Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Mhagmasmahatyam Bhashatikasamatam
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श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ मंगलमूरति सुखसदन, ऋद्धिसिद्धिदातार । द्विजज्वालाप्रसाद पर, रीझहु नंदकुमार ॥३॥ नारायण नरोत्तम नर देवी सरस्वती और व्यासजीको प्रणाम कर जयनामक ग्रंथका उच्चारण करना चाहिये ॥ ३ ॥ ऋपि बोले हे महाभाग सूतजी ! आपने लोकोंके मंगलके निमित्त भुक्ति मुनिका देनेवाला कार्तिकाख्यान वर्णन किया ॥ २॥ हे लोमहर्पण ! अब आप हमसे माघ सानका माहात्म्य वर्णन कीजिये, जिसके सुननेसे लोकोंका महान् संदेहे दूर होता है ।। ३॥ हे महाभाग ! लोकमें प्रथम किसने श्रीगणेशायनमः ॥ ॥ श्रीमद्वेङ्कटेशायनमः॥ ॥ नारायणनमस्कृत्यनरंचैवनरोत्तमम् ॥ देवीसरस्वतींच्या संततोजयमुदीरयेत् ॥ १॥॥ ऋपयऊचुः ॥ ॥ सूतसूतमहाभागत्वयालोकहितैपिणा ॥ कथितंकार्तिका ख्यानभुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ॥२॥ अधुनामाघमाहात्म्यंवदनोलोमहर्पणे ॥ श्रुतेनयेनलोकानांसंशयःक्षीय तेमहान् ॥ ३॥ पुराकेनमहाभागलोकेस्मिन्संप्रकाशितम् ॥ माघस्नानस्य माहात्म्यंसेतिहासंतदादिश॥४॥ ॥ सूतउवाच ॥ ॥ साधुसाधुमुनिश्रेष्ठायूयंकृष्णपरायणाः॥ यत्पृच्छथमुदायुक्ताभक्त्याकृष्णकथामुहुः॥५॥ कथयिष्यामिमाघस्यमाहात्म्यंपुण्यवर्धनम् ॥ पापघ्नंशृण्वतांपुंसांस्नातानांचारुणोदये ॥६॥ एकदापार्वती विप्राःशंकरलोकशंकरम् ॥ प्रप्रच्छविनयोपेतास्पृष्ट्वातच्चरणांबुजम् ॥ ७॥ इसको प्रकाशित किया, इतिहास सहित माघस्नानका माहात्म्य कहो ॥ ४ ॥ सूतजी बोले हे मुनियों ! तुम धन्य और कृष्णपरायण हो, जो प्रेमभक्तिसे तुम वारंवार कृष्णकी कथा पूछते हो ॥ ५॥ पुण्यका बढानेवाला माघस्लानमाहात्म्य कहताहूं, जो श्रवण कर नसे अरुणोदयमें स्नान करनेवाले पुरुषोंका पाप दूर करता है ॥६॥ हे ब्राह्मण ! एक समय लोकके आनंद करनेवाले शंकरके . चरणोंको स्पर्शकर विनययुक्त हो पार्वती पूंछने लगी ॥ ७ ॥ पार्वती बोली हे देवदेव महादेव भक्तोंको अभय देनेवाले स्वामिन विश्वपति प्रसन्न हूजिये, जो मैं पूंछती हूँ सो कहियें ॥ ८॥ हे प्रभो ! पूर्वमें मैंने आपसे अनेक धर्म सुने हैं, अब मायके स्नानका माहात्म्य सुननेकी इच्छा करतीहूं सो आप मुझसे कहिये ॥ ९ ॥ यह पहले किसने किया, इसकी विधि और देवता क्या है, वह सब विस्तारसे कहो कारण कि तुम भक्तवत्सल हो ॥ १० ॥ शंकर बोले यज्ञान्त अवभृथ स्नानकर ऋपियोंसे मंगलाचारको प्राप्त ॥ पार्वत्युवाच ॥ ॥ देवदेवमहादेवभक्तानामभयप्रद ॥प्रसीदनाथविश्वेशयत्पृच्छेतद्वदाधुना ॥८॥ श्रुतानाना विधाधर्मास्त्वत्तः पूर्वमयाविभो ॥ अधुनाश्रोतुमिच्छामिमाहात्म्यंमाघजवद ॥ ९॥ तत्तुकेनपुराचीर्णकोवि धिःकाचदेवता ॥ तत्सर्वविस्तराहियतस्त्वंभक्तवत्सलः ॥१०॥ ॥ महेशउवाच ॥ ॥ अध्वराऽवभृथ स्नातऋपिभिःकृतमंगलः ॥ पूजितोनागरैःसर्वेःस्वपुरान्निर्गतो वहिः ॥ ११ ॥ दिलीपोभूभृतांश्रेष्ठामृगयार सिकोनृपः॥ कोतूहलसमाविष्टआखेटव्यूहसंवृतः ॥ १२ ॥ उपानबूढपादस्तुनालाप्णीपउरच्छदी ॥ वद्ध गोधांगुलिवाणोधनुष्पाणिःसरीसृपः ॥ १३॥ बद्धक्षुद्रासिधानुप्कैस्तथाभूतेश्वपत्तिभिः ॥ गांधारेपुसुरम्येपुवने पुविपुलेपुच ॥ १४॥ हो अपने नगरवासियोंसे पूजित हो नगरके बाहर निकल ॥ ११ ॥ राजोंमें श्रेष्ठ मृगया खेलनेमें रसिक राजा दिलीप, कौतूहलको प्राप्त हो सिकारकी सामग्री लिये ॥ १२॥ चरणोंमें जूता पहरे नील पगडी बांधे बख्तर धारे अंगुलीमें गोधाचर्म बांधे, धनुप' धारण कर चलता हुआ ॥ १३ ॥ क्षुद्र तलवार धनुपधारी प्यादोंको साथ लिये मनोहर वन उपवनमें विचरते ॥ १४ ॥ १ कांतारेपु-३० पा०।
सिंहकी समान विक्रमी अनेक नदीसरोवरोंको उल्लंघन करते कुंजोंमें मृगोंको ढूंढते उनके साथ क्रीडा करते थे॥१५॥मारो मारो यह मृग भागा जाताहै ऐसा २ अपने भृत्योंके कहने पर यह स्वयं जाकर उसको मारता ॥१६॥ फिर इधर उधर जाते तभी वनस्थलीको देखता कहीं पेड़ों पर उड़ उडकर मोरोंको बैठता हुआ देखता ॥ १७ ॥ कहीं हारणी जनोंके समूहसे वित्रस्त होते हैं हरिणों के बच्चे दिशाओंमें धायमान होते हैं कहीं गीदडोंकी फेत्कार और ऊंचेस्वरसे भयंकर शब्द करना ।।.१८॥ कहीं खगजातिवाले मृगोंके उहंधितमहास्रोतायुवापंचास्यविक्रमः ॥ मुदाक्रीडतितःसादकुंजेधुमृगयन्मृगान् ॥ १५॥ हन्यताहन्यतामेप मृगोवैपपलायते ॥ इतिजल्पस्वभृत्येपुस्वयमुत्पत्यहतिच ॥ १६॥ इतस्ततः पुनातिकचित्पश्यन्वनस्थ लीम् ॥ विटपोड्डीनसंत्रस्तलीनकेकिकुलाकुलाम् ॥ १७ ॥ हरिणीगणवित्रस्तांधावच्छाक्कदिङ्मुखाम् ।। कचित्फेरवफेत्कारतारारावविभीषणाम् ॥ १८॥ खड्गयूथैः कचिल्लक्ष्मी दधानामिवदंतिनाम् ॥ वचित्को टरसंदटोलूकनादविनादिनीम् ॥ १९॥ मृगारिपदमुद्राभिर्मुद्रितांचकचित्कचित् ॥ शार्दूलनखनिभिन्नरी हिद्वक्तारुणांकचित् ॥ २० ॥ पीवरस्तनभारातसुस्निग्धमहिपीगणैः ॥ अवरोधाजिरक्षोणी सूचयंतींमनः कचित् ॥ २१॥ कपिवृक्षघनच्छन्नविन्यपुष्पसुगधिनीम् ॥ कैचिल्लतागृहद्वारां गशब्दसुशोभनाम् ॥२२॥ समूह हाथिर्योकी शोभा धारण किये थे, कहीं कोटरमें बैठेहुए उलूकगण अपना शब्द करतेथे ॥ १९ ॥ कहीं सिंहके चरणोंके शब्द दिखाई देतेथे, कहीं शार्दूलके नखसे भिन्न रोहितमृगका रुधिर पडाथा, उससे पृथ्वी लाल थी ॥ २०॥ कहीं पीवर ऐनके भारसे व्याप्त भैंसे फिरती थीं जो रणवासकें आंगनकी भूमिकी समान मनको विदित होती थीं ॥ २१ ॥ कहीं वृक्षोंकी घनी १.कोचल्लतागृहद्वारं भृगधारेणतोरणम् इ० पा०] २ फालबग-इत्यपिपाठान्तरम। ३ कचिल्लतागृहद्वारं भंगधोरणतोरणम्--१०पा० मा.मा. भा.दी. अ.१ सुगंधिसे बन व्याप्त था, कहीं लतागृहों पर भौरे गुंजार कर रहेथे ॥ २२ ॥ कहीं सपोंकी कैंचली बिलसे आधी निकल रही थी, बिलोंमें अजगर लीन थे बाहर उनकी कैंचली पड़ी थी ॥ २३ ॥ कहीं दावानल लगी हुई है शिलाओं पर उसकी ज्योति पडती है कहीं मृग व्याघोंका फूत्कार शब्द हो रहा है ॥ २४ ॥ कहीं खरगोशों पर कुत्तोंका समूह छोडा है कहीं छोटे सरोवरोंपर विश्राम करके दूसरे वनमें जाते ॥ २५ ॥ इस प्रकार व्याधवर्गोंके कहने और गजाके वनमें फिरनेसे कोलाहल कर्ता अर्धनिःसृतनिर्मोकनागभीमवृहद्विलाम् ॥ विलेपुलीनाजगरेीमांनिर्मोकसर्पिणीम् ॥ २३ ॥ क्वचिदा वानलज्वालांशिलाज्योतिःसुशोभनाम्॥ फूत्कारशब्दसंपूर्णामृगव्याघ्रसमाकुलाम् ॥ २४ ॥ प्रविमुंचञ्छनां यूवंशशकेपुवचित्कचित् ॥ पल्वलेपुचविश्रम्यपुनर्यातिवनान्तरम् ॥ २५ ॥ एवंत्रजतिराजेन्द्रेव्याधवर्गेचव ल्गति ॥ कुर्वन्कोलाहलंतत्रसारंगोनिर्गतोवनात् ॥ २६॥ स्फालवेगक्रमाक्रांतदुर्गमार्गमहीतलः ॥ कदाचि द्गगनारूढःकदाचिद्भूमिगोचरः ॥ २७ ॥वक्रस्रोतोतिगंभीरंकण्टकद्रुमसंकुलम् ॥ प्रविष्टोविपमारण्यंराजासो तत्पदानुगः ॥ २८ ॥ दूरादुरतरंगत्वादेशादेशंचनिर्जनम् ॥ मृगादर्शनसंरम्भसंशुष्कगलकन्धरः ॥२९॥ हुआ एक सारंग मृग वनसे निकला ॥ २६ ॥ अपनी तीक्ष्ण चौंकडीसे पृथ्वीको आक्रमण करताहुआ कभी आकाश और कभी भूमिपर दीखताथा ॥ २७ ॥ टेढे गंभीर सोते और कंटीले वृक्षवाले महावनमें प्रवेश करगया और राजा भी उसके पीछे चला ॥२८॥ वह एक देशसे दूसरे देश और वनसे दूसरे निर्जन वनको गया, मृगके न देखनेसे संभम और प्यासके कारण राजाका गला सूख १ फालवेग-इत्यपिपाठान्तरम् ।।
गया ॥२९॥ लाल तालू होगया, मुखपर पसीना आगया, प्यादे थकगये, घोडौंकी गति रुकी, राजा बडा मार्ग अतिक्रमण करनेके कारण मध्याह्न समयमें बड़ा प्यासा हुआ ॥ ३० ॥ आगे जलकी इच्छा करते करते देखा जो कि घने वृक्षोंके नीचे एक सरोवर था ॥३१॥ जिसमें विशाल कमल खिले हुए भैौरे गुंजार रहे, कमलिनीसे व्यात मानों मरकत मणिसे व्यान है ॥३२॥ स्वच्छंदतासे मछली जिसमें कूद रहीं जिसका जल साधुओंके मनकी समान निर्मल चलायमान जलचर और ताम्रतालुमुखःस्विनःश्रांतपत्तिःस्खलद्धनिः॥ अतीत्यदीर्घमार्गान्सतृषातामध्यगेरखौ ॥ ३० ॥ ददर्शाग्रे तुकासारस्पर्धयंतमपांपतिम् ॥ घनपादपतीरस्थंसुतीर्थविमलंशुभम् ॥ ३१ ॥ विशालविकचांभोजमधुम त्तमधुव्रतम् ॥ पभिनीपनपालाशच्छन्नमरकतरिख ॥ ३२॥ स्वच्छंदमुच्छलन्मत्स्यं स्वच्छंसाधुमनोयथा ।। चलजलचरोमिभंवीचिराजिविराजितम् ॥ ३३ ॥ अंतर्याहगणकूरंखलानामिवमानसम् ।। क्वचिच्छेवा लदुर्गम्यंकृपणस्येवमंदिरम् ॥ ३४ ॥ नानाविहङ्गसर्वातिशमयतदिवानिशम् ॥ दातारमिवसर्वस्वैरापन्नार्तिप्र णाशनम् ॥ ३५ ॥ तर्पयंतंनिजांभोभिःश्वापदान्स्वपितृनिव ॥ हरंतंसर्वसंतापंहिमांशुमिवचाह्निकम् ॥३६॥ जलकी लहरोंसे युक्त॥३३॥भीतर क्रूर ग्राहोंसे आकीर्ण जैसे खलोंका मन, कहीं रुपणके धरकी समान शैवालसे व्यात॥३४॥ राव दिन सब प्रकारके पक्षियोंका सब प्रकारका ताप दूर करनेवाला, मानो शरणमें आयेहुओंको दाता लोग सर्वस्व प्रदान करते हो ॥ ३५ ॥ अपने जलोंसे हिंसक जन्तुओंको पितरोंकी समान तृप्त करताहुआ चन्द्रमाकी समान दिनका सब संताप दूर करने मा.मा. भा.टी. अ.१. वाला ॥ ३६ ॥ उसको देखतेही राजाका श्रम इस प्रकार दूर हुआ जैसे मेघको देख चातककी ग्लानि मिटती है, वहां जलपानकर राजाने मध्याह्न संध्या की ॥३७॥ अपनी सहाय सहित मृग मांसादि खाकर उस सरोवरहीके तटपर चित्र विचित्र कथा कहते स्थित हुआ ॥ ३८ ॥ धनुषपर वाण चढाय रात्रिको तरुके नीचे स्थित रहे व्याधे लोग संधानको प्राप्त हो दिशाओंका मार्ग रोकते हुए ॥ ३९ ॥ इस प्रकार वनमें जाल विस्तारकर वीरोंके वनमें स्थित होनेमें अर्ध रात्रिको शूकरोंका यूथ तटतटसे निकला॥४०॥ तंदृष्ट्वाभूद्गतग्लानिश्चातकोजलदंयथा ॥ तत्रपीतजलोराजाकृतमाध्याह्निकक्रियः॥ ३७ ॥ भुक्त्वाखेटकमा सानिसहाय सहितोनृपः ।। उवाससरसस्तीरेसुरम्यांकथयन्कथाम् ।। ३८॥ ततःशरासनेवाणंकृत्वाराबोस्थिं तस्तरो।व्याधाःसंधानमास्थायरुरुधुःककुभांपथः॥३९॥ एवंस्थितेषुवीरेपुवनेविस्तार्यवागुराम् ॥ निशाधेनि गतंयूथंसूकराणांतटतटे ॥४०॥ चरित्वासरसीकंदान्पपातव्याधसंकुले॥राज्ञाविद्धाश्चतेकोडाव्याधैश्चवहवो हताः॥ ११ ॥क्षणेनैववराहास्तेविद्धा-पेतुर्महीतले ॥ तान्दृष्ट्वानुमुलंनादव्याधाश्चकुसुदर्पिताः ॥१२॥ धावंतःप्रमुदायुक्तामिलितायत्रभूपतिः ॥ तानादायभटै योनिःसृतःसरसीतटात् ॥ ४३ ॥ स्वपुरंगंतुकामो सौदृष्टवान्पथितापसम् ॥ ब्राह्मणवृद्धहारीतशंखचक्रसुशोभितम् ॥४४॥ कमलके कंद खानेपर बहुतोंको राजाने और बहुतोंको व्याधोंने मार झला ॥४१॥ क्षणमात्रमें वे सब शूकर विद्धहो पृथ्वीमें गिरे, उनको देख दर्पित हो व्याध बड़ा शब्द करने लगे ॥४२॥ प्रमोदसे दौडतेहुए राजासे मिले उन योद्धाओंको लेकर राजा सरोवर के तटसे चला ॥ ४३ ॥ और अपने पुरको जानेकी इच्छा करने लगा, मार्गमें एक तपस्वी देखा यह ब्राह्मण वृद्ध हारीत १ खेटकसंपन्नम्-३० पा०॥ २ स्थितस्तटे-३० पा० । ३ वैखानसमतस्थितम् दान पा०1 नाशी गा-ि--- वैखानसके मतमें स्थित थे, हाथकी उंगलियोंमें शंखचक्रसे शोभित ॥ ४४ ॥ दुष्कर और उप नियोसे जिनका शरीर कंश रहा, अस्थि मात्र शेप बडे चतुर कर्कश शरीर ॥ ४५॥ हारणका चर्म धारण किये मृदुवल्कल वस्त्र पहरे, नख लोम जटाधारे निगमजप करते ॥ ४६ ॥ वनके आश्रमीको देखकर राजाने उनको मार्ग दिया, प्रणाम कर हाथ जोड सन्मुख स्थित हुआ॥४७॥ नियमेर्दुष्करैरुप्रै परिक्षीणकलेवरम् ॥ अस्थिशेपमहदांतविस्फुरत्कर्कशत्वचम् ॥ १५ ॥ दुधानंहारिणं चर्मवसानंमृदुवल्कलम् ॥ कुर्वाणनेगमंजाप्यनखलोमजटाधरम् ॥ १६ ॥ तंवनाश्रमिणदृष्ट्वामार्गदत्त्वाससं- भ्रमः॥ प्रणम्यशिरसाराजाकृतपांजलिः स्थितः ॥ ४७ ॥ अथचैनमलंकारैर्द्विजोनिश्चित्यभूमिपम् ॥ उवाच श्रेयसेहेतोपरोपकृतिवांच्छया ॥४८॥ किमर्थंगम्यतेराजन्कालेपुण्यतमेशुभे ॥ माघांसेविहायैवप्रातः नानसरोवरे ॥ ४९॥ इति श्रीपद्मपुराणेमाघमासमाहात्म्येदिलीपमृगयागमोनामप्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ ॥ मृतउवाच ॥ प्रत्युवाचततोराजानाहजानेंदिजोत्तम ॥ माघस्नानफलंकीहक्तन्मेकथयविस्तरात् ॥१॥ तब ब्राह्मणने वेपसे इसको राजा जानकर परोपकारकी पांच्छासे कल्याणके निमित्त कहा ॥४८॥ हे राजन् ! इस पुण्य पवित्र कालमें कहां जाते हो, माव महीनेमें प्रातः सरोवरका स्नान कैसे छोडते हो ॥ ४९ ॥ इति श्रीपद्मपुराणे माघमाहात्म्ये पं०-ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभापाटीकायां प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ सूतजी बोले, तब राजाने कहा हे द्विजश्रेष्ठ ! यह तो मैं नहीं जानता १ तपसाकृशदेहंतं विस्फुटत्-इ० पा! २ विधायैव-इ० पा०॥
.... मा.मा. ४ माघस्नानका फल किस प्रकार है सो विस्तारसे कहिये ॥ ३ ॥ इस प्रकार राजाके वचन सुनकर वे वैखानस मुनि बोले कि, शीघही भा.टी. भगवान् सूर्य अब उदय हुआ चाहते हैं. ॥ २॥ सो यह हमारे स्नानका समय है कथाका अवसर नहीं है तुम स्नान कर जाओ 10 अ.२ और अपने कुलगुरु वसिष्ठजीसे प्रश्न करना ॥ ३ ॥ ऐसा कह वे मौनी तपस्वी प्रातःस्नान करनेको गये दिलीपभी पीछेको लौटे और यथाविधि स्नान करके ॥ ४ ॥ फिर प्रसन्न हो अपनी नगरीको चले गये और उन वानप्रस्थ ऋपिकी कथा अन्तःपुर (रनवास)में इतिभूपवचः श्रुत्वापाहवैखानसोमुनिः॥ भगवान्युमाणिः शीघ्रमभ्युदेतितमोपहा ॥ २ ॥ स्नानकालोयम स्माकंनकथावसरोनृप ॥ स्नात्वागच्छवसिष्ठंतपृच्छस्वस्वकुलप्रभुम् ॥ ३ ॥ इत्युक्त्वातापसोमौनीप्रातः स्नानायनिर्गतः ॥ प्रत्यावृत्यदिलीपोपितत्रस्नात्वा यथाविधि ॥ ४॥ पुनः स्वनगरीवीरोगतोसोहर्पपूरितः॥ अन्तःपुरेनिवेद्याथवानप्रस्थकथांपुनः ॥५॥श्वेताश्वरथमारुह्यसुश्वेतच्छत्रचामरः ॥ सालंकारः सुवासाश्च संवृत्तोमंत्रिभिः सह ॥ ६॥ जयशब्दान्पुनः शृण्वन्स्तुतोमागधबंदिभिः ॥ वसिष्ठस्याश्रमं यातऋपिवा क्यमनुस्मरन् ॥ ७ ॥ तत्रैवनत्वाब्रह्मर्पिविनयाचारपूर्वकम् ॥ दत्तासनोगृहीताय॑आशीभिः समलंकृतः ॥ ८॥ सानंदमुनिनापृष्टः कुशलंभूपतिर्यदा ।। तदात्रवीद्रचोराजाहर्षयन्मुनिमानसम् ॥ ९॥ कही ॥ ५॥ श्वेत घोडोंके स्थमें बैठकर श्वेतही छत्रसे शोभायमान श्वेत चंवर अलंकार सुवस्त्र धारण किये मंत्रियोंसे संयुक्त ॥६॥ जय शब्द सुना हुआ मागध बंदियोंसे स्तुतियों को प्राप्त ऋषिके वाक्य स्मरण करते वसिष्ठके आश्रममें आये ॥७॥ विनय आचार पूर्वक ब्रह्मर्पिको प्रगाम कर आसन पर अर्घ आशीर्वादको स्वीकार कर बैठे ॥ ८॥ तब मुनिने आनंदपूर्वक राजासे कुशल पूंछी, तब . ४ राजा मुनिराजका मन प्रसन्न करते हुए बोले ॥ ९॥ और वह भी वैखानसके वचनको मधुर स्वरसे पूंछने लगे, दिलीप बाल भगवन् आपके प्रसादसे मैंने विस्तारसे सुना ॥ १० ॥ आचार धर्म नीति और राजधर्म सुने, चार वर्णाचार आश्रमकी क्रिया ॥ ११ ॥ दान उनके विधान और यज्ञ आपके कथन किये व्रत विष्णु भगवान्का आराधन सुना है ॥ १२ ॥ अब वह सुनने की इच्छा है जो फल माघस्नान करनेसे होता है, किस विधानसे करना चाहिये हे मुनिराज ! सो कथन कीजिये ॥१३॥ वसिष्ठजी सोपिवैखानसेनोक्तंपप्रच्छमधुराकृतिः ॥ ॥ दिलीपउवाच ॥ ॥ भगवंस्त्वत्प्रसादेनश्रुताविस्तरतो मया ॥ १० ॥ आचारोदंडनीतिश्चराजधर्माश्चयेपरे ।। चतुर्णामपिवर्णानामाश्रमाणांचया क्रियाः ॥११॥ दानानितद्विधानानियज्ञाश्चविधयस्तथा ॥ बेतानितत्प्रदिष्टानिविष्णोराराधनंतथा ॥ १२ ॥ अधुनाश्रोतु मिच्छामिमाघस्नानेचयत्फलम् ॥ विधेययद्विधानेनतन्मेब्रह्मन्मुनेवद् ॥ १३॥ ॥ वसिष्ठउवाच ॥ ॥ सम्ययुक्तंपरश्रेयोलोकत्रयहितावहम् ॥ निर्मलीकरणतेनमुनिनावनवासिना ॥ १४ ॥ कटाक्ष कामिनीनाते प्रत्यासन्नमखंडिताः॥ कामयंतेमृगाकेंतेस्रोतसिनाठमेवच ॥ १५॥ विनावह्निविनायज्ञमिष्टापूर्तविनाप्रिये ॥ वांछतिसद्गतिनातुप्रातर्माघेवहिर्जले ॥ १६॥ बोले बहुत अच्छा पूछा इसमें त्रिलोकीका हित होता है, और उस वनवासीने निर्मल करनेहीके निमिन तुमसे ऐसा कहा ॥ १४ ॥ धीरे रहकर भी जो स्त्रियांके नेत्रोंके कटाक्षसे खंडित नहीं हुए हैं वह मकरमासमें स्नान करनेकी इच्छा करते हैं ॥१५॥ विना अग्नि विना यज्ञ विना बावडी कूप बनवाये वह सद्गतिकी इच्छासे माघमें बाहर जलमें स्नानकी इच्छा करते हैं।॥१६॥ १ व्रतानि तत्प्रतिष्ठाश्च-३० पा०। २ निर्मलीकरणं लोके मुनीनां वनवासिनाम् इ० पा० ।
मा.मा. ५ जो भूमि सुवर्ण माणिक्य जो धेनु आदि हैं, विना दान किये जो इनका फल' चाहते हैं हे राजन् ! वे माघ स्नान करें ॥ भा.टी. ॥ १७ ॥ त्रिसप्ताह बन कच्छ्र व्रत पराक व्रतों द्वारा अपना शरीर विना शुष्क किये जो फलकी इच्छा करते हैं, हेराजन् ! वे माघस्नान करें ॥ १८ ॥ वैशाखमें हारकी पूजा, कार्तिक, तप और पूजा है और तप होम तथा दान यह तीनवस्तु माघमें करनी अ.२ श्रेष्ठ हैं ॥ १९ ॥ निरन्तर ऐसा करनेसे वह पुरुष भूमिपति होताहै, वह मुक्तिकी उत्पन्न करनेवाली बुद्धि प्रगट करता है, जिससे गो हिरण्यमाणिक्यस्वर्णधेन्वादिकानिये ॥ अदत्त्वेच्छंतितैःकार्यमाघस्नाननराधिप ॥ १७ ॥ निःसप्ताह व्रते कृच्छेपराकैश्चनिजांतनुम् ॥ अशोप्येच्छंतियेस्वर्गतपसिस्नान्तुतेसदा ॥ १८॥ हरेःपूजाचवैशाखेतपः पूजाचकार्तिके ॥ तपोहोमस्तथादानंत्रयंमाघेविशिष्यते ॥ १९॥ सानुबंधोतिपर्याप्तोधराधीशोभवेद्धवम् ॥ केवल्योत्पादिकाबुद्धिर्ययावानभवेत्पुनः॥ २० ॥ पदध्यावरिवस्यासाविहितादिव्यलोचनैः ॥ तदनन्तंतपोदा नंमाघमासिमृपोत्तम ॥ २१ ॥ सकामोवाप्रजायैवाहरयेतद्विनापिवा ॥ कायशुद्धितीभूत्वाचतुर्दास्नान फलम् ॥ २२ ॥ निरन्नाअदितिःसस्नौमाघेद्वादशवत्सरे ॥ पुत्रांश्चद्वादशादित्याँल्लेभेत्रैलोक्यदीपकान्॥२३॥ फिर जन्म नहीं लेता ॥ २० ॥ दिव्य दृष्टिवालोंने यह कहाहै कि माघमासमें तप या दान करनेसे अनन्त फल होताहै ॥ २१ ॥ सकाम हो चाहे प्रजाकी इच्छावाला हो नारायणके निमित्त या अन्य प्रकार कायशुद्ध कर जो व्रती हो उसको चार प्रकारसे स्नानका फल मिलताहै ॥ २२ ॥ माघको बारह वर्ष अदितिने विना अन्नके स्नान किया, उसके फलसे त्रिलोकीके दीपक बारह ५ १ गोभूमितिलवामांमि स्वर्णधान्यानिकानिच । अदत्वच्छति येनाकंनेमाघे स्नातुमुद्यताः । इ० पाठान्तरम् ।।
पुत्रोंको प्राप्त किया ॥ २३ ॥ माघ स्नानसेही रोहिणी सुभगा और अरुंधती दानशीला है और सत महलेस्थानमें इसी स्नानसे शची रूपसम्पन्न है ॥ २४ ॥ जो शोभासे भरपूर निर्मल जिसके आंगनमें नृत्य करानेवालियोंसे शोभा हो रही है जहां अनेक दीपक बल रहे रूपवान् खियोंसे संकुल ॥ २५॥ गीत बाजोंके शब्दसे युक्त मंगलाचारसे शोभित, वेदश्वनिमें तलर ब्राह्मणोंसे l युन ॥ २६ ॥ देवाचनमें तत्पर मनोहर सदा अतिथियोंसे शोभित स्थानमें मकररविमें स्नान करनेवाले प्राप्त होतेहैं ॥ २७ ॥ सुभगारोहिणीमावादानशीलात्वरंधती ॥ शचीचरूपसंपन्नाप्रासादेसप्तभूमिके ।। २४ ॥ विमलीकृतशोभाये नर्तकीललिताजिरे ।। द्वीपवर्णसमुच्छिन्नेरूपवत्स्त्रीजनाकुले ॥ २५॥ गीतवादिवनिर्घोपेमंगलाचारशोभिते॥ वेद्ध्वनिपवित्रेचविद्वापरलंकृते ॥२६॥ सुरार्चनरतेरम्येसदातिथिनिपेविते ॥ मुदितास्तेवसंतीहयैःस्नातम करेखी ॥२७॥ यदत्तंबहुमाघेचमुरारिश्वाचितःस्तुतः॥ इष्टवस्तुपरित्यागानियमस्यतुपालनात् ॥२८॥ धर्म सूतिःसदामाघःपापमूलंनिबंतति ॥ काममूलःफलद्वारानिष्कामोज्ञानदासदा ॥२९॥ येलोकाज्ञानशीला नायेलोकाविपिनौकसाम् ॥ येलोकाविष्णुभक्तानांतेमाघस्नायिनांसदा ॥ ३० ॥ देवलोकान्निवर्ततेपुण्य रन्यैःपरंतप ॥ कदाचिननिवर्ततेमावस्नानरतानराः ॥ ३१॥ जिसने माघमासमें बहुत दान दिया, तथा भगवान्की पूजा कीहै स्तुति कीहै. इष्ट वस्तुका दान और व्रत नियमका पालन कियाहै वह श्रेष्ठ है ॥ २८॥ माघ मास सदा धर्मका प्रसव करनेवाला और पापका नाशक है, फल देनेसे काममूल और निष्काम होनेसे ज्ञान देनेवाला है ॥ २९ ॥ जो लोक ज्ञानी और वनमें रहकर तप करनेवालोंको मिलते हैं, जो लोक विष्णुभक्तोंको मिलते हैं वह लोक सदा-माघस्नान करनेवालोंको मिलतेहैं ॥ ३० ॥ और पुण्योंके क्षीण होनेसे देवलोकसे
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भा.टी.
मा.मा.
अ.२
यहां आना होताहै परन्तु माघ स्नान करनेवाले वैकुण्ठसे फिर नहीं आते ॥ ३१ ॥ माघ स्नान कर जो मनुष्य दुधारी गाय
किसीको देता है, हे राजन् ! उसके शरीरमें जितने रोम हैं ॥३२॥ उतनेही सहस्र वर्पतक वह स्वर्गलोकमें स्थित होताहै, माघ
लान करके जो गुड तिल दान करताहै ॥ ३३ ॥ उसके पाप दूर होकर वह मनुष्य निर्मल हो जाताहै, सब धानों में तिल विशेष
कर पापके नाश करने वाले हैं ॥ ३४ ॥ इस कारण यत्नपूर्वक माघ मासमें तिल दान करे माघ स्नान करके ब्राह्मणोंको भोजन
मावेनावातुयोधेनुंदद्यान्मर्त्य पयस्विनीम् ॥ तस्यायावंतिरोमाणिसांगेचनृपोत्तम ॥ ३२ ॥ तावद्वपसह
स्राणिस्वर्गलोकेमहीयते।। माघनानंप्रकुर्वाणोयोदद्यात्सगुडांस्तिलान्॥३शापातकंतस्यप्रक्षाल्यनिर्मलोभाति
वेनरः ॥ सर्वेषाधान्यराशीनांतिला-पापप्रणाशनाः ॥३४॥ तस्मान्मावेप्रयत्नेनतिलादेयानृपोत्तम ॥ माघ
स्नानप्रकुर्वाणोदयाद्राह्मणभोजनम् ॥ ३५॥ पितॄन्संतप्यं शुद्धात्मायातिविष्णोःपरंपदम् ॥ तस्मात्सर्व
प्रयत्लेनमाधोदानेननीयते ॥ ३६ ॥ अदाननक्षिपेन्मासर्वदानृपसत्तम ॥ वित्तानुसारंज्ञात्वावैमाघेदानस
दाददेत् ॥ ३७॥ माघनानंतुयःकुर्यादुपानहकमंडलून् ॥ ददातित्राह्मणेभ्यश्चसस्वर्गेतिष्टतिध्रुवम् ।। ३८॥
माघनानमयंराजन्कुर्वाणस्तपउत्तमम् ॥ दानविनाक्षिपेनैवदानात्स्वर्गमवाप्यते ॥ ३९॥
करावे ॥ ३५ ॥ तो यह अपने पितरोंको तृतकर शुद्ध हो विष्णुलोकको जाताहै इस कारण सब प्रयत्नसे माघ मासमें दान करे
॥३६॥ हे राजन् ! किसी प्रकार भी दान के विना माघ स्नान को न जानेदे वित्नके अनुसार जान कर सदा माघ में दान करना
चाहिये ॥३७॥ जो माघ स्नान करके उपानह कमंडलु ब्राह्मणों को देताहै उसकी अवश्य स्वर्गमें प्रतिष्ठा होताहै ॥३८॥हे राजन्!
जो माघ मास में स्नानमय तप करते हैं और दानके विना नहीं बिताते उनको इस दान के करने से स्वर्गकी प्राति होतीहै ॥३९॥
दान से स्वर्ग और दान सेही सुख प्राप्त होताहै दान से पाप और महापातक दूर होतेहैं ॥ ४०॥ विना दानके तपकी शोभा नहीं होती जैसे सूर्यके विना आकाश अथवा जैसे संतान के पिना कुल और आचार के विना गृह शोभा नहीं पाता ॥ ४१ ॥ इससे l अधिक कोई पवित्र और पाप नाशक नहींहै यह बात भृगुजीने मणिपर्वत पर विद्याधरों से कहीहै ॥४२॥ इति श्रीपाग्नेमहापुराणे पण्डितज्वालाप्रसादमिश्ररुतभापाटीकायां माघमाहात्म्ये दिलीपवसिष्ठसंवादो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ ॥ राजा बोले हे दानेनप्राप्यतेस्वर्गोंदानेनप्राप्यतेसुखम् ॥ दानेनहीयतेपापमहापातकमप्यहो ॥४०॥ अदानंनतपोभातिम सूर्यगगनंयथा ॥ असंततिकुलंयदाचाचारेणविनागृहम् ॥४१॥ नातःपरतरंकिंचित्पवित्रंपापनाशनम् ॥ वि द्याधरायसंगीतंभृगुणामणिपर्वते ॥४२॥ इति श्रीपाद्मेमाघमासमाहात्म्योदिलीपवसिष्ठसंवादोनामद्वितीयो ऽध्यायः ॥२॥ ॥ राजोवाच ॥ ॥ ब्रह्मन्कदाभृगुर्विप्रोनिजगादमहीधरे ॥ तस्मैधर्मोपदेशंचकथ्यतांमेकु तूहलात् ॥॥॥ वसिष्टउवाच॥ ॥ द्वादशाव्दपुराराजन्नववर्पबलाहकः।।तेनोद्विग्नाःप्रजाक्षीणागताःसर्वादिशो दश ॥२॥ खिलीभूतेतदामध्येहिमवदिध्ययोर्नृप ॥ स्वाहास्वधावपट्कारवेदाध्ययनवजिते ॥ ॥३॥सो पप्लवेतदालोकेलुप्तधर्मेचनिष्प्रभे ॥ फलमूलानपानीयशून्येवैभूमिमंडले ॥४॥ ब्रह्मन् ! भृगुजीने किस समय महीधर से ज्ञान उपदेश किया था सो आप कुतूहलपूर्वक मुझसे कहिये ॥ १॥ वसिष्ठजी बोले हे राजन्! बारह वर्ष तक एक समय मेघ नहीं वर्षा, उससे प्रजा उद्दिम हो सब दशोदिशामें क्षीण होगई॥२॥हे राजन्!मध्यदेश हिमा लय और विन्ध्याचलके खिन्न होने में तथा स्वाहा स्वधा वपटुकार और वेदाध्ययनसे वर्जित होनेसे ॥ ३ ॥. लोकके उपद्रव प्रस्त २ " भा.दी. मा.मा. अ.३ ७ होने तथा धर्मके लुप्त और प्रभाहीन होनेमें फल मूल पानी से महीमण्डल के शून्य होनेमें ॥ ४ ॥ विन्ध्य पर्वत खाके तटवर्ती होने से वृक्षों से आच्छादित था तब भृगु शिष्यों सहित वहां से चलकर हिमालय को गये ॥ ५॥ कैलास गिरिके पश्चिम ओर मणिकूट नाम एक हेम तथा सुवर्णका पर्वत है ॥ ६॥ नीचे नीचे श्वेत स्फटिक और मध्यमें नील शिलाओं से युक्त है, विभूति से सब ओर से शुक्र नीलकंठकी समान शोभित हुआ ॥ ७ ॥ सब ओर नीलशिलावाला कहीं कहीं सुवर्णकी रेखासे युक्त कृष्णमेघमें विन्ध्यपादतरुच्छन्नरम्यरेवातटाश्रमात् ॥ सहशिष्येश्वनिर्गम्यहिमाद्रिंसगतोभृगुः ॥ ५॥ तत्रतिष्ठतिकैलास गिरेःपश्चिमतोगिरिः ॥ मणिकूटइतिख्यातोहेमरत्नशिलोचयः ॥ ६ ॥ अधोधःस्फटिकश्वेतोमध्येनीलशि लोगिरिः। भूतिभिःसर्वतःशुक्कोनीलकंठइवावभौ।। ७॥ सर्वत्रासौनीलशिलोहेमरेखांतरांतरः स्फुरद्विद्युल्लतःकृ प्णोजीमूतइवराजते ॥ ८॥ मूर्धिनीलशिल शैलअधःकांचनमेखलः ॥ नारायणइवाभातिपरिवीतइवांबरः ॥ ९॥ अमेखलासुनीलाभोमध्येमध्येसितोपलः ॥ सतारकमिवव्योमशुशुभेसमहीधरः ॥ १० ॥ लब्ध्वा त्मनस्तनुंशुभ्रांदीप्तदिव्यौपधीधरः ॥ बहुद्योतकरोभातिद्वितीयइवचंद्रमाः ॥ ११॥ स्फुरायमान विजली की रेखाकी समान शोभित होता है ॥ ८ ॥ शिखर पर नील शिलाका पर्वत नीचे सुवर्णकी मेखलावाला पीतवस्त्र पहरे नारायणकी समान शोभित होता है ॥ ९॥ मेखलाको त्यागकर नीलवर्ण मध्यमध्यमें श्वेतपत्थरोंसे युक्त तारे सहित आकाशकी समान उस पहाड़की शोभा हो रही ॥ ३० ॥ अपने शरीरसे शोभायमान दिव्यौषधीसे दीप्त दूसरे चन्द्रमाको समान १ सर्वनीलशिलाढ्यश्च । २ वहुदीप्तिवृतोद्दयोतविवस्वानिवभातिसः ।
बहुत प्रकाशमान ॥ १३ ॥ अधित्यकार्मि किन्नर कीचक गान करते हैं रंभापत्र और पताकाओंसे वह पर्वत सदा शोभित होता ॥ १२॥ हरितवर्णके उपल वैदूर्य मणी मभराग श्वेतप्रस्तर श्वेतकिरण मण्डलमे इन्द्रधनुपकी समान शोभायमान ॥ १३ ॥ मम्पूर्ण धातु युक्त सुवर्ण और अनेक प्रकारके रत्नोंसे शोभायमान, अमिज्वालावाले ऊंचे गोसे सब ओरसे शोभित और वंटित ॥ १४ ॥ उसके प्रान्त भाग और तृणयुक्त शिलाओंमें कामसे पीडित होकर वियाधरी शयन करती हैं ॥ १५॥ अन्तर वायुके अधित्यकासुसंगीतैःकिन्नरीणांसकीचकैः ॥ रंभापत्रपताकाभि-शोभतेससदाऽचलः ॥ १२॥ हरितोपलवैदूर्य पद्मरागसिताश्मनाम् ॥ रुग्रश्मिमंडलेः सोगइंद्रचापरिवावृतः ॥ १३॥ सर्वधातुमयेहॅमैर्नानारत्ने प्रशो भितः सोग्निज्वालैरिखात्युच्चैःशृंगैःसर्वत्रवेटितः ॥ १४॥ तस्यागत्यनितंबेपुसतृणासुशिलासुच ॥ विद्याधर्यः प्रसेवतेस्वपतीन्कामविश्वाः ॥ १५॥ निरुद्धांतर्मरुन्मार्गाजितक्लेशाविरागिणः ॥ ध्यायत्यहर्निशंब्रह्मरम्य सानुगुहासुच ॥ १६॥ साक्षसूत्रकराः सिद्धाअर्धोन्मीलितलोचनाः ॥ आराधयंतिभूतेशंसुंदरीपुदरीपुच ॥ १७॥ मंदारकुसुमामोदसुरभीकृतदिङ्मुखः ॥ एपनिर्झरिणीवारिझंकारमुखरः सदा ॥ १८॥ उपत्य कासुखेलद्भिर्वनस्थैःकलभैगजैः ॥ कस्तूरीमृगयूथेश्वचारुचित्रमृगैस्तथा ॥ १९॥ रोकनेवाले क्लेश जीतनेवाले विरागी उसकी गुहाओंमें निरन्तर ब्रह्मका ध्यान करते हैं ॥ १६ ॥ हाथमें रुद्राक्ष लिये सिद्ध अर्धनेत्र मीचे हुए सुन्दर गुहार्मे शिवजीका ध्यान करते हैं ॥ १७ ॥ मंदारके फूलोंकी सुगंधिसे दिशा सुवासित हो रहीं झरनोंके पानी झरने से जहां शब्द हो रहा, वनमें स्थित हाथियोंके बच्चे और हाथी ॥ १८॥ उपत्यकाओंमें खेल रहे कस्तूरीवाले मृगयूथ तथा १ साग्निज्वालैरिवोच्चैः स इति पाठः। २ विद्याधरादि सेवंते स्वपत्नीः कामविह्वलाः इ० पा०।
भा.टी.
मा.मा.
अ३३
॥ वहाच
सुंदर चित्र रंगवाले मृगोंके यूथ ॥ १९ ॥ चंवरी गाय फिरती हुई विचित्र श्वापदोंसे युक्त पारावत और चकोर कोकिलके शब्दोंसे
व्याम ॥ २० ॥ राजहंस और मोरोंसे सदा रमणीय सदा देवता गुह्यक और अप्सराओंसे व्याप्त तथा ॥ २१ ॥ राजा बोले यह
पर्वत अनेक आश्चर्योंसे युक्त सब सिद्धोंका आश्रयवाला है.हे भगवन् ! वह कितना लम्बा और कितना चौडा है ॥ २२॥ ऋषी
योले ३६ योजन का ऊंचा मस्तकमें दशयोजनघाला चौडा व विस्तारमें मूलमें सोलह योजनवाला है ॥ २३ ॥ हरिचंदन मंदार
विलसच्चामरीदेविचित्रैः श्वापदैस्तथा ॥ नदत्पारावतैश्चैवचकोरेश्चापिकोकिलेः ॥ २० ॥ राजहंसमयूरै
चूसदारम्यः सपूर्वतः ।। सेव्यमानः सदादेवैर्गुह्यकैरप्सरोगणैः ॥ २१ ॥ ॥राजोवाच ॥
यमयशेलः सर्वसिद्धिसमाश्रयः॥ भगवन्कियदुच्छ्रायः कियदायामविस्तरः॥२२॥ ॥ऋपिरुवाच ॥
पत्रिंशद्योजनोच्छायोमस्तकेदशयोजनः ॥ आयामविस्तराभ्यांसमूलेपोडशयोजनः ॥२३॥ हरिचंदन
मंदारचूतराजिविराजितः ॥ देवदारुद्रुमाकीर्ण-सरलार्जुनशोभितः ॥ २४॥ कालागुरुलवंगैश्चनिकुंजैश्चलता
गृहेः ॥ विराजतेगिरिश्रेष्ठः सदापुष्पफलप्रदः ॥ २५॥ तंदृष्ट्वापर्वतरम्यंतदादुर्भिक्षपीडितः।।भृगुश्चकारत
त्रैववसतिहटमानसः ॥ २६ ॥ तस्मिन्मनोहरेशैलेकंदरेपुवनेपुच ॥ चिरकालंतपस्तपैतपःसुनिरतोभृगुः
॥ इति श्रीपद्मपुराणेमाघमासमाहात्म्येमणिशेलवर्णनंनामतृतीयोऽध्यायः॥३॥ .॥७॥
और आमके वृक्षोंसे शोभित देवदारु सरल अर्जुनके सरलके वृक्षोंसे युक्त ॥ २४ ॥ काल अगरु लवंग निकुंजलतागृहोंसे विराजित
सदा पुष्प फर्लोसे शोभायमान है ॥ २५ ॥ इस मनोहर पर्वतको देखकर दुर्भिक्ष पीडित भृगुही निवास करनेकी इच्छा करने लगे
॥ २६ ॥ उस मनोहर पर्वत की कंदरा और वनोंमें भृगुजी बहुत कालतक तप करते रहे ॥ २७ ॥ ॥ इति श्रीपाने
माघमासमाहात्म्ये भापाटीकायां मणिशैलवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३॥
फपि बोले हे राजन् ! इस प्रकार आश्रमवासी ब्राह्मणों के स्थित होनेमें उसपर्वतसे दो विद्याधर ( स्त्रीपुरुष) उतर कर गये ॥ १ ॥
और आकर मुनिको नमस्कार कर दुःखी हो स्थित हुए इस प्रकार उनको देख ब्राह्मण कोमलवाणीसे बोले ॥२॥ हे विद्याधर ! प्रसन्न
होकर कहो तुम अति दुःखी क्यों हो उन मुनिके वाक्य सुनकर विद्याधर ब्राह्मणसे बोले ॥३॥ हे तापस श्रेष्ठ ! आप हमारे दुःखका
कारण सुनो,पुण्यका फल प्रातहोनेसे मुझको स्वर्ग मिलाहै ॥४॥ देवता देहभी प्राप्त होकर व्याघकी समान हमारा मुख हो रहाहै नहीं
॥ ऋपिरुवाच ॥ ॥ एवंतिष्टतिराजेंद्रद्विजेस्वाश्रमवासिनि ॥ अवतीर्यागतोशेलाहौविद्याधरदंपती ॥१॥
समागम्यमुन्नित्वास्थितीतावतिदुःखितौ ॥ तथाविधीचतौदृष्ट्वामंजुवाक्यंद्विजोत्रवीत् ॥२॥ वदविद्याधर
प्रीत्यायुवांकिमतिदुःखितौ ॥ श्रुत्वातस्यमुनेर्वाक्यं प्राहविद्याधरोद्विजम् ॥३॥ श्रूयतांतापसश्रेष्ठममदुःख
स्यकारणम् ॥ सुकृतस्यफलं प्राप्यप्राप्तोस्मिनिदशालयम् ॥४॥ लब्ध्वाऽपिदेवतादेहमुखव्याघ्रस्यमेभवत् ॥
नजानेकर्मणःकस्यविपाकोयमुपस्थितः ॥५॥ इतिसंस्मृत्यसंस्मृत्यनलेभेशर्ममेमनः ॥ अन्यच्चथूयतां
विप्रयेनमेह्याकुलंमनः ॥६॥.जायेयममकल्याणीमधुवाणीसुरूपिणी ॥ नृत्यगीतकलाभिज्ञासर्वसद्गुणशा
लिनी ॥७॥ यस्मिन्कालेकुमारीयंतदाचाऽमलयानया ॥ विपंचीपरिवादिन्यातंत्रीभिःसप्तभिर्भृशम् ॥८॥
जानते हमको यह किस कर्मका फल मिलाहै ॥५॥ इस प्रकार वारंवार विचार करके मेरे मनमें शान्ति नहीं होती, हे ब्राह्मण !
और भी सुनो जिस कारण मेरा मन व्याकुलहै ॥ ६॥ यह मेरी स्त्री मधुर वाणी बोलनेवाली स्वरूपवान है ॥७॥ नृत्यगीत कलाकी
ज्ञाता सम्पूर्ण सद्गुणसे युक्त है, जिस समय यह कुमारी थी उस समय इस निर्मल मनवालीने सात स्वर युक्त वीणाको बजाकर॥८॥
।.मा. भा.टी. अ.४ 'बीणा बादन करे सनाता नारद मुनिको सन्तुष्ट किया मुग्ध भाव से भी मनोहर कंठ से गाती हुई इसने ॥ ९ ॥ विचित्र स्वर और नादके ज्ञाता नारद मुनिको संतुष्ट किया तथा इस कौतुक से भिन्नांगवालीने, वीणाबजाते हुए ॥ १० ॥ अनेक प्रकारकी वक्र गति से स्निग्ध उसकी पंचम धुनि को सुनकर रोम खडे हो जाने से शिवजी प्रसन्न होगये ॥ ११ ॥ शील वीणावादरसाभिज्ञस्तोपितोनारदोमुनिः ॥ मुग्धभावेपिगायंत्यांत्वनयारक्तकंठया ॥ ९॥ विचित्रस्वरनादज्ञो देवराजोपितोपितः ॥ अस्या कौतुकभिन्नांग्यावादयंत्याविपंचिकाम् ॥ १० ॥ नानावक्रगतिस्निग्धंश्रुत्वातपं चमध्वनिम् ॥ तुतोपोद्भिनरोमांचोधुन्वन्मोलिंमहेश्वरः ॥ ११ ॥ शीलौदार्यगुणग्रामरूपयौवनसंपदा ॥ नानयासदृशीनाकेकाचिदस्तिनितंविनी ॥ १२॥ केयंदेवमुखीरामाकाहंव्याप्रमुखापुमान् ॥ इतिब्रह्मन्सदा चिंत्यदह्यामिहदिसर्वदा ॥ १३ ॥ इतिविद्याधरप्रोक्तंश्रुत्वाचेक्ष्वाकुनंदन ॥ त्रिकालज्ञोभृगुःप्राहप्रहसन्दिव्य लोचनः ॥१४॥ शृणुविद्याधरश्रेष्ठविचित्रकर्मणांफलम् ॥ प्राप्यप्राज्ञानमुह्यंतिमुह्यत्यज्ञानचेतसः ॥१५॥ उदारता गुणोंके समूहमे युक्त रूप यौवनकी संपदावाली इसकी समान अन्य कोई स्त्री नहीं है।। १२॥कहां तो यह देव मुखी ओर कहाँ मैं व्याव मुसवाला हूं इस प्रकार से सदा मैं हृदममें विचार करताहूं ॥ १३ ॥ इस प्रकार विद्याधरों के वचनको श्रवणकर त्रिकालज भृगुजी हमकर बोले ॥ १४ ॥ हे श्रेष्ठ विद्याधर ! सुनो कर्मके विचित्र फल हैं उसको प्रान हो बुद्धिमान् मोहित नहीं १ गुणागम १० पा०॥
होते अज्ञानी मोहित होजाते हैं ॥ १५॥ मख्खाके चरणमात्र भी जैसे विपम विप है इसी प्रकार कर्मका दारुण फल है।।१६॥ तेने माघमास में एकादशीका व्रत करके तेल शरीरमें लगाया था और द्वादशी तबतक प्राप्त नहीं हुईथी इस कारण तुम्हारा व्याघ मुख हुआ ॥ १७ ॥ एकादशीके दिन व्रत रह कर और द्वादशीको तेल लगानेसे प्रथम पुरूरवाको कुरूपकी प्रामि हुई थी॥१८॥ तब वह अपनी कुकाया देख कर उस दुःखसे दुःखी हुआ; वह सरोवरके तट गिरिराजके समीप पान होकर ॥ १९ ॥ स्नान कर मक्षिकापदमावंतुयथाहिविपमंतिपम् || क्रियात्वविहिताल्पापिविपाकेदारुणातथा ॥ १६॥ उपोष्यकादशी माघेतलाभ्यंग कृतस्त्वया ॥ द्वादश्यांप्राग्भवेदेहेतेनव्याघ्रमुखोभवान् ॥ १७॥ उपोष्यैकादशीपुण्यांद्वाद श्यतिलसेवनात् ॥ कुरूपंमाप्तवान्देहंपुराह्येवंपुरूरवाः ॥३८॥ दृष्ट्वात्मनःकुकायंसतेनदुःखनदुःखितः । गिरि राजसमागम्यदेवतासरसस्तटे ॥ १९ ॥ स्थित्याचपरमग्रीत्याशुचिःस्नातःकुशासने ॥ नवनीलघनश्यामन लिनायतलोचनम् ॥ २०॥ शंखचक्रगदापद्मधरंपीतांबरावृतम् ॥ कौस्तुभेनविराजतंवनमालाधरंहारम् ॥ २१ ।। चिंतयन्हृदयेराजानिगृहीताखिलेंद्रियः ॥ मासत्रयंनिराहारस्तपस्तेपेसुदारुणम् ॥ २२॥ अल्पे नतपसातुष्टःसप्तजन्मकृतार्चनः । संस्मरंस्तस्यभूपस्यतदाप्रादुरभूत्स्वयम् ॥ २३ ॥ परमप्रतिसे पवित्र हो कुशासन पर बैठे नवीन नील मेघकी समान घनश्याम कमललोचन ।। २० ।। शंख चक्र गदा पद्म लिये पीताम्बरधारी कौस्तुभधारे वनमाला पहरे हारेको ।। २१ ॥ राजाने सम्पूर्ण इन्द्रियसमूहको वश कर मनमें विचार करते हुये तीन महीने निराहार रहकर दारुण तप किया॥२२॥ सात जन्मके पूर्व अर्चन होनेसे थोडेही समय में भगवान् उनसे प्रसन्न होगये मा.मा. भा.टी. अ.४ १ उस राजाकी प्रीति विचारकर प्रगट हुए॥२३॥ माघके शुक्ल पक्ष द्वादशी मकरके सूर्यमें भगवान्ने अपने शंखसे राजाका अभिषेक किया ॥ २४ ॥ और उसके तेल लगानेकी चेटाको स्मरण कराते भगवानने उसको सुन्दर रूप दिया ॥२५ ॥ जिसको देख उर्वशी अप्सरा ने उसकी इच्छा की इस प्रकार वर पाय कृतकृत्य हो राजा अपने पुर को गया ॥ २६ ॥ हे किन्नर इस प्रकार कर्मकी गति जानकर क्यों खेद करते हो, जो तुम यह दानवकी रूपता हरण की इच्छा करते हो ॥ २७ ॥ तो शीघ्र माघस्यशुक्रपक्षेतद्वादश्यांमकरेरंवौ ॥ शंखाद्भिरभिपिच्याशुमुदातंचक्रवर्तिनम् ॥ २४ ॥ वासुदेवोदौतस्मै स्मारयस्तैलचेष्टितम् ॥ अतीवसुंदररूपंकमनीयंमनोहरम् ॥ २५ ॥ येनतंचकमेदेवीउर्वशीदेवनायिका ॥ इत्थंलब्धवरोराजाकृतकृत्य पुरंगतः ॥ २६ ॥ इतिकर्मगतिज्ञात्वाकिविद्याधरखिद्यते ॥ भवान्परिजिहीर्घश्चे दानवस्यविरूपताम् ॥ २७ ॥ शीघ्रंमद्वचनादेवप्राचीनापविनाशनम् ॥ माघमासेकुरुस्नानमणिकूटनदी जले ॥२८॥ मुनिसिद्धसुरे ऐकथयिष्यामितद्विधिम् ॥ तवभाग्यवशान्माधोनिकट-पंचमेहनि ॥ २९ ॥ पौपस्यैकादशींशुकामारभ्यस्थंडिलेशयः ॥ मासमेकनिराहारस्त्रिकालंस्नानमाचर ॥ ३० ॥ त्रिकालमर्चय विष्णुंत्यक्तभोगोजितेंद्रियः॥ माघस्येकादशीशुक्लायावद्विद्याधरोत्तम ॥३१॥ मेरे वचन से प्राचीन पापके नाशक मणिकूटनदी के जलमें माघमासमें स्नान करो ॥ २८ ॥ जो मुनि सिद्ध देव समूहसे व्यातहै मैं इस विधान को कहूंगा, तेरे भाग्यवश से पांचवेही दिन माघ प्रारंभ होगा ॥ २९ ॥ पौपकी शुक्ल एकादशीसे आरंभ कर भूमिपर शयनकर एक महीने निराहार रहकर त्रिकाल स्नानकर ॥ ३० ॥ भोग त्यागनकर तीन काल विष्णु भगवान् का पूजनकर १० विद्याधर ! जबतक माघ शुक्ल एकाशी आवे॥ ३३ ॥ तब तू पाप रहित होकर पवित्रहो शुक्ल द्वादशीके दिन मंगल के अर्थ पवित्र जलोंसे स्नानकर ॥ ३२॥ हम तुम्हारा मुख कामदेव की समान कर देंगे हे विद्याधरश्रेष्ठ ! तुम देवता के मुख होकर ॥ ३३॥ इस वरवणिनिके साथ सुख पूर्वक क्रीडा करो, माघके प्रभाव को जानकर सदा माघस्नान करो॥ ३४ ॥ जिस प्रकार तुम्हारी सदा मनोरथ की प्राप्ति होगी, इस प्रकार महात्मा सर्वज्ञ भृगुजीने ॥ ३५॥ हे राजन् ! विद्याधर के निमित्त फिर गाथा कही कि माघ ततोनिर्दग्धपापत्वद्विादश्यांपुण्यवासरे ॥ अभिपिच्यशिवस्तोयमंत्रपूतैरहंसुर ॥ ३२॥ कामवक्त्रोपमंवक्त्रं करिष्यामितवानघ ॥ देवतावदनोभूत्वात्वं विद्याधरसत्तम. ॥ ३३ ॥ अनयावरवर्णिन्यासाईक्रीडयथासु खम् ॥ ज्ञातमाघप्रभावस्त्वंमाघखानंसदाकुरु ॥ ३४ ॥ यथामनोरथावाप्तिजीयतेतवसर्वदा ॥ इत्युक्तंभृगुणा तस्मैसर्वज्ञेनमहात्मना ॥ ३५ ॥ विद्याधरायराजेंद्रपुनर्गाथाउदाहृता ॥ माघस्नानैर्विपन्नाशोमाघस्नानैरघ क्षयः ॥ ३६॥ सर्वयज्ञाधिकोमाघःसर्वदानफलप्रदः ॥ मावोगर्जतियज्ञेभ्योमाधोयोगाच्चगर्जति ॥ ३७ ॥ तीवाचतपसोमाघोभोविद्याधरगर्जति ॥ पुष्करेचकुरुक्षेत्रेब्रह्मावर्तेपृथूदके ॥ ३८ ॥ अविमुक्तेप्रयागेचगंगासा गरसंगमे ॥ यत्फलंदशभिवः प्राप्यतेनियमेनरैः॥३९॥ स्नानसे विपत्ति का नाश और माव स्नानसे पापका क्षय होताहै ॥ ३६ ॥ माघ सम्पूर्ण यों में अधिक और सम दान फल का देनेवाला है माघ यज्ञों से गर्जताहै माग यज्ञसे अधिकता में गर्जता है ॥ ३७ ॥ हे विद्याधर ! माघ अधिकाई तीव्र तपसे भी गर्जताहै पुष्कर कुरुक्षेत्र ब्रह्मावर्त पृथूदक ॥ ३८ ॥ काशी प्रयाग गंगासागरका संगम यहां दशवर्ष . मा.मा. भा.टी. 11 अ.४ नियम करनेसे जो फल मिलता है ॥ ३९ ॥ वह फल माघमें तीन दिन स्नान करनेसे प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं जिनके मनमें बहुतकाल तक स्वर्गमे रहनेकी इच्छा है ॥ ४० ॥ उनको कहीं जलेमें मकरके सूर्यमें खान करना चाहिये इससे आयु आरो ग्य सम्पत्ति रूप सौभाग्यतादि गुणोंकी प्राप्ति होती है ॥ ४३ ॥ जिनके ऐसे मनोरथ हैं उनको माघस्नान कभी त्यांगना न चाहिये, जो नरक और दारिद्रसे डरते हैं ॥ ४२ ॥ वह सदा प्रयत्नपूर्वक माघस्नान करें, दारिद्र पाप दुर्भाग्यरूपी कीच धोनेको माघस्नानकी तत्फलंप्राप्यतेमाघेन्यहस्रानानसंशयः ॥ स्वर्गलोकेचिरंरागोयेपांमनसिवर्तते ॥ १० ॥ यत्रक्वापिजलेते स्तुस्नातव्यंमकरेरवौं । आयुरारोग्यसंपत्तिरूपसौभाग्यतागुणाः ।।४१॥येपांमनोरथस्तैस्तुनत्याज्यंमाधम जनम् ॥ येचविभ्यतिनरकायेदरिद्राचसंचिताच ॥ ४२ ॥ सर्वथातैःप्रयत्नेनमावेकार्यनिमजनम् ॥ दारि चपापदौर्भाग्यपंकप्रक्षालनायच ॥४३॥ माघस्नानानचान्योस्तिउपायोराजसत्तम.॥ श्रद्धाहीनानिकर्मा णितथात्यल्पफलानिवै ॥ ४४ ॥ फलंददातिसंपूर्णमाघनानंयथातथा ॥ अकामोवासकामोवायत्रका पिबहिर्जले ॥ ४५ ॥ इहामुत्रचदुःखानिमाधनायीनविंदति ॥ पक्षद्वयेयथाचंद्रोवर्द्धतक्षयितेतथा ॥४६॥ पातकंक्षीयतेमाघेपुण्यराशिश्चवर्धते । यथाचखन्याजायतरत्नानिविविधानिच ॥ १७ ॥ समान अन्य कोई उपाय नहीं है, श्रद्धाहीन कर्म अल्प फलवाले हैं ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ परन्तु, चाहे जैसे माघस्नान कर पूर्ण फल प्राप्त होता है, अकाम हो या सकाम कहीं बाहर जलम ॥ ४५ ॥ मायनान करनेवाला दोनों लोकौ दुःख नहीं पाता, जिस प्रकार दोनों पक्षमें चन्द्रमा घटता बढता है ॥ १६ ॥ इस प्रकार मात्र खान करनेसे पाप नष्ट होता और पुण्य बढता है जैसे खानासे अनेक प्रकारके रत्न प्रगट होते हैं ॥ ४७ । इसी प्रकार माघस्नानसे विविध प्रकारके पुण्य होते हैं, आयु विन कलंत्र सम्पत्नि | होती है ॥४८॥ जैसे कामधेनु कामना, चिन्तामणी मन चिन्तित फल देती है इसी प्रकार माघस्नान सब मनोरथ देता है ॥४९॥ सतयुगमें तप पर ज्ञान तामें यज्ञ पर ज्ञान द्वापरकलिम माघस्नान तो पर जानहै यह तो सब युगोंमें है॥५०॥ हे राजन् ! सब वर्ण और आश्रमोको माघस्नान मनोरथकी धाराआसे वर्षा करना है ॥ ५॥ ॥ वशिष्ठजी बोले यह वाक्य भृगुजीके सुनकर वह स्रानात्पुण्यानिजायंतेनराणांमाधतस्तथा ॥ आयुर्वित्तंकलवादिसंपदःप्रभवंतिच ॥ १८ ॥ कामधेनुर्यथा कामचिंतामणिस्तुचिंतितम् ॥ माघनानंदातीहतद्रत्सर्वान्मनोरथान् ॥ ४९ ॥ कृतेतपःपरंज्ञानंत्रेतायां यजन्तथा ॥ द्वापरेतुकलौज्ञानमाचःसर्वयुगेपुच ॥५०॥ सर्वेपामेववर्णानामाश्रमाणांच भूपते ॥ माघस्नानं तुधर्मस्यधारांभिरभिवर्पति ॥५१॥॥ वसिष्टउवाच ॥ ॥ इतिवाक्यंभृगोःश्रुत्वातस्मिन्नेवाश्रमेसुरः ॥ सहैवभृगुणामाचेगिरौ निर्झरिणीतटे॥५२॥ यथोक्तविधिनास्नानमकरोद्भार्ययासह ॥ भृगोरनुग्रहात्सोथसं प्राप्यमनसेप्सितम् ॥५३॥ देवतावदनोभूत्वामुमुदेमणिपर्वते ॥ आजगामभृगुर्विध्यंतमनुग्रााहर्पितः ॥५॥ मणिमयगिरिराजेनानमात्रेणमाघेमदनवदनरूपस्तन विद्याधरोऽभूत् ।। क्षपितनियमदेहोविध्यपादावतीर्णो भृगुरपिसहशिष्यराजगामाथरेवाम् ॥ ५५॥ विद्याधर माघमासमें भृगुके साथही पर्वतके झरनेमें।। ५२॥भार्य के साथ यथोक्त विधिसे स्नान करता हुआ भृगुके अनुयहसे उसको मनोरथकी प्राप्तिहुई ॥ ५३ ॥ देवमुख होकर मणिपर्वत पर आनदं करने लगा, और उसपर अनुग्रह कर प्रसन्न भृगुजी विन्ध्य पर्वत पर आये ॥ ५४ ॥ मणिमय गिरिराजम मात्रमं स्नानमात्रसे ही विद्याधर काम रूप हो गया, और नियमादिसे निश्चित हो म मा.मा. भा.टी. अ.४ नियम करनेसे जो फल मिलता है ॥ ३९ ॥ वह फल माघमें तीन दिन स्नान करनेसे प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं जिनके मनमें बहुतकाल तक स्वर्गमें रहनेकी इच्छा है ॥ ४० ॥ उनको कहीं जलमें मकरके सूर्यमें स्नान करना चाहिये इससे आयु आरो ग्य सम्पत्ति रूप सौभाग्यतादि गुणों की प्राप्ति होती है ॥ ४१ ॥ जिनके ऐसे मनोरथ हैं उनको माघस्नान कभी त्यागना न चाहिये, जो नरक और दरिद्रसे डरते हैं ॥ ४२ ॥ वह सदा प्रयत्नपूर्वक माघस्नान करें, दारिद्र पाप दुर्भाग्यरुपी कीच धोनेको माघस्नानकी तत्फलंप्राप्यतेमाषेत्र्यहनानानसंशयः ॥ स्वर्गलोकेचिरंरागोयेपांमनसिवर्तते ॥ ४० ॥ यत्रकापिजलेते स्तुस्नातव्यंमकरेखो ॥ आयुरारोग्यसंपत्तिरूपसौभाग्यतागुणाः॥४१॥येपांमनोरथस्तैस्तुनत्याज्यमाघम जनम् ॥ येचबिभ्यतिनरकायेदरिद्राच्चसंचिताच ॥ ४२ ॥ सर्वथातैःप्रयत्नेनमाघेकार्यनिमज्जनम् ॥ दारि व्यपापदौर्भाग्यपंकप्रक्षालनायच ॥४३॥ माघस्रानानचान्योस्तिउपायोराजसत्तम. ॥ श्रद्धाहीनानिको णितथात्यल्पफलानिवै ॥ ४४ ॥ फलंददातिसंपूर्णमाघनानंयथातथा ॥ अकामोवासकामोवायत्रका पिवहिर्जले ॥ ४५ ॥ इहामुत्रचदुःखानिमाघनायीनविंदति ॥ पक्षद्वयेयथाचंद्रोवर्द्रतक्षयितेतथा ॥४६॥ पातकंक्षीयतेमाघेपुण्यराशिश्चवर्धते ॥ यथाचखन्याजायतेरत्नानिविविधानिच ॥ १७ ॥ समान अन्य कोई उपाय नहीं है, श्रद्धाहीन कर्म अल्प फलवाले हैं ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ परन्तु चाहे जैसे माघस्नान कर पूर्ण फल प्राप्त होता है, अकाम हो या सकाम कहीं बाहर जलमें ॥ ४५ ॥ माघस्नान करनेवाला दोनों लोकम दुःख नहीं पाता, जिस प्रकार दोनों पक्षमें चन्द्रमा घटता बढता है ॥ ४६॥ इस प्रकार माघमें स्नान करनेसे पाप नष्ट होता और पुण्य बढता है जैसे खानोंसे अनेक प्रकारके रत्न प्रगट होते हैं ॥ १७ ॥ इसी प्रकार मावस्नानसे विविध प्रकारके पुण्य होते हैं, आयु वित्त कलन सम्पाए होती है ॥४८॥ जैसे कामधेनु कामना, चिन्तामणी मन चिन्तित फल देती है इसी प्रकार मायस्लान सब मनोरथ देता है ॥४९॥ सत्युगमें तप पर जान त्रेता यज्ञ पर ज्ञान द्वापरकलिमें मावस्नान तो पर जानहै यह तो सब युगोंमें है।॥५०॥ हे राजन् ! सब वर्ण और आश्रमोको मावस्नान मनोरथकी धाराओंसे वा करता है ।। ५१ ॥ वशिष्ठजी बोले यह वाक्य भृगुजीके सुनकर वह स्नानात्पुण्यानिजायंतेनराणांमाघतस्तथा ॥ आयुर्वित्तंकलनादिसंपदःप्रभवंतिच ॥ १८ ॥कामधेनुर्यथा कामचिंतामणिस्तुचिंतितम् ।। माघनानंदातीहतद्भत्सर्वान्मनोरथान् ॥ १९ ॥ कृतेतप-परंज्ञानंत्रेतायां यजन्तथा ॥ द्वापरेतुकलीज्ञानंमाघःसर्वयुगेपुच ।। ५०॥ सर्वेपामेववर्णानामाश्रमाणांच भूपते । माघस्नान तुधर्मस्यधारांभिरभिवति ॥५१॥ ॥ वसिष्टउवाच॥ ॥ इतिवाक्यभूगोश्रुत्वातस्मिन्नेवाश्रमेसुरः ।। सहैवभृगुणामाचेगिरी निर्झरिणीतटे ।। ५२॥ यथोक्तविधिनास्नानमकरोद्भार्ययासह ।। भृगोरनुग्रहात्सोथसं प्राप्यमनसेप्सितम् ॥५३॥ देवतावदनोभूत्वामुमुदेमणिपर्वते ॥ आजगामभृगुर्विध्यंतमनुग्राह्यहर्पितः ॥५॥ मणिमयगिरिराजेनानमात्रेणमाघेमदनवदनरूपस्तत्र विद्याधरोऽभूत् ॥ क्षपितनियमदेहोविंध्यपादावतीर्णो भृगुरपिसहशिष्यैराजगामाथरेवाम् ॥५५।। विद्याधर माघमासमें भृगुके साथही पर्वतके झरनेमें।। ५२॥भायीक साथ यथोक्त विधिसे स्नान करता हुआ भृगुके अनुग्रहसे उसको मनोरथकी प्राप्तिहुई ॥ ५३ ॥ देवमुख होकर मणिपर्वत पर आनदं करने लगा, और उसपर अनुग्रह कर प्रसन्न भृगुजी विन्ध्य पर्वत पर आये ॥ ५४ ॥ मणिमय गिरिराजमें माधर्म स्नानमात्रसे ही विद्याधर काम रूप हो गया, और नियमादिसे निश्चित हो मा.मा. भा.टी. १२ अ.५ पर्वतसे उतर भृगुजी रेखा तटमें आये ॥ ५५ ॥ यह माघमाहात्म्य सब भुवनका सार है, सो भृगुजीने विद्याधरसे कहा, नित्य इसको सुनते हैं उनको अनेक प्रकारके विचित्र फल और देवयत् सब काम प्राप्त होते हैं ॥ ५६ ।। ॥ इति श्रीपाने माघमासमाहात्म्ये वशिष्ठदिलीपसंवादे पंडितज्वालाप्रसादमिश्रकृतभापाटीकायां चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४॥ वसिष्ठजी बोले हे राजन् ! अब तुमसे माघमाहात्म्य कहताहूं जो कार्तवीर्यके पूछनेपर दत्तात्रेयने कथन किया है ॥ १ ॥ साक्षात् हरिरूप अखिलभुवनसारंमाघमाहात्म्यमेतद्विजवरभृगुणोक्तंभूपविद्याधराय॥ विविधफलविचित्रंय शृणोतीहनित्यंरुचि रसकलकामान्देववत्प्राप्नुयात्सः ॥५६॥ ॥ इति श्रीपद्मपुराणे माघमाहात्म्येवसिष्ठदिलीपसंवादेचतुर्थोऽ ध्यायः॥४॥ ॥ वसिष्ठउवाच ॥ ॥ अधुनामाघमाहात्म्यंप्रवक्ष्यामिनृपोत्तम ॥ पृच्छतेकातेवीयायदत्ता येणभापितम् ॥ १ ॥ दत्तात्रेयहरिसाक्षाद्वसंतंसह्यपर्वते ॥ पप्रच्छतंद्विजंगत्वाराजामाहिष्मतीपतिः ॥२॥ सहस्रार्जुनउवाच ॥ भगवन्योगिनांश्रेष्ठसर्वेधर्माः श्रुतामया। माघस्नानफलंब्रूहिकृपयाममसुव्रत ॥३॥ ॥ श्रीदत्तात्रेयउवाच ॥ ॥ श्रूयतांनृपशार्दूलएतत्प्रश्नोत्तरंशुभम् ॥ ब्रह्मणोक्तंपुरा तन्नारदायमहात्मने ॥ ४॥ तत्सर्वकथयिष्यामिमाघस्नानफलंमहत् ॥ यथादेशंयथातीर्थयथाविधियथाक्रियम् ॥५॥ दत्तात्रेयजी जब सह्य पर्वतपर निवासकरते थे, तब माहिष्मतीके राजाने उनसे जाकर पूछा था ॥ २ ॥ सहस्रार्जुन बोले हे भगवन् ! योगिश्रेष्ठ ! हमने सब धर्म सुने सो कंपाकरके अब माघ स्नानका फल कहो॥३॥ श्रीदत्तात्रेय बोले राजन् इस प्रश्नका उनर सुनो, जो पहले महात्मा नारदजीके प्रति ब्रह्माजीने कहा है ॥ ४ ॥ वह सब माघस्नानका महाफल कहताहूं यथा देश १२ मा.मा. अ.५ परम विप लालची पिशुन क्रूर कतन्न क्षणिकबुद्धि ॥ १४ ॥ दुप्पूर दुर्धर दुष्ट तीनों दोपोंसे युक्त अपवित्र वस्तुका निकालनेवाला छिद्रयुक्त तीन तापसे मोहित ॥ १५॥स्वभावसे अधर्ममें रंत सैकडों तृष्णासे व्यात काम क्रोध लोभयुक्त नरकदारसे व्याप्त ॥१६॥ कमिकीडोंसे युक्त परिणाममें भस्महोकर कुोंकी हवि होता है माघस्नानके विना इस प्रकारका शरीर व्यर्थही है ॥ १७॥ जलके बुद्धदोंकी समान जन्तुओंमें पूतिका (जन्तुविशेपदीमक ) की समान माघस्नानके विना मनुष्य मरणकेही निमित्त है ॥१८॥ ब्राह्मण दुप्पूरंदुद्धरंदुष्टंदोपत्रयसमन्वितम् । अशुचिस्राविसच्छिद्रंतापत्रयविमोहितम् ॥१५॥ निसर्गतोऽधर्मरतंतृष्णा शतसमाकुलम् ॥ कामक्रोधमहालोभनरकद्वारसंस्थितम् ॥१६॥ क्रिमिविड्भस्मभवतिपरिणामेशुनाहविः॥ ईक्छरीरंव्यर्थहिमाघस्नानविवर्जितम् ॥ १७ ॥ बुद्रुदाइवतोयेपुपूतिकाइवजंतुषु ॥ जायतेमरणायैवमाघ स्नानविवर्जिताः ॥१८|| अवैष्णवोहतोवियोहतंश्राद्धमयोगिच ॥ अब्रह्मण्यहक्षेत्रमनाचारहतंकुलम् ॥१९॥ सदंभश्चहतोधर्मक्रोधेनैवहतंतपः ॥ अदृढंचहतं ज्ञानप्रमादेनहतं श्रुतम् ॥२०॥गुर्वभक्ता हतानारी ब्रह्मचारी तयाहतः॥ अदीप्तेनौहतोहोमोहताभुक्तिरसाक्षिका ॥२१॥ होकर भगवान् नारायणको न माने तो ब्राह्मण हत है, अयोगी श्राद्ध हत है, अब्रह्मण्य क्षेत्र हत है और अनाचारसे कुल नष्ट है ॥ ॥ १९ ॥ दंभसे धर्म क्रोधसे तप हतं होजाता है दृढ़ताके विना ज्ञान और प्रमादसे शास्त्र नष्ट होजाता है ।॥ २०॥अपने गुरुजनोंका मान्य न करनेसे नारी तथा ब्रह्मचारी हत होते हैं , अदीम अनिमें होम हत, साक्षी ,रहित भुक्ति हत है ॥ २१ ॥ २ कृमिवर्चस्कभस्मास्थिपरिपाकसमाकुलम्-इ० पा० । २ दुर्भगाचेतिपाठः । ३ हताशक्तिरसात्विकी-इ० पा० । १३ उपजीविकाके निमिन कन्या हत है, अपने निमित्तही भोजन हत है, शूदके घरकी भिक्षासे यज्ञ और रुपणका धन हत है, ॥ २२ ॥ विना . यासके विद्या विरोधी राजा और जीवन के निमित्त तीर्थ हत है और निस्सन्देह जीवनहीके निमित्त व्रत हत है ॥ २३ ॥ असत्यसे वाणी हत है, तथा चुगलीसे हत है, सन्दिग्ध होनेसे मंत्र हत है, व्यग्रचित्त होनेसे जप हत है॥२४॥ अश्रोत्रियको दान देना हत है, नास्तिकसे लोक हत है, और श्रद्धाके विना कीहुई सब उपजीव्याहताकन्यास्वार्थपाकक्रियाहता ॥ शूद्रभिक्षाहतोयाग कृपणस्यहतधनम् ॥ २२ ॥ अनभ्यासा हतावियाहतोराजाविरोधकृत।जीवनार्थहततीर्थजीवनार्थंहतंबतम् ॥२३॥ असत्याचहतावाणीतथापेशुन्य वादिनी ॥ संदिग्धश्चहतोमंत्रोव्यग्रचित्तोहतोजपः ॥ २४ ॥ हतमथोत्रियेदानंहतोलोकश्चनास्तिकः ॥ अश्रद्धयाहतंसकृतंयत्पारलौकिकम् ॥ २५॥ इहलोकोहतोनृणांदरिद्राणांयथानृप ॥ मनुष्याणांतथाजन्म माघस्नानविनाहतम् ॥२६|| मकरस्थेरवायोहिनस्नात्यनुदितेरवौ॥ कथंपापैःप्रमुच्येतकथंसत्रिदिवंबजेत् ॥ ॥ २७ ॥ ब्रह्महाहेमहारीचसुरापोगुरुतल्पगः ।। माघस्नायीविपापःस्यात्तत्संसगीचपंचमः ॥ २८ ॥ माघमा सेरटंत्यापःकिंचिदभ्युदितरवौ ॥ ब्रह्मनंवासुरापंवाकंपतंतं पुनीमहे ॥२९॥ पारलौकिक क्रियाहत है॥२५॥ हे राजन् ! इस लोकमें जैसे प्राणी दरिद्रसे हत हैं, इसी प्रकार माघस्नानके विना मनुष्यका जन्म हत है। ॥२६॥मकरके सूर्यमें जो प्रभात समय स्नान नहीं करता वह किसप्रकार पापसे छूटे और कैसे स्वर्गको जाय॥२७॥ब्रह्महत्यारा सुवणको चुरानेवाला, मय पीनेवाला, गुरुकी सेजपर चढनेवाला, यह पाप करनेवाला और पाँचवा इनका संसर्ग करनेवाला यह सत्र माघ स्नान करनेसे पवित्र होजाते हैं।।२८॥माघमासमें किंचित सूर्यके उदय होने पर जल कहते हैं ब्रह्महत्यारा सुरापान करनेवाला और मा.मा. भा.दी. १४ अ.५ पनित हुएको हम पवित्र करेंगे ॥ २९ ॥ सब उपपातक और महापातकभी माघलान सुरू करनेसे भस्म होजाते हैं ॥ ३०॥ माघनानके आतेही पाप कंपित होने लगते हैं, यदि यह पुरुप स्नानकर लेगा तो हमारा नाश होगा॥३१॥इस प्रकार स्नान करनेको उद्यत हुए पुरुषको देखकर पाप दुःखी होते हैं माघनायी मनुष्य अमिकी ममान दीखने लगते हैं।॥३२ ॥ वे पापोंसे विमुक्त होकर इस प्रकार दीन होते हैं जिस प्रकार मेघोंसे मुक्त होकर चन्द्रमा दीन होता है, गीला सूखा लघुवाणी मनसे जो पाप किया है। ३३॥वह उपपापानिसर्वाणिपातकानिमहांत्यपि॥ भस्मीभवंतिसर्वाणिमाघस्नायिनिमानवे ॥ ३० ॥ कंपतिसर्वपापा निमाघस्नानसमागमे ॥ नाशकालोयमस्माकंयदिस्नास्यतिवारिणि ॥ ३१ ॥ एवंकोशंति पापानिदृष्ट्वा स्नानोद्यतनरम् ॥ पावकाइवदीप्यंतेमाघस्नाननरोत्तमाः॥ ३२॥ विमुक्ताःसर्वपापेभ्योमेघेभ्यइवचंद्रमाः॥ आशुष्कलघुस्थूलंवाङ्मनःकर्मभिःकृतम् ॥ ३३॥ माघस्नानंदहेत्पापंपावकःसमिधोयथा ॥ प्रामादिकं चयत्पापंज्ञानाज्ञानकृतंचयत् ॥३४॥ स्नानमानेणतनश्येन्मकरस्थे दिवाकरे ॥ निप्पापानिदिवंयांतिपापि छायांतिशुद्धताम् ॥३५॥ संदेहोनाकर्तव्योमाघस्नानेनराऽधिप ॥ सर्वेधिकारिणोमावेविष्णुभक्तीयथानृप ।। ।। ३६ ।। सर्वेपास्वर्गदोमावः सर्वेपांपापनाशनः एपएवपरो मंत्रोह्येतदेवपरंतपः॥३७॥ सब पाप माघस्नानसे इस प्रकार दूर होजाते हैं जैसे अग्निमें समिधा, जो प्रमाद वा अन्नान जानमें या अजानमें पाप किया है । ॥ ३४ ॥ वह मकरके मूर्य होनेमें स्नान मात्रसे नद होजाता है, पापरहित स्वर्गको जाते, पापिष्ठ शुद्ध होजाते हैं ॥ ३५॥ हे राजन् ! माघस्नान विषयमें सन्देह न करना चाहिये, हे राजन् ! मारके स्नानमें सबही अधिकारी हैं, जैसे भगवान्के भनिमें सय अधिकारी हैं ॥ ३६ ॥ माघ सबहीको स्वर्ग देनेवाला और सबहीका पाप नाशक है यही परं मंत्र और यही परं ।
तप है ।। ३७ ॥ माघस्नानका करना परमोत्तम प्रायश्चित्त है जन्मान्तरोंके आयाससे मनुष्योंकी माघस्नानमें भक्ति होती है ॥ ३८ ॥ जिस प्रकार जन्मान्तरोंके आयाससे अध्यात्म ज्ञानकी प्राप्ति होती है, संसाररूपी कर्दमका इसीसे प्रक्षालन होता है ॥ ३९ ॥ हे राजन् ! यह माघस्नान पवित्रोंका पवित्र करनेवाला है हे राजन् ! जो सब काम फल देनेवाले माघमें स्नान नहीं करते हैं ॥ ४० ॥ वे चन्द्र सूर्यको समान बडे भोग किस प्रकारसे भोग कर सकते हैं, हे राजन् ! माघ प्रायश्चित्तंपरंचैतन्माघस्नानमनुत्तमम् ॥ नृणांजन्मांतराभ्यासान्माघस्नानेमतिर्भवेत् ।। ३८॥ अध्यात्मज्ञा नकौशल्यंजन्माभ्यासाद्यथानृप ॥ संसारकर्दमालेपप्रक्षालनविशारदम्॥ ३९ ॥ पावनंपावनानांचमाघस्नानं परंनृप ॥ स्नांतिमाघेनयेराजन्सर्वकामफलप्रदे ॥४०॥ कंथतेमुंजतेभोगांश्चंद्रसूर्यग्रहोपमान् ॥ शृणुराजन्म हाश्चर्यमाघस्नानप्रभावजम् ॥४३॥ कुब्जिकानामकल्याणीब्राह्मणीभृगुवंशजा ॥ बालवैधव्यदुःखार्तातपस्ते पेसुदुस्तरम् ॥ ४२ ॥ विंध्यपादेमहाक्षेत्ररेवाकपिलसंगमे ॥ तत्रसाबतिनीभूत्वानारायणपरायणा ॥ १३॥ सदाचारवतीनित्यनित्यंसंगविवर्जिता ॥ जितेंद्रियाजितकोधासत्यवागल्पभापिणी ॥४४॥ स्नानके प्रभावसे उत्पन्न हुआ महा आश्चर्य सुनो ॥४१॥ एक भृगुवंशमें उत्पन्न हुई कुजिका नाम कल्याणी ब्राह्मणी थी, वह बालवैधन्यसे दुःखी हो घोर तप करने लगी ॥ ४२ ॥ विन्ध्याचलपर्वतके महा क्षेत्रमें जहां रेवाकपिलका संगम हुआ है वहां वह तिनी होकर नारायणपरायण हुई ॥ ४३ ॥ सदा सदाचारसे युक्त सम्पूर्ण संगसे वर्जित जितेन्द्रिय जितक्रोध सत्यवाक् अल्प १ कुक्षी-३० पा०।
मा.मा. भा.टी. १५ अ.५ .. भाषण करनेवाली ॥ ४४ ॥ सुशीला दानशीला अपने देहको शोपनेवाली पितृदेवताओंको देकर अनिमें आहुति देनेवाली थी । ॥४५॥.हे राजन् ! वह उच्छवृत्नि करनेवाली सदा छठे.कालमें भोजन करती कच्छू अतिकच्छू और तप्तकछू ब्रतका सदा अनुष्ठान करती ॥ ४६॥ पुण्यसेही वह नर्मदाके तटमें अपना समय व्यतीत करतीथी, इस प्रकार वल्कल वस्त्रधारिणी उस सुशी लाने ॥ १७ ॥ महासत्वतासे युक्त धैर्य और सन्तोपसे युक्त वाकपिलके संगममें साठ माघस्नान किये ॥ ४८ ॥ सुशीलादानशीलाचदेहशोपणशालिनी ॥ पितृदेवद्विजेभ्यश्चदत्त्वाहुत्वातथानले ॥४५॥ पष्ठेकालेचसाभुङ्क्ते ह्युच्छवृत्तिःसदानृप॥कृच्छ्रातिकृच्छ्रपाराकतप्तकृच्छ्रादिभिर्वतैः ॥ ४६॥ पुण्यानयर्तिसामासानर्मदायाश्चरो धसि ॥ एवंतयातपस्विन्यावल्कलिन्यासुशीलया ॥ ४७॥ सुमहासत्त्वशालिन्याधृतिसंतोपयुक्तया ॥ पष्टिाधास्तयास्नातारेवाकपिलसंगमे ॥ ४८ ॥ ततःसातपसाक्षीणातस्मिंस्तीर्थमृतानृप ॥ माघस्नानज पुण्येनतेनसावेष्णवेपुरे ॥ १९ ॥ उवासप्रमुदायुक्ताचतुर्युगसहस्रकम् ॥ सुंदोपसुंदनाशायपश्चात्पद्मभवा त्पुनः॥५०॥ तिलोत्तमेतिनानासाब्रह्मलोकेवतारिता ॥ तेनपुण्यस्यशेपेणरूपस्येकायनंययौ ॥५१॥ अयोनिजावलारत्नदेवानामपिमोहिनी ॥ लावण्यह्रदिनीतन्वीसाभूदप्सरसांवरा ॥५२॥ राजन् ! तब वह तपसे क्षीण होकर उस क्षेत्रमें मृतक होगई तब वह माघस्नानके पुण्यसे उस वैष्णवपुरमें ॥ ४९ ॥ प्रसन्न होकर सहस्र चतुर्युगी निवास करती हुई सुन्दउपसुन्दके नाश करनेको पद्मभवसे प्रगट हुई ॥ ५० ॥ तिलोत्तमा नाम होकर ब्रह्मलोकमें रही और उस पुण्यके शेपसे महा रूपवती हुई ॥ ५१ ॥ वह अयोनिजखियोमें रल देवता १५ महा रसायती इ. लिलोनमा नाप होकर महामोरूमें रही और उम पुण्यक ओंकी मोहनेवाली हुई सुन्दर नाभियाली मनोहर अप्सरा होती हुई ॥ ५२ ॥ विधाताकी चातुरीका मानो आश्चय करनपाला उसको उत्पन्न कर विधाताने प्रसन्न हो आज्ञादी ॥ ५३ ।। हे मृगलोचनी ! शीघही तुम दैत्योंके नाशके निमित्त गमन करो तब वह भामिनी वीणा लेकर ब्रह्माजीके लोकसे ॥ ५४ ॥ पुष्कर मार्गसे गई जहां वे दोनों दैत्य स्थित थे वहां रेवाके पवित्र निर्मल जलमें स्नानकर॥ ५५ ॥बंधूकपुप्पकी समान लाल वन धारण कर शब्दायमान कंकण और मेखला नूपुर धारण किये॥५६॥ निपुणस्यविधेःस्रष्टुनूनमाश्चर्यकारिणी ॥ तामुत्पाद्यविधातावैतुष्टोनुज्ञांतदाददौ ॥५३॥ एणशावाक्षिगच्छ त्वदैत्यनाशायसत्वरम् ॥ ततःसाब्रह्मणोलोकाद्वीणामादायभामिनी ॥ ५४॥ गतापुष्करमार्गेणयत्रतौदेववै रिणी ॥ तत्रस्नात्वातुरेवाया पवित्रेनिर्मलेजले ॥५५॥ परिधायांबररक्तंबंधूककुसुमप्रभम् ॥ रणद्वलयिनी चारुसिंजन्मखलनूपुरा ॥५६॥ लोलमुक्तावलीकंठीचलत्कुंडलशोभना ॥ माधवीकुसुमापीडाकंकेलिवि. टपेस्थिता ॥९७ ॥ गायतीसुस्वरसापिपीडयंतीतुवल्लकीम् ॥ मूर्च्छयंतीस्वरपइंसुस्निग्धंकोमलंकलम् ॥५८॥ इत्थंतिलोत्तमावालातिष्ठंत्यशोककानने ॥ दृष्टा दैत्यभटैरिंदो कलेवसुखदाहृदि ॥ ५९॥ चलायमान मुनावली कंठी चलायमान कुंडलोंसे शोभित चमेलीके फूलोंको जूडेमें गूथे अशोकवृक्षके नीचे स्थित ॥ ५७ ॥ मधुर स्वरसे गाती वीणाको बजाती छःओं सुरोंकी तान लेती सुस्निग्ध कोमल शब्दसे युक्त ।। ५८ ॥ इस प्रकार तिलोत्तमा वाला अशोक वृक्षके नीचे स्थित हुई दैत्यके सेवकोंने उसको मनकी आनंद देनेवाली चन्द्रमाकी कलाकी समान देख कर॥५९॥ १मालती इति पा० । २ ककेली अशोकवृक्षः। CO -takarm मा.मा. भा.टी. १६ अ.५ उसको देख विस्मित हो आनंदित हो सेनाके बड़े लोगोंने शीघतासे सुन्दउपसुन्दके समीप जाकर ॥६० ॥ वारंवार उसका वर्णन करके संक्रममे कहा हे दैत्य ! हम नहीं जानते कि, वह एक स्त्री देवी वा दानवी है॥६॥ नागस्वी यक्षिणी कौन है सर्वथा वह वीरल है आप लोकमें रत्नभोगी हो और वह अबला रत्नभूत है ॥ ६२ ॥ वह शोककी हरनेवाली थोड़ी ही दूरपर स्थित है, उसको जाकर शीव देखो कामकी भी मोहित करनेवाली है ॥ ६३ ।। इस प्रकार वे दोनों सेनापतियोंकी मनोहर वाणी मुन तांदृष्ट्वाविस्मितराजन्सानंदैःसैनिक शम् ॥ त्वरमाणेरदृष्ट्वेवगत्वासुंदोपसुंदयोः ॥ ६० ॥ कथितासंभ्रमेणे ववर्णयित्वापुनःपुनः ॥ हेदैत्यौनविजानीमोदेवीवादानवीनुकिम् ॥ ६१ ॥ नागांगनाथवायक्षीस्त्रीरत्नंसर्व थातुसा ।। युवारनभुजौलोकेरत्नभूताहिसावला ॥३२॥ वर्ततेनातिदूरेग्रेअशोकेशोकहारिणी ॥ गत्वातांपश्यतं शीघ्रमन्मथस्यापिमोहिनीम् ॥ ६३ ॥ इतिसेनापतीनांतोश्रुत्वावाचमनोहराम् ॥ चपकंसीधुनस्त्यक्त्वावि हायजलसेचनम् ॥ ६४ ॥ उत्तमस्त्रीसहवाणित्यक्त्वातस्माजलाशयात् ॥ शतभारायसींरांकालदंडोपमा गदाम् ॥६५॥ भिन्न भिन्नांगृहीत्वातुजवेनाभिप्लुतंगतो ॥ यत्रशृंगारसज्जासाहंतुंचंडीवसस्थिता ॥६६॥ राजन्संधुक्षयंतीवदेत्ययोर्मन्मथानलम् ॥ स्थित्वातस्याःपुरोज़ाल्मौतद्रूपेणविमोहितौ ॥ ६७ ॥ कर सीधु मधुके कटोरेको त्याग तथा जल सेचनेको त्यागकरके ॥ ६४ ॥ महस्रों उनम खियोंको छोड उस जलाशयसे निकल सोभारकी बनी लोहेकी कालदण्डकी समान गदा लेकर ॥ ६५॥ भिन्न २ दोनों गदाओंको लेकर बड़े वेगसे चले, जहां वह शृंगार किये चंडीकी समान इनको मारनेको स्थित थी ॥ ६६ ॥ हे राजन् ! वह उन दोनों दैत्योंकी कामानि प्रदीप्त करती हुई १ शीघ्रत इ०पा०। २ स्थित्वादत्यो पुरस्तस्या इति पा० ।
स्थित थी उसके रूपसे मोहित हो दोनों उसके आगे स्थित होते हुए ॥ ६७ ॥ और मदसे विशेष मत्त हो परस्पर कहने लगे है। भाता ! तुम इस्से विरामको प्राप्त हो इसको मैं अपनी भार्या बनाऊंगा ॥ ६८ ॥ तुम इसको छोडो यह मेरी भार्या होगी इस प्रकार मातंगकी समान मन हो परस्पर दोनों कहने लगे ॥ ६९ ॥ कालके वशीभूत हो दोनोंने परस्पर गदाघात किया और परस्परके प्रहारसे प्राणरहित हो पृथ्वीपर गिरे ॥ ७० ॥ इनको मरा देखकर सेनाके लोगोंने बड़ा कोला विशेषान्मधुनामत्ताबूचतुस्तोपरस्परम् ॥ भ्रातर्विरमभार्ययममास्तुवरवर्णिनी ॥ ६८॥ त्वमेवार्यत्यजेतामे भायाँतुमदिरेक्षणाम् ॥ इत्याग्रहेणसंरब्धौमातंगाविवसोन्मुदौ ॥ ६९. ॥ अन्योन्यंकालनिर्दिष्टोगदयाजन तुस्तदा । परस्परप्रहारेणगतासूपतितौभुवि ॥ ७० ॥ तौमृतोसेनिकैर्दष्ट्वाकृतःकोलाहलोमहान् ॥ कालरा त्रिसमाकेयंहाकिमेतदुपस्थितम् ॥ ७० ॥ एवंवदत्सुसैन्येपुदैत्योसुंदोपसुंदको ॥ पातयित्वागिरेःशृंगेहादिनी वतिलोत्तमा ॥ ७२ ॥ प्रस्थितागगनंशीघ्रद्योतयंतीदिशोदश ॥ देवकार्यततःकृत्वाआगतात्रह्मण पुरः ॥७३॥ ततस्तुष्टेनदेवेनविधिनासानुमोदिता । स्थानंसूर्यरथेदत्तं तवचंद्राननेमया ॥ ७४ ॥ भुंवभोगाननेकांस्त्वं यावत्सूर्योबरेस्थितः ॥ इत्थंसाबाह्मणीराजन्भूत्वाचाप्सरसांवरा ॥ ७ ॥ हल किया यह कालरात्रिकी समान कौन है यह क्या वार्ता उपस्थित हुई ॥ ७१ । सेनाके ऐसा कहने पर सुन्द उपसुन्द दैत्योंको मनोहारिणी तिलोत्तमा पर्वत शंगपर पातित करके ॥ ७२ ॥ दशों दिशाओंको प्रकाश करती आकाशको गई, और देवकार्य करके ब्रह्माजीके आगे आकर स्थित हुई ॥ ७३ ॥ तब संतुष्ट होकर ब्रह्माजीने उसका अनुमोदन किया, हे चंद्रानने ! मैंने तुमको सूर्यके रथपर स्थान दिया ॥ ७४ ॥ जबतक सूर्य आकाशमें स्थित हैं, तबतक तू अनेक प्रकारके भोगोंको भोग, मा. मा.टी. --- अ.६ हेराजन्! इस प्रकार यह ब्राह्मणी श्रेष्ठ अप्सरा होकर ॥ ७५ ॥ अवतक सूर्यलोकमें माघस्नानका बड़ा फल भोगती है हे राजन् ! इस कारण श्रद्धावाले मनुष्योको सदा यत्नपूर्वक ॥ ७६ ॥ परमगति चाहनेवालीको माघस्नान करना चाहिये उसने कौनसे पुरुषार्थकी प्राप्ति न करी वा उसके कौनसे पापक्षीण न हुए. ॥ ७७ ॥ जो मनुष्य माघमासमें स्नान करता है दक्षिणा सहित सव यज्ञ इसकी बरावार नहीं करसकते ॥ ७८ ॥ हे राजन् ! माघस्नान और विशेष कर तीर्थ सेवनसे ऐसा पापनाशक और स्वर्ग भुक्तेद्यापिरवेलोंकेमाघस्नानफलंमहत् ॥ तस्मात्प्रयत्नतोराजञ्छूद्दधानः सदानरैः ॥७६॥ स्नातव्यंमकरादि त्येवांच्छद्भिःपरमांगतिम् ॥ नानवाप्तोत्रतस्यास्तिपुरुषार्थोहिकञ्चन ।। ७७. ॥ नाक्षीणपातकंकिंचिन्माघेमज्ज तियोनरः॥ तुलयंतिनतेनारयज्ञाः सर्वेसदक्षिणाः ॥ ७८ ॥ माघस्नानेन राजेंद्रतीर्थेचैवविशेषतः ॥ नचान्य स्वर्गदकर्मनचान्यत्पापनाशनम् ॥ ७९ ॥ नचान्यन्मोक्षदंयस्मान्माघस्नानसमभुवि ॥ ८॥ ॥ इति श्रीपद्मपुराणेमाघमाहात्म्येवसिष्ठदिलीपसंवादेमाघस्नानप्रशंसायांसुंदोपसुंददैत्यवधोनामपंचमोऽध्यायः ॥ ॥५॥ ७ ॥ श्रीदत्तात्रेयउवाच ॥ ॥ अत्रतेकथयिष्यामिइतिहासंपुरातनम् ॥ पुराकृतयुगेराजन्नेपधेनगरे वरे ॥ १॥ आसीद्वेश्यःकुबेराभोनामतोहिमकुण्डलः ॥ कुलीनःसक्रियोदांतोद्विजवह्निसुरार्चकः ॥ २ ॥ का देनेवाला कोई कर्म नहीं है ॥ ७९ ॥ माघस्नानकी समान भूमिमें और कोई मोक्ष देनेवाला नहीं हैं ॥ ८ ॥ इति श्रीपमपुराणे माघमाहात्म्ये वसिष्ठ--दिलीपसम्बादे पण्डित-ज्वालाप्रसाद मिश्रकृतभापाटीकायां पंचमोऽध्यायः ॥ ५॥ ।। श्रीदनात्रय बोले इसमें एक और भी पुरातन इतिहास आपसे कहते हैं, .हे राजन् ! पहले सतयुग; निषध नगरमें १ स्नातोवाइमात्रतश्चास्ति इ० पा० ।
कुवेरके समान धनी एक वैश्य हिमकुंडल नामवाला था कुलीन सक्रियावाला चतुर द्विज अनि देवताओंका पूजन करनेवाला ॥१॥२॥ कपिवाणिज्यका करनेवाला अनेक प्रकार क्रय विक्रयके कार्य की गौ घोडे महिपी आदि पशु पालन करता ॥ ३ ॥ दूध दही महा गोमय तृण काष्ठ फल मूल लवण पिप्पल धान्य शाक तैल और अनेक प्रकारके वस धातु खांड मिठाई आदि सदा वेचता ॥ ४ ॥ ५॥ इस प्रकार वह वैश्य नानाप्रकारके उपायोंसे सुवर्णकी आठ करोड कृपिवाणिज्यकर्तासीबहुधाकयविक्रयी ॥ गोघोटकमहिष्यादिपशुपोपणतत्परः ॥३॥ पयोदधीनितकाणिगो मयानिवृणानिच ॥ काष्ठानिफलमूलानिलवणानिचपिप्पलीम् ॥ ४॥ धान्यानिशाकतैलानिवस्त्राणिविविधा निच ॥धातूनीरुविकारांश्चविक्रीणीतेचसर्वदा ॥५॥ इत्यनानाविधैःश्यउपायैःपरमैस्तदा ॥ द्रव्याण्युपार्ज यामासअटोहाटककोटयः ॥६॥ एवंमहाधनःसोथआकर्णपलितोभवत् ॥ पश्चाद्विचार्यसंसारक्षणिकत्वस्वचे तसि ॥७॥ तदनस्यपडशेनधर्मकार्यचकारसः॥ विष्णोरायतनंचक्रेचक्रेगेहंशिवस्यच ॥ ८॥ तडागं खानयामासविपुलंसागरोपमम् ॥ वाप्यश्चपुष्करिण्यश्च बहुशस्तेनकारिताः ॥ ९॥ वटाश्वत्थानकंकोलजं बूनिंबादिकाननम् ॥ आरोपितंसुसत्वेनतथापुप्पव शुभम् ॥ १०॥ अशरफी उपार्जन करता हुआ ॥६॥ इस प्रकार उस महाधनीकी कर्णपर्यन्त वृद्धता प्राप्त हुई पीछे अपने मनमें विचार करनेलगा कि, यह संसार क्षणिक है ॥ ७ ॥ उस धनके छठे अंशसे उसने धर्म कार्य किया ठाकुरद्वारा और शिवजीका मन्दिर बनवाया ॥८॥ और सागरको समान एक बडा सरोवर खुदवाया बावडी और पुष्करिणी उसने बहुतसी बनवाई ॥ ९ ॥ बड अश्वत्थ मा.मा. भा.दी. १८ अ.६ आम्र कंकोल जामुन नीम आदिक्के वन पुष्पवाटिका यह उसने प्रेमसे लगाई ॥ १०॥ उदयसे अस्त पर्यन्त उसने अन्नदान किया पुरके बाहर चारोंओर उसने परकोटा बनवाया ॥ ११ ॥ पुराणों में भूमि में जितने प्रपा (पौसरे) दान स्थित हैं उस धर्मात्माने वह सब दान दिये।॥ १२॥ फिर जन्म पर्यन्त तक किये पापोंका उसने प्रायश्चित्त किया सदा देवता अतिथिका पूजन करता॥१३॥ इस प्रकार कर्म करते उसके दो पुत्र हुए वह श्रीकुंडल विकुंडल नामसे प्रसिद्ध थे ॥ १४ ॥ उन बालकोंको घर सौंपकर वैश्य उदयास्तमनंयावदन्नदानंचकारसः ॥ पुरावाहिश्चतुर्दिाप्रपाश्चकेसुशोभनाः ॥ ११ ॥ पुराणेपुप्रसिद्धानिप्र पादानानिभूतले ॥ ददौदानानिधर्मात्मानित्यंदानरतस्तथा ॥ १२॥ यावजीवंकृतेपापेप्रायश्चित्तमथाक रोत ॥ देवपूजारतोनित्यंनित्यंचातिथिपूजकः ॥१३॥ तस्येत्थंवर्तमानस्यसंजीतोद्वौसुतौनृप ॥ तोतुप्रसिद्ध नामानौश्रीकुंडलविकुंडलौ ॥ १४ ॥ तयोर्मूर्भिगृहंत्यक्त्वाजगामतपसेवनम् ॥ तत्राराध्यपरंदेवंगोविंदंवरदंप्र भुम् ॥ १५ ॥ तपःक्किएशरीरोसोवासुदेवमनाःसदा ॥ आप्तवान्वैष्णवलोकंयत्रगत्वानशोचति ॥ १६॥ अथतस्यसुतोराजन्धनमानमदान्वितौ ॥ तरुणीरूपसंपन्नोधनगर्वेणगर्वितौ ॥ १७॥ दुःशीलौव्यसनासक्तौ धर्मकर्मविदूरंगौ ॥ नवाक्यंशृणुतोमातुर्वृद्धानांवचनं तथा ॥ १८॥ नारायणका भंजन करने वनको गया वहां गोविन्द प्रभुका आराधन कर ॥ १५॥ तपसे शरीरको क्लेश देता सदा वासुदेवमें मन लगाये वैष्णवलोकको प्राप्त हुआ जहां जाकर फिर शोच नहीं करता ॥ १६ ॥ हे राजन् ! तब उसके पुत्र धन मानसे मन होकर तरुण रूप सम्पन्न धनके गवसे गर्वित होकर ॥ १७ ॥ दुःशील व्यसनमें आसक्त-धर्म कर्मसे रहित हुए माता तथा वृद्ध जनोंके वचन नहीं मानते हुए ॥ १८ ॥ वे दुरात्मा पितृ मित्रोंका निषेध करनेवाले उन्मार्ग अधर्ममें निरत दुष्ट पराई स्त्रियोंको ताकनेवाले। तथा गमन करनेवाले ॥ १९ ॥ गीत बाजोंमें निरत वीगा वेणुको बजाते सैकडों वेश्या साथ लिये सदी गाते फिरते थे ॥ २०॥ बनावटी खुशामदी मनुष्योंसे युक्त धूर्तीकी गोष्ठीमें चतुर सुन्दर वेप सुन्दर वस्त्र सुन्दर चंदनसे विभूपित ॥ २१ ॥ सुगन्धित मालाओंसे युक्त कस्तूरीके चिह्नोंसे सेवित अनेक आभूपोंसे शोभित मोतोके श्रेष्ट हार पहरे ॥ २२ ॥ हाथी घोडे रोंके समूह उन्मार्गगौदुरात्मानौपितृमित्रनिपेधको ॥ अधर्मनिरतौदुष्टोपरदारांभिगामिनी ॥ १९॥ गीतवादिवनिरत वीणावेणुनिनादिनी ।। वारस्त्रीशतसंयुक्तौगायतौरतुःसदा ॥२०॥चाटुवाचिनरैर्युक्तो विटंगोष्ठीविशारदौ। सुवेपोचारुवसनौचारुचंदनभूपितो ॥२१॥ सुगंधमाल्यमालाचौकस्तूरीलक्ष्मलक्षितौ ॥ नानालंकारशो भाब्यौमौक्तिकोदारहारिणौ ॥ २२ ॥ गजवाजिरथोघेनकीडंतोतावितस्ततः ॥ मधुपानसमायुक्तीवारंस्त्रीरति मोहितो ॥२३॥ नाशयतौपितुर्द्रव्यंसहस्रंददतुःशतम् ॥ तस्थतुःस्वगृहेरम्यनित्यंभोगपरायणौ ।। २४॥ इत्यतुतद्धनताभ्यांविनियुक्तमसद्ययः ।। वारस्त्रीविटशैलूपमल्लचारणबंदिषु ॥२५॥ अपात्रेतद्धनंदत्तंक्षिप्तवी जमिवोपरे॥ नसत्पात्रेपुतहत्तनब्राह्मणमुखेहुतम् ॥२६॥ से युक्त इधर उधर क्रीडा करते हुए मधुपान किये वेश्या संग लिये ॥ २३ ॥ पिताका द्रव्य नाश करते सहस्रों सैकडों धन लुटाते नित्य भोग परायण अपने घरमें निवास करते थे ॥ २४ ।। इस मकार वह धन उन्होंने असन्मार्गमें व्यय किया वेश्या जार शैलूप पहलवान् भाट बनावटी श्लाघा करने वाले जनोंमें ॥ २५॥ अर्थात् अपात्रोंमें सर धन इस प्रकार व्यय किया जिस ४ मा.मा. भा.दी, १९ अ.६ प्रकार ऊपरमें बोया, न कभी सत्पात्रोंको दिया, न ब्राह्मणाके मुखमं हवन किया ॥ २६॥ न कभी भूतोंके पालक सब पापहारी विष्णुका अर्चन किया,इस, प्रकार उनका द्रव्य बहुत थोडे कालमें ही क्षय होगया ॥ २७ ॥ तब वे महादुःखी हो परम कृपणताको प्राप्त हुए शुधाकी पीडासे दुःखी हो शोचकरते मोहको प्राप्त होगये ॥ २८ ॥ यह घरमें कोई ऐसी वस्तु नहीं देखते हुए जिसे भोजन करें स्वजन बंधु सेवक उपजीवि ॥ २९ ॥ इन सबने द्रव्यके अभाव से उनको त्यागन कर दिया तब पुरमें निन्दा होने नार्चितोभूतभृद्विष्णुःसर्वपापप्रणाशनः॥ तयोरेवंतुतद्रव्यमचिरेणक्षयंययौ ॥२७ ॥ ततस्तौदुःखमापन्नौकार्प ण्यपरमंगतौ ॥ शोचमानोमुमुह्येतांक्षुत्पीडादुःखदुःखितौ ॥२८॥ तयोस्तुतिष्टतोर्गेहेनास्तियढुज्यतेतदा ॥ स्वजनेबांधव सर्वःसेवकैरुपजीविभिः ।। २९ ।। द्रव्याभावात्परित्यक्तौनिंद्यमानौततःपुरे ॥ पश्चाचौर्यसमारब्धं ताभ्यांतनगरेनृप ॥ ३० ॥ राजतोलोकतोभीतौरवपुरानिःसृतौतदा । चक्रतुर्वनवा संचसर्वेपामृणपीडितो॥ ॥ ३१ ॥ जतुःसततंमूढोशितवाणैर्विपादितः॥ नानापक्षिवराहांश्चहरिणाबोहितांस्तथा ॥ ३२॥ शशका ञ्छल्लकीगांधा श्वापदांश्चवहूंस्तथा ॥ महावलोभिल्लसंगावांखेटकरतौसदा ॥३३॥ एवंमांसमयाहारोपापा चारोपरंतप ॥ कदाचिद्भुधरप्राप्तएकोन्यश्चवनंगतः॥३४॥ लगी हे राजन् ! तब उन्होंने उस नगरमें चोरी करनी प्रारंभ की ॥ ३० ॥ तब राजा और लोकोंसे भीत हो अपने पुरते निकले और सबके ऋणसे पीडित हो वनमें निवास करते हुए ॥ ३२ ॥ और मूढ वहां तीक्ष्ण बाणोंसे अनेक पक्षी वराह हारिण रोहित मृग ॥ ३२॥ खरगोश शल्लक गोय अनेक हिंसकजीव मारने लगे वे महाबली भीलोंके संग आखेट करते थे ॥ ३३ ॥ इस प्रकार
मांसका आहार करते पापाचरणमें रत रहते एक समय किसी पर्वत पर प्राप्त हुए एक उनमेंसे वनको गया ॥ ३४ ॥ बडेको
सिंहने मार लिया और छोटेको सर्पने डस लिया हे राजन् ! एक ही दिन वे दोनों पापी मरणको प्राप्त हुए ॥ ३५॥ तब यमदूत
उनको पार्टीमें बांधकर यमलोकको लेगये जाकर दूतोंने कहा यह बडे पापी हैं ॥ ३६॥ हे धर्मराज ! इन दोनोंको हम आपकी
आज्ञासे लाये हैं अपने भूयोंको शीब आज्ञादो कि अब हम क्या करें ॥ ३७॥ चित्र गुप्तके द्वारा उनका लेखा लिया
शार्दूलेनहतोज्येष्ठःकनिष्ठःसर्पदंशितः॥ एकस्मिन्दिवसेराजन्पापिष्टौनिधनंगतौ ॥३५॥ यमदूतैस्तदाबद्धौ
पाशैनीतीयमक्षयम् ॥ गत्वाभिजगदुःसर्वेतेदूताःपापिनाविमौ ॥३६॥ धर्मराजनरावेतावानीतोतवशासनात्॥
आज्ञादेहिस्वभृत्येपुप्रसीदकरवामकिम् ॥ ३७॥ आलोक्यचित्रगुप्तेनतदादूताजगीयमः॥ एकस्तुनीयतांघो
रंनिरयंतीबवेदनम् ॥ ३८ ॥अपर-स्थाप्यतास्वर्गेयत्रभोगाअनुत्तमाः ॥ तदाज्ञातुसुसंप्राप्यतेस्तैः क्षिपकारि
भिः॥३९॥ निक्षिप्तोरोरवेघोरेतत्रज्येप्टोनराधिप ॥ तेषांदूतवरः कश्चिदुवाचमधुरवचः॥४०॥ विकुण्डलम
यासार्धमेहिस्वगंददामिते ॥ भुश्वभागान्सुदिव्यास्त्वमर्जितान्स्वेनकर्मणा ॥४१ ॥ इति श्रीपद्मपुराणे उत्तर
खंडे माघमासमाहात्म्ये वसिष्ठदिलीपसंवादे विकुण्डलस्वर्गप्राप्ति मपष्टोऽध्यायः ॥६॥
गया तब यमने कहा एकको तो घोर नरकमें जहां तीव्र वेदना होती है लेजाओ ।। ३८ ॥ दूसरेको उत्तम भोगवाले स्वर्गमें
लेजाओ शीघकारी दूतोंने उनकी आज्ञासे वैसाही क्रिया ॥ ३९ ॥ हे राजन् ! बड़ा तो घोर नरकमें भेजा गया तब एक दूत
मनोहर वचन बोला ॥ ४० ॥ हे विकुंडल ! मेरे साथ आ मैं तुझे स्वर्ग दूंगा अपने कर्मसे उत्पन्न भोगोंको तू भोग ॥ ४५ ॥
॥ इति श्रीपमपुराणे उचराधे माघमाहात्म्ये भापाटीकायां वसिष्ठदिलीपसंवादे विकुंडलस्वर्गप्रानि म पष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
.46 भा.टी. ..मा. अ. ७ ऋपि बोले वह प्रसन्न मन हो मार्गमें दूतसे पूंछने लगा हृदयमें बडा सन्देह कर परमविस्मयको प्राप्त हुआ ॥ १ ॥ मनमें विचारकर किसपुण्यके प्रभार से मुझे स्वर्गकी प्रानि हुई विकुंडल बोला हे श्रेष्ठ दूत ! मुझे बडा सन्देह है इस कारण तुझसे पूंछताहूं ॥ २ ॥ हम दोनोंने तुल्य कुल में जन्म लेकर तुल्यही कर्म किये दुर्भृत्युभी तुल्यही हुई तुल्यही यमराजका दर्शन हुआ ॥ ३॥ फिर तुल्य कर्मा मेरा भाई किम कारण नरकको गया मुझे स्वर्ग कैसे हुआ वह सन्देह तुम दूर करो ॥ ४ ॥ ॥ऋपिरुवाच ॥ ॥ ततोत्दृष्टमनाःसोपिदूतंपप्रच्छतंपथि ॥ संदेहहदिकृत्वातुविस्मयं परमंगतः ॥ १॥ विचारयनुत्दादिस्वर्ग:कस्यहेतोःफलंमम ॥ विकुंडलउवाच ॥ भोदूतवरपृच्छामिसंदेहत्वामहंपरम् ॥ २ ॥ आवाजातोकुलेतुल्येतुल्यंकर्मतथाकृतम् ॥ दुर्मृत्युरपितुल्योभूत्तुल्यं दृष्टोयमस्तथा ॥३॥ कथंसनिरयेक्षिप्तस्तु ल्यकाममाग्रजः॥ ममभावीकथं स्वर्गइतित्वछिधिसंशयम् ॥४॥ देवदूतनपश्यामिस्वस्यस्वर्गस्यकारणम् ।। इतिपृष्टोदेवदूतोविकुंडलमुवाचह ॥५॥ यमदूतउवाच ॥ ॥ मातापितासुतोजायास्वसाभ्राताविकुंडल ॥ जन्महेतुरियं संज्ञाजन्मकर्मोपभुक्तये॥६॥ एकस्मिन्पादपेयद्वच्छकुंतानांसमागमः ॥ पुत्रभ्रातृपितृणांचतथा भवतिसंगमः ॥ ७॥ तेपायोगोहियत्कर्मकुरुतेपूर्वभावितः ॥ तस्यतस्यफलंभुक्तकर्मणःपुरुप सदा ॥८॥ हे देवदूत ! अपने स्वर्ग आनेका कारण मैं नहीं देखता हूं यह सुन देवदूत विकुंडल से बोला ॥५॥ यमदूत बोला हे विकुंडल! माता पिता जाया भगिनी भाई यह संज्ञा तो जन्मका कारण है जन्म कर्मके भोगनको होता है ॥ ६॥ जैसे एक वृक्षपर अनेक पक्षियोंका आगमन होता है इसी प्रकार पुत्र माता पिता आदिका समागम होता है । ७ ।। उनके योगसे जो यह पूर्व भावित कर्म करता उस उस कर्मसे यह पुरुष सब काँको भोग करता है ।। ८ ।। हे वैश्य ! प्रीति पूर्वक तुझसे सत्य कहताहूं कि, मनुष्य प्रीतिसे शुभाशुभ कर्म अपना किया हुआ कालमें वारंवार भोगताहै।।९।।एकही कर्म करता और एकही उसका फल भोगता है हेवैश्य! कोई किसी के कर्मको प्राप्त नहीं होता है ॥ १० ॥ इस कारण तेरा माता घोर नरक में गया हे धर्मात्मन् ! तुम धर्मसे स्वर्गलोको जातेहो ॥ ११ विकुंडल बोला, हम दोनोंने सदा पाप किया, कभी धर्ममें मन नहीं लगाया, यदि हमारा पुण्य जानते हो तौ सत्यंवदामितेप्रीत्यानरःकर्मशुभाशुभम् ॥ स्वकृतंभुंजतेवेश्यकालेकालेपुनःपुनः ॥९॥ एकःकरोतिकर्माणि एकस्तत्फलमश्नुते ।। अन्योन्यंलिप्यतेवेश्यकर्मनान्यस्यकस्यचित् ॥ १० ॥ अतस्तुनरकेपापेतवभ्राता सुदारुणः ॥ त्वंचधर्मेणधर्मात्मन्स्वर्गप्राप्स्यसिशाश्वतम् ॥ ११॥ ॥ विकुंडलउवाच ॥ ॥ अवाभ्योः समपापेपुनपुण्येपुरतंमनः ॥ यदिजानासिमत्पुण्यंतन्मांत्वकृपयावद ॥ १२॥॥ यमदूतउवाच ।। शृणुवैश्य प्रवक्ष्यामियत्त्वयापुण्यमजितम् ॥ जानामितदहंसवनत्ववेत्सिसुनिश्चितम् ॥१३॥ हरमित्रसुतोविप्रःसुमित्रो वेदपारगः ॥ ॥ आसीत्तस्याश्रमः पुण्योयमुनादक्षिणेतदे ॥ १४॥ तेनतस्मिन्वनेसख्यंजातंतवविशांवर ॥ सत्संगेनत्वयास्नातंमाघमासदयंतथा ॥ १५॥ कपाकरके कहो ॥ १२॥ यमदूनने कहा हे वैश्य ! जो तैने किया है सो मैं कहताहूं तू सुन मैं सब जानताहूं परन्तु तुझको उसकी खबर नहीं ॥ १३ ॥ हरभित्रका पुत्र सुमिन वेदपारगामी ब्राह्मण है उसका पुण्य आश्रम यमुनाके दक्षिण तटमें है ॥ १४ ॥ हे वैश्यश्रेष्ठ ! वनमें उसके साथ तेरी मित्रता होगई और उस सत्संगतिके प्रभावसे तैंने मायके महीनेमें दो स्वान किया ॥ १५॥ ICON 100 COM RECTES भा. टी. .मा. अ.७ यमुनाके सब पाप हरने पाले पवित्र जलमें जो कि सब पाप दूरकरनेमें लोक विख्यात तीर्थहै ।। १६ ॥ सो एक वार माघस्नानके कारण तू सब पापसे विमुक्त हुआ और दूसरे के पुण्य से स्वर्गकी प्राप्ति तुझको हुई ॥ १७ ॥ उस पुण्यके प्रभाव से स्वर्गमे आनंद कर और नरकमे तेराभाई यमकी यातना भोगे ॥ १८ ॥ असिपत्र से छेदित और मुहरों से भेदित पत्थरों के प्रहार से चूर्णीय अंग अंगारोंसे तापित होगा ॥ १९॥ श्रीदत्तात्रेय बोले इस प्रकार दूतके वचन सुनकर भाईके दुःखसे दुःखी सब अंगसे पुलकित दीनहो कालिंदीपुण्यपानीयेसर्वपापहरेशुभे ॥ तत्तीर्थलोकविख्याते सर्वपापप्रणाशने ॥ १६॥ एकेनसर्वपापेभ्यो विमुक्तस्त्वं विशांवर ॥ द्वितीयमाघपुण्येनप्राप्तःस्वर्गस्त्वयानध ॥ १७ ॥ त्वंतत्पुण्यप्रभावेणमोदस्वसुचिरं दिवि ।। नरकेपुतवभ्रातासहतांयमयातनाम् ॥ १८॥ छिद्यमानोसिपश्चभियमानश्चमुद्गरैः ॥ चूय॑मानः शिलापृष्ठेस्तप्तांगारेषुभार्जितः ॥ १९ ॥ ॥ श्रीदत्तात्रेयउवाच ॥ ॥ इतिदूतवच श्रुत्वाभ्रातृदुःखेनदुःखितः ॥ पुलकांकितसर्वांगोदीनोसोविनयान्वितः॥२०॥ उवाचदेवदूतंतंमधुरंनिपुणंवचः ॥ मैत्रीसाप्तपदीसाधोसतां भवतिसत्फला ॥२१॥ मैत्रीभावविचिंत्याथमामुपाकर्तुमर्हसि । त्वत्तोहंश्रोतुमिच्छामिसर्वज्ञस्त्वंमतोमम ॥ ॥२२॥ यमलोकनपश्यंतिकर्मणा केनमानवाः ॥ गच्छतियेननिरर्थतन्मत्वंकृपयावद ॥२३॥ विनय पूर्वक ।। २० ।। देवदूतसे मधुरता पूर्वक मधुर वचन बोला हे महात्मन् ! सत्पुरुषों की सातपदकेही साथ होने से मित्रता होजाती है ॥ २१ ॥ मित्रताका भाव विचारकर तुम मेरे ऊपर रुपाकरो मैं तुमसे सुननेकी इच्छा करताहूं तुम मेरे मतमें सर्वज्ञ हो ॥ २२ ॥ किस-कर्मसे मनुष्य यमलोक का दर्शन नहीं करते जिससे नरकको न जांय सो रुपा करके तुम मुझसे २३ - कहो ॥ २३ ॥ यमदूत बोले सौम्य ! भली बात पूछी इससमय तुम पापरहित हो विशुद्ध हृदय होने में पुरुपोंकी कल्याण मार्गमें शुद्धि लगनी है ॥ २४ ॥ यद्यपि परसेवाके कारण मुझे अवसर नहीं है, तथापि तेरी प्रीतिके कारण मैं तुझसे कहताहूं ॥२५॥ सब अवस्थाओंमें मन वचन कर्मसे जो किसीको पीड़ा नहीं देते, वे यमालयको नहीं जाते ॥ २६ ॥ हिंसा करनेवाले पुरुष वेद दान यज्ञ तपसेभी सद्गतिको प्राप्त नहीं होते ॥ २७ ॥ अहिंसाही परम धर्म अहिंसाही परम तप अहिंसाही परम दान ऐसा ॥ यमदूत उवाच ॥ ॥ सम्यक्पृष्टत्वयासौम्यलुप्तपापोसिसांप्रतम् ॥ विशुद्धहृदयपुंसांबुद्धिः श्रेयसिजायते ॥२४॥ यद्यप्यवसरोनास्तिममसेवापरस्यवै ॥ तथापिचतवस्नेहात्प्रवक्ष्यामियथामति ॥२५॥ मनसाकर्म णावाचासविस्थासुसर्वदा ॥ परपीडनकुर्वतिनतेयांतियमालयम् ॥ २६ ॥ नवेदैर्नचदानैश्चनतपोभिर्न चाध्वरैः ॥ कथंचित्सद्गतियांतिपुरुपाःप्राणिहिंसकाः ॥ २७ ॥ अहिंसापरमोधर्मोह्यहिंसापरमंतपः ॥ अर्हि सापरमंदानमित्याहुर्मुनयः सदा ॥ २८ मशकान्मत्कुणान्दंशान्यूकादिप्राणिनस्तथा ॥ आत्मौपम्ये नरक्षतिमानवायेदयालवः ॥ २९ ॥ तप्तांगारमयंकालमार्गप्रेततरंगिणीम् ॥ दुर्गतिनचपश्यंतिकृतांतस्यचते नराः ॥ ३० ॥ भूतानियेत्रहिसंतिजलस्थलचराणिवै ॥ जीवनार्थहितेयांतिकालसूत्रांचदुर्गतिम् ॥ ३१ ॥ मनि जनाने सदा कथन किया है ॥ २८ ॥ मशक डांश खटमल लीख जूंआदिकोभी दयालु पुरुप पीडा देनेकी इच्छा नहीं करते अपनी समान रक्षा करते हैं ॥ २९ ॥ वने अंगारे के बने कीलवाले मार्गमें प्रेतकी तरंगवाली दुर्गति वे पुरुष नहीं देखते हैं। तथा कृतान्त का दर्शन नहीं करते हैं ॥ ३० ॥ जो जलथल के प्राणियोंकी हिंसा करते हैं और अपने भोजनके निमित्त करते भा.दी अ. ७ हैं वे कालकी गतिको प्राप्त नहीं होते ॥ ३३ ॥ वहां उनको उनके शरीरकाही मांस भोजन करनेको मिलता राध रुधिर फेन मजा वसा मिलती वहां आँधेमुख करके डाल दिये जाते हैं कीडे काटते हैं ॥ ३२ ॥ अंधकारमें परस्पर एक दूसरे को खाते हैं इसप्रकार दारुण शब्द करते एक कल्प वहां निवास करना पडता है ।। ३३ ।। हे वैश्य ! फिर वे नरकसे निकलकर स्थावरयोनिको प्रातहोते हैं फिर ये क्रूर अनेक तिर्यग् योनियों में निवास करते हैं ॥३४॥ हे वैश्य ! फिर वे जाति अंधे काने कुबडे लँगड़े दारिद्री स्वमांसभोजनास्तत्रपूयशोणितफेनदाः ॥ मजंतश्चवसापकंदुष्पाकीटैरधोमुखाः ॥ ३२॥ परस्परंचखादंतो ध्वांतेचान्योन्यघातिनः । वसंतिकल्पमेकंतेरटंतोदारुणंवम् ॥ ३३॥ नरकानिःसृतावैश्यस्थावरान्स्युश्चिरं तुते ॥ ततोगच्छंतितेकरास्तिर्यग्योनिशतेपुच ॥३४॥ पश्चाद्भवंतिजात्यंधा काणाकुब्जाश्चपंगवः ।। दार द्राअंगहीनाश्चपुरुपा प्राणिहिंसकाः ।। ३५ ।। तस्माद्वैश्यपरद्रोहकर्मणामनसागिरा ॥ लोकद्वयेसुखप्रेप्सुर्धर्म ज्ञोनसमाचरेत् ॥ ३६॥ लोकद्वयेनविंदतिसुखानिप्राणिहिंसकाः ॥ यहिंसंतिनभूतानिनतविभ्यतिकुंत्र चित् ॥ ३७॥ प्रविशंतियथानद्यःसमुद्रमृजुवक्रगाः॥ सर्वेधर्माह्यहिंसायांप्रविशंतितथादृढम् ॥३८॥ इति श्रीपद्मपुराणे उत्तरखंडेमाघमाहात्म्ये दिलीपवसिष्ठसंवादे विकुंडलदूतसंवादोनाम सप्तमोऽध्यायः॥७॥ अंगहीन होते हैं जो प्राणियोंकी हिंसा करते हैं ॥३५॥ हे वैश्य! इस कारण पराये द्रोह कर्म मन वाणी से दोनों लोक सुखकी प्राप्ति करनेवाला कभी न करे ॥३६॥ हिंसा करनेवालोंको दोनों लोक में मुख नहीं होता जो किसीकी हिंसा नहीं करते उनको कहीं से भय नहीं होता ॥ ३७॥ जिस प्रकार सीधी तथा कुटिलगामिनी नदी समुद्र में प्राप्त होती हैं इसी प्रकार सम्पूर्ण धर्म अहिंसामें प्राप्त होते हैं यह निश्चय है ।। ३८ ॥ इति श्रीपद्मपुराणे माघमाहात्म्ये पण्डितज्वालाप्रसाद मिश्रकत भाषाटीकायां सप्तमोऽध्यायः ॥७॥ ૧૨ SEE यमदूत बोला वह सब तीमें स्नान करचुका . सब यज्ञों में उसने दीक्षा प्राप्त करली हे वैश्य श्रेष्ठ ! जिसने सबको अभय देदिया ॥१॥ अपने २ शास्त्रोक्त धाँको जो यथा योग्य पालन करते हैं वे कभी यमालय का दर्शन नहीं करते ॥ ३ ॥ ब्रह्मचारी गृहस्थ वानप्रस्थ संन्यासी अपने धर्म में निरत रहकरही स्वर्गमें निवास करते हैं ॥३॥ जो' वर्णाश्रम धर्मों के यथोक्त कारी हैं और जितेन्द्रिय हैं वे सनातन ब्रह्मलोकको जाते हैं ॥ ४ ॥ जो इष्टापूर्त यज्ञों में रत और पंचयज्ञों ॥ यमदूतउवाच ॥ ॥ सस्नातःसर्वतीर्थेपुसर्वयज्ञपुदीक्षितः ॥ अभयंयेनभूतेभ्योदत्तमनविशांवर ॥१॥ निजांनिजांश्चशास्त्रोक्तान्वर्णधर्मानमिश्रितान् ॥ पालयतीहयेवेश्यनतेयांतियमालयम् ॥२॥ ब्रह्मचारीगृह स्थश्चवानप्रस्थोयतिस्तथा ॥ स्वधर्मनिरताःसर्वेनाकपृष्ठेवसंतिते ॥ ३ ॥ यथोक्तकारिणःसर्वेवर्णाश्रमसम न्विताः॥ नराजितेंद्रियायांतिब्रह्मलोकंचशाश्वतम् ॥ ४॥ इष्टापूर्तरतायेचपंचयज्ञरताश्चये ॥ यान्विताश्च येनित्यनेक्षतेतेयमालयम् ॥ ५॥ इंद्रियानिवृत्तायेसमर्थावेदवादिनः ॥ अग्निपूजारतानित्यंतेविप्राःस्वर्ग गामिनः॥ ६॥ अदीनवादिनःशूरा शत्रुभिः परिवेष्टिताः ॥ आहवेपुविपन्नायतेपांमागोंदिवाकरः ॥७॥ अनाथस्त्रीद्विजार्थेचशरणागतपालने ॥ प्राणांस्त्यजंतियेवैश्यतेमोदंतेसदादिवि ॥ ८॥ में प्रीति करते हैं तथा नित्य दया युक्त हैं वे यमालय का दर्शन नहीं करते ॥ ५ ॥ जो इन्द्रियों के विपयों से पृथक समर्थ वेदवादी हैं नित्य अग्रिहोत्र करते हैं वे ब्राह्मण स्वर्गगामी होते हैं ॥ ६ ॥ दीन वचन न कहनेवाले शूर शत्रुआ से वेष्टित संग्राम में प्राण देनेवाले सूर्य मार्गमें होकर गमन करते हैं . ॥ ७ ॥ जो अनाथ खी ब्राह्मण तथा शरणमें जा मा. भा.दी. अ. आपके निमित्त प्राण त्यागन करते हैं हे वैश्य ! वे स्वर्गमें सदा आनंद करते ह ॥ ८॥ लँगडे अंधे बालक वृद्ध रोगी अनाथ दरिद्री इनको जो सदा अन्न देते हैं वे स्वर्गसे पतित नहीं होते ॥ ९ ॥ पंकम फँसी गौ और रोगमें मग्न ब्राह्मण को देख कर जो मनुष्य उद्धार करते हैं वे अश्वमेधियोंके लोकको जाते हैं ॥ १० ॥ जो गौग्रास देकर गौकी शुशुपा करते हैं जो बैलके ऊपर नहीं चढते ये स्वर्गगामी होते हैं ॥ ११ ॥ जहां गौ जल पीती है वहां जो गर्न मात्र करदेते हैं ये विना यमलोकका दर्शन पंग्वंधवालवृद्धानांरोग्यनाथदरिद्रिणाम् ॥ येपुष्णंतिसदावैश्यनच्यवंतेदिवस्तुते ॥९॥ गांदृष्ट्वापंकनिर्मग्नां रोगमग्नंद्रिजंतथा ।। उद्धरंतिनरायेतुतेपालोकोश्वमेधिनाम् ॥ १० ॥ गोग्रासंयेप्रयच्छंतिशुश्रूपंतिचगांसदा ॥ येनारोहंतिगोपृष्ठेतेस्युःस्वलॊकगामिनः॥ ११॥ गतमात्रंचयेचकुर्यत्रगौवितृपीभवेत् ॥ यमलोकमदृष्ट्रेवतेयां तिस्वर्गतिनराः ॥ १२॥ वापीकूपतडागादौधर्मस्यांतोनविद्यते ॥ पिबंतिस्वेच्छयायत्रजलस्थलचरासदा ॥ ॥ १३॥ यथायथाचपानीयंपिवंतिस्वेच्छया नराः । तथातथाऽक्षयास्वर्गोधर्मवृद्धिर्विशांवर ॥१॥ प्राणिनां जीवनवारिमाणावारिणिसंस्थिताः ॥ तत्पपायेप्रयच्छतिते दीप्यतेसदादिवि ॥ १५॥ अश्वत्थमेकंपिचुमंद मेकंन्यग्रोधमेकंदशतिंतिणीकम् ॥ कपित्थविल्लामलकत्रयंचपंचाम्रवापीनरकं नपश्येत् ॥ १६ ॥ किये स्वर्गको जाते हैं ॥१२॥ बावडी कूप तडागादिमें धर्म अनन्त होता है जहां स्वेच्छासे स्थल चारी जलपान करते हैं ॥३३॥ स्वेच्छासे मनुष्य जैसे २ जलपान करते हैं हे वैश्य श्रेष्ठं वैसे २ ही उनको धर्मको वृद्धि और स्वर्गकी प्राप्ति होती है ॥ १४ ॥ प्राणियोंका जीवन और प्राग जलमें स्थित है सो जो पो लगाते हैं वे सदा स्वर्गमें रहते हैं ॥ १५ ॥ एक पीपल एक रुईका २३ एक न्यग्रोध (वटवृक्ष) तितिणी (इमली) के दश कैथ बेल आमलेके तीन आमके पांच वृक्ष लगाने से नरकका दर्शन नहीं होना है १६ ॥ वृक्ष पांच भी अच्छे हैं कुपुत्र दशभी अच्छे नहींवृक्ष पत्र पुष्प फल मूलोंसे सदा पितृतर्पण करते हैं ॥ १७॥ यह मी पुत्र अमिहोत्र नहीं करता अर्थात उसे आवश्यकता नहीं जो मार्गमें वृक्ष लगाकर सघन छायाकर देता है ॥१८॥ वह सदा मुसी वसता सदा आनंद देता है वह उसी समय यज्ञ कर रहा है जो वृक्ष लगाता है ॥ १९ ॥ वरंभूमिरुहा पंचनतुकोप्टरुहादश ॥ पःपुप्पैम्फलेर्मूलैःकुर्वतिपितृतर्पणम् ॥ १७ ॥ नतत्करोत्यग्निहोत्र सुहुतयोपितःसुतः ।। यत्करोतिषनच्छायःपादप-पथिरोपितः ॥१८॥ सदासुखीसवसतिसदादानंप्रयच्छति ॥ सदायशंसयजते योरोपयतिपादपम् ॥ १९॥ सच्छायान्फलपुप्पाढ्यान्पादपान्पथिरोपितान् ॥ येछिदंति सदामूढास्तेयांतिनिरयेचिरम् ॥ २० ॥ नपश्यतियमवैश्यतुलसीवनरोपणात् ॥ सर्वपापहरंपुण्यंकामदं तुलसीवनम् ॥ २३ ॥ तुलसीकाननंवैश्यगृहेयस्मिश्चतिप्पति ॥ तदहंतीर्थभूतहिनोयांति यमकिंकराः ॥ ॥ २२ ॥ तावदर्पसहस्राणियावदीजदलानिच ॥ वसतिदेवलोकेतेतुलसीरोपयंतिये ॥ २३ ॥ तुलसीगंधमा प्रायपितरस्तुष्टमानसाः॥प्रयांतिगरुडारूढाभवनंचक्रपाणिनः ॥२४॥ अच्छी छायापाले फल पुप्पोसे युक्त मार्ग में लगाये वृक्ष जो मूर्स काटते हैं वे नरकको जाते हैं ॥ २० ॥ हे वैश्य ! तुलसीका वन रोपण करने से यम का दर्शन नहीं होता सब पाप हरनेपाला परम पवित्र कामना देनेवाला तुलसीका वनहै ॥२१॥ हे वैश्य ! जिसके घरमें तुलसी कानन है वह घर तीर्थरूप है वहां यमके किंकर नहीं जाते ॥ २२ ॥ जो तुलसी लगाते हैं उनके बीज दल जितने हैं नितने कालतक वे स्वर्ग में निवास करते हैं ॥ २३ ॥ तुलसी गंध सुंचते ही पितर संतुष्ट होजाते हैं गरुड पर आरूढ .मा. भा.दी. २४ अ.८ भगवानके स्थानको जाते हैं ॥२४॥ हे वैश्य श्रेष्ठ । नर्मदाका दर्शन गंगाकालान तुलसीवनका स्पर्श यह सब समानहीं है ॥२५॥ इनके लगाने पालने सिंचने तथा दर्शन करने से तुलसी मन वचन कर्म से उत्पन्न हुए पापको दूर करती है ॥२६॥ हे वैश्य श्रेष्ठ ! द्वादशीको प्रतिपक्षमें ब्रह्मादिक देवता तुलसीका दर्शन पूजन करते हैं ॥ २७ ॥ माणि कांचनके पुष्प मोती यह तुलसीपत्रसे पूजन करनेकी पोडशी कला भी नहीं है ॥ २८ ॥ सहस्र आम लगाने से सौ पीपल लगाने से जो फल है वह एक तुलसीके दर्शनंनर्मदायास्तुगंगास्नानंविशांवर ॥ तुलसीवनसंस्पर्शः सममेतत्रयस्मृतम् ॥ २५ ॥ रोपणात्पालनात्से कादर्शनात्स्पर्शनान्नृणाम् ॥ तुलसीदहतेपापंवाङ्मनःकायसंचितम् ॥२६॥ पक्षेपक्षेतुसंप्राप्तेद्वादश्यांव श्यसत्तम ।।.ब्रह्मादयोपिकुर्वतितुलसीवनपूजनम् ॥२७॥ मणिकांचनपुष्पाणितथामुक्ताफलानिच ॥ तुलसी पत्रपूजायाःकलांनाहतिपोडशीम् ॥ २८॥ आम्ररोपसहस्रेणपिप्पलानांशतेनच ॥ यत्फलंहितदेकेनतुलसी विटपेनच ॥ २९ ॥ विष्णुपूजनसंसक्तस्तुलसीयस्तुरोपयेत् ॥ युगायुतंदशैकंचरोपकोरमतेदिवि ॥३०॥ तुलसीमंजरीभिस्तुकुर्यादरिहरार्चनम् ॥ नसगर्भगृहयातिमुक्तिभागीभवेन्नरः ॥ ३१ ॥ पुष्करादीनितीर्था निगंगाद्या सरितस्तथा ॥ वासुदेवादयोदेवावसंतितुलसीदले ॥३२॥ आरोप्यतुलसीवेश्यसंपूज्यतहलेहरिम्॥ वसंतिमोदमानास्तेयत्रदेवश्चतुर्भुजः ॥३३॥ विरुए से होताहै ॥ २९ ॥ विष्णु पूजनमें संसक्त चित्त जो तुलसीको रोपण करते हैं वह दशमहन युग तक स्वर्ग में ॥ ३० ॥ जो तुलसीकी मंजरी से नारायणकी पूजा करते हैं वह गर्भ में नहीं आते सदा मुक्ति भागी रहते हैं ॥ ३१ ॥ पुष्क रादि तीर्थ गंगादि नदी वासुदेवादि देवता सब तुलसीदल में निवास करते हैं ॥ ३२ ॥ जो तुलसीको लगाकर उस से नारायणका २४ पूजन करते हैं वे प्रसन्न होकर भगवान के निकट निवास करते हैं ॥ ३३ ॥ एक काल दो काल अथवा तीन कालम जा मनुष्य रेवा नदीमें प्रकट हुए भूतपतिका अर्चन करता है ॥ ३४ ॥ अथवा स्फटिक मणिके रत्न के पार्थिव के वा स्वयं प्रादुर्भूत अथवा कहीं तीर्थ वा बन में स्थापित किये हुएको ॥ ३५ ॥ नमः शिवाय इस मंत्र द्वारा जो जप करता है वह मनुष्य यमलोककी कथाभी अवण नहीं करते हैं ॥३६॥ शिवकी पूजाके प्रभावसे शिवभक्त शिव में तत्पर चौदह इन्द्रपर्यन्त शिवलोकमें आनंद करते एककालंद्रिकालंबात्रिकालवापियोनरः ॥ समर्चयतिभूतेशंलिंगेरेवासमुद्भवे ॥ ३४ ॥ स्फाटिकेरत्नलिंगेवापा थिवेवास्वयंभुवि ॥ स्थापितेवाकचिद्वैश्यतीर्थतीथंगिरौवने ॥ ३५ ॥ नम:शिवायमंत्रेणकुर्वतस्तनपंसदा ॥ शृण्वंतियमलोकस्यकथामपिनतेनराः॥३६॥ शिवपूजाप्रभावेणशिवभक्ता:शिवरताः ॥ मोदतशिवलोकंते यावदिवाश्चतुर्दश।।३७॥ प्रसंगेनापिमोहेनदंभेनापिहिलोभतः ।। येसेवतेमहादेवंनतेपश्यंतिभास्करिम् ॥३८॥ शिवार्चनसमपुण्यसर्वपापप्रणाशनम् ।। सर्वेश्वर्यप्रदवैश्यनास्तिकिंचिजगत्रये ॥ ३९ ॥ शिवभक्तिंप्रकुर्वाणाये द्विपतिजनार्दनम् ।। तेपानिरयपातस्तुतत्कालेचउदाहृतः॥४०॥ द्रव्यमन्नफलंतोयंशिवस्वनस्पृशेत्कचित् ।। निर्माल्यंनेवसलंघेत्कूपेसर्वचतत्क्षिपेत् ॥४१॥ हैं॥३७॥प्रसंग से भी दम मोह या लोभयुक्त होकर भी जो शिवका दर्शन करतेहैं वे यमका दर्शन नहीं करते हैं।॥३८॥शिवार्चनकी समान पुण्यकारक पापका नाश करनेवाला सब ऐश्वर्यका देनेवाला त्रिलोकी में नहीं है ॥३९॥ हे वैश्य! शिवभक्ति करनेवाले यदि जनार्दनकी निन्दा करें अथवा नारायणके भक्त शिवकी निन्दा करें तो अवश्य नरकपात होता है और इस में कुछभी सन्देह नहीं है॥४०॥ द्रव्य अन्न फल जल जो शिव का धन है उसको ग्रहण न करै तथा उनके निर्माल्यको लंघन न करै कहीं एकांतर्मे निक्षेप ra मा.मा. R) अ.८ किरदे ॥४१॥ जो लोभ वा मोहसे मक्खीके पाद मात्र भी शिवका धन लताहै चढाया खाताहै वह कल्प पर्यन्त नरक. पाता। भा. टी. है शिव निर्माल्य योगियोंको ग्राह्य है जो कि, लिया करते हैं, शिव लिंगपर चढा हुआ ही सर्व साधारणको अग्राह्य है अन्य नहीं । ॥४२॥ उन्तालीस से बयालीस श्लोकतक अप्रासंगिक श्लोक होनेसे क्षेपक विदित होते हैं, तृण काष्ठ वा पापाण का जो शिवकी मंदिर बनाते हैं यह मनुष्प शिवके साथ सदा शिवलोक में आनंद करते हैं ॥४३॥ ब्रह्मा विष्णु महादेव इन तीनों देवताओंमें किसी एक मक्षिकापादमाहिशिवस्वमुपजीवति ॥ मोहाल्लोभात्सपच्येतकल्पांतनरकंनरः ॥ ४२ ॥ तृणैःकाष्ठैश्चपापाणे येंकुर्वतिशिवालयम् ।। मोदंतेसहरुद्रेणतेनरा-शिवसन्निधौ ॥४३॥ ब्रह्मविष्णुमहादेवप्रासादमठमेवच ॥ कृत्वा तुसुचिरंकालंतत्रलोकवसंतिते ॥४४॥ येधर्ममठगोशाला-पथिविश्राममंदिरम् ॥ यतीनांसद वैश्यदानानां चकुटीरकम् ॥ ४५ ॥ ब्रह्मशालांचविपुलांत्राह्मणस्यचमंदिरम्।। सृष्ट्वायांतिविशांश्रेष्ठइंद्रस्यभवननराः ॥४६॥ जीर्णोद्धारेणवतेपांतत्फलंद्विगुणंभवेत् ॥ तद्भगंयत्रयःकुर्यात्सगच्छेन्निरयंध्रुवम् ॥१७॥ देवविप्रयतीनांतुमठलो भविमोहितः॥ मठाधिपत्ययःकुर्यात्सर्वधर्मवहिप्कृतः॥१८॥ देवताका भी मंदिर बनाने से चिरकाल तक उन उन देवताओंके लोक में निवास करता है ॥४४॥ जो मार्गमें धर्मशाला मठ वा विश्राममंदिर बनाते हैं हे वैश्य! जो यतियोंको स्थानकुटी बनाते हैं दान देते हैं ॥ ४५ ॥ ब्रह्मशाला तथा बाह्मणका मंदिर बनाते हैं हे वैश्यश्रेष्ठ ! वे इन्द्र भवनमें निवास करते हैं ॥ ४६॥ और जो इन स्थानोंका जीणोद्धार करते हैं उनको फल होता है और जो इनको तोडता है वह घोर नरक को जाता ॥ ४७ ॥ पत्र पुष्प फल द्रव्य अन्न मठ · जो दुगुना
पचालेते हैं वे इक्कीस नरकोंका दुःख भागते हैं ॥४८॥ जो देव ब्राह्मण यतियोंके मठको लोभसे अपना कर
लेता है वह सब धर्मसे बहिष्कृत होता है ॥ ४९ ॥ जो अपने पुत्र पशु बांधवोंको नरक में ले जाने चाहै वह इस ब्राह्मणोंके
तथा गौओंके स्थानमें अधिकार करताहै ॥५०॥, मठधारियोंका अन्न अभोज्य है उसको खाकर चान्द्रायण करै और इन
मठाधिकारियोंको स्पर्श करके सवस्त्र स्नान करे ॥ ५१ ॥ आदित्य चंडिका विष्णु रुद्र गणेश्वर इनका अन्न जो अन्यायसे खाते हैं
पत्रपुप्पंफलंतोयंद्रव्यमनमठस्यच ।। योश्नातिनरकान्घोरान्सेवतेचेकविंशति ॥४९॥ यइच्छेनरकनेतुंसपु
पत्रशुवांधवम् ॥ तंदेवेप्वधिपंकुर्याद्गोशुचित्राह्मणेपुच ॥५०॥ अभोज्यंमठिनामन्नंभुक्त्वाचांद्रायणंचरेत् ॥
स्पृष्ट्वामठपतिवैश्यसवासाजलमाविशेत् ॥५१॥ आदित्यंचण्डिकांविष्णुंरुद्रंचैवगणेश्वरम् ॥ उपभुअंतिये
व्यतेवनिरयगामिनः॥१२॥ ब्रह्मविष्णुमहेशानांपूजार्थंपुष्पवाटिकाम् ॥ आरोपयंतियेधन्यादेवलोकेवसं
तिते ॥ ५३॥ येसदापितृदेवांश्चप्रीणयंत्यतिथीन्सदा ॥ प्राजापत्यंहितेयान्तिलोकंसर्वोत्तमोत्तमम् ॥ ५४॥
मूखोंवापंडितोवापिश्रोत्रियापतितोपिवा ॥ ब्रह्मतुल्योतिथिर्वेश्यमध्याह्नयः समागतः॥५५॥ पथिश्रांताय
विप्रायान्यस्मेक्षुधितायच ॥ प्रयच्छंत्यन्नपानीयंतेनाकेचिरवासिनः॥५६॥
वे नरकगामी होते हैं ॥ ५२ ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश्वरकी पूजाके निमित्त जो फुलवारी बनाते हैं वे धन्य हैं और देवलोकमें निवास
करते हैं ॥ ५३ ।। जो सदा देवता पितृ अतिथियोंका पूजन श्राद्ध और सत्कार करते हैं वह प्रजापतिके सर्वोत्तम लोकोंको प्राप्त
होते हैं ॥ ५४ ॥ मूर्ख पंडित श्रोत्रिय वा पतित हे वैश्य ! मध्याह्नमें जो अपने यहां आने वह ब्रह्मकी तुल्य सत्कार योग्य
है ॥ ५५ ॥ मार्गमें श्रान्त ब्राह्मण वा और किसी भूखेको जो जल देते हैं वे चिरकालतक स्वर्गमें निवास करते हैं ॥ ५६ ॥
मा.मा. अ.८ जो कभी देखे नहीं ऐसे पुरुष आनकर भूखे प्राप्त हो तो वे जिसके घर तृन होते हैं वे स्वर्गमें निवास करते हैं ॥ ५७ ॥ जिसके भा.टी. घर आया अतिथि निराश होकर चला जाता है हे वैश्य ! सायं वा मध्याह्नमें उलटा लौटजाता है वह यमालयको जाता है ॥५८॥ जब के नहींहै २ यह वचन सुन अतिथि निराश होकर चला जाता है वह गृहस्थीका जन्मसंचित पुण्य ग्रहणकरके ले जाता है ॥ ५९ ॥ अतिथिकी समान बंधु अतिथिकी समान धन अतिथिकी समान धर्म और अतिथिकी समान हितकारी कोई नहीं प्राप्तादृष्टपूर्वाश्चमोक्तुकामा:क्षुधातुराः ॥ यद्गुहेतृप्तिमायांतिब्रह्मलोकवसंतिते ॥५७॥ अतिथिर्विमुखोयस्य संगच्छेद्गृहमागतः॥ मध्याह्नवैश्यसायवासप्रयातियमालयम् ॥ ५८॥ नास्तिनास्तिवचःश्रुत्वात्यक्ताशोह्य तिथिजेत्॥ आजन्मसंचितंपुण्यंगृह्णातिगृहमेधिनः ॥ ५९॥ नास्त्यतिथिसमोवंधु स्त्यतिथिसमंधनम् ॥ नास्त्यतिथिसमोधर्मोनास्त्यतिथिसमोहितः ॥६०॥ आतिथ्यस्यप्रभावेणराजानोमुनयस्तथा ॥ ब्रह्मलोकं गताद्यापिनच्यवंतेविशावर ॥६१ ॥ आजन्मतोगृहस्थोय-प्रमादाद्वाकथंचन ॥ भोजयेदतिथिनूननेवपश्य तिसोतकम् ॥ १२॥ सुदीप्तेषु विमानेषुभुंक्तेपीयूपमन्नदः॥ यातिस्वर्गच्युतोवैश्यउत्तरांश्चकुरून्प्रति ॥ १३॥ ततश्चभारतेवराजाभवतिधार्मिकः ॥ अन्नदोदीर्घमायुश्चविदतेसुखसंपदः॥ ६४ ॥ है ॥ ६० ॥ आतिथ्यकेही प्रभाव से राजा और मुनि.ब्रह्मलोकको प्राप्त हुए आजतक निवृत्त नहीं होते हैं ॥ ६३ ॥ हे वैश्य ! जो जन्मसे गृहस्थ कभी प्रमादसे अतिथिको भोजन करादे वह भी यमलोकका दर्शन नहीं करते हैं । ६२ ॥ प्रदीप्त विमानों २६ अमृतवत् अन्नको भोजन करते हैं और स्वर्गसे च्युत होकर उत्तर कुरुओंमें जन्म पाते हैं ॥ ६३ ॥ ,फिर भारतवर्ष में धर्मात्मा ।
राजा होना है अनका देनेवाला दीर्घायु और सुखसम्पत्तिको प्रान होताहै ॥६४ ॥ सब भूतोंके प्राण अनमें प्रतिष्ठित हैं हे वैश्य ! इस कारण कन्नका देनेवाला प्राणदाता कहा जाता है ॥ ६५ ॥ यह वैवस्वतदेवने राजा केसरिध्वजसे जब कि, वह स्वर्गलोकसे पत्तित होताथा करुणाकर कहा ॥ ६६ ॥ हे राजन् ! यदि तुझको स्वर्ग जानेको इच्छा है तो कर्मभूमिमें जाकर अन्नदान कर ॥ ६७ ॥ हे वैश्य ! यह बात मैंर्ने साक्षात् धर्मके मुखसे सुनी है अन्नदानकी समान दूसरा दान नहीं है ऐसा मैंने निश्चय कर सर्वेपामेवभूतानामन्नेप्राणा प्रतिष्टिताः॥ तेनानदोविशांश्रेष्ठप्राणदातास्मृतोयुधैः ॥६५॥ प्राह वैवस्वतोदेवो राजा केसरिध्वजम् ॥ च्यवंतंस्वर्गलोकात्तंकारुण्येनविशांपते ॥६६॥ ददस्वानंदस्वानंददस्वानंनराधिप।। कर्मभूमोगतोभूयोयदिस्वगत्वमिच्छसि ॥ ६७ ॥ इत्याविमयावैश्यसाक्षाद्धर्ममुखादपि ॥ अन्नदानसमं दानमतोनास्तिमयोदितम् ।। ६८॥ पानीयंप्रददेवीप्मेहेमंतेचतपोधन ॥ अनंचसर्वदादत्त्वागच्छेद्याम्यांनया तनाम् ॥ ६९ ॥ ज्ञाताज्ञातेपुपापेपुक्षुद्रेपुचमहत्सुच ॥ पसुपसुचमासेघुप्रायश्चित्तंतुयश्चरेत् ॥ ७० ॥ निष्कल्मपोनरोवैश्यसकृतांतनपश्यति ॥ प्रायश्चित्तंचरेद्यस्तुवाड्मनःकायकर्मसु ॥७१ ॥ सप्राप्नोतिशुभाँल्लो कान्देवगंधर्वशोभितान् ॥ नित्यंजपंतियवैश्यगायत्रींवेदमातरम् ॥ ७२ ॥ कहा है ॥ ६८ ॥ जो ग्रीष्मऋतुमें जल और हेमन्तमें अन्नदान करते हैं वे यमकी यातनाको नहीं देखते हैं॥ ६९ ॥ ज्ञात अलात छोटे बड़े पापोंका जो छः छः महीनेमें प्रायश्चित्त करे ॥ ७० ॥ हे वैश्य ! वह पापरहित होकर कृतान्तको नहीं देखता है जो वाणी मन कर्ममे प्रायश्चित्न करता है ।। ७१ ॥ वह देवगन्धयाँसे शोभित उत्तमलोकोंको प्राप्त होता है हे वैश्य ! जो वेदमाता मा.मा. भा.टी. २७ अ.८ गायत्रीका नित्य जप करते हैं ॥७२॥ या दूसरा वैदिक जप करते हैं वे पातकोंसे लिप्त नहीं होते हैं जो वेदाभ्यासमें रत होकर प्रातः सायं अग्निमें ।।७३॥ हवन करते हैं हे वैश्य ! वे ब्राह्मण शुभ गातिके अधिकारी होते हैं नित्य व्रत कर्ता और नित्य तीर्थसेवी ।। ७४ ॥ नित्य जितेन्द्रिय पुरुप सत्यही कठिन यमयातनाका दर्शन नहीं करते हैं, दारुण नरकका स्मरण कर परान्नसे प्रीति त्यागन करे ॥७५॥ जो जिसका अन्न खाता है वह उसका पापही खाता है तथा प्रभातकाल लान करनेवाला यमकी यातनाको प्राप्त अन्यद्रावैदिकंजाप्यंनतेलिंपतिपातकैः ॥ वेदाभ्यासरतानित्यंसायंप्रात ताशने ॥ ७३ ॥ येजुह्वतिद्विजावै श्यतेलभंतेऽक्षयांगतिम् ॥ नित्यंत्रतसमाचारोनित्यंतीर्थोपसेवकः ॥ ७४ ॥ नित्यंजितेंद्रियःसत्यंयमरौद्र नपश्यति ॥ नरकंदारुणस्मृत्वापरानेचरतित्यजेत् ॥ ७५ ॥ योयस्याग्नंसमश्नातितस्याश्नातिचकिल्विपम् ॥ याम्यहियातनादुःखंप्रातःस्नायीनविंदति ॥ ७६ ॥ प्रातःस्नाननपूयतेआतिपापकरानराः ॥ प्रातःस्नानं हरेद्वैश्यसबाह्याभ्यंतरंमलम् ॥ ७७॥ प्रातःस्नानेननिष्पापोनरोननिरयंव्रजेत् ॥ स्नानविनातुयोभुक्तेसम लाशीसदानरः ।। ७८॥ अस्नायिनोऽशुचेस्तस्यनिराशा-पितृदेवताः ॥ स्नानहीनोनर पापस्नानहीनोऽ शुचिःसदा ॥ ७९ ॥ नहीं होता है ।। ७६ ॥ प्रभात लान करनेसे पापी मनुष्यभी पवित्र हो जाते हैं हे वैश्य ! प्रभातकाल स्नान करनेसे बाहर भीतरका मल स्वच्छ हो जाता है ॥ ७७ ॥ प्रभातमें स्नान करनेसे पाप रहित हो मनुष्य नरकको नहीं जाता है जो स्नानके बिना भोजन करता है वह पाप भौजी है ॥ ७८ ॥ जो स्लान नहीं करता अपवित्र रहता है उसके पितृ देवता निराश होजाते हैं स्लान हीन मनुष्य पापरूप और स्लानहीन सदा अशुचि है ।। ७९ ॥ स्लान न करनेवाला नरक भोगकर पुक्कस चाण्डालादिकी योनियों में जन्म लेता है, और जो तपयुक्त पर्वोमें स्नान करते हैं ॥ ८० ॥ न उनकी दुर्गति होती न कुयोनियों में जन्म होता है दुस्स्वप्न और दुश्चिन्ता सदा मोघ हो जाती है ॥ ८१ ॥ हे वैश्य श्रेष्ठ ! प्रभातस्नानसे शुद्ध मनुर्योको तिलका पात्र तिलकमल यथा विधिसे दे ॥ ८२ ॥ इसके प्रदान करनेसे फिर मनुष्य यमलोकको कभी नहीं जाते हैं, पृथ्वी, सुवर्ण, गौ यह पोडश महा दान हैं। अस्नायीनरकंभुक्त्वापुल्कसादिपुजायते ॥ येपुनस्तपसिस्नानमाचरंतीहपर्वणि ॥ ८० ॥ तेनैवदुर्गतियांति नजायंतेकुयोनिषु ॥ दुःस्वप्नंदुष्टचिंत्यंचवंध्यभवतिसर्वदा ॥८॥ प्रातःस्नानविशुद्धानांपुरुपाणांविशावर ।। तिलांश्चतिलपापंचतिलप यथाविधि ॥ ८२ ॥ दत्त्वाप्रेतपते मिनबजतिनराक्वचित् ॥ पृथिवींकांचनंगाश्च महादानानिपोडश ॥ ८३ ॥ दत्त्वातुननिवर्ततेस्वर्गलोकाद्विकुंडल ॥ पुण्यासुतिथिषुप्राज्ञोव्यतीपातेचसं क्रमे ॥ ८४ ॥ स्नात्वादत्त्वातुयत्किचिनवेगच्छतिदुर्गतिम् ॥ नैवाकमंतिदातारोदारुणरौरवपथम् ॥८॥ इहलोकेनजायतेकुलेधनविवर्जिते ॥ सत्यवादीसदामौनीप्रियवादीचयोनरः ।। ८६॥ अक्रोधनः क्षमासारो. नातिवागनसूयकः ॥ सदादाक्षिण्यसंयुक्त सदाभूतदयान्वितः॥ ८७ ॥ ॥ ८३ ॥ हे विकुंडल इनके दान करनेसे स्वर्गलोकसे निवृत्ति नहीं होनी हे बुद्धिमान् ! पवित्र तिथियोंसे व्यतीपात वा संक्रान्तिमें ॥ ८४ ॥ स्नान दान करनेसे फिर दुर्गतिको प्राप्त नहीं होता, ऐसे दाता दारुण रौरवनरको नहीं पड़ते हैं ॥ ८५॥ इस लोकमें फिर धनहीनके यहां उसका जन्म नहीं होता जो मनुष्य सत्यवादी मौनी और प्रियवादी हैं ॥ ८६ ॥ क्रोधहीन क्षमा सारवान भा.दी. मा. मा. २८ अ.८ बहुत न बोलनेवाले निन्दारहित सदा चतुरतायुक्त सदा प्राणियों पर दया करनेवाले ॥ ८७ ॥ पराये धमाके रक्षक पराये गुणों के कथन करनेवाले जो तिलमात्रभी मनसे पराये धनको नहीं लेते हैं ॥ ८८॥ हे वैश्यश्रेष्ठ ! वह नरककी यातनाको प्राप्त नहीं होते पराये निन्दक पापी पाप में अनुरन पुरुष ॥ ८९ ॥ प्रलय पर्यन्त घोर नरकम पड़े रहते हैं खोटे वचन कहने वाले को नरक गामी जानना चाहिये ॥ ९० ॥ इसम सन्देह नहीं कि वह फिर भी नरकगामी होगा कतन्न की तीर्थ और तपस्या से गोप्ताचपरधर्माणांवक्तापरगुणस्यच ॥ परस्वतिलमातुमनसापिनयोहरेत् ॥८८॥नपश्यतिविशांश्रेष्ठसवै नरकयातनाम् ।। परापवादीपापिष्टम्पापप्वभिरत सदा ॥८९॥ पच्यतेनरकेघोरेयावदाभूतसंप्लवम् ॥ वक्ताप रुपवाक्यानांमंतव्योनरकागतः॥९०॥.संदेहोनविशांश्रेष्ठपुनर्यास्यतिदुर्गतिम् ॥ नतीर्थे तपोभिश्चकृतनस्याऽ स्तिनिष्कृतिः ॥९१॥ सहतेयातनांधोरांसनरोनरकेचिरम् ॥ पृथिव्यांयानितीर्थानितेपुमज्जतियोनरः ॥१२॥ जितेंद्रियोजिताहारोनसयातियमालयम् ॥ नतीर्थेपातकंकुर्यात्त्यजेत्तीर्थोपजीवनम् ॥ ९३ ॥ अन्यतीर्थ समांगंगांयोंत्रवीतिनराधमः ॥ सयातिरोखवेश्यनरकंदारुणंभृशम् ॥ ९४॥ तीर्थप्रतिग्रहस्त्याज्यस्त्याज्यो 'धर्मस्यविक्रयः ॥ दुर्जरंपातकंती/दुरश्चप्रतिग्रहः ॥ १५ ॥ निष्कृति नहीं होती ॥ ९३ ॥ वह मनुष्य चिरकालतक नरक में घोर यातनाको प्राप्त होगा पृथ्वीमें जितने तीर्थहें उन मनुष्य स्नान करताहै ॥९२॥ जितेन्द्रिय जिताहार होने से वह फिर यमालयको नहीं जाता तीर्थमें पातक न करै तीर्थमें जीविका न करै ।। ९३ ॥ जो नराधम गंगाकों और तीर्थोकी समान कहताहै हे वैश्य ! वह दारुण रौरव नरक में पड़ताहै ॥ ९४ ॥ तीर्थमें दान न ले धर्मका विक्रय न करै तीर्थ में किया पानक दुर्जर है और इसी प्रकार प्रतिग्रहभी दूर नहीं होता ॥ ९५ ॥ २८ तीर्थमें किये सभीपापदुर्जरहें इनके करनेसे नरक होताहै एक बार गंगा स्नान करनेसे पवित्र होकर ।।९६॥ कितनेही पाप किये हो परन्तु वह मनुष्य नरकको नहीं जाता व्रतदानं तप यज्ञ औरजो पवित्र करने वाले हैं ॥९७॥ वे गंगाके एक विन्दु अभिषेक की समान नहीं है ऐसा हमने सुना है धर्म द्रव्य धर्म बीज बैकुण्ठनाथके चरण से च्युत हुई ॥ ९८ ॥ फिर शिवजीने शिरपर धारण की इत्यादि कारणों से गंगा अनेक प्रकार से निर्मल हुई है जो ब्रह्म निर्गुण प्रकृति से परे है ॥ १९ ॥ तीर्थपुदुर्जरंसर्वमेतत्कृन्नरकंत्रजेत् ॥ सकृद्गांभसिस्नात्वांपूतोगांगेनवारिणा ॥ ९६ ॥ नरोननरकंयाति अपिपातकराशिकृत् ।। व्रतंदानंतपोयज्ञाः पवित्राणीतराणिच ॥ ९७॥ गंगाविंद्वभिपेकस्यनसमानीतिवि श्रुतम् ॥ धर्मव्यधर्मवीजवकुंठचरणच्युतम् ॥ ९८॥ धृतंमूर्तिमहेशेनयद्गाङ्गममलंजलम् ॥ यहोवनसंदे होनिर्गुणंप्रकृतेःपरम् ॥ ९९ ॥ तेनकिंसमतांगच्छेदपिब्रह्मांडगोलके ॥ गंगेतिनामग्रहणायोजनानांशतैरपि ।। ॥१०० ॥ नरोननरकंयातिकितयासदृशंभवेत् ॥ नान्येनदह्यतेसद्यःक्रियानरकदायिनी ॥१॥ गंगांभसि प्रयत्नेनस्नातव्यतेश्चमानुपैः ।। प्रतियहनिवृत्तोयः प्रतिग्रहक्षमोपिसन् ॥२॥ सद्विजोद्योततेवेश्यतारारूप श्चिरंदिवि ॥गामुद्धरंतियेपंकायेचरक्षेतिरोगिणम् ॥ ३॥ ब्रह्माण्ड गोलकर्म उसकी समताको किस प्रकार प्राप्त हो सका है गंगा इस नामके ग्रहण करने से सौ योजनसे भी॥ १०॥ मनुष्य नरकको पाम नहीं होना नरक देने वाली क्रिया शीच और कार्य से दग्ध नहीं होती ॥ ३॥ प्रयत्न से गंगाजलमें मनुष्योंको स्नान करना चाहिये जो प्रतिग्रहसे निवृत्त है और प्रतिग्रहमें क्षमावाला है ॥ २ ॥ हे वैश्य ! यह ब्राह्मण नारे की। HD I] मा.मा. भा.टी. २९ 4- समान स्वर्ग में प्रकाशित होता है जो पंक से गौका उद्धार करते हैं जो रोगी की रक्षा करते हैं ॥ ३ ॥ जो गोशाला में शरीर त्यागते हैं वे आकाश में तारागण होते हैं प्राणायाम करनेवाले यमलोक का दर्शन नहीं करते हैं ॥ ४ ॥ दुष्कृत कर्म करनेवाले भी पापहीन होते हैं हे वैश्य ! जो दिन २ सोलह सोलह प्राणायाम करते हैं ॥ ५ ॥ उनकी भ्रूणहत्या का पाप दूर होता है जो तप करते व्रत नियम धारण करते हैं ॥ ६॥ और सहस्र गोदान करते हैं वह प्राणायाम की बराबर फल है जो कुशाय से एक नियंतेगोगृहेचैवतेस्युनभसितारकाः ॥ यमलोकनपश्यंतिप्राणायामरतानराः॥४॥ अपिदुप्कृतकर्माणस्त एवहतकिल्विपाः ॥ दिवसेदिवसेवैश्यप्राणायामास्तुपोडश ॥५॥ अपिभ्रूणहताःपुंसांपुनंत्यहरहःकृताः ॥ तपांसियानितप्यतेवतानिनियमाश्चये ॥ ६॥ गोसहस्रप्रदानञ्चप्राणायामास्तुतत्समाः ॥ गंगांभोपिकुशाग्रे णमासमेकंतुयःपिवेत् ।।७। संवत्सरशतंसायंप्राणायामस्तुतत्समः॥पातकंतुमहद्यच्चतथाक्षुद्रोपपातकम् ॥८॥ प्राणायामैक्षणात्सर्वंभस्मसाचविशांवर ॥ मातृवत्परदारान्येसंपश्यंतिनरोत्तमाः ॥ ९॥ तेनयांतिविशांश्रेष्ठ कदाचिद्यमयातनाम्॥ मनसापिपरपांयाकलत्राणिनसेवते ॥ ११० ॥ सहिलोकद्वयेदेवस्तेनवेश्यधराधृता ॥ तस्मात्सर्वात्मनात्याज्यपरदारोपसेवनम् ॥ ११॥ महीने तक गंगाजल पान करते हैं ॥ ७ ॥ सो सम्वत्सर प्राणायाम करनेकी वरावर उसका फल है महापातक और क्षुद्र उपपातक हैं ॥ ८ ॥ प्राणायाम से क्षणार्ध में भस्म हो जाते हैं जो नरश्रेष्ठ पराई त्रियों को माता की समान देखते हैं ॥ ९ ॥ हे वैश्य वे कभी यमलोकको नहीं जाते जो मनसे भी पराई त्रियों की सेवा नहीं करते ॥10॥ उसने दोनों लोक मानो अपने वशमें २९ कर लिये हैं इस कारण सम प्रकार से पराई म्रियोंका सेवन न करना चाहिये ॥ ३३ ॥ पराई स्त्री इक्कीसवार नरक म प्राप्त करावा है जिनका मन दूसरों के मनका लोभी नहीं होताहै ॥ १२ ॥ हे वैश्य श्रेष्ठ ! ये देवलोक को गमन करते हैं यमलोक को नहीं जाते, जो कोधके निमिन प्राप्त होनेमें क्रोध को नहीं जीतता है ॥ १३ ॥ उस अक्रोधी पुरुप को स्वर्गका जीतनेवाला जानना चाहिये, जो मातापिनाको देवता जानकर आराधना करताहै ॥ १४ ॥ वह वृद्धसेवी यमालय को गमन नहीं करता है जो नयंतिपरदारास्तुनरकानेकविंशतिम् ।। नलोभेजायतेयेपांपरद्रव्येपुमानसम् ॥ १२ ॥ तेयांतिदेवलोकेहि नयाम्यवेश्यसत्तम ॥ सत्सुक्रोधनिमित्तपुयःक्रोधेननजीयते ॥ १३ ॥ जितस्वर्गः समतंव्यःपुरुपोक्रोधनो भुवि ॥ मातरंपितरंयस्तुआराधयतिदेववत् ॥ १४ ॥ संप्राप्तेवार्धकेकालेनसयातियमालयम् ॥ पितुराधिक्य भावेनयेऽयंतिगुरुंनगः ॥ १५॥ भवत्यतिथयोलोकेब्रह्मणस्तविशांवर ॥ इहताश्चस्त्रियोधन्याशीलस्यपरि रक्षणात् ॥१६॥ शीलभंगेननारीणांयमलोकः सुदारुणः ॥ शीलंरक्षतियानित्यंदुष्टसंगविवर्जनात् ॥१७॥ शीलेनहिपरः स्वर्गःखीणांवेश्यनसंशयः॥ विशुद्धपाकयज्ञेन्निपिद्धाकरणेनच ॥ १८॥ स्वर्गतिर्विहिताये श्यनगतिस्तस्यनारकी ॥ विचारयंतियेशास्ववेदाभ्यासरताश्चये ॥ १९॥ मनुप्प पिता से अधिक गुरु की शुश्रूपा करते हैं ॥ १५॥ हे वैश्य श्रेष्ठ ! वे ब्रह्मलोक' को गमन करते हैं इसमें संदेह नहीं शीलकी रक्षा करनेवाली स्त्री धन्य हैं ॥ १६॥ शील भंगसे स्त्रियोंको दारुण यमलोककी प्राति होती है जो स्त्री दुष्टोंका संग न करके शील की रक्षा करती है ॥ १७ ॥ हे वैश्य ! त्रियोंको शीलसेही परम स्वर्ग की प्राप्ति होती है विशुद्ध पाकयज्ञ और निषिद्ध कार्यके न करने से ॥ १८॥ हे वैश्य ! स्वर्गकी गति होती है फिर वह नरक को नहीं जाता जो शास्त्रका विचार मा.मा. भा.टी. - ३. अ.९ करते हैं और वेदान्यास करते हैं ॥ ३९ ॥ जो स्वर्गनि प्राप्त कराने वाले पुराणादि सुनाते और पढ़ते हैं जो स्मृतियोंकी व्याख्या करते और धर्म को प्रतिबोधन करते हैं ॥ १२० ॥ जो वेदान्त शास्त्र में निपुण हैं उन्होंने इस पृथ्वीको धारण कररक्खाहै उन उनके आयाम और माहात्म्य से वे पापरहित होगये हैं ॥ २१ ॥ वे ब्रह्मलोक को जाते हैं जहां फिर मोह नहीं होता जो येदशास्त्र के ज्ञान को दूसरों को देते हैं ॥ २२ ॥ उस संसार के भय दूर करने वाले की देवताभी पूजा करते हैं ॥ १२३ ॥ स्वर्गतिविहितायेचश्रावयंतिपठतिच ।। व्याकुर्वतिस्मृतियेचयेधर्मप्रतिबोधकाः ॥ १२०॥ वेदांतनिपुणायतै रियंजगतीधृता ॥ तत्तदभ्यासमाहात्म्यैः सर्वतेहतकिल्विपाः ॥ २१ ॥ गच्छन्तिब्रह्मणोलोकंयत्रमोहोनवि द्यते.॥ ज्ञानमादाययोदयाद्वेदशास्त्रसमुद्भवम् ॥ २२ ॥ अपिदेवास्तमर्चतिभववंधविदारकम् ॥ १२३ ॥ इतिश्रीपद्मपुराणेउत्तरखंडेमाघमाहात्म्येवसिष्टदिलीपसंवादेअष्टमोऽध्यायः ॥ ८॥ ॥ यमदूतउवाच ॥ श्रूयतामद्भुतंह्येतद्रहस्यवैश्यसत्तम । संमतधर्मराजस्यसर्वलोकामृतप्रदम् ॥ १ ॥ नयमंयमदूतंचनदूतान् घोरदर्शनान् ॥ पश्यंतिवेष्णवानूनंसत्यमेतन्मयोदितम् ॥ २॥ आहास्मान्यमुनाभ्रातासादरंचपुनःपुनः ।। भवद्भिर्वेष्णवास्त्याज्यानतेस्युर्ममगोचराः॥३॥ इति श्रीपमपुराणे उतरखण्डे माघमासमाहात्म्ये वशिष्ठदिलीपसंवादे पण्डित ज्यालाप्रसादमिश्रकत भापाटीकायामष्टमोऽध्यायः ॥८॥ यमदूत बोले हे वैश्य ! मैं एक अद्भुत रहस्य कहताहूं सुनो जो धर्मराजका संमत और सब लोकका अभय देनेवाला है ॥ ३ ॥ पह में मत्य कहताहूं भगवान् विष्णुकी भक्ति करनेवाले यम यमदूत धोर दर्शनवालोंका कभी दर्शन नहीं करते हैं।॥२॥ यमुनाके भाता ३० यमराजजीने यह हमसे वारंवार कहा है कि विण भक्तोंको कभी तुम हमारे निकट मत लाना ॥ ॥ हे दूतो ! जो प्रसंग से कभी एक बार भगवानका स्मरण करते हैं वह सब पापरहित हो भगवान विष्णु के लोकको गमन करते हैं ॥ ४ दुराचारी दुश्शील सदा पापी यदि विष्णुका भजन करता हो तो उसके निकट तुम न जाना ॥ ५ ॥ हरिभक्त जिनके घर भोजन करते हैं जो उनकी संगति करते हैं उनके सत्संगतिसे पाप दूर होगये हैं उनके घर भी तुम गमन न करना ॥६॥ हे येस्मरंतिसकताःप्रसंगेनापिकेशवम् ॥ तेविध्वस्ताखिलाघौचायांतिविष्णोःपरंपदम् ॥ ४॥ दुराचारोपिदुः शील सदापापरतोपिया ॥ भवद्भिःसर्वदात्याज्योविष्णुंचेगजतेनरः॥ ५॥ वैष्णवोयगृहेभुंक्ततेपविष्णवसं गतिः । तेपिकापरिहार्याःस्युस्तत्संगहतकिल्बिपाः॥६॥ इतिवेश्यानुशास्तास्मान्देवोदंडधर सदा ।।अतोनवै प्णवोयातिराजधानीयमस्यतु ॥ ७ ॥ विष्णुभक्तिविनानृणांपापिष्टानांविशांवर । उपायोनास्तिनास्त्यन्यः संततुनरकाबुधिम् ॥ ८॥ श्वपाकमिवनेक्षतेलोकाविषमवैष्णवम् ॥ वैष्णवोवर्णवाह्योपिपुनातिभुवनत्रयम्॥ ॥९॥ नरकेपिचिरंममाःपूर्वजायेकुलद्वये ॥ तदेवयांतितेस्वगयदार्चतिसुतोहरिम् ।। १० ।। वैश्य ! उन दंडधारी देवने इस प्रकार हमको सदा शिक्षा दी है इस कारण हरिभक्त यमराजकी राजधानीमें गमन नहीं करता है ॥ ७ ॥ हे वैश्यश्रेष्ठ ! हार भक्ति के विना पापियोंका संसार सागर से तरनका और उपाय नहीं है ॥ ८॥ जो. हरि भक्तन हो उस ब्राह्मणको लोक देखनेकी इच्छा नहीं करते हरिभक्त यदि वर्णवाहर भी हो तो वह सबको हारभक्तिके प्रभाव से पवित्र करता है ॥ ९ ॥ जो दो कैलके पूर्वज चिरकालसे नरक में मम हैं जब उनकी संतान नारायणका पूजन करती है। १ नानाका फुल और पिताका कुल।
मा.मा.
भाः टी
अ.९
तभी वे स्वर्गको जाते हैं ॥ १० ॥ जो हरिभक्तोंके दास हैं वैष्णव अन्न भोजी हैं हे वैश्य ! वे भी श्रेष्ठ गतिको जाते हैं इस
मन्देह नहीं ॥ ११॥ हरिभक्तोंके दिये प्रसाद की यलसे इच्छा करै सब पाप इससे दूर होते हैं यदि यह न मिले तो चरणामृतही
ग्रहण करे ॥३२॥ "गोविन्दाय नमः" इस मंत्रको जपता हुआ यदि कहीं मरजाय तो उसको हम वा यमराज नहीं देखते
॥ १३ ॥ अंग सहित समग्र न्यास ऋपि छंद देवताका स्मरण दीक्षा ग्रहण "ओं नमो भगवते वासुदेवाय" यह बारह अक्षरका
विष्णुभक्तस्ययेदासावेप्णवानभुजश्चये ॥ तेपितुभुजांश्रेष्ठगतियांतिनरा-किल ॥ ११॥ अर्थयेद्वेष्णवस्यान्नं
प्रयत्नेनविचक्षणः॥ सर्वपापविशुद्ध्यर्थतदभावेजलंपिवेत् ॥ १२॥ गोविंदेतिजपन्मंचंकुत्रचिन्मियतेयदि ॥
सनरोनयमपश्येत्तंचप्रेक्षामहेवयम् ॥१३॥ सांगंसमग्रंसंन्यासंसऋपिच्छंददैवतम् ॥ तद्दीक्षाविधिसंपन्नसन्मंत्रं
द्वादशाक्षरम् ।।१४।। अष्टाक्षरंचमंशयेजपंतिनरोत्तमाः॥ तान्दृष्ट्वाब्रह्महाशुद्धस्तेजातावैष्णवा-स्वयम् ॥१५॥
शंखिनिश्चक्रिणीभूत्वाब्रह्मायुर्वनमालिनः ॥ वसंतिवेप्णवेलोकेविष्णुरूपेणतेनराः ॥ १६॥ हृदिसूर्येजलेवा
थप्रतिमास्थंडिलेपुच ॥ समभ्यय॑हरियांतिनरास्तेवैष्णवंपदम् ॥ १७॥ अथवासर्वदापूज्योवासुदेवामुमुक्षु
भिः ॥ शालिग्रामशिलाचक्रचक्रेकीटविनिर्मिते ॥ १८॥
मंत्र जप ॥ १४ ॥ तथा "ओं नमो नारायणाय" इस अष्टाक्षर मंत्रका जो जप करतेहैं उनके दर्शनसे ब्रह्महत्यारे भी शुद्ध होतेहैं वे
स्वयं हरिभक्त हैं ॥ १५॥ शंख चक्र धारण किये ब्रह्माकी आयुपर्यन्त वनमाली होकर विष्णुरूपसे नारायणके लोकमें निवास'
करते हैं ॥ १६ ॥ हृदय सूर्य जल स्थंडिल अथवा प्रतिमामें नारायणकी अर्चा करने से हरिभक्त परमपदको प्राप्त होतेहैं ॥१७॥
मुक्तकी इच्छा करनेवालोंको वासुदेवक सदा जन करना चाहिये शालियामशिलाचक्रमें कीट विनिर्मित चक्रमें ॥ १८ ॥
विष्णुको स्थिति है यही सब पापके नाश करनेवाले हैं यह सब पुण्य देनेवाले हैं और सब पापके दूर करनेवाले हैं सबको मुक्तिके देनेवाले हैं ॥ १९ ॥ जो नारायणको चक्र शिला अथवा शालिग्राम शिलामें पूजन करते हैं वह सहस्रराजसूयको समान प्रतिदिन फल पाते हैं ॥ २० ॥ जिस समय जानने योग्य ब्रह्म निर्वाण अच्युतको प्रमाण करते हैं वह प्रसाद उनको शालिग्रामके पूजनसे होजाता है ११ २१ ॥ बडे काष्ठ में स्थित अग्नि जैसे स्थान में प्रकाश करती है इसी प्रकारसे सर्वव्यापी नारायण शालिग्राम अधिष्ठानहितद्विष्णोःसर्वपापप्रणाशनम् ॥ सर्वपुण्यप्रदेवैश्यसर्वेपामपिमुक्तिदम् ॥ १९॥ यःपूजयेद्धरिचके शालिग्रामशिलोद्भवे ॥ राजसूयंसहस्रेणतेनेप्टंप्रतिवासरम् ॥२०॥ यदानमंतिवेद्यतंब्रह्मनिर्वाणमच्युतम् ॥ तत्प्रसादोभवेन्मणांशालिग्रामशिलार्चनात् ॥ २१ ॥ महत्काष्ठस्थितीवह्नियथास्थानप्रकाशते ।। तथातथाह रियापीशालिग्रामप्रकाशते ॥ २२ ॥ अपिपापसमाचारा नकर्मण्याधिकारिणः ॥ शालिग्रामार्चकावैश्यन वेयांतियमालयम् ॥ २३ ॥ नतथारमतेलक्ष्म्यांनतथास्वपुरेहारः ॥ शालिग्रामशिलाचक्रेयथासरमतेसदा॥ ॥ २४ ॥ अग्निहोत्रंहुतंतेनदत्तापृथ्वीससागरा ॥ येनार्चितोहरिश्चक्रेशालिग्रामसमुद्भवे ॥२५॥ सकृत्करो तिमनुजःशालिग्रामशिलार्चनम् ॥ पापानिविलयंयांतितमःसूर्योदयेयथा ॥ २६॥ शिलामें प्रकाश करते हैं ॥ २२ ॥ जो पापी अकर्मी अनधिकारी हैं वे भी शालिग्राम पूजनसे यमालय को नहीं जाते ॥ २३ ॥ भगवान् इस प्रकार लक्ष्मी और अपने शरीरमें नहीं रमते हैं जिस प्रकार शालिमाम शिला और चक्र शिलामें रमण करते हैं ॥ २४ ॥ उसने अमिहोत्र कर लिया सागरपर्यन्त भूमि दान करली जिसने चक्र शिला और शालिग्राम में नारायणका अर्चन किया है ।। २५ ॥ जो मनुष्य एक वार भी शालिग्राम शिला में अर्चन करता है उसके पाप इस प्रकार भा.टी. मा.मा. ३२ अ.९ नारा होजाते हैं जिस प्रकार सूर्योदयसे अंधकार ॥ २६ ॥ हे वैश्य ! शालिग्रामसे प्रादुर्भूत वारह शिला जिसने विधिपूर्वक पूजन की उसका पुण्य तुझसे कहता हूं ॥ २७ ॥ बारह कोटि शिवलिंग सुवर्णके कमलसे वारह कल्प पूजनेसे जो फल है वह एक दिनमें मिल जाता है ॥ २८ ॥ जो भक्तिसे शालिग्रामकी सौ शिलाका पूजन करता है वह नारायणके लोकमें बहुत काल बस कर चक्रवर्ती होता है ॥ २९ ॥ जो मनुष्य काम क्रोध लोभसे व्याप्त होकर शालिग्राम पूजन करे वह भी हारलोकको जाता है शिलाद्वादशभविश्यशालिग्रामसमुद्भवाः ॥ विधिवत्पूजितायेनतस्यपुण्यंवदामिते ॥२७॥ कोटिद्वादशलिंग स्तुपूजितेःस्वर्णपंकजेः ॥ यच्चद्वादशकल्पेदिनेनैकेनतद्भवेत् ॥ २८॥ यःपुनःपूजयेद्त्त्याशालिग्रामारीला. शतम् ॥ उपित्वासहरेलोकंचक्रवर्तीहजायते ॥ २९ ॥ कामक्रोधैश्चलोभैश्चव्याप्तोयश्चनरोत्तमः ॥ सोपिया तिहरेलोकंशालिग्रामशिलार्चनात् ॥ ३० ॥ यापूजयतिगोविंदंशालिग्रामेसदानरः ॥ आभूतसंप्लवंयावन्नवे प्रच्यवतेहिसः॥ ३१ ॥ विनातीविनोदानर्विनायज्ञैर्विनामतिम् ॥ मुर्तियांतिनरावैश्यशालिग्रामशिलार्च नात् ॥ ३२॥ नरकगर्भवासंचतिर्यक्त्वंचकुयोनिपु॥ नयातिवैश्यपापिष्टःशालिग्रामाच्युतार्चकः ॥ ३३ ॥ दीक्षाविधानमंत्रज्ञश्चक्रेयोबलिमाहरेत् ॥ सयातिवैष्णवंधामसत्यंसत्यमयोदितम् ॥ ३४ ॥.सनातःसर्वतीर्थे पुसर्वयज्ञपुदीक्षितः॥ शालिग्रामशिलातोययोंभिपकसमाचरेत् ।। ३५ ॥ ॥ ३० ॥ जो मनुष्य शालिग्राम में गोविन्द का पूजन सदा करता है वह प्रलयकालतक स्वर्गसे नहीं गिरता है ॥ ३१ ॥ विना तीर्थ विना यज्ञ विना बुद्धिके शालियाम पूजनसे मनुष्य मुक्त हो जातेहैं ॥ ३२॥ नरक गर्भवास तिर्यक् योनिमें जन्मको हे वैश्य! कैसाभी पापीहो शालिग्राम पूजनसे प्राप्त नहीं होता ॥ ३३ ॥ मंत्रका और दीक्षा विधानका जाननेवाला बलिपूजा करता वह अवश्य विष्णुके लोकको प्राप्त होता है इसमें सन्देह नहीं ॥ ३४ ॥ वह सबतीर्थोमें स्नान करचुका और सब यज्ञोंमें । ३ दीक्षित हो चुका, जिसने शालिग्रामको स्नान कराया ॥ ३५॥ ३६ ॥ नैवेद्य अनेक प्रकारके पुप्प धूप दीप चंदन स्तोत्र बाजे गीतादिसे शालिग्राम शिलार्चन॥ ३७॥जो मनुष्य भक्तिपरायण होकर कलियुगमें करता है, वह सहस्र कोटि कल्पतक नारायणके समीप निवास करता है ॥ ३८ ॥ कोटि लिंगके दर्शन पूजनका जो फल है तथा स्तुतिका जो फल है वह एक शालिग्रामजीके पूजनसे फल होता है ।। ३९ ॥ एक बारही शालिग्राम शिलाके पूजन करनेसे सांख्य वर्जित मनुष्यभी अवश्य मुक्तिको प्राप्त होते हैं। गंगागोदावरीरेवानधोमुक्तिप्रदास्तुयाः ॥ निवसंतिसतीर्थास्ता-शालिग्रामशिलाजले ॥३६॥ नैवेद्यैर्विविधैः पुप्पधूपदीपेश्चचंदनः ॥ स्तोत्रयादिवगीतायेःशालिग्रामशिलार्चनम् ॥ ३७॥ कुरुतेमानबोयस्तुकलोभक्ति परायणः॥ कल्पकोटिसहस्राणिरमतसन्निधौहरेः॥३८॥ लिङ्गैस्तुकोदिमिर्दष्टैर्यत्फलंपूजितःस्तुते॥शालिग्रा मशिलायांतुएकायामपितत्फलम् ॥३९॥ सकृदभ्यर्चनालिंगेशालिग्रामशिलोद्भवे ॥ मुर्तिप्रयांतिमनुजानून सांख्येनयर्जिताः ॥ ४० ॥ शालिग्रामशिलारूपीयवतिष्टतिकेशवः। तत्रयक्षाःसुरा सिद्धाभुवनानिचतुर्दशा ॥११॥ शालिग्रामशिलातुय श्राद्धंकुरुतेनरः ।। पितरस्तस्यतिष्ठंतितृप्ता:कल्पशतंदिवि ॥ १२॥ येपिवं तिनरानित्यंशालिग्रामशिलाजलम् ॥ पंचगव्यसहस्रैस्तुप्राशितैःकिप्रयोजनम् ॥४॥ शालिग्रामशिलायत्र तत्तीर्थयोजनत्रयम् ॥ तत्रदानंचहोमश्वसर्वकोटिगुणंभवेत् ।। ४४॥ ॥ ४० ॥ ॥ जहां शालिग्राम रूपसे केशव स्थित हैं, वहां यज्ञदेवता सिद्ध चौदह भुवन स्थित हैं ॥ ४३ ॥ जो मनुष्य शालिग्रामके आगे श्राद्ध करता है, उसके पितर सौ कल्पतक तृप्त होकर स्वर्गमें निवास करते हैं ॥ ४२ ॥ जो मनुष्य प्रतिदिन शालियामका जलपान करते हैं उनको सहस्र पंचगव्यके आचमनसेभी क्या प्रयोजन है ॥४३॥ जहां शालिग्राम शिला स्थित मा.मा. भा. टी अ.९ है, वहां तीन योजनपर्यन्त तीर्थ जानना, वहां दान होम करना कोटिगुणा फल करता है ॥४४॥ शालियामका जल और चक्र अंकित शिलाके जलसे जो मिलाकर पान करते हैं वा देह और शिरपर धारण करते हैं ॥ ४५ ॥ उसका देह विष्णुके चक्रसे स्वयं अंकित होजाता है इसमें संदेह नहीं, वह गुप्त रहता है उसको यमके विना कोई नहीं देख सकता ॥ ४६ ॥ इसकारण हारभक्तोंके स्थानसे दूर्तीको निवारण किया है, हारभक्तोंके चरणोदक सेवन से भीत है ॥ ४७ ॥ जो नदी सागरमें शालिग्राशिलातोयंचक्रांकितशिलाजलैः ॥ मिश्रितंपिवतेयस्तुदेहेशिरसिधारयेत् ॥ १५ ॥ तस्यचक्रांकितो देहोभवेन्नास्त्यत्रसंशयः ॥ गुप्तनपश्यतेकोपिलोकेसूर्यसुतविना ॥ ४६ ॥ अतोन्यवारय दुतान्वैष्णवीनांगृहो त्तमे ॥ भीतोवैष्णवभक्तानांपादोदकनिपेवणात् ॥ ४७ ॥ विरात्रफलदोमाघोया काश्चिदसमुद्गाः ॥ समुद्र गास्तुपक्षस्यमासस्यसरितांपतिः ॥४८॥ पण्मासफलदागोदावत्सरस्यतुजाह्नवी ॥ पादोदकं भगवतोद्वाद शाब्दफलप्रदम् ॥४९॥ कोटितीर्थसहस्रेस्तुसेवितैःकिप्रयोजनम् ॥ तोयंयदिभवेत्पुण्यशालिग्रामसमुद्भवम् ।। ॥ ५० ॥ शालिग्रामशिलाताययःपिवेद्विदुमात्रकम् ॥ मातुः स्तन्यरसेनैवसभवेन्मुक्तिभाषनरः ॥५१॥ नहीं मिलती है वह माघमें स्नान करनेसे त्रिरात्र फल देती है, समुद्रगामिनी एक पखबारेकर, सागर एक महीनेका ॥ १८ ॥ गोदावरी छः महीनेका, गंगा एक वर्षका और भगवानका चरणोदक बारह वर्ष माघस्नान के फलका देनेवाला है ॥ ४९ ॥ करोड सहस्र तीर्थोके सेवनसे क्या प्रयोजन है, यदि शालिग्राम शिलाके जलकी प्राप्ति होती हो ॥५०॥ जोशालिग्रामका जल एक बिन्दु मात्र पान कर ले वा माताके दुग्धमें मिलाय पान करै तो वह मनुष्य मुक्तिका अधिकारी होता है ॥ ५१ ॥ ३३ शालिग्रामके समीप कोशपर्यन्त यदि कोई कीटभी मरजाय तो वह मुक्तिका अधिकारी हो वैकुंठ को जाता है इसमें संदेह ना ॥ ५२ ॥ शालिग्राम शिला चक्रका जो उत्तम दान करता है उसने मानो पर्वत वनसहित भूमिचक्र भदान करदी ॥ ५३ ॥ और जो शालिग्राम शिलाका मूल्य करता है, बेचता वा उसमें सम्मति देता है, परीक्षा में अनुमोदन करता है ॥ ५४ ॥ वह प्रलयतक नरकको जाते हैं हे वैश्य ! इसकारण चक्रका क्रय विक्रय करना उचित नहीं ॥ ५५॥ हे वैश्य ! बहुत कहनेसे शालिग्रामसमीपेतुकोशमासमंततः ॥ कीटकोपिम्तोयातिवैकुंठभवनदृढम् ॥५२॥ शालिग्रामशिलाच कंयोदद्यादानमुत्तमम् ।। भूचक्रतेनदत्तस्यात्सशेलवनकाननम् ॥ ५३॥ शालिग्रामशिलायास्तुमौल्यचैवकरो तियः ।। विक्रेताचानुमंताचयापरीक्षानुमोदकः ॥५४॥ तेसर्वेनरकंयांतियावदाभूतसंप्लवम् ॥ अतस्तद्वर्जये द्वैश्यचक्रस्यक्रयविक्रयम् ।। ५५ ॥ बहुनोक्तेनकिंवश्यकर्तव्यंपापभीरुणा ॥ स्मरणंवासुदेवस्यसर्वपापहरं सदा ॥५६॥ तपस्तत्त्वानरोधोरमरण्येनियतेंद्रियः। यत्फलंसमवाप्नोतितत्स्मृत्वागरुडध्वजम् ।। ६७ ॥ कृत्वातुबहुधापापनरोमोहसमन्वितः ॥ नयातिनरकनत्वासर्वपापहरहरिम् ॥ ५८॥ पृथिव्यायानितीर्थानि पुण्यान्यायतनानिच ॥ तानिसर्वाण्यवाप्नोतिविष्णोर्नामानुकीर्तनात् ॥२९॥ क्या है पापसे डरनेवालेको सब पाप दूर करनेवाले वासुदेवका स्मरण नित्य करना चाहिये ॥ ५६ ॥ जो मनुष्य वनमें घोर तप करके जितेन्द्रिय होकर जो फल प्राप्त करता है, वह गरुडध्वजके नामस्मरण करनेसे प्राप्त होता है ॥ ५७ ॥ मोहसे युक्त होकर मनुष्य अनेक प्रकारके पाप करकेभी सब परपहारी हरिको प्रणाम कर फिर नरकको नहीं प्राप्त होताहै ॥५८॥ पृथ्वीमें जितने भा.टी - मा. मा. तीर्थ और पवित्र पुण्य स्थान हैं, वह सब विष्णुके. नाम कीर्तन करनेसेही प्राप्त होजाते हैं ॥ ५९ ॥ जो लोग शाई धनुपधारी नारायणकी शरणको प्राप्त हुए हैं, वे यमलोकको नहीं जाते, न उनको नरक वास होता है ।। ६० ॥ हे वैश्य ! जो वैष्णव होकर शिवकी निन्दा करते हैं वह वैष्णव लोकको नहीं जाते.परंतु नरकको प्राप्त होते हैं ।। ६१॥ जो मनुष्य प्रसंगसेभी एकादशीका व्रत करता है, वह यमके दुःखको नहीं मान होता, ऐसा हमने यमराजसे सुना है ॥ ६ ॥ इसकी समान त्रिलोकीमें देवंशाधिरविष्णुंयेप्रपन्ना-परायणम् ॥ नतेपायमसालोक्यनतेवानरकौकसः ॥६० ॥ वैष्णव-पुरुपोवैश्य शिवनिंदांकरोतियः॥ नगच्छेद्वेष्णवलोकंसयातिनरकंध्रुवम् ॥६॥ उपोष्यैकादशीमेकांप्रसंगेनापिमानवः। नयातियातनांयाम्यामितिनोयमतःश्रुतम् ॥ ६२॥ नेदृशंपावनंकिंचित्रिपुलोकेपुविद्यते ॥ यादृशंपद्मनाभस्य दिनंपातकनाशनम् ॥ ६३ ॥ तावत्पापानिदेहेस्मिन्वसंतीहविशांवर ॥ यावनोपवसेजंतुःपद्मनाभदिनंशु भम् ॥ ६४ ॥ अश्वमेधसहस्राणिराजसूयशतानिच ॥ एकादश्युपवासस्यकलांनाहतिपोडशीम् ॥ ६५ ॥ एकादशेंद्रिय पापयत्कृतश्यमानवैः ॥ एकादश्युपवासेनतत्सर्वंविलयंत्रजेत् ॥६६॥ एकादशीसमंकिंचित्पु ण्यलोकेनविद्यते ॥ व्याजेनापिकृतायैस्तुतेपियांतिनभास्करिम् ॥ ६७॥ पवित्र कोई नहीं है, जैसी यह एकादशी.पाप की दूर करनेवाली है ॥ ६३. ॥ हे वैश्य ! तभीतक देहम पातक निवास करते हैं, जबनक मनुष्य एकादशीका व्रत नहीं करते हैं ॥ ६४ ॥ हजार अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञका फलभी . एकादशीकी पोडश कलाको समान नहीं है ॥६५॥ हे वैश्य ! जो मनुष्यने ग्यारह इंद्रियोंसे पाप किया है, वह एकादशीके पुण्यसे सब नष्ट हो जाता है ॥ ६६ ॥ एकादशीकी समान त्रिलोकीमें कोई पुण्य नहीं है, जो किसी बहानेसेभी करते हैं वह यमलोकको प्राप्त नहीं ४ होते हैं ।। ६७ ।। यह सब भोगकी देनेवाली शरारमें आरोग्यकी दाता है, अच्छी खी और दीर्घायु पुत्रकी देनेवाली हा ॥ हे वैश्य ! गंगा गया काशी पुष्कर कुरुक्षेत्र रेवा वेणी ॥ ६९ ॥ यमुना चन्द्रभागाका स्नान कोईभी एकादशीके समान नहीं है, वे मनुष्य अनायाससे वैष्णव पदको प्राप्त होते हैं ॥ ७० ॥ रात्रि जागरण करके एकादशीके दिन व्रत करके पैतृक पक्षमें दश माताके पक्ष में दश ॥ ७१ ॥ प्रियके पक्षके भी दश सन्तानोंको उद्धार करता है इस में सन्देह नहीं, वह सब सर्वभोगप्रदाटेपाशरीरारोग्यदायिनी ॥ सुकलंबप्रदाचैपाजीवपुत्रप्रदायिनी ॥ ६८॥ नगंगानगयावश्यन काशीनचपुष्करम् ॥ नचापिकौरवक्षेत्रंनरेवानचवेणिका ॥ ६९ ॥ यमुनाचंदुभामाचदिनेननसमाहरेः ॥ अनायासेनयेनाप्राप्यतेवैष्णवपदुम् ॥ ७० ॥ रानौजागरणकृत्वासमुपोष्यहरेर्दिनम् ॥ दशपैतृकेपक्षेमातृके दशपूर्वजान् ॥ ७१॥ प्रियायादशवैश्यैतान्समुद्धरतिनिश्चितम्॥ तएवसंगनिर्मुक्तानागारिकृतकेतनाः ॥७२॥ स्रग्विणः पीतवस्त्राहिप्रयांतिहरिमंदिरम् ॥ बालत्वेयौवनेवापिवृद्धत्वेवाविशांवर ॥ ७३ ॥ उपोप्यैकादशी नूनंनेतिपापोपिदुर्गतिम् ॥ उपोष्येहविराबाणिकृत्वातीर्थचमजनम् ॥ ७४ ॥ दत्त्वाहेमतिलान्गाश्चस्वर्गतियां तिमानवाः ॥ तीर्थेनस्नांतियेवैश्यनदत्तंकांचंनंतुयैः॥ ७९ ॥ संगसे निर्मुक्त होकर भगवानके लोकको प्राप्त होता है ॥७२॥ माला पितांबरधारी हरि मंदिरको प्राप्त होते हैं बालक पन यौवन और बुढापा ।। ७३ ॥ इनमें एकादशी व्रतकरनेवाले पापसे दुर्गतिको प्राप्त नहीं होते, तीन रात बतकरके और तीर्थ, मजन करके ॥ ७४ ॥ सुवर्ण विल गोदान करके मनुष्य स्वर्गको प्रान होते हैं। हे वैश्य ! जो तीर्थमें खान नहीं करते जिन्होंने सुवर्णका भा.टी. मा.मा. अ.९ दान नहीं किया ।। ७५ ॥ अथवा जिन्होंने कुछ तप नहीं किया वे सर्वत्र दुःखी होते हैं, मैं आपसे संक्षेपसे नरक निवारक धर्मको कहताहूं ॥ ७६ ॥ जो मन वचन कर्मसे किसीका द्रोह नहीं करते हैं इन्द्रियोंका विरोध और नारायणकी सेवा ॥ ७७ ॥ वर्णा श्रम धर्मका पालन करना तप और दान स्वर्गकी इच्छा करनेवाला सदा करै ॥ ७८॥ अपने हितकी इच्छा करकै उपानह छत्र वस्त्र अन्न मूल फल जल ॥७९॥ यह बात निरंतर आचरण करनी चाहिये दरिद्री यह नहीं कर सकते. धनी इसको सदा करै नैवतप्तपःकिंचित्तेस्युःसर्वत्रदुःखिताः ॥ संक्षिप्यवच्मितेधर्मनरकस्यनिवारकम् ॥ ७६ ॥ अद्रोहःसर्वभूते पुवाड्मनकायकमेभिः ॥ इंद्रियाणांनिरोधश्चदानंचहरिसेवनम् ॥ ७७॥ वर्णाश्रमाणांधर्माणांपालनंवि धितः सदा ॥ स्वर्गार्थीसर्वदावेश्यतपोदानंचकीर्तयेत् ॥ ७८ ॥ यथाशक्तिसमंदद्यादात्मनोहितमिच्छता ॥ उपानच्छत्रवस्त्रादिह्यन्नमूलंफलंजलम् ॥ ७९ ॥ अवन्ध्यंदिवसंकुर्यानदरिद्रैर्हिमानवैः ॥ इहलोकेपरेचैवनाद त्तमुपतिष्ठति ॥८०॥ इतिमत्वासदाचैवदातव्यतुस्वशक्तितः॥ दातारोनैवपश्यंतितांताहियमयातनाम् ॥८॥ दीर्घायुपोधनान्यास्तेभवंतीहपुनः पुनः॥ किमत्रबहुनोक्तेनयांत्यधर्मेणदुर्गतिम् ॥ ८२ ॥ आरोहतिदिवंधमैं नराः सर्वत्रसर्वदा.॥ तेनवालत्वमारभ्यकर्तव्योधर्मसंग्रहः ॥ ८३॥ इस लोक वा परलोक में विना दिये नहीं मिलता है ॥ ८० ॥ ऐसा जानकर अपनी शक्ति के अनुसार सदा दान करना चाहिये दानी पुरुष यमकी यातनाको नहीं देखते हैं ।। ८१ ॥ वारंवार दीर्घायु और धनाढ्यताको प्राप्त होते हैं बहुत कहनेसे क्या है अधर्मसे दुर्गतिको प्राप्त होते हैं ।। ८२ ॥ धर्मसेही मनुष्य स्वर्गको सदा प्राप्त होते हैं इस कारण बालकपनसे लेकरही धर्मका ॥ इति संग्रह करना चाहिये ॥ ८३ ॥ यह सब मैंने तुमसे कहा और फिर क्या सुननेकी इच्छा करते हो ॥-८४ ॥ श्रीपद्मपुराणे उत्तरखण्डे माघमाहात्म्ये भाषाटीकायां वसिष्ठदिलीपसंवादे शालिग्राममहिमावर्णने नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ ॥ विकुंडल बोले हे सौम्य ! ताप नाकश तुम्हारा वचन श्रवण कर मेरा मन प्रसन्न हुआ गंगाकी समान सत्सुरुपोंके वचन तापका नाश करते हैं ॥ ३ ॥ सत्पुरुपोका स्वाभाविक धर्म है कि वे श्रेष्ठपुरुप उपकार करते इतितकथितंसर्वकिमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥ ८४ ॥ ॥ इति श्रीपद्मपुराणेउत्तरखडेमाघमाहात्म्येवसिष्ठदिली पसंवादेविकुंडलदूतसंवादेशालिग्रामशिलामहिमावर्णनंनामनवमोऽध्यायः ॥ ९॥ ॥ विकुंडलउवाच ॥॥ श्रुत्वातववचः सौम्यप्रसन्नमममानसम् ।। गंगेवतापहंसधः पापहागी सतांयतः॥१॥ उपकर्तुप्रियंवक्तुंगुणो नैसर्गिकःसताम् ॥ शीतांशुक्रियतेयेनशीतलोऽमृतमंडलः ॥२॥ देवदूतततोबहिकारुण्यान्ममपृच्छतः ॥ नरकानिर्गतिः सद्योभातुर्मजायतेकथम् ॥३॥ ॥श्रीदत्तात्रेयउवाच ॥ ॥ इतितस्यवचः श्रुत्वादेवदूतो जगादह ।। ज्ञानहट्याक्षणंध्यात्वातन्मैनीरज्जुबंधनः ॥४॥ ॥ दूतउवाच ॥ । गतवैश्याटमेपुण्यं त्वयाजन्मनिसंचितम् ॥ तद्धानेदीयतांशीअंतस्यस्वर्गयदीच्छसि ॥५॥ जो चन्द्रमाको शीतल अमृतमय करते हैं ॥ २ ॥ है दूत ! मेरे पूछनेते, रुपाकरके कहिये मेरे भाईकी नरकसे किस प्रकार निरुति होगी ॥ ३ ॥ श्रीदत्तात्रेय बोले वह उनके वचन सुनकर देवदूत कहने लगा ज्ञान दृष्टिसे विचारकर उसकी मित्रतासे बंधनको प्राप्त हुआ-॥ ४ ॥ दूत बोला हे वैश्य ! बीते आठवें जन्ममें जो तैने पुण्य संचय किया है सो भाईको दीजिये भा.टी अ.१ मा. मा. ., विकुंडल बोला वह क्या पुण्य है कैसे हुआ किस जन्ममें मैं पहले हुआ ? हे दूत ! वह शीघ कहो मैं उस सर्व पुण्यको दूंगा ॥ ५॥६॥ दूत बोला हे वैश्य ! सुन हेतु सहित मैं तेरा पुण्य कहताहूं पहले मधुवनमें एक शाकलि मुनि थे ॥ ७ ॥ तप और वेदपाठसे सम्पन्न तेजमें ब्रह्माकी समान उसकी स्त्री रेवती में ग्रहोंकी समान नौ पुत्र हुए ॥ ८॥ ध्रुव, शशी, बुध, तार, ज्योतिष्मान्, यह पांच अग्निहोत्र, प्रिय होके गृहधा रमण करते रहे ॥ ९ ॥ निर्मोह, जितमाय, ध्यानकाम, गुणातिग यह ॥ विकुंडलउवाच ॥ ॥ किंतत्पुण्यंकथंजातंकिंजन्माईपुराभवम् ॥ तत्सर्वकथ्यतांदूततच्चदास्यामिसत्त्व रम् ॥ ६ ॥ ॥ दूतउवाच ॥ शृणुवैश्यप्रवक्ष्यामित्वत्पुण्यंचसहेतुकम् ॥ पुरामधुवनेपुण्यमुनिरासीचशाक लिः॥७॥ तपोध्ययनसंपन्नस्तेजसाब्रह्मणासमः ॥ जज्ञिरेतस्यरेवत्यांनवपुत्राग्रहाइव ॥८॥ध्रुवःशशी बुधस्तारोज्योतिष्मानवपंचमः॥ अग्निहोत्रप्रियायतेग्रहधर्मेपुरेमिरे ॥ ९॥ निर्मोहोजितमायश्चध्यानकामो गुणातिगः ॥ एतेहवियुक्तास्तुचत्वारोद्विजसूनवः ॥ १०॥ चतुर्थाश्रमसंपन्नासर्वकर्मसुनिस्पृहाः ॥ ग्रामे कवासिनःसर्वेनिःसंगानिःपरिग्रहाः ॥ ११॥ निशिखानोपवीताश्चसमलोप्टाश्मकांचनाः ॥ येनकेनचिदा च्छन्नायेनकेनचिदाशिताः ॥ १२ ॥ सायंगृहास्तथानित्यंब्रह्मध्यानपरायणाः ॥ जितनिद्राजिताहारावात शीतसहिष्णवः ।। १३॥ चार पुत्र उस्के विरक्त हुए ॥ १०॥ संन्यास आश्रममें सम्पन्न सम्पूर्ण कामें इच्छा न करनेवाले एकही गांवमें सब निवास करनेवाले तथा सब कोंमें इच्छा न करनेवाले हुए न विवाह किया ॥ १३ ॥ शिखा उपवीत रहित मट्टी सुवण में एक दृटिवाले जिस किसी प्रकार से कुछ वस्त्र धारे ज्यों त्यों कुछ खातेथे॥ १२॥ संध्याकालके समय नित्य ध्यान में परायण थे निद्रा आहार- जीते 3GEEBAR Rad वात.शीतके सहनेवाले ॥ १३ ॥ चराचर जगतको विष्णुरूप देखनेवाले मौन धारे पृथ्वीमें विचरण करते फिरते थे ॥ १४ ॥ और वे योगी अणुमात्र भी कुछ क्रिया नहीं करतेथे दृढज्ञानी सन्देह रहित चित्त विचारमें। विशारद ॥ १५ ॥ इस प्रकार तुम्हारे आठवें जन्ममें विप्ररूपसे पुत्रदार कुटुम्बी हुए मत्स्यदेशमें स्थित हुये ॥ १६ ॥ तुम्हारे समीप मध्याह्नमें भूखे प्यासे होकर तुम्हारे स्थानमें आये वैश्वदेव करनेके उपरान्त तुमने उनको आंगनमें देखा ॥ १७ ॥ गद्गद कंठ नेत्रोंमें आंसू भरे हर्ष और पश्यतिविष्णुरूपणजगत्सर्वंचराचरम् ।। चरंतिलीलयापृथ्वीतेन्योन्यमौनमास्थिताः॥१॥नकुर्वतिक्रियांकि चिदणुमात्राहियोगिनः ॥ दृढज्ञानाअसंदेहाश्चिद्विचारविशारदाः ॥१५॥ एवंतेतवविप्रस्यपूर्वमएमजन्मनि । तिष्ठतोमत्स्यदेशेपुपुत्रदारकुटुंबिनः ॥१६॥ गेहंतावकमाजग्मुर्मध्याह्नक्षुत्पिपासिताः॥ वैश्वदेवोत्तरेकाले त्वया दृष्टागृहांगणे ।। १७ ॥ सगद्गदसाश्रुनेसहपंचससंभ्रमम् ॥ दंडवत्प्रणिपातेनबहुमानपुर-सरम् ॥ १८॥ प्रणम्यचरणौस्पृष्ट्वाकृत्वापाणिपुटांजलिम् । तदाभिनंदिताःसर्वेत्वयासूनृतयागिरा ॥ १९॥ अयमेसफलं जन्मसफलंजीवितमम ॥ अद्यविष्णु प्रसन्नोऽभूत्सनाथोस्म्यद्यपावितः ॥२०॥ धन्योस्मिमेगृहंधन्यधन्यामेऽ घकुटुंबिनी ॥ ममाद्यपितरौधन्योधन्यागावः श्रुतंधनम् ॥ २१ ॥ यदृष्टीभवतांपादौतापत्रयहरौमया। भवतां दर्शनंयस्माइन्यसर्वहरेवि ॥२२॥ संन्नमसे युक्त दंडवतकर बहुत मानसे युक्त ॥ १८ ॥ प्रणाम कर चरण छूकर हाथ जोड मनोहर वाणीसे तुमने सबको आनंदित किया ॥ १९ ॥ आज मेरा जन्म और जीवन सफल हुआ आज विष्णु हमपर प्रसन्न हुए आज मैं सनाथ और पवित्र हुआ॥२०॥ मैं धन्य मेरा घर धन्य आज मेरी स्त्री धन्य है आज हमारे पितर गौ श्रुति (वेद) धन धन्य हैं ॥ २१ ॥ जो मैंने तीनों तापके मा.मा. भा. टी. अ.१० दूर करनेवाले तुम्हारे चरणोंका दर्शन किया आपके दर्शनसे हरिदर्शनकी समान सब धन्य है. ॥ २२ ॥ इस प्रकारसे उनका पूजन कर तुमने चरण धोये और परम श्रद्धासे चरणोंका जल शिरपर धारण किया ॥ २३ ॥ हे वैश्य ! यतिके चरणोका जल पुराहत पापोंको दूर करता है सात जन्मके अर्जन किये पाप तत्काल ही दूर होते हैं, जो श्रद्धासे धारण करै ॥ २४ ॥ गंध पुष्प अक्षत धूप नीराजनसे युक्त उन यतियोंका सत्कार कर परम श्रमसे भोजन कराया ॥ २५॥ परमहंस तृप्त होकर उस एवंसंपूज्यतेपांतुचरणक्षालनंत्वया ॥ धृतंमूर्षिचपादोदःश्रद्धयापरयातदा ॥ २३॥ यतिपादोदकंवेश्यहंति पापपुराकृतम् ॥ सप्तजन्मार्जितंसद्यः अद्यापरयाधृतम् ॥ २४ ॥ गंधपुप्पाक्षतै पै!राजनपुरःसरम् ॥ संपूज्यसंस्कृतैरनौजितायतयस्त्वया ॥२५॥ तृप्ता परमहंसास्तविश्रांतामंदिरेनिशि ॥ ध्यायंतश्चपरंब्रह्म यज्योतिज्योतिपावरम् ॥ २६ ॥ तेपामातिथ्यजंपुण्यंजालंतेयदिशांवर ॥ नतद्वत्रसहस्रेणवक्तुंशक्तोस्म्यहं खलु ॥ २७॥ भूतानांप्राणिनःश्रेष्ठाःप्राणिनांबुद्धिजीविनः॥ बुद्धिमत्सुनराःश्रेष्ट्रानरेपुब्राह्मणाःस्मृताः ॥२८॥ ब्राह्मणेषुचविद्वांसोविद्वत्सुकृतबुद्धयः॥ कृतबुद्धिपुकार कर्तृषुब्रह्मवेदिनः॥२९॥ अतएवहिपूज्यास्तेयस्माच्छ्रे ठाजगत्रये ॥ यत्संगतिर्विशांश्रेष्ठमहापातकनाशिनी ॥ ३०॥ रातको तुम्हारे मंदिरमें वसे परब्रह्म ज्योतिस्वरूपको ध्यान करते हुए ॥ २६ ॥ हे वैश्य ! उनके अतिथिसत्कारका जो पुण्य तुझको हुआ मैं उसको सहस्रमुखसे नहीं कह सकता ॥ २७ ॥ भूतोंमें प्राणी श्रेष्ठ, प्राणियोंमें बुद्धिसे जीनेवाले श्रेष्ठ, बुद्धिमानों मनुष्य श्रेष्ठ, मनुयॊमें ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं ॥ २८॥ ब्राह्म!में विद्वान् विद्वानोंमें कतबुद्धि कृतबुद्धियोर्म करनेवाले उनमेंभी ब्रह्मवादी । श्रेष्ठ हैं ॥ २९ ॥ इस कारण त्रिलोकीमें श्रेष्ठ उनका पूजन अवश्य करना चाहिये, हे वैश्य श्रेष्ठ । उनकी संगति महापातकोंके
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नाश करनेवाली है ॥ ३० ॥ सतो गुणमें स्थित ब्रह्मवादी गृहस्थियोंके घरमें विश्रामको प्राप्त होकर जन्मके संचित पापोको एक
क्षणमें नाश करते हैं ॥ ३१ ॥ सो आठवें पूर्व जन्मका पुण्य इस प्रकार तैने संचय किया है, सो पुण्य अपने भाईको दे, इससे
तेरा भाई नरकसे छूट जायगा ॥ ३२ ॥ इस प्रकार दुतके वचन सुनकर उसने शमितासे पुण्यप्रदान किया और प्रसन्न मन हो
उसका भाई नरकसे निर्गत हुआ ॥ ३३ ॥ और दोनों देवताओंसे पूजित हो स्वर्गको गये, देवताओंने उनपर फूल वर्षाये और
विश्रांतागृहिणोगेहेसत्त्वस्थाब्रह्मवादिनः ॥ आजन्मसंचितंपापनाशयतिक्षणेनवे ॥ ३१ ॥ इतितेसंचितं
पुण्यमष्टमपूर्वजन्मनिस्वभानेदेहितत्पुण्यनरकायेनमुच्यते ॥३२॥ इति दूतवचःश्रुत्वाददौपुण्यससत्वरम् ॥
हृष्टेनचेतसाभानिरयात्सोपिनिर्गतः ॥ ३३॥ देवस्तीपुप्पवणपूजितौचदिवंगतो ॥ ताभ्यांचपूजितःसम्य
म्गतोदूतोयथागतम् ॥ ३४ ॥ अखिलजनसुबोधंदेवदूतस्यवाक्यंनिगमवचनतुल्यवैश्यपुत्रोनिशम्यं ॥स्वकृत
सुकृतदानादातरंतारयित्वासुरपतिवरलोकंतेनसाधजगाम ॥ ३५ ॥ इतिहासमिमंराजन्य पठेच्छृणुयादपि
सगोसहसदानस्यविपापोलभतेफलम् ॥ ३६॥ इति श्रीपद्मपुराणेउत्तरखंडेमाघमाहात्म्येवसिष्ठदिलीपसंवादे
श्रीकुंडलविकुंडलयोःस्वर्गगमननामदशमोऽध्यायः ॥ १०॥
उनसे पूजित हो देवदूत यथायोग्य अपने स्थानोंको गये ॥ ३४ ॥ यह देवदूतके वाक्य सब जोंको बुद्धिदाता वेदवचनकी समान
वैश्यपुत्र सुनकर अपने पुण्य देकर भाईको तारकर उसके साथ इन्द्रलोकको गया ॥ ३५॥ हेराजन् ! जो इस इतिहासको पर्दै
और सुनें वह पापरहित हो सहस्र गोदानका पुण्य प्राप्त करते हैं ॥३६॥ इति श्रीमाघमाहात्म्ये भाषाटीकायां दशमोऽध्यायः ॥१०॥
मा.मा. भा.टी. ३८ कार्तवीर्य बोले हे महतं! किस कारणसे माघस्नानका बड़ा प्रभाव कहा जाता है, सो आप मुझसे कहिये ॥३॥ जो वैश्य एक मायके सानसे पापरहित हो दूसरके फलसे स्वर्गको गया. माघका पुण्य वैश्यको ऐसा किसप्रकार प्राप्त हुआ यह कुतूहल मुझसे कहिये ॥ २॥ श्रीदत्तात्रेय बोले हे पुरुपश्रेष्ठ ! स्वभावसेही जल पवित्र निर्मल शुचि और पाण्डुरवर्ण है, मलनाशक द्रावक और दाह नाशक है ॥ ३ ॥ सब प्राणियोंका तारक पुष्टि और जीवन करनेवाला है जल नारायण देवहैं ऐसा सब वेदोंमें पढ़ा जाता ॥ कार्तवीर्यउवाच ॥ हेतुनाकेन विप्रर्पमाघस्नानेमहाद्भुतः ॥ प्रभावोवर्ण्यतेनूनंतन्मेकथयसुव्रत ॥१॥ गतपा पोयदेकेनद्वितीयेनदिवंगतः॥ वैश्योऽसोमाघपुण्येनबहिमेतत्कुतूहलम् ॥२॥ श्रीदत्तात्रेयउवाच ॥ निसर्गा त्सालिलमेध्यंनिर्मलंशुचिपांडुरम् ॥ मूलहंपुरुपव्याघद्रावकंदाहनाशनम् ॥३॥ तारकंसर्वभूतानांपोपणं जीवनंचयत् ॥ आपोनारायणोदेवः सर्ववेदेषुपठ्यते ॥४॥ग्रहाणांचयथासूर्योनक्षत्राणां यथाशशी ॥ मासा नांचतथामाघःश्रेष्ठःसर्वेपुकर्मसु ॥५॥ मकरस्थेखोमाघेप्रातःकालेतथाऽमले ॥ गोप्पदेऽपिजलेखानस्वगर्दै पापिनामपि ॥६॥ योगोऽयंदुर्लभोराजस्त्रैलोक्येसचराचरे ॥ अस्मिन्योगत्वशक्तोपिलायायदिदिनत्रयम् ॥ दद्यात्किंचिदशक्तोपिदरिद्राभाववांछया ॥ त्रिस्नानेनापिमाघस्यधनिनोदीर्घजीविनः ॥ ८॥ पंचवास तवाऽहानिचंद्रवर्धतेफलम् ॥ संप्राप्तेमकरादित्येपुण्येपुण्यप्रदेनृणाम् ॥ ९॥ ॥ ४ ॥ ग्रहोंमें जैसे सूर्य नक्षत्रोंमें जैसे चन्दमा इसी प्रकार महीनोंमें सब कमर्मि माघ श्रेष्ठ है ॥ ५॥ मकरके सूर्य होनेमें माघ मासको प्रभातके समय गौके खुरमात्र जलमभीनान करनेसे पापियोंको स्वर्ग प्राप्त होता है ॥६॥ हे राजन् ! यह योग माघका त्रिलोकी और चराचरको दुर्लभ है इस योग, जो कोई तीनदिनभी स्नान करे ॥ ७ ॥ और दरिदके अभाव होनेके निमित्त कुछभी दे माधम तीनबार स्नान करनेसे धनी दीर्घजीवी होते हैं ॥८॥ पांच वा सातदिनमें चन्द्रमाकी समान फल बढता है, परमपवित्र पुण्य देनेवाले मकरके सूर्य प्राप्त होनेमें मनुष्योको ॥ ९॥ स्नानदानके समय अतिथियोंका सत्कार करना चाहिये कर्ताको अक्षय और शाश्वत पदकी प्राप्ति होती है ॥ १०॥ इस कारण अपने हितकी इच्छा करके माघमासमें बाहर स्लान करे अब माघलानकी विधि कहते हैं ॥ ११ ॥ मनुष्योंको इसमें कोई व्रतरूपी नियम करना चाहिये अति फलकी प्राप्तिकी निमित्त पण्डित कुछ भोजन त्यागै ॥ १२॥ भूमिमें सोवै, घृत तिलका हवन करे, तीनकालमें वासुदेव सनातन विष्णुकी पूजा करे ॥ १३ ॥ सत्कार्यास्तिथयः सर्वाः स्नानदानादिकर्मभिः ॥ कर्तारंदापयंतीहह्मक्षयशाश्वतंपदम् ॥ १० ॥ तस्मान्मा बहिःस्नायादात्मनोहितकाम्यया ॥ अथातःसंप्रवक्ष्यामिमाघस्नानविधिपरम् ॥ १५ ॥ कर्तव्योनियमः कश्चिद्रतरूपीनरोत्तमैः ॥ फलातिशयहेतोकिंचिद्भोज्यत्यजेद्रुधः ॥ १२ ॥ भूमौशयीतहोतव्यमाज्यांतिल विमिश्रितम् ॥ निकालंचार्चयेद्विष्णुवासुदेवसनातनम् ॥ १३ ॥ दातव्योदीपकोऽखंडादेवमुद्दिश्यमाधवम् ॥ इंधनकंबलंवत्रमुपानत्कुंकुमघृतम् ॥३४॥ तैलंकासकोठंचतूलींतूलवटींपटीम् ॥ अन्नचैवयथाशक्तिदेयमाघे नराधिप ॥ १५॥ सुवर्णरत्तिकामानंयाद्वेदविदेतथा ॥ तदानमक्षयंराजन्समुद्रइवसर्वदा ॥१६॥ परस्यार्मि नसेवेतत्यजेचैवप्रतिग्रहम् ॥ माघतिभोजयेद्विप्रान्यथाशक्तिनराधिप ॥ १७ ॥ भगवान माधवके उद्देश्यसे अखण्ड दीपदान दे, इन्धन ऊर्णवस्त्र उपानत् (जूता ) कुंकुम घृत ॥ १४ ॥ तैल कपास कोठला तूलवटी (पीनी ) वन और अन्न यथाशक्ति माघमें देना चाहिये ॥ १५ ॥ वेद जाननेवालेको रत्तीमात्र सोना देना उचित हे राजन् ! वह दान समुद्रकी समान सदा अक्षय होता है । १६ ॥ दूसरेकी अग्नि न सेवे, प्रतियह न ले, १ परान्नानि न सेवेत इ० पा०॥ ----- मा.मा. भा.टी. अ.१ माषके अन्तमें ब्राह्मणों को यथाशक्ति भोजन करावे ॥ १७ ॥ अपने कल्याणकी इच्छासे उनको दक्षिणा दे, एकादशीके विधानसे माधका उद्यापन करे ॥ १८ ॥ अक्षय स्वर्गकी इच्छा करके श्रद्धापूर्वक करे, अनन्तपुण्य और विष्णुकी प्रीतिके निमित्त यह सब करे ॥ १९ ॥ मकरके सूर्य माघमें प्राप्त होनेसे "गोविन्दायनमः अच्युतायनमः माधवायनमः" यह मंत्र पाठकर स्नान करनेसे यथोक्त फल मिलता है ॥ २० ॥ यह मंत्र पढकर मौन हो स्नान करे, फिर वासुदेव हरि कृष्ण माधवका स्मरण करे ॥ २१ ॥ देयाचदक्षिणातभ्यआत्मनः श्रेयइच्छता ॥ एकादशीविधानेनमाघस्योद्यापनंतथा ॥ १८॥ कर्तव्यंश्रद्दधा नेनाक्षय्यस्वर्गवांछया ॥ अनंतपुण्यावाप्त्यर्थविष्णुसंप्रीतिहेतवे ॥ १९ ॥ मकरस्थेरवोमाघेगोविंदाच्युतमा धव ।। लानेनानेनभोदेवयथोक्तफलदोभव ॥ २० ॥ इतिमंत्रसमुच्चार्यस्त्रायान्मौनीसमाहितः ॥ वासुदेवंहार कृष्णंमाधवंचस्मरेत्पुनः ॥ २१ ॥ गृहेपिसजलंकुंभंवायुनानिशिपीडितम् ॥ तत्नानंतीर्थसदृशंसर्वकामफल प्रदम् ॥ २२ ॥ तव्रतेनदातव्यसानंचोपस्करान्वितम् ॥ तत्स्नानस्यप्रभावेणनरोननिरयंव्रजेत् ॥२३॥ तप्ते नवारिणानानंयद्गृहेक्रियतेनरैः ॥ पडन्दफलदंतद्धिमकरस्थेदिवाकरे ॥ २४ ॥ वहिःस्रानंतुवाप्यादौद्वादशाब्द फलंस्मृतम् ॥ तडागेद्विगुणराजन्नद्यांचैवचतुर्गुणम् ॥२५॥ और घरमेंभी जलका भरा धरा घडा जिसे रात्रिमें वायुने स्पर्श किया है उसका स्नानभी तीर्थकी समान सब कामना देनेवाला है ॥ २२ ॥ सामग्री सहित अन्न इसका व्रतकर देना चाहिये, उस स्नानके प्रभावसेभी मनुष्य नरकको नहीं जाते हैं ॥ २३ ॥ जिस घरमें मनुष्य तने जलसे स्नान करतेहैं वह मकरके सूर्यका स्नान छः वर्षके स्नानका फल देताहै ॥ २४ ॥ बाहर बावडी आदिमें स्नान करनेसे बारह वर्षका फल होता है हे राजन् ! तालाबमें दूना और नदीमें चौगुना फल होताहै ॥ २५ ॥ देव हृदमें सौगुना महानदमें सौगुना महानदी संगममें चारसौगुना फल होता है ।। २६ ॥ मकरके सूर्यमें यह फल सहस्रगुण गंगास्नान करनेसे प्राप्त होजाता है ।। २७ ॥ हे राजन् ! जो माघमासमें गंगास्नान करतेहैं, वह चार सहस्र युगतक स्वर्गसे ,पतित नहीं होते हैं ॥ २८ ॥ हे राजन् ! जो दिन २ सहस्र सुवर्ण देनेका फल है वह माघमासमें गंगास्नानका फल है ॥ २९ ॥ हे राजन् ! शतधादेवखातेपुशतधातुमहानदे ॥ शतंचर्तुगुणराजन्महानद्याश्चसंगमे ॥ २६ ॥ सहस्रगुणितंसर्वतत्फलं मकरेरवौ ॥ गंगायांनानमात्रेणलभतेमानवोनृप ॥२७॥ गंगायांयेऽवगाहंतिमाघमासेनृपोत्तम ॥ चतुर्यु गसहस्रंतुनपतंतिसुरालयात् ॥ २८॥ दिनेदिनेसहस्रंतसुवर्णानांविशांपते ॥ तेनदत्तंतुगंगायांयोमाघेस्राति मानवः ॥२९॥ शतेनगुणितमाघेसहस्रंराजसत्तमः॥ निर्दिष्टमृपिभिसानगंगायामुनसंगमे ॥ ३०॥ पापी घभूरिभारस्यदाहार्थेचप्रजापतिः ॥ प्रयागंविदधेभूपप्रजानांचहितेस्थितः ॥ ३१ ॥ शृणुस्थानमिदंसम्यक सितासितजलंकिल ॥ पापरूपपशूनांचब्रह्मणाविहितंपुरा ॥३२॥ सितासितजलेमजेदपिपापशतान्वितः॥ मकरस्थेरवौमाघेनैवगर्भेपुमज्जति ॥ ३३॥ वह माघमें शत और सहस्र गुण फलकी प्राप्ति करता है जहां गंगा यमुनाका संगम है वहां ऋपियोंने यह पुण्य कहा है ॥ ३० ॥ हे राजन् ! प्रजापतिने पापसमूहोंके नाश करनेके निमित्त प्रजाके हितके निमित्त प्रयागकी रचना की है ॥३३॥ इस सित असित जलके स्थानको पापरूपी जीवोंके उद्धारके निमिन प्रथम ब्रह्माजीने निर्माण किया है ॥ ३२ ॥ सैकडों पाप करनेवाला मनुष्य मा.मा. भा.टी. ४० अ.१. यदि प्रयागमें स्नान करे और माघका महीना हो तो वह पुरुष फिर गर्भमें नहीं आता ॥ ३३ ॥ पांच प्रकारकी हिंसा करनेवाला मनुष्य प्रयागमें स्नान करै हे राजन् ! वह माघमें स्नान करनेवाला परमपदको प्राप्त होता है.॥ ३४ ॥ जो गंगा यमुनाकी धार सरस्वतीके जलसे युक्त है वह ब्रह्माजीने विष्णु लोकका मार्ग कथन किया है ॥ ३५ ॥ वैष्णवी माया बडी दुस्तर देवताओंको भी दुर्जय है हे राजन् ! वहभी माघमास प्रयाग में खान करनेसे नष्ट. होती है ॥ ३६ ॥ तेजोमय सूनारतोपियोमर्त्य प्रयागेनानमाचरेत् ॥ माघेमासिनख्याघ्रसयातिपरमपदम् ॥ ३४ ॥ सितासिताया धारासरस्वत्याविगर्भिता ॥ तन्मार्गविष्णुलोकस्यसृष्टिकर्ताससर्जवे ॥ ३५ ॥ दुस्तरावैष्णवीमायादेवैरपिसुदु र्जया ॥ प्रयागेदह्यतेसातुमाघेमासिनराधिप ॥३६॥ तेजोमयेपुलोकेषुभुक्त्वाभोगाननेकशः ॥ पश्चाच्चकि णिलीयतेप्रयागेमाघमजनात् ॥ ३७॥ उपस्पृशतियोमाघेमकरार्केसितासिते ॥ नतत्पुण्यंचसंख्यातुंचित्र गुप्तोपिवेत्त्यलम् ॥ ३८ ॥ सनिमजतियोमाघेमकरस्थेसितासिते ॥ तस्यपुण्यस्यमाहात्म्यंवक्तुंब्रह्मापिनक्ष मः ॥ ३९ ॥ संवत्सरशतंसाग्रनिराहारस्ययत्फलम् ॥ प्रयागेमाघमासेतुन्यहनानस्यतत्फलम् ॥४०॥ लोकोंमें अनेक भोगोंको भोगकर पीछे माघस्नायी परमात्मामें लीन होजाते ॥ ३७ ॥ जो माघमास मकरकी संक्रान्तिको सूर्यको नमन करके गंगा यमुनाको स्पर्श करता है चित्रगुप्त उसके पुण्यकी संख्या नहीं कह सकते ॥ ३८ ॥ जो मकरके सूर्य युक्त माघमासमें प्रयागमें स्नान करै उसके पुण्यकामाहात्म्य ब्रह्माभी कथन नहीं कर सकता ॥३९॥ सौ वर्पतक निराहार रहनेका जो १ तस्यपुण्यमसंख्यातं चित्रगुप्तोलिखेरफलमिति पाठः । ४० फल है प्रयाग में तीन दिन माघस्नानसे वही फल मिलताहै ॥ ४० ॥ सूर्यग्रहण पर कुरुक्षेत्रमें सुवर्णके सहस्रभार दानका जो फल है वह माप दिन दिन वेणीके स्नानसे फल होता है ॥ ४१ ॥ हे राजन् ! सहस्र राजसूयका आविकल फल होताहै परन्तु माघमास प्रयागमें स्नान करनेसे निश्चल फल होता है ॥४२॥.पृथ्वीमें जितने पुरी और सात तीर्थ हैं हे राजन् सब माघ मासमें वेणीके स्नानको आते हैं ॥ ४३ ॥ पापियोंके संग दोपसे सब तीर्थ कृष्ण होजाते हैं वह प्रयाग, माघस्नान स्वर्णभारसहस्रेणकुरुक्षेत्ररविग्रहे ।। यत्फलं लभतेमाघेवेण्या-नानादिनेदिने ॥११॥राजसूयसहस्रस्यराजन्न विकलंफलम् ॥ सितासितेतुमाधेचनानानांभवतिध्रुवम् ॥ ४२॥ पृथिव्यांयानितीर्थानिपुर्य-सप्तचया पुनः॥ वेण्यांनातुसमायांतिमाघेमासिनृपोत्तम ॥४३॥ सर्वतीर्थानिकृष्णानिपापिनांसंगदोपतः ॥ भवतिशुक्वर्णा निप्रयागेमाघमजनात् ॥ ४४ ॥ आकल्पसंचितंपापजन्मभिर्यन्नरैर्नृप ॥ तद्भवेद्भस्मासान्मावेनातानांचसि तासिते ॥४५॥ वाङ्मन कायजपापनरस्यविलयंवजेत् ॥ प्रयागेमाघमासेतुत्र्यहनातस्यनिश्चितम् ॥ ॥ ४६॥ प्रयागेमाघमासेयख्यनातिचमानवः॥ पापंत्यत्क्वादियातिजीणांत्वचमिवोरगः ॥४७॥ कुरुक्षेत्र समागंगायत्रकुनावगाहिता ॥ तस्मादशगुणापुण्यायविंध्येनसंगता ॥४८॥ करनेसे शुक्लवर्ण होते हैं ॥ ४४ ॥ कल्पोंके संग्रह किये अनेक जन्मोंमें जो पाप मनुष्योंने कियेहैं वह माघमें प्रयागस्तानसे भस्म होजाते हैं ॥ ४५ ॥ वाणी मन कायाके पाप मनुष्यके सब विलीन हो जाते हैं जो माघ मास प्रयागमें तीन दिन स्नान करते हैं ॥ ४६ ॥ प्रयागर्ने माघ मासमें जो मनुष्य तीन दिन स्नान करताहै वह पापको सर्पकी कैंचलीकी समान त्याग कर स्वर्गको जाता है ॥ ४७ ॥ कुरुक्षेत्रको समान गंगामें जहां कहीं स्लान किया है और जहां विन्ध्यपर्वतसे संगत हुई है मा.मा. भा.टी.. ४ अ.११ उससे दश गुणा अधिक पुण्य देती है ॥ ४८ ॥ काशीमें उत्तर वाहिनी उस्से सौगुणा आधिक फल देती है, गंगा यमुना संगम काशीसे सौगुणा अधिक फल देता है ॥४९॥ पश्चिमवाहिनी उससे सहस्र गुण अधिक फल देती है हे राजन् ! जो देखतेही ब्रह्म हत्या दूर करतीहै ॥५०॥जो पश्चिम वाहिनी गंगा कालिन्दी से मिली है, हे राजन् ! वह माघमासमें करोडों पापोंको दूर करती है ॥५३॥हे राजन् ! जिसको अमृत कहते हैं भूमिमें वह वेणी कहाती है, माघमासमें मुहूर्त मात्रको उसकी प्रानि देवताओंकोभी दुर्लभ तस्माच्छतगुणागंगाकाश्यामुत्तरवाहिनी॥ काश्या शतगुणाप्रोक्तागंगायामुनसंगमे ॥४९॥ सासहस्रगुणा तासांभवेत्पश्चिमवाहिनी॥ याराजन्दर्शनादेवब्रह्महत्यापहारिणी॥५०॥ यापश्चाद्वाहिनीगंगाकालिंद्यासहसं गता ।। हंतिकोटिकृतंपापंसामाघेमृपदुर्लभा ॥५१॥ यत्कथ्यतेऽमृतराजन्सावेणीभुविकीर्तिता। तस्यांमावे मुहूर्ततुदेवानामपिदुर्लभम् ॥ ५२॥ ब्रह्माविष्णुर्महादेवोरुद्रादित्यमरुद्गणाः ॥ गंधर्वालोकपालाश्चयक्षकिन्न रूपन्नगाः ॥५३॥ अणिमादिगुणे:सिद्धायेचान्येतत्त्ववादिनः ॥ ब्रह्माणीपार्वतीलक्ष्मीःशचीमेनाऽदितिर्दि तिः॥५४॥ .सर्वास्तादेवपल्यश्चतथानागांगनानृप ॥ घृताचीमेनकारंभाउर्वशीचतिलोत्तमा ॥ ५५॥ गणाह्यप्सरसांसपितॄणांचगणास्तथा ॥ स्नातुमायांतितेसर्वेमाघेवेण्यांनराधिप ।। ५६ ॥ है ॥ ५२ ॥ ब्रह्मा विष्णु महादेव रुद्र आदित्य मरुद्गण गंधर्व लोकपाल यक्ष किन्नर पन्नग ॥ ५३॥ अणिमा. आदि गुणोंसे सिद्ध जो और तत्वादि हैं तथा ब्रह्माणी पार्वती लक्ष्मी शची मेना ( हिमालय पत्नी ) दिति अदिति ॥ ५४ ॥ (वा रति ) सब देवपत्नी और नागोंकी म्री घृताची मेनका रंभा उर्वशी तिलोनमा ॥ ५५ ॥ अप्सराओंके सम्पूर्ण गण पितृगण यह माघमासमें २ तथा रतिरिति पाठः।
वणीमें सब सान करनेको आतेहैं ॥ ५६ ॥ सतयुगमें अपने स्वरूपसे और कलियुगमें प्रच्छन्नरूप से आत हो गया In स्नानमें जो तीन दिन स्नान का फल है ।। ५७ ॥ वह फल सहस्र अश्वमेध भी भूमिमें प्राप्त नहीं होताहै पहले कांचन मालिनीने माघमासमें तीन दिनका फल राक्षसको दिया था उस्ने वह पापात्मा मुक्त हुआ ॥ २८॥ इति श्रीपमपुराणे उत्तर खंडे माघमासमाहात्म्ये पण्डितज्वालामसादमिश्रकतमापाटीकायां प्रयागस्नानप्रशंसानाम एकादशोऽध्यायः ॥ १३॥ कार्तवार्य कृतयुगेस्वरूपेणकलोप्रच्छन्नरूपिणः ।। प्रयागेमाघमासेतुत्र्यहस्नानस्ययत्फलंम् ॥१७॥ नाश्वमेधसहले णतत्फलंलभतेभुवि ॥ध्यहस्नानफलंमाघेपुराकांचनमालिनी ॥ राक्षसायददीभूपतेनमुक्तःसपापकृत् ॥५८॥ इति श्रीपद्मपुराणेउत्तरखण्डेमाघमाहात्म्येप्रयागस्नानप्रशंसानामएकादशोऽध्यायः ॥ ११॥ ॥ कार्तवीर्य उवाच॥ ॥ भगवनाक्षसकोऽसौसाकाकांचनमालिनी ।। १ ॥ कथंपत्तवतीधर्मकर्थवातस्यसद्गतिः ॥ एतत्कथययोगींद्रअत्रिसंतानभास्कर ॥ २ ॥ यदित्वमन्यसेश्राव्यपरकौतूहलाहमे ॥ श्रीदत्तात्रेय उवाच ॥ शृणुराजन्विचित्रत्वमितिहासंपुरातनम् ॥३॥ यस्यस्मरणमात्रेणवाजपेयफलंलभेत् ॥ अप्सरारूपसंपन्ना नानाकांचनमालिनी ॥४॥ बोले, हे भगवन ! वह राक्षस कौन और वह कांचनमालिनी कौन थी ॥ १ ॥ किस प्रकार उसने धर्म दिया किस प्रकार उसकी सगति हुई हे अत्रिसंतानभास्कर ! यह वाती आप हमसे वर्णन कीजिये ॥ २॥ यदि आप इसका श्रवण कराना उचित समझें तो मुझे परम कौतूहल है. श्रीदत्तात्रेय बोले हे राजन् ! विचित्र पुरातन इतिहासको श्रवण करो ॥ ३॥ जिसके स्मरण मात्रसे वाज है मा.मा. भा.टी. ४२ अ.१२ पेयका फल होता है. कांचनमालिनी पड़ी रूपवती एक अप्सरा थी ॥ ४ ॥ माघमास प्रयाग स्नानकर शिवमंदिरको आतीथी. जो गिरिराज हिमवान्के निकुंजमें गिरिके समान शरीरसे स्थित ॥ ५॥ उस वृद्ध राक्षसने उसको जो कि तेजस्विनी सुवर्णकी कान्तिवाली सुश्रोणी दीर्घलोचना थी आकाशमें आरुढ देखकर ॥६॥ जो कि चन्द्रमुखी सुकेशी उन्नतपीनपयोधरवाली रूपवती थी उसको देखकर वह राक्षस बोला ॥ ७ ॥ हे कमललोचने ! तुम कौनहो ? कहांसे आतीहो ? तेरे वस्त्र और केश गीलो क्यों हो प्रयागेमाघमासेसास्नात्वायातिहरालयम् ॥ निकुंजेगिरिराजस्यतिष्ठतागिरिरूपिणा ॥५॥ दृष्टागगनमा रूढातेनवृद्धेनरक्षसा ॥ तेजस्विनीसुहेमाभासुश्रोणीदीर्घलोचना ॥ ६॥ चंद्राननासुकेशीचपीनोन्नतपयो धरा ।। तादृष्ट्वारूपसंपन्नामुवाचराक्षसस्तदा ॥७॥ कात्वंकमलपत्राक्षिकुतआगम्यतेत्वया ॥आदचवसनंक स्मात्सातेकवरीकुतः ॥८॥ कुत्रआगम्यतेभीरुकुतस्तेखेचरीगतिःकिनपुण्येनवाभइतवतेजोमयंवपुः ॥९॥ अतीवरूपसंपनसंभूतंचमनोहरम् ॥ त्वद्ववबिंदुपातेनमममूर्भिसुलोचने ॥१०॥ क्षणेनंह्यगमच्छार्तिकरमेमान संसदा ॥ नीरस्यमहिमाकोऽयमेतद्व्याख्यातुमर्हसि ॥ ११ ॥ त्वमेशीलवतीभासिनाकृतिनिर्गुणाभवेत् ॥ अप्सराउवाच ॥ श्रूयतामप्सराश्चाहंभोरक्षःकामरूपिणी ॥ १२ ॥ रहे हैं ? ॥ ८॥ हे भीरु ! कहांसे आती हो ! आकाशचारी · तुम्हारी गति कैसे है ? हे भद्रे • किस पुण्यसे तुम्हारा शरीर तेजोमय हो रहा है ॥ ९ ॥ तुम्हारा रूप अधिक मनोहर है हे सुलोचने ! तुम्हारे वस्वसे एक बिन्दुजल मेरे ऊपर गिरा ॥ १० ॥ जो मेरा मन सदा क्रूर था सो क्षणमात्रमें शान्त होगया, यह जलकी महिमा कैसी है ? सो हमसे कहिये ॥ १३ ॥ तुम मुझे शीलवती विदित होती हो; तुम्हारी आकति निर्गुण नहीं होगी. अप्सरा बोली हे राक्षस ! सुन मैं कामरूपिणी अप्सरा ४२ हूं ॥ १२ ॥ मैं प्रायगसे आई हूं, मेरा नाम कांचनमालिनीहै, मेरे वस्त्र इस कारण गीले हैं कि मैं अभी प्रयागर्म स्नान किये आती हूं ॥ १३ ॥ हे राक्षस ! अब मैं पर्वतश्रेष्ठ कैलासको जाती हूं, वहां सुर असुरोंसे पूजित पार्वतीनाथ निवास करते हैं ॥ १४ ॥ वेणीके जलके प्रभावसे हे राक्षस ! तेरी क्रूरता गई, जिस पुण्यसे मैं सुबुद्धि गन्धर्वकी कन्या श्रेष्ठ ॥ १५॥ दिव्य रूप कन्या हुई, वह सब तुझसे कहती हूं. मैं कलिंगाधिपति राजाकी वेश्या थी ॥ १६ ॥ रूपलावण्यसे सम्पन्न सौभाग्यके. मदसे प्रयागतश्चागताऽहनाम्राकांचनमालिनीआई परिकरोमेऽतः सुनाताहसितासिते ॥१३॥ गंतव्यंतुमयारक्षः कैलासेतुनगोत्तमे ॥ तत्रास्तेपार्वतीनाथःसुरासुरसुपूजितः ॥ १४ ॥ वेणीवारिप्रभावेणरक्षस्तेक्रूरतागता ॥ जाताऽहंयेनपुण्येनगंधर्वस्यसुमेधसः ॥ १५॥ कन्यकादिव्यरूपातुतत्सर्वंकथयामिते ॥ कलिंगाधिपतेराज्ञ स्त्वहमासंहिवेश्यका ॥ १६ ॥ रूपलावण्यसंपन्नासौभाग्यमदगविता ॥ अन्यासायुवतीनांचतत्पुरेऽहंशिरी मणिः ।। १७ ॥ तजन्मनिमयारक्षोभुक्त्वाभोगान्यथेच्छया ॥ मोहितंतत्पुरंसर्वमयायौवनसंपदा ॥ १८॥ रत्नानिविचित्राणिभूपणानिधनानिच ॥ वासांसिचित्ररूपाणिकर्पूरागुरुचंदनम् ॥ १९॥ एतच्चोपार्जितं सर्वमयामोहनरूपया ॥ नाईजानामिहेनोतस्वनिवासेनिशाचर ॥२०॥ गर्वित और स्त्रियोंमें वहां मैं शिरोमणिथी ॥ १७ ॥ हे राक्षस ! उस जन्ममें मैंने यथेच्छ भोग अपनी इच्छासे भोगे मेरी यौवन सम्पनिसे सब पुर मोहित था ॥ १८॥ विचित्ररत्नभूपण धन चित्ररूप वस्त्र कर्पूर अगर चन्दन ॥ १९॥ मुझ मोहिनी रूप वालीने यह सब कुछ उपार्जन किया, हे निशाचर ! अपने निवासमें मैंने कभी हिमऋतुका अन्त न जाना ॥ २० ॥ १ धर्मवै स्वनिवासे स्थितासती । ८
ड
मा.मा.
भा. टी.
४३
अ.१
काम पीडित अनेक युवा मेरे चरणोंको सेवन करतेथे, मैंने उनका सर्वस्व मायाजालसे हरण करलिया।॥२१॥कोई कामी परस्पर स्पर्धा
करके मृत्युको प्राप्त हुए इस प्रकार नगरमें मेरी गति थी ॥२२॥ जब वृद्धावस्था हुई तब मेरे हृदयमेंशोच हुआन मैंने दान किया
नहयन और न जप किया ॥२३॥ तथा चतुर्वर्गके फल देनेवाले देवका मैंने आराधन न किया, न मैंने दुर्गति नाशिनी दुर्गा
देवीका पूजन किया ॥ २४ ॥ भोगके लोभसे सब पापहारी विष्णुका मैंने स्मरण न किया, न ब्राह्मणोंको तृप्त किया, न कुछ
संसेवंतेयुवानोमेचरणोकामपीडिताः॥ मयातेवंचिता सर्वेसर्वस्वेनतमायया ॥ २१ ॥ अन्योन्यस्पर्धाभावे
नमृताःकेचित्तुकामिनः॥ इत्थंतनगरेरम्येसकलेमेगतिस्तदा ॥२२॥ प्राप्तेतुवाईकेकालेशुशोचहृदयंमम ॥
नदत्तनहुतंजप्तनवतंचरितमया ॥२३॥ नाराधितोमयादेवश्चतुर्वर्गफलप्रदः ।। नमयापूजितादेवीदुर्गादुर्गति
नाशिनी ॥ २४ ॥ सर्वपापहरोविष्णुर्नस्मृतोभोगलुब्धया ॥ नचसंतर्पिताविप्रानकृतंप्राणिनांहितम् ॥ २५ ॥
अणुमात्रमिदंपुण्यनकृतंचप्रमादतः ॥ पातकंतुकृतंभद्रतेनमेदह्यतेमनः ॥ २६ ॥ बहुधैवंविलप्याहंब्राह्मणं
शरणंगता ॥ ब्रह्मण्यंवेदविद्वांसंतस्यराज्ञःपुरोहितम् ॥ २७ ॥ सहिपृष्टोमयारक्षःकथमेनिष्कृतिर्भवेत् ॥ पाप
स्यास्यद्विज श्रेष्ठकथंयास्यामिसद्गतिम् ।। २८ ।।
प्राणियोंका हित किया ॥ २५ ॥ और प्रमादसे अणुमात्र पुण्यभी न किया, हे भद्र ! पापही किये इससे मेरा मन भस्म
होने लगा ॥ २६ ॥ इस प्रकार में बहुत विलापकर बाह्मणकी शरण गई, वह विद्वान् ब्राह्मण उस राजाका पुरोहित था ॥२७॥
राक्षस ! उससे मैंने पूछा कि, मेरा निस्तार कैसे होगा ? हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! इस पापसे छूटकर मेरी सद्गति कैसे होगी ? ॥ २८॥
अपने कर्मसे तापित हुई वशको दीनमन पापरूपी कीचमें पड़ी मुझको बाल ग्रहणकर उद्धारकरो ॥ २९ ॥ हे ब्राह्मण हर्षकी दृष्टिसे मेरे ऊपर करुणाका जल वर्षाओ साधु महात्मा भले बुरे सबपर रुपा करते हैं.॥ ३० ॥ इस प्रकार मेरे वचन सुन ब्राह्मणने मेरे ऊपर रूपा की और सब धर्मके सम्मित वचन मुझसे कहे ॥ ३१॥ ब्राह्मण बोले, हे वरानने ! मैं तुम्हारे सब निपिद्ध आचारणको जानता हूं, तू मेरा वचन शीघ्र मानकर प्रजापतिके क्षेत्रको गमन कर ॥ ३२ ॥ वहां जाकर. स्नानकर, स्वेनैवकर्मणातप्तविराकीदीनमानसाम् ॥ पापपंकनिमग्नांत्वंमामुद्धरकचग्रहः ॥ २९॥ मयिकारुण्यजंवारि वर्पहर्पदृशाद्विज ॥ सजनेसाधवःसर्वसाधुःसाधुरसज्जने ॥ ३० ॥ इत्यसौमद्वचः श्रुत्वाचकारानुग्रहमयि ॥ ऊचेप्रीतिकरंवाक्यंसर्वधर्ममयंद्विजः ॥३१॥ ॥ द्विज उवाच ॥ ॥ निपिद्धाचरणंजानेसर्वतेऽहंवरानने ॥ कुरुमेसत्वरंवाक्यंयाहिक्षेत्रप्रजापतेः ॥३२॥ तत्रगत्वाकुरुनानंतेनपापक्षयस्तव ॥ सर्वमनोगतंभद्रेत्वदीयं शोधितंमया ॥३३॥ नाहमन्यत्प्रपश्यामियत्तेपापप्रणाशनम् ॥ प्रायश्चित्तंपरंतीर्थेनानंचऋपिभिःस्मृतम्॥ ।। ३४॥ किंतुतीर्थत्यजेद्भीरुमनसाऽप्यशुभंकृतम् ॥ प्रयागनान्शुद्धावस्वर्गयास्यसिनिश्चितम् ॥३५॥ प्रयागलानमात्रेणनृणांस्वर्गानसंशयः ।। अन्यदेशकृतंपापंतत्क्षणादेवभामिनि ॥३६॥ उससे तेरा पापक्षय होजायगा; हे भद्रे ! मैंने सब तेरे मनकी बात सोचली ॥ ३३॥ तीर्थस्नानके सिवाय और तेरे पापोंका दूर करनेवाला प्रायश्चित्त में नहीं देखताहूँ. यह स्नान ऋपियोंद्वारा कथित है ॥ ३४ ॥ हे भीरु ! परन्तु तीर्थोमें मनसेभी अशुभका चिन्तन न करै प्रयागस्नान कर शुद्ध हो, तू अवश्य स्वर्गको जायगी ॥३५॥ इसमें सन्देह नहीं, प्रयागस्नान करतेही मनुप्य १ पापपके निमग्नांचमांसमुद्धरकोविद । २ कुरुकारुण्यजंवारिदग्धाहकिनिरीक्ष्यसि ।
Date मा.मा. भा.टी. ४४ अ.१ स्वर्गको प्राप्त होताहै. हे भामिनी ! और स्थानके किये पाप ॥ ३६ ॥ प्रयागमें नष्ट होते हैं, जो कि, तीर्थ स्थानमें नहीं किये हैं हे भीरु ! सुन पहले इन्द्रने गौतम ऋपिकी स्त्रीको ॥ ३७॥ देखकर कामवश हो गुप्तरूपसे उसके निकट जानेकी इच्छा करी उग्र पापका उसी समय फल मिला ॥ ३८॥ ऋषिकी स्त्रीके समीप गमन करनेसे इन्द्रका शरीर अति लज्जायुक्त होगया ॥ ३९ ॥ अर्थात् उसके स्वामीके शाप देनेके कारण उसके शरीरमें सहस्र भग होगये तब नीचेको मुखकर इन्द्र प्रयागेविलयंयातिपापतीर्थकृतंविना ॥ शृणुभीरुपुराशनोगौतमस्यमुनेर्वधूम् ॥ ३७॥ दृष्ट्वाकामवशंप्राप्तस्तां गतोगुप्तकामुकः ॥ उग्रेणतेनपापनदेवजनितंफलम् ॥ ३८ ॥ ऋपिस्त्रीगंतुरिंद्रस्यतस्याश्चपुरतस्तदा । कुत्सितंगर्हितंजातमितिलज्जाकरवपुः ॥ ३९॥ तद्भर्तुःशापमाहात्म्यात्सहस्त्रभगचिह्नितम् ॥ अधोमुखस्ततो भूत्वादेवराजोविनिर्गतः ॥ ४० ॥ निनिंदस्वकृतंकर्मसोभिभूतःसलजितः ॥ मेरोःशिरसितोयाढयेशतयो जनविस्तृते ॥ ४२ ॥ तत्रगत्वाप्रविष्टस्तुहेमांभोरुहकोरके ॥ तत्रस्थोगर्हयन्नित्यमात्मानमन्मथंतथा ॥४२॥ धिक्तांकामात्मतालोकेसद्यपातकदायिनीम् ॥ ययाहिनरकंयातिसर्वलोकविगर्हितः॥४३॥ वहांसे निकले ॥ ४० ॥ और लजित हो अपने कर्मकी निन्दा करने लगे सुमेरु पर्वतपर एक सुन्दर जलसे युक्त योजनके विस्तारमें ॥ ४१ ॥ जहां सुवर्णके कमल खिल रहेथे वहां प्रविष्ट होगया, वहां स्थित हो अपनी और कामदेवकी निन्दा करने लगा ॥ ४२ ॥ तत्काल पातक देनेवाले कामात्माको लोक, धिक्कार है, जिसके कारण सर्वलोकसे निन्दित हो १ कोटरे इति पाठः।
यह प्राणी नरकको जाता है ॥ ४३ ॥ आयु कीर्ति यश धर्म धैर्यका ध्वंस करनेवाली यह कामकी दुराचार रूपिणी आपत्ति ।। स्थितही है ॥ ४४ ॥ यह देहमें स्थित असन्तुष्ट दुर्दम शत्रु अवश्य है इस प्रकार कमलमें छिपे हुए इन्द्र कथन करता है । ॥४५॥ हेभीरु ! परन्तु इन्द्र के विना देवलोककी शोभा नहीं है तब देवता गंधर्व लोकपाल किन्नर ॥४६॥ शचीके सहित आकर बृहस्पतिजीसे पूछने लगे कि, हे भगवन् ! इन्द्र कहां है ? यह वार्ता हम नहीं जान्ते हैं ॥ ४७ ॥ कहां हैं कहां आयु कीर्तियशोधर्मधैर्यध्वसंकरीतथा ॥ धिङ्मन्मथंदुराचारमापदांनियतंपदम् ॥४४॥ देहस्थंदुर्दमंशत्रुमसं तुष्टंसदावशम् ॥ इत्थंवादिनिप्रच्छन्नेवासवेपद्मसमनि ।। ४५ ॥ आखंडलंविनाभीरुदेवलोकोनशोभते ॥ ततोदेवा-सगंधर्वालोकपालाःसकिन्नराः ॥ ४६॥ शच्यासहसमागम्यपप्रच्छुस्तेबृहस्पतिम् ॥ भगवन्धलाभ देवनेवजानीमहेवयम् ॥ ४६॥ कतिष्ठतिगतःकुचकुचवामृगयामहे ॥ ननाक-शोभतेतेनावनादेवगणैःसह ॥ ॥ १८ ॥ सुपुत्रेणविनायद्वत्कुलेश्रीमद्गुणान्वितम् ॥ उपायश्चित्यतांसद्यःस्थलोकोयेनशोभते ॥ १९ ॥ सनाथःसुश्रियायुक्तोनविलंबोऽत्रयुज्यते ॥ इतितेपांवच श्रुत्वगुरुर्वचनमब्रवीत् ॥५०॥ जानेऽहंस्वापराधे नलज्जयायप्रतिष्ठति ॥ रभसालब्धकार्यस्यभुक्तसमघवाफलम् ॥५१॥ गये कहां उनका खोज करें ? उनके विना स्वर्ग शोभित नहीं होता है ।। ४८॥ जिस प्रकार सुपुत्रके विना श्रेष्ठ कुल शोभित नहीं होता है, सो उपाय शीघ विचारो जिस्से स्वर्गलोककी शोभा हो ॥ ४९ - ।। जिससे यह लक्ष्मीयुक्त सनाथ हो जाय अब विलम्ब करनेका काम नहीं है. उनके यह वचन सुन गुरु बोले ॥ ५० ॥ मैं जानताहूं जहां वह अपराधी होने के १ दुराचारं निर्लज्ज पापदायिनमिति पाठः। २ लक्ष्म्या विनागुणाति पाठः । ३ युक्ता भवामाधुनावयम् इति पाठः ।
मा.मा. अ.१ कारण लज्जासे स्थित हैं, विना विचारे कार्य करनेका इन्द्र फल भोगते हैं ॥५३ ॥ नीति त्यागनेसे मनुष्योंको इसका भयंकर भा.टी. फल होता है, यह अपने राज्यमें मन हो कत्य अकृत्यके विचारसे रहित रहा ॥५२॥ दृष्ट अदृष्ट क्षयकारी निंधकर्म करता रहा प्राणी देवसे हतबुद्धि हो बड़े २ मूर्खताके कर्मको करते हैं ॥५३॥ यजमानके अपराधसे दोनों लोकके फल नष्ट होजाते है अब हम वहां जाते हैं जहां इन्द्र स्थित है ॥ ५४ ॥ ऐसे कह सब बृहस्पति आदि चले, सुवर्णके कमल खिले एक सरोवरका दर्शन नृणांनीतिपरित्यागाद्विपाकाःस्युर्भयंकराः ॥ अहोराज्यमदैमत्तःकृत्याकृत्यमचिंतयन् ।। ५२ ॥ कृतवानिंद्य मानांहदृष्टादृएक्षयंकरम् ॥ कुर्वतिवालिशायदेवोपहतबुद्धयः ॥ ५३ ॥ अपराधाद्यथाजन्मस्यादिहामुत्र निष्फलम् ॥ अधुनातनगच्छामोयत्रशक्रःसतिष्ठति ॥ ५४ ॥ इत्युक्त्वानिर्गताःसर्वेबृहस्पतिपुरोगमाः ।। दृष्ट्वा सरसिविस्तीर्णस्वर्णपंकजकाननम् ॥६५॥ तुष्टुवुर्देवराजानंप्रबोधोयेनजायते ॥ ततोगुरोःप्रवोधेननिर्गतः पद्मकुशलात् ॥५६॥ दीनाननोविरूपस्तुत्रीडाकुंचितलोचनः ॥ जग्राहचरणाविदोगुरोस्तस्याग्रजन्मनः ॥ १७ ॥ त्राहिमांनिष्कृतिंबहिपापस्यास्यबृहस्पते ॥ देवराजवच श्रुत्वाजगोविप्रोबृहस्पतिः ॥५८॥ शृणुदेवेंद्रवक्ष्येहमुपायंपापनाशनम् ॥ प्रयागनानमात्रेणतत्क्षणादेवपातकात् ॥ ५९ ॥ किया ॥५५॥ वहां इन्दको प्रसन्न करने लगे जिस्से उसको प्रबोध होप तब गुरुके प्रबोधसे कमलकलीसे इन्द्र निर्गत हुए ॥ ५६ ॥ हीन मुख रूपरहित लज्जासे कुंचितनेत्र इन्द्रने गुरुके चरण ग्रहण किये ॥ ५७ ॥ हे बृहस्पते गुरो ! मेरी रक्षा करो, इस पापसे । ४५ मेरी निप्कृति कहो, देवराजके वचन सुन बृहस्पतिने कहा ॥५८ ॥ हे इन्द्र ! सुनो पापनाशका उपाय कहताहूं. प्रयागके । H स्नान मात्रसे उसी समय पापसे ॥ ५९ ॥ छूट जाओगे सो तुम्हारे सहित हम वहां चलें. तब इन्द्र पुरोहिवके साथ वहां गये ॥६० ॥ और प्रयागर्ने स्नान करनेसे बहुत शीघ पासे मुक्त होगये, तब देव गुरुने प्रसन्न हो इन्द्रको वर दिया ॥६॥ हेपापरहित ! तुम प्रयाग स्नानसे क्षीण पाप हुए हो, हे इन्द्र । हमारे प्रसादसे क्षीण पाप होनेसे ॥६२ ॥शरीरमें जो लज्जाके चिह्न हैं यह सहस्र नेत्र होजायगे. तब उसी समय ब्राह्मणके वाक्यसे इन्न् शोभित हुए ॥ ६३ ॥ सहस्र नेत्र ऐसे भोभित हुए मुच्यसेदेवराजत्वंतत्रयामःसहैवते ॥ अथपुरोधसासार्द्धमागत्यवलमर्दनः ॥ ६०॥ सनीसितासितेतीर्थे सद्योमुक्तोरस्ततः ॥ अथदेवगुरुस्तस्मैप्रसन्नस्तुवरंदौ ॥६१ ॥ प्रयागनानमात्रेणक्षीणपापंतवाऽनघ॥ क्षीणपापस्यतेशक्रमत्प्रसादेनसत्वरम् ॥ ६२ ॥ सहस्रमेतद्योनीनांसहस्रस्यादृशांतव ॥ तदेवद्विजवाक्येनशु शुभेचशचीपतिः ॥ ६३ ॥ लोचनानांसहस्रेणपंकजैरिवमानसम् ॥ अथवृंदारकैःसर्वेऽपिभिश्वाभिपूजितः॥ ॥ ६४॥ गंधर्वःस्तूयमानस्तुगतःशकोमरावतीम् ॥ इत्थंसद्योविपापोऽभूत्प्रयागपाकशासनः ॥ ६५ ॥ याहित्वमपिकल्याणिप्रयागंदेवसेवितम् ॥ सद्यःपापविनाशायतथास्वर्गतयेदृढम् ॥ ६६ ॥ इतितस्यवचः श्रुत्वासेतिहाससमंगलम् ॥ तदेवसंभ्रमापनानत्वापार्दाद्विजस्यतु ॥ ६७ ॥ जैसे कमलोंसे मानस सरोवर. तब सब देवता और ऋपियोंने उनकी पूजा की ॥ ६४ ॥ और गन्धर्वो से स्तुतिको प्राप्त हो इन्द्र अमरावती पुरीको गये इस प्रकार प्रयाग स्नान करनेसे इन्द्र शीघही पाप रहित होगया ॥६५॥ हे कल्याणि । तूंभी प्रयाग सेवन करनेको जा शीघ पापनाश होकर स्वर्गकी प्राप्ति होगी ॥ ६६ ॥ इस प्रकार इतिहास सहित उसका सुमंगल नाम श्रवण FRE
भा.टी.
मा.मा.
४
अ. १२
करके उसी समय ब्राह्मणके चरणोंको नमस्कार करके संचमको प्राप्त हुई ॥ ६७ ॥ सब बंधुजन दास दासी और घरको त्यागन
करके तथा सब पापोंको विपके ग्रासकी समान त्यागन करके ॥ ६८॥ हे राक्षस 1 क्षणविध्वंसी शरीरको देख कर मैं घरसे
निकली जो नरकरूप सागरका गिरानेवाला अग्निके समान लेलिहान ॥ ६९ ॥ हृदयरूपी निर्जीव' दुःखरूप व्यावसे तप्यमान
हुई मैंने माघमासमें प्रयागमें जाकर स्नान किया ॥ ७० ॥ हे वृद्ध निशाचर ! सुन उस स्नानके माहात्म्यसे तीन दिनमें तो
त्यक्त्वावंधुजनंसर्वान्दासदासीगृहंतथा ॥ सकलान्विपयात्रक्षोविपनासानिवस्फुटम् ॥ ६८ ॥ वपुश्च
क्षणाविध्वंसिपश्यंतीनिर्गतापहम् ॥ नरकार्णवसंपातदारुणांतरवह्निना ॥ ६९ ॥ हृदयेकुणपव्याघतदातत्त
प्यमानया ॥ मयागत्वाकृतस्नानमात्रेमासिसितासिते ॥ ७० ॥ तस्यनानस्यमाहात्म्यंशृणुवृद्धानिशाचर ॥
त्र्यहात्पापक्षयोजातःसप्तविंशतिभिर्दिनः ॥७१॥ शेपैमैयदभूत्पुण्यंतेनदेवत्वमागता ॥ रममाणातुकैलासगि
रिजायाप्रियासखी ॥७२॥ जातिस्मरातथाजाताप्रयागस्यप्रभावतः ॥ स्मृत्वाप्रयागमाहात्म्यमाघमाघे
बजाम्यहम् ॥७३॥ ॥ इति श्रीपद्मपुराणेमाघमाहात्म्येवसिष्ठदिलीपसंवादेकांचनमालिनीरक्षःसंवादो
नामद्वादशोऽध्यायः ॥ १२॥
मेरे पाप दूर होगये और सनाईस दिनके ॥ ७१ ॥ शेप पुण्यसे में देवता होगई. कैलासमें गिरिजाकी प्रिय सखी होकर विहार
करूंगी ॥ ७२ ॥ और प्रयाग स्नानके कारणही मुझको जातिका स्मरण वनारहा. प्रयागका माहात्म्य स्मरण कर प्रत्येक माघमें
स्नानको जाती हूं ॥ ७३ ॥ इति श्रीमाघमाहात्म्ये कांचनमालिनीरक्षासम्बादो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
कांचनमालिनी बोली, हे राक्षस । विस्मित चित्तसे जो तैने पूछा सो मैंने तुम्हारी प्रीतिके निमित्त सब कहा ॥ ॥ हे राक्षस ! मेरी प्रीति के निमिन तुम अपना चरित्र कहो किस कर्मसे तुम भयंकर और विरूप हुए हो? ॥२॥ दाढी मूछोंवाले बड़ी-दा क्रव्याद रूपसे पर्वतके गहरमें स्थित हो ? राक्षस बोला, जो इष्ट देता ग्रहण करता गुप्त कहता और पूछता है ॥ ३ ॥ हे भद्रे ! यह सजनोंकी प्रीतिहै, सो सब तुझमें स्थित है, हे यामलोचने ! मैं तुझसे अपनेको सत्कृत मानता हूं ॥ ४ ॥ तुझसे इस क्रूर कर्मकी कांचनमालिन्युवाच ॥ ॥ इति राक्षसयत्पृष्टत्वयाविस्मितचेतसा ॥ तन्मयाकथितंसर्वचरितंप्रीतयेतष ॥३॥ मत्प्रीतयेचरित्रंस्त्वंत्वंचुहिममराक्षस । कर्मणाकेनजातोसिविरूपोऽतिभयंकरः ॥२॥ श्मश्रुलोदीर्घदंदू श्चक्रव्यादोगिरिगह्वरे ॥ राक्षसउवाच ॥ इदंदातिगृह्णातिगुह्यंवदतिपृच्छति ॥३॥ प्रीत्याहिसज्जनोभद्रे तच्चसर्वत्वयिस्थितम् ॥ त्वयासंभावितोनूनंमन्येऽहवामलोचने॥8॥ भाविनीनिष्कृतिःसद्यस्त्वत्तोस्यक्रूरक मणगाअतोवक्ष्यामितेभद्रेदुप्कृतंयत्स्वयंकृतम् ॥५॥ निवेद्यसज्जनेदुःखंततःसर्वःसुखीभवेत् ॥ शृणुसुश्रीण्यह काश्यांवढचोवेदपारगः ॥ ६॥ जातःपुराद्विजःश्रेष्ठाकुलेमहतिनिर्मले ॥ राज्ञांदुष्कृतिनांभीरुशूद्राणांचयथा विशाम् ॥ ७॥ वाराणस्यांकृतोपोरोमयादुटप्रतिग्रहः ॥ बहुधाबहुधावारंनिपिद्धकुत्सितोबहु ।। ८॥ निष्कृति होनी है हे भद्रे ! तुझसे मैं अपने दुष्कृतको कहताहूं जो मैंने स्वयं किया है ॥ ५॥ सज्जनसे दुःख निवेदन करके मनुष्य सुखी होता है. हे सुभोणि ! सुनो मैं काशीका बढच वेदपारगामी ॥ ६ ॥ निर्मल ब्राह्मणके कुलमें उत्पन्न हुआहूं, हे भीरु ! राजा दुष्कृती शूद्र तथा वैश्य ॥ ५ ॥ इनसे काशीमें मैने घोर परिग्रह लिया, बहुतवार निपिद्ध कुत्सित वस्तु ग्रहण भा.टी. मा.मा. ४७ अ.१३ की ॥ ८ ॥ दुष्टप्रतिग्रह मैंने चाण्डालकाभी त्यागन नहीं किया, औरभी मुझ मूढमतिसे अनेक पातक हुए ॥ ९ ॥ ऐसा कोई पापकर्म नहीं जो मैंने न कियाहो; हे वरवर्णिनी ! और क्षेत्रका दोप श्रवण करो ॥ १० ॥अविमुक्तक्षेत्रमें अणुमात्र पाप करनेसे मेरुकी तुल्य होजाता है, उस जन्ममें मैंने कुछभी धर्म संचित नहीं किया ॥ १३ ॥ हे शोभने ! बहुत दिनोंके उपरान्त वहीं मृत्युको प्राप्त हुआ, काशी क्षेत्रके प्रभावसे मैं नरकको नहीं गया ॥ १२ ॥ अविमुक्तमें मरनेवाला कोईभी पापी नरकको नहीं चांडालस्यापिनत्यक्तोमयादुष्टप्रतिग्रहः ॥ अन्यच्चपातकंतत्रममाभून्मूढचेतसः ॥९॥ तन्नास्तिदुष्कृतंकर्म मयायत्रनयत्कृतम् ॥ अन्यच्चश्रूयतांदोपाक्षेत्रस्यवरवणिनि ॥ १०॥ अविमुक्तेऽणुमायत्तदर्घमेरुतांबजेत् ॥ नधर्मस्तुमयाकश्चित्संचितस्तत्रजन्मनि ॥ ११ ॥ ततोबहुतिथेकालेमृतस्तत्रैवशोभने ॥ अविमुक्तप्रभावे णनचाहनरकंगतः ॥ १२ ॥ अविमुक्तेमृतःकश्चिन्नरकंनैतिकिल्बिपी ॥ अविमुक्तकृतंकिंचित्पावजीभवे दृढम् ॥ १३ ॥ वज्रलेपेनपापेनतेनमेजन्मराक्षसम् ॥ रौद्ररतरंपापंसंभूतंहिमपर्वते ॥ १४ ॥ द्विजोतो गृध्रयोनोप्राविाप्रोद्विःसरीसृपः ॥ एकवारमुलूकस्तुविड्वराहस्ततः परम् ॥ १५॥ इदंतुदशमंजन्मराक्षस ममभामिनि ।। अतीतानिसहस्राणिवाणिममजन्मनः ॥१६॥ जाता है और इस अविमुक्तक्षेत्रमें किया हुआ किंचित् पापभी वज्रके समान दृढ होजाता है ॥ १३ ॥ उस वज्रलेप पापके कारण मेरा जन्म राक्षस हुआ, रौद्र क्रूर पापसे युक्त इस हिमवान् पर्वतमें हुआ ॥१४ ॥ इससे पहले दोबार गृध्र, तीन बार व्याघ, दोवार सरीसृप हुआ; एकवार उलूक, एकबार विवाह हुआ ॥ १५॥ हे भामिनि ! यह दशमा जन्म मेरा राक्षस का वर्षाणां पञ्चसप्ततिरिति पाठः।
है, मेरे जन्मको सहस्रों वर्ष बीतगये ॥ १६॥ हे भद्रे ! इस दुःखसागरसे मरा निस्तारा नहीं है. हे सुसू ! तीन योजनतक यह स्थान मैंने जन्तुओंसे हीन करदिया है ॥ १७ ॥ विनापराध बहुतसे जन्तुओंका क्षय किया है, हे सुद्ध । इस कर्मसे सदा मेरा अन्तर जलता रहताहै ॥ ३८॥तुम्हारे दर्शनरूप सुधाके सिंचनसे मेरे मनका शीत गया, तीर्थ कालमें फल देते हैं साधु समागम शीघ फल देता है ॥ १९ ॥ हे सुचू ! इससे महात्मा सत्संगतिकी प्रसंशा करते हैं, यह मैंने अपने हृदयका सब दुःख नास्तिमेनिष्कृतिभद्रेएतस्माद्दुःखसागरात् ॥ अत्रत्रियोजनंसुभ्रर्निजतुहिमयाकृतम् ॥ १७॥ अनागसा चभूतानांबहूनांचकृतःक्षयः ॥ कर्मणातेनमेसुभूर्दह्यतेसततंमनः ॥१८॥ त्वदर्शनसुधासिक्तंगतशैत्यंमनोमम।। तीर्थफलतिकालेनसद्यःसाधुसमागमः ॥ १९ ।। अतःसत्संगतिंसुभ्रूःप्रशंसंतिमनीपिणः ॥ एतत्तेकथितंसर्व स्वदुःखद्गमया॥२०॥ विरल-सजनःसुभःस्वात्मायस्यनखिद्यते॥जानास्यत्रोचितंत्वंहिर्किचिन्नोवच्म्यतः परम् ॥ २१ ॥ अस्यदुःखोदधेःपारंकथंयामीतिचिंतयन् ॥ सजनानांसमाभूतिःसर्वेपामुपजीवनम् ॥ २२॥ क्षीरार्णव-पयोदत्तेहंसायनवकायकिम् ॥ ॥ श्रीदत्तात्रेयउवाच ॥ ॥ इतितस्यवचःश्रुत्वादयार्दीकृतमानसा ॥ २३ ॥ धर्मदाने मर्तिकृत्वाजगोकांचनमालिनी ॥ करिष्यनिष्कृतिरक्षइदानींखलुमाशुचः ॥२४॥ तुमसे कहा है ॥ २० ॥ हे सुत्र ! ऐसे कोई विरलेही हैं जिनकी आत्मा खेदित न हो, इसका उत्तर तुम जानतीहो जो उचित है। इस कारण मैं कुछ नहीं कहताहूं॥२३॥उस दुःखसागरसे कैसे पार हूंगा इसी प्रकार विचार करता हुआ रहताहूं, सजनोंका ऐश्वर्य दूसरों के उपकारके मिमिन होता है ॥२२ ॥ क्षीरसागर दूध हंसके निमित्त देता है. क्यानकके निमित्त नहीं?श्रीदत्तात्रेय बोले उसके इस प्रकार वचन सुन दयासे आई मन होकर ॥ २३ ॥ धर्म दानमें मति कर कांचनमालिनीने कहा, हे राक्षस ! मैं तेरा निस्तार १ यामिसुलोचने इतिपा० ।
मा.मा. भा.टी. ४८ अ.१३ करूंगी तू शोच मतकरै ॥ २४ ॥ दृढ प्रतिज्ञा कर तेरी मुक्तिक निमित्त यत्न करूंगी मैंने प्रत्येक वर्प, यथाविधि बहुतसे माघ किये हैं ॥ २५ ॥ हे भद्र ! श्रद्धापूर्वक प्रयाग ब्रह्मक्षेत्र सेवन किये हैं, हे राक्षस ! उस धर्मकी संख्या कथन करतीहूं ॥ २६॥ पंडित जनोंने कहा है धर्मको गूढरूपसे करना चाहिये, दुःखीको दान करनेकी वेदकादियोंने प्रसंशा की है ॥ २७ ॥ हे भने । समुद्रमें वर्पनेसे मेघका क्या फलहोता है ? हे राक्षस ! उस पुण्यका फल मैंने स्वयं अनुभव किया है ॥ २८ ॥ हे मित्र ! वह प्रतिज्ञांतुदृढांकृत्वायतिष्येतवमुक्तये ॥ बहवोहिकृतामाघाववयथाविधि॥२५॥ श्रद्धापूर्वमयाभद्रब्रह्मक्षेत्रोसि तासिते । तीवदामितसंख्यातितस्यधर्मस्यराक्षस ॥ २६ ॥ गूढोधर्मोहिकर्तव्यइत्यूचुर्विवुधाजनाः ॥ आर्ते दानप्रशंसंतिमुनयोवेवादिनः ॥२७॥ सागरेवतोभद्रकिमेघस्यफलंभवेत् ॥ अनुभूतंमयारक्षःस्वयंतत्पुण्य जंफलम् ॥२८॥ तत्तदास्यामितोमत्रसद्यःपापविनाशनम् ॥ निप्पीडयाथततोवस्त्रंजलंकृत्वाकरांजे ॥२९॥ दौसामाघजेपुण्यंतस्मेवृद्धायरक्षसे ॥ शृणुराजन्विचिबंहिप्रभावंमाघधर्मजम् ॥ ३० ॥ तदेवंप्राप्यतत्पुण्यं विमुक्ताराक्षसीतनुः ॥ संभूतोदेवताकारस्तेजोभास्करविग्रहः॥ ३१ ॥ देवयानसमारूढःसहोत्फुल्ललोचनः योतमानस्तदाव्योनिभासयन्प्रभयादिशः ॥ ३२ ॥ पापनाशी पुण्यफल मैं शीघ तुझको देतीहूं तब यस्खको निचोड़ उसका जल हाथमे लेकर ॥ २९ ॥ उस वृद्धराक्षसके निमित्त उसने मायका पुण्य दिया, हे राजन् ! सुनो माघस्नानका फल विचित्र है ॥ ३० ॥ उस पुण्यको प्राप्त हो वह राक्षसी शरीरसे मुक्त हुआ, देवनाके आकार तेजमें सूर्यको समान हुआ॥ ३१ ॥ देवताओंके विमानमें चढा प्रसन्नतासे फूले नेत्र आकाशमें प्रकाश १ नानुनक्तुं समर्याहं संख्यां धर्मस्य राक्षसेति पाठान्तरम् ।
CD GEET मान कान्तिसे दिशाओंको प्रकाश करता ॥ ३२॥ दिव्य रूपधारे दूसरे सर्यकी समान शोभित हुआ. तब उस कांचनमालिनीका बड़ाई करने लगा ॥ ३३॥हे भद्रे ! कर्मका फलदाता ईश्वरही इस बातको जानता है, तैंने वह उपकार किया जिस्से मेरी निष्कृति नहीं होती ॥ ३४ ॥ अवभी रूपा करके मेरे ऊपर प्रसन्न हो अनुग्रह कर. हे देवी ! सर्वनीतिकी भरी परम पवित्र शिक्षा हमको दीजिये ॥ ३५ ॥ जो सब धर्मकी करनेवाली हो; जिससे मैं फिर पातकको न करूं, तुम्हारी आज्ञा पाय उसे सुनकर दिव्यरूपधरोरेजेद्वितीयइवभास्करः ॥ ततोऽभिनंदयामाससतांकांचनमालिनीम् ॥ ३३ ।। भद्रेवेत्तीश्वरोदेवः कर्मणांय फलप्रदः ॥ तत्त्वयोपकृतंसवयत्रमेनास्तिनिष्कृतिः॥३१॥ इदानीमपिकारुण्यात्प्रसादानुग्रहंकुरु ।। शिक्षाविधीहमेदेविसर्वनीतिमयीशुभाम् ॥ ३५ ॥ सर्वधर्मकरीनू नकुर्वपातकंयथा ॥ तांश्रुत्वात्वदनुज्ञातः पश्चायामिसुरालयम् ॥ ३६ ।।.॥ श्रीदत्तात्रेय उवाच ॥ ॥ एतन्निशम्यतेनोक्तंप्रियंधर्ममयंवचः॥अतिमी त्याध्यवीद्धमराजन्कांचनमालिनी॥३७॥ धर्मभजस्वसततंत्यजभूतहिंसांसेवस्वसाधुपुरुपाहिकामशत्रुम् ।। अन्यस्यदोपगुणकीर्तनमाशुहित्वासत्यंवदार्चयहारिबजदेवलोकम् ॥३८॥ देहेऽस्थिमांसरुधिरेस्वमतित्यज त्वंजायासुतादिपुसदाममताविमुंच ॥ पश्यानिशंजगदिदंक्षणभंगुरंहिवैराग्यभावरसिकोभवयोगनिष्ठः॥३९ ।। फिर देवस्थानको जाऊंगा॥३६॥ श्रीदत्तात्रेय बोले-यह उसके मिय ओर धर्ममय वचन सुनकर हे राजन् ! कांचनमालिनी बड़े प्रेमसे धर्म कथन करने लगी ॥ ३७ ॥ सदा धर्मका सेवन करो, प्राणियोंकी हिंसा त्यागो, साधु पुरुषोंका सेवन करो, काम शत्रुको जीतो, दूसरेके गुणदोप कहना त्यागो, सत्य बोलो, नारायणकी अर्चा कर देवलोकको जाओ॥ ३८॥ देह आस्थि मांस मा.मा. भा.दी. अ. १३ रुधिरमें आत्म मतिको त्यागन करो, स्त्री पुरुषमें ममताको त्यागो, इस जगत्को रातदिन क्षणभंगुर देखो,वैराग्यके भाव में रसिक होकर योगनिष्ठायाले हो ॥ ३९ ॥ यह प्रीतिसे मैंने तुमसे धर्ममार्ग कहा यह सब चित्तमें रखकर शीलयुक्त हो, और राक्षसशरीर त्याग देवतादेह धारणकर यथासुख ज्योतिर्मय स्वर्गको गमन करो ॥४०॥ यह धर्म सुन सन्तुष्ट हो राक्षस बोला, तू सदा प्रसन्न हो तुझको सदा मंगल हो॥४१॥चन्द्रसूर्यकी स्थितितक कैलासमें शिव के समीप रमणकर हे वरवर्णिनि ! पार्वतीमे तेरा अखण्ड प्रेमहो॥४२॥ प्रीत्यामयानिगदितंतवधर्ममार्गचित्तेनिधेहिसकलंभवशीलयुक्तः ।। संत्यज्यराक्षसतनुधृतदेवदेहोज्योतिर्मयो वजयथासुखमाशुनाकम् ॥४०॥ श्रुत्वाधमततोदृष्टःसंतुष्टोराक्षसोऽत्रवीत् ॥ भवप्रमुदितानित्यंसर्वदाशिव मस्तुते ॥ ४१ ।। आचन्द्राकरमस्वत्वकैलासेशिवसन्निधौ ॥ उमयाऽखंडितप्रेमतवास्तुवरवणिनि ॥४२॥ धर्मनिष्ठातपोनिष्ठामातस्त्वंभवसर्वदा ॥ मास्तुलोभ-शरीरेतेआपन्नार्तिसदाहर ॥ ४३ ॥ इत्युक्कातृप्रणम्या थसतांकांचनमालिनीम् ॥ जगामराक्षस-स्वर्गगंधर्वहुभि-स्तुतः ॥ १४ ॥ देवकन्यास्तदागत्यववर्यु-पुष्पवृ टिभिः ॥ तस्याःकांचनमालिन्यामूर्षिहर्पसमाकुलाः॥४५॥ तामालिंग्यततःप्रोचुकिन्यकास्तुप्रियंवचः॥ कृतंभनेत्वयाचित्रंराक्षसस्यविमोक्षणम् ॥ ४६॥ हे मातः ! तुम सदा धर्म और तपमें निष्ठावाली हो तेरे शरीरमें लोभ न हो सदा दुःख दूर करनेवाली हो ॥ ४३ ऐमा कहकर वह कांचनमालिनीको प्रणामकर गन्धोंसे स्तुतिको प्राप्त हो स्वर्गको गया ॥ ४४ ॥ देवकन्याओंने आकर हर्ष युनहोकर उस कांचनमालिनीके ऊपर प्रेममे पुष्पवर्षा की ॥ ४५ ॥ उसको आलिंगन कर देवकन्या प्रेमसे बोली है भद्रे
तैने राक्षसकी विचित्रं मुक्ति की॥४६॥इस दुष्टके भयसे कोई इस वनमें प्रवेश नहीं करता था, अब हम निर्भय हो यथासुखस।
विचरण करेंगी ॥ ४७ ॥ हे राजन् ! कांचनमालिनी उनके वचन सुनकर उस दानसे प्रसन्न हो सतहत्य हुई ॥४८॥ कांचन
मालिनी गन्धर्वकन्या उस राक्षसकी मुक्निकरके क्रीडा करती हुई शिवके स्थानको गई और परोपकारसे पूर्ण प्रीतिको प्राप्त हुई ।
॥ ४९ ॥ इस कन्याओं के सम्बादको जो मनुष्य परमभक्तिसे सुनते हैं वह राक्षसोंसे बाधाको प्राप्त नहीं होते, और उनकी धर्ममें
दुष्टस्यास्यभयात्कश्चिद्विशत्यस्मिन्नकानने । अधुनानिर्भयाह्यत्रविचरामोयथासुखम् ॥ १७॥ श्रुत्वातद्वचनं
राजस्तासांकांचनमालिनी ।। हृष्टातेनैवदानेनकृतकृत्यातदासती ॥४८॥ तंराक्षसंकांचनमालिनीवरागन्धर्व
कन्यापरिमोच्यसत्वरम् ॥ क्रीडत्यमूभिःप्रययौहरालयंप्रीत्यासपूर्णाचंपरोपकारया ॥ ४९॥ संवादमेनंवरक
न्यकेरितंभक्त्यापरंयःशृणुयाचमानवः ॥ नबाध्यतेजातुसदासराक्षसैर्धमतिस्तस्यभृशंहिजायते ॥५०॥
इति श्रीपद्मपुराणेमाघमासमाहात्म्येदिलीपवसिष्ठसंवादेराक्षसमोक्षोनामत्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३॥ वसिष्ट
उवाच ॥ ॥ कथितंमाघमाहात्म्यंदत्तात्रेयेणभापितम् ॥ अधुनाऽहंप्रवक्ष्यामिमाघस्नानस्ययत्फलम् ॥१॥
सर्वक्रतुवरिष्ठंतुसर्वदानफलप्रदम् ॥ सर्वत्रततपस्तुल्यंमाघस्नानंपरंतप ॥ २॥
मति सदा होती है ॥ ५० ॥ ॥ इति श्रीपमपुराणे माघमाहात्म्ये पंडित ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां राक्षसमोक्षोनाम
त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ ॥ वसिष्ठजी बोले-श्रीदत्तात्रेयका कहा माघमाहात्म्य वर्णन किया, अब माघस्नानका फल कहताहूं
॥ १ ॥ सब योमें श्रेष्ठ सय दानोंका फल देनेवाला हे परंतप ! यह माघस्नान सम्पूर्ण व्रत और तपकी तुल्य है ॥ २॥
- 4. भा.दी. मा.मा. अ.१४ माघलानसे विशुद मन होकर दोनों कुलके पितरोंको स्वर्गमें स्थापन करकै स्वयं उज्ज्वल मुख होकर स्वर्गको जाते हैं सुन्दर मनोहर कामगामी विमानोंपर स्थित होते हैं ॥३॥ जो मनुष्य सदा पाप करते हैं दुराचारी कुमार्गी हैं वे भी माघस्नानकर नारायणका अर्चन करनेसे महापापसे छूट जाते हैं ॥ ४ ॥ जो सत्यसे हीन माता पिताके दुःख देनेवाले आश्रम और कुलके धर्मसे वर्जित हैं जो पाखंडी पापी हैं वेभी स्नानसे श्रेष्ठ गतिको प्राप्त होते हैं ॥ ५॥ “माघमासमें- पुण्य तीर्थोंमें -स्नान मिलना भूमिमें परम दुर्लभ स्नानेनमाघस्यविशुद्धमानसाः पितॄन्दिविस्थाप्यकुलद्वयस्यवे ॥ स्वर्गप्रयांतिस्वयमुज्वलाननावरेविमाने- रुचिरेश्वकामगैः॥३॥ येमानवाःपापकृतोपिसर्वदासदादुराचाररताविमार्गगाः॥ स्नात्वाहिमाघेहरिमर्चयं तियेमुंचंतितेपीहमहाघसंचयम् ॥ ४ ॥ सत्येनहीना पितृमातृदुःखदाहनाश्रमस्थाःकुलधर्मवर्जिताः ॥ येदांभिस्कास्तेपिनराःसांगतिस्त्राने प्रात्यहिमाघसंभवैः ॥ ५॥ पुण्येपुतीर्थपुचमाघमासेनाननराणाम तिदुर्लभभुवि ॥ तस्माद्यतोब्रह्मविदापदंनरेः संप्राप्यतेनात्रविचारणामम ॥ ६॥ माघेतपोदानजपप्रसेवनं स्थानहरेःपूजनमक्षयंनृप ॥.तस्माद्यथाशक्तिनरेःप्रयत्नतःस्नात्वाप्रदेयंवसननिकांचनम् ॥७॥ माघेऽन्नदाताऽ मृतपःसुरालयेहेनश्चदातावलभित्समीपगः ।। दीपानिवासांसिददन्नर सदासूर्यस्यलोकेवसतिप्रभामयः ॥८॥ इससे मनुष्योंको ब्रह्मविदोंका पद प्राप्त होता है इसमें सन्दह वा विचारकी बात नहीं है ॥६॥ माघमें तप दान जपका करना हरिका पूजन स्नान अक्षय होता है, इस कारण स्नान करके यथाशक्ति मनुष्योंको वन अन्न सुवर्ण देना चाहिये ॥ ७ ॥ माधम अन्नदान करनेवाला देवलोकमें अमृत पाता है, सुवर्णका देनेगला इन्द्रके समीप जाता है, दीप अग्नि वनका देनेवाला १ अप्रयाणाधिय',दिनानि सतापिचपंचमानवाः' इनि केषित्पुस्तकेतु लभ्यते। २ वसनानिकांचनम्-३० पा० । - Train ErabhraarAFP-Rscureग कर..." -- 141 S मूर्यक समीप कान्तिमान होकर निवास करता है ॥८॥ यज्ञ दान और उज्ज्वल तप करके ब्रह्मचर्य अर्चा योग सेवासे प्राणी ऐसे नहीं होते जैसे मायके स्नान करनेसे पाणी शुद्ध होते हैं ॥९॥ जो असह्य यातनासे दुःखी होकर वे यमयातनाको प्राप्त नहीं होते जो माघमाम श्रेष्ठ तीर्थमें मजन करते हैं जब कि, सूर्यबिम्ब-आधा-उदित होता है ॥ १०॥ माघमासमें स्नान करके जो नारायणको अर्चन करते हैं वे स्वर्गसे च्युत होकर राजा होते हैं. श्रेष्ठ सुरुप सुभग प्यारे बोलनेवाले धर्मयुक्त बड़े धनी सौवर्पवाले यज्ञैःसुदाने सुतपोभिरुज्यले सुब्रह्मचर्यार्चनयोगसेवया॥ शुद्धाभवंतीहतथानपापिनःस्नानैर्यथापुण्यंभवस्तुमा घः ॥९॥ दुःखौघसंतप्तिमसह्ययातनांयाम्यांनतेयांत्यपिपापकारिणः ॥ येमाघमासेवरतीर्थमजनंकुवं तिचाोंदितसूर्यमंडले ॥ १० ॥ स्नात्वाचमावे हरिमर्चयंतियस्वर्गच्युताभूपतयोभवंति ॥ भव्याःसुरूपाः सुभगा प्रियंवदाधान्विताभूरिधना शतायुपः ॥ ११ ॥ दीप्तानले काष्ठचयोयथाहुतोभस्मावशेपोभवती हतत्क्षणात्॥ सानेनमावस्यतथाविलीयतेक्षुद्रोपिपापौघमहाघसंचयः॥ १२॥ कायेनवाचामनसापिपातकं ज्ञातंयदज्ञातमलंकृतंनरैः ।। स्नानंचमाघेवरतीर्थसंभवंसदहेद्विष्णुरिवाशुद्गतः ॥ १३॥ संभुज्यमानाधफलं हिपार्थिवप्रमादतोपीहनृणांकदाचन ॥ खानहिमाघस्ययतःप्रसज्यतेतदैवतत्संक्षयमेतिनिश्चितम् ॥ १४ ॥ होते हैं ॥ ११ ॥ दीनामिजिसप्रकार काष्ठसमूहकी आहुति दी जाती है और वह तत्काल भस्म होती है इसी प्रकार माघस्ना नसे छोटे बड़े सब पाप क्षय हो जाते हैं ॥ १२॥ वचन मन कायाके पाप जानकर अथवा अनजानकर वा अज्ञात जो मनुष्योंने किये हैं वह माघमासमें कहीं तीर्थम स्नान करनेसे विष्णु भगवान् हृदयमें प्राप्त हुए सब भस्म कर देते हैं ॥ १३॥ हे राजन् ! १ तीर्थभवैश्च माधना-पा० । 0113 मा.मा. भा.टी. ५. अ.१' पापके फलके भोगनेवाले कभी प्रमादसेभी माघस्नान करले तो उनके सब पाप कट जाते हैं ॥ १४ ॥ हे नृप ! गन्धर्वकी कन्या शापमे पापके महाफलको भोगती हुई माघमाममें स्नानकर लोमशके वचन मान पापसे मुक्त होगई ॥ १५॥ इति श्रीपद्मपुराणे मायमाहात्म्ये भापाटीकायां चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥ ॥ मूतजी बोले राजाने यह सुन प्रसन्न हो गुरुके चरणोंको प्रगामकर परम श्रद्धासे नम्र होकर पुरोहितमें यह कहा ॥ १ ॥ हे भगवन् ! कहिये कन्याओंको शाप गंधर्वकन्या पृथिवीशशापजसंभुज्यमानावफलंदुरत्ययम् ॥ नानाद्विमुक्ताःखलुमावमासजादाक्यात्पुरालो मशजातमद्भुतम् ॥ १५ ॥ इति श्रीपद्मपुराणेमाघमाहात्म्येवसिष्ठदिलीपसंवादेचतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥ । सूतउवाच ॥ ॥ श्रुत्वेतत्पार्थियःप्रीत्यानत्वातत्पादपंकजम् ॥ श्रद्धयापरयानम्रस्तंपप्रच्छपुरोधसम् ॥१॥ भगवन्यूहिकन्याभिःशापोह्यभिगतःकुतः॥ कस्यापत्यानितास्तासांनामकिंकीदृशंवयः ॥ २॥ कथंलो मशवाक्येनविपाकाच्छापसंभवात् ॥ विमुक्ताः कुत्रताः सस्नुर्मासंता कतिसंख्यया ॥३॥ वसिष्ठउवाच ।। श्रूयतांराजशार्दूलधर्मगभांकथांपराम् ॥ यथाऽरणिर्वह्निगर्भाधर्मसूर्वह्निसरिख ॥ ४॥ गंधर्वःसुखसंगीतिस्तस्य । कन्याप्रमोदिनी । सुशीलस्यसुशीलाचसुस्वरास्वरखेदिनः ॥ ५॥ कहां हुआ ? वह किसकी कन्याथीं और उनके क्या नाम थे ? कितनी उमर थी ? ॥२॥ लोमशके वाक्यसे किस प्रकार गापान्तको प्रान हुई ? ये कह स्नानकर मुक्क हुई और कितनी थी ? ॥ ३ ॥ वसिष्टजी बोले, हे राजन् ! सुनो। धर्मयुन कथा तुमगे कहताहूं जैमे अरणीके गर्भमें अनि ऐमे धर्म मन्तानकी उत्सादकहै ॥ ४॥ सुखमंगीती गन्धर्व । ५१ की प्रमोदिनी कन्या थी सुशीलकी सुशीला आर स्वरवेदीकी सुस्वरा थी ॥५ ।। चन्द्रकान्तिकी सुतारा, सुप्रभकी चाबका छ। राजन् ! उन अप्सराओंके ये श्रेष्ठ नाम थे ॥ ६॥ ये पांचों कुमारी अवस्थामें समान थीं चन्द्रमासे निकली हुई चन्द्रिकाके समान उज्ज्वल थीं ॥ ७॥ चन्द्रमुखी सुकेशी चन्द्रकै अमृतके समान रसयुक्त थीं नेत्रोंको आनंद करनेवाली थीं जैसे बबूलोंको कौमुदी ॥८॥ लावण्य (सुन्दरना) के पिण्डसे सम्भूत सुन्दररूपवाली मनोहर उठे कुचकुंभवाली वैशाखमें खिली कमलिनीकी समान सुताराचंद्रकांतस्यचंद्रिकासुप्रभस्यच ॥ इमानिवरनामानितासामप्सरसांनृप ॥ ६ ॥ कुमार्यःपंचसर्वा स्तावयसासुसमा पुनः ॥ चंद्रादिवविनिप्कांताश्चंद्रिकेवसमुज्ज्वलाः ॥ ७॥ चंद्राननाःसुकेशिन्यश्चंद्रामृत रसाधराः ।। नेष्वानंदकारिण्याकौमुदीकुमुदेष्विव ।। ८॥ लावण्यपिंडसंभूताश्चारुरूपामनोहराः ॥ उद्भिन्न कुचकुंभिन्य पद्मिन्यइवमाधवे ॥ ९॥ उन्मील्ययौवनकांतवल्लीवनवपल्लवैः ॥ हेमगौराश्चहेमाभाहेमालंकार भूपिताः ॥ १० ॥ हेमचंपकमालिन्योहेमच्छविसुवाससः ॥ स्वरयामावलीहासुविविधामूर्च्छनासुच ॥११॥ तालदानविनोदेपुवेणुवीणाप्रवादने । मृदंगनादसंभिन्नलास्यमार्गलपुच ॥ १२॥ चित्रादिपुविनोदेषुकला सुचविशारदाः ॥ एवंभूतास्तुता-कन्यामुमुहु-क्रीडनेवने ॥ १३ ॥ शोभित थीं ॥ ९ ॥ मनोहर यौवनसे उठी मानों वनके पल्लवोंकी लता है, सुवर्णके समान गौरवर्ण सुवर्णहीकी कान्तिवाली सुवर्णके अलंकारोंसे भूपित ॥ १० ॥ सुवर्णके चम्पोंकी माला पहरे सुवर्णकी छविके वन पहरे स्वरग्राम लीला मूर्च्छना ॥ ११ ॥ तालविनोद वीणावजाना मृदंगनाद लास्यनृत्य विशेष मार्ग लव ॥ १२ ॥ चित्र विचित्र विनोद और कलाओंमें सब भा.टी. ५२ अ.१५ कुशल थीं. इस प्रकारकी वे कन्या वनमें पारंवार क्रीडा करती थीं ॥ १३ ॥ पिताओंसे लालित हुई कुबेरके स्थानमें विचरती थी एक समय वैशाखमासमें सब कौतुकसे मिलकर इस वनसे उस वनमें मंदारके फूलोंको तोडती ॥ १४॥ गौरीके आराधन करनेको वे श्रेष्ठ अंगना अच्छे जलके अच्छोद सरोवरके निकट गई. सुवर्णकमल और जल कमलोंको लेकर ॥१५॥ वैडूर्यमणिके समान शुद्ध स्फटिक छविवाले तथा मूंगे जड़े सरोवरमें स्नान करके वस्त्र पहर मौन होकर स्थल पिण्डिकाकी अर्थात् सुवर्णसिकताकी पितृभिर्लालिताःसत्यश्वेरुश्वधनदालये॥ कौतुकादेकदापंचमिलित्वामासिमाधवे ॥ कन्यामंदारपुप्पाणिवि चिन्वंत्योवनाद्वनम् ॥ १४ ॥ गौरींसमाराधयितुंवरांगना-कदाचिदच्छोदसरोवरंययुः ॥ हेमांबुजानिप्रवराणि तात्पुनस्तस्मादुपादायवरोत्पलै सह ॥ १५ ॥ वैडूर्यशुद्धस्फटिकाच्छविद्रुमेस्नात्वातडागेपरिधायचांवरम् ।। मोनेनचस्थडिलपिंडिकामयीस्वर्णस्यसिक्ताभिरुमांविनिर्ममः ॥१६॥ समार्चितांचन्दनचंद्रकुंकुमैरभ्यर्च्यगौरी वरपंकजादिभिः॥नानोपचारैश्चसुभक्तिभावितास्तालप्रयोगर्ननृतुःकुमारिकाः॥१७॥ गांधारमाश्रित्यवरस्वरंत तोगेयंसुतारध्वनिभिःसुमूर्च्छितम्।।एणीदृशस्ता प्रजगुःकलाक्षरंचारुप्रबंधगतिभिस्तुसुस्वरम्॥१८॥तास्मन्सु नादेरसवर्पहर्पदेकन्यास्वलंनिर्भरनृत्यवृत्तिषु॥अच्छोदतीर्थप्रवरेतदागतःस्नातुंमुनेदनिधेःसुतोऽमिपः॥१९॥ गौरीकी मूर्ति बनाई ॥ १६ ॥ चंद्र चन्दन कुंकुम कमलादिसे गौरीका पूजनकर अनेक उपचार कर सुन्दर भक्तिमें भावित होकर तालप्रयोगसे वे कुमारी नृत्य करने लगी ॥ १५ ॥ फिर गांधार स्तरका आश्रय करके उच्च ध्वनीसे मूर्च्छनाके सहित गान करने लगी. इस प्रकार ये मृगलोचनी मनोहरं अक्षरोंसे गाने लगी जो कि, सुन्दर बंध और मनोहर गतिसे सुस्वर राग था --
स्थानमें वेदनिधि मुनिके पुत्र अग्निप कपि थे। १९ ।। रूपमें सीमारहित अनन्त सुन्दर मुखकमल लोचन चौड़ी छाती युवा
सुन्दर भुजा श्याम छवि दूसरे कामदेवके समान सुन्दर ॥ २० ॥ शिखा सहित वह ब्रह्मचारी विराजमान हो रहेथे. दण्डसे युक्त
धनुष लिये कामदेवके समान भृगचर्म ओड़े सुन्दर सूत्र यज्ञोपवीत धारण किये सुवर्णके समान मूजकी कटिसूत्र और मेखला
धारण कियेथे ॥ २१ ॥ उन ब्राह्मणको देखकर वे सब वाला सरोवरके किनारे कौतुकको पाम हो प्रसन्न हुई यह हमारे नैनोंको
रूपेणनिःसीमतरोवराननःसरोजपत्रायतलोचनोयुवा ॥ विशालवक्षा-सुभुजोऽतिसुंदरःश्यामच्छविकामइया
परोहिसः ॥ २०॥ सब्रह्मचारीसशिखोविराजतेदंडनयुक्तधनुपैवमन्मथः ॥ एणाजिनावरणःसुसूत्रधृग्घेमा
भोंजीकटिसूत्रमेखलः॥२१॥ तंदृष्वाब्राह्मणं वालास्तास्तत्रसरसस्तटे ॥ जहर्पःकौतुकाविष्टाः कोयंनोनय
नातिथिः ॥२२॥ संत्यक्तनृत्यगीतास्तास्तस्यालोकनतत्पराः।।हरिण्योलुब्धकेनेवविद्धाःकामेनसायकैः॥२३॥
पश्यपश्येतिजल्पंत्योमुग्धाःपंचसुसंभ्रमम् ॥ तस्मिन्विप्रवरेयूनिकामदेवभ्रमंययुः॥२४॥ पुनःपुनस्तमभ्य
य॑नयनैःयंकजेरिव ॥ पश्चाद्विचारयामासुस्ताश्चकन्या:परस्परम् ।। २५ ।। यद्ययंकामदेवोहिरतिहीनस्कथं
बजेत् ॥ अथायमाश्विनीदेवोतौनूनंयुग्मचारिणी ॥ २६ ॥
कौन अतिथि प्राप्त हुआ ? ॥ २२ ॥ वह गीत नृत्यको त्यागकर उन्हींको देखने लगी; जैसे हरिणी कामरूपी लुब्धकके बाणसे
विद्ध हो जाती हैं ।। २३ ।। वे पांचों मुग्धा संवमसे कहने लगी कि अरी ! देखो तो, "उस युवा ब्राह्मणमें उनको काम
देवका प्रभ होगया" ॥ २४ ॥ नेत्ररूपी कमलोसे मानों उसको वारंवार अर्चनाकी पीछे वह कन्या विचार करने लगीं ॥ २५॥
जो यह कामदेव है नो रतिके विना कैसे गमन करेगा ? जो यह देव अश्विनीकुमार होते तो दोनों साथ होते ॥ २६ ॥
.मा. भा.टी. अ.१५ 3000 यह कोई गन्धर्व किन्नर वा सिद्ध कामरूप बनाये हैं, अथवा कोई ऋषि वा मनुष्यका पुत्र है ॥ २७ ॥ अथवा कोई हो इसे विधा ताने हमारे निमिन बनाया है जैसे भाग्यवानोंको पूर्वकर्मसे धन मिलता है ॥ २८ ॥ इसी प्रकार, हम कुमारियोंको गौरीने यह वर प्राप्त किया है करुणा जलकी तरंग और प्लवसे गीले चित्तवाली ॥ २९ ॥ उनके यह वचन कि, मैंने वरा तैंने वरा तुम मुझसे यह वरागया. इस प्रकार पांचो कन्याओंने कहा ॥ ३० ॥ हे राजन् ! उनके वचन सुनकर ऋपिकुमार मध्याह्नकी गंधर्वः किन्नरोवाथसिद्धोवाकामरूपधृक् ॥ ऋपिपुत्रोथवाकश्चित्कश्चिद्वामानुपोत्तमः ॥२७॥ अस्तुवाकश्चि - देवायंधात्रासृष्टोहिनः कृते ॥ यथाभाग्यवतामथेनिधानपूर्वकर्मभिः ॥ २८॥ तथाऽस्माकंकुमारीणांगौर्या नीतोवरोत्तमः ॥ करुणाजलकल्लोलप्लवार्टीकृतचित्तया ॥२९॥ मयावृतस्त्वयाचायंत्वयावृत्तस्तथामया ॥ एवंपंचसुकन्यासुवदंतीपुनृपोत्तम ॥ ३०॥ श्रुत्वातद्वचनंतत्रकृत्वामाध्यानिकी क्रियाः ॥ आलोच्यहृदये सोपिविनमतदुपस्थितम् ॥३३॥ब्रह्मविष्णुगिरिशादयःसुरायेच सिद्धमुनयःपुरातनाः॥तेपियोगबलिनोविमो हितालीलयातवलाभिरद्भुतम् ॥३२॥योपितांनयनतीक्ष्णसायकैर्भूलतासुदृढचापनिर्गतैः॥ धन्विनामकरके हनाहतःकस्य नोपततिहामनोमृगः ॥३३॥ तावदेवनयधीविराजतेतावदेवजनताभयंभजेत् ॥ तावदेवदचि त्तताभृशतावदेवगणनाकुलस्यच ॥ ३४॥ क्रिया करके मनमें विचारा कि, यह बड़ा विन आनकर उपस्थित हुआ ॥३१॥ ब्रह्मा विष्णु गिरीश आदि देवता और जो पुरातन सिद्ध मुनि हैं वेभी लीलासेही अबलाओंपर मोहित होगये. यह अद्भुत है ।। ३२ ।। स्त्रियोंके नयनही तीक्ष्ण बाण भूलतारूप दृढ धनुषसे निकले हुए कामरूपी धन्वीके छोड़े बाणोंसे किनकामी जनोंका मनरूपी मृग नहीं विद्ध-होताहै ? ॥३३॥ जभीतक नीति TE660 ५३ ܚܙ और बुद्धि है तभीतक जनोंका भय है और तभीतक दृढ चिनता है तभीतक कुलकी गणना है ॥ तभीतक तपकी प्रगल्भता है तमीतक मनुप्योको यमादिकी धारणा है जबतक स्त्रीके तीक्ष्ण बाणोंसे मनुष्यका मन नहीं मोहित । होता ॥ ३५॥ यह रागियोंको मोहित और मदयुक्त करती है इनके मनोहर विलास हैं यह मुझे भी मोहितकर.मदता करती हैं किन गुणोंमे धर्मकी रक्षा होगी ।। ३६ ॥ मांस वीर्य मल मूत्र सेवने निषण अपवित्रा स्त्रियों के शरीरमें कामीजन मनोहरताकी तारदेवतपसप्रगल्भतातावदेवयमधारणंनृणाम् ॥ यावदेववनितेक्षणबाणैर्मोहमेत्युरुमदेर्नमानुपः ॥ ३५ ॥ मोहयतुमदयंतरागिणांयोपितःसुललितैर्मनोहरैः।मोहयंतिमदयंतिमामिमधर्मरक्षणपरहिकैर्गुणैः॥ ३६॥ मांस शुक्रमलमूत्रनिर्मितेयोपितांवपुपिनिघणेशुचौ ॥ कामिनश्वपरिकल्प्यचारुतांमारमंतुसुविमूढचेतसः ॥ ३७॥ दारुणोहिपरिकीर्तितोंगनासन्निधिविमलवुद्धिभिर्बुधैः ॥ यावदननसमीपगाइमास्तावदेवहिगृहबजाम्यहम् ॥ ३८॥ समीपंतस्ययावद्धिनागच्छंतिवरांगनाः ।। वैष्णवेनप्रभावेणतावदंतर्दधेदिजः ॥३९ ॥ तस्ययोगव लालूपगतस्यादर्शनंतदा। हवातदद्भुतकर्मऋपिपुत्रस्यधीमतः॥४०॥ वित्रस्तनयनावाला कुरंग्यइक्कातराः ॥ संभ्रांतनयना शून्यादहशुस्तादिशोदश ॥ ४॥ कल्पना करके मूढ चिन हो रमण न करें तो अच्छा है ।। ३७ ॥ बुद्धि सम्पन्न निर्मल चित्तवार्लोके निकट सियोका रहना महात्माओंने दारुण कहा है जबतक यह धोरे न आवे तबतक मैं घरको चला जाऊं ॥ ३८ ॥ जमतक उनके समीप चे सुहासिनी न आयें तबतक वैष्णव प्रभावसे ब्राह्मण अन्तर्शन होगये ॥ ३९ ॥ हे राजन् ! जब यह योगवलसे अदृष्ट हुए तय पिपुत्रका यह अद्धत कर्म देखकर ॥ ४०॥ घबडाये नेत्रवाली वे वाला हरिणीकी समान कातर होगई संघान्त नेत्रपाली दर्शो दिशा मा.मा. भा.टी. BEESEREE - अ.१५ BECREEEEEEEEE शून्य देखने लगीं ॥ ४१ ॥ यह इन्द्रजाल अथवा मायाको जानता है यह देखनेसे कैसे अदृष्टरूप हुए इस प्रकार परस्पर बोली ॥ ४२ ॥ विरहामिसे उनका हृदय सदा व्याप्त रहने लगा वह स्निग्ध और सघन वन जब जलता सा दीखने लगा ॥४३ तब बोली हे कान्त इन्द्र ! जालकी विद्याको त्यागकर शीघ्र दर्शन दो पहलेही यासमें मक्षिकाकी समान तुम अपनेको हमसे पृथक् मतकरो ॥ ४४ ॥ हा ! कष्ट है विधाताने तुमको दिखाकर फिर क्यों छिपा दिया जाना तुमसे हमको सन्ताप पाना इंद्रजालंस्फुटवेत्तिमायांजानातिवापुनः॥ दृष्टोऽप्यदृष्टरूपोऽभूदित्यूचुश्चपरस्परम् ॥४२॥ व्यासंतुहृदयंतासांस देवविरहामिना ॥ ज्वलद्दावानलेनेवसुस्निग्धंसांद्रकाननम्॥४३॥ त्यक्त्वेंद्रजालिकोंविद्यांकांतदर्शयसत्वरम्॥ स्वात्मानंनोमनोयुक्तंप्राग्यासेमाक्षिकोपमम् ॥४४॥ हाकप्रदर्शितःकस्मादात्रात्वं घटितःपुनः॥ज्ञातंमहानुसं तापहेतोर्नस्त्वं विनिर्मितः ॥ ४५ ॥ कचित्तेनिर्दयंचेतःकच्चिदस्मासुनोमनः ॥ कचिबूतोंसिहेकांतकचिन्मुष्णा सिनोमनः॥४६॥ कच्चिन्नप्रत्ययोऽस्मासुकच्चिदस्मान्परीक्षसे।कच्चिन्नमकलाशील कच्चिन्मायाविशारदः॥७॥ कचिचित्तेप्रवेष्टुंचवेत्सिविज्ञानलाघवम् ॥ कचिनिष्क्रमणोपायनजानासिकुतःपुनः ॥ ४८ ॥ कचिद्विनाऽ पराधतुत्वमस्मासुप्रकुप्यसे ॥ कच्चिदुःखविजानासिपरेपांविप्रलंभनम् ॥ १९॥ निमित्त किया है ॥ ४५ ॥ या तुम्हाराचिन निर्दयी है या हमपर तुम्हारा मन नहीं है हे कान्त ! क्या धूर्त हो जो हमारे मनको चुरातेहो ॥ ४६ ॥ या हमारा विश्वास नहीं या हमारी परीक्षा लेतेहो क्या तुम मनोहर कलावान् या मायामें विद्वानहो ॥४७॥ या चित्तमें प्रवेश करनेसे विज्ञान में लघुता समझते हो फिर क्या निकलनेका उपाय नहीं जानते ॥४८॥ श्या विना अपराध तुम हमसे कुपित होते हो क्या दूसरोंके वंचितंकरने का दुःखे जानते हो? ॥४९॥ हेप्राणेश्वर!इस समय तुम्हारे दर्शन के विना हम नहीं जियेंगी, तो तुम्हारे दर्शन दो ॥ ५० ॥ हमकोभी शीघ वहां लेजाओ जहां तुम गये हो विधाताने तुम्हारा दर्शन हरकर हमे शूल दिया । ५१ सब प्रकार दया कर हमको दर्शनदो सज्जन मनुष्य अन्तावस्था को नहीं देखते हैं ॥ ५२ ॥ इस प्रकार वह कन्या विलापकर और बहुतकाल प्रतीक्षा कर फिर पिताके भयसे शीघ्रतासे घरको चलने लगीं॥ ५३ ॥ उसके प्रेमरूपी निगड त्वदर्शनं विनानूनहृदयेश्वरसांप्रतम् ॥ नजीवामोथजीवामःपुनस्त्वदर्शनाशया ॥१०॥ अस्मांश्चनीयता तत्रयंत्रशीधंगतोमवान् ॥ त्वद्दर्शनहरोधाताव्यदधादंकुरच्छिदम् ॥५१॥ सर्वथादर्शनंदेहिकारुण्यंभजसर्व था । पर्यंतनप्रपश्यंतिसर्वथासजनाजनाः ॥५२॥ इत्थंविलप्यताकन्या प्रतीक्ष्यचबहुक्षणम् ॥ पितुर्भि यागृहंगतुंशीप्रमारेभिरेगतिम् ॥५३॥ तत्प्रेमनिगडैद्धाभृशंविरहविक्लवाः ॥ कथंचिद्धर्यमालंव्यताःस्वस्वं गृहमागताः ॥ ५४॥ आगत्यपतिता-सर्वाजलयंत्रसमीपतः ॥ किमतन्मातृभिः पृष्टा कुतःकालात्ययोऽभ वत् ॥५५॥ ॥ इति श्रीपद्मपुराणेमाघमाहात्म्येदिलीपवसिष्ठसंवादेगंधर्वकन्याविरहप्राप्ति मपंचदशोऽ ध्यायः ॥१५॥ ॥ कन्याऊचुः॥ ॥ कन्याऊचुः॥ ॥ क्रीडत्यःकिन्नरीभिस्तुसाधंसंगीतकमुदा ॥ ॥ संस्थितास्ते ननज्ञातदिवसादिसरोवरे ॥१॥ से बंधी और अत्यन्त विरहसे व्याकुल किसी प्रकार धैर्यको धारण कर वे अपने २ घरको गई ॥ ५४ ॥ और आकर सब फुहारके समीप गिर पड़ी यह क्या ऐसा उनकी माताओंने पूछा कि तुमको इतना विलम्ब क्यों हुआ ॥ ५५ ॥ ॥ इति श्रीप० भा० टी० गन्धर्वकन्याविरहप्राप्ति म पंचदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ ॥ कन्या बोली गंधर्वियोंके संग आनंदसे संगीतकी १० मा.मा. भा.दी. अ.१६ BESTEEEEEEEECRETS.. क्रीडा करते स्थित होने से हमने समय न जाना ॥ १ ॥ हे माता ! हम मार्गसे श्रान्तहैं इस कारण हमारे तनमें संताप हुआ मोहसे हम कुछभी कहने का उत्साह नहीं करतीं ॥ २॥ ऐसा कह वे कुमारी मणिभूमिमें लोटने लगी और आकार छिपाकर माताओंसे जल्पना करने लगीं ॥ ३॥ कोई क्रीडा करके, मयूरों से नहीं खेलतीथीं कोई कुतूहल से पीजरे के तोतेभी न पढाती| थीं ॥ ४ ॥ नकुल का लालन सारिकाका उल्लास छोड दिया क्षौर अति मुग्धा होकर सारसोंसे क्रीडा नहीं करती हैं॥ ५॥ नवि पथिश्रांतावयंमातःसंतापस्तेननस्तनौ ॥ मोहेनमहतावक्तुंनकेनाप्युत्सहामहे ॥ २॥ इत्युत्कालुलुटुस्तत्रम णिभूमौकुमारिकाः ॥ आकारंगोपयंत्यस्तामुग्धाजल्पंतिमातृभिः ॥ ३॥ काचिन्नर्तयतिक्रीडामयूरनमु दातदा ॥ नपाठयतितंकीरपंजरेऽन्याकुतूहलात् ॥ ४॥ लालयेनकुलंनान्यानोल्लासयतिसारिकाम् ॥ अप रातीवसंसुग्धानवक्रीडतिसारसैः ॥५॥ भेजिरेनविनोदास्तारोमिरेनैवमंदिरे ॥ उचिरेवांधवैर्नालंवीणावाचं नचक्रिरे ॥ ६॥ कल्पद्रुमप्रसूनंयद्रसवत्तुसुधोपमम् ॥ मंदारकुसुमामोदिनपपुर्मधुरंमधु ॥७॥ योगिन्यइ वताःकन्यानासाग्रन्यस्तलोचनाः ॥ अलक्ष्यध्यानसंतानाःपुरुपोत्तममानसाः ॥ ८॥ चंद्रकांतमणिच्छन्ने स्रवद्वारिकणद्रवे ॥ क्षणंवातायनेस्थित्वाजलयंत्रेक्षणक्षणात् ॥९॥ नोद करती और न मंदिरमें रमण करतीथी न बांधोंसे बोलती न वीणा बजातीर्थी ॥ ६॥ जो कल्प वृक्षके फल रस वाले अमृत की समान तथा मंदारके फूलों की गंधि और मधुभी पान नहीं करती थीं ॥ ७ ॥ योगिनीकी समान वे कन्या नासाके अय भागमें नेत्र रक्खे अलक्ष्य ध्यान किये उस पुरुप श्रेष्ठमें मन लगाये॥८॥ चन्द्रकान्तमणिसे छन्न वारी कण पसीना जिनके छ छी TAIT. 'मामा - - चूरहा, क्षण मात्रको झरोखोमें और क्षण मात्रको फुहारे के समीप स्थित होतीथीं ॥ ९ ॥ क्षण मात्र कमलिनी दलों शम्या रचतीथी सखी उनकी शीतल कदली दल से बयार करती थीं ॥ १० ॥ इस प्रकार उन्होंने उस रात्रिको युगकी । समान जाना किसी प्रकार धीरताको धारण कर विह्वल ज्वर की समान ॥ ३३ ॥ प्रातःकाल सूर्यको देख अपना जीवन मान कर अपनी २ माताओंसे पूंछकर गौरी पूजनको चली ।।१२ ॥ उसी विधिसे स्नान कर फूल गंधसे यथा तथा पूजा कर गान रचयंतिक्षणंशय्यांदीर्घिकांभोजिनीदलेः॥ वीज्यमानाःसतीभिस्ता शीतलै कदलीदलैः॥१०॥ इत्थंयुगसमां रानिमन्वानास्तावरस्त्रियः ॥ कथंचिद्धीरतांकृत्वाविह्वलासज्वराइव ॥ १३॥ प्रातव्योममाणदृष्ट्वामन्यमानाः स्वजीवितम् ।। विज्ञाप्यमातरंस्वांतुगौरीपूजयितुंगताः ॥ १२ ॥ स्नात्वातेनविधानेनपुष्यधूपैर्यथातथा ॥ विधायपूजनंदेव्यागायंत्यस्तत्रता:स्थिताः ॥ १३ ॥ एतस्मिन्नंतरेविप्रास्त्रातुंसोपिसमागतः ॥ पित्राश्रमपदा तस्मादच्छोदेचसरोवरे ।। १४॥ मित्रंदृष्ट्वैवराज्यतेनालन्यइवकन्यकाः॥ उत्फुल्लनयनाजातास्तंदृयाब्रह्मचा रिणम् ॥ १५॥ गत्वातदेवता कन्या समीपब्रह्मचारिणः ॥ सव्यापसव्यबंधनभुजपाशंचचक्रिरे ॥ १६॥ गतोसिधूर्तपूर्वेयुगंतुमयनशक्यते ॥ वृतस्त्वंनूनमस्माभिर्नात्रतेस्तुविचारणा ॥ १७ ॥ करने लगीं ॥ १३ ॥ इस समय वह ब्राह्मण भी स्नान करनेको अपने पिताके आश्रम से अच्छोदके समीप आये ॥ १४ ॥ उस मित्रको देखकर रात्रिके अन्तमें खिली कमलिनीकी समान प्रसन्न हुई उस ब्रह्मचारीको देख उनके नेत्र फूलगये ॥ १५॥ उसी समय वे कन्या उस ब्रह्मचारीके समीप गई और चारों ओरसे उनको घेरलिया ॥ १६॥ हे धूर्त ! कल तो तुम चलेगये भा.दी. मा.मा. अ.१६ आज जा नहीं सकोगे हमने तुमको वरण किया है अब इसमें तुमको विचार करना नहीं चाहिये ॥ १७ ॥ यह सुनकर वह बाह्मण हँसते हुए बोले हे भद्रे ! तुम अनुकूल और प्रियवचन कहती हो ॥ १८ ॥ परन्तु मैं प्रथम आश्रममें निष्ठां वालाहूं यह मेरा व्रत नहीं हैं गुरुकुलमें रहकर पहले वेदान्यासके पार होते हैं ॥ १९ ॥ जिस आश्रमका जो धर्म है विद्वानोंको उसकी रक्षा करनी चाहिये हे कन्यकाओ ! इस कारण इस समय मैं विवाह करना धर्म नहीं मानता ॥ २०॥ उनके वचन सुन वे कन्या इत्युक्तोबाह्मणःप्राहमहसन्वाहुपाशगः ॥ युष्माभिरुच्यतेभद्रमनुकूलंप्रियंवचः ॥ १८ ॥ प्रथमाश्रमनिष्ठस्य किंतुनायापिमेव्रतम् ॥ वेदाभ्यसनशीलस्यपारंयातिगुरोःकुले ॥ १९॥ आश्रमेयत्रयोधर्मोरक्षणीयः स पं डितः॥ विवाहोऽयमतोमन्येनधर्मइतिकन्यकाः ॥२०॥आकर्ण्यतस्यवाक्यानितमूचुस्तावचस्ततः॥ सक लध्वनिसोत्कंठा-कोकिलाइवमाधवे॥२३॥ धर्मादोंर्थतःकामकामाद्धर्मफलोदयः ॥ इत्येवंनिश्चितशास्त्रं वर्णयतिविपश्चितः ॥ २२॥ सकामोधर्मवाहुल्यात्पुरस्तेसमुपागतः ॥ सेव्यतांविविधैभोंगैःस्वर्गभूमिरियं ततः॥२३॥ श्रुत्वातद्वचनंतासांप्राहगंभीरयागिरा। तथ्यंवोवचनंकिंतुसमाप्येहस्वकंवतम् ॥२४॥ प्राप्या नुज्ञांगुरोःसर्ववैवाहकर्मनान्यथा ॥ इत्युक्त्वापुनरूचुस्ताःस्फुटंमूढोसिसुन्दर ॥ २५ ॥ योली मानो वैशाखमें कोकिला बोलती हो ॥ २१ ॥ धर्म से अर्थ अर्थ से काम काम से धर्म फलका उदय होता है इस कारण बुद्धिमान् निश्चित शास्त्रका वर्णन करते हैं ॥ २२ ॥ हम सकाम और धर्म की अधिकता से तुम्हारे समीप आकर प्राप्त हुई अनेक भोगोंसे इस स्वर्ग भूमिकी सेवा करो ॥ २३ ॥ उनके यह वचन सुन ब्राह्मण गंभीर वाणीसे बोले यह तुम्हारा वचन सत्य है किंतु मैं अपना व्रत समाप्त करके ॥ २४ ॥ गरुकी आज्ञा लेकर सबसे विवाह करूंगा इसमें अन्यथा नहीं है गद्र सुनकर वे बोली, हे सुन्दर ! तुम अवश्यही अज्ञ हो ॥ २५ ॥ दिव्य ओपपि दिव्य रसायन सिद्धि निधि साधु कला सुन्दर खी मंत्र तथा धर्म सिद्धि यह आनेपर इनका निपेध किसीको करना न चाहिये ॥ २६ ॥ देवसे यदि कार्य सिद्धि हो जाय नीति जाननेवालेको उसकी उपेक्षा करनी न चाहिये क्योंकि उपेक्षा करनेसे फल नहीं मिलता इस कारण उपेक्षा न करें ।। २७ ॥ घने अनुराग बली कुल जन्मसे निर्मल स्नेहसे आई चित्त सुन्दरी वाणीवाली स्वयंवरकी इच्छावाली स्वरूपवान् यौवनवाली रुपवती दिव्यौपचंब्रह्मरसायनंचसिद्धिनिःसाधुकलावरांगनाः॥ मंत्रस्तथासिद्धिरसश्चधर्मतोनेमानिध्याःसुधियास मागताः ॥२६॥ काहिंदैवाद्यदिसिद्धमागतंतस्मिन्नपेक्षनचयातिनीतिगः ॥ यस्मादुपेक्षानपुनःफलप्रदात स्मानदीकिरणप्रशस्यते ॥ २७ ॥ सांद्रानुरागाकुलजन्मनिर्मलालेहाईचित्ता-सुगिरःस्वयंवराः ॥कन्या सुरूपाःखलुचारुयौवनाधन्यालभंतेवनरास्तुनेतरे ॥ २८ ॥ कवयंवरसुन्दर्य-कचायंतापसोबटुः ।। दुर्घ टस्यविधानेहिमन्यधातातिपंडितः॥ २१ ॥ तस्मादस्मादिदानीतुस्वीकुर्यान्मंगलं भवान् ॥ गांधर्वेणविवाहे नान्यथानोनजीवितम् ॥ ३० ॥ श्रुतवाक्यस्ततःपाहब्राह्मणोधर्मवित्तमः ॥ भोमृगाक्ष्याकथंत्याज्योधर्मों धर्मधर्नरैः ॥ ३३ ॥ धर्मश्चार्थश्चकामश्चमोक्षश्चैतच्चतुष्टयम् ॥ यथोक्तंसफलंज्ञेयंविपरीतंतुनिष्फलम् ॥३२॥ कन्या धन्य पुरुपही प्राप्त करते हैं दूसरे नहीं ॥ २८ ॥ कहां हम सुन्दरी और कहाँ यह तपस्वी बटु दुर्घटके विधानमें ही हम जानते हैं विधाता पंडित है ॥ २९ ॥ इस कारण आप हमारे इस मंगलको स्वीकार करो गन्धर्व विवाह करो अन्यथा हमारा जीवन न होगा ॥ ३० ॥ उनके यह वचन सुन धर्मात्मा ब्राह्मण बोले, हे मृगलोचनीयो । धर्मात्मा मनुष्य अपना धर्म कैसे त्यागन कर सकते हैं ॥ ३१ ॥ धर्म अर्थ काम मोक्ष यह चार यथोन कर सफल होते हैं और विपरीततासे निष्फल भा.टी. अ.१ मा. मा. ( हैं ॥ ३२॥ विना समय में व्रतके कारण स्त्री परिग्रह नहीं करूंगा जो क्रिया के समयको नहीं जानता वह क्रिया के फलको ।, नहीं प्राप्त होता ॥ ३३ ॥ इस कारण मेरा मन धर्म विचारमें लगाहै इस कारण हे कन्याओ ! सुनो मैं स्वयंवरकी इच्छा नहीं करता ॥३४ ॥ यह उसका आशय जानकर वे परस्पर एक दूसरीको देखने लगी हाथसे हाथ छोडकर उनके चरण पकड लिये ॥३५॥ और उन सुशीलाओंने आतुर होकर उनकी भुजा ग्रहण करली सुताराने आलिंगन कर उसका चन्द्रमुख चूम लिया नाकालेऽहंवतीकुर्यामतोदारपरिग्रहम् ॥ नक्रियाफलमाप्नोतिक्रियाकालंनवेत्तियः ॥ ३३॥ यतोधर्मविचारे स्मिन्प्रसक्तमममानसम् ॥ तस्माच्छृणुतहेकन्यानसमीहेस्वयंवरम् ॥ ३४ ॥ एवंज्ञात्वाशयंतस्यसमीक्ष्य ताःपरस्परम् ॥ करात्करविमुच्याथजग्राहांत्रोप्रमोदिनी ॥ ३५ ॥ भुजोजग्राहतुस्तस्यसुशीलासुस्वरातथा॥ आलिलिंगसुताराचुचुचुंबचंद्रिकामुखम् ॥ ३६॥ तथापिनिर्विकारोसोपलयानलसन्निभः ॥ शशापब्रह्मचारी ताक्रोधेनात्यंतमूछितः ॥ ३७॥ पिशाच्यइवमालग्नास्तत्पिशाच्योभविष्यथ ॥ एवंतेनाशुशप्तास्तास्तंसं त्यज्यपुर:स्थिताः ॥ ३८ ॥ किमतचेष्टितंपाप नागसिजनेत्वया ॥ प्रियेकृत्येऽप्रियंकृत्वाधिक्तांधर्मज्ञतां तव ॥ ३९ ॥ अनुरक्तेपुभक्तेपु मित्रपुद्रोहकारिणः ॥ पुंसोलोकद्वयेसौख्यंनाशयातीतिन श्रुतम् ॥ ४०॥ ॥ ३६ ॥ तो भी यह प्रलय अमिके समान निर्विकार रहे तब ब्रह्मचारीने क्रोध से मूर्छित होकर उनको शाप दिया ॥ ३७ ॥ तुम पिशाचियों की समान मुझे लिपटी हो इस कारण पिशाचिनी होगी ऐसा शाप देतेही वे उसे छोडकर सन्मुख स्थित हुई ॥३८॥ पापिष्ठ ! निरपराध जनोंको क्यों शाप दिया यह तुम्हारी क्या चेष्टा है, प्रियकरनेमें अप्रिय किया तुम्हारी धर्मज्ञताको धिक्कार है ॥ ३९ ॥ अनुरक भक्तों और मित्रों में जो द्रोह करते हैं उन पुरुषों के दोनों लोक नष्ट होते हैं ऐसे हमने सुना है ॥ ४०॥ ५७
इसकारण तुमभी हमारे शापसे पिशाच होंगे, इस प्रकार कह वह बाला निवृत्त हुई और क्षुधाके कारण श्वास लेने लगीं ॥४१॥
हे राजन् ! फिर उस सरोवरमें एक दूसरेके संरंभसे वह कन्या और ब्रह्मचारी पिशाच और पिशाचनी हुए।। ४२॥
वह पिशाच पिशाचिनी दारुण शब्द करने लगे और उस अपने कर्मका विपाक बिताने लगे ॥ ४३ ॥ पूर्व उपार्जन किया कर्म
समय पर ही फलता है और हे राजन् ! वह अपनी इच्छासे होता है देवताभी इसको निवृत्त नहीं करसकते ॥ ४४ ॥ उनके
तस्मात्त्वमपिनःशापात्पिशाचोभवसत्वरम् ॥ इत्युक्त्वोपरतावालानिःश्वसंत्याक्षुधाकुलाः॥४१॥तदाचान्यो
न्यसंरंभात्तस्मिन्सरसिपार्थिव ।। ताकन्याब्रह्मचारीससर्वेपैशाचमागताः ॥ ४२ ॥ पिशाच्यासपिशाचश्चक्र
दमानाःसुदारुणम् ॥ क्षपयंतिविपाकंतंपूर्वोपात्तस्यकर्मणः ॥४३॥ स्वकालेतुफलत्येवपूर्वोपात्तंशुभाशुभम् ॥
स्वच्छायाइवदुरिंदेवानामपिपार्थिव ॥४४॥ कंदंतिपितरस्तासांमातरस्तत्रतस्यच ॥ अप्रमादश्वबालानांदै
वंहिदुरतिक्रमम् ॥ ४५ ॥ ततउध्वंपिशाचास्तेआहारार्थेसुदुःखिताः॥ इतस्ततश्चधावंतोवसंतिसरसस्तटे ॥
॥४६॥ एवंबहुतिथेकालेलोमशोमुनिसत्तमः ॥ पोपेमासिचतुर्दश्यामच्छोदेस्नातुमागतः॥ १७॥ दृष्ट्वातं
ब्राह्मणसर्वपिशाचाः क्षुत्समाकुलाः ॥ धावंतोहंतुकामास्तमिलित्वायूथवर्तिनः॥४८॥
माता पिता जहां तहां विलाप करने लगे, बालाओंका प्रमाद नहींथा परन्तु प्रारब्धको कोई मेट नहीं सकता ॥ ४५ ॥ तब वे
पिशाच भोजनके निमित्त वडे दुःखी हुए इधर उधर धावमान हो सरोवरके किनारे रहते थे ॥ ४६॥ इस प्रकार बहुत दिन
बीतनेपर मुनिश्रेष्ठ लोमशजी पोपमासकी शुक्ल चतुर्दशीको अच्छोद सरोवरको स्नान करनेके निमित्त आये ॥ ४७ ॥ उन
बाह्मणको देखकर वे सब पिशाच पिशाचिनी भूखसे व्याकुल हो इकठे हो उनके मारनेकी इच्छासे धावमान हुए ॥ ४८ ॥
I. मा. भा. टी.' ५८ अ. १६ परन्तु लोमशके तेजसे वे दह्यमान होने लगे आगे आनेको असमर्थ हो दूर स्थित हुए ॥ ४९ ॥ वेदनिधि ब्राह्मण उसो समय वहां आये लोमशको देखकर उसने साष्टांग प्रणाम किया ॥५०॥ शिरपर अंजली बांध मनोहर वचन कहे अहो भाग्यसेही आज महात्माकी संगतिहुईहै ॥ ५३ ॥ जो मनुष्य सदा गंगादि तीर्थमें स्नान करता है और जो सत्संगति करताहै उस में सत्संगति श्रेष्ठ है ॥ ५२॥ हे भगवन् ! गुरुजनों की संगति भूमिमें दृदादृष्ट फलदायक स्वर्गदायक रोगहारक है किन्तु कुछ उपद्रव युक्त दह्यमानाःसुतीनेणतेजसालोमशस्यच ।। असमार्थाःपुरःस्थातुंसवेंतेदूरतःस्थिताः ॥४९॥ तत्रवेदनिधिर्वि प्रस्तदेवहिसमागतः ॥ समीक्ष्यलोमशंराजन्साष्टांगंप्रणिपत्यसः ॥ ५० ॥ उवाचसूनृतांवाचंबद्धाशिरसिचां जलिम् ॥ महाभाग्योदयेविप्रसाधूनांसंगतिर्भवेत् ।। ५१ ॥ गंगादिसर्वतीर्थेपुयोनर नातिसर्वदा ॥ यःकरोति सतांसंगतयोःसत्संगतिर्वरा ॥५२ ॥ गुरूणांसंगमोविप्रदृष्टादृष्टफलोभुवि ॥ स्वर्गदोरोगहारीचकिंतुसोपद्रवो मतः॥५३॥ इत्युक्त्वाकथयामासपूर्ववृत्तांतमद्भुतम् ॥ इमागंधर्वकन्यास्तावटु-सोयममात्मजः ॥ ५४ ॥ सर्वपिशाचरूपणमिथःशापविमोहिताः ॥ दीनाननास्तुतिष्ठंतितवामुनिसत्तम ॥५५॥ त्वदर्शनेनवालानां निस्तारोऽधभविष्यति ॥ सूर्योदयेतमःस्तोमाकिनलीयेतगहरे ॥५६॥ है ॥ ५३ ॥ ऐसा कहकर पूर्व अद्भुतवृनान्तको वर्णन किया कि यह वह गंधर्षकी कन्याहैं, और यह वो मेरा पुत्र ब्रह्मचारीहै ॥ ५४ ॥ यह सब परस्पर शापदेनेके कारण पिशाचरूपसे मोहितहैं हे मुनिश्रेष्ठ! तुम्हारे सन्मुख दीन हुए खडे हैं ॥५५॥ तुम्हारे दर्शन से इसमालकोंका आज निस्तार होजायगा, जैसे सूर्यके उदय होनेसे अंधकार समूह गुहाओंमें लीन होजाता है ॥ ५६ ।। ५८ हे राजन् ! लोमशजी यह बात सुन दयासे आई चित्तहो वह महा तेजस्वी पुत्रके दुःखी ब्राह्मणसे बोले ।। ५७ ॥ मेरे प्रमाद इन बालकोंको शीघही स्मृति होगी और वह धर्म कहताहूं जिस्से इनका शाप परस्सर लोप होजायगा॥५८॥ इति श्रीपमपुराणेमाघ माहात्म्यभामाटीकायों पोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ ॥ वेदनिधि बोले हे महर्षे ! वह धर्म कहो जिस्से बालक शापसे मुक्तिको प्राप्त होजाय यह समय देरका नहीं कारण कि शापानि बडी दारुण है॥३॥लोमशजी बोले ! यह मेरे साथ विधिसे माघस्नान करें श्रुत्वातल्लोमशोराजन्कृपार्टीकृतमानसः॥ प्रत्युवाच महातेजास्तंमुनिपुत्रदुःखितम् ॥५७॥ मत्प्रसादाचवा लानांस्मृतिःसपदिजायताम् ॥ धर्मचवच्मितयेनमिथःशापोलयंत्रजेत् ॥ ५८॥ इति श्रीपद्मपुराणेमाघमा हात्म्यवसिष्टदिलीपसंवादेगंधर्वकन्याशापवर्णनंनामपोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ ॥ वेदनिधिरुवाच ॥ महर्पेकथ्यताधर्मोमुच्यतेयेनवालकाः॥ नायंकालोविलंबस्यशापाग्निरुणोयतः ॥ ॥ ॥ लोमशउवाच ॥ मयासाधप्रकुर्वतुमाघनानंविधानतः ॥शापान्मुच्यतिमाघतिनान्यथानिप्कृतिर्भवेत् ॥२॥शाप-पापफलं विप्रपापनाशोभवेत्रणाम् ॥ माघस्नानेनतीर्थचइतिमेनिश्चितामतिः॥३॥ सप्तजन्मकृतंपापंवर्तमानंचपात कम् ॥ माघस्नानंदहेत्सर्वपुण्यतीर्थविशेषतः ॥ ४॥ प्रायश्चित्तंनपश्यंतियस्मिन्पापेमुनीश्वराः ॥ पातकंपु ण्यतीर्थपुनश्येत्तदपिमावतः॥५॥ तो माधके अन्तमें इनका उद्धार होजायगा और प्रकारसे निष्कृति न होगी ॥२॥ हे विष ! पापका फल और शाप माघलानसेही दूर होते हैं और प्रकार नहीं यह मुझे निश्चय है ॥ ३॥ सात जन्मका किया पाप और वर्तमान जन्मका पाप यह सब मावका स्नान नष्ट करदेता है विशेष कर पुण्य तीर्थमें ॥ ४॥ हे मुनीश्वरो ! मैं जिस पापका प्रायश्चित्त नहीं देखताहूं वह पातकभी पुण्य मा.मा. भा.टी. ५९ अ.१७ तीर्थ, माघस्नान करनेसे नाश होजाता है ॥ ५॥ जानकर पाप करनेसे भी माघस्नानसे छूट जाता है हिमालयके तीर्थीम स्नान करनेसे सब पाप-टूटते हैं ॥ ६ ॥ अच्छोदमें सान करनेसे इन्द्र लोककी मामिहोती है ऐसा बेदवादी कहते हैं वदरी वनमें माघमासमें स्नान करनेसे सब पाप दूरहोते हैं ॥ ७ ॥ पापहारी दुःख नाशक सब काम फलका दाता नर्मदा, माघ स्नान रुद्र लोकका फल देता है ॥ ८॥ यमुनाके स्नानसे पाप नाशहो सूर्य लोक मिलता है सरस्वतीका जल पाप दूर कर ज्ञानकृन्मानसेमाघस्तस्मान्मोक्षफलप्रदः ॥ हिमवत्पृष्ठतीर्थेपुसर्वपापप्रणाशनः ॥ ६॥ इंद्रलोकप्रदोऽच्छोदे निर्दिष्टोवेदयादिभिः ॥ सर्वपापहरोमाघोमोक्षंदोबदरीवने ॥७॥ पापहादुःखहारीचसर्वकामफलप्रदगारुद्रलो कपदोमाधोनार्मदेपापनाशनः ॥ ८ ॥ यामुनः सूर्यलोकायभवेत्कल्मपनाशनः ॥ सारस्वतोऽवविध्वंसी ब्रह्मलोकफलप्रदः ॥ ९॥ विशालफलदोमाघोविशालायांद्विजोत्तम ॥ पातकेंधनदावामिर्गर्भहेतुक्रियापहः॥ ॥१०॥ विष्णुलोकायमोक्षायजाह्नवःपरिकीर्तितः ॥ सरयूगंडकीसिंधुश्चंद्रभागाचकौशिकी ॥ ११ ॥ तापी गोदावरीभीमापयोप्णीकृष्णवेणिका ॥ कावेरीतुंगभद्राचअन्यायाश्वसमुद्रगाः ॥ १२॥ आशुमाधीनरोया तिस्वर्गलोकविकल्मपः ॥ नमिपेविष्णुसायुज्यंपुष्करेब्रह्मणांतिकम् ।। १३ ।। ब्रह्म लोक देता है ॥९॥ विशालामें माघस्नान बड़ा फल देता है यह पाप रूपी इंधनको दावाग्नि और गर्भके कारणको दूर करता है ।। १० ॥ गंगा स्नानसे विष्णुलोककी प्रानि और मुक्ति होती है सरयू गंडकी सिंधु चन्द्रभागा कौशिकी ॥ ११ ॥ तापी गोदावरी भामा पयोष्णी कृष्णा येगी-कावेरी तुंगभद्रा तथा और समुद्रगामिनी ॥ १२॥ इनमें माघस्नान करनेसे मनुष्य शीग्रही पाप रहित होजाता है, नैमिपारण्य, विष्णुका सायुज्य पुष्कर में ब्रह्मकी समीपता ॥ ॥ और कुरुक्षेत्रमें स्नान कर- विष्णुकी समीपता प्राप्त होती है देवदर्भ माघस्नान करनेसे योग्य सिद्धिका फल मिलता है ॥ १४ ॥ प्रभासक्षेत्रमें माघस्नानसे गण होताहै देवकी में स्नानसे देवता होता है ॥ १५ ॥ हे विष ! गोमती में स्नान करनेसे फिर जन्म नहीं - होता हेमकूट महाकाल ओंकारेश्वर अमरेश्वर ॥ १६॥ नीलकंठ अर्बुद में माघस्नानसे रुद्रलोक आखंडलस्यलोकोहिकुरुक्षेमावतः ॥ माघोदेवह्नदेविप्रयोगसिद्धिफलप्रदः ॥१४॥ प्रभासेमकरादित्ये स्नानागुदगणोभवेत् ।। देवक्या देवतादेहोनरोभवतिमातः॥ १५॥माघस्रानेनभोविप्रगोमत्यांनपुनर्भवः॥ हेमकूटेमहाकालेओंकारेअमरेश्वरे ॥ १६ ॥ नीलकंठेबुंदेमाघाद्रुद्रलोकेमहीयते ।। सर्वासांसरिताविप्रसंगमे मकरेवा ।। १७॥ स्नानेनसर्वकामानामवाप्तिर्जायतेनृणाम् ।माघस्तुप्राप्यतेधन्यैःप्रयागेद्विजसत्तम।। अपु नर्भवदंतत्रसितासितजलंयतः ॥ १८॥ गायंतिदेवा-सततंदिविस्थामाधःप्रयागेकिलनोभविष्यति ।। स्नाना बारायत्रनगर्भवेदनांपश्यतितिष्ठतिचविष्णुसन्निधौ ॥ १९ ॥ मजतियेपित्र्यहमत्रमानवास्तीर्थप्रयागेबड्डपापक चुका ॥ ब्रजतितेनोनिरयेपुधर्मिणःस्वर्गेशुभेचारुचरंतिदेववत् ॥ २० ॥ प्राप्त होता है हे विष ! मकरके सूर्य में सत्र नदियोंके ॥ १७ ॥ स्नानसे मनुष्योंको सब कामनाकी प्राप्ति होती है है ज़िश्रेष्ठ! प्रयागौ माघ स्नान बड़े भाग्योंसे प्राप्त होता है गंगा यमुनाका जल मुक्ति देता है ।। १८ ॥ स्वर्ग स्थित देवता इस बालको कहते हैं कि प्रयागमें माघस्नान करनेसे फिर जन्म नहीं होता ये नरकको नहीं जाते और स्वर्गमें देवताओंकी समान विचरण करते हैं ॥ १९ ॥ जो पापी मनुष्यभी माघमें तीन दिन स्नान करते हैं वे नरकको नहीं जाते और स्वर्गमें देवताकी समान मा. मा. भा.टी. ६० नवास करते हैं ॥ २० ॥ तीर्थ बत दान तप यज्ञ इनको विधाताने एक ओर तुलापर धारण किया, एक ओर माघमें प्रयाग स्लान रक्खा उनमें मावलानही गरिष्ठ रहा ॥ २१ ॥ जल पवन सेवन पर्ण भोजनादिकरके जो तपका फल चिर कालमें संचित किया है तथा जो योगका फल है वह फल प्रयाग, माघस्नानसे मिलता है ।। २२ ॥ जो मकरके सूर्यमें प्रयाग, स्नान करते हैं उनके घरके द्वारपर हस्तिकर्णताडित ,गावली क्या करेंगी अर्थात् वे महा धन सम्पन्न होंगे यही सिंधु सागर संगमका फल है तीर्थत्रतेीनतपोभिरध्वरैःसाधविधानातुलयाधृतंपुरा ॥ माघेप्रयागस्यतयोयोरेभून्माघोगरीयानतएवसोड धिकः॥२१॥ वातावुपर्णाशनदेहशोपणैस्तपोभिरुग्रेश्चिरकालसचितः ॥ योगैश्चसंयांतिनरानतांगतिस्नाने नमाघस्यहियांतियांगतिम् ॥२२॥ स्नाताश्चयेमकरभास्करोदयेतीथेप्रयागेसुरसिंधुसंगमे ॥ तेपांगृहद्वारमलं करोतिकिं गावलि कुंजरकर्णताडिता ॥ २३॥ योराजसूयाद्धयमेधयज्ञतःस्रानात्फलंसंप्रदातिचाधिकम् ॥ पापानिसर्वाणिविलोप्यलीलयानूनंप्रयोगःसकथंनसेव्यते ॥२४ ॥ अवंतिविपयेराजावीरसेनोऽभवत्पुरा ॥ नर्मदातीरमागत्यराजसूयंचकारसः ॥२५॥ पोडशेरश्वमेधैश्चस्वर्णवाटविराजितः॥ स्वर्णभूषणयूपाढयरीजेसो पियथाविधि॥२६॥ प्रददोधान्यराशींश्चद्विजेभ्य-पर्वतोपमान् ॥ वदान्योदेवताभक्तोगोप्रद ससुवर्णदः ॥२७॥ ॥ २३ ॥जो राजसूय अश्वमेधका फल है स्नानका फल इससे कहीं अधिक है उससे वह सब पाप दूर करनेवाले प्रयागका सेवन क्गों न किया जाय ॥ २४ ॥ पहले अवन्तिदेशका एक राजा वीरसेन था उसने नर्मदाके किनारे आकर अश्वमेध यज्ञ किया ॥ २५॥ सुवर्गके मार्गसे युक्त सोलह अश्वमेध किये जो सुवर्णके भूपोंसे युक्त यज्ञस्तं भोसे शोभित थे॥२६॥ब्राह्मणोर्के १ स्तानात्प्रयागस्यादि यानियांगतिमितिपाठः । २ स्नातानराये भशभास्करोटये रति च पारः।
निमित्त तसे रल धान्यदिये बडादानी देवताका भक्त गौ और सुवर्णका देनेवाला था ।। २७ ॥ एक श्राह्मण भत्रकनाम मूख और कुलस रहित खेती करनेवाला दुराचारी सब धर्मोसे बहिष्कृत ॥ २८ ॥ कृषि कर्ममें समुद्विग्न बंधुओंसे असेवित इधर उधर in घूमता र यासे पीडितहो निर्गत हुआ ॥ २९ ॥ यात्रियोंके साथ प्रयागमें चलाआया महामावकी संक्रान्ति होने पर तीन दिन वहां स्नान किया ॥ ३० ॥ स्नान मात्रसे वह ब्राह्मण पाप रहित होकर प्रयागसे फिर अपने स्थानको प्राप्त हुआ ॥ ३१ ॥ ब्राह्मणोभट्टकोनाममूखोंहीनकुलस्तथा ॥ कृपीवलोदुराचारःसर्वधर्मवहिप्कृतः ॥२८॥ कृषिकर्मसमुद्विग्रोवंधु मिश्चाप्यसंस्कृतः ॥ इतस्ततःपरिभ्रम्यनिर्गतःक्षुत्पपीडितः ॥२९॥ देवतःसार्थमाविश्यप्रयागंससमागतः।। महामाघींपुरस्कृत्यसस्नोतत्रदिनत्रयम् ॥ ३० ॥ अनघस्नानमात्रेणभूत्वेहसद्विजोत्तमः॥ प्रयागाच्चलितस्त अपुनर्यस्मात्समागतः ॥ ३१ ॥ सराजासोपिविप्रश्चविपन्नावेकदातदा ॥ तयोर्गतिःसमादृष्टामयाशक्रस्यस निधौ ।। ३२॥ तेजोरूपंबलंत्रणदेवयानविभूपणम् ॥ पारिजातमयीमालानृत्यंगीतंतयोःसमम् ॥३३॥ इतिहष्टहिमाहात्म्यक्षेत्रस्यकथमुच्यते ॥ माध-सितासितेविप्रराजसूयैःसमोमतः ॥ ३४ ॥ धनुस्त्रिशतविस्तीर्णे सितनीलांबुसंगमे। अपुनरावृत्तिाधीराजसूयोपुनर्भवेत् ॥ ३५॥ वह राजा और ब्राह्मण एकही दिन मृतक हुए मैंने इन्द्रके समीप उन दोनोंकी बराबर गति देखी ॥ ३२॥ तेज रूप बल खी देव यान भूपण पारिजातकी माला नृत्य गीत समानथे ।। ३३ ॥ उस क्षेत्रका माहात्म्य क्या कहा जाय हे विम ! माघमासमें प्रयाग स्नान राजसूयकी समानहै ॥ ३४ ॥ गंगा यमुनाके संगममें तीन सौ धनुपतक माघमें स्नान करनेसे मुक्ति हो जाती है इसमें .मा. भा. टी. अ.१८ D मन्देह नहीं और राजसूय करके नो फिरभी संसारमें आता है ॥ ३५॥ जो माधमासकी पवन भी गंगा यमुनाको स्पर्श करे| उसके लगनेसे अधर्म स्पर्श नहीं करता यह महापानककी हरनेपाली है ॥३६॥ बहुत कहने से क्या है हे द्विजो ! यह निश्चय सुनिये कहींके तीर्थका उत्पन्न हुआ पाप मावस्नानसे दूर हो जाता है ॥ ३७ ॥ सावधान होकर सुनो इस स्थलमें पिशाचमो चन नाम एक इतिहास तुमसे कहताहूं ॥ ३८ ॥ यह बालक गंधर्वी और तुम्हारा पुत्र भी सुने, मेरे प्रसादसे स्मृतिको प्राप्त हो माघमासीयवातोपिसितासितजलेस्पृशेत् ॥ अधयनस्पृशेनूनमहापातकहाहिसः ॥ ३६॥ किमत्रबहुनोक्त. नथूयतांद्विजनिश्चितम् ॥ समुद्भूतफलंपापंतीर्थमाघःप्रणाशयेत् ॥ ३७॥ अत्रतेकथयिष्यामिसावधानमंतिः शृणु ॥ पिशाचमोचननामइतिहासंपुरातनम् ॥ ३८॥ शृण्वत्वप्सरसोवालाःशृणोतुत्वत्सुतस्तथा ॥ मत्त सादात्स्मृतिलब्धापैशांच्यान्मुक्तिकामिनः ॥ ३९ ॥ पुरादेवद्युतिविप्रोवैष्णवोवेदपारगः ॥ पिशाचान्मो चयामासकरुणालुतमानसः ॥ ४० ॥ ॥ इति श्रीपद्मपुराणेमाघमाहात्म्येवसिष्ठदिलीपसंवादेसप्तदशोऽ ध्यायः॥ १७॥ ॥ दिलीपउवाच ॥ ॥ कुत्रस्थित कस्यपुत्रोनियमकोऽस्यवाजपः ॥ केनवावैष्णवो वृत्तःकेपिशाचाश्चमोचिताः॥ १॥ यह कामी मुक्त होजायेंगे ॥ ३९ ॥ पहले एक देवातिनाम वेदपारगामी वैष्णव ब्राह्मण करुणापरवश हो पिशाचको मुक्त कर जुकाहै ॥ १० ॥ इति श्रीपाले माघमाहात्म्ये पण्डित ज्वालाप्रसाद मिश्रकत भाषाटीकायां सतदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ दिलीप बोले वह कहांके निवामी किमके पुत्र थे उनका नियम क्या था जप कैसा था कैमी वैष्णवी वृति थी कौन पिशाच -को Art" 447 -A- मुक्त किया ॥ १ ॥ है महामुने ! यह सब विस्तारसे कहिये हम आपके प्रसादसे सुनत ह इस ॥ २॥ वसिष्ठ बोले प्लक्षके पवित्र स्रोत सरस्वतीके सुन्दर तटमें पर्वतको आश्रय किये ब्राह्मणका पवित्र सुन्दर आश्रम था । ॥ ३ ॥ शाल ताल तमाल बेल बकुल पाटल इमली चिखेल आम चंपक कांचन ॥४॥ करंज कोविदार केसर कुंजर अशन तिलक कर्णिकार कुंभ खैर तेंदू ॥ ५ ॥ वानीर साल्व जंभीरी पीलू गूलर वेत शाखोट आडू करहाट बटके एतद्विस्तरतःसर्वकीर्तयस्वमहामुने । कौतूहलंमहापुण्यशृणुमस्त्वत्प्रसादतः॥२॥ ॥ वसिष्ठउवाच ॥ पक्षप्रलवणेपुण्येसरस्वत्यास्तटेशुभे ॥ तवाश्रमपदंतस्यशैलमाश्रित्यशोभनम् ॥३॥ शालेस्तालेस्तमालेश्च विल्वेर्वकुलपाटलेः ॥ तिंतिडीचिरिविल्वैश्चचूतचंपककांचनैः॥४॥ करंजे कोविदारैश्चकेसर कुंजराशनैः ।। तिलके कर्णिकारेश्चकुंभे खादिरर्तिदुकैः ॥५॥ वानीरैःसाल्वजवीरे-पीलुदुंबरवेतसः॥ शाखोटैरटरूपेश्चकरहा टेटद्रुमैः॥६॥ घोटाकुटजपालाशेरशोकै शोकहारिभिः ॥ जंबूनिबकदंवैश्चक्षीरिकाकरमर्दकैः ॥ ७॥ वीजपूरे सनारिंगरंभाराजिविराजितः ॥ पनसैरसवद्भिश्चनारिकेलै सदाफलैः ॥ ८॥ सप्तच्छदैस्त्रिपत्रैश्चशिरी पामलके शुभैः ॥ ककंधूलकुचेरसैपारिभद्रेर्वचादिभिः॥ ९॥ केतकैःसिंदुवारैश्चतगरेःकुन्दमल्लिकः ॥ पझे न्दीवरकद्वारमालतीयूथिकादिभिः॥१०॥ पेड़ ॥ ६ ॥ घोंटा कुटज ढाक शोक हरनेवाले अशोक जामुन नीम कदम्ब शारिका करमर्दक ॥ ७ ॥ विजोरा नारंगी केलोंके समूहसे विराजमान रमवाले पनम कटहल. तथा नारियलों से व्याप्त ॥ ८॥ सप्तच्छद, त्रिपत्र, शिरम, आमले, कर्कन्ध, लकुच, अखरोट, पारिभद्र, वचादि से युक्त ॥ ९॥ केतकी, मिन्धुवार, तगर, कुन्दमटी, कमल, नीलकमल, कल्हार, भा.टी. अ.१८ माटती, चमेली ॥ १०॥ मालती, मोगरी, जायफलोंसे विराजित नागकेशर, टेमू, बर्बरी, तुलसी ॥ ११॥ हे राजन् । अनेक ना.मा.. प्रकारके वृक्षोसे वह आश्रम मनोहर होरहा था वनके बीच, पुण्यजला सरस्वती वहन करती थी ॥ १२ ॥ मदसे स्निग्ध सारस यहां गुंजार करतेथे कोकिला शब्द करनी और भारे गुंजारतेथे ॥१३॥ हे राजन् ! तोते मैनाओंसे वह वन बडा कोलाहल कररहा था उस उत्तम पनमें अनेक वनके जीव सिंहादि विचरतेथे ॥ १४ ॥ सदा फल फूलों से व्याप्तं पराग से धूसर सब ओर मालतीमोगरेश्चैवजातीफलविराजितः ॥ पुन्नागैःकिंशुकैश्चैववर्वरीतुलसीद्रुमैः ॥ ११ ॥ आश्रमोरंमणीयः सद्रुमेनीनाविधैर्नृप ॥ वनमध्येनदीयातिपुण्यतोयासरस्वती ॥ १२ ॥ कूजतिसारसास्तत्रमदस्निग्धकलं सदा ॥ नदंतिकोकिला शब्दगुंजंतिचमध्रुवताः ॥ १३॥ बहुकोलाहलंभूपतद्वनंशुकसारिभिः ॥ चरंतिचाप दास्तत्रविविधाःकाननोत्तमे ॥ १४ ॥ सदाफलंसदापुप्पंपरागकणधूसरम् ॥ आच्छन्नंकाननंसर्वमधुवृक्षः समंततः ॥ १५ ॥ नवपल्लवसंजातमंजरीभरवल्लिभिः ॥ आश्लिएमभितोरम्यंपियाभिरिववल्लभः ॥ १६ ॥ तस्यशापभयावस्तोवातोवातिसमंततः ॥ नवपंत्युश्मभिर्मेघानशोपयतिभास्करः ॥ १७ ॥ वनंनोपद्रवंत दिसदासिद्धनिपेवितम् ॥ आहादजनकनित्यवनचैत्ररथंयथा ॥ १८॥ मधु वृक्षोंसे वह वन व्याप्त था ॥३५॥ नये पत्ते और मंजरीसे येलें भरी हुई चारोंओर वृक्षोंसे लिपटी ऐसी शोभित होती थी जैसे प्रियासे बलभ शोभित होताहै ॥ १६ ॥ उसके शापके भयमे पवन मंद मंद चलती थी न मेघोंसे कभी ओले पडते न सूर्य विशेष जल शोपता था ॥ १७ ॥ उपद्रव रहित वह वन सदा मिदोंमे सेवित था चैत्ररथ वनकी समान सदा आनंददायक था ॥१८॥ ६२ १प्रस्ता गंगावाता: प्रोनि नेनिपाठः।
300Reso उसमें धर्मात्मा देवताओंकी समान काान्तमान् ब्राह्मण निवास करता था यह सुमित्र ब्राह्मणका पुत्र भगवानसे बरपाया था ॥ ॥ १९ ॥ उसके नियम सुनो कि, वह सदा नियममें तत्पर ग्रीप्ममें सूर्यकी और नेत्रकरे पंचामि तापता था ॥ २० ॥ मे?के वर्पतेमें मैदानमें बैठकर तपकरता था पवन चलनेपर हिमवानको समान निष्कंप रहता था ॥ २१ ॥ हे विप्र ! हेमन्त ( अगहन पोप) में सारस्वत हृदमें बैठकर तपकरता और तीनि वार निर्मल जल स्पर्श कर संध्या करता ॥ २२ ॥ श्रद्धासे देवता पितरोंका तस्मिन्वसतिधर्मात्मादेवधूतिर्द्विजोत्तमः ॥ पुत्र सुमित्रोविप्रस्यलब्धोलक्ष्मीपतेर्वरात् ॥ १९ ॥ नियमः यूयतां तस्य सर्वदानियतात्मनः ॥ ग्रीष्मपंचतपानित्यंसूर्यन्यस्तविलोचनः ॥२०॥ वपत्कादंबिनीयावद्वर्या स्वभावकाशगः ॥ वातेप्रवाते निप्कंपोदुःसहोहिमवानिव ॥ २१ ॥ वसत्यप्मुसहेमंतेह्रदेसारस्वतेद्विज ॥ उपस्पृशतिकालेसत्रिवारंवारिनिर्मलम् ॥ २२॥ पितॄन्देवानृपीनित्यंसंतर्पयतिश्रद्धया ॥ ब्रह्मयज्ञपरोनित्यं सत्यवादीजितेंद्रियः ॥ २३॥ भूमौविश्रम्यविश्रांत-प्रध्यौपार्थयन्हारम् ॥ वन्यैर्जुहोत्यग्निहोत्रंश्रद्धयाति थिपूजकः ॥२४॥ चांद्रायणविधानेनकालंनयतिसर्वदा ॥ स्वयंविगलितै-पत्रै फलैर्वृतिसमीहते ॥२५॥ अनुद्विग्नस्तपोनिष्ठोवेदवेदांगपारगः ॥धमनीविकरालोसावस्थिमात्रकलेवरः ॥२६॥ नित्य तर्पण करता नित्य ब्रह्मयज्ञ करता सत्यवादी जितेन्द्रिय रहता था ॥२३॥ भूमिमें शयन कर भगवान्का ध्यान और प्रार्थना करता अग्निहोत्र कर श्रद्धासे अतिथि सत्कार करता ॥ २४ ॥ सदा चान्द्रायणके विधानसे समयको व्यतीत करता था और आप स्वयं गिरेहुये पत्रोंसे अपनी आजीविका करता था ॥२५॥ उद्वेग रहित हो तप करता वेदवेदाङ्गका पारगामी नाडी दीख .मा. भा.टी. अ.१८ रहीं अस्थि मात्र जिसका शरीस्थित था ॥२६ ॥ इस प्रकार बनमें उसको सहस्र वर्ष बीत गये तब उसके तेजसे वह पर्वत प्रज्य लित हो उठा ॥२७॥ उस माहात्माके तेजको कोई प्राणी न सहसका वह ब्राह्मण तपसे अमिकी समान दीखते थे ॥ २८ ॥ उस बनमें वैर रहित हो सब प्राणी विहार करते थे मृग व्याघ मूपक मार्जार निर्भय हो परस्पर वैर त्याग विचरते थे॥ २९ ॥ और भी उसका अति दुर्लभ नियम सुनो तीनों कालमें नारायणका वह पूंजन करता था ॥ ३० ॥ और सहस्र पुष्प खिले हुए मुगंधिके इत्थंजगामवाणांसहस्रतस्यकानने ॥ तदाजज्वालशैलोऽसौतपसस्तस्यतेजसा ॥ २७ ॥ सोढुंनशक्यतेभूतै स्तेजस्तस्यमहात्मनः ॥ वैश्वानरइवाभातिप्रज्वलंस्तपसाद्विज ॥२८॥ गतवैराणिभूतानिसमजायंततद्वने ॥ मृगव्याघ्राखुमार्जारामिथ क्रीडतिनिर्भयाः ॥ २९ ॥ अन्योपिनियमस्तस्यश्रूयतामतिदुर्लभः ॥ नारायणं त्रिकालंससंपूजयतिनित्यशः ॥ ३० ॥ पुष्पाणांतुसहस्रेणाविकचेनसुगंधिना ॥ वेदमुक्तविधानेनविष्णुध्या नपरायणः ॥३१॥ विष्णोःसंप्रीतयेविप्र-कुरुतेकर्मचाखिलम् ॥ दधीचेवरदानात्ससंजातोवरवैष्णवः ॥३२॥ एकदामासिवेशाखेएकादश्यांमहामुनिः ॥ पूजांकृत्वाहरेरम्यांविचित्रामकरोत्स्तुतिम् ॥ ३३ ॥ तदेवखगमा रुह्यदेवदेवोहरि स्वयम् ॥ आजगामपुरस्तस्यतयास्तुत्यातिहपितः॥ ३४॥ चढाताथा वेद सूक्तके विधानसे विष्णुका ध्यान करताथा ॥ ३१ ॥ हे ब्राह्मणो ! विष्णुकी प्रीतिके निमिन ही वह सब कर्म कर ताथा दधीचिके वरदानसे वह उत्तम वैष्णव हुए ॥ ३२ ॥ एक.समय वैशाखमास एकादशीके दिन वह महामुनि भगवानकी पूजा कर विचित्र स्तुति करनेलगा ॥ ३३ ॥ उमी ममय देवदेव भगवान् गरुडके ऊपर चढकर उसकी स्तुतिसे प्रसन्न हो उसके EEEEEE समीप आये ॥ ३४॥. उन श्याममेघ की छविवाले भगवान्को गरुडपर ॥ ३५॥ ब्राह्मण पुलकायमान होगया आनंदका जल नेत्रोंमें भार आया और रुतकत्य हो भूमिमें प्रणाम किया ॥ ३६ ॥ और हर्पताके कारण ब्रह्माण्डके उदरवालेको न जानसका उसने अपने देहको स्मरण न किया ब्रह्मरूपही होगया ।। ३७ ॥ तथ तंदृष्ट्वागरुडारूढप्रत्यक्षंजलदच्छविम् ॥ चतुर्वादुविशालाक्षसलिंकारभूपितम् ॥ ३५ ।। उद्भूतपुलकोविप्रः सानंदजललोचनः ।। जगामशिरसाभूमौकृतकृत्यमनास्तदा ॥ ३६॥ नमर्मातेनहर्पणसब्रह्मांडोदरेपिहि ॥ नसस्मारनिजदेहब्रह्मभूतइवाभवत् ॥ ३७ ॥ ततःसंभापितःप्रीत्याहरिणावैष्णवोमुनिः ॥ देवद्युतेविजाना मिमद्भक्तस्त्वंमदाश्रयः ॥ ३८॥ संन्यस्ताखिलकर्मासिमद्भावोमन्मनाःसदा ॥ वरंब्रूहिप्रसन्नोस्मिस्तोत्रेणाने नचानघ ॥ ३९ ॥ इतिश्रुत्वाहरेर्वाक्यंप्रत्युवाचसतापसः ॥ देवदेवारविंदाक्षस्वमायाधृतविग्रह ॥ ४० ॥ त्वदर्शनात्सदादेवदुर्लभोनापरोवरः ॥ ब्रह्मादयःसुराःसर्वेयोगिनःसनकादयः ॥४१॥ भगवान् प्रसन्न हो वैष्णव मुनिसे बोले हे देवद्युति ! मैं जानताहूं तुम मेरे भक्त और मेरे आश्रय हो ॥३८॥ सब कर्माका फल त्यागे सदा मुझमें मन लगाये हो इस स्तोत्रसे मैं प्रसन्न हूं हे पापरहित ! वर मांगो ॥ ३९॥ यह भगवान्के वचन सुन वह तप स्वी बोला हे देवदेव कमललोचन ! अपनी मायासे शरीर धारण करनेवाले ॥ ४० ॥ आपका दर्शन सदा दुर्लभ है, सो प्राप्त १ रत्नालंकारमंडितमित्यन्यत्र पा० । पोरी भा.. ना.मा. अ.१८ ६४ हुआ अब इससे अधिक और वर न चाहिये ब्रह्मादि सब देवता सनकादि योगी ॥ ४५ ॥ और कपिलादि सिद्ध आपसे साक्षात करनेकी इच्छा करते हैं अहंकार ममत्वके जो लोभ मोह शुभ अशुभ पाश हैं ॥ ४२ ॥ जो कारण जन्मके हैं वह आप परावर के दर्शनसे दग्ध होजाते हैं मेरे जन्म कर्म और धुद्धिका फल प्राप्त हुआ । ४३ ॥ हे जगत्पति जो आपका दर्शन हुआ अब इससे अधिक क्या मांगू हे देवेश ! हृदयमें आपके चरण कमल वरके निमित्त नहीं है ॥ ४४ ॥ सदा भक्तिसे आपमें मन लगाये मैं त्वांसाक्षात्कर्तुमिच्छंतिसिद्धाश्चकपिलादयः ॥ अहंममेतिपांशायेमोहलोमाःशुभाशुभाः ॥ ४२ ॥ सहे तुकाश्चदांतेहप्रोत्वयिपरावरे ॥ जन्मनःकर्मणोबुद्धराविभूर्तफलंमम ॥ १३ ॥ यदृष्टोसिजगन्नाथप्रार्थये किमतःपरम् ॥ नवरार्थहिदेवेशत्वत्पादपंकजंहदि ॥ १४ ॥चितयामिसदाभत्त्यात्वद्गतेनांतरात्मना ॥ इममे ववरंयाचेत्वद्भक्तिरचलामम ॥४५॥ अस्तुवैकमलानाथप्रार्थयेनापरंवरम् ॥ इति श्रुत्वावचस्तस्यप्रसन्नवदनो हरिः ॥ ४६॥ प्रत्युवाचप्रसन्नात्माएवमस्तुद्विजोत्तम ॥ अन्यस्ततपसःकश्चित्प्रत्यूहोनभविष्यति ॥४७॥ एतच्चत्वत्कृतस्तोत्रंयेपठिष्यतिमानवाः॥ तेपमिद्विपयाभक्तिनिश्चलाचभविष्यति ॥४८॥ धर्मकार्यंचयकि चित्सांगंसर्वभविष्यति ॥ ज्ञानेचपरमानिष्ठातेपस्थिास्यतिनिश्चला ॥ ४९ ॥ तुम्हारा चिंतन करताहूं यही मैं वर मांगताहूं कि, आपकी अचल भक्ति मुझमें निवास करै ॥४५॥ हे कमलानाथ ! यही और वरकी इच्छा नहीं करताहूं यह ब्राह्मणके वचन सुन भगवान् प्रसन्न होकर ॥ ४६ ॥ प्रसन्नतासे ऐसाही होगा तेरे तपमें, कोई भी विन न होगा ॥४७॥ और इस तुम्हारे किये स्तोत्रको जो मनुष्य पढ़ेंगे उनकी मेरेमें निश्चल भक्ति होगी॥ ४८ ॥ जो कुछ १ देहस्प मोहमूला: शुभाशुमो इतिपाठः।
धर्म कार्य है वह सांग और सम्पूर्ण होगा और उनका निश्चल IT निष्ठा होगी ।। ४९ ॥ एसा रु 700 ...... होगये देवयुति उसी समयसे नारायणके ध्यानमें मम हुए ॥५०॥ ॥ इति श्रीमाघमाहात्म्ये पण्डितज्वालाप्रमादमिश्रकृतभाषाटीकायां दवातिवरमदानं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ ॥ दिलीप बोले हे महर्षे ! पवित्र कथा सुनाकर मुझे कृतकृत्य करदिया इन विष्णु भगवान्की संगतिसे आज मैं गंगाकी समान पावन हुआ॥ १॥ आप कहिये वह कौनसा स्तोत्र है जिस्से भगवान् प्रसन्न होते इत्युक्त्वांतर्हितस्तत्रदेवदेवोजनार्दनः ॥ देवद्युतिस्तदारभ्यनारायणपरोऽभवत् ॥ ५० ॥ इति श्रीपद्मपुराणेमा घमाहात्म्येबसिष्टदिलीपसंवाददेवद्युतिवरमदानंनामाटादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ ॥ दिलीपउवाच ॥ महर्पेड नुगृहीतोस्मिकथयापावनीकृतः ॥ अनयाविष्णुसंगत्यागंगयेवाहमधवै ॥ १॥ किंतत्स्तोत्रंसमाख्याहिप्रसन्नो येनमाधवः ॥ तस्यानघस्यविपस्यमहत्कौतूहलंमम ॥२ ॥ त्वत्प्रसादादहं विप्रमन्येप्राप्तंमनोरथम् ॥ महतां संगतिःकस्यमहत्त्वायनकल्पते ॥३॥ कथयस्वप्रसादेनविष्णोःस्तोत्रमनुत्तमम् ॥ येनतुष्टः सभगवान्ददौ तस्यचदर्शनम् ॥४॥ ॥ वसिष्ठउवाच ॥. ॥ कथयामिरहस्यंतेयजप्तस्तोत्रमुत्तमम् ॥ प्राग्गृहीतंसुपर्णे नगरुडान्मयिचागतम् ॥५॥ हैं उस पवित्र ब्राह्मणके चरित्रोंमें मुझे बडी लालसा है ॥ २॥ हे विष ! आपके प्रसादसे मैं अपने पूर्ण मनोरथ मानू हूं. महात्मा ओंकी संगतिसे कौन बड़ा नहीं होता है ।। ३ ।। रुपाकर उनम विष्णुकास्तोत्र कहिये जिस्से प्रसन्न होभगवान्ने उसे दर्शन दिया॥४॥ वासिष्ठजी बोले में तुमसे यह गुप्त कथा कहताहूं जो उत्तम स्तोत्र जपनेके योग्य है पहले इसको गरुडजीने ग्रहण किया था उनसे !
.मा. भा.टी.' अ.१९ मेरे पास आपाहै ॥५॥ यह अध्यात्मगर्भका सार और महाउदयका करनेवाला है हे राजन् !. सब पापका हरनेवाला और आत्मज्ञानका अधिक करनेवाला है ॥ ६ ॥ ओं नमो वासुदेवाय जगत्के स्वरूप सबमें व्यान विश्वरूप चक्रधारी भक्तोंके प्रिय रुप्ण जगत्सति शान्धिारीके निमिन नमस्कार है ।। ७॥ स्तुति करनेवाले स्तुतिके योग्य और स्तुति यह सब जगत् जब कि, विष्णु रूप है तब किससे स्तुति की जाय भक्ति मनुर्पाको आनंदकी करनेवाली है ।।८॥ जिस देवके श्वाससे सांग सूत्र सहित वेद हुए हैं अध्यात्मगर्भसारतन्महोदयकरंशुभम् ॥ सर्वपापहरंभूपूस्वात्मज्ञानकरंपरम् ॥ ६॥ नमोवासुदेवायनमो विश्वायचक्रिणे ॥ भक्तप्रियायकृष्णायजगन्नाथायशाङ्गिणे ॥ ७॥ स्तोतास्तुत्यःस्तुतिःसर्वजगद्विष्णुमय यदा॥तदासंस्तृयतेकेनभक्तिमादकरीनृणाम् ॥ ८॥ यस्यदेवस्यनिःश्वासोवेदाःसांगा ससूचकार । कास्कृतिः प्रमुदतस्यभक्त्याऽहंमुखरोऽभवम् ॥९॥ चक्रवद्धमतेसर्वत्रैलोक्यसचराचरम् ॥अतस्त्वंगीयसेदेवचक्रपाणिवरा युध ॥ १० ॥ वेदोनवक्तियंसाक्षानचवाग्वेत्तिनोमनः॥ मद्विधस्तंकथंस्तौतिभक्तिमान्वाकथंभवेत् ॥११॥ ब्रह्मादिब्रह्मविष्णुस्त्वंत्वमेवसकलाश्रयः॥ खप्टाब्रह्मनिदानंचशुद्धब्रह्मत्वमेवच ॥ १२॥ कोयंकायस्तवविभो भित्त्वास्पृशतिकायिनम् ॥ कायदोपर्नचाघातस्तस्मनमोस्तुयोगिने ॥१३॥ उसको कौनसी स्तुति प्रसन्नं करेगी केवल भक्तिसे मैं वाचालता करता हूं ॥९॥ जिसकी महिमासे त्रिलोकी चक्रकी समान भमण करती है इस कारण हे देव ! हे चक्रपाणि ! आपही जगत्में गाये जाते हो ॥१०॥ जिसको साक्षात वेद नहीं कह सकता जिसको न वाणी और न मन जानता है मुझ सरीका उनकी स्तुति कैसे करसके और किस प्रकार भक्तिमान हो सकता है ॥ ११॥ ब्रह्माकी आदि वा ब्रमा विष्णुरूप तुम हो तुमही सबके आश्रय. सबके स्रष्टा ब्रह्माके भी आदिकारण शुद्धब्रह्म आपही हो ॥१२॥ हे व्यापक !
पापा नमस्कार है ॥१३॥ आप देवभावसे सदा जागते हैं आत्मस्वरूपसे कभी निद्रा नहीं लेतेहो जो सुख संदोहकी बुद्धि है हे विष्णो ! वह आपमें है इसमें संदेह नहीं ॥ १४ ॥ महत्व आदि महाभाव और पंचभूतोंके गुण हे नाथ ! वह सब कुछ आपही हो यह नानात्व मूढ कल्पना है ॥१५॥ केश और केशव रूप तीन कल्पनाओंसे हे भगवन् ! पुत्रोंको पिता जैसे आपही सबकी कल्पना देवभावेनजागर्तिननिद्रातिनिजात्मनि ॥ सुखसंदोहबुद्धिर्यासात्वंविष्णोनसंशयः ॥ १४ ॥ मेहदादयोमहा भावास्तथावकारिकागुणाः ॥ त्वमेवनाथतत्सर्वनानात्वंमूढकल्पना ॥ १५॥ केशकेशवरूपाभि-कल्पनातिस भिस्तथा ।। त्वमेवकल्पसेब्रह्मापुमानिवसुतादिभिः॥ १६॥ विदोपविगुणंचेकंचिन्मूर्तिरखिलंजगत् ॥ कवी नांभातियत्तत्त्वंतंविष्णुनौमिनिर्मलम् ॥ १७॥ यस्यज्ञानेनकुर्वतिकर्मापिश्रुतिभापितम् ॥ निरीपणाजग न्मित्राःशुद्धब्रह्मनमामितत् ॥ १८ ॥ ध्वस्तेतरच्चसन्मायत्प्रबोधादुपासते ॥ योगिनःसर्वभूतेपुसद्रूपंनौमितं हरिम् ॥ १९ ॥ ब्रह्माहमितिगायतियंज्ञात्वैकंवराद्विजाः ॥ पश्यंतोहित्वयातुल्यंदेवतनौमिमाधवम् ॥ २०॥ करतेहो ॥१६॥ आपकी चिन्मूर्तिने सब जगत्को विदोप और गुण रहित कर रक्खा है। जिसका तत्व कवियोंको प्रकाशित होता है उस निर्मलतत्वको प्रणाम करताहूं ॥१७॥ जिसके ज्ञानसे श्रुति भापित कर्म किये जाते हैं उस इच्छारहित जगतके मित्र शुद्ध ब्रह्मको प्रणाम करते हैं ॥ १८॥ आकाशमें व्याप्त सन्मानं जिसके प्रबोधसे उपासना होती है योगी सब भूतोंमें जिसको जानते हैं उस सद्रूप हरिको प्रणाम करनाहूं ॥१९॥ जिसको एक जान कर ब्राह्मणमें ब्रह्महूं ऐसा मान करते हैं आपकी समान अपनेको १ महदादिद्विधाभावाः-३०पा० । २ निरीक्षणे जगन्मित्रमिति पाठः। ३ सं (ख ) खेचरतमिति पा०। GH මුදිය
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भा. टी.
अ.१९
मानते हैं उन माधवको मैं प्रणाम करताहूं ॥२०॥ माया मोहकी विचित्रता और ममता तथा मनुष्योंके जो पाप नाश करता
उस चिदात्माके निमित्न नमस्कार है ॥२३॥ प्रयाण वा अप्रयाणमें जिसका नाम स्मरण मनुष्योंके पापशीघ्र नाश करदेता है उस
चिदात्माके निमित्न नमस्कार है ॥ २२ ॥ मोहकी पचनसे तृष्णाकी ज्वाला सदा प्रचण्ड रहती है और जिसके चरण कमलकी
छायाको पान होकर फिर नहीं जलाती उसको नमस्कार है ॥ २३ ॥ जिसके स्मरणमात्रसे मोह और दुर्गति नहीं होती रोग
माययामोहवैचित्र्यंतथाईममतांनृणाम् ॥ योनाशयतिपापोधान्नमस्तस्मैचिदात्मने ॥२१॥ प्रयाणेवाप्रयाणे
चयन्नामस्मरतांनृणाम् ॥ सद्योनश्यंतिपापौघानमस्तस्मैचिदात्मने ॥ २२ ॥ महानललसज्वालाज्वलल्लो
केपुसर्वदा ॥ यत्पादांभोरुहच्छायांप्रविष्टश्चनदह्यते ॥२३॥ यस्यस्मरणमात्रेणनमोहोनैवदुर्गतिः॥ नरोगाने
वदुःखानितमनंतनमाम्यहम् ॥ २४ ॥ कामयंतेप्रजानैवधिपणाभ्यःसमुत्थिताः॥ लोकमात्मैवपश्यंतियंबुद्धे
कचराजनाः॥ २५॥ शब्दार्थःसंविदर्थश्वविष्णोर्नामपरोयदि ॥ सत्येनतेनसंसारोमासंस्पृशतुमाधव ॥२६॥
नारायणोजगद्व्यापीयदिवेदादिसंमतः॥ सत्येनतेननिर्विनाविष्णुभक्तिर्ममास्तुवै ॥२७॥
दुःख नहीं होते उनको मैं नमस्कार करताहूं ॥ २४ ॥ जिसको पाय प्रजा किसी इच्छाकी कामना नहीं करती जिसको जानकर
यह प्राणी केवल आत्माहीकी इच्छा करते हैं ॥ २५ ॥ शब्दार्थ और ज्ञान यदि विष्णुके नाममें तत्पर हो तो सत्यही उसको
संसार स्पर्श नहीं करसकता ॥ २६ ॥ जगद्व्यापी नारायण यदि वेदादि शास्त्र के सम्मत हैं तो इस सत्यसे निर्विन विष्णु
भक्ति मुझे पानहो ॥ २७ ॥
जो विना बीजके बीज नहीं धीजमें जो पीजसे भावितहै वह भगवान् विष्णु मेरे संसारका बीज विद्यारुपी खडसे छेदनकरै ॥ २८ ॥ जो नटकी समान तीन शरीर धारण कर सृष्टि पालन और लय करता है जो गुणोंसे कायोंमें होते हैं वह भगवान् मुझसे प्रसन्न हो ॥ २९ ॥ जो केवल धर्मकी रक्षा करनेके निमित्त दश रूपसे अवतार धारण करते हैं, जो देवताओंसे प्रार्थित हो उनके कार्य सिद्ध करते हैं, वे भगवान् मेरे ऊपर प्रसन्न हो ॥३०॥ब्रह्मासे लेकर स्तम्ब पर्यन्त प्राणियों के निर्मल हृदयमें जो देव एकही निवास योनवीजपिनावीजबीजेयोवीजभावितः ॥ सविष्णुर्भववीजमशितविद्यासिनायतु ॥२८॥ त्रितनुर्नटवद्यस्तुस टिस्थितिलयेपुच ॥ गुणैर्भवतिकार्येपुसप्रसीदतुमेहरिः ॥ २९ ॥ दृशधेहावती!योधर्मवाणायकेवलम् ॥ अभ्यर्थितःसुरेःसर्वेःसप्रसीदतुमेहरिः ॥ ३० ॥ ब्रह्मादिस्तंवपर्यंतंप्राणिहृन्मंदिरेऽमलः ॥एकोवसतियोदेवः सप्रसीदतुमेहरिः॥३॥ इच्छांचक्रेसदेवाएकश्चैवबहुस्तथा ॥ प्रविष्टोदेवता स्रष्टासप्रसीदतुमेहरिः ॥ ३२ ॥ हृत्खगःखसमःखादिर्खातीतःखक्रियःखगः ॥ खंब्रह्माखादिभुक्चतिखमूर्तिस्त्वंमखाशनः ॥३३ ॥ यद्भासा यन्मुदायस्यमाययासजतेजगत् ॥ जाडचंदुःखमसत्यंचसभवानवतन्मयः॥ ३४॥ करते हैं, वे मेरे ऊपर प्रसन्न हो ॥३१॥आगे उसी देवने इच्छा की थी कि मैं एक बहुत रूप होजाऊं देवताओंको निर्माणकर उसमें प्रविष्ठ होगये सो मेरे ऊपर प्रसन्नहीं ॥ ३२॥ हृदयमें विहारी आकाशकी समान आकाशकीसी आदि आकाशसे परे आकाशमै क्रियावाले आकाशचारी खंब्रह्म आकाशकी समान व्याप्त आकाशका विषय भोगी आकाश मूर्ति यज्ञ भोगी ॥ ३३ ॥ जिनकी कान्ति जगतमें भासमान है, जिनकी मायासे जगत मोहित है, और जड़ता और असत्यता दुःखदेती है, वहीं भगवान १ दो अवखण्डने लोट् द्यतु नाशयत्वित्यर्थः। २ सत्तयासंततं-३० पा० । १२ .मा. भा. टी. अ.१९ तन्मय हो मेरी रक्षा करे ॥ ३४ ॥ आपका निर्मित विश्व आनंद करता है, त्यागतेही अशुचि होजाता है, उसके संग करते हुएभी तुम असंगहो इस कारण तुममें कोई विकार नहीं है ॥ ३५॥ पंचभूतके योगसे चैतन्य माननेवाले चार्वाकभी आपहीकी उपासना करते हैं सौगत युद्धिसे नुमको क्षणभंगुर मानते हैं ।। ३६ ॥ जिन देवतावाले तुमको शरीरका परिणामी मानते हैं, सांख्यवाले प्रकृतिसे परे तुमहीको पुरुप मानते हैं ॥ ३७॥ जो पूर्वजोंके कहे जन्मादिसे रहित आनंद लक्षण है उसीको उपनिपयाले ब्रह्म त्वत्सृष्टंमोदतेविश्वंत्वत्त्यक्तमशुचिर्भवेत् ॥ तत्संगतोप्यसंगस्त्वंविकारस्तेनतेनहि ॥ ३५ ॥ भूतयोगजचैतन्यं चार्वाकायमुपासते ॥ सौगतावतेतस्त्वांबुदिक्षणभंगुराम् ॥ ३६॥शरीरपरिमाणत्वांमन्यंतोजनदेवताः॥ ध्यायंतिपुरुपंसांख्यास्त्वामेवप्रकृतेःपरम् ॥३७॥ जन्मादिरहितःपूर्वयःस्यादानंदलक्षणम् ॥त्वामेवोपनिपद्ब्रह्म चिंतयंतिपरस्परम् ॥ ३८॥ खादिभूतानिदेहश्चमनोवुद्धींद्रियाणिच ॥ विद्याविद्येत्वमेवात्रनान्यत्त्वत्तोऽस्तिकिं चन ॥ ३९॥ त्वंधातासर्वभूतानांत्वमेवशरणमम ॥ त्वमग्निस्त्वंहविःशकोहोतामंत्रक्रियाफलम् ॥४०॥ त्वमास्तिनास्तिवैकुंठत्वामहंशरणंगतः॥ त्वंकर्मफलदाताचदीक्षितानांक्रियाफलम् ॥४१॥ त्वंहेतुःसर्वभूता नांत्वमेवशरणंमम ।। युवतीनांयथायूनियूनांचयुवतोयथा ॥४२॥ नामसे विचार करते हैं ॥ ३८ ॥ आकाश पंचमहाभूत देह मन बुद्धि इन्द्रिय विद्या अविद्या सब आपहो, आपसे भिन्न कुछ नहीं है ॥ ३९ ॥ आपही सब प्राणियोंके विधाता आपही मुझे शरण देनेवाले अमि हवि इन्द्र होता मंत्र क्रिया फल सब तुमहो ॥४०॥ अस्ति नास्ति वैकुंठ तुमहो, तुम्हारी मैं शरणको प्राप्तहूं, तुम कर्मफलके दाता दीक्षितोंके किया फलहो ॥ ४१ ॥ तुम सब भूतकि १ पूर्ण चित्सदानंदलक्षणम् ।
॥ ४२ । मन । न 1- हेतु और तुमहीं मुझे शरण देनेवालेहो, युवतियोंको जैसे तरुण तरुणको जै तरु । इसी प्रकार मेरी तुममें प्रीति है, हे हरे ! यदि पापी दुराचारी आपको प्रणाम करै ॥ ४३ ॥ उसको यमके दूत इस प्रकार नहीं देससकते जैसे उल्लू मूर्यको, यह तीन ताप और पाप समूह तभीतक मनुष्यको पीड़ा देते हैं ॥ ४४ ॥ हे नाथ ! जबतक भक्तिसे आपके चरण कमल का स्मरण नहीं करता ॥ ४५ ॥ जिसको गुण जाति शरीरके धर्म स्पर्श नहीं करते जिसको सम्पूर्ण मनोऽभिरमतेतद्वत्पीतिमेरमतांत्वयि ॥ आपपापंदुराचारंनरंत्वत्प्रणतंहरे ॥४३॥ नेक्षतेर्किकरायाम्याउलू कास्तपनंयथा ॥ तापत्रयमघोषश्चतावत्पीडयतेजनम् ॥४४॥ यावत्स्मरतिनोनाथभत्त्यात्वत्पादपंकजम् ।। ॥४५॥ यंनस्पृशंतिगुणजातिशरीरधर्मायंनस्पृशंतिगतयस्त्वखिलेंद्रियाणाम् ॥ यंचस्पृशंतिमुनयोगतसंगमो हास्तस्मैनमोभगवतेहरयेकरोमि ॥ ४६ ॥ स्थूलंविलाप्यकरणेकरणंनिदानेतत्कारणंकरणकारणवर्जितेच ।। इत्थंविलाप्यमुनयःप्रविशंतितत्रतस्मैनमोऽस्तुहरयेमुनिसेविताय ॥१७॥ ययानसंवहनघूर्णवशीकृतांतामै श्वर्यचारुगुणिनीसुखमोक्षलक्ष्मीम्॥ आलिंग्यशेरतइहात्मसुखैकभाजस्तस्मैनमोस्तुहरयेमुनिसेविताय॥४८॥ इन्द्रियोंकी गति स्पर्श नहीं करती जिसको संग रहित मुनि मोह को त्याग स्पर्श करते हैं उन भगवान् हरिके निमिन नमस्कार है ॥४६ ॥ स्थूल को करण करणको निदान में विलीन करके उसके कारण साधक कारणसे वर्जित कर मुनि इस प्रकार विलीन करके उसमें प्रवेश करते हैं उन मुनिसेवित हरि भगवान्के निमित्त नमस्कार है ॥ ॥ ४७ ॥ जिनके ध्यान धारणासे अन्तःकरण वशी करके ऐश्वर्यसे सुन्दर सुख भोग लक्ष्मीको प्राप्त होते हैं अर्थात् यहां आत्मसुख को प्राप्त हो मुक्तिको आलिंगन किये सोते मा.मा. भा.टी. ८ अ.१९. हैं इन मुनि सेवित हरिके निमित्त नमस्कारहै ॥४८॥जन्मादि भावसे विकृत विरह स्वभाव वाले जिसमें कि यह काम क्रोधादिपवर्ग शान्तिको प्रान होजाता है, तथा जिसको कामदिदोप कभी ताप नहीं देते हैं उन निर्मल वासुदेवको मनसे प्रणाम करताहूं ॥४९॥ जिनके ध्यानको संगतिसे अविद्याका मल शांत होताहै; जिसके ध्यानकी अनिसे जगत् नश्वर होजाताहै जिसके ज्ञानकी तलवार संशय रूपी शत्रुको मारती है उन विशदयोध दुःखहारी भगवानको प्रणाम करताहूं ॥ ५० ॥ सत्र चराचर जीव हरिके वशमें जन्मादिभावविकृतेविरहस्वभावेयस्मिन्नयंपरिधुनोतिपडूमिवर्गः ॥ यंतापयंतिनसदामदनादिदोपास्तवासुदे वममलंप्रणतोऽस्मिहार्दम् ॥ १९॥ ययानसंगतमलविज़हात्यविद्यायद्यानवह्निपतितंजगदेतिनाशम् ॥ यज्ज्ञानमुल्लसदसियतिसंशयारितत्वांहरिविशदवोधघननमामि ॥५०॥ चराचराणिभूतानिसर्वाणिचहरेर्वशे॥ यथावतेनसत्येनपुरस्तिष्ठतुमेहरिः॥५१॥ यथानारायणःसर्वजगत्स्थावरजंगमम् ॥ तेनसत्येनमेरूपंप्रदर्श यतुकेशवः ॥५२॥ भक्तिर्यथाहरौमेऽस्तितद्वरिष्ठागुरौयदि ॥ ममास्तितेनसत्येनस्वंदर्शयतुकेशवः ॥५३॥ तस्यैवंशपथैःसत्येभक्तितस्यानुचितयन्।। दर्शयामासचात्मानंसप्रीत पुरुपोत्तमः॥५४॥ ततोदत्त्वावरंतस्यपूर. यित्वामनोरथम् ॥ जगामकमलाकांतः स्तुत्याविप्रेणतोपितः॥५५॥ हैं, जैसे यहां तो इसी सत्य से भगवान सन्मुख हो मुझे दर्शन दें॥ ५१ ॥ जैसे नारायण सव स्थावर जंगम जगत्को व्याप्तकर रहे हैं उसी सत्यसे केशव मुझे दर्शन दें ॥ ५२ ॥ जैसे नारायण में और उनसे अधिक गुरुमें मेरी भक्ति है तो इस सत्य से नारा यण मुझको दर्शन दें ॥ ५३ ॥ इस प्रकार शपथोंसे उसकी भक्ति विचारते हुए पुरुषोत्तम भगवान् ने प्रसन्न हो दर्शन दिया । ५४ ॥ फिर उसको वर दे मनोरथ पूर्णकर ब्राह्मणकी स्तुतिसे प्रसन्न हो भगवान गये ॥ ५५ ॥ ६८
कृत कृत्य हो ब्राह्मण भी वासुदेव परायण हुआ और शिष्योंके सहित उस स्तोत्रको जपता उस आश्रममें रहनेलगा ॥ ५६ ॥
जो इस स्तोत्रको कहतेंवा जो मनुष्य सुनते हैं उनको अश्वमेधयज्ञका बड़ा फल मिलता है ॥ ५७ ॥ वह ब्राह्मण सदा आत्मवि
याके प्रबोधको प्राप्त होता है, न पापमें बुद्धि होती न अमंगल देखताहै ॥ ५८ ॥ बुद्धि मन इन्द्रिय स्वस्थ होतीहैं उन सब मनुष्यों
की जो इस स्तोत्रका पाठ करते हैं ॥ ५९ ॥ जो मनुष्य श्रद्धासे अर्थ विचारकर तत्पर हो जपते हैं वह यहां पापोंको दूर करके
कृतकृत्योद्विजन्सोऽपिवासुदेवपरायणः ॥ शिष्यःसाधुजपनस्तोत्रंतस्मिन्नास्तेतपोवने ॥५६॥ कीर्तयेद्यइदं
स्तोत्रंशृणुयायोऽपिमानवः ॥ अश्वमेधस्ययज्ञस्यप्राप्नोतिविपुलंफलम् ॥ ५७ ॥ आत्मविद्याप्रबोधचलभते
ब्राह्मण सदा ॥ नपापजायतेबुद्धिवपश्यत्यमंगलम् ।। ५८ ॥ बुद्धिस्वास्थ्यमनःस्वास्थ्यस्वास्थ्यमद्रियकं
तथा॥ नृणां भवतिसर्वेपामस्यस्तोवस्यकीर्तनात् ॥ ५९॥.विचार्यार्थजपेद्यस्तुश्रद्धयातत्परोनरः॥ सविधूये
हपापानिलभतेवैष्णवपंदम् ॥६० ॥ लभतेवांछितान्कामान्पुत्रपौत्रान्पशूस्तथा ॥ दीर्घमायुर्वलंबीयलभते
ससदापठन् ॥ ६१ ॥ तिलपात्रसहस्रेणगोसहस्रेणयत्फलम् ॥ तत्फलंसमवाप्नोतियइमांकीर्तयेत्स्तुतिम् ॥
॥ ६२॥ धर्मार्थकाममोक्षाणांयेयंकामयतेसदा ॥ अचिरात्तमवाप्नोतिस्तोत्रेणानेनमानवः ॥ ६३॥
वैष्णव पदको प्राप्त होते हैं ॥ ६० ॥ पुत्र पौत्र पशु तथा वांछित कामनाको प्राप्त होते हैं दीर्घ आयु बल वीर्य पाठ करनेसे सदा
मिलता है ॥ ६१ ॥ सहस्रतिलपात्र और गोदानका जो फल है वह इस स्तुतिके कीर्तन करनेवालेको प्राप्त होताहै ॥ ६२ ॥ धर्म
अर्थ काम मोक्ष जिस जिस वस्तुकी इच्छा करै वह इस स्तोत्रसे' बहुत शीघ्र प्राप्त होते हैं, इसमें सन्देह नहीं ॥ ६३ ॥
D भा.टी. मा.मा. अ. १९ आचार विनय धर्म ज्ञान तप नीति बुद्धि इसके सुनसेने मनुष्योंको नित्य होतीहै ॥६४॥ महापातक वा उपपातकसे युक्त इस स्तोत्रके पढनेसे शीघ्र शुद्ध होता है ॥ ६५ ॥ प्रज्ञा (बुद्धि ) लक्ष्मी यश कीर्ति ज्ञान धर्म वृद्धि होती है दुष्ट ग्रहका फल और सब अशुभ शीघ्र निवारण होते हैं ॥ ६६ ॥ सर व्याधिका हरनेवाला पथ्यरूप सब. आरटका नाशक कठिनाईसे तारनेवाला स्तोत्र ब्राह्मणों को पढ़ना चाहिये ॥ ६७ ॥ नक्षत्र ग्रह पीडा राजचोर भय अनिचोर भयमें शीघ्र इसको पढे ॥ ६८॥ सिंह व्याघ्र आचारेविनयेधर्मेज्ञानेतपसिसन्नये ।। नृणांभवतिनित्यंधीरिमांसंशृण्वतांस्तुतिम् ।। ६४ ॥ महापातकयुक्तो वायुक्तोवायुपपातकैः ॥ सद्योभवतिशुद्धात्मास्तोत्रस्यपठनात्सकृत् ॥ ६५ ॥ प्रज्ञालक्ष्मीयशाकीर्तिज्ञानधर्म विवर्धनम् ॥ दुष्टग्रहोपशमनंसर्वाशुभविनाशनम् ॥६६॥ सर्वव्याधिहरंपथ्यंसर्वारिष्ट्रनिपूदनम् ।। दुर्गतेस्तरणं स्तोत्रंपठितव्यंद्विजातिभिः॥ ६७ ॥ नक्षत्रग्रहपीडासुराजचोरभयेपुच ॥ अग्निचोरनिपातेपुसद्य-संकीर्तये दिदम् ॥ ६८॥ सिंहव्याघ्रभयंनास्तिनाभिचारभयंतथा ॥ भूतप्रेतपिशाचेभ्योराक्षसेभ्यस्तथैवच ॥ ६९॥ पूतनाज़ुभकेभ्यश्चविनेभ्यश्चैवसर्वदा ॥ नृणांकचिद्भयनास्तिस्तवेह्यस्मिन्प्रकीर्तिते ॥७०॥ वासुदेवस्यपूजायः कृत्वास्तोत्रमुदीरयेत् ॥ लिप्यतेपातकै सौपद्मपत्रमिवांभसा ॥ ७१ ॥ गंगादिपुण्यतीर्थेपुयास्नानै प्यतेग तिः॥ तांगतिसमवाप्नोतिपठन्पुण्यामिमांस्तुतिम् ॥ ७२ ॥ और अभिचार (टोटका ) का भय नहीं होता भूत प्रेत पिशाच राक्षसोंसे भय नहीं होता ॥ ६९ ॥ पूतना जुंभक तथा अन्य विनोंसे उनको भय नहीं होता जो इस स्तोत्रको पढते हैं ॥ ७० ॥ जो वासुदेवकी पूजा कर इस स्तोत्रको पढे वह पातकोंसे लिप्त नहीं होता जैसे पद्मपत्र जलसे ॥७१।-गंगादि पुण्यतीर्थोमें स्नानमे जो गति है वह गति इस स्तुतिके पाठसे मिलतीहै ॥७२॥]
एक दो तीन या सर्व कालमें जो इसको पढे वह अक्षय सुख पाता ॥ ७३ ॥ चार दे की तीन आवृत्तिका जो फल है वह फल एकवार इस स्तोत्रके पढने से मनुष्य को प्राप्त होताहै ॥ ७४ ॥ अक्षय धन प्राप्त होकर स्त्रीजनों का प्यारा होताहै श्रद्धा से नारायण को स्मरण करने से इस लोकमें सत्कार पाता है ॥ ७५ ॥ सदा सम्पत्तिसे युक्त होकर विपत्ति को प्रात नहीं होता उस स्तोत्र का पढनेवाला इन्द्रियोंके वशीभूत नहीं होता ॥ ७६ ॥ अलक्ष्मी कालकर्णी दुःस्वन दुर्विचिन्तना इस एककालंद्रिकालंबात्रिकालवापियःपठेत् ॥ सर्वदासर्वकालेपुसोऽक्षयंसुखमश्नुते ॥७३॥ चतुर्णामपिवेदानां त्रिरावृत्त्याचयत्फलम् ॥ तत्फलंलभतेस्तोत्रमधीयान-सकृन्नरः ॥ ७॥ अक्षय्यंधनमाप्नोतिस्त्रीणांभवति वल्लभः ॥ पूजांविंदतिलोकेऽस्मिञ्च्छृदयासंस्मरन्हरिम् ॥ ७५ ॥ सर्वदासंपदायुक्तोविपदंनेवगच्छति ॥ गो भिनह्रियतेस्तोत्रंनित्यंयाकीर्तयेद्धियत् ।। ७६ ॥ अलक्ष्मीकालकर्णीचदुःस्वप्नदुर्विचिंतितम् ॥ सयोनश्यति भक्तानामतंसंशृण्वतांस्तवम् ॥ ७७॥ प्रातरुत्थाययोऽधीतेशुचिर्विष्णुपरायणः ॥ अक्षय्यलभतेसौख्यमिह लोकेपरचच ॥ ७८॥ देवद्युतिप्रणीतंवैविष्णुप्रीतिकरंशुभम् ॥ विष्णुप्रसादजननं विष्णुदर्शनकारकम् ॥ ७९ ॥ योगसारमिदनामस्तोत्रंपरमपावनम् ॥ यःपठेत्सततंभत्त्याविष्णुलोकंसगच्छति ॥ ८०॥ स्तोत्रके सुनतेही यह भक्तों की व्याधी दूर होती है । ७७ ॥ प्रातःकाल उठ विष्णु परायणहो पवित्रतासे जो इसको पढ़ते हैं इस लोक और परलोक में अक्षय सुख को लेते हैं ॥७८॥ यह देवयुतिका निर्मित स्तोत्र विष्णुकी प्रीति करनेवालाहै विष्णुकी प्रसन्नता और उन के दर्शन करानेवाला है ॥ ७९ ॥ यह योगसार नामक परम पावन स्तोत्र है जो निरन्तर भक्तिसे पटै वह विष्णुलोकको भा. टी. अ, २० ७० जाता है ॥ ८ ॥ इस प्रकार यह स्तोत्र गुह्य और पापका नाशक है अब इसके आगे पिशाचमोचन कहता हूं ॥ ८१ ॥ इति श्रीपाने माघमाहात्म्ये पंडितज्वालाप्रसादमिश्रकृतभापाटीकार्या योगसारस्तोत्रकथनं नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥ ॥ बसि छजी बोले सुनो जो पिशाच उसने वनमें मुक्त किया पहले द्रविडदेशमें चित्ररथ नामवाला एक राजा था ॥ ३ ॥ वह चंद्रवंशी महा वीर शूर शस्त्र अखका पारगामी गजवाजी स्योंके समूहसे सम्पन्न सदा विक्रमी ॥ २ ॥ जिसका कोश सुवर्ण और नाना इतितेकथितं स्तोत्रंगुह्यंपापप्रणाशनम् ॥ अतऊर्ध्वप्रवक्ष्यामिपिशाचस्यविमोचनम् ॥ ८१॥ ॥ इति श्रीपद्म पुराणेमाघमाहात्म्यवसिष्ठदिलीपसंवादेयोगसारस्तोत्रकथनंनामैकोनविंशोऽध्यायः॥ १९ ॥ ॥ वसिष्ट उवाच ॥ ॥ श्रूयतांयेपिशाचाश्चमोचितास्तनतद्वने ॥ आसीद्राजाचित्रनामाद्राविडेविपयेपुरा ॥ १ ॥ सोमान्वयेमहावीर शूरःशस्त्रास्त्रपारगः ॥ गजवाजिरथौचैश्चसंपन्नोविक्रमीसदा ॥२॥ स्वर्णे नाविधैरत्नैः पूर्णकोशोमहाधनः ॥ मध्येनारीसहस्रस्यसदाक्रीडतितत्परः ॥३॥ स्त्रैणःकामीसदालुब्धश्चंडकोपःसपार्थिवः॥ नकरोतिवचोधयंसचिवःसमुदीरितम्॥४॥विष्णुंनिंदतिसोऽत्यर्थवैष्णवान्टेप्टिसर्वदा॥कोऽसौविष्णुःकदृष्टोसौ कचास्तेकेनकीर्त्यते ॥६॥ इत्थंनसहतेविष्णुंसराजादेवमोहितः॥ नारायणंभजतेयेतान्पीडयतिकोपितः॥६॥ रत्नोंसे पूर्ण था सहस्र नारियोंके बीचमें सदा क्रीडा करताथा ॥ ३ ॥ स्त्रीलुब्ध कामी लोभी महाक्रोधी वह राजा मंत्रियोंके कहे धर्मयुक्त वचन कभी नहीं मानता था ॥ ४ ॥ विष्णुकी निंदा विष्णु भक्तोंका सदा द्वेष करताथा, कौन विष्णु किसने देखा है कहां कौन उसको कहता है ॥ ५॥ इस प्रकार दैव मोहित हुआ वह राजा विष्णुको नहीं सहसकता था, जो नारायणका भजन ८ करते उनको पीडा देताथा क्रोध करताथा |॥ ६॥ न ब्राह्मण न वेद न वैदिक कर्म न व्रत न दानदेनेवालेको मानै इस प्रकार पास इस्थितिमें स्थित था ॥ ७ ॥ अनीतिसे कठिन दण्ड देकर प्रजाको पीडित करताथा निठुर निर्दयी क्रूर पुण्यकर्मसे पराङ्मुख ॥ आचारहीन हार देपी अमिहोन तथा क्रियासे दीन दूसरे कालकी समान वह अपने प्रजाकी शासना करताथा ॥ ९ ॥ तव बहुत दिनों के उपरान्त राजा मृत्युको प्राप्त हुआ वैदिक विशनसे उसकी ऊचं दैहिक क्रिया न हुई नब्राह्मणान वेदांश्चवैदिकंकर्मनव्रतम् ॥ नदानंमन्यतेदातुंपाखंडस्थितिसंस्थितः ॥७॥ अनीत्याचंडदंडे श्वप्रजापीडांकरोतिसः ॥ निष्ठुरोनिर्दयः क्रूरःपुण्यकार्यपराङ्मुखः ॥८॥ च्युताचारोऽच्युतद्वेष्टाच्युतामिश्च क्युतक्रियः ॥ सोऽनुशास्तिजनभूपाकालरूपइवापरः ॥ ९॥ ततोबहुतिथेकालेसराजापंचतांगतः॥वैदिकेन विधानेनलेभेनेवोर्ध्वदेहिकम् ॥ १० ॥ अथकिंकरयूथेनपीड्यमानोभृशंतदा ॥ अयाकीलमयेमार्गेतप्तास तापपारते ॥ ११॥ चंडाकरश्मिसंतप्तेवृक्षच्छायाविवर्जिते ।। तप्तांगारप्रपूर्णेचवह्निज्वालासमाकुले ॥ १२ ॥ लोहतुडैश्चकाकोले«न्यमानःसुदारुणैः ॥ वृकैदँट्राकरालैश्चश्वभिघोरेश्वभक्षितः ॥ १३ ॥ शृण्वन्नंदितमन्ये पनिणांकिल्विपकारिणाम् । जगामपार्थिवोलोकमंतकस्यभयावहम् ॥ १४॥ ".१०॥ तब यमराजके दूत समूहोंसे पीडित हुआ लोहेकी कीलोवाले मार्गमें जहां जलता रेता पूर्ण था ॥ ११ ॥ सूर्यको किरणे जहां ताप देतीर्थी वृशोको छायासेहीन तम अंगारसे पूर्ण अभिकी ज्यालासे समाकुल ॥ १२ ॥ लोह तुण्ड और दारुण काकोलसे वारंवार पीडित कराल डार्दोवाले वृक और घोर कुनोंसे भक्षित ॥ १३ ॥ जहां दूसरे पापियोंका घोर शब्द सुनाई आताथा, इस '.मा. भा.दी. अ.२० प्रकार वह राजा यमलोकको गया ॥ ३४ ॥ हे राजन् ! उस लोककी उसकी दुस्सह गति सुनो क्रमसे वह राजा नरक से नरकको गया ॥ १५॥ प्रथम महा दुःखदायक तामित्र नरकको गया, फिर निरन्तर दुःखवाले अंधतामित्रमें गया ॥ १६ ॥ फिर महा रोख रौखनामक महानरकर्म गया, और कालसूत्र महानरक में गया ॥ १७ ॥ फिर दुस्तर दुःसमें मम होनेसे वह राजा मूठित हुआ फिर चैतन्य होने पर तापन संपतापन नरकको गया ॥१८॥ दुःखकी अग्निसे व्याकुल हो राजा नरकोंमें पडा, प्रपात संपात शृणुभूपगर्तितस्यतस्मिल्लोकेसुदुःसहाम् ॥ निरयानिरययातःपर्यायेणसभूपतिः ॥ १५॥ आदोप्रयातस्ता मिलेदारुणेभूरिदुःखदे ॥ पुनश्चैवांधतामिसेयत्रदुःखंनिरंतरम् ॥ १६॥ गतोऽनंतरमत्युग्रंमहारौरवरौरवम् ॥ नरकंकालसूत्रंचमहानरकमेवच ॥१७॥ पश्चान्मनःसभूपालोदुस्तरेदुःखमूच्छितः ॥ संजीवनेमहावीचौता पनेसंप्रतापने ॥ १८॥ पपातनरकंराजादुःखामिछुटमानसः ॥ संतापंचसकाकोलंकुड्मलंपूतिमृत्तिकम् ।। ॥ १९ ॥ लोहशंकुंमृगीयंवपंथानंशाल्मलिनदीम्॥ प्रविष्टोऽथमहाभीमंदुर्दर्शदुर्गमंपुनः॥ २० ॥ असिपत्रव नंचेवलोहचारकमेवच ॥ एवमेतेपुसर्वेषुपतित्वापापकृन्नृपः ॥ २१ ॥ अपिंदन्नरकेघोरेसंतापंयातनामयम् ॥ विष्णुप्रवेपघोपेणयुगानामेकविंशतिः॥ २२॥ भुक्काचयातनांयाम्यांनिस्तीर्णनरको नृपः ॥ समयागिरि राजेतुपिशाचोऽभूत्तदामहान् ॥२३॥ काकोल कुइमल पूति मृत्तिका ॥ १९ ॥ लोहरांक मृगीयंत्र शाल्मली मार्ग शाल्मलीनदी फिर महा भीम दुर्गम · मार्गमें प्रविष्टं हुआ ॥ २० ॥ असिपत्र वन लोहचारक इत्यादि सभी नरकोंमें वह पापी राजा गया ॥ २१ ॥और नरकोंमें घोर यातनाको प्राप्त हुआ विष्णुके देप से इक्कीसयुग तक ॥ २२ ॥ यातना भोग कर नरकसे निकला गिरिराजपर महापिशाच योनिको प्राप्त ७१ . हुआ ॥२३॥ उस वनमें भूखा हुआ सय दिशाओंमें फिरताथा उसको मेरु पर्वतमें भी तो भोजन जल नहीं दीखताथा ॥२४॥ एक समय वह शोक पीडित पिशाच प्रमण करता हुआ कोई होनहार सतफलके प्राप्त करनेको लक्षात्रवण वनमें प्रविष्ट हुआ ॥२५॥ बिहेडेके पेड़की छायाम वह दुःखी आश्रय होकर हाय । मैं मरा ऐसे घोर शब्द करने लगा ॥ २६ ॥ क्षुधा तृपासे व्याकुल होने के कारण मेरा सब प्राणियोंसे द्रोह है इस दुरंत जन्मका अन्त किस प्रकार होगा ॥ २७ ॥ प्रथम इस सभाम्यतिदिशःसर्वावनेतस्मिन्बुभुक्षितः ।। नपश्यत्यशनंतोयमेरावपिसदागिरी ।। २४ ॥ कदाचित्पर्यटन्सो थपिशाचःशोकपीडितः । प्क्षप्रस्रवणारण्यप्रविष्टोभाविसत्फलम् ॥२५।। विभीतकतरुच्छायांसमाश्रित्यसु दुःखितः॥ दाहतोस्मीतिचाकंदोरमुच्चैःपुनःपुनः ॥ २६॥ क्षुतृड्भ्यांमुह्यमानस्यसर्वभूतनुहोमम ॥ जन्म नोस्यदुरंतस्यकथमंतोभविष्यति ॥ २७॥ आदौपापसमुद्रेस्मिन्दुःखकल्लोलमालिनि ॥ करावलंवनंकोऽद्य निममस्यपदास्यति ।। २८ ।। ।। इति श्रीपद्मपुराणेमाघमाहात्म्येवसिष्पदिलीपसंवादेपिशाचाख्यानंनाम विंशोऽध्यायः ॥२०॥ ॥ वसिष्टउवाच ॥ ॥ इत्यंतस्यपिशाचस्यरोदनंदीनचेतसः॥ देवद्युतिरधीयानः शुश्रावकरुणामयम् ।।१॥ समागम्यततस्तत्रपिशाचंचदर्शसः ॥ विकरालमुखंभीमंपिशंगनयनकृशम् ॥२॥ ऊर्ध्वमूर्धजकृष्णगिंयमदूतमिवापरम् ॥ ललज्जिलुचलंबोटंदीपजंघशिराकुलम् ॥३॥ दुःख समूह भरे पापके समुद्री डूबते हुए कौन मुझको हाथका अवलम्बन देगा ॥ २८॥ इति श्रीपाने माघमाहात्म्ये भापाटी कायां विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥ ॥ वसिष्ठजी बोले इस प्रकार उस पिशाचका दीन स्वरसे रोदन वेद पाठ करते हुए देवद्युतिने सुना ॥१॥ क्ष वहां आकर उसने पिशाचको देखा, विकराल मुख भयंकर नेत्र कश शरीर ॥ २ ॥ ऊपरको जिसके बाल मा.मा. भा.टी. ७२ अ.२१ कृष्ण शरीर दूसरे यमदूतकी समान चलायमान जीभ और ओष्ठ दीर्घ जंया और शिरसे व्यात ॥ ३ ॥ दीर्घ अंघ्रि सूखी तुण्ड गढेकी समान आखें सूखा पंजर शरीर था कौतुकसे प्राप्त होकर मुनिने उससे पूंछा ॥ ४ ॥ देवद्युति बोले तुम भीपण आकारखाले कौन हो क्यों दारुण रोते हो यह अवस्था क्यों हुई कहो मैं तुम्हारा क्या प्रिय करूं ॥ ५ ॥ मेरे आश्रममें प्रविष्ट होकर प्राणी दुःख नहीं पातेहैं यैप्णव भवन की समान सब आनंद करते हैं ॥६॥ हे भद्र ! तुम शीघ्र इस दुःखका कारण कहो बुद्धिमान् अर्थके दीप्रिंशुष्कतुंडचंगशिंशुष्कपंजरम् ॥ अथासुकौतुकाविष्टःपप्रच्छमुनिपुंगवः ॥४॥ देवद्युतिरुवाच ॥ कोसित्वंभीपणाकारः कुतोरोदिपिदारुणम् ॥ अवस्थेयंकुतोबहिकिंचाहंकरवाणिते ॥५॥ममाश्रमप्रविष्टा हिदुःखमाजोनजंतवः ॥ मोदंतेकेवलंसर्वेवैष्णवेभवनेयथा ॥ ६॥ वदत्वंसत्वरंभद्रदुःखस्येतस्यकारणम्॥ कालक्षेपनकुर्वतिप्राप्तेथेहिमनीपिणः॥७॥ ॥ वसिष्ठउवाच ॥ ॥ श्रुत्वेतद्वचनंप्रीतःपिशाचस्त्यक्तरो दनः ॥ उवाचदीनयावाचाप्रश्रयावनतस्तदा ॥ ८॥ ॥ पिशाचउवाच ॥ ॥ सर्वांगव्यापिसं तापंजहारत्वद्वचोमम ॥ ग्रीप्मेदावानलोद्भूतंवर्पन्मेवइवाचले ॥९॥ यन्मेऽस्तिसुकृतीकचित्तेनदृष्टोऽ सिमेद्विज ॥ नासंचितपुण्यानांसद्भिरेकत्रसंगमः ॥ १०॥ इत्युक्त्वाकथयामासपूर्ववृत्तांतमात्मनः॥ विष्णुद्वेपनदोपेणदशामेतामहंगतः॥११॥ प्राप्त होने में कालक्षेप नहीं करते हैं ॥७॥ वशिष्ठ बोले यह वचन सुनकर वह पिशाच रोदन त्यांग कर दीन और नम्र होकर यह वचन कहने लगा ॥८॥ पिशाच बोला मेरे सम्पूर्ण अंगमें व्यापी तापको तुम्हारे वचनने हरण कर लिया ॥९॥ कोई मेरा बडा मुरून है इस कारण तुम्हारा दर्शन हुआ विना पूर्व जन्मके पुण्यके सत्पुरुषोंका दर्शन नहीं होता' ॥ १० ॥ ऐसा कह अपना ७२ वृत्तान्त कथन करता हुआ कि, विष्णु भगवानसे द्वेष करनेके निमित्त मैं इस दशाको प्राप्त हुआ हूं ॥११॥ प्राणान्तक समय जिनका नाम स्मरणकर मनुष्य मुक्त हो जाते हैं हे द्विज ! मुझ पापिष्ठीका सदा उन हरिसे द्वेष रहा ॥१२॥ जो प्राणियोंको पालन करता है जिससे त्रिलोकीमें धर्म प्राप्त होता है जो भूतोंका अन्तरात्मा है उसमें मेरा द्वेप हुआ ॥१३॥जो कर्मका फल वेदोमें गाया जाता है जो तप द्वारा ब्राह्मणोंसे यजन किया जाता है उनसे मैंने देप किया ॥ १४ ॥ क्रिया त्यागी वनवासी निस्संगचारी यन्नामप्राणान्मुक्तोहिस्मृत्वाविष्णुपदंव्रजेत् ।। पापिष्ठोहिहरौतस्मिन्ममद्धेपोभवधिज ॥ १२॥ यःपालयतिभूता निधर्मयातिजगत्रये ॥ यांतरात्माचभूतानांतस्मिन्द्वपोममाभवत् ॥ १३॥ कर्मणाफलदोयोत्रसर्ववेदेपुगी यते ॥ तपोभिरिज्यतेविप्रेःसमेटेपवशंगतः ॥१४॥ त्यक्तक्रियै प्रियारण्येनिःसंगैकचरैश्चयः॥ वेदान्तियतिमि चित्य समेटेपीहरिजि ॥ १५॥ ब्रह्मादयःसुराःसर्वेयोगिनःसनकादयः॥ मुक्त्यर्थमर्चयंतीहसविष्णुढेपितो मया ॥ १६॥ आदौमध्येऽवसानेयोविश्वधातासनातनः॥ यस्यनेवादिमध्यांताःसमेटेपपदंययौ ॥ १७ ॥ यन्मयासुकृतंकर्मकृतंप्राक्तनजन्मनि ॥ विष्णुद्वेपानिनादग्धतत्सर्वभस्मासादभूत् ॥ १८ ॥ कथंचिदस्य पापस्यसीमांद्रक्ष्यामिचेदहम् ॥ मुक्त्वानारयणनान्यमर्चयिष्यामिदेवताम् ॥ १९॥ वेदान्ती यतियोंसे जो चित्तनीय हैं उन हरिभागवान्से मैंने द्वेप किया ॥१५॥ ब्रह्मादि सब देवता योगी सनकादिक मुक्तिके निमित्त जिनका चिन्तन करते हैं उन हरिसे मैने वेप किया ॥ १६ ॥ आदि मध्य अंतमें जो विष्णु विधाता सनातन हैं, जिसके आदि मध्य अंत नहीं है उनसे मैने देष किया ॥ १७ ॥ जो मैने पूर्व जन्ममें सुकृत किया वह विष्णुके वैपकी अनिसे सब भस्म होगया ॥ १८॥ किसी प्रकार यदि मैं इस पापका अंत देखू तो नारायणको छोडकर फिर कभी अन्य देवताका पूजन नहीं भा. टी. ७३ अ.२१ GEEEEEEEEEEEE करूं ॥ १९ ॥ विष्णुके द्वेषसे मैंने बहुत कालतक नरक यातना भोगी, अब नरकसे निकलकर मैं पिशाची योनिको प्राप्त हुआ ॥२०॥ अब कर्म मंत्रसे तुम्हारे आश्रममें प्राप्त हुआ हूं, जो तुम्हारे दर्शन रूप सूर्यसे दुःखमय अंधकार दूर हो गयाहै ॥२१॥ जहां मरण प्राति बंधन लक्ष्मी सुख और वधूहो इन स्थानोंपर कर्म गले, भुजा डालकर ले जाता है ॥ २२ ॥ इस समय आप पिशाचनाशक उनम कर्म कहिये, परोपकार करनेमें देर करनेवाले धन्य नहीं होते ॥ २३ ॥ देवयुति बोले-अहो ! यह मायः विष्णुद्वेपाचिरंभुक्त्वामयानरकयातनाम् ॥ निरयानिःमृत सोऽहंपैशाचीयोनिमागतः ॥२०॥ अधुनाकर्मम बेकरथानीतस्त्वदायमम् ॥ यत्रत्वदर्शनार्कान्मेनटंदुःखमयंतमः ।। २१ ॥ प्राप्यतेमरणंयत्रवंधनश्री सुखं वधूः॥ सतत्रनीयतेस्वेनकर्मणागलहस्तिना ॥२२॥ इदानीमुचितंकर्मबूहिपैशाच्यनाशनम् ॥ परोपका रकार्येहिनधन्यामंदगामिनः ॥२३॥ ॥ देवद्युतिरुवाच ॥ ॥ अहोमुष्णातिमायेयंदेवासुरनृणांस्मृतिम् ।। ययादेवेष्वपिद्धेपोजायतेधर्मनाशनः ॥२४॥ स्रष्टापालयिताहंताजगतायोमहेश्वरः ॥ आत्माचसर्वभूतानां तमूढोष्टिकः कथम् ॥ २५ ॥ भवंतिसर्वकर्माणिसफलानियदर्पणात् ॥ तद्भक्तिविमुखोमर्त्यःकोनयातीहदुर्ग तिम् ॥ २६ ॥ श्रुतिस्मृतिसदाचारविहितंकर्मकेवलम् ।। सेवितव्यंचतुर्वणे जेनारायणंसदा ॥२७॥ देवता, असुर, मनुष्य, सबको मोहित करती है सबकी स्मृतिको नष्ट करती है, कि जिनका देवताओंसे भी धर्म नाशी द्वेष होता है। ॥ २४ ॥ जगत्के पालन उत्पत्ति नाशक महेश्वर जो कि सब भूतोंके आत्मा, मूढ उनसे भी देष करते हैं ॥ २५ ॥ जिनके अर्पण करनेमे सब कर्म सफल होतेहैं उनकी भक्तिसे विमुख होकर कौन मनुष्य दुर्गतिको प्राप्त नहीं होताहै ॥ २६ ॥ श्रुति, स्मृति, ॥ अन्यथा सदाचारसे जो कर्म विधान किया है नारायणका भजन करते सव वर्णों को वह सेवन करना चाहिये ॥ २७ विना शाम्रकी सेवासे वह नरकको जाताहै इस कारण वेदविरुद्ध ग्रन्थोक्त कर्मको त्याग दे ॥ २८ ॥ अपनी बुद्धके कल्पित मन्थ मूर्योको छलते हैं, यह कल्याणके मार्गमें विन करते केवल लोकनाशके निमित्त हैं ॥ २९ ॥ जो विष्णु वेद तप सद्राह्म गोकी निन्दा करते हैं, इस कारण वे असग्रन्थोंके सेवन करनेसे नरकको जाते हैं ॥ ३० ॥ अहो सन्मार्गमें निष्ठावली सच्चारत अन्यथानिरयंयातिविनाह्यागमसेवनात् ॥ अतोवेदविरुद्धार्थशास्त्रोक्तंकर्मसंत्यजेत् ॥ २८॥ स्वबुद्विरचितेः शास्त्रे प्रताउँहतुवालिशान् ॥ विनंतिश्रेयसोमार्गलोकनाशायकेवलम् ॥ २९ ॥ विष्णुंनिंदंतिवेदांश्चतपोनिंदं तिसद्विजान् ॥ तेनतेनरकंयांतिासच्छास्त्रनिपेवणात् ॥ ३० ॥ अहोसन्मार्गनिष्ठस्यसचरित्रस्यभूपतेः॥ जाताविधिवशादृष्टाकुमार्गाकुलिनीमतिः ॥ ३१॥ असतांसंगतिः कस्यमूलंनविपदांभवेत् ॥ श्रुतिस्मृतिसदा चारविहितंशाश्वतंपरम् ॥ ३२ ॥ स्वस्वधर्मप्रयत्नेनश्रेयो हसदाचरेत् ॥ स्वबुद्धिरचितैःशास्त्रैर्मोहयित्वाजनं जडाः ॥३३॥ हरिशंकरयोःपापायत्रभेदेहिकुर्वते॥ हरेहरौचधर्मात्मानभेदहृदयंचरेत् ॥३४॥ अयमेवयथारा जाद्रविडोनिरयंगतः ॥ द्विपन्नारायणंदेवंदेवदेवंगत्प्रभुम् ॥ ३५॥ राजाको विधि वशमे कुमार्ग आकुलनी मति प्राप्त हुई ॥ ३१ ॥ असत्पुरुषोंकी संगतिसे किसको विपत्ति नहीं प्राप्त होती श्रुति स्मृति सदाचारसे जो परम शाश्वत कहा है ॥ ३२ ॥ श्रेयकी इच्छा करनेवाला अपने २ धर्ममें सदा आचरण करै मूर्ख अपनी बुद्धिके रचे ग्रन्थोंसे मनुष्य जोंको मोहित करते हैं ॥ ३३ ॥ जहां पापी हरि शंकरमें भेद करते हैं वे हरिहरमें भेदकारी पापी हैं धर्मात्माको चाहिये कि हरिहरमें भेद चिन्ता न करै ।। ३४ ॥ इसीसे द्रविडका राजा नरकको गया यह नारायण देवके द्वेप HERE मा.मा. भा.टी. अ.२१ करनेका कारण है ॥ ३५ ॥ इस कारणसे देवता और विशेषकर ब्राह्मणोंमें पुण्यकी इच्छा करनेवाला टेप और वेदवार नियाको त्यागन करै ।। ३६ ॥ ऐसा कह मुनिने पिशाचको हितकर वचन कहे हे भद्र माघमासमें तुम प्रयागको गमन करो ॥ ३७ ॥ वहां तुम पिशाचत्वसे अवश्य मुक्त होगे इसमें सन्देह नहीं, वहां स्नान करनेसे स्वर्गकी प्राप्ति होतीहै, यह सनातनी श्रुतिहै ॥ ३८ ॥ वहां मनुष्यके पूर्व जन्मके किये पाप नाश होतेहैं, प्रयागलानसे अधिक और कहीं पुण्य नहीं है ॥३९॥ प्राय तस्माद्देपंहिदेवेपुत्राह्मणेपुविशेषतः॥ संत्यजेत्पुण्यकामोनवेदवारांक्रियांत्यजेत् ॥३६॥ इत्युक्काकथयामास पिशाचायहितंमुनिः। प्रयागंगच्छभोभद्रमाघमासंविचारय॥३७॥ तत्रतनिश्चितामुक्ति पेशाच्यानात्रसंशयः॥ तवाछुतादिवंयांतिश्रुतिरेपासनातनी ॥३८॥ विजहातिनरस्तत्रप्राक्तनंकमर्दुष्कृतम् ॥ प्रयागस्नानतोनास्ति काप्यन्यदधिकंपरम् ॥ ३९॥ प्रायश्चित्तंतपोरूपंदानरूपंक्रियात्मकम् ।। यागयोगाधिकंविद्धिप्रयागंपापिना मपि ॥ ४० ॥ स्वर्गापवर्गयोरिंतत्पृथिव्यामपावृतम् ॥ सितासितोदवेणीयाताहित्वाभुविनापरम् ॥४१॥ पापनेगडवदस्यछेदनेककुठारिका ॥ क्वविष्णुःसूर्यतेजोनिगंगायामुनसंगमः॥४२॥ क्ववराकीनृणांतुच्छा पापराशितृणाहुतिः॥ मलीमसघनध्वंसेयथाशरदिचंद्रमाः॥४३॥ चिन तप दानरूप क्रियात्मक योग और योगसे भी अधिक सिदि प्रयागमें पापियोंको मिलती है ॥ ४०॥ यह पृथ्वीमें स्वर्ग अपवर्गका खुलाहुआ दारहै, गंगा यमुनाके संगमको छोड भूमिमें अन्य पवित्र स्थान ऐसा नहीं ॥ ४१ ॥ पापरूपी निगडमें बधेको छेदन करनेको यह एक कुल्हाड़ी है कहां तौ विष्णु सूर्य तेज अग्नि गंगा यमुना का संगम ॥४२॥ और कहां.. उसमें ७४ HAR मनुप्या पापरूपी तृणसमूहकी आहुति, घने अंधकारके दूर होनेसे जैसे चन्द्रमा ॥ ४३ ॥ प्रकाशित होता है इसी प्रकरा वेणीमें स्नान करनेसे मनुष्य पापरहित होताहै मैं तुझसे गंगा यमुनाका माहात्म्य नहीं कह सकता ॥ ४४ जिसके जल कणके. स्पर्शसे केरलवासी ब्राह्मण मुक्त होगया यह ऋपिके वचन सुन पिशाच परम संतुष्ट मन होकर ॥ ४५ ॥ दुःख रहितको समान प्रसन्न हो मुनिसे बोले हे महामुने ! केरलदेशी ब्राह्मण कैसे मुक्त होयगा ॥४६ ॥ भातिपापक्षयादूवनरोवेणीजलाप्लुत ॥ सितासितस्यमाहात्म्यमहवक्तुंनतेक्षमः॥४॥ यत्तोयकणसंस्पृष्टो मुक्ताकेरलकोद्विजः ॥ इतिवाक्यमृपेः शृत्वापिशाचस्तुष्टमानसः ॥४५॥ मुक्तदुःखइवप्रीतःपप्रच्छप्रणयान्मु निम् ॥कथंकरलदेशीयोद्विजोमुक्तोमहामुने ।। ४६॥ एतंकथयवृत्तांतसंश्रित्यकरुणांमयि ।। ४७।। ।। इति श्रीपभपुराणेमाघमाहात्म्येव० दि० सं० पिशाचाख्यानंनामेकर्षिशतितमोऽध्यायः ।।२१ ॥ ॥ देवद्युति रुवाच ॥ ॥ पिशाचशृणुपुण्यमिकथांकथयतःशुभाम् ॥ केरलेवसुनामात्रब्राह्मणोवेदपारगः॥१॥ दायादैर्हत, वित्तस्तुनिर्धनोबंधुवजितः ॥ जन्मभूमिपरित्यज्यमहादुःखेनदुःखितः ॥ २॥' देशादेशंपरिभ्राम्यकालेनम हतापुनः॥ प्रविश्यसमहारण्यमीपद्व्याधिप्रपीडितः॥३॥ मेरे ऊपर कपाकर यह वृत्तान्त कहो ॥ ४७ ॥ इति श्रीपाने महापुराणे माघमाहात्म्ये भापाटीकायां पिशाचाख्यान नाम एकविंशतितमोऽध्यायः ॥ २१ ॥ देवद्युति बोले हे पिशाच ! सुन मैं पवित्र और पुण्य कथा कहताहूं केरल देशमें वसुनामवाला वेदपारगामी ब्राह्मण था ॥ १ ॥ हिस्सेदार कुटुम्बियोंने उसका धन हरलिया इस्से वह निधन और बंधुवर्जित था जन्म भूमिको त्याग मादुःखसे दुःखी हुआ ॥२॥ देश देशमें भ्रमण करते २ कुछ कालमें कुछ व्याधिसे पीडित होकर महावनमें की मा.मा. अ.२२ प्रवेश किया ॥ ३ ॥ तीर्थादिमें गमन करता थका भूखप्स दुरल विध्याचल पवतम दाभक्षक कारण मृत्युका प्राप्त हुआ उसका दाह वा और्षदेहिक क्रिया भी न हुई ॥४॥ इस कर्मविपाकसे उसी सघन पर्वतमें निर्जन वनमें चिरकालतक प्रेतरूप होकर निवास करता रहा ॥ ५॥ शीत और धूपसे क्लेशित निराहार जलरहित दिगंवर उपानद रहित पर्वतमें हाहाकार करता हुआ वासलेना ॥६॥ वायु रूपसे वह इधर उधर भ्रमण करताथा उस ब्राह्मणको न कहीं शरण और न सुखकी प्राप्ति हुई ॥ ७ ॥ गच्छंस्तीतिरंश्रांताक्षुत्क्षामोविंध्यपर्वते ॥ दुर्भिक्षेणमृतिलेभेनदाहंचोर्ध्वदेहिकम् ॥ ४ ॥ तेनकर्मविपाके नतत्रैवगिरिगह्वरे ॥ प्रेतीभूतश्चिरंकालमुवासनिर्जनेवने ॥५॥शीतातपपरिक्तिप्टोनिराहारोनिरूदकः॥ दिगं बरोव्युपानकोगिराहाहेतिनिःश्वसन ॥ ६॥इतस्ततःपरिभ्राम्यवायुभूतःसकेरलः॥ द्विजोनशरणलेभेनसुखं कुत्रचित्तदा ॥ ७॥ संशोचतिस्मदुःखातोंनेवपश्यतिसद्गतिम् ॥ सर्वदादत्तदानसभुक्तस्वकर्मणःफलम् ॥ ८॥ हविर्जुवतिनानौयगोविंदनार्चयंतिये ॥ भजतेनात्मविद्यायेसुतीर्थविमुखाश्चये ॥ ९॥ सुवर्णवस्त्रतांबूलेमणि मनफलंजलम् ॥ आतेभ्योनप्रयच्छंतिसतकृतहीनकाः ॥ १०॥ ब्रह्मस्वंचपरस्वंचस्त्रीधनानिहरंतिये ॥ बलेनछद्मनावापिधूर्ताश्चपरवंचकाः ॥ ११॥ दुःससे व्याकुल हुआ शोच करताथा उसने कहीं सद्गतिकी प्राप्ति नहीं देखा सदा दान न देनेके अपने कर्मके फलको भोगता था ॥ ८॥ जो अनिमें आहुति नहीं देते गोविन्दका पूजन नहीं करते जो आत्मवियाको भजन नहीं करते और सुतीयोंसे जो विमुख हैं ॥ ९ ॥ सुवर्ण वध ताम्बूल मणि अन्न फल जल दुःखीजनोंको जो नहीं देते वे सब हीनकृत्य हैं । i. १० ॥ जो ब्राह्मगका धन दूसरोंका भन तथा स्त्री जातिका धन हरण करते हैं, बल वा छलसे वे धूर्त दूसरोंको ठगने
वाले हैं ॥ ११ ॥ दांभिक कुहक चोर जो अनिकी वृत्निवाले हैं बालक बूढे स्त्रीजनाम जा निर्दयता करते हैं सत्य वर्जित ।
॥ १२॥ अनिलगानेवाले विपदेनेवाले तथा और जो झूठी साक्षी देते हैं, जो अगम्यागामी तथा ग्राम बालोंको
यजन कराते हैं । १३ ॥ माता पिता भगिनी सन्तान और अपनी स्वीके त्याग करनेवाले जो डरपोक
नास्तिक और धर्मदूपक हैं ॥ १४ ॥ जो युद्धमें स्वामीका त्याग करते हैं, शरणागतको छोड़ते हैं, गौ भूमिके हत
दांभिकाःकुहकाचोरायेचपावकवृत्तयः । वालवृद्धातुरस्त्रीपुनिर्दयाःसत्यवर्जिताः ॥ १२ ॥ अनिदागरदाये
चयेचान्येकूटसाक्षिणः ॥ अगम्यागामिनःसर्वेयेचान्यग्रामयाजिनः ॥ १३॥ पितृमातृस्नुपापत्यस्वदारत्या
गिनश्चये ॥ येकदर्याश्चलुब्धाश्चनास्तिकाधर्मदूपकाः ॥ १४ ॥ त्यजतिस्वामिनयुद्धेत्यजतिशरणागतम् ॥
गवांभूमेश्वहंतारोयेचान्यरत्नदूपकाः ॥१५॥ परापवादिनःपापादेवतागुरुनिंदकाः ॥ महाक्षेत्रेषुसवेंपुप्रतिग्रह
रताश्चये ॥ १६॥ परद्रोहरतायेचतथाचप्राणिहिंसकाः ॥ कुप्रतिग्राहिणः सर्वेतेभवंतिपुनःपुनः॥ १७ ॥
प्रेतराक्षसपेशान्तिर्यग्यक्षकुयोनिषु ॥ नतेपासुखलेशोस्तिइहलोकेपरत्रच ॥ १८॥ तस्मात्त्यक्त्वानिपिद्धार्थ
विहितंकर्मचाचरेत् ॥ यज्ञदानंतपस्तीर्थमंत्रदेवगुरुंभजेत् ॥ १९॥
करनेवाले रत्नोंको दूपण देनेवाले ॥ १५॥ पराई निन्दा करनेवाले पापी देवता और गुरुओंकी निन्दा करनेवाले महाक्षेत्रों
प्रतिग्रहके लेनेवाले ॥ १६ ॥ पराये द्रोही प्राणियोंके हिंसक कुत्सित दान लेनेवाले वारंवार जन्म लेते हैं ॥ १७ ॥ प्रेत
राक्षस पिशाच तिरछे चलनेवाले वृक्षोंकी योनिवालोंको इस लोक और परलोकमें सुखका लेशभी नहीं है ॥ १८ ॥ इस कारण
निषिद्ध कर्मको त्यागकर विहित कर्म करना चाहिय; यज्ञ दान तप.तीर्थ देवगुरुका भजन करना चाहिये ॥ १९ ॥
.मा. भा. टी. अ, २२ काँका विपाक अनेक योनियोंमें दुस्तर जानकर चारों वर्णीको निरन्तर धर्मका सेवन करना चाहिये।॥२०॥इस प्रकार प्रेतकी गति देख पापके बीजसे उसको हुआजान धर्मोपदेशकर उस्से ब्राह्मणने कहा ॥ २३ ॥ इस प्रकार वह केरलमेत पर्वतमें स्थित हुआ बहुत काल बीतनेपर मार्गमें पथिकको देखता हुआ ॥ २२ ॥ वेणीके जलकी दो कुंडी लिये हुए पुण्यश्लोक जनर्दनका चरित्र गाताथा ॥ २३ ॥ उसको देखतेही प्रेतने आनकर मार्ग रोका और अपने शरीरको दिखाकर कहा डरना मत ॥२४॥ हे काम विपाकंकर्मणादृष्ट्वायोनिकोटिपुदुस्तरम् ॥ चतुभिरपिवर्णेश्चसेव्योधर्मोनिरंतरम् ॥२०॥ इतिप्रेतगतिंदृष्ट्वापाप वीजोत्थितांहिसः।। कृत्वाधर्मोपदेशंचपुनस्तस्मैद्विजोत्रवीत् ॥ २१॥ इत्थंसकेरलःप्रेतोवर्तमानोगिरौतदा ॥ अतिवााचिरंकालमपश्यत्पथिकंपथि ॥ २२ ॥ वहंतंद्रीकरंडोचवेणीजलयुतौतथा ॥ गायंतप्रेमतोदेवंपुण्य श्लोकंजनार्दनम् ॥ २३ ॥ तंदृष्ट्वासहसाप्रेतोमार्गरोधंचकारसः ॥ दर्शयामासचात्मानमाभैपीरित्युवाचसः ॥ ॥२४॥ पानीयंपातुमिच्छामित्वत्तःकार्याटिकोत्तम ॥ नपास्यसिजलंचेन्मांप्राणायास्यंतिमेदृढम् ॥ इति प्रेतवचःश्रुत्वापाथःप्रत्याहकोतुकात् ॥२५॥ ॥ काटिकउवाच ॥ ॥ कस्त्वदुःखाभिभूतस्तुकृशोम्लानो दिगंबरः ॥ २६ ॥ जीवशेपोममर्पश्चविकृतोभयवर्धनः ॥ नवधूममयाकारश्चंडश्चंचललोचनः ॥२७॥ पद्भया मस्पृष्टभूमिस्त्वनिमासोदरवाहुकः।। इतितद्वचनं श्रुत्वाप्रेतोवाक्यमथात्रवीत् ॥ २८॥ रथी मैं तुझसे जल पान करनेकी इच्छा करताहूं जो मुझे जल न पिलायेगा तो मेरे प्राण जायँगे ॥ २९ ॥ प्रेतके यह वचन सुन कुतहटसे वह पथिक बोला तू महारुश मलिनरूप नग्न कौन है ॥ २६ ॥ जीव शेप मरनेकी इच्छा किये विकत दर्शन भयकारी । नये धूमकी समान आकारवाला चण्ड चंचल नेत्र किये ॥ २७ ॥ पृथ्वीको चरणोंसे न छुयेहुये उदर बाहुर्मे मांससे हीन है यह ।
उसफ वचन सुनकर प्रत वचन बोला ॥ २८ ॥ प्रेतने कहा हे धर्मात्मा सुनो मैं तुमसे कहताहूं कि जिस कारणसे ऐसी दशाको प्राप्त हुआहूं मैं दानन देनेशला लोभी मलिनक्रिय ब्राह्मणहूं ॥ २९ ॥ परान्नहीं सदा खाता और इकलाही मीठा भोजन करता न मैंने कभी भिक्षादी न हन्तकार दिया ॥ ३० ॥ न वैश्वदेव क्रियान कभी बलि दी और न कभी प्यासे प्राणियोंको जलही दिया ॥ ३३ ॥ और पृथ्वीपर विचरण करते कभी अपने पितरोंको तृम नहीं किया. न कभी श्राद्ध किया न देवताओं का पूजन । प्रेतउवाच ॥ शृणुमिप्यतेवन्मियेनाहमीदृशोभवम् ॥ ब्राह्मणोऽदत्तदानोहलोभीचमलिनक्रियः ॥२९॥ परानचसदामुक्तमेकाकीमिष्ठभोजनः॥ मयादत्तानभिक्षापिहतकारोनपुष्कलः ॥३०॥ नकृतोवैश्वदेवस्तुप क्षिप्तोनवहिर्बलिः ॥ भूतानांतुनृपानिनिहतापयसाचतृट् ॥ ३१ ॥ कदाचित्पितरोनैवतर्पिताअटतामहीम् ॥ नचवाईकृतकापिपूजितानवदेवताः॥ ३२॥ वातपयरित्राणनदत्तंपादरक्षणम् ॥ जलपानदत्तंचतांबूलंनी पधंमया ॥३३॥ नगृहेवसतिर्दत्तानातिध्यकस्यचित्कृतम् ॥अंधवृद्धाधनानाथदीनापानानतोपिताः ॥३४॥ गवांगासोनदुत्तोवैनरोगीपरिमोचितः ।। नदत्तानहुताविप्रपवित्राश्चतिलामया ॥३५॥ पृथिव्यांतिलदातारो नभवंतितुमद्विधाः ॥ व्यतीपातेनदत्तहिकिञ्चित्स्वर्णमहाफलम् ॥ ३६॥ किया ॥ ३२॥ न कभी छत्री और न पादत्राण प्रदान किये, जलपात्र ताम्बूल औषधि कभी प्रदान न की ॥ ३३ ॥ न किसीको घरमें ठहराया, न कभी किसीका अतिथि सत्कार किया, वृद्ध अनाथ दीनोंको अन्न, जलादिसे कभी संतुष्ट न किया ॥३४॥ न गौओको ग्रास दिया न कभी किसी रोगीको मुक्त कियापवित्र तिलादिसे कभी ब्राह्मणों को तृप्त न किया ॥३५॥ पृथ्वी तिलके '.मा. भा.टी. अ.२२ देनेवाले मेरी समान न होंगे, व्यतीपातमें भी मैंने कुछ भी सुवर्णका दान न दिया ॥ ३६ ॥ संक्रान्ति वा सूर्य चंद्रके ग्रहणमें भी मैंने कुछ दान न दिया सम्पूर्ण पर्वही मेरे शुन्य रूपसे बीत गये ॥ ३७॥ कार्तिककी मुख्य तिथिभी मैंने शून्यतासे बिताई आठौ मया आदिमें पितरोंके निमिन भी मैंने कुछ नहीं दिया ॥ ३८ ॥ मन्वादि और युगादिमें ब्राह्मणोंकी प्रीतिके निमिन कुछ न किमा कार्तिकमें तिल तैलके सहित मैंने दीपक नहीं दिया ॥ ३९ ॥ सौभाग्यरूप और कामनाके देनेवाले माघमासका, मैंने स्नान संक्रांतायुपरागेचनदत्तंसूर्यचन्द्रयोः ॥ पर्वाण्यन्यानिसर्वाणिजग्मुःशून्यानिमेद्विज ॥ ३७ ॥ तिथय कार्तिके मुख्याजातावंध्या:सदामम ॥ पितृभ्योनेवदत्तवाअप्टकासुमधासुच ॥ ३८॥ द्विजानांनकृताप्रीतिर्मन्वादि पुयुगादिषु ॥ नदत्तस्तिलतेलेनादपि कार्तिकेमया ॥ ३९ ॥ ननातोमाघमासेहरूपसौभाग्यकामदे ॥ द्विजा यवेदविदुपेगौतम्यांसिंहगेगुरौ ॥ ४०॥ मयासंकल्पितंद्रव्यंनदत्तंपूर्वजन्मनि ॥ नखातोहंकृष्णवेण्यांतथाक न्यागतेगुरो ॥४१॥ अमिंप्रज्वाल्यकाष्ठानातानांपोपमाघयोः ॥ शीतार्तानांचविप्राणांनकृतोजाड्यनि ग्रहः ॥ ४२ ॥ माधवादिपुमासेपुनदत्तंशीतलंजलम् ॥. मयानारोपितोश्वत्थोन्यग्रोधोनैववर्धितः ॥४३॥ वंदिगृहान्मयामुक्तिनकृतामाणिनांकचित् ।। नप्राणिभयसंत्रस्तोरक्षित-शरणागतः॥४४॥ नहीं किया न वेदपाठी ब्राह्मणके निमित्त गौतमी नदीपर सिंहकी बृहस्पतिमें ॥ ४०॥ पूर्व जन्ममें मैंने संकल्प कर द्रव्य नहीं दिया कन्याकी बृहस्पतिकभी मैंने पवित्र वेणीमें स्नान नहीं किया ॥ ४१ ॥ पौष माघमें स्नान करनेवालोंको तापनेके निमित्त कभी काष्ठ नहीं दिया शीतसे दुःखियोंके निमित्त कभी वखादि नहीं दिया ॥४२॥ वैशाख.आदि महीनेमें कभी किसीको शीतल जल तक नहीं दिया न मैंने पीपल लगाया न वट लगाया ॥ १३ ॥ कभी किसी प्राणीकी मैंने बंधनसे मुक्ति न की प्राणियोंके भयसे कभी शरणागतकी रक्षा न की ॥४४ ॥ तीन रात्रितक एकादशी व्रत करके कभी मधुसूदनको प्रसन्न नहीं किया लच्छू अतिरुच्छू तथा चान्द्रायण कभी नहीं किया ॥४५॥ तवकच्छू तथा सांतपन अविरुच्छ्र और इन्द्रादि देवताओंके सेपित व्रत ॥ ४६॥ मैंने कभी न सेवन करके देहकोशुष्क किया. इस प्रकारसे पूर्व चरित्र मेरा है ।। ४७ ॥ हे ब्राह्मण देखिये इस जन्म मेरी कैसी क्रूरता यह ज्ञानरहित गति पूर्व जन्मके क्रूर कर्मके कारण मुझे प्राप्त हुई है ॥ ४८ नोपोष्याचत्रिरावाणितोपितोमधुसूदनः। कृच्छ्रातिकृच्छूपाराकंतयाचांद्रायणंद्विज ॥४५॥ अथान्यत्ततकृच्छू चतथासांतपनानिच ॥ ब्रतान्येतानिपुण्यानिजुटानींद्रादिभिःसुरैः ॥ ४६ ।। चरित्वानमयातानिदेह-संशो पितापुरा ॥ इत्थंपूर्वभवोवंध्योममजातोद्विजोत्तम ॥ १७॥ पश्यदिजमहामूरामद्धतामजन्मनि ॥ गतिंदूर प्रयोघांतूममपूर्वस्यकर्मणः ॥ १८ ।। संतिमांसानिमार्गेपुवृकव्यावहतानिवे ॥ फलान्यन्यानिशेलेस्मिन्छुकै स्त्यक्तानिसर्वतः ॥ ४९ ।। पुण्यानिचसुगंधीनिफलानिरसर्वतिच ।। मूलानितुसुभक्ष्याणिमृदूनिमधुराणिच ॥ ॥ २०॥ नानाविधानितिष्ठतिमधूनिसुबहून्यपि ।। स्रोतसांनिझराणांचसंतिवारीणिसर्वशः -॥५१॥ सुलभे पुपदार्थपूसर्वप्वतेपुपर्वते । नेक्षेहमशनंक्वापिदेवेनापिहतंसदा ॥५२॥ वाताहारेणीवामियथाजीवंतिपन्न गाः ॥ पुनर्जीवामिभोविप्रदेवयोनिप्रभावतः ॥ ५३॥ मार्गोमें वृक व्याघके खाये हुए मांसादिहै तोते आदिके खाये फल इस पर्वतमें हैं ॥ ४९ ॥ पुण्य गंधी और रसवाले फल सुभक्ष्य मृदु और मधुर मूल हैं ॥ ५० ॥ विविध प्रकारके और भी बहुतसे मृदु मधुर हैं स्रोत निर्झर और जर बहुत ॥ ५१ ॥ स पदार्थ इस पर्वतमें सुलभ हैं परन्तु देवसे हत होने के कारण मैं कुछभी नहीं खासकता ॥ ५२ ।। साँकी समान मा.मा. ७८ betterest पवनके आहारसे जानाहू फिर हे विप्र ! देवयोनिके प्रभावसे जीताहूं ॥ ५३ ॥ बल प्रज्ञा और मंत्र पौरुप विक्रम तथा मित्रोंके | भा.टी. सहायसे भी मनुष्य अलभ्य पदार्थको प्राप्त नहीं करसकता ॥५४ ॥ लाभालाभ सुख दुःख विवाह मृत्यु जीवन भोग रोग वियोगमें to अ.२२ एक दैवही कारण है ॥ ५५ ॥ कुरूप कुकुल निंदित मूर्ख कुत्सित आचारसम्पन्न तथा शूरता विक्रमसे हीन दैवके दिये राज्यों को भोगते हैं ॥ ५६ ॥ काने गंजे अभव्य नीतिहीन दुर्गुणसम्पन्न नपुंसकभी प्रारम्धसे राज्यपर स्थित दीखते हैं ॥ ५७ ॥ घलेनप्रज्ञयानित्यमंत्रपौरुपविक्रमः॥ सहायश्चैवमित्रैश्चनालभ्यंलभतेनरः ॥५४॥ लाभालाभेसुखदुःखेवि वाहेमृत्युजीवने ॥ भोगेरोगेवियोगेचदैवमेवहिकारणम् ॥ ५५॥ कुरूपाःकुकुलामूर्खा कुत्सिताचारनिदिताः॥ शौर्यविक्रमहीनाश्चदेवाद्राज्यानि जते॥५६॥ काणाःखंजाअभव्याश्चनीतिहीनाश्चदुर्गुणाः ॥ नपुंसकाश्च दृश्यतेदेवाद्राज्येप्रतिष्टिताः ॥५७॥ यैर्दत्ताश्चतिलागावोहिरण्यवसनानिच ॥ गौरीकन्याचयैर्दत्तायैर्दत्ता चवसुंधरा ॥ ५८॥ शय्यासनानितांबूलमंदिराणिधनानिच ॥ भक्ष्यभोज्यानिदत्तानिचंदनान्यगरूणिच ।। ॥ २९ ॥ अटव्यांपर्वताचग्रामेवानगरेपिवा ॥ पुरःपुरश्चतिष्ठंतितेपांभोगाःप्रयत्नतः ॥६० ॥ संत्यत्रपर्वते न्येपिराक्षसावलवत्तराः ॥ राक्षसाश्चपिशाचाश्चपिशाच्यश्वातिदारुणाः ॥६१ ॥ कदाचिचकथंचिचकापि यत्रस्वकर्मणा ॥ लभतेचानपानानिपर्यटतोवनवने ॥ ६२॥ जिन्होंने तिल गौ सुवर्ण वस्त्र दिये हैं जिन्होंने गौरी कन्या और वसुंधरा दान की है ॥ ५८ ॥ शम्या भोजन ताम्बूल मंदिर धन भक्ष्य भोज्य चंदन अगर जिन्होंने दिये हैं ॥ ५९ ॥ वनमार्ग पर्वतका अग्रभाग गांव वा नगरमें आगे २ उनके भोग स्थित हैं ॥६० ॥ इम पर्वतपर औरभी बडे बली राक्षस हैं राक्षस पिशाच पिशाची बड़ी दारुण हैं ॥ ६१ ॥ कभी किसी प्रकार कोई अपने कर्मसे वनमें फिरतेहुए अन्न पान प्राप्त करते हैं ॥ ६२ ॥ उनसे यह वचन सुनकर कि तुमको भय न हो पवित्र गोवि न्दके भक्त तुमको वे देखभी नहीं सकते ॥ ६३ ॥ विष्णुभक्ति रक्षाके वर्मवाले नारायणके भक्तको राक्षस प्रेत पूतना न छू सकते न देख सक्ने हैं ॥ ६४ ॥ भूत वेताल गंधर्व शाकिनी ग्रह रेवती वृद्धरेवती मुखमण्डग्रह ॥ ६५ ॥ यक्ष क्रूर बालग्रह दुष्ट वृद्धग्रह तथा मातृकाग्रह भयंकर तथा विनायकादियह ॥६६॥ कृत्या सर्प कूष्माण्ड और दूसरे दुष्ट जन्तु हे विप्र पवित्र वैष्णव इतिश्रुत्वात्रतेभ्यश्चमाभयंभवतांभवेत् ॥ शुचिंगोविभक्तत्वांनतेद्रष्टुमपिक्षमाः ॥ ६३॥ विष्णुभक्तितनुवाणं नारायणपरायणम् ॥ नस्पृशंतिनपश्यन्तिराक्षसाःप्रेतपूतनाः ॥ ६ ॥ भूतवेतालगंधर्वा-शाकिन्यश्चार्यका ग्रहाः ॥ रेवत्योवृद्धवत्योमुखमंड्यस्तथाग्रहाः ॥६५॥ यक्षावालग्रहाःकरादुष्टावृद्धग्रहाश्चये ॥ तथामात्य हाभीमानहाश्चान्येविनायकाः ॥६६॥ कृत्याःसश्चिकूष्मांडायेचान्येदुष्टजंतवः ॥ नपश्यंतिपरंविप्रवैष्णवं ब्राह्मणशुचिम् ॥ ६७ ॥ शुचिंरक्षतिभूतानिधर्मिष्ठंपीडयंतिन ॥ रक्षतिचशुचिंनित्यंग्रहनक्षत्रदेवताः ॥६८॥ गोविंदनामजिह्वाग्रहदिवेदस्तुसंस्थितः । शुचिश्चदानशीलश्चत्वंसर्वत्राकुतोभयः ॥६९॥ एवंब्राह्मणतिष्ठामिभुं जानकर्मणःफलम् ॥ नशोचामीतिमत्त्वाईविमृश्यचपुनःपुनः॥ ७० ॥ ब्राह्मणको नहीं देखते हैं ।। ६७ ॥ पवित्रकी सब प्राणी रक्षा करते हैं उसको पीडा नहीं देते हैं ग्रह नक्षत्र देवता पवित्रकी सदा रक्षा करते हैं ॥ ६८॥ जिसकी जिह्वामें गोविन्दका नाम हृदयमें वेद स्थित है पवित्र और दानशील है उसको कहीं भय नहीं है ॥६९॥ हे ब्राह्मण इस प्रकार काँका फल भोगताहुआ यहां स्थित हूं वारंवार विचारकर शोच नहीं करताहूं ॥ ७० ॥ 006 JODH भा. टी. ७९ अ.२३ जम्बालिनीके किनारे विचरते हुए सासके वचन सुनकर मैं दुःखी नहीं होता हूं ॥ ७१ ॥ इति श्रीपाने महापुराणे पिशाचवोधोनाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥२२॥ ब्राह्मण वोले सारसके केहे वचन तैने किस प्रकार सुने हैं हे प्रेत वह मेरे सुन्नेकी इच्छा है सो तुम शीघ्र कहो ॥१॥ प्रेत बोला हे कामरथी ! मैं सारसके वचन कहताहूं तुम सुनो इस धूसर नाम कक्षसे एक नदी निकलती है ॥ २॥ जिसके श्रेष्ठ जलाशय ताल वृक्ष परिमित अथाह जलवाले हैं जहाँ मतवाले हाथी रहते हैं. महाककुभ शोभासे युक्त, स्निग्ध जामनसे नदुनोमितथातावद्यापजवालिनीतटे॥सारसोदीरितवाक्यंश्रुतंपर्यटतामया ॥७१ ॥ इति श्रीपद्मपुराणेमाघ माहात्म्यवसिप्ठदिलीपसंवादेपिशाचवोधोनामद्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥ ॥ ब्राह्मणउवाच ॥ ॥ सारसो दीरितवाक्यकीदृशंहिश्रुतत्वया ॥ तदहंश्रोतुमिच्छामिहित्वंप्रेतसत्वरम् । १॥ ॥प्रेतउवाच ॥ ॥ ब्रवीमिसारसंवाक्यंशृणुकापाटिकोत्तम ।। धूसरानामकस्मिन्नदीगिरिसमुद्भव ॥२॥ सदाजलाशयोत्ताला मत्तदंतिकुलाकुला ॥ महाककुभशोभाढ्यास्निग्धजंवूमनोहरा ॥३॥ तस्यास्तीरमहंप्राप्तोगाहमानोवनंघ नम् ॥ मयितिष्ठतिवेतत्रफलभोजनकाम्यया ॥४॥ वनांतरात्समुड्डीयसारसोलक्ष्मणायुतः॥ आगत्यपुलिन नद्याःसेवितंबहुपक्षिभिः ॥५॥ पीत्वातत्रैवपानीयंरमित्वाभार्ययासह ॥ सुप्तःपक्षपुटेवामप्रवेश्यचशिरो मुखम् ॥ ६॥ एतस्मिन्नंतरेदृष्ट पादपादवतीर्यच ॥ रक्ताननःसुरक्ताक्षोदंडीहढनखावलिः ॥७॥ मनोहर ॥३॥ धन वनमें विचरता मैं उस नदीके समीप प्राप्त हुआ, मैं वहां फल भोजन कामनासे स्थितथा॥४॥ वनान्तरसे उडकर एक सारसका जोडा वहांआया बहुत पक्षियोंसे सेवित नदीके तटको प्रान होकर ॥५॥ वहां पानी पी भार्या के साथ रमण करके बांये पंखमें शिर और मुख प्रवेशकर सोगया ॥ ६ ॥ इसी समय वृक्षसे उतरकर लालमुख लालनेत्र दंड हाथमें लिये दृढ नख ॥ ७ ॥ ७९ --- --
॥ और आकर
सारस
POEEGOR
यडेरोमयाला अडीपूंछ चंचलस्वभाय वानर जहां सोरहाथा वहां बडे बैंगसे आया ॥
दृढतामे सारसका चरण पकडलिया यह बहुत पक्षियोंके देखते क्रूर बुद्धिसे दृढता पूर्वक पकडा ॥१॥ वे सब पक्षी उडकर
अन्यत्र चले गये और सारसी महाडरसे रोतीहुई वहां स्थित हुई ॥१०॥ सारसकी नींद टूटी डरसे उसके नेत्र चलायमान होगये
गिरउठाकर पृथ्वीको देखता हुआ॥ ११ ॥ उस मारनेकी इच्छा करनेवाले दारुण वानरको देखकर मधुरखाणीसे सारस कहने
लोमशोदीर्घलांगूलश्चलचेष्टोहिवानरः ॥ यत्रासौसारसःसुतस्तत्रवेगेनचागतः ॥ ८ ॥ समागत्यचजग्राहसा
रसंचरणेदृढम् ।। कराभ्यांफरयाबुद्ध्यापश्यतांबहुपक्षिणाम् ॥९॥ उड्डीयोड्डीयतेसर्वेगताश्चान्यत्रखेचराः॥
सारसीभीतभीताचविरावान्कुर्वतीस्थिता ॥ १०॥ सारसोभननिस्तुत्रासाचलितलोचनः ॥ अवलोकित
वाच्छीअंतदोत्ताम्यशिरोधराम् ॥ ११॥ विलोक्यवानरंदुष्टहतुकामसुदारुणम् ॥ तदासंभापयामासगिरामधु
रयासगः ॥ १२ ॥ अपराधविनामांत्वंकिंशाखामृगवाधसे । सापराधाजनालोकेवध्यंतेभूमिपेरपि ॥ १३॥
नपीडयितुमहतित्वाइशाउत्तमाजनाः ॥ अस्मानहिंसकानसाधून्परवृत्तिपराङ्मुखान् ॥ १४ ॥ जलशेवाल
भक्षांश्चखेचरान्वनवासिनः ॥ स्वदाररतिशीलांश्चपरदाराभिवर्जितान् ॥ १५॥
लगा ॥ १२ ॥ हे शाखामृग अपराधके बिना तुम मुझको क्यों वाधा देते हो अपराधी मनुष्योंको ही राजाभी वांधते हैं ॥१३॥
तुम सरीसे उत्तम पुरुष किसीको पीडा नहीं देते हैं हम अहिंसक साधु पराईवृत्तिसे विमुख हैं ॥ १४॥ जलशैवालके खानेवाले
आकाशचारी वनवासी अपनीही खीसे प्रेम करनेवाले दूसरोंकी स्त्रीसे विमुख हैं ॥१५॥
1.मा. भा.टी. अ.२३ हे वानरश्रेष्ठ ऐसेको आपसरीखे पीडा नहीं देते हैं पराये अपवादमें निपुण परम सेवक पक्षियोंको ॥ १६ ॥ और उनमें सर्वथा मुझ निरपराधीको हे वानर शीघ्र छोडदो, मैं तुम्हारा जन्म जान्ताहूं तुम मुझको नहीं जान्ते॥१७॥वह वचन सुन वानरने सारसको छोड दिया और दूर स्थित होकर वह चपल वानर कहने लगा ॥१८॥ वानर बोला हे सारस ! कह तूं मेरे पुरातन जन्मको कैसे जान्ता है, तू पक्षी ज्ञानहीन और वनचारी है मैं तिर्यक् चारीहूं ॥ १९ ॥ सारसने कहा मैं तुम्हारा जन्म जान्ता हूं मैं जातिस्मर हूं तुम नपीडयितुमर्हतित्वद्विधावानरोत्तम ॥ परापवादपैशुन्यान्द्विजान्परमसेवकान् ॥१६॥ शाखामृगविमुंचाशु सर्वथामामनागसम् ॥ जानामितवजन्माहेनत्वंवेत्सितमामकम् ॥ १७॥ इत्याकर्ण्यवचस्तस्यमुमोचसारसं तदा ॥ चपलोवानरःशीघ्रमाहदूरेव्यवस्थितः ॥ १८॥ ॥ वानरउवाच ॥ ॥ हिरेत्वंथवेत्सिममज न्मपुरातनम् ॥ त्वंपक्षीज्ञानहीनश्चतिर्यक्चाहंवनेचरः ॥ १९॥ ॥ सारसउवाच ॥ ॥ जानेहंतावकंजन्म जातिस्मरमितिस्फुटम् ॥ त्वंहि विन्ध्याधिपोराजाप्राग्भवेपर्वतेश्वरः ॥ २० ॥ अहंपूज्यतमोविप्रस्तववंशेपुरो हितः ॥ तेनप्रत्यभिजानामित्वांसम्यग्वानरोत्तम ॥ २१ ॥ इमापालयताभूमिग्रजाःसर्वाःप्रपीडिताः॥ त्वया विवेकहीनेनभृशंसंचयताधनम् ॥ २२॥ प्रजापीडनतापोत्थवह्निज्वालेस्तुवानर ॥ प्राक्त्वंदग्धःपुनःक्षिप्तः कुंभापाकऽतिदारुणे ॥२३॥ प्रथम विंध्याचल पर्वतके राजा थे ॥ २० ॥ और मैं पूजनीय ब्राह्मण तुलारे वंशका पुरोहित था हे वानर ! इससे तुमको भली भांति जान्ताहूं ॥ २१ ॥ इस भूमिकी पालना करते तुमने सब प्रजाको पीडा दी तुम विवेकहीनने केवल धनसंग्रह करनेमें मन लगाया ॥ २२ ॥ हे वानर ! प्रजा पीड्नके तापसे उठी अग्निकी ज्वालासे तुम पहलेही दग्ध हो चुके थे फिर पीछे दारुण कुंभीपाकमें डाले गये ॥ २३ ॥ कारवार दग्ध होने और जन्म लेनेसे नारकी शरीरमें तीस.वर्ष तुम्हारे बीत गये ॥ २४ दारुण शब्द करते वारंवार रुदन करते कुंभीपाककी तीव्र ज्वाला और अनेक बाह्य यातना भोगी ॥२५॥ उस नरकसे निकलकर शेप पापसे अब वानरजन्मको प्राप्त हुए कि मुझको मारनेकी इच्छा करतेहो ॥ २६ ॥ पहले ब्राह्मणके वनके पक्के केलेके फल विना आज्ञाके बलसे तुमने भक्षण करलिये ॥ २७ ॥ देखो उस कर्मका महाफल पाकको प्राप्त होताहै हे वानर ! उसीसे तुम पुनःपुनश्चदग्धेनजातेनचपुनःपुनः । नारकेणशरीरेणसमास्त्रिंशद्तत्वया ॥ २४ ॥ कुर्वतादारुणाञ्छब्दान् रुदताचपुनःपुनः ॥ कुंभीपाकानलेतीबाह्यनुभूताश्चयातनाः ॥२५॥ निस्तीर्णनरकोभूयःपापशेपेणसांप्रतम् ॥ प्राप्तोसिवानरंजन्मयेनमहिंतुमिच्छसि ।। २६ ॥ विप्रस्योपवनात्पूर्वपकरंभाफलानिवै ॥ अननुज्ञाप्यभुक्तानि त्वयापहत्यपोरुपात् ॥ २७॥ विपाकःकर्मणस्तस्यफलतेपश्यदारुणः ॥ वानरस्त्वंवनेवासोह्यधुनातेनर्वतसे ॥२८॥ अशुभस्यशुभस्यापिपुराविहितकर्मणः ॥ भोगक्रीडतिभूतेषुनोल्लंघ्यस्त्रिदशैरपि ॥२९ ॥ इत्थंत्व ज्जन्मजानामियथावत्सहेतुकम् ॥ प्राप्तःसारसदेहोपिज्ञानेनापरिमोहितः ॥ ३०॥ वनयासी होकर वर्तते हो ॥ २८ ॥ अशुभ शुभ पहले किये कर्मका प्राणियोंमें भोग क्रीडा करता है वह देवताभी उल्लंघन नहीं कर सकते ॥ २९ ॥ इस प्रकारसे यथावत हेतुसहित तुम्हारे जन्मको जान्ताहूं मैं सारसदेहको प्राप्त होकरभी ज्ञानसे मोहित नहीं हुआ ॥ ३० ॥ s मा.मा. भा.टी. अ.२४ प्रेत बोला यह वचन सुन वानरने सारससे कहा आप ठीक जान्ने हो परन्तु यह तो कहो तुम पक्षी कैसे हुये ? ॥ ३१ ॥ इति श्रीपाने माघमाहात्म्ये भापाटीकायां त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥ सारसने कहा यह कर्म कहताहूं जिस्से मेरी दुर्गति हुई जिस्से पक्षियोनिको प्राप्त हुआ हूं वह सब सुनो ॥ १ ॥ पहले तुमने धान्यकी सौसारी परिमाण नर्मदा नदीके किनारे सूर्यग्रहणमें बहुतसे ब्राह्मणों के निमित्त दी थी ॥२॥ मैंने पुरोहितके मद और लोभसे उन ब्राह्मणों को वंचित प्रेतउवाच ॥ ॥ इतिश्रुत्वाकांविप्रवानरोप्याहसारसम् ॥ सम्यग्वेत्तिभवानूनकथंत्वपक्षितांगतः॥३१॥ इति श्रीपद्मपुराणेमाघमाहात्म्येवसिष्टदिलीपसंवादेवानरजन्मकथनंनामत्रयोविंशोऽध्यायः ॥२३॥ सारस उवाच ॥ कथयिष्यामितत्कर्मयेनाहंदुर्गतिंगतः। पक्षियोनिंगतोयेनतत्सर्वश्रोतुमर्हसि ॥ १॥धान्यंखार शतंसाग्रमुत्सृष्टंहित्वयापुरा ॥ बहुभ्योबाह्मणेभ्यश्चनर्मदायांरविग्रहे ॥२॥ पौरोहित्यमदाल्लोभादंचयित्वाद्वि जास्तथा ॥ किंचिहत्त्वातुतेभ्यश्चगृहीतमखिलंमया ॥३॥ विप्रसाधारणद्रव्यग्रहणोत्पन्नपातकात् ॥ पतितः कालसूत्रेहनरकेरक्तकर्दमे ॥ ४॥ चलत्क्रिमिसुसंपूर्णेदुर्गंधेपूयफेनिले ॥.आनाभेस्तवमनोस्मिलिहन्पूयमधो मुखः॥५॥ तथोपरिमहागृधेर्भक्ष्यमाणस्तुवायसैः ॥ किमिभिस्तुद्यमानस्तुममदेहोनिरंतरम् ॥ ६॥ करके उन्हें कुछ एक देकर शेप सब मैंने लेली ॥ ३ ॥ ब्राह्मणोंके साधारण द्रव्य हरण करनेके पातकसे कालसूत्र और रक्त कर्दम नाम नरकमें में पतित हुआ ॥ ४ ॥ चलायमान क्रिमियोंसे पूर्ण दुर्गध रादसे अनिल पवनसे पूर्ण- नरकर्म नाभिपर्यन्त नीचेको मुखकर मन किया गया वही भोजन मिला ॥ ५॥ उसके ऊपर महागूध और काक तुझको साते थे, मेरा देह निर ८१ रन्त कीडोंसे नोचा जाताथा ॥ ६ ॥ तब उस शोणितकी पंक, मैं श्वासरहित होगया एक मुहूर्तभी महाकल्पके समान बीतता था ॥ ७॥ तीस सहस्र वर्पतक मुझको यातना भोगनी पड़ी हे वानर नरकका दुःख मैं कह नहीं सकताहूँ ॥८ ॥ पौरोहित्य कर्म महाघोर और स्वभावसेही पापका देनेवाला है. देवके द्वारा जीविका ब्राह्मणके द्वारा जीविका ॥९॥ विशेषकर राजाका दान महापोर है उससे द्विजाति दग्ध होजाते हैं उनकाभी धन पुरोहित हरण करताहै इस्से वह नरंकको जाता है ॥ १०॥ राजा तस्मिञ्छोणितपंकेहंनिरुछासोऽभवंतदा ॥ मुहूतोपिमहाकल्पसमोजातोममात्रवे ॥ ७॥ यातनाश्चानुभूताश्च समास्त्रियुतंमया। वक्तुंचतनशक्नोमिदुःखंवानरनारकम् ॥८॥ पौरोहित्यमहाघोरंपापदंचस्वभावतः॥ देवो पजीवनयवब्राह्मणस्योपजीवनम् ॥ ९॥ राजप्रतिग्रहोपोरस्तेनदग्धाद्विजातयः॥ तेपामपिहरेद्रव्यपुरोधास्ते ननारकी ॥१०॥ राजायत्कुरुतेपापंपुरादेहेनधीयते ॥ तस्यतनपुरोधाश्चगीयतेतत्त्वदर्शिभिः ॥ १३॥ देवात्कथमपिप्राप्तउत्तारोनरकांबुधेः॥मयादौदैवयोगेनशकुनित्वमुपस्थितम् ॥ १२॥ अपहृत्यपुराकांस्यमा जनभगिनीगृहात् ॥ आशिकायमयादत्तंतेनमेसारसीगतिः॥१३॥ इयंचब्राह्मणीपूर्वकांस्यचोरीसुदारुणा ॥ तेनेयंसारसीजाताममभार्यासधर्मिणी ॥ १४॥ जो पाप करताहै पहले देहसे उसको यह धारण करताहै इस कारण इसकी पुरोहित संज्ञा है ऐसा तत्त्ववादी कहते हैं ॥ ११ ॥ फिर मैंने प्रारब्धसे किसी प्रकार नरक सागरके पारभी होकर मैने फिर प्रारब्धयशसे पक्षीका जन्म पाया ॥ १२॥ पहले भगि नीके घरसे कांसेका बस्तन हरणकर आक्षिक (पासाखेलनेवाले ) के निमित्त मैंने दियाथा इस कारण मैं सारस हुआ ॥१३॥ और यह सारसी पहले ब्राह्मणी थी इसने दारुण कांसेकी चोरी की इस कारण यह सहधर्मिणी मेरी भार्या हुई 50SE भा.दी. अ.२ ESDCCCCCCEEEEEEEE मा. मा. हे वानर ! इस प्रकार तुझसे मैंने सब कर्मका फल कथन किया वर्तमान वृत्त यह है अब भविष्य सुन ॥ १५॥ आगेको मैं और तू दोनों हंस होंगे और यह मेरी भार्या सारसीभी हंसी होगी ॥ १६ ॥ हम यथासुख कामरूप देशमें निवास करेंगे फिर कल्याणी योगिनीको प्राप्त होंगे॥ १७ ॥ फिर हम दुर्लभ मानुपी जन्मको प्राप्त होंगे जहां प्राणी मंगल और उसके विपरीत पनको साधन करते हैं ॥ १८॥ इस प्रकार शिव सब प्राणियोंको अपनी मायासे मोहित करते हैं केवल हमहीको नहीं सब जगत्को | इत्थंवानरतेसर्वकथितंकर्मणः फलम् ॥ वृत्तंचवर्तमानंचभविष्यशृणुसांप्रतम् ॥ १५ ॥ अहंसोभविष्यामित्वं चहसोभविष्यास ॥ हंसीयमपिमद्भार्यासारसीचभविष्यति ॥१६॥ देशेचकामरूपेवेस्थास्यामोवैयथासुखम् ॥ योगिनींभाविकल्याणीयास्यामस्तदनंतरम् ॥ १७॥ ततश्चमानुपंजन्मप्राप्स्यामोदुर्लभंपुनः ॥ श्रेयस्तद्विप रीतंचप्राणिभियंत्रसाध्यते ॥ १८॥ एवंसर्वाञ्छियोजंतून्मोहयित्वास्वमायया ॥ सुखै नतिदुःखैश्चनास्माने वतुकेवलम् ।। १९ ॥ अयंलोकेप्रवृत्तश्चमार्गोंविविधनिर्मितः ॥धर्माधर्ममयोऽत्यर्थेसुखदुःखफलात्मकः । ॥ २० ॥ सेवित प्राणिभिः सर्वेसर्वदावापुनःपुनः॥ देवासुरनरख्याप्रकिमिकीटजैलेचरैः ॥२१॥ नातिक्रांतो हिकेनापिपंथाऽयंदुःखकंटकः ॥ विरक्तान्योगिनोध्यायविनावेदांतपारगान् ॥२२॥ सुख दुःखसे संयुक्त करते हैं ॥ १९॥ इस लोकमें प्रवृत्तिके निमित्त अनेक मार्ग हैं जो धर्म अधर्म करनेवालोंको सुख दुःख देते हैं ॥ २० ॥ सब प्राणियोंको वारंवार धर्मका सेवन करना चाहिये, हे नरव्याघ्र ! देवता असुर कमि कीट जलचर ॥ २३ ॥ किसीसे भी यह दुःखके केंटकका मार्ग अतिक्रमण नहीं होसकता, विना वेदान्तके पारगामी योगी और विरक्कोंके' कोई इस्से १ कलेवरैरितिपाठः। ८२ २३ । इस नहीं छूटा ॥ २२ ॥ अणु वा गुरु जैसे पुण्य पाप हो ईश्वर उसका फल जानकर देश काल अनुसार देता है । प्रकार विधिविधानके ज्ञाता ईश्वरकी माया जानकर शोच ताप और व्यथा नहीं करते हैं कारण कि बुद्धिमान होते हैं ॥ २४ ॥ पूर्व कर्मोंका कल कोई मेट नहीं सकता, उपाय बुदिसे हे वानर ! देवताभी नहीं मेट सकते ॥ २५ ॥ पहले तू राजा हुआ फिर नरकमें पडा अब वानर हुआ आगे भी ऐसे ही योनिमें प्राप्त होगा ॥ २६ ॥ ऐसा मानकर हे वानर ! शोक मतकर इस वनमें अणोर्वापिगुरोर्वापिपुण्यापुण्यस्यकर्मणः ॥ ददातीहफलज्ञात्वादेशंकालंमहेश्वरः ॥२३॥ इत्थं विधिविधानज्ञां मायाज्ञात्वेश्वरस्यच ॥ नशोचंतिनतप्यंतिनव्यथंतिमहाधियः ॥ २४ ॥ नान्यथाशक्यतेकविपाकःपूर्वकर्म णाम् ॥ उपायैःप्रज्ञयावापिशाखामृगसुरैरपि ॥ २५॥ पुरात्वंभूपतिर्जातःपश्चाजातोसिनारकी ॥ अधुनावा नरोभूयोजन्मप्राप्स्यसितादृशम् ॥ २६॥ इतिमत्वाविशोकस्त्वंशाखामृगयथासुखम् ॥ प्रतीक्षांकुरुकाल स्यरममाणोऽत्रकानने ॥२७॥ अहमप्येवमीशानमायावद्धोवनेवने ॥ क्षपयिष्यामिवेजन्मधैर्यमास्थायसा रसम् ॥ २८॥ वानरउवाच ॥ मयात्वपूजितःपूर्वनोमित्वामधुनाप्यहम् ॥ जातिस्मरोऽसिजानामिसर्वमत्पूर्व दैहिकम् ॥ २९॥ तिष्ठसारससारस्याशिवमस्तुसदातव ॥ त्वद्वाक्यागतमोहोऽहंविचरिष्यामिसर्वदा ॥३० विचारताहुआ सुखसे कालकी प्रतीक्षा कर ॥ २७ ॥ और मैंभी ईश्वरकी मायामें बद्ध होकर धैर्यको धारणकर यहां समय व्यतीत करताहूं ॥ २८ ॥ वानरने कहा मैंने तुम्हारी पहले पूजाकी थी अवभी मैं तुमको प्रणाम करताहूं तुम जातिस्मर होनेसे पूर्व देहकी बात सब जान्ते हो ॥ २९ ॥ हे सारस ! आनन्दपूर्वक रहो सदा तुम्हारा मंगल हो तुम्हारे वाक्यसे मोह रहित हो मा.मा. भा.टी. ८३ अ.२४ CECECEESEcccse में भी विचरण करूंगा ॥ ३० ॥ प्रेत बोला हे ब्राह्मण ! यह परम मनोहर परम विचित्र पक्षी और वानरका संवाद मैंने नदीके किनारे सुना ॥ ३१ ॥ तब मुझको भी बोध हुआ और शोकक्षय हुआ अब गंगाजलका परम अद्भुत माहात्म्य ॥ ३२ ॥ देखकर हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! तुमसे गंगाजल मांगताहूं बडी तृष्णासे व्याकुल हुआ प्रेतत्व दूर करनेकी इच्छा करताहूं ॥ ३३ ॥ हे ब्राह्मण ! इसी पर्वतपर मैंने आचर्य देखा इस कारण में गंगाजलपान करनेकी इच्छा करताहूं ॥ ३४॥ एक ग्रामयाजक ॥ प्रेतउवाच॥ ॥ इमरम्यंविचित्रंचपावनंपरमंद्विज ॥ पक्षिवानरसंवादंश्रुतंयावन्नदीतटे ॥३३॥ तावन्ममा पियोधोभूत्तेनशोकः क्षयंगतः ॥ इदानींजाह्नवीतोयमाहात्म्यपरमाद्भुतम् ॥ ३२॥ दृष्ट्वाबत्राह्मणश्रेष्ठत्वायाचे जाह्नवीजलम् ॥ प्रेतत्वंतर्तुकामोहंतीवतृष्णाप्रपीडितः ॥ ३३॥ अस्मिन्नेवाचलेदृष्टंमयाश्चर्यचद्विज ॥ गंगातोयस्यतावद्धिपातुमिच्छामितजलम् ॥ ३४ ॥ पारियानोद्भवाकोपित्राह्मणोग्रामयाजकः ॥ अयाज्य याजनाविंध्येसंभूतोब्रह्मराक्षसः॥ ३५ ॥ अस्मत्संगस्यलोभेनस्थितोसौहायनाष्टकम् ॥ तस्यास्थीनिसुपुत्रे संचितानिद्विजोत्तम ॥ ३६॥ क्षिप्तान्यानीयगंगायांतीर्थेकनखलेऽमले ॥ तत्क्षणादेवमुक्तोऽसोराक्षसत्वा त्सुदारुणात् ॥ ३७॥ इतिगंगाजलनानमहिमामहदद्भुतः ॥ साक्षादृष्टोमयातेनगांगेयप्रार्थितंजलम् ॥३८॥ पारियावका उत्पन्न हुआ यजनके अयोग्यौंको यजन करानेसे ब्रह्मराक्षस हुआ ॥३५॥ हमारी संगतिके लोभमें वह आठ वर्पतक रहा हे बाह्मण! उसकी अस्थि उसके पुत्रने संचितकी थी॥३६॥ और लाकर निर्मल कनखल तीर्थक वीचमें डाली उसी क्षण यह कठिन राक्षमत्वमे छूट गया ॥३७॥ इस प्रकार गंगाजलग्नानकी बडीअट्ठत माहिमा है यह मैंने साक्षात् देसी इस कारण मैं गंगाज लकी प्रार्थना करताहूं ॥३८॥ पहले जो मैंने तीर्थोपर पड़े दान लिये थे और जपादि करके उसका प्रतीकार नहीं किया ॥३९॥ इस'कारण मुझ प्रेतको जल और भोजनभी दुर्लभ होगया इस विंध्यपर्वत पर मुझे सहस्र वर्ष बीत गये ॥ ४०॥ यह सब कथा लजाको छोढ़ तुमसे वर्णन की हे धार्मिकश्रेष्ठ । इस समय शीघ जलदानसे ॥ ४१ ॥ कंठमें आयेहुए मेरे प्राणोंको तृप्त करो प्रेतभावमें भी प्राणियोंको जीवन दुर्लभ है ॥ ४२॥ सब प्रकार सदा प्राणियोंको शरीरकी रक्षा करनी उचित है| पुरस्तायत्कृतस्तीर्थमयाभूरिपरिग्रहः ॥ नकृतस्तुप्रतीकारस्तस्यजाप्यादिलक्षणः ॥३९॥ तेनमेप्रेतरूपस्यदुर्ल भोदकभोजनम् ।। सहसंयत्रवाणामतीतंविंध्यपर्वते ॥ ४० ॥ इतितेकथितंसर्वहिवालज्जांगरीयसीम् ।। इदानींधार्मिक श्रेष्ठजलदानेनसत्वरम् ॥ ११ ॥ संतपयममप्राणान्कंठमात्रावलंबितान् ।। दुर्लभप्रेतभावेपिजी वितंप्राणिनामिह ॥४२॥ शरीरंरक्षणीयंहिसर्वथासर्वदानरैः ॥ नहीच्छंतितनुत्यागमपिकुष्टादिरोगिणः ॥४३॥ ॥ देवद्युतिरुवाच॥ ॥ इतितद्वचनं श्रुत्वाविस्मयपरमंगतः। पथिकश्चितयामासकृपांप्रतेसमुद्रहन् ।॥४४॥ पापपुण्यफललोकेप्रत्यक्षदश्यतेखलु ॥ देवदानवमानुष्यंतिर्यक्त्वकिमिकीटकम् ॥४५॥ नानायोनिपुजन्मा निनानाव्याधिप्रपीडनम् ।। मरणवालवृद्धानामंधत्त्वंकुजतातथा ॥ ४६ ।। कुष्ठादि रोगी भी शरीर त्यागकी इच्छा नहीं करते ॥४३ ॥ देवद्युति बोले इस प्रकार उसके चचनको सुन परम विस्मयको प्राप्त प्रेतपर कपालु हो वह पथिक विचारने लगा ॥ ४४ ॥ लोगोंको पाप पुण्यका फल प्रत्यक्ष दीखताहै देव दानव मनुष्य तिरछे चलनेवाले जीव रुमि कीट ॥४५॥ अनेक योनियों में जन्म अनेक व्याधियोंकी पीडा बालवृद्धोंका मरण अंधा और कुबडापना AR?
भा. टी. अ. २ ८४ मा.मा. होना ॥ ४६ ॥ धनी दरिद्र पण्डिताई मूर्खता यह रचना लोकमें नहीं तो कैसे होती ? ॥ ४७ ॥ इस कर्मभूमिमें वे धन्य जो न्यायमार्गसे धन अर्जन करते हैं और सत्पात्रोंको देकर अपना हित साधन करते हैं ॥४८॥ भूमि रत्न सुवर्ण गो धान्य गृह हाथी रथ घोडे याम सिद्ध अन्न फल जल ॥ ४९ ॥ कन्या दिव्य औषधी अन्न छत्र उपानह श्रेष्ठ आसन शम्या ताम्बूल माला तालके पंखे श्रेष्ठ आसन ॥ ५० ॥ त्रिलोकी जीतनेकी इच्छा करनेवालोंको यह सब देना चाहिये दियाहुवाही ऐश्वर्यचदरिद्रत्वंपांडित्यंमूर्खतातथा ॥ एताश्चरचनालोकेभवंतिकथमन्यथा॥४७॥ तेधन्याःकर्मभूमौयेन्याय मार्गाजितंधनम्॥ सत्पात्रेभ्यःप्रयच्छंतिकुर्वतिचात्मनोहितम् ॥४८॥भूमिरत्नहिरण्यानिगावोधान्यंगृहंगजाः॥ स्थाश्ववसनग्रामा-सिद्धमन्नंफलंजलम् ॥४९॥ कन्यादिव्योपधमन्नंछनोपानद्वरासनम् ॥ शय्यातांबूलमाल्या नितालवृतंवरासनम् ॥५०॥ सर्वमेतत्प्रदातव्यंलोकत्रयजिगीपुभिः ॥ दत्तंहिप्राप्यतेस्वर्गदत्तमेवहिभुज्यते ॥ ॥५१॥ छत्रचामरयानानिवराश्ववरवारणाः॥हाणिवरशय्याश्चगोमहिप्योवरस्त्रियः ॥ ३२ ॥ अन्नभूप णमुक्ताश्चपुत्रादास्योमहाकुलम् ॥ आयुरारोग्यमेश्वर्यकलाविद्यासुकौशलम् ॥५३ ॥ दानस्यैवफलंसर्व प्राप्यते विमानवेः ॥ तस्मादेयंप्रयत्नेननादत्तमुपतिष्ठति ॥५४॥ स्वर्गमें प्राप्त होता और दियाहुवाही भोगाजाता है ॥ ५१ ॥ छत्र चमर यान अच्छे घोडे हाथी महल सुन्दर शय्या गौ महिपी सुन्दर स्त्री ॥ ५२ ॥ अन्न वा रल भूपण मोती पुत्र दासी महाकुलम अन्न आयु आरोग्य ऐश्वर्य कला सब विद्याओंमें कुशलता ॥ ५३ ॥ दानकाही सब फल भूमिमें मनुष्योंको प्राप्त होता है इस कारण यत्नसे देना चाहिये विना दिया नहीं मिल १ रन-३० पा०1 HEORREEn सकता ॥ ५४ ॥ धर्मनिष्ठ पथिक इस गाथाको गाताहुआ यह वचन सुन प्रेत बडा आत होकर बोला ॥ ५५ ॥ हे पथिक इसमें सन्देह नहीं तुम बडे महात्मा हो तुम मुझे जीवन (जल) दो जैसे मेघ चातकको देताहै ॥ ५६ ॥ इम् प्राणदानमें बहुत देर मत करो तव पथिक न्याय युक्त वचन बोला ॥ ५७ ॥ हे प्रेत ! भृगुक्षेत्रमें मेरे माता पिता स्थित हैं उनके निमित्त यह तीर्थ राजका जल में लायाहूं ॥५८॥ सो वीचमें तैने गंगायमुनाके जलकी प्रार्थना की है न जाने इस धर्मसन्देहमें क्या होगा ॥१९॥ 'पर्मिटेनतुपर्थिनगाथेयंसमगायत ॥ इतिश्रुत्वापुनः प्रेतःप्रोवाचहार्तमानसः॥५५॥ मन्येधर्मज्ञकल्पोसिपा थत्वनात्रसंशयः ॥ देहिमेजीवनवारिचातकायधनोयथा ॥५६॥ एतस्मिन्प्राणदानेहिमाविलंबंकृथाबहु ॥ ततःपत्याहपांथस्तुवचनंन्यायगर्भितम् ॥ २७॥ भृगुक्षेवेशृणुप्रेतपितरोम्मतिष्ठतः ॥ तदर्थतीर्थराजस्यमया वारिसमाहृतम् ॥१८॥ तत्सितासितपानीयंमध्येचप्रार्थितत्वया ॥ नजानेधर्मसंदेह किमत्रममयुज्यते ॥१९॥ बलावलंविचारार्थकरिप्येप्रवलंविधिम् ॥ वेदेभ्योधर्मशास्त्रेभ्योनाहंमानेनकेवलम् ॥६०॥ हयमेधादियज्ञे भ्यःसर्वेभ्योप्यधिकंमतम् ॥ ऋपिभिर्देवताभिश्चप्राणिनांप्राणरक्षणम् ॥ ६१ ॥ इतिदत्त्वावरंवारिकृत्वाप्रेतस्य रक्षणम् ॥ पिवयंपुनरादायजलनेप्यामिपावनम् ॥ ६२ ॥ एपमेप्रवलोभातिशुद्धधर्मप्रदोविधिः ॥ परोपक रणादन्यत्समल्यस्मृतंवुधः ॥ ६३॥ बलावलको विचारकर प्रबल विधिका अनुष्ठान करूंगा मैं केवल वेद और शास्त्रके मानसेही नहीं ॥ ६ ॥ किन्तु अश्वमेध यज्ञ तथा और सबसे ऋपि और देवताओंसेभी अधिक मैं प्राणियों के प्राणकी रक्षा मानताहूं ॥६१ ॥ इस प्रकार श्रेष्ठ जल देकर इस प्रेतकी रक्षा कर पिताके निमित्त और पवित्र जल लेकर जाऊंगा ॥ ६२ ॥ यही विधि मुझको शुद्ध और प्रबल १५ मा. SEE अ. २४ विदित होती है परोपकारके करनेके समान और कोई कार्य नहीं ऐसा पंडित कहते हैं और सब इस्से न्यून है ॥ ६३ ॥ परोप कारियोंने प्रसन्नतासे अपने प्राण देदिगे हैं जो जल से परोपकार होजाय तो मैंने क्या नहीं पाया ॥६४ ॥ दधीचिका कहा यह श्लोक भूमिपर गायाजाता है जो सब धर्ममय सार और सब धर्मात्माओंका सम्मत है ॥६५॥कि धन और प्राणसेभी पराया उपकार करना चाहिये परोपकारका पुण्य सौ यज्ञोंकी समानहै ॥ ६६ ॥ ऐसा कह गंगायमुनाके स्थानका जल परोपकारिभिर्दत्ताअपिप्राणानृभिर्मुदा ॥ अद्भिःपरोपकारस्यात्किनलब्धमयापुनः ॥ ६ ॥ धीचिनापुरा गीतश्लोकोयंश्रूयतेभुवि ॥ सर्वधर्ममयःसारःसर्वधर्मज्ञसंमतः ॥६५॥ परोपकार कर्तव्यःप्राणैरपिधनैरपि ॥ परोपकारजंपुण्यंतुल्यंक्रतुशतैरपि ॥६६॥ इत्युक्त्वाप्रददौतोयंगंगायामुनसंभवम् ॥ प्रेतायप्राणरक्षार्थसध मिठोवरोद्विजः ॥ ६७ ।। प्रेतःप्रीतोजलंपीत्वाह्यभिपिच्यशिरस्तथा ॥ प्रजहाँप्रेतदेहंतंदिव्यदेहोभवत्क्षणात् ॥. ॥ ६८॥ तदाश्चर्यमहदृष्ट्वानिंजगादसकेरलः ॥ अहोविमुक्त प्रेतत्वाद्रेणीपानीयबिंदुभिः॥ ६९ ॥ ब्रह्मापिनेव शक्नोतिमन्यवक्तुमपांगुणम् ॥ गङ्गातोयंमहादेवोधत्तेके कथमन्यथा ॥ ७० ॥ उसको देदिया उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने प्रेतके प्राण रक्षाको जल दिया तौ ॥ ६७ ॥ प्रेतके प्रसन्न हो जल पिया और उसको शिरसर छिडका उसी समय वह प्रेतदेहको छोडकर दिव्य देह होगया ॥६८॥ उस बड़े आश्चर्यको देखकर वह केरल ब्राह्मण बोला अहो वेणीके किंचित् जलसे यह प्रेतत्वसे छूटगया ॥ ६९ ॥ मैं जानताहूं इस जलके गुण ब्रह्माभी नहीं कहसकते नहीं तो भला .मा. भा.टी. तत्काल प्रयागमें स्नान करनेको गया ।। ७७ ॥ हेब्राह्मण ! माघमासमें वह वेणीमें स्नान करनेसे क्षीणपाप होकर पिशाची शरी रको त्यागता हुआ॥ ७८ ॥ वह द्रविडपति दिव्य देह होकर दोपरहित हो भनिसे नारायण देवकी स्तुति करता हुआ॥७९॥ गंधवाँसे स्तुतिको प्राप्त होकर देवांगनाओंसे पूजित हो उत्तम विमानमें बैठ इन्द्रलोकको गया ॥ ८०॥ हे विष ! यह तुमको, अ.२५ पूर्ववृत्तान्त कहा हे द्विज श्रेष्ठ यह इतिहास शीघ्र पापका नाश करती है ॥ ८१ ॥ यह ज्ञान और मोक्ष देती तथा दुर्गति नाश स्नात्वासितासितेसोपिमाघमासेद्विजोत्तम ॥ पिशाचाक्षीणपापस्तुपैशाची विजहौतनुम् ॥७८॥ दिव्यदेहस्ततो भूत्वाद्राविडोभूपतिस्तदा ॥ स्तुवन्नारायणंदेवंभक्त्यादोपविवर्जितः ॥ ७९ ॥ गन्धर्वःस्तूयमानस्तुनाकनारी सुपूजितः ॥ उत्तमेनविमानेनपुरंदरपुरंययौ ।। ८० ।। इतितेकथितविप्रपूर्ववृत्तंसकौतुकम् ॥ इतिहासद्विजत्रे सद्यापातकनाशनम् ॥ ८ ॥ ज्ञानदंमोक्षदंविप्रश्रुतंदुर्गतिनाशनम् ॥ ८२ ॥ इतिश्रीपद्मपुराणेमाघमाहा त्म्येवसिष्टदिलीपसंवादेचतुर्विंशोऽध्यायः ॥२४॥ ७ ॥ इतितेकथितंसर्वपुरावृत्तंसकौतुकम् ॥ इतिहासद्धि जश्रेष्ठश्रुतंदुर्गतिनाशनम् ॥ १॥-अधुनातुमयासार्धमिमा-कन्याःसुतश्चते ॥ त्वंचायातुप्रयागवैसर्वेसद्गतिमी प्सवः ॥ २॥ माघनानंप्रकुर्मोनदेवानामपिदुर्लभम् ॥ तत्रमोक्ष्यंतिपेशाच्यसद्यःपापसमुद्भवम् ।। ३ ।। करती है ॥ ८२ ॥ ॥ इति श्रीपाग्ने माघमाहात्म्ये भापार्टीकायां चतुर्विशोऽध्यायः ॥ २४ ॥ ॥ यह सब तुमसे पुरातन वृत्तान्त कौतुक सहित कहा हे विजश्रेष्ठ ! यह दुर्गतिनाशक इतिहास आपने सुना ॥३॥ अब मेरे साथ यह कन्या तुम्हारा यह पुत्र और तुम सद्गतिके निमित्त प्रयागको चलो ॥ २॥ वहां देवताओंकोभी दुर्लभ माघस्नान करेंगे और वहां यह पाप और ८६ --- रा उत्सन दुग पिशाचपनको त्यागन करेंगे ॥ ३ ।। महेश बोले इसप्रकार वार्सष्ठीके मुखकमलसे मधुर रस प्रेममे पान कर वे सब नरक सागरसे निस्तीर्ण हुये ॥४॥ उनके साथ वे प्रसन्न हो आकाशमार्गसे चले हे दिलीप ! सितासित तीर्थकी महिमा श्रवण कीजिये ॥५॥ शीघही वे अपने दुःसहकामनाकी प्राप्तिके निमित्त आकाशमार्ग में प्राप्त होकर प्रसन्नगनसे उस स्थानमें पहुँचगये ॥६॥ त्व दयापूर्वक आकाशमें स्थित ही लोमशजीने कहा श्रद्धासे सब कोई तीर्थराजका दर्शन करो ॥७॥ इस प्रयागर्ने ज्ञान महेशउवाच॥ ॥ एवंवसिष्टवक्काजकथामधुरसंमुदा ॥ पीत्वाप्रमुदिताःसर्वेनिस्तीर्णानरकार्णवात् ॥ ४॥ पस्थितास्तेनसाधतेसत्वरंब्योमिहर्पिताः ॥ दिलीपशृणुतत्सर्वतत्तीर्थतुसितासितम् ॥५॥ सत्वरंव्योममार्गे णकाममासायदुःसहाः ॥ समागम्यतदातत्रसंपहृदयाश्चते ॥ ६॥ अथोचेलोमशस्तत्रसदयंगगनांगणे॥ पश्यतुश्रद्धयासर्वतीर्थराजमिर्मभुवि ॥ ७ ॥ विनाज्ञानप्रयागेस्मिन्मुच्यतेसर्वजंतवः ॥ इट्वात्रैवमहायज्ञं स्रष्टुकाम प्रजापतिः ॥ ८॥ अवापसृष्टिसामयंततःसृष्टिंचकारसः ।। अवनारायणःसनौपत्नीकामासिता सिते ॥ ९॥ अतःसलब्धवाँलक्ष्मीभार्याममृतमंथने ॥ उपित्वाचानपण्मासंस्नात्वावण्यायथेच्छया ॥१०॥ त्रिपुरंघातयामासत्रिवाणेनविशूलभृत् । इमानित्रीणिकुंडानिदीप्तान्यजस्रवह्निभिः ॥ ११ ॥ के बिनाही सबकी मुक्ति होती है यहां देखकरही ब्रह्माजीने महायज्ञ करनेकी इच्छा की थी ॥८॥ और यज्ञ करके सृष्टि रचनाकी सामर्थ्य प्राप्त की थी लक्ष्मीको इच्छासे इसी तीर्थमें नारायणने स्नान कियाथा ॥९॥ इसीसे अमृतमंथनके समय उनको लक्ष्मीभार्याकी प्राप्ति हुई, यहां छ:महीने निवास कर यथेच्छासे वेणीमें नानकर ॥ १० ॥ तीन बाणसे शिवजीने त्रिपुरको मा.मा. (भा.टी. अ.२५ तत्काल प्रयागमें स्नान करनेको गया ॥ ७७ ॥ हेब्राह्मण ! माघमासमें वह वेणीमें स्नान करनेसे क्षीणपाप होकर पिशाची शरी रको त्यागता हुआ॥ ७८ ॥ वह द्रविडपति दिव्य देह होकर दोपरहित हो भक्तिसे नारायण देवकी स्तुति करता हुआ॥७९॥ गंधोंसे स्तुतिको प्राप्त होकर देवांगनाओंसे पूजित हो उत्तम विमानमें बैठ इन्द्रलोकको गया ॥ ८० ॥ हे विप्र ! यह तुमको पूर्ववृत्तान्त कहा हे द्विज श्रेष्ठ यह इतिहास शीघ्र पापका नाश करती है ॥ ८१ ॥ यह ज्ञान और मोक्ष देती तथा दुर्गति नाश स्रात्वासितासितेसोपिमाघमासेद्विजोत्तम ॥ पिशाचक्षीणपापस्तुपैशाचींविजहौतनुम् ॥७८॥ दिव्यदेहस्ततो भूत्वाद्राविडोभूपतिस्तदा ॥ स्तुवन्नारायणंदेवंभक्त्यादोपविवर्जितः ॥ ७९ ॥ गन्धर्वःस्तूयमानस्तुनाकनारी सुपूजितः ॥ उत्तमेनविमानेनपुरंदरपुरंययौ ॥ ८० ॥ इतितेकथितविप्रपूर्ववृत्तंसकौतुकम् ॥ इतिहासंद्विजश्रे एसधःपातकनाशनम् ॥ ८१ ॥ ज्ञानदंमोक्षदंविप्रश्रुतंदुर्गतिनाशनम् ॥ ८२ ॥ इतिश्रीपद्मपुराणेमाघमाहा त्म्येवसिष्टदिलीपसंवादेचतुर्विंशोऽध्यायः ॥२४॥ ७ ॥ इतितेकथितंसर्वपुरावृत्तंसकौतुकम् ॥ इतिहासद्वि जश्रेष्ठश्रुतंदुर्गतिनाशनम् ॥ १॥-अधुनातुमयासार्धमिमा'कन्याःसुतश्चते ॥ त्वंचायातुप्रयागवैसर्वेसद्गतिमी प्सवः ॥ २ ॥ माघस्नानप्रकुर्मोऽवदेवानामपिदुर्लभम् ॥ तत्रमोक्ष्यतिपैशाच्यसबापापसमुद्भवम् ॥ ३॥ करती है ॥ ८२॥ ॥ इति श्रीपाझे माघमाहात्म्ये भापाटीकायां चतुर्विशोऽध्यायः ॥ २४ ॥ ॥ यह सब तुमसे पुरातन वृत्तान्त कौतुक सहित कहा हे विजश्रेष्ठ ! यह दुर्गतिनाशक इतिहास आपने सुना ॥१॥ अब मेरे साथ यह कन्या और तुम्हारा यह पुत्र और तुम सद्गतिके निमिन प्रयागको चलो ॥ २ ॥ वहां देवताओंकोभी दुर्लभ माघस्नान करेंगे और वहां यह पाप SEE ८६ हे मुने ! इन दोनों नदियोका संगम सुखदायक और पुण्यवर्धक है, इनमें स्नान कर ज्ञानी हो फिर नरकमें नहीं पडते है ॥ १८॥ इस प्रयागर्ने बानके विनाही सब प्राणी मुक्त होजाते हैं हे विष ! औरभी पुरातन इतिहास सुनो ॥ १९ ॥ जो सुन्नेवालोंके सब पाप और सब रोगको दूर करती है, ऋपिके शापसे एक गन्धर्व वायस होगयाथा ॥२०वह सितासितके जलमे स्नान करके तत्काल पापसे छूटगया, एक समय इन्द्र के शापसे उर्वशी स्वर्गसे भ्रष्ट हुई ॥ २१ ॥ यहभी स्वर्गकी अनयोःपुण्यनद्योःश्वसंगमसुखदोमुने । अवनातानपच्यतेनरकेज्ञानभाविताः ॥१८॥ विनाज्ञानप्रयागेस्मि न्मुच्यतेसर्वजंतवः ॥ अन्यच्चथूयतांविप्रइतिहासपुरातनम् ॥ १९ ॥ शृण्वतांसर्वपापनसर्वरोगविनाशनम् ॥ ऋचीकेनपुराशतोगंधर्वोवायसोभवत् ॥ २० ॥ शापमुमोचसोत्रैवस्नातःसवासितासिते ॥ वासवस्यलशापे नस्वर्गाद्धष्टाप्सरोर्वशी ॥२१॥ स्वर्गकामाचसासस्नोलेभेस्वर्गततोचिरात् ।। पुत्रंचशंकरलेभेययातिनाहुपोमुने ॥२२॥ पुत्रकामःप्रयागेहिस्नात्वापुण्यसितासिते ।। धनकामः पुराशका सुस्नातोऽवद्विजोत्तम ॥ २३ ॥ धनदस्यनिधीन्सर्वानहारसचमायया ॥ कश्यपोचतपस्तेपेशिवाराधनतत्परः ।। २४ ॥ अस्मिस्तीर्थेभरद्धा जोयोगसिद्धिमवाप्तवान् । अस्मिस्तीर्थेपुराविप्रयोगशाःशांतमानसाः ॥२५॥ कामनासे यहां लान कर स्वर्गको गई नहुपपुत्र ययातिने यहां स्नानकर मंगलदायक पुत्रको पाया पहले इन्द्रने धनकी कामनासे यहां स्नान कियाथा ॥ २२ ॥ २३ ॥ तव मायासे कुबरेकी ऋद्धि सब हरण करली शिवजीका आराधन पूर्वक कश्यपीने यहां तप कियाथा ॥२४॥ इसी तीर्थम भरद्वाजजी योगसिद्धिको प्राप्त हुएथे, हेविप्र ! इसी तीर्थमे शान्तमन यगो
मा.मा.
भा.टी.
अ.२५
विध कियाथा यह जो अनिके कुण्ड निरन्तर दीन रहते हैं ॥ ११ ॥ यह तृप्तिको प्राप्त हुई अनि जिस किसीसे पुष्ट होती है।
'यही तेतीस देवता प्रसन्न होकर तृत हुए आनंद करते हैं ॥ १२ ॥ यहीं कपालधारी महेश नीलकंठ प्रगट हुए हैं निरंतर सुर
असुर जिनकी सेवा करते हैं वटु अंजलिके निमित्त प्राप्त होते हैं ॥ १३ ॥ मृकण्डके पुत्र मार्कण्डेयजी कल्पान्तमें जिनके
मुखमें ज्वालासे व्यात लोकहोनेमें जिनके मुसमें प्रविष्ट हुए वही यह योगरूपी जनार्दन हैं ॥ १४ ॥
एपतृर्तिगतोवह्निर्यःकेनापिचपुष्यति ॥ अत्रदेवास्त्रयस्त्रिंशतृप्तामुमुदिरेभृशम् ॥ १२ ॥ आविर्भूतोमहेशो
नीलकंठःकपालभृत् ॥ अनिशंससुरैःसेव्यआयातोंजलयेवटुः ॥१३॥ मृकंडसूनुनाकल्पप्रविश्ययन्मुखे
स्थितम् ॥ लोकेज्वालाकुलेसोयंयोगरूपीजनार्दनः ॥ १४ ॥ सेयंभागीरथीशंभोःसर्वदुःखापहारिणी ॥
सिद्ध्यर्थसेव्यतेसिद्धैर्भुक्तिमुक्तिफलप्रदा ॥ १९ ॥ अनिशंभूतिदायाचस्वर्गमार्गानुत्तमा ॥ स्वर्गहे
तुश्चयादेवीसेयंभागीरथीनदी ॥ १६ ॥ यदंभःस्नानमात्रेणवैकर्तनसलोकताम् ॥ लभतेप्राणिनःसर्वेनदी
सायमुनास्वयम् ॥ १७ ॥
वही यह भागीरथी शंभुके सब दुःखकी हरनेवाली है भक्ति मुक्तिकी फलदात्री है सिद्धिके निमित्त सिद्धजन इनका
सेवन करते हैं ॥ १५ ॥ यह निरंतर ऐश्वर्यकी दाता और स्वर्गका एकही उत्तम मार्ग है जो स्वर्गकै कारणहै वही यह गंगा नदी
है ॥१६॥ जिसके स्नानमात्रसे पाप दूर होकर मुक्ति होती है सब प्राणी मनोरथको प्राप्त होते हैं वही यह यमुना नदी है. ॥१७॥
शको प्रसन्न करने लगे है पे ! आपके अनुग्रहसेही यह पापमहासागरके पार हुए ॥ ३३ ॥ हे ऋषि श्रेष्ठ ! इस समय इन बालकों के योग्य वचन कहिये लोमशजी बोले यह कुमार वेद पढकर अपना नियम समात करचुका तथा युवा है ॥ ३४ ॥ इन अनुराग करनेवाली कन्याओंका पाणिग्रहण करे, तब लोमश और अपने पिताके वचनसे ।। ३५ ॥ विवाहकी विधिसे ब्रह्म चारी धर्मात्माने शुभत्रव्य और मंत्रोद्वारा ऋपियोंसे मंगलको प्रातहो ॥३६॥ धर्मसे पांचौं कन्याओंका पाणिग्रहण किया तब ये इदानीमुचितंवहिवालानामृपिसत्तम ॥ लोमशउवाच ॥ कुमारोधीतवेदोऽयंसमाप्तनियमोयुवा- ॥ ३४ ॥ आसांतुसानुरागाणांग्रहातुकरपंकजम् ॥ ततोलोमशवाक्येनस्वपितुर्वचनात्तदा ॥३५॥ विवाहविधिनाचाशु ब्रह्मचारीसधार्मिकः । शुभद्रव्यैश्चमश्चऋपिभिः कृतमंगलः ॥ ३६॥ पंचानामपिकन्यानांपाणिजग्राहय मतः ।। आनंदिन्यस्तदासकिन्याः पूर्णमनोरथाः ॥३७॥ बभूवुःसकुमारश्चसंतुष्टश्चबभूवह ॥ दत्त्वानु ज्ञामुनि सोथलोमशस्तैनमस्कृतः ॥ ३८॥ जगामस्वाथममेरुपर्वतंसुरसेवितम् ॥ ततोवेदनिधीराजन्सुपाः पंचसुतंतथा ॥ पुरस्कृत्यमुदायुक्तोधनदस्यपुरंययो॥ ३९ ॥ इतिनृपवरमाघेलानसंजातपुण्यान्सुनिवरवचसा द्राक्तीर्थराजप्रयागे ॥ सकलकलुपमुक्ता पंचगंधर्वकन्याअलमभिगतलाभात्प्राप्यतर्पचजग्मुः ॥ ४० ॥ सब कन्या पूर्ण मनोरथ होकर प्रसन्न हुई ॥ ३७ ॥ और कुमारभी प्रसन्न हुआ वह लोमश मुनि उनको आज्ञा दे और उनसे नमस्कत हो ॥ ३८ ॥ देवताओंसे सेचित मेरुपर्वतपर अपने आश्रमको गये हे राजन् ! तब वेदनिधि अपने पुत्र और पांचों बहु ऑको लेकर प्रसन्नतासे कुबरके पुरको गये ॥ ३९ ॥ हे नृपश्रेष्ठ ! इस प्रकार यह माघस्नानका फल तीर्थराज प्रयाग, एकही भा. टी. मा.मा. अ.२५ ८८ श्वर॥२५॥सनकादिकोंने योगकी फलभूमि प्राप्त की थी; माघमासमें जो गंगा यमुनाके संगम, न्हावे ॥२६॥ वे सब तारारूप हैं उनसे वह सब जगत् व्याप्त है, कामी कामनाओंको और मुमुक्षु मुक्तिको प्राप्त होते हैं ॥२७॥ हे विजश्रेष्ठ ! प्रयागमें साधक सिद्धि को प्राप्त होते हैं, इस समय मुक्तिको कामनासे यह कन्या और तुम्हारा पुत्र ॥२८॥ मेरे वचनसे यह सब और तुम भी इसी संगममें स्नान करो वेणीके जलकी सामर्थ्यसे पूर्व समयका पाप नष्ट होजायगा ॥ २९ ॥ इस शापके महाफलकी असिल योगस्यफलभूमितुलेभिरेसनकादयः ॥ अस्मिन्माचेतुयेनातागंगायामुनसंगमे ॥ २६॥ तारारूपाश्चतेस वैतातिसकलंजगत् ॥ विदंतिकामिनाकामान्मुक्तियांतिमुमुक्षवः ॥ २७ ॥ विदंतिसाधका-सिद्धिप्रयागे हिद्विजोत्तम ॥ सांप्रतमुक्तिकामास्तुकन्याश्चापिसुतश्चते ॥ २८ ॥ मद्वाक्यादरमजंतुसर्वत्वंचसितासिते ॥ प्राकालीनाधविध्वंसिवेणीजलवलेनतु ॥२९॥ लभंतामखिलालक्ष्मीप्राप्तशापामहाफलाम् ॥ एवमार्पवचः सत्यमतींद्रियमलंघनम् ॥ ३० ॥ श्रुत्वाचोत्कंठचित्तास्तेसर्वेनानायचोद्यताः ॥ प्रयागंप्राप्यदुष्प्राप्यंपैशा च्यविजहुःक्षणात् ॥ ३१ ॥ विमुक्ताःशापदुःखेनतनुस्वांस्वांचलेमिरे ॥ दृष्ट्वावेदनिधिःपुत्रंता कन्यादिव्यरू पिणीः ॥ ३२ ॥ तुष्टावलोमशंपीत्याप्रसन्नेनांतरात्मना ॥ त्वदनुग्रहमाचेणोत्तीर्णपापमहार्णवः ॥ ३३ ॥ लक्ष्मीको प्राप्त होंगे इस प्रकार ऋपिके सत्य वचन जो अतीन्द्रिय और अलंघनीय हैं ॥ ३० ॥ सुनकर उत्कंठितहो वे सब स्नान करनेको उद्यत हुए दुष्प्राप्य प्रयागको प्राप्त होकर क्षण मात्रमें पिशाचत्व छोड़ते हुए ॥ ३१ ॥ शापके दुःखसे छूटकर (अपने २ शरीरको प्राप्त हुए, वेदनिधि अपने पुत्र और उन दिव्य रूप वाली कन्याओंको देखकर ॥ ३२ ॥ प्रसन्नमन हो लोम विक्रय्यपुस्तकोंकी संक्षिप्त-सूची। की. रु. आ. नाम. नाम. की,रु. आ, शिवपुराण-बडा-२४००० मूलमात्र-इसमें विद्ये- थरसंहिता २००० रुद्रसंहिता १०५३० शत- रुद्रसंहिता २१५० कोटिरुदसंहिता २२४० उमासंहिता १८४० कैलाससंहिता, १२४० और वायवीयसंहिता ४००० है. बहुत परि- अमसे यह अलभ्य ग्रंथ मिलाहै, और बहुत विद्वानोंकी संमतिसे शुद्धकर छापागया है शिवपुराण-उपरोक्त पं० ज्वालाप्रसाद मिश्रकत भापाटीकासमेत शिवपुराणमाहात्म्य-मूल ब्रह्मपुराण-संपूर्ण मूळ संस्कृत -५-० ब्रह्मांडपुराण-संपूर्ण आदिपुराणमूल-सम्पूर्णपुराणोंका सार यह आदि- पुराण व्यासदेवने २९ अध्यायोंमें वर्णन कियाहै । इसमें सूत और शौनकमुनिके समागमके समय शौनकने सन्ध्याकालका तथा कलियुगके दोपोंका ऐसा विचित्र रूप दर्शायाहै कि पढते २ मन मुग्ध होजाताहै । कृष्ण भगवानके जन्मसे लेकर उनकी अनेक लीला रामावतारकी चर्चा तथा वैष्णवोंकी उपयोगी अनेक चित्ताकर्षक कथा इसम लिखीहुई हैं। ०-१२॥ Pregccce मा.मा. भा.टी. अ.२५ बार स्नानसे होता है सो मुनि वचनसे जाना गन्धर्वांकी पाँचों कन्या सव पार्पोसे मुक्त होगई और अपने मनोरथोंको प्राप्त हो अपने स्थानको गई ॥४०॥ यह तीर्थमहिमासंयुक्त इतिहास परम पावन है पापनाशका हेतु है जो इसको नित्य सुनतेहैं उनके सब काम पूर्ण होते हैं और धर्मयुक्त हो दुर्लभ वैकुंठको जाते हैं ॥ ४३ ॥ इस पवित्र इतिहासको सुनकर जो वक्ताका पूजन करते परमिममितिहासंपावनंतीर्थभूतं वृजिनविलयहेतुंयःशृणोतीहनित्यम् ॥ सभवतिखलुपूर्णःसर्वकामेरभीत्रज तिचसुरलोकेदुर्लभोधर्मयुक्तः ॥४१॥ इतिहासमिमंश्रुत्वापूजयेद्यस्तुपाठकम् ॥ गोभिर्हिरण्यवस्त्रेश्वब्रह्मतुल्यो यतोहिसः॥ १२॥ वाचकेपूजितेयस्माद्विष्णुर्भवतिपूजितः॥ तस्मात्प्रपूजयेन्नित्यंयदीच्छेत्सफलंभवम्॥१३॥ इति श्रीपद्मपुराणेमाघमाहात्म्येवसिष्ठदिलीपसंवादे गंधर्वकन्यापरिणयोनामपंचविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥ गौ सुवर्ण वस्त्र देते हैं ॥ ४२ ॥ वाचकके पूजनसे वह विष्णुरूप होते हैं जो सफलताकी इच्छा करै वह वक्ताको नित्य पूजन करै ।। ४३ ॥ इति श्रीपमपुराणे माघमाहात्म्ये वशिष्ठदिलीपसंवादे पण्डित ज्यालाप्रसादमिश्रकृत भापाटीकायां गन्धर्वकन्यापरिण योनाम पंचविंशोऽध्यायः॥ २५ ॥ दोहा-उन्निससेचौअनसुभग, चैत्रकृष्णशशिवार ॥ बुधज्वालाप्रसादने,पूरयोग्रंथविचार ॥ १ ॥ नितप्रतिभजियेरामको, सुमिरणकीजेराम ॥ महावीरभजियेवहुरि, सिद्धहोतसवकाम ॥२॥ इदं पद्मपुराणोत्तरखण्डस्थमाघमाहात्म्यं भाषाटीकान्वितं मुम्बय्यां श्रीकृष्णदासात्मजेन खेमराजेन स्वकीये "श्रीवङ्कटेश्वर" स्टीम् यन्त्रालयेऽदित्वा प्रकाशितम् । संवत् १९६६, शके १८३१... विज्स्यरस्तकाका सायास-या विक्रय्यपुस्तकोंकी संक्षिप्त-सूची। नाम. की. रु. भा. cece की, रु. आ, शिवपुराण-बड़ा-२४००० मूलमात्र--इसमें विद्ये- श्वरसंहिता २००० रुद्रसहिता १०५३० शत- रुतसंहिता २१५० कोटिरुतसंहिता २२४० उमासंहिता १८४० कैलाससंहिता, २२४० और वायवीयसंहिता ४००० है..बहुत परि- अमसे यह अलाय यंथ मिलाहै, और बहुत विद्वानोंकी संमतिसे शुद्धकर छापागया है शिवपुराण-उपरोक्त पं० ज्वालाप्रसाद मिश्ररुतं भापाटीकासमेत शिवपुराणमाहात्म्य-मूल ०-३ ब्रह्मपुराण-संपूर्ण मूल संस्कृत ब्रह्मांडपुराण-संपूर्ण आदिपुराणमूल-सम्पूर्णपुराणोंका सार यह आदि- पुराण व्यासदेवने २२ अध्यायोंमें वर्णन कियाहै । इसमें सूत और शौनकमुनिके समागमके समय शौनकने सन्ध्याकालका तथा कलियुगके दोपोंका ऐसा विचित्र रूप दर्शायाहै कि पढते २ मन मुग्ध होजाताहै । कृष्ण भगवानके जन्मसे लेकर उनकी अनेक लीला रामावतारकी चर्चा तथा वैष्णवोंकी उपयोगी अनेक चित्ताकर्षक कथा इसमें लिखीहुईहैं । + . ५-० ...
नाम. नाम. राव. ७-० की, इ, आ. की, रु. भा. अमिपुराण-इसमें शाखकलाओंका संक्षेप वर्णन कथा स्तोत्रादि और नारदादिकी उत्पत्ति सर्वदेवताओंकी प्रतिष्ठा लक्षकोटि आदि होम गंगों. पाख्यान सावित्र्युपाख्यान लक्ष्मीकी उत्प- शिल्पशास्त्र, राजधर्म, राजनीति, युद्धरचना, त्ति मनसादेवी उपाख्यानादि वर्णितहैं भारतसार, रामायणसार, ईश्वरावतार, सर्वति- ब्रह्मवैवर्तपुराण-प्रकृतिखंड, गणेशखंड और ब्रह्मखंड ३-८ थिवारनक्षत्रादि व्रत, पद्प्रयोग, गन्धर्ववेद, ब्रह्मवैवर्तपुराण-श्रीकृष्णजन्मखंड -श्रीकृष्णचरित्र अपूर्व वर्णित है भरतशास्त्र, काव्य नाटक भेद, स्त्रीशिक्षा, रत्नादिपरीक्षा, वेदशास्त्रादि बहुतसे विपयोंका माकडेयपुराण-सप्तशती शान्तनवीटीकासह इसमें मार्कंडेय और जैमिनिका सत्संग और संवाद अपूर्व वर्णन है ४-० अप्सराओंपर दुर्वासामुनिका शाप कंकके ब्रह्मवैवर्नपुराण-संपूर्ण चारोखण्ड-जिसमें कृष्ण- मारेजानेपर विद्युतरूप राक्षसका माराजाना । जन्मखण्ड, प्रतिखण्ड, गणेशखण्ड, और पक्षियोंके जन्म और चरित्र और देवीजीका अलखंड इसमें श्रीकृष्णजीके अपूर्व चरित्र माहात्म्य संयुक्त है ४- पुस्तक मिलनेका ठिकाना-खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर” स्टीम्-प्रेस मुंबई: 08888880RRE . =75-वि
1000
इति पद्मपुराणोक्तं
माधमासमाहात्म्य भाषाटीकासमेत
समाप्तम्।
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