Prakrit Bharati Academy, Jaipur

Rajvinodmahakavyam

Mahakavi, Udairaj · 2010/08

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Front matter

राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला प्रकाशित ग्रन्थ १ प्रमाणमञ्जरी - तार्किकचूडामणि सर्वदेव । २ यन्त्रराजरचना - महा- राजाधिराज जयसिंहदेव कारिता । ३ कान्हडदे प्रवन्ध महाकवि पद्मनाभ । ४ स्यामखांरासा - नवाव अलफखां (कविवर नान ) । ५ लावारासा- चारण कविया गोपालदान । ६ महर्षिकुलवैमवम् - विद्यावाचस्पति स्व. श्री मधुसूदनजी ओझा । ७ वृत्तिदीपिका - मौनि कृष्णभट्ट । ८ राजविनोद काव्य - कवि उदयराज । प्रेस में त्रिपुराभारतीलघुस्तव - सिद्धसारस्वत लघुपण्डित । २ बालशिक्षा व्याकरण - ठक्कुर संग्रामसिंह । ३ करुणामृतप्रपा – महाकवि ठक्कुर सोमेश्वरदेव । ४ पदाथरत्नमञ्ज षा - पं. कृष्णमिश्र । ५ शकुनप्रदीप - पं. लावण्यशर्मा । ६ उक्ति- रत्नाकर – पं. साधुसुन्दर गणी । ७ प्राकृतानन्द - पं. रघुनाथ कवि । ८ ईश्वर- विलासकाव्य - पं. कृष्णभट्ट । ह चक्रपाणिविजयकाव्य - पं. लक्ष्मीधर भट्ट । १० काव्यप्रकाश - भट्ट सोमेश्वर । ११ तर्कसंग्रहफक्किका - क्षमाकल्याण गणी । १२ कारकसंबन्धोद्योत - पं.रभसनन्दी । १३ शंगारहारावलि - हर्षकवि । १४ कृष्ण- गीतिकाव्यनि - कवि सोमनाथ । १५ नृत्यसंग्रह - अज्ञातकर्तृ के । १६ नृत्यरत्न कोश - महाराजाधिराज कुंभकर्णदेव । १७ नन्दोपाख्यान - अज्ञातकर्तृक । १८ चान्द्रव्याकरण - चन्द्रगोमी । १६ शब्दरत्नप्रदीप - अज्ञातकर्तृक । २० रत्नकोश -- अज्ञातकर्तक । २१ कविकौस्तुभ - पं. रघुनाथ मनोहर । २२ एकाक्षरकोशसंगह - विविधकविकर्तृक । २३ शतकत्रयम् - भर्तृहरि, धनसारकृत व्याख्यायुक्त । २४ वसन्तविलास - अज्ञातकर्तृक । २५ दुर्गापुष्पाञ्जलि - म. म. पं. दुर्गाप्रसादजी द्विवेदी । २६ दशकण्ठवधम् – म. म. पं. दुर्गाप्रसादजी द्विवेदी । २७ गोरा बादल पदमिणी चऊपई - कवि हेमरतन । २८ वांकीदासरी ख्यात -- महाकवि वांकीदास । २६ मुंहता नैणसीरी ख्यात - मुंहता नेणसी। इत्यादि । प्राप्तिस्थान - सञ्चालक, राजस्थान पुरातत्त्वांन्वेषण मन्दिर, जयपुर ।

महाकवि उदयराज विरचितं
राजविनोदमहाकाव्यम्
★
सम्पादक
श्रीगोपालनारायण, बहुरा, एम० ए०
: प्रकाशनकर्ता :-
श्रीराजस्थान-राज्याज्ञानुसार
संचालक-राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर
( Rajasthan Oriental Research Institute)
ज य पुर (राज स्था न)
विक्रमाब्द २०१३] प्रथमावृत्ति
x
मूल्य
[ख्रिस्ताव्द १९५६

प्रकाशकीय वक्तव्य प्रस्तुत "राजविनोद" काव्य की रचना कवि उदयराज द्वारा अहमदाबाद के सुप्रसिद्ध सुलतान महमूद वेगड़ा के यशोवर्णन के रूप में हुई है। महमूद वेगड़ा गुजरात का एक महाप्रतापी, शूरवीर और कर्त्तव्यपरायण नरेश हो गया है, जिसका वर्णन सम्बन्धित इतिहासों में विस्तार से मिलता है। उदयराज महमूद वेगड़ा का आश्रित एक संस्कृत कवि था। तत्प्रणीत “राजविनोद " द्वारा मध्यकालीन भारतीय इतिहास के कई नवीन तथ्यों पर प्रकाश पड़ता है तथा राजस्थान की तात्कालिक स्थिति आदि के विषय में भी कितनी ही सूचनाएं प्राप्त होती हैं। सर्व प्रथम डाक्टर बूलर ने सन् १८७५ ई० में बम्बई सरकार के लिये “राजविनोद " की प्रति प्राप्त कर इसका महत्त्व प्रदर्शित किया था। तब से इसके प्रकाशन की आवश्यकता बनी हुई थी। भाण्डारकर रिसर्च इंस्टीट्य ट, पूना में हमारा जाना हुआ तो वहां पर सुरक्षित बम्बई सरकार के ग्रन्थ-संग्रह से "राजविनोद " की प्रति प्रकाशन के लिये हम अपने साथ ले आए | राजस्थान सरकार द्वारा जयपुर राजस्थान पुरातत्त्व मन्दिर" की स्थापना होने पर श्री गोपालनारायण जी बहुरा हमारे सम्पर्क में आये और हमने इनकी साहित्यिक रुचि देख कर " राजविनोद " के सम्पादन का कार्य इनको सौंप दिया। इन्होंने प्रास्ताविक परिचय के साथ-साथ ऐतिहासिक ग्रन्थों के आधार पर महमूद वेगड़ा का वंश-परिचय तथा डा० एच० डी० सांकलिया के दोहाद के शिलालेख का अनुवाद और अनुक्रमणिका आदि से इसे समन्वित करके पुस्तक की उपयोगिता को संवर्धित कर दिया है। "राजस्थान पुरातन ग्रन्थ माला" के ८ वें पुष्प के रूप मे प्रस्तुत रचना को प्रकाशित करते हुए हमें परम प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है। इति । मुनि जिनविनय सम्मान्य संचालक जयपुर, ज्येष्ठ कृष्णा राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मंदिर, वि० सं० २०१३ जय पुर प्रास्ताविक परिचय डाक्टर बलर ने सन् १८७५ ई० में बम्बई सरकार के लिये 'राजविनोद' नामक काव्य की एक हस्तलिखित प्रति* प्राप्त की। इस काव्य में अहमदावाद के मुलतान महमूद बेगडा के जीवन चरित्र का वर्णन मिलता है । यह ऐतिहासिक काव्य अभी तक प्रकाशित नही हुआ है। डाक्टर वूलर ने 'सस्कृत के हस्तलिखित ग्रन्यो की रिपोर्ट (१८७४-७५) में इस काव्य को एक साहित्यिक विनोद बतलाते हुए इस प्रकार लिखा है --"उदयराज विरचित 'राजविनोद' अथवा 'जर बक्स पातसाहि श्री महमूद सुराणचरित्र', जिसमें अहमदावाद के मुलतान महमूद वेगडा का जीवन-चरित्र वर्णित है, एक विशुद्ध साहित्यिक विनोद है । प्रयागदास के पुत्र और रामदास के शिष्य उदयराज ने महमूद की प्रशसा करते हुए उसको महान् पराक्रमी, प्रतापी और हिन्दू धर्म - T * प्रति स० १८ । १८७४-७५ ई० (भा० ओ० रि० इ०) + वेगडा का जन्म १४४५ ई० में हुआ था। उसका नाम फतहखां था । वह १४५८ मे १५११ ई० तक ५३ वर्ष गुजरात का सुलतान रहा । उसके समय की कुछ मुख्य मुख्य घटनायें इस प्रकार है १४६७-७० ई० जूनागढ का युद्ध । १४७२ ई० कच्छ और सिन्ध पर आक्रमण । १४७३ ई० द्वारका पर अधिकार, मन्दिर का तोडना । १४६५ ई० महमूद द्वारा बहरोट, पारनेर के किलो और दम्मन के बन्दरगाह पर अधिकार करने के लिये सेना भेजना । महमूद के सेनानायक अल्पखान द्वारा सजान की पारसी वस्ती का ध्वस (१४६५ अथवा १४६१ ई०) । १४७६ ई० वातरक पर महमूदावाद का बसाना । रानपुर विजय । १४८२-८४ ई० चम्पानेर की लडाई । पावागढ का २० महीने तक घेरा। १४८४ ई० (नवम्बर) पावागढ पर आक्रमण और विजय ।. १४६१-६४ ई० बहमनी राज्य के वहादुर गिलानी द्वारा गुजरात के समुद्री किनारे पर हमले । गिलानी को पराजित करके मार डाला गया । १५०८ ई०,खान देश के तख्त पर महमूद द्वारा अपने आदमी को विठाना। १५०८-६ ई० चौल और दीव पर पुर्तगालियो से झगडा । १५११ ई० (२३ नवम्बर) महमूद की ६७ वर्ष की अवस्था में मृत्यु । उसकी मृत्यु के थोडी ही देर पहले महमूद को दिल्लीश्वर की ओर से भेंट प्राप्त हुई। (पृ० २०७) । (कोमिसरियट-History of Gujrat, Vol 1 (1938) P. 130) राजविनोद महाकाव्य - का रक्षक बतलाया है, मानो वह कोई कट्टर हिन्दू राजा हो । कवि ने क्षत्रिय राजा के समान वर्णन करते हुए लिखा है कि वह राजन्यचूडामणि है, श्री और सरस्वती दोनो उसकी सेवा करती है, दानवीरता में वह कर्ण से भी बढ कर है और उसके पूर्वज मुज़फ्फरखाँ ने श्रीकृष्ण की कलिकाल के विरुद्ध सहायता की थी। यह चरित्र सात सर्गो में वर्णित है । पहले सर्ग मे २६ श्लोक है और इममें सुरेन्द्र-सरस्वती-सम्वाद रूप से काव्य की भूमिका वाँधते हुए यह वर्णन किया है कि ब्रह्मा ने इन्द्र को सरस्वती की खोज करने के लिये भेजा । इन्द्र ने उसे महमूदशाह के सभामण्डप में पाया । सरस्वती ने अपने वहाँ रहने का कारण बताते हुए महमूद का कोर्तिगान किया । दूसरे सर्ग का नाम 'वशानुकीर्तन' है । इसमे ३१ श्लोक है और महमूदगाह की वशपरम्परा का वर्णन है । इसमे दिया हुआ वशानुक्रम इतिहास के अनुसार सही ज्ञात होता है । “सभा समागम' नामक तीसरे सर्ग मे ३३ ग्लोको में महमूद के सभा प्रवेश का वर्णन है । दरवार में कौन-कौन से राजा और सभ्य उपस्थित होते थे, इसका वर्णन सर्वावसर नामक चतुर्थ सर्ग में ३३ श्लोको में किया गया है । पाँचवे मर्ग में सङ्गीतरङ्गप्रसङ्ग का ३५ श्लोको में वर्णन है और छठे सर्ग में विजययात्रोत्सव वर्णन के ३६ श्लोक है । सातवें सर्ग का नाम 'विजय लक्ष्मीलाभ' है और इसमें ३७ श्लोको मे मह- मद के सामरिक पराक्रम का वर्णन है । पातशाह की उदारता के अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन से ज्ञात होता है कि कवि को उसके दरवार से पर्याप्त दक्षिणा मिली होगी अथवा मिलने की आशा रही होगी।" अहमदावाद के प्रसिद्ध सुलतान महमूद बेगडा (१४५८ ई० १५११ ई०) के दरबारी कवि उदयराज विरचित ऐतिहासिक काव्य की इस दुर्लभ प्रनि* पर यह टिप्पणी पर्याप्त नहीं है । सामान्यत गुजरात के इतिहास और विशेषत गुजरात के सुलतानो के इतिहास में रुचि रखनेवाले एव अन्य साहित्यिक अभिरुचि वाले विद्वानो के परिचय के लिए यह दुप्प्राप्य ग्रन्थ प्रकाशित किया जा रहा है । इसकी प्रति+ भाण्डारकर ओरियण्टल रिसर्च इस्टीट्यूट पूना से प्राप्त की गई है और इमी सस्थान के मग्रहाध्यक्ष श्री पी० के० गोडे के मन्तव्यानुसार इस काव्य को आवश्यक टिप्पणियो सहित प्रस्तुत किया गया है। गजविनोद के प्रत्येक सर्ग के अन्त में निम्नलिखित पद्य दिया हुआ है जिसमे सुलतान महमद के वगानुनम का वर्णन है श्रीमान् साहिमुदपफरः समजनि श्रीगूजरक्ष्मापति- स्तस्मात्साहि महन्मदस्समभवत्साहिस्ततोऽहम्मद साहिमहम्मदोऽस्य तनुजो गायासवीनाख्यया श्रीमहमूदसाहिनृपति यातदीयात्मज पिग्राफिका इन्डिका जि० २४ भाग ५, जनवरी १९३८ पृ० २१२ पर डाक्टर एच डी * जाफेट ने 'गजविनोद' को भाण्डारकर संग्रहालयवाली प्रति के अतिरिक्त और रिमी प्रति का उल्लेख नहीं दिया है । (CCI 502) कृष्णमाचारि ने भी History of Classical Sanskrit Literature, Madrass, 1937 P 271, 433 H 59 rasfat उल्लब किया है। - जात स्यात + गहन मैन्ट मैनिम्झिट लाइब्रेरी, भा ओ रि इ पुग, म० १८ । १८७४-७५ ।

प्रास्ताविक परिचय [३ सांकलिया द्वारा सम्पादित दोहाद का एक शिलालेख प्रकाशित हुआ है । महमूद बेगडा का यह लेख विक्रम सम्वत् १५४५ शक सम्वत् १४१० (१४८८ ई०) का है। इस लेख में दिए हुए वशानुक्रम और ऊपर दिये हुए पद्यान्तर्गत क्रम को इस प्रकार मिलाया जा सकता है राजविनोद (१ १४५८-१५११ ई०) दोहाद का शिलालेख (१४८८ ई०) १--साहि मुदफ्फर (१३६२-१४१० ई०) १-शाहिमुदाफर २-साहि महम्मद (१) का पुत्र २-महम्मद (१) का पुत्र (तत्पुत्र ) । (तस्मात्समभवत्) । ३–साहि अहम्मद (१४११-१४४२ ई०) ३-अहम्मद (इसका वशज) 'तस्यान्वये इसके बाद (तत )। ४--साहि महम्मद (३) का पुत्र (तस्य तनुज ४--साह महम्मद (३) का पुत्र (तस्माद- जात ) '१४४२-१४५१ ई० । भूत्) । ५----महमूदसाहि (४) का पुत्र ४-साह महमूद 'अन्वये जात 'तदीयात्मज' (१४५८-१५११ ई०) । प्रसूत' इन वशावलियो से विदित होगा कि चार पीढी के नाम तो ज्यो के त्या मिलते है केवल महमूद (बेगडा) को राजविनोद में तो महम्मद का पुत्र लिखा है 'जीयात्तदीयात्मज' और दोहाद के शिलालेख मे उसको साह महम्मद का वशज 'तस्यान्वये जात' लिखा है। डाक्टर साँकलिया ने मुसलमान इतिहासकारो के आधार पर इन सुलतानो का वशानुक्रम* इस प्रकार लिखा है-(१) मुजफ्फरशाह (मुज़फ्फर १), २-अहमदशाह (अह्मद), (३) उसका पुत्र मुहम्मदशाह (मुहम्मद), (४) उसका पुत्र कुतुबुद्दीन (कुतुबुद्दीन अहमदशाह), (५) दाऊद और (६) महमूद १, मुहम्मदशाह का द्वितीय पुत्र । सम्वत् १५८७ में पण्डित विवेकधीरगणि नामक जैन विद्वान् ने शत्रुञ्जयतीर्थोद्वार- प्रबन्ध नामक एक ऐतिहासिक प्रबन्ध की रचना की है जिसका सम्पादन मुनि श्रीजिनविजयजी ने करके सम्वत् १९७३ में भावनगर की जैन आत्मानन्द सभा द्वारा प्रकाशित कराया है । सम्वत् १५८७ में चित्तौड के रहनेवाले ओसवाल जाति के कर्माशाह ने लाखो रुपये खर्च करके शपुज्जय के मुख्य मन्दिर का जीर्णोद्धार कराया और उसका प्रतिष्ठा महोत्सव किया । उस समय वहाँ पर गुजरात के सुलतान वहादुरशाह का राज्य था । इसी बहादुरशाह की आज्ञा प्राप्त करके यह जीर्णोद्धार कार्य सम्पन्न किया गया था । इसलिये इस ऐतिहासिक प्रबन्ध में गुजरात के इन सुलतानो का सक्षेप में वश वर्णन दिया गया है । बहादुरशाह, जिसके समय में जीर्णोद्धार कार्य सम्पन्न हुआ, प्रस्तुत राजविनोद काव्य में वर्णित महमूदशाह अर्थात् महमूद बेगडा का पौत्र था। इसलिये इसमें इसके वश का उल्लेख होना स्वाभाविक है । इस ऐतिहासिक प्रबन्ध मे गुजरात के सुलतानो के वशानुक्रम के विषय में निम्नलिखित श्लोक मिलते है * एपिग्राफिया इन्डिका, जनवरी १६३८, पृ० २१४ । r ४] ४ राजविनोद महाकाव्य पीरोजशाहेः समयेऽय जज्ञे श्रीगूर्जरत्रा भुवि पादशाहि । मुज्जफराह्वः(१) खगुणाधिचन्द्रमितेषु (१४३०) वर्षेषु च विक्रमार्कात् ॥१४॥ अहिमदशाहिर्जज्ञे (२) तत आशेष्वब्धिचन्द्रमितवर्षे (१४५४) दिग्रसवेदेन्द्वन्दे (१४६८) योऽस्थापयदहिमदाबादम् ॥१५॥ महिमुन्द (३) कुतुबदीनौ (४) शाहिमहिमुंद (५)वेगडस्तवन । यो जीर्णदुर्गचम्पकदुर्गा जग्राह युद्धेन ॥१६॥ उल्लास २, पृ० १३ । इतिहास के विशेषज्ञ इन वशावलियो की छानबीन करके इन पर विशेष प्रकाश डालेगे। राजविनोद महाकाव्य का रचयिता उदयराज अवश्य ही महमूद का दरबारी कवि था क्योकि उसने इस काव्य में उसकी भूरि-भूरि प्रशसा की है। यह विचारणीय है कि धार्मिक कट्टरता के लिये प्रसिद्ध महमूद ने* उदयराज जैसे हिन्दू पण्डित को अपने आश्रय में कैसे रक्खा। यो तो इस काव्य के रचनाकाल का निर्धारण करने के लिये यह कहा जा सकता है कि महमूद के शासन काल १४५८ ई० से १५११ ई० के बीच में ही यह लिखा गया था परन्तु अवश्य ही यह उस समय रचा गया होगा जब महमूद का भाग्य उदय के शिखर पर पहुंच चुका था। प्रस्तुत काव्य के चतुर्थ सर्ग में उन सभी राजाओ का वर्णन आया है जिनको महमूद ने अपने आधीन कर लिया था। इसके अतिरिक्त अलग अलग राजाओ के पद और सम्मान आदि का भी इस सर्ग के पद्यो से पता चलता है। "राज्ञोऽस्य वेत्रघरदत्तपदावकाशान्देशाधिपान सदसि कृतप्रवेशान् ।" १, स०४ इस प्रसङ्ग मे मालवराज और दक्षिणनृप का वर्णन इस प्रकार है 'वैषं विशेषरुचिरं दधतादरेण हस्तारविन्दसमुदञ्चितचामरेण । राजा विराजतितरां परिहृप्यमानो गोष्ठीषु दक्षिणनृपेन विचक्षणेन ॥१०॥ स० ४. एतस्य चण्डभुजदण्डपराक्रमेण नि शेषखण्डितरणाङ्गणशौण्डभाव. । सर्वस्वमेव निजजीवितरक्षणाय दण्ड समर्पयति मालवमण्डलेश. ॥११॥ स०४ फिर ७ वें सर्ग में 'मालव' के लिए लिखा है- "त्यक्त्वा लुब्तिदेशकोशविषयो द्राग्दुर्गमानग्रहं राजन् जीवितमात्रलाभमघुना काक्षत्यमी मालव ॥२६॥ सम्भवत दक्षिण के निजामशाह पर जब मालवा के महमूद खिलजी ने १४६२-६३ ई० म हमला किया तव मुलतान महमूद (वेगडा) ने जो मालवा के विरुद्ध सैनिक सहायता दी थी, महमूद ने अपने आज्ञाकारी गिग्नार के माण्डलिक राजा को इस्लाम धर्म ग्रहण करने के लिये बात्य किया। (देवो डा एम के बनर्जी कृत 'हुमायू वादगाह' सस्करण १६३८ पृ० ११२ और कैम्ब्रिज हिल्ट्री ऑफ इण्डिया, मा० ३, पृ० ३०५) ।

प्रास्ताविक परिचय [५ . यहाँ उसी से अभिप्राय है; यदि यह सच है तो यह काव्य १४६३ ई० के बाद का रचा हुआ होना चाहिए । इसी चतुर्थ सर्ग के बारहवें श्लोक में मेवाड के राणा कुम्भा का वर्णन है- "यः पार्थिवः खलु कुम्भकर्णः कर्णेन वर्णमुचित सहते तुलायाः। सोऽयं करोति महमूदनृपस्य सेवा दण्डे वितीर्णवरभूरिसुवर्णभारः ॥१२॥ इसके अतिरिक्त सातवें सर्ग में भी मेदपाट के राजा का ज़िकर है । इससे स्पष्ट है कि महमूद और राणा कुम्भा समकालीन थे । राणा कुम्भा* ने १४३३ से १४६८ ई० तक राज्य किया था। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि “राज विनोद" का रचना काल १४६२ से १४६६ के बीच मे है। दोहाद के शिलालेख (१४८८ ई०) में बहुत सी उन घटनाओ का भी उल्लेख मिलता है जिनका राजविनोद में कोई वर्णन नही है । यदि राजविनोद के रचना काल के विषय मे उपरोक्त अनुमान ठीक मान लिया जावे तो इसका समाधान सहज ही में हो सकता है । क्योकि शिलालेख का समय राज विनोद के समय से लगभग २० वर्ष वाद का है जिसमें महमूद के १४५८ ई० से १४८८ ई० तक ३० वर्षों के राज्यकाल का वर्णन मिलता है। दोहाद के शिलालेख की भाषा, शैली और विषय को देखते हुए यह भी एक धारणा बनती है कि सम्भवतः राजविनोद नामक ऐतिहासिक काव्य और दोहाद के शिलालेख, दोनो का रचयिता एक ही हो । इन दोनो की समानता के कुछ अश इस प्रकार है- महाराणा कुम्भा वि० स० १४६० (ई० स० १४३३) में चित्तौड के राजसिंहासन पर बैठा। .. पिछले दिनो में महाराणा को उन्माद रोग हो गया था। एक दिन वह कुम्भलगढ में मामादेव (कुम्भ स्वामी) के मन्दिर के पास जलाशय के तट पर बैठा हुआ था उस समय उसके राज्यलोभी पुत्र ऊदा (उदयसिंह) ने कटार से उसे अचानक मार डाला। यह घटना वि० स० १५२५ (ई० स० १४६८) में हुई । (श्री गौरीशकर हीराचन्द ओझा कृत 'राजपूताने का इतिहास' पृ० ६३३-६३४) इस सम्बन्ध में देखिए-मुहाणोत नैणसी की ख्यात, पत्र १२, पृ० १ । वीर विनोद, भा० १ १० ३३४ । इतिहास और शिलालेखो के आधार पर महमूद और राणा कुम्भा मे कोई लडाई होना अथवा राणा का उसके आधीन होना नही पाया जाता है । महमूद के पूर्वज कुतुबुद्दीन से अवश्य ही कुम्भा का युद्ध हुआ था जवकि उसने मालवा के महमूदशाह के साथ मिल कर चित्तौड पर आक्रमण किया था। इस युद्ध में कुतुबुद्दीन और मालवा का सुलतान दोनो ही रागा से हार कर अपने अपने देशो को लौट गए थे। (देखिए-वि० स० १५१७ (ई० म० १४६०) मार्ग० बु० ५ का कीर्तिस्तम्भप्रशस्ति लेख) । प्रस्तुत काव्य में कवि परम्परा के अनुसार ही कवि ने अपने प्रशसनीय सुलतान के सम- कालीन, प्रसिद्ध और पराक्रमी कुम्भा को उसके आधीन होना लिख दिया है। डा० सांकलिया द्वारा सम्पादित दोहाद के शिलालेख में भी कुम्भा का महमृद के साथ कोई सम्बन्म वणित नही है । (स०) ।

६] राजविनोद महाकाव्य उदयराजकृत राजविनोद १--काव्य पद्यात्मक है । दोहाद का शिलालेख १-लेख पद्यात्मक है। २-काव्य की भाषा सस्कृत है। २–लेख सस्कृत भाषा में है। ३-काव्य की हस्तलिखित प्रति डा० वूलर ने ३-लेख वडोदा मे उत्तर-पूर्व मे ७७ मील पर गुजरात में प्राप्त की। दोहाद में प्राप्त हुआ। ४-राजविनोद की हस्तलिखित प्रति में. ४-शिलालेख विक्रम सम्वत् १५४५ शक सन् सम्वत् नही दिया हुआ है परन्तु लेख सम्वत् १४१० (२४ आपरेल, १४८८ व पृष्ठ मात्रा के आधार पर १५०० और ई०) का लिखा हुआ है। १६०० ई० के बीच की लिखी ज्ञात होती है । ५-राजविनोद महमूद बेगडा के शासन ५--शिलालेख भी महमूद बेगडा के शासन काल (१४५८ से १५११ ई०) में ही काल में ही उसके राज्यारोहण के समय रचा गया था । अथवा, जैसे कि ऊपर से लगभग ३० वर्ष वाद १४८८ ई० में अनुमान लगाया गया है १४६३ से लिखा गया था। १४६६ के बीच में लिखा गया था। + ६–राजविनोद सरस्वती वन्दना से आरम्भ होता है । प्रथम सर्ग को सुरेन्द्र सरस्वती- सम्वाद नाम दिया गया है। वास्तव मे, सम्पूर्ण काव्य ही सरस्वती के द्वारा अभिगीत है । 'महमूदपातसाहे अभि- नववर्णने प्रसक्ता सरस्वती सरसपदानि व्यतानीत् ॥३२।। स० ४ । ६-शिलालेख भी काश्मीरवासिनीदेवी अर्थात् सरस्वती की वन्दना से प्रारम्भ होता है (डा० सांकलिया का नोट एपि० इडिका जन० १६३८ पृ० २१३) । डा० सांकलिया का कथन है कि यह देवी ब्राह्मी अथवा सरस्वती प्रतीत होती है । राजविनोद में भी सरस्वती को 'ब्राह्मि नाम से सम्बोधित किया है । (पद्य २ सर्ग २रा) ७-राजविनोद में दिया हुआ वेगडा का वंशानुक्रम इस प्रकार है:- मुदफ्फर, महम्मद, (१) अहम्मद, मह- म्मद, (२) महमूद । यह वशानुक्रम मुसलमान इतिहासकारो को आधार से भिन्न है। ७-शिलालेख में दिया हुआ वशानुक्रम भी इस प्रकार है मुदाफर, महमद, (१) अहमद, महम्मद, (२) महमूद । यह वशानुक्रम भी मुस्लिम इतिहास- कारो द्वारा दिये हुये वशानुक्रम से भिन्न है। -राजविनोद के दूसरे सर्ग के ३० पद्यो में महमूद के पूर्वजो के पराक्रम का वर्णन -शिलालेख में कुल २६ पद्य है जिनमें से पहले ६ पद्यो में तो महमूद के पूर्वजो प्रास्ताविक परिचय [७ ७ उदयगजकृन राजविनोद है । शेप सर्गों में स्वय महमूद के परा- क्रमो (१४५८ से १४६६ ई० तक) का वर्णन है । दोहाद का शिलालेख का वर्णन है और शेष २० पद्यो में महमूद के राज्यकाल में १४५८ ई० से १४८८ ई० तक की घटनाओ का वर्णन chc ह-प्रथम सर्ग के तीसरे पद्य में कवि ने लिखा है कि “पूजोपहाराय मयोपनीत कवित्त्व- पुष्पञ्जलिरेष रम्य ।" इसमे विदित होता है कि महमूद प्राप्त करने के लिये (सम्भवत ) उसके दरवार में प्रवेश पाने के लिये ही यह काव्य लिखा गया था। की कृपा ह-शिलालेख की रचना का प्रकार प्राय राजविनोद के समान ही है । ऐसा प्रतीत होता है कि राजविनोद के कर्ता ने ही, बहुत समय तक सुलतान की कृपा का उपभोग कर चुकने के बाद इसकी रचना की थी । शिलालेख में बहुत से ऐसे पुरुषो और स्थानो का उल्लेख है जिनका राजविनोद में वर्णन नही है । अत स्पष्ट है कि यह राजविनोद के रचना- काल से शिलालेख के समय (१४८८ ई०) तक की घटनाओ का वर्णन उसी कवि ने इस लेख मे किया है। १० --राजविनोद मे महमूद के पूर्वज अहमद १०--शिलालेख में भी अहमद को अहमटेन्द्र को अहमदेन्द्र लिखा है । (पृ० ५ व ६) लिखा है । (पद्य ४) २१ --राज विनोद, सर्ग २, पद्य १८ में महमूद ११-शिलालेख में पावकदुर्ग पर (नवम्बर द्वारा पावागढ पर आक्रमण करने का १४८४ ई०) चढाई का उल्लेख यो वर्णन है- किया है “यस्य प्रतापभरपावकसङ्गमेन "जित्वा पावक (दुर्ग) पित्रारुद्धं दग्धस्य पावकगिरे शिखरान्तरषु । प्रतापतापूर्व ॥१०॥ प्रेक्षन्त जर्जरसुधाविधुराणि भस्म महमूदमहोपालप्रतापेनैव पावकम् । राशिप्रभाभि रिपवो निजमन्दिराणि ॥" प्रविश्य ज्वालितं सर्वं वैरिवृन्द पतगवत्।।११।। जीवंतं तत्पति (बद्धवा) दुर्ग नीत्वा महावल । चकार तत्पुरे राज्यं महमूदमहोश्वर ॥१२॥ डा० सांकलिया ने लिखा है कि पावागढ लेने के लिये अहंमद का प्रयत्न असफल हुआ था । (एपि० इण्डि०, जन० १६३८ पृ० ३२१ ।

८ ] था- राजविनोद महाकाव्य उदयराजकृत राजविनोद दोहाद का शिलालेख १२-मुदफ्फर के पुत्र महमद के विषय में १२-दोहाद शिलालेख के पद्य १८ में पल्लिदेश वर्णन करते हुए राजविनोद (सर्ग २ का उल्लेख है । इस देश पर वेगडा सुल- प० १०) में नन्दपद और पल्लिवन का तान के मुख्य मन्त्री इमादल का शासन उल्लेख है "आद्याप्यहो नन्दपदाधिनाया "पल्लीदेशाधिकारं च पुण्यं पुण्यमतिस्तदा भल्लूकवत्पल्लिवने भ्रमन्ति" ॥६॥ दुष्टारिहृदये राज्यं दुर्गमेनं चकार वै ॥१८॥" फिर, नन्दपद के राजाओ के विषय में डा० सांकलिया का मत है कि गोधरा लिखा है- तालुका में पाली नामक स्थान ही पल्लि 'विभिन्नप्राकारसौवस्फुरदेहमाला.' देश है। यहाँ 'विभिन्न प्राकार' पद से विदित पल्लीवन और पल्लिदेश एक ही है। होता है कि पल्लिवनान्तर्गत नन्दपद में उस समय कोई किला भी था । यहाँ मुदफ्फर के पुत्र महम्मद के समय यहाँ वेगडा के समय के पल्लि देश के पल्लिवन मे तात्पर्य है। से तात्पर्य है। . १३-राजविनोद में 'गायासदीन' उपाधि का १३- दोहाद शिलालेख के पद्य ७ में-"श्री श्याम प्रयोग महमूद वेगडा के पिता महम्मद के (दीन) प्रभो अन्वये साह श्री महमूद वीर लिए हुआ है नृपति जात" लिखा है। यह भी मह- "गायासदीन इति साहि महंमदेन्द्र. मूद के पिता ही की उपाधि है, महमूद की नही, जैसाकि पद्य पढने से प्रतीत होता है। महमूद को सिक्कों और लेखो में 'नासिर उदुनियां वा-उद्-दीन' (ससार और धर्म का रक्षक) लिखा है। अहमद (१) के पुत्र महमद (२) को भी सिक्को में गायासउद्दीन लिखा है । (एपि० इन्डि० जन०.१६३८ पृ०२१६) इस प्रकार दोहाद के शिलालेख और राजविनोद काव्य की तुलना करने से हम नीचे लिग्वे निष्कर्षों पर पहुंचते है - (१) प्रयागदास का पुत्र उदयराज महमूद वेगड़ा (१४५८-१५११ ई०) का हिन्दू राज- कवि था। (३) उदयराज ने यह ननमर्गात्मक 'राजविनोद महाकाव्य' सस्कृत में लिखा है और इसमें महमूद बेगडा व उसके पूर्वजो का वर्णन है । यह काव्य वेगटा के राज्य के पहले दस वर्षों {१४५८-१४६६) में लिया गया था ।

प्रास्ताविक परिचय (३) इसके बाद भी दो दशको तक वह महमूद के दरवार मे ही रहा और उसके पूर्वजो व उसके पराक्रमो के वर्णन मे अभिरुचि रखता रहा । (४) राजविनोद और दोहाद के शिलालेख की तुलना से यह धारणा बनती है कि यह गिलालेख इसी कवि की पूर्व रचना की सक्षिप्त और सम्पूर्ण आवृत्तिमात्र है । 'एपिग्राफिआ इन्डिका' जनवरी, सन् १९३८, भाग २४ अक ४ मे यह लेख इसके मूल सम्पादक डाक्टर एच० डी० सांकलिया की टिप्पणी सहित प्रकाशित हुआ है जो बहुत महत्त्वपूर्ण है । उक्त लेख को ज्यो का त्यो एव डाक्टर सॉकलिया की टिप्पणी का अनुवाद, आवश्यक टिप्पणियो सहित, इसी पुस्तक मे पृष्ठ २३ से प्रकाशित किया जा रहा है । जैसा कि ऊपर सूचित किया गया है इस काव्य की एकमात्र प्राचीन हस्तलिखित प्रति वम्बई सरकार के संग्रहालय की सम्पत्तिरूप है जो पूना के भाण्डारकर ओरिएन्टल रिसर्च इन्स्टीट्यूट में सुरक्षित है । इस प्रति के कुल २८ पन्ने है । इसके लिखे जाने का कोई समयोल्लेख प्रति मे नही दिया गया है । इससे यह तो निश्चित नहीं कहा जा सकता कि यह किस समय में लिखी गई होगी परन्तु, प्रति की जीर्ण-शीर्ण अवस्था देखते हुए प्रतीत होता है कि यह प्राय- रचनाकाल के बहुत पीछे लिखी हुई नही है, और यह तो निश्चित ही है कि उसी शताब्दी में लिखी हुई तो अवश्य है । इसको किसी. राम नामक लिपिकार ने अपने आत्मज के पठनार्थ लिखा है । यह कथन अन्तिम उल्लेख से ज्ञात होता है। पाठको के अवलोकनार्थ, प्रति के अन्तिम पत्र का चित्र भी अन्यत्र दिया जाता है जिससे प्रतिकी लिपि आदि का साक्षात् परिचय मिल सकेगा--प्रति का पाठ प्राय शुद्ध है । पूरे काव्य में कोई ४-५ ही स्थल ऐसे दृष्टिगोचर होते जो अशुद्ध कहे जा सकते है । इससे मालूम होता है कि लिपिकार श्रीराम स्वय अच्छा संस्कृत का विद्वान् होगा । महमृद वेगडा गुजरात के सुलतानो में प्रसिद्ध और लोकप्रिय सुलतान हुआ है । सभी हिन्दू अथवा मुसलमान इतिहास लेखको ने समान रूप से इसकी प्रशसा लिखी है । इन्ही के आधार पर अग्रेज इतिहासकारो ने भी इसके इतिहास पर पूर्ण रूप से प्रकाश डाला है । मूलत यह सुलतान राजपूत वंश का था और इसके पूर्वजो ने किस प्रकार सत्ता हाथ में लेकर गुजरात का स्वतत्र राज्य स्थापित किया, इसका विवरण ‘मीराते सिकन्दरी' 'मीराते अहमदी,' 'तवारीख मोहम्मदशाही,' कॉमिसरियट की 'हिस्ट्री ऑफ गुजरात' व किन्लाक् फास् कृत 'रासमाला' आदि पुस्तको के आधार पर सक्षिप्त रूप मे 'वश परिचय' शीर्षक लेख में अन्यत्र दिया गया है । इस लेख में आवश्यक पाद-टिप्पणियो के साथ राज- विनोद महाकाव्य के वे श्लोक भी उद्धृत किए गए है जिनसे मुख्य-मुख्य ऐतिहासिक घटनाओ पर प्रकाश पडता है । इससे यह भी स्पष्ट हो जावेगा कि राजविनोद महाकाव्य केवल माहित्यिक विनोद न होकर अपना ऐतिहासिक महत्त्व भी रखता है । इस महाकाव्य के कर्ता कवि उदयराज के विपय मे अभी और कोई विशेष परिचय प्राप्त नहीं है । कृति को देखते हुए यही प्रतीत होता है कि वह महमूद का समकालीन

राजविनोद महाकाव्य
कवि था । सम्भव है, उसके दरबार मे भी उसे स्थान प्राप्त हो । प्रस्तुत काव्य के द्वारा
कितनी ही ऐतिहासिक घटनाओ व महमूद के चरित्र पर तो प्रकाश पड़ता ही है, साथ ही
अपनी कृति के लिए समयानुसार
विपय चुनकर संस्कृत काव्य परम्परा की शृखला में
एक
कही जोडने का श्रेय भी कवि को अवश्य ही प्राप्त है
इस कृतिके इस प्रकार सपादन और प्रकाशन में राजस्थान पुरातत्त्वमन्दिर के
सम्मान्य संचालक आचार्य श्रीजिनविजयजी की ही प्ररेणा और मार्ग-दर्शन मुख्यत. कारणभूत
है, अत इनके प्रति आन्तरिक कृतज्ञभाव प्रकट करना अपना परम कर्तव्य मानता हूँ।
यदि मध्यकालीन इतिहास के विशेषज्ञ इस ऐतिहासिक काव्य से अपनी गवेषणा में
कोई सहायता प्राप्त करके इतिहास के तथ्यो पर अधिक प्रकाश डाल मकेंगे तो इसके
प्रकाशन का श्रम सफल समझा जा सकेगा।
गोपाललारायण

महमूदबेगड़ा का वंश-परिचय गुजरात के राजपूत सुलतानों का मूलपुरुष जिसने इस्लाम धर्म अंगीकार किया था उसका नाम सहारन था। बाद में उसको उपाधि व उपनाम वजीर-उल-मुल्क हुआ । वह टांक (तक्षक) जातीय सूर्यवंशी क्षत्रिय था इसीलिए गुजरात के इतिहास में इसके वंशजों का 'राजपूत सुलतान' नाम से उल्लेख किया गया है । भगवान श्री रामचन्द्र जी से कितनी ही पीढ़ियो वाद मुहस हुआ। उसी के कुल में कम से दुर्लभ, नाक्त, भूक्त, मंडन, भुलाहन, शीलाहन, त्रिलोक, कुंअर, दरसप, हरीमन, कुंअरपाल, हरीन्द्र , हरपाल, किन्द्रपाल, हरपाल और हरचन्द हुए । सहारन हरचन्द का पुत्र था और थानेश्वर के पास एक गांव में रहता था। उसके छोटे भाई का नाम साघु था। वे दोनों भाई जमींदारी का काम करते थे । एक बार दिल्ली के बादशाह मुहम्मद तुगलक के काका का लड़का शाहजादा कीरोजशाह शिकार को निकला और अपने साथियों से बिछुड़ कर सहारन के गांव के पास जा पहुंचा। उस समय सहारन, उसका छोटा भाई साधु और दूसरे राजपूत एक जगह बैठे हुए थे। एक राजपूत ने फीरोजं के पैर में राजचिह्न पहचान लिया। सहारन और साधु उसे अपने घर ले गए और उसका आगत-स्वागत किया। साधु की बहन ने उसे शराब पिलाई और उसी की लहर में फीरोज़ ने अपना परिचय दे दिया । साधु की बहन और फीरोज की शादी हो गई । तदनन्तर, वे दोनो भाई फीरोजशाह के साथ दिल्ली चले गये और इसलाम धर्म को ग्रहण कर लिया। बादशाह ने सहारन को वजीर- उल-मुल्क का खिताब दिया। वजीर-उल-मुल्क के जफरखां और शमशेर खां नामक दो लड़के हुए । जफर खां ही आगे चल कर मुजफ्फर खान के नाम से इस वंश का गुजरात का प्रथम शासक हुआ। बादशाह के कहने से सहारन और साधु ने कुतुब उल आफताव-हजरत मुखदुम अहानिओं से इसलाम धर्म की दीक्षा ली थी। सहारन का पुत्र जफर खां भी इन्हीं महात्मा का शिष्य था । एक दिन हज़रत के मठ पर कुछ फकीर इकट्ठे हुए । उस समय महात्मा मुखदुम के पास खाने पीने का कुछ भी सामान नहीं था । जफ़र खां को यह बात मालूम थी। वह तुरन्त ही अपने घर से व बाजार से मिठाइयां आदि ले आया और सभी फकीरों को भोजन करा दिया। फकीरों ने तृप्त होकर जोर से 'अल्लाहो अकबर' का नारा लगाया। जव मुखदुम जहानिओं को यह बात मालूम हुई तो उन्होने जफर खां को नुलाकर प्रसन्नता पूर्वक कहा 'जो तुमने फकीरों को भोजन कराकर तृप्त कियाह उसके बदले में मैं तुम्हें सम्पूर्ण गुजरात की हुकूमत प्रदान करता हूँ।' इस प्रकार जफरखां को फकीर का वरदान प्राप्त हुआ। *वशस्सहस्राशुभवो जगत्या जागर्त्यसौ राजभिरर्चनीय । कर्णोपमो यत्र किलावतीर्ण श्रीमान् साहि मुदप्फरेन्द्र ॥१॥ राजविनोद-सर्ग २ । १२] राजविनोद महाकाव्य हिजरी सन् ७६३ (१३६१ ई०) में यह खबर आई कि गुजरात के सवेदार मुफरर खां ने जो रास्ती खां के नाम से प्रसिद्ध था, बलवा कर दिया। उसी वर्ष के रवीउल- अव्वल महीने की दूसरी तारीख को सुलतान मोहम्मद ने जफर खां को एक लाल तम्बू वरशीश किया और निजाम मुकर्रर खां को दण्ड देने के लिए गुजरात की तरफ भेजा। उसो महीने को चौथी तारीख को सुलतान मोहम्मद जफर खां को विदा करने के लिए होजखास पर गया और उसके पुत्र तातार खाँ को अपने पास रखफर पुत्रवत् पालन करने का वचन दिया। हिजरी सन् ७६४ (१३६२ ई०) में सनहुमन नामक ग्राम के पास जफर खाँ और मुकर्रर की मुठभेड़ हुई और इस लड़ाई में जफरखां विजयी हुमा। निजाम युद्ध में मारा गया और जफर ने पाटण में प्रवेश किया। सन् ७६५ हिजरी में खान खम्भात' की तरफ गया और मुसलमानी रीतिफे, अनुसार गुजरात को अपने आधीन कर लिया। हिजरी सन् ८०६ (ई० स० १४०३) में मुजफ्फरशाह ने तातार सां को गद्दी सौंप दी और उसको नासिरउद्दीन मोहम्मद शाह की पदवी धारण कराई । वह स्वय आशावल कमवेमें आकर रहने लगा और सव झझट छोड दिया । सुलतान मोहम्मदशाह इसी वर्ष के जमादिउल आखिर महीने में आशावल सवे में तख्त पर बैठा। एक सप्ताह बाद ही उसने नांदोल' के हिंदुओ पर चढ़ाई की और उनको हराया। फिर, उसने अपने लश्कर को साथ लेकर दिल्ली की ओर कूच किया। यह खबर सुनकर इक़वाल खां के मन में बहुत सताप उत्पन्न हुआ। परन्तु शनवान (१) समुद्गिग्न कच्छमहीषु येन डिण्डीरपाण्डूनि यशासि खंड्ग । म्फूर्जद्विपच्छोणितपइकलिप्त प्रक्षालित पश्चिमवारिंगशौ ।।३।। रा० वि० सर्ग २. (२) यस्य प्रसिद्धद्विरदविभिन्नप्राकारमोधस्फुरदट्टमाला । अद्याप्यहो नन्दपदाधिनाथा.भल्लूकवत् पल्लिवने ब्रमन्ति ।।६।। ग० वि० सर्ग २ | (३) तवारीख मोहम्मदगाही में लिया है कि फीरोज़गाह के पुत्र सुल्तान मोहम्मद को मृत्यु के बाद दिल्ली में एक बडा विद्रोह हुआ । प्रत्येक विद्रोही सरदार दिल्ली का तम्त प्राप्त करना चाहता था । इसी बीच में दिल्ली का राज्य कार्यभार एक वकील (प्रतिनिवि) के रूप में इकबाल खां के हाथ में आया । उस समय तातार खां पानीपत में था उसको जीतने के लिए इकवाल खाँ पानीपत को रवाना हुआ। तातार खां अपना सव सामान किले में रखकर लडाई के लिए तैयार हुआ और दिल्ली में घेग डाला। तीसरे दिन इकबाल खाँ ने पानीपत का किला जीतकर तातार वाँ के सामान पर अधिकार कर लिया । तातार खाँ ने गुजरात मे लश्कर लाकर दिल्ली पर चढाई करने का इरादा किया इसलिए वह अपने बाप से आकर मिला । इकबाल खाँ का वैर और दिल्ली का तस्त उसके मन से दूर न हुए । इकवाल खां भी, उससे सशङ्क रहता था । निम्नाकित पद्य में सम्भवत मल्लखान से इकबालखा का ही तात्पर्य है ।

महमूद वेगड़ा का वंश-परिचय [१३ के महीने में तातार खाँ की तबीयत एकदम बिगड़ गई और अच्छे अच्छे वैयो के दवा करने पर भी कोई फायदा नहीं हुआ। अन्त में, तातार खाँ की मृत्यु हो गई और उसका शव पाटण में लाकर दफनाया गया। . .. ....... गुजरात को हकीकत जानने वाले लोगो का कहना है कि कुछ दिखावटी मित्रो फे कहने से तातार खां ने अपने पिता जफर खाँ को कैद कर दिया था और स्वय मोहम्मद- शाहका नाम धारण करके गद्दी पर बैठ गया।.... कुछ दिनो बाद उसके पास रहनेवाले जफरखाँ के हितचिन्तको ने उसे जहर दे दिया । इसीलिए लोग उसको 'खुदाई शहीद' (The Martyred Lord) कहते है । इससे भी प्रतीत होता है कि उसकी मृत्यु स्वभाविक रूप से नहीं हुई थी। सुल्तान मोहम्मद की मृत्यु के बाद जफर खाँ फिर गद्दी पर बैठा । राज्य के नौकर चाकर सव उसके आधीन हो गए और उसने भी सवको आश्वासन दिया ।- प्राचीन इतिहास लेखको ने लिखा है कि सुलतान मोहम्मद की मृत्यु के बाद राज्य के बड़े बड़े अमीरो और अधिकारियो ने इकट्ठे होकर जफर खाँ से प्रार्थना की कि वादशाह के वंश में दिल्ली के शासन को सम्हालने वाला अब कोई नहीं रह गया है और वहाँ पर गड़बड़ी फैल रही है। गुजरात के शासन जैसे बड़े कार्य को सम्हालनेवाला आपके सिवाय अन्य पुरुष दिखाई नहीं देता है । अत समस्त प्रजा का यह मत है कि आप गुजरात का राजच्छत्र धारण करें। इससे सवको आनन्द होगा । ऐसी इच्छा रखने- वालो की प्रार्थना पर (?) वीरपुर ग्राम में हि० स० ८१० (१४०७ ई०) में सुलतान मोहम्मद की मृत्यु के तीन वर्ष और सात महीने बाद जफर खां ने राज्यछत्र धारण करके मुजफ्फरशाह नाम धारण किया । इस प्रकार सुलतान का पद धारण करने के पश्चात् मुजफ्फरशाह ने मालवा में धार के हाकिम अलपखाच (दिलावरखाँ के पुत्र) को आधीन करने के लिए चढाई की और उसकी कैद करके उसके देश का शासन नुसरत खां को सौंप दिया । - इसी बीच में खबर मिली कि जवानपुर के सुलतान इब्राहीम ने दिल्ली पर अधिकार करने की नीयत से कन्नोज के आगे लड़ाई का निशान रोप दिया है । उस समय दिल्ली के तख्त पर सुलतान मोहम्मदका पुत्र महमूद था। उसकी सहायता करने के लिए मुजफ्फर- शाह ने दिल्ली की तरफ कूच किया । यह खबर सुनकर सुलतान इब्राहिम वापस जवानपुर चला गया। सुलतान मुजफ्फर ने उसका पीछा किया और फिर अपनी उदित्वरो यस्य वभी जगत्या सहस्रभानुप्रतिम प्रताप । यो मल्लखानाख्यमुलुकमिन्द्रप्रस्थस्थमुद्वेजितवान् द्विषन्तम् ।।८।। रा०वि० सर्ग २ 1 (१) दिल्लीपुराद् गूजरदेशमेत्य दधार यो मूदिन सितातपत्रम ।।२।। रा०वि० सर्ग २ ।

१४] राजविनोद महाकाव्य राजधानी को लौट आया। उस समय यह धार के पूर्व शासक अलपक्षों को सपने साथ सेता आया था। अलपखाँ एक वर्ष तक केव में रहा । इसी बीच में उसी के एफ उमराव भूसालो ने, जो मांडू का हाकिम था, मालवे के थोड़े से भाग पर अधिकार फर लिया । इस पर मलपखां ने अपने हाय से एफ अर्जी लिखकर मुजफ्फरशाह के पास भेमी कि मेरे एक अधीनस्य उमराव ने मालवे के कुछ हिस्से पर फजा कर लिया है। यदि आप मुझे इम वैड़ियो से मुक्त करके उपकार को कैद में डाल दें तो थोड़े ही समय में मालवे पर पुन. अधिकार प्राप्त करके अपनी शेप आयु आपके गुलाम की तरह विताऊँगा । सुलतान ने उसपर कृपा करके मुक्त' ही नहीं कर दिया वरन् अपने पुत्र अहमदर्खा को लश्कर देकर सहायता के लिए उसके साथ भी भेजा ।मूसाखा में सामना करने की शक्ति कहाँ पी ? वह भाग गया और शाहजादा अलपखां को गद्दी पर विठा कर वापस आया। मुजफ्फरशाह न हिजरी सन् ८१२ (ई० १४०६) में फुम्भकोट के हिन्दुओं क विरुद्ध खुवावन्द खां की सरदारी में फौज भेजी जो विजयी होकर वापस आई। मुजफ्फरशाह को मृत्यु के विषय में तवारोस्न वहादुरशाही में इतनाही लिखा है कि सुलतान की मृत्यु हि० स० ८१३ (ई० स० १४१०) में हुई । कुछ जानकार लोग इस वृत्तान्त के विषय में इस प्रकार कहते है कि माशावल कस के कोलियों ने सुल्तान को सत्ता को स्वीकार नहीं किया और घाट बाट पर लूट पाट करने लगे । मुसरफर- शाह न एक हजार सिपाही साय देकर अहमदखां को उन्हें दबाने के लिए भेजा। अहमदखां ने शहर से बाहर निकल कर विद्वानों को बुलाया और उनसे प्रश्न किया कि 'एक शरश किसी दूसरे शख्श के बाप को विना फुसूर मार डाले तो उससे बाप के मारने का बदला लेना धर्मानुकूल है या नहीं?" सभी विद्वानो ने कहा "वदसा लेना ठोक है।" विद्वानों को यह सम्मति एक फागज पर लिखाकर अहमदखां ने अपने पास रखी। दूसरे दिन वह अपने सवारी सहित शहर में दाखिल हुमा और सुलतान को कैद करके मार डाला। सुलतान ने मरते समय अहमदखां को कुछ शिक्षाएं हों, जो इस प्रकार है "पुत्र! तुमने इतनी जल्दी क्यों को ? कुरान में लिखा है कि मृत्यु तो अन्त में आवेगो हो-एक घड़ी पहले या पीछे । मेरोइन शिक्षाओं पर ध्यान रखना । इनसे तुझे लाभ होगा। जिन लोगों ने तुझे यह काम करने के लिए उकसायाह उनसे दोस्ती मत रखमा वरन् उनको मार डालना क्योंकि दगाबाज का खून हलाल (उचित) है। शराब पीने का शौक विलकुल मत करना क्योकि शराब के प्याले में दुख के समुद्र का तूफान रहता है। (१) मुमोच बन्दीकृतमल्पखानमनल्पवीर्य बलवत्तरो य । वश्यास्ततो मालवराजवन्दिमोक्षपदास्य विरुद वन्ति ॥४॥ रा०वि० सर्ग २॥

महमूद घेगड़ा का वंशपरिचय [१५ शेख मलिक और शेर मलिक को मार डालना क्योंकि ये राज्य में खड़ा करने वाले है। तू हमेशा कृपावन्त रहना । यदि तू अपने ही सुख में डूबा रहेगा तो देश में सुख चैन नहीं रह सकेगा। गरीब दरवेशों (सन्तों) की फिकर रखना क्योकि प्रजा के बल पर ही राजा ताज धारण किए रहता है। प्रा मूल है और सुलतान वृक्ष है । हे पुत्र ! मूल ही से वृक्ष मजबूत होता है । इसलिए जहां तक हो सके वहां तक प्रजा से बिगाड़ नहीं करना चाहिए । हे पुत्र ! यदि ऐसा करोगे तो तुम अपनी ही जड़ काट डालोगे ।" इसके योड़ी ही देर बाद सुलतान इस क्षणभगुर ससार को छोड़कर चल यसा । यह घटना सफर महीने के अन्तिम दिनो में हुई । उसको पाटण शहर के किले के अन्दर कब में दफनाया गया । मुजफ्फरशाह के बाद उसका पौत्र सुलतान मोहम्मद का पुत्र अहमदशाह-- सुल्तान अहमद नासिरुद्दीन अबुलक़त अहमदशाह का पद धारण करके हिजरी सन् ८१३, तारीख १४ रमजान के महीने में गद्दी पर बैठा । उस समय उसकी आयु २१ वर्ष की थी। अहमदशाह के गद्दी पर बैठते ही उसके चचेरे भाई फीरोज खाँ ने अपना हक प्रकट किया और मडौंच में अपनेआपको सुलतान घोषित कर दिया । परन्तु अहमदशाहने कुछ समय के लिए उसके विद्रोह को दबा दिया। इसके बाद सुलतान ने आशावल ग्राम को जलवायु को अपने अनुकूल मानते हुए वहीं पर १४१२ ई० में एक नगर बसाया जो उसीके नाम पर अहमदावाद कहलाया । आशावल ग्राम भी इस बड़े नगर का ही एक हिस्सा बन गया। अहमदाबाद उसी समय से गुजरात के बादशाहो की राजधानी रहता आया है। १ मुजफ्फरशाह की मृत्यु २७ जनवरी सन् १४११ ई० को हुई । रासमाला पृ० ४३४ २ आशावल ग्राम आशा नामक भील के नाम पर बसा हुआ था। यही पर कर्ण सोलकी ने - कर्णावती पुरी वसाई थी। अलवरूनी ने भी ४ शताब्दी पूर्व येगावल नगर का जिकर किया है। ३ अहमदाबाद का कोट हि० स० ८१६ (१४१३ ई०) में बन कर तैयार हुआ था। कहते है कि इस नगर की नीव रखने में अहमद नाम के चार व्यक्तियो का हाथ था । एक, कुतुवुल मुशायख शेख अहमद खतु, दूसरा सुलतान अहमद, तीसरा शेख अहमद और चौया मुल्ला अहमद । पिछले दोनो व्यक्ति बहुत विद्वान् थे । राज विनोद में अहमदशाह द्वारा नगर बसाए जाने का कोई वर्णन नही है ।

१६] राजविनोद महाकाव्य उसी वर्ष के अन्त में फीरोज खाँ ने फिर राजगद्दी का दावा किया और मोडासा के स्थान पर अपना झण्डा खडा किया। ईडर का राव रणमल भी उसके साय हुआ परन्तु शाह ने रूपनगर स्थान पर उनको परास्त कर दिया और राव व फीरोज़ खां प्राण बचाकर पहाडियो में भाग गए। थोडे दिन बाद राव में और फीरोज खां में भी अनवन हो गई और रणमल ने उसके हाथी और घोडे छीन कर शाह को भेंट कर दिए। मालवा के सुल्तान हुशगशाह ने गुजरात के शत्रुओ को आश्रय दिया तथा इस देश पर १४११ ई० व १४१८ ई० में हमले किये परन्तु शाह ने उसको हर बार परास्त कर दिया। अहमदशाह ने भी १४१६ ई० में मालवा पर हमला किया और हुशगशाह को भागकर मांडू के किले में शरण लेनी पड़ी । १४२२ ई० में अहमदशाह ने फिर मालवा पर आक्रमण किया परन्तु वह मांडू के किले पर अधिकार करने में सफल न हुआ । हि० स० ८१७ (१४१५ ई०) में अहमदशाह को गिरनार का किला देखने को इच्छा हुई इसलिए उसने विद्रोहियोको उसी दिशा में खदेड़ा। उस समय तक सौराष्ट्र के किसी भी राजा ने मुसलमानो के आगे सिर नहीं झुकाया था इसलिए सोरत के राजा पर शेर मलिक को आश्रय देने का बहाना बना कर शाह ने उस पर आक्रमण कर दिया। हिन्दू राजा ने सामना तो किया परन्तु मुसलमानो की युद्धप्रणाली से अनभिज्ञ होने के कारण वह जल्दी ही हार गया और भाग खड़ा हुआ । शाह ने गिरनार के किले तक उसका पीछा किया । इसके बाद कुछ वार्षिक कर देना स्वीकार करलेने पर वह अहमदाबाद लौट गया। रास्ते में उसने सिद्धपुर के देवालयो को नष्ट करके बहुत सा धन व जवाहरात प्राप्त किए। गुजरात के बलशाली राजाओ के अतिरिक्त छोटे छोटे सरदारो को भी वश करने व उनसे कर वसूल करने में अहमदशाह को खूब प्रयास करना पड़ा था। ये लोग अपने अपने किलो में छुप जाते थे और जगलो में भाग जाते थे इसलिए इनसे कर वसूल करने में बहुत कठिनाई पडती थी, । अन्त में शाह ने इन पर वार्षिक कर नियुक्त कर दिए और इनकी जमीनें व किले इनको वापस कर दिये । १४२६ ई० में शाह ने फिर ईडर पर विजय प्राप्त करने की इच्छा की। वह जानता था कि ईडर के राज्य पर अधिकार रखना उसके काबू बाहर थी। वह यहाँ का किला कभी भी न ले सका था, इसलिए उसने यहाँ के रावो पर आतक जमाने के लिए हाथमती नदी के किनारे एक विशाल किला बनवाना शुरू किया। यह किला ईडरगढ पर झुके हुए पर्वत शिखरो पर से स्पष्ट दिखाई पड़ता था। बादशाह ने इसका नाम अहमदनगर रक्खा । तत्कालीन ईडर का राव पूंजा तो से की बात. १ "डगङ्गगाहे-विवामदुर्गमाक्रामता मण्डपमाग्रहेण। येनोच्चकरात्रकृपे करेण पदे पदे मालवमण्डलश्री १० स० वि मग २ महमूद वेगड़ा का वंश-परिचय [१७ - एक खड्डे में गिरकर मर गया और उसके पुत्र नारायणदास चांदी के तीन लाख टंक वार्षिक कर देना स्वीकार करके सषि करली । परन्तु दूसरे ही वर्ष १४२८ ई० में वह संधि टूट गई और अहमदशाह ने १४ नवम्बर को वह किला जीत लिया। वहीं पर उसने एक विशाल मसजिद भी बनवाई । इसके बाद (८३५ हि०, १४३१ ई०) दक्षिण के बहमनी सुलतान, सालसेट, माहिम और वम्बई द्वीप पर सुलतान ने विजय प्राप्त की। दिव, घोघा और खम्भात के द्वीप भी गुजरात के इस सुलतान के अधिकार में थे। कितनी ही बार गुजरात की विजयिनी सेना इन द्वीपो से सोने चांदी और जरकशी के कपड़े व जवाहरात लेकर घर लौटी थी।' अहमदशाह की मृत्यु ४ जुलाई सन् १४४३ ई० को अहमदाबाद नगर में हुई और उसको जामा मसजिद के सामने दफनाया गया । गुजरात के सुलतानो में अहमदशाह को बहुत प्रजाप्रिय और न्यायो सुलतान रूप में याद किया जाता है । एक कवि ने उसके लिए लिखा है कि "हे राजा ! तेरे न्यायपूर्ण समय में किसी मनुष्य को फरियाद करने की आवश्यकता नहीं पडी ।" यह कविता प्रेमी और गुणग्राहक था । अहमदशाह के बाद उसका पुत्र मुहम्मदशाह गद्दी पर बैठा । यह बहुत विलासी४ था और राजकाज में विशेष रुचि नहीं रखता था। इसमें बादशाह के पदयोग्य बुद्धि भी नहीं थी; परन्तु, वह बहुत उदार' था इसीलिए उसको लोग 'जरबख्श' कहते थे । गद्दी पर बैठते ही उसने ईडर पर चढ़ाई की । राव कुछ दिनो तक तो इधर उधर पहाड़ियो में छिपता रहा, बाद में उसने अपने अपराधो के लिए क्षमा मांग ली । १४४६ ई० में सुलतान ने चम्पानेर के रावल गंगादास पर चढ़ाई की और उसको हराकर किले में भाग जाने के लिए बाध्य किया। परन्तु, गगादासने बाद में मालवा के खिलजी सुलतान को अपनी सहायता के लिए राजी कर लिया (१) फरिश्ता । (२) इन सब घटनाओ का उल्लेख राजविनोद के इस ग्लोक मे किया गया है विभज्य दुर्गाणि निहत्य वीरान् हठान् महाराष्ट्रपति विजित्य । जग्राह रत्नाकरमारजातमनर्गलैर्य स्ववलैवलीयान् ।।१२।। रा० वि० सर्ग २ (३) कुर्वन्तु गर्व बहवोऽप्यखर्वमुझेश्वराः श्रीगुणगौरवेण । अहम्मदेन्द्रस्य जतानुरागसौभाग्यलेश न परे लभन्ते ॥१३॥ रा० वि० सर्ग २ (४) रूपश्रियैव विजित समभून् मनोभू श्रीमन्महम्मदनराधिपतेरनन । अस्य स्त्रिय. खलु जगज्जयिनोऽपि तस्य वीक्ष्यैव तत्क्षणममु विवशीवभूवु ।।१६।। रा०वि० सर्ग २. (५) रा० वि० १७,१६ सर्गः २; (६) मीराते सिकन्दरी । (७) रा० वि० १८, स० २ ३ १८] राजविनोद महाकाव्य १ तब इस नवीन शत्रु के सामने मुहम्मदशाह न टिक सका और बुरी तरह हारकर लौट गया । थोडे ही समय बाद हि० स० ८५५ (ई० १४५१-५२) के मोहर्रम मास की २०वों तारीख को उसकी मृत्यु हो गई।' मुहम्मदशाह के बाद हि० स० ८५५ (१४५१ ई०) के मोहर्रम मास की ११ वीं तारीख को उसका बडा शाहजादा कुतुबउद्दीन तख्त पर बैठा । उसी समय उसे मालूम हुआ कि राजधानी से कुछ ही मील की दूरी पर मालवा के सुलतान की सेना आ पहुंची है इसलिए आगे बढकर उसका सामना किया। मालवा के महमूद खिलजी को वापस लौटना पड़ा और कुतुब की जीत हुई । इसके बाद इन दोनो सुलतानो ने मिलकर हिन्दुओ के विरुद्ध युद्ध-योजना करते रहने की प्रतिज्ञा की और मेवाड के राणा कुम्भा के राज्य को आपस में बांट लेने का मनसूबा किया। मुजफ्फरशाह के भाई का वशज शम्स खा उस समय नागौर का स्वामी था इसलिए उसने राणा के विरुद्ध सहायता करने के लिए कुतुबशाह से प्रार्थना की। शाह ने अपनी फौजें उसकी सहायता के लिए भेजी परन्तु राणा ने उन्हें तुरी तरह हरा दिया। इस पर कुतुबशाह फिर नागौर की तरफ स्वय रवाना हुआ और मेवाड के अधीनस्थ सिरोही के राजपूतो को जीत लिया। फिर वह पहाड़ी मार्ग से कुम्भलमेर के किले की ओर बढ़ा परन्तु बीच ही में राणा ने उस पर आक्रमण कर दिया। इसके बाद राणा में और कुतुबशाह में सन्धि हो गई। अव, मालवा के सुलतान कुतुबशाह को फिर भड़काया और चम्पानेर के स्थान पर राणा के राज्य को आपस में बांट लेने की सधि पर हस्ताक्षर किए। दूसरे वर्ष, कुतुबशाह ने फिर आवूगढ को जीत लिया। वहां कुछ फौज छोडकर वह सिरोही पहुंचा और एकबार फिर राणा से सधि हो गई। अगले वर्ष १४५८ ई० में राणा ने फिर नागौर पर चढाई की । बहुत देर करके कुतुबशाह उसका सामना करने के लिए रवाना हुआ और जय प्राप्त करता हुआ कुम्भलमेर की तरफ बढ़ा परन्तु उसको बीच ही में रुकना पड़ा । इसके थोडे ही दिनो वाद वह अहमदावाद लौट गया और मर गया । कुतुबउद्दीन के बाद हिजरी सन् ८६३ (१४५८-५९) के रजब महीने की २३ वीं तारीख को अहमदशाह का पुत्र दाऊद गद्दी पर बैठा । परन्तु वह विलकुल अयोग्य 3 इसलिए गुजरात के अमीरो व उच्च राज्याधिकारयो ने निर्णय किया ने । सिद्ध हुआ (१) गसमाला (२) अथवा उसको जहर दे दिया गया । देखो रासमाला, मीराते सिकन्दरी, तवारीख अहमदशाही । ३ राजविनोद में कुतुबुद्दीन और दाऊद का कोई वर्णन नही है । दाऊद का नाम न होने का तो कारण स्पष्ट है क्योकि उसने केवल ७ ही दिन राज्य किया परन्तु कुतुबुद्दीन ने तो८ वर्ष के लगभग राज्य किया था और मेवाड के राणा व मालावा के सुलतान से युद्ध करके उसने कीर्तिलाभ भी किया था । अन्य हिन्दू एव मुसलमान इतिहासकारो ने उसका उल्लेख किया है । इसका कारण यह प्रतीत होता है कि कुतुबुद्दीन फतहखाँ महमूद वेगड़ा का वंश-परिचय [१९ कि मुहम्मदशाह के पुत्र फतहखाँ को गद्दी पर बिठाना चाहिए क्योकि उसमें बादशाह होने के गुण भी पाए जाते है और आकृति में भी वह भव्य है । फतहखाँ महमूदशाह के नाम से हि० स०८६३ (१५१० ई०) के शअबान मास की पहली तारीख, रविवार के दिन अहमदाबाद में तख्त पर बैठा । उस समय उसकी अवस्था तेरह वर्ष की थी। यही महमूदशाह आगे चल कर महमूद बेगड़ा के नाम से प्रसिद्ध हुआ और यही राजविनोद काव्य का चरित्र-नायक है। तख्त पर बैठने के थोडे ही दिन बाद कुछ अविचारशील सरदारो ने वजीर ईमादउल मुल्क के साथ झगड़ा करके उसको मार देने का षड्यन्त्र किया। परन्तु, सुलतान ने धीरज और चतुराई से ऐसी व्यवस्था की कि सब विद्रोह शात हो गया और इसके बाद में वजीर के विरुद्ध सर उठाने की किसी भी सरदार की हिम्मत न पड़ी। सन् १४६७ ई० में महमूद ने सोरठ पर चढ़ाई की परन्तु इस बार उसको विशेष सफलता नहीं मिली इसलिए उसने बहुत से जवाहरात और नकदी की भेंट लेकर राव से शत्रुता बन्द कर देने की आज्ञा दे दी। (महमूद वेगाडा का पहला नाम) का सौतेला भाई था और शुरू से ही उससे द्वेष रखता था । फतह खाँ की माता सिन्ध के बादशाह जाम जानु- हन की पुत्री थी। उसका नाम वीवी मुधली था। उसकी दूसरी वहन वीवी मिरची थी। पहले उनके पिता ने बीबी मिरधी की शादी गुजरात के सुलतान मुहम्मदशाह के साथ और मुघली की हज़रत कुतुवुल आफनाव के पुत्र हजरत शाह आलम के साथ करने का निश्चय किया था। परन्तु वीवी मधुली अधिक सुन्दरी थी इसलिए मुहम्मदशाह ने अपनी सत्ता और द्रव्य के दवाव से उसकी शादी अपने साथ करवाली। वीवी मिरची का विवाह हजरत शाह आलम के साथ हो गया । मुहम्मदशाह की मृत्यु के बाद कुतुबुद्दीन के व्यवहार से असन्तुष्ट होकर मुघली अपने पुत्र फतह खाँ को लेकर शाहआलम के आश्रय में आकर रही। कुछ समय बाद बीवी मिरधी की मृत्यु हो गई और मुधली ने शाहआलम के साथ पुनर्विवाह कर लिया। इस प्रकार फतहखा का पालनपोषण व शिक्षा दीक्षा हज़रत शाह आलम ही ने किया । वीवी मुधली ने अपनी सेवाओ से प्रसन्न करके उनसे फतहखाँ के लिए गुजरात के तख्त का वरदान भी प्राप्त कर लिया था । कुतुवखा ने कई बार फतह खाँ को मार देने के प्रयत्न किए परन्तु हज़रत ने उसकी हर बार रक्षा की। राजविनोद महमूद की प्रशस्ति मे उसके आश्रित कवि द्वारा रचा हुआ काव्य है अत इसमें कुतुव का उल्लेख जानबूझ कर नही किया गया है । कविने तो यहा तक किया है कि कुतुबुद्दीन ने राणा कुम्भा पर जो विजय प्राप्त की थी उसका श्रेय भी अपने वर्णनीय आश्रयदाता महमूद को ही दे दिया है । वास्तव में राणा कुम्भा और महमूद बेगडा में किसी युद्ध का होना इतिहास में नही पाया जाता है । (सं) (१) मीराते सिकंदरी (२) रासमाला । 1 २०] राजविनोद महाकाव्य परन्तु, इससे उसको सतोष नहीं हुआ और वह फिर गिरनार पर हमला करने का बहाना ढूंढने लगा । दूसरे ही वर्ष उसे बहाना मिल भी गया । राव माण्डलिक राजचिन्हो को धारण किए हुए किसी मन्दिर में पूजा करने के लिए गया । जव महमूद को यह समाचार मिला तो उसे वह सहन नहीं कर सका और तुरन्त चालीस हजार फौज लेकर राव को शिक्षा देने के लिए रवाना हो गया। राव में इतनी सामर्थ्य नही थी कि वह मुसलमानो का सामना करता इसलिए उसने मुंहमांगा कर दे दिया और राजचिह्न भी सुलतान को भेंट कर दिए। परन्तु, यह सब व्यर्थ हुमा और परम शूरवीर पृथ्वीराज चौहान का यह कथन कि 'एक बार उडाई हुई मक्खी की तरह शत्रु भी फिर फिर कर वापस आता है' उस पर ठीक ठीक लागू हो गया। उसी वर्ष के अन्त में महमूद ने सोरठ पर फिर चढाई कर दी। राव ने अपनी प्रजा को सकट से बचाने के लिए फिर मुंहमांगा धन देना चाहा परन्तु महमूद ने उसे इसलाम धर्म स्वीकार करने के लिए वाध्य किया। राव ने कुछ उत्तर न देकर किले के दरवाजे बन्द कर लिए और महमूद ने घेरा डाल दिया । अन्त में, राव ने देखा कि उसके दुःखों का अन्त नहीं है तो उसने किले की चाबियां सुलतान को सौंप दी और उसके कहने के अनुसार कलमा पढ लिया। (१४७० ई०) इस विजय के अनन्तर महमूद ने विभिन्न प्रांतो से बहुत से सय्यदो और विद्वानो को सोरठ में बसने के लिए बुलाया और एक नगर भी बसाया । इस नगर का नाम मुश्तफाबाद पड़ा । कहते हैं, यह नगर बहुत जल्दी ही तैयार होकर राजधानी की समानता करने लगा था । वर्ष का कुछ भाग महमूद यहीं विताता था। ។ जब वह इस नए नगर के भवनो का निरीक्षण कर रहा था उसी समय यह समाचार मिला कि कच्छ के निवासयिो ने गुजरात पर आक्रमण कर दिया है इसलिए वह उधर चढ़ चला और बहुत जल्दी ही उनको अपनी आधीनता स्वीकार करने के लिए बाध्य कर लिया। इसके अनतर महमूदशाह ने सिन्ध के जाटो और बलूचियो पर चढाई की और सिन्धु नदी तक देश के अतरग में घुसता चला गया। ये घटनाएं ई० स० १४७२ में हुई। सिन्ध की चढ़ाई के बाद महमूद ने जगत (द्वारका) और शङ्खोद्धार (बेट) द्वीप के सरदारो पर चढाई की। इसका कारण यह बतलाया जाता है कि मौलाना मोहम्मद समरकन्दी ने सुलतान के पास आकर द्वारका व बेट द्वीपके ब्राह्मणो की शिकायत की और महमूद ने उधर चढाई कर दी। उसने द्वारका की बहुत सी (१) मीराते सिकन्दरी के लेखक का कहना है कि रावने सुलतान के कहने से इसलाम धर्म स्वीकार नहीं किया था वरन् एक फकीर का चमत्कार देखकर ऐसा किया था। उसे यह वोध देने वाले रसूलाबाद के पीर शाहआलम थे । (२) कॉमिसरियट-हिस्ट्री आफ गुजरात, भा० १ (१९३८), पृ० १३० - महसूद वेगड़ा का वंश-परिचय [२१ १ इमारतो व मूर्तियो को तुड़वा दिया। इसके बाद वहीं एक मसजिद बनवाने के विचार से चार महीनो तक फौज को रोके रहा । तदनन्तर, राजोद्धार द्वीप पर चढ़ाई की। वहाँ के राजा भीम ने २२३ वार युद्ध किया परन्तु अन्त में महमूद का बेड़ा पार उतर गया और वहुत से राजपूत मारे गए । एक छोटीसी नाव में बैठकर भागता हुआ भीम पकड लिया गया और अहमदाबाद में लाकर मार दिया गया। सन् १४७६ ई० की बरसात मे सुलतान अहमदाबाद की तरफ गया और शरद ऋतु में मुश्तफावाद आकर रहने लगा । वहीं आस पास के जगलो में वह शिकार के लिए निकलता था । कुछ दिनो बाद वह फिर अहमदावाद आ गया। एक बार वह शिकार खेलता हुआ अहमदाबाद से ईशानकोण में बारह कोस की दूरी पर वात्रक नदी तक जा पहुंचा। वहाँ उसे ज्ञात हुआ कि लोग जभी तभी लूट पाट कर लेते है इसलिए उसके मन में विचार आया कि इस स्थान पर एक नगर बसाया जावे और उसका नाम महमूदाबाद रक्खा जावे। उसी समय नगर की नींव रख दी गई और बहुत जल्दी ही वह बन कर तैयार हो गया। इसके बाद ही हि० स० ८८५ (ई० स० १४८०) में कुछ मुसलमान सरदारो ने महमूद को पदभ्रष्ट करके उसके पुत्र अहमद (मुजफ्फर) को तख्त पर बिठाने का षड्-यन्त्र रचा । सुलतान ने उनका ध्यान बटाने के लिए चम्पानेर पर चढ़ाई करने के विषय में उनसे मत्रणा की। परन्तु, वे उसकी बातो में न आए । अतः चम्पानेर की चढ़ाई कुछ समय के लिए स्थगित रही। बाद में १४८२ ई० में उसने फिर चम्पानेर पर आक्रमण करने की तैयारयां की। परन्तु, उसी समय उसका ध्यान सूरत के दक्षिण में बलसाड़ के जहाजियो की ओर गया जिनका प्रभाव इतना बढ़ गया था कि वे केवल व्यापार ही नहीं करते थे प्रत्युत उनकी ओर से उसके राज्य पर भी हमला होने की आशंका होने लगी थी । महमूद ने खम्भात में एक बेडा इकट्ठा किया जिसमें तीरदाज व बन्दूकें तथा तो चलाने वाले सभी लोग थे । यह वेडा जहाजो में चढ़कर रवाना हुआ । शत्रुओ के पैर उखड़ गए और सुलतान के बेड़े ने उसका पीछा देर युद्ध होने के बाद मल्लाह और उनके वाहन पकड़ लिए गए। इसी वर्ष के अन्त में उसने चम्पानेर पर चढाई कर दी। हिजरी सन् ८८७ (१४८२ ई०) में समस्त गुजरात व चम्पानेर में वर्षा बहुत कम हुई थी। उसी समय सुलतान की फौज का विशेष अफसर मलिक असद अपने लश्कर के साथ चम्पानेर दुर्ग के पास जा पहुंचा। रावल ने भी किले से किया। कुछ वे (१) द्वारका और बेट द्वीपो पर महमूद ने हि० स० ८७८ (ई० स० १४७३) मे विजय प्राप्त करके मलिक तोघान को वहाँ का सूवेदार नियुक्त किया और उसको 'फरहतउल मुल्क' का अलकाव दिया । वेट का राजा भीम १४७५ में मौलाना समरकन्दी के कहने के अनुसार नगर में चारो तरफ घुमाकर टुकडे टुकड़े करके मार दिया गया (मीराते सिकन्दरी), २२] राजविनोद महाकाव्य बाहर आकर युद्ध शुरू किया। मलिक की हार हुई और सरकारी हायी, कुछ घोड़े- और सभी सिपाही मारे गये । यह खबर सुनकर सुलतान को बहुत क्रोध आया और उसने चम्पानेर पर पूर्ण विजय प्राप्त करने का निश्चय किया। जव चम्पानेर के रावल ने सुना कि महमूद उसपर हमला करने आ रहा है तो पहले तो वह आवेश में आकर निकल पडा और सुलतान के मुल्क में आग लगाने लगा व मार काट करने लगा। परन्तु, फिर कुछ सोच विचार कर उसने सन्धि का प्रस्ताव कर दिया । महमूद किसी भी शर्त पर सन्धि करने को राजी न हुमा और अन्त में मुसलमानी सेना ता० १७ मार्च १४८३ ई० को काली के पर्वत की तलहटी में जा पहुंची। रावल ने एक बार फिर सन्धि के लिए प्रार्थना की परन्तु उस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया । अन्त में उसने पूर्ण साहस के साथ सामना करने का निश्चय किया। मुसलमानी सेना ने घेरा डाल दिया और राजपूतो ने उन पर आक्रमण चालू कर दिए। कई वार मुसलमानो के छक्के छूट गए परन्तु अन्त में विवश होकर रावल को अपने पुराने सहायक मालवा के सुलतान गियासुद्दीन से सहायता मांगनी पड़ी और वह उसका साथ देने के लिए रवाना भी हो गया। परन्तु, इतने ही में महमूद ने उस पर चढ़ाई कर दी और वह समय अनुकूल न देखकर मालवा लौट गया। महमूद भी अपने घेरे पर चम्पानेर लौट आया । अपना घेरा चालू रखने का आशय जानते हुए सुलतान ने वहीं एक मसजिद बनवाई और सुदृढ घेरा डाल दिया । अन्त में सुसलमान लोग किले के इतने नजदीक पहुंच गए कि उन्हें उस गुप्त मार्ग का भी पता चल गया जिससे राजपूत लोग नहाने-धोने व पानी आदि लेने के लिए बाहर आया करते थे। इसके बाद उन्होंने किले की पश्चिमी दीवार तोड़ डाली और उस मार्ग पर अधिकार कर लिया । यह घटना सन् १४८४ ई० के १७ नवम्बर को है । अव किले पर गोलावारी शुरू हुई और उधर राजपूतो ने जौहर की तैयारियां की । चिता तैयार हुई और उसमें रानियां, दासियां, धन दौलत आदि सभी कुछ स्वाहा हो गए २ । इसके बाद पावागढ़ के रक्षक राजपूत केसरिया वस्त्र पहन कर बाहर आए और रणभूमि में मृत्यु प्राप्त की । चम्पानेर का रावल और उसका प्रधानमत्री डूगरशी जीवित पकड लिए गए । महमूद ने अपनो विजय के स्मारक-स्वरूप वहीं महमूदाबाद नामक नगर बसाया । रावल और डूंगरशी के घाव अच्छे होने पर उन्हें इसलाम धर्म (१) रावल गगादास का पुत्र जयसिंह, फरिश्ता ने इसका नाम बेनीराय लिखा है। हिन्दू दन्तकथाओ में यह 'पताई रावल' के नाम से प्रसिद्ध है। (देखो रा० व० गो० ही० ओझा कृत मेवाड का इतिहास )। (२) राजविनोद में पावक गिरिका यह वर्णन महमूद के पिता महम्मद के समय में होना बताया गया है- "यस्य प्रतापभरपावकसगमेन दग्धस्य पावकगिरे शिखरान्तरेषु । प्रेक्षन्त जर्जरसुधाविधुराणि भस्मराशिप्रभामि रिपवो निजमन्दिराणि ।। रा०वि० सर्ग २ १८ महमूद वेगड़ा का वंश-परिचय [ રરૂ ग्रहण कर लेने को कहा गया परन्तु उन्होने अस्वीकार कर दिया । इस पर सुलतान ने उनको मरवा दिया। भाट ने इस घटना का वर्णन इस प्रकार किया है :- सवत् पंदर प्रमाण, एकतालो संवत्सर, पोस मास तिथि त्रीज, बढ़ेहु वार रवि सुदन; मरशिया पद्भप, प्रथम वेरसी पडीजे, जाडेचो सारंग, करण,, जेतपाल कहोजे । सरवरियो चन्द्रभाण, पताह काज पिंडज दियो । महमुदावाद मेहराण, लघु कटक सर पावो लियो । सन् १४६४ ई० में दक्षिण के बहमनी राज्य के विद्रोही बहादुर गिलानी नामक सरदार ने गुजरात के कुछ व्यापारिक जहाजो को लूट कर माहिम द्वीप पर अधिकार कर लिया। महमूद ने उसके विरुद्ध जल व स्थल सेनाए भेजी और बहमनी के सुलतान के पास भी एक ऐलची द्वारा पत्र भेजा । उसने तुरंत शिलानी पर चढाई करदी और उसे पक्ड कर मार डाला । गुजरात के मनुष्यो व वाहनो को मुक्त करके वापस भेज दिया गया । दूसरे वर्ष महमूद ने बागड और ईडर' पर चढाई की और वहां के राजाओ से भारी भेट वसूल करके महमूदावाद (चम्पानेर) लौटा । सन् १५०७ ई० में महमूद फिर हमारे सामने जल-सेनापति के रूप में आता है । कुछ यूरोप निवासियो ने समुद्र पर अधिकार जमा रक्खा था और गुजरात के किनारे बस जाने की इच्छा से कुछ बन्दरगाहो पर कब्जा कर लिया था । तुर्की बादशाह बजाजत द्वितीय का जहाजी कप्तान पन्द्रहसौ आदमियो का वेडा लेकर गुजरात के किनारे आ पहुंचा । उधर महमूद व उसके अन्य सेनापति भी आ पहुंचे । इस लड़ाई में मुसलमानो की विजय हुई और पुर्तगालियो का झण्डेवाला जहाज, एडमिरल डॉन लारेजो अलमीड़ा व १४० मनुष्य नष्ट हुए । सन् १५१० ई० में महमूद पाटण गया। यह उसकी अन्तिम यात्रा थी। उसने वहाँ के बड़े बडे आदमियों को बुलाकर उनमे भेंट की। फिर वह अहमदाबाद लौट आया और तीन महीनो तक बीमार रहा । इसी बीच में उसने अपने पुत्र खलील खाँ को बुलवाया और उसकी अतिम सलाम लेकर हिजरी सन् ६१७ (१५११ ई०) के रमजान महीने की तीसरी तारीख सोमवार को वह इस असार संसार को छोड़कर चल बसा । उसे सरखेज में दफनाया गया था जहां पर उसकी कन्न अब तक मौजूद है । (१) उस समय ईडर पर राव भान का पुत्र सूरजमल राज्य करता था । (२) मीराते अहमदी । फरिश्ता ने लिखा है कि उसकी मृत्यु हि० स० ६१७ के रमज़ान महीने की दूसरी तारीख मगलवार को हुई थी। उस समय उसकी आयु ७० वर्ष ११ महीने की थी। उसने ५५ वर्ष १ महीना और दो दिन राज्य किया ।

२४] राजविनोद महाकाव्य अहमदावाद के सुलतानो में महमूदशाह, यदि सबसे महान नहीं तो अत्यन्त लोकप्रिय अवश्य हुआ है । जैसे हिन्दू सम्माट सिद्धराज के विषय में कितनी ही किम्बदनियाँ और अद्भुत कथाएं प्रचलित है वैसे ही इसके विषय में भी कितनी ही वातें प्रसिद्ध है । महमूद की शारीरिक गठन, शूरता, बल, न्याय, परोपकार, इसलाम पर दृढ आस्था, नियम पालन में दृढता और विचारशक्ति की श्रेष्ठता का समानरूप से वखान हुआ है । उसकी 'वेगडा' उपाधि के बारे में कुछ लोगों का कहना है कि जिस बैल के सींग दाए बाए लम्बे (एक आदमी दूसरे से मिलते. समय हाय वढाए इसतरह) हो उस बल को हिंदी में बेगडा कहते है। सुलतान की मूछे इसी तरह की थी इसलिए लोग उसे वेगड़ा कहते थे । दूसरा मत यह है कि सुलतान महमूदने जूनागढ और चम्पानेर के दो किले जीते थे इसलिए वह (वे-दो; गढा-किला) वेगड़ा (दो किलो का विजेता) कहलाता था।' कहते कि, वह बहुत खाने वाला था और इतने बड़े राज्य का स्वामी और राजवैभव में रहनेवाला होने पर भी उसकी जठराग्नि बहुत प्रबल थी । वह फला प्रेमी था और इमारतो का उसे बहुत शौक था। गुजरात को मुसलमानी इमारतो में से अधिकाश के साथ महमूद वेगडा का नाम सम्बद्ध है । 'मुश्तफाबाद और महमूदाबाद (चम्पानेर) के अतिरिक्त वात्रक नदी के किनारे उसने अपने नाम से एक और शहर बसाया था जिसके चारो ओर कोट खिचवाकर अच्छी अच्छी इमारतें बनवाई थीं । इसी नदी के किनारे पर उसने एक उत्कृष्ट महल बनवाया था जिसके अवशिष्ट अब तक वर्तमान है । वह इन्हीं तीन नगरो में से एक में प्राय. बना रहता था परन्तु गरमी के दिनो में जब मतीरे (तरबूज) पक जाते है तब अहमदावाद अवश्य जाता था। मीराते अहमदी के कर्ता ने आगे चलकर लिखा कि गुजरात देश में जितने शहरो, कसवो और गांवो में फलो के पेड है वे सव महमूद के समय में लगाए हुए है। मीराते सिकन्दरी में लिखा है कि अपनी बीमारी की अवस्था मे उसने फरमाया कि शाहजादा खलील खा को बुलाओ। परन्तु, वह आकर पहुचा इससे पहले ही हि० म० ६१७ के मवारक रमजान महीने में सोमवार के दिन दोपहर की नमाज़ के वस्त इस फानी दुनिया को छोड कर अनन्त धाम के लिए विदा हो गया।. उसकी उम्र ६७ वर्प और तीन महीने की थी। कॉमिसरियट-हिस्ट्री आफ गुजरात भा० १ पृ० २०७ में लिखा है कि उसकी मृत्यु २३ नवम्बर १५५१ ई० को हुई । उस समय वह अपने ६७ वें वर्ष में था। (१) फरिश्ता । (२) मीराते अहमदी (१८५६ ई०). (३) गावोट कुटजैश्च शाल्मलिवनश्च्छन्नाश्च या भूमय- स्तत्राशोकरसालबाल-वकुलै रम्या कृता. वाटिकाः। आमाताः किटिकोटिमकंटकुलैहय क्षयश्च या- स्तयानेन पुराणि पुण्यजनतापूर्णानि क्लुपतानि च ।। २४ ॥ रा वि सर्ग । उस समय 1 महमूद वेगड़ा का वंश-परिचय [२५ । . जहाजी लड़ाइयाँ लडने के कारण उसकी प्रसिद्धि यूरोपीय देशो तक फैल गई थी। मिस्टर एल्फिन्स्टन ने लिखा है कि इस वादशाह क विषय में तत्कालीन प्रवासियो के बड़े भयानक विचार थे । Bartema ( वाटिमा ) और Barbosa ( वार्वोसा ) दोनो ही में उसका विस्तारसहित वर्णन किया गया है। एक यात्री ने उसके शरीर को बनावट के विषय में भयकर वर्णन लिखा है । उसके असाधारण मात्रा में भोजन करने और उसके शरीर में विष होने के बारे में दोनो ही लेखक सहमत है । विषला भोजन करते करते उसके शरीर में इतना विष फैल गया था कि यदि कोई मक्खी उडती उउती आकर बैठ जाती तो तुरन्त मर जाती थी। सत्तावान् मनुष्यो को दण्ड देने की उसकी साधारण रीति यह थी कि पान खाकर उन पर पीक की पिचकारी मार देता था। दरलर ने खम्भात के राजा की बात" लिखी है जिसमें उसका नित्य का भोजन दो जहरी साँप और एक जहरी मेंढक लिखा है। मीसते सिकन्दरी में लिखा है कि साधारण भोजन के अतिरिक्त १५० सोन केले व गुजराती तौल का सवा मन रायता उसके नित्य के भोजन में सम्मिलित थे। रात को सोते समय दो बडे बड़े भगोने पूओं व बडे भुजियो के भरे हुए उसके पलग के दोनो ओर रख दिए जाते थे। जब तक नींद न आती वह इधर उधर करवट लेकर उनको खाता रहता था। वीचमें नींद खुलजाने पर भी वह उन्हें खाने लगता था । वह प्रायः कहा करता था कि यदि वह वादशाह न होता तो उसकी जठरान्ति किस प्रकार शान्त होती? मीराते सीकन्दरी में इस सुलतान के चरित्र एव राज्य-प्रबन्ध के विषय में जो विवरण लिखा है वह इस प्रकार है- "यहां यह बात प्रकट करना है कि यह सुलतान गुजरात के सुलतानो में सब से उत्तम था । न्याय में, धर्म में, संग्राम में, इसलाम धर्म के नियमो का पालन करने में, बाल्य, यौवन, और वृद्धावस्था में सदैव एकसार उत्तम बुद्धि रखने में, शारीरक सामर्थ्य में और उदारता में अद्वितीय था । इतने बड़े राज्य वैभव और महान् देश का स्वामी होते हुए भी उसकी पाचन-शक्ति बहुत प्रवल थी। (इसके राज्य में) "गुजरात देश में एक नई स्फूति आई जो कितने ही समय पूर्व तक न आई थी । सेना सुव्यवस्थित थी और प्रजा निरुपद्रव थी। साधु-सन्त स्थिर चित्त से भजन में व्यस्त रहते थे और व्यापारी अपने व्यापार और लाभ से प्रसन्न थे । देश में सर्वत्र शान्ति थी और चोरो का भय नहीं था । सोने की थैली लिये हुए अकेला आदमी पूर्व से पश्चिम तक घूम आता है । हे सम्राट । तेरे भय से ससार को सभी दिशाएं निर्भय है । इस प्रकार किसी को पुकार करने की आवश्यकता हो न पड़ती थी।" "सुलतान की आजा थी कि कोई अमीर अथवा सैनिक अधिकारी युद्ध में मारा जाय वा स्वाभाविक रीति से मर जाय तो उसकी जागीर उसके पुत्र को दी राजविनोद महाकाव्य जाय, यदि उसके पुत्र न हो तो जागीर का आधा भाग उसको पुत्री को दे दिया जाय, यदि पुत्री भी न हो तो उसके आश्रितो के लिये ऐसा प्रबन्ध कर दिया जाय कि उनको जीवन-यापन में किसी प्रकार का कष्ट न मिले । कहते हैं कि एक बार एक मनुष्य ने आकर कहा कि अमुक अमीर मर गया है और उसका पुत्र उस पद के योग्य नहीं है। सुलतान ने कहा कि वह पद उस लडके को अपने योग्य बना लेगा । इसके बाद ऐसी बातो में किसी को कुछ कहने का साहस न पडा । इस सुलतान के समय में प्रजा सुसी थी इतफा कारण यह या फि अकारण ही अत्याचार करके किसी जागीरदार को जागीर नहीं छीनी जाती थी और सरकार द्वारा निश्चित लगान ही ले लिया जाता था। जब सुलतान महमूद शहीद के समय में कार्यकर्ता मस्त्रियों ने देश की उपज को तपास को तो ज्ञात हुमा कि उस समय देश में पहले से दशगृनो उपज अधिक होने लगी थी और गावों में कोई भी किसान निर्वद नहीं था। व्यापारियो को लुटेरो को कोई चिन्ता न थी क्योकि व्यापार के सभी मार्ग सुरक्षित थे और सुलतान के राज्य में चोर को उत्पत्ति हो न होती थी। साधु-सन्त शान्ति से रहते थे क्योकि सुलतान स्वय इस मान्य वर्ग का शिष्य एव भवत था। वह प्रति वर्ष इनको जागीरें बढ़ाता रहता था और इसके अतिरिक्त भी सन्तों को इच्छानुसार उन्हें अनुदान दिया करता था। यात्रियों के लिये उसने वडी-बड़ी धर्मशालाएं वनवाई और स्वर्ग के समान सुन्दर पाठशालाओ तथा मसजिदों का निर्माण कराया । सुलतान बडा न्यायो था और उसके राज्य म किसी को हानि पहुचाने का किसी का साहस न होता था। उसके विषय में एक कविता में लिखा है कि "अपराधियों पर तुम्हारा ऐसा आतङ्क छाया हुआ है कि कोई कबूतर पकड़ने के लिये बाज नहीं छोड़ सकता है। छोटे बड़े सभी वर्गों के लोगों का मत है कि महमूद वेगड़ा जैसा बादशाह गुजरात में पहले नहीं हुआ और न्याय में तो उस के बाद भी कोई समानता न कर सका । उसने जूनागढ़ का किला, सोरठ देश, चौपानेर का किला तथा और आसपास फे प्रदेशों को जीतकर वहां पर हिन्दू रीति-रिवाजों को नष्ट कर दिया और इसलामी रोति-रिवाजो को प्रचलित किया, इसलिये कयामत तक जो भी कार्य इन प्रदेशों में होंगे वे उसी के नाम लिखे जावेंगे। उसका पौत्र बहादुरशाह यद्यपि देश जीतने में उससे बढ़ कर हुआ तथापि अनुभव में वह सुलतान महमूद को नहीं पा सकता था। सुलतान तो इन दोनो ही बातो में बढ़ कर था। "युवा प्रतिभाशालो और भाग्यवान वह ऐसा था कि वैभव में युवक और युक्ति प्रयुक्ति में प्रौढ़ था।" - . "जिस समय यह सुलतान यहां राज्य करता था उसी ममय खुरासान में सुलतान हुसेन मिर्जा राज्य करता था और बेनमुन वजीर मीरअली उसके प्रधान मंत्री महमूद वेगड़ा का वंश-परिचय [२७ - है। के पद पर सुशोभित था। मुल्ला तथा मनोहर काव्यकर्ता के स्थान पर मौलाना जामी प्रतिष्ठित थे जो ईश्वरीय मार्ग एवं मोक्ष प्राप्ति के परम साधन ज्ञान में अनुभवी थे। उसी समय दिल्ली के तख्त पर सुलतान सिकन्दर दहलोल लोदी विराजमान थे । उनके वजीर परम बुद्धिमान और दूरदर्शी जीयान बहलोलखां लोदी थे। उसी समय मांडू के तख्त पर सुलतान महमूद खिलजी के पुत्र सुलतान गयासुद्दीन बैठे थे जिनके शासन और उदारता की ख्याति चारो ओर फैल रही थी। उसी समय दक्षिण की गद्दी पर सुलतान महमूद वहमनी वर्तमान था । सक्षेप में यह कहा जा सकता है कि कितने ही वर्षों बाद सुलतान महमूद गजनवी की मात्मा सुलतान महमूद बेगड़ा के रूप में अवतार लेकर आ गई थी क्योकि उसके सभी कार्य उतने ही प्रतिष्ठित थे जितने कि उस महान् सुलतान के थे।" "कहते है कि जिस दिन सुलतान महमूद गद्दी पर बैठा उस दिन उसके जमाई खुदावन्द खां ने लो बड़ा विद्वान और वक्तृत्व कला में निपुण था, सुलतान के हाथ में दीवान हाफिज को पुस्तक देकर शकुन देखने के लिये प्रार्थना की। ज्यों ही सुलतान ने पुस्तक खोली अनायास उसमें इस भाशय की कविता निकली "अरे जिसके शरीर पर वादशाही का जलवा आ रहा है और जिसके नमूने के दो मोतियो से वाद- शाही झलक रही है।" "इस सुलतान के राज्य में कभी अनाज महंगा नहीं हुआ। प्रत्येक चीज सस्ते मूल्य पर प्राप्त होती थी। गुजरात के लोगों का कहना है कि गुजरात में ऐसी सस्ताई कभी नहीं देखी थी। चगेजखां मुग़ल की तरह इसकी सेना ने भी कभी पराजय का अनुभव नहीं किया था। सदा नई-नई विजय इसको प्राप्त होती थी। सुलतान ने एक आदेश जारी किया था कि सेना के आदमियो में से कोई ऋण न ले उनके लिये सरकारी फर का कोई अंश अलग निर्धारित करके रख दिया जाता था जिसमें से सिपाही लोग आवश्यकतानुसार रकम उधार लेते थे और वापस जमा करा दिया करते थे। इस प्रबन्ध से व्यापारी लोग अवश्य ही कुछ सकट में पड़ गये थे और इसलिये वे उसकी आलोचना करते हुये उसे बुरा कहा करते थे। सुलतान वारम्बार कहा करता था कि जो मुसलमान व्याज खाता है वह धर्म-युद्ध में नहीं टिक सकता। इसी कारण परमात्मा उसे युद्ध में विजयी करता था।" "ईश्वर की कृपा से गुजरात में आम, अनार, रायण, जामुन, नारियल, बैल और महुआ आदि के अनेक जाति के पेड प्रचुरता से मिलते है वे सब इसी महाप्रतापी सुलतान के सत्प्रयत्नों के फल है । प्रजा में जो कोई अपनी भूमि में पेड़ लगाता था उसको सहायता दी जाती थी । इसी कारण जनसाधारण में बागों की रचना करने व पेड़ लगाने की प्रवृत्ति बढ़ गई थी। इस सम्बन्ध में कहा जाता है कि सड़क पर या किसी झोपड़ी के आगे लगाया हुआ पेड़ देख कर सुलतान २८] राजविनोद महाकान्य अपने घोड़े को रोक लेता और पेड़ लगानेवाले से पूछता कि इस वृक्ष को पानी कहां से लाकर पिलाते हो। यदि वह पानी का स्थान कहीं दूर पर बतलाता तो सुलतान कृपापूर्वक वहीं कुंआ खुदवा देता और पेड़ बड़ा होने पर लगानेवाले को इनाम देता। फिरदौस बाग जो ५ कोस लम्बा और १ कोस चौडा है इसी सुलतान का लगवाया हुआ है । शावान वारा भी जो स्वर्ग को समानता करता है इसी के समय में तैयार हुआ था। इसी प्रकार जब वह किसी खाली दुकान या मकान को देखता तो वहां के अधिकारी या नौकरों से इसका कारण पूछता और तुरन्त ही उसको आवाद करने का प्रवन्ध करता था। इस प्रकार 'जो दाखिल होता है वह सही सलामत है' इस कुरान, की आयत के अनुसार प्रजा उसके राज्य में सुखी थी।' - अनेक लड़ाइयों में विजयलाभ प्राप्त करने से उसको वीरता व भवनो तथा वान बगीचो से उसके कला-प्रेम का तो परिचय मिलता ही है, परन्तु कवि उदयराज विरचित प्रस्तुत राजविनोद काव्य से उसके चरित्र का एक और पहलू भी सामने आता है (जिसको प्रायः हमारे इतिहासकार विशेष महत्त्व नहीं दिया करते है); वह यह है कि वह कविता प्रेमी भी था। अवश्य ही, कट्टर मुसलमान होते हुए भी, संस्कृत में निगुम्फित उसके इस यशोगान ने उसके मूलतः हिन्दू हृदय को परम सन्तोष प्रदान किया होगा। resor- वितरतिशः साना - सानुमायुत चलदामथकोटाभकमृदसा राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला प राजवि तानियोगायधनकाई दाद मदोत्यायोदयराडोनाशा नियावदनवायावचन्नप्लषयोयाक्शनिसप्तमतिरमल यावश्चमक्षापवानी यावतधराधरा पुनरिमामधेश्यामाका_श्रीमुरमूर माहिपतन्त्रावा नगश्यता॥४श्रीमानमादिसुंदफ्फरन्समजनिश्रीगुंडकरमापतिस्तन्मादि महमद मामलवाहिन्नता हमदमाजातःसाहिमहेमंदायिनलागायामदीनाए रपयारयान-श्रीमस्सदमादिपतिजीयानंदीयात्मनः४शाइनिश्रीमहाराजा धिराजूजरवकापात भादिश्रीमहमुदखुरन्नाचरित्रै राजनिनादत्रामदुदयराज विरदिनमहाकाव्यविजयललीलाजीनाममशमन्मच काश्रित पतिः यतिमार्थ नामक:॥ ॥जीशनेगा भडानाष्टामचननाम- राजविनोद काव्यकी आदर्शभूत प्रतिका अन्तिम पत्र

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कवि-उदयराजविरचितं
राजविनोदमहाकाव्यम् ।
॥प्रथमः सर्गः।।
॥ ॐ नम सरस्वत्यै ॥श्री जगत्कत्रे नम ।।
जगत्का विजयते करुणावरुणालयः।
राजरूपेण रमते यः प्रजानुग्रहेच्छ्या ॥१॥
राजन्यचूडामणिमत्युदारमाशास्महे श्रीमहमूदसाहिम् ।
कलानिधेर्यस्य पद श्रयेते सरस्वती श्रीश्च समानमेव ॥२॥
एतच्चरित्रे क्व लभेत पार पदे पदे हन्त मति स्खलन्ती ।
उदारकीर्तमहमूदसाहेस्तावद्गुणानेव गुरूकरोमि ॥ ३ ॥
अमुष्य राज्ञां परमेश्वरस्य पूजोपहाराय मयोपनीतः ।
कवित्वपुष्पाञ्जलिरेष रम्य सन्तस्तदामोदभरं भजन्तु ।।४।।
उत्कर्षमालक्ष्य सदैव लक्ष्म्या सौभाग्यलाभान्महमूदसाहे ।
उत्सङ्गमुत्सृज्य पितामहस्य सरस्वती मावलय प्रपन्ना ॥५॥
प्रष्टु क्वचित् केलि [पृ०१B] परा तनूजा चतुर्भुजस्येव दिशश्चतस्त्र ।
विधेनिदेशात् प्रथमो दिगीश सहस्रमणामदिशत् पृथिव्याम् ॥ ६ ॥
क्षणादथ क्षोणितल विगाह्य मधुव्रतानामिव पडक्तिरक्ष्णाम् ।
पौरन्दरी श्रीमहमूदसाहे पद्माकरे राजपुरेऽवतीर्णा ।। ७ ।।
वीथीषु वीथीपु च राजधान्या द्वारे नरेन्द्रस्य च मन्दिरेषु ।
श्रेणी सुरेन्द्रस्य दृशा व्यराजद् व्यालम्विता वन्दनमालिकेव ॥ ८ ॥
दिवस्पतेर्नेत्रसहस्रमाला दीपावलिश्रीभवने भ्रमन्ती ।
आरात्रिकं संसदि कुर्खतीव प्राप्ता मुदा श्रीमहमूदसाहे ॥९॥
सद्वृत्तिस्थपदमा परिलसत्तर्कानुमेयोदरा
मीमांसाद्वयसुन्दरस्तनभरा तत्त्वार्थवादानना ।
वाग्देवी वरनव्यकाव्यरचनागृङ्गारिणी प्रेक्षिता [पृ०२A]
सुत्राम्णा महमूदसाहनृपतेर्विद्वत्सभामाश्रिता ॥१०॥

[१.
1
२] कवि-उदयराजविरचितं राजविनोदमहाकाव्यम् ।
ब्राह्मि । ब्रह्मसभा सुभाषितरसत्यागेन रूक्षानना
कृत्वा क्रीडसि भूतले किमिति सा शक्रेण पृष्टाऽब्रवीत् ।
सुत्रामन् महमूदसाहिनृपतेविद्याविदा ससदि
स्वच्छन्दप्रसरत्कवित्वलहरी त्यक्तु कथ शक्यते ॥११॥
इन्द्र कि कमलापति किमथवा कि वा रतेर्वल्लभ.
शृङ्गार किमु मूर्तिमानिति वुधैस्सोल्लासमालोकित ।
चञ्चच्चामरवीजित सुमहच्छत्रेण विभ्राजित.
सोऽय श्रीमहमूदसाहिनृपति सिंहासने राजते ॥१२॥
औदार्य परमस्य शौर्यमतुल गाम्भीर्यमुख्यान् गुणान्
प्रेक्ष्य श्रीमहमूदसाहनृपतेराश्चर्यमासेदुषाम् ।
केषा वा विदुषा दधीचिररुचि धत्ते न चित्ते चिर
कर्ण कर्णकटुत्वमेति [पृ० २B] भवति प्रायो बलिविस्मृत ॥१३॥
पूर्णोध्न्य सुरधेनव फलभरैर्भुग्नाश्च कल्पद्रुमा-
स्ते चिन्तामणयो दृपद्गुरुतया योग्यास्तुलारोहणे ।
वीरश्रीमहमूदसाहनपते सत्पात्रकोटिम्भरे-
र्जात दानगुणेन सम्प्रति यतो याञ्चाविमुक्त जगत् ॥१४॥
चिन्तामणेर्लोचनमाश्रिता श्री कर च कल्पद्रुमदानशक्ति ।
वाणी विलासेन च दोग्धि कामान् जिप्णोर्जगत्या महमूदसाहे ॥१५॥
उच्चद्विषद्भूधरलक्षपक्षच्छेदैककर्तु शतकोटिभर्तु ।
सलक्ष्यते श्रीमहमूदसाहेराखण्डलत्व क्षितिमण्डलेऽपि ॥१६॥
यशोभरै श्रीमहमूदसाहेर्वसुन्धराया कुमुदावदातै ।
उदस्य दोषाकरमव्जजन्मा विधित्सता चन्द्रमसा सहस्रम ॥१७॥
प्राच्या प्रतीच्यामपि दिश्यवाच्यामुच्चैरुदी [पृ०३A] च्यामुदय दधान ।
प्रतापभानुर्महमूदसाहे करोति निर्वैरितम समस्तम् ॥१८॥
श्रीचन्द्रहासो महमूदसाहे सृजत्यहो वैरिशिरासि राहून् ।
तेषा यशश्चन्द्रमस प्रतापभानोश्च सर्वग्रहणे रणेषु ॥१९॥
सोत्तालपात रिपुकन्धरासु तूर्यस्वनस्ताण्डविता रणेषु ।
कृपाणयप्टिमहमूदसाहेर्यश प्रसूनाञ्जलिमातनोति ॥२०॥
प्रवर्तित दक्षिणवामभागयोर्जवेन पश्यद्भिरलक्षितक्रमम् ।
धनुहि शाङ्ग महमूदभूपतेर्व्यनक्ति युद्धेषु चतुर्भुजश्रियम् ॥२१॥

२.३] कवि-उदयराजविरचितं राजविनोदमहाकाव्यम् । [३ बलीयसा श्रीमहमूदभूभुजा हता हि ये हेतिभिराहवेऽहिताः । विभिद्य ते मण्डलमशुमालिनो गतास्स्वराखण्डलदृष्टचण्डता ॥२२॥ अक्ष्णां जिघृक्षति सहस्रकर सहस्रमस्मात् सहस्रकरता च सहस्रनेत्र. । श्रीपा [पृ०३ B] तसाहमहमूदनृपप्रयाणे रेणुव्रजे दिशि दिशि प्रविजृम्भमाणे ॥२३॥ किं भास्करोऽयमुदयाचलमध्यवर्ती जम्भारिरभ्रमपति किमथाधिरूढ. । इत्थं वदन्ति समुद महमूदसाहं दृष्ट्वा विशिष्टमतयो वरवारणस्थम् ॥२४॥ दुर्नीतिदावदहन निजमण्डलारधाराजलैश्शमयता सकलावनीयम् । एतेन सान्द्रकरुणाम्बुघनेन काम सम्पत्तिभिस्सपदि पल्लवितेव भाति ॥२५॥ मुक्तोज्ज्वलाभिरभित किलशातकुम्भधाराभिरग्रकरपल्लवसम्भृताभि । पट्टाभिषेकसमये स्वयमेव राज्ञा प्रेम्णा घनेन महिपीव सुधाभिषिक्ता ॥२६॥ लीना क्वचित्क्वचिदपि प्रकटीभवन्ती भ्रान्त्वा जगज्जडतयाधिपयोधिखिन्ना। साऽह प्रकाशमधुनाऽधिगताऽस्मि लोके विद्याविवेकरसिकस्य सदस्यमुष्य ।।२७।। [पृ०४] इति निगद्य सुपद्यमनोरम सुचरितं महमूदमहीपते । शतमखाभिमुखी किल भारती पुनरवोचदिद मधुर वच. ॥२८॥ श्रीमान् साहिमुदप्फरस्समजनि श्रीगूजरक्ष्मापति- स्तस्मात् साहिमहम्मदस्समभवत् साहिस्ततोऽहम्मद । जातस्साहिमहम्मदोऽस्य तनुजो गायासदीनाख्यया ख्यात श्रीमहमूदसाहिनृपतिर्जीयात् तदीयात्मज ॥२९॥ ॥ इति श्रीमहाराजाधिराज-जरबक्सपातसाह-श्रीमहमूदसुरत्राणचरित्रे राजविनोदे महाकाव्ये सुरेन्द्रसरस्वतीसम्वादो नाम प्रथमस्सर्गः ॥ ॥ द्वितीयः सर्गः॥ वंशस्सहस्रांशुभवो जगत्या जागर्त्यसो राजभिरर्चनीय. । कर्णोपमो यत्र किलावतीर्ण श्रीमान् पुरा साहिमुदप्फरेन्द्र ।। १ ।। लीनस्य वा ' कलिकालभीत्या कृष्णस्य साहाय्यचिकी[पृ० ४ B]र्षयेव । दिल्लीपुराद् गूजरदेशमेत्य दधार यो मूर्द्ध नि सितातपत्रम् ।। २ ।। समुगिरन् कच्छमहीषु येन डिण्डीरपाण्डूनि यशासि खड्ग । स्फूर्जद्विषच्छोणितपडकलिप्त. प्रक्षालित पश्चिमवारिराशौ ॥ ३ ॥ (१) वाद्धि -वारिधि-समुद्रम् ।

४] कवि-उदयराजविरचितं राजविनोदमहाकायाम् । [२.१७
विलडध्य वारानिधिमेकवीरो लडकाभिव द्वीपमगात् कपीन्द्र. ।
तत्स्पर्द्धयेवोग्रतरश्चचार द्वीपेषु सप्तस्वपि यत्प्रताप ॥ ४ ॥
मुमोच बन्दीकृतमल्पखानमनत्पनीर्य बलवत्तरो य ।
वश्यास्ततो मालवराजवन्दिमोक्षपदाख्य बिस्द वहन्ति ॥५॥
तस्यात्मजस्साहिमहम्मदोऽभूद् यस्य क्षमाभोगपुरन्दरस्य ।
औदार्यसूर्येण जगत्यजस्र व्यदारि दारिद्रयमय तमिस्रम् ॥ ६ ॥
दधार शस्त्र न रिपुर्न मित्र यस्मिन् दधत्यायुधमेकवीरे ।
पूर्वस्तत[पृ० ५ A]स्सगरभङ्गभीतेरन्यत् पुनस्तस्य वलप्रतीते ॥७॥
उदित्वरो यस्य वभौ जगत्यां सहस्रभानुप्रतिम प्रताप. ।
यो मल्लखानाख्यमुलूकमिन्द्रप्रस्थस्थमुद्वेजितवान् द्विषन्तम् ॥ ८॥
यस्य प्रसिद्धैदिरदै विभिन्नप्राकारसीधस्फुरदट्टमाला. ।
अद्याप्यहो नन्दपदाधिनाथा भल्लूकवत् पल्लिवने भ्रमन्ति ॥ ९॥
तस्मात् समुद्रादिव पूर्णचन्द्र श्रीमानभूत् साहिरहम्मदेन्द्र ।
निरस्तदोषावसरैरशोभि ज्योत्स्नोज्ज्वलैर्यस्य जगद् यगोभि ॥१०॥
हुशङ्गसाहेरधिवासदुर्गमाक्रामता मण्डपमाग्रहेण ।
येनोच्चकैराचकृषे करेण पदे पदे मालवमण्डलश्री ॥११॥
विभज्य दुग्र्गाणि निहत्य वीरान् हठान् महाराष्ट्रपति विजित्य ।
जग्राह [पृ० ५ B] रत्नाकरसारजातमनर्गलैर्य स्ववलैबलीयान् ॥१२॥
कुर्वन्तु गर्व वहवोऽप्यखर्चमुझेश्वरा श्रीगुणगौरवेण ।
अहम्मदेन्द्रस्य जनानुरागसौभाग्यलेशं न परे लभन्ते ॥१३॥
आनन्दन सुमनसामथ नन्दनोऽभूद् भाग्यश्रिया निधिरहम्मदपातसाहे ।
गायासदीन इति साहिमहम्मदेन्द्र क्षोणीभुजां मुकुटघृष्टपदारविन्द ॥१४॥
सूर्यो दिवैव कुरुते जगति प्रकाश कान्ति गगी वितनुते नियत निशायाम् ।
श्रीमन्महम्मदनराधिपते पृथिव्या दृष्ट प्रतापयशसोर्युगपत्प्रचार ।।१५।।
रूपश्रियैव विजित समभून् मनोभू श्रीमन्महम्मदनराधिपतेरनङ्गः ।
अस्र स्त्रिय खलु जगज्जयिनोऽपि तस्य वीक्ष्यैव तत्क्षणममु विवशी वभुवु ॥१६॥
यो भारतस्य [पृ० ६A] भरतस्य च सम्प्रयोगादुच्चैरजायत नयेऽभिनये प्रवीण ।
वीरो रणे वितरणे च विशिष्टशक्ति कर्णार्जुनावपि जिगाय जगत्प्रसिद्धी ॥१७॥

२. २७] कवि-उदयराजविरचितं राजविनोदमहाकाव्यम् । [५
यस्य प्रतापभरपावकसङ्गमेन दग्धस्य पावकगिरे शिखरान्तरेषु ।
प्रक्षन्त जर्जरसुधाविधुराणि भस्मराशिप्रभाणि रिपवो निजमन्दिराणि ॥१८॥
नित्यप्रसादपरिवद्धितहर्पयोगा सम्मानदस्य महता महितापकर्तु ।
यस्य प्रभो. कनकवेत्रधरा पुरस्तात् क्षोणीभुजोऽपि परिचारकता प्रपन्ना' ॥१९॥
तस्यात्मज किल महम्मदपातसाहे श्रीमानय विजयते महमूदसाहि ।
रागेण गूर्जरभुवाऽप्युपसेव्यमानो धारापुरीकरपरिग्रहसाग्रहो य ॥२०॥
पूर्वविशिष्टमतिभिर्विहिता क्षितीन्द्रर्येषा प्रसाधनवि[पृ० ६ B]धौ वहुधा प्रयत्ना. ।
दुर्गाण्यनेन सहसा प्रभुणा स्वशक्त्या भग्नानि तानि वलवद्रिपुरक्षितानि ॥२१॥
पाणौ चकास्ति महमूदनरेश्वरस्य खड्गो रणे विभजनाक्षरपट्ट एप ।
प्रत्यथिने दिशति यद्भवमथिदैन्य प्रत्यर्थिवैभवमिहार्थिजनाय दत्ते ।।२२।।
एतच्चमूचरतुरङ्गमचडक्रमार्थ मामण्डलं खलु कुलाचलक्लुप्तसीमम् ।
अब्धि विलडघ्य दहति द्विषतो विमुक्तमर्यादमस्य जगति प्रसरन् प्रताप ॥२३॥
शाखोट कुटजैश्च शाल्मलिवनश्च्छन्नाश्च या भूमय-
स्तत्राशोकरसालबालवकुलरम्या कृता वाटिका ।
आक्रान्ता किटिकोटिमवर्कटकुलहर्यक्षत्र्यक्षश्च या-
स्तत्रानेन पुराणिं पुण्यजनतापूर्णानि क्लुप्तानि च ॥२४॥
उद्दण्डस्फुटपुण्डरीकरुचिरच्छाया पर विस्फुरद्-पृ० ७ A]
वीचीचामरवीजिता परिसरत्सद्वाहिनीसङ्गता ।
राजन्ते स्थिरकम्बुकूर्ममकरै कोशै समृद्धा. सदा
कासारा क्षितिपा इवास्य नृपतेर्हसोल्लसत्कीर्त्तय ॥२५॥
सौन्दर्ये मकरध्वजप्रतिनिधि दाने च कर्णोपम
कारुण्ये रघुनन्दनेन सदृश भीमेन तुल्य रणे ।
वाचा सिद्धिषु वाक्पते समधिक लीलासु लक्ष्मीवर
भरि महमूदसाहमनघ वाञ्छन्ति नित्य प्रजा. ॥२६॥
आलोकोद्यतलोकवारिधिसदाऽऽनन्दोम्मिसवर्द्धन
दन्धि प्रसरत्प्रतीपनृपतिध्वान्तौघविद्ध्वसनम् ।
वीरश्रीमहमूदसाहनृपते शश्वद् धृतं मूर्द्ध नि
श्वेतच्छत्रमुदित्वर विजयते पूर्णेन्दुशोभाधरम् ॥२७॥

कवि-उदयराजविरचितं राजविनोदमहाकाव्यम् । [३.५
उच्चरकशता विभति वलिना या सर्वदा मौलियु
प्रायक्षितिपालमूर्द्ध[पृ० ७ B]मु पुनर्या चक्रवद् भ्राम्यति ।
मान्याना महता च शेखरपदे मालेव या भ्राजते
वीरश्रीमहमूदसाहनृपतेराज्ञा जगद् रक्षति ॥२८॥
मर्यादा न विलङवयन्ति निधयो वारामवारोमय-
चन्द्रार्कावृदयास्तकालनियम नैवाप्यतिक्रामत ।
यस्याज्ञावशतश्चरन्ति परितस्तारा निरालम्बने ।
सोऽय श्रीमहमूदसाहमवतात् कर्ता जगत्तारक ॥२९॥
इत्यागीर्वचनपरम्परा सृजन्ती वाग्देवी विरचितनव्यकाव्यवन्धा ।
शिष्याय त्रिदशगुरो पुरोगताय व्याकर्तुं पुनरुदयुडक्त राजचर्याम् ॥३०॥
श्रीमान् साहिमुदप्फरस्समजनि श्रीगूजरक्ष्मापति-
स्तस्मात् साहिमहम्मदस्समभवत् साहिस्ततोऽहम्मद. ।
जातस्साहिमहम्मदोऽस्य तनुजो गायासदीनाख्यया
ख्यात श्रीमहमूदसाहिनृपति[पृ० ८ A]ीयात् तदीयात्मज ॥३१॥
॥ इति श्रीमहाराजाधिराज-जरबक्सपातसाह-श्रीमहमूदसुरत्राणचरित्रे
राजविनोदे महाकाव्ये वशानुसड़कीर्तनो नाम द्वितीय सर्ग. ।।
॥तृतीयः सर्गः॥
उच्चस्तरा कुञ्जरगजितेन प्रहृष्यमाणो यहेपितेन ।
सान्द्रेण नादेन च दुन्दुभीना प्रवुद्ध्यतेऽसौ समये नरेन्द्र ॥१॥
उल्लासयन्त्यो रहसि स्वरेण वीणाक्वणैस्सम्वदतानुरागम् ।
सौभाग्यवत्योऽस्य विलासगीत प्राभातिक मङ्गलमाचरन्ति ।।२।।
आलोकनीयं घनपक्ष्मलाभ्या विलोचनाभ्यामलिमञ्जुलाभ्याम् ।
मुखारविन्द स्वयमाश्रिताऽस्य प्रबोधलक्ष्मीर्मुदमादधाति ॥ ३ ॥
प्राभातिकाचारविवौ जलेन प्रक्षालित वीक्ष्य मुख नृपस्य ।
सरोरुह मुञ्चति नाम्बुवास शशी पुनर्मज्जति वारि[पृ० ८ B] राशौ ॥ ४ ॥
सुवर्णवर्णेऽस्य विगेपमङ्गे कवर्ण्यराग कुरुतेऽघिवर्ण्यम् ।
अलकृतानेन कुरङ्गनाभि श्रीखण्डकाश्मीरविलेपनश्री. ॥ ५ ॥

[७
३. १९]
कवि-उदयराजविरचितं राजविनोदमहाकाव्यम् ।
विलासिन. श्रीमहमूदसाहे. सद्भि सभायामभिशोभितायाम् ।
कर्पूरवासैः ककुभा मुखानि ताम्वूलयोग. सुरभी करोति ॥ ६ ॥
मृणालसूत्ररिव निम्मितं यद् अय नवीनमृदुल महीन्द्र ।
वास. शरच्चन्द्रमरीचिगौरमङ्गस्य तन्मण्डनमाविति ॥७॥
विश्लेष्य पूष्णोर्वपुप. प्रयत्नात् त्वष्ट्रेव पूर्व घटित मयूखै ।
रत्नप्रभाभूषितदिग्विभागमय महीन्द्रो मुकुट विति ॥८॥
परिस्फुरत्कुण्डलपद्मरागप्रभाडकुरैरजितमास्यमस्य ।
स्मितांशुलेगैर्हसतीवगूढं वालारुणस्पृष्टसरोजलक्ष्मीम् ॥ ९॥
अलं विशाल नहरेविभाति वक्ष स्थल श्रीमहमूदसाहे' । [पृ० ९A]
लक्ष्मीर्यदालिङग्य सदा सहार मुदा करोति प्रमदाविहारम् ॥१०॥
अयं भुजाभ्यां स्फुरदगदाभ्यामालिङ्गिताभ्यां चतुरङ्गलक्ष्म्या ।
विराजते श्रीमहमूदसाहि. साम्राज्यमुद्राङ्कितपाणिपद्म ॥११॥
पादारविन्द महमूदसाहे. श्रियोऽधिवास वयमानमाम ।
दारिद्रयसन्तापनुदे सदैव यदातपत्रीक्रियते धरित्र्या ॥१२॥
आत्मानमादर्शतले सलीलमालोकयन्त महमूदसाहिम् ।
मुह्यन्ति साक्षान् मदनावतारमुदीक्ष्यमाणा मदिरायताक्ष्य ॥१३॥
आसीनमष्टापदपीठपृष्ठे राजानमेन नयनाभिरामम् ।
नीराज्य ना• नवरत्नदीपैर्मुक्ताक्षतै सस्पृहमर्चयन्ति ॥१४॥
एवं सदान्त पुरसुन्दरीभिमुंदा प्रसन्नो वरिवस्यमान ।
वहि समाजस्थितराज [पृ० ९ B] लोकविलोकनेच्छा सफली करोति ॥१५।।
सिंहासन श्रीमहमूदसाहे सहेलमारोहति राजसिंहे ।
जयेतिशब्द. प्रसरन् पुरस्ताज्जनस्य कर्णोत्सवमातनोति ॥१६॥
सहस्रपत्र ध वमातपत्र शिरस्युदार महमूदसाहे ।
सुवर्णकुम्भश्रितकर्णिकाश्रि चकास्ति गारुत्मद् दण्डनालम् ॥१७॥
तप. पुराऽतप्यत याभिरिन्दोरवर्कस्य सम्पर्कमवाप्य भाभि ।
एताश्चलच्चामरचारुभावान्नरेन्द्र चन्द्र परिवीजयन्ति ॥१८॥
आलोकमात्रादपि सर्वलोकानालादयन्त कमनीयकान्तिम् ।
नेच्छन्ति के द्रष्टुमिमं नरेन्द्र सतां सभापर्वणि पूर्णचन्द्रम् ॥ १९ ॥

८] कवि-उदयराजविरचितं राजविनोदमहाकाव्यम् । [३.३२ सिहासनस्थस्य पदारविन्द दूगन् नमत्यस्य नरेन्द्रवृन्दम् । तत्पीठभूमौ विलुठत्युदारा तन्मौलिमाणिक्यमयूखधारा ॥ २० ॥ निरङकुशत्वेन मदातिरेका [पृ०१०A] नोज्झन्ति ये स्वैरविहारदर्पम् । स्थिता निपिद्धा महमूदसाहेारे गजेन्द्रा इव ते नरेन्द्रा. ॥२१॥ सम समास्थाय नरेन्द्रवृन्दै रकुण्ठकण्ठ मधुर पठन्त । वैतालिका श्रीमहमूदसाह छन्दोविद ससदि सस्तुवन्ति ॥२२॥ उपायनानामपि लक्षकोटी राजन्यकोटीरमणे' पुरस्तात् । दृक्पातमात्रेण कृतप्रसादा यदृच्छयैवाथिजना लभन्ते ॥२३॥ यतो यतो भूमिभुजोऽवतीर्ण प्रसादपूर्ण खलु दृक्तरङ्ग । ततस्तत ससदि रत्नमालालध्येण लक्ष्मीर्भजते विगाला ॥२४॥ आकर्ण्यते कर्णविशेषवात् सुवर्णवर्षान् महमूदमाहे । प्रागेव सिद्धार्थमनोरथत्वाद् देहीति कस्यापि न दीनशब्द ॥२५॥ कवीश्वराणा महमूदसाहेरि प्रसादाधिगता द्विपेन्द्रा । दानाम्बुना कीतिसरोजि [पृ०१०B] नीना स्फुटैमणालैरिव भान्ति दन्तै ॥२६॥ कवित्वरूपेण महाकवीना कीर्ति स्फुरन्ती महमूदसाहे । विगाहते राजसभान्तराणि सुधाभिषेकोत्सवमावहन्ति ॥२७॥ सिंहासने भाति नरेश्वरोऽसौ व्याप्नोति तेजोमहिमाऽस्य विश्वम् । कोश श्रयत्यस्य कृपाणयष्टिराज्ञामय रक्षति दिक्षु चक्रम् ॥२८॥ आक्रम्य दिग्दगकचक्रमपाकरिष्णोरन्ध तमो गगनमूर्ध्निगतस्य पूष्ण दृग्गोचरे चरति कोऽपि न भूतले यस्तुल्यो रणे वितरणे महमूदसाहे ॥२९॥ उच्चै प्रतापदहन समरे प्रदीप्यज्जुह्वन् मुहुर्वहलगाववकीतिलांजान् । रत्नाकरोचितसमुज्ज्वलमेखलाया वीर करग्रहमय कुरुते धराया ॥३०॥ उल्लासयन् श्रियममुष्यकर समुद्र सान्द्रा प्रदा [पृ० ११ A] नलहरीरभितो वित्ति । यास्तन्वते दगदिगन्तरसैकतानि मुक्ताफलैरिव यशोभिरलकृतानि ॥३१॥ इति दगशतनेत्रस्यापि देवी समक्ष क्षितिशतमखकीर्ति कुवती ब्रह्मपुत्री । व्यलसदिह कटाक्षश्रेणिभृङ्गानुयात स्मितकुसुमसमूहै पूजयन्ती समाजम् ॥३२॥ (१) कोटीर-किरीट:

F ४. १०] कवि-उदयराजविरचितं राजविनोदमहाकाव्यम् । श्रीमान् साहिमुदप्फरस्समजनि श्रीगूजरमापति- स्तस्मात् साहिमहम्मदस्समभवत् साहिस्ततोऽहम्मद । जातस्साहिमहम्मदोऽस्य तनुजो गायासदीनाख्यया ख्यात श्रीमहमूदसाहिनृपतिर्जीयात् तदीयात्मज ॥३३॥ ॥ इति श्रीमहाराजाधिराज-जरबक्सपातसाह-श्रीमहमूदसुरत्राणचरित्रे राजविनोदे महाकाव्ये सभासमागमो नाम तृतीय सर्गः ॥[पृ० ११ B] ॥ चतुर्थः सर्गः॥ भूयोऽप्यभाषत सुभाषितभावपूर्णा सा पूर्णचन्द्रवदना त्रिदशेन्द्रमेवम् । राज्ञोऽस्य वेवधरदत्तपदावकागान् देशाधिपान् सदसि पश्य कृतप्रवेशान् ॥१॥ देशस्य यस्य महिमानमिवोपगातु गङ्गा विराजति सहस्रमुखी भवन्ती । वङ्गस्य तस्य नृपति प्रणति विधत्ते प्राचीपयोनिधिसमपितरत्नपाणि ॥२॥ मुक्ताफलान्यमलतारकसन्निभानि व्यक्तेन्दुखण्डशुचिशुक्तिपुटार्पितानि । अस्येश्वरस्य यशसा तुलया धृतानि राशीकरोति पुरत प्रणिपत्य पाण्ड्य ॥ ३॥ स्त्रीणा विचित्रवरवेशविभूषणानामने निधाय शतक हरिणेक्षणानाम् । आराधयत्यमुमनङ्गजिदङ्गरूपमङ्गाधिप सरसनृत्यसमुत्कलोऽसौ ॥ ४ ॥ निर्गच्छता प्रविशता मुहु[पृ०१२A] रङ्गदेभ्यो हीरैश्च्युतै क्षितिभुजा भुजघट्टनेन । द्वारप्रदेशमतिदृश्यममुष्य पश्यन् मान जहाति किल रत्नपुराधिराज ॥ ५ ॥ आयाति मन्यरतयैष कलिङ्गनाथ श्रीगूजरक्षितिपते प्रतिहारभूमौ । उद्दामयामिकमहत्तरहस्तियूयदानद्रवप्रसरपङ्किलपिच्छिलायाम् ॥ ६ ॥ अश्रान्तमेव समरेषु कृतश्रमा ये प्रागेव साम्प्रतममुष्य सभाङ्गणस्था । तेऽमी त्रिलिङ्गसुभटा नटता प्रपन्ना प्रोद्दण्डताण्डवकला परिदर्शयन्ति ॥७॥ भक्त्या न लड वयति राघवसेतुसीमा लङ्कापति तदपि यस्तनुते सशङ्कम् । सोऽप्यस्य पश्य चरणौ शरण प्रपन्न कर्णाटक. समुपढौकितहेमकूट ॥ ८॥ मुक्ताचलैरिव पयोविनिवेशबाधामुामवज्रधरभी[पृ०१२B]तया चरद्भि । ऐरावतप्रतिवलैरवनीन्द्रमेन दन्ताबलैर्भजति सिंहलभूमिपाल ॥९॥ वेष विशेषरुचिर दधतादरेण हस्तारविन्दसमुदञ्चितचामरेण । राजा विराजतितरा परिहृष्यमानो (णो) गोष्ठीषु दक्षिणनृपेण विचक्षणेन ।।१०।।

१०]
कवि-उदयराजविरचितं राजविनोदमहाकाव्यम् ।
[४.२४
एतस्य चण्डभुजदण्डपराक्रमेण निश्शेषखण्डितरणाङ्गणगौण्डभाव ।
सर्वस्वमेव निजजीवितरक्षणाय दण्ड समर्पयति मालवमण्डलेश ॥११॥
य पार्थिव पृथुतर खलु कुम्भकर्ण कर्णेन वर्णपुच्ति सहते तुलाया. ।
सोऽयं करोति महमूदनृपस्य सेवां दण्डे वितीर्गवरभूरिसुवर्णभार ॥१२॥
य कामरूप इति देशपति प्रसिद्धो न क्षोभ्यते परवल द्धृवमानसस्थ. ।
अस्याग्रतो विलुठति प्रभुशक्तियोगाद् आकृष्ट एप विनिवेदि [पृ० १३ A] तरत्नदण्ड ॥१३॥
एतस्य केलिवनराजिविहारलाभाद् गन्तु न राजवनमिच्छति मागधेन्द्र ।
न स्तौति पुष्पामयमण्डपवासयोगाद् भोगाय पुष्पपुरवासमपि प्रकामम् ।।१४।।
यद्देशमेत्य सरितौ परिषष्वजाते जह्नो सुता च यमुना च तरङ्गदोभि ।
सोऽयं प्रयागपतिरुज्ज्वलशातकुम्भकुम्भ. पयो वहति पेयममुष्य राज ॥१५॥
य शूरसेन इति शूरतया प्रसिद्धो देशोऽस्ति तस्य पतिरेप विशेष शूर ।
क्ष्माचक्रवत्तिमुकुटस्य समीपवर्ती सेनाधिपत्यमधिगत्य जयत्यरातीन् ॥१६॥
पावें चरन् हरिचरित्रकथाप्रसङ्गात् कोटिम्भरेर्महम्मदक्षितिपालमूनो ।
कृत्येषु नित्यमधिकृत्य पद हि राजा विज्ञापना वितनुते मथुराधिनाथ. ॥१७॥
एतस्य सम्प्रति मुदप्फरपातसाहेवगै [पृ०१३B]कभूपणमणेञ्चरणेऽवनम्र ।
ढिल्लीपुरीपरिदृढोऽप्यभिमानगाढा प्रौढिं परित्यजति निज्जितकान्यकुब्ज ॥१८॥
एतत्समाजमणिमण्डितवेदिकायांमालोकयन् घनविलेपनमेणनाभे ।
नेपालमण्डलपति शिथिलीकरोति स्वस्या मितेरपि तदाकरताभिमानम् ।।१९।।
इन्द्रोऽसि वीर वरुणोऽसि वसुप्रदोऽसि लोकेश्वरोऽप्यसि पुरारिमुरारिमूर्ति. ।
इत्यं हि साहिमहमूदनृपस्य साक्षात् काश्मीरमण्डलपतिस्तनुते प्रशसाम् ॥२०॥
वीर स्वय समिति विद्विषता निहन्ता प्रख्यातपौरुषमपधनुर्द्धरेषु ।
आरोहणे चितविचित्रतुरङ्गमाणा सवाहनाविधिषु सिन्धुपति नियुडक्ते ॥२१॥
लक्षेण शार्ङ्गधनुपामपि वाजिना च तेजस्विना समुपढौकितभागधेय ।
अस्याग्रतो भवति गूजर[पृ० १४ A]पातसाहेरानम्रमौलिरधिप किल मुद्गलानाम् ॥२२॥
एतस्य साहिमहमूदनृपस्य सर्व सर्वसहेश्वरतयाधिकद्वित· ।
स्पर्द्धत कस्तुलनया मलयाद्विमाद्रिमस्ताचलादुदयभूमिवर च यावत् ॥२३॥
सिंहासने महति तिष्ठति चक्रवर्ती यस्मिन् विशिष्टमणिदर्पणदर्शनीये ।
पार्श्वस्थराजपरिपत्प्रतिविम्बिताङ्गी साक्षाद् वित्ति पदमस्य निजोत्तमाङ्गे ॥२४॥

४. ३३] कवि-उदयराजविरचितं राजविनोदमहाकाव्यम् । [११ अस्यावनीन्द्रतिलकस्य' सभा. कवीना केपा न चेतसि चमत्कृतिमावहन्ति । वक्त्रारविन्दनिवहेषु समुल्लसन्त स्वच्छन्दमिन्दुरुचयो वचसां विलासा ॥२५॥ अस्य प्रभोवितरणाज्जित कर्णकीर्तेविद्वज्जना प्रणयदृष्टिकृतप्रसादा । पट्टाम्बरैश्च मुकुटेश्च समप्रतिष्ठासम्भावनां सदसि भूप [पृ० १४ B] तिभिर्लभन्ते ॥२६॥ रागेण सुस्वरतया प्रगुणेन हा हा हू हूपहासपटुसद्गमकप्रयोगा। गीतानि गायनवराश्चरितैरुदारैर्गायन्ति गुम्फितपदानि महीमघोन ॥२७॥ अन्योन्यमुष्टिहतिवक्त्रितपृष्ठदेशा पादाभिघातपरिघट्टितहृत्कपाटा. । खेलन्त्यनर्गलभुजार्गलदुनिवारा कौतूहलाय बलिन पुरतोऽस्य मल्ला ॥२८॥ भाति प्रसृत्त्वरतरै परितो जनीविभ्राजमानवहुरत्नसमृद्धिमद्भि । क्षोणीसहस्रनयनस्य महान् समाज पूर्णस्तरङ्गनिवहरिव वारिराशि ॥२९।। स्वच्छन्दमेव निजमन्दिरभूमिकासु य य प्रदेशमभिलप्य पद दधाति । सभ्या प्रतापनिधिमेनमनुव्रजन्त. सर्वत्र तत्र किरणा इव विस्फुरन्ति ॥३०॥ अमृतसमरसाभिदृष्टिभि [पृ० १५ A] प्रीतियोगान्मुहुरपि बहुमानं भावयन् भृत्यवर्गम् । विगति मधुरगीतैरेष नृत्योत्सवार्थ रचितसदुपचारं मन्दिर सुन्दरीभि. ॥३१॥ इति किल महमूदसाहेरभिनववैभववर्णने प्रसक्ता । पुनरपि पुरुहूतकौतुकार्थ सरसपदानि सरस्वती व्यतानीत् ॥३२॥ श्रीमान् साहिमुदप्फरस्समजनि श्रीगूजरक्ष्मापति- स्तस्मात् साहिमहम्मदस्समभवत् साहिस्ततोऽहम्मद । जातस्साहिमहम्मदोऽस्य तनुजो गायासदीनाख्यया ख्यात. श्रीमहमूदसाहिनृपतिर्जीयात् तदीयात्मज ॥३३ ॥ ॥ इति श्रीमहाराजाधिराज-जरवक्सपातसाह-श्रीमहमूदसुरत्राणचरित्रे राजविनोदे महाकाव्ये सर्वावसरो नाम चतुर्थ सर्गः ॥ श्री. कल्याणमस्तु लेखक पाठकयो ॥श्री.।। [पृ०१५ B] actor- (१) सभाकवी० इति प्रतौ। (२) वितरणाजित० इति प्र० ।

२ १२] कवि-उदयराजविरचितं राजविनादमहाकाव्यम् । [५.१३ ॥पञ्चमः सर्गः॥ इतो मृदङ्गध्वनिना मृगीदृशो मुहुर्वहन्त्योऽभिनयाय विभ्रमम् । रणज्झणन्नूपुरसूचितागमा विगन्ति सङ्गीतकरङ्गमण्डपम् ॥१॥ सुगन्धिनानाकुसुमस्रजाभरै प्रक्लृप्तमुद्दिश्य विलासमण्डपम् । समापतन्त परितो मधुव्रता सृजन्ति झङ्कारमनोहरा दिन ॥२॥ समीरणो रङ्गभुव समुल्लसन् विलेपिता या घनयक्षकद्दमै. । सभाजन भावयतीव सौरभै कृतार्थयिप्यन्निव गन्यवाहताम् ॥३॥ समन्ततोऽपि प्रसृत नृपालये प्रकृष्टकृष्णागरु'धूपसञ्चयम् । गवाक्षमार्गेनियता मुहुर्वहिर्न भस्वता वासितमम्बर महत् ॥४॥ तमो नुदत्यो निजभूषणस्फुरन्मणिप्रभाभि परित- पुरन्ध्रय । नृपस्य नीराजनमङ्गलोत्सव सृजन्ति सायतनदीपमालया ॥५॥ उदारशृङ्गारमनोहराकृतिविभाति राजा कनकासनस्थित । स्फुरत्सुप[पृ०१६A]ोपरि सन्निषेदुष श्रयन्मुरारेरनुरूपंतामिव ।।६।। सम समन्तात् परिवृत्य वल्लभ विभान्त्यमूश्चन्द्रमिवोडव. स्थिता.! विलोचनैरञ्चितविभ्रमैस्स्त्रिय कृतोपहारा विकचोत्पलैरिव ॥७॥ इमा. प्रकृत्येव पर मनोरमा. पुनर्विचित्राभरणविभषिता । तथा च नृत्याभिनयाथमुत्सुका कथ न रामा रमयन्ति-मानसम् ।।८। अमुक्तया पाणितलादपि क्षण रहस्यसख्येव निवद्धरागया । कल क्वणन्त्या वरवीणयाऽनया प्रवीणया राजमनो विनोद्यते ॥९॥ जित हि वादित्रशतेऽपि वेणुना स्वय निधायाधरपल्लवेऽनया । यदेव रागातिशयेन मुग्धया स्वकण्ठमाधुर्यमिवोपशिक्ष्यते ॥१०॥ दिगडन्तरालेषु नरेन्द्रमन्दिराद् विजृम्भते सान्द्रमृदङ्गनिस्वन' । अमु समभ्यस्यति गज्जितच्छलाद्वलाहकस्ताण्डवयन् शिखण्डिन ॥११॥ [पृ०१६B] कलावतीय मधुरेण गायति स्वरेण सवासितरागमूर्च्छनम् । निजं मनो मञ्जुलकास्यतालजस्वनैरिवोज्जागरयन्त्यनुक्षणम् ॥१२॥ इय मुखाम्भोरुहसौरभार्थिनी विलासिनीना मधुपावलिर्मुहु । मनोरमालप्तिषु गीतिपु श्रुते करोति हुकारभरेण पूरणम् ।।१३।। (१) गुरु इति प्र० ।

५२७] कवि-उदयराजविरचितं राजविनोदमहाकाव्यम् ।
१३
अलंकृतं षोडशभि पदैरियं समग्रसूडमगानपण्डिता ।
प्रबन्धमेलांख्यमखण्डलक्षणं विचक्षणा गायति भूपतेः पुर ॥१४।।
पदैरुदारैविरुदै स्वरैरपि स्फुटैश्च पाटैरतिहर्षवर्द्धनम् ।
अमुष्य राज्ञः कलकण्ठभापिणी कुतूहलाद् गायति हर्षवर्द्धनम् ॥१५॥
प्रियेण वृत्त स्वयमेव निर्मित स्वय च कण्ठाभरणीकृतैरियम् ।
शुचिस्मिता गायति वीणया सम मनोरम रागकदम्बक मुदा ।।१६।।
इय विशन्ती नवरङ्गमङ्गना स्फुरत्प्रसूनै परिपूरिताञ्जलि [पृ० १७ A]
प्रियस्य सौन्दर्यविनिजितात् स्मरात् स्वय ग्रहीतैरिव भाति मार्गणै ॥१७॥
समुल्लसन्ती करपल्लवश्रिया स्मितेन तन्वी कुसुमानि तन्वती।
इय कटाक्षभ्रमरोपशोभिता मनोभुव कल्पलतेव नृत्यति ॥१८॥
विधाय विश्राम्यति नृत्यमेकिका परानुसन्धानपरा च नृत्यति ।
समानसौन्दर्यविशिष्टयोयोविविच्यते नैव परापरक्रम ।।१९।।
समानलावण्यवयोविभूपणा. प्रतन्वते लास्यविलासमझना ।
इमा सुसङ्गीतकलाकुतूहलात् करोति मन्ये बहुरूपविभ्रमम् ॥२०॥
प्रदर्शयन्त्यो वदनै सुधानिधे स्फुट वपुर्वृहमुदारकान्तिभि ।
शयर्दधत्यश्च कुशेशयश्रिय विवृण्वते भावमपूर्वमङ्गना ॥२१॥
यथाङ्गहारैर्हरिणेक्षणा क्षणान् नव नव बिभ्रति विभ्रमोदयम् ।
तथातिदादधुना पुरद्विषो जयाय सज्जीभवतीव मन्मथ. ॥२२॥[पृ० १७ B]
गतानि लीलाललितानि शिक्षितु नितम्बिनीना चरणाब्जसङ्गतै ।
कलं क्वद्भिर्मणिहसकावलिच्छलेन हसैरभिरम्यते मन. ।।२३।।
समुच्चयैर्भूषणरत्नरोचिषा स्फुट दधाना परिवेषमुज्ज्वलम् ।
नतभ्रुवो बिभ्रति नेत्रवाससस्तिरस्करिण्यन्तरिता इव भ्रमीः ।।२४।।
समीरण पल्लवलालनोद्गते. प्रसक्तनृत्यश्रमवारिहारिभि ।
करोति रङ्गाङ्गणकेलिवाटिका वधूजनाना व्यजनौचितीमिव ॥२५॥
प्रियस्य सङ्गीतरसे मनो मनाक् प्रसक्तमाकर्षति चारुहासिनी ।
इय चलच्चामरचारुदोर्लता समुल्लसत्काञ्चनकङकणक्वण ॥२६॥
प्रकृष्टरोमाञ्चसमुच्छ्वसत्तरस्तनद्वयाभोगविगाढवन्धनम् ।
इय सुनेत्रा प्रियपाणिनाप्पितं बिभर्ति रत्नावलिचारुकञ्चकम् ॥२७॥

१४] कवि-उदयराजावरचित राजविनोदमहाकाव्यम् । "[५३५ स्वय प्रसन्नेन कुचावलडकृती प्रियेण हारेण नितान्त हा[पृ० १८ A]रिणा। अतीव तुङ्गो पृथुलौ सुमध्यमा सखीजने साक्षिणि का न मन्यते ॥२८॥ करे गृहीता मणिकडकणार्पणे प्रियेण तन्वी तनुकम्पमात्मन । मरुच्चलाना चतुरा विनुहृते मुहुर्लतानामभिनीय विभ्रमम् ॥२९॥ इत प्रफुल्लेन नवाम्वुजन्मना सरोजिनी भानुमिवोपतस्थुषी । विभाति वाला प्रसृतेन पाणिना प्रसादयन्ती प्रियमूर्मिकाकृते ॥३०॥ इत कवित्वै. प्रतिभावती प्रभु नवैर्नवैस्तोषयति प्रतिक्षणम् । स्फुट पठन्ती किल तानि पञ्जरे करोति कीरावलिरस्य कौतुकम् ॥३१॥ जयेतिशब्दं समुदीरयन्त्यमी कलाविदो मङ्गलसूचकं मुहु । नरेन्द्रलक्ष्मीनिनदेन दन्तिना तमेव सवर्द्धयतीव सम्मदात् ॥३२॥ यो दत्तवानिह हि भूरि सुवर्णवर्षि- कर्णाय कुण्डलयुग जगदकदीप । सोऽय प्रसारितकर किल सुप्रभात कुर्वन्नृपस्य' पुरत प्रतिभाति भानु ॥३३।। पृ० १८-B] इत्यस्य साहिमहमूदनृपस्य गेहे सङ्गीतकेलिषु शतक्रतुमालपन्ती । वीणाक्वणैरिव विरञ्चिसुतावचोभिश्चित्ते चमत्कृतिमधत्त समाजभाजाम्॥३४॥ श्रीमान् साहिमुदप्फरस्समजनि श्रीगूर्जरमापति- स्तस्मात् साहिमहम्मदस्समभवत् साहिस्ततोऽहम्मद । जातस्साहिमहम्मदोऽस्य तनुजो गायासदीनाख्यया ख्यात. श्रीमहमूदसाहिनृपतिर्जीयात् तदीयात्मज. ॥३५॥ ॥ इति श्रीमहाराजाधिराज-जरवक्सपातसाह-श्रीमहमूदसुरत्राणचरित्र राजविनोदे महाकाव्ये सङ्गीतरङ्गप्रसङ्गो नाम पञ्चम सर्गः ॥

कवि-उदयराजविरचितं राजविनोदमहाकाव्यम् । [१५ ॥षष्ठः सर्गः॥ अथ विकस्वरवारिरुहेक्षणा शरदिव स्फुटकाशसितांशुका । पुनरवोचत हसमृदुस्वना सुरपति प्रति वागधिदेवता ॥१॥ अयमनर्गलवाहुबलोद्धत. प्रयतते परचक्रजिगी[पृ० १९ A]पया । वसुधयापि नृपा धनिनो न कि-न विजयेन विना तु यशस्विन. ॥२॥ भजति मन्त्रमशेषविशेषवित् प्रकृतिभि सुकृती कृतनिश्चयम् । अभिमतं सकृदुद्यमिनामपि स्फुरति मन्त्रवले खलु सिद्ध्यति ॥३॥ करगतैव सदा परखण्डने प्रखरतर्कमतेरिव वादिन. । विजयसम्पदमुष्य सुनिश्चिता समरससदि विक्रमशालिन ॥४॥ भुजवलेन विनिज्जितभूतलं प्रतिबलो न हि कश्चिदमु प्रति । निजचमूरमुनातिगरीयसी परिजनप्रणयेन पुरस्कृता ।।५।। क्षितिभृत. कटके गणना कृता सुभटकोटिपु मुख्यतया स्थिते । करिषु यूयशतैरथ पडक्तिभिईयवरेषु रथेषु च मण्डलै. ॥६॥ अगणित वितरत्यवनीपतावविरत वसु वैश्रवणोपमे । हसति गूजरवीरवसुन्धरा न नगरी न विभीषणगोपिताम् ॥७॥[पृ० १९ B] असिषु निर्मलितेषु शरासनेष्वधिगुणेषु तथा कवचेषु च । ध्रुवमभेद्यतरेषु रणैषिणा प्रकटयत नवीनमिवादरम् ॥८॥ स्मरति यन्मनसा तदुपस्थित सपदि वस्तु पुराकृतसग्रहम् । भवति भूमिपतेरतिवल्लभ किमिह भाग्यवत खलु दुर्लभम् ।।९।। नरपतेर्बहुमानपदे स्थिता प्रकृतय पुरुषा समुपस्थिताः । निजनिजाधिकृतिप्वधिकादरा अवहिताद् बहुसैन्यसमन्विता ॥१०॥ क्षितिपती विजयाय यियासति प्रसृमर पटुदुन्दुभिसम्भव । ध्वनिरुदेतितरा परिपूरयन् गिरिदरीमुखरीकृतदिङमुख.' ॥११॥ सकलभूवलयस्य पुरन्दर. प्रवलशस्त्रभृतामतिसुन्दर । विलसदनमुवल्लभवन्धुरं समधिरोहति सम्प्रति सिन्धुरम् ।।१२।। विदितवीरसहस्रपुरस्सर जय जयेति [पृ०२०A] गिर पृथिवीश्वरम् । चटुलचारणबन्दिजनेरिता श्रुतिगता सुखयन्ति समन्तत ॥१३।। - (१) दिग्मुख इति प्र० ।

१६]
कवि-उदयराजविरचितं राजविनोदमहाकाव्यम् । [६.२७
दिशि दिशि द्विवतामतिदुस्सहो बहिरसावुदयन्निजमन्दिरात् ।
अधिकदीप्तिघरा समुदीश्यते दिनकर गरदम्बुवरादिव ।।१४।।
नरपतेरनुकारितया श्रिया स्फुटतर बहुरूपगुणाश्रय ।
अवनिर्मदनैरिव सङ्गत चलति चारुवल मकरध्वजै ॥१५।।
अथ सुमङ्गललम्भिनगो कुरो तिविगतेऽनतिदूरतरे पुर ।
उपवनेऽनुगतैर्व हुशोऽभित पुरजनै प्रणयादुपशोभित ॥१६।।
अरुणरागभरस्फुरिताम्बर प्रततरश्मिसहस्रमवेक्षते ।
इह भुवोऽधिभुवो नवमण्डप दिनकृते प्रतिरूपमिवोदितम् ।।१७।।
सितपटप्रभवे शरदम्बुदप्रतिभटै कटकस्य निवेशभू ।
हिमगिरेरिव सानुभिरुन्न पृ० २०A] नैरुपचिता क्व न राजति मण्डपै ॥१८॥
विजयिन कटकेस्य महीपते प्रकटितनिशि दीपसहस्रक ।
प्रतिहता विजनेषु विजृम्भिता रिपुपुरेपु घना तमसाभरा ॥१९।।
अमृतकुम्भमिवैन्दवमण्डल क्षितिभुज सुरराजदिगङ्गना ।
अभिमुख कुरुते ध्रुवमुच्चकैरुदयपर्वतमौलिसमर्पितम् ॥२०॥
क्रीडाविचित्रनवनाटककौतुकेन निद्रा दृशो प्रियतमामपि वञ्चयित्वा ।
कं वा न वीरकटके रमयत्युदारा वाराङ्गनेव रजनी शिशिरप्रगल्भा ॥२१॥
प्राच्या हरित्यरुणसङ्गमपाटलिम्ना व्यक्तेन लक्षितविभातनिशाविभागा ।
आराधयन्ति महमूदनराधिराज वैतालिका सुललितैर्वचसां विलासै ॥२२॥
यन्मङ्गल पुररिपोगिरिजाविवाहे लक्ष्म्या स्वयम्वरविधौ च जनार्दनस्य ।
श्रीपातसाहमहमूदनरेन्द्र नित्य [पृ०२१ A] लाभात्तदस्तु रणमूनि जयश्रियस्त ॥२३॥
कान्ता नितान्तरतकेलिभरेण खिन्ना द्रागेव तल्पमिव नोज्झितुमिच्छतीयम् ।
व्योम्नस्तल नृपविचक्ष गदीर्घयामा रात्रि स्फुरद्विरलतारकपुष्पहारा ॥२४॥
अस्माभिरेतदनघ तव गीयमानमाकर्णयन्निव यश श्रवणाभिरामम् ।
चन्द्र कुरङ्गमधुना परिहर्तुमिच्छु तिद्रुतं प्रमितकान्तिरपि प्रयाति ॥२५॥
यावत्कथाभिरनुनीय कथ कथञ्चित् कान्त प्रिया नयति मन्मथबाणवश्यम् ।
तावच्छ्ते कटु रटत्यनुवेलमुच्चरीभवस्तरुणयोरिव ताम्रचूड ॥२६॥
प्राचीमुखं भ्रमवशात् परिचुम्ब्य किञ्चिद् रागादिवाम्बरवगात्त्ववलम्बमान ।
दूरात् प्रसारयति सम्प्रति पद्मिनीना प्राणाधिप किल करान् परिरम्भहेतो ॥२७॥

६.३६11 कवि-उदयराजविरचितं राजविनोदमहाकाव्यम् । [१७ उत्कण्ठया निशि भृग विरह विषह्य तीरान्तरेषु सरस सरस रसन्ति । [पृ० २१B] राजन् परस्परवितीर्णमृणालनालान्येतानि हन्त निथुनानि रथाङ्गनाम्नाम् ॥२८॥ प्राभातिकन पवनेन हिमागमेऽपि भूय प्रबोधितमहाविरहानलाच्चि । त्वद्वैरिणामविरलैर्जगदेकवीर सिञ्चन्ति लोचनजलैह्रदय तरुण्य ॥२॥ श्रीमण्डपे तव नवारुणभाविगिष्टमाजिप्ठमाञिमनि मङ्गलगायनीनाम् । नि.श्वाससौरभगुणेन मुहुर्धमन्तो वीणारवैर्मधुकरा नृप सम्वदन्ते ॥३०॥ दन्ताबलेष्वधिकृता युधि योधमुख्यान् नासाय चाटुभिरमून् प्रतिवोधयन्ति । धीरा पराभवमपि प्रणयात् सहन्ते मानोज्झिता न नृपसम्पदमाद्रियन्ते ॥३१॥ अन्योन्यमत्सरभृतो नवमन्दुरासु क्षुण्णोदरासु खुरलीखुरलीलयैव । चेतो हरन्ति मधुरं नृप हेषमाना प्राभातिकाय यवसाय हयास्त्वदीया ॥३२॥ नाद. समुल्लसति [पृ० २२ A] मर्दलझल्लरीणा सेवार्थराजकसमाजनिवेशगंशी । राजन् मुखानि घनमङ्गलभूरिभेरीभाङ्कारभाञ्जि कुकुभामभितो भवन्ति ॥३३॥ इति मधुरवचोभिर्मागधस्स्तूयमान क्षितिपतिशतचूडारत्ननीराजिताइघ्रि । दिनकर इव भूयस्तेजसा बर्द्धमानो महमदनृपसूनु स्वा सभामभ्युपैति ।।३४॥ एव निगद्य वचसामभिदेवता सा सानन्दमुल्लसितकुन्दसमानहासा । एतत्समाजकविराजकुल कटाक्षेरालक्षितप्रचलषट्पदलक्षणीयै ॥३५॥ श्रीमान् साहिमुदप्फरस्समजनि श्रीगूजरक्ष्मापति- स्तस्मात् साहिमहम्मदस्समभवत् साहिस्ततोऽहम्मद । जातस्साहिमहम्मदोऽस्य तनुजो गायासदीनाख्यया ख्यात श्रीमहमूदसाहिनृपतिर्जीयात् तदीयात्मज ॥३६॥ ॥इति श्रीमहाराजाधिराज-जरबक्सपातसाह-श्रीमहमूदसुरत्राणचरित्रे राजविनोदे महाकाव्ये विजययात्रोत्सवो नाम षष्ठ सर्गः ॥, [पृ० २२ B] [७.११ कवि-उदयराजविरचितं राजविनोदमहाकाव्यम् । ॥सप्तमः सर्गः॥ प्रकाम सुश्रूषौ सति चरितमस्य श्रुतिसुख नृप स्वेनागेन श्रितवति सुरेन्द्र प्रभवता । दधाना सानिध्य सदसि महमूदक्षितिपते कवीना वाग्गुम्फर्मुदमुदवहत् सा भगवती ॥१॥ एका सैन्यपरम्परा तव पुरो विन्ध्य विलडघ्यापरा प्रालेयाद्रितटीरतीत्य झटिति प्राची दिश गाहते । वीर श्रीमहमूदसाहनृपते धावन्ति सार्द्ध मृग- स्तन्मध्ये परिपन्थिनो निपतिता स्थातु न यातु क्षमा ॥२॥ दिक्चक्रवन्धपरपत्तिपरम्पराणा पृष्ठानुयातगजवाजिरथव्रजानाम् । मध्ये पुर सरभटैस्तव मृग्यमाणा भ्राम्यन्ति हन्त हरिणस्सह वैरिणोऽपि ॥३॥ त्रस्यन्ति यान्ति परिवृत्य विलोकयन्ति सङघीभवन्ति च विघटय दिशो व्रजन्ति । मृग्यश्च वीररिपुराजमृगीदृशश्च चेष्टा समा दधति चापभृत पुरस्ते ॥४॥ पृष्ट भ पृ० २३ A] व यवशाद् रिसव स्वनारीराक्रोशिनी पथि विहाय पलायमाना । वीर त्वदीयकटकेन पुरो निरुद्धास्तास्वेव निस्त्रपतया पुनरापतन्ति ।।५।। प्राणास्तृणानि गणयन्ति रणेतु शूरा लोकापवादमिति लाघवद त्यजन्ति । रुष्टे नृप त्वयि परर्वदनेऽपितानि प्राणावनात् खलु गुरूणि कृतान्यरीणाम् ।।६।। विख्यातवीरवरदर्पहरप्रचण्डदोर्दण्डकुण्डलितदुर्द्धरचापदण्ड । आखण्डलत्वमखिलक्षितिमण्डलस्य सिंह निह सि सरुष पुरुषकसिंह ॥७॥ मुक्ताफले रविरलत्वदसिपहार कुम्भस्थलात् प्रतिगजस्य समुच्छलद्भि । हृष्टातिौसभरात् नव वीरवाह्वोर्वर्धापन प्रकुरुतेऽभिमुखी जयश्री ॥८॥ प्रतिनृपगजसिंहतासजाग्रद्रयाणा जनयति हरिणा [पृ० २३ B] नां श्रेणिराश्चर्यमेषा । क्षितिगतिमपहाय त्वच्छरै पावलग्नरुपहितनवपक्षे वान्तरिक्षे चरन्ती ॥९॥ हयखुरहनभूमीरे गुसछिन्नभानी नभसि धृतपयोदभ्रान्तयोऽमी मयूरा । ध्वनिभि तिगभीरैस्त्वद्यशोदुन्दुभीना नृपवर तरुखण्डे तन्वते ताण्डवानि ॥१०॥ चलदचलनिभाना व्यूहभाजामिभाना प्रकटयति समन्तात् कुम्भसिन्दूरपूर । अभिनवदिनभर्नुस्त्वत्प्रतापस्य वीर प्रसरदुदयसन्ध्यारागसौभाग्यलक्ष्मीम् ॥११॥ त्वत्सेनातुरगावलीखुरपुटरुद्धूलिताभिर्धव धूलीभि स्थलता गता पयि भृश लुप्ता न नद्य कति ।

७. १८] कवि-उदयराजविरचितं राजविनोदमहाकाव्यम् । [१९ . वीर श्रीमहमूदसाहनृपते त्वत्कुञ्जराणा पुन- निोद्रेकलसत्प्रवाहनिवहे. पूर्णा न जाता. कति ॥१२॥ राजन् स्यन्दनमण्डलानि बहुधाऽऽव[पृ० २४ A]र्तभ्रम विभ्रति क्रूरा सयति कोटिशश्च सुभटा कुर्वन्ति नक्रोचितीम् । कल्लोलश्रियमावहन्ति तुरगा द्वीपोपमां दन्तिनो मज्जन्ति द्विषता कुलानि वलिना त्वत्सैन्यवारानिधौ ॥१३॥ धावत्तावकवाजिराजिखुरलीक्षुण्णक्ष्मामण्डली धूलीवातनिपातपीतसलिले सद्य स्थलत्व गते । वीर श्रीमहमूदसाहनृपते त्वत्तोऽधुना तोयधौ भूय. से नुपथप्रबन्धवकितो लङकापति शड ते ॥१४॥ पश्यन्तो बहुरूपिगानभिनयं त्वद्वैरिण. स्वेच्छया वीर श्रीमहमूदसाह सहसा धाटी भिरावेप्टिता । ऋक्षाकारभृतोऽय मर्कटमुखा केविच्च कापालिका योपिद्वेषभृतो नटैनिजगृहान् निर्यान्ति नियन्त्रणम् ॥१५॥ त्यक्ता. शृङ्खलिता द्विपा परिहृता वाहोत्तमा. सयता मञ्जूपा [पृ० २४ B] समुपेक्षिता समय कोशालय सार्गले. पुर्यश्चाभिमुख प्रकीर्णविपणा नो दीक्षिता एव ते सर्वस्वार्पणतत्परैस्तव परै स्व रक्षितु जीवितम् ॥१६॥ त्रुट्यद्भिर्मणिमेखलागुणशतैहरिश्च कण्ठच्युत विस्रस्तैरवतसकै प्रतिपद भ्रप्ट पुनर्नूपुरै । कान्तारेऽपि पथि प्रसाधनविधिर्धावत्तरैरग्रतो नाथ त्वत्परिपन्थिना कुलवधूवर्ग समारभ्यते ॥१७॥ अद्रे कन्दरमाश्रयन्ति रिपवस्तन्मन्दिरं मर्कटा- स्ते दु सस्तरशायिन परममी दोलासु केलीपरा । ते भ्राम्यन्ति बनान्तरेषु विहरन्त्युद्यानमालास्वमी स्वामिस्त्वद्भुजविक्रमेण जनित तद्भाग्यमप्यन्यथा ॥१८॥ आरोहन्ति गिरि विशन्ति विपिन भ्राम्यन्ति दिक्प्रान्तरे पारावारमहो तरन्ति परितो द्वीपान्त[पृ० २५ A]रं यान्ति च । * घाटी-धाड इति लोके । (१) कण्ठश्च्युत इति प्रती। (२) विश्रस्तरिति प्रती। .. .

२०] कवि-उदयराजविरचितं राजविनोदमहाकाव्यम् । [७.२८ यत्र त्वद्भयतो व्रजन्ति रिपवो वीर प्रताप स्फुट तत्रैव प्रकटीभवन् हठवशान् मन्येऽग्रतो धावति ॥१९॥ त्वद्विद्वेषिपुरेषु दावहुतभुगज्वालावली जृम्भते लुम्पन्ति क्षितिमम्बर हयखुरैरुद्धलिता धूलय. । हेलाखेलकुतूहलादिव भटा कुर्वन्ति कोलाहल स्क्क्षतजौघरागसलिलनश्यन्ति ते शात्रवा . ॥२०॥ आबिद्धा परित शिलीमुखशत रक्तप्रसूनोगिर- श्शाखाखण्डभृत परिच्छदभरैर्दूरान्तरे वज्जिता । लक्ष्यन्ते न वनान्तरे त्वदरयो राजेन्द्र सेनाचरे- स्तुल्याकारतया वसन्तसमये लीना पलागद्रुमै ॥२१॥ किमपि विरमदानोद्रेका सरस्स्ववगाहने शिशिरसमयप्रान्ते राजेन्द्र भद्रगजास्तव । कमलवनिकास्त्य[पृ० २५ B]क्त्वा सद्य कटेषु निपातिना- मिह मधुलिहा झडकारौधर्वहन्ति मद मुहु ॥२२॥ अतिवलतया निर्मथ्नन्तो द्विषा युधि यूथपान् विविधनगरीसौधाट्टालप्रपातसमुद्यता । उपवनतरुश्रेणीरुच्चैविचूर्णयितु क्षमास्तव कथमिमे राजन् मत्ता नदन्ति न दन्तिन ॥२३॥ रिपुजनपदाक्रान्तौ धारां समुत्पतनक्रिया प्रतिगजघटाकुम्भद्वन्द्वप्रहारविधी पुन. । धरणिवलय जेतु राजन् परिक्रमणे दिशा कटकसुभट रध्याप्यन्ते हयास्तव मण्डलीम् ।।२४।। असमसमरक्रीडावेशान्मुहुविजितश्रमा पवनरयमप्युच्चरेते निवत्तितुमुद्धता । नृप तव हया. झोणावातैरुदनखुराञ्चलैविजयकमलामाशसन्ति त्वदीयकरे स्थिताम् ॥२५॥ न दक्षिणनृप क्षण भजति मेदपाटो मुद न विन्दति न माद्यति स्वहृदये स ढिल्लीपति । घराघर तवाधुना समरचण्डिमव्याहत करोति न च डम्बर स खलु गौडचूडामणि ॥२६॥ अखण्डि रणचण्डिमा झटिति मण्डपक्ष्मापतेरलुण्टि पुटभेदन खलु गरिष्टमाष्टाभिधम् । अवन्धि गजवन्धिराडवधि दुर्द्धरो विन्ध्यराडमाथि मथुराधिपो नृप भवद्भुटैरुद्भटै ॥२७॥ वङ्गा के क इमे त्रिलिङ्गसुभटा केऽमी महाराष्ट्रजा के वा मालव-मेदपाटकुनृपा कर्णाटकीटाश्च क । वीर श्रीमहमूदसाहनृपते त्वज्जैत्रयात्रोत्सवे नि साणध्वनिधौङकृतैरपि चमत्कुर्युद्दिशामीश्वरा ॥२८॥ सेवन्ते चरणी शकक्षितिभुजो दत्ते च गौडेश्वर कन्यारत्नमखण्डदण्डमपरे कर्णाट-लाटादयः ।

७.३५] कवि-उदयराजविरचितं राजविनोदमहाकाव्यम् । [२१ त्यक्त्वा लण्टितदे पृ० २६ B]शकोश विषयो द्राग् दुर्गमानग्रह राजन् जीवितमात्रलाभमधुना काँक्षन्त्यसौ मालव ॥२९॥ या शीर्णोपवनेषु दग्धनगरेष्वालोक्य वीचिभ्रमाद् देशेषु द्विषता हठेन हरिणा धावन्ति तृष्णालव । न ह्येता मृगतृष्णिका नृप भवत्तीव्रप्रतापानल- प्लुष्टस्य द्युमणेनिमज्जनकृते तोयाशया सम्भृता ॥३०॥ भग्नानां समराङ्गणे बलवता वीर त्वया वैरिणा यद् ग्रामेषु पुरेषु याचकजना देशेषु च स्थापिता । एतत्ते महमूदसाह चरितं लोकोत्तर सर्वत कीत्तिस्तम्भमिषादुदञ्चितभुजा व्याख्याति पृथ्वी स्वयम् ॥३१॥ असमसमरकेलीसङ्गमायासभाजा क्षितिप तव भटानां भग्ननानारिपूणाम् । मलयमरुदिदानी वन्दनामोदवाही प्रियसुहृदिव'मृद्नात्यङ्गमालिङग्य खेदम्॥३२॥[पृ०२७A] स्फुरति विरहभाजा दु सहोऽय वसन्तस्तरुणजनमनङ्गो बाणलक्षीकरोति । इति हि परभृतानां वाक्कुहूकारगर्भा त्वरयति नृप पान्थान् प्रेयसीसङ्गमार्थम् ॥३३॥ कनकशिखरवद्भिर्मञ्जरीपुजिताम्रर्नवकिशलयसङ्गाकृष्टकौशेयशोभै । प्रतिदिशमुपचिन्वन् गूर्जरक्ष्मापलक्ष्मी रचयति सहकारैस्तोरणानीव चैत्र ॥३४॥ घनतरमकरन्दै स्नापिता पल्लवीधै कलितललितवासा प्रोल्लसद्दिडमुखश्री. । स्फुटकुसुमपराग सान्द्रकाश्मीररागैर्नृप नवक्रतुलक्ष्म्यालडकृता गूर्जरक्ष्मा ॥३५।। अपि बहुतरदूरादुत्सव लोचनाना वरणशिखररूढ केतनैर्वर्द्धयन्ती । नृपतुरगरयेण प्रापितासन्नदेशा जनयति मुदमुद्यततोरणा राजधानी ॥३६॥ [पृ०२७ B] एना प्रविश्य नगरी परमद्धिपूर्णां द्वारावतीमिव रमारमण प्रकामम् । नानाविधान्यधिवसन् मणिमन्दिराणि राजन् रमस्व तरुणीभिरुदारमूर्ते ॥३७॥ सम्भाविता करपरिग्रहणेन सम्यक् मौभाग्यमेतु भवता नृप रत्नगर्भा । श्रीपातसाहमहमूद पितेव पुत्रान् प्रेम्णाधिकेन परिपालय भृत्यलोकान् ॥३८॥ एव विधानि वचनानि कवीश्वराणा कर्णामृतानि कलयन् नृपचक्रवर्ती । सौवर्णवृष्टिभिरध कृतकर्णकीर्ती राज्यश्रियाभिमतया रमते प्रकामम् ॥३९॥ श्रीसङ्गमेऽपि सुविवेकपुरस्कृताया कीर्तिप्रशस्तिकरणादनृणीभवन्त्या । आज्ञावशेन वचसामधिदेवताया काव्य मया विरचित महमूदसाहे ॥४०॥ (१) मृद्भात्यग० इति प्र० २२1 कवि-उदयराजविरचितं राजबिनोदमहाकाव्यम् । प्रयागदासस्य तनूद्भवेन श्रीरामदासेन कृ [पृ० २८AJ ताभियोग । व्यवत्त काव्य महमूदसाहे सदोदयायोदयराजनाम्ना ॥४१॥ [लोका सप्त?] विभान्ति यावदनघा यावच्च सप्तर्षयो यावद्दीप्यति सप्तसप्तिरमलो यावच्च सप्तार्णवा । यावत्सप्तधराधरा पुनरिमा. पुर्यश्च सप्तोत्तमा काव्य श्रीमहमूदसाह्नपतेस्तावज्जनैर्गीयताम् ।।४२।। श्रीमान् साहिमुदप्फरस्समजनि श्रीगूजरक्ष्मापति- स्तस्मात् साहिमहम्मदस्समभवत् साहिस्ततोऽहम्मद । जातस्साहिमहम्मदोऽस्य तनुजो गायासदीनाख्यया ख्यात श्रीमहमूदसाहिनृपतिर्जीयात् तदीयात्मज ॥४३॥ ॥ इति श्रीमहाराजाधिराज-जरवक्सपातसाह-श्रीमहमूदसुरत्राणचरित्र राजविनोदे श्रीमदुदयराजविरचिते महाकाव्ये विजयलक्ष्मीलाभो नाम सप्तम. सर्गः ॥ वितरति सता प्रसन्न सहस्रमयुत च लक्षमथ कोटिम् । महमूदसाहनृपति पूरयति प्रार्थनामेक ॥१॥ श्रीरामेणात्मजपठनार्थमिद पुस्तकमलेषि । [ पृ० २८ B] ॥ श्री ॥ महमूद (बेगड़ा) का दोहाद का शिलालेख (वि० सं० १५४५, शक सं० १४१०) श्री' कास्मीरवासिनी देवी नत्वा साहि मुदा [फ] रस्यादौ वशं जगति विशु [द्ध] - - च पातसाहीनां (नाम्) ॥ १ ॥ आदौ श्री [गू*] जरेशो नृपकुलतिलक [.] प्राप्त पुण्यै ] कदेश[] श्रीमान् शौर्यादिसारै पकुलमखिल यो विजित्याधि [त] स्थौ । पश्चात् श्रीपत्तने स्मिन् प्र[व]रगुण रकीत्तिर्यशस्वी मानी भूपालमौलिवरमुकुटमणिर्वीरविख्यातमू [त्ति.] ॥२॥ श्रीमान् वीरोऽभवत् शाहिमुदाफरनृपप्रभु. । तत्पुत्रो वीरवि [ख्या] नो महम्मदमहीपति ॥ ३ ॥ तस्यान्वये प्रसूत. प्रतापसंतापितमालवेश.। वीर सदा श्रीमदहम्मदेन्द्रो राजा महीमंडलमडनाय ॥ ४ ॥ य. सर्वधर्मार्थविचारसारसर्वज्ञ [शुद्धो नृप] वगजात । जित्वा मही मालवकाधिपस्य जग्रह तद्देश धन च पश्चात् ॥ ५ ॥ तस्मात्तुनर्भूमिपति. प्रधानवीर [] सदा साहमहम्मदो ऽभूत् । दाता जगज्जीवनजातकीत्ति [र्यस्य प्रभावो] विदित पृथिव्याम् ॥ ६ ॥ साहश्रीमहमूदवीरनृपति. श्रीग्यास [दीन] प्रभो- विख्यात उदारचरितो जातोन्वये वीर्यवान् । यो राज्यादधि [क] घदामेन . कर्णं विक्रमभूपति च जितवान् शास्त्रार्थसारे गुरुम् ॥७॥ राज्य प्राप्य निज प्रसन्न [वद]नो दातातिवी [-] न्वित पश्चाद (६) क्षिणदिक्पति स्वनगरे स (१) यह अक्षर अव बहुत हल्कामा दिखाई पड़ता है। इसके पहले सम्भवतः 'स्वस्ति' शब्द होगा। (२) काश्मीर होना चाहिए। (३) शुद्ध शब्द 'शाहि' है। आगे तीसरे श्लोक में शाहि लिखा है । (४) सम्भवतः यहा 'वक्ष्ये' पद है । (५) अब इस अक्षर की 'ॐ' की मात्रा ही दिखाई देती है । (६) पाठ सदिग्ध है । (७) रेफ यहा णि पर दिया गया है । (८) 'तद्वश्मधन च' ऐसा होना चाहिये । (९) 'स्वगुणर्' (१) (१०) 'दानेन' होना चाहिए। (११) यहा स पर अनुस्वार दिया गया है जो अनावश्यक है । (१२) सम्भवत 'सख्ये च' ऐसा पाठ हो । प पदवी वै १२ जित्वा रिपुम् । - चपक - २४] कवि-उदयराजविरचितं राजविनोदमहाकाव्यम् । [तप्तो वैई (द) मनाधिपस्य सकल देश सम भूधर- र्नीत्वा श्रीमहमूदसाहनृपतिश्चक्रे मति [२] वते ।। ८ ॥ तत्रोत्तुगनगेन्द्र सगतभटान् वीक्ष्यादरेण [स्वय] युद्ध चाद्भुतविक्रम [स कृतवान्] भूप. स्वसेनाजनै । जित्वा दुर्गमशेपवैरिसहित यो जीर्ण सज्ञ --' कीतिस्तभमिद चकार नृपतिस्तदैवत पर्वतम् ॥ ९॥ ३ पश्चात् स वैरिकुद्ध (ल? )कुद्दाल [] ! जित्वा पावक [दुर्गं] पित्रा रुद्ध प्रतापतापू' (र्वम्) ||१०॥ महमूदमहीपालप्रतापेनेव पावकम् । प्रविश्य ज्वालित [सर्व] वैरिवृ द पतगवत् ॥११॥ जीवतं तत्तति व[ध्वा] दुग्गं [नी] त्वा महाबलम् । चकार तत्पुरे राज्य महमूदमहीश्वर [] ॥१२॥ ज्ञात्वा गुण [] कर्मभिरप्युदारैरेत कुलीन नृपवगजातम् । मुख्य चकारात्मगृहे महीश स सेवके [भ्यो]धिकमानदान ॥१३॥ पश्चादि [म] सेवक (मे] कवीरमिमादल कार्यकर विदित्वा । सदातिशूरं सद्वाक्य - देशरक्षाम् ॥१४॥ [पा] मीरवगे नृपतिप्र [धा] न (न )- - - मोभूदतुलप्रताप. । स - हव या स (सा) नागरीत - तूयते चारुकीत्ति ॥१५॥ मखिल क्षिती - - -() मा (मी) प्रतापवान् वीर (रो) विख्यात [] पुण्यकर्मणि ॥१६॥ महामूद महीपालसेवाप्रौढप्रतापवान् । दानवीरश्चिर जीयान्मलिकश्रीईमादल ॥१७॥ पल्लीदेशाधिकार च पुण्य पुण्यमतिस्तदा । दुष्टारिहृदये राज्य दुर्गमेनं चकार वै ॥१८॥ [येनादौ] धौति [विपुल] गगोर्मिकल्लोलवत् पूर्ण पुण्यजलेन सर्व दमोद ण मनसोल्लासेन निष्पादित सोय वीर इमादले [द्रनृप] तिर्दुग्गं चकारोत्तमम् ॥१९॥ (१) 'सज्ञ पुन.' ऐसा होना सभव है । (२) 'द्रग' होगा । (३) इस पद का ठीक, ठीक अर्थ नही निकलता । पाठ सदिग्ध है । (४) मूलमें 'वेशरक्षा' जैसा मालूम देता है । (५) शल्य । (६) 'कामारद्वयमादरेण' यह पाठ हो सकता है। आ तस्मात् संबलवनेज - कासार - ७, ४३]] महमूद वेगड़ा का दोहाद का शिलालेख [२५ अहम्मदपुराँतस्थ कूपो यस्य विराजते । जगज्जीवनदानेन यशोराणिमिवोद्वहन् ॥२०॥ य [] श्रीमन्महमू शाहकृपया श्रीचपकाख्ये पुरे +--[की] तिविवर्द्धन मुविपुल तापत्रयोन्मूलनम् । मानदेन चकार मानससम 'मत्पुष्कर' भूतले मोय बीर इमादलेद्रनृपतिर्दुग्गं चकारोत्तमम् ॥२१॥ वागू लाविपतिर्यस्य जयदेवो म ट. [] मिनिन्ये लूपजीवगिर [.] स्वयम् ॥२२॥ तत्रागेवा ]ि पून् हत्वा कृत्वा दिग्विजयोदयम् । रायदुर्ग समज यत् योसौ वीर इमादल. ॥२३॥ (गवल) वेधनेन सकल तवरिवृन्द त [था] लि - त्रिमुक्त गोलकगण सहत्य चूर्णीक [तम्] दुर्ग पू [] वली विजित्य सबल प्रोद्यत्प्रतापेन यो धर्मादृ रमिद प्रहारसहित त बागू [ल] भूप लबल प्रह [त्य प्रच] ण्डभूमी-वरकालकर्ता । य पावके पूर्ववि [५] द्ध भर्ता कि वर्ण्यते चास्य जयस्य वार्ता ॥२५॥ दविपद्रे रुचिरतर दुर्ग वै दु.सह श्रीमदिमादलमुलको दान सुदरश्चक्रे ॥२६॥ श्रीनृपत्रिक पार्कसमयातीत सवत् १५४५४ वर्षे शाके १४०१०' वर्षे प्रवर्तमाने वैशाख शुदि १३ मलिक श्रीइमादलमलिकि दुर्ग उद्रे [श्रीरस्तु] जे गढ पोलि नी पारी ते वतरी तिस र्ददौ ॥२४॥ . -- शुभे दिने १ १ (१) 'पुण्य' (२) अर्थ स्पष्ट नहीं है । (३) तम्मं कृपाधिददौ । (४)-१५४ और ५ के बीच में एक विन्दु सा दिखाई देता है । सभवत पत्थर की खरोच है। (५) १४ और १० के बीच का विन्दु अनावश्यक है । । - ३ महमूद वेगड़ा के समय का दोहाद का शिलालेख। (वि० स० १५४५, गाके १४१०) मूल लेख के संपादक ० एच० डी० सांकलिया, एम्० ए०, एल-एल वी०, पीएच ० डी० ( लन्दन ) यह शिलालेख प्रिंस आफ वेल्स म्यूजियम, बम्बई में सुरक्षित है । उक्त म्यूजियम के सरक्षको के सौजन्य से प्राप्त लेख को छापों एव मूल शिला मे भी देख कर इस लेख को सर्वप्रथम अभी प्रकाशित किया जा रहा है। पुरातत्व विभाग के क्यूरेटर श्री जी. वो० आचार्य व श्री आर० के० आचार्य ने इम लेख के कुछ अशो को पढ़ने में महायता की है अतः सम्पादक उनका आभार मानता है । जिस पत्थर पर यह देख चुदा हुआ है वह ३ (फोट ३ इंच लम्बा और १ फुट ७ इंच चौड़ा है । कहते हैं कि यह पत्थर दोहाद कस्वे से प्राप्त किया गया था जो वम्बई प्रेसीडेन्सी में बडौदा से उत्तरपूर्व में ७७ मोल पर स्थित है। दोहाद पांचमहाल जिले के सबडिवीजन का एक प्रमुख कम्बा है। दो लम्बी दरारो के अतिरिक्त कई जगह से इस पत्थर को चटखें उतरी हुई है जिनमे इम लेख को पढने में कठिनाई पडती है । कहीं-कहीं इस पर मिन्दूर अयवा और कुछ रंगीन चिकना पदार्थ लगा हुआ है जिससे यह कठिनाई और भी बढ़ जाती है । इस लेख में कुल २२ पंक्तियां लिखी हुई है, पहली व अन्त की दो पक्तियो के बहुत से अक्षर विलफुल "घिस गये है। प्रत्येक अक्षर प्राय. इच का है। यह लेख वैशाख सुदी १३ विक्रम सम्बत् १५४५, शक सम्बत् १४१०, का है (सम्भवत. २१ वी पक्ति के पूर्वार्द्ध में हिजरी सम्बत् और वार का नाम भी खुदा हुआ या जो विलकुल चटख गया है) । गणना से यह दिन बृहस्पतिवार, २४ अप्रैल १४८८ ई० (हिजरी सन् ८६३ जमादि-उल-अव्वल) आता है । तिथि के विषय में यह बात ध्यान देने योग्य है कि इस लेख पर विक्रम सम्वत् तथा शक सम्वत् दोनो ही खुदे हुए है । यह क्रम गुजरात में पाए जाने वाले महमूद के समय के सभी सस्कृत शिलालेखो में +'एपिग्राफिआ इण्डिका' के जनवरी, सन १६३८ (भाग २४, अक ४) मे प्रकाशित । * इण्डियन एफिमरीज़, जिल्द ५, पृ० १७८ (एस के पिल्लई (वाई हरी) का शिलालेख । इण्डियन एण्टीक्वेरी, जिल्द ४, पृ. ३६८ 'अडालज वाव' शिलालेख 'रिवाइज्ड लिस्ट एन्टीक्वेरियन ग्मेिन्स बाम्बे प्रेसीडेन्मी' - पृ० ३०० ।

महमूद वेगड़ा का दोहाद का शिलालेख [२७ 1 नहीं वरता गया है वरन् उत्तरी भारत के दूसरे लेखो में भी ऐसा ही पाया जाता है । काठिया- वाड में प्राप्त *इसी काल के शिलालेखोन पर केवल विक्रम सम्वत् ही पाया जाता है । लेख की लिपि देवनागरी है और इस विषय पर विशेष प्रकाश डालने की आवश्यकता नहीं है। शिलालेख की भाषा सस्कृत है और आरम्भ में मङ्गलाचरण व अन्त में २६ । पद्य के वाद के अश के अतिरिक्त सम्पूर्ण लेख पद्य में है दुर्भाग्य से अन्त की तीन पंक्तियाँ बहुत ज्यादा घिस गई है और यह ठीक-ठीक पता लगाना सम्भव नहीं है कि यह लेख महमूद बेगड़ा के राज्यकाल में खुदवाया गया था अथवा उसको स्वयं की आज्ञा से उसके कार्यों का इतिहास-अकित करने के लिये उत्कीर्ण किया गया था। इन पंक्तियो से जो कुछ आशय निकलता है वह इतना ही है कि यह लेख महमूद बेगडा के मुख्यमन्त्री इमादुल-मुल्क द्वारा दधिपद्र (दोहाद) के दुर्ग का निर्माण कराए जाने के बाद ही खुदवाया गया था। प्रसंगवश इसमें गुजरात के सुलतानो की वशावली, उनके कार्यों और मुख्यत महमूद के वीरकृत्यो का भी वर्णन आगया है । यह पहला ही शिलालेख है जिसमें महमूद बेगडा और उसके पूर्वजो के कार्यों का अर्थात उनकी वनवाई हुई इमारतो व उनकी जीती हुई लडाइयो का विवरण दिया हुआ है। * देखो भाण्डारकर, लिस्ट आफ इन्सक्रिप्शन्स आफ नार्दन इण्डिया (Last of Inscriptions of Northen India,) स० ७२३ और ११२१, ७३६ और ११२६, ७३७ और ११२७, ७४८ और ११२८, ७५७ और ११२६, ७७३ और ११३० ८७३ और ११३६, ६०१ और ११३८, ६६७ और ११४६ । + देखो रिवाइज्ड लिस्ट Revised List etc पृ० २३६-२४६, २४८- ४९, २५१, २५४, २५७, २६३ । * इससे पता चलता है कि सवत्सरो का प्रयोग करने की जो प्राचीन रूढि काठियावाड मे १३वी शताब्दी के अन्त तक पाई जाती थी वह बाद में बन्द हो गई थी। अव तक के प्रकाशित अन्य शिलालेख ये है --अरबी लेख-रिवाइज्ड लिस्ट, एण्टी क्वेरियन रिमेन्स वाम्बे प्रेसीडेन्सी, पृ० ३०३, ३०६-०७, एक लेख एण्टी० रिपोर्ट A.S I १९२७,२८ पृ०.१४६ मे प्रकाशित हुआ है, कहते है कि इसमें गुजरात के उन सुलतानो के नाम दिए है जिनका दौहाद कस्बे को पूरा कराने से सम्बन्ध था । हालोल दरवाजा और चांपानेर से प्राप्त दो लेख 'एपि० इन्डो-मोस्लि० १९२६-३० पृ० ४ में प्रकाशित हुए है। सस्कृत लेख-अडालज 'रिवाइज्ड लिस्ट' पृ० ३१० वाई हरी का शिलालेख Inscription Rev List पृ० ३००, इन्डियन एण्टी०, जिल्द ४, पृ० ३६८, जिल्द ४ पृ० २६८ । १५०० ई० तक के सभी लेखो में-चाहे वे मुसलमान शासको के हो अथवा - । २८] महमूद वेगड़ा का दोहाद का शिलालेख यह लेख मङ्गलाचरण से आरम्भ होता है जिसमें काश्मीरवासिनी देवी को नमस्कार किया गया है । इसके बाद मुदाफर पातशाह का उल्लेख है जो गुजरात के मुजफ्फर प्रथम के अतिरिक्त और कोई नहीं हो सकता । इसके बाद गुजरात के सुलतानो को बंशावली इस प्रकार दी हुई है --(१) शाह मुदाफर (२) उसका पुत्र महम्मद (३) उसके वश में उत्पन्न शाह अहमद (४) तत्पुत्र शाह महम्मद (५) उसका वशज शाह महमूद । यह वशावली मुस्लिम इतिहासकारो द्वारा दी हुई (एव कैम्ब्रिज हिस्ट्री ऑफ इण्डिया* द्वारा स्वीकृत) वंशावली मे भिन्न है। इस पर नीचे विचार किया जाता है। फरिश्ता, मोराते सिकन्दरी, मोराते अहमदी और अरैविक हिस्ट्री ऑफ गुजरात|| के लेखको ने सुलतानो की सूची इस प्रकार दी है - राजपूत राजाओ के, उनके मुसलमान प्रभुनासको का उल्लेख है । उनमे मे प्रस्तुन लेख के समय का निकटवर्ती एक ही लेख गजपूताने की जोधपुर रियासत के अन्तर्गत लाडनू नामक स्थान का मिला है। यह लेन्च सस्कृत में है और वि० म० १३७३ का है । प्रमगवश इसमे शाहबुद्दीन गोरी से अलाउद्दीन खिलजी तक दिल्ली के वादगाहो की वंशावली दी है । देखो जि० १२, पृ० १७-२७ । ६ महमद के समय के दूसरे लेखो मे इस देवी को पहचानने में सहायता नही मिलती । सभवत यह ब्राह्मी सरस्वती देवी है क्योकि गुजरात के एक लेखक चन्द्रप्रभमूरि (१२७८ ई०) ने भी अपने प्रभावक-चरित (म० हीरानन्द गर्मा, बम्बई १६०० ई०) के हेमचन्द्र प्रबन्ध खण्ड में 'देवी काश्मीरवासिनी' पद का प्रयोग किया गया है (पद्य ३६-४६) । इसमे यह बताया गया है कि हेमचन्द्र ने काश्मीरवासिनी ब्राह्मी देवी को प्रसन्न किया और 'सिद्धसारस्वत' हो गया । यहा काश्मीर के शारदामन्दिरवाली दुर्गा सरस्वती मे भी तात्पर्य हो सकता है। यह मन्दिर १५वी और १६वी शताब्दी में भारतवर्ष मे खूब प्रसिद्ध था । देखो- स्टॉर्डन का 'कल्हणम् क्रानिकल आफ काश्मीर,' भा० २, पृ० २७६ । * जिल्द ३, पृ० २६५ और ७११, + विग्स द्वारा फारसी से अग्रेजी अनुवाद-'हिस्ट्री आफ दी राइज आफ दी महोमेदन पावर' जिल्द ४, पृ० १-६ । यहा पृ० ८-६ पर फरिश्ता ने किसी इतिहास- कार का हवाला नही दिया है परन्तु लिखा है कि मुजफ्फरशाह ने अपने पुत्र को दिल्ली रवाना होने से पूर्व 'गियास उद्दौला-उद्दीन मोहम्मद शाह' की उपाधि प्रदान की। * फरीदी कृत अनुवाद पृ० ७, इममें भी लिखा है कि जफरखा ने स्वतन्त्र होने से पहले तातारखा को नामिर उद्दीन मुहम्मदशाह की उपाधि देदी थी। 1 Bird (वर्ड) कृत अनु० पृ० १६५,-१६७, २०१-०२, || जफ़र उलवालि बी मुज़फ्फर वा आली (रॉस) पृ० १, ३, १४, ६०६ (देखो जिल्द ३ परिगिप्ट) - महमूद वेगड़ा का दोहाद का शिलालेख २९ (१) मुजफ्फर शाह (मुजफ्फर प्रथम) (२) अहमद शाह (अहमद) (३) उसका पुत्र मुहम्मदशाह (मुहम्मद), (४) उसका पुत्र कुतुवउद्दीन (कुतुबउद्दीन अहमद शाह), (५) दाउद (दाऊद) और (६) महमूद (महमूद प्रथम), मुहम्मदशाह का द्वितीय पुत्र । इससे विदित होगा कि इस लेख को वंशावली में क्रमाक (४) व (५) के अर्थात् नुहम्मदशाह के पुत्र कुतुबुद्दीन और उसके भाई तथा कुतुबुद्दीन के काका दाऊद के नाम नहीं दिए हुए है । परन्तु इसमें महम्मद (जिसको मुसलमान इतिहासकार मुहम्मद लिखते है) का उल्लेख अवश्य किया गया है । मुहम्मद का असली नाम तातारखां था और उसको यह उपाधि, उसके दिल्ली रवाना होने से पहले, उसके पिता जफरखाँ ने प्रदान की थी। यह घटना उस समय की है जब जफरखाँ दिल्ली के बादशाह की ओर से गुजरात में सूबेदार ही था और वहाँ का स्वतन्त्र शासक नहीं हुआ था । प्रस्तुत शिलालेख में महम्मद का 'महीपति' की स्थिति में वर्णन किया गया है । सम्भवतः उसके लिए इस उपाधि का प्रयोग महम्मद के उपरिवणित अल्पकालीन प्रभुत्व का स्मरण कराने के लिए ही किया गया हो। यह बात इस कारण से और भी सगत प्रतीत होती है कि उसे 'महीपति' लिखने के अतिरिक्त इस लेख में उसके द्वारा विजय की हुई किन्ही लडाइयो का उल्लेख नहीं किया गया है। परन्तु, इन कुतुबुद्दीन और दाऊद के नाम इसी शिलालेख में छोड दिये गये हों ऐसी बात नहीं है, दूसरे दो अरवी शिलालेखो में भी ये नाम नहीं मिलते है । एक लेख तो स्वय महमूद का है और दूसरा बाई हरी की बनवाई बावडी में प्राप्त हुआ है ।महमूद के चांदी के सिक्को और अन्य कयानको में भी इनका पता नहीं चलता है । इसके अति- रिक्त इन लेखो में भी मुजफ्फरशाह के पुत्र मुहम्मद (तातारखां) को मुहम्मदशाह लिखा है जिसका अर्थ यह निकलता है कि वह गुजरात के स्वतन्त्र सुलतानो में से था । इस वशावली के सम्बन्ध में दो बातें और ध्यान देने योग्य है। (१) यद्यपि अहम्मद (क्र० ३) और महमूद (क्र० ५) क्रमश महम्मद (क्र० २) और शाह महम्मद (क्र० ४) के पुत्र थे परन्तु जिस प्रकार इन दोनो को स्पष्टतया क्रमश. मुजफ्फर और * देखो-ऊपर वताए हुए इतिहासकारो की टिप्पणिया । + ब्रिग्स-पृ० ९, फरीदी-पृ० ६, वर्ड-पृ० १७६, फरिश्ता ने लिखा है कि तातारखा ने अपने पिता को कैद करके मोहम्मद शाह को उपाधि ग्रहण की, रॉस ने पृ० ६०४ पर लिखा है कि मुहम्मदखा उसका नाम था और तातारखा उसकी उपाधि थी। एपि० इण्डो-मोस्लिम Ep Indo-Mos , 1929-30 P 4 इण्डियन एण्टि०, भा० ४, पृ० ३६७ ६ देखो-प्रिन्स आफ वेल्स म्यूजियम, बम्बई का सूचिपत्र, गुजरात के सुलतान, पृ० २२ ३०] महमूद वेगड़ा का दोहाद का शिलालेख । अहम्मद का पुत्र लिखा है उस प्रकार इनके बारे में स्पष्ट न लिखकर "उनके वशज" इतना ही उल्लेख किया है। (२) कुतुबउद्दीन और दाऊद के नाम इस सूची में नहीं दिये गए है । दाऊद का नाम न देने की बात समझ में आ सकती है, क्योकि उसने बहुत ही थोडे समय राज्य किया और वह इस वश का क्रमानुयायी भी नहीं था, परन्तु कुतुबउद्दीन तो महम्मद का ज्येष्ठ पुत्र था और उसने ७ वर्ष* तक राज्य किया। यद्यपि ७ वर्ष का समय कोई लम्बा समय नहीं कहा जा सकता परन्तु उसका राज्यकाल नगण्य भी नहीं माना जा सकता। इसलिए, इन लेखो में इसका नाम न पाये जाने का कोई कारण, समझ में नहीं आता है । ऐसा हो सकता है कि महमूद के समय के सभी अरवी और सस्कृत के लेखो में मुहम्मद (प्रथम) का नाम उल्लिखित करने का और कुतुबउहीन व दाऊद का नाम निकाल देने का कोई विशेष कारण रहा हो, जो अब तक ज्ञात नहीं हो सका है। परन्तु, यह कहना तो सगत नहीं होगा कि उन लेखो के लिये जिन साधनो से जानकारी प्राप्त की गई थी वे इतने विशद नहीं थे जितने कि उन इतिहासकारो की जानकारी के स्रोत जिनको हम जानते हैं। फिर, महमूद में और इन दोनो में इतनी अधिक पीढियो का अन्तर भी नहीं है कि उसके घरेलू आलेखो में उनको सहज ही भुलाया जा सके । वरन्, ऐसे आलेखो में तो उनके विषय में बाहरी लोगो की अपेक्षा और भी अधिक जानकारी की सामग्री मौजूद होनी चाहिये । सम्भवत विभिन्न इतिहासकारो और लेखों में प्राप्त वंशावलियो में भिन्नता होने का यही कारण हो (कि वे इन सुलतानो के घरू आलेखो पर आधारित नहीं है )। इस लेख से हमें जो दूसरी जानकारी प्राप्त होती है वह यह है कि इसमें मुजफ्फर शाह को 'मुदाफर नृप प्रभु' लिखा है । इस 'नृप प्रभु' उपाधि से, दिल्ली के बादशाहो। की सेवा करते हुए १३६६ ई० में मुजफ्फर द्वारा गुजरात के स्वतन्त्र राज्य की स्थापना की ओर सकेत किया गया है । इस राज्य की राजधानी पट्टण थी जो प्राचीन काल में गुजरात के चालुक्यो के समय (६६०-१३०० ई०) में अणहिल पट्टण के नाम से प्रसिद्ध थी। दिल्ली के सम्राट् मुहम्मदशाह के सूबेदार की हैसियत से मुजफ्फर द्वारा गुजरात के विद्रोही सूबेदार फरहत-उल-मुल्क और अन्य पडोसी सूबो पर विजया का उल्लेख इस प्रकार किया गया है.- * कैम्ब्रिज हिस्ट्री आफ इण्डिया, भा० ३, पृ० ३०१-३०३ , व्रग्स-पृ० ३७- ४४; फरीदी-पृ० ४१, रॉस-पृ० १४, २००, ४५१ । + कैम्ब्रिज हिस्ट्री आफ इण्डिया (जि० ३ पृ० ३०१) में लिखा है कि वह बहुत बीमार होकर मर गया था परन्तु यह हो सकता है कि वह सन्देहात्मक दशा में मर गया हो जैसे उसका पिता मुहम्मह मर गया था (ब्रिग्म-जि० ४ पृ० ३६) + विवरण के लिए देखो 'कैम्ब्रिज़ हिस्ट्री आफ इण्डिया' जि० ३, पृ० २६४-६५ पा देवोके० हि० इ०, दिग्स-जि० ४, पृ० ४-१०, फरीदी-पृ० ५-७, ६-१०, बर्ड-पृ० १७७ महमूद वेगड़ा का दोहाद का शिलालेख [३१ "नृपकुलं अखिलं यो विजित्य अधितस्थु.' “मुदाफर के पुत्र महम्मद को केवल 'महीपति' लिखा है । जब तक कोई विशेष वृत्तान्त प्राप्त न हो, इस उपाधि से कोई तात्पर्य नहीं निकलता है । वास्तव में, न तो महम्मद अपने पिता का उत्तराधिकारी हुआ और न इतिहासकारो ने ही उसके विषय में कुछ अधिक लिखा है । अतः उसके लिये इस साधारण -उपाधि का प्रयोग उपयुक्त ही जान पड़ता है। महम्मद के बाद अहम्मद हुआ। उसके विषय में लिखा है कि वह 'महीमण्डल' का मण्डन (भूषण) और सव धर्मों, पदार्थों और विचारो को जानने वाला और समझने वाला था। उसने अपने पराक्रम से मालवाधिपति को आक्रान्त ही नहीं किया वरन् उसके देश और धन पर भी अधिकार कर लिया। अहमद को इस प्रशस्ति को सत्यता बहुत कुछ इतिहास स प्रमाणित होती है । उसको 'मही-मण्डल-मण्डन' इमलिये कहा गया है कि वह गुजरात के पहले बड़े सुलतानो में से था, उसने अपने राज्य को दृढ बनाया और अहमदावाद शहर वसाया । यह आश्चर्य की बात है कि इस लेख में उसके अन्य महान् कार्यों के साथ-साय नगर निर्माण के विषय में कुछ नहीं उल्लेख किया गया है। यद्यपि २० वें पद्य से इस नगर का नाम प्रसगवश आगया है । जैसा कि हमें मुसलमान इतिहासकारों से ज्ञात होता है अहमद मालवा के अधि. पति हुशङ्गशाह को आँखो में चुभता था। सन् १४११ व १४१८ ई० में दो बार हुशङ्गशाह ने गुजरात पर आक्रमण किये परन्तु अहमद ने दोनो ही बार उसे पीछे हटा दिया। इतना ही नहीं, १४१६५ ई० में उसने स्वयं मालवा पर चढाई की और हुशङ्ग को हार कर मांडू के गढ़ में शरण लेनी पडी । इसके बाद १४२२ ई० में जब हुशङ्गशाह उडीसा पर चढाई करने गया हुआ था तो अहमद ने फिर मालवा पर आक्रमण किया परन्तु माण्डू पर अधिकार करने में सफल नहीं हुआ। अहमदशाह के इन हमलो का कोई विशेष फल न निकला । उसने केवल मालवा प्रान्त को लूटा और बरबाद कर दिया परन्तु उसे अपने राज्य में न मिला सका । प्रस्तुत शिलालेख में उल्लिखित मालवा का ग्रहण करना ऐतिहासिक आधारो पर सिद्ध नहीं होता है । विग्स-जि० ४, पृ० १६, १८, फरीदी पृ० १३, १५, कै० हि० इ० जि० ३, पृ० २६६-७ | विग्स-जि० ४, पृ० २१-२२, फरीदी-पृ० १६-१७ * ब्रिग्स-पृ० २२-२५, फरीदी-पृ० १८, कै० हि० इ०, जि० ३, पृ० २९६ । 'जग्राह तद्देशधन च पश्चात्'--यहाँ 'तद्देशवन' का द्वन्द्व समास करते है तो 'तद्देश च वन च' ऐमा विग्रह होता है । इसमे प्रतीत होता है कि उसका देश और धन ग्रहण कर लिए । यदि उसका विग्रह 'तद्देशस्य धन जग्राह' इस तरह किया जावे तो इसका अर्थ उसके देश का धन ग्रहण किया अर्थात् उसके देश को लूट लिया ऐसा होता है । विवरण के लिए देखिए-ब्रिग्स-जि० ४, पृ० १७, २६, ३०, फरीदी-पृ० १४, १७, १६, २१, वर्ड-पृ० १८८, के० हि० इ०, जि० ३, पृ० २६६-६६ ।

३२] महमूद वेगड़ा का दोहाद का शिलालेख - यह भी विचारणीय है कि इस लेख में अहमद को दूसरी लडाइयों का कोई उल्लेख नहीं है, विशेषत: गिरनार के चूडासमा राजा, खानदेश के नासिर और चांपानेर के राजा का, जिनको उसने १४२२ ई० में अपने आधीन कर लिया था। दक्षिण के बहमनी राजा अलाउद्दीन अहमद के विषय में भी इसमें कोई उल्लेख नहीं है। अहमद के पुत्र महम्मद के बारे में इन लेख में विशेष हाल नहीं लिखा है और यह ठोक भी है। यद्यपि ऐसा कहते है कि ईडर के राजा वीर (बैर), मेवाड के राणा कुम्भा और चम्पानेर के राजा गगादास पर उसने विजय प्राप्त की थी परन्तु कुछ मुसलमान इतिहासकारो ने उसके विषय में लिखा है कि वह कायर था और जब मालवा के सुल- तान महमूद ने उस पर हमला किया तो उसने पीठ दिखा दी थी। उसकी इस कायरता के फलस्वरूप हो कुछ अफसरो के बहकाने से उसकी स्त्री ने उसे विष दे दिया था। उसका एक गुण यह था कि वह उदार बहुत था और इसीलिये मुसलमान लोग उसे 'करीम' कहते थे । महम्मद के बाद तुरन्त ही महमूद से हमारा परिचय होता है । जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है उसके दो पूर्वाधिकारियो के नाम छोड दिये गये है । म्हमूद का नाम महमूद बेगडा (गुजराती वेगडो) अधिक प्रसिद्ध है । प्रस्तुत शिलालेख में उसको वीर योहा** लिखा है और आगे चल कर ग्यासदीन का उल्लेख है । यह स्पष्ट नहीं है कि इस उपाधि का प्रयोग महमूद के लिए किया गया है अथवा उसके कुल में उत्पन्न किसी अन्य व्यक्ति के लिए । यदि इसका प्रयोग महमूद के लिए किया गया है तो यह बात कुछ विचित्र सी जान पडती है क्योकि इत्त उणधि का अर्थ है (गियास-उद्दीन) धर्म का सहायक, और सिक्को और लेखोई में उसके लिए नामिरउद्दीन वा उदुनिया अर्थात् 'धर्म और जगत् का रक्षक' लिखा है पुत्र मुहम्मद द्वितीय को उसके सिक्को में गियासउद्दीन लिखा है । देखिए-कैम्ब्रिज हिस्ट्री आफ इण्डिया, जि० ३, पृ० २६६-६६ +देखिए टिप्पणी पृ० * कै० हि० इ०, जि० ३, पृ० ३००-०१, ब्रिग्स-जि० ४, पृ० ३५, फरीदी- पृ० २३-२४ || ब्रिग्स-जि० ४,१० ३६, फरीदी ने यह कृत्य किसी सय्यद का लिखा है,पृ० २६। ६ मीराते सिकन्दरी, पृ २३ पर लिखा है कि उसने 'ज़र बहा' स्वर्ण-दाता का नाम प्राप्त किया। || बिग्म-जि०४, पृ० ३६, 'करीम अर्थात् दयावान्' । वर्ड-पृ० १६६ “जरवक्स" ** फरिश्ता जि० ४ पृ० ६९-७० If सूचीपत्र, गुजरात के सुलतान, पृ० २२ + एपि इन्डो-मो०, १९२६-३०, पृ० ३-५, रिवाइज्ड लिस्ट, पृ० २५३ ॥ सूचीपत्र पृ० २२ अहमद प्रथम के - - -- महसूद बेगड़ा का दोहाद का शिलालेख [३३ जिन पक्तियो में उसके युद्धो का वर्णन किया गया है वे दुर्भाग्य से कई जगह खण्डित हो गई है, अतः इन सब घटनाओ का ठीक-ठीक पता लगाना कठिन है। आठवें पद्य में दक्षिण दिक्पति और दम्मण के अधिपति के साथ महमूद के सम्बन्धो का वर्णन है (?) वत तक पृथ्वी पर अधिकार (?) का भी जिकर है । (पद्य के) पूर्व भाग में मालवा के महमूद खिलजी द्वारा १४६२ और १४६३ ई० में दक्षिण दिक्पति' निजाम शाह पर चढ़ाई करने के अवसर पर महमूद ने जो सहायता की थी उसका उल्लेख किया गया प्रतीत होता है और अपर भाग में दम्मण के पास पारडो के राजा द्वारा १४६४ ई० में किए गए आत्म-समर्पण की ओर संकेत है। रैवत अर्थात् जूनागढ के गिरनार पर्वत का उल्लेख करने से महमूद द्वारा १४६६ ई० में उस राज्य पर किए पहले हमले से तात्पर्य है। उस समय वहाँ के राजा रावमांडलिक से महमूद ने कर वसूल किया था और उसे राजचिह्न छोडने को बाध्य किया था। आगे पद्य में लिखा है कि महमूद ने उस दुर्भेद्य जूना (जोर्ण) गढ को विजय किया और उसको कीर्ति को चिरस्यायो करने के लिये रैवताचल ही विजय स्तम्भ बनाया गया। इससे जूनागढ के किले को पूर्णतया जीत कर दिसम्बर १४७० ई० में सोरठ को गुज- रात में सम्मिलित कर लेने को ओर लक्ष्य किया गया है। मुसलमान इतिहासकारो का कहना है कि गिरनार के राजा को फिर आत्म-समर्पण करने के लिए दवाया गया तब उसने इस्लाम धर्म को अगीकार कर लिया और उसको 'खान-ए-जहान्' को उपाधि प्रदान की गई। पहाडी की तलहटी में महमूद मुश्तफाबाद नामक नगर बसाया और वह नगर भी उसको राजधानियो में से एक था--साय हो, वह उसके ठहरने का एक मनचाहा स्थान भी था । * कै० हि० इ०, जि० ३, पृ० ३०४-०५, ब्रिग्स पृ० ४६-५१, फरीदी पृ० ४० ४२, वर्ड ने पृ० २०६ पर एक ही लडाई का हाल १४६१-६२ लिखा है। रॉस पृ० १७ + कै० हिं० इ०, जि० ३, पृ० ३०५, बर्ड ने इसका कोई उल्लेख नही किया है; ब्रिग्स ने पृ० ५१ पर दम्मण का तो उल्लेख नहीं किया है परन्तु १४६५ ई० में गुजरात से कोकण की चढाई का वर्णन अवश्य किया है, फरीदी ने पृ० ४२ पर बडोदर पर्वत पर चढाई और एक चट्टानी किले की विजय का उल्लेख किया है ।, रॉस ने पृ० १८ पर (Bardu) वरडू विजय का हाल लिखा है । यह एक पहाडी पर स्थित है जो दम्मण के सामने देखती हुई है । + कै० हि० इ०, जि० ३, पृ० ३०५, ब्रिग्स के मतानुसार पहला हमला १४३९ ई० में हुआ पृ० ५२, फरीदी (पृ० ५३-५४) और वर्ड इस हमले को १४६७ ई० के आस पास हुआ बताते है ।, रॉस-पृ० १९ || कै० हि० इ०, जि० ३, पृ० ३०५-०६, पृ० ५५, पृ० ५७ और पृ० २०६ पर १४७२ लिखा है। ६ कै० हि० इ०, पृ० ३०६-०७, पृ० ५६, ५७, २०६, २०, २५, २६ क्रमश ने f ३४] महमूद वेगड़ा का दोहाट का शिलालेख - पद्य सस्या १०-१२ में बताया गया है कि महमूद ने चम्पक (पद्र ?) अर्थात् वर्तमान (चांपानेर) को ले लिया, पावक (पावागढ) को जीत कर वहाँ के शासक को जीवित पकड लिया और उस नगर पर राज्य करने लगा। यहाँ चम्पानेर और इसके किले पावागढ़ पर अन्तिम विजय के सम्बन्ध में मुख्य मुख्य घटनाओं का पता चलता है । मालवा और गुजरात के बीच में चांपानेर एक 'राजनैतिक स्थिति का राज्य था । यहाँ के शासक चौहान शाखा के राजपूत थे और गुजरात के पास यही एकमात्र हिन्दू राज्य था। इसलिए जब कभी मालवा के शासक को गुजरात पर आक्रमण करना होता तो वह पहले चांपानेर के राजा को बहकाता था अथवा यदि उसी को कोई आपत्ति होती तो वह स्वयं गुजरान प्रदेश में लूट मार करके वहां के सुलतानो को तग किया करता था। इस प्रकार, इस राजा और गुजरात के सुलतानो में प्राय छुटपुट को लडाइयां और कभी-कभी बडी लडाइयाँ होती ही रहती थीं परन्तु महमूद से पहले कोई भी सुलतान पावागढ को जीत कर वहाँ के राजा को काबू में नहीं कर सका था। उस समय सम्भवत जयसिंह चापानेर का राजा था और महमूद उसके विद्रोह- पूर्ण कार्यों को अच्छी तरह जानता था परन्तु बहुत समय तक उसके राज्य पर आक्रमण * जयसिंह का वि० स० १५२५ का एक शिलालेख, इण्डियन एण्टीक्वेरी, जि० ० ६, पृ० २, रासमाला जि० १ पृ० ३५७ (रॉलिन्सन), वाम्बे गजेटियर, जि० ३, पृ० ३०४, ब्रिग्स, जि० ४, पृ० ६६ । आजकल इनके प्रतिनिधि छोटा उदयपुर और देवगढ वारिया के राजा हैं। +वि स० १५२५ के लेखानुसार जयसिंह उस समय पावक दुर्ग पर राज्य करता था और शायद महमूद के हमले तक भी वही राज्य कर रहा था । प्रस्तुत शिलालेख के २१ वें पद्य में जिम जयदेव का नाम आया है वह वास्तव में जयसिंह ही है क्योकि 'तवकाते अकबरी' (ब्रिग्स् द्वारा संपादित पृ० २१२) और 'मीराते सिकन्दरी' (फरीदी पृ० ५६) में भी लिखा है कि चांपानेर के राजा 'जयसिंह को महमूद ने हराया था । इन नामो में बहुत समानता है । इसके अतिरिक्त लेख में दिए हुए उसके पूर्वजों के नाम ममलमान इतिहासकारो द्वारा दिए हुए नामो से मिलते हैं । यथा- जयसिंह के १५२५ वि० स० का लेग्व मुसलमान इतिहासकार (१) वीर धवल (१) वीरसिंह (तबकाते अकबरी) यह अहमदशाह का सम- कालीन था । (२) श्यम्बक भूप (२) त्रिम्वक दास (मीराते सिकन्दरी पृ० १४-१७) यह भी अहमदशाह का समकालीन था। (३) गगराजेश्वर (३) गंगादास (मीराते सिकन्दरी पृ० २४ व ३०) यह कुतुबुद्दीन का ममकालीन था सम्भवत । ३५ महमूद वेगड़ा का दोहाद का शिलालेख करने का कोई अवसर नहीं मिला। निदान, १४८२ ई० में जव चापानेर के एक पताई* द्वारा पड़ौसी प्रदेश का सूबेदार मलिक सूद मारा गया तो उसे मौका मिल गया। उसके इस कार्य से नाराज होकर महमूद ने चापानेर पर चढ़ाई की और उस पर अधिकार करके- वहां एक मस्जिद बनवाई । पताई ने पावागढ़ में शरण ली और महमूद ने उस किले को घेर लिया। यह घेरा २१ महीनो तक चला और अन्त में चालाको से किले पर हमला बोल दिया गया । हताश होकर राजपूतो ने (जो अब बहुत थोडे रह गये थे) स्त्रियो को जीवित जला कर जौहर पूर्ण किया और मरणपर्यन्त मुसलमानो से अन्तिम युद्ध करने के लिये मैदान में आ गए। (इसका उल्लेख शिलालेख में किया गया मालूम होता है) कहते है कि और सव राजपूत मारे गये परन्तु राना पताई और उसका एक मन्त्री डूगरशी जीवित पकडे गए । महमूद उनके साहस और वीरतापूर्ण युद्ध करने पर बहुत प्रसन्न हुआ और जब उनके घाव ठीक हो गए तो उन्हें इसलाम धर्म अंगीकार करने के लिये कहा । जब वे इन्कार हो गए तो उन्हें कैद कर दिया गया और फिर सोचने के लिए समय दिया गया। जब उन्होंने फिर सुलतान के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और मुसलमान न होने का दृढ निश्चय प्रकट किया तो पांच महीने बाद उनको फांसी दे दी गई। इसके बाद महमूद ने महमूदाबाद नगर बसाया और इसके चारो तरफ एक किला बनाया जो जहाँपनाह कहलाया। १३-१४ पद्यों का तात्पर्य यह है कि इस नए जोते हुए प्रदेश पर शासन करने के लिए इमादल को नियुक्त किया गया । आगे के कुछ पद्यो में मलिक इमादल द्वारा पल्लिदेश को विजय और वहाँ पर एक गढी निर्माण कराने का वर्णन है । इमादल की आना से बने हुए इसी किले व वहीं पर खुदवाए हुए दो तालाबो का उल्लेख १९ वें पद्य में किया गया प्रतीत होता है। जैसा कि आगे बताया गया है, यह पल्लिदेश गोधरा जिले का ही कुछ भाग था न कि राजपूताने का वह जिला जो इस नाम से प्रसिद्ध है। पद्य संख्या २० में एक कुए का वर्णन है जो, स्पष्ट है कि, इमादल द्वारा अहम्मदपुर में खुदवाया गया था। यहां अहम्मदपुर से अहमदाबाद का तात्पर्य है न कि अहमदनगर का। दूसरे इतिहासकारो (जैसे फरिश्ता, ब्रिग्स पृ० ६६) ने उसे 'वेनीराय' लिखा है, फरीदी (पृ० ६५-६७) ने रावल पताई, वर्ड (पृ० २१२) ने 'रावन तुप्पई, और वेले ने 'लोकल महोमेदन डाइनेस्टीज़ गुजरात' (१८८६, पृ० २११) में 'राय-पताईलिखा है । इसमे विदित होता है कि दूसरे 'चाहमान' अथवा 'चौहान' वा के राजाओ की तरह चांपानेर के राजा भी 'राय' कहलाते थे १ वाटसन (इन्डि० एण्टि०, जि० ६, पृ० २) का यह अनुमान ठीक है कि 'पताई पावापति का - सक्षिप्त स्प है। * कै० हि० इ०, जि० ३, पृ० ३०६-१०, फरीदी, पृ० ६६-६७ फरिश्ता, जि० ४, पृ० ६६-७०, रॉस, पृ० २७-३१ - .

३६] मयूर वाड़ा का दोहाद का शिलालय । इक्कीसवें पद्य में फिर निसा है कि इमाद न ने तापूदशाह को आजा मै [चम्पक पुर (चांपानेर ?)] में एफ सुदृढ दुर्ग और वावडी बनवाई । यहाँ दुर्ग में तात्पर्य चांपानेर के चारो ओर की उस बाहरी दीवार और विशेष परकोटे मे है जिसको बनवाने के निा महमूद ने आज्ञा दी थी।* पद्य न० २२-२५ में बागूलापिपति का वर्णन है जिसका नाम जगदेव या (पद्य २२) । इमादल ने उसको सेना को पूर्णत. पराजित कर दिया था । पाने रायदुर्ग विजय का उल्लेख है । यह राय (राजा) का दुर्ग सम्भरत. इसो (जयदेव) गजा का था । चौबीमवें पद्य में फिर किसी किने पर विजय प्राप्त करने का वर्णन है। यहाँ पर यह स्पष्ट नहीं है कि ये सब पद्य पावागढ़ के राजा हो ग विश्य में है जिपा नाम जयदेव था और जिसको पावागढ के शिलालेख का जयसिहदेव बताया जाना है अथवा बागूलाधिपति जयदेव के विषय में जो पावागढ़ के राजा से भिन्न व्यापिन था। पूर्व पक्ष को मान लेने के लिए पद्य २३ में प्रयुक्त दिग्विजय' शब्द हो नाना है। सम्भव है पावागढ को विजय को हो 'दिग्विजय' कहा गया हो । क्योंकि इसे अब तक कोई भी गुजरात का सुलतान पूर्ण नहीं कर सका था । फिर, यही एक ऐमा हिन्दू राज्य था जो जब तक स्वतन्त्र बना हुआ था। इस दलील में तो कोई सार नहीं है कि चम्पापुर विजय का उल्लेख एक ही बार किया गया है और फिर नहीं किया गया क्योकि २५ ३ पद) में फिर 'पावक'का उल्लेख मौजूद है । यह प्रश्न तब तक ठीक-ठोक हल नहीं हो सकता जबतक कि बागूला का पता न लगा लिया जावे। शायद यह उन भू भाग का दूसरा नाम हो जिस पर चापानेर का राजा राज्य करता या। सम्भव है, पायही के प्रदेश वागड से भिन्न नाम रखने के लिये ही ऐसा किया गया हो अन्यया यह 'बागलान' हो जो गुजरात दक्षिण के बीच में एक छोटी सी राजपूत रियासत यो । मुसलमान लेखलो द्वारा बागूला का कहीं उल्लेख नहीं किया गया है। छब्बीसवें पद्य में, जो ठीक ठीक नहीं पढा जा सका है, दधिपद्र (आधुनिक दोहाद) के सुन्दर किले का उल्लेख है । यह किला इमादल मुल्क द्वारा शक सम्बत् १४१० व विक्रम * बाम्बे गेजे०, जि० १, भा० १, १० २४७, बर्ड पृ. २१२, बेले (तबकाते अकबरी, पृ० २१०) । यह विचारणीय है कि यद्यपि 'मीराते अहमदी' का लेखक 'मीराते सिकन्दरों' के आधार पर ही चलता है परन्तु 'सिकन्दरी' में इसका कोई उल्लेख नही है । कैहि० इ०, जि० ३, पृ० ६१२और pt 25, Beley (वेले) ने पृ० २१२ पर एक नोट में लिग्वा है कि 'यह ऊपरवाला 'राजप्रासाद' मालूम होता है । स्पष्ट ही दिखाई पडता है कि ऊपर के किले के अवशेषो की बनावट मुसलमानी ढग की है । यह महमूद बेगडा द्वारा बनवाया हुआ बताया जाता है जिसने इसका नाम 'मान महेश' रक्खा था । देखिए 'बॉम्बे गजेटियर' जि० ३, पृ० १६० + यह दक्षिण सम्भवत पल्लिदेश (वर्तमान गोधरा तालुका) के बहुत समीप है। और -- - - महमूद वेगड़ा का दोहाद का शिलालेख [३७ अनुमार मलिक सम्वत् १५४५ में वनवाया गया था। इक्कीसवीं पंक्ति में इमादन मलिक द्वारा किसी खास दिन जीर्णोद्धार कराए जाने का उल्लेख है । यह तिथि और दिन अब नहीं पढ़े जा जा सके है। इस (२६ ३) पद्य में हमें एक नई ही सूचना मिलती है । किसी भी मुसलमान इतिहासकार ने, दधिपद्र (दोहाद) के दुर्ग के निर्माण अथवा जीर्णोद्धार का श्रेय महमूद अयवा उसके साथियो को जिनके कार्यों का विस्तृत वर्णन मीराने-सिकन्दरी* में मिलता है, नहीं दिया है। इस शिलालेख में महमूद को १४६० ई० (जब यह उत्कीर्ण हुआ था) तक को सभी महत्वपूर्ण विजयो का उल्लेख है परन्तु इसमें सिन्व, जगत और द्वारा (द्वारका) के हमलो को छोड़ दिया है जो क्रमश. १४७२ और १४७३ ई० में हुए थे। लेख को ११, १३, १५-१७, २० और २१ वीं पक्तियोंमें क्रमशः (१) इमादल (२) इमादल मलिक (३) 'वीर' इमादल, (४) इमादुल मुल्क और (५) इमादुल मलिक नामक व्यक्ति के कार्यों का उल्लेख है। पहली (११वो) पक्ति का सन्दर्भ स्पष्ट नहीं है । (इससे) ऐसा प्रतीत होता है कि उसे (इमादल को) देश रक्षा', (सम्भवतः नये जोते हुए चापानेर राज्य को रक्षा) के लिए नियुक्त किया गया था। दूसरी (१३ वी) पंक्ति के इमादल ने पल्लिदेश को जीत कर वहां एक किला बनवाया था। तीसरे, उसने चम्पकपुर में एक किला बनाया था। और चौथे, इमादुल मुल्क ने दधिपद्र दुर्ग के सम्बन्ध में एक दान किया और अन्त में मलिक इमादल ने अपने अधीनस्थ उसी दुर्ग का (?) जीर्णोद्धार कराया (मलिकि ?) प्रसंग देखने से ये सब कार्य एक ही व्यक्ति इमादुल मुल्क द्वारा सम्पन्न हुए जान पडते है । प्रस्तुत शिलालेख में इन कार्यों का वर्णन. 'देश रक्षा' पर नियुक्ति से लेकर शक सम्वत् १४१० में दधिपद्र दुर्ग के जीर्णोद्धार तक तिथि क्रमानुसार लिखा गया है। यह इमादल मुलक और इमादुलमुल्क एक ही हो सकता है जो कि प्रधान मन्त्री के समकक्ष ही एक पद होता था। महमूद के समय में इस तरह के तीन इमादुल-मुल्क हुए (१) इमादुल मुल्क शा' वान, (२) इमादुल मुल्क हाजी सुलतानी और (३) उसका पुत्र बूद। पहले इमादुलमुल्क ने महमूद की उस षड्यन्त्र के विरुद्ध सहायता की जो उसके तख्त पर बैठते समय हुआ था। वूद वह व्यक्ति था जिसकी सहायता से महमूद ने चांपानेर आदि स्थानो पर विजय प्राप्त की और दधिपद्र (दोहाद) का किला बनवाया * देखिये-फरीदी पृ० ७८-८८, बेले पृ० २३८ इतिहासकारो ने इमादुन- मुल्क मलिक आईन का नाम लिखा है जिसने आईनपुरा बसाया । यह अहमदाबाद का बहुत मुन्दर कस्वा है । परन्तु, दधिपद्र और दोहाद एक है अत इस सूचना से विशेष काम नही चलता है। +कै० हि० इ०, जि० २, पृ० ३०६-०७ - प्रिन्स ऑफ वेल्स म्यूजियम के श्री ज्ञानी के मतानुसार । पा के० हि० इ०, जि० ३, पृ० ३०४ व ३०६ ३८] महमूद बेगड़ा का दोहाद का शिलालेख तथा उसका जीर्णोद्धार कराया क्योंकि उसका पिता हाजी सुलतानी चांपानेर की चढाई* के पहले ही मर चुका था । इस शिलालेख में अहम्मदपुर, चम्पक (पद्र), चम्पकपुर, दविपद्र नामक स्थानों, गूर्जर, मालवक, दम्मण और वागूला के अधिपतियों; पावक और जीर्ण (?) दुर्गों तथा रंवतक पर्वत के नाम आये है। जिस प्रसग में अहम्मदपुर का नाम आया है वह स्पष्ट नहीं है । अधिक सम्भव यही है कि इससे अहमदाबाद ही का तात्पर्य है जिसको अहमदशाह ने प्राचीन नगर आशावाल के स्थान पर बसाया था। यहां पर उसी के बसाये हुए अहमदनगर का प्रसंग इसलिये ठीक नहीं बैठता कि महमूद द्वारा वहाँ पर बनवाई हुई किसी भी इमारत का उल्लेख नहीं मिलता है, जब कि अहमदाराद में उसने चांपानेर विजय करने के बाद ही बहुन-सी शानदार इमारने, नगर के चारो तरफ एक दोवार व बहुत-सी बुजे बनवाई थीं। चम्पक (पद्र) अयवा चम्पकपुर ही आधुनिक चांपानेर है जिसके प्राचीन गौरव का इतिहासकारों ने बखान किया है। महमूद को बनवाई हुई कितनी ही इमारतों के खण्डहर अव भी चांपानेर में मौजूद हैं । इनमें से गढ (राज प्रासाद) का परकोटा, बुर्ज, दरवाजे, राहदारी के थाने, मस्जिदें और छत्तरियां मुख्य है। सबसे बढ कर जामा मस्जिद है।|| दधिपद्र और दोहाद एक ही है। इसका शब्दार्य है 'दघि पर बसा हुआ पद्र (गांव)। दघि मे तात्पर्य है दधिमती नदी जिसके किनारे आजकल दोहाद** बसा हुआ है। * कै० हि० इ०, जि० ३, पृ० ३०९ + कै० हि० इ०, जि० ३, पृ० ३०० * वर्ड, पृ० १६० के० हि० इ०, जि० ३, पृ० ६१२; जि० ४, पृ० ७० ६ आईन-ए-अकबरी (अबुल फज़ल) जि० २, पृ० २४१-२४२ || इस मसजिद और दूसरी इमारतो के लिए देखिए-आकियालाजिकल मर्वे, वेस्टर्न इण्डिया, भा० ६, पृ० ४१ (Arch Surey West India, Vol VI, P 41 and Pts, LVI, LVI II,EXI, and XIV, and CHI Vol III, 612-13 and Pt XxV और कै० हि० इ०, भा ३, पृ० ६१२-१३ ** पौराणिक आधार पर इसका नाम दध्येश्वर महादेव के कारण दधिपुर का नगर था । दध्येश्वर महादेव दविमती नदी पर स्थित है। नदी का नाम दधिमती इसलिए पड़ा कि दधीचि ऋपि यहा पर रहते थे। इन आधारो पर दधिपढ़ नाम ही अधिक सगत जान पडता है । दविपुर नगर तो वाद में शिव की पुरातनता बताने के लिए नाम रख लिया जान पडता है। [ इस गाँव का स्थानिक उच्चारण 'देवद' या 'दहिवद है जो ठीक 'दधिपद्र' का अपभ्रश है। मुसलमानो ने अपने जिह्वा-वैक्लव्य के कारण इसको 'दाहोद' या दोहाद कह कर बोलना शुरू किया और उसी तरह लिखना प्रारम किया और फिर जिनका अनुकरण इग्रेजो ने किया-जिन विजय ।]

. महमूद वेगड़ा का दोहाद का शिलालेख [३९ दोहाद से प्राप्त हुए जयसिंह और कुमारपाल के समय के शिलालेखो में भी दधिपद्र शब्द का प्रयोग मिलता है। मुसलमान इतिहासकार दोहाद में दुर्ग निर्माण के जिस प्रश्न को पूर्णतया हल नहीं कर सके थे वह प्रस्तुत शिलालेख से हो जाता है। उदाहरणार्थ, मीराते अहमदी के लेखक ने एक जगह लिखा है कि दोहाद की व्यापारी मण्डी की पहाडियो में अहमदशाह ने एक किला बनवाया, दूसरी जगह इसके वनवाने का श्रेय मुजफ्फर (द्वितीय) को दिया गया है। परन्तु, मोरात-ए-सिकन्दरी के कर्ता का अभिप्राय है कि धमोद और दोहाद एक ही स्थान के नाम है और दोहाद का किला अहमद (प्रयम)* ने बनवाया तथा मुज- पफर ने मालवा जाते हुए १५१४+ ई० में इसका जीर्णोद्धार कराया। हमारे शिलालेख के प्रसग से ज्ञात होता है कि दधिपद्र में किला तो पहले ही मौजूद था परन्तु वह टूटी-फूटी दशा में था। इसका र्जीर्णोद्धार || महमूद (प्रयम) के समय में मलिक इमादल ने कराया । सम्भवतः यह किला अहमद (प्रथम) का हो बनवाया हुआ था, जैसा कि ऊपर बताया गया है हम ऊपर लिख चुके है कि बागूला या तो फरिश्ता द्वारा उल्लिखित 'बगलान' है अथवा अबुल फजल|| व अन्य ग्रन्थ कर्ताओ के मतानुसार "बागलान" है । फरिश्ता का कहना है कि यह 'सूरत' के पास का प्रदेश है, दूसरे लोगो का मत है कि यह सूरत और नन्दरबार के बीच का पहाड़ी और घनी आबादी वाला प्रदेश था। आजकन के नासिक जिले** का एक भाग जो बागलान कहलाता है वह इस वर्णन से मिलता है । मुसलमान इतिहासकारो के मतानुसार इस स्थान के शासक राष्ट्रकूट वंश के थे । ये लोग और कन्नौज के राठौड एक ही थे। इन लोगो को वशपरम्परागत उपाधि 'बहरजी' थी जो * इण्डियन एण्टिक्वेरी, जि० १०, पृ० १५६ + बर्ड, पृ० १६० वर्ड, पृ० २२२ * 'दोहाद का एक थान का कोट खिचवाया जो पहाडियो के बीच में था' । फरीदी, पृ० १७ + फरीदी, पृ० ६६ दधिपद्रे रुचिरतर दुग्ग वै-प० १६ वा उद्धरेत् प० २१ ६ विग्स, जि० ४, पृ० १९ व ३० || आईन ए अकबरी (ग्लैडविन), जि० २, पृ० ७३ । इस का उल्लेख सर्वप्रथम, Bombay Gaz Vol. XVI, p 188, Vol VII, p: 65 and 189 में किया गया है। Bombay Gaz Vol XVI, p 399. बर्ड द्वारा उल्लिखित 'मोआसिरुल उमरा' (उमरावो का इतिहास) पृ० १२२-इसका यह कयन विश्वसनीय नहीं है कि 'जमीदार के पास.. चौदह सौ वर्ष से कब्जे में था।' . .. देश ४०] महसूट वेगड़ा का दोहाद का शिलालेख शायद मसूदी* के मतानुसार कन्नौज के राज्यवश को उपाधि 'वडराह' से मिलती है। इन लोगो का कहना है कि इस प्रदेश में सात दुर्ग थे जिनमें से मुल्हेर और सालेर के किले असाधारणतया दृढ+ थे। वहुत पहले ही से वागलान दक्षिण और गुजरात के समुद्री किनारे पर बीच का स्यान रहा है । तेरहवीं शताब्दी के अन्त में गुजरात के अन्तिम हिन्दू शासक कर्ण ने यहीं पर शरण ली थी। इसके बाद भी यह स्थान गुजरात के और दक्षिण के सुलतानों के वीच लड़ाई का कारण रहा है । कभी इस पर एक का अधिकार होता था तो कभी दूसरे का, और कभी कभी यह दोनो ही के अधिकार से निकल कर स्वतन्त्र हो जाता था। प्रस्तुत शिलालेख में भी गुजरात के सुलतानो को किसी ऐसी ही विजय से अभिप्राय है जिसका मुसलमान इतिहासकारो ने उल्लेख नहीं किया है। यह विजय, उन्होने दौलताबाद के सूबेदार मलिक वागी और मलिक अशरफ बन्धुओ को १४८७ ई० को जीत से पहले प्राप्त की होगी । पल्लीदेश के विषय में प्रसङ्ग स्पष्ट नहीं है परन्तु इतना अवश्य विदित होता है कि इस नाम के देश में इमादल ने एक किला बनवाया था। आजकल के गोधरा तालुका में एक स्थान है जो पाली कहलाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस प्रदेश के प्राचीन नाम पल्लोदेश के आधार पर ही इस स्थान का यह नाम चला आ रहा हो । शिलालेख में वर्णित पल्लीदेश को राजपूताने का प्रसिद्ध जिला पाली मानने के लिए प्रसङ्ग को संगति ठीक नहीं बैठती है क्योकि चांपानेर विजय करते समय महमूद ने उसो भूखण्ड पर अधि- कार किया होगा जो आजकल गोधरा ताल्लुका के अन्तर्गत है और जो उस समय पल्लीदेश के नाम से प्रसिद्ध था। राजपूताने में महमूद ने कोई विजय प्राप्त नहीं को । हाँ, जूलवाडा और आबूगढ के राजाओ से कर वसूल करने के लिये मारवाड़ के सांचोर और जालोर जिलो पर आक्रमण करने का उसने मनसूवा अवश्य किया था। इस हमले का कार्य इमादु- * जैसा कि 'वाम्वे गजेटियर',भा० १६, पृ० १८४ नोट ८ में लिखा है । + इनमें से बहुत से अब भी मौजूद है । (वाम्बे गजेटियर, भा० १६, पृ० ४००) बहुत सी पहाडियो पर सीधी चट्टानें खडी है और बहुत सी पहाडियो पर परकोटे खिचे हुए है । इनमें से विल्कुल पश्चिम में बम्बई प्रदेश का सालेर और इससे करीव दस मील पूर्व में मुल्हेर का किला मुख्य है । * रिवाइज्ड लिस्ट अन्टिक्वेरियन रिमेन्स, वाम्बे प्रेसि०, पृ० ९८ पा जोधपुर राज्य में, देखिए-राजपूताना गजेटियर (इम्पीरियल गजट इण्डिया, प्राविन्शियल सिरीज) पृ० २०३, हेमचन्द्राचार्य ने भी अपने द्वयाश्रय महाकाव्य के सर्ग २० पद्य ३३ में पल्लिदेश का उल्लेख किया है परन्तु उसका अभिप्राय भी राजपूताने के तन्नामक प्रदेश से है। विग्स, जि० ४, पृ० ६४, कै० हि० इ०, जि० ३, पृ० ३०६, वेले पृ०-२०६ महमूद-वेगड़ा का दोहाद का शिलालेख [४१ . ल्मुल्क और कैसरखों के आधीन किया गया था। परन्तु, इसमें सन्वेह है कि यह हमला कभी हना भी था या नहीं। इसके विपरीत यह कहा जाता है कि महमूद के अधिकार में गोषरा नाम का एक अलग ही प्रान्त था जिसका सूवेदार फुवाम-उल-मुल्क था । कुछ भी हो, इस (पल्ली) देश में दुर्ग-निर्माण का प्रश्न इस स्थान पर हल नहीं हो सकता है। पावकदुर्ग (१६) ही पावागढ़ का पहाड़ी किला है जो वम्बई प्रान्त के पंचमहाल जिले में गोवरा से २५ मील दक्षिण में और सड़क द्वारा बड़ौदा से २६ मील पूर्व में स्थित है । यहाँ के शासकों के एक शिलालेख में इसका नाम पावागढ़ भी दिया है । महमूद से पहले अहमदशाह और उसके पुत्र महम्मदशाह ने इस दुर्ग को लेने के लिए प्रयत्न किये थे परन्तु वे सफल नहीं हुए । एक लम्बे घेरे के वाद १४८४ ई० के नवम्बर मास में इस किले पर हमला करने और इसके दरवाजे तोड़ देने में सफलता मिली। कहते है कि पहाड़ी पर अधिकार प्राप्त करने के बाद महमूद ने ऊपर और नीचे के दोनो किलों में रक्षकों के दल को और भी मजबूत कर दिया और वहां पर महमूदाबाद नामक शहर बसाया जो महमूदाबाद चांपानेरई भी कहलाता था । प्रस्तुत शिलालेख में इन कार्यों की ओर इतना ही कह कर लक्ष्य किया है कि महमूद ने उस देश पर राज्य किया। जीर्ण (दुर्ग) से आधुनिक जूनागढ़ का अभिप्राय नहीं है बल्कि यहाँ पर बनाये गये किलों में से एक का है जिनका हाल मुसलमान इतिहासकारों ने लिखा है और दूसरे शिलालेखो में भी जिनका उल्लेख मिलता है। उक्त आधारों से विदित होता है कि १५वीं शताब्दी में यहाँ पर दो किले|| और एक शहर था। शहर का नाम सम्भवतः गिरिनगर** था जैसा कि इससे पूर्व क्रमशः दूसरी और आठवीं शताब्दियों में मिलता है । शहर का किला जो दामोदर घाटा के किनारे पर गिरनार (रैवत पर्वत) की ढाल पर बना * विग्स, पु० ६२ + बाम्बे गजेटियर, जि० ३, पृ० १८५ नो० १ वही, पृ० २१७ नो० ३,४ पावागढ की पहाडी और किले का नकमा देखिये, वाम्वे गजे०, जि०३,पृ० १६६, ६ फरिश्ता, जि० ४, पृ० ७, वर्ड, पृ० २१२, फरीदी, पृ० ६७, के० हि० इ०, जि० ३, पृ० ३१० || फरीदी, पृ० ५२, ५४, बर्ड पृ० २०८ ** ब्रिग्स (फरिश्ता), जि० ४, पृ० ५२, ५३ "महमूदशाह . देश की ओर (चला) जिसकी राजधानी का भी यही नाम था।" + रुद्रदामन का शिलालेख, निग्स, जि० ८, पृ० ४५ I जयभट्ट का दानपत्र (इण्डि० एण्टि०, भा० १३, पृ० ७८ पंक्ति १९) | ब्रिग्स, जि०४, पृ० ५३ ...गिरनाल महमूद वेगड़ा का दोहाद का शिलालेख हुआ है जीर्णदुर्ग,* झिझरकोट अथवा जूनागढ़ कहलाता था। इसीको शायद आजकल ऊपरकोटमा कहते है । वास्तव में, यह परकोटे से घिरा हुआ राजमहल था । यह मुगलों को गढ़ियों जैसा था और सम्भवतः इसको गिरनार के चूड़ासमा राजाओ ने बनवाया था । दूसरा किला पहाड़ के ऊपर बना हुआ था और अब उसके कोई भी चिह्न अव- शिष्ट नहीं है । इस पर्वत का प्राचीन नाम रेवत अथवा ऊर्जयन्त (उज्जयन्त) से बदल कर गिरिनगर के आधार पर गिरनार होना और शहर का नाम जीर्णदुर्ग अथवा जूनागढ में बदल जाना सम्भवत. १५ वीं शताब्दी के बाद की बात है। रैवतक गिरनार पर्वत का ही दूसरा नाम प्रतीत होता है । इसी स्थान पर मिले हुए एक शिलालेख में इस पर्वत का नाम ऊर्जयत्|| लिखा है । स्कन्दगुप्त** के लेख में ये दोनों ही नाम मिलते है । फ्लीट साहब का मत है कि गिरनार को दो पहाडियों में से एक का नाम रंवतक है न कि खास गिरनारवाही का । इसके बाद १३०० ई० तक का कोई शिलालेख सम्बन्धी प्रमाण अवतक प्राप्त नहीं हुआ है । इसके बाद के शिलालेखों में रैवत * मल्लदेव का चोरवाड का लेख वि० सं० १४४५ (रिवाइज्ड् लिस्ट एण्टि० रिमेन्स वाम्बे प्रेसि०, पृ० २५०; ब्रिग्स, जि० २१, परिशिष्ट पृ० १०३ स० ७३१, थेपक राजा मेहरा के हथसनी के लेख, इण्डि० एण्टि०, भा० १५, पृ० ३६०, वही० भा० १६, परि० पृ० ६८ + रिवाइज्ड् लिस्ट वाम्वे प्रेसि०, पृ० ३६१ लेन्ब ऋ० ३५ पक्ति ६ * ब्रिग्स, जि० ४, पृ० ५३ ना यह हिन्दू ढग का बना हुआ और सम्भवत १३वी अयवा १४वी शताब्दी का है या इससे भी पहले का हो सकता है । (आकियालॉजिकल सर्वे वेस्टर्न इण्डिया, भा० २, पृ० १५) ६ फ़रिश्ता (ब्रिग्म, जि० ४, पृ० ५३) “पहाड़ पर, || रुद्रदामन का लेख (विग्स, जि० ८, पृ० ४२) ** गुप्तकालीन लेख, कॉ० इ० इ०, भा० ३, पृ० ६० वही पृ० ६४ नो० १, "ऊर्जयत् अथवा गिरनार के सामने का पहाड ।" परन्तु 'वाम्बे गजेटियर' जि० २, पृ० ४४१-४२ में लिखा है कि रेनतकुण्ड (जो दामोदर कुण्ड भी कहलाता है) के ठीक ऊपरवाले पर्वत को ही रेवताचल कहते हैं । इसका नाम रेवताचल, राजा रेवत के नाम पर पड़ा है । कहते है कि अपनी पुत्री रेवती का विवाह श्रीकृष्ण के बडे भाई वलदेव के साथ करने के बाद राजा रेवत द्वारका में गिरनार आकर रहने लगा था। भागवतपुराण के स्कन्ध १० अध्याय ५२ में इम क्या का उल्लेख है । वहाँ रेवत को आनर्तराज लिग्ना है परन्तु यह नही लिखा है कि वह गिरनार जाकर रहने लगा था । जौनपुर के ईश्वर वर्मन् के शिलालेख में रेवतक का उल्लेख है । गुप्त- कालीन लेख कॉ० इ० इ०, भा० ३, पृ० २३० 4. दृढतम किला", महमूद वेगड़ा का दोहाद का शिलालेख [४३ और उज्जयन्त पर्वत को एक ही बताया गया है । इससे ऐसा प्रतीत होता है कि पूर्व समय में गिरनार को दो भिन्न-भिन्न पहाडियो के नाम रैवत और उज्जयन्त थे परन्तु बाद में वे एक ही पर्वत के नाम हो गए । अत प्रस्तुत शिलालेख में उल्लिखित रैवतक से उस पर्वत का अभिप्राय है कि जिस पर मन्दिर आदि बने हुए है और जो गिरनार के नाम से प्रसिद्ध है। * देखो नेमीनाथ के मन्दिर से प्राप्त लेख स० १४ (रिवाइज्ड लिस्ट बाम्बे प्रसि०, पृ० ३५५) और मल्लदेव का चोरवाड का लेख पृ० २५० । माण्डलिक राजा के एक लेख में दोनो नाम है परन्तु यह स्पष्ट नही है कि ये दोनो नाम एक ही के है.अथवा भिन्न भिन्न पर्वतो के । (पृ० ३४७-४८) वाम्बे गजेटियर, भा० ८, पृ० ४४१ "जैन लोग कभी कभी गिरनार को ही रेवताचल कहते हैं, परन्तु यह गलत है।" २ ४ ४. शिलालेख का पद्य विवरण पद्य स० १,१०, २६ आर्या ३, ११, १२, १६ से १८, २०, २२, २३ अनुष्टुप इन्द्रवज्रा ४, १३, १४, १५, २५ उपजाति स्रग्धरा ७ से ८, १९, २१, २४ शार्दूलविक्रीडित राजविनोद महाकाव्य में वर्णित प्रसिद्ध व्यक्तियों एवं स्थानों आदि की सूची अङ्गाधिप कर्णाट ७ २८, २९. अर्जुन २ १७. कलिग ४. ६ अल्पषा (खा) न २ ५. कामरूप (देशपति) ४ १३ अहंमद १. २६., २ १०, १३,१४,३१; काश्मीर ३ ५, ७ ३५ ३ ३३, ४ ३३, ५ ३५, काश्मीर मण्डलपति, ६ ३६, ७.४३. कृष्ण २ २ इन्द्रप्रस्थ कुभकर्ण ४ १२ उदयराज ७ ४१ गायासदीन ऐरावत । ४ ६. १.२६, २ १४, -३१,, ३ ३३, ५ ३५, ६ ३६, कच्छ २ ३ ७ ४३ कान्यकुब्ज ४ १८ गूजर २ २०, ४ ६, ७. ३४,,३५. कर्ण १. १३, २ १७, २६, ४.२६, गजर क्षमापति १. २६, २. ३१, ५.३३ ३.३३, ४३३, ५.३५%; कर्णाटक ४. ८. ६.३६, ७. ३४,४३. ४ २० ४. २०. 1 1 राजविनोद में वर्णित व्यक्ति एवं स्थान पान्डय् ४, ३ गूर्जरपातसाह ४. २२. महमद (द्वितीय) १. २६; २.१५, १६ गजरवेश २ २. २०,३१, ३.३३, ४, १७,३३, गौडत्तडामणि ७. २६. गौडेश्वर ७ २६. ५. ३५, ६.३४,३६, ७.४३. गङ्गा ४. २. महाराष्ट्र ७. २८. दिल्लीपुरी ४. १८. महाराष्ट्रपति २. १२. दिल्लीपति ७ २६. मागधेन्द्र ४. १४. त्रिलिङ्ग ४. ७. मण्डप दक्षिणनृप ४. १०; ७ २६. २. ११. दिल्लीपुर (पुरी) २, २, ४.१८. मण्डपक्षमापति ७. २७. द्वारावती ७. ३७. मालव ७. २८, २६, घारापुरी २. २०, मालवराज २. ५. नन्दपदाधिनाथ २. ६ नेपालमण्डलपति ४ १६ मालवमण्डलेश ४. ११. पल्लिवन २६ मालवमण्डल २. ११. पश्चिमवारिराशि २. ३. मुदप्फर १.२६% २.१.३१, ४.१८% पावकागिरि २ १८. ३३.५ ३५, ६.३६. मुद्गलाधिप ४. २२. पुष्पपुर ४ १४ प्रयागपति मेदपाट ७. २६, २८ प्रयागदास ७.४१ यमुना ४. १५. वलि १. १३. रत्नपुराधिराज ४ ५. २. १७ रामदास ७. ४१. भारत २. १७ भीम २ २६ लाट ७ २६. मल्लखान २. ८. लङ्कापति ४. ८; ७. १४. मयुराधिप ७. २७ लद्धाद्वीप २. ४.. मथुराधिनाथ ४. १७ वरुण महमूद १. २, ३, ५, ७, ९, १०, ११, २४, २८, २६, २. २०, २२, बङ्गनपति ४.२, ७ २८ २६, २६, ३१, ३, ६, १०, विन्ध्यराट् ७. २७. १३, १६, १७, २१, २२, २६, सरस्वती १.२,५, ४. ३२. २६,३३, ४.२३, ३२, ३३, ५ ३४,३५; ६. २२, २३, सिन्धुपति ४. २१ ३४, ३६, ७. १, २, १२, १४, सिंहलभूमिपाल ४. ६. १५, २८,३८,४०,४३. शकक्षितिभुज ७. २६. महम्मद (प्रथम) १ २६, २. ६. ३१, शूरसेनदेशपति ४. १६. ३. ३३, ४. ३३, ५ ३५; ६.३६, ७४३ हुशनसाह २. ११० ४ १५ ४. २०. * मांडू

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Rajvinodmahakavyam

Author
Mahakavi, Udairaj
Title
Rajvinodmahakavyam
File name
Rajvinodmahakavyam
Text
OCR done
Citation
1956
Published
2010/08
Publisher
Jodhpur, Rajasthan Oriental Research Institute
Language
Sanskrit
Pages
78
Library
Prakrit Bharati Academy, Jaipur
DLI number
326254
Barcode
99999990002384.00
Scanning centre
Banasthali University
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