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Gommatsar [jeevkand]

Siddhantshastri, Khoobchandra · 2010/1

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रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । और भी-" अज्जजसेणगुणगणसमूहसंधारि अजियसेणगुरु । भुवणगुरु जस्स गुरु सो राओ गोम्मटो जयउ॥" अर्थात् वह श्री चामुण्डराय जयवंता रहो कि जिसके गुरु अजितसेन नाथमें ऋद्विप्राप्त गणवर देवादिकोंके गुण पाये जाते है ॥ आचार्य श्री आर्यसेनके अनेक गुणोंके समूहको धारण करनेवाले तथा तीन लोकके गुरु अजितसेन गुरु जिसके गुरु हैं वह गोम्मट राजा जयवंता रहो ॥ इससे यह बात मालुम होती है कि जिन अजितसेन स्वामीका उल्लेख बाहुबली चरितमें और गोमट्टसारमें किया गया है वे एक ही है। परंतु ये अजितसेन कब हुए इस बातका कुछ पता श्रवणवे लगोलाके एक शिलालेखसे मिलता है। उसमें अजितसेन के विषयमें लिखा है कि:- गुणा-कुंदस्पन्दोड्डमरसमरा वागमृतवाः, प्लवप्रायः प्रेय प्रसरसरसा कीतिरिव सा। नखेन्दुर्योत्स्ना पचयचकोरप्रणयिनी, न कासां श्लाघांना पदमजितसेनो व्रतिपतिः॥ यह शिलालेख करीव ग्यारहमी शदीका खुदा हुआ है । इससे मालुम होता है कि श्री अजितसेन स्वामी ग्यारहमी शदीके पूर्व हुए है, और उसी समय श्री चामुण्डराय भी हुए हैं । परंतु प. नाथूरामजी प्रेमी द्वारा लिखित 'चंद्रप्रभचरितकी भूमिका में श्री चामुण्डरायके परिचयमें लिखा है कि कनडी भाषाके प्रसिद्ध कवि रत्नने शक सम्वत् ९१५ में ' पुराणतिलक ' नामक ग्रंथकी रचना की है और उसने अपनेको रकस गगराजका आश्रित बतलाया है | चामुण्डरायकी भी अपनेपर विशेष कृपा रहनेका वह निकर करता है । ' इससे मालुम होता है कि शक स ९१५ या विक्रम सं. १०५० के लगभग ही श्री चामुण्डराय और श्री अजितसेन स्वामी हुए है गोमट्टसारकी श्री चामुण्डरायकृत एक कर्नाटक वृत्ति श्रीनेमिचंद्र सि, चक्रवर्तीके समक्ष ही वन चुकी थी। उसीके अनुसार श्री केशववर्णीकृत सस्कृत टीका भी है। उसकी आदिमें लिखाहुआ है कि:- 'श्रीमदप्रतिहतप्रभावस्याद्वादशासनगुहाभ्यंतरनिवासिप्रवादिसिंधुरसिंहायमान-सिंह- नंदिनन्दितगंगवशललाम-राजसर्वज्ञायनेकगुणनामधेय-श्रीमद्राजमल्लदेवमही-वल्लभमहा- मात्यपदविराजमान-रणरगमल्लासहायपराकम-गुणरत्नभूषण-सम्यक्त्वरत्ननिलयादिविवि धगुणनामसमासादितकीर्तिकांत-श्रीमच्चामुंडरायप्रश्नावताणेकचत्वारिंशत्पदनामसत्वप्ररूप- णद्वारेणापविनेयजननिकुरंचसंबोधनार्थ श्रीमन्नेमिचद्रसैद्धान्तिक-चक्रवर्ती समस्तसैद्धान्तिकजनप्रख्यातविशदयशाः विशालमतिरसौ भगवान् गोमट्टसारपंचसंग्रहप्रपंचमारचयस्तदादौ निर्विघ्नतः शास्त्रपरिसमाप्तिनिमित्तं देवताविशेष नमस्करोति । । ... राचमल और रक्क्स गंगराज ये दोनों ही भाई थे। उपर्युक्त गोमट्टसारकी पक्तियोंसे स्पष्ट है कि राचमट चामुण्डगय तथा श्री नेमिचद्रसिद्वांतचक्रवर्ती तीनोंही समकालीन है । राचमल्लका समय विक्र- मकी परमी शदी निश्चित की जाती है । अत एव स्वयं सिद्ध है कि यही समय चामुण्डराय तथा श्री नेमिचंद्र मिद्धातचावर्तीका भी होना चाहिये।

गोम्मटसार । - नेमिचंद्र सिद्धांतचक्रवर्तीने कई जगह वीरनंदि आचार्यका स्मरण किया है । यथा:- जस्त य पायपसाएणणंतससारजलहिमुत्तिण्णो। वीरिंदणंदिवच्छो णमामि तं अभयणंदिगुरुं॥" णमिऊण अभयणंदि सुदसागरपारगिंदणंदिगुरु वरवीरणंदिणाहं पयडीणं पञ्चयं वोच्छं ॥" णमह गुणरयणभूसणसिद्धंतामियमहन्धिभवभावं। वरवीरणदिचंदं णिम्मलगुणभिंदणंदिगुरुं ।। " इन्ही वीरनंदिका स्मरण वादिराज सूरीने भी किया है । यथा:- चंद्रप्रभाभिसंबद्धा रसपुष्टा मन प्रियम् । कुमुद्वतीय नो धत्ते भारती वीरनंदिनः ॥ ( पार्श्वनाथकाव्य लो ३०) वादिराज सूरीने पार्श्वनाथ काव्यकी पूर्ति शक सं. ९४७ में की है, यह उसीकी अन्तिम प्रश- स्तिके इस पद्यसे मालुम होता है । शाकादे नगवाधिरन्ध्रगणने संवत्सरे कोधने, मासे कार्तिकनाम्नि बुद्धिमाहिते शुद्ध तृतीयादिने । सिंहे पाति जयादिके वसुमती जैनी कथेयं मया, निष्पत्तिं गमिता सती भवतु वः कल्याणनिष्पत्तये॥" अर्थात् ' शक सम्बत् ९४७ (क्रोधन सम्वत्सर) की कार्तिक शुक्ला तृतीयाको पार्श्वनाथ काव्य पूर्ण किया।' इस कथनसे यद्यपि यह मालुम होता है कि वीरनंदि आचार्य शक सबत् ९४७ के पहले ही होचुके हैं; तथापि जब कि वीरनंदी आचार्य स्वयं अभयनंदीको गुरु स्वीकार करते है और नेमिचंद्र सिद्धांत चक्रवर्ती भी उनको गुरुरूपसे स्मरण करते हैं तब यह अवश्य कहा जा सकता है कि वीरनंदि और नेमिचंद्र दोनों ही समकालीन है। गोमट्टसारकी गाथाओंका उल्लेख प्रमेयकमलमार्तण्डमें भी मिलता है-यथाः • विग्रहगदिमावण्णा केवलिणो समुहदो अजोगी य । सिद्धा य अणाहारा सेसा आहारिणो जीवा ॥" (६६५) श्रीप्रभाचंद्र आचार्यने प्रमेयकमलमार्तण्डकी रचना भोजराजके समयमें की है, क्योंकि उमरे अंतमें यह उल्लेख है कि:- " श्री भोजदेवराज्ये श्रीमद्धारानिवासिना परापरपरमेष्ठिप्रणामार्जितामलपुण्यनिरा- कृतनिखिलमलकलंकेन श्रीमत्प्रभाचंद्रपण्डितेन निखिलप्रमाणप्रमेयस्वरूपोधोतपरीक्षामु- खपदमिदं विवृतमिति।" धारानगरीके अधिपति भोजराजका समय विक्रमी ११ वी गदी निश्चित है I या मान्द्रम होता है कि नेमिचद्रस्वामी या तो प्रभाचंद्राचार्यके समकालीन है या कुछ पहने च पापित प्रमाणसे यह भी मालुम होसक्ता है कि श्री नेमिचंद्र सिद्वांतचनवी प्रभाचंद्राचार्य पं. दीप हुए है, परंतु जबकि कवि रन्नने अपनेपर श्रीमान् चामुण्डगयकी कृपा गनेका जिट पिया - णतिलककी रचना शक सं. ९१५ में उसने की यह निश्रित दर मारा। अत एव इतिहासप्रेमी यह निश्चित करते है कि श्रीमान नेमिचंद्र मिहानाही : am शक सं. ९१५ के ही है । पन्तु यह निश्चय एक प्रकारले पुराणतिर रई :: :: (r ६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । ? अभी इतना संदेह ही है कि यदि पुराणतिलकके कथनको प्रमाण माना जाय तो वाहुबलीचरितके क्य- नको प्रमाण क्यों न माना जाय ? यदि माना जाय तो किस तरह घटित किया जाय इसतरह नमि- चंद्र सि. चक्रवर्तीका समय एक तरहसे अभीतक हमको सदिग्ध ही है । इसीलिये समयनिर्णयको हम यहीं विराम देते है । दूसरी बात यह भी है कि समयकी प्राचीनता या अर्वाचीनतासे प्रमाणता या अप्र- माणताका निर्णय नहीं होता । प्रामाण्य या अप्रामाण्यके निर्णयका हेतु ग्रंथकर्ताका ग्रंथ होता है । इस ग्रंथके रचयिता साधारण विद्वान् न थे। उनके रचित गोमट्टसार त्रिलोकसार लब्धिसार आदि उपलब्ध ग्रंथ उनकी असाधारण विद्वत्ता और 'सिद्वातचक्रवर्ती ' इस पदवीको सार्थक सिद्ध कर रहे हैं। यद्यपि उपलब्ध ग्रयोंमें गणितकी प्रचुरता देखकर लोग यह विश्वास कर सकते है कि श्री नेमिचढ़ सि. चक्रवर्ती गणितके ही अप्रतिम पिण्डित थे, परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि वे सर्वविषयमें पूर्ण निष्णात थे। ऊपर जो गोमट्टसार संस्कृत टीकाकी उत्थानिकाका उल्लेख दिया है उसमें यह बात दिखाई गई है कि इस ग्रंथकी रचना श्रीमच्चामुण्डरायके प्रश्नके अनुसार हुई है । इस विषयमें ऐसा सुननेमें आता है कि एक वार श्री नेमिचंद्र सिद्धातचक्रवर्ती धवलादि महासिद्वांत ग्रंयोमसे किस सिद्वांत-ग्रंथका स्वाध्याय कर रहे थे। उसी समय गुरुका दर्शन करनेकेलिये श्री चामुण्डराय भी आये। शिष्यको आता हुआ देख- कर श्रीनेमिचंद्र सि. चक्रवर्तीने स्वाध्याय करना बंद कर दिया । जब चामुण्डराय गुरुको नमस्कार करके वैठगये तब उनने पूछा कि गरो ! आपने ऐसा क्यों किया ? तब गुरुने कहा कि श्रावकको इन सिद्धांत ग्रंथोंके सुननेका आधिकार नहीं है । इसपर चामुण्डरायने कहा कि हमको इन ग्रंथोंका अवबोध किस तरह होसकता है ? कृपया कोई ऐसा उपाय निकालिये कि जिससे हम भी इनका महावानुभव कर सकें। सुनते हैं कि इसीपर श्रीनेमिचद्र सि. चक्रवर्तीने सिद्धांत ग्रंथोंका सार लेकर इस गोमट्टसार ग्रथकी रचना की है। -- इम ग्रथका दूसरा नाम पंचसंग्रह भी है । क्योंकि इसमें महाकर्मप्राभृतके सिद्वांतसंबंधी जीव- स्थान क्षुबंध वधस्वामी वेदनाखंड वर्गणाखड इन पांच विषयोंका वर्णन है । मूलग्रंथ प्राकृतमें लिखा गया है । यद्यपि मूल लेखक श्रीयुत नेमिचद्र सि. चक्रवर्ती ही हैं, तथापि कहीं २ पर कोई २ गाथा माधवचंद्र विद्यदेवने भी लिखी है । यह टीकामें दी हुई गाथाओंकी उत्थानिका के देखनेसे मालुम होती है । माधवचद्र विद्यदेव श्री नेमिचंद्र सि चक्रवर्तीके प्रधान शिष्योंमेंसे एक थे । मालुम होता है कि तीन विद्याओंके अधिपति होनेके कारण ही आपको त्रैविद्यदेवका पद मिला होगा । इससे पाठकोंको यह भी अंदाज करलेना चाहिये कि नेमिचंद्र सि. चक्रवर्तीकी विद्वत्ता क्तिनी असाधारण थी । इस यथराजके ऊपर अभीतक चार टीका लिखी गई है। जिसमें सबसे पहले एक कर्नाटक वृत्ति बनी है । उनके रचयिता ग्रंयकर्ताके अन्यतम शिष्य श्रीचामुण्डराय है। इसी टकिाके आधारपर एक संस्कृत टीश बनी है, जिसके निर्माता केशववर्णी है, और यह टीका भी इसी नामसे प्रसिद्ध है । दूसरी संस्कृत टीका श्रीमदभरचंद्र सिद्धांतचक्रवर्तीकी बनाई हुई है जो कि 'मंदप्रबोधिनी' नामसे प्रख्यात है। उप- युक्त दोनों टीका आवाग्से श्रीमद्विद्दर टोइग्मल्लजीने 'सम्यग्जानचंद्रिका नामकी हिंदी टीका बनाई F1उन कर्नाटक वृत्ति के सिवाय तीनों टीकाओंके आधारपर यह संक्षिप्त बालबोधिनी टीका लिखी है। मंदिनी' हमको पूर्ण नहीं मिकसकी इसलिये जहांतक मिल सकी वहांतक तीनों टीकाओंके अवरम और आगे कंगववी' तथा 'सम्यम्ञानचंद्रिका के आधारसे ही हमने इसको लिखा है।

गोम्मटसार । । इस ग्रंथके दो भाग हैं-एक जीवकांड दूसरा कर्मकाड । जीवकाण्डमें जीवकी अनेक अशुद्ध अवस्थाओंका या भावोंका वर्णन है । कर्मकाण्डमें कर्मोकी अनेक अवस्थाओंका वर्णन है । कर्मकाण्डकी संक्षिप्त हिंदी टीका श्रीयुत पं. मनोहरलालजी शास्त्री द्वारा सम्पादित इसी ग्रथमालाके द्वारा पहले प्रका- शित हो चुकी है । जीवकाण्डकी संक्षिप्त हिंदी टीका अभीतक नहीं हुई थी । अत एव आज विद्वानोंके समक्ष उसीके उपस्थित करनेका मेंने साहस किया है। जिस समय श्रीयुत प्रातःस्मरणीय न्यायवाचस्पति स्याहादवारिधि वादिगजकेसरी गुरुवर्य पं. गोपालदासजीके चरणोमे मैं विद्याध्ययन करता था उसी समय गुरुकी आज्ञानुसार इसके लिखनेका मैने प्रारम्भ किया था। यद्यपि इसके लिखने में प्रमाद या अज्ञानवश मुझसे क्तिनी ही अशुद्विया रहगई होंगी, तथापि सज्जन पाठकोंके गुणग्राही स्वभावपर दृष्टि देनेसे इस विषयमें मुझे अपने उपहासका बिल- कुल भय नहीं होता । ग्रंथके पूर्ण करने में मैं सर्वथा असमर्थ था तथापि किसीभी तरह जो मैं इसको पूर्ण कर सका हूं उसका कारण केवल गुरुप्रसाद है । अत एव इस कृतज्ञताके निदर्शनार्थ गुरुके चर- गोंका चिरंतन चिंतवन करना ही श्रेय है । प्राचीन टीकाएं समुद्रसमान गम्भीर हैं-सहसा उनका कोई अवगाइन नहीं कर सकता । जो अवगाहन नही कर सकते उनकेलिये कुल्याके समान इस क्षुद्र टीकाका निर्माण क्यिा है । आशा है कि इसके अभ्याससे प्राचीन सिद्वात तितीर्घओंको अवश्य कुछ सरलता होगी । पाठकोंसे यह निवेदन है कि यदि इस कृतिमें कुछ सार भाग मालुम हो तो उसे मेरे गुरुका समझ हृदयंगत करै । और यदि कुछ निःसारता या विपरीतता मालुम पडे तो उसे मेरी कृति समझें, और मेरी अज्ञानतापर क्षमाप्रदान करे। यह टीका स्व. श्रीमान् रायचंद्रजीद्वारा स्थापित ‘परमश्रुतप्रभावक्मडल'की तरफसे प्रकाशित की गई है । अत एव उक्त मंडल तथा उसके ऑनरेरी व्यवस्थापक शा. रेवाशंकर जगजीवनदासजीका साधुवादन करता हूं। इस तुच्छ कृतिको पढनेके पूर्व “गच्छतः स्खलन क्वापि भवत्येव प्रमादतः । हसंति दुर्जनास्तत्र समादधति सज्जनाः" इस श्लोकक अर्थको दृष्टिपथ करनेके लिये विद्वानोंस प्रार्थना करनेवाला- खूबचंद जैन ७-७-१९१६ ई. २ रा पाजरापोळ ववई न. ४ वेरनी (एटा) निया

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विषयसूची। विषय. पृ. 4. . १४॥२२ १५। ७ १५/१५ १५/२५ १६.११ १६२५ १७१० १७१२४ १८६ १८॥२३ ... १९1१० १९।२२ ... २०1३ २०१११ मंगलका प्रयोजन मंगल और प्रतिज्ञा बीस अधिकारोंके नाम गुणस्थान और मार्गणाकी उत्पत्तिका निमित्त और उनके पर्याय वाचक शब्द गुणस्थान संज्ञाको मोहयोगभवा क्यों कहा ? इसका उत्तर दो प्ररूपणा और बीस प्ररूपणाकी भिन्न २ अपेक्षा .. मार्गणाप्ररूपणामें दूसरी प्ररूपणाओका अंतर्भाव संज्ञाओका अंतर्भाव उपयोगका अंतर्भाव गुणस्थानका लक्षण चौदह गुणस्थानोंके नाम चार गुणस्थानोमें होनेवाले पाच भाव ४ गुणस्थानोके पाच भावोकी अपेक्षा पांचमे आदि गुणस्थानोमे होनेवाले भाव और उनकी अपेक्षा मिथ्यात्वका लक्षण और भेद मिथ्यात्वके पोच भेदोंका दृष्टांत प्रकारांतरसे मिथ्यात्वका लक्षण मिथ्यादृष्टिके वाह्य चिन्ह सासादन गुणस्थानका लक्षण सासादनका दृष्टांत तीसरे मित्र गुणस्थानका लक्षण तीसरे गुणस्थानका दृष्टान्त तीसरे गुणस्थानकी कुछ विशेषता वेदक सम्यक्त्वका लक्षण ... भोपशमिक और क्षायिक सम्यक्त्वका लक्षण चतुर्थ गुणस्थानकी फुट विशेषता पोचमे गुणस्थानका लक्षण विरताविरतकी उपपत्ति गो. प्र २ पृ पं विषय. १। १ छठे गुणस्थानका लक्षण १। ५ प्रमादके १५ भेद २। १ | प्रमादके विषयमे ५ प्रकार . ... सख्या २०१८ प्रस्तारका पहला क्रम प्रस्तारका दूसरा क्रम ३॥ १ प्रस्तारकी अपेक्षा अक्षपरिवर्तन दूसरे प्रस्तारको अपेक्षा अक्षसंचार नष्टकी विधि उद्दिष्टका स्वरूप ३.१४ प्रथम प्रस्तारकी अपेक्षा नष्ट उदिष्टका ४। १ गूढयंत्र ४११३ दूसरे प्रस्तारको अपेक्षा गूढयत्र ४।२५ | सातमेगुणस्थानका स्वरूप ... सातमे गुणस्थानके दो भेदोंका स्वरूप ... ६.१ अध करणका लक्षण ६।१६ | अपूर्वकरण गुणस्थान अपूर्वकरण परिणामोंका कार्य ७१ नवमे गुणस्थानका स्वरूप ७/२१ दशमे गुणस्थानका स्वरप ... ८.१४ ग्यारहमे गुणस्थानका स्वरूप ८१२३ चारहमा गुणस्थान । ५ तेरहमा गुणस्थान ... ९।१४ (चौदहमा गुणस्थान ९।२५ । गुणस्थानों में होनेवाली गुणश्रेणिनिर्जरा १०.११ सिद्धाका स्वरूप १०1३० सिखोंको दियेहुए विपोका फर जीवसमास-अधिकार . ११३८ १२१ १ जीवसमामका सपना जीवसमाय चौद मेर १२०० जीवरमामो .. १३। १ जिसमास दिने :- २३११५ २५। ३ २५.२ . २८ . ... २७1८ २८६ २८.११ .. ... - ... ... ...

१० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । पृ. पं पृ. पं. ... ... ... ... ... ... . विपथ. विषय. योनिअधिकार ३५।२७ / संज्ञाओंके स्वामी ५७६ तीन प्रकारका जन्म ३६.१५ मार्गणा-महाधिकार जन्म गेनिके साय सम्बन्ध ૨૭ ૪ मंगलाचरण और मार्गणाधिकारके वर्ण- गुगयानिकी संख्या ३७५२४ नकी प्रतिज्ञा ५७१२१ गतिकी अपेक्षा जन्म ३८।१२ | मार्गणाका निरुक्तिपूर्वक लक्षण ५८ १ गतिकी अपे.ा वेदोका नियम ३९। ७ । चौदह मार्गणाओंके नाम ५८११० अवगाहनाअधिगर ३९।१९ । अंतरमार्गणाओंके भेद और उनके काल- अवगाहनामोंके स्वोमी और उनकी न्यु. का नियम ... ५८1१७ नाधिनताका गुणाकार ४१ ७ अंतरमार्गणा विशेष ५९. ७ चनु स्तनपतित वृद्धि और अवगाहनाके गतिमार्गणा अ-६ मध्य भेद ४३.१४ गति शब्दकी निरुक्ति और उसके भेद ५९/२१ युगयकी अवगाहना ४५।१३ नारकादि ४ गतियोंका भिन्न २ स्वरूप ६०१ तेजराजटिकी अवगाहनाओंके गुणाका- सिद्धगतिका स्वरूप ६२। ३ रही उत्पत्तिका क्रम ४६।२३ गतिमार्गणाम जीवसख्या ६२११८ अपगाहनाके विषयमें मत्स्यरचना ४७३ इन्द्रियमार्गणा अ-७ अधिकार ४७१६ इन्द्रियका निरुक्तिसिद्ध अर्थ ६६.२३ पर्याप्ति-अधिकार ३ इन्द्रियके द्रव्य भावरूप दो भेद और द्वारा पर्याप्त अपर्याप्तका स्वरूप ४८१२२ उनका स्वरूप ६७। ५ पीलो भेट और उनके स्वामी ४९॥ ५ | इन्द्रियकी अपेक्षा जीवोके भेद ६७११४ पीमिन काल ५० १ । इन्द्रियवृद्धिका क्रम ६८1१ मरमा स्वरूप ५०१२६ इन्द्रियोका विषयक्षेत्र ६८।११ भरतमो उ३८ भर ५१ १ इन्द्रियोंका आकार ७०. १ कान्यात अश्याप्तताकी शकाका परि- इन्द्रियगत आत्मप्रदेशोंका अवगहना- ५२।१० प्रमाण ७०1८ भ्यागमा पर्याप्त अपर्याप्त अतीन्द्रियनानियों का स्वरूप ७५११ ५२।२८ । एकेन्द्रियादि जीवोंकी संख्या rrrrnोरगम्यस्य अनारमा ७१1१७ कायमार्गणा अ-८ ५३।१० पाण-अधिकार कायका लक्षण और भेद ७३।२७ पृथ्वी आदि ४ स्थावरोंकी उत्पत्तिका कारण ७४।६ ५४. ५ शरीरके भेद और लक्षण ७४।१६ शीरमा प्रमाण ७४१२५ बनस्पतिका स्वरूप और भेद म मोका म्वरूप भेद क्षेत्र आदि ७९.२६ ग-अधिकार ५ बनायतिके समान दमरे जीवोंमें प्रतिष्ठित अप्रतिष्ठित भेट ८०/२६ म्यावर और घमजावो मासर ८१ ५ ... ... ... ... ... + ... . . .

गोम्मटसारः । ११ विषय. पृ.पं. ... १०९.१४ ૧૧ મે ... १११११४ १११।२६ ११२। ४ ११४।१३ . ... ११५।२८ ८१1१५ कषायमार्गणा अ-११ ८१।२६ कषायके निरुक्तिसिद्ध लक्षण ८२१० शक्तिकी अपेक्षा क्रोधादिके ४ भेद गतियों के प्रथम समयमे क्रोधादिका नियम ८७ ९ कषायरहित जीव ८७१२३ कषायोंके स्थान ८८1१३ कषायकी अपेक्षा जीवसंख्या ९०२४ ज्ञानमार्गणा अ-१२ ज्ञानका निरूक्तिसिद्ध सामान्य लक्षण ९१1१७ पांच ज्ञानोंका क्षायोपशमिक क्षायिकरु- ९११२५ पसे विभाग ९२।१७ मिथ्याज्ञानका कारण और स्वामी ९६। ४ मिश्रज्ञानका कारण और मन पर्ययज्ञान- ९६१११ का स्वामी ९६१८ दृष्टांतद्वारा तीन मिथ्याज्ञानका स्वरूप... ९६१२६ मतिज्ञानका स्वरूप उत्पत्ति आदि श्रुतज्ञानका सामान्य लक्षण ९७१३ श्रुतज्ञानके भेद ९८॥ १ पर्यायज्ञान ९८११२ पर्यायसमास ९८१२५ छह वृद्धियोंकी छह सज्ञा ९९। ३ छह वृद्धियोकी कुछ विशेषता ९९1१४ ११६६ ११६।१३ विषय. दृष्टांतद्वारा कायका कार्य ... कायरहित-सिद्धोंका स्वरूप पृथ्वीकायिकादि जीवोंकी संख्या योगमार्गणा अ-९ योगका सामान्य लक्षण योगका विशेष लक्षण दश प्रकारका सत्य अनुभय वचनके भेद चार प्रकारके मनोयोग और वचनयो- गके कारण सयोगकेवलीके मनोयोगकी सभवता काययोगके प्रत्येक भेदका स्वरूप योगप्रवृत्तिका प्रकार अयोगी जिन शरीरमें कर्म नोकर्मका विभाग औदारिकादिके समयप्रबद्धकी संख्या औदारिकादिके समयप्रवद्ध और वर्गणा- का अवगाहन प्रमाण . विससोपचयका स्वरूप कर्म नोकर्मका उत्कृष्ट सचय और स्थान उत्कृष्ट सचयकी सामग्रीविशेष शरीरोंकी उत्कृष्ट स्थिति उत्कृष्ट स्थितिका गुणहानि आयाम शरीरोके समयप्रबद्धका बंध उदय सत्व अवस्थामें द्रव्यप्रमाण ... भौदारिक और वैक्रियिक शरीरकी विशे- षता औदारिक शरीरके उत्कृष्ट सचयका स्वामी वैक्रियिक शरीरके उत्कृष्ट सचयका स्थान तेजस कर्मणके उत्कृष्ट संचयका स्थान योगमार्गणामे जीवोकी संख्या वेदमार्गणा अ-१० तान वेदोके दो भेदोंका कारण और उनकी समविषमता भावभेद और उसके तीन भेदोंका स्वरूप वेदरहित जीव वेदकी अपेक्षा जीयसत्या ... ... ... ११६१२२ ११७३ ११८३ १२११२३ १२२१ २ १२०२८ १२४१३ १२४६२० १२४॥२८ १२७१० १२७२१ १०८ १२८1११ १२८१-४ :: अर्थाक्षर श्रुतज्ञान ९९/२२ १००1११ १००१२८ १०११ ५ १०१।१६ १०११२५ श्रुतनिवद्ध विषयका प्रमाण अक्षरसमास और पदज्ञान पदके भक्षरोंका प्रमाण पदसमास भार सघात धृतहान सघातसमास आदि १३ प्रकारफे धना- नसा विस्तृत स्वरूप अंगवार ध्रुतके भेट धुतसनसमाहात्म्य सवधिदानका स्वरूप और दो दो प्रकारको अवधिमामी । १०६।१३ १०४१५ १०७१२३ गुनप्रत्यय और अभियानमा पन्न १२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । विषय. पृ पं. विषय प्र.पं. .. . १६५।२१ १६६१११ १६७४१६ १६७१२९ ... ... ... ... अवधिश सबसे जघन्य द्रव्य अवधिका जघन्य क्षेत्र जघन्यक्षेत्रका विशेष कथन अवधिका समयप्रवद्ध उपहारका प्रमाण मनोदय-वर्गणाका जघन्य और उत्कृष्ट प्रमाण प्रकारान्तरसे धृवहारका प्रमाण देशापविके द्रव्य की अपेक्षा भेद क्षेनकी अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट प्रमाण वर्गणाका प्रमाण परमावधिके भेद देशावधिक विक्प और उनके विषयभूत क्षेत्रादिके प्रमाण निकालनेके क्रम... बनीस काउको दोनॉक्रमोंका स्वरूप... ध्रुववृद्धिका प्रमाण मधमदिरा प्रमाण उन देशावधिके विषयभूत द्रव्यादिका प्रमाण परमाधिके जघन्य व्यका प्रमाण व्यका प्रमाण miघका यिमत दृग्य परम पवित्र कालसी अपेक्षा भेद पिपरेमगरयानगुणितकममा प्रकार रस्मे फारसा प्रमाण पनि शिपयभूत स्कृष्ट क्षेत्र और ६. प्रमान निशालनेकेलिये दो "यूम चिपियन मार- १४३।१७ विपुलमतिका द्रव्य १४३।२८ दोनों भेदोंके क्षेत्रादिका प्रमाण १४४७ केवल ज्ञानका स्वरूप १४५।२७ ज्ञानमार्गणामे जीवसंख्या १४६ ५ संयममार्गणा अ-१३ संयमका स्वरूप और उसके पाच भेद १४६।१४ सयमकी उत्पत्तिका कारण १४६।२३ | देशसंयम और असंयमका कारण १४७६ सामायिक सयम १४७११५ छेदोपस्थापना संयम १४७१२४ परिहारविशुद्धि सयम १४८। ३ । सूक्ष्मसांपराय सयम यथाख्यात सयम १४८११२ देशविरत १५०1१० असंयत १५२। ४ इन्द्रियोंके अट्ठाईस विषय १५२११६ सयमकी अपेक्षा जीवसंख्या दर्शनमार्गणा अ-१४ १५३ १ दर्शनका लक्षण... १५३१२५ चक्षुदर्शन आदि ४ भेदोका क्रमसे स्वरूप १५४।३ दर्शनकी अपेक्षा जीवसंख्या १५४/११ लेश्यामार्गणा अ-१५ १५४।२२ लेश्याका लक्षण १५४।२८ लेश्याभोंके निर्देश आदि १६ अधिकार १५५११७ १ निर्देश १६९ १ १६९/१० १७०३ १७०1१० १७०११९ १७०१२८ १७१११७ १७११२६ १७२१ ९ १७२।२५ १७३. ३ १७३.१२ ... ... १७४१ १ १७४।१७ १७५।१३ २ वर्ण ३ परिणाम . १५६११३ ४ सनम ५ कर्म ENTER क्षेत्र 1. भवधि 2017 ... १७६।११ १७७ १ १७७११३ १७७२४ १७९१६ १८०1१८ १८२॥ ९ १८३१ १ १८५। ९ १८९/१८ १९२॥ १ १९२११२ १९४१२७ १९६६ १९८1१६ १९९४१२ ... १५६.३० १५७२० १५७३० १५८ ९ १६११२८ १६.३५ 1E १६॥ १:१८ ६ लक्षण ७ गति ८ स्वामी ९ साधन १० साच्या ११ क्षेन १२ स्पर्श .. ...---:::: ... म ... - ... ... १८ अनर ...

गोम्मटसारः । १३ विषय. पृ. पं. ... ... ... ... ३ स्थिति विषय. पृ.पं. १५-१६ भाव और अल्पवहुत्व २००।२७ | संज्ञी असंज्ञीकी परीक्षाके चिन्ह २४५३१२ लेश्यारहित जीव २०१1११ सही मार्गणामे जीवसंख्या २४६॥ १ भव्यमार्गणा अ-१६ आहारमार्गणा अ-१९ भव्यअभव्यका स्वरूप २०१।२४ आहारका स्वरूप २४६११० भव्यत्व अभव्यत्वसे रहित जीव २०२।२४ आहारक अनाहारकका विभेद २४६१२५ भन्यमार्गणामें जीवसंख्या... समुद्धातके भेद २०३। ५ २४७ ४ पांच परिवर्तन.. २०३११२ समुद्धातका स्वरूप २४७११२ सम्यक्त्वमार्गणा अ-१७ आहारक और अनाहारकका कालप्रमाण २४७१२६ आहारमार्गणामें जीवसख्या २४८॥ ५ सम्यक्त्वका स्वरूप २०८११३ उपयोगाधिकार-२० सात अधिकारोके द्वारा छह द्रव्यका उपयोगका स्वरूप और दो भेद २४८1१४ निरूपण २०८५२७ | दोनों उपयोगोंके उत्तर भेद २४८१२२ १ नाम २०९। ५ साकार उपयोगकी विशेषता २४९। १ २ उपलक्षण २०९।२२ अनाकार उपयोगकी विशेषता २४९११३ २१५/१२ उपयोगाधिकारमें जीवसंध्या २४९।२७ ४ क्षेत्र २१६। ३ अंतर्भावाधिकार १ ५ संख्या २१७॥२५ गुणस्थान और मार्गणामे शेप प्ररूपणा- ६ स्थानस्वरूप २१८१२३ ओंका अंतर्भाव २५०1७ ७ फल २२३, ४ मार्गणाओंमे गुणस्थानादि.. २५०1१७ परमाणुके स्कन्धरूप परिणमनका कारण २२४।२१ गुणस्थानोमे जीवसमासादि २५८/२० पंचास्तिकाय २२८/२६ आलापाधिकार २ २२९/१४ नमस्कार और आलापाधिकारके कहनेकी गुणस्थानक्रमसे जीवसंख्या २३०६ प्रतिज्ञा २६३११६ अजीवादि-तत्वाका सक्षिप्त स्वरूप २३८। ७ गुणस्थान और मार्गणामोंके सालापोंकी क्षायिक सम्यक्त्व २३९। ७ सत्या २६.२४ वेदक सम्यक्त्व २४०।२६ / गुणस्थानोंमे भालाप २६८० १ उपशम सम्यक्त्व २४११ ७ मार्गणाओंमें आलाप २६५१ पांच लब्धि २४११२२ जीवसमासकी विशेषता २६१२७ सम्यक्त्व ग्रहणके योग्य जीव २४२।६ पीस भेदोकी योजना ०७०1११ सम्यक्त्वमार्गणाके दूसरे भेद २४२।२७ आवश्यक नियम ७.१.९ सम्यक्त्वमार्गणामे जीवसख्या २४४। १ गुणस्थानातीत मिलोंका स्वरूप संज्ञी मार्गणा अ-१८ पीस भेदोंके जान्ने का उपाय संझी असंहीका स्वरूप २४५। १ अतिम भागीर्वाद . ... ... नव पदार्थ . ... ... :: . ...

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रायचन्द्रजैनशास्त्रमालाद्वारा प्रकाशित ग्रन्थोंकी सूची । - १ पुरुषार्थसिद्धयुपाय भाषाटीका यह श्रीअमृतचन्द्रस्वामी विरचित प्रसिद्ध शास्र है। इसमें भाचार- संबन्धी बडे २ गूढ रहस्य हैं। विशेष कर हिंसाका स्वरूप बहुत खूबीकेसाय दरसाया गया है। यह एक वार छपकर विकगयाथा इसकारण फिरसे संशोधन कराके दूसरीवार छपाया गया है। न्यों १ रु २ पञ्चास्तिकाय संस्कृ. भा. टी. यह श्रीकुन्दकुन्दाचार्यकृत मूल और श्रीअमृतचन्द्रसूरीकृत संस्कृतटीकासहित पहले छपा था । अबकी बार इसकी दूसरी आवृत्तिमे एक संस्कृतटीका तात्पर्यवृत्ति नामकी जो कि श्रीजयसेनाचार्य ने बनाई है अर्थकी सरलताकोलिये लगादी गई है। तथा पहली संस्कृतटीकाके सूक्ष्म अक्षरोको मोटा करादिया है और गाथासूची व विषयसूची भी देखनेकी सुगमताके लिये लगादी हैं । इसमे जीव, अजीव, धर्म, अधर्म और आकाश इन पांच द्रव्योंका तो उत्तम रीतिसे वर्णन है तथा कालद्रव्यका भी सक्षेपसे वर्णन किया गया है। इसकी भाषा टीका स्वर्गीय पांडे हेमराजकी भाषाटीकाके अनुसार नवीन सरल भापाटीकामें परिवर्तन कीगई है। इसपर भी न्यों. २ रु. ३ ज्ञानार्णव भा. टी. इसके कर्ता श्रीशुभचन्द्रस्वामीने ध्यानका वर्णन बहुत ही उत्तमतासे किया है। मकरणवश ब्रह्मचर्यव्रतका वर्णन भी बहुत दिखलाया है। यह एकवार छपकर विकगया था भय द्वितीयवार संगोधन कराके छपाया गया है। न्यो. ४ रु ४ सप्तभड्कीतरंगिणी भा टी. यह न्यायका अपूर्व ग्रन्थ है इसमें ग्रंथकर्ता श्रीविमलदासजीने स्यादस्ति, स्यान्नास्ति आदि सप्तमगी नयका विवेचन नव्यन्यायकी रीतिसे किया है । स्याद्वादमत क्या है यह जाननेकेलिये यह ग्रंथ अवश्य पढना चाहिये । इसकी पहली आवृत्ति की एक भी प्रति नहीं रही अप दुसरी आवृत्ति शीघ्र छपकर प्रकाशित होगी । न्यो. १ रु. ५ बृहद्रव्यसंग्रह संस्कृत भा. टी. श्रीनेमिचन्द्रस्वामीकृत मूल और श्रीब्रह्मदेवजीकृत सस्टनटीका तथा उसपर उत्तम वनाई गई भाषाटीका सहित है। इसमे छह द्रव्योंका स्वरूप भतिस्परीनिमे दिगाया गया है। न्यों. २ रु. ६ द्रव्यानुयोगतर्कणा इस ग्रंथमें शास्त्रकार श्रीमद्भगोजसागरजीने सुगमतासे मन्दयुद्धिजीको दण्य- ज्ञान होनेकेलिये। " गुणपर्ययवद्रव्यम्” इस महाशाख तत्वार्थसूनके अनुकूल सम-गुण तथा अन्य पदार्थों का भी विशेष वर्णन किया है और प्रसगवश ' स्यादस्ति ' आदि सप्तभाशा हार मिला. यवयं श्रीदेवसेनस्वामीविरचित नयचक्रके आधारसे नय, उपनय तथा मूल्नयों का भी वितरंगे मन किया है। न्या. २ रु. ७ सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्र इसका दूसरा नाम तत्त्वाधिगम मोक्षमार भी है। मकान परममान्य और मुख्य प्रन्य है। इसमे जैनधर्मफे संपूर्णसिसान्त आचार्यवर्य श्रीउमास्वाति (मी) जीने को संग्रह किये हैं। ऐसा कोई भी जैनसिद्धान्त नहीं है जो इसके सूतोमें गर्मित न हो । RazTTET - अत्यन्त छोटेसे तत्त्वार्थरूपी घटमें भरदेना यह कार्य अनुपमसामर्थ्यवाले इसके रचयिता हो या छोटे २ सूत्रोंके अर्थगांभीर्यको देखकर विद्वानोको विस्मित होना पटता है। न्. 6 ८ स्याद्वादमारी संस्कृत भा. टी. इसमें छदो मनोका विवेचना टीका ...... लियेणसूरीजीने स्याद्वादको पूर्णरूपसे सिद्ध किया है। न्यों. ४ र ९ गोम्मटसार (कर्मकाण्ड) सहाया और सक्षिप्त : श्रीनमिचन्दाचार्यसिसान्तवा वतीका बनाया हुआ है, इसने अथ, (१६) कर्मका स्वरूप इतना विस्तारसे है कि वचनद्वारा प्रशसा नहीं होसकती देखनेसेही मालूम होसकता है। और जो कुछ संसारका झगडा है वह इन्हीं दोनों (जीव-कर्म ) के सवन्धसे है सो इन दोनोंका स्वरूप दिखा- नेकेलिये अपूर्व सूर्य है । न्यों २ रु १० प्रवचनार-~-श्रीअमृतचन्द्रसूरिकृत तत्त्वप्रदीपिका सं टी., " जो कि यूनिवर्सिटीके कोर्समे दाखिल तथा श्रीजयसेनाचार्यकृत तात्पर्यवृत्ति से टी और वालावबोधिनी भाषाटीका इन तीन टीकाओं सहित छपाया गया है इसके मूलकर्ता श्रीकुन्दकुन्दाचार्य है। यह अध्यात्मिक ग्रन्थ है। न्यों. ३ रु ११ मोक्षमाळा-कर्ता मरहुम सतावधानी कवी श्रीमद्रराजचंद्र छे. आ एक स्यादवाद तत्वाववोध- वृक्षनु बीज छे आ ग्रन्थ तत्व पामवानी जिज्ञासा उत्पन्न करीशके एq एमा कंइ अशे पण दैवत रा छे. पुस्तक प्रसिद्ध करवानो मुख्य हेतु उछरता वाळ युवानी अविवेकी विद्या पामी जे आत्मसिद्धीथी भ्रष्ट थाय छे ते भ्रष्टता अटकाववानो छे. आ मोक्षमाळा मोक्षमेळववानां कारण रुप छे. आ पुस्तकनी बे वे आवृत्तिो खलास थइ गइछे अने ग्राहकोनी बहोळी मागणी थी आ त्रीजी आवृत्ति छपाची छे कीमत आना वार. १२ भावनाबोध-~आ ग्रन्थना कर्ता पण उक्त महापुरुष छे वैराग्य ए आ ग्रन्धनो मुख्यविषय छे. पात्रता पामवार्नु भने कपायमल दूर करवानुं आ ग्रन्थ उत्तम साधन छे. आत्मगवेषिओने आ ग्रन्थ मानंदोल्लास आपनार छे आ ग्रन्थनी पण वे आवृत्तिओ खपी जवाथी अने ग्राहकोनी वहोळी मागणी थी आ त्रीजी आवृति छपावी छे. कीमत आना चार आवंने अन्थो गुजराती भाषामा अने वालबोध टाइपमा छपावेल छे. १३ परमात्मप्रकाश--यह ग्रथ श्रीयोगींद्रदेव रचित प्राकृतदोहाओंमें है इसकी संस्कृतटीका श्रीब्रह्मदेवकृत है तथा भाषाटीका पं० दौलतरामजीने की है उसके आधारसे नवीन प्रचलित हिंदीभाषा अन्वयार्थ भावार्थ पृथक् करके वनाई गई है । इसतरह दो टीकाभों सहित छपगया है। ये अध्यात्मग्रंथ निश्व- यमोक्षमार्गका साधक होनेसे बहुत उपयोगी है । न्यों० ३ रु. १४ पोडशकप्रकरण-यह ग्रन्थ श्वेताम्बराचार्य श्रीमद्धरिभद्रसूरिका बनाया हुआ संस्कृत आर्या छन्दोंमें है इसमें सोलह धर्मोपदेशके प्रकरण हैं। इसका संस्कृत टीका तथा हिंदीभाषाटीका सहित प्रकाशन होरहा है। एक वर्षमें लगभग तैयार होजायगा। १५ लब्धिसार (क्षपणासार सहित) यह ग्रन्य भी श्रीनेमिचद्राचार्य सिद्धोत चक्रवर्तीका बनाया हुमा है और गोम्मटसारका परिशिष्ट भाग है । इसीसे गोमटसारक स्वाध्याय करनेकी सफलता होती है । इसमे मोक्षका मूलकारण सम्यक्त्वके प्राप्त होने की पांच लब्धियोंका वर्णन है फिर सम्यक्त्व होनेके वाद कोंके नाश होनेका यहुत अच्छा क्रम बतलाया गया है कि भव्यजीव शीघ्र ही काँसे छूट अनंत सुखको प्राप्त होकर अवि- नाशी पदको पासकते हैं। यह भी मूल गाथा छाया तथा सक्षिप्त भाषाटीका सहित छपाया जा रहा है। छह महीने के लगभग तयार होजायगा। - इस सानमालाको प्रशंमा मुनिमहाराजोंने तथा विद्वानोंने बहुत की है उसको हम स्थानाभावसे लिख नहीं मरते । और यह संस्था क्सिी स्वार्थकेलिये नहीं है केवल परोपकारकेवास्ते है । जो द्रव्य आता है वह मममा तमग्रन्योंके उद्वारकेवास्ते लगाया जाता है ॥ इति शम् ।। ग्रंथोंके मिलनेका पत्ता-- शा० रेवाशंकर जगजीवन जोहरी ऑनरेरी व्यवस्थापक श्रीपरमश्रुतप्रभावक्रमंडल जोहरी बाजार खाराकुवा पो० न० २ वबई.

रायचन्द्रजैनशास्त्रमाला । ॐ श्रीमन्नोमिचन्द्राय नमः । अथ छायाभापाटीकोपेतः गोम्मटसारः। जीवकाण्डम् । अथ श्रीनेमिचन्द्र सैद्धान्तिकचक्रवर्ती गोम्मटसार ग्रन्थके लिखनेके पूर्व ही निर्विघ्न समाप्ति नास्तिकतापरिहार, शिष्टाचारपरिपालन और उपकारस्मरण-इन चार प्रयोजनोसे इष्टदेवको नमस्कार करते हुए इस ग्रन्थमें जो कुछ वक्तव्य है उसकी " सिद्धं " इत्यादि गाथासूत्रद्वारा प्रतिज्ञा करते है:- सिद्धं सुद्धं पणमिय जिणिन्दवरणेमिचन्दमकलंकं । गुणरयणभूसणुदयं जीवस्स परूवणं वोच्छं ॥१॥ सिद्धं शुद्धं प्रणम्य जिनेन्द्रवरनेमिचन्द्रमकलङ्कम् । गुणरत्नभूषणोदयं जीवस्य प्ररूपणं वक्ष्ये ॥ १ ॥ अर्थ-जो सिद्ध अवस्था अथवा स्वात्मोपलब्धिको प्राप्त हो चुका है, अथवा न्याय के अनेक प्रमाणोंसे जिसकी सत्ता सिद्ध है, और जो चार घातिया-द्रन्यकर्मके अभावस गन, और मिथ्यात्वादि भावकर्मोके नाशसे अकलङ्क हो चुका है, और जिसके हमेगाही सम्यक्त्वादि गुणरूपी रत्नोंके भूपर्णोका उदय रहता है, इस प्रकारके श्रीजिनंन्द्रवरनेमिन्द्र स्वामीको नमस्कार करके, जो उपदेशद्वारा पूर्वाचार्य परम्परामे का आरहा है। हर सिद्ध, और पूर्वापर विरोधादि दोपोंसे रहित होनेके कारण शुस. और वन मित्र आदि न करनेके कारण तथा रागादिका उत्पादक न होनने निष्कर सम्यक्त्वादि गुणरूपी रतभूषणोंकी प्राप्ति होती है जो किया भाजीनगर नहीं है इस प्रकारके जीवप्ररूपण नामक ग्रन्थो अगत् निमा पार भेद प्रभेद आदि दिखलाये है इस प्रकारचे प्रन्यो र गा । + AH ।

रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम् इस प्रकार नमस्कार और विवक्षित ग्रंयकी प्रतिज्ञा कर इस जीवकाण्डमें जितने अधिकारोके द्वारा जीवका वर्णन करेगे उनके नाम और संख्या दिखाते है। गुणजीवा पज्जत्ती पाणा सण्णाय मग्गणाओ य । उनओगोवि य कमसो वीसं तु परूबणा मणिदा ।। २ ॥ गुणजीवाः पर्याप्तयः प्राणाः संज्ञाश्च मार्गणाश्च । उपयोगोपि च क्रमशः विशतिस्तु प्ररूपणा भणिताः ॥ २ ॥ अर्थ-गुणस्थान, जीवसमास, पर्याप्ति, प्राण, संज्ञा, चौदह मार्गणा, और उपयोग इस प्रकार ये वीस प्ररूपणा पूर्वीचार्योने कही है। भावार्थ इनहीके द्वारा आगे जीवद्रव्यका निरूपण किया जायगा । इसलिये इनका लक्षण यद्यपि अपने अपने अधिकारमें स्वय आचार्य कहेंगे तथापि यहापर संक्षेपसे इनका लक्षण कहदेना भी उचित है। मोह और योगके निमित्तसे होनेवाली आत्माके सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्रगुणोंकी अवस्थाओंको गुणस्थान कहते है। जिन सदृशधर्मोके द्वारा अनेक जीवोका सङ्ग्रह किया जासके उन सदृशधर्मोका नाम जीवसमास है । शक्तिविशेषकी पूर्णताको पर्याप्ति कहते है। जिनका संयोग रहनेपर जीवमें ' यह जीता है। और वियोग होनेपर ' यह मरगया । ऐसा व्यवहार हो उनको प्राण कहते है। आहाररादिकी वाञ्छाको संज्ञा कहते हैं । जिनके द्वारा अनेक अवस्थाओंमें स्थित जीवोंका ज्ञान हो उनको मार्गणा कहते है। वाह्य तथा अभ्यंतर कारणोके द्वारा होनेवाली आत्माके चेतना गुणकी परिणतिको उपयोग कहते है। उक्त वीस प्ररूपणाओका अन्तर्भाव गुणस्थान और मार्गणा इन दो प्ररूपणाओंमेंही हो सकता है, इस कथनके पूर्व दोनो प्ररूपणाओकी उत्पत्तिका निमित्त तथा उनके पर्यायवाचक शब्दोंको दिखाते है। संखेओ ओघोत्ति य गुणसण्णा सा च मोहजोगभवा । वित्थारादेसोति य मग्गणसण्णा सकम्मभवा ॥३॥ संक्षेप ओघ इति गुणसंज्ञा सा च मोहयोगभवा । विस्तार आदेश इति च मार्गणसंज्ञा स्वकर्मभवा ॥ ३ ॥ अर्थ-संक्षेप और ओघ यह गुणस्थानकी संज्ञा है और वह मोह तथा योगके निमि- तसे उत्पन्न होती है, इसी तरह विस्तार तथा आदेश यह मार्गणाकी संज्ञा है और यह भी अपने २ कोंके उदयादिसे उत्पन्न होती है। यहापर चकारका ग्रहण किया है इससे गुणस्यानकी सामान्य और मार्गणाकी विशेष यह भी संज्ञा समझना । यहापर यह शङ्का होसकती है कि मोह तथा योगके निमित्तसे गुणस्थान उत्पन्न होते है, नकि ' गुणस्थान १ नाम के एकदेशसे भी सम्पूर्ण नाम समझा जाता है इस लिय गुणशब्दसे गुणस्थान और जीवशब्दसे जीसमान समझना ।

गोम्मटसारः । ३ यह संज्ञा; फिर संज्ञाको मोहयोगभवा ( मोह और योगसे उत्पन्न ) क्यों कहा ? इसका उत्तर यह है कि यद्यपि परमार्थसे मोह और योगके द्वारा गुणस्थान ही उत्पन्न होते है न कि गुण- स्थानसंज्ञा, तथापि यहांपर वाच्यवाचकमें कथंचित् अभेदको मानकर उपचारसे संज्ञाको भी मोहयोगभवा कहा है। उक्त वीस प्ररूपणाओंका अन्तर्भाव दो प्ररूपणाओंमें किस अपेक्षासे हो सकता है और वीसप्ररूपणा किस अपेक्षासे कही हैं यह दिखाते है । आदेसे संलीणा जीवा पज्जत्तिपाणसण्णाओ। उबओगोवि य भेदे वीसं तु परूबणा भणिदा ॥४॥ आदेशे संलांना जीवाः पर्याप्तिप्राणसंज्ञाश्च । उपयोगोपि च भेदे विशतिस्तु प्ररूपणा भणिताः ॥ ४ ॥ अर्थ-मार्गणाओंमें ही जीवसमास, पर्याप्ति, प्राण, संज्ञा और उपयोग इनका अन्त- र्भाव हो सकता है, इस लिये अभेद विवक्षासे गुणस्थान और मार्गणा ये दो प्ररूपणा ही माननी चाहिये; वसि प्ररूपणा जो कही है वे भेद विवक्षासे है। किस मार्गणामे कौन २ प्ररूपणा अन्तर्भूत हो सकती है यह वात तीन गाथाओद्वारा दिखाते है। इन्दियकाये लीणा जीवा पज्जत्तिआणमासमणो । जोगे काओ णाणे अक्खा गदिमग्गणे आऊ ॥ ५॥ इन्द्रियकाययोनिा जीवाः पर्याप्त्यानभाषामनासि । योगे कायः ज्ञाने अक्षीणि गतिमार्गणायामायुः ॥ ५ ॥ अर्थ----इन्द्रियमार्गणामें तथा कायमार्गणामें स्वरूपम्वरूपवत्सम्बन्धकी अपेक्षा, अथवा सामान्यविशेषकी अपेक्षा जीवसमासका अन्तर्भाव हो सकता है। क्योकि इन्द्रिय तथा काय जीवसमासके स्वरूप है और जीवसमास स्वरूपवान् है । तथा इन्द्रिय और काय विशेष है जीवसमास सामान्य है। इसीप्रकार धर्ममि सम्बन्धकी अपेक्षा पर्याप्ति भी अन्तत हो सकती है, क्योंकि इन्द्रिय धर्मा है और पर्याप्ति धर्म है। कार्यकारणसम्बन्धकी अपेक्षा मो प्राण, वचनवल प्राण, तथा मनोवलप्राणका, पर्याप्तिमें अन्तर्भाव हो सकता है; को प्राण कार्य है और पर्याप्ति कारण है । कायरल प्राण विशेष है और योग मागल्या सामान्यविशेषकी अपेक्षा योगमार्गणामे कायवलागण अन्तर्भूत हो मरता है Tam सम्बन्धकी अपेक्षासही ज्ञानमार्गणामे इन्द्रियों का अन्तर्भाव है। सस्ता है। , का, प्रति लब्धीन्द्रिय कारण हैं। इसीप्रकार गतिमार्गणाम आयमाणा अन्तम नाम: अपेक्षा हो सकता है, क्योंकि इन दोनोका उदय सायही होता है। १ इन्द्रिय गनापरणरन क्षोपनिने उस !

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् 8 संज्ञाओंका अन्तर्भाव किस प्रकार होता है सो दिखाते है। मायालोहे रदिपुवाहारं कोहमाणगरि भयं । वेदे मेहुणसण्णा लोहह्मि परिग्गहे सपणा ॥ ६ ॥ मायालोभयो रतिपूर्वकमाहारं क्रोधमानकयोर्भयम् । वेदे मैथुनसंज्ञा लोभे परिग्रहे संज्ञा ॥ ६ ॥ अर्थ-रतिपूर्वक आहार अर्थात् आहारसंज्ञा रागविशेष होनेसे रागका स्वरूपही है और माया तथा लोभकषाय दोनोंही स्वरूपवान् है इसलिये स्वरूपस्वरूपवत्सम्बन्धकी अपेक्षा माया और लोभकषायमे आहारसंज्ञाका अन्तर्भाव होता है। इसीप्रकार ( स्वरूपस्वरूपवत्स- म्बन्धकी अपेक्षा ) क्रोध तथा मानकषायमें भयसंज्ञाका अन्तर्भाव होता है । कार्यकारणसम्ब- न्धकी अपेक्षा वेदकषायमें मैथुनसंज्ञाका और लोभकषायमे परिग्रहसंज्ञाका अन्तर्भाव होता है; क्योंकि वेदकषाय तथा लोभकषाय कारण है और मैथुनसंज्ञा तथा परिग्रहसंज्ञा कार्य है। उपयोगका अन्तर्भाव दिखानेके लिये सूत्र कहते है । सागारो उबजोगो णाणे मग्गमि दंसणे मग्गे। अणगारो उबजोगो लीणोत्ति जिणेहिं णिद्दिष्टुं ॥७॥ साकार उपयोगो ज्ञानमार्गणाया दर्शनमार्गणायाम् । अनाकार उपयोगो लीन इति जिनैर्निर्दिष्टम् ॥ ७ ॥ अर्थ--उपयोग दो प्रकारका होता है एक साकार दूसरा अनाकार । साकार उपयोग उसको कहते है जिसमें पदार्थ यह घट है, यह पट हैं। इत्यादि विशेषरूपसे प्रतिभासित हो । इसीको ज्ञान कहते है। इसलिये इसका ज्ञानमार्गणामें अन्तर्भाव होता है। जिसमे कोई भी विशेष पदार्थ प्रतिभासित न होकर केवल महासत्ताही विषय हो उसको अनाकार उपयोग तथा दर्शन कहते हैं । इसका दर्शनमार्गणामे अन्तर्भाव होता है। यद्यपि यहांपर ऊपर सब जगह अभेद विवक्षासे दो ही प्ररूपणाओंमें शेष प्ररूपणाओका अन्तर्भाव दिखलादिया है तथापि आगे प्रत्येक प्ररूपणाका निरूपण भेदविवक्षासे ही करेंगे। प्रतिज्ञाके अनुसार प्रथम क्रमप्राप्त गुणस्थानका सामान्य लक्षण करते है जेहिं दु लक्खिज्जते उदयादिसु संभवेहिं भावहिं । जीवा ते गुणसण्णा णिदिठा सव्वदरसीहिं ॥८॥ यैस्तु लक्ष्यन्ते उदयादिषु सम्भवैर्भावैः । जीवास्ते गुणसंज्ञा निर्दिष्टाः सर्वदर्शिभिः ॥ ८ ॥ अर्थ-दर्शनमोहनीयादि कर्मोकी उदय, उपशम, क्षय, क्षयोपशम आदि अवस्थाके गोम्मटसारः। होनेपर होनेवाले जिन परिणामोंसे युक्त जो जीव देखे जाते हैं उन जीवोंको सर्वज्ञदेवने उसी गुणस्थानवाला और परिणामोंको गुणस्थान कहा है। भावार्थ:-जिस प्रकार किसी जीवके दर्शन मोहनीय कर्मकी मिथ्यात्वप्रकृतिके उदयसे मिथ्यात्व ( मिथ्यादर्शन ) रूप परिणाम हुए तो उस जीवको मिथ्यादृष्टि और उन परिणामोंको मिथ्यात्व गुणस्थान कहेंगे । गुणस्थानोंके १४ चौदह भेद है । उनके नाम दो गाथाओंद्वारा दिखाते है । मिच्छो सासण मिस्सो अविरदसम्मो य देसविरदो य । विरदा पमत्त इदरो अपुव्व अणियह सुहमो य ॥९॥ १ मिथ्यात्वं २ सासनः ३ मिश्रः । ४ अविरतसम्यक्त्वं च ५ देशविरतश्च । विरताः ६ प्रमत्तः ७ इतरः ८ अपूर्वः ९ अनिवृत्तिः १० सूक्ष्मश्च ॥ ९ ॥ अर्थ-मिथ्वात्व, साप्तादन, मिश्र, अविरतसम्यग्दृष्टि, देशविरत, प्रमत्तविरत, अप्रमत्त- विरत, अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण, सूक्ष्मसांपराय । इस सूत्रमें चौथे गुणस्थानके साथ अविरतशब्द अन्त्यदीपक है इसलिये पूर्वके तीन गुणस्थानोंमेंभी अविरतपना समझना चाहिये । तथा छढे गुणस्थानके साथका विरत शब्द आदि दीपक है इस लिये यहासे लेकर सम्पूर्ण गुणस्थान विरत ही होते है ऐसा समझना । उबसंत खीणमोहो सजोगकेवलिजिणो अजोगी य । चउदस जीवसमासा कमेण सिद्धा य णादव्वा ॥ १० ॥ ११ उपशान्तः, १२ क्षीणमोहः, १३ संयोगकेवलिजिनः, १४ अयोगी च । चतुर्दश जीवसमासाः क्रमेण सिद्धाश्च ज्ञातव्याः ॥ १० ॥ अर्थ-उपशान्तमोह, क्षीणमोह, सयोगकेवलिजिन, अयोगकेवली ये १४ चौदह नीग्य- मास (गुणस्थान ) है । और सिद्ध जीवसमासोंसे रहित है । अर्थात् इस मूत्रमें क्रमेण गम नो पडा है उससे यह सूचित होता है कि जीवसामान्यके दो भेद है, एक ससारी दूसरा मना । मुक्तअवस्था संसारपूर्वक ही होती है । संसारियोंके गुणस्थानकी अपेक्षा नीवह मे। इसके अनन्तर क्रमसे गुणस्थानोंसे रहित मुक्त या मिन्द्ध अन्गा प्राप्त होती गाथामे सयोग शद अन्त्यदीपक है इसलिये पूर्वक मिथ्णयादि मही नगर जीव योगसहित होते है। और जिन शन मध्यदीपर है तो अपना अयोगी पर्यन्त मभी जिन होते हैं। केवलि शरः आदिढीपत काय ... तथा सिद्ध तीनों ही केवली होते है यह सुनित होना है। -- or रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् इस प्रकार सामान्यसे गुणस्थानोंका निर्देशकर अब प्रत्येक गुणस्थानाम जो २ भाव होने है उनका उल्लेख करते है। मिच्छे खलु ओदइओ विदिये पुण पारणामिओ भावो। मिस्से खओबससिओ अविरसम्मलि तिण्णव ॥ ११ ॥ मिथ्यात्वे खलु औदायिको द्वितीये पुनः पारणामिको भावः । मिश्रे क्षायोपशमिकः अविरतसम्यक्त्वे त्रय एव ॥ ११ ॥ अर्थ-प्रथम गुणस्थानमें औदयिक भाव होते है । और द्वितीय गुणस्थानमें पारणा मिक भाव होते है । मिश्रमे क्षायोपशामिक भाव होते है । और चतुर्थ गुणस्थानमें औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक इस प्रकार तीनोंही भाव होते है । कर्मके उदयसे जो आत्माके परिणाम हो उनको औदयिक भाव कहते है। जो कर्मके उप- शम होनेसे भाव होते है उनको औपशमिक भाव कहते है। सर्वघातिस्पर्धकोंके वर्तमान निपे- कोंके विना फल दिये ही निर्जरा होनेपर और उसीके ( सर्वघातिस्पर्धकोंके ) आगामिनिपेकोंका सदवस्थारूप उपशम होनेपर देशघाति स्पर्धकोका उदय होनेपर जो आत्माके परिणाम होते है उनको क्षायोपशमिक भाव कहते है । जिनमें कर्मके उदय उपशमादिकी कुछ भी अपेक्षा न हो उनको पारणामिक भाव कहते है उक्त चारों ही गुणस्थानके भाव किस अपेक्षासे कहे है उसको दिखानेके लिये सूत्र कहते है। एदे भावा णियमा दसणमोहं पडुञ्च भणिदा हु। चारित्तं णत्थि जदो अविरदअन्तेसु ठाणेसु ।। १२ ।। एते भावा नियमा दर्शनमोहं प्रतीत्य भणिताः खलु । चारित्रं नास्ति यतो अविरतान्तेषु स्थानेषु ॥ ११ ॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टयादिगुणस्थानोमें जो नियमबद्ध औदयिकादि भाव कहे है वे दर्शनमो- हनीय कर्मकी अपेक्षासे है, क्योंकि चतुर्थगुणस्थानपर्यन्त चारित्र नहीं होता । अर्थात् मिथ्यादृष्ट्यादि गुणस्थानोंमें यदि सामान्यसे देखा जाय तो केवल औदयिकादि भाव ही नहीं होते किन्तु क्षायोपशीमकादि भाव भी होते है तथापि यदि केवल दर्शनमोहनीय कर्मकी अपेक्षा देखा जाय तो औदयिकादि भाव ही होते है क्योकि प्रथमगुणस्थानमे दर्शनमोहनीय- कर्मकी मिथ्यात्वप्रकृतिके उदयमात्रकी अपेक्षा है इसलिये औदयिक भाव ही है । द्वितीयगु- णस्थानमें दर्शनमोहनीयकी अपेक्षा ही नहीं है इसलिये पारणामिकभाव है। तृतीयगुणस्थानमें जात्यन्तर सर्वत्राति मिश्रप्रकृतिका उदय है इसलिये क्षायोपशमिक भाव होते है । इसीप्रकार चतुर्य गुणस्थानमें दर्शनमोहनीयकर्मके उपशम क्षय क्षयोपशम तीनोंका सद्भाव है इसलिये तीनों ही प्रकारके भाव होते है ।

गोम्मटसारः। ७ पञ्चमादिगुणस्थानोंमें जो २ भाव होते है उनको दो गाथाओद्वारा दिखाते है । देसविरदे पमत्ते इदरे य खओबसमियभावो दु । सो खलु चरित्तमोहं पडुच्च भणियं तहा उवरि ॥ १३ ॥ देशविरते प्रमत्ते इतरे च क्षायोपशमिकभावस्तु । स खलु चारित्रमोहं प्रतीत्य भणितस्तथा उपरि ॥ १३ ॥ अर्थ-देशविरत प्रमत्त अप्रमत्त इन गुणस्थानोंमें चारित्रमोहनीयकी अपेक्षा क्षायो- पशमिक भाव होते है। तथा इनके आगे अपूर्वकरणादि गुणस्थानोंमें भी चारित्रमोहनीयकी अपे- सासे ही भावोंको कहेंगे । तत्तो उरि उवसमभावो उवसामगेसु खबगेसु । खइओ भावो णियमा अजोगिचरिमोत्ति सिद्धे य ॥ १४ ॥ तत उपरि उपशमभावः उपशामकेषु क्षपकेषु । क्षायिको भावो नियमात् अयोगिचरिम इति सिद्धे च ॥ १४ ॥ अर्थ-सातवें गुणस्थानके ऊपर उपशमश्रेणिवाले आठवें नौवें दशवे गुणस्थानमें तया ग्यारहवेमें औपशमिकभाव ही होते है, इसीप्रकार क्षपकश्रेणिवाले उक्त तीन गुणस्थान तथा क्षीणमोह, सयोगकेवली अयोगकेवली गुणस्थानोंमें और सिद्धोके नियमसे क्षायिक भाव ही होते है। क्योंकि उपशम श्रेणीवाला तीनों गुणस्थानोमे चारित्रमोहनीय कर्मकी इक्कीस प्रकृतियोंका उपशम करता है और ग्यारहवेमें सम्पूर्ण चारित्रमोहनीयका उपशम इसलिये यहापर औपशमिक भाव ही होते है। इसीतरह क्षपकश्रेणिवाला इक्कीस प्रकृतियोंका क्षय करता है और क्षीणमोह, सयोगी, अयोगी और सिद्ध यहापर क्षय होनुका है इसलिये क्षायिक भाव ही होते है । इसप्रकार संक्षेपसे सम्पूर्ण गुणस्थानों में होनेवाले भाव और उनके निमित्तको दिवाकर गुणस्थानोका लक्षण अब क्रमप्राप्त है, इसलिये पहले प्रथमगुणस्थानका लक्षण और उसके भेदोंको कहते है। मिच्छोदयेण मिच्छत्तमसदहणं तु तच्चअस्थाणं । एयंतं विबरीयं विणयं संसायदमण्णाणं ॥ १५ ॥ मिथ्यात्वोदयेन मिथ्यात्वमश्रद्धान तु तत्त्वार्थानाम् । एकान्तं विपरीतं विनय मंशयितमज्ञानम् ॥ १२ ॥ अर्थ-मिथ्यात्वप्रकृतिके उदयमे तत्वार्यके विपरीत अन्नान किया है । इसके पाच भेट है एकान्त विपरीत विनय मति अजान । किसी एक धर्मात्मक मानना इसको एकान्त मिन्यात वनेको न...' अथवा नित्य ही है, वक्तव्य ही है, अपचय ही त्याला करचुकता है ८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् धर्मादिकके स्वरूपको विपर्ययरूप मानना इसको विपरीत मिथ्यात्व कहते है, जैसे हिंसासे स्वर्गादिककी प्राप्ति होती है। सम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टि देव गुरु तथा उनके कहे हुए शास्त्रोंमें समान बुद्धि रख- नेको विनयमिथ्यात्व कहते है। जैसे जिन और बुद्ध तथा उनके धर्मको समान समझना । समीचीन तथा असमीचीन दोनों प्रकारके पदार्थोमेंसे किसी भी एकका निश्चय न होना इसको संशय मिथ्यात्व कहते हैं। जैसे सग्रन्थ लिङ्ग मोक्षका साधन है या निर्ग्रन्थ लिङ्ग, अथवा सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्र इनकी एकता मोक्षका साधन है अथवा यागादि कर्म, तथा कर्मोंके सर्वथा अभावसे अनन्तगुणविशिष्ट आत्माकी शुद्ध अवस्थाविशेषको मोक्ष कहते हैं यद्वा बुद्धि आदि विशेषगुणोंके अभावको मोक्ष कहते है। जीवादि पदार्थोको " यही है " " इसी प्रकार है " इस तरह विशेषरूपसे न सम- अनेको अज्ञानमिथ्यात्व कहते हैं। इस प्रकार सामान्यसे मिथ्यात्वके ये पांच भेद है विस्तारसे असख्यातलोकप्रमाणतक भेट हो सकते है। उक्त मिथ्यात्वके पाच भेदोके दृष्टान्तोंको दिखाते है। एयंत बुद्धदरसी विवरीओ बह्म तावसो विणओ। इंदो विय संसइयो मक्कडियो चेव अण्णाणी॥१६॥ एकान्तो बुद्धदर्शी विपरीतो ब्रह्म तापसो विनयः । इन्द्रोपि च संशयितो मस्करी चैवाज्ञानी ॥ १६ ॥ अर्थ-ये केवल दृष्टान्तमात्र है इसलिये प्रत्येकके साथ आदि शब्द लगालेना चाहिये। अर्थात् वौद्धादिमतवाले एकान्तमिथ्यादृष्टि है । याज्ञिक ब्राह्मणादि विपरीत मिथ्यादृष्टि है। तापसादि विनयमिथ्यादृष्टि है । इन्द्रनामक श्वेताम्बर गुरु प्रभृति संशयमिथ्यादृष्टि है। और मस्करी आदिक अज्ञानी हैं। उक्त मिथ्यात्वके लक्षणको दूसरे प्रकारसे कहते हैं | मिच्छंतं वेदंतो जीवो विवरीयदंसणो होदि । ण य धम्म रोचेदि हु महुरं खु रसं जहा जरिदो ॥ १७ ॥ मिथ्यात्व विदन् जीवो विपरीतदर्शनो भवति । न च धर्म रोचते हि मधुरं खलु रसं यथा ज्वरितः ॥ १७ ॥ अर्थ-मिथ्यात्व प्रकृतिके उदयसे उत्पन्न होनेवाले मिथ्या परिणामोका अनुभव कर- वाव विपरीत श्रद्धानवाला हो जाता है । उसको जिसप्रकार पित्तज्वरसे युक्त जीवको म भी अच्छा मान्नुम नहीं होता उस ही प्रकार यथार्थ धर्म अच्छा मालुम नहीं होता :- मावार्थ-मिथ्यात्वप्रकृतिके उदयमे जो जीव देवगुरुशास्त्रके यथार्थ स्वरूपका गोम्मटसारः । श्रद्धान न करके विपरीत श्रद्धान करता है उसको मिथ्यादृष्टि कहते है। यहांपर जो च शब्द डाला है उससे यह अभिप्राय समझना चाहिये कि यदि कोई जीव वाहिरसे सम्यग्ह- ष्टिके समान आचरण करै और अन्तरङ्गसे उसके विपरीत परिणाम हो तो वह यथार्थमें मिथ्यादृष्टि ही है। इस अर्थको दृढ़ करनेके लिये ही मिथ्यादृष्टिके वाह्य चिह्नोंच्नो दिखाते है। मिच्छाइट्ठी जीवो उबइ8 पवयणं ण सद्दहदि । सद्दहदि असम्भावं उबइ वा अणुबइठें ॥१८॥ मिथ्याष्टिीव उपदिष्टं प्रवचनं न श्रद्दधाति । श्रद्दधाति असद्भावमुपदिष्टं वाऽनुपदिष्टम् ॥ १८ ॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टि जीव समीचीन गुरुओंके पूर्वापर विरोधादि दोपोसे रहित और हितके करनेवाले भी वचनका यथार्थ श्रद्धान नहीं करता । किन्तु आचार्याभासोंकेद्वारा उपदिष्ट या अनुपदिष्ट असद्भावका अर्थात् पदार्थके विपरीत स्वरूपका इच्छानुसार श्रद्धान करता है। इस प्रकार प्रथम गुणस्थानका स्वरूप, उसके भेद, और उनके दृष्टान्त, तथा बाह्य चिह्नोंको दिखाकर अब दूसरे सासादन गुणस्थानको कहते है । आदिमसम्मत्तद्धा समयादो छावलित्ति वा सेसे । अणअण्णदरुदयादो णासियसम्मोत्ति सासणक्खो सो ॥ १९ ॥ आदिमसम्यक्त्वाद्धा आसमयतः पडावलिरिति वा शेपे । अनान्यतरोदयात् नाशितसम्यक्त्व इति सासनाख्यः सः ॥ १९ ॥ अर्थ-प्रथमोपशम सम्यक्त्वके अथवा यहापर वा शब्दका ग्रहण किया है इसलिये द्वितीयोपशम सम्यक्त्वके अन्तर्मुहूर्तमात्र कालमेंसे जब जघन्य एक समय तथा उत्कृष्ट छह आवली प्रमाण काल शेष रहे उतने कालमें अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, रोभमसे किमीके भी उदयसे सम्यक्त्वकी विराधना होनेपर सम्यग्दर्शनगुणकी जो अव्यक्त अतत्त्वश्रद्धानन्य परिणति होती है उसको सासन या सासादन गुणस्थान कहते है। अब इस गुणस्थानको दृष्टान्तद्वारा स्पष्ट करते है। सम्मत्तरयणपव्वयसिहरादो मिच्छभूमिसमभिमुहो । णासियसम्मत्तो सो सासणणामो मुणेयधों ।। २० ॥ सम्यक्त्वरलपर्वतशिखरात् मिथ्यात्वभूमिसमभिमुस । नाशितसम्यक्त्वः सः सासननामा मन्तव्यः ॥ २८ ॥ अर्थ-सम्यक्त्वरूपी रलपर्वन के शिखरमे गिगा जो नियम ::: गो.

१० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम हो चुका है, अत एव जिसने सम्यक्त्वकी विराधना (नाश ) करदी है और मिथ्यात्वको प्राप्त नहीं किया है उसको सासन या सासादन गुणस्थानवर्ती कहते है । भावार्थ--जिसप्रकार पर्वतसे गिरनेपर और भूमिपर पहुंचनेके पहले मध्यका जो काल है वह न पर्वतपर ठहरनेकाही है और न भूमिपर ही ठहरनेका है; किन्तु अनुभय काल है। इसी प्रकार अनन्तानुवन्धी कपायमेसे किसी एकके उदय होनेसे सम्यक्त्वपरिणामोंके छूटनेपर, और मिथ्यात्व प्रकृतिके उदय न होनेसे मिथ्यात्व परिमाणोंके न होनेपर मध्यके अनुभयकालमें जो परिणाम होते है उनको सासन या सासादन गुणस्थान कहते है। यहापर जो सम्यक्त्वको रत्नपर्वतकी उपमा दी है उसका अभि- प्राय यह है कि जिसप्रकार रत्नपर्वत अनेक रत्नोंका उत्पन्न करनेवाला और उन्नतस्थान पर पहुंचानेवाला है उसही प्रकार सम्यक्त्व भी सम्यग्ज्ञानादि अनेक गुणरत्नोंको उत्पन्न करनेवाला है और सबसे उन्नत मोक्षस्थानपर पहुंचानेवाला है । क्रमप्राप्त तृतीयगुणस्थानका लक्षण करते हैं। सम्मामिच्छुदयण य जत्तरसव्वधादिकज्जेण । णय सल्म मिच्छ पि य सम्मिस्सो होदि परिणामो ॥ २१ ॥ सम्यग्मिथ्यात्वोदयेन च जात्यन्तरसर्वघातिकार्येण । नच सम्यक्त्वं मिथ्यात्वमपि च सम्मिश्रो भवति परिणामः ॥ २१ ॥ अर्थ-निसका प्रतिपक्षी आत्माके गुणको सर्वथा घातनेका कार्य दूसरी सर्वघाति प्रकृतियोंसे विलक्षण जातिका है उस जात्यन्तर सर्वघाति सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृतिके उदयसे केवल सम्यक्त्वरूप या मिथ्यात्वरूप परिणाम न होकर जो मिश्ररूप परिणाम होता है उसको तीसरा मिश्र गुणस्थान कहते है । (शङ्का ) यह तीसरा गुणस्थान वन नहीं सकता, क्योंकि मिश्र- रूप परिणाम ही नहीं हो सकते । यदि विरुद्ध दो प्रकारके परिणाम एकही आत्मा और एकही कालमें माने जाय तो शीतउष्णकी तरह परस्पर सहावस्थान लक्षण विरोध दोष आवेगा। यदि क्रमसे दोनों परिमाणोंकी उत्पत्ति मानीजाय तो मिश्ररूप तीसरा गुणस्थान नहीं बनता । ( समाधान ) यह शङ्का ठीक नहीं है, क्योकि मित्रामित्रन्यायसे एककाल और एकही आत्मामें मिश्ररूप परिणाम हो सकते है । भावार्थ-जिसप्रकार देवदत्तनामक किसी मनुष्यमें यज्ञदत्तकी अपेक्षा मित्रपना और चैत्रकी अपेक्षा अमित्रपना ये दोनो धर्म एकही कालमें रहते है और उनमें कोई विरोध नहीं है । उस ही प्रकार सर्वज्ञ निरूपित पदार्थके स्वरूपके श्रद्धानकी अपेक्षा समीचीनता और सर्वज्ञाभासकथित अतत्त्वश्रद्धानकी अपेक्षा मिथ्यापना ये दोनों ही धर्म एक काल और एक आत्मामें घटित हो सकते है इसमें कोई भी विरोधादि दोष नहीं है । उक्त अर्थको ही दृष्टान्तद्वारा स्पष्ट करते है। दहिगुडमिव पामिस्स पहभावं व कारिदुं सक्कं ।

गोम्मटसारः । ११ एवं मिस्सयभावो सम्मामिच्छोत्तिणादवो ॥२२॥ दधिगुडमिव व्यामिश्रं पृथग्भावं नैव कर्तुं शक्यम् । एवं मिश्रकभावः सम्यग्मिथ्यात्वमिति ज्ञातव्यम् ॥ २२॥ अर्थ-~जिसप्रकार दही और गुडको परस्पर इस तरहसे मिलानेपर कि फिर उन दोनोंको पृथक् २ नहीं करसकें, उस द्रव्यके प्रत्येक परमाणुका रस मिश्ररूप ( खट्टा और मीठा मिला हुआ) होता है । उस ही प्रकार मिश्रपरिणामोंमें भी एकही कालमें सम्यक्त्व और मिथ्यात्वरूप परिणाम रहते है ऐसा समझना चाहिये । इस गुणस्थानमें होनेवाली विशेषताको दिखाते है। सो संजमं ण गिण्हदि देसजमं वा ण बंधदे आउं । सम्म वा मिच्छ वा पडिवज्जिय मरदि णियमेण ॥ २३ ॥ स संयम न गृह्णाति देशयमं वा न बध्नाति आयुः । सम्यक्त्वं वा मिथ्यात्वं वा प्रतिपद्य म्रियते नियमेन ॥ २३ ॥ अर्थ-तृतीय गुणस्थानवर्ती जीव सकल संयम या देशसंयमको ग्रहण नहीं करता, और न इस गुणस्थानमें आयुकर्मका वन्ध ही होता है । तथा इस गुणस्थानवाला जीव यदि मरण करता है तो नियमसे सम्यक्त्व या मिथ्यात्वरूप परिणामोंको प्राप्त करके ही मरण करता है, किन्तु इस गुणस्थानमें मरण नहीं होता। उक्त अर्थको और भी स्पष्ट करते है। सम्मत्तमिच्छ परिणामेसु जहिं आउगं पुरा बद्ध । तहिं मरणं मरणंतसमुग्धादो वि य ण मिस्सम्मि ॥ २४ ॥ सम्यक्त्वमिथ्यात्वपरिणामेषु यत्रायुष्कं पुरा वद्धम् । तत्र मरण मारणान्तसमुद्धातोपि च न मिश्रे ॥ २४ ॥ अर्थ-तृतीयगुणस्थानवी जीवने तृतीयगुणस्थानको प्रान करने से पहले सगाव या मिथ्यात्वरूपके परिणामोंमेंसे जिस जातिके परिणाम कारमें आयकर्म का वध किया तो उस ही तरहके परिणामोंके होने पर उसका मरण होता है, किन्तु मिश्रगुणस्थानने मरन नन।। और न इस गुणस्थानमे मारणान्तिक समुद्यात ही होता है। १ मूल शरीरको विना छोडे ही भात्मा प्रदेशांश यदि निकता भेद है-वेदना पाय पैनिक मारणानिर तार मारगान्तिक सगुलात परते ६ । --- 4 17 रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् चतुर्थ गुणस्थानका लक्षण बताने के पूर्व उसमें होनेवाले सम्यादर्शन के औपामिक क्षायिक क्षायोपशभिक इन तीन भेदों से प्रथम क्षायोपशमिकका लक्षण करते है। सम्मत्तदेसघादिस्सुदयादो वेदगं हवे सम्म । चलमलिनमगाढं तं णिचं कम्मक्खवणहेदु ।। २५ ॥ सम्यक्त्वदेशघातेरुदयाद्वेदकं भवेत्सम्यक्त्वम् । चलं मलिनमगाढं तन्नित्यं कर्मक्षपणहेतु ॥ २५ ॥ अर्थ-सम्यग्दर्शनगुणको विपरीत करनेवाली प्रकृतियोमसे देशवाति सम्यक्त्व प्रकृ- तिके उदय होने पर ( तथा अनन्तानुवन्धि चतुष्क और मिथ्यात्व मित्र इन सर्ववाति प्रकृति- योंके आगामि निषेकोका सदवस्थारूप उपशम और वर्तमान निपेकोंकी विना फल दिये ही निर्जरा होनेपर ) जो आत्माके परिणाम होते है उनको वेदक या क्षायोपशामिक सम्यग्दर्शन कहते है । वे परिणाम चल मलिन या अगाढ़ होते हुए भी नित्य ही अर्थात् जघन्य अन्तर्मुहू- तसे लेकर उत्कृष्ट छयासठ सागरपर्यन्त कर्मोकी निर्जराको कारण है। जिसप्रकार एकही जल अनेक कल्लोलरूपमें परिणत होता है उसही प्रकार जो सम्य- ग्दर्शन सम्पूर्ण तीर्थकर या अर्हन्तोंमें समान अनन्त शक्तिके होने पर भी ' श्रीशान्तिनाथजी शान्तिकेलिये और श्रीपार्श्वनाथजी रक्षा करनेके लिये समर्थ है' इस तरह नाना विषयोंमें चला- यमान होता है उस को चल सम्यग्दर्शन कहते है । जिस प्रकार शुद्ध सुवर्ण भी मलके निमित्तसे मलिन कहा जाता है उसही तरह सम्यक्त्व प्रकृतिके उदयसे जिसमें पूर्ण निर्मलता नहीं है उसको मलिन सम्यग्दर्शन कहते हैं। जिस तरह वृद्ध पुरुषके हाथमें ठहरी हुई भी लाठी कापती है उसही तरह जिस सम्यग्दर्शनके होते हुए भी अपने वनवाये हुए मन्दिरादिमें यह मेरा मन्दिर है ' और दूसरेके वनवाये हुए मन्दिरादिमें ' यह दूसरेका है ' ऐसा भ्रम हो उसको अगाद सम्यग्दर्शन कहते है। अब औपशमिक या क्षायिक सम्यग्दर्शनका लक्षण कहते हैं। सत्तण्हं उबसमदो उबसमसम्मो खयाटु खइयो य । बिदियकसायुदयादो असंजदो होदि सम्मो य ॥ २६ ॥ सप्तानामुपशमत उपशमसम्यक्त्वं क्षयात्तु क्षायिकं च । द्वितीयकषायोदयादसंयतं भवति सम्यक्त्वं च ॥ २६ ॥ अर्थ-तीन दर्शनमोहनीय अर्थात् मिथ्यात्व मिश्र और सम्यक्त्व तथा चार अनन्ता- नुवन्धी कपाय इन सात प्रकृतियोके उपशमसे उपशम और सर्वथा क्षयसे क्षाधिक सम्यग्दर्शन होता है । इस ( चतुर्थगुणस्थानवर्ती ) सम्यग्दर्शन के साथ संयम बिलकुल ही नहीं होता; क्योंकि यहां पर दूसरी अप्रत्याख्यानावरणकपायका उदय है । अत एव इस गुणस्थानवर्ती जीवको असंयतसम्यग्दृष्टि कहते है। .

गोम्मटसार। . १३ . इस गुणस्थानमें जो कुछ विशेषता है उसको दिखाते है । सम्माइही जीवो उबइ8 पबयणं तु सद्दहदि । सद्दहदि असल्भावं अजाणमाणो गुरुणियोगा ॥ २७ ॥ सम्यग्दृष्टि व उपदिष्टं प्रवचनं तु श्रद्दधाति । श्रद्दधात्यसद्भावमज्ञायमानो गुरुनियोगात् ।। २७ ॥ अर्थ-सम्यग्दृष्टि जीव आचार्योंके द्वारा उपदिष्ट प्रवचनका श्रद्धान करता है, किन्तु अज्ञानतावश गुरुके उपदेशसे विपरीत अर्थका भी श्रद्धान करलेता है । भावार्थ “ अरिहंत- देवका ऐसा ही उपदेश है " ऐसा समझकर यदि कोई पदार्थका विपरीत श्रद्धान भी करता है तो भी वह सम्यग्दृष्टि ही है। क्योंकि उसने अरिहंतका उपदेश समझकर उस पदार्थका वैसा श्रद्धान किया है। परन्तु- सुत्तादो त सम्म दरसिज्जतं जदा ण सद्दहदि । सो चेव हवइ मिच्छाइट्ठी जीवो तदो पहुदी ।। २८ ॥ सूत्रात्तं सम्यक् दर्शयन्तं यदा न श्रद्दधाति । स चैव भवति मिथ्यादृष्टि वस्तदा प्रभृति ॥ २८ ॥ अर्थ-गणधरादिकथित सूत्रके आश्रयसे आचार्यादिके द्वारा भलेप्रकार समझाये जाने पर भी यदि वह जीव उस पदार्थका समीचीन श्रद्धान न करे तो वह जीव उस ही कालसे मिथ्यादृष्टि होजाता है। भावार्थ-आगममें दिखाकर समीचीन पदार्थके समझाने पर भी यदि वह जीव पूर्वमें अज्ञानसे किये हुए अतत्त्वश्रद्धानको न छोडे तो वह जीव उसही कालसे मिथ्यादृष्टि कहा जाता है। चतुर्थगुणस्थानवी जीवका और भी विशेष स्वरूप दिखाते है । णो इन्दियेसु विरदो णो जीवे थावरे तसे वापि । जो सद्दहदि जिणुत्तं सम्माइट्ठी अदिरदो सो ॥ २९ ॥ इन्द्रियेषु विरतो नो जीवे स्थावरे त्रसे वापि । यः श्रद्दधाति निनोक्तं सम्यग्दृष्टिरविरतः सः ॥ २९ ॥ अर्थ-जो इन्द्रियोके विषयोंसे तथा त्रस स्थावर जीवोंकी हिंसाले मिस नती है, किन्तु जिनेन्द्रदेवद्वारा कथित प्रवचनका श्रद्धान करता है वह अविरतसम्यादृष्टि है । माय- संयम दो प्रकारका होता है, एक इन्द्रियसंयम दूसरा प्राणसंयम । इन्द्रियोंके पिये मे कि होनेको इन्द्रियसंयम, और अपने तथा परके प्राणों की रक्षाको प्राणमया पर हैं। गुणस्थानमें दोनों संयमोमेंसे कोई भी संयम नहीं होता अन एय टमां अग्नि कहते है । परन्तु इस गुणस्थानमें जो अपि शा पड़ा है उसमे मनोज प्रयोजन किसी हिंसा प्रवृत्त भी नहीं होता।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । पंचमगुणस्थानका लक्षण कहते हैं । पञ्चक्खाणुयादो संजमभावो ण होदि णवरितु । थोववदो होदि तदो देसवदो होदि पंचमओ ॥३०॥ प्रत्याख्यानोदयात् संयमभावो न भवति नरिं तु । स्तोकवतो भवति ततो देशव्रतो भवति पञ्चमः ॥ ३० ॥ अर्थ-यहा पर प्रत्याख्यानावरण कषायका उदय होनेसे पूर्ण संयम तो नहीं होता, किन्तु यह विशेषता है कि अप्रत्याख्यानावरणकषायका उदय न होनेसे देशवत होता है, अत एव इस पंचमगुणस्थानका नाम देशव्रत है। इस गुणस्थानको विरसाविरत भी कहते है । सो क्यों ? इसकी उपपत्तिको कहते हैं। जो तसबहाउविरदो अविरदओ तहय थावरबहादो। एक्कसमयम्हि जीवो विरदाविरदो जिणेक्कमई ॥ ३१ ॥ यस्त्रसवधाद्विरतः अविरतस्तथा च स्थावरवधात् । एकसमये जीवो विरताविरतो जिनकमतिः ॥ ३१ ॥ अर्थ-जो जीव जिनेन्द्रदेवमें अद्वितीय श्रद्धाको रखता हुआ त्रसकी हिंसासे विरत और उस ही समयमें स्थावरकी हिंसासे अविरत होताहै उस जीवको विरताविरत कहते है। भावार्थ-यहा पर जिन शब्द उपलक्षण है इसलिये जिनशब्दसे जिनेन्द्रदेव, और उनके उपदेशरूप आगम, तथा उसके अनुसार चलनेवाले गुरुओंका ग्रहण करना चाहिये । अर्थात् निनदेव, जिन आगम, जिनगुरुओंका श्रद्धान करनेवाला जो जीव एकही समयमें त्रस हिंसाकी अपेक्षा विरत और स्थावरहिंसाकी अपेक्षा अविरत होता है इसलिये उसको एकही समयमें विरताविरत कहते है । यहांपर जो तथा च शब्द पड़ा है उसका यह अभिप्राय है कि विना प्रयोजन स्थावरहिंसाको भी नहीं करता। छट्टे गुणस्थानका लक्षण कहते है। संजलणणोकसायाणुदयादो संजमो हवे जम्हा । मलजणणपमादो वि य तम्हा हु पमत्तविरदो सो॥ ३२ ॥ संज्वलननोकपायाणामुदयात्संयमो भवेद्यस्मात् । मलजननप्रमादपि च तस्मात्खलु प्रमत्तविरतः सः ॥ ३२ ॥ अर्थ-~~-सकलसंयमको रोकनेवाली प्रत्याख्यानावरण कपायका उपशम होने से पूर्ण संयम तो हो चुका है, किन्तु उस संयम के साथ संज्वलन और नो कपायके उदयसे संयममें मलको उत्पन्न करनेवाला प्रमाद भी होता है, अत एव इस गुणस्थानको प्रमत्तविरत कहते है। १ विशेषता अर्थका द्योतक यह अव्यय है ।

गोम्मटसारः। वत्तावत्तपमादे जो वसइ पमत्तसंजदो होदि । सयलगुणशीलकलिओ महव्वई चित्तलायरणो ॥३३॥ व्यक्ताव्यक्तप्रमादे यो वसति प्रमत्तसंयतो भवति । सकलगुणशीलकलिंतो महाव्रती चित्रलाचरणः ॥ ३३ ॥ अर्थ-जो महाव्रती सम्पूर्ण मूलगुण ( २८ ) और शीलसे युक्त होता हुआ भी व्यक्त और अय॑क्त दोनो प्रकारके प्रमादोंको करता है उस प्रमत्तसंयतका आचरण चित्रले होता है। प्रकरणमें प्राप्त प्रमादोंका वर्णन करते है। विकहा तहा कसाया इंदियाणदा तहेव पणयोय । चदु चदु पणमेगेगं हाति पमादा हु पण्णरस ॥ ३४ ॥ विकथास्तथा कषाया इन्द्रियनिद्रास्तथैव प्रणयश्च । चतुःचतुःपञ्चैकैकं भवन्ति प्रमादाः खलु पञ्चदश ॥ ३४ ॥ अर्थ-चार विकथा ( स्त्रीकथा भक्तकथा राष्ट्रकथा अवनिपालकथा ) चार कपाय ( क्रोध मान माया लोभ ) पांच इन्द्रिय ( स्पर्शन रसन घ्राण चक्षु और श्रोत्र ) एक निद्रा और एक प्रणय ( स्नेह ) ये पंद्रह प्रमादोंकी संख्या है। अब प्रमादोंका विशेष वर्णन करनेके लिये उनके पांच प्रकारोका वर्णन करते है। संखा तह पत्थारो परियट्टण ण तह समुदिई । एदे पंच पयारा पमदसमुक्कित्तणे णेया ॥ ३५ ॥ संख्या तथा प्रस्तारः परिवर्तन नष्टं तथा समुद्दिष्टम् । एते पञ्च प्रकाराः प्रमादसमुत्कीर्तने ज्ञेयाः ॥ ३५ ॥ अर्थ--प्रमादके विशेष वर्णनके विषयमें इन पांच प्रकारोको समझना चाहिये । संत्या, प्रस्तार, परिवर्तन, नष्ट, और समुद्दिष्ट । आलापोंके भेदों की गणनाको संख्या कहते है। संख्याके रखने या निकालनेके क्रमको प्रस्तार, और एक भेदसे दूसरे भेदपर पहुंचने के क्रमको परिवर्तन, संख्याके द्वारा भेदके निकालनेको नष्ट, और भेढको रखकर संन्याके निकटने समुद्दिष्ट कहते है। संख्याकी उत्पत्तिका कम बताते है। सव्वेपि पुव्वभंगा उवरिमभंगेस एक्कमेक्केसु । मेलंतित्ति य कमसो गुणिदे उप्पज्जदे संवा ।। ३६ ॥ १-२ जिसका स्वयं अनुभव हो उसको व्या और उस चिरीकोरे। ३ चितकारा अर्थात् जिसमें क्सिी एमे भी कामPrata - । कपादयुज होने से निकाल कदाजीला दे।

१६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायामे सर्वेपि पूर्वभङ्गा उपरिमभङ्गेषु एकैकेषु । मिलन्ति इति च क्रमशो गुणिते उत्पद्यते संख्या ॥ ३६ ॥ अर्थ-पूर्वके सव ही भङ्ग आगेके प्रत्येक भङ्गमें मिलते है, इसलिये क्रमसे गुणा- कार करने पर संख्या उत्पन्न होती है । भावार्थ----पूर्वके विकथाओंके प्रमाण चारको आगेकी कपायोंके प्रमाण चारसे गुणा करना चाहिये, क्योंकि प्रत्येक विकथा प्रत्येक कषायके साथ पाई जाती है । इससे जो राशि उत्पन्न हो ( जैसे १६ ) उसको पूर्व समझकर उसके आगेकी इन्द्रियोंके प्रमाण पाचसे गुणा करना चाहिये, क्योकि प्रत्येक विकथा या कषाय प्रत्येक इन्द्रि- यके साथ पाई जाती है । इसके अनुसार सोलहको पाचसे गुणने पर अस्सी प्रमादोंकी संख्या निकलती है। निद्रा और प्रणय ये एक ही एक है इसलिये इन के साथ गुणा करनेपर संख्या वृद्धि नहीं हो सक्ती । अत्र प्रस्तारक्रमको दिखाते हैं। पढम पमदपमाणं कमेण णिक्खिविय उवरिमाणं च । पिंड पडि एक्केकं णिक्खित्ते होदि पत्थारो ॥३७ । प्रथमं प्रमादप्रमाणं क्रमेण निक्षिप्य उपरिमाणं च । पिण्डं प्रति एकैकं निक्षिप्ते भवति प्रस्तारः ।। ३७ ।। अर्थ---प्रथम प्रमादके प्रमाणका विरलन कर क्रमसे निक्षेपण करके उसके एक एक रूपके प्रति आगेके पिण्डरूप प्रमादके प्रमाणका निक्षेपण करनेपर प्रस्तार होता है। भावार्थ- प्रथम विकथा प्रमादका प्रमाण ४, उसका विरलन कर कमसे ११११ इसतरह निक्षेपण करना । इसके ऊपर कपायप्रमादके प्रमाण चारको प्रत्येक एकके ऊपर पण करना, ऐसा करनेके अनंतर परस्पर ( कपायको ) जोड़ देने पर १६ सोलह होते है। दन सोलहका भी पूर्वकी तरह विरलन कर एक २ करके सोलह जगह रखना तथा प्रत्येक एकके ऊपर आगेके इन्द्रियप्रमादका प्रमाण पांच २ रखना । ऐसा करनेसे पूर्वकी तरह परस्पर जोड़ने पर अस्सी प्रमाढ होते हैं । इसको प्रस्तार कहते हैं । इससे यह मालूम हो जाता कि पूर्वके समस्त प्रमाद, आगेके प्रमाद के प्रत्येक भेदके साथ पाये जाते है। प्रस्तारका दूसरा क्रम बताते हैं। णिक्खित्तु विदियमेत्तं पढमं तस्सुवरि बिदियमेक्केक्कं । पिंटं पटि मिक्खेओ एवं सम्वत्थ कायबो ॥ ३८॥ निक्षिप्वा द्वितीयमानं प्रथम तस्योपरि द्वितीयमेकैकम् । रिण्ट प्रति निक्षेप एव सर्वत्र कर्तव्यः ॥ ३८ ॥ ११११ इसतरह निक्षे.

गोम्मटसारः । १७ ११११ अर्थ-दूसरे प्रमादका जितना प्रमाण है उतनी जगहपर प्रथम प्रमादके पिण्डको रखकर, उसके ऊपर एक २ पिण्ड प्रति आगेके प्रमादमेंसे एक २ का निक्षेपण करना, और आगे भी सर्वत्र इसी प्रकार करना । भावार्थ-दूसरे कषाय प्रमादका प्रमाण चार है इसलिये चार जगह पर प्रथम विकथाप्रमादके पिण्डका स्थापन करके उसके ऊपर पिण्ड पिण्डके प्रति एक २ कषायका ( ) स्थापन करना । इनको परस्पर जोड़नेसे सोलह होते है। इन सोल- हको प्रथम समझकर, इनसे आगेके इन्द्रिय प्रमादका प्रमाण पांच है इस लिये सोलहके पिण्डको पांच जगह रखकर पीछे प्रत्येक पिण्डपर क्रमसे एक २ इन्द्रियका स्थापन करना (१६ १६ १६ १६ ११ ) इन सोलहको इन्द्रियप्रमादके प्रमाण पाचसे गुणा करने पर या पाच जगहपर रक्खे हुए सोलहको परस्पर जोड़नेसे प्रमादोकी संख्या अस्सी निकलती है। प्रथम प्रस्तारकी अपेक्षा अक्षपरिवर्तनको कहते है। तदियक्खो अंतगदो आदिगदे संकमेदि विदियक्खो। दोण्णिवि गंतूणतं आदिगदे संकमेदि पढमक्खो ।। ३९ ।। तृतीयाक्ष अन्तगत आदिगते संक्रामति द्वितीयाक्षः । द्वावपि गत्वान्तमादिगते संक्रामति प्रथमाक्षः ॥ ३९ ॥ अर्थ-~-प्रमादका तृतीयस्थान अन्तको प्राप्त होकर जब फिरसे आदिस्थानको प्राप्त हो- जाय तब प्रमादका दूसरा स्थान भी वदलजाता है । इसी प्रकार जब दूसरा स्थान भी अन्तको प्राप्त होकर फिर आदि को प्राप्त होजाय तव तीसरा प्रमादका स्थान बदलता है। भावार्य- तीसरा इन्द्रियस्थान जत्र स्पर्शनादिके कमसे क्रोध और प्रथम विकथापर चूमकर अन्तको प्राप्त होजाय तब दूसरे कषायस्थानमें क्रोधका स्थान छूटकर मानका स्थान होता है। इसी प्रकार क्रमसे जब कषायका स्थान भी पूर्ण होजाय तब विकथामें स्त्रीकथाका स्थान छूटकर रा. कथाका स्थान होता है । इस क्रमसे स्त्रीकथालापी क्रोधी स्पर्शनेन्द्रियवशगतो निद्रादः लहान आदि अस्सी हूँ भड्न निकलते है । निद्रा और स्नेह इनका दूसरा भेद नहीं है, इसन्द्रिये इनमें अक्षसंचार नहीं होता। दूसरे प्रस्तारकी अपेक्षा अक्षसंचारको कहते है पदमक्खो अंतगदो आदिगदे संकमेदि विदियक्सो । दोणिवि गंतूणंतं आदिगदे संकमेदि तदियक्सो ॥ ४० ॥ प्रथमाक्ष अन्तगत आदिगते संकमति द्वितीयाः । द्वावपि गत्वान्तमादिगते संजामति तृतीयासः ॥ १० ॥ । १ एक स्थानको टोलरे पर। गो०३ १८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् अर्थ-प्रथमाक्ष जो विकथारूप प्रमादस्थान वह घूमता हुआ जब कमसे अंततक पहुं- चकर फिर स्त्रीकथारूप आदि स्थानपर आता है तब दूसरा कपायका स्थान क्रोधको छोड़कर मानपर आता है । इसी प्रकार जव दूसरा कषायस्थान भी अन्तको प्राप्त होकर फिर आदि ( क्रोध ) स्थानपर आता है तब तीसरा इन्द्रियस्थान वदलता है । अर्थात् स्पर्शनको छोड़कर रसनापर आता है। आगे नष्टके लानेकी विधि बताते है। सगमाणेहिं विभत्ते सेसं लक्खित्तु जाण अक्खपदं । लद्धे रूबं पक्खिव सुद्धे अंते ण रूवपक्खेबो ॥४१ ॥ स्वकमानर्विभक्ते शेष लक्षयित्वा जानीहि अक्षपदम् । लब्धे रूपं प्रक्षिप्य शुद्ध अन्से न रूपप्रक्षेपः ॥ ४१ ।। अर्थ--किसीने जितनेवा प्रमादका भङ्ग पूछा हो उतनी संख्याको रखकर उसमें क्रमसे प्रमादप्रमाणका भाग देना चाहिये । भाग देनेपर जो शेष रहे उसको अक्षस्थान समझ जो लब्ध आवे उसमे एक मिलाकर, दूसरे प्रमादके प्रमाणका भाग देना चाहिये, और भाग देनेसे जो शेष रहै उसको अक्षस्थान समझना चाहिये । किन्तु शेप स्थानमें यदि शून्य हो तो अन्तका अक्षस्थान समझना चाहिये, और उसमे एक नहीं मिलाना चाहिये । जैसे किसीने पूछा कि प्रमादका वीसवा भड्ग कौनसा है ? तो वीसकी संख्याको रखकर उसमे प्रथम विकथाप्रमादके प्रमाण चारका भाग देनेसे लब्ध पाच आये, और शून्य शेपस्थानमें है इसलिये पाचमें एक नहीं मिलाना, और अन्तकी विकथा ( अवनिपालकथा) समझना चाहिये । इसी प्रकार आगे भी कषायके प्रमाण चारका भाग देनेसे लव्ध और शेष एक २ ही रहा इस लिये प्रथम क्रोधकषाय, और लब्ध एकमे एक और मिलानेसे दो होते है इसलिये दूसरी रस- नेन्द्रिय समझनी चाहिये । अर्थात् २० वा भङ्ग अवनिपालकथालापी क्रोधी रसनेन्द्रियवशंगतो निद्रालुः स्नेहवान् यह हुआ । अत्र उद्दिष्टका स्वरूप कहते है। संठाविदूण रूपं उबरीदो संगुणित्तु सगमाणे । अबणिज्ज अणंकिदयं कुज्जा एमेव सव्वत्थ ॥ ४२ ॥ संस्थाप्य रूपमुपरितः संगुणित्वा स्वकमानम् । अपनीयानाद्दितं कुर्यात् एवमेव सर्वत्र ॥ ४२ ॥ अर्थ--एकका स्थापन करके आगेके प्रमादका जितना प्रमाण है उसके साथ गुणा- कार करना चाहिये । और उसमें जो अनङ्कित हो उसका त्याग करै । इसीप्रकार आगे भी करनेसे उद्दिष्टका प्रमाण निकलता है। भावार्थ--प्रमादके भड़को रखकर उसकी संख्याके निकालने गोम्मटसारः। १९ को उद्दिष्ट कहते है । उसके निकालने का क्रम यह है कि किसीने पूछा कि राष्ट्रकथालापी मायी घ्राणेन्द्रियवशंगतः निद्रालुः स्नेहवान् यह प्रमादका भङ्ग कितनेमा है ? तो एक (१) संख्या को रखकर उसको प्रमादके प्रमाणसे गुणा करना चाहिये और जो अनंकित हो उसको उसमेसे घटादेना चाहिये। जैसे १ एकका स्थापनकर उसको इन्द्रियोंके प्रमाण पांचसे गुणा करनेपर पाच हुए उसमें से अनंकित चक्षुः श्रोत्र दो है; क्योकि भङ्ग पूछनेमें प्राणेन्द्रिय का ग्रहण किया है, इसलिये दोको घटाया तो शेष रहे तीन, उनको कषायके प्रमाण चारसे गुणा करनेपर बारह होते है, उनमे अनंकित एक लोभकषाय है, इसलिये एक घटादिया तो शेष रहे ग्यारह । उनको विकथाओंके प्रमाण चारसे गुणनेपर चवालीस होते हैं, उसमेंसे एक अवनिपालकथाको घटा दिया तो शेष रहे तेतालीस, इसलिये उक्त भङ्ग तेतालीसमां हुआ । प्रथम प्रस्तारकी अपेक्षा जो अक्षपरिवर्तन वताया था उसके आश्रयसे नष्ट और उद्दिष्टके गूढयन्त्रको दिखाते है। इगिवितिचपणखपणदशपण्णरसं खवीसतालसट्ठी य । संठविय पमठाणे णहुद्दिष्टं च जाण तिट्ठाणे ॥ ४३ ॥ एकद्वित्रिचतुःपंचखपञ्चदशपञ्चदश खविंशच्चत्वारिंशत् षष्ठीश्च । संस्थाप्य प्रमादस्थाने नष्टोद्दिष्टे च जानीहि त्रिस्थाने ॥ ४३ ॥ अर्थ-तीन प्रमादस्थानों में क्रमसे प्रथम पांच इन्द्रियोंके स्थानपर एक दो तीन चार पाचको क्रमसे स्थापन करना । चार कषायोके स्थानपर शून्य पाच दश पन्द्रह स्थापन करना । तथा विकथाओंके स्थानपर क्रमसे शून्य वीस चालीस साठ स्थापन करना । ऐसा करनेसे नष्ट उद्दिष्ट अच्छीतरह समझमे आसकते है। क्योंकि जो भङ्ग विवक्षित हो उसके स्थानोंपर रक्खी हुई संख्याको परस्पर जोड़नेसे, यह कितनेवां भा है अथवा इस संख्यावाले भड्गमें कौन २ सा प्रमाद आता है यह समझमे आसकता है। दूसरे प्रस्तारकी अपेक्षा गूढयन्त्रको कहते है । इगिवितिचखचडवारं खसोलरागठदालचउसद्धिं । संठविय पमठाणे णटुद्दिष्टुं च जाण तिहाणे ॥ ४४ ॥ एकद्वित्रिचतुःखचतुरटद्वादश खपोडशराँगाष्टचत्वारिशच्चतुःषष्ठिम् । सस्थाप्य प्रमादस्थाने नष्टोद्दिष्टे च जानीहि त्रिस्थाने ॥ ४४ ॥ अर्थ-दूसरे प्रस्तारकी अपेक्षा तीनों प्रमादस्थानोंमें क्रमसे प्रथम विक्याओंके स्थानपर १।२।१४ स्थापन करना, और कपायोंके स्थानपर ०।४।८।१२ स्थापन करना, और १-रागदाब्दसे ३२ लिये जाते हैं, क्योंकि " कटपयपुर स्थवर्ण कटपयपुर स्थवर्ण "इत्यादि नियमसूत्र के अनुसार गका अर्थ ३ और रका अर्थ २ होता है। और यह नियम है कि "अहोही विपरीत गति होती है'।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् इन्द्रियोंकी जगहपर ०११६।३२१४८१६४। स्थापन करना । ऐसा करनेसे दूसरे प्रस्तारकी अपेक्षा भी पूर्वकी तरह नष्टोद्दिष्ट समझमे आसकते है । सप्तमगुणस्थानका स्वरूप बताते है। संजलणणोकसायाणुओ मंदो जदा तदा होदि । अपमत्तगुणो तेण य अपमत्तो संजदो होदि ॥ ४५ ॥ संज्वलननोकषायाणामुदयो मन्दो यदा तदा भवति । अप्रमत्तगुणस्तेन च अप्रमत्तः संयतो भवति ॥ ४५ ॥ अर्थ-जब संज्वलन और नोकपायका मन्द उदय होता है तब सकल संयमसे युक्त मुनिके प्रमादका अभाव हो जाता है । इसहीलिये इस गुणस्थानको अप्रमत्तसंयत कहते है । इसके दो भेद है-एक स्वस्थानाप्रमत्त दूसरा सातिशयाप्रमत्त । स्वस्थानाप्रमत्तसंयतका निरूपण करते है। णहासेसपमादो वयगुणसीलोलिमंडिओ णाणी। अणुबसमओ अखवओ झाणणिलीणोहु अपमत्तो ।। ४६ ॥ नष्टाशेषप्रमादो व्रतगुणशीलावलिमण्डितो ज्ञानी । अनुपशमक अक्षपको ध्याननिलीनो हि अप्रमत्तः ॥ ४६ ।। अर्थ-जिस संयतके सम्पूर्ण व्यक्ताव्यक्त प्रमाद नष्ट हो चुके है, और जो समग्र ही महाव्रत अट्ठाईस मूलगुण तथा शीलसे युक्त है, और शरीर आत्माके भेदज्ञानमें तथा मोक्षके कारणभूत ध्यानमें निरन्तर लीन रहता है, ऐसा अप्रमत्त जवतक उपशमक या क्षपक श्रेणिका आरोहण नहीं करता तबतक उसको स्वस्थान अप्रमत्त अथवा निरतिशय अप्रमत्त कहते है। सातिशय अप्रमत्तका स्वरूप कहते है। इगवीसमोहखवणुबसमणणिमित्ताणि तिकरणाणि तहिं । पढम अधापवत्तं करणं तु करेदि अपमत्तो ॥४७॥ एकविंशतिमोहक्षपणोपशमननिमित्तानि त्रिकरणानि तेषु । प्रथममधःप्रवृत्तं करणं तु करोति अप्रमत्तः ॥ ४७ ॥ अर्थ-अप्रत्याख्यान प्रत्याख्यान संज्वलन सम्बन्धी क्रोधमानमायालोभ तथा हास्यादिक नव नोकपाय मिलकर इक्कीस मोहनीयकी प्रकृतियोंके उपशम या क्षय करनेको आत्माके ये तीन करण अर्थात् तीन प्रकारके विशुद्ध परिणाम निमित्तभूत है, अधःकरण अपूर्वकरण अनिवृत्ति- करण ! उनमेंसे सातिशय अप्रमत्त-अर्थात् जो श्रेणि चढनेके सम्मुख है वह प्रथमके अध:- प्रवृत करणको ही करता है।

गोम्मटसारः । २१ अधःप्रवृत्तकरणका लक्षण कहते हैं। जह्मा उवरिमभावा हेट्ठिमभावेहिं सरिसगा होति । तमा पढमं करणं अधापवत्तोत्ति णिद्दिढें ॥४८॥ यस्मादुपरितनभावा अधस्तनभावैः सदृशका भवन्ति । तस्मात्प्रथमं करणमधःप्रवृत्तमिति निर्दिष्टम् ॥ ४८ ॥ अर्थ-अधःप्रवृत्तकरणके कालमेंसे ऊपरके समयवर्ती जीवोके परिणाम नीचेके समय- वर्ती जीवोंके परिणामके सदृश-अर्थात् संख्या और विशुद्धि की अपेक्षा समान होते हैं इसलिये प्रथम करणको आगममें अधःप्रवृत्त करण कहा है । अधःप्रवृत्तकरणके काल और उसमें होनेवाले परिणामोंका प्रमाण बताते है । अंतोमुहुत्तमेत्तो तत्कालो होदि तत्थ परिणामा । लोगाणमसंखमिदा उबरुबरें सरिसवढिगया ॥ ४९ ॥ अन्तर्मुहूर्तमात्रस्तत्कालो भवति तत्र परिणामाः । लोकानामसंख्यमिता उपर्युपरिसदृशवृद्धिगताः ॥ ४९ ॥ अर्थ-इस अधःप्रवृत्तकरणका काल अन्तर्मुहूर्त मात्र है, और उसमें परिणाम असं- ख्यातलोक प्रमाण होते है, और ये परिणाम ऊपर ऊपर सदृश वृद्धिको प्राप्त होते गये हैं। अर्थात् यह जीव चारित्रमोहनीयकी शेष २१ प्रकृतियोंका उपशम या क्षय करनेके लिये अधःकरण अपूर्वकरण अनिवृत्तिकरणोंको करता है। उसमें से अधःकरण श्रेणि चढ़नेके सम्मुख सातिशय अप्रमत्तके होता है, और अपूर्वकरण आठवें और अनिवृत्तकरण नववें गुणस्थानमें होता है। भावार्थ-करण नाम आत्माके परिणामोंका है । इन परिणामों में प्रतिसमय अनन्तगुणी विशुद्धता होती जाती है। जिसके वलसे कर्मोंका उपशम तथा क्षय और स्थितिखण्डन तथा अनुभागखण्डन होते है। इन तीनों करणोंका काल यद्यपि सामा- न्यालापसे अन्तर्मुहूर्तमात्र है, तथापि अधःकरणके कालके सख्यातवें भाग अपूर्वकरणका काल है, और अपूर्वकरणके कालसे संख्यातवें भाग अनिवृत्तकरणका काल है । अधःप्रवृत्तकरणके परिणाम असंख्यातलोक प्रमाण है । अपूर्वकरणके परिणाम अधःकरणके परिणामोसे असं- ख्यातलोकगुणित है । और अनिवृत्तकरणके परिणामोकी संख्या उसके कालके समयोंके समान है। अर्थात् अनिवृत्तकरणके कालके जितने समय है उतने ही उसके परिणाम है । पूर्वोक्त कथनका खुलासा विना दृष्टान्तके नहीं हो सकता इसलिये इसका दृष्टान्त इसप्रकार समझना चाहिये कि:-कल्पना करो कि अधःकरणके कालके समयोंका प्रमाण १६, अपूर्व करणके कालके समयोंका प्रमाण ८, और अनिवृत्तकरणके कालके समयोंका प्रमाण ४ है। अधःकरणके परिणामोंकी संख्या ३०७२, अपूर्वकरणके परिणामोंकी संख्या ४०९, और रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् २२ अनिवृत्तकरणके परिणामोंकी संख्या ४ है । एक समयमें एक जीवके एकही परिणाम होता है इसलिये एक जीव अधःकरणके १६ समयोंमें १६ परिणामोंको ही धारण कर सकता है। अध.करणके और अपूर्वकरणके परिणाम जो १६ और ८ से अधिक कहे है, वे नाना जीवों- की अपेक्षासे कहे गये है। यहां इतना विशेष है कि अधःकरणके १६ समों से प्रथम सम- यमें यदि कोई भी जीव अधःकरण मा.गा तो उसके अधःकरणके समस्त परिणामोंमेंसे पहले १६२ परिणामों से कोई एक परिणाम होगा । अर्थात् तीन कालमें जब कभी चाहे जब चाहे जो अधःकरण माडेगा तो उसके पहले समयमे नम्बर १ से लगाकर नम्बर १६२ तकके परि- णामोंमेंसे उसकी योग्यताके अनुसार कोई एक परिणाम होगा । इसही प्रकार किसी भी जीवके उसके अधःकरण मांडनेके दूसरे समयमें नम्बर ४० से लगाकर नम्बर २०५ तक १६६ परिणामोमेंसे कोई एक परिणाम होगा । इसही प्रकार तीसरे चौथे आदि समयोंमें भी क्रमसे नम्बर ८० से लगाकर २४९ तक १७० परिणामों से कोई एक और १२१ से लाकर २९४ तकके १७४ परिणामोमेंसे कोई एक परिणाम होगा । इसीतरह आगेके समयोंमें होनेवाले परिणाम गोम्मटसारकी बड़ी टीका, या सुशीला उपन्यासमें दिये हुए यन्त्रद्वारा समझलेने चाहिये । अधःकरणके अपुनरुक्त परिणाम केवल ९१२ है । और समस्त सम- योंमें होनेवाले पुनरुक्त और अपुनरुक्त परिणामोका जोड़ ३०७२ है । इस अधःकरणके परिणाम समानवृद्धिको लिये हुए है-अर्थात् पहले समयके परिणामसे द्वितीय समयके परिणाम जितने अधिक है उतने ही उतने द्वितीयादिक समयोके परिणामोंसे तृतीयादिक समयोंके परिणाम अधिक है। इस समानवृद्धिको ही चय कहते है। इस दृष्टान्त, चयका प्रमाण ४ है, स्थानका प्रमाण १६, और सर्व धनका प्रमाण ३०७२ है। प्रथमस्थानमें वृद्धिका अभाव है इसलिये अन्तिमस्थानमें एक घाटि पद ( स्थान ) प्रमाण चय वर्द्धित है । अतएव एक घाटि पदके आधेको चय और पदसे गुणाकरनेपर १५४१x१६ ४८० चयधनका प्रमाण होता है। भावार्थ-प्रथम समयके समान समस्त समयोंमें परिणामोंको मिन्न समझकर वर्द्धित प्रमाणके जोडको चयधन वा उत्तरधन कहते है। सर्वधनमेंसे चयधनको घटाकर शेषमें पदका भागदेनेप्से प्रथम समयसम्बन्धी परिणाम पुंजका प्रमाण ३०७३.१८०-१६२ होता है । इसमें क्रमप्ते एक २ चय जोडनेपर द्वितीयादिक समयोंके परिणामपुंजका प्रमाण होता है। एक घाटि पदप्रमाण चय मिलानेसे अंतसमयसम्बन्धी परिणामपुंजका प्रमाण १६२+१५४४२२२ होता है । एक समयमें अनेक परिणामोंकी सम्भावना है इसलिये एक समयमें अनेक जीव अनेक परिणामोंको प्रहण करसकते है । अतएव एक समयमें नाना जीवो- की अक्षासे परिणामोंमें विसदृशता है । एकसमयमें अनेक जीव एक परिणामको ग्रहण कर मरते है इसलिये एक समयमें नानाजीवोंकी अपेक्षासे परिणामोंमें सदृशता है। भिन्न समयोंमें अनेक जीव अनेक परिणामोंको ग्रहण कर सकते है इसलिये मिन्न समयोंमें नानाजीवोंकी - गोम्मटसार। २३ ३ अपेक्षासे परिणामोमे विसदृशता है । जो परिणाम किसी एक जीवके प्रथम समयमें हो सकता है वही परिणाम किसी दूसरे जीवके दूसरे समयमें, और तीसरे जीवके तीसरे समयमे, तथा चौथे जीवके चौथे समयमें हो सकता है, इसलिये भिन्नसमयवर्ती अनेक जीवोके परिमाणोंमें सदृशता भी होती है । जैसे १६२ नम्बरका परिणाम प्रथम द्वितीय तृतीय चतुर्थ समयमें होसकता है। प्रथम समयसम्बन्धी परिणामपुंजके भी ३९, ४०, ४१, ४२, इसतरह चार खण्ड किये गये हैं । अर्थात् नम्बर १ से लेकर ३९ नम्बर तकके ३९ परिणाम ऐसे है जो प्रथम संमयमें पाये जाते है, द्वितीयादिक समयोंमें नहीं; इनही ३९ परिणामोंके पुंजको प्रथम खंड कहते है । दूसरे खण्डमें नम्बर ४० से ७९ तक ४० परिणाम ऐसे हैं जो प्रथम और द्वितीय समयमें पाये जाते है इसको द्वितीय खण्ड कहते है। तीसरे खण्डमें नम्बर ८० से १२० तक ४१ परिणाम ऐसे है जो प्रथम द्वितीय तृतीय समयोंमें पाये जाते हैं । और चतुर्थ खण्डमें नम्बर १११ से १६२ तक ४२ परिणाम ऐसे है जो आदिके चारोंही समयोमें पाये जा सकते है। इसही प्रकार अन्य समयोंमेंभी समझना । अधःकरणके ऊपर २ के समस्त परिणाम पूर्वपूर्व परिणामकी अपेक्षा अनन्त २ गुणी विशुद्धता लिये हुए है। अब अपूर्वकरण गुणस्थानको कहते है। अंतोमुहुत्तकालं गमिऊण अधापवत्तकरणं तं । पडिसमयं सुझंतो अपुव्वकरणं समल्लियइ ॥ ५० ॥ अन्तर्मुहूर्तकालं गमयित्वा अधःप्रवृत्तकारणं तत् । प्रतिसमयं शुध्यन् अपूर्वकारणं समाश्रयति ॥ ५० ॥ अर्थ-जिसका अन्तर्मुहूर्तमान काल है ऐसे अधःप्रवृत्तकरणको विताकर वह साति- शय अप्रमत्त जब प्रतिसमय अनन्तगुणी विशुद्धिको लिये हुए अपूर्वकारण जातिके परिणामोंको करता है तब उसको अपूर्वकरणनामक अष्टमगुणस्थानवर्ती कहते है। अपूर्वकरणका निरुक्तिपूर्वक लक्षण कहते है। एदमि गुणहाणे विसरिससययट्ठियहिं जीवहिं। पुत्वमपत्ता जमा होति अपुवा हु परिणामा ॥ ५१ ॥ एतस्मिन् गुणस्थाने विसदृशसमयस्थितीवैः । पूर्वमप्राप्ता यस्मात् भवन्ति अपूर्वा हि परिणामाः ॥ ५१ ॥ अर्थ---इस गुणस्थानमे भिन्नसमयवर्ती जीव, जो पूर्वसमयमें कभी भी प्राप्त नहीं हुए थे ऐसे अपूर्व परिणामोको ही धारण करते है इसलिये इस गुणस्थानका नाम अपूर्वकारण है । भावार्थ-जिसप्रकार अधःकरणमे भिन्न समयवर्ती जीवोंके परिणाम सहा और विमा दोनों २४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ही प्रकारके होते है, वैसा अपूर्वकरणमें नहीं है, किन्तु यहांपर भिन्नसमयवर्ती जीवोंके परिणाम विसदृश ही होते है सहश नहीं होते। इस गुणस्थानका दो गाथाओंद्वारा विशेष स्वरूप दिखाते हैं। भिण्णसमयट्ठियेहिं दु जीवेहिं ण होदि सव्वदा सरिसो । करणेहिं एक्कसमयट्टियहिं सरिसो विसरिसो वा ॥५२॥ भिन्नसमयस्थितैस्तु जीवैर्न भवति सर्वदा सादृश्यम् । करणैरेकसमयस्थितैः सादृश्यं वैसादृश्यं वा ॥ १२ ॥ अर्थ-यहांपर ( अपूर्वकरणमें ) भिन्नसमयवर्ती जीवामें विशुद्ध परिणामोंकी अपेक्षा कभी भी सादृश्य नहीं पाया जाता; किन्तु एक समयवर्ती जीवोंमें सादृश्य और वैसादृश्य दोनोंही पाये जाते है। अंतोमुहत्तमेचे पडिसमयमसंखलोगपरिणामा । कमउड्डा पुव्वगुणे अणुकट्ठी णत्थि णियमेण ॥ ५३ ॥ अन्तर्मुहूर्तमात्रे प्रतिसमयमसंख्यलोकपरिणामाः । क्रमवृद्धा अपूर्वगुणे अनुकृष्टिर्नास्ति नियमेन ॥ ५३ ॥ अर्थ-इस गुणस्थानका काल अन्तर्मुहूर्तमात्र है, और इसमें परिणाम असंख्यात लोक- प्रमाण होते है, और वे परिणाम उत्तरोत्तर प्रतिसमय समानवृद्धिको लिये हुए हैं । तथा इस गुणस्थानमें नियमसे अनुकृष्टिरचना नहीं होती है । भावार्थ-अधःप्रवृत्तकरणके कालसे अपूर्वकरणका काल यद्यपि सख्यातगुणा ही है; तथापि सामान्यसे अन्तमुहर्तमात्रही है । और इसमें परिणामोंकी संख्या अधःप्रवृत्तकरणके परिणामोकी संख्यासे असंख्यातलोकगुणी है । और इन परिणामों में उत्तरोत्तर प्रतिसमय समान वृद्धि होती गई है । अर्थात् प्रथम ममयके परिणामोंसे जितने अधिक द्वितीय समयके परिणाम है उतने २ ही अधिक हितीयादि समयके परिणामोंसे तृतीयादि समयके परिणाम हैं । तथा जिसप्रकार प्रवृत्तकरणमें भिन्नसमयवर्ती जीवोंके परिणामोंमें सादृश्य पाया जाता है इसलिये वहांपर अनुष्टि रचना की है उस प्रकार अपूर्वकरणमें अनुकृष्टि रचना नहीं होती; क्योंकि मिन्न- समयानी जीवोंके परिणामाम यहापर सादृश्य नहीं पाया जाता । इसकी अंकसंदृष्टि इस प्रार! सर्वपनका प्रमाण ४०९६ है, चयका प्रमाण १६ और स्थानका प्रमाण ८ है। पर टिपटके आयेको चय और पदसे गुणाकरनेपर घयधनका प्रनाण ७४१६४८ =४४८ मनमने नयधनको घटाकर पढका भाग देनेसे प्रथमसमयसम्बन्धी परिणाम- - Tre=४५६ होता है। इसमें एक २ चय जोडनेपर द्वितीयादिक अधः- गोम्मटसारः। २५ समयमें होनेवाले परिणामाका प्रमाण निकलता है । इसमें एक घाटि पदप्रमाण चय जोड़नेसे अंतसमयसंबन्धी परिणामोंका प्रमाण १५६+७४१६५६८ होता है। इन अपूर्वकरण परिणामोंके द्वारा क्या कार्य होता है ? यह दो गाथाओद्वारा रपष्ट करते हैं। तारिसपरिणामट्ठियजीवा हु जिणेहिं गलियतिमिरेहिं । मोहस्सपुबकरणा खबणुबसमणुज्जया भणिया ॥ ५४ ॥ ताशपरिणामस्थितजीवा हि जिनैर्गलिततिमिरैः । मोहस्यापूर्वकरणाः क्षपणोपशमनोद्यताः भणिता ॥ १४ ॥ अर्थ-अज्ञान अन्धकारसे सर्वथा रहित जिनेन्द्रदेवने कहा है कि उक्त परिणामोंको धारण करनेवाले अपूर्वकरण गुणस्थानवर्ना जीव मोहनीय कर्मकी शेष प्रकृतियोंका क्षपण अथवा उपशमन करनेमें उद्यत होते है। णिद्दापयले णद्वे सदि आऊ उबसमंति उबसमया । खबयं दुक्के खवया णियमेण खबंति मोहं तु ॥ ५५ ॥ निद्राप्रचले नष्टे सति आयुषि उपशमयन्ति उपशमकाः । क्षपकं ढौकमानाः क्षपका नियमेन क्षपयन्ति मोहं तु ॥ ५५ ।। अर्थ-जिनके निद्रा और प्रचलाकी वन्धन्युच्छित्ति हो चुकी है, तथा, जिनका आयुकर्म अभी विद्यमान है, ऐसे उपशमश्रेणिका आरोहण करनेवाले जीव शेषमोहनीयका उपशमन करते है, और जो क्षपकश्रेणिका आरोहण करनेवाले है वे नियमसे मोहनीयका क्षपण करते हैं । भावार्थ-जिसके अपूर्वकरणके छह भागोमेसे प्रथम भागमें निद्रा और प्रच. लाकी वन्धव्युच्छित्ति होगई है, और जिसका आयुकर्म विद्यमान है ( जो मरणके सम्मुख नहीं है ), अर्थात् जो श्रेणिको चढ़नेवाला है, क्योंकि श्रेणिसे उतरते समय यहांपर मरणकी सम्भावना है, इसप्रकारके उपशमश्रेणिको चढ़नेवाले जीवके अपूर्वकरण परिणामोंके निमित्तसे मोहनीयका उपशम और क्षपकश्रेणिवालेके क्षय होता हैं। नवमें गुणस्थानका स्वरूप कहते हैं । एकह्मि कालसमये संठाणादीहिं जह णिवट्ठति । ण णिवदृति तहावि य परिणामेहिं मिहो जेहिं ॥ ५६ ॥ १ इस विशेषणसे उनके कहे हुए वचनमें प्रामाण्य दिखलाया है, क्योकि यह नियम है कि जो परिपूर्ण ज्ञानका धारक है वह मिथ्या भाषण नहीं करता । २ इन दोनों कोंकी वन्धव्युच्छित्ति यहीं पर होती है। हम कथनसे अष्टमगुणस्थानका प्रथम भाग लेना चाहिये, क्योकि उपरान या क्षयका प्रारम्भ यहाँसे होजाता है। ३ भरणफे समयसे पूर्वममय में होनेवाले गुणस्थानको भी उपचारसे मरणका गुणस्थान करते है। ४ इन गाधामें सु' शब्द पड़ा है इसमे सूचित होता है कि सोने मरग नहीं होता। गो.

२६ रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम् एकस्मिन् कालसमये संस्थानादिभिर्यथा निवर्तन्ते । न निवर्तन्ते तथापि च परिणामैमिथो यैः ॥ १६ ॥ अर्थ-अन्तर्मुहूर्तमात्र अनिवृत्तिकरणके कालमेंसे आदि या मध्य या अन्तके एक समयवर्ती अनेक जीवोमें जिस प्रकार शरीरकी अवगाहना आदि बाह्य कारणोंसे तथा ज्ञानाव- रणादिककर्मके क्षयोपशमादि अन्तरङ्ग कारणोंसे परस्परमे भेद पाया जाता है, उस प्रकार जिन परिणामोंके निमित्तसे परस्परमें भेद नहीं पाया जाताः- होति अणियट्टिणो ते पडिसमयं जेस्सिमेक्कपरिणामा । विमलयरझाणहुयबहसिहाहिं णिहड्ड कम्मवणा ॥५७॥ (जुम्मम्) भवन्ति अनिवर्तिनस्ते प्रतिसमयं येषामेकपरिणामाः । विमलतरध्यानहुतवहशिखाभिर्निर्दग्धकर्मवनाः ॥ ५७ ।। (युग्मम् ) अर्थ-उनको अनिवृत्तिकरण परिणाम कहते हैं। और अनिवृत्तिकरणका जितना काल है उतनेही उसके परिणाम है । इसलिये उसके कालके प्रत्येक समयमें अनिवृत्तिकरणका एक २ ही परिणाम होता है। तथा ये परिणाम अत्यन्तनिर्मल ध्यानरूप अग्निकी शिखा- ओंकी सहायतासे कर्मवनको भस्म करदेते है। भावार्थ-अनिवृत्तिकरणका जितना काल है उतनेही उसके परिणाम है, इसलिये प्रत्येक समयमे एक ही परिणाम होता है। अतएव यहाँपर भिन्नसमयवर्ती परिणाोंमें सर्वथा विसदृशता और एकसमयवर्ती जीवोंके परिणा- मॉमें सर्वथा सदृशता ही होती है । इन परिणामोंसेही आयुकर्मको छोड़कर शेष सात कर्मोकी गुणश्रेणिनिर्जरा, गुणसंक्रमण, स्थितिखण्डन, अनुभागकाण्डकखण्डन होता है, और मोहनीय कर्मकी बादरकृष्टि सूक्ष्मकृष्टि आदि होती है । नवमें गुणस्थानके संख्यात भागोमेंसे अन्तके भागमें होनेवाले कार्यको कहते है। पुवापुचप्फड्डयबादरसुहमगयकिट्टिअणुभागा । हीणकमाणंतगुणेणवरादु वरं च हेट्ठस्स ॥ ५८ ॥ पूर्वापूर्वस्पर्धकवादरसूक्ष्मगतकृष्टयनुभागाः । हीनक्रमा अनन्तगुणन अवरात्तु वरं चाधस्तनस्य ॥ १८ ॥ अर्थ-पूर्वस्पर्धकसे अपूर्व स्पर्धकके और अपूर्वस्पर्धकसे बादरकृष्टिके तथा बादरकृष्टि से सूक्ष्मकृष्टिके अनुभाग क्रमसे अनन्तगुणे २ हीन है। और ऊपरके (पूर्व २ के ) जघन्यसे नीचेका (उत्तरोत्तरका ) उत्कृष्ट और अपने २ उत्कृष्टसे अपना २ जघन्य अनन्तगुणा २ हीन है। भावार्थ:-अनेक प्रकारकी अनुभागशक्तिसे युक्त कार्मणवर्गणाओंके समूहको स्पर्धक कहते है । जो म्पर्धक अनिवृत्तिकरणके पूर्वमें पायेजाय उनको पूर्वस्पर्धक कहते है । जिनका अनिवृ- तिकणके निमित्तप्ते अनुभाग क्षीण हो जाता है उनको अपूर्वस्पर्धक कहते है । तथा जिनका गोम्मटसारः । -- अनुभाग अपूर्व स्पर्धकसेभी क्षीण हो जाय उनको बादरकृष्टि, और जिनका अनुभाग बादरक- ष्टिकी अपेक्षाभी क्षीण हो जाय उनको सूक्ष्मकृष्टि कहते हैं । पूर्वस्पर्धकके जघन्य अनुभा- गसे अपूर्वस्पर्धकका उत्कृष्ट अनुभाग भी अनन्तगुणा हीन है । इसीप्रकार अपूर्वस्पर्धकके जघ- न्यसे बादरकृष्टिका उत्कृष्ट और बादरकृष्टिके जघन्यसे सूक्ष्मकृष्टिका उत्कृष्ट अनुभाग अनन्त- गुणा २ हीन है । और जिस प्रकार पूर्वस्पर्धकके उत्कृष्टसे पूर्वस्पर्धकका जघन्य अनन्तगुणाहीन है उसही प्रकार अपूर्वस्पर्धक आदिमें भी अपने २ उत्कृष्टसे अपना २ जघन्य अनुभाग अनन्तगुणा २ हीन है। दश गुणस्थानका स्वरूप कहते है । धुदकोसुंभयवत्थं होदि जहा सुहमरायसंजुत्तं । एवं सुहमकसाओ सुहमसरागोत्ति णादवो ॥ ५९ ॥ धौतकौसुम्भवस्त्रं भवति यथा सूक्ष्मरागसंयुक्तम् । एवं सूक्ष्मकषायः सूक्ष्मसराग इति ज्ञातव्यः ॥ ५९॥ अर्थ-निस प्रकार धुले हुए कसृमी वस्त्रमे लालिमा ( सुर्थी ) सूक्ष्म रहनाती है, उसही प्रकार जो अत्यन्तसूक्ष्म राग ( लोभ ) से युक्त है उसको सूक्ष्मसाम्पराय नामक दशम गुणस्थानवर्ती कहते है । भावार्थ:-जहांपर पूर्वोक्त तीन करणके परिणामोसे क्रमसे लोभकषायके विना चारित्रमोहनीयकी शेष वीस प्रकृतियोंका उपशम अथवा क्षय होनेपर सूक्ष्म- कृष्टिको प्राप्त लोभकषायका उदय पाया जाय उसको सूक्ष्मसाम्पराय नामका दशवां गुणस्थान कहते हैं। इस सूक्ष्मलोभके उदयसे होनेवाले फलको दिखाते है । अणुलोहं वेदंतो जीवो उबसामगो व खबगो वा । सो सुहमसंपराओ जहखादेणूणओ किंचि ॥६॥ अणुलोमं विदन् जीव उपशमको व क्षपको वा । स सूक्ष्मसाम्परायो यथाख्यातेनोनः किञ्चित् ।। ६० ।। अर्थ-चाहे उपशमश्रेणिका आरोहण करनेवाला हो अथवा क्षपकश्रेणिका आरोहण जो जीव सूक्ष्मलोभके उदयका अनुभव कर रहा है ऐसा दशमे गुणस्थान- वर्ती जीव यथाख्यात चारित्रसे कुछही न्यून रहता है । भावार्थ-यहांपर सूक्ष्म लोभका उदय रहनेसे यथाख्यात चारित्रके प्रकट होनेमें कुछ कमी रहती है। ग्यारहमे गुणस्थानका स्वरूप दिखाते है। कदकफलजुदजलं वा सरए सरवाणियं व णिम्मलयं । सयलोवसंतमोहो उबसंतकसायो होदि ।। ६१ ।। करनेवालाहो; परन्तु रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् कतकफलयुतजलं वा शरदि सरःपानीयं व निर्मलम् । सकलोपशान्तमोह उपशान्तकषायको भवति ॥ ६१ ॥ अर्थ-निर्मली फलसे युक्त जलकी तरह, अथवा शरदऋतुमें होनेवाले सरोवरके जलकी तरह, सम्पूर्ण मोहनीयकर्मके उपशमसे उत्पन्न होनेवाले निर्मल परिणामोंको उपशान्तक- पाय ग्याहरमा गुणस्थान कहते है। वारहमे गुणस्थानको कहते है। णिस्सेसखीणमोहो फलिहामलभायणुदयसमचित्तो। खीणकसाओ अण्णदि णिग्गंथो वीयरायहिं ।। ६२ ।। निःशेषक्षीणमोहः स्फटिकामलभाजनोदकसमचित्तः । क्षीणकषायो भण्यते निग्रन्थो वीतरागैः ॥ ६२॥ अर्थ-जिस निर्ग्रन्थका चित्त मोहनीय कर्मके सर्वथा क्षीण होनेसे स्फटिकके निर्मल पात्रमें रक्खे हुए जलके समान निर्मल होगया है उसको वीतरागदेवने क्षीणकषायनामक वार- हमे गुणस्थानवर्ती कहा है। दो गाथाओंद्वारा तेरहवें गुणस्थानको कहते है। केवलणाणदिवायरकिरणकलाबप्पणासियण्णाणो। णवकेवललझुग्गममुजणियपरमप्पववएसो ॥६॥ केवलज्ञानदिवाकरकिरणकलापप्रणाशिताज्ञानः । नवकेवललब्ध्युद्गमसुजनितपरमात्मव्यपदेशः ॥ १३ ॥ अर्थ-जिसका केवलज्ञानरूपी सूर्यकी अविभागप्रतिच्छेदरूप किरणोंके समूहसे ( उत्कृष्ट अनन्तानन्तप्रमाण ) अज्ञान अन्धकार सर्वथा नष्ट होगया हो, और जिसको नव केवललब्धियोंके ( क्षायिक-सम्यक्त्व चारित्र ज्ञान दर्शन दान लाभ भोग उपभोग वीर्य) प्रकट होनेसे । परमात्मा यह व्यपदेश ( संज्ञा ) प्राप्त होगया है, वहः- असहारणाणदंसणसहिओ इदि केवली हु जोगेण- जुत्तोत्ति सजोगिजिणो अणाइणिहणारिसे उत्तो ॥६४ ॥ असहायज्ञानदर्शनसहित इति केवली हि योगेन- युक्त इति सयोगिनिनः अनादिनिधनाचे उक्तः ॥ ६४ ॥ अर्थ-इन्द्रिय आलोक आदिकी अपेक्षा न रखनेवाले ज्ञान दर्शनसे युक्त होनेके कारण बती, और काययोगसे युक्त रहनेके कारण सयोगी, तथा घातिकर्मोंसे रहित होनेके कारण निन कहा जाता है। ऐसा अनादिनिधन आप आगममें कहा है। भावार्थ-बारहमे गुणस्था- गोम्मटसारः। २९ नका विनाश होतेही जिसके ज्ञानावरणादि तीन घाति और सोलह अघाति प्रकृति, सम्पूर्ण मिलाकर ६३ प्रकृतियोंके नष्ट होनेसे अनन्त चतुष्टय तथा नव केवललब्धि प्रकट हो चुकी और काय योगसे युक्त है उस अरहंतको तेरहमे गुणस्थानवर्ती कहते है। चौदहमे अयोगकेवली गुणस्थानको कहते है। सीलसिं संपत्तो णिरुद्धणिस्सेसआसवो जीवो। कम्मरयविप्पमुक्को गयजोगो केवली होदि ॥६५॥ शीलैश्यं संप्राप्तः निरुद्धनिःशेषास्रवो जीवः । कर्मरजोविप्रमुक्तो गतयोगः केवली भवति ॥ ६५ ॥ अर्थ-जो अठारह हजार शीलके भेदोंका स्वामी हो चुका है । और जिसके कर्मों के आनेका द्वाररूप आस्रव सर्वथा बन्द होगया । तथा है सत्त्व और उदय अवस्थाको प्राप्त कर्मरूप रजकी सर्वोत्कृष्ट निर्जरा होनेसे, जो उस कर्मसे सर्वथा मुक्त होनेके सम्मुख है, उस काय योगरहित केवलीको चौदहमे गुणस्थानवर्ती अयोगकेवली कहते है। भावार्थ-शीलकी पूर्णता यहींपर होती है, इसलिये जो शीलका स्वामी होकर पूर्ण संवर और निर्जराका पात्र होनेसे मुक्त अवस्थाके सम्मुख है, ऐसे काययोगसे भी रहित केवलीको चौदहमें गुणस्थानवर्ती कहते है। इसप्रकार चौदह गुणस्थानोंको कहकर, अब उनमे होनेवाली आयुकर्मके विना शेष सातकर्मोंकी गुणश्रेणिनिर्जराको दो गाथाओं द्वारा कहते है । सम्मत्तुप्पत्तीये सावयविरदे अणंतकम्मंसे । दसणमोहक्खबगे कसायउबसामगे य उबसंते ॥ ६६ ॥ मम्यक्त्वोत्पत्तौ श्रावकविरते अनन्तकाशे । दर्शनमोहक्षपके कपायोपशामके चोपशान्ते ॥ १६ ॥ खबगे य खीणभोहे जिणेसु दव्या असंखगुणिदकमा । तव्विरीया काला संखेजगुणक्कमा होति ॥६७ ॥ ( जुम्म) क्षपके च क्षीणमोहे जिनेषु द्रव्याण्यसंख्यगुणितक्रमाणि । तद्विपरीताः कालाः संख्यातगुणक्रमा भवन्ति ॥ ६७ ॥ (युग्मम् ) अर्थ-सातिशय मिथ्यादृष्टि, श्रावक, विरत, अनन्तानुबन्धी कर्मका विसंयोजन करने- वाला, दर्शनमोहनीयकर्मका क्षय करनेवाला, कपायोंका उपशम करनेवाले ८-९-१० गुणस्थान. वर्ती जीव, उपशान्तकपाय, कपायोंका क्षपण करनेवाले ८-९-१० गुणस्थानवी जीव, श्रीण- मोह, सयोगी अयोगी दोन प्रकारके जिन, इन ग्यारह स्थानोंमें द्रव्यकी अपेक्षा कमकी निर्जरा १ मोरनी पहले ही नष्ट हो नुमा है इस लिये यहाँ तीनही देना चाहिये । २ मोहनीय नहिन ।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम क्रमसे असंख्यातगुणी २ अधिक होती है । और उसका काल इससे विपरति है-क्रमसे उत्तरोत्तर संख्यातगुणा २ हीन है। भावार्थ-सादि अथवा अनादि दोनोंही प्रकारका मिथ्या- दृष्टि जत्र करणलब्धिको प्राप्त कर उसके अधःकरणपरिणामोंको भी विताकर अपूर्वकरण परि- णामोंको ग्रहण करता है, उस समयसे गुणश्रेणिनिर्जराका प्रारम्भ होता है। इस सातिशय मिथ्याष्टिके जो कर्मोकी निर्जरा होती है वह पूर्वकी निर्जरासे असंख्यातगुणी अधिक है । श्रावक अवस्था प्राप्त होनेपर जो कर्मकी निर्जरा होती है वह सातिशयमिथ्यादृष्टिकी निर्जरासे भी असंख्यातगुणी अधिक है। इसप्रिकार विरतादिस्थानों में भी उत्तरोत्तर क्रमसे असंख्यात. गुणी २ कर्मकी निर्जरा होती है । तथा इस निर्जराका काल उत्तरोत्तर संख्यातगुणा २ हीन है। अर्थात् सातिशय मिथ्यादृष्टिकी निर्जरामें जितना काल लगता है, श्राव- ककी निर्जरा, उससे संख्यातगुणा कम काल लगता है । इसी प्रकार विरतादिमें भी समझना चाहिये। इस प्रकार चौदहगुणस्थानोंमें रहनेवाले जीवोंका वर्णन करके अब गुणस्थानोंका अतिक- मग करनेवाले सिद्धोका वर्णन करते है। अविहकम्मवियला सीदीभूदा णिरंजणा णिचा। अट्ठगुणा किदकिच्चा लोयग्गणिवासिणो सिद्धा ॥ ६८॥ अष्टविधकर्मविकलाः शीतीभूता निरञ्जना नित्याः । अष्टगुणाः कृतकृत्याः लोकाग्रनिवासिनः सिद्धाः ॥ ६८ ॥ अर्थ जो ज्ञानावरणादि अष्ट कर्मोंसे रहित है, अनन्तसुखरूपी अमृतके अनुभव करनेवाले-शान्तिमय है, नवीन कर्मबन्धको कारणभूत मिथ्यादर्शनादि भावकर्मरूपी अञ्जनसे ररित है, नित्य हैं, नान दर्शन सुख वीर्य अव्यावाध अवगाहन सूक्ष्मत्व अगुरुलघु ये अट मुन्यगण जिनके प्रकट हो चुके है, कृतकृत्य ( जिनको कोई कार्य करना बाकी नहीं गा) है, लीको अग्रमागमें निवास करनेवाले है, उनको सिद्ध कहते है। सिगे टियहुये उन सात विशेषणोंका प्रयोजन दिखाते है । सदासिव मंखो मक्कडि बुद्धो णेयाइयो य बेसेसी। ईसग्मंडलिदंसणविदृसण8 कयं एवं ॥ ६९ ॥ मटा भर माग्न्यः मस्करी बुद्धो नैयायिकश्च वैशेषिकः । मानिदर्शनबिदृषणार्य कृतमेतत् ।। ६९ ।। अर्थ-मिा, माय, मकरी, बौद्ध, नैयायिक और वैशेषिक, कर्तृवादी (ईश्वरको - नो मां का निराकरण करनेके लिये ये विशेषण दिये

गोम्मटसार ।
३१
। भावार्थ--सदाशिव मतवाला जीवको सदा कर्मसे रहितही मानता है, उसके निराकरणके
लिये ही ऐसा कहा है कि सिद्ध अवस्था प्राप्त होनेपर ही जीव कर्मोंसे रहित होता है-सदा
नहीं। सिद्ध अवस्थासे पूर्व संसार अवस्थामें कर्मोंसे सहित रहता है । सांख्यमतवाला
मानता है कि " बन्ध मोक्ष सुख दुःख प्रकृतिको होते है, आत्माको नहीं ' । इसके निराकर-
णके लिये “ सुखस्वरूप " ऐसा विशेषण दिया है। मस्करीमतवाला मुक्तजीवोंका लौटना मानता
है, उसको दूषित करनेके लिये ही कहा है कि " सिद्ध निरञ्जन है अर्थात् मिथ्यादर्शन
क्रोध मानादि भावकोंसे रहित है । क्योंकि विना भावकर्मके नवीन कर्मका ग्रहण नहीं हो सकता
और विना कर्मग्रहणके जीव निर्हेतुक संसारमें लौट नहीं सकता । बौद्धोंका मत है कि “सम्पूर्ण
पदार्थ क्षणिक अर्थात् क्षणध्वंसी है ” उसको दूषित करनेके लिये कहा है कि वे " नित्य "
है। नैयायिक तथा वैशेषिकमतवाले मानते है कि "मुक्तिमें बुद्धयादिगुणोंका विनाश होजाता है,"
उसको
दूर
करनेके लिये “ ज्ञानादि आठगुणोंसे सहित है " ऐसा कहा है । ईश्वरको कर्ता
माननेवालोके मतके निराकरणके लिये “ कृतकृत्य " विशेषण दिया है । अर्थात् अव ( मुक्त
होनेपर ) जीवको सृष्टि आदि बनानेका कार्य शेष नहीं रहा है । मण्डली मतवाला मानता
कि “ मुक्तजीव सदा ऊपरको गमन ही करता जाता है, कभी ठहरता नहीं " उसके निरा-
करणके लिये “ लोकके अग्रभागमें स्थित है " ऐसा कहा है।
शति गुणस्थानप्ररूपणा नामा प्रथमोऽधिकारः ।
क्रमप्राप्त जीवसमासप्ररूपणाका निरुक्तिपूर्वक सामान्य लक्षण कहते हैं।
जेहिं अणेया जीवा णज्जंते बहुविहा वि तज्जादी ।
ते पुण संगहिदत्था जीवसमासात्ति विण्णेया ॥ ७० ॥
यैरनेके जीवा नयन्ते वहुविधा अपि तज्जातयः ।
ते पुनः संगृहीतार्था जीवसमासा इति विज्ञेयाः ॥ ७० ॥
अर्थ-जिनके द्वारा अनेक जीव तथा उनकी अनेक प्रकारकी जाति जानी जाय उन
धर्मोको अनेक पदार्थोंका संग्रह करनेवाले होनेसे जीवसमास कहते है, ऐसा समझना चाहिये ।
भावार्थ-उन धर्मविशेषोंको जीवसमास कहते है कि जिनके द्वारा अनेक जीव अथवा जीवकी
अनेक जातियोंका संग्रह किया जासके ।
उत्पत्तिके कारणकी अपेक्षा लेकर जीवसमासका लक्षण कहते है ।
तसचदुजुगाणमज्झे अविरुद्धेहिं जुदजादिकम्मदये ।
जीवसमासा होंति हु तद्भवसारिच्छसामण्णा ।। ७१ ।।
१ सदाशिव सदाऽर्मा सोल्यो मुकं मुखोजिमनं । मस्सरी मिल मुक्तानी मन्यते पुनरागनिम् ॥ १॥
६.णि निर्गुण पैव पुसो गागल मन्यते 1 ताय नमोगानो मण्डलीनोर्वगामिनम् ॥ २ ॥

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम । त्रसचतुर्युगलानां मध्ये अविरुद्धैर्युतजातिकर्मादये । जीवसमासा भवन्ति हि तद्भवसादृश्यसामान्याः ॥ ७१ ॥ अर्थ--बसस्थावर वादरसूक्ष्म पर्याप्तअपर्याप्त प्रत्येकसाधारण इन चार युगलीमसे अत्रि- रुद्ध त्रसादि कर्मोसे युक्त जाति नामकर्मका उदय होनेपर जीवोंमें होनेवाले उर्वतासामान्यरूप या तिर्यक् सामान्यरूप धर्मोको जीवसमास कहते है । भावार्य-~~-एक पदार्थकी कालक्रममे होनेवाली अनेक पर्यायोमें रहनेवाले समानधर्मको उर्वतासामान्य अथवा सादृश्यसामान्य कहते है। एक समयमें अनेक पदार्थगत सदृश धर्मको तिर्यक् सामान्य कहते हैं । यह उर्वतासामान्यरूप या तिर्यक् सामान्यरूप धर्म, सादि युगलोंमेंसे अविरुद्ध कर्मोसे युक्त एकेन्द्रियाटि जाति नाम- कर्मका उदय होनेपर उत्पन्न होता है । इसीको जीवसमास कहते है। जीवसमासके चौदह भेदोंको गिनाते है। बादरसुहमेइंदियवितिचडरिंदियअसण्णिसण्णी य । पज्जत्तापज्जत्ता एवं ते चोदसा होति ।। ७२ ।। वादरसूक्ष्मैकेन्द्रियद्वित्रिचतुरिन्द्रियासंज्ञिसंझिनश्च । पर्याप्तापर्याप्ता एवं ते चतुर्दश भवन्ति ॥ ७२ ॥ अर्थ-एकेन्द्रियके दो भेद है, वादर तथा सूक्ष्म । द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय असंज्ञिपंचेन्द्रिय, संज्ञिपंचेन्द्रिय । ये सातो ही प्रकारके जीव पर्याप्त और अपर्याप्त दोनों ही प्रकारके होते है। इसलिये जीवसमासके सामान्यसे चौदह भेद हुए। विस्तारपूर्वक जीवसमासोंका वर्णन करते है। भूआउतेउवाऊणिचचदुग्गदिणिगोदथूलिदा । पत्तेयपदिहिदरा तसपण पुण्णा अपुण्णदुगा ।। ७३ ॥ म्वप्तेजोवायुनित्यचतुर्गतिनिगोदस्थूलेतराः । प्रत्येकप्रतिष्ठेतराः त्रसपञ्च पूर्णा अपूर्णद्विकाः ॥ ७३ ।। अर्थ-पृथिवी, जल, तेज, वायु, नित्यनियोद, इतरनिगोद । इन छहके बादर सूक्ष्मके भेदसे वारह मेद हुए । तथा प्रत्येकके दो मेद, एक सप्रतिष्ठित दूसरा अप्रतिष्ठित । और द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय, असंज्ञी, संज्ञी इसतरह त्रसके पांच भेद । सब मिलाकर उन्नीस मेद होते हैं। ये सभी पर्याप्त, निवृत्यपर्याप्त, लध्यपर्याप्त होते है । इसलिये उन्नीसका तीनके साथ गुणा करनेपर जीवसमासके उत्तरभेद ५७ होते है । जीवसमासके उक्त ५७ मेदोंके भी अवान्तर भेद दिखानेके लिये स्थानादि चार अधिका- रॉको कहते हैं। १ असकर्मका बादरकेसाथ अविरोध और सूक्ष्मके साथ विरोध है, इसीप्रकार पर्याप्तकर्मका साधारणकर्मके साब बिरोध और प्रत्येकके साथ भविरोध है । इसीतरह अन्यत्र भी यथासम्भव लगालेना।

गोम्मटसारः। ३३ ३ ठाणेहिं वि जोणीहिं वि देहोग्गाहणकुलाणभेदेहिं। जीवसमासा सव्वे परूविदव्वा जहाकमसो ॥ ७४ ॥ स्थानैरपि योनिभिरपि देहावगाहनकुलाना भेदैः । जीवसमासाः सर्वे प्ररूपितव्या यथाक्रमशः ॥ ७४ ॥ अर्थ-स्थान, योनि, शरीरकी अवगाहना, कुलोके भेद इन चार अधिकारोके द्वारा सम्पूर्ण जीवसमासोका क्रमसे निरूपण करना चाहिये । एकेन्द्रिय द्वीन्द्रिय आदि जातिभेदको स्थान कहते है । कन्द मूल अण्डा गर्भ रस स्वेद आदि उत्पत्तिके आधारको योनि कहते है । शरीरके छोटे बड़े भेदोको देहावगाहना कहते है । भिन्न २ शरीरकी उत्पत्तिको कारणीभूत नोकर्मवर्गणाके भेदोको कुल कहते है । क्रमके अनुसार प्रथम स्थानाधिकारको कहते है। सामण्णजीव तसथावरेसु इगिविगलसयलचरिमदुगे । इंदियकाये चरिमस्स य हुतिचदुपणगभेदजुदे ॥ ७५ ॥ सामान्यजीवः त्रसस्थावरयोः एकविकलसकलचरमद्विके । इन्द्रियकाययोः चरमस्य च द्वित्रिचतुःपञ्चभेदयुते ॥ ७५ ॥ अर्थ-सामान्यसे ( द्रव्यार्थिक नयसे ) जीवका एकही भेद है, क्योकि "जीव" कह- नेसे जीवमात्रका ग्रहण हो जाता है । इसलिये सामान्यसे जीवसमासका एक भेद । त्रस और स्थावरकी अपेक्षासे दो भेद । एकेन्द्रिय विकलेन्द्रिय (द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय ) सकलेन्द्रिय ( पंचेन्द्रिय ) की अपेक्षा तीन भेद । यदि पंचेन्द्रियके दो भेद करदिये जाय तो जीवसमासके एकोन्द्रिय विकलेन्द्रिय संज्ञी असंज्ञी इस तरह चार भेद होते है । इन्द्रियोंकी अपेक्षा पाच भेद है, अर्थात् एकेन्द्रिय द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय पंचेन्द्रिय । पृथिवी जल अग्नि वायु वनस्पति ये पाच स्थावर और एक त्रस इसप्रकार कायकी अपेक्षा छह भेद है। यदि पाच स्थावरों में त्रसके विकल और सकल इसतरह दो भेद करके मिला दिये जाय तो सात भेद होते है। और विकल असंज्ञी संज्ञी इसप्रकार तीन भेदकरके मिलानेसे आठ भेद होते है । द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय पंचेन्द्रिय इसतरह चार भेद करके मिलानेसे नव भेद होते है । और द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय असंज्ञी संज्ञो इसतरह पाच भेद करके मिलानेसे दश भेद होते है। पणजुगले तससहिये तसस्स दुतिचदुरपणगमेदजुदे । छडुंगपत्तेयम्हि य तसस्स तियचदुरपणगभेदजुदे ॥ ७६ ।। पञ्चयुगले त्रससहिते त्रसस्य द्वित्रिचतुःपञ्चकभेदयुते । पड्द्विकप्रत्येके च त्रसस्य त्रिचतुःपञ्चभेदयुते ॥ ७६ ।। गो.५ रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ -~-पाच स्थावरोंके वादर सूक्ष्मकी अपेक्षा पांच युगल होते हैं । इनमें उस सामा- न्यका एक भेद मिलानेसे ग्यारह भेद जीवसमासके होते है । तथा इनही पाच युगलोंमें असके विकलेन्द्रिय सकलेन्द्रिय दो भेद मिलानेसे वारह, और उसके विकलेन्द्रिय संजी असंनी इसप्रकार तीन भेद मिलानेसे तेरह, और द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय पंचेन्द्रिय ये चार भेद मिलानेसे चौदह, तथा द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय असंक्षी संज्ञी ये पाच भेद मिलानेसे पन्द्रह भेद जीवसमासके होते है । पृथिवी अप तेज वायु नित्यनिगोद इतर निगाद इनके बीदर सूक्ष्मकी अपेक्षा छह युगल और प्रत्येक वनस्पति इनमें त्रसके उक्त विकलेन्द्रिय असंज्ञी संजी ये तीन भेद मिलानेसे सोलह, और द्वीन्द्रियादि चार भेद मिलानेसे सत्रह, तथा पांच भेद मिलानेसे अठारह भेद होते है। सगजुगलम्हि तसस्स य पणभंगजुदेसु होति उणवीसा । एयादुणवीसोत्ति य इगिवितिगुणिदे हवे ठाणा ।। ७७ ॥ सप्तयुगले त्रसस्य च पंचभंगयुतेषु भवन्ति एकोनविंशतिः । एकादेकोनविंशतिरिति च एकद्वित्रिगुणिते भवेयुः स्थानानि ॥ ७७ ।। अर्थ-पृथिवी अप तेज वायु नित्यनिगोद इतरनिगोदके बादर सूक्ष्मकी अपेक्षा छह युगल और प्रत्येकका प्रतिष्ठित अप्रतिष्ठितकी अपेक्षा एक युगल मिलाकर सात युगलोंमें त्रसके उक्त पांच भेद मिलानेसे जीवसमासके उन्नीस भेद होते है। इस प्रकार एकसे लेकर उन्नीस तक जो जीवसमासके भेद गिनाये है, इनका एक दो तीनके साथ गुणा करनेपर क्रमसे उन्नीस, अड़तीस, सत्तावन, जीवसमासके अवान्तर भेद होते है। एक दो तीनके साथ गुणाकरनेका कारण बताते है । सामण्णेण तिपंती पढमा विदिया अपुण्णगे इदरे । पज्जत्ते लद्धिअपज्जत्तेऽपढमा हवे पंती ॥ ७८॥ सामान्येन त्रिपनयः प्रथमा द्वितीया अपूर्णके इतरस्मिन् । पर्याप्ते लब्ध्यपर्याप्तेऽप्रथमा भवेत् पतिः ।। ७८ ॥ अर्थ---उक्त उन्नीस भेदोकी तीन पति करनी चाहिये । उसमें प्रथम पङ्क्ति सामा- न्यकी अपेक्षासे है । और दूसरी पति अपर्याप्त तथा पर्याप्तकी अपेक्षासे है। और तीसरी पति पर्याप्त निर्वृत्यपर्याप्त लब्ध्यपर्याप्तकी अपेक्षासे है। भावार्थ---उन्नीसका जब एकसे गुणा करते है तब सामान्यकी अपेक्षा है, पर्याप्त अपर्याप्तके भेदकी विवक्षा नहीं हैं। जब दोके साथ गुणा करते है तब पर्याप्त अपर्याप्तकी अपेक्षा है । और जब तीनके साथ गुणा करते है तब पर्याप्त निवृत्त्यपर्याप्त लब्ध्यपर्याप्तकी अपेक्षा है । गाथामें केवल लब्धि शब्द है उसका अर्थ लब्ध्यपर्याप्त होता है; क्योंकि नामका एक देशभी पूर्णनामका वोधक होता है ।

गोम्मटसारः । जीवसमासके और भी उत्तर भेदोंको गिनानेकेलिये दो गाथा कहते है। इगिवण्णं इगिविगले असण्णिसण्णिगयजलथलखगाणं । गब्भमवे सम्मुच्छे दुतिगं भोगथलखेचरे दो दो ॥ ७९ ॥ एकपञ्चाशत् एकविकले असंज्ञिसंज्ञिगतजलस्थलखगानाम् । गर्भभवे सम्मूछ द्वित्रिकं भोगस्थलखेचरे द्वौ द्वौ ॥ ७९ ॥ अर्थ-जीवसमासके उक्त ६७ भेदोंमेंसे पञ्चेन्द्रियके छह भेद निकालनेसे एकेन्द्रिय विकलेन्द्रियसम्बन्धी ५१ भेद शेष रहते है । कर्मभूमिमें होनेवाले तिर्यञ्चोंके तीन भेद है, जलचर स्थलचर नभश्चर । ये तीनो ही तिर्यञ्च सङ्घी और असञ्जी होते है। तथा गर्भज और सम्मूर्छन होते है। परन्तु गर्भजोंमें पर्याप्त और निवृत्यपर्याप्त ही होते है, इसलिये गर्भजके बारह भेद, और सम्मूर्छनोंमें पर्याप्त निवृत्यपर्याप्त लब्ध्यपयाप्त तीनोंही भेद होते हैं, इसलिये सम्मूर्छनोंके अठारह भेद, सब मिलाकर कर्मभूमिज तिर्यच्चोंके तीसभेद होते है । भोगभूमिमें पंचेन्द्रियतिर्यञ्चोंके स्थलचर नभश्चर दो ही भेद होते हैं। और ये दोनोंही पर्याप्त तथा निवृत्यपर्याप्त होते है । इसलिये भोगभूमिज तिर्यञ्चोके चार भेद, और उक्त कर्मभूमिन सम्बन्धी तास भेद, उक्त ५१ भेदोमें मिलानेसे तिर्यग्गति सम्बन्धी सम्पूर्ण जीवसमासके ८५ मेद होते है । भोगभूमिमें जलचर सम्मूर्छन तथा असंज्ञी जीव नहीं होते । मनुष्य देव नारकसम्बन्धी भेदोंको गिनाते है। अज्जवमलेच्छमणुए तिदु भोगकुभोगभूमिजे दो दो । सुरणिरये दो दो इदि जीवसमासा हु अडणउदी ॥ ८०॥ आर्यम्लेच्छमनुष्ययोखयो द्वौ भोगकुभोगभूमिजयो द्वौ । सुरनिरययो? द्वौ इति जीवसमासा हि अष्टानवतिः ॥ ८ ॥ अर्थ-आर्यखण्डमें पर्याप्त निवृत्यपर्याप्त लब्ध्यपर्याप्त तीनोंही प्रकारके मनुष्य होते है। म्लेच्छखण्डमें लब्ध्यपर्याप्तको छोडकर दो प्रकारके ही मनुष्य होते है । इसीप्रकार भोग- भूमि कुभोगभूमि देव नारकियोमें भी दो दो ही भेद होते है । इसलिये सब मिलाकर जीवसमासके ९८ भेद हुए । भावार्थ--पूर्वोक्त तिर्यञ्चोके ८५ भेद, और ९ भेद मनुष्योके तथा दो भेद देवोंके; दो भेद नारकियोंके, इसप्रकार सब मिलाकर जीवसमासके अवान्तर भेद ९८ होते है। इसप्रकार स्थानाधिकारकी अपेक्षा जीवसमासोका वर्णन किया । अब दूसरा योनि अधि- कार क्रमसे प्राप्त है । उस योनिके दो भेद है, एक आकारयोनि दूसरी गुणयोनि । उसमें प्रथम आकारयोनिको कहते है। संखावत्तयजोणी कुम्मुण्णयवंसपत्तजोणी य । तत्थ य संखावत्ते णियमादु विवजदे गम्भो ।। ८१ ।।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम शंखावर्तकयोनिः कूर्मोन्नतवंशपत्रयोनी च । तत्र च शंखावर्ते नियमात्तु विवज्यते गर्भः ॥ ८१ ॥ अर्थ-योनिके तीन भेद है, शंखावर्त कूर्मोन्नत वंशपत्र । उनमेंसे शंखावर्त योनिमें गर्भ नियमसे वर्जित है। भावार्थ--जिसके भीतर शंखके समान चक्कर पड़े हों उसको शंखा- वर्त योनि कहते है । जो कछुआकी पीठकी तरह उठी हुई हो उसको कूर्मोन्नत योनि कहते है। जो वांसके पत्तेके समान लम्बी हो उसको वंशपत्र योनि कहते है। ये तीन तरह की आकार योनि है। इनमेंसे प्रथम शंखावर्तमें नियमसे गर्भ नहीं रहता। कुम्मुण्णयजोणीये तित्थयरा दुविहचक्कवडी य । रामा वि य जायते सेसाए सेसगजणो दु ॥ ८२॥ कूर्मोन्नतयोनौ तीर्थकरा द्विविधचक्रवर्तिनश्च । रामा अपि च जायन्ते शेषाया शेषकजनस्तु ॥ ८२ ॥ अर्थ---कूर्मोन्नतयोनिमें तीर्थकर अर्धचक्री चक्रवर्ती तथा बलभद्र और अपिशब्दकी सामर्थ्यसे साधारण पुरुष भी उत्पन्न होते है। तीसरी वंशपत्रयोनिमें साधारण पुरुष ही उत्पन्न होते है तीर्थकरादि महापुरुष नहीं होते । जन्म तथा उसकी आधारभूत गुणयोनिके भेदोंको गिनाते है। जम्मं खलु सम्मुच्छणगब्भुबबादा दु होदि तज्जोणी। सञ्चित्तसीदसंउडसेदरमिस्सा य पत्तेयं ॥ ८३ ॥ जन्म खलु सम्मूर्छनगर्भोपपादास्तु भवति तद्योनयः । सचित्तशीतसंवृतसेतरमिश्राश्च प्रत्येकम् ॥ ८३ ॥ अर्थ-जन्म तीन प्रकारका होता है, सम्मूर्छन गर्भ उपपाद । तथा इनकी आधारभूत सचित्त शीत संवृत, अचित्त उष्ण विवृत, मिश्र, ये गुण योनि होती है । इनमेंसे यथासम्भव प्रत्येक सम्मुर्छनादि जन्मके साथ लगालेनी चाहिये । किन जीवोंके कौनसा जन्म होता है यह बताते है । पोतजरायुजअंडजजीवाणं गम्भ देवणिरयाणं । उववाद सेसाणं सम्मुच्छणयं तु णिदिटुं॥ ८४ ॥ पोतजरायुजांडनजीवानां गर्भः देवनारकाणां । उपपाद शेषाणा सम्मूर्छनकं तु निर्दिष्टम् ।। ८४ ॥ अर्थ-योत (जो उत्पन्न होते ही भागने लगे, जैसे शेर विल्ली हिरन आदि), जरायुज भाभप्रदेशों से युक्त पुहरपिग्टको सचित्त कहते हैं । २ ढका हुआ । ३ सुला हुआ { ४ दोका मिला मदिन और अचित्ता मिलकर एक मित्र योनि होती है। -- गोम्मटसारः। ३७ (जो जेरके साथ उत्पन्न हों), अण्डज (जो अण्डेसे उत्पन्न हों) इन तीन प्रकारके जीवोंका गर्भ जन्म ही होता है । देव नारकियोंका उपपाद जन्म ही होता है। शेष जीवोंका सम्मूर्छन जन्मही होता है । किस जन्मके साथ कौनसी योनि सम्भव है यह तीन गाथाओंद्वारा बताते है । उबबादे अच्चित्तं गन्भे मिस्सं तु होदि सम्मुच्छे । सञ्चित्तं अञ्चित्तं मिस्सं च य होदि जोणी हु॥ ८५ ॥ उपपादे अचित्ता गर्ने मिश्रा तु भवति सम्मूर्छ । सचित्ता अचित्ता मिश्रा च च भवति योनिर्हि ॥ ८५ ॥ अर्थ-उपपाद जन्मकी अचित्त ही योनि होती है । गर्भ जन्मकी मिथ योनि ही होती है । तथा सम्मूर्छन जन्मकी सचित्त अचित्त मिश्र तीनो तरहकी योनि होती है । उबबादे सीदुसणं सेसे सीदुसणमिस्सयं होदि । उबबादेयक्खेसु य संउड वियलेसु विउलं तु ॥ ८६ ॥ उपपादे शीतोष्णे शेषे शीतोष्णमिश्रका भवन्ति । उपपादैकाक्षेषु च संवृता विकलेघु विवृता तु ॥ ८६ ॥ अर्थ-उपपाद जन्ममें शीत और उष्ण दो प्रकारको योनि होती है। शेष जन्मों में शीत उष्ण मिश्र तीनों ही योनि होती है । उपपाद जन्मवालोंकी तथा एकन्द्रिय जीवोंकी योनि संवृत ही होती है । और विकलेन्द्रियोंकी विवृत ही होती है । गब्भजजीवाणं पुण मिस्सं णियमेण होदि जोणी हु। सम्मुच्छणपंचक्खे वियलं वा विउल जोणी हु ।। ८७ ॥ गर्भजजीवानां पुनः मिश्रा नियमेन भवति योनिर्हि । सम्मूर्छनपंचक्षाणांः विकलं वा विवृतयोनिर्हि ॥ ८७ ॥ अर्थ-गर्भजजीवोंकी योनि नियमसे मिश्र ( संवृत विवृतकी अपेक्षा ) होती है। पंचेन्द्रिय सम्मूर्छन जीवोंकी विकलेन्द्रियोकी तरह विवृत योनि ही होती है । उक्त गुणयोनिकी उपसंहारपूर्वक विशेषसंख्याको वताते है । सामण्णेण य एवं व जोणीओ हवंति वित्थारे । लक्खाण चदुरसीदी जोणीओ होंति णियमेण ॥ ८८॥ सामान्येन चैवं नव योनयो भवन्ति विस्तारे । लक्षाणा चतुरशीतिः योनयो भवन्ति नियमेन ॥ ८८ ॥ १ देवोंके उत्पन्न होनेकी शन्या और नारफियोंके उत्पन्न होनेके उष्ट्रकादि स्थानोंको उपपाद कहते है, उनमें उन्पन होनेको भी उपपाद कहते हैं । २ चारो तरफने पुलका इकट्ठा होना (जू मन्टर सादिके जन्मविशेपमें रूह) । ३ माताके सचित्तरज और पिताफे अचिन घार्यके मिलनेसे मिध योनि होती है।

रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम्
अर्थ-पूर्वोक्त क्रमानुसार सामान्यसे योनियोके नियमसे नव ही भेद होते है।
विस्तारकी अपेक्षा इनके चौरासी लाख भेद होते है।
योनिसम्बन्धी विस्तृत संख्याको दिखाते है।
णिच्चिदरधादुसत्त य तरुदस वियलिंदियेसु छच्चेव ।
सुरणिरयतिरियचउरो चोदस मणुए सदसहस्सा ॥ ८९ ॥
नित्येतरधातुसप्त च तरुदश विकलेन्द्रियेषु षट् चैव ।
सुरनिरयतिर्यक्चतस्रः चतुर्दश मनुष्ये शतसहस्राः ।। ८९ ॥
अर्थ-नित्यनिगोद इतरनिगोद पृथिवी जल अग्नि वायु इन प्रत्येककी सात २ लाख,
वनस्पतिकी दशलाख, द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय इन प्रत्येककी दो २ लाख अर्थात् विकले-
न्द्रियको छह लाख, देव नारकी तिर्यञ्च इन प्रत्येककी चार २ लाख, मनुष्यकी चौदह लाख,
सब मिलाकर ८४ लाख योनि होती है।
किस गतिमें कौनसा जन्म होता है यह दो गाथाओंद्वारा दिखाते है।
उववादा सुरणिरया गमजसम्मुच्छिमा हुणरतिरिया ।
सम्मुच्छिमा मणुस्साऽपज्जत्ता एयवियलक्खा ॥१०॥
उपपादाः सुरनिरया गर्भजसम्मूछिमा हि नरतियञ्चः ।
सम्मूच्छिमा मनुष्या अपर्याप्ता एकविकलाक्षाः ॥ १० ॥
अर्थ-देवगति और नरकगतिमे उपपाद जन्मही होता है । मनुष्य तथा तिर्यञ्चोमें
गर्म और सम्मर्छन दो ही प्रकारका जन्म होता है; किन्तु लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्य और एके-
न्द्रिय विकलेन्द्रियोंका सम्मूर्छन जन्म ही होता है ।
पंचक्खतिरिक्खाओ गब्भजसम्मुच्छिमा तिरिक्खाणं ।
मोगमुमा गभभवा नरपुण्णा गन्भजाचेव ॥ ९१ ॥
पञ्चाक्षतिर्यञ्चो गर्भनसम्मूर्छिमा तिरश्चाम् ।
भोगभूमा गर्भभवा नरपूर्णा गर्भजाश्चैव ॥ ९१ ॥
अर्थ-कर्मभूमिया पंचेन्द्रिय तिर्यञ्च गर्भज तथा सम्मूर्छन ही होते है। तिर्यञ्चोंमें
जो भोगभूमिया तिर्यञ्च है वे गर्भन ही होते है । और जो पर्याप्त मनुष्य है वे भी गर्मन
ही होते है।
मध्यपर्याप्तकोंकी कहा २ सम्भावना है और कहां नहीं है यह बताते है।
उरवादगमजेसु य लद्धिअपजत्तगा ण णियमेण ।
णरसम्मुच्छिमजीवा लद्धिअपजत्तगा चेव ॥ १२ ॥

गोम्मटसारः। ३९ उपपादगर्भजेषु च लब्ध्यपर्याप्तका न नियमेन । नरसम्मूर्छिमजीवा लब्ध्यपर्याप्तकाश्चैव ॥ ९२ ॥ अर्थ-उपपाद और गर्भ जन्मवालोंमें नियमसे लब्ध्यपर्याप्तक नहीं होते । और सम्म- छैन मनुष्य नियमसे लब्ध्यपर्याप्तक ही होते है। भावार्थ-देव नारकी पर्याप्त निर्वृत्यपर्याप्त ही होते है । और चक्रवर्तीकी रानी आदिको छोडकर शेष आर्यखण्डकी स्त्रियोकी योनि कांख स्तन मूत्र मल आदिमें उत्पन्न होनेवाले संमूर्छन मनुष्य लब्ध्यपर्याप्तक ही होते है। नरकादि गतियोमें होनेवाले वेदोंका नियम करते है। णेरइया खलु संढा णरतिरिये तिण्णि होंति सम्मुच्छा। संढा सुरभोगभुमा पुरिसिच्छीवेदगा चेव ॥ ९३ ॥ नैरयिकाः खलु षण्ढा नरतिरश्चोस्त्रयो भवन्ति सम्म :: षण्डाः सुरभोगभूमाः पुरुषस्त्रीवेदकाश्चैव ॥ ९३ ॥ अर्थ-नारकियोंका द्रव्यवेद तथा भाववेद नपुंसक ही होता है। मनुष्य और तिर्य- च्चोंके तीनोंही (स्त्री पुरुष नपुंसक) वेद होते है। देव और भोगभूमियाओके पुरुषवेद और स्त्रीवेद ही होता है । भावार्थ-देव नारकी भोगभूमियां और सम्मूर्च्छन जीव इनका जो द्रव्यवेद होता है वही भाववेद होता है; किन्तु शेष मनुष्य और तिर्यच्चोंमें यह नियम नहीं है। उनके द्रव्यः वेद और भाववेदमें विपरीतता भी पाई जाती है । अङ्गोपाङ्गः नामकर्मके उदयसे होनेवाले शरीरगत चिह्नविशेषको द्रव्यवेद, और मोहनीयकर्मकी वेदप्रकृतिके उदयसे होनेवाले परिणाम- विशेषोंको भावभेद कहते है। शरीरावगाहनाकी अपेक्षा जीवसमासोका निरूपण करनेसे प्रथम सबसे उत्कृष्ट और जघन्य शरीरकी अवगाहनाओके स्वामियोंको दिखाते है । सुहमणिगोदअपज्जत्तयस्य जादस्स तदियसमयम्हि । अंगुलअसंखभागं जहण्णमुक्कस्सयं मच्छे ॥ ९४ ॥ सूक्ष्मनिगोदापर्याप्तकस्य जातस्य तृतीयसमये । अङ्गुलासंख्यभागं जघन्यमुत्कृष्टकं मत्स्ये ॥ ९४ ॥ अर्थ-उत्पन्न होनेसे तीसरे समयमे सूक्ष्मनिगोदिया लब्ध्यपर्याप्तक जीवकी अगुलके असंख्यातमे भागप्रमाण शरीरकी जघन्य अवगाहना होती है । और उत्कृष्ट अवगाहना मत्स्यके होती है। भावार्थ-ऋजुगतिकेद्वारा उत्पन्न होनेवाले सूक्ष्मनिगोदिया लब्ध्यपर्याप्तक जीवकी उत्पत्तिसे तीसरे समयमें शरीरकी जघन्य अवगाहना होती है, और इसका प्रमाण घनाद्गुलके १ उत्पत्तिके प्रथम समयमें भावतचतुरस्त्र और दूसरे समयमें समचतुरन होता है, इस लिये प्रथम द्वितीय समयमें जघन्य भवगाहना नहीं होती, किन तीसरे समयमें गोल होजाने जघन्य अवगाहना होती है।

४० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । असंख्यातमें भागप्रमाण है । उत्कृष्ट अवगाहना स्वयम्भूरमण समुद्रके मध्यमें होनेवाले महाम- त्स्यकी होती है। इसका प्रमाण हजार योजन लम्बा, पाचसौ योजन चौडा, ढाईसौ योजन मोटा है । जघन्यसे लेकर उत्कृष्ट पर्यन्त एक २ प्रदेशकी वृद्धिके क्रमसे मध्यम अवगाहनाके अनेक भेढ होते है । अवगाहनाके सम्पूर्ण विकल्प असंख्यात होते है । इन्द्रियकी अपेक्षा उत्कृष्ट अवगाहनाका प्रमाण वताते है। साहियसहस्समेकं वारं कोसूणमेकमेक्कं च । जोयणसहस्सदीहं पम्मे वियले महामच्छे ॥ ९५ ॥ साधिकसहस्रमेकं द्वादश क्रोशोनमेकं च । योजनसहस्रदीर्घ पझे विकले महामत्स्ये ॥ ९५ ॥ अर्थ- -पद्म (कमल), द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, महामत्स्य इनके शरीरकी अव- गाहना क्रमसे कुछ अधिक एक हजार योजन, बारह योजन, तीनकोश, एक योजन, हजार योजन लम्बी समझनी चाहिये । भावार्थ-एकेन्द्रियोंमें सबसे उत्कृष्ट कमलकी कुछ अधिक एक हजार योजन, द्वीन्द्रियोमें शंखकी वारहयोजन, त्रीन्द्रियोंमें ग्रैमी ( चींटी ) की तीन कोश, चतुरिन्द्रियोंमें भ्रमरकी एक योजन, पंचेन्द्रियोंमें महामत्स्यकी एक हजार योजन लम्बी शरीरकी अवगाहनाका प्रमाण है । यहापर महामत्स्यकी एक हजार योजनकी अवगाहनासे जो पद्मकी कुछ अधिक अवगाहना वतलाई है, और पूर्वमें सर्वोत्कृष्ट अवगाहना महामत्स्यकी ही वतलाई है, इससे पूर्वापर विरोध नहीं समझना चाहिये क्योंकि यहांपर केवल लम्बाईका वर्णन है, और पूर्वमें जो सर्वोत्कृष्ट अवगाहना वताई थी वह घनक्षेत्रफलकी अपेक्षासे थी । इसलिये पद्मकी अपेक्षा मत्स्यके शरीरकी अवगाहना ही उत्कृष्ट समझनी चाहिये; क्योंकि पद्मकी अपेक्षा मत्स्यके शरीरकी अवगाहनाका क्षेत्रफल अधिक है। पर्याप्तक द्वन्द्रियादिकोंकी जघन्य अवगाहनाका प्रमाण क्या है ? और उसके धारक जीव कौन २ है यह बताते है। बितिचपपुण्णजहण्णं अणुंधरीकुंथुकाणमच्छीसु । सिच्छयमच्छे विंदंगुलसंखे संखगुणिदकमा ॥ ९६ ॥ द्वित्रिचपपूर्णजघन्यमनुधरीकुंथुकाणमक्षिकासु । सिक्यक्रमत्स्ये वृन्दागुलसंख्यं संख्यगुणितक्रमाः ॥ ९६ ॥ अर्थ-द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय पंचेन्द्रिय जीवोंमें अनुधरी कुंथु काणमक्षिका सिक्यमत्स्यके क्रमसे जघन्य अवगाहना होती है । इसमें प्रथमकी घनाडुलके संख्यातमे भागप्रमाण है । और पूर्वकी अपेक्षा उत्तरकी अवगाहना क्रमसे संख्यातगुणी २ अधिक है । भावार्थ-हीन्द्रियोंमें सबसे जघन्य अवगाहना अनुधरीके. पाई जाती है और उसका गोम्मटसारः। ४१ प्रमाण धनाड्गुलके संख्यातमें भागमात्र है। उससे संख्यातगुणी त्रीन्द्रियोंकी जघन्य अव- गाहना है, यह कुंथुके पाई जाती है । इससे संख्यातगुणी चौइन्द्रियोमें काणमाक्षिका की, और इससे भी संख्यातगुणी पंचेन्द्रियोमें सिक्थमत्स्यकें जघन्य अवगाहना पाई जाती है । यहांपर आचार्योंने द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय आदि शब्द न लिखकर "वि, ति, च, प," ये शब्द जो लिखे है वे ' नामका एकदेश भी सम्पूर्ण नामका बोधक होता है। इस नियमके आश्रयसे लाघवके लिय लिखे हैं। जघन्यसे लेकर उत्कृष्ट अवगाहनापर्यन्त जितने भेद है उनमें किस भेदका कौन स्वामी है ? और अवगाहनाकी न्यूनाधिकताका गुणाकार क्या है ? यह पांच गाथाओद्वारा बताते है । सुहमणिवातेआभूवातेआपुणिपदिद्विदं इदरं । बितिचपमादिल्लाणं एयाराणं तिसेढीय ॥ ९७ ॥ सूक्ष्मनिवातेआभूवातेअपृनिप्रतिष्ठितमितरत् । द्वित्रिचपमाद्यानामेकादशानां त्रिश्रेणयः ॥ ९७ ॥ अर्थ --एक कोठेमें सूक्ष्मनिगोदिया वायुकाय तेजकाय जलकाय पृथिवीकाय इनका क्रमसे स्थापन करना । इसके आगे दूसरे कोठे वायुकाय तेजकाय जलकाय पृथिवीकाय निगोदिया प्रतिष्ठित इनका क्रमसे स्थापन करना । और तीसरे कोठेमें अप्रतिष्ठित द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय पंचेन्द्रियोंका क्रमसे स्थापन करना । इसके आगे उक्त सोलह स्थानों मेंसे आदिके ग्यारह स्थानोंकी तीन श्रेणि मांडना चाहिये । भावार्थ-तीनकोठोमें स्थापित सोलह स्थानोंके आदिके ग्यारहस्थान जो कि प्रथम द्वितीय कोठेमें स्थापित किये गये है-अर्थात् सूक्ष्मनिगोदियासे लेकर प्रतिष्ठित पर्यन्तके ग्यारह स्थानोंको क्रमानुसार उक्त तीन कोठा ओंके आगे पूर्ववत् दो कोठाओंमें स्थापित करना चाहिये, और इसके नीचे इनही ग्यारह स्थानोंके दूसरे और दो कोठे स्थापित करने चाहिये, तथा दूसरे दोनो कोठोंके नीचे तीसरे दो कोठे स्थापित करना चाहिये । इसप्रकार तीन श्रेणिमें दो २ कोठाओंमें ग्यारह स्थानको स्थापित करना चाहिये । और इसके आगे:- अपदिद्विदपत्तेयं बितिचपतिचबिअपदिहिदसयलं । तिचबिअपदिहिदं च य सयलं बादालगुणिदकमा ॥ ९८॥ अप्रतिष्ठितप्रत्येकं द्वित्रिचपत्रिचनप्रतिष्ठितं सकलम् । त्रिचनप्रतिष्ठितं च च सकलं द्वाचत्वारिंशद्गुणितक्रमाः ।। ९८ ॥ अर्थ-छट्टे कोठेमें अप्रतिष्ठित प्रत्येक द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चौडन्द्रिय पंचेन्द्रियका स्थापन करना । इसके आगेके कोठेमें क्रमप्से त्रीन्द्रिय चौइन्द्रिय द्वन्द्रिय अप्रतिष्ठित प्रत्येक पचेन्द्रियका स्थापन करना । इससे आगे के कोठेमें त्रीन्द्रिय चौइन्द्रिय द्वीन्द्रिय अप्रतिष्ठित प्रत्येक गो.६

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रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् |
पंचेन्द्रियका क्रमसे स्थापन करना । इन सम्पूर्ण चौसठ स्थानोंमें व्यालीस स्थान उत्तरोत्तर गुणि-
तक्रम है । भावार्थ-आदिके तीन कोठोमें स्थापित सोलह स्थान और जिन ग्यारहस्थानोंको
तीन श्रेणियोंमें स्थापित किया था उनमेंसे नीचेकी दो श्रेणियों में स्थापित वाईस स्थानोंको
छोड़कर ऊपरकी श्रेणिके ग्यारहस्थान । तथा इसके आगे तीन कोठामें स्थापित पन्द्रह
स्थान । सब मिलाकर व्यालीस स्थान उत्तरोत्तर गुणितक्रम है । और दूसरी तीसरी श्रेणिके
वाईस स्थान अधिककम हैं। व्यालीस स्थानोंके गुणाकारका प्रमाण और वाईसस्थानोंके अधिकका
प्रमाण आगे वतावेगे । यहाँपर उक्त स्थानोंके स्वामियोंको बताते है।
अवरमपुण्णं पढम सोलं पुण पढमबिदियतदियोली।
पुण्णिदरपुण्णयाणं जहण्णमुक्कस्समुक्कस्स ॥ ९९ ॥
अवरमपूर्ण प्रथमे षोडश पुनः प्रथमद्वितीयतृतीयावलिः ।
पूर्णेतरपूर्णाना जघन्यमुत्कृष्टमुत्कृष्टम् ॥ ९९ ॥
अर्थ-आदिके सोलह स्थान जघन्य अपर्याप्तकके है । और प्रथम द्वितीय तृतीयश्रेणि
क्रमसे पर्याप्तक अपर्याप्तक तथा पर्याप्तककी जघन्य उत्कृष्ट और उत्कृष्ट समझनी चाहिये ।
भावार्थ-प्रथम तीन कोठोंमें विभक्त सोलह स्थानों में अपर्याप्तककी जघन्य अवगाहना बताई है।
और इसके आगे प्रथम श्रेणिके ग्यारह स्थानोंमें पर्याप्तककी जघन्य और इसके नीचे दूसरी
श्रेणिमें अपर्याप्तककी उत्कृष्ट तथा इसके भी नीचे तीसरी श्रेणिमें पर्याप्तकोंकी उत्कृष्ट
अवगाहना समझनी चाहिये ।
पुण्णजहण्णं तत्तो वरं अपुण्णस्स पुण्णउक्तस्सं ।
वीपुण्णजहण्णोत्ति असंखं संखं गुणं तत्तो ॥१०॥
पूर्णजघन्यं ततो वरमपूर्णस्य पूर्णोत्कृष्टम् ।
द्विपूर्णजघन्यमिति असंख्य संख्यं गुणं ततः ॥ १०० ।।
अर्थ-श्रेणिके आगेके प्रथम कोठेमें (छट्टे कोठेमें ) पर्याप्तककी जघन्य और दूसरे
कोठेमें अपर्याप्तककी उत्कृष्ट तथा तीसरे कोठेमें पर्याप्तककी उत्कृष्ट अवगाहना समझनी
चाहिये। द्वीन्द्रिय पर्याप्तककी जघन्य अवगाहना पर्यन्त असंख्यातका गुणाकार है, और इसके
आगे संख्यातका गुणाकार है । भावार्थ-पहले जो व्यालीस स्थानोंको गुणितक्रम वताया था
उनमेंसे आदिके उनतीस स्थान ( सूक्ष्मनिगोदिया अपर्याप्तक जघन्यसे लेकर द्वीन्द्रिय पर्याप्तकी
जवन्य अवगाहना पर्यन्त ) उत्तरोत्तर असंख्यातगुणे २ है। और इसके आगे तेरह स्थान
उत्तरोत्तर संख्यातगुणे २ हैं।
गुणाकार रूप असंख्यातका और श्रेणिगत वाईस स्थानोंके अधिकका प्रमाण बताते है ।
सुहमेदरगुणगारो आवलिपल्लाअसंखभागो दु।
सहाणे सेढिगया अहिया तत्थेकपडिभागो ॥१०१॥

गोम्मटसारः। समेतरगुणकार आवलिपल्यासंख्येयभागस्तु । स्वस्थाने श्रेणिगता अधिकास्तत्रैकप्रतिभागः ॥ १०१॥ अर्थ- -सूक्ष्म और बादरोंका गुणकार स्वस्थानमें क्रमसे आवली और पल्यके असं- ख्यात में भाग है। और श्रेणिगत वाईस स्थान अपने २ एक प्रतिभागप्रमाण अधिक २ है। भावार्थ--सूक्ष्म निगोदियासे सूक्ष्म वायुकायका प्रमाण आवलीके असंख्यातमें भागसे गुणित है, और इसीप्रकार सूक्ष्मवायुकायसे सूक्ष्म तेजकायका और सूक्ष्मतेनकायसे सूक्ष्मजलकायका सूक्ष्म- जलकायसे सूक्ष्म पृथिवीकायका प्रमाण उत्तरोत्तर आवलीके असंख्यातमें २ भागसे गुणित है। परन्तु सूक्ष्म पृथिवीकायसे बादर वातकायका प्रमाण परस्थान होनेसे पल्यके असंख्यातमें भाग- गुणित है । इसीप्रकार बादर बातकायसे वादर तेजकायका और बादर तेजकायसे बादर जल- कायादिका प्रमाण उत्तरोत्तर क्रमसे पल्यके असंख्यातमें भाग २ गुणा है । इसीप्रकार आगेके स्थान भी समझना । परन्तु श्रेणिगत वाईस स्थानोंमें गुणाकार नहीं है, किन्तु उत्तरोत्तर अधिक २ है, अर्थात् वाईस स्थानोंमें जो सूक्ष्म है वे आवलीके असंख्यातमें भाग अधिक है, और जो बादर है वे पल्यके असंख्यातमें भाग अधिक है। सूक्ष्मनिगोदिया लब्ध्यपर्याप्तककी जघन्य अवगाहनासे सूक्ष्म वायुकायकी अवगाहना आवलीके असंख्यातमें भाग गुणित है यह पहले कह आये हैं । अब इसमें होनेवाली चतुः- स्थानपतित वृद्धिकी उत्पत्तिका क्रम तथा उसके मध्यमें होनेवाले अनेक अवगाहनाके भेदोंको कहते है। अवरुबरि इगिपदेसे जुदे असंखेज्जमागवड्डीए। आदी णिरंतरमदो एगेगपदेसपरिवड्डी ॥१०२ ॥ अवरोपरि एकप्रदेशे युते असंख्यातभागवृद्धेः । आदिः निरन्तरमतः एकैकप्रदेशपरिवृद्धिः ॥ १०२ ॥ अर्थ-जघन्य अवगाहनाके प्रमाणमें एक प्रदेश और मिलानेसे जो प्रमाण होता वह असंख्यातभागवृद्धिका आदिस्थान है । इसके आगे भी क्रमसे एक २ प्रदेशको वृद्धि करनी चाहिये । और ऐसा करते २- अवरोग्गाहणमाणे जहण्णपरिमिदअसंखरासिहिदे । अवरस्सुवरि उढे जेट्ठमसंखेज्ज भागस्स ॥ १०३ ।। अवरावगाहनाप्रमाणे जघन्यपरिमितासंख्यातराशिहते । अवरस्योपरि वृद्धे ज्येष्ठमसंख्यातभागस्य ॥ १०३ ॥ अर्थ- जघन्य अवगाहनाके प्रमाणमें जघन्यपरीतासंख्यातका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतने प्रदेश जघन्य अवगाहनामें मिलानेपर असंख्यातभागवृद्धिका उत्कृष्ट स्थान होता है। -- रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् तस्सुवरि इगिपदेसे जुदे अवत्तव्वमागपारम्मो। वरसंखमवहिदवरे रूऊणे अवरउवरिजुदे ॥१०४॥ तस्योपरि एकप्रदेशे युते अवक्तव्यभागप्रारम्भः । वरसंख्यातावहितावरे रूपोने अवरोपरि युते ॥ १०४ ।। अर्थ-असंख्यातभागवृद्धिके उत्कृष्ट स्थानके आगे एक प्रदेशकी वृद्धि करनेसे अव- क्तव्य भागवृद्धिका प्रारम्भ होता है । इसमें एक २ प्रदेशकी वृद्धि होते २, जब जघन्य अव- गाहनाके प्रमाणमें उत्कृष्ट संख्यातका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उसमें एक कमकरके जवायके प्रमाणमें मिलादिया जाय तवः- तव्वड्डीए चरिमो तस्सुवरि रूबसंजुदे पढमा । संखेज्जमागउड्डी उबरिमदो रूवपरिवडी ॥१०५ ॥ तदृद्धेश्वरमः तस्योपरि रूपसंयुते प्रथमा । संख्यातभागवृद्धिः उपर्यतो रूपपरिवृद्धिः ॥ १०५ ॥ अर्थ-~-अवक्तव्यभागवृद्धिका उत्कृष्ट स्थान होता है। इसके आगे एक और मिला- नेसे संख्यातभागवृद्धिका प्रथम स्थान होता है। और इसके आगे एक २ की वृद्धि करते २ जत्रः- अवरद्धे अवरुबरि उड्ढे तव्वडिपरिसमत्ती हु। रूवे तदुबरि उड्ढे होदि अवत्तवपढमपदं ।। १०६ ॥ अवरा॰ अवरोपरिवृद्धे तवृद्धिपरिसमाप्तिर्हि । रूपे तदुपरि वृद्धे भवति अवक्तव्यप्रथमपदम् ॥ १०६ ॥ अर्थ-जघन्यका जितना प्रमाण है उसमें उसका ( जघन्यका ) आधा और मिला- नेसे संख्यातभागवृद्धिका उत्कृष्टस्थान होता है । इसके आगे भी एक प्रदेशकी वृद्धि करनेपर अवक्तन्यवृद्धिका प्रथम स्थान होता है। रूऊणवरे अबरुस्सुबार संवडिदे तदुक्कस्सं । तमि पदेसे उढे पढमा संखेज्जगुणवडी ॥१०७ ॥ रूपोनावरे अवरस्योपरि संवद्धिते तदुत्कृष्टम् । तस्मिन् प्रदेशे वृद्धे प्रथमा संख्यातगुणवृद्धिः ॥ १०७ ॥ अर्थ-जघन्यके प्रमाण एक कम जघन्यका ही प्रमाण और मिलानेसे अवक्तव्य- वृद्धिका उत्कृष्ट स्थान होता है । और इसमें एक प्रदेश और मिलानेसे संख्यातगुणवृद्धिका प्रथम स्थान होता है। अवरे वरसंखगुणे तञ्चरिमो तम्हि रूबसंजुत्ते । उग्गाहणम्हि पढ़मा होदि अवत्तव्वगुणवड्ढी ॥ १०८॥ .

गोम्मटसारः। ४५ . । अवरे वरसंख्यगुणे तच्चरमः तस्मिन् रूपसंयुक्ते । अवगाहने प्रथमा भवति अवक्तव्यगुणवृद्धिः ॥ १०८ ॥ अर्थ-जघन्यको उत्कृष्ट संख्यातसे गुणा करनेपर संख्यातगुणवृद्धिका उत्कृष्टस्थान होता है । इस संख्यातगुणबृद्धिके उत्कृष्ट स्थानमे ही एक प्रदेशकी वृद्धि करनेपर अवक्तव्यगुणवृ- द्धिका प्रथमस्थान होता है। अवरपरित्तासंखेणवरं संगुणिय रूबपरिहीणे । तच्चरिमो रूबजुदे तहि असंखेज्जगुणपढमं ॥ १०९॥ अवरपरीतासंख्येनावरं संगुण्य रूपपरिहीने । तच्चरमो रूपयुते तस्मिन् असंख्यातगुणप्रथमम् ॥ १०९ ॥ अर्थ --जघन्य अवगाहनाका जघन्यपरीतासंख्यातके साथ गुणा करके उसमेंसे एक घटाने पर अवक्तव्यगुणवृद्धिका उत्कृष्ट स्थान होता है। और इसमें एक प्रदेशकी वृद्धि होनेपर असंख्यातगुणवृद्धिका प्रथम स्थान होता है । रूबुत्तरेण तत्तो आवलियासंखभागगुणगारे । तप्पाउग्गेजादे वाउस्सोग्गाहणं कमसो ॥११० ॥ रूपोत्तरेण तत आवलिकासंख्यभागगुणकारे । तत्प्रायोग्ये जाते वायोरवगाहनं क्रमशः ॥ ११० ॥ अर्थ-इस असंख्यातगुणवृद्धिके प्रथमस्थानके ऊपर क्रमसे एक २ प्रदेशकी वृद्धि होते २ जब सूक्ष्म अपर्याप्त वायुकायकी जघन्य अवगाहनाकी उत्पत्तिके योग्य आवलिके असंख्यातमे भागका गुणाकार उत्पन्न होजाय तब क्रमसे उस वायुकायकी अवगाहना होती है । भावार्थ-जघन्य अवगाहनाके ऊपर प्रदेशोत्तर वृद्धिके क्रमसे असंख्यातभागवृद्धि संख्या- तभागवृद्धि संख्यातगुणवृद्धि असंख्यातगुणवृद्धिको क्रमसे असंख्यात २ वार होनेपर, और इन वृद्धियोंके मध्यमें अवक्तव्यवृद्धिको भी प्रदेशोत्तरवृद्धि के क्रमसे ही असंख्यात २ वार होनेपर, जत्र असंख्यागुणवृद्धि होते २ अन्तमे अपर्याप्त वायुकायकी जघन्य अवगा- हनाको उत्पन्न करनेमें योग्य आवलीके असंख्यातमें भागप्रमाण असंख्यातका गुणाकार आजाय तब उसके साथ जघन्य अवगाहनाका गुणा करनेसे अपर्याप्त वायुकायकी जघन्य अवगाहनाका प्रमाण निकलता है । यह पूर्वोक्त कथन विना अंकसंदृष्टिके समझमें नहीं आसकता इसलिये यहापर अंकसंदृष्टि लिखदेना उचित समझते है। वह इस प्रकार है- कल्पना कीजिये कि जघन्य अवगाहनाका प्रमाण ९६० है और जवन्य संख्यातका प्रमाण २ तथा उत्कृष्ट संख्यातका प्रमाण १५ और जवन्य परीतासंख्यातका प्रमाण १६ है। इस जघन्य अवगाहनाके प्रमाणमें जघन्य अवगाह्नाका ही भाग देनेसे १ लब्ध आता है रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम उसको जघन्य अवगाहनामें मिलानेसे असंख्यातभागवृद्धिका आदिस्थान होता है। और जघन्य परीतासंख्यात अर्थात् १६ का भाग देनेसे ६० लब्ध आते है उनको जघन्य अवगाहनामें मिलानेसे असंख्यातभागवृद्धिका उत्कृष्ट स्थान होता है। उत्कृष्ट संख्यातका अर्थात् १५ का जघन्य अवगाहनामें भाग देनेसे लब्ध ६४ आते है इनको जघन्य २ का अवगाहनामें मिलानेसे संख्यातभागवृद्धिका आदिस्थान होता है । जघन्यमें भागदेनेसे जो लब्ध आवे उसको अर्थात् जघन्यके आधेको जघन्यमें मिलानेसे संख्या- तभागवृद्धिका उत्कृष्ट स्थान होता है । परन्तु उत्कृष्ट असंख्यातभागवृद्धिके आगे और जघन्य संख्यातभागवृद्धिके पूर्व जो तीन स्थान हैं, अर्थात् जघन्यके ऊपर ६० प्रदेशोंकी वृद्धि तथा ६४ प्रदेशोंकी वृद्धिके मध्यमें जो ६१-६२ तथा ६३ प्रदेशोंकी वृद्धिके तीन स्थान हैं, वे न तो असंख्यातभागवृद्धिमें ही आते है और न संख्यातभागवृद्धिमें ही, इसलिये इनको अवक्तव्यवृद्धिमें लिया है। इसके आगे गुणवृद्धिका प्रारम्भ होता है, जघन्यको दूना करनेसे संख्यातगुणवृद्धिका आदिस्थान ( १९२० ) होता है । इसके पूर्वमें उत्कृष्ट संख्यातभागवृ- द्धिके स्थानसे आगे अर्थात् १४४० से आगे जो १४४१ तथा १४४२ आदि १९१९ पर्यत स्थान है वे सम्पूर्ण ही अवक्तव्यवृद्धिके स्थान है । इसही प्रकार जघन्यको उत्कृष्ट संख्यातसे गुणित करनेपर संख्यातगुणवृद्धिका उत्कृष्ट स्थान होता है। और इसके आगे जघन्यपरीतासंख्यातका जघन्य अवगाहनाके साथ गुणा करनेपर असंख्यातगुणवृद्धिका आदिस्थान होता है । तथा इन दोनोंके मध्यमें भी पूर्वकी तरह अवक्तव्य वृद्धि होती है । इस असंख्यातगुणवृद्धिमें ही प्रदेशोत्तरवृद्धिके क्रमसे वृद्धि होते २ सूक्ष्म वातकायकी जघन्य अवगाहनाकी उत्पत्तिके योग्य गुणाकार प्राप्त होता है उसका जघन्य अवगाहनाके साथ गुणा करनेपर सूक्ष्म वातकायकी जघन्य अवगाहना उत्पन्न होती है। इस अंकसंदृष्टिके अनुसार अर्थ संदृष्टि भी समझना चाहिये; परन्तु अंकसंदृष्टिको ही अर्थसंदृष्टि नहीं समझना चाहिये। इसप्रकार सूक्ष्म निगोदियाके जघन्य अवगाहनास्थानोंसे सूक्ष्म वातकायकी जघन्य अव- गाहनापर्यन्त स्थानोंको वताकर तेजस्कायादिके अवगाहनास्थानोंके गुणाकारकी उत्पत्तिके क्रमको वताते है। एवं उवरि विणेओ पदेसवहिक्कमो जहाजोग्गं । सम्वत्थेक्कलि य जीवसमासाण विच्चाले ॥ १११ ॥ एवमुपर्यपि ज्ञेयः प्रदेशवृद्धिक्रमो यथायोग्यम् । सर्वत्रैकैकस्मिंश्च जीवसमासानामन्तराले ॥ १११ ॥ अर्थ-जिसप्रकार सूक्ष्म निगोदिया अपर्याप्तसे लेकर सूक्ष्म अपर्याप्त वातकायकी जघन्य अवगाहना पर्यन्त प्रदेश वृद्धिकै क्रमसे अवगाहनाके स्थान वताये, उसही प्रकार आगे

गोम्मटसारः ।
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भी तेजस्कायिकसे लेकर पर्याप्त पञ्चेन्द्रियकी उत्कृष्ट अवगाहना पर्यन्त सम्पूर्ण जीवसमासोंके प्रत्येक
भन्तरालमें प्रदेशवृद्धिक्रमसे अवगाहनास्थानोंको समझना चाहिये ।
उक्त सम्पूर्ण अवगाहनाके स्थानोंमें किसमें किसका अन्तर्भाव होता है इसको मत्स्यर-
चनाके द्वारा सूचित करते है।
हेठा जेसिं जहण्णं उबरि उक्कस्सयं हवे जत्थ ।
तत्यंतरगा सव्वे तेसिं उग्गाहणविअप्पा ॥ ११२॥
अधस्तनं येषां जघन्यमुपर्युत्कृष्टकं भवेद्यत्र ।
तत्रान्तरगाः सर्वे तेषामवगाहनविकल्पाः ॥ ११२ ।।
अर्थ-जिन जीवोंकी प्रथम जघन्य अवगाहनाका और अनन्तर उत्कृष्ट अवगाहनाका
जहाँ २ पर वर्णन किया गया है उनके मध्यमें जितने भेद है उन सबका मध्यके भेदोंमें
अन्तर्भाव होता है। भावार्थ-जिनके अवगाहनाके विकल्प अल्प है उनका प्रथम विन्यास करना,
और जिनकी अवगाहनाके विकल्प अधिक है उनका विन्यास पीछे करना । जिसके जहासे
जहांतक अवगाहना स्थान है उनका वहांसे वहांतक ही विन्यास करना चाहिये । ऐसा करनेसे
मत्स्यका आकार होजाता है । इस मत्स्यरचनासे किस जीवके कितने अवगाहनाके स्थान हैं
और कहासे कहांतक है यह प्रतीत होजाता है।
इसप्रकार स्थान योनि तथा शरीरकी अवगाहनाके निमित्तसे जीवसमासका वर्णन करके
कुलोंके द्वारा जीवसमासका वर्णन करते हैं।
बावीस सत्त तिण्णि य सत्त य कुलकोडिसयसहस्साई ।
णेया पुढविदगागणि वाउक्कायाण परिसंखा ॥११३ ॥
द्वाविंशतिः सप्त त्रीणि च सप्त च कुलकोटिशतसहस्राणि ।
ज्ञेया पृथिवीदकाग्निवायुकायकानां परिसंख्या ॥ ११३ ॥
अर्थ-पृथिवीकायके वाईस लाख कुलकोटि है, जलकायके सात लाख कुलकोटि हैं।
अग्निकायके तीन लाख कुलकोटि है । और वायुकायके सात लाख कुलकोटि है । भावार्थ-
शरीरके भेदको कारणभूत नोकर्मवर्गणाके भेदको कुल कहते है । ये कुल क्रमसे पृथिवीकायके
वाईस लाख कोटि, जल्कायके सात लाख कोटि, अग्निकायके तीन लाख कोटि, और वायु-
कायके सात लाख कोटि समझने चाहिये ।
अद्धत्तेरस वारस दसयं कुल कोडिसदसहस्साई।
जलचरपक्खिउप्पय उरपरिसप्पेसु णव होति ।। ११४ ।।
अर्द्धत्रयोदश द्वादश दशकं कुलकोटिशतसहस्राणि ।
जलचरपक्षिचतुष्पदोरुपरिसपेंषु नव भवन्ति ॥ ११ ॥

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् अर्थ-जलचरोंके कुल साढ़ेवारह लाख कोटि, पक्षियोंके वारह लाख कोटि, पशुओंके दश लाख कोटि, छातीके सहारे चलनेवाले जीव दुमुही आदिके नव लाख कोटि कुल है । छप्पंचाधियवीसं नारसकुल कोडिसदसहस्साई। सुरणेरइयणराणं जहाकम होति णेयाणि।। ११५ ॥ षट्पञ्चाधिकविंशतिः द्वादश कुलकोटिशतसहस्राणि । सुरनैरयिकनराणा यथाक्रमं भवन्ति ज्ञेयानि ॥ ११५ ॥ अर्थ-देव नारकी तथा मनुष्य इनके कुल क्रमसे छव्वीस लाख कोटि, पच्चीस लाख कोटि, तथा वारह लाख कोटि है। पूर्वोक्तप्रकारसे भिन्न २ जीवोके कुलोंकी संख्याको वताकर सबका जोड़ कितना है यह बताते है। एया य कोडिकोडी सत्ताण उदीय सदसहस्साई। पण्णं कोडिसहस्सा सवंगीणं कुलाणंय ॥ ११६ ॥ एका च कोटिकोटी सप्तनवतिश्च शतसहस्राणि । पञ्चाशत्कोटिसहस्रााण सर्वाङ्गिना कुलाना च ॥ ११६ ॥ अर्थ- सम्पूर्ण जीवोंके समस्त कुलोंकी संख्या एक कोडाकोड़ि सतानवे लाख तथा पचास हजार कोटि है। भावार्थ-सम्पूर्ण कुलोंकी संख्या एक कोड़ि सतानवे लाख पचास हजारको एककोटिसे गुणनेपर जितना लब्ध आवे उतनी है। अर्थात् १९७५००००००००००० प्रमाण है। इसप्रकार स्थान योनि देहावगाहना तथा कुलके द्वारा जीवसमास नामक दूसरे अधि- कारका वर्णन किया। इति जीवसमासप्ररूपणो नाम द्वितीयोऽधिकार. । इसके अनन्तर तीसरे पर्याप्तिनामक अधिकारका प्रतिपादन करते है। जह पुण्णापुण्णाइं गिहघडवत्थादियाई दवाई। तह पुण्णिदरा जीवा पज्जत्तिदरा मुणेयव्वा ॥११७ ॥ यथा पूर्णापूर्णानि गृहघटवस्त्रादिकानि द्रव्याणि । तथा पूर्णेतरा जीवाः पर्याप्तेतरा मन्तव्याः ।। ११७ ।। अर्थ-निसप्रकार घर घट वस्त्र आदिक अचेतन द्रव्य पूर्ण और अपूर्ण दोनो प्रका- रके होते है. उस ही प्रकार जीव भी पूर्ण और अपूर्ण दो प्रकारके होते है । जो पूर्ण है उनको पर्याप्त और जो अपूर्ण हैं उनको अपर्याप्त कहते है। भावार्थ-गृहीत आहारवर्गणाको खल- रेम भागादिरूप परिणमानेकी जीवक्री शक्तिके पूर्ण होजानेको पर्याप्ति कहते है। यह गोम्मटसारः। पर्याप्ति जिनके पाई जाय उनको पर्याप्त, और जिनकी वह शक्ति पूर्ण नहीं हुई है उन जीवोको अपर्याप्त कहते है । जिसप्रकार घटादिक द्रव्य वनचुकनेपर पूर्ण और उससे पूर्व अपूर्ण कहे जाते हैं । इसही प्रकार पर्याप्ति सहितको पर्याप्त और पर्याप्ति रहितको अपर्याप्त कहते है। पर्याप्तिके छह भेद तथा उनके स्वामियोंका नामनिर्देश करते है। आहारसरीरिदियपज्जत्ती आणपाणभासमणो । चत्तारि पंच छप्पि य एइंदियवियलसण्णीणं ॥ ११८ ॥ आहारशरीरेन्द्रियाणि पर्याप्तयः आनप्राणभाषामनान्सि । चतस्रः पञ्च षडपि च एकेन्द्रियविकलसंज्ञिनाम् ॥ ११८ ॥ अर्थ-आहार शरीर इन्द्रिय श्वासोछास भाषा मन इस प्रकार पर्याप्तिके छह भेद है। जिनमें एकेन्द्रिय जीवोंके आदिकी चार पर्याप्ति, और द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय तथा असं. ज्ञिपंचेन्द्रियके मनःपर्याप्तिको छोड़कर शेष पांच पर्याप्ति होती है। और संज्ञी जीवोके सभी पर्याप्ति होती है । भावार्थ--एक शरीरको छोड़कर नवीन शरीरको करण भूत जिस नोकर्म वर्गणाको जीव ग्रहण करता है उसको खल रस भागरूप परिणमावनेकेलिये जीवकी शक्तिके पूर्ण होजानेको आहारपर्याप्ति कहते है । और खलभागको हड्डी आदि कठोर अवयवरूप तथा रसभागको खून आदि द्रव ( नरम ) अवयवरूप परिणमावनेकी शक्तिके पूर्ण होनेके शरीरपर्यप्ति कहते है। तथा उस ही नोकर्मवर्गणाके स्कन्धर्मसे कुछ वगणाओंको अपनी २ इन्द्रियके स्थानपर उस उस द्रव्येन्द्रियके आकार परिणमावनेकी शक्तिके पूर्ण होजानेको इन्द्रियपर्याप्ति कहते है । इसही प्रकार कुछ स्कन्धोको श्वासोच्छासरूप परिणमावनेको जो जविकी शक्तिकी पूर्णता उसको श्वासोछास पर्याप्ति कहते है । और वचनरूप होनेके योग्य पुद्गल स्कन्धोंको ( भाषावर्गणाको ) वचनरूप परिणमावनेकी जीवकी शक्तिके पूर्ण होनेको भाषापर्याप्ति कहते है । तथा द्रव्यमनरूप होनेको योग्य पुद्गलस्कन्धोको ( मनोवर्गणाको ) द्रव्य- मनके आकार परिणमावनेकी शक्तिके पूर्ण होनेको मन पर्याप्ति कहते है। इन छह पर्या- प्तियोंमसे एकेन्द्रिय जीवोके आदिकी चार पर्याप्ति ही होती है। और द्वीन्द्रियसे लेकर अस- ज्ञिपंचेन्द्रिय पर्यन्त मनःपर्याप्तिको छोड़कर पाच पर्याप्ति होती है । और सज्ञि जीवोंके सभी पर्याप्ति होती है। जिन निवोंकी पर्याप्ति पूर्ण हो जाती है उनको पर्याप्त, और जिनकी पूर्ण नहीं होती उनको अपर्याप्त कहते है। अपर्याप्त जीवोंके भी दो भेद है-एक निर्वृ. त्यपर्याप्त दूसरा लब्ध्यपर्याप्त । जिनकी पर्याप्ति अभीतक पूर्ण नहीं हुई है, किन्तु अन्तर्मु- हूर्तके वाद नियमसे पूर्ण होजायगी उनको निवृत्त्यपर्याप्त कहते है। और जिसकी अभीतक भी पर्याप्ति पूर्ण नहीं हुई और पूर्ण होनेसे प्रथम ही जिसका मरण भी होनायगा-अर्थात् अपनी आयुके काल्मे जिसकी पर्याप्ति कभी पूर्ण न हो उसको लभ्यपर्याप्तक कहते हैं । गो ७

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्
इन पर्याप्तियोंमेंसे प्रत्येक तथा समस्तके प्रारम्भ और पूर्ण होनेमें कितना काल लगता
हैं यह बताते है।
पज्जत्तीपठवणं जुगवं तु कमेण होदि णिठवणं ।
अंतोमुहुत्तकालेणहियकमा तत्तियालावा ॥ ११९ ॥
पर्याप्तिप्रस्थापनं युगपत्तु क्रमेण भवति निष्ठापनम् ।
अन्तर्मुहूर्तकालेन अधिकक्रमास्तावदालापात् ॥ ११९ ॥
अथ-सम्पूर्ण पर्याप्तियोंका आरम्भ तो युगपत् होता है, किन्तु उनकी पूर्णता क्रमसे
होती है। इनका काल यद्यपि पूर्व २ की अपेक्षा उत्तरोत्तरका कुछ २ अधिक है; तथापि सामा-
न्यकी अपेक्षा सवका अन्तर्मुहूर्तमात्र ही काल है । भावार्थ---एकसाथ सम्पूर्ण पर्याप्तियोंके
प्रारम्भ होनेके अनन्तर अन्तर्मुहूर्त कालमें आहारपर्याप्ति पूर्ण होती है। और उससे संख्यात-
भाग अधिक कालमें शरीर पर्याप्ति पूर्ण होती है । इस ही प्रकार आगे २ की पर्याप्तिके पूर्ण
होनेमें पूर्व २ की अपेक्षा कुछ २ अधिक २ काल लगता है, तथापि वह अन्तर्मुहूर्तमात्र
ही है । क्योकि असंख्यात समयप्रमाण अन्तर्मुहूर्तके भी असंख्यात भेद है; क्योंकि
असंख्यातके भी असंख्यात भेद होते है। इस लिये सम्पूर्ण पर्याप्तियोंके समुदायका
काल भी अन्तर्मुहर्तमात्र ही है।
पर्याप्त और निवृत्यपर्याप्तका काल वताते हैं ।
पजत्तस्स य उदये णियणियपज्जत्तिणिछिदो होदि
जाव सरीरमपुण्णं णिव्वत्ति अपुण्णगो ताव ॥ १२० ॥
पर्याप्तस्य च उदये निजनिजपर्याप्तिनिष्ठितो भवति ।
यावत् शरीरमपूर्ण निर्वृत्यपूर्णकस्तावत् ॥ १२० ॥
अर्थ-पर्याप्त नामकर्मके उदयसे जीव अपनी २ पर्याप्तियोंसे पूर्ण होता है; तथापि
जबतक उसकी शरीरपर्याप्ति पूर्ण नहीं होती तवतक उसको पर्याप्त नहीं कहते; किन्तु
निर्वृत्यपर्याप्त कहते है। भावार्थ---इन्द्रिय श्वासोछास भाषा और मन इन पर्याप्तियोंके पूर्ण
नहीं होनेपर भी यदि शरीरपर्याप्ति पूर्ण होगई है तो वह जीव पर्याप्त ही है, किन्तु उससे
पूर्व निर्वृत्यपर्याप्तक कहा जाता है।
लन्ध्यपर्याप्तकका स्वरूप दिखाते है।
उदये दु अपुण्णस्स य सगसगपज्जत्तियं ण णिवदि ।
अंतोमुहुत्तमरणं लद्धिअपज्जत्तगो सो दु ॥ १२१ ।।
उदये तु अपूर्णस्य च स्वकस्वकपर्याप्तीननिष्ठापयति ।
अन्तर्मुहूर्तमरणं लब्ध्यपर्याप्तकः स तु ॥ १२१ ॥

गोम्मटसारः । ५१ अर्थ-अपर्याप्त नामकर्मके उदय होनेसे जो जीव अपने २ योग्य पर्याप्तियोंको पूर्ण न करके अन्तर्मुहूर्तकालमें ही मरणको प्राप्त होजाय उसको लब्ध्यपर्याप्तक कहते हैं । भावार्थ-जिन जीवोका अपर्याप्त नामकर्मके उदयसे अपने २ योग्य पर्याप्तियोंको पूर्ण न करके अन्तर्मुहूर्तमें ही मरण होजाय उनको लब्ध्यपर्याप्तक कहते है । इस गाथामें जो तु शब्द पडा है उससे इस प्रकारके जीवोंका अन्तर्मुहूर्तमें ही मरण होता है, और दूसरे चकारसे इन जीवोंकी जघन्य और उत्कृष्ट दोंनो ही प्रकारकी स्थिति अन्तर्मुहूर्तमात्रही ऐसा समझना चाहिये । यह अन्तर्मुहूर्त एक श्वासके अठारहवें भागप्रमाण है । इस प्रकारके - लब्ध्यपर्याप्तक जीव एकेन्द्रियसे लेकर पंचेन्द्रिय पर्यन्त सबहीमें पाये जाते है । यदि एक जीव एक अन्तर्मुहूर्तमें लब्ध्यपर्याप्तक अवस्थामें ज्यादेसे ज्यादे भवोंको धारण करै तो कितने करसकता है ? यह बताते है । तिण्णिसया छत्तीसा छावट्टिसहस्सगाणि मरणाणि । अन्तोमुहुत्तकाले तावदिया चेव खुद्दभवा ।। १२२ ।। त्रीणि शतानि षट्त्रिंशत् षट्षष्ठिसहस्रकाणि मरणानि । अन्तर्मुहूर्तकाले तावन्तश्चैव क्षुद्रभवाः ॥ १२२ ॥ अर्थ-एक अन्तर्मुहूर्तमें एक लब्ध्यपर्याप्तक जीव घ्यासठ हजार तीनसौ छत्तीस मरण और इतने ही भवोंको ( जन्म ) भी धारण कर सकता है । भावार्थ-एक लब्ध्यप- यप्तिक जीव यदि निरन्तर भवोंको धारण करे तो ६१३३६ जन्म और इतने ही मरणोंको धारण कर सकता है । अधिक नहीं करसकता। उक्त भोंमें एकेन्द्रियादिकमेसे किस २ के कितने २ भोंको धारण करता है यह बताते हैं। सीदी सट्ठी तालं वियले चउवीस होंति पंचक्खे । छावहि च सहस्सा सयं च वत्तीसमयक्खे ॥ १२३ ॥ अशीतिः षष्ठिः चत्वारिशद्विकले चतुर्विशतिर्भवन्ति पंचाक्षे । षट्पष्ठिश्च सहस्राणि शतं च द्वात्रिंशमेकाक्षे ॥ १२३ ॥ अर्थ-विकलेन्द्रियोंमें द्वीन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तकके ८० भव, त्रीन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तक्के ६०, चतुरिन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तकके ४० और पंचेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तकके २४, तथा एकेन्द्रि- योंके ६६१३२ भवोंको धारण कर सकता है, अधिकको नहीं । एकेन्द्रियोंकी संख्याको भी स्पष्ट करते है। पुढविदगागणिमारुदसाहारणथूलसुहमपत्तेया। एदेसु अपुण्णेसु य एक्कक्के वार खं छक्कं ।। १२४ ।।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । ६२ पृथ्वीदकाग्निमारूतसाधारणस्थूलसूक्ष्मप्रत्येकाः । एतेषु अपूर्णेषु च एकैकस्मिन् द्वादश खं पटकम् ॥ १२४ ॥ अर्थ-स्थूल और सूक्ष्म दोनोंही प्रकारके जो पृथ्वी जल अग्नि वायु और साधारण, और प्रत्येक वनस्पति, इसप्रकार सम्पूर्ण ग्यारह प्रकारके लब्ध्यपर्याप्तों से प्रत्येक ( हर- एक ) के ६० १२ भेद होते है । भावार्थ-स्थूल पृथिवी सूक्ष्म पृथिवी स्थूल जल सूक्ष्म जल स्थूल वायु सूक्ष्म वायु स्थूल अग्नि सूक्ष्म अग्नि स्थूल साधारण सूक्ष्म साधारण तथा प्रत्येक वनस्पति इन ग्यारह प्रकारके लब्ध्यपर्याप्तकोमेंसे प्रत्येकके ६०१२ भव होते है। इसलिये ११ को ६०१२ से गुणा करनेपर एकेन्द्रिय लन्ध्यपर्याप्तक जीवोंके उत्कृष्ट भाका प्रमाण ६६१३२ निकलता है । समुद्रात अवस्थामे केवलियोंके भी अपर्याप्तता कही है सो किस प्रकार हो सकती है यह बताते है । पज्जत्तसरीरस्स य पज्जत्तुदयस्स कायजोगस्स । जोगिस्स अपुण्णत्तं अपुण्णजोगोत्ति णिद्दिठं ॥ १२५ ॥ पर्याप्तशरीरस्य च पर्याप्त्युदयस्य काययोगस्य । योगिनोऽपूर्णत्वमपूर्णयोग इति निर्दिष्टम् ॥ १२५ ॥ अर्थ-जिस सयोग केवलीका शरीर पूर्ण है, और उसके पर्याप्ति नाम कर्मका उदय भी मौजूद है, तथा काययोग भी है, उसके अपर्याप्तता किसप्रकार हो सकती है ? तो इसका कारण योगका पूर्ण न होना ही बताया है । भावार्थ-जिसके अपर्याप्त नामकर्मका उदय हो, अथवा जिसका शरीर पूर्ण न हुआ हो उसको अपर्याप्त कहते है। क्योंकि पहले " सरीरमपुण्णं णिवत्तिअपुण्णगो ताव" ऐसा कह आये है। अर्थात् जब तक शरीर पर्याप्ति पूर्ण न हो तब तककी अवस्थाको निर्वृत्त्यपर्याप्ति कहते है । परन्तु केवलीका शरीर भी पर्याप्त है, और उनके पर्याप्ति नामकर्मका उदय भी है, तथा काययोग भी मौजूद है, तब उसको अपर्याप्त क्यों कहा ? इसका कारण यह है कि यद्यपि उनके काययोग आदि सभी मौजूद है तथापि उनके कपाट, प्रतर, लोकपूर्ण तीनोही समुद्रात अवस्थामें योग पूर्ण नहीं है, इस ही लिये उनको आगममे गौणतासे अपर्याप्त कहा है, मुख्यतासे अपर्याप्त अवस्था जहांपर पाई जाती है ऐसे प्रथम द्वितीय चतुर्थ और छटा ये चार ही गुणस्थान है। किस २ गुणस्थानमें पर्याप्त और अपर्याप्त अवस्था पाई जाती है ? यह बताते है । लद्धिअपुण्णं मिच्छे तत्थवि विदिये च उत्थछहे य । णिवत्तिअपज्जत्ती तत्थवि सेसेसु पज्जत्ती ॥ १२६ ।। जाव --- गोम्मटसारः। लब्ध्यपूर्ण मिथ्यात्वे तत्रापि द्वितीये चतुर्थषष्ठे च । निवृत्त्यपर्याप्तिः तत्रापि शेषेषु पर्याप्तिः ॥ १२६ ॥ अर्थ-लब्ध्यपर्याप्तक मिथ्यात्व गुणस्थानमें ही होते है। निर्वृत्यपर्याप्तक प्रथम द्वितीय चतुर्थ और छट्टे गुणस्थानमें होते है । और पर्याप्ति उक्त चारो और शेष सभी गुणस्था- नोंमें पाई जाती है। भावार्थ-प्रथम गुणस्थानमें लब्ध्यपर्याप्ति निवृत्यपर्याप्ति पर्याप्ति तीनों अवस्था होती है । सासादन असंयत और प्रमत्तमें निवृत्यपर्याप्त पर्याप्त ये दो अवस्था होती हैं। उक्त तथा शेष सब ही गुणस्थानों में पर्याप्ति पाई जाती है । प्रमत्त गुणस्थानमें जो निर्वृत्यपर्याप्त अवस्था कही है, वह आहारक मिश्रयोगकी अपेक्षासे है। इस गाथामें जो च शब्द पड़ा है। उससे सयोगकेवली भी निर्वृत्यपर्याप्तक होते है यह वात गौणतया सूचित की है। सासादन और सम्यक्त्वके अभावका नियम कहां २ पर है यह बताते है । हेट्ठिमछप्पुढवीणं जोइसिवणभवणसव्वइत्थीणं । पुण्णिदरे णहि सम्मो ण सासणो णारयापुण्णे ॥ १२७ ।। अधःस्तनषट्पृथ्वीनां ज्योतिप्कवनभवनसर्वस्त्रीणाम् । पूर्णेतरस्मिन् न हि सम्यक्त्वं न सासनो नारकापूर्णे ॥ २७ ॥ अर्थ-द्वितीयादिक छह नरक और ज्योतिषी व्यन्तर भवनवासी ये तीन प्रकारके देव, तथा सम्पूर्ण स्त्रिया इनकी अपर्याप्त अवस्थामें सम्यक्त्व नहीं होता । और सासादन सम्य- ग्दृष्टी अपर्याप्त नारकी नहीं होता । भावार्थ -सम्यक्त्वसहित जीव मरण करके द्वितीयादिक छह नरक ज्योतिषी व्यन्तर भवनवासी देवोंमें और समग्र स्त्रियोंमें उत्पन्न नहीं होता । और सासादनसम्यग्यदृष्टि मरण कर नरकको नहीं जाता । इति पर्याप्तिप्ररूपणो नाम तृतीयोऽधिकारः : अब प्राणप्ररूपणा क्रमप्राप्त है उसमे प्रथम प्राणका निरुक्तिपूर्ण लक्षण कहते है। बाहिरपाणेहिं जहा तहेव अभंतरेहिं पाणेहिं । पाणति जेहिं जीवा पाणा ते होंति णिहिट्ठा ॥ १२८॥ वाह्यप्राणैर्यथा तथैवाभ्यन्तरैः प्राणैः । प्राणन्ति यै वाः प्राणास्ते भवन्ति निर्दिष्टाः ॥ १२८ ।। अर्थ-जिस प्रकार अभ्यन्तरप्राणों के कार्यभूत नेत्रोंका खोलना, वचनप्रवृत्ति, उच्छास निःश्वास आदि वाह्य प्राणोंके द्वार जीव जीते है, उसही प्रकार जिन अभ्यन्तर इन्द्रिया- वरणकर्मके क्षयोपशमादिके द्वारा जीवमें जीवितपनेका व्यवहार हो उनको प्राण कहते है। भावार्थ-जिनके सहायमें जीवमें जीवितपनेका और वियोग होनेपर मरणपनेका व्यवहार ६४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । हो उनको प्राण कहते है । ये प्राण पूर्वोक्त , पर्याप्तियोंके कार्यरूप है-अर्थात् प्राण और पर्याप्तिमे कार्य और कारणका अन्तर है । क्योंकि गृहीत पुद्गलस्कन्ध विशेषोंको इन्द्रिय वचन आदिरूप परिणमावनेकी शक्तिकी पूर्णताको पर्याप्ति, और वचन व्यापार आदिकी कारण- भूत शक्तिको, तथा वचन आदिको प्राण कहते है। प्राणके भेदोंको गिनाते है। पंचवि इंदियपाणा मणवचिकायेसु तिण्णि बलपाणा । आणापाणप्पाणा आउगपाणेण होति दस पाणा ॥ १२९ ।। पञ्चापि इन्द्रियप्राणाः मनोवचःकायेषु त्रयो बलप्राणाः । अनापानप्राणा आयुष्कप्राणेन भवन्ति दश प्राणाः ॥ १२९ ।। अर्थ-पांच इन्द्रियप्राण-स्पर्शन रसन प्राण चक्षुः श्रोत्र । तीन बलप्राण-मनोबल वचनवल कायवल । श्वासोच्छ्रास तथा आयु इस प्रकार ये दश प्राण है । द्रव्य और भाव दोनोंही प्रकारके प्राणोंकी उत्पत्तिकी सामग्री बताते है। वीरियजुदमदिखउवसमुत्था णोइंदिये दियेसु बला । देहुदये कायाणा वचीबला आउ आउदये ॥१३०॥ वार्ययुतमतिक्षयोपशमोत्था नोइन्द्रियेन्द्रियेषु बलाः । देहोदये कायानौ वचोबल आयुः आयुरुदये ॥ १३०॥ अर्थ-~मनोबल प्राण और इन्द्रिय प्राण वीर्यान्तराय कर्म और मतिज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशम रूप अन्तरङ्ग कारणसे उत्पन्न होते हैं। शरीरनामकर्मके उदयसे कायवलप्राण होता है । श्वासोच्छ्रास और शरीरकर्मके उदयसे प्राण-श्वासोच्छ्रास उत्पन्न होते है । स्वरनाम- कर्मके साथ शरीर नामक्रमका उदय होनेपर वचनबल प्राण होता है। आयु कर्मके उदयसे आयुःप्राण होता है । भावार्थ-वीर्यान्तराय और अपने २ मतिज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशमसे उत्पन्न होनेवाले मनोवल और इन्द्रियप्राण, निज और पर पदार्थको ग्रहण करनेमें समर्थ लब्धिनामक भावेन्द्रिय रूप होते है । इस ही प्रकार अपने २ पूर्वोक्त कारणसे उत्पन्न होनेवाले कायवलादिक प्राणोंमें शरीरकी चेष्टा उत्पन्न करनेकी सामर्थ्यरूप कायबलप्राण, श्वासोच्छासकी प्रवृत्तिमें कारणभूत शक्तिरूप श्वासोच्छास प्राण, वचनव्यापारको कारणभूत शक्तिरूप वचोबल प्राण, नरकादि भव धारण करनेकी शक्तिरूप आयुःप्राण होता है। प्राणोंके स्वामियोंको बताते है। इंदियकायाऊणि य पुण्णापुण्णेसु पुण्णगे आणा। बीइंदियादिपुण्णे वचीमणो सणिपुण्णेव ॥ २३१ ॥ J गोम्मटसारः। इन्द्रियंकाया!षि च पूर्णापूर्णेषु पूर्णके आनः । द्वीन्द्रियादिपूर्ण वचः मनः संज्ञिपूर्णे एव ॥ १३१ ।। अर्थ-इन्द्रिय काय आयु ये तीन प्राण, पर्याप्त और अपर्याप्त दोनोही के होते है। किन्तु श्वासोच्छ्रास पर्याप्तके ही होता है । और वचनबल प्राण पर्याप्त द्वीन्द्रियादिके ही होता है। तथा मनोबल प्राण संज्ञिपर्याप्तके ही होता है। एकेन्द्रियादि जीवोंमें किसके कितने प्राण होते है इसका नियम बताते है । दस सण्णीणं पाणा सेसेगूणंतिमस्स वेऊणा । पज्जत्तेसिदरेसु य सत्त दुगे सेसगेगूणा ॥ १३२ ॥ दश संज्ञिनां प्राणाः शेषैकोनमन्तिमस्य व्यूनाः । पर्याप्तेष्वितरेषु च सप्त द्विके शेषकैकोनाः ॥ १३२ ॥ अर्थ-पर्याप्त संज्ञिपंचेन्द्रियके दश प्राण होते है । शेषके पर्याप्तकोंके एक २ प्राण कम होता जाता है; किन्तु एकेन्द्रियोके दो कम होते है । अपर्याप्तक संज्ञि और असंज्ञी पंचे- न्द्रियके सात प्राण होते है और शेषके अपर्याप्त जीवोके एक २ प्राण कम होता जाता है। भावार्थ-पर्याप्त संज्ञिपंचेन्द्रियके सबही प्राण होते है। असंज्ञिके मनोबलप्राणको छोड़कर वाकी नब प्राण होते है । चतुरिन्द्रियके श्रोत्रेन्द्रियको छोड़कर आठ, और त्रीन्द्रियके चक्षुको छोड़कर बाकी सात, द्वीन्द्रियके घ्राणको छोड़कर बाकी छह, और एकेन्द्रियके रसनेन्द्रिय तथा वचनबलको छोड़कर बाकी चार प्राण होते है । यह सम्पूर्ण कथन पर्याप्तककी अपेक्षासे है । अपर्याप्तकमें कुछ विशेषता है । वह इस प्रकार है कि संज्ञि और असंज्ञि पंचेन्द्रियके श्वासो- च्छास वचोबल मनोवलको छोड़कर वाकी पाच इन्द्रिय कायवल आयुःप्राण इसप्रकार सात प्राण होते है । आगे एक २ कम होता गया है—अर्थात् चतुरिन्द्रियके श्रोत्रको छोड़कर वाकी १ प्राण, त्रीन्द्रियके चक्षुः को छोड़कर ५, और द्वीन्द्रयके घ्राणको छोड़कर ४, तथा एकेन्द्रियके रसनाको छोड़कर बाकी तीन प्राण होते हैं । इति प्राणप्ररूपणो नाम चतुर्थोऽधिकारः । इह जाहि बाहियावि य जीवा पावंति दारुणं दुक्खं । सेवंतावि य उभये ताओ चत्तारि सण्णाओ ॥ १३३ ।। इह याभिर्वाधिता अपि च जीवाः प्राप्नुवन्ति दारुणं दुःखम् । सेवमाना अपि च उभयस्मिन् ताश्चततः संज्ञाः ॥ १३३ ॥ अर्थ-जिनसे सक्लेशित होकर जीव इस लोकमें और जिनके विषयका सेवन करनेसे दोनों ही भवॉमें टारुण दुःखको प्राप्त होता है उनको संज्ञा कहते है। उसके चार भेद है।

रायचन्द्र नशाखमालायाम्
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भावार्थ---संज्ञानाम वांछाका है, जिसके निमित्तसे दोनोंही भवोंमें दारुण दुःखकी प्राप्ति
होती है उस वांछाको संज्ञा कहते है । उसके चार भेद है, आहारसंना भयसना मैथुन-
संज्ञा परिग्रहसंज्ञा।
आहारसंज्ञाका स्वरूप बताते हैं।
आहारदसणेण य तस्सुबजोगेण ओमकोठाए।
सादिदरुदीरणाए वदि हु आहारसण्णा हु॥ १३४ ॥
आहारदर्शनेन च तस्योपयोगेन अवमकोष्ठया ।
साततरोदीरणया भवति हि आहारसंज्ञा हि || १३४ ॥
अर्थ-आहारके देखनेसे अथवा उसके उपयोगसे और पेटके खाली होनेसे तथा
असातावेदनीयके उदय और उदीर्णा होनेपर जीवके नियमसे आहारसंज्ञा उत्पन्न होती है।
भावाथ-किसी उत्तम रसयुक्त आहारके देखनेसे अथवा पूर्वानुभूत भोजनका स्मरण करनेसे
यद्वा पेटके खाली होजानेसे और असाता वेदनीयके उदय और उदीर्णासे इत्यादि और भी
अनेक कारणोसे आहारसंज्ञा अर्थात् आहारकी वाछा उत्पन्न होती है।
भयसंज्ञाके कारण और उसका स्वरूप बताते है।
अइभीमदसणेण य तस्सुवजोगेण ओमसत्तीए ।
भयकम्मुदीरणाए भयसण्णा जायदे चदहि ॥ १३५ ।।
अतिभीमदर्शनेन च तस्योपयोगेन अवमसत्त्वेन ।
भयकर्मोदीरणया भयसंज्ञा जायते चतुर्भिः ॥ १३५ ॥
अर्थ-अत्यन्त भयंकर पदार्थके देखनेसे, अथवा पहले देखे हुए भयंकर पदार्यके
स्मरणादिसे, यद्वा शक्तिके हीन होनेपर, और अंतरगमें भयकर्मकी उदय उदीर्णा होनेपर
इत्यादि कारणोंसे भयसंज्ञा होती है।
मैथुनसंज्ञाको बताते है।
पणिदरसभोयणेण य तस्सुवजोगे कुसीलसेवाए।
वेदस्सुदीरणाए मेहुणसण्णा हवदि एवं ॥ १३६ ॥
प्रणतिरसभोजनेन च तस्योपयोगे कुशीलसेवया ।
वेदस्योदीरणया मैथुनसंज्ञा भवति एवम् ॥ १३६ ॥
अर्थ-स्वादिष्ट और गरिष्ठ रसयुक्त भोजन करनेसे, और पहले भुक्त विषयोंका
स्मरण आदि करनेसे, तथा कुशीलका सेवन करनेसे और वेद कर्मका उदय उदीर्णा आदिसे
मैथुनसंज्ञा होती है।
परिग्रह संज्ञाका वर्णन करते है।
उवयरणदसणेण य तस्सुवजोगेण मुच्छिदाए य ।
लोहस्सुदीरणाए परिग्गहे जायदे सण्णा ॥ १३७ ॥

गोम्मटसारः। ५७ उपकरणदर्शनेन च तस्योपयोगेन मूर्छिता ये च । लोभस्योदीरणया परिग्रहे जायते संज्ञा ॥ १३७ ॥ अर्थ-इत्र भोजन उत्तम वस्त्र स्त्री आदि भोगोपभोगके साधनभूत पदार्थोके देखनेसे अथवा पहले भुक्त पदार्थोंका स्मरण करनेसे, और ममत्व परिणामोंके होनेस, लोभकर्मका उदय उदीर्णा होनेसे, इत्यादि कारणोंसे परिग्रहसंज्ञा उत्पन्न होती है। किस जीवके कौनसी संज्ञा होती है यह बताते हैं। णठपमाए पढमा सण्णा हि तत्थ कारणाभावा । सेसा कम्मत्थित्तेणुबयारेणत्थि णहि कज्जे ॥ १३८ ॥ नष्टप्रमादे प्रथमा संज्ञा न हि तत्र कारणाभावात् । शेषाः कर्मास्तित्वेनोपचारेण सन्ति न हि कार्ये ॥ १३८ ।। अर्थ-अप्रमत्त गुणस्थानमें आहारसंज्ञा नहीं होती, क्योंकि यहांपर उसका कारण असातवेदनीय कर्मका उदय नहीं है । और शेषकी तीन संज्ञा उपचारसे वहांपर होती है। क्योंकि उनका कारण कर्म वहापर मौजूद है । किन्तु उनका कार्य वहांपर नहीं होता। भावार्थ-साता असाता वेदनीय और मनुष्य आयु इन तीन प्रकृतियोंकी उदीरणा प्रमत्तविरतमें ही होती है--आगे नहीं । इसलिये सातवें गुणस्थानमे आहारसंज्ञा नहीं है । किन्तु शेष तीन संज्ञा उपचारसे होती हैं, वास्तविक नहीं । क्योकि उनका कारणभूत कर्म वहांपर है। किन्तु भागना रतिक्रीडा परिग्रहस्वीकार आदिमे प्रवृत्तिरूप उनका कार्य नहीं है । क्योंकि वहांपर ध्यान अवस्था ही है । अन्यथा कभी भी ध्यान न हो सकेगा, और कर्मोंका क्षय तथा मुक्तिकी प्राप्ति भी नहीं होसकेगी। इति संज्ञाप्ररूपणो नाम पञ्चमोऽधिकारः । अथ मडूगलपूर्वक क्रमप्राप्त मार्गणा महाधिकारको कहते है । धम्मगुणमग्गणाहयमोहारिबलं जिणं णभंसित्ता। मग्गणमहाहियारं विविहहियारं भणिस्सामो ॥ १३९॥ धर्मगुणमार्गणाहतमोहारिवलं जिनं नमसित्वा । मर्गणामहाधिकार विविधाधिकारं मणिप्यामः ।। १३९ ।। अर्थ-सम्यग्दर्शनादि अथवा उत्तमक्षमादि धर्मरूपी धनुष, और ज्ञानादि गुणरूपी प्रत्यंचा ( डोरी ), तथा चौदह मार्गणारूपी वाणोंसे जिसने मोहरूपी शत्रुके वलको नष्ट कर. दिया है इसप्रकारके जिनेन्द्रदेवको नमस्कार करके, मार्गणा महाधिकारका जिसमें कि और मी अनेक अधिकारोंका अन्तर्भाव होता है वर्णन करूंगा । गो.८ रायचन्द्रनशास्त्रमालायाम इसप्रकार मार्गणानिरूपणकी प्रतिज्ञा करके प्रथम उसका ( मार्गणाका ) निरुक्तिपूर्वक लक्षण कहते है । जाहि व जासु व जीवा मग्गिजंते जहा तहा दिट्ठा । ताओ चोदस जाणे सुयणाणे मग्गणा होति ॥ १४० ॥ याभिर्वा यासु वा जीवा मृग्यन्ते यथा तथा दृष्टाः । ताश्चतुर्दश जानीहि श्रुतज्ञाने मार्गणा भवन्ति ॥ १४०॥ अर्थ-जिसप्रकारसे प्रवचनमें देखेगये हो उसही प्रकारसे जीवादि पदार्थोंका जिन भावोंके द्वारा अथवा जिन पर्यायोंमें विचार किया जाय वे ही मार्गणा है, ऐसा सममना चाहिये। उनके चौदह भेद है। चौदह मार्गणाओंके नाम बताते है । गइइंदियेसु काये जोगे वेदे कसायणाणे य । संजमदंसणलेस्सामवियासम्मत्तसण्णिआहारे ॥ १४१ ।। गतीन्द्रियेषु काये योगे वेदे कषायज्ञाने च । संयमदर्शनलेश्यामन्यतासम्यक्त्वसंश्याहारे ॥ १४१॥ अर्थ-गति इन्द्रिय काय योग वेद कषाय ज्ञान संयम दर्शन लेश्या भव्य सम्यक्त्व संज्ञा आहार, ये चौदह मार्गणा है। अन्तरमार्गणाओंके भेद तथा उनके कालका नियम बताते हैं । उबसमसुहमाहारे वेगुश्वियमिस्सणरअपज्जत्ते । सासणसम्मे मिस्से सांतरगा मग्गणा अट्ठ ॥१४२ ।। उपशमसूक्ष्माहारे वैर्विकामिश्रनरापर्याप्ते । सासनसम्यक्त्वे मिश्रे सान्तरका मार्गणा अष्ट ॥ १४२ ॥ अर्थ-उपशमसम्यक्त्व सूक्ष्मसापराय आहारकयोग आहारकमिश्रयोग वैक्रियिकमिश्न अपर्याप्त मनुष्य सासादनसम्यक्त्व मिश्र ये अन्तमार्गणा है । उक्त आठ अन्तरमार्गणाओंका उत्कृष्ट और जघन्य काल बताते है । सत्तदिणा छम्मासा वासपुधत्त च बारसमुहुत्ता। पल्लासंखं तिण्हं वरमवरं एकसमयो दु॥१४३ ॥ सप्तदिनानि पण्मासा वर्षपृथक्त्वं च द्वादशमुहूर्ताः । पल्यासंख्यं त्रयाणां वरमवरमेकसमयस्तु ।। १४३ ॥ अर्थ-उक्त आठ अन्तर मार्गणाओका उत्कृष्ट काल क्रमसे सात दिन, छह महीना, गोम्मटसारः। पृथक्त्व वर्ष, पृथक्त्व वर्ष, वारहमुहूर्त और अन्तकी तीन मार्गणाओंका काल पल्यके असंख्या- तवें भाग है। और जघन्य काल सबका एक समय है । भावार्थ-उपशम सम्यक्त्वका उत्कृष्ट काल सात दिन, सूक्ष्मसांपरायका छह महीना, आहारकयोगका पृथक्त्ववर्ष, तथा आहारक- मिश्रका पृथक्त्ववर्ष, वैक्रियिकमिश्रका बारह मुहूर्त, अपर्याप्त मनुष्यका पल्यके असंख्यातवें भाग, तथा सासादन सम्यक्त्व और मिश्र इन दोनोंका भी उत्कृष्ट अंतरकाल पल्यके असंख्यांतवें भाग है । और जघन्य काल सबका एक समय ही है। अंतरमार्गणाविशेषोंको दिखाते है। पढमुवसमसहिदाए विरदाविरदीए चोदसा दिवसा । विरदीए पण्णरसा विरहिदकालो दु बोधवो ।। १४४ ॥ प्रथमोपशमसहिताया विरताविरतेश्चतुर्दश दिवसाः । विरतेः पञ्चदश विरहितकालस्तु बोद्धव्यः ॥ १४४ ॥ अर्थ-प्रथमोपशमसम्यक्त्वसहित पचमगुणस्थानका उत्कृष्ट विरहकाल चौदह दिन, और छठे सातमें गुणस्थानका उत्कृष्ट विरहकाल पंद्रह दिन समझना चाहिये । भावार्थ-उपशम- सम्यक्त्वके दो भेद है, एक प्रथमोपशम सम्यक्त्व दूसरा द्वितीयोपशम सम्यक्त्व । चार अनन्तानुबन्धी तथा एक दर्शनमोहनीय ( मिथ्यात्व ) के, अथवा तीनों दर्शनमोहनीय और चार अनंतानुबंधी, इस प्रकार पांच या सातके उपशमसे जो हो उसको प्रथमोपशम सम्यक्त्व कहते है। और अनन्तानुवन्धी चतुष्कका विसंयोजन और दर्शनमोहनीयत्रिकका उपशम होनेसे जो सम्यक्त्व होता है उसको द्वितीयोपशम सम्यक्त्व कहते है । इनमेंसे प्रथमोपशम सम्यक्त्वसहित पंचमगुणस्थानका उत्कृष्ट विरहकाल चौदह दिन, और छट्टे सातवे गुणस्थानका पंद्रह दिन है। किन्तु जघन्य विरहकाल सर्वत्र एक समय ही है। गतिमार्गणाका प्रारम्भ करते हुए प्रथम गतिशब्दकी निरुक्ति और उसके भेदोंको गिनाते है। गइउदयजपज्जाया चउगइगमणस्सहेउ वा हु गई। णारयतिरिक्खमाणुसदेवगइत्तिय हवे चदुधा ॥ १४५ ॥ गत्युदयजपर्याय चतुर्गतिगमनस्य हेतुर्वा हि गतिः । नारकतिर्यग्मानुपदेवगतिरिचि च भवेत् चतुर्धा ॥ १५ ॥ अर्थ-तिनाम कर्मके उदयसे होनेवाली जीवकी पर्यायको अथवा चारों गतियों में गमन करनेके कारणको गति कहते है । उसके चार भेट है, नरकगति तिर्यग्गति मनुष्य- गति देवगति।

६० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् गतिमार्गणामें कुछ विशेष (चारों गतियोंका पृथक् २) वर्णन पाच गाथाओं द्वारा करते हैं । ण रमति जदो णिचं दवे खेत्ते य कालभावे य । अण्णोण्णेहिं य जह्मा तह्मा ते णारया भणिया ॥ १४६ ॥ न रमन्ते यतो नित्यं द्रव्ये क्षेत्रे च कालभावे च । अन्योन्यैश्च यस्मात्तस्मात्ते नारता भणिताः ॥ १४६ ।। अर्थ-द्रव्य क्षेत्र काल भावमें स्वयं तथा परस्परमें प्रीतिको प्राप्त नहीं होते अतएव उनको नारत ( नारकी ) कहते है । भावार्थ-शरीर और इन्द्रियके विषयों में उत्पत्ति शयन विहार उठने बैठने आदिके स्थानमे, भोजन आदिके समयमें, अथवा और भी अनेक अवस्थाओंमें जो स्वयं अथवा परस्परमें प्रीति ( सुख ) को प्राप्त न हों उनको नारत कहते है। इस गाथामें जो च शब्द पडा है उससे इसका दूसरा भी निरुक्तिसिद्ध अर्थ समझना चाहिये । अर्थात् जो नरकगतिनाम कर्मके उदयसे हों उनको, अथवा ( नरान् ) मनुष्योंको ( कायन्ति ) क्लेश पहुंचा। उनको नारक कहते है। क्योंकि नीचे सातो ही भूमियोंमें रहनेवाले नारकी निरन्तर ही स्वाभाविक शारीरिक मानसिक आगन्तुक तथा क्षेत्रजन्य इन पाच प्रकारके दुःखोंसे दुःखी रहते हैं। तिर्यगतिका स्वरूप बताते है। तिरियंति कुडिलमावं सुविउलसण्णा णिगिहिमण्णाणा। अच्चंतपाबबहुला तह्मा तेरिच्छया भणिया ॥ १४७ ॥ तिरोञ्चन्ति कुटिलभावं सुविवृतसंज्ञा निकृष्टमज्ञानाः । अत्यन्तपापबहुलास्तस्मात्तैरश्वका भणिताः ॥ १४७ ॥ अर्थ-जो मन वचन कायकी कुटिलताको प्राप्त हों, अथवा जिनकी आहारादि विषयक संना मरे मनुष्योंको अच्छीतरह प्रकट हो, और जो निकृष्ट अज्ञानी हों तथा जिनमें अत्यन्त पापका बाहुल्य पाया जाय उनको तिर्यच कहते है । भावार्थ-जिनमें कुटिलताकी प्रधानता हो, क्योंकि प्रायःकरके सबही तिर्यंच जो उनके मनमें होता है उसको वचनद्वारा नहीं कहते; क्योंकि उनके उसप्रकारकी वचनशक्ति ही नहीं है, और जो वचनसे कहते है उसको कायसे नहीं करते, तथा जिनकी आहारादिसंज्ञा प्रकट हो, और श्रुतका अभ्यास तथा शुभोपयोगादिके न करसकनेसे जिनमें अत्यन्त अज्ञानता पाई जाय । तथा मनुष्यकी तरह महावतादिकको धारण न करसकने और दर्शनविशुद्धि आदिके न होसकनेसे जिनमें अन्यन्त पापका बाहुल्य पाया जाय उनको तिर्यच कहते है। मनुन्यगतिका स्वरूप बताते हैं । मण्णति जदो णिचं मणेण णिउणा मणुक्कडा जह्मा । मण्णुमवा य सब्वे तह्मा ते माणुसा भणिदा ॥ १४८ ।।

गोम्मटसारः। ६१ मन्यन्ते यतो नित्यं मनसा निपुणा मनसोत्कटा यस्मात् । मनूद्भवाश्च सर्वे तस्मात्ते मानुषा भणिताः ॥ १४८ ॥ अर्थ-जो नित्य ही हेय उपादेय तत्त्व अतत्त्व धर्म अधर्मका विचार करै, और जो मनके द्वारा गुणदोषादिका विचार स्मरण आदि कर सकें, जो पूर्वोक्त मनके विषयमें उत्कृष्ट हों, तथा युगकी आदिमें जो मनुओंसे उत्पन्न हुए हो उनको मनुष्य कहते है। भावार्थ- मनका विषय तीव्र होनेसे गुणदोषादिका विचार स्मरण आदि जिनमें उत्कट रूपसे पाया जाय, तथा चतुर्थ कालकी आदिमें आदीश्वर भगवान् तथा कुलकरोंने उनको व्यव- हारका उपदेश दिया इसलिये जो आदश्विर भगवान् अथवा कुलकरोंकी संतान कहे जाते है, उनको मनुष्य कहते है। इस गाथामें एक यतः शब्द है दूसरा यस्मात् शब्द है, अर्थ दोनोंका एक ही होता है, इसलिये एक शब्द व्यर्थ है, वह व्यर्थ पड़कर ज्ञापन करता है कि लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्योंमें यद्यपि यह लक्षण घटित नहीं होता तथापि उनको मनुष्यगति नामकर्म और मनुष्य आयुकर्मके उदयमात्रकी अपेक्षासे ही मनुष्य कहते है ऐसा समझना चाहिये । तिर्यंच तथा मनुष्योंके भेदोंको गिनाते है। सामण्णा पंचिंदी पज्जत्ता जोणिणी अपज्जत्ता। तिरिया णरा तहावि य पंचिंदियभंगदो हीणा ॥१४९ ॥ सामान्याः पंचेन्द्रियाः पर्याप्ताः योनिमत्यः अपर्याप्ताः । तिर्यञ्चो नरास्तथापि च पंचेन्द्रियभंगतो हीनाः ॥ १४९ ॥ अर्थ-तियोंके पाच भेद है, सामान्यतिर्यच पंचेन्द्रियातर्यच पर्याप्ततिर्यच योनिमती- तिर्यच और अपर्याप्ततिर्यच । इसही प्रकार मनुष्यके भी पंचेन्द्रियके भंगको छोड़कर वाकी चार भेद होते है। भावार्थ-तियचोमें पंचेन्द्रियके प्रतिपक्षी एकेन्द्रियादि जीवोंकी सम्भावना है इससिये तिर्योंमे पंचेन्द्रियके भंगसहित पांच भेद है, किन्तु मनुष्योंमें पंचेन्द्रियके प्रतिपक्षकी सम्भावना नहीं है इसलिये उनके सामान्यमनुष्य पर्याप्तमनुष्य योनिमती- मनुष्य अपर्याप्तमनुष्य इसप्रकार चार ही भेद होते है। देवोंका स्वरूप बताते है । दीवंति जदो णिच्च गुणेहिं अद्वेहिं दिव्वभावहिं । भासंतदिव्बकाया तह्मा ते वणिया देवा ॥ १५० ॥ दयिन्ति यतो नित्यं गुणैरष्टाभिद्रेन्यभावः । भासमानदिव्यकाया तस्मात्ते वर्णिता देवा. ॥ १५० ॥ अर्थ-जो देवगतिमें होनेवाले परिणामोंसे सदा मुखी रहते है । और अणिमा महिमा oner ६२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम आदि आठ गुणों ( ऋद्धियों ) के द्वारा सदा अप्रतिहतरूपसे विहार करते है। और जिनका रूप लावण्य यौवन आदि सदा प्रकाशमान रहे उनको परमागममें देव कहा इसप्रकार संसारसम्बन्धी चारों गतियोंका स्वरूप बताकर अब संसारसे विलक्षण पांचमी सिद्धगतिका स्वरूप बताते है। जाइजरामरणभया संजोगविजोगदुक्खसण्णाओ। रोगादिगा य जिस्से ण संति सा होदि सिद्धगई ॥ १५१ ॥ जातिजरामरणभयाः संयोगवियोगदुःखसंज्ञाः । रोगादिकाश्च यस्यां न सन्ति सा भवति सिद्धगतिः ।। १५१ ॥ अर्थ-पंचेन्द्रियादि जाति वुढापा मरण भय अनिष्टसंयोग इष्टवियोग इनसे होनेवाला दुःख आहारादिविषयक संज्ञा ( वाञ्छा ) और रोगादिक जिस गतिमें नहीं पाये जाते उसको सिद्धगति कहते है। भावार्थ-एकेन्द्रियादि जाति, आयुःकर्मके घटनेसे शरीरके शिथिल होनेरूप जरा, आयुःकर्मके अभावसे होनेवाला प्राणत्यागरूप मरण, अनर्थकी आशंका करके अपकारक वस्तुसे भागनेकी इच्छारूप भय, क्लेशके कारणभूत अनिष्ट पदार्थ की प्राप्तिरूप संयोग, सुखके कारणभूत इष्ट पदार्थके दूर होनेरूप वियोग इत्यादि दुःख, और आहारसंज्ञा आदि तीनसंज्ञा, ( क्योंकि भयसज्ञाका पृथक् ग्रहण हो चुका है), खांसी आदि अनेक रोग, तथा आदिशब्दसे मानभंग वध वन्धन आदि दुःख जिस गतिमें अपने २ कारणभूत कर्मके अमाव होनेसे नहीं पाये जाते उसको सिद्धगति कहते है। गतिमार्गणामें जीवसंख्याका वर्णन करनेकी इच्छासे प्रथम नरकगतिमें जीवसंख्याका वर्णन करते है। सामण्णा रइया घणअंगुलबिदियमूलगुणसेढी । बिदियादि बारदसअडछत्चिदुणिजपदहिदा सेढी ॥ १५२ ॥ सामान्या नैरयिका घनाङ्गुलद्वितीयमूलगुणश्रेणी । द्वितीयादिः द्वादशदशाष्टषत्रिद्विनिजपदहिता श्रेणी ॥ १५२ ॥ अर्थ-सामान्यसे सम्पूर्ण नारकियोंका प्रमाण धनामुलके दूसरे वर्गमूलसे गुणित जगच्छ्रेणी प्रमाण है। द्वितीयादि पृथिवियोंमें होनेवाले नारकियोंका प्रमाण क्रमसे अपने बारहमे दशमे आठमे छढे तीसरे दूसरे वर्गमूलसे भक्त जगच्छ्रेणीप्रमाण समझना चाहिये । भावार्थ-~-धनाड्गुलके दूसरे वर्गमूलका जगच्छ्रेणीके साथ गुणा करनेपर जो राशि उत्पन्न हो उतने ही सातो पृथिवियोंके नारकी है । इसमेसे द्वितीयादिक पृथिवियोंके नार- कियोंका प्रमाण वतानेके लिये कहते है कि अपने अर्थात् जगच्छ्रेणीका जितना प्रमाण है १ इस ग्रन्यके अन्तमें गणितका प्रकरण लिखेंगे वहाँपर इन सवका प्रमाण स्पष्ट रूपसे वताया जायगा ।

गोम्मटसारः । उसके बारहमे वर्गमूलका जगच्छ्रेणीमें ही भागदेनेसे जो लब्ध आवे उतने ही दूसरी पृथिवीके नारकी है । इस ही प्रकार दशमे वर्गमूलका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतने तीसरी पृथिवीके, और आठमे वर्गमूलका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतने चौथी पृथिवीके, तथा छट्टे वर्गमूलका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतने पांचमी पृथिवीके, और तीसरे वर्गमूलका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतने छठ्ठी पृथिवीके, तथा दूसरे वर्गमूलका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतने सातमी पृथिवीके नारकी होते है । यह उत्कृष्ट संख्याका प्रमाण है-अर्थात् एक समयमें जादेसे जादेसे इतने नारकी हो सकते हैं। इसतरह नीचेकी छह पृथिवियोंके नारकियोंका प्रमाण बताकर अब प्रथम पृथिवीके नारकियोंका प्रमाण बताते है। हेहिमछप्पुढवीणं रासिविहीणो दु सव्वरासी दु। पढमावणिमि रासी णेरइयाणं तु णिहिट्ठो ॥ १५३ ॥ अधस्तनषट्पृथ्वीनां राशिविहीनस्तु सर्वराशिस्तु । प्रथमावनौ राशिः नैरयिकाणां तु निर्दिष्टः ॥ १५३ ॥ अर्थ-नीचेकी छह पृथिवियोंके नारकियोंका जितना प्रमाण हो उसको सम्पूर्ण नारक- राशिसे घटानेपर जो शेष रहे उतना ही प्रथम पृथ्वीके नारकियोंका प्रमाण है। तिर्यग्जीवोंकी संख्या वताते हैं। संसारी पंचक्खा तप्पुण्णा तिगदिहीणया कमसो । सामण्णा पंचिदी पंचिंदियपुण्णतेरिक्खा ॥ १५४॥ संसारिणः पञ्चाक्षास्तत्पूर्णाः त्रिगतिहीनकाः क्रमशः । सामान्याः पश्चेन्द्रियाः पञ्चेन्द्रियपूर्णतैरश्चाः ॥ १५४ ॥ अर्थ-सम्पूर्ण जीवराशिमेसे सिद्धराशिको घटानेपर जितना प्रमाण रहे उतना ही संसारराशिका प्रमाण है । संसारराशिमसे नारक मनुष्य देव इन तीन राशियोंको घटानेपर जो शेष रहे उतना ही सामान्य तियचोंका प्रमाण है । सम्पूर्ण पंचेन्द्रियोंमेंसे उक्त तीन गतिके पंचेन्द्रियोंको घटानेपर जो शेष रहें उतने पंचेन्द्रिय तियच है। तथा पंचेन्द्रिय पर्यातकोंके प्रमाण से उक्त तीन गतिके पंचेन्द्रिय पर्याप्त जीवोंका प्रमाण घटानेपर जो शेष रहें उतने ही पर्याप्त तिर्यंच पंचेन्द्रिय जीव हैं। छस्सयजोयणकदिहिदजगपदरं जोणिणीण परिमाणं । पुण्णूणा पंचक्खा तिरियअपज्जत्तपरिसंसा ॥ १५५ ॥ १--२ पंचेन्द्रिय और पर्याप्तकोका प्रमाण आगे नागे ।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् षट्शतयोजनकृतिहितजगत्प्रतरं योनिमतीनां परिमाणम । पूर्णोनाः पंचाक्षा: तिर्यगपर्याप्तपरिसंख्या ॥ १५६ ।। अर्थ-छहसौ योजनके वर्गका जगत्प्रतरमे भाग टेनेसे जो लब्ध आवे उतना ही योनिमती तिर्यचोंका प्रमाण है। और पंचेन्द्रिय तिर्योंमेंसे पर्याप्त तियोंका प्रमाण घटानेपर जो शेष रहे उतना अपर्याप्त पंचेन्द्रिय तिर्यंचोंका प्रमाण है। मनुष्योंका प्रमाण बतानेके लिये तीन गाथाओंको कहते है। सेढीसूईअंगुलआदिमतदियपदभाजिदेगूणा | सामण्णमणुसरासी पंचमकदिधणसमा पुण्णा ॥ १५६ ॥ श्रेणी सूच्यड्गुलादिमतृतीयपदभाजितकोना । सामान्यमनुष्यराशिः पञ्चमकृतिघनसमाः पूर्णाः ॥ १५६ ॥ अर्थ-सूच्यंगुलके प्रथम और तृतीय वर्गमूलका जगच्छ्रेणीमें भाग देनेसे जो शेप रहे उसमें एक और घटानेपर जो शेष रहे उतना सामान्य मनुष्य राशिका प्रमाण है । इसमसे द्विरुपवर्गधारामें उत्पन्न पांचमे वर्ग ( वादाल ) के घनप्रमाण पर्याप्त मनुष्योंका प्रमाण है। पर्याप्त मनुष्योकी संख्याको स्पष्टरूपसे बताते है। तललीनमधुगविमरंधूमसिलागाविचोरभयमेरु । तटहरिखझसा होति हु माणुसपज्जत्तसंखंका ॥ १५७ ॥ तललीनमधुगविमलंधूमसिलागाविचोरभयमेरू । तटहरिखझसा भवन्ति हि मानुषपर्याप्तसंख्याङ्काः ॥ १५७ ॥ अर्थ-तकारसे लेकर सकारपर्यन्त जितने अक्षर इसगाथामें बताये है, उतने ही अङ्कप्रमाण पर्याप्त मनुष्योंकी संख्या है। भावार्थ-~-इस गाथामें तकारादि अक्षरोंसे अकोंका ग्रहण करना चाहिये, परन्तु किस अक्षरसे किस अङ्कका ग्रहण करना चाहिये इसके लिये कटपयपुरस्थवर्णैर्नवनवपंचाष्टकल्पितैः क्रमशः। स्वरजनशून्य संख्यामानोपरिमाक्षरं त्याज्यम् , यह गाथा उपयोगी है । अर्थात् कसे लेकर आगेके झ तकके नव अक्षरोंसे क्रमसे एक दो आदि नव अङ्क समझने चाहिये । इस ही प्रकार टसे लेकर नव अक्षरोंसे नव अङ्क, और पसे लेकर पाच अक्षरोंसे पांच अङ्क, तथा यसे लेकर आठ अक्षरोसे आठ अङ्क, एवं सोलह स्वर और न न इनसे शन्य ( ) समझना चाहिये । किन्तु मात्रा और ऊपरका अक्षर, इससे कोई भी अङ्क ग्रहण नहीं करना चाहिये । इस नियमके और " अङ्कोंकी विपरीत गति होती है ” इस नियमके अनुसार इस गाथामें कहे हुए अक्षरोसे पर्याप्त मनुष्योंकी संख्या ७१२२८१६२५१४२६४३३७५९३९ ४३१६०३३६ निकलती है - गोम्मटसारः। -६५ - मानुषी तथा अपर्याप्त मनुष्योंकी संख्या बताते हैं। पज्जत्तमणुस्साणं तिचउत्थो माणुसीण परिमाणं । सामण्णा पुण्णूणा मणुवअपज्जत्तगा होति ॥ १५८॥ पर्याप्तमनुष्याणां त्रिचतुर्थो मानुषीणां परिमाणम् । सामान्याः पूर्णोना मानवा अपर्याप्तका भवन्ति ॥ १५८ ॥ अर्थ-पर्याप्त मनुष्योका जितना प्रमाण है उसमे तीन चोथाई ( है ) मानुषियोंका प्रमाण है । सामान्य मनुष्यराशिमेसे पर्याप्तकोंका प्रमाण घाटनेपर जो शेष रहे उतना ही अपर्याप्त मनुष्योंका प्रमाण है। इसप्रकार चारों ही प्रकारके मनुष्योंकी संख्या बताकर अब देवगतिके जीवोंकी संख्या बताते है। तिण्णिसयजोयणाणं बेसदछप्पण्ण अंगुलाणं च । कदिहिदपदरं वेंतरजोइसियाणं च परिमाणं ॥ १५९ ।। त्रिशतयोजनानां द्विशतषट्पञ्चाशद्गुलाना च । कृतिहितप्रतरं व्यन्तरज्योतिष्काणां च परिमाणम् ॥ १५९ ॥ अर्थ-तीनसौ योजनके वर्गका जगत्प्रतरमें भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना व्यन्त- रदेवोंका प्रमाण है । और २५६ प्रमाणाडलोंके वर्गका जगत्प्रतरमें भाग देमेसे जो लब्ध आवे उतना ज्योतिषियोंका प्रमाण है। घणअगुलपढमपदं तदियपदं सेढिसंगुणं कमसो । भवणे सोहम्मदुगे देवाणं होदि परिमाणं ॥ १६० ॥ घनाङ्गुलप्रथमपदं तृतीयपदं श्रेणिसंगुणं क्रमशः । भवने सौधर्मद्विके देवानां भवति परिमाणम् ।। १६० ।। अर्थ-जगच्छ्रेणीके साथ घनामुलके प्रथम वर्गमूलका गुणा करनेसे भवनवासी, और तृतीय वर्गमूलका गुणा करनेसे सौधर्मद्विकके देवोंका प्रमाण निकलता है । तत्तो एगारणवसगपणचउणियमूलमाजिदा सेढी । पल्लासंखेज्जदिमा पत्तेयं आणदादिसुरा ॥ १६१ ।। तत एकादशनवसप्तपञ्चचतुर्निनमूलभाजिता श्रेणी । पल्यासंख्यातकाः प्रत्येकमानितादिसुराः ॥ १६१ ।। अर्थ-इसके अनन्तर अपने ( जगच्छ्रेणी ) ग्यारहमें नवमे सातमे पाचमे चौथे वर्ग- मूलसे भाजित जगच्छ्रेणी प्रमाण देवोंका प्रमाण है । आनतादिकमें प्रत्येक कल्पके देवोंका १ यह योजन प्रमाणाद्लकी अपेक्षामे है । गो.९ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम inci प्रमाण पल्यके असंख्यातमें भाग प्रमाण है । भावार्य-~-ऐशान स्वर्गसे आगे सानत्तुमार माहेन्द्र स्वर्गके देवोंका प्रमाण जगच्छ्रेणीमें जगच्छ्रेणीके ग्यारहमे वर्गमूलका माग देनमे नितना लब्ध आवे उतना ही है । इसही प्रकार जगच्छ्रेणीके नवमे वर्गमूलका जगच्छ्रेणीमें भाग देनेपर जो लब्ध आने उतना ब्रह्म ब्रह्मोत्तर स्वर्गके देवोंका प्रमाण है, और सातम वर्गमूल (जगच्छ्रेणीका) का जगच्छेणीमें भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना लान्तव कापिष्ट स्वगेके देवोंका प्रमाण है । पाचमें वर्गमूलका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना शुक्र महाशुक्र स्वर्गक देवोंका प्रमाण है । चौथे वर्गमूलका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना मतार सहबार स्वर्गके देवोंका प्रमाण है। आनत प्राणत आरण अच्युत नव वेयक नव अनुदिश विजय वैजयंत जयंत अपरा- जित इन छन्वीस कल्पोंमें देवोंका प्रमाण पल्यके असंख्यातमें भाग सर्वार्थसिद्धिके देवोंका तथा सामान्यदेवराशिका प्रमाण बताते है। तिगुणा सत्तगुणा वा सव्वट्ठा माणुसीपमाणादो। सामण्णदेवरासी जोइसियादो विसेसहिया ॥ १६२॥ त्रिगुणा सप्तगुणा वा सर्वार्थी मानुपीप्रमाणतः । सामान्यदेवराशिः ज्योतिष्कतो विशेषाधिकः ॥ १६२ ॥ अर्थ-मनुष्यस्त्रियोंका जितना प्रमाण है उससे तिगुना अथवा सतगुना सर्वार्थसिद्धिके देवोंका प्रमाण है । ज्योतिष्क देवोका जितना प्रमाण है उससे कुछ अधिक सम्पूर्ण देवराशिका प्रमाण है । भावार्थ-मानुपियोंसे तिगुना और सतगुना इसतरह दो प्रकारसे जो सर्वार्थसिद्धिके देवोंका प्रमाण वताया है वह दो आचार्योके मतकी अपेक्षासे है । सम्पूर्ण देवोंमें ज्योतिपियोंका प्रमाण वहुत अधिक है, शेष तीन जातिके देवोंका प्रमाण वहुत अल्प है इसलिये ऐसा कहा है कि सामान्यदेवराशि ज्योतिषियोंसे कुछ अधिक है। ॥ इति गतिमार्गणाधिकारः ॥ क्रमप्राप्त इन्द्रियमार्गणामें इन्द्रियोका विषय स्वरूप भेद आदिका वर्णन करनेसे प्रथम उसका निरुक्तिपूर्वक अर्थ वताते है । अहमिंदा जह देवा अविसेसं अहमहति मण्णंता । ईसंति एक्कमेक्कं इंदा इव इंदिये जाण ॥ १६३ ॥ अहमिन्द्रा यथा देवा अविशेषमहमहमिति मन्यमानाः । ईशते एकैकमिन्द्रा इव इन्द्रियाणि जानीहि ॥ १६३ ॥ अर्थ-जिस प्रकार अहमिन्द्र देवोंमें दूसरेकी अपेक्षा न रखकर प्रत्येक अपने २ को स्वामी मानते है, उसही प्रकार इन्द्रियां भी है । भावार्थ-इन्दके समान जो हो उसको इन्टिय कहते है। इसलिये जिस प्रकार नव ग्रैवेयकादिवासी देव अपने २ विषयोंमें गोम्मटसारः। Rar ७ -- दूसरेकी अपेक्षा न रखनेसे अर्थात् स्वतन्त्र होनेसे अपने २ को इन्द्र मानते हैं। उस ही प्रकार स्पर्शनादिक इन्द्रियां भी अपने २ स्पर्शादिक विषयोंमें दूसरेकी ( रसना आदिकी.) अपेक्षा न रखकर स्वतन्त्र है । अतएव इनको इन्द्रके ( अहमिन्द्रके) समान होनेसे इन्द्रिय कहते हैं। इन्द्रियके संक्षेपसे भेद और उनका स्वरूप बताते हैं। मदिआवरणखओबसमुत्थविसुद्धी हु तज्जबोहो वा । भाविंदियं तु दव्वं देहुदयजदेहचिण्हं तु ॥१६४ ॥ मत्यावरणक्षयोपशमोत्यविशुद्धिर्हि तज्जबोधो वा । भावन्द्रियं तु द्रव्यं देहोदयजदेहचिह्नं तु ॥ १६४ ॥ अर्थ-इन्द्रियके दो भेद हैं एक मावेन्द्रिय दूसरा द्रव्येन्द्रिय । मतिज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशमसे उत्पन्न होनेवाली विशुद्धि, अथवा उस विशुद्धिसे उत्पन्न होनेवाले उपयोगा- त्मक ज्ञानको भावेन्द्रिय कहते है । और शरीरनामकर्मके उदयसे होनेवाले शरीरके चिह्नवि- शेषको द्रव्येन्द्रिय कहते है। इन्द्रियकी अपेक्षासे जीवोंके भेद कहते है। फासरसगंधरूवे सद्दे णाणं च चिण्हयं जेसिं। इगिबितिचदुपंचिंदियजीवा णियभेयभिण्णाओ ॥ १६५॥ स्पर्शरसगंधरूपे शब्दे ज्ञानं च चिह्नकं येपाम् । एकद्वित्रिचतुःपञ्चेन्द्रियजीवा निजभेदभिन्नाः ॥ १५ ॥ अर्थ-जिन जीवोंके वाह्य चिह्न ( द्रव्येन्द्रिय ) और उसके द्वारा होनेवाला स्पर्श रस गंध रूप शब्द इन विषयोंका ज्ञान हो उनको क्रमसे एकेन्द्रिय द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरि- न्द्रिय पंचेन्द्रिय जीव कहते है। और इनके भी अनेक अवान्तर भेद है। भावार्थ-जिन जीवोंके स्पर्शविषयक ज्ञान और उसका अवलम्बनरूप द्रव्येन्द्रिय मौजूद हो उनको एकेन्द्रिय जीव कहते है। इस ही प्रकार अपने २ अवलम्बनरूप द्रव्येन्द्रियके साथ २ जिन जीवोंके रसविषयक ज्ञान हो उनको द्वीन्द्रिय, और गंधविषयक ज्ञानवालोंको त्रीन्द्रिय, तथा रूपविप- यक ज्ञानवालोंको चतुरिन्द्रिय, और शब्दविषयक ज्ञानवालोंको पंचेन्द्रिय जीव कहते हैं। इन एकेन्द्रियाटि जीवोंके भी अनेक अवान्तर भेद है । तथा आगे २ की इन्द्रियवालोंके पूर्व २ की इन्द्रिय अवश्य होती है । जैसे रसनेन्द्रियवालोको स्पर्शनेन्द्रिय अवश्य होगी और घ्राणेन्द्रियवालोंके स्पर्शन और रसना अवश्य होगी । इत्यादि पंचेन्द्रिय पर्यन्त ऐसा ही समझना।

. रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् इसप्रकार एकेन्द्रियादि जीवोंके इन्द्रियोंके विषयकी वृद्धिका क्रम वताकर अब इन्द्रिय- वृद्धिका क्रम बताते है। एइंदियस्स फुसणं एक्कं वि य होदि सेसजीवाणं । होति कमउड्डियाइं जिब्भाधाणच्छिसोत्ताई ॥१६६ ॥ एकेन्द्रियस्य स्पर्शनमेकमपि च भवति शेषजीवानाम् । भवन्ति क्रमवर्द्धितानि जिव्हाघ्राणाक्षिश्रोत्राणि ॥ १६६ ॥ अर्थ-एकेन्द्रिय जीवके एक स्पर्शनेन्द्रिय ही होती है। शेष जीवोंके क्रमसे जिव्हा घ्राण चक्षु और श्रोत्र वढ़ जाते है । भावार्थ--एकेन्द्रिय जीवके केवल स्पर्शनेन्द्रिय, द्वीन्द्रि- यके स्पर्शन रसना ( जिव्हा ), त्रीन्द्रियके स्पर्शन रसना घ्राण ( नासिका ) चतुरिन्द्रियके स्पर्शन रसना घ्राण चक्षु, और पंचेन्द्रियके स्पर्शन रसना घ्राण चक्षु श्रोत्र होते है । स्पर्शनादिक इन्द्रियां कितनी दूर तक रखे हुए अपने विषयका ज्ञान कर सकती हैं यह बतानेके लिये तीन गाथाओंमें इन्द्रियोका विषयक्षेत्र बताते है । धणुवीसडदसयकदी जोयणछादालहीणतिसहस्सा। अट्ठसहस्स धणूणं विसया दुगुणा असण्णित्ति ॥ १६७ ॥ धनुर्विशत्यष्टदशककृति: योजनषट्चत्वारिंशद्धीनत्रिसहस्राणि । अष्टसहस्रं धनुषा विषया द्विगुणा असंज्ञीति ॥ १६७ ॥ अर्थ-स्पर्शन रसना प्राण इनका उत्कृष्ट विषयक्षेत्र क्रमसे चारसौ धनुष चौसठ घनुष सौ धनुष प्रमाण है । चक्षुका उत्कृष्ट विषयक्षेत्र दो हजार नवसौ चौअन योजन है। और श्रोत्रन्द्रियका उत्कृष्ट विषयक्षेत्र आठ हजार धनुष प्रमाण है । और आगे असंज्ञिपर्यन्त दूना दूना विषय बढ़ता गया है । भावार्थ-~-एकेन्द्रियके स्पर्शनेन्द्रियका उत्कृष्ट विषयक्षेत्र चारसौ धनुप है । और द्वीन्द्रियादिके वह दूना २ होता गया है । अर्थात् द्वीन्द्रियके आठसौ त्रीन्द्रियके सोलहसौ चतुरिन्द्रियके वत्तीससौ असंज्ञीपंचेन्द्रियके चौसठसौ धनुष स्पर्शनेन्द्रियका उत्कृष्ट विषय क्षेत्र है । द्वीन्द्रियके रसनेन्द्रियका उत्कृष्ट विषयक्षेत्र चौसठ धनुष है और वह भी त्रीन्द्रियाढिकके स्पर्शनेन्द्रियके विषयक्षेत्रकी तरह दूना २ होता गया है। इस ही प्रकार प्राण चक्षु और श्रोत्रका विषयक्षेत्र भी समझना । संज्ञी जीवकी इन्द्रियोंका विषयक्षेत्र बताते है । सण्णिस्स वार सोदे तिण्हं णव जोयणाणि चक्खुस्स । सत्तेतालसहस्सा बेसदतेसट्ठिमदिरेया ॥ १६८ ॥ संनिनो द्वादश श्रोत्रे त्रयाणा नव योजनानि चक्षुषः । सप्तचत्वारिंशत्सहस्राणि द्विशतत्रिषष्ठ्यतिरेकाणि ॥ १६८ ।।

गोम्मटसारः। -- अर्थ-संज्ञी जीवके स्पर्शन रसन घ्राण इन तीनमें प्रत्येकका विषय क्षेत्र नव २ योजन है । और श्रोत्रेन्द्रियका बारह योजन, तथा चक्षुका संतालीस हजार दोसौ त्रेसठसे कुछ अधिक उत्कृष्ट विषयक्षेत्र है। चक्षुके उत्कृष्ट विषयक्षेत्रकी उपपत्तिको बताते है । तिण्णिसयसहिविरहिदलक्खं दसमूलताडिदे मूलम् । णवगुणिदे सट्ठिहिदे चक्खुप्फासस्स अद्धाणं ॥ १६९ ॥ त्रिशतषष्ठिविरहितलक्षं दशमूलताडिते मूलम् । नवगुणिते षष्ठिहिते चक्षुःस्पर्शस्य अध्वा ॥ १६९ ॥ अर्थ-तीनसौ साठ कम एक लाख योजन जम्बूद्वीपके विष्कम्मका वर्ग करना और उसका दशगुणा करके वर्गमूल निकालना, इससे जो राशि उत्पन्न हो उसमें नवका गुणा और साठका भाग देनेसे चक्षुरिन्द्रियका उत्कृष्ट विषयक्षेत्र निकलता है । भावार्थ—सूर्यका चारक्षेत्र पांचसौ बारह योजन चौड़ा है। उसमे तीनसौ बत्तीस योजन तो लवणसमुद्रमें हैं और शेष एकसौ अस्सी योजन जम्बूद्वीपमें है । इस लिये जम्बूद्वीपके दोनों भागके तीनसौ साठ योजन क्षेत्रको छोडकर वाकी निन्यानवे हजार छहसौ चालीस योजन प्रमाण जम्मू- द्वीपके विष्कम्भकी परिधि करणसूत्रके अनुसार तीन लाख पन्द्रह हजार नवासी योजन होती है । इस अभ्यन्तर परिधिको एक सूर्य अपने भ्रमणके द्वारा साठ मुहूर्तमें समाप्त करता है। और निषधगिरिके एक भागसे दूसरे भाग तककी अभ्यन्तर वीथीको अठारह मुहूर्तमें अपने भ्रमण द्वारा समाप्त करता है । इसके विलकुल वीचमें अयोध्या नगरी पड़ती है। इस अयोध्या नगरीके वीचमें वने हुए अपने महलके ऊपरले भागपरसे भरतादि चक्रवर्ती निषिधगिरिके ऊपर अभ्यन्तर वीथीमें उदय होते हुए सूर्यके भीतरकी जिन प्रतिविम्बका दर्शन करते है। और निषधगिरिके उस उदयस्थानसे अयोध्या पर्यन्त उक्तरी- तिके अनुसार सूर्यको भ्रमण करनेमें नव मुहूर्त लगते है। इसलिये साठ मुहूर्तमें इतने क्षेत्रपर भ्रमण करै तो नव मुहूर्तमें कितने क्षेत्रपर भ्रमण करै ? इसप्रकार त्रैराशिक करनेसे अर्थात् फलराशि ( परिधिका प्रमाण ) और इच्छाराशिका ( नव ) गुणा कर उसमें प्रमाणराशि साठका भागदेनेसे चक्षुरिन्द्रियका उत्कृष्ट विषयक्षेत्र सेतालीस हजार दोसौ त्रेसठसे कुछ अधिक निकलता है । अर्थात् ज्यादेसे ज्यादै इतनी दूर तकका पदार्थ चक्षुकेद्वारा जाना जा सकता है। १॥ विकम्भवग्गददगुणकरिणी वहस्स परिरहो होदि " अर्थात् विष्कम्मका जितना प्रमाण है उसका वर्गकर दशगुणा करना पीछे उसका वर्गमूल निकालना ऐसा करनेसे जो राशि रत्पर हो उतना ही वृतक्षेत्रको परिधिका प्रमाण होता है । २ तीन लाख पन्द्रह हजार नवामी योजन । ३ सातयोउनके पास भोगोमध एक भाग ।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् तु इन्द्रियोंका विषयक्षेत्र बताकर अब उनका आकार बताते हैं। चक्खू सोदं घाणं जिब्भायारं मसूरजवणाली। अतिमुत्तखुरप्पसमं फासं तु अणेयसंठाणं ॥ १७०॥ चक्षुःश्रोत्रघ्राणजिव्हाकारं मसूरयवनाल्य--1 तिमुक्तक्षुरप्रसमं स्पर्शनं अनेकसंस्थानम् ॥ १७० ॥ अर्थ-मसूरके समान चक्षुका जवकी नलीके समान श्रोत्रका तिलके फूलके समान घ्राणका तथा खुरपाके समान जिव्हाका आकार है । और स्पर्शनेन्द्रियके अनेक आकार है। इन्द्रियोंके (द्रव्येन्द्रियोंके ) आकारमें जो आत्माके प्रदेश है उनका अवगाहन प्रमाण बताते है। अंगुलअसंखभाग संखेज्जगुणं तदो विसेसहिय । तत्तो असंखगुणिदं अंगुलसंखेज्जयं तत्तु ॥ १७१ ॥ अड्गुलासंख्यभाग संख्यातगुणं ततो विशेषाधिकम् । ततोऽसंख्यगुणितमगुलसंख्यातं तत्तु ॥ १७१ ॥ अर्थ-आत्मप्रदेशोंकी अपेक्षा चक्षुरिन्द्रियको अवगाहन धनाड्गुलके असंख्यातमे भाग- प्रमाण है । और इससे संख्यातगुणा श्रोत्रेन्द्रियका अवगाहन है। श्रोत्रेन्द्रियका जितना प्रमाण है उससे पल्यके असंख्यातमे भाग अधिक घ्राणेन्द्रियका अवगाहन है । घ्राणेन्द्रियके अवगाहसे पत्यके असंख्यातमे भाग गुणा रसनेन्द्रियका अवगाहन है । परन्तु सामान्यकी अपेक्षा गुणाकार और भागहारका अपवर्तन करनेसे उक्त चारों ही इन्द्रियोंका अवगाहन प्रमाण घनामुलके संख्यातमे मागमात्र है । स्पर्शनेन्द्रियके प्रदेशोंका अवगाहनप्रमाण बताते हैं । सुहमणिगोदअपज्जत्तयस्स जास्स तदियसमयसि । अद्गुल असंखमागं जहण्णमुक्कस्सयं मच्छे ॥ १७२ ।। सूक्ष्मनिगोदापर्याप्तकस्य जातस्य तृतीयसमये । अगलासंख्यमागं जघन्यमुत्कृष्टकं मत्स्ये ॥ १७२ ॥ अर्थ-स्पर्शनेन्द्रियकी जघन्य अवगाहना घनाड्गुलके असंख्यातमे भाग प्रमाण है । और यह अवगाहना सूक्ष्मनिगोदिया लब्ध्यपर्याप्तकके उत्पन्न होनेसे तीसरे समयमें होती है । उत्कृष्ट अवगाहना महामत्स्यके होती है, इसका प्रमाण संख्यातधनाड्गुल है । १ द्रव्येन्द्रियके दो भेद है, निति और उपकरण 1 नितिके भी दो भेद है, बाह्य तथा आभ्यन्तर । यहापर सान्मन्तर नितिस्प द्रव्येद्रियका प्रमाण बताते हैं। - गोम्मटसारः ।। । - - - इस प्रकार इन्द्रियज्ञानवाले संसारी जीवोंका वर्णन करके , अतीन्द्रियज्ञानवालोंका निरूपण करते है। णबि इंदियकरणजुदा अवग्गहादीहिं गाहया अत्थे । णेव य इंदियसोक्खा अणिंदियाणतणाणसुहा ॥ १७३ ॥ नापि इन्द्रियकरणयुता अवग्रहादिभिः ग्राहका अर्थे । नैव च इन्द्रियसौख्या अनिन्द्रियानन्तज्ञानसुखाः ॥ १७३ ॥ अर्थ-वे मुक्त जीव इन्द्रियोंकी क्रियासे युक्त नहीं हैं। तथा अवग्रहादिक क्षायोपश- मिक ज्ञानके द्वारा पदार्थका ग्रहण नहीं करते । और इन्द्रियजन्य सुखसे भी युक्त नहीं है; क्योकि उन मुक्त जीवोका अनन्तज्ञान और अनन्तसुख अनिन्द्रिय है। भावार्थ-मुक्त- जीवोंका अनन्त ज्ञान और अनन्त सुख अपनी प्रवृत्तिमें इन्द्रियन्यापारकी अपेक्षा नहीं रखता; क्योंकि वह निरावरण है जो सावरण होता है उसको दूसरेकी अपेक्षा होती है । और जो स्वयं अपने कार्यके करनेमें समर्थ है उसको दूसरेकी अपेक्षा नहीं होती। इस ही लिये वे मुक्त जीव इन्द्रियन्यापारसे रहित है। और त्रिकालवर्ती समस्त पदार्थोंको अनन्तज्ञान के द्वारा प्रत्यक्ष जानते है, अवग्रह ईहा अवाय धारणा स्मृति प्रत्यभिज्ञान तर्क अनुमान आदि क्षायोपशमिक ज्ञानके द्वारा नहीं जानते । और उनके इन्द्रियजन्य सुख भी नहीं है । क्योंकि उसके कारणभूत प्रतिपक्षी कर्मका सर्वथा अभाव होचुका है। संक्षेपसे एकेन्द्रियादि जीवोंकी सख्याको बताते है । थावरसंखपिपीलियभमरमणुस्सादिगा सभेदा जे । जुगवारमसंखेज्जाणताणंता णिगोदभवा ॥ १७४ ॥ स्थावरशङ्खपिपीलिकाभ्रमरमनुष्यादिकाः सभेदा ये । युगवारमसंख्येया अनन्तानन्ता निगोदभवाः ॥ १७४ ॥ अर्थ-स्थावर एकेन्द्रिय जीव, शङ्स आदिक द्वीन्द्रिय, चींटी आदि त्रीन्द्रिय, भ्रमर आदि चतुरिन्द्रिय, मनुष्यादिक पंचेन्द्रिय जीव अपने २ अन्तभेदोंसे युक्त असंख्यातास- ख्यात है। और निगोविया जीव अनन्तानन्त है । भावार्थ-वस प्रत्येक वनस्पति पृथिवी जल अग्नि वायु इनको छोडकर वाकी संसारी जीवोंका (साधारण जीवोंका) प्रमाण अनन्तानन्त है। और साधारणको छोडकर वाकी एकेन्द्रिय स्थावर तथा द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय पंचेन्द्रिय इनमें प्रत्येकका प्रमाण जगत्प्रतरके असंख्यातमे भागमात्र असंख्यातासंख्यात है। तसहीणो संसारी एयक्खा ताण संखगा भागा। पुण्णाणं परिमाणं संखेजदिम अपुण्णाणं ।। १७५ ।।

रायचन्द्र नशास्त्रमालायाम् । त्रसहीनाः संसारिण एकाक्षास्तेषां संख्यका भागाः । पूर्णानां परिमाणं संख्येयकमपूर्णानाम् ॥ १७५ ॥ अर्थ संसारराशिमेंसे त्रसराशिको घटानेपर जितना शेष रहे उतने ही एकेन्द्रिय जीव है । और एकेन्द्रियजीवोंकी राशिमें संख्यातका भाग देना उसमे एक भागप्रमाण अपर्याप्तक और शेष बहुभागप्रमाण पर्याप्तक जीव है । बादरसुहमा तेर्सि पुण्णापुण्णेत्ति छन्विहाणपि । तक्कायमग्गणाये भणिज्जमाणक्कमो यो॥ १७६॥ वादरसूक्ष्मास्तेषां पूर्णापूर्ण इति षड्विधानामपि । तत्कायमार्गणाया मणिष्यमाणक्रमो ज्ञेयः ॥ १७६ ॥ अर्थ-एकेन्द्रियजीवोंके सामान्यसे दो भेद है वादर और सूक्ष्म । इसमें भी प्रत्येकके पर्याप्तक और अपर्याप्तकके भेदसे दो २ भेद है । इस प्रकार एकेन्द्रियोंकी छह राशियोंकी संख्याका क्रम कायमार्गणामें कहेंगे वहासे ही समझलेना । भावार्थ-एकेन्द्रिय जीवोंकी छह राशियोंका प्रमाण कायमार्गणा में विशेषरूपसे कहेंगे । इस प्रकार एकेन्द्रिय जीवोंकी संख्याको सामान्यसे बताकर अब त्रसजीवोंकी संख्याको तीन गाथाओंमें बताते है। बितिचपमाणमसंखेणवहिदपदरंगुलेण हिदपदरं । हीणकर्म पडिभागो आवलियासंखभागो दु ॥ १७७ ॥ द्वित्रिचतुःपञ्चमानमसंख्येनावहितप्रतराङ्गुलेन हितप्रतरम् । हीनक्रमं प्रतिभाग आवलिकासंख्यभागस्तु ॥ १७७ ।। अर्थ-प्रतरामुलके असंख्यातमें भागका जगत्प्रतरमें भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना सामान्यसे त्रसराशिका प्रमाण है । परन्तु पूर्व २ द्वीन्द्रियादिककी अपेक्षा उत्तरोत्तर त्रीन्द्रियादिकका प्रमाण क्रमसे हीन २ है। और इसका प्रतिभागहार आवलिका असंख्यातमा माग है। इस उक्त त्रसराशिके प्रमाणको स्पष्टरूपसे विभक्त करते हैं । बहुमागे समभागो चउण्णमेदेसिमेक्कभागसि । उत्तकमो तत्थवि बहुभागो बहुगस्स देओ दु॥ १७८ ।। बहुमागे सममागश्चतुर्णामेतेपामेकभागे । उक्तक्रमस्तत्रापि बहुभागो वहुकस्य देयस्तु ॥ १७८ ॥ अर्थ-वसराशिमें आवलिके असंख्यातमे भागका भाग देकर लब्ध वहुभागके समान चार माग करना । और एक २ मागको द्वीन्द्रियादि चारोहीमें विभक्त कर, शेष एक भागमें - - - गोम्मटसारः। ७३ है; फिरसे आवलिके असंख्यातमे भागका भाग देना चाहिये, और लब्ध बहुभागको बहुतसं- ख्यावालेको देना चाहिये । इस प्रकार अन्तपर्यन्त करना चाहिये । भावार्थ-कल्पना की जिये कि त्रसराशिका प्रमाण दोसौ छप्पन है। और प्रतिभागहाररूप आवलीके असंख्यातमे भागका प्रमाण ४ चार है । इसलिये दोसौ छप्पनमें चारका भाग देनेसे लब्ध ६४ आते है । इस ६४ के एक भागको अलग रखदेने पर वहुभागका प्रमाण एकसौ बानवे वाकी रहता इस बहुभागके अड़तालीस २ के समान चार भाग करके द्वीन्द्रियादि चारोंको विभक्त करना चाहिये । और शेष चौसठमें फिर चारका भाग देना चाहिये । इससे लब्ध सोलहके एक भागको अलग रखकर वाकी अड़तालीसके बहुभागको बहुतसंख्यावाले द्वीन्द्रियको ना चाहिये । और शेष सोलहके एकभागमें फिर चारका भाग देनेसे लब्ध बारहके बहु- भागको क्रमप्राप्त त्रीन्द्रियको देना चाहिये । और शेष चारके एक भागमें फिर चारका भाग देनेसे लब्ध तीनके बहुभागको चतुरिन्द्रियको देना चाहिये । और शेष एक पंचेन्द्रियको देना चाहिये । इस प्रकार त्रसोंकी २५६ राशिमेंसे द्वीन्द्रियोका प्रमाण ९६, त्रीन्द्रियोंका प्रमाण ६०, चतुरिन्द्रियोका प्रमाण ५१, और पंचेन्द्रियोका प्रमाण ४९ हुआ। जिसप्र- कार अंकसंदृष्टिमे यह प्रमाण बताया है उसही प्रकार अर्थसंदृष्टिमे भी समझना; परन्तु अङ्कसंदृष्टिको ही अर्थसंदृष्टि नहीं समझना चाहिये । त्रसोंमें पर्याप्तक और अपर्याप्तकोंका प्रमाण बताते है । तिविपचपुण्णपमाणं पदरंगुलसंखभागहिदपदरं । हीणकम पुण्णूणा बितिचपजीवा अपज्जत्ता ॥ १७९ ॥ त्रिद्विपञ्चचतुःपूर्णप्रमाणं प्रतराड्गुलसंख्यभागहितप्रतरम् । हीनक्रम पूर्णोना द्वित्रिचतुःपंचजीवा अपर्याप्ताः ॥ १७९ ॥ अर्थ-प्रतराड्गुलके संख्यातमे भागका जगत्प्रतरमे भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना ही त्रीन्द्रिय द्वीन्द्रिय पंचेन्द्रिय चतुरिन्द्रियमें प्रत्येक पर्याप्तकका प्रमाण है । परन्तु यह प्रमाण “ वहुभागे समभागो" इस गाथामे कहे हुए क्रमके अनुसार उत्तरोत्तर हीन २ है । अपनी २ समस्तराशिमसे पर्याप्तकोका प्रमाण घटानेपर अपर्याप्तक द्वीन्द्रिय त्रीद्रिय चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय जीवोंका प्रमाण निकलता है। इति इन्द्रियमार्गणाधिकार समाप्त ॥ कायमार्गणाका वर्णन क्रमसे प्राप्त है। अतः उसकी आदिमें कायका लक्षण और उसके भेदोंको वाताते है। जाईअविणाभावीतसथावरउदयजो हवे काओ । सो जिणमदह्मि भणिओ पुढघीकायादिछन्भेयो ।। १८० ॥ १० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम जात्यविनाभावित्रसस्थावरोदयनो भवेत् कायः । स जिनमते मणितः पृथ्वीकायादिषड्भेदः ॥ १८० ॥ अर्थ-जातिनामकर्मके अविनाभावी बस और स्थावर नामकर्मके उदयसे होनेवाली आत्माकी पर्यायको जिनमतमें काय कहते है । इसके छह भेद है, पृथिवी जल अग्नि वायु वनस्पति और त्रस । पाच स्थावरोंमेसें वनस्पतिको छोडकर बाकी पृथिवी आदि चार स्थावरोंकी उत्पत्तिका कारण बताते है। पुढवीआऊतेउवाऊकम्मोदयेण तत्थेव । णियवण्णचउक्कजुदो ताणं देहो हवे णियमा ॥ १८१ ॥ पृथिव्यप्तेनोवायुकर्मोदयेन लत्रैव । निजवर्णचतुष्कयुतस्तेषां देहो भवेन्नियमात् ॥ १८१ ॥ अर्थ-पृथिवी अप् ( जल ) तेन ( अग्नेि ) वायु इनका शरीर, नियमसे अपने २ पृथिवी आदि नामकर्मके उदयसे, अपने २ योग्य रूप रस गंध स्पर्शसे युक्त पृथिवी आदिकमें ही वनता है । भावार्थ-पृथिवी आदि नामकर्मके उदयसे पृथिवीकायिकादि जीवोंके अपने २ योग्य रूप रस गंध स्पर्शसे युक्त पृथिवी आदि पुद्गलम्कन्ध ही शरीररूप परिणत होजाते है । शरीरके भेद और उनके लक्षण बताते है। बादरसुदुमुदयेण य बादरसुहुमा हवंति तदेहा । घादसरीरं थूलं अघाददेहं हवे सुहुमं ॥ १८२ ।। वादरसूक्ष्मोदयेन च वादरसूक्ष्मा भवन्ति तदेहाः । घातशरीरं स्थूलमघातदेहं भवेत सूक्ष्मम् ॥ १८२ ॥ अर्थ-~~-वादर नामकर्मके उदयसे वादर और सूक्ष्म नामकर्मके उदयसे सूक्ष्म शरीर होता है । जो शरीर दूसरेको रोकनेवाला हो अथवा जो दूसरेसे रुके उसको बादर ( स्थूल ) कहते हैं । और जो दूसरेको न तो रोके और न स्वयं दूसरेसे रुके उसको सूक्ष्म शरीर कहते है। शरीरका प्रमाण बताते है। तदेहमंगुलस्स असंखभागस्स बिंदमाणं तु । आधारे थूला ओ सव्वत्थ णिरंतरा सुहुमा ॥ १८३ ।। तदेहमगुलस्यासंख्यभागस्य वृन्दमानं तु । आधारे स्थला: ओ सर्वत्र निरन्तराः सूक्ष्माः ॥ १८३ ।। १४स गाया " ओ शिष्यसम्बोधनके लिये आया है।

गोम्मटसारः। अर्थ-बादर और सूक्ष्म दोंनो ही तरहके शरीरोंका प्रमाण घनामुलके असंख्यातमे भागप्रमाण है । इनमें से स्थूल शरीर आधारकी अपेक्षा रखता है, किन्तु सूक्ष्म शरीर विना व्यवधानके सब जगह अनन्तानन्त भरे हुए है। वनस्पतिकायका स्वरूप और भेद बताते है। उदये दु वणप्फदिकम्मस्स य जीवा वणप्फदी होति । पत्तेयं सामण्णं पदिहिदिदरेत्ति पत्तेयं ॥ १८४ ॥ उदये तु वनस्पतिकर्मणश्च जीवा वनस्पतयो भवन्ति । प्रत्येकं सामान्यं प्रतिष्ठितेतरे इति प्रत्येकम् ॥ १८४ ॥ अर्थ-वनस्पति नामकर्मके उदयसे जीव वनस्पतिकायिक होते है। उनके दो भेद है, एक प्रत्येक दूसरा साधारण। प्रत्येकके भी दो भेद है, प्रतिष्ठित और अप्रतिष्ठित । भावार्थ- प्रत्येक उसको कहते है कि जिसके एक शरीरका एक जीव मालिक हो । जहाँपर अनेक जीव समानरूपसे रहें उसको । साधारण शरीर कहते है। प्रत्येक वनस्पतिके दो भेद है। एक प्रतिष्ठित दूसरी अप्रतिष्ठित । प्रतिष्ठित प्रत्येक उसको कहते है कि जिस एक शरीरमें एक जीवके मुख्यरूपसे रहनेपर भी उस जीवके आश्रय से अनेक निगोदिया जीव रहै । और जहांपर एक मुख्य जीवके आश्रयसे अनेक निगोदिया जीव नहीं रहते उनको अप्रतिष्ठित प्रत्येक कहते है। मूलग्गपोरबीजा कंदा तह खंदबीजबीजरुहा । सम्मुच्छिमा य भणिया पत्तेयाणंतकाया य ॥ १८५ ॥ मूलाग्रपर्ववीजाः कन्दास्तथा स्कन्धवीजवीजरुहाः । सम्मूछिमाश्च भाणताः प्रत्येकानंतकायाश्च ॥ १८५ ।। अर्थ-जिन वनस्पतियोंका वीज, मूल, अग्र, पर्व, कन्द, अथवा स्कन्ध है, अथवा जो चीजसे ही उत्पन्न होजाती है, यद्वा सम्मूर्छन है, वे सभी वनस्पतियां सप्रतिष्ठित तथा अप्रतिष्ठित दोनो प्रकार की होती है । मावार्थ-वनस्पति अनेक प्रकारकी होती है। कोई तो मलसे उत्पन्न होती है, जैसे अदरख हल्दी आदि । कोई अग्रसे उत्पन्न होती है जेसे गुलाब । कोई पर्वसे ( पंगोली ) उत्पन्न होती है, जसे ईख वेंत आदि । कोई कन्दसे उत्पन्न होती है, जैसे सूरण आदि । कोई स्कन्धसे उत्पन्न होती है, जैसे ढाक । कोई अपने २ वजिसे उत्पन्न होती है, जैसे गेहूं चना आदि । कोई मट्टी जल आदिके सम्बन्ध ही उत्पन्न होजाती है, जैसे घास आदि । परन्तु ये सब ही वनस्पति सप्रतिष्ठित प्रत्येक और अप्रतिष्ठित प्रत्येक दोनों प्रकारकी होती है ।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम ७ सप्रतिष्ठित प्रत्येक और अप्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पतिकी पहचान ( परक्षिा-चिन्ह) वताते हैं। गूढसिरसंधिपब्वं समभंगमहारुहं च छिण्णरुह । साहारणं सरीरं तविबरीयं च पत्तेयं ॥ १८६ ॥ गूढशिरासन्धिपर्व समभङ्गमहीरुकं च छिन्नरुहम् । साधारणं शरीरं तद्विपरीतं च प्रत्येकम् ॥ १८६ ॥ अर्थ-जिनकी शिरा संधि पर्व अप्रकट हो, और जिसका भग करनेपर समान भंग हों, और दोनों भङ्गोंमें परस्पर तन्तु न लगा रहै, तथा छेदन करनेपर भी जिसकी पुनः वृद्धि होजाय उसको सप्रतिष्ठित प्रत्येक, और इससे विपरीतको अप्रतिष्ठित प्रत्येक कहते है। मूले कंदे छल्लीपवालसालदलकुसुमफलबीजे । समभंगे सदि णंता असमे सदि होंति पत्तेया ॥ १८७ ॥ मूले कन्दे त्वक्प्रवालशालादलकुसुमफलबीजे । समभङ्गे सति नान्ता असमे सति भवन्ति प्रत्येकाः ॥ १८७ ॥ अर्थ-जिन वनस्पतियोंके मूल कन्द त्वचा प्रवाल ( नवीन कोंपल) क्षुद्रशाखा ( टहनी ) पत्र फूल तथा बीजोको तोड़नेसे समान भंग हो उसको सप्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पति कहते है। और जिनका भंग समान न हो उसको अप्रतिष्ठित प्रत्येक कहते है। कंदस्स व मूलस्स व सालाखंदस्स वाबि बहुलतरी । छल्ली साणंतजिया पत्तेयजिया तु तणुकदरी ॥ १८८॥ कन्दस्य वा मूलस्य वा शालास्कन्धस्य वापि वहुलतरा । त्वक् सा अनन्तजीवा प्रत्येकजीवा तु तनुकतरा ॥ १८८ ॥ अर्थ-जिस वनस्पतिके कन्द, मूल, क्षुद्रशाखा या स्कन्धकी छाल मोटी हो उसको अनन्तजीव ( सप्रतिष्ठित प्रत्येक ) कहते है। और जिसकी छाल पतली हो उसको अप्रतिष्ठित प्रत्येक कहते है। बीजे जोणीभूदे जीवो चंकमदि सो व अण्णो वा । जे वि य मूलादीया ते पत्तेया पढमदाए ॥ १८९ ॥ वीजे योनीभूते जीवः चङ्गामति स वा अन्यो वा । येपि च म्लादिकास्ते प्रत्येकाः प्रथमतायाम् ॥ १८९ ॥ अर्थ-निप्त योनीमृत चीजमें वही जीव या कोई अन्य जीव आकर उत्पन्न हो वह और मूदादिक प्रथम अवस्थामें अप्रतिष्ठित प्रत्येक होते है । मावार्थ-वे बीज जिनकी कि गोम्मटसारः। ७७ अड्कुर उत्पन्न करनेकी शक्ति नष्ट नहीं हुई है, और जिनमें या तो वही जीव आकर उत्पन्न हो जो पहले उसमें था, या कोई दूसरा जीव कहीं अन्यत्रसे मरण करके आकर उत्पन्न हो, और मूल कन्द आदि जिनको कि पहले सप्रतिष्ठित कहा है वे भी अपनी उत्पत्तिके प्रथम समयसे लेकर अन्तर्मुहूर्तपर्यन्त अप्रतिष्ठित प्रत्येक ही रहते है। इस प्रकार प्रत्येक और साधारणके भेदसे दो प्रकारकी वनस्पतियोंमेंसे प्रत्येकका वर्णन करके अब साधारणका वर्णन करते है। साहारणोदयेण णिगोदसरीरा हवंति सामण्णा । ते पुण दुविहा जीवा बादरमुहमात्ति विण्णेया ॥ १९० ॥ साधारणोदयेन निगोदशरीरा भवन्ति सामान्याः । ते पुनर्द्विविधा जीवा बादरसूक्ष्मा इति विज्ञेयाः ॥ १९० ॥ अर्थ-जिन जीवोंका शरीर साधारण नामकर्मके उदयसे निगोदरूप होजाता है उनही को सामान्य या साधारण कहते है। इनके दो भेद है, एक बादर दूसरा सूक्ष्म । भावार्थ-साधारण नामकर्मके उदयसे इस प्रकारका जीवोंका शरीर होता है कि जो अनन्तानन्त जीवोंको आश्रय दे सकें । इस सरीरमें एक मुख्य जीव नहीं रहता; किन्तु अनन्तानन्त जीव समानरूपसे रहते ह । अत एव इनका नाम सामान्य या साधारण जीव है। इनके दो भेद है, एक वादर दूसरा सूक्ष्म साहारणमाहारो साहारणमाणपाणगहणं च । साहारणजीवाणं साहारणलक्खणं भणियं ॥ १९१ ॥ साधारणमाहारः साधारणमानापानग्रहणं च । साधारणजीवाना साधारणलक्षणं भणितम् ॥ १९१ ॥ अर्थ-इनका ( साधारण जीवोंका ) साधारण (समान ) ही तो आहार होता है, और साधारण ही श्वासोच्छासका ग्रहण होता है । साधारण जीवोंका लक्षण साधारण ही परमागममें कहा है। भावार्थ-साथ ही उत्पन्न होनेवाले जिन अनन्तानन्त ( साधारण ) जीवोंकी आहारादिक पर्याप्ति और उनके कार्य सदृश और समान कालमें होते हों उनको साधारण कहते है। जत्थेक्कमरइ जीवो तत्थ दु मरणं हवे अणंताणं । वक्कमइ जत्थ एक्को बक्कमणं तत्थ ताणं ॥ १९२ ।। यत्रैको म्रियते जीवस्तत्र तु मरणं भवेत् अनन्तानाम । प्रकामति यत्र एकः प्रकमणं तत्रानन्तानाम् ॥ १९२ ॥ अर्थ-साधारण जीवोंमें जहा पर एक जीव मरण करता है वहापर अनन्त जीवोंका रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम मरण होता है। और जहांपर एक जीव उत्पन्न होता है वहां अनन्त जीवोंका उत्पाद होता है । भावार्थ-साधारण जीवोंमें उत्पत्ति और मरणकी अपेक्षा भी सादृश्य है। प्रथम समयमें उत्पन्न होनेवाले साधारण जीवोंकी तरह द्वितीयादि समयोंमें भी उत्पन्न होनेवाले साधारण जीवोंका जन्म मरण साथ ही होता है। यहां इतना विशेष समझना कि एक वादर निगोद शरीरमें या सूक्ष्म निगोद शरीरमें साथ उत्पन्न होनेवाले अनन्तानन्त साधारण जीव या तो पर्याप्तक ही होते है या अपर्यातक ही होते है । किन्तु मिश्ररूप नहीं होते क्योंकि उनके समान कर्मोदयका नियम है। वादर निगोदिया जीवोंकी संख्या बतानेको दो गाथा कहते है। खंधा असंखलोगा अंडरआवासपुलविदेहा वि। हेट्टिल्लजोणिगाओ असंखलोगेण गुणिदकमा ॥ १९३ ॥ स्कन्धा असंख्यलोका अंडरावासपुलविदेहा अपि । अधस्तनयोनिका असंख्यलोकेन गुणितक्रमाः ॥ १९३ ॥ अर्थ:-स्कन्धोंका प्रमाण असंख्यातलोकप्रमाण है । और अंडर आवास पुलवि तथा देह ये क्रमसे उत्तरोत्तर असंख्यातलोक २ गुणित है। भावार्थ-अपने योग्य असंख्यातका लोकके समस्त प्रदेशोंसे गुणा करनेपर जो लब्ध आवे उतना समस्त स्कन्धोंका प्रमाण है । और एक एक स्कन्धमें असंख्यातलोक प्रमाण अंडर है, एक २ अंडरमें असंख्यात- लोक प्रमाण आवास है, एक २ आवसमें असंख्यातलोक प्रमाण पुलवि है । एक २ पुल- विमें असंख्यातलोकप्रमाण वादर निगोदिया जीवोंके शरीर है । इस लिये जब एक स्कन्धर्म असंख्यात लोक प्रमाण अंडर है तब समस्त स्कन्धोंमें कितने अंडर होगे ? इस प्रकार इनका त्रैराशिक करनेसे अंडर आवास पुलवि तथा देह इनका उत्तरोत्तर क्रमसे असंख्यातलोक असं ख्यातलोक गुणा प्रमाण निकलता है इसका दृष्टान्त बताते है। जम्बूदीबं भरहो कोसलसागेदतग्घराइं वा । खंधंडरआवासापुलविशरीराणि दिलुता ॥ १९४ ॥ जम्बूद्वीपो मरतः कोशलसाकेततगृहाणि वा । स्कन्धाण्डरावासाः पुलविशरीराणि दृष्टान्ताः ॥ १९४ ॥ अर्थ-जम्बूद्वीप भरतक्षेत्र कोशलदेश साकेतनगरी ( अयोध्या ) और साकेत नग- के घर ये क्रमसे स्कन्ध अंडर आवास पुलवि और देहके दृष्टान्त हैं। भावार्थ---जिस प्रकार जम्बट्टीप आदिक एक २ द्वीपमें भरतादिक अनेक क्षेत्र, एक २ भरतादि क्षेत्रमें १सन्ध अटर वाम भादि प्रत्येकजीवोंके शरीरविगेष है।

गोम्मटसारः।
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कोशल आदि अनेक देश, एक २ देशमें अयोध्या आदि अनेक नगरी, और एक २ नगरीमें
अनेक घर होते है । उस ही प्रकार एक २ स्कन्धौ , असंख्यातलोक २ प्रमाण अंडर,
एक २ अंडरमे असंख्यातलोक २ प्रमाण आवास, एक २ आवासमें असंख्यातलोक २
प्रमाण पुलवि, और एक २ पुलविमें असंख्यातलोक २ प्रमाण बादर निगोदियाजीवोके
शरीर होते है।
एक निगोदशरीरमें द्रव्यकी अपेक्षा जीवोका प्रमाण बताते है ।
एगणिगोदशरीरे जीवा दवप्पमाणदो दिट्ठा ।
सिद्धेहिं अणंतगुणा सव्वेण वितीदकालेण ॥ १९५ ॥
एकनिगोदशरीरे जीवा द्रव्यप्रमाणतो दृष्टाः ।
सिद्धैरनन्तगुणाः सर्वेण व्यतीतकालेन ॥ १९५ ॥
अर्थ-द्रव्यकी अपेक्षा सिद्धराशिसे और सम्पूर्ण अतीतकालके समयोंसे अनन्तगुणे
जीव एक निगोद शरीरमे रहते है।
नित्यनिगोदका लक्षण कहते है।
अत्थि अणंता जीवा जेहिं ण पत्तो तसाण परिणामो।
भावकलङ्कन्सुपउरा णिगोदवासं ण मुंचति ॥ १९६ ॥
सन्ति अनन्ता जीवा यैन प्राप्तः त्रसाना परिणामः ।
भावकलड्कसुप्रचुरा निगोदवासं न मुञ्चन्ति ॥ १९६ ॥
अर्थ-ऐसे अनन्तानन्त जीव है कि जिन्होने त्रसोंकी पर्याय अभीतक कभी नहीं
पाई है, और जो निगोद अवस्थामे होनेवाले दुर्लेश्यारूप परिणामोंसे अत्यन्त अभिभूत रहनेके
कारण निगोदस्थानको कभी नहीं छोडते । भावार्थ-निगोदके दो भेद है, एक इतरनिगोद
दूसरा नित्यनिगोद । जिसने कभी त्रस पर्यायको प्राप्त करलिया हो उसको इतरनिगोद
कहते है । और जिसने अभीतक कभी त्रसपर्यायको नहीं पाया, अथवा जो कमी त्रस
पर्यायको नहीं पावेगा उसको नित्यनिगोद कहते है । क्योंकि नित्यशब्दके दो अर्थ होते
है, एक तो अनादि दूसरा अनादि अनन्त । इन दोनों ही प्रकारके जीवोंकी संख्या
अनन्तानन्त है।
दो गाथाओंमें त्रस जीवोंका स्वरूप भेद और उनका क्षेत्र आदि बताते है।
बिहि तिहि चदुहिं पंचहिं सहिया जे इंदिएहिं लोयमि।
ते तसकाया जीवा या वीरोबदेसेण ।। १९७ ॥
द्वाभ्यां त्रिभिश्चतुर्भिः पञ्चभिः सहित. ये इन्द्रियोंके ।
ते त्रसकाया जीवा ज्ञेया वीरोपदेशेन ॥ १९७ ॥

अर्थ- रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-जो जीव दो तीन चार पांच इन्द्रियोंसे युक्त है उनको वीर भगवान्के उपदे- शसे त्रस काय समझना चाहिये । भावार्थ-~-पूर्वोक्त स्पर्शनादिक पांच इन्द्रियोंमें से आदिकी तीन, चार, या पाच इन्द्रियोंसे जो युक्त है उसको स कहते है। अत एव इन्द्रियोंकी अपेक्षा त्रसोके चार भेद हुए-द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, पंचेन्द्रिय । उबबादमारणंतियपरिणदतसमुज्झिऊण सेसतसा। तसणालिबाहिरह्मि य णस्थित्ति जिणेहिं णिद्दिढें ॥ १९८॥ उपपादमारणान्तिकपरिणतत्रसमुज्झित्वा शेषत्रसाः । त्रसनालीवाह्ये च न सन्तीति जिनैर्निर्दिष्टम् ॥ १९८ ॥ -उपपाद और मारणान्तिक समुद्घातवाले त्रस जीवोंको छोडकर वाकीके त्रस जीव वसनालीके बाहर नहीं होते यह जिनेन्द्रदेवने कहा है। भावार्थ-किसी विवक्षित भवके प्रथम समयकी पर्यायको उपपाद कहते है । अपनी आयुके अन्तिम अन्तर्मुहूर्तमें जो समुद्घात होता है उसको मारणान्तिक समुद्घात कहते है । लोकके बिलकुल मध्यमें एक २ राजू चौडी और मोटी तथा चौदह राजू ऊंची नाली है-उसको असनाली कहते है, क्योकि त्रस जीव इसके भीतर ही होते है-बाहर नहीं होते । किन्तु उपपाद और मारणान्तिक समुद्घातवाले त्रस, तथा इस गाथामें च शब्दका ग्रहण किया है इसलिये केवलसमुद्घातवाले भी त्रसनालीके बाहर कदाचित् रहते है । वह इस प्रकारसे कि लोकके अन्तिम वातवलयमें स्थित कोई जीव मरण करके विग्रहगतिद्वारा त्रसनालिमें सपर्यायसे उत्पन्न होनेवाला है, वह जीव जिस समयमें मरण करके प्रथम मोडा लेता है उस समयमें त्रसपर्यायको धारण करने पर भी वसनालीके वाहर है। इस लिये उपपादकी अपेक्षा त्रस जीव त्रसनालीके बाहर रहता है । इसही प्रकार त्रसनालीमें स्थित किसी त्रसने मारणान्तिक समुद्घातके द्वारा त्रसनालीके बाहिरके प्रदेशोंका स्पर्श किया; क्योंकि उसको मरण करके वहीं उत्पन्न होना है, तो उस समयमें भी त्रस जीवका अस्तित्व सनालीके वाहिर पाया जाता है। इस ही तरह जब केवली केवलसमुद्धातके द्वारा प्रसनालीके वाह्य प्रदेशोंका स्पर्श करते है उस समयमे भी सनालोके बाहर त्रस जीवका सद्भाव पाया जाता है । परन्तु इन तीनको छोड़कर वाकी त्रस जीव प्रसनालीके वाहर कभी नहीं रहते । निस तरह वनस्पतियोंमें प्रतिष्ठित अप्रतिष्ठित भेद है उस ही तरह दूसरे जीवों में भी ये भेद होते हैं यह बताते हैं। पुढवीआदिचउण्हं केवलिआहारदेवणिरयंगा। अपदिहिदा णिगोदहिं पदिट्ठिदंगा हवे सेसा ॥ १९९ ।। पृथिन्यादिचतुष्णा केवल्याहारदेवनिरयाङ्गानि । अप्रतिष्ठितानि निगोदैः प्रतिष्ठिताझा भवन्ति शेषाः ॥ १९९ ।।

गोम्मटसारः । ८१ अर्थ-पृथिवी, जल, अग्नि, और वायुकायके जीवोंका शरीर तथा केवलिशरीर आहार- कशरीर और देवनारकियोंका शरीर निगोदिया जीवोसे अप्रतिष्ठित है। और शेष वनस्पतिका- यके जीवोंका शरीर तथा द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय पंचेन्द्रिय तिर्यञ्च और मनुष्योका शरीर निगोदिया जीवोंसे प्रतिष्ठित है। स्थावरकायिक और त्रसकायिक जीवोका आकार बताते है। मसुरंबुबिंदुसईकलावधयसण्णिहो हवे देहो। पुढवीआदिचउण्हं तरुतसकाया अणेयविहा ॥ २०० ॥ मसूराम्बुबिन्दुसूचीकलापध्वजसन्निभो भवेद्देहः । पृथिव्यादिचतुर्णा तरुत्रसकाया अनेकविधाः ॥ २० ॥ अर्थ--मसूर ( अन्नविशेष ), जलकी बिन्दु, सुइयोंका समूह, ध्वजा, इनके सदृश पृथिवी अप् तेज वायुकायिक जीवोका शरीर होता है । और वृक्ष तथा त्रसोंका शरीर क प्रकारका होता है । भावार्थ-जिस तरहका मसूरादिकका आकार है उस ही तरहका भी ..कक शरीर होता है, किन्तु वृक्ष और त्रसोंका शरीर एक प्रकारका नहीं; किन्तु • आकारका होता है। इस प्रकार कायमार्गणाका निरूपण करके, अब कायविशिष्ट यह संसारी जीव कायके ही कर्मभारका वहन करता है यह दृष्टान्तद्वारा बताते है । जह भारवहो पुरिसो वहइ भरं गेहिऊण कावलियं । एमेव वहइ जीवो कम्मभरं कायकावलियं ॥ २०१॥ यथा भारवहः पुरुषो वहति भारं गृहीत्वा कावटिकाम् । एवमेव वहति जीवः कर्मभरं कायकावटिकाम् ॥ २०१ ॥ अर्थ-जिस प्रकार कोई भारवाही पुरुष कोवटिकाके द्वारा भारका वहन करता है, ही प्रकार यह जीव कायरूपी कावटिकाके द्वारा कर्मभारका वहन करता है । भावार्थ- प्रकार मजूर कावटिकाके द्वारा निरन्तर वोझा ढोता है, और उससे रहित होनेपर सुखी है, उस ही प्रकार यह संसारी जीव कायके द्वारा कर्मरूपी वोझाको नाना गतियोंमें लिये । है, किन्तु इस काय और कर्मके अभावमें परम सुखी होता है । कायमार्गणासे रहित सिद्धोंका स्वरूप बताते है । जह कंचणमग्गिगयं मुंचइ किट्टेण कालियाए य । तह कायबंधमुक्का अकाइया झाणजोगेण ।। २०२ ॥ १ अमात् इतने जोपॉफ नारीरफे गधय निगोदिचा जीव नहीं रहते हैं । २ नईगी-मामी। गो.११ ८२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् यथा कंचनमग्निगतं मुच्यते किट्टेन कालिकया च । तथा कायवन्धमुक्का अकायिका ध्यानयोगेन । २०२॥ अर्थ-जिस प्रकार अग्निके द्वारा सुसंस्कृत सुवर्ण बाह्य और अभ्यन्तर दोनों ही प्रकारके मलसे रहित होजाता है । उस ही प्रकार ध्यानके द्वारा यह जीव शरीर और कर्म- वन्धसे रहित होकर सिद्ध होजाता है । भावार्थ-जिस प्रकार सोलह तावके द्वारा तपाये हुए सुवर्णमें बाह्य और अभ्यतर दोनो ही प्रकारके मलका बिलकुल अभाव होजानेपर फिर किसी दूसरे मलका सम्बन्ध नहीं होता । उस ही प्रकार शुक्लध्यान आदिरूपी अग्निके द्वारा सुतप्त आत्मामें काय और कर्मके सम्बन्धके सर्वथा छूटने पर फिर उनका बन्ध नहीं होता । ग्यारह गाथाओंमें पृथिवी कायिकादि जीवॉकी संख्याको बताते है। आउढरासिवारं लोगे अण्णोण्णसंगुणे तेऊ । भूजलवाऊ अहिया पडिभागोऽसंख्यलोगो दु॥२०३ ॥ सार्धत्रयराशिवारं लोके अन्योन्यसंगुणे तेजः । भूजलवायवः अधिकाः प्रतिभागोऽसंख्यलोकस्तु ॥ २०३ ॥ अर्थ-शलाकात्रयनिष्ठापनकी विधिसे लोकका साढ़े तीन वार परस्पर गुणा करनेसे तेजस्कायिक जीवोंका प्रमाण निकलता है । पृथिवी जल वायुकायिक जीवोंका उत्तरोत्तर तेजस्कायिक जीवोंकी अपेक्षा अधिक २ प्रमाण है । इस अधिकताके प्रतिभागहारका प्रमाण असंख्यातलोक है। भावार्थ-लोकप्रमाण ( जगच्छ्रेणीके घनका जितना प्रमाण है उसके वरावर ) शलाका विरलन देय इस प्रकार तीन राशि स्थापन करना । विरलन राशिका विरलन कर ( एक २ वखेर कर ) प्रत्येक एकके ऊपर उस लोकप्रमाण देय राशिका स्थापन करना, और उन देय राशियोंका परस्पर गुणा करना, और शलाका राशिमसे एक कम करना । इस उत्पन्न महाराशिप्रमाण फिर विरलन और देय ये दो राशि स्थापन करना, तथा विरलन राशिका विरलन कर प्रत्येक एकके ऊपर देयराशि रखकर पूर्वकी तरह परस्पर गुणा करना, और शलाका राशिमेंसे एक और कम करना । इस ही प्रकारसे एक २ कम करते २ जब समस्त शलाका राशि समाप्त होजाय तब उस उत्पन्न महाराशिप्रमाण फिर विरलन देय शलाका ये तीन राशि स्थापन करना, और विरलन राशिका विरलन और देय राशिका उक्तरीतिसे गुणा करते २ तथा पूर्वोक्त रीतिसे ही शलाका राशिमेंसे एफ २ कम करते २ जब दूसरी वार भी शलाका राशि समाप्त होजाय, तब उत्पन्न महा- गशिरमाण फिर तीसरी वार उक्त तीन राशि स्थापन करना । और उक्त विधानके अनुसार ही विरत्न गणिका विरलन देय राशिका परस्पर गुणाकार तथा शलाका राशिमेंसे एक २ गोम्मटसारः । ८३ कम करना । इस प्रकार शलाकात्रयनिष्ठापन कर चौथी वारकी स्थापित महाशलाकाराशि- मेंसे पहली दूसरी तीसरी शलाका राशिका प्रमाण घटानेपर जो शेष रहे उतनी वार उक्त कमसे विरलन राशिका विरलन और देयराशिका परस्पर गुणाकार तथा शेष महाशलाका- राशिमेंसे एक २ कम करना । ऐसा करनेसे अन्तमें जो महाराशि उत्पन्न हो उतनाही तेज- स्कायिक जीवोंका प्रमाण है । इस तेजस्कायिक जीवराशिमें असंख्यात लोकका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उस एक भागको तेजस्कायिक जीवराशिमे मिलानेपर पृथिवीकायिक जीवोंका प्रमाण निकलता है। और पृथिवीकायिक जीवोंके प्रमाणमें असंख्यात लोकका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उस एक भागको पृथिवीकायिक जीवोंके प्रमाणमें मिलानेपर जलकायके जीवोंका प्रमाण निकलता है। जलकायके जीवोंके प्रमाणमे असंख्यात लोकका माग देनेसे जो लब्ध आवे उस एक भागको जलकायकी जीवराशिमें मिलानेपर वायुकायिक जीवोंका प्रमाण निकलता है। अपदिहिदपत्तेया असंखलोगप्पमाणया होति तत्तो पदिहिदा पुण असंखलोगेण संगुणिदा ॥ २०४॥ अप्रतिष्ठितप्रत्येका असंख्यलोकप्रमाणका भवन्ति । ततः प्रतिष्ठिताः पुनः असंख्यलोकेन संगुणिताः ॥ २०४ ॥ अर्थ-अप्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पतिकायिक जीव असंख्यातलोकप्रमाण है, और इससे भी असंख्यातलोकगुणा प्रतिष्ठितप्रत्येक वनस्पतिकायिक जीवोंका प्रमाण है। तसरासिपुढविआदीचउक्कपत्तेबहीणसंसारी। साहारणजीवाणं परिमाणं होदि जिणदिठं ॥ २०५॥ त्रसराशिपृथिव्यादिचतुष्कप्रत्येकहीनसंसारी । साधारणजीवानां परिमाणं भवति जिनदिष्टम् ॥ २०५ ॥ अर्थ-सम्पूर्ण संसारी जीवराशिमेसे, बस, पृथिव्यादि चतुष्क ( पृथिवी अप् तेज वायु ) प्रत्येक वनस्पतिकायका प्रमाण घटानेसे जो शेप रहे उतना ही साधारण जीवोंका प्रमाण है ऐसा जिनेन्द्रदेवने कहा है। सगसगअसंखभागो बादरकायाण होदि परिमाणं । सेसा सुहमपमाणं पडिभागो पुव्वणिदिठो ॥ २०६ ॥ स्वकस्वकासख्यभागो बादरकायानां भवति परिमाणम् । शेपाः सूक्ष्मप्रमाण प्रतिभाग. पूर्वनिर्दिष्टः ॥ २०६ ॥ अर्थ.-अपनी २ राशिका असख्यातमा माग बादरकाय जीनोंका प्रमाण है । और रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् शेष सूक्ष्म जीवोंका प्रमाण है । इसके प्रतिभागहारका प्रमाण पूर्वोक्त असंख्यातलोकप्रमाण है । भावार्थ-पृथिवीकायिकादि जीवोंकी अपनी २ राशिमे असंख्यात लोकका भाग देनेसे जो लब्ध आवे वह एक भाग प्रमाण चादर, शेष बहुभागप्रमाण सूक्ष्म जीवोका प्रमाण है। सुहमेसु संखभागं संखा मागा अपुण्णगा इदरा । जस्सि अपुण्णद्धादो पुण्णद्धा संखगुणिदकमा ॥ २०७॥ सूक्ष्मेषु संख्यभागः संख्या भागा अपूर्णका इतरे । यस्मादपूर्णाद्धातः पूर्णाद्धा संख्यगुणितक्रमाः ॥ २०७ ॥ अर्थ- -सूक्ष्म जीवोमें संख्यात भागमेंसे एक भागप्रमाण अपर्याप्तक और बहुभाग- प्रमाण पर्यातक है । क्योंकि अपर्याप्तकके कालसे पर्याप्तकका काल संख्यातगुणा है। पल्लासंखेज्जवहिदपरंगुलभाजिदे जगप्पदरे । जलभूणिपवादरया पुण्णा आवलिअसंखभजिदकमा ।। २०८ ॥ पल्यासंख्यावहितप्रतरागुलभाजिते जगत्प्रतरे । जलभूनिपवादरकाः पूर्णा आवल्यसंख्यभजितक्रमाः ॥ २०८॥ अर्थ-पल्यके असंख्यातमें भागसे भक्त प्रतराड्गुलका जगत्प्रतरमें भाग देनसे जो लव्य आवे उतना वादर पर्याप्त जलकायिक जीवोंका प्रमाण है। इसमें अवलिके असंख्यातमे भागका भाग देनेसे जो लब्ध रहे उतना बादर पर्याप्त पृथ्वीकायिक जोवोका प्रमाण इसमें भी आवलिके असख्यातमे भागका भाग देनेसे जो लब्ध रहे उतना सप्रतिष्ठित प्रत्येक पर्याप्त जीवराशिका प्रमाण होता है। पूर्वकी तरह इसमें भी आवलीके असंख्यातमे भागका भाग देनेसे जो लब्ध रहे उतना अप्रतिष्ठित प्रत्येक पर्याप्त जीवराशिका प्रमाण होता है। विंदावलिलोगाणमसंखं संखं च तेउवाऊणं । पज्जत्ताण एमाणं तेहिं विहीणा अपज्जत्ता ॥ २०९॥ वृन्दावलिलोकानामसंख्यं संख्यं च तेजोवायूनाम् । पर्याप्तानां प्रमाणं तैर्विहीना अपर्याप्ताः ॥ २०९ ॥ अर्थ-बनावलिके असंख्यात भागोंमेंसे एक भाग प्रमाण पर्याप्त तेजस्कायिक जीवोंका प्रमाण है । और लोकके संख्यात भागों से एक भागप्रमाण पर्याप्त वायुकायिक जीवोंका प्रमाण है । अपनी २ सम्पूर्ण राशिमसे पर्याप्तकोंका प्रमाण घटानेपर जो शेष रहे वही अप- यानोंका प्रमाण है । भावार्थ-मूक्ष्म जीवोंका अलग वर्णन किया गया है । इसलिये "पटासावजवहिद" और " विंदावलिलोगाण" इन दो गाथाओमें वादर जीवोका ही प्रमाण गोम्मटसारः। ८५ समझना । और इन दो गाथाओंमें कहे हुए पर्याप्तक जीवोंके प्रमाणको अपनी २ सामान्य राशिमेसे घटानेपर जो शेष रहे उतना अपर्याप्तकोका प्रमाण है। साहरणबादरेसु असंखं भागं असंखगा भागा। पुण्णाणमपुण्णाणं परिमाणं होदि अणुकमसो ॥ २१० ॥ साधारणबादरेषु असंख्यं भागमसंख्यका भागाः । पूर्णानामपूर्णाना परिमाणं भवत्यनुक्रमशः ॥ २१० ॥ अर्थ-साधारण बादर जीवें में असंख्यात भागमेंसे एक भागप्रमाण पर्याप्त और बहु- भागप्रमाण अपर्याप्त है। आवलिअसंखसंखेणवहिदपदरडलेण हिदपदरं । कमसो तसतप्पुण्णा पुण्णूणतसा अपुण्णा हु ॥ २११ ॥ आवल्यसंख्यसंख्येनावहितप्रतराड्गुलेन हितप्रतरम् । क्रमशस्त्रसतत्पूर्णाः पूर्णोनत्रसा अपूर्णा हि ॥ २११ ॥ अर्थ-आवलीके असंख्यातमे भागसे भक्त प्रतरागुलका भाग जगत्प्रतरमें देनेसे जो लब्ध आवे उतना ही सामान्य त्रसराशिका प्रमाण है। और आवलीके संख्यातमे भागसे भक्त प्रतराड्गुलका भाग जगत्प्रतरमें देनेसे जो लब्ध आवे उतना पर्याप्त त्रस जीवोंका प्रमाण है। सामान्य त्रसराशिमसे पर्याप्तकोंका प्रमाण घटानेपर शेष अपर्याप्त त्रसोंका प्रमाण निकलता है। बादर तेजस्कायिकादि जीवोंकी अर्द्धच्छेद संख्याको बताते है। आवलिअसंखभागेणवहिदपल्लूणसायरद्धछिदा । बादरतेपणिभूजलवादाणं चरिमसायरं पुण्णं ॥ २१२ ॥ आवल्यसंख्यभागेनावहितपल्योनसागरार्धच्छेदाः । वादरतेपनिभूजलवाताना चरमः सागरः पूर्णः ॥ २१२ ॥ अर्थ-आवलीके असंख्यातमे भागसे भक्त पल्यको सागरमेसे घटानेपर जो शेष रहे उतने वादर तेजस्कायिक जीवोंके अर्द्धच्छेद है । और अप्रतिष्ठित प्रत्येक, प्रतिष्ठित प्रत्येक, वादर पृथ्वीकायिक, वादर जलकायिक जीवोंके अर्द्धच्छेदोंका प्रमाण कमसे आवलीके असंख्यातमे भागका दो वार, तीन वार, चार वार, पाच वार पल्यमें भाग टेनेसे जो लब्ध आवे उसको सागरमें घटानेसे निकलता है। और वादर वातकायिक जीवोंके अर्द्धच्छेदका प्रमाण पूर्ण सागरप्रमाण है । भावार्थ-किसी राशिको जितनी वार आधा २ करनेसे एक शेप रहे उसको अर्द्धच्छेद राशि कहते है । जैसे दोको एक, चारकी दो, आठकी तीन, सोलहकी चार, और वत्तीसकी पाच अनुच्छेद राशि है । इस ही प्रकार वादर तेजस्कायिक जीवोंकी .

८६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम अर्द्धच्छेद राशिका प्रमाण एक वार आवलीके असंख्यातमे भागसे भाजित पल्यको सागरमें घटानेपर जो शेष रहे उतना है। दो वार आवलीके असंख्यातमे मागसे भाजित पल्यको सागरमें घटानेपर अप्रतिष्ठित प्रत्येक जीवोंके अर्द्धच्छेदोंका प्रमाण निकलता है। तीन बार आवलीके असंख्यातमे भागसे भाजित पल्यको सागरमें घटानेसे शेष प्रतिष्ठित प्रत्येक जीवोंके अर्द्धच्छेदोंका प्रमाण होता है। चार वार आवलीके असंख्यातमे मागसे भाजित पल्यको सागरमें घटानेसे वादर पृथ्वीकायिक जीवोंके अर्द्धच्छेदोंका प्रमाण निकलता है । पाच वार आवलीके असंख्यातम भागसे भाजित पल्यको सागरमेंसे घटानेपर शेष वाटर जलकायिक जीवोंके अर्द्धच्छेदोंका प्रमाण होता है । और वादर वातकायिक जीवोंके अर्द्धच्छेदोंका प्रमाण पूर्ण सागर प्रमाण है। तेवि विसेसेणहिया पल्लासंखेज्जभागमेत्तेण । तम्हा ते रासीओ असंखलोगेण गुणिदकमा ॥ २१३ ।। तेपि विशेषेणाधिकाः पल्यासंख्यातभागमात्रेण । तस्मात्ते राशयोऽसंख्यलोकेन गुणितक्रमाः ॥ २१३ ॥ अर्थ-ये प्रत्येक अर्द्धच्छेद राशि पल्यके असंख्यातमे २ भाग उत्तरोत्तर अधिक है। इसलिये ये सभी राशि ( तेजस्कायिकादि जीवों के प्रमाण ) क्रमसे उत्तरोत्तर असं- ख्यातलोकगुणी है । भावार्थ-वादर तेजस्कायिक जीवोंकी अपेक्षा अप्रतिष्ठित, और अप्रतिष्ठि- तोंकी अपेक्षा प्रतिष्ठित जीवोके अर्द्धच्छेद पत्यके असंख्यातमे २ भाग अधिक है । इसी प्रकार पृथिवीकायिकादि के भी अर्द्धच्छेद पूर्व की अपेक्षा पल्यके असंख्यातमे भाग अधिक हैं। इस लिये पूर्व २ राशिकी अपेक्षा उत्तरोत्तर राशि ( मूल ) असंख्यात लोकगुणी है । उक्त असंख्यातलोकगुणितक्रमको निकालनेके लिये करणसूत्रको कहते है । दिण्णच्छेदेणवहिदइट्ठच्छेदेहिं पयदविरलणं भजिदे । लद्धमिदइट्ठरासीणण्णोण्णहदीए होदि पयधणं ॥ २१४ ॥ देयच्छेदेनावहितेष्टच्छेदैः प्रकृतविरलनं भाजिते । लब्धमितेष्टराश्यन्योन्यहत्या भवति प्रकृतधनम् ॥ २१४ ॥ अर्थ-देयराशिके अर्द्धच्छेदोसे भक्त इष्ट राशिके अर्द्धच्छेदोंका प्रकृत विरलन राशि में भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतनी जगह इष्ट राशिको रखकर परस्पर गुणा करनेसे प्रकृत- धन होता है। भावार्थ-इसकी अंकसंदृष्टि इस प्रकार है कि जब सोलह जगह दूआ माड़ (सोलह जगह दोका अंक रखकर ) परस्पर गुणा करनेसे पण्णट्ठी (६५५३६ ) उत्पन्न होती है तब ६४ जगह दूआ माड़ परस्पर गुणा करनेसे कितनी राशि उत्पन्न होगी ? तो देयराशि दोके अर्धच्छेद एकका इष्टराशि पण्णदीके अर्धच्छेद सोलहमें भागदेनेसे लब्ध गोम्मटसार। ८७ सोलहका भाग प्रकृतविरलन राशि ६४ में दिया, इससे चारकी संख्या लब्ध आई । इसलिये चार जगह पर पण्णठ्ठीको रखकर परस्पर गुणा करनेसे प्रकृतधन होता है । इस ही प्रकार अर्थसंदृष्टिमें जब इतनी जगह ( अर्धच्छेदोंकी राशिप्रमाण ) दूआ माडि परस्पर गुणा करनेसे इतनी राशि उत्पन्न होती है तब इतनी जगह ( आगेकी राशिके अर्धच्छेदप्रमाण) दुआ माड़ि परस्पर गुणा करनेसे कितनी राशि उत्पन्न होगी ? इस प्रकार उक्त क्रमसे त्रैराशिक विधान करनेपर पूर्व २ की अपेक्षा उत्तरोत्तर राशि असंख्यातलोकगुणी सिद्ध होती है। इति कायमार्गणाधिकारः अव योगमार्गणा क्रमप्राप्त है, इसलिये प्रथम ही योगका सामान्य लक्षण कहते हैं। पुग्गलविवाइदेहोदयेण मणवयणकायजुत्तस्स । जीवस्स जा हु सत्ती कम्मागमकारणं जोगो ॥२१५॥ पुद्गलविपाकिदेहोदयेन मनोवचनकाययुक्तस्य । जीवस्य या हि शक्तिः कर्मागमकारणं योगः ॥ २१५ ॥ अर्थ-पुद्गलविपाकिशरीरनामकर्मके उदयसे मन वचन कायसे युक्त जीवकी जो कर्मोके ग्रहण करनेमें कारणभूत शक्ति है उस ही को योग कहते हैं । भावार्थ-आत्माकी अनन्त शक्तियों में से एक योग शक्ति भी है । उसके दो भेद हैं, एक भावयोग दूसरा द्रव्य- योग । पुद्गलविपाकी आङ्गोपाङ्गनामकर्म और शरीरनामकर्मके उदयसे, मनो वचन काय पर्याप्ति जिसकी पूर्ण होचुकी है और जो मनोवाक्कायवर्गणाका अवलम्बन रखता है ऐसे संसारी जीवकी जो समस्त प्रदेशों में रहनेवाली कर्मोके ग्रहण करनेमें करणभूत शक्ति है उसको भावयोग कहते है। और इस ही प्रकारके जीवके प्रदेशोंका जो परिम्पन्द है उसको द्रव्ययोग कहते है। यहां पर कर्मशब्द उपलक्षण है इसलिये कर्म और नोकर्म दोनोंको ग्रहण करनेवाला योग होता है ऐसा समझना चाहिये । योगविशेषका लक्षण कहते है। मणवयणाणपउत्ती सच्चासच्चुभयअणुभयत्थेसु । तण्णामं होदि तदा तेहि टु जोगा हु तज्जोगा ॥ २१६ ॥ मनोवचनयोः प्रवृत्तयः सत्यासत्योभयानुभयार्थेषु । तन्नाम भवति तदा तैस्तु योगात् हि तयोगाः ॥ २१६ ॥ अर्थ-मत्य असत्य उभय अनुभय इन चार प्रकारके पदार्थोंमेंसे जिस पदार्थको जानने या कहनेकेलिये जीवके मन वचनकी प्रवृत्ति होती है उस समयमें मन और वन- ।

है
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्
८८
नका वही नाम होता है । और उसके सम्बन्धसे उस प्रवृत्तिका भी वही नाम होता है ।
भावार्थ-सत्य पदार्थको जाननेकेलिये किसी मनुष्यके मन या वचन की प्रवृत्ति हुई तो
उसके मनको सत्यमन और वचनको सत्य वचन कहेंगे । तथा उनके द्वारा होनेवाले योगको
सत्यमनोयोग और सत्य वचनयोग कहेंगे । इस ही प्रकारसे मन और वचनके असत्य
उभय अनुभय इन तीनो भेदोंको भी समझना चाहिये ।
सम्यग्ज्ञानके विषयभूत पदार्थको सत्य कहते है, जैसे यह जल है । मिथ्यानानके विष-
यभूत पदार्थको मिथ्या कहते हैं, जैसे मरीचिकामें यह जल है । दोनोंके विषयभूत पदा-
र्थको उभय कहते है, जैसे कमण्डलुमें यह घट है, क्योंकि कमण्डलु घटका काम देता है
इसलिये कथंचित् सत्य है और घटाकार नहीं है इसलिये असत्य भी है। जो दोनोंही
प्रकारके ज्ञानका विषय न हो उसको अनुभय कहते है, जैसे सामान्यरूपसे यह प्रतिभास
होना कि “ यह कुछ है " । यहा पर सत्य असत्यका कुछ भी निर्णय नहीं होसकता इस:
लिये
अनुभय
योगविशेषोंका लक्षण कहते है।
सम्भावमणो सच्चो जो जोगो तेण सञ्चमणजोगो।
तबिवरीओ मोसो जाणुभयं सञ्चमोसोत्ति ॥ २१७ ॥
सद्भावमनः सत्यं यो योगस्तेन सत्यमनोयोगः ।
तद्विपरीतो मृषा जानीहि उभयं सत्यमृषेति ॥ २१७ ॥
अर्थ-समीचीन भावमनको ( पदार्थको जाननेकी शक्तिरूप ज्ञानको ) अर्थात् समी-
चीन पदार्थको विषय करनेवाले मनको सत्यमन कहते है। और उसके द्वारा जो योग होता
है उसको सत्यमनोयोग कहते है । सत्यसे जो विपरीत है उसको मिथ्या कहते है। तथा
सत्य और मिथ्या दोनों ही प्रकारके मनको उभय मन कहते है।
ण य सञ्चमोसजुत्तो जो दु मणो सो असच्चमोसमणो ।
जो जोगो तेण हवे असच्चमोसो दु मणजोगो ॥ २१८॥
न च सत्यमृषायुक्तं यत्तु मनः तदसत्यमृषामनः ।
यो योगस्तेन भवेत् असत्यमृषा तु मनोयोगः ॥ २१८ ॥
अर्थ-जो न तो सत्य हो और न मृषा हो उसको असत्यमृषा मन कहते है ।
और उसके द्वारा जो योग होता है उसको असत्यमृषामनायोग कहते है ।
दसविहसच्चे वयणे जो जोगो सो दु सच्चवचिजोगो।
तब्धिवरीओ मोसो जाणुभयं सच्चमोसोत्ति ॥ २१९ ॥

गोम्मटसारः । ८९ दशविधसत्ये वचने यो योगः स तु सत्यवचोयोगः । तद्विपरीतो मृषा जानीहि उभयं सत्यमृषेति ॥ २१९ ॥ अर्थ-दश प्रकारके सत्य अर्थके वाचक वचनको सत्यवचन और उससे होनेवाले योगको सत्यवचनयोग कहते है । तथा इससे जो विपरीत है उसको मृषा और जो कुछ सत्य और कुछ मृषाका वाचक है उसको उभयवचनयोग कहते है। जो णेव सच्चमोसो सो जाण असच्चमोसवचिजोगो। अमणाणं जा भासा सण्णीणामंतणी आदी ॥ २२० ॥ यो नैव सत्यमृषा स जानीहि असत्यमृषावचोयोगः । अमनसां या भाषा संज्ञिनामामन्त्रण्यादिः ॥ २२० ॥ अर्थ-जो न सत्यरूप हो और न मृषारूप ही हो उसको अनुभय वचनयोग कहते है। असंज्ञियोंकी समस्त भाषा और संज्ञियोंकी आमन्त्रणी आदिक भाषा अनुभय भाषा कही जाती है। दशप्रकारका सत्य बताते है। जणवदसम्मदिठवणाणामे रूबे पडुच्चववहारे । संभावणे य भावे उवमाए दसविहं सच्चं ॥ २२१ ॥ जनपदसम्मतिस्थापनानाम्निं रूपे प्रतीत्यव्यवहारयोः । संभावनायां च भावे उपमायां दशविधं सत्यम् ॥ २२१ ॥ अर्थ-जनपदसत्य, सम्मतिसत्य, स्थापनासत्य, नामसत्य, रूपसत्य, प्रतीत्यसत्य, व्यवहारसत्य, संभावनासत्य, भावसत्य, उपमासत्य, इस प्रकार सत्यके दश भेद है । दश प्रकारके सत्यका दो गाथाओमें दृष्टान्त बताते है । मत्तं देवी चंदप्पहपडिमा तह य होदि जिणदत्तो। सेदो दिग्घो रच्झदि कुरोत्ति य ज हवे वयणं ॥ २२२ ॥ सक्को जंबूदीपं पल्लदृदि पाववज्जवयणं च । पल्लोवमं च कमसो जणवदसञ्चादिदिछता ॥ २२३ ॥ भक्तं देवी चन्द्रप्रभप्रतिमा तथा च भवति जिनदत्तः । श्वेतो दी? रघ्यते क्रूरमिति च यद्भवेद्वचनम् ॥ २२२ ।। शको जम्बूद्वीपं परिवर्तयति पापवर्नवत्रनं च । पल्योपमं च क्रमशो जनपदसत्यादिदृष्टान्ताः ॥ २२३ ।। अर्थ-उक्त दश प्रकारके सत्यवचनके ये दश दृष्टान्त है। मावार्थ-तत्तद्देश- वासी मनुष्योंके व्यवहारमें जो शब्द रूढ होरहा है उसको जनपद सत्य कहते है । मे भक्त - गो १२

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रायचन्द्रनैनशास्त्रमालायाम् ।
भात-कुलु । वहुत मनुष्योकी सम्मतिसे जो साधारणमें रूढ हो उसको सम्मतिसत्य या संवृति-
सत्य कहते है । जैसे पट्टराणीके सिवाय किसी साधारण स्त्रीको भी देवी कहना । भिन्न वस्तुमें
भिन्न वस्तुके समारोप करनेवाले वचनको स्थापनासत्य कहते हैं। जैसे प्रतिमाको चन्द्रप्रभ
कहना । दूसरी कोई अपेक्षा न रखकर केवल व्यवहारकेलिये जो किसीका संज्ञाकर्म करना इसको
नामसत्य कहते है। जैसे जिनदत्त । यद्यपि उसको जिनेन्द्रने दिया नहीं है तथापि व्यवहार-
केलिये उसको जिनदत्त कहते है । पुद्गलके रूपादिक अनेकगुणोंमेंसे रूपकी प्रधानतासे जो
वचन कहा जाय उसको रूपसत्य कहते है । जैसे किसी मनुष्यके केशोंका काला कहना, अथवा
उसके शरीरमें रसादिकके रहने पर भी उसको श्वेत कहना । किसी विवक्षित पदार्थकी अपेक्षासे
दूसरे पदार्थके स्वरूपका कथन करना इसको प्रतीत्यसत्य अथवा आपेक्षिकसत्य कहते है । जैसे
किसीको वड़ा लम्बा या स्थूल कहना । नैगमादि नयोंकी प्रधानतासे जो वचन बोला जाय उसको
व्यवहारसत्य कहते है । जैसे नैगम नयकी प्रधानतासे " भात पकाता हूं " संग्रहनयकी अपेक्षा
सम्पूर्ण सत् है ' अथवा ' सम्पूर्ण असत् है" आदि । असंभवताका परिहार करते हुए वस्तुके
किसी धर्मको निरूपण करनेमें प्रवृत्त वचनको संभावना सत्य कहते है । जैसे इन्द्र जम्बूद्वीपको
लौटादे अथवा लौटा सकता है । आगमोक्त विधि निषेधके अनुसार अतीन्द्रिय पदार्थोंमें संकल्पित
परिणामोंको भाव कहते है, उसके आश्रित जो वचन हो उसको भावसत्य कहते है । जैसे
शुष्क पक्व तप्त और निमक मिर्च खटाई आदिसे अच्छीतरह मिलाया हुआ द्रव्य प्रासुक होता
है। यहां पर यद्यपि सूक्ष्म जीवोको इन्द्रियोसे देख नहीं सकते तथापि आगमप्रामाण्यसे उसकी
प्रासुकताका वर्णन किया जाता है । इसलिये इसही तरहके पापवर्न वचनको भावसत्य कहते
है । दूसरे प्रसिद्ध सदृश पदार्थको उपमा कहते है। इसके आश्रयसे जो वचन बोला जाय
उसको उपमासत्य कहते है । जैसे पल्य । यहां पर रोमखण्डोंका आधारभूत गड्डा, पत्य
अर्थात् खासके सदृश होता है इसलिये उसको पल्य कहते है। इस संख्याको उपमासत्य कहते
है । इस प्रकारके ये दशप्रकारके सत्यके दृष्टान्त है इसलिये और भी इस ही तरह जानना ।
दो गाथाओंमें अनुभय वचनके भेदोंको गिनाते है।
आमंतणि आणवणी याचणिया पुच्छणी य पण्णवणी ।
पञ्चक्खाणी संसयवयणी इच्छाणुलोमा य ॥ २२४ ॥
णवमी अणक्खरगदा असच्चमोसा हवंति भासाओ।
सोदाराणं जम्हा वत्तावत्तंससंजणया ॥ २२५ ।।
आमन्त्रणी आनापनी याचनी आपृच्छनी च प्रज्ञापनी ।
प्रन्यान्यानी संशयवचनी इच्छानुलोम्नी च ॥ २२४ ॥

गोम्मटसारः। ९१ नवमी अनक्षरगता असत्यमृषा भवन्ति भाषाः । श्रोतृणां यस्मात् व्यक्ताव्यक्तांशसंज्ञापिकाः ॥ २२५ ॥ अर्थ-आमन्त्रणी, आज्ञापनी, याचनी, आपृच्छनी, प्रज्ञापनी, प्रत्याख्यानी, संशयवचनी, इच्छानुलोम्नी, अनक्षरगता ये नव प्रकारकी अनुभयात्मक भाषा है। क्योंकि इनके सुननेवालेको व्यक्त और अव्यक्त दोनोंही अंशोंका ज्ञान होता है । भावार्थ-हे देवदत्त ! यहां आओ, इसतरहके बुलानेवाले वचनोंको आमन्त्रणी भाषा कहते है। यह काम करो, इसतरहके आज्ञावचनोंको आज्ञापनी भाषा कहते है । यह मुझको दो, इसतर- हके प्रार्थनावचनोंको याचनी भाषा कहते है। यह क्या है ? इसतरहके प्रश्नवचनोंको आपृच्छनी भाषा कहते है । मै क्या करूं, इसतरहके सूचनावाक्योंको प्रज्ञापनी भाषा कहते है। इसको छोड़ता हूं, इसतरहके छोडनेवाले वाक्योंको प्रत्याख्यानी भाषा कहते हैं । यह वलाका है अथवा पताका, ऐसे संदिग्ध वचनोंको संशयवचनी भाषा कहते है । मुझको भी ऐसा ही होना चाहिये, ऐसे इच्छाको प्रकटकरनेवाले वचनोंको इच्छानुलोम्नी भाषा कहते है। द्वीन्द्रियादिक असंज्ञिपंचेन्द्रियपर्यन्त जीवोंकी भापा अनक्षरात्मक होती है। ये सब ही भाषा अनुर्भयवचन रूप है । क्योंकि इनके सुननेसे व्यक्त और अव्यक्त दोनों ही अंशोंका वोध होता है । इसलिये सामान्य अंशके व्यक्त होनेसे असत्य भी नहीं कहसकते, और विशेष अंशके व्यक्त न होनेसे सत्य भी नहीं कहसकते । चारों प्रकारके मनोयोग तथा वचनयोगका मूलकारण बताते है । मणवयणाणं मूलणिमित्तं खलु पुण्णदेहउदओ दु । मोसुभयाणं मूलणिमित्तं खलु होदि आवरणं ॥२२६ ॥ मनोवचनयोर्मूलनिमित्तं खलु पूर्णदेहोदयस्तु । मृपोभययोर्मूलनिमित्तं खलु भवत्यावरणम् ॥ २२६ ॥ अर्थ---सत्य और अनुभय मनोयोगका तथा वचनयोगका मूलकारण पर्याप्ति और शरीर नामकर्मका उदय है । मृपा और उभय मनोयोग तथा वचनयोगका मूलकारण अपना २ आवरण कर्म है। सयोगकेवलीके मनोयोगकी संभवता बताते है । मणसहियाणं वयणं दिटुं तप्पुवमिदि सजोगसि । उत्तो मणोवयरोणिंदियणाणेण हीणमि ॥ २२७ ॥ मन.महितानां वचन दृष्टं तत्पूर्वमिति मयोगे । उत्तो मन उपचारेणेन्द्रियनानन होने ॥ २२७ ।। अर्थ--अस्मदादिक सुमन्य मनमहिन जीने के वचनप्रयोग मनपूर्वक ही होता है

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रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्
इसलिये इन्द्रियज्ञानसे रहित सयोगकेवलीके भी उपचारसे मन कहा है । भावार्थ यद्यपि
उनके मन मुख्यतया नहीं है तथापि उनके वचनप्रयोग होता है । और वह वचनप्रयोग
अस्मदादिकके विना मनके होता नहीं, इसलिये उनके भी उपचारसे मनकी कल्पना की
जाती है।
'अस्मदादिक निरतिशय पुरुषोंमें होनेवाले स्वभावको देखकर सातिशय भगवान्में भी
उसकी कल्पना करना अयुक्त है फिर भी उसकी कल्पना करनेका क्या हेतु है ! यह
बताते है।
अंगोवंगुदयादो दव्यमणठं जिणिंदचंम्हि ।
मणवग्गणसंधाणं आगमणादो दु मणजोगो ॥२२८ ।।
आडोपाड्गोदयात् द्रव्यमनोर्थ जिनेन्द्रचन्द्रे ।
मनोवर्गणास्कन्धानामागमनात् तु मनोयोगः ॥ २२८ ॥
अर्थ-~-आगोपाड्गनामकर्मके उदयसे हृदयस्थानमें विकसित अष्टदल पद्मके आकार
द्रव्यमन होता है। इस द्रव्यमनकी कारणभूत मनोवर्गणाओंका सयोगकेक्ली भगवान्के
आगमन होता है । इस लिये उपचारसे मनोयोग कहा है। भावार्थ-यद्यपि मनके कार्य नहीं
हैं, तथापि उसके एक कारणका सद्भाव है अतः उसकी अपेक्षासे उपचारसे मनोयोगको
भी कहा है।
काययोगकी आदिमें औदारिक काययोगको निरूक्तिपूर्वक कहते है।
पुरुमहदुदारुराल एयहो संविजाण वझि भवं ।
औरालियं तमुच्चइ औरालियकायजोगो सो ॥२२९ ॥
पुरुमहदुदारमुरालमेकार्थः संविनानीहि तस्मिन् भवम् ।
औरालिकं तदुच्यते औरालिककाययोगः सः ॥ २२९ ॥
अर्थ-पुरु महत् उदार उराल ये शब्द एकार्थवाचक है । उदारमें जो होय उसको
औदारिक कहते है । यहापर भव अर्थमें ठण् प्रत्यय होता है। उदारमें होनेवाला जो
काययोग उसको औदारिक काययोग कहते है । भावार्थ-मनुष्य और तिर्यञ्चोंका शरीर
वैक्रियिकादिक शरीरोकी अपेक्षा स्थूल है, इसलिये इसको उदार अथवा उराल कहते है.
और इसके द्वारा होनेवाले योगको औदारिक काययोग कहते है । यह योगरूढ संज्ञा है ।
औदारिकमिश्रयोगको कहते है।
ओरालिय उत्तत्थं विजाण मिस्सं तु अपरिपुण्णं तं ।
जो तेण संपजोगो ओरालियमिस्सजोगो सो ॥ २३०॥
औरालिकमुक्तार्थ विजानीहि मिश्रं तु अपरिपूर्ण तत् ।
यस्तेन संप्रयोगः औरालिकमिश्रयोगः सः ॥ २३०॥

गोम्मटसारः। ९३ अर्थ-जिस औदारिक शरीरका स्वरूप पहले बताचुके हैं, वही शरीर जब तक पूर्ण नहीं होता तबतक मिश्र कहाजाता है । और उसके द्वारा होनेवाले योगको औदारिकमिश्रयोग कहते है । भावार्थ-शरीरपर्याप्तिसे पूर्व कार्मणशरीरकी सहायतासे होनेवाले औदारिक काय- योगको औदारिकमिश्रकाययोग कहते है। वैक्रियिक काययोगको बताते हैं विविहगुणइडिजुत्तं विक्किरियं वा हु होदि वेगुन्न । तिस्से भवं च णेयं वेगुब्वियकायजोगो सो ॥ २३१ ॥ विविधगुणद्धियुक्तं विक्रियं वा हि भवति विगूर्वम् । तस्मिन् भवं च ज्ञेयं वैगूर्विककाययोगः सः ॥ २३१ ॥ अर्थ-नाना प्रकारके गुण और ऋद्धियोंसे युक्त देव तथा नारकियोंके शरीरको वैक्रियिक अथवा विगूर्व कहते है । और इसके द्वारा होनेवाले योगको वैगर्विक अथवा वैक्रियि- ककाययोग कहते हैं। वैक्रियिक काययोगकी सम्भावना कहां २ पर है यह बताते है। बादरतेऊवाऊपंचिदियपुण्णगा विगुब्वति । ओरालियं सरीरं विगुव्वणप्पं हवे जेसिं ॥ २३२ ॥ वादरतेजोवायुपंचेन्द्रियपूर्णका विगूर्वन्ति । औरालिकं शरीरं विगर्वणात्मकं भवेत् येषाम् ॥ २३२ ॥ अर्थ-वादर ( स्थूल ) तेजस्कायिक और वायुकायिक तथा संज्ञी पर्याप्त पंचेन्द्रिय, और भोगभूमिज तिर्यग् मनुष्य भी विक्रिया करते है। इसलिये इनका भी औदारिक शरीर वैक्रियिक होता है । भावार्थ-यद्यपि इन जीवोंका शरीर औदारिक वैक्रियिक होता है, परन्तु यह विक्रिया अपृथक् विक्रिया होती है । किन्तु भोगभूमिन और चक्रवर्ती पृथक् विक्रिया करते है। वैक्रियिक मिश्र काययोगको बताते है। वेगुब्धियउत्तत्थं विजाण मिस्तं तु अपरिपुण्णं तं । जो तेण संपजागो वेगुब्बियमिस्सजोगो सो ॥ २३३ ॥ वैगर्विकमुक्तार्थ विजानीहि मिश्रं तु अपरिपूर्ण तत् । यस्तेन संप्रयोगों वैगर्विकमिश्रयोगः सः ।। २३३ ॥ अर्थ-उक्त वैक्रियिक शरीर जबतक पूर्ण नहीं होता तब तक उसको वैक्रियिकमिश्र कहते हैं। और उसके द्वारा होनेवाले योगको वैक्रियिकमित्रकाययोग कहते है । भावार्थ- रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् उत्पत्तिके समयसे अन्तर्मुहूर्त पर्यन्त वैक्रियिक शरीरसे जब कार्मण शरीरकी सहायतासे योग होता है तब उस योगको वैक्रियिकमिश्र काययोग कहते है। आहारक काययोगका निरूपण करते है। आहारस्सुदयेण य पमत्तविरदस्स होदि आहारं । असंजमपरिहरणटुं संदेहविणासणटुं च ॥ २३४ ॥ आहारस्योदयेन च प्रमत्तविरतस्य भवति आहारकम् । असंयमपरिहरणार्थ संदेहविनाशनार्थ च ।। २३४ ॥ अर्थ-असंयमके परिहार तथा संदेहको दूर करनेकेलिये छट्टे गुणस्थानवर्ती मुनिके आहारकशरीरनामकर्मके उदयसे आहारक शरीर होता है । णियखेत्ते केवलिदुगविरहे णिक्कमणपहुदिकल्लाणे । परखेत संवित्ते जिणजिणघरवंदणठं च ॥ २३५ ।। निजक्षेत्रे केवलिद्विकविरहे निःक्रमणप्रभृतिकल्याण । परक्षेत्रे संवृत्ते जिनजिनगृहवंदनार्थ च ॥ २३५ ॥ अर्थ-अपने क्षेत्रमें केवली तथा श्रुतकेवलीका अभाव होनेपर किन्तु दूसरे क्षेत्रमें जहां पर कि औदारिक शरीरसे उस समय पहुंच नहीं सकता, तपकल्याणक आदिके होनेपर, और जिन जिनगृह (चैत्यालय ) की वन्दनाकेलिये भी आहारक ऋद्धिको प्राप्त छठे गुणस्थान- वर्ती मुनिके आहारक शरीर उत्पन्न होता है। उत्तमअंगम्हि हवे धादुविहीणं सुहं असंहणणं । सुहसंठाणं धवलं हत्थपमाणं पसत्थुदयं ॥ २३६ ॥ उत्तमाओं मवेत् धातुविहीनं शुभमसंहननम् । शुभसंस्थान धवलं हस्तप्रमाणं प्रशस्तोदयम् ॥ २३६ ॥ अर्थ-यह आहारक शरीर रसादिक धातु और संहननसे रहित, समचतुरस्त्र संस्था- नसे युक्त, चन्द्रकान्तके समान श्वेत, एक हस्तप्रमाणवाला आहारकशरीरादिक शुभ नामकर्मके उदयसे उत्तमाङ्ग-शिरसे उत्पन्न होता है। अव्वाचादी अंतोमुहत्वकालट्ठिदी जहाण्णदरे । पज्जत्तीसंपुणे मरणंपि कदाचि संमवइ ॥ २३७॥ अव्याघाति अन्तर्मुहूर्तकालस्थिती जघन्येतरे । पर्याप्तिसंपूर्णाया मरणमपि कदाचित् संभवति ॥ २३७ ॥ अर्थ-न तो इस शरीरके द्वारा किसी दूसरे पदार्थका और न दूसरे पदार्थके द्वारा इस शरीरका ही व्याघात होता है । तथा इसकी जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति अन्तर्मुहूर्त गोम्मटसारः। मात्र है । आहार शरीरपर्याप्तिके पूर्ण होने पर कदाचित् आहारकऋद्धिवाले मुनिका मरण भी हो सकता है। आहारक काययोगका निरुक्तिसिद्ध अर्थ बताते है । आहरदि अणेण मुणी सुहमे अत्थे सयरस संदेहे । गत्ता केवलिपासं तम्हा आहारगो जोगो ॥ २३८ ॥ आहरत्यनेन मुनिः सूक्ष्मानर्थान् स्वस्य संदेहे । गत्वा केवलिपार्श्व तस्मादाहारको योगः ॥ २३८ ॥ अर्थ-छठे गुणस्थानवर्ती मुनि अपनेको संदेह होनेपर इस शरीरके द्वारा केवलीके पासमें जाकर सूक्ष्म पदार्थोका आहरण ( ग्रहण ) करता है इसलिये इस शरीरके द्वारा होनेवाले योगको आहारककाययोग कहते हैं । आहारक मिश्रयोगका निरूपण करते है। आहारयमुत्तत्थं विजाण मिस्सं तु अपरिपुण्णं तं । जो तेण संपजोगो आहारयमिस्सजोगो सो ॥ २३९ ॥ आहारकमुक्तार्थ विजानीहि मिश्रं तु अपरिपूर्ण तत् । यस्तेन. संप्रयोग आहारकमिश्रयोगः सः ॥ २३९ ॥ अर्थ-उक्त आहारक शरीर जब तक पर्याप्त नहीं होता तब तक उसको आहारक- मिश्र कहते है । और उसके द्वारा होनेवाले योगको आहारकमिश्रयोग कहते है। कार्मणकाययोगको बताते हैं। कम्मेव य कम्मभवं कम्मइयं जो दु तेण संजोगो । कम्मइयकायजोगो इगिविगतिगसमयकालेसु ॥ २४० ॥ कम्मैव च कर्मभवं कार्मणं यस्तु तेन संयोगः । कार्मणकाययोग एकद्विकत्रिकसमयकालेषु ॥ २४० ।। अर्थ-ज्ञानावरणादिक अष्टकर्मोके समूहको अथवा कार्मणशरीर नामकर्मके उदयसे होनेवाली कायको कार्मणकाय कहत है । और उसके द्वारा होनेवाले योगको कार्मणका- ययोग कहते है । यह योग एक दो अथवा तीन समयतक होता है । भावार्थ-विग्रहगतिमें और केवलसमुद्घातमें भी तीन समय पर्यन्त ही कार्मणकाययोग होता है। किन्तु दूसरे योगोंका ऐसा नियम नहीं है। यहां पर जो समय और काल ये दो शब्द दिये हैं उससे यह सूचित होता है कि शेष योगोंका अव्याघातकी अपेक्षा अन्तर्मुहूर्त और व्याघातकी १ दो प्रतर और एक लोम्पूर्ण समुदातकी अपेक्षा फेदलगनलारामें भी फार्मणलोगो तीन दी समाप लगते है।

९६
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
अपेक्षा एक समयसे लेकर अन्तर्मुहूर्तपर्यन्त काल है । यह काल एक जीवकी अपेक्षासे
है। किन्तु नाना जीवोंकी अपेक्षा आठ अन्तर मार्गणाओंको छोडकर वाकी निरन्तरमार्गणा-
ओंका सर्व काल है।
योगप्रवृत्तिका प्रकार बताते है।
वेगुब्बियआहारयकिरिया ण सम पमत्तविरम्हि ।
जोगोवि एलकाले एक्केव य होदि णियमेण ॥ २४१ ॥
वैगूर्विकाहारकक्रिया न समं प्रमत्तविरते ।
योगोऽपि एककाले एक एव च भवति नियमेन ।। २४१ ॥
अर्थ--छठे गुणस्थानमें वैक्रियिक और आहारक शरीरकी क्रिया युगपत् नहीं होती ।
और योग भी नियमसे एक कालमें एक ही होता है ।
योगरहितका वर्णन करते है।
जेसिं ण संति जोगा सुहासुहा पुण्णपावसंजणया ।
ते होंति अजोगिजिणा अणोवमाणंतबलकलिया ॥२४२॥
येषां न सन्ति योगाः शुभाशुभाः पुण्यपापसंजनकाः ।
ते भवन्ति अयोगिजिना अनुपमानन्तवलकलिताः ॥ २४२ ॥
अर्थ-जिनके पुण्य और पापके करणभूत शुभाशुभ योग नहीं है उनको अयोगिनिन
कहते है । वे अनुपम और अनन्त वल करके युक्त होते है ।
शरीरमें कर्म नोकर्मका विभाग करते है ।
ओरालियवेगुम्वियआहारयतेजणामकम्मुदये ।
चउणोकम्मसरीरा कम्मेव य होदि कम्मइयं ॥ २४३ ॥
औरालिकवैर्विकाहारकतेनोनामकर्मोदये ।
चतुर्नोकर्मशरीराणि कर्मैव च भवति कार्मणम् ॥ २४३ ॥
अर्थ-औदारिक वैक्रियिक आहारक तैजस नामकर्मके उदयसे होनेवाले चार शरी-
रोको नोकर्म कहते है। और कार्मण शरीर नामकर्मके उदयसे होनेवाले ज्ञानावरणादिक आठ
कर्मोके समूहको कार्मण शरीर कहते है।
औदारिकादिकोंकी समयप्रवद्धकी संख्याको बताते है ।
परमाणूहिं अणंतहिं वग्गणसण्णा हु होदि एक्का हु।
ताहि अणंतहिं णियमा सभयपबद्धो हवे एक्को ॥ २४४ ॥
परमाणुभिरनन्तैर्वर्गणासंज्ञा हि भवत्येका हि ।
तामिरनन्तैर्नियमात् समयप्रबद्धो भवेदेकः ॥ २४ ॥

गोम्मटसारः । - अर्थ-अनन्त ( अनन्तानन्त ) परमाणुओंकी एक वर्गणा होती है। और । अनन्त वर्गणाओंका नियमसे एक समयप्रबद्ध होता है । ताणं समयपबद्धा सेढिअसंखेजभागगुणिदकमा । णतेण य तेजदुगा परं परं होदि सुहमं खु ॥ २४५ ॥ तेषां समयप्रबद्धाः श्रेण्यसंख्येयभागगुणितक्रमाः । अनन्तेन च तेजोद्विका परं परं भवति सूक्ष्मं खलु ॥ २४५ ॥ अर्थ-औदारिक वैक्रियिक आहारक इन तीन शरीरोके समयप्रबद्ध उत्तरोत्तर क्रमसे श्रेणिके असंख्यातमे भागसे गुणित है और तैजस तथा कार्मण अनन्तगुणे है । किन्तु ये पांचो ही शरीर उत्तरोत्तर सूक्ष्म है । भावार्थ-औदारिकसे वैक्रियिकके और वैक्रियिकसे आहारकके समयप्रबद्ध श्रेणिके असंख्यातमे भाग गुणित है। किन्तु आहारकसे तैजसके अनन्तगुणे और तैजससे कर्मणशरीरके समयप्रबद्ध अनन्तगुणे है। इस तरह समयप्रवद्धोंकी संख्याके अधिक २ होनेपर भी ये पांचो शरीर उत्तरोत्तर सूक्ष्म २ है । औदारिकादिक शरीरोंके समयप्रबद्ध और वर्गणाओंका अवगाहनप्रमाण वताते है । ओगाहणाणि ताणं समयपबद्धाण वग्गणाणं च । अंगुलअसंखभागा उवरुवरिमसंखगुणहीणा ॥२४६ ॥ अवगाहनानि तपा समयप्रवद्धानां वर्गणाना च । अडलासंख्यभागा उपर्युपरि असंख्यगुणहीनानि ॥ २४६ ॥ अर्थ-इन शरीरोके समयप्रबद्ध और वर्गणाओंकी अवगाहनाका प्रमाण सामान्यसे अंगुलके असंख्यातमे भाग है। किन्तु आगे आगेके शरीरोंके समयप्रबद्ध और वर्गणाओकी अवगाहनाका प्रमाण क्रमसे असंख्यातगुणा २ हीन है । इस ही प्रमाण को माधवचन्द्र विद्यदेव भी कहते है। तस्समयवद्धवग्गणीगाहो सूइअंगुलासंख-। भागहिदविंदअंगुलमुवरुवरिं तेण भजिदकमा ॥ २४७ ॥ तत्समयवद्धवर्गणावगाहः सूच्यडुलासंख्य- भागहितवृन्दाङ्गुलमुपर्युपरि तेन भजितक्रमाः ॥ २४७ ॥ अर्थ-औदारिकादि शरीरोंके समयप्रवद्ध तया वर्गणाओंका अवगाहन सृच्यडुलके असंख्यातमे भागसे भक्त घनाङ्गुलप्रमाण है । और पूर्व २ की अपेक्षा आगे २ की अवगाहना क्रमसे असंख्यातगुणी २ हीन है । १इस गायादी स्रालयाला धीमदभयचटनीने और हिन्दीभाषा टीका विदः प्रोटोनीने की। इसलिये हमने भी इसमेनहार लिय दिया है। किन्तु संगवी टीफाइनकोपरया हमारे देखनमें नदी है। गो.१३ ९८ रायचन्द्रजैनशाखमालायाम् विस्रसोपचयका स्वरूप बताते है । जीवादो गंतगुणा पडिपरमाणुम्हि विस्ससोबचया । जीवण य समवेदा एक्ककं पडि समाणा हु ॥ २४८ ॥ जीवतोऽनन्तगुणाः प्रतिपरमाणौ विस्त्रसोपचयाः । जीवेन च समवेता एकै प्रति समाना हि ॥ २४८ ॥ अर्थ-पूर्वोक्त कर्म और नोकर्मकी प्रत्येक परमाणुपर समान संख्याको लिये हुए जीवराशिसे अनन्तगुणे विखसोपचयरूप परमाणु जीवके साथ सम्बद्ध है। भावार्थ-जीवके प्रत्येक प्रदेशोंके साथ जो कर्म और नोकर्म बधे है, उन कर्म और नोकर्मकी प्रत्येक परमाणु के साथ जीवराशिसे अनन्तगुणे विस्रसोपचयरूप परमाणु सम्बद्ध हैं। जो कर्मरूप तो नहीं है किन्तु कर्मरूप होनेकेलिये उम्मेद वार है उन परमाणुओंको विनसोपचय कहते है । कर्म और नोकर्मके उत्कृष्ट संचयका स्वरूप तथा स्थान बताते है । उक्करसहिदिचरिये सगसगउक्कस्ससंचओ होदि । पणदेहाणं वरजोगादिससामग्गिसहियाणं ॥ २४९ ॥ उत्कृष्टस्थितिचरमे स्वकस्वकोत्कृष्टसंचयो भवति । पञ्चदेहानां वरयोगादिस्वसामग्रीसहितानाम् ॥ २४९ ॥ अर्थ- उत्कृष्ट योगको आदि लेकर जो २ सामग्री तत् कर्म या नोकर्मके उत्कृष्ट संचयमें कारण है उस २ सामग्रीके मिलनेपर औदारिकादि पाचो ही शरीरवालोंके उत्कृष्ट- स्थितिके अन्तसमयमें अपने २ योग्य कर्म और नोकर्मका उत्कृष्ट संचय होता है । भावार्थ-स्थितिके प्रथम समयसे लेकर प्रतिसमय समयप्रवद्धका बंध होता है, और उसके एक २ निषेककी निर्जरा होती है । इस प्रकार शेष समयोंमें शेष निषेकोका संचय होते २ स्थितिके अन्त समयमें आयुः कर्मको छोड़कर शेष कर्म और नोकर्मका उत्कृष्ट संचय होता है । यह संचय उत्कृष्ट योगादिक अपनी २ सामग्रीके मिलनेपर पाचो शरीरवालोंके होता है। उत्कृष्ट संचयकी सामग्रीविशेषको बताते है। आवासया हु भवअद्धाउस्सं जोगसंकिलेसो य । ओकढुक्कट्टणया छञ्चेदे गुणिदकम्मंसे ॥ २५० ॥ आवश्यकानि हि भवाद्धा आयुष्यं योगसंक्लेशौ च । अपकर्पणोत्कर्षणके षट् चैते गुणितकाशे ॥ २५० ।।

गोम्मटसारः। ९९ अर्थ-कर्मोके उत्कृष्ट संचयसे युक्त जीवके उत्कृष्ट संचय करनेकेलिये ये छह आव- श्यक कारण होते है। -भवाद्धा, आयुष्य, योग, संक्लेश, अपकर्षण, उत्कर्षण । पांचशरीरोंकी उत्कृष्टस्थितिका प्रमाण बताते हैं। पल्लतियं उवहीणं तेत्तीसांतेमुहुत्त उवहीणं । छवट्ठी कम्मट्ठिदि बंधुक्कस्सहिदी ताणं ॥ २५१ ॥ पल्यत्रयमुधीनां त्रयस्त्रिंशदन्तर्मुहूर्त उदधीनाम् । षट्षष्टिः कर्मस्थितिबन्धोत्कृष्टस्थितिस्तेषाम् ॥ २५१ ॥ अर्थ-औदारिक शरिकी उत्कृष्ट स्थिति तीन पल्य, वैक्रियिक शरीरकी तेतीस सागर, आहारक शरीरकी अन्तर्मुहूर्त, तैजस शरीरकी छ्यासठ सागर है। कार्मण शरीरकी सामान्यसे सत्तर कोडाकोडी सागर किन्तु विशेषरूपसे ज्ञानावरण दर्शनावरण वेदनीय और अन्तराय कर्मकी उत्कृष्ट स्थिति तीस कोडाकोडी सागर है। मोहनीयकी सत्तर कोडाकोडी सागर, नाम गोत्रकी वीस कोडाकोडी सागर, और आयुः कर्मकी केवल तेतीस सागर उत्कृष्ट स्थिति है। पाच शरीरोंकी उत्कृष्ट स्थितिके गुणहानि आयामका प्रमाण बताते है। अंतोमुहुत्तमत्तं गुणहाणी होदि आदिमतिगाणं । पल्लासंखेज्जदिम गुणहाणी तेजकम्माणं २५२ ॥ अन्तर्मुहूर्तमात्रा गुणहानिर्भवति आदिमात्रकाणाम् । पल्यासंख्याता गुणहानिस्तेजःकर्मणोः ॥ २५२ ॥ अर्थ-औदारिक वैक्रियिक आहारक शरीरकी गुणहानिका प्रमाण अन्तर्मुहूर्तमात्र । और तैजस तथा कार्मण शरीरकी गुणहानिका प्रमाण पल्यके असंख्यातमे भाग- मात्र है। औदारिकादि शरीरोंके समयप्रवद्धका वध उदय और सत्त्व अवस्थामें द्रव्यप्रमाण यह बताते है। एक्कं समयपबद्धं बंधदि एक्कं उददि चरिमम्मि । गुणहाणीण दिवट्ठे समयपबद्धं हवे सत्तं ॥ २५३ ।। एकं समयप्रवद्धं वध्नाति एकमुदेति चरमे । गुणहानीना न्यधं समयप्रवद्धं भवेत् सत्त्वम् ।। २५३ ॥ अर्थ-प्रति समय एक समयप्रवन्द्वका बंध होता है, और एक ही समयप्रवद्धका उदय होता है, किन्तु अन्तमें कुछ कम डेढ गुणहानि गुणित समयपत्रद्धोंकी सत्ता रहती है। भावार्थ-पाचो शरीरोंमेंसे तैनस और कार्मणका तो प्रतिसमय वध उदय सत्व होता है, कितना रहता है -१०० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् इस लिये इन दोनोंके समयप्रवद्धका प्रतिसमय बंध और उदय होता है, तथा किसी विवक्षित समयप्रवद्धके चरमनिषेक समयमे डेढ़ गुणहानि गुणित समयप्रबद्धोंकी सत्ता रहती है। किन्तु औदारिक तथा वैक्रियिक शरीरके समयप्रवद्धोंमें कुछ विशेषता है । वह इस प्रकार है कि जिस समयमें शरीर ग्रहण किया उस समयमें बंधको प्राप्त होनेवाले समयप्रवद्धके प्रथम निषेकका उदय होता है और द्वितीयादि समयोंमे द्वितीयादि निपेकोंका उदय होता है । और दूसरे समयमें वंधको प्राप्त होनेवाले समयप्रबद्धका प्रथम निषेक तथा प्रथम समयमें वद्ध समयप्रवद्धका द्वितीय निपेक उदित होता है । इस ही तरह तृतीयादिक समयोंका हिसाव समझना चाहिये । इसलिये इस क्रमसे अन्तमें द्वयर्धगुणहानि---गुणित समयप्रवद्धोंकी सत्ता रहती है। किन्तु आहारक शरीरका युगपद् प्रथम समयप्रवद्धमात्र द्रव्यका उदय सत्त्व संचय रहता है। औदारिक और वैक्रियिक शरीरमें विशेषताको बताते हैं। णवरि य दुसरीराणं गलिदवसेसाउमेत्तठिदिबंधो । गुणहाणीण दिवढं संचयसुदयं च चरिमम्हि ।। २५४ ॥ नवरि च द्विशरीरयोर्गलितावशेषायुर्मात्रस्थितिवन्धः । गुणहानीना द्वयर्ध संचयमुदयं च चरमे ॥ २५४ ॥ अर्थ-औदारिक और वैक्रियिक शरीरमें यह विशेषता है कि इन दोनों शरीरोंके वध्यमान समयप्रबद्धोकी स्थिति भुक्त आयुसे अवशिष्ट आयुकी स्थितिप्रमाण होती है। और इनका आयुके अन्त समयमे डेढ गुणहानिमात्र उदय तथा संचय रहता है । भावार्थ- शरीरग्रहणके ग्रथम समयमे वधको प्राप्त होनेवाले समयप्रवद्धकी स्थिति पूर्ण आयुःप्रमाण होती है । और दूसरे समयमे वेधको प्राप्त होनेवाले समयप्रवद्धोंकी स्थिति एक समय कम आयुःप्रमाण और तीसरे समयमें बंधको प्राप्त होनेवाले समयप्रवद्धोंकी स्थिति दो समय कम आयुःप्रमाण होती है। इस ही प्रकार आगेके समयप्रबद्धोकी स्थिति समझना चाहिये । इस क्रमके अनुसार अन्त समयमे बंधको प्राप्त होनेवाले समयप्रवद्धकी स्थिति एक समयमात्र होती है। आयुके प्रथम समयसे लेकर अन्तसमय पर्यन्त बंधनेवाले समयप्रबद्धोंकी अवस्थिति, आयुके अन्तसमयसे आगे नहीं रह सकती इसलिये अन्त समयमें कुछ कम डेढ़ गुणहानिमात्र समयप्रवद्धोंका युगपत् उदय तथा संचय रहता है। किस प्रकारकी आवश्यक सामग्रीसे युक्त जीवके किस स्थान पर औदारिक शरीरका उत्कृष्ट संचय होता है यह बताते है। ओरालियवरसंचं देवुत्तरकुरुवजादजीवस्स । तिरियमणुस्सस्स हवे चरिमदुचरिमे तिपल्लठिदिगस्स ॥ २५५ ।। , Pra गोम्मटसारः। १०१ औरालिकवरसंचयं देवोत्तरकुरूपजातजीवस्य ।। तिर्यग्मनुष्यस्य भवेत् चरमद्विचरमे त्रिपल्यस्थितिकस्य ॥ २५५ ॥ अर्थ-तीन पल्यकी स्थितिवाले देवकुरु तथा उत्तरकुरुमें उत्पन्न होनेवाले तिर्यञ्च और मनुष्योंके चरम तथा द्विचरम समयमें औदारिक शरीरका उत्कृष्ट संचय होता है। वैक्रियिक शरीरके उत्कृष्ट संचयका स्थान वताते है। वेगुन्धियवरसंचं बावीससमुद्दआरणदुगम्हि । जमा वरजोगस्स य वारा अण्णत्थ णहि बहुगा ॥ २५६ ।। वैगर्विकवरसंचयं द्वाविंशतिसमुद्रमारणद्विके । यस्मात् वरयोगस्य च वारा अन्यत्र नहि वहुकाः ॥ २५६ ॥ अर्थ-वैक्रियिक शरीरका उत्कृष्ट संचय, वाईस सागरकी आयुवाले आरण और अच्युत स्वर्गके ऊपरके विमानोंमें रहनेवाले देवोंके ही होता है । क्योंकि वैक्रियिक शरीरका उत्कृष्ट योग तथा उसके योग्य दूसरी सामग्रिया अन्यत्र अनेकवार नहीं होती। भावार्थ-आरण अच्युत स्वर्गके उपरितन विमानोंमें रहनेवाले देवोंके ही जिनकी आयु वाईस सागरकी है वैक्रियिक शरीरका उत्कृष्ट योग तथा दूसरी सामग्री अनेक वार होती है, इसलिये इन देवोंके ही वैक्रियिक शरीरका उत्कृष्ट संचय होता है। तैजस तथा कार्मणके उत्कृष्ट संचयका स्थान बताते है। तेजासरीरजेहूँ सत्तमचरिमम्हि विदियवारस्स । कम्मस्स वि तत्थेव य णिरये बहुवारभमिदस्स ॥ २५७ ।। तैजसशरीरज्येष्ठं सप्तमचरमे द्वितीयवारस्य । कार्मणस्यापि तत्रैव च निरये वहुवारभ्रमितस्य ।। २५७ ।। अर्थ-तैजस शरीरका उत्कृष्ट संचय सप्तम पृथिवीमें दूसरीवार उत्पन्न होनेवाले जीवके होता है। और कार्मण शरीरका उत्कृष्ट संचय अनेक वार नरकोंमें भ्रमण करके सप्तम पृथिवीमें उत्पन्न होनेवाले जीवके होता है । आहारक शरीरका उत्कृष्ट संचय आहारक शरीरका उत्थापन करनेवाले प्रमत्तविरतके ही होता है। योगमार्गणामें जीवोकी संख्याको बताते है । बादरपुण्णा तेऊ सगरासीए असंखभागमिदा । विक्किरियसत्तिजुत्ता पल्लासंखेजया बाऊ ॥ २५८ ॥ वादरपूर्णाः तेजसाः म्बकराशेरसंख्यभागमिता । विक्रियाशक्तियुक्ता पल्यासख्याता वायवः ॥ २५८ ।। अर्थ-वादर पर्याप्तक तैजसकायिक जीवोंका जितना प्रमाण है उसमें असंख्यात

१०२
रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम
भागप्रमाण विक्रिया शक्तिसे युक्त है। और वायुकायिक जितने जीव हैं उनमें पल्यके
असंख्यातमे भाग विक्रियाशक्तिसे युक्त है।
पल्लासंखेज्जाहयविंदंगुलगुणिदसेढिमेत्ता हु।
वेगुब्बियपंचक्खा भोगभुमा पुह विगुब्बंति ॥ २५९ ॥
पल्यासंख्याताहतवृन्दाङ्गुलगुणितश्रेणिमात्रा हि ।
वैगूर्विकपञ्चाक्षा भोगभूमाः पृथक् विगूर्वन्ति ॥ २५९ ।।
अर्थ-पल्यके असंख्यातमे भागसे अभ्यस्त ( गुणित ) घनाडुलका जगच्छेणीके
साथ गुणा करने पर जो लब्ध आवे उतने ही पर्याप्त पंचेंद्रिय तिर्यचोंमें वैक्रियिक योगके
धारक हैं । और भोगभूमिया तिर्यच तथा मनुष्य तथा कर्मभूमियाओंमें चक्रवर्ती पृथक्
विक्रिया करते है। भावार्थ-विक्रिया दो प्रकारकी होती है, एक पृथक् विक्रिया दूसरी
अपृथक् विक्रिया । जो अपने शरीरके सिवाय दूसरे शरीरादिक वनाना इसको पृथक्
विक्रिया कहते है । और जो अपने शरीरके ही अनेक आकार बनाना इसको अपृथक्
विक्रिया कहते है। इन दोनों प्रकारकी विक्रियाके धारक तिर्यंच तथा मनुष्योंकी संख्या
ऊपर कही हुई है।
देवेहिं सादिरैया तिजोगिणो तेहिं हीण तसपुण्णा ।
वियजोगिणो तदूणा संसारी एक्कजोगा हु॥२६० ॥
देवैः सातिरेकाः त्रियोगिनस्तैहीनाः त्रसपूर्णाः ।
द्वियोगिनस्तदूना संसारिणः एकयोगा हि ॥ २६ ॥
अर्थ-देवोसे कुछ अधिक त्रियोगियोका प्रमाण है। पर्याप्त सराशिमेंसे त्रियोगि-
योंको घटानेपर जो शेष रहे उतना द्वियोगियोंका प्रमाण है । संसारराशिमेसे द्वियोगी तथा
त्रियोगियोंका प्रमाण घटानेसे एकयोगवालोंका प्रमाण निकलता है। भावार्थ-नारकी
देव संज्ञिपर्याप्त पंचेन्द्रिय तिर्यच पर्याप्त मनुष्य इनका जितना प्रमाण है उतना ही त्रियो-
गियोंका प्रमाण है । त्रसराशिमेसे त्रियोगियोंका प्रमाण घटानेपर द्वियोगियोंका और
संसारराशिमसे त्रियोगि तथा द्वियोगियोंका प्रमाण घटानेपर एकयोगियोंका प्रमाण
निकलता है।
अंत्तोमुहुत्तमेत्ता चउमणजोगा कमेण संखगुणा ।
तज्जोगो सामण्णं चउवचिजोगा तदो दु संखगुणा ।। २६१ ॥
अन्तर्मुहूर्तमात्राः चतुर्मनोयोगाः क्रमेण संख्यगुणाः ।
तद्योग: सामान्य चतुर्वचोयोगा; ततस्तु संख्यगुणाः ॥ २६१ ॥

गोम्मटसारः। १०३ अर्थ-सत्य असत्य उभय अनुभय इन चार मनोयोगोंमें प्रत्येकका काल यद्यपि अन्तर्मुहूर्तमात्र है तथापि पूर्व २ की अपेक्षा उत्तरोत्तरका काल क्रमसे संख्यातगुणा है । और चारोंके जोड़का प्रमाण भी अन्तर्मुहूर्तमात्र ही है । इस ही प्रकार चारों मनोयोगोंके जोड़का जितना प्रमाण है उससे संख्यातगुणा काल चारों वचनयोगोंका है । और प्रत्येक वचनयोगका काल भी अन्तर्मुहूर्त है । तथा पूर्व २ की अपेक्षा उत्तरोत्तरका प्रमाण संख्यातगुणा है । और चारोंके जोड़का प्रमाण भी अन्तर्मुहूर्त है । तज्जोगो सामण्णं काओ संखाहदो तिजोगमिदं । सव्वसमासविभजिदं सगसगगुणसंगुणे दु सगरासी ॥ २६२ ॥ तद्योगः सामान्यं कायः संख्याहतः त्रियोगिमितम् । सर्वसमासविभक्तं स्वकस्वकगुणसंगुणे तु स्वकराशिः ॥ २६२ ॥ अर्थ-चारो वचनयोगोंके जोडका जो प्रमाण हो वह सामान्यवचनयोगका काल है । इससे संख्यातगुणा काययोगका काल है। तीनो योगोके कालको जोड़देनेसे जो समयोंका प्रमाण हो उसका पूर्वोक्त त्रियोगिजीवराशिमें भाग देनेसे जो लब्ध आवे उस एक भागसे अपनी २ राशिका गुणा करने पर अपनी २ राशिका प्रमाण निकलता है। भावार्थ-तीनो योगोके जोड़का काल ८५४१७०१ अन्तर्मुहूर्तमात्र है। इसके जितने समय हों उनका त्रियोगिजीवोंके प्रमाणमें भाग दीजिये । लब्ध एक भागके साथ सत्यम- नोयोगाके कालके जितने समय है उनका गुणा कीजिये, जो लब्ध आवे वह सत्यमनोयोगवाले जीवोंका प्रमाण है । इस ही प्रकार असत्यमनोयोगीसे लेकर काययोगी पर्यन्त जीवोंमें प्रत्येकका प्रमाण समझना। कम्मोरालियमिस्सयओरालद्धासु संचिदअणंता । कम्मोरालियमिस्सयओरालियजोगिणो जीवा ॥ २६३ ॥ कार्मणौदारिकमिश्रकौरालाद्धासु संचितानन्ताः । कार्मणौरालिकमिश्रकौरालिकयोगिनो जीवाः ॥ २६३ ॥ अर्थ-कार्मणकाययोग औदारिकमिश्रयोग तथा औदारिककाययोगके समयमें एकत्रित होनेवाले कार्मणयोगी औदारिकमिश्रयोगी तथा औदारिककाययोगी जीव अनन्तानन्त है। इस ही अर्थको स्पष्ट करते है । समयत्तयसंखावलिसंखगुणावलिसमासहिदरासी । सगगुणगुणिदे थोवो असंखसंखाहदो कमसो ।। २६४ ॥ समयत्रयसंख्यावलिसख्यगुणावलिसमासहितराशिम । स्वगुणगुणिते स्तोक. असंन्यसंख्याहतः क्रमशः ॥ २६४ ॥ .

१०४ रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम अर्थ-कार्मणकाययोगका काल तीन समय, औदारिकमिश्रयोगका काल संख्यात आवली, औदारिक काययोगका काल संख्यात गुणित ( औदारिकमिश्रके कालसे ) आवली है। इन तीनोंको जोड़ देनेसे जो समयोंका प्रमाण हो उसका एकयोगिजीवरा- शिमें भाग देनेसे लब्ध एक भागके साथ कार्मणकालका गुणा करने पर कार्मणकाययोगी जीवोंका प्रमाण निकलता है । इस ही प्रकार उसी एक भागके साथ औदारिकमिश्रकाल तथा औदारिककालका गुणा करनेपर औदारिकमिश्रकाययोगी और औदारिककाययोगी जीवोंका प्रमाण होता है। इन तीनों तरहके जीवोंमें सबसे कम कार्मण काययोगी है उनसे असंख्यातगुणे औदारिकमिश्रयोगी है और उनसे संख्यातगुणे औदारिककाय- योगी है। चार गाथाओंमें वैक्रियिकमिश्र तथा वैक्रियिककाययोगके धारक जीवोका प्रमाण बताते है। सोवक्कमाणुवक्कमकालो संखेज्जवासठिदिवाणे । आवलिअसंखभागो संखेज्जावलिपमा कमसो ॥ २६५ ॥ सोपक्रमानुपक्रमकालः संख्यातवर्षस्थितिवाने । आवल्यसंख्यभागः संख्यतावलिप्रमः क्रमशः ॥ २६५ ॥ अर्थ.-संख्यातवर्षकी स्थितिवाले उसमें भी प्रधानतया जघन्य दश हजार वर्षकी स्थितिवाले व्यन्तर देवोका सोपक्रम तथा अनुपक्रम काल क्रमसे आवलीके असंख्यातमे भाग और संख्यात आवली प्रमाण है । भावार्थ-उत्पत्तिसहित कालको सोपक्रम काल कहते है । और उत्पत्तिरहित कालको अनुपक्रम काल कहते है । यदि व्यन्तर देव निरन्तर उत्पन्न हों तो आवलीके असंख्यातमे भागमात्रकाल पर्यन्त उत्पन्न होते ही रहें । यदि कोई भी व्यन्तर देव उत्पन्न न हो तो ज्यादेसे ज्यादे संख्यात आवलीमात्र काल पर्यन्त ( बारह मुहूर्त ) उत्पन्न न हो, पीछे कोई न कोई उत्पन्न हो ही । तहिं सव्वे सुद्धसला सोवक्कमकालदो दु संखगुणा। तत्तो संखगुणूणा अपुण्णकालम्हि सुद्धसला ॥ २६६ ॥ तस्मिन् सर्वाः शुद्धशलाकाः सोपक्रमकालतस्तु संख्यगुणाः । ततः संख्यगुणोना अपूर्णकाले शुद्धशलाकाः ॥ २६६ ॥ अर्थ जघन्य दश हजार वर्षकी स्थितिमें अनुपक्रमकालको छोड़कर पर्याप्त तथा अप- यप्ति कालसम्बन्धी सोपक्रम कालकी शलाकाका प्रमाण, सोपक्रमकालके प्रमाणसे संख्यात गुणा है । और इससे संख्यातगुणा कम अपर्याप्तकालसम्बन्धी सोपक्रमकालकी शलाकाका गोम्मटसारः । १०६ प्रमाण है। भावार्थ -स्थितिके प्रमाणमें जितनीवार सोपक्रम कालका सम्भव हो उसको शलाका कहते है। इसका प्रमाण उक्त क्रमानुसार समझना। तं सुद्धसलागाहिदणियरासिमपुण्णकाल लद्धाहिं। सुद्धसलागाहिं गुणे उतरवेगुव्वमिस्सा हु ॥ २६७ ।। तं शुद्धशलाकाहितनिजराशिमपूर्णकाललब्धाभिः । शुद्धशलाकाभिर्गुणे व्यन्तरवैगूर्वमिश्रा हि ॥ २६७ ॥ अर्थ—पूर्वोक्त व्यन्तर देवोंके प्रमाणमे शुद्ध उपक्रम शलाकाका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उसका अपर्याप्त-काल-सम्बन्धी शुद्ध उपक्रम शलाकाके साथ गुणा करने पर जो प्रमाण हो उतने ही वैक्रियिकमिश्रयोगके धारक व्यन्तरदेव समझने चाहिये । भावार्थ-संख्यात वर्षकी स्थितिवाले व्यन्तरदेव अधिक उत्पन्न होते है इसलिये उनकीही मुख्यतासे यहां प्रमाण बताया है तहिं सेसदेवणारयमिस्सजुदे सव्वमिस्सवेगुव्वं । सुरणिरयकायजोगा वेगुम्वियकायजोगा हु ॥ २६८ ॥ तस्मिन् शेषदेवनारकमिश्रयते सर्वमिश्रवैगूर्वम् । सुरनिरयकाययोगा वैगूर्विककाययोगा हि ॥ २६८ ॥ अर्थ--उक्त व्यन्तरोंके प्रमाणमें शेष भवनवासी, ज्योतिषी, वैमानिक और नार- कियोके मिश्र काययोगका प्रमाण मिलानेसे सम्पूर्ण मिश्र वैक्रियिक काययोगका प्रमाण होता है । और देव तथा नारकियोंके काययोगका प्रमाण मिलानेसे समस्त वैक्रियिक काय- योगका प्रमाण होता है। आहारककाययोगी तथा आहारकमिश्रकाययोगियोंका प्रमाण बताते है। आहारकायजोगा चउवण्णं होति एकसमयम्हि । आहारमिस्सजोगा सत्तावीसा दु उक्करसं ॥ २६९ ॥ आहारकाययोगाः चतुप्पञ्चाशत् भवन्ति एकसमये । आहारमिश्रयोगा सप्तविंशतिस्तूत्कृष्टम् ॥ २६९ ॥ अर्थ-एक समयमें आहारककाययोगवाले जीव अधिकसे अधिक चौअन होते है । और आहारमिश्रयोगवाले जीव अधिकसे अधिक सत्ताईस होते है । यहा पर जो उत्कृष्ट शब्द है वह मध्यदीपक है। भावार्थ-जिस प्रकार देहलीपर रक्खा हुआ दीपक बाहर और भीतर दोनों जगह प्रकाश करता है उसही प्रकार यह शब्द भी पूर्वक्ति तथा जिसका आगे वर्णन करेंगे ऐसी दोनोंही संख्याओंको उत्कृष्ट अपेक्षा समझना यह मूचित करता है इति योगमार्गणाधिकारः॥

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्। क्रमप्राप्त वेदमार्गणाका निरूपण करते है। पुरिसिच्छिसंढवेदोदयेण पुरिसिच्छिसंढओ भावे । णामोदयेण दवे पाएण समा कहिं विसमा ॥ २७० ॥ पुरुषस्त्रीषण्ढवेदोदयेन पुरुषस्त्रीषण्डाः भावे । नामोदयेन द्रव्ये प्रायेण समाः क्वचिद् विषमाः ।। २७० ॥ अर्थ-पुरुष स्त्री और नपुंसक वेदकर्मके उदयसे भावपुरुष भावस्त्री माव नपुंसक होता है । और नामकर्मके उदयसे द्रव्य पुरुष द्रव्य स्त्री द्रव्य नपुंसक होता है । सो यह भाववेद और द्रव्यवेद प्रायःकरके समान होता है, परन्तु कहीं २ विपम भी होता है। भावार्थ-वेदनामक नोकषायके उदयसे जीवोंके भाववेद होता है, और आङ्गोपाङ्गनामक- मके उदयसे व्यवेद होता है । सो ये दोनों ही वेद प्रायःकरके तो समान ही होते हैं, अर्थात् जो भाववेद वही द्रव्यवेद और जो द्रव्यवेद वही भाववेद । परन्तु कहीं २ विष- मता भी होजाती है, अर्थात् भाववेद दूसरा और द्रव्यवेद दूसरा । वेदस्सुदीरणाए परिणामस्स य हवेज संमोहो । संमोहेण ण जाणदि जीवो हि गुणं व दोषं वा ॥ २७१ ॥ वेदस्योदीरणायां परिणामस्य च भवेत् संमोहः । संमोहेन न जानाति जीवो हि गुणं वा दोषं वा ॥ २७१ ॥ अर्थ-वेद नोकषायके उदय अथवा उदीरणा होनेसे जीवके परिणामोंमें बडा भारी मोह उत्पन्न होता है । और इस मोहके होनेसे यह जीव गुण अथवा दोषका विचार नहीं कर सकता। पुरुगुणभोगे सेदे करोदि लोयम्मि पुरुगुणं कम्म । पुरुउत्तमो य जम्हा तम्हा सो वण्णिओ पुरिसो ॥ २७२ ॥ पुरुगुणभोगे शेते करोति लोके पुरुगुणं कर्म । पुरुरुत्तमश्च यस्मात् तस्मात् स वर्णितः पुरुषः ॥२७२ ॥ अर्थ-उत्कृष्ट गुण अथवा उत्कृष्ट भोगोंका जो स्वामी हो, अथवा जो लोकमें उत्कृष्ट- गुणयुक्त कर्मको करै, यद्वा जो स्वयं उत्तम हो उसको पुरुष कहते है । छादयदि सयं दोसे णयदो छाददि परं वि दोसेण । छादणसीला जम्हा तम्हा सा वणिया इत्थी ॥ २७३ ॥ १ यद्यपि शीट् वातुका अर्थ स्वप्न है, तथापि “धातूनामनेकार्थः” इस नियमके अनुसार स्वामी, करना तथा स्थिति अर्थ मानकर घोटराटि गणके द्वारा यह शब्द सिद्ध किया गया है । पुरुयु शेते इति पुरुष व्यादि । अथवा पोऽन्तकर्मणि इन धातुसे इस शळकी सिद्धि समझना चाहिये । पुरु शब्दका अर्थ उत्तम होता है।

गोम्मटसारः। छादयति स्वकं दोषे नयतः छादयति परमपि दोषेण । छादनशीला यस्मात् तस्मात् सा वर्णिता स्त्री ॥ २७३ ॥ अर्थ-जो मिथ्यादर्शन अज्ञान असंयम आदि दोषोंसे अपनेको आच्छादित करे, और मृदु भाषण तिरछी चितवन आदि व्यापारसे जो दूसरे पुरुषोंको भी हिंसा अब्रह्म आदि दोषोसे आच्छ दित करै, उसको अच्छादन--स्वभावयुक्त होनेसे स्त्री कहते है । भावार्थ-यद्यपि बहुत सी स्त्रियां अपनेको तथा दूसरोंको दोषोंसे आच्छादित नहीं भी करती है तव भी बहुलता की अपेक्षा यह निरुक्तिसिद्ध लक्षण किया है। णेवित्थी व पुमं णउंसओ उहयलिङ्गविदिरित्तो । इद्वावग्गिसमाणगवेदणगरुओ कलुसचित्तो ।। २७४ ॥ नैव स्त्री नैव पुमान् नपुंसक उभयलिङ्गव्यतिरिक्तः । इष्टापाकाग्निसमानकवेदनागुरुकः कलुषचित्तः ॥ २७४.॥ अर्थ-जो न स्त्री हो और न पुरुष हो ऐसे दोनों ही लिङ्गोंसे रहित जीवको नपुंसक कहते है । इसके अवा ( भट्टा ) में पकती हुई इंटकी अग्निके समान तीव्र कषाय होती है। अत एव इसका चित्त प्रतिसमय कलुषित रहता है । वेदरहित जीवोंको बताते है। तिणकारिसिट्ठपागग्गिसरिसपरिणामवेदणम्मुक्का । अवगयवेदा जीवा सगसंभवणंतवरसोक्खा ॥ २७५ ।। तृणकारीषेष्टपाकाग्निसदृशपरिणामवेदनोन्मुक्ताः । अपगतवेदा जीवाः स्वकसम्भवानन्तवरसौख्याः ॥ २७५ ॥ अर्थ-तृणकी अग्नि कारीप अग्नि इष्टपाक अग्नि ( अवाकी अग्नि ) के समान वेद के परिणामोंसे रहित जीवोको अपगतवेद कहते है । ये जीव अपनी आत्मासे ही उत्पन्न होनेवाले अनन्त और सर्वोत्कृष्ट सुखको भोगते है। वेदमार्गणामें पाच गाथाओं द्वारा जीवसंख्याका वर्णन करते है। जोइसियवाणजोणिणितिरिक्खपुरुसा य सणिणो जीवा । तत्तेउपम्मलेस्सा संखगुणूणा कमेणेदे ।।२७६ ॥ ज्योतिष्कवानयोनिनीतिर्यक्पुरुषाश्च संझिनो जीवाः । तत्तेजःपद्मलेश्याः संख्यगुणोनाः क्रमेणैते ॥ २७६ ॥ अर्थ-ज्योतिषी, व्यन्तर, योनिमती तिर्यच, संज्ञी तियेच, संनो तिर्थव तेजोलेश्या- वाले, तथा संक्षीतिर्यच पद्मलेश्यावाले जीव क्रमसे उत्तरोत्तर संख्यातगुणे संख्यातगुणे १स्व पर पा मोरे सीजति आन्धी नि नी २ नमो न पुमानिति नपुर !

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
हीन है। भावार्थ-६५५३६ से गुणित प्रतरामुलका भाग जगत्प्रतरमें देनेसे जो लब्ध
आवे उतना ही ज्योतिषी जीवोंका प्रमाण है । इसमें क्रमसे असंख्यातगुणा २ कम करनेसे
आगे २ की राशिका प्रमाण निकलता है।
इगिपुरिसे बत्तीसं देवी तज्जोगभजिददेवोधे।
सगगुणगारेण गुणे पुरुषा महिला य देवेसु ।। २७७ ।।
एकपुरुषे द्वात्रिंशद्देव्यः तद्योगभक्तदेवौधे ।
स्वकगुणकारेण गुणे पुरुषा महिलाश्च देवेषु ॥ २७७ ॥
अर्थ-देवगतिमें एक देवकी कमसे कम बत्तीस देविया होती है । इसलिये देव और
देवियोंके जोडरूप तेतीसका समस्त देवराशिमें भाग देनेसे जो लव्ध आवे उसका अपने २
गुणाकारके साथ गुणा करनेसे देव और देवियोका प्रमाण निकलता है। भावार्थ-समस्त
देवराशिमें तेतीसका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उसका एकके साथ गुण करनेसे देवोंका
और वत्तीसके साथ गुणा करनेसे देवियोंका प्रमाण निकलता है । यद्यपि इन्द्रादिकोंकी देवि-
योंका प्रमाण अधिक है, तथापि प्रकीर्णक देवोंकी अपेक्षा इन्द्रादिका प्रमाण अत्यल्प है, अतः
उनकी यहां पर विवक्षा नहीं की है।
देवेहिं सादिरैया पुरिसा देवीहिं साहिया इत्थी।
तेहिं विहीण सवेदो रासी संढाण परिमाणं ॥ २७८ ॥
देवैः सातिरेकाः पुरुषा देवीभिः साधिकाः स्त्रियः ।
तैविहीनः सवेदो राशिः षण्ढाना परिमाणम् ॥ २७८ ॥
अर्थ-देवोसे कुछ अधिक, मनुष्य और तिर्यग्गतिसम्बन्धी पुंवेदवालोंका प्रमाण है।
और देवियोंसे कुछ अधिक मनुष्य तथा तिर्यग्गति सम्बन्धी स्त्रीवेदवालोंका प्रमाण है। सवेद
राशिसे पुवेद तथा स्त्रीवेदका प्रमाण घटानेसे जो शेष रहे वह नपुंसकोंका प्रमाण है।
गब्मणपुइत्थिसण्णी सम्मुच्छणसणिपुण्णगा इदरा ।
कुरुजा असण्णिगभजणपुइत्थीवाणजोइसिया ॥२७९ ।।
थोवा तिसु संखगुणा तत्तो आवलिअसंखभागगुणा ।
पल्लासखेज्जगुणा तत्तो सव्वत्थ संखगुणा ॥२८० ॥
गर्भनपुत्रीसंझिनः सम्मर्छनसंज्ञिपूर्णका इतरे ।
कुरुना असज्ञिगर्भजनपुस्त्रीवानज्योतिष्काः ॥ २७९ ॥
स्तोकाः त्रिषु संख्यगुणाः तत आवल्यसंख्यभागगुणाः ।
पल्यासंख्येयगुणा ततः सर्वत्र संख्यगुणाः ॥ २८० ॥

गोम्मटसारः। १०९ अर्थ-गर्भन संज्ञी नपुंसक १ पुल्लिङ्ग २ तथा स्त्रीलिङ्ग ३ ।सम्मूर्छन संज्ञी पर्याप्त ४ और अपर्याप्त ५ भोगभूमिया - ६ असंज्ञी गर्भज नपुंसक ७ पुल्लिङ्ग ८ स्त्रीलिङ्ग ९ । व्यन्तर १० । और ज्योतिषी ११। इन ग्यारह स्थानोंको क्रमसे स्थापन करना चाहिये । जिसमें पहला स्थान सबसे स्तोक है । और उससे आगेके तीन स्थान संख्यातगुणे २ है । पांचमा स्थान आवलीके असंख्यातमे भाग गुणा है। छटा स्थान पल्यके असंख्यातमे भागगुणा है। इससे आगेके स्थान क्रमसे संख्यातगुणे २ है । भावार्थ-चौथे और पांचमे स्थानवाले जीव नपुंसक ही होते है । छढे स्थानवाले पुल्लिङ्ग और स्त्रीलिन ही होते है । ६५५३६ से गुणित प्रतराड्गुलका, आठवार संख्यातका, एकवार आवलीके असंख्यातमे भागका, एकवार पल्यके असंख्यातमे भागका, जगत्प्रतरमें भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना ही पहले स्थानका प्रमाण है । इससे आगेके तीन स्थान क्रमसे संख्यातगुणे २ है। पांचमा स्थान आवलीके असंख्यातमे भागगुणा, छट्ठा स्थान पल्यके असंख्यातमे भागगुणा, सातमा आठमा नौमा दशमा ग्यारहमा स्थान क्रमसे संख्यातगुणा २ है। इति वेदमार्गणाधिकारः॥ क्रमप्राप्त कषाय-मार्गणाके वर्णनकी आदिमें प्रथम कषायका निरुक्तिसिद्ध लक्षण वताते है। सुहदुक्खसुबहुसस्सं कम्मक्खेतं कसेदि जीवस्स । संसारदूरमेरं तेण कसाओत्ति णं वेति ॥ २८१ ॥ सुखदुःखसुबहुसस्यं कर्मक्षेत्रं कृषति जीवस्य । संसारदूरमर्यादं तेन कषाय इतीमं ब्रुवन्ति ॥ २८१ ॥ अर्थ-जीवके सुख दुःख आदि अनेक प्रकारके धान्यको उत्पन्न करनेवाले तथा जिसकी संसाररूप मर्यादा अत्यन्त दूर है ऐसे कर्मरूपी क्षेत्र ( खेत )का यह कर्पण करता है इसलिये इसको कपाय कहते है। कृष धातुकी अपेक्षासे कपाय शब्डका अर्थ वताकर अत्र हिसार्थक कप धातुकी अपेक्षासे कपाय शब्दकी निरक्ति बताते है । सम्मत्तदेससयलचरित्तजहक्खादचरणपरिणामे । शादंति वा कपाया चउसोलअसंखलोगमिदा ॥ २८२ ॥ सम्यक्वदेशसक्लचरित्रययाख्यातचरणपरिणामान् । घातयन्ति वा कपायाः चतु.पोउशासंख्यलोकमिताः ॥ २८२ ॥ अर्थ--सम्यरत्त्व देशचारित्र सकलचारित्र यथाख्यातचारित्ररूपी परिणामोंको जो पे- घाते-न होनेदे उसको कपाय कहते है । इसके अनन्तानुवन्धी अप्रत्याल्यानावरण प्रत्या- ११० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । ख्यानावरण संज्वलन इसप्रकार चार भेद है । अनन्तानुवन्धी आदि चारोंके क्रोध मान माया लोभ इस तरह चार २ भेद होनेसे कषायके उत्तरभेद सोलह होते है। किन्तु कपायके उदयस्थानोंकी अपेक्षासे असंख्यात लोकप्रमाण भेद है। जो सम्यक्त्वको रोके उसको अन- न्तानुबन्धी; जो देशचारित्रको रोके उसको अप्रत्याख्यानावरण, जो सकलचारित्रको रोके उसको प्रत्याख्यानावरण, जो यथाख्यातचारित्रको रोके उसको संज्वलन कपाय कहते है। शक्तिकी अपेक्षासे क्रोधादि चार कषायोंके चार गाथाओद्वारा भेद गिनाते है। सिलपुढविभेदधलीजलराइसमाणओ हवे कोहो । णारयतिरियणरासरगईसु उपायओ कमसो ।। २८३ ॥ शिलापृथ्वीभेदधूलिजलराजिसमानको भवेत् क्रोधः । नारकतिर्यग्नरामरगतिषत्पादकः क्रमशः ॥ २८३ ॥ अर्थ-क्रोध चार प्रकारका होता है । एक पत्थरकी रेखाके समान, दूसरा पृथ्वीकी रेखाके समान, तीसरा धूलिरेखाके समान, चौथा जलरेखाके समान । ये चारो प्रकारके क्रोध क्रमसे नरक तिर्यक् मनुष्य तथा देवगतिमें उत्पन्न करनेवाले है । सेलटिकट्ठवेत्ते णियभेएणणुहरंतओ माणो। णारयतिरियणरामरगईसु उपायओ कमसो ॥२८४ ॥ शैलास्थिकाष्ठवेत्रान् निजभेदेनानुहरन् मानः । नारकतिर्यग्नरामरगतिषत्पादकः क्रमशः ॥ २८४ ॥ अर्थ-मान भी चार प्रकारका होता है । पत्थरके समानः हड्डीके समान, काठके समान, तथा वेतके समान । ये चार प्रकारके मान भी क्रमसे नरक तिर्यञ्च मनुष्य तथा देव गतिके उत्पादक है। भावार्थ-जिस प्रकार पत्थर किसी तरह नहीं नमता, इस ही प्रकार जिसके उदयसे जीव किसी भी तरह नम्र न हो उसको शैलसमान ( पत्थरके समान ) मान कहते है। ऐसे मानके उदयसे नरकगति उत्पन्न होती है। इस ही तरह अस्थिसमान ( हड्डीके समान ) आदिक मानको भी समझना चाहिये । वेणुवमूलोरभयसिंगे गोमुत्तए य खोरप्पे । सरिसी माया णारयतिरियणरामरगईसु खिबदि जियं ॥२८५॥ वेणूपमूलोर-कशृद्धेण गोमूत्रेण च क्षुरप्रेण । सदृशी माया नारकतिर्यग्नरामरगतिषु क्षिपति जीवम् ॥ २८५ ॥ अर्थ-~~-माया भी चार प्रकारकी होती है । वासकी जडके समान, मेढ़ेके सींगके समान, गोमूत्रके समान, खरपाके समान । यह चार तरहकी माया भी क्रमसे जीवको १ अनन्तानुसन्धी आदि चार प्रकारके क्रोधमें प्रत्येक काधके ये चार २ भेद समझने चाहिये,

गोम्मटसारः ।
नरक तिर्यञ्च
मनुष्य
और देवगतिमें लेजाती है। भावार्थ-मायाके ये चार भेद कुटिलताकी
अपेक्षासे हैं। जितनी अधिक कुटिलता इसमे पाई जाय उतनी ही उत्कृष्ट माया कही जाती
है, और वह उक्त क्रमानुसार गतियोंकी उत्पादक होती है ।
किमिरायचक्कतणुमलहरिदारण सरिसओ लोहो ।
णारयतिरिक्खमाणुसदेवेसुप्पायओ कमसो ॥ २८६ ॥
क्रिमिरागचक्रतनुमलहरिद्रारागेण सदृशो लोभः ॥
नारकतिर्यग्मानुषदेवेषत्पादकः क्रमशः ॥ २८६ ॥
अर्थ-लोभ कषाय भी चार प्रकारका है। क्रिमिरागके समान, चक्रमल ( रथ आदि-
कके पहियोंके भीतरकी ओंगन) के समान, शरीरके मलके समान, हल्दीके रंगके समान । यह
भी क्रमसे नरक तिर्यञ्च मनुष्य देवगतिका उत्पादक है। भावार्थ-जिस प्रकार किरिमिजीका रंग
अत्यंत गाढ़ होता है बड़ी ही मुश्किलसे छूटता है । उसी प्रकार जो लोभ सबसे जादे गाढ़ हो
उसको किरिमिजी के समान कहते है । इससे जो जल्दी २ छूटनेवाले है उनको क्रमसे ओंगन,
शरीरमल, हल्दी के रंगके समान कहते है,
नरकादि गतिमें उत्पत्तिके प्रथम समयमें बहुलताकी अपेक्षासे क्रोधादिकके उदयका
नियम वताते है।
णारयातरिक्खणरसुरगईसु उप्पण्णपढमकालम्हि ।
कोहो माया माणो लोहुदओ अणियमो वापि ॥ २७ ॥
नारकतिर्यग्नरसुरगतिपत्पन्नप्रथमकाले ।
क्रोधो माया मानो लोभोदयः अनियमो वापि ॥ २८७ ॥
अर्थ-नरक तिर्यञ्च मनुष्य तथा देवगतिमें उत्पन्न होनेके प्रथम समयमें क्रमसे क्रोध
माया मान और लोभका उदय होता है । अथवा अनियम भी है। भावार्थ-नरकगतिमें
उत्पन्न होनेवाले जीवके प्रथम समयमें क्रोधका उदय होता है । परन्तु किसी २ आचार्यका
मत है कि ऐसा नियम नहीं है । इस ही प्रकार तिर्यग्गतिमें उत्पन्न होनेवालेके प्रथम समयमे
किसी २ आचार्यके मतसे नियमसे माया कषायका उदय होता है । और मनुष्यगतिके प्रथम
समयमें मानका तथा देवगतिके प्रथम समयमें लोभ कपायका उदय होता है।
कपायरहित जीवोंको बताते है।
अप्पपरोभयवाधणबंधासंजमणिमित्तकोहादी।
जसिं णत्थि कप्ताया अमला अकसाइणो जीवा ॥ २८८ ।।
आत्मपरोभयवाधनबन्धासंयमनिमित्तक्रोधादयः ।
येषां न सन्ति कपाया अमला अकपायिणो जीवाः ॥ २८८ ॥

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-जिनके, खुदको दूसरेको तथा दोनोंको ही वाधा देने और बन्धन करने तथा असंयम करनेमें निमित्तभूत क्रोधादिक कषाय नहीं है, तथा जो वाह्य और अभ्यन्तर मलसे रहित है ऐसे जीवोंको अकषाय कहते है। क्रोधादि कपायोंके शक्तिकी अपेक्षासे स्थान वताते है । कोहादिकसायाणं चउ चउदसवीस होति पदसंखा । सत्तीलेस्साआउगबंधाबंधगदभेदेहिं ॥ २८९ ॥ क्रोधादिकषायाणा चत्वारश्चतुर्दशविंशतिः भवन्ति पदसंख्याः । शक्तिलेश्याऽऽयुष्कबंधावंधगतभेदैः ॥ २८९ ॥ अर्थ-शक्ति, लेश्या, तथा आयुके बंधावन्ध गत भेदोंकी अपेक्षासे क्रोधादिक कपा- योंके क्रमसे चार चौदह और वीस स्थान होते है । भावार्थ-~-शक्तिकी अपेक्षा चार, अपेक्षा चौदह और आयुके बन्धावन्धकी अपेक्षा क्रोधादि कषायोंके वीस स्थान होते हैं । शक्तिकी अपेक्षासे होनेवाले चार स्थानोंको गिनाते है। सिलसेलवेणुमूलक्किमिरायादी कमेण चत्तारि । कोहादिकसायाणं सतिं पडि हॉति णियमेण ॥ २९० ॥ शिलाशैलवेणुमूलक्रिमिरागादीनि क्रमेण चत्वारि । क्रोधादिकषायाणा शक्ति प्रति भवन्ति नियमेन ॥ २९० ॥ अर्थ-शिलाभेद आदिक चार प्रकारका क्रोध, शैलसमान आदिक चार प्रकारका मान, वेणु ( वांस ) मूलके समान आदिक चार तरहकी माया, क्रिमिरागके समान आदिक चार प्रकारका लोभ, इस तरह क्रोधादिक कषायोंके उक्त नियमके अनुसार क्रमसे शक्तिकी अपेक्षा चार २ स्थान है। लेश्याकी अपेक्षा होनेवाले चौदह स्थानोंको गिनाते है। किण्हं सिलासमाणे किण्हादी छक्कमेण भूमिम्हि । छक्कादी सुककोत्ति य धूलिम्मि जलमिम सुक्केक्का ॥ २९१ ॥ कृष्णा शिलासमाने कृष्णादयः षट् क्रमेण भूमौ । पटकादिः शुक्लेति च धूलौ जले शुक्लैका ॥ २९१ ॥ अर्थ-शिलासमान क्रोधमें केवल कृष्ण लेश्याकी अपेक्षासे एक ही स्थान होता है। पृथ्वीसमान क्रोधमें कृष्ण आदिक लेश्याकी अपेक्षा छह स्थान है । धूलिसमान क्रोध छह लेश्यासे लेकर शुक्ललेश्यापर्यंत छह स्थान होते है। और जलसमान क्रोधमें केवल एक शुक्लेलेश्या ही होती है । भावार्थ-शिलासमान क्रोघमें केवल कृष्णलेश्याका एक .

गोम्मटसारः । :११३ ही स्थान होता है । पृथ्वीभेदसमान क्रोधमें छह स्थान होते हैं, पहला केवल कृष्णले- श्याका, दूसरा कृष्ण नील लेश्याका, तीसरा कृष्ण नील कपोत लेश्याका, चौथा कृष्ण नील कपोत पीत लेश्याका, पांचमा कृष्ण नील कपोत पीत पद्म लेश्याका, छटा कृष्ण नील कपोत पीत पद्म शुक्ललेश्याका । इस ही प्रकार धूलिरेखा समान क्रोधमे भी छह स्थान होते है। पहला कृष्णादिक छह लेश्याका, दूसरा कृष्णरहित पांचलेश्याका, तीसरा कृष्ण नीलरहित चारलेश्याका, चौथा कृष्ण नील कपोतरहित अतकी तीन शुभ लेश्याओका, पांचमा पद्म और शुक्ल लेश्याका, छट्ठा केवल शुक्ल लेश्यका । जलरेखा समान क्रोधमे एक शुक्ल लेश्याका ही स्थान होता है । जिस प्रकार क्रोधके लेश्याओकी अपेक्षा ये चौदह स्थान वताये है उस ही तरह मानादिक कषायमें भी चौदह २ भेद समझना चाहिये। आयुके बंधाधकी अपेक्षासे तीन गाथाओद्वारा वीस स्थानोंको गिनाते हैं। सेकगकिण्हे सुण्णं णिरयं च य भूगएगबिहाणे । णिरयं इगिबितिआऊ तिहाणे चारि सेसपदे ॥ २९२ ॥ शैलगकृष्णे शून्यं निरयं च च भूगैकद्विस्थाने । निरयमेकद्विव्यायुस्त्रिस्थाने चत्वारि शेषपदे ॥ २९२ ॥ अर्थ-शैलगत कृष्णलेश्यामें कुछ स्थान तो ऐसे है कि जहांपर आयुवन्ध नहीं होता, इसके अनन्तर कुछ स्थान ऐसे है कि जिनमे नरक आयुका वन्ध होता है । इसके बाद पृथ्वीभेदगत पहले और दूसरे स्थानमे नरक आयुका ही वन्ध होता है । इसके भी वाद कृष्ण नील कपोत लेश्याके तीसरे भेदमें ( स्थानमे ) कुछ स्थान ऐसे है जहा नरक आयुका ही वन्ध होता है, और कुछ स्थान ऐसे है जहा नरक तिर्यञ्च दो आयुका वन्ध होसकता तथा कुछ स्थान ऐसे है जहांपर नरक तिर्यञ्च तथा मनुष्य तीनों ही आयुका बन्ध हो सकता है । शेषके तीन स्थानोंमें चारो आयुका वन्ध हो सकता है। धूलिगछसहाणे चउराऊतिगद्गं च उवरिलं । पणचदुठाणे देवं देवं सुण्णं च तिहाणे ॥ २९३ ॥ धूलिगषट्कस्थाने चतुरायपि त्रिकद्विकं चोपरितनम् । पञ्चचतुर्थस्थाने देवं देवं शून्यं च तृतीयस्थाने ।। २९३ ॥ अर्थ-धूलिभेदगत छहलेश्यावाले प्रथम भेदके कुछ स्थानोंमें चागे आयका बन्ध होता है, इसके अनन्तर कुछ स्थानोमें नरक आयुको छोड़कर शेष तीन आयका और कुछ स्थानोमें नरक तिर्यचको छोटकर शेप दो आयुका बन्ध होता है । कृष्णग्याको छोडकर पानश्यावाले दूसरे स्थानमें तथा कृष्ण नीलोयाको कोटकर शेष नार न्या गो. १५ . ११४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । वाले तृतीयस्थानमे केवल देव आयुका बंध होता है । अन्तकी तीन लेश्यावाले चौथे भेदके कुछ स्थानोंमें देवायुका वन्ध होता है और कुछ स्थानोंमें आयुका अबन्ध है। सुण्णं दुगइगिठाणे जलम्हि सुण्णं असंखभजिदकमा चउचोदसवीसपदा असंखलोगा हु पत्तेयं ॥ २९४ ॥ शून्यं द्विकैकस्थाने जले शून्यमसंख्यभजितक्रमा :। चतुश्चतुर्दशविशतिपदा असंख्यलोकी हि प्रत्येकम् ॥ २९४ ॥ अर्थ----इस हीके (धूलिभेदगतहीके ) पद्म और शुक्ललेश्यावाले पांचमे स्थानमें और केवल शुक्ललेश्यावाले छठे स्थानमें आयुका अबन्ध है, तथा जलभेदगत केवल शुक्ललेश्या- वाले एक स्थानमे भी आयुका अबन्ध है। इस प्रकार कषायोके शक्तिकी अपेक्षा चार भेद, लेश्याओंकी अपेक्षा चौदह भेद, आयुके बन्धावन्धकी अपेक्षा वीस भेद है । इनमें प्रत्येकके असंख्यात लोक प्रमाण भेद है। तथा अपने २ उत्कृष्टसे अपने २ जघन्यपर्यन्त क्रमसे असंख्यातगुणे २ हीन है। कपायमार्गणामें तीन गाथाओद्वारा जीवोंकी संख्या बताते है। पुह पुह कसायकालो णिरये अंतोमुहत्तपरिमाणो । लोहादी संखगुणो देवेसु य कोहपहुदीदो ॥ २९५ ॥ पृथक् पृथक् कपायकालः निरये अन्तर्मुहूर्तपरिमाणः । लोभादिः संख्यगुणो देवेषु च क्रोधप्रभृतितः ॥ २९५ ।। अर्थ-नरकमे नारकियोके लोभादि कपायका काल सामान्यसे अन्तर्मुहूर्त मात्र होने- पर भी पूर्व.२ की अपेक्षा उत्तरोत्तर कषायका काल पृथक् २ संख्यातगुणा २ है । और देशोंमे क्रोधादिक लोमपर्यन्त कपायोंका काल सामान्यसे अन्तर्मुहूर्त; किन्तु विशेषरूपसे पूर्व २ की अपेक्षा उत्तरोत्तरका संख्यातगुणा २ काल है । भावार्थ-यद्यपि सामान्यसे प्रत्येक कपायका काल अन्तर्मुहूर्त है, तथापि नारकियोंके जितना लोभका काल है उससे सग्न्यातगुणा मायाका काल है, और जितना मायाका काल है उससे संख्यातगुणा मानका काट है , मानके कालसे भी संख्यातगुणा क्रोधका काल है। किन्तु देवोंमें इससे विपरीत है। अर्थात् जितना कोषका काल है उससे संख्यातगुणा मानका काल है, मानसे संख्यातगुणा मायाना और मायासे सख्यातगुणा लोमका काल है। सम्बसमासेणवाहिदसगसगरासी पुणोवि संगुणिदे। मगसगगुणगारेहिं य सगसगरासीणपरिमाणं ।। २९६ ।।। सर्वममामनासहितन्वकम्बकराशौ पुनरपि संगुणिते । म्पक पाणश्च स्वकम्वकगगीना परिमाणम ॥ २९६ ॥ - गोम्मटसारः। ११५ , अर्थ-अपनी २ गतिमें सम्भव जीवराशिमें समस्त कषायोंके उदयकालके जोडका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उसका अपने २ गुणाकारसे गुणन करनेपर अपनी २ राशिका परि- माण निकलता है। भावार्थ-कल्पना कीजिये कि देवगतिमें देव राशिका प्रमाण १७०० है और क्रोधादिकके उदयका काल क्रमसे ४, १६, ६४, २५६ है । इस लिये समस्त कषायोदयके कालका जोड ३४० हुआ । इसका उक्त देवराशिमें भाग देनेसे लब्ध ५ आते है । इस लब्ध राशिका अपने कषायोदयकालसे गुणा करने पर अपनी २ राशिका प्रमाण निकलता है। यदि क्रोधकषायवालोंका प्रमाण निकालना हो तो ४ से गुणा करने पर वीस निकलता है, यदि मानकषायवालोंका प्रमाण निकालना हो तो १६ से गुणा करनेपर ८० प्रमाण निकलता है। इस ही प्रकार आगे भी समझना । जिस तरह यह देवोंकी अङ्कसं- दृष्टि कही उस ही तरह नारकियोंकी भी समझना, किन्तु अङ्कसंदृष्टिको ही अर्थसंदृष्टि नही समझना । क्रोधादि कषायवाले जीवोंकी संख्या निकालनेका यह क्रम केवल देव तथा नरक- गतिमें ही समझना। मनुष्य तथा तिर्यञ्चोंमें कषायवाले जीवोका प्रमाण बताते है । णरतिरिय लोहमायाकोहो माणो विइंदियादिव्व । : आवलिअसंखभज्जा सगकालं वा समासेज्ज ॥ २९७ ॥ नरतिरश्चोः लोभमायाक्रोधो मानो द्वीन्द्रियादिवत् । आवल्यसंख्यभाज्याः स्वककालं वा समासाद्य ॥ २९७ ॥ अर्थ-जिस प्रकार द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय तथा पंचेन्द्रिय जीवोकी संख्या पहले निकाली है उसही क्रमसे मनुष्य तथा तिर्यञ्चोके लोभ माया क्रोध और मानवाले जीवोंका प्रमाण आवलीके असंख्यातमे भाग क्रमसे निकालना चाहिये । अथवा अपने २ कालकी अपेक्षासे उक्त कपायवाले जीवोका प्रमाण निकालना चाहिये । भावार्थ-चारो कपायोंका जितना प्रमाण है उसमे आवलीके असख्यातमे भागका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उसके बहुभागको चारों जगह समान रूपसे विभक्त करना और शेष एक भागका " बहुभागे समभागो" इस गाथामें कहे हुए क्रमके अनुसार विभाग करनेसे चारो कपायवालोका प्रमाण निकलता है । अथवा यदि इतने कालमें इतने जीव रहते है तो इतने कालमें कितने रहेंगे इस त्रैराशिक विधानसे भी कपायवालोका प्रमाण निकलता है । इति कषायमार्गणाधिकारः॥ ---- क्रमप्राप्त ज्ञानमार्गणाके प्रारम्भमे ज्ञानका निरुक्तिसिद्ध सामान्य लक्षण कहते है । जाणइ तिकालविसए दव्वगुणे पजए य बहुभेदे । पञ्चक्खं च परोक्खं अणेण जाणेत्ति णं वेति ॥ २९८ ।।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । जानाति त्रिकालविषयान् द्रव्यगुणान् पर्यायांश्च बहुभेदान् । प्रत्यक्षं च परोक्षमनेन ज्ञानमिति इदं ब्रुवन्ति ॥ २९८ ॥ अर्थ-जिसके द्वारा जीव त्रिकालविषयक ( भूत भविष्यत् वर्तमान ) समस्त द्रव्य और उनके गुण तथा उनकी अनेक प्रकारकी पर्यायोको जाने उसको ज्ञान कहते है। इसके दो भेद है, एक प्रत्यक्ष दूसरा परोक्ष । ज्ञानके भेदोको दिखाते हुए उनका क्षायोपशमिक और क्षायिकरूपसे विभाग करते है। एंचेव होंति णाणा मदिसुदओहीमणं च केवलयं । खयज्वसमिया चउरो केवलणाणं हवे खइयं ॥ २९९ ।। पञ्चैव भवन्ति ज्ञानानि मतिश्रुतावधिमनश्च केवलम् । सायोपशमिकानि चत्वारि केवलज्ञानं भवेत् क्षायिकम् ॥ २९९ ॥ अर्थ-ज्ञानके पाच भेद है। मति श्रुत अवधि मनःपर्यय तथा केवल । इनमें आदिके चार ज्ञान क्षायोपशमिक है, और केवलज्ञान क्षायिक है। मिथ्याज्ञानका कारण और स्वामी बताते है। अण्णाणतियं होदि हु सण्णाणतियं खु मिच्छअणउदये। णवरि विभंगं णाणं पंचिदियसण्णिपुण्णेव ॥ ३०॥ अज्ञानत्रिकं भवति हि सद्ज्ञानत्रिकं खलु मिथ्यात्वानोदये । नवरि विभङ्गं ज्ञानं पञ्चेन्द्रियसंज्ञिपूर्ण एव ॥ ३०० ॥ अर्थ-आदिके तीन ( मति श्रुत अवधि ) ज्ञान समीचीन भी होते हैं और मिथ्या भी होते हैं । ज्ञानके मिथ्या होनेका अन्तरग कारण मिथ्यात्व तथा अनन्तानुवन्धी कषायका उदय है । मिथ्या अवधिको विभंग भी कहते है । इसमे यह विशेषता है कि यह विभंग ज्ञान संज्ञी पर्यातक पंचेन्द्रियके ही होता है। मिश्रज्ञानका कारण और मनःपर्ययज्ञानका स्वामी बताते है । मिस्सुदये सम्मिस्सं अण्णाणतियेण णाणतियमेव । संजमविसेससहिए मणपज्जवणाणमुद्दिछं ॥३०१॥ मित्रोदये समिश्रमज्ञानत्रयेण जानत्रयमेव । मंयमविशेषसहिते मन पर्ययज्ञानमुद्दिष्टम् ॥ ३०१ ॥ अर्थ-मित्र प्रकृतिके उदयसे आदिके तीन ज्ञानोंमें समीचीनता तथा मिथ्यापना दोनों ही पाये संत हैं, इसटिये टनको मिश्र ज्ञान कहते है । मनःपर्ययज्ञान जिनके विशेष संयम ता। उनके होता है । भावार्थ-मनःपर्यय ज्ञान प्रमत्त गुणस्थानसे लेकर क्षीणकपाय गोम्मटसारः। ११७ गुणस्थानपर्यन्त सात गुणस्थानोंमें होता है; परन्तु इनमें भी जिनका चारित्र उत्तरोत्तर वर्धमान - होता है उनहीके होता है। तीन गाथाओंमें दृष्टान्तद्वारा मिथ्याज्ञानोंको स्पष्ट करते है। विसर्जतकूडपंजरबंधादिसु विणुवएसकरणेण । जा खलु पवदृइ मई मइअण्णाणंत्तिणं बॅति ॥३०२॥ विषयन्त्रकूटपञ्जरवंधादिषु विनोपदेशकरणेन । या खलु प्रवर्तते मतिः मत्यज्ञानमिति इदं ब्रुवन्ति ॥ ३०२ ॥ अर्थ-दूसरेके उपदेशके विना जो विष यन्त्र कूट पंजर तथा बंध आदिकके विषयमें जो बुद्धि प्रवृत्त होती है उसको मत्यज्ञान कहते है । भावार्थ-जिसके खानेसे जीव मर सके उस द्रव्यको विष कहते है । भीतर पैर रखते ही जिसके किवाड़ बन्द होजाय, और जिसके भीतर बकरी आदिको बांधकर सिंह आदिकको पकड़ा जाता है उसको यन्त्र कहते है। जिससे मूसे वगैरह पकड़े जाते है उसको कूट कहते है । रस्सीमें गांठ लगाकर जो जाल बनाया जाता है उसको पंजर कहते है । हाथी आदिको पकडनेके लिये जो गड्ढे आदिक बनाये जाते है उनको बंध कहते है । इत्यादिक पदार्थोंमें दूसरेके उपदेशके विना जो बुद्धि प्रवृत्त होती है उसको मत्यज्ञान कहते है क्योकि उपदेशपूर्वक होनेसे वह ज्ञान श्रुतज्ञान कहा जायगा । आभीयमासुरक्खं भारहरामायणादिउवएसा । तुच्छा असाहणीया सुयअण्णाणंति णं बेंति ॥ ३०३ ॥ आभीतमासुरक्षं भारतरामायणाद्युपदेशाः । तुच्छा असाधनीया श्रुताज्ञानमिति इदं ब्रुवन्ति ॥ ३०३ ॥ अर्थ-चौरशास्त्र, तथा हिंसाशास्त्र, भारत, रामायण आदिके परमार्थशन्य अत एव अनादरणीय उपदेशोको मिथ्या श्रुतज्ञान कहते है। विवरीयमोहिणाणं खओवसमियं च कम्मवीजं च । वेभंगोत्ति पउच्चइ समत्तणाणीण समयम्हि ॥ ३०४॥ विपरीतमवधिज्ञानं क्षायोपगमिकं च कर्मवीनं च । विभङ्ग इति प्रोच्यते समाप्तनानिना समये ॥ ३०४ ॥ अर्थ-सर्वज्ञोंके उपदिष्ट आगममें विपरीत अवधि ज्ञानको विभङ्ग कहते है । इसके दो भेद हैं, एक क्षायोरशमिक दूसरा भवप्रत्यय । भावार्थ-देव नारकियोंके विपरीत अवधि- ज्ञानको भवप्रत्यय विभङ्ग कहते है, और मनुष्य तथा तिर्यचोंके विपरीत अवधिज्ञानको क्षायोपशमिक विभंग कहते है । इस विभटका अन्नरट्र कारण मिव्यात्व आदिक कर्म है।

११८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । इसके निमित्तसे विशिष्ट ( समीचीन ) अवधिज्ञानके मन होनेको ( विपरीत होनेको ) विभङ्ग कहते हैं । यह इसका ( विभङ्गका ) निरुक्तिसिद्ध अर्थ है । मतिज्ञानका स्वरूप, उत्पत्ति, कारण, भेद, विषय नौ गाथाओंमे दिखाते है। अहिमुहणियमियबोहणमाभिणिचोहियमणिंदिइंदियजम् । अवगहईहावायाधारणगा होंति पत्तेयं ॥३०५॥ अभिमुखनियमितवोधनमाभिनिवोधिकमनिन्द्रियेन्द्रियजम् । अवग्रहहावायधारणका भवन्ति प्रत्येकम् ॥ ३०५ ॥ अर्थ-इन्द्रिय और अनिन्द्रिय ( मन ) की सहायतासे अभिमुख और नियमित पदा र्थका जो ज्ञान होता है उसको आभिनिवोधिक कहते है । इसमे प्रत्येकके अवग्रह ईहा अवाय धारणा ये चार २ भेद है । भावार्थ-स्थूल वर्तमान योग्य क्षेत्रमें अवस्थित पदार्थको अभिमुख कहते है। और जैसे चक्षुका रूप विषय है इस ही तरह जिस इन्द्रियका जो विषय निश्चित है उसको नियमित कहते है । इस तरहके पदार्थोंका मन अथवा स्पर्शन आदिक पाच इन्द्रियोकी सहायतासे जो ज्ञान होता है उसको मतिज्ञान कहते है । इस प्रकार मन और इन्द्रियकी अपेक्षासे मतिज्ञानके छह भेद हुए । इसमे भी प्रत्येकके अवग्रह . ईहा अवाय धारणा ये चार २ भेद होते है। प्रत्येकके चार २ भेद होते है इसलिये छहको- चारसे गुणा करने पर मतिज्ञानके चौवीस भेद होते है। अवग्रहके भी भेद आदिक दिखाते है। वेंजणअत्थअवगहभेदा हु हवंति प्रत्तपत्तत्थे । कमसो ते वावरिदा पढमं ण हि चक्रघुमणसाणं ॥ ३०६ ॥ व्यञ्जनार्थावग्रहभेदौ हि भवतः प्राप्ताप्राप्तार्थे । क्रमशस्तौ व्यापृतौ प्रथमो नहि चक्षुर्मनसोः ।। ३०६ ॥ अर्थ----अवग्रहके दो भेद है, एक व्यञ्जनावग्रह दूसरा अर्थावग्रह । जो प्राप्त अर्थके विपयमें होता है उसको व्यञ्जनावग्रह कहते है, और जो अप्राप्त अर्थक विषयमें होता है उसको अर्थावग्रह कहते है । और ये पहले व्यञ्जनावग्रह पीछे अर्थावग्रह इस क्रमसे होते है। तथा व्यन्जनावग्रह चक्षु और मनसे नहीं होता । भावार्थ-इन्द्रियोसे प्राप्त-सम्बद्ध अर्थको व्यञ्जन कहते है, और अप्राप्त असम्बद्ध पदार्थको अर्थ कहते है । और इनके ज्ञानको क्रमसे व्यञ्जनावग्रह, अर्थावग्रह कहते हैं । (शङ्का ) राजवार्तिकादिकमें व्यञ्जन शब्दका अर्थ अव्यक्त किया है, और यहा पर प्राप्त अर्थ किया है, इस लिये परस्पर विरोध आता है। (उत्तर ) व्यञ्जन शब्दके अनभिव्यक्ति तथा प्राप्ति दोनो अर्थ होते है । इसलिये इसका ऐसा अर्थ समझना चाहिये कि इन्द्रियोंसे सम्बद्ध होने पर भी जब तक प्रकट न, गोम्मटसारः । ११९ - हो तब तक उसको व्यञ्जन कहते है, प्रकट होनेपर अर्थ कहते है। अत एव चक्षु और मनके द्वारा व्यञ्जनावग्रह' नहीं होता; क्योकि ये अप्राप्यकारी है। जिस तरह नवीन मट्टीके सकोरा आदिपर एक दो पानीकी बूद पड़नेसे वह व्यक्त नहीं होती; किन्तु अधिक बूंद पड़नेसे वही व्यक्त हो उठती है। इस ही तरह श्रोत्रादिकके द्वारा प्रथम अव्यक्त शब्दादि कके ग्रहणको व्यंजनावग्रह, और पीछे उसहीको प्रकटरूपसे ग्रहण करनेपर अर्थावग्रह कहते हैं । व्यंजन पदार्थका अवग्रह ही होता है, ईहा आदिक नहीं होते, इसलिये चार इन्द्रियोकी अपेक्षा व्यंजनावग्रहके चार ही भेद है। पूर्वोक्त चौवीस भेदोमें इन चार भेदोको मिलानसे मतिज्ञानके अट्टाईत भेद होते है । विसयाणं विसईणं संजोगाणंतरं हवेणियमा । अवगहणाणं गहिदे विसेसकंखा हवे ईहा ॥३०७॥ विषयाणा विषयिणा संयोगानन्तरं भवेत् नियमात् । अवग्रहज्ञानं गृहीते विशेषाकांक्षा भवेदीहा ॥ ३०७ ॥ अर्थ--पदार्थ और इन्द्रियोका योग्य क्षेत्रमें अवस्थानरूप सम्बन्ध होनेपर सामान्यका अवलोकन करनेवाला दर्शन होता है। और इसके अनन्तर विशेष आकार आदिकको ग्रहण करनेवाला अवग्रह ज्ञान होता है । इसके अनन्तर जिस पदार्थको अवग्रहने ग्रहण किया उसहीके किसी विशेष अंशको ग्रहण करनेवाला ईहा ज्ञान होता है। भावार्थ-जिस तरह किसी दाक्षिणात्य पुरुषको देखकर यह कुछ है इस तरहके महासामान्यावलोकनको दर्शन कहते है । इसके अनन्तर ' यह पुरुप है' इस तरहके ज्ञानको अवग्रह कहते है । और इसके यह दाक्षिणात्य ही होना चाहिये" इस तरहके विशेष ज्ञानको ईहा कहते हैं। ईहणकरणेण जदा सुणिण्णओ होदि सो अवाओ दु । कालांतरेवि णिण्णिदवत्थुसमरणस्स कारणं तुरियं ॥ ३०८॥ ईहनकरणेन यदा सुनिर्णयो भवति स अवायस्तु । कालान्तरेऽपि निर्णीतवस्तुस्मरणस्य कारणं तुर्यम् ॥ ३०८ ॥ अर्थ-ईहा ज्ञानके अनन्तर वस्तुके विशेष चिह्नोंको देखकर जो उसका विशेप निर्णय होता है उसको अवाय कहते है । जैसे भाषा वेप विन्यास आदिको देखकर “ यह दाक्षिणात्य ही है" इस तरहके निश्चयको अवाय कहते है । जिसके द्वारा निणीत वस्तुका कालान्तरमें भी विस्मरण न हो उसको धारणा ज्ञान कहते है। उक्त नार तरके ज्ञानोंका वारह तरहका विषय दिखाते हैं। बहु बहुविहं च सिप्पाणिस्सिदणुत्तं धुवं च इदरं च । तत्थेक्कक्के जादे छत्तीसं तिसयभेदं तु ॥ ३०९ ।। अनन्तर १२० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । वहु वहुविधं च क्षिप्रानिःसृदनुक्तं ध्रुवं च इतरञ्च । तत्रैकैकस्मिन् जाते षट्त्रिंशत् त्रिशतभेदं तु ॥ ३०९ ॥ अर्थ-उक्त मतिज्ञान के विषयभूत पदार्थके वारह भेद है । वहु, अल्प, बहुविध, एकविध, क्षिप्र, अक्षिप्र, अनिसृत् , निसृत् , अनुक्त, उक्त । इनमेसे प्रत्येक विषयमे मति- ज्ञानके उक्त अट्ठाईस भेदोंकी प्रवृत्ति होती है । इसलिये बारहको अट्ठाईससे गुणा करनेपर मतिज्ञानके तीनसौ छत्तीस भेद होते है। बहुवत्तिजादिगणे बहुबहुविहमियरमियरगहणम्हि । सगणामादो सिद्धा खिप्पादी सेदरा य तहा ॥ ३१० ॥ बहुव्यक्तिजातिग्रहणे बहु बहुविधमितरदितरग्रहणे । स्वकनामतः सिद्धाः क्षिप्रादयः सेतराश्च तथा ॥ ३१० ॥ अर्थ-एक जातिकी वहुतसी व्यक्तियोको बहु कहते है । अनेक जातिके बहुत पदा- थोंको वहुविध कहते है । एक जातिकी एक दो व्यक्तिको अल्प ( एक) कहते है। एक जातिकी अनेक व्यक्तियोको एकविध कहते है । क्षिप्रादिक तथा उनके प्रतिपक्षियोका उनके नामसे ही अर्थ सिद्ध है। भावार्थ-शीघ्र पदार्थको क्षिप्र कहते है, जैसे तेजीसे वहता हुआ जलप्रवाह । मन्द पदार्थको अक्षिप्र कहते है, जैसे कछुआ, धीरे २ चलनेवाला घोडा मनुष्य आदि । छिपे हुएको ( अप्रकट ) अनिसृत कहते है, जैसे जलमें डूवा हुआ हस्ती आदि । प्रकट पदार्थको निसृत कहते है, जैसे सामने खड़ा हुआ हस्ती । जो पदार्थ अभिप्रायसे समझा नाय उसको अनुक्त कहते है । जैसे किसीके हाथ या शिरसे इसारा करनेपर किसी कामके विषयमें हा या ना समझना । जो शब्दके द्वारा कहा जाय उसको उक्त कहते है, जैसे यह घट है । स्थिर पदार्थको ध्रुव कहते हैं, जैसे पर्वत आदि, क्षणस्थायी ( अस्थिर ) पदार्थको अध्रुव कहते है, जैसे विजली आदि । अनिसृत ज्ञानविशेपको दिखाते है। वत्थुस्स पदेसादो वत्थुग्गहणं तु वत्थुदेसं वा । सकलं वा अवलंबिय अणिस्सिदं अण्णवत्थुगई ।। ३११ ।। वस्तुनः प्रदेशात् वस्तुग्रहणं तु वस्तुदेशं वा। सकलं वा अवलम्व्य अनिसृतमन्यवस्तुगतिः ॥ ३११ ॥ अर्थ-वस्तुके एकदेशको देखकर समस्त वस्तुका ज्ञान होना, अथवा वस्तुके एकदेश या पूर्ण वस्तुन ग्रह्ण करके उसके निमित्तमे किसी दूसरी वस्तुके होनेवाले ज्ञानको भी अनि- मन करने है।

गोम्मटसारः। १२१ इसका दृष्टान्त दिखाते है। पुक्खरगहणे काले हथिस्स य वदणगवयगहणे वा । वत्थंतरचंदुस्स य घेणुस्स य बोहणं च हवे॥ ३१२॥ पुष्करग्रहणे काले हस्तिनश्च वदनगवयग्रहणे वा । वस्त्वन्तरचन्द्रस्य च धेनोश्च बोधन च भवेत् ॥ ३१२ ॥ अर्थ-जलमें डूबे हुए हस्तीकी सूंडको देखकर उस ही समयमे जलमग्न हस्तीका ज्ञान होना, अथवा मुखको देखकर उस ही समय उससे भिन्न किन्तु उसके सदृश चन्द्रमाका ज्ञान होना, अथवा गवयको देखकर उसके सदृश गौका ज्ञान होना । इनको अनिसृत ज्ञान कहते है। सामान्य विषय अर्ध विषय और पूर्ण विषयकी अपेक्षासे मतिज्ञानके स्थानोंको गिनाते है । एक्कचउक्कं चउवीसट्ठावीसं च तिप्पडि किच्चा । इगिछव्वारसगुणिदे मदिणाणे होंति ठाणाणि ॥ ३१३ ॥ एकचतुष्कं चतुर्विंशत्यष्टाविशतिश्च त्रिःप्रतिं कृत्वा । एकषड्वादशगुणिते मतिज्ञाने भवन्ति स्थानानि ॥ २१३ ॥ अर्थ-मतिज्ञान सामान्यकी अपेक्षा एक भेद, अवग्रह ईहा अवाय धारणाकी अपेक्षा चार भेद, पाच इन्द्रिय और छट्टे मनसे अवग्रहादि चारके गुणा करनेकी अपेक्षा चौवीस भेद. अर्थावग्रह व्यञ्जनावग्रहकी अपेक्षासे अट्ठाईस भेद मतिज्ञानके होते है। इनको क्रमसे तीन पंक्तियोंमें स्थापन करके एक छह और वारहसे यथाक्रमसे गुणा करनेपर मतिज्ञानके सामान्य अर्ध और पूर्ण स्थान होते है । भावार्थ-विषयसामान्यसे यदि इन चारका गुणा किया नाय तो क्रमसे एक चार चौवीस और अट्टाईस स्थान होते है । और यदि इन चार ही का वहु आदिक छहसे गुणा किया जाय तो मतिज्ञानके अर्ध स्थान होते है । और बहु आदिक बारहसे यदि गुणा किया जाय तो पूर्ण स्थान होते है । क्रमप्राप्त श्रुत ज्ञानका विशेष वर्णन करनेसे पहले उसका सामान्य लक्षण कहते है। अत्थादो अत्यंतरमुवलंभंतं भणंति सुदणाणं । आभिणियोहियपुव्वं णियमेणिह सद्दजं पमुहं ॥ ३१४ ।। अर्थादर्थान्तरमुपलभमानं भणन्ति श्रुतनानम् । आभिनिवोधिकपूर्व नियमेनेह शब्द प्रमुखम् ॥ ३१४ ॥ अर्थ-मतिजानके विषयभूत पदार्यन भिन्न पढार्थ ज्ञानको मृतनान कहते है । यह ज्ञान नियममे मतिज्ञानपूर्वक होता है । इस श्रुतज्ञानके अक्षरात्मक अनजगन्मक इस तरह गो. ९६ १२२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । है अथवा शब्दजन्य और लिङ्गजन्य इस तरहसे दो भेद है, इनमें मुख्य शब्दजन्य श्रुतज्ञान श्रुतज्ञानके भेद गिनाते है। लोगाणमसंखमिदा अणक्खरप्पे हवंति छट्ठाणा । वेरूवछट्ठवग्गपमाणं रूऊणमक्खरगं ॥ ३१५ ॥ लोकानामसंख्यमितानि अनक्षरात्मके भवन्ति षट् स्थानानि । द्विरूपषष्ठवर्गप्रमाणं रूपोनमक्षरगम् ॥ ३१५ ॥ अर्थ-अनन्तभागवृद्धि असंख्यातभागवृद्धि संख्यातभागवृद्धि संख्यातगुणवृद्धि असं- ख्यातगुणवृद्धि अनन्तगुणवृद्धि इन षट्स्थानपतित वृद्धिकी अपेक्षासे अनक्षरात्मक श्रुतज्ञानके सबसे जघन्य स्थानसे लेकर उत्कृष्ट स्थान पर्यन्त असंख्यातलोकप्रमाण भेद होते है । द्विरूप- वर्गधारामें छडे वर्गका जितना प्रमाण है ( एकट्टी ) उसमें एक कम करनेसे जितना प्रमाण वाकी रहे उतना ही अक्षरात्मक श्रुतज्ञान का प्रमाण है। भावार्थ-अनक्षरात्मक श्रुतज्ञानके असंख्यात भेद है । अपुनरुक्त अक्षरात्म श्रुतज्ञानके संख्यात भेद है, और पुनरुक्त अक्षरात्म- कका प्रमाण इससे कुछ अधिक है। दूसरी तरहसे श्रुतज्ञानके भेद दो गाथाओमें गिनाते है। पज्जायक्खरपदसंघादं पडिवत्तियाणिजोगं च । दुगवारपाहुडं च य पाहुडयं वत्थु पुव्वं च ॥ ३१६ ॥ तेसिं च समासेहि य वीसविहं वा हु होदि सुदणाणं । आवरणस्स वि भेदा तत्तियमेत्ता हवंतित्ति ॥ ३१७ ॥ पर्यायाक्षरपदसंघातं प्रतिपत्तिकानुयोगं च । द्विकवारप्राभृतं च च प्राभृतकं वस्तु पूर्व च ॥ ३१६ ॥ तेषां च समासैश्च विंशविधं वा हि भवति श्रुतज्ञानम् । आवरणस्यापि मेदाः तावन्मात्रा भवन्ति इति ॥ ३१७ ।। अर्थ- पर्याय पर्यायसमास अक्षर अक्षरसमास पद पदसमास संघात संघातसमास प्रति- पत्तिक प्रतिपत्तिकसमास अनुयोग अनुयोगसमास प्राभृतप्राभृत प्राभृतप्राभृतसमास प्राभूत प्राभृत- ममाम वस्तु वस्तुसमास पूर्व पूर्वसमास, इस तरह श्रुतनानके वीस भेद है । इस ही लिये श्रुतज्ञानावरण कर्मके भी वीस भेद होते है । किन्तु पर्यायावरण कर्मके विषयमें कुछ भेद है उमको आगेके गाधामें बतायेंगे। चार गाथाओंमें पर्याय नानका स्वरूप दिखाते हैं। णवरि विसेसं जाणे सुहमजहण्ण तु पजयं णाणं । पजायावरणं पुण तदणंतरणाणभेदम्हि ।। ३१८ ॥

गोम्मटसारः। १२३ - नवरि विशेष जानीहि सूक्ष्मजघन्यं तु पर्यायं ज्ञानम् । पर्यायावरणं पुनः तदनन्तरज्ञानभेदे ॥ ३१८ ।। अर्थ-सूक्ष्म निगोदिया लब्ध्यपर्याप्तकके जो सबसे जघन्य ज्ञान होता है उसको पर्याय ज्ञान कहते है। इसमें विशेषता केवल यही है कि इसके आवरण करनेवाले कर्मके उद- यका फल इसमें ( पर्याय ज्ञानमें ) नहीं होता; किन्तु इसके अनन्तरज्ञानके ( पर्यायसमास ) प्रथम भेदमें होता है । भावार्थ-यदि पर्यायावरण कर्मके उदयका फल पर्यायज्ञानमें होजाय तो ज्ञानोपयोगका अभाव होनेसे जीवका भी अभाव होजाय, इसलिये पर्यायावरण कर्मका फल उसके आगेके प्रथम ज्ञानके भेद में ही होता है। इसीलिये कमसे कम पर्यायरूप ज्ञान जीवके अवश्य पाया जाता है। सुहमणिगोदअपज्जत्तयस्स जादस्स पढमसमयम्हि । हवदि हु सव्वजहण्णं णिचुग्घाडं णिरावरणम् ॥ ३१९ ॥ सूक्ष्मनिगोदापर्याप्तकस्य जातस्य प्रथमसमये । भवति हि सर्वजघन्यं नित्योद्घाटं निरावरणम् ॥ ३१९ ॥ अर्थ- सूक्ष्म निगोदिया लब्ध्यपर्याप्तक जीवके उत्पन्न होनेके प्रथम समयमें सबसे जघन्य ज्ञान होता है। इसीको पर्याय ज्ञान कहते है। इतना ज्ञान हमेशह निरावरण तथा प्रकाशमान रहता है। पर्याय ज्ञानके स्वामीकी विशेषता दिखाते है। सुहमणिगोदअपज्जत्तगेसु सगसंभवेसु भमिऊण । चरिमापुण्णतिवक्काणादिमवक्कहियेव हवे ॥ ३२० ॥ सूक्ष्मनिगोदापर्याप्तगेषु स्वकसम्भवेषु भ्रमित्वा । चरमापूर्णत्रिवाणामादिमवक्रस्थिते एव भवेत् ॥ ३२० ॥ अर्थ- सूक्ष्म निगोदिया लब्ध्यपर्याप्तक जीवके अपने २ जितने भव ( छह हजार वारह ) सम्भव है उनमे भ्रमण करके अन्तके अपर्याप्त शरीरको तीन मोडाओंके द्वारा ग्रहण करनेवाले जीवके प्रथम मोडाके समयमें सर्वजघन्य ज्ञान होता है। सुहमणिगोदअपज्जत्तयस्स जादस्स पढमसमयम्हि । फासिंदियमादिपुव्वं सुदणाणं लद्धिअक्खरयं ।। ३२१ ॥ सूक्ष्मनिगोटापर्याप्तकस्य जातस्य प्रथमसमये । स्पर्शेन्द्रियमतिपूर्व श्रुतज्ञानं लब्ध्यक्षरकम् ।। ३२१ ॥ अर्थ---सूक्ष्म निगोदिया लब्थ्यपर्याप्तक जीवके उत्पन्न होनेके प्रथम ममयमें स्पर्शन इन्द्रियनन्य मतिज्ञानपूर्वक लब्ध्यक्षररूप श्रुतज्ञान होता है। मावार्थ-लब्धि नाम श्रुत- ज्ञानावरण कर्मके लयोपशमक्त है, और अक्षर नाम अग्निचरका है; टमलिय इस ज्ञानको १२४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम लब्ध्यक्षर कहते है क्योंकि इस क्षयोपक्षमका कभी विनाश नहीं होता, कमसे कम इतना क्षयोपशम तो जीवके रहता ही है । पर्यायसमास ज्ञानका निरूपण करते है। अवरुवरिम्मि अणंतमसंखं संखं च भागवड्डीए । संखमसंखयणतं गुणवड्डी होति हु कमेण ॥ ३२२ ॥ अवरोपरि अनन्तमसंख्यं संख्यं च भागवृद्धयः । संख्यमसंख्यमनन्त गुणवृद्धयो भवन्ति हि क्रमेण ॥ ३२२ ॥ अर्थ-सर्वजघन्य पर्याय ज्ञानके उपर क्रमसे अनन्तभागवृद्धि असंख्यातभागवृद्धि संख्यातभागवृद्धि संख्यातगुणवृद्धि असंख्यातगुणवृद्धि अनन्तगुणवृद्धि ये छह वृद्धि होती है । जीवाणं च य रासी असंखलोगा वरं खु संखेज । भागगुणम्हि य कसलो अवढिदा होति छट्ठाणा ॥ ३२३ ॥ जीवानाच च राशिः असंख्यलोका वरं खलु संख्यातम् । भागगुणयोश्च क्रमशः अवस्थिता भवन्ति षट्स्थाने ॥ ३२३ ॥ अर्थ-समस्त जीवराशि, असंख्यातलोकप्रमाण राशि, उत्कृष्ट संख्यात राशि ये तीन राशि, पूर्वोक्त अनन्तभागवृद्धि आदि छह स्थानोंमें भागहार अथवा गुणाकारकी क्रमसे अवस्थित राशि है। भावार्थ-अनन्तभागवृद्धि और अनन्तगुणवृद्धि इनका मागहार और गुणाकार समस्त जीवराशिप्रमाण अवस्थित है, असंख्यातभागवृद्धि और असंख्यातगुणवृद्धि इनका भागहार और गुणाकार असंख्यातलोकप्रमाण अवस्थित है । संख्यातभागवृद्धि संख्यातगुणवृद्धि इनका भागहार और गुणाकार उत्कृष्ट संख्यात अवस्थित है। लाधवके लिये छह वृद्धियोंकी छह संज्ञा रखते है । उव्वंकं चउरकं पणछस्सत्तंक अट्ठअंकं च । छब्बड्डीणं सण्णा कमसो संदिछिकरणहूँ ।। ३२४ ॥ उर्वश्चतरह. पञ्चपट्सप्ताहः अष्टाङ्कश्च । पवृद्धांना संज्ञा क्रमशः सदृष्टिकरणार्थम् ॥ ३२४ ।। अर्थ- बुन्प मदृष्टिकेलिये क्रमसे छह वृद्धियोकी ये छह संज्ञा है। अनन्तभाग- हिर उर्यद, अन्नत्यातभागवृद्धिकी चतुरद, संख्यातभागवृद्धिकी पञ्चाङ्क, संख्यातगुणवृद्धिकी १८, अमन्यातगणवृद्धि की सलाद, अनन्तगुणवृद्धिकी अष्टाङ्क । अदुलअसंखभागे पुचगवड्ढीगदे दु परबड्डी । एकं वारं होदि इ पुणो पुणो चरिमउदित्ती ।। ३२५ ॥

गोम्मटसारः। १२५ अडलासंख्यातभागे पूर्वगवृद्धिगते तु परवृद्धिः । एकं वारं भवति हि पुनः पुनः चमरवृद्धिरिति ॥ ३२५ ॥ अर्थ-सूच्यङ्गुलके असंख्यातमे भागप्रमाण पूर्व वृद्धि होनेपर एक वार उत्तर वृद्धि होती है । यह नियम अंतकी वृद्धि पर्यन्त समझना चाहिये । भावार्थ-सूच्यंगुलके असं- ख्यातमे भागप्रमाण अनन्तभागवृद्धि होनेपर एक वार असंख्यातभागवृद्धि होती है, इसके अनन्तर सूच्यड्गुलके असंख्यातमे भागप्रमाण अनन्तभागवृद्धि होनेपर फिर एकवार असंख्यात- भागवृद्धि होती है । इसी क्रमसे असंख्यातभागवृद्धि भी जब सूच्यंगुलके असंख्यातमे भागप्रमाण होजाय तब सूच्यंगुलके असंख्यातमे भागप्रमाण अनन्तभागवृद्धि होनेपर एक वार संख्यात- भागवृद्धि होती है । इस ही तरह अन्तकी वृद्धिपर्यन्त जानना । आदिमछट्ठाणम्हि य पंच य वड्डी हवंति सेसेसु । छव्वड्डीओ होति हु सरिसा सवत्थ पदसंखा ॥ ३२६ ॥ आदिमषटूस्थाने च पञ्च च वृद्धयो भवन्ति शेषेषु । षड्वृद्धयो भवन्ति हि सदृशा सर्वत्र पदसंख्या ॥ ३२६ ॥ अर्थ-असंख्यातलोकप्रमाण पट्स्थानोमेसे प्रथम पट्स्थानमें पाच ही वृद्धि होती है; अष्टाड्क वृद्धि नहीं होती । शेप सम्पूर्ण षट्स्थानोंमें अष्टाडकसहित छहू वृद्धि होती है । सूच्यड्गुलका असंख्यातमा भाग अवस्थित है इसलिये पदोंकी संख्या सब जगह सदृश ही समझनी चाहिये। प्रथम पट्स्थानमें अष्टाड्कवृद्धि क्यों नहीं होती ? इसका हेतु लिखते है। छट्ठाणाणं आदी अट्ठकं होदि चरिमसुव्वंकं । जम्हा जहण्णणाणं अहंकं होदि जिणदिटुं ॥ ३२७ ॥ पटस्थानानामादिरष्टाड्कं भवति चरममुर्वकम् । यस्माज्जघन्यज्ञानमष्टाकं भवति जिनदृष्टम् ॥ ३२७ ॥ अर्थ-सम्पूर्ण पट्स्थानोंमें आदिके स्थानको अष्टाड्क और अन्तके स्थानको उर्वक कहते है, क्योंकि जघन्य पर्यय ज्ञान भी अगुरुलघु गुणके अविभागप्रतिच्छेदोंकी अपेक्षा अष्टाङ्क हो सकता है ऐसा जिनेन्द्रदेवने प्रत्यक्ष ढेग्वा है । एकं सलु अट्ठकं सत्तंकं कंडयं तदो हेट्ठा । रूवहियकंडएण य गुणिदकमा जावमुब्वंकं ।। ३२८ ।। एक खलु अष्टाकं सप्ताक काण्टक ततोऽधः । रूपाधिककाण्डकेन च गणितक्रमा या क. ॥ ३२८ ।। अर्थ-एक पट्यानमें एक ही अमाल होता है । और समादक सूच्यंगरके १२६ रायचन्द्र नशास्त्रमालायाम् । असंख्यातमे भागमात्र होते है । इसके नीचे षडंक पञ्चांक चतुरंक उर्वक ये एक २ अधिकवार सूच्यंगुलके असंख्यातमे भागसे गुणित कम हैं । भावार्थ----घडंक दो वार सूच्यंगुलके असंख्यातमे भागसे गुणित है, और पञ्चांक तीन वार सूच्यंगुलके असंख्यातमे मागसे गुणित है । इस ही तरह चतुरंकमें चार वार और उर्वकमें पाच वार सूच्यंगुलके असंख्यातमे भागका गुणाकार होता है। सम्पूर्ण षड्वृद्धियोंका जोड बताते हैं । सबसमासो णियमा रूवाहियकंडयरस वग्गस्स । बिंदस्स य संवग्गो होदित्ति जिणेहिं णिदिलु ॥ ३२९ ॥ सर्वसमासो नियमात् रूपाधिककाण्डकस्य वर्गस्य । वृन्दस्य च संवर्गो भवतीतिजिनैर्निर्दिष्टम् ॥ ३२९ ॥ अर्थ-एक अधिक काण्डकके वर्ग और धनको परस्पर गुणा करनेसे जो प्रमाण लब्ध आवे उतना ही एक षट्स्थानपतित वृद्धियोंके प्रमाणका जोड है ऐसा जिनेन्द्रदेवने कहा है। भावार्थ-~-एक अधिक सूच्यंगुलके असंख्यातमे भागको पांच जगह रख कर परस्पर गुणा करनेसे जो लब्ध आवे उतनी वार एक षट्स्थानमें अनन्तभागवृद्धि आदि होते है । उकस्ससंखमत्तं तत्तिचउत्थेकदालछप्पण्णं । सत्तदसमं च भागं गंतूणय लद्धिअक्खरं दुगुणं ॥ ३३० ॥ उत्कृष्टसंख्यातमात्रं तत्रिचतुर्थंकचत्वारिंशत्षट्पञ्चाशम् । सप्तदशमं च भागं गत्वा लब्ध्यक्षरं द्विगुणम् ॥ ३३० ॥ अर्थ--एक अधिक काण्डकसे गुणित सूच्यंगुलके असंख्यातमे भागप्रमाण अनन्तभाग- वृद्धिके स्थान, और सूच्यंगुलके असख्यातमे भागप्रमाण असंख्यातभागवृद्धिके स्थान, इन दो वृद्धियोंको जघन्य ज्ञानके उपर होजानेपर एक वार संख्यातभागवृद्धिका स्थान होता है । इसके आगे उक्त क्रमानुसार उत्कृष्ट संख्यातमात्र संख्यातभागवृद्धियोंके होजानेपर उसमें प्रक्षेपक वृद्धिके होनेसे लब्ध्यक्षरका प्रमाण दूना होजाता है। परन्तु प्रक्षेपककी वृद्धि कहा २ पर क्तिनी २ होती है यह बताते है । उत्कृष्ट संख्यातमात्र पूर्वोक्त संख्यातभागवृद्धिके स्था- नामसे तीन-चौथाई भागप्रमाण स्थानोंके होजानेपर प्रक्षेपक और प्रक्षेपकप्रक्षेपक इन दो वृदियाको जघन्य ज्ञानके ऊपर होजानेसे लब्ध्यक्षरका प्रमाण दूना होजाता है । पूर्वोक्त संख्यात- भागवृद्धियुक्त उत्कृष्ट सख्यातमात्र स्थानोके छप्पन भागोंमेंसे इकतालीस भागोके वीतजानेपर प्रक्षेपक और प्रक्षेपकप्रक्षेपकी वृद्धि होनेसे साधिक ( कुछ अधिक ) जघन्यका दूना प्रमाण ता है । अथा संख्यातमागवृद्धिके उत्कृष्ट संख्यातमात्र स्थानॉमसे सत्रह स्थानोंके अनन्तर गोम्मटसारः । १२७ प्रक्षेपक प्रक्षेपकप्रक्षपके तथा पिशूलि इन तीन वृद्धियोंको साधिक जघन्यके ऊपर करनेसे साधिक जघन्यका प्रमाण दूना होता है । एवं असंखलोगा अणक्खरप्पे हवंति छाहणा। ते पज्जायसभासा अक्खरगं उवरि वोच्छामि ॥ ३३१ ॥ एवमसंख्यलोका अनक्षरात्मक्रे षट्स्थानानि । ते पर्यायसमासा अक्षरगमुपरि वक्ष्यामि ॥ ३३१ ॥ अर्थ-इस प्रकारसे अनक्षरात्मक श्रुत ज्ञानके असंख्यात लोकप्रमाण षट्स्थान होते है। ये सब ही पर्यायसमास ज्ञानके भेद है। अब इसके आगे अक्षरात्मक श्रुत ज्ञानका वर्णन करेंगे। अक्षर श्रुत ज्ञानको बताते है । चरिमुव्वंकेणवहिदअत्थक्खरगुणिदचरिममुव्बकं । अत्थक्खरं तु णाणं होदित्ति जिणेहिं णिदिदं ॥ ३३२ ।। चरमोर्वकणावहितार्थाक्षरगुणितचरमोर्वङ्कम् । अर्थाक्षरं तु ज्ञानं भवतीति जिननिर्दिष्टम् ॥ ३३२ ॥ अर्थ- अन्तके उर्वकका अाक्षरसमूहमे भाग देनेसे जो लब्ध आवे उसको अन्तके उर्वकसे गुणा करनेपर अक्षर ज्ञानका प्रमाण होता है ऐसा जिनेन्द्र देवने कहा असंख्यात-लोकप्रमाण षट्स्थानोमें अन्तके पट्स्थानकी अन्तिम उर्वक-वृद्धिसे युक्त उत्कृष्ट पर्यायसमास ज्ञानसे अनन्तगुणा अर्थाक्षर ज्ञान होता है। यह अर्थाक्षर सम्पूर्ण श्रुत- केवल ज्ञानरूप है। इसमें एक कम एकट्टीका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना ही अक्षर ज्ञानका प्रमाण होता है। श्रुतनिवद्ध विपयका प्रमाण वताते है। पण्णवणिज्जा भावा अणंतमागो टु अणभिलप्पाणं । पण्णवणिज्जाणं पुण अणंतभागो सुदणिवद्धो ॥ ३३३ ॥ प्रज्ञापनीया भावा अनन्तभागस्तु अनभिलप्यानाम् । प्रज्ञापनीयानां पुनः अनन्तभागः श्रुतनिवद्धः ॥ ३३३ ।। अर्थ-अनभिलप्य पदार्थोके अनन्तमे भाग प्रमाण प्रजापनीय पदार्थ होते है । और प्रज्ञापनीय पदार्थोके अनन्तमे भाग प्रमाण श्रुतमें निबद्ध हैं। भागर्थ-जो केवल केवट- ज्ञानके द्वारा जाने जासकते है। किन्तु जिनका वचनके द्वारा निरूपण नहीं किया जाममता ऐसे पदार्थ अनन्तानन्त है। इस तरहके पदार्थोसे अन्न्तमें भाग प्रमाण वे पदार्थ है कि है । भावार्थ- १२८ रायचन्द्रनैनशास्त्रमालायाम् जिनका वचनके द्वारा निरूपण होसकता है, उनको प्रज्ञापनीय भाव कहते है। जितने प्रज्ञाप- नीय पदार्थ है उनका भी अनन्तमा भाग श्रुतमे निरूपित है। अक्षरसमास ज्ञान तथा पदज्ञानका स्वरूप बताते है। एयक्खरादु उवार एगेगेणक्खरेण वहृतो। संखेज्जे खलु उले पदणामं होदि सुदणाणं ॥ ३३४ ।। एकाक्षरात्तूपरि एकैकेनाक्षरेण वर्धमानाः । संख्येये खलु वृद्धे पदनाम भवति श्रुतज्ञानम् ॥ ३३४ ॥ अर्थ-~-अक्षर ज्ञानके ऊपर क्रमसे एक २ अक्षरकी वृद्धि होते २ जब संख्यात अक्ष- रोकी वृद्धि होजाय तब पदनामक श्रुतज्ञान होता है । अक्षर ज्ञानके ऊपर और पदज्ञानके पूर्व तक जितने ज्ञानके विकल्प है वे सब अक्षरसमास ज्ञानके भेद हैं। एक पदके अक्षरोका प्रमाण बताते है । सोलससयचडतीसा कोडी तियसीदिलक्खयं चेव । सत्तसहस्साहसया अहासीदी य पदवण्णा ॥ ३३५ ॥ पोडशशतचतुस्त्रिशत्कोट्यः व्यशीतिलक्षक चैव । सप्तसहस्राण्यष्टशतानि अष्टाशीतिश्च पदवर्णाः ॥ ३३५ ॥ अर्थ-सोलहसौ चौंतीस कोटि तिरासी लाख सात हजार आठसौ अठासी ( १६३४ ८३०७८८८ ) एक पदमें अक्षर होते है । भावार्थ-पद तीन तरहके होते है, अर्थपद प्रमाण पद मध्यम पद । इनमेंसे " सफेद गौको रस्सीसे वांधो " " अग्निको लाओ " इत्यादि अनियत अक्षरोंके समूहरूप किसी अर्थविशेषके वोधक वाक्यको अर्थपद कहते है । आठ आदिक अक्षरोंके समूहको प्रमाणपद कहते है, जैसे श्लोकके एक पादमें आठ अक्षर होते है । इस ही तरह दूसरे छन्दोके पदोंमें भी अक्षरोंका न्यूनाधिक प्रमाण होता है। परन्तु गाथामें कहे हुए पदके अक्षरोंका प्रमाण सर्वदाकेलिये निश्चित है, इस ही को मध्यमपद कहते है। संवात श्रुतज्ञानको बताते है। एयपदादो उवरिं एगेगेणक्खरेण वढेतो। संखेज्जसहस्सपदे उड्डे संघादणाम सुदं ॥ ३३६ ॥ एकपदादुपरि एकैकेनाक्षरेण वधमानाः । संख्यातमहत्वपढे वृद्धे संवातनाम श्रुतम् ॥ ३३६ ॥ अर्थ- -~-एक पटके आगे भी कमसे एक २ अक्षरकी वृद्धि होते होते संख्यात हजार की पृद्धि नाय उसको मंबातनामक श्रुत ज्ञान कहते है । एक पदके ऊपर और संवा- गोम्मटसारः । १२९ त ज्ञानके पूर्व जितने ज्ञानके भेद है वे सब पदसमासके भेद है । यह संघात नामक श्रुतज्ञान चार गतिमेंसे एक गतिके स्वरूपका निरूपण करनेवाले अपुनरुक्त मध्यम पदोंका समूहरूप है। प्रतिपत्तिक श्रुतज्ञानका स्वरूप बताते है । एक्कदरगदिणिरूवयसंवादसुदादु उवरि पुव्वं वा । वण्णे संखेज्जे संघादे उम्हि पडिवत्ती ॥ ३३७ ॥ एकतरगतिनिरूपकसंघातश्रुतादुपरि पूर्व वा । वर्णे संख्येये संघाते वृद्ध प्रतिपत्तिः ॥ ३३७ ॥ अर्थ-चार गति से एक गतिका निरूपण करनेवाले संघात श्रुतज्ञानके ऊपर पूर्वकी , तरह क्रमसे एक २ अक्षरकी वृद्धि होते २ जब संख्यात हजार संघातकी वृद्धि होजाय तब एक प्रतिपत्ति नामक श्रुतज्ञान होता है । संघात और प्रतिपत्ति श्रुतज्ञानके मध्यमें जितने ज्ञानके विकल्प है उतने ही संघातसमासके भेद है। यह ज्ञान नरकादिक चार गतियोंका विस्तृत स्वरूप जाननेवाला है। अनुयोग श्रुतज्ञानका स्वरूप बताते है। चउगइसरूवरूवयपडिवत्तीदो दु उवरि पुव्वं वा । वण्णे संखेज्जे पडिवत्तीउडम्हि अणियोगं ॥ ३३८ ॥ चतुर्गतिस्वरूपरूपकप्रतिपत्तितस्तु उपरि पूर्व वा । वर्णे संख्याते प्रतिपत्तिवृद्धे अनुयोगम् ॥ ३३८ ॥ अर्थ-चारों गतियोंके स्वरूपका निरूपण करनेवाले प्रतिपत्ति ज्ञानके ऊपर क्रमसे पूर्वकी तरह एक २ अक्षरकी वृद्धि होते २ जब संख्यात हजार प्रतिपत्तिकी वृद्धि होजाय तव एक अनुयोग श्रुतज्ञान होता है । इसके पहले और प्रतिपत्ति ज्ञानके ऊपर सम्पूर्ण प्रतिपत्तिसमास ज्ञानके भेद है । अन्तिम प्रतिपत्तिसमास ज्ञानके भेदमें एक अक्षरकी वृद्धि होनेसे अनुयोग श्रुतज्ञान होता है। इस ज्ञानके द्वारा चौदह मार्गणाओंका विस्तृत स्वरूप जाना जाता है। प्राभृतप्राभृतकका स्वरूप दो गाथाओं द्वारा बताते है । चोद्दसमग्गणसंजुदआणियोगादुवरि वड्डिदे वण्णे । चउरादीअणियोगे दुगवारं पाहुडं होदि ॥ ३३९ ॥ चतुर्दशमार्गणासंयुतानुयोगादुपरि बर्धित वर्ण । चतुराद्यनुयोगे द्विकवारं प्राभृतं भवति ।। ३६९ ॥ गो. १७ १३० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-चौदह मार्गणाओका निरूपण करनेवाले अनुयोग ज्ञानके ऊपर पूर्वोक्त क्रमके अनुसार एक २ अक्षरकी वृद्धि होते २ जब चतुरादि अनुयोगोकी वृद्धि होजाय तब प्राभूत- प्राभृतक श्रुतज्ञान होता है । इसके पहले और अनुयोग ज्ञानके ऊपर जितने ज्ञानके विकल्प है वे सब अनुयोगसमासके भेद जानना । अहियारो पाहुडयं एयट्ठो पाहुडस्स अहियारो । पाहुडपाहुडणामं होदित्ति जिणेहिं णिदिलु ॥ ३४० ॥ अधिकारः प्राभृतमेकार्थः प्राभृतस्याधिकारः। प्राभृतप्राभृतनामा भवतीति जिननिर्दिष्टम् ॥ ३४० ॥ अर्थ-प्राभूत और अधिकार ये दोनों एक अर्थके वाचक है । अत एव प्राभूतके अधिकारको प्राभृतप्राभूत कहते है, ऐसा जिनेन्द्रदेवने कहा है । भावार्थ-वस्तुनाम श्रुतज्ञानके एक अधिकारको प्राभृत और अधिकारके अधिकारको प्राभूतप्राभूत कहते है। प्राभृतका स्वरूप बताते है। दुगवारपाहुडादो उरि वण्णे कमेण चउवीसे। दुगवारपाहुडे संउड्डे खलु होदि पाहुडयं ॥ ३४१ ॥ द्विकवारप्राभृतादुपरि वर्णे क्रमेण चतुर्विशतौ । द्विकवारप्राभृते संवृद्धे खलु भवति प्राभृतकम् ।। ३४१ ॥ अर्थ---प्राभृतप्राभृत ज्ञानके ऊपर पूर्वोक्त क्रमसे एक २ अक्षरकी वृद्धि होते २ जब चौवीस प्राभृतप्राभृतककी वृद्धि होजाय तब एक प्राभृतक श्रुत ज्ञान होता है । प्राइतके पहले और प्राभृतप्राभृतके उपर जितने ज्ञानके विकल्प हैं वे सब ही प्रामृतप्राभृतसमासके मेद जानना । उत्कृष्ट प्राभूतप्राभृतसमासके भेदमें एक अक्षरकी वृद्धि होनेसे प्राभूत ज्ञान होता है। वस्त श्रुतज्ञानका स्वरूप दिखाते है। वीसं वीसं पाहुडअहियारे एक्कवत्थुअहियारो। एक्वेक्कवण्णउड्ढी कमेण सव्वत्थ णायव्वा ॥ ३४२ ॥ विंशतो विंशतो प्राभृताधिकारे एको वस्त्वधिकारः । एकैकवर्णवृद्धि. क्रमेण सर्वत्र ज्ञातव्या ॥ ३४२ ॥ अर्थ—पूर्वक्त क्रमानुसार प्राभृत ज्ञानके ऊपर एक २ अक्षरकी वृद्धि होते २ जव मो ई.म प्राभूतकी वृद्धि होजाय तत्र एक वस्तु अधिकार पूर्ण होता है । वस्तु ज्ञानके पर और प्राभूत ज्ञानके उपर जितने विकल्प है वे सब प्राभृतसमास ज्ञानके भेद है। का प्रमुनममाममें एक अलरकी वृद्धि होनेसे वस्तुनामक श्रुतज्ञान पूर्ण होता है।

गोम्मटसारः। १३.१. भावार्थ-एक २ वस्तु अधिकारमें वीस २ प्राभूत होते है और एक २ प्राभृतमें चौवीस २ प्राभृतप्राभूत होते है। पूर्व ज्ञानके भेदोंकी संख्या बताते है । दस चोदसट्ठ अट्ठारसयं बारं च बार सोलं च । वीसं तीसं पण्णारसं च दस चदुसु वत्थूणं ॥ ३४३ ॥ दश चतुर्दशाष्ट अष्टादशकं द्वादश च द्वादश षोडश च । विंशतिः त्रिशत् पञ्चदश च दश चतुर्पु वस्तूनाम् ॥ ३४३ ॥ अर्थ-पूर्व ज्ञानके चौदह भेद है जिनमें से प्रत्येकमें क्रमसे दश, चौदह, आठ, अठा- रह, बारह, बारह, सोलह, वीस, तीस, पंद्रह, दश, दश, दश, दश वस्तु नामक अधिकार है। चौदह पूर्वके नाम गिनाते है। उप्पायपुव्वगाणियविरियपवादस्थिणत्थियपवादे । णाणासच्चपवादे आदाकम्मप्पवादे य ॥ ३४४ ॥ पञ्चक्खाणे विज्जाणुवादकल्लाणपाणवादे य । किरियाविसालपुवे कमसोथ तिलोयविंदुसारे य ॥ ३४५॥ उत्पादपूर्वाग्रायणीयवीर्यप्रवादास्तिनास्तिकप्रवादानि । ज्ञानसत्यप्रवादे आत्मकर्मप्रवादे च ॥ ३४४ ॥ प्रत्याख्यानं वीर्यानुवादकल्याणप्राणवादानि च । क्रियाविशालपूर्व क्रमशः अथ त्रिलोकविन्दुसारं च ॥ ३४५ ॥ अर्थ--उत्पादपूर्व, आग्रायणीयपूर्व, वीर्यप्रवाद, अस्तिनास्तिप्रवाद, ज्ञानप्रवाद, सत्यप्र- वाद, आत्मप्रवाद, कर्मप्रवाद, प्रत्याख्यान, वीर्यानुवाद, कल्याणवाद, प्राणवाद, क्रियाविशाल, त्रिलोकविन्दुसार, इस तरहसे ये क्रमसे पूर्वज्ञानके चौदह भेद है । भावार्थ-वस्तुज्ञानके ऊपर एक २ अक्षरकी वृद्धिके क्रमसे पदसंघातआदिकी वृद्धि होते २ जब क्रमसे दश वस्तुकी वृद्धि होजाय तव पहला उत्पादपूर्व होता है। इसके आगे क्रमसे अक्षर पट संघात आदि- ककी वृद्धि होते २ जब चौदह वस्तुकी वृद्धि होनाय तब दूसरा आग्रायणीय पूर्व होता है। इसके आगे भी क्रमसे अक्षर पढ़ सघात आदिकी वृद्धि होते २ जव क्रमसे आठ वस्तुकी वृद्धि होजाय तत्र तीसरा वीर्यप्रवाद होता है । इसके आगे क्रमसे अक्षरादिककी वृद्धि होते २ जब अटा. रह वस्तुकी वृद्धि होजाय तत्र चौधा अस्तिनान्तिप्रवाद होता है । इस ही तरह आगेके पांचमें आदिक पूर्व भी क्रमसे बारह. वारह, सोलह, वीस, तीस, पन्द्रह, दश, दश, दश, दश, वस्तुकी वृद्धिके होनेसे होते है । अर्थात् अन्तिनान्तिप्रवादके ऊपर नमसे बारह यातकी वृद्धि १३२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । होनेसे पांचमा ज्ञानप्रवाद, और ज्ञानप्रवादके ऊपर भी क्रमसे बारह वस्तुकी वृद्धि होनेसे सत्यप्रवाद होता है। इस ही तरह आगेके आत्मप्रवाद आदिकका प्रमाण भी समझना चाहिये । चौदह पूर्वके समस्त वस्तुकी और उनके अधिकारभूत समस्त प्राभूतोंके जोड़का प्रमाण वताते है। पणणउदिसया वत्थू पाहुडया तियसहस्सणवयसया । एदेसु चोदसेसु वि पुजेसु हवंति मिलिदाणि ।। ३४६ ॥ पञ्चनवतिशतानि वस्तूनि प्राभृतकानि त्रिसहननवशतानि । एतेषु चतुर्दशस्वपि पूर्वेषु भवन्ति मिलितानि ।। ३४६ ॥ अर्थ-इन चौदह पूर्वोके सम्पूर्ण वस्तुओंका जोड़ एकसौ पचानवे ( १९५) होता है। और एक २ वस्तुमें वीस २ प्राभृत होते है इस लिये सम्पूर्ण प्राभृतोंका प्रमाण तीन हजार नौ सौ ( ३९०० ) होता है। पहले वीसप्रकारका जो श्रुतज्ञान बताया था उसहीका दो गाथाओंमें उपसंहार करते है। अस्थक्खरं च पदसंघातं पडिवत्तियाणिजोगं च । दुगवारपाहुडं च य पाहुडयं वत्थु पुवं च ॥३४७ ॥ कमवण्णुत्तरवाड्डिय ताण समासा य अक्खरगदाणि । णाणवियप्पे वीस गंथे बारस य चोदसयं ॥ ३४८॥ अर्थाक्षरं च पदसंघातं प्रतिपत्तिकानुयोगं च । द्विकवारप्राभृतं च च प्राभृतकं वस्तु पूर्व च ॥ ३४७ ॥ क्रमवणोत्तरवर्धिते तेषा समासाश्च अक्षरगताः । ज्ञानविकल्पे विंशतिः ग्रन्ये द्वादश च चतुर्दशकम् ॥ ३४८ ॥ अर्थ-अर्थाक्षर, पद, संघात, प्रतिपत्तिक, अनुयोग, प्राभृतप्राभृत, प्राभृत, वस्तु, पूर्व, ये नव तथा क्रमसे एक २ अक्षरकी वृद्धिके द्वारा उत्पन्न होनेवाले अक्षरसमास आदि नव इस तरह अठारह भेद द्रव्य श्रुतके होते है। पर्याय और पर्यायसमासके मिलानेसे वीस भेद ज्ञानरूप श्रुतके होते है । यदि ग्रन्थरूप श्रुतकी विवक्षा की जाय तो आचाराङ्ग आदि वारह और उत्पादपूर्व आदि चौदह भेद होते है । द्वादशाङ्गके समस्त पदोंकी संख्या वताते है वारुत्तरसयकोडी तेसीदी तहय होंति लक्खाणं । अट्ठावण्णसहस्सा पंचेत्र पदाणि अंगाणं ।। ३४९ ॥ द्वादशोत्तरशतकोट्यः व्यशीतिस्तथा भवन्ति लक्षानाम् । अष्टापञ्चाशत्सहस्राणि पञ्चैव पदानि अज्ञानाम् ॥ ३४९ ॥ - गोम्मटसारः। अर्थ-द्वादशाङ्गके समस्त पद एक सौ बारह करोड़ व्यासी लाख अठ्ठावन हजार पांच (११२८३५८००५ ) होते है । अङ्गवाह्य अक्षर कितने है उनका प्रमाण बताते हैं। अडकोडिएयलक्खा असहस्सा य एयसदिगं च । पण्णत्तरि वण्णाओ पइण्णयाणं पमाणं तु ॥ ३५० ।। अष्टकोट्येकलक्षाणि अष्टसहस्राणि च एकशतकं च । पञ्चसप्ततिः वर्णाः प्रकीर्णकाना प्रमाणं तु ।। ३५० ॥ अर्थ-आठ करोड एक लाख आठ हजार एकसौ पचहत्तर (८०१०८१७५) प्रकीर्णक ( अङ्गबाह्य ) अक्षरोका प्रमाण है। चार गाथाओद्वारा उक्त अर्थको समझनेकी प्रक्रिया बताते है । तेत्तीस वेंजणाई सत्तावीसा सरा तहा भणिया । चत्तारि य जोगवहा चउसट्ठी मूलवण्णाओ ॥ ३५१ ।। त्रयस्त्रिंशत् व्यंजनानि सप्तविशतिः स्वरास्तथा भाणताः । चत्वारश्च योगवहाः चतुःषष्ठिः मूलवर्णाः ॥ ३५१ ॥ अर्थ-तेतीस व्यंजन सत्ताईस स्वर चार योगवाह इस तरह कुल चौसठ मूलवर्ण होते है । भावार्थ-स्वरके विना जिनका उच्चारण न हो सके ऐसे अर्धाक्षरोंको व्यंजन कहते है। उनके क् ख से लेकर ह् पर्यन्त तेतीस भेद है । अ इ उ ऋ ल ए ऐ ओ औ ये नव स्वर है, इनके ह्रस्व दीधे प्लुतकी अपेक्षा सत्ताईस भेद होते है । अनुस्वार विसर्ग जिहामूलीय उपध्मानीय ये चार योगवाह है । सब मिलकर चौसठ अनादिनिधन मूलवर्ण है । यद्यपि दीर्घ लू वर्ण संस्कृतमें नहीं है तब भी अनुकरणमें अथवा देशान्तरोंकी भाषामें आता है इसलिये चौसठ वर्षों में इसका भी पाठ है। चउसहिपदं विरलिय दुगं च दाउण संगुणं किच्चा । रुऊणं च कए पुण सुदणाणस्सक्खरा होति ॥ ३५२ ॥ चतुःपष्ठिपदं विरलयित्वा द्विक च दत्त्वा संगुणं कृत्वा । रूपोने च कृते पुन. श्रुतज्ञानस्याक्षराणि भवन्ति ॥ ३५२ ॥ अर्थ उक्त चौसट अक्षरोंका विरल्न करके प्रत्येकके ऊपर दोका अङ्ग देकर पर- स्पर सम्पूर्ण दोके अझोंका गुणा करनेसे लब्ध राशिमे एक घटा टेनेसे जो प्रमाण रहता है उतने ही ध्रुत ज्ञानके अक्षर होते है । वे अक्षर कितने है उसका प्रमाग बताते हैं।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । एकछ च च य छस्सत्तयं च च य सुण्णसत्ततियसत्ता। सुण्णं णव पण पंच य एक छक्केस्कगो य पणगं च ॥ ३५३ ॥ एकाष्ट च च च पट्सप्तकं च च च शून्यसप्तत्रिकसप्त । शून्यं नव पञ्च पञ्च च एकं पट्कैककश्च पञ्चकं च ॥ ३५३ ॥ अर्थ--परस्पर गुणा करनेसे उत्पन्न होनेवाले अक्षरोंका प्रमाण यह है । एक आठ चार चार छह सात चार चार शून्य सात तीन सात शून्य नव पांच पाच एक छह एक पांच । भावार्थ--१८४४६७४४०७३७०९५५१६१५ इतने अङ्गप्रविष्ट और अङ्गबाह्य श्रुतके समस्त अपुनरुक्त अक्षर है । पुनरुक्त अक्षरोंकी संख्याका नियम नहीं है । इन अक्षरोमेंसे अङ्गप्रविष्ट और अड्गबाह्य श्रुतके अक्षरोंका विभाग करते है। मज्झिमपदक्खरवहिदवण्णा ते अंगपुधगपदाणि । सेसक्खरसंखा ओ पइण्णयाणं पमाणं तु ।। ३५४ ॥ मध्यमपदाक्षरावहितवर्णास्ते अड्गपूर्वगपदानि । शेषाक्षरसंख्या अहो प्रकीर्णकाना प्रमाणं तु ॥ ३५४ ॥ अर्थ-मध्यमपदके अक्षरोका जो प्रमाण है उसका समस्त अक्षरोके प्रमाणमें भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतने अंग और पूर्वगत मध्यम पद होते है। शेष जितने अक्षर रहें उतना अड्गबाह्य अक्षरोका प्रमाण है । भावार्थ -पहले मध्यम पदके अक्षरोंका प्रमाण बताया है कि एक मध्यम पदमें सोलहसौ चौंतीस करोड़ तिरासी लाख सात हजार आठसौ अठासी अक्षर होते है । जब इतने अक्षरोंका एक पद होता है तब समस्त अक्षरोंके कितने पद होंगे इस तरह त्रैराशिक करनेसे अर्थात् फलराशि ( एक मध्यम पद) और इच्छा- राशिका ( समस्त अक्षरोका ) परस्पर गुणा कर उसमें प्रमाण राशिका ( एक मध्यम पदके समस्त अक्षरोंके प्रमाणका ) भाग देनेसे जो लब्ध आवे वह समस्त मध्यम पदोंका प्रमाण है । इन समस्त मध्यम पदोंके जितने अक्षर हुए वे अड्गप्रविष्ट अक्षर है और जो शेष अक्षर रहे वे अनवाह्य अक्षर है। तेरह गाथाओमें अड्गोके और पूर्वांके पदोकी संख्या बताते है । आयारे सुद्दयडे ठाणे समवायणामगे अंगे। तत्तो विक्खापण्णत्तीए णाहस्स धम्मकहा ॥ ३५५ ॥ तोवासयअज्झयणे अंतयडे णुत्तरोबवाददसे । पण्हाणं वायरणे विवायसुत्ते य पदसंखा ॥ ३५६ ॥ आचारे सूत्रकृते स्थाने समवायनामके अड्गे । ततो व्याख्याप्रज्ञप्तौ नाथस्य धर्मकथाया ॥ ३५५ ।। - , गोम्मटसारः । १३५ तत उपासकाध्ययने अन्तकृते अनुत्तरौपपाददशे । प्रश्नाना व्याकरणे विपाकसूत्रे च पदसंख्या ॥ ३५६ ॥ अर्थ-आचाराङ्गा, सूत्रकृताङ्ग, स्थानाङ्ग, समवायाइ, व्याख्याप्रज्ञप्ति, धर्मकथाइ, उपासकाध्ययनाङ्ग, अन्तःकृद्दशाङ्ग, अनुत्तरौपपादिकदशाङ्ग, प्रश्नव्याकरण, और विपाकसूत्र इन ग्यारह अङ्गोंके पदोंकी संख्या क्रमसे निम्नलिखत है। अट्ठारस छत्तीसं बादालं अडकडी अडबि छप्पण्णं । सत्तरि अट्ठावीसं चउदालं सोलससहस्सा ॥३५७ ॥ इगिद्गपंचेयारं तिवीसदुतिणउदिलक्ख तुरियादी। चुलसीदिलक्खमेया कोडी य विवागसूत्तम्हि ।। ३५८ ॥ अष्टादश षट्त्रिंशत् द्वाचत्वारिंशत् अष्टकृतिः अष्टद्वि पट्पञ्चाशत् । सप्ततिः अष्टाविशतिः चतुश्चत्वारिंशत् पोडशसहस्राणि ॥ ३५७ ॥ एकद्विपञ्चैकादशत्रयोविंशतिद्वित्रिनवतिलक्षं चतुर्थादिपु । चतुरशीतिलक्षमेका कोटिश्च विपाकसूत्रे ॥ ३५८ ।। अर्थ-आचाराङ्गमें अठारह हजार पद है, सूत्रकृताङ्गमें छत्तीस हजार, स्थानाङ्गमें वियालीस हजार, समवायागमें एक लाख चौसठ हजार, व्याख्याप्रज्ञप्तिमे दो लाख अट्ठाईस हजार, धर्मकथागमे पाच लाख छप्पन हजार, उपासकाध्ययनाङ्ग में ग्यारह लाख सत्तर हजार, अंतःकृद्दशाङ्गमें तेईस लाख अठ्ठाई हजार, अनुत्तरौपपादिक दशाङ्गमें वानवे लाख चालीस हजार, प्रश्नव्याकरण अगमें तिरानवे लाख सोलह हजार पद है । तथा ग्यारहमे विपाकसूत्र अङ्गमें एक करोड चौरासी लाख पद है। सम्पूर्ण पदोंका जोड बताते हैं। वापणनरनोनानं एयारंगे जुदी हु वादम्हि । कनजतजसताननम जनकनजयसीम बाहिरे वण्णा ॥ ३५९ ।। वापणनरनोनान एकादशाङ्गे युतिर्हि वादे । कनजतजमताननमं जनकनजयसीम वाह्ये वर्णाः ॥ ३५९ ॥ अर्थ-पूर्वोक्त ग्यारह अगोके पदोका जोड चार करोड पन्द्रह लाख दो हजार (४ १ १०२०००) होता है । बारहमे दृष्टिवाद अद्गमें सम्पूर्ण पद १०८६८५६ होते है। और अगवा अक्षरोंका प्रमाण आठ करोड एक लाख आठ हजार एक सौ पचहत्तर (८०१०८१७५ ) है। बारहमें अन्नके भेद और उनके पदोंका प्रमाण चताते है ।

१३६ रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम्। चंदरविजंबुदीवयदीवसमुद्दयवियाहपण्णत्ती। परियल्स पंचविहं सुत्तं पढमाणिजोगमदो ॥ ३६०॥ पुच्वं जलथलसाया आगासयरूवगयमिमा पंच । भेदा हु चूलियाए तेसु पमाणं इणं कमसो ॥३६१॥ चन्द्ररविजम्बूद्वीपकद्वीपसमुद्रकव्याख्याप्रज्ञप्तयः । परिकर्म पञ्चविधं सूत्रं प्रथमानुयोगमतः ॥ ३६० ॥ पूर्व जलस्थलमायाकाशकरूपगता इमे पञ्च । भेदा हि चूलिकायाः तेषु प्रमाणमिदं क्रमशः ॥ ३६१ ॥ अर्थ-वारहमें दृष्टिवाद अङ्गके पांच भेद हैं--परिकर्म सूत्र प्रथमानुयोग पूर्वगत चूलि- का । इसमें परिकर्मके पांच भेद है चन्द्रप्रज्ञप्ति सूर्यप्रज्ञप्ति जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति द्वीपसागरप्रज्ञप्ति व्याख्याप्रज्ञप्ति । पूर्वगतके चौदह भेद है जिनका वर्णन आगे करेंगे । चूलिकाके पांच भेद है जलगता स्थलगता मायागता आकाशगता रूपगता । अब इनके पदोंका प्रमाण क्रमसे बताते है। गतनम मनगं गोरम मरगत जवगातनोननं जजलक्खा। मननन धममननोनननाम रनधजधराननजलादी ॥३६२।। पाजकनामेनानलमेदाणि पदाणि होति परिकम्मे । कानवधिवाचनाननसेसो पुण चूलियाजोगो ॥ ३६३ ।। गतनम मनगं गोरम मरगत जवगातनोननं जजलक्षाणि । मननन धममननोनननामं रनधजधरानन जलादिषु ॥ ३६२ ॥ याजकनामेनाननमेतानि पदानि भवन्ति परिकर्मणि । कानवधिवाचनाननमेपः पुनः चूलिकायोगः ॥ ३६३ ॥ अर्थ-क्रमसे चन्द्रप्रज्ञप्तिमें छत्तीस लाख पांच हजार; सूर्यप्रज्ञप्तिमें पांच लाख तीन हजार, जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिमे तीन लाख पच्चीस हजार, द्वीपसागरप्रज्ञप्तिमें बावन लाख छत्तीस हजार, व्याख्याप्रज्ञप्तिमें चौरासी लाख छत्तीस हजार पद है। सूत्रमें अठासी लाख पद है। प्रथमानुयोगमें पांच हजार पद है । चौदह पूर्वोमें पचानवे करोड पचास लाख पाच पद हैं । पाचो चूलिकाओंमेसे प्रत्येकमें दो करोड नौ लाख नवासी हजार दो सौ पद है। चन्द्रप्रनप्ति आदि पाचप्रकारके परिकर्मके पदोंका जोड एक करोड़ इक्यासी लाख पांच हजार है। पांच प्रकारकी चूलिकाके पदोंका जोड दश करोड उनचास लाख छयालीस हनार (१०४९४६००० ) है । भावार्थ यहा पर जो अक्षर तथा पदोका प्रमाण जताया है वह अपुनरुक्त अक्षर तथा पदोंका प्रमाण समझना । -~- गोम्मटसारः । १३७ चौदह पूर्वोमेंसे प्रत्येक पूर्वके पदोंका प्रमाण बताते है । पण्णहदाल पणतीस तीस पण्णास पण्ण तेरसदं । णउदी दुदाल पुग्वे पणवण्णा तेरससयाई ॥ ३६४ ॥ छस्सय पण्णासाई चउसयएण्णास छसयपणुशीसा । बिहि लक्खहि दु गुणिया पंचम रूऊण छज्जुदा छठे ॥ ३६५॥ पञ्चाशदष्टचत्वारिंशत् पञ्चत्रिंशत् त्रिंशत् पञ्चाशत् पञ्चाशत् त्रयोदशशतम् । नवतिः द्वाचत्वारिंशत् पूर्वे पञ्चपञ्चाशत् त्रयोदशशतानि ॥ ३६४ ॥ षट्छतपञ्चाशानि चतुःशतपञ्चाशत् पट्छतपञ्चविंशतिः । द्वाभ्या लक्षाभ्या तु गुणितानि पञ्चमं रूपोनं षट्युतानि पष्ठे ॥ ३६५ ॥ अर्थ-चौदह पूर्वोमेंसे क्रमसे प्रथम उत्पाद पूर्वमें एक करोड़ पद है । दूसरे आग्रा- यणीय पूर्वमें छयानवे लाख पद है । तीसरे वीर्यप्रवादमें सत्तर लाख पद है। चतुर्थ अस्तिना- स्तिप्रवाद पूर्वमें साठ लाख पद है । पाचमे ज्ञानप्रवादमे एक कम एक करोड़ (९९९९९९९) पद है । छ? सत्यप्रवाद पूर्वमें एक करोड छह ( १००००००६ ) पद है । सातमे आत्म- प्रवादमें छब्बीस करोड़ पद है । आठमे कर्मप्रवाद पूर्वमें एक करोड़ अस्सी लाख पद है । नौमे प्रत्याख्यान पूर्वमें चउरासी लाख पद है । दशमे विद्यानुवाद पूर्वमें एक करोड दश लाख पद है । ग्यारहमे कल्याणवाद पूर्वमे छब्बीस करोड़ पद है। वारहमे प्राणावाद पूर्वमें तेरह करोड़ पद है । तेरहमे क्रियाविशाल पूर्वमें नौ करोड़ पद है । चौदहमे त्रिलोकविन्दुसारमें वारह करोड़ पचास लाख पद है। भावार्थ -चौदह पूर्वोमेसे किस २ पूर्वमें कितने २ पद है यह इन दो गाथाओंमें बता दिया है । अब प्रकरण पाकर यहांपर द्वादशङ्ग तथा चौदह पूर्वोमें किस २ विषयका वर्णन है यह सक्षेपसे विशेष बताया जाता है । प्रथम आचाराङ्ग में किस तरह आचरण करे किस तरह खड़ा हो ? किस तरह वैठे। किस तरह शयन करें। किस तरह भाषण करै ? किस तरह भोजन करै । पापका बन्ध किस तरह से नहीं होता" इत्यादि प्रश्नोंके अनुसार 'यत्नपूर्वक आचरण करै, यतपूर्वक खड़ा हो, यतपूर्वक बैठे, यत्नपूर्वक शयन करे, यनपूर्वक भाषण करें, यत्नपूर्वक भोजन करे, इस तरहसे पापका बन्ध नहीं होता' इत्यादि उत्तररूप वाक्योंके द्वारा मुनियों के समस्त आचारणका वर्णन है । दूसरे मूत्रकृताङ्गमें ज्ञानविनय आदि निर्विघ्न अध्ययनक्रियाका अथवा प्रज्ञापना कलाकल्प छेदोपस्थापना आदि व्यवहारधर्मक्रियाका, तथा स्वममय और परम- मयका स्वरूप सत्रोके द्वारा बताया है । तीसरे स्थानागमें सम्पूर्ण द्रव्योंके एकमे लेकर कितन स्थ चरे कर नि पथमाने कथं गए, पप भीर मात्र जो पाप ८६ दमदे नान " घरे जद पि. जदमाने उद नये जी भामेज पान.न्यादि ।। गो, १८ १२८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । विकल्प हो सकते है उन विकल्पोका वर्णन किया है। जैसे सामान्यकी अपेक्षासे जीवद्रव्यका एक ही स्थान ( विकल्प भेद ) है, संसारी और मुक्तकी अपेक्षासे दो भेद हैं, उत्पाद व्यय ध्रौव्यकी अपेक्षासे तीन भेद है, चार गतियोंकी अपेक्षासे चार भेद है। इत्यादि । इस ही तरह पुद्गल आदिक द्रव्योंके भी विकल्प समझना । चौथे समवायाझमें सम्पूर्ण द्रव्योंमें पर- स्पर किस २ धर्मकी अपेक्षासे सादृश्य है यह बताया है । पाचमे व्याख्याप्रज्ञप्ति अङ्गमे जीव है या नहीं ? वक्तव्य है अथवा अवक्तव्य है ? नित्य है या अनित्य है ? एक है या अनेक है ? इत्यादि साठ हजार प्रश्नोंका व्याख्यान है । छट्टे नाथधर्मकथा अथवा ज्ञातृधर्मकथा अङ्गमें जीवादि वस्तुओंका स्वभाव, तीर्थकरों का माहात्म्य, तीर्थंकरोकी दिव्यध्वनिका समय तथा माहात्म्य, उत्तम क्षमा आदि दश धर्म, सम्यग्दर्शनादि रत्नत्रयधर्मका स्वरूप बताया है। तथा गण इन्द्र चक्रवर्ती आदिकी कथा उपकथाओंका वर्णन है। सातमे उपासकाध्ययन अङ्गमें उपासकोंकी (श्रावकोंकी ) सम्यग्दर्शनादिक ग्यारह प्रतिमासम्बन्धी व्रत गुण शील आचार तथा दूसरे क्रिया काण्ड और उनके मन्त्रादिकोंका सविस्तर वर्णन किया है। आठमें अन्तःकृद्दशाङ्गन्में प्रत्येक तीर्थकरके तीर्थमें जो दश २ मुनि चार प्रकारका तीव्र उपसर्ग सहन करके संसारके अन्तको प्राप्त हुए उनका वर्णन है । नौमे अनुत्तरौपदादिकदशाङ्ग में प्रत्येक तीर्थंकरके तीर्थमें होनेवाले उन दश २ दक्ष मुनियोंका वर्णन है जो कि घोर उपसर्गको सहन करके अन्तमे समाधिके द्वारा अपने प्राणोंका त्याग करके विजय आदि पांच प्रकारके अनुत्तर विमानोंमें उत्पन्न हुए । दशमे प्रश्नव्याकरण अङ्गमें दूतवाक्य नष्ट मुष्टि चिन्ता आदि अनेक प्रकारके प्रश्नोंके अनुसार तीन कालसम्बन्धी धन धान्यादिका लाभालाभ सुख दुःख जीवन मरण जय पराजय आदि फलका वर्णन है । और प्रश्नके अनुसार आक्षेपणी विक्षेपणी संवेननी निर्वेजनी इन चार प्रकारकी कथा- ओंका वर्णन है । ग्यारहमे विपाकमूत्रमें द्रव्य क्षेत्र काल भावके अनुसार शुभाशुभ कर्मोंकी तीव्र मंद मध्यम आदि अनेक प्रकारकी अनुभाग-~~शक्तिके फल देनेरूप विषयका वर्णन है। वाहरमे दृष्टिवाद अङ्गमें तीन सौ त्रेसठ मिथ्या मतों का वर्णन और उनका निराकरण है । दृष्टिवाद अङ्गके पाच भेद है-परिकर्म सूत्र प्रथमानुयोग पूर्वगत चुलिका । परिकर्ममें गणित के करणसूत्रोंका वर्णन है । इसके ( परिकर्मके पांच भेद है, चन्द्रप्रज्ञप्ति मूर्यप्रज्ञप्ति जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति द्वीपसागरप्रज्ञप्ति व्याख्याप्रज्ञप्ति । प्रज्ञप्तिमें चन्द्रमासम्बन्धी विमान आयु परिवार ऋद्धि गमन हानि वृद्धि पूर्ण ग्रहण अब ग्रह्ण चतुर्थाश ग्रहण आदिका वर्णन है । इस ही प्रकार सूर्यप्रज्ञप्तिमें सूर्यसम्बन्धी आयु परिवार गमन ग्रहण आदिका वर्णन है । जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिमें जम्बूद्वीपसम्बन्धी मेरु एक ताथरके अनन्तर जब तक दसरा तीथकर उत्पन्न न हो तब तकके समयको प्रथम तीर्थंकरका तीर्थ कहते है। चन्द्र- गोम्मटसारः । १३९ 1 कुलाचल महाह्रद ( तलाव ) क्षेत्र कुंड वेदिका वन व्यन्तरोंके आवास महानदी आदिका वर्णन है । द्वीपसागरप्रज्ञप्तिमें असंख्यात द्वीप और समुद्रोंका स्वरूप तथा वहांपर होनेवाले अकृत्रिम चैत्यालयोंका वर्णन है । व्याख्याप्रज्ञप्तिमें भव्य अभव्य-भेद प्रमाण लक्षण रूपी अरूपी जीव अजीव द्रव्योंका और अनन्तरसिद्ध परंपरासिद्धोका तथा दूसरी वस्तुओंका भी वर्णन है । दृष्टि- वादके दूसरे भेद-सूत्रमे तीनसौ त्रेसठ मिथ्यादृष्टियोका पूर्वपक्षपूर्वक निराकरण है। तीसरे भेद प्रथमानुयोगमें त्रेसठ शलाका पुरुषोका वर्णन है। चौथे पूर्वके चौदह भेद है। उनमें किस २ विष- यका वर्णन है यह संक्षेपसे क्रमसे बताते है । उत्पादपूर्वमें प्रत्येक द्रव्यके उत्पाद व्यय ध्रौव्य और उनके संयोगी धर्मोंका वर्णन है । आग्रायणीय पूर्वमें द्वादशाङ्गमे प्रधानभूत सातसौ सुनय तथा दुर्णय पञ्चास्तिकाय पड्द्रव्य सप्त तत्त्व नव पदार्थ आदिका वर्णन है। वीर्यानुवादमें आत्मवीर्य परवीर्य उभयवीर्य कालवीर्य तपोवीर्य द्रव्यवीर्य गुणवीर्य पर्यायवीर्य आदि अनेकप्रकारके वीर्य ( सामर्थ्य ) का वर्णन है । अस्तिनास्तिप्रवादमें स्यादस्ति स्यान्नास्ति आदि सप्तभंगीका वर्णन है। ज्ञानप्रवादमें मति श्रुत अवधि मनःपर्यय केवल रूप प्रमाण-ज्ञान, तथा कुमति कुश्रुत विभङ्ग रूप अप्रमाण ज्ञानके स्वरूप संख्या विषय फलका वर्णन है । सत्यप्रवादमें आठ प्रकारके शब्दोच्चारणके स्थान, पाच प्रयत्न, वाक्यसंस्कारके कारण, शिष्ट दुष्ट शब्दों के प्रयोग, लक्षण, वचनके भेद, वारह प्रकारकी भाषा, अनेक प्रका- रके असत्यवचन, दशप्रकारका सत्यवचन, वारगुप्ति, मौन आदिका वर्णन है। आत्मप्रवादमें आत्माके कर्तृत्व आदि अनेक धर्मोका वर्णन है । कर्मप्रवादमें मूलोत्तर प्रकृति तथा बंध उदय उदीरणा आदि कर्मकी अनेक अवस्थाओंका वर्णन है । प्रत्याख्यानपूर्वमें नाम स्थापना द्रव्य क्षेत्र काल भाव, पुरुषके संहनन आदिकी अपेक्षासे सदोष वस्तुका त्याग, उपवासकी विधि, पांच समिति, तीन गुप्ति आदिका वर्णन है । विद्यानुवादमें अंगुष्ठप्रसेना आदि सातसौ अल्पविद्या, तथा रोहिणी आदि पांचसौ महा विद्याओंका स्वरूप सामर्थ्य मन्त्र तन्त्र पूजा--विधान आदिका, तथा सिद्ध विद्याओंका फल और अन्तरिक्ष भौम अंग स्वर स्वप्न लक्षण व्यजन छिन्न इन आठ महा. निमित्तोंका वर्णन है । कल्याणवादमे तीर्थकरादिके गर्भावतरणादि कल्याण, उनके कारण पुण्य- कर्म पोडश भावना आदिका, तथा चन्द्र सूर्य ग्रह नक्षोंके चारका, ग्रहण शकुन आदिके फलका वर्णन है । प्राणावादमें कायचिकित्सा आदि आठ प्रकारके आयुर्वेदका, इडा पिंगला आदिका, दश प्राणोंके उपकारक अपकारक द्रव्योंका गतियोंके अनुसारसे वर्णन किया है क्रियाविशालमे संगीत छद अल कार पुरुषोंकी वहत्तर कन्या स्त्रीके चौसठ गुण, शिल्यादिविनान, गर्भाधानादि क्रिया, नित्य नैमित्तिक क्रियाओंका वर्णन है । त्रिलोकविन्दुसारमें लोकक स्वरूप, छत्तीम परिकर्म, आट व्यवहार, चार चीन, मोक्षका म्वरूप, उसके गमनका कारण, किया, मोक्षसम्बके ग्वरूपका वर्णन है । दृष्टिवादनामक वारहमे अंग का पाचमा भेट नलिका है। उसके १४० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । पाच भेद है, जलगता स्थलगता मायागता आकाशगता रूपगता । इनमेंसे जलगतामें जलगमन अग्निस्तम्भन अग्निभक्षण अग्निका आसन अग्निप्रवेश आदिके मन्त्र तन्त्र तपश्चर्या आदिका वर्णन है। स्थलगतामे मेरु कुलाचल भूमि आदिमें प्रवेश शीघ्रगमन आदिके कारण मन्त्र तन्त्र आदिका वर्णन है । मायागतामें इन्द्रजाल सम्बन्धी मात्रादिका वर्णन है । आकाशगतामें आकाशगमनके कारण मन्त्र तन्त्र आदिका वर्णन है। रूपगतामें सिहादिक अनेक प्रकारके रूप बनाने के कारण- भूत मन्त्रादिका वर्णन है। अङ्गबाह्य श्रुतके भेद गिनाते है। सामाइयचउवीसत्थयं तदो बंदणा पडिक्कमणं । वेणइयं किदियम्म दसवेयालं च उत्तरज्झयणं॥३६६ ॥ कप्पववहारकप्पाकप्पियमहकप्पियं च पुंडरियं । महपुंडरीयणिसिहियमिदि चोदसमंगवाहिरयं ।। ३६७ ॥ सामायिकचतुर्विशस्तवं ततो वंदना प्रतिक्रमणम् । बैनयिक कृतिकर्म दशवकालिकं च उत्तराध्ययनम् ॥ ३६६ ॥ कल्प्यव्यवहार-~~~-कल्पाकल्प्यिक-महाकल्प्यं च पुंडरीकम् । महापुंडरीकनिषिद्धिके इति चतुर्दशाबाह्यम् ॥ ३६७ ॥ अर्थ-~-सामायिक, चतुर्विशस्तव, वन्दना, प्रतिक्रमण, वैनयिक, कृतिकर्म, दशवैकालिक, उत्तराध्ययन, कल्पव्यवहार, कल्पाकल्प्य, महाकल्प, पुंडरीक, महापुडरीक, निपिद्धिका अङ्गबाह्यश्रुतके चौदह भेद है। श्रुतज्ञानका माहात्म्य बताते है। सुकेवलं च णाणं दोषिणवि सरिसाणि होति बोहादो। सुदणाणं तु परोक्वं पञ्चक्खं केवलं जाणं ॥ ३६८॥ श्रुतं केवलं च ज्ञानं द्वेऽपि सदृशे भवतो वोधात् । श्रुतज्ञानं तु परोक्षं प्रत्यक्षं केवलं ज्ञानम् ॥ ३६८ ॥ अर्थ-~-जानकी अपेक्षा श्रुत ज्ञान तथा केवल ज्ञान दोनो ही सदृश है । परन्तु दोनोंमें अन्तर यही है कि श्रुत ज्ञान परोक्ष है और केवल ज्ञान प्रत्यक्ष है। भावार्थ-जिस तरह श्रुत ज्ञान सम्पूर्ण द्रव्य और उनकी पर्यायोंको जानता है उस ही तरह केवल ज्ञान भी सम्पूर्ण द्रव्य और पर्यायोंको जानता है। विशेषता इतनी ही है कि श्रुत ज्ञान इन्द्रिय और मनकी सहायता होता है इसलिये इसकी अमूर्त पदार्थों में और उनकी अर्थपर्याय तथा दूसरे मूदम अंशोमें स्पष्टरूपसे प्रवृत्ति नहीं होती । किन्तु केवल ज्ञान निरावरण होनेके कारण समस्त पदार्योको स्पष्टरूरसे विषय करता है ।

गोम्मटसारः। १४१ क्रमप्राप्त अवधि ज्ञानका निरूपण करते है। अवहीयदित्ति ओही सीमाणाणत्ति वण्णियं समये । भवगुणपञ्चयविहियं जमोहिणाणेत्ति णं बेंति ॥ ३६९॥ अवधीयते इत्यवधिः सीमाज्ञानमिति वर्णितं समये । भवगुणप्रत्ययविधिकं यदवधिज्ञानमिति इदं ब्रुवन्ति ॥ ३६९ ॥ अर्थ-द्रव्य क्षेत्र काल भावकी अपेक्षासे जिसके विषयकी सीमा हो उसको अवधि ज्ञान कहते है । इस ही लिये परमागममे इसको सीमाज्ञान कहा है । तथा इसके जिनेन्द्रदेवने दो भेद कहे हैं, एक भवप्रत्यय दूसरा गुणप्रत्यय । भावार्थ-नारकादि भवकी अपेक्षासे अवधिज्ञानावरण कर्मका क्षयोपशम होकर जो अवधिज्ञान हो उसको भवप्रत्यय अवधि कहते है। जो सम्यग्दर्शनादि कारणोकी अपेक्षासे अवधिज्ञानावरण कर्मका क्षयोपशम होकर अवधिज्ञान होता है उसको गुणप्रत्यय अवधि कहते है। इसके विषयको परिमित होनेसे इस ज्ञानको अवधिज्ञान अथवा सीमाज्ञान कहते है । यद्यपि दूसरे मतिज्ञानादिके विषयकी भी सामान्यसे सीमा है, इसलिये दूसरे ज्ञानोंको भी अवधिज्ञान कहना चाहिये; तथापि समभिरूढनयकी अपेक्षासे ज्ञानविशेषको ही अवधि ज्ञान कहते है । दोनों प्रकारके अवधि ज्ञानका स्वामी तथा स्वरूप बताते है । भवपञ्चइगो सुरणिरयाणं तित्थेवि सवअंगुत्थो । गुणपञ्चइगो णरतिरियाणं संखादिचिह्नभवो ॥ ३७०॥ भवप्रत्ययकं सुरनारकाणां तीर्थेऽपि सर्वाङ्गोत्थम् । गुणप्रत्ययकं नरतिरश्चां संखादिचिह्नभवम् ॥ ३७० ॥ अर्थ-भवप्रत्यय अवधिज्ञान देव नारकी तथा तीर्थकरोंके होता है। और यह ज्ञान सम्पूर्ण अङ्गसे उत्पन्न होता है । गुणप्रत्यय अवधिज्ञान पर्याप्त मनुष्य तथा संज्ञी पचेन्द्रिय तिर्यंचाके भी होता है । और यह ज्ञान शखाठि चिह्नोंसे होता है। भावार्थ-नाभिके उपर शंख पद्म वज्र स्वस्तिक कलश आदि जो शुभ चिह्न होते है; उस जगह के आत्मप्रदेशों में होनेवाले अवधिज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशमसे गुणप्रत्यय अवधिज्ञान होता है । किन्तु भवप्रत्यय अवधि सम्पूर्ण आत्मप्रदेशोंसे होता है । उत्तरार्ध प्रकारान्तरसे सामान्य अवधिक तथा पूर्वार्धमें गुणप्रत्यय अवधिके भेटोंको गिनाते है। गुणपञ्चइगो उद्धा अणुगावट्ठिवपट्टमाणिदरा । दसोही परमोही सम्बोहित्ति य तिधा ओही ।। ३७१ ।।

१४२
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
गुणप्रत्ययकः पोढा अनुगावस्थितप्रवर्धमानेतरे ।
देशावधिः परमावधिः सर्वावधिरिति च त्रिधा अवधिः ॥ ३७१ ॥
अर्थ-गुणप्रत्यय अवधिज्ञानके छह भेद हैं, अनुगामी अननुगामी अवस्थित अनव-
स्थित वर्धमान हीयमान । तथा सामान्यसे अवधिज्ञानके देशावधि परमावधि सर्वावधि इसतरहसे
तीन भेद भी होते है । भावार्थ-जो अवधिज्ञान अपने स्वामी जीवके साथ जाय उसको
अनुगामी कहते है । इसके तीन भेद है, क्षेत्रानुगामी भवानुगामी उभयानुगामी । जो दूसरे
क्षेत्रमें अपने स्वामीके साथ जाय उसको क्षेत्रानुगामी कहते है । जो दूसरे भवमें साथ जाय
उसको भवानुगामी कहते है । जो दूसरे क्षेत्र तथा भव दोनोंमें साथ जाय उसको उभयानुगामी
कहते है । जो अपने स्वामी जीवके साथ न जाय उसको अननुगामी कहते हैं, इसके
तीन भेद है क्षेत्राननुगामी भवाननुगामी उभयाननुगामी । जो सूर्यमण्डलके समान न घटे न वढे
उसको अवस्थित कहते है । जो चन्द्रमण्डलकी तरह कभी कम हो कभी अधिक हो उसको
अनवस्थित कहते है । जो शुक्लपक्षके चन्द्रकी तरह अपने अन्तिम स्थानतक वढता जाय
उसको वर्धमान अवधि कहते है । जो कृष्णपक्षके चन्द्रकी तरह अन्तिम स्थानतक घटता
जाय उसको हीयमान कहते है।
भवपञ्चइगो ओही देसोही होदि परमसव्वोही।
गुणपञ्चइगो णियमा देसोही वि य गुणे होदि ॥ ३७२॥
भवप्रत्ययकोऽवधिः देशावधिः भवति परमसर्वावधी ।
गुणप्रत्ययको नियमात् देशावधिरपि च गुणे भवति ॥ ३७२ ॥
अर्थ---भवप्रत्यय अवधि नियमसे देशावधि ही होता है । और दर्शनविशुद्धि आदि
गुणोंके निमित्तसे होनेवाला गुणप्रत्यय अवधि ज्ञान देशावधि परमावधि सर्वावधि इस तरह तीनों
प्रकारका होता है।
देसोहिस्स य अवरं णरतिरिये होदि संजदम्हि वरं ।
परमोही सम्वोही चरमसरीरस्स विरदस्स ॥ ३७३ ॥
देशावधेश्च अवरं नरतिरश्चोः भवति संयते वरम् ।
परमावधिः सर्वावधिः चरमशरीरस्य विरतस्य ॥ ३७३ ॥
अर्थ जघन्य देशावधि ज्ञान संयत तथा असंयत दोनों ही प्रकारके मनुष्य तथा
तियचोंके होता है । उत्कृष्ट देशावधि ज्ञान सयत जीवोके ही होता है। किन्तु परमावधि और
सर्वावधि चरमशरीरी और महाव्रतीके ही होता है।
पडिवादी देसोही अप्पडिवादी हवंति सेसा ओ।
मिच्छत्तं अविरमणं ण य पडिवज्जति चरिमदुगे ॥ ३७४ ॥

गोम्मटसारः । प्रतिपाती देशावधिः अप्रतिपातिनौ भवतः शेषौ अहो । मिथ्यात्वमविरमणं न च प्रतिपद्यते चरमद्विके ॥ ३७४ ॥ अर्थ-देशावधि ज्ञान प्रतिपाती होता है। और परमावधि तथा सविधि अप्रतिपाती होते है । तथा परमावधि और सर्वावधिवाले जीव नियमसे मिथ्यात्व और अव्रत अवस्थाको प्राप्त नहीं होते । भावार्थ-सम्यक्त्व और चारित्रसे च्युत होकर मिथ्यात्व और असंय- मकी प्राप्तिको प्रतिपात कहते है। यह प्रतिपात देशावधिवालेका ही होता है। परमावधि और सर्वावधिवालेका नही होता । अवधि ज्ञानका द्रव्यादि चतुष्टयकी अपेक्षासे वर्णन करते है । दव्वं खेत्तं कालं भावं पडि रूबि जाणदे ओही। अवरादुक्कस्सोत्ति य वियप्परहिदो दु सम्बाही ॥ ३७५ ॥ द्रव्यं क्षेत्रं कालं भावं प्रति रूपि जानीते अवधिः । अवरादुत्कृष्ट इति च विकल्परहितस्तु सर्वावधिः ॥ ३७५ ॥ अर्थ-जघन्य भेदसे लेकर उत्कृष्ट भेदपर्यन्त सब ही अवधि ज्ञान द्रव्य क्षेत्र काल भावकी अपेक्षासे रूपि ( पुद्गल ) द्रव्यको ही जानता है । तथा उसके सम्बन्धसे संसारी जीव द्रव्यको भी जानता है। किन्तु सर्वावधि ज्ञानमें जघन्य उत्कृष्ट आदि भेद नहीं है वह निर्विकल्प है। अवधि ज्ञानके विषयभूत सबसे जघन्य द्रव्यका प्रमाण बताते है । णोकम्मुरालसंचं मज्झिमजोगज्जियं सविस्सचयं । लोयविभत्तं जाणदि अवरोही दव्वदो णियमा ॥ ३७६ ॥ नोकौरालसचय मध्यमयोगार्जित सविस्नसोपचयम् । लोकविभक्त जानाति अवरावधिः द्रव्यतः नियमात् ॥ ३७६ ।। अर्थ-मध्यम योगके द्वारा सचित विनसोपचयसहित नोकर्म औदारिक वर्गणाक संचय, लोकका भाग देनेसे जितना द्रव्य लब्ध आवे उतनेको नियमसे जघन्य अवधि ज्ञान द्रव्यकी अपेक्षासे जानता है । भावार्थ-वित्रसोपचयसहित और जिसका मध्यम योगके द्वारा सचय हुआ हो ऐसे डेढगुणहानिमात्र समयप्रवद्धरूप औदारिक नोकर्मके समूहमें लोक. प्रमाणका भाग देनेसे जो द्रव्य लब्ध आवे उतने द्रव्यको जघन्य अवधि ज्ञान नियमसे क्षेत्रका जानता है। अवधि ज्ञानके विषयभूत जघन्य प्रमाण बताते हैं । सुहमाणगोदअपजत्तयरस जादस्स तदियसमयम्हि । अवरोगाहणमाणं जहण्णय ओहिरवेत्त तु ॥ ३७७ ।।

१४४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । सूक्ष्मनिगोदापर्याप्तकस्य जातस्य तृतीयसमये । अवरावगाहनमानं जघन्यकमवधिक्षेत्रं तु ॥ ३७७ ।। अर्थ—सूक्ष्म निगोदिया लब्ध्यपर्याप्तककी उत्पन्न होनेसे तीसरे समयमे जो जघन्य अवगाहना होती है उसका जितना प्रमाण है उतना ही अवधि ज्ञानके जघन्य क्षेत्रका प्रमाण है। भावार्थ--इतने क्षेत्रमें जितने जघन्य द्रव्य होग जिसका कि प्रमाण पहले बताया गया है उनको जघन्य देशावधिवाला जान सकता है-इसके बाहर नहीं । जघन्य क्षेत्रके विषयमें विशेष कथन करते है। अवरोहिखेत्तदीहं वित्थारुस्सेहयं ण जाणामो। अण्णं पुण समकरणे अवरोगाहणपमाणं तु ॥ ३७८॥ अवरावधिक्षेत्रदीर्घ विस्तारोत्सेधकं न जानमः । अन्यत् पुनः समीकरणे अवरावगाहनाप्रमाणं तु ॥ ३७८ ॥ अर्थ -जघन्य अवधि ज्ञानके क्षेत्रकी उंचाई लम्बाई चौडाईका भिन्न २ प्रमाण हम नहीं जानते । तथापि यह मालुम है कि समीकरण करनेसे जितना जघन्य अवगाहनका प्रमाण होता है उतना ही जघन्य अवधिका क्षेत्र है। अवरोगाहणमाणं उस्सेहंगुल असंखभागस्स । सूइस्स य घणपदर होदि हु तक्खेत्तसमकरणे ॥ ३७९ ॥ अवरावगाहनमानमुत्सेधाड्गुलासख्यभागम्य । सूचेश्च घनप्रतरं भवति हि तत्क्षेत्रसमीकरणे ॥ ३७९ ॥ अर्थ-उत्सेधाड्गुलकी अपेक्षासे उत्पन्न व्यवहार सूच्यड्गुलके असंख्यातमे भागप्रमाण- भुना कोटी और वेधौ परस्पर गुणा करनेसे जितना जघन्य अवगाहनाका प्रमाण होता उतना ही समीकरण करनेसे जघन्य अवधि ज्ञानका क्षेत्र होता है । भावार्थ-गुणा कर. नसे अइगुलके असंख्यातमे भागप्रमाण जघन्य अवधिका क्षेत्र होता है । अवरं तु ओहिखेत्तं उस्सेहं अंगुलं हवे जम्हा । मुहमोगाहणमाणं उवरि पमाणं तु अंगुलयं ॥ ३८० ॥ अवर तु अवविक्षेत्रमुत्सेधमडगुलं भवेद्यस्मात् । सदमावगाहनमानमुपरि प्रमाणं तु अगुलकम् ।। ३८० ॥ अर्थ-जो जवन्य अवधिका क्षेत्र पहले बताया है वह भी उत्सेधाड्गुल ही है; गयोंकि वह मूक्ष्म निगोदिया लन्यपर्याप्तककी जघन्य अवगाहना प्रमाण है । परन्तु आगे असे प्रमाणाद्गलका ग्रहण करना। भावार्थ-जघन्य अवगाहनाके समान अड्गुलके अस. यिनमे भाग ना जवन्य अधिका क्षेत्र बताया भी उत्सेधागुलकी अपेक्षासे ही है है वह

गोम्मटसारः।
ऐसा समझना चाहिये क्यों कि परमागमका ऐसा नियम है कि शरीर गृह ग्राम नगर आदिके
प्रमाण उत्सेधामुलसे ही लिये जाते है । परन्तु आगे अङ्गुलशब्दसे प्रमाणाङ्गुल लेना चाहिये।
अवरोहिखेत्तमज्झे अवरोही अवरदव्वमवगमदि ।
तद्दव्वस्सवगाहो उस्सेहासंखघणपदरा ॥ ३८१ ॥
अवरावधिक्षेत्रमध्ये अवरावधिः अवरद्रव्यमवगच्छति ।
तव्यस्यावगाहः उत्सेधासंख्यघनप्रतरः ॥ ३८१॥
अर्थ-जघन्य अवधि अपने जघन्य क्षेत्रमें जितने जघन्य द्रव्य है उन सवको
जानता है । उस द्रव्यका अवगाह उत्सेधाडलके असंख्यातमे भागका घनप्रतर होता है ।
भावार्थ-यद्यपि जघन्य अवधिके क्षेत्रसे जघन्य द्रव्यके अवगाह--क्षेत्रका प्रमाण असं-
ख्यातगुणा हीन है, तथापि घनरूप उत्सेधाडुलके असख्यातमे भागमात्र है। इसकी भुजा
कोटी तथा वेधका प्रमाण सूच्यंगुलके असंख्यातमे भाग है ।
आवलिअसंखभागं तीदभविस्सं च कालदो अवरं ।
ओही जाणदि भावे कालअसंखेजभागं तु ॥ ३८२ ।।
आवल्यसंख्यभागमतीतभविष्यच्च कालतः अवरम् ।
अवधिः जानाति भावे कालासंख्यातभागं तु ॥ ३८२ ॥
अर्थ-जघन्य अवधि ज्ञान कालकी अपेक्षासे आवलीके असंख्यातमे भागप्रमाण द्रव्य-
की व्यंजन पर्यायोंको जानता है । तथा जितनी पर्यायोको कालकी अपेक्षासे जानता
उसके असंख्यातमें भागप्रमाण वर्तमान कालकी पर्यायोंको भावकी अपेक्षासे जानता है ।
इस प्रकार जघन्य देशावधि ज्ञानके विषयभूत द्रव्य क्षेत्र काल भावकी सीमाको वताकर
द्रव्यादि चतुष्टयकी अपेक्षासे देशावधि ज्ञानके विकल्पोंका वर्णन करते है।
अवरद्दव्वादुवरिमदव्ववियप्पाय होदि धुवहारो।
सिद्धाणंतिमभागो अभव्वसिद्धादणंतगुणो ।। ३८३ ।।
अवरद्रव्यादुपरिमद्रव्यविकल्पाय भवति ध्रुवहारः ।
सिद्धानन्तिमभागः अभव्यसिद्धादनन्तगुणः ॥ २८३ ॥
अर्थ जघन्य द्रव्यके ऊपर द्रव्यके दूसरे भेट निकालनेके लिये ध्रुवहार होता है
इसका (ध्रुवहारका ) प्रमाण सिद्धराशिसे अनन्तमे भाग और अभव्यराशिसे अनन्तगुणा है।
अवधि ज्ञानके विषयमें समयप्रवद्रका प्रमाण बताते है ।
धुवहारकम्मवग्गणगुणगारं कम्मवग्गणं गुणिदे ।
समयपबद्धपमाणं जाणिजो ओहिविसयाम्हि ॥ ३८४ ॥

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
ध्रुवहारकार्मणवर्गणागुणकारं कार्मणवर्गणां गुणिते ।
समयप्रवद्धप्रमाणं ज्ञातव्यमवधिविषये ॥ ३८४ ॥
अर्थ-ध्रुवहाररूप कार्मण वर्गणाके गुणाकारका और कार्मण वर्गणाका परस्पर गुणा
करनेसे अवधि ज्ञानके विषयमें समयप्रवद्धका प्रमाण निकलता है।
ध्रुवहारका प्रमाण विशेषतासे बताते है।
सणव्यवग्गणाण वियप्पाणंतिमसमं खु धुवहारो।
अवरुक्कस्सविसेसा रूवहिया तबियप्पा हु ॥ ३८५ ।।
मनोद्रव्यवर्गणानां विकल्पानन्तिमसमं खलु ध्रुवहारः ।
अवरोत्कृष्टविशेषाः रूपाधिकास्तद्विकल्पा हि ॥ ३८५ ॥
अर्थ-मनोद्रव्य--वर्गणाके उत्कृष्ट प्रमाणमेंसे जघन्य प्रमाणके घटानेसे जो शेष रहे
उसमे एक मिलानेसे मनोद्रव्य-वर्गणाके विकल्पोका प्रमाण होता है। इन विकल्पोंका जितना
प्रमाण हो उसके अनन्त भागों से एक भागकी वरावर अवधि ज्ञानके विषयभूत व्यके
ध्रुवहारका प्रमाण होता है।
मनोद्रव्य--वर्गणाके जघन्य और उत्कृष्ट प्रमाणको बताते हैं ।
अवरं होदि अणतं अणंतभागेण अहियमुक्कस्सं ।
इदि मणमेदाणंतिमभागो दवम्मि धुवहारो ॥ ३८६ ।।
अवरं भवति अनन्तमनन्तभागेनाधिकमुत्कृष्टम् ।
इति मनोभेदानन्तिमभागो द्रव्ये ध्रुवहारः ॥ ३८६ ॥
अर्थ--मनोद्रव्यवर्गणाका जघन्य प्रमाण अनन्त, इसमें इसीके (जधन्यके ) अनन्त
भागों से एक भाग मिलानेसे मनोवर्गणाका उत्कृष्ट प्रमाण होता है। इस प्रकार जितने
मनोवर्गणाके भेद हुए उसके अनन्त भागोंमेंसे एकभाग-प्रमाण अवधि ज्ञानके विषयभूत द्रव्यके
विषयमें ध्रुवहारका प्रमाण होता है ।
प्रकारान्तरसे फिर भी ध्रुवहारका प्रमाण बताते है ।
धुवहारस्स पमाणं सिद्धाणंतिमपमाणमेत्तं पि।
समयपबद्धणिमित्तं कम्मणवग्गणगुणादो दु ॥ ३८७ ।।
होदि अणंतिमभागो तग्गुणगारो वि देसओहिस्स ।
दोजणदव्यमेदपमाणडुवहारसंवग्गो ॥ ३८८ ।।
ध्रुमहारस्य प्रमाणं सिद्धानन्तिमप्रमाणमात्रमपि ।
ममयप्रवद्धनिमित्त कार्मणवर्गणागुणतस्तु ॥ ३८७ ॥
भग्न्यनन्तिमभागरतट्टणकारो वि देशावधेः ।
पानन्यभेटप्रमाणवहारसंवर्गः ॥ ३८८ ॥

--- गोम्मटसारः। १४७ अर्थ-यद्यपि ध्रुवहारका प्रमाण सिद्धराशिके अनन्तमे भाग है, तथापि अवधि- ज्ञान-विषयक समयप्रबद्धका प्रमाण निकालनेके निमित्तभूत कार्मण वर्गणाके गुणकारसे अनन्तमें भाग समझना चाहिये । द्रव्यकी अपेक्षासे देशावधि ज्ञानके जितने भेद है उनमे दो कम कर- नेसे जो प्रमाण शेष रहे उसका ध्रुवहारप्रमाण परस्पर गुणा करनेसे कार्मण वर्गणाके गुणकारका प्रमाण निकलता है। देशावधि ज्ञानके द्रव्यकी अपेक्षा कितने भेद हैं यह बताते हैं । अंगुलअसंखगुणिदा खेत्तवियप्पा य दवभेदा हु । खेत्तवियप्पा अवरुक्कस्सविसेसं हवे एत्थ ॥३८९ ॥ अङ्गुलासंख्यगुणिताः क्षेत्रविकल्पाश्च द्रव्यभेदा हि । क्षेत्रविकल्पा अवरोत्कृष्टविशेषो भवेदत्र ॥ ३८९ ॥ अर्थ-देशावधि ज्ञानके क्षेत्रकी अपेक्षा जितने भेद है उनको सूच्यंगुलके असंख्यातमे भागसे गुणा करनेपर, द्रव्यकी अपेक्षासे देशावधिके भेदोका प्रमाण निकलता है । क्षेत्रकी अपेक्षा उत्कृष्ट प्रमाणमेंसे सर्व-जघन्य प्रमाणको घटाने और एक मिलानेसे जो प्रमाण शेष रहे उतने ही क्षेत्रकी अपेक्षासे देशावधिक विकल्प होते है । क्षेत्रकी अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट प्रमाण कितना है यह बताते है । अंगुलअसंखभार्ग अवरं उक्कस्सयं हवे लोगो। इदि वग्गणगुणगारो असंखधुवहारसंवग्गो ॥ ३९० ॥ अङ्गुलासंख्यभागमवरमुत्कृष्टकं भवेल्लोकः । इति वर्गणागुणकारोऽसंख्यध्रुवहारसंवर्गः ॥ ३९० ॥ अर्थ-देशावधिका पूर्वोक्त लब्ध्यपर्याप्तककी जघन्य अवगाहनाप्रमाण, अर्थात् घना- डुलके असंख्यातमे भागस्वरूप जो प्रमाण बताया है वही जघन्य क्षेत्रका प्रमाण है । सम्पूर्ण लोकप्रमाण उत्कृष्ट क्षेत्र है । इसलिये असंख्यात ध्रुवहारोंका परस्पर गुणा करनेसे कार्मण वर्ग- णाका गुणकार निप्पन्न होता है। वर्गणाका प्रमाण बताते है। वग्गणरासिपमाणं सिद्धाणंतिमपमाणमेत्तं पि। दुगसहियपरमभेदपमाणवहाराण संवग्गो ॥ ३९१ ॥ वर्गणाराशिप्रमाणं सिद्धानन्तिमप्रमाणमात्रमपि । हिकसहितपरमभेदप्रमाणावहाराणा सवर्मा ॥ २९१ ॥ अर्थ-कार्मण वर्गणाका प्रमाण यद्यपि मिद्धराशिके अनन्तम भाग है; तथापि परमा- १ शुकदारा निशा प्रमालानी यार ।

१४८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । करनेसे वधिके भेदोंमें दो मिलानेसे जो प्रमाण हो उतनी जगह ध्रुवहार रखकर परस्पर गुणा लब्धराशिप्रमाण कार्मण वर्गणाका प्रमाण होता है। परमावधिके कितने भेद है यह बताते है । परमावहिस्स दा सगओगाहणवियपहदतेऊ । इदि धुवहारं वग्गणगुणगारं वग्गणं जाणे ।। ३९२ ॥ परमावधेर्भेदाः स्वकावगाहनविकल्पहततेजसः । इति ध्रुवहारं वर्गणागुणकारं वर्गणां जानीहि ॥ ३९२ ॥ अर्थ-तेजस्कायिक जीवोंकी अवगाहनाके जितने विकल्प है उसका और तेजस्का- यिक जीवराशिका परस्पर गुणा करनेसे जो राशि लब्ध आवे उतना ही परमावधि ज्ञानके द्रव्यकी अपेक्षासे भेदोका प्रमाण होता है । इस प्रकार ध्रुवहार, वर्गाणाका गुणकार, और वर्गणाका स्वरूप समझना चाहिये। देसोहिअवरदव्वं धुवहारेणवहिदे हवे विदियं । तदियादिवियप्पेसु वि असंखवारोत्ति एस कमो ।। ३९३ ॥ देशावध्यवरद्रव्यं ध्रुवहारेणावहिते भवेत् द्वितीयम् । तृतीयादिविकल्पेष्वपि असंख्यवार इत्येषः क्रमः ॥ ३९३ ॥ अर्थ-देशावधि ज्ञानके जघन्य द्रव्यका जो प्रमाण पहले वताया है उसमें ध्रुवहारका एक वार भाग देनेसे देशावधिक दूसरे विकल्पके द्रव्यका प्रमाण निकलता है। दूसरे विक- ल्सके द्रव्यमें ध्रुवहारका एक वार भाग देनेसे तीसरे विकल्पके द्रव्यका और तीसरे विक- ल्पके द्रव्यमें ध्रुवहारका भाग देनेसे चौथे विकल्पके द्रव्यका प्रमाण तिकलता है। इसी तरह आगेके विकल्पोंके द्रव्यका प्रमाण निकालनेकेलिये क्रमसे असंख्यात वार ध्रुवहारका भाग देना चाहिये। देसोहिमज्झभेदे सविस्ससोवचयतेजकम्मंगं । तेजोभासमणाणं वग्गणयं केवलं जत्थ ।। ३९४ ॥ पस्सदि ओही तत्थ असंखेजाओ हवंति दीउवही । वासाणि असंखेज्जा होंति असंखेज्जगुणिदकमा ॥ ३९५ ॥ देशावधिमध्यभेदे सविनसोपचयतेजःकर्मागम् । तेजोमापामनसा वर्गणां केवला यत्र ॥ ३९४ ॥ पश्यत्यवधिस्तत्र असंख्यया भवन्ति द्वीपोदधयः । वर्षाणि असंख्यातानि भवन्ति असंख्यातगुणितक्रमाणि ।। ३९५ ॥

गोम्मटसारः । १४९ अर्थ-इस प्रकार असंख्यात वार ध्रुवहारका भाग देते २ देशावधि ज्ञानके मध्य भेदों से जहां पर प्रथम भेद विस्रसोपचयसहित तैजस शरीरको विषय करता है, अथवा इसके आगेका दूसरा मध्यभेद विस्त्रसोपचयसहित कार्मण शरीरको विषय करता है, अथवा तीसरा भेद विस्नसोपचयरहित तैजस वर्गणाको विषय करता है, अथवा चौथा भेद विस्नसोपचय- रहित भाषा वर्गणाको विषय करता है, अथवा पांचमा भेद विनसोपचयरहित मनोवर्ग- णाको विषय करता है, वहां पर सामान्यसे देशावधिके उक्त पांचो ही मध्य भेदोंके क्षेत्रका प्रमाण असंख्यात द्वीपसमुद्र और कालका प्रमाण असंख्यात वर्ष है । परंतु विशेषताकी अपे- क्षासे पूर्व २ भेदके क्षेत्र और कालके प्रमाणसे उत्तरोत्तर भेदके क्षेत्र और कालका प्रमाण असंख्यातगुणा असंख्यातगुणा है; क्योंकि असख्यातके भी असंख्यात भेद होते है। तत्तो कम्मइयस्सिगिसमयपबद्धं विविस्ससोवचयं । धुवहारस्स विमज्जं सव्वोही जाव ताव हवे ॥ ३९६ ॥ ततः कार्मणस्य एकसमयप्रवद्धं विवित्रसोपचयम् । ध्रुवहारस्य विभाज्यं सर्वावधिः यावत् तावत् भवेत् ॥ ३९६ ॥ अर्थ-इसके अनन्तर मनोवर्गणामें ध्रुवहारका भाग देना चाहिये । इस तरह भाग देते २ विनसोपचयरहित कार्मणके एक समयप्रवद्धको विषय करता है । उक्त क्रमानुसार इसमें भी सर्वावधिक विषयपर्यन्त ध्रुवहारका भाग देते जाना चाहिये । एदम्हि विभजते दुचरिमदेसावहिम्मि वग्गणयं । चरिमे कम्मइयस्सिगिवग्गणमिगिवारभजिदं तु ॥ ३९७ ॥ एतस्मिन् विभज्यमाने द्विचरमदेशावधौ वर्गणा । चरमे कार्मणस्यैकवर्गणा एकवारभक्ता तु ॥ ३९७ ॥ अर्थ-इस समयप्रबद्ध में भी ध्रुवहारका भाग देनेसे देशावधि ज्ञानके द्विचरम मेदके विषयभूत द्रव्यका कार्मण वर्गणारूप प्रमाण निकलता है । इस एक कार्मण वर्गणा में भी एक- वार ध्रुवहारका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना देशावधिक चरम भेदके विषयभूत द्रव्यका प्रमाण निकलता है। अंगुलअसंखभागे दववियप्पे गदे दु खेत्तम्हि । एगागासपदेसो वट्टदि संपुण्णलोगोत्ति ॥ ३९ ॥ अद्भुलासंग्व्यभागे द्रव्यविकल्पे गते तु क्षेत्रे । एकाकागप्रदेशो वर्धते संपूर्ण लोक इति ॥ ३९८ ॥ अर्थ-सूयंगुलके अमंल्यातमे भाग प्रमाण जब द्रव्यो विकल्प होजाय तब क्षेत्रकी १५० रायचन्द्रनैनशास्त्रमालायाम् । अपेक्षा एक आकाशका प्रदेश बढता है । इस ही क्रमसे एक २ आकाशके प्रदेशकी वृद्धि वहातक करनी चाहिये कि जहां तक देशावधिका उत्कृष्ट क्षेत्र सर्वलोक हो जाय । आवलिअसंखभागो जहण्णकालो कमेण समयेण । वड्ढदि देसोहिवरं पल्लं समऊणयं जाव ॥ ३९९ ॥ आवल्यसंख्यभागो जघन्यकालः क्रमेण समयेन । वर्धते देशावधिवरं पल्यं समयोनकं यावत् ॥ ३९९ ॥ अर्थ-जघन्य देशावधिक विषयभूत कालका प्रमाण आवलीका असंख्यातमा भाग है । इसके ऊपर उत्कृष्ट देशावधिके विषयभूत एक समय कम एक पल्यप्रमाण काल पर्यन्त, ध्रुव तथा अध्रुव वृद्धिरूप क्रमसे एक एक समयकी वृद्धि होती है । उक्त दोनों क्रोको उन्नीस काण्डकोंमें कहनेकी इच्छासे आचार्य पहले प्रथम काण्डकमें उनका ढाई गाथाओंद्वारा वर्णन करते है। अंगुलअसंखभागं धुवस्वेण य असंखवारं तु । असंखसंखं भागं असंखवारं तु अद्धवगे ॥ ४०० ॥ अडलासंख्यभागं ध्रुवरूपेण च असंख्यवारं तु । असंख्यसंख्यं भागमसंख्यवरं तु अध्रुवगे ॥ ४०० ॥ अर्थ ----प्रथम काण्डकमें चरम विकल्पपर्यन्त असंख्यात वार घनामुलके असंख्यात भागप्रमाण ध्रुव वृद्धि होती है । और इस ही काण्डकके अन्त पर्यन्त घनामुलके असंख्यातमें और संख्यातमे भाग प्रमाण ध्रुव वृद्धि भी असंख्यात वार होती है। धुवअद्धवरूवेण य अवरे खेत्तम्हि वड्डिदे खेत्ते। अवरे, कालम्हि पुणो एक्केक्कं वड्डदे समयं ॥ ४०१ ।। ध्रुवाध्रुवरूपेण च अवरे क्षेत्रे वर्द्धिते क्षेत्रे । अवरे काले पुनः एकैको वर्धते समयः ॥ ४०१ ॥ अर्थ-जघन्य देशावधिके विषयभूत क्षेत्रके उपर ध्रुवरूपसे अथवा अध्रुवरूपसे क्षेत्रकी वृद्धि होनेपर जघन्य कालके ऊपर एक एक समयकी वृद्धि होती है। संखातीदा समया पढमे पव्वम्मि उभयदो वड्डी। खेत्तं कालं अस्सिय पढमादी कंडये वोच्छं ॥ ४०२ ॥ संग्न्यातीता- समयाः प्रथमे पर्वे उभयतो वृद्धिः । क्षेत्र कालमाश्रित्य प्रथमादीनि काण्डकानि वक्ष्ये ॥ ४०२ ॥ अर्थ-प्रथम काण्डकमें ध्रुवरूपसे और अध्रुवरूपसे असंख्यात समयकी वृद्धि होती है । इसके आगे प्रयमादि काण्डकोंका क्षेत्र और कालके आश्रयसे वर्णन करते है।

गोम्मटंसारः । १५१ अंगुलमावलियाए भागमसंखेज्जदोवि संखेज्जो । अंगुलमावलियंतो आवलियं चांगुलपुधत्तं ॥ ४०३ ॥ अडगुलावल्योः भागोऽसंख्येयोऽपि संख्येयः । अड्गुलमावल्यन्त आवलिकश्चागुलपृथक्त्वम् ॥ ४०३ ॥ अर्थ-प्रथम काण्डकमें जघन्य क्षेत्रका प्रमाण घनाड्गुलके असंख्यातमे भागप्रमाण, और उत्कृष्ट क्षेत्रका प्रमाण घनाड्गुलके संख्यातमे भाग प्रमाण है। और जघन्य कालका प्रमाण आवलीका असंख्यातमा भाग, तथा उत्कृष्ट कालका प्रमाण आवलीका संख्यातमा माग है, दूसरे काण्डकमें क्षेत्र घनाङ्गुलप्रमाण और काल कुछ कम एक आवली प्रमाण है। तीसरे काण्डकमें क्षेत्र घनाड्गुल-पृथक्त्व और काल आवली-पृथक्त्व --प्रमाण है। आवलियपुधत्तं पुण हत्थं तह गाउयं मुहुत्तं तु । जोयणभिण्णमुहुत्तं दिवसंतो पण्णुवीस तु ।। ४०४ ॥ आवलिपृथक्त्वं पुनः हस्तस्तथा गन्यूतिः मुहूर्तस्तु । योजन भिन्नमुहूर्त:दिवसान्तः पञ्चविंशतिस्तु ॥ ४०४ ॥ अर्थ-चतुर्थ काण्डकमे काल आवलीपृथक्त्व और क्षेत्र हस्तप्रमाण है । पाचमे काण्डकमें क्षेत्र एक कोश और काल अन्तर्मुहूर्त है । छटे काण्डकमें क्षेत्र एक योजन और काल भिन्नमुहूर्त है । सातमे काण्डकमें काल कुछ कम एक दिन और क्षेत्र पच्चीस योजन है। भरहम्मि अद्धमासं साहियमासं च जम्बुदीवम्मि । वासं च मणुवलोए वासपुधत्तं च रुचगम्मि ॥४०५ ॥ भरते अर्धमासः साधिकमासश्च जम्बूद्वीपे । वर्षश्च मनुजलोके वर्षपृथक्त्वं च रुचके ॥ ४०५ ॥ अर्थ-आठमे काण्डकमें क्षेत्र भरतक्षेत्र प्रमाण और काल अर्धमास ( पक्ष ) प्रमाण है। नौमे काण्डकमें क्षेत्र जम्बूद्वीप प्रमाण और काल एक माससे कुछ अधिक है। दशमे काण्डकमें क्षेत्र मनुष्यलोक प्रमाण और काल एक वर्षप्रमाण है । ग्यारहमे काण्डकमें क्षेत्र रुचक द्वीप और काल वर्षपृथक्त्व प्रमाण है। संखेज्जपमे वासे दीवसमुद्दा हवंति संखेज्जा। वासम्मि असंखेने दीवसमुद्दा असंखेजा ॥ ४०६ ॥ संख्यातप्रमे वर्षे द्वपिसमुद्रा भवन्ति संन्याताः । वपं असंख्येये द्वीपममुद्रा अमंल्येयाः ॥ ४०६ ॥ १ सानो नी सकसी सराको पृथल कहते हैं ।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । १६२ अर्थ बारहमे काण्डकमें संख्यात वर्ष प्रमाण काल और संख्यात द्वीपसमुद्रप्रमाण क्षेत्र है। इसके आगे तेरहमे से लेकर उन्नीसमे काण्डक पर्यन्त असंख्यात वर्ष-प्रमाण काल और असंख्यात द्वीपसमुद्र-प्रमाण क्षेत्र है। कालविसेसेणवहिदखेतविसेसो धुवा हवे वड्डी। अद्धववड्डीवि पुणो अविरुद्धं इट्ठकंडमिम ।। ४०७ ॥ कालविशेषेणावहितक्षेत्रविशेषो ध्रुवा भवेत् वृद्धिः । अध्रुववृद्धिरपि पुनः अविरुद्धा इष्टकाण्डे ॥ ४०७ ॥ अर्थ-किसी विवक्षित काण्डकके क्षेत्रविशेषमें कालविशेषका भाग देनेसे जो शेष रहे उतना ध्रुव वृद्धिका प्रमाण है । इस ही तरह आवरोधरूपसे इष्ट काण्डको अध्रुव वृद्धिका भी प्रमाण समझना चाहिये । इस अध्रुव वृद्धिका क्रम आगेके गाथामे कहेंगे । भावार्थ-विव- क्षित काण्डकके उत्कृष्ट क्षेत्रप्रमाणमेसे जघन्य क्षेत्रप्रमाणको घटाने पर जो शेष रहे उसको क्षेत्रविशेष कहते है । और उत्कृष्ट कालके प्रमाणमेंसे जघन्य कालके प्रमाणको घटानेपर जो शेष रहे उसको कालविशेष कहते है। किसी विवक्षित क्षेत्रविशेषमें उसके कालविशेषका भाग देनेसे जो प्रमाण शेष रहे उतना ध्रुव वृद्धिका प्रमाण है । तथा अध्रुव वृद्धिका क्रम किसी भी विवक्षित काण्डको अविरोधकरके सिद्ध करना चाहिये । अध्रुव वृद्धिका क्रम बताते है । अंगुलअसंखभागं संखं वा अंगुलं च तस्सेव । संखमसंखं एवं सेढीपदस्स अद्धवगे ॥ ४०८ ॥ अंगुलासंख्यभागः संख्यं वा अडगुलं तस्यैव । संख्यमसंख्यमेवं श्रेणीप्रतरयोः अध्रुबगायाम् ॥ ४०८ ॥ अर्थ-~घनाड्गुलके असंख्यातमे भागप्रमाण, वा घनाड्गुलके संख्यातमे भागप्रमाण वा धनाड्गुलमात्र, वा सख्यात घनागुलमात्र, वा असंख्यात धनाड्गुलमात्र, वा श्रेणीके असंख्यातमे भागप्रमाण, वा श्रेणीके संख्यातमे भागप्रमाण, वा श्रेणीप्रमाण, वा संख्यात श्रेणीप्रमाण, वा असख्यात श्रेणीप्रमाण, वा प्रतरके असंख्यातमे भाग-प्रमाण, वा प्रतरके संख्यातमे भाग-- प्रमाण, वा प्रतरप्रमाण, वा संख्यात प्रतर-प्रमाण, वा असंख्यात प्रतर -प्रमाण प्रदेशोंकी वृद्धि होने पर एक एक समयकी वृद्धि होती है । यही अध्रुव वृद्धिका क्रम है। भावार्थ-जहां पर नितने प्रकारकी वृद्धियोंका होना सम्भव हो, वहां पर उतने प्रकारकी वृद्धियोमेंसे कभी किसी प्रकारकी और कमी किसी प्रकारकी प्रदेश वृद्धिके होने पर एक एक समयकी वृद्धिका होना यहीं अध्रुव वृद्धिका क्रम है ।

गोम्मटसारः। १५३ । - उत्कृष्ट देशावधिक विषयभूत द्रव्य क्षेत्र काल भावका प्रमाण बताते है। कम्मइयवग्गणं धुवहारेणिगिवारभाजिदे दुव्वं । उक्कस्सं खेत्तं पुण लोगो संपुण्णओ होदि ॥ ४०९ ॥ कार्मणवर्गणा ध्रुवहारेणैकवारभाजिते द्रव्यम् । उत्कृष्टं क्षेत्र पुनः लोक संपूर्णो भवति ॥ ४०९ ।। अर्थ-कार्मण वर्गणामें एकवार ध्रुवहारका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना देशाव- धिके उत्कृष्ट द्रव्यका प्रमाण है । तथा सम्पूर्ण लोक उत्कृष्ट क्षेत्रका प्रमाण है । पल्लसमऊण काले भावेण असंखलोगमेत्ता हु। दव्वस्स य पज्जाया वरदेसोहिस्स विसया हु॥४१० ॥ पल्यं समयोनं काले भावेनासंख्यलोकमात्रा हि । द्रव्यस्य च पर्याया वरदेशावधेर्विषया हि ॥ ४१० ॥ अर्थ-कालकी अपेक्षा एक समय कम एक पल्य, और भावकी अपेक्षा असंख्यात- लोकप्रमाण द्रव्यकी पर्याय उत्कृष्ट देशावधिका विषय है। भावार्थ-काल और भाव शब्दके द्वारा द्रव्यकी पर्यायोका ग्रहण किया जाता है । इसलिये कालकी अपेक्षा एक समय कम पल्य- प्रमाण और भावकी अपेक्षा असंख्यातलोकप्रमाण द्रव्यकी पर्यायोंको उत्कृष्ट देशावधि ज्ञान विषय करता है। काले चउण्ण उड्डी कालो भजिव्व खेत्तउड्डी य । उड्डीए दयपज्जय भजिव्वा खेत्तकाला हु ॥ ४११॥ काले चतुर्णा वृद्धिः कालो भनितव्यः क्षेत्रवृद्धिश्च । वृद्धया द्रव्यपर्याययो भजितव्यो क्षेत्रकालौ हि ॥ ४ ११ ॥ अर्थ-कालकी वृद्धि होने पर चारो प्रकारकी वृद्धि होती है । क्षेत्रकी वृद्धि होने पर कालकी वृद्धि होती भी है और नहीं भी होती है । इस ही तरह द्रव्य और भावकी अपेक्षा वृद्धि होने पर क्षेत्र और कालकी वृद्धि होती भी है और नहीं भी होती है । परन्तु क्षेत्र और कालकी वृद्धि होने पर द्रव्य और भावकी वृद्धि अवश्य होती है । देशावविका निरूपण समाप्त हुआ, अतः क्रमप्राप्त परमावविका निरूपण करते है। देसावहिवरदव्यं धुवहारेणवहिदे हवे णियमा । परमावहिस्स अवरं दव्वपमाणं तु जिणदिट्ठम् ॥ ४१२ ॥ देशावधिवरदन्यं ध्रप्रहारेणावहिल भवत् नियमात् । परमाधेरखर द्रन्यप्रमाणे त जिनपिष्टम् ॥ ४१२ ॥ गा, २०

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रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
अर्थ-देशावधिका जो उत्कृष्ट द्रव्य-प्रमाण है उसमें ध्रुवहारका भाग देनेसे निय
मसे परमावधिके जघन्य द्रव्यका प्रमाण निकलता है ऐसा जिनेन्द्र देवने कहा है।
परमावधिके उत्कृष्ट द्रव्यका प्रमाण बताते है।
परमावहिल भेदा सगउग्गाहणवियप्पहदतेऊ ।
चरमे हारपमाणं जेट्ठस्स य होदि दव्वं तु ॥ ४१३ ॥
परमावधेर्भेदाः स्वकावगाहनविकल्पहततेजाः ।
चरमे हारप्रमाणं ज्येष्ठस्य च भवति द्रव्यं तु ॥ ४१३ ॥
अर्थ---अपनी ( तेजस्कायिक जीवराशि ) अवगाहनाके भेदोंका जो प्रमाण है,
उसका तेजस्कायिक जीवराशिके साथ गुणा करनेसे जो राशि उत्पन्न हो उतने ही परमाव-
धिके भेद है। इनमें से सर्वोत्कृष्ट अन्तिम भेदमें द्रव्य ध्रुवहारप्रमाण होता है ।
सवावहिस्स एको परमाणू होदि णिवियप्पो सो ।
गंगामहाणइस्स पवाहोव्व धुवो हवे हारो॥ ४१४ ॥
सर्वावधेरेकः परमाणुर्भवति निर्विकल्पः सः ।
गंगामहानद्याः प्रवाह इव ध्रुवो भवेत् हारः । ४१४ ॥
अर्थ-~-परमावधिके उत्कृष्ट द्रव्यप्रमाणमे ध्रुवहारका एकवार भाग देनेसे लब्ध एक
परमाणु-मात्र द्रव्य सर्वावधिका विषय होता है । यह ज्ञान तथा इसका विषयभूत परमाणु
निर्विकल्पक है । भागहार गंगा महानदीके प्रवाहकी तरह ध्रुव है। भावार्थ-जिसतरह गंगा
महानदीका प्रवाह हिमाचलसे निकलकर अविच्छिन्न प्रवाहके द्वारा वहता हुआ पूर्व समुद्रमें
जाकर अवस्थित होगया है । उसी तरह वह भागहार जघन्य देशावधि द्रव्यप्रमा-
णसे आगे परमावधिके सर्वोत्कृष्ट द्रव्यपर्यन्त अविच्छिन्न रूपसे जाते २ परमाणुपर जाकर
अवस्थित होगया है।
परमोहिबभेदा जेत्तियमेत्ता हु तेत्तिया होति ।
तस्सेव खेत्तकालवियप्पा विसया असंखगुणिदकमा ॥ ४१५ ॥
परमावधिद्रव्यमेदा यावन्मात्रा हि तावन्मात्रा भवन्ति ।
तस्यैव क्षेत्रकालविकल्पा विषया असंख्यगुणितक्रमाः ॥ ४ १५ ॥
अर्थ-परमावधिके जितने द्रव्यकी अपेक्षासे भेद हैं उतने ही भेद क्षेत्र और
करकी अपेक्षासे है। परन्तु उनका विषय असंख्यातगुणितक्रम है।
अमंल्यातगणितक्रम किस तरहसे है यह बताते है ।
आवलिअसंखमागा इच्छिदगच्छधणमाणमेत्ताओ।
देसावहिस्स खेत्ते काले वि य होति संवग्गे ॥ ४१६ ॥

गोम्मटसारः। १५५ आवल्यसंख्यभागा इच्छितगच्छधनमानमात्राः । देशावधेः क्षेत्रे कालेऽपि च भवन्ति संवर्गे ॥ ४१६ ॥ अर्थ-किसी भी परमावधिके विवक्षित विकल्पमें अथवा विवक्षित कालके विकल्पमें संकल्पित धनका जितना प्रमाण हो उतनी जगह आवलीके असंख्यातमे भागोको रखकर परस्पर गुणा करनेसे जो राशि उत्पन्न हो वही देशावधिके उत्कृष्ट क्षेत्र और उत्कृष्ट कालमें गुणकारका प्रमाण होता है । भावार्थ-परमावधिके प्रथम विकल्पमे संकल्पित धनका प्रमाण एक और दूसरे विकल्पमें तीन तथा तीसरे विकल्पमें छह चौथे विकल्पमें दश पांचमे विक- ल्पमें पन्द्रह छट्टे विकल्पमें इक्कीस सातमे विकल्पमें अट्ठाईस होता है। इसी तरह आगे भी संकल्पित धनका प्रमाण समझना चाहिये । परमावधिके जिस विकल्पके क्षेत्र या कालका प्रमाण निकालना हो, उस विकल्पके संकल्पित धनके प्रमाणकी वरावर आवलीके असंख्यातमे भागोंको रखकर परस्पर गुणा करनेसे जो राशि उत्पन्न हो, उसका देशावधिके उत्कृष्ट क्षेत्र और उत्कृष्ट कालके प्रमाणके साथ गुणा करनेसे परमावधिके विवक्षित विकल्पके क्षेत्र और कालका प्रमाण निकलता है। जितनेमा भेद विवक्षित हो वहां पर्यन्त एकसे लेकर एक एक अधिक अङ्क रखकर सबको जोडनेसे जो राशि उत्पन्न हो वह उस विवाक्षित भेदका संकल्पित धन होता है। जैसे प्रथम भेदका एक, दूसरे भेदका तीन, तीसरे भेदका छह, इत्यादि । प्रकारान्तरसे गुणकारका प्रमाण वताते है । गच्छसमा तक्कालियतीदे रूऊणगच्छधणमेत्ता। उभये वि य गच्छस्स य धणमेत्ता होति गुणगारा ॥ ४१७ ॥ गच्छसमाः तात्कालिकातीते रूपोनगच्छधनमात्राः । उभयेऽपि च गच्छस्य च धनमात्रा भवन्ति गुणकाराः॥ ४१७ ॥ अर्थ-विवक्षित गच्छकी जो सख्या हो उतने प्रमाणको विवक्षित गच्छसे अव्यवहित पूर्वके गच्छके प्रमाणमें मिला कर एक कम करनेसे जो राशि उत्पन्न हो उसमें विवक्षित गच्छकी संख्या मिलानेसे संकल्पित धनका प्रमाण होता है । यही गुणकारका प्रमाण है । भावार्थ- जैसे चौथा भेट विवक्षित है. तो गच्छके प्रमाण चारको अव्यवहित पूर्वके भेद तीनमें मिलाकर एक कम करनेसे छह होते है, इसमें विवक्षित गच्छके प्रमाण चारको मिलानेसे दश होते है, यही गुणकारका प्रमाण है । तथा यही विवक्षित भेटका संकल्पितधन है। परमावहिवरखेत्तेणवहिदउमस्सओहिसेत्तं तु । सव्वावहिगुणगारो काले वि असंखलोगो दु ।। ४१८ ॥ १ तासान।

१५६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । परमावधिवरक्षेत्रेणावहितोत्कृष्टावधिक्षेत्रं तु । सर्वावधिगुणकारः कालेऽपि असंख्यलोकस्तु ॥ ४१८ ।। अर्थ--उत्कृष्ट अवधि ज्ञानके क्षेत्रमें परमावधिके उत्कृष्ट क्षेत्रका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना सर्वावधिसम्बन्धी क्षेत्रकेलिये गुणकार है। तथा सर्वावधिसम्बन्धी कालका प्रमाण लानेके लिये असख्यात लोकका गुणकार है । भावार्थ-असंख्यात लोकके प्रमाणको पाचवार लोकके प्रमाणसे गुणा करने पर जो राशि उत्पन्न हो उतना सर्वावधि ज्ञानके उत्कृष्ट क्षेत्रका प्रमाण है। इसमें परमावधिके उत्कृष्ट क्षेत्रका भाग देनेसे सर्वावधिके क्षेत्रसम्बन्धी गुण- कारका प्रमाण निकलता है । अर्थात् इस गुणकारका परमावधिके उत्कृष्ट क्षेत्रप्रमाणके साथ गुणा करनेसे सर्वावधिके क्षेत्रका प्रमाण निकलता है। और इस ही तरह सर्वावधिके कालका प्रमाण निकालनेकेलिये असंख्यातलोकका गुणकार है । अर्थात् असंख्यातलोकका परमावधिके उत्कृष्ट कालप्रमाणके साथ गुणा करनेसे सर्वावधिके कालका प्रमाण निकलता है। परमावधिके विषयभूत उत्कृष्ट क्षेत्र और उत्कृष्ट कालका प्रमाण निकालनेकेलिये दो करणसूत्रोंको कहते है। इच्छिदरासिच्छेदं दिण्णच्छेदेहिं माजिदे तत्थ । लद्धमिददिण्णरासीणब्मासे इच्छिदो रासी ॥ ४१९ ॥ इच्छितराशिच्छेदं देयच्छेदैर्भाजिते तत्र । लव्धमितदेयराशीनामभ्यासे इच्छितो राशिः ।। ४१९ ॥ अर्थ-विवक्षित राशिके अर्धच्छेदोंमें देय राशिके अर्धच्छेदोंका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतनी जगह देयराशिको रखकर परस्पर गुणा करनेसे विवक्षित राशिका प्रमाण निकलता है। दिण्णच्छेदेणवहिदलोगच्छेदेण पदधणे मजिदे । लद्धमिदलोगगुणणं परमावहिचरिमगुणगारो॥ ४२० ॥ देयच्छेदेनावहितलोकच्छेदेन पदधने भजिते । लव्धमितलोकगुणनं परमावधिचरमगुणकारः ॥ ४२० ॥ अर्थ-देयराशिके अर्धच्छेदोंका लोकके अर्धच्छेदोमें भाग देनेसे जो लब्ध आवे उसका विवक्षित संकल्पित धनमें भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतनी जगह लोकप्रमाणको रखकर परस्पर गुणा करनेसे जो राशि उत्पन्न हो वह विवक्षित पदमें क्षेत्र या कालका गुणकार होता है। ऐसे ही परमावधिके अन्तिम भेदमें भी गुणकार जानना । आवलिअसंखभागा जहण्णदव्वस्स होंति पज्जाया। कालस्स जहण्णादो असंखगुणहीणमेत्ता हु ।। ४२१ ॥

गोम्मटसारः । है आवल्यसंख्यभागा जघन्यद्रव्यस्य भवन्ति पर्यायाः । कालस्य जघन्यतः असंख्यगुणहीनमात्रा हि ॥ ४२१ ॥ अर्थ-जघन्य देशावधिके विषयभूत द्रव्यकी पर्याय आवलीके असंख्यातमे भागप्रमाण है । और जघन्य देशावधिक विषयभूत कालका जितना प्रमाण है उससे असंख्यातगुणा हीन जघन्य देशावधिक विषयभूत भावका प्रमाण सम्वोहित्ति य कमसो आवलिअसंखभागगुणिदकमा । दव्वाणं भावाणं पदसंखा सरिसगा होति ॥ ४२२ ॥ सर्वावधिरिति च क्रमश. आवल्यसंख्यभागगुणितक्रमाः । द्रव्याना भावानां पदसंख्या. सदृशकाः भवन्ति ॥ ४२२ ॥ अर्थ-देशावधिके जघन्य द्रव्यकी पर्यायरूप भाव, जघन्य देशावधिसे मर्वावधिपर्यन्त आवलीके असंख्यातमे भागसे गुणितक्रम है । अत एव द्रव्य तथा भावके पदोंकी सख्या सदृश है । भावार्थ-जहा पर देशावधिक विषयभूत द्रव्यकी अपेक्षा जघन्य भेद है वहा पर भावकी अपेक्षा भी आवलीके असंख्यातमे भाग प्रमाण जघन्य भेद होता है। और जहां पर द्रव्यकी अपेक्षा दूसरा भेद होता है, वहा भावकी अपेक्षा भी प्रथम भेटसे आवलीके असंख्यातमे भागगुणा दूसरा भेद होता है । जहा पर द्रव्यकी अपेक्षा तीसरा भेट होता है वहां पर भावकी अपेक्षा दूसरे भेदसे आवलीके असख्यातमे भागगुणा तीसरा भेद होता है। इस ही क्रमसे सर्वावधिपर्यन्त जानना । अवधि ज्ञानके द्रव्यकी अपेक्षासे जितने भेद है उतने ही भेद भावकी अपेक्षासे है । अत एव द्रव्य तथा भावकी पदसंख्या सदृश है। नरक गतिमें अवधिक विषयभूत क्षेत्रका प्रमाण बताते है । सत्तमखिदिम्मि कोसं कोसस्सद्धं पवड्डदे ताव । जाव य पढमे णिरये जोयणमेकं हवे पुण्णं ॥ ४२३ ॥ सप्तमाक्षितौ क्रोशं क्रोशम्याधि प्रवर्धते तावत् । यावच्च प्रथमे निरये योजनमेक भवेत् पूर्णम् ॥ ४२३ ॥ अर्थ-सातमी भूमिमे अवधि जानके विषयभूत क्षेत्रका प्रमाण एक कोस है । इसके ऊपर आध २ कोस की वृद्धि तब तक होती है जब तक कि प्रथम नरकमें अवधि ज्ञानके विषयभूत क्षेत्रका प्रमाण पूर्ण एक योजन हो । भावार्थ~सातमी पृनीमें अवधिका क्षेत्र एक कोस है । इसके उपर प्रथम भूमिके अवधि-क्षेत्र पर्यन्त क्रमसे आध २ कोसकी वृद्धि होती है । प्रथम भूमिमें अधि-क्षेत्र का प्रमाण एक योजन है तिर्यगति और मनप्यगनिमें अस्तिो बताते है।

१५८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । तिरिये अवरं ओघो तेजोयते य होदि उक्कस्सं । मणुए ओ, देवे जहाकम सुणह वोच्छामि ॥ ४२४ ॥ तिरश्चि अवरमोघः तेजोऽन्ते च भवति उत्कृष्टम् । मनुजे ओघः देवे यथाक्रमं शृणुत वक्ष्यामि ॥ ४२४ ॥ अर्थ-तिर्यच्चोंके अवधि ज्ञान जघन्य देशावधिसे लेकर उत्कृष्टताकी अपेक्षा उस भेदपर्यन्त होता है कि जो देशावधिका भेद तैजस शरीरको विषय करता है। मनुष्य गतिमें अवधि ज्ञान जघन्य देशावधिसे लेकर उत्कृष्टतया सर्वावधिपर्यन्त होता है। देवगतिमें अवधि ज्ञानको यथाक्रमसे कहूंगा सो सुनो । प्रतिज्ञाके अनुसार देवगतिमें अवधिके क्षेत्रादिका वर्णन करते है। पणुवीसजोयणाई दिवसंतं च य कुमारभोम्माणं । संखेजगुणं खेत्तं बहुगं कालं तु जोइसिगे ॥ ४२५ ॥ पञ्चविशतियोजनानि दिवसान्तं च च कुमारभौमयोः । संख्यातगुणं क्षेत्रं बहुकः कालस्तु ज्योतिष्के ॥ ४२५ ॥ अर्थ-भवनवासी और व्यन्तरोकी अवधिके क्षेत्रका जघन्य प्रमाण पच्चीस योजन और जघन्य काल कुछ कम एक दिन है । और ज्योतिषी देवोकी अवधिका क्षेत्र इससे संख्या- तगुणा है और काल इससे बहुत अधिक है। असुराणभसंखेज्जा कोडीओ सेसजोइसंताणं । संखातीदसहस्सा उक्कस्सोहीण विसओ दु॥ ४२६ ॥ असुराणामसंख्येयाः कोट्यः शेषज्योतिष्कान्तानाम् । संख्यातीतसहस्रा उत्कृष्टावधीना विषयस्तु ॥ ४२६ ॥ अर्थ--असुरकुमारोंकी अवधिका उत्कृष्ट विषयक्षेत्र असंख्यात कोटि योजन है । शेष नौ प्रकारके भवनवासी तथा व्यन्तर और ज्योतिषी इनकी अवधिका उत्कृष्ट विषयक्षेत्र असं- ख्यात हजार योजन है। असुराणमसंखेज्जा वस्सा पुण सेसजोइसंताणं । तस्संखेज्जदिभागं कालेण य होदि णियमेण ॥ ४२७ ॥ असुराणामसंख्येयानि वर्षाणि पुनः शेषज्योतिप्कान्तानाम् । तत्संख्यातभागं कालेन च भवति नियमेन ॥ ४२७ ॥ अर्थ-असुरकुमारोंकी अवधिके उत्कृष्ट कालका प्रमाण असंख्यात वर्ष है। और मेष नौ प्रकारके भवनवासी व्यन्तर ज्योतिषी इनकी अवधिके उत्कृष्ट कालका प्रमाण असुरोकी अवधिक उत्कृष्ट कालके प्रमाणसे नियमसे संख्यातमें भागमात्र गोम्मटसारः । १६९ भवणतियाणमधोधो थोवं तिरियेण होदि बहुगं तु । उड्डेण भवणवासी सुरगिरिसिहरोत्ति पस्संति ॥ ४२८॥ भवनत्रिकाणामधोऽधः स्तोकं तिरश्चा भवति वहुकं तु । ऊर्बेन भवनवासिनः सुरगिरिशिखरान्तं पश्यन्ति ॥ ४२८ ॥ अर्थ-भवनवासी व्यन्तर ज्योतिषी इनकी अवधिका क्षेत्र नीचे २ कम होता है और तिर्यग् रूपसे अधिक होता है । तथा भवनवासी देव अपने अवस्थित स्थानसे सुरगिरिके ( मेरुके ) शिखरपर्यन्त अवधिदर्शनके द्वारा देखते है । सक्कीसाणा पढमं बिदियं तु सणक्कुमारमाहिंदा । तदियं तु बम्हलांतव सुक्कसहस्सारया तुरियं ॥ ४२९ ॥ शक्रैशानाः प्रथम द्वितीयं तु सनत्कुमारमाहेन्द्राः । तृतीयं तु ब्रह्मलान्तवाः शुक्रसहस्रारकाः तुरियम् ॥ ४२९ ॥ अर्थ-सौधर्म और ऐशान स्वर्गके देव अवधिके द्वारा प्रथम भूमिपर्यन्त देखते हैं । सनत्कुमार माहेन्द्र स्वर्गके देव दूसरी पृथ्वीतक देखते है । ब्रह्म ब्रह्मोत्तर लातव कापिष्ठ स्वर्गवाले देव तीसरी भूमि तक देखते है। शुक्र महाशुक्र शतार सहस्रार स्वर्गके देव चौथी भूमि तक देखते है। आणदपाणदवासी आरण तह अच्चुदा य पस्सति । पंचमखिदिपेरंतं छठिं गेवेज्जगा देवा ॥ ४३० ॥ आनतप्राणतवासिनः आरणास्तथा अच्युताश्च पश्यन्ति । पञ्चमक्षितिपर्यन्तं पष्ठी ग्रैवेयका देवाः ॥ ४३० ॥ अर्थ-आनत प्राणत आरण अच्युत स्वर्गके देव पात्रमी भूमि तक अवधिके द्वारा देखते है । और ग्रैवेयकवासी देव छट्ठी भूमि तक देखते है । सव्वं च लोयणालिं पस्सति अणुत्तरेसु जे देवा । सक्खेत्ते य सकम्मे रूबगदमणंतभागं च ।। ४३१ ॥ सर्वां च लोकनाली पश्यन्ति अनुत्तरेषु ये देवाः । स्वक्षेत्रे च स्वकर्मणि रूपगतमनन्तभाग च ॥ ४३१ ॥ अर्थ-अनुत्तरवासी देव सम्पूर्ण लोकनालीको अवधिद्वारा देखते हैं । अवधिक विषयभृत क्षेत्रका जितना प्रदेशप्रचय है उममें से एक २ कम करते जाना चाहिये और अवविज्ञानार- रण कर्मका जितना द्रव्य है उसमें ध्रुवहारका भाग देते जाना चाहिये । अवधिक क्षेत्ररूप प्रदेशप्रवयमें एक २ प्रदेश कहा तक कम करना चाहिये । और अधिज्ञानावरण कम्प द्रव्यम ध्रुवहारका भाग कहा तक देते जाना चाहिये ! उर्माको आगे स्पष्ट करते है:- १६० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । कप्पसुराणं सगसगओहीखेत्तं विविस्ससोबचयं । ओहीदव्वपमाणं संठाविय धुवहरेण हरे ॥ ४३२ ॥ सगसगखेत्तपदेससलायपमाणं समप्पढ़े जाव । तत्थतणचरिमखंडं तत्थतणोहिस्स व्वं तु ॥ ४३३ ॥ कल्पसुराणा स्वकस्वकावधिक्षेत्रं विविनसोपचयम् । अवधिद्रव्यप्रमाणं सस्थाप्य ध्रुवहरेण हरेत् ॥ ४३२ ॥ स्वकस्वकक्षेत्रप्रदशशलाकाप्रमाणं समाप्यते यावत् । तत्रतनचरमखण्डं तत्रतनावधेर्द्रव्यं तु ॥ ४३३ ॥ अर्थ-कल्पवासी देवोमे अपनी २ अवधिके क्षेत्रका जितना २ प्रमाण है उसका एक जगह स्थापन कर, और दूसरी जगह विस्त्रसोपचयरहित अवधिज्ञानावरण कर्मरूप द्रव्यका स्थापन कर, द्रव्यप्रमाणमे ध्रुवहारका भाग देना चाहिये और प्रदेशप्रमाणमें एक कम करना चाहिये । द्रव्यप्रमाणमे ध्रुवहारका एकवार भाग देनेसे लब्ध द्रव्यप्रमाणमें दूसरीवार ध्रुवहारका भाग देना चाहिये और प्रदेशप्रचयमे एक और कम करना चाहिये । दूसरी बार भाग देनेसे लब्ध द्रव्यप्रमाणमें तीसरी वार ध्रुवहारका भाग देना चाहिये और प्रदेशप्रचयमें तीसरी वार एक कम करना चाहिये । इस प्रकार उत्तरोत्तर लब्ध द्रव्यप्रमणमें ध्रुवहारका भाग, एक २ प्रदेश कम करते २ जब सम्पूर्ण प्रदेशप्रचयरूप शलाका राशि समाप्त होजाय वहा तक देना चाहिये । इसतरह प्रदेशप्रचयमें एक २ प्रदेश कम करते २ और द्रव्यप्रमाणमे ध्रुवहारका माग देते २ जहा पर प्रदेशप्रचय समाप्त हो वहा पर द्रव्यका जो स्कन्ध शेष रहे उतने स्कन्धको अवधिके द्वारा वे कल्पवासी देव जानते है कि जिनकी अवधिके विषयभूत क्षेत्रका प्रदेशप्रचय विवक्षित हो । भावार्थ-जैसे सौधर्म और ईशानकल्पवासी देवोंका क्षेत्र प्रथम नरक पर्यत है । ईशान कल्पके ऊपरके भागसे प्रथम नरक डेढ़ राजू है । इसलिये एक राजू लम्बे चौडे और डेढ़ राजू उचे क्षेत्रके जितने प्रदेश हो उनको एक जगह रखना, और दूसरी जगह अवधि नानावरण कर्मके द्रव्यका स्थापन करना । द्रव्यप्रमाणमें एक वार ध्रुवहा- रका भागडेना और प्रदेशप्रमाणमेसे एक कम करना। इस पहली बार ध्रुवहारका भाग देनेसे जो लब्य आया उस नृत्यप्रमाणमे दूसरीवार ध्रुवहारका भाग देना और प्रदेशप्रमाणमेसे दूसरा एक और कम करना । इस तरह प्रदाप्रमाणमेसे एक २ कम करते २ तथा उत्तरोत्तर लब्ध द्वन्यप्रमाणम ध्रुवहारका भाग देत २ प्रदेशप्रचय समाप्त होनेपर द्रव्यका जो परिमाण शेष रहे उन पग्माणके सुक्ष्म पट्टलम्कन्धको सौधर्म और ईशान कल्पवासी देव अवधिके द्वारा जानते मां म्यूटको तो जानते ही है, किन्तु इससे सूमिको नहीं जानते । इस ही तरह -- भी मनाना ।

गोम्मटसारः। १६.१ , सौधर्म ईशान कल्पवासी देवोंका क्षेत्र डेढ़राजू , सनत्कुमार माहेन्द्रवालोंका चार राजू, ब्रह्म ब्रह्मोत्तरवालोका साढ़े पांच राजू, लांतव कापिष्ठवालोंका छह राजू , शुक्र महाशुक्रवा- लोका साढ़े सात राजू , सतार सहस्रारवालोंका आठ राजू , अनात प्राणतवालोंका साढ़े नव- राजू , आरण अच्युतवालोंका दश राजू, ग्रैवेयकवालोंका ग्यारह राजू, अनुदिश विमानवा- लोका कुछ अधिक तेरह राजू , अनुत्तरविमानवालोंका कुछ कम चौदह राजू क्षेत्र है। इस क्षेत्रप्रमाणके अनुसार ही उनकी ( कल्पवासी देवों की ) अवधिके विषयभूत द्रव्यका प्रमाण उक्त क्रमानुसार निकलता है। सोहम्मीसाणाणमसंखेज्जाओ हु वस्सकोडीओ। उवरिमकप्पचउक्के पल्लासंखेज्जभागो दु ॥ ४३४ ॥ तत्तो लांतवकप्पप्पहुदी सव्वत्थसिद्धिपेरंतं । किंचूणपल्लमेत्तं कालपमाणं जहाजोग्गम् ।। ४३५ ॥ सौधर्मशानानामसंख्येया हि वर्षकोट्यः । उपरिमकल्पचतुष्के पल्यासंख्यातभागस्तु ॥ ४३४ ॥ ततो लान्तवकल्पप्रभृति सर्वार्थसिद्धिपर्यन्तम् । किञ्चिदूनपल्यमानं कालप्रमाणं यथायोग्यम् ॥ ४३५ अर्थ-सौधर्म और ईशान स्वर्गके देवोंकी अवधिका काल असंख्यात कोटि वर्ष है । इसके ऊपर सनत्कुमार माहेन्द्र ब्रह्म ब्रह्मोत्तर कल्पवाले देवोकी अवधिका काल . यथायोग्य पत्यका असंख्यातमा भाग है। इसके ऊपर लान्तव स्वर्गसे लेकर सर्वार्थसिद्धिपर्यन्त वाले देवोंकी अवधिका काल कुछ कम पल्यप्रमाण है। जोइसियंताणोहीखेत्ता उत्ता ण होति वणपदरा । कप्पसुराणं च पुणो विसरित्थ आयदं होदि ॥ ४३६ ॥ ज्योतिष्कान्तानामवधिक्षेत्राणि उक्तानि न भवन्ति घनप्रतराणि । कल्पसुराणां च पुनः विसदृशमायतं भवति ॥ ४३६ ॥ अर्थ-भवनवासी व्यन्तर ज्योतिषी इनकी अवधिका क्षेत्र वरावर घनरूप नहीं है। कल्प- वासी देवोंकी अवधिका क्षेत्र आयतचतुरस्र ( चौकोर; किन्तु लम्बईमे अधिक और चौड़ाई में थोड़ा ) है । शेप मनुष्य तिर्यच नारकी इनकी अवधिका विषयभूत क्षेत्र बरावर घनरूप है । ॥ इति अवधिज्ञानप्ररूपणा ।। मनःपर्यय ज्ञानका स्वरूप बताते है । चिंतियमचिंतियं वा अद्धंचिंतियमणेयमेयगयं । मणपज्जवं ति उच्चइ जं जाणइ तं खु णरलोए ॥ ४३७ ।। गो. २१

१६२
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
।
चिन्तितमचिन्तितं वा अधं चिन्तितमनेकभेदगतम् ।
मनःपर्यय इत्युच्यते यज्जानाति तत्खलु नरलोके ।। ४३७ ।।
अर्थ-जिसका भूत कालमें चिन्तवन किया हो, अथवा जिसका भविष्यत् कालम
चिन्तवन किया जायगा, अथवा वर्तमानमें जिसका आधा चिन्तवन किया है, इत्यादि अनेक
भेदस्वरूप दूसरेके मनमे स्थित पदार्थ जिसके द्वारा जाना जाय उस ज्ञानको मनःपर्यय कहते
है। यह मनःपर्यय ज्ञान मनुष्यक्षेत्रमें ही होता है, वाहर नहीं ।
मनःपर्ययके भेदोंको गिनाते है ।
मणपज्जवं च दुविहं उजुविउल मदित्ति उजुमदी तिविहा ।
उजुमणवयणे काए गदत्थविसयात्ति णियमेण ॥ ४३८॥
मनःपर्ययश्च द्विविधः ऋजुविपुलमतीति ऋजुमतिस्त्रिविधा ।
ऋजुमनोवचने काये गतार्थविषया इति नियमेन ॥ ४३८ ।।
अर्थ-सामान्यकी अपेक्षा मनःपर्यय एक प्रकारका है। और विशेष भेदोंकी अपेक्षा दो
प्रकारका है । एक ऋजुमति दूसरा विपुलमति । ऋजुमतिके भी तीन भेद है । ऋजुमनोगतार्थ-
विषयक, ऋजुवचनगतार्थविषक, ऋजुकायगतार्थविषयक । परकीयमनोगत होने पर भी जो
सरलतया मन वचन कायके द्वारा किया गया हो ऐसे पदार्थको विषय करनेवाले ज्ञानको ऋजुमति
कहते है । अतएव सरल मन वचन कायके द्वारा किये हुए पदार्थको विषय करनेकी अपेक्षा
ऋजुमतिके पूर्वोक्त तीन भेद है।
विउलमदीवि य छद्धा उजुगाणुजुवयणकायचित्तगयं ।
अत्थं जाणदि जम्हा सद्दत्थगया हु ताणत्था ॥ ४३९ ।।
विपुलमतिरपि च पोढा ऋजुगानृजुवचनकायचित्तगतम् ।
अर्थ जानाति यस्मात् शब्दार्थगता हि तेषामर्थाः ॥ ४३९ ।।
अर्थ-विपुलमतिके छह भेद है । ऋजु मन वचन कायगत पदार्थको विषय करनेकी
अपेक्षा तीन भेद, और कुटिल मन वचन कायके द्वारा किये हुए परकीय मनोगत पदार्थोको
विपय करनेकी अपेक्षा तीन भेद । ऋजुमति तथा विपुलमति मनःपर्ययके विषय शब्दगत तथा
अर्थगत दोनो ही प्रकारके होते है।
तियकालविसयरूविं चिंतितं वट्टमाणजीवेण ।
उजुमदिणाणं जाणदि भूदभविस्सं च विउलमदी ॥ ४४० ॥
त्रिकालविपयरूपि चिंतितं वर्तमानजीवेन ।
ऋजुमतिज्ञानं जानाति भूतभविष्यच्च विपुलमतिः ॥ ४४० ॥

गोम्मटसारः। अर्थ-पुद्गल द्रव्य त्रिकालविषयक है । उसमें वर्तमान जीवके द्वारा चिन्त्यमान (वर्त- मानमें जिसका चितवन किया जा रहा है) पदार्थको ऋजुमति मनःपर्यय ज्ञान जानता है । और विपुलमतिज्ञान भूत भविष्यत्को भी जानता है । भावार्थ-जिसका मूतकालमें चिन्तवन किया हो अथवा जिसका भविष्यत्मे चिन्तवन किया जायगा यद्वा वर्तमानमें जिसका चिन्तवन होरहा है, ऐसे तीनों ही प्रकारके पदार्थको विपुलमति मनःपर्यय ज्ञान जानता है। सव्वंगअंगसंभवचिण्हादुप्पज्जदे जहा ओही । मणपज्जवं च दवमणादो उप्पज्जदे णियमा ॥ ४४१ ॥ सर्वाङ्गाङ्गसम्भवचिह्नादुत्पद्यते यथावधिः । मनःपर्ययं च द्रव्यमनस्त उत्पद्यते नियमात् ॥ ४४१ ॥ अर्थ-जिस प्रकार अवधिज्ञान शंखादि शुभ चिह्नोंसे युक्त समस्त अइसे उत्पन्न होता है । उस तरह मनःपर्यय ज्ञान जहांपर द्रव्यमन होता है उनही प्रदेशोंसे उत्पन्न होता है । भावार्थ-जहांपर द्रव्य मन होता है उस स्थानपर जो आत्माके प्रदेश है वहीं मनःपर्यय ज्ञानावरण कर्मका क्षयोपशम होता और वहीसे मनःपर्यय ज्ञान उत्पन्न होता है। किन्तु अवधि सर्वाङ्गसे होती है; क्योंकि यद्यपि अवधि शंखादि चिन्हों के स्थानसे ही होती है तथापि इन चिन्हो का स्थान द्रव्यमन की तरह निश्चित नहीं है । यह उत्पत्तिस्थानकी अपेक्षा अवधि और मनःपर्यय ज्ञानमें अंतर है। हिदि होदि हु दव्वमणं वियसियअट्ठच्छदारविंदं वा । अङ्गोबंगुदयादो मणवग्गणखंधदो णियमा ॥ ४४२ ॥ हृदि भवति हि द्रव्यमनः विकसिताष्टछदारविंदवत् । आङ्गोपाङोदयात् मनोवर्गणास्कन्धतो नियमात् ॥ ४४२ ॥ अर्थ-आङ्गोपाङ्गनामकर्मके उदयसे मनोवर्गणाके स्कन्धोंके द्वारा हृदयस्थानमें निय. मसे विकसित आठ पाखडीके कमलके आकारमं द्रव्यमन उत्पन्न होता है । णोइंदियत्ति सण्णा तस्स हवे सेसइंदियाणं वा । वत्तत्ताभावादो मणमणपज्जं च तत्थ हवे ॥ ४४३ ॥ नोइन्द्रियमिति संज्ञा तम्य भवेत् शेषन्द्रियाणा वा । व्यक्तत्वाभावात् मनो मन पर्ययश्च तत्र भवत् ॥ ४४३ ॥ अर्थ---उम द्रव्यमनकी नोडन्द्रिय मंना भी हैं। क्योंकि दूसरी इन्द्रियोंकी तरह यह व्यक्त नहीं है । इस द्रव्यमन के होनेपर ही भायमन तथा मन.पर्यय कान उत्पन्न होता है।

रामचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम् । ~ .. मनःपर्यय ज्ञान का स्वामी बताते है । मणपज्जवं च णाणं सत्तसु विरदेसु सत्तइड्डीणं । एगादिजुदेसु हचे वढुंतविसिद्धचरणेसु ॥ ४४४ ॥ मनःपर्ययश्च ज्ञानं सप्तसु विरतेपु सप्तर्षीनाम् । एकादियुतेषु भवेत् वर्धमानविशिष्टाचरणेपु ॥ ४४४ ॥ अर्थ-प्रमत्तादि क्षीणकपायपर्यन्त सात गुणस्थानामसे किसी एक गुणस्थानवालेके, इस पर भी सात ऋद्धियोंसे किसी एक ऋद्धिको धारण करनेवालेके. ऋद्धिप्राप्तमें भी वर्धमान तथा विशिष्ट चारित्रको धारणकरनेवालोंके ही यह मनःपर्यय ज्ञान उत्पन्न होता है। इंदियणोइंदियजोगादि पेक्खित्तु उजुमदी होदि । णिरवेक्खिय विउलमदी ओहिं वा होदि णियमेण ॥ ४४५ ॥ इन्द्रियनोइन्द्रिययोगादिमपेक्ष्य ऋजुमतिर्भवति । निरपेक्ष्य विपुलमतिः अवधिर्वा भवति नियमेन ॥ ४४५ ॥ अर्थ-अपने तथा परके स्पर्शनादि इन्द्रिय और मन तथा मनोयोग काययोग वचन- योगकी अपेक्षासे ऋजुमति मनःपर्यय ज्ञान उत्पन्न होता है । अर्थात् वर्तमानमें विचार- प्राप्त स्पर्शनादिके विषयोंको ऋजुमति जानता है। किन्तु विपुलमति अवधिकी तरह इनकी अपेक्षाके बिना ही नियमसे होता है । पडिवादी पुण पढमा अप्पडिवादी हु होदि बिदिया हु। सुद्धो पढमो बोहो सुद्धतरो बिदियबोहो दु॥४४६ ॥ प्रतिपाती पुनः प्रथमः अप्रतिपाती हि भवति द्वितीयो हि। शुद्धः प्रथमो बोधः शुद्धतरो द्वितीयवोधस्तु ॥ ४४६ ॥ अर्थ-ऋजुमति प्रतिपाती है, क्योंकि ऋजुमतिवाला उपशमक तथा क्षपक दोनों श्रेणियोंपर चढ़ता है। उसमें यद्यपि क्षपककी अपेक्षा ऋजुमतिवालेका पतन नहीं होता। तथापि उपशम श्रेणीकी अपेक्षा पतन सम्भव है। विपुलमति सर्वथा अप्रतिपाती है । तथा ऋजुमति शुद्ध है, और विपुलमति इससे भी शुद्ध होता है। परमणसिट्ठियम8 ईहामदिणा उजुट्ठियं लहिय । पच्छा पञ्चक्खेण य उजुमदिणा जाणदे णियमा ॥ ४४७ ॥ परमनसिस्थितमर्थमीहामत्या ऋजुस्थितं लब्ध्वा । पश्चात् प्रत्यक्षेण च ऋजुमतिना जानीते नियमात् ॥ ४४७ ॥ अर्थ--ऋजुमतिवाला दूसरेके मनमें सरलताके साथ स्थित पदार्थको पहले ईहामति- जानके द्वारा जानता है, पीछे प्रत्यक्ष रूपसे नियमसे ऋजुमति ज्ञानके द्वारा जानता है ।

गोम्मटसारः। चिंतियमचिंतियं वा अद्धं चिंतियमणेयभेयगयं । ओहिं वा विउलमदी लहिऊण विजाणए पच्छा॥ ४४८॥ चिन्तितमचिन्तितं वा अर्द्ध चिन्तितमनेकभेदगतम् । अवधिर्वा विपुलमतिः लब्ध्वा विजानाति पश्चात् ॥ ४४८ ॥ अर्थ-चिन्तित अचिन्तित अर्धचिन्तित इस तरह अनेक भेदोंको प्राप्त दूसरेके मनोगत पदार्थको अवधिकी तरह विपुलमति प्रत्यक्षरूपसे जानता है । दव्वं खेत्तं कालं भावं पडि जीवलक्खियं रुबि । उजुविउलमदी जाणदि अवरवरं मज्झिमं च तहा ॥ ४४९ ॥ द्रव्यं क्षेत्रं कालं भावं प्रति जीवलक्षितं रूपि । ऋविपुलमती जानीतः अवरवरं मध्यमं च तथा ॥ ४४९ ॥ अर्थ-द्रव्य क्षेत्र काल भावकी अपेक्षासे रूपि ( पुद्गल ) द्रव्यको तथा उसके सम्ब- न्धसे जीवद्रव्यको भी ऋजुमति और विपुलमति जघन्य मध्यम उत्कृष्ट तीन तीन प्रकारसे जानते हैं। ऋजुमतिका जघन्य और उत्कृष्ट द्रव्यप्रमाण बताते है । अवरं दव्वमुदालियसरीरणिज्जिण्णसमयबद्धं तु । चक्खिदियणिज्जण्णं उक्कस्सं उजुमदिस्स हवे ॥ ४५० ॥ अवरं द्रव्यमौरालिकशरीरनिर्णिसमयप्रवद्धं तु । चक्षुरिन्द्रियनिर्णिमुत्कृष्टमृजमतेर्भवेत् ॥ ४५० ॥ अर्थ-औदारिक शरीरके निर्जीर्ण समयप्रवद्धप्रमाण ऋजुमतिके जघन्य द्रव्यका प्रमाण है । तथा चक्षुरिन्द्रियकी निर्जरा-द्रव्य-प्रमाण उत्कृष्ट द्रव्यका प्रमाण है। विपुलमतिके द्रव्यका प्रमाण बताते है । मणदव्बवग्गणाणमणंतिमभागेण उजुगउक्कस्सं । खंडिदमेत्तं होदि हु विउलमदिस्सावरं दव्यं ॥ ४५१ ।। मनोद्रव्यवर्गणानामनन्तिमभागेन ऋजुगोत्कृष्टम् । खण्डितमात्र भवति हि विपुलमतेरवर द्रव्यम ॥ ४५१ ॥ अर्थ-मनोद्रन्यवर्गणाके जितने विकल्प है, उसमें अनन्तका भाग देनेसे लक्ष्य एक भागप्रमाण ध्रुवहारका, जुमतिके विषयभूत उन्कृष्ट द्वन्यप्रमाणम भाग देनेस जो लब्ध आ उतने त्यस्कन्धको विपुलमति जघन्यकी अपेक्षासे जानता है। अट्ठण्हं कम्माणं समयपवद्धं विविस्ससोवचयम् । धुवहारेणिगिवारं भजिदे विदियं हवे दव्वं ॥ ४५२ ।।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अष्टानां कर्मणां समयप्रबद्धं विवित्रसोपचयम । ध्रुवहारेणैकवारं भजिते द्वितीयं भवेत् द्रव्यम् ॥ ४५२ ।। अर्थ-विनसोपचयसे रहित आठ कर्मोके समयपत्रसका जो प्रमाण है उसमें एक्वार ध्रुवहारका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना विपुलमतिके द्वितीय द्रव्यका प्रमाण होता है । तविदियं कप्पाणमसंखेज्जाणं च समयसंखसमं । धुवहारेणवहरिदे होदि हु उक्कस्सयं दबं ॥४५३ ।। तद्वितीयं कल्पानामसंख्येयानां च समयसंख्यासमम् । ध्रुवहारेणावहृते भवति हि उत्कृष्टकं द्रव्यम् ॥ ४५२ ॥ अर्थ-~असंख्यात कल्पों के जितने समय है उतनी वार विपुलमतिके द्वितीय द्रव्यमें ध्रुवहारका भाग देनेसे विपुलमतिके उत्कृष्ट द्रव्यका प्रमाण निकलता है। गाउयपुधत्तमवरं उक्कस्सं होदि जोयणपुधत्तं । विउलमदिस्स य अवरं तस्स पुधत्तं वरं खु णरलोयं ॥ ४५४ ॥ गन्यूतिपृथक्त्वमवरमुत्कृष्टं भवति योजनपृथक्त्वम् । विपुलमतेश्च अवरं तस्य पृथक्त्वं वरं खलु नरलोकः ॥ ४५४ ॥ अर्थ-ऋजुमतिका जघन्य क्षेत्र दो तीन कोस और उत्कृष्ट सात आठ योजन है। विपुलमतिका जघन्य क्षेत्र आठ नव योजन तथा उत्कृष्ट मनुष्यलोकप्रमाण है। णरलोएत्ति य वयणं विक्खंभणियामयं ण वढुस्स । जम्हा तग्घणपदरं मणपज्जवखेत्तमुद्दिढ़ ॥ ४५५ ।। नरलोक इति च वचनं विष्कम्भनियामकं न वृत्तस्य । यस्मात् तद्धनप्रतरं मन पर्ययक्षेत्रमुद्दिष्टम् ॥ ४९५ ॥ अर्थ-मनःपर्ययके उत्कृष्ट क्षेत्रका प्रमाण जो नरलोकप्रमाण कहा है सो नरलोक इस शब्दसे मनुष्यलोकका विष्कम्भ ग्रहण करना चाहिये नकि वृत्त; क्योंकि दूसरेके द्वारा चिंतित और मानुषोत्तर पर्वतके वाहर स्थित पदार्थको भी विपुलमति जानता है; क्योकि मनःपर्यय ज्ञानका उत्कृष्ट क्षेत्र समचतुरस्र घनप्रतररूप पैतालीस लाख योजनप्रमाण है। दुगतिगभवा हु अवरं सत्तट्ठभवा हवंति उक्कस्सं । अडणवभवा हु अवरमसंखेज्ज विउलउक्कस्सं ॥ ४५६ ॥ द्विकत्रिकभवा हि अवरं सप्ताष्टभवा भवन्ति उत्कृष्टम् । अष्टनवभवा हि अवरमसंख्येयं विपुलोत्कृष्टम् ॥ ४५६ ॥ अर्थ-कालकी अपेक्षासे ऋजुमतिका विषयभूत जघन्य काल दो तीन भव और उत्कृष्ट सात आठ भव, तथा विपुलमतिका जघन्य आठ नौ भव और उत्कृष्ट पल्यके असंख्यातमे भागप्रमाण है।

गोम्मटसारः। १६७ आवलिअसंखभागं अवरं च वरं च वरमसंखगुणं । तत्तो असंखगुणिदं असंखलोगं तु विउलमदी ॥ ४५७ ॥ आवल्यसंख्यभागमवरं च वरं च वरमसंख्यगुणम् । ततःअसंख्यगुणितमसंख्यलोक तु विपुलमतिः ॥ ४५७ ॥ अर्थ-भावकी अपेक्षासे ऋजुमतिका जघन्य तथा उत्कृष्ट विषय आवलीके असंख्या- तमे भागप्रमाण है; तथापि जघन्य प्रमाणसे उत्कृष्ट प्रमाण असंख्यातगुणा है। विपुलमतिका जवन्यप्रमाण ऋजुमतिके उत्कृष्ट विषयसे असंख्यातगुणा है, और उत्कृष्ट विषय असंख्यात लोकप्रमाण है। मज्झिमदव्वं खेत्तं कालं भावं च मज्झिमं णाणं । जाणदि इदि मणपज्जवणाणं कहिदं समासेण ॥ ४५८ ॥ मध्यमद्रव्यं क्षेत्रं कालं भावं च मध्यमं ज्ञानम् । जानातीति मनःपर्ययज्ञानं कथितं समासेन ॥ ४५८ ॥ अर्थ-इस प्रकार द्रव्य क्षेत्र काल भावका जघन्य और उत्कृष्ट प्रमाण बताया इनके मध्यके जितने भेद है उनको मनःपर्यय ज्ञानके मध्यम भेद विषय करते है। इस तरह संक्षेपसे मनःपर्यय ज्ञानका निरूपण किया । केवलज्ञानका निरूपण करते है। संपुण्णं तु समग्गं केवलमसवत्त सव्वभावगयं । लोयालोयवितिमिरं केवलणाणं मुणेदव्वं ॥ ४५९ ॥ सम्पूर्ण तु समग्रं केवलमसपत्नं सर्वभावगतम् । लोकालोकवितिमिरं केवलज्ञानं मन्तव्यम् ॥ ४५९ ॥ अर्थ-यह केवलज्ञान, सम्पूर्ण, समग्र, केवल, प्रतिपक्षरहित, सर्वपदार्थगत, और लोका- लोकमें अन्धकार रहित होता है। भावार्थ-यह ज्ञान समस्त पदार्थोको विषय करनेवाला है और लोकालोकके विषयमे आवरण रहित है। तथा जीवद्रन्यकी ज्ञान शक्तिके जितने अश है वे यहापर् सम्पूर्ण व्यक्त होगये है इसलिये उसको ( केवल ज्ञानको ) सम्पूर्ण कहते है। मोहनीय और अन्तरायका सर्वथा क्षय होजानेके कारण वह अप्रतिहतशक्ति युक्त है, अत एव उसको समग्र कहते है । इन्द्रियोकी सहायता की अपेक्षा नहीं रखता इसलिये केवल कहते है । समस्त पदार्थोके विषयकरनेमें उसका कोई बाधक नहीं है इसलिये उसको असपत्न ( प्रतिपक्षरहित ) कहते है। ज्ञानमार्गणामें जीवसंख्याका निरूपण करते है । चटुगदिमदिसुदबोहा पल्लासंखेज्जया हु मणपज्जा । संसेज्जा केवलिणो सिद्धादो हॉति अतिरित्ता ।। ४६० ।।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । चतुर्गतिमतिश्रुतबोधाः पल्यासंख्येया हि मनःपर्ययाः । संख्येयाः केवलिनः सिद्धात् भवन्ति अतिरिक्ताः ॥ ४६० ॥ अर्थ-चारो गतिसम्बन्धी मतिज्ञानियोंका अथवा श्रुतज्ञानियोंका प्रमाण पल्यके असं- ख्यातमे भागप्रमाण है । और मनःपर्ययवाले कुल संख्यात है। तथा केवलियोंका प्रमाण सिद्धराशिसे कुछ अधिक है । भावार्थ-सिद्धराशिमे जिनकी ( अर्हन्तोंकी ) संख्या मिलानेसे केवलियोंका प्रमाण होता है। ओहिरहिदा तिरिक्खा मदिणाणिअसंखभागगा मणुगा । संखेज्जा हु तदूणा मदिणाणी ओहिपरिमाणं ॥ ४६१ ।। अवधिरहिताः तिर्यञ्चः मतिज्ञान्यसंख्यभागका मनुजाः । संख्येया हि तदूना मतिज्ञानिनः परिमाणम् ॥ ४६१ ।। अर्थ-अवधिज्ञानरहित तिर्यञ्च-मतिज्ञानियोंकी संख्याका असंख्यातमा भाग, और अवधिज्ञानरहित मनुष्यों की संख्यात राशि इन दो राशियोंको मतिज्ञानियोंके प्रमाण से घटाने पर जो शेष रहे उतना ही अवधि ज्ञानका प्रमाण है । पल्लासंखघणंगुलहदसदितिरिक्खगदिविभङ्गजुदा । णरसहिदा किंचूणा चदुगदिवेमङ्गपरिमाणम् ॥ ४६२ ।। पत्यासंख्यघनामुलहतश्रेणितिर्यग्गतिविभगयुताः । नरसहिताःकिञ्चिदूनाः चतुर्गतिवैभङ्गपरिमाणम् ॥ ४६२ ॥ अर्थ-पल्यके असंख्यातमे भागसे गुणित घनाडुलका और जगच्छ्रेणीका गुणा करनेसे जो राशि उत्पन्न हो उतने तिर्यञ्च, और संख्यात मनुष्य, घनामुलके द्वितीय वर्गमूलसे गुणित जगच्छ्रेणी प्रमाण नारकी', तथा सम्यग्दृष्टियोंके प्रमाणसे रहित सामान्य देवराशि, इन चारों राशियोंके जोड़नेसे जो प्रमाण हो उतने विभङ्गज्ञानी है। सण्णाणरासिपंचयपरिहीणो सधजीवरासी हु। मदिसुदअण्णाणीणं पत्तेयं होदि परिमाणं ॥ ४६३ ॥ सद्ज्ञानराशिपञ्चकपरिहीनः सर्वजीवराशिर्हि । मतिश्रुताज्ञानिना प्रत्येक भवति परिमाणम् ।। ४६३ ॥ अर्थ -पाच सम्यग्ज्ञानी जीवोंके प्रमाणको ( केवलियोंके प्रमाणसे कुछ अधिक ) सम्पूर्ण जीवराशिके प्रमाणसे घटानेपर जो शेप रहे उतने कुमतिज्ञानी तथा उतने ही कुच तज्ञानी जीव है। इति ज्ञानमार्गणाधिकारः ।। १ परन्नु दसमसे सम्यग्दाठियोंका प्रमाण घटाना ।

गोम्मटसारः ।
१६९
।। अथ संयममार्गणाधिकारः ।
वदसमिदिकसायाणं दंडाण तहिंदियाण पंचण्डं ।
धारणपालणणिग्गहचागजओ संजमो भणिओ ॥ ४६४ ॥
व्रतसमितिकषायाणां दण्डानां तथेन्द्रियाणा पञ्चानाम् ।
धारणपालननिग्रहत्यागजयः संयमो भणितः ॥ ४६४ ॥
अर्थ-अहिंसा अचौर्य सत्य शील ( ब्रह्मचर्य ) अपरिग्रह इन पाच महाव्रतोंका
धारण करना, इ. भापा एपणा आदाननिक्षेण उत्सर्ग इन पांच समितियोंका पालना, चारप्रका-
रकी कषायोंका निग्रह करना, मन वचन काय रूप दण्डका त्याग, तथा पांच इन्द्रियोंका जय,
इसको संयम कहते है । अतएव संयमके पाच भेद है।
संयमकी उत्पत्तिका कारण बताते है।
बादरसंजलणुदये सुहुमुदये समखये य मोहस्स ।
संजमभावो णियमा होदित्ति जिणेहिं णिद्दिढें ॥ ४६५ ॥
वादरसंज्वलनोदये सूक्ष्मोत्ये शमक्षययोश्च मोहस्य ।
संयमभावो नियमात् भवतीति जिनैर्निर्दिष्टम् ॥ ४६५ ॥
अर्थ-वादर संज्वलनके उदयसे अथवा सूक्ष्मलोभके उदयसे और मोहनीय कर्मके
उपशमसे अथवा क्षयसे नियमसे संयमरूप भाव उत्पन्न होते है ऐसा जिनेन्द्रदेवने कहा है ।
इसी अर्थको दो गाथाओं द्वारा स्पष्ट करते है।
बादरसंजलणुदये बादरसंजमतियं खु परिहारो।
पमदिदरे सुहुमुदये सुहुमो संजमगुणो होदि ।। ४६६ ॥
वादरसंज्वलनोदये वादरसयमत्रिकं खलु परिहारः ।
प्रमत्तेतरस्मिन् सूक्ष्मोदये सूक्ष्म संयमगुणो भवति ॥ ४६६ ॥
अर्थ-जो संयमके विरोधी नहीं है ऐसे वादर संज्वलन कपायके देशवाति स्पर्धकोंके
उदयसे सामायिक छेदोपस्थापना परिहारविशुद्धि ये तीन चारित्र होते है। इनमेंसे परिहारवि-
शुद्धि संयम तो प्रमत्त और अप्रमत्तमें ही होता है, किन्तु सामायिक और छेदोपस्थापना प्रम-
तादि अनिवृत्तिकरणपर्यन्त होते हैं । मूक्ष्मकृष्टिको प्राप्त सञ्चलन लोभके उदयसे सूक्ष्मसापराय
गुणस्थानवर्ती सयम होता है।
जहखादसंजमो पुण उवसमदो होदि मोहणीयस्स ।
खयदो विच सो णियमा होदित्ति जिणेहिं णिहिलं ॥ ४६७ ॥
यथाल्यातसंयमः पुनः उपममतो भवति मोहनीयम्य ।
क्षयतोऽपि न स नियमात् भवतीति जिननिर्दिशा ॥ १४७ ॥

१७० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-यथाख्यात संयम नियमसे मोहनीय कर्मके उपशम तथा क्षयसे भी होता है ऐसा जिनेन्द्रदेवने कहा है। तदियकसायुदयेण य विरदाविरदो गुणो हवे जुगवं । विदियकसायुदयेण य असंजमो होदि णियमेण ॥ ४६८॥ तृतीयकषायोदयेन च विरताविरतो गुणो भवेत् युगपत् । द्वितीयकषायोदयेन च असंयमो भवति नियमेन ॥ ४६८ ॥ अर्थ-तीसरी प्रत्याख्यानावरण कषायके उदयसे विरताविरत देशविरत=मिश्रविरत पांचमा गुणस्थान होता है । और दूसरी अप्रत्याख्यान कषायके उदयसे असंयम ( संयमका अभाव ) होता है। सामायिक संयमका निरूपण करते है। संगहिय सयलसंजममेयजममणुत्तरं दुरवगम्मं । जीवो समुव्वहंतो सामाइयसंजमो होदि ॥ ४६९ ॥ संगृह्य सकलसंयममेकयममनुत्तरं दुरवगम्यम् । जीवः समुद्वहन् सामायिकसंयमो भवति ॥ ४६९ ॥ अर्थ -उक्त व्रतधारण आदिक पांच प्रकारके संयममे संग्रह नयकी अपेक्षासे अभेद करके " मै सर्व सावधका त्यागी हूं" इस तरह जो सम्पूर्ण सावद्यका त्याग करना इसको सामायिक संयम कहते है । यह संयम अनुपम तथा दुर्धर्ष है । इसके पालन करने वालेको सामायिकसयम ( मी ) कहते है । छेदोपस्थापना संयमका निरूपण कहते है । छेत्तूण य परियायं पोराणं जो ठवेइ अप्पाणं । पंचजमे धम्मे सो छेदोवहावगो जीवो ॥ ४७० ।। छित्त्वा च पर्यायं पुराण यः स्थापयति आत्मानम् । पंचयमे धर्मे सः छेदोपस्थापको जीवः ॥ ४७० ॥ अर्थ-~-प्रमादके निमित्तसे सामायिकादिसे च्युत होकर जो सावध क्रियाके करनेरूप सावधपर्याय होती है, उसका प्रायश्चित्तविधिके अनुसार छेदन करके जो जीव अपनी आत्माको व्रतधारणादिक पाचप्रकारके संयमरूप धर्ममें स्थापन करता है उसको छेदोपस्थापनसंयमी कहते है। परिहारविशुद्धिसंयमीका स्वरूप बताते है । पंचसमिदो तिगुत्तो परिहरइ सदावि जो हु सावज्ज । पंचेकजमो पुरिसो परिहारयसंजदो सो हु॥४७१ ।।

गोम्मटसारः। १७१ पञ्चसमितः त्रिगुप्तः परिहरति सदापि यो हि सावद्यम् । पञ्चैकयमः पुरुषः परिहारकसंयतः स हि ॥ ४७१ ॥ अर्थ-पांच प्रकारके संयमियों से जो जीव पांच समिति तीन गुप्तिको धारण कर सदा सावद्यका त्याग करता है उस पुरुषको परिहारविशुद्धिसंयमी कहते है। इसीका विशेष स्वरूप कहते है। तीसं वासो जम्मे वासपुधत्तं खु तित्थयरमूले । पञ्चक्खाणं पढिदो संझूणदुगाउयविहारो ॥ ४७२ ॥ त्रिशद्वा! जन्मनि वर्षपृथक्त्वं खलु तीर्थकरमूले । प्रत्याख्यानं पठितः संध्योनद्विगव्यूतिविहारः ॥ ४७२ ॥ अर्थ-जन्मसे तीस वर्षतक सुखी रहकर दीक्षा ग्रहण करके श्री तीर्थंकरके पादमूलमे आठ वर्षतक प्रत्याख्यान नामक नौमे पूर्वका अध्ययन करनेवाले जीवके यह संयम होता । इस संयमवाला जीव तीन संध्याकालोंको छोड़कर दो कोस पर्यन्त गमन करता है; किन्तु रात्रिको गमन नहीं करता । और वर्षाकालमें गमन करनेका नियम नहीं है । भावार्थ-जिस संयममें परिहारके साथ विशुद्धि हो उसको परिहारविशुद्धि संयम कहते है। प्राणिपीडाके त्यागको परिहार कहते है । इस संयमवाला जीव जीवराशिमें विहार करता हुआ भी जलसे कमलकी तरह हिंसासे लिप्त नहीं होता। सूक्ष्मसाम्पराय संयमवालेका स्वरूप बताते है । अणुलोहं वेदंतो जीवो उवसामगो व खवगो वा । सो सुहुमसांपराओ जहखादेणूणओ किंचि ॥ ४७३ ॥ अणुलोभं विदन् जीवः उपशामको वा क्षपको वा । स सूदमसाम्परायः यथाख्येतेनोनः किञ्चित् ॥ ४७३ ॥ अर्थ-जिस उपशमश्रेणी अथवा क्षपक श्रेणिवाले जीवके सूक्ष्मकृष्टिको प्राप्त लोभक- पायका उदय होता है, उसको सूक्ष्मसापरायसंयमी कहते है । इसके परिणाम यथाख्यात चारित्रवाले जीवके परिणामोंसे कुछ ही कम होते है । क्योंकि यह सयम दशमे गुणस्थानमें होता है, और यथाख्यात संयम ग्यारहमेसे शुरू होता है। यथाख्यात संयमका स्वरूप बताते है । उवसंते सीणे वा अमुहे कम्मम्मि मोहणीयम्मि । छदुमट्ठो व जिणो वा जहखादो संजदो सो दु ॥ ४७४ ।। १ परिदास नेल जीव पहारा बिल् । पदोष मान रिसने पापानिमन ।। ५॥

१७२
रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम् ।
उपशान्ते क्षीणे वा अशुभे कर्मणि मोहनीये ।
छमस्थो वा जिनो वा यथाख्यातः संयतः स तु ॥ ४७४ ॥
अर्थ-अशुभरूप मोहनीय कर्मके सर्वथा उपशम होजानेसे ग्यारहमे गुणस्थानवर्ती
जीवोंके, और सर्वथा क्षीण होजानेसे बारहमे गुणस्थानवी जीवोंके, तथा तेरहमे चौदहमे
गुणस्थानवालोंके यथाख्यात संयम होता है । भावार्थ-यथावस्थित आत्मस्वभावकी उपल-
ब्धिको यथाख्यात संयम कहते है। यह संयम ग्यारहमेसे लेकर चौदहमे तक चार गुणस्था-
नॉमें होता है । ग्यारहमेमें चारित्र-मोहनीय कर्मके उपशमसे और ऊपरके तीन गुणस्थानोमें
क्षयसे यह संयम होता है।
दो गाथाद्वारा देशविरतका निरूपण करते है।
पंचतिहिचहुविहहिं य अणुगुणसिक्खाबयेहिं संजुत्ता।
उच्चंति देसविरया सम्माइट्ठी झलियकम्मा ॥ ४७५ ॥
पञ्चत्रिचतुर्विधैश्च अणुगुणशिक्षाव्रतैः संयुक्ताः ।
उच्यन्ते देशविरता. सम्यग्दृष्टयः अरितकर्माणः ॥ ४७५ ॥
अर्थ---जो सम्यग्दृष्टी जीव पाच अणुव्रत तीन गुणव्रत चार शिक्षाव्रतसे युक्त है
उनको देशविरत अथवा संयमासंयमी कहते है। इस देश संयमके द्वारा जीवोंके असंख्यातगुणी
कर्मोंकी निर्जरा होती है।
देशसंयमीके ग्यारह मेदोको गिनाते है।
दंसणनयसामाइय पोसहसचित्तरायभत्ते य ।
बम्हारंभपरिग्गह अणुमणसुच्छिट्ठदेसबिरदेदे ॥ ४७६ ॥
दर्शनव्रतसामायिका प्रोषधसचित्तरात्रिभक्ताश्च ।
ब्रह्मारम्भपरिग्रहानुमतोद्दिष्टदेशविरता एते ॥ ४७६ ॥
अर्थ-दर्शनिक, व्रतिक, सामायिकी, प्रोषधोपवासी, सचित्तविरत, रात्रिभुक्तिविरत,
ब्रह्मचारी, आरम्भविरत, परिग्रहविरत, अनुमतिविरत, उद्दिष्टविरत ये देशविरत ( पांचमे
गुणस्थान ) के ग्यारह भेद है ।
असंयतका स्वरूप बताते हैं ।
जीवा चोद्दसभेया इंदियविसया तहट्ठवीसं तु ।
जे तेसु णेव विरया असंजदा ते मुणेदच्चा ॥ ४७७ ।।
जीवाश्चतुर्दशभेदा इन्द्रियविषयाः तथाप्टाविंशतिस्तु ।
ये तेषु नैव विरता असंयताः ते मन्तव्याः ॥ ४७५ ॥

गोम्मटसारः। १७३ अर्थ-चौदह प्रकारके जीवसमास और अट्ठाईस प्रकारके इन्द्रियोंके विषय इनसे जो विरक्त नही है उनको असंयत कहते है। अट्ठाईस इन्द्रियविषयोंके नाम गिनाते है । पंचरसपंचवण्णा दो गंधा अट्ठफाससत्तसरा । मणसहिदहावीसा इंदियविसया मुणेदबा ॥ ४७८॥ पञ्चरसपञ्चवर्णाः द्वौ गन्धौ अष्टस्पर्शसप्तस्वराः । मनःसहिताः अष्टाविंशतिः इन्द्रियविषयाः मन्तव्याः ॥ ४७८ ॥ अर्थ-पांच रस ( मीठा खट्टा कषायला कडुआ चरपरा ) पांच वर्ण ( सफेद पीला हरा लाल काला ) दो गंध (सुगंध दुर्गंध ) आठ स्पर्श ( कोमल कठोर हलका भारी शीत उष्ण रूखा चिकना ) आठ स्वर (षड्ज ऋषभ गाधार मध्यम पंचम धैवत निषाद ) और एक मन इस तरह ये इन्द्रियोंके अट्ठाईस विषय है। संयममार्गणामें जीवसंख्या बताते है। पमदादिचउण्हजुदी सामयियदुर्ग कमेण सेसतियं । सत्तसहस्सा णबसय णवलक्खा तीहिं परिहीणा ॥ ४७९ ॥ प्रमत्तादिचतुणां युतिः सामायिकद्विकं क्रमेण शेषत्रिकम् । सप्त सहस्राणि नव शतानि नव लक्षाणि त्रिभिः परिहीनानि ॥ ४७९ ॥ अर्थ-प्रमत्तादि चार गुणस्थानवर्ती जिवोका जितना प्रमाण है उतने सामायिकसंयमी होते है । और उतने ही छेदोपस्थापनासयमी होते है। परिहारविशुद्धि संयमवाले तीन कम सात हजार ( १९९७ ), सूक्ष्मसापराय संयमवाले तीन कम नौ सौ ( ८९७ ), यथारख्यात संयमवाले तीन कम नौ लाख ( ८९९९९७ ) होते है। पल्लासंखेज्जदिमं विरदाविरदाण दव्वपरिमाणं । पुवुत्तरासिहीणा संसारी अविरदाण पमा ॥ ४८० ॥ पल्यासंख्येयं विरताविरताना द्रव्यपरिमाणम् । पूर्वोक्तराशिहीना संसारिणः अविरतानां प्रमा ॥ ४८० ॥ अर्थ-पल्यके असंख्यातमे भाग देशसयमी जीवद्रव्यका प्रमाण है। उक्त संयमियोंकी राशियोंको संसारी जीवराशिमसे घटाने पर जो शेष रहे उतना असंयमियोंका प्रमाण है। ॥ इति संयममार्गणाधिकार. ॥ क्रमप्राप्त दर्शनमार्गणाका निरूपण करते हैं। १ बाट परोर नगरिनर न ( ८९०९९.१०. ) रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम । जं सामण्णं गहणं भावाणं णेव कहुमाया। अविसेसदूण अद्वे दंसणसिदि भण्णदे समये ॥ ४८१ ॥ यत् सामान्यं ग्रहणं भावानां नैव कृत्वाकारम् । अविशेष्यार्थान् दर्शनमिति भण्यते समये ।। ४८१ ॥ अर्थ-सामान्यविशेषात्मक पदार्थके विशेप अंशका ग्रहण न करके केवल सामान्य अंशका जो निर्विकल्परूपसे ग्रहण होता है उसको परमागममें दर्शन कहते है। उक्त अर्थको ही स्पष्ट करते है। भावाणं सामण्णविसेसयाणं सरूवमेत्तं । वण्णणहीणग्गहणं जीवेण य दंसणं होदि ॥ ४८२ ॥ भावाना सामान्यविशेपकानां स्वरूपमात्रं यत् । वर्णनहानग्रहणं जीवेन च दर्शनं भवति ॥ ४ ८२ ।। अर्थ-निर्विकल्परूपसे जीवके द्वारा जो सामान्यविशेषात्मक पदार्थोकी स्वपरसत्ताका अवभासन होता है उसको दर्शन कहते है । भावार्थ-पदार्थोमें सामान्य विशेप दोनों ही धर्म रहते हैं; किन्तु केवल सामान्य धर्मकी अपेक्षासे जो स्वपरसत्ताका अभासन होता है उसको दर्शन कहते है । इसका शब्दोंके द्वारा प्रतिपादन नहीं किया जा सकता । इसके चारभेद है चक्षुदर्शन अचक्षुदर्शन अवधिदर्शन केवलदर्शन । प्रथम चक्षु दर्शन और अचक्षु दर्शनका स्वरूप कहते है:- चक्खूण जं पयासइ दिस्सइ तं चक्खुदंसणं वेति । सेसिंदियप्पयासो णायको सो अचक्खूत्ति ॥ ४८३ ॥ चक्षुषोः यत् प्रकाशते पश्यति तत् चक्षुदर्शनं ब्रुवन्ति । शेषेन्द्रियप्रकाशो ज्ञातव्यः स अचक्षुरिति ॥ ४८३ ॥ अर्थ-जो पदार्थ चक्षुरिन्द्रियका विषय है उसका देखना, अथवा वह जिसके द्वारा देखा जाय, यद्वा उसके देखनेवालेको चक्षुदर्शन कहते है। और चक्षुके सिवाय दूसरी चार इन्द्रियोके अथवा मनके द्वारा जो अपने २ विषयभूत पदार्थका सामान्य ग्रहण होता है उसको अचक्षुदर्शन कहते है। अवधिदर्शनका स्वरूप बताते है। परमाणुआदियाई अंतिमखंधत्ति मुत्तिदव्वाई। तं ओहिदंसणं पुण जं पस्सइ ताई पच्चक्खं ॥ ४८४ ॥ परमाण्वादीनि अन्तिमस्कन्धमिति मूर्तद्रव्याणि । तदवधिदर्शनं पुनः यत् पश्यति तानि प्रत्यक्षम् ॥ ४८४ ।।

गोम्मटसारः । १७५ अर्थ-अवधिज्ञान होनेके पूर्व समयमें अवधिक विषयभूत परमाणुसे लेकर महास्क- न्धपर्यन्त मूर्तद्रव्यको जो सामान्यरूपसे देखता है उसको अवधिदर्शन कहते है । इस अवधि- दर्शनके अनन्तर प्रत्यक्ष अवधि ज्ञान होता है । केवलदर्शनको कहते है। बहुविहबहुप्पयारा उज्जोवा परिमियम्मि खेत्तम्मि । लोगालोगवितिमिरो जो केवलदसणुज्जोओ ॥ ४८५ ॥ बहुविधवहुप्रकारा उद्योताः परिमिते क्षेत्रे । लोकालोकवितिमिरो यः केवलदर्शनोद्योतः ॥ ४८५ ॥ अर्थ-तत्रि मंद मध्यम आदि अनेक अवस्थाओंकी अपेक्षा तथा चन्द्र सूर्य आदि पदार्थों की अपेक्षा अनेक प्रकारके प्रकाश जगत्में परिमित क्षेत्रमें रहते है; किन्तु जो लोक और अलोक दोनो जगह प्रकाश करता है ऐसे प्रकाशको केवलदर्शन कहते है। भावार्थ- समस्त पदार्थोंका जो सामान्य दर्शन होता है उसको केवल दर्शन कहते है। दर्शनमार्गणामें दो गाथाओंद्वारा जीवसंख्या बताते है । जोगे चउरक्खाणं पंचक्खाणं च खीणचरिमाणं । चक्खूणमोहिकेवल परिमाणं ताण गाणं च ॥ ४८६ ॥ योगे चतुरक्षाणा पञ्चाक्षाणा च क्षीणचरमाणाम् । चक्षुषामवधिकेवलपरिमाणं तेपा ज्ञानं च ॥ ४८६ ।। अर्थ-क्षीणकपाय गुणस्थानपर्यन्त नितने पञ्चेन्द्रिय है उनका तथा चतुरिन्द्रिय जीवों की संख्याका परस्पर जोड देनेसे जो राशि उत्पन्न हो उतने चक्षुर्दर्शनी जीव है। और अव- विज्ञानी तथा केवलज्ञानी जीवोका जितना प्रमाण है उतना ही अवधिदर्शनी तथा केवल दर्शनवालोंका प्रमाण है । भावार्थ- चक्षुदर्शन दो प्रकारका होता है, एक शक्तिरूप दूसरा व्यक्तिरूप । चतुरिन्द्रिय पञ्चेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तक जीवोके शक्तिरूप चक्षुदर्शन होता है, और पर्याप्त जीवोंके व्यक्तिरूप चक्षुदर्शन होता है । इनमेंमे प्रथम शक्तिरूप चक्षुर्शनवालोंका प्रमाग बताते है । आवलीके असंख्यातमे भागका प्रतरागलम भाग देनेसे जो लब्ध आन उसका भी जगत्पतरमें भाग देनेसे जितना लब्ध आवे उतनी राशिप्रमाण मरामि है। उममेसे पैरानिक द्वारा लब्ध चतुरिन्द्रिय पद्धेन्द्रियों के प्रमाणसे कुछ कम करना; क्योंकि हीन्द्रियादि जीवोंका प्रमाण उत्तरोत्तर कुर २ कम २ होता गया है । तथा दन्ध राशिममे पर्याप्त जीवीका प्रमाण घटाना । शेष शक्तिरूप चक्षुदर्शनवाले जीका प्रमाण है । इस ही तरह पर्याप्त वार राशिम पारका भाग देकर टोमे गुणा करनेपर जो गगि उत्पन्न हो उसमें कुछ कम न्यल्प १७८ रायचन्द्र जैनशानमालायाम है । इसके कृष्ण नील कापोत पीत पद्म शुक्ल ये छह भंट है । तथा प्रत्येको उत्तर भेद अनेक है। छप्पयणीलकवोदसुहेमंवुजसंखसण्णिहा वण्णे। संखेज्जासंखेज्जाणंतवियप्पा य पत्तेचं ॥४९४ ॥ षट्पदनीलकपोतसुहेमाम्बुजशङ्खसन्निभाः वर्ण । संख्येयासंख्येयानन्तविकल्पाश्च प्रत्येकम ॥ ४९४ ।। अर्थ-वर्णकी अपेक्षासे भ्रमरके समान कृष्णलेल्या, नीलमणिके ( नीलमके ) समान नीललेश्या, कबूतरके समान कापोतलेश्या, सुवर्णके समान पीतलेण्या, कमलके समान पद्मलेश्या, शंखके समान शुक्ललेश्या होती है । इनमसे प्रत्येकके इन्द्रियोंसे प्रकट होनेकी अपेक्षा संख्यात भेद है, तथा स्कन्धकी अपेक्षा असंख्यात और परमाणुभेदकी अपेक्षा अनन्त भेद है। किस गतिमें कोनसी लेश्या होती है यह बताते है । णिरया किण्हा कप्पा मावाणुगया हु तिसुरणरतिरिये । उत्तरदेहे छकं भोगे रविचंदहरिदंगा ॥ ४९५ ॥ निरयाः कृष्णाः कल्पाः भावानुगता हि त्रिसुरनरतिरश्चि । उत्तरदेहे पटकं भोगे रविचन्द्रहरिताङ्गाः ॥ ४९५ ॥ अर्थ-सम्पूर्ण नारकी कृष्णवर्ण है । कल्पवासी देवोकी द्रव्यलेश्या ( शरीरका वर्ण ) भावलेश्याके सदृश होता है । भवनवासी व्यन्तर ज्योतिषी मनुष्य तिर्यञ्च इनकी द्रव्यलेश्या छहो होती है । तथा विक्रियाके द्वारा उत्पन्न होनेवाले शरीरका वर्ण भी छह प्रकारमेसे किसी एक प्रकारका होता है । उत्तम भोगभूमिवालोंका सूर्यसमान, मध्यम भोगभूमिवालोका चन्द्रप्तमान, तथा जघन्य भोगभूमिवालोका हरितवर्ण शरीर होता है । बादरआऊतेऊ सुकातेऊय वाउकायाणं । गोमुत्तमुग्गवण्णा कमसो अव्वत्तवण्णो य ॥ ४९६ ॥ बादराप्तैजसौ शुक्लतेजसौ वायुकायानाम् । गोमूत्रमुद्गवर्णी क्रमशः अव्यक्तवर्णश्च ॥ ४९६ ॥ अर्थ-क्रमसे वादर जलकायिककी द्रव्यलेश्या शुक्ल और बादर तेजस्कायिककी पीत होती है। वायुकायके तीन भेद है, घनोदधिवात, बनवात, तनुवात । इनमेंसे प्रथमका शरीर गोमूत्रवर्ण, दूसरेका शरीर मूंगसमान, और तीसरेके शरीरका वर्ण अव्यक्त है। सब्वेसिं सुडमाणं कावोदा सव्व विग्गहे सुक्का । सब्बो मिस्सो देहो कवोदवण्णो हवे णियमा ॥ ४९७॥ , गोम्मटसारः । १७९ सर्वेषां सूक्ष्माना कापोताः सर्वे विग्रह शुक्लाः । सर्वो मिश्रो देहः कपोतवर्णो भवेन्नियमात् ॥ ४९७ ।। अर्थ-सम्पूर्ण सूक्ष्म जीवोकी देह कपोतवर्ण है । विग्रहगतिमें सम्पूर्ण जीवोका शरीर शुक्लवर्ण होता है। तथा अपनी २ पर्याप्तिके प्रारम्भ समयसे शरीरपर्याप्तिपर्यन्त समस्त जीवोका शरीर नियमसे कपोतवर्ण होता है । इस तरह वर्णाधिकारके अनन्तर पांच गाथाओंमें परिणामाधिकारको कहते है । लोगाणमसंखेज्जा उदयट्ठाणा कसायगा होति । तत्थ किलिट्ठा असुहा सुहा विसुद्धा तदालाबा ॥ ४९८ ॥ लोकानामसंख्येयान्युदयस्थानानि कपायगाणि भवन्ति । तत्र क्लिष्टान्यशुभानि शुभानि विशुद्धानि तदालापात् ॥ ४९८ ॥ अर्थ-कषायोंके उदयस्थान असंख्यात लोकप्रमाण है । इसमेंसे अशुभ लेश्याओंके संक्लेशरूप स्थान यद्यपि सामान्यसे असंख्यात लोकप्रमाण है; तथापि विशेषताकी अपेक्षा असंख्यातलोक प्रमाणमें असंख्यात लोकप्रमाण राशिका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उसके बहुभाग प्रमाण संक्लेशरूप स्थान है । और एक भागप्रमाण शुभ लेश्याओके विशुद्ध स्थान. है। परन्तु सामान्यसे ये भी असंख्यात लोकप्रमाण ही है। तिव्वतमा तिव्वतरा तिव्वा असुहा सुहा तहा मंदा । मंदतरा मंदतमा छट्ठाणगया हु पत्तेयं ॥ ४९९ ।। तीव्रतमास्तीव्रतराम्तीवा अशुभाः शुभास्तथा मन्दाः । मन्दतरा मन्दतमाः पटस्थानगता हि प्रत्येकम ॥ ४९९ ॥ अर्थ-अशुभ लेश्यासम्बन्धी तीव्रतम तीव्रतर तीन ये तीन स्थान, और शुभलेश्या- सम्बन्धी मन्द मन्दतर मन्दतम ये तीन स्थान होते है, क्योंकि कृष्ण लेश्यादि छह लेश्याओके शुभ स्थानामें जघन्यसे उत्कृष्टपर्यन्त और अशुभ स्थानोंमें उत्कृष्टसे जवन्यपर्यन्त प्रत्येकम पटूम्यानपतित हानिवृद्धि होती है। अमुहाणं वरमज्झिमअवरंसे किण्हणीलकाउतिए । परिणमदि कमेणप्पा परिहाणीदो किलेसस्स ॥ ५०० ॥ अशुभाना वरमध्यनावराशे कृष्ण नीटकापोतत्रिकानाम । परिणमनि कमेगात्ना परिक्षानितः शल्य ।। ५०० ॥ अर्थ-~~-कृष्ण नी- कापोतन तीन अशुभ लेन्याओंके उत्कृष्ट मध्यम नगन्य अगा. :पमें यह आत्मा करने संशती रानि होने पनि मन करता है । भावार्य इस अगरी जिर २ तरह शाररिणति महोती जाती है उनी २ नन्द यह आत्मा १८० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् अशुभ लेश्याओंमेंसे उत्कृष्ट कृष्ण लेश्याको छोड़कर नील लेश्यारूपमें और नीलको छोडकर कापोतरूपमें परिणमन करता है। काऊ णीलं किण्हं परिणमदि किलेसवडिदो अप्पा । एवं किलेसहाणीवड्डीदो होदि असुहतियं ।। ५०१॥ कापोतं नीलं कृष्णं परिणमति क्लेशवृद्धित आत्मा । एव क्लेशहानिवृद्धितः भवति अशुभत्रिकम् ॥ ५०१ ॥ अर्थ-उत्तरोत्तर संक्लेशपरिणामोकी वृद्धि होनेसे यह आत्मा कापोतसे नील और नीलसे कृष्णलेश्यारूप परिणमन करता है । इस तरह यह जीव संक्लेशकी हानि और वृद्धिकी अपेक्षासे तीन अशुभ लेश्यारूप परिणमन करता है। तेऊ पडसे सुक्के सुहाणमवरादिअंसगे अप्पा । सुद्धिस्स य वड्डीदो हाणीदो अण्णदा होदि ॥ ५०२ ।। तेजसि पझे शुक्ले शुभानामवराचंशगे आत्मा । शुद्धेश्च वृद्धितो हानितः अन्यथा भवति ॥ ५०२ ।। अर्थ-उत्तरोत्तर विशुद्धिकी वृद्धि होनेसे यह आत्मा पीत पद्म शुक्ल इन तीन शुभ लेश्याओंके जघन्य मध्यम उत्कृष्ट अंशरूपमें परिणमन करता है । तथा विशुद्धिकी हानि होनेसे उत्कृष्टसे जघन्यपर्यन्त शुक्ल पद्म पीत लेश्यारूप परिणमन करता है । इस तरह शुद्धिकी हानि वृद्धि होनेसे शुभ लेश्याओंका परिणमन होता है। उक्त परिणामाधिकारको मनमें रखकर संक्रमाधिकारका निरूपण करते हैं। संकमणं सट्ठाणपरहाणं होदि किण्हसुक्काणं । वड्डीसु हि सट्ठाणं उभयं हाणिम्मि सेस उभयेवि ॥ ५०३ ॥ संक्रमणं स्वस्थानपरस्थानं भवति कृष्णशुक्लयो । वृद्धिषु हि स्वस्थानमुभय हानौ शेषस्योभयेऽपि ॥ ५०३ ॥ अर्थ-परिणामोकी पलटनको संक्रमण कहते है। उसके दो भेद है, एक स्वस्थान- संक्रमण दूसरा परस्थान-सक्रमण । किसी विवक्षित लेश्याका एक परिणाम छूटकर उस ही लेश्यारूप जव दूसरा परिणाम होता है, वहा स्वस्थान-संक्रमण होता है । और किसी विव- क्षित लेश्याका एक परिणाम छूटकर किसी दूसरी लेश्या (विवक्षित लेश्यासे भिन्न ) का जत्र कोई परिणाम होता है वहां परस्थान-संक्रमण होता है। कृष्ण और शुक्ललेश्या वृद्धिकी अपेक्षा स्वस्थान--संक्रमण ही होता है । और हानिकी अपेक्षा स्वस्थान परस्थान दोनों ही संक्रमण होते है । तथा शेष चार लेश्याओमें हानि तथा वृद्धि दोनों अपेक्षाओंमें स्वस्थान परस्थान दोनों संक्रमणोंके होनेकी सम्भावना है।

गोम्मटसारः। १८१ भावार्थ-कृष्णलेश्या अशुभलेश्या है, इस लिये उसमे यदि संक्लेशताकी वृद्धि होगी। तो कृष्णलेश्याके उत्कृष्ट अंशपर्यन्त ही होगी। तथा शुक्ललेश्या शुभलेश्या है इस लिये शुक्ललेश्यामें यदि शुभपरिणामोकी वृद्धि होगी तो शुल्कलेश्याके उत्कृष्ट अंशपर्यन्त ही होगी। इस लिये वृद्धिकी अपेक्षा कृष्ण और शुक्ललेश्यामें स्वस्थानसंक्रमण ही है । तथा कृष्ण- लेश्यामें संक्लेशताकी यदि हानी हो तो कृष्णलेश्याके जघन्य अंशपर्यन्त भी होसकती है, और इसके नीचे नील कापोत लेश्यारूप भी होसकती है, इसलिये कृष्णलेश्यामे हानिकी अपेक्षा दोनों संक्रमण संभव है। इस ही तरह शुल्कलेश्यामें यदि विशुद्धताकी हानि होय तो शुक्लले- श्याके जघन्य अंशपर्यन्त भी होसकती है, और उसके नीचे पद्म पीत लेश्यारूप भी होसकती है, इसलिये इसमें भी हानिकी अपेक्षा दोनों संक्रमण सम्भव है। किन्तु मध्यकी चारलेश्याओंमेंसे अशुभलेश्याओंमें संक्लेशताकी हानि हो या वृद्धि हो दो प्रकारके संक्रमणोंमेंसे कोई भी संक्रमण होसकता है । तथा शुभलेश्याओमें विशुद्धताकी हानि हो या वृद्धि हो दो प्रकारके संक्रमणों से कोई भी संक्रमण हो सकता है। जैसे पद्मलेश्यामें यदि विशुद्धताकी वृद्धि हुई तो वह पद्मलेश्याके उत्कृष्ट अंशपर्यन्त भी हो सकती है इसलिये स्वस्थानसंक्रमण, और शुक्ललेश्यारूप भी परिणाम होसकता है इसलिये परस्थान संक्रमण भी सम्भव है। इसीप्रकार पीत तथा नील और कापोतलेश्यामें भी समझना चाहिये । लेस्साणुक्कस्सादोवरहाणी अवरगादवरवड्डी । सहाणे अवरादो हाणी णियमा परहाणे ॥ ५०४ ॥ लेश्यानामुत्कृष्टादवरहानिः अवरकादवरवृद्धिः । स्वस्थाने अवरात् हानिर्नियमात् परस्थाने ॥ ५०४ ॥ अर्थ-स्वस्थानकी अपेक्षा लेश्याओके उत्कृष्टस्थानके समीपवर्ती स्थानका परिणाम उत्कृष्ट स्थानके परिणामसे अनतभागहनिरूप है। तथा स्वस्थानकी अपेक्षासे ही जघन्यस्थानके समीपवर्ती स्थानका परिणाम जवन्य स्थानसे अनन्तभागवृद्धिरूप है । सम्पूर्ण लेश्याओंके जघन्य स्थानसे यदि हानि हो तो नियमसे अनन्तगुणहानिरूप परम्यान सक्रमण ही होता है । भावार्थ-किसी विवक्षित लेश्याके जघन्य स्थानमे हानि होकर उसके समीपवर्ती लेण्याके उत्कृष्ट स्थानरूप यदि परिणाम हो तो वहापर परम्यान संक्रमण ही होता है, और यह न्यान अनन्तगणहानिरूप होता है । जैसे कृष्णलेश्याके जवन्यन्धानके समीप नीललेटयाका उत्कृष्ट स्थान है, वह कृष्णलेश्याके जवन्यस्थानमे अनन्तगणहानिन्लप हैं। उपर्युक्त निरूपणका कारण क्या है यह बताते है । संकमणे छहाणा हाणिनु वढीसु होति तण्णामा । परिमाणं च य एवं उत्तकम होदि मुदणाणे ॥ ५०५ ।।

१८२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् संक्रमणे षस्थानानि हानिपु वृद्धिप भवन्ति तन्नामानि । परिमाणं च च पूर्वमुक्तक्रमं भवति श्रुतज्ञाने ॥ १०५ ॥ अर्थ-~-संक्रमणाधिकारमें हानि और वृद्धि दोनो अवस्थाऑमें पट्स्थान होते है । इन षट्स्थानों के नाम तथा परिमाण पहले श्रुतज्ञानमार्गणामे जो कहे है वेही यहापर भी समझना । भावार्थ-षट्स्थानोके नाम ये है अनन्तभाग असंख्यातभाग संख्यातभाग संख्यातगुण अस- ख्यातगुण अनन्तगुण । इन षट्स्थानोकी सहनानी क्रमसे उर्वक चतुरक पञ्चाङ्क पडङ्क सप्ताङ्क अष्टाङ्क है । और यहापर अनन्तका प्रमाण जीवराशिमात्र, असंख्यातका प्रमाण असंख्यातलोक- मात्र, और संख्यातका प्रमाण उत्कृष्ट संख्यात है। लेश्याओंके कर्माधिकारको कहते है। पहिया जे छप्पुरिसा परिभट्टारण्णमज्झदेसम्हि । फलभरियरुक्खमेगं पेक्खित्ता ते विचिंतंति ॥ ५०६ ॥ णिम्मूलखंधसाहुवसाहं छित्तुं चिणित्तु पडिदाई। खाउं फलाई इदि जं मणेण वयणं हवे कम्मं ।। ५०७ ॥ पथिका ये षट् पुरुषाः परिभ्रष्टा अरण्यमध्यदेशे। फलभरितवृक्षमेकं प्रेक्षित्वा ते विचिन्तयन्ति ।। ५०६ ।। निर्मूलस्कन्धशाखोपशाखं छित्वा चित्वा पतितानि । खादितुं फलानि इति यन्मनसा वचन भवेत् कर्म ॥ ५०७ ॥ अर्थ-कृष्ण आदि छह लेश्यावाले छह पथिक वनके मध्यमें मार्गसे भ्रष्ट होकर फलोसे पूर्ण किसी वृक्षको देखकर अपने २ मनमें इस प्रकार विचार करते है, और उसके अनुसार वचन कहते है। ---कृष्णलेश्यावाला विचार करता है और कहता है कि मै इस वृक्षको मूलसे उखाडकर इसके फलोका भक्षण करूंगा। और नीललेश्यावाला विचारता है और कहता है कि मै इस वृक्षको स्कन्धसे काटकर इसके फल खाऊंगा । कापोतलेश्यावाला विचारता है और कहता है कि मै इस वृक्षकी वडी २ शाखाओको काटकर इसके फलोंको खाऊंगा । पीत- लेण्यावाला विचारता है और कहता है कि मै इस वृक्षकी छोटी २ शाखाओको काटकर इसके फलोको खाऊगा । पद्मलेल्यावाला विचारता है और कहता है कि मै इस वृक्षके फलोको तोड़कर खाऊगा । शुक्ललेश्यावाला विचारता है और कहता है कि मै इस वृक्षसे स्वयं टूट हुए फलोको खाऊगा ! इस तरह जो मनपूर्वक वचनादिकी प्रवृत्ति होती है वह लेख्याका कर्म है | यहा पर यह एक दृष्टान्तमात्र दियागया है इसलिये इस ही तरह अन्यत्र भी समझना चाहिये। कर पडे गोम्मटसारः । १८३ लेश्याओंके लक्षणाधिकारका निरूपण करते है । चंडो ण मुचइ वेरं भंडणसीलो य धम्मदयरहिओ । दुट्ठो ण य एदि वसं लक्खणमेयं तु किण्हस्स ॥ ५०८ ।। चण्डो न मुञ्चति वैरं भण्डनशीलश्च धर्मदयारहितः । दुष्टो न चैति वशं लक्षणमेतत्तु कृष्णस्य ॥ ५०८ ॥ अर्थ-तीव्र क्रोध करनेवाला हो, वैरको न छोडे, युद्धकरनेका ( लड़नेका ) जिसका स्वभाव हो, धर्म और दयासे रहित हो, दुष्ट हो, जो किसीके भी वश न हो ये सब कृष्णले- श्यावालेके चिह्न ( लक्षण ) है। नीललेश्यावालेके चिह्न बताते है । मंदो बुद्धिविहीणो णिविण्णाणी य विसयलोलो य । माणी मायी य तहा आलस्सो चेव भेज्जो य ॥ ५०९ ॥ णिदावंचणबहुलो धणधण्णे होदि तिव्वसण्णा य । लक्खणमेयं भणियं समासदो णीललेस्सस्स ।। ५१० ॥ मन्दो बुद्धिविहीनो निर्विज्ञानी च विषयलोलश्च । मानी मायी च तथा आलस्यश्चैव भेद्यश्च ॥ ५०९ ॥ निद्रावञ्चनबहुलो धनधान्ये भवति तीव्रसंज्ञश्च । लक्षणमेतद्भणितं समासतो नीललेश्यस्य ।। ५१० ॥ अर्थ-कामकरनेमें मन्द हो, अथवा स्वच्छन्द हो, वर्तमान कार्य करनेमें विवेकरहित हो, कला चातुर्यसे रहित हो, स्पर्शनादि पाच इन्द्रियोंके विषयोके लम्पट हो, मानी हो, माया- चारी हो, आलसी हो, दूसरे लोग जिसके अभिप्रायको सहसा न जान सकें, तथा जो अति निद्रालु और दूसरोको ठगनेमें अतिदक्ष हो, और धनधान्यके विषयमें जिसकी अतितीव्र लालसा हो, ये नीललेश्यावालेके सक्षेपसे चिन्ह बताये है। तीन गाथाओंमें कपोतलेश्यावालेका लक्षण कहते है। रूसइ णिंदइ अण्णे दूसइ बहुसो य सोयमयबहुलो। असुयइ परिभवइ परं पसंसये अप्पयं बहुसो ॥ ५११ ।। ण य पत्तियइ परं सो अप्पाणं यिव परं पि मण्णतो । सइ अभित्थुवंतो ण य जाणइ हाणिवर्द्वि वा ॥ ५१२॥ मरणं पत्थेड रणे देइ मुबहुगं वि थुखमाणो दु । ण गण कज्जाकजं लक्खणमेयं तु काउस्स ।। ५१३ ॥

१८४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । रुष्यति निन्दति अन्यं दुष्यति बहुशश्च शोकभयवहुलः ! असूयति परिभवति परं प्रशंसति आत्मानं बहुशः ॥ ५११ ॥ न च प्रत्येति परं स आत्मानमिव परमपि मन्यमानः। तुष्यति अभिष्टुवतो न च जानाति हानिवृद्धी वा ॥ ५१२॥ मरणं प्रार्थयते रणे ददाति सुबहुकमपि स्तूयमानस्तु । न गणयति कार्याकार्य लक्षणमेतत्तु कापोतस्य ॥ ५१३ ॥ अर्थ-दूसरेके ऊपर क्रोध करना, दूसरेकी निन्दा करना, अनेक प्रकारसे दूसरोंको दुःख देना अथवा औरोसे वैर करना, शोकाकुलित तथा भयग्रस्त होना, दूसरोंके ऐश्वर्यादिको सहन न करसकना, दूसरेका तिरस्कार करना, अपनी नानाप्रकारसे प्रशंसा करना, दूसरेके ऊपर विश्वास न करना, अपनेसमान दूसरोको भी मानना, स्तुति करनेवाले पर संतुष्ट होजाना, अपनी हानि वृद्धिको कुछ भी न समझना, रणमें मरनेकी प्रार्थना करना, स्तुति करनेवालेको खूब धन दे डालना, अपने कार्य अकार्यकी कुछ भी गणना न करना, ये सत्र कपोतले. श्यावालेके चिन्ह है। पीतलेश्यावालेके चिन्ह बताते है। जाणइ कज्जाकज सेयमसेयं च सव्वसमपासी । दयदाणरदो य मिदू लक्खणमेयं तु तेउस्स ॥ ५१४ ॥ जानाति कार्याकार्य सेव्यमसेव्यं च सर्वसमदर्शी । दयादानरतश्च मृदुः लक्षणमतत्तु तेजसः ॥ ५१४ ॥ अर्थ--अपने कार्य अकार्य सेव्य असेव्यको समझनेवाला हो, सबके विषयमें समदर्शी हो, दया और दानमे तत्पर हो, कोमलपरिणामी हो, ये पीतलेश्यावालेके चिह्न है । पद्मलेश्यावालेके लक्षण बताते है । चागी भद्दो चोक्खो उज्जवकम्मो य खमदि बहुगं पि । साहुगुरुपूजणरदो लक्खणमेयं तु पम्सस्स ॥ ५१५ ।। त्यागी भद्रः सुकरः उद्युक्तकर्मा च क्षमते बहुकमपि । साधुगुरुपूजनरतो लक्षणमेतत्तु पद्मस्य ।। ११५ ॥ अर्थ-~दान देनेवाला हो, भद्रपरिणामी हो, जिसका उत्तम कार्य करनेका स्वभाव हा इष्ट तथा अनिष्ट उपद्रवोको सहन करनेवाला हो, मुनि गुरु आदिकी पूजामे प्रीतियुक्त ये सब पद्मलेश्यावालेके लक्षण है।

गोम्मटसारः। १८५ शुक्ललेश्यावालेके लक्षण बताते है । ण य कुणइ पक्खवायं णवि य णिदाणं समो य सम्वेसिं । णस्थि य रायदोसा होवि य सुक्कलेस्सस्स ॥ ५१६ ॥ न च करोति पक्षपातं नापि च निदानं समश्च सर्वेषाम् । नास्ति च रागद्वेषौ स्नेहोऽपि च शुक्ललेश्यस्य ॥ ५१६ ॥ अर्थ -पक्षपात न करना, निदानको न बांधना, सब जीवोमें समदर्शी होना, इष्टसे राग और अनिष्टसे द्वेष न करना, स्त्री पुत्र मित्र आदिमें स्नेहरहित होना, ये सब शुक्लले- श्यावालेके लक्षण है। क्रमप्राप्त गति अधिकारका वर्णन करते है। लेस्साणं खलु अंसा छब्बीसा होति तत्थ मज्झिमया । आउगबंधणजोगा अवगरिसकालभवा ॥ ५१७ ॥ लेश्यानां खलु अंशाः षडूविशतिः भवन्ति तत्र मध्यमकाः । आयुष्कबन्धनयोग्या अष्ट अष्टापकर्षकालभवाः ॥ ५१७ ॥ अर्थ-लेश्याओंके कुल छन्वीस अंश है, इनमेंसे मध्यके आठ अंश जो कि आठ अपकर्ष कालमें होते है वे ही आयुकर्मके वन्धके योग्य होते है । भावार्थ-जैसे किसी कर्मभूमिया मनुष्य या तिर्यचकी भुज्यमान आयुका प्रमाण छह हजार इकसठ है । इसके तीन भागमेंसे दो भाग बीतने पर और एक भाग शेष रहने पर, इस एक भागके प्रथम समयसे लेकर अन्तर्मुहूर्तपर्यन्त प्रथम अपकर्षका काल कहा जाता है । इस अपकर्ष कालमें परभवसम्बन्धी आयुका वन्ध होता है। यदि यहां पर भी बन्ध न हो तो अवशिष्ट एक त्रितीय भागमेंसे भी दो भाग वीतने पर और एक भाग शेष रहने पर प्रथम समयसे लेकर अन्तर्मुहूर्त पर्यन्त द्वितीय अपकर्प कालमें परभवसम्बन्धी आयुका वन्ध होता है । यदि यहा परभी बंध न हो तो तीसरे अपकर्पमें होता है । और तीसरेमें भी न हो तो चीये पाचमे छट्टे सातमे आठमे अपकर्षमसे किसी भी अपकर्षमें परभवसम्बन्धी आयुका वन्ध होता है । यदि किसी भी अपकर्षमें वन्ध न हो तो असंक्षेपाद्धा ( भुज्यमान आयुका अन्तिम आवलीके असंख्यातमे भागप्रमाण काल ) से पूर्वके अन्तर्मुहूर्तमें अवश्य ही आयुका बन्ध होता है । भुज्यमान आयुके तीन भागोमसे दो भाग वीनन पर अवशिष्ट एक भागके प्रथम अन्तर्मुहूर्त प्रमाण कालको अपकर्म कहते हैं । इस अपकर्ष कालम लेश्याओंके आट मध्य माशोंमे जो अंश होगा उसके अनुसार आयका बन्ध होगा । तथा आयम्यक योग्य आठ मध्यमाॉमसे कोई संग निम अपमें होगा उस ही अपमें आयका बन्ध होगा, दूसरे कालमें नहीं।

रीय वन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् |
जीवोके दो भेद हैं एक सोपक्रमायुष्क दूसरा अनुपक्रमायुष्क । जिनका विपक्षणादि
निमित्तके द्वारा मरण संभव हो उनको सोपक्रमायुष्क कहते है । और इससे जो रहित
है उनको अनुपक्रमायुष्क कहते है । जो सोपक्रमायुष्क हैं उनके तो उक्त रीतिसे ही पर-
भवसम्बन्धी आयुका बन्ध होता है । किन्तु अनुपक्रमायुष्फोमे कुछ भेद है, वह यह
कि अनुपक्रमायुष्कोमें जो देव और नारकी है वे अपनी आयुके अन्तिम छह महीना शेष
रहने पर आयुके बन्ध करनेके योग्य होते है। इसमे भी छह महीनाके आठ अपकर्षका-
लमे ही आयुका बंध करते है-दूसरे कालमें नहीं । जो भोगभूमिया मनुष्य या तिर्यच है
वे अपनी आयुके नौ महीना शेष रहने पर नौ महीनाके आठ अपकर्पोमेसे किसी भी
अपकर्षमें आयुका बन्ध करते है। इस प्रकार ये लेश्याओंके आठ अंश आयुवन्धको कारण
है। जिस अपकर्षमे जैसा जो अंश हो उसके अनुसार आयुका वन्ध होता है ।
शेष अठारह अशोका कार्य बताते है ।
सेसद्वारस अंसा चउगइगमणस्स कारणा होति ।
सुक्कुकरसंसमुदा सम्बटुं जांति खलु जीवा ॥ ५१८॥
शेषाष्टादशाशाश्चतुर्गतिगमनस्य कारणानि भवन्ति ।
शुक्लोत्कृष्टाशमृता सर्वार्थ यान्ति खलु जीवाः ॥ ५१८ ॥
अर्थ-अपकर्षकालमे होनेवाले लेश्याओंके आठ मध्यमाशोंको छोडकर वाकीके अठा-
रह अंश चारो गतियोके गमनको कारण होते है । तथा शुक्ललेश्याके उत्कृष्ट अंशसे संयुक्त
जीव मरकर नियमसे सर्वार्थसिद्धिको जाते है।
अवरंसमुदा होंति सदारदुगे मज्झिमंसगेण मुदा ।
आणदकप्पावरि सवट्ठाइल्लगे होति ।। ५१९ ॥
अवरांशमृता भवन्ति शतारद्विके मध्यमाशकेन मृताः ।
आनतकल्पादुपरि सर्वार्थादिमे भवन्ति ॥ ५१९ ॥
अर्थ-शुक्ललेश्याके जघन्य अंशोसे संयुक्त जीव मरकर शतार सहस्रार स्वर्गपर्यन्त
जाते है । और मध्यमाशोकरके सहित मरा हुआ जीव सर्वार्थसिद्धिसे पूर्वपूर्वके तथा आनत
स्वर्गसे ऊपरके समस्त विमानोमेंसे यथा सम्भव विमानमें उत्पन्न होता है । और आनत
स्वर्गमें भी उत्पन्न होता है।
पम्मुक्कस्संसमुदा जीवा उवजांति खलु सहस्सारं ।
अवरंसमुदा जीवा सणक्कुमारं च माहिं ।। ५२० ॥
पद्मोत्कृष्टाशमृता जीवा उपयाति खलु सहस्रारम् ।
अवराशमृता जीवाः सनत्कुमारं च माहेन्द्रम् ॥ ५२० ॥

गोम्मटसारः। १८७ अर्थ-पद्मलेश्याके उत्कृष्ट अंशोंके साथ मरे हुए जीव नियमसे सहस्रार स्वर्गको प्राप्त होते है। और पद्म लेश्याके जघन्य अंशोंके साथ मरे हुए जीव सनत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्गको प्राप्त होते है। मज्झिमअंशेण मुदा तम्मज्झं जांति तेउजेहमुदा । साणक्कुमारमाहिंदंतिमचक्किंदसेढिम्मि ॥ ५२१ ।। मध्यमाशेन मृता तन्मध्यं यान्ति तेजोज्येष्ठमृताः । सनत्कुमारमाहेन्द्रान्तिमचक्रेन्द्रश्रेण्याम् ॥ ५२१ ॥ अर्थ-पद्मलेश्याके मध्यम अंशोके साथ मरे हुए जीव सनत्कुमार माहेन्द्र स्वर्गके ऊपर और सहस्त्रार स्वर्गके नीचे २ के विमानोमें उत्पन्न होते है । पीतलेश्याके उत्कृष्ट अंशोके साथ मरे हुए जीव सनत्कुमार माहेन्द्र स्वर्गके अन्तिम पटलमे चक्रनामक इन्द्रकसम्बन्धी श्रेणी- बद्ध विमानमे उत्पन्न होते है । अवरंसमुदा सोहम्मीसाणादिमउडम्सि सेढिम्मि । मज्झिमअंसेण मुदा विमलविमाणादिबलभद्दे ॥ ५२२ ।। अवराशमृताः सौधर्मेशानादिमौ श्रेण्याम् । मध्यमांशेन मृताः विमलविमानादिवलभद्रे ॥ ५२२ ॥ अर्थ-पीतलेश्याके जघन्य अंशोके साथ मरा हुआ जीव सौधर्म ईशान स्वर्गके ऋतु (ज) नामक इन्द्रक विमानमें अथवा श्रेणीबद्ध विमानमें उत्पन्न होता है । पीत लेश्याके मध्यम अंशोके साथ मरा हुआ जीव सौधर्म ईशान् स्वर्गके मरे पटलके विमल नामक इन्द्रक विमनसे लेकर सनत्कुमार माहेन्द्र स्वर्गके द्विचरम पटलके ( अन्तिम पटलसे पूर्वका पटल ) बलभद्र नामक इन्द्रक विमानपर्यन्त उत्पन्न होता है। किण्हवर सेण मुदा अवधिट्ठाणम्मि अबरअंसमुदा । पंचमचरिसतिमिस्से मज्झ मज्झेण जायते ॥ ५२३ ॥ कृष्णवगंशेन मृता अवधिस्थाने अवरागमृताः । पञ्चमनरमतिमिश्रे मध्ये म-येन जायन्ते ॥ ५२३ ॥ अर्थ-कृष्णरेयाके उत्कृष्ट अगोंके माथ मरे हुए जीव सातमी पृथ्वी के अवधिम्यान नामक इन्द्रक बिलमें उत्पन्न होते है । जयन्य अशों माय मरे हुए जीत पाचमी पृथ्वी के अन्तिम पटके तिमिशनामका इन्द्रक विल्म उत्पन होते है । कृणनेन्या मध्यम अंगाके माय मरे म जी दोनोंजे. (माननी पक्षी अवपिन्थान नामक इन्टरविल और कही पपीके अन्तिम पटाची निमिन विर) मयन्यानमे यथासम्भव उत्पन होने हैं।

१८८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । हैं नीलुक्कस्संससुदा पंचम अंधिंदयम्मि अवरमुदा । वालुकसंपज्जलिदे मज्झे मज्झेण जायते ॥ ५२४ ॥ नीलोत्कृष्टाशमृताः पञ्चमान्धेन्द्र के अवरमृताः । वालुकासंप्रज्वलिते मध्ये मध्येन जायन्ते ॥ ५२४ ॥ अर्थ-नीललेश्याके उत्कृष्ट अंशोंके साथ मरे हुए जीव पाचमी पृथ्वीके द्विचरम पटलसम्बन्धी अन्ध्रनामक इन्द्रकविलमें उत्पन्न होते है। कोई २ पांचमे पटलमें भी उत्पन्न होते है । इतना विशेष और भी है कि कृष्णलेश्याके जघन्य अंशवाले भी जीव मरकर पाचमी पृथ्वीके अन्तिम पटलमें उत्पन्न होते है । नीललेश्याके जवन्य अंशवाले जीव मरकर तीसरी पृथ्वीके अंतिम पटलसम्बन्धी संप्रज्वलित नामक इन्द्रकविलमें उत्पन्न होते हैं। नीललेश्याके मध्यम अंशोंवाले जीव मरकर तीसरी पृथ्वीके संप्रज्वलित नामक इन्द्रकविलके आगे और पाचमी पृथ्वीके अन्ध्रनामक इन्द्रकविलके पहले पहले जितने पटल और इन्द्रक उनमें यथायोग्य उत्पन्न होते हैं । वरकाओदंसमुदा संजलिदं जांति तदियणिरयस्स । सीमंतं अवरमुदा मज्झे मज्झेण जायते ॥ ५२५ ॥ वरकापोतांशमृताः संज्वलितं यान्ति तृतीयनिरयस्य । समिन्तमवरमृता मध्ये मध्येन जायन्ते ॥ ५२५ ॥ अर्थ-कापोतलेश्याके उत्कृष्ट अंशोके साथ मरे हुए जीव तीसरी पृथ्वीके द्विचरम पटलसम्बन्धी संज्वलित नामक इन्द्रकविलमें उत्पन्न होते है। कोई २ अन्तिम पटलस- म्बन्धी संप्रज्वलित नामक इन्द्रकविलमे भी उत्पन्न होते है । कापोतलेश्याके जघन्य अंशोंके साथ मरे हुए जीव प्रथम पृथ्वीके सीमन्त नामक प्रथम इन्द्रकविलमें उत्पन्न होते है । और मध्यम अंशोंके साथ मरे हुए जीव प्रथम पृथ्वीके सीमन्त नामक प्रथम इन्द्रकविलसे आगे और तीसरी पृथ्वीके द्विचरम पटलसम्बन्धी संज्वलित नामक इन्द्रकविलके पहले तीसरी पृथ्वीके सात पटल, दूसरी पृथ्वीके ग्यारह पटल और प्रथम पृथ्वीके वारह पटलोमें यथायोग्य उत्पन्न होते हैं। किण्हचउक्काणं पुण मज्झंसमुदा हु भवणगादितिये । पुढवीआउवणप्फदिजीवेसु हवंति खलु जीवा ॥ ५२६ ॥ कृष्णचतुष्काणां पुनः मध्यांशमृता हि भवनकादित्रये । पृथिव्यवनस्पतिजीवेषु भवन्ति खलु जीवाः ॥ ५२६ ॥ अर्थ-कृष्ण नील कपोत इन तीन लेश्याओके मध्यम अंशोके साथ मरे हुए कर्म- भूमिया मिथ्यादृष्टि तिर्यच वा मनुष्य, और पातलेश्याके मध्यम अंशोंके साथ मरे हुए गोम्मटसारः। १८९ भोगभूमियां मिथ्यादृष्टि तिर्यच वा मनुष्य, भवनवासी व्यन्तर ज्योतिषी देवोंमें उत्पन्न होते है । तथा कृष्ण नील कापोत पीत लेश्याके मध्यम अंशोंके साथ मरे हुए तिर्यच वा मनुष्य भवनवासी व्यन्तर ज्योतिषी वा सौधर्म ईशान स्वर्गके मिथ्यादृष्टि देव, वादर पर्याप्त पृथ्वीकायिक जलकायिक वनस्पतिकायिक जीवोमें उत्पन्न होते है । किण्हतियाणं मज्झिमअंसमुदा तेउवाउवियलेसु । सुरणिरया सगलेस्सहिं णरतिरियं जांति सगजोग्गं ॥ ५२७ ।। कृष्णत्रयाणां मध्यमांशमृतास्तेजोवायुविकलेषु । सुरनिरयाः स्वकलेश्याभिः नरतियञ्चं यान्ति स्वकयोग्यम् ॥ ५२७ ॥ अर्थ-कृष्ण नील कापोत इन तीन लेश्याओंके मध्यम अंशोके साथ मरे हुए तिर्यंच या मनुष्य, तेजकायिक वातकायिक विकलत्रय असंज्ञी पंचेन्द्रिय साधारण-वनस्पति इनमे. यथायोग्य उत्पन्न होते है । और भवनत्रय आदि सर्वार्थसिद्धिपर्यन्तके देव तथा सातो पृथ्वीसम्बन्धी नारकी अपनी २ लेश्याके अनुसार मनुष्यगति या तिर्यंचगतिको प्राप्त होते है। भावार्थ-जिस गतिसम्बन्धी आयुका वन्ध हुआ हो उस ही गतिमें मरण समयपर होनेवाली लेश्याके अनुसार उत्पन्न होता है । जैसे मनुष्यअवस्थामें किसीने देवायुका वन्ध किया और मरणसमयपर उसके कृष्ण आदि अशुभ लेश्या हुई तो वह मरण करके भवन- त्रिकमें उत्पन्न होगा-उत्कृष्ट देवोंमें नही होगा । यदि शुभ लेश्या हुई तो यथायोग्य कल्प- वासियोंमें भी उत्पन्न होगा। क्रमप्राप्त स्वामी अधिकारका वर्णन करते है। काऊ काऊ काऊ णीला णीला य णीलकिण्हा य । किण्हा य परमकिण्हा लेस्सा पढमादिपुढवीणं ॥ ५२८ ॥ कापोता कापोता कापोता नीला नीला च नीलकृपणे च । कृष्णा च परमकृष्णा लेल्या प्रथमादिपृथिवीनाम ॥ ५१८ ॥ अर्थ -प्रथम पृथ्वीम कपोतलेश्याका जघन्य अश है । दूसरी पृथ्वीम कपोतलश्याका मध्यम अंश है। तीसरी पृथ्वीमे कपोतलेश्याका उत्कृष्ट अंश और नीललेश्याका जघन्य अंश है। चौथी पृथ्वीमे नीलन्देझ्याका मध्यम अश है। पात्रमी पृथ्वीमें नीललेश्याका उत्कृष्ट अंश और कृष्णलेझ्याका जघन्य अश है । छट्टी पृथ्वीमें कृष्णलेश्याका मन्यम अंश है । मातमी पृथ्वीमें कृष्णलेश्याका उत्कृष्ट अश है । भावार्थ-स्वामी अधिकाम भावलेण्याकी अपेक्षा ही कथन है, इस लिये उपर्युक्त प्रकास नकाम भी भारल्या ही समवना । णरतिरियाणं ओघो इगिविगले तिणि चर असण्णिम्स । सण्णिअपुण्णगमिच्छे सामणमम्मेचि अनुहतियं ॥ ५२९ ।।

१९० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । नरातिरश्चामोघ एकविकले तिस्त्रः चतस्रः असंज्ञिनः । संश्यपूर्णकमिथ्यात्वे सासनसम्यक्त्वेपि अशुभत्रिकम् ॥ ५२९ ।। अर्थ-मनुष्य और तिर्यंचोके सामान्यसे छहों लेश्या होती है। एकेन्द्रिय और विकलत्रय (द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय ) जीवोंके कृष्ण आदि तीन अशुभ लेश्या ही होती है। असंज्ञी पञ्चेन्द्रिय पर्याप्त जीवोके कृष्ण आदि चार लेश्या होती है, क्योकि असंज्ञी पंचेन्द्रिय कपोतलेश्यावाला जीव मरणकर पहले नरकको जाता है। तथा तेजोले- श्यासहित मरनेसे भवनवासी और व्यन्तर देवोमें उत्पन्न होता है। कृष्ण आदि तीन अशुभ लेश्यासहित मरनेसे यथायोग्य मनुष्य या तिर्यचोमें उत्पन्न होता है। संज्ञी लव्ध्य- पर्याप्तक तथा अपि शब्दसे असंज्ञी लब्ध्यपर्याप्तक और सासादन गुणस्थानवर्ती निवृत्यप यति तथा भवनत्रिक जीवोंमें कृष्ण आदि तीन अशुभ लेश्या ही होती है । उपशम सम्य- क्त्वकी विराधना करके सासादन गुणस्थानवाले जीवके अपर्याप्त अवस्थामे तीन अशुभ लेश्या ही होती है। मोगा पुण्णगसम्मे काउस्स जहण्णियं हवे णियमा । सम्मे वा मिच्छे वा पज्जत्ते तिणि सुहलेस्सा ॥ ५३० ॥ भोगापूर्णकसम्यक्त्वे कापोतस्य जघन्यकं भवेत् नियमात् । सम्यक्त्वे वा मिथ्यात्वे वा पर्याप्ते तिस्रः शुभलेश्याः ॥ ५३० ॥ अर्थ-भोगभूमियां निवृत्यपर्याप्तक सम्यग्दृष्टि जीवोमें कापोतलेश्याका जघन्य अंश होता है । तथा भोगभूमिया सम्यग्दृष्टि या मिथ्यादृष्टि जीवोके पर्याप्त अवस्थामें पीत आदि तीन शुभ लेश्या ही होती है । भावार्थ-पहले मनुष्य या तिर्यच आयुका बंध करके पीछे क्षायिक या वेदक सम्यक्त्वको स्वीकार करके यदि कोई कर्मभूमिज मनुष्य या तिथंच मम्यक्त्वसहित मरण करै तो वह भोगभूमिमे उत्पन्न होता है, वहां पर उसके कापोत लेब्याके जवन्य अंशरूप सक्लेश परिणाम होते है। परन्तु पर्याप्त अवस्थामे सम्यग्दृष्टि या मिश्यादृष्टिके शुभ लेश्या ही होती है । अयदोत्ति छ लेस्साओ सुहतियलेस्सा हु देसविरदतिये । तत्तो मुक्का लेस्सा अजोगिठाण अलेस्सं तु ॥ ५३१ ॥ असंयत इति पड् लेण्या.शुभत्रयलेल्या हि देशविरतत्रये । तत. शक्ला लेण्या अयोगिस्थानमलेग्यं तु ॥ ५३१ ।। अर्थ-चतुर्थ गणस्थानपर्यन्त व्हीं लेश्या होती है । तथा देशविरत प्रमत्तविरत अत्त पिग्न इन तीन गुणस्थानाम तीन शुभलेश्या ही होती है । किन्तु इसके आगे गोम्मटसारः । १९१ अपूर्वकरणसे लेकर सयोगकेवलीपर्यन्त एक शुक्ललेश्या ही होती है । और अयोगकेवली गुणस्थान लेश्यारहित है। ण?कसाये लेस्सा उच्चदि सा भूदपुवगदिणाया। अहवा जोगपउत्ती मुक्खोत्ति तहिं हवे लेस्सा ।। ५३२ ॥ नष्टकषाये लेश्या उच्यते सा भूतपूर्वगतिन्यायात् । अथवा योगप्रवृत्तिः मुख्येति तत्र भवेल्लेश्या ॥ ५३२ ॥ ----अकषाय जीवोंके जो लेश्या वताई है वह भूतपूर्वप्रज्ञापन नयकी अपेक्षासे वताई है । अथवा, योगकी प्रवृत्तिको लेश्या कहते है, इस अपेक्षासे वहा पर मुख्यरूपसे भी लेश्या है, क्योंकि वहा पर योगका सद्भाव है। तिण्हं दोण्हं दोण्ह छण्हं दोण्हं च तेरसण्हं च । एत्तो य चोद्दसण्हं लेस्सा भवणादिदेवाणं ।। ५३३ ॥ तेऊ तेऊ तेऊ पम्मा पम्मा य पम्मसुक्का य । सुक्का य परमसुक्का भवणतिया पुण्णगे असुहा ॥ ५३४ ॥ त्रयाणा द्वयोर्द्वयोः पण्णा द्वयोश्च त्रयोदशाना च । एतस्माच्च चतुर्दशाना लेश्या भवनादिदेवानाम् ॥ ५३३ ॥ तेजस्तेजस्तेजः पद्मा पद्मा च पद्मशुक्ले च । शुक्ला च परमशुक्ला भवनत्रिका अपूर्णके अशुभा. ॥ ५३४ ॥ अर्थ-भवनवासी व्यन्तर ज्योतिषी इन तीन देवोंके पीतलेश्याका जघन्य अंश है। सौधर्म ईशान स्वर्गवाले देवोंके पीतलेश्याका मध्यम अश है । सनत्कुमार माहेन्द्र म्वर्गवा- लोके पीतलेश्याका उत्कृष्ट अंश और पद्मलेश्याका जघन्य अंश है । ब्रह्म ब्रह्मोत्तर लातव कापिष्ठ शुक्र महाशुक्र इन छह स्वर्गवालोके पद्मलेश्याका मध्यम अश है । शतार सहस्रार स्वर्गवालोके पद्मलेश्याका उत्कृष्ट अंश और शुक्ललेश्याका जघन्य अंग हैं । आनत प्राणत आरण अच्युत तथा नव ग्रेवेयक इन तेरह स्वर्गवाले देवोंके शुरुलेन्याका मभ्यम अश है । इसके ऊपर नव अनुदिश तथा पाच अनुत्तर इन चौदह विमानवाले देवोंके शुरू लेश्याका उत्कृष्ट अंश होता है । भवनवानी आदि तीन दवोके अपर्याप्त अवस्थामें कृष्ण आदि तीन अशुभ लेश्या ही होती है। भावार्थ ---जब भवनत्रिक देवोंके अपर्याप्त अप. म्यामें अशुभ तीन लया और पर्याप्त अवस्थामें पीत लेख्याका जवन्य अंग ननाया इससे मालम रोता है कि शेष वैमानिक दलोंके पयाम और अपर्याप्त अपन्या लेण्या मान ही रोती रे।

१९२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । इस प्रकार स्वामी अधिकारका वर्णन करके साधन अधिकारका वर्णन करते है। वण्णोदयसंपादितसरीरवण्णो दु व्वदो लेस्सा। मोहुदयखओवसमोवसमखयजजीवफंदणं भावो ॥ ५३५ ॥ वर्णोदयसंपादितशरीरवर्णस्तु द्रव्यतो लेश्या । मोहोदयक्षयोपशमोपशमक्षयजजीवस्पन्दो भावः ॥ ५३५ ॥ अर्थ-वर्णनामकर्मके उदयसे जो शरीरका वर्ण ( रंग ) होता है उसको द्रव्यलेश्या कहते है । मोहनीय कर्मके उदय या क्षयोपशम या उपशम या क्षयसे जो जीवके प्रदे- शोकी चंचलता होती है उसको भावलेश्या कहते है । भावार्थ-द्रव्यलेश्याका साधन वर्णनामकर्मका उदय है । भावलेश्याका साधन असंयतपर्यन्त चार गुणस्थानोंमें मोहनीय कर्मका उदय, और देशविरत आदि तीन गुणस्थानोमे माहनीय कर्मका क्षयोपशम, उपश- मश्रेणिमें मोहनीय कर्मका उपशम, तथा क्षपकश्रेणिमें मोहनीय कर्मका क्षय होता है । क्रमप्राप्त संख्या अधिकारका वर्णन करते है। किण्हादिरासिमावलिअसंखभागेण भजिय पविभत्ते । हीणकमा कालं वा अस्सिय दवा दु भजिव्वा ॥ ५३६ ॥ कृष्णादिराशिमावल्यसंख्यभागेन भक्त्वा प्रविभक्ते । हीनक्रमाः कालं वा आश्रित्य द्रव्याणि तु मक्तव्यानि ॥ ५३६ ॥ अर्थ-संसारी जीवराशिमेंसे तीन शुभ लेश्यावाले जीवोका प्रमाण घटानेसे जो शेष रहै उतना कृष्ण आदि तीन अशुभ लेश्यावाले जीवोका प्रमाण है। यह प्रमाण संसारी जीवराशिसे कुछ कम होता है । इस राशिमे आवलीके असंख्यातमे भागका भाग देकर एक भागको अलग रखकर शेप बहुभागके तीन समान भाग करना । तथा शेष-अलग रखे हुए एक भागमें आवलीके असंख्यातमे भागका भाग देकर वहुभागको तीन समान भागोंमेसे एक मागमें मिलानेसे कृष्णलेश्यावाले जीवोका प्रमाण होता है । और शेष एक भागमें फिर आवलीके अमख्यातमे भागका भाग देनेसे लब्ध वहुभागको तीन समान भागोमेंसे दूसरे भागमें मिलानेसे नीललेश्यावाले जीवोंका प्रमाण होता है । और अवशिष्ट एक भागको तीमरे भागमें मिलानेसे कापोतलेश्यावाले जीवोंका प्रमाण होता है । इस प्रकार अशुभ लेट्यावालाका द्रव्यकी अपेक्षासे प्रमाण कहा । यह प्रमाण उत्तरोत्तर कुछ २ घटता २ है । अन कालकी अपेक्षासे प्रमाण बताते है । कृष्ण नील कापोत तीन लेश्याओंका काल मिलानेसे जो अन्तर्महूर्तमात्र काल होता है, उसमें आवलीके असंख्यातमे भागका भाग येना । इसमें एक भागको जुदा रखना और वहुभागके तीन समान भाग करना । तथा शिष्ट एक भागमें आवलोके असंख्यातमे भागका फिर भाग देना । लब्ध एक भागको गोम्मटसारः। १९३ अलग रखकर बहुभागको तीन समान भागोंमेंसे एक भागमे मिलानेसे जो प्रमाण हो वह कृष्णलेश्याका काल है। लब्ध एक भागमें फिर आवलीके असंख्यातमे भागका भाग देनेसे लब्ध बहुभागको तीन समान भागों से दूसरे भागमें मिलानेमे जो प्रमाण हो वह नीललेश्याका काल है। अवशिष्ट एक भागको अवशिष्ट तसिरे समान भागमे मिलानेसे जो प्रमाण हो वह कापोतलेश्याका काल है । इस प्रकार तीन अशुभ लेश्याओके कालका प्रमाण भी उत्तरोत्तर अल्प २ समझना चाहिये । खेत्तादो असुहतिया अणंतलोगा कमेण परिहीणा । कालादोतीदादो अणंतगुणिदा कमा हीणा ॥ ५३७ ।। क्षेत्रतः अशुभत्रिका अनन्तलोकाः क्रमेण परिहीनाः । कालदतीतादनन्तगुणिताः क्रमाद्धीनाः ॥ ५३७ ॥ अर्थ-क्षेत्रप्रमाणकी अपेक्षा तीन अशुभलेश्यावाले जीव लोकाकाशके प्रदेशोंसे अन- न्तगुणे है, परन्तु उत्तरोत्तर क्रमसे हीन २ है । कृष्ण लेश्यावालोंसे कुछ कम नलि लेश्यावाले जीव हैं और नीललेश्यावालोंसे कुछ कम कापोत लेश्यावाले जीव है। तथा कालकी अपेक्षा अशुभ लेश्यावालोका प्रमाण, भूतकालके जितने समय है उससे अनन्तगुणा है । यह प्रमाण भी उत्तरोत्तर हीनकम समझना चाहिये । केवलणाणाणंतिमभागा भायादु किण्हतियजीवा । तेउतिया संखेज्जा संखासंखेज्जभागकमा ॥ ५३८॥ केवलज्ञानानन्तिमभागा भावात्तु कृष्णत्रिकजीवाः । तेजस्त्रिका असंख्येयाः संख्यासंख्येयभागक्रमाः ॥ ५३८ ॥ अर्थ-~-भावकी अपेक्षा तीन अशुभ लेश्यावाले जीव, केवलज्ञानके जितने अविभाग- प्रतिच्छेद है उसके अनन्तमे भागप्रमाण है । यहा पर भी पूर्ववत् उत्तरोत्तर हनिक्रम समझना चाहिये । पीत आदि तीन शुभ लेश्यावालोका प्रमाण सामान्यसे असंख्यात है । तथापि पति- लेश्यावालोंसे संख्यातमे भाग पद्मालेश्यावाले है । और पद्मलेश्यावालोंसे असंख्यातमे भाग शुक्ल- लेश्यावाले जीव हैं। क्षेत्रप्रमाणकी अपेक्षा तीन शुभ लेय्यावालोका प्रमाण बताते हैं । जोइसियादो अहिया तिरिक्खसण्णिस्स संखभागो दु । सृइस्स अंगुलस्स च असंखभागं तु तेउतियं ।। ५३९ ॥ ज्योतिष्कता अधिका. तिर्यक्मनिन सन्यमागन्तु । सूनेर गुदल्य च असत्यभागं तु तेनन्नयम ॥ ५३९ ॥ अर्थ-योतिषी दयोंके प्रमाणसे गुर अदिज तेनान्दया गन्द जी । और नेनो- १९४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । लेश्यावाले संज्ञी तियच जीवोके प्रमाणसे संख्यातगुणे कम पद्मलेश्यावाले जीव है । और सूच्य- ड्गुलके असंख्यातमे भाग शुक्ललेश्यावाले जीव है । भावार्थ-पैसठ हजार पाचसौ छत्तीस प्रतराड्गुलका भाग जगत्प्रतरको देनेसे जो प्रमाण शेष रहे उतने ज्योतिषी देव है । और पाच वार संख्यातसे गुणित पण्णट्ठी प्रमाण प्रतराड्गुलका भाग जगत्प्रतरको देनेसे जो प्रमाण रहे उतने तिर्यच, और संख्यात मनुष्य, इन दोनों राशियोके जोड़नेसे जो प्रमाण हो उतने तेजो- लेश्यावाले जीव है । तथा तेजोलेश्यावालोंसे संख्यातगुणे कम पद्मलेश्यावाले और सूच्यड्गुलके असंख्यातमे भाग शुक्ललेश्यावाले जीव है । उक्त अर्थको ही स्पष्ट करते है । वेसदछप्पण्णंगुलकदिहिदपदरं तु जोइसियमाणं । तस्स य संखेजदिमं तिरिक्खसण्णीण परिमाणं ॥ ५४० ।। द्विशतषट्पञ्चाशदडलकृतिहितप्रतरं तु ज्योतिष्कमानम् । तस्य च संख्येयतमं तिर्यक्संज्ञिनां परिमाणम् ॥ ५४० ॥ अर्थ-दो सौ छप्पन अंगुलके वर्गप्रमाण (पण्णद्वीप्रमाण=६५५३६) प्रतरागु- लका भाग जगत्प्रतरमे देनेसे जो प्रमाण हो उतने ज्योतिषी देव है। और इसके संख्यातमें भागप्रमाण संज्ञी तिर्यंच जीव है। तेउदु असंखकप्पा पल्लासंखेज्जभागया सुक्का । ओहिअसंखेजदिमा तेउतिया भावदो होति ॥ ५४१ ॥ तेजोद्वया असंख्यकल्पाः पल्यासंख्येयभागकाः शुक्लाः । अवध्यसंख्येयाः तेजस्त्रिका भावतो भवन्ति ॥ ५४१ ॥ अर्थ असख्यात कल्पकालके जितने समय है उतने ही सामान्यसे तेजोलेश्यावाले और उतने ही पद्मलेश्यावाले जीव है । तथापि तेजोलेश्यावालोसे पद्मलेश्यावाले संख्या- तमे भाग है । पल्यके असंख्यातमे भागप्रमाण शुक्ललेश्यावाले जीव है । इस प्रकार कालकी अपेक्षासे तीन शुभलेश्याओंका प्रमाण समझना चाहिये । तथा अवधिज्ञानके जितने विकल्प है उसके असंख्यातमे भाग सामान्यसे प्रत्येक शुभलेश्यावाले जीव है । तथापि तेजोलेश्यावालोंसे संख्यातमे भाग पद्मलेश्यावाले और पद्मलेश्यावालोंसे शुक्ललेश्यावाले असं- त्यातमे भाग मात्र है। क्षेत्राधिकारके द्वारा लेश्याओंका वर्णन करते है। सट्ठाणसमुग्वादे उववादे सब्बलोयमसुहाषां । लोयस्सासंखेजदिमागं खेत्तं तु तेउतिये ।। ५४२ ॥

गोम्मटसारः। स्वस्थानसमुद्धाते उपपादे सर्वलोकमशुभानाम् । लोकस्यासंख्येयभागं क्षेत्रं तु तेजस्त्रिके ॥ ५४२ ॥ अर्थ-तीन अशुभलेश्याओंका सामान्यसे स्वस्थान तथा ससुद्घात और उपपादकी अपेक्षा सर्वलोकप्रमाण क्षेत्र है । और तीन शुभ लेश्याओंका क्षेत्र लोकप्रमाणके असंख्यातमे भागमात्र है। भावार्थ-यह सामान्यसे कथन किया है, किन्तु लेश्याओके क्षेत्रका विशेष वर्णन, स्वस्थानस्वस्थान विहारवत्स्वस्थान सात प्रकारका समुद्घात और एक प्रकारका उपपाद इस तरह दश कारणोकी अपेक्षासे किया है । सो विशेषजिज्ञासुओको वह बड़ी टीकामें देखना चाहिये। उपपादक्षेत्रके निकालनेके लिये सूत्र कहते है । मरदि असंखेजदिमं तस्सासंखा य विग्गहे होति । तस्सासंखं दूरे उववादे तस्स खु असंखं ॥ ५४३ ॥ म्रियते असंख्येयं तस्यासंख्याश्च विग्रह भवन्ति । तस्यासंख्यं दूरे उपपादे तस्य खलु असंख्यम् ॥ ५४३ ॥ अर्थ-घनामुलके तृतीय वर्गमूलका जगच्छ्रेणीसे गुणा करनेपर जो प्रमाण हो उतने सौधर्म और ईशान स्वर्गके जीवोंका प्रमाण है । इसमे पल्यके असंख्यातमे भागका भाग देनेसे एक भागप्रमाण प्रतिसमय मरनेवाले जीव है। मरनेवाले जीवोंके प्रमाणमें पल्यके असंख्यातमे भागका भाग देनेसे जो वहुभागका प्रमाण हो उतने विग्रहगति करनेवाले जीव है । विग्रहगतिवाले जीवोंके प्रमाणंमें पल्यके असंख्यातमे भागका भाग देनेसे जो वहुभागका प्रमाण हो उतने मारणान्तिक समुद्घातवाले जीव है । इसमें भी पल्यके असंख्यातमे भागका भाग देनेसे लब्ध एक भाग प्रमाण दूर मारणान्तिक समुद्धातवाले जीव है । इसमे भी पल्यके असंख्यातमे भागका भाग देनेसे लब्ध एक भागप्रमाण उपपाद जीव है । यहा पर तिर्योंकी उत्पत्तिकी अपेक्षासे एक जीवसम्बधी प्रदेश फैलनेकी अपेक्षा डेट राजू लम्बा सख्यात सूच्यंगुलप्रमाण चौड़ा वा ऊचाक्षेत्र है, इसके धन- क्षेत्रफलको उपपाद जीवोके प्रमाणसे गुणा करनेपर जो प्रमाण हो उतना ही उपपाट क्षेत्रका प्रमाण है । भावार्थ---जिस स्थानवाले जीवोका क्षेत्र निकालना हो उस स्थानकाले जीवोंकी सख्याका अपनी २ एक जीवसम्बन्धी अवगाहनाप्रमाणसे अथवा जहा तक एक जीव गमन कर सकता है उस क्षेत्रप्रमाणसे गुणा करनेपर जो प्रमाण हो सामान्यम उतना ही उनका क्षेत्र कहा जाता है। यहाँपर पीतल्यासम्बन्धी क्षेत्र का प्रमाण बताया पन लल्यांमें नया शुरल लेगमें भी क्षेत्रका प्रमाण इस ही प्रगारमे होता है का विशेषता है सो वही टीका देवना।

१९६
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
सुक्कस्स समुग्धादे असंखलोगा य सव्वलोगो य ।
शुक्लायाः समुद्धाते असंख्यलोकाश्च सर्वलोकश्च ।
अर्थ--इस सूत्रके पूर्वार्धमें शुक्ललेश्याका क्षेत्र लोकके असंख्यात भागोंमेंसे एक भागको
छोड़कर शेष बहुभाग प्रमाण वा सर्व लोक बताया है सो केवल समुद्घातकी अपेक्षासे है।
भावार्थ-शुक्ल लेश्याका क्षेत्र दूसरे स्थानोंमें उक्त रीतिसे ही समझना ।
क्रमप्राप्त स्पर्शाधिकारका वर्णन करते है।
फासं सर्व लोयं तिहाणे असुहलेस्साणं ।। ५४४ ॥
स्पर्शः सर्वो लोकस्त्रिस्थाने अशुभलेश्यानाम् ॥ ६४४ ॥
अर्थ-कृष्ण आदि तीन अशुभ लेश्यावाले जीवोंका स्पर्श स्वस्थान, समुद्धात, उप-
पाद, इन तीन स्थानोंमें सामान्यसे सर्व लोक है । भावार्थ-वर्तमानमें जितने प्रदेशोंमें जीव
रहे उतनेको क्षेत्र कहते है । और भूत तथा वर्तमान कालमें जितने प्रदेशोंमें जीव रहे उतनेको
स्पर्श कहते है । सो तीन अशुभलेश्यावाले जीवोका स्पर्श उक्त तीन स्थानोंमें सामान्यसे सर्व-
लोक है। विशेषकी अपेक्षासे कृष्णलेश्यावालोंका दश स्थानोंमेंसे स्वस्थानस्वस्थान, वेदना कषाय
मारणान्तिक समुद्घात, तथा उपपादस्थानमें सर्वलोकप्रमाण स्पर्श है । संख्यात सूच्यंगुलको जग-
त्प्रतरसे गुणा करने पर जो प्रमाण उत्पन्न हो उतना विहारवत्स्वस्थानमे स्पर्श है। तथा वैक्रि-
यिक समुद्धातमें लोकके सख्यातमे भागप्रमाण स्पर्श है। और इस लेश्यामें तैजस आहारक
केवल समुद्धात नहीं होता । कृष्णलेश्याके समान ही नील तथा कापोतलेश्याका भी स्पर्श
समझना ।
तेजोलेश्यामें स्पर्शका वर्णन करते हैं।
तेउस्स य सट्ठाणे लोगस्स असंखभागमेत्तं तु ।
अडचोद्दसभागा वा देसूणा होति णियमेण ॥ ५४५ ॥
तेजसश्च स्वस्थाने लोकस्य असंख्यमागमात्रं तु ।
अष्ट चतुर्दशमागा वा देशोना भवन्ति नियमेन ॥ ५४५ ॥
अर्थ-पातलेश्याका स्वस्थानस्वस्थानकी अपेक्षा लोकके असंख्यातमे भागप्रमाण स्पर्श है।
और विहारवत्म्वस्थानकी अपेक्षा त्रसनालीके चौदह भागोंमेंसे कुछ कम आठ भागप्रमाण स्पर्श है ।
एवं तु समुग्धादे णव चोदसभागयं च किंचणं ।
उववादे पटमपदं दिवढचोद्दस य किंचूणं ॥ ५४६ ॥
एवं तु समुदाते नव चतुर्दशभागश्न किश्चिदूनः ।
उपपादे प्रयमपदं न्यर्घचतुर्दश च किञ्चिदूनम् ॥ ५४६ ॥

गोम्मटसारः। १९७ है है । अर्थ-विहारवत्स्वस्थानकी तरह समुद्घातमे भी त्रसनालीके चौदह भागोंमेंसे कुछ कम आठ भागप्रमाण स्पर्श है । तथा मारणान्तिक समुद्घातकी अपेक्षा चौदह भागोंमेंसे कुछ कम नव भागप्रमाण स्पर्श है । और उपपाद स्थानमे चौदह भागमेंसे कुछ कम डेढ़ भागप्रमाण स्पर्श । इस प्रकार यह पीत लेश्याका स्पर्श सामान्यसे तीन स्थानों में बताया डेढ़ २ गाथामें पद्म तथा शुक्ललेश्याका स्पर्श बताते है। पम्मस्स य सट्ठाणसमुग्धाददुगेसु होदि पढमपदं । अड चोदस भागा वा देसूणा होति णियमेण ॥ ५४७॥ पद्मायाश्च स्वस्थानसमुद्धातद्विकयोः भवति प्रथमपदम् । अष्ट चतुर्दश भागा वा देशोना भवन्ति नियमेन ॥ ५४७ ॥ अर्थ-पद्मलेश्याका विहारवत्स्वस्थान, वेदाना कषाय वैक्रियिक तथा मारणान्तिक समुद्घातमें चौदह भागोंमेसे कुछ कम आठ भागप्रमाण स्पर्श है । तैजस तथा आहार समु- द्घातों संख्यात घनामुल प्रमाण स्पर्श है । यहा पर च शब्दका ग्रहण किया है इसलिये स्वस्था- नस्वस्थानमें लोकके असंख्यातभागोंमेंसे एक भाग प्रमाण स्पर्श है। उववादे पढमपदं पणचोदसभागयं च देसूणं । सुक्कस्स य तिट्ठाणे पढमो छच्चोदसा हीणा ॥ ५४८॥ उपपादे प्रथमपदं पञ्चचतुर्दशभागकश्च देशोनः । शुक्लायाश्च त्रिस्थाने प्रथमः पट्चतुर्दश हीनाः ॥ ५४८ ॥ अर्थ-पद्मलेश्या शतार सहस्रार स्वर्गपर्यन्त सम्भव है। इसलिये उपपादकी अपेक्षासे पद्मलेश्याका स्पर्श त्रसनालीके चौदह भागोंमेंसे कुछ कम पाच भागप्रमाण है । शुक्ललेश्यावाले जीवोंका स्वस्थानस्वस्थानमें तेजोलेश्याकी तरह लोक्के असंख्यातमे भागप्रमाण स्पर्श है। और विहारवत्स्वस्थान, तथा वेदना कपाय वैक्रियिक मारणान्तिक समुद्घात और उपपाद, इन तीन स्थानोंमें चौदह भागोमेसे कुछ कम छह भाग प्रमाण स्पर्श है। तेजस आहारक समुद्घातमें संख्यातघनामुल स्पर्श है। णवरि समुग्धादम्मि य संखातीदा हवंति भागा वा। सव्वो वा खलु लोगो फासो होदित्ति णिहिट्ठो ॥ ५४९ ।। नवरि समुद्घाते च संख्यातीता भवन्ति भागा वा । सो वा खल लोकः स्पशी भवतीति निर्दिष्टः ॥ ५४९ ॥ अर्थ-केवल-समुद्यातमें विशेषता है, वह इस प्रकार है कि दण्ट ममुद्द्यातमें स्पर्श क्षेत्रकी तरह संख्यात प्रतरागल्से गणित जगलेगी प्रमाण है । और थिन ग उपविष्ट कपाट समुवातमें सन्न्यातसूच्यगुमान नगत्पनर प्रमाण है। प्रतर समुद्गतमें लंकले '१९८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । के चार असंख्यात भागोंसे एक भागको छोडकर शेप वहु भागप्रमाण म्पर्श है । लोकपूर्ण समु रातमे सर्वलोकप्रमाण स्पर्श है । भावार्थ-केवलसमुद्घातके चार भेट है। टण्ड कपाट प्रतर लोकपूर्ण । दण्ड समुद्घातके भी दो भेद है, एक स्थित दूसरा उपविष्ट । और स्थित तथा उपविष्टके भी आरोहक अवरोहककी अपेक्षा दो २ मेद है । कपाट समुद्घात भेद है पूर्वाभिमुख स्थित उत्तराभिमुख स्थित पूर्वाभिमुख-उपविष्ट उत्तराभिमुख-उपविष्ट । इन चारमेंसे प्रत्येकके आरोहक अवरोहककी अपेक्षा दो २ भेट है। तथा प्रतर लोकपर्णका एक २ ही भेद है। यहा पर जो दण्ड और कपाट समुद्घातका स्पर्श बताया है वह आरोहक और अवरो- हककी अपेक्षा दो भेदोंमेंसे एक ही भेद का है, क्योंकि एक जीव समुद्रात अवस्थामें जितने क्षेत्रका आरोहण अवस्थामे स्पर्श करता है उतने ही क्षेत्रका अवरोहण अवस्थामें भी स्पर्श करता है । इस लिये यदि आरोहण अवरोहण दोनों अवस्थाओका सामान्य स्पर्श जानना हो तो दण्ड और कपाट दोनों ही का उक्त प्रमाणसे दूना २ स्पर्श समझना चाहिये । प्रतर समुद्धातमे लोकके असंख्यातमे - भागप्रमाण वातवलयका स्थान छूट जाता है इसलिये यहा पर लोकके असंख्यात भागोंमेंसे एक भागको छोड़कर शेप वहुभागप्रमाण स्पर्श हैं । ॥ इति स्पर्शाधिकार.॥ क्रमप्राप्त कालाधिकारका वर्णन करते है। कालो छल्लेस्साणं णाणाजीवं पडुच्च सव्वद्धा । अंतोमुहुत्तमवरं एवं जीवं पडच हवे ॥ ५५० ॥ कालः षड्लेश्यानां नानाजीव प्रतीत्य सर्वार्द्धा । अन्तर्मुहूतोऽवर एक जीवं प्रतीत्य भवेत् ॥ ५५० ।। अर्थ- ---नाना जीवोंकी अपेक्षा कृष्ण आदि छहों लेश्याओंका सर्व काल है। तथा एक जीव अपेक्षा सम्पूर्ण लेश्याओका जघन्य काल अन्तर्मुहूतमात्र है । अवहीणं तेत्तीसं सत्तर सत्तेव होंति दो चेव । अट्ठारस तेत्तीसा उक्कस्सा होति अदिरेया ।। ५५१ ॥ उदधीनां त्रयस्त्रिंशत् सप्तदश सप्तैव भवन्ति द्वौ चैव । अष्टादश त्रयस्त्रिंशत् उत्कृष्टा भवन्ति अतिरेकाः ॥ ९५१ ॥ अर्थ-उत्कृष्ट काल कृष्णलेश्याका तेतीस सागर, नीललेश्याका सत्रह सागर, कापोत- लेण्याका सातसागर, पीतलेश्याका दो सागर, पद्म लेश्याका अठारह सागर, शुक्ल लेश्याका तेतीस सागर से कुछ अधिक है। भावार्थ-यह अधिकका सम्बन्ध छहो लेश्याओंके उत्कृष्ट कालके साथ २ करना चाहिये, क्योंकि यह उत्कृष्ट कालका वर्णन देव, और नार- गोम्मटसारः । १९९ कियोंकी अपेक्षासे है । सो जिस पर्यायको छोडकर देव या नारकी उत्पन्न हो उस पर्यायके अन्तके अन्तर्मुहूर्तमें तथा देव नारक पर्यायको छोड़कर जिस पर्यायमें उत्पन्न हो उस पर्यायके आदिके अन्तर्मुहूर्तमें वही लेश्या होती है । इस ही लिये छहों लेश्याओंके उक्त उत्कृष्ट कालप्रमाणमें दो २ अन्तर्मुहूर्तका काल अधिक २ समझना । तथा पीत और पद्मलेश्याके कालमें कुछ कम आधा सागर भी अधिक होता है। जैसे सौधर्म और ईशान स्वर्गमें दो सागरकी आयु है । परन्तु यदि कोई घातायुष्क सम्यग्दृष्टि सौधर्म या ईशान स्वर्गमे उत्पन्न हो तो उसकी अन्तर्मुहूर्त कम ढाई सागरकी भी आयु हो सकती है । इस ही तरह घातायुष्क मिथ्यादृष्टिकी पल्यके असंख्यातमे भागप्रमाण आयु अधिक हो सकती है। परन्तु यह अधिकपना सौधर्म स्वर्गसे लेकर सहस्रार स्वर्ग पर्यन्त ही है । क्योंकि आगे घातायुष्क जीव उत्पन्न नहीं होता। ॥ इति कालाधिकारः॥ दो गाथाओंमें अन्तर अधिकारका वर्णन करते है। अंतरमवरुक्कस्सं किण्हतियाणं मुहुत्तअंतं तु । उवहीणं तेत्तीसं अहियं होदित्ति णिद्दिढें ॥ ५५२ ॥ तेउतियाणं एवं णवरि य उक्तस्स विरहकालो दु। पोग्गलवरिवहा हु असंखेज्जा होंति णियमेण ॥ ५५३ ॥ अन्तरमवरोत्कृष्टं कृष्णत्रयाणां मुहूर्तान्तस्तु । उदधीनां त्रयस्त्रिशदधिकं भवतीति निर्दिष्टम् ।। ५५२ ।। तेजस्त्रयाणामेव नवरि च उत्कृष्टविरहकालस्तु । पुद्गलपरिवर्ता हि असंख्येया भवन्ति नियमेन ।। ५५३ ॥ अर्थ-कृष्ण आदि तीन अशुभलेश्याओंका जघन्य अंतर अन्तर्मुहूर्तमात्र है । और उत्कृष्ट अंतर कुछ अधिक तेतीस सागर होता है । पीत आदि तीन शुभ लेण्याओंका अंतर भी इस ही प्रकार है, परन्तु कुछ विशेषता है । शुभ लेश्याओंका उत्कृष्ट अतर नियमसे असंख्यात पुद्गल परिवर्तन है । भावार्थ-किसी विवक्षित एक लेश्याको छोड़कर दूसरी लेश्यारूप परिणमन करके जितने कालमें फिरसे विवक्षित लेण्यारूप परिणमन कर उतन कालको विवक्षित लेदयाका विरहकाल या अन्तर कहते हैं । इस प्रकारका अंतर कृणदेश्याका जघन्य अन्तर्मुहुर्तमात्र है । उत्कृष्ट अंतर दश अन्तर्मुहूर्त और आठ वर्ष कम एक कोटिपूर्व वर्ष अधिक तेतीस रागर प्रमाण है। इस ही प्रकार नीट तथा कापोन्लेब्याका भी अंतर जानना । परन्तु इतनी विशेषता है कि नीट केल्याने अनरम आठ अंतमहत और बनलेल्या नग्में एर अनर्मुरत ही अधिक है । अत्र शुभ लेण्याओंका उत्कृष्ट अर टन्नद्वारा बताने हैं।

२००
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
कोई जीव पीत लेश्याको छोडकर क्रमसे एक २ अन्तर्मुहूर्तमात्रतक कपोत नील कृष्ण लेश्याको प्राप्त
हुआ, कृष्ण लेश्याको प्राप्त होकर एकेन्द्रिय अवस्थामें आवलीके असंख्यातमे भागप्रमाण पुद्गलद्रव्यपरि-
वर्तनोका जितना काल हो उतने काल पर्यन्त भ्रमण कर विकलेन्द्रिय हुआ, यहा पर भी उत्कृष्टतासे
संख्यात हजार वर्ष तक भ्रमण किया । पीछे पंचेन्द्रिय होकर प्रथम समयसे एक २ अंतर्मुहूर्तमें क्रमसे
कृष्ण नील कपोत लेश्याको प्राप्त होकर पीत लेश्याको प्राप्त हुआ । इस प्रकारके जीवके पीत
लेश्याका उत्कृष्ट अंतर छह अंतर्मुहूर्त और संख्यात हजार वर्ष अधिक आवलीके असंख्यातमे
भागप्रमाण पुद्गलद्रव्यपरावर्तन है। पद्म लेश्याका उत्कृष्ट अंतर इस प्रकार है कि कोई
पद्मलेश्यावाला जीव पद्मलेश्याको छोड़कर अंतर्मुहूर्त तक पीत लेश्यामे रह कर पल्यके असं-
ख्यातमेभाग अधिक दो सागरकी आयुसे सौधर्म ईशान स्वर्गमें उत्पन्न हुआ, वहांसे चयकर
एकेन्द्रिय अवस्थाम आवलीके असंख्यातमे भागप्रमाण पुद्गलपरावर्तनोके कालका जितना प्रमाण
है उतने काल तक भ्रमण किया । पीछे विकलेन्द्रिय होकर संख्यात हजार वर्ष तक भ्रमण
किया । पीछे पंचेन्द्रिय होकर प्रथम समयसे लेकर एक २ अन्तर्मुहूर्ततक क्रमसे कृष्ण नील
कपोत पीत लेश्याको प्राप्त होकर पद्मलेश्याको प्राप्त हुआ इस तरहके जीवके पाच अंतर्मुहूर्त
और पल्यके असंख्यातमे भाग अधिक दो सागर तथा संख्यात हजार वर्ष अधिक आवली के
असंख्यातमे भागप्रमाण पुद्गलपरावर्तनमात्र पद्मलेश्याका उत्कृष्ट अंतर होता है। शुक्ल लेश्याका
उत्कृष्ट अंतर इस प्रकार है कि कोई शुक्ल लेश्यावाला जीव शुक्ललेश्याको छोड़कर क्रमसे
एक २ अन्तर्मुहूर्ततक पद्म पीत लेश्याको प्राप्त होकर सौधर्म ईशान स्वर्गमें होकर तथा वहां
पर पूर्वोक्त प्रमाण कालतक रह कर पीछे एकन्द्रिय अवस्थामें पूर्वोक्त प्रमाण काल तक भ्रमण
कर पीछे विकलेन्द्रिय होकर भी पूर्वोक्त प्रमाण काल तक भ्रमण करके क्रमसे पंचेन्द्रिय होकर
प्रथम समयसे लेकर एक २ अन्तर्मुहूर्त तक क्रमसे कृष्ण नील कपोत पीत पद्म लेश्याको
प्राप्त होकर शुक्ल लेश्याको प्राप्त हुआ इसतरहके जीवके सात अंतर्मुहूर्त संख्यात हजार
और पल्यके असंख्यातमे भाग अधिक दो सागर अधिक आवलीके असंख्यातमे भागप्रमाण
पहलपरावर्तनमात्र शुक्ललल्याका उत्कृष्ट अंतर होता है ।
॥ इति अंतराधिकारः॥
वर्ष
प्रमप्राप्त भाव और अव्यवहत्व अधिकारका वर्णन करते है।
मावादी छल्लेम्सा ओदयिया होंति अप्पबहुगं तु ।
इत्वपमाण सिद्ध इदि लेस्सा वपिणदा होति ॥ ५५४ ॥

गोम्मटसारः।
२०१
भावतः षड्लेश्या औदयिका भवन्ति अल्पवहुकं तु ।
द्रव्यप्रमाणे सिद्धमिति लेश्या वर्णिता भवन्ति ।। १५४ ॥
अर्थ-भावकी अपेक्षा छहों लेश्या औदयिक है, क्योंकि योग और कषायके सयोगको
ही लेश्या कहते है, और ये दोनो अपने २ योग्य कर्मके उदयसे होते है । तथा लेश्याओंका
अल्पबहुत्व, पहले लेश्याओंका जो संख्या अधिकारमें द्रव्य प्रमाण वताया है उसीसे सिद्ध है।
इनमें सबसे अल्प शुक्ललेश्यावाले है, इनसे असंख्यातगुणे पद्मलेश्यावाले और इनसे भी संख्यातगुणे
पीतलेश्यावाले जीव है। पीत लेश्यावालोसे अनंतानंतगुणे कपोतलेश्यावाले है, इनसे कुछ
अधिक नील लेश्यावाले और इनसे भी कुछ अधिक कृष्णलेश्यावाले जीव है ।
॥ इति अल्पबहुत्वाधिकारः ॥
इस प्रकार सोलह अधिकारोंके द्वारा लेश्याओंका वर्णन करके अब लेश्यारहित जीवोका
वर्णन करते है।
किण्हादिलेस्सरहिया संसारविणिग्गया अणंतमहा।
सिद्धिपुरं संपत्ता अलेस्प्लिया ते मुणेयव्वा ॥ ५५५ ।।
कृष्णादिलेश्यारहिताः संसारविनिर्गता अनंतसुखाः ॥
सिद्धिपुरं संप्राप्ता अलेश्यास्ते ज्ञातव्याः ॥ ५५५ ॥
अर्थ-जो कृष्ण आदि छहों लेश्याओंसे रहित है, अतएव जो पंचपरिवर्तनरूप
संसारसमुद्रके पारको प्राप्त होगये है तथा जो अतीन्द्रिय अनंत सुखसे तृप्त है, और आत्मो-
पलब्धिरूप सिद्धिपुरीको जो प्राप्त होगये है, उन जीवोंको अयोगकेवली या सिद्धभगवान् कहते
है। भावार्थ-जो अनंत सुखको प्राप्तकर संसारसे सर्वथा रहित होकर सिद्धि पुरको प्राप्त
होगये है वे जीव सर्वथा लेश्याओंसे रहित होते हैं। अत एव उनको अलेश्य-सिद्ध कहते हैं।
॥ इति लेश्याप्ररूपणा समाप्ता ।
क्रमप्राप्त भन्यमार्गणाता वर्णन करते है।
भविया सिद्धी जेसिं जीवाणं ते हवंति भवसिद्धा।
तविवरीयाऽमया संसारादो ण सिझंति ॥ ५५६ ।।
भन्या मिन्द्रियपी जीवानां ते भान्ति मानिला ।
तस्पिरीता अभयाः मंगागज मियानि ॥ ५५ ॥

२०२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्। अर्थ-जिन जीवोकी अनन्तचतुष्टयरूप सिद्धि होनेवाली हो अथवा जो उसकी प्राप्तिके योग्य हों उनको भव्यासिद्ध कहते है। जिनमें इन दोनोमेंसे कोई भी लक्षण घटित न हो उन जीवोको अभव्यसिद्ध कहते है। भावार्थ-कितने ही भव्य ऐसे है जो मुक्तिकी प्राप्तिके योग्य है; परन्तु कभी मुक्त न होगे; जैसे वन्ध्यापनेके दोपसे रहित विधवा सती स्त्री पुत्रोत्य- त्तिकी योग्यता है; परन्तु उसके कभी पुत्र उत्पन्न नहीं होगा । कोई भव्य ऐसे हैं जो निय- मसे मुक्त होंगे। जैसे वन्ध्यापनेसे रहित स्त्रीके निमित्त मिलने पर नियमसे पुत्र उत्पन्न होगा। इन दोनो स्वभावोंसे जो रहित है उनको अभव्य कहते है। जैसे वन्ध्या स्त्रीके निमित्त मिल चाहे न मिलै; परन्तु पुत्र उत्पन्न नहीं हो सकता है । जिनमें मुक्तिप्राप्तिकी योग्यता है उनको भव्यसिद्ध कहते हैं इस अर्थको दृष्टान्तद्वारा स्पष्ट करते है। भव्वत्तणस्स जोग्गा जे जीवा ते हवंति भवसिद्धा । ण हु मलविगमे णियमा ताणं कणओवलाणमिव ॥ ५५७ ॥ भव्यत्वस्य योग्या ये जीवास्ते भवन्ति भवसिद्धा. । न हि मलविगमे नियमात् तेषा कनकोपलानामिव ॥ ५५७ ॥ अर्थ-जो जीव अनन्तचतुष्टयरूप सिद्धिकी प्राप्तिके योग्य है; परन्तु उस सिद्धिको कभी प्राप्त न होंगे उनको भवसिद्ध कहते है । इसप्रकारके जीवोंका कर्ममल नियमसे दूर नहीं हो सकता । जैसे कनकोपलका । भावार्थ-ऐसे बहुतसे कनकोपल है जिनमें निमित्त मिलानेपर शुद्ध स्वर्णरूप होनेकी योग्यता है, परन्तु उनकी इस योग्यताकी अभिव्यक्ति कभी नहीं होगी। अथवा जिसतरह अहमिन्द्र देवोमें नरकादि में गमन करनेकी शक्ति है परन्तु उस शक्तिकी अभि- व्यक्ति कभी नहीं होती । इस ही तरह जिन जीवोमें अनंतचतुष्टयको प्राप्त करनेकी योग्यता है परन्तु उनको वह कभी प्राप्त नहीं होगी उनको भवसिद्ध कहते है। ये जीव सदा संसारमें ही रहते है। ण य जे भधाभवा मुत्तिसुहातीदणंतसंसारा । ते जीवा णायव्वा णेव य भव्वा अभव्या य ॥ ५५८ ॥ न च ये भव्या अभव्या मुक्तिसुखा अतीतानन्तसंसाराः । ते जीवा ज्ञातव्या नैव च भन्या अभव्याश्च ।। ६५८ ॥ अर्थ-जिनका पाच परिवर्तनरूप अनन्त संसार सर्वथा छूट गया है, और जो मुक्ति- सुखके भोक्ता है उन जीवोंको न तो भव्य समझना चाहिये और न अभव्य समझना चाहिये; क्योंकि अब उनको कोई नवीन अवस्था प्राप्त करना शेष नहीं रहा है इसलिये वे भन्य भी नहीं है। और अनन्त चतुष्टयको प्राप्त हो चुके है इसलिये अभव्य भी - गोम्मटसारः । २०३ नहीं है । भावार्थ-जिसमें अनंत चतुष्टयके अभिव्यक्त होनेकी योग्यता ही न हो उसको अभव्य कहते है । अतः ये अभव्य भी नहीं है, क्योंकि इन्होने अनंत चतुष्टयको प्राप्त कर लिया है । और भव्यत्वका परिपाक हो चुका अतः अपरिपक्व अवस्थाकी अपेक्षासे भव्य भी नहीं है। भव्यमार्गणामें जीवोंकी संख्या बताते है । अवरो जुत्ताणतो अमव्वरासिस्स होदि परिमाणं । तेण विहीणो सव्वो संसारी भव्यरासिस्स ।। ५५९ ॥ अवरो युक्तानन्तः अभव्यराशेर्भवति परिमाणम् । तेन विहीनः सर्वः संसारी भव्यराशेः ॥ ५५९ ॥ अर्थ-जधन्य युक्तानन्तप्रमाण अभव्य राशि है । और सम्पूर्ण संसारी जीवराशिमेंसे अभव्यराशिका प्रमाण घटाने पर जो शेष रहे उतना ही भव्यराशिका प्रमाण है । भावार्थ-- भव्यराशि बहुत अधिक है और अभव्य राशि बहुत थोडी है । अभव्य जीव सदा पांच परिवर्तन रूप संसारसे युक्त ही रहते है । एक अवस्थासे दूसरी अवस्थाका प्राप्त होना इसको संसार-परिवर्तन कहते है। इस संसार अर्थात परिवर्तनके पांच भेद है। द्रव्य क्षेत्र काल भव भाव । द्रव्यपरिवर्तनके दो भेद है, एक नोकर्मद्रव्यपरिवर्तन दूसरा कर्मद्रव्यपरिवर्तन । यहां पर इन परिवर्तनोंका क्रमसे स्वरूप बताते है। किसी जीवने, स्निग्ध रूक्ष वर्ण गन्धादिके तीव्र मंद मध्यम भावों से यथासम्भव भावोंसे युक्त, औदा- रिकादि तीन शरीरोमेंसे किसी शरीर सम्बन्धी छह पर्याप्तिरूप परिणमनेके योग्य पुद्गलोंका एक समयमें ग्रहण किया । पीछे द्वितीयादि समयोंमें उस द्रव्यकी निर्जरा करदी । तथा पीछे अनतवार अग्रहीत पुद्गलोंको ग्रहण करके छोड दिया , अनन्तवार मिश्रद्रव्यको ग्रहण करके छोडदिया, अनंतवार ग्रहीतको भी ग्रहण करके छोड दिया । जब वही जीव उन ही स्निग्ध रूक्षादि भावोंसे युक्त उनही पुद्गलोको जितने समयमें ग्रहण करें उतने कालसमुदायको नोकर्मद्रव्यपरिवर्तन कहते है। पूर्वमें ग्रहण किये हुए परमाणु जिस समयप्रवद्धरूप स्कधर्मे हों उसको ग्रहीत कहते है । जिस समयप्रवद्धमें एसे परमाणु हो कि जिनका जीवने पहले ग्रहण नहीं किया हो उसको अग्रहीत कहते है । जिस समयप्रद्धमें दोनोंप्रकारके परमाणु हो उसको मिश्र कहते है। अग्रहीत परमाणु भी लोकरें अनन्तानन्त है; क्योंकि सम्पूर्ण जीवराशिका समयप्रवद्धके प्रमाणमे गुणा करने पर जो लय आवे उसका अतीतकार के समस्त समयप्रमाणन गुणा करनेपर जो लय आने उससे भी अनन्तगणा पुद्गलद्रव्य है । इन परिननका माल अग्रहीतम्रण ग्रहीतग्रहण मिश्रमणके भेदमे नीन प्रकारका | इसी ना किस तरह रोती है यर नवम गन्त्रहाग चनाते है।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । ००x OOX ००४ ००x Xx० XXO Xx० xxo Xxo XXO द्रव्यपरिवर्तन यन्त्र. ००१ xx१ xx१ xx१ xx१ xx१ xx१ ११४ ११४ ११० ११४ ११४ ११० इस यन्त्रमें शून्यसे अग्रहीत, हंसपदसे (४ इस चिह्नसे ) मिश्र और एकके अंकसे ग्रहीत समझना चाहिये । तथा दोवार लिखनेसे अनन्तवार समझना चाहिये । इस यन्त्रके देखनेसे स्पष्ट होता है कि निरन्तर अनन्तवार अग्रहीतका ग्रहण होचुकनेपर एक वार मिश्रका ग्रहण होता है, मिश्रग्रहणके बाद फिर निरन्तर अनन्तवार अग्रहीतका ग्रहण हो चुकने पर एकवार मिश्रका ग्रहण होता है । इस ही क्रमसे अनन्तवार मिश्रका ग्रहण हो चुकने पर अग्रहीतग्रहणके अनंतर एक वार ग्रहीतका ग्रहण होता है । इसके बाद फिर उस ही तरह अनंत वार अग्रहीतका ग्रहण हो चुकने पर एक बार मिश्रका ग्रहण और मिश्रग्रहणके बाद फिर अनन्तवार अग्रहीतका ग्रहण होकर एकवार मिश्रका ग्रहण होता । तथा मिश्रका ग्रहण अनन्तवार होचुकने पर अनन्तवार अग्रहीतका ग्रहण करके एकवार फिर ग्रहीतका ग्रहण होता है । इस ही क्रमसे अनन्तवार ग्रहीतका ग्रहण होता है। यह अभिप्राय सूचित करनेके लिये ही प्रथम पङ्तिमे पहले तीन कोठोंके समान दूसरे भी तीन कोठे किये है। अर्थात् इस क्रमसे अनंतवार ग्रहीतका ग्रहण होचुकने पर नोकर्मपुद्गलपरिवर्तनके चार भेदोमेसे प्रथम भेद समाप्त होता है । इसके बाद दूसरे भेदका प्रारम्भ होता है । यहा पर अनन्त- वार मिश्रका ग्रहण होनेपर एकवार अग्रहीतका ग्रहण, फिर अनंतवार मिश्रका ग्रहण होने पर एक वार अग्रहीतका ग्रहण इस ही क्रमसे अनन्तवार अग्रहीतका ग्रहण होकर अनंत वार मिश्रका ग्रहण करके एक वार ग्रहीतका ग्रहण होता है। जिस क्रमसे एकवार ग्रही- तका ग्रहण किया उस ही क्रमसे अनंतवार ग्रहीतका ग्रहण होचुकने पर नोकर्मपुद्गलपरि- वर्तनका दूसरा भेद समाप्त होता है । इसके बाद तीसरे भेदमें अनन्तवार मिश्रका ग्रहण करके एकवार ग्रहीतका ग्रहण होता है, फिर अनन्तवार मिश्रका ग्रहण करके एकवार ग्रहीतका ग्रहण इस । क्रमसे अनंतवार ग्रहीतका ग्रहण हो चुकने पर अनंतवार मिश्रका ग्रहण करके एकवार अग्रहीतका ग्रहण होता है। जिस तरह एकवार अग्रहतिका ग्रहण किया उस ही तरह अनंतवार अग्रहीतका ग्रहण होनेपर नोकर्मपुद्गलपरिवर्तनका तीसरा भेद समाप्त होता है। इसके बाद चौथे भेदका प्रारम्भ होता है, इसमें प्रथम ही अनन्तवार ग्रहीतका ग्रहण करके एकवार मिश्रका ग्रहण होता है, इसकेबाद फिर अनंतवार ग्रही-

गाम्मटसारः।
२०५
तका ग्रहण होनेपर एकवार मिश्रका ग्रहण होता है। इस तरह अनंतवार मिश्रका ग्रहण
होकर पाछे अनंतवार ग्रहीतका ग्रहण करके एकवार अग्रहीतका ग्रहण होता है । जिस
तरह एकवार अग्रहीतका ग्रहण किया उस ही क्रमसे अनंतवार अग्रहीतका ग्रहण हो
चुकने पर नोकर्मपुद्गलपरिवर्तनका चौथा भेद समाप्त होता है । इस चतुर्थ भेदके समाप्त
होचुकने पर, नोकर्मपुद्गलपरिवर्तनके प्रारम्भके प्रथम समयमें वर्ण गन्ध आदिके जिस
भावसे युक्त जिस पुद्गलद्रव्यको ग्रहण किया था उस ही भावसे युक्त उस शुद्ध ग्रहीतरूप
पुद्गलद्रव्यको जीव ग्रहण करता है । इस सबके समुदायको नोकर्मद्रव्यपरिवर्तन कहते है । तथा
इसमें जितना काल लगे उसको नोकर्मद्रव्यपरिवर्तनका काल कहते है ।
इस ही तरह दूसरा कर्मपुद्गलपरिवर्तन भी होता है । विशेषता इतनी ही है कि जिस
तरह नोकर्मद्रव्यपरिवर्तनमे नोकर्मपुद्गलोंका ग्रहण होता है उस ही तरह यहा पर कर्म-
पुद्गलोंका ग्रहण होता है । परन्तु क्रममें कुछ भी विशेषता नही है । जिस तरहके चार
भेद नोकर्मद्रव्यपरिवर्तनमें होते हैं उस ही तरह कर्मद्रव्यपरिवर्तनमे भी चार भेद होते
है । इन चार भेदोंमे भी अग्रहीतग्रहणका काल सबसे अल्प है, इससे अनंतगुणा काल
मिश्रग्रहणका है । इससे भी अनंतगुणा ग्रहीतग्रहणका जघन्यकाल है, इससे अनंतगुणा
ग्रहीतग्रहणका उत्कृष्ट काल है । क्योकि प्रायःकरके उस ही पुद्गलद्रव्यका ग्रहण होता है
कि जिसके साथ द्रव्य क्षेत्र काल भावका संस्कार हो चुका है। इस ही अभिप्रायसे यह
सूत्र कहा है कि:-
सुहमट्टिदिसंजुत्तं आसण्णं कम्मणिज्जरामुक्कं ।
पाऐण एदि गहणं व्वमणिहिट्ठसंठाणं ॥ १ ॥
सूक्ष्मस्थितिसंयुक्तमासन्न कर्मनिर्जरामुक्तम् ।
प्रायेणैति ग्रहणं द्रव्यमनिर्दिष्टसंस्थानम् ॥ १ ॥
अर्थ-जिन कर्मरूप परिणत पुद्गलोंकी स्थिति अल्प थी अत एव पाछे निर्णि होकर
जिनकी कर्मरहित अवस्था होगई हो परन्तु जीवके प्रदेशोंके साथ जिनका एकक्षेत्रावगाह हो
तथा जिनका संस्थान ( आकार ) कहा नहीं जा सकता इस तरहके पुद्गल द्रव्यका ही प्रायः-
करके जीव अहण करता है। भावार्थ-यद्यपि यह नियम नहीं है कि इस ही तरहके
पुदलका नीव ग्रहण कर तथापि बहुधा टस ही तरहके पुद्गलका ग्रह्ण करता है। क्योंकि
यह द्रव्य क्षेत्र काल भावसे संस्कारित है।
द्रव्यपरिवर्तनके उक्त चार भेटांका इस गाथामें निरूपण किया है.----
अगहिदमिस्सं गहिदं मिस्समगहिदं तहेव गहिदं च ।
मिस्सं गहिदमगदिदं गहिदं मिमसं अगहिदं च ॥ २ ॥

२०६ रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम् । अग्रहीत मिश्रं ग्रहीतं मिश्रमग्रहीतं तथैव ग्रहीतं च । मिश्रं ग्रहीतमग्रहीतं ग्रहीतं मिश्रमग्रहीतं च ॥ २ ॥ अर्थ-पहला अग्रहीत मिश्र ग्रहीत, दूसरा मिश्र अग्रहीत ग्रहीत, तीसरा मिश्र ग्रहीत अग्रहीत, चौथा ग्रहीत मिश्र अग्रहीत, इस तरह चार प्रकारसे पुद्गलोंका ग्रहण होनेपर परिवर्तनके प्रारम्भ समयमे ग्रहण किये हुए पुद्गलोंका ग्रहण होता है । और तब ही एक द्रव्यपरिवर्तन पूरा होता है । इसका विशेष स्वरूप पहले लिख चुके है। भावार्थ-यहा पर प्रकरणके अनुसार शेष चार परिवर्तनोंका भी स्वरूप लिखते है । क्षेत्रपरिवर्तनके दो भेद है, एक स्वक्षेत्रपरिवर्तन दूसरा परक्षेत्रपरिवर्तन । एक जीव सर्व जघन्य अवगाहनाओंको जितने उसके प्रदेश हो उतनीवार धारण करके पीछे क्रमसे एक २ प्रदेश अधिक २ की अवगाहनाओको धारण करते २ महामत्स्यकी उत्कृष्ट अवगाहनापर्यन्त अवगाहनाओको जितने समयमें धारण करसके उतने काल समुदायको एक स्वक्षेत्रपरिवर्तन कहते है । कोई जघन्य अवगाहनाका धारक सूक्ष्मनिगोदिया लब्ध्यपर्याप्तक जीव लोकके अष्ट मध्य- प्रदेशको अपने शरीरके अष्ट मध्य प्रदेश बनाकर उत्पन्न हुआ, पीछे वही जीव उस ही रूपसे उस ही स्थानमें दूसरी तीसरी वार भी उत्पन्न हुआ। इसी तरह घनाङ्गुलके असंख्यातमे भागप्रमाण जघन्य अवगाहनाके जितने प्रदेश है उतनीवार उसी स्थानपर क्रमसे उत्पन्न हुआ और श्वासके अठारहमे भागप्रमाण क्षुद्र आयुको भोग २ कर मरणको प्राप्त हुआ । पाछे एक २ प्रदेशके अधिकक्रमसे जितने कालमें सम्पूर्ण लोकको अपना जन्मक्षेत्र बनाले उतने कालसमु- दायको एक परक्षेत्रपरिवर्तन कहते है। कोई जीव उत्सर्पिणीके प्रथम समयमें पहलीवार उत्पन्न हुआ, इस ही तरह दूसरीवार दूसरी उत्सर्पिणीके दूसरे समयमे उत्पन्न हुआ, तथा तीसरी उत्सर्पिणीके तीसरे समयमे तीसरीवार उत्पन्न हुआ । इसही क्रमसे उत्सर्पिणी तथा अवसर्पिणीके वीस कोडाकोड़ी सागरके जितने समय है उनमें उत्पन्न हुआ, तथा इसही क्रमसे मरणको प्राप्त हुआ, इसमे जितना काल लगे उतने कालसमुदायको एक कालपरिवर्तन कहते है। कोई जीव दशहजार वर्षके जितने समय है उतनीवार जघन्य दश हजार वर्षकी आयुसे प्रथम नरकमे उत्पन्न हुआ, पीछे एक २ समयके अधिककमसे नरकसम्बन्धी तेतीस सागरकी उत्कृष्ट आयुको क्रमसे पूर्ण कर, अन्तर्मुहूर्तके जितने समय है उतनीवार जघन्य अन्तर्मुहूर्तकी आयुसे तिर्यंचगतिमे उत्पन्न होकर यहांपर भी नरगतिकीतरह एक २ समयके अधिकक्रमसे तिर्यग्गतिसम्बन्धी तीन पल्यकी उत्कृष्ट आयुको पूर्ण किया । पीछे तिर्यग्ग- तिकी तरह मनुष्यगतिको पूर्ण किया, क्योंकि मनुष्यगतिकी भी जघन्य अन्तमुहूर्तकी तथा उत्कृष्ट तीन पल्यकी आयु है । मनुष्यगतिके वाद दश हजार वर्षके जितने समय है इतनीवार जघन्य दश हजार वर्षकी आयुसे देवगतिमें उत्पन्न होकर पीछे एक २ समयके गोम्मटसारः । २०७ अधिकक्रमसे इकतीस सागरको उत्कृष्ट आयुको पूर्ण किया, क्योकि यद्यपि देवगतिसम्बन्धी उत्कृष्ट आयु तेतीस सागरकी है तथापि यहांपर इकतीस सागर ही ग्रहण करना चाहिये; क्योंकि मिथ्यादृष्टि देवकी उत्कृष्ट आयु इकतीस सागरतक ही होती है । और इन परिवर्त- नोंका निरूपण मिथ्यादृष्टिकी अपेक्षासे ही है; क्योंकि सम्यग्दृष्टि संसारमे अर्धपुद्गल परिवर्तनका जितना काल है उससे अधिक कालतक नही रहता । इस क्रमसे चारों गतियोमे भ्रमण करनेमे जितना काल लगे उतने कालको एक भवपरिवर्तनका काल कहते है। तथा इतने कालमें जितना भ्रमण किया जाय उसको एक भवपरिवर्तन कहते है। योगस्थान अनुभागबन्धाध्यवसायस्थान कषायाध्यवसायस्थान स्थितिस्थान इन चारके निमित्तसे भावपरिवर्तन होता है। प्रकृति और प्रदेशबन्धको कारणभूत आत्माके प्रदेशपरिस्पन्दरूप योगके तरतमरूप स्थानोंको योगस्थान कहते है । निन कषायके तरतमरूप स्थानोंसे अनुभागबंध होता है उनको अनुभागबन्धाध्यवसायस्थान कहते है । स्थितिवन्धको कारणभूत कपाय- परिणामोंको कषायाध्यवसायस्थान या स्थितिवन्धाध्यवसायस्थान कहते है । वन्धरूप कर्मकी जघन्यादिक स्थितिको स्थितिस्थान कहते है। इनका परिवर्तन किस तरह होता है यह दृष्टान्तद्वारा नीचे लिखते है। श्रेणिके असंख्यातमे भागप्रमाण योगस्थानोंके होजानेपर एक अनुभागवंधाध्यवसाय- स्थान होता है, और असंख्यातलोकप्रमाण अनुभागवंधाध्यवसायस्थानोके होजानेपर एक कपायाध्यवसायस्थान होता है, तथा असंख्यातलोकप्रमाण कपायाध्यवसायस्थानोंके होजाने पर एक स्थितिस्थान होता है । इस क्रमसे ज्ञानावरण आदि समस्त मूलप्रकृति वा उत्तर- प्रकृतियोंके समस्त स्थानोंके पूर्ण होनेपर एक भावपरिवर्तन होता है। जैसे किसी पर्यात मिथ्यादृष्टि संज्ञी जीवके ज्ञानावरण कर्मकी अंतःकोडाकोड़ी सागरप्रमाण जघन्य स्थितिका बंध होता है । यही यहापर जयन्य स्थितिस्थान है । अत: इसके योग्य विवक्षित जीवके जघन्यही अनुभागवन्धाध्यवसायस्थान जघन्य ही कपायाध्यवसायस्थान और जघन्य ही योगस्थान होते है । यहासे ही भावपरिवर्तनका प्रारम्भ होता है । अर्थात् इसके आगे श्रेणीके असख्यातमे भागप्रमाण योगस्थानोंके क्रमसे होजानेपर दूसरा अनुभागवन्धाध्य- वसायस्थान होता है । इसके बाद फिर श्रेणीके असंख्यातमे भागप्रमाण योगन्यानोंके कमसे होजानेपर तीसरा अनुभागवाव्यवसायस्थान होता है । इसही क्रमसे अमन्यात लोकप्रमाण अनुभागबन्याभ्यवसायस्थानोंके होजानेपर दमा कपायाध्यवसायस्थान होता है । जिस मामले दसरा व पायाध्यवमायस्थान हुआ उनी जमने असग्न्यातक प्रमण कपागन्यमायम्यान, १एक घर:-.- 711: " MER:- २०८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । होजानेपर जघन्य स्थितिस्थान होता है । जो क्रम जघन्य स्थितिस्थानमें बताया वहीं क्रम एक २ समय अधिक द्वितीयादि स्थितिस्थानोमे समझना चाहिये । तथा इसी क्रमसे ज्ञानावरणके जघन्यसे लेकर उत्कृष्ट तक समस्त स्थिति स्थानोंके हो जानेपर. और ज्ञानावरणके स्थिति स्थानोंकी तरह क्रमसे सम्पूर्ण मूल वा उत्तर प्रकृतियोंके समस्त स्थितिस्थानोंके पूर्ण होनेपर एक भावपरिवर्तन होता है । तथा इस परिवर्तनमें जितना काल लगे उसको एक भावपरिवर्तनका काल कहते है। इस प्रकार संक्षेपसे इन पाच परिवर्तनोका स्वरूप यहां- पर कहा है । इनका काल उत्तरोत्तर अनन्तगुणा २ है । नानाप्रकारके दुःखोंसे आकुलित पाच परिवर्तनरूप संसारमे यह जीव मिथ्यात्वके निमित्तसे अनतकालस भ्रमण कर रहा इस परिभ्रमणके कारणभूत कर्मोको तोड़कर मुक्तिको प्राप्त करनेकी जिनमें योग्यता नहीं है उनको अभव्य कहते है । और जिनमें कर्मोंको तोडकर मुक्तिको प्राप्त करनेकी योग्यता है उनको भव्य कहते है। ॥ इति भव्यत्वमार्गणाधिकारः समाप्त ॥ है क्रमप्राप्त सम्यक्त्व मार्गणाका वर्णन करते है। छप्पंचणवविहाणं अत्थाणं जिणवरोवइट्ठाणं । आणाए अहिगमेण य सद्दहणं होइ सम्मत्तं ॥ ५६०॥ षट्पञ्चनवविधानामर्थांनां जिनदरोपदिष्टानाम् । आज्ञया अधिगमेन च श्रद्धानं भवति सम्यक्त्वम् ॥ ५६० ॥ अर्थः-छह द्रव्य पाच अस्तिकाय नव पदार्थ इनका जिनेन्द्र देवने जिस प्रकारसे वर्णन किया है उस ही प्रकारसे इनका जो श्रद्धान करना उसको सम्यक्त्व कहते है। यह दो प्रकारसे होता है एक तो केवल आज्ञासे दूसरा अधिगमसे । भावार्थ-जीव पुद्गल धर्म अधर्म आकाश काल ये छह द्रव्य है । तथा कालको छोडकर शेष ये ही पाच अस्तिकाय कहे जाते है । और जीव अजीव आस्रव बन्ध संवर निर्जरा मोक्ष पुण्य पाप ये नव प्रकारके पदार्थ है। इनका ‘जिनेन्द्रदेवने जैसा स्वरूप कहा है वास्तवमें वही सत्य है,' इस तरह विना युक्तिसे निश्चय किये ही जो श्रद्धान होता है उसको आज्ञासम्यक्त्व कहते है । तथा इनके विषयमें प्रत्यक्ष परोक्षरूप प्रमाण, द्रव्यार्थिक आदि नय, नाम स्थापना आदि निक्षेप इत्यादिकेद्वारा निश्चय करके जो श्रद्धान होता है उसको अधिगम सम्यक्त्व कहते है । छह द्रव्योके अधिकारोंका वर्णन करते है। छदव्वेसु य णामं उवलक्खणुवाय अत्थणे कालो । अत्थणखेत्तं संसाठाणसरूवं फलं च हवे ॥ ५६१ ॥ १ सभी परिवर्तनोंमें जहा क्रमभंग होगा वह गणनामें नहीं आवेगा।

गोम्मटसारः । २०९ षड्व्येषु च नाम उपलक्षणानुवादः अस्तित्वकालः । अस्तित्वक्षेत्र संख्या स्थानस्वरूपं फलं च भवेत् ॥ ५६१ ॥ अर्थ-छह द्रव्योंके निरूपण करनेमें ये सात अधिकार हैं। -नाम, उपलक्षणानुवाद, स्थिति, क्षेत्र, संख्या, स्थानस्वरूप, फल । प्रथमही नाम अधिकारको कहते है। जीवाजीवं दव्वं रूवारूवित्ति होदि पत्तेयं । संसारत्था रूवा कम्मविमुक्का अरूवगया ॥ ५६२ ॥ जीवाजीवं द्रव्यं रूप्यरूपीति भवति प्रत्येकम् । संसारस्था रूपिणः कर्मविमुक्ता अरूपगताः ।। ५६२ ॥ अर्थ-द्रव्य सामान्यके दो भेद है । एक जीवद्रव्य दूसरा अजीव द्रव्य । जीवद्रव्यके भी दो भेद है । एक रूपी दूसरा अरूपी । जितने संसारी जीव है वे सत्र रूपी है, क्योंकि उनका कर्म-पुद्गलके साथ एकक्षेत्रावगाहसम्बन्ध है । जो जीव कर्मसे रहित होकर सिद्ध अवस्थाको प्राप्त हो चुके है वे सत्र अरूपी है, क्योंकि उनसे कर्मपुद्गलका सम्बन्ध सर्वथा छूट गया है। अजीव द्रव्यमें भी रूपी अरूपीका भेद गिनाते है । अज्जीवेसु य रूवी पुग्गलदव्वाणि धम्म इदरोवि । आगासं कालोवि य चत्तारि अरूविणो होति ॥ ५६३ ॥ अर्जावेषु च रूपीणि पुद्गलद्रव्याणि धर्म इतरोऽपि । आकाशं कालोपि च चत्वारि अरूपीणि भवन्ति ॥ ५६३ ॥ अर्थ-अजीव द्रव्यके पांच भेद है, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल । इनमें एक पुद्गल द्रव्य रूपी है । और शेप धर्म अधर्म, आकाश, काल ये चार द्रव्य अरूपी हैं । उपलक्षणानुवाद अधिकारको कहते है। उवजोगो वण्णचऊ लक्खणमिह जीवपोग्गलाणं तु । गदिठाणोग्गहवत्तणकिरियुवयारो दु धम्मचऊ ॥ ५६४ ॥ उपयोगो वर्णचतुष्कं लक्षणमिह जीवपुद्गलाना त । गतिस्थानावगाहवर्तनक्रियोपकारस्तु धर्मचतुगाम ॥ ५६४ ॥ अर्थ-ज्ञानदर्शनरूप उपयोग जीवद्रव्यका लक्षण है। वर्ण गन्ध रस सर्श ग्रह पद्गलद्रव्यका लक्षण है । जो जीव और पुद्गल्दन्यको गमन करने में सहकारी हो उसको धर्म- न्य कहते है । जो जीव तथा पुद्गद्रव्यको ठहग्नम सहकारी हो उसको अधद्रव्य करने है। जो सम्पूर्ण न्यों को मान देनमें सहायर तो उमगे भाकाम कहते है । माम्न बल्योंके अपने २ सभामें वर्तना महमारी है उमो लद्रव्य पर है २१० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । गदिठाणोग्गहकिरिया जीवाणं पुग्गलाणमेव हवे । धम्मतिये णहि किरिया मुक्खा पुण साधका होति ॥ ५६५ ॥ गतिस्थानावगाहक्रिया जीवानां पुद्गलानामेव भवेत् । धर्मत्रिके नहि क्रिया मुख्याः पुनः साधका भवन्ति ॥ ५६५ ॥ अर्थ-गमन करनेकी या ठहरनेकी अथवा रहनेकी क्रिया जीवद्रव्य या पुद्गलद्रव्यकी ही होती है। धर्म अधर्म आकाशमें ये क्रिया नहीं होती, क्योंकि न तो इनके स्थान चलाय- मान होते है, और न प्रदेश ही चलायमान होते है । किन्तु ये तीनो ही द्रव्य जीव पुद्गलकी उक्त तीनों क्रियाओके मुख्य साधक है। भावार्थ -मुख्य साधक कहनेका अभिप्राय यह नहीं है कि धर्मादि द्रव्य जीव पुद्गलको गमन आदि करनेमें प्रेरक है; किन्तु इसका अभि- प्राय यह है कि जिस समय जीव या पुद्गल गति आदिमें परिणत हो उस समय उनकी गति आदिमे सहकारी होना धर्मादि द्रव्यका मुख्य कार्य है। गति आदिमें धर्मादि द्रव्य किसतरह सहायक होते है यह दृष्टान्त द्वारा दिखाते है। जत्तस्स पहं ठत्तस्स आसणं णिवसगरस वसदी वा । गदिठाणोग्गहकरणे धम्मतियं साधगं होदि ।। ५६६ ॥ यातस्य पन्थाः तिष्ठतः आसनं निवसकस्य वसतिर्वा । गतिस्थानावगाहकरणे धर्मत्रयं साधकं भवति ॥ ५६६ ॥ अर्थ-गमन करनेवालेको मार्गकी तरह धर्म द्रव्य जीवपुद्गलकी गतिमें सहकारी होता है । ठहरनेवालेको आसनकी तरह अधर्म द्रव्य जीव पुद्गलकी स्थितिमे सहकारी होता है । निवासकरनेवालेको मकानकी तरह आकाशद्रव्य जीव पुद्गल आदिको अवगाह देनेमें सहकारी साधक होता है। वत्तणहेदू कालो वत्तणगुणमविय दव्वणिचयेसु । कालाधारेणेव य वटृति हु सव्वदव्वाणि ॥ ५६७ ॥ वर्तनाहेतुः कालो वर्तनागुणमवेहि द्रव्यनिचयेषु । कालाधारेणैव च वर्तन्ते हि सर्वद्रव्याणि ॥ ५६७ ॥ अर्थ-सम्पूर्ण द्रव्योंका यह स्वभाव है कि वे अपने २ स्वभावमें सदा ही वर्ते । परन्तु उनका यह वर्तना किसी वाह्य सहकारीके विना नहीं हो सकता इसलिये इनको वर्तानेवाला महकारी कारणरूप वर्तनागुण जिसमें पाया जाय उसको काल कहते है, क्योंकि कालके आश्रयमे ही ममस्त द्रव्य वर्तत है। मनींक जीव पुद्गलके वर्तनेका सहकारी कारण होना काल द्रव्यमें सम्भव है, परन्तु चटिक अमूर्तीक तथा व्यापक द्रव्योम किसतरह घटित होसकता है? इस शङ्काका पमापन करते है। है गोम्मटसारः । २११ धम्माधम्मादीणं अगुरुगुलहुगं तु छहिं वि वड्डीहिं । हाणीहिं वि वर्द्धंतो हायंतो वहदे जमा ॥ ५६८ ॥ धर्माधर्मादीनामगुरुकलघुकं तु षड्भिरपि वृद्धिभिः । हानिभिरपि वर्धमानं हीयमानं वर्तते यस्मात् ॥ ५६८ ।। अर्थ-धर्मादिक द्रव्योंमें अगुरुलघु नामका एक गुण है । इस गुणमें तथा इसके निमित्तसे धर्मादिक द्रव्यके शेष गुणोंमें छह प्रकारकी वृद्धि तथा छह प्रकारकी हानि होती है । और इन वृद्धि हानिके निमित्तसे वर्धमान तथा हीयमान धर्मादि द्रव्योंमे वर्तना सम्भव है । भावार्थ-धर्मादि द्रव्यों में स्वसत्ताका नियामक कारणभूत अगुरुलघु गुण है । इसके अनन्तानन्त अविभागप्रतिच्छेदोमें अनन्तभागवृद्धि असंख्यातभागवृद्धि, संख्यातभागवृद्धि, संख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणवृद्धि, अनन्तगुणवृद्धि ये छह वृद्धि, तथा अन्तभागहानि, असंख्यातभागहानि, संख्यातभागहानि, संख्यातगुणहानि, असं- ख्यातगुणहानि, अनंतगुणहानि ये छह हानि होती है । तथा इस गुणके निमित्तसे दूसरे गुणोंमें भी ये. हानि वृद्धि होती है । इसलिये धर्मादि द्रव्योंके इस परिणमनका भी वाह्य सहकारी कारण मुख्य काल द्रव्य ही है वर्तनाका कारण कालद्रव्य किसतरह है यह स्पष्ट करते है । ण य परिणमदि सयं सो ण य परिणामेइ अण्णमण्णेहिं । विविहपरिणामियाणं हवदि हु कालो सयं हेदु ॥ ५६९ ।। न च परिणमति स्वयं स नच परिणामयति अन्यदन्यैः । विविधपरिणामिकानां भवति हि कालः स्वय हेतुः ॥ ५६९ ॥ अर्थ–परिणामी होनेसे कालद्रव्य दूसरे द्रव्यरूप परिणत हो जाय यह वात नहीं है, वह न तो स्वयं दूसरे द्रव्यरूप परिणत होता है, और न दूसरे द्रव्योंको अपने स्वरूप अथवा भिन्नद्रव्यस्वरूप परणमाता है, किन्तु अपने स्वभावसे ही अपने २ योग्य पर्यायासे परिणत होनेवाले द्रव्योके परिणमनमे कालद्रव्य उदासीनतासे स्वयं वाघ सहकारी होजाता है । कालं अस्सिय दव्वं सगसगपज्जायपरिणदं होदि। पज्जायावहाणं सुद्धणये होदि खणमेत्तं ॥ ५७० ।। कालमाश्रित्य द्रव्यं म्वकस्वकपर्यायपरिणतं भवति । पर्यायावस्थानं शुन्दनयन भवति क्षणमात्रा ॥ ५७० ।। अर्थ-कालके आश्रयसे प्रत्येक दन्य अपने २ योन्य पायर्याने परिणत हेना है। इन पयागेवी स्थिति शुलनयने एक क्षण मात्र रहती है।

२१२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । ववहारो य वियप्पो भेदो तह पज्जओत्ति एयट्ठो। ववहारअवठाणद्विदी हु ववहारकालो दु॥ ५७१ ॥ व्यवहारश्च विकल्पो भेदस्तथा पर्याय इत्येकार्थः । व्यवहारावस्थानस्थितिर्हि व्यवहारकालस्तु ॥ ६७१ ॥ अर्थ-व्यवहार विकल्प भेद पर्याय इन शब्दोंका एक ही अर्थ है । व्यंजनपर्यायके ठहरनेका जितना काल है उतने कालको व्यवहारकाल कहते है। अवरा पज्जायठिदी खणमेत्तं होदि तं च समओत्ति । दोण्हमणूणमदिक्कमकालपमाणं हवे सो दु॥ ५७२ ॥ अवरा पर्यायस्थितिः क्षणमात्रं भवति सा च समय इति । द्वयोरण्वोरतिक्रमकालप्रमाणं भवेत् स तु ॥ ५७२ ॥ अर्थ-सम्पूर्ण द्रव्योंकी पर्यायकी जघन्य स्थिति एक क्षणमात्र होती है, इसीको समय भी कहते है । दो परमाणुओके अतिक्रमण करनेके कालका जितना प्रमाण है उसको समय कहते है । भावार्थ-समीपमें स्थित दो परमाणुओंमेंसे मंद गमनरूप परिणत होकर जितने कालमें एक परमाणु दूसरी परमाणुका उल्लंघन करै उतने कालको एक समय कहते है । इतनी ही प्रत्येक पर्यायकी जघन्य स्थिति है। प्रकारान्तरसे समयका प्रमाण बताते है। णभएयपयेसत्थो परमाणु मंदगइपवढंतो । बीयमणंतरखेत्तं जावदियं जादि तं समयकालो ॥ १ ॥ नभएकप्रदेशस्थः परमाणुर्मन्दगतिप्रवर्तमानः । द्वितीयमनन्तरक्षेत्रं यावत् याति सः समयकालः ॥ १ ॥ अर्थ-आकाशके एक प्रदेशपर स्थित एक परमाणु मन्दगतिके द्वारा गमन करके दूसरे अनन्तर प्रदेशपर जितने कालमें प्राप्त हो उतने कालको एक समय कहते है। प्रदेशका प्रमाण बताते है । जेत्तीवि खेत्तमेत्तं अणुणा रुद्धं खु गयणव्वं च । तं च पदेसं भणियं अवरावरकारणं जस्स ॥२॥ यावदपि क्षेत्रमात्रमणुना रुंद्ध खलु गगनद्रव्यं च । स च प्रदेशो भणितः अपरपरकारण यस्य ॥ २ ॥ अर्थ-जितने आकाशद्रव्यमें पुद्गलका एक अविभागी परमाणु आजाय उतने क्षेत्र- मात्रको एक प्रदेश कहते है । इस प्रदेशके निमित्तसे ही आगे पीछेका अथवा दूर समी- 1-२ ने दोनों ही गाथा क्षेपक हैं।

गोम्मटसारः।
२१३
है
पका व्यवहार सिद्ध होता है । भावार्थ-अमुक पदार्थ अमुक पदार्थके आगे है और अमुक
पदार्थ पीछे है । अथवा अमुक पदार्थ अमुक पदार्थके समीप है और अमुक पदार्थसे
दूर
इस व्यवहारको सिद्ध करनेवाला प्रदेशविभाग ही है।
व्यवहारकालका निरूपण करते है ।
आवलिअसंखसमया संखेज्जावलिसमूहमुस्सासो।
सत्तुस्सासा थोवो सत्तत्थोवा लवो भणियो ।। ५७३ ॥
आवलिरसंख्यसमया संख्येयावलिसमूह उच्छासः ।
सप्तोच्छ्रासः स्तोकाः सप्तस्तोको लवो भणितः ॥ ५७३ ॥
अर्थ-असंख्यातसमयकी एक आवली होती है । संख्यात आवलीका एक उच्छास
होता है। सात उच्छासका एक स्तोक होता है । सात स्तोकका एक लव होता है ।
उच्छासका स्वरूप क्षेपक गाथाद्वारा बताते है।
अड्ढस्स अणलस्स य णिरुवहदस्स य हवेज्ज जीवस्स ।
उस्सासाणिस्सासो एसो पाणोत्ति आहीदो ।। १ ।।
आढ्यस्यानलसस्य च निरुपहतस्य च भवेत् जीवस्य ।
उच्छासनिःश्वास एकः प्राण इति आख्यातः ॥ १ ॥
अर्थ----सुखी, आलस्यरहित, रोग पराधीनता चिन्ता आदिसे रहित जीवके संख्यात-
आवलीके समूहरूप एक श्वासोच्छास प्राण होता है | भावार्थ-दुःखी आदि जीवके संख्यात
आवलीप्रमाण कालके पहले भी श्वासोच्छ्रास हो जाता है । इसलिये यहां पर मुखी आदि
विशेषणोंसे
युक्त
जीवका ग्रहण किया है।
अट्ठत्तीसद्धलवा नाली वेनालिया मुहुत्तं तु ।
एगसमयेण हीणं भिण्णमुहुत्तं तदो सेसं ॥५७४ ।।
अष्टत्रिंशदर्धलवा नाली द्विनालिको मुहूर्तस्तु ।
एकसमयेन हीनो भिन्नमुहूर्तस्ततः शेप ॥ ५७४ ॥
अर्थ-साढ़े अडतीस लवकी एक नाली ( घडी ) होती है। दो घीका एक मुहूर्त
होता है । इसमें एक समय कम करनेसे भिन्नमुहूर्त अथवा अन्तर्मुहूर्त होता है । तथा दमके
आगे दो तीन चार आदि समय कम करनेसे अन्तर्मुहूर्नके भेद होते है।
जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर्महर्नका प्रमाण क्षेपक गाथाके द्वारा बताते है ।
ससमयमावलि अवरं समऊणमुत्तरं तु उसम्म ।
मज्झासंसवियप्प वियाण अंतोमुत्तमिणं ॥ १ ॥

२१४
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
ससमय आवलिरवरः समयोनमुहूर्तकस्तु उत्कृष्टः ।
मध्यासंख्यविकल्पः विजानीहि अन्तर्मुहूर्तमिमम् ।। १ ।।
अर्थ-एक समयसहित आवलीप्रमाण कालको जघन्य अन्तर्मुहूर्त कहते है । एक
समय कम मुहूर्तको उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त कहते है। इन दोनोंके मध्यके असंख्यात भेद हैं।
उन सबको भी अन्तर्मुहूर्त ही जानना चाहिये ।
दिवसो पक्खो मासो उड अयणं वस्समेवमादी हु।
संखेज्जासंखेज्जाणंताओ होदि ववहारो ॥ ५७५ ।।
दिवसः पक्षो मास ऋतुरयनं वर्षमेवमादिहिं ।
संख्येयासंख्येयानन्ता भवन्ति व्यवहाराः ॥ १७५ ॥
अर्थ-तीस मुहूर्तका एक दिवस ( अहोरात्र ) पन्द्रह अहोरात्रका एक पक्ष,
दो
पक्षका एक मास, दो मासकी एक ऋतु, तीन ऋतुका एक अयन, दो अयनका एक
वर्ष
इत्यादि व्यवहार कालके आवलीसे लेकर संख्यात असख्यात अनन्त भेद होते है ।
ववहारो पुण कालो माणुसखेत्तम्हि जाणिवो दु ।
जोइसियाणं चारे ववहारो खलु समाणोत्ति ॥ ५७६ ॥
व्यवहारः पुनः कालः मानुषक्षेत्रे ज्ञातव्यस्तु ।
ज्योतिष्काणां चारे व्यवहारः खलु समान इति ॥ ५७६ ॥
अर्थ-परन्तु यह व्यवहार काल मनुष्यक्षेत्रमे ही समझना चाहिये; क्योंकि मनुप्य-
क्षेत्रके ही ज्योतिषी देवोके विमान गमन करते है, और इनके गमनका काल तथा व्यवहार
काल दोनों समान है।
प्रकारान्तरसे व्यवहारकालका प्रमाण बताते है ।
ववहारो पुण तिविहो तीदो बहतगो भविस्सो दु ।
तीदो संखेज्जावलिहदसिद्धाणं पमाणं तु ॥ ५७७॥
व्यवहारः पुनस्त्रिविधोऽतीतो वर्तमानो भविष्यस्तु ।
अतीतः संख्येयावलिहतसिद्धानां प्रमाणं तु ॥ ५७७ ॥
अर्थ-व्यवहार कालके तीन भेद है । भूत वर्तमान भविष्यत् । सिद्धराशिका संख्यात
आवलीके प्रमाणसे गुणा करनेपर जो प्रमाण हो उतना ही अतीत कालका प्रमाण है ।
समओ हु वट्टमाणो जीवादो सव्वपुग्गलादो वि ।
भावी अणंतगुणिदो इदि ववहारो हवे कालो ॥ ५७८॥
समयो हि वर्तमानो जीवात् सर्वपुद्गलादपि ।
भावी अनंतगुणित इति व्यवहारो भवेत्कालः ॥ ५५८ ॥

गोम्मटसारः । २१६ अर्थ-वर्तमान कालका प्रमाण एक समय है । सम्पूर्ण जीवराशि तथा समस्त पुद्गलद्र- न्यराशिसे अनंतगुणा भविष्यत् कालका प्रमाण है । इस प्रकार व्यवहार कालके तीन भेद होते है। कालोविय ववएसो सब्भावपरूवओ हवदि णिच्चो । उप्पण्णप्पद्धंसी अवरो दीहंतरट्ठाई॥ ५७९ ॥ कालोऽपि च व्यपदेशः सद्भावप्ररूपको भवति नित्यः । उत्पन्नप्रध्वंसी अपरो दीर्घान्तरस्थायी ॥ ६७९ ॥ अर्थ-काल यह व्यपदेश ( संज्ञा ) मुख्यकालका बोधक है, क्योंकि विना मुख्यके गौण अथवा व्यवहारकी भी प्रवृत्ति नहीं होसकती । यह मुख्य काल द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षा नित्य है तथा पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षा उत्पन्नध्वंसी है। तथा व्यवहारकाल वर्त- नकी अपेक्षा उत्पन्नध्वंसी है और भूत भविष्यत्की अपेक्षा दीर्घन्तरस्थायी है । क्रमप्राप्त स्थिति अधिकारका वर्णन करते है। छदबावट्ठाणं सरिसं तियकालअत्थपज्जाये । वेंजणपज्जाये वा मिलिदे ताणं ठिदित्तादो ॥ ५८० ॥ षड्व्यावस्थानं सदृशं त्रिकालार्थपर्याये । व्यंजनपर्याये वा मिलिते तेषां स्थितित्वात् ॥ ५८० ॥ अर्थ-अवस्थान-स्थिति छहों द्रव्योकी समान है। क्योकि त्रिकालसम्बन्धी अर्थपर्याय वा व्यंजनपर्यायके मिलनेसे ही उनकी स्थिति होती है । भावार्थ छहों द्रव्य अनादिनि- धन है; क्योंकि कथंचित् द्रव्य पर्यायोंसे भिन्न कुछ भी चीज नहीं है । और इन पर्यायोंके दो भेद है, एक व्यंजनपर्याय दूसरी अर्थपर्याय । वाग्गोचर-वचनके विपयभूत स्थूलपर्यायको व्यंजनपर्याय कहते है, और वचनके अगोचर सूक्ष्म पर्यायोको अर्थपर्याय कहते है । ये दोनोंही पर्याय पर्यायत्वकी अपेक्षा त्रिकालवर्ती अर्थात् अनादिनिधन है। इस ही अर्थको स्पष्ट करते है। एयदवियम्मि जे अत्थपजया वियणपज्जया चावि । तीदाणागदभूदा तावदियं तं हवदि दव्वं ॥ ५८१ ॥ एकद्रव्ये ये अर्थपर्याया व्यजनपर्यायाश्चापि । अतीतानागतभता तावत्तत् भवति द्रव्यम् ॥ ५८१ ।। अर्थ-एक द्रव्यमें जितनी त्रिकालसम्धी अर्थपर्याय या व्यंजनपर्याय है उतना ही न्य है। भावार्थ----त्रिकाल सम्बन्धी सम्पानम्वरूप ( आकाररूप ) प्रदेशवत्त्वगणकी पाय-यजनपर्याय, तथा प्रदेशकागको दर शेषगरी निकालपत्राची २१६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । समस्तपर्याय ( अर्थपर्याय ) इनका जो समूह है वही द्रव्य है। त्रिकालवी पर्यायोंको छोड़कर द्रव्य कोई चीज नहीं है। इस प्रकार स्थिति अधिकारका वर्णन करके क्रमके अनुसार क्षेत्र अधिकारका वर्णन करते है। आगासं वज्जित्ता सव्वे लोगम्मि चेव णत्थि वहिं। वावी धम्माधम्मा अवडिदा अचलिदा णिचा ।। ५८२ ॥ आकाशं वर्नयित्वा सर्वाणि लोके चैव न सन्ति बहिः । व्यापिनौ धर्माधर्मों अवस्थितावचलितौ नित्यौ ॥ ५८२ ॥ अर्थ-आकाशको छोड़कर शेष समस्तद्रव्य लोकमे ही है-बाहर नहीं है । तथा धर्म और अधर्मद्रव्य व्यापक है, अवस्थित है, अचलित है, और नित्य है। भावार्थ-आकाश- द्रव्यके दो भेद है, एक लोक दूसरा अलोक । नितने आकाशमें जीव पुद्गल धर्म अधर्म काल पाया जाय उतने आकाशको लोक कहते है। इसके वाहर जितना अनन्त आकाशद्रव्य उसको अलोक कहते है । धर्म अधर्म द्रव्य सम्पूर्ण लोकमें तिलमे तैलकी तरह व्याप्त है । तथा ये दोनो ही द्रव्य आकाशके जिन प्रदेशों में स्थित है उनही प्रदेशोंमें स्थित रहते है । जीवा- दिकी तरह एक स्थानको छोड़कर दूसरे स्थानमे गमन नही करते । और अपने स्थानपर रहते हुए भी इनके प्रदेश जलकल्लोलकी तरह सकम्प नहीं होते है और न ये दोनों द्रव्य कभी अपने स्वरूपसे च्युत होते है । अर्थात् न तो इनमे विभाव पर्याय होती है और न इनका कभी सर्वथा अभाव ही होता है । लोगस्स असंखेजदिभागप्पहुदिं तु सव्वलोगोत्ति । अप्पपदेसविसप्पणसंहारे वावड़ो जीवो ॥ ५८३ ॥ लोकस्यासंख्येयादिभागप्रभृतिस्तु सर्वलोक इति । आत्मप्रदेशविसर्पणसंहारे व्यापृतो जीवः ॥ ५८३ ॥ अर्थ-एक जीव अपने प्रदेशोंके संहारविसर्पकी अपेक्षा लोकके असंख्यातमे भागसे लेकर सम्पूर्ण लोकतकमें व्याप्त होकर रहता है । भावार्थ-आत्मामें प्रदेशसंहारविसर्पत्व गुण है । इसके निमित्तसे उसके प्रदेश संकुचित तथा विस्तृत होते है। इसलिये एक जीवका क्षेत्र शरीरप्रमाणकी अपेक्षा अमुलके असंख्यातमे भागसे लेकर हजार योजन तकका होता है। इसके आगे समुद्धातकी अपेक्षा लोकके असख्यातमे भाग, संख्यातमे भाग, तथा सम्पूर्ण लोकप्रमाण भी होता है। पोग्गलदव्वाणं पुण एचपदेसादि होंति भजणिज्जा । एकेको दु पदेसे कालाणूणं धुवो होदि ॥ ५८४ ।।

गोम्मटसारः । २१९ अपने स्थानसे कभी चलायमान नही होते, तथा एक स्थान पर ही रहते हुए भी इनके प्रदेश कभी सकम्प नहीं होते । किन्तु संसारी जीवोके प्रदेश तीन प्रकारके होते है । चल भी होते है, अचल भी होते है, तथा चलाचल भी होते है । विग्रहगतिवाले जीवोके प्रदेश चल ही होते है । अयोगकेवलियोके प्रदेश अचल ही होते है। और शेष जीवोके प्रदेश चलाचल होते हैं। पोग्गलवम्हि अणू संखेज्जादी हवंति चलिदा हु। चरिममहक्खंधम्मि य चलाचल। होंति हु पदेसा ॥ ५९२ ॥ पुद्गलद्रव्येऽणवः संख्यातादयो भवंति चलिता हि । चरममहास्कन्धे च चलाचला भवन्ति हि प्रदेशाः ॥ ६९२ ॥ अर्थ-पुद्गलद्रव्यमे परमाणु तथा संख्यात असंख्यात आदि अणुके जितने स्कन्ध है वे सभी चल है, किन्तु एक अन्तिम महास्कन्ध चलाचल है, क्योकि उसमे कोई परमाणु चल है और कोई परमाणु अचल है। परमाणुसे लेकर महास्कन्ध पर्यन्त पुद्गलद्रव्यके तेईस भेदोको दो गाथाओमें गिनाते है। अणुसंखासंखेज्जाणता य अगेज्जगेहिं अंतरिया । आहारतेजभासामणकम्मइया धुवक्खंधा ॥ ५९३ ॥ सांतरणिरंतरेण य सुण्णा पत्तेयदेहधुवसुण्णा । बादरणिगोदसुण्णा सुहमणिगोदा णभो महक्खंधा ॥ ५९४ ॥ अणुसंख्यासंख्यातानन्ताश्च अग्राह्यकाभिरन्तरिताः । आहारतेजोभापामनःकार्मणा ध्रुवस्कन्धाः ॥ ६९३ ।। सान्तरनिरन्तरया च शून्या प्रत्येकदेहध्रुवशून्या । वादरनिगोदशन्याः सूक्ष्मनिगोदा नभो महास्कन्धाः ।। ५९४ ॥ अर्थ-पुद्गलद्रव्यके तेईस भेट है । अणुवर्गणा, संख्याताणुवर्गणा, असरल्याताणुवर्गणा, अनन्ताणुवर्गणा, आहारवर्गणा, अग्राहयवर्गणा, तैजसवर्गणा, अग्रायवर्गणा, भापावर्गणा, अग्राय- वर्गणा, मनोवर्गगा, अग्रायवर्गणा, कार्मणवर्गणा, ध्रुववर्गणा, सांतरनिरतरवर्गणा, शून्यवर्गणा, प्रत्येकशरीरवर्गणा. ध्रुवशन्यवर्गणा. वादरनिगोदवर्गणा, शून्यवर्गणा, मनिगोटवर्गणा, नभोवर्गणा. महाकवर्गणा । इन वर्गणाओंके जान्य माम उत्कृष्ट भंड तथा इनका अन्यत्रहत्व बनाने है। परमाणवग्गणम्मि ण अवरुवारमं च सेमगे अस्थि । गेझमहक्संधाणं वरमहियं संसगं गुणियं ॥ ५५५ ।। .

२२० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । परमाणुवर्गणायां नावरोत्कृष्टं च शेषके अस्ति । ग्राह्यमहास्कन्वाना वरमधिकं शेषकं गुणितम् ॥ ५९५ ॥ अर्थ तेईस प्रकारकी वर्गणाओंमेंसे अणुवर्गणामें जघन्य उत्कृष्ट भेद नही है । शेष वाईस जातिकी वर्गणाओमें जघन्य उत्कृष्ट भेद है । तथा इन वाईस जातिकी वर्गणाओमें भी आहारवर्गणा, तैजसवर्गणा, भाषावर्गणा, मनोवर्गणा, कार्मणवर्गणा, ये पांच ग्राह्य वर्गणा और एक महास्कन्ध वर्गणा इन छह वर्गणाओके जघन्य उत्कृष्ट भेद प्रतिभागकी अपेक्षासे है। किन्तु शेष सोलह जातिकी वर्गणाओंके जघन्य उत्कृष्ट भेद गुणकारकी अपेक्षासे है । पांच ग्राह्यवर्गणाओका तथा अन्तिम महास्कन्धका उत्कृष्ट भेद निकालनेके लिये प्रतिभागका प्रमाण बताते है। सिद्धाणंतिमभागो पडिभागो गेज्झगाण जेटुं । पल्लासंखेजदियं अंतिमखंधस्स जेट्टई ॥ ५९६ ॥ मिद्धानन्तिमभागः प्रतिभागो ग्राह्याणां ज्येष्टार्थम् । पल्यासंख्येयमन्तिमस्कन्धस्य ज्येष्ठार्थम् ॥ ५९६ ॥ अर्थ-पाच ग्राह्यवर्गणाओंका उत्कृष्ट भेद निकालनेकोलिये प्रतिभागका प्रमाण सिद्ध- राशिके अनन्तमे भाग है । और अन्तिम महास्कन्धका उत्कृष्ट भेद निकालनेकेलिये प्रतिभागका प्रमाण पत्यके असंख्यातमे भाग है। भावार्थ-सिद्धराशिके अनंतमे भागका अपने २ जघन्यमें भाग देनेसे जो लब्ध आवे उसको अपने २ जघन्यमे मिलानेसे पांच ग्राह्य वर्गणाओके अपने २ उत्कृष्ट भेदका प्रमाण निकलता है। और अन्तिम महास्कन्धके जघन्य भेदमे पल्यके असंख्यातमे भागका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उसको जघन्यके प्रमाणमे मिलानेसे महास्कन्धके उत्कृष्ट भेदका प्रमाण निकलता है। संखेज्जासंखेज्जे गुणगारो सो दु होदि हु अणंते । चत्तारि अगेज्जेसु वि सिद्धाणमणंतिमो भागो ॥ ५९७ ।। संख्यातासख्याताया गुणकारः स तु भवति हि अनन्तायाम् । चतमपु अग्राह्यास्वपि सिद्धानामनन्तिमो भागः ॥ ५९७ ॥ अर्थ--संख्याताणुवर्गणा और असंख्याताणुवर्गणामें गुणकारका प्रमाण अपने २ उत्कृ- हम अपन २ जघन्यका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना है । इस गुणकारके साथ अपने २ जयन्यका गुणा करनेमे अपना २ उत्कृष्ट भेद निकलता है । और अनन्ताणुवर्गणा तथा चार अनन्यवर्गणाओंके गुणकारका प्रमाण सिद्धराशिके अनंतमे भागमात्र है । इस गुणकारके मय अपने २ जयन्यका गुणा करनेसे अपना २ उत्कृष्ट भेद निकलता है। ।

गोम्मटसारः। २१७ पुद्गलद्रव्याणां पुनरेकप्रदेशादयो भवन्ति भजनीयाः । एकैकस्तु प्रदेशः कालाणूनां ध्रुवो भवति ॥ ५८४ ॥ अर्थ-पुद्गलद्रव्यका क्षेत्र एकप्रदेशसे लेकर यथासम्भव समझना चाहिये-जैसे परमा- णुका एक प्रदेशप्रमाण ही क्षेत्र है, तथा व्यणुकका एक प्रदेश और दो प्रदेश भी क्षेत्र है, त्र्यणुकका एक प्रदेश दो प्रदेश तीन प्रदेश क्षेत्र है, इत्यादि । किन्तु एक २ कालाणुका क्षेत्र एक २ प्रदेश ही निश्चित है । भावार्थ-कालद्रव्य अणुरुप ही है । कालाणुके पुद्ग- लद्रव्यकी तरह स्कन्ध नहीं होते । जितने लोकाकाशके प्रदेश है उतनी ही कालाणु है । इस लिये रत्नराशिकी तरह एक २ कालाणु लोकाकाशके एक २ प्रदेशपर ही सदा स्थित रहती है। तथा जो कालाणु जिस प्रदेशपर स्थित है वह उसी प्रदेशपर सदा स्थित रहती है। किन्तु पुद्गल द्रव्यके स्कंध होते है अतः उसके अनेक प्रकारके क्षेत्र होते है। संखेज्जासंखेज्जाणता वा होति पोग्गलपदेसा। लोगागासेव ठिदी एगपदेसो अणुस्स हवे ।। ५८५ ॥ संख्येयासंख्येयानन्ता वा भवन्ति पुद्गलप्रदेशाः । लोकाकाश एव स्थितिरेकप्रदेशोऽणोर्भवेत् ॥ ५८५ ॥ अर्थ-पुद्गल द्रव्यके स्कन्ध संख्यात असंख्यात तथा अनन्त परमाणुओंके है, परन्तु उन सबकी स्थिति लोकाकाशमे ही होजाती है; किन्तु अणु एक ही प्रदेशमें रहता है। भावार्थ-जिस तरह जलसे अच्छीतरह भरे हुए पात्रमें लवण आदि कई पदार्थ आसकते है उसी तरह असंख्यातप्रदेशी लोकमें अनंतप्रदेशी स्कन्ध आदि समा सकते है। लोगागासपदेसा छहव्वेहिं फुडा सदा होति । सवमलोगागासं अण्णेहिं विवज्जियं होदि ॥ ५८६ ।। लोकाकाशप्रदेशाः पड्व्यैः स्फुटाः सदा भवन्ति । सर्वमलोकाकाशमन्यैर्विवर्जितं भवति ॥ ५८६ ॥ अर्थ-लोकाकाशके समस्त प्रदेशों में छहो द्रव्य व्याप्त है । और अलोकाकाश आका- शको छोड़कर शेषद्रव्योंसे सर्वथा रहित है। इस तरह क्षेत्र अधिकारका वर्णन करके सख्या अधिकारको कहते है। जीवा अणंतसंखाणंतगुणा पुग्गला हु तत्तो दु। धम्मतियं एकेक लोगपदेसप्पमा कालो ॥ ५८७ ॥ जीग अनन्तसाव्या अनन्नगुणाः पला हि ततम् । धर्मनिक लोरप्रदेशात वालः ॥ ५८७ ॥ गो.२८ १ २१८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-जीव द्रव्य अनन्त है । उससे अनन्तगुणे पुद्गलद्रव्य है । धर्म अधर्म आकाश ये एक २ द्रव्य है । तथा लोकाकाशके जितने प्रदेश है उतने ही कालद्रव्य है। लोगागासपदेसे एक्कक्के जेहिया हु एक्कका । रयणाणं रासी इव ते कालाणू मुणेयवा ॥ ५८८॥ लोकाकाशप्रदेशे एकैकस्मिन् ये स्थिता हि एकैके । रत्नाना राशिरिव ते कालाणवो मन्तव्याः ॥ ५८८ ॥ अर्थ-वे कालाणु रत्नराशिकी तरह लोकाशके एक २ प्रदेशमें एक २ स्थित है, ऐसा समझना चाहिये । भावार्थ-जिसतरह रत्नोकी राशि भिन्न २ स्थित रहती है उसी तरह प्रत्येक कालाणु लोकाकाशके एक २ प्रदेशपर भिन्न २ स्थित है। इसी लिये जितने लोकाकाशके प्रदेश है उतने ही कालद्रव्य है। ववहारो पुण कालो पोग्गलदव्वादणंतगुणमेत्तो। तत्तो अणंतगुणिदा आगासपदेसपरिसंखा ॥ ५८९ ॥ व्यवहारः पुनः कालः पुद्गलद्रव्यादनन्तगुणमात्रः । ततः अनन्तगुणिता आकाशप्रदेशपरिसंख्या ।। ५८९ ॥ अर्थ-पुद्गलद्रव्यके प्रमाणसे अनन्तगुणा व्यवहारकालका प्रमाण है । तथा व्यवहार कालके प्रमाणसे अनन्तगुणी आकाशके प्रदेशोंकी संख्या है। लोगागासपदेसा धम्माधम्मेगजीवगपदेसा। सरिसा हु पदेसो पुण परमाणुअवट्टिदं खेत्तं ॥ ५९० ॥ लोकाकाशप्रदेशा धर्माधर्मकजीवगप्रदेशाः सदृशा हि प्रदेशः पुनः परमाण्ववस्थितं क्षेत्रम ॥ ६९० ॥ अर्थ-धर्म, अधर्म, एक जीवद्रव्य, तथा लोकाकाश, इनकी प्रदेशमंख्या परस्परमें समान है । जितने क्षेत्रको एक पुद्गलका परमाणु रोकता है उतने क्षेत्रको प्रदेश कहते है । स्थानस्वरूपाधिकारका वर्णन करते है । सवमरूवी दवं अवट्ठिदं अचलिआ पदेसा वि । रूवी जीवा चलिया तिवियप्पा होति हु पदेसा ॥ ५९१ ॥ सर्वमरूपि द्रव्यमवस्थितमचलिता. प्रदेशा अपि । रूपिणो जीवाश्चलितात्रिविकल्पा भवन्ति हि प्रदेशाः ॥ ५९१ ॥ अर्थ- सम्पूर्ण अरूपी द्रव्य जहा स्थित है वहा ही सदा स्थित रहते है, तथा इनके प्रदेश भी चलायमान नहीं होते । किन्तु रूपी ( संसारी ) जीवद्रव्य चल है, तथा इनके प्रदेश तीन प्रकारके होते है। भावार्थ-धर्म, अवर्म आकाश काल और मुक्त जीव ये गोम्मटसारः। २२३ अर्थ-जो सर्वाशमें पूर्ण है उसको स्कन्ध कहते है । उसके आधेको देश और आधेके आधेको प्रदेश कहते है । जो अविभागी है उसको परमाणु कहते है। ॥ इति स्थानस्वरूपाधिकारः॥ क्रमप्राप्त फलाधिकारको कहते है। गदिठाणोग्गहकिरियासाधणभूदं खु होदि धम्मतियं । वत्तणकिरियासाहणभूदो णियमेण कालो दु ॥ ६०४ ॥ गतिस्थानावगाहक्रियासाधनभूत खलु भवति धर्मत्रयम् । वर्तनाक्रियासाधनभूतो नियमेन कालस्तु ॥ ६ ०४ अर्थ- गति, स्थिति, अवगाह, इन क्रियाओंके साधन क्रमसे धर्म, अधर्म, आकाश- द्रव्य है । और वर्तना क्रियाका साधन काल द्रव्य है । भावार्थ-क्षेत्रसे क्षेत्रान्तरकी प्राप्ति- की कारणभूत जीव पुद्गलकी पर्यायविशेषको गति कहते है । इस गतिक्रियाका साधन ( उदा- सीन निमित्त ) धर्मद्रव्य है। जैसे जलमें मच्छियोकी गतिक्रिया जलके निमित्तसे होती है। गतिविरुद्ध पर्यायको स्थिति कहते है । यह पर्याय जीव पुद्गलकी होती है । तथा यह स्थिति- क्रिया अधर्मद्रव्यके निमित्तसे ही होती है। कहीं पर भी रहनेको अवगाह कहते है। यह अवगाहक्रिया आकाशद्रव्यके निमित्तसे ही होती है। तथा प्रत्येक पदार्थकी वर्तना क्रिया कालद्रव्यके निमित्तसे होती है। ( शड्का ) सूक्ष्म पुद्गलादिक भी एक दूसरेको अव- काश देते है, इसलिये अवगाहहेतुत्व आकाशका ही असाधारण लक्षण क्यों कहा? ( समाधान ) यद्यपि सूक्ष्म पुद्गलादिक एक दूसरेको अवगाह देते है तथापि ये सम्पूर्ण द्रव्योको अवगाह नहीं दे सकते । समस्त द्रव्योंको अवगाह देनेकी सामर्थ्य आकाशमें ही है । इसलिये आकाशकाही अवगाहहेतुत्व यह असाधारण लक्षण युक्त है । यद्यपि अलो- काकाश किसी द्रव्यको अवगाह नहीं देता, तथापि उसका अवगाह देनेका स्वभाव वहा पर भी है । किन्तु धर्मद्रव्यका निमित्त न मिलनेमे जीवादि अवगाह्य पदार्थ अटोकाकाशमें गमन नहीं करते इसलिये अलोकाकाश किसीको अवगाह नहीं देता। जीव और पुद्गलका उपकार ( फल ) बताते है । अण्णोष्णुवयारेण य जीवा बटुंति पुग्गलाणि पुणो । देहादीणिवत्तणकारणभूदा हुणियमेण ।। ६०५ ।। अन्योन्योपकारेण न जीना वर्तन्ते पुनला पुन । दहादिनिर्वतनकारणभूता हि नियमेन ॥ ६०५ ॥ अर्थ-जीप परम्परमें उपचार करने है । जैसे मेवक स्वामीवी हितमिदिमें प्रत होना है, और पामी मार को पनादि देकर मंतुष्ट मन्ता है । तथ्य पद्न्न गरीदि उत्तर २२४ रायचन्द्रनैनशास्त्रमालायम् । करनेमें कारण है। भावार्थ-शरीर इन्द्रिय मन श्वासोच्छ्रास आदिके द्वारा पुद्गलद्रव्य जीवका उपकार करता है । तथा पुद्गलद्रव्य जीवका उपकार करता है यही नहीं किन्तु परस्परमे भी उपकार करता है । जैसे शास्त्रका उपकार गत्ता वेष्टन करते है। यहां पर चकारका ग्रहण किया है इसलिये जिस तरह परस्परमें या एक दूसरेको जीव पुद्गल उप- कार करते है उस ही तरह अपकार भी करते है । इसी अर्थको दो गाथाओमे स्पष्ट करते है। आहारवग्गणादो तिणि सरीराणि होति उस्सासो । णिस्सासोवि र तेजोवरगणखंधादु तेजंगं ।। ६०६ ॥ आहारवर्गणातः त्रीणि शरीराणि भवन्ति उच्छासः । निश्वासोपि च तेजोवर्गणास्कन्धात्तु तेजोऽङ्गम् ॥ ६०६ ॥ अर्थ-तेईस जातिकी वर्गणाओंमेंसे आहारवर्गणाके द्वारा औदारिक वैक्रियिक आहा- रक ये तीन शरीर और श्वासोझास होते है । तथा तेजोवर्गणारूप स्कन्धके द्वारा तैजस शरीर बनता है। भासमणवग्गणादो कमेण भासा मणं च कम्मादो। अट्ठविहकम्मदव्वं होदित्ति जिणेहिं णिद्दिढ ॥ ६०७ ॥ भाषामनोवर्गणातः क्रमेण भाषा मनश्च कार्मणतः । अष्टविधकर्मद्रव्यं भवाति जिनैर्निर्दिष्टम् ॥ ६०७ ॥ अर्थ-भाषावर्गणाके द्वारा चार प्रकारका वचन, मनोवर्गणाके द्वारा हृदयस्थानमें अष्ट दल कमलके आकार द्रव्यमन, तथा कार्मण वर्गणाके द्वारा आठ प्रकारके कर्म बनते है, ऐसा जिनेन्द्रदेवने कहा है। अविभागी पुद्गल परमाणु स्कन्धरूपमें किस तरह परिणत होती है, इसका कारण बताते है। णिद्धत्तं लुक्खत्तं बंधस्प्त य कारणं तु एयादी। संखेज्जासंखज्जाणंतविहा णिद्धणुक्खगुणा ॥ ६०८॥ स्निग्वत्वं रूक्षत्वं वन्धस्य च कारणं तु एकादयः । सख्ययासख्येयानन्तविधा स्निग्धरूक्षगुणाः ॥ ६०८ ॥ अर्थ-वन्धका कारण स्निग्धत्व या रूक्षत्व है। इस स्निग्धत्व या रूक्षत्व गुणके एकसे टेकर संन्यात अमख्यात अनन्त भेट हैं। भावार्थ-एक किसी गुणविशेषकी म्निग्धत्व अर नसत्व ये दो पर्याय है। ये ही बन्धकी कारण है । इन पर्यायोंके आविभागप्रतिच्छे- गड़ी (गक्तिके निश अग) अपेक्षा एकसे लेकर सख्यात असंख्यात अनंत भेद है ।

गोम्मटसारः। २२१ जीवादोणंतगुणो धुवादितिण्हं असंखभागो दु । पल्लस्स तदो तत्तो असंखलोगवहिदो मिच्छो ॥ ५९८॥ जीवादनन्तगुणो ध्रुवादितिसृणामसंख्यभागस्तु । पल्यस्य ततस्ततः असंख्यलोकावहिता मिथ्या ॥ ५९८॥ अर्थ-ध्रुववर्गणा, सांतरनिरंतरवर्गणा, शून्यवर्गणा, इन तीन वर्गणाओंका उत्कृष्ट भेद निकालनेकेलिये गुणकारका प्रमाण जीवराशिसे अनन्तगुणा है। तथा प्रत्येकशरीर वर्ग. णाका गुणाकार पल्यके असंख्यातमे भाग है । और ध्रुवशून्यवर्गणाका गुणकार, मिथ्यादृष्टि जीवराशिम अंसख्यात लोकका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना है । इस गुणकारके साथ जघन्य भेदका गुणा करनेसे उत्कृष्ट भेदका प्रमाण निकलता है। सेढी सूई पल्ला जगपदरा संखभागगुणगारा । अप्पप्पणअवरादो उक्कस्से होंति णियमेण ॥ ५९९ ॥ श्रेणी सूची पल्यजगत्प्रतरासंख्यभागगुणकाराः । आत्मात्मनोवरादुत्कृष्टे भवन्ति नियमेन ॥ ५९९ ॥ अर्थ-बादरनिगोदवर्गणा, शून्यवर्गणा, सूक्ष्मनिगोदवर्गणा, नभोवर्गणा इन चार वर्ग- णाओंके उत्कृष्ट भेदका प्रमाण निकालनेके लिये गुणकारका प्रमाण क्रमसे जगच्छ्रेणीका असंख्या- तमा भाग, सूच्यंगुलका असंख्यातमा भाग, पल्यका असंख्यातमा भाग, जगत्प्रतरका असंख्या- तमा भाग है । अपने २ गुणकारके प्रमाणसे अपने २ जघन्यका गुणा करनेसे अपने २ उत्कृष्ट भेदका प्रमाण निकलता है । भावार्थ-यहा पर पुद्गलद्रव्यकी तेईस वर्गणाओंका एक- पतिकी अपेक्षा वर्णन किया है । जिनको नानापतिकी अपेक्षा इन वर्गणाओंका स्वरूप जानना हो वे वडी टीकामें देख लें। किसी भी वर्तमान एक कालमें उक्त तेईस वर्गणाओंमसे कौन २ सी वर्गणा कितनी २ पाई जाती हैं, इस अपेक्षाको लेकर जो वर्णन किया जाता है उसको नाना पतिकी अपेक्षा वर्णन कहते है । हेट्ठिमउकस्स्सं पुण रूवहियं उवरिमं जहण्णं खु । इदि तेवीसवियप्पा पुग्गलदबा हु जिणदिवा ॥ ६०० ॥ अधस्तनोत्कृष्ट पुनः रूपाचिकमुपरिमं जवन्यं खलु । इति त्रयोविंशतिविकल्यानि पुद्गलद्रव्याणि हि मिनदिष्टानि ।। ६०० ॥ अर्थ-तेईस वर्गणाआमेने अणवर्गणाको छोडकर शेप वार्टम वर्गणाओम नीती वाणाके उत्कृष्ट भेटका जो प्रमाण है उसमें एक मिन्नानेसे आगे की वर्गणा नगन्य दका प्रमाण होता है। मे मंगानाणपणारे उत्प भेटका जो प्रमाण है उनमें एक मिनेमे असल्यानागंणाका जन्य भेद होता है। और अमन्यातागण उमर भेटमें एक दिन २२२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अनन्ताणुवर्गणाका जघन्य भेद होता है । इसी तरह आगे भी समझना । इसी क्रमसे पुद्गल- द्रव्यके वाईस भेद होते है, किन्तु एक अणुवर्गणाको मिलानेसे पुद्गलद्रव्यके तेईस भेद होते है यह जिनेन्द्रदेवने कहा है। प्रकारान्तरसे होनेवाले पुद्गलद्रव्यके छह भेदोंके दृष्टान्त दिखाते है। पुढवी जलं च छाया चउरिदियविषयकम्मपरमाणू । छबिहभेयं भणियं पोग्गलदव्वं जिणवरेहिं ॥६०१॥ पृथ्वी जलं च छाया चतुरिन्द्रियविषयकर्मपरमाणवः । पडिधभेदं भणितं पुद्गलद्रव्यं जिनवरैः ॥ ६०१ ॥ अर्थ--पुद्गलद्रव्यको जिनेन्द्र देवने छह प्रकारका बताया है । जैसे १ पृथ्वी २ जल ३ छाया, ४ नेत्रको छोडकर शेष चार इन्द्रियोंका विषय, ५ कर्म, ६ परमाणु । इन छह भेदोंकी क्या २ संज्ञा है यह बताते है । बादरबादर वादर बादरसुहमं च सुहमथूलं च । सुहमं च सुहमसुहमं च धरादियं होदि छब्भेयं ॥६०२॥ वादरवादरं वादरं वादरसूक्ष्मं च सूक्ष्मस्थूलं च । सूक्ष्मं च सूक्ष्मसूक्ष्म धरादिकं भवति षड्भेदम् ॥ ६०२॥ अर्थ बादरवादर, बादर, बादरसूक्ष्म, सूक्ष्मवादर, सूक्ष्म, सूक्ष्मसूक्ष्म, इस तरह पुद्ग- लद्रव्यके छह भेद है, जैसे उक्त पृथ्वी आदि । भावार्थ-जिसका छेदन भेदन अन्यत्र प्रापण हो सके उस स्कन्धको वादरवादर कहते है, पृथ्वी काष्ठ पाषाण आदि । जिसका छेदन भेदन न हो सके किन्तु अन्यत्र प्रापण हो सके उस स्कन्धको बादर कहते है जैसे जल तैल आदि । जिसका छेदन भेदन अन्यत्र प्रापण कुछ भी न हो सके ऐसे नेत्रसे देखने योग्य स्कन्धको वादरसूक्ष्म कहते है, जैसे छाया, आतप, चादनी आदि । नेत्रको छोडकर शेष चार इन्द्रियोके विषयभूत पुद्गलस्कन्धको सूक्ष्मस्थूल कहते है, जैसे शब्द गन्ध रस आदि । जिसका किसी इन्द्रि- यके द्वारा ग्रहण न हो सके उस पुद्गलस्कन्धको सूक्ष्म कहते है, जैसे कर्म । जो स्कन्धरूप नहीं है ऐसे अविभागी पुद्गल परमाणुओंको सूक्ष्मसूक्ष्म कहते है । खंछ सयलसमत्थं तस्स य अद्धं भणति देसोत्ति । अद्धद्धं च पदेसो अविभागी चेव परमाणू ॥ ६०३ ।। स्कन्ध सकलसमर्थ तस्य चाधं भणन्ति देशमिति । अर्द्धाद्धं च प्रदेशमविभागिन चैव परमाणुम् ॥ ६०३ ॥ , n गोम्मटसारः । २२६ जैसे स्निग्ध पर्यायके एक अंश दो अंश तीन अंश इत्यादि एकसे लेकर संख्यात असंख्यात अनंत अंश होते हैं और इन्हीकी अपक्षा एकसे लेकर अनंततक भेद होते है । उस ही तरह रूक्षत्व पर्यायके भी एकसे लेकर संख्यात असंख्यात अनंत अंशोंकी अपेक्षा एकसे लेकर अनंत तक भेद होते हैं । अथवा, बन्ध कमसे कम दो परमाणुओंमें होता है । सो ये दोनो परमाणु स्निग्ध हों अथवा रूक्ष हों या एक स्निग्ध एक रूक्ष हो परन्तु बंध हो सकता है । जिस तरह दो परमाणुओंमें वन्ध होता है उस ही तरह संख्यात असंख्यात अनंत परमाणुओमें भी बन्ध होता है; क्योंकि बन्धका कारण स्निग्धरूक्षत्व है। उक्त अर्थको ही स्पष्ट करते है। एगगुणं तु जहण्णं णिद्धत्तं विगुणतिगुणसंखेज्जाs-। संखेजाणंतगुणं होदि तहा रुक्खभावं च ॥ ६०९ ॥ एकगुणं तु जघन्यं स्निग्धत्वं द्विगुणत्रिगुणसंख्येयाऽ- | संख्येयानन्तगुणं भवति तथा रूक्षभाव च ॥ ६०९ ॥ अर्थ-स्निग्धत्वका जो एक निरंश अंश है उसकोही जघन्य कहते हैं। इसके आगे स्निग्धत्वके दो तीन आदि संख्यात असंख्यात अनंत भेद होते है । इस ही तरह रूक्ष- त्वके भी एक अंशको जघन्य कहते है। और इसके आगे दो तीन आदि संख्यात अस- ख्यात अनंत भेद होते है। एवं गुणसंजुत्ता परमाणू आदिवग्गणम्मि ठिया । जोग्गदुगाणं बंधे दोण्हं बंधो हवे णियमा ॥ ६१० ॥ एवं गुणसंयुक्ताः परमाणव आदिवर्गणाया स्थिताः । योग्यद्विकयोः बंधे द्वयोर्वन्धो भवेनियमात् ॥ ६१० ॥ •अर्थ-इस प्रकार स्निग्ध या रूक्ष गुणसे युक्त परमाणु अणुवर्गणामें ही हैं । इसके आगे दो आदि परमाणुओंका वन्ध होता है, परन्तु यह टोका बन्ध भी तब ही होता है जब कि दोनों नियमसे बन्धके योग्य हों। जब कि सामान्यसे वन्धका कारण स्निग्धरूक्षत्व वतादिया तब उसमें योग्यता ओर अयोग्यता क्या है ? यह वताते है। णिद्धणिद्धा ण बज्झंति रुक्खरुक्खा य पोग्गला । णिद्धलुक्खा य बज्झंति वारूवी य पोग्गला ॥६११ ॥ निन्धस्निया न वध्यन्ते स्तल्लाश पुहन्नः । ग्निग्यक्षाश्च वन्यन्ते रुप्यर-पिणच पहलाः ॥ ६ ११ ॥ अर्थ-निव स्निग्ध पुन्टका और नक्ष का पुलका परम्पग्में बन नहीं होता।

-जन an- २२६ रायचन्द्रनशास्त्रमालायाम् । किन्तु स्निग्ध रूक्ष और रूपी अरूपी पुद्गलोंका परस्परमे वन्ध होता है । मावार्थ- यद्यपि यहां पर यह कहा है कि स्निग्धस्निग्ध और रक्षरूक्षका बन्ध नहीं होता । तथापि यह कथन सामान्य है; क्योकि आगे चलकर विशेप कथनके द्वारा स्वयं ग्रन्यकार इस बातका स्पष्ट कर देंगे कि स्निग्धस्निग्ध और रुक्षरूक्षका भी वन्ध होता है। और इस ही लिये यहां- पर रूपी अरूपीका बन्ध होता है ऐसा कहा है। रूपी अरूपी संज्ञा किसकी है यह बताते है । णिद्धिदरोलीमज्झे विसरिसजादिस्स समगुणं एकं । रूवित्ति होदि सपणा सेसाणं ता अरूवित्ति ॥ ६१२॥ स्निग्धेतरावलीमध्ये विसदृशजातेः समगुण एकः । रूपीति भवति संज्ञा शेषाणा ते अरूपिण इति ॥ १२ ॥ अर्थ-स्निग्ध और रूक्षकी श्रेणिमे जो विसदृश जातिका एक समगुण है उसकी रूपी संज्ञा है । और समगुणको छोड़कर अवशिष्ट सबकी अरूपी संज्ञा है। भावार्थ- कि विसदृश जातिके एक समगुणकी ही रूपी सज्ञा है और शेषकी अरूपी, और रूपी अल- पीका वन्ध होता है, तब यह सिद्ध है कि स्निग्धस्निग्ध और रूक्षरूक्षका भी वन्ध होता है। स्निग्धकी अपेक्षा रूक्ष और रूक्षकी अपेक्षा स्निग्ध विसदृश होता है । रूपी अरूपीका उदाहरण दिखाते है। दोगुणणिद्धाणुस्स य दोगुणलुक्खाणुगं हवे रुवी। इगितिगुणादि अरूवी रुक्खस्स वि तंव इदि जाणे ॥ ६१३ ॥ द्विगुणस्निग्धाणोश्च द्विगुणरूक्षाणुको भवेत् रूपी । एकत्रिगुणादिः अरूपी रूक्षस्यापि तद्व इति जानीहि ॥ ६१३ ॥ अर्थ-स्निग्धके दो गुणोंसे युक्त परमाणुकी अपेक्षा रूक्षका दोगुण युक्त परमाणु रूपी है शेष एक तीन चार आदि गुणोंके धारक परमाणु अरूपी है । इस ही तरह रूक्षका भी समझना चाहिये । भावार्थ-रूक्षके दो गुणोंसे युक्त परमाणुकी अपेक्षा स्निग्धके दो गुणोसे युक्त परमाणु रूपी है और शेष एक तीन आदि गुणोंके धारक परमाणु अरूपी है। णिद्धस्स णिद्धेण दुराहिएण लुक्खस्स लुक्खेण दुराहिएण । णिद्धस्स लुक्खेण हवेज्ज बंधो जहण्णवज्जे विसमे समे वा ॥६१४॥ स्निग्धस्य स्निग्धेन व्यधिकेन रूक्षस्य रूक्षेण व्यधिकेन । स्निग्धस्य रूक्षेण भवेद्वन्धो जघन्यवये विषमे समे वा ॥ १४ ॥ अर्थ- --एक स्निग्ध परमाणुका दूसरी दो गुण अधिक स्निग्ध परमाणुके साथ वन्ध गोम्मटसारः । २२७ है होता है । एक रूक्ष परमाणुका दूसरी दो गुण अधिक रूक्ष परमाणुके साथ बन्ध होता । एक स्निग्ध परमाणुका दूसरी दो गुण अधिक रूक्ष परमाणुके साथ भी वन्ध होता है। सम विषम दोनोका बन्ध होता है, किन्तु जघन्यगुणवालेका वन्ध नहीं होता। भावार्थ-एक गुणवालेका तीनगुणवाले परमाणुके साथ वन्ध नहीं होता । शेष स्निग्ध या रूक्ष दोनों जातिके परमाणुओंका समधारा या विषमधारामे दो गुण अधिक होनेपर बन्ध होता है। दो चार छह आठ दश इत्यादि जहां पर दोके ऊपर दो दो अंशांकी अधिकता हो उसको समधारा कहते हैं । तीन पांच सात नौ ग्यारह इत्यादि जहां पर तीनके ऊपर दो दो अंशोंकी वृद्धि हो उसको विषमधारा कहते है। इन दोनो धाराओंमें जघन्य गुणको छोडकर दो गुण अधिकका ही वन्ध होता है औरका नहीं । णिद्धिदरे समविसमा दोत्तिगआदी दुउत्तरा होति । उभयेवि य समविसमा सरिसिदरा होंति पत्तेयं ॥ ६१५॥ स्निग्धेतरयोः समविषमा द्वित्रिकादयः व्युत्तरा भवन्ति । उभयेऽपि च समविषमाः सदृशेतरे भवन्ति प्रत्येकम् ॥ ६१५ ॥ अर्थ-स्निग्ध और रूक्ष दोनोंमेंही दोगुणके ऊपर जहा दो २ की वृद्धि हो वहां सम- धारा होती है । और जहां तीन गुणके ऊपर दो २ की वृद्धि हो उसको विषमधारा कहते है। सो स्निग्ध और रूक्ष दोनोंमेही दोनो ही धारा होती है । तथा प्रत्येक धारामें रूपी और अरूपी होते है। इस ही अर्थको प्रकारान्तरसे स्पष्ट करते है। दोत्तिगपभवटुउत्तरगदेसणंतरदुगाण बंधो दु । णिद्धे लुक्खे वि तहावि जहण्णुभयेवि सव्वत्थ ॥ ६१६ ॥ द्वित्रिकप्रभवद्वयु त्तरगतेष्वनन्तरद्विकयोः वन्धस्तु । निग्धे रूक्षे पि तथापि जघन्योभयेऽपि सर्वत्र ॥ ६१६ ॥ अर्थ-स्निग्ध या रूक्ष गुणमें समधारामें दो अंशोंके आगे दो दो अंशोंकी वृद्धि होती है। और विषमधारामें तीनके आगे दो २ की वृद्धि होती है । सो इन दोनोंमें ही अनन्त- रहिकका बन्ध होता है । जैसे दो गुणवाले निग्ध या रूक्षका चारगुणवाले निन्ध या रूक्षके साथ, तथा तीनगुणवाले निन्ध या रूक्षका पाच गुणवाले न्निन्ध या रक्षके साथ बन्ध होता है। इसी तरह आगे भी समझना चाहिये । किन्तु जयन्यका बन्ध नहीं होता । दूसरी सत्र जगह निन्ध और लक्षमें वध होता है। भावार्थ-निन्ध या क्ष गुणसे युक्त जिन दो पुदलेंमें बन्ध होता है उनको निग्ध या मक्ष गणके अंगों में तो अशोका अंतर होना नाहिये । मैले दो नार, तीन पांच. चार ह. पांच मात इत्यादि । इस तरह दो अंश अनिक २२८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । रहनेपर सर्वत्र बंध होता है । इस नियमके अनुसार एकगुणवाले और तीनगुणवालेका भी बंध होना चाहिये, किन्तु सो नहीं होता; क्योंकि यह नियम है कि जघन्य गुणवालेका बंध नहीं होता । अतएव एक गुणवालेका तीन गुणवालेके साथ बंध नहीं होता; किन्तु तीन गुणवालेका पांच गुणवालेके साथ बंध हो सकता है; क्योंकि तीन गुणवाला जघन्यगुणवाला नहीं है, एक- गुणवालेको ही जघन्य गुणवाला कहते है। णिद्धिदरवरगुणाणू सपरहाणेवि णेदि बंधटुं । बहिरंतरंगहेदुहि गुणतरं संगदे एदि ॥ ६१७ ॥ स्निग्धेतरावरगुणाणुः स्वपरस्थानेऽपि नैति वधार्थम् बहिरंतरङ्गहेतुभिर्गुणान्तरं संगते एति ॥ ६ १७ ॥ अर्थ-स्निग्ध या रूक्षका जघन्य गुणवाला परमाणु स्वस्थान या परस्थान कहीं भी वन्धको प्राप्त नही होता । किन्तु बाह्य और अन्तरङ्ग कारणके निमित्तसे किसी दूसरे गुणवाला- अंशवाला होने पर बन्धको प्राप्त होते है । भावार्थ-स्निग्ध या रूक्ष गुणका जब एक अंश-अविभागप्रतिच्छेद-रूप परिणमन होता है तब उसका न स्वस्थानमें बंध होता है और न परस्थानमें बंध होता है। किन्तु बाह्य अभ्यन्तर कारणके निमित्तसे जब जघन्य स्थानको छोड़कर अधिक अंशरूप परिणमन होजाय तब वे ही स्निग्ध रूक्ष गुण बंधको प्राप्त हो सकते है। णिद्धिदरगुणी अहिया हीणं परिणामयंति बंधम्मि । संखेज्जासंखेज्जाणंतपदेसाण खंधाणं ॥ ६१८॥ स्निग्धेतरगुणा अधिका हीनं परिणामयंति बन्धे । संख्येयासंख्येयानन्तप्रदेशानां स्कन्धानाम् ॥ ६१८ ॥ अर्थ-संख्यात असंख्यात अनंतप्रदेशवाले स्कन्धोंमें स्निग्ध या रूक्षके अधिक गुणवाले परमाणु या स्कन्ध अपने से हीनगुणवाले परमाणु या स्कधोंको अपनेरूप परणमाते है । जैसे एक हजार स्निग्ध या रुक्ष गुणके अंशोंसे युक्त परमाणु या स्कन्धको एक हजार दो अंशवाला स्निग्ध या रूक्ष परमाणु या स्कन्ध परणमाता है। इसी तरह अन्यत्र भी समझना चाहिये । ॥ इति फलाधिकार.॥ इस तरह सात अधिकारोके द्वारा छह द्रव्योंका वर्णन करके अब पंचास्तिकायका वर्णन करते है। दव्वं छक्कमकालं पंचत्थीकायसण्णिदं होदि । काले पदेसपचयो जम्हा णस्थित्ति णिद्दिढें ॥ ६१९ ।।

गोम्मटसारः।
२२९
द्रव्यं षष्टमकालं पञ्चास्तिकायसंज्ञितं भवति ।
काले प्रदेशप्रचयो यस्मात् नास्तीति निर्दिष्टम् ।। ६१९ ॥
अर्थ-कालमें प्रदेशप्रचय नही है इसलिये कालको छोडकर शेष द्रव्योंको ही पञ्चा-
स्तिकाय कहते है । भावार्थ-जो सद्प हो उसको अस्ति कहते है । और जिनके प्रदेश
अनेक हों उनको काय कहते है । काय दो प्रकारके होते है, एक मुख्य दूसरा उपचरित ।
जो अखण्डप्रदेशी है उन द्रव्योंको मुख्य काय कहते है। जैसे जीव धर्म अधर्म आकाश ।
जिसके प्रदेश तो खण्डित हो; किन्तु स्निग्ध रूक्ष गुणके निमित्तसे परस्परमें वन्ध
होकर जिनमे एकत्व होगया हो, अथवा बन्ध होकर एकत्व होनेकी जिसमें सम्भावना
हो उसको उपचरित काय कहते हैं, जैसे पुद्गल । किन्तु कालद्रव्य स्वयं अनेकप्रदेशी न
होनेसे मुख्य काय भी नहीं है । और स्निग्ध रूक्ष गुण न होनेसे बंध होकर एकत्वकी भी
उसमें सम्भावना नहीं है, इसलिये वह ( काल ) उपचरित काय भी नहीं है । अतः काल-
द्रव्यको छोड़कर शेष जीव पुद्गल धर्म अधर्म आकाश इन पाच द्रव्योको ही पंचास्तिकाय कहते
है । और कालद्रव्यको कायरूप नहीं किन्तु अस्तिरूप कहते है।
नव पदार्थोंको बताते है।
णव य पदत्था जीवाजीवा ताणं च पुण्णपावदुगं ।
आसवसंवरणिज्जरबंधा मोक्खो य होंतित्ति ॥ ६२० ॥
नव च पदार्था जीवाजीवाः तेषा च पुण्यपापद्विकम् ।
आस्त्रवसंवरनिर्जराबन्धा मोक्षश्च भवन्तीति ।। ६२० ॥
अर्थ-मूलमें जीव और अजीव ये दो पदार्थ है । इन हीके सम्बन्धसे पुण्य और
पाप ये दो पदार्थ होते है । इसलिये चारपदार्थ हुए । तथा पुण्यपापके आस्रव वंध संवर
निर्जरा मोक्ष पांच पदार्थ होते है । इसलिये 'सत्र मिलाकर नव पदार्थ होते है।
मावार्थ-जिसमें ज्ञानदर्शनरूप चेतना पाई जाय उसको जीव कहते है। जिसमें
चेतना न हो उसको अजीव कहते है शुभ
कर्मोको
पुण्य
और अशुभ कर्मोको पाप कहते
है । कर्मोके आनेके द्वारको, या मन वचन कायके द्वारा होनेवाले आत्मप्रदेशपरिस्पन्दको,
अथवा वन्धके कारणको आस्रव कहते है । अनेक पदार्थोम एकत्वबुद्धिके उत्पादक सन्त्र-
न्धविशेषको अथवा आत्मा और कर्मके एकक्षेत्रावगाहरूप सम्बन्धविशेषको बन्ध कहते
हैं । आस्ववके निरोधको संवर कहते है । बद्ध कोंके एकदेश क्षयको निर्जरा कहते है।
आत्मासे समस्त कर्मोके हट जानेको मोक्ष कहते हैं । ये ही नव पदार्य है।
जीवद्गं उत्तटुं जीवा पुण्णा हु सम्मगुणसहिदा ।
बदसहिदावि य पावा तविवरीया हवंतित्ति ॥ ६२१ ॥

२३० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । जीवद्विकमुक्तार्थ जीवाः पुण्या हि सम्यक्त्वगुणसहिताः । व्रतसहिता अपि च पापास्तद्विपरीता भवन्तीति ॥ ६२१ ॥ अर्थ-जीव और अजीवका अर्थ पहले वताचुके हैं । जीवके भी दो भेट है, एक पुण्य और दूसरा पाप । जो सम्यक्त्वगुणसे या व्रतसे युक्त है उनको पुण्य जीव कहत है। और इससे जो विपरीत है उनको पाप जीव कहते है । गुणस्थानक्रमकी अपेक्षासे जीवराशिकी संख्या बताते हैं । मिच्छाइट्ठी पावा ताणंता य सासणगुणावि । पल्लासंखेज्जदिमा अणअण्णदरुयमिच्छगुणा ॥ ६२२ ।। मिथ्यादृष्टयः पापा अनन्तानन्ताश्च सासनगुणा पल्यासंख्येया अनान्यतरोदयमिथ्यात्वगुणाः ।। ६२२ ॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टि पाप जीव है ये अनंतानत है; क्याकि द्वितीयादि तेरह गुणस्थानवाले जीवोका प्रमाण घटानेसे अवशिष्ट समस्त संसारी जीवराशि मिथ्यादृष्टि ही है । तथा सासादन गुणस्थानवाले जीव पल्यके असंख्यातमे भाग हैं। और ये भी पाप जीव ही है, क्योंकि अनंतानुबंधी चार कषायोंमें से किसी एक कपायका इसके उदय हो- रहा है । इसलिये यह मिथ्यात्व गुणको प्राप्त है। भावार्थ-सासादन गुणस्थानवालेका पहले यह लक्षण कह आये है कि " किसी एक अनंतानुबंधी कपायके उदयसे जो सन्य- क्त्वरूपी रत्नपर्वतप्ते तो गिरसड़ा है; किन्तु मिथ्यात्वरूप भूमिके सन्मुख है-अर्थात् अभी- तक जिसने मिथ्यात्वभूमिको ग्रहण नहीं किया है, किन्तु एक समयसे लेकर छह आवली- तकके कालमें नियमसे वह उस मिथ्यात्व भूमिको ग्रहण करलेगा ऐसे जीवको सासादन- गुणस्थानवाला कहते है। अतः इस गुणस्थानवाले जीवोको पुण्य जीव नहीं कह सकते क्योंकि अनंतानुबंधी कषायके उदयसे इनका सम्यक्त्वगुण भी नष्ट हो चुका है और इनके किसी प्रकारका व्रत भी नहीं है। किन्तु नियमसे ये मिथ्यात्व गुणस्थानको प्राप्त होगे इसलिये इनको मिथ्यादृष्टि--पाप जीव ही कहते है। इन जीवोंकी संख्या पल्यके असंख्यातमे भाग है । और मिथ्यादृष्टि जीवोकी संख्या अनंतानंत है । मिच्छा सावयसासणमिस्साविरदा दुवारणंता य । पल्लासंखेजदिममसंखगुणं संखसंखगुणं ॥ ६२३ ॥ मिथ्याः श्रावकसासनमिश्राविरता द्विवारानन्ताश्च । पल्यासंख्येयमसंख्यगुणं संख्यासंख्यगुणम् ॥ ६२३ ॥ अर्थ--मिथ्यादृष्टि अनंतानंत है। श्रावक पल्यके असंख्यातमे भाग है। सासादन गुण- स्थानवाले श्रावकोंसे असंख्यातगुणे है। मिश्र सासादनवालोंसे संख्यातगुणे है । अव्रतस.

गोम्मटसारः । २३१ म्यग्दृष्टि मिश्रजीवोंसे असंख्यातगुणे है । इनमें अन्तके चार स्थानोमें कुछ २ अधिक समझना चाहिये । भावार्थ-मनुष्य और तिर्यच इन दो गतियोमे ही देशसंयम गुणस्थान होता है। इनमें तेरह करोड़ मनुष्य और पल्यके असंख्यातमे भाग तिर्यच है । सासादन गुणस्थान चारों गतियोमें होता है। इनमें बावन करोड़ मनुष्य और श्रावकोसे असंख्यातगुणे इतर तीन गतिके जीव है । मिश्रगुणस्थान भी चारो गतियोमे होता है इनमें एकसौ चार करोड़ मनुष्य और सासादनवालोंसे संख्यातगुणे शेष तीन गतिके जीव है । तथा अव्रत गुणस्थान भी चारो गति- योमें होता है। इनमें सातसौ करोड़ मनुष्य है और मिश्रवालोंसे असंख्यातगुणे शेष तीन गतिके जीव है। तिरधियसयणवणउदी छण्णउदी अप्पमत्त वे कोडी । पंचेव य तेणउदी णवट्ठविसयच्छउत्तरं पमदे ॥ ६२४ ॥ व्यधिकशतनवनवतिः पण्णवतिः अप्रमत्ते द्वे कोटी । पञ्चैव च त्रिनवतिः नवाप्टद्विशतपडुत्तरं प्रमत्ते ॥ ६२४ ॥ अर्थ-प्रमत्त गुणस्थानवाले जीवोका प्रमाण पाच करोड़ तिगनवे लाख अठानवे हजार दो सौ छह है ( ५९३९८२०६ )। अप्रमत्त गुणस्थानवाले जीवोंका प्रमाण दो करोड़ छयानवे लाख निन्यानवे हजार एक सौ तनि ( २९६९९१०३ ) है । तिसयं भणंति केई चउरुत्तरमत्थपंचयं केई । उवसामगपरिमाणं खवगाणं जाण तदुगुणं ॥ ६२५ ॥ त्रिशतं भणन्ति केचित् चतुरुत्तरमस्तपञ्चकं केचित् । उपशामकपरिमाणं क्षपकाणां जानीहि तद्दिगुणम् ।। ६२५ ॥ अर्थ-उपशमश्रेणिवाले आठवें नौमे दशमे ग्यारहमे गुणस्थानवाले जीवोंका प्रमाण कोई आचार्य तीनसौ कहते है । कोई तीनसौ चार कहते है। कोई दो सौ निन्यानवे कहते है। क्षपकश्रेणिवाले आठमे नौमे दशमे बारहमे गुणस्थानवाले जीवोंका प्रमाण उपशम श्रेणिवालोसे दूना है। उपशमश्रेणिवाले तीनसौ चार जीवोका निरंतर आठ समयोंमें विभाग करते है । सोलसयं चउवीसं तीसं छत्तीस तह य वादालं । अडदालं चउवण्णं चउवण्णं होंति उवसमगे ॥ ६२६ ।। पोडशकं चतुर्विशतिः त्रिशत् पत्रिंशत् तथा च वाचत्वारिंगत् । अष्टनत्वारिंशत् चतु पञ्चाशत् चतुःपञ्चाशत् भवन्ति उपशमके ॥ ६२६ ॥ अर्थ-निरंतर आठ समयपर्यन्त उपगमणि मांटनेवाले जीगम अधिक्से अधिक प्रथम समयम १६. द्वितीय ममयमें २४. तृतीय समयमें १०. ननई नमम ३१ पानी समय, ४२, उटे समयमें ४८. सातममें ४, और आठमम ५४. न.य हो।

२३२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । बत्तीसं अडदालं सट्ठी वावत्तरी य चुलसीदी। छण्णउदी अहुत्तरसयमदुत्तरसयं च खवगेसु ।। ६२७ ॥. द्वात्रिशदष्टचत्वारिंशत् पष्ठिः द्वासप्ततिश्च चतुरशीतिः । षण्णवतिः अष्टोत्तरशतमष्टोत्तरशतं च क्षपकेषु ।। ६२७ ॥ अर्थ--.अंतरायरहित आठ समयपर्यन्त क्षपकोण माड़नेवाले जीव अधिकसे अधिक, उपर्युक्त आठ समयोंमें होनेवाले उपशमीण वालोंसे दूने होते है । इनमेंसे प्रथम समयमें ३२, दूसरे समयमे ४८, तीसरे समयमे ६०, चतुर्थ समयमे ७२, पाचमे समय, ८४, छट्टे समयमे ९६, सातमे समयमें १०८, आठमे समयमें १०८ होते है। अठेव सयसहस्सा अट्ठाणउदी तहा सहस्साणं । संखा जोगिजिणाणं पंचसयविउत्तरं वंदे ॥६२८॥ अष्टैव शतसहस्राणि अष्टानवतिस्तथा सहस्राणाम् । संख्या योगिजिनाना पंचशतव्युत्तरं वन्दे ॥ ६२८ ॥ अर्थ-सयोगकेवली जिनकी संख्या आठ लाख अठानवे हजार पांचसौ दो है। इनकी मै सदाकाल बन्दना करता हूं । भावार्थ -निरंतर आठ समयोंमें एकत्रित होनेवाले सयोगी जिनकी संख्या दूसरे आचार्यकी अपेक्षासे इस प्रकार कही है कि “ छसु सुद्धसमयेसु तिणि तिणि जीवा केवलमुप्पाययंति, दोसु समयेसु दो दो जीवा केवल मुप्पाययंति एवमट्ठसमयसंचिद- जीवा वावीसा हवंति ” अर्थात् आठ समयोमेसे छह समयोमें प्रतिसमय तीन तीन जीव केवल- ज्ञानको उत्पन्न करते है, और दो समयोंमें दो दो जीव केवलज्ञानको उत्पन्न करते है। इस तरह आठ समयोंमें वाईस सयोगी जिन होते है । जब केवलज्ञानके उत्पन्न होनेमें छह महीनाका अंतराल होता है तब अन्तराल न पड़ नेसे निरंतर आठ समयोंमें वाईस केवली होते है। इसके विशेष कथनमें छहप्रकारका त्रैराशिक होता । प्रथम यह कि जब छह महीना आठ समयमात्र कालमें वाईस केवली होते है। तब आठ लाख अठानवे हमार पांच सौ दो केवली कितने कालमें होगे । इसका चालीस हजार आठसौ इकतालीसको छह महीना आठ समयोंमें गुणा करनेपर जो कालका प्रमाण लब्ध आवे वही उत्तर होगा। दूसरा छह महीना आठ समयोंमे निरंतर केवलज्ञान उत्पन्न होनेका काल आठ समय है तब पूर्वोक्त प्रमाण कालमे कितने समय होगे । इसका उत्तर तीन लाख छब्बीस हजार सात सौ अटाईस है । तथा दूसरे आचार्योके मतकी अपेक्षा आठ समयोमे वाईस या चवालीस या अठासी या एकसौ छिहत्तर जीव केवलज्ञानको उत्पन्न करते है तब पूर्वोक्त समयप्रमाणमें या उसके आधेमें या चतुर्थांशमें या अष्टमाशमें कितने जीव केवलज्ञानको उत्पन्न करेंगे। इन चार प्रकारके त्रैराशिकोंका उत्तर आठ लाख अठानवे हजार पांचसौ दो होता है। . है गोम्मटसारः । २३.३ क्षपक तथा उपशमक जीवोंकी युगपत् संभवती विशेष संख्याको तीन गाथाओंमें कहते है। होति खवा इगिसमये बोहियबुद्धा य पुरिसवेदा य । उक्कस्सेणहुत्तरसयप्पमा सग्गदो य चुदा ॥ ६२९ ॥ पत्तेयबुद्धतित्थयरत्थिणउंसयमणोहिणाणजुदा । दसछक्कवीसदसवीसट्ठावीसं जहाकमसो ।। ६३०॥ जेट्टावरबहुमज्झिमओगाहणगा दु चारि अडेव । जुगवं हवंति खवगा उवसमगा अद्धमेदेसिं ॥ ६३१ ॥ भवन्ति क्षपका एकसमये वोधितवुद्धाश्च पुरुषवेदाश्च । उत्कृष्टेनाष्टोत्तरशतप्रमाः स्वर्गतश्च च्युताः ॥ ६२९ ॥ प्रत्येकबुद्धतीर्थकरस्त्रीपुंनपुंसकमनोवधिज्ञानयुताः । दशषट्कविंशतिदशविशत्यष्टाविंशो यथाक्रमशः ॥ ६३० ॥ ज्येष्ठावरवहुमध्यमावगाहा द्वौ चत्वारोऽष्टदैव । युगपत् भवन्ति क्षपका उपशमका अर्धमेतेषाम् ॥ ६३१ ॥ अर्थ-युगपत्--एक समयमें क्षपकश्रेणिवाले जीव अधिकसे अधिक होते है तो कितने होते है ? उसका हिसाव इस प्रकार है कि बोधितबुद्ध एकसौ आठ, पुरुषवेदी एकसौ आठ, स्वर्गसे च्युत होकर मनुष्य होकर क्षपकश्रेणि माडनेवाले एकसौ आठ, प्रत्येकवुद्धि ऋद्धिके धारक दश, तीर्थकर छह, स्त्रीवेदी वीस, नपुसकवेदी दश, मनःपर्ययज्ञानी वीस, अवधिज्ञानी अट्ठाईस, मुक्त होनेके योग्य शरीरकी उत्कृष्ट अवगाहनाके धारक दो, जघन्य अवगाहनाके धारक चार, समस्त अवगाहनाओके मध्यवर्ती अवगाहनाके धारक आठ । ये सब मिलकर चारसौ बत्तीस होते है । उपशमश्रेणिवाले इसके आधे (२१६ ) होते है । भावार्थ- पहले तो गुणस्थानमें एकत्रित होनेवाले जीवोंकी संख्या बताई थी, और यहा पर श्रेणिमें युग- पत् सम्भवती जीवोंकी उत्कृष्ट संख्या बताई है। सर्व संयमी जीवोकी सख्याको बताते है । सत्तादी अटुंता छण्णवमज्झा य संजदा सच्चे । अंजलिमोलियहत्थो तियरणमुद्धे णमंसामि ॥ ६३२ ।। सप्तादयोऽष्टान्ता. पण्णवमध्याश्च संयता. मंत्र । अजरिमौल्किहस्तविकरणशया नमम्यामि ॥ ६१२ ॥ ?

२३४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-छट्टे गुणस्थानसे लेकर चौढहमे गुणस्थानतकके सर्व संयमियोंका प्रमाण तीन कम नव करोड है ( ८९९९९९९७ )। इनको मै हाथ जोडकर शिर नवाकर मन वचन कायकी शुद्धिपूर्वक नमस्कार करता हूं । भावार्थ-प्रमत्तवाले जीव ( ५९३९८२०६ ) अप्रमत्तवाले ( २९६९९१०३ ) उपशमश्रेणीवाले चारो गुणस्थानवर्ती ( ११९६ ) क्षपक- श्रेणीवाले चार गुणस्थानवर्ती ( २३९२) सयोगी जिन ( ८९८५०२ ) इन सबका जोड़ (८९९९९३९९ ) होता है सो इसको सर्वसंयमियोंके प्रमाणमेसे घटाने पर शेष अयोगी जीवोंका प्रमाण ( ५९८ ) रहता है । इसको संयमियोके प्रमाणमे जोड़नेसे संयमियोंका कुल- प्रभाण तीन कम नौ करोड़ होता है । चारो गतिसम्बन्धी मिथ्यादृष्टि सासादन मिश्र और अविरत इनकी संख्याके साधकभूत पल्यके भागहारका विशेष वर्णन करते है। ओघासंजदमिस्सयसासणसम्माणभागहारा जे । रूऊणावलियासंखेजेणिह भजिय तत्थ णिक्खित्ते ॥ ६३३॥ देवाणं अवहारा होति असंखेण ताणि अवहरिय । तत्थेव य पक्खित्ते सोहम्मीसाण अवहारा ॥ ६३४ ॥ ओघा असंयतमिश्रकसासनसमीचा भागहारा ये । रूपोनावलिकासंख्यातेनेह भक्त्वा तत्र निक्षिप्ते ॥ ६३३ ॥ देवानामवहारा भवन्ति असंख्येन तानवहृत्य । तत्रैव च प्रक्षिप्ते सौधर्मशानावहाराः ॥ ६३४ ॥ अर्थ-~-गुणस्थानसंख्यामें असंयत मिश्र सासादनके भागहारोका जो प्रमाण बताया है उसमे एक कम आवलीके असंख्यातमे भागका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उसको भागहारके प्रमाणमे मिलानेसे देवगतिसम्बन्धी भागहारका प्रमाण होता है । तथा देवगतिसम्बन्धी भागहा- रके प्रमाणमें एक कम आवलीके असंख्यातमे भागका भाग देनेसे जो लव्ध आवे उसको देवगतिसम्बन्धी भागहारके प्रमाणमे मिलानेसे सौधर्म ईशान स्वर्गसम्बन्धी भागहारका प्रमाण होता है। मावार्थ-जहा जहाका जितना २ भागहारका प्रमाण वताया है उस २ भाग- हारका पल्यमें भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतने २ ही वहा २ जीव समझने चाहिये । पहले गुणस्थानसंन्यामे असंयत गुणस्थानके भागहारका प्रमाण एकवार असंख्यात कहाथा, इसमें एक कम आवलीके असंख्यातमे भागका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उसको भागहारके प्रमाणमें मिलनसे देवगतिमम्बन्धी असंयत गुणस्थानके भागहारका प्रमाण होता है, इस देवगतिसम्बन्धी मागहारके प्रमाणका पल्यमें भाग दनेसे जो लब्ध आवे उतने देवगतिसम्बन्धी असंयत- गणम्याननी जीव है । तथा देवगतिसम्बन्धी असंयतगुणस्थानके भागहारका जो प्रमाण है उनमें एक कम आवकि असंख्यातमे भागका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उसको उस गोम्मटसारः। २३५ भागहारमें मिलानेसे सौधर्म ईशान स्वर्गसम्बन्धी असंयतगुणस्थानके भागहारका प्रमाण होता है । इस भागहारका पल्यमें भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना सौधर्म ईशान स्वर्गसम्बन्धी असंयत गुणस्थानवी जीवोका प्रमाण है । इसी तरह मिश्र और सासादनके भागहारका प्रमाण भी समझना चाहिये । सनत्कुमार माहेन्द्र स्वर्गके असंयत मिश्र सासादनसम्बन्धी भागहारका प्रमाण बताते है। सोहम्मसाणाहारमसंखेण य संखरूवसंगुणिदे। उवरि असंजदमिस्सयसासणसम्माण अवहारा ।। ६३५ ॥ सौधर्मेशानहारमसंख्येन च संन्यरूपसंगुणिते । उपरि असंयतमिश्रकसासनसमीचामवहाराः ॥ ६३५ ॥ अर्थ-सौधर्म ईशान स्वर्गके सासादन गुणस्थानमें जो मागहारका प्रमाण है उससे असंख्यातगुणा सानत्कुमार माहेन्द्र स्वर्गके असंयतगुणस्थानके भागहारका प्रमाण है। इससे असंख्यातगुणा मिश्र गुणस्थानके भागहारका प्रमाण है । तथा मिश्रके भागहारसे संख्यातगुणा सासादन गुणस्थानके भागहारका प्रमाण है। इस गुणितक्रमकी व्याप्तिको बताते हैं। सोहम्मादासारं जोइसिवणभवणतिरिय पुढवीसु । अविरदमिस्से संखं संखासंखगुण सासणे देसे ॥६३६॥ सौधर्मादासहस्रारं ज्यातिपिवनभवनतिर्यक्पृथ्वीषु । अविरतमिश्रेऽसंख्यं संख्यासख्यगुणं सासने देशे ॥ ६३६ ॥ अर्थ-सौधर्म स्वर्गसे लेकर सहस्रार स्वर्गपर्यन्त, ज्योतिषी, व्यंतर, भवनवासी, तियेच, सातों नरकपृथ्वी, इनके अविरत और मिश्र गुणस्थानम असंख्यातका गुणक्रम है। और सासादन गुणस्थानमें संख्यातका तथा देशसंयम गुणस्थानमें असंख्यातका गुणक्रम समझना चाहिये । भावार्थ-सौधर्म ईशान स्वर्गके आगे सानत्कुमार माहेन्द्रके असंयत मिश्र सासा- दन गुणस्थानके भागहारोंका प्रमाण वता चुके है । इसमे सासादन गुणस्थानके भागहारका जो प्रमाण है उससे असख्यातगुणा ब्रह्म ब्रह्मोत्तरके असयत गुणस्थानका भागहार है । इससे असं- ख्यातगुणा मिश्रका भागहार और मिश्रके भागहारसे संख्यातगुणा मामादनका भागहार है। ब्रम नलोत्तरसम्बन्धी सासाउनके भागहारसे असख्यातगुणा लानव कापिष्टके असयत गुणम्यान सम्बन्धी भागहारका प्रमाण है । और इससे अमख्यातगणा मिश्रका भागहार और मिश्र भागहारसे सख्यानगुणा मासादनका भागहार है । इसी क्रम अनुसार शुक्र महाशमी लेकर मातमी वीत अपयत मित्र सासाटनसम्बन्धी भागहांगका प्रमाण रमटाना चाहिये । विी- ।

२३६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । षता यह है कि देशसंयम गुणस्थान स्वर्गोमें तथा नरकोंमें नहीं होता; किन्तु तिर्यच्चामें होता है । इसलिये तिर्यचोंमें जो सासादनके भागहारका प्रमाण है उससे असरन्यातगुणा तियचोंके देशव्रत गुणस्थानका भागहार है । तथा तियचोंके देशसंयम गुणस्थानके भागहारका जो प्रमाण है वही प्रथम नरकके असंयत गुणस्थानके भागहारका प्रमाण है । किन्तु देशव्रतके भागहारका प्रमाण स्वर्ग तथा नरकमे नहीं है । आनतादिकमें गुणितक्रमकी व्याप्तिको तीन गाथाओद्वारा बताते है । चरमधरासाणहरा आणदसम्माण आरणप्पहुदि । अंतिमगेवेच्चंत सम्माणमसंखसंखगुणहारा ॥ ६३७ ॥ चरमधरासानहारादानतसमीचामारणप्रभृति । अंतिमौवेयकान्तं समीचामसंख्यसंख्यगुणहाराः ॥ ६३७ ।। अर्थ-सप्तम पृथ्वीके सासादनसम्बन्धी भागहारसे आनत प्राणतके असंयतका भाग- हार असंख्यातगुणा है । तथा इसके आगे आरण अच्युतसे लेकर नौमे ग्रैवेयकपर्यंत दश स्थानोंमें असंयतका भागहार क्रमसे संख्यांतगुणा २ है। तत्तो ताणुत्ताणं वामाणमणुदिसाण विजयादि । सम्माणं संखगुणो आणदमिस्से असंखगणो ॥ ६३८॥ ततस्तेषामुक्तानां वामानामनुदिशानां विजयादि-। समीचां संख्यगुण आनतमिश्रे असंख्यगुणः ॥ ६३८ ॥ अर्थ---इसके अनंतर आनत प्राणतसे लेकर नवम ग्रैवेयक पर्यतके मिथ्यादृष्टि जीवोका भागहार क्रमसे अंतिम ग्रैवेयक सम्बन्धी असंयतके भागहारसे संख्यातगुणा संख्यातंगुणा है । इस अंतिम अवेयक सम्बन्धी मिथ्यादृष्टिके भागहारसे क्रमपूर्वक संख्यातगुणा संख्यात- गुणा नव अनुदिश और विजय वैजयंत जयंत अपराजितके असंयतोंका भागहार है । विजया- दिकसम्बन्धी असंयतके भागहारसे आनत प्राणत सम्बन्धी मिश्रका भागहार असंख्या- तगुणा है। तत्तो संखेज्जगुणो सासणसम्माण होदि संखगुणो । उत्तट्ठाणे कमसो पणछस्सत्तचदुरसंदिट्ठी ।। ६३९ ।। तत. संख्येयगुणः सासनसमीचा भवति सख्यगुणः । उक्तस्थान क्रमशः पञ्चषटूछताप्टचतुःसंदृष्टिः ।। ६३९ ॥ १-२-३- इन स्थानोमें सख्यातकी सहनानी क्रमसे पाच अक छह अक तथा सातका अक है । इस वातको आगेके गाथामे कहेंगे।

गोम्मटसारः। २३७ अर्थ-आनत प्राणतसम्बन्धी मिश्रके भागहारसे, आरण अच्युतसे लेकर नवम ग्रैवे- यक पर्यंत दश स्थानों में मिश्रसम्बन्धी भागहारका प्रमाण कमसे संख्यातगुणा संख्यातगुणा है । यहांपर संख्यातकी सहनानी आठका अंक है। अंतिम ग्रैवेयकम्बन्धी मिश्रके मागहारसे आनत प्राणतसे लेकर नवम ग्रैवेयकपर्यंत ग्यारह स्थानोमें सासादनसम्यग्दृष्टीके भागहारका प्रमाण क्रमसे संख्यातगुणा २ है । यहां पर संख्यातकी सहनानी चारका अंक है । इन पूर्वोक्त पाच स्थानोंमें संख्यातकी सहनानी क्रमसे पांच, छह, सात, आठ, और चारके अंक है। सगसगअवहारेहिं पल्ले भजिदे हवंति सगरासी । सगसगगुणपडिवण्णे सगसगरासीसु अवणिदे वामा ॥ ६४० ॥ स्वकस्वकावहारैः पल्ये मक्ते भवन्ति स्वकराशयः । स्वकस्वकगुणप्रतिपन्नेषु स्वकस्वकराशिपु अपनीतेपु वामाः ॥ ६४० ॥ अर्थ-अपने २ भागहारका पल्यमें भाग देनेसे अपनी २ राशिके जीवोका प्रमाण निकलता है। तथा अपनी २ सामान्य राशिमेसे असंयत मिश्र सासादन तथा देशव्रतका प्रमाण घटानेसे अवशिष्ट मिथ्यादृष्टि जीवोका प्रमाण रहता है । भावार्थ-यहा पर मनुष्योंके भागहारका प्रमाण नहीं बताया है, तथा देशव्रत गुणस्थान मनुष्य और नियंच इन दोनों हीके होता है, इसलिये तियचोंकी ही सामान्य राशिमेसे असयत मिश्र सासादन तथा देशत्रत गुण- स्थानवाले जीवोंका प्रमाण घटानेसे मिथ्यादृष्टि तिर्यंच जीवोका प्रमाण होता है; किन्तु देव और नारकियोंकी सामान्य राशिमेसे असंयत मिश्र और सासादन गुणस्थानवाले जीवोंका ही प्रमाण घटानेसे अवशिष्ट मिथ्यादृष्टि जीवोका प्रमाण होता है । परन्तु जहा पर मिथ्यादृष्टि आदि जीव सम्भव हो वहा पर ही इनका (मिथ्यादृष्टि आदि जीवोंका ) प्रमाण निकालना चाहिये, अन्यत्र नहीं; क्योकि ग्रैवेयकसे ऊपरके सत्र देव असंयत ही होते है । मनुष्यगतिमें गुणस्थानोंकी अपेक्षासे जीवोका प्रमाण बताते है । तेरसकोडी देसे बावण्णं सासणे मुणेदव्वा । मिस्सावि य तदृगुणा असंजदा सत्तकोडिसयं ॥ ६४१ ।। त्रयोदशकोट्यो देशे द्वापञ्चाशत् सामने मन्तव्याः । मिश्रा अपि च तद्दिगुणा असंयताः सप्तकोटिशतम् ॥ ६४१ ।। अर्थ-देसमंयम गुणस्थानमें तरह करोड. सासाटनम वाचन करोड़, मिध एकला चार करोड, असंयतमें मात करोः मनुष्य है । प्रमत्तष्टि गुणस्थानवाद नीनाका प्रमाण पूर्व ही बता चुके है । इस प्रकार यह गुणस्थानोंमें मनु य जी का प्रमाण है।

२३८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । जीविदरे कम्मचये पुण्णं पावोत्ति होदि पुण्णं तु । सुहपयडीणं दवं पावं असुहाण दव्यं तु ।। ६४२ ।। जीवेतरस्मिन् कर्मचये पुण्यं पापमिति भवति पुण्यं तु । शुभप्रकृतीना द्रव्यं पापमशुभप्रकृतीनां द्रव्यं तु ॥ ६४२ ॥ अर्थ-~-जीव पदार्थमें सामान्यसे मिथ्यादृष्टि और सासादन गुणस्थानवाले जीव पाप है। और मिश्र गुणस्थानवाले पुण्य और पापके मिश्ररूप है । तथा असंयतसे लेकर सब ही पुण्य जीव है । इसके अनंतर अजीव पदार्थका वर्णन करते है । अनीव पदार्थमें कार्मण स्कन्धके दो भेद है । एक पुण्य दूसरा पाप । शुभ प्रकृतियोंके द्रव्यको पुण्य और अशुभ प्रकृतियोंके द्रव्यको पाप कहते है । भावार्थ---कार्मण स्कन्धमें सातावेदनीय, नरकायुको छोड़कर शेष तीन आयु, शुभ नाम, उच्च गोत्र, इन शुभ प्रकृतियोके द्रव्यको पुण्य कहते है। इनके सिवाय घातिकर्मकी समस्त प्रकृति और असातावेदनीय, नरक आयु, अशुभ नाम, नीच गोत्र, इन प्रकृतियोके द्रव्यको पाप कहते है। आसवसंवरदव्वं समयपबद्धं तु णिज्जरादव्यं । तत्तो असंखगुणिदं उक्कस्सं होदि णियमेण ॥ ६४३ ॥ आत्रवसंवरद्रव्यं समयप्रवद्धं तु निर्जराद्रव्यम् । ततोऽसंख्यगुणितमुत्कृष्टं भवति नियमेन ॥ ६४३ ॥ अर्थ-~~आस्त्रव और संवरका द्रव्यप्रमाण समयप्रवद्धप्रमाण है। और उत्कृष्ट निर्जरा- द्रव्य समयप्रबद्धसे असंख्यातगुणा है। भावार्थ-एक समयमें समयप्रबद्धप्रमाण कर्मपुद्ग- लका ही आस्रव होता है, इसलिये आस्त्रकको समयप्रबद्धप्रमाण कहा है । और आस्रवके निरोधरूप संवर है । सो यह संवर भी एकसमयमें उतने ही द्रव्यका होगा, इसलिये द्रव्य-संवरको भी समयप्रबद्ध प्रमाण कहा है । गुणश्रेणिनिर्जरामे असख्यात समयप्रबद्धोकी निर्जरा एक ही समयमें हो जाती है, इसलिये उत्कृष्ट निर्जराद्रव्यको असंख्यात समयप्रवद्ध- प्रमाण कहा है। बंधो समयपबद्धो किंचूणदिवड्डमेत्तगुणहाणी । मोक्खो य होदि एवं सदहिदव्वा दु तचट्ठा ॥६४४ ।। वन्धः समयप्रवद्धः किञ्चिदूनन्धर्धमात्रगुणहानिः । मोक्षश्च भवत्येव श्रद्धातव्यास्त तत्त्वार्थाः ॥ ६४४ ॥ अर्थ-वन्धद्रव्य समयप्रवद्धप्रमाण है; क्योंकि एक समयमे समयप्रवद्धप्रमाण ही कर्म- प्रकृतियोका बंध होता है । तथा मोक्षद्रव्यका प्रमाण व्यर्धगुणहानिगुणितसमयप्रवद्ध प्रमाण १ पुण्य और पाप प्रकृतियोकी भिन्न २ सख्या कर्मकाण्डमे देखना चाहिये।

गोम्मटसारः । २३९ है; क्योंकि अयोगि गुणस्थानके अन्तमें जितनी कर्म प्रकृतियोंकी सत्ता रहती है उतना ही मोक्षद्रव्यका प्रमाण है । तथा यहा पर ( अयोगि गुणस्थानके अंत समयमें ) कर्मोकी सत्ता द्वयर्धगुणहानिगुणित समयप्रवद्धप्रमाण है। इसलिये मोक्षद्रव्यका प्रमाण भी व्यर्धगुणहानिगुणित- समयप्रबद्धप्रमाण ही है । इस प्रकार इन सात तत्त्वोंका श्रद्धान करना चाहिये । भावार्थ- पूर्वमें जो छह द्रव्य पञ्चास्तिकाय नव पदार्थोका स्वरूप बताया है उसके अनुसार ही उनका श्रद्धान करना चाहिये; क्योकि इनके श्रद्धानको सम्यक्त्व कहते है । सम्यक्त्वके भेदोको गिनानेके पहले क्षायिक सम्यक्त्वका स्वरूप बताते है । खीणे दंसणमोहे जं सद्दहणं सुणिम्सलं होई। तं खाइयसम्मत्तं णिचं कम्मक्खवणहेदु ॥ ६४५ ।। क्षीणे दर्शनमोहे यच्छ्रद्धानं सुनिर्मलं भवति । तत्क्षायिकसम्यक्त्वं नित्यं कर्मक्षपणहेतु ॥ ६४५ ॥ अर्थ-दर्शनमोहनीय कर्मके क्षीण होजाने पर जो निर्मल श्रद्धान होता है उसको क्षायिक सम्यक्त्व कहते है । यह सम्यक्त्य नित्य और कर्मोके क्षय होनेका कारण है। भावार्थ-यद्यपि दर्शनमोहनीयके मिथ्यात्व मिश्र सम्यक्त्वप्रकृति ये तीन ही भेद है। तथापि अनंतानुबंधी कषाय भी दर्शन गुणको विपरति करता है इसलिये इसको भी दर्शन- मोहनीय कहते है। इसी लिये आचार्योंने पञ्चाध्यायीमें कहा है कि ' सप्तैते दृष्टिमोहनम् । अतएव इन सात प्रकृतियोंके सर्वथा क्षीण होजानेसे दर्शन गुणकी जो अत्यन्त निर्मल अवस्था होती है उसको क्षायिक सम्यक्त्व कहते है । इसके प्रतिपक्षी कर्मका एकटेश भी अवशिष्ट नहीं रहा है इस ही लिये यह दूसरे सम्यक्त्वोंकी तरह सात नहीं है । तथा इसके होनेपर असंख्यातगुणी कर्मोकी निर्जरा होती है इसलिये यह कर्मक्षयका हेतु है । इसी अभिप्रायका वोधक दूसरा क्षेपक गाथा भी है । वह इसप्रकार है कि- दसणमोहे खवि सिज्झदि एक्केव तदियतुरियभवे । णादिक्कदि तुरियभवं ण विणस्सदि सेससम्म व ॥ १ ॥ दर्शनमोहे क्षपिते सिद्धयति एकस्मिन्नेव तृतीयतुरीयभवे । नातिकामति तुरीयभवं न विनश्यति शेपसम्यक्त्वं व ॥ १ ॥ अर्थ-दर्शनमोहनीय कर्मका क्षय होजाने पर उस ही भवमें या तीसरे चौथे भवमें जीव सिद्धपदको प्राप्त होता है, किन्तु नौथे भाका उल्लंघन नहीं करता, नया दूसरे सन्य- क्त्वोंकी तरह यह सन्यवत्व नष्ट नहीं होता। भावार्थ-सायिक समन्दर्शन होने पर या तो उस ही भवमें जीव मिलपटको प्राप्त होजाता है । या देवर' वय हेगया हो तो तीसरे भयमे सिद्ध होता है। यदि मन्यन्दीनले पर मिथ्यात्व मान्य में मनुष्य या

२४०
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् |
तिर्यच आयुका बंध होगया हो तो चौथे भवमें सिद्ध होता है; किन्तु चतुर्य भवका अतिक्रमण
नहीं करता । यह सम्यक्त्व साधनंत है।
क्षायिकसम्यक्त्वका विशेषस्वरूप बताते है ।
वयणेहिं वि हेदूहिं वि इंदियभयआणएहिं रूवेहिं ।
वीभच्छजुगुच्छाहिं य तेलोक्केण वि ण चालेनो ॥६४६ ॥
वचनैरपि हेतुभिरपि इन्द्रियभयानीतै रूपैः ।
वीभत्स्यजुगुप्साभिश्च त्रैलोक्येनापि न चाल्यः ॥ ६४६ ॥
अर्थ-श्रद्धानको भ्रष्ट करनेवाले वचन या हेतुओंसे अथवा इन्द्रियोको भय उत्पन्न
करनेवाले आकारोसे यद्वा ग्लानिकारक पदार्थोंको देखकर उत्पन्न होनेवाली ग्लानिसे किंबहुना
तीन लोकसे भी यह क्षायिक सम्यक्त्व चलायमान नहीं होता । भावार्थ-क्षायिक सम्यक्त्व
इतना दृढ़ होता है कि तर्क तथा आगमसे विरुद्ध श्रद्धानको भ्रष्ट करनेवाले वचन या हेतु
उसको भ्रष्ट नहीं कर सकते । तथा वह भयोत्पादक आकार या ग्लानिकारक पदार्थोको देखकर
भ्रष्ट नहीं होता । यदि कदाचित् तीन लोक उपस्थित होकर भी उसको अपने श्रद्धानसे
भ्रष्ट करना चाहें तो भी वह भ्रष्ट नहीं होता ।
यह सम्यग्दर्शन किसके तथा कहा पर उत्पन्न होता है यह बताते है।
दसणमोहक्खवणापट्ठवगो कम्मभूमिजादो हु।
मणुसो केवलिमूले णिट्ठवगो होदि सव्वत्थ ॥६४७ ॥
दर्शनमोहक्षपणाप्रस्थापकः कर्मभूमिजातो हि ।
मनुष्यः केवलिमूले निष्ठापको भवति सर्वत्र ॥ ६४७ ॥
अर्थ-दर्शनमोहनीय कर्मके क्षय होनेका प्रारम्भ केवलीके मूलमें कर्मभूमिका उत्पन्न
होनेवाला मनुष्य ही करता है, तथा निष्ठापन सर्वत्र होता है। भावार्थ-दर्शनमोहनीय
कर्मके क्षय होनेका जो क्रम है उसका प्रारम्भ केवली या श्रुतकेवलीके पादमूलमे (निकट )
ही होता है, तथा उसका ( प्रारम्भका ) करनेवाला कर्मभूमिज मनुष्य ही होता है । यदि
कदाचित् पूर्ण क्षय होनेके प्रथम ही मरण होजाय तो उसकी (क्षपणकी ) समाप्ति चारों
गतियोमेंसे किसी भी गतिमें हो सकती है।
वेदकसम्यक्त्वका स्वरूप बताते है।
दसणमोहुदयादो उप्पज्जइ जं पयत्थसद्दहणं ।
चलमलिणमगाढं तं वेदयसम्मत्तमिदि जाणे ॥ ६४८॥
दर्शनमोहोदयादुत्पद्यते यत् पदार्थश्रद्धानम् ।
चलमलिनमगाढं तद् वेदकसम्यक्त्वमिति जानीहि ॥ ६४८ ॥

गाम्मटसारः। २४१ अर्थ-सम्यक्त्वमोहनीय प्रकृतिके उदयसे पदार्थोंका जो चल मलिन अगाढरूप श्रद्धान होता है उसको वेदक सम्यक्त्व कहते है । भावार्थ-मिथ्यात्व मिश्र और अनंतानुबंधी चतुष्क इनका सर्वथा क्षय अथवा उदयाभावी क्षय और उपशम हो चुकने पर; किन्तु अवशिष्ट सम्यक्त्वप्रकृतिके उदय होते हुए पदार्थोंका जो श्रद्धान होता है उसको वेदक सम्यवत्व कहते है। यहा पर भी सम्यक्त्व प्रकृतिके उदयजनित चलता मलिनता और अगाढता ये तीन दोष होते है। इन तीनोंका लक्षण पहले कहचुके है। तीन गाथाओंमें उपशम सम्यक्त्वका स्वरूप और सामग्रीका वर्णन करते है । दसणमोहुवसमदो उप्पज्जइ जं पयत्थसदहणं । उवसमसम्मत्तमिणं पसण्णमलपंकतोयसमं ॥ ६४९ ॥ दर्शनमोहोपशमावत्पद्यते यत्पदार्थश्रद्धानम् । उपशमसम्यक्त्वमिदं प्रसन्नमलपवतोयसमम् ॥ ६४९ ॥ अर्थ-उक्त सम्यक्त्वविरोधिनी सात प्रकृतियोंके उपशमसे जो पदार्थोंका श्रद्धान होता है उसको उपशमसम्यक्त्व कहते है । यह सम्यक्त्व इस तरहका निर्मल होता है जैसा कि निर्मली आदि पदार्थोंके निमित्तसे कीचड़ आदि मलके नीचे बैठ जाने पर जल निर्मल होता है । भावार्थ-उपशम सम्यक्त्व और क्षायिक सम्यक्त्व निर्मलताकी अपेक्षा समान है, क्योंकि प्रतिपक्षी कोका उदय दोनो ही स्थानपर नहीं है । किन्तु विशेषता इतनी ही है कि क्षायिक सम्यक्त्वके प्रतिपक्षी कर्मका सर्वथा अभाव होगया है, और उपशम सम्यक्त्वके प्रतिपक्षी कर्मकी सत्ता है। जैसे किसी जलमे निर्मली आदिके द्वारा ऊपरसे निर्मलता होने पर भी नीचे कीचड़ जमी रहती है, और किसी जलके नीचे कीचड़ रहती ही नहीं । ये दोनों जल निर्मलताकी अपेक्षा समान है । अन्तर यही है कि एकके नीचे कीचड़ है दूसरीके नीचे कीचड़ नहीं है । खयउवसमियविसोही देसणपाउम्गकरणलद्धी य । चत्तारि वि सामण्णा करणं पुण होदि सम्मत्ते ॥६५० ॥ क्षायोपशमिकविशुद्धी देशना प्रायोग्यकरणलब्धी च । चतस्रोऽपि सामान्याः करण पुनर्भवति सम्यक्त्वे ॥ ६५० ॥ अर्थ-क्षायोपशमिक, विशुद्धि, देशना, प्रायोग्य, करण, ये पाच लब्धि है । इनमें चार तो सामान्य है, किन्तु करण-लब्धि विशेष है । इसके होनेपर सम्यक्त्व या चारित्र नियमसे होता है । भावार्थ-लब्धि शळका अर्थ प्राप्ति है । प्रकृतमें सम्यक्त्व ग्रहण करनेके योग्य सामग्रीकी प्राप्ति होना इसको लब्धि कहते है । उसके उक्त पनि भेट है। सम्पनलके योन्य कोंके क्षयोपशम होनेको आगोपशमिक ननि कहते है। निर्मलता. विशेषको विशुन्नि कहते हैं। योग्य उपदेशको देशना कहते है । पंनेन्द्रियादिमन्प गो.३१

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम !
योग्यताके मिलनेको प्रायोग्यलब्धि कहते हैं । अधःकरण अपूर्वकरण अनिवृत्तिकरणरूप
परिणामोको करणलब्धि कहते है । इन तीनो करणोंका स्वरूप पहले कह चुके हैं।
इन पाच लब्धियोंमेंसे आदिकी चार लब्धि तो सामान्य है-अर्थात् भव्य अभव्य दोनोके
होती है, किन्तु करण लब्धि असाधारण है-इसके होने पर नियमसे सम्यक्त्व या चारित्र
होता है। जब तक करणलब्धि नहीं होती तब तक सम्यक्त्व नहीं होता ।
उपशम सम्यक्त्वकी प्राप्तिके योग्य सामग्रीको वताकर उसको ग्रहण करनेकेलिये योग्य
जीव कैसा होना चाहिये यह बताते है ।
चदुगदिभव्यो सपणी पज्जत्तो सुज्झगो य सागारो।
जागारो सल्लेसो सलद्धिगो सम्ममुवगमई ॥ ६५१ ॥
चतुर्गतिभव्यः संज्ञी पर्याप्तः शुद्धकश्च साकारः ।
जागरूकः सल्लेश्यः सलब्धिकः सम्यक्त्वमुपगच्छति ॥ ६५१ ॥
अर्थ-जो जीव चार गतियों से किसी एक गतिका धारक, तथा भव्य, संज्ञी, पर्याप्त,
विशुद्धियुक्त, जागृत, उपयोगयुक्त, और शुभ लेश्याका धारक होकर करणलब्धिरूप
परिणामोका धारक होता है वह जीव सम्यक्त्वको प्राप्त करता है।
चत्तारिवि खेत्ताई आउगबंधेण होदि सम्मत्तं ।
अणुवदमहत्वदाई ण लहइ देवाउगं मोत्तुं ॥ ६५२ ।।
चत्वार्यपि क्षेत्राणि आयुष्कबन्धेन भवति सम्यक्त्वम् ।
अणुव्रतमहाव्रतानि न लभते देवायुष्कं मुक्त्वा ॥ ६५२ ॥
अर्थ-चारो गतिसम्बन्धी आयुकर्मका बन्ध होजाने पर भी सम्यक्त्व हो सकता है;
किन्तु देवायुको छोड़कर शेष आयुका बंध होने पर अणुव्रत और महाव्रत नहीं होते।
भावार्थ-चारो गतिमेसे किसी भी गतिमें रहनेवाले जीवके चार प्रकारकी आयुमेंसे
किसी भी आयुका वंध होने पर भी सम्यक्त्वकी उत्पत्ति हो सकती है-इसमें कोई बाधा
नहीं है। किन्तु सम्यक्त्व ग्रहण होनेके अनन्तर अणुव्रत या महानत उसी जीवके हो
सकते है जिसके चार आयुकर्मोमेसे केवल देवायुका बंध हुआ हो, अथवा किसी भी
आयुका बंध न हुआ हो । नरकायु तिर्यगायु मनुष्यायुका बंध करनेवाले सम्यग्दृष्टिके अणु-
व्रत या महाव्रत नहीं होते ।
सम्यक्त्वमार्गणाके दूसरे भेदोंको गिनाते है ।
ण य मिच्छत्तं पत्तो सम्मत्तादो य जो य परिवडिदो।
सो सासणोत्ति यो पंचमभावेण संजुत्तो ॥ ६५३ ॥
न च मिथ्यात्वं प्राप्तः सम्यक्त्वतश्च यश्च परिपतितः ।
स सासन इति ज्ञेयः पंचमभावेन संयुक्तः ॥ ६५३ ॥

गोम्मटसारः। २४३ अर्थ-जो जीव सम्यक्त्वसे तो च्युत हो गया है किन्तु मिथ्यात्वको प्राप्त नहीं हुआ है उसको सासन कहते है। यह जीव पांचमे पारणामिक भावोंसे युक्त होता है । भावार्थ- सासनरूप परिणामोंका होना भी सम्यक्त्वगुणका एक विपरिणाम है, इसलिये यह भी सम्यक्त्वमार्गणाका एक भेद है । अत एव यहां पर इसका वर्णन किया है, क्योकि सम्य- क्त्वमार्गणामें सामान्यसे सम्क्त्वके समस्त भेदोका वर्णन करना चाहिये । इस गुणस्थानमें दर्शनमोहनीयकी अपेक्षा पारणामिक भाव होते है, तथा अनन्तानुबंधी आदिकी अपेक्षा औदयिकादि भाव होते है, । और इसका विशेष स्वरूप गुणस्थानाधिकारमें कह चुके है इसलिये यहा नही कहते है। मिश्रगुणस्थानका स्वरूप बताते है। सदहणासदहणं जस्स य जीवस्स होइ तच्चेसु । विरयाविरयेण समो सम्मामिच्छोत्ति णायव्वो ॥ ६५४ ।। श्रद्धानाश्रद्धानं यस्य च जीवस्य भवति तत्त्वेषु । विरताविरतेन समः सम्यग्मिथ्य इति ज्ञातव्यः ॥ ६५४ ॥ अर्थ-विरताविरतकी तरह जिस जीवके तत्त्वके विषयमें श्रद्धान और अश्रद्धान दोनो हों उसको सम्यग्मिथ्यादृष्टि समझना चाहिये । भावार्थ-जिसतरह विरत और अविरत दोनों प्रकारके परिणामोंके जोडकी अपेक्षा विरताविरत नामका पाचमा गुणस्थान होता है, उसी तरह श्रद्धान और अश्रद्धानरूप परिणामोंके जोडकी अपेक्षा सम्यग्मि- थ्यात्व नामका तीसरा गुणस्थान होता है । यह भी सम्यक्त्वमार्गणाका एक भेद है। मिच्छाइट्ठी जीवो उवइ8 पवयणं ण सद्दहदि । सदहदि असम्भावं उवइटुं वा अणुवइदं ॥ ६५५ ।। मिथ्यादृष्टिीव उपदिष्टं प्रवचनं न श्रद्दधाति । श्रद्दधाति असद्भावमुपदिष्टं वा अनुपदिष्टम् ॥ ६५५ ॥ अर्थ-जो जीव जिनेन्द्रदेवके कहे हुए आप्त आगम पदार्थका श्रद्धान नहीं करता; किन्तु कुगुरुओंके कहे हुए या विना कहे हुए भी मिथ्या पदार्थका श्रद्धान करता है उसको मिथ्यादृष्टि कहते है । भावार्थ-मिथ्यात्व-दर्शनमोहनीके उदयसे दो प्रकारके विपरि- णाम होते है । एक ग्रहीत विपरीत श्रद्धान दूसरा अग्रहीत विपरीत श्रद्धान । जो कुगुरु ओंके उपदेशसे विपरीत श्रद्धान होता है उसको ग्रहीतमिथ्यात्व कहते है । और जो विना उपदेशके ही विपरीत श्रद्धान हो उसको अग्रहीतमिथ्यात्त्र कहते है । इन दोनों ही प्रका- रके विपरिणामोंको मिन्यात्व इस सामान्य शब्दसे कहते है । तया यह मिथ्यात्व सम्यक्त्वमार्गणाका एक भेद है । इसलिये इमी गाथाको एकतार गुणस्थानाविकारमें आने पर भी यहा दूसरीवार कहा है ।

२४४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । सम्यक्त्वमार्गणामें तीन गाथाओंद्वारा जीवसंख्या बताते हैं। वासपुधत्ते खइया संखेजा जइ हवंति सोहम्मे । तो संखपल्लठिदिये केवदिया एवमणुपादे ॥ ६५६ ।। वर्षपृथक्त्वे क्षायिकाः संख्येया यदि भवन्ति सौधर्मे । तर्हि संख्यपल्यस्थितिके कति एवमनुपाते ॥ ६५६ ॥ अर्थ-क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव सौधर्म ईशान स्वर्गमें पृथक्त्व वर्ष संख्यात उत्पन्न होते है तो संख्यात पल्यकी स्थितिमे कितने जीव उत्पन्न होंगे? इसका त्रैराशिक करनसे क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीवोंका प्रमाण निकलता है; क्योकि क्षायिकसम्यग्दृष्टि बहुधा कल्पवासी देव होते है और कल्पवासी देव वहुत करके सौधर्म ईशान स्वर्गमें ही है। भावार्थ- फलराशि संख्यातका और इच्छाराशि संख्यात पल्यका परस्पर गुणा करके प्रमाण राशि पृथक्त्ववर्षका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना ही क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीवोंका प्रमाण है। इस प्रकार त्रैराशिक करनेसे लब्धप्रमाण कितना आया यह बताते है । संखावलिहिदपल्ला खइया तत्तो य वेदमुवसमगा। आवलिअसंखगुणिदा असंखगुणहीणया कमसो ॥ ६५७ ॥ संख्यावलिहितपल्या क्षायिकास्ततश्च वेदमुपशमकाः । आवल्यसंख्यगुणिता असंख्यगुणहीनका क्रमशः ॥ ६५७ ॥ अर्थ-संख्यात आवलीसे भक्त पल्यप्रमाण क्षायिकसम्यग्दृष्टि है । क्षायिक सम्यग्दृष्टिके प्रमाणका आवलीके असंख्यातमे भागसे गुणा करने पर जो प्रमाण हो उतना ही वेदकस- म्यग्दृष्टि जीवोका प्रमाण है । तथा क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीवोंके प्रमाणसे असंख्यातगुणा हीन उपशम सम्यग्दृष्टि जीवोंका प्रमाण है। सासादन मिश्र और मिथ्यादृष्टि जीवोंका प्रमाण बताते हैं । पल्लासंखेजदिमा सासणमिच्छा य संखगुणिदा हु। मिस्सा तेहिं विहीणो संसारी वामपरिमाणं ॥ ६५८ ॥ पल्यासंख्याताः सासनमिथ्याश्च संख्यगुणिता हि । मिश्रास्तविहीनः संसारी वामपरिमाणम् ॥ ६५८ ॥ अर्थ-पल्यके असंख्यातमे भागप्रमाण सासादनमिथ्यादृष्टि जीव है । और इनसे सख्यातगुणे मिश्र जीव है । तथा संसारी जीवराशिमेसे क्षायिक औपशमिक क्षायोपशमिक सासादन मिश्र इन पाच प्रकारके जीवोंका प्रमाण घटानेसे जो शेष रहे उतना ही मिथ्या- दृष्टि जीवोंका प्रमाण है। ॥ इति सम्यक्त्वमार्गणाधिकार ॥

गोम्मटसारः । २४५ क्रमप्राप्त संज्ञिमार्गणाका निरूपण करते है। णोइंदियआवरणखओवसमं तज्जवोहणं सण्णा । सा जस्स सो दु सण्णी इदरो सेसिंदिअवबोहो ॥ ६५९ ॥ नोइन्द्रियावरणक्षयोपशमस्तज्जबोधनं संज्ञा । सा यस्य स तु संज्ञी इतरः शेषेन्द्रियावबोवः ॥ ६५९ ॥ अर्थ-नोइन्द्रियावरण कर्मके क्षयोपशमको या तज्जन्य ज्ञानको संज्ञा कहते है । यह संज्ञा जिसके हो उसको संज्ञी कहते है । और जिनके यह संज्ञा न हो किन्तु केवल यथा- सम्भव इन्द्रियजन्य ज्ञान हो उनको असंज्ञी कहते है। भावार्थ-जीव दो प्रकारके होते हैं एक संज्ञी दूसरे असंज्ञी । जिनके लब्धि या उपयोगरूप मन पायानाय उनको संज्ञी कहते है। और जिनके मन न हो उनको असंज्ञी कहते है । इन असंज्ञी जीवोके यथासम्भव इन्द्रि- यजन्य ज्ञान ही होता है। संज्ञी असंज्ञीकी पहचानकेलिये चिह्नोंका वर्णन करते है । सिक्खाकिरियुवदेसालावग्गाही मणोवलंबेण । जो जीवो सो सण्णी तश्विवरीओ असण्णी दु॥ ६६० ॥ शिक्षाक्रियोपदेशालापग्राही मनोऽवलम्वेन । यो जीवः स संज्ञी तद्विपरीतोऽसंज्ञी तु ॥ ६६० ।। अर्थ-हितका ग्रहण और अहितका त्याग जिसके द्वारा किया जा सके उसको शिक्षा कहते है । इच्छापूर्वक हाथ पैरके चलानेको क्रिया कहते है । वचन अथवा चावुक आदिके द्वारा बताये हुए कर्तव्यको उपदेश कहते है । और श्लोक आदिके पाठको आलाप कहते है। जो जीव इन शिक्षादिकको मनके अवलम्बनसे ग्रहण धारण करता है उसको संजी कहते है । और जिन जीवों में यह लक्षण घटित न हो उनको असंज्ञी कहते है। मीमंसदि जो पुवं कजमकजं च तञ्चमिदरं च । सिक्खदि णामेणेदि य समणो अमणो य विवरीदो ।। ६६१ ॥ मीमासति यः पूर्व कार्यमकार्य च तत्त्वमितरच्च । शिक्षते नाम्ना एति च समना अमनाश्च विपरीतः ॥ ६६१ ॥ अर्थ-जो जीव प्रवृत्ति करनेके पहले अपने कर्तव्य और अकर्तव्यका विचार करे, तथा तत्त्व और अतत्त्वका स्वरूप समझ सके, और उसका जो नाम रखा गया हो उस नामके द्वारा बुलाने पर आसके, उसको समनस्क या संज्ञी जीव कहते हैं। और इममे जो विपरीत है उसको अमनस्क या असनी रहते हैं।

२४६
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
संज्ञीमार्गणागत जीवोंकी संख्याको बताते है।
देवेहिं सादिरेगो रासी सण्णीण होदि परिमाणं ।
तेणूणो संसारी सव्वेसिमसण्णिजीवाणं ॥ ६६२ ॥
देवैः सातिरेको राशिः संज्ञिनां भवति परिमाणम् ।
तेनोनः संसारी सर्वेषामसंज्ञिजीवानाम् ॥ ६६२ ॥
अर्थ-देवोके प्रमाणसे कुछ अधिक संज्ञी जीवोका प्रमाण है। सम्पूर्ण संसारी
जीव राशिमेंसे संज्ञी जीवोंका प्रमाण घटाने पर जो शेष रहे उतना ही समस्त असंनी
जीवोका प्रमाण है।
॥ इति संज्ञिमार्गणाधिकारः॥
क्रमप्राप्त आहारमार्गणाका वर्णन करते है।
उदयावण्णसरीरोदयेण तदेहवयणचित्ताणं ।
णोकम्मवग्गणाणं गहणं आहारयं णाम ॥ ६६३ ।।
उदयापन्नशरीरोदयेन तद्देहवचनचित्तानाम् ।
नोकर्मवर्गणानां ग्रहणमाहारकं नाम ॥ ६६३ ॥
अर्थ-शरीरनामा नामकर्मके उदयसे देह वचन और द्रव्य मनरूप बननेके योग्य
नोकर्मवर्गणाका जो ग्रहण होता है उसको आहार कहते है ।
निरुक्तिपूर्वक आहारकका अर्थ लिखते है ।
आहरदि सरीराणं तिहं एयदरवग्गणाओ य ।
भासमणाणं णियदं तम्हा आहारयो भणियो ॥ ६६४॥
आहरति शरीराणा त्रयाणामेकतरवर्गणाश्च ।
भाषामनसोनियतं तस्मादाहारको भणितः ॥ ६६४ ॥
अर्थ-औदारिक, वैक्रियिक, आहारक इन तीन शरीरों से किसी भी एक शरिके
योग्य वर्गणाओंको तथा वचन और मनके योग्य वर्गणाओंको यथायोग्य जीवसमास तथा कालमें
जीव आहरण ग्रहण करता है इसलिये इसको आहारक कहते है।
जीव दो प्रकारके होते है एक आहारक दूसरे अनाहारक । आहारक जीव कौन २
होते है और अनाहारक जीव कौन २ होते है यह बताते है ।
विग्गहगदिमावण्णा केवलिणो समुग्घदो अजोगी य ।
सिद्धा य अणाहारा सेसा आहारया जीवा ॥६६५ ।।
विग्रहगतिमापन्नाः केवलिनः समुद्धाता अयोगिनश्च ।
सिद्धाश्च अनाहाराः शेषा आहारका जीवाः ॥ ६६५ ॥

गोम्मटसारः।
२४७
अर्थ-विग्रहगतिको प्राप्त होनेवाले चारों गतिसम्बन्धी जीव, प्रतर और लोकपूर्ण समु-
द्घात करनेवाले सयोगकेवली, अयोगकेवली, समस्त सिद्ध इतने जीव तो अनाहारक होते है।
और इनको छोड़कर शेष जीव आहारक होते है।
समुद्दात, कितने प्रकारका होता है यह बताते है।
वेयणकसायवेगुब्बियो य मरणंतियो समुग्धादो।
तेजाहारो छटो सत्तमओ केवलीणं तु ।। ६६६ ।।
वेदनाकषायवैगूर्विकाश्च मारणान्तिकः समुद्धातः ।
तेज आहारः षष्ठः सप्तमः केवलिनां तु ।। ६६६ ।।
अर्थ-ससुद्धातके सात भेद है । वेदना, कपाय, वैक्रियिक, मारणान्तिक, तैजस,
आहारक, केवल । इनका स्वरूप लेश्यामार्गणाके क्षेत्राधिकारमें कहा जाचुका है इस लिये यहां
पर नही कहा है।
समुद्धातका स्वरूप बताते है।
मृलसरीरमछंडिय उत्तरदेहस्स जीवपिंडस्स ।
णिग्गमणं देहादो होदि समुग्धादणामं तु ॥ ६६७॥
मूलशरीरमत्यक्त्वा उत्तरदेहस्य जीवपिण्डस्य ।
निर्गमनं देहाद्भवति समुद्धातनाम तु ॥ ६६७ ॥
अर्थ-मूल शरीरको न छोड़कर तैजस कार्मण रूप उत्तर देहके साथ २ जीवप्रदे-
शोंके शरीरसे बाहर निकलनेको समुद्धात कहते है।
आहारमारणंति य दुगं पि णियमेण एगदिसिगं तु ।
दसदिसि गदा हु सेसा पंच समुग्घादया होंति ॥ ६६८॥
आहारमारणातिकद्विकमपि नियमेन एकदिशिकं त ।
दशदिशि गता हि शेषाः पञ्चसमुद्धातका भवन्ति ॥ ६६८ ॥
अर्थ-उक्त सात प्रकारके समुद्धातोंमें आहार और मारणान्तिक ये दो समुद्धात तो
एक ही दिशामें गमन करते है, किन्तु वाकीके पांच समुद्घात दशों दिशाओमें गमन करते है।
आहारक और अनाहारकके कालका प्रमाण बताते है ।
अंगुलअसंखभागो कालो आहारयस्स उक्करसो।
कम्मम्मि अणाहारो उक्कस्सं तिणि समया हु ॥ ६६९ ।।
अलासंख्यभागः काल आहारकम्योत्कृष्ट ।
कार्मणे अनाहारः उत्कृष्टः त्रय ममया हि ॥ ६६९॥

२४८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्। अर्थ-आहारकका उत्कृष्ट काल सूच्यंगुलके असंख्यातमें भागप्रमाण है । कार्मण शरीरमे अनाहारका उत्कृष्ट काल तीन समयका है, और जघन्य काल एक समयका है । तथा आहारका जघन्य काल तीन समय कम श्वासके अठारहमे भाग प्रमाण है, क्योंकि विग्रहगति- सम्बन्धी तीन समयोंके घटाने पर क्षुद्र भवका काल इतना ही अवशेप रहता है। आहारमार्गणासम्बन्धी जीवोकी संख्याको बताते है। कम्मइयकायजोगी होदि अणाहारयाण परिमाणं । तविरहिदसंसारो सम्बो आहारपरिमाणं ॥ ६७० ॥ कार्मणकाययोगी भवति अनाहारकाणा परिमाणम् । तद्विरहितसंसारी सर्व आहारपरिमाणम् ॥ ६७० ।। अर्थ-कार्मणकाययोगी जीवोंका जितना प्रमाण है उतना ही अनाहारक जीवोंका प्रमाण है। और संसारी जीवराशिमसे कार्मणकाययोगी जीवोंका प्रमाण घटाने पर जो शेष रहे उतना ही आहारक जीवोंका प्रमाण है। ॥ इति आहारमार्गणाधिकारः॥ क्रमप्राप्त उपयोगाधिकारका वर्णन करते है। वत्थुणिमित्तं भावो जादो जीवस्स जो दु उवजोगो। सो दुविहो णायवो सायारो चेव णायारो ॥ ६७१ ॥ वस्तुनिमित्तं भावो जातो जीवस्य यस्तूपयोगः । स द्विविधो ज्ञातव्यः साकारश्चैवानाकारः॥ ६७१ ॥ अर्थ-जीवका जो भाव वस्तुको (ज्ञेयको) ग्रहण करनेकेलिये प्रवृत्त होता है उसको उप- योग कहते है। इसके दो भेद हैं एक साकार ( सविकल्प ) दूसरा निराकार (निर्विकल्प )। दोनोंप्रकारके उपयोगोंके उत्तरभेदोको बताते हुए यह उपयोग जीवका लक्षण है यह बताते हैं। णाणं पंचविहंपिय अण्णाणतियं च सागरुवजोगो। चदुदंसणमणगारो सब्वे तल्लक्खणा जीवा ॥ ६७२ ॥ ज्ञानं पंचविधमपि च अज्ञानत्रिकं च साकारोपयोगः । चतुर्दर्शनमनाकारः सर्वे तल्लक्षणा जीवाः ।। ६७२ ॥ अर्थ-पांच प्रकारका सम्यग्ज्ञान और तीन प्रकारका अज्ञान ये साकार उपयोग है। चार प्रकारका दर्शन अनाकार उपयोग है । यह उपयोग ही सम्पूर्ण जीवोका लक्षण है।

गोम्मटसारः ।
२४९
साकार उपयोगमे कुछ विशेषताको बताते है।
मदिसुदओहिमणेहिंय सगसगविसये विसेसविण्णाणं ।
अंतोमुहुत्तकालो उवजोगो सो दु सायारो ॥ ६७३ ॥
मतिश्रुतावधिमनोभिश्च स्वकस्वकविषये विशेषविज्ञानम् ।
अन्तर्मुहूर्तकाल उपयोगः स तु साकारः ।। ६७३ ।।
अर्थ-मति श्रुत अवधि और मनःपर्यय इनकेद्वारा अपने २ विषयका अन्तमुहूर्तका-
लपर्यन्त जो विशेषज्ञान होता है उसको ही साकार उपयोग कहते है। भावार्थ-साकार
उपयोगके पांच भेद है । मति श्रुत अवधि मनःपर्यय और केवल । इनमेंसे आदिके चार ही
उपयोग छद्मस्थ जीवोके होते है। उपयोग चेतनाका एक परिणमन है । तथा एक वस्तुके
ग्रहणरूप चेतनाका यह परिणमन छद्मस्थ जीवके अधिकसे अधिक अन्तर्मुहूर्तकालतक ही
रह सकता है। इस साकार उपयोगमें यही विशेषता है कि यह वस्तुके विशेष अंशको
ग्रहण करता है।
अनाकार उपयोगका स्वरूप बताते है ।
इंदियमणोहिणा वा अत्थे अविससिदूण जं गहणं ।
अंतोमुहुत्तकालो उबजोगो सो अणायारो ।। ६७४ ।।
इन्द्रियमनोऽवधिना वा अर्थे अविशेष्य यद्ग्रहणम् ।
अन्तर्मुहूर्तकालः उपयोगः स अनाकारः ॥ ६७४ ॥
अर्थ-इन्द्रिय मन और अवधिकेद्वारा अन्तर्मुहूर्तकालतक पदार्थोका जो सामान्यरूपसे
ग्रहण होता है उसको निराकार उपयोग कहते है । भावार्थ-दर्शनके चार भेद है, चक्षु-
दर्शन अचक्षुदर्शन अवधिदर्शन और केवलदर्शन । इनमेंसे आदिके तीन ही दर्शन छद्मस्थ
जीवोके होते है । नेत्रकेद्वारा पदार्थका जो सामान्यावलोकन होता है उसको चक्षुदर्शन कहते
हैं। और नेत्रको छोडकर शेप चार इन्द्रिय तथा मनकेद्वारा जो सामान्यावलोकन होता है
उसको अचक्षुदर्शन कहते है । अवधिज्ञानके पहले इन्द्रिय और मनकी सहायत.के विना आत्म-
मात्रसे जो रूपी पदार्थविषयक सामान्यावलोकन होता है उसको अवधिदर्शन कहते है। यह
दर्शनरूप निराकार उपयोग भी साकार उपयोगकी तरह छमस्य जीवोंके अविकसे अधिक
अन्तर्मुहूर्ततक ही होता है।
उपयोगाधिकारमें जीवोका प्रमाण बताते हैं ।
णाणुवजोगजुदाणं परिमाणं णाणमग्गणं व हवे ।
दसणुवजोगियाणं दंसणमरगण व उत्तकमो ॥ ६७५ ॥

२६० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । । - ज्ञानोपयोगयुतानां परिमाणं ज्ञानमार्गणावद्भवेत् । दर्शनोपयोगिनां दर्शनमार्गणावदुक्तकमः ॥ ६७५ ॥ अर्थ-ज्ञानोपयोगवाले जीवोका प्रमाण ज्ञानमार्गणावाले जीवोकी तरह समझना चाहिये । और दर्शनोपयोगवालोंका प्रमाण दर्शनमार्गणावालोंकी तरह समझना चाहिये । इनमें कुछ विशेषता नहीं है। ॥ इति उपयोगाधिकार ॥ उक्त प्रकारसे वीस प्ररूपणाओका वर्णन करके अब अन्तर्भावाधिकारका वर्णन करते हैं। गुणजीवा पजत्ती पाणा सण्णा य मग्गणुरजोगो । जोग्गा परूविदव्वा ओधादेसेसु पत्तेयं ॥ ६७६ ॥ गुणजीवाः पर्याप्तयः प्राणाः संज्ञाश्च मार्गणोपयोगी । योग्याः प्ररूपितव्या ओघादेशयोः प्रत्येकम् ॥ ६७६ ।। अर्थ--उक्त वीस प्ररूपणाओंमेंसे गुणस्थान और मार्गणास्थानमे यथायोग्य प्रत्येक गुणस्थान जीवसमास पर्याप्ति प्राण संज्ञा मार्गणा उयोगका निरूपण करना चाहिये भावार्थ- इस अधिकारमें यह बताते है कि किस २ मार्गणा या गुणस्थानमें शेष किस २ प्ररूपणाका अन्तर्भाव होता है । परन्तु इस अन्तर्भावका निरूपण यथायोग्य होना चाहिये । किस २ मार्गणामें कौन २ गुणस्थान होते हैं ? उत्तरः-- चउपण चोद्दस चउरो णिरयादिसु चोदसं तु पंचक्खे । तसकाये सेसिंदियकाये मिच्छं गुणट्ठाणं ॥ ६७७ ॥ चत्वारि पञ्च चतुर्दश चत्वारि निरयादिषु चतुर्दश तु पञ्चाक्षे । त्रसकाये शेषेन्द्रियकाये मिथ्यात्वं गुणस्थानम् ॥ ६७७ ॥ अर्थ-गतिमार्गणाकी अपेक्षासे क्रमसे नरकगतिमें आदिके चार गुणस्थान होते है, और तिर्यग्गतिमें पाच, मनुष्यगतिमें चौदह, तथा देवगतिमें नरकगतिके समान चार गुणस्थान होते है । इन्द्रियमार्गणाकी अपेक्षा पंचेन्द्रिय जीवोंके चौदह गुणस्थान और शेष एकेन्द्रियसे लेकर चतुरिन्द्रियपर्यन्त जीवोंके केवल मिथ्यात्व गुणस्थान ही होता है । कायमार्गणाकी अपेक्षा त्रसकायके चौदह और गेप स्थावर कायके एक मिथ्यात्व गुणस्थान ही होता है। भावार्थ-~-यहा पर यह बताया है कि अमुक २ गति इन्द्रिय या कायवाले जीवोके अमुक २ गुणस्थान होता है । इसी तरह जीवसमासादिकोंको भी यथायोग्य समझना चाहिये । नते कि नरक और देवगतिमें पर्याप्ति और निवृत्यपर्याप्ति ये दो जीवसमास होते विगनिमें नौदह तथा मनुष्यगतिमें गंजीसम्बन्धी पर्याप्त अपर्याप्त ये दो जीवसमास ।

गोम्मटसारः। २५१ होते हैं । इन्द्रिय मार्गणामे एकेन्द्रिय जीवोंके वादर पर्याप्त अपर्याप्त सूक्ष्म पर्याप्त अपर्याप्त ये चार जीवसमास होते है । द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय जीवोंके अपने २ पर्याप्त अपर्याप्त इस- तरह दो २ जीवसमान होते है। पंचेन्द्रियमें संज्ञी पर्याप्त अपर्याप्त असंज्ञी पर्याप्त अपर्याप्त ये चार जीवसमास होते हैं । कायमार्गणाकी अपेक्षा स्थावरकायमें एकेन्द्रियके समान चार जीवसमास होते है। और त्रसकायमे शेष दश जीवसमास होते है। मज्झिमचउमणवयणे सण्णिप्पहुदि दु जाव खीणोत्ति । सेसाणं जोगित्ति य अणुभयवयणं तु वियलादो ।। ६७८ ॥ मध्यमचतुर्मनोवचनयोः संज्ञिप्रभृतिस्तु यावत् क्षीण इति । शेषाणां योगीति च अनुभयवचनं तु विकलतः ॥ ६७८ ॥ अर्थ-असत्यमन उभयमन असत्य वचन उभय वचन इन चार योगोंके स्वामी संज्ञी मिथ्यादृष्टि से लेकर क्षीणकषायपर्यंत वारह गुणस्थानवाले जीव है। और सत्यमन अनु- भयमन सत्यवचन इनके स्वामी आदिके तेरह गुणस्थानवाले जीव है। अनुभय वचनयोग विक- लत्रयसे लेकर सयोगीपर्यन्त होता है। अनुभय वचनको छोडकर शेष तीन प्रकारका वचन और चार प्रकारका मन, इनमें एक संज्ञी पर्याप्त ही जीवसमास है । और अनुभय वचनमें पर्याप्त द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय असंज्ञी संज्ञी ये पांच जविसमास होते है। ओरालं पजत्ते थावरकायादि जाव जोगोत्ति । तम्सिस्ससपज्जत्ते चदुगुणठाणेसु णियमेण ॥ ६७९ ॥ औरालं पर्याप्त स्थावरकायादि यावत् योगीति । तन्मिश्रमपर्याप्ते चतुर्गणस्थानेषु नियमेन ॥ ६७९ ॥ अर्थ-औदारिककाययोग, स्थावर एकेन्द्रिय पर्याप्त मिथ्यादृष्टिसे लेकर सयोगी पर्यन्त होता है। और औदारिक मिश्रकाययोग नियमसे चार अपर्याप्त गुणस्थानों में ही होता है । औदारिक काययोगमे पर्याप्त सात जीवसमास होते है, और मिश्रयोगमें अपर्याप्त सात जीवसमास है। अपर्याप्त चार गुणस्थानोको गिनाते है । मिच्छे सासणसम्से वेदयदे कवाडजोगिम्मि । णरतिरियेवि य दोणिवि होतित्ति जिणेहिं णिढेिं ॥ ६८० ॥ मिथ्यात्वे मासनसन्यक्त्वे पुवेदायने कपाटयोगिनि । नरतिरश्चोरपि च द्वापि भवन्तीति जिननिर्दिष्टन ।। ६८० ॥ :y*༌་༽ '། - བགས་ ཡ་ཡོ། 1: २५२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । । अर्थ-मिथ्यात्व, सासादन, पुरुषवेदके उदयसंयुक्त असंयत, तथा कपाटसमुद्धात करनेवाले सयोगकेवली, इन चार स्थानोंमें ही औदारिकमिश्रकाययोग होता है । तथा औदा- रिक काययोग और औदारिकमिश्रकाययोग ये दोनों ही मनुष्य और तिर्यच्चोंके ही होते है ऐसा जिनेन्द्रदेवने कहा वेगुव्वं पज्जत्ते इदरे खलु होदि तस्स मिस्सं तु । सुरणिरयचउट्ठाणे मिस्से णहि मिस्सजोगो हु ॥ ६८१ ।। वैगूर्वं पर्याप्ते इतरे खलु भवति तस्य मिश्रं तु । सुरनिरयचतुःस्थाने मिश्रे नहि मिश्रयोगो हि ॥ ६८१ ।। अर्थ-मिथ्यादृष्टिसे लेकर असंयतपर्यंत चारो ही गुणस्थानवाले देव और नारकि योंके पर्याप्त अवस्थामें वैक्रियिक काययोग होता है, और अपर्याप्त अवस्थामें वैक्रियिकमिश्रयोग होता है, किन्तु यह मिश्रयोग चार गुणस्थानोंमेंसे मिश्र गुणस्थानमें नहीं होता; क्योंकि कोई भी मिश्रयोग मिश्रगुणस्थानमें नहीं होता । वैक्रियिक योगमें एक संज्ञीपर्याप्त ही जीवसमास है और मिश्रयोगमे एक संज्ञी निर्वृत्यपर्याप्त जीवसमास है। आहारो पज्जत्ते इदरे खलु होदि तस्स मिस्सो दु । अंतोमुहुत्तकाले छट्ठगुणे होदि आहारो ॥६८२ ।। आहारः पर्याप्ते इतरे खलु भवति तस्य मिश्रस्तु । अन्तर्मुहूर्तकाले षष्ठगुणे भवति आहारः ॥ ६८२ ॥ अर्थ-आहारककाययोग पर्याप्त अवस्थामें होता है, और आहारकमिश्रयोग अपर्याप्त अवस्थामें होता है । ये दोनो ही योग छट्टे गुणस्थानवाले मुनिके ही होते है। और इनके उत्कृष्ट और जघन्य कालका प्रमाण अंतमुहूर्त ही है भावार्थ-यहांपर जो पर्याप्तता या अपर्याप्तता कही है वह आहारक शरीरकी अपेक्षासे कही है, औदारिक शरीरकी अपेक्षासे नहीं कही है, क्योंकि औदारिकशरीरसम्बन्धी अपर्याप्तता छठे गुणस्थानमे नही होती। ओरालियमिस्सं वा चउगुणठाणेसु होदि कम्मइयं । चदुगदिविग्गहकाले जोगिस्स य पदरलोगपूरणगे ॥६८३ ॥ औरालिकमिश्रो वा चतुर्गुणस्थानेषु भवति कार्मणम् । चतुर्गतिविग्रहकाले योगिनश्च प्रतरलोकपूरणके ॥ ६८३ ॥ अर्थ-औदारिक मिश्रयोगकी तरह कार्मण योग भी चार गुणस्थानोंमें और चारों विग्रहगतियोके कालमें होता है, विशेषता केवल इतनी है कि औदारिकमिश्रयोगको जो सयोगके- वलिगुणस्थानमें बताया है सो कपाटसमुद्धात समयमें बताया है, और कार्मणयोगको प्रतर और लोकपूरण समुद्धात समयमे वताया है। यहां पर औदारिकमिश्रकी तरह जीवसमास भी आठ होते है।

गोम्मटसारः ।
थावरकायप्पहुदी संढो सेसा असण्णिआदी य ।
अणियहिस्स य पढमो भागोत्ति जिणेहिं णिदिहं ॥ ६८४ ॥
स्थावरकायप्रभृतिः षण्डः शेषा असंश्यादयश्च ।
अनिवृत्तेश्च प्रथमो भाग इति जिनैर्निर्दिष्टम् ॥ ६८४ ॥
अर्थ-वेदमार्गणाके तीन भेद है, स्त्री, पुरुष, नपुंसक । इसमे नपुंसक वेद स्थावर-
काय मिथ्यादृष्टिसे लेकर अनिवृत्तिकरणके पहले सवेद भाग पर्यन्त रहता है। अत एव इसमें
गुणस्थान नव और जीवसमास चौदह होते है । शेष स्त्री और पुरुषवेद असंज्ञी पंचेन्द्रिय
मिथ्यादृष्टि से लेकर अनिवृत्तिकरणके सवेद भाग तक होते है । यहां पर गुणस्थान तो पहलेकी
तरह नव ही है, किन्तु जविसमास असंज्ञी पंचेन्द्रियके पर्याप्त, अपर्याप्त और संज्ञीके पर्याप्त
अपर्याप्त इसतरह चार ही होते है।
थावरकायप्पहुदी अणियट्टीबितिचउत्थभागोत्ति ।
कोहतियं लोहो पुण सुहमसुरागोत्ति विण्णेयो ।। ६८५ ।।
स्थावरकायप्रभृति अनिवृत्तिद्वित्रिचतुर्थभाग इति ।
क्रोधत्रिकं लोभः पुनः सूक्ष्मसराग इति विज्ञेयः ॥ ६८५ ॥
अर्थ-कषायमार्गणाकी अपेक्षा क्रोध मान माया ये तीन कषाय स्थावरकायमिथ्या-
दृष्टि से लेकर अनिवृत्ति करणके दूसरे तीसरे चौथे भाग तक क्रमसे रहते है। और लोभकपाय
दशमे सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थान तक रहता है । अतएव आदिके तीन कपायोमें गुणस्थान नव
और लोभकपायमे दश होते है, किन्तु जीवसमास दोनो जगह चौदह २ ही होते है। :
थावरकायप्पहुदी मदिसुअण्णाणयं विभंगो दु ।
सण्णीपुण्णप्पहुदी सासणसम्मोत्ति णायवो ॥ ६८६ ॥
स्थावरकायप्रभृति मतिश्रुताज्ञानकं विभड्गस्तु ।
संज्ञिपूर्णप्रभृति सासनसम्यगिति ज्ञातव्यः ।। ६८६ ।।
अर्थ-कुमति और कुश्रुत ज्ञान स्थावरकाय-मिथ्यादृष्टि से लेकर सासादन गुणस्थान
तक होते हैं । विभड्गज्ञान संनी पर्याप्त मिश्यादृष्टि से लेकर सासादनपर्यन्त होता है। कुमति
कुश्रुत ज्ञानमे गुणस्थान दो और जीवसमास चौदह होते है । विभड्ग गुणस्थान दो और
जीवसमास एक संज्ञीपर्याप्त ही होता है ।
सण्णाणतिगं अविरदसम्मादी छट्ठगादि गणपज्जो।
खीणकसायं जाव दु केवलणाणं जिणे सिद्धे ॥ ६८७ ॥
मज्ञानविकमविरतसम्यगादि पष्ठकादिनन.पर्ययः ।
क्षीणकपायं यावत्त केवलज्ञानं जिने मिद्धे ॥ ६८७ ॥

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । २५४ - अर्थ-आदिके तीन सम्यग्ज्ञान ( मति श्रुत अवधि ) अव्रतसम्यग्दृष्टिसे लेकर क्षीणकषायपर्यन्त होते है । मनःपर्ययज्ञान छट्टे गुणस्थानसे लेकर वारहमे गुणस्थान तक होता है। और केवलज्ञान तेरहमे चौदहमे गुणस्थानमें तथा सिद्धोंके होता है । भावार्थ- आदिके तीन सम्यग्ज्ञानोमें गुणस्थान नव और जीवसमास संज्ञी पर्याप्त अपर्याप्त ये दो होते है । मनःपर्यय ज्ञानमें गुणस्थान सात और जीवसमास एक संज्ञीपर्याप्त ही है। यहां पर यह शंका नही हो सकती कि आहारक मिश्रयोगकी अपेक्षा अपर्याप्तता भी सम्भव है इसलिये यहा दो जीवसमास कहने चाहिये ? क्योंकि मनःपर्यय ज्ञानवालेके नियमसे आहारक- ऋद्धि नहीं होती । केवलज्ञानकी अपेक्षा गुणस्थान दो ( सयोगी, अयोगी ) और जीवसमास भी संज्ञी पर्याप्त अपर्याप्त ये दो होते है । सयोगकेवलियों के समुद्धात समयमें अपर्याप्तता भी होती है यह पहले कहचुके है । गुणस्थानोसे रहित सिद्धोके भी केवलज्ञान होता है। अयदोत्ति हु अविरमणं देसे देसो पमत्त इदरे य । परिहारो साभाइयछेदो छट्ठादि थूलोत्ति ॥ ६८८॥ सुहमो सुहमकसाये संते खीणे जिणे जहक्खादं । संजममग्गणभेदा सिद्धे णस्थित्ति णिद्दिढें ॥ ६८९ ॥ अयत इति आवरमणं देशे देशः प्रमत्तेतरस्मिन् च । परिहारः सामायिकश्छेदः षष्ठादिः स्थूल इति ॥ ६८८ ॥ सूक्ष्मः सूक्ष्मकपाये शान्ते क्षीणे जिने यथाख्यातम् । संयममार्गणभेदाः सिद्धे न सन्तति निर्दिष्टम् ॥ ६८९ ।। अर्थ-संयममार्गणामे असंयमको भी गिनाया है, इसलिये यह ( असंयम ) मिथ्या- दृष्टिसे लेकर अबतसम्यग्दृष्टितक होता है । अतः यहा पर गुणस्थान चार और जीवसमास चौदह होते है । देशसंयम पांचमे गुणस्थानमें ही होता है । अतः यहां पर गुणस्थान एक और जीवसमास भी एक संजी पर्याप्त ही होता है । परिहारविशुद्धि संयम छट्टे सातमे गुण- स्थानम ही होता है, यहापर भी जीवसमास एक संज्ञीपर्याप्त ही होता है; क्योकि परिहार- विशुद्धिवाला आहारक नहीं होता । सामायिक और छेदोपस्थापना संयम छठेसे लेकर अनि- वृतिकरण गुणस्थानतक होता है । इसलिये यहापर गुणस्थान चार और जीवसमास दो होते है । सूक्ष्मसापराय संयम दशमे गुणस्थानमें ही होता है । अतः यहापर गुणस्थान और जीवसमास एक २ ही है । यथारख्यात संयम उपशातकपाय क्षीणकपाय सयोगकेवली और अयोगकेवलियोंक होता है । यहा पर गुणस्थान चार और जीवसमास सज्ञी पर्याप्त तथा केवल- ममुद्धानकी अपेक्षा अपर्याप्त ये दा होते है । सिद्ध गुणस्थान और मार्गणाओसे रहित है अतः उनके कोई भी सयम नहीं होता।

गोम्मटसारः । २५५ क्रमप्राप्त दर्शनमार्गणाकी अपेक्षा यथासम्भव गुणस्थान और जीवसमास घटित करते है । चउरक्खथावरविरदसम्माइट्ठी दु खीणमोहोत्ति । चक्खुअचक्खू ओही जिणसिद्ध केवलं होदि ॥ ६९० ॥ चतुरक्षस्थावराविरतसम्यग्दृष्टिस्तु क्षीणमोह इति । चक्षुरचक्षुरवधिः जिनसिद्धे केवलं भवति ॥ ६९० ॥ अर्थ-दर्शनके चार भेद है। चक्षुदर्शन अचक्षुदर्शन अवधिदर्शन केवलदर्शन यह पहले वताचुके है। इनमें पहला चक्षुदर्शन चतुरिन्द्रियसे लेकर क्षीणमोहपर्यन्त होता है। और अचक्षुदर्शन भी स्थावरकायसे लेकर क्षीणमोहपर्यन्त ही होता है। तथा अवधिदर्शन अव्रतसम्यग्दृष्टिसे लेकर क्षीणमोहपर्यन्त होता है । केवलदर्शन सयोगकेवल और अयोगकेवल इन दो गुणस्थानोमे और सिद्धोंके होता है। भावार्थ-चक्षुदर्शनमें गुणस्थान बारह और चतुरि- न्द्रिय तथा पंचेन्द्रियके असंज्ञी संज्ञीसम्बन्धी अपर्याप्त पर्याप्तकी अपेक्षा जीवसमास छह होते है। अचक्षुदर्शनमें गुणस्थान वारह और जीवसमास चौदह होते है । अवधिदर्शनमे गुणस्थान नवे और जीवसमास संशी पर्याप्त अपर्याप्त ये दो होते है। केवलदर्शनमें गुणस्थान दो और जीवसमास भी दो होते है । विशेषता यह है कि यह ( केवलदर्शन ) गुणस्थानातीत सिद्धोंके भी होता है। लेश्याकी अपेक्षासे गुणस्थान और जीवसमासोंका वर्णन करते है । थावरकायप्पहुदी अविरसम्मोत्ति असुहतियलेस्सा । सण्णीदो अपसत्तो जाव दु सुहतिण्णिलेस्साओ ॥ ६९१ ।। स्थावरकायप्रभृति अविरतसम्यगिति अशुभत्रिकलेश्याः । सज्ञितः अप्रमत्तो यावत्तु शुभास्तिस्रो लेश्याः ॥ ६९१ ॥ अर्थ-लेश्याओके छह भेदोको पहले वताचुके है। उनमें आदिकी कृष्ण नील कापोत ये तीन अशुभ लेश्या स्थावरकायसे लेकर चतुर्थ गुणस्थानपर्यन्त होती है। और अतकी पीत पद्म शुक्ल ये तीन शुभलेश्या सनी मिथ्यादृष्टिसे लेकर अप्रमत्तपर्यन्त होती है । भावार्थ- अशुभ लेश्याओमे गुणस्थान चार और जीवसमास चौदह होते है, तथा शुभलेश्याओंमें गुणस्थान मात और जीवसमास दो होते है। इस कथनसे शुक्लदेश्या भी सातमे गुणस्थानतक ही सिद्ध होनी है, अत: शुक्रव्याके विषयमें अपवादात्मक विशेष कयन करते है। णवरि व सुहा लेस्सा सजोगिचरिमोत्ति होदि णियमेण । मोनिका ममीनीन पादरी 4 माने पर दान न होता! -- २५६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायम् । है गयजोगिम्मि वि सिद्धे लेस्सा णत्थित्ति णिद्दिढें ।। ६९२ ॥ नवरि च शुक्ला लेश्या सयोगिचरम इति भवति नियमेन । गतयोगेऽपि च सिद्धे लेश्या नास्तीति निर्दिष्टम ॥ ६९२ ॥ अर्थ-शुक्ललेश्यामें यह विशेषता है कि वह मनी पर्याप्त मिथ्यादृष्टि से लेकर सयोग- केवल गुणस्थानपर्यन्त होती है। और इसमें जीवसमाम दो ही होते है । इसके ऊपर चौदहमे गुणस्थानवी जीवोंके तथा सिद्धोके कोई भी लेश्या नहीं होती, यह परमागममें कहा थावरकायप्पहुदी अजोगि चरिमोत्ति हांति भवसिद्धा। मिच्छाइट्ठिट्ठाणे अभवसिद्धा हवंतित्ति ।। ६९३ ॥ स्थावरकायप्रभृति अयोगिचरम इति भवन्ति भवसिद्धाः । मिथ्याप्टिस्थाने अभव्यसिद्धा भवन्तीति ।। ६९३ ॥ अर्थ--भव्यसिद्ध स्थावरकाच-मिथ्याष्टिसे लेकर अयोगिपर्यंत होते है। और अभन्य- सिद्ध मिथ्यादृष्टिस्थानमें ही रहते है। भावार्थ-भव्यत्वमार्गणाके दो भेद है, एक भव्य और दूसरे अभव्य-इन्हीको भव्यसिद्ध अभव्यसिद्ध भी कहते है। जिसके निमित्तसे वाह्य निमित्त मिलनेपर सिद्धपर्यायको तथा उसके साधनभूत सम्यग्दर्शनादिसम्बन्धी शुद्धपर्यायकी प्राप्ति होसके जीवकी उस शक्तिविशेषको भव्यत्वशक्ति कहते है। जिसके निमित्तसे वाह्य निमित्तके मिलने पर भी सम्यग्दर्शनादिककी तथा उसके कार्यरूप सिद्धपर्यायकी प्राप्ति न हो सके जीवकी उस शक्तिविशेषको अभव्यत्वशक्ति कहते है । भव्यत्वशक्तिवालोको भव्य और अभव्यत्वशक्तिवाले जीवोंको अभव्य कहते है । भव्यजीवोके चौदह गुणस्थान और चौदह जीवसमास होते है। और अभव्य जीवोंके चौदह जीवसमास और एक मिथ्यात्व गुणस्थान ही होता है। सम्यक्त्वमार्गणाकी अपेक्षा वर्णन करते है। मिच्छो सासणमिस्सो सगसगठाणम्मि होदि अयदादो। पढमुवसमवेद्गसम्मत्तदुगं अप्पमत्तोत्ति ॥ ६९४ ॥ मिथ्यात्वं सासनमिश्री स्वकस्वकस्थाने भवति अयतात् । प्रथमोपशमवेदकसम्यक्त्वद्विकमप्रमत्त इति ॥ ६९४ ॥ अर्थ—सम्यक्त्वमार्गणाके छह भेद है-मिथ्यात्व, सासन, मिश्र, औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक । इनमें आदिके तीन सम्यक्त्व तो अपने २ गुणस्थानमें ही होते हैं। और प्रयमोपशम तथा वेदक ये दो सम्यक्त्व चतुर्थ गुणस्थानसे लेकर सातमे गुणस्थानतक होते हैं। भावार्थ-मिथ्यादर्शनका गुणस्थान एक प्रथम और जीवसमास चौदह । सासादनका ।

गोम्मटसारः । गुणस्थान एक दूसरा जीवसमास सात होते है। वे इस प्रकार है कि बादर एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रय, असंज्ञी, संज्ञी इनसम्बन्धी अपर्याप्त और एक संज्ञपिर्याप्त । मिश्रदर्शनका गुणस्थान एक तीसरा और जीवसमास भी संज्ञी पर्याप्त यह एक ही होता है। उपशमसम्य- क्त्वके दो भेद है-एक प्रथमोपशम दूसरा द्वितीयोपशम । जो प्रतिपक्षी पांच या सात प्रकृ- तियोंके उपशमसे होता है उसको प्रथमोपशम सम्यक्त्व कहते है। और जो सम्यग्दर्शन तीन दर्शनमोहनीय प्रकृतियोंके उपशमके साथ २ चार अनंतानुबंधी कषायोंके विसंयोजनसे उत्पन्न होता है उसको द्वितीयोपशम सम्यक्त्व कहते है। इनमेंसे एक प्रथमोपशम सम्यक्त्व तथा वेर्दैक सम्यक्त्व असंयतसे लेकर अप्रमत्तपर्यंत होता है । प्रथमोपशमसम्यक्त्व अवस्थामें मरण नहीं होता । इसलिये जीवसमास एक संज्ञीपर्याप्त ही होता है । और वेदकसम्यक्त्वमें संज्ञी- पर्याप्त अपर्याप्त ये दो जीवसमास होते है। क्योंकि प्रथम नरक और भवनत्रिकको छोडकर शेष देव, भोगभूमिज मनुष्य तथा तिर्यंचोमें अपर्याप्त अवस्थामें भी वेदक सम्यक्त्व रहता है। द्वितीयोपशम सम्यक्त्वको कहते है। विदियुवसमसम्मत्तं अविरदसम्मादि संतमोहोत्ति । खइगं सम्मं च तहा सिद्धोत्ति जिणेहिं णिद्दिढ ॥ ६९५॥ द्वितीयोपशमसम्यक्त्वमविरतसम्यगादिशातमोहइति । क्षायिकं सम्यक्त्वं च तथा सिद्धइति जिनैर्निर्दिष्टम् ॥ ६९५ ॥ अर्थ-द्वितीयोपशम सम्यक्त्व चतुर्थ गुणस्थानसे लेकर उपशांतमोहपर्यन्त होता है। सायिक सम्यक्त्व चतुर्थगुणस्थानसे लेकर सिद्धपर्यन्त होता है । द्वितीयोपशम सम्यक्त्वमें सज्ञी- पर्याप्त और देव अपर्याप्त ये दो जीवसमास होते है । क्षयिक सम्यक्त्वें संज्ञीपर्याप्त अपर्याप्त ये दो जीवसमास होते हैं । तथा यह सम्यक्त्व सिद्धोके भी होता है; परन्तु वहापर कोई भी जीव- समास नहीं होता । भावार्थ-यहां पर चतुर्थ पंचम तथा पष्ठ गुणस्थानमें जो द्वितीयोपशम सम्यक्त्व बताया है उसका अभिप्राय यह है कि यद्यपि द्वितीयोपशम सम्यक्त्व सातमे गुण- स्थानमें ही उत्पन्न होता है; परन्तु वहासे श्रेणिका आरोहण करके जब ग्यारहमे गुणस्थानसे नीचे गिरता है तब छठे पांचमे चौथे गुणस्थानमें भी आता है इस अपेक्षासे इन गुणस्थानोमें भी द्वितीयोपशम सम्यक्त्व रहता है। १ विशेषता इतनी है कि दितीयोपाम सम्यक्यो न्युर होकर गेनामाग्न गुगलानोमना पति लौर देरअपर्याप्त ये दो ही जीवामानाने है। अनतानु वा अमन्दार रानासिर परिणतन होना । ३ दरमम्मकरानापरले कनके हैं।

२६८
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
संज्ञामार्गणाकी अपेक्षा वर्णन करते है।
सण्णी सण्णिप्पहदी खीणकसाओत्ति होदि णियमेण ।
थावरकायप्पहुदी असणित्ति हवे असण्णी हु ॥ ६९६ ॥
संज्ञी संक्षिप्रमृतिः क्षीणकषाय इति भवति नियमेन ।
स्थावरकायप्रभृतिः असंज्ञीति भवेदसज्ञी हि ।। ६९६ ॥
अर्थ-संज्ञी जीव संज्ञी मिथ्यादृष्टिसे लेकर क्षीणकपायपर्यन्त होते है। इनमें गुण-
स्थान बारह और जीवसमास संज्ञी पर्याप्त अपर्याप्त ये दो होते हैं। असंही जीव स्थावरकायसे
लेकर असंज्ञीपंचेन्द्रियपर्यन्त होते है। इनमें गुणस्थान एक मिथ्यात्व ही होता है, और जीव-
समास संज्ञीसम्बन्धी पर्याप्त अपर्याप्त इन दो भेदोंको छोडकर शेप वारह होते है।
थावरकायप्पहुदी सजोगिचरिमोत्ति होदि आहारी ।
कम्मइय अणाहारी अजोगिसिद्धे विणायव्वो ॥ ६९७ ॥
स्थावरकायप्रभृतिः सयोगिचरम इति भवति आहारी ।
कार्मण अनाहारी अयोगिसिद्धेपि ज्ञातव्यः ।। ६९७ ।।
अर्थ-स्थावरकायमिथ्यादृष्टिसे लेकर सयोगकेवलीपर्यन्त आहारी होते हैं । और
कार्मणकाययोगवाले तथा अयोगकेवली अनाहारक समझने चाहिये । भावार्थ-कार्मणकाय-
योग और अयोग केवल गुणस्थानवाले जीवोंको छोडकर शेष समस्त संसारी जीव आहारक
होते है । आहारक जीवोके आदिके तेरह गुणस्थान और चौदह जीवसमास होते हैं । अनाहा-
रक जीवोके गुणस्थान पांच ( मिथ्यादृष्टि सासादन असंयत सयोगी अयोगी) और जीवसमास
सात अपर्याप्त और एक अयोगीसम्बन्धी पर्याप्त इसप्रकार आठ होते हैं।
किस २ गुणस्थानमें कौन २ सा जीवसमास होता है यह घटित करते है
मिच्छे चोद्दस जीवा सासण अयदे पमत्तविरदे य ।
सण्णिदुर्ग सेसगुणे सण्णीपुण्णो दु खीणोत्ति ॥ ६९८ ॥
मिथ्यात्वे चतुर्दश जीवाः सासनायते प्रमत्तविरते च।
संज्ञिद्विकं शेषगुणे संक्षिपूर्णस्तु क्षीण इति ॥ ६९८ ॥
अर्थ-मिथ्यात्वगुणस्थानमें चौदह जीवसमास है । सासादन असंयत प्रमत्तविरत चका-
रसे सयोगकेवली इनमें संज्ञी पर्याप्त अपर्याप्त ये दो जीवसमास होते है। शेष गुणस्थानोमें संज्ञी-
पर्याप्त एक ही जीवसमास होता है।
मार्गणास्थानोंमें जीवसमासोको संक्षेपसे दिखाते हैं।
तिरियगदीए चोद्दस हवंति सेसेसु जाण दो दो दु ।
मग्गणठाणस्सेवं णेयाणि समासठाणाणि ॥ ६९९ ॥

। गोम्मटसारः । २५९ -- - तिर्यम्गतौ चतुर्दश भवन्ति शेषेषु जानीहि द्वौ द्वौ तु । मार्गणास्थानस्यैवं ज्ञेयानि समासस्थानानि ॥ १९९ ॥ अर्थ-मार्गणास्थानके जीवसमासोंको संक्षेपसे इसप्रकार समझना चाहिये कि तिर्यम्ग- तिमार्गणा तो चौदह जीवसमास होते है। और शेष समस्त गतियोंमें दो दो ही जीवस- मास होते हैं। गुणस्थानों में पर्याप्ति और प्राणोंको बताते है। पज्जत्ती पाणावि य सुगमा भाविंदयं ण जोगिम्हि । तहि वाचुस्सासाउगकायत्तिगद्गमजोगिणो आऊ ॥ ७०० ॥ पर्याप्तयः प्राणा अपि च सुगमा भावेन्द्रियं न योगिनि । तस्मिन् वागुच्छासायुष्ककायत्रिकद्विकमयोगिन आयुः ॥ ७०० ॥ अर्थ-पर्याप्ति और प्राण ये सुगम है, इसलिये यहां पर इनका पृथक् उल्लेख नहीं करते; क्योकि वारहमे गुणस्थानतक सब ही पर्याप्ति और सब ही प्राण होते है । तेहरमे गुणस्थानमें भवेन्द्रिय नहीं होती; किन्तु द्रव्येन्द्रियकी अपेक्षा छहों पर्याप्ति होती है। परन्तु प्राण यहापर चार ही होते है-वचन श्वासोच्छास आयु कायवल । इसी गुणस्थानमें वचनबलका अभाव होनेसे तीन और श्वासोच्छासका अभाव होनेसे दो प्राण रहते हैं। चौदहमे गुणस्थानमें काययोगका भी अभाव होजानेसे केवल आयु प्राण ही रहता है । क्रमप्राप्त संज्ञाओंको गुणस्थानोंमें बताते है । छट्ठोत्ति पढमसण्णा सकज्ज सेसा य कारणावेक्खा । पुवो पढमणियट्टी सुहुमोत्ति कमेण सेसाओ ॥ ७०१ ॥ पष्ठ इति प्रथमसंज्ञा सकार्या शेषाश्च कारणापेक्षाः । अपूर्वः प्रथमानिवृत्तिः सूक्ष्म इति क्रमेण शेषाः ॥ ७०१ ॥ अर्थ-मिथ्यात्व गुणस्थानसे लेकर प्रमत्तपर्यन्त आहार भय मैथुन और परिग्रह ये चारों ही संज्ञा कार्यरूप होती है। किन्तु इसके ऊपर अप्रमत्त आदिको जो तीन आदिक संज्ञा होती है वे सव कारणकी अपेक्षासे होती है । छटे गुणस्थानमें आहारसंज्ञाकी व्युच्छित्ति होजाती है । शेष तीन संज्ञा कारणकी अपेक्षासे अपूर्वकरणपर्यन्त होती है । यहांपर ( अपूर्वकरणमें ) भयसंज्ञाकी भी व्युच्छित्ति होजाती है । शेष दो सना अनिवृत्तिकरणके सवेभागपर्यन्त होती है । यहा पर मैथुनसंज्ञाका विच्छेद होनेसे सूक्ष्मसापरायमें एक परिग्रह संज्ञा ही होती है । इस परिग्रह संज्ञाका भी यहां विच्छेद होजानेसे उपर उपशातकपाय गदि गुणस्थानोमें कोई भी सना नहीं होती।

२६० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । मग्गण उवजोगावि य सुगमा पुव्वं परविदत्तादो। गदिआदिसु मिच्छादी परूविदे रूविदा होंति ॥ ७०२ ॥ मार्गणा उपयोगा अपि च सुगमाः पूर्व प्ररूपितत्वात् । गत्यादिषु मिथ्यात्वादौ प्ररूपिते रूपिता भवति ॥ ७०२ ॥ अर्थ-पहले मार्गणास्थानकमें गुणस्थान और जीवसमासादिका निरूपण करचुके हैं इसलिये यहां गुणस्थानके प्रकरणमें मार्गणा और उपयोगका निरूपण करना सुगम है। भावार्थ-मार्गणा और उपयोग किसतरह सुगम है यह संक्षेपमें यहां पर स्पष्ट करते हैं । मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें नरकादि चारो ही गति पर्याप्त और अपर्याप्त होती है । सासादन गुणस्थानमें नरकगतिको छोड़कर शेष तीनों गति पर्याप्त अपर्याप्त होती है । और नरक गति पर्याप्त ही है । मिश्रगुणस्थानमें चारों ही गति पर्याप्त ही होती है । असंयत गुणस्था- नमें प्रथम नरक पर्याप्त भी है अपर्याप्त भी है। शेष छहों नरक पर्याप्त ही है । तिर्यग्ग- तिमें भोगभूमिज तिर्यंच पर्याप्त अपर्याप्त दोनों ही होते है । कर्मभूमिन तियच पर्याप्त ही होते है । मनुष्यगतिमें भोगभूमिज मनुष्य और कर्मभूमिज मनुष्य भी पर्याप्त अपर्याप्त दोनों प्रकारके होते हैं । देवगतिमें भवनत्रिक पर्याप्त ही होते है । और वैमानिक देव पर्याप्त मी होते है और अपर्याप्त भी होते है । देशसंयत गुणस्थानमें कर्मभूमिज तियंच और मनुष्य ये दो ही और पर्याप्त ही होते है । प्रमत्तगुणस्थानमें मनुष्य पर्यात ही होते है। किन्तु आहारक शरीरकी अपेक्षा पर्याप्त अपर्याप्त दोनों होते है । अप्रमत्तसे लेकर क्षीणकषायपर्यन्त मनुष्य पर्याप्त ही होते है । सयोगकेवलियोंमें पर्याप्त तथा समुद्धातकी अपेक्षा अपर्याप्त भी मनुष्य होते है । अयोगकेवलियोंमें मनुष्य पर्याप्त ही होते है । इन्द्रि- यमार्गणाके पांच भेद है । ये पाचो ही मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें पर्याप्त अपर्याप्त दोनों प्रकारके होते है । सासादनमें पाचो अपर्याप्त होते है; और पंचेन्द्रिय पर्याप्त भी होता है अर्थात् अपर्याप्त अवस्थामें पांचो ही इन्द्रियवालोके सासादन गुणस्थान होता है, किन्तु पर्याप्त अवस्थामें पंचेन्द्रियके ही सासादन गुणस्थान होता है । मिश्रगुणस्थानमें पंचेन्द्रिय पर्याप्त ही है। असंयतमें पंचेन्द्रिय पर्याप्त वा अपर्याप्त होते है। देशसंयतसे लेकर अयोगी- पर्यन्त सर्वगुणस्थानोंमें पंचेन्द्रिय पर्याप्त ही होते है; किन्तु छटे गुणस्थानमें आहारककी अपेक्षा और सयोगीमें ममुद्वातकी अपेक्षा अपर्याप्त पंचेन्द्रिय भी होता है । कायके छह भेद है । पांच स्थावर और एक त्रस । ये छहों मिथ्यात्वमें पर्याप्त अपर्याप्त दोनो होते है। सासादनमें वादर-पृथ्वी जल वनस्पती तथा द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय असंज्ञी पंचेन्द्रिय अपर्याप्त ही होते है और संज्ञी पचेन्द्रिय पर्याप्त अपर्याप्त दोनो ही होते है । मिश्रगुणस्थानसे लेकर अयोगीतक संज्ञी त्रसकाय पर्याप्त ही होता है, किन्तु असंयत गुणस्थानमें तथा गोम्मटसारः। ~ २६१ आहारककी अपेक्षा प्रमत्तमें और समुद्धातकी अपेक्षा सयोगीमें संज्ञीत्रसकाय अपर्याप्त भी होता है । भावयोग आत्माकी शक्तिरूप है यह पहले कहचुके है । मन-वचन-कायके निमित्तसे जीवप्रदेशोंके चंचल होनेको द्रव्य योग कहते है। इसके तीन भेद हैं, मन वचन काय । इसमें मन और वचनके चार २ भेद है--सत्य असत्य उभय अनुभय । काययोगके सात भेद है-औदारिक वैक्रियिक आहारक और इन तीनोंकेमिश्र तथा कार्माण । इस प्रकार योगके पन्द्रह भेद होते है । इनमेंसे किस २ गुणस्थानमें कितने २ योग होते है यह बतानेकेलिये आचार्य सूत्र करते है- तिसु तेरं दस मिस्से सत्तसु णव छट्ठयम्मि एयारा । जोगिम्मि सत्त जोगा अजोगिठाणं हवे सुण्णं ॥ ७०३ ॥ त्रिषु त्रयोदश दश मिश्रे सप्तसु नव पष्ठे एकादश । योगिनि सप्त योगा अयोगिस्थानं भवेत् शून्यम् ॥ ७०३ ॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टि सासादन असंयत इन तीन गुणस्थानोमें उक्त पन्द्रह योगोंमेंसे आहारक आहारकमिश्रको छोड़कर शेष तेरह योग होते है । मिश्रगुणस्थानमें उक्त तेरह- योगोंमेंसे औदारिकमिश्र वैक्रियिकमिश्र कार्माण इन तीनोके घटजानेसे शेष दश योग होते है। इसके ऊपर छट्टे गुणस्थानको छोडकर सात गुणस्थानोमें नव योग होते है, क्योंकि उक्त दश योगोंमेंसे वैक्रियिक योग और भी घट जाता है । किन्तु छटे गुणस्थानमें ग्यारह योग होते हैं, क्योंकि उक्त दश योगोंमेंसे वैक्रियिक योग घटता है और आहारक आहा- रकमिश्र ये दो योग मिलते है । सयोगकेवलीमें सातयोग होते है, वे ये है-सत्यमनोयोग अनु- भयमनोयोग सत्यवचनयोग अनुभयवचनयोग औदारिक औदारिकमिश्र कार्माण। अयोगकेवलीके कोई भी योग नहीं होता । भावार्थ-इस सूत्रमें प्रत्येक गुणस्थानमें कितने २ योग होते है उनको बताकर अब वेदादिक मार्गणाओको बताते है । वेदके तीन भेद है, स्त्री पुरुष नपुंसक । ये तीनो ही वेद अनिवृत्ति करणके सवेद भागपर्यन्त होते है-आगे किसी भी गुणस्थानमें नहीं होते । कपायके चार भेद है । क्रोध मान माय लोम-इनमें प्रत्येकके अनतानुबन्धी आदि चार २ भेद होते है । इस प्रकार कपायके सोलह भेद होते है । इनमेंसे मिथ्यात्व और सासादन गुणस्थानमें अनतानुबन्धी आदि चारो कपायका उदय रहता है। मिश्र और असंयतमें अनंतानुवधीको छोडकर शेष तीन कपाय रहते है । देशसंयतमें प्रत्या- ध्यान और संज्वलन ये दो ही कपाय रहते है । प्रमत्तादिक अनिवृत्तिकरणके दूसरे भागप- र्यन्त संज्वलन कषाय रहता है। तीसरे भाग संज्वलनके मान माया लोम ये तीन ही भेद रहते है-क्रोध नहीं रहता । चौथे भागतक माया और लाभ, तथा पांचमे भागतक बादर लोभ रहता है । दशमे गणस्थान तक सूक्ष्मलोभ रहता है । इसके ऊपर सर्व गुणम्यान कपायरहित २६२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । ही है । ज्ञानके आठ मेद है, कुमति कुश्रुत, विभंग, मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय, केवल । इनमें आदिके तीन मिथ्या और अंतके पांच ज्ञान सम्यक् होते है । मिथ्यादृष्टि सासादनमें आदिके तीन ज्ञान होते है। मिश्रमें भी आदिके तीन ही ज्ञान होते है, परन्तु वे विपरीत या समीचीन नहीं होते; किन्तु मिश्ररूप होते है। असंयत देशसंयतमें सम्यग्ज्ञानों से आदिके तीन होते है । प्रमत्तादिक क्षीणकषायपर्यन्त आदिके चार सम्यग्ज्ञान होते है। सयोगी अयो- गीमें केवल केवलज्ञान ही होता है। संयमका सामान्यकी अपेक्षा एक सामायिक; किन्तु विशेष अपेक्षा सात भेद है। असंयम देशसंयम सामायिक छेदोपस्थापना परिहारविशुद्धि सूक्ष्मसांपराय यथाख्यात । इनमें आदिके चार गुणस्थानोमें असंयम और पांचमे गुणस्था- नमें देशसंयम होता है । प्रमत्त अप्रमत्तमें सामायिक छेदोपस्थापना परिहारविशुद्धि ये तीन संयम होते है । आठमे नवमेमें सामायिक छेदोपस्थापना दो ही संयम होते है । दशमे गुणस्थानमें सूक्ष्मसापराय होता है । इसके ऊपर सब गुणस्थानोंमें यथाख्यात संयम ही होता है । दर्शनके चार भेद है, चक्षु अचक्षु अवधि केवल । मिश्रपर्यन्त तीन गुणस्थानोंमें चक्षु अचक्षु दो दर्शन होते है । असंयतादि क्षीणकषाय पर्यन्त चक्षु अचक्षु अवधि ये तीन दर्शन होते है । सयोगी अयोगी तथा सिद्धोंके केवलदर्शन ही होता है। लेश्याके छह भेद है, कृष्ण नील कापोत पीत पद्म शुक्ल । इनमें आदिकी तीन अशुभ और अंतकी तीन शुभ है । आदिके चार गुणस्थानोमे छहो लेश्या होती है । देशसंयतसे लेकर अप्रमत्तपर्यन्त तीन शुभ लेश्या होती है । इसके ऊपर सयोगी पर्यन्त शुक्ल लेश्या ही होती है । और अयोगी गुणस्थान लेश्यारहित है । मध्यमार्गणाके दो भेद है, भव्य अभव्य । मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें भव्य अभव्य दोनो होते है । सासादनादि क्षीणकषायपर्यन्त भव्य ही होते है । सयोगी और अयोगी भव्य अभव्य दोनोसे रहित है । सम्यक्त्वके छह भेद है, मिथ्यात्व, सासादन, मिश्र, उपशम, वेदक, क्षायिक । मिथ्यात्वमें मिथ्यात्व, सासादनमें सासादन, मिश्रमे मिश्र सम्यक्त्व होता है। असंयतसे अप्रमत्ततक उपशम वेदक क्षायिक तीनो सम्यक्त्व होते है । उसके ऊपर उपशमश्रेणीमें-अपूर्वकरण आदि उपशांतकषायतक उपशम और क्षायिक दो सम्यक्त्व होते है । क्षपक श्रेणीमें-अपूर्वकरण आदि समस्त गुणस्थानोमें तथा सिद्धोके क्षायिक सम्यक्त्व ही होता है। संज्ञीमार्गणाके दो भेद है-एक संज्ञी दूसरा असंज्ञी । प्रथम मिथ्यात्व गुणस्थानमें संज्ञी असंज्ञी दोनों ही मार्गणा होती है। इसके आगे सासादन आदि क्षीणकषायपर्यन्त संज्ञी मार्गणा ही होती है । सयोगी अयोगीके मन नहीं होता अतः कोई भी संज्ञा नहीं होती। आहारमार्गणाके भी दो भेद है-एक आहार दूसरा अनाहार । मिथ्यादृष्टि सासादन असंयत सयोगी इनमे आहार अनाहार दोनों ही होते है । अयोगकेवली अनाहार ही होते है। शेष नव गुणस्थानोमें आहार ही होता है ।

गोम्मटसारः। गुणस्थानोंमें मार्गणाओंको वताकर अब उपयोगको बताते है । दोण्हं पंच य छञ्चेव दोसु मिस्सम्मि होति वामिस्सा । सत्तुवजोगा सत्तसु दो चेव जिणे य सिद्धे य ॥ ७०४ ॥ द्वयोः पञ्च च छट् चैव द्वयोर्मिश्रे भवन्ति व्यामिश्राः । सप्तोपयोगाः सप्तसु द्वौ चैव जिने च सिद्धे च ॥ ७० ४ ॥ अर्थ-दो गुणस्थानों में पांच, और दोमें छह, मिश्री मिश्ररूप छह, सात गुणस्थानोंमें सात, जिन, और सिद्धोंके दो उपयोग होते है । भावार्थ-उपयोगके मूलमें दो भेद हैं, एक ज्ञान दूसरा दर्शन । ज्ञानके आठ भेद है, इनके नाम पहले वता चुके है। दर्शनके चार भेद है इनके भी नाम पहले गिना चुके है । इसतरह उपयोगके बारह भेद है । इनमेंसे मिथ्यात्व और सासादनमें आदिके तीन ज्ञान और आदिके दो दर्शन ये पांच उपयोग होते है । असंयत और देशसंयतमें मति श्रुत अवधि तथा चक्षु अचक्षु अवधिदर्शन ये छह उपयोग होते है। मिश्र गुणस्थानमें ये ही छह उपयोग मिश्ररूप होते है । प्रमत्तादि क्षीणकषायपर्यन्त सात गुणस्थानों में मनःपर्ययसहित सात उपयोग होते है। सयोगी अयोगी तथा सिद्धोंके केवलज्ञान और केवलदर्शन ये दो ही उपयोग होते हैं। इसप्रकार गुणस्थानों में वीसप्ररूपणानिरूपणनामा इक्कीसमा अधिकार समाप्त हुआ । इष्टदेवको नमस्कार करते हुए आलपाधिकारको कहनेकी प्रतिज्ञा करते है। गोयमथेरं पणमिय ओघादेसेसु वीसभेदाणं । जोजणिकाणालावं वोच्छामि जहाकम सुणह ॥ ७०५ ॥ गौतमस्थविरं प्रणम्य ओघादेशयोः विंशभेदानाम् । योजनिकानामालापं वक्ष्यामि यथाक्रमं शृणुत ॥ ७०५ ॥ अर्थ-सिद्धोको वा वर्धमान-तीर्थकरको यद्वा गौतमगणधरस्वामीको अथवा साधुसम्- हको नमस्कार करके गुणस्थान और मार्गणाओके योननिकारूप वीस भेदोंके आलापको क्रमसे कहता हूं सो सुनो। ओघे चोदसठाणे सिद्धे वीसदिविहाणमालावा। वेदकपायविभिण्णे अणियट्टीपंचमागे य ॥ ७०६ ॥ ओये चतुर्दशस्थाने सिद्धे विंशतिविधानामालापाः । वेदकपायविभिने अनिवृत्तिपञ्चभागे च ॥ ७०६ ॥ अर्थ-चौटर गणस्थान और नौदह मार्गणास्थानाम उक्त वीस प्रपणाओंके सामान्य पर्याद अपर्याप्त ये नीन आन्टाप होते है । वेद और कपायकी अपेक्षामे अनिवृत्तिकरणके पान भागामें पंच आलाप भिज २ सममने चाहिये ।

२६४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । गुणस्थानोंमें आलापोंको बताते है। ओघे मिच्छदुगेवि य अयदपमते सजोगिठाणम्मि । तिण्णेव य आलावा सेसेसिको हवे णियमा ॥ ७०७ ।। ओघे मिथ्यात्वद्विऽके पि च अयतप्रमत्तयोः सयोगिस्थाने । त्रय एवचालापाः शेषेप्वेको भवेत् नियमात् ।। ७०७ ॥ अर्थ-मिथ्यात्व सासादन असंयत प्रमत्त सयोगकेवली इन गुणस्थानोंमें तीनो आलाप होते है। शेष गुणस्थानोंमें एक पर्याप्त ही अलाप होता है। इसी अर्थको स्पष्ट करते है । सामण्णं पज्जत्तमपज्जत्तं चेदि तिण्णि आलावा । दुवियप्पमपज्जत्तं लद्धीणिवत्तगं चेदि ॥ ७०८ ।। सामान्यः पर्याप्तः अपर्याप्तश्चेति त्रय आलापाः । द्विविकल्पोऽपर्याप्तो लब्धिनिर्वृत्तिकश्चेति ॥ ७०८ ॥ अर्थ-आलापके तीन भेद है-सामान्य पर्याप्त अपर्याप्त । अपर्याप्तके दो भेद है-एक लब्ध्यपर्याप्त दूसरा निवृत्त्यपर्याप्त । दुविहं पि अपज्जत्तं ओघे मिच्छेव होदि णियमेण । सासणअयदपमत्ते णिव्वत्तिअपुण्णगो होदि ॥ ७०९ ॥ द्विविधोप्यपर्याप्त ओघे मिथ्यात्व एव भवति नियमेन । सासादनायतप्रमत्तेषु निर्वृत्त्यपूर्णको भवति ॥ ७०९ ॥ अर्थ—दोनों प्रकारके अपर्याप्त आलाप समस्त गुणस्थानोमेसे मिथ्यात्व गुणस्थानमें ही होते है । सासादन असंयत प्रमत्त इनमें निवृत्यपर्याप्त आलाप होता है । भावार्थ-अप- याप्तके जो दो भेद गिनाये है उनमेसे प्रथम गुणस्थानमें दोनों और सासादन असंयत प्रमत्त इनमें एक निर्वृत्त्यपर्याप्त ही होता है; किन्तु सामान्य और पर्याप्त ये दोनो आलाप सर्वत्र -पाचो गुणस्थानोंमें होते हैं। जोगं पडि जोगिजिणे होदि हु णियमा अपुण्णगत्तं तु । अवसेसणवट्ठाणे पज्जत्तालावगो एक्को ॥ ७१० ॥ योगं प्रति योगिजिने भवति हि नियमादपूर्णकत्वं तु । अवशेषनवस्थाने पर्याप्तालापक एकः ॥ ७१० ॥ अर्थ-सयोगकेवलियोंमें योगकी ( समुद्धातकी ) अपेक्षासे नियमसे अपर्याप्तकता होती है, इसलिये उक्त पांच गुणस्थानोंमें तीन २ आलाप और शेष नव गुणस्थानोंमें एक पर्याप्त ही आलाप होता है ।

गोम्मटसारः । २१५ क्रमप्राप्त चौदह मार्गणाओमें आलापोंका वर्णन करते है। सत्तण्डं पुढवीणं ओघे मिच्छे य तिण्णि आलावा । पढमाविरदेवि तहा सेसाणं पुण्णगालावो ॥ ७११॥ सप्तानां पृथिवीनामोघे मिथ्वात्वे च त्रय आलापाः । प्रथमाविरतेपि तथा शेषाणां पूर्णकालापः ॥ ७११ ॥ अर्थ-सातो ही पृथिवियोमें गुणस्थानोमेंसे मिथ्यात्व गुणस्थानमे तीन आलाप होते है। तथा प्रथमा पृथिवीके अविरत गुणस्थानमें भी तीन अलाप होते है । शेष पृथिवि- योमे एक पर्याप्त ही आलाप होता है। भावार्थ-प्रथम पृथिवीको -प्रथम पृथिवीको छोड़कर शेष छह पृथिवियोमें सासादन मिश्र असंयत ये तीन गुणस्थान पर्याप्त अवस्थामे ही होते है। अतः इन छह पृथिवीसम्बन्धी तीन गुणस्थानोमें और प्रथम पृथिवीके सासादन तथा मिश्रमें एक पर्याप्त ही आलाप होता है, शेष स्थानोमे तीनो ही आलाप होते है। तिरियचउक्काणोघे मिच्छदुगे अविरदे य तिण्णे व । णवरि य जोणिणि अयदे पुण्णो सेसेवि पुण्णो दु ॥ ७१२ ॥ तिर्यक्चतुष्काणामोघे मिथ्यात्वद्विके अविरते च त्रय एव । नवरि च योनिन्ययते पूर्णः शेषेऽपि पूर्णस्तु ॥ ७१२ ॥ अर्थ-तिर्यञ्च पांच प्रकारके होते है--सामान्य, पंचेन्द्रिय, पर्याप्त, योनिमती, अप- यप्ति । इनमेंसे अंतके अपर्याप्तको छोडकर शेष चार प्रकारके तिर्यंचोंके पाच गुणस्थान होते है । जिनमेसें मिथ्यात्व सासादन असंयत इन गुणस्थानोमें तीन २ आलाप होते है। इसमें भी इतनी विशेषता है कि योनिमती तिर्यचके असंयत गुणस्थानमें एक पर्याप्त आलाप ही होता है। शेष मिश्र और देशसंयतमें भी पर्याप्त ही आलाप होता है। तेरिच्छियलद्धियपज्जत्ते एक्को अपुण्ण आलावो । मूलोघं मणुसतिये मणुसिणिअयदम्हि पज्जत्तो ॥ ७१३ ॥ तिर्यग्लब्ध्यपर्याप्ते एकः अपूर्ण आलापः । मूलोचं मनुप्यत्रिके मानुप्ययते पर्याप्तः ॥ ७१३ ॥ अर्थ-लेव्यपर्याप्त तियचोंके एक अपर्याप्त ही आलाप होता है । मनुप्यके वार भेट है। सामान्य, पर्याप्त, योनिमत, अपर्याप्त । इनमेंसे आदिके तीन मनुष्योंके चौदह गण- स्थान होते हैं। उनमें गणम्थानसामान्यक समान ही आलाप होत है। विशेषता इतनी १मदा नराश नहीं हो अपनी कि योनिमा मनुष्य के हो आदि गुरम्यान किस नाद हो सस्ने 4 में मरे भादवी प्रधानामे पर्गन ६ । अतएव पदर्भ भारपेयी भक्षा रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् | है कि असंयत गुणस्थानवर्ती मानुषीके एक पर्याप्त ही आलाप होता है भावार्थ-गुण- स्थानोंमें जिस क्रमसे आलापोका वर्णन किया है उस ही क्रमसे मनुष्यगतिमें भी आला- पोंको समझना चाहिये; किन्तु विशेषता यह है कि योनिमत् मनुष्यके असंयत गुणस्था- नमें एक पर्याप्त आलाप ही होता है। मणुसिणि पमत्तविरदे आहारदुगं तु णत्थि णियमेण । अवगदवेदे मणुसिणि सण्णा भूदगदिमासेज्ज ॥ ७१४ ।। मानुष्यां प्रमत्तविरते आहारद्विकं तु नास्ति नियमेन । अपगतवेदायां मानुष्या संज्ञा भूतगतिमासाद्य ॥ ७१४ ॥ अर्थ- जो द्रव्यसे पुरुष है; किन्तु भावकी अपेक्षा स्त्री है ऐसे प्रमत्तविरत जीवके आहारक शरीर और आहारक आगोपाड्ग नामकर्मका उदय नियमसे नहीं होता । वेदर- हित अनिवृत्तिकरण गुणस्थानवाले भावस्त्री-मनुष्यके जो मैथुनसंज्ञा कही है वह भूतगति- न्यायकी अपेक्षासे कही है। मावार्थ-जिस तरह पहले कोई सेठ था परन्तु वर्तमानमें वह सेठ नहीं है तो भी पहलेकी अपेक्षासे उसको सेठ कहते है। इसी तरह वेदरहित जीवके यद्यपि वर्तमानमें मैथुनसंज्ञा नहीं है तथापि पहले थी इसलिये वहा पर मैथुनसंज्ञा कही जाती है । इस गाथामे जो तु शब्द पड़ा है उससे इतना विशेष समझना चाहिये कि स्त्रीवेद या नपुंसकवेदके उदयमे मनःपर्यय ज्ञान और परिहारविशुद्धि संयम भी नहीं होता । द्रव्यस्त्रीके पाच ही गुणस्थान होते है, किन्तु मावमानुषीके चौदहो गुणस्थान होसकते है । इसमें भी भाववेद नौमे गुणस्थानसे ऊपर नहीं रहता । तथा आहारक ऋद्धि और परिहारविशुद्धिसंयम- वाले जीवोंके द्वितीयोपशम सम्यक्त्व नहीं होता । णरलद्धिअपज्जत्ते एक्को दु अपुण्णगो दु आलावो। लेस्साभेदविभिण्णा सत्त वियप्पा सुरठाणा ॥ ७१५ ॥ नरलव्ध्यपर्याप्ते एकस्तु अपूर्णकस्तु आलापः । लेश्याभेदविभिन्नानि सप्त विकल्पानि सुरस्थानानि ॥ ७१५ ॥ अर्थ--मनुष्यगतिमें जो लब्ध्यपर्याप्तक है उनके एक अपर्याप्त ही आलाप होता है देवगतिमें लेश्याभेदकी अपेक्षासे सात विकल्प होते है । भावार्थ-देवगतिमें लेश्याकी अपेक्षासे सात भेदोको पहले वताचुके है कि; भवनत्रिकमे तेजका जघन्य अंश, सौधर्मयु- गलमें तेजका मध्यमाश, सनत्कुमार युगलमें तेजका उत्कृष्ट अंश और पद्मका जघन्य अंश, ब्रह्मादिक छह स्वर्गोमें पद्मका मध्यमांश, शतारयुगलमें पद्मका उत्कृष्ट और शुक्लका जघन्य अश, आनतादिक तेरहमें शुक्लका मध्यमाश, अनुदिश और अनुत्तरमें शुक्ललेश्याका उत्कृष्ट अंग होता है।

गोम्मटसारः । २६७ सव्वसुराणं ओघे मिच्छदुगे अविरदे य तिण्णव । णवरि य भवणतिकप्पित्थीणं च य अविरदे पुण्णो ॥ ७१६ ॥ सर्वसुराणामोधे मिथ्यात्वद्विके अविरते च त्रय एव । नवरि च भवनत्रिकल्पस्त्रीणां च च अविरते पूर्णः ॥ ७१६ ॥ अर्थ-समस्त देवोके चार गुणस्थान सम्भव है । उनमेंसे मिथ्यात्व सासादन अविरत गुणस्थानमें तीन २ आलाप होते है। किन्तु इतनी विशेषता है कि भवनत्रिक देव और कल्पवासिनी देवी इनके असंयत गुणस्थानमे एक पर्याप्त ही आलाप होता है। मिस्से पुण्णालाओ अणुद्दिसाणुत्तरा हु ते सम्मा। अविरद तिण्णालावा अणुहिसाणुत्तरे होति ॥ ७१७ ॥ मिश्रे पूर्णालापः अनुदिशानुत्तरा हि ते सम्यञ्चः । अविरते त्रय आलापा अनुदिशानुत्तरे भवन्ति ।। ७१७ ॥ अर्थ-नव ग्रैवेयकपर्यन्त सामान्यसे समस्त देवोके मिश्र गुणस्थानमें एक पर्याप्त ही आलाप होता है । इसके ऊपर अनुदिश और अनुत्तर विमानवासी सब देव सम्यग्दृष्टि ही होते है; अतः इन देवोके अविरत गुणस्थानमे तीन आलाप होते है । क्रमप्राप्त इन्द्रियमार्गणामें आलापोको बताते है। बादरमुहमे इंदियबितिचउरिदियअसण्णिजीवाणं । ओघे पुण्णे तिण्णि य अपुण्णगे पुण अपुण्णो दु ॥ ७१८॥ वादरसूक्ष्मैकेन्द्रियाद्वित्रिचतुरीन्द्रयासंजिनीवानाम् । ओघे पूर्णे त्रयश्च अपूर्णके पुनः अपूर्णस्तु ॥ ७१८ ।। अर्थ-एकेन्द्रिय-बादर सूक्ष्म, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, असंज्ञी पंचेन्द्रिय जीवो. मेंसे जिनके पर्याप्ति-नामकर्मका उदय है उनके तीन आलाप होते है । और जिनके अपर्याप्ति- नामकर्मका उदय होता है उनके लब्भ्यपर्याप्त ही आलाप होता है । भावार्थ-निवृत्यपर्याप्तके भी पर्याप्ति नामकर्मका ही उदय रहता है अतः उसके भी तीन ही आलाप होते है। सण्णी ओघे मिच्छे गुणपडिवण्णे य मूलआलावा । लद्धियपुण्णे एक्कोऽपजत्तो होदि आलाओ ॥ ७१९ ॥ सध्याचे मिन्यात्वे गुणप्रतिपन्ने च मूलालापा. । ल यपणे एकः अपर्याप्तो भवति आलापः ॥ ७१९ ॥ अर्थ-संज्ञी जीवो जितने गुगम्यान होते है उनमसे मिथ्यादृष्टि या विशेष गणम्या- नको प्राप्त होनेवाले मूलके समान ही आगप समझने चाहिये । और ट्रब्यपालक मजी. एक अपाम तो आलाप होता है। भावार्थ-मनी जीगेमस नियंउ पांच ही

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रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
गुणस्थान होते है । इनमेंसे मिथ्यात्व सासादन असंयतमें तीन २ आलाप होते है । और
मिश्र देशसंयतमें एक पर्याप्त ही आलाप होता है। दूसरे संज्ञी जीवोंमें सामान्य गुणस्थानोमें
जो आलाप कहे है उसी तरह समझना चाहिये । संज्ञी जीवोंमें नारकी और देवोके चार
तथा मनुप्योके चौदहो गुणस्थान होते हैं।
क्रमप्राप्त कायमार्गणाके आलापोको दो गाथाओंमे गिनाते है।
मूआउतेउवाऊणिञ्चचदुग्गदिणिगोदगे तिण्णि ।
ताणं थूलेदरसु वि पत्तेगे तदुभेदेवि ।। ७२० ॥
तसजीवाणं ओघे मिच्छादिगुणे वि ओघ आलाओ।
लद्धिअपुण्णे एक्कोऽपज्जत्तो होदि आलाओ ॥ ७२१ ॥
म्वतेजोवायुनित्यचतुर्गतिनिगोदके त्रयः ।
तेषां स्थूलेतरयोरपि प्रत्येके तद्दिभेदेपि ॥ ७२० ॥
त्रसजीवानामोघे मिथ्यात्वादिगुणेऽपि ओघ आलापः ।
लब्ध्यपूर्णे एक अपर्याप्तो भवत्यालापः ॥ ७२१ ॥
अर्थ-पृथिवी जल अग्नि वायु नित्यनिगोद चतुर्गतिनिगोद इनके स्थूल और
सूक्ष्म
भेटोमें तथा प्रत्येकके सप्रतिष्ठित अप्रतिष्ठित दो भेदोमें तीन २ आलाप होते है । त्रसजीवोमें
चौढह गुणस्थान होते है। इनके आलापोमें कुछ विशेषता नहीं है । गुणस्थानसामान्यके
जिस तरह आलाप वताये है उसी तरह यहा भी समझने चाहिये । पृथ्वीसे लेकर त्रसपर्यंत
जितने भेद है उनमें जो लब्ध्यपर्याप्त है उनके एक लब्ध्यपर्याप्त ही आलाप होता है ।
योगमार्गणामें आलापोंको बताते है।
एक्कारसजोगाणं पुण्णगदाणं सपुण्णआलाओ।
मिस्सचउक्कस्स पुणो सगएकअपुण्णआलाओ ।। ७२२॥
एकादशयोगानां पूर्णगताना स्वपूर्णालाप. ।
मिश्रचतुष्कस्य पुनः स्वकैकापूर्णालापः ॥ ७२२ ॥
अर्थ --चार मनोयोग चार वचनयोग सात काययोग इन पन्द्रह योगोंमेंसे औदारिक
मित्र वैक्रिषिकमित्र आहारकमिश्न कार्माण इन चार योगोको छोड़कर शेष ग्यारह योगोमें
अपना २ एक पर्याप्त आलाप होता है। और शेप उक्त चार योगोमें अपना २ एक अप-
मेन आप ही होता है।
अमीष्ट मार्गणाओंके आलापोंको सक्षेपमें कहते है ।
बंदादाहारोत्ति य सगुणट्ठाणाणमोघ आलाओ।
वरि च संदित्थीणं णत्थि हु आहारगाण दुगं ॥ ७२३ ॥

गोम्मटसारः। - है २६९ केदादाहार इति च स्वगुणस्थानानामोघ आलापः । नवरि च षण्ढस्त्रीणां नास्ति हि आहारकानां द्विकम् ॥ ७२३ ॥ अर्थ-वेदमार्गणासे लेकर आहारमार्गणापर्यन्त दशमार्गणाओंमें अपने २ गुणस्थानके समान आलाप होते है । विशेषता इतनी है कि जो भावनपुंसक या भावस्त्रीवेदी है उनके आहारक-काययोग और आहारक--मिश्रकाययोग नहीं होता । भावार्थ-जिस २ मार्ग- णामें जो २ गुणस्थान सम्भव है और उनमें जो २ आलाप बताये है वे ही आलाप उन २ मार्गणाओंमें होते है, इनको यथासम्भव लगालेना चाहिये । गुणस्थानोंके आलापोंको पहले बता- चुके है अतः पुनः यहांपर लिखनेकी आवश्यकता नहीं है। गुणजीवापजत्ती पाणा सण्णा गइंदिया काया। जोगा वेदकसाया णाणजमा दंसणा लेस्सा ॥ ७२४ ॥ भव्वा सम्मत्तावि य सण्णी आहारगा य उवजोगा। जोग्गा परूविदवा ओघादेसेसु समुदायं ॥ ७२५ ॥ गुणजीवाः पर्याप्तयः प्राणाः संज्ञाः गतीन्द्रियाणि कायाः । योगा वेदकषायाः ज्ञानयमा दर्शनानि लेश्याः ॥ ७२४ ॥ भव्याः सम्यक्त्वान्यपि च संज्ञिनः आहारकाश्चोपयोगाः । योग्याः प्ररूपितव्या ओघादेशयोः समुदायम् ॥ ७२५ ॥ अर्थ-चौदह गुणस्थान, चौदह जीवसमास, छह पर्याप्ति, दश प्राण, चार संज्ञा, चार गति, पाच इन्द्रिय, छह काय, पन्द्रह योग, तीन वेद, चार कपाय, आठ ज्ञान, सात संयम, चार दर्शन, छह लेश्या, भव्यत्व अभव्यत्व, छह प्रकारके सम्यक्त्व, सज्ञित्व, असंज्ञित्व, आहा- रक अनाहरक, वारह प्रकारका उपयोग इन सबका यथायोग्य गुणस्थान और मार्गणास्थानों में निरूपण करना चाहिये । भावार्थ---इन वीस स्थानोमेंसे कोई एक विवक्षित स्थान शेष स्थानोंमें कहां २ पर पाया जाता है इस वातका आगमके अविरुद्ध वर्णन करना चाहिये । जैसे चौदह गणस्थानोमसे कौन २ सा गुणस्थान जीवसमासके चौदह भेदों से किस २ विवक्षित भेदमें पाया जाता है । अथवा जीवसमास या पर्याप्तिका कोई एक विवक्षित भेद- रुप स्थान किस २ गणस्थानमें पाया जाता है इसका वर्णन करना चाहिये । इसी प्रकार दूसरे स्थानों में भी समझना चाहिये । जीसमाममें कुल विशेषता है उसको बताते है। ओये आदेसे वा सण्णीपजंतगा हवे जत्थ । तत्त च उणवीसंता इगिविंतिगुणिदा हवे ठाणा ।। ७२६ ।।

रायचन्द्रनशास्त्रमालायाम् । २७० ओघे आदेशे वा संज्ञिपर्यन्तका भवेयुर्यत्र । तत्र चैकोनविंशाता एकद्वित्रिगुणिता भवेयुः स्थानानि ॥ ७२६ ॥ अर्थ- ---सामान्य ( गुणस्थान ) या विशेषस्थानमे ( मार्गणास्थानमें ) संजी पंचेन्द्रिय- पर्यन्त मूलजीवसमासोका जहा निरूपण किया है वहा उत्तर जीवसमासम्थानके भेद उन्नीसप- र्यन्त होते है। और इनका भी एक दो तीनके साथ गुणा करनेसे क्रममे उन्नीस अइतीम और सत्तावन जीवसमासके भेद होते है। भावार्थ-गुणस्थान और मार्गणाओंमें जहा संनि- पर्यन्त भेद वताये हैं, वहां ही जीवसमासके एकसे लेकर उन्नसिपर्यन्त भेद और पर्याप्त अपर्याप्त इन दो भेदोंसे गुणा करनेकी अपेक्षा अड़तीस भेद, तथा पर्याप्त निवृत्यपर्याप्त लब्ध्यपर्याप्त इन तनि भेदोंसे गुणा करनेकी अपेक्षा सत्तावन भेद भी समझने चाहिये । इसका विशेष स्वरूप जीवसमासाधिकारमें कहचुके है । गुणजीवे "--त्यादि गाथाके द्वारा बताये हुए वीस भेदोंकी योजना करते है। वीरमुहकमलणिग्गयसयलसुयग्गहणपयउणसमत्थं । णमिऊणगोयममहं सिद्धतालावमणुवोच्छं ।। ७२७ ।। वीरमुखकमलनिर्गतसकलश्रुतग्रहणप्रकटनसमर्थम् । नत्वा गौतममहं सिद्धान्तालापमनुवक्ष्ये ॥ ७२७ ॥ अर्थ-~अंतिम तीर्थकर श्रीवर्धमानस्वामीके मुखकमलसे निर्गत समस्त श्रुतसिद्धान्तके ग्रहण करने और प्रकट करने में समर्थ श्रीगौतमस्वामीको नमस्कार करके मै उस सिद्धान्ता- लापको कहूंगा जो कि वीर भगवान्के मुखकमलसे उपदिष्ट श्रुतमे वर्णित समस्त पदार्थोके प्रकट करनेमें समर्थ है। भावार्थ-जिस तरह श्रीगौतमस्वामी तीर्थंकर भगवान्के समस्त उपदेशको ग्रहण और प्रकट करनेमे समर्थ है उसी तरह यह आलाप भी उनके ( भग- वान्के ) समस्त श्रुतके ग्रहण और प्रकट करनेमें समर्थ है। क्योकि इस सिद्धान्तालापमें उन्ही समस्त पदार्थोका वर्णन है जिनको कि श्रीगौतमस्वामीने भगवान्के समस्त श्रुतको ग्रहण करके प्रकट किया है। पहले गुणम्यान जीवसमास आदि वीस प्ररूपणाओको बताचुके है उनमें तथा उनके उत्तर भेदोमें क्रमसे एक २ के ऊपर यह आलाप आगमके अनुसार लगालेना चाहिये कि विवक्षित किसी एक प्ररूपणाके साथ शेष प्ररूपणाओमेसे कौन २ सी प्ररूपणा अथवा उनका उत्तर भेद पाया जाता है । इनका विशेष स्वरूप देखनेकी जिनको इच्छा हो वे इसकी संस्कृत टीका अथवा बड़ी भापाटीकामें देखे । इन आलापोंको लगाते समय जिन बातोंका अवश्य ध्यान रखना चाहिये उन विशेष वातीको ही आचार्य यहा पर दिखाते हैं।

गोम्मटसारः । २७१ सव्वेसिं सुहमाणं काओदा सव्वविग्गहे सुक्का। सव्वो मिस्सो देहो कओदवण्णो हवे णियमा ॥१॥ सर्वेषा सूक्ष्माणां कापोताः सर्वविग्रहे शुक्लाः । सर्वो मिश्रो देहः कपोतवर्णो भवेन्नियमात ॥ १ ॥ अर्थ-पृथिवीकायादि समस्त सूक्ष्मकी कपोत लेश्या ही होती है । तथा समस्त विग्रहगतिसम्बन्धी कार्मणशरीरकी शुक्ल लेश्या होती है।तथा समग्र मिश्र शरीर नियमसे कपोतवर्ण- वाला होता है । भावार्थः -अपर्याप्त आलापोमें द्रव्यलेश्या कपोत और शुक्ल ये दो ही होती है। इसके सिवाय और भी विशेषता है वह यह है कि मनुष्यरचना सम्बन्धी प्रमत्तादि गुण- स्थानोंमें जो तीन वेद वताये है वे द्रव्यवेदकी अपेक्षासे है । भाववेदकी अपेक्षासे एक पुरुष वेदही होता है । तथा स्त्री नपुंसक वेदके उदयमे आहारक योग मनःपर्यय ज्ञान परिहारविशुद्धि संयम ये नही होते । नारकियोके अपर्याप्त अवस्थामें सासादन गुणस्थान नहीं होता । तथा किसी भी अपर्याप्त अवस्थामे मिश्र गुणस्थान नहीं होता। इत्यादि और भी जो नियम " पुढवी आदि चउण्हं " आदि पहले वताये है उनको तथा अन्यत्र भी कहे हुए नियमोंको आलाप लगाते समय ध्यानमें रखना चाहिये । और भी कुछ नियमोंको गिनात है। मणपज्जवपरिहारो पढमुवसम्मत्त दोणि आहारा । एदेसु एक्कपगदे णस्थित्ति असेसयं जाणे ॥ ७२८ ॥ मनःपर्ययपरिहारौ प्रथमोपसम्यक्त्व द्वावाहारौ । एतेषु एकप्रकृते नास्तीति अशेपकं जानीहि ।। ७२८ ॥ अर्थ-मनःपर्यय ज्ञान परिहारविशुद्धि संयम प्रथमोपशमसम्यक्त्व और आहारकद्वय इनमे किसी भी एकके होनेपर शेप भेद नहीं होते ऐसा जानना चाहिये । विदियुवसमसम्मत्तं सेढीदोदिण्णि अविरदादीसु । सगसगलेस्सामरिदे देवअपज्जत्तगेव हवे ।। ७२९ ।। द्वितीयोपशमसम्यक्त्वं श्रेणितोऽवतीणेऽविरतादिपु । स्वकस्वफलेश्यामृते देवापर्याप्तक एव भवेत् ॥ ७२९ ॥ अर्थ-उपशमणिसे उतरकर अविरतादिक गुणस्थानोंको प्राप्त करनेवालोंमेंमे जो अपनी २ लेग्याके अनसार मरण करके देवपर्यायको प्राप्त करता है उमहीके अपर्याप्त अवस्थामें द्वितीयोपशम सम्यक्त्व होता है । भावार्थ-नारगतिमेसे एक देव अपर्याप्तको छोडकर अन्य किमी भी गतिकी अपर्याप्त अपम्याम द्विनीयोपशम सम्यक्त्व नहीं होता। रेया गोगरी मारियाग में योगा ममार पुन ।

२७२ रायचन्द्र नशास्त्रमालायाम् । गुणस्थानियोका स्वरूप बताकर गुणस्थानातीत सिद्धोंका स्वरूप बताते है । सिद्धाणं सिद्धगई केवलणाणं च दंसणं खयियं । सम्मत्तमणाहारं उवजोगाणक्कमपउत्ती॥ ७३० ॥ सिद्धानां सिद्धगतिः केवलज्ञानं च दर्शनं क्षायिकम् । सम्यक्त्वमनाहारमुपयोगानामक्रमप्रवृत्तिः ॥ ७३० ॥ अर्थ-सिद्ध जीवोके सिद्धगति केवलज्ञान क्षायिकदर्शन क्षायिकसम्यक्त्व अनाहार और उपयोगकी अक्रम प्रवृत्ति होती है। भावार्थ-छद्मस्थ जीवोके क्षायोपशमिक ज्ञान दर्शनकी तरह सिद्धोके क्षायिक ज्ञान दर्शनरूप उपयोगकी क्रमसे प्रवृत्ति नहीं होती, किन्तु युगपत् होती है । तथा सिद्धोके आहार नहीं होता-वे अनाहार होते है । क्योकि उनसे कर्मका और नोकर्मका सर्वथा सम्बन्ध ही छुटगया है । . णोकम्मकम्महारो कवलाहारो य लेप्पमाहारो ओजमणोवि य कमसो आहारो छभिहो णेयो ” ॥ १ ॥ इस गाथाके अनुसार नोकर्म और कर्म भी आहार ही है, अतः सर्वथा अनाहार सिद्धोके ही होता है । गुणजीवठाणरहिया सण्णापज्जत्तिपाणपरिहीणा। सेसणवमग्गणूणा सिद्धा सुद्धा सदा होति ॥ ७३१ ॥ गुणजीवस्थानरहिताः संज्ञापर्याप्तिप्राणपरिहानाः । शेषनवमार्गणोनाः सिद्धाः शुद्धाः सदा भवन्ति ॥ ७३१ ॥ अर्थ-सिद्ध परमेष्ठी, चौदह गुणस्थान चौदह जीवसमास चार संज्ञा छह पर्याप्ति दश प्राण इनसे रहित होते है। तथा इनके सिद्धगति ज्ञान दर्शन सम्यक्त्व और अनाहारको छोड- कर शेष नव मार्गणा नहीं पाई जाती । और ये सिद्ध सदा शुद्ध ही रहते है, क्योकि मुक्ति- प्राप्तिके वाद पुनः कर्मका बन्ध नहीं होता। अंतमें वीस भेदोके जाननेके उपायको बताते हुए इसका फल दिखाते है । णिक्खेवे एयत्थे णयप्पमाणे णिरुत्तिअणियोगे। मग्गइ वीसं भेयं सो जाणइ अप्पसब्भावं ॥ ७३२ ॥ निक्षेपे एकार्थे नयप्रमाणे निरुत्तयनुयोगयोः । मार्गयति विशं भेदं स जानाति आत्मसद्भावम् ।। ७३२ ॥ अर्थ-जो भव्य उक्त गुणस्थानादिक वीस भेदोको निक्षेप एकार्थ नय प्रमाण निरुक्ति अनुयोग आदिके द्वारा जानलेता है वही आत्मसद्भावको समझता है। भावार्थ-जिनके द्वारा पदार्थोका समीचीन व्यवहार हो ऐसे उपायविशेषको निक्षेप कहते है। इसके चार भेद है, नाम स्थापना द्रव्य और भाव । इनकेद्वारा जीवादि समस्त पदार्थोंका समीचीन व्यवहार होता है । जैसे किसी अर्थ विशेषकी अपेक्षा न करक विशेषकी अपेक्षा न करके किसीकी जीव यह गाम्मटसार । २७३ - संज्ञा रखदी इसको जीवका नामनिक्षेप कहते है। किसी काष्ठ चित्र या मूर्ति आदिमें किसी जीवकी । यह वही है ' ऐसे संकल्परूपको स्थापनानिक्षेप कहते है । स्थापनामें स्थाप्यमान पदार्थकी ही तरह उसका आदर अनुग्रह होता है। भविष्यत् या भूतको वर्तमानवत् कहना जैसे कोई देव मरकर मनुष्य होनेवाला है उसको देवपर्यायमें मनुष्य कहना, अथवा मनुष्य होनेपर देव कहना यह द्रव्यनिक्षेपका विषय है । वर्तमान मनुष्यको मनुष्य कहना यह भाव- निक्षेपका विषय है । प्राणभूत असाधारण लक्षणको एकार्थ कहते है । जैसे जीवका लक्षण दश प्राणोंमेंसे यथासम्भव प्राणोंका धारण करना या चेतना ( जानना और देखना ) है। यही जीवका एकार्थ है । वस्तुके अंशग्रहणको नय कहते है । जैसे जीवशब्दके द्वारा आत्माकी एक जीवत्वशक्तिका ग्रहण करना । एक शक्तिके द्वारा समस्त वस्तुके ग्रहणको प्रमाण कहते है। जैसे जीवशब्दके द्वारा संपूर्ण आत्माका ग्रहण करना । जिस धातु और प्रत्ययके द्वारा जिस अर्थमें जो शब्द निष्पन्न हुआ है उसके उसही प्रकारसे दिखानेको निरुक्ति कहते है। जैसे जीवति जीविष्यति अजीवीत् वा स जीवः जो जीता है या जीवेगा या जिया हो उसको जीव कहते है । जीवादिक पदार्थोके जाननेके उपाय विशेषको अनुयोग कहते है। उसके छह भेद । निर्देश ( नाममात्र या स्वरूप अथवा लक्षणका कहना ) स्वामित्व, साधन ( उत्पत्तिके निमित्त ) अधिकरण, स्थिति ( कालकी मर्यादा ) भेद । इन उपायोसे जो उक्त वीसप्ररूपणा- ओंको जानलेता है वही आत्माके समीचीन स्वरूपको समझ सकता है । ।। इति आलापाधिकारः॥ +e अन्तमे आशीर्वादस्वरूप गाथाको आचार्य कहते है। अज्जजसेणगुणगणसमूहसंधारिअजियसेणगुरु । भुवणगुरू जस्स गुरू सो राओ गोम्मटो जयतु ॥ ७३३ ।। आर्यसेनगुणगणसमूहसंधार्यजितसेनगुरुः । भुवनगुरुय॑स्य गुरुः स राजा गोम्मटो जयतु ॥ ७३३ ॥ अर्थ-श्रीआर्यसेन आचार्यके अनेक गुणगणको धारण करनेवाले और तीनलोकके गुरु श्रीअनितसेन आचार्य जिसके गुरु है वह श्री गोम्मट (चामुण्डराय ) राजा जयवन्ता रहो । دون ان تمام مت میں ایک امامت ॥ इति गोम्मटतारस्य जीवकाण्डसमप्तिमा Syanvi 3.

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अकारादिके क्रमसे गाथासूची । गाथा. अ. ... . ... . अयदोत्ति छ ... ... ... ... ... ... ... पृ. गाथा अंतोमुहुत्तमेत्ता ५६।१३५ अद्धत्तेरस वारस ७०११७१ अपदिद्विदपत्तेय १२४१३३५ | अपदिद्विदपत्तेया १४७१३८९ | अप्पपरोभय १४७१३९० १४९।३९८ अयदोत्ति हु अवि १५०१४०० , अवरद्दव्वादुवरिम १५२१४०८ अवरद्ध अवस्व २४७१६६९ अवरपरित्ता १५११४०३ अवरमपुण्णं ९२१२२८ अवरा पज्जाय... २७३।७३३ अवस्वीर इगि... ३५।८० अवस्वरिम्मि २०९१५६३ अवरे वरसंख... २१३१५७४ ] अवरोग्गाहण ३०१६८ अवरोग्गाहण १६५।४५२ | अवरो जुत्ताणत्तो १३५।३५७ | अवरोहिखेत्त २३२१६२८ अवरोहिखेत्त ९३३१३५० अवर तु ओहि ११६३०० अवर दव्वमुदा २२३१६०५ अवरसमुदा होति २७१६० १७१।४७३ अवर होदि अर्णत २१९/५९३ अवह यदित्ति १३२।३८७ अवाघादी अंतो १२११३१४ असहायणाण ७९।१९६ अमुराणमनखे १७७४९१ अमुराणमस १९९१५५२ अमृहाण वर . अजिंदा ज्ह देवा २४५३ १४९ अहिनमणिपमिय ९९.५२ पृ. गा १०२।२६१ ४७११४ ४१३९८ ८३१२०४ ११११२८८ १९०१५३१ २५४१६८८ १४५।३८३ ४४।१०६ ४५/१०९ ४.९९ २१२१५७२ ४३३१०२ १२४/३२२ ४४।१०८ ४३११०३ १४४१३७९ २०३१५७९ १४४१३७८ १४५।३८१ १४४१३८० १६५६४५० १८६५१९ १८७१५२२ १४६।३८६ १४११३६९ ९८॥२३७ २८१६४ १५८४२६ अइभीमदंसणेण अंगुलअसंख अंगुलअसख अंगुलअसंख अंगुलअसख अंगुलअसंख अंगुलअसख अंगुलअसंख अंगुलअसंख अंगुलमावलिया अंगोवगुदया . अजजसेणगुण अनवमलेच्छ... अन्नीवेसु य रूबी अद्वत्तीसद्धलवा अढविहकम्म अहण्ह कम्माण अहारसछत्तीसं अहेव सयसहस्सा अडकोडिएय अण्णाणतियं होदि अण्णोष्णुवयारेण अणुलोहं वेदतो अणुलोहं वेदतो अणुमसासंसे... अत्यक्तरं च... अथादो अत्यतर भत्थि अणता जीवा अतरभावप्पर... स्तरमरास्त सामुदुतसलं संतोमुत्तनेते पतोमुत्तमेत्तो अनोमानमेत ... • • ... अवरसमुदा सो ... ... ... . ... ... १५८१४२७ ... ... ... 1१६३ ११८३५ १.०1३८० ... अहिदागे पाय ...

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । गाथा. पृ गा पृ आ . गा. १५६.४१९ २१५ ५४।१३१ १६४।०४५ २४९।६७४ ५५1१३३ .. . ... ... . .. ... ... ई उ ... आउढरासि आगासं वजित्ता आणदपाणद आदिमछठाण आदिमसम्मत्त.. आदेसे... आभीयमासुर आमतणि आण आयारे सुद्दयडे आवलिअसंखसं आवलिअसखभा आवलिअसख आवलिअसख... आवलिअसख... आवलिअसख. आवलिअसंख... ११९/३०८ . ... आवलिअसख... ... गाथा इच्छिदरासिच्छे ८२।२०२ | इंदियकाये २१६।५८२ | इंदियकायाऊणि १५९।४३० | इंदियणोदिय १२५।३२६ | इंदियमणोहिणा ९।१९ इह जाहि वाहिया ૨૪ ११७।३०३ / ईहणकरणेण ९०१२२४ १३४१३५५ | उक्चस्सहिदि ८५।२११ / उक्क्स्ससखमेत्त ८५।२१२ | उत्तमअंगाम्ह १४५।३८२ | उदयावण्णसरी १५०३९९ | उदये दु अपुण्ण १५३१४१६ उदये दु वणप्फ १५६।४२१ | उप्पायपुचगाणिय १६७।४५७ | उवजोगो वण्ण २१३१५७३ / उववादगन्भजेसु १५११४०४ | उववादमारणतिय ९८।२५० | उववादा सुरणिरया २३८१६४३ | उववादे अच्चित्तं ९५।२३८ | उववादे सीदुसणं २४६१६६४ | उवसमसुहमाहार ४९.११८ / उवसते खीणे ५६।१३४ / उवसतरवीण ९४१२३४ | उबवादे पढम ९५।२३९ उवहीण तेत्तीसं १०५।२६९ उच्वंक चउरंक २२४१६०६ २४७१६६७ | एइंदियपहुदीण २५२१६८२ एइदियस्सफुसण एकटचचय १३५१३५८ | एकम्हि काल १०८१२७७ | एकं खलु अटकं एकचउक्वं चउ १९८४३ / एक्दरगदि १९।४४ | एकं समयपवद्ध २०१४७] एक्कारस जीवा ९८२४९ १२६१३३० ९४॥२३६ २४६१६६३ ५०1१२१ ७५1१८४ १३११३४४ २०९।५६४ ३८१९२ ८०11९८ ३८1९० ३७१८५ ३७१८६ ५८1१४२ १७११४७४ ५।१० १९७.४८ १९८१५५१ १२४।३२४ ... आवलियपुवत्त आवासया हु. आसवसवर आहरदि अणेण आहरदि सरीराणं आहारसरीरं. आहारदसणण आहारस्सुदयण आहारयमुत्तत्य आहारकायजो... आहारवग्गणादो आहारमारण आदारो पन्जत्ते ... ... ... ... - ... ... ... .. ... ... इ .. .. इगिदुगपचे इनिपुरिसे वत्तीनं अगिरगाइगि... दागवनिवरण विनिचखुच नोद १७६.४८७ ६८1१६६ १३४।३५३ २५॥५६ १२५/३२८ १२११३१३ १२९।३३७ ९९/२५३ २६८/७२२ ... ... . ...

गोम्मटसारः । गाथा. ... गाथा एगगुण तुज एगणिगोदसरीरे एदम्हि गुणहाणे एदम्हि विभज्जते एदे भावा णियमा एयक्खरादु एयदवियम्मि एयपदादो उव एया य कोडिकोडी पृ गा. ११११२८६ ३६.८२ २८१६३ १९३१५३८ ... . ख ... ... २२२।६०३ ७८1१९३ २४११६५० २९.६७ २३९१६४५ १९३११३७ एयंत बुद्ध ... ... ... एव असंसलोग एवं उवरि विणेओ एवं गुणसंजुत्त एवं तु समुग्घादे ग क .. पृ.गा. २५२१६०९ किमिरायचक्क ७९/१९४ कुम्मुण्णय जो २३३५१ केवलणाणदि १४९।३९७ केवलणाणाण, ६.१२ १२८१३३४ | खंधं सयल २१५1५८१ खंधा असंखलोगा १२८१३३६ खयउवसमिय... ४८1११६ खवगे य खीणमोहे ८1१६ खीणे दंसणमोहे १२७४३३१ खेत्तादो असुह ४६१११ २२५।६१० गइददियेसु १९६१५४६ गइउदयज गच्छसमा तका २७६१ गतनममनग ७६।१८८ / गदिठाणोग्गह १४०१३६७ / गदिठाणोग्गह १६०१४३२ गव्भजजीवाणं २४८१६७० गभणइत्थि १५३१४०९ गाउयपुधत्त ९५१२४० गुणजीवा १०३१२६३ गुणजीवा पज्जत्ती १३२।३४८ गुणजीवा पजत्ती १८०१५०१ गुणजीवठाण १८९।५२८/ गुणपञ्चइगो १५२।४०७ / गूटसिरसधि १५३१४११ गोयमथेरं १९८१५५० २१५५७९ घणअगुलपटम २१११५७ १८८1५२६ चउगाइसरव १८९१५२७ व पण चोद्दस १८७४५२३ वनचावर ११२१२९१ चनदिग्द १७७४९२ नरयण जपमा १९२६ नागदं २०१५५५ । नदो नमुनर ... कदकफलजुद कंदस्स व मूलस्स कप्पववहार ... कप्पसुराण कम्मायकाय कम्मइयवग्गणं कम्मेव य कम्मभवं कम्मोरालिल्य कमवण्णुत्तर काऊणीलविण्हं काऊ काऊ काऊ कालविलेसेण .. ५८1१४१ ५९/१४५ १५५।४१७ १३६।३६२ २१०१५६५ २२३१६०४ ३७१८७ १०८१२७९ १६६४५४ २।२ २५०१६७६ २६९/७२४ २७२।७३१ १४११३३१ ७६.१८६ २६३१७०५ :: ... " वाले चउग ... ... घ . ६५/१६० कालो छरेस्ता कालोवि य ववएसो पालं अस्सिय पिहाणं दिनि पिप गुमा च " . ... ... १२९/३३८ २५०१६७७ २७५६९० ११३:५२ १७/१८८३ ७.15७० १८६०५०८ ...

४ रायचन्द्र नशास्त्रमालायाछ । ... .. गाथा चत्तारिवि खे चदुगदि भन्यो चदुगदिमदि चदरविजंबु चरमधरासाण चरिमुव्वकेण चागी भद्दो चोक्खो चिंतियमचितिय चिंतियमचिंतिय चोद्दसमग्गण . ... पृ. गा. ५८1१४० २२९१६२१ २१७१५८७ १७२।४७७ २०९।५६२ १२४।३२३ ९८१२४८ २२११५९८ २३८६४२ २३३१६३१ ९६२४२ ३११७० १०७१२७६ १६११४३६ १९३१५३९ १७६१४८९ २६४१७१० १७५१४८६ ८९।२२० १४।३१ ... पृ.गा गाथा २४२१६५२ | जाहिव जासु व २४२।६५१ | जीवदुग उत्तई १६७६६० जीवा अणंतसंखा १३६॥३६० | जीवा चोइसमे २३६२६३७ | जीवाजीव दन्वं १२७१२३२ जीवाणं च य रासी १८४१५१५ जीवादोणंत १६११४३७ | जीवादोणतगु, १६५।४४८ जीविदरे कम्म १२९।३३९ / जेठावरवहु जेसिं ण सति १२५।४३७ | जेहिं अणेया २५९।७०१ / जोइसियवाण २१५।५८० | जोइसियंताणो २०८१५६१ जोइसियादो अहिया १७८१४९४ जोगपउत्ती ४८1११५ जोगं पडि जोगि २०८१५६० / जोगे चउरक्खा ६३११५५ जो णेव सच्चमोसो १३७१३६५ तसवहादु... १०६।२७३ १७०।४७० ठाणेहिंवि जोणीहिं छ ... छठाणाण आ छटोत्ति पढम . ... .. ... छदवावठाण छदव्वेसु य णाम छप्पयणील छप्पंचाधिय छपचणववि छस्सय जोयण छस्सयपण्णासाई छादयदि सयं छेत्तूणय परि- जो ठ ... ३३१७४ ज ण ... . .. .. . जगवदसम्मदि जत्तस्स पहं जत्येक्मरह जम्म खलु सम्म जम्बूदीवं भरहो जम्हा उरिम ज सामणं जह क्वणमग्गि जहरवादसजमो जह पुगापुग्गाई जह भाग्यहो जाटजरामरण जई अविगाभावी डा नाचन जाट निसल .. ८९४२२१ | णकसाये २१०१५६६ | णपमाए पढमा ७७११९२ | णट्ठासेसपमादो ३६.८३ णय कुणइ पक्खवाय ७८/१९४ णय जे भव्वाभवा २१४८ णय परिणमदि १७४४८१ णय पत्तियइ ... ८११२०२ णय मिच्छत्त... १६९।४६७ णय सचमोस ४८1११७ गरतिरियाणं ८१।२०१ णरतिरिय ६२११५१ ण रमति जदो ७३११८० गरलद्धिअपजत्त १८४१५१४ | णरलोएत्ति य... ११५॥२९८ णत्रमी अणक्खर १९११५३२ ५७११३८ २०४६ १८५६५१६ २०२१५५८ २१११५६९ १८३१५१२ २४२.६५३ ८८१२१८ १८९१५२९ ११५।२९२ ६०1१४६ २६६७१५ १६६४५५ ९०१२२५ ... ... ... . ... ... .. ... ...

गाम्मटसारः । गाथा ... ... ... ... णव य पदत्या वरि य दुस णवरि विसेस णवरि समुग्धा णवरि य सुक्का णवि इंदिय णाण पंचविह णाणुवजोगजुदाण णारयतिरिक्ख णिक्खित्तु विदिय णिक्सेवे एयत्थे णिचिदरधादु णिद्दापयले णिहापचण णिदेसवण्णपरि णिद्धत्तं लुक्सत्तं ... १६११४३५ २३६१६३९ ७४/१८३ १७४० ६७०४६८ ६४।१५७ ४४११०५ १६६१४५३ ३१/७१ २६८/७२१ ८३१२०५ ९७१२४७ ४४११०४ ७२११७५ १०४।२६६ १०५/२६८ १०५।२६७ ९७१२४५ . c.. गाया. २२९।६२० तत्तो लातव १००१२५४ तत्तो सखेज १२२।३१८ } तद्देमंगुलस्स १९७१५४९ तदियवखो अत २५५/६९२ तदियकसाय ७१११७३ तललीनमधुग २४८१६७२ तव्वठ्ठीए वरिमो २४.१६७५ | तन्विदियं कप्पाण ११११२८७ तसचदुजुगाण १६३८ तसजीवाणं २७२।७३२ ) तसरासिपुढवि ३९.८९ तस्समयबद्ध २५१५५ तस्सुवरि इगि १८३१५.१० तसहीणो ससारी १७७१४९० तहिं सव्वे मुद्ध २२४१६०८ तहिं सेसदेव २२५।६११ तं सुद्धसलागा २२६१६१४ ताणं समयपवद्धा २२६१६१२ तारिसपरिणाम २२८१६१७ तिगुणा सत्तगुणा २२८६१८ तिणकारिसि २२७१६१५ तिष्णिसया १८२१५०७ तिणिसयजोय ९४२३५ तिगिसयसहि १७८१४९५ तिण्हं दोण्डं दोण्हं २८१६२ ३९.९३ तियकालविसय १०६२७४ तिराधियमय २४५१६५९ तिरियगदीए १६३१४४३ तिरिया ... ... गिद्धणिद्धा ण ... . गिद्धस्स णिद्धण णिद्धिदरोली णिद्धिदरवरगु णिद्धिदरगुणा णिद्धिदरे सम ... जिम्मूलखध णियखेत्ते केवलि णिरया किण्हा णिस्सेसखीण... परश्या सल पित्थी व गोइंदियावरण जोइदियति को दियेनु नि पो कामुराला २५१५४ ६६.१६२ १०७/२७५ ५१११२२ ६५1१५९ ६९1१६९ १९११५३३ ७३।१७९ १६२१४४० २३११६२४ २५८/६९९ २६५/७१२ तिविपव पुण्ण ... ... ... १३१२९ तिरिवेअवर ... १५८८२४ ... त . १४३३७६ तिरियति कुटिल तिब्बतमा तिन्व १०३१२६२ निसय भगति नितेर टर ६५1१६१ तीन बानो जन्म १३५१३६६ नियाज पज २२६८८ तेशुमार ... ६०1१४७ १७९१८९९ २३१६२५ २६१७८३ १७११४७२ १९१५५.३ १९८५८१ .

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । गाथा पृ.गा तेउस्सय सहा . . पृ गा गाथा १९६१५४५ देवाणं अवहारा १९११५३४ देवेहिं सादिरेया १८०१५८० | देवेहिं सादिरेया १०१।२५७ देवेहि सादिरेगो १३३१३५१ देसविरदे २३७६४१ देसावहिवर २६५१७१३ देसोहिअवर ८६०२ १३ / देसोहिमज्झ १२२१३१७ | देसोहिस्स य १३४।३५६ | दोगुणणिद्धाणु तेऊ तेऊ तेऊ तेऊ पढमे सुक्के तेजा सरीरजठं तेत्तीसवेजणाई तेरसकोडी देसे तेरिच्छियलद्धि तेवि विसेसण तेसिं च समासे तो वासय अज्झय ... .. २३४१६३४ १०८/२७८ १०२।२६० २४६१६६२ ७११३ १५३३४१२ १४८1१९३ १४८३९४ १४२१३७३ २२६१६१३ २६३१७०४ २२७१६१६ थ दोण्हं पचय ध थावरकायप्पहुदी थावरकायप्प थावरकायप्प यावरकायप्प ... यावरकायप्प यावरकायप्प . थावरसंख थोवा तिसु ६८1१६७ ५७११३९ २१११५६७ १५०१४०१ २७१५९ १४५१३८४ १४६।३८७ ११३१२९३ द ... न .. १८८१५२४ प २५३१६८४ दोत्तिगपभव २५३१५८५ २५३१६८६ धणुवीसडदस २५५१६९१ धम्मगुणमग्गणा २५६१६९३ धम्मावम्मादीणं २५८१६९७ | धुवअद्भुवस्वे ७१।१७४ | धुवकोसुभय १०८।२८० धुवहारकम्म धुवहारस्स य १४३।३७५ धूलिगछक्कटाणे १६५/४४९ २२८१६१९ / नीलकस्सस १३११३४३ ८८।२१९ । पच्चक्खाणुदयादो ५५।१३२ पच्चक्खाणेव २४०१६४७ पंचक्खतिरि- २४०१६४८ पंचतिहिचहु २४११६४९ ) पंचवि इंदिय १७२।४७६ पंचरस पंच १०॥२२ पंचसंमिदो तिगुत्तो ८६।२९४ पंचव होति णाणा १५६१४२० पनत्तस्स य २१४१७७५ पनत्तसरीरस्स... ६१1१५० पनत्तमणुस्साण १६४५६ पत्नत्तीपचण १३०३४१ पज्जत्ती पाणावि २६४१७०९ पन्नायक्सर ... ... दव्वं खेतं कालं दव्व खेत्त काल दव्व छक्मकालिय दस चोदसठ्ठ दसविहसच्चे दस सण्णीण दसणमोह दसणमोहुद दसणमोहुव टनणवयसामाइय दहिदुडमिव वा दिग्गच्छेद दिग्गच्छेदेणपहिंद दिवसो भिग दीवंति जदो दुगनिगमवा हु दुगारमाहटादो जर ... . ... ... ... १४।३० १३११३४५ ३८१९१ १७२।४७५ ५४११२९ १७३१४७८ १७०१४७१ ११६२९९ ५०११२० ५२।१२५ ६५/१५८ ५०1११९ २५९/७०० १२२।३१६ ... ... ... ... ... -- गोम्मटसारः। ७ पृ गा पृ गा. ... ... . ४२११०० १०६।२७० १०६२७२ ९२१२२९ १३६३६१ २६॥५८ ११४॥२९५ २१९/५९२ २१६३५८४ ३६१८४ ... ... ... ... ... - फ ६४१६५ ... ... गाथा पडिवादी दे- पडिवादी पुण पढमक्खो अत- पठम पमदपमा- पढमुवसमसहि- पणजुगले तस पण्गदाल पण- पणणउदिसया पण्णवाणिजा पणिदरसभोय पणुवीस जोय- पत्तेयवुद्धतित्थ- पमदादिचउ- पम्मस्स य सहाण पम्मुक्स्ससमुदा परमणसिठियम परमाणुआदि परमाणुवग्गणादो परमाणूहि अणं- परमावहिवर परमावहिस्स परमापहिस्स परमोहिदच पहतिय उव- परममण पहासंराषण- पहागरोगन पसरोन- पारोन पारोबा- पस्मादि ओरी पहिमा जे पु- पुरगरगरणे पुगारवाद पुदिदगागणि पुराने आकर गाथा. १४२।३७४ | पुण्णजहणं १६४१४०६ पुरिसिच्छिसंढ १७१३९ पुस्गुणभोगे १६१३७ । पुरुमहदुदारु ५९।१४४ पुवं जलथल ३३.७६ पुव्वापुव्यप्फढय १३६।३६४ पुहपुहकसाय * ३२॥३४६ पोग्गलदव्वम्हि १२७॥३३३ पोग्गलदब्बाण ५६११३७ | पोतजरायुज- १५८।४२५ १३३१६३० फासरसगंध १७३१४७९ १९७१५४७ बंधो समयप- १८६५२० बहुवहुविहं च १६४१४४७ बहुभागे समभागो १७४१४८४ वहुवत्तिजादि २१९५९५ वहुविहबहुप्प- ९६२४४ बादरआऊ १५५१४१८ वादरतेऊबाऊ १४८१३९२ वादरपुण्णातेऊ १५८४१३ बादरवादर १५.१४१५ बादरमुहमे ९९।२५१ बादरसुहमा १५३१४१० वादसुहम १६८१४६२ वादरसजल- ८४।२०८ यादरसंजलणु १७३१४८० २४४।६५८ बास्तरसय १०२।२५९ चाहिरपाणेहिं १४८।३९५ १८२१५०६ वितिचपमाण १२११३१२ चिदियुवतम ८७१२१५ निहितिी चदुहिं ५१1१०४ दोज सोणीभूदे ७४११०१ ८०11९९ भत्त देवी पदप्पर ... २३८१६४४ ११९०३९ ७२।१७८ १२०१३१० १७५/४८५ १७८१४९६ ९३.२३२ १०१।२५८ २२२१६०२ ३२१७२ ७२११७६ ७४|१८२ १६९।४६५ १६९।४६६ ४७१११३ १३२१३४९ ... चावीस सत्त . ... . ... ... चितिचप पुग ४०१९६ .. ... ... २७१७१९ ७९.१९७ ७६।१८९ ... ... 4 म ... . भरदाम्म अद :: ८१२२२ १५११४०५ ८ रायचन्द्रजनशास्त्रमालायाम् । ... .. ... पृ गा २४३१६५७ २३०1६२३ २३०१६२२ ६.११ २५८१६९८ २५११६८० ७.१५ मिच्छे खलु गाथा भवमातियाण भवपञ्चडगो भवपच्चइगो भन्नत्तणस्स जोग्गा भवासम्मत्तावि भविया सिद्धी भावाण सामण्ण भावादो छल्लेस्सा भासमणवमा- भिण्गसमयहि भूआटतेउ भूआरतेउवाऊ ... .. ... ..- ... ... ... ... ... - २५६६९४ ११६१३०१ २६७७१७ २४५/६६१ ७५/१८५ २४७१६६७ ७६११८७ भोगा पुण्णग स . य १३६३६३ ... र पृ गा गाथा. १५६१४२८ मिच्छाइठी जीवो १४११३७० । मिच्छाइटी पावा १४२।३७२ मिच्छा सावय २०२१५५७ २६९१७२५ मिच्छे चोइस २०११५५६ मिच्छे सासण १७४|४८२ मिच्छोटयण २००१५५४ मिच्छो सासण २२४।६०७ मिच्छो मासण २४/५२ मिस्सुदये सम्मिस्स ३२।७३ | मिस्से पुण्णालाओ २६८७२० मीमासदि जो पुष १९०५३० मूलागपोरवीजा मूलसरीरमछं- २६०/७०२ मूले कंदे छल्ली १८७५२१ २५११६७८ याजकनामेनानन १६७१४५८ १३४१३७४ | रुऊणवरे अवरु ६01१४८ स्वुत्तरेण तत्तो १४६१३८५ १६५६४५१ १६२।४३८ | लद्धिअपुण्णं १६४४४४ लिंपइ अप्पीकीरइ २७११७२८ लेस्साणं खु ८७२१६ लेस्साणुक्कस्सा- ९११२२६ । लोगस्सअसखे- ९१।२२७ / लोगागासपदेमा २६६७१४ लोगागासपदेसे ६७११६४ | लोगागासय २४९।६७३ | लागाणमसं- १८३१५०९ लोगाणमस- १८३१५१३ १९५१५४३ वग्गणरासि ८११२०० वण्योदयेण वण्णादयसपा- ८1१७ | वनणद कालो ९.१८ वत्तावत्तपमाटे ४४|१०७ ... ४७११० ... रुसइ जिंदइ १८३१५११ .. ल ... मम्गणउवजोगा मज्झिमसेण मज्झिमचर मझिमदन खेतं मजिमपदक्खर- मगति जदो मणदचवम्गमा मणब्बवरगणा मणपनवच मणपनवं च मणपन्नवपरिहारो मणवयगाण मणवणाणं मगमहिह्याण मणुमिणिपमत्त नदिआवरण माटिनुदमोही मटो बुद्धिविहीणो मण पर मदिअमंचन- ममुग्युविंट नावाने मिन्न वदता निरबी जीना ... . ... ५२।१२६ १७६१४८८ १८५३५१७ १८११५०४ २१६५८३ २१७१५८६ २१८१५८८ २१८1५९० १२२।३१५ १७९१४९८ ... ... ... ... च ... . ... १४७१३९१ १७७४४९३ १९२१५३५ २१०१५६७ १५१३३ ... ... ...

गोम्मटसारः । 10 गाथा. वत्तीस अडदा- वत्थुणिमित्तं ... वस्थुस्स पदे- .. ... - वसदमिदिकसा- वयणेही वि वरकामोदस ववहारो पुण का- ववहारो पुण ति- ... ... ववहारो पुण पृ. गा. १५९।४२९ ८९१२२३ १५।३५ १५०1४०२ ३५।८१ २४४१६५७ २।३ १५११४०६ २१७१५८५ २२०१५९७ ३४१७७ १८.४१ ८३१२०६ १६०1४३३ २३७६४० १७०१४६९ १४।३२ ... ... ... ... ... - ववहारो य विय- वादरसुहमे वापणनरनो वासपुधत्ते खझ्या विउलमदीवि . विकहा तहा विग्गहगदिमा- विदावलिलोगाण विदियुवसम विवरीयमोहि विविहगुण विसजंतकूड विमयाण विस- चीरमुहकमल वारियजुदमदि चीन वीस पाहुट चेगुव्व पनत्ते... गुपिय आहारो पेन्धिय उत्तय पेगब्धियवरस- जगअय परलोर-, पेस्तोरणाए देशाटारतिनि- पृ गा गाथा. २३२१६२७ सक्कीसाणा पढमं २४८६७१ सको जम्बूदीवं १२०1३११ संखा तह पत्यारो १६९.४६४ सखातीदा सम २४.१६४६ सखावत्तय जोणी १८८५२५ सखावलिहिद . २१४१५७६ सखेओ ओघो २१४।५७७ | सखेज्जपमे वासे २१८१५८९ | सखेज्जासखेजा २१२१५७१ सखेज्जासंखे- २६७१७१८ सगजुगलम्हि .. १३५।३५९ सगमाणहिं विभत्ते २४४।६५६ सगसगअसंख १६०१४३९ | सगसगखेत्त १५।३४ सगसगअवहा.. २४६१६६५ सगहिय सयल ८४१२०९ | संजलणणोकसा- २५७१६९५ संजलगणोकसा- ११७१३०४ सटाणसमुग्धा- ९३३२३१ । सठाविदूण व ११७४३०२ सण्णाणतिग ११९.३०७ | सण्णाणरासि २७०/७२७ सणिस्स वार... ५४११३० सण्णी ओघे मिच्छे १३०॥३४२ सणी सणिप्प २५२१६८१ सत्ताह उवममदो ९६२४१ मत्तम्ह पुटवीणं ९३१२३३ सत्तदिणा छम्मामा १०१।२५६ मत्तमरिवदिम्मि ११८१३०६ / सत्तादी अंता ११०।२८५ सदसिवनसो... १०६०७१ नपुग्ण तु समग्ग ૧૮૫૭૨૩ महणासद्दहण २४७१९६६ मम्भावनगो मी १९४१५४० मम्मनदमघादि ६८१५०५ मम्मनदर - १८००३ गन्ननमिसरि- ... ... ... . ... २०१४५ १९४/५४२ १८१४२ २५३१६८७ १६८१४६३ ६८1१६८ २६७७१९ २५८१६९६ १२॥२६ २६५।११ ५८।१४३ १५७१४२३ २३३१६३२ ३९ १६४७९ २४३१६५४ ८८1१७ २१४।३८ १०१० १०९।२८२ ११.२४ ... .. . ... .. ... ... ... मओ हकमा स . ..

१० सयचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । गाथा. ... ... पृ गा. १९६५४४ ११४।२९४ १३.२८ १४०।३६८ ३९.९४ ७०1१७२ १२३३१९ १२३१३२० १२३१३२१ १४३१३७७ ... ... ... ... ... ... . ... ... . सम्मत्तरयण मम्मत्तुप्पत्तीए.. समयत्तयसखा सम्माइट्टी जीवो सम्मामिच्छुदये सव्वंगअगसभव सब च लोयणालिं सव्वमरवी सब्वसमासे सव्वसमासो सञ्चसुराणं ओघे सव्वावहिस्स एक्क सव्वपि पुब्वभगा सव्वेर्सि सुहमाणं सव्वोहित्ति य क- सपारी पंचक्खा सागारो उवजोगो सातरणि तरेण सामण्णजीव सामण्णा णेरइया सामण्णा पंचिंदी सामग्रेण य एवं सामोण तिपंती सामण्णं पज्जत्त सामाइयचउ साहरणवादरे नाहारणोढयेण साहारणमाहारो साहियनहस्समेकं मिवचाकिरियु- मिदमुद्धं निद्वातिम निद्वारा सिद्धगई मिलपुत्रवि सिलमेलवेणु मोदी नही तालं मोलेगि नंपत्तो प्र गा. गाया ९।२० सुक्क्स्स समुग्घा- २९।६६ | सुण्ह दुगइगि १०३।२६४ सुत्तादो तं सम्म १३१२७ सुदकेवलं च णाण १०२१ सुहमणिगोद १६३१४४१ सुहमणिगोद १५९।४३१ सुहमणिगोद २१८१५९१ | सुहमणिगोद ११४।२९६ | सुहमणिगोद १२६।३२९ सुहमणिगोद २६७१७१६ | सुहदुक्खसुवहु १५४६४१४ | सुहमेसु सख १५'३६ | सुहमेदरगुण १७८१८९७ सुहमणिवाते १५७१४२२ सुहमो सुहम ६३।१५४ | सेढी सूई अगुल ४।७ सेढी सूई पला- २१९१५९४ सेलगकिण्हे ३३१७५ | सेलठिकह ६२।१५२ | सेसहारसअसा ६१११४९ | सोलसय चउ ३७८८ सोवकमाणुवक्कम ३४१७८ सो सजम ण गि- ०६४।७०८ | सोहम्मसाण १४०।३६६ सोहम्मादासा- ८५।२१० | सोहम्मीसाणा ७७११९० | सोलससय ७७११९१ ४०१९५ हिदि होदि हु २४५१६६० हेछिमउक्क्स्सं १.१ २२०१५९६ हेट्ठा जर्सि २७२।७३० हेछिमछप्पुढवीणं ११०।२८३ | हेष्टिमछप्पुढवीण ११२१२९० होति अणियटियो ५१११२३ होति खवा इगि २९/६५ होदि अणंतिम .. ... १०९।२८१ ८४॥२०७ ४२११०१ ४१४९७ २५४६६८९ ६४।१५६ २२१२९९ ११३१२९२ ११०१२८४ १८६५१८ २३१५६२६ १०४।२६५ ११.२३ २३५१६३५ २३५/६३६ १६११४३४ १२८/३३५ .. ... .. ... ... .. ... ह . .. ... १६३१४४२ २२११६०० ४७११२ ५३।१२७ ६३११५३ २६.५७ २३३१६२९ १४६१३८८ ... ... ... ... ... ... ६

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Gommatsar [jeevkand]

Author
Siddhantshastri, Khoobchandra
Title
Gommatsar [jeevkand]
File name
Gommatsar [jeevkand]
Text
OCR done
Citation
1927
Published
2010/1
Publisher
Mumbai, Vaibhav Press
Language
Sanskrit
Pages
296
Library
Sanmati Library
Classification
Jian sahitya
DLI number
344497
Barcode
99999990234358.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
Copyright permitted
VMLT id
hz7QBqiXRdf
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Gommatsar [jeevkand]