Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Vegyapan Vegyan Aur Uska Upyogh
Front matter
!
स्वर्गीय वायू रामयदु भहाचार्य,
भूतपूय मधामध्यप, बोविहानंद सरस्वती विद्यालय,
CIENCE ॥ श्री. T विज्ञापन-विज्ञान और उसका उपयोग ग पोजनेता (रागसागार भूमिका टेसक- पापू कालीप्रसाद खेतान, पम्० ए०, पी० एल, पार ऐर-ला। INSHAS98333SisiSRSDX लेखक और प्रमशफ- कन्हैयालाल शर्मा, वी० ए० । "Advertising is fit very fue blood of moderm business."-~R HURBIDOE -- प्रथमयार १०००] ज्येष्ठ १६७ [ मूल्य सजिव १) जESस्वास्र
प्रसारक
कन्हैयालाल शर्मा, यी० ए०, .
१४७, हैरीसन रोग, कलकण
१
मुठक।
पं० मंपिकाप्रसाद पाजपेयी,
इरियनशनल प्रेस
१५१ पी मामापाजार लीट, फटकया।
'
ARSAMRAAT
समर्पण।
श्रीविभुमानन्द सरस्वती विद्यालयक भूतपूर्व
प्रपानामा सीप पावू रामयदु भट्टाचार्य
महोदयकी भदेस मास्माको लेसका यह प्रथम
प्रयास, उनके स्नेह प्रदर्शन मौर सयल शिक्षा
प्रदानके लिये,
सादर समर्पित ।
-
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भूमिका ।
मैं समझता है यह हममें मत्युक्ति नहीं होगी किम
छोटीछोटी समाजोंकी जोरकर जिनाबाहरी अगदसे परत
कम सम्बधि हवा, भौरी पनी मोवश्यक पी माप बना
लेती है लोगों की किसी किसी में विज्ञापनकी सहायता
नपस्य ना पड़ता है। ज्योहाकोसिमाज प्रारम्भिक भवसा
को पो हो ति करने लगती हपौर ऐकही भाषश्प.
कताको सिकरनेके लिये मनुष्योम प्रसिद्ध दिसा होने माती'
दस्योंही विज्ञापनकालावर मावि होता , बारम्भमें पाई।
मनमानमें ही क्यों नहीं घमान सभ्यतीमें। मनुष्यकी'
मावश्यकताए बहुत बड़े गई मोर उसती प्राय प्रत्येक
मोवश्यकतापी पूर्विक लिये ममेक प्रकारे साधन मिलते हैं।
इस अवलोमाजमनीचीका विकी मष्ठा करनी ही सह
विज्ञापन सगलता दिखलॉमी पड़ती है। यहतिक कि
मांजकल विज्ञापन पर सुन्दर के (Fine AED ART
मौर मण्ले पिशापनके लिये सुधी दो युरिभोर परिश्रम
मंगाना पडता है। वास्तवमै मत्यन्त सफल विपनाम का
और गम्भीर भाष तथा रसपाळे होते है कि
१
.
फोक वामनुपपोगी नही होआते। उनमें कविता समान
किरोती है। न केवल इतना ही, उनके सहारे पात भन
मिळवाओ मिरी कवितासे सपा नहीं प्राप्त होता है। मन्डे
विज्ञापनोंके नियम ध्यानमें माने लगते हैं मोर नालियों का
संप्रहकर उनका एक विशाल बनाना बहुत उपयोगी हो जाता है।
विज्ञापन विधा छ मामूली चीज नहीं है। युरोप और
अमेरिकामे इसके सिखानेका विशेष प्रबन्ध मौर विद्यापन
विशामके विण्यात भावार्य होते हैं। ऐसे ममेक- मिलेंगे
जिनकी जीविकाका एकमात्र मामार:-लिापन बनाना।
भारतवर्ष मी ऐसे मापमियोंका विकल ममाष नहीं है।
- विज्ञापनोंसे समाजकी तितिका पता लाता है।
पथा, समाजमें रोग भीरम्पमिवार बढाइमा हो तो दुषामंकि
और मश्लील विज्ञापन ही मधिक देना पड़ेगे। फिर जब
समान समति, करतार बाइसके शिान मी-अभी मछी,
पीजोंके होने लगते हैं। विज्ञापनको समाजके मस्सी हालका
पक प्रकारसे मतिबिम्ब समभाबा सकता है।
भारतवर्ष की पर्तमान, भषला: ऐसी है कि विकापनाका
उत्तरोत्तर प्रचार, बढ़ता-साया है। दूर दूर खानों के लिये
(केवल लामीय-व्यवहारके लिये ही मही) जितमा मात तैयार
होगा उतनी ही नियमित और सुनियन्त्रित-विज्ञापनकी भाषश्य.
कता अधिक होगी। मविप्प पिडापनापनकी मोर भारतमें
अधिकाधिक ध्यान होते दोन परता है।-:- । न
-उपयोगी होने के अतिरिक, यह विष मत्पन्न चिकामा
१ मिताली सामग्री पल सायन- शालामक भीतर छ चुने हुए लोगोंतकरीमापरमदा है। उलटेरस विधानके मसाले सयमापारणको दृष्टिके मामने सर रहते है। यह विज्ञापन विषयक विज्ञान मौर शिपन तो विकापन ही नहीं जबतक किजनता से माने, मौरसम राथा इससे मरोगे। मसएष यह स्पष्ट है कि ऐसी साम प्रिोसेजो विधामने से सबमम मोर उससे लाम तथा मामादमाप्त करें। मुरे हिन्दीमाषा भाषियों को समिक्षापन सम्पपी हिन्दीकी, जहातक में जामताई, प्रथम पुस्तकका परिचय देव बरा मानन्द होता है। मैंने इस पुस्तकका एकबार अपरोकन दिया है और मुझे यह पत पमन्द माई। मुझे पूर्ण भाशा है कि पाठकगण भी मेरी सम्मतिसे सहमत होंगे। ममी शिन्दी साहित्य व्यापारिक पुस्तकोंसे भरपूर नहीं। मतपय व्यापा रिक विपोंकी जो पुस्ता पर्ने यही मच्छी। विशेषकर ऐसी मुलिचित मौर गवेषणापूर्ण मंसित पुस्तकका तो गुत मादर मोर प्रचार होना चाहिये। प्रत्यकार उत्साही मोर परिश्रमी है भीर उनके इस प्रथम प्रपनमें जो इस उत्साह दिया जाएगा, व्यर्थ नहीं होगा। कालीप्रसाद खेतान। -
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។
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-
दो बातें।
पुस्तकके मावि पृष्ठपर अंग्रेजीकी जो सक्ति उछत की गई
है उसका अर्थ यह कि विज्ञापन माधुनिफ व्यापारका जीवन
रुधिर है। जिस प्रकार विना रफके प्राणियोंका जापन सम्भव
नहीं उसी भांति माजकल पिना विज्ञापनके घ्यापारका चलना
मसम्मषसा। भापके पास अच्छीसे मच्छी बीज मौजूद है
पर जवसक लोगोंपर इसके गुण म प्रगट करें, आप इसे पेच
नहीं सकते। केयल मासको प्रस्तुत कर रक्षमा सयतक लाम
दायक नहीं होता अवतक इसके प्रचारके उपायोंका भली प्रकार
हान न हो। इस समय धेशका प्रोद्योगिक उन्नतिकी मोर पूरा
ध्यान है। घड़ाघर लिमिटेड कम्पनियां खुल रही है, धारों
मोर मिलें और कारखाने स्थापित हो रहे हैं। इस मषस्थामें
माल देबनेके सर्वोत्तम और सरल उपार्योका मध्ययन परम
भावश्यक है। विज्ञापन विधान यह विधा है जो इन सपार्योंका
मनुसन्धानकर व्यापारकी उन्नतिमें प्रधामरूपसे सहायक
होती।
कुछ समय मा, लेखकको पावास्यदेशीय विद्वानों को इस
विषपपर लिखी हुई कतिपय पुस्तफोफे पढ़नेफा अवसर प्राप्त
इमा। इनमें केवळ पिडाफोक विषयकी ही पुस्तके महीं थीं,
किन्तसो विपन विद्या शपिशेष पर लिखी गई थीं।
हिम्दी में ऐसे महत्वपूर्ण विषयपर कोई स्वटम्म पुस्तक न होमके
.
1
.
कारण इसको लिषनेका साहस किया है। अंग्रेजी भाषाको
जिन पुस्तफोंसे कुछ मी सहायता मिली है उनके रचयिताभोंका
झक मामारी।
मातमें था कालीप्रसादजी खेतान एम्० ५०मी० 48०,
-पेट-छा महोदयके प्रति लेखक अपनी हार्दिक कृतज्ञता प्रगट
करता है जिन्होंने इस पुस्तफको परफर अपनी सम्मति देनेकी
कृपा की और इसकी भूमिका लिखफर उसे उत्साहित किया।
घह इसके लिये उमफा ऋणी है और अनेक धन्यवाद देता है।
विनीत,
लेखक
विषय-सूची।
वि. सं०
पृष्ठ
१
३
विषप
विषय प्रवेश
विज्ञापनोंका इतिहास
ममोविज्ञानसे सम्बन्ध
स्सामाषिक इच्छाप
घ्याम माकर्षित करता
विज्ञापन किस प्रकारके होने चाहिये
पळीलयाले विज्ञापन
सचित्र और रङ्गीन विज्ञापन
कैसे विहापम कहाँ पाना चाहिये
पार्टर भोर मान छोड़ना
मुमाना
दुफामदारीको सहायता
कुछ विशेष पाते
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विज्ञापन-विज्ञान
और उसका उपयोग ।
भरापान
अगर
विपय-प्रवेश
पोयामेर,
(राजपुतामा
मदारप
म्भव है इस पुस्तपके नामको परफर कई पाठक
स चौकेगे कि विज्ञापनके साथ "विज्ञान' शब्द कैसा?
परन्तु भारम्ममें "विज्ञान" शब्दको अर्थ समझना
मावश्यफ है। क्या फारण है कि कितनी ही पार
लम्ये चौड़े सचित्र विज्ञापनोंसे फुछ लाभ नहीं होता
मोर एक घार पंक्तिके छोटेसे विज्ञापनसे व्यापारीकी घस्तु पातकी
पातमें बिक जाती है। मच्छे विद्यापम यही होंगे जो कुछ विशेष
नियमोंका पालन करेंगे-वाई जान यूझ
फर, चाहे यिना जामेही। किन नियमीफा
पालन किया जाय कि लोगोंफा सनपर
मधिक ध्यान पड़े, मधिक फालतफ ये उन्हें स्मरण लें और
मधिकतर संध्यामें हम पस्तुमोको घे परीदने स्टगे जिनका
.
विज्ञान पाद!
विज्ञापन विज्ञान।
[२
HA
-
विज्ञापन उल्लेख करते हैं ? इन नियमोफा भनुसंधान करना
विज्ञापन "विज्ञान" का काम है।
परन्तु विज्ञापन क्या है मौर उनकी जरूरत क्यों होती है।
क्या विना इनकी सहायताके मनुष्य अपना माल नहीं घेच सकता
और क्या इसके लिये चूकानदारी यथो नहीं ? क्या विज्ञापन
अनिवार्य है?
पों तो साधारणतः विज्ञापनको अर्थ "प्रसिद्धि" है। अपने
पा अपनी धस्तुके विषयमें लोगोंको जना देना "विज्ञापन" होगा।
फिन्तु जिम प्रसिद्रिके लिये उभ्यय करमा परे, या मो विज्ञा-
पनदाताके उयोगका फल हो,वास्तयमें उसीको विज्ञापन सममना
माहिये। समाचारपत्रोंमें छपी हुई समालोचनाए विज्ञापन
नहीं हो सकती।
ममेरिफाफे एक लेखक विधापनको
परिभाषा इस
प्रकारकी है-*व्यापारिक विज्ञापन किसी
विज्ञापनको
परिभाषा।
व्यक्ति या उसके समूहफा दूसरोंको एक
ऐसा विशेष काम करने के लिये समझानेका
था है जिससे उस व्यक्ति या समूहको कुछ मार्थिक
लाम पहुंचे। परन्तु यह चेरा सनसे विना मिजमें । पात
किये, पोर ऐसे साधन द्वारा जिसके लिये उन्हें (प्यक्ति या
महको प्यय करना परता हो, होमी चाहिये।
"म्यय करना पड़वा हो" इसका अर्थ यह है कि विपन.
-
-
विषय प्रवेश
दाताको अधिकार रहे कि यह मपनी इच्छा या भनुभयसे
प्रसिद्धिके रूसमें परिवर्शन कर सके।
यह न समझ लेना चाहिये कि केपल छपी हुई सूचनाही
विज्ञापन है। साफूर लोग अपने इयाखानोंके सामने बहुधा एक
प्रकारकी लालटेन लगाते हैं जिससे लोगोंको मालूम हो कि
यहां साफर रहते हैं। यह भी विज्ञापन ही है। चश्मा पेखने
घाले भी अपनी दूकाईके बाहर एक वरा नकली चश्मा रखते है
जिससे लोग आम जाय फि घश्मा पेचनेवालेफी काम है।
से भी विद्यापम ही सममिये।
कितनी ही यार तो पारीकी वस्तु स्वय विज्ञापनका
काम करती है। समाहरणके लिये किसी छापेमानेको छपी
पुस्तके चित्र भादि उस छापेस्त्रानेके सम्बन्धमें विज्ञापनका
काम देते हैं।
ऊपर दी दुई परिमापा “मिना निजमें पास किये" पापांश
ध्यान देने योग्य है क्योंकि दुकानदारीसे यह विज्ञापनको
पृथक् कर देता है।
दूकानदारी भौर विज्ञापनों द्वारा माल बेचने में यह अन्तर
है कि दुकामदार निजमें प्राहकको अपनी
विद्यापप घस्तुके गुण सममाता है मौर उसे मम्तमें
मोल लेनेको राजी' करता है, पर
विज्ञापनदाता ऐसा नहीं कर सकता-यह प्राइपासे
दूकानदारी और
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घिपय प्रवेश
फिर मी इनसे लाम तभी होगा जप ये ठीक २ हानिक
रीतिसे प्रस्तुत किये जायेंगे। जिस
करसाम दायक हो। प्रकार मच्छे विज्ञापन लोगोंका मन मोह
देते हैं और उनके हवयमें प्रपल इच्छा
उत्पा कर देते है कि उलिक्षित घस्तु पात मच्छी भौर सस्ती है
रसे अवश्य घरीदना चाहिये, पैसेही निमपधिरख मनमाने
चिसापनोंसे लामकी मपेक्षा हामिही अधिक होती है। लोगकि
मनमें यह पात जम जाती है कि यातो पिठापनदाता सो महीं
है या विद्यापित घस्तुही दोपयुकफ है। इस घिपयको भागेके
मध्यामि उदाहरण सहित समझानेफा यम किया जायगा।
विज्ञापनोंकी तुलमा भाफसे की जा सकती है। माफ जिन
फार्माम लगाई आती है उम समीको पूरा करनेफी शक्ति इसमें
होती है। तथापि यिना पजिन या अन्य सहायक पंकि यह
शक्ति कुछ भी काम नहीं दे सक्ती-येफाम पड़ी रहती है।
उसी प्रकार व्यापारीके लिये मी विज्ञापनकी शक्तिका मूल्य
जिस रीतिसे इसका उपयोग किया जाता है उसी पर पूर्णनपा
मिर्मर फरसा है।
-
।
.
विज्ञापनोंका इतिहास ।
1
J
,
ज्ञापनोंका इतिहास यदा रोचक और शिक्षाप्रद विषय
वि है। छापेफी फल यननेके पहले यदि किसीफो कुछ
सूचना ऐनी होती तो अधिकतर मुहसे योलकर
उसे ऐसा करना पड़ता था। राजसम्बन्धी
सूचमा पा इश्तहारोंको सुनानेके लिये कुछ विशेष
कर्मचारी नियत रहते जो लोगोंको फिसी स्थान विशेष पर
एकत्र करके अपना संदेशा उन्हें सुमा
भारम्भमें मु इसे पोलकर दिया करते थे। विज्ञापन-सम्बन्धी
निषेदन भी पहुंघा उनकी उक्तियोंमें
सम्मिलित रहते।
दूसरा तरीका यह था कि जहां बहुत से लोग जमा होते, एक
दृष्टि
स्थानपर,
हायसे
अपया हायसे मिलकर लिमकर सूचना लगा दी जाती। प्राचीन
कालमें, रोममें, नहानेके स्थानोंम नोटिस
चिपकाये जासे थे, मास कळ छोटे मगरों में साकया में
सगाये जाते है।
पहने योग्य
.] यिमापनोंका इतिहा परन्तु अपसे आपको कल पमी है मौर ऊन साधारण किमु धापेको फल पढनेफा अभ्यास यदा है छपे हुए पननेपर परमान रूपमें विज्ञापनोंका उसगेसर पिकास दोता प्रचार पस्तागपा। गया है। कहा जा मफता है कि मुरणालाफे सरको फरने पर -आधुनिक विज्ञापनोंका भारम्म हमा। 1- गरिस्तानमें पहले पहल जो समाचारपत्र प्रकाशित गुमा वह सन् १६६०ई० में पिना विनापोंके निकला । फिन्तु इसके प्रकाशित होने के तीस पर्प पीछे 'मरफ्यूरियस पालिटियस" नामक पमने अपने फालमोमें खोई हुई चीजों, नौकरियों मादिफी सूचनाए छापना मारग्म कर दिया। यात अब्धी हा समाचार- पत्रके कालमोंफा व्यापारफे लिये प्रयोग करना लोग सरमने सगे। फिर मी विशपनों पर मनमामा फर लगाया गया इससे कुछ समय के लिये उनके प्रचारमें रफापट परी। सन् १८५३ ई. में यह कर उठा दिया गया जो फलत पहुत ही पुसिमानीका फाम सायित हुआ। यिमा विज्ञापनोंको भायके समाचार- पोंका घटना सम्भव नहीं। परन्तु विज्ञापनोंको वास्तषिफ उम्नति गत दो सदिपी, ८यों मौर ११ वी, में हुई हमार सच पूछिये तो पर बास्तविक प्रति व्यापारफी वास्तविक उन्नति भी इसी गत दामदियों में हुई। समयमें हुई विज्ञापनोंफा पाणिज्यकी . ग
[८
विज्ञापन विज्ञान
I
वृसिके साथ इतना घना सम्पन्ध रहा है कि १८ घी
सदीफे भारम्मसे पदि विज्ञापनोंका अध्ययन किया जाय
तो प्राय यह व्यापारकी पढती का ही अध्ययन होगा।
ज्यापारकी उमतिके साथ विज्ञापनोंफा प्रचार बढ़ता
गया
इनफा आजकलफे पाणिज्यमें क्या स्थान है यह इससे स्पष्ट है।
माफ और बिजलीफे आविष्कारसे व्यापारमें मवीन युग
माफ मोर विजप्तीके मा गया। इनकी सहायतासे चलनेवाली
भाषिकारने व्यापा-
कलोंसे इतना माल तैयार होने लगा कि
रमें मवीम युग सादिया। उसको येचने के लिये लोगोंफो अपनी सप
पुदि लगानी परी और विज्ञापनोंका महत्त्व पहुत बढ़ गया ।
उदाहरणके लिये के व्यवसायको नीजिये। टनिटेनमें
माफफा माविष्कार होनेके प्रथम वर्ष हीमें काका तैयारी माल
३०० सैकदा बढ गया। फिर अप इंगलिस्तानकी पहली रेर
मञ्चटर और लिवरपुलके बीच यमी तो यह पृद्धि ३०० सैकड़ा
और अधिक हो गयी। इतने और अधामकके पड़े हुए मालको
कैसे थेचा नाय यह प्रयोगोंको व्याकुळ करने लगा।
इस समपसे माल तैयार करमेकी कॉमें निरन्तर सरकी
होती गयी। तैयारी मालको ले जामेके लिये रेल अहाज मादि
भी दिनपर दिन पढ़ते गये और इममें सुधार होता गया।
तार और टेलीफोमके प्रचारसे पर यादि भेजनेमें लोगोंको
बड़ी मुविधा हुई। फलतः दिन दुना रात चौगुना तैयारी माल
पड़ने लगा। इसके साथ हमारों मई वीमें मौर भी धनती गयीं।
विज्ञापनोंका इतिहास इसका मर्य, मेसा हम ऊपर दिखा चुके हैं, यह है कि पेचनेका सयाल और भी जटिल हो गया। लोगोंने देखा कि माल पेचनेकी साधारण रीतिसे फाम नहीं चलेगा। माल इतना अधिक यनने लगा और इसे तैयार कर नेफे लिये इतने अधिक धनकी आवश्यकता होती गयी फि व्यापारियोंफो विज्ञापनोंका भाश्रय लेना ही पड़ा। विज्ञापनोंकी सहायतासे लालों मनुष्योंके पास व्यापारीफी, एक ही समयमें, पहुच हो सकती है और माल येचनेमें फी मदत मर्म भी पात फम पड़ता है, मतपय व्यापारियोने दिनोंदिन इनसे अधिकाधिक काम लिया हो तो इसमें माश्वयं ही फ्या? गत पीस पचीस वर्षो में तो विज्ञापनोफा भूप ही प्रचार गत पीस पचीस हुमा है। पहले की तरह अब मनमाने विज्ञापनोंसे भधिक लाम सम्मय नहीं। उम्पसि। प्रत्येक म्यवसायीको इनके विपयमें मध्य- न्यन करना पड़ता है। अमेरिका इनलेएर भादि पेशमि पर पर व्यवमायी इनमें अपरिमित धन व्यय कर डालते है। १५००० रुपया, हफ्ते में, विज्ञापनोंमें खर्च करना तो उनके लिये कोई मनोभी पात महीं समझी जाती। वे विज्ञापन "समर के सेनापति कई गाते है भौर प्राहकोंपर विजय "मास फर अपनी पस्तुका प्रचार पढाना उनका उद्देश्य रहता है। भोकी असाधारण
विज्ञापन विज्ञान
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वृद्धिके साथ इतना घना सम्बन्ध रहा है कि १८' वीं
सदीके आरम्मसे यदि विज्ञापनोंका अध्ययन किया जाय
तो प्राय यह व्यापारकी पड़ती का ही मध्ययन होगा।
व्यापारफी उमतिके साथ विज्ञापनोंका प्रचार बढ़ता गया।
इनका भाजकळके वाणिज्यमें क्या स्थान है यह इससे स्पष्ट है
माफ और बिजलीके आविष्कारसे व्यापारमें नवीन युग
माफ और विमलीके मा गया। इनकी सहायताले चलनेवाली
माविष्कारने व्यापा-
फलोंसे इतना माल तैयार होने लगा फि
रमें मवीम युग सादिया। उसको येचनेके लिये लोगोंको अपनी सब
बुद्धि लगानी पड़ी मोर विज्ञापनोंका महत्स्य पाहुत बढ़ गया।
उदाहरणफे लिये सके व्यवसायको लीजिये। प्रटग्रिटेनमें
माफफा आविष्कार होनेके प्रथम वर्ष ही काका तैयारी माल
३०० सैकड़ा पढ गया। फिर जप इगलिस्तानकी पहली रेल
मञ्च पर और लिवरपुलके पीय बनी तो यह पुचि ३.० सैकमा
और अधिफ हो गयी। इसमे और अचामकके धड़े हुए मालको
कैसे येषा जाय यह प्रश लोगोंको व्याकुल करने लगा।
इस समयसे माल तैयार करमेकी कलाम निरन्तर सरकी
होती गयी। तैयारी माळको ले जानेके लिये रेल जहाज , आदि
भी दिमपर दिन पढते गये भौर इनमें सुधार होता गया।
तार और टेलीफोम प्रचारसे पर आदि भेजनेमें लोगोंको
पड़ी मुविधा हुई। फलत: दिन दुना रात चौगुना तैयारी माल
पहने लगा। इसके साथ हमागें मई चीजें मोर मी बनती गयीं।
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विज्ञापनोंका इतिहास हास पसका मर्य, जैसा हम ऊपर दिया चुके है, यह है कि येचनेका सपाल मोर भो मटिल हो गया। लोगोंने देखा कि माल पेचनेकी साधारण रीतिसे फाम नहीं चरेगा। माल इतना अधिक पनने लगा और इसे तैयार कर नेके लिये इतने अधिक धनकी भाषश्पकसा होती गयी कि प्यापारियोंको विज्ञापनोंका भाश्रय लेना ही पड़ा। विप्तापनोंफी सहायतासे लाखों मनुप्योंके पास व्यापारीकी, एक ही समयमें, पद्धच हो सफती है और माल येचने की अदत पर्व मी पास फम पड़ता है, मतएव व्यापारियोने दिनोंदिन इनसे अधिकाधिक काम लिया हो तो इसमें आपर्य हो फ्या! गत पीस पचीस वर्षो में सो विज्ञापनोंका व ही प्रचार गत पीस पचीस हमा है। पहले की तरह अब मममामे भोंकी असाधारण विज्ञापनोंसे अधिक लाम सम्भय महीं। सम्नति। प्रत्येक व्यवसायीको दमके विषयमें मध्य- यन करना पड़ता है। अमेरिका गएर मावि देशों में पड़े पड़े ध्यघमायी इममें अपरिमित धन भ्यय फर डालते है। १५०००) रपया, हफ्तेमें, विधापनोंमें पर्य करना तो उनके लिये कोई मनोसी पास नहीं समझी जाती। ये विद्यापन- "समर के सेनापति कहे माते है और प्राइकोपर विजय माप्त कर अपनी पस्तुफा प्रचार पदामा सनका उद्देश्य
विज्ञापन-विज्ञान।
हवास
अमेरिफा आधि देशों में तो विज्ञापनोंकी शिक्षा देनेके लिये
स्कूल भी स्थापित हो चुके है। इनमें
विज्ञापन सम्मन्नी
अर्थशास्त्र, कैसे विज्ञापन लिखना चाहिये,
किन समाचारपत्र, भेगजीन मादि साध
नोंमें उन्हें छपाना उचित है इत्यादि सेकडों विपय सिखाये जाते
है। प्रतिवन्विताकी प्रबलताके कारण परे परे ज्यवसायी विक्षा
पन फुशल व्यकिपीको यष्टीपट्टी तनयाहॉपर फेघल इसलिये नियुक्त
फरते है कि ये मार्मिक और सुन्दर विष्ठापन तैयार किया करे ।
इधर कुछ समयसे विज्ञापन विषयक फुल फाम विज्ञापनोंकी
एजेंसियां करने लगी है। ये पजेंसियां
एसियां
विद्यापनदावा और पत्रपत्रिकाओके बीच
मध्यस्थका फाम देती है जिससे समय
पक्षके लिखने बनाने आदिका पातसा समय पच
भाता है। इलेएट आदि देशोंमें विज्ञापनवाले अपने
भनयारतक चलाते हैं जिनमें साता-
और समाचार पत्र ।
हिक मासिक सभी है।
विशेषकर अमेरिफाने तो पिठापनकि व्यवहारमें अपरिमित
उन्नति की है और इस विषयके ज्ञानको
अमेरिकन विज्ञापन।
पराकाष्ठातक पहुंचा दिया है। इसको
संसारके समी देश स्वीकार करते हैं।
मिस प्रकार दो और दो मिलकर चार होते हैं और इनमें पिसी
-
११] विज्ञापोंका इतिहास यातका सन्देह नहीं रह जाता उसी प्रकार से विशापोका पमा प्रभाष पड़ेगा इस विषयमें पहले ही निम्ध्यरूपसे कहा आ सकता है। अमेरिफामें विज्ञापनोंक सम्बन्ध कहावफ सन्मति हुई है इसका मामास केवल इसी यावसे हो सफता है फि कुछ समय हुमा पफ अमेरिकन लेखफने भपनी पुस्तकमें लिया था कि ममेरिकाका सयुक्त राज्य विज्ञापनोंमें प्रतिवर्ष ६१ करोड़ डालर लगभग २ मरव ४४ करोड़ रुपये म्यय फरता है। उसके दिये हुए मांफर इस प्रकार हैं समाचारपत्रोंम विज्ञापन २५ फरोगरालर सीधे हाक मारा विज्ञापन फार्म भौर डाक द्वारा करोए ५.लाश मालर मैगजीनफि विज्ञापन ६ करोड डालर दीवालोंपर विज्ञापम चिपकाना ३ बिजली द्वारा विज्ञापन २ ५० लाख डालर मधीन युतियों द्वारा ३ करोड प्रयोग विसालाना मौर नमूना ८० लाजावर सड़कोपर पलनेवाली गाड़ियों में विज्ञापन लमाना १ घरके भीतर पाजे द्वारा पांटमा थियेटर प्रोग्रामों में १० फरोए . 17 " बालर " ..हास " फुल जाम ६१ परा६० लादा "
विज्ञापन विमान।
[.१२
-
छालके आफसे पता चलता है कि यह संख्या पट फर
अब ७० करोस सालर तक पहुंच गयी है।
मैगजीन के विज्ञापनोंमें अमेरिकाकी कोई देश इस समय यरा-
परी महीं कर सकता और कुछ मैगीक विज्ञापनोंकी उपाई
सुन कर तो दांतोंके नोचे अगुली पानी परती है। त्रियोंकी
एक मेगमीममें एक पृष्ठ विज्ञापनकी छपाई एफ पारके लिये
१००० बालर अर्थात् प्राय १६०००) रुपये !
मनो-विधानसे सम्बन्ध ।
पारका
प्राबश्यकता।
एफ मात्र उद्देश्य प्रप्त मालको
व्या
वेचना है मौर माल पेचनेका सपसे सुगम
*
तथा उत्तम उपाय पिशापनाका व्ययहार है।
परन्तु इसके लिये मनोविज्ञान आमनेकी बड़ी जरूरत है।
विधापनदाताको मनोविज्ञानफा पास अठा झान रहना
चाहिये। ग्राइफके हदयपर वह सभी
मनोविज्ञानको
प्रभाव राक्ष सकता है जब उसकी मान
सिक स्थितिफा असे पूरा पान छो-कह
मा विज्ञापन भी पमा सफता है जप उसे पहलेसे यह मालूम
रहे कि किस प्रकारफे विज्ञापनका माफके मन पर कैसा
भसर पड़ेगा।
यपि संसारमें मनेक प्रकार मनुष्य है, एफफी प्रकृति और
विचार दूसरसे नहीं मिलते, पचपि मिन्न २
मपपस्वभावत्री
मवस्या और मम्याखोसे या शिक्षाकी कमी
मेसीले, मितने मनुष्य है उतनेही उनके
भाचरण-परन्तु पास्तवमें मनुष्य स्वभाष एक है मौर म कमी
1 विज्ञापन चिझान। [१५ हामा पदमाता है। यदि मनुष्य समाव एक न होता तो माम दो हनार पर्षके पश्चात् कालिदासकी कवितामोम हमें पद मानन्द नहीं मिलता जो पहल लोगोंको निम्मा पातामाषीक रोजेकी कारीगरी मौर सुन्दरताको देख भाज भी मोगरतने प्रसभ भौर फित न होते जितने शाहजहां यादशाहके समयमें होते थे। भून लगने पर सभीको भनकी मापश्यकता होती है चाहे पद धमी हो वा निम, सी हो या पुरुष शिक्षित हो या अशिक्षित। यह पात मित है कि कोई गेहूँ पसन्द करता है कोई पारा, मिसी को रसगुला मच्छा लगता है तो किसीको कलाकन्दमही मानन्द मिलता है और कोई यदि काटों पा एरीकी सहापतासे फुर्सीपर पठफर मोनन फरता है तो कोई ममीन पर बैठकर केवळ हायसे भोमन कर तृप्त होता है। पर मूल लगने पर सभी मनुष्य- चाहे किसी अवस्थामें क्यों न हो-भोजन प्राप्त करनेका बन करेंगे और समकि बास्ताविक व्यवहार प्राय एक ही होंगे। - झोप भानेपर संसारफे सभी मनुष्योंकी एक होमवस्था होगी- माणोंका लाल हो जाना, मामे वळ परमाना, पांघोंसे ओगे का काटमा और मुहिपोंको याद करना। हां यह बात दूसरी है कि दुश्मन सामने हो तो कोई हापोंका प्रपोग करता है, कोर लाठी सापता है मौर काई पिस्तौलका मुह रसके सामने कर देता है। सारांश यह कि मनुष्यका समाव एक ही है, मोर इसका वानिक रीति मध्ययन करना काम मनोविज्ञानका
२५]
मनो चिंचानसे सम्यन्ध
है, फिस स्थितिमें साधारणत मनुष्य फैसा माचरण करेगा यह
दिना मनोविज्ञानका मध्ययन फिये मानना सम्भव नहीं।
मतएव विज्ञापनलेसफफो मनोविज्ञानकी सहायतासे मपश्य
मान लेना चाहिये कि मनुष्य फेसे सोचता है, पाइरी जगतका
उस पर क्या प्रमाष पडता और किसी कार्यफो मारम्भ
करमे पहले उस मनमें फ्या २ पिचार रखते हैं। यदि यह
सफल होना चाहता हो तो उसे जान लेना उचित है कि कौनसी
वात मनुष्यका ध्यान मपनी ओर खींचती है और किस दातसे
'घपदाकर वह पीछे हट जाता है।
मनुष्यफो मारम्भमें किसी पातको आयश्यफता पा ममाच
होता है।
तय यह सोयताफि किस
मनुष्य किस प्रकार
वस्तुसे उसकी पूर्ति होगी। यदि मनेफ
काम करता है।
बीजोंसे उसफी एकही आवश्यकता दूर
होसी हो तो यह उनमें सस्ती या उत्तम देखकर पकको युन फिर
से प्राप्त करनेका पक्ष करता है।
विहाफ्नदाताके सम्मुख प्रधानतः चार प्रम सदा उपस्थित
रहते हैं। प्रथमद उसे पामारवी मध
मापारीकेचार प्रस।
स्पाका भली भांति शान रपनेकी उमरत
होती है मर्याद उसे मालूम रहना चाहिये
फिस समय लोगोंको किस पस्तुकी कितनी मावस्यकता है।
समागके उन व्यकियोकी इच्छामोसे तो उसे विशेप जानकार
भ
विज्ञापन विज्ञान।
[१६
1
होना चाहिये जो मोल लेनेकी शकि रखते हों। यदि व्यापारी ।
लोगोंकी इच्छामोंसे ही अपरिचित रहेगा तो उनकी पूर्ति कैसे
करेगा ? मतएव उसके लिये नी पुरषोंकी मूल स्वाभाविक
इच्छामोंका जानना भी घश उपयोगी है और यह जानकारी
फराना एकमात्र मनोविज्ञानका काम है।
फिर जब मनुष्यको किसी यस्तुकी इच्छा होती है तो वह
इस पातफी बोजमें लगता है कि कौनसी वस्तु इसको पूरी
करेंगी। विज्ञापनदाताको अपनी वस्तुका समुचित झाम
अवस्य रहना चाहिये जिससे वह विज्ञापनों द्वारा प्राहकोपर
उसके गुण प्रकट कर सके। उसकी चीजोंमें फोन २ गुण है
जो अन्य व्यापारियोंको घस्तुर्मोमें नहीं पाये जाते और उनसे
ग्राहकफि फिस २ अमाघकी पूर्ति होती है क्या उनसे माहौफी
पासनाए तुरत पूरी होंगी था कोई विशेष वस्तु प्रस्तुतकी
जायगी जिससे उनकी इच्छाए पूर्ण होंगी ?–प्रत्यादि पातोफा
सूक्ष्म झान उसके लिये आवश्यक है।
तीसरा काम व्यापारीफा अपनी घस्तुके साथ प्राहककी
इच्छाका सम्बन्ध स्थापित करना है। मवएष उसे प्राहककोंको
ऐसा मानसिक अभ्यास फरामा पंरता है कि जब कभी उन्हें
कोई विशेष अमाघ मालूम हो तो विज्ञापनदाताकी ,घस्तु
नत्क्षण सूख जाय । यह विशेषत मनोविज्ञान हीका कार्य है।
प्राहफोंकि मनमें कुछ ऐसी आदतें जमामा अकरी होता है जिससे
उमको किसी विशेष वस्तुके व्यवहारका अभ्यास हो जाता है।
।
-
१०]
भमो विधामसे सम्बन्ध
पष्ट
।
इसके लिये स्मरण शकि, सुभाना इत्यादि मनोविज्ञान विपर्यो
का ज्ञान मयस्य चाहिये।
तयापि फेवल उपरोक सम्बन्ध स्थापित करना ही ययेष्ठ नहीं
है-प्राइफको जप फमी फिसी घस्तुफी माघश्यकता जाम पटे
तप २ विज्ञापनशताफी फिसी यस्तुविशेषका उसे ध्यान मा
जाय इतना ही पर्याप्त नहीं। उसे ऐसा उपाय करना पड़ता है
कि ग्राहक उस घस्सुको वरीदे। यह उसफा चीया और भन्सिम
काम है जो पूर्ण तथा मनोविज्ञामफा ही घिपय है क्योंकि इसको
लिये मानसिक विचारोंको फा-में परिणत करनेके नियमों को
मानना आवश्यक होता है।
साभाविक इच्छाएं।
।
-
म पहले लिख भाये कि कुपवाओंकी या
मनुप्यमार को समावसे होती है। अन्य दाए
मी इन्धीका रूपान्तर या विकास है। मवश्व
विज्ञापनोंसे जो लोग लाभ उठाना चाहते है जो
लिये इन मूल साभाविक इच्छाओंका झान बढे
फामका है। पिशापनदाताका कर्राज्य इनकी
पूर्शिका उपाय मौर इनको सहायतासे मई इच्छामोंका
रत्पादन करना ही है। मतएव उसे इनका सम्पा मध्ययन
करना चाहिये।
(१) पहली सामाषिक इच्छा मनुष्यको अपनी रक्षाके विषय
में यती है। कोई हिंस्र जन्तु उसे मार न
पास्मरजाफो
डाले या शत्रु सस पर प्रहार न करे इसका
यह पहलेसे उपाय करके रखता है। जो
वस्तु उसकी शारीरिक रक्षामें सहायक होगी उसकी मोर सर्व
प्रथम ध्यान जायगा। भाजका, सम्प पेशाम सरकार मान्य
की रमाका मार, न्यायालय पा फौजकी सहायतासे अपने असर
सामाविकाच्या
.
[१६
सामाषिक इच्छाए ।
-
ले लेती है इसलिये बाहरी ससे अपने को पचानेकी या
उसमें एवीसी रहती है। इसो मात्मरक्षा के टिपे मनुष्य मोमन
करता है। लव कामोंको छोरफर यह भूख लगने पर भोजन
भौर प्यास लगनेपर पानीफा ध्यपहार फरेगा। कहा मी-
“पहले पेट पूजा, पीछे काम पूजा ।"
मनुष्यों में संतानोत्पावनफी इम्छा इतना प्रयाल रहती है-
'भोजनका छोड़फर कोई भी इच्छा इतनी प्रबळ नहीं रहती-स
का भी यही कारण है।
परन्तु इस पातको मळीमाति समझ लेना चाहिये कि मनुष्य
इस लिये मोअम महीं फरता फि इससे उसको लाम होगा मोर
म इसलिये विधाइहीं करता है कि ऐसा करनेसे मनुष्य जातिकी
रसा होगी। ऐसा होता हो यह भौर पात है। अपनी
स्थामाधिक छाको पहरोक नहीं सकता इमलिये उसे ऐसा
करना पड़ता है।
एक ममेरिफन विद्वान् लिखते हैं -- यदि मैं सोचू कि कोई
घस्तु स्वादमें मच्छी लगेगी तो मैं उसफो इच्छा किये विमा रह
महों सकता। मैं इस पास पर विचार करनेको नहीं सकता कि
उससे मुमको काम पहुंचेगा या नहीं। यदि साद अस्या है तो
मेरे लिये इतनाही पयेष्ट है। प्रकृविनामुमो प्रत्येक सापिट
पस्तुके खानेफी इच्छापी है, मौर साधारणत उससे पूर्ण साम
ही होता है। लोग शायद सोचेते होंगे कि मनुष्यको पवि
इस लिये घामाघपदामि सोसास्थ्य रिये सर्वश्रेष्ठ ।
विज्ञापन विज्ञान।
-
न
उन्हींफो सुनेगा। परन्तु, मैं देखता : फि में पपा साऊगा
इसको निश्चित फरमेफे लिये मेरी साभाविक इच्छा विवेक
मबष्ठ है।
अतएघ यदि घिज्ञापनदाताको किसी खाद्यपदार्थका विज्ञापन
देगा हो तो उसे उसके जायके पर अधिक जोर देना चाहिये।
साधकळ पुशल विज्ञापनलेषक ऐसा ही करते है- भोज्य
पदार्थो के स्वास्थ्य सम्यम्धी गुणोंको वितीय स्थान देते है। ऐसे
विज्ञापन में मूल्य पर तो और म जोर देना चाहिये।
अन्य सानेन्द्रियां भी इसी प्रकार शरीर रक्षाफा काळ
सम्पादन करती है और इन चीफीवारोंको जो अच्छा लगता है
उसकी तरक्षण मनुप्य इच्छा फरता है। उदाहरणके लिये, यदि
जूतोंका पिझापा देना हो तो उसमें सर्वप्रथम दिखलाना चाहिये
जिउनसे पैरोंफा पहुन फुल आराम मिलता है, एल्के , इत्यादि ।
यह मात्मरक्षाफी प्रवृति ही माता पिताको संतामके पति
इसता फव्याशील बनाती है। विशेष कर माताका प्रेम तो इस
ससारमें मलौकिक पस्तु ही समझा जाता है। माता योंके
लियो सय कुछ छोड़ सफती है। संतान होते ही श्रीफे लिये
"जगत्काकेद्र पणा यम आता है-मपना उसे कुछ मी ध्यान नहीं
रहता। यह समं नहीं जानती फि पथ को देखकर उसे इतना
मुख क्यों मिलता है। कोई माता संतामका पालन पोषण करते
समय मातृप्रेमका उद्देश्य मनुष्यजातिकी रक्षा पर विचार मनमें
१ नहीं रही। फिर भी यह उसके लिये प्राण तक त्याग सकती है।
.
.
.
---
। २१J
सामाधिक इच्छाए।
जो भी घस्तु पस्चैकी परतोंको मिटाता है वह माताकी
दष्ठिम अनिवार्या है। इनको पूर्ण कस्मेमें व्ययकी भोर उसका
ध्यान पहुत फा जाता है। इस प्रतिफा उपयोग करने में
विज्ञापनरेनकोको यड़ी सफन्ता हुई है। जो वस्तु पाठकको
सुन्दरता मोर भारामको पढ़ाने वाली है ये फेवळ मावाओं के
दहिपथमें मानी पाहिगे। फिर उनको प्राप्त करनेकी प्रबल
इच्छा फिमे पिना पे नहीं रह सकती।
जिस प्रकार मनुष्य अपनी देह भौर मध्येको “अपना"
समभवा है सी तरह घकि विषयम, पम्पासके कारण,
साबमे लगता है फि से उसकी देहके प्राय अंश है। मिने,
पञ्चेको यदि हयासे टोपी उड़ जाती है तो वह किस प्रकार
रोमे उगता है! परन्तु साथ ही, घोंसे दहकी शोभा पाती है
इसलिये भी ये हमें बहुत कुछ बार्पित करते है। पत्रोंफ यिहा
पमोंको लोग पढ़े चायसे पढ़ते हैं मोर देखा गया है हरकिस्मके
फपड़े का पिशापन लाभदायक ही रहता है।
(२) दूसरी मूल सामायिक इच्छा संग्रह और स्वामित्वको
है। जिन लोगनि मधुमपियोंको शहद
मेमर पारामित्व
इका फरते पर ध्यानस देखा
की प्राप्ति हमें भरोसा दिलाते हैं कि ये परिश्रमी
मक्खियां इस लिये मधु महीं इफटा फर छोसती फि मारेफे
दिमि उर इनफी भाषश्यकता होगी परतु ऐसा फरने में उन्हें
एफ विशेष मानन्द प्रात होता है। जामें पद समके काम
विज्ञापन-विज्ञान, माता हो यह मौरयात है। अन्य जानवरोका भी यही हाल है। उनमें संग्रहकी स्वाभाविफ प्रवृत्ति होती है। ऐसे लोग बहुत कम होगे जिन्होंने जीवनमें किसी न किसी समय पुछ संग्रह नहीं किया होगा। धन जमा कर रखनेको उत्कट इच्छा तो प्राय समीपो रहती है। पेखा गया है कि, अत्यन्न षढ़ा पुरुप, सम्तान म रहते हुए भी धन एकत्र फरता ही जाता है। ससे जो पस्तुये प्राप्त होंगी उसकी यह परघा नहीं करता, जमा कर रखना हो उसके लिये पयेष्ठ है। कृपण यदि समझता हो कि वह मविष्य उपयागके लिये' धन बटोरता है तो यह उसकी भूल है। यह इसलिये ऐसा नहीं करता, पलिफ इसलिये कि उसे इसमें एक विशेष आनन्द प्राप्त होता है। भविष्य उपयोगका विधार उसकी प्रसूचिको पलवती अवश्य फर देना है और इससे अपना काम उसे उचित जान । संग्रह करना मनुष्यको म्वाभ। विक इच्छा है मोर लामा माशासे प्रायः सभी मनुष्य ललचाये', सकते हैं हमारी इस प्रवृचिका उपयोग विज्ञापनदेनेवाले भनेक प्रफारसे करते हैं और इनमें जो अपना दायित्व नहीं सममते वे मनमाने विज्ञापम छपाकास प्रवृसिसे मनुविस छाम उठाते है। यहुधा फिसी पस्तको मिना मूल्य घा अत्यल्प मूल्यमें दे डालनेके विज्ञापन गराधे भोलेमाले लोगोंको धोखा देते हैं। माधयं तो इस पातफा है कि जनता इनकी दमपट्टीमें मा जाती । पटने लगता ही जा - 1
२Ji
है। नामकी भाशा, "जे घड़ी मुफ्त", "मुटा दिपा" इत्यादि
शीर्थकपाले विज्ञापन पढकर यह इस पातपर विचार रनेको
नहीं रानी फिघिसापसाताफा उदेस मुनाफेसे मपमा माय
पेचना ही नहीं ६ किन्तु विज्ञापनका व्यय भी घर अपने पास
नहीं देना चाहता मुफ्त पा घाटा उठा कर बेचना हो पात
मौर है।
तथापि यदि इस प्रतिफा रचित उपयोग किया जाय तो
प्रारूष मोर विज्ञापनमाता पानों ही को पधेप लाम दो।
उदाहरण के कि, "से' के विज्ञापन परकर प्राहक सस्ता माछ
पा सरने है व्यापारी में छपापर शीघ्र सपना माल बेचने
समर्थ होते है।
(३) पाधास्य विशय विद्वान् शिफारसनेपो मी एफ म्य
स्वाभायिक इष्प मानते हैं। समका
गिरको इच्या
फधन फिसेतो फरमा सीपौके पर
हमारे पूर्वज मासेट पिये हुए जानवरोंका
माप जाफर हो सनी प्राण रक्षा करके थे। इसीसे गाजराम भी
एम शिकार खेरना या जलाशप, मउली पकाना पवित
सममसे हैं। अपने पूर्वमोसे हमें यह प्रति प्राप्त हुई। नहीं
तो फ्यों कोई एक मिपि हरिणको मारने के लिये मपनो मागको
जोखिममें साल और पत्त कुरा व्यय फरक मीका दिनोंतक
कठिनाइयां पलसा मपश्य हो सका मांस पा धर्म इसका
कारपा नहीं है। कितने ही पार को, देखा गया है, शिकारिपनि
विज्ञापन विज्ञान । [२४ 4 । - जानयरको मारते ही दूसरों को दे माला। इसी प्रकार जो' जलाशयम मछली पकडते हैं बटों जलती धूपमें आल फैलाए बैठे रहते है इसका कारण न तो मछलियोंका मूल्यवान् होना ही है और न इस काव्येका स्वास्थ्य के लिये हितकर सममामाना। यह इच्छा भाजपाल लड़ाईको भासुरिफ अमिलापाफे रूपमें देख्न परती है। पहल, धूलेयाजी, या फुटयौल मादिके खेलों को देखने के लिये जनता इतना उत्साह दिखलाती है इसका फारण हमारी यही मूल इच्छा है। साक पर साधारण मगड़ा मा कि लोगोंकी भीड़ जमा हुई। शिकारके समय भी जितना मीपण आनघर हो, या दहल भाविके लिये परायरके मोटे हों मौर जिवनी देर तक पाजी चले उतनाही हमें उनसे मधिक मानन्द प्राप्त होगा। पैशाचिक काहीका वर्णन अनेक ऐसे, लोग भी घड़े चावसे पठते देखे गये हैं जिनको पीछे इस पातको स्वीकार करनेमें लम्बा मालूम हुई। (४)श्वरने हाय हमें काम करने के लिये दिये हैं मोर इनका रुपयोग फरमेफी इच्छा मनुप्यमाप्रको मिम्मायेच्या। स्वभाषसे होती है। हम सभी चाहते हैं फिर कोई नई यस्तु बनाये और धनी हुई थस्तुको पदलने या सुधारमेकी राष्ठा करते हैं। ऐसा जाता है कि छोटे पालक स्लेट पर मनमानी , या मिट्टी के खिलौने बनाकर बड़े प्रसन्न होते हैं। शायद ही कोई ऐसा मनुष्य हो -- , ,
गिसेचमी पर पनामेकी प्रपस नई होगी। जो पना
पनाया घर मोल लेते हैं या दूसरोंके मकानमें भ पर रहते
गहें भी उसे नये इसे पमाने पारसमें सुधार करनेकी भमि-
लापा होने लगती है।
परन्तु नगरोंमें मामकल इमारी यह प्रति पी रहती है।
सब पूछिये तो जोवनके एफ प्रपान गानन्दसे शहरोंमें हम पंचित
किये जाते हैं। यदि हमें हार्योसे काम लेनेफा भवसर मिळे तो
ध्यापार मादिफे मनन्तर यह एमारे लिये एक मतुलनीय मन
पहलाप हो। इस प्रवृत्तिका उपयोग फर पालको प्रारम्भमें
ऐसी शिक्षा दी जानी चाहिये मिससे घे भपने दायोसे काम
लेमा सीमें।
पितापमलेखक मो हमारी इस प्रवृत्तिका अनेक प्रकारसे
उपयोग कर सकते है। यदि हम ऐसी वस्तुमा विज्ञापन देते
है जिससे हाथोंसे फाम लेनेफा मयसर मिलता हो सा उसकी
मोर हमारा क्तक्षण ध्याम आता हे मोर उसे हम खरीद को
मपश्य इन्छा फरत है।
(५, मनुष्य एक साथ रहने के लिये मे है और एक पुसरेको
देखने की इच्छा सनम समापसे रहती है।
सामाजिक प्रचि। फोई भी पहुत समय तक भोला नही रह
सकता। इस
सस्पत्यमें रायिनसन
फसोको कहानी प्रसिद्ध है। थाहते तो हम र जनोंफा सग
है किन्तु उनके अमाष, जो प्राप्त हो सकते हों उन्हींका संग
। r । J विज्ञापन विज्ञान [२४ हाका जानवको मारते ही दूसरोंको है साला। इसी प्रकार जो अलाशयमें मछली पकड़ते हैं ये बटो अलती धूपमें जाल फैलाप बैठे रहते हैं इसका कारण न तो मछलियोंका मूल्पवान् होना ही है भौर न इस काय्येका स्वास्थ्य के लिये हितकर समयाजाना। यह इच्छा आजकल लाकी मामुरिफ अमिलाषाके रूपमें देख पड़ती है। पहल, धूसेपाजी, या फुटयौल भादिके खेलों को देखनेके लिये अमवा इतना उत्साह दिखलाती है इसका कारण हमारी यही मूळ इच्छा है। साक पर साधारण भगता हुआ कि लोगोंकी भीड जमा हुई। शिकारके समय भी जितना भीपण जानवर हो, वा बङ्गल आदिफे लिये परायरफै मोरे हों मौर जितनी देर तक याजी चले उतनाही हमें उमसे मधिक मामन्द प्राप्त होगा। पैशाचिफ काहीका वर्णन अनेक ऐसे लोग भी पढ़े चावसे पदवे देखे गये है जिनको पीछे ' इस पातको स्वीकार करने में मालूम हुई। (४) ईश्वरने हाय हमें काम करने के लिये दिये है और मका उपयोग करनेकी इच्छा मनुष्यमात्रको मिम्मायेया। स्वभावसे होती है। हम सभी चाहते हैं फि कोई न घस्तु बनाये और पनी हुई वस्तुको पदलने या सुधारमेकी इच्छा करते हैं। देखा जाता है फि छोटे पालक स्लेट पर मम मानी शल, या मिट्टीके मिलाने बनाकर परे प्रसन्न होते हैं। शायद ही कोई ऐसा मनुप्य हो - । न 3 ।
गिसे कमी पर पनाने की प्रबल शान हई होगी। सो पना
पनाया पर मोल लेते हैं या दूसरोंके मकानमें भरे पर वेके
आहें भी उसे भये उसे पनाने पारसमें सुधार करनेकी ममि--
लापा होने लगती है।
परन्तु नगरोंमें मानकळ पमारी यह मपत्ति यी रहती है।
सब पूछिये तो जीवनके एक प्रधान गानन्दसे शहरोंमें हम पचित
किये जाते हैं। यदि हमें हाथोंसे काम लेनेफा भयसर मिले तो
व्यापार आदिक अनन्तर यह हमारे लियो एक अतुलनीय मम
पहलाप हो। इस प्रधिका उपयोग कर पालकोंको भारम्भमें
ऐसी शिक्षा दी जानी चाहिये मिससे घे भपने हाथोंसे काम
लेना सीप्लें।
विज्ञापनलेशक भी हमारी इस प्रवृत्तिका भनेक प्रकारसे
उपयोग कर सफते है। यदि हम ऐसी पस्तुका विज्ञापन देखते
६ जिससे हार्यासे फाम लेनेका मपसर मिलता हो तो उसकी
मोर हमारा तरक्षण ध्यान जाँदा रमौर से हम परीव नको
मपश्य इच्छा फरी है।
(५, मनुष्य एफ साथ रहने के लिये धमे है और एक दूसरेको
ऐपने की इच्छा उनमें खभायसे रहती है।
सामाभित्र प्रवृति। फोमो पहुत समय तक भफेला महीप
सकता। इस
सम्पत्यमें रापिनसन
फसोको कहानी प्रसिद्ध है। पाहते तो हम श्री अनोंका सग
१किन्तु उनके ममाधम जो प्राप्त हो सकये हों उन्हींका संग
विकाफ्म विज्ञान।
।
-
।
करेगे। रापिनसन म सोको मरने अनुचर मारके सापही
पदा मानन्द मिलता था। सम्य जातियां मिदने पर अपरा-
धियोंफो देती हैं उनमें एफास्तफेवही सबसे कठोर है। सायही
हमारी इच्छा रहती है कि दूसरे भी हमारा संग करें मार मारी
मोर ध्यान दे। यदि ऐसा न होता और दूसरोंकी सम्मतिका
हम विचार न करते होते तो मनुष्प,जातिकी इतनी सन्मति होती
या नहीं सदेह है। यही कारण है कि इम,घर वा मादिके
मोल लेने सथा मिले और वीषिकाको चुमनेमें दूसरोकी सम्मति
का परापर ध्यान रखने है। ये हमें प्रसन्द नाही पर्याप्त
नहीं समझते। मतपय विज्ञापनलेखफ किसी वस्तु विशेषके
विज्ञापन में यह दिखलानेका प्रयम करताई कि रसको समाजकी
उसश्रेणीके लोग फाममें लाते है। समस्त प्रकारपे यस
विकताल के लिये ही मनुष्यस्पमाषकी इस प्रवृत्तिसे लाम
रखाना सम्भव है।
(1) मारा स्वभाव है कि म्यापपयका अनुसरण करते हैं
पौर मन्यायसे दूर भागते है-अन्यायको
कि मोर पार्मिक
प्रतिपा।
हम सह नहीं सकते। उपन्यासके नायक,
जातिके नेता, चीजोंफो देखनेवाले व्यापारी,
साथ रहनेवासे मित्र समोमें हम मच्छे गुणोंका समावेश मेखना
चाहेंगे। उनके प्रत्येक फायफा इम तिकदृष्टिले पिचार
.
-
-सुनत मामक प्रसिद यूनानी सत्वचाका किवास था कि
मनुप जय फभी म्यार देनेगा तो सकाएपने समर्थन करेगा
भौर समस्त पुरे कर्मा मम्यापके पाल साप। म अब दूसरों
को मन्याप फरवे देखते हैं तो हमें उनसे मान्तरिक मा होती
है। यदि पिमापगफे थिन, दलील, या उशिषित पस्तु मोर
रेनेफी शठे ऐसी हो जिससे हमारे नैतिफ वियागेको
पापाव पहुंचता हो वा मनसे लाभको अपेक्षा निधी
दोती है।
मनुष्यको धार्मिक प्राधिका पिज्ञापन लेपाको भवश्य
विशेष ध्यान रखना चाहिय । एक बार किसी प्रकारणे
"प्रतिके चमत्कार" माम कर एक पुस्तक प्रकाशित की परतु
यह याहुत कम विकी। तब उसोनाम बदसकर पर निर्मित
एटिके चमत्कार" रथा सो च सपो पातमें इसकी सप प्रतिवा
पप गई। पिळायतमें फिमी पपा में शराब मिला हो तो को।
रसे पुष्टिफारक समझ कर भधिक काममें छाते ६ मिन्न्तु इस
देशमें यदि मालूम हो जाय कि मनुफ पयामें शराम दे सो रोग
उसे फूए'गे भी नहीं।
मतपय व्यापाराको उचित है कि यह मिस पेशी पिकापन
छपाता हो उसकी स्थिति और इतिहास, तथा सामाजिक पौर
धार्मिक प्रतियोको अयम्य भन्छी तरण समप ले। नहीं तो
-मसा हीसुदर और प्रभाव त्पादक विज्ञापन हो, म्पर्य होगा।
जो पात समाजमें निषिद, या जिसे लोग धमविस्य मानते
उसफा उल्लघ सिधापनमें कदापि न करना चाहिये। इसके
-
।
। - ग विज्ञापन विज्ञान। [२८ "यायन विपरीत इन साभाधिक प्रवृत्तियोंका उफ्याग मनमत लाम उठाया जा सकता है। (७) हम सभी अपनेको सुन्दर वस्तुओंसे घेरेना चाहते हैं। अंग्रेजी भापाके एफ प्रसिब् फपिने तो सौंदयोदा। यहां तक कहा है- "Bennty is truth, truth beauty that is all Ye koov on earth and all ye need to know" अर्थात् सौन्दर्य हो सत्य है और सत्य सीपर्य है, मनुष्य समारमें इतना ही जानता है और इतना ही जाननेकी उसे जरूरत मी है। अधिक नहीं। किसी सुन्दर विज्ञापनको देखकर हम मयश्य रुकेंगे। किन्तु बहुधा हमें यह नहीं माला रहता कि हमारे रुफमेका कारण विज्ञापनकी सुन्दरता है। सबसे सुन्दर तस्वीरें तो वे समझी जाती है जिनमें हमारा ध्यान पूर्णतया चित्रित पस्सुकी मार जाय मौर किम मिपुणतासे चित्रकारने उन्हें धमाया है यह न सूझ। म प्रेजी में एक उकि प्रसिद्ध है कि Art thes in concealing art" अर्थात कारीगरीफो छिपामे हीमें कारीगरी है। सबसे सुन्दर विज्ञापन यही है जिसको देखकर लोगोंका ध्यान उसके रखना कौशल की मोर न जाय । वास्तवमें ऐसे ही विसापनका प्राहकपर प्रमाघ भी पस्ता है। (८) पातोंको जानकी इच्छा भी हमारा स्वामाषिक पातोपत्रे जामनेकी गुण है। ययाको अपमे खारों मोरकी षस्तुभोंको जामनेका यडा चाप होता है। घद यह समझनेके लिये किये कैसे पने --
at]
स्वाभाधिक छाए।
-
है अपने नये खिलौनोंवफको तोड़ फोद डालता है। पड़
होनेपर यह इच्छा मानप्राप्तिकी अभिलापाके रूपमें परिवर्तित
हो जाती है-चाहे से शामसे हमें लाभ हो या ग हो। मनुष्य
जातिकी यह इच्छा मी विज्ञापन लेसकके परे कामकी है।
सनता यह जानना चाहती है कि किसी घोडका विज्ञापन १
और विज्ञापनदाता इसके विषयमें क्या भाता है। यदि यह
लोगोंको इस प्रवृत्तिले लाम उठाना चाहता हो तो उसे माना
पकल्प रोचक भाषा, संक्षेपसे फरदेश चाहिये।
कितनी ही यार प्रधानत दैनिक समाचारपत्रों के विज्ञापनोंम
पहले दिन थोड़ीसी पाय पतला दी जातं जिसका विशेष
'मतलय नहीं निकलता और इससे याकी दाल जाननेके लिये
'पाठक मधीर हो उठते है। फुछ विशाप में तो दूसरे दिन
भी पूरा षकश्य नदी छापा ज्ञाता फिन्तु पदनेवालोंकी सत्कटा
मोर मी पढ़ा दी जाती है। फिर तीमरे दिम समूचा विज्ञापन
प्रकाशित होता है।
मोस्सुस्पफी इस प्रतिके उपयोगमें शीर्षक पट्टी सहायता
"महात्मा गांधीकी भाशा " इस शीर्थ फको पढकर
लोगोंके लिये पाकी विद्यापण न पदना महाकदिन हो
'पड़ता है।
फिर भी इस प्रवृत्तिका दुरुपशेग कर पाठकोंका बहुत
परेशान फरना पन्छा नहीं। मसल मतलव तो अपनी बीम
बेचनेसे है। वहांतक हो सके शीत्र मपनी पस्तुकै विषयम
विज्ञापन विमान।
[२८
4-
1
4
विपरीत इन साभाधिक प्रवृत्तियोंका उपयाग कर मनमत
लाभ उठाया जा सकता है।
(७) हम समी अपमेको सुम्बर वस्तुओंसे घरैना चाहते हैं।
अंग्रेजी भापाके पफ प्रसि फधिने तो
सोदोक्षा। यहा तक कहा है-
"Beanty 18 truth, truth beauty that is all
Te know on eartb and all ye need to know"
अर्थात् सौन्दर्य हो सत्य है और सत्य सौर्य है, मनुष्य
समारमें इतना ही जानता है और इतना ही जाननेकी उसे मरूरत
भी है । अधिक नहीं। किसी सुन्दर विज्ञापनको देखकर इम
भवश्य रुपंगे। किन्तु पहुधा हमें यह नहीं मालूम रहता कि हमारे
रुकनेका कारण विज्ञापनकी सुन्दरता है । सयले सुन्दर तसोरे सो
ये समझी जाती है जिनमें हमारा ध्यान पूर्णतया चित्रित धम्तुकी
मोर माय और किस निपुणतासे चित्रकारने उन्हें बनाया है
यह म सूझे। अप्रेजी में एक उकि प्रसिद्ध है कि Art hes
In connealing art" अर्थात् कारीगरीको छिपाने हीमें'
कारीगरी हैं। सबसे सुन्दर विज्ञापन यही है जिसको देखकर
लोगोंका ध्यान उसके रचना कौशलकी ओर न जाय । घास्तधमें
ऐसे ही घिसापनफा प्राहकपर प्रमाष भी पड़ता है।
(८) मई पातोंको सामनेको इच्छा भी हमारा स्वामाधिक
पासोंफो धानमंत्री
गुण है। ययको अपमे चारों मोरकी
पस्नुभोंको माननेका यहा धाय होता है।
घह यह समझनेके लिये कि में कैसे पने
t]
स्वाभाविक पाए।
हा
हे भपने नये मिळोनोंतफफो तोर फोर सालसा है। यह
होनेपर यह इच्छा प्रामप्राप्तिकी अमिलापाफे रूपमें परिवर्तित
हो जाती है चाहे ससे मानसे हमें लाम हो या न हो। मनुष्य
नातिकी यह इच्छा मी पिशापन लेखफके पडे फाकी है।
बमता यह जानना चाहती है कि किसी घोउफा विनापन है
और विज्ञापनदाता इसके विपय, फ्या माता है। यदि यह
लोगोंको इस प्रवृत्तिले लाम उठाना चाहता हो तो उसे अपना
वक्तव्य मेधक मापामें संक्षेपसे फद देना चाहिये।
फिननी ही पार प्रधानत देमिफ समाचारपर्यो विज्ञापनोंम
पहले दिन योपीसी पात पतला दी जातं : जिसका विशेष
"मतलय नहां निकलता और इससे याकी दाल जाननेके रिये
पाठक, अधीर हो उटते हैं। कुछ विज्ञापम तो दूसरे दिन
भी पूग पत्रव्य नहीं छापा जाता फिन्तु पदनेवालोंकी सत्फठा
और भी बढ़ा दी जाती है। फिर तीसरे दिन सम्चा विज्ञापन
प्रकाशित होता है।
मोत्सुक्यकी इस प्रति उपयोगमें शीर्षक परी महायता
देते है। "महात्मा गाधीकी मामा" इस शीर्पफमो पदकर
प्लोगांके लिये पाकी विज्ञापन म महाफठिा हो
पड़ता।
फिर भी इस प्रवृसिका दुरुपयोग फर पाठकोंका बहुत
परेशान करना अच्छा महीं। मसल मवलप तो अपनी, वीज,
बेचनेसे है। बहातक हो सके शीघ्र मपनी पस्तुके विषयमें
पटना
है
चिमाज विधान।
[३०
-
तलाना भारम्भ कर देना चाहिये मौर थोड़े में, सरलतासे,
प्राहकोकोसकी पिशेपता मममा दी जानी चाहिये। प्रवृत्तिका
उपयोग तो सापनमात्र
।
1-
।
-
ध्यान माफर्पित करना।
7
-
।
-
ज्ञापनोंका देण्य व्यापारी मारकी मोर
ध्याम माकर्पित करमा और से चला है।
पदि उन्हें फोई पढे ही नर्घा तो विपापम
दासाका श्रम व्यर्थ होगा। पक्षिक उपाईका व्यय
उसे पाससे देना पगा। फिवने तो लम्वे चौ विशापम
इसलिये पाते हैं कि उमका माल भधिक विकेगा मौर मपनी
समझमें पेरिप्पने योग्य कोई पात नहीं छोड़ते दो चार मधिक
ही रमते हैं। किन्तु यह सोचाना उनफा भ्रम है। विज्ञापन
चाहे छोटा हो, यदी उत्तम है जिसे लोग मारस्मसे मन्ततफ पर्ट
मौर पदकर उल्लिजित षस्तु परीद पाले। इसका यह मसलप
नहीं कि पढ़े विज्ञापन लोग महीं पढ़ते किन्तु सफलताफे लिये
प्रधामत,दो पाटॉफी भाषश्यकता है-यिमापनकी ओर ध्यान
मापित करना मोर उसे मन्तवफ यनाए रमना ।
-
,
1
।
विज्ञापन बिहान
[३६
स
सन्देह है। यही उम्र वालों के लिये भी यही पात हैं। किसी
नई चीज"या प्राचीन वस्तुके नवीन उपयोगको सममाना हमारे
लिये कठिन हो पड़ता है। यही कारण है कि सुगमतासे पढे
जानेवाले और ठीक भर्थ न समझे जाने वाले चित्र माफर्षक
नहीं होते।
(४) किसी वस्तु पर ध्यान जमाने के लिये यह आवश्यक है
कि समय समयपर यह दोहराई जाय।
दोहराना किन्तु
यथा उस कहानीपर विशेष ध्यान देगा
अंग विशेषको
और एसीको यड़े चावसे सुनेगा भी जिसे
उसमे पहले कई बार सुना हो। यह चौथा नियम यद्यपि देख
नेमें दूसरे नियमका विरोधक है किन्तु वास्तवमें बात ऐसी
नहीं है। एकही वस्तु कम या अधिक मित्र रूपमें दोहराईमा
सकती है। किसी विज्ञापनको घारगार दोहरानेसे उसकी
नवीनता जाती रहती है सही और नवीनता ध्यान भाकर्षित
करनेके लिये परम भावश्यक है तथापि प्रथम दो यिन्कुल नई
वाव समम्मा ही कठिन होता है फिर प्रतिवार नये विज्ञापन
मिफालनेसे पहले विज्ञापनोंफा असर कम हो जाता है।
व्यापारीको उचित है कि वह इसके किसी विशेष अंशको प्रत्येक
विज्ञापनमें रहनेसे जिससे वह पहचाना जाय और नवीनताके
लिये शेप मागको बदलता रहे। माजफल प्रसिद्ध विज्ञापनदाता
ऐसा ही करने लगे हैं जिससे पुराने विज्ञापन की धार वोहराये
जाने परमी ऐसे जान परमानों प्राचीन मित्र मये या धारण
म . UHLATORTTURN THE SINU Ralston PURINA CEREALS R-CHUS JLekura AORaam TALAYAN RUMEIMATEwilliams. BALTory ntn LA AAI ---- --- - Hient Marwadi --- --- R PASTM Hmom TEAM ---.- ---.- Heart SNA -- LAILALA- Mara L ऊपर जो विष दिया गया है उसमें विज्ञापनदाताने विज्ञापनको सुन्दर बनाने में कोई यात उठा नहीं रखी है पर पदमे में कठिनाई होनेके कारण परिश्रम भौर पय व्ययं ही सममिये। इसमें ध्यान नहीं माकर्षित होता । 1
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उ
-
उपयोग।
कर मिन्ने आगे है और मानों उनका स्वागत करमेफे लिमे हम
तैयार हो माते हैं!
(५) जिस वस्तुको ओर म उदासीन भाव रखते हैं यह
हमारा ध्यान नहीं माफर्षित कर सफती है
मनोविकारोंका
ध्यान प्राप्त करनेके लिये आवश्यक है।
या ता यह हमें अच्छी लगती हो या पुरी-
उससे हमें प्रसन्नता होती हो था दुस। मनके भाषोंको
उभाहनेवाले विज्ञापन ही हमारा विशेष ध्यान प्राप्त करते हैं।
यही कारण है कि कुशल विज्ञापनलेखक उत्सुकता भात्मगौर,
सहानुपति, उधोफामा मादि मिन्म २ मनोविकारोंका उपयोग
पर मनमामा लाम रठाते हैं।
मपने मालकी ओर ध्यान माफर्पित करने में व्यापारी कुछ
सठा नहीं रणसे मोर पिकापनको लोग पसे
इसके लिये नई २ युफिया ५८ कर
निफालते रहते हैं। विशेषत छोटे घिमा
पमि तो उन्हें अपनी सय पुखि इस पातफे लिये वर्ष करनी
परती है।
विसापनके दोनों भोरफी रेखाए पा पार्टर तोड़कर शीर्षक
पा पवेको पाहर की ओर निकाल देते है और शेप विज्ञापन उनके
मीवर रहता है। यधपि ध्यान आफर्णित फरनेमें इस युक्तिका
भनेक लोग उपयोग करने लगे हैं, फिर भी ऐसा न होमा
चाहिये कि, पार्डर का जगइसे टूटे। इससे विकापनको
मुन्दाग नए को गाती है।
विशेष पुफिया।
- । JI पिलायन विज्ञान। [३८ दमक कमी २ वार्डरके बाहर जिस चीजका पिडापन होता उसका कुछ अंश प्रदर्शित किया जाता है मौर शेप मानों विज्ञापनके पीछे छिपा रहता है। ऐसे स्पर्लोमें वार्डरके बादरका सफेद स्माम आकर्णित फरता है और चित्र तथा शीर्षक विमापन के विषय में संक्षेपमें अना देते है। चिस माकर्णित फरनेमें गोल सक घटे कामकी है क्योंकि सामयिकपत्रों के पृष्ट, कालम इत्यादि सप चोकोने होते हैं और इम लोगोंको अपने चारों मोर अधिकांश चतुष्कोण घस्तुओंको देखनेफा ही अभ्यास रहता है उदाहरणके लिये घर, मेज, संदूक मादि। विज्ञापनको देखतेही चित्र पा शीर्षकसे तुरत समझा जाय कि अमुक चीज्का विज्ञापन है इसके रिये अनेफ युक्तियां काममें लाई जाती हैं। घस्तु जिस पात्र, यक्स या योतल्में रहती है उनका चित्र और इसपर उस वस्तुका नाम विज्ञापनका सार अथवा चित्रका पिछवासा ऐसा हो जिसे देखनेसे विज्ञापनमें वर्णित वस्तु सूम पड़े। आधी टेडी रेखाए ध्यान माकर्पित किये बिना कमी नहीं रहती। जो विज्ञापन इमफा उपयोग करते हैं उनकी मोर अन्य विज्ञापनोंसे हटकर ध्यान जरूर जाता है। पारके स्थानमें इमका भ्यवहार होना उत्तम है। यधपि ऐसे विज्ञापनोंकी यनाघट येढङ्गी होती है किन्तु इनकी ओर ध्यान गये पिना नहीं रहता। - यतहानेमें थहत ह। 1
समाचारपत्र धादिमें छपी सारीफ किवनी बीपार काट
फर उनका चित्र विज्ञापनमें सदधृत किया जाता है जिससे किसी
वस्तुपर ध्याम पटे मोर लोगोंको इसकी श्रेष्ठताका विश्वास हो।
परन्तु उससे विहापोंमें, ऊपर ही, उसका नाम स्पष्ट छपा देना
चाहिये जिससे परमेवालेको मिस चीजका विज्ञापन है यह
जाननेके लिये समूचा हात मंश म पढना पड़े।
विज्ञापन किस यकारके होने चाहिये। त्येक विज्ञापन तीन हिस्सों में बाटा ना सकता है शीर्णक, मुल्य माग और पला । शीर्षकका प्रधान उद्देश्य ध्यान आफर्णित करना है। इसके द्वाराही पूरा विज्ञापन पढने के लिये प्राइफको सनि दिलाई जाती है। समाचार- पत्र तथा अन्य सामयिफपत्र पत्रिकाओंको कोई विज्ञापन पढने के लिये मही मोल लेता।' शीर्षक ऐसे होने चाहिये सो ताजा युचुठाती भयरों और रोचक सुपाट्य लेखोंसे एटाफर पढ़नेपालका ध्यान उसकी इच्छाफे घिस्ट, इनको मोर माफपित करे । देखा गया है फि केवल शीर्णफ यदल नेसे विज्ञापनकी असफल्सा सफलतामें परिणत हुई। कमी २ तो शीर्षक एफ शब्दको बदल देने ही से मांगों माफाश पातालका अन्तर पर गया। फिसी ध्याफ विज्ञापनमें “टरले पीक।
पिशापन फिम प्रकाश होने चादि
टपका
पैर के स्थानमें "गरम पैर कर देने पर विणीमें मात्र जनम
युद्धि होती देखी गयी। मतपय प्रथम पच्छे शीर्षफ फिस
प्रफार प्रस्तुत किये माय इसका सम्पफ अध्ययन मायश्यक है।
शीर्षक ऐसे हों फि विनापनका सार उनमे प्रगट हो जाय ।
विज्ञापनफो पढे पिमा ही किस पस्तुफे यिापन है यह समझने
मा आय। नहीं तो यहुत कम लाग उनको पदमेकी इच्छा
फरेगे। पुन्छ लेखफ शीर्षफोंफो दो विभागामें विभक्त करते
है-उन विप्लोपनोंके शीर्षक सिनका उद्देश्य मुख्यतः किसी
पस्तुको प्रसिद्ध करना होता है, और उन विज्ञापनोंक शीर्षक
जो प्रधानत पिशापित धस्तु शीघ्र पिफ जानेके लिये छपाये जाते
है। उक्त लेखकोंका मत है फि प्रसिदि बाले यिमापनोरे
शीर्पफादी के पल ऐसे दो जिमसे उमका सार मालूम हो जाय,
शेपोक श्रेणीफे पिशापनोंसे तो लाम तभी होगा जय लोग पूरा
विज्ञापन पगे। अदपप इमफे शीर्षक इस प्रकारके दोमे
पाहिये कि उन्हें पढ़ते दो उत्कण्ठा घढ़ जाय और पूरा विद्यापन
पढ़नेके लिये पाठफ ध्यम हो उठे।
शीर्षकोंक षिफ्यमें पहले पान यह है कि वे जिवने फम हो
स्तना ही अच्छा। एकही शीर्षक पदिकौशल्के साथ घना हो
वो सर्वोत्तम है। इसका कारण है कि मोठे । मलाकि फाई
शीर्पफ हो तो ये सभी एक साथ पदमे पाळेका ध्यान अपनी मोर
घाँधनेकी घेश फरेगे और फलत यह पिसीएफ पर भी पसे
जमा न सकेगा। एकाधिक शीर्षकही यदि देना भावश्यफ
।
विज्ञापन चिलान ।
[२
आन पडे तो उनमें एफको प्रधानता देकर मोटे टाइपोंमें छपाना
चाहिये। शेष ऐसे हों जो इसको सहायता दे और इसका
स्पष्टीकरण करें। ये कुछ छोटे टाइपोमें छापे आय ।
दूसरी थात शीर्णफोक सम्बन्धमें यह है घे यथासम्भव छोटे
रहें। चार शब्दोंसे अधिक वो होना ही न चाहिये कारण
मनोविज्ञानका नियम है कि साधारण मनुष्यके आंख और
मस्तिष्क एफ टिपातमें फेवल घार शब्द प्रहण कर सकते हैं
यदि यडा शीर्षक ही देना हो तो उसे पफ पंक्किमें न छापफर इस
प्रकार विमक करना चाहिये कि अधिकाधिक चार शब्द ऊपर
की पंकिमें रहें और अवशेष नीवेकी पंक्तियों में। दूसरी पंकि
पहलीसे छोटी होनी चाहिये या छोटे टाइपोमें छपे।
शीर्षक ऐसे हो जो फुछ यिशेष यासे पतला। "जगत्में
सर्वोत्तम", "सबसे सस्ता' “यडी फिफायत" आदि शीर्णको पर
पाठफका उसमा ध्यान नहीं जाता जितना “यस दिन ठहरता'
है", "प्रति टायर १०) रुपये यवत", "२५) सैफडा मूख्य कम
पर। जो शीर्षक कुछ विशेष यातें यतलाते हैं उन्हें देखकर तो
ममेफ लोग मसूमा विज्ञापन पद डालते हैं किन्तु व्यापक मर्य
पाले अनिश्चयात्मक शीर्षकोंफा उद्देश्य व्यर्थ ही होता है। जो
शीर्षक एकाधिक घस्तुमोके लिये प्रयुक किये जा सकते हो
उनका ध्ययहार न करना ही उत्तम है।
शीर्षकोंमें कुछ नधी
शीर्षक तो समाचारपत्रके
4
11
४३]
विज्ञापन किस प्रकार के होने चाहिये
६। 'जिन शीर्षकोंको पाठकोंने पहले कर चार पदा होगा सो,
यह स्वाभाषिक बात है कि उस ओर उनफा ध्यान नहीं
गायगा। नवीन वस्तु ही हमारा ध्यान माफर्षित करती है।
मय सफ शीर्षक रुचिकर म होंगे. विज्ञापम कोई पड़ेगा ही
नहीं। अतपय घे रोचक भवश्य हों। पाठमाफी रोचकता दी
मधाम है, इसलिये जिन शीर्षकोंमें "माप" शप्दया प्रयोग हमा
हो और उयाकांक्षा, मौत्सुक्य, संग्रहफी भमिलापा आदि
मानसिक प्रवित्तियोंसे जो सम्पन्ध रखते हों उनका विशेष प्रभाय
पड़ता है। उदाहरण-"क्या मापके हाथ पधे ११" क्या आप
घर बैठे १०० मासिक उपार्जन करना चाहते हैं ? " "अपमा
घर दो घंटेमें पना लीजिये।" किन्तु प्रत्येक यिझापनमें "माप"
शयको दोहरानेसे मवीनता महीं रहती इसलिये कमी २ कैसे"
मौर “यों" शप्पों का उपयोग करते हैं यथा - स पुरनी
देगचीसे विश्वव्यापफ व्यवसाय फसे पना!" "गोडसकी
तमोरियां क्यों मोल लेनी चाहिये।"
पाषा शीर्षकमें ऐसा शब्द रसना उत्तम है जिससे जिन
सोपोलिये विज्ञापन लिम्बा गया. मेरसे पदें। कारखा
व्यय उपार्जन फर छो" इस शीर्षकसे छात्रोंक लिये विज्ञापन
यह स्पष्ट हो जाता है।
शीर्षकांक विषयमें एक पास मौर है। साधारणत ये "न"
फार सूचक म हों। किसी दंतमंजनके विज्ञापनमें "मैले दांत"
या "विगढ़े पांत ऐसा शीर्षक उक्त मंजनको प्रसिद्ध करने के
विज्ञापन विज्ञान ।
[४६
अतिरिक्त, विषयकी भी प्रधानता है। तमाख और अधाहिरातफे
लिये मिन्न भाषा चाहिये। विज्ञापनदाताकी स्थिविके अनुसार
भी लेखनशैलीमें परिवर्तन मावश्यक होता है।
विज्ञापनोंका वक्तव्य संक्षिप्त चाहिये। निरर्यफ शब्दोंकी
अधिकता पाठकोंफे लिये फटकारफ होती है। यदि विशेष
रूपसे रुचिकर न झुमा तो किसी विज्ञापनको पढने में यह अधिक
ममय न लगायेगा। इस बातके विचारसे अपना पचम्य
विज्ञापनदाताको जितने कम शब्दोंमें सम्भव हो व्यक्त कर देना
चाहिये। विज्ञापनोंकी छपाई अधिक पामेके कारण अनेक
लोगोंको वो ऐसा करना ही पड़ता है विहापनदाता इसमें
और पाठक दोनोंका लाम समान है। किन्तु इसके विपरीत,
का यार विज्ञापन लेखक बहुत फम शब्दोंमें अधिक पातें फह
देना चाहते हैं जिसका फल यह होता है कि अर्यका अनर्थ हो
जाता है। उदाहरण-किसी मूमिविकताने एक पार - यह
विज्ञापन छपाया, "हो मफाम, एकका मूल्य पांच इमार सालर,
दूसरेफा चार हजार पाच सौ। ये अधिक फाल न रहेंगे।
प्रत्येक व्यापारी अपने विज्ञापनमें फिसो म किसी प्रकार
की विशेषता रखना चाहता है, जो मन्य विज्ञापनोंमें न हो भौर
जिससे पढनेयालेका चिच उसकी इच्छाके विरुण इसकी भोर
खिंव जाय। सीमाके मीवर ऐसा अवश्य होना चाहिये। किन्तु
यहमा विज्ञापनलेखक, फलाफल सोचे विनाही इसका दुरुपयोग,
करते हैं।, पर नौजवान व्यापारीने एक पार यह विधापन
२७
विज्ञापन फिस प्रकार होने चाहिये
स्पाया, "मेरी उम्र फेघल छपीस घर्षकी है, किन्तुमै ३३ सालसे
पौर (Bond) येच रहा है"। निस्सन्देव लोगोंमें इस विज्ञापनकी
यात फुछ चया चली तथापि उसके यौन पिके। विशेषता
प्राप्त करनेका मर्य सस्ती घालाफी नहीं है।
पता ठोक नहो तो शोर्षक और विसापमफा उपरोक
भाग दोनों ही न्यर्थ होंगे। इनको पदफर
प्राइफफेहदयमें जो लालसा उत्पन्न होती
हे यह पता ठीफ न रहमेसे कार्य उपमें
परिणत नहीं की जा सकती। पता ऐसा होना चाहिये जिससे
विज्ञापित यस्तु प्राप्त करनेमें सुगमता
हो
। पूर्ण विज्ञापनमा
ममिप्राय माल पेचना ही है और पता सूचित करता है कि वह
कहां मिलेगा। इसमें शादोंकी किफायत फरना बुदिमानी
पता।
.
नहीं।
भासकल तो पैमानिक रीतिसे विज्ञापन छपानेवाले इसके
मन्त पाने छोड़ देते है जिनमें परीरदारको केवल भपमा नाम
और पता लिखना पड़ता है। फिर या उस भयको फारफर
व्यापारीक पास मेज देवा । मासे रफ मशको प्रया
फरनी चाहिये यहां पहलेसे चिन्ह यमे रहते है। इससे प्राहकको
पत्र लिमने मादिफा समय और श्रम दोनों बचते है।
लाम प्रत्यक्ष है। मान छोजिये विज्ञापनको पढ़कर फिसीकी
रस्कटे षछा हुई कि उसिसित घस्तुको मंगायें। उसमे मनमें
सोचा माजही इसके लिये पर लिखूगा किन्तु कुछ समयके वार
।
.
विज्ञापन विज्ञान।
[४८
विचार ढीला पड़ गया और भन्त में उसने निश्चय किया कि जाने
दो फिर देखा जायगा। यदि उपरोक्त कूपन लगा हाता तो
केवल नाम और पता लिखकर वह उसे तत्क्षण हाफमें छोड
देता। लोहा जर तफ गरम रहता है नमी वफ उसको
पीरना चाहिये।
दूसरा लाम यह कि इससे ठीक २ मालूम हो आar ,
कि किस पभमें विधापन छपानेसे फितनी विक्री हुई। इससे
विज्ञापन यातायाघही सहायता मिलती है। जिन पम उपने
से सफलता हुई होगा उनमें तो वह विभापन छपायेगा, और
अन्य पोंमें या ता उनका छपना पन्द कर देगा या उनकी
त्रुटियां दूर फरेगा। इससे विज्ञापन-विज्ञानको भी धरा लाम
होता है। जिस प्रकारफे विनापनसे कितना प्रभाव पड़ता है
यह सत्क्षण जाना जा सकता है। इस रीतिफा व्यवहार होनेफे
पूळ विज्ञापन दातामोंको लिखना पड़ता था कि रुपया “स
पत्र का उल्लेय कर दी जियेगा
मोर पफ बात है। भाजफल प्राय समी विज्ञापन छ्याने
धाले कुपनको विकोणके रूप में देते हैं क्योंकि वैज्ञानिफ पिसे
थही सर्वोत्तम रूप। फलतः विज्ञापनके मन्य मागसे मिन्न
होनेके कारण, क्योंकि यह चौफोना होता है, एक तोइससे ध्यान
आकर्षित होता है। दूसरे, यदि विज्ञापनलेधक यदि पक्ष हुआ
तो इससे विज्ञापनकी यहुस फुछ मुन्धवा यहती है। किन्तु
इसे पृटके किनारे पर रखना चाहिये जिससे काटने में सुगमता हो
।
,
T [BE विज्ञापन फिस प्रकारफे होने चाहिये म कोई २ विज्ञापनदाता मैगजीन था सूचीपत्रमें छपा छपाया और ठिकाना किया हुमा पोस्टकार्ड तक लगा देते है। जहासे इसे अलग करना होता है यहां छेद फटे रहते है। केवल उसे फाड़कर अपना नाम पता लिन टिफट लगाकर साफमें छोड़ दीजिये। यस आपके पास इच्छित वस्तु स्वय पहुंच आयेगी। साराश यह कि आरम्ममें मनुप्पफो फिसी घस्तुफी इच्छा अमाय या तकलीफ होती है जिसे दूर विज्ञापन से हों। फरनेका यह उपाय सोचने लगता है। ऐसा चाहिये कि विज्ञापनका प्रथम भाग पिसी अमायकी मोर ध्यान भाकर्पित करें। फिर दितीय यिभागमें यह पताया जाना उचित है फि फौनसी घस्तु उस प्रभाषको दूर करेगी। तीसरे हिस्समें वह फहाँ मिलती है इसका उलष हो। उदाहरण- पया आप खटमलोंसे परेशान है? हमारा “मटमल-मुठार* चूर्ण मंगाइये । पता-डा० मुखर्जी, पायाजार, फलपत्ता । पियापित मस्सुके साथ माहम की इच्छाका सम्बन्ध फरानेके लिये यह माघश्यक है कि दोनोंफा साथ २ उल्लेख्य हो मौर इस सम्यन्धको गुट फरनेके लिये उन्हें कई पार दोहराना जरूरी है। पथा-वाय सिप्टन, ममफ सुलेमामी। सुलेमानी नमम पेसा लिमना ठीक नहीं। वर्णमाला अक्षर हम सी तो मटपट दोहरा आवे है किन्तु सलटा सुनानेके लिये यदि फोई कहे तो भिशापन विधान। ? ५०] घडा परिश्रम और समय लगेगा। अभ्यास जमनेपर छूिटना फठिन है। मनपर ऐसा अभ्यास नहीं कराना चाहिये जिससे मनोविज्ञानका नियम टूटता हो। होटल कन्टिनेन्टल" यह उदाहरण इस नियमका उपय गकरता है क्योंकि पहले मनुष्यको किली होटल था भोजनालयकी मोयश्यकता जान - परती है फिर यह किम होटलमें ठहरना चाहिये इसका विचार फरता है। "लीची मुजफ्फरपुर"इस नियमके उपयोगमा दूसरा उदाहरण है। अनेक व्यापारी मोटे अक्षरों में तो अपने फर्मका या अपना नाम पाते हैं और जिस वस्तुको बेचना चाहते हैं उसका नाम छोटे टायमें देते हैं। अधिफांश साइन बोर्ड तथा पोस्टरोंमें भी यही देखा जाता है। ऐसा करनेसे चाहे उक व्यापारियोंका मन प्रसन्न मलेही होता हो किन्तु यिफ्रीमें विशेप सहायरा नहीं पहुंचती। साइन योरों को देखनेसे तो तुरस मालूम हो जाना साहिले, कौन वस्तु यहाँ यिमती है। पोस्टर मादिमें मो जिस वस्तुका विज्ञापन हो उसे ध्यान माफर्षित करनेके लिये छेना परम आवश्यक है। शिम व्यापारियोंका नाम लोक प्रसिद्ध हो और उसफे उल्लेख्य मात्रसे यस्तुफे साथही उसकी अंठता भी आनी आय, उन्हें तो अपने नामको प्रधानता देनी ही चाहिये। उपादरणके लियो "भीम नाग" शम्य पदिनोटे भक्षरों में छापा जाय तो फषल यही नहीं प्रगट होता कि संदेश नामण मिठाईका विज्ञापन है किन्तु यह भी, फियो संदेश पानारमै सयोसम है। बीनाको मोल रेने पहरे कितनी ही चार ग्राहक विचारमें
मूल्य मिदान्यः-
[५१
विधापन किस प्रकारके होने चाहिये
हममा
पड़ जाता है कि उन्हें परी या महीं। उसे दलीलेंसे समझाना
पड़ता है। केयल म्यामायिफ प्रवृत्तियोंका उमाइमा यथेष्ट महों
दोता। चीज अच्छी है मूल्य अधिक नहीं है इत्यादि ममेफ
पातीपर विश्वास जमाना पड़ता है। अकाट्य प्रमाणों द्वारा सिद्ध
फरना होता है कि उस प्रकारकी अन्य कोई भी पस्त इसके
सामने नहीं ठहर सकती। सप पह उसे खरीदता है। ऐसे
विज्ञापनों दलीलोफो प्रधान स्थान दिया जाता है
विज्ञापन रथमाफा पहला सिद्धान्त “एफस्य" या पफ यात
फो प्रधान पनाना है। फिसी पफ पातको
हृदय पर अडित फरनेका यम करना
(१) पमस्या
चाहिये, भन्य पार्ने कम या अप्रधान दो।
विमापनमें ऐसा कुछ मो रखना ठीक नहीं जो उक्त प्रधाम
विपयका सहायक न बने ।
सूचीपत्रमि इस सिद्धान्तमा यहुत अपिफ नएन होता है
मौर इसलिये मी सूचीपकि विधापन परे कममोर समझ जाते
है। इममें पस्तुफे प्रत्येक मच्छे गुणफा उल्लेख कर टम पाटन
के हृदय पर जमानेका प्रयत्न होता है और परिणाममें पफ गुणमी
नहीं जमता। बाहरणार्थ, पैयराज लिखते हैं कि हमारी या
ममुफ २ रोगांको छूमन्तरफी तरह भाराम करती है, मप
दवाभोंसे सस्ती है, मत्यम्त स्वादिए है मूल्य यहत कम है, सेक्न
विधि अत्यन्स सरल. है, इत्यादि।
मप फाहिये,
हृदय पर उक्त दवा किस गुणने स्थान दिया ?
*
विज्ञापन विधाम।
उचित था कि एक गुणको चुनकर उसके चारों ओर विज्ञापन
बनाते। किसी वस्तुमें कर पाते थरापर महस्वकी जान पड़े सध
मी एफ चिसापनमें एक ही यातपर जोर देना और उस विशेषताको
भली प्रकार समझा देना यक्षिक अधिक लाभ दायकं होगा।
कुछ समय हुमा फिसी रेशमी पत्ताने बनानेवालेने इनकी
एफ ही विशेषताफो लोगोंपर प्रगट फरनेके लिये समूचे विज्ञापन
तकको पयेष्ट नहीं समझा, यल्फि तमाम मौसिम उनके इसी एक
गुणको पतलानेमें लगा दी कि अगुलियोंकी नोफपर इनमें दोहरा
पपरा दिया जाता है और पस्तानेके भन्य भागसे यह कमी पक्षले
नहीं फटता। दूसरे मोसिनमें उसने इस यातको प्रधामता दी
कि प्रत्येक दस्तानेके साथ निर्माताको गराएटी रहती है मौर
अङ्गुलियोंके छोर थाले दोहरे कपड़ेका उखमान किया।
पाएको तीसरी मौसिममें उसने इस घायपर जोर लगाया,
"भंगजीमें ट्रेडमार्क दिया है उसे जहर देखिये।" यद्यपि उक्त
व्यापारीमे इस सिद्धान्तको १६ प तक पहुंचाया है फिर मी
उसकी सफलताको देखकर कहना पड़ेगा कि उसने जो कुछ
फिया यह पहुत कुछ ठीफ था।
अय फिसो घस्तुमें कुछ विशेष गुण होता है जो उसी
प्रकारकी अन्य चीजोंमें नहीं होता, तो उस पर जोर देना ही
एकत्यके सिदान्तका उपयोग है। बाल्सपार यानिश
(Valspar varnish) घरायर इस पातपर जोर देती रही है
कि धौलमा पानी भी इसे सफेद नहीं पना सफता और अन्य
5
-
विज्ञापन फिस प्रकार होने चाहिये
H
गुणोंफा, जो पार्निशाम होने चाहिये, उलप माष करती
रदी है।
जय किसी पस्सुफो मुण्य यात व्यापारी पर प्रगट कर दी
जाये तो व्यापारीको उचित है यह उन पातोपर जोर देना
भारम्म फर देसिन्द पहले मप्रधान सममता था, मोर उक
मुख्य गुणको मक्षिम उतिके रूपमें पाठकोंफो याद दिलाता
रहे। माइयरी सायुन ( Irory Soap ) के विषय में पहले
इम पास पर ध्यान जमाया जाता था कि इसमें मिलायट मी
मौर यह पानी पर मैरती है। घरफे प्रत्येक पिक्षापनमें इसका
फोम फोई विशेष उपयोग यतलाया जाता है जैसे मेज फुर्सी
मारि काठकी चीजोंफा धोमा पत्थर म दिकी मूर्ति साफ करना
इत्यापि। पहलेको मुण्य पातें सक्षित उफिफे रूपमें इस प्रकार
लिपी जाती है "मारपरी साघुम--तैरती है", "भारपरी
सायुन - सेकडा शुद्ध है।"
फिन्तु एकत्यके लिये फोर प्रधान पासपर ध्याम समानाही
पर्याप्त नहीं। पाठकके पास एक समयमें एक दी मोरसे
पहुंचना चाहिये। एक पाफे विषयमें लिया गया था-"इसकी
म्याम्प्य सम्पन्धी विशेषता यह है कि यह प्रत्येक कीटाणु
सदृश जोधको मार डालती है। यह घरको पुम्दर पना देती है।"
इसमें कही हुई दो पातें पेमोड होने के कारण परस्पर सहायक
विभापग विमान
हमा
५४
-
दूसरा मूल सिद्धान्त यह है कि विनापनका सङ्गठन ठीक
होमा चाहिये। इसके लिये तीन बातोंकी
(२४संगटन। जरूरत है युक्तिसङ्गत योजना, उचित
रचना, धनिर सम्बन्ध । -
योजनाफे विषयमें ध्यान रखनेकी बात यह है कि प्रारम्भिक
भाग आफर्णित करता है, धीचमा दिस्सा चाह और विश्वास,
उपजाता है गौर अस्तफा भाग उभारता या मोल लेनेफो प्रेरित
करता है। फसी २ साधारण : उनको पदल देना ही
उपयुक्त है।
रखता ऐसी होनी चाहिये कि स्थान, २ पर न थले । एक
प्रस्फे पश्चात् घुसरा -प्रम ठीक रहता है, न कि माफे पक्षात्-
फोर्ड यकन्य। , उचित, रचना द्वारा सङ्गठन, धनाये रखनेफे
लिये ही अनेक विज्ञापनोंमें हम "क्योंकि" शब्दकी सला
देखते है।
पकही प्रफारफी रचना ा घाफ्यों या पाराग्राफॉमें रुधिकर'
नहीं जान पड़ती। फिर भी फिी चाफ्यमें "तुम" शम्दा
प्रयोग किया गया हो तो उसे अन्त तक रहने देना चाहिर
इसी मांतिमय थधि विज्ञापनमा
N
।
ANS.
[५' विज्ञापन किस प्रकारफे होने चाहिये - PM ।" अन्य का साधारण प्रयोग किया जाता है किन्तु “मोर तथा "परन्तु" के स्थानमें जहां तक हो भन्य योजय शम्दोका प्रयोग फरमा उत्सम है। इस व्यापक सिद्धान्तका यह मतलब है कि पिनापनमें जिसने महरपके विचार हों उन्हें उतनीही प्रधानता (३) बोर मा। पी आप। इसके लिये माटे राइप, टेहे अक्षर और इसी प्रकारफे साधनों द्वारा काम लिया, जावा है। मित्रोक- पारामाफे, पन्कि प्रत्टोक पाप्यमें एक मुख्य विचार रहता है। जिसका जैसा महस्य को ठसे टसीके अनुसार कम या मधिक स्यान देना चाहिय। समायमै आरमा मौर मन्त पे ही दो मत्यम्स महत्वपूर्ण स्थान घमने आये है इसलिये ऐसे घिसारांको जो सबसे जरूरी है पिसापनके भारम्भी रजमा उचित है। विज्ञापनके भारतमें यद पात मामी चाहिये जिससे विशापनदाताफा मुम्प सम्बन्ध रहता भयार काय्य करनेको प्रतिको उत्तेजना देना। inफिर भी यह ममम पिसना चाहिये कि विज्ञापनमें कई जगहपर मोटे टाइप लगाना और शोक,मीचे रेखाये खींचना विज्ञापनलेखककी कममोरी चिता करता है। जोर उसी विज्ञापन देनेफी बरत होती है जो अच्छी सरम नहीं लिया गया हो या जिसके लोगोंपर प्रमाय राळमेकी सम्भाषमा यात 1- -
--
.
विज्ञापन विक्षान।
हयाक
कम हो। यदि किसी मनुष्यको कुछ आवश्यकता हो तो
उसके सम्मुख एक अच्छासा शीर्षक देकर सरचार्श्वक अपना
कम्प सुना देना ही यथेष्ट होता है।
मान लीजिये कि विज्ञापनों का शय जोर देने के लिये मोटे
मक्षमि छापे गये है। पढ़नेपालेको दूधि पहले इन्हीं शम्दॉपर
परगी, पीछे यह विज्ञापनके शेष 'भागको पदेगा। यह ठीक
नहीं। जिन शब्दोंपर जोर दिया गया है उनका पाक्यमें अन्य
शब्दोंसे धना सम्बन्ध है। जोर दिये हुए शब्दकि पहले और पीछे
पपा लिखा है यह आने चिना उनसे विशेष कुछ अर्थ नहीं
निकलता। दूसरी बात यह है, ऐसे विज्ञापनोंको पढ़नेमें ।
कम्निता होती है। आपको एक भाकारफे टारपसे दूसरे
प्रफारफे टाइपपर कलना पड़ता है और फमो शम्दकि नीचे टानी
हुई रेखाए उमको रोक लेती है। परिणाममें समूचा विज्ञापन
गएघोटाला हो जाता है।'
यदि मोर ही देना भावश्यक होतो लिखावटफे बीचमें
शयोंफो टेवा छपाया जा सकता है। परन्तु इनका भाकार
भस्य शम्दीसे यड़ा म होना चाहिये। यदि मोरे ही बने
हों तो जिस घस्तुका विज्ञापन है उसके माममें
कई जगह लग सकते है। । मोमें बीचमें देंगी मी
तो उक्त मामपर ठहरेगी जिससे यह मली प्रकार पढ़नेवालरोक
सयपर अमित हो जायेगा।
[५७
धापन किस प्रकारकहानसाहय
किस पातको कितना महरष देना चाहिये यह मपनी अपनी
विचार शकिसर निमर है परन्तु मन्य व्यापारियोपर.मारोप
करके लिये भाषश्यकतासे अधिक स्याम देना हानिकारक ही
होगा।
विज्ञापन विधान। ५ मिन्ट समय मागे पीछे नहीं होगा। कल पुर्जे फेसे है इस लिये घसीपर केवल हमाग नाम पदमा योए है। साथमें दो वर्षकी गरोटी देगे सो अलग इस बीचमें यदि बन्द हो जाय सो मुफ्त घला देगे। मूल्य अधिक है ? साहय, सस्ते दामको घडियां बेचकर हम अपने नामको सराय नहीं करते। एमाग कहना मानिणे तो भापको पफ सलाह देगे। सस्ते दामको, घडी खरीद कर रुपये पानी में मत फैफिये। सच, पूटियो तो ये सस्ती नहीं महंगी हैं। हमारी एक घड़ी मंगाइये, जन्मभर यूमरी मोल लेनेको आवश्यकता न होगी।" यो तो जिन चीजोंफो मनुष्य फेवळ स्वामाविक इशामा द्वारा प्रेरित होकर मोल लेता है उनके दस्सीलोंके लिये उप- सम्बन्धमें ही जोर, देनेके लिये दलील पुक्त विज्ञापन। मावश्यक होती है शराषतकफे विज्ञापनोंमें ग्नमें पुटिफारक गुण दिखलामेका प्रपरल कर दलीलोंसे काम गया है। परन्तु निम्नलिखित भौणियों में घिमक चीजोंके लिये दलीलोंका व्यवहार विशेष प्रकारसे उपयुफ है (१) ये चीजें जो कारवार मेती या उद्योग धन्धोंके लिये खरीदी जायें। जैसे कलें, इफ्तरका सामान, औजार इत्यादि । (२) जो धीमें निर्माणमें उपयोगी हों जैसे टीन, लकड़ी, छतोंके लिये राली आदि। (३) घे चीजें जो स्वय तो किसी काम नहीं मानीं परन्तु काम भामेयाली चीजोंदे लिये उनकी भाषश्यकता होती है उसे 1
[६१
दली ग्याले विज्ञापन
का
मोटरफे टायर, कोंमें डालनेका तेल फुटयोलके भीतरफ
रपर।
घे चीजें जिनको मनेक व्यापारी वेचते ६ असे मोटर
गारियां, मेज फुसी, घसिया इत्यादि।
(५) मो चीजें रुपया काममें लगानेके लिये परीदी जाती है
से स्टाफ (Stook) और योर (Bond), मफान जमीन आधि,
विज्ञापन देनेके लिये मान ।
जैसा ऊपर फहा जा चुका है, दलीलयाले विज्ञापनोंमें पहले
क्सिी घस्तुका उपयोग समझाया जाता है जिससे मनुप्पको
उसकी मापश्यफसा जाम पग्ने छगे। विशेषकर ना मावि
प्कृत थी जिनके षिष्यमें लोग कुछ भी नहीं जानते, उनका
ध्यान सयतक माफर्विन नहीं कर सकती जबतक उन्हें समम्हा
न दिया जाय फि इनसे क्या क्या हराम हैं। इसके लिये बाधा
चित्रोंफी भावश्यकता होती है। उदाहरणके लिये, मोटर
गादियोंके पिशापोंमें पहले यही दिखलाया जाता था फि
ये हरसरहफी जमीनपर सुगमतासे घर सकती ह.तगामी
है, उपयोगिताके सामने ध्यय भी कुछ नहीं है, इस्यादि। फिर
जप लोगोंके मनमें घस्तुके व्यवहारोपयोगी होनेकी यात बैठा दी
माय मौर उन्हें इसकी जरूरत मालूम होतो व्यापारीको अपनी
यस्तुफी विशेषता पतलानी पाती है। उसे तो हम सभी
होगा मय उसकी यमाई हुई यस्तु लोग लेगे। अन्तमें जप
लोग इस यावको भी समझ जाय कि ममुक व्यापारीफी यस्तु
विज्ञापन घिमान ।
शा
६४]
है। उदा
अन्य स्पट गराटियां घ्यापारीफी वस्तुपर प्राहकका" विश्वास
उत्पादन करतो है।
जिन लोगोंने फिसो घस्तुमा व्यवहार किया है उनके प्रशंसा
पत्र द्वितीय श्रेणीका प्रमाण है। किन्तु वे ऐसे लोगों द्वारा
मेजे गये हों जो सचाईफे लिये लोगोंमें ख्याति पा चुके है या
जिन्हें अपने उम्चपद या प्रशस्त अनुमयके कारण जगसाधारणके
मम्मुख अपने विचार उपस्थित फरमेका अधिम
हरणके लिये किसी दयाफे सम्बन्धमें प्रसिद्ध डाक्टरॉकी सम्मति,
या फिसो पुस्तफफे विषयमें लन्धकीर्सि पत्रसम्पादकोंकी राय।
प्रशला पत्र भेजनेघालेको यदि 'अधिकांश खरीददार स्वय
जानते हों या उसका नाम सुन रखा हो तो और भी अच्छा।
तीसरी श्रेणीका प्रमाण घटित याते या हिसाय देना है
जिससे फिसी वस्तुफे सम्बन्धमें पूरा हाल ल गोंपर प्रगट हो
और उन्हें इसकी उसमता समझने में सहायता मिले। यथा,
मिन्न २ अवस्थानों में किसी वस्तुसे क्या फाम निकला, निर्वा-
रित समयमै फितनी बिफी इत्यादि। किन्तु माफडे याधा
रुचिकर नहीं होते इसळिये जो विज्ञापन साधारपाजमता
लिये हों, उनमें इनका कम व्यवहार होना चाहिये।
अहां कहीं इस प्रकारका प्रमाण दिया जाय, विशेष याते
यतलामा उचित है। ऐसा कहनेसे काम नहीं चलेगा कि एक
पडी कम्पनीने अपनी इमारतॉपर हमारी बनाई हुई टालिया
लगाई पल्कि कहना चाहिये कि अमुफ कम्पनीने हमारी ३१
[६५
।
लाम धर्गफीट टालियोंका उपयोगड़िया। सूखी यावें मोर मणि
फर मांकड़े मी याहुपा ममोरबफ मनाये जा सकते हैं। किसी
मोटर गाड़ी को मजबूती के सम्बन्ध में यह दिखलाने की अपेक्षा
कि हममे इतनी मील पात्रा की, इतने गैरान वेळ जला भोर
मरम्मत मादि के लिये इतना ध्यय हुमा, साधारणत: दिसलामा
चाहिये कि गाड़ी पहियों सफ फीचड में चली, मीलों नक रेसीपी
मरुभूमि उसने पार को मौर ऊंची चट्टानों के फिनार • कुछ दूर
तक जाना पड़ा।
दलीले मुख्यतः दो प्रकार की होती है। पफतो पेमिन
आरम्महीमें असल पात या पतन्य यता दिया
दमोक्षों को पो
जाता है और फिर प्रमाणों द्वारा उसे समूचे
विभाग।
विज्ञापनमें पुष्ट करनेका प्रयन होता है
जैसे मोटर के विज्ञापन के मारम्म में फमीर लिया जाता है,
पढ़ी सरल यमाघट है" और फिर बनावट का विशेष पर्णन
देकर इसकी पुष्टि की जाती है । दूसरा सदाहरण “एक छाटेन
के मूल्य पर तीन" है। कई बार इस श्रेणी फो धलीले प्रक्ष का
रूप धारण करती है। पथा, “१६१८ में क्या?" “कौनसी मोटर
मरीदनी चाहिये यह मैं कैसे पता सकता है ?" इस्पादि। इस
प्रकार की बढी उन विज्ञापनों के सन्वरम में प्रयुक्त होती है
जिनका उद्देश्य असल बात को लोगों के पय पर अमाफर उसे
प्रसिद्ध करमा होता है चाहे कोई पूरा विज्ञापन पड़े या न पड़े।
किन्तु इस थेणी की दलीलें उसमी रुविकर नहीं होती। किसी
व
५
विज्ञापन विमान
६
वास को कहकर फिर “पयोंकि शब्द से बहुधा प्रत्येक वाफ्य
आरम्म किया जाता है जिसका न तो परस्पर सम्बन्ध रहता है
मौरन रोचकही जान पसता है। पहले असल घात यता कर
फिर उसकी पुष्टि के लिये कारणों को सही उपम्पित करना साधार
णत कमजार रोति है। यदि 'क्योंफि" शब्द लिखना ही हो तो
प्रत्येक कारणके बारम्भमें इसे न देना चाहिये क्योंकि यह महस्य
पूर्ण अश नहीं है जिसपर दोहरा फर जोर दिया जाय।
दूसरी श्रेणी फी दलीलें घे है जिनमें प्रमाण का एक टुकड़ा
उठाकर ऊपर रख दिया साता है और फिर धीरे२ असल, पात
तफ पढ़नेपाळेको पहुंचाया जाता है। उदाहरण “हमारी फाउनटेन
पेन चूती नहीं है। "हमारा पोसत नफा टायर पीछे १०)
रुपया है। इससे स्पष्ट है कि प्रसिसि के लिये इस श्रेणी की
दलीलें उपयुक नहीं है। इसलिये समाचारपत्रों के विज्ञापनों में
इनका व्यवहार नहीं होना चाहिये। यह तरीफा कारवारी या
अमे हुए पाठकों को मैगजीमों के लिये उपयोगी है।
पिज्ञापन लिखते समय किसी वस्तु के अच्छे गुणोंकी एक
समयानुकत वालिका पना लेनी चाहिये । नको अंगरेजी
दसीले ।
में Talking points या प्रभाव डालने
1
.
वालो पासे कइसे है। फिर इस तालिफा की एफ मुख्य यात
पुनकर उसे विज्ञापन का माधार बनाना उचित है। जिस पास
पील का विज्ञापनफा आधार बनाया जाता है यह समपानुमार
1६७
एलीलपाले विज्ञापन
हाभ
यदलती रहती है। युइफे समय बने के घिझापामें उनके सस्ते
पन पर जोर देना मावश्यक होता था। भाजफल इस पातको
प्रधानता देनी पड़ती है फि यल स्वदेशी है पलिक हाय से कावे
सूतप्ते यने है। फिस समय किस पात पर जोर देना चाहिये इसके
लिये यात कुछ पुतिको सहरत है और इसी पर पहुधा विज्ञापन
की मफलता या माफामयायी निमर करती है।
एक पार ममफके किसी प्ययसायीने विज्ञापन छपानेके पूर्व्य
भपने नमफके समस्त मच्छे गुणोंफी एफ तालिपा यमाई। फिर
किसी एफको प्रधानता देकर उसके चारों ओर विज्ञापन पनानेके
लिये यह विचार करने लगा। अम्तमें उसने इस यात पर जोर
देना निधय फिल्पा कि इस नमक मिलावट नहीं है। पस, इसी
के अनुसार यिसपन लिखे जाने लगे। कई महीने यीत जाने पर
देखा गया कि जितनी आशा यो सतमा माल नहीं बिक रहा है।
नय पह फिर विचार करने लगा। सोक्ते२ उसके ध्यानमें माया
कि उसफे ममफ फी देराके जिन भागोमें साभिक मांग है यहां
सहीं अधिक पड़ती है भौर योसोक पाहर सुगमतासे महीं नि
पळता। साथही उसको अपने ममफाफा यह विशेष गुण स्मरण
हो पाया कि इस पर मोसिमी परिवर्तनका प्रमाष नहीं पड़ता
भोर निरन्तर सूमा रहने के कारण यहो सुगमतासे पात्रफि पाहर
माने लगता है। फिर क्या था, शुद्धताकी दळील निकालकर
उसने इसीको मुष्प स्थान दिया। मांग सुरत पड़ने लंगी।
समयानुकूल दस्टोलॉक पड़ा प्रमय परमा है। जिस पर
1
१
1-
विज्ञापन विज्ञान-1
६८]
भाका
घस्तुफी शित विशेषता पर जोर देनेसे लोगों को उसकी प्रबल
लालसा होगी उस समय उसीको प्रधान स्थान देना पड़े कौराठ
का काम है। उदाहरणके लिये, गरमीफे दिनों में यदि किसी श
तफा घिमापन छपाना हो तो इस यात पर जोर देमा मापस्यक
होता है कि इसके पानसे प्यास धुमती'हे और हृदयमें तरापर
पहुंचती है। उसी गर्यतको जाडेके दिनोंमें पेचना हो तो इन
यातीसे उलटे हानि होगी। उस समय तो केवल इस बात पर
ओर देना चाहिये कि हमारे थाम या भंगूरके शर्वतसे बल
बढ़ता है।
बहुधा जिन सामपिक पार्वोफी सम्बादपोंमें बहुत कुछ
चर्चा होती है, भौर जिमफे विषयमें ही लोग कुछ काल तक
सोचते रहते ई उनकै माथ अपनी पस्तुका सम्बन्ध कराना
विज्ञापनको रोचकताको पनुत कुछ पढाता है। लोग ऐसे.
विज्ञापन पदकर विज्ञापनलेखकफे कौशल पर मुग्ध हो माते
है और कुछ समप तफ ऐस विज्ञापन नहीं भूलते। परन्तु इस
यात पर ध्यान रममा चाहिये कि सामयिक विषयके साथ
ऐसा सम्बन्ध हो कि मस्सामायिफ न जाम पटे भौर पढ़ने
चालेको ऐसा न मालूम हो कि यहुन चेसे नोचे भा गिरा है।
यह कहना कि लम्ये विज्ञापम लोग नहीं पढते ठीक नहीं
यॉन परता स्योंकि फिसीर "ध्यापरिफ
लम्बे पिशापन। पत्रमें माठ माठ पेज तकके विज्ञापन
सफल सिद्ध हुए। रोचक हो और
वित्र और रंगीन विहाम। हमला करने लग जाय जिससे परमेपारेका ध्यान पिना सके इससे विहापनपर पहुंचे। उदाहरणके लिये घड़ीफा मित्र होतो प्रथम पाराहमें इसका पणम होना चहिय यह नहीं कि विसापनदाता अपनो प्राचीनता मोर सचाईका राग मालापने हंगे। साराश यह फि चित्र और विज्ञापनोंका धना सम्बन्ध है। उन्हें एक दूसरे को पुए करमा चाहिये। नहीं तो चित्र पाना व्यय ही महा उलटे हानिकारक होता है। विज्ञापन में चित्रीकी उत्तमता उनकी सुम्परतापर निमर महीं है किन्तु इस पातपर कि उनमे व्यापारीका माल कितगा त्रिकता है। कल्पना फीजिये कि फिलीने अपनी पेंसिलोंका नाम "सरस्वती पसिल" रखा भोग उनके वितापनमें सरस्वतीजीका यहुत सुन्दर चित्र उपाया जिसमें सरस्थतीजी पीणा पच्च रही है। यद्यपि चित्र- कारने पटरी स्वयीसे इस भाषको ध्यक्त किया है और विभ भी पास मच्छा यना है किन्तु कहना पड़ेगा कि थिमापनदातामे इस चित्रको छपाफर ध्यर्थही अर्थ व्यय किया। वास्तय उमका द्वपिमे चित्र अच्छा महीं हुमा क्योंकि पढनेनाले उसकी पंसिलोंको बिल्कुल भूल जाते हैं। उसे सो सचित था कि भपनी पसिलोका विर छपाता जिनमें इनकी पनायट मोर विशेपता पाठको पर प्रगट होती। कहां तो सरसतीजी मीणा पमा पी मोर को विज्ञापनके भारग्ममें घर मपनी पेंसिरोका वर्णन कर रहा है।
सचित्र और रगीन विज्ञापन ।
प्रोंका उपश्य विज्ञापनाके अईफो स्पष्ट झरना है..
चिइनसे विज्ञापनका आशय साफ झलक जाता है।
जो बात दजनों पक्तियां पढ से नहीं समझमें आती
वह चित्रको देखते ही ध्यानमें जम जाती है। किन्तु
इसका सम्बन्ध विज्ञापनसे अवश्य रहना चाहिये।
केवल व्यान आफर्पित करने के लिये ही ऐसे चिोंका छपाना
जिनका लगाय विज्ञापनसे कुछ भी न हो,
सनिय विधापना
हानिकारक है क्योंकि पढ़नेवालेका ध्यान
मुख्य विषयसे घटफर मित्रकी ओर चला जाता है।
चित्र मामों जिस पस्तुका विज्ञापन होता है उसे पाठकॉफी
भालोंके सामने लाकर रख देते है। धे ससकी बनावट और
विशेषता प्रत्यक्ष देख मफते है। यदि उन्हें इसकी आवश्यकता
मालूम हुई तो तुरस विज्ञापनको पढने लगते हैं। परन्तु विमा.
पनलेखफको उचित है कि घर मारम्भ हासे चिपके अयको
.
1.
मचित्र और रंगीन विहान।
स्पर करने लग जाय जिससे पदमेवार का ध्यान पिना रुके
इससे विज्ञापनपर पहुंचे। उदाहरणके लिये घड़ीका मित्र होतो
प्रथम पाराहोमें इसका पणन होना चहिय यह मही कि
विज्ञापनदाता अपनो प्राचीनता भौर सपाईका राग मालापने
सारांश यह कि वित्र मौर विज्ञापनोंका बना सम्पन्ध है।
उन्हें एफ मरेसा पुए करना चाहिये। मही तो चित्र पाना
व्यय ही महा उलटे हामि कारफ होता है। विज्ञापन में चित्रों की
उसमता उनकी सुम्मरताप निमर महीं है किन्तु इस पावपर
कि उनसे व्यापारीका माळ कितना विकता है। कल्पना
फीजिये कि किसीने मपनी पंसिलोंका नाम "सरस्पती पमिल"
रखा और उनके विज्ञापनमें सरस्वतीमीफा यात सुन्दर चित्र
छपाया मिसमें सरस्वतीजी वीणा पा रही है। यपि चित्र
कारने यही प्यासे इस मायको प्यक किया हे भौर चिम मी
पात मच्छा पना है फिन्तु फहमा पड़ेगा कि पिशापगदावाने
एम चित्रको छपाफर ध्यर्पही अर्थ भ्यय फिया। चारसयमें उम्मका
इष्टिमे विन अच्छा नहीं हुमा फोकि पढनेयाले उसकी
पसिझेको पिलल मूल जाते है। उसे हो उचित था कि
भपनी पसिलोफा खेर छपाता जिनमें इनकी पनायट और
विशेषता पाठको पर प्रगट होती। कहा तो सरखतीजी पीणा
पजा रही है और कहाँ विज्ञापनके माररममें वह अपनी
पंसिलों का वर्णन कर रहा है।
11
पिठापन विज्ञान।
०२)
जब हम फिसीको कोई काम करते देखते हैं तो हमारी
भी इच्छा पैसाही करनेफी होती है। हम अपनी इस इच्छा
फा थाधा राफ नहीं सकते । जब हम देखते है कि कोई
मनुष्य शर्यत पी रहा है और उसके चेहरे पर खुशी टपकी
पसी है तो अनुमान करते हैं कि यह शपत पड़ा स्वादिष्ट
होगा । हममी से घमनेकी इच्छा करने लगते है । अत
एय उदाहरण के लिये, किसी शतके विज्ञापनमें चित्रकार
यदि इस मायको व्यक करता हुआ दिखलावे कि एफ
मनुष्य शर्बतका पात्र अपने हाधमें लिये हुए है और उसका
चेहरा मानन्द परिपूर्ण है तो प्राय निश्चय है कि उक्त
शर्वतको मगाये पिना अनेक लोग न रह सफेगे । इससे
स्पष्ट है कि चित्र किसी वस्तुफा उपयाग दिलाकर
ग्राहकोंफो उसे मोल रेमेका प्रेरण करते हैं।
पुरे और पम्पष्ट चित्रोंसे उन्हें म पानाही उत्तम है।
लोग चित्रोंको देखकर विज्ञापित घस्तु के विषय में बाधा
अपनी राय ठीक करते है। यदि ये देखते है कि चित्र
मच्छा महों ई-अस्पष्ट और धुघला है-तो तुरत समझने
लगते हैं कि घस्तु अच्छी नहीं है । आप कहेंगे कि उन्हें ऐसा
म फरना चाहिये। पात ठीक है, किन्तु पिया क्या अय?
मनुष्य स्वभाघही ऐसा है। घड़ी चाहे फसीही हो. यदि
विप्र भन्छी नहीं है तो लोग अच्छो नहीं समझते ।
चिोकी उलिखित घटना ऐसी हामी साहिये जो प्रति
-
[02
सचित्र मौर रंगीन विज्ञापन ।
हमको
दिन अधिकांश पाठफोंके सम्मुत घटित होती हो मौर जिसे
ये सुगमवासे समम सके । ऐसी पाते' या वस्तुक चित्र
जिन्हें उन्होंने पहले कभी नहीं देखा न तो उमझा ध्यान
मामपित फरते है और म विहापित यिफ्पको रोचकदी
धनाते हैं।
मारांश यह कि षिचारकं साथ पदि अच्छा वित्र यना हो
सा उसमें लगाया हुम धन कमी पप नहीं माना और पुरे
मस्पर घिन छपाना रुपया पामीमें फेंकना है। यदि चित्र
उत्तमता यक प्रस्तुस म हो सके तो बिना उनके षिक्षापन
छाना पमुख मन्छा होगा। फेषळ सोधी मादी सरल भाषामें
पकम्य यसलाकर पाठकोंको पस्तु फैसी है, इसकी स्वयं कात्यना
करने देना चाहिये, न कि धु घले येडझे चिो द्वारा यम्सुसे
उनका विश्याम उठा लेमा
मपने चारों मोर संसारमें हम मितनी ची देखते हैं,
उनका कोई न कोई रंग होता है। सभी
रङ्गीन विशापन ।
भषिकाश चित्रोंकी भांति काली भोर
सफेद महीं रहतीं। यदि ऐसा होता तो समार सौन्दय्य
शून्य वम माता। एक गिरा फूल, भिन्न भिन्न थाँफे चित्र
पिचिन पक्षो, हरिख भूमि, मीळ भाकाश-इम सयके कारण
ही प्रकृतिको सुन्दरता विसको इसमा मुभाती है।
दिना र चित्र के घम्तुके माकार मात्रका पाय होता
है। पीसी, लाल, गोटी, हरी समी टोपियां फालीसी देण
विज्ञापन विज्ञान।
16
-
-
पाती हैं। उनमें कुछ भी पता नहीं जमता। अतएव जिन
मधिक,मूल्ययाली चीजोंको सुन्दरता प्रधानता रहोपर निर्भर
करती है टनको बेचने में फठिनता.पजती है। उदाहरणफे रिय,
किसीफो यदि मोटरगाड़ी घेचनी हो तो उचित है, यह
यथासम्भय रङ्गीन यिमापन छगावे। श्रीमती सुन्दर घरियां
बा भगूठियां रङ्गीन विद्यापमोंकी सहायतासे पातकी यातमें
पेची जा सकती है। उक्त विमापनोंसे इनकी ओर अनेक ऐसे
कोगोंका ध्यान आयगा, जो इन्हें खरीदना तो चाहते हैं, किन्तु
निझमें बसे देखकर कि वास्तवमें फैसी है। रङ्गोन
विज्ञापम, यद जैसी होती है, लाकर मानों पाठकोंक सामने
रख देते है
दीपालोंपर चिपकाये आनेवाले इश्तहारों, साइनयो?
आदिम तो रङ्गों ही कायाधिष्म रहता है। किन्तु मनमाने
रड जहाँ इच्छा हो लगा देनेसे भमिलपित फल प्राप्त नहीं होता।
न सो विमापन सम्पक ध्यान ही माफर्षित करते हैं और न
देखने ही में सुन्दर जंचते है-पविफ फितने तो पास्तममें मदे
भोर नेत्रोंको चौंधिया देनेवाले ठहरते हैं। पात यद्यपि सच है,
कि अन्धाअन मी कितने अच्छे विज्ञापन बन जाते हैं, किन्तु को
किम रहनेका ध्ययहार करना चाहिये, इस विषयके मूल व्यापक
सिदान्तोंको सम लेना परम मावश्यक है
रसोफे विषयमें पहली बात यह जान रखनी चाहिये, कि
मपरकी पातीक भतिरिक प्रत्येक रहका कुछ विशेष गुण ऐता
[..
सचित्र भोर रगीन विज्ञापन
M
है और यह मनके पिसी भाव विशेष वा गुप्मको पालामेमें
भयुक किया जा सकता है। जाडेके विकमि रातको यदि किसी
मनुष्यको पड़ा शोत लगता हो बार उसे मोदनेके लिये घरापर
घजनके दो मनी पल दिये जाय, जिनमें एफका सहका
मीला हो भोर दूसरेका गहरा लाल तो उप्णताके लिये यह
स्वमायता किसको सुनेगा! भवश्य ही मीले रङ्गको महीं।
लाल पड़ सप्णता पा कार्य करनेकी प्रवृत्तिको उभालता है
और मीला रङ्ग पहलेफे ठण्डेपनको और पढ़ाता है तथा कार्य
फग्मेको प्रवृत्तिको शान्त करता है।
। विज्ञापन छपानेघालेको
मी उचित है, कि यह उत्तेजनाके लिये लाल रसका व्यवहार
करे मोर मीले रङ्गको ठण्टेपन, रुकावट और विश्राम लिये
काममें लाये।
मूल रग ( Primary Colours ) केवल तीन है पोला,
रंगोका बर्मन, लाल, और नीला। शेष इन्दीय मेरसे
(१) मूल रंग। पमते है। प्रत्येक अपना फोर विशेष
गुण प्रगट करता है।
पोला र प्रकाश, प्रसन्नता भोर हर्षाधिक्य सूचित फरमा
है, क्योंकि यह सूर्य, चन्द्रमा या मन्य कृत्रिम प्रफाशोंसे पहस
कुछ मिलता चलता है।
उक गुणोंको उत्पादन घरमैके लिये
विज्ञापन में इसका व्यवहार हामा चाहिये ।
मानों मोर भीतरफे कमरोम इसका प्रयोग कर देखा गया है,
कि दीवालोंपर चिपकाये पीले कागज मोर पर्यो से इन स्थानों के
भन्धकारमय
विज्ञापन विज्ञान। 6] आज- रहमेवालोंफे जीधनपर तत्काल प्रभाव पड़ा और वे चिन्तारान्य सया प्रसन्न रहने लगे। यह रंग सय रंगोंमें अधिक चमकने पाला और अन्धकारका शत्रु है, इससे यदि ऐसे स्थामि विज्ञापन गामा हो जहां कुछ अन्धकार हो तो रस रंगका ध्यषधार करना चाहिये। लाल रंगक विषयों ऊपर कुछ लिखा आ चुका है। यह देखने में भागके सदश है। यही रग है जो मनुप्यफो कार 'करनेके लिये उसेजित करता है। ध्यान माकर्पित करनेमें इसके समाम कोई रंग नहीं। इसे गरम रंग कहते है और दोपहर के समय भामि चकाचर्णध ला देता है। कल, विशेषफर प्रीष्मसमें लाल रजाका कपड़ा पहनना सम्योचित नहीं समझा जाता। इससे भाखको हानि पहुंचती है। तो क्या विज्ञापनदाताको उचित है कि यह बडेर लाल स्थानों और इसरंगके लपचौड़े साइनयोहरों पर विमा पम छपाये ? उसे पदमेवालों पर दया करनी चाहिये। मीला रस सय तरहसे लालफा विपरीत है । इसे "ठएडा' "रंग कहते है और यह उत्तेजित रगोंको शांत करता है। पदि पीला और लाल परापर परापर मिळाया माय सो "मारंगी रंग बनता है। इसी प्रकार (२) प्रिमिभित रंग। पीलेफे साथ नीलेका संयोग होनेसे "हरा तैयार होता है तथा मीलेके साथ लाल मिधित करनेसे "घजमी' रगकी सष्टि होती है। इन्हें द्विमिश्रित -
[७७
सचित्र और रंगीन विज्ञापन
मान्स
रंग" (Binary'Colours) कहते है क्योंकि दो मूल रंग
के मिलमेसे इनकी उत्पत्ति है।
हिमिश्रित रंग जिन दो मूल गोफे योगसे यनते हैं उनके
प्रत्येकका गुण इनमें होता है। "नागी" रंग लाल मौर
पीले के मेळसे धमा है इसलिये प्रकाश ओर सप्णता दोनों
गुण इसमें है। इसकी उपमा मागकी सपटसे दी जा सकती है।
एक छोटी मागतो भोजन पकाने में काम माती है किन्तु पडी
लपटें लिखित स्थानोंको मलाकर प्राक कर सारती हैं।
इमसे सोच समाफर इस रंगका व्यवहार करना चाहिये।
"हरा" रंग प्रकाश भौर उर पन दोमोंका चोधक ?
क्योंकि पीले और मोळे रंगको मिलानेसे बनता है। ऐसा
प्रिय दूसरा फो भो रंग नहीं है, विशेषकर प्रीष्मयतुमें।
मापने देखा होगा फि इस समय घास मोर पेट हरे रहते
है तथा भास्मान नीला । ये मत्यम्त उष्णताकी दवा है।
"वैजनी" रंग नीले और लालका मेल है जिसे माग
मोर पर्फका साथ सममिये । फठल राम उत्पन्न होती है।
यह पोलेका विपरीत रंग है जो प्रकाश भया हप दूरकर
भन्धकार या शोक लाता है।
काला, सफेद और भूरा-ये तीन उदासीन" रक मामे
जाते है जिसका अय यह है कि इनमें
शरवासीन रग।
कोर रङ्ग प्रत्यक्ष नहीं देख पड़ता।
रहोंफा ममाय "काला" है मोर समस्त रहौंका योग सफेर
-
विज्ञापन विशाम।
७८]
समझिये । फिसी का न होना "काला" है मतपय यह
ग्गोंको सोखता है। काले स्थान पर लाल रज घर्त
सुन्दर देव परता है इसका कारण यह है कि लान रङ्ग
की नीम्रताको काला रङ्ग यहुत कुछ कम कर देता है
'जिससे यह भांखोंको पति मनोहर जपता है। इसके
विपरीत सकेर समस्त र गाँसे परिपूर्ण है इससे आप उन्हें
प्रहण नहीं कर सकता। यही कारण है कि सफेद
पिछवाडा रहनेसे चोदनी स्पए देन परती है।
शेष सीनफो छोड ऊपर कहे गये यहो रंग प्रधान रग माने
जाते है। इनके हल्के या घने होनेसे जितने रंग हम अपने
चारों ओर देखते हैं, पनते हैं।
पीला और यधनी, नीला और नारको, लाल और हरा-
ये "विरोधक" रंग कहे जाते हैं, क्योंफि
विरोधक रंग।
इनमें पहला दुसरेका शत्रु है। हमें
लाल रंग मिलाइये, देखियेगा यह मपना रंग छोडकर पहलेसे
हल्का पसने लगेगा और फिर भूरा हो गया। लालमै हरा
मिलाइये, लालकी भी यही पशा होगी। इसी मांति
नारङ्गी रंग नीलेका नाश करता है और पीठा, बैंजनीका।
रंगोंका उचित व्यवहार ( Harmony ), जिससे ये
रोका म्ममहार।
देखने में मांसको मजे लगे, उनके दो
गुणों पर भयलम्पित है -समामता
और विपर्यय । उमारणार्य पूरा मोरे भोर पीले रंगों
माधम माररगान विज्ञापन।
के परापर मागमें मिलमेसे पनता है इसलिये प्रत्येक
आधा समान है। इसमें दो मूल रंग सम्मिलित है और
जिन रंगोंमें ये मूल रंगहों पे समान हुए, उनफा हरेफे
साथ प्रयोग किया जा सकता है क्योंकि इस मोर ये
समान है। समान रंगोंके व्यवहारमें इस पावका ध्यान
रखना पड़ता है कि जिन दो मूलरंगोंक पोगसे ये पर्ने
उनमें तीसरा मूलरंग प्रवेश करने म पावे ।
विपरीत गोम परस्पर माशक मिार रंगोंका उपयोग
छोता है.- अमे मीला और नारंगी । नारंगी रंग लान
मार पोलेके मेळसे प्रस्तुत होता है। तीसरा मूल रंग
नीला है। मतएष नारंगी और नीला विपरीत रंग हुए।
पूर्ण घिपरीत, विरोधक रंगोंका ध्ययहार भासपास, एक
दूसरेको स्पर्श करते हुए, कमी म फरमा चाहिये। यदि
करमाही पटे तो “उदासीन" रंगोंकी सीध धारियोंसे उन्हें
पृथक् कर देना उचित है, या उन्हें समान मामर भास
-पास रखा जा सकता है। उदाहरणके लिये, जैसा अपर
कहा गया है, नारंगी मोर मीठा विपरीत रंग है। इनमें
इस प्रकार समानता लाई बा सकती है भारङ्गी हमें
मीला मिळापा शाम और नीलेमें नारंगी। जय प्रत्येक
भाषा नष्ट हो जायगा तो इन्हें 'समान" सममिये भीर
सप सिकट परस्पर मूते हुए रह सकते हैं। पूर्ण नीले
रगरा पुन्छ माग माघे टदासीन रहके यहचर क्षेत्रफल
विज्ञापन विज्ञान
Feria
के साथ ध्यवहत हो सकता है और इसीप्रकार पूरे सेम
नारङ्गीफा कुछ अंश अपनसे बड़े आधे उदासीन नीले
रड़के साथ प्रयुक हो सकेगा | इममें यदि एक रंग
आधसे अधिक नकर दिया जाय तो दूसरे रङ्गका
पहलेसे मो यदा हिस्सा इसके साथ भासकता है।
इस प्रकार रंगांका घिरोधक रंगों दाग नाशकर उन्हें समान
पिण्यावा । यनाना पिछवाडेके सम्मन्त्रमें पड़े महस्वका
है। पिज्यादा तो प्रधान पस्तु नहीं है, मतपय इसके लिये उदा-
मोन रंग सर्वोत्तम समझ जाते हैं। पूर्ण तीघ्र गंगोंका व्यवहार
पिछयाडेके लिये फमी न करना चाहिये । उदाहरणार्थ,
माघसे अधिक सोन रंगका कागज यदि दीवालोंपर चिपकाया
जाय तो मांखोंमें चकाचौंध आजामेसे कमरेके भीतरमी
चीजें स्पष्ट और मली नहीं देख परती
पर कोई पदार्थ उसममास प्रदर्शित करना हो तो उस
घस्तुका रंग सर्वदा हल्का रहना चाहिपे ।
पिउघारे इस मियमसे पफ यात और निकलती है।
जितना पड़ा क्षेत्र हो उतनाही फीफा रंग पिछयाडेके
लिये होना जरूरी है। अतएष दीयालों पर रणे सुप
विज्ञापन, लन्ये चौहे साइनयोई, सूचीपत्रोंके काघर इत्यादि
के विधाकि लिये पूण सीम रंगकी भावश्यकता नहीं है
इनपर छपी हुई बातों या चोजोको गहरे रंगमें प्रदर्शित
'कर उनपर जोर देना चाहिये ।
किसी वस्तु
-
कैसे विज्ञापन कहां छपाना चाहिये।
मापनोंफी निम्नलिखित घोणियां है
(१) निमक विज्ञापन। ये विज्ञापन
वि
उन लोगोफ छिये है मिहें मारम्भमें
फोई भाषस्यकता या ममाष पाता है
मौर उसे मिटानेके लिये विज्ञापन
पढते हैं। यथा, किसीफो एफ मकान भाडेपर चाहिये। यह
समाचारपत्रके विज्ञापन इस भभिप्रायसे
तीन भेसिया
पढ़ना पारम्भ फरेगा, कि उसके मन लायक
मकान मिले। समाचारपत्रों में मानकल कुछ मान ऐसे
विज्ञापनोंके लिये पृथक् निर्धारित रहता है। किसीको नौकरीकी
मायश्यकता हुई तो यह उसी कामको पढता है, जहां मोफरी
सालो के विज्ञापन एपते है। इस युक्तिसे ऐसे विज्ञापोंक
लिये प९२ शीर्षक और लम्बे नौड़े सान देलेकी भानश्यकता
महीं होती। यितापमदासाका सस्सेमें काम यगता है और
प्राहफको भटकना नहीं पाता।
६
विज्ञापन विज्ञान।
L
[८२
,
,
(२) दूसरे प्रकारके पितापन घे हैं, जो शीर्षक वा अन्य
उपायोसे ग्राहकका ध्यान माकर्पित करते हैभोर विद्यापित
चस्तुके विशेष गुण समाफर मोल लेनेको प्रेरण करते है।
मधिश विज्ञापन इसी श्रेणीके अन्तर्गत है।
(२) सोसरी श्रेणीमें उन विधापनोंको समझना चाहिये,
जिनके द्वारा व्यापारी उन वस्तुओंफी प्रसिद्धिका यक्ष करता
है, जिनका प्रचार तो बहुत कुछ हो चुका है भौर ममेक लोग
उमका पयहार करते भी है, फिन्तु यह चाहता है, यह
प्रचार कायम रहे और भविष्यमें भी लोग उन्हीं वस्तुओंका
व्यवहार करते जाय । इस श्रेणीके विज्ञापन मुख्यत लोगोंको
स्मरण कराते है, कि उक व्यापारो पूर्ववत् अपना व्यवसाय
कर रहा है और उसकी वर्तमान भाषिक भयस्ता विशेष सन्तोष
जनक है, समी विहापन छपानेका इसना ध्यय उठा सकता है।
समाचारपत्रके एक बड़े स्थानपर "लिप्टन की चाय पीभो"
केवल इतना भी छपाना इन कारणोंसे लाभदायक होता है
अप प्रम यह है, कैसे विज्ञापन फहां छपाये आय ?
समाचारपत्रों में से विज्ञापन पाने चाहिये
कह पाना चाहिये।
और मैगजीनोम फैसे? रेळके पशोपर,
द्रामगारियो मौर सड़कॉपर पोष्टरों मादिके लिये से विज्ञापन
लाभदायक होंगे? सूचीपत्र वा अन्य साधनोंमें कैसे विज्ञापन
हो? प्रत्येकका यहां पृथक् २ विचार करना भावश्यक है।
(क) निफ-यो होसमाचारपत्रमात्रकी विशेषता है, कि
1
८२]
केसे विद्यापन कहाँ छपामा चाहिये।
इनका प्रचार स्थानिक होता है, किन्तु दैनिक
पत्रोंके सम्बन्धमें यह यत पिशेष
(१) समाचारपत्र।
उपयुक है। जैसे, जो गिफपत्र फल
कसे निकलते है उन्हें कलकमें, पा इसके मासपास
रहनेवाले ही पढते है। सपष स्थानीय पस्तुओंके लिये से
यहुत षष्ठे साधन है। फिर दैनिक समाचारपत्र कुछ पुष्टियां
छोड़ सालमें प्रतिदिन निकलता है इससे भाषश्यकता
नुसार विद्यापन कई वार दोहराया जा सकता है। स्थानीय
विशेष यातक लिये तो जैसे सेल, मूल्यका कुछ समयके
लिये घटा दिया जाना भादि-पे सर्वोत्तम साधन माने
जाते हैं। जिन चीजोंको मष्ट हो जानेके भयसे शीघ्र
देखना पड़े, या जिनका भाष अल्प समयमें घट यढ़ जाता हो,
उनके विज्ञापन तो दैनिक पमोहीमें छपामा बकरी होता है ।
(स) साताहिक-साप्ताहिफ पत्रोंफा प्रचार भी पद्यपि
म्मानीय है किन्तु दैनिक पत्रों की अपेक्षा यह मधिक व्यापक
होता है। उदाहरणके लिये, फलमसे निकालमेघाले साता
हिक पत्रों का प्रचार यमाल प्रान्तमें हो अधिक सम्मय है-
पपई या मनाज प्रवेशम बहुत फम । मा मुफस्सिलपाले
रोज रोज पर न मंगाफर हफ्ते भरकी पपरे एक
ही आन लेना चाहते है घे इन्हें मंगासे ३, इमफा दैनिक
पोंसे दाममी फम होता है। फिर सप्ताहिकपभोको
परमेयाला हफ्वेमर तक इन्हें बता रहता है, एक घार पर
पार
पिज्ञापन घिद्धान। [६४ १ कर फेंक नहीं देता। अतएव इनमें प्रपे विज्ञापनोंका प योग कुछ भशोंमें दैनिक सनाचारपत्रोंसे अधिक है। दैनिक हों या साप्ताहिक, समाचारपत्रोंके विज्ञापन प्रबरोंफो भांति चुचुहाते हुए, ताजा हो। समाचारपत्रों को कम पढे लिखे लोग भी फेवल अवरे माननेके लिये पढते हैं इसलिये एफ शम्दभी इन विज्ञापनोंमें ऐसा न दिया माय जो खयरक पालमोसे हिट जान पुर। किसी घस्तुको देश भरमें फैलानेफे लिये समाचारपत्रोंमे उत्सम दूसरा साधन नहीं है। मिस२ स्थानकि मुख्य२ प्रत्रों में विज्ञापन छपानेसे, अल्प ध्ययमें घस्तुका प्रचार देशव्यापी हो सकता है। फिन्तु समाचारपत्रोंके सम्बन्धमें कुछ विशेष कठि माइयोका सामना करना पड़ता है इनमें मासपास और भी अनेक विज्ञापन रहते है जिससे इनमें छपे विज्ञापनाको यात फुन्छ प्रति दिता करनी पड़ती है कागज भी मैगजीन मादिसे पराय रहता है। रगोंका उप योग यार्जत ही है। 'फिर, समाचारपत्र पाठकोंके हाथमें अल्प समय तक रहता है, दैनिकपत्र तो साधारणतः बीस पचीस मिन्टसे अधिक महीं पढ़ा जाता, सपरे पट- कर इधर उधर फेंक दिया जाता है। मैगजीन (मासिक पत्र आदि) -मैगजीनों में विज्ञापन (२) मैगमीन। छपानेसे भी अपेक्षाकृत लाम हानि दोनों है। लाभफी मोर दांप गलने से पता चलता
कैसे विज्ञापन कहाँ पाना चाहिये
।
है कि कुछ मैगजीनीका प्रचार समाचार पत्रोंसे मंपिक है भीर
समाचारपत्रों के विपरीत इनके ग्राहक स्थानीय में होकर देशक
मिसर भागोमें फैले रहते हैं। इन्हें पढ़कर लोग फेंक नहीं देते
क्योंकि इसमें छपे हुए लेख मादि पड़े महत्यके होते है,
घेरना समय समय पर फी पार पढ़ते हैं। देखिये,
मासिकपत्र महोभेमें एक पार निकलता है जो महीने
मर तो अवश्यही पाठकोंकि सामने रहता है इसलिये
इसमें छपे हुए पिझापम भी इस पीच कई बार पढे जा
सकते हैं। ऐसा तो शायदही कोई विज्ञापन होगा जिसे
पठिंक पैकयार मे ऐन आते होंग कागजमी मैगजीनों
फा यठिया होता है इसलिये रंगोंका ध्यपहार सम्मष है।
फिरभो, मैगजीमोंका प्रचार देशके दूर दूर स्थानों सक
होनेके कारण स्थानीय व्यापारीको इमसे लाभ नहीं। दूसरे,
ये कुछ समय बोध घेफर प्रकाशित होती है इससे
समाचारपत्रोंकी भांति एक विज्ञापन की यार
अपनी षस्तु प्राहफके दिलपर ममा देना फठिन होगा।
किस ममाचारपत्र या मैगजीनमें विधापन छपाना चाहिये,
इस सम्यम्धमें तोम यातें ध्यान देने योग्य है। प्रथम तो
जिस पत्र पत्रिकाके जितने प्राइक होंगे, उतना ही इसमें
विज्ञापन छेपानसे लाभ होगा। विपन पाने के पूर्ण इस
पातका मली मोति निर्णय कर लेनी चाहिये कि किसका
तिनो' प्रचार है। किन्तु केवल नाईक सश्या' ही देखना
उपाफर
विहान विद्वान। -- कर फेंक नहीं देता। मृतएघ इनमें प्रपे विहापोंका उप- योग कुछ भशोंमें दैनिक सनाचारपत्रोंसे अधिक है। दैनिक हों या साप्ताहिक, समाचारपकोंके विज्ञापन भयरोंको भांति चुचुलाते हुए, ताजा हो। समाचारपत्रों को फम पढ़े लिखे लोग भी केवल खवरे जानने के लिये पढ़ते है इसलिये एफ शब्दमी इन विज्ञापनों में ऐसा न दिया जाय जो प्रयके फालमोंसे लिए जान पहे। निसी घस्तुको देश मरमें फैलानेके लिये समाचारपत्रोंसे उत्तम दूसरा साधन नहीं है। मिसर म्यानकि मुख्यर पुत्रों में विज्ञापन छपानेसे, अल्प ध्ययमें घस्तुका प्रचार देशव्यापी हो सकता है। फिन्तु समाचारपत्रोफे सम्पन्ध्रमें कुछ विशेष कठि नाइयाँका सामना करना पड़ता है इनमें' आसपास और भी अनेक विज्ञापन रहते हैं जिससे इनमें छपे विद्यापनाको बहुत कुछ प्रति दिता करनी पड़ती है। कागज भी मैगजीन मादिसे पराय रहता है। रगोंका उप योग घार्जत दी है। फिर, समाचारपत्र पाटकोंके हाथमें सफ रहता है, दैनिकपत्र तो साधारणतः पीस पचीस मिन्टसे अधिक महीं पढ़ा जाता, बयरे पढ- फर इधर उधर फेंक दिया जाता है। मैगजीन (मासिक पत्र आदि) मैगजीनोम विज्ञापन १२) मैगजीम- उपानेसे भी भपेक्षाहत लाभ हामि दोनों है। स्लामफी भोर पालने से पता चलता अल्प समय , ' 4 1
८५]
कैसे विज्ञापन कहाँ पाना चाहिये।
हम
है कि कुछ मैगजीनीका प्रचार समाचार पत्रोंसे अधिक है मीर
समाचारपत्र के विपरीत इनके ग्राहक स्मानीय में होकर देशक
मिार भागों में फैले रहते हैं। इन्हें पढ़कर लोग फेंक नहीं देते
क्योकि इनमें छपे हुए लेख आदि परे महत्त्व होते है,
घरमा समय समय पर फई पार पढते है देखिये,
मासिकपत्र महीने में एक पार निकलता है जो महीने
भर तो मवश्यही पाठकोकि सामने रहता है इसलिये
इसमें छपे हुए विज्ञापन भी इस पीचमें कई बार पढ़े जा
सफत है। ऐसा तो शायदही कोई विनापन होगा जिसे
पाठक एकयार न ऐन जाते होंगे कागज़मी मैगजीनों
फा पदिया होता है इसलिये रंगोंका व्यवहार सम्भव है।
फिरभो, मैगजीमोफी प्रचार देश दूर दूर स्थानों सफ
होमेके कारण स्थानीय व्यापारीको इनसे काम नहीं। दूसरे,
ये कुछ समय पीवी देकर प्रकाशित होती है इससे
समाचारपत्रों की भांति एक विद्यापन कई पार उपाकर
अपनी वस्तु प्राहकके दिलपर अमा देना फठिन होगा।
किस समाचारपत्र या मैगजीनमें विज्ञापन पीना चाहिये,
इस सम्बन्धमै तोम बातें ध्यान देने योग्य है। प्रथम तो
जिस पत्र पत्रिकाक 'जितने प्राहक होंगे, उतना ही इसमें
विज्ञापन छपानेसे लीम होगा। विज्ञापन छपानेके पूर्व इस
बासका भली भांति निर्णय कर रेनी चाहिये कि किसका
किसनो' प्रचार है। किन्तु फेल ग्राहक सख्या ही
विज्ञापन विज्ञान।
[८६
-
पर्याप्त नहीं। किस पत्रको फिस,'श्रेणीके लोग पढ़ते हैं,
इसका भी घिधार प्रत्यावश्यक है। विज्ञापन -ऐसे पोंमें
छपाना ठीक है जिनको ऐसे ल ग पढ़ते हों, जो विज्ञापित
वस्तुको पद सकें या सिमके मोल लेने की सम्भावना हो।
फुटपो का विज्ञापन नियोंके पत्रमें छपाना या मोटर गाडीका
विज्ञापन ऐसे समाचारपत्रमें देना असे
मजदर पढते हों व्यर्थ
रुपया फेंकमा । तीमरी यात इस विषयमें यह है कि पत्र
कैसा है, कैसे कागजपर.फसे टाइपमें छग्स।
उसमें छपमेवाले
अन्य विज्ञापन फैसे हैं- लोगोंको धोखा तो नहीं दिया करते
इन यातोंपर विज्ञापन छपानेघालेको अवश्य ध्यान रखना,
चाहिये।
समाचारपन और मैगजीन दोनों में ही विज्ञापन छपानेसे
एक पडी असुविधा यह है कि उन्हें अनेक ऐसे लोग पढ़ते हैं,
सो या तो यिझापित घस्तु मारीने असमर्थ रहते हैं या जिनके
लिये विज्ञापन ही नहीं लिखा गया। अतएव उनके लिये ये
व्यर्थ ही हैं। एकदम ध्यर्थ तो नहीं क्योंकि जो आज
असमय है, कल समर्थ हो सकता है या अनके लिये विज्ञापन
नहीं लिखा गया ये ऐहे। गोंके सामने पस्तुका उन्नस कर
मकवे है जिन्हें इसकी आवश्यकता होती है। फिर भी इनमें
छपे घिसापन भनेक ऐसे लोगोंके पास पहुंचते है, मिनसे
एस्तुका कुछ भी सम्बन्ध नहीं रहता।
सूचीपत्रकि,विषयमें यह बात नहीं है। व्यापारी अपने
40] से विज्ञापन कहां माना वाहिये।। - मालका सूचीपत्र छपाकर खिल उन्हीं ॐ सूचीपत्र और नमूमे। लोगोंके पास भेजता है, जो समयं तो अवश्य ही होते हैं, किन्तु साथ ही उसमें रुपि भी. रजते है। उदाहरणके लिये पुस्तक विकता पा प्रकाशक अपनी किताबोंका सुखीपत्र उन्हीं लोगोंके पास मेमेगा, मो- पुस्तकमी होंगे। आहकको सूचीपत्रोंसे लाभ यह है, कि एक व्यापारीकी या एक प्रकार की फुल चीजें उसे एक स्यामपर मिलती है मौर अपनी पसन्दफे अनुसार उममें मच्छी पा सस्ती देखकर यह मंगा सकता है। बहुतसे व्यापारी सूचीपत्रोंको घटिया कागजपर उपा लोगोंफ पास भेजते है और जा चित्र उनमें देते है मामको चित्र है। ऐसे सूत्रीपत्र भेगनेने म मेमना मन्छा । सुन्दर फागजपर इस प्रकार छपाकर कि पड़ने में किसी प्रकार फठिनाई न हो, भेजमा चाहिये। एक प्रकारची वस्तु एक ही सामपर क्रमानुसार छापना उचित है। स्वीपमि चित्रोंकी प्रचुरता होनी चाहिये फ्पोंकि घस्तुके ममायमें पही पफ साधन व्यापारी की वस्तु भली भाति समझ लेनेफा प्राहरूपे पास रहता है। रहीन चित्र हो तो फिर यात ही क्या। एक छपा छपाया और ठिकामेयुक पा पा काई इनमें रख देना चाहिये जिससे किसीको सूचीपत्र पदफर कोई यस्तष्फी एण्ण हो तो उसका केवल माम लिसफर को छोड़ दे पत्र लिममेका कार सकन हो। सूचीपोंके सम्पन्ध एक कठिनाईका हम मन्यत्र रहे " ॥ । -
बिपिन-विज्ञान
८८}
कर चुके हैं। इनमें वस्तुफै समस्त अशे गुणोंका एक ही
सौर्य उल्लेख किया जाता है, इससे किसीपर भी ध्यान नहीं
जमा। दूसरी कठिनाई यह है कि सूचीपत्रोंकी लीग पढ़ते
कम है, पकवार देक्षा और रही खानेमें फेंका। यह भी पंर्फे
फरिण है, कि सूचीपत्रको सुन्दर कागजपर अच्छे चित्रोंसे
विमपित कर इस प्रकार छपामा चाहिये कि लोग उन्हें यक्ष
पूष्यफ रखें और यरि ३ ठमेकी इच्छा करें। हालमें हमें एफ
स्थानीय पुस्तफधिकताफे सूचीपत्र घेखनेका अवसर मिला,
जिसमें उन्हनि प्रत्येक पृष्ठक नीचे जामने योग्य उपयोगी यात
दी है। इससे कई बार सूचीपत्र पढ़ना पड़ता है और कुछ
पुस्तक नामपर दूष्टि पहुंच ही जाती है . ध्यान रम्ममा पड़ता
है कि कहीं सूचीपत्र खो न आये।
कितनी ही चार लोगोंके पास नमूने मे जाते है, जिससे
घे पस्तुको सय घेख्न ल या उसके व्यवहारका उन्हें अभ्यास हो
जाय। परन्तु मई माइते डालना सहज नहीं है, इसलिये
किफायत न कर अधिक परिमाणमें नमूना भेजना चाहिये,
जिससे साधारणत इसकी परीक्षा हो और लोगोंका यिना
इसके काम म चलेबायका प्रचार इसका प्रत्यहं उदाहरण
है। आरम्भमें धाप मुस्ने निर्णयी जाती थी। अब लोगको
सिके व्यवहारका मम्यास हो गया तो मुफ्त देना रोक दिया
चाय कम्पनियां आजकल तो सालमें लाखों रोट्रॉफी
मुनाफा करती है। ऐसे मनेक उदाहरण दिये जा सकते है।
गया।
---
t
कैसे विज्ञापन कहां पाना पाहिये।
दीवालोंपर चिपकाये जानेवाले विज्ञापन ऐसे सामोपर
मगाये जाने चाहिये, महो अनेक लोगोंकी
पोस्टर इस्पादि।
निगोह पड़े और उनके पढ़े जामे में सुविधा
हो। इनमें मोटे मझर मनिषाऱ्या है, क्योंकि सच सानपर
लगाये जाते हैं और राह चर्मता आदमी रुककर छोटे भक्षरोंको
पढ़नेका कर नहीं उठायेगा। न पहुत पातें पढ़नेफा उसके
पास समय ही रहता है। इससे में
अक्षरोम ये पत
संक्षिप्त होने चाहिये। इनका उद्देश्य तो फेवल वस्तुफे नामको
म्मरण कराकर उनको मोल लेनेका प्रेरण करना भी है।
जिन चीजति विषयमै पाठकॉन समाचारपत्र माविमें विस्तृत
रूपसे अन्यत्र पढा होगा, उनकी यादमर दिलाना इनका काम
है। सम्भव है, जिस वस्तुका पोस्टर अलख करते है, पद
पगलकी दूकानमें मिले । बहुपा अपमें रुपये मी मोजूद ही
रहते हैं। यस; दूकाममें गये, रुपये दूकानवारक सामने
रखे और सस्तो+A.
का
रसगादो के भीतर छपे ए विज्ञापनों को, छ पाम न रहने
के पारण, मुसाफिर कई बार पढ़ जाता।
अपर ऐसा ही
एका चित्र उचुत किया गया है।
कैसे विज्ञापन कहां जाना चाहिये।
दीवालोंपर विकाये जानवाले पितापन पैसे सानोपर
लगाये जाने चाहिये, जहाँ बनेक लोगोंकी
१४ पोस्टरत्यादि।
निगीह पटे और उनके पट जाने में सुविधा
हो। इनमें मोटे मसर मनिवार्य है, क्योंकि म सानपर
लगाये जाते हैं मीर राह धरता आदमी रफकर छोटे मक्षरोंको
पढनेफा कट नहीं उठायेगा। न यात पातें पदनेफा उसके
पास समय ही रहता है। इससे म
मक्षम में पहुत
संक्षिप्त होने चाहिये। इनका उद्देश्य तो केयेल घस्तुफे मामफो
स्माण कराकर उनको भोक मेका प्रेरण करना मान है।
जिन खोजाँफै विषयमै पाठकोंने समाचारपत्र मादिमें विस्तृत
रूपसे भन्यत्र पढ़ा होगा, उनकी यादभर दिलाना इनका काम
है। सम्भव है, जिस वस्तुका पोस्टर उल्लेम करते है,
यगलफी दूफाममें मिले । पहुधा सेयमें रुपये मी मौजूद ही
रहते हैं। बस, दुकानमें गये, रूपये दूकानदारक सामने
रसे भौर यस्तु मोल ली।
ऐसे विद्यापीम रंगों और चित्राफा व्यपहार तो होना ही
चाहिये। लपहनके पफ लेखफमे कुछ समय हुआ, यहाँके
पीपालोंपर गाये हुए विधापनोंकी सुन्दरता देखफर मिन
स्थानोपर ये मंगे थे, समको रियो चित्रशालासे उपमा
दी थी।
साइमपोर्टों में मी रंगोंका उचित उपयोग होना जरी है।
किस घस्सुिका काम है। इसपर होगाँको विशेष ध्यान जामा
यह
विज्ञापन विज्ञान।
हाला
[0
7
1
चाहिये। यदि यहुत प्रसिद न हो तो फर्मके मामको प्रधानता
देना ठीक नहीं।
विजलो द्वारा रातमें चमकनेवाले घिहापन पनेक युक्तियोंसे
विज्ञापिता घस्तुफा स्मरण कराते हैं। अबसे यासफोपका
प्रचार पढ़ा, यह भी विज्ञापनोंक लिये बहुत उत्तम साधन यन
गया है
ट्राम और रेलगाड़ियों में लगाये गये विज्ञापम कुछ
विशेषता रहती है। इनमें जब मनुष्य सफर करता है, तो
ममय पीतना उसके लिये फठिन हो जाता है और यह अपने
सामनेफे विज्ञापन का पार पढ़ पालता है। रेलफे ऐशनोंपर
लगे पिधापन मी एक प्रकार इसी श्रेणी में सम्मिलित किये
जा सकते हैं, क्योंकि जय गाड़ी, किसी शनपर पड़ी होनी
है, मो कुछ काम न रहनेसे मुसाफिर इनको का पार पढ़ता है।
जय हमें कोई कुछ उपयोगी वस्तु देता है तो हम
१५) सेंटर मादि।
प्रसन्न होते हैं और देनेवालेके प्रति हमारे
तवयमें सनाव मुत्पन हो जाता है।
सुन्दरर कैलेंडर (पञ्चांग), पेपरट (Paper weights)
मादि वस्तुप जिनपर विज्ञापनदाता और उसकी वस्तुका
नाम छपा होता है निरन्तर इमें उनका स्मरण दिलाते
रहते हैं। हमारी इच्छा होती है उनसे ध्यापारिक
सम्यन्ध सापित करें।
कैलेंटर दो प्रकारके होते है-धे जिनको दीपालोपर
WHITDREAS
ERTISH
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स्दनकी समीनके भीतर जानेवाली रेस्गाडीका पह एक स्टेशन
है। दीवालोंपर पिडापन लगे हुए हैं।
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फसे विज्ञापन कहाँ उपाना चाहिये।
हाक
-
रागा जाता है भीर ये जो
पुस्तफाकार उपाकर भेजे
जाते हैं। योनों प्रकारफे पलेंडरोंमें शिफ्न देमेसे
ध्यारोको मासा लाम रहता है।
तो फलेंडर दीवालोंपर टांगे जाते हैं उनको तारीय
यार माननेके लिये मनुप्य दिनमें को पार देखता मौर
दर पसे व्यापारीया नाम सधा यस्तु उसपी माझकि सामने
माचने एगसे है। 'पन्तु यह स्मरण रखना चाहिये फि
असल चीज सारीख और पार विसापन नहीं। पहुसेरे
दन पैसेंजरोफो ऊपरसे नीचे नव विमापनोंसे भर देते है
और थोडेसे खानमें महीन अक्षरों में तारीख और पार
छापते है। यह पड़ी भूल है। मुइपर थप्पड़ जद नेसे
जितना ध्यान आकर्षित होता है उतनाटी धा धोरसे
कंघ पर हाथ रख देनेसे भी हो सकता है। दूसरी बात यह
कि दीयालोपर लगाये जाने वाले फैलेंटरोंसे सस्वीरों की
भांति फमरेकी सुन्दरता पढनी चाहिये। इस पातको समझ
भाजफल प्रसिन् व्यापारी यरे२ चित्रकारोंफो इस काव्य
पर नियुक रखते हैं। अन्यत्र हम बड़े भाकारके तीन
रंगे फलेटरका छोटा एफरंगा चित्र प्रकाशित करते हैं।
इसमें भछ कैलेंडम्फे प्राय समी गुण।
पुस्तकाकार में तारीख पारफे भतिरिक पाहण
'मादि सालभरमें होनेवाली मुम्य घटनाओं का सम रहता
है। मौर भी मानने योग्य किसमीही पातोंका इममें समा
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से विज्ञापन कहां छपाना चाहिये।
लेकिपी, झपे हुए विज्ञापमपर तो पिना हमारा ध्याम
गने कभी नहीं रहता पोंकि इन्धीको पढ़ने के लिये वो
इम समाचारपत्र मोल लेते है।
मैगजीमों के विपपमें, जैसा ऊपर लिमा जा चुका है,
कापरके प्रथम मौर अन्तिम पृषु ध्याम माफर्पित करने में
सर्वोपरि है। इनके उपरांत दूसरे और तीसरे पृष्टका नम्बर
है। अयशेप विज्ञापन साधारणत लेखक आरम्भमें या मन्त
में छापे जाते है। विलायतकी स्ट्रैड मैगजीन (Strand
magazine) के घमान सालका एफ मा हमारे सामने
है। इसमें पूरे ६. पृष्ट यिमापूनोक है, ४० रेशाके
पहले मोर शेप २० पीछे। इतने विमापनों में ध्यान
माफर्पित करनेफे साचन केवल शीप फ और चित्र ही हैं।
सम्मम है का मिलापनो को तो सोग पठसेही न होंगे। इस कठि
माफिी दूर करनेके लिये ममेरिफन मैगजीनामें एक नयीन युधिसे
फाम लिया जाता है। इनमें पीचमें पाश्म विपय मौर दोनों
फिनारोपर विज्ञापन रहते हैं या पाट्य विषयके यीसमें पफ २ पेज
विज्ञापनफा होता है। ऐसा करनेसे माय समी विज्ञापनों
पर आनेका समान मौका मिलता है। उक्त स्ट्रार मैगजीमके
सलिखित ममें फायरफे प्रथण पृष्टपर एफ सुन्दर रशीन
सानपर लिम्मा हुमा है,-"फाइका, चाईसषा पृष्ठ।" इससे
पाठक, प्राय निषय है, फाफे २२ पृष्ठपर उपेहप विज्ञापनको
निफाल फर मयश्य पढ़ेंगे।
विज्ञान विज्ञान ।
fe
-
मैगजीनों में विज्ञापन छपानेके सम्बन्धमें एक विशेष यात
यद्द है, फि पुस्तकों की तरह यीचसे सीपी जानेके कारण जो
विज्ञापन पृष्ठके किनारेपर रहते हैं, उनको लोग अधिक पटते
दमौर जो भीतरफी मोर होते है, कम। इससे पृष्ठफे भीतरकी
मोर विज्ञापन छपाना उतना ठीक नहीं होता।
पार्डर और स्थान छोडना ।
र लगानेफे कई फायदे है। पहला, तो
यह फि मन्य विज्ञापनोंसे यार्डर किसी खास
विज्ञापनको पृथक् कर पता है। दूसरे
इससे पिशापनकी शोभा रहती है और
उसमें विशेषता.मा जाती-है। किन्तु मुख्य
घस्तु तो विज्ञापन है और पार्डप, गार। पाईर शिपम
केलिये है, पितापन पाईरफे लिये नहीं। इससे गार्डर इसमें
धने मीर भड़कीले म हो पि ध्यान धिमापनसे बटाफर
चार्टरदीमें लगा है। पार्डर तो-विज्ञापमके लिये सहायक
मात्र है।
पार्टर इतना सेन को सभी न हो कि शीर्षक या चित्र
पारि
माय । अपसफ कुला
मिशेष मभिप्राय म रहे पार सरल
और साधा रमनाही ग्रेए है। सबसे उत्तम पार्डर सो
कमजोर पर
विज्ञापन विधाम।
१६]
विज्ञापनके चारों ओर दो सीधी रेखाये लगामा है। इनसे
विज्ञापनके भिमर मग एक बने रहते है और में पृष्टके
दूसरे विज्ञापनोंसे इसको पृथक् भी अमाये रखती है। जय
विज्ञापनदाता इस यातका निश्चय न कर सके कि कहां
फेसा पार्डर लगाया जाय वो उसे उपित है कि सीधी
रोखामोफा उपयोग करे। येजोड़ यार्डर लगाफर विज्ञापनका
प्रभाव नष्ट कग्मेसे यह बहुत अच्छा होगा।
विज्ञापनके चारों ओर दो से अधिक सीधी रेखाये
लगाना ठीक नहीं है क्योंकि इससे ध्यान फैल जाता है।
नोकीले पाईरोंमें कोने भीतरकी भोर रखना चाहिये कारण
ऐसा फरनेसे ये पढने घालझी दृष्टि इधर उधरमे पटोर
कर यिमापनपर ला गिराते हैं। पाहरफी भोर निकले
हुए कोने नजर विज्ञापनसे हटाफर इधर उधर छित्तरा
ऐठे हैं।
कितनीही घार वा पाईरफा विशेष मर्थ रहता है।
उदाहरणार्थ, गलीवेके विज्ञापनमें ऐसा पार लगाया जाता
है जो इसनेमें गल चेसा जान पड़ता है, फीतेके विज्ञापनमें
फीताही कमी२ घाटर रहता है मौर सो प्रकार जिस
वस्तुमा विशापन होता है उससे मिलता जुलता वार्डर
बने हैं। इसका लाभ प्रप्यक्ष है। पार्टर विज्ञापनकी
थातोफो पुए करना है और यह घस्सु मानो पाठककी
भाषो के सामने नाचती हई उममे काहतो है जिअवश्य ।
पठसे २ पौर
छोटे पदनपारेको
चाहिये कि विहापनसे छाभ तभी होता है व योगदन्दै
फष्ट होता है जिससे विज्ञापन छिपानेका गंदी पर्य
कि ध्यान माकर्पित करनेमें इसका सान बहुत ऊमा ६॥
पूरे पृष्ठपर यदि - किसी वस्तुफा, मामही या दिया
तरह मनावश्यक स्थान छोड़ना ध्यप रपये पद परना।
भववष कहां कितना स्थाम छोड़ना चाहिणे, या विज्ञापनदाताक
विज्ञापन में जितना स्थान याता'६, उसका शमांश सामी
रणत पाईर मौर विज्ञापन पीच छोड़ना सोरुम है।
मोटा और घमा हो तो क्षिपर उसका असर कम करने
यापपर भी सानकी कमी सी निर्भर करती है।
से विज्ञापन कहां दिवे
देखा जाता है कि कितने विपनदाता मिस नामपर
विज्ञापन छपाते है से लेकर
स्याम बोड़मा।
विल भर देते हैं।
कारण यह है कि उन्हें एचके दिमाये जिन
छपाई देनी पड़ती है जिससे घे घालं हूँ
अगमी लान व्यर्थ न छुटे ।। किन्तु उनणे समाना
विना उवित मान
आता है । स्पान छोड़ने के सम्बन्धमें दूसरी बात यह है
परन्तु जिस प्रकार उधिष्ठ काम न छोड़ना बुरा है, उसी
लिये बड़े महत्त्यका किन्तु पेचीला सपास है।
पार
छोदनेकी माघश्यकता होगी। विशाप
लिये मधिक मान
जाय वो सय उसे पगे।
[lek
विजापाशिम
माक
पहरिइतना मातरबारीरी टाइप बमपरक रहे
जिससे 'पटनेमें मुगमता । एक पकिसे दूसरी पंक्ति
पटने में मार्डरमे झोप न टकराये इतना तो 'खान' भनि-
धार्य है।
स्थान छोडसमय इस यातपर जरूर ध्यानारखना चाहिये,
कि ऐसा महाकहीं तो पहुत साना छूटानाया मौराफी कम
छूटे। इससे सफेदा खानका उचित व्यवहार नहीं होता।
पदि कहीं उचितसे अधिक पानटजाता है, तो विज्ञापनकी
अपेक्षा कोरे पानपर पदनेवालेका विशेष ध्यान रहता हा।
खाली स्थानका ठीक उपयोग होतो घुरे विशापम पर मी
उदमा ही ध्यान जाता है, जितना अच्छे पर।। सोमातको यदि
दूसरी तरह कहा जाय तो इस प्रकाराकह सकसे है कि अच्छे
विज्ञापनकी मोर ध्यान आकर्षित करने में कोरा स्थान छोरनेकी
उसनी मावश्यकता नहीं होती, किन्तु यदि विज्ञापना ठीक सौरसे
म पना हो तो दूना स्थान छोडना परता है और बर्य भी प्राय:
चूना गिरता है।
सुझाना
ज
पकिसी पातका फूछामंशा पतला मेपर
पाकी मनुष्य अपनो दुनिसे मालूम कर ले
तो उसे “सुझाना कहते हैं। कुछ तो
पठला दिया जाता शेरमनुप्या मरनी
सनशिक्किा और मर्नुमषसे जाम लेता है।
उदाहरणको लिये हममे गोल शक्लें
पहले कायारादेमी है। कागजपर यदि कोई इसका कुछ
माना किसे भाग यीचमें छोड़कर ऐसी ही मपूर्ण शक्ल
पमाघे तो हम-अवशेष सुरत जान लेंगे।
माम छो हुए अंशपरसे सो फायगी और इमगोलाकार
रोशा अपने सामने देगे। मौरा एका उदाहरणा लीजिये।
किसी प्रसिदकिके प्रारम्मकाल मंशका नेपर पके हुए
माको । हम सम पूरा करा लेते हैं। कहावतका पहला माग
दूसरेको "सुझाता है।
पपि मनुप्पो विधारंगील प्राणी कहा जाता है, किन्तु
पर सो अधिकार प्रता कम गऐसे होंगलो
1
का
विकापन विज्ञान।
AM
-
फिसी पातको पूरी तरह षिचारकर-पक्ष और, विपक्ष दो!
ओरफी पाते'तोलकर-फिर उसमें हाथ गले गे। मशिक्षित
लोगोंकी तो यात ही छोट दीजिये, बहुतसे पढ़े लिखे लोग भी
"सुझाने के शिकार बन जाते हैं। विशेषकर ऐसी-चीजोंका
प्रचार करनेके लिये जो हमारी सामायिक प्रचियोंसे सम्यन्ध
रखती हों विद्यापममें लम्यो चीडी दलीलोफी मावश्यकता नहीं।
यह भी कहनेकी दरकार नहीं होती कि घस्तु अच्छी है।
पाठकको यह स्वय' मालूम कर लेना पडता है। उसके मच्छे
मुण न यवलाफर “सुम्माये माते है।
हमारा प्रत्येक विचार कार्य में परिणत होनेकी चेटा करता
है। जब हम किसी पातको मनमें सोचते
प्रत्येक विद्यार
कायमें परिणत हैं, तो साधारणत उसे फरदी डालते
दोनेकी चेप्टा
हैं। यदि मकानकी छतसे फूलनेकी पाता
भी हमारे मनमें उठे तो स्वमायत इम
करे गेहो, परन्तु फिर दूसरा विवाध्यानमें माता है कि
मफान पहुत मचा है, फल्नेपर मिदा न रहेंगे, और हम रुक
जाते हैं। यदि कोई मन्य विचार हमारीमनमें उत्पन्न न होता
तो करने का विचार मानेपर हम फर ही पड़ते॥ दाहिने हाथकी,
किसो अंगुलीको मोड़ने कीयात मनमें सोचिये और मपने मनको
अम्प पातोंसे हटाकर इसीपर एफाम कीजिये, देखियेगा कि
गुली मपने आप मुह 'गई। ऐसा भी होता है कि पापने
अंगुलोको वरफ ध्यानसे ऐसा और इसे मोड़नेके विषयमें सोचने
करता है।
.
-
1011
सुभाना।
। इस नियमका
'टगे, पर पह सीधी ही रही। क्यों! इसका कारण यह है,
कि मापने इस प्रतिको मषश्य रोकनेकी श्रेष्टा की होगी।
सोचा होगा, सीधी रहे।
एक लेखकने विचारका कार्य से पपा सम्बन्ध, सफी
। पफ पड़ी रोचक कहामी दी। उन्होंने
अपने पिसी-मित्रसे फदा फिमकानफे
मोसरकी ऐसी घस्सुफो मनमें सोयो जो दूरपर हो फिर
उमको मोमोफर उस मित्रने पट्टी बांध की भीर उनका दाय
पकड़कर उस घस्तु मौर समके यहां मानेको पाव सोधन
लगा। उससे कहा गया, उस पस्तुके विषयमें ही पकाम
चित्तसे सोचते रहो। उन्हें यह महों माराम था घद
कौन थी थी और कहां छिपी थी पर थे मीधे उसके पास जा
पहुंचे। मित्र यड़ा विस्मित हुभा, सोचने लगा कोई माद
पर अप उससे कहा गया कि यह मुद उन्हें पदासक ले गया
'या तो उसने इस पातफो माननेसे माफ नकार कर दिया।
पाव इस प्रकार थी कि किसी पातका पिचार अपनेको उस
फाप के रूपमै लामेका प्रसन करता है जिससे इसफा सम्पन्ध
होता है। निनने सनके माय २ उस पम्तुतक पहुंचने में जिम
कार्य की भावश्यकता होगी उसका विचार किया था।
उसने विमा जाने इस विचारका मनुसरण फिया मोरहें
यहसिक ले गया ययपि सोचता था यह उसे यदासकले
विशालामा
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तात्पर्यबकि किसी कार्यकापिय सोचमासे
सरनेकी सुपाता है, क्योंकिपिधार और काय साथमाया
करते हैं और लम्ये अभ्यासके कारण विचार मावेही काय्यकी
सूपती है। जो हम सोते है वही करते भी हैं। पदि हम मनमें
मच्छे विचारों को साम देते है तो अडकाम करतेहपुगेको
देवेन्दरतो.पुरे। इसलिये मनुष्यको बाहिये यह बुरे विचार
मनमें कमी म घुसने दे।
हमारे सभी विचार कार्यका रूप नहीं धारण करते इसका
कोरण यह है कि भन्य विरोधक विचार पाकर वाथा पहुंचाने
लगते है। इसीलिये जय दम किसीसे कोई फाम करामा
चाहते हैं तो उसके सामने इसफो इस प्रकार उपस्थित करनेका
प्रयत करते हैं कि एसराज उटे ही नहीं। मिवापनलेखकको
भी उचित है यह ऐसा उपाय करे जिससे, जहांतक सम्भव हो.
विपरीत पात प्राइफके ध्यानमें न मानोपाये , अथवा भावे ही
दर जाय । सिमापनके ऊपर ही "नकालोंसे बचो",छपाना ठीक
महीं है क्योंकि इससे प्राहकके मनमें धोखा खानेका उर पहलेसे
पैठ नाता है। कई विज्ञापनों में देखा गया है कि भारम्भमें
मोई विपरीत विचार उपस्थित फरशेष विज्ञापनमें उसको हटाने
फा प्रयक्ष होता है--विसीयुरी वस्तुफे भवगुणोंका उसकर
दिनलाया जाना है कि हमारी वस्तु सी नहीं है। यह
सध्या त्याज्य है।
किन्तु थियारोंसे हमें काम करनेको समाप्ती हैयही बात
1-
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Do as I do
wwwmum
"
ETakes
BEECHAMS PILLS
AND KEEP SMILING,
अब हम किसीको कोई काम करते देखते है तो हमारो
इच्छा मी असा ही करने को होता है, विशेष फर जप पोरों को
इमसे प्रसन्नता या क्षाभ होवे देखते हैं। म भपनी इस प्रहत्ति
को पाधा रोक नहीं सकते।
सुपना।
विचार स्वयं भी
मी विचार सय मीमा माते
सकाये पाते हैं। किसीको कोई काम करते देखा कि
उसका विचार हमारे मन में सूबा भीर विचारकी प्राधि
सो कार्य में परिणताम्होनेकी ही। "जानवमि पी माप
सयंत्र "यह बात दिन पड़ती। पक जामवरपरकर
भागता है, तो उसे मार्ग देष दूसरे मी षिपदकी माशश कर
बेतहासा मागने लातेहै। एकबार किसी रुसी पल्टममें एक
घोरेको डरकर भागते देख उसापाटनके समी १०० घोडे भाग
बटे हुए मोर मीलोतक न पके मा सफे! केसे परे गये सो
भी सुनिये। अब ये सरपट दौर रहे थे तो किसीने दामा
खिलाफे समयफा विगुल "पाया।। मोड़े मपमे २ काम
रएकाएक रके और पूमकर सय आधीन हो गये।
जब से रुपया निकालने के लिये दौड़ते हैं सोमिनुप्पोंकी
भी कुछ ऐसी ही मषक्षा होती। मारम्ममें छछरोग रुपया
मंगाते है और जप यह पपरमारीको मिलती है सो, घे भी ऐसी
हो करते हैं। पहले उर पहुत थोड़ा रहता २ पर एक
मनुष्य के दूसरेको 'सुमामेके कारण यह बढ़ता ही मायगा।
प्रत्येक व्यक्ति दूसरोंसे पहले भर्पनीमा हरा लेना चाहता है,
मी सी हग गाती है, धकाधुनी होने लगती है, जिससे पपड़ा
हट और फेसठी है। मन्तमें धैर्य युक्क तथा विद्यापीठ
ध्यापारी भी उसिसित घोहौसे बहुत मिम्न मही रह जाते।
इस पीपमें कोई धनी मानी सज्जन रपया जमा करने देले जात
.
Do as I do
Take
BEECHAMS PILLS
म
AND KEEP SMILING.
नव इम किसोको कोई काम करते देखते है तो मारो
पच्छा भी येसा ही करने को मोसो, विशेष कर अब पोरों को
इससे प्रसवता या शाम होते देखते हैं। म पपनी इस महत्ति
को महधा रोक नहीं सकते।
सत्याना
विचार स्वामी
रही विचार सय माम्मुनाफेवात
एकापेमाते। किसीको कोई काम करते देखा कि
उसका विधार'हमारे मन में सूषा भीर विचारको प्राधि
तो कार्य में परिणतः होमेकी हो। जामवमि तो माव
सर्यत्र पह पात कि पड़ती है। एक जानवर परकर
भागता है, तो सेसे भाग दिस दूसरे भी विपकी माशङ्का करके
येतहासा भागमे लगते हैं। एकबार किसी रुसी पल्टममें एक
घोडेको डरकर भागते देख उस पल्टनके सभी १०० घोड़े भाग
बंटे हुए भोर मीलोतक न पकड़े जा सके। कैसे पकड़े गये सो
भी सुनिये। अब ये सरपट दौड़ रहे तो किसीने दाना
खिलामिक समयका पिगुल "पमाया। मोड़े अपने २ कान
न कर पकाएक रुके औल्मकर स्वय माधीन हो गये !
जब से या निकालने के लिये दीदते है तो मनुप्योकी
भी कुछ ऐसी ही मषरमा होती है। मारम्भमें कुछ लोग रुपया
मंगाते हैं और अप यह पपरमारों को मिलती है तो कभी ऐसा
हो करते हैं। पहले घर पाहत घोड़ा रहता है पर एक
मतुप्यके दूसरेको सुम्बामेके कारण यह बढ़ता ही जायगा।
प्रत्येक भ्यकि दूसरोंसे पहले मपंनी समा हटा लेना चाहता है,
मीइसीधा गाती पक्षाकी होने लगती है, जिससे घबड़ा
इट भौर फेलती है।- मम्तमें धैर्य युफ तथा विधातील
व्यापारी भी उल्लिखित पोहोंसे पहुँत 'मिन्न नहीं पहनाते।
इस बीसमें कोई धनी मानी सम्बन स्पया ममा कर देने जाते
विज्ञापन विज्ञान
[[RROR
--
समानेमें मित्रोंसे बड़ी सहायता मिलती है किसीको
कोई विशेष वस्तुका उपयोग करते दिवाना भौरोको.भी-ता
ही करनेकी-सुमाता है।। फुटपौलफे विज्ञापन में फुटौलका
चित्र अपना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि दिखलाना चाहिये कि
खिलाड़ी यूनीफार्म पहनफर मैदानमें उतरनेको तैयार है मौर
-धील उसके भागे पड़ी है, जिसको मारने के लिये वह पैर उठाता
चाहता है। बस्तुसे-पुख पालामा होते दिखलाना उसकी
प्रवल चाह कराता इससे जप हम किसी बाप पदार्य विज्ञा-
पममें देखते है कि कोईवालक साखाकर अंगुली बाट पा
है, तो तुरत समम जाते है कि यस्तु याही स्वादिया।
किसीफो कोई काम फरनेके लिये कहना या मामा दनामी
सुझानाही है। इसमें एक मममती
--माम्पाए।
कोई पात उठती मीर यह दूसरेको
इसके विषयमै सुझाता है। माता मनुष्यको निधय करनेके
फएसे बचाती है, इससे कार्य में सुगमता होती है। यदि 'पूर्व
विचार या अन्य कोई वातसे पाघा न पहुंचे तो मनुष्य, माझा
पालन करता ही है। इस प्रकार मामा- देनेसे दो पात सिद
होती है-प्रथम तो ध्यान आकर्षित होता है, दूसरे मनुष्य
तुरत कार्य फरमेके लिये प्रेरित होता है। सलती हुई वस्तुके
समान भौर काई धीज उतना हमारा ध्यान भारतिनिहीं
करती। जब हम किसी मित्रका ध्यान मार्कर्पित करमा पाइते
तो असे रुमाल निकालकर हिलाने लगते हैं। किसी दूकनकी
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AND DONT YOU FORGET.IT
२६
@Knolly reminder not to forget
BERCNAMS, PILLS
व्यापारी अपने विनापन में किसी न किसी प्रकार की विशेषता
रखना चाहता है मो पन्य विधापनों में न हो, जिससे योग से
पढ़ें पीर याद रखें। अपर ऐसे हो एक विज्ञापन का सषिप्त चित्र
छापा जाता है। जरदो इस विज्ञापन को सोग भूत महीं सकते।
है
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