Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Garud Purana Khand-ii
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दो शब्द 'गरुड-पुराण को विशेषताओ पर इसकी भूमिका और उपयंहार में अावश्यक विवेचना की जा चुकी है । एक सामान्य हिन्दू-धर्म अनुयायो की दृष्टि में मरणोत्तर कर्मकाण्ड का महत्त्व बहुत अधिक है-इतना अधिक है कि उसका मायोजन पूर्ण नियमानुकूल मौर परम्परा के अनुसार करने के लिए वह प्राय. अपने लिए बडी-बडी कठिनाइयां पैदा कर लेता है । भनेक स्थानो में पौर अनेक जातियो में दाह-सस्कार, तीजा, एकादशा, त्रयोदशा (तेरहवी) मादि के नाम पर मोर महाब्राह्मण को दो यादानादि करने के रूप में, और फिर समस्त जाति-भाइयो को भोज देने की प्रथा का पालन करके इतना व्यय भार उठाना पड़ता है कि मनेक गरीबो की उससे कमर ही टूट जाती है मौर उसका कुपरिणाम उनको बरसो तक भोगना पडता है । पाठको ने ऐसे ऐसे मृतक भोजों का भी वर्णन सुना होगा जिनमे ५.५ हजार तक लोग भोजन करते हैं । अगर इससे चौपाई भी भार किसी साधारण मार्थिक अवस्था वाले पर पड जाय तो उसको केपी सांघानिक चोट लगेगी इसे भुक्तमोगी सहज ही में जान सकते हैं । जन-साधारण की दृष्टि में 'गरड पुराण' का महत्व इमी पारण प्रधिक है क्योंकि इसमें मोदैहि कमों का विवेचन किया गया है और लोग उमे यापूर्वक सुनते मोर मानते हैं। इस समय यद्यपि देश-काल के प्रभाव से लोगों के विचारो में भनेक नवीन परिवर्तन हो रहे हैं, तो भी हिन्दू-समान में, विशेष. तया प्रामीण जनता में ऐसे व्यक्ति बहुत कम मिलेंगे जो इन प्रयामों का उल्लपन करने का साहस कर सकें। इस कारण सब लोग अपनी शक्ति मोर परिस्थिति के अनुसार उन कर्मकाण्डो की पूर्ति करने का प्रयत्न करते हैं, जिनका निर्देश 'गहरु पुराण' मे दिया गया है। हिन्दू धर्म में पुनर्जन्म के सिद्धान्त का बडे मटन मोर निधारमा रूप से प्रतिपादन किया गया है और सब पूछा जाय तो वर्तमान समय में धर्म का जो रूप हमारे देश के विद्वानो मोर उघ श्रेणी के व्यक्तिरों में भी प्रालित है उसा माघार नजन्म का मिसान्त ही है । नमी के प्रभाव से मिल बनमा में यह भाव फैला हमा है कि हम जंगा मला-धुग बाम गे उसमरा गा ही परिणाम हमको मागामी जन्म में भोगना पडेगा। यह प्रभाव चाहे विभिन्न व्यक्तियो में न्यूनाधिक मात्रा में पाया जाता है फिर भी बहुसख्यक लोग इसके कारण किसी दुष्कर्म को करते हुए कुछ सङ्कोच करते हैं इसमें सन्देह नहीं । वह तो स्वार्थी और मूढ लोगो ने मनमानी कल्पनायें और प्रतिरजित बाते करके इसके स्वरूप को बिगाड रखा है, अन्यया यह 'पुनर्जन्म तथा वर्मफल' का सिद्धान्त नैतिकता तथा सचरित्रता की रक्षा के लिए एक अमूल्य मोर अमोघ सराय ही है। पर हम यह कह देना भी प्रावश्यक समझते हैं कि इस विषय मे अन्ध- श्रद्धा से काम लेना कमी कल्याणकारी नही हो सकता। यह समझ लेना कि 'गरड पुराण' मे जिन क्रिया कर्म के विषय मे जो कुछ लिखा गया है उसको अक्षरश सत्य मान कर पूर्ण रूप से तदनुकूल आचरण करने से ही सद्गति प्राप्त हो सकेगी, हानिकारक है । ऐसे प्रराङ्गो मे जन-साधारण को श्रद्धा-भक्ति को बढाने की दृष्टि से बहुत सो वातो को बड़ा चढ़ा कर वर्णन किया जाता है मौर अधिकाधिक दान देने को भी विशेष रूप से प्रेरणा की जाती है। ऐसे विषय मे देश-काल और मपनी परिस्थिति का ध्यान रखकर ही कार्य करना चाहिए । धर्मशास्त्रो में ही जगह जगह यह स्पष्ट रूप से कह दिया गया है कि वास्तविक फ्ल शुद्ध भावना और सात्त्विक कर्मों का होता है। बाह्य क्रियाएं मोर दान- दक्षिणा मादि सदैव अपनी सामयं मोर साधनो के अनुसार ही करना चाहिये जिससे बाद में किसी प्रकार को अमुविधा सहन न करनी पडे । धर्म की गति मूक्ष्म कही गई है । जो लोग समझते हैं कि सत्- कम मौर परमार्थ के पथ पर चले बिना भी केवल कर्मकाण्डों के द्वारा परलोव में कल्याण हो सकता है, वे मूल करते हैं। अपनी श्रद्धा और परम्परा के मनुसार उपयोगी प्रयामों का पालन करना उचित है पर उससे भी अधिक यावश्या सत्यम, सदाचार, परोपकार प्रादि मास्म-कल्याण करने वाले गुणो मी तरफ ध्यान देना है। 'गरुड पुराण' में यह कहा गया है कि 'ज्ञानी भोर मरपती व्यक्ति बिना पौदं दैहिक मंगएड भी परलोर में उच्चगति प्राप्त करते हैं।' इमलिये मौका प्रयासों के साथ ही प्रारिमा गुणों का घारए और मन परना हमारा परम पसंम्य है । ---श्रीराम शर्मा श्राचार्य श्री गरुडपुराण ( द्वितीय खराड ) की विषय-सूची ६३-~-राजवश वर्णन ६४---रामायण-सार ... ... २० ... २२ ... २६ ... ... ४१ ... - ६१-महाभारत-सार ९७-पायुर्वेद १८-ज्वर निदान ६९-चिकित्सा के विभिन्न योग १००--विविधौषधि (१) ११०१--विविधोपधि (२) १०२-विविधोपधि (३) ११०३-विविधोपधि (४) १.४-शक्तिवर्धक योग '१०५-~नारायण भक्ति कथन १०६-विष्णु पूजादि कथन १०७--विष्णु माहात्म्य कथन १०५-नृसिंह-स्रोत्र १०१-कुलामृत-स्तोत्र ११०-मृत्वष्टक-स्तोत्र . ... ... ... Re- .. ...
-- १०६ ... १४१ १४५ १५२ ... ... १११--मच्युन-स्तोत्र ११२-रोगनाशक वैष्णव कवचम् ११३---सर्वकामद विद्या कथनम् ११४--व्याकरण कथन ११५-सदाचार कथन ११६-धर्मसार कथन ११७-युग धर्म कयन ११८-नैमित्तिक प्रलय कथन ११६-पाप-परिणाम कथन १२०--प्रष्टाङ्ग योग-काथन १२१-विष्णुमक्ति कीर्तन १२२-थेदान्त-साहा सिद्धान्त ब्रह्मज्ञान १२३-गीतासार १२४-पायोश्वर मन्त्र विद्यान १९५--सुदर्शन-पूजा विधान १२६.२७-हयग्रीव पूजा विधान १२:-शिवाचन विधान १२६-शिवी को पवित्रार्गहण विधि १३०-विष्णु भगवान का पवित्रारोहण १३१-फ-पित्त रोग का निदान १३२-वासरोग का निदान १३३-धारा-रोग निदान १३४-हिनका-रोग निदान १२५-~यामा-रोग निदान १३६---मसीसा-रोग निदान १३७---महादिस्य-रोग निदान ... १६. . ... १६६ २०७ २१६ २२० ... २२४ २२६ २३० .. ... २४० ... २४६ २५३ २५६ २६२ २७१ २८७ २६५ २६६ . - ... .- ... [ ७ ] श्री गरुडपुराण ( उत्तरार्ध (प्रेतकल्प) १-धर्मकथन २--जन्मान्तर-गति कथन ३---दान फल कथन ४-प्रौदैहिक क्रिया कथन मौर वृपोत्सर्ग ५-मोर्वदैहिक कर्मादि संस्कार ६-यमलोक वर्णन ७--श्रावण-गण चरित्र ८--प्रेतोद्दश्य से विविध दानों का फल ६-~यमपुर वर्णन १०-प्रतपीडा वर्णन ११तो का स्वरूप मोर चरित्र १२-तस्व-प्राप्ति का कारण और उनका भाहार १३---मृत्यु के कारणो का वर्णन १४.-प्रशोच पोर प्रतकृत्य वर्णन १५--प्रेतकृत्य मोर पुत्र-निर्णय १६-सपिण्डीकरण तथा श्राद्ध १७-प्रेतत्त्व से मुक्ति १५--तत्त्व मोचनार्थ घटादि दान १९--पुत्रोत्पादन फल भोर मुक्ति के उपाय २०--प्रेतसौरयकर दान २१-शारीरिक स्थान निर्णय मार चतुर्विध परीर २२-देहनिर्णय मोर उत्पत्ति २३-यमलोक विवरण ... . ३२५ ३६५ ३७३ ... ३७५ - ३८६ ४०
..
...
...
[ ८ ]
२४-धर्माधर्म लक्षण
२५-पाद विधान वर्णन
४२६
२६-तीर्थ माहात्म्य और मनशन व्रत
४४२
२७---उदकुम्भ प्रदान विधि
२८-दान-तीर्थ और मोक्ष कथन
२६---प्रशौच विधि कथनम्
४५१
३०--अपमृत्यु-फल
४५४
३१--भूमि-स्वर्ण-गोदान फल
४६४
३२-विविध-श्राद्ध कथन
३३----नित्य नियम धाद्ध कथन
३४--मनुष्यो के कर्म विपाक कथन
३५-विविध-पाप कथन
४७८
उपसंहार
४५७-५०४
मरणोपरान्त जीवन-पुनर्जन्म के प्रमाण-प्रेतो के स्वरूप पौर
कार्य-कर्मों के सस्कार और प्रारब्ध ।
श्रीगरुड महापुराणाम्
(द्वितीय खण्ड)
१३-राजवंश वर्णन
शतानीको ह्यश्वमेघदत्तचाप्यधिसोमकः ।
कृष्णाऽनिरुद्धश्चाप्युटणस्ततश्चित्ररथो नृप. ॥१
शुचिद्रयो वृष्णिमान सुपेणश्च सुनीथक |
नृचक्षुश्च मुखावाणो मेधावी च नृपञ्जयः ॥२
पारिप्लवश्व सुनयो मेधावी च नृपञ्जयः।
हरिस्तिग्मो वृहद्रथ शतानीकः सुदानक. ॥३
उदानोऽहिनरश्चैव दण्डपाणिनिमित्तकः।
क्षेमकश्च तत शूद्र. पिता पूर्वस्ततः सुतः ॥४
वृहदलास्तु क्थ्यन्ते नृपाश्चेक्ष्वाकुवराजाः ।
वृहद्वलादुरुक्षयो वत्सम्यूहस्तत पर ॥५
वृहदश्वो भानुरथ प्रतीव्यश्च प्रतीतक. ।
मनुदेव सुनक्षत्र. किन्नरश्चान्तरिक्षक ॥६
सुपर्ण कृतजिच्चव वृहद् भ्राजश्व धार्मिक ।
कृतक्षयो धनञ्जय सञ्जय शाक्य एव च ॥७
शुद्धोदनो याहुलन सेनजित्द्रकस्तया।
समित्र कुड़वश्वात सुमित्रो मागधान् शृणु ॥८
- १० ] [ गरुडपुराण श्री हरि ने कहा-शतानीक-अश्वमेध दत्त-मधिसोमक-कृष्ण-अनि- रुद्ध-उष्टा और इसके पश्चात् चित्ररथ नृप हुए ॥१॥ शुविद्रय--वृष्णिमान- सुषेणमुनीथक-नृचक्षु-मुसावाण-मधावी-नृपञ्जय--पारिफरव-सुनय-- मेधावी-नृाजब-हरि-तिग्म-वृहद्रथ-शतानीक-सुदानक-उदान- प्रह्निनर दण्डपाणि-निमित्तक--क्षेमक-इसक अनन्तर शूद पिता पूर्व इसके उपरान्त मुत ये सब हुए थे ॥२॥३॥४॥ ये इक्ष्वाकु क वश म जन्म लने वाल नृप वृहदल कहे ज त हैं । वृहदन से उरुक्षय इससे वत्मन्यूह हुमा था ।बृहदश्व-भानुरथ प्रतीय--प्रतीतक--मनुदेव--सुनक्षत्र-किन्नर--अन्तरिक्ष-मुपण-कृतजित् भोर धमनिष्ठ वृद्भाज-कृतजय-धगजय-गञ्जय---शाक्य-शुद्धोदन---- बाहुल-सेनजित-क्षुद्रक-समित्र-कुडव और इससे सुमित्र ये राव हुए थे । अब मागधी का श्रवण करो ॥६॥७॥८॥ जरासन्ध सहदेव सामापिश्च श्रु तथवा । अयुतायुनिरमिन स्वक्षेत्रा बहुकमक ९ थतञ्जय सेनजिच्च भूरिश्चैव शुनिस्तथा । क्षेभ्यश्च सुव्रता धर्म इमथ मो दृढसेनक ॥१० सुमति सुवलो नीता सत्यजिद्विश्वजित्तथा । इपुञ्जयश्च इत्येते नृपा वाहयद्रथा स्मृता. ॥११ अमिष्ठाश्च शूद्राश्च भविष्यन्ति नृपास्तत । स्वर्गादिकृद्धि भगवान्साक्षान्नारायणोऽव्यय ॥१२ नैमित्तिक प्राकृतिवस्तथैवात्यन्तिका लय । याति भू प्रलयचाप्सु पापस्तजसि पावक ॥१३ वायो वायुश्च वियति आकाश यात्यहकृतौ । ग्रहवुद्धो मतिर्जीवे जीवाऽव्यक्त तदात्मनि ॥१४ प्रात्मा परेश्वरो विष्णुरेको नारायणो नर । अविनाश्यपर सर्व जगत्मर्गादि नाशि हि ॥१५ गृपादयो गता नारामत पाप विवजयत् । धर्म पुास्थिर येन पाप हित्वा हरि प्रजेत् ॥१६ .
रामायण-सार । - मगध देश में होने वारो नृपतियों में जगसन्ध-सहदेव-सोमापि-युतधवा-- अयुतायु-निरमित्र--स्वक्षेय-बहुकमंक-श्रुतञ्जय--सेनजित्-भूरि-शुचि-- क्षेम्प-सुव्रत-धर्म-मश्ग---ढमेनक-सुमति-मुवल-नीत--~मत्यजिव-विश्व. जित्-इष्टुब्जय-ये सब नृप वाहपथ कहे गये है ।।६।१०।११। इसके उपरान्त सब प्रधामिष्ट प्रोर शूद्र नृपति होगे । स्वर्ग आदि पे प्रदान करने वाले प्रश्रय स क्षात् भगवान् नारायण ही होते हैं ।। १२ । तीन प्रकार का लप होता है जिनके नाम नैमित्तिक-प्राकृतिक और पारयन्तिक होते हैं । यह भूमि जल में लय को प्राप्त हो जाती है। बल तैज मे पोर वह तत्त्व तेज अर्थात पावक वायु मे तथा वायु प्राकाश में लय होता है । वह माफाश महद्वार मे, महसार बुद्धि में, धुद्धि जीव मे, जीव अपक्त मे और यह अव्यक्त पात्मा में लय होता है ।।१३३३१४॥ यात्मा हो पर ईश्वर विश्णु एक है-वह ही नारायण नर और विनाश रहित है । अन्य यह सगम्त जगत् गौर मग पादि नागवान है ।। १५ ।। जितने भी बडे २ महान नृप धादि इस मही मण्डल पर हो गये है वे सभी नाश को प्राप्त हो गये हैं और यही स्थायी रूप से किमी की भी स्थिति नहीं हो सकी है । अतः सबका निपं यही है कि पाप कर्मों से बचे रहो पौर धर्म में काम करो जिमसे स्थिर होते हुए सम्पूर्ण पापो का नाम कर भग- वान् श्री हरि के मानिध्य में पहुंच जाता ॥१६॥ १४-रामायण-मार रामायणमतो वक्ष्ये श्रु त पापविनाशनम् । विष्णुनाम्यजतो ब्रह्मा मरीचिम्नत्गुतोभयत् ॥१ मग कश्यपस्तम्माद्रविस्तस्मान्मनु स्मृतः । मनोरिक्ष्वाकुरस्याभूह मे राजा रघु म्मृतः ॥२ पोरजस्ततो जातो राजा दशरयो बनी। तम्य पुत्रास्तु चत्वारो महावनागरमा ॥३ गोदात्यायामभूद्रामा भरतः के रयीमुतः । गुतो लक्ष्मरणम तुघ्नो मुगिनाया बभूवतुः ॥ रामो भक्त पितुर्मानुपिन्चामियादवातयाम् । प्रस्मग्रामं ततो यदी ताइपा प्रजपान र ॥५ १२ ] [ गरुडपुराण विश्वामित्रस्य यज्ञ व सुबाहु न्यवधीद्वली। जनकस्य ऋतु गत्वा उपयेमेऽथ जानकीम् ॥६ अमिला लक्ष्मणो वोरो भरतो माण्डवी सुताम् । शत्रुघ्नो वै कीतिमती कुशध्वजसुते उभे ॥७ थी ब्रह्माजी ने कहा-इसलिये अब हम मम्पूर्ण पापो के विनाश करने पाली रामायण पा वणन करते हैं। भगवान् विष्णु की नामि के कमल से ग्रहा हुए थे और मोवि उनके पुत्र हुए थे ॥१॥ मरीचि के पुत्र श्यप हुए। उससे रवि को उत्पत्ति हुई और रवि से मनु का जन्म हुआ था। मनु से इक्ष्वाकु पैदा हुए थे और फिर इसके वश में रघु नाम वाला महान प्रतापी राजा हुमा या ॥२॥ रयु से पज की उत्पति हुई और फिर अज महाराज के दशरथ नाम पाले नृप ने जन्म ग्रहण किया था। यह बहुत ही बलवान हुए थे । महाराज दारय ये महान् बम और पराक्रम वाले चार पुत्र समुत्पन्न हुए दशरथ महाराज यो मवसे वही पत्नी वौशल्या के उदर से श्रीराम का जन्म हुमा पा और कोयो थे पुत्र का नाम भरत पा । लक्ष्मण पोर शत्रुघ्न इन दो पुत्रो मुमित्रा ने जन्म लिया पा ॥४॥ धीराम मपन माता-पिता के परम भक्त थे। श्रीराम न महषि विश्वामिन से गम्पूर्ण मस्त्रा को विद्या को प्राप्त किया था। यही विश्वामित्र के पायम में हो यक्षी ताडा का वध किया था ॥५॥ विश्वा- मिल में यश में बलगानी श्रीराम ने गुयाह पा पप दिया था। इस पश्चात महाराजा जनाको पानाला म पच पर पग बरसे जानकी ये साय दियादरिया पा॥६॥वीरवर मदमण न मिना या--भरत ने गुता माणवी रा-गनुम्न ने वीतिमती पारित ग्रहण किया था। ये दोनो सुमपज पुत्री थीं 10 पिप्रादिभिरयोध्याय माग रामायः स्थिता । गुधाजिन मानमरतो गतो॥ गतमापवयोमो गाय दातु गमुयत । गमा तरवाय पंच्या प्रागिनदा ।। पनुमा ममा यामी यो गगस्य बाडिया HE 1 रामायण-सार ] [ १३ रामः पितृहितार्थञ्च लक्ष्मणेन च सीतया । राज्यञ्च तृणवत्यक्त्वा शृङ्गवेरपुर गतः ।।१० रथ त्यक्त्वा प्रयागञ्च चित्रकूटगिरि गतः। रामस्य तु वियोगेन राजा स्वर्ग समाश्रितः ।।११ सस्कृत्य भरतश्चागाद्राममाह बलान्वितः । अयोध्या तु समागत्य राज्य कुरु महामते ॥१२ स नैच्छत्पादुके दत्त्वा राज्याय भरताय तु । विसजितोऽथ भरतो रामराज्यमपालयत् ॥१३ नन्दिग्रामे स्थितो भक्तो ह्ययोध्यां नाविशद् व्रती। रामोऽपि चित्रकूटाच्च अग्रेराश्रममाययौ ॥१४ अयोध्या में प्राकर श्रीराम मादि सब भाई अपने माता-पिता के साथ स्थित रहे थे। भरत पौर शत्रुघ्न मपने मामा युधाजित के पास चले गये थे ।। ८ ।। इन दोनो भाइयो के ननसाल चले जाने के बाद नृप श्रेष्ठ दशरथ ने श्रीराम को राज्याभिपिक्त करने का विचार किया था। उसके प्रति सत्पुष राम के लिए कैकेयी ने चौदह वर्ष पर्यन्त वन में निवास कराने का वरदान राजा से मांग कर वचन ले लिया था ॥६॥ श्रीराम ने अपने पिता के हित के लिए अपनी पत्नी सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ अयोध्या के महान विशाल राज्य वैभव. को एक तिनके की भांति त्याग कर वनवास को प्रस्थान कर दिया और शृङ्ग- चेर पुर में चले गये थे।॥ १० ॥ मार्ग में रय का त्याग कर वह प्रयाग मौर चित्रकूट गिरि पर चले गये थे । प्राणाधिक प्रिय श्रीराम जैसे पुत्र के वियोग से महाराज दशरथ ने पार्थिव शरीर का त्याग कर स्वर्ग का प्रस्थान कर दिया घा ।।११।। भरत ने ननसाल से आकर पिता का दाह-सस्कार प्रादि सम्पूर्ण कर्म किया और बल-दल सहित वन मे श्रीराम के समीप पहुंच कर उनसे प्रार्थना की कि प्राप वापिस अयोध्या जाकर अपना राज्य-शासन स्वीकार करे ।। १२ ।। श्रीराम ने पिता के वचनो का पूर्ण पालन करने के विचार से इस प्रार्थना को स्वीकृत नहीं किया था और राज्यासन पर रखने के लिए अपनी चरण-पादुकाएं प्रदान कर भरत को विदा कर दिया था कि अपने प्रतिनिधि [ गरुडपुराण के स्वरूप में तब तक वह राज्य का पालन करे ॥१३॥ भरत ने बनवाम मा पूर्ण व्रत का पालन किया था। उसने अयोध्या में प्रवेश नहीं किया था और नन्दि ग्राम में स्थित होकर रहो लगे थे। श्रीराम भी इसके अनन्तर चित्रकूट से पनि मुनि के भाश्रम मे पहुँच गये थे ॥१४॥ नत्वा सुतीक्ष्ण चागस्त्य दण्डकारण्यमागतः । तत्र शूर्पणखा नाम राक्षरी चात्तुमागता ।।१५ निकृत्य क्यों नासे च रामेणाथापराहिता । तत्प्रेरितः सरश्चागाद् दूपणनिशिरास्तथा ॥१६ चतुर्दशसहस्रण रक्षसा तु बलेन च । रामोऽपि प्रेपयामास बाणेर्यमपुरञ्च तान् ॥१७ राक्षस्या प्रेरितोऽभ्यागाद्रावणो हरणाय हि । मृगरूप स मारीच कृत्वाऽथ निदण्डधृक् ।।१८ सोतया प्रेरितो रामो मारीच निजधान है। म्रियमाण. स च प्राह हा सीते लक्ष्मणेति च ।।१६ सीतोक्तो लक्ष्मणोऽथागाद्रामश्चानु ददर्श तम् । उवाच राक्षसी माया नून सीता हृतेति सा ॥२० रावणोऽन्तरमासाद्य अङ्घनादाय जानकोम् । जटायुप विनिर्भिध ययौ लबा ततो बली ॥२१ वहाँ पर सुतीक्षण और अगस्त्य मुनि को प्रणाम करके फिर दण्डकार नामक वन मे पागये थे । वहा पर शूर्पणखा नाग वाली एक राक्षसी इनक खाने के लिए आ गई थी ।।१५। उसके दोनो कान मोर नाक काटकर भगवा श्रीराम ने उसे अपराहित कर दिया था। उसने जाकर अपने दुख पोर इन चुरूपता के अपमान का रोना भाई खर तथा दूपण के सामने किया तो उस प्रेरित होकर ये खर-दूपण और त्रिशिरा चौदह हजार राक्षसो की सेना लेक इन से युद्ध करने को वहां भागये थे। श्रीराम ने अपने प्रमोघ वारणों से सभी क मार कर यमपुर भेज दिया या ॥१६॥१७॥ फिर उस सूपणखा राक्षमो ने जग जागी जागको को सुन्दरता बतलाते हुए अपने अपमानित होने की बार रावरा रामायण-सार ] से जाकर कही थी और रावण ने सीमा के हरण के लिए मारोच को मृग का रूप बनाकर पागे कर दिया और वह एक तीन दगड घारी सन्यासी का रूप धारण कर वहां अा गया था ।।१८।। सीता ने सोने के मृग की छाला प्राप्त करने को राम को प्रेरित कर उसे मारने को भेज दिया था और इधर राम ने मारीच का चध किया था। मरते समय मारीव ने "हा सीते! हा लक्ष्मण !" ये शब्द मुंह से निकाले थे। इन शब्दो को सुनकर जानकी ने लक्ष्मण को भी राम को देखने के लिए पीछे से भेज दिया था । लक्ष्मण को पीछे से प्राया हुपा श्रीराम ने देखकर कहा-निश्चय ही राक्षसो को माया के द्वारा सीता का हरण होगया है ॥ १६॥२० । इमी अन्तर मे रावण ने जानकी को गोद में उठाकर हरए किया था । म.र्ग में वह बलवान् राक्षम रावण जटायु का भेदन कर जानकी फो लङ्कापुरी मे ले पहुंचा पा ॥२१॥ अशोकवृक्षच्छायाया रक्षिता तामधारयत् । आगत्य राम: शून्याञ्च पर्णशाला ददर्श ह ।।२२ शोक कृत्वा जानक्या मार्गरण कृतवान्प्रभुः। जटायुपश्च सस्कृत्य तदुक्तो दक्षिणा दिशम् ॥२३ गत्वा सख्य ततश्चक्र सुग्रीवेण च राघवः । सप्त तालान्विनिभिद्य शरेयानतपर्वणा ॥२४ बालिनञ्च विनिभिद्य किष्किन्धाया हरीश्वरम् । सुग्रीव कृतवाचाम ऋष्यमूके स्वय स्थितः ॥२५ सुग्रीवः प्रेपयामास वानरान्पर्वतोपमान् । सीताया मार्गरण क पूर्वाधः सुमहाबलान् ॥२६ प्रतीचीमुत्तरा प्राची दिश गत्वा समागताः । दक्षिणान्तु दिश ये च मागयन्तोऽथ जानकीम् ॥२७ धनानि पर्वतान्द्रोपानदीना पुलिनानि च । जानकीन्ते ह्यपश्यन्तो मरणे कृतनिश्वयाः ॥२८ यहाँ रावण ने मशोक वृक्ष की छाया मे उमे रस दिया था। उधर धीराम ने देखा था कि पर्णशाला बननी मे रहित सूनी थी॥२२॥ श्रीराम ने
[ गरुडपुराण
हृदय में बहुत शोक किया और फिर जानकी की खोज करते हुए वे इधर-उधर
यन में भ्रमण करने लगे । जटायु को मृत प्राय देखा और उसके मर जाने पर
उसका सस्कार किया था। जटायु ने दक्षिण दिशा में जानकी को ले जाने की
बात बताई थी ॥२३॥ फिर श्रीराम ने ऋष्यमूक पर्वत पर जाकर सुग्रीव के साथ
मित्रता की थी। मुग्रीव को अपने वाणो की प्रमोधता सात तालो को भेदन कर
दिखलाई थी और सुग्रीव के भाई बाली का मार कर सुग्रीव को किकिग्धा पुरी
का राजा बना दिया था। इसके अनन्तर स्वय राम ऋष्यमूक पर्वत पर निवास
करने लगे थे। सुग्रीव ने सीता की खोज करने के लिए बडे-बडे बलवान
वानरो को भेजा था। वे बलवान बन्दर उत्तर प्रादि दिशानी से तथा पूर्व और
पश्चिम सभी दिशाग्रो से खोज करके वापस लौट आये थे। जो बन्दर सीता
को ढूढने के लिये दक्षिण दिशा मे गये थे उन्होने वन,नदियो के पुलिन,पवंत प्रौर
द्वीपो में सर्वत्र जानकी की खोज की थी किन्तु उन्होने कही पर भी जानको को
नहीं पाया तो फिर उन मवने मरने का निश्चय किया था ।।२४ से २८।।
सम्पातिवचनाज्ज्ञात्वा हनूमान्कपिकुञ्जरः ।
शतयोजनविस्तीर्ण पुप्लुवे मकरालयम् ॥२६
अपश्यज्जानकी तत्र अशोकवनिकास्थिताम् ।
भत्सिता राक्षसीभिश्च रावणेन च रक्षसा ।।३०
भव भार्येति वदता चिन्तयन्तीच राघवम् ।
अगुरीयं कपिदत्वा सीता कौशल्यमब्रवीत् ॥३१
रामस्य तस्य दूतोऽहं शोक मा कुरु मैथिलि ।
स्वाभिज्ञानश्च मे देहि येन रामः स्मरिष्यति ॥३२
तन्छ त्वा प्रदो सीता वेणीरत्न हनूमते ।
यथा रामो गयेच्छीघ्र तथा वाच्यं त्वया गते ॥३६
तथेत्युक्त्वा तु हनुमान्वन दिव्य बना है।
हत्वाक्ष राक्षसाश्वान्यान्वन्धन स्वयमागत: ॥३४
मर्वरिन्द्रजितो वारण्या रावणमब्रवीत् ।
रामदूतोऽम्मि हनुमान्दैहि रामाय मैथिलीम् ॥३५
रामायण-सार ] जटायु ने भाई मभाति गृक्ष के वचन से ज्ञान प्राप्त करके वानरो में परम शिरोमणि हनुमान ने सो योजन के विस्तार वाले समुद्र को लांघ लिया या ॥२६॥ पौर फिर पनोक वाटिका के मध्य मे सस्थित जानकी को लड़ापुरी मे हनुमान ने पहुंच कर देखा था। वहाँ बहुत-पी राशतियां उनको भरमंना दे रही थी और कभी-कभी रावण भी पाकर भय-अस्त किया करता था ॥ ३० ॥ रावण बार-बार जानकी से मेरी भार्या वन बामो-यही कहना था । सीता महनिदा थी गघवेन्दु का निन्तन रिगा करती थी। इसी बीच में हनुमान ने श्रीराम की दी हुई अंगूठी देकर समस्त घुशलता उन्हें मुना दी थी ।। ३१ ॥ हनुमान ने कहा-हे मैथिली ! मैं श्रीराम का दून -प्रय पाप कोई भी गोम न परिये । पर पाप मोई अपनी पहिचान की वस्तु दे दीजिए जिगमो देमार राम स्मरण करेंगे ॥३२॥ यह हनुमान की प्रार्थना का श्रवण करणे. मीता ने भपनी येणी का रस निगल पर हनुमान को दे दिया पा मोर हनुमान में जानसी ने यह कहा कि श्रीगम मे कहना fr मुन सोन ही निकाल कर लिया मे आयें । हनुमान ने कहा कि मैं ऐना ही पगा। फिर हनुमान ने मसा के उद्यान को नष्ट कर दिया था जोकि बहुत ही पच्छा बना हपा पा । हम पर पाये हुए पक्षर मार रावण के पुष । यध पर दिया और अन्य भी बहस गे राक्षमों पा पर दिया पापौर फिर म्यही बन्धन में मा गये।।.. १३४॥ पना ने हनुमान को पापपर रावण के मापा पनापा को या! हनुमान ने पहा-हे रापण । गम पारा:-पब तुझे जानरामी धीराम पी गया में भेग देना -:मी में तुम्हारा मन्दाग १ ॥५॥ एनन्छ,त्या प्रकुपितो दीपयामाम पुन्छम् । कपिज्यतिनलाइगूलो लमा देहे मनावमः ॥३६ दम्या नाममायानो गमपा ग यानरः । जाध्या फल मधुनोटा मोनेगवेदयत् ।।३७ वेगोग्लश गमार गमो मार्ग यी । ममुगीव: गर गुमाग्मानाः मलामग्गः ॥ विभीषणोऽपि मम्माम गा रामय प्रति। मभयायनि-सामा रायमानुजम् ।।
१८ 1 [ गरुडपुराण रामो नलेन सेतुश्च कृत्वावधौ चोत्ततार तम् । सुवेलावस्थितश्चैव पुरी लद्धा ददर्श ह ।।४० अथ ते वानरा वीरा नीलाङ्गदनलादय । धूम्रधुम्राक्षवीरेन्द्रा जाम्ववत्प्रमुखास्तदा ।।४१ मन्द द्विविदमुखोस्ते पुरी लङ्का वञ्जिरे । राक्षसाश्चमहाकायान्कालाञ्जनचयोपमान् ।।४२ राम मलक्ष्मणो हत्वा सकपि• सर्वराक्षसान् । विद्य जिह्वञ्च धूम्राक्ष देवान्तकनरान्तको ॥४३ महोदरमहापावितिकाय महावलम् । कुम्भ निकुम्भ मत्तञ्च मकराक्ष हकम्पनम् ।।४४ प्रहस्त वीर मुन्मत्त कुम्भकर्ण महायलम् ॥४५ हनुमान की ऐमी वान सुनकर रावण को वहा क्रोध भागया था और उमने हनुपान को पूछ मे भाग लगवादी थी । जव पूछ में प्राग की ज्वालामो ने भीपण रूप धारण किया तो उस महान बलवान् हनुमान् ने लङ्कापुरी को ला दिया था ॥३६।। उस पूरी लापुरी को जलाकर वह वानर शिरोमणि हनुमान वापिस श्री राम के समीप मे मागया था, किष्किन्धा पुरी में प्राकर वहाँ के उद्यान में यथेष्ट रूप से फल खाकर अर्थात् मधुवन मे फल खाने के पश्चात् फिर हनुमान ने जानकी के प्राप्त करने का समाचार श्रीराम को मुना दिया था ॥३७॥ इसके अनन्तर हनुमान ने जानकी के द्वारा दिया हुआ वह गो का रत्न जो एक अभिज्ञान के प में लाया था श्रीराम को दे दिया था। श्रीराम ने लक्ष्मण-सुग्रीव-अङ्गद प्रभृति सबके साथ लड्डू, पुरी मे चढाई कर दी थी । फिर रावण का भ ई विभीषण श्रीराम की शरणागति में पागया था। राव. रणादि के सम्पूर्ण राज्य का स्वामी विभीषण को बनाकर उसका पहिले ही अभिषेक कर दिया था । इमरे उपरान्त नल नामक वानर के द्वारा समुद्र गुल बनाकर सागर को पार कर लङ्का के पास समुद्र के.तट पर अपना पड़ाव श्रीराम न डाल दिया या । वहाँ से ही लापुरी का भली भांति निरीक्षण दिया पा ॥३८॥३६॥४०॥ इसके मनन्तर बडे-बड़े वीर वानर जिनम नील-अङ्गद- में रामायण-मार ) [ १६ नल-धूम-धुम्राक्ष-चोरेन्द्र--परम प्रमुख जाम्यवान्-' न-मन्द-द्विविद प्रादि सभी थे । इन सबने लङ्गा को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया था बड़े वीर काले पर्वत के समान विशालकाय सभी राक्षमो का हनन करके वानरो के और लक्ष्मण के सहित राग ने भयानक युद्ध किया था। धूम्राक्ष ने विद्युज्जिह्व को-देवान्तक--नरान्तक को- महोदर--महापाव'-अतिकाय-महाबल-कुम्भ-निकुम्भ-भत्त-मकराक्ष- अकम्पन-प्रहस्त का वर किया था। पीर-उन्मत्त-कुम्भकरणं महाबली हनन किया था ।।४१ से ४५।। *. रावणि लक्ष्मणश्छित्वा शस्त्राद्य राघवो बली। निकृत्य बाहुचक्राणि रावण तु व्यपातयत् ।।४६ सीता शुद्धा गृहीत्वाथ विमाने पुष्पके स्थितः । सवानरः समायातो ह्ययोध्या प्रवरा पुरीम् ।।४७ तत्र राज्य चकाराथ पुत्रवत्पालयन्प्रजाः । दशाश्वमेधानाहृत्य गया शिरसि पातनम् ।।४८ पिण्डाना विधिवत्कृत्वा दत्त्वा दानानि राघवः । पुत्रौ कुशलवी दृष्ट्वा तौ राज्येऽभ्यपेचयत् ॥४६ एकादशसहस्राणि रामो राज्यमकारयंत् । शत्रुघ्नो लवरण जघ्ने शैलूपो भरतः स्थितः ॥५० अगस्त्यादीमुनीन्नत्वा श्रुत्वोत्पत्तिञ्च रक्षसाम् । स्वर्ग गतो जने सार्द्धमयोध्यास्थ कृतार्थकः ।।५१ के पुन इन्द्र जीन मेघनाद का वध लक्ष्मण ने दिया था और मतुल बलशाली श्रीराम ने प्रपने अस्त्रो के द्वारा रावण की भुजामो का छेदन कर उमका हनन रणभूमि में कर दिया था ।। ४६ ।। इसके मनन्तर सीता की शुद्धि करके अपने साथ में ले लिया और पुष्पक विमान पर समारूढ होकर प्रमुख परम भक्त वानरो के सहित श्रेष्ठतम अयोध्यापुरी मे श्रीराम चले प्राय थे ॥४॥ यहाँ पर पावर मपनी समस्त प्रजा को पुन की तरह समझ पर प्रेम-पूर्वक उसका पालन किया और राज्य वा शासन क्यिा था। दस प्रश्वमेध यज्ञ किये तथा गया तोर्थ मे विधि पूर्वक पितृगणो का पिण्डदान किया था तथा बहन से गवण २० ] ( যন্ত दान भी दिये थे । श्रीराम ने अपने दो पुत्र कुश मोर लव को राज्यासन पर अभिषिक्त कर दिया था ||४६ ग्यारह महल वर्ष तक श्रीराम ने राज्य किया था । शत्रुघ्न ने लवण को पैदा किया था और भरत ने छोलूप को समुत्पन्न किया या । अगस्त्य आदि मुनियों को प्रणिपात करके भोर राक्षसों की उत्पत्ति फा श्रवण करके पूर्णतया कृतार्थ होकर अयोध्या में स्थित सब मनुष्यो के साथ श्रीराम स्वर्ग में चले गये थे ॥४६।५०१५॥ १५-हरिवंश सार हरिवग प्रवक्ष्यामि कृष्णमाहात्म्यमुत्तमम् । वसुदेवात्तु देवक्या वासुदेवो बलोऽभवत् ॥१ धर्मादिरक्षणार्थाय अधर्मादिविनष्टये। कृष्ण पीत्वा स्तनो गाढ पूतनामनयत्क्षयम् ।।२ शकट परिवृत्तोऽथ भग्नौ च यमलार्जुनो। दमित. कालियो नागो धेनुको विनिपातित. ॥३ घृतो गोबर्द्धन: शैल इन्द्रेण परिपूजितः । भारावतरण चक्रे प्रतिज्ञा कृतवान्हरिः ॥४ रक्षणायार्जुनादेच अरिष्टादिनिपातित.। केशी विनिहतो दैत्यो गोपाया. परितापिता ॥५ श्री ब्रह्माजी ने कहा-अब हम हरिवंश का वर्णन करते हैं जिसमें परमोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण का माहात्म्य है । वसुदेव से देवको भार्या में वासु- देव बल उत्पन्न हुए थे ॥१॥ वासुदेव की समुत्पत्ति धर्म धादि के सरक्षण करने के लिए तथा मधर्म प्रभृति के विनाश करने के लिए ही हुई थी। श्रीकृष्ण ने पूतना के खूब जोर से स्तनो को पीपर उसका क्षय कर दिया था ॥२॥ श्रीकृष्ण ने गाट को परिवृत्त कर दिया था और यमलार्जुनो को भग्न कर दिया था। कालिय नाग का दमन किया तथा धेनुकासुर का विनिपातन किया था ।। ३ ।। गौवन पर्वत को निष्ठिा पर धारण कर समस्त वन की इन्द्र के कोप में रक्षा को थी और इन्द्र के द्वारा परिपूजित हुए थे। हरि भगवान् ने प्रतिज्ञा की पो मोर भूमि के मार का अवसरण कर दिया था ॥४॥ अर्जुन आदि की रक्षा हरि वश सार -- करने के लिये अरिष्ट यादि का निपातन किया था। केशी नाम वाले दैत्य का वध किया था तथा गोप भादि सबको परितुष्ट कर दिया था ॥५॥ चाणूरोमुष्टिको मल्लः कंसो मञ्चानिपातितः । रुक्मिणीसत्यभामाद्या अष्टौ पन्यो हरेः पराः ।।६ पोडशस्त्रीसहस्राणि अन्यान्यासन्महात्मनः । तासां पुत्राश्च पौत्राद्या शतशोऽथ सहस्रशः ।।७ रुक्मिण्याञ्चैव प्रद्युम्नो न्यवधीच्छम्बरञ्च यः। तस्य पुनोऽनिरुद्धोऽभूदुपावारणसुतापतिः । हरिशङ्करयोर्यत्र महायुद्ध बभूव ह । वागवाहुसहस्रञ्च छिन्नं बाहुद्वयो ह्यभूत् ।। नरको निहतो येन पारिजात जहार यः । बलश्च शिशुपालश्च हतश्च द्विविद: कपिः ॥१०” अनिरुद्धादभूवः स च राजा गते हरौ। मान्दीपनि गुरुञ्चके सपुषञ्च चकार स: ॥ मथुरायाञ्चोग्रसेन पालनञ्च दिवौकसाम् ।।११ मथुरा में पहुंच कर चारगुर मोर मुष्टिक नाम वाले मल्ली को मार गिराया था तथा राजा कंम को च टी पकड कर मञ्च से नीचे गिरा कर हनन किया था। रुक्मिणी पौर सत्यभामा प्रादि श्रीकृष्ण को माठ प्रमुख पलिया हुई थीं ।।६।। महान् पात्मा वाले श्रीकृष्ण को अन्य भी गोलह सहस पत्नियां थी। उनके पुत्र और पौत्र सैकडों एवं सहस्रो की संरया मे हुए थे।॥ ७ ॥ रुक्मिणी से प्रद्युम्न पुन को उत्पत्ति हुई थी जिसने शम्बर का वध किया था। प्रद्युम्न के पात्मज का नाम अनिरुद्ध था जो वाण को पुती उपा के पति थे । ॥ ८ ॥ जहाँ पर हरि मोर सादर इन दोनो का महान् युद्ध था। वारण की सहम चाहु घिन्त होगई पी और से बाइपो याला होगया या जिमने नरकासुर का निहनन किया था जोकि पारिजात वृक्ष के हरण करने वाला था। बल पौर शिशुपाल हुए । दिविद नामक कपि मारा गया था । मनिझड से बच नाम हुए। यह हरि के गत होने पर राजा हुमाया। थोपा ने सान्दीपनि -- । गरुडपुराण को अपना गुरु बनाया था अर्थात् समस्त विद्यापो का अध्ययन सादीपति स किया था। गुरु दक्षिणा क रूप में उसके मृत पुन वा लाकर दिया था जिससे पुन. पुन वाले होगय थे । मथुरा म उग्रसेन का राजा फिर से बनाया था मोर दवो का पूर्णतया पालन किया था ॥१०॥११॥ १६-महाभारत मार भारत सप्रवक्ष्यामि भारावतरण भुव । चक्रे कृष्णो युध्यमान पाण्डवादिनिमित्तत ॥१ विष्णुनाम्यजतो ब्रह्मा ब्रह्मपुनोऽनिरनित । सोमस्ततो बुधस्तस्मादुर्वश्याञ्च पुरूरवा, ॥२ तस्यायुस्तत्र वशेऽभूत्ययातिभरत. कुरु । शन्तनुम्नस्य वशेऽभूद् गङ्गाया शन्तनो सुत ॥3 भीष्म सवेंगुणयुक्तो ब्रह्मवैवर्तपारग ।।४ शन्तनो सत्यवत्याञ्च द्वौ पुत्री सम्बभूवतु । चिनाङ्गद तु गन्धर्व पुन चियाङ्गदोऽवधीत् ।।५ प्रन्या विचित्रवीर्योऽभूत्काशिराजमुतापति । विचित्रवीर्य स्वर्यात व्यासातरक्षेवतोऽभवत् ॥६ धृतराष्ट्रोऽम्बिकापुत्र पाण्डुरम्बालिकासुत । भुजिघ्यायान्तु विदुरो गान्धा- धृतराष्ट्रत ॥७ दुर्योधनप्रधानास्तु शतसत्या महाबला. । पाण्डो कुन्त्याच माद्रयाश्च पञ्च पुना प्रजज्ञिरे ।।८ श्री ब्रह्माजी ने कहा-अब हम महाभारत के विषय में वर्णन करेंगे जोकि इस भूमि पर एक अत्यन्त विशाल भार का प्रबतरण हुमा था । इसी मही मण्डल के मार को हटाने के लिये भारत युद्ध की पूरी भूमिका भगवान् श्रीकृष्ण ने ही की थी और अर्जुन प्रादि पाण्डवो का इसका एक निमित्त मात्र बना कर ही ग्रह युद्ध किया गया था । भगवान् प्रादि पुरुष विष्णु की भाभि से समुत्सन पमल स ब्रह्माजी की उत्पत्ति हुई फिर ब्रह्मा के पुत्र अत्रि मुनि हुए पौर भनि स सोम समुपन्न हुए । सोम स बुध और बुध से उबंशो म पुरुरवा पाया महाभारत मार ] ने जन्म ग्रहण किया था ॥ २॥ पुरूरघा का पुत्र मायु हुमा और उस वंश मे पयाति-भरत और कुर हुए थे । इनके उपरान्त राजा गन्ननु ने जन्म लिया । उग गन्तनु से गङ्गा में भीष्म ( देव प्रत ) नामक पुत्र की उत्पत्ति हुई थी जो समस्त गुरागरण युक्त और ब्रह्म वैवत्तं के पारगामी थे ॥३॥४॥ राजा रामनु की दूसरी पत्नी जो मत्यवती एक मल्लाह की पुत्री थी उसमे दो पुत्र रामुपम हुए पे । एक उन दोनो म चित्राङ्गद पुत्र था जिसको चित्राङ्गद गन्धवं ने वध कर दिया था ॥५॥ दूसरा विचित्र वीयं नाम वाला मात्मज हुमा था जिमका विवाह काशिराज की पुयी के माथ हुप्रा था । विचित्र वीर्य के स्वर्ग गमन पर जाने पर महपि व्यारादेव से उसके क्षेत्र पर्यात् पत्नी में अम्बिका नाम की स्त्री से धृतराष्ट्र मौर अभ्यालिया नामधारिणी स्त्री से पाण्डु का जन्म हुआ था। भुजिया नाम वाली एक दामी से विदुर की उत्पत्ति हुई थी। राष्ट्र को पत्नी गान्धारी यो उसमे सौ पुन हुए थे जो कौरव नाम से विरयात हुए थे। इनमें दुर्योधन प्रधान था और ये सब महान वल वाले हुए थे। पारडु मे बुन्ती और माद्रो नाम पालीको पनि मो में पाच पुत्र समुत्पन्न हुए थे जो पाएट रहा नाम से प्रमिद हुए थे ।।६७८|| युधिष्ठिरो भीमसेनो घर्जुनो नयुत्तस्तथा । सहदेवश्च पश्च ते महायलपराक्रमा: 16 कुरुपाण्डवयोवेर देवयोगाद्वभूव ह। दुर्योधनेनाधीरेगा पाण्या समुपद्रुता ।।१० दग्ध्वा जतुगृह वीगम्ते मुक्ता म्वधियामलाः । ततम्तदेकचनाया ग्रामग्गस्य निवेगन ॥११ विप्रवेशा महात्मानो निहत्य बकरानभम् ॥१२ तत. पाचालविषये द्रौपद्यान्ते स्वयवरम् । विशाय वीय्यंगृल्पाला पाण्या उपये मिरे ॥१३ दोगाभीमानुगत्या तु धृतराष्ट्र गमानयत् । प्र राज्य तत. प्रामा इन्द्रप्रम्धे पुरोतमे ॥१४ समो पाराम नाम गुपिरि-भीमगेन-जुनन्नान और गादेग थे। पामो पुप महान् पन पौर पराक्रम में मम्मित एमे ॥६पुषदेप २६ । [ गरुडपुराण पाण्डवाना भिखण्डी च तयोर्युद्ध बभूव है। शस्त्राशस्त्रि महाघोर दशरात्र शराशरि ॥२६ शिखण्ड्यर्जुनवारगश्न भीष्म. शरशतयुत । उत्तरायणमीक्ष्याथ ध्यात्वा देव गदाधरम् ।।२७ उक्त्वा धर्मान्वहुविधास्तपयित्वा पितृन्वहून् । आनन्दे तु पदे लीनो विमले मुक्तकिल्बिपे ।।२८ इस प्रकार से महान् प्राज्ञ इन पांचों पारडवो ने द्रौपदी के सहित एक वर्ष तक प्रज्ञातवास यहाँ पर गोगृहादि के पालन करते हुए किया था। इसके पश्चात् ज्ञात होते हुए पाहत होकर अपने राष्ट्र प्राप्त करने की प्रार्थना की थी ॥ २२ ॥ इन्होंने पांचो भाइयो के लिए केवल पाच ही ग्राम अपने माधे राज्य से दुर्योधन से मागे थे किन्तु उस प्रार्थना को भी दुर्गेवन ने स्वीकार नहीं किया था। तब दल-चल से समन्वित होकर इन्होंने कुरुक्षेत्र के मैदान में किया था जो महान् भारत युद्ध के नाम से प्रख्यात हुमा था ॥२३॥ पाएडवो के पास केवल सात ही मक्षोहिणी सेना यो भौर दुर्योधन मादि कौरव ग्यारह प्रक्षोहिणी सेना से समन्वित थे । इस प्रकार से दोनो ओर को पठारह प्रक्षौहिणी सेना का युद्ध हुपा था ।। २४ । यह बडा सकुल युद्ध हुमाया । इस युद्ध को देवो पौर पसुगे के समूह से होने वाले युद्ध के समान ही अति भीपण वताया गया है। मादि में दुर्योधन की सेना में भीष्म पितामह ने सेनापति के पद को सभाला पा ॥२५॥ पाण्डवो के दल का सेनाध्यक्ष शिखण्डी हुप्रा था। इस तरह दोनो दलों का महान् घोर युद्ध शस्त्रो का शस्त्रो से तथा शरी का शरो के द्वारा दश रात्रि तक चलता रहा ॥२६॥, शिखण्डी को मागे कर मजुंन के वारो के द्वारा भीष्म सैकडो शगे से विद्ध कर दिये गये थे। जब भीष्म पितामह ने अपना मन्त समय समझ लिया तो प्राणत्याग के लिये उत्तरायण सूर्य की प्रतीक्षा मे देव गदापारी का ध्शन करने लगे थे १२७॥ उस समय मे भीष्म ने बहुन प्रकार के धर्मों का यर्णन किया-प्रपने पितृगण को तृप्त किया और फिर मुक्त किल्विष बिमल मानन्दमय पद में विलीन होगये थे ॥२८॥ ततो द्रोणो ययौ योद्ध, धृष्टद्युम्नेन वीर्यवान् । दिनानि पञ्च तद्य द्धमासीत्परमदारुणम् ।।२९
महाभारत सार ]
[ २७
यत्र ते पृथिवीपाला हता. पार्थास्त्रसागरे ।
शोकसागरमासाद्य द्रोणोऽपि स्वर्गमाप्तवान् ॥३०
ततः कर्णो ययौ योद्ध मर्जुनेन महात्मना ।
दिनवयं महायुद्ध कृत्वा पास्त्रसागरे ।।
निमग्न. सूर्यलोकन्तु तेतः प्राप स वीर्यवान् ॥३१
तत. शल्यो ययौ योद्ध, धर्मराजेन धीमता।
दिनाद्धन हतः शल्यो वाणवलनसन्निभः ।।३२
दुय्योधनोऽथ वेगेन गदामादाय वीर्यवान् ।
अभ्यधावत वै भीम कालान्तकयमोपमः ॥३३
अथ भीमेन वीरेण गदया विनिपातितः ।
अश्वत्थामा प्रतो द्रौरिणः सुप्तसैन्य ततो निशि ॥३४
जधान बाहुवीर्येण पितुर्वधमनुस्मरन् ।
दृष्टद्य म्न जघानाथ द्रौपदेयांश्च वीर्यवान् ॥३५
इसके अनन्तर महान् पराक्रमी प्राचार्य द्रोण धृष्टय म्न के साथ युद्ध
करने के लिए युद्ध क्षेत्र में उपस्थित हुए थे। पांच दिन तक यह युद्ध परम
दारुण हुआ ॥२९॥ इस युद्ध मे अनेक नुपति पार्यास्त्र सागर में निहत होगये थे।
फिर अन्त मे द्रोणाचार्य भी शोक सागर में प्राप्त होकर स्वर्गगामी होगये ये
॥३०॥ फिर करर्ण अर्जुन के साथ युद्ध करने के लिए प्राया। इसके साथ भी
दो दिन पर्यन्त युद्ध होता रहा और यह भी पार्थ अर्जुन के प्रस्त्रो के सागर में
भीपण समर करता हुमा निमग्न होगया । यह महा पराक्रमी कर्ण मरकर सूर्य.
लोक मे प्राप्त हुआ ॥ ३१ ॥ फिर धीमान धर्मराज युधिष्ठिर के साथ युद्ध करने
के लिये पाल्य उपस्थित हुआ। माघे ही दिन में शल्य निहत होगया था क्योकि
अग्नि के समान बड़े तीक्ष्ण वारणो की वर्षा हुई ॥३२।। इसके पश्चात् दुर्योधन,
जो महान वीर्य-पराक्रम से युक्त पा, बडे ही वेग से गदा लेकर कालान्तक
यमराज के समान भीम पर दौड कर पाया ।। ३३ ।। इसके मनन्तर बौरवर
भीम ने उस दुर्योधन को अपनी गदा के द्वारा निपातित कर दिया । इराके
मनन्तर द्रोण का पुत्र अश्वत्थामा रात्रि में सेना के सोने पर गया ॥३४॥ उसने
२८ । गरुडपुराण अपने पिता द्रोए के वध का स्मरण करते हुए बाहुमो के पराक्रम से धृष्टद्युम्न का हनन कर दिया और द्रोपदी के पुत्रो का भी हनन किया ॥३॥ द्रौपद्या रुद्यमानायामश्वत्थाम्न शिरोमरिणम् । ऐपिकास्त्रेण त जित्वा जगाहार्जुन उत्तम ॥३६ युधिष्ठिर समाश्वास्य स्नीजन शोकसङ्कुलम् । स्नात्वा सन्तयं देवाश्च पितृनय पितामहान् ।।३७ प्राश्वासितोऽथ भीमेन राज्यञ्च वाकरोन्महत् । विष्णुमीजेऽश्वमेधेन विधिवद्दक्षिणावता ॥३८ राज्ये परीक्षित स्थाप्य यादवाना विनाशनम् । श्रुत्वा तु मौशले राजा जप्त्वा नामसहस्रकम् ॥ विष्णो स्वर्ग जगामाथ भीमाद्य तृभियुत ॥३६ वासुदेव पुनर्बुद्ध स मोहाय सुरद्विषाम् । देवादीना रक्षणाय अधर्महरणाय च ।।४० दुष्टाना-च बघार्थाय अवतार क्रोति च । यथा धन्वन्तरिविशे जात क्षीरोदमन्यने ।।४१ देवादीना जीवनाय आयुर्वेदमुवाच ह । विश्वामित्रसुतायैव सुथ ताय महात्मने ।। भारताशावताराश्च धू त्या स्वर्ग प्रजेन्नर ॥४२ जब द्रोपदी के पुत्र को मृयु होगई और यह रहार रन करने लगी तो परपामा को निग्रहीत कर ऐपिकाल के द्वारा अर्जुन मे उमको जीत लिया और उगरी निगमगिको प्रहण कर लिया || ३६ ॥ महाराज युधिष्ठिर को समाधामिन से परम पोर से मन्तप्त स्त्रीजनों रा समझा-युभारर देवों सपा विगए वो स्नान में पारा तृप्त रिया ॥३७॥ भीम द्वारा भावासित होगर पुषितिर ने महार राज्याचामन दिया और पचमेप के द्वारा प्रगवान् विपा यजन पिया, शिगमें विधि-विधान साप पियुन दक्षिणादि म॥१८॥ दिम पयंत पो भाइयों में महिम राय के गुगों का मौतम में पादयों का पूर्ण विनाश मुरति मायुर्वेद । युधिष्ठिर ने राज्यारान पर परीक्षिन को स्थापित कर दिया। भगवान के सहस्र नाम का जाप करके भीमादि भाइयो के साथ विष्णु के स्वर्ग मे गमन किया ॥ ३९ ॥ वासुदेव पुन युद्ध हुए । गुरो के द्वेषी लोगो के मोह के लिए और देवादि के रक्षण के वास्ते तथा प्रधम के हरण करने के निमित्त मोर दुओं के वध करने के अर्थ भगवान् अवतार ग्रहण किया करते हैं जिस प्रकार से क्षीर मागर के मन्थन के अवसर पर भगवान् धन्वन्तरि प्राविभूत हुए थे। उन्होंने देवादिको के जीवन के लिए आयुर्वेद शास्त्र का उपदेश दिया और उस पायुर्वेद शास्त्र का प्रध्यापन विश्वामित्र महर्षि के पुत्र सुश्रुत को किया। सुश्रुत भी एक महान प्रास्मा वाले महा पुरुष थे । इस तरह इन भारत अवतारो का जो मनुष्य धवरा करता है वह स्वर्गकोक की प्रति किया करता है ॥४०॥४१॥४२॥ ६७-श्रायुर्वेद सर्वरोगनिदानञ्च वक्ष्ये सुश्रु त तत्त्वत । पायाद्य मुनिवरैर्यथा पूर्वमुदीरितम् ।।१ रोग पाम्मा ज्वरो व्याधिविकारो दुष्टमामय । यक्ष्मातङ्कगदावाधा शब्दा पर्याययाचिन ॥२ निदान पूर्वरूपाणि रूपाण्युपशयस्तथा । सप्राप्तिश्चेति विज्ञान रोगाणा पञ्चधा स्मृतम् ॥३ निमित्तहेत्वायतनप्रत्ययोत्थानकारण । निदानमाहु पर्याय प्राग्न प येन लक्ष्यते ॥४ उत्पित्सुरामयो दोपविशेपेणानाधिष्ठित । लिङ्गमव्यक्तमल्पत्वाद्वयाधीना तद्यथायथम् ।। तदेव व्यक्तना जात रूपमित्यभिधीयते । सस्थान व्यञ्जन लिङ्ग लक्षण चिह्नमाकृति ॥६ हेतुव्याधिविपर्यास्तविपर्यस्तार्थवारिणाम् । प्रौपधानविहाराणामुपयोग सुखावहम् ।।७ विद्यादुपशय व्याधे स हि सात्म्यमिति स्मृत । विपरीतोऽनुपशयो ध्याध्यसात्म्येति सशित ॥
- ३० [ गरुडपुराण भगवान धन्वन्तरि ने कहा-हे सुश्रुत ! मय हम समस्त रोगों के निदान मर्थान् मूलकारण को तुमको बतलाते हैं जिसको तत्त्व पूर्वक प्राय आदि मुनि- श्रेठों ने पहिले वतलाया था ॥१॥ यह रोग पाप होता है, पर व्याधि है और किसी भी प्रकार का विकार का होना दुष्ट मामय होता है । इनके यक्ष्मा--- मातङ्क-गदा-वाधा ये सभी शब्द पर्याय वाचक अर्थात् समानार्थक शब्द हुमा करते हैं ॥ २ ॥ निदा-पूर्वरूप-- --रूप अर्यात् रोग का स्वरूप-उपशय मोर सम्प्राति इन पावों के द्वारा रोगो का विज्ञान प्रति विशेष रूप से भलो भौति भान प्राप्त करना होता है ऐसे यह पाच प्रकार का निदान ही कहा जाता है क्योंकि इन्हीं से वास्तविक रोगों का ज्ञान होता है ॥३॥ केवल निदान के भी निमित्त हेतु-प्रायनन-प्रत्यय उत्थान कारण इन पर्याय वाचक शब्दो के द्वारा कहा गया है जिससे कि रोगो का प्राय प लक्षित हुमा करता है ॥ ४ ॥ उत्पन्न होने वाला मामय भर्पात् रोग किसी विशेष दोप से ही प्रधिष्ठिन हुमा करता है । निङ्ग पर्यात् व्याधियो का चिह्न अल्ल होने मे अव्यक्त प्रकाश में न भाने वाला पोर ठीक प्रकार से न जानने के योग्य होता है ॥५॥भारम्भ में यह कुछ घिरा हुआ-सा रहता है किन्तु शन.२ अपना एक प्रकट स्पष्ट स्वरूप पारण पर लेता है तो उसी को उसका कहा करते हैं । निदान हुमा । उमका फिर एक पव्यक्त स्वरूप बनकर पूर्व रूप हुपा पोर जा वह व्यक्त होकर सामने स्पष्ट होगया तो रूप होगया अर्थात् रोग सही स्वरूप मागया । इमको मस्यान-व्यञ्जन मक्षण-चिह्न और प्राकृति कहते हैं ॥ ६॥ हेतु-यापि से विपर्यस्त भौर विपर्यस्त अर्थ के करने वाले मोषप-प्रग्न भोर विहारों का उपयोग सुमावह होता है उसको ध्यापि पा उपाय कहते हैं । इसी से गारम्प नाम में भी कहा जाता है। हम जो विपरीत हो प्रात् प्रोपर- पन्न और विदागे । उपयोग मुप देने वाला न हो वही मनुपशप कहा जाता है। मीशेप्याधिको भगारम्य यह मंना दी गई है ॥७॥ यथा दुप्टेन दोपेण यथा चानुधिमर्पता । निवृत्तिगमयम्यामो मम्माप्तिातिरागति. 18 संम्यायिपम्पप्राधान्यवलमालविणेपत. । साभिचते यथारय यक्ष्यन्तेष्टो पराति ।।१० किसी दोप के होने से पायुर्वेद ] द्रोपारणा समवेतानां विकल्पोशाशवल्पना । स्वातन्त्र्यपारतन्त्र्याभ्यां व्याधेःप्राधान्यमादिशेत् ।।११ हेत्वादिकात्स् वयवेबलावलविशेषणम् । नक्त दिनहुँ भुक्तांशाधिकालो यथा मलम् ॥१२ इति प्रोक्तो निदानार्थः स व्यासेनोपदेष्यने । सर्वेषामेव रोगाणां निदान कुपिता मलाः ॥१३ तत्प्रकोपस्य तु प्रोक्त विविधाहितसेवनम् । अहितस्त्रिविधो योगस्त्रयाणा प्रागुदाहृतः ॥१४ जिस प्रकार मे दुष्ट दोप से ओर से अनुविरूपण करने वाले से रोग की निवृत्ति है यह सम्प्राप्ति होती है । इसका मागमन संख्या-विषय--प्रधानता घल और काल की विशेषता से होता है। इन्ही कारणो से इसके भेद भी होते हैं । अव यहाँ पाठ प्रकार के ज्वर बलाते हैं ।। ६१० ॥ समवेत अर्थात् एक साथ मिलकर उपस्थित हुए दोपो का विक्ल भौर उनके प्रशाश की कल्पना मा होना स्वतन्त्रता से और पराधीनता से उनसे होने के अनुसार ही पाधि के प्राधान्य को बतलाना चाहिए ॥ ११ ॥ हेतु प्रति के पूर्ण अवयवो से बस और पवल की विशेषता होती है । दिन-रात मोर चतु मे भुक्ता प्रशो से व्याधि का काल मल की भाति होता है ।।१२। इस प्रकार से यह निदान का प्रथं ठीक- ठीक बता दिया गया है। व्यासदेव के द्वारा यह नपदिष्ट किया जाता है कि ममम्त रोगो का प्रादिकारण निदान मलो का पुपित हो जाना ही होता है ॥१३॥ उसका प्रकोप अनेक प्रकार की महित कर वस्तुमो का सेवन करने से होता है । महित तीन प्रकार का होता है जोकि तीनो का योग है मौर पहिले बता दिया गया है ॥१४॥ तितोपरणकपायाम्लरक्षाप्रमितभोजन । घावनोदोरणनिद्राजागरात्युच्चभापणः ॥१५ क्रियाभियोगभीशोकचिन्ताव्यायाममथुनः। मोमाहोरात्रभुक्तचन्ते प्रकुप्यति समीरणः॥१६ पित्त कट्वम्लतीक्ष्णोप्राक्टुबोधविदाहिभिः । शरन्मध्याहराध्यद्ध विदाहसमयेषु च ।।१७ - ३२ ] स्वादम्ललवणस्निग्धगुर्व भिष्यन्दिशीतलः। प्रास्यास्वप्नसुखाजीर्णदिवास्वप्नादिवृहणः ॥१८ प्रच्छर्दनाद्ययोगेन भुक्तमात्रयसन्तयोः । पूर्वाल्ले पूर्वराने च श्लेष्मा वक्ष्यामि सङ्करान् ।।१६ तीन प्रधान दोष है जिनके नाम यात-पित और पफ पे होते हैं हममे भी सबसे प्रबल वायु को ही माना जाता है। प्रतः प्रथम वात के प्रको के कारणो पर प्रकाश डालते है--विक्त-उपरा-पाय-अम्ल-रक्ष और मात्र मित भोजन से-वोड लगाना-उदोरण-निद्रा-जागरण-मधिक ऊँचे स्वर । भापण-क्रिया का अभियोग-मय-शोर-चिन्ता-शक्ति से अधिक व्यायाम-मधु से-पीष्म में तथा महोरात्र मे भोगन से मस्त में वायु प्रदुषित हो आया करत है। उपयुक्त कार्य अधिक मात्रा में ही प्रकोप करने वाले होते हैं ॥१५॥१६॥ मन पित्त को कुपित होने के कारणों को बतलाते हैं-टु-अम्ल (सट्टा) तीक्ष्ण (तेज)-उष्ण (प्रधिक गर्म)-क्रोष प्रौर विशेष दाह करने वाले भोज से-शरत् ऋतु के मध्य में-दिन-रात के अर्घ विदाह के समय मे पित्त प्रा पित होता है । पब कफ के प्रकोप के कारण और समय बतलाते है-स्वादु अम्ल-लवरण-स्निग्ध-गुरु (भारी)-अभिस्पन्दन करने वाले-शीतल भोजन से पास्य-भस्वप्न (निद्रा न लेना)-सुख-प्रजीणं-दिन मे सोना-वृहण--अछ मादि के प्रयोग से-वसन्त ऋतु मे-दिन के पूर्वाह्न में (दुपहर के पूर्व में) ओ पूर्व रात्रि में कफ प्रकुपित होता है । अब इन तीनों दोपो के मिश्रण के विष में बनलाते हैं ॥१७॥१८॥१६॥ मिश्रीभावात्समस्तानां सन्निपातस्तथा पुनः । सकीरजीविषमविरुद्धाशनादिभि. २० ध्यापनमद्यपानीयशुष्कशाकाममूलकैः । पिण्याकमृत्यवसरपूतिशुध्ककृपामिपैः॥२१ दोपत्रयकरस्तस्तैस्तथानपरिवर्ततः । घातोदुष्टात्पुरो वाताद्विग्रहावेशविप्लवात् ।।२२ दृष्टामान्नैरतिश्लेष्मग्रहजन्मक्षपीउनाद ।
ज्वर निदान ]
मिथ्यायोगाच्च विविधात्पापानाञ्च निवरणात् ।।
स्त्रीणा प्रसववैषम्यात्तथा मिश्रोपचारत ॥२३
प्रतिरोगमिति क्रुद्धा रोगविध्यनुगामिनः ।
रसायन प्रपद्याशु दोपा देहे विकुर्वते ॥२४
वात-पित्त और कफ इन तीनो समस्तो के मिलावट रो जो प्रकोप होता
है उसे ही मनिपात कहते हैं। यह सङ्कीर्ण भोजन-प्रजीणं-विषम भोगन
मर्थात् ऐस भोजन जो परस्पर मे विषमता रखने वाले हैं जैसे दीर और दघि
पादि-विरोधी भोजन से-व्यापकता-मद्य-पानीय-शुष्क शाकाम मूलक से-
पिण्याक मृतवसर- दुर्गन्ध युक्त भोजन से-शुष्क कृष्ट प्रामिप से तीनो दोप
प्रकुपित हो जाते हैं । अन्न के परिवर्तन से-पातु के दोष से-पहिले वात से
पौर विग्रह-मावेश एव विप्लव से-दुष्टामान से प्रति इलेप्मा से-ग्रहो से-
जन्म नक्षत्र के पीडन से-मिथ्यायोग से और अनेक प्रकार के पापो के परने
से--स्त्रियों के प्रसव के वैषम्य से तथा मिश्रित उपचार से प्रत्येक रोग में रोग
विधि के अनुगमन करने वाले तीनो दोप प्रकुपित हो जाते हैं । रसायन को प्राप्त
पर ये दोष शीघ्र ही देह में विकार किया करते हैं ॥२० से २४।।
६८-ज्वर निदान
वक्ष्ये ज्वरनिदान हि सर्वज्वरविबुद्धये ।
ज्वरो रोगपति पाप्मा मृत्युराजोऽशनोन्तकः ॥
क्र द्धदक्षाध्वरध्वसिरुद्रोवंनयनोद्भवः ॥१
तत्सन्तापो मोहमपः सन्तापात्मापचारजः ।
विविध ममि करो नानायोनिपु वत्तंते ।।२
पाकलो गजेष्वभितापो वाजिष्यलक: कुक्कुरेपु ।
इन्द्रमदो जलदेवप्सु नीलिका ज्योतिरोपी भूम्यामूपरो नाम
हल्लासश्छदंन पास स्तम्भः पौत्य त्वगादिषु ।
प्रङ्ग पु च समुद्भुताः पीटकान कफोद्भये ।।३।४
काले यथास्त सर्वपा प्रवृत्ति दिरेव वा।
निदानोक्तानुपायो विपरीतो यथापि वा ॥५
३४ ] [ गरुडपुगण अरचिश्वाविपाकश्च स्तम्भमालस्यमेव च । हृद्दाहश्च विपाकश्च तन्द्रा चालस्यमेव च ।। यस्तिविमविनया दोषाणामप्रवत्तनम् ॥६ लालाप्रसेको हुल्लासः शुनाशो रसद मुखम् । स्वच्छमुणगुरुत्वच गामारणा बहुमूत्रता ।। न पिजीर्ण न च ग्लानिज्वरस्यामस्य लक्षणम् ॥७ भगवान् धन्वन्तरि ने कहा-मा समस्त प्रकार के ज्वरो के ज्ञान प्राप्त करने के लिए ज्वर का निदान बसलाया जाता है। यह राब रोगो का स्वामी है-पाप स्यरूप है-मृत्युराज-मशन (भक्षण करने वाला) और अन्त कर देने वाला होता है। यह दा प्रजापति पर क्रोध करने वाले और उसके यश को विकास करने वाले भगवान् रु के ऊपर के तोगरे नेत्र से उत्पन्न हुप्रा था ॥१॥ उस पर का सन्नाप मोह से परिपूर्ण होता है। यह सन्तापात्मा मौर पपगार से समुत्पन्न होने वाला है । यह विविध नामो से युक्त एवं अत्यन्त कर मोरनाना योनियो मे होता है ॥२॥ हाथियो मे जो ज्वर का अभितार होता है उसका नाम 'पागल' होता है । घोडो में होने वाले ताप को 'मलर्क' नाम से कहा जाता है । कूकरो मे जो घर होता है उसको 'इन्द्रामद' कहते हैं । जलदो जल मे हमका नाम 'नोलिका' है। पौषधियो में इसी को 'ज्योति' कहा करते है । भूमि में इसको 'ऊपर' इस नाम से पुकारते हैं ॥३॥ हृदय में वेदना- एर्दन पर्थात् बी को मतली-सांसो-स्तम्भ पोर स्वना पादि मे शोतलता मर्यात् पारीर का ठण्डा पर जाना-सम्पूर्ण मङ्गो मे पीडा का उत्पन्न होना ये सब ज्वर निदान ) होता है ॥६॥ लाला प्रसेक अर्थात् मुख से लारों का गिरना.-हल्लास-सुधा का न रहना-~-मुख में पानी का पाना-शरीर के अङ्गो मे स्वच्छ्ता-उष्णता और भारीपन रहना--- -पेशाव का अधिक पाना-विशेष रूप से जीता काम होना और ग्लानि का न होना ये सब पाप ज्वर के लक्षण हुप्रा करते हैं । जो खाये हुए पदार्थ का परिपाक होकर पूर्ण रस नही बनता है और वच्चा ही रह जाता है वह माम कहा जाता है जोकि मल के साथ चिकना-सा निकला करता है ॥७॥ क्षुत्क्षामत वञ्च गावाणां ज्वरमार्दवम् । दोपप्रवृत्तिरष्टाहान्निरामज्वरलक्षणम् ।। यथा स्वलिङ्ग ससगै ज्वरमंसर्गजोऽपि वा । शिरोत्तिमूच्छविमिदेहदाहकण्ठास्यशोपावपि पर्वभेदाः । उन्निद्रता सम्भ्रमरोमहर्षा जम्भातिवाक्त्वं पवनात्सपित्तात् ॥ तापहान्यरुचिपर्वशिरोमरिणक्षीरणश्वासकास विवर्मा । शीतजाव्यतिमितभ्रमिनन्द्राश्लेष्मवातजनितज्वरलिङ्गम् ।।१० शीतस्तम्भस्वेददाहाव्यवस्थास्तृष्णा कासः श्लेष्मपित्तप्रवृत्तिः । मोहस्तन्द्रा लिप्ततिक्तास्यता च ज्ञेय रूप श्लेष्मपित्तज्वरस्य ।।११ सर्वजो लक्षण. सर्दाहोऽय च मुहुमुहु.। तद्वच्छीत तिमिर निद्रा दिवा जागरण निशि ॥१२ सदा वा नव वा निद्रा महास्वेदो हि नव वा। गीतननिहास्यादिः प्रकृतेहाप्रवर्तनम् ।।१३ साथ गगी कलुपे रफ्ते भुग्ने लुलितपक्षमणी। अक्षिणी पिण्डिकापाव शिर.पर्वास्थिापनमः॥१४ शुधा से क्षामता का होना-गात्री की माता पर्यात हलकापन- वर मादंब-दोष को प्रवृत्ति प्रा6 दिन में होती है-यह निरामसर का लक्षण होता है। मपने चिह से समर्ग मे है भयवा ज्वर के संमगं से उत्पन्न होने वाना भी यह होता है । सिर में बड़ा दं-मूळ प्रर्याद यहोतो पाहोना यमि प्रति उल्टी पाहोना शरीर में दाह या होना-गले मौर मुप पाएक - [ गरुडपुगण प्रपचार अरुचिश्वाविपाकश्च स्तम्भमालस्यमेव च । हृद्दाहश्च विपाकश्च तन्द्रा चालस्यमेव च ।। वस्तिविमर्दावनया दोषाणामप्रवत्तनम् ॥६ लालाप्रसेको हल्लासः क्षुम्नाशो रसद मुखम् । स्वच्छमष्णगुरुत्वञ्च गातारणा बहुमूत्रता॥ न विजीर्ण न च ग्लानिर्वरस्यामस्य लक्षणम् ।।७ भगवान् धन्वन्तरि ने कहा-अब समस्त प्रकार के ज्वरो के ज्ञान प्राप्त करने के लिए ज्वर का निदान बतलाया जाता है। यह सब रोगो का स्वामी है-पाप स्वरूप है-मृत्युराज--प्रशन (भक्षण करने वाला) और पन्त कर देने वाला होता है । यह दक्ष प्रजापति पर क्रोध करने वाले मोर उसके यश को विज्ञप्त करने वाले भगवान् रुद्र के ऊपर के तीगरे नेत्र से उत्पन्न हुआ था ॥१॥ उम चर का सन्ताप मोह से परिपूर्ण होता है। यह सन्तापात्मा पौर से समुत्पन्न होने वाला है । यह विविध नामो से युक्त एव अत्यन्त कर मोर नाना योनियो में होता है ॥२॥ हाथियो मे जो घर का प्रभितार होता है उसका नाम 'पाकल' होता है । घोडो मे होने वाले ताप को 'प्रलयां' नाम से कहा जाता है । कूकरो मे जो जर होता है उसको 'इन्द्रामद' कहते हैं । जलदो मे जल मे इसका नाम 'नोलिका' है। पौषधियो में इसी वो 'ज्योति' कहा करते हैं । भूमि मे इसको 'ऊपर' इस नाम से पुकारते हैं ॥३॥ हृदय मे वेदना छर्दन अर्थात् जी को मतली-खासी-स्तम्भ और त्वना प्रादि मे शीतलता अर्थात् परीर का ठण्डा पड जाना-सम्पूर्ण मङ्गो मे पीडा का फफ के दोष से उत्पन्न घर में होते हैं ॥४॥ किसो काल में इन सबका शमन पौर किसी समय मे प्रवृत्ति तथा बढाव हुमा करता है । निदान में उक्त मनुपः राय प्रथवा इगये विपरीत होता है ।। ५ ।। प्रह'च-प्रविपाक अर्थात् किसी भी पदार्थ की ओर रुथि का न होना मोर खाये हुए पदार्थ का परिपाक न होना- स्तम्भ यानी शरीर का ज्यों कि त्यों रह जाना-पालस्य (शरीर में मुस्ती या होना) हृदा में दाह अर्थात् जनन का होना-विपाक-तन्द्रा ( नीद जमी दुपारी का रहता )-प्रालस्य-स्ति--विमर्द इसमें दोपों या प्रवतन नहीं उत्पन्न होना ये सब
ज्वर निदान
होता है ॥६॥ लाला प्रसेक अर्थात् मुख से लारों का गिरना-हृल्लास-शुधा
का न रहना--मुस मे पानी का पाना-शरीर के प्रङ्गो मे स्वच्छता-उष्णता
मोर मारोपन रहना--पशाव का अधिक पाना-विशेष रूप से जीता काम
होना पोर ग्लानि का न होना ये सब पाप ज्वर के लक्षण हुमा करते है। जो
खाये हुए पदार्थ का परिपाय होकर पूर्ण ररा नहीं बनता है और बच्चा ही रह
जाता है वह पाम कहा जाता है जोकि मल के साथ चिकना-सा निकला
करता है।
सुत्क्षामता लघुत्वञ्च गानाणा ज्वरमार्दवम् ।
दोपप्रवृत्तिराहान्निरामज्वरलक्षणम ॥
यथा स्वलिङ्ग मसगै ज्वरमसर्गजोऽपि वा।
शिगेत्तिमुविमिदेहदाहरण्ठास्यशोपावपि पर्वभेदा ।
उग्निद्रता सम्भ्रमरोमहर्षा ज़म्भातिवायत्व पवनात्सपित्तात् ॥
तापहान्यरुचिपर्वशिरोमणिक्षीएश्वासकासविवर्मा ।
शीतजाडयतिमितभ्रमिनन्द्राश्लेष्मवातजनितज्वरलिङ्गम् ॥१०
शोत्तम्तम्भस्वेददाहाव्यवस्थास्तृष्णा कास श्लेमपित्तप्रवृत्ति ।
मोहस्तन्द्रा लिप्ततिक्तास्यता च शेय स्पश्लेष्मपित्तज्वरस्य ॥११
सर्वजो लक्षणं सौदाहोऽत्र च मुहुमुहु ।
तद्वच्छीत तिमिरनिद्रा दिवा जागरण निशि ॥१२
सदा वा नंब धा निद्रा महास्वेदो हि नव वा।
गोतननिहास्यादि प्रवृतेहाप्रवर्तनम् ॥१३
साथ गी पलुपे रस्ते भुग्ने लुलितपक्षमगी।
अक्षिणी पिण्डिकापावंशिर पर्वास्थिकाभ्रम. ॥१४
शुपा से धाममा पाना-पानी की सपुता पनि हमापन-सर
माईक-दोपहर पार में होनी है-यह लि९९ राम
होता है। मरने चिहगे समर्ग में पयवा घर से समर्ग मे उत्पन्न होने
पामा भी यह होता है । पिर में बठा ई-मूर्दा प्रा होमो रा होता
पपि पान उल्टी का होना जमेर में वह सा होना-गरे प्रौर मुग का एक
३६ ] [ रहना-शरीर के जोडो मे भेदन का होना- नीद का पाना-सम्भ्रम अर्थात चक्कर पाना-रोमाञ्चो का होना-जुभाइयो का अयिक माना और जरंबक देना ये लक्षण पित्त के साथ वायु के दोष से हुमा करते हैं ॥६॥ ताप की कमी-- प्ररुचि-गांठो में और माथे मे पीडा-श्वास का क्षीणता के साथ चलना- खामी का होना--विवर्णता--शीन का माना-जडता-खो के सामने अंधेरापन का होना-तन्द्रा वा रहना ये सब कफ और वात मे मिश्रित होकर उत्पन्न होने वाले ज्वर का लक्षण होता है ॥१०॥ शीत-स्तम्भता-पसीने का पाना--दाह का होना और इनकी कोई व्यवस्था का न रहना अर्थात् कभी पसीना पाता है--दाह होता है और कभी-कभी ये नही होते हैं। प्यास का अधिक लगना--खासी का होना ये सब लक्षण हो तो समझ लेना चाहिए कि रोगी को रफ मोर पित्त से मिश्रित घर है। जब क्फ और पित्त दोनो है दोष मिलकर कुपित होते हैं तब ऐसे ही रोगी के लक्षण हुप्रा करते हैं । श्लेडर (कफ) और पित्त से होने वाले ज्वर का यही स्वरूप होता है कि उसको मोह तन्द्रा और मुख का लिप्त-मा होना तथा तिक्त स्वाद का रहना होता है ॥११॥ यदि ये सभी लक्षण दिखलाई देवे तो समझना चाहिए कि सभी दोपो मे युन ज्वर है । इसमें बार-बार दाह होता है। इसी प्रकार से शीत-अंधेरा-नि: दिन में होना और रानि मे जागरण होता है ।१२॥ अथवा सदा ही निद्रा नई होती है या नीद हो रहा करती है । कभी-कभी बहुत अधिक पसीना माता और कभी बिल्कुल भी नही होता है । (गीत-नृत्य और हास्य मादि प्रक घेष्ट प्रो को प्रवृत्ति होती है ॥ १३ ॥)नेत्रो मे पासू होते हैं और प्रासें कलुषि रक्त-भुग्न-झुकी हुई पलको पाली रहा करती हैं। पिंडलिया-पगवाडे--माथ पौर जोडो में तथा हड्डियों में वेदना होती है और भ्रम होता है ॥१४॥ सस्वनौ सरुजी करणी महाशीतो हि नैव वा । परिदग्धा खरा जिह्वा गुरुस्रस्ताङ्गसन्धिता ॥१५ ठीवन रक्तपित्तस्य लोठन शिरसोऽतिहट । कोठामा श्यावरक्ताना मण्डलानाञ्च दर्शनम् ॥१६ हव्यथा मलमसर्ग. प्रवृत्तिाल्पशोऽति वा । स्निग्यारयता बलदंश. स्वरसाद प्रलापितः ॥१७ - पर निदान [ ३७ दोपपाकश्चिरं तन्द्रा प्रततं कण्ठकूजनम् । सन्निपातमभिन्यास तं व याच हतौजसम् ॥१८ वायुना कण्ठरुद्ध न पित्तमन्त.सुपीडितम् । व्यवायित्वाच्च सौख्याच्च बहिर्मागं प्रपद्यते ।। तेन हारिद्रनेत्रत्वं सन्निपाताद्भवे ज्वरे ॥१६ दोषे विवृद्ध नष्टेऽग्नी सर्वसंपूर्णलक्षणः । सन्निपातज्वरोऽसाध्यः कृच्छ्रसाध्यस्ततोऽन्यथा ।।२० अन्यत्र सन्निपातोत्थं यत्र पित्त पृथक् स्थितम् । त्वचि कोष्ठे च वा दाह विदधाति पुरोऽनु वा ॥२१ कानो मे भी पीडा होती है और भुन-भुनाहट-सी होती रहती है । कभी-कभी महान शीत होता है और कभी नही होता है। जीभ परिदग्ध मौर खरखरी रहा करती है। मङ्गो की सन्धियो मे गुरुता और लस्तता रहती है ।१५।। थूक मे रक्त पित्त होता है। शिर मे लोठन होता है और प्पास बहुत अधिक लगती है । कोष्ठ श्याव तथा रक्त वर्ण के होते हैं और मण्डलो का दर्शन भी होता है ।।१६। हदय मे व्यथा होती है । मल का समर्म ऐगा होता है कि कभी तो यहुत अधिक जाता है और कभी प्रत्यन अल्प ही निकलता है । मुख का जायका स्निग्धता वाला होता है जैसे कोई लुपावसा घुल रहा हो । बल की धोरणता हो जाती है। स्वर भी बिगड जाया करता है। कभी-कभी प्रलाप होता है ॥१७॥ चिरकाल मे दोष का परिपाक होता है। तन्द्रा और कराठ में घरघराहट की आवाज होती है। जिसमें मोज का हनन हो जाता है ऐमा यह भभिन्यास सग्निपात कहते हैं ॥ १८ ॥ वायु के द्वारा कराठ के रुद्ध हो जाने से मन्दर पित्त सुपीडित होता है। वह व्यवायी और सौस्प होने से वाहिर के मार्ग को प्राप्त होता है । सन्निपात से उत्पन्न होने वाले ज्वर मै नेत्रो मै हल्दी के समान नेत्रो का रङ्ग हो जाता है |॥१६॥ सब प्रकार से पूर्ण लक्षणों वाला रोग सन्निपात ज्वर एक प्रपाच्य रोग हो जाता है पथवा साध्य भी होता है तो यह बहुन कठिनाई से अच्छा होता है। दोषों के बढ जाने पर प्रग्नि नष्ट हो जाया करती है ॥२०॥ अन्यत्र सन्निपात से उठा हुमा जय पित्त पृथक स्थित होता है तो स्वधा में--कोठ में पहिसे या पीछे दाह किया करता है ॥२१॥ .
- गरुडपुराण करते हैं। तद्वद्वातकफे शीत दाहादिर्दुस्तरस्तयो । शीतादौ तन पित्तन क्फे स्पन्दितगोपिते ॥२२ पित्त शान्तेऽथ व मूर्छा मदस्तृष्णा च जायते। दाहादौ पुनरन्तेपु तन्द्रालस्ये वमि प्रमात् ।।२३ आगन्तुरभिघाताभिषङ्गशापाभिचारत । चतुर्धा तु कृत स्वेदो दाहाद्य रभिघातज ॥२४ श्रमाच तस्मिन्पवन प्रायो रक्त प्रदूपयन् । सव्यथाशोकवण्यं सरुज कुरुते ज्वरम् ॥२५ इसी प्रकार से वात-कफ में शीत मौर दुस्तर दाह प्रादि उन दोनो हुमा उस दशा मे शीत मादि मे पित्त के द्वारा कफ के स्पन्दित एव शोषित होने पर तथा पित्त के शान्त हो जाने पर मूर्दा -मद और तृष्णा हो जाते हैं । दाह के मादि मे मोर फ़िर भन्न में तन्द्रा-मालस्य और वमन क्रम से हुमा करते हैं ।।२२।२३।। मभिधात-मभिपङ्ग-शाप और मभिचार इनसे प्राने वाला चार तरह से किया हुमा स्वेद ( पसीना ) होता है । दाहादि से अभिघातज होता है ।। २४ ॥ क्रम से उसमें वायु वहुपा रक्त को दूपित करता हुमा व्यथा-शोक मोर विवर्णता के सहित ज्वर को सरुज किया करता है ।२५। 86--चिकित्सा के विभिन्न रोग एव धन्वन्तरिविष्णु सुश्रु तादीनुवाच ह। हरि पुनहरायाह नानायोगान्रुगर्दनान् ॥१ सर्वज्वरेषु प्रथम कार्य शङ्कर लड्दनम् । क्वथितोदकपानञ्च तथा निर्वातसेवनम् ॥२ अग्निस्वेदाज्ज्वरास्त्वेव नाशमायान्ति हीश्वर । वातज्वरहर क्वाथो गुड च्या मुस्तकस्य च ॥३ दुरालभ कृत क्वाथ पित्तज्वर हर शृणु । शुण्ठीपर्पटमुस्तश्च बालकोशीरचन्दन ॥४ साज्य क्वाथ श्लेष्मजन्तु सशुण्ठि सदुरालभ.। सवालक. सर्वज्वर सशुण्ठि सहपर्पट. ॥५ ...ना विामन याग - क्वाथश्च तिक्तकरण्डगुडूचीशुण्ठिमुस्तक. । पित्तज्वरहरः स्याच शृण्वन्य योगमुत्तमम् ॥६ वालकोशीरपाठाभि. कण्टकारिकमुस्तक. । ज्वरनुच्च कृत. क्वाथस्तथा वै ज्वरदारुण.॥७ श्री रुद्र ने कहा--इस प्रकार से विष्णु के प्रवत र भगवान् धन्वन्तरि ने शङ्कर जी को रोग के प्रर्दन करने वाले अनेक योग बतल ये थे । श्री हरि ने कहा--हे शङ्कर ! सभी प्रकार के वो मे स्वमे प्रथम लद्धन करना चाहिए प्रर्थात् भोजन बिल्कुल त्याग देना चाहिए । औटाया हुमा पानी का पान करना और किसी निर्यात स्थान में जहां कि हवा का सञ्चार न हो रहना ज्वर के रोगी को हितकर होता है ।। ११२ ॥ हे ईश्वर ! इस प्रकार से अग्नि स्वेद से ज्वर नाश को प्राप्त हुमा करते हैं । यदि वात ज्वर हो अर्थात् घायु कुपित होकर ज्वर की उत्पत्ति हुई हो तो गिलोय पौर सुस्तक का पवाथ ( काढा ) देना ५ चाहिए। इससे वात ज्वर का प्रशमन होता है ॥३॥ अब पित्त के दोप से पाने बाते ज्वर का हरण करने वाले काढ़े का विवरण श्रवण करो। दुरालभ गुण्टी । (सौंट)-पपंट और मुस्त (मोथा) तथा बालकोशीर (नवीन सस) और चन्दन के द्वारा क्याप प्रस्तुत कर देवे ॥४५॥ श्लेष्मा (फ) से दोष से समुत्पन्न ज्वर का शमन करने के लिए पाज्य और दुरालभ के सहित शुण्ठि से युक्त काढा होता है । पपंट और सौंठ से युक्त सवालक ब्राप समस्त प्रकार के अरो के शमन करने वाला होता है ॥६॥ तिक्तक-एरएड-गिलोय-सोठ मोर मुस्तक इनके द्वारा तयार विया हुमा क्वथ पित्त के दोप से होने वाले ज्वर का हरण किया करता है । इसके अतिरिक्त अन्य उत्तम योग का थवरण करो ॥६॥ वालकोशीर पाठा--एटकारि-मुस्तक-इनसे प्रस्तुत क्यिा हुमा क्वाथ ज्वर का नाशक होता है ॥७॥ धन्याकनिम्बमुस्ताना समयु स तु शङ्कर । पटोलपत्रयुक्तस्तु गुड चीत्रिफलायुतः ।। पीतोऽखिलवरहर छुधाकृद्वातनुत्त्विदम् । हरीतकी पिप्पलीनामामलीचित्रकोद्भवम् । पूर्ण ज्वरच कथित धन्याकोशीरपपंट:16 ४० [ गरुडपुराण ग्रामलक्या गुडूच्या च मधुयुक्त सचन्दनम् । समस्तज्वरनुच्च स्यात्सन्निपातहरं शृणु ॥१० हरिद्रानिम्बत्रिफलामुस्तकैर्देवदारुणा । कपाय कटुरोहिण्या सपटोल सपत्रकम् ।। निदोपज्वरनुच्च स्यात्पोतन्तु क्वथित जलम् ।।११ कण्टकार्या नागरस्य गुडूच्या पुष्करेण च । जग्वा नागवलाचूर्ण श्वासकासादिनुद्भवेत् ।।१२ देवदार-घ न्यार-नाम पोर मुस्तक पटोल पन के सहित और गिलोय एव निफना से युक्त मधु से समन्वित क्वाथ हे शङ्कर ! पीने पर सब प्रकार के ज्वर का हरण करता है और इससे क्षुधा की मी वृद्धि होती है ॥ ८ ॥ हरं- पीपल-प्रावला और चित्रक-इनका कूट-पीसकर बनाया हुमा चूर्ण भी ज्वर का नाशक होता है । धान्याक-उशीर मोर पपंट के द्वारा प्रोट या हा काढा पामलकी- गुडूची ( गिलोय ) के साथ जिसमै चन्दन भी ज्वर को नष्ट करने वाला होता है और सभी प्रकार के ज्वरो का उखाड फेकता है । अव सन्निपात ज्वर के हरण करने वाले योग का श्रवण करो ॥ १० ॥ हरिद्रा--निम्ब- त्रिफला--मुस्तक-देवदाम-टुरोहिणी का कपाय जोकि पटोल पत्र के सहित हो इसका काढा बनाकर पिलाया जावे तो त्रिदोष के कुपित होने पर जो घर होता है उसका हरण हो जाता है ।।११॥ कण्टकारि (कटेरी)-नागर-गिलोय और पुष्कर के साथ नाग बला का पूर्ण खाने पर श्वास और खांसी प्रादि का नाश हो जाता है ॥१२॥ कफवातज्वरे देय जलमुष्ण पिपासिने। विश्वपर्पटकोशीरमुस्तचन्दनसाधितम् ॥१३ दद्यात्सुशीतल वारि तृट छदिज्वरदाहनुत् ! बिल्वादिपञ्चमूलस्य क्वाथ: स्याद्वातिके ज्वरे ।।१४ पाचन पिप्पलीमूल गुडूचीविश्वभेपजम् । वातज्वरे त्वय क्वाथो दत्त, शान्तिकर. परः ।। पित्तज्वरनुत्समधुः क्वाथ: पर्पटनिम्बयोः ॥१५
विविधोपधि (१) ]
विधाने क्रियमाणेऽपि यस्य संज्ञा न जायते ।
पादयोस्तु ललाटे वा ददेल्लौहशलाकया ॥१६
तिक्ता पाठा पटोलश्च विशाला त्रिफला निवृत् ।
सक्षीरो भेदनः क्वाथः सर्वज्वरविशोधनः ।।१७
कफ वात के ज्वर में पिपासु को सदा उष्ण जल ही पीने के लिए देना
चाहिए । यह विश्व पर्पटक-~~-उशीर----मुस्तक और चन्दन पापित किया होना
चाहिए ॥१३॥ शीतल जल देने से तृपा-दि-वर पोर पाह का क्षय होता
है । यदि बातिक उबर हो तो उसमे विल्वादि पञ्चमूल का काढा देने से परम
शान्ति होती है । पित्त ज्वर में पर्पट पौर निम्ब का क्वाथ मधु के साथ पीने से
ज्वर का उपशमन हो जाता है । वात ज्वर मे पिप्पनीमून-गिलोय और विश्व
भेज पाचन होते हैं और इनका क्वाथ शमन करने वाला होता है ॥१४.१५।।
-इस प्रकार के विधान के करने पर भी यदि होश न हो तो रो में अथवा
ललाट मे लोह की दालाना से दाह करना चाहिए ॥१६॥ तिक्ता-पाठा--
पटोल--विसाला--त्रिफला--विवृत क्षीर के सहित किया हुमा क्वाथ भेदन
तथा समस्त प्रकार के ज्वरो का विशेष रूप से गोधन करने वाला है ।।१७।।
१००-~-विविधीपधि (१)
सप्तराच्याः प्रजायन्ते सल्वाटस्य कचाः शुभाः ।
दग्धहस्तिदन्तलेपात्साजाक्षीररसाञ्जनात् ॥१
भृङ्गराजरसेनैव चतुर्भागेन साधितम् ।
केशवृद्धिकर तैलं गुआचूर्णान्वितेन च ॥२
एलामासीकुष्ठमुरायुक्तमभ्युद्गत गिरः ।
गुलाफलं समादेय लेपन चन्द्रलुप्तनुत् ॥३
अाम्रास्थिचूर्णलेपाद् व केशाः सूक्ष्मा भवन्ति च ।
फरक्षामलकलाः सलाक्षा लेपोऽरुणापहः ।।४
प्रामास्थिमजामलकलेपारलेशा भवन्ति ।
बदमूला घना दीर्घाः स्निग्धाः स्युनोत्पतन्ति च ॥
४२ ] । गरुडपुराण विडङ्गगन्धपापाणसाधित तैलमुत्तमम् । सचतुर्गुणगोमूत्र मनस. शिलमेव वा ॥ शिरोऽभ्यङ्गाच्छिरोजन्मयूकालिक्षा. क्षयं नयेत् ।।६ नवदग्ध शङ्खचूर्ण घृष्टसीसकलेपितम् । कचा लक्षणा महाकृता भवन्ति वृपभध्वज ७ श्री भगवान् ने कहा-जिसका मस्तक बल्वाट होता है प्रर्थात् जिसकी चाद मे बाल न ही उस मनुष्य के माथे मे बहुत सुन्दर केश सात रात्रियो में हो आजाया करते हैं यदि हायी दांत को भस्म कर उसका लेप किया जावे और साना के दूध रसाञ्जन से करे । भृङ्गराज के रस के साथ तैल चतुर्भाग मे साधित करके गुजा के चूणं से युक्त स्तमाल किया जावे तो यह केशों की वृद्धि करने वाला होता है ।। १२ ।। एला-मामी-कुष्ठ-मुरा इनका अम्पङ्ग शिर मे करे और गुजा के फलो का लेपन करे तो चन्द्र का लोप होता है अर्थात् केशों का प्रभाव दूर हो जाता ॥ ३ ॥ पान की अस्थियो के चूर्ण का लेप करने केश सूक्ष्म हो जाया करते हैं। करज-पामलक-एला (इलायची) ये लाक्षा के साथ लेप करने से अरुणा का अपहरण होता है ॥ ४ ॥ प्रामास्थि मजा- मोवला इनके लेप से केश बद्धमूल-धने-स्निग्य होते हैं और उनका उत्पतन नहीं होना है । यायविडङ्ग गन्ध पापाग के द्वारा साधित तेल भी परम उत्तम होता है। चौगुना गोमूत्र मौर मैनशिल इनका शिर पम्यङ्ग करे तो केशो में जो भी जूमा लोक प्रादि उत्पन्न होकर पीडा देते हैं वे सब नष्ट हो जाते हैं ॥५- ॥६॥ हे वृषभध्वज । नवीन तयार किया हुमा शह को भस्म का चूरण शीशे पर घिसकर लेप करे तो बाल श्लरण (घने) मोर अत्यन्त काले होजाते हैं ॥७॥ भृगराज लोहचूर्ण त्रिफला वीजपूरकम् । नोली च करवीरञ्च गुडमेतः समः शृतम् ।। पलितानीह कृष्णानि कुर्याल्लेपान्महौषधम् ॥ प्राग्रास्थिमजा ग्रिफला नीली च भृङ्गराजकम् । जीर्ण पक्वलोहचूर्ण कालिक कृष्णरावृत् ।। चक्रमर्दक बीजानि युष्ठमेरण्डमूलरम् । मात्युणाशिक पिष्टवा लेपारगम्तकरोगनुन् ।।१० वोपधि (१) । [ ४३ सैन्धवञ्च वचा हिङगु कुष्ठ नागेश्वरं तथा । शतपुष्पा देवदारु एभिस्तलं तु साधितम् ॥११ गोपुरीपरसेनैव चतुर्भागेन संयुतम् । तत्काभरण दुग्रकर्णशूलं क्षयं नयेत् ।।१२ मेपमूत्रसैन्धवाभ्यां कर्णयोर्भरणाच्छिव । कयोः पूतिनाशः स्यात्कृमिस्रावादिकस्य च ॥१३ मालतीपुष्पदलयो रसेन भरणात्तथा । गोजलेनैव पूरेगा पूयस्रावो विनश्यति ॥१४ कुष्ठमाषमरीचानि तगरं मधु पिप्पली। अपामार्गोऽश्वगन्धा च वृहती सितसर्पपाः ।।१५ यवास्तिला: सैन्धवञ्च तेषामुद्वर्त्तनं शुभम् । लिङ्गवाहुस्तम्भनाशं कर्णयो कृद्भवेत् ॥१६ भृगराज ( भैगरा-एक बूटी का नाम )-मोहे का बुरादा-त्रिफला- विजीरा-नील-करवीर-इन समस्त वस्तुप्रो के समान है। गुड डाले और शा करके फिर लेप करे तो जो केश पलित मर्थात् श्वेत होगये हैं वे पुनः काले हो जाया करते हैं। पति के मिटाने की यह महोपधि है ॥८॥ मानास्पि--. भान की मना-लिफना ( हरं-बहेडा-मावला ) नीलीभृङ्गराज इन सबको जीणं करे (पकाचे) भोर उममे लोहे का चुरादा पाजो डाले तो लेप करने पर केशो को कृष्ण ( काला ) करता है ॥ ६ ॥ चक्रमर्दक के बीज-कुष्ट-एरएड (परडुमा-एक वृक्ष का नाम) की जह-इन सबको कानो के साथ पीसकर गर्म करे और फिर लेप करे तो मस्तक के सम्पूर्ण रोगों का हरए होता है ॥१०॥ संधव (संश नमक)-च-होग-कुछ-नागेश्वर-शत पुप्पा-देवदाह इन सबको समान माग में लेकर तैम में पाक करे मोर तल को साधित कर पान कर तयार परे । इससे भी सिर की समस्त पीहाएं दीण होती हैं। इस तेल को गोवर के चतुर्भाग रस से युक्त पर शन मे इ.ले तो का ददं नष्ट हो जाता है ॥११॥१२।। मेप का मूत्र और संन्धय इन दोनो जो मिलाकर है शिव ! कान में हासने से कानों की दुगन्ध रा नाश होता है और कान में कोई गृमि हो या ४४ ] [ गरुडपुराण कान से साव होता हो अर्थात् कान वहता हो तो वह भी नष्ट होजाता है ।१३। मालती लता के पुप्प मोर उसके दलो का रस के डालने से अथवा गो-मूत्र के डालने से भी पूय का स्राव नष्ट हो जाता है ।। १४ ॥ कुष्ट-माप और मिर्च- तगार--मधु तथा पीपल-अपामार्ग (प्रौधा [-एक बूटी का नाम)-प्रश्वगन्धा बृहती और सफेद सरसौ-यव ( जो )-तिल और संन्धव इनका उद्वर्तन (उवटना) बनाकर लगावे तो यह बहुत ही अच्छा होता है । इससे-वाहु के स्तम्भ का नाश होता है और कणों की वृद्धि करने वाला होता है ।।१५।१६।। १०१ -विविधौपधि (२) शोभाजनपत्ररसं मधुयुक्त हि चक्षुपोः । भरणाद्रोगहरण भवेन्नास्त्यत्र सशयः ॥१ अशीतितिलपुष्पाणि जात्याश्च कुसुमानि च । उपनिम्बामलाशुएठीपिप्पलीतण्डुलीयकम् ।।२ छायाशुष्का वटी कुर्यात् पिष्ट्वा तण्डुलवारिला । मधुना सह सा चाक्ष्णोरञ्जनात्तिमिरादिनुत् ॥३ विभीतकास्थिमजा तु शङ्खनाभिर्मन.शिलाः । निम्बपत्रमरोचानि अजामूत्रेण पेपयेत् ॥ पुष्य राश्यन्धता हन्ति तिमिर पटल तथा ॥४ चतुर्भागानि शसस्य तदद्धन मन शिला। सैन्धवञ्च तदद्धन एतत् पिष्ट्वोदकेन तु ॥५ छायाशुष्का तु वटिका कृत्वा नयनमञ्जयेत् । तिमिरं पटल हन्ति पिञ्जटस्य महौषधम् ॥६ त्रिकटु त्रिफला चैव करञ्जस्य फलानि च । .सैन्धवं रजनी द्वे च भृगराजररोन हि ॥ पिष्ट्वा तदअनादेव तिमिरादिविनाशनम् ॥७ यो हरि ने कहा-शोभाजन (सहजन-एक वृक्ष का नाम) के पल पा रस मधु के गाय मिधित करके नेत्रो में डाले तो नेत्रों के रोगो का हरण हो जाता है-इसमें तनिक भी समय नहीं है ॥१॥ मशीति तिल के पुष्प विविधोपधि (२) ] के जल जाती के पुष्प-उपनिम्ब-पावला-मीठ-पिप्पली-तण्डुलीयक-इन सबको पीस कर वटी बनाये और उन्हें छाया मे ही सुखा लेवे । तात्पर्य यह है कि चावलो के साथ इनको पीसे। चावलो के पानी से तात्पर्य चावल भिगोकर मसल कर उस पानी के साथ घर्षण कर वटी निमित करे । इस वटी को घिस. फर शहद के साथ माखो मे प्रजन लगावे तो पाखो में जो तिमिरान्धता होती है वह नष्ट हो जाती है ।।२।३।। विभी तक की अस्थि और उसकी मजा-शक्ष नाभि-मैनशिल-नीम के पत्ते कालीमिर्च इन सबको बकरी के मूत्र के साथ पेषण करे फिर इसका अञ्जन करे तो रात्र्यन्धता (रतौध) का हनन होजाता है तथा आँखो के सामने जो अंधेरा-सा छा जाता है उसका नाश हो जाता है ॥४॥ चार भाग शद्ध के पोर इसमें बाधा भाग मैनशिल तथा मैनशिल का माधा भाग सैन्धव इन तीनो को जल के साथ पीसकर वटी बना लेवे और उन्हे छाया में शुष्क कर लेवे फिर उस वटी का नेत्रो मे प्रजन करे तो तिमिर के पटल का क्षय हो जाता है । यह पिञ्जटक की महान उत्तम औषध है ।।५।। ॥६॥ त्रिकुटा (सौंठ-मिर्च-पीपल)-अथवा त्रिकुट त्रिफला पौर करज के फल सैन्धव और दोनो हल्दी इनको भंगरा के रस से पीस लेवे फिर भजन करे तो तिमिर आदि का नाश हो जाता है ॥७॥ अटरूपकमूल तु काञ्जिकापिष्टमेव तु । तेनापोभू रिलेपाच चक्षु शूल विनश्यति ।।८ शतद्रुवदरीमूलं पीतमक्षिव्यथा हरेत् । सैन्धव कटुतैलञ्च अपामार्गस्य मूलकम् क्षीरका जिकसघृष्ट ताम्रपाने तु तेन च । अञ्जनात् पिञ्जटस्यैव नाशो भवति शङ्कर ।। दद्रु सर को ही ठ ठ दद्रु सर ह्री ही ॐ उॐ सर की की ठः ठः पाद्या वशमायान्ति मन्त्रेणानेन चाञ्जनात् ॥१० बिल्वक नीलिकामूल पिष्टमम्यजनेन च । अनेनाजितमात्रेण नश्यन्ति तिमिराणि हि ॥११ पिप्पलीतगरञ्चव हरिद्रामलका वचा। सदिरः पिष्टवर्तिश्च अञ्जनान्नेत्ररोगनुत् ॥१२ . । गडपुराण नीरपूर्णमुसो धौति जलक्षेपेण योऽक्षिणी । प्रभाते नेत्ररोगश्च नित्य सर्वे. प्रमुच्यते ॥१३ शुल्करण्डस्य मूलेन पत्रेणापि प्रसाधितम् । छागदुग्धसेकयुक्ताच्चक्षुपोतिरोगनुत् ।।१४ प्रटरूपक की जड को कामी से पीसकर इससे बहु बार पायो पर लेप करे तो इससे चक्षुमो का मूल न हो जाता है ।।८ । रामदू और पदरी का मूल को पोटकर पीवे तो नेत्रो की व्यथा दूर होती है। संन्यव-वडुवा तेल और अपामार्ग का (पौंगाका) मूल को क्षीर पानी मे तान के पात्र में घर्पण करे और फिर भजन करे तो हे शङ्कर । पिजट का नाश हो जाता है। इस प्रजन के करने में मात्र का उच्चारण करना प्रावक है । मन्त्र-ॐ दद्रु सर ग्रोह्रीं ठ ठ दनु सर ह्रीं ह्रीं ॐ उ ऊ को की ठ"-इस्य दि मत्रों के द्वारा प्रांजने से माद्या वश मे आ जाते हैं ॥६-१०॥f व-नीलिका का मूल को पीस कर अजन करे तो हाके भोजने मात्र से ही तिमिरो का नारा हो जाता है ॥१॥ पिप्पली (पीपर)-नगर-हरिद्रा (दी)-प्रामा -मामलक -(आवना) वच और खदिर इनको पीसकर एक वत्ति (वत्ती) बना लेवे। इसमे प्रजन करने से समस्त नेत्रों के रोग का हनन हो जाता है ॥१२॥ प्रात.काल अति भोर मे उठकर ठण्डे पानी को मुह मे भर लेवे और फिर शीतल जल से नित्य-प्रति नेत्रो को छपके दे देकर घोवे तो वह मनुष्य सभी नेत्रों के रोगों से मुक्त होजाया करता है ।।१३ । शुक्न-प्रएड के मूल पोर पत्र से भी प्रसाधित तथा छाग के दूध से युक्त सेक से नेत्रों में बात दोष से समुत्पन्न रोग का नाश हाता है ॥१४॥ चन्दन सैन्धव वृद्धपलाशश्च हरीतकी पटल कुसुम नीली चकिका हरतेऽञ्जनात् ।। गुञ्जामूल छागमूत्रे घृष्ट तिमिरबन्धनुत् ॥१५ रोप्यताम्रसुवर्णाना हस्तघृष्टशलाकया। घृष्टमुद्वर्सन रुद्र कामलाव्याधिनाशनम् ।।१६ घोपाफलमथाघ्रात पीत कामलनाशनम् । दूर्वा दाडिमपुष्प तु अलक्तत्रहरीतकी ।। नासार्श वातरक्तनुन्नस्या स्वरसेन हि ।।१७ विविधौषधि (२) ] [ ४७ सुपिष्ट जिङ्गिनीमूल तद्रसेन वृपध्वज । नस्यादानाद्विनश्येत नासार्हो नीललोहितः ॥१८ गव्य घृत सर्जरस रुद्र धन्याकसन्धवम् । धुस्तूरक गैरिकञ्च एतै साधितसिक्थकम् ।। सतल प्रणनुत् स्याच स्फुटितोच्चटिताधरे ॥१६ जातीपनञ्च चवित्वा विधृत मुखरोगनुत् । भक्षारणात्केशरचोजस्य दन्ता स्युश्चलिता स्थिरा. ॥२० मुस्तक कुष्ठमेला च याष्टिक मधुवालकम् । धन्याकमेतददनान्मुखदुर्गन्धनुद्धर ।।२१ कपाय बाटुक वापि तिक्तशाकस्य भक्षणात् । तैलयुक्तस्य नित्य स्यान्मुखदुर्गन्धताक्षय ।। दन्तवरणानि सर्वाणि क्षय गच्छन्त्यनेन तु ॥२२ चन्दन-मैन्यव-वृद्ध पलाश-हरीतकी (हर)-पटल कुसुम-नोली इनका प्रशन करने से चक्रिका का हरण होता है । गुजा की जड़ को बकरी के मूध मे घर्षण कर मानने से तिमिर के दम्य का हनन हो जाता है ॥१५॥ ह रुद्र ! चादी-नान और सुवर्ण की शलाका (सलाई) से धर्पण किया उद्वत्तन मामला व्याधि का नाशश है ॥ १६ ॥ घोषा के फल सूचना पर पीना भी पामला रोग को नष्ट विया करता है । दूर्वा (दूभ)-दाडिम पुष्प ( भनार का पूल)-पलक्तक-हरीतको नाक के प्रशं और वात रक्त का नाश करने वाना है। इसके स्वरस स जिङ्गिनी के मूल को भली भांति पोसर अपवा इसके रस रो नस्य लेवे तो इससे नोल सोहित नाद का भरा न हो जाता है ॥१७॥ ॥१८॥ गो या पुत-सज रस-चन्पार-संपव-पुस्तूरब और गरिक (गेरू) इन रायके द्वारा बनाया हुमा विषयक तेल से युक्त पाणका नाशक है जोकि स्पुटित पौर उच्चरित प्रघर में होता है ॥ १६ ॥ जाती ये पत्तो को पवावर मुह मे गुछ समय तक रमसे तो मुस के रोग का नारा होता है । केशर के दोनों के परने से जो दात हिना हो तो ये भी स्थिर हो पाया करते हैं ॥२०॥ मुस्तक सुष्ट-एमा ( इसापी )-माटिल-मधुवातर-पन्याक इनके प्रदन करने से - 1 অনুৰাগ अर्थात् खाने से मुख मे जो दुर्गन्ध माती हो तो उसका नाश हो जाया करता है ।।२१।। कषाय-पटु (कडप) पौर निक्त शाक के भक्षण मे जोकि तैल से युक्त हो तो मुख को दुर्गन्धता का क्षय होता है। इससे सभी प्रकार के दांतो के व्रण भी नष्ट हो जाया करते हैं ॥२२॥ काजिकस्य सतैलस्य गण्डूपकवलस्थितिः । ताम्बूलचूर्ण दग्धस्य मुखस्य व्याधिनुच्छिन ।।२३ परित्यक्तिः श्लेष्मणश्च शुण्ठीचर्वणतो यथा । मातुलुङ्गदलान्येला यष्टीमघु च पिप्पली ।।२४ जातीपत्रमथपाञ्च चूर्ण लीढतथा कृतम् । शेफालिकाजटायाश्च चर्वणं गलशुण्ठिनुत् ॥२५ नासाशिरारक्तवन्निश्येच्छङ्कर जिहिका । रस.शिरोपबीजाना हरिद्रायाश्चतुगुणः ।।२६ तेन पक्वेन भूतेश नस्यं मस्तकरोगनुन् । गलरोगा विनश्यन्ति नस्यमाग्रेश तत्क्षणात् ।।२७ दन्तकीटविनाश. स्याद् गुमामूलस्य चर्वणात् । काकाजवास्नुहीनीलीवपायो मघुयोजितः॥ दन्ताकान्तं दन्तजाश्व कृमीनाशयते शिव ॥२८ घृतं कर्कटपादेन दुग्धमिश्रण साधितम् । तेन चाम्यदिता दन्ताः कुय्यु: कटकटां न हि ।।२६ लिप्त्वा कर्कटपादेन केवलेनाथवा शिव । त्रिसप्ताह वारिपिष्ट्वा ज्योतिष्मत्याः फलानि हि ॥३० शुक्नाभयामजले पाद्दन्तस्याङ्ककलङ्कनुत् । लोध्रकुड कुममन्जिष्ठालोहकालयकानि च ॥३१ यवतण्डुलमेतश्च यष्टीमघुसमन्वितैः । वारिपिष्टवमनलेप: स्त्रीणा शोभनवप्रद ॥३२ हे शिव ! तेल युक्त कक्षा से गण्डूप (कुल्ली) करे और मुह में मर कर क्वम स्थिति परे । दग्ध मुष का व्याधि को तान्यून पा चूर्ण नाश पर विविधौषधि (२) । [ ४६ देता है ॥२३॥ जिस तरह शुण्ठी (सांठ) के चवंग करने से श्लेष्मा की परि. त्यक्ति होती है अर्थात् कफ का विकार नष्ट हो जाता है उसी प्रकार से मातृतुङ्ग (नोवू) के हल-एना-यष्टि-मधु--पीपल और जाती पन इनका चूर्ण चाटा जावे या उसी तरह लेवे तो रोकालि का जरा का नाश होता है और चर्वगा (चवाने) से गल शुष्टी का क्षय होता है ।।२४।२५।। हे शङ्कर ! नासा के शिरा के रक्त के कपण होने से नष्ट कर देता है । जिबिका रस-शिरस के बीज और हरिद्रा का चतुर्गुण भाग हे भूतेश! इससे पक्व कर बनाया हुआ नस्य माथे के रोगो का नाशक होता है । गले के तो सभी रोग नस्य के सूघने मात्र से ही तुरन्त नष्ट हो जाया करते हैं ।।२६।२७।। गुजा (चिरमिटी) को लता के मूल को लेकर चवावे तो दांतों के कोहो का नाश हो जाया करता है । हे शिव ! पाव जघा (एक बूटी का नाम है जोकि क्षुप के रूप मे प्राय: सर्वत्र प्राप्त होती है)-स्नुही (सहुड)-नीलोपा पाय मधु से योजित कारे। इससे दन्ता फ्रान्त मोर दांतो में समुत्पन्न कृमियों का न श हो जाता है ।। 50 ॥ दुग्ध से मिश्रित कर्कट पाद से प्रस्तुत किया हुमा घृत हो इससे अभ्यस्ति दान कटर टाया नही करते हैं ।। २६ ॥ हे शिव ! प्रथवा व कंट पाद से लिप्त करे तो भी उक्त रोग का क्षय होता है। ज्योतिष्मती के फलो को तीन हफ्ते तक जल से घर्पण फरे । इमसे तथा शुक्ल अभया ( हरं ) के मान से या लेप से दांतो के ऊपर जो निशान हो जाते हैं उसके कलङ्क को दूर कर दिया जाता है । लोध- फुङ कुम-मजीठ-लोह-का लेगक-यव-तण्डुल-यष्टी और मघु इन सबको जनसे पोसकर मुख पर लेपन करे तो स्त्रियों के मुख की शोभा बढ़ जाया करती है। यह एक प्रकार या मुख पर लगाने का उबटना है ॥३०॥३१॥३२॥ द्विभाग छागदुग्धेन तैलप्रस्थं तु साधितम् । रक्तचन्दनमञ्जिष्ठालाक्षाणा कर्षकेण वा ।। यष्टोमघुकुङ कुमाभ्यां सप्ताहान्मुसकान्तिकृत् ॥३३ शुण्ठीञ्च पिप्पलीचूर्ण गुहूची कण्टकारिका । एभिन्न फ्यथितं वारि पीतं चाग्नि करोति वै ॥३४ वातमूलसपञ्चय करोति प्रमथेश्वर । करजकटोशोर बृहती फटुरोहिणी ॥३५ ५० ॥ गपुराण गोक्षुरं क्वथितं त्वेभिर्वारि पीतं भ्रमापहम् । दाह पितज्वरं शोप मूच्चि व क्षय नयेत् ॥३६ मध्वाज्यपिप्पलीचूर्ण क्वथित क्षीरसयुतम् । पीस हृद्रोगकासस्य विषमज्वरनुद्भवेत् ॥३७ पवाौषधीना सर्वासा कपाद्ध ग्राहमेव च । वयोऽनुरूपतो ज्ञेयो विशेपो वृपभध्वज ॥३८ दुग्ध पोत तु सयुक्त गोपुरीपरसेन च । विषमज्वरनुत्स्याच्च काकजवारसस्तथा ॥३६ सशुण्ठीक्वथित क्षीर विपमज्वरनुद्भवेत् । यष्टीमधुकमुस्तञ्च सैन्धव वृहतीफलम् ॥४० एतैर्नस्य प्रदानाच्च निद्रा स्यात्पुरुषस्य च । मरीचमधूयुक्ताना नस्यान्निद्रा भवेच्छिव ॥४१ दो भाग खाग का दूप मोर एक प्रस्थ तेल साधित करे अथवा रक्त पन्टन--मीट और लाख एक कपं यष्टी-मधु और फुड तुम के साथ एक समाह प्रयोग करे तो मुस को कान्ति बढती है ॥ ३३॥ सौठ-पोपल का चूर्ण गिलोल-फ्रण्टपारी इनका क्वचित जन प्रर्थाव निर्माण किया हपा काढा पीया जाये तो प्रग्नि की वृद्धि करता है ।। ३४ ॥ हे प्रमथेश्वर! इससे वात मूल का क्षय होता है । करञ्ज-कंट-उशीर (सस)-बृहत्ती-बटु रोहिणी-गोखरू- इन सबका पानी में क्वाथ पकाया जाये और उस काढ़े को पीवे तो भ्रम का अपहरण होता है । यह क्वाथ दाह-पित्त दोष के कुपित होने वाला पित्त ज्वर- शोप और मूछी- इन सबका भी क्षय किया करता है ॥३५॥३६॥ मधु- भाज्य (घृत) और पीपल का चूर्ण इनको क्वाधित करके क्षीर से युक्त पीदे तो इससे हृद्रोग खांसी मोर विषम ज्वर होता है ।। ३७ ॥ समस्त क्वाथ करने की भोपधियो का प्राधा कप ग्रहण करना चाहिए । है वृषभ ध्वज ! विशेष मव- स्था के अनुसार ही जानना चाहिए ।। ३८ ॥ जो पारो से पाने वाला विषम बर होता है उसे निवारण करने के लिये गोमय के रा से सयुक्त कर पीया हुप्रा दून ही पर्याप्त है। यो-मधुक-मुस्त--स-पव-वृहतो फन-इन समस्त विविधौषधि (२) ] वस्तुओं के द्वारा प्रस्तुत किया हुमा नस्य देने से पुरुष को निद्रा हो जाती हैं । है शिव ! कालीमिचं मधु से युक्त करके नस्य देने से निद्रा होती है ।।३६ से ४१॥ मूल तु काकजवाया निद्राकृत्स्याच्छिरःस्थितम् । सिद्धल काजिकेन तथा सर्जरसेन च ।।४२ शतोदकसमायुक्त लेपात्सन्तापनाशनम् । शोणितज्वरदाहेभ्यो जातसन्तापनुत्तथा ॥४३ शैलिशवालाग्निमन्थः शुण्ठीपापाणभेदकम् । शोभाजन गोक्षुर वा वरुणच्छन्नमेव च ॥४४ शोभाजनस्य मूलञ्च एतैः क्वथितवारि च । दत्त्वा हि गुयवक्षारं पित्तवातविनाशनम् ॥४५ पिप्पली पिप्पलीमूलं तथा भल्लातकं शिव । वार्यतः क्वथितं पीतं शूलापस्मारनुद्भवेत् ।।४६ अश्वगन्धामूलकाम्या सिद्धा बल्मीकमृत्तिका। एतया मर्दनाद्र द्र ऊरुस्तम्भ प्रशाम्यति ॥४७ वृहतीकस्य वै मूलं संपिष्टमुदकैन च । पीत सङ्घातवातस्य विपाटनकृदेव च ॥४८ पीत तक्रेण मूलञ्च पास्य तगरस्य च । हरेत झिलिनीवात वृक्षमिन्द्राशनियंथा ॥४६ अस्थिसंहारमेकेन भक्तेन सह खादितम् । पीत मांसरसेनापि वातनुच्चास्थिभगनुत् ॥५० काक जपा के मूल से भी निद्रा होती है। इससे सिद्ध किया हुमा तल घिर मे लगावे जो कि काम्जिक तथा सर्जक रस से शतोदक से ममायुक्त हो। इसके लेप से सन्ताप का नाश होता है । शोणित (रक्त) ज्वर पोर दाह से जो सन्ताप उत्पन्न होता है उसका नोदन करने वाला है ॥४२॥४३॥ दोली-शैवाल- मग्निमन्य-शुष्टि-पापाण भेदक-शोभाजन-गोखरू अपवा धरणाच्दन और पोमार का मूल इन राबका बल के साथ क्वाथ करे मोर देवे। हाँग पौर स्वाक्षार से पित्त और वात का विशेष रूप से नाश होता है ।४॥४५॥ है शिव !
५४ ] । धी गरुडपुराण कटिबद्ध निम्बूलमक्षिशुलहरं भवेत् । शणमूल सताम्बूल दग्वमिन्द्रियकल्पहृत् । ६३ अन्नस्विनहरिद्रा च श्वेतसर्पपमूलकम् । बीजानि मातुलुङ्गम्य एपामुद्वनि समम् ॥ सप्तरात्रप्रयोगेण शुभदेहकर भवेत् ।।६४ श्वेतापराजितापत्र निम्बपत्ररसेन तु । नस्यदानाड्डाकिनीना पितृणा ब्रह्मरक्षसाम् ॥ मोक्षः स्यान्मधुसारेण नस्याच्च वृषभध्वज ॥६५ ग्राम के वृक्ष की जड के रस से ही शस्त्र के द्वारा होने घाला घाव भर जाया करता है । शस्त्र का पात ढोक्मान होता है और घृत से पूरित होता हुआ वह व्रण रहित हो जाया करता है ॥ ५८ ।। शरपु खा ( लोक भाषा मे सरपोका )-लजालुका (लजबन्ती-छुई मुही)-पाठा (ग्वारपाठा) इनकी जडी को जन के साथ घोटकर शस्त्र से होने वाले घाव पर प्रलेप करे तो वह प्रश- मित हो जाया करता है ॥५६॥ काक जघा की जड से तीन रात्रि में ही शस्त्र घात का घाव शोपित हो जाया करता है और रोहित व्रण मे पकाव आदि की वेदना का नाश कर दिया करती है ॥६०॥ जल के सहित तिल का तैल-अपा- मार्ग (प्रौंधा) की जह इनके द्वारा दिये हुए सेक से प्रहार से उत्पन्न होने वाली बेदना का नाश हो जाता है ॥६१॥ प्रभया (हरी तकी)-संन्धव (संघा नमक) शुण्डी (सो)-इनको जल के साथ पीस डाले और सेवन करे तो हे शङ्कर ! मजोरणं का नाश होता है । अर्थात् भक्षित पदार्थ जो जीर्ण नही हो कर अपच करता है वह मिट जाया करती है ।। ६२ ।। नीम को जड को कमर में बांध लेने से माखो की शूल को पीडा का हरण हो जाता है । सन को जड ताम्वूल के सहित दग्ध दिया हुप्रा इन्द्रिय कल्प का हरण करता है ॥६३।। अन्न स्विप्न और हरिद्रा-श्वेत सर्पप (सफेद सरसों) का मूल-मातुलुङ्ग (मोवू) के बीज इन सबके समान भाग का उद्वर्तन (उबटना) वनावे । इस उद्वतन वा सात रात्रि तक प्रयोग करे तो यह देह को शुभ करने वाला होता है ।। ६४ ।। श्वेत अपराजिता के पत्तों का नीम के पत्तो के रम के साथ नस्य प्रस्तुन कर देवे तो विविधौषधि (२) ] [ ५५ बाबिनियो का—पितरो का पोर ब्रह्म राक्षसो का मोक्ष (छुटकारा) हो जाता है । मधुसार के द्वारा नस्य से भी हे वृषभध्वज ! उपर्युक्त वाघापो से मुक्ति हो जाती है ।॥६५॥ मूल श्वेतज्जयन्त्याश्च पुष्यक्ष तु समाहृतम् । श्व तापराजितार्कस्य चित्रकस्य च मलम् ॥ कृत्वा तु वटिकां नारी तिलकेन वशीभवेत् ॥६६ पिप्पलीलोहचूर्णन्तु शुण्ठीश्चामलकानि च । समानि रुद्र जानीयात्सन्धव मधुशर्करा ॥६७ उदुम्बरप्रमाणेन सप्ताहभक्षणात्समम् । पुमांश्च बलवान्स स्यात्जीवेद्वर्षशतद्वयम् ।। ॐ ठ ठ ठ इति सर्ववश्यप्रयोगपु प्रयुक्तः सर्वकामकृत् ॥६८ सगृह्य वृक्षात्काकस्य निलय प्रदहेच्च तत् । चिताग्नी भस्म तच्छनोर्दत्तं शिरसि शङ्कर ॥६६ तमुच्चाटयते रुद्र शृणु तद्योगमुत्तमम् । निक्षिप्तश्च पुरीप व वनमूपिकचर्मणि ॥७० कटितन्तुनिवद्ध वै कुन्मिलनिरोधनम् । कृष्णकाकस्य रक्त न यस्य नाम प्रलिख्यते ॥७१ मध्येमध्ये च्युतदले ततो निक्षिप्यते हर । स साद्यते काकवृन्दनारी पुरुप एव च ।।७२ पुष्य नक्षत्र में श्वेत जय ती का मूल लावे-इसी प्रकार से श्वेत मप- राजिता-पर्क और चित्रक या मूल लावे इन सबको जही को पीस कर वटी बना लेवे और उस वटी से अपने मस्तक पर तिलक लगावे तो उस पुरुष को देखकर ही नारी वशीभूत हो जाती है ॥६६॥ पीपल लोह चूर्ण-पावला मोठ ये सब समभाग है रुद्र ! जानने चाहिए संन्यव-मधु पोर शर्करा इनके साथ गूलर के समान गोली बना कर बरावर एक सप्ताह तक भतारण करने से यह पुरप बहुत ही बलवान हो जाता है और दो सौ वर्ष तक जीवित रहता है। "* 3 " इस मन्त्र का समस्त यश्य के प्रयोगों में प्रमयोग करने से सम्पूर्ण
[ श्री गरुडपुराण
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काम वाला होता है ॥६७।६८।। वृक्ष से काक का घोंसला अर्थात् रहने का
स्थान सग्रहीत करके उसे जला देवे । चिताग्नि मे जो भस्म हो उसे हे शहर
शत्रु के गिर में डाल देवे तो हे रुद्र ! उसका वह उच्चाटन कर देता है। भव
उत्तम योग का श्रवण को। पनले चूहे के धर्म मे निक्षिप्त पुरीप को कमर मे
सन्तु से निबद्ध कर देने से मल का निरोध हो जाता है । काने कौए के रक्त से
जिसका नाम लिखा जाता है। हे हर ! मध्य-मध्य मे च्युत दल में इसके
पश्चात् निक्षिप्त किया जाता है वह काक वृन्दों के द्वारा नारी हो या पुरुप खाया
जाता है ॥६६ से ७२।।
शर्करामध्वजाक्षीरं तिलगोक्षुरकं रामम् ।
स शत्रु नाशयेद्द उच्चाटितमिद हर ।।७३
उलूककृष्णकाकस्य विल्वस्याथ समिन्छनम् ।
रुधिरेण समायुक्त ययोर्नाम्ना तु हूयते ॥
तयोर्मध्ये महावरं भवेन्नास्त्यत्र संशयः ।।७४
भावित ऋक्षदुग्धेन मत्स्यस्य रोहितस्य च ।
मास तत्साधित तैलं तदभ्यङ्गाच्च रोगनुत् ।।
चन्दनोदकनस्यात्त रोमोत्थान भवेत्पुनः ।।७५
हस्ते लाङ्गलिकाकन्द गृहीतं तेन लेपितम् ।
शरीरं येन स गुमान्वृद्धदपं व्यपोहति ॥७६
मयूररुधिरेगव जीव सहरसे शिव ।
ज्वलतान्तु भुजङ्गानां बिलस्थानामपीश्वर ७७
देहश्चिताग्नौ दग्धश्न सर्पस्याजगरस्य हि ।
तद् भस्म समुखे क्षिप्त शत्रूणा भङ्गकृद् भवेत् ।७८
शकरा--मधु-वकरी का क्षीर--तिल-गोखरू ये सव समान भाग मे
हों। हे रुद्र ! यह उच्चाटन उस शत्रु का नाश करता है ॥७३|| उलूक-कृष्ण
काम के रस से सयुत विल्व की सो सामिधा जिनके नाम, मे, दान, को, चारी
उन दोनों के बीच में महान वैर हो जाया करता है इसमें कुछ भी समय
नहीं है ।।७४।। मरस्य रोहित का मास ऋक्ष वे दुग्ध से भावित : रे और उससे
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विविधोपधि (२) ] फिर तैन को साधित करे तथा उस तेल से अपड्क करे तो रोग का हरण होता है । चन्दनोदक के नस्य से पुन: रोमो का उत्थान हो जाता है ।। ७५ ॥ हाथ मे लागलिना के कन्द को ग्रहण कर के उस से शरीर को लेरित करे तो वह पुरुप वृद्धि के दर्प को नष्ट कर देता है ।। ७६ ॥ हे शिव ! हे ईश्वर ! दिलो मे स्थित भी भुजङ्गो के जीव को मयूर के रुधिर से ही सहरण करता है 11७७॥ सपं या अजगर का शरीर चिता की अग्नि में जलाया हुआ हो और उसका भस्म शत्रु के सामने डाल देने से उनके भङ्ग करने वाला होता है ॥ ७८ ॥ मन्नणानेन तक्षिप्त महाभङ्ग करं रिपोः । ॐ ठ ठ ठ चाही हि चाहीहि स्वाहा ।। ॐ उदर पाहिहिं पाहिहि स्वाहा ॥७६ सुदर्शनाया मूल तु पुष्यः च समाहृतम् । निक्षिप्त गृहमध्ये तु भुजङ्गा वर्जयन्ति तत् ॥८० अमूलेन रविणा अर्काग्निज्वलिता शिव । युक्ता मिद्धार्थतेलेन वत्तिर्माईहिनाशिनी ॥८१ मार्जारपलल विष्ठा हरितालञ्च भावितम् । छागमूत्रण तल्लिप्तो मूपिको मूपिकान्हरेत् ।।८२ मुक्तो हि मन्दिरे रुद्र नात्र कार्या विचारणा ।, त्रिफलार्जुनपुष्पाणि भल्लातकशिरीपकम् ॥१३ लाक्षा सर्जरसश्च व विडङ्गश्च व गुग्गुलः । एतेषू पो मक्षिकाणा मशकाना विनाशनः ।।८४ यदि इस निम्नलिखित मन्त्र के द्वारा यह सिप्त की जावे तो शत्रु के महान भङ्ग के करने वाला होता है। मन्म यह है --" ॐ४४० चा हाहि चाहीहि स्वाहा । ॐ उदर याहिहि स्वाहा १७६।। सुदर्शना का मूल जोकि पुष्य नक्षत्र में लाया गया हो। यदि इस पर के मध्य में निमित कर दे तो उम पर को मुजङ्ग त्याग दिया करते हैं ॥ ८०॥ है शिव ! प्रबं से मून से रवि के द्वारा मग्नि ज्वलित हुई सिटायं तन से युक्त दुई वत्ति मार्ग मे महियों ५८ ] [ श्री गरुडपुराण के नाश करने वाली होती है ।।८१॥ मार्जार का पलल ( मास )-विष्टा और हरि ताल गाय के मूत्र से भावित हो उससे लिप्त होने वाला भूपिक अन्य मूपिको का हरण किया करता है ।।२॥ हे रुद्र । यदि यह मन्दिर में मुक्त हो तो इस विषय में कोई भी विचारणा नहीं करनी चाहिए। त्रिफला-अर्जुन वृक्ष को पुष्प-भलम्रातक (भिलावा) और शिरस-लाक्षा (लाख)-सर्ज का रस-वायविडङ्ग और गूगल-इन समस्त वस्तुप्रो से बनाया हुमा धूप हो तो उसके देने स भक्षिकामो और मशको का विनाश होता है ।।८३॥२४॥ १०२-विविधौपधि (१) हरिताल यवक्षार पनाङ्ग रक्तचन्दनम् । जातिहिंगुलक लाक्षा पक्त्वा दन्तान्प्रलेपयेत् ॥ हरीतकीकपायेण मृष्ट वा दन्ताप्रलेपयेत् । दन्ता स्युलॊहिता पुस श्वेता रुद्र न सशय ॥२ मूलक स्विद्य मन्दाग्नौ रस तस्य प्रपूरयेत् । कम्यो पूरणात्त न कणस्रावो विनश्यति ॥३ अर्कपन गृहीत्वा तु मन्दाग्नी तापयेच्छन । निष्पीड्य पूरयेत्करणो कर्णशूल विनश्यति ।।४ प्रियगुमधुकायष्टिधातक्युत्पलपक्तिभि । मञ्जिष्ठालोध्रलाक्षाभि कपित्थस्वरसेन च ॥ पचेतल तथा स्त्रीणा नश्येत्क्लेदः प्रपूरणात् ॥५ यो हरि भगवान् ने कहा-हरिताल-यवक्षार-पत्राङ्ग-रक्त चन्दन- जाति हिंगुलक-लाक्षा इनको पका कर दांतो पर प्रलेप करे ॥ १॥ हरीतकी के पाय से दांतो को मांजवर प्रलेप करना चाहिए । हे रुद्र । लोहित भी दांत पुरुप के एकदम श्वेत हो जाया करते हैं-इसमे कुछ भी सदेह नहीं है ॥२॥ मन्द अग्नि में मूलक का स्वेदन पर उसके रस को कानों में डाल देने मे पानी का बहना नष्ट हो जाया करता है ॥ ३ ॥ थाक के पत्ते लाकर मन्द अग्नि में धीरे-धीरे उनको रुपावे मोर फिर निष्पीडन फर वानी में डाल देवे तो कान का दर्द वविधौषधि (१) ] [ ५६ वैनष्ट हो जाया करता है ।। ४ ।। प्रियंगु-मधुका-यष्टी-धातकी-उत्पल पङ्कि- जीठ-लोध-लाक्षा और वरिस्थ के स्वरस से तेल का पाक करे । इसके पूरण करने से स्त्रियो के क्लेद का नाश होता है ॥५॥ शुप्कमूलक शुण्ठीनां क्षारो हिंगु महौषधम् । शतपप्पा वचा कुष्ठ दारुशिग्र रसायनम् । ६ सौवर्चलं यवक्षार तथा सर्जकसंन्धवम् । तथा प्रन्थि विड़ मुस्त मधुयुक्त चतुर्गुणम् ॥ मातुलुङ्गरसस्तद्वत्कदल्याच रसो हि तैः । पक्वल हरेदाशु सावादीश्व न संशयः ॥ कर्णयोः कृमिनाशः स्यात्कटुतैलस्य पूरणात् । हरिद्रा निम्बपनारिण पिप्पल्यो मरीचानि च ॥ विडङ्गभद्र मुस्तञ्च सप्तमं विश्वभेषजम् । गोमूत्रेण च पिष्ट व कृत्वा च वटिका हर ।। अजीर्णहृद्भवेच्चैक द्वयं विसूचिकापहम् ।।१० पटोल मधुना हन्ति गोमूत्रण तथाg दम् । एपा च शाङ्करी वत्ति: सर्वनेग्रामयापहा ॥११ शुष्क मूलक शुण्डी का क्षार-हिंगु-महोपघ-शत पुष्पा-चम-कुछ- दार शिम रसायन-मोवल-यवक्षार--मर्जक संन्यव-प्रन्थि-विड-~-मुस्त मोर मधु से युक्त चोगुना मातुलुङ्ग (नीवू) का रस तथा इसी की भांति कदली का रस से तेल का पाक करे । यह तेल स्राव मादि का बहुत ही शीघ्र हरण किया करता है-इसमें तनिक भी सराय की बात नहीं है ॥ ६ ॥७॥5॥ऐ तेल के पूरण करने से कानों के कृमियों का नाश होता है । हल्दी-नीम के पत्ते- पीपल और मिचं कालो-दिड ममद-मुस्त तथा गतम विश्व भेपज इन समस्त रतुपो को गोमूत्र से पीस कर हे हर ! वटिकाभी का निर्माण करे। एक के सेवन से अजीरण का हरण होता है और दो के सेवन करने से विमूचिता (A) मपहरण हो जाता है ।।१०॥मए. ये साप पटोल तथा गोमूत्र - । श्री गरुडपुराण के साथ अबुंद का हनन होता है । यह शादरी वत्ति ( वत्ती ) है जो सम्पूर्ण नेत्रो के भय का अपहरण करने वाली कही जाती है ॥११॥ १०३-विविधौपधि (२) वना मासी च विल्वञ्च तगर पद्मकेशरम् । नागपुष्प प्रियगुञ्च समभागानि चूर्णयेत् ।। अनेन धूपितो मर्त्य कामवद्विचरेन्महीम् ।।१ कर्पूर देवदारुञ्च मधुना सह योजयेत् । लिङ्गलेपाच्च तेनेय वशीकुर्य्यात्स्निय किल ॥२ मैथुन परुषो गच्छेद्गृह्णीयात्स्वकमिन्द्रियम् । वामहस्तेन वामञ्च हस्त यस्या स्निया लिहेत् ॥ आलिप्ता स्त्री वश याति नान्य पुरुषमिच्छति ॥३ ॐ रक्तचामुण्डे अमुक मे वशमानय प्रानय । ॐ ह्री ह्रौ ह फट् । इम जपत्वाऽयुत मन्त्र तिलकेन च शङ्कर । गोरोचनासयुतेन स्वरक्तन वशी भवेत् ।।४ सैन्धव कृष्णलवरण सौवीर मत्स्यपित्तकम् । मधुसपि सितायुक्त स्त्रीणा तद्भगलेपनम् ॥५ य पुमान्मैथुन गच्छन्नान्या नारी गमिष्यति । शङ्खपुष्पी वचा मासी सोमराजी च फल्गुकम् ॥६ माहिप नवनीतञ्च गुटीकरणमृत्तमम् । सनलानि च पक्षारिण क्षीरेणाज्येन पेपयेत् ।।७ गुटिका शोधिता कृत्वा नारीयोन्या प्रवेशयेत् । दशवार प्रसूतापि पुन कन्या भविष्यति ।। श्रीहरि ने कहा--जटामासी-वच-बिल्व-तगर-पद्म केशर-नाग पुष्प-प्रियगु इन सबको समान भाग मे लेकर चूर्ण बना डाले। फिर इस की 'पूर, देते. रे, मना, बामदेव ही. भारि. विचारा. भूमि पर लिया करता है ॥ १॥ पपूर पोर देवदार को शहर के साथ योजित करके जनमेन्द्रिय पर प्रलेप करने रो स्त्री-प्रसङ्ग में स्त्री को वशीकृत कर लेता है ।।२।। जब पुरुष मैथुन क्रिया विविधौपधि (२) ] करे तो अपनी इन्द्रिय को यौये हाथ से ग्रहण करे और पाये हाथ को जिस भी स्त्री का चाटे तो वह आलिता स्त्री फिर अन्य पुरुष को नही चाहा करती है ।।३। इस विषय का एक मन्त्र भी नीचे दिया जाता है-'ॐ रक्त चामुण्डे अमुक मे वश मानय मानय । ॐ ह्री ह्रौं ह्रः फट्" यह मन्त्र है। इस मन्त्र का दशहजार जाप करे । हे शहर ! गोरोपन से संयुक्त अपने रक्त से तिलक मे वशी होता है ॥४॥ संन्धव-कृष्णलवण (काला नमक) सौवीर मछली का पिता-मधु-घृत और मिश्री से युक्त करके स्त्रियो को जनमेन्द्रिय का प्रलेप करे तो उस का ऐसा प्रभाव होता है कि जो पुरुष उसका गमन करेगा फिर किसी भी अन्य स्त्री को कभी इच्छा हो नहीं करेगा । शङ्ख पुष्पी (एक प्रसर बूटी का नाम है जिसे शहाहुली कहते हैं )-चच-जटामासी-सोम राजी- फल्गुक-भैस के दूध का मयखन-इन सबकी गुटिका बना लेवे । रानाल पमी को क्षीर और घृत से पेपण करे। इस तरह से शोधित गुटिका बना कर नारी की योनि में प्रविष्ट कर देचे । दश वार प्रसूता भी हो फिर भी पन्या ही होगी सर्पपाश्व वचा चैव मदनस्य फलानि च । मार्जारविष्ठाधुस्तूर स्त्रीकेशेन समन्वितः १६ चातुर्यकहरो धूपो डाकिनीज्वरनाशक'। अर्जुनस्य च पुष्पाणि भल्लातकविडङ्गके ॥१० बाला चैव सर्जरस सौवीरसर्पपास्तथा। सर्पयूकामक्षिकारणा धूमो मशकनाशनः ।।११ भूलतायाश्च चूर्णेन स्तम्भ स्याद्योनिपूरणात् । तेन लेपनतो योनौ भगस्तम्भस्तु जायते ॥१२ सर्व पर (सरसो)-पच-मदन के फल-मार्जार (घल्ली) फी विष्ठा- घुस्तूर और नारी के केश इन सब वस्तुप्रो को धूप लगा देने से चौथे दिन आने वाला चौथया ज्वर शान्त हो जाया करता है और इस धूप से डाकिनी ज्वर का भी प्रशमन हो जाता है । अणुन नाम वाले वृक्ष के पुष्प-भल्लातक (मिलावा)-चाय विडङ्ग-बालाजं रस-सौवोर--रापंय इनका धूम सर्प [ श्री गरुड पुराण यूका (भा), मक्सिया का और मदाकर (गछर) का नाश कर देने वाल होता है ॥॥१०॥११॥ भूलता के चूर्ण से पूरण कर देने पर अर्थात् भर द से योनि मे स्तम्भता हो जाया करती है। इसका लेप कर देने स भी भगस्तम्भ होता है ॥१२॥ ताम्ब्लञ्च घृत क्षौद्र लवण ताम्रभाजने । तथा पय समायुक्त चक्षु शूलहर परम् ।।१३ हरीतको वचा कुष्ठ व्याप हिन मन शिला । कासे श्वासे च हिककाया लिह्यात्क्षौद्र घृनप्लुतम् ॥१४ पिप्पलीनिफलाचूर्ण मधुना लेहयेनर । नश्यते पीनस पास श्वासश्च बलवत्तर ॥१५ समूलचित्रक भस्म पिप्पलीचूर्णक लिहेत् । श्वास काशश्च हिकाश्च मधुमिश्र वृपध्वज ॥१६ नीलोत्पल शकरा च मधुक पद्मक समम् । तण्डुलोदकसमिश्र प्रशमेद्रक्तविक्रिया ॥१७ भगवान् श्री हरि ने कहा-ताम्बूल (पान), घृत, क्षौद्र (शहत), लवण तथा पत्र मे समन्वित ताम्र के पात्र मे रखे तो यह प्रयोग नेत्रो क शूल को दूर करने के लिये परमोत्तम पौषधि है ॥१३॥ हरीतकी (हर), वचा (वच), कुष, व्योप, हिङ्ग (होग), मन शिला (मैनमिल) इन सब वस्तुओ को शहत् और घृत मे प्लुन करके चाटे तो यह कास (खांसी), श्वास (दमा) पोर हिका (हिचकी माता) में बहुत लाभदायक होता है ॥१४॥ पोपल, त्रिफला ( हर- बहेडा-आँवला) का नूर्ण इनको मनुष्य यदि शहद के साथ चाटे तो उसको पोनम का रोग (पीनस वह रोग है जिसम नाक मे कृमि होकर एक प्रकार की मह न दुगधि उसम उत्पन्न कर दिया करते हैं जो पास मे स्थित मादमी को असह्य हो जाया करती है ), कास (साँसी) पौर श्वास चाहे ये रोग कितने ही मधिक बलवान क्यों न हों, शीघ्र नष्ट हो जाया फ ते हैं ।।१५।। जड के सहित चित्रक की भाम और. पीपल का चूण च टने मे हे वृषभध्वज शहद रो मिश्रित करके इससे चाटा जावे तो इससे श्वास, खांसी और हिचरियो के पाने वाले रोग में आशातीत लाम हो जाता है ॥१६॥ नीलोत्पल, शकर, मधुक पौर विविधोपधि (२) ] पना ये चारो वस्तुएं समान भाग मे लेकर सबको एकरस कूट-पीस कर रख लेये और फिर चावलों को मशल कर धोये हुए जल के साथ सेवन करे तो रक्त की विक्रिया का शमन हो जाता है ।।१७। शुण्ठी च शर्करा चैव तथा क्षौद्रेण संयुता। कोकिलस्वर एव स्याद् गुण्डिकाभुक्तिमानत ॥१८ हरिताल शहचूर्ण कदलीदलभस्मना । एतद्रव्येण चोद्वत्त्यं लोमशातनमुत्तमम् ॥१६ लवण हरितालञ्च तुम्बिन्याश्च फलानि च । लाक्षारससमायुक्त लोमशातनमुत्तमम् ॥२० सुधा च हरितालञ्च शव भस्म मन.शिला। सैन्धवेन सहैकत्र छागमूत्रेण पेपयेत् । तत्क्षणाद्वर्त्तनादेव लोमशातनमुत्तमम् ॥२१ शव मामलक पत्र धातक्या कुसुमानि च । पिष्ट्वा तत्पयसा सार्द्ध सप्ताह धारयेन्युखे । स्निग्धा श्वेताश्च दन्ताश्च भवन्ति विमलप्रभा ॥२२ सौठ, शर्करा (शक्कर) को शहद के साथ संयुक्त करके खाने से कोकिल के जैसा स्वर हो जाता है और गुरिडका मात्र चाटने से ही स्वर मे माधुर्य पाकर सुन्दरता समुत्पन्न हो जाया करती है। निस्वरता के निवारण करने के लिये इसका सेवन हितकर होता है ॥१८॥ हरिताल, शङ्ख का पूर्ण और पदली (केला) के पत्तो की भस्म इन तीनो का उद्वर्तन बना कर प्रर्थात् उबटन करने से लोमो का शातन बहुत अच्छी रीति से हो जाना है अर्थात् बाल उड जाया फरते हैं ॥१६॥ अन्य लोगो के शामन (नाश) करने का प्रयोग यह है जो कि परम उत्तम है-लवण (नमक), हरिताल, तुम्बिनी के फल इन तीनो चीजों को लाक्षारस से समन्वित करके उपयोग मे लावे तो बालों का शाप्तन होता है। ॥२०॥ तुरन्त ही लोगो का शासन करना हो तो मुधा, हरिसाल, द्ध की भाम मैनसिल इन चारो चोगो को सैन्धव अर्थात संघे नमक साथ मिलाकर बकरी के पेशाब क साय घोटे। जब भली-भांति घुटकर सब वस्तुएं एकररा एवं बारीक हो जावें तो इसका उबटना वहाँ पर लगाने जहाँ के रोमो का शासन ६४ ] [ श्री गरुडपुराण फरना अभीष्ट हो तो उसो क्षण में अर्थात् लगाने के साथ ही लोमो का क्षय हो जाया करता है। यह सर्वोत्तम लोम शातन करने का नुस्खा है ॥२१॥ शह्व, भावले के पत्र, धातको के पुष्प उस जल के साथ पीसकर सात दिन तक मुख में धारण करे तो दांत स्निग्ध, श्वेत और मत्यन्त विमल प्रभा से युक्त हा जाया करते हैं ॥२॥ १०४ शक्तिवर्धक योग शरद्ग्रीमवसन्तेषु प्रायशो दधि गहितम् । हेमन्ते शिशिरे चैव वासू दधि शस्यते ॥१ भुक्ते तु शर्करा पीता नवनीतेन वुद्धिकृत् । गुडस्य तु पुराणस्य पलमेकन्तु भक्षयेत् । स्त्रीसहस्रञ्च गच्छेच्च पुमान्वलयुतो हर ॥२ कुष्ठ सचूर्णित कृत्वा घृतमाक्षिकसयुतम् । भक्षयेत्स्वप्नवेलाया बलोपलितनाशनम् ॥३ अतसीमाषगोधूमचूर्णं कृत्वा तु पिप्पलीम् । घृतेन लेपयेद्गात्रमेभिः साद्ध विचक्षण । कन्दर्पसद्दशो मर्यो नित्य भवति शङ्कर ।।४ यवास्तिलाश्वगन्धा च मुपली सरला गुडम् । एभिश्च रचिता जग्ध्या तरुणो बलवान्भवेत् ।।५ हिङ्ग, सौवर्चल शुण्ठी पीत्वा तु यथितोदक । परिणामाख्यशूलच्च अजीरगञ्चैव नश्यति ॥६ धातकीसोमराजीञ्च क्षीरेण सह पेपयेत् । दुर्बलश्च भवेत्स्थूलो नात्र कार्या विचारणा ॥७ श्री हरि भगवान ने कहा-~शरद, वमन्त पौर ग्रीष्म ऋतुषों में बहुधा दही गहित होता है । दधि का सेवन शिशिर, हेमन्त और वर्षा ऋतुमों मे प्रशस्त माना जाता है ॥१॥ भोजन करने के पश्चात् नवनीत के साथ पी हुई शर्करा बुद्धि की वृद्धि करने वाली होती है । जो ताजा मठ्ठा से मक्वन निकाला जाता है उसे ही नवनीत पहते हैं,। भोजन करने के पीछे एक पल परिमाण का पुराना शक्तिार्द्धक योग ] गुड़ खाना चाहिये। इसके सेवन से पुरुप में अत्यधिक पुंस्त्व हो जाता है । इसके नियम से सेवन करने वाला पुरुष एक सहस्र नारियो के साथ अभिगमन करने का बल प्राप्त कर लिया करता है ।।२।। कुष्ठ को भली-भांति चुरणे करके घृत और शहद के साथ मिश्रित करे और शयन करने के समय में इसका मक्षण किया करे तो बली और पलित का नाश हो जाता है प्रर्यात वृद्धावस्था के कारण जो शरीर के अङ्गो में तथा चेहरे पर झुरियां पड़ जाती हैं और बालो में सफेदी आ जाती है, इन सबका निवारण हो जाया करता है ॥३॥ हे शङ्कर ! प्रतसी (अलसी), माप (उद), गोधुम (गेहूँ) इनका चूर्ण करके अर्थात् इन तीनो का चून और पीपल इन सबको घृत के साथ विचक्ष । पुरुष शरीर पर लेप करे तो शरीर के अङ्गो में सौन्दर्य की छटा पूट निकलती है । निस्य- प्रति इस प्रकार से उपयुक्त लेपन करने से मनुष्य कामदेव के समान हो जाया करता है ॥४॥ यव (गो), तिल, अश्वगन्ध, मुपनी, सरला, गुड इन सबको एकत्रित कर विरचित पद थं को खाने से मनुष्य तरुण एव बलशाली हो जाया करता है ॥शा हींग, सौवर्चल, मोठ इनका क्वाथ (काढा) करके पीने से परि- णाम नाम वाला जो शून होता है वह और भोजन का परिपाक न होने से प्रजीणं ये दोनो ही नष्ट हो जाते हैं। भोजन के करने के कुछ ही पश्चात जैसे ही उसका परिणाम अर्थात् परिपाक होना प्रारम्भ होता है वैसे ही एक प्रकार का शूल ( दर्द ) उदर में होना शुरू हो जाया करता है इसे ही परिणाग शुल कहा जाता है ॥६॥ पातको पोर सोमराजी इन दोनो को क्षीर के साथ पीसे , इसके सेवन से जो बहुत दुर्बल और दुबला-पतला हो वह भी स्थूल अर्थात् मोटा ताजी, 1, हृष्ट-पुष्ट हो जाया करता है-इसमें तनिक भी विचार नहीं करना चाहिए ।।७॥ शर्करामधुसयुक्तं नवनीत बली लिहेत् । क्षीराशी च क्षयी पुष्टि मेधाञ्चैवातुला लभेत् ।। कुलीरचूर्णं सक्षीर पीतञ्च क्षयरोगनुत् । भल्लातकं विडङ्गञ्च यवक्षारश्च संन्धवम् ।। मन.शिलाशङ्खचूर्ण तैलपक्वं तथैव च। लोमानि शातयत्येव नान कार्या विचारणा १० [ गरुडपुगण मालूरस्य रसं गृह्य जलौकां तत्र पेपयेत् । हस्तौ सलेपयेत्तेन अग्निस्तम्भनमुत्तमम् ।।११ शाल्मलीरसमादाय खरमूत्रे निधाय तम् । अग्न्यादौ विक्षिपेत्तेन अग्निस्तम्भनमुत्तमम् ॥१२ वायस्या उदर गृह्य मण्डूकवसया सह । गुटिकां कारयेत्तेन ततोऽग्नौ सक्षिपेत्सुधीः । एवमेतत्प्रयोगेण अग्निस्तम्भनमुत्तमम् ।।१३ मुण्डीतकवचामस्तं मरिच तगर तथा। चर्वित्वा च इमं सद्यो जिया ज्वलन लिहेत् ॥१४ शर्करा और मधु ( शहद ) से समन्वित नवनीत को बली नो चाटना चाहिए । क्षीर का मशन करे अर्थात् दूध का पान करे तो क्षय बाला पुष्टि को प्राप्त किया करता है और केवल पुष्टि ही नहीं, इसके साथ-साथ अतुल मेधा (बुद्धि) का भी लाभ प्रास किया करता है अर्थात् इससे अनुपम बुद्धि भी बढनी है 11 कुलीर का चूर्ण क्षीर के सहित पीवे तो क्षय रोग का नाश होता है । जिराको शारीरिक धातुऐं असमय मे क्षीण होने लगती हैं उस रोग का नाम क्षय रोग है । भल्लातक, वायविडङ्ग, यवक्षार, संन्धव, मनसिल, सह का सूर्ण इन सबको तेल में पक्क करके प्रस्तुत करे । इससे लोमों का लगाने पर निशातन हो जाता है-इसमे कोई भी विचारणा अर्थात् सन्देह नहीं करना चाहिये। तात्पर्य यह है कि यह निश्चित एव सफल प्रयोग है ।।१०॥ मालूर के रस को प्रहण करके उसमे जलौका को पेपण करे अर्थात् पीस हाले, फिर उससे दोनों हाथों का लेपन करे। इसका यह प्रभाव होता है कि अग्नि-स्तम्भ हो जाता है पौर यह उत्तम अग्नि स्तम्म है। अर्थात् फिर अग्नि से भी हाय नहीं जला करते ६॥११॥ शाल्मली का रस लाकर उसे गधे के पेशाब में रख देवे और अग्नि प्रादि में विक्षिप्त कर देवे । इमसे उत्तम अग्नि-स्तम्भ होता है ॥१२॥ घोयमो का उदर लेकर मैठकको घमा के साथ उसकी गुटिका बना लेवे । इसके पश्चात् उससे भग्नि में क्षिप्त कर देवे । सुधी पुरुष के इस प्रकार से करने पर इस प्रयोग से उत्तम पग्नि का स्तम्भन होता है ॥१३॥ भुण्डी तक बच
शक्तिवर्दक योग 1
[ ६७
और मुस्त-मरिच तथा तगर इन सबको लेकर खूब चर्वण करे मोर फिर सुरन्न
ही जीभ से अग्नि का लेहन करे अर्थात् पग्नि को मुह मे रस लेवे ।।१४।।
गोरोचना भृङ्गराज चूर्णीकृत्य घृतं समम् ।
दिव्याम्भसः स्तम्भन स्यान्मन्नेरणानेन ये तथा ।
ॐ अग्निस्तम्भन कुरु कुरु ॥१५
ॐ नमो भगवते जल स्तम्भय स स स केक केक चर चर ।
जलस्तम्भनमन्त्रोऽय जल स्तम्भयते शिव ॥१६
गृध्रास्थिञ्च गवास्थिच तया निर्माल्यमेव च ।
अरेर्यो निखनेद्वारे पञ्चत्वमुपयाति सः ।।१७
पञ्चरक्तानि पुष्पाणि पृथम्जात्या. समालभेत् ।
कुकुमेन समायुक्तमात्मरक्तसमन्वितम् ॥१८
पुष्पेण तु सम पिण्ट्वा रोचनाया पलकत. ।
स्त्रिया पुसा कृतो रुद्र तिलकोऽय वशीकर ।। १९
ब्रह्मदएडी तु पुष्येण भध्ये पाने वशीकर. ।
यष्टीमधुपलेकेन पत्रमुष्णोदक पिवेत् ।।२०
विष्टम्भिकाच हृच्छूल हरत्येव महेश्वर ।
ह. जः मन्त्रोऽय हरते रुद्र सर्पवृश्चिकज विपम् ॥२१
गोरोचन और भृङ्गराज का पूरण करक इसके समान भाग पुन लेथे
तो दिव्य अम्भ प्रर्थात् जल का स्तम्मन होता है । स्तम्भन के लिए निम्नावित
मन्त्र का उच्चारण करना चाहिए । मन्त्र- 'ॐ अग्नि स्तम्भन पुष धुम
सो अग्नि के सम्भन को औषधि के साथ मन्त्र बोलते रहना चाहिए । प्रब जल
पे स्तम्भन का मन्त्र यह है-"मोम् नमो भगवते जत स्तम्भय रा रा रा फेवा
ऐफ चर चर" यह जल के स्तम्भन मन्त्र हे शि! जल का स्तम्मन किया
परता है ॥१५॥१६॥ गृद्ध की अस्थि (हडी) और गो की मस्थि सपा निर्माल्प
को को कोई भपने शत्रु के द्वार पर निfer वरदे प्रति डाल दे तो यह पसस्य
को (मृत्यु) को प्राप्त हो जाता है ॥१७॥ पाच रक्त वर्ग के पुष्प भी विभिन्न
पाच लाल रड के फूल मोर जाती के पण पुण समालभ परे, पुमून गे
समायुक्त बर प्रपने रक्त से समन्वित रे फिर पुप के समान पीसकर रोपना
। श्री शिवपुराण के मलैक से तिलक करे तो हे रुद्र । स्त्री के द्वारा पुरुप और पुरुष के द्वारा स्त्री का यह तिलक वश्य करने वाला होता है ॥ १६॥ ब्रह्मदएडी ( एक बूटी का नाम है ) को पुष्य नक्षत्र में लाफर साने पर या पोने पर वशीकरण करने घाली होती है। यष्टी मधु एक पल पकाकर उष्ण उदक (जल) का पान करे तो विष्टम्भिका हृदय शूल को हे हर ! यह हरण करता है । 'ॐ ह्रज" यह मन्त्र हे रुद्र । सप और बिच्छू के विप का हरण कर देता है ॥२१॥ पिप्पली नवनीतञ्च शृङ्गवेरच सैन्धत्रम् । मरिच दधि कुष्ठञ्च नस्ये पाने विप हरेत् ।।२२ त्रिफलाद्रं ककुष्ठश्च चन्दन घृतसयुतम् । एतत्पलाच्च लेपाच्च विपनाशो भवेच्छिव ॥२३ पारावतस्य चाक्षोणि हरिताल मन शिला । एतद्योगाद्विप हन्ति वैनतेय इवोरगान् ॥२४ सन्धव म्यूपण चूर्ण दधिमध्वाज्यसयुतम् । वृश्चिकस्य विप हन्ति लेपोऽय वृषभध्वज ।।२५ ब्रह्मदण्डी तिलान्क्वाथ्य चूर्ण त्रिकटुक पिबेत् । नाशयेद्र द्र गुल्मानि निरुद्ध रक्तमेव च ॥२६ पीत्वा क्षीर क्षौद्रयुत नाशयेदसृज श्रुतिम् । अटरूपकमूलेन भग नाभिश्व लेपयेत् । सुख प्रसूयते नारी नात्र कार्या विचारणा ॥२७ शर्करा मधुसयुक्ता पीत्वा तण्डुलवारिणा । रक्तातिसारशमन भवतीति वृषध्वज ॥२८ पीपल, नवनीत, ऋगवेर, सन्धव, काली मिर्च, दृषि, कुष्ठ इनको नस्य मैं तथा पान में उपयुक्त करने से विष का हरण होता है ।।२२॥ हे शिव ! त्रिफला ( हरें, बहेडा, भोवला ), मादक अदरख), कुष्ठ, चन्दन को घृत से सयुत करे। इसके लेप और पान से विष का नाश होता है ॥२३॥ पारावत ( कबूतर) को पीले, हरिताल, मन शिला (मनोसल) इन सब वस्तुओं के योग से विप का हनन गरुड के द्वारा सपों की हो जाता है ॥२४॥ से घव ( सेंधा समक), यूपण चूण, दधि, मधु और घृन से सयुत करके हे वृषभधज नारायण-भक्ति कथन 1 इसका प्रलेप बिच्छू के विष को मार दिया करता है ।।२५।। ब्रह्मदण्डी ( एक रूखडी का नाम ) और तिलो का क्वाथ (काढा) करके निकुटका चूर्य के साथ पीवे तो हे रुद्र ! गुल्मो का नाश हो जाता है और निरुद्ध रक्त को भी नष्ट कर देता है ॥२६॥ क्षोद्र (शहद) से युक्त क्षीर पीकर रक्त की युति का नाश किया जाता है। अटरूपक की जड को पीसकर नाभि और भग पर लेप करने से नारी सुख पूर्वक प्रराव किया करती हैं-इसमे कुछ भी विचारणा अर्थात् सशय करने की मावश्यकता नही हैं ॥२७॥ मधु (शहद ) से संयुक्त शर्करा को तण्डलों ( चावलो ) के पानी के साथ पान करने से हे वृषभध्वज ! रक्तातिसार अर्थात खून के दस्तो में शमन हो जाता है ॥२८॥ ॥ १०५--नारायण-भक्ति कथन ॥ मुक्तिहेतुमनाद्यन्तमजमव्ययमक्षयम् । यो नमेत् सर्वलोकस्य नमस्यो जायते नरः ।।१ विष्णुमानन्दमदत विज्ञानं सर्वग प्रभुम् । प्रणमामि सदा भक्तधा चेतसा हृदयालयम् ॥२ योऽन्तस्तिष्ठनशेपस्य पश्यतीश शुभाशुभम् । त सर्वसाक्षिण विष्णु नमस्ये परमेश्वरम् ॥३ शक्ती नापि नमस्कारः प्रयुक्तश्चक्रपाणये । संसारतृणवर्गाणामुढे जनकरो हि सः ॥४ कृष्णे स्फुरज्जलघरोदरचारुकृष्णे लोकाधिकारपुरुपे परमप्रमेये। एको हि भावगुणमामठप्रणामः सद्य श्वपाकमपि साधयितु प्रलय दरवभूमी नमरवारे पोर्चयेत् । स या गतिमवाप्नोति न ता मनुगतरपि ।।६ दुर्गमसारमान्तारकूपारामेऽपि धायताम् । एक. कृपणे ना मारो मुक्तधा तास्तारयिष्यति ॥७ प्रशक्तः ॥५ ७० [ श्री गरुडपुराण सूतजी ने कहा-मुक्ति के कारण स्वरूप-प्रादि एवं अन्त से रहित- मजन्मा--अव्यय अर्थात् नाश शून्य तथा क्षय से रहित प्रभु को जो नमन करता है वह मनुष्य सम्पूरणं लोको का नमन करने के योग्य हो जाया करता है ॥१॥ प्रानन्द स्वरूप द्वत से रहित-विज नमय-सर्वत्र गमन करने वाले परम प्रभु विष्णु को मैं सदा भक्ति भाव पूर्वक हृदय से प्रणाम करता हूँ जो कि मेरे हृदय में ही विराजमान रहने वाले हैं ।।२।। जो अन्तःकरण मे सस्थित होकर सबके शुभ एव शुभ कर्मों को बराबर देखते रहा करते हैं उन सबके साक्षी परमेश्वर भगवान् विष्णु को मैं नमन करता हूं ॥ ३ ।। भगवान् चयापारिंग के लिये प्रयुक्त किया हुआ नमस्कार उनकी सर्वक्षम शक्ति के लिये है। वह प्रभु इम सम्पूर्ण ससार के तृण वर्गो के उद्वेजन करने वाले हैं ॥४॥ उमडते हुए महा मेघ की पटा के मध्य भाग के समान परम सुन्दर कृष्ण वर्ण वाले-समस्त लोको पर पूर्ण प्रभु व रखने वाले पुरुष एव परम प्रया के करने योग्य भगवान् श्री कृष्ण के प्रति भक्ति-भाव पूर्वक किया हुमा केवल एक बार का दृढ प्रणाम श्वपच को भी तुरन्त ही साधित करने के लिये पूर्ण समर्थ होता है ।।५।। भूमि भाग में पडे हुए दण्ड की भौति प्रणाम करके जो भी कोई भगवान् श्रीकृष्ण की अर्चना किया करता है वह जो परमोत्तम गति को प्राप्त किया घरता है, उसे सैक्डो यज्ञ करने वाला भी-कभी प्राप्त नही करता है॥६॥ अत्यन्त दुर्गम इम ससार के गहन धन के कूपा राम में धावन फरने वाले प्राणियो को श्री कृष्ण के प्रति क्यिा हुमा एक ही प्रणाम मुक्ति दान के द्वारा उनको तार देगा।॥ ७॥ पासीनो वा शयानो वा तिष्ठन् वा यत्र तत्र वा। नमो नारायणायेति मन्न कारणो भवेत् ॥ नारायणेति शब्दऽस्ति वागस्ति वशत्तिनी। तथापि नरके मूढाः पतन्तीति किमद्भुतम् ॥ चतुर्मुसो वा यदि कोटिवक्त्रो भवेन्नरः कोपि विशुद्धचेता. । सवै गुणानामयुतैकदेश वदेन वा देववरस्य विष्णो ॥१० व्यासाद्या मुनयः सर्वे स्तुवन्तो मधुसूदनम् । मतिक्षयान्निवर्तन्ते न गोविन्दगुणक्षमात् ॥११ नारायण-भक्ति कपन - [७१ अवशेनापि यन्नाम्नि कत्तिते सर्वपातकः । पुमान् विमुच्यते सद्यः सिंहहस्तेमृगो यथा । बद्धः परिकरस्तेन मोक्षाय गमन प्रति ॥१२ स्वप्नेऽपि नाम स्पृशतोऽपि तुसः क्षयं करोत्यक्षयपापराशिम् । प्रत्यक्षतः किं पुनरत्र पुसा प्रकीत्तिते नाम्नि जनार्दनस्य ॥१३ नमः कृष्णाच्युतानन्तवासुदेवेत्युदीरितम् । यर्भावभावितैविप्र न ते यमपुर ययुः ।।१४ बैठा हुआ हो-शयन करता हुमा हो या स्थित हो जहाँ-कहीं भी किसी भी स्थिति में क्यो न हो जो कोई एक ही बार 'नमो नारायण'-अर्थात् भगवान नारायण के लिये मेरा नमस्कार है-इस मन्त्र द्वारा उनकी शरणा- गति ग्रहण किया करता है उसका कल्याण हो जाता है ॥८नारायए-यह सन्द वाणी को वशवत्तिमी करता है-ऐसा इसका अद्भुत चमत्कार है तो भी मूह जीव नरक में पतित होते हैं--यह कितनी माश्चर्य की बात है ॥ ६॥ चार मुलो वाना हो अथवा एक करोड़ मुखों वाला मनुष्य क्यों न हो-कोई भी विधुत वित्त वाला हो भोर देवो में परम श्रेष्ठ विष्णु से सहस्रो गुणो के एक देश को मुख से उच्चारण करे अथवा न करे ॥१०॥ व्यास भादि समस्त मुनि- गरण मधुसूदन भगवान की स्तुति करते हुए मति के क्षप से निवृत्त हो जाया करते हैं गोविन्द के गुष्ठ क्षम से नहीं होते हैं ॥ ११ ॥ प्रवशता में रहने वाले के द्वारा भी भगवान के कीर्तन करने पर पुरुष समस्त पातको से सिंह के हाथों से मृग को भाति तुरन्त ही विमुक्त हो जाता है तथा मोक्ष के लिये गमन करने के प्रति वद्धपरिकर होता है ।।१२. स्वप्न में भी भगवान के नाम का स्पर्श करने वाले पुरुष के अक्षम पापो के समुदाय का क्षय हो जाता है-ऐसा इस भगवनाम का माहात्म्य है । यदि प्रत्यक्ष रूप से इस लोक में पुरुष के द्वारा भगवान जनार्दन के नाम का कीर्तन करने पर तो जो इसका महत्व है उसका देना ही घमा है ।१३॥ हे विप्र ! हे कृष्ण ! हे अच्युन ! हे अनन्त ! हे वासुदेव ! मापके लिये नमस्कार है-ऐसा भक्ति के भाव से पूर्व भाविन टोकर जो पुरप भगवन्नाम को पहते है ये अभी भी यमपुर को नहीं जाया करते हैं 11१४॥
७२
]
[ श्री गरुडपुराण
क्षयो भवेद्यथा वह्न स्तमसो भास्करोदये ।
तथव कलुपौघस्य नामसकीर्तनाद्धरे ॥१५
का नाकपृष्ठगमन पुनरायाति न क्षयम् ।
गच्छता दूरमध्वान कृष्णमूच्छितचेतसाम् ।।१६
पाथेय पुण्डरीकाक्षनामसकीर्तन हरे ।
ससारसपसदष्टविपचेष्टं कभेपजम्
कृष्णेति वैष्णव नाम जप्त्वा मुक्तो भवेन्नर ।।१७
ध्यायन्कृते जपेन्मन् स्त्रोताया द्वापरेऽर्चयन् ।
यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ सस्मृत्य केशवम् ।।१८
छिह्वाग्नं वर्तते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम् ।
सतारसागर तीत्वा स गच्छेद्वष्णव पदम् ॥१६
विज्ञातदुष्कृतिसहस्रसमावृतोऽपि श्रेय पर तु
परिशुद्धिमभीप्समान ।
स्वप्नान्तरे न हि पुनश्च भव स पश्येन्नारायणस्तुतिकथापरमो
मनुप्य ॥२०
भुवन भास्कर सूर्य के उदय होने पर प्रग्नि की भांति अन्धकार का
क्षय हो जाता है उसी प्रकार से पापो के समूह का क्षय हरि भगवान् के
शुभ
नाम एव गुणो की सकीर्तन से हो जाया करता ॥१५|| स्वर्ग में गमन करना
क्या है जहां पुण्यो के क्षीण हो जाने पर पुन मानव यहां इस लोक मे प्रा
जाया करता है अर्थात् स्वग वास सावधिक ही हुमा करता है चिर स्थायी नहीं
होता है । भगवान श्री कृष्ण के नमोचारण करने से भावावेश मे मूछित चित्त
वाले और दूर मार्ग में जाने वाले भक्तो का कभी क्षय नहीं होता है ।।१६।।
भक्ति माग मे चलने वालो का पाथेय (मार्ग का माहार) पुण्डरीकाक्ष भगवान्
हरि के नामो का सङ्घोत्तंन ही हुमा करता है अर्थात् नाम-सतन के बल
पर ही भक्त लोग भागे बढते चले जाया करते हैं । भगवान के नामो का सङ्की-
तन ससार रूपी सप के दशन के विष की चेष्टा को एक मात्र महायध है।
मनुष्य 'कृष्ण'-इस विष्णु के नाम का जाप करके मुक्त हो जा है ॥ १७ ॥
विष्णा पूजादि कथन ] कृतयुग में ध्यान से-ता मे मन्त्रो के जाप से-द्वापर मे भगवान् के अन से जो भी फल प्राप्त होता था वहीं फल इस पलियुग मे भगवान् केशव के शुभ परम मङ्गलमय नाम के कीर्तन एय स्मरण से होता है ।।१८। जिसकी जिह्वा क अग्रमाग पर 'हरि' '-य भगवान् के दो प्रक्षर विद्यमान रहा करते हैं अर्थात् जो रात दिन 'हरि हरि'---यह रटता रहता है वह इस प्रथाह समार फे सागर को पार कर अन्त में भगवान् विष्णु क गृह अर्थात् लोन की प्राप्ति किया करता है ॥१६॥ सहस्रो विज्ञात दुष्कृत्यों से घिरा हुमा भी पशुद्धि पी इच्छा रखने वान्ना मानव पर श्रेय को भगवन्नाम के प्रभाव से प्राप्त पर लेता है । भगवान् नारायण को स्तुति तथा क्या में महानश परायण रहने घाला मनुष्य स्वप्नान्तर में भी फिर इम ससार को नहीं देखा करता है ॥२०॥ १०६-विष्णु पूजादि कथन यशेषलोकनाथस्य सारमाराधन हरेः । दद्यात्परुपमूक्तेन य पुष्पाण्यप एव च ॥१ अचित स्याज्जगदिद तेन सर्व चराचरम् । यो न पूजयते विगु त विद्याद् ब्रह्मघातकम् ॥२ यत प्रवृत्तिभूताता येन सबमिद ततम् । त यो न ध्यायते विष्णु म विष्ठाया निमिर्भवेत् ॥३ नरके पच्यमानम्तु यमेन परिभाषित । कि त्वया नाचितो देव पेशव बलेगनागन ॥४ उदनाप्यभावेन द्रव्याणामचिन प्रभु । यो ददाति स्वक ताप स त्वया किन चाचित ॥ न तकगतिमा माता न पिता नापि वान्धव । यावर्गति दपोंग गन्तुष्ट पदयाति ॥६ यश्रिमानारयता पुमोरग पर चुमान् । विष्णुगराध्यते पन्या नान्यन्तत्तोपवार [ थी गारपुराण न दानविविधदत्तन पुष्प नुलेपनः । तोपमेति महात्मासो यथा भक्त्या जनार्दनः । सम्पद श्वर्यमाहात्म्यं. सन्तत्या न च कर्मणा । विमुक्तैश्च कता लम्या मूलमाराधनं हरेः ।।६ सूतजी ने कहा-समस्त लोको के स्वामी भगवान् हरि की माराधना करना ही इस समार मे परम सार वस्तु है । जो हरि को पुरप सूक्त मन्त्रो के द्वारा जल तथा पुष्पो को समर्पित करता है वह हरि का परमाराधक पुर है ॥१॥ केवल एक श्री हरि की समर्चना करने से यह सम्पूर्ण चराचर जगत प्रचित हो जाता है । जो पुरुष भगवान् विष्णु का पूजन नहीं किया करता है उसको ब्रह्म घातक ही समझना चाहिए मर्थात् ब्रह्म पाती के तुल्य पाप का भागी होता है ।।२।। जिसमे समस्त भूतो की प्रवृत्ति होती है पौर जिसके द्वार ही इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का विस्तार हुमा करता है उन भगवान् विष्णु के जो ध्यान में नहीं लाना है वह निश्चय ही विष्ठा मे रहने वाला कृमि हुमा करता है ॥३॥ नरक में घोर यातनाएं सहन करते हुए मनुष्य से यमराज के द्वारा पूछ जाता है कि क्या तूने सब क्लेशो के नाश करने वाले देय केशव भगवान के कभी अर्चना नहीं की थी ? ॥४॥ भगवान् वै शव तो इतने कृपालु हैं कि यदि पूजा के अन्य समस्त उपचार द्रव्यो का भी प्रभाव हो तो केवल जल से ही उनकी अर्चना भक्ति के साथ करने से वे इतने सन्तुष्ट एवं प्रसन्न हो जायः करते हैं कि उम प्रचना करने वाले जीव को अपना लोक प्रदान कर देते ऐसे महज दयालु प्रभु की तूने मर्चना क्यो नही को थो ॥५॥ फिर यमराज कहा-अपने गर्भ से उत्पन्न करने वालो वह माता जिस काम को नहीं किया करती है-न पिता ही करता है और न कोई बान्धव करता है उसको परम श्रद्धा के भाव से अक्ति किये हुए हृपो केश प्रभु पूरी सन्तुष्ट होकर मपने भत के परम कल्याण को कर दिया करते हैं ॥६॥ दणों और पाश्रमो के शास्त्रोन भाषाएतले तुरुप सरापामाराध पुरुष भगवान विष्णु ममागाधित ।। जाते हैं । उनको प्राराधना के अतिरिक्त मन्य उनको सन्तुष्ट करने का को भी मार्ग नहीं है ॥७॥ अनेक प्रकार के दानो से जो कि दिय जाया करते हैं- ने विष्णु पाहात्म्य कथन ] षो से और अनुलेपनो से यह महान् प्रात्मा थाले भगवान् तोप को प्राप्त नहीं होते हैं जैसे कि जनार्दन प्रभु भक्ति के द्वारा प्रसन्न एव सन्तुष्ट हुमा करते हैं 11८। विमुक्तो के द्वारा सम्पत्ति-ऐश्वर्य-माहात्म्य-सन्तति पौर कर्म से एकता प्राप्त नहीं की जाती है। इस एकता प्रर्थात् एकरूपता एव भगवत्सरिधि के प्राप्त करन का मूल श्री हरि का पाराधन ही होता है । १०७-विष्णु माहात्म्य कथन पालोक्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुन पुनः । इदमेक सुनिष्पन्न ध्येयो नारायण सदा ॥१ कि तस्य दान कि तीर्थे कि तपोभि किमध्वर । यो नित्य ध्यायते देव नारायणमनन्यधी ॥२ पष्टिस्तीर्थसहस्राणि पष्टिस्तीर्यशतानि च । नारायणप्रणामस्य कला नाहन्ति पोडशीम् ॥३ प्रायश्चित्तान्यशेपाणि तप कर्माणि यानि वै । यानि येपामशेपाणा कृष्णानुस्मरण परम् ॥४ कृतपापेतुरक्तिश्च यस्य पु स प्रजायते । प्रायश्चित्त तु तत्येक हरे सस्मरण परम् ।।५ मुहूर्तमपि यो ध्यायेन्नारायशमतन्द्रित । सोऽपि स्वर्गतिमाप्नोति किं पुनस्तत्परायण ॥६ जाग्रत्स्वप्नसुपुप्त षु योगस्थस्य च योगिन । या काचिन्मनसो वृत्ति सा भवत्यच्युताथा ॥७ श्री सूनजी ने कहा-ममस्त शास्यो वा प्रवलोकन व रके पौर वारम्वार गली-भांति विचार करके यह एक ही सिद्ध न्त निष्पन्न हुप्रा है कि सर्वदा भग- वान् नारायण का ही ध्यान करना चाहिए ॥१॥ जो परम देव भगवान् नारा- यग या पनन्य बुद्धि के द्वारा नित्य ध्यान लिया करता है उससोदानों देन, मीर, " 'महासपस्चर पदो, पता करने ग, पपा प्रगत है अर्थात इन सबक करने की नारायण ने उपायक को काई भी मवश्यकता नही है ।। माठ हजार मोर माठ मी तीयं भी नारायण से रिये हुए एक प्रणाम मी ७६ ] [ यो गरुडपुराण सोलहवी कला के समान नहीं होते हैं। भगवान नारायण के लिये किये प्रणाम का इतना अधिक महत्त्व है ॥३॥ सम्पूर्ण प्रायश्चित्त और समस्त तप- श्चर्या के कर्म-कलाप जो भी हैं ये मब उतना महत्त्व नही रखते हैं जितना श्री कृष्ण नाम के स्मरण का होता है । कृपा' का अनुस्मरण इन सबसे परमाधिक होता है । जिम पुरुष की क्यि हुए पाप मे मनुरक्ति हो जाती है उसका एक ही श्री हरि का सस्मरण परना परमोत्तम प्रायश्चित्त है ॥५॥ जो कोई व्यक्ति तन्द्रा रहित होकर एक मुहून मात्र भी नारायण का ध्यान करता है यह भी स्वर्ग को गमन करता है उसके विषय में तो क्या कहा जावे, जो महनिया नारायण के ध्यान में ही परायण रहा करता है ।।६।। जाप्रत-स्वप्न और सुषुप्ति की अवस्था में प्रोर योग में स्थित योगी की दशा में जो कुछ भी मन को वृत्ति होती है वह मनोवृत्ति भगवान् के ममाश्रय प्राप्त करने वाली हुमा का उत्तिष्ठनिपतन्त्रिप्णु प्रलपन्विविशस्तथा। भजन जाग्रच्च गोविंद माधव यश्च सस्मरेत् !! स्वे स्वे कर्मण्यभिरत कुाच्चित्त जनार्दने । एपा शास्त्रानुसारोक्ति किमन्यै हुभापित ।। ध्यानमेव परो धर्मो ध्यानमेव पर तप । ध्यानमेव पर शौच तस्माद् ध्यानपरो भवेत् ।।१० नास्ति विष्णो पर ध्येय तपो नानशनात्परम् । तस्मात्प्रधानमत्रोक्त वासुदेवस्य चिन्तनम् ॥११ यद् दुर्लभ पर प्राप्य मनसो यन्न गोचरम् । तदप्यप्राथित ध्यातो ददाति मधुसूदन ॥१२ प्रमादात्पूर्वता पृ सा प्रच्यवेताध्वरेपु यत् । स्मरणादेव तद्विष्णो सपूर्ण स्यादिति श्रुति ।।१३ घ्यानेन मदृश नास्ति शोधन पापकर्मणाम् । अागामिदेहहेतूना दाहका योगपावक "१४ उठते हुए तथा विवश होकर बैठते भोजन करते हुए, पडते -- विष्णु माहात्म्य कथन [ ७७ और जागते हुए जो भगवान् हरि के नाम का उधारण करता रहता है तथा गोविन्द माधव का सस्मरण किया करता है। अपने अपने कर्मों में रत रहते हुए जो भगवान् जनार्दन में अपना चित्त लगाता रहता है, यह शास्त्र के मनुसार हो उक्ति है, अन्य बहुत कुछ कथनो से क्या लाभ है ।।८६॥ भगवान् का ध्यान करना ही राव से परम धर्म है और भगवद्-ध्यान ही सबसे बडा तर होता है । ध्यान का करना हो सर्वोत्तम शुचिता है। इसलिये सवंदा भगवान् के ध्यान में ही परायण रहना चाहिए ||१०|| भगवान विष्णु से अधिक अन्य कोई भी ध्येय अर्थात् ध्यान करने के योग्य नही है और मनमन करने से बड़ा अन्य कोई तप रही होता है । प्रतएव प्रधान मन्त्र द्वारा कथित भगवान् वासुदेव का हो चिन्ता होता है ।।११।। जो प्राप्त करना अत्यन्त ही दुर्लभ प्रौर जो मन में भी कभी राने वाला नहीं है उसको भी बिना ही प्रार्थना किये हुए ध्यान मे पाने वाले गिवान् मधुसूदन प्रदान कर दिया करते हैं ॥१२॥ प्रमाद पूर्वफ करने वाले 'रुषों का जो कुछ भी यज्ञो मे छूट जाता है वह सभी विष्णु के स्मरण करने ही सम्पूर्णता को प्रप्त हो जाया करता है-यह श्रुति प्रतिपादन करती है । १३॥ पाप कर्मों के शोधन करने के लिए ध्यान के समान अन्य कोई भी त्तम साधन नहीं है। पाने वाले देह के हेतुप्रो को दाह करने वाला योग हो क पावक होता है ।।१४॥ विनिप्पन्नसमाधिस्तु मुक्तिमय व जन्मनि । प्राप्नोति योगी योगाग्निदग्धकर्मा च योऽचिरात् ।।१५ ययाग्निरुद्यतशिरा पक्ष दहति वानिल । तथा चित्तस्थिते विष्णो यागिना सकिल्बिषम् ॥१६ यथाग्नियोगात्कनकममल सप्रजायते । सप्नुटो वासुदेवैन मनुष्याणा मदा मल । १. गद्गास्नानसहस्रपु पुष्करस्नानकोटिषु । याप पिलय याति स्मृते नश्यति तदरी ॥१८ प्राणायामसहसंस् यत्पाप नश्यति ध्रयम् । क्षणमागेण तसाप हानात्मरणश्यति ।।१६ [ श्री गरुडपुराण कलिप्रभावो दुष्टोक्ति पापण्डाना तथोक्तय । न कामेन्मानस तस्य यस्य चेतसि केशव ॥२० सा तिथिस्तदहोरात स योग स च चन्द्रमा । लग्न तदेव विख्यात यन प्रस्मर्यते हरि ॥२१ विशेष रूप से निष्पन्न समाधि वाला योगी इसी जन्म मे मुक्ति की प्राप्ति कर लिया करता है क्याकि वह योग की अग्नि के द्वारा अपने समस्त कर्मों का शीघ्र ही दाह कर दिया करता है ।।१५।। जिस प्रकार से उठी हुई ज्वाला वाला पानि कक्ष को दग्ध कर दिया करता है उसी भांति विष्णु के चित्त मे स्थित होने पर योगियो के सम्पूण पापो को अनिल दग्य कर दिया करता है ॥१६॥ जिस तरह अग्नि के ताप के सम्पक को प्राप्त करके सुवरण विशुद्ध एव मल रहिन हो जाया करता है उसी तरह से भगवान् वासुदेव के सम्मक होने से मनुष्यो के मन का मल भी सदा सप्लुष्ट हो जाता है ||१७|| जो महापाप सहस्रो वार भागीरथी गगा मे स्नान करने से तया करोडो चार पुष्कर में स्नान करने से क्षीण हुमा करता है वह भगवान् श्री हरि के स्मरण करने मात्र से नष्ट हो जाया करता है ।।१८।। सहस्रा बार प्राणायाम करने से जो पाप का निश्चय रूप से नाश होता है वही पाप एक क्षण मान के श्री हरि के ध्यान करने से नष्ट हो जाया करता है ॥१९॥ इस घोर एव महाम् दारुण कलियुग का प्रभाव दुओं को उक्ति तथा पाखण्डियो को उक्तियां उस पुरुष के हृदय को क्रोमण नहीं किया करती है जिनके हृदय मे भगवान् केशव विद्यमान रहा करते हैं। तात्रयं यह है कि भगवान् के ध्यान करने वाले के हृदय पर कोई भी दूषित प्रभाव नहीं होता है ॥२०॥ वही उत्तम तिथि है-वही श्रेष्ठ प्रहोरात्र है-वह ही अच्छी योग और चन्द्रमा है तथा उत्तम लग्न कही गई है जिसमें श्री हरि का स्मरण दिया जाता है ॥२॥ सा हानिस्तन्महच्छिद्र सा चार्थजडमूकता । मन्मुहूर्त क्षारगो वापि वासुदय न चिन्तते ।।२२ फलो तयुगस्तस्य वलिस्तस्य कृते युगे । हृदय यस्य गोविन्दो यस्य चेतसि नाच्युत ॥२३ विष्णु माहात्म्य कयन ] । यस्याग्रतस्तथा पृष्ठे गच्छनस्तिष्ठतोऽपि वा। गोविन्दे नियत चेतः कृतकृत्य सदैव सः ॥२४ घासुदेवे मनो यस्य जपहोमार्चनादिषु । तस्यान्तरायो मैत्रेय देवेन्द्रत्वादिक फलम् ।।२५ असत्यज्य च गार्हस्थ्य स तप्त्वा च महत्तप.। छिनत्ति पौरुपी माया केशवार्पितमानसः ॥२६ क्षमा कुर्वन्ति क्रुद्ध पु दया मूर्खेषु मानवा. । मुदञ्च धर्मशीलेषु गोविन्दे हृदयस्थिते ॥२७ ध्यायेन्नारायण देवं स्नानदानादिकर्मसु । प्रायश्चित्तषु सर्वेषु दुष्कृतेषु विशेषतः ॥२८ वही सबसे बडी हानि है और वही महान छिद्र है तथा वही अर्थ जामा एव मूकता है, जो घडी और क्षण भगवान् वासुदेव के चिन्तन के विना यो ही नष्ट हो जाया करते हैं। इस मग दुर्लभ मनुष्य जीवन का समय भग- के ध्यान, चिन्तन और स्मरण के बिना नष्ट कर देने के समान महान् हानि पन्य कुछ भी नहीं है ॥२२॥ जिसके हृदय में गोविन्द का ध्यान है और वह विराजमान रहते है उसके लिये इस पलियुग मे भी सतयुग ही होता है और जिसके हृदय में गोविन्द का ध्यान-स्मरण प्रोर चिन्तन नही है उसको कृत- गुग मे भी घोर पलियुग हो रहा करता है ।।२३।। जिमके मागे-पीछे जाते हुए पौर स्थित होते हुए चित्त मे नियन रूप से गोविन्द का ध्यान एव स्मरण रहता है वह पुरुष सदा कृत कृत्य समझना चाहिये ॥२४॥ जप, होम और अर्चन पादि मे जिसवा मन भगवान् घासुदेव में स्थित रहा करता है। हे मंत्रेय ! उसके उस निरन्तर भगवचिन्तन में देवेन्द्र के पदादि के प्राप्ति का फल ही महान विघ्न हुप्रा करता है ॥२शा गृहस्थाश्रम का त्याग न करके महान तप करते हुए पेशव भगवान् मे अपने मन को लगा देने याला पुरुष पौरपी माया का पेस्त कर दिया करता है ॥२६|| भगवान् गोविद जब हृदय में विराजमान रहते हैं तो मनुष कटो पर क्षमा, मूगों पर दया पोर प्रमंसीलो पर प्रसन्नता घान् ८० ] ! श्री गरुडपुराण किया करते हैं ॥२७॥ स्नान प्रादि सब कर्मों में, समस्त प्रायश्चित्तों में पौर विशेष रूप से दुष्कृतों में देववर नारायण का ही ध्यान करना चाहिए ॥२८॥ लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराभवः । येपामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः ।।२६ कोटपक्षिगणानाञ्च हरौ संन्यस्तचेतसाम् । ऊर्धा एव गतिश्चास्ति किं पुन निनां नृणाम् ।।३० वासुदेवतरुच्छाया नातिशीतातितापदा । नरकद्वारशमनी सा किमयं न सेव्यते ॥३१ न च दुर्वाससः शापो राज्यञ्चापि शचीपतेः । हन्तु समर्थ हि ससे हृत्कृते मधुमूदने ॥३२ वदतस्तिष्ठतोऽन्यद्वा स्वेच्छया कर्म कुर्वतः । नापयाति यदा चिन्ता सिद्धा मन्येत घारगाम् ।।३३ ध्येयः सदा सचितृमण्डलमध्यवर्ती नारायणः सरसिजासन- सन्निविष्ट.. केयूरवान्कनककुण्डलवान्किरीटी हारी हिरण्मयवपुधृतशङ्खचक्र। न हि ध्यानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । श्वपनान्नानि भुलानो पापी नैवात्र लिप्यते ॥३४॥३५ जिन पुरुषो के हृदय में इन्दीवर के सदृश श्याम वर्ण वाले भगवान् जनार्दन विराजमान रहते हैं अर्थात् जो जनार्दन प्रभु का निरन्तर चिन्तन एवं स्मरण किया करते हैं उनको सदा लाभ ही होता है और उनकी सर्वदा विजय होती है। उनका पराभव तो कभी होता ही नही है ॥२६॥ जिन कोट और पक्षीगणों ने भी हरि मे अपने चित्त को वृत्ति लगादी है उनकी ऊध्र्व ही गति होती है । जो ज्ञान वाले मनुष्य हैं उनको चित्तवृत्ति हरि में सलग्न हो जाये तो उनके कल्याण के विषय में तो कहना ही क्या है ? ॥३०॥ भगवान वासुदेव के चरण की शरणागति एक तरवर की छाया के समान ही है, जो न अत्यन्त दशात देने वाला है और न प्रीत ताप ही प्रदान करने वाली होती है । वह तो नरको के द्वारोरा शमन करने वाली होती है। ऐसी वासुदेव तह की छाया
विष्णु माहात्म्य कथन ]
[ १
का सेवन क्यो नही किया जाता है ? तात्पर्य यह है कि उसका सेवन अवश्य
हर एक को करना ही चाहिए ।।३१।। भगवान् मधुसूदन को अपने हृदय मे
स्थित कर लेने पर अर्थात् हृदय में उनका चिन्तन-स्मरण करने पर हे मखे !
दुर्वासा मुपि का शाप और शची के पति इन्द्रदेव का राज्य भी हनन करने को
समर्थ नहीं होता है ।।३२।। बोलते हुए, स्थित रहते हुए अथवा स्वैच्छा से पन्य
कोई भी कम करते हुए भी जिम ममय मे भगवान् का चिन्तन हृदय से दूर
नही रहता है उसकी ही सिद्ध धारणा मानना चाहिए ।।३३॥ सूर्य-मण्डल के
मध्य मे स्थित, कमन के भासन पर मन्निविष्ट केयूर धारण करने वाले, सुवर्ण
कुण्डल पहिने हुए नथा किरीट और हार घारे हुए, सुवर्ण महश शरीर वाले
एव शख धौर चना को धारण करने वाले भगवान नारायण वा सदा ध्यान
करना चाहिए ॥३४॥ भगवान के ध्यान के तुल्प इम लोक में अन्य कुछ भी
पवित नही है । श्वपच के अनो का साने वाला पानी इसमें लिप्त नहीं होता है ।
सदा चित्त ममासक्त जन्तीविषयगोचरे।
यदि नारायणेऽप्येव को न मुच्येत बन्धनात् ॥३६
विष्णुभक्तिर्यस्य चित्त त वा जीवो नमेत्सदा ।
स तारयति चात्मान तथैव दुरितावर्णनात् ॥३७
तज्ज्ञान यन गोविन्द स कथा यम केशव ।
तत्कर्म यत्तदर्थाय किमन्यवहुभापितं । ३८
स जिह्वा या हरिं स्तौति तच्चित्त यत्तदर्पितम् ।
तावेव केवलो श्लाघ्यो यो तत्पूजाकरी करो॥३६
प्रणाममीशस्य शिर फल विदुस्तदर्चन पारिणफल दिवोरम ।
मन फल तद्गुणकर्मचिन्तन वस्तु गोविन्दगुणस्तुति
फनम् ॥४०
मम्मन्दारमानोऽपि राशिः पापस्य कर्मण ।
केशवम्मरणादेव तस्य सर्व विनश्यति ॥४१
८२ ] । श्री गरुडपुगण यत्किञ्चित्कुरुते कर्म पुरुष सरध्यसाधु वा। सर्व नारायणे न्यस्य कुन्निपि न लिप्यते ॥४२ तृणादिचतुरास्यान्त भूतग्राम चतुर्विधम् । चराचर जगस्सवं प्रसुप्त मायया तव ।।४३ जीयो पा चित्त सासारिव' विषयों में सदा भासक्त रहा करता है। जैमी मासक्ति उसको विपयो में होती है वैसी हो यदि नारायण के चरणों में हो तो पिर इम जन्म-मरण पे पावागमन के गागारिक बन्धनो से कौन मुक्ति नहीं पा जाना ।।३६।। सूतजी ने कहा-जिम वित्त मे सदा विष्णु की भक्ति रहती है अथवा विष्णु का जो नमन किया करता है वह दुरितो ( पापो) के समुद्र से सपने आप वा पार पर ले जाया करना है ॥ ३०॥ वह ही शान चर्चा है जिम में गोविन्द के गुणो का वर्णन हो और वही क्या है जिस में भगवान के शव की लीला या वरान हो तथा वही यमं है जो भगवान की सेवा से सम्बन्धिन होता है अर्थात् भगवान् के निमित्त ही किया जाता है। विशेष क्थन करने से क्या लाभ है ।।३८॥ वही वस्तुत जिह्वा सफल एव सायंक है जो हरि का स्तवन किया करती है। वही चित्त प्रशसनीय है जो भगवान में लगा दिया गया हो। वे ही दोनो हाथ श्लाघा करने के योग्य होते हैं जो भगवान् की करने में लगे रहते हैं ॥३६॥ ईश्वर को प्रणाम करना ही शिर के प्राप्त करने का फल होता है । जो शिर भगव न के आगे झुक जाता है वही सफा गिर होता है । देवगणों की पूजा-अर्चा का करना ही हायो का फन होता है । भगवान् के गुण गपो का चिन्तन करने ही म मन की सफ- लता हुप्रा करतो है । वाणी को सफलता तभी होती है जब श्री गोविन्द के गुणों का बगान करे या उनकी स्तुति क्यिा करती है ॥४०॥ मेरु एव मन्दार पवत के समान भी पाप कर्मों का समूह भगवान् कशव के स्मरण से ही वह महान् पापों की राशि सम्पूर्ण विनष्ट हो जाया करती है ॥४१॥ तृण से लेकर ब्रह्मा पर्यन्त चार प्रकार का भूनो का ममुदाय होना है। यह समस्त चर- पर हा जगत् साधको माग से प्रसुप्त है । जो कुछ भी सदमा असम कर्म पुरुष किया करता है उस सबको तारायण में न्यस्त कर देने पर वह कुछ भी करता हुप्रा भी लिप्त नही हुआ करता है ॥४२॥४३।। - पूजा विष्णु माहात्म्य क्थन ] -- जिस भगवान् यस्मिन्न्यस्तमतिर्न याति नरक स्वर्गोऽपि यञ्चिन्तने विघ्नो यत्र न वेशितात्ममनसो ब्राह्मोऽपि लोकोऽल्पकः । मुक्तिञ्च तसि सस्थितोजड़धियांसा ददात्यव्ययः । किञ्चित्तं यदयं प्रयाति विलय तत्राच्युते कीत्तिते ।।४४ अग्निकार्य जपः स्नान विष्णोानञ्च पूजनम् । गन्तु दु खोदधेः कुयु य च तत्र तरन्ति ते ॥४५ राष्ट्रस्य शरणं राजा पितरो बालकस्य च । धर्मश्च सर्वमानां सर्वस्य शरणं हरिः।।४६ ये नमन्ति जगद्योनि वासुदेव सनातनम् । न तेभ्यो विद्यते तीर्थमधिक मुनिसत्तम ॥४७ अनय रत्नपूजाञ्च कुर्यात्स्वाध्यायमेव च । तमेवोद्दिश्य गोविन्द ध्यान नित्यमतन्द्रितः ॥४८ में अपनी मति को न्यस्त कर देने वाला पुरुष नरम में फाभी नहीं जाया करता है और जिपके चिन्तन करने में स्वर्ग में प्राप्त होता है। जिसने अपनी प्रात्मा और मन को निवेशित कर देने वाले को कभी ब्रह्म का लोक भी बडी वस्तु नही होता है । चित्त मे सस्थित होकर जो जड बुद्धि वालो को भी पुरुषो को अव्यय मविनाशी भगवान् मुक्ति प्रदान कर दिया करते है तो क्या प्राश्चर्य की बात है कि अच्युत भगवान् का सकीर्तन करने पर यह पुरुप बिलय को प्राप्त हो जाता है ।। ४४ ॥ पग्नि कार्य पर्थात् होम करना-जर-मान-विष्णु का ध्यान तथा भगवान् विष्णु का प्रचन दुराः के सागर मे पार होने के लिये करने चाहिए जिम में वे तर जाते हैं ।। ५ ।। राष्ट्र फा रक्षक राजा होता है-पाल्यावस्था मे बालक के रक्षा करने वाले उपके माता-पिता होते हैं- समस्त मनुष्यों का शरण अर्थात् रक्षा करने वाला धर्म हुमा करता है और सभी का शरण भगवान् श्री हरि होते हैं ।। ४६ ।। जो इम जगत् योनि पर्यात उद्भव स्थान-मनातन भगवान वासुदेव का नमन किया करने है हे मुनि श्रेष्ठ ! उनसे विशेष अधिक तीर्य नहीं होता है। तात्पर्य यह है कि भगवान को नमन करने वाले भक्त तीर्थ स्वरूप ही हमा करते हैं ॥४७॥ - ८४ ] [ थी गरडपुराण नित्य ही तद्रा से रहित होकर अनध्य रल-पूजा और स्वाध्याय उपी गोविन्द क उद्देश्य रख कर ध्यान करना चाहिए ॥४८॥ शूद्र वा भगवद्भक्त निपाद श्वपच तथा। द्विजजाति सम मन्ये न याति नरक नर ॥४६ आदरेण सदा स्तौति धनवन्त धनेच्छया। तथा विश्वस्य कर्तार को न मुच्येत बन्धनात् ॥५० यथा जातवना वह्निर्दहत्याद्र मपीन्धनम् । तथाविध स्थितो विष्णुर्योगिना सर्वकिल्विपम् ॥५१ प्रादीप्त पर्वत यद्वनाथयन्ति मृगादय । तद्वत्पापानि सर्वाणि योगाभ्यासरता नर ॥५२ यस्य यावाश्च विश्वासस्तस्य सिद्धिस्तु तावती। एतावानेव कृष्णस्य प्रभाव परिमीयते ॥५३ विद्वपादपि गोविन्द दमघोषात्मज स्मरन् । शिशुपालो गतस्तत्त्व किं पुनस्तत्परायण ॥५४ भगवान का भक्त शूद्र-निपाद, श्वपच मथवा द्विज जाति हो सबको ममान मानना चालिए ऐसा पुरुप कभी नरक मे नही जाया करता है ॥ ४६ ।। जिस प्रकार से बहुत ही आदर के साथ घन को इच्छा से धनवान पुरुपो की स्तुति किया करते हैं उसी भांति इस सम्पूर्ण विश्व के कर्ता भगवान् का स्तवन किया जावे तो कौन पुरुष है जो सामारिक अन्धन से मुक्ति न पावे अर्थात संभ मुक्त हो जाया करते हैं ।।५०।। जिस तरह वन मे वृक्षो के हो सघप से समुपात दावानल गीले भी ईधन को दग्ध कर दिया करता है उसी भांति योगियो के हृदय में स्थित भगवान् विष्णु उनके सम्पूण किलिपपो को जला कर नष्ट कर दिया करते हैं ।। ५१ ॥ जैसे चारों भोर रा अग्नि स दीप्त पवत को मृग मादि पशुगण अपना आश्रय नहीं बनाया करत हैं उसी तरह याग के अभ्यास में रति रखने वाले पुरुप समस्त पापो को अपने अन्दर अश्रय नहीं दिया करते हैं ।।५२॥ जिस पुरुप का जितना विश्वास भगवाए म होगा है उनकी उतनी ही सिद्धि हुणा करती है। भगवान् श्री कृष्ण का इतना ही
नृहि स्तोत्र ]
८५
प्रभाव परिमारिणत होता है ॥५३॥ दमघोस का पुत्र शिशुपाल विद्वेष के भाव
से भी श्री कृष्ण का अहर्निश स्मरण करता हुमा मुक्ति को प्राप्त हो गया था
फिर जो श्री कृष्ण के ध्यान-स्मरण में भक्ति भाव से परायण रहने वाले
हैं उनके कल्याण के विषय में क्या कहा जा सकता है ।।५४।।
१०८-नृसिंह स्तोत्र
नारसिंहस्तुति वक्ष्ये शिवोक्त शौनकाधुना ।
पूर्व मातृगणाः सर्वे शङ्करं वाक्यम वन् ॥१
भगवन् भक्षयिष्याम सदेवासुरमानुपम् ।
त्वत्प्रसादाज्जगत्सर्व तदनुज्ञातुमर्हसि ॥२
भवतीभिः प्रजाः सर्वा रक्षणीयान सशयः।
तस्माद्धोरतरप्रायं मन शीघ्र निवर्त्यताम् ॥३
इत्येव शङ्करेगोक्तमनादृत्य तु तद्वच ।
भक्षयामासुरव्यमान लोक्य सचराचरम् ।।४
त्रैलोक्ये भक्ष्यमाणे तु तदा मातृगणेन वै ।
नृसिंहरूपिण देव प्रदध्यौ भगवान् शिवः ।।५
अनादिनिधन देव सर्वभूतभवोद्भवम् ।
विद्य जिह्व महादष्ट्र स्फुरत्केशरमालिनम् ॥६
रत्नाङ्गद सुमुकुट हेमकेशरभूपितम् ।
श्रोणिसूत्रेण महता काञ्चनेन विराजितम् ।।७
सूतजी ने कहा--हे शौनक ! अब मैं शिव के द्वारा वरिंगत नरसिंह
भगवान् की स्तुति को बतलाता हूँ। पहिले सब मातृगण ने भगवान् शङ्कर से
यह वाक्य कहे घे ॥१॥ हे भगवन् ! आपके प्रसाद से हम इस देव-असुर और
मनुप्यो से युक्त सम्पूर्ण जगत् को भक्षगा कर ज यगें । पाप हमको अपनी
भाज्ञा दे दीजिये ॥२॥ शङ्कर ने कहा-पाप सबके द्वारा इन समस्त प्रजाजनो
को रक्षा करनी चाहिए-इसमे कुछ भी समय नही है। इनके विषय में जो
सुम्हारा अत्यन्त घोरतर मन है उसे शीघ्र ही निवृत्त कर डालो।॥ ३॥ भगवान्
[ श्री गपुराण शङ्कर ने यही कहा था किन्तु उन ने शहर के वचनो को न मान कर भव्यग्र होते हुए चराचर इम त्रिलोकी को भक्षण करना प्रारम्भ कर दिया था ।।४।। इस प्रकार से मातृाण के द्वारा नोक्य के भक्ष्यमारा हो जाने पर भगवान् शिव ने नृसिंह रूप वाले देव का ध्यान दिया था ।। ५ ।। नृमिह देव के ध्यान --मे स्वरूप का वर्णन दिया जाता है-आदि और अन्त से रहित देव- समस्त प्राणियो के उत्पत्ति स्थान-विद्युत् के तुल्य जीभ वाले-महान् द ढो से युक्त- स्फुरमारा केसरो की माला वाला उनका दिव्य रूप है।॥ ६ ॥ रत्नो से जटित पगदो को भुजाओं में धारण करने पाले-सुन्दर मुकुट मस्तक पर पहिने हुए---सुनहले केसरो से अलकृत तथा विशाल सुवर्ण की करधनी से विभूपित नीलोत्पलदलश्याम रत्ननूपुरभूपितम् । तेजसाक्रान्तसकलब्रह्माण्डोदरमण्डपम् ॥८ आवर्तमदृशाकार : सयुक्त देहरोमभिः । सर्वपुष्यविचित्राञ्च धारयश्च महात्रजम् ।। स ध्यातमात्रो भगवान्प्रददौ तस्य दर्शनम् । यादृशेनैव रूपेण ध्यातो रुद्र स्तु भक्तित ॥१० तादृशेनंव रूपेण दुनिरीक्षेण देवत. । प्रणिपत्य तु देवेश तदा तुष्टाव शङ्करः ॥११ नमस्तेऽस्तु जगन्नाथ नरसिंहवपुर्धर। दैत्येश्वरेन्द्र सहारनखशुक्तिविराजित ।१२ नखकमलसलग्न हैमपिङ्गलविग्रह । नमोऽस्तु पद्मनाभाय शोभनाय जगद्गुरो॥ कल्पान्तेऽम्भोदनि?प सूर्यकोटिसमप्रभ ॥१३ नील कमल के दलो के समान श्याम वर्ण वाले–रत्नो से निमित, नपुगे से भूपिन और अपने प्रतुन तेज से समस्त ब्रह्माण्ड के उदर भण्डप को प्राक्रान्त प्रिये हुए हैं । माक्र्त (भेवर) के गमान प्राकार वाले शरीर के. रोमो से समन्वित मापा देह है। समस्त प्रकार के पुष्पो से सुनिमित एव नृसिंह स्तोत्र [२७ . मति अद्भुत विशाल माला को धारण किये हुए हैं Hell इस प्रकार के अस्प दभुत स्वरूप वाले भगवान् का जैस ही शङ्कर ने ध्यान किया था मे ही नृसिंह भगवान् ने ध्यान करने ही से तुरन्त शिव को दशन दिशा था। भक्ति भाव पूर्वक जिस प्रकार क स्वरूप का ध्यान शिव ने किया था उसी प्रकार के रूप स जोकि देवो के द्वारा भी दुनिरीक्ष्य था नृमिह देव ने दशन प्रदान किया था। उस समय शङ्कर ने देवेश नृसिंह को प्रणाम करके फिर उनकी स्तुति की थी ।। १० ।। ११ ।। शङ्कर ने कहा--हे जगत् के स्वामिन् । नरसिंह के स्वरूप धारण करने वाले प्रापको मेरा नमस्कार है । दैत्या के स्वामी हिरण्य काशिपु के सहार करने वाले नखरूपी शक्तियो से प्राप सुशोभित हैं। नखरूपी कमलो में सलग्न हेम वे ममान पिङ्गल वण के विग्रह स युक्त हैं। हे जगत् परम शोम न पद्मनाभ मापक लिय मेरा प्रणाम है। पाप कल्प के मा मे मेघो के समान निर्घोष (गणना) घाले हैं पोर करोडो सूर्गे के तुल्य प्रभा से युक्त हैं ॥१२॥१३॥ सहस्रयमसनास राहस्रन्द्रपराक्रम । सहस्रधनदस्फीत सहस्रचरणात्मक ।।१४ रहस्रचन्द्रप्रतिम सहस्राशुहरिक्रम । हस्ररुद्रतेजस्क सहस्रब्रह्मसस्तुत ।।१५ सहस्ररुद्रसजप्त सहस्राक्षनिरीक्षण । हस्रजन्ममथन सहस्रवन्धमोचन ॥१६ रहस्रवायुवेगान सहस्राक्ष कृपाकर । तुत्वैव देवदवेश नृसिंहवपुप हरिम् ।। वज्ञापयामास पुनविनयावनत शिव ॥१७ उन्धकस्य विनाशाय या सृष्टा मातरो मया । पुनाहत्य तु मद्वाक्य भक्षयन्त्यद्भुना प्रजा ॥१८ पृष्ट वा ताश्च न शक्तोऽह सहत्तं मपराजित । एवं कृत्वा कथ तासा विनाशमभिरोचये ॥१६ ६८ -- । श्री गरुडपुराए - एवमुक्त स रुद्रण नरसिंवपूर्हरिः । सहस्रदेवीजिह्वाग्रात्तदा वागीश्वरो हरि ॥२० तथा सुरगणान्सन्रोिद्रान्मातृगणान्विभुः। सहृत्य जगत शर्म कृत्वा चान्तरधीयत ॥२१ हे ननिह देव । आप सहनी यमो को समाम देने वाले हैं और महल इन्द्रो के समान पराक्रम से युक्त हैं । माप महस कुवरो के तुल्प रफीत है तथा सहस्र चरगो व स्वरूप वाले हैं ।।१४।। सहस्र चन्द्रो की प्रतिभा के महा है... और सहश्राशु (मूप) के हरि (मङ्गो) के समान क्रम वाले है। सहस्र रुद्रा के समान तेज चाले हैं भोर माप सहनो ब्रह्मामो से सस्तुत हैं ॥१५ ।। महस्र रुद्रों से भली भांति जर किये हुए हैं और सहस्राक्ष ( इन्द्र) ) के ममान निरीक्षण करने वाले है । आप सहस्र जन्मो के मथन करने वाले तथा सहस्रो के बन्धो को मोचन करने वाले हैं ।।१६।। सहस्र वायु के वेग के राम न भन गामी हैं। आप सहस्राक्ष है तथा कृपा के करने वाले हैं। इस तरह से शिव ने देवो के हेतु नृभिह वपुधारण करने वाले हरि भगवान् की स्तुति की थी और फिर बहुत नम्रता के माथ अवनत होकर शङ्कर ने उनको विज्ञापित किया था ॥१७॥ पन्धक दैत्य के विनाश करने के लिये जो मैने मातृगण का सृजन किया था वे मेरे वाक्य का अनादर करके अद्भुत प्रजाम्रो का भक्षण परती हैं ॥१८॥ उनका सृजन करके अपराजित मैं अब उनका सहार करने में असमर्थ हूं क्योकि पहिले मैंने उनका मृनन किया था अब उनका विनाश करना कैसे अच्छा लगता है ? ॥१६॥ इस प्रकार से जब रुद्र ने कहा तो न सिंह के स्वरूप धारण करने वाले भगवान् हरि ने जो वागीश्वर थे अपनी जिह्वा के अग्रभाग से सहस्र देवी-सुरगण-रोदगण और मातृगणो को विभु ने सहार करके सम्पूर्ण जगत् का कल्याण कर दिया था तथा उसी समय वही पर अन्तहित हो गये थे ॥२०॥२१॥ नारसिंहमिदं स्तोत्र य पठेनियतेन्द्रिय. । मनोरथप्रदस्तस्य रुद्रस्येव न सशय. ॥२२ नारायण-भक्ति कपन ध्यायेन सिंह तरुणार्कनेत्रसिताम्वुजातं ज्वलिताग्निवक्त्रम् । अनादिमध्यान्तमज पुराणं परावरेश जगतां निधानम् ॥२३ जपेदिद सन्ततदु खजालं जहाति नोहारमिवांशुमाली । समातृवर्गस्य करोति मूत्ति यदा यदा तिष्ठति तत्समीपे ॥२४ देवेश्वरस्यापि नृसिंहमूर्ते. पूजां विधातु त्रिपुरान्तकारी । प्रसाध त देववर स लव्वा अव्याज्जगन्मातृगणेम्य एव ॥२५ इस नमिह भगवान के स्तोत्र को अपनी सब इन्द्रियो को नियत करके जो भी कोई पुरुष नित्य पढ़ेगा नस पाठ करने वाले के समस्त मनोरथो को रुद्र की ही भांति यह स्तोत्र प्रदान कर देगा- इसमें कुछ भी संशय नहीं है ॥२२॥ तरुण सूर्य के सदृश नेत्रो वाले-श्वेत कमल के समान वर्ण वाले- जलनी हुई अग्नि के तुल्य मुख वाले-आदि-मध्य तथा अन्त से रहित-~प्रजन्मा परावर के स्वामी-जगतो के निधान-परम पुराण पुरष नृसिंह भगवान का ध्यान करता हूँ ॥२३।। जो इसका जाप करता है वह सूर्य के द्वारा नीहार. (कुहरा ) की भांति सन्तत रहने वाले दुखो के समुदाय को त्याग देता है अर्थात् उस जप करने वाले के दुःखो का जाल नष्ट हो जाता है । मातृ वर्ग के सहित को मूत्ति बनाधे जब-जब उसके समीप पे स्थित होवे । देवेश्वर नृसिंह मूत्ति की पूजा करने के लिये त्रिपुर दैत्य के विनाश करने वाले शङ्कर ने देवो श्रेष्ठ नूमिह भगवान को प्राप्त कर उन्हे प्रसन्न दिया था और फिर मातृगण ही जग की रक्षा की थी ॥२४॥२५॥ १०६-कुलामृत स्तोत्र चुलामृन प्रवक्ष्यामि स्तोय यत्त हरोऽब्रवीत् । पृष्ट श्रीनाग्दैनव नारदाय तथा शृणु ॥१ य: ससारे सदा द्वन्द्व : कामक्रोध. शुभाशुभैः । शब्दादिविपयर्वद्ध. पीड्यामान. स दुर्मतिः ॥२ ..क्षरण विमुच्यते जन्तुमृत्युसंसारसागरात् । भगवन् श्रोतुमिच्छामि त्वत्तो हि त्रिपुरान्तक ॥३ [ श्री गडग तस्य तद्वचन श्रत्वा नारदम्य मिलोचन । उवाच तमृपि शम्भु प्रसन्नवदनी हर ॥ ज्ञानामृत पर गुह्य रहस्यमृपिमत्तम । वक्ष्यामि शृणु दुमच्न भवयाघभयापहम् ॥५ तृणादिनतुराम्यान्त भूतमाम चतुर्विधम् । चगचर जगत् गर्व प्रमुप्त यस्य मायया ॥६ तम्य विष्णो प्रसादेन यदि पश्चित् प्रयुध्यति । स निस्तरति समार देवानामपि दुस्तरम् ।।७ मून जी ने पहा-श्री नारद न शिव से पूछा या तव नारद के द्वारा पूछे गये गिव न नारद मे जो कहा पा उग गुलामृा स्तोत्र को म अब कहता हूँ। उमका तुम श्रवण करो ॥ १॥ नारद जो पहा-जो सार में सदा शुभ ओह भशुभ द्वन्द्व काम और शोध तथा पद प्रादि अनेक दिपयो स बद्ध रहा है और यह दुष्ट मत्ति याला पोट्यमान रहता है। ऐमा व्यक्ति इम मृत्यु सयार रूपी सागर म क्षण मात्र म ही विमुक्त हो जाये इस प्रकार का प्रयोग है त्रिपुरान्तक शिव । मैं मापसे श्रवण करन की इच्छा रखता हूं ॥ २ ॥ ३॥ त्रिलोचन भगवान् गदर ने नारद के वचन को सुनकर परम प्रसन्न होकर हर शम्भु उम ऋपि म बाले--11 ४ ॥ महेश्वर न पहा-हे ऋषियो। मैं परम श्रेष्ठ ज्ञानामृत अत्यन्त गोपनीय वस्तु है और परम गुह्य रहम्य है । यह दु खो के हनन करन ताला तथा सामारिक बन्धन भय का अपहरण करने वाला है-इमका मैं तुमको बतलाता हूं तुम समाहित होकर इसका श्रवण करो ॥ ५॥ जिम परमात्मा प्रभु की माया से तृण स तुच्छ वस्तु से तेवर ब्रह्मा पयन्त चारो प्रकार का यह भूतों का नर मोर मचर समुदाय एव सम्पूण जगर प्रमुख हो रहा है उस प्रभु विष्णु के प्रसाद रा यदि कोई जन्तु प्रबुद्ध हो जाता है अर्थात् ज्ञान प्राप्त कर लता है तो वह इस दनो के द्वारा मी दुस्तर समार सागर से पार नला जाता है। तात्पय है समार के जन्म मरण द्वारा निरन्तर आवागमन महान् व धन स निस्तार प्रप्त कर लिया करता है .
मुलामृत स्तोत्र ]
भोगेश्वर्य मदोन्मत्तस्तत्वज्ञानपराड मुख ।
पुत्रदारकुटुम्वेषु मत्ता सीदन्ति जन्तवः ।।
सर्व एकावे मग्ना जी वनगजा इव ।
यस्त्वानन निबध्नाति दुर्मति: कोपकारवत् ।।
तस्य मुक्ति न पश्यामि जन्मकोटिशतैरपि ॥६
तस्मान्नारद सर्वेपा देवाना देवमव्ययम् ।
पाराधयेत् सदा सम्यग्ध्यायेद्विषामुदान्वितः ।।१०
यस्तु विश्वमनाद्यन्तमजमात्मनि सस्थितम् ।
सर्वज्ञमचल विष्णु सदा ध्यायेत् स मुच्यते ॥११
देव गर्भोचित विष्णु सदा ध्यायन् विमुच्यते ।
अशरीर विधातार सर्वज्ञानमनोरतिम् ।
अचल सर्वग विष्णु सदा ध्यायन् विमुच्यते ॥१२
निविकल्प निराभास निष्प्रपञ्च निरामयम् ।
वासुदेव गुरु विष्णु सदा ध्यायन् विमुच्यते ।।१३
सर्वात्मकस्य यावन्तमात्मचैतन्यरूपकम् ।
शुभमेकाक्षर विष्णु सदा ध्यायन् विमुच्यते ॥१४
मासारिक भोगो के प्रति विशाल जाल और ऐश्वर्य के मद में उन्मत्त
तथा तत्त्व-ज्ञान से विमुख जन्तु गण अपने पुत्र पोर दास एव कुटुम्न परिवार
में ही मत होकर अनेक दुग्यो एवं अवमादों को भोगने रहा करते हैं l
सभी जन्तु इमी एक महा विशाल सागर में डूबे हुए है और वन के हाथियो की
मांति जीर्ण हो रहे हैं । कोषकार के ममान जो प्रानन को निबद्ध कर लेता है
वह दुर्मति है और उस ऐसे पुरुप की करोडो जन्मो के पश्चात् भी मैं मुक्ति नही
देखता हूँ ।।९।। इलिये हे नारद । ममस्त देवों के भी देव परम प्रभु अव्यय,
पविनाशी भगवान विष्णु की मदा माराधना अवश्य ही करनी चाहिए । परम
मानन्द से युक होकर विष्णु को भली भांति ममाराधना करे ॥१०॥ जो प्राणा
विश्व स्वरूप प्रादि और प्रल मे रहित, अजन्मा सर्वज्ञ, अचल और अपनी ही
मात्मा मे ममर्यामी रूप में विराजमान भगवान् विष्णु का ध्यान मदा किया
[ श्री गरुडपुराण करता है वह अवश्य ही 'इस ससार से मुक्त हो जाता है ॥११॥ गर्मोचित देव विष्णु का सर्वदा ध्यान करने वाला गुरुप विमुक्ति प्राप्त कर लिया करता है । शरीर से रहित, विधाता, सबके ज्ञान और मन को रति प्रदान करने वाले, सर्वत्र गमन करने वाला अर्थात् सबमें व्यापक एवं अचल भगवान विष्णु का ध्यान करते रहने वाला पुरुष ससार से विमुक्त हो जाया करता है ॥१२॥ विकल्पो से रहित, प्रामास शून्य, बिना प्रपञ्चों वाला एव निरामय परम गुरु भगवान् यामुदेव विष्णु का सर्वदा ध्यान करने वाला व्यक्ति इम ससार से मुक्त हो जाता है ।।१३॥ मर्वात्मा का जितना भी आत्म चैतन्य स्वरूप है ऐसे परम शुम, एकाक्षर भगवान् विष्णु का सवंदा निरन्तर ध्यान करते रस्ते वाला पुरुप इस ससार के विशाल बन्धन से छुटकारा पा जाता है ।।१४।। वाक्यातीत त्रिकालज्ञ विश्वेश लोकसाक्षिणम् । सर्वस्मादुत्तम विष्णु सदा ध्यायन् विमुच्यते ॥१५ ब्रह्मादिदेवगन्धर्वे, निभि. सिद्धचारण । योगिभिः सेवित विष्णु सदा ध्यायन विमुच्यते ।।१६ समारबन्धनान्मुक्तिमिच्छन्लोको ह्यशेपतः। स्तुत्वैव वरद विष्णु सदा ध्यायन् विमुच्यते ॥१ ससारवन्धनात्कोऽपि मुक्तिमिच्छन्समाहित । अनन्तमव्यय देव विष्णु विश्वे प्रतिष्ठितम् । विश्वेश्वरमज विष्णु सदा ध्यायन्विमुच्यते ॥१८ नारदेन पुरा पृष्ट एव न वृपभध्वज. । यत्तेन तस्मै व्याख्यात तन्मया कथित तव ।।१६ वचनो से भी परे, तीनों ( भूत, भविष्यत् और वर्तमान ) कालो का शाता, विश्व के स्वामी मोर समस्त लोकों के साक्षी तथा राबसे उत्तम भगवान विष्णु का ध्यान करते रहने वाला जन्तु अवश्य ही विमुक्ति प्राप्त कर लेता है । ११५॥ ब्रह्मा से प्रादि लेकर देवो और गन्धर्वो के द्वारा, महामुनियो मे, सिद्ध तथा चारणो के द्वारा एव योगिया से जो मेदिन हैं ऐसे भगवान विष्णु का निरन्तर ध्यान करने वाला पुरुष निश्चय ही मोक्ष प्राप्त कर लेता है .in फुनामृत स्तोत्र इरा प्रत्यन्त दुस्तर और महाविशाल संसार के बन्धन से मुक्ति प्राप्त करने की इच्छा वाला पुरुष समाहित होकर सम्पूर्ण लोक से छुटकारा पाने की चाह रखता हुआ वरद विष्णु की इस प्रकार स्तुति करके उनका ही सवंदा ध्यान फरता हुआ इससे छुटकारा पा जाता है ॥१७।। ससार के बन्धन से मुक्ति की इच्छा करने वाला कोई भी सावधान होकर अनन्त, अव्यय विष्णुदेव को जो इस विश्व में प्रतिष्ठित हैं तथा विश्व के ईश्वर एवं अजन्मा है उनका सर्वदा निर. तर ध्यान करने अवश्य ही विमुक्त हो जाता है ।।१८।। श्री सूत जी ने कहा- धम प्रकार से पहिले समय मे नारद देवपि के द्वारा पूछे गये वह भगवान् वृषभ- ध्वज शिव ने उनको जो भ्याख्या करने बतलाया था वही मैंने सब तुमको बतला दिया है ॥१६॥ तमेव सतत ध्यायनिय॑य ब्रह्म निष्कलम् । अवाप्स्यसि ध्रुव तात शाश्वत पदमव्ययम् ॥२० अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च । क्षणमेवाग्रचित्तस्य कला नाहन्ति पाडशीम् ॥२१ श्रुत्वा सुरऋपिविष्णो प्राधान्यमिदमीश्वरात् । स विष्ण सम्यगाराध्य सिद्ध पदमवाप्तवान् ॥२२ य पठेच्छणयाद्वापि नित्यमेव स्तवोत्तमम् । कोटिजन्मकृत पापमपि तस्य प्रणश्यति ॥२३ विष्णोः स्तवमिद दिव्य महादेवन कीतितम् । प्रयत्नाद्य. पठेन्नित्यममृतत्व स गच्छति ॥२४ हे तात । इसलिये निर्णय, निकाल उमी ब्रह्म पा निरन्तर ध्यान करते हुए तुम सब निश्चय ही अव्यय एव शाश्वत पद को प्राप्त कर लोग ॥२०॥ सहसो प्रश्वमेघ यज्ञ तया सैपडी घाज रेय यन भी एक दाण भर एकाग्र चित्त परके भगवान् विष्णु के ध्यान करने की सोलहवी क्ला के समान भी नहीं होते हैं। ऐमा विष्णु के ध्यान का माहात्म्य है ॥२१॥ इस तरह म देवर्षि नारद जी ने ईश्वर शिव से भगवान् विष्णु के ध्यान का परम प्राधान्य श्रवण किया था और फिर उनने विष्णु यो भलो भौति आराधना की तथा सिद्धि के १४) [ श्री गरुडपुराण परम पद को प्राप्त किया था ॥२२॥ जो कोई भी पुरुष इस परमोत्तम स्नक का नित्य ही पाठ करता है प्रथवा इसका श्रवण किया करता है उसके करोडा जन्मो मे किये हुए भी पाप पूर्ण रूप से नष्ट हो जाया करते हैं ।।२३। इस भगवान् विष्णु के स्तव को जो कि पत्यन्त दिव्य एव परम उत्तम है, महादेव ने इसका कीर्तन किया था। जो भी कोई प्रयत्न पूर्वक इसका नित्य ही पाठ करता है वह अमृतत्त्व को प्राप्त हो जाता है ॥२४॥ ११०--मृत्य्वष्टक स्तोत्र स्तोन सर्व प्रवक्ष्यामि मार्कण्डेयेन भाषितम् । दामोदर प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्यु करिष्यति ॥१ शङ्खचक्रधर देव व्यक्तरूपिणमव्ययम् । अधोक्षज प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्यु करिष्यति ॥२ वराह वामन विष्ण नारसिंह जनार्दनम् । माधवञ्च प्रपन्नोऽस्मि किन्ना मृत्यु करिष्यति ॥३ पुरुष पुष्करधोनवीज पुण्य जगत्पतिम् । लोकनाथ प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्यु करिष्यति ।।४ सहस्रशिरस देव व्यक्ताव्यक्त सनातनम् । महायोग प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्युः करिष्यति ॥५ भूतात्मान महात्मान यज्ञयोनिमयोनिजम् । विश्वरूप प्रपन्नोऽस्मि विन्नो मृत्यु करिष्यति ।।६ श्री मूनजी ने कहा-मार्कण्डेय के द्वारा भापित्त में सर्व स्तोत्र को बत- लाता हूँ। अब तो मै भगवान् दामोदर की शरणागति म प्राप्त हो गया है। पह मृत्यु हमारा क्या विगाह करेगा ? ||१|| शङ्ख, चक्र भायुधो वे धारण करते वाले व्यक्त रूप से सपुन एव परम अध्यक्त देव अधोक्षज विष्णु की शरणागति में पहुंच गया हूँ पर मेरा यह मृत्यु क्या फर मगा ? ॥२॥ वराह, घामना, नृसिंह, माधव, जनार्दन भगवान विष्णु की प्रपत्ति में मैं प्राप्त हो गया है। अब यह मृत्यु हमारी पा हानि करेगा? १३ पुष्कर क्षेत्र के बीज, जगतो के स्वामी,
मृत्वा स्तोत्र
पुण्य स्वरूप, लोको के नाथ परम पुरुष विष्णु का में प्रपन्न हो चुका हूँ, मेरा
अव यह मृत्यु का बुरा करेगा ? ॥४॥ महल शिरो वाले, व्यक्त और मव्यक्त
स्वरूप से ममन्वित, रानातन ( सदा गर्वदा रहने वाला) एवं महान योग वाले
विष्णुदेव प्रपत्ति मैंने ग्रहण कर ली है। अब यह परम कारण मृत्यु प्राप्त होकर
भी हमारी क्या हानि कर सकेगा? ॥शा समस्त भूतों की मामा, महान् प्रात्मा
यज्ञो की योनि मर्यात् उद्भव स्थान, विश्व रूप वाले तथा प्रमोनिज भगवान्
विष्णु की मैं शरणागति में प्राप्त हो गया है। अब यह विचारा मृत्यु हमारा
का कर मकेगा? ॥६॥
इत्युदीरितमाकर्ण्य स्तवं तस्य महात्मनः ।
अपयातस्ततो मृत्युविष्णदूतैः प्रपीड़ितः ॥७
इति तेन जितो मृत्युमार्कण्डेयेन धीमता।
प्रसन्ने पुण्डरीकादो नृसिहे नास्ति दुर्लभम् १८
मृत्य्वष्टकमिद पुण्य मृत्युप्रशगन शुभम् ।
मार्कण्डेयहितार्थाय स्वय विष्णरुवाच ह ।।
इद य पठते भक्त्या निकाल नियत शुचि ।
नाकाले तस्य मृत्यु. स्यामरस्याच्युतचेतसः ।।१०
हृत्पद्ममध्ये पुरुष पुगण नारायण गाश्वतमप्रमेयम् ।
विचिन्त्य सूर्यादतिगजमान मृत्यु स योगी जितवास्तथैव ॥११
इस प्रकार से बहे हुए महान् आत्मा वाले भगवान् के स्तव ा पण
कर मृत्यु वहां से चला गया या मोर वह पाणु के दूतो के द्वारा बहुत ही प्रपी-
डित दिया गया इस प्रकार से परम धीमान् गाण्डेय मुनि ने उरा
मृत्यु पर विजय प्राप्त की थी। पुण्डरीक दे गमान नेयो वाले भगवान् गिह फे
प्रमन्न हो जाने पर या फिर कुछ भी वस्नु दुभ नही रहा करती है। यह
मृ'गु का अपरम पुष्पमप है। यह परया शुभ है पोर मृत्यु का प्रशमन
करने वाला है। इगको माझण्डेय मुनि केहि-सम्पादन करने के लिये ही
विष्णु भगवान् ने स्वयं ही अपने मुनाविन्द में यहा या l इम मृत्यु के
मक को जो नित्य ही नियम पूया भत्तिा भाव के साप सीनो पानी मे नियन
॥७॥
[ थी गरडपुराण
एव पवित्र होकर पढता है उस पच्युत भगवान् में चित्त को लगाने वाले मनुष्य
की अकाल मे कभी भी मृत्यु नहीं होगी ॥१०॥ अपने हृदय रूपी पद्म मे सर्वदा
संस्थित, परम पुराण पुरुप, शाश्वत, प्रमान करने के योग्य भगवान् नारायण
का विशेष रूप से चिन्तन फरे जो कि सूर्यदेव से भी अत्यधिक दीप्ति वाले हैं ।
ऐसा ध्यान करने वाला योगी मृत्यु को उसी प्रकार से मार्कण्डेय की भांति ही
जीत लेता है ।।११॥
१११-अच्युत् स्तोत्र
वक्ष्येऽहमच्युतस्तोत्र शृण शौनव सर्वदम् ।
ब्रह्मा पृष्टो नारदाय यथोवाच तथापरम् ।।१
यथाऽक्षयोऽव्ययो विष्णु स्तोतव्यो वरदो मया ।
प्रत्यह चार्चनाकाले तथा त्व वक्त मर्हसि ॥२
ते धन्यामते सुजन्मानस्ते हि सर्वसुखप्रदा ।
सफलं जीवित तेषा ये स्तुवन्ति सदाच्युतम् ॥३
मुने स्तोत्र प्रवक्ष्यामि वासुदेवस्य मुक्तिदम् ।
शृणु येन स्तुतः सम्यक्पूजाकाले प्रसीदति ।।४
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम सर्वपापहारिणे ।
ममो यज्ञवराहाय गोविन्दाय नमो नमः ॥५
नमस्ते परमानन्द नमस्ते परमाक्षर ॥६
नमस्ते ज्ञानसभाव नमस्ते ज्ञानदायक ।
नमस्ते परमात नमस्ते पुरुषोत्तम ॥७
सूतजी ने कहा-हे शौनक ! अब हम भगवान् अच्युत के स्तोत्र रहेगे
जो कि समस्त पदार्थों के प्रदान करने वाला है। अब तुम उसका श्रवण करो।
एक बार देवर्षि नारद जी ने ब्रह्मा जी से इसको पूछा था तब जैसा भी उन्होंने
नारदजी से कहा था वही मैं तुमको बता रहा हूँ ॥१॥ नारद जी ने कहा-
जिस विधि-विधान से प्रक्षय मोर अव्यय तथा वरदान देने वाले भगवान् विष्णु
का स्तवन मुझे करना चाहिए मोर प्रतिदिन भर्चना करने के समय में उनकी
मच्युत् स्तोत्र ] i EU स्तुति जिस प्रकार में करनी चाहिए-यह मुझे पाप वर्णन करने के योग्य होते हैं ॥२॥ ये पुरुप इस लोक में परम धन्य है तथा उनका जन्म धारण करना भी यहुत ही शुभ है एव वे पस्यन मुग के प्रदान करने वाले है पोर उनका जीवन ही पूर्णत. मफन एवं मायंक है जो मदा भगवान् पशु स्तवन किया करते हैं ॥३॥ ब्रह्माजी ने कहा-है मुनिवर ! मैं भगवान वासुदेव के मुक्ति प्रदान कर देने वाले स्तोत्रमा वरांन करता हूँ, तुम उमा श्रवण करो। पूजन करने फे प्रवगर पर इग म्तोत्र के द्वारा स्तवन किये जाने पर भगवान् परम प्रमर हो जाया करते हैं ॥४॥ सोत्र यह है- भगवान वासुदेव के निपे नमस्कार है। ममम्न पापों के अपहरण करने वाले भगवान ६ मिये नमस्कार है। या वराह म्वर भगवान के लिये नमस्कार है भोर गोविन्द के लिये बारम्बार नमस्कार है ॥५॥ परम मानन्द स्वरूप पारे भगवन् ! मापक निये नमार है। है पर. माक्षर ! प्रापफी सम्मिपि में मंरा नमस्कार है॥६॥ पाप मान पं गन्द्राय । पापो नि ममम्बार है। हैजान के प्रदान करने वाले प्रभो ! पापको मे प्रणाम है । माप परम परत स्यम्प वाले है मोर पुष्पो में मातम मासे लिये मेरा मविनय प्रणाम है ॥७॥ नमस्ते विश्वदेव नमम्ने विश्वभावन । नमस्तेऽस्तु विश्वनाय नमम्ते विश्व कारण । गमम्ने मधुदत्यम्न नमस्ते रावरगालक । नमस्ते फमोनिन नमस्ते पेटभान नमन्ते सातपमान नमस्तं गाटापन। नमस्ते कालनेमिन नमस्ते गमहामन ।।१० नमम्त देशप नमस्ते गिनन्दन । नमा विमणीशन नमस्ते दिगिनन्दन । नमो गोगुनापाम नमस्ते गोपुनप्रिय ! जा गोप गुणा जय गोगगनप्रिय । जय गोयनापार जप मालपन॥ जर रापण पोरान जस पाएमान ।
। श्री गरहपुराण एव पवित्र होकर पढता है उम पच्युत भगगन मै चित्त को लगाने वाले मनुष्य को प्रकाल में कभी भी मृत्यु नही होगी ॥१०॥ अपने हृदय रूपी पन मे सयंदा संस्थिन, परम पुराण पुरुष, शाश्वत, प्रमान करने के योग्य भगवान् नारायण का विशेष रूप मे चिन्तन करे जो कि सूर्यदेव से भी अत्यधिक दीप्ति वाले हैं । ऐसा ध्यान करने वाला योगी मृत्यु को उमी प्रकार से मार्कण्डेय की भांति ही जीत लेता है ॥११॥ १११-अच्युत् स्तोत्र वक्ष्येऽहमच्युतस्तोत्र शृण शौनका सवंदम् । ब्रह्मा पृष्टो नारदाय यथोवाच तथापरम् ॥१ यथाऽक्षयोऽव्ययो विष्णुः स्तोतन्धो वरदो मया । प्रत्यहं चार्चनाकाले तथा त्व वक्त मर्हसि ॥२ ते धन्यास्ते सुजन्मानस्ते हि सर्वसुग्वप्रदाः । सफल जीवितं तेषां ये स्तुवन्ति सदाच्युतम् ॥३ मुने स्तोत्रं प्रवक्ष्यामि वासुदेवस्य मुक्तिदम् । शृणु येन स्तुतः सम्यक्पूजाकाले प्रसीदति ॥४ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः सर्वपापहारिणे । नमो यज्ञवराहाय गोविन्दाय नमो नमः ॥५ नमस्ते परमानन्द नमस्ते परमाक्षर ॥६ नमस्ते ज्ञानसद्भाव नमस्ते ज्ञानदायक । नमस्ते परमात नमस्ते पुरुपोत्तम ।।७ सूतजी ने कहा-हे शौनक ! अब हम भगवान् अच्युत के स्तोत्र कहेगे जो कि समस्त पदार्थो के प्रदान करने वाला है। प्रध तुम उसका श्रवण करो। एक बार देवर्षि नारद जी ने ब्रह्मा जी से इसको पूछा था तब जैसा भी उन्होने नारदजी से कहा था वही मैं तुमको बता रहा हूं ॥१॥ नारद जी ने कहा- जिम विधि-विधान से प्रक्षय और अव्यय तथा वरदान देने वाले भगवान् विष्णु का स्तवन मुझे करना चाहिए पोर प्रतिदिन अर्चना करने के समय में उनकी
अच्युत् स्तोत्र ]
-
स्तुति जिस प्रकार से करनी चाहिए-यह मुझे आप वर्णन करने के योग्य होते
हैं ॥२॥ वे पुरुष इस लोक में परम धन्य हैं तथा उनका जन्म पारण करना भी
बहुत ही शुभ है एव वे प्रत्यन्त सुम्ब के प्रदान करने वाले हैं और उनका जीवन
ही पूर्णत, सफल एव सार्थक है जो सदा भगवान् अच्युत् स्तवन किया करते
हैं ।।३।। ब्रह्माजी ने कहा- हे मुनिवर ! मैं भगवान् वासुदेव के मुक्ति प्रदान
कर देने वाले स्तोत्र का वर्णन करता हूँ, तुम उसका श्रवण करो। पूजन करने
के अवसर पर इस स्तोत्र के द्वारा स्तवन किये जाने पर भगवान् परम प्रसन्न
हो जाया करते हैं ।।४।। स्तोत्र यह है- भगवान वासुदेव के लिये नमस्कार है ।
समस्त पापो के अपहरण करने वाले भगवान के लिये नमस्कार है । पन वराह
म्वरूप भगवान के लिये नमस्कार है मौर गोबिन्द के लिये वारम्बार नमस्कार
है ।।५।। परम अानन्द स्वरूप वाले भगवन् ! अापके लिये नमस्कार है । हे पर.
माक्षर ! प्रापकी सन्निधि में मेरा नमस्कार है ॥६॥ माप ज्ञान के सद्भाव हैं
.यापके लिये नमस्कार है। हे ज्ञान के प्रदान करने वाले प्रभो ! मापको मेरा
प्रणाम है । आप परम अद्वैत स्वरूप वाले हैं और पुरुषो में सर्वोतम है मापके
लिये मेरा सविनय प्रणाम है ।।७।।
नमस्ते विश्वकृद्दव नमस्ते विश्वभावन ।
नमस्तेऽस्तु विश्वनाथ नमस्ते विश्वकारण 15
नमस्ते मधुदैत्यघ्न नमस्ते रावणान्तक ।
नमस्ते कसके शिघ्न नमस्ते कैटभार्दन ।।
नमस्ते शतपत्राक्ष नमस्ते गरुडध्वज ।
नमस्ते कालनेमिघ्न नमस्ते गरुडासन ।।१०
नमस्ते देवकोपुय नमस्ते वृष्णिनन्दन ।
नमस्ते रुक्मिणीकान्त नमस्ते दितिनन्दन ।
नमस्तै गोकुलावास नमस्ते गोकुलप्रिय ॥११
जय गोपवपुः कृष्ण जय गोपीजनप्रिय ।
जय गोवर्द्धनाधार जय गोकुलवर्द्धन ॥१२
जय रायवोरघ्न जय चारपूरनाशन !
६८ ] [ मी गरुडपुराण जय वृष्णिकुलोद्योत जय कालीयमदन ॥१३ जय सत्यजगत्साक्षिन् जय मर्वार्थसाधक । जय बेदान्तविद्वद्य जय सर्वद माधव ॥१४ हे विश्व की रचना करने वाले देव ! प्राप तो इस समस्त विश्व का पूर्णतया पालन एक रक्षण करने वाले हैं। प्राप सम्पूर्ण विश्व के स्वामो हैं पौर विश्व की रचना के कारण स्वरूप हैं । प्रापकी सेवा में मेरा बारम्बार प्रणाम है ॥६॥ हे मधु नामक दैत्य के हनन करने वाले प्रभो ! मापको नमस्कार है। गवण राक्षम के अन्न करने वाले प्रापके लिये मेरा प्रणाम है । कंस मोर वेशी के वध करने वाले तथा कैटम के हनन करने वाले भापके लिये मेरा प्रणाम है । ॥६॥ हे गरुडध्वज ! कमल के सइश मुन्दर नेयों वाले प्रभो! पापको मेरा प्रणाम है। हे गरुड़ के कार पासीन रहने वाले ! आपने कालनेमि का हनन किया था ! प्रापको सेवा मे मेरा प्रणाम है ॥१०॥ हे देवको के पुत्र ! हे वृष्णि नन्दन ! पापको मेरा नमस्कार है। हे रुक्मिणी के कान्त ! हे दिति को प्रानन्द देने वाले ! प्रापको मेरा नमस्कार है। आपका प्रावास गोकुल ग्राम में है और आप गोकुल के परम प्रिय है, मापकी सेवा मे मेरा प्रणाम है ॥११॥ हे कृष्ण ! पापने एक गोप का शरीर धारण करके भूमण्डल पर अवतार लिया है और गोपीजनो के परम प्रिय हैं, भापकी जय हो। आप गोवर्धन को प्राधार बन कर गिरिराज का सब भोग ग्रहण करने वाले हैं और गायो के कुल बढ़ाने वाले हैं, प्रापकी सदा जय हो ।।१२।। मापने रावण जैसे महा वीर का हनन किया था और चाणूर मल्ल का विनाश करने वाले हैं, आपकी सदा जय जयकार होवे । मापने जन्म लेकर विश्व मे वृष्णि कुल को प्रकाशित कर दिया था । आपने महा विषधर कालिय नाग का मर्दन कर दिया था, आपकी मदा जय हो ।।१३।। हे इस जगत् के सच्चे साक्षी प्रभो ! हे सम्पूण प्रयों के साधन करने वाले ! प्रापकी सर्वदा जय हो । है. मानत ! अाप देयान, के. बेला मली. पियों के वद्य हैं और सभी कुछ प्रदान करने वाले हैं. प्रापको सदा जप हो।।१४।। को
अच्युत् स्तोत्र
जय सर्वाथयाव्यक्त जय सर्वद माधव ।
जय सूक्ष्मचिदानन्द जय चिनिरञ्जन ।।१५
जयस्तेऽस्तु निरालम्ब जय शान्त सनातन ।
जय नाथ जगत्पुष्ट जय विष्णो नमोऽस्तु ते ॥१६
त्व गुरुस्त्व हरे शिन्यस्त्व दीक्षामन्त्रमण्डलम् ।
त्व न्यासमुद्रासमयस्त्वञ्च पुष्पादि साधनम् ॥१७
त्वमाधारस्त्वमनन्तस्त्व कूर्मस्त्व धराम्बुज ।
धर्मज्ञानादयस्न हि वेदिमण्डलशक्तय ॥१८
स्व प्रभो छलभृद्रामस्त्व पुन सवरान्तक ।
त्व ब्रह्मपिश्च देवस्त्व विष्ण सत्यपराक्म ॥१६
त्व नृसिंह परानन्दो वगहस्त्व धराधर ।
व सुवर्णस्तथा चक्रत्व गदा शद्ध एव च ॥२०
त्व श्री प्रभो पुष्टिस्त्व त्व माला देव शाश्वती।
श्रीवत्स कौस्तुभस्व हि शाङ्गी त्वञ्च तथेषुधि ॥२१
हे लक्ष्मी के पति देव । पाप सबके प्रत्यक्त रूप से माथय है पौर
समात अर्थों के प्रदान करने वाले हैं आपकी मदा जय हाये । है भगवान् ।
प्रापका स्यम्प परभ मूक्ष्मचित् अर्थात् शानमय मोर मानन्द प है। आप
सबारे चित्त के ररजन करन वाले हैं । प्रापको सदा जय हो ॥१५॥ पाप स्वय
विना अबलम्ब वार हैं-शान्त स्वरूप हैं और सनातन पर्थात् मवंदा स चल
पाने वाले तथा सदा रहन बाल हैं, पापको सदा जय हो। ह नाय । माप से
ही यह समस्त जगत् पोपण प्राप्त कर पुष्ट होता है। है विष्णो । भापकी जय
हो और पापये लिय मेरा नमस्कार है ॥१६॥ हे हरे । पाप हो गवई पमान,
4 नाश करने वाले गुरु है मोर पाप ही दीक्षा देने वाल मन्त्रो पा मएन
है-पाप म्पाम, मुद्रा पौर ममय हैं तथा पुष्प मादि की पचना ये साधन
भी पाप है। हे॥१७॥ प्रभो पाप हो सर ये माधार है पोर पाप मान्न
है । पाप ही भूमि का पाधार सूर्ण है, पाप धरा है और पापही पम्युन
अर्थात नया है। जो घम और ज्ञान आदि है ये मभो पापा हो गए है।
१०० ]
[ थी गरुडपुराण
वेदि मण्डल मौर शक्तियां भी पाप ही हैं ॥१८॥ हे प्रभो । माप ही छल मृत
राम हैं और फिर पाप ही सवरान्तक हैं । आप ही ब्रह्मपि देव हैं और सत्य
पराक्रम वाले विष्णु रूप भी पाप ही है ॥१६॥ परम प्रानन्द स्वरूप नृसिंह
भी पाप हैं और इस धरा मण्डल को धारण कर पातालसे लाने वाले वाराह भी
आप ही हैं । आप सुन्दर वर्ण वाले हैं तथा शह-चक्र और गदा जो प्रायुध
हैं वे भी सब माप के हो स्वरूप हैं ॥२०॥ हे प्रभो ! माप ही श्री हैं-माप ही
पुष्टि हैं माप ही बनमाला हैं हे देव ! जो वनमाला सर्वदा धारण किये हुए
हैं आप ही श्री वत्स हैं-पाप ही कौस्तुभ हैं भोर पाप ही शाङ्ग धनुष
है ।। २१ ॥
त्व खङ्गचर्मणा साद्ध म दिक्पालस्तथा प्रभो।
ल रक्षोऽधिपति साध्यस्त्वं वायुस्त्व निशाकर ॥२२
श्रादित्या वसवो रुद्रास्त्वमश्विन्यो मरुद्गणा ।
त्व देत्या दानवानागास्त्व यक्षा राक्षसाः खगा ॥२३
गन्धर्वाप्सरसः सिद्धा पितरस्त्व महामरा ।
भूतानि विषयस्त्व हि त्वमव्यक्त न्द्रियाणि च ।।२४
मनोवुद्धिरहवारः क्षेत्रज्ञस्त्व हृदीश्वर::
त्व यज्ञस्त्व वपटकारस्त्वमोङ्कार समित्कुश ॥२५
त्व वेदी त्वहरे दीक्षा त्व यूपस्त्व हुताशन ।
त्व होता यजमानस्त्वं त्वं धान्य. पशुयाजक ॥२६
त्वमध्वर्युस्त्वमुद्गाता त्व यज्ञ पुरुपोत्तम ।
दिक्पातालमही व्योम द्यौस्त्व नक्षत्रवारक. ॥२७
देवतिर्यड मनुप्येषु जगदेतच्चराचरम् ।
यत्किञ्चिदृश्यते देव ब्रह्माण्डमसिल जगत् ॥२८
तव रूपमिदं सर्व दृष्टयर्थ सप्रकाशितम् ।
नाथ यत्ते पर ब्रह्म देवैरपि दुरासदम् ॥२६
धर्म के साथ यह भी पार हैं और हे प्रभो ! समस्त दिशामी के
पाला दिरापान भी पाप ही है । प्राप दासोपं अधिपति हैं । पाप ही साध्य
अच्युत् स्तोत्र ] १०१ -- तथा वायु और निशाकर चन्द्र भी आप ही हैं ॥ २२ ।। द्वादश आदित्य---- पाठ वमुगरण-एकादश रुद्र-~-दोनो अश्विनी कुमार एव मरुद्गण आप ही है अर्थात् मापके ही ये सब विभिन्न रूप हैं। आप ही दैत्यो के रूप में रहते है-माप ही दानव हैं-नाग, यक्ष, राक्षस सग, गन्धर्व, अप्सरा, सिद्ध और पितृगण तथा महान् अमर गण भी माप ही हैं अर्थात् ये सब आपके हो स्वरूप है । तात्पर्य यह है कि आपके अतिरिक्त अन्य कही भी कुछ नहीं है सर्वत्र सभी रूपो मे भाप ही विराजमान हैं। समस्त भूत और विषय पाप ही हैं। पाप हो अव्यक्त हैं और समस्त इद्रियां भी आपका स्वरूप हैं ।। २३ ।। २४ ।। मन-बुद्धि-अहङ्कार भोर हृदय में क्षेत्रज्ञ ईश्वर गी माप ही हैं। पाप ही यज्ञ हैं-माप हो वषटकार और भोकर भी हैं तथा कुश एव समित् भी भापका स्वरूप हैं ॥२५॥ हे हरे ! पाप ही वेदो-दीक्षा-यूप और हुतागन है । प्रार हो होता हैं और पाप ही यजमान हैं । आन ही धान्य तथा पशुपाजक हैं ॥२६॥ पाप ही अध्ययु हैं और प्राप ही उद्गाता हैं । माप ही पुरुषोत्तम एव यश भी माप ही हैं। दिशाएँ-पाताल-मही-व्योम-यो और नक्षत्र मादि सब पाप ही के स्वरूप हैं ।। २७ ॥ देवगण-विर्यक योनि के जन्तु तथा मनुष्य के स्वरूप मे जो यह चर एव प्रचर जगत् है तथा हे देव । यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जगत् जो कुछ भी दिखलाई देता है यह सब पाप ही का रूप है मौर दृष्टि के लिये ही ये सब सम्प्रकाशित हुए हैं। हे नाथ आपका जो परात्पर स्वरूप है जिसे ब्रह्म कहा जाता है वह तो देवो के द्वारा गो दुष्प्राप्त होने वाला है साधारण जन्तु तो प्राप्र ही से कर सकता है ? ॥२८॥२६॥ - ? कस्तज्जानाति विमल योगिगम्यमतीन्द्रियम् अव्यय पुरुप नित्यमव्यक्तमजमव्ययम् ।।३० प्रलयोत्पत्तिरहित सर्वव्यापिनमीश्वरम् । सर्वज्ञ निर्गुण शुद्धमानन्दमजर परम् ॥३ बोधस्पध्रव शान्त पूर्णमदं तमक्षयम् । अवतारेषु या मूत्तिविहरे व दृश्यते ॥३२ १०२ ] [ श्री गरडपुरात के परं भावमजानन्तस्त्वां भजन्ति दिवौकसः । कथं त्वामीदा सूक्ष्मं शक्नोमि पुरुषोत्तम ॥३३ पुष्पधूपादिभिर्यत्तत्तव सनविभूतयः । सङ्कर्पणादि हे देव तव यत्पूजितो मया ॥३४ क्षन्तुमर्हसि तत्सर्न यकृतं न कृत मया । न शक्नोमि विभो सम्यक्तव पूजां यथोदिताम् ॥३५ मापके उस ब्रह्म स्वरूप को कौन जानता है ? वह तो मत्यन्त विमल- योगियो के द्वारा जानने के योग्य होता है और वह इन्द्रियो से भी परे को बग्तु है । ब्रह्म का स्वरूप प्रव्यव गुरुप है--नित्य--अव्यक्त-प्रज और नाश रहित है ।।३०॥ ब्रह्म प्रलय तथा उत्पत्ति मे रहित है--सर्वत्र व्याप्त रहने वाला पोर मबका ईश्वर है । वह सर्वज्ञ अर्थात् सभी कुछ ज्ञाता हैं। ब्रह्म में धोई भी गुग्ण नहीं है प्रर्थान् गुणो से शून्य निर्गुण हैं। उस ब्रह्म का शुद्ध म्वरूप होता है । जरा से ( वार्धका से ) रहित परातर और प्रानन्दमय वह होता है ॥३१॥ ब्रह्म वोध प्रर्थात् ज्ञान के स्वरूप वाला है-ध्रव है-शान्त है-पूर्ण है तथा क्षय से यून्य एव हैनभाव से विपीन होता है। जो उसी ब्रह्म की मूत्ति प्रवतीर्ण होकर इम लोक मे अवतार धारण दिया करती है वह मत्र पिचर किया करती है और हे देव ! वह मवके द्वारा दिखलाई देती है ।। ३२ ।। हे पुरषो मे परमश्रेष्ठ ! उम अापके ग्रह्म स्वरूप के परम भाव का जान न रखने वाले देवगण प्रापका भजन एव सेवन किया करते हैं। प्रापके इम प्रकार के मूहम स्वरूप को कैसे प्राप्त कर मक्ते हैं ।। ३३ ॥ गन्धाक्षत पुटर पूरा दीपादि पूजनोपचागे के द्वारा मैंने जो सरपण मादि की प्रनिभानो का पचन किया है वे मर प्राप हो की विभूतिया है। उन पापको विभूतियो का पूजन भी पाप हो पूजन है ॥३४॥ हे यिभो ! मैंने जो कुछ भी मापकी प्रचंना पादिमी है और जो कुछ भी नहीं किया है अर्थात् मुभम ओ चुट रह गई है उन गयो भाप क्षमा करने में योग्य होते हैं। हे प्रभो ! जिम प्रगर में बाकी पूजा बनाई गई है उमे ठीक तरह से में नहीं कर सकता है।॥ ३५ ॥ - अच्युत् स्तोत्र यत्कृत जपहोमादि असाध्य पुरुषोत्तम । विनिप्पादयितु भवत्या अतस्त्वा क्षमयाम्यहम् ॥३६ दिवारानी च सन्ध्याया सर्वावस्थासु चेष्टत । अचला तु हरे भक्तिस्तवाघ्रियुगले मम ॥३७ शरीरेण तथा प्रीतिन च धर्मादिकेषु च। यथा त्वयि जगन्नाथ प्रीतिरात्यन्तिकी मम ॥३८ किं तेन न कृत कर्म स्वगमोक्षादिसाधनम् । यस्य विष्णो दृढा भक्ति. सर्वकामफलप्रदे॥३६ पूजा कत्तं तथा स्तोत्र क. शक्नोति तवाच्युत । स्तुत तु पूजित मेऽद्य तत्क्षमस्व नमोऽस्तु ते ॥४० इति चक्रधरस्तोर मया सम्यगुदाहृतम् । स्तौहि बिष्ण मुने भक्त्या यदीच्छसि पर पदम् ॥४१ हे पुरुषोत्तम । मैंन जो कुछ भी असाध्य अर्थात् माधना अयोग्य जप एव होम प्रादि को विशेष रूप से निष्पादित करने के लिये भक्तिभाव पूर्वक किया है। उनमें बहुत-मी त्रुटियां अवश्य ही रही होगी। प्रतएव में पाप से उन सब के लिये क्षमा की याचना करता है ।। ३६ ।। दिन भोर राति मे तथा दोनो मन्धि काला मे एव सभी प्रकार की प्रस्थानो में स्थित रहकर चेष्टा करते हुए मेरी हे हरि भगवन् । प्रापय चरण युगत में अचल भक्ति है ।।३७।। ह जगत् के नाथ । धम प्रादि अन्य पार्यो म मेरी शरीर के द्वारा उम प्रकार की प्रीति नही है जमी कि प्रात्यन्ति की प्रीति मेरी प्रापरे चरण पमन में रहती है ॥ ३८ ॥ उत पुरुप ने स्वर्ग और मोक्ष प्रादि का कौन-सा साधन नही कर लिया है । जिमकी समस्त कामनाप्नो १ पनो को प्रदान कर देने वाले भगवान् विष्णु के परणायित मे परम सुदृढ भक्ति होती है। विष्णु की भक्ति ही समस्त कर्मों फलो को प्रदान करने वाली होती है। इसक मरने के बाद फिर अन्य विमो भी धर्मादि साधन करने की भावश्यकता हो नही रहा करती है ॥३६॥ हे मच्युत् । पपगी उम प्रसार की विधि विधान पूर्वर पचना तथा माप स्तोत्रमा पाट फोन पुरप करने में समर्थ होता है 7
१०४ ।
[ श्री गरुडपुराण
अर्थात् कोई भी कर नही सपना है। हे भगवन् ! प्राज मैंने आपका स्तवन
किया है और पापका अर्चन भी किया है । इनमे बहुत-सो त्रुटियां जो हो गई
हैं उन्हे पाप कृपाकर क्षमा कर देवें। आपके लिये मेरा वारम्वार नमस्कार
है ।। ४० ॥ यह भगवान् चक्रधारी का स्तोत्र मैंने भली भांति वर्णन करके
तुमको बना दिया है । हे मुने ! यदि आप परम पद के प्राप्त करने की इच्छा
रखते हो तो भक्ति की भावना से भगवान् विष्णु का स्तयन करो। एकमात्र
इसी से तुमको सर्वोत्तम पद की प्राप्ति हो जायगी और पूर्ण कल्याण
होगा ।। ४१ ।।
स्तोत्रेणानेन यः स्तौति पूजाकाले जगद्गुरुम् ।
अचिराल्लभते मोक्ष छित्त्वा ससारवन्धनम् ।।४२
कल्येऽपि यो जपेद्भक्त्या त्रिसन्ध्य नियत. शुचिः ।
इदं स्तोत्र मुने सोऽपि सनकाममवाप्नुयात् ।।४३
पुत्रार्थी लभते पुत्रान्वद्धो मुच्येत बन्धनात् ।
रोगाद्विमुच्यते रोगी निधनो लभते धनम् ॥४४
विद्यार्थी लभते विद्यां यशः कीत्तिञ्च विन्दति ।
जातिस्मरत्व मेधावी यद्यदिच्छति चेतसा ॥४५
अधन्यः सर्व वित्प्राज्ञस्त्वसाधुः सर्नकर्मकृत् ।
सत्यवाक्यः शुचिता यः स्तोति पुरुषोत्तमम् ॥४६
साधुशीला हि ते सर्वे सर्व धर्मवहिष्कृताः ।
येपा प्रवर्तन नास्ति हरिमुद्दिश्य सस्क्रियाः ।।४७
नाशीचं विद्यते तस्य मनो वाक् च दुरात्मन ।
यस्य सर्वार्थदे विष्णौ भक्ति ग्यभिचारिणी ॥४८
आराध्य विधिवद्दे व हरिं सर्गमुखप्रदम् ।
प्राप्नोति पुरुप. सम्यग्यद्यत्प्रार्थयते फलम् ॥४E
इस भगवान् विषा के स्तोत्र के द्वारा विष्णु के प्रचंन के समय मे
सम्पूर्ण जगत् के गुरु भगवान् विष्णु का जो भी कोई पुरुप स्तवन किया करता
है यह बहुत ही शीघ्र ससार फे सम्पूर्ण विशाल बन्धनो का छेदन करके मवश्य
अच्युत् स्तोत्र १०५ - हो मोक्ष पाने का लाभ प्राप्त कर लिया करता है ।।४२॥ जो पुरुप प्रात काल में भी भक्ति भाव पूर्वक नियत रूप से पवित्र होकर तीनों सम्ध्या में इस स्तोत्र का जाप किया करता है हे मुनिवर | वह पुष्प भी अपनी सभी काम- नामो के फलो को प्राप्त कर लिया करता है ॥४३॥ जो पुत्र के प्राप्त करने की कामना रम्बकर इस स्तोत्र का जप करता है वह पुया की प्राप्ति किया करता है और जो सासारिक बन्धनो मे बँधा हुआ उन मब से छुटकारा पाने के लिये इस स्तव मा जाप करता है वह उन सभी व.धनो से मुक्त हो जाता है। जो कोई रोग से मुक्त होने वाला इस विष्णु के स्तोत्र का जाप करता है वह रोग से छुटकारा पा जाता है पौर धन रहित पुरुष धन की प्राप्ति कर लेता है ।। ४४ ॥ विद्या की चाह रखने वाला पुरुप पूण विद्या का लाभ प्राप्त कर लेता है तथा इमी प्रकार से यश और पति को भी प्राति किया करता है । मपनी गानि म प्रमुखता का भी इस स्तोत्र के पाठ एव जाप के प्रभाव से मनुष्य प्राप्त कर लेता है। मेघावी पुरुष जो-जो भी चित्त स चाहता है उसी का लाभ निश्चय ही उसपो हो जाया करता है। जो मधन्य है वह इस स्तव के प्रभाव से मरका वैत्ता परम प्राश हो जाता है और जो साधु है वह समस्त दमों के करन वाला बन जाया करता है । जो मस्य वचनों के बोलने वाला-परम पवित्र हो कर तथा दान शील रहत हए इम मात्र द्वारा भगवान् पुरुषोत्तम का स्तवन करता है उसमा मयताभाव से पूण पत्यारा हा जाता है ॥४५॥४६॥ जा चाह माधु शील भी हों किन्तु व मद ममन घमा से वहिप्न होते हैं जिनकी प्रवृत्ति भगवान् विष्ण की गाग्निधि प्राप्त करने के उदय का लेकर नही होती है । ४७ ।। उप दुरा(म्य व मन तथा वाणी में कभी शुचिता नही रहा करती है जिसपी सर पपो क प्रदान करने वाले भगवान् विष्णु मे भव्यभिचारिणी भक्ति नही होती है। मभिचार रहित अर्थात् प्रात्यन्तिको विष्णु भक्ति का होना परमावश्या गाधन मानव नि यम प्राप्त करने का लिय होता है ।। ४८ ॥ मद मुखो क पदान करने वाले हरिदय का विधि पूर्वक माराधन कर क मनुष्य मिम जिस भी फल पान की प्रार्थना परता है उमी उसी पन का लाभ यह अवश्य ही र लेता है- सपन िभी सन्दह नही है ॥४६॥ .
[ श्री गरुडपुरागा
११२-रोग नाशन वैष्णव कवचम्
श्वेतद्वीपनिवासी च श्वेतद्वीपं नयत्वजः ।
सन्शिन्सूदयतु मधुकैटभमूदनः ॥१
विष्णः सदा चाकर्षतु किल्बिप मम विग्रहात् ।
हसो मत्स्यस्तथा कूर्मः पातु मा सर्वतो दिशम् ॥२
त्रिविक्रमस्तु मे देवः सन्पिापानिगृह्यतु ।
तथा नारायणो देवो बुद्धि पालयता मम ।।३
गेपो मे निर्मत शान करोत्वज्ञाननाशनम् ।
बड़वामुखो नाशयतु कल्मप यत्कृत मया ॥४
पद्भया ददातु परम मुवं मूनि मम प्रभुः ।
दत्तात्रेयः कलयतु मनपशुवान्धवम् ॥५
सनिरीन्नाशयतु राम, परशुना मग।
रक्षोघ्नस्तु दाशरथिः पातु नित्य महाभुजः ॥६
गा न्हलेन मे हन्याद्रमो यादवनन्दनः ।
प्रलम्यगिधारपूर पूतनाकमगाशन ।
कृष्णस्य यो बालभावः स मे कामान् प्रयच्छत् ॥७
रोग नाशन वैष्णव कवचम् ]
१०७
भगवान परशुराम अपने परशु से मेरे राभी शत्रुप्रो का नाश कर देवे ! सम्पूर्ण
राक्षसो के सहार करने वाले भगवान् दाशरथि श्री राम जिनकी बडी बडी
मुजाएं हैं मेरी नित्य ही रक्षा करें ।। ६ ।। भगवान् बलराम जो कि यादव
कुल में अवतीर्ण हुए हैं अपने हल से मेरे समस्त शत्रुप्रो का हनन करे ।
प्रलम्ब-शी-चारगूर-पूनना और कम के नाश करने वाला जो भगवान्
श्री कृष्ण का वाल भाव है वह मेरी समस्त कामनाओ को प्रदान करें ।।७।।
अन्धकारतमोघोर पुरुष कृपण पिङ्गलम् ।
पश्यामि भयसत्रस्त पाशहस्तमिवान्तकम् ॥
ततोह पुण्डरीकाक्षमच्युत शरण गत ।
धन्योऽह निर्भयो नित्य यस्य मे भगवान्हरिः ME
ध्यात्वा नारायण देव सर्वोपद्रवनाशनम् ।
वैष्णव कबच बद्ध्वा विचरामि महीतले ॥१०
अप्रधृष्योऽस्मि भूताना सर्वदेवमयो ह्यहम् ।
स्मरणाद्देवदेवम्य विष्णारमिततेजस ॥११
सिद्धिर्भवतु मे नित्य यथा मन्त्रमुदाहृतम् ।
यो मा पश्यति चक्षुभ्यां यश्च पश्यामि चक्षुपा ।।
सपा पापदुष्टाना विष्णुर्वध्नाति चक्षुपी ।।१२
वासुदेवस्य यच्चक तम्य चक्रस्य ये त्वरा ।
ते हि छिन्दन्तु पापानि मम हिसन्तु हिंसकान् ॥१३
अन्धकार तम से परम घोर कृष्ण गौर पिङ्गल वगा वाले पुरुष को
जिसके हायो मे पास है साक्षात् यम क समान मैं जब देखता हूँ तो भय से
एकदम समस्त हो जाता हूँ । नव मैं पुण्ड गेय व समान प्रो बाले भगवान्
च्युत् के भरणागति मे प्राप्त हुआ हूं। मैं परम घ•य एव भाग्यशाली हूँ कि
फर में निर्भय हो जाता है क्योकि मैं नित्य ही भगवान् हरि के सनिकट में
स्थत रहता हूँ ।। ८ । ६ ।। सम्पूर्ण उपद्रयो के नाश करने वाले देव नारायण
ध्यान करके और इम वैष्णु सम्बन्धी वैष्णव ववच यो वाष पर मैं निर्भय
स महो मण्डल में विचरण करता हूं ।१०। मैं भूतो के प्रघपण करन
[ श्री गरु पुराण के भयोग्य हूँ और मैं सब देवो से परिपूर्ण हूं अर्थात् सब देव मेरे साथ हैं। अमित तेज वाले भगवान विष्णु जो देवों के भी देव हैं उनके स्मरण का ही यह प्रभाव है ।। ११॥ जैसे ही मैंने मन्त्र का उच्चारण किया वैसे ही मुझे नित्य सिद्धि होवे । जो मुझको नेत्रों से देखता है और जिस को मैं नेत्र से देखता है, भगवान् विष्णु समस्त दुष्ट पापियो के नेव को बांध देते हैं ॥१९॥ भगवान् वासुदेव का जो थमा है और उस चक्र की जो त्वराऐ हैं वे पापो का छेदन करें और मेरे हिसको की हिंसा कर देवें ॥१३॥ राक्षसेषु पिशाचेषु कान्तारेष्वटवीपु च । विवादे राजमार्गेषु धूतेषु कलहेषु च ॥१४ नदीसन्तारणे घोरे सप्राप्त प्राणसशये। मग्निचौरनिपातेषु सर्व प्रहनिवारणे ॥१५ विद्य त्सर्पविपोद्वगे रोगे च विघ्नसङ्कटे। जप्यमेतज्जपेन्नित्य शरीरे भयमागते ॥१६ अय भगवतो मन्त्री मन्त्राणा परमो महान् । विभ्यात कवच गुह्य सर्व पापप्रणाशनम् ॥ स्वमायाकृतनिर्माणकल्पान्तगहन महत् ।।१७ ॐ अनाद्यन्त जगद्वीज पद्मनाभ नमोऽस्तु ते ॥१८ राक्षसो मे---पिशाचो में-घोर वनो मे-प्रवियो में-विवाद अवसर पर--राजमागों में-धूतों मे और क्लदो में-नदी , सन्न्तरण में--- घोर प्राणो के सराय के अवसर पर-प्रग्नि, चौरो के नियातो म---सव यह के निवारण में विद्युत्-सर्पविप-द्वेग मे-रोग में-विघ्नो के मङ्कट इस क्यच का जाप नित्य ही करना चाहिए और जिस समय में भी दारो पर कोई भय उपस्थित ने इसका जाप करे। यह भगवान् का मन्त्र है समस्त मन्त्रो म यह परम महान् है । यह वैष्णव कवच मनि विख्यात पोर भत्यन्त गोपनीय है । यह गमस्त पापों का नाम है। अपनी माया किये गये निर्माण और कल्यान ये ममान महान् गहन है ॥ १४॥ १५ ॥ १६ ॥ १७ ॥ मन्त्र-"ॐ पनान्त बगीज पपनाम नमोऽस्तुते a ।
सर्वकामद विद्या कथन [ १०६ अर्थात् माप प्रादि और अन्त से रहित हैं-इस जगत के बीज स्वरूप प्राद कारण हैं-पापको नाभि मे पद्य है ऐसे अापके लिये प्रणाम है ॥१८॥ ११३--सर्वकामद विद्या कथन सव कामप्रदा विद्या सप्तरात्रेण ता शृगु । नमस्तुभ्य भगवते वासुदेवाय धीमहि ॥१ प्रद्युम्नायानिकद्धाय नम सङ्कर्षणाय च । नमो विज्ञानदात्रे च परमानन्दमूर्तये ॥२ आत्मारामाय शान्ताय निवृत्तद्वतदृष्टये । त्व रूपाणि च सर्वाणि तस्मात्त म्य नमो नमः ॥३ हृषीकेशाय महते नमस्तेऽनन्तमूर्तये । यस्मिमिनिद यतश्च तत्तिष्ठत्यन्योऽपि जायते ॥४ मृन्मयी वहसि क्षोणी तस्मै ते ब्रह्मणे नम । यन्न स्पृशन्ति न विदुर्मनोबुद्धीन्द्रियासव ॥ अन्तर्वहिश्चरसि त्व व्योमतुल्य नमाम्यहम् ॥५ ॐ नमो भगवते महापुरुपाय महाभूतपतये सकलसत्वभावि. ब्रोडनिकरकमलरेणूत्पलनिभधारयविद्यया चरणारवि- न्दयुगल परमेष्ठिन्नमस्ते अवापविद्याधरता चिनकेतोश्च विद्यया ।।६ श्री हरि ने कहा-समस्त कामनाघो वे प्रदान करने वाली उस विद्या को सात रानि पर्यन्त श्रवण करो। भगवान प्रापके लिये नमस्कार है। वासु- देव भगवान का ध्यान करते हैं ॥१॥ प्रथम-पग्निरुद्ध मोर सरपंण भगवान् के लिये नमस्कार है। पिज्ञान के दाता के लिय मोर परम मानन्द की भूमि के लिये नमस्कार है।॥ २॥ अपनी ही मारमा में रमण करने वाले-शान्त स्वरूप और दैत दृष्टि के निवृत्त हो जाने वाले मापके लिये मेरा गमसार है। पाप ही समस्त रूपो में विद्यमान है। इसलिये मापको पारम्पार नमस्मार ११० 1 [ श्री गरु पुराण है ।। ३ ॥ भगवान् हुपीकेप और महान अनन्तमूत्ति के लिये मेरा नमस्का है । जिसके स्वरूप में यह सम्पूर्ण जगत् है पौर जिमसे इसकी उत्पत्ति होत है तथा जिसमें यह स्थिति प्राप्त किया करता है एवं अन्य भी समुत्पन्न होर है, उन भगवान के लिये मेरा नमस्कार है । जो इस मृत्तिकामयी पृथ्वी व वहन करते हैं न्न ब्रह्म के लिये नमस्कार है। जिसका मन-बुद्धि-इन्द्रि पोर प्राण स्पर्श नही किया करते हैं और न जानते ही हैं। हे भगवन ! मा बाहिर पौर भीतर सर्वत्र विचरण किया करते हैं और ब्योम के समान हैं मैं ऐसे पाप के लिये नमस्कार करता हूँ ॥४॥५॥ मन्त्र- 'ॐ नः भगवते चित्रो तोन विद्यया"-अर्थात् महाभूतो के पति महा पुरुष भगव के लिये नमस्कार है । समस्त सत्त्वो के, भाविद्रोड के, समुदाय के, कमल रे के. उत्पल के तुल्य धर्म नाम वाली विद्या से चरणारविन्द युगल परमे आपके लिये नमस्कार है । चित्रकेतु की विद्या से आपने विद्यापरता का प्र' किया था ऐसे प्रापके लिये नमस्कार है ॥६॥ - ११४-व्याकरण कथन अथ व्याकरण वक्ष्ये कात्यायन समासत । सिद्धशब्दविवेकाय बालव्युत्पत्तिहेतवे ॥१ सुप्तिडन्त पद स्यात सुप सप्त विभक्तयः । स्वौजसः प्रथमा प्रोक्तासा प्रातिपदिकात्मके ।।२ सम्बोधने च लिङ्गादावुक्त कर्मणि कर्तरि । अर्थवत्प्रातिपदिक धातुप्रत्ययवजितम् ॥३ प्रमोशसा द्वितीया स्यातकर्म क्रियते च यत् । द्वितीया कर्मणि प्रोक्ताऽन्तरान्तरेण सयुते ॥४ टाभ्याभिसस्तृतीया स्यात्करणे वत्तरीरिता। येन क्रियते तत्करणं कर्ता यश्च करोति सः ॥५ डेभ्याम्यसश्चतुर्थी स्यात्सम्प्रदाने च कारके। यस्म दित्मा धारयते,रोचते सम्प्रदानकम् ॥६ " पञ्चमी स्यान्डसिम्यांभ्यो ह्यपादाने च कारकै । यतोऽपति समादत्ते अपादत्ते भयं यतः ।।७ कुमार ने कहा -इसके मनन्तर अब में व्याकरण के विषय में बतलाना हूँ । हे कात्यायन ! बाल को को गुरपति के निमित्त मिद गन्दी के विवेक के लिए संक्षेप में इसका वर्णन किया जाना है |शा सुवन्त पौर तिइन दो प्रकार के पद कहे गये हैं । मुप ये भात विभक्तियों होती हैं । सु-ओ-जम् नाम घाली प्रातिपदिक म्प शब्द मे तीन, एक वचन, द्विवचन मोर बहुवचन में विभ- कियां प्रथमा कही जाती हैं ॥२॥ यह प्रथमा विभक्ति सम्बोधन में-लिज़ादि मे, उक्त पर्म में प्रर्थात् वही बहो मर्म को ही प्रधानना कपित हो और फर्ता में होती है । जो शन्द प्रथं याना हो मोर धातु एव प्रत्यय मे रहित हो वही प्राति- पदिक कहा जाता है ॥३।। अम्-मो-स्-- तीनो वननो मे कम पी विभ- • तिया होती है । अन्तरा पोर मन्रेण मे मयुत में और वर्म में द्वितीया विभक्ति होनी है ॥४॥ टा-म्यान्-भिगये नोनो यचनो में वरण की विभक्तिया होती है। ये वक्त कर्म जहा होता है वहां पर्ता में भी होती हैं। जिसके द्वारा किया जाता है अर्थात् जो ग्रिया का मान होता है वह करण कहा जाता है. मौर जो शिया को करता है वह वर्ना होता है | इ-माम्-म्यग-ये सीन पयनों में तीन विभक्रिया चतुर्थी पही जानी हैं और मम्प्रदान कारक में होती हैं । जिम के लिये देने की इच्छा होती है और जो मनिका पात्र होता है वह सम्प्रदान कहा जाता है ॥६॥ इमि-भ्याम्-यस्-ये तीन पचनी में पपी विभक्ति होती है जो पपादान कार में होती है। वही में अपगम्न छोरा है, समादान होना वा भगदान एव मप जिसमे हाता है यहा पर पान पारपा करना है ॥७॥ मोमाम पष्ठी स्याम्बानिगम्बन्धगुम्यो । इयो.मुपच मतमो म्यात् मा पाधिकरी भवेत् ।। पापाराधिकरगो रक्षार्याना प्रयोगत.। मितचानोमित पत्तदादानान्मृतम् ॥ বষণা শৰ্মা হলনা ।
११२ ]
[ श्रो गरडपुरार
1
एनयोगे द्वितीया स्यात्कर्मप्रवचनीयकैः ।।१०
वीप्सेत्थम्भावचिह्नभिर्भागे चैव परिप्रती ।
अनुरेषु राहार्थे च हीनेऽनूपश्च क्थ्यते ॥११
द्वितीया च चतुर्थी स्याच्चेष्टाया गतिकर्मणि ।
अप्राणे हि विभक्ती व मन्यकर्मण्यनादरे ॥१२
नम• म्वस्ति स्वधा स्वाहालवपड्योग ईरिता ।
चतुर्थी चैव तादर्थ्य तुमर्याद्भाववाचिनः॥१३
तृतीया सहयोगे स्यात्कुत्सितेऽङ्ग विशेषण।
काले भाये सप्तमी स्यादेतोगेऽपि पप्ठ्यपि ॥१४
डस्, प्रोस्, पाम्-ये तीनो वचनो मे पष्ठी विभक्ति के रूप होते हैं।
यह पष्ठी विभक्ति मुख्यतय स्वामी के सम्बन्ध मे ही हुआ करती है । डि, पोस्,
सुप-ये तीनो वचनो मे सप्तमी विभक्ति के रूप होते हैं। यह मधिकरण में
होती है ।।८॥ जो क्रिया का होना जिस स्थान, समय मादि में होता है वही
उसका आधार होता है उसे ही अधिकरण कहा जाता है । रक्षार्थों के प्रयोग से,
ईप्सित भोर मनीसित जो होता है वह अपादान कहा गया है । परि, पप् पौर
श्राड के योग मे तथा इतरत्-ऋते और अन्य दिशा के मुख मे भी पञ्चमी
होती है । एन के योग मे द्वितीया होती है तथा कर्म प्रवचनीय नामक सज्ञा के
योग में द्वितीया विभक्ति हुमा करती है ।।८१९१०६ वीप्सा में-इत्थभाव चिह्न
में-पभिभाग में परि और प्रति के याग में-महायं में अनु और हीन मे अनूप
कहा जाता है ॥११॥ भोर इनमे द्वितीया विभक्ति होती है। चेष्टा में, गति कर्म
मे प्रौर मप्रमाण मे, मन्य कमं मे और मनादर मे द्वितीया तथा चतुर्थी दोनो
विभक्तियां होती हैं ।।१२।। नम -स्वस्ति, स्वधा, स्वाहा, अल, वषट्-इनके
योग में भी चतुर्थी विभक्ति कही गई है । तादथ्य में भोर गाववाची तुमथ मे
प्रर्थात् तुमुन् प्रत्यय के पर्थ में भी चतुर्थी विभक्ति हुआ करती है ।।१३॥ मह
पौर सहायक मन्य भी किसी शब्द के योग मे एव कुत्सित मङ्ग के विशेषरण
के होने पर तृतीया विभक्ति होती है। काल में और भाव में सप्तमी होती है
और इनके योग में पष्टी भी होती है ॥१४॥
व्याकरण कथन ]
स्वामीश्वराधिपतिभि. साक्षाद्दायादसूतकः ।
निर्धारणे द्व विभक्ती पष्ठी हेतुप्रयोगके ॥१५
स्मृत्यर्थकर्मरिण तथा करोतेः प्रतियत्नके।
हिंसार्थानां प्रयोगे च प्रतिकर्मणि कर्तरि ॥१६
न कर्तृ कर्मणोः पष्ठीनिष्ठयोः प्रातिपादिके ।
द्विविध प्रातिपदिक नाम धातुस्तथैव च ।।१७
भुवादिभ्यस्तिङो ल:स्याल्लकाग दश वै स्मृताः ।
तिप्तसन्ति प्रथमो मध्यः सिप्यसथोत्तमपुरुष. ॥१८
मिब्वस्मस्परस्मै तु पदानाश्चात्मनेपदम् ।
त प्रात अन्ते प्रथमो साथे ध्वे च मध्यमः ॥१६
स्वामी, ईश्वर, अधिपति और साक्षात् दायाद तथा सूतको के साथ
निर्धारण करने मे दो विभक्तियां होती है । हेतु के प्रयोग मे षष्ठी विभक्ति हुमा
करती है ।।१५।। स्मृति के मर्थ कर्म मे तथा कृञ् धातु के प्रति यत्न मे और
हिसार्थको के प्रयोग मे प्रतिकर्म कर्ता मे पष्ठी होती है ।।१६॥ प्रातिपदिक मे
निष्ठ फर्ता पोर कर्म में पष्ठी नहीं होती है । प्रातिपदिक दो प्रकार का होता है।
एक नाम है और दूसरा धातु है ।।१७॥ भू यादि से तिड होते है । तिडो से
लकार होते हैं। वे लकार दश कहे गये हैं। तिप्, तम्, झि (मन्ति ) ये तीन
तिड, प्रत्यय प्रथम पुरुष में होते हैं। मध्यम पुरप मे सिम्, थर मौर थ-ये
तीन प्रत्यय एक वचन, द्विवदन और बहुवचन मे होते हैं । उत्तम पुरप के इसी
फ्रम से तीनो वचनो मे मिप्, वस् प्रौर मस-ये तिड प्रत्यय होते हैं । ये तीनो
पुरुपो भोर तीन-तीन वचनो के तिड, प्रत्यय परस्मै पद मे हुमा करते हैं । दूसरे
के लिये जो क्रिया का प्रयोग किया जाता है वह परस्मैपद कहा जाता है । भव
मात्मनेपद बतताते है जो अपने प्रथं प्रयुक्त होता है । ते, भाताम्, क (पाताम्
और झ का परिणत रूप 'पाते', 'मन्ते' है) ये तीनों वचनो के आत्मनेपद में
प्रथम पुरुप के तिड, प्रत्यय होते हैं। म-प्राये-ध्वे-ये तीन मध्यम पुरुष मे
होते हैं ॥१८॥१६॥
श्री गरुडपुराण ए यहे मह उत्तमः पुरुपो हि निरूप्यते । नाम्नि प्रयुज्नमानेऽपि प्रथम. पुरुपो भवेत् ।।२० मध्यमो युष्मदि प्रोक्त उत्तमः पुरुषोऽस्मदि । भूराद्या धातवः प्रोक्ताः सनाद्यन्तास्तथा ततः ॥२१ लडीरिते वर्तमाने स्मेनातीते च धातुतः। भूतेऽनद्यतने लड् वा लुडाशिपि च धातुतः ।।२२ विष्यादावेवानुमतौ लोड् वाच्यो मन्नणे भवेत् । निमन्त्रणाधीष्टसप्रश्ने प्रार्थनेषु तथाशिपि ।।२३ लिडतीते परोक्षे स्यादुद्भूते लुड् भविष्यति । धातोल क्रियातिपत्तो लिडर्थे लोट प्रकीत्तितः ।।२४ कृतस्त्रिष्वपि वर्तन्ते भावे कर्मणि कर्तरि । तृण्तव्यवड्नीय. स्यात् शतृडाद्याश्च घातुतः ॥२५ ए-वहे-महे-ये तीन उत्तम पुरुप मे होते है । नाम के प्रयोग किये जाने पर प्रथम पुरुप होता है। युष्मद् शब्द के प्रयोग में मध्यम पुरुप होता है और अस्मद् शब्द के प्रयोग मे उत्तम पुरुष होता है। भू मादि धातुएं कही जाती हैं। उनऐ फिर सनादि प्रत्यय भी होते हैं ।।२०।२१।। लट् लकार वर्तमान काल में होता है। लट् लकार मे घातु के प्रागे 'स्म' लगा देने से भूतकाल का अर्थ हो जाता है। मनद्यतन भूतकाल में लड, लकार होता है। चौबीस घण्टो मे पहिले के काल को पनद्यतन काल कहते हैं। धातु से प्राशीर्वाद के अर्थ में लिड. लकार होता है। प्राशिपि लिइ, मोर विधि लिड, ऐसे लिड, लकार दो प्रकार का होता है। विधि प्रादि के अर्थ में मोर अनुमति में भी लिड, होता है। मन्त्रण मे लोट् लकार होता है । निमन्त्रण-प्रधीष्ट सप्रश्न- प्रार्थना में और प्राशोप मे लिड, लकार होता है। परोक्ष में लिट् लकार होता है और उद्भून लुरू होता है । भविष्यदर्थ में धातु से लट् लकार होता है। क्रियातिपत्ति में लिट् के मथ मे लोट् लकार बताया गया है। तीनो कालों में भाव, कमं मोर का मे कृदन्त प्रत्यय हुप्रा करते हैं। केवल पातु के मषं -
सदाचार कथन
[ ११५
माय का नहीं द्योतन होता है उसे भान कहते हैं । तृण, तव्य, मनीपर, शर्ट,
शानच् प्रादि कृत्प्रत्यय धातु से हुमा करते हैं ।।२२ से २५।।
११५-~मदाचार कथन
हरेः श्रुत्वाऽनवीद् ब्रह्मा यथा व्यावसाय शौनक ।
ब्राह्मणादिसमाचार सर्वद ते यथा वदे ॥१
श्रुतिस्मृती तु विज्ञाय श्रोत कर्म समाचरेत् ।
श्रौत कर्म न चेदुक्त तदा स्मात्त समाचरेत् ।।२
तत्राप्यगक्त करणे मदाचार चरेद् वुध ।
श्रुतिस्मृतीह विप्राणा लोचने कर्मदर्शने ॥३
थु त्युक्तः परमो धर्मः स्मृतिशास्त्रगतोऽपरः ।
शिष्टाचारेण शिष्टानां प्रयो धर्मा मनातना ॥४
सत्य दान दया लोभो विद्यज्या पूजन दमः ।
अष्टौ तानि पविनारिण शिष्टाचारस्य लक्षणम् ।।५
तेजोमयानि पूर्वेपा शरीराणोन्द्रियारिंग च ।
न च लिप्यति पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥६
निवास मुख्या वर्णाना धर्माचार प्रकीत्तिता।
सत्य यज्ञस्तपो दानमेतद्धर्मस्य लक्षणम् ।।७
सूजी ने कहा-हे सौनक । भगवान् हरि में थवरण करके ब्रह्माजी ने
जिस से व्यास महर्षि से कहा था वह सब देने वाला ब्राह्मणादि का ममा-
चार तुमको बतलाता हूँ॥१॥ श्रुति मोर स्मृति का ज्ञान प्रास करके जो श्रीर
{ वैदिक ) कम है उममा समाचरण वरना नाहिए। यदि श्रीत यमं न कहा
गया है तो फिर स्मार्त कम पर स्मृतयो के द्वाग प्रतिपादित कर्म करना
चाहिए । वैदिक कर्म को प्राथमिकता देनी चाहिए ॥२॥ यदि स्मात्तं कमों के
करने मे भी असमर्थता किसी कारण से हो तो फिर युग पुरुष को मत्पुरुषों का
पाचार हो करना चाहिए । श्रुति पोर स्मृने ये दोनो विप्रो के नैव होते हैं ।
जिन द्वारा फर्मों का दान हमा करता है ॥३॥ श्रुति के द्वारा जो धर्म प्रति-
[ श्री गरुडपुराण पारित किया गया है वह परम धर्म होता है । स्मृति शास्त्रों के द्वारा जो कहा गया है वह दूसरी श्रेणी का अपर धर्म होता है। शिष्ट पुरुषों के शिष्टाचार के द्वारा जिस धर्म का वोध होता है वह भी तीसरी श्रेणी का धर्म होता है। इस प्रकार से ये तीन सनातन ( सर्वदा से चले माने वाले ) धर्म होते हैं ॥४॥ सत्य, दान, दया, लाभ, विद्या, इज्या, पूजन और दम ये पाठ पवित्र अर्थात् शुद्ध धर्म के स्वरूप है जो कि शिष्टाचार के लक्षण हैं ॥५॥ पूर्व पुरुषो के शरीर और इन्द्रियाँ तेजोमय थे और वे पाप में लिप्त नहीं हुप्रा करते थे जिस तरह पद्म के पत्र जल से कभी लिप्त नहीं होते हैं और वे जल में ही रहा करते हैं । ॥६॥ वर्णो के धर्म तथा प्राचार निवास को मुख्यता वाले बताये गये हैं । सत्य, यज्ञ, तप और दान ये धर्म के लक्षण हैं ।।७।। अदत्तस्यानुपादानं दानमध्ययन तपः । विद्या वित्त तपः शौय्यं कुले जन्म त्वरोगिता ।। ससारोच्छित्तिहेतुश्च धर्मादेव प्रवर्तते । धर्मात् मुखञ्च ज्ञानञ्च ज्ञानान्मोक्षोऽधिगम्यते ।। इज्याध्ययनदानानि यथाशास्त्र सनातन: । ब्रह्मक्षत्रियवैश्याना सामान्यो धर्म उच्यते ॥१० याजनाध्ययने शुद्ध विशुद्धाच्च प्रतिग्रहः । वृत्तित्रयमिद प्राहुमुनयः श्रेष्ठगिनः॥११ शस्त्रैणाजीवन राज्ञो भूतानाञ्चाभिरक्षणम् । पाशुपाल्य कृषिः पण्यं वेश्यस्य जीवन स्मृतम् ॥१२ शूद्रस्य द्विजशुश्रू पा द्विजानामनुपूवंश. । गुरो वासोऽग्निशुश्रू पा स्वाध्यायो ब्रह्मचारिणः ॥१३ विस्ताता स्नापिता भक्ष्य गुरौ प्राणान्तिको स्थिति. । समेखले जटा दण्डी मुण्डो वा गुरुसश्रय. ।।१४ प्रदत्त अर्थात् न दिये हुए का अनुपदान, दान, अध्ययन, तन, विधा, वित्त, शौर्य, मच्छे कुल में जन्म, नीरोगता भौर सपार के उच्छेदन के हेतु यह धर्म से ही प्रवृत्त होता है। धर्म से हो सुरस की प्राप्ति होती है पोर पर्म सदाचार कथन ] । ११७ से ही ज्ञान का लाम भी हुमा करता है। ज्ञान जब हो जाता है तो उमसे सपार के जन्म-मरण के प्रावागमन से छुटकारा पाकर मोक्ष की प्राप्ति हो जाया करती है ।।८।। इज्या ( यज्ञादि का करना, कराना), अध्ययन ( वेद- वेदाङ्गादि शास्त्रो का पढ़ना )-दान शास्त्र के अनुसार और सदा से चला आने वाला ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यो का साधारण धर्म कहा जाता है ॥१०॥ मुनिगण श्रेष्ठ वर्ण वाले को शुद्ध याजन और अध्ययन तथा विशुद्ध से प्रतिग्रह लेना वृत्ति अर्थात् तीन प्रकार की रोजी बतलाते हैं ।। ११॥ क्षत्रिय का कम शस्त्र के द्वारा जीवन निर्वाह करना और प्राणिमात्र की अभिरक्षा करना है । पशुप्री का पालन, कृपि करना तथा दूकानदारी का व्यवसाय वारना यही जीवन निर्वाह फा साधन वैश्यों को बताया गया है ॥१॥ शूद्र का कम द्विजातियो की सेवा करना है जो कि द्विजो को प्रानुपूर्व शुश्रूपा करनी चाहिए अर्थात् सबसे प्रथम विप्र फिर क्षत्रिय और इसके पश्चात् वैश्य की सेवा करे । अब चारों वर्गों के धर्मों के अनन्तर चारो प्राथमो के धर्म बतलाते हैं-ब्रह्मचर्य की अवस्था का पालन करने वाले ब्रह्मचारी का कर्म है पपने गुरुवर्य के निकट गुरुकुल में घर छोडकर निवास करना, अग्निहोत्र नित्य नियम से करना और वेद एव वेद के प्र शास्त्रो का समयानुमार अव्ययन करना होता है ॥१३॥ ब्रह्मचारी को तीनो कालो में स्नान और त्रिपवरण तथा स्नापन करना चाहिए-भिक्षाचरण करे, गुरु की मन्निधि में प्राणो के अन्त तक स्थिति रक्खे, मेखला, जटा, दण्ड धारण करे, मुण्डन मोर गुरु का राश्रय रवखे । ये उसके कर्म-धर्म होते हैं ।। १४ ।। अग्निहोत्रोपचरण जीवनच स्वकर्मभि । धर्मदारेपु कल्पेत पर्ववर्ज रतिक्रिया ॥१५ देवपिनतियिभ्यश्च पूजादिष्वनुकल्पनम् । श्र तिस्मृत्यर्थसस्थान धर्मोऽय गृहमेधिन ।।१६ जयित्वमग्निहोतृत्व भूशय्याजिनधारणम् । वने वास: पयोमूरानीवारफल वृत्तिता ॥१७ प्रतिपिद्ध निवृत्तिश्च निःस्नान व्रतधारिता ।
११८ ॥ श्री गरुडपुराण - देवतातिथिपूजा च धर्मोऽय वनवासिनः ॥१८ सर्वारम्भपरित्यागो भष्यान्न वृक्षमूलता। निष्परिग्रहता द्रोह समता सर्वजन्तुपु ॥१६ प्रियाप्रियपरिध्वङ्ग सुखदु खाधिकारिता । सबाह्याभ्यन्तर शौच वाग्यमो ध्यान दारिता ॥२० सन्द्रियगमाहारो धारणध्याननित्यता। भावसंगुद्धिरित्येप परिवाड् धर्म उच्यते ॥२१ गृहस्थ पाश्रम में प्राप्त होकर उसका फिर कगं होता है नित्य पग्नि होत्र करना-प्रपने शास्त्रोक्त कर्मो के द्वारा जीवन का निर्वाह करना तथा वैदिक पद्धति से परिगीत गवणं पत्नी के साथ पर्वो का त्याग कर रति क्रिया करे ।। १५ ।। देवता-पितृगण और अतिथियो का पूजन-सत्कार करना चाहिए तथा श्रुनि स्मृति के द्वारा प्रतिपादित अर्थ या सस्थान रवसे यही एक गृह मेधी (गृहस्थी) का धर्म एव कार्य होता है। गृहस्थ्य धर्म का पूर्ण निर्वाह कर लेने के अनन्तर यन में निवाम करके वानप्रस्थ माश्रम में जब प्रवेश फरता है तो उम ममय उमका धम है कि इन्द्रियो पर समग परे–नित्य अग्नि होप करे-भूमि पर गयन करे-मृग चगं धारण करे। उस दशा मे बन में निवास करना चाहिए । वहाँ पर जो युविधा से जल-मूल-निवार और फल पादि प्राप्त हो उनमे ही निर्वाह करे ॥ १५ ॥ १७॥ जो शास्त्र द्वारा प्रनिषेध पिया गया हो उमसे निवृत्त रहे-तीन बार स्नान करे-वना को धारण करे और दव एव सभागत प्रतिपियो का प्रनग परना चाहिए यही यम एम वनयामी प्राश्रयधारी या होता है ॥ १८ ॥ अव चौथा पाथम गन्याम है उस भाश्रम में रहने पाले में यम बनाये जाते हैं-गब प्रकार के भारम्भीरा परियाग मन्यामी को मयमे प्रथम परमा पाहिए-भिक्षा वृत्ति मे जो मम प्राप्त हो उम गे पानी पागेर यात्रा पूरी परे । वृक्ष मूल में नियाग परे । पने पाम मुद भी माधन गधित न रप-निमी मे ब्राह न करे। गमस्त गुपो में समनारामाद रगे ॥१६॥रिमोगोभी यि सपा प्रप्रिय म समझे। मुम और दुरा में समान है। बाहिर और भीगर अर्थात प्रगत:
सदाचार कथन ] [ ११६ करण मे भी शुद्ध रहे--मौन रहे या बहुत कम मापण करे। ध्यान में मग्न रहे । २० ।। समस्त इन्द्रियो का नियन्त्रित करे तथा नित्य ध्यान एव धारणा परे । सर्वदा अपने हृदय की भावनाप्रो को गुद्ध रवसे—यही एक परिवाड् (सन्यासी) का धर्म कहा जाता है ॥२१॥ अहिंसा सूनृता वाणी सत्यशोचे क्षमा दया। परिगना लिगिनाञ्च व समान्यो धर्म उच्यते ॥२२ यथोक्तकारिणः सर्वे प्रयान्ति परमा गतिम् । श्रावोधात स्वपन यावत् गृहस्वधर्म वच्मि ते ॥२३ ब्राह्म मुहूर्ते वुध्येत धर्मायीं चानुचिन्तयेत् । शर्वर्यन्ते समुत्थाय कृतशोच: समाहित. ॥२४ स्नात्वा सन्ध्यामुपासीत दन्तधावनपूर्विकाम् । प्रातःसन्ध्यामुपातीत दन्तधावनपूर्विकाम् ॥२५ उभे मूत्रपुरीपे च दिवा कुर्य्यादुदङ्मुसः । रात्रौ च दक्षिणे कुर्यादुभे सन्ध्ये यथा दिवा ॥२६ छायायामन्धकार वा रात्री वाहनि वा द्विजः । यथा तु सुमुख कुर्यात् प्राणायाधभयेपु च ॥२७ गोमयाङ्गारवल्मीकफालाकृष्ट जले शुभे । मार्गोपजीव्यच्छायासु न मूत्रञ्च पुरीपकम् ॥२८ किमी भी प्राणी की हिंमा न करना अर्थात् किसी भांति से न सताना- सत्य एव सुप्रिय वाणी बोलना-सत्य घ्यवहार मन वचन और कर्म से करना---पवित्रता मना-क्षमा रखना-सव पर दया भाव रखना ये सब वर्गों के लोगो का और ममस्त माश्रमो मे रहने वालो का सामान्य धर्म है जो मामान्यतया राभी में होना चाहिए ।। २२ ।। जैसा शास्त्र ने बताया है उसी का पूर्णतया पालन करने वाले सभी को परम गति प्राप्त हुग्रा करती है । जब से मस्त कार मे हारमा से और राशि से जिम समय ला सायत करे उप पूरे समय का एक गृहस्थ धर्म को मैं अब तुमो बतलाता है ।। २३ ।। एक गृहस्य को प्रातः काल म ब्राह्म मुहूर्त मे शय्या का स्थान कर उठ जाना [ था गरुडपुराण ] नाहिए । अरुणोदय पोर उपा पान से भी पूर्व वा समय माहा मुहत वहा जाना है। उठ र अर्थान् शय्या या त्याग कर सब से प्रथम धर्म और पर्य या चिन्तन करें। रानिक मन्न मे उठकर फिर शौचादि क्रिया मे निवृत्त होवे पोर पूर्णग्या मावधान हो जाये ।। २४ ।। स्नान करे-सन्ध्या-वन्दन करे। इस स्नान क्रिया के पूर्व ही दम्न धावन आदि शुद्धि कर लेनी चाहिए। प्रातः काल को मध्या तभी करे जर पहिले दातुन यादि की पूर्ण शुद्धि कर लेवै ।। २५ ।। मूत्र त्याग और मल का त्याग ये दोनो कार्य दिन में उत्तर दिशा की ओर मुख करके करना चाहिए। यदि रामि के समय में ये दोनो कार्य परे तो दक्षिण दिशा की ओर मुख करके परे। दोनो दिन-रात के सन्धि-काल में इन मल मूत्रो का त्याग करना हो तो दिन की जो विशा बताई गई है उसी ओर मुख करके करना चाहिए ॥ २६ ॥ छाया में-- अन्धकार है- रात्रि में अथवा दिन मे द्विज को जैसे भी सुमुख हो वमे ही करे। प्राणो की यदि वाघा होने का भय उपस्थित हो तो भी जमे भी हो मल-मूत्र का त्याग- करे ॥ २७ ॥ गोमय (गोबर)- प्राग का अंगारा वल्मो क (वायी)-हल से जुता हुप्रा भू-भाग-शुभ स्थान-जल-मार्ग उपजीव्य छाया में कभी भी मल और मूत्र का त्याग नहीं करना चाहिए ॥२८॥ अन्तर्जलाद्देवगृहाद्वल्मीकान्मूपिकस्थलात् । परेपा शौचशिष्टाच्च श्मशानाच्च मृद त्यजेत् ।।२६ एका लिङ्ग मृद दद्याद्वामहस्ते मृद द्वयम् । उभयोढेच दातव्ये मूत्रशौच प्रचक्षते ॥३० एका लिङ्ग गुदे तिस्रस्तथा वामकरे दश । पञ्च पादे दर्शकस्मिन् करयो सप्त मृत्तिका ॥३१ अर्द्ध प्रमृतिमात्रा तु प्रथमा मृत्तिका स्मृता । द्वितीया च तृतीया च तदर्धा परिकीत्तिता ।।३२ उपविष्टस्तु विरामून कहुँ यस्तु न विन्दति । स कुादद्ध शोच तु अस्य शौचस्य सर्वदा ॥३३ - मदाचार कथन [ १२१ दिया शौचस्य रात्र्यद्धं यद्वा पादो विधीयते । स्वस्थस्य तु यथोद्दिष्टमातः कुर्याद्यथावलम् ॥३४ वसाशुक्रमसृड मज्जालालाविण्मूत्रकर्णगुत् । प्लेष्माथ दूपिका स्वेदो द्वादर्शते नृणा मला ॥३५ जल के अन्दर से-~-देवगृह से-वल्मीक से चूहो के रहने के स्थल से--पर पुरुषो में शौच से, शिष्ट स्थल से और श्मशान से मिट्टी का त्याग कर देना चाहिए अर्थात् इन उक्त स्थलो से मिट्टो नहीं लेनी चाहिए ॥ २६ ॥ मूत्र त्याग करने के पश्चात् एक बार मिट्टी मून्द्रिय पर लगायें-बॉय हाथ में दो बार मिट्टी लगावे और फिर दोनो हायो में दो बार मिट्टी लगा कर मूत्र त्याग के मगन्तर शुद्धि को ।। ३० ॥ मल के त्याग करने के पश्चात एक बार लिङ्ग पर-तीन बार गुदा पर-दावार वाये हाथ में--पांच बार पंर मे-एक कर मे दशवारपोर दोनो हाथो में मिलाकर सातबार मृत्तिका लगा पर शुद्धि शौच जाने के बाद करना चाहिए ।॥ ३१॥ प्राधी पस मिट्टी पहिली बताई गई है-दूसरी बार और तीसरी कर उससे प्राधी-प्राधी कही गई है ।। ३२ ॥ जो उपरिष्ट होता हुआ मल-मूत्र का त्याग नहीं कर पाता है उसे अर्ध शोच (माधी शुद्धि) ही करना चाहिए क्योकि इस शौच का सर्वदा यही बताया गया है ।। ३३ ।। दिन मै जो शुद्धि का विधान कहा गया है रात्रि मे उसका प्राधा अथवा चौथाई भाग ही का विधान होता है । यह सम्पूर्ण विधान स्वस्थ व्यक्ति के लिये ही कहा गया है। जो प्रारी हो उस तो अपनी शक्ति मोर बल के ही अनुमार शारीरिक शुद्धि करनी चाहिए ॥ ३४ ॥ मनुष्यो के निकलने वाले मल बारह प्रकार के हुमा करते । उनके नाम निम्नलिखित हैं-वसा- शुक्र-रक्त-मजा-साला ( लार )-विष्ठा-मूत्र--गुन्-पांसू-श्लेष्मा (कफ)-स्वेद (पसीना) हैं ।।३।। यावता शुद्धिर्मन्येत तावच्छौच समाचरेत् । प्रमाण शौचसख्याया नादिष्ट रवशिष्यते ॥३६ शौच तु द्विविध प्रोक्त वाह्यमाभ्यन्तर तथा । मृज्जताभ्या स्मृत वाह्य भावशुद्धिरथान्तरम् ।।३७
!
१२२ ]
धो गरुडपुराण
मिराचागेदप. पूर्व द्विः प्रमृज्याततो मुगम् ।
समृज्यागुष्ठमूलेन मिभिरास्यमुपस्पृशेद ॥३८
अगुप्ठेन प्रदेशिन्या प्रारण पश्चादनन्तरम् ।
अंगुष्ठानामिकाम्याञ्च चक्षु श्रोत्रे पुनः पुन. ॥३६
कनिष्ठागुप्ठयो भि हृदय तु तलेन ।
सर्वाभिस्तु शिर पश्चाढाहू चाग्रेण सस्पृशेत्॥४.
चो यजूपि सामानि त्रिः पठन प्रीणयेत्क्रमात् ।
अथर्वाङ्गिरसौ पूर्व द्वि प्रमाष्टमय पण्मुसम् ॥४१
इतिहासपुराणानि वेदाङ्गानि यथाक्रमम् ।
स मुसे नासिके वायु ने सूर्य्यः श्रु तिदिश. ॥४२
प्राणग्रन्थिमथो नाभि ब्रह्माण हुदये स्पृशेत् ।
रुद्र मूर्ना समालभ्य प्रीणात्यशिसामृपीन् ।।४३
जहाँ नक मन में शुद्धि हो जाने की बात ठीक बैठे वहाँ तक उस
। शुद्धि करनी चाहिए । शोच को सख्या का प्रमाण जो मादिष्ट किया गया
वह अवशिष्ट नहीं रहता है ॥ ३६ ॥ यह शौच (शुद्धि) बाह्य मोर मायन
दो तरह को बताई गई है। मिट्टी भौर जल से तो बाहिरी शरीरिक शु
हुआ करती है तथा प्राग्यनर शुद्धि तो भावो के विशुद्ध रखने पर ही हो
है । जब तक मन को मन्तर्भावना शुद्ध नहीं होगी तब तक भान्तरिक शु
नही हो मकती है । वाहिरी शुद्धि के साथ मान्तरिक शुद्धि का होना भी प
मावश्या होता है ।। ३७ ।। सबसे पूर्व तीन बार जल का भाचमन करे ।
दो बार मुस का प्रमार्जन रे फिर अगुठे के मूल से तीन बार मुख का
स्पर्शन करना चाहिए ।। ३८ ।। अगुष्ठ मोर प्रदेशिनो से पीछे घ्राण (नासिक
का स्पर्श करे । इसके उपरान्त अगूठा और अनामिका से गर-बार नेत्र
श्रोत्र का स्पर्श करना चाहिए ॥ ३६॥ कनिष्ठिका पौर अ गुष्ठ से नाभि
और तले से हृदय का स्पर्श करे। सम्पूर्ण अंगुलियो से शिर का स्पर्श
और इसके अनन्तर अग्रभाग मे पाहुप्रो का रपर्श करना नाहिए ॥ ४० .
मृग्वेद-यजुर्वेद मोर सामवेद इन तीनो का क्रम से पाठ करता हुमा प्रीणन
सदाचार कथन ] [ १२३ हृदय में करना चाहिए । इसके पूर्व अथर्व और प्राङ्गिरस करे मोर दोनों से परामुख का प्रमार्जन करे ॥४१॥ इसके उपरान्त इतिहास और पुराण तथा यथाक्रम वेदी के अङ्गी का पारायण करना चाहिए। मुख में आकाश-नासिका मे वायु-नेत्र में सूर्य-कानो मे दिशा-नाभि मे प्राण ग्रन्थि और ब्रह्मा का स्पर्श करना चाहिए । मस्तक से रुद्र का सम्यक् प्रकार से लाभ करके फिर शिखा के स्पर्श से ऋषियों को प्रसन्न करे ॥४२॥४३॥ बाहू यमेन्द्रवरुणे कुबेरवसुधानलान् । अभ्युक्ष्य चरणौ विष्णुमिन्द्र विष्णु करद्वयम् ॥४४ अग्निर्वायुश्च सूर्येन्दुगिरयोऽङ्ग लिपर्वसु । गङ्गाद्याः सरितस्तासु या रेखा. करमध्यगाः ।।४५ उपःकाले तु सप्राप्त शौच कृत्वा यथार्थवत् । ततः स्नान प्रकुर्वीत दन्तधावनपूर्वकम् ॥४६ मुखे पय्युपिते नित्य भवत्यप्रयतो नर. । तस्मात्रार्वप्रयत्नेन कुद्वि दन्तधावनम् ।।४७ कदम्वबिल्वखदिरकरवीरवटाणुना । यूथी च बृहती जाती करनार्कातिमुक्तका ॥४८ जम्बूमधूकापामार्गशिरीपोदुम्बराशना । क्षोरिकण्टकिवृक्षाद्याः प्रशस्ता दन्तधावने ॥४६ दोनो बाहुमो मे यम-इन्द्र मोर व रागा कर-चरणो मे कुवेर, वसुधा और मनल का तथा दोनो हाथो मे विष्णु प्रौर इन्द्र का अभ्युक्षण करे ।।४४।। अग्नि-वायु-मूर्य-चन्द्र गिरि ये अ गुलियो के पर्वो में तथा कर के मध्य मे जो राव रेखाएं हैं वे सब गङ्गा प्रादि मम्पूर्ण नदियाँ हैं ।। ४५ ॥ प्रात: काल के प्राप्त होने पर यथार्थ रीति से शौच { शुद्धि ) करके फिर दन्त धावन के पश्चात् स्नान करना चाहिए ॥ ४६ ॥ मुख के पर्युपित ( वासी) बने रहने पर गर्वदा मनुष्य अप्रयत रहा करता है । इसलिय सब प्रकार के पूर्ण प्रयत्लो के साथ दांतुन अवश्य हो करना चाहिए ।। ४७ ।। दन्त धावन के लिये जो जिन वृक्षो भी दातुन अच्छी मानी गई है उन वृक्षो के नाम ये हैं----क्दम्य- १२४ [ श्री गरुडपुराण विल्य-खदिर-करवीर-वट-अर्जुन-करञ्ज-जाती -यूथी-वृहती- अर्क-प्रति मुक्तक-जामुन-मधूक-अपामार्ग-शिरीष-उदुम्बर (गूलर)- प्रशन मोर जो वृक्ष दूध वाले तथा कांटेदार हैं वे भी प्रशस्त माने जाते हैं ॥४८॥४६॥ कटुतिक्तकषायाश्च धनारोग्यसुखप्रदाः । प्रक्षाल्य भुक्त्वा च शुचौ देशे त्यक्त्वा तदाचमेत् ।।५० अमावस्या तथा पप्ठयां नवम्या प्रतिपद्यपि । वर्जयेद्दन्तकाप्ठं तु तथैवार्कस्य वासरे ॥५१ अभावे दन्तकाष्ठस्य निपिद्धाया तथा तिथौ । अपां द्वादशगएडूपै. कुर्वीत मुखशोधनम् ॥५२ प्रातः स्नात्वा प्रशसन्ति दृष्टादृष्टकर हितम् । सर्व महंति शुद्धात्मा प्रात.स्नायी जपादिकम् ॥५३ अत्यन्तमलिनः कायो नरश्छिद्रसमन्वितः। श्रवत्येष दिवाराची प्रातःस्नानं विशोधनम् ॥५४ कटु-तिक्त और कपाय (कसले) स्वाद वाली जो दातुन होती हैं वे घन--प्रारोग्य तथा सुख के प्रदान करने वाली हुआ करती है। दांतुनो को धोकर फिर उन से दांत साफ करने चाहिए । दन्त धावन करके किसी शुद्ध स्थान पर डाल देवे और आचमन (कुल्लो) करे ॥ ५० ॥ प्रमावस्या-पष्टी- नवगी और प्रतिपदा तिथियो मै तथा रविवार के दिन मे दन्त काष्ठ का सेवन करना अर्थात् काष्ठ से दांनो को स्वच्छ करना वनित होता है ॥५१॥ दातुन के अभाव मे तथा जो तिथियां ऊपर निपिद्ध बताई गयी है उनमें जल के बाहर कुल्ले करके मुख का शोधन कर लेना चाहिए। मुख का शोधन करना तो परम भावश्यक है ॥ ५२ ।। प्रातः काल मे दृष्ट तथा मदृष्ट हित करने वाले हित स्नान करके ही प्रशस्त होते हैं । प्रातः काल मे स्नान करने वाला शुद्ध प्रात्मा से युक्त पुरुष ही जप आदि सम्पूर्ण कार्य करने के योग्य होता है ॥५३॥ शरीर के अनेक छिद्रों से युक्त यह मानव अत्यन्त मलिन देह वाला होता है। इस शरीर से रात-दिन अनेक मलिनता करने वाले मलों का स्राव बराबर सदाचार क्थन ] [ १२५ । होता ही रहता है। प्रातः काल में जो सर्वाङ्ग स्नान किया जाता है उससे सब देह का पूर्ण शोधन हो जाता है। प्रतः प्रातः स्नान परम आवश्यक शुद्धि के लिये माना गया है ।॥५४॥ मन प्रसादजनन रूपसौभाग्यवर्द्धनम् । शोकादु खप्रशमनं गङ्गास्नानवदाचरेत् ॥५५ अद्य हस्ते तु नक्षत्रे दशम्यां ज्येष्ठके सिते । दशपापहरायाञ्च अदस्वा दानकल्मषम् ।।५६ विरुद्धाचरणं हिंसा परदारोपसेवनम् । पारुष्यानृतपशून्यमसम्बद्धाभिभापणम् ॥५७ परद्रपाभिधानञ्च मनसानिष्टचिन्तनम् । एतद्दशाघधातार्थ गङ्गास्नान करोम्यहम् ॥५८ प्रात: सक्षेपतः स्नान बारप्रस्थगृहस्थयो. ॥५६ प्रातः काल में किये हुए स्नान से मन में एक प्रकार की प्रसन्नता होती है और मुबह ही स्नान करने से रूप तथा मौभाग्य की उत्पत्ति हुमा करती है । यह स्नान शोक और दु.स शमन करने वाला है। इसे गङ्गा स्नान को भांति परम पुण्यमय समझ कर करना चाहिए ॥ ५५ ॥ पाज हस्त नक्षत्र में और ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि में अर्थात् दशहरा मे जो कि दशमी तिथि दश पाप का अपहरण करने वाली होती है-कुछ भी दान न देकर कल्मप रहित यह गङ्गा स्नान करता हूँ ।५६। यह स्नान किसी के विरुद्ध भाचरण करना-हिंसा--पराई स्त्री का सेवन करना--पारुप वचन एक कठोर व्यवहार करना--मिथ्या भापण--पिशुनता (चुगली)-मसम्बद्ध भापण करना-पराये द्रव्य का अपहरण-प्रभिधान तथा मन से किसी के मनिष्ट का चिान करना इन दश पापो के घात करने के लिये यह स्नान किया जाता है। यह वाराप्रस्थ मोर गृहस्थ को प्रातः काल में सक्षेप से स्नान फरना चाहिए ॥५७॥५८॥५६॥ यतेस्त्रिपवरण स्नान सकृत्तु ब्रह्मचारिण । प्राचम्य तीर्थमावाह्य स्नायास्मृत्वाव्यय हरिम् ।।६० १२६ ] [ श्री गरुडपुराण तिस्त्र कटघद्ध विज्ञया मन्देहा नाम राक्षसाः । उदयन्त दुरात्मान सूर्यमिच्छन्ति खादितुम् ॥६१ स हन्ति सूयं सन्ध्याया नोपास्ति कुरुते तु य । दह्यन्ति मन्त्रपूतेन तोयेनानलरूपिणा ॥६२ अहोरात्रस्य य सन्धि सा सन्ध्या भवतीति ह। दिनाडिका भवेत्सन्ध्या यावद्भवति दर्शनम् ॥६३ रान्ध्याकर्मावसाने तु स्वयहोमो विधीयते । स्वयहोमफल यत्त नदन्येन न जायते ॥६४ ऋत्विवपुत्नो गुरुर्धाता भागिनेयोऽथ विट्पति.। एभिरेव हुत यत्त तद्धत स्वयमेव हि ॥६५ ब्रह्मा वै गार्हपत्याग्निदक्षिणाग्निस्त्रिलोचन । विष्णुराहवनीयोऽग्नि कुमारः सत्य उध्यते ॥६६ यति को तीन बार स्नान और सन्ध्या करनी चाहिए और ब्रह्मचारी को एक बार ही स्नान पर्याप्त होता है । प्रात्तमन करके तथा तीर्थ का मावा- हुन करके, अव्यय भगवान् हरि का स्मरण करके सार करना चाहिए ॥६॥ मन्देह नामवाले साढ़े तीन करोड राक्षस हैं जो दुष्ट प्रात्मा वाले उदय होने वाले सूर्य को भक्षण कर जाना चाहते हैं ।। ६१ ॥ जो साध्या क समय मे उपामना नही करता है वह सूर्य का हनन किया करता है। मन्त्रों से पूत अनल रूप जल से जलते है ।। ६२ ।। दिन भोर गत की जो सन्धि होती है वहीं सन्ध्या हुप्रा करती है। दो नाडिका के रागय पर्यन्त सन्ध्या होती है जब तक कि दर्शन होता है ।। ६३ ।। साध्या मं के अन्त में स्वय होम करने का विधान है । जो स्वय होम का फल होता है, वह अन्य स्मिी से भी नही होता है ॥ ६४ ॥ स्विम् पुत्र, गुरु भ्राता-भागिनेय (भामजा) और विट् पति इन के द्वारा जो होम किया गया है वह स्वय ही हुत समझना चाहिए ॥६५॥ गार्हपत्याग्नि ब्रह्मा है-दक्षिणाग्नि त्रिलोचन शिव है-पाहवनीय अग्नि विष्णु है तथा सत्य कुमार कहे जाते हैं ॥६६॥ - सदाचार क्यन -- । १२७ कृत्वा होमं यथाकालं सौरान्मन्त्राञ्जपेत्ततः: समाहितात्मा सावित्री प्रणवञ्च यथोदितम् ॥६७ , प्रणवे नित्ययुक्तस्य ध्याहृतीषु च सप्तसु । त्रिपदायाञ्च साविश्यां न भय विद्यते क्वचित् ।।६८ गायत्री यो जपेन्नित्य कल्यमुत्थाय मानव. । लिप्यते न स पापेन पयवामिवाम्भसा ॥६६ श्वेतवर्णा समुद्दिष्टा कौशेयवसना तथा । प्रक्षसूत्रधरा देवी पद्मासनगता शुभा ॥७० आवाह्य यजुपाऽनेन तेजोऽसीति विधानत. । एतद्यजुः पुरा देव प्टिदर्शनकाक्षिभिः ।।७१ श्रादित्यमएडलान्त.स्था ब्रह्मलोकस्थितामपि । तनावाह्य जपिस्वातो नमस्काराद्विसजयेत् ॥७२ पूर्वाह्न एव कुर्वीत देवतानाञ्च पूजनम् । न विष्णो. परमो देवस्तस्मात्त पूजयेत्सदा ।।७३ यथा समय होम करके सूर्य सम्बन्धी मन्त्रो का जाप करना चाहिए । समाहित भात्मा वाला होकर यथोदित प्रणव और सावित्री का जाप करे । ॥६७ ॥ नित्य प्रणव मे और सात व्यातियो तथा त्रिपदा मावित्री में जो युक्त रहता है उस फो कही भी भय नही होता है ॥ ६८ ॥ जो मनुष्य प्रातः फाल में उठ कर नित्य प्रति नियम से गायत्री मन्त्र का जप किया करता है पह कभी भी पापो से जल से कमल के पत्र की भांति लिम नही हुमा करना है ।। ६६ ।। गायत्री देवी ने स्वरूप का ध्यान बतलाते हैं-गायत्री का वर्ण श्वेत है और वह देवी पौशय ( रेशमी ) घम्त्रों को धारण करने वाली केपासन वह शुभा देवी विराजमान हैं । तेजोऽसि "-इस यजुर्वेद के मन्त्र के द्वारा विधान से आवाहन करे। यह यजुर्वेद दा मन्त्र पहिले दृष्टि से दर्शन करने की देवो ने पढ़ा था ॥ ७१ ॥ धादित्य के मण्डल के अन्दर विनाश करने वालो और ब्रह्मानोक में विराजमान देवी सावित्री का बह्म और पद्म पर इच्छा वाले १८ ] [ श्री गठपुराण पर अावाहन करवे तथा जाप करके अभिवादन कर विसर्जन करना चाहिए ॥७२॥ दो पहर के पूर्व में हो देवतापो का पूजन परे । भगवान् विष्णु से परम देव अन्य कोई नही है अतएव उनका सदा अचंन करना चाहिए ॥७३॥ ब्रह्मविष्णुशिवान्देवान्न पृथग्भावयेत्सुधी । लाकेऽस्मिन्मङ्गलान्यष्टौ ब्राह्मणो गौहुताशन ॥७४ हिरण्य सपिरादित्य आपो राजा तथाष्टम । एतानि सतत पश्व दर्चयेच्च प्रदक्षिणम् ॥७५ वेदस्याध्ययन पूर्व सर्वदाम्यसन चरेत् । तद्दानञ्चैव शिष्येभ्यो वेदाभ्यासो हि पञ्चधा ॥७६ वेदार्थ यज्ञशास्त्राणि धर्मशास्त्राणि चैव हि । मूल्येन लेखयित्वा यो दद्याद्याति स वैदिकम् ॥७७ इतिहासपुराणानि लिखित्वा य प्रयच्छति । ब्रह्मदानसम पुण्य प्राप्नोति द्विगुणीकृतम् ॥७८ तृतीये च तथा भागे पोध्यवर्गार्थ साधनम् । माता पिता गुरुओता प्रजा दीना समाश्रिता ॥७६ अभ्यागतोऽतिथिश्चाग्नि पोप्यवर्गा उदाहृता । भरण पोण्यवर्गस्य प्रशस्त स्वर्गसाधनम् ।।८० सुधी पुरुष को चाहिए कि ब्रह्मा-विष्णु और शिव इन तीनो को पृथया न समझे । इस लोक म ये पाठ मङ्गलमय वस्तु हैं-ब्राह्मण-गो-~- हुनागन----हिरण्य-पृत-सूर्य F-जल तथा पाठवां राजा है। इनको सदा देखे और इनकी अचना करे एव प्रदक्षिणा करे ।। ७४ ।। ७५॥ वेद का पांच प्रकार का अभ्यास होता है-प्रथम वेद का भध्ययन, सघा, उसका अभ्यास करत रहना उस वेद का दान अर्थात् अध्यापन जो कि शिष्यो को कराना चहिए ।। ७६ ॥ वेदार्थ-यज्ञ करने-कगने का शास्त्र---धम शास्त्र इनको मूल्य देकर लिखवा कर जो किसी वैदिक वाहाण को दान करता है और इति- हास----पुराणो को लिखकर देता है वह ब्रह्मदान के समान दुगना पुण्य प्राप्त कया करता है ।। ७७ ॥ ७८ ।। तीसरे भाग में जो पोप्य ( पोषण परने के
सदाचार कथन ]
[ १२६
योग्य हो) वर्ग के प्रथं का साधन करे जैसे-माता-पिता-गुरु-धाना-
प्रजा-दीन और आश्रम मे रहने वाले हो -प्रन्यागत-अथिति मोर अग्नि
ये सब पोप्य कहे गये है। पोप्य वर्ग का भरण करना भी परम
प्रशस्त और
स्वर्ग का साधन माना गया है १७९॥
भरणं पोप्यवर्गस्य तस्माद्यनेन कारयेत् ।
स जीवति वरश्चैको बहुभिर्योपजीव्यति ॥८१
जीवन्तो मृतकास्त्वन्ये पुरुपाः स्वोदरम्भराः ।
स्वकीयोदरपूर्णञ्च कुक्कुरस्यापि विद्यते ॥८२
अर्थेभ्योऽपि विवृद्ध भ्यः राम्भूतेभ्यस्ततस्ततः ।
क्रियाः सर्वा प्रवर्तन्ते पर्वतेभ्य इवापगाः॥८३
सर्वरत्नाकरा भूमिर्धान्यानि पशवः स्त्रियः ।
अर्थस्य कार्ययोगत्वादर्थ इत्यभिधीयते ।।८४
अद्रोहेगव भूतानामल्पद्रोहेण वा पुनः ।
या वृत्तिस्ता समास्याय विप्रो जीवेदनापदि ॥८५
धन तु विविध ज्ञय शुक्ल शवलमेव च ।
कृष्णञ्च तस्य विज्ञ या विभागः सप्तवा पृथक् ।।८६
कमायत्त प्रीतिदत्त प्राप्तच सह भार्यया ।
अविशेपेण सर्वेपा वरना विविध धनम् ।।८७
अतएव पोप्य वर्ग का भरण-पोषण यत्नपूर्वक करना चाहिए। उस एक
पुरुष का परम प्रशन जीवन हाता है जिसके सहारे बहुतो का उपजीवन होता
है ॥१॥ जो अपने ही उदर को भरन वाले रहकर जोवन बिताते हैं वे पुरुष
जीवित रहते हुए भी मृतक हो के समान होते हैं। अपने पेट को तो एक कुत्ता
भी किमी प्रकार से भर ही लिया करता है ॥८२॥ प्रर्यों के विशेष रूप से बढ़
जाने पर तथा इधर-उधर चारो मोर से पाने पर फिर उन्ही से पर्वती से
नदियो की भाँति समस्त क्रियाएँ प्रवृत्त हुप्रा वरती हैं ||३|| यह भूमि समस्त
प्रकार के रत्नो की सान है। धान्य, पशु, स्त्रियां ये सब अर्थ के कार्यो के योग
होते हैं अतएव इन को प्रथ ही कहा जाता है ॥४॥ समस्त प्राणियों के साथ
[ श्री गरुडपुराण
उस धन का सात
किसी भी प्रकार का द्रोह न हो अथवा द्रोह कुछ हो भी तो बहुत ही कम हो,
इस प्रकार की जो वृत्ति हो उमी वृत्ति मे विप्र को अनापत्ति काल में स्थित रह
कर जीवन का यापन करना चाहिए ॥८॥ यह घन तीन प्रकार का जानना
चाहिए-शुक्ल, शवल और कृष्ण ये तीन वरण होते हैं ।
प्रकार से पृया विमाग होता है ।॥८६॥ यह धन एक तो पितृ परम्परा के क्रम
से माया हुप्रा होता है-दूसरा ऐसा धन होता है जो किसी के द्वारा प्रीति से
प्रदान किया हुमा होता है। तीसरे प्रकार का धन ऐमा होता है जो भार्या के
साथ प्राप्त होने वाला होता है। विशेपता के बिना प्राय समस्त वणों का यह
तीन ही प्रकार का पन हुमा करता है ।।८७॥
वैशेषिक धन दृष्ट ब्राह्मणस्य विलक्षणम् ।
याजनाध्यापने नित्य विशुद्धश्च प्रतिग्रह ।।८८
विविध क्षनियस्यापि प्राहुबैशेषिक धनम् ।
गुद्धार्थ लब्धकरज दण्डाप्त जयज तथा 11८६
वैशेपिक धन दृष्ट वैश्यस्यापि निलक्षणम् ।
कृपिगोरक्षवारिणज्य शूद्रस्यभ्यस्त्वनुग्रहाव ।।१०
कुपोदकृषिवाणिज्य प्रकुर्वीत स्वय वृत्तम् ।
आपत्काले स्वय कुर्वनं नसा युज्यते द्विज ॥६१
वहवो वर्तनोपाया ऋपिभि परिकीत्तिता ।
सर्वेषामपि चंवैपा कुपीदमधिक विदु ॥६२
अनावृष्टया राजभयान्मूपिकाद्यरुपद्रव ।
कृष्यादिके भवेद्वाघा सा कुपीदे न विद्यते ॥६३
पेश गताना या वृद्धि नापण्योपजोविनाम् ।
कुपीद कुर्वत सम्यक्स स्थितस्यैव जायते ॥६४
लव्यलाभ पितृन्देवान्त्राह्मणाश्चव पूजयेत् ।
ते तृप्तास्तस्य तद्दोप शपयन्ति न मशय ॥५
विशेषता से युक्त ब्राह्मण या पन तीन प्रकार पे सदा से मुक्त देखा
गया है-पाजन से प्राप्त होने वाला, पध्यापन से प्राप्त पौर विशुद्ध प्रतिमाह
सदाचार कथन ] [ १३१ से प्राम होने वाला धन होना है ।।८। इसी प्रकार से क्षत्रिय का भी धन तीन प्रकार का होता हैं जो कि वैशेपिक धन कहलाता है। शुद्ध धन वह है जा करा के द्वारा न्यायोचित रूप से प्राप्त किया जाता है अर्थात् श स्त्रोक्त उचित करी के द्वारा जो रामा के पास माता है । दण्डो द्वारा जो धन राजा के पास पाया करता है । तीसरा वह धन है जो विजय करके धन प्राप्त होता है अर्थात् भन्य गजा से युद्ध करके उस पर जय प्राप्त कर उममे से मिला करता है ।।८६॥ इसी तरह दिशेपना से सयुत वैश्य का धन भी तीन प्रकार का हुप्रा करता है। कृषि क द्वारा लब धन, पशु पालन से पाने वाला धन और वाणिज्य व्यवसाय से मिलने वाले मुनाफे का धन तोमरी तरह का वंशेषिक धन है । शूद्रा के पास जो धन होता है वह तो इन तीन वर्ण वालो के अनुग्रह से ही प्राप्त हुमा करता है ।।६०॥ ब्राह्मण भी आपत्ति काल उपस्थित हाने कुमीद, गारक्षण और वाणिज्य यदि स्वय भी कर तो उसे कोई पाप नहीं लगता हैं ।।६१|| ऋपियो ने बहुत से जीवन निर्वाह के उपाय बननाय हैं किन्नु इन सभी उपाया म कुपीद (पाज) को सबसे प्राधक बताया है ॥२॥ कृषि कम म अनावृष्टि से, राजा के भय से और मूषिका भादि के अन्य अनेको उपद्रवो मे वाधा उपस्थित हो जाया करती हैं किन्तु कुसीद वृत्ति में यह कुछ भी वधाएं नहीं हैं ॥३॥ दूसरे देशो में जाने वान अनेक पण्य पदार्थों का विक्रय कर रोगो कमाने वाला वो जो वृद्धि होती है वह कुनीद के काम करने वाला को एक ही स्थान पर स्थित रहते हुए ही हो जाया करती है ॥६४॥ जो लाभ प्राप्त होता है उमस मनुष्य को चाहिए कि पितृगण, देयता मोर ब्राह्मणो का पूजन परे । तृप्त होकर उसका जो भी कुछ दोष होता है उसका शमन कर दिया करते हैं- इसमें कुछ भी सशय नही है ॥६५॥ कृपीवलोऽनपानादियानशय्यासनानि राजभ्या विंशतिदत्वा पशुस्वर्णादिक गतम् ॥६६ विद्या शिल्प भृति सवा गारक्षा विपरित कृपि । वृत्तिभक्ष्यं कुपीदच दश जोवनहतव. ॥१७ प्रतिग्रहाजिता विप्रेक्षश्येि शस्ननिजिता । वक्ष्ये न्यायाजिता स्वार्या शूद्र शुश्रू पयाजिता HEE ये स १३२ [ श्री गरुडपुराण नदी वहूदका शाकपर्णानि च समित्कुशाः । आग्नेयो ब्रह्मघोपश्च विप्राणां धनमुत्तमम् IIBE अयाचितोपपन्न तु नास्ति दोपः प्रतिग्रहे। अमृत तद्विदुर्देवास्तस्मात्तनं व वर्जयेत् ॥१०० गुमद्रव्यांचोज्जिही चिम्यन्देवतातिथीन् । सर्वतः प्रतिगृह्णीयाद्यत्तु तृप्ये स्वयं ततः॥१.१ द्विजः । मज्जति ।।१०२ - कृपीवल (किसान) मा पान मादि, शय्या, मागन मोर पशु स्वर्णादिका पात तथा विशनि राजामो को देते हैं ॥६६॥ विद्या, शिल्प, भृति, सेवा, गोरक्षा दूकानदारी, सेती, वृत्ति, भय मोर सुयोद ये दश जीवन निर्वाह के हेतु होते बाह्मण में प्रतियह रो जित, क्षत्रिय में शास्त्रों के दाग निजित पौर वंध्य में न्याय रो उपानित तथा घर में सेवा से अजित स्वापं होते है । ग्रामगों मा उतम धन सो यहुन जम व लो नदी, शाकपत्र, ममिया, दुमा, पारने और ब्रह्म पोष होता है IIEIRE बिना पायना किये हुए जो उपम हो ऐगे प्रति प्रह में योई भी दोर नही होता है। देवगण उनको पाकहो है दलिये उगी यति नहीं परना पादिए ।॥१०॥ गुरुगरण में द्रव्यो का हरण र पीरुधा पाना और देवता तथा प्रतिषियोंगा पंतग परतापा को गभी भौर में प्रतिग्रह मेगा है और यही उमगे तृप्ति रिपा पता ॥१०॥ KHET के विषय में यह बताया जाता है freir साधु पुष गेही मंगा पाग, प्रमाणु पुराग शरमेन विपार शेरला पाहिए। कौमान गुरु पारीमा भाा दोनों में मुकद-का भी विधार Emir । जो मुल होदय निमसिह १.२॥
सदाचार क्थन ]
[
नित्य नैमित्तिक काम्य क्रियाङ्ग मलकपणम् ।
मार्जनाचमावगाहाश्चाष्टस्नान प्रकीर्तितम् ।।१०५
अस्नातस्तु पुमाना) जपाग्निहवनादिपु ।
प्रात स्नान तदर्थन्तु नित्यस्नान प्रकीतितम् ।।१०६
चाण्डालशवविष्ठाद्यान् स्पृष्ट्वा स्नान रजस्वलाम् ।
स्नानार्हस्तु यदा स्नाति स्नान नैमित्तिकं हि तत् ।।१०७
पुप्यस्नानादिक स्नान देवज्ञविधिचोदितम् ।
तद्धि काम्यं समुद्दिष्ट नाकामस्तत्प्रयोजयेत् ॥१०८
जप्तुकामः पवित्राणि अचिष्यन्देवतातिथीन् ।
स्नान समाचरेद्यत्त क्रियाङ्ग तच्च कोत्तितम् ।।१०६
इम प्रकार से प्रक्षर वृत्ति के द्वारा प्रपना भरण पर विजोत्तम को
बाद में प्रायश्चित्त करके विशुद्धि कर लेनी चाहिये ।।१०३।। तया चतुर्थ भाग
में स्नान के लिये मृत्तिका का पाहरण करे मोर तिल, पुष्प तथा युगा मादि
लावे । अकृत्रिम अर्थात् प्राकृतिक भरे हुए जल में स्नान करे । स्नान पाठ प्रकार
के होते हैं। नित्यस्नान, निमित्त से सम्बन्धित स्नान, काम्य अन् मिमी
पागना यो हदय में रमकर पिया जाने वाला स्नान, विमी शिया का मन
स्वरूप स्नान, मल को साफ करने वाला स्नान, माजन, पानमन मोर प्रवगा.
हन ये पाठो के नाम हैं ॥१०४।१०।। जो पुरुष म्नान न पिया हुआ हो यह
जर, पग्नि और हवन पादियों के बरन याय नही हाता है। बा प्रात..
साल में रिया जाने वाला स्नान होता है यह उमरे निम निरपम्मान पहा गग
है।।१०६॥ किमी पाहाल, समोर विद्या मादिरा मारी यादिमी
रजमा राम्नान जा स्नान पोपहार मान मिपा रहा है यह नगि.
सिरान पहा गया है ॥१७॥ मोतिषियों द्वारा यमाई विपि मे प्रेरित
होरो तुष्य स्नान प्रारि मे विधान में स्नाता है यह माम्म स्नान है।
दमे बिना कामना पाला भी पिया परता है ॥१० जापपरन की
दावाना वना तया प्रतिदियोगी प्रचना वरन मिस पविना प्रय
स्नान किया जाता है यह स्नान शिया मत स्नान रहा गया है ॥१६॥
१३४ ]
[ श्री गरुडपुराण
मलापकर्पणार्थाय प्रवृत्तिस्तत्र नान्यथा।
सर मु देवखातेषु तीर्थेषु च नदीप च ॥११०
स्नानमेव क्रिया यस्मारिक्रयास्नानमत परम् ।
अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति तीर्थस्नानात्फल लभेत् ॥१११
मार्जनान्मज्जनमन्त्रं पापमाशु प्रणश्यति ।
नित्य नैमित्तिकञ्चापि क्रियान्न मलकर्षणम् ।
तीर्थाभावे तु कर्तव्यमुष्णोदकपरोदकं ॥११२
भूमिष्ठादुद्ध त पुण्य ततः प्रस्रवणादिकम् ।
ततोऽपि साररा पुण्य तस्मानादेयमुच्यते ।।११३
तीर्थतोय ततः पुण्य गाङ्गपुण्यन्तु सर्वतः ।
गाङ्ग पयः पुनात्याशु पापमामरणान्तिकम् ॥११४
गयायाञ्च कुरुक्षेत्र यत्तीय समुपस्थितम् ।
तस्मात्त ताङ्गमपर जानीयात्तीयमुत्तमम् ॥११५
पुनजन्मनि योगेपु तथा सक्रमणे रवे.।
राहोश्च दशने स्नान प्रशस्त निशि नान्यथा । ११६
उपम्युपसि यत्स्नान सन्ध्यायामुदिते रवी ।
प्राजापत्येन तत्तुल्य महापातकनाशनम् ।।११७
केवल शरीर के मल का प्रक्षालन करने के ही निमित्त जो स्नान होता
है वह मलापक पण स्नान कहा गया है क्योकि अन्य कोई हेतु उसका नहीं होता
है । उसकी प्रवृत्ति ही मन का प्रकर्षण ही होती है । सरोवरो मे-देव सातो
मे, तीर्थो मे और नदियों में जो स्नान है वही एव किया है, इसनिये इसे निन्या
स्नान कहते हैं। इसके पश्चात् उल से शरीर के मङ्गो की शुद्धि होती है और
तीयों के स्नान से फल का भी लाभ होता है ।।११०११११॥ मज्जन मन्त्री के
द्वाग मान करने में पापो का बहुत ही शीघ्र प्रणाश हो जाता है। नित्य,
मिलिर, दिया जाना ली भाप में जगपादक स्या
में करना चाहिये ।।११२|| भूमि मे जो उन त पल होता है वह पुष्प है ।
इगरी भी अधिक पुण्य प्रस्तषण प्रादि का होता है । इमसे ज्यादा सरोवर का
-
सदाचार कथन ]
[ १३५
जल पवित्र है । सरोवर से भी अधिक पुरय नदी का जल है-ऐमा कहा जाता
है ॥११३॥ तीर्थ का जल विशेष पुण्य होता है । गङ्गा का जल तो सभी प्रकार
से पुण्य है । गगा का जल शीघ्र ही पवित्र किया करता है और पामरणा-
न्तिक पापो को नष्ट कर देता है ॥११४॥ गया मे, कुरुक्षेत्र मे जो जल उपस्थित
है उससे भी उत्तम दूसरा गगाजल को ही समझना चाहिये ।।११५॥ पुत्र के
जन्म मे, योग विशेषो मे, रवि के सक्रमण को वेला में, राहु के दर्शन में प्रर्थात्
ग्रहण के समय में रात्रि में स्नान प्रशस्त माना गया है अन्यथा निशा को बेला
में स्नान अच्छा नहीं कहा गया है ।।११६।। सुबह ही सुबह के समय मे रवि
के उदय होने की सन्धि में जो ग्नान होता है यह प्राजापत्य व्रत के समान
महापातको के नाश करने वाला होता है ।।११७||
यत्फल द्वादशाब्दानि प्राजापत्ये कृते भवेत् ।
प्रात स्नायी तदाप्नोति वरण श्रद्धयान्वित ।।११८
य इच्छेद्विपुलान्भोगाश्चन्द्रसूर्यग्रहोपमान् ।
प्रात स्नायी भवेन्नित्य मासौ द्वौ माघफाल्गुनी ॥११६
यस्तु माघ समासाद्य प्रात स्नायी हविष्यभुक् ।
अतिपाप महाघोर मासादेव व्यपोहति ।।१२०
मातर पितरञ्चापि नातर सुहृद गुरुम् ।
यदुद्दिश्य निमज्जेत द्वादशाश लभेत्त स ॥१२१
तुण्यत्यमलविष्णुरेवादश्या विशेषत ।
श्रीकाम सर्वदा स्नान कुर्वीतामलर्नर ।।१२२
सन्ताप कोतिरल्पायुधन निधनमेव च ।
आरोग्य सर्वकामाप्तिरम्यगाद्भास्करादिषु ।।१२३
उपोपितस्प अतिन कृत्तकेशस्य नापित्त ।
तावच्छीस्तिष्टति प्रोता यावत्तेल न मम्पृशेत् । १२४
मारह वर्ष तर प्राजापत्य या के करने से जो फल प्रात होता है उसे
प्रदा मे समन्धिन होकर नित्य प्रात काम में स्नान करने वाला एक वर्ष ही में
प्राप्त कर लिया करता है ।।११८॥ जो पुरुष चन्द्र पौर सूर्य ग्रहो के तुल्य बहुत
[ श्री गरड पुराण अधिक भोगो के प्राप्त करने की इच्छा रखता है उसे माघ और फाल्गुन इन दो माप्तो में नित्य ही प्रात काल म स्नान करने वाला हो जाना चाहिय ।।११६।। जो पुरुप माघ मास को प्राप्त कर नित्य प्रात काल में स्नान करता है और हविष्य का भोजन करता है वह अत्यन्न उन महान् पाप को भी एक ही मास म नष्ट करके विशुद्ध हो जाता है ।।१२०। माता, पिता, भ्राता, सुहृद् गुरु इनम जिस किसी का उद्देश्य लेकर निमज्जन किया करता है उसका बारहवा अश वह प्राप्त किया करता है ॥१२१॥ भगवान् विष्णु विशेषकर एकादशी तिथि म प्रामलको से बहुन सन्तु हुमा करते हैं। जो श्री की कामना रखता हो उस मनुष्य को सवदा मागलका ( प्रांवला) स्नान करना चाहिये ।।१२२।। भास्कर प्रादि दिना मे अभ्यग करने से सन्ताप कीति, अल्पायु धन, निधन और आरोग्य इन सम्पूरण कामो की प्राप्ति हाती है ।।१२३॥ उपोपित, व्रती भौर नापित के द्वारा कशो के कर्त्तन कराने वाले की श्री प्रसन होकर तभी तक स्थित रहा करती है जब तक तैल का स्पश नही किया करता ॥१२४॥ एव स्नात्वा पितृ देवान्मनुप्यास्तर्पयेतर । नाभिमाने जले स्थित्वा चिन्तयदूर्वमानस ॥१२५ आगच्छन्तु मे पितर इम गृह्णन्त्वपोऽञ्जलिम् । जीस्तीनञ्जलीन्दद्यादाकाशे दक्षिणे तथा ॥१२६ वसित्वा वसन शुष्क स्थलम्थास्तीणवहिपि । विधिज्ञास्तर्पण कुय्युन पाने तु कदाचन ।।१२७ यदपा क्रूरमासात्त यदमेध्य तु किश्चन । अशान्त मलिन यच्च तत्सर्वमपगच्छतु ॥१२८ गृहीत्वानेन मन्त्रेण तोय सव्येन पाणिना। प्रक्षिपेदिशि नै त्या रक्षाऽपहतये तु तत् ।।१२६ निपिद्धभक्षणाद्यत्तु पापाद्यच्च प्रतिग्रहम् । दुप्त यच्च मे किञ्चद्वाड्मन कायकर्मभि ॥१३० पुनातु मे तदिन्द्रस्तु वरण सवृहस्पति । सविता च भगश्य मुनय सनवादय !!१३१ मदाचारकपन [१३७ इस प्रकार से स्नान करके मनुष्य को पितृगण, देवना और मनुष्यो को हम परना चाहिए । नाभि मान जल में स्थित होकर अध्यं मन वाला होते हए चिन्तन करे ।। १२५ ।। चिन्तन इस प्रकार से करे-हे मेरे पितृगण ! पाप लोग माइये और मेरी इस दी हुई जलाजलि को ग्रहण कीजिए । दक्षिण दिशा मे तीन-तीन मजलियाँ प्राकाश में देवे । फिर सूखे हुए पत्रों को पहिन कर स्थल पर विछे हुए वहि पर बैठकर विधि के शातामों को तर्पण करना चाहिए किन्तु पात्र में कभी तपंण न करे ॥ १२६ ॥ १२७ ।। पूर मांस मे जो पुछ भी जल में मभेध्य हो भौर प्रशान्त एवं मलिन जो कुछ भी हो वह सब प्रभगत हो जाये ॥ १२८ ।। हम मन्त्र से मध्य हाय से जल प्रहण करये नमत्य दिशा में राक्षसो के प्रप हनन करने के लिये उस जन पो प्रक्षिप्त पर देये ।। १२६ ।। निपिद्ध पदार्थ के भक्षण करने के पाप से घोर प्रतिग्रह के लेने से जो भी कुछ पुष्कृत मन-याणी-दारोर के धर्म के द्वारा मेरा हुपा हो उसे इन्द्रदेव-वरण-वृहस्पति-सविता-भग और सनकादि मुनि गरण पवित्र करें॥१३०॥ १३१॥ प्राग्रहास्तम्यपर्यन्तं जपंस्तृप्यन्निति ब्रुवन् । क्षिपेदपोरञ्जलीसीस्तु पुर्वन्स पतर्पणम् ॥१३२ सुराणामर्चन पुर्याद् ब्रह्मादीनाममत्सरी प्राह्मवंपरावरौद्र सावित्र मनवारुणेः ।।१३३ सल्लिङ्गरचंयेन्मन्यः सर्वदेवान्नमस्य च । नमस्कारेण पुष्पाणि विन्यसेत. पृथपृयकः ॥१३४ सर्वदेवमय विष्णु भास्करचाप चायेत् । पात्पुरुपमूक्त न य पुप्पाण्यप एव या ॥१३५ पनिन स्याज्जगदिदं तेन सर्व चरानरम् । अन्यन तान्त्रिमन्ः पूजयेच्च जनादनम् ॥१३६ 'पाप स्तम्य पर्यन्तम्"- '-दम मन्त्र का जप से उपाणरता हुमा, मशेर गे सरसामा सोन-नोन जस को अनलियो का प्रसर करना पाहिए ॥ १२॥ गिर प्रमादि गुरों ा मामरता से रहिम होरपर्यन १३८ । । श्री गरुडपुराण परना चाहिए। ब्राह्म- विशेद-सावित्र-मंत्रवारण तत् तत् लिङ्गों वाले मन्त्रो के द्वारा सम्पूर्ण देवो का मन करे फिर राब देवताओं को नम- स्कार करके पृयक पृथक नमस्कार द्वारा ही पुप्पो का विन्यास करना चाहिए ।। १३३ ॥ १३४ ॥ समस्त देशो के परिपूर्ण भगवान् विष्णु पौर मुवन भास्कर की प्रचना करनी चाहिए। पुरुष सूक्त के द्वारा जो पुरुषो को एक पल को ममपित करता है उसने इस सम्पूर्ण चराचर जगत् की हो मचना करली है। इसके अतिरिक्त तान्त्रिक मन्त्रो के द्वारा भी जनार्दन की पूजा करे ॥ १३५ ॥ १३६।। प्रादावध्ये प्रदातव्य तत पश्चाद्विलेपनम् । तत पुष्पाअलि धूपं उपहारफलानि च ।।१३७ स्नानमन्तर्जले चंव मार्जनाचमन तथा । जलाभिमन्त्रण यच्च तीर्थस्य परिकल्पनम् । अधमर्पणसूक्तेन निवार वेव नित्यश ॥१३८ स्नाने चरितमित्येतत्समुद्दिष्ट महात्मभि । ब्रह्मक्षत्रविशाञ्च व मन्त्रवत् स्नानमिष्यते । तूप्रणीमेव तु शूद्रस्य सनमस्कारक स्मृतम् ।।१३९ अध्यापन ब्रह्मयज्ञ पितृयज्ञस्तु सर्पणम् । होमो देवो वलिभाँतो नृयज्ञोऽतिथिपूजनम् ॥१४० गवा गोप्न दशगुण अग्न्यागारे शताधिकम् । सिद्धक्षेत्रेपु तीर्थषु देवतायतनेषु च ॥ सहस्रशतकोटीनामनन्त विष्णुसन्निधौ ॥१४१ पञ्चमे च तथा भागे सविभागो यथार्थत। पितृदेव मनुष्यारणा कोटीनाञ्चोपदिश्यते ।।१४२ ब्राह्मणेभ्य प्रदायान य सुहृदि सहारनुते । सप्रेत्य लभते स्वर्गमन्नदान समाचरन् ॥१४३ सर्वप्रथम मानि मे जय कि प्रचर्चा का बारम्भ कर देव को मय देना चाहिए । इसके मनन्तर विलेपन देवे । इसके पश्चात् पुष्पाजलि देवे भोर क्रमश:
सदाचार कथन ] [ १३६ भूप और उपहार के लिये फल मादि समर्पित करने चाहिए। इसके उपरान्त जल के अन्दर स्नान करावे--मार्जन तथा प्राचमन करावे। जल को मभि- मन्त्रित करे तथा तीर्थ का परिकल्पन करना चाहिए । इस तरह से अधमपंग सूक्त से नित्य हो तीन बार करना चाहिए । १३७ ।। १३८ ।। महान् प्रात्मा वालो ने स्नान में यह इतना चरित कहा है। प्राह्मण-क्षत्रिय भौर वैश्यो को मन्त्रवत् स्नान करना चाहिए। केवल शूद्र को चुप चाप ही नमस्कार के साथ स्नान बताया गया है ।। १३९ ।। प्रध्यापन करना ब्रह्मयज्ञ है और तर्पण करना पितृ यज्ञ होता है । होम करना देवयज्ञ होता है तथा बलि देना मौत यज है । प्रथितियों का अर्धा-सस्कार करना नृयज्ञ होता है ॥१४०।। गोप्रो के गोष्ट में इस सबका करना दशगुना फल वाला होता है। प्रग्यागार मे यदि यह सब दिया जाये तो शत गुना फार प्रद होता है । जो सिद्ध क्षेत्र हैं- तीर्थ हैं तथा देवतायतन हैं उन मे देवाचंन मादि करने से सहम शत कोटि गुना फन प्रद होता है एवं भगवान विष्णु को सन्निधि में किया जाये तो अनन्न गुना फल देने वाला हुमा करता है ॥१४१॥ तपा पञ्चम भाग में यथार्थ रूप से पितृ-देव-मनुप्य मोर काटियों का विभाग करे-ऐसा उपदेश दिया जाना है ।। १४९।। सबसे पूर्व ब्राह्मणो को प्रदान कर के जो अपने सुहृदो के साथ प्रशन किया करता है वह इस तरह मन का दान करने वाला मनुष्य मर कर स्वर्ग की प्राप्ति किया करता है ।। १४३ ।। पूर्व मधुरमपनीयाल्लवणान्नौ च मध्यत.। पतिक्ततपायाश्च पयलं व तथान्तत ॥१४४ शाकञ्च रामो भूमिष्ठमत्यन्तञ्च विवर्जयेत् । न चकरसरोवाया प्रमात कदाचन ।।१४५ अमृत ब्राह्मणस्यान्न क्षत्रियान्न पयः स्मृतम् । वैश्यस्य चान्नमेवान्न शूद्रान्न रुधिर स्मृतम् ॥१४६ अमावसी वसेद्यत्र एक्हायनमेव वा । तप श्रीव व लक्ष्मीश्न वसते नात्र संशयः ॥१४७ १४. 1 [ घी गरऽपुराण उदरे गार्हपत्याग्निः पृष्ठदेशे तु दक्षिण । प्रास्ये माहवनीयोऽग्नि सत्ये सर्वञ्च मूद्ध नि ॥१४६ य पञ्चाग्नीनिमान्वेद आहिताग्निः स उच्यते । शरीरमापः सोमच विविधञ्चान्नमुच्यते ॥१४६ प्राणो ह्यग्निस्तथादित्य स्त्रिमोक्ता एक एव तु । अन्न वलाय मे भूमेरपामग्न्यनिलस्य च ॥१५० भवत्येतत्परिणतो समाप्तव्याहत सुसम् । हस्तेन परिमाथि कुर्यात्ताम्बूलभक्षणम् ॥१५१ श्रवणञ्चेतिहासस्य तत्कुत्सुिसमाहितः। इतिहासपुरागाद्य: पाठसप्तमके नयेत् ॥१५२ ततःसन्च्यामुपासीत स्नात्वा वं पश्चिमा नर. । एतद्वा दिवसे प्रोक्तमनुप्ठान मया द्विज ॥१५३ प्राचार य. पठेद्विद्वान्गृणुयात्स दिव व्रजेत् । प्राचारादिधर्मकर्ता केशवो हि स्मृतो द्विज ॥१५४ सबसे पूर्व जो मयुर पदार्थ हो उसका प्रशन बरे पोर मध्य में सव. पानों का भोजन परला पाहिए । जो कटु-ति तथा पपाय स्वाद पाते हों उन्हें बाद में गाने मोर सबमे पन्त में पप वा पान करे ॥१४॥ रात्रि में शाका मन करे मोर जो भूमि हो उगमा विशेष से मन र देना चाहिए। अभी भी एही रमा सेवन नहीं करना पाहिए ॥१५॥ FE 1 अनमत सुत्य माना गया है-ववियपा प्रन दुग्ध पान बनाया गया है-पाको पाम होता है यह मर ही होता हसपा पूर मा पनि पिरतुन्य हा गया है। वहां पर प्रमावामी बाग रहा पाएर हापन नियाम रला है यहाँ पर थी पर महमी मि निवाmrarरती-गमें निर भी गुगप नहीं है॥१४॥ उदर में माईपापानिपौर राम शिनात मुग में पानी नि पार पर्दा रानिमा १४॥ोम पनियों होता है पारिवारिहा गरीर-पाप और गोम निषि धर्मसार कथन ] । १४१ - प्रय कहा जाता है ।। १४६ ॥ प्राण-प्रग्नि तथा प्रादित्य ये तीन भोक्त एक हो होता है । भूमि का अन्न मेरे बल के लिये है। जलो का-अग्नि प्रो. मबिल का भी बल के लिये होता है ॥ १५० ॥ यह समाप्त और व्याहत सुरु परिणति (परिपाक) मे होता है। हाथ से परिमार्जन करके ताम्बूल का भक्षर करना चाहिए ॥ १५१ ।। इसके उपरान्त पूर्णतया सावधान होते हुए इतिहार श्रवण करना चाहिए । पष्ठ और सप्तम भाग को इतिहास-पुराणादि के आवरण पठन प्रादि के द्वारा व्यतीत करना चाहिए ॥१५२॥ इसके मनन्तर प्रर्था दिवस के जो सात भाग बताये गये हैं उनका अपर में बताये हुए क्रम उप योग किये जाने पर फिर पश्चिम सन्ध्या की वन्दना स्नान करके करनी चाहिए हे द्विज ! इस प्रकार से मैंने दिवस का पूरा अनुष्ठान बता दिया है। जो विद्वान इम दिन भर के अनुष्ठान को पढता है या श्रवण करता है वह दिप लोक के जागा करता है । हे द्विज ! इस माचार प्रादि धर्म का जो फरने व ला है या तो केशव ही बनाया गया है ॥१५३॥१५४॥ ११६-धर्म-सार कथन धर्मसारमहं वक्ष्ये सक्षेपाच्छ शु शङ्कर । भुक्तिमुक्तिप्रदं सूक्ष्म सर्वपापविनाशनम् ॥१ श्रत धर्म चलं धैर्य सुखमुत्साहमेव च । पोको हरति वै नृरणा तस्माच्छोक परित्यजेत् ॥२ फर्मदारा कर्मलोकाः कर्मसम्बन्धिवान्धवाः । कर्माणि प्रेरयन्तीह पुरुष सुखदुःखयो ॥३ दानमेव परी धर्मो दानात्सर्वमवाप्यते । दान स्वगंञ्च राज्यश्च दद्यादान ततो नरः ।।४ एकतो दानमेवाहु समप्रवरदक्षिणम् । एकतो भयभीतस्य प्रारिणन. प्राणरक्षणम् ॥५ तपसा ब्रह्मनयेण यः स्नानेन वा पुनः । धर्मस्य नाराका ये पते व निरयगामिनः ॥६ १४२ ] [श्री गरुडपुराण ये च होमजपस्नानदेवताचनतत्परा । सत्यक्षमादयायुक्तास्ते नरा. सर्वगामिनः । ७ ब्रह्माजी ने कहा-हे शहर ! प्रा में सक्षेत्र में धर्म का सार बतलाता हूँ उसका तुम श्रवण परो। यह धर्म का सार अत्यन्त सूक्ष्म है पोर मुक्ति तथा मुक्ति के प्रदान करने वाला एव सब प्रकार के पापों का नाश कर देने वाला होता है ॥१॥शोक बहुत ही बुरी वस्तु है, इससे यत, धर्म पल, पथ्यं मोर सुख एवं उत्साह इन मवका हरण हो जाया करता है अर्थात शोक से ये सब नष्ट हो जाते हैं । अतएव शोक का परित्याग कर देना चाहिए। तात्पर्य यह है कि शोक को कभी भी न करे ॥२॥ ये कर्म ही पत्नियां हैं, गर्म ही लोक हैं कम ही सम्बन्धी और बान्धव हैं । म समार में सुख तथा दुःख मे पुरुष को कर्म ही प्रेरित किया करते हैं ॥३॥ दान करना सबसे बड़ा परम धर्म होता है । दान करने से ससार में सभी कुछ को प्रामि की जाया करती है । दान ही स्वर्ग है और दान ही राज्य है अर्थात् दान से स्वर्ग तथा राज्य की प्राप्ति हुआ करती है। अतएव मनुष्य को दान अवश्य ही देना चाहिये ।।४। एक भोर तो समग्र श्रेष्ठ दक्षिणा से युक्त दान है पौर एक घोर भय से भीति (डरा हुआ) प्राणी के प्राणों का रक्षरण है ॥५॥ तप, ब्रह्मचर्य, यज्ञ और स्नान के त्यागने से जो धर्म के नाश करने वाले हैं वे मनुष्य निश्चय ही नरक के गामी हुमा करते हैं । ॥६॥जो मनुष्य होम, जप, स्नान, देवों का अर्चन इन सामों मे सदा परायण रहा करते हैं और सत्य, क्षमा मोर दया से युक्त होते हैं वे मनुष्य अवश्य ही स्वर्ग के गमन करने वाले होते हैं ॥७॥ न दाता सुखदु खानां न च हस्ति कश्चन । स्वकृतान्येव भुञ्जन्ते दुःखानि च सुखानि च । धर्मार्थ जीवितं येषां दुर्गाण्यतितरन्ति ते। सन्तुष्टः को न शक्नोति फलमूलैश्च वतितुम् । सर्व एव हि सौख्येन सङ्कटान्यवगाहते । इदमेव हि लोभस्य कार्य स्यादतिदुष्करम् ।।१० यमंमार सधन । [१४३ लोभाक्रोध प्रभवति लोभाद्रह प्रवर्तते । लोमान्मोहश्च माया च मानो मत्सर एव च ॥११ राग पानृतकोवलोभमोहमदोज्झिन । य स शान्त पर लोक याति पापविवजित ।।१२ देवता मुनयो नागा गन्धर्वा गुह्यका हर । धार्मिक पूजयन्तीह न धनाढ्य न कामिनम् ।।१३ अनन्तवलवीर्येण प्रज्ञया पौरुपेण वा । अगम्य लभते मयंस्तत्र या परिवेदता ॥१४ सुसों और दुखो का देने वाला या इनके हरण करने वाला कोई भी नहीं है । मनुष्य अपने ही किये हुए कमो के अनुमार चाहे वे पहिले जन्म नरो में किय हों या इमी जन्म के हो-सुख-दु सो का भोग पिया करते हैं ॥८॥ रिना जीवन ही धर्म के लिये होता है वे सभी दुखों का नाश कर दिया परते हैं। कौन सन्तुष्ट पुरुष फल पौर मूनो के द्वारा जीवन निर्वाह नहीं कर सस्ता है? सभी मुस मे सरटी का प्रवगाहन करते हैं । यह ही लोभ का परयन्त पठिन कार्य है ॥१०॥ सोम से क्रोय होता है मौर लोम से ही द्रोह प्रवृत हमारता है । लोभ हो एर ऐमा महान् दोष है जिसमे मोह, माया, गान पोर मार उत्साहुपा पाते हैं ॥११॥ यही पुरुष शा.त होता है जो राग, प, पिप्पा, पोष, लोभ, मोह पौर पद से दूर रहता है पर्यात् हनका स्पाग जिसने पर दिया है तथा जो सान्ति से सम्पन होता है पाप से रहिम होगर परमौक में गद्गति प्राप्त किया करता है ॥१२॥ हे हर ! देयता. मुनि. गण, नाग, गपर्व और गुहागरण ये सभी लोग यह! गोr धमनिट पुरुषही का पूमन रिमा करते है, पन से सम्मान तपा कामो पुरुष को कोई भी पूधामही artm माने पनर बन और योग्य से, प्रशा से पपया पुराप मे मनुष्य प्राम्य पापं को प्राप्त करता है। मैं फिर परि- या (पपासार) या करना है ? ॥१४॥ समस्यदयात्यर्थ मन्द्रिपपिनिग्रह । सयंत्रानित्यमित्वं यप. परमिद स्मृतम् ॥१५ [ श्री गरुड पुराण पश्यन्निवानको मृत्यु यो धर्म नाचरैन्नर. । अजागलस्तनस्येव तस्य जन्म निरर्थकम् ॥१६ भ्रूणहा ब्रह्महा गोप्न पितृहा गुरुतल्पगः। भूमि सर्वगुणोपेतां दत्त्वा पापैः प्रमुच्यते ॥१७ न गोदानात्परं दान किञ्चिदस्तीह मे मतिः । या गोर्यापाजिता दत्ता कृत्स्नं तारयते कुलम् ॥१८ नान्नदानात्तर दान किञ्चिदस्ति वृषध्वज । अन्नेन घाय॑ते सर्व चराचरमिद जगत् ॥१६ समस्त प्राणियो पर अत्यन्त दया करना तथा सम्पूर्ण इन्द्रियो का विशेष रूा से नियन्त्रण रखना चोर सभी में मनित्यता की बुद्धि का रखना ही परम श्रेय बताया गया है ॥११॥ अपने सामने मृत्यु को खड़ी हुई तय्यार .देखकर भी जो मनुर धर्म का आचरण नहीं किया करता है उसका यहां इस लोक में जन्म ग्रहण करना भी बेकरी के गले में होने वाले स्तन की भांति हो बिल्कुल व्यर्थ होता है। किसी किसी बकरी के कण्ठ में एक स्तन होता है जिससे दूर नहीं निकलता है भौर वह बेकार ही होता है ॥१६॥ जो भरण (गर्भस्थ बालक) की हत्या करने वाला है, ब्राह्मण को हत्या करने वाला है, गौ का हनन करने वाला, पिता के मारने वाला और गुरु की पत्नी के साथ गमन करने वाला है वह समस्त गुणो से सम्पन्न भूमि का दान करके पापो से छुटकारा पाया करता है ।।१७। इस सगार में गोदान से उत्तम अन्य कोई भी दान नहीं होता है-ऐसी मेरी मति है। जो न्याय से अजिन को हुई गो का दान किया जाता है वह गोदान पूर्ण कुन का उद्धार कर दिया करता है ।। अध के दान का भी बड माहात्म्य है। इसे बडा भी अन्य कोई दान नहीं होता है। हे वृपमा! मल से ही यह सम्पूर्ण चराचर जगत् धारण जाता है ॥१६॥ कन्यादान वृपोत्सर्गस्तीर्थसेवा थमं तथा । हस्त्यशरथदानानि मगिरलकमुन्धरा ॥२० अन्नदानस्य सर्वाणि कला नाहन्ति पोडशोम् । अन्नात्प्राणा वल तेजश्चान्नाद्वीयं धृति. स्मृतिः ॥२१ पुगधर्म कथन [ १४५ कूपनापीतडागादि पारामाणि च कारयेत् । विसप्तकुलमुद्ध त्य विष्णुलोके महीयते ॥२२ साधूना दर्शन पुण्ण तीर्थादपि विशिष्यते। कालेन फलते तीर्थ सद्य. साधुसमागमः ॥२३ सत्य दमस्तप. शौच सन्तोषश्च क्षमार्जवम् । ज्ञान शमो दया दानमेप धर्म. सनातन. 1॥२४ कन्या का दान देना, वृपोत्सर्ग तीर्थों का सेवन करना, श्रुत, हाथी, घोडा और रथ का दान तथा मणि, रत्त एव भूमि का दान देना ये सभी महान से महान् दान भी अन्न के दान की मोलहवी कला के समान भी नहीं हुआ करते हैं । अन्न से प्राणो की रक्षा होती है, बल की वृद्धि होती है, तेज बढता है और अन्न से ही वीर्याधुनि तथा स्मृति हुपा करते है अतएव यह दान परम मरत्वशाली होता है ॥२०॥२१॥ कुमा, बावडी, तालाब मादि का निर्माण एवं उद्यान की रचना भी अवश्य ही करानी चाहिए। इनमें मनुष्य प्राने इक्कीस कुलो का उद्धार करके अन्न मे विष्णु लोक में प्रतिष्ठित हुपा करता है ॥२२॥ साधु-सन्त पुरुषों का दर्शन परम पुण्यप्रद होता है जो कि तीर्थों के सेवन से भी अधिक कहा जाता है । तीर्थों का सेवन तो समय माने पर ही फन दिया करता है किन्तु साधु पुरुषो का समागम तुरन्त ही फल दिया करता है ॥२३॥ सत्य, दम, तप, शौच, सन्तोप, क्षमा, आर्जव ( सीधा भाव ), ज्ञान, शम, दया और दान ये सब सनातन धर्म कहे गये हैं ।।२४।। ११७-युग-धर्म कथन मुनिभिश्चारिता धर्मा भक्त्या व्यास मयोदिताः । यविष्णुस्तुष्यते चैव सुखादिपरिचारका ॥१ तपणेन च होमेन सन्ध्याया वन्दनेन च । प्रायले भगवान चितुर्वकामार्णमोक्षद पर धर्मो हि भगवान् विष्णु पूजाविष्णुस्तु तर्पणम् । होम. सन्ध्या तथा ध्यान धारणा सकल हरिः॥३ १४६ ] [ श्री गडपुराण प्रलय जगतो वक्ष्ये तत्सर्व शृणु शौनक । चतुर्युगसहस्रन्तु कल्पकाजदिन स्मृतम् ।। कृतताद्वापरादियुगावस्था निवोध मे। कृते धर्मश्चतुप्पाच्च सत्य दान तपो दया ॥५ धर्मपाता हरिश्चेति सन्तुष्ट ज्ञानिनो नग । चतुवंषसहस्राणि नरा जीवन्ति वै तदा ॥६ कृतान्ते क्षत्रियविप्रा विशूद्राश्चजिता द्विज । शूरश्चातिवलो विष्णू रक्षासि च जघान ह ॥७ ब्रह्माजी ने कहा-हे व्यास । भक्तिभाव से मुनियो के द्वारा समाचरण किये गये धर्म मैंने बतलाये हैं जिन धर्मों से भगवान् विष्णु की तृप्ति होती है पौर सुसादि के परिचारक होते हैं ॥१॥ तरण करने से, होम करने से मोर सध्या के समय में वन्दना करने से धम, काम, मथ और मोक्ष के प्रदान करने वाले भगवन विष्णु प्राप्त किये जते हैं ॥२॥ भगवान् विष्णु का ही स्वरूपा धर्म होता है। पूधा विषणु है और तर्पण भी विष्णु है। होम, सन्ध्या-वदन एव ध्यान भोर धारणा ये सभी हरि के ही स्वरूप हैं ॥३॥ श्री सूतजी ने कहा हे मौनक । पब हम इस जगर को प्रलय का वर्णन करते हैं। उस सबका तुम धारण करो । एक सहस्र सतयुग, द्वापर, वेता पौर कलियुग इन चारों युगो का एक कल्प होता है जो कि ब्रह्म का एक दिन हुमा करता है ॥४॥ अव कृत. युग, त्रेता, द्वापर आदि युगा को अवस्था मुझसे सुन समझ लो। कृतयुग में धर्म के चारों पाद होते हैं । वे चार पाद सत्य, दान, तप और दया ये ही होते हैं । १५॥ धर्म का पालन करने वाले हरि हैं । ज्ञानी मनुष्य सन्तुष्ट रहा करते हैं। उस समय कृतयुग में मनुष्य चार हजार वष तक जीवित रहते हैं अर्थात् मनुष्यों की भायु उम युग में चार सहस्र वर्ष की हुमा करती है ॥६॥ कृतयुग के भन्त में क्षतिगे के द्वारा विष, वैश्य और शूद्र जीत लिये गये। द्विजो मे मति बल वान शुर विष्णु ने राक्षसो का हनन किया था ॥७॥ त्रेतायुगे निपाद्धर्म सत्यदानदयात्मक । नरा यज्ञपरास्तस्मिस्तथा क्षमोद्भव जगत् ।।८
युगधर्म पथन
[ १४७
रक्तो हरिनर पूज्यो नरा दशशतायुपः ।
तत्र विष्णुर्भीमरथ क्षत्रिया राक्षसानहन् ।।६
द्विपादविग्रहो धर्म पीताताञ्चाच्युते गते ।
चतु शनायुपो लोका द्विजक्षत्रोद्भवा. प्रजाः ।।१०
तत्र दृष्ट्वाल्पबुद्धीश्च विष्णुव्यासस्वरूपधृक् ।
तदेक तु चतुर्वेद चतुर्दा व्यभजत् पुनः ।।११
शिष्यानध्यापयामास समस्तान् तान् निवोध मे।
ऋग्वेदमथ पैलन्तु सामवेदश्च जैमिनिम् ॥१२
अथर्वाण सुमन्तु तु यजुर्वेद महामुनिम् ।
वैशम्पायनसङ्गन्तु पुराण सूतमेव च ।
अष्टादश पुराणानि यो वेत्ति हरिरेव हि ।।१३
सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वशो मन्वन्तराणि च ।
वशानुचरितञ्चैव पुराण पञ्चलक्षणम् ।।१४
पेस
युग में धर्म के तीन ही पाद रह गये थे। और वे तीन धर्म के
पाद मत्य, दान और दया ये थे। उस समय में मनुष्य यज्ञों के करने मे तत्पर
रहते थे तथा यह उम्पूर्ण जगत् क्षत्रोद्भव हो गया था । ८॥ हरि का रक्त वर्ण
था जो कि मनुष्यो के द्वारा पूजा के योग्य थे। मनुष्यो फी मायु इम युग में
एक सहस्र वर्ष की होती थी। उस समय मे भीमरथ विष्णु थे भोर क्षत्रियो ने
राक्षसों का हनन किया था ।९।। द्वापर युग मे धर्म दो पादो के शरीर वाला
था । भगवान भच्युत् उस समय मे पोत वर्ण के थे। मनुष्यों की प्रायु उस युग
मे चारसी वर्ष की थी और प्रजा, द्विज तया क्षत्रियो से उद्भव प्राप्त करने वाली
पी 1ton उम समय में मनुष्यो को मल्ल बुद्ध वाले देखकर भगवान् विष्णु
ने महपि व्यास के स्वरूप को धारण किया था। उन एक महपि ध्यास देव ने
चारों वेदो के रूप में वेद का विभाजन किया था ॥११॥ उन चारो वेदो को
सम्पूर्ण रूप से शिष्यो को पलाया था। उनको भी अब तुम समझ लो 'ग्वेद
को तो पैल को पढाया था और सामवेद जैमिनि नामक शिष्य को पढाया था।
पथर्व वेद सुमन्तु को पढाया था तथा यजुर्वेद महामुनि को पढाया था ।
[ श्रो गरुडपुराण १४८ ] वैशम्पायन के साथ सूतजी को पुगण का मध्यापन कराया था। जो अठारह पुराणों का ज्ञान रखता है वह साक्षात् हरि ही है ॥१२॥१३॥ पुराण के पांच लक्षण होते हैं-उममें सर्ग, प्रतिसगं, वंश, मन्वन्तरो का वर्णन मोर वशानु- चरित होते हैं |॥१४॥ ब्राह्म पान वैष्णवञ्च शैवं भागवत तथा। भविष्यन्नारदीयञ्च स्कान्द लिङ्ग वराहकम् ॥१५ मार्कण्डेयं तथाग्नेयं ब्रह्मवैवर्तमेव च । कोम मात्स्य गारुड़ञ्च वायवीयमनन्तरम् ॥ अष्टादशसमुद्दिष्टं ब्रह्माण्डमिति सज्ञितम् ॥१६ अन्यान्युपपुराणानि मुनिभि. कथितानि तु । पाद्य सनत्कुमारोक्त नारसिंहमथापरम् ॥१७ तृतीयं स्कन्दमुद्दिष्टं कुमारेण तु भापितम् । चतुर्थ शिवधर्मास्य स्यानन्दीश्वरभापितम् ।।१८ दुर्वामसोक्तमानयं नारदोक्तमतः परम् । कपिल वामनञ्चैव तथंवोशनसेरितम् ॥१६ ब्रह्माण्ड वारुणञ्चाय कालिकाह्वयमेव च । माहेश्वरं तथा साम्बमेव सर्वार्थसञ्चयम् ।। पराशरोक्तमपरं मारीनं भार्गवाह्वयम् ॥२० पुराण धर्मशास्यञ्च वेदस्त्वङ्गानि यन्मुने । न्यायः शौनक मीमासा आयुर्वेदार्थ शास्त्रकम् ॥ गन्धर्वश्र धनुर्वेदो विद्या ह्यष्टादश स्मृताः ॥२१ पुराणों के नाम ये है-ब्राह्म ( ब्रह्मपुराण )-पाप (पम पुराण)- वैष्णव (विष्णु पुगण)- (शिव पुराण)-भागयत-भविष्यत्-नारदीय. हान्द (बन्द पुराण)-लिङ्ग-पराहरू-मार्कण्डेय-माग्नेष (मग्नि पुराण)- बोझ ( धर्म पुगए )-पारस्य-TE-यनीय ( वायु पुराण ) ये अष्टादमा पृगए हैं जिनमें पठारहवा ग्रयाण्ड पुगए है ॥ १५ ॥१६॥ हनये भनिरिक भी उपपुराण है जो मुनियों द्वारा बहे गये हैं। सपरो मादिका नामह युगधर्म कथन [ १४६ पुगण है जिसको सनत्कुमारी ने कहा है, वह भी दूसरा पुगण है। तीसरा स्कन्द पुराण कुमार के द्वारा कथित है। चौथा गिव धर्म नाम वाला पुराण है जो नन्दीश्वर के द्वारा भापित हुमा है ॥ १७ ॥ १८ ॥ दुर्वासा के द्वारा कथित आश्रयं और इसके मनन्तर नारद के द्वारा उन्म पुराण है। कपिल- बामन और उशना के द्वारा कथित पुराण है ॥ १६ ॥ ब्रह्माण्ड-बारुण पौर कालिका नामक पुराण है। माहेश्वर-साम्ब-सर्वाथ सञ्चय--पराशर के द्वारा कथित पुराण-मारीच और भार्गव नाम वाला पुराण है ॥ २० ॥ पुराण-धर्मशास्त्र-वेद के पङ्ग हे शौनक मुने ! न्याय--मीमामा मोर मायु. वेदार्थ शास्त्र-गन्धर्व शास्त्र-धनुर्वेद ये सब मिल कर भठारह विद्याएँ बताई गई हैं ॥२१॥ द्वापरान्तेन च हरिगुरुभारमपाहरत् । एकपादस्थिते धर्मे कृष्णत्वञ्चाच्युते गते ॥२२ जनास्तदा दुराचारा भविष्यन्ति च निर्दयाः । सत्त्व रजस्तम इति दृश्यन्ते पुरुषे गुणाः ॥ कालसञ्चोदितास्तेऽपि परिवर्तन्त आत्मनि ।।२३ प्रभूतञ्च यदा सत्त्व मनोवुद्धीन्द्रियाणि च । तदा कृतयुगं विद्यात् ज्ञाने तपसि यद्रत ॥२४ यदा कर्मसु काम्येषु शक्तिर्यशसि देहिनाम् । तदा त्रेता रजभूतिरिति जानीहि शौनक ॥२५ यदा लोभस्त्वसन्तोपो मानो दम्मश्च मत्सरः । कर्मणाश्चापि काम्याना द्वापरं तद्रजस्तगः ॥२६ यदा सदानृत तन्द्रा निद्रा हिंसादिसाधनम् । शोकमोही भय दैन्य स कलिस्तमसि स्मृतः ॥२७ यस्मिन् जना कामिन. स्युः शश्वत् कटुकभाषिणः । दस्यूत्कृष्ठा जनपदा वेदाः पापण्डपिता.॥२८ द्वापर युग के अन्त में भूमि के बहुत भारी मार को भगवान् हरि ने दूर किया था जब कि धर्म का केवल एक ही पाद यहां पर स्थित रहा था [ प्रो गरुडपुराण उस समय में भगवान् अव्युत् ने कृष्णावतार धारण किया था ॥ २२॥ उम समय में मनुष्यो के भाचार बहुत दूषित हो गये थे। मनुष्यों मै दया विल्कुल नहीं रहेगी पोर पुरुषो मे सत्व-रष प्रौर तम ये गुण दिखलाई दिया करते हैं । वे सभी काल से सम्प्रेरित होकर मारमा में परिवत्तित हो जाते हैं ॥२३॥ जिस समय सत्त्व का बाहुल्य रहता है और मन-बुद्धि-इन्द्रियाँ उसी प्रकार के होते हैं उस समय कृतयुग जानना चाहिए मनुष्य उस समय ज्ञान तथा तपस्या में रत रहा करते हैं ॥ २४ ॥ जिस समम में देहधारियो की रति काम्य कमी मे शक्ति पण में हुमा करतो है 'उस समय त्रेता युग होता है। हे शौनक ! इमे रजो गुण को उत्पत्ति या वैभव ही समझना चाहिए ॥ २५॥ जिस समय में लोभ-~-प्रसन्तोष-मान-दम्भ-~-मत्सर और केवल कामना से युक्त - कर्म हो होते हैं उसे द्वापर युग समझो। इसमें रजोगुण और तमोगुण की ही प्रधानता रहा करती है ॥ २६ ।। जिस समय मे सदा मिथ्या-तान्द्रा-निद्रा, पौर हिसा आदि के साधन होते हैं तथा शोक-मोह-~-भय-देग्म हुमा करते हैं वह कलियुग कहा गया है इसमे केवल नमो गुण ही रहा करता है ॥ १७ ॥ जिस समय में मनुष्य कामी भोर सदा पटुभाषी हो जाते हैं। जन पद दस्युभो के द्वारा सस्कृष्ट होते हैं और वेद पापण्ड के द्वारा दूषित हो जाया करते हैं। ये सब कलियुग का प्रभाव है ।।२८॥ বানান সামিলা, দিলীঘলিনা। अग्रता बटयो शौचा भिक्षयश्च कुटुम्बिन: ॥२६ तपस्विनो ग्रामवासाः न्यासिनो यर्थ लोलुपाः । हस्वकाया महाहाराश्चोर्यास्तु साधकः स्मृताः ॥३० त्यक्ष्यन्ति भृत्याच पति तापसस्त्यक्ष्यति व्रतम् । शूद्राः प्रतिमहिप्यन्ति वैश्यस्तपपरायणः ॥३१ उद्विग्नाः सन्ति च जनाः पिशाचसहशाः प्रजाः। अन्यायभोजनाग्निदेवतातिथिपूजनम् ॥३२ करिष्यन्ति फलो प्राप्त न च पिन्युदक्यिाम् । श्रीपरान जनाः सर्वे शूद्रमायाश्च शौनकः ॥३३ ।
गमं न ] बहुप्रजाल्पभाग्याश्च भविष्यन्ति कली स्यिय । शिरःकण्डूयनपरा आज्ञा भेत्स्यन्ति भत्सिता ॥३४ विष्णुन पूजयिष्यन्ति पापण्डोपहता जना. । फ्ले पनिधेविना अस्ति ह्य को महागुण ॥३५ वोत्तनादेव कृष्णस्य महावन्ध परित्यजेत् । कृते यज्ञादिना विष्णु प्रेताया जपतः फलम् ॥३६ द्वापरे परिचाया बली तद्धरिकीर्तनाद । तस्माद् ध्येयो हरिनित्य ध्येय. पूज्यश्च शौनक ॥३७ पलियुग में राम लीग प्रजाजनों से भिक्षा को याचना करते है पौर ये सभी शिश्न तपा उदर की पूति में हो परायण रहने वाले होते हैं। पटु सोग पात् ब्रह्मचारी व्रत रहित, शौच विहीन-भिशु भोर कुटुम्मी होगे ॥ २६॥ यो तपस्वी नामधारी पुरुष होंगे ये ग्रामों पे अन्दर निवास करने पास हो जायेंगे। जो संन्यास पारण करने वाले लोग हैं घे महान् पन में मामी हो जायेंगे। साधु गण वे ही पहलायेंगे जिनके और का मापार छोटा होगा-मधिय पाहार करने वाले मोर चोरी करने वाले होगे ॥३०॥ भृत्य मोग अपने स्वामियों को नस समय में स्याग कर दिया करेंगे । तापम- गए पपने वर्ती घोर दिया करेंगे। पूरलोग दान प्रहप दिया रेंगे । पाय सोग तपस्या में परापए होंगे ॥ ३१ ॥ सभी मनुष्य उद्वेग से युक्त रहेगे पौर सारी प्रमा पिसापों के सुल्म हो जापगी। अन्याय के भोजन द्वारा लोग प्रग्नि-देवता और प्रतिपियों पूजन करेंगे। अब कलियुग प्राम होगा तो पितृगण की रोई भी सदा प्रिया नहीं करेगा। हे पोस ! रसियुग में गभी माय नियों में ही परायण पौरपूर प्राय हो जायेंगे ॥३२॥३३॥ पोगों गतान प्रापित होंगी पोर पे सम भाग्य होनहमा परेंगे। त्रियों ऐगी पमागिनी होंगो लिपपने विणको गुममाने में सार रेंगी भोर मित होrरोपीधामा नारायन रिया करेंगो ॥ ३४॥ मोगों में पालना होमग उपाय होपर ये प्रिया मन नहीं रिया है yि Inोषों मे दूषित मिपुर में एर हो महान् गुण १५६ ] [ श्री गरुडपुरार तज्जाया मनसा वाञ्छम्तद्रव्यं वाप्यसशयः। गर्द भो जायते जन्तुमित्रस्यवापमानकृत् ॥१४ इसके मनन्तर अगुली–नेप-नासिका-प्रन बल भादि उपाङ्ग प्रकट होते हैं जो कि भङ्गो से उत्पन्न हुप्रा करते हैं। इसके मनन्तर नस मादि की उत्पत्ति तथा निर्माण हो जाता है ॥८॥ स्वना-गेम मौर फिर केश उत्पन्न हुमा करते हैं । इन सबके निर्माण हो जाने पर मनुष्य नीचे की मोर मुख वाला होकर स्थित रहा करता है। जब दशम मास पा मारम्भ होता है तो यह उत्पन्न होता है मर्यात गर्भाशय रो वाहिर होता है ।। ६ ।। जैसे ही पह जीवात्मा यहाँ लोक मे देह धारण कर उत्पन्न होता है वैसे ही वैष्णवी माया जो कि अत्यन्त मोहन करने वाली है उसे मावृत्त कर लिया करती है। यह प्राणी इस लोक मे माकर बचपन-कुमारावस्था-यौवन और वृद्धता को क्रम रो प्राप्त करके पूर्ण उम्र समाप्त कर देता है और इसके पश्चात् उसको मृत्यु प्राप्त होती है । इस प्रकार से यह मानव तत्-तत् धर्म को प्राप्त किया करता है । इस प्रकार का यह ससार का एक चक्र है जिसमें जीवात्मा घडी के यन्त्र को भौति भ्रमित होता रहता है। उत्पन्न हुआ-उम्र भोगी-मर गया-कर्म फल भोगे भले बुरे जैसे भी हो और फिर जन्म लिया-यही चक्र गति है ॥ १० ॥ ११ ॥ नरको से कर्मानुसार भोग भोगलेने के पश्चात अपनी अवधि समाप्त करके यह जीवात्मा फिर यहाँ पापयोनियो मे जन्म ग्रहण किया करता है । हे बुध । पतित पुरुप से प्रतिग्रह लेकर यह अधो योनियो मे जाया करता है ॥ १२ ॥ याचक नरक से प्रति मुक्त होकर कृमि होता है। जो द्विज उपाध्याय होकर ध्यलोक किया करता है वह कुत्ते की योनि में जन्म ग्रहण करता है ॥ १३ ॥ उसकी जाया को मन से इच्छा करता है या उसके द्रव्य को मन मे प्राप्त करने की चाह रखता है तो बिना किसी सशय के गधे की योनि में जन्म लेता है जो जन्तु अपने मित्र का अपमान करता है वह भी गधा होता है ॥१४॥ पितरौ पीडयित्वा तु कच्छपत्वञ्च जायते । भत्तु पिण्डमुपाश्वस्तो वञ्चयित्वा तमेव य. १५ पाप परिणाम क्थन ] [ १५७ सोऽपि मोहसमापन जायते वानरो मृतः । न्यासोपहर्ता नरकाद्विमुक्तो जायते कृमिः ॥१६ असूयकश्च नरकान्मुक्तो भवति राक्षसः । विश्वासहर्ता च नरो मौनयोनौ प्रजायते ॥१७ यवधान्यानि राहत्य जायते मूपको मृतः। परदाराभिमत्ति वृको घोरोभिजायते ॥१८ मातृभा-प्रसङ्गत्वे कोकिलो जायते नरः । गुर्वादिभार्यागमनाच्छूकरो जायते नरः ।।१६ यज्ञदानविवाहानां विघ्नकर्ता भवेत्कृमिः। देवतापितृविप्राणामदत्वा यो समथ ते ॥२० प्रमुक्तो नरकाद्वापि वायसः सम्प्रजायते । ज्येष्ठभ्रात्रपमानाच कौञ्चयोनौ प्रजायते ॥२१ जो अपने माता-पिता को उत्पीडित पिया करता है वह कछुमा होकर पोर मे जन्म लिया करता है। स्वामी के पिण्ड से उपाश्वस्त होकर उसी को जो वधिन किया करता है वह भी मोह के समापन होने पर मृत होने के पश्चात् वानर की योनि में उत्पन्न हुप्रा करता है। जो किसी के प्रयास (धरो. हर) का उपहरण करने वाला है वह नरक से विमुक्त होकर अर्थात् पहिले नरक की पीठा पा भोग भोगकर फिर शेव भोग को भोगने के लिये कृमि होकर हम लोर मे जन्म लिया करता है ॥१५॥१६॥ जो प्रसूया (निन्दा) करने वाला पुरुष है यह नरक को यातना भोगार फिर शेष वर्मों के फल की पीडा भोगने के लिये राक्षम हुआ करता है। जो किमी को विश्वास देकर फिर उसका पात लिया करता है वह मीन (मछली) की योनि प्राप्त करता है ॥१७॥ जो निमी फे यय तया धान्यो का सहार करता है वह मरकर मूषक (नहा) हुआ करता है। जो पराई स्त्री के गाघ मभिमपं किया करता है वह पोर वृत (भेडिया) कर उत्पन होता है ।।१८। अपने भाई को भार्या के साथ प्रसङ्ग करने पर मनुष्य कोषिष की योनि में जन्म लेना है। गुरु मादिमी पूजनीय भार्या के गपन ररने मे भूत्र की योनि में जन्म ग्रहण किया करता है ॥१॥ यम, दान १५८ ] - [ श्री गरुडपुराण और विवाहों में जो विघ्न उपस्थित किया करता है वह कृमि होता है। देवता, पितृगण और विप्रों को समर्पण न करके स्वय ही पहिले खा लिया करता है वह पहिले तो नरक की यातना भोगता है और पीछे कोमा होकर जन्म ग्रहण किया करता है। अपने ज्येष्ठ भाई के अपमान करने से यह मनुष्य प्रौञ्च की योनि मे जन्म प्रास किया करता है॥२॥२१॥ शूद्रस्तु ब्राह्मणी गत्वा कृमियोनी प्रजायते। तस्यामपत्यमुत्पाद्य काष्टान्त कोटको भवेत् ॥२२ कृतघ्नः कृमिकः कीट: पतङ्गो वृश्चिकस्तथा । अशम् पुरुष हर्ता नरः सञ्जायते खरः ।।२३ कृमिः स्त्रीवधकर्ता च वालहन्ता च जायते । भोजनचोरयित्वा तु मक्षिका जायते नरः॥२४ हृत्वान्नञ्चैव मार्जारस्तिलहृच्चैव मूषिकः । पृत हृत्वा च नकुलः काको मद्गुरमामिपम् ॥२५ मधु हुत्वा नरो दंशः पूपं हत्वा पिपीलिकः । अपो हत्वा तु पापात्मा वायमः सम्प्रजायते ॥२६ हुतै काठे च हारीतः कपोतो वा प्रजायते । हृत्वा तु काञ्चनं भाएड कृमियोनो प्रजायते ॥२७ कासिके हृते नोचो वह्निहर्ता वकस्तथा । मयूरो वर्णक हृत्वा शाकपत्रञ्च जायते ॥२८ जो कोई शूद्र परणं का हो और किमो ब्राह्मणी के साथ गमन करता है तो इस पाप या फल भोगने के लिये वह किसी की योनि में जन्म लिया करता है। उस योनि सलति का उत्पादन कर फिर काट के मन्दर रहने वाला कोट (कोड़ा) हुमा करता है ॥२२॥ जो कोई कृतघ्न प्रति किये हुए उपकार को मटियामेट कर देता है वह कृमि, कीट-पतङ्ग मोर विच्च की योनि प्राप्त पिया करता है। जो बिना बस्न थाले पुरुप मा हनन किया करता है वह मर (गर्थे| वी योनि में जन्म पारण करता है ॥२६॥) स्त्री के वध को करने वाला, वाता का हनन करने वाला भी मि को योनि त किया करता है । जो कोई भोजन पि परिणाम कथन । की चोरी करता है यह मक्षिका (मक्खी) को योनि में उत्पन्न होता है ॥२४॥ अन्न का हरण करने वाला मार्जार (बिलाव) और तिलों का हर्ता मूपिक होता है । पुन को चोरी करने वाला नकुल (न्योला ) तथा मुद्घ और अमिg का घोर फाक (कोप्रा) हुमा करता है ॥२शा मधु (शहर) का हरण करने वाला दश पोर पूप (पूम्रो) का हर्ता पिपीलक (चौटा) होता है । जल का हर्ता बडा पापी होना है और वह वायस ( कोमा ) होकर जन्म ग्रहण किया करता है । ।२६।। काष्ठ की चोगे से हारीत (एक पक्षी का नाम) अथवा कपोत (कबूतर) होता है । जो कोई सुवर्ण के पात्र की चोरी करता है वह कृमि की योनि में उत्पन्न होता है ।।२७॥ कासिक प्रर्यात् कपास की वस्तु हरण करने से क्रौञ्च मोर वह्नि के हरण से पक (गुला)-वर्णक के हरण से मयूरी तथा शाक पत्र हरण से भी मोरनी होता है ॥२८॥ जीवजीवकता याति रक्तवस्त्वपहन्नरः । छुछुन्दरिः शुभान्गन्धान् शश हृत्वा शशो भवेत् ।।२६ पण्ढ कलापहरण काष्ठहत्तृणकीटक । पुष्पं हत्वा दरिद्रस्तु पगुर्यावकहुन्नर ॥३० शाकहर्ता च हारीतस्तोयहर्ता च चातकः । गृहहन्नरकान्गत्वा गैरवादीन्मुदारुणान् ।।३१ तृणगुल्मलतावल्लीत्वक्हा च तरुता यजेत् । एप एव क्रमो दृष्टो गोसुवर्णादिहारिणाम् ॥३२ विद्यापहारी मूकश्च गत्वा च नरकान्वहून् । असमिद्ध हुते चाग्नो मन्दाग्नि समजायत ॥३३ परनिन्दा कृतघ्नत्व परमर्यादघातनम् । नष्ठुर्य नेणत्वञ्च परदारोपसे विनाम् ॥३४ परस्यहरसाशोच देवतानाच फुत्मनम् । निकृत्य वञ्चन गृणां कापण्यन्व नणां नरः । उालक्षगादि जानीयान्मुक्तानां नरकादनु ॥३५ سا [ श्री गरुडपुराण दया भूतेषु संवाद परलोकं प्रतिक्रिया । सत्य हितार्थमुक्तिश्व वेदप्रामाण्यदर्शनम् ॥३६ गुरुदेवर्षिसिद्धपिसेवन साधुमंयमः । सकियाद्यसन मैत्री स्वर्गस्य लक्षण विदुः । अष्टाङ्गयोगविज्ञानात्प्राप्नोत्यात्यन्तिक फलम् ॥३७ रक्त वस्तु का व्युपहत्ता नर जीता हुमा जीवकता को प्राप्त होता है। शुभ गन्ध युक्त पदार्थों का अपहरण करने से छळू दर होता है मोर शश के शा ही होता है ॥२६॥ कला के अपहरण से मनुष्य पण्ड होता है तथा काष्ठ के हरण से तृण का कोट हुमा करता है । जो पुप्पो की चोरी करता है या हरण करता है वह मनुष्य दरिद्री होता है । यावक का हरण करने वाला पंगला होता है ॥३७॥ शाक के हरण करने वाला हारीत मोर तोय (जल) के हरण करने वाला चातक पक्षी होता है । जो किसी के गृह का हरण करता है वह गैरव भादि महान् दारुण नरको मे जाकर घोर यातना भोगता है। तृण, गुल्म, लता, वल्लो के त्वच का हर्ता या हनन करने वाला मानव जड वृक्ष की योनि को प्राप्त होता है। यही गो और स्वर्ण आदि को हरण करने वालो को देखा गया है ॥३१॥३२॥ विद्या का अपहरण करने वाला मूक (गूगा) होता है जो पहिले बहुत से नरकों को यातनाएं भोग लेता है । असमिद्ध प्रर्थात बिना समिधाम्रो वाली अग्नि मे हवन करने पर मन्दाग्नि का रोग उत्पन्न हो जाता हैं ॥३३॥ जो पराई त्रिपो का सेवन करने वाले मनुष्य है-जो पराई निन्दा किया करते हैं-जो कुन होते हैं मोर जो पराई मर्यादा के घात करने वाले है-जो निष्ठुरता रखते हैं और जिनमे विघृणव होता है-जो पराये धन के हरण करने से अपवित्र हैं जो देवनामो की बुराई किया करते हैं। निकृतन करके मनुष्यो का जो वञ्चन किया करते हैं तथा जिन मनुष्यो मे कृपणता होती है इन सबको इस बात का उपलक्षण समझ लेना चाहिये कि पापो का फा भोगने के लिए ऐसे ये लोग पहिले नरकों को यातनाएं भोगकर फिर शेय रहे पाप पल को भोगने के लिये वाद में यही लोक में उत्पन्न हुए हैं ॥३४१३५॥ प्राणिशे पर दया, सम्पाद, परलोक के लिए प्रतिक्रिया वा करना, सत्य भाषण पाङ्ग योग कथन ] [ १६१ तथा सत्य व्यवहार, हित के सम्पादन करने वाली उक्ति, वेदों के प्रामाण्य का दर्गन, गुरु, देव, ऋपि, सिद्धों का मेवन, साधु संयम, सरिमाया अर्थात् पच्छे कर्मों के करने का व्यसन, मित्र भावना, ये सव स्वर्ग के उपलक्षण हैं अर्थात् इनसे यह समझ लेना चाहिए कि ऐसे प्राणी स्वर्ग के सुख की अवधि समाप्त करके ही यहां शेष सुख भोगने को और पर जन्म के लिये सत्कर्म करने को उत्पन्न हुए हैं। पाठ अङ्गों वाले योग के विशेष ज्ञान होने से प्रात्यन्तिक फन मनुष्य प्राप्त करता है ॥३६॥ ३७॥ १२०-अष्टाङ्ग योग कथन वक्ष्ये साङ्ग महायोगं भुक्तिमुक्तिकरं परम् । सर्वपापप्रशमनं भक्तयानुपठितं शृणु ।।? ममेति मूलं दु.खस्य न ममेति निवर्तते । दत्तात्रेयो ह्यलाय इममा महामति. ॥२ अहमित्यङ्कुरोत्पन्नो ममेति स्कन्धवान्महान् । गृहक्षेयाश्च शाखाश्च यत्र दाराभिपल्लवः ॥३ धनधान्ये महापात्र पापमूलोऽतिदुर्गमः । विधिवत्सुखशान्त्यर्थं जातो ज्ञानमहातरुः ॥४ छिन्नो विद्याकुठारेण ते गता लयमीश्वरे । प्राप्य ब्रह्मरस पीत नीरजस्कमकण्टकम् ॥५ प्राप्नुवन्ति परा. प्राज्ञा सुखनिर्वृतिमेव च । मूर्तेन्द्रियलय नून न त्व राजन् न चाप्यहम् ।।६ न तन्मात्रादिकं वाचा नैवान्त.करण तथा । क वा पश्यमि राजेन्द्र प्रधानमिदमावयोः ।।७ सूतजी ने कहा- अब मैं अङ्गो के सहित महायोग को बतलाता हूं जो कि परम भुक्ति और मुक्ति-इन दोनो का देने वाला है। यह समस्त पापों को शान्त करने वाला होता है। इसे मैं अनुपठिन करता हूं तुम भक्ति के साथ इपका श्राए करो ।।१।। मम प्रर्याद यह मेरा है-यही सम्पूर्ण दु.खो का मूल १६२ ] [ श्री गरुडपुराण है। मेरा कुछ नहीं है---यही भाव निवृत्ति का मूल होता है । महान् मति चालें धीमान दत्तात्रेय ने अलक के लिए इसी को बतलाया था ।२॥ अहम् ( मैं ) इस प्रकुर से यह पारम्भ में उत्पन्न एक वृक्ष जैसा ही है । अह के अकुर से उत्पन्न वृक्ष का 'मम अर्थात् मेरा यह स्कन्द प्रर्यान तना होता है। गृह भोर क्षेत्र मादि इसकी शाखाएं हैं और दारा प्रादि इम तृम्प के परे है॥३॥ धन और धान्य रूपी महान पात्र में यह पाप मूल अर्थात् जिमकी जह पाप ही होता है, अत्यन्त दुगम होता है । विधि पूर्वक सुख और शान्ति के लिये यहाँ ज्ञान का एक महान वृक्ष भी उतन्न हो गया है ॥४॥ वह पाप मूर महा वृक्ष विद्या रूपी कुठार से छिन हो जाता है फिर वे मनुष्य रजोगुण से रहित भकारक पीत ब्रह्मरस को प्राप्त करके ईश्वर में लय को प्राप्त हो गये हैं ।।५।। परम प्राज्ञ जो सुख रिवृति को ( परमानन्दमय सुख ) प्राप्त किया करते हैं । हे राजन् मूर्त इद्रियों के लय को न तो प्राप्त हो सकते और न में भी उसे पा सकता हूँ ॥६॥ वाणी से तमामादिक और मात करण का लय नहीं है। हे राजेद्र अपवा किसको देखते हो। हम दोनो में यह प्रधान है ॥७॥ मृत परेऽह्नि क्षेत्रज्ञ मजातोऽय गुणात्मक । एकत्वेऽपि पृथग्भावस्तथा क्षेत्रात्मनो नृप।।८ ज्ञानपूर्ववियोगोऽमो ज्ञाने न च योगिन । सा मुक्ति ह्मणा चक्यमनंक्य पुत्र ते गुण तद्गृह पर वसति तद्भाज्य येन जोवति । यन्मुक्तये तदेवोक्त ज्ञानाज्ञानेन चान्यथा ॥१० भरभागेन पुण्यानामपुण्याना-च पार्थिव । पर्तव्यानाञ्च नित्याना क्षय त्वकरणात्तथा ॥११ अहिंमा सत्यमस्तेय ब्रह्म पर्यापरिग्रहो। यमा पञ्चाय नियमा शौच द्विविधमीरितम् ॥१२ सन्तोपस्तपसा गान्तिर्वासुदेवार्चन दम । प्रामग पाय त प्राणायामो मरुज्जप ॥१३ प्रत्यव विविध गोपि पूरयुम्भव रेच । लघुर्गा दसमायस्तु द्विगुण स तु मध्यम ॥१४ राष्टाङ्ग योग कथन [१६३ ! मृत दूसरे दिन में यह क्षेत्र गुणात्मक हो गया । है नृप ! एकत्व होने पर भी क्षेत्रात्मा का पृथग्भाव होता है ।।८॥ यह यियोग ज्ञान पूर्वक होता है । न न नष्ट हो जाने पर योगी की वही मुक्ति होती है । हे पुन ! गुणो के द्वारा तेरा ब्रह्म के साथ ऐक्य और अनक्य होता है 18|| वही गृह है जहाँ पर वास करता है और वही भोज्य है जिमके द्वारा जीवित रहता है। मुक्ति के लिये यही कहा गया है जो ज्ञानाज्ञान से अन्यथा है । १०॥ हे पार्थिव । भव (ससार) फे भोग से पुण्यो और अपुण्यो का तथा कर्तव्यो का जो नित्य है न करने से क्षय होता है ॥११॥ अहिंसा, सत्य, अस्तेय ( नोरी न करना) ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ( दान न लेना या सग्रह न करना ) ये पांच नियम हैं। शौच ( शुद्धि ) दो प्रकार की होती है ।।१२॥ सन्तोष-तप के द्वारा शान्ति-- भगवान् वासुदेव का अर्चन ये दम कहे जाते हैं। पाक आदि सासन बताये गये हैं मोर वायु का जय प्राप्त करना ही प्राणायाम है ॥१३।। प्रत्येक प्राणायाम पूरक-कुम्भक और रेचक के भेद से तीन प्रकार का होता है। जो पाणायाम लघु होता है वह दश मात्रा वाला होता है । इमसे जो दुगुना होता है वह गधम है ॥१४॥ त्रिगुणाभिस्तु माताभिरुत्तम स उदाहृतः। जपध्यानयुतो गर्भो विपरीतत्वभक्षकः । १५ प्रथमे जनयेत्स्वप्न मध्यमेन च वेपथुः । विपाक हि तृतीयेन जाता दोपास्त्वनुक्रमात् ।।१६ प्रासनस्थ तु युञ्जीन कृत्वा च प्रणव हृदि । पाणिभ्या लिङ्गपणो स्पर्शन्न कानमानस ॥१७ रजसा तमसो वृत्ति सत्त्वेन रजसस्तथा । निरुध्य निश्चलो वृत्ति स्थितो युक्षीत योगवित् ।।१८ इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्य प्रारणादीन्मन एव च । निगृह्य समवायेन प्रत्याहारमुपक्रमात् ।।१६ प्राणायामा दशाष्टौ च धारणा सा विधीयते । द्वे धारणे स्मृतो योगो योगिभिस्तत्वदर्शिभिः ॥२० [ घी गरुड पुराण प्राडनाड्या हृदये चात्र तृतीया च तयोरसि । कण्ठे मुखे नासिकाने नेत्रे भ्रूमध्यमूर्घसु ॥२१ किञ्चित्तस्मात्परस्मिश्च धारणा दशधा स्मृता । दर्शता धारणा प्राप्य प्राप्नोत्यक्षररूपताम् ॥२२ जिनमें लघु से तिगुनी मात्राएं होती है वह उत्तम प्राणायाम कहा गया है । इस प्राणायाम के गर्भ मर्यात् मध्य में जप तथा ध्यान होना चाहिए, इस प्रकार से जप एवं ध्यान युक्त गर्भ वाला प्राणायाम विपरीतत्व के भक्षण करने वाला होता है ॥१५॥ प्रथम प्राणायाम मे स्वप्न का जनन होता है मध्यम प्राणायाम के द्वारा वेपथु अर्थात् कम्य होता है। तथा तृतीय प्राणायाम से विपाक होता है। इस अनुक्रम से ये दोप हुमा करते हैं ॥१६॥ हृदय मे प्रणव का ध्यान करके मामन पर स्थित होकर योग करना चाहिए। दोनो पाणियो से जननेन्द्रिय एव वृपणो का स्पर्श करते हुए प्रासन पर अपनी स्थिति वरनी चाहिए और मन को पूर्णतया एकाग्र कर लेवे ॥१७॥ रजोगुण के द्वारा तमोगुण की वृत्ति को मोर सत्त्व गुण के द्वारा तमोगुण को निरुद्ध करके अपनी वृत्ति को पूर्णतया निश्चल करके योग के पेत्ता पुरुष को अपनी स्थिति बना कर ही योग साधन करना चाहिरे ॥१८॥ अपनी समस्त इन्द्रियो को उन इन्द्रियो के विषयो से-प्राणादि को एव मन को पूर्णतया निगृहीन करके सम- वाय के द्वारा प्रत्याहार क्रम मे करना चाहिए ॥१६॥ इस तरह से मठारह प्राणायाम जब क्येि जाते हैं तो वह धारणा विहित होती है प्रर्याद उसे ही धारणा कहा जाता है। तत्त्व के जानने वाले योगियो के द्वारा इस प्रकार से दो धारणामो को ही योग कहा गया है ॥२०॥ पहिले नाही में फिर हृदय में और तीसरी उर स्थल मे-कण्ड मे-मुख मे-नासिका के अप भाग मे-नेत्र मे-भ्रू मध्य और मूर्या मे कुछ उससे परे म इस प्रकार से धारणा दश प्रकार की बताई गई है। इन दश धारणाओ को प्राप्त करके योगाभ्यास करने वालो पभर रूपता को प्राप्त होता है ॥२१॥२२॥ यथाग्निरग्नो सक्षिप्तस्तयात्मा परमात्मनि । ब्रह्मरूप महापुण्यमामित्येकाक्षर जपेत् ॥२३ प्रष्टाङ्गयोग कथन प्रकारश्च तथोकारो मकारश्चाक्षरत्रयम् । इत्येतदक्षरं ब्रह्म परमोङ्कारसज्ञितम् ॥२४ अहं ब्रह्म परं ज्योतिः स्थूल देहविर्जितम् । ग्रह ब्रह्म पर ज्योतिर्जरामरणवर्जितम् ।।२५ अहं ब्रह्म परं ज्योतिः पृथिव्या मलजितम् । अहं ब्रह्म परं ज्योतिरिवाकाश विवजितम् ॥२६ अह ब्रह्म परं ज्योतिः सूक्ष्मदेहविवर्जितम् । अहं ब्रह्म परं ज्योतिः स्थानास्थानविवजितम् ।।२७ अहं ब्रह्म परं ज्योतिर्गन्धमात्रविजितम् । यहं ब्रह्म परं ज्योतिः श्रोत्रत्वपरिजितम् ॥२८ जिस तरह से पग्नि अग्नि में संक्षिप्त होता है वैसे ही प्रात्मा परमात्मा में सक्षिप्त होता है । इस प्रकार से महान पुण्यमय ब्रह्म रूप "प्रोम्" -इम एक प्रक्षर का जाप करना चाहिए ॥२३॥ इस 'मोम्' में प्रकार, उकार और मकार ये सीन मार होते हैं। इन तीनों प्रक्षरो से मिलकर 'प्रोम्'-- -३म एक यक्षर की रचना होती है जो ब्रह्म स्वरूप परम पोद्दार सता वाला होता है ।।२४॥ मैं ग्रहा स्वरूप पर ज्योति हूं और इस स्थूल देह से विशेष रूप में अमित हूँ। में परब्रह्म ज्योति स्वरूप जरा ( वृद्धता ) पोर मरण से रहित हूँ ॥२५।। मैं ज्योति रूप परब्रह्म पृथिवी के मल से वजित हूं तथा वायु, पाकाश मादि से भी रहित हूँ ॥२६॥ मैं ज्योति स्वरूप परग्रहा मूक्ष्म देह से भी रहित और स्थाना- स्थान से वजित हूँ। मैं योनि प परग्रह्म गन्ध मात्र से वजित तया श्रोत्र एवं श्यचा से वजित हूँ ॥२७॥२८॥ अहं ब्रह्म पर ज्योतिजिह्वाधागविवर्जितम् । मह ब्रह्म पर ज्योतिः प्राणापानविजितम् ॥२६ मह प्रहा पर ज्योतिषानोदानविजितम्। प्रह ब्रह्म परं ज्योतिरमानपरिवजितम् ।।३० ग्रह यहा पर ज्योतिस्त्रीय परम पदम् । देहेन्द्रियमनासिधारणाहवारवजितम् ॥३१ [ श्री गाहपुराण नित्यशुद्धबुद्धयुक्तमहमानन्दमद्वयम् । ग्रह ब्रह्म पर ज्योतिर्ज्ञानरूपो विमुक्तये ॥३२ इत्यष्टाङ्गो मया योग उक्तः शौनक मुक्तिदः। नित्यनमित्तिक प्राप्वा लय प्राकृतवन्धना. ॥३३ उत्पद्यन्ते हि ससारे नैक प्राप्त्वा परात्मनाम् । विमुच्यते विमुक्तश्च ज्ञानादज्ञानमोहित. ॥३४ ततो न म्रियते दुखी न रोगी न च बन्धवान् । न पापयुज्यते योगी नरके न विपच्यते ॥३५ मैं परब्रह्म ज्योति स्वरूप जिह्वा और प्राण रो रहित तथा प्राण एव अपान से भी दजित हूँ ॥२६॥ में ब्रह्म हूं और ज्योति स्वरूप पाला हूँ स्था ब्यान-उदान एव प्रधान से परिवर्जित हूं ॥३०॥ उस समय में ऐसा हो ध्यान करना चाहिए कि मैं नित्य शुद्ध एव बुद्ध तथा प्रद्वय प्रानन्द स्वरूप हूँ और मैं ज्योति रूप परब्रह्म ज्ञान के स्वरूप वाला हूँ जो विमुक्ति के योग्य पात्र हूं। परब्रह्म ज्योति के रूप वाला देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, प्राण मोर अहवार पजित हूँ और परम पद को प्राप्त होने वाला हूँ ॥३१॥३२॥ सूतजी ने कहा- यम, नियम, ध्यान, धारणा आदि आठ मङ्गो वाला यह योग हे शौनक | मैंने तुम्हारे सामने भली भांति वर्णन कर दिया है, यह मुक्ति के प्रदान करने वाला है। प्राकृत बन्धन नित्य तथा नैमित्तिक लय को प्राप्त कर ससार में उत्पन्न होते हैं। एक परमात्मा को प्राप्त करके यह प्रज्ञान से मोहित जीवात्मा ज्ञान से प्रज्ञान-विमुक्त होकर विमुक्ति प्राप्त किया करता है ॥३३॥३४॥ अतएव योगी न मरता है, न दुखित होता है, न रोगयुक्त होता है तथा न बान्धवो को पापो से युक्त किया करता है और न नरक में ही विपच्यमान होता है ॥३५ गर्भवासे स नो दुखी स स्यान्नारायणोऽव्यय । भक्त्या त्वनन्यया लम्यो भगवान्भुक्तिमुक्तिद ॥३६ ध्यानेन पूजया जप्य सम्यक्स्तोत्र यतव्रत । यज्ञं निश्चित्तशुद्धिस्थया ज्ञानञ्च लभ्यते ॥३५ विष्णुमक्ति कीर्तन [ १६७ प्रणवादिकमन्त्र श्च जप्यमुक्ति गता द्विजाः । इन्द्रोऽपि परमं स्थान गन्धर्वाप्सरसो वराः ॥३८ प्राप्ता देवाश्च देवत्व मुनित्वं मुनयो गताः । गन्धर्वत्वञ्च गन्धर्वा राजत्वञ्च नृपादयः ।।३६ योगी पुरुष कभी अपनी माता के गर्भवास मे दुःख नहीं भोगता है। उसे तो अपय भगवान् नारायण प्राप्त हो जाते हैं जो कि अनन्य भक्ति के द्वारा प्राप्त किये जाते हैं और भुक्ति तथा मुक्ति दोनो के प्रदान करने वाले हैं । ॥३६॥ ध्यान के द्वारा, पूजा से, जाप, स्तोत्र, पाठ, यतव्रत, यज्ञ, दान इनके द्वारा चित्त की शुद्धि होती है और भक्ति के द्वारा ज्ञान प्राप्त किया जाता है । ॥३७॥ द्विजगण प्रणव मादि के मन्त्र जपों के द्वारा मुक्ति को प्राप्त हुए हैं । इन्द्र ने भी परम पद प्राप्त किया है तथा परम श्रेष्ठ गन्धर्व एवं अप्परायें प्राप्त की हैं। देवगरण ने इसी के बल से देवत्व को प्राप्ति की है एवं मुनियो ने मुनिश्व को, गन्धों ने गन्धर्वत्व तथा नृपगरण ने राजत्व को प्राप्त किया है ॥३८॥३६॥ १२१ – विष्णु भक्ति कीर्तन विष्णुभक्ति प्रवक्ष्यामि यया सर्वमवाप्यते । यथा भक्त्या हरिस्तुप्येत्तथा नान्येन केनचित् ॥१ महतः श्रेयसो मूल प्रसवः पुण्यसन्तते । जीवितस्य फल स्वादु नियतिस्मरण हरेः ॥२ तस्मात्सेवा बुध प्रोक्ता भक्तिसाधनभूयसी। ते भक्ता लोकनाथस्य नामकर्मादिकीर्तने ॥३ मुञ्चन्त्यभू रिण सहपछि प्रहृष्टतनूरुहाः । जगद्धातुर्महेशस्य ज्ञानद चरणद्वयम् ।।४ इह नित्यक्रिया कुम्यु. स्निग्या ये वैष्णवास्तु ते । यह्माक्षर न एकत्व तथा भगवतरितम् ॥ प्रगामपूर्वक भक्तघ यो वदेहं पणवो हि सः । तदक्तजनवात्सल्यं पूजयंश्वानुमोदनम् ॥६
। धो गरुडपुराण
१६८
तत्कथाश्रवणे प्रीतिः भवणं सफल भवेत् ।
येन सर्वात्मना विष्पो भक्तया भावो निवेशित: ॥७
विश्वेश्वरकृताद्विप्रान्महाभागवतो हि सः।
स्वयमभ्यचंनञ्चव यो विष्णुञ्चोपजीवति ॥८
श्री सूतत्री ने यहा-मय हम भगवान् विष्णु की भक्ति के विषय में
पणन करते हैं जिसमे द्वारा सभी बुध प्राप्त पिया जाया करता है। भगवान्
हरि जितने भक्ति के द्वारा सतुष्ट हुआ करते हैं वैसे अन्य किसी से भी सम्तुष्ट
एव प्रसन्न नहीं होते हैं ॥१॥ निरन्तर नियत रूप धी हरि का स्मरण करना
महान् येय का मूल-पुण्य सन्तति का प्रसव और जीवन का स्वाद युक्त
फल होता है ॥०॥प्रतएव युप पुरपो के द्वारा भक्ति के साधनो से सम्पन्न
रोया यतलाई गई 1 वे भक्त लोग समस्त लोकों के स्मामी भगवान के नाम
तथा यमों के कीर्तन में अपने मासुपो वा भावावेश में मग्न होकर त्याग किय
धरते हैं । गुणगान करने मे तथा नाम--संकीर्तन में भगवान् के भत्तो छ
बहुत अधिक हर्पोद्गम होता है पोर उममे उम समय उनका शरीर पुलका
मान हो जाया करता है । जगती तल ये धाता महेश के दोनो परण ज्ञान के
प्रदान करने वाले हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥ जो परम स्निग्ध विष्णु के भक्त हैं वे ब्रह्मा
क्षर का श्रवण न करते हुए यहाँ इसी प्रकार से नित्य क्रिया करते हैं जैसा
कि भगव न के द्वारो कहा गया है ॥५॥ जो प्रणाम पूर्वक बोलता है वही
विष्णु का भक्त वैष्णव है। जो इस तरह से पूजन किया करता है उनका
भगवान अनुमोदन करते हैं और उन भत्तो पर भगवान् का परम वात्सल्य
होता है ॥ ६ ॥ भगवत्कथा के श्रवण करने मे जो पूर्णतया प्रीति होती है
तो यह अवरण करना सफल हुमा करता है । तात्पर्य यह है कि प्रेम के बिना
भगवरकया के केवल सुन लेने मात्र से वह फल नही मिलता है जोकि वास्तव
में उससे मिलना चाहिए । जिसने सर्वात्म स्वरूप से भक्ति-भाव पूर्वक भगवान्
विष्णु में अपना भाव निवेशित कर दिया है वह विश्वेश्वर कृत विप्र से महा•
भागवत् होता है जो स्वय मभ्यर्चन करके विष्णु को उपजीवित किया करता
है ॥७॥८॥
प्णु भक्ति कीर्तन ] [ १६६ भक्तिरष्टविधा ह्यपा यस्मिन् म्लेच्छोऽपि वर्तते । स विप्रेन्द्रो मुनिः श्रीमान् स याति परमां गतिम् 16 तस्मै देयं तत्तो ग्राह्य स च पूज्यो यथा हरिः । पुनाति भगवद्भक्तश्चण्डालोऽपि यदृच्छया ।।१० दयां कुरु प्रपन्नाय तवास्मीति च यो वदेत् । अभय सर्वभूतेभ्यो दद्यादेतद् व्रत हरेः ।।११ मन्त्रयाजिसहस्रम्य सर्ववेदान्तपारगः । सर्ववेदान्तवित्कोटया विष्णुभक्तो विशिष्यते ॥१२ एकान्तिनः स्ववपुपा गच्छन्ति परम पदम् । एकान्तेन समो विष्णुस्तस्मादेपां परायणः ।।१३ यस्मादेकान्तिनः प्रोक्तास्तद्भागवतचेतसः । प्रियाणामिपि सर्वेपां देवदेवस्य सुप्रियः ॥१४ यह भगवान् की भक्ति पाठ प्रकार की हुमा करती है जिसमें म्लेच्छ भी भाग लिया करता है अर्थात् भक्ति करने का नीच से नीच का भी पूर्ण अधिकार । भक्ति करने वाला म्लेच्छ भी विप्रो का शिगेमरिण-मुनि और श्रीमान है तपा वह परम गति को प्राप्त क्यिा करता है ॥६॥ उसको जो भी कुछ दिया जाता है वह प्राह्य होता है प्रयवा तमसे भी ग्रहण करने के योग्य मभी कुछ हुमा करता है । चाहे वह चाएहाल फ्यो न हो यदि भगवान् का भक्त है तो वह यह इच्छा मे पवित्र कर दिया करता है क्योकि उसमे भगवान की भकि की विशेषता होती है ।।१०।। जो भगवत्प्रपन्न है उस पर दया करो । बो 'मैं तेरा ही हूँ-ऐसा बोलता है उन समस्त प्राणियो को भगवान् अभय प्रदान किया करते हैं-ऐमा हरि का व्रत है ॥ ११॥ सहनो मन्यो द्वारा यजन करने वालों से मोर जो सम्पूण वेदान्त के पारगामी विद्वान् हैं उनमे तथा समस्त वेदान्त में शाता से विष्णु भक्त करोड गुना विनिष्ट होता है ॥ १२॥ मो एकान्त में रहते हैं वे अपने ही परीर में परम पद जाया परते है । एकान्त को ममान विष्णु होते हैं इमलिये एकान्त निवास में परायण होना पाहिए ॥१३॥ वो एकान्त में रहने वाले हैं पे भगवान् मे चित्त को [ श्री गरडपुराण - १७० सलान रसने वाले हुआ परते हैं। वे लोग जो नितान्त एकान्त निवास कर भगवद्भजन-गरण मोर नाम-मझीर्तन किया करते हैं वे सभी के प्रिय होकर भी देवो के देव भगवान् विष्णु के तो मत्यन्त ही सुप्रिय हुआ परते हैं ॥ १४॥ आपत्स्यपि सदा यस्य भक्तिरव्यभिचारिणी। या प्रीतिरधिका विष्णो विपयेप्वनपायिनी ॥१५ विष्णु सस्मरत. सा मे हृदयानोपसर्पति । दृढभक्तोऽपि वेदादिसर्वशास्त्रार्थनारग. ॥१६ यो न सर्वेश्वरे भक्तस्त विद्यात् पुरुषाधमम् । नाधीतवेदशास्त्रोऽपि न कृतोऽध्वरसम्भवः । यो भक्ति वहते विष्णौ तेन सर्व कृत भवेत् ॥१७ यज्वन तुमुख्याना वेदाना पारगा अपि । न ता यान्ति गति भक्ता या यान्ति मुनिसप्तमाः । १८ यः कश्चिद् वैष्णवो लोके मिथ्याचारोऽप्यनाथमी। पुनाति सकलान् लोकान् सहस्राशुरिवोदित ।।१६ ये नशसा दुरात्मान पापाचाररतास्तथा। येऽपि यान्ति पर स्थान नारायणपरायणा दृढा जनार्दने भक्तिर्यदैवाव्यभिचारिणी । तदा कियत् म्वर्गसुख संव निर्वाण हेतुकी ॥२१ जिस मनुष्य की सदा प्रापत्ति के समयो म भी अव्यभिचारिणी भगवान मे भक्ति हुआ करती है और जो प्रोति भगवान् विष्णु में अधिक होती है वह विषयो मे अनपायिनी होती है। जो भगवान् को छोडकर कभी अन्यत्र चित्त को वृत्ति नहीं जाती है वही अव्यभिचारिणी भक्ति कहलाती है। जिसकी प्रीति विष्णु के चरणो मे होती है उसका मन कभी भी विषयो मे जाया ही नहीं करना है । विष्णु का सस्मरण करने वाले की वह मेरी भन्नि ऐसी ही होनी है कि कभी भी हृदय मे अन्यत्र कहीं भी नही जाया करती है। जो भगवान् विष्णु का परम दृढ भक्त होता है वह भी वेद प्रादि समस्त शास्त्री के प्रों का पार ॥२० विष्णु भक्ति कीर्तन ] गामी हुमा करता है ।। १५ ।। १६ ।। जो पुरुप भगवान् सर्वेश्वर मे भक्ति नही रखने वाला है उसको मनुष्यो म सबसे अधम ही ममझना चाहिए। ऐसा पुरप भले ही वेदशास्त्र आदि सब कुछ पढा हुग्रा भी क्यो न हो किन्तु उसे कुछ भी वेदादि क पढन वाला नहीं समझना चाहिए। ऐसा पुरुप अध्वरादि करने पर भी यज्ञादि क नही करने वाले के ही तुत्य होता है । जिसने भगवान् विष्णु म भक्ति की है उसने सभी कुछ वेदादि का अध्ययन और यज्ञादि का यजन पूरा कर लिया है - यही समझना चाहिए ॥ १७ ॥ प्रमुस ऋतुप्रो के करन वान और वेदो के पारगामी पुस्प भी उस उत्तम गति को प्राति नही किया करत हैं जिम परमोत्तम गति को भक्त मुनिगग्ग प्राप्त किया करत हैं ॥ १८ ॥ जो कोई वैष्णय अर्थात् भगवान् विष्णु का भक्त लोक में होता है वह चाहे मिथ्याचारी भी हो और किसी भी उचित प्राधम में रहने वाला न हा तो भी वह विष्णु का भक्त उदित होने वाले सूर्य की भांति समस्त लोको को पवित्र किया करता है । १६ ।। जो परग नाग (फर ) दुष्ट प्रात्मा वाले तथा पापा के प्राचरण वरने वाले हो और नारायण म परायण रहन वाल हो तो वे भी नारायण की भक्ति भाव के प्रभाव के कारण परम पद को प्राप्त क्यिा करत हैं ।। २० ।। जब भगवान् जनादन में सुरढ भक्ति होती है तो वही भक्ति भव्यभिचारिणी भक्ति वही जाती है। ज्य ऐसो भगवान विष्णु मे दृढ भक्ति हो जाती है तो उमप लिय स्वर्ग का मुख पया वस्तु है भोर कितना महत्व रखने वाला है ? अर्थात् कुछ भी नहीं है। विग की व्यभिचरित न होने वाली एक मात्र भक्ति ही निगि (मक्ष ) पद का प्रदान करन वाली होती है ॥२१॥ भ्राम्यता तन समारे नराणा कमदुगमे। हस्तावलम्बने या दृष्टस्तुष्टो जनादन ॥२ न शृणोति गुग्गान् दिव्यान् दवदेवस्य चकिर म नगे बधिरोया सर्वधर्माहित ॥२३ नाम्नि सकौतित विष्णोर्यम्य पु सो न जा शरीर पुलकाद्भासि तदभयन्गुरणपोपमम् ।।
१७२ । [ श्री गरुडपुरार यस्मिन् भक्तिद्विजप्ट मुक्तिरप्यचिराद्भवेत् । निविष्टमनसा पुंसा सर्वथा वृजिनक्षयम् ॥२५ स्वपुरुषमभिवीक्ष्य पाशहस्त वदति यमः किल तस्य कर्णमूले । परिहर मधुसूदनप्रपन्नान् प्रभुरहमन्यनृणा न वैष्णवानाम् ।।२६ अपि चेत् सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् । साघुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥२७ क्षिप्र भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्ति स गच्छति । विप्रेन्द्र प्रतिजानीहि विष्णुभक्तो न नश्यति ॥२८ मनुष्यो के कर्मों के दुर्गम इम ससार मे भ्रमण करने वाले पुरुषो को हाथ का अवलम्बन देने में एक परम प्रसन्न होने वाले भगवान् जनार्दन प्रभु जब कृपा करते है तो अपने हाथ का अवलम्ब प्रदान करके कर्मों के इस गहन ससार से भी उद्धार कर दिया करते है। इनके अतिरिक्त अन्य कोई भी ऐस नही होता है ।। २२ ॥ जो मनुष्य देवो के देव भगवान् विष्णु के दिव्य गुणो का श्रवण नही करता है उस मनुष्य को समस्त धर्मों रो वहिष्कृत होने वाला वधिर ही जानना चाहिए ।। २३ ।। भगवान् विष्णु के शुभ नामो के सङ्घन होने पर जिस पुरुष का शरीर रोमाञ्चित नहीं होता है वही कुणय के समान होता है ॥ २ ॥ हे द्विजो मे श्रेष्ठ । जिस मनुष्य में विष्ण, की होती है उसकी मुक्ति भी तुरन्त ही हो जाती है। भगवान में निविष्ट मन रखने वाले पुरुषो के सवथा पापो का क्षय हो जाया करता है ।। २५ ।। माँ के दण्ड की व्यवस्था करने वाले यमगज जिस समय अपने दूतो को पाश हाथो मे लेकर जीवात्मानो के लाने के लिये प्रस्तुत होते हुए देखते हैं उस समय मे वह यमराज उन अपने दूनों के कान में घुपके से कहा करते हैं कि देखो, तुम इस बात को अच्छी तरह समझ लेना मैं अन्य सभी मनुष्यो को दण्ड देने का स्वामी हूँ किन्तु जो वैष्णव लोग हैं उन पर मेरा कुछ भी प्रमुत्त्व नही है अतएव तुम लोग उनको बिल्कुल ही छोड देना जो भगवान् मधुसूदन को प्रपत्ति प्राप्त कर चुके हो अर्थात् वैष्णव बन गये हो। तुम विष्ण-भत्तों को विल्कुन भी मत छेडना ॥ २६ ॥ वह दुराचरण करने वाला भी है और सुदृढ भक्ति [ १७५ विष्ण भक्ति कीर्शन ] रा फिर अनन्य भक्त बन कर भजन करने लगा है तो उसे भी दुष्ट, दुराचारी [ समझ कर पूर्ण साधु ही मानना चाहिए क्योकि भले ही मेरी भक्ति करने । पूर्व उसने चाहे जितना दुराचरण किया हो किन्तु ज्योही उसने मेरे भजन का मनन्य भाव से समायय ग्रहण किया है वैसे यह भली भांति व्यवसित हो गया है अर्थात् आगे भविष्य में कोई भी बुरा प्राचरण न करने का निश्चय कर लिया है ।। २७ । भगवान् ने अर्जुन से कहा था कि मेरी अनन्य भाव से भक्ति करने वाला पुरुष शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाया करता है और उसका यह फल होता है कि उसे शाश्वत (सर्वदा रहने वाली) शान्ति प्राप्त हुमा करती है । हे विप्रेन्द्र ! भगवान ने अर्जुन से कहा था कि यह प्रतिज्ञा है कि विष्णु का भक्त कभी भी नाश को प्राप्त नहीं होता है ॥२८॥ धर्मार्थकामः किं तस्य मुक्तिस्तस्य करे स्थिता । समस्तजगतां मूले यस्य भक्तिः स्थिरा हरौ ॥२६ दैवी ह्यपा गुणमयी हरेमार्या दुरत्यया । तमेव ये प्रपद्यन्ते मायामेता तरन्ति ते ॥३० किं यज्ञाराधने पुसा सिध्यते हरिमेधसः । भक्तयं वाराध्यते विष्णु न्यत्तत्रापि कारणम् ॥३१ न दानविविधर्दत्त : पुष्पर्नेवानुलेपनः । तोपमेति महात्मासो यथा भत्तधा जनार्दनः ।।३२ ससार विपवृक्षस्य द्वे' फले ह्यमृतोपमे । कदाचित्केशव भक्तिस्तद्भक्तं वा समागमः ॥३३ पयेषु पुष्पेषु फलेपु तोयेध्वकष्टलम्येषु सदैव सत्सु । भक्तचं कलम्ये पुरुपे पुराणे मुक्पयं कलाभे क्रियते प्रयत्नः ॥३४ प्रास्फोटयन्ति पितर प्रनृत्यन्ति पितामहाः । चंणयो मत्कुले जातः स नः सन्तारयिष्यति ॥३५ - और कम से प्राप्त कर लेता जालियो स्थायी बात है? उसके हाप में तो मुक्ति भी स्थित हो रहा करती है । जिसके भेमग- पान हरि मै स्पिर रहने वाली भक्ति होती है जोकि इन समस्त जगतो का :
श्री गपुगत प्राप्त परने का पूर्ण अधिकारी धन बाया करता है ॥२६॥ माया गुगणमयी पर्यान् त्रिगुणारिमा है और बहुत ही दुश्मन इगको जान सेना और स्याग देना बहुत ही कठिन है। जो सोग उन्दी भगवान हरि को शरण महत शिरते है ये ही इस यो माया से सर जाया करते हैं मन्यथा इगमै पूरना यहाद दुस्तर पाय है ।३०1शों के पान द्वारा आराधना करने में पुरुषो को पुष भी सिद्धि नही होती है। जो भगवान हरि की ही भक्ति किया करते हैं और उनमे घरगो में ही अपनी बुद्धि को लगा देते हैं उनका ही कल्याण होना है भयोकि भगवद्भक्ति ही हारा भगवान पीपाराधना की जाया करती है इसके अतिरिक्त उनकी धाराधना करने का तथा सन्तुष्ट करने का प्रन्य कोई भी कारण नही है ॥ ३१ ॥ बहुत से अतुल दानों के द्वारा-पुडयो के समपंग से पोर मनुलेपनो से भगवान् जनार्दन सभी भी तोष को प्रास नहीं हुपा करते हैं जैसे कि यह महान आत्मा वाले प्रमु पनन्य भक्ति से प्रसन्न होते हैं ।। ३९ ।। इस ससार रूपी विष वृक्ष के दो फन अमृत के तुल्य हुमा करते हैं उनमे एक तो भगवान केशव मे सुहद भक्ति है मोर दूसरा भगवान के भक्तों के साथ समागम प्राप्त करना है। अन्यथा यह समार पूर्णतया विषला एक वृक्ष के ही समान होता है जो सर्वनाम किया करता है। भगव-क्ति मोर सन्तो का सत्सङ्ग ये दो ही इसमे माकर उत्तम श्रेय के सम्पादक फल प्राप्त किये जा सकते हैं ॥ ३३ ॥ पग-पुष्प-फ्ल पोर तोय मे तथा प्रष्टक लम्प सदा सत्पुरुषो मे भक्ति के द्वारा प्राप्त करने के योग्य पुराण पुरुष में मुक्ति से एक के लाभ मे प्रयत्न दिया जाता है ॥ ३४ ॥ (जिम कुल में कोई भी भगवान् विष्णु का भक्त प्णय उत्पन्न हो जाता है उसके पितृगण बहुत ही प्रसन्न होते है और उसके पितामह भादि सब पं से नृत्य किया करते हैं कि हमारे वश मे वैष्णव पैदा हो गया है यह हम सबका उद्धार कर देगा ॥३॥ प्रज्ञानिनः सुरवर समधिक्षिपन्तो यत्पापिनोऽपि शिशुपालसुयोधनाद्या । मुक्ति गता स्मरणमानविधूतपापा. क सशय :परमभक्तिमता जनानाम् ॥३६ पगु भक्ति कीर्तन ] सफलमुनिभिराधश्चिन्त्यते यो हि सिद्धो निखिलहृदि निविष्ट वेत्ति यः सर्वसाक्षी । समजममृतमीशं वासुदेवं नतोऽस्मि स्वभयमरणहीनं नित्यमानन्दरूपम् ॥३७ निखिलभुवननाथ शाश्वतं सुप्रसन्न प्रतिविमलविशुद्ध निर्गुण भावपुष्पैः। सुखमुदितसमस्त पूजयाम्यात्मभावं विशतु हृदयपद्म सर्वसाक्षी चिदात्मा ॥३८ एवं मयोक्त परमप्रभावमाद्यन्तहीनस्य परस्य विष्णोः । तस्माद्विचिन्त्यः परमेश्वरोऽसौ विमुक्तिमार्गेण नरेण सम्यक् ।३६ योधस्वरूपं पुरुप पुराणमादित्यवर्णं विमलं विशुद्धम् । सञ्चिन्त्य विष्णु परमद्वितीय कस्तम योगी न लयं प्रयाति ।।४० पज्ञानी पुरुष भी केवल विष्णु-भक्ति के प्रभाव से सुरवर के भी कार पहुँच जाते । जो महापापी शिशुपाल और सुयोधन आदि थे वे भी भगवान् के स्मरण मात्र से पापो का नाश फर मुक्ति को प्राप्त हो गये थे। जो भगवान् विष्णु की परम भपित करने वाले भयतजन हैं उनके मोक्ष प्राप्त करने में तो क्या समय हो सकता है ? अर्थात् उनके मुक्त होने में तनिक भी मन्देह नहीं है ॥ ३६ ॥ जो भगवान् का चिन्तन करता है वह ममस्त मुनियो में प्रथम है और वह मिद्ध है, जो सबके हृदयो में विराजमाम् प्रभु सभी कुछ को जानता है यह सपा साक्षी है उस प्रज-प्रमृत-ईश भगवान् वासुदेव फको प्रणाम करता है जो भय और गरण से रहित है-नित्य एप मानन्द स्वरूप है ॥ ३७ ॥ वह समस्त भुवनो या स्थामी है-निरन्तर रहगे पाला है-सुप्रगान स्वरूप वाला है-प्रयन्त यिमन-विशुद्ध भौर निगुण है। यह मुगरर भोर मय के उदिन करने वाला है उसपो मैं भावही पुप्पो के द्वारा पूमा करता हूं। वह सबका माशी-गान स्वरूप मेरे हृदय में प्रवेश परें। ॥८॥ इस प्रकार में प्रादि एक परत से हीन परास्पद भगवान विष्णु के परम प्रभाव को मैंने यसमा दिया है। प्रसएव घिमुक्ति के मार्ग प्रारा पाने की १७६ ] [ श्री गरुडपुराण इच्छा वाले पुरुप को भली भांति ऐसे परमेश्वर का सदा चिन्तन करना ।। ३६ ॥ ज्ञान के स्वरूप वाले-मूर्य के तुल्य तेज एव वएं वाते-विमल--- विशुद्ध-पुराण पुरुष-परम एव मद्वितीय भगवान् वा चिन्तन करके कौन-- सा ऐसा योगी है जो लय को प्राप्त नहीं होता है ? अर्थात सभी को मोक्ष प्राप्त हो जाया करता है ॥४०॥ इम स्तव य. सतत मनुष्यः पठेच्च तद्वत्प्रयत: प्रशान्तः। स धौतपामा विततप्रभावःप्रयाति लोकं विततं मुरारे: ॥४१ यः प्रार्थयत्यर्थमशेपसोप्य धर्मञ्च कामच नशैव मोक्षम् । स सर्वमुत्सृज्य पर पुराण प्रयाति विष्णु शरण वरेण्यम् ॥४२ विभुप्रभु विश्वधर विशुद्धमशेपसंसारविनाशहेतुम् । यो वासुदेवं विमल प्रपन्नः स मोक्षमाप्नोति विमुक्तसङ्गः ॥४३ इस स्तव को जो मनुष्य पूर्णतया प्रयत्न और प्रशान्त होकर निरन्तर पढ़ता है वह पपने सम्पूर्ण पापो को धो डालने वाला तथा वितत प्रभाव वाला हो जाया करता है एव वह मुरारि के विशद लोक की प्राप्ति किया करता है ॥ ४१ ।। जो अत्यन्त एव सम्पूर्ण सुखों की प्रार्थना करता है तथा धर्म-मर्थ काम और मोक्ष की चाह किया करता है वह इन सबका त्याग कर परम पुराण-वरेण्य एवं शरण ( रक्षक ) भगवान की सनिधि मे प्राप्त हो जाता है ॥ ४२ ॥ विभु ( सर्वत्र मापक)-प्रभु ( करने न करने और अन्यथा करने में समर्थ सबके स्वामी )-विश्व को धारण करने वाले विशुद्ध स्वरूप मौर इस सम्पूर्ण संसार की रचना के विनाश करने के कारण स्वरूप एवं विमल भगवान वासुदेव की शरणागति प्राप्त कर लेता है वह सम से विमुक्त होकर मोक्ष (संसार के जीवन-मरण के बारम्बार आवागमन से छुटकारा पाकर भगवान के स्वरूप मे लय हो जाना) को प्राप्त कर लेता है ॥४३॥ १२२-वेदान्त सांख्य सिद्धान्त ब्रह्मज्ञान वेदान्तमातयसिद्धान्तब्रह्मज्ञानं वदाम्यहम् । अहं ब्रह्म परं ज्योतिविष्णुरित्येव चिन्तयन् ।।१ वेदान्त साख्य सिद्धान्त ब्रह्मज्ञान - सूर्योन्दुव्योम्नि वह्नौ च ज्योतिरेकं त्रिधा स्थितम् । यथा सपिः शरीरस्थ गवां न कुरुते बलम् । निर्गतं कर्मसयुक्त दत्त तासां महाबलम् ॥२ तथा विष्णुः शरीरस्थो न करोति हितं नृणाम् । विनाराधनया देवः सवंगः परमेश्वरः ॥३ श्रारुरुक्षुमतीनां तु कर्मज्ञानमुदाहृतम् । पारूढयोगवृक्षाणा ज्ञान त्यागं परं मतम् ॥४ ज्ञातुमिच्छति शब्दादीन्रागद्वपोऽथ जायते । लोभमोहः क्रोध एतैर्युक्तः पापं नरश्चरेत् ॥५ हस्तावुपस्थमुदरं वाक्चतुर्थी चतुष्टयम् । एतत्सुसयतं यस्य स विप्रः कथ्यते बुधः ॥६ परवित्तं न गृह्णाति न हिंसा कुरुते तथा । नाक्षक्रीडारतो यस्तु हस्तौ तस्य सुसयतौ ॥७ श्री मूतजी ने कहा-मब हम भाप सब लोगो को वेदान्न पौर सौख्य दर्शनो के मिदान स्वरूप ब्रह्मज्ञान को बतलाते है । मनुष्य को ऐमा चिन्तन करना चाहिए कि मैं ही परम ज्योति स्वरूप ब्रह्म एव विष्णु हूँ॥१॥ सूर्य, इन्दु (चन्द्र ) व्योम और वह्नि मे एक ही तेज है जो तीन प्रकार का होकर स्थित हो रहा है। जिस प्रकार से घृन दूध में रहते हुए गोमो के शरीर में ही रहा करता है किन्तु गोमो को बल नही दिया करता है। शरीर से रूप मे निकल कर और घृत के सच्चे स्वरूप में प्राप्त होकर वही जव गोमो को दिया जाता है तो महान बल प्रदान किया करता है ॥२॥ इसी तरह सबके शरीरो मे रहने वाला भी भगवान् विष्णु जो कि मन्नर्यामी स्वरूप से सर्वत्र चराचर में विद्यमान है, कोई भी मनुष्य का हित नही किया करता है । यह विदेव सबमे गमन करने वाला अर्थात् सर्वत्र विद्यमान है तो भी यह परमेश्वर बना आराधना के पिये मानवो को मलाई नहीं करता है। भली-भांति जब उस मर्वत्र व्यापक प्रभु की आराधना भक्ति भाव से मनन्य होकर की जापा करती है तो इग जीवात्मा का पूर्ण कल्याण वह किया करते हैं । जिन- दुग्य के
१७८ ]
[ श्री गरुडपुराण
मति प्रारुरुक्ष होती है उनके लिये कर्मज्ञान बतलाया गया है और जो योग के
वृक्ष पर समाहट हैं उन मानधो के लिये त्याग और ज्ञान का मबसे परम माना
गया है ॥४॥ जो शब्दादि इन्द्रियों के विषयों को जानना चाहता है पर्थात्
विषयों में लिप्त रहता है उसे राग प्रो र द्रुप समुत्पन्न हो जाया करते हैं और
फिर वह लोभ, मोह तथा क्रोव-इनसे युक्त होकर गनुष्य पाप का प्राचरण
किया करता है ।।५) मनुष्य को चार इन्द्रियाँ बहुत ही प्रबल है-दोनों हाथ,
उपस्थ (जननेद्रिय), उदर और चौथी वाणी। जिसको ये चारो सुसमत होती
हैं वही बुध वस्तुत विष कहा जाया करता है ॥६॥ जो कमी भी पराये धन
को ग्रहण नहीं दिया करता है तथा किसी भी समय में हिंसा का कम भी नहीं
किया करता है और अक्ष-क्रोदा वर्षात् जूषा के खेल में रति नही रखता है
अर्थात जूमा नहीं खेलता है उस पुरुष के दोनो हाथो को भली-भांति सयत
यानी सयम में रहने वाले माने जाते हैं ।1७॥
परस्त्रीवर्जनरतस्तस्योपस्थ सुसयतम् ।
अलोलुपमिद भुक्त जठर तस्य सयतम् ।।
सत्य हित मित व्रते यस्माद्वायतस्य सयता ।
यस्य सयतान्येतानि तस्य कि तपसाध्वरं ।
भ्र वोमंधो स्थिता वुद्धि विषयेषु युनक्ति य ।
जीवो जाग्रदवस्थायामेवमाविपश्चित ॥१०
हृदि स्थित स तमसा मोहितो न मरत्यपि ।
यदा तस्य कुता वेति सुषुप्तिरिति कथ्यते ॥११
जाग्रतो तस्य न स्त्री न मोहो न भ्रमस्तथा ।
उत्पद्यते न जातालि शब्दार्थविषयान्वशी ॥१२
इन्द्रियाणि समाहृत्य विषयेभ्यो मनस्तया ।
बुद्धचाहनारमपि च प्रवृत्या बुद्धिमेव च ॥१३
सयम्य प्रकृतिश्चापि चिच्छक्त्या केवले स्थित ।
पश्यत्यात्मनि चात्मानमात्मानमुपकारकम् ॥१४
वेदान्त सांस्य सिद्धान्त ब्रह्मज्ञान ] [ १७६ च्चिद्र पममृतं शुद्ध निष्क्रियं व्यापकं शिवम् । तुरीयायामवस्थायामास्थितोऽसौ न सशयः ॥१५ पराई स्त्री से सयोग जिसने कभी नहीं किया है पौर पर स्त्री से सर्वदा वजित रहा करता है उस पुरुष का उपस्थ सुसयत होता है । जो लोलुप न होकर ही शरीर की रक्षा के लिये ही साता है उसका उदर सुसपत कहा जाना है ॥८॥ जो सदा सत्य, हित और मित बोला करता है उसको वाणी सुसयत होती है । जिसकी ये चारो सुरापत हो उसे यज्ञ-योगादि पोर तपश्चर्या करने को क्या प्रायश्यकता है ?जो भ्रूषो के मध्य में स्थित बुद्धि को विषयों में युक्त किया करता है वह जीव जाग्रत् अवस्था में ही होता है-ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं ॥१०॥ जब हृदय में स्थित होकर वह तम से मोहित हो। हुआ कहीं भी नहीं जाता है उस समय मे उसरी सुषुप्ति को अवस्था होती हैं ॥१९॥ जाग्रत् दशा में भी उसे न स्त्री का मान रहता है -न कोई मोह ही होता है मया किसी भी प्रकार रा भ्रम भी नही होता है। उस दशा मे परने हो वा गे ऐसा रहता है कि शब्दार्य विषयो का भी उसे पुछ ज्ञान नही रहा परता है । पपनी मम्पूर्ण इन्द्रियो को विषयों से हटाकर तथा मन को भी मम पोर से पोचार, युद्धि मे पहवार को भोर प्रवृति से बुद्धि को रायन करक एव अपनी चित् शक्ति के द्वारा प्रकृति को समिन करके केवर प्रात्मा में स्थिा होपर पानी मात्मा म उपचार करन यानो मात्मा का दान परता वह चिढ़य, अमृत, पुद, निस्क्रिय, व्यापर और शिव वा यात्रा है। उम ममप में यह तुगेय परस्या में ही पास्थित हो।है-इसमे युध भी गप नहीं है ॥१२॥ ॥१३॥१४॥१५॥ पुगेष्टकस्य पयस्य पाण्यष्टौ च तानि हि। माम्यावस्था गुगाकृता प्रकृतिस्तम पणिवा ॥१६ कणिकाया स्थितोदेयो देहे निटू प एव हि । पुण्यंष्ट परित्यज्य प्रतिव गुणात्मिपाम् । यदा याति सदा जोयो याति मुक्ति न समय ॥१७ प्राणायामो जय प्रत्याहाराज्य पारगा। ध्यान समाधिरिस्पेसे पटवागम्य प्रमाः ॥१८ १८० [ श्री गडपुरा पापक्षये देवतानां प्रीतिरिन्द्रियसंयमः। जपध्यानयुतो गर्भे विपरीतस्त्वगर्मकः ॥१६ पविशन्मातृक: अंधश्चतुविशतिमातृकः । मभ्यो द्वादशमानतु प्रोङ्कारं सतसं जपेत् ।।२० वाचके प्रणये जाते वाच्य ब्रह्म प्रसीदति । *नमो विष्णवे । पठाक्षरच जप्तभ्यो गायत्री द्वादशाक्षरा २१ अष्ट दल वाले पप की पूरी में वे माठ पत्र हो गुणों की की हुई साम्प प्रयस्था होती है। उसमें प्रकृति ही कणिका है ॥१६।। उसमें कणिका देव स्थिन हैं पौर देह चिद्रूप ही है । उस पुर्यष्टक का परित्याग करके जिम समय में गुरगा. स्मिका प्रकृति को प्राप्त करता है उस समय में जीव मुक्ति को प्राप्त किया करता है इसमे कुछ भी संशय नहीं है ।।१७॥ प्राणायाम, जप, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि ये छ योग के प्रमापक होते हैं ॥१॥ पापो के क्षय होने पर देवतामो मे ति होती है। यह इन्द्रियों का समम है। गर्भ में जापौर ध्यान से युक होता है। भगर्भक इसके विपरीत होता हैं ॥१६॥ छत्तीस माया वाला धेष्ट होता है-चौबीस मातृक मध्यम होता है मौर बारह मात्रा वाला तीसरी श्रेणी का होता है। निरन्तर ओद्वार का जप करना पाहिए ॥२॥ ब्रह्म के पापक प्रसव के ज्ञान हो जाने पर उसका वाच्य ब्रह्म प्रसन्न होता है। "यो नमो विष्णवे"-इम छ प्रक्षर वाले मन्त्र का जप करना चाहिए । गायत्री बारह की होती है ॥२॥ सर्वेषामिन्द्रियाणा तु प्रवृत्तिविपयेषु च । निवृत्तिर्मनसा तस्यां प्रत्याहारः प्रकीर्तितः ।।२२ इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यः समाहृत्य हितो हि सः। सहसा राह बुद्धया च प्रत्याहारेपु सस्थितः ।।२३ प्राणायामदशभिर्यावत्कालकृतो भवेत् । यस्तावत्कालपर्यन्तं मनो ब्रह्मणि धारयेत् ॥२४ तस्यव ब्रह्मणा प्रोक्तं ध्यान द्वादश धारणाः । तुप्येत नियतो युक्तः समाधिः सोऽभिधीयते ॥२५ वेदान्न सारयसिद्धान्त ब्रह्मज्ञान ] [ १८१ ध्यायन्न चलते यस्य मनोभिया॑यते भृशम् । प्राप्तयावधिकृत काल यावत्सा धारणा स्मृता ॥२६ ध्येये सक्त मनो यस्य ध्येयमेवानुपश्यति । नान्य पदार्थ जानाति ध्यानमेत प्रकीतितम् ।।२७ ध्येये मनो निश्चलता याति ध्येय विचिन्तयन् । यत्तद्धयान पर प्रोक्त मुनिभिानचिन्तकं ॥२८ समस्त इन्द्रियो की विषयो मे प्रवृत्ति होती हैं उसम मन पोर इन्द्रियो की जो निवृत्ति होती है उसी को प्रत्याहार कहा गया है । विषपो रो इन्द्रियो तथा मन का प्रत्याहरण अर्थात् निवृत्त कर लेना यानी हटा लेना ही इसका शब्दार्थ होता है ॥२२॥ इद्रियो को इन्द्रियो के अर्थो से यानी विषयो से समा- हरण करके स्थित रहने वाला वह सहसा बुद्धि के साथ प्रत्याहारो मे सस्थित होता है ॥२३॥ बारह प्राणायामा के द्वारा जितने समय तक वह स्थित रहता है उनने समय तक मन को ब्रह्म मे धारण करे ॥२४॥ उसी अवस्था को ब्रह्म का ध्यान बताया गया है। बारह धारणा हैं । जव नियत एव युक्त पुधि प्राप्त करता है तो उसको ही समाधि कहा जता है ॥२५॥ इस प्रकार से ब्रह्म का ध्यान करते हुए जिसका मन चलित नहीं होता है और मन के द्वारा खूब अच्छी तरह ध्यान किया करता है । जब तक प्राप्तव्य का अवधि का काल होता है तव तक ध्यान का बना चले जाना ही धारणा कही जाती है ॥२६॥ ध्यान परने के योग्य जो लक्ष्य होता है वह ध्येय कहा जाता है, उस ध्धेय म जिसका मन सक्त होता है और जो मन केवल ध्येय को ही देखा करता है उस अपने ध्येय के अतिरिक्त अन्य किसी को भी नहीं जानता है उसको ही ध्यान कहते हैं ।।२७।। अपने ध्येय ना विशेष रूप से चिन्तन करते हुए जब उस ध्येय म मन निश्चलता अर्थात् स्थिर भाव को प्राप्त हो जाता है तो उस पान का ध्यान फे चितन करने वाले मुनिया ने परमोत्तम ध्यान बतलाया है ॥२८॥ ध्येयमेव हि सर्वग्र ध्येयस्तन्मयता गत । पश्यति द्वंतरहित समाधि सोऽभिधीयते ॥२६ -
१८४ ]
! श्री गगरपुर
ध्यान करता हुमा योगी भक्ति को प्रान करने वाला होता है ॥४०॥ कुछ यो
जन पात्मा द्वारा भारमा को ध्यान :पी नेत्र से देखा करते हैं। दूसरे सारू
को बुद्धि (शाग) से तथा अन्य लोग ( योगीजन ) इस योग के द्वारा देखते हैं .
॥४॥ ब्रह्म ये काम करने वाला शाप भय (ममार) के बन्धनो का शेष
रूप से भेदन करने वाला है। वित्त पी एग्रता का हो जाना ही योग होना
है मोर मुक्ति के प्रदान पर वाला होता है-इसमें लेशमान भी कोई माय
नहीं है ।।४२॥
जितेन्द्रियात्मकरणो ज्ञानहप्तो हि यो भवेत् ।
रा मुक्तः कथ्यते योगो परमात्मान्धवस्थितः ॥४३
आमनस्थानविपया न योगस्य प्रसाधकाः ।
विलम्बजनका सर्वे विस्तरा. परिकीतिता. ॥४४
शिशुपाल. सिद्धिमाप स्मरणाभ्यामगौरवात् ।
योगाभ्यासं प्रकुर्वन्तः पश्यन्त्यात्मानमात्मना ॥४५
सर्वभूतेषु कारुण्य विद्वप विपमेषु च ।
लुप्तशिश्नोदरादिश्च कुर्वन् योगी विमुच्यते ।।४६
इन्द्रियै रिन्द्रियार्थास्तु न जानाति नरो यदा।
काठयद् ब्रह्मसंलोनो योगी मुक्तस्तदा भवेत् ॥४७
सर्ववर्णाः स्त्रियः सर्वाः कृत्वा पापानि भस्मसात् ।
ध्यानाग्निी च मेधावी लभन्ते परमां गम् ॥४८
मन्यनाद् दृश्यते ह्यग्निस्तद्वद् ध्यानेन वै हरिः।
ब्रह्मात्मनोर्यदैकत्व स योगश्चोत्तमोत्तमः ।४६
बाह्यरूपैर्न मक्तिस्तु चान्तस्यै, स्याद्यमादिभिः ।
सावधज्ञानेन योगेन वेदान्तधवर्णन च ५०
प्रत्यक्षतात्मनो या हि सा मुक्तिरभिधीयते ।
अनारमन्यात्मरूपत्वमसत: सत्स्वरूपता ॥५१
इन्द्रियो को जीतकर शाम करण जो ज्ञान हस होता है वह परमात्मा-
न्धवत् स्थित योगी मुक्त कहा जाता है ।।४३।। आसन, स्थान और विषम योग
[ श्री गरुडपुराण
विधूम इव दीप्ताचिरादीप्त इव दीप्तिमान् ।
वंद्य तोऽग्निरिवाकाशे हृत्मङ्ग ग्रात्मनात्मनि ॥४
क्षोवादीनि न पश्यन्ति स्व स्वमात्मानमात्मना।
सर्वज्ञः सर्वदर्गी च क्षेत्रनम्तानि पश्यति ।।५
यदा प्रकाशते ह्यात्मा पटे दीपो ज्वलन्निव ।
ज्ञानमुत्पद्यते पुसा क्षयात्पापम्य कर्मणा ॥६
यथादर्शतलप्रन्ये पश्यत्यात्मानमात्मनि ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थांश्च महाभूतानि पञ्चकम् ।।७
मनोवुद्धिरहद्वारमव्यक्त पुरुष तथा ।
प्रसरयाय पराव्याप्तौ विमुक्तो बन्धनभवेत् ॥८
श्री भगवान ने कहा- अब हम भगवद्गीता का मार तुमयो बतलाते
हैं जो कि पहिने भगवान् श्रीकृष्ण ने भारत के युद्धस्थल में अर्जुन को यह लाया
था । आठ यम-नियम-गन-धारणा प्रादि पङ्गो वाले योग से युक्त मारमा
सम्पूर्ण वेदान्त पा पारगामी प्रारम लाम हो पर है तथा पाल्म देद पादि जिा
मन्य नती। रूप मादि में होन देह भोर मत करण मादि लोग है राना
विशन से रहित प्राण है, मैं गुपुर ई-ऐगा प्रतीत होता है। दुम मादि और
गवार प्रादि के गमधा से में मान्मा नहीं हूँ॥३॥ गुम रहिन दीप्त पचि की
भार, दीतिमान पादीत की तर मोर पाया में येन (विली में मामाय
ने यापी) पमि के ममान तान आरमा मै मात्मा के द्वारा योगादिक
भरमा मे अपनी भारमा को नहीं देखते है । मवो जानने वाला, मद पुधको
देवन यामा शेरावरही उनको देखा करना है ॥४५॥ पट में जमग
हा पोरी भी जिग मर में मारमा प्रापिा परता है. पाप पारे
सय में मनुष्य को जान से सना ॥६॥ मिग सरद गे माया)
तनपारमा में पारमा को देगा , मी प्रकार में मोमो
पागो, २ माभूतो , गा, यति. परद्वार पो. Kura great
मला है पौर परारा में प्रगर नि यमनी में fry am
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गोतासार - १८६ को प्रयत्न पूर्वक वजित कर देना चाहिए |१८|| शोच (शुद्धि) दो प्रकार का होता है । बाह्य शौच मिट्टी और जल से होता है तथा आन्तरिक शौच शुद्ध भाव के रसने से होता है। जो कुछ स्वतः ही बिना किसी प्रयत्न के यहच्छा से प्राप्त हो जावे उसी से सन्तुष्ट हो जाना सन्तोष कहलाता है और यह अक्षय सुख होता है ॥१९मन तथा समस्त इन्द्रियो की जो एकाग्रता होती है यही सबसे श्रेष्ट परम तप है। कृच्छ चान्द्रायण प्रादि व्रतो के द्वारा जो शरीर का शोपण किया जाता है वह भी तपस्या होती है ।२०। बुध लोग द्वारा वेदान्त शत रुद्रीय और प्रणव मादि का जो जाप तथा पठन होता है वह सत्व की शुद्धि करने वाला पुरुपो का होता है उसे स्वाध्याय कहते हैं ॥२१॥ स्तुतिस्मरणपूजादिवाङ्मनःकायकर्मभिः । अनिश्चला हरौ भक्तिरेतदीश्चरचिन्तनम् ।।२२ प्रासनं स्वस्तिकं प्रोक्त पद्ममर्धासन तथा । माणः स्वदेहजो वायुरायामस्तनिरोधनम् ॥२३ इन्द्रियाणां विचरता विपयेपु त्वसस्विव । नियम प्रोच्यते सद्धि प्रत्याहारस्तु पाण्डव ।।२४ मू मूर्तब्रह्मरूपचिन्तन ध्यानमुच्यते । योगारम्भे मूर्तहरिममूर्तमपि चिन्तयेत् ।।२५ अग्निमण्डलमध्यस्थो वायुदेवश्चतुर्भुज. । पास चक्रगदापायुक्त कौस्तुभसयुतः ॥२६ चनमाली कौस्तुभेन यतोह ब्रह्मसनक । धारणेत्युच्यते चेय धार्यते यन्मनोलये ॥२७ ह ब्रह्म त्यवस्थान समाधिरभिधीयते । ब्रह्मास्मि वाक्याच्न ज्ञानान्मोक्षो भवेन्नृणाम् ॥२८ गिदपतलक्षयित्या स्थितस्य च । म. द ब्रह्म ग्रह ब्रह्मपदार्थयोः ॥२६ स्तुति, प्रभु का स्मरण, परमात्मा का अर्चन आदिको रारिक कर्मों के द्वारा करना तया हरि में निधन भक्ति .
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विधिना या भवेद्धिसा सा त्वहिंसा प्रकीर्तिता।
सत्य ब्रूयात् प्रिय ब्रूयान्न व यात् सत्यमप्रियम् ।
प्रियञ्च नानृत यादेप धर्म. सनातनः ॥१५
यच्च द्रव्यापहरण चौद्विाथ वलेन वा।
स्तेय तस्यानाचरण अस्तेय धर्ममाधनम् ॥१६
कर्मणा मनसा वाचा सर्वावस्थासु सर्वदा ।
सर्वन मैथुनत्याग ब्रह्मचर्य प्रचक्ष्यते ॥१७
द्रव्याणामप्यनादानमाप स्वपि तथेच्छया।
अपरिग्रहमित्याहुस्त प्रयत्नेन वर्जयेत् ।।१८
द्विधा शौच मृज्जलाम्या बाह्य भावादथान्तरम् ।
यदृच्छालाभतस्तुष्टि सन्तोष सुखमक्षयम् ।।१६
मनसश्न न्द्रियाणाञ्च ऐकाग्नथ परम तप.।
शरीरशोपण वापि कृच्छचान्द्रायणादिभिः ।।२०
वेदान्तशतरुद्रीयप्रणवादिजप वुधा ।
सत्त्वशुद्धिकर पु सा स्वाध्याय परिचक्षते ।।२१
यागादि मे विधि का अङ्ग जो भी कोई हिंसा बताई गई है वह हिंस
न होकर मदा अहिमा ही कही गई है। सदा सत्य भापण करना चाहिए औ
वह सत्य भी सबको थोत्र सुख देने वाला प्रिय हो ऐसा ही वोले । जो सत्य में
अप्रिय हो तो उसे कभी न बोलना चाहिए। ऐसा प्रिय भो कभी न कहे ज
मिथ्या है--यह ही सनातन (सर्वदा से चले पाने वाला) धर्म होता है ॥१५
चौर कर्म के द्वारा या बल पूर्वक जो पराये द्रव्य का आहरण करता है व
स्तेय कहा जाता है । उस स्तेय कर्म का न करना हो अस्तेय होता है और प्रस्त
का प्रावरण ही धर्म का एक साधन होता है अर्थात् यह भी धर्म का एक म
होता है ॥१६॥ दश प्रकार के धर्म के अङ्गो में एक अस्नेय भी है। कम,
और वाणी स सभी अवस्थाम्रो म सर्वदा और सर्वत्र जो मथुन का त्याग ।
देता है उसी को ब्रह्मचर्य कहा जाता है ।।१७॥ यापत्ति के समय में भी इ
से शो का जो न लेना है उसी को अपरिग्रह कहते हैं उसको अर्थात् परि
गोतासार ] । १८६ को प्रयत्न पूर्वक वजित कर देना चाहिए ॥१८॥ शोच (शुद्धि) दो प्रकार का होता है । बाह्य शोध मिट्टी और जल से होता है तथा आन्तरिक शौच शुद्ध भाव के रापने से होता है। जो कुछ स्वतः ही विना किसी प्रयत्न के यहच्छा से प्राप्त हो जाये उसी से सन्तुष्ट हो जाना सन्तोष कहलाता है और यह अक्षय सुम्व होना है ॥१६॥ मन तथा समस्त इन्द्रियो को जो एकाग्रता होती है यही सबसे श्रेष्ठ परम तप है। कृच्छ चान्द्रायण प्रादि व्रतो के द्वारा जो शरीर का शोषण किया जाता है वह भी तपस्या होती है ।२०। बुध लोग द्वारा वेदान्त शत रुद्रीय और प्रणव मादि का जो जाप तथा पठन होता है वह सत्त्व की शुद्धि करने वाला पुरुपों का होता है उसे स्वाध्याय कहते हैं ॥२१॥ स्तुतिस्मरणपूजादिवाङ्मनःकायकर्मभिः । अनिश्चला हगै भक्तिरेतदीश्चरचिन्तनम् ।।२२ प्रासनं स्वस्तिक प्रोक्त पद्ममर्डासन तथा । माणः स्वदेहजो वायुरायामस्तनिरोधनम् ॥२३ इन्द्रियाणां विचरता विषयेषु त्वसरिस्वव । नियम प्रोच्यते सद्धि प्रत्याहारस्तु पाण्डव ।।२४ मूर्तामूर्तब्रह्मरूपचिन्तन ध्यानमुच्यते । गोगारम्भे मूर्तहरिममूर्तमपि चिन्तयेत् ।।२५ अग्निमण्डलमध्यस्थो वायुदेवश्चतुर्भुज. । रासचक्रगदापायुक्त कौस्तुभसयुत. ॥२६ वनमाली कौस्तुभेन यतोह ब्रह्मसज्ञक. । धारणेत्युच्यते चेय धार्यते यन्मनोलये ।।२७ ग्रह ब्रह्म त्यवस्थान समाधिरभिधीयते । यह ब्रह्मास्मि वाक्याच्च ज्ञानान्मोक्षो भवेन्नृणाम् ।।२८ घद्धयानन्दचतन्य लक्षयित्वा स्थितस्य च । ब्रह्माहमस्म्यह ब्रह्म ग्रह ब्रह्मपदार्थयोः ॥२६ भगवान् की स्तुति, प्रभु का स्मरण, परमात्मा का पर्चन आदि को पाणी, मन और शारीरिक कर्मों के द्वारा करना तया हरि में भनिश्चल भक्ति १६० ] [ भी गरुडपुरा का करना हो ईश्वर का चिनन का बांया है ॥२२॥ आमनी में लिवास पनासन और पर्दामन कहे गये हैं । प्राणायाम का त त्वयं यह है कि स्वदेह जो प्राण वायु है उसका आयाम अर्थात् उसका विरोध किया जाता है ॥२३ असत् विषपो में विचरण करने वाली इन्द्रियो मा रोकना हो सत्पुरुषो के द्वार कहा जाता है। विपयो से मन मादि का प्रत्याहरण करने अर्थात् हटा को ही योग में प्रत्याहार हे पाएड कहा जाता है ॥२४॥ मुरी तथा अमूर स्वरूप वाले ग्रह का जो चिन्तन किया जाता है उसो को ध्यान कहते हैं योगाभ्यास के पारम्भ क ल में हरि के मूत बनो तथा उनके प्रमू स्वरूप कामी चन्तन करना चाहिए ॥२५॥ अग्नि-मण्डल के मध्य में स्पि चार भुजायो वाले वायुदेर है जो शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म इन चागे आयुष से युक्त हैं पोर कोतुभ मे ममन्दित है ।२६। धनमाली और कौस्तुभ म युक्ता में है ब्रह्म की राज्ञा वाला हूँ-इम तरह से मनोलय में जो धारण किया जाया करत है इसीलिये इसको योग में धारणा कहा बाया करता है ॥२७॥ में ही प्रमा इस प्रकार का जो अवस्थान है जमी को समावि कहा जाता है । 'अह ब्रह्मास्मि' --अर्थात् में ब्रह्म हूँ इस तरह के वान्य से और इस प्रकार के ज्ञान में मनुष्यो का मोक्ष होता है ॥२८॥श्रा से स्थित पान र चाय का लक्षर करके मैं ब्रह्म हूँ, ब्रह्म में ही हूँ और ब्रह्म और अह पदार्यो मे ब्रह्म ही है ।।२६।। .१२४- प्राणेश्वर मंत्र विधान प्राणेश्वर गारुडच शिवोक्त प्रवदाम्यहम् । स्थानान्यादी प्रवक्ष्यामि नागदष्टो न जीवति ॥१ चितावल्मीवर्शनादौ कूप च विवरे तरो । दो रेखान्य यस्य प्रच्छन्न म न जीवति ।।२ पष्ठयाञ्च कांटे मेपे मूलारलपामघारिपु। पक्षाश्रोणिगले सन्धौ शहरोदरादिपु ॥३ दण्डी शरूधरो भिक्षुनंग्नादि कालदूतक। का वाही च प्रोनाया पृष्ठे च न हि जीवति ॥४
प्रणेश्वर मन विधान }
पूर्व दिनपतिभुक्त अर्द्ध याम ततोऽपरे ।
पा ग्रहा प्रतिदिन पट्सख्यापरिवर्तन ॥५
नागभोग क्रमाज्ज्ञ यो रानौ वाणविवर्तनं ।
गेपोऽर्क. फरिणपश्चन्द्रस्तक्षको भौम ईरितः । ६
कर्मोटोज्ञो
पद्मो महापद्मश्च भार्गवः ।
शस गनेश्वरो राहुः कुलिकश्चायो ग्रहा. ७
रामो दिया सुरगुरोभर्भाग स्यादमरान्तक ।
पगो कालो दिवा राहु गुलिकेन मह स्थिन ।
यामाद्धि सन्धिमस्थ. वेला कालवतीञ्चरेत् ।।
श्री मूतजी ने कहा-प्रय में शिर के द्वारा रचित प्राणेशर गारुड यो
पहता है। मब आदि में मैं उन स्थानो विषय में बन पाता है जहां पर नाग
पे द्वारा कटे जार पर मनुष्य जोयित नही रहा करता है ॥१॥ निता अर्थात्
मशान भूमि, बल्मोर अर्थात् म रहन को वापी और पत आदि मे. पूर
मे मोर वृक्ष के वियर प्रर्यान् सोनर में एश यग्मे पर जिसको प्रमान तीन
रेबाप हो वह प भी जीवित नही रहता है ॥२॥ पटी निपि में, म, मप मून.
पालपा और मघा पादि नक्षत्रो म, पक्षा, प्रोगिा, गला, माघ भोग, मार्ग
पोर उदर प्रादि मे दारी, पम्प धारण फग्न वाला, भिपोर न पारि
मुष, बाह, ग्रीवा (गग्दन) और पृर में दशा नियमाने पर जीवित नहीं रहना
॥३॥ । पहिन दिनपनि मूग भोग पा. मिममा मगर पर प्रहर हाना
है। हम उपसत शंप प्रा प्रति ईको गार परिवत नाम भोग किया
है ॥५॥ यगर पियानोरागमन गाग भीग जानना चाहिए ।
शेप मा (गूर) है, परिणाममा है और नक्षर या मोर कहा गया है।
काटा युध नपा पप को गुरु (नि) और महापबा शुर. पान नं.
मा पोरगुसि राह कहा जाता है। मगन ग प हो
राति-दिन म पमना गुरु
भाग मानसिय
६ पौर पर गार नि मायामरे में दम
होनाली रामपामा
[ो गाडपुराम
वाग द्विपवह्निवाजियुगभूरेकमागतः ।
दिवा पड्वेदनेत्राद्रिपञ्चत्रिमानुपाशकं. १६
पावागुप्ठे पादपृष्ठे गुल्फ जानुनि लिङ्गके ।
नाभी हृदि स्तनपुटे कण्ठे नासापुटेऽक्षिणि ।
वायोश्च भू वो शद्ध मस्तके प्रतिपरक्रमाद ॥१०
तिष्ठेचन्द्रश्य जीवेन पु सो दक्षिणमागके।
कायस्य वामभागे तु स्त्रिया वायुहात्कगत् ।
अमवत्वत्कृतो मोहो निवर्तेन च गर्दनात् ।।११
मात्मन परम बीज हमाल्य स्फटिकामलम् ।
ज्ञातव्य विषपापघ्न वीज तम्य चतुर्विधम् ।।१२
विन्दुपञ्चस्वरयुतमाधमुक्त द्वितीयकम् ।
पष्टारूढ तृतीय स्यात्सविसर्ग चतुर्थकम् । १३
ॐ कुरु कुन्दे स्वाहा।
विद्या लोक्य रक्षार्थ गरुडेन धृता पुरा ।।१४
बधेप्मुगिनागाना मुखेऽथ प्रणव न्यसेत् ।
गले कुरु न्यसेद्धीमान कुन्दे च गुल्फयो स्मृतः ।
स्वाहा पादयुगे चैत्र युगहा न्यास ईरित ॥१५
पांच दरे, छ, नरेन, मात, चार घोर एक माग से दिन मे छ, घर, दो
सात, पाच, तीन मानुषाशो के द्वारा पैर के अंगूठे मे, पाद पृष्ठ मे, गुल्फ म,
जानु (घुटना) मे लिङ्ग मे नाभि मे, हृदय में, स्तन पुट थे, कण्ठ मे, नासापुट
कानीम, प्रा में, शङ्ख में और मस्तक में प्रतिपदा के नाम से
पुरुष वे दक्षिण भाग मे चन्द्र स्थित रहता है और वह नही जीवित रहता है।
स्त्री के शरीर के बाग भाग में तो व यु कह कर से मर्दन करने से अमन
कृन माह दूर हो जाया करता है ॥६।१०।११॥ म्फटिक वे समान निमन हम
गाम वाला प्रात्मा का परम बोज जान लेना चाहिए। उसका विष और गाए
का हनन करने वाला वीज है और उसके चार प्रकार हैं ।।१२।। बिन्दु पञ्च
स्वर से युक पाद्य और द्वितीय बताया गया है, तृतीय पारूल होता है तथा
मे नेत्र में
प्राणेश्वर मय विधान ] १६३ -- चतुर्थ विसर्ग से समन्वित होता है ॥१३॥ ॐ कुरु कुन्दै स्वाहा"- -यह मन्त्र विद्या का स्वरूप है। प्राचीन समय म गरुड ने इस विद्या को धारण किया था ।।१४।। नागो के वध करने की इच्छा वाले पुरुष को मुख मे प्रगाव का भ्याग करना चाहिए। इसके अनन्तर फिर धीम न पुरुष को गले में 'कुरु'-- इसका न्यास करना चाहिए । “कुन्दे"- पद का न्यास दोनो गुल्फो में बताया गया है । और 'स्वाहा'- '-इसका न्यारा दोनो पदो में युग का हनन करने बाला कहा गया है ॥१५॥ गृहेऽपि लिखितो यत्र तन्नागा सन्त्यजन्ति च । सहस्रमन्त्र जप्त्वा तु कर्णे सूत्र धृत तथा ॥१६ यद्गृहे शर्करा जप्ता क्षिप्ता नागास्त्यजन्ति तम् । जप्तलक्षस्य जप्याद्धि सिद्धि प्राप्ता सुरासुरै ॥१७ ॐ सुवर्णरेखे कुक्कुटविग्रहरूपिणि स्वाहा । एवचाष्टदले पद्म दले वरणयुग लिखेत् । नामैतद्वारिधाराभि स्नातो दष्टो विप त्यजेत् ॥१८ ॐ पक्षि स्वाहा । अंगुष्ठादि कनिष्ठान्त करे न्यस्याथ देहके । के वक्ने हृदि लिङ्ग च पादयोर्गरुड. स हि ॥१६ नाकामन्ति च तच्छाया स्वप्नेऽपि विपपन्नगा । यस्तु लक्ष जपेच्चास्या स दृष्ट्वा नाशयेद्विपम् ।।२० *ह्रो ह्री ह्री भिरुण्डायै स्वाहा । पणे जप्ता विय विद्या दष्टकस्य विप हरेत् । २१ मिस घर में भी यह लिखा हमा रहता है उस गृह को भी नाग त्याग दिया करते हैं । इमरा मह प्रभाव होता है । इस मन्त्र का एक महय गार जाप करके कान में मूत्र को धारण करे ॥१६॥ जिस पर मे इम उपयुक्त मन्त्र से शर्करा को मभिमन्त्रित करके उसका प्रक्षेप किया जाये तो उस घर को नाग स्वय हो स्याग कर चले जाया करते है। इस मन्त्र का ए मास जाप करने परस जाप से सुर मौर मगुगे ने सिदि की प्राप्ति की ॥१७॥ दूसरे मात्र । श्री गरुडपुराण का स्वरूप " सुवरणं से कुक्कुद विनत रूपिणि स्वाहा" यह है । इस प्रकार से प्रष्ट दल वाले पद्य कदन में दो चरणों में लिखना चाहिए। इस नाम से जल की धाराओ से स्नान कराये जान पर जिस पुरुप का दशन किया गया है उसका विप नष्ट हो जाता है ॥१८॥ तीसरे मन्त्र का स्वरूप यह है-ॐ पक्षि स्वाहा' अंगूठे से कनिष्ठिका पर्यन्त कर में व्याम करके देहक में, मुख में, हृदय प्रौर लिङ्ग में तथा दोनो पदो म न्याय करे। वह निश्रम ही गरुड है ।।१९।। बढे. धडे विपधारी सर्प भी उसको छाया को स्वप्न में भी कभी बात नहीं किया करते हैं । जो पुरुष इस मन्त्र का एच लाप जाप कर लेता है उममे मो इसके प्रभाव से ऐसी शक्ति समुत्पन्न हो जाया करती है कि यह सप दर पुरुष को कर ही उसके दिप का नाश कर दिया करता है ।।२०।। चतुप म.भ का स्वरूप यह है-~-" हो ही हो मिरएडाय स्वाहा"। इस मन्त्र की विद्या को वान मे जाप करने मुना देने पर ही जिपको सप नै कटा है उसका विप नष्ट हो जाता है॥२१॥ ग्र प्रा न्यसेतुपादान इ ई गुल्फेोऽथ जानुनि । उ ऊ ए ऐ कटितटे प्रो नाभी हुदि नौ न्यसेत् ॥२२ वो प्रमुत्तमाङ्ग अ न्यसेच्च हससयुता । हमो विपादि च हरेज्जता ध्यातोऽथ पूजितः ॥२३ गरुडोऽहमिति ध्यात्वा कुर्याद्विपहरी क्रियाम् । ह मन्त्र गाविन्यस्त विधादिहरमीरितम् ॥२४ न्यस्य हस वामकरे नासामुख निरोधात् । मन्त्रो हरेष्टकस्य त्वड्मासादिगत विषम् ॥२५ स वायुना समाकृष्य दधाना गरल हरेत् । तनी न्यसेद्दष्टरस्य नीलकण्ठादि सस्मरेत् ॥२६ पीत प्रत्यङ्गिरामूल तण्डुलाद्भिविपापहम् । पुनर्नवाफलिनीना मूल काजमीहशम् ॥२७ मूल मुगलहत्यास्तु कर्कोटया गरिणिकम् । अधूि घृतोपेत लेपोऽय विपमर्दन. ॥२८ प्राणेश्वर मप्र विधान ] [ १६५ नभोर पा इसका न्याम पाद के अग्र भाग में करे तथा इ ई इसका गुल्फ मे और इसके अनन्तर जानु (घुटने) में उ ऊ का न्यास करे तथा ए ऐ का कटि तट मे, 'पो' का न्यास नाभि में और ओ वा न्यास हुण्य मे करना चाहिए ।।२२।। ह स से सयुत मुग्व मे और उत्तमाङ्ग म 'प्र'--इममा न्याम करें। यह हम जाप किया हुमा, ध्यान किया हुआ और ममनिन होता हुमा सम्पूर्ण विष प्रादि का नाश कर दिया करता है। मै स्वय हो गरुड है-ऐसा ध्यान करक ही विप के हरण कर देने वाली क्रिया को करना चाहिए । ह मन्त्र को जिस समय मे गात्र मे विन्यस्त किया जाता है तो वह विप आदि के हरण परने वाली कही जाने वाली विद्या है ॥२३॥२४॥ वाम र मे हम का न्याम करक नाय और मुप का निरोध करने वाला होता है । यह मान दृष्ट विय हुए पुरुप ये त्वचा मोर माम प्रादि मे प्राप्त होने वाले विप का नाश कर देना है । ॥२५॥ वह वायु के द्वारा समापण करके दृश किये हए पुरुप के गरल का उम हरण करना चाहिए । दृष्ट पुरुप के शरीर म न्यास बरे और उस समय म मोनकराठ प्रादि का स्मरण करना चाहिए ||२६। चावलो व जल के साथ प्रत्यङ्गिरा को जट का पान करने से विप का माहरण हो जाता है। पिर पुनर्नवा (माउ), फलिनी और चक्रन वे मूल का भी इपी प्रचार मे पान करना पाहिए ।।२७।। शुक्रवृहतो का मूल, कोटी र गाय गैरिकणिक को जल के साय घिम कर उसका लेप करने म विप का मदन हो जाता है ॥२८॥ विपवृद्धि न प्रजेच्च उष्ण पिय नि यो घृतम् । पञ्चाङ्गन्तु शिरीपस्य मूल गृजनज तथा ।२६ सर्वाङ्गलेपतश्चापि पागाद्वा विपहरभवन् । ॐ ह्री गोनसादिविपत् ॥३० हल्ललाटविमर्गान्त ध्यात वश्यादिद्भवेत् । न्यम्त यानी वसेत् मन्या सुन्मिदज नाविलाम् ॥३१ जप्वा सप्ताष्टमाहस्र गएत्मानिर मग । पनि म्यानिधारी च वश्यास्त्री न समाप्नुयात् । विपत्म्यात् पयानत्त्व मुनेदामम्य ते भ्र.नम् ॥३२
| श्री गरडपुराण
जो उष्ण घृन का पान करता है इसके विप की वृद्धि नहीं हुमा करनी
है । शिरीष वृक्ष के पांचो अङ्ग अर्थात् मूल, फन, पता, पुष्प भोर छ ल और
गाजर के मूल को लेकर राव पग पर लेप काने से अथवा पान करने में विष
फा हरण होता है । ॐ हो'-यह मात्र गोनस मादि के विष का हरण करने
वाला है ॥२६॥३०॥ हृदय, ललाट और विसर्ग के अन्त पयंत मान करने
पर वश्य प्रादि के करने वाला होता है । यदि इस हा योनि में न्यान किया आवे
तो कन्या को वशीभूत कर देता है और उसे मद जल से प्राविल अर्थात् उन्मत्त
कर देता है ।।३१ । मह सात सास इस मन्त्र का जाप करने से गरुड को भौति
सर्वन गमन करने वाला हो जाता है, कवि और श्रुतिधारी हो जाया करता है
तथा स्त्री को वश बनाकर प्राह करता है। यह विप का हरण करने वाला
व्यास मुनि का कथा रत्व प्रापको बतला दिया है ।।३।।
१२५--सुदर्शन पूजा विधान
सुदर्शनस्य पूजा मे वद शङ्खगदाधर ।
नहरोगादिक सर्व यत्कृस्वा नाशमेति वै ॥१
सुदर्भनस्य चक्रम्य शृणु पूजा वृषध्वज ।
स्नानमादौ प्रकुर्वीत पूजयेच्च हरिं तत ॥२
मूलमन्त्रेण वं न्यास मूलमन्त्र शुगुप्त च ।
सहस्रार हु फट नमो मन्त्र प्रणवपूर्वक ॥
कथित' सर्वदुष्टाना नाशको मन्त्रभेदक ॥३
ध्यायेत् सुदशन देव हदि पद्मऽमले शुभे ।
शङ्खचक्रगदापधर सौम्य कोरिटिनम् ॥४
प्रावाह्य
मण्डले देव पूर्वोक्तविधिना हर ।
पूजयेत् गन्धपुप्पाघ रुपचारमहश्वर ॥
पूजयित्वा जपेन्मन्न शतमष्टोत्तर नर ।
एव य. कुरुते रुद्र चाम्यानमुत्तमम् ॥६
सर्वरोगविनिमुक्तो विष्णुलोक समाप्नुयात् ।
एतानोन जपेत्पश्चात् सर्वव्याधिविनाशनम् ॥७
सुदर्शन पूजा विधान ] । १६७ -- श्री रुद्र ने कहा--हे शह और गदा के धारण करने वाले भगवन् ! अब पाप कृपाकर सुदर्शन की पूजा बतल इये जिसके करने से ग्रह रोग आदि समस्त नाश को प्राप्त हो जाते हैं ।।१।। भगवान् श्री हरि ने कहा-हे वृपध्वज अब पाप सुदर्शन चक्र की पूजा जो मैं म.पको वनलाता हूँ उसका माप श्रवण करो। सवमे प्रथम स्नान करना चाहिए फिर हरि की अर्चना करे ॥२।। इसके उपरान्त मूल मन्त्र के द्वारा न्यास करना चाहिए। अब मूल मन्त्र को सुनो। पहिले प्रणव (प्रोम्) लगा कर 'सहस्रारं हु फट नग.' यह मूल मन्त्र है। यह मन्त्रो का भेदन करने वाला समस्त दुष्टो का नाश करने वाला मन्त्र बता दिया गया है ॥ ३ ॥ इसके पनन्तर परम शुभ विशुद्ध हृदय में सुदर्शन देव का ध्यान करना चाहिए । सुदर्शन का स्वरूप शङ्ख-चक्र-गदा और पद्म को धारण करने वाला किरीट धारी और सौम्य होता है ।। ४ ।। करना चाहिए । हे हर ! मण्डल मे सुदर्शन देव का प्रावाहन करके पूर्व में जो बताई विधि से है महेश्वर ! गन्ध क्षत पुष्प अादि पूजन के प्रावश्यक उपचारो के द्वारा सुदर्शन का पूजन करना चाहिए ॥ ५॥ इस तरह से पूजन करने के पश्चात् अष्टोत्तर शत मन्त्र का जाप करे। हे रुद्र ! जो इस प्रकार से सुदर्शन चक्र के उत्तम पूजन को करता है वह सब प्रकार के रोगों से विमुक्त होकर अन्त मे भगवान् विष्णु के लोक की प्राप्ति किया करता है । इसके पीछे सब व्या- धियो के विनाश करने वाले सुदर्शन के स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। ।। ६ ।। इस स्वरूप का ध्यान नम सुदर्शनायैव सहस्रादित्यवर्चसे । ज्वालमालाप्रदीप्ताय सहस्राराय चक्षुपे । सर्वदुष्टविनाशाय सर्व पातकदिने । सुचकाय विचक्राय सर्व मन्त्रविभेदिने पर प्रसवित्रे जगद्धात्रे जगद्विध्व सिने नमः । पालनार्थाय लोकाना दुष्टासुरविनाशिने ॥१० उग्राय चव सौम्याय चाण्डाय च नमो नमः । नमश्चक्षुःस्वरूपाय ससारभयभेदिने ॥११ १६५ ] [र्थ गपुराण मायापञ्जरभेने च शिवाय च न नमो नम | अहातिमहरूपाय ग्रहारणा पतये नमः ॥१२ कालाय मृत्यवे चैव भीमाय च नमो नम । भक्तानुग्रहदाने च भक्तगोप्ने नमो नमः ॥१३ विगुरूपाय शान्ताय चायुधाना धराय च । विष्णुशलाय चाय नमो भूयो नमो नम ॥१४ इति स्तोत्र महापुण्य नक्रस्य तब कीतितम् । य. पठेत्परया भक्त्या विष्णु लोक स गच्छति ।।१५ चक्रपूजाविधि यश्च पठेद्र जितेन्द्रिय. । स पाप भस्मसात्कृत्वा बिष्णुलोकाय कल्पते ॥१६ भगवान् सुदर्शन देव के लिये मेरा नमस्कार है। जो सुदर्शन भगवान सहस सूर्य के समान धस वाले हैं । ज्वानानी की माला से दीप्ति ममन्धित, सहस प्रोर चक्षु स्वरूप वाले भगवान के लिये नमस्कार है ।। ८ ।। समस्त पुष्टो के दिनाया करन वाले, तथा सम्पूर्ण पातको को मदन करने वाले, समस्त मन्यो को विशेष मे का परने वाले, विचक एवं सुचक्र के लिये हमारा नमस्कार है। इस जगत् को प्रसून करने वाले, जगत् को धारण करने वाले और जगत का विवस करन वाले भगवान मुदर्शन देव के लिये प्रणाम है । लोको को पालन करने ये हेतु भवतोसे होने वाले, और दुष्ट मसुर के विनासा करने माल मत्युग्न स्वरूप वाले तथा सौम्य स्वरूप मै युक्त और चणु रूप वाले के लिये बारम्बार नमस्कार है । ग्रहो को अभिभून करने को महरूप वाले, ग्रहो के स्वामी श्री सुदर्शन देव के लिये नमस्कार है। पक्ष के स्वरूप वाले और मयार के भय को भेदन करने वाले देर के लिये नमस्कार है ॥१०॥ ॥ ११॥ १२॥ मामा के पक्षर को भेदन करने वाले और शिव स्वरूप वाले देव यो नमस्कार है । बाल रूप, मृत्यु, भीम स्वरूप वाले के लिये बारम्बार नमस्कार है अपने भक्तो पर पा रन थाले, भक्तों की रक्षा करने वाले देव को बारम्बार नमस्कार है ॥ १३ ॥ विस्णु के सहा स्वरप वाले-परम शान्त, मायुगे वे धारण परने वाले, धिपशु के शस्त्र स्वरूप गुदर्शन पर भगवान हयग्रीव पूजा विधान ] [ १६६ को पुन: पुन: नमस्कार है ।। १४ ॥ यही सुदर्शन चक्र का महा स्तोत्र है जिसे आपके समक्ष मे बता दिया गया है । जो इसको नित्य ही परम भक्ति भाव से पढता है वह विष्णु लोक को चला जाता है ॥ १५ ॥ हे रुद्र ! जो कोई भी जितेन्द्रिय होकर चक्र की पूजा विधि में पढता है वह अपने सब पापो को भस्म करके विष्णु लोक की प्राप्ति किया करता है ॥१६॥ १२६-हयग्रीन पूजा निधान पुनर्देवार्चनं हि हृषीकेश गदाधर । शृण्वतो नास्ति तृप्तिम गदतस्तव पूजनम् ॥१ हयग्रीवस्य देवस्य पूजनं कथयामि ते । तच्छृणुष्व जगन्नाथो येन विष्णुः प्रतुप्यति १२ मूलमन्त्र महादेव ह्यग्रीवस्य वाचकम् । प्रवक्ष्यामि परं पुण्य तदादौ शृणु शङ्कर ।३ ॐ हो क्षौ शिरसे नम इति प्रणवरायुतः । प्रय नवाक्षरी मन्यः सर्व विद्याप्रदायक ॥४ अम्याङ्गानि महादेव तान् शृणुप्व वृपध्वज । कक्षा हृदयाय नम । ॐ ह्री शिरसे स्वाहायुक्त शिर: प्रोक्त क्ष वपट् तथा ! ओंकारयुक्ता देवस्य शिसा ज्ञया वृपध्वज । ॐक्ष' कवचाय हु व कवच परिकीतितम् ॥६ *क्षी नेत्रत्रयाय वौपट नेत्र देवस्य कीतितम् । ॐ ह अस्त्राय फट् अस्त्र देवस्य कत्तितम् ॥७ थी रद्र देव ने यहा--हे हषीरेश । है गदाधर | पाप पुन मिी देय अर्चन के विषय मे वालाइये । मुझे भभी श्रवण करने से पूर्ण सृप्ति नही हुई है यद्यपि मापने मुदर्शन के पूजन करने का विधान कृपा परके मुझे बनला दिया है ॥१॥ भगवान् हरि ने कहा-अब हम मापको हयग्रीव देव पूजन शे धनलाते हैं उसको पाप सुनें । इमसे जगत् के स्वामी भगव न विष्णु परम प्रमान २०० ] [ थी गरुडपुरण होते हैं ॥ २ ॥ हे महादेव ! मूल मन्त्र हो हरग्रीव या वाचक है। मैं उसे बतलाता है। यह परम पुषयमय है । हे गङ्कर ! सबसे प्रारम्भ में इसका हो प्राप श्रवण करें ।। ३ ॥ प्रणव (पोम्) से युक्त पर्थात् प्रादि में 'ॐ'यह लगा कर "ह्रौं भी शिरसे नमः नौ मशरो वाला मन्त्र है जोकि समस्त विधामो के प्रदान करने वाला है ।। ४ ।। हे महादेव ! हे वृषध्वज ! हम मन्त्र के अङ्ग बताये जाते हैं उन्हे सुनो । न्यास इस प्रकार से हैं-ॐक्षा हृदयाय नमः । ॐ ह्रीं शिरमे स्वाहा ॐक्ष शिरसे चपट ।। ५ ।। है वृपध्वज ! हय- ग्रीव देव की शिखा पोकार मे युक्त जाननी चाहिए । ॐक्ष. पवचाय हुम्- यह वाक्य कहा गया है ।॥ ६॥ क्षों ने प्रयाय वौषट -यह देव का नेत्र बताया गया है ॐ हः मस्त्राय फ्ट ---यह देव का मस्त्र कीतित किया गया पूजाविधि प्रवक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु । प्रादौस्नात्वा तथाचम्य ततो यागगृह व्रजेत् ।।८ तत. प्रविश्य विधिवद कुर्याद्व शोपणादिकम् । यक्षो रमिति बोजश्च कठिनीकृत्य लमिति । अण्डमुत्पाद्य च ततः मोकारेणंव भेदयेत् । अण्डमध्ये हयग्रीवमात्मान परिचिन्तयेत् ।।१० शवकुन्देन्दुधवल मृगालरजतप्रभम् । शव चक्र गदा पद्म धारयन्तं चतुभुजम् ॥११ किरीटिन कुण्डलिन वनमालासमन्वितम् । सुरक्त सुकपोलञ्च पीताम्बरधर विभुम् ॥१२ भावयित्वा महात्मानं सवंदे, समन्वितम् । अङ्गमन्यस्ततो न्यास मूलमन्त्रेण वै तथा ॥१३ ततश्च दर्शयेन्मुद्रा यसपद्मादिका शुभाम् । ध्यायेद् ध्यात्वाऽर्चयेदिप्णु मूलमन्त्रेण शङ्कर १४ पद में हयग्रीव पूजा का विधान बतलाना हूं उसे मुझ से श्रवण करो। सब से मादि में स्नान करे फिर पाचमन करे मोर इसके उपरान्त यागगृह ।
हयग्रीव पूजा विधान । [ २०१ जाना चाहिए। फिर वहाँ प्रवेश करके विधिके साथ शोषण प्रादि कर्म करे । य क्षीर-इन बीजो से कठिनी करण करके र इससे अण्ड का समुत्पादन करके फिर ओकार से ही भेदन करना चाहिए । उस प्रण्ड के मध्य में हयग्रीव देव का और अपनी प्रात्मा का चिन्सन करे ॥६॥ १०॥ हयग्रीव देव का स्वरूप ऐसा है जिसका कि ध्यान करना चाहिए । हयग्रोव का वणं शख- कुन्द पुष्प और चन्द्र के सदृश धवल है, मृणाल के पराग के तथा रजत के 'समान श्वेत है । शङ्ख-चक्र-गदा मोर पद्म इन पारो भ युधो के घारण करने वाले हैं-चार भुजाओ से सयुत है' ॥ ११ ॥ फिरीट मोर पुण्डलो के, पारण करने वाले हैं तथा वनमाला से भूपित वक्षस्थल वाले हैं। इनके कपोल रक्त वर्ण वाले हैं तथा पीतार्वर को पहिने हुए हैं ऐसे विभु का रूप है ॥ १२ ॥ समस्त देवगण से युक्त महान् पात्मा वाले प्रभु हयग्रीव हैं-ऐसा ही उनका ध्यान करना चाहिए। इसके पश्चात प्रशमन्त्रो तथा मूल मन्त्र के द्वारा न्यास करे ॥ १३ ॥ इसके अनन्नर शङ्ख-पम मादि शुभ मुद्रामो को दिखाकर ध्यान परे फिर है शङ्कर ! मूल मन्त्र के द्वारा विष्णु का रामचंन करना चाहिए - ततश्चावाहयेद्रद्र देवता आसनस्य याः।। ॐ हयग्रीवासनेस्य मागच्छत च देवताः ॥१५ आवाह्य मण्डले तास्तु पूजयेत्स्वस्तिकादिके । द्वारे धातुर्विधातुश्च पूजा कार्या वृपध्वज ॥१६ समस्तपरिवाराय अच्युताय नम इति अस्य मध्येचन कार्य द्वारे गङ्गाञ्च पूजयेत् ॥१७ यमुनाञ्च महादेवी शवपमनिधी तथा । गरुड पूजयेदने मध्ये शक्तिञ्च पूजयेत् ॥१८ माधाराख्या महादेव तत पूर्म समर्पयेत् । अनन्त पृथिवी पश्चाद् धर्मज्ञानी ततोऽयेत् ।। वैराग्यमथ चश्वर्यमाग्नेयादिषु पूजयेत् ॥१६ [ श्री गरुडपुराण २०२ ] अधर्माज्ञानावैराग्यानेश्वर्यादीस्तु पूर्वत. सत्व रजस्तमश्च व मध्यदेशेऽथ पूजयेत् ॥२० नन्दं नालञ्च पद्मञ्च मध्ये चैव प्रपूजयेत् । अर्कसोमाग्निसंज्ञानां मण्डलानां हि पूजनम् ॥ मध्यदेशे प्रकर्तव्यमिति रुद्र प्रकीतितम् ॥२१ इसके अनन्तर जो प्रासन के देवता हैं उनका मावाहन करना चाहिए । ॐ हयग्रीवासन के देवताओ माइये ॥ १५॥ उन सब देवगणों का मावाहन करके फिर स्वस्तिक आदि मण्डल में उन सबका पूजन करना चाहिए। हे वृप- ध्वज ! द्वार पर घाता मौर विधाता का यजन करे ।।१६॥ समस्त परिवार वाले भगवान् अच्युत् के लिये नमस्कार है-इस मथं वाले मन्त्र के द्वारा इसके मध्य मे पर्चन करे मोर द्वार पर गङ्गा का पूजन करना चाहिए ॥१७॥ महादेवी यमुना तथा शङ्ख-पत्र निधि और गरुड का पागे पूजन करे मोर मध्य में शक्ति का यजन करना चाहिए ॥ १८॥ हे महादेव ! आधाराहव्या का यजन कर फिर कूर्म का समर्चन करे। मनन्त --पृथिवी के यजन के प्रनन्तर धर्म और ज्ञान का पर्चन करना चाहिए । प्राग्नेयादि दिशामों मे वैराग्य एवं ऐश्वर्य का यजन करे ॥ १६ ।। अधर्म-प्रज्ञान-मपैराग्य और अनश्वर्य प्रादि का पूर्व मे यजन करे । इसके उपरान्त सत्त्व-रज पोर तम का मध्य देश में पूजन करना चाहिए ॥ २० ॥ नन्द-नाल प्रौर पद्म को मध्य मे प्रपूजित करे। पक-सोम और अग्नि संज्ञा वाले मण्डलो का यजन करना चाहिए। हे रुद्र! इन सबका पूजन मध्य देश मे ही करने का विधान बतलाया गया है ॥२१॥ विमलोकपिणी ज्ञाना क्रियायोगे वृषध्वज । प्रह्वी सत्या तथेशानानुग्रहाः शक्तयो ह्यमूः ॥२२ पूर्वादिपु च पत्रेषु पूज्याश्च विमलादयः। अनुग्रहा कणिकायां पूज्या श्रेयोऽथिभिर्नरैः ॥२३ प्रणवाद्य नमोऽन्तश्च चतुर्थ्यन्तश्च नामभिः । मन्यं रेतैर्महादेव प्रासनं परिपूजयेत् ॥२४ हयग्रीव पूजा विधान स्नानगन्धप्रदाऽनेन पुष्पधूपप्रदानतः । दीपनवेद्यदानेन आसनस्यार्चनं शुभम् ॥२५ कर्तव्यं विधिनाऽनेन इति हर प्रकीतितम् । ततश्चावाहयेत् देवं हयग्रीवं सुरेश्वरम् ॥२६ वामनासापुटेनैव आगच्छन्तं विचिन्तयेत् । आगच्छतः प्रयोगेण मूलमन्त्रण शङ्कर ॥२७ आवाहनं प्रकर्तव्य देवदेवस्य शङ्खिनः । अावाह्य मण्डले तस्य ग्यासं कुर्यादतन्द्रितः ।।२८ हे वृपध्वज ! विमला-त्यापिणी-ज्ञाना-क्रियायोग में प्राही- सत्या-ईशाना मोर अनुग्रहा ये शक्तियां है । पूर्वादि दिशामों में दलो में इन उपर्युक्त विमला मादि शक्तियों का पूजन करना चाहिए। जो मनुष्य अपने परम श्रेय प्राप्त करने को कामना रखते हैं उनको अनुग्रह शक्ति का पद्म की कणिका मे यजन करना चाहिए । है महादेव ! प्रणव प्रादि में मोर नम:- यह अन्त में लगाकर नामो के प्रागे चतुर्थी विभक्ति जोड़कर इन्हीं मात्री के द्वारा मास्न का पूजन करे ।। २२ ।। २३ ।। २४ ॥ स्नान-गन्ध प्रदान पर पुष्प-धूप प्रदान करे और फिर दीप तथा नैवैद्य के समर्पण के द्वारा पासन का शुभ पचन करे ॥ २५ ॥ हे हर ! इसी विधि से पूजन करे-यह सब कोतित कर दिया है । इस सबके वरने के पश्चात् फिर सुरेश्वर भगवान हय- ग्रीव देव का मावाहन करना चाहिए ॥ २६ ॥ वाम नामापुट के द्वारा ही पागमन करने वाले भगवान् का ध्यान करे । हे पाझर ! मूल मन्त्र के प्रयोग के द्वारा माते हुए पद्धयारी देवों के देव का भावाहन करमा पाहिए । भाषा- हन करके फिर पानन्दित होते हुए मण्डल में उसका ग्यास परे ।२७॥२८॥ न्यासं कृत्वा च तस्यं चिन्तयेत्परमेश्वरम् । हयग्रीय महादेव सुरामुरनमातम् ।।२९ इन्द्रादिलोकपालभ सयुत विष्णमव्ययम् । प्यारया प्रदर्शयन्मुद्राः समादियाः शुभा. ॥३० [ श्री गरुडपुराण पाद्यार्धाचमनीयानि ततो दद्याच्च विष्णवे। स्नापयेच्च ततो देवं पद्मनाभमनामयम् ॥३१ देव सस्थाप्य विधिववस्त्र दद्याद् वृपध्वज । ततो ह्याचमन दद्यादुपवीत तत. शुभम् ॥३२ ततश्च मण्डले रुद्र घ्यायेद्देन परमेश्वरम् । ध्यात्वा पाद्यादिक भूयो दद्याद्देवाय शङ्कर ॥३३ दद्याद् भैरवदेवाय मूलमन्नण शङ्कर । ॐक्षा हृदयाय नम अनेन हृदय यजेत् ॥३४ ॐक्षी शिरसे नमश्च शिरस पूजन भवेत् । ॐ धू शिखाय नमश्च शिखामनेन पूजयेद ५३५ ॐक्ष पवचाय नमः क्वच परिपूजयेत् । ॐक्षों नेयाय नमश्च नेत्रश्चानेन पूजयेत् ॥३६ ॐक्ष अस्त्राय नम इति प्रस्नधानेन पूजयेत् । हृदयश्च शिरश्च व शिवाय वच तथा ॥३७ पूर्यादिपु प्रदेशेषु यतास्तु परिपूजयेत् । पोणेप्यस्मयचंद्र नेम मध्ये प्रपूजयेत् ॥३८ यहां पर स्थित देवान्याम रमे महान् देव गुरों के स्वामी एवं मुरारों के द्वारा पति परमेश्वर हयग्रीय का ध्यान परे ।। २६ ।। भगवान हयग्रीव ए मादि लोर पानों मे सान्वित एष मापय स्वरूप पाले विष्णु ६-ऐगा प्यान पर पारि परम शुभ मुहापों को दिरामाये ॥३०॥ पिरपितुरे मिय पाप प्रप्यं और पाधीय गपित करें। हो उन माम रहिस पप नाम देव का नापन पराना पाहिए ॥४॥ प प्रा. विपि हिनदेव को सम्मान पत्र देये। Pिापमापौर कापी गति रे॥१२॥गरे प्रम में परमेशरदेश राना पाहा। यान के पा मिपे पादादिला मात करे ॥३३॥ तुर! TRATमा गये। दयाय नम ॥ में हयग्रीव पूजा विधान । [ २०५ हृदय मे यजन करे ॥ ३४ ॥ ॥ ॐक्षी शिरसे नम "--इस से शिर का जन होता है। ॐ शू शिखायै नम -इस मन्त्र के द्वारा शिक्षा का जन करे ॥ ३५ ॥"ॐक्ष कवचाय नम '-इससे कवच को पूजे । * नेत्राय नम "-इससे नेत्र का पूजन करे ॥ ३६ ।। "ॐक्ष अस्त्राय -इससे अस्त्र का यजन करे । हृदय-शिर-शिखा तथा कवच इनका व प्रादि प्रदेशो मे परिपूजन करना चाहिए । हे रुद्र | काणो मे प्रस्त्र का पौर मध्य म नेय का पूजन करे ॥३७॥३८॥ पूजयेत्परमा देवी लक्ष्मी लक्ष्मीप्रदा शुभाम् । शङ्ख पद्म तथा चक्र गदा पूर्वादितोऽर्चयेत् ॥३६ खङ्गञ्च मुशल पाशमकुश सशर धनु । पूजयेत् पूर्वतो रुद्र एभिमन्नं स्वनामकै ॥४० श्रीवत्स कौस्तुभ माला तथा पीताम्बर शुभम् । पूजयेत्पूर्वतो रुद्र शङ्खचक्रगदाधरम् ।।४१ ब्रह्माण नारद सिद्ध गुरु परगुरु तथा । गुरोश्च पादुकै तद्वत्परमस्य गुरोस्तथा ॥४२ इन्द्र सवाहन वाथ परिवारयुत तथा। अग्नि यम निमंतिञ्च वरुण वायुमेव च ॥४३ सोममीशाननागश्च ब्रह्माण परिपूजयेत् । पूर्वादि चोर्ध्वपर्यन्त पूजयेद् वृपभध्वज ।।४४ वन शक्ति तथा दण्ड खङ्ग पाश ध्वज गदाम् । त्रिशूलचक्पा च प्रायुधान्यथ पूजयेत् ॥४५ विष्वक्सेन ततो देवमैशान्या दिशि पूजयेत् । एभिमन्त्र नमोऽन्तश्च प्रणवाचं वृपध्वज ॥४६ पूजा कार्या महादेव हातन्तस्य वृपध्वज । देवस्य मूलमन्येण पूजा कार्या वृपध्वज, गन्ध पुष्प तथा धूप दीप नैवेद्यमय च ॥४७ पदमी के प्रदान परने वाली परम शुमा देवी सामी मा पूरन करे और पूर्णदि में पग, पत्र, गदा पोर पप का पवन परता पाहिए !
२०६ ] ! धो गरुहपुराण खड्ड, - ड, मुशल, पाश, मंकुश, शर सहित धनुष इनका अपने नाम वाले इन मन्त्रों से पूर्व मे पूजन करे ॥४०॥ श्रोबटर, कोस्तुभ, वनमाला, शुभ योताम्बर मोर गंख, चक्र, गदाधर का पूर्व मे पूजन करे ॥४१॥ ब्रह्मा, नारद, सिद्ध, गुरु, परगुरु, गुरु को पादुकाऐ पोर इमो भात परम गुरु को पादुकाएं. सवाहन इन्द्र जो कि अपने सम्पूर्ण परिवार में समन्वित हो, मीन, यम, निऋति, वरुण, बायु, मोम, ईशान, नाग मोर ब्रह्मा का पूजन करना चाहिए । हे वृष- ध्वज ! पूर्व प्रादि दिशा से अवं पर्यन्त पूजन करे ॥४२॥४३॥४४॥ वन, शक्ति, दण्ड, खड्ग, पश ध्वज, गदा, त्रिशून, चक्र, पद्म इन समस्त बरायुधो का वजन करना चाहिए ॥४५॥ इसके उपरान्त ऐशानी दिशा में विश्न देव का पूजन करे । है वृषध्वज ! इन मन्त्री से जिनके मादि में 'पौर अन्त में 'नम:'--इसको सयुक्त करके परे। हे महादेव ! भगवान् अनल को पूजा करनी चाहिए । देव को मूल मन्त्र के द्वारा ही पूजा करे । पूजा में गन्ध, अक्षत, पुर, घर, दीप मोर नैवेद्य समर्पित करे ।।४६/४७11 प्रदक्षिण नमस्कार जप्य तस्मै समर्पयेत् । स्तुवीत चानया स्तुत्या प्रणवाद्य वृषध्वज ॥४८ ॐ नमो हयशिरसे विद्याध्यक्षाय वे नम । नमो विद्यास्वरूपाय विद्यादाने नमो नम. ४६ नम शान्ताय देवाय त्रिगुणायात्मने नमः । सुरासुरनिहन्त्रे च सर्वदुष्टविनाशिने ॥५० सर्व लोकाधिपतये ग्रह्मरूपाय नमः । नमश्चेश्वरवन्याय शङ्खचक्रधराय च ॥५१ नम प्राधाय दान्ताय सर्वसत्त्वहिताय च । त्रिगुणायागुणायव ब्रह्मविष्णुस्वरूपिणे। का हा सुरेशाय सवंगाय नमो नम ॥५२ इत्येवं सस्तव करवा देवदेवं विचिन्तयेत। हृत्पद्म विभले रद्र शद्धचक्रगदाघरम् ॥५३ [ श्री गरुडपुरा २०८ ] . 7 . ॐ हा प्रात्मतत्त्वाय विद्यातत्त्वाय ही तथा। ॐ हूँ शिवतत्त्वाय स्वाहा हृदा स्यात् श्रोत्रवन्दनम् ।।२ भस्मस्नानं तर्पणञ्च ॐ हां यां स्वाहा सर्वमन्त्रकाः। सर्वे देवाः सर्वमुनि मोऽन्तो वौषडन्तकः ।, -स्वधान्ताः सर्वपितरः स्वधान्ताश्च पितामहाः ॥३ ॐ हां प्रपितामहेभ्यस्तथा मातामहादयः । हां नमः सर्वमातृभ्यस्ततः स्यात्प्रारणसंयमः ॥४ आचाम मार्जनचाथो गायत्रीञ्च.जपेत्ततः।। ॐ हां तन्महेशाय विद्महे वाग्विशुद्धाय धीमहि तन्नो रुद्र प्रचोदयात् ।।५ सूर्योपस्थापनं कृत्वा सुय्यमन्त्रीः प्रपूजयेत् ।। ॐ हां ही हूँ है हौं हः शिवसूर्याय नमः । ॐ हं खखोल्काय मूय्यंमूर्तये नम, । . ॐ ह्रां ह्रीं सः सूर्याय नमः । दण्डिने पिङ्गले त्वतिभूतानि नियमं स्मरेत् । अग्न्यादौ विमलेशानमाराध्य परमं सुखम् ॥६ यजेत्पद्याञ्च रां दीप्तां री सूक्ष्मा रूजयाञ्च रें। भद्राञ्चर विभूति में विमला रोपमोधिकाम् ॥७ रं विद्य ताञ्च पूर्वाद्रौ रो मध्ये रं सर्वतोमुखीम् । अर्कासन सूर्यमूत्ति ह्रां हसः सूर्यमर्च येत् ॥ श्री मूतजी ने कहा-हम मर धर्म कामादि का साधन स्वरूप भगवान् गिव का पचन यतसाते हैं। प्रथम प्रादि में मोर मन्त में स्वाहा संयुक्त करके तीन मन्त्रों से पाचमन करना चाहिए ॥१॥ ॐ हा प्रारम तत्त्वाय स्वाहा-- *ही विद्या तत्त्वाय स्वाहा-ॐ शिव तत्त्वाय स्वाहा-इन मंत्रों के द्वारा हृदय से प्रोत्र वन्दन परे ॥२।। हो पा स्वाहा-ये सभी मन्त्र है। नसे भस्म स्नान और तपंण करे। चौपट भरत में सगाकर तथा नम:-दमे संयुक्त करके समस्त देवगण, मर मुनिगण को नमस्कार करना चाहिए । मस्त पितरों शिवान विधान ] [ २०१ को स्वधा अन्त मे लगाकर तथा पितामहों को भी स्वधा अन्त मे लगाकर नम- स्कार करना चाहिए ॥३॥ ॐ हा प्रपिता महेन्य. -इम मन्त्र से तथा इसी प्रकार मातामहादिक को हा नम' इस मन्त्र से सब माताओं के लिये प्रणाम करे। इसके मनन्तर प्राणो का सयम करना चाहिए ॥४॥ प्राचमन, माजन, और इसके प्रनगर गायत्री मन्त्र का जाप करना चाहिए। वह गायत्री मन्त्र निम्नलिखित है-“ॐ हा तन्महेशाय विघ्न हे वाग्नि शुद्धाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्" यह गायत्रो का स्वरूप है ॥५॥ फिर सूर्य का उपायान करके सूर्य्य मन्त्रों के द्वारा पूजन करना चाहिए। वे मन्त्र ये हैं'ॐ हा ही हूँ हैं है गिव मूर्याय नम । ॐ ह खखोल्काय सुम्यं मूर्तये नमः । ॐ ह्रा हो सः सूर्याय नम.' । इन्ही मन्त्री के द्वारा यजन करे । दण्डी के लिये पिङ्गल मे भनि- भूत नियम का स्मरण करे । अग्नि प्रादि दिशा में परम सुरा स्वरूप विमलेशान की समाराधना करे ।।६।। फिर रा पदमा का-री दीप्ता को-रू मूधमा को- जपा को-₹ भद्रा को-रो विभूति को- ममेधिका विमला पो-7 विना को पूजित करे पोर पूर्वाद्रि मे इसका यजन करना चाहिए । मध्य में 'रो' और 'र' को सर्वनीमुषी का यजन करे। मकं का प्रासन भोर मूर्य की मूत्ति का तथा 'हा है. स.' इससे सूर्य का प्रचंन करना चाहिये ।।७।८) ॐा हृदयार्काय च शिर शिखाय व भूभुयः स्वरोम् ॥ ज्वालिनी हू कवचस्प चास्त्र राजीव दीक्षिताम् । यजेत्सूयंहृदा सर्वान्सो साम मञ्च मङ्गतम् ॥१० व वुध वृ बृहस्पति भ भार्गव श शनैश्चरम् । र राहु क यजेद पेतु ॐ तेजश्चएडमच येत् ॥११ सूर्यगम्यऱ्या चाचम्य कनिशतोऽङ्गकाम्यसेत् हा हो शिरोहू शिसा हैं वम्भ हो च नेत्रकम् । होऽस्त्र शक्तिस्थिति कृत्वा भूतशुद्धि पुनन्यसेत् ॥१२ मध्यपान तमः कृत्वा तदभिः प्रोक्षयेद् यजेत् । प्रात्मान पनसस्यच हो शिवाय तता वहि ॥१३ • [ श्री गरुडपुराण द्वारे नन्दिमहाकाली गङ्गा च यमुनाऽथ गीः । श्रीवत्स वास्त्वधिपति ब्रह्माणञ्च गरण गुरुम् ।।१४ शक्तयनन्तो यजेन्मध्ये पूर्वादो धर्मकादिकम् । अधर्माद्यञ्च वह्नयादी मध्ये पद्मस्य कणिके । वामा ज्येष्ठा च पूर्वादो रोद्री काली शिवा सिता ।।१५ 'ॐ हृदयाय च शिरः शिखाय च भूर्भुव: स्वरोम"--यह मन्त्र का स्वरूप है । ज्वालिनी हूँ :-कवच का पोर दीक्षिता राज्ञी-पस्त्र यजन करे। सूर्य हृदय से सो सोम का, म मङ्गल का, ब बुध का, वृ वृहस्पति का, भं भागव (शुक) का, या शनैश्चर का, र राहु का, क केतु का पोर ॐ तेजः इस प्रकार से सबका यजन करना चाहिए ॥१०॥११॥ इस विधि से सूर्य देव को अभ्य- चंना करके मामन परे मोर फिर कनिष्ठा से अङ्गो का न्यास करे । हा ही शिर का, हूँ शिखा का, हैं वर्म का, हौं नेत्र का, हः पत्र का न्यास करके शक्ति को स्थिति करे मोर फिर भूत शुद्धि का व्याप्त करना चाहिए ॥१२॥ इसके अनन्तर अर्घ्य का पात्र करके उसके जलो से प्रीक्षण करे तथा यजन करे । पद्प पर सस्थित बास्मा का मोर फिर बाहिर हो शिवाय इससे यजन करे । द्वार में नन्दी भोर महाकाल, गङ्गा, यमुना, सरस्वती, श्री वत्स, वास्तुका पधि- पति, ब्रह्मा, गण, गुरु, शक्ति-अनन्त इस सबका यजन करना चाहिए । मध्य में पूर्वादि दिशा मे धर्मादिका, वह्नि मादि दिशा मे पधर्म मादि का, पदम की परिणका के मध्य में वामा, ज्येष्ठा तथा पूर्वा प्रादि दिशा में काली, शिवा, सिता का पजन करे ॥१३॥१४॥१५॥ ॐ हौं कलविकरिण्यं बलविकारिणी तत: । बलप्रमथिनी सर्वभूताना दमनी ततः ।।१६ मनोन्मनी यजेदेता. पीठमध्ये शिवाग्रतः। निवासनसहामूति मूर्तिमध्ये शिवाय च ॥१७ आवाहनं स्थापनञ्च सन्निधान निरोधनम् । सकलीकरणं मुद्रादर्शन चाध्य पाद्यकम् ॥१८ प्राचामाम्यङ्गमुद्वत्तं स्नान निमंछन चरेत् । वस्त्र विलेपन पुष्पं धूप दीप चरु ददेत् ॥१६ शिवार्चन विधान ] । २११ आचामं मुखवासञ्च ताम्बूलं हस्तशोधनम् । छत्रचामरोपवीत परमीकरणं चरेत् ॥२० रूपकल्पनकैकत्वे जपो जपसमर्पणम् । स्तुति तिहदाय॑श्च शेयं नामाङ्गपूजनम् ॥२१ अग्नीश रक्षो वायव्ये मध्ये पूर्वादितन्त्रकम् । इन्द्राद्यांश्च यजेच्चण्डं तस्मै निर्माल्यमर्पयेत् ।।२२ " हौं कमविकरिण्यै"-~-दस मन्त्र से कलविकरिणी-वल विकरिणी- फिर बल प्रमथिनी मोर सर्व भूतों को दमनी तथा मनोन्मनो का यजन करे । इन सबका पीठ के मध्य मे शिव के ही मागे करे। मूति के मध्य मे शिवासन महामति का शिव के लिये भावाहन, स्थापन, मग्निधान, निरोधन, सकलीकरण, मुद्रापा का दर्शन भौर अध्यं तथा पाच करे ॥१६॥१७॥१८॥ फिर आचमन, अभ्यग, उद्वत्तंन, स्नान और निमंञ्छन करना चाहिये । इपके अनन्तर वस्त्र, विलेपन, पुष्प, धूप, दीप मोर धरु सरित करे ॥१६॥ भाचमन, मुग्नवास, ताम्यूल, हायो को शोधन, छत्र, चामर, उपवीत मोर परमोकरण करे ॥२०॥ रूप की कल्पना के एसव में जप करे तथा उस जाप को समर्पित करे । स्तुति, नमस्कार और हृदाध के द्वरा नामाङ्ग पूजन करे ॥२१॥ अग्नि, ईशान, नैऋत्य, वायव्य, पूर्व मादि तन्त्र से इन्द्रादि का यजन करे अर्थात समस्त दिक्पालों का अपनी-अपनी दिशा के अनुसार पूजन करना चाहिए । चण्ड का यजन कर उसके लिये निर्माल्य का समपरा करे ॥२२॥ गुह्यातिगुहागोप्ता त्वं गृहाणास्मस्कृत जपम् । सिद्धिर्भवतु मे देव तत्प्रसादात्त्वयि स्थिते ॥२३ यत्किश्चित् कर्म हे देव सदा दुष्कृतदुष्कृतम् । तन्मे शिवपदस्थस्य क्षय कुरु यशस्कर ॥२४ शिवो दाता शिवो भोक्ता शिवः सर्वमिद जगत् । शिवो जयति सर्वत्र यः शिवः सोऽहमेव च ।।२५ यत् कृतं यत् करिष्यामि तद् सवं सुकृत तव । त्वं त्राता विश्वनेता च नान्यो नाथोऽस्ति मे शिव ।।२६ [ धी गरुडपुगण अथान्येन प्रकारेण शिवपूजा वदाम्यहम् । गण सरस्वती नन्दी महाकालोऽथ गङ्गया ॥२७ यमुना तु वास्त्वधिपो द्वारि पूर्वादितस्त्विमै । इन्द्रायाः पूजनीयाश्च तत्त्वानि पृथिवी जलम् ।।२८ तेजो वायुयोमगन्धो रसरूले च शब्दक, । स्पर्शी वाक् पाणिपादौ च पायूपस्थ श्र तित्वची ॥२६ चक्षुजिह्वा प्राणमनोबुद्धिश्वाह प्रकृत्यपि । पुमान् रागो द्व पविद्ये कालाकाली नियत्यपि ॥३० माया च शुद्धविद्या च ईश्वरश्च सदाशिव । शक्ति शिवश्च तान् ज्ञात्वा मुक्तो ज्ञानी शिवो भवेत् ॥३१ य शिव स हरिखमा सोऽह ब्रह्मास्मि मुक्तित ॥३२ इसके अनन्तर प्रार्थना करे, पाप गुहातिगुह्य के रक्षा करने वाले हैं । पाप मेरे द्वरंग किये हुए जाप को अङ्गीकार करें। हे देव ! आपके यहाँ सस्थित होने पर भापके प्रसाद में मुझे सिटि हो जाये ॥२३॥ हे देव । जी भी दुष्कृत से भी/दुकृम सदा मैंने किया है, हे यशस्कर । उस मेरे सबको क्षीण कर दीजिये क्योकि इम समय में मैं पापो चरणो की शरण मे स्थित है ॥२४॥ भगवान शिव दाता है, शिव ही सबका भोग करने वाले हैं, यह सम्पूर्ण जगत् भी शिव काही स्वरूप है शिव की सबंश जय होती है, जो शिव है वही में हूँ ॥२५।। जो कुछ मैंने दिया और जो कुछ भी भविष्य में करूंगा वह सभी मापका हो सुकृत है। माप होवारण करने वाले हैं और इस विश्व के नायक है। हे शिव! मेरा अन्य कोई नाथ नहीं है ॥२६|| इसके मनन्तर अब अन्य प्रकार से शिव की पूजा को बतलाते हैं। गण सरस्वती, नन्दी, महाकाल, पङ्गा, यमुना, वास्त्वधिप इन सवका द्वार पर पूर्वामि दिशा के क्रम से यजन करे । इन्द्र प्रादि का भी पूजन करना चाहिए । त्यो को बतलाते हैं -पृथ्वी, जल, तेज, वायु, योम, गन्ध, रस, रूप, गा, स्पो, बस पारिस, पार, वायु, उसस्य, श्रुति, वक, पशु, जिला, प्राण, मन, बुद्धि, महवार, प्रकृति ये चौवीस सत्त्व हैं। पुम न्, रागद्वेष, विद्या, कालीकाल, निति, माया, शुद्ध विद्या, शवार्चन विधाने ] [[ २१३ । ईश्वर, सदाशिव, शक्ति पीर शिव उनको जानकर मुक्तं ज्ञानी शिव होता है । जो शिव है वही हरि और ब्रह्मा है । मुक्ति के प्राप्त होने से यह मैं भी ब्रह्म हूं ॥२७ से ३२॥ भूतशुद्धि प्रवक्ष्यामि यया शुद्ध. शिवो भवेत् । हृत्पद्म सद्यो मन्त्रः स्यानिवृत्तिश्च कला इड़ा ।।३३ पिङ्गला द्वे च नॉडयो च प्राणोऽपानश्च मारुतो। इन्द्रदेहो ब्रह्मदेहश्चतुरस्रञ्च मण्डलम् ॥३४ वज्रण लाञ्छित दीप्तमेकोद्घातगुणाः शराः । हृत्स्थानसातूणहनें शतकोष्ठप्रविस्तरम् ॥३५ ॐ ह्री प्रतिष्ठाय हु हः फट् ॐ ह्र विद्याय ह हः फट । चतुरशीतिकोटीनामुच्छ्रयं भूमितन्त्रकम् । तन्मध्ये भववृक्षञ्च आत्मानञ्च विचिन्तयेत् ।।३६ अब मैं भूतशुद्धि को बतलाता हूँ जिसके द्वारा शुद्ध होकर शिव हो जाता है । हृदय कमल, सद्योमन्न निवृत्ति होती है। कलाइडा और पिङ्गला ये दो नाही है, प्राण और पान दो मारुत हैं, इन्द्र देह और ब्रह्म देह यह चतुरस्त्र मण्डल हैं ॥३३॥३४॥ वज से लाञ्छित और दीप्त है, एकोहरात गुण वाले मार हैं, हुस्थान सातूणहन शतकोष्ठ विस्तार वाला है ॥३५॥ "ॐ ह्री प्रति- छाय हुं हः फट् ॐ ह्र विधार्य ह हः फट"-यह मन्त्र का स्वरूप है । चौरासी करोडो का उच्छ्रय भूमि तन्त्र है । उसके मध्य में इस ससार के वृक्ष को और अपने भापको चिन्तन करे अर्थात् ध्यान करना चाहिए ॥३६॥ अधोमुखी तत पृथ्वी तत्तत् शुद्ध भवेद् ध्रुवम् । वामादेवी प्रतिष्ठा च सुपुम्ना धारिका तथा ।।३७ समानोदानवरुणो देवता विष्णुकारणम् । उद्घाताश्च गुणं वेदाः श्वेता ध्यानं तथैव च ॥३' एव कुर्यात्कण्ठपद्ममर्द्ध चन्द्राख्यमण्डलम् । पद्मावत द्विशतक कोटिविस्तीर्णवान्स्मरेत् ॥३६ [ श्री गरुडपुराण २१४ ] चतुर्नवत्युच्छयञ्च प्रात्मानञ्च ह्यधोमुखम् । तासु स्थानञ्च पाञ्च अघोरो विद्ययान्वितः ॥४० इसके अनन्तर इस पृथ्वी को नीचे की ओर मुख बाली देखे तो वह सभी शुद्ध हो जाता है । वामा देवी-प्रतिष्टा, सुपुम्ना तथा धारिका, समानोदान मोर वरुण दो देवता हैं, विष्णु कारण, उद्धाता मोर गुण है तथा वेद श्वेत है-इसी प्रकार का ध्यान करना चाहिए ॥३७॥३८॥ इस प्रकार से कराठ पर को अर्घ चन्द्रारूप मण्डल ध्यान करे । पद्म से मङ्कित दो सौ करोड विस्तार वाला स्मरण करे ।। ३६ ॥ चौरानवे उच्छ्रय वाली और नीचे की ओर मुख वाली मात्मा को ध्यान में करे। उनमें स्थान पौर पदम है तथा विद्या से समन्वित मघोर है ॥४॥ नाम्योष्ठया हस्तिजिह्वा ध्यानो नागोऽग्निदेवता। रुद्रहेतुविरुद्धातास्त्रिगुणा रक्तवरणकम् ।।४१ ज्वालाकृते त्रिकोणञ्च चतुःकोटिशतानि च । विस्तीर्णञ्चसमुत्सेध रुद्रतत्व विचिन्तयेत् ।।४२ ललाटे तु तत्पुरुष शक्तिर्यः शावलं बुधाः । कूर्मञ्च ककरो वायुर्देव ईश्वरकारणम् ।।४३ द्विरुद्धातगुणो द्वौ च वृपं पट्कोणमण्डलम् । विन्द्वतिञ्चाष्टकोटिविस्तीर्णञ्चोच्छ्यस्तथा । चतुर्दशाधिक वोटि वायुतत्त्वं विचिन्तयेत् ।।४४ द्वादशान्ते सरसिजे शान्त्यतीतास्तथेश्वराः । कुहुश्च शङ्खिनी नाड्यो देवदत्तो धनञ्जयः ॥४५ शिखेशानकारणञ्च सदाशिव इति स्मृतः । गुणे एकस्तयोद्धातं शुद्धस्फटिकवत् स्मरेत् ॥४६ पोडश कोटिविस्तीर्ण पञ्चविंशति चोच्छ्रयम् । वतुलं चिन्तयेद्धाम भूतशुद्धिरुदाहृता ।।४७ गणगुरुबीजगुरुः शक्तयनन्तौ च धमक. । ज्ञानवैराग्यमैश्वर्यस्ततः पूर्वादिपत्रके ॥४८ शिवाचन विधान ] । २१५ अघोद्ध वदने द्वे च पद्मकरिणककेशरम् । वामाद्या आत्मविद्या च सदा ध्यायेत् शिवाख्यकम् । तत्त्वं शिवासने मूतिहाँ हौं विद्यादेहाय नमः ।।४६ नाभि पोष्ठ से युक्त हस्ति जिह्वा, ध्यान, नाग, अग्नि देवता, रुद्रहेतु, तीन उखाता, तीन गुण, रक्त वणं, ज्वालाकृत में त्रिकोण और चार सौ करोड विस्तार वाना समुत्सेध है-ऐसा रद्र तत्त्व है यह ध्यान करे।।४११४२। ललाट मे तत्पुरुप शक्ति है जो बुधों के द्वारा शाब्दल कही जाती है। कूर्म और कुकर नाम वाली वायु है तथा ईश्वर कारण देव है ॥४३॥ दो उद्धात गुण हैं और दो वृप हैं, पटकोण वाला मण्डल है। विन्दु से पङ्कित पाठ करोड़ विस्तार से युक्त उच्छय है। इस प्रकार से चौदह करोड मधिक वायु तत्त्व का विचिन्तन करना चाहिए ॥४४॥ द्वादशान्त कमल में शान्ति से भी प्रतीत ईश्वर हैं । कुहू मोर शनिी ना हयां हैं। देवदत्त और धनञ्जय नाम वाले वायु है । शिखेशान कारण सदा शिव कहे गये हैं। गुण मे एक उद्धात शुद्ध स्फटिक मणि के समान उनका स्मरण करना चाहिए ॥४५॥४६॥ सोलह करोड़ विस्तार से युक्त, पच्चीस उच्छय वाला मोर वनाकार वह धाम है-ऐगा ध्यान करना चाहिए । यह भूत शुद्धि बतला दी गई है ॥४७॥ गण गुरु, बीज पाक्ति अनन्त, धर्म, शान, वैराग्य, ऐश्वर्यों के सहित पूर्वादि पत्रो में दो मधोवदन मोर कार्यवदन, पद्म, कणिका, केशर, वामा मादि मोर पात्मविद्या यह सब शिव नाम वाले हैं इनका सदा ध्यान करना चाहिए। शिवामन पर तत्व मूत्ति है। उसका "हों हौं विद्यादेहाय नमः"-यह मनन का स्वरूप है ॥४८॥४॥ बद्धपद्मासनासीनः सितः पोडशवर्षकः । पञ्चवक्षः करा: स्वदेशभिश्चैव धारयन् ।।५० अभयप्रसादशक्ति शूलं खट्वाङ्गमीप्यरः। दक्ष: करमिकश्च भुजगञ्चाक्षसूत्रकम् । डमरुक नीलोत्पलं वीजपूरकमुत्तमम् ॥५१ इच्छाज्ञाननियाशक्तिस्थिनेनो हि सदाशिवः । एवं शियाचनध्यानी सर्वदा कालवजितः ॥५२ [ श्री गरुडपुराण इहाहोराविचारेण पाणि-चणि जीवति । दिनद्वयस्य चारेण जीवेद्वपद्वय नर ॥५३ दिनयस्य चारेण वर्षमेक स जीवति। नाकाले शीतले मृत्युरुप्णे चैव तु कारके ॥५४ सदाशिव भगवान का स्वरूप इस प्रकार का है। पद्मासन बांधकर बैठे हुए है, सित वणं है मौर सोलह वप की मायु है । पाँच मुख हैं, अपने दश रो के मन भागो म विभिन्न प्रायुधो को धारण किये हुए हैं ॥५०॥ दाहिने भाग के हाथों मे अभय दान-प्रसाद-~-शक्ति-शूल और खड्वाङ्ग ईश्वर ने धारण कर ससे हैं। तथा वाम भाग के करो मे भुजग-प्रक्षसून-डमरू-- नीलोत्पल और बत्तम बीज पूरक धारण करने वाले हैं ॥५१॥ भगवान् सदा. शिव इच्छा, ज्ञान और क्रिया को शक्ति से सम्पन्न है तथा तीन नेत्रो से युक्त है। इन प्रकार से शिव को अर्चना और उनका ध्यान करने वाला पुरुष सर्वदा हो. काल से वजित रहता है ॥५२॥ यहाँ अहोराम के चार से मनुष्य तीन व पयन जीवित रहता है। दो दिन के चार से दो वप पोर तीन दिन के चार से एक वष जीवित रहता है । अकाल-शीतल मौर उप्पकाल में मृत्यु नही होती है ।। ५३॥५४ ॥ १२६-शिवजी की पवित्रारोहण विधि पवित्रारोहण वध्ये शिवस्याशिवनाशनम् । आचार्य साधक कुात्पुनक समयो हर ॥१ सवत्सरकृता पूजा विघ्नेशो हरतेऽन्यया । पापाढे श्रावण माघे कुर्याद्भाद्रपदेऽपि वा ।।२ सौवरणरोप्यताम्रश्च सून कासिक प्रमाद । ज्ञम कृतादौ सगृह्य कन्यया कत्तितञ्च यत् ॥३ निगुरण निगुणीकृत्य तत कुर्यात्पविनकम् । ग्रन्थयो वामदेवेन सत्येन क्षालयेच्छिा ॥४ अघोरेण तु सयोध्य वद्धस्तत्पुरुषाद्भवेत् ।, धूपयेदीशमन्दरण तन्तुदेवा इति स्मृता. ॥५ । 1 शिवजी का पवित्रारोहण विधि ] [ २१० ओंकारश्चन्द्रमा वह्निर्बह्मा नाग शिखिध्वज. । रविविष्णु शिव. प्रोक्तः क्रमात्तन्तुपु देवताः ॥६ अष्टोत्तरशत कुर्य्यालञ्चाशत्पञ्चविंशतिम् । रुद्रोऽहन्तमादि विज्ञय मानञ्च ग्रन्थयो दश ॥७ श्री हरि ने कहा--प्रब पवित्रारोहण के विषय में बतलाते हैं जोकि शव के प्राशिव (अमङ्गल) को नाश करने वाला है। हे हर ! साधना करने पाला पाचाय्य को करना चाहिए। ममय पर पुत्र को करना चाहिए ॥१॥ अन्यथा विघ्नो के ईश सवत्सर मे को हुई पूजा का हरण कर लिया करते हैं । प्राषाढ-श्रावण-माघ अथवा भाद्रपद मारा में यह कर्म करना चाहिए ॥ २ ॥ सुवर्ण से निर्मित, चाँदी का बनाया हुआ, ताम्र से विरनित सूत्र हो या क्रम से कपात के द्वारा इसका निर्माण कराया जावे । कृतादि में सग्रह करके रक्खे पौर यह किसी कन्या के द्वारा काता हुमा होना चाहिए ॥ ३॥ पहिले इस सूत्र को तीन गुना करे और फिर उसे विगुणित करके पविया की रचना करनी चाहिए । वामदेव मन्त्र से उसकी ग्रन्थियां लगावे तथा सत्य के द्वारा है शिव ! उसका क्षालन करे ॥ ४ ॥ अघोर मन्ध से इसका सशोधन करके तत्पुरुप से बद्ध करे । ईश मन्त्र से इसको धूप देवे। ये तन्तु देव कहे गये है ॥ ५ ॥ इन तन्तुओ के प्रोकार-चन्द्रमा-वह्नि-ब्रह्मा-नाग-शिखिध्वज- रवि-विष्ण-शिव ये क्रम से देवता होते हैं ।। ६॥ अष्टोतर शत-पचास या पच्चीस बनावे । मैं रुद्र हूँ, उसको मादि जाने तथा उसका मान भी जानना चाहिए, अन्थियो दश होती हैं ॥७॥ चतुरगुलान्तरालाः स्युन्थिनामानि च क्रमात् । प्रकृतिः पौरुषी वीरा चतुर्थी चापराजिता ॥८ जया च विजया रुद्रा अजिता च सदाशिव । मनोन्मनी सवमुखो द्वयं गुलागुलतोऽथवा IME रञ्जयेत् कु कुमाद्यस्तु कुर्याद्गन्धः पवित्रकम् । सप्तम्यां वा त्रयोदश्या शुक्लपक्षे तथेतरे ।।१० 1 श्री गरुडपुराण क्षीरादिभिश्च सस्नाप्य लिङ्ग गन्धादिभिर्यजेत् । दद्याद्गन्धपविनन्तु प्रात्मने ब्रहारणे हर ॥११ पुष्प गन्धयुत्त दद्यान्मूलेनेशानगोचरे । पूर्वे च दएडकाष्ठन्तु उत्तरे चामलकोफलम् ॥१२ मृत्तिका पश्चिमे दद्याद्दक्षिण भस्मभूतयः । नम ते ह्यगुरु दयाच्छिखामन्त्रणा मन्त्रविद ।। वायव्या सर्पप दद्यात्कवचेन वृपध्वज ॥१३ गृह सवैप्ट्य सूत्रण दद्याद्गन्धपवित्रकम् । होम कृत्वाऽनये दत्त्वा दयाभूतलि तथा ॥१४ इन प्रन्थियो मे चार अगुल का मन्तर रहना चाहिए क्रम से प्रयियों के नाम पे होते हैं-प्रकृति-पौरुपी-वीरा-चौथी अपराजिता-जया विजया-- रद्रा मोर भजिता, हे सदा शिव ! मनोमनी और सर्वमुखी हैं। अथवा दो दो मंगुल से इनकी रचना करे ।। ८ ।। ६ ।। इन ग्रन्थियो को कु कुम भादि के द्वारा रञ्जिन करे तथा गन्ध से पवित्र करे। सप्तमी प्रश्वा नयोदशी तिथि में, शुक्ल पक्ष में तथा अन्य पक्ष म इनको रचना करे ॥ १० ॥ हे हर । लिङ्ग का दूध प्रादि से सस्नपन कराके फिर गन्धाक्षतादि से यजन करना चाहिए । मारमा और ब्रह्म के लिय गन्ध पवित्र को देवे ॥ ११ ॥ ईशान दिशा में गन्ध में युक्त पुप्प मूल मन्त्र से समपिम करे। पूर्व दिशा म ण्ड काठ देवे और उत्तर मे प्रावले के फल को मर्पित करना चाहिए ।। १२ ।। पश्चिम दिशा में मृत्तिका देवे और दक्षिण में भस्म को भूति देवे । नत्य कोण मे मगुरु देवे। ह वृष- ध्वजा मन्यो के वेता को मिला मन्त्र के द्वारा वायव्य कोण मे सर्पय (सरसो) देवे और कवच के द्वारा अर्पण करे ।। १३ ।। सूत्र से गृह को सवेष्टित करके गन्ध पवित्रा को प्रर्पण करे। फिर होम करे और मग्नि को देकर भूत बलि देशी पहिए ॥१४॥ आमन्त्रितोऽसि देवेश गणं सार्द्ध महेश्वर ! प्रातस्त्वा पूजयिष्यामि म सन्निहितो भव ॥१५
शवजी का पवित्रारोहण विधि ]
. २१९
निमन्त्रयानेन तिष्ठेत्तु कुर्वन्गीतादिक निशि।
मन्त्रितानि पवित्राणि स्थापयेद्दवपार्श्वत. ॥१६
स्नात्वादित्य चतुर्दश्या प्रारुद्रञ्च प्रपूजयेत् ।
ललाटस्थ विश्वरूप ध्यात्वात्मानं प्रपूजयेत् ।।१७
अस्त्रेण प्रोक्षितान्येव हृदयेनाचितान्यथ ।
सहितामन्त्रितान्येव धूपितानि समर्पयेत् ॥१८
शिवतत्त्वात्मक चादी विद्यातत्त्वात्मक ततः ।
अात्मतत्त्वात्मक पश्चाईवकाख्य ततोऽर्चयेत् ।।
ॐ हो शिवतत्त्वाय नम । ॐ ही विद्यातत्त्वाय नमः ।
ॐ हा भात्मतत्त्वाय नमः ।।१६
ॐ हा ही हूँ क्षौं सर्वतत्त्वाय नमः ।
ॐ कालात्मना त्या देव यद् दृष्ट माम विधौ ।।
कृत क्लिष्ट समुत्सृष्ट हुत गुप्तञ्च यत्कृतम् ।
सर्वात्मनात्मना शम्भो पवित्रण त्वदिच्छया ।।
पूरय पूरय मखवत तनियमेश्वराय सर्वतत्त्वात्मकाय
सर्वकारणपालिताय ॐ हा ही हूँ हैं हो शिवाय नम ॥२०
पूर्वैरनेन यो दद्यात्पवित्राणा चतुष्टयम् ।
दत्त्वा वह्न पवित्रञ्च गुरवे दक्षिणा दिशेद ॥
बलि दत्त्वा द्विजान्भोज्य चएड प्राच्यं विसर्जयेत् ॥२१
इसके उपरान्त यह प्रार्थना करे-हे देवो के ईश ! हे महेश्वर ! माप
का अपने गणों के माप मामन्त्रण किया जाता है मैं मापका कल प्रात काल के
रामय में पूजन कहेगा सो पाप यहाँ पर ही सग्निहित होकर विराजमान होवें
।। १५ ।। इस मांति इससे निमन्त्रण देकर राशि में गीत-गान मादि करते हुए
स्थित रहे। पवित्रामो को प्रभिमन्त्रित करके देव के समीप मे ही स्थापित
फरना चाहिए ।। १६ ।। स्नान करके प्रादिस्य पा मोर चतुर्दशी में प्रथम रुद्र
या पूजन करना चाहिए । ललाट में सस्थित विश्व रूप का ध्यान करके मारमा
का यजन परे ।। १७ ।। मन मन्त्र मे प्रोदाण किये हुए, हृदय मन्त्र से पचित,
२२० ] [ श्री गरुडपुराण सहिता से मन्वितों को धूपित करके फिर समर्पित करे ।। १८॥ आदि में शिव तत्त्वात्मक की, फिर विद्या तत्त्वस्वरूप की और पीछे प्रात्म तत्त्वात्मक को मौर इसके अनन्तर देव कारब्य की अर्चना करनी चाहिए । इसके मन्य ये हैं-- “ॐ ही शिव तत्त्वाय नमः, ॐ ही विद्यातत्त्वाय नमः, ॐ हां प्रास्मतत्त्वाय नमः ॥१६॥ॐ हा ही है दो सर्वतत्त्वाय नमः मोम् काल स्वरूप आपने हे देव ! मेरे द्वारा सम्पन्न विधि-विधान में जो भी कुछ देखा है। मैंने जो क्लिष्ट किया है या उत्सृष्ट कर दिया है, होम किया है और जो किया हुआ गुस रह गया है, हे शम्भो ! सबकी पात्मा, मात्मा से पवित्र के द्वारा प्रापकी इच्छा से इसे पूर्ण कर देवें । यह मन्त्र कहे-" ॐ पूरय-पूरय मख प्रत तनिय- मेश्वराय सर्वतत्त्वात्मकाय सर्व कारण पालिताय ॐ हा ही हूँ है हौं शिवाय । पूर्षों के द्वारा इस मन्त्र से जो चार पवित्रामों को समर्पित करता है मोर वह्नि को पविना देकर फिर गुरु चरण की सेवा में दक्षिणा अर्पित करे । फिर बलि देकर द्विजो को भोजन करावे मौर चण्ड का समर्चन करके विसर्जन कर देवे ॥२०॥२॥ " नमः १३०-विष्णु भगवान् का पवित्रारोहण पवित्रारोपणं वक्ष्ये भुक्तिमुक्तिप्रदं हरेः । पुरा देवासुरे युद्धं ब्रह्माद्याः शरण ययुः ।। विष्णुश्च तेपा देवाना ध्वज वेयक ददौ ॥१ एतौ दृष्ट वा विलवन्ति दानवानववीद्धरिः। विष्णूते हबबीनागो वामुकेरनुजस्तदा ॥२ वृणीत च पवित्राख्यं वरञ्चेदं वृपध्वज । ग्रे वेयं हरिदत्त तु तन्नाम्ना ख्यातिमेष्यति ।। इत्युक्त तेन देवास्तान्नाम्ना न तद्वरं ददौ ॥३ प्रावृट्काले तु ये मा नाचिध्यन्ति पवित्रकः। तेपा सात्वमरी पूजा विफला च भविष्यति । तस्मात् सर्वेषु देवेषु पवित्रारोहणं क्रमात् ॥४ विष्णु भगवान् का पवित्रारोहण ] [ २२१ प्रतिपत्पौर्णमास्यान्ता यस्य या तिथिरुच्यते। द्वादश्यां विष्णवे कार्य शुक्ले कृष्णेऽथवा हर ॥५ व्यतीपातेऽयने चैव चन्द्रसूर्यग्रहे शिव । विष्णवे वृद्धिकार्ये च गुरोरागमने तथा । नित्य पवित्रमुद्दिष्टं प्रावृट्काले त्ववश्यकम् ॥६ कोपेयं पट्टसूत्र वा कार्यास क्षोममेव वा । कुशसूत्र द्विजानां स्याद्राज्ञां कौपेयपट्टकम् ॥७ वैश्यानाभौर्णकं क्षोम शूद्राणा नववल्कजम् । कापस पद्मज-चैव सर्वेषां शस्तमीश्वर ॥ श्री हरि ने कहा-प्रय हरि का भुक्ति और मुक्ति का प्रदान करने घाला पवित्रारोहण का वर्णन करते हैं । पहिले देवासुर संग्राम मे जिस समय युद्ध हो रहा था घबडा कर ब्रह्मा प्रादि समस्त देवगण शरण में गये थे। भगवान् विष्णु ने उन देवगणो को ध्वज और वेयक प्रदान किया था ॥१।। इन दोनो को देख कर बिलवन करते हुए दानवो से हरि ने कहा। विष्णु के कहने पर वासुकि का अनुज (छोटा भाई) नाग उस समय में बोला था ॥२॥ हे वृपध्वज ! यह पवित्रा नाम वाला घर वृणीत कोजिए । हरि के द्वारा प्रदान किया हुमा नवेय लोक में उसके नाम से प्रसिद्धि को प्राप्त करेगा। उसके द्वारा यह कहने पर उन देवो को नाम से वह घरदान दिया था ॥ ३ ॥ वर्षा ऋतु मे जो मनुष्य पवित्रामो के द्वारा अर्चन नहीं पार गे उन भनुप्यो को सावत्सरी (वार्षिक) पूजा विफल हो जायगी । इमलिये समस्त देवो में क्रम से पवित्रा रोहण करना परम पावश्यक है ॥ ४॥ प्रतिपदा से लेकर पोगमासी तिथि तक जिसको भी जो विधि कही जाती है । शुक्ल पक्ष अथवा पृषण पक्ष मे हे हर ! द्वादशी तिथि मे भगवान् विष्णु के लिये यह पवित्रारोहण करना चाहिए ॥ ५॥ हे शिव ! अतीपात-प्रपन चन्द्रमा-सूयं के ग्रहण के पवसर पर--वृद्धि के कार्य के समय पर तथा गुरु के मागमन पर भगवान विष्णु के लिये प्रावृट फाल में पवित्रारोहण नित्य ही मावश्यक रूप से होना चाहिए । ॥ ६॥ पवित्राओ के निर्माण करने के लिये कोपेय, पट्ट मूत्र, कपास का मूत्र
२२२ ।
[ घी गरुडपुराए
या क्षौम मूत्र होना चाहिए । द्विजो को पुश सूत्र होना चाहिए पोर राजा
को यौधेय या पट्ट मूत्र होता है ।। ७ ॥श्य वणं पाले मनुष्यों के लिये अन्
का सूप क्षोम मोर मूदों के लिये नवोन वल्कल में होने वाला होना चाहिए ।
हे ईश्वर ! कपाम से रचित भौर पचन सूत्र सभी के लिये प्रशस्त कहा गया
है।
ब्राह्मण्या कत्तितं सूत्रं त्रिगुणं भिगुरणीकृतम् ।
श्रोंकारोऽथ शिवः सोमो ह्यग्निब्रह्मा फरणी रवि: 16
विघ्नेशो विष्णुरित्येते स्थितास्तन्तुपु देवताः ।
ब्रह्मा विष्णुश्व रुद्रश्च मिसूत्रे देवताः स्मृताः ॥१०
सोवणे राजते तन्त्र वणवे मृण्मये न्यसेत् ।
अंगुष्ठन चतुःपष्टिः श्रेष् मध्य तदद्धतः ॥११
तदर्धा तु कनिहा स्यात् सूत्रमष्टोत्तरं शतम् ।
उत्तमं मध्यमञ्च व कन्यस पूर्ववत् क्रमाव ॥१२
उत्तमोऽ गुष्ठमानेन मध्यमो मध्यमेन तु ।
कन्यसे च कनिष्ठेन अगुल्या ग्रन्थयः स्मृताः।।
विमाने स्थण्डिले चैव एतत्सामान्यलक्षणम् ॥१३
शिवोद त पवित्रन्तु प्रतिमायाञ्च कारयेत् ।
हनाभिरूरुमानेन जानुभ्यामवलम्विनी ६१४
अष्टोत्तरसहस्रेण चत्वारो ग्रन्थय. स्मृताः ।
पत्रिंशच चतुर्विंश द्वादश ग्रन्थयोऽथवा ॥१५
उत्तमादिपु विज्ञयाः पर्वभिर्वा पवित्रकम् ।
चचित कु कुमेनैव हरिद्राचन्दनेन वा ॥१६
ब्राह्मणी के द्वारा बात कर तैयार किया हुमा सूत्र तिगुना हो और
फिर उसे त्रिगुणित करे । भोकार--शिव-सोम-अग्नि प्रह्मा-फणी-रवि-
विमलेश और विष्णु ये इतने सब उन पवित्रा के तन्तुप्पो मे देवता होले हैं।
ब्रह्मा, विष्णु मौर.रुद्र ये त्रिसूत्र मे देवता बताये गये हैं ॥ ६ ॥ १० ॥ सौवर्णा
( सुवर्ण से रचित ), राजत ( चांदी से निर्मित ) वैणय ( वेणु अर्यात बांस से
-
विष्णु भगवान का पवित्रारोहण ] [ २२३ निर्मित ) पोर 7एमय तन्त्र में ग्यास करे । अंगूठे से चौसठ सबसे श्रेष्ठ होना है। इममे प्राधा परिमाण बाला मध्यम श्रेणी का होता है ॥ ११ ॥ इससे भी प्राधे परिमाण वाला सबसे कनिष्ठ घेणो का होता है । अष्टोत्तर शत मूत्र उत्तम, प्रध्यम पोर कनिष्ठ पूर्व की भांति क्रम से हुप्रा करता है ।। १२ ।। प्र गुष्ठ के मान से जो बनाया जाता है वह उत्तम होता है, मध्यमा के द्वारा मध्यम और फनिष्ठा अ गुलि से जो किया जाता है वह कनिष्ट होता है, इस प्रकार से इसकी अन्यिमा कही गई हैं। विमान में और स्थण्डिल में करे—यही इनका साधारण लक्षण होता है ।। १३ । शियोद्धृत पवित्रा को तो प्रतिमा मे हो करावे । हृदय, नाभि मोर करुनी के परिमाण से जानुभो तक लटकने वाली पवित्रा होनी चाहिए । अष्टोतर सहस से चार ग्रन्थियां बताई गई हैं। अथवा छत्तीस, चौबीस और बारह ग्रन्थियां होती हैं ॥ १४ ॥ १५ ॥ अथवा पर्षों से पमित्रा उत्तम मध्यम प्रौर कनिष्ठ समझ लेने पाहिए । इनका पूजन कुंकुम से अथवा चन्दन के द्वारा करना चाहिए ॥१६॥ सोपवास पवित्रन्तु पामस्थमधिवासयेत् । प्रश्वत्यपत्रपुटके अष्टदिक्षु निवेशितम् ॥१७ दण्डकाष्ठं कुशाग्नञ्च पूर्वे सङ्कपणेन तु । रोचनाकुकुमेनैव प्रद्य म्नेन तु दक्षिणे ॥१८ युद्धार्थी भल सिद्धयर्थमनिरुद्ध न पश्चिमे । चन्दन नीलयुक्तञ्च तिलभस्माक्षत तथा ।। प्राग्नेयादिपु कोरणेपु श्रियादीना क्रमान्यसेत् ॥१६ उपवास पूर्वक पवित्रा को एक पात्र में सस्थित करके उमका अधिवाम परना पाहिए । प्रश्वस्य (पोपल) के पत्रो के पुटक (दोना) में प्राठ दिशाम्रो में उसे निवेशित करे ।। १७ ॥ पूर्व दिशा में मपंगा के द्वारा दण्ड पाठ मोर पुमा के अग्र भाग का दक्षिण दिशा में रोचना फुकुम रोही प्रद्युम्न से- पशिन दिसा में जो युट करने वाला हो मोर फन की मिदिलिये परे- चन्दन, नील में युक्त, निल तथा भस्मासत को प्राग्नेयादि कोणो में दिया. पा दम से न्यास करना चाहिए ।।१६॥ A २२४ ] । श्री गरुड़ा १३१-रक्त पित्त रोग का निदान अथातो रक्तपित्तस्य निदानं प्रवदाम्यहम् । भृशोष्ण तिक्तकट्वम्ललवणादिविदाहिभिः ॥१ कोद्रवोद्दालकश्चान्य स्तदुक्तं रतिसेवितः । कुपितं पैत्तिकः पित्त द्रवं रक्तञ्च मूर्च्छति ।।२ तमिथस्तुल्यरूपत्वमागम्य व्याप्नुवंस्तनुम् । पित्तरक्तस्य विकृतेः ससईद्द पणादपि ॥३ गन्धवर्णानुवृत्तेपु रक्तन व्यपदिश्यते । प्रभवत्यसृजः स्थानात्प्लीहतो यकृतश्च तद् ॥४ शिरीगुरुत्वमरुचिः शीतेच्छा धूमकोऽम्लकः । छद्धितश्छविभत्स्य कासः श्वासो भ्रम, क्लमः ॥५ लोहितो न हितो मत्स्यगन्धास्यत्वञ्च विवरे । रक्तारिद्रहरितवर्णता नयनादिषु॥६ नीललोहितपीतानां वर्णानामविवेचनम् । स्वप्ने उन्मादमित्वं भवत्यस्मिन्भविष्यति ॥७ भगवान धन्वन्तरि ने कहा-प्रब रक्तपित्त नाम वाले रोग का निभान बतलाते हैं। यह रोग मस्यन्त उपण, ति, पद्ध. अम्त ( खट्टा) मोर लवरण पादि विदाही पदार्थों के तथा कोद्रय, सहारमक और अन्य इसी प्रकार के बहे हुए पदार्थों के प्रत्यधिक सेवन करने से और पित्त मयुन पदार्थों में पिस बुषित हो जाता है तथा यह दव पित्त और रक्त को मूदित कर देता है ॥ ॥ २ ॥ ये सब आपम मे तुल्य स्वच्पना को प्राप्त होरर गरीर में ताप्त होते हुए विकृत रूप में पित्तरक्त में तया सम्र्ग दूषण से गन्य और पर्ण में पनुवृत होने पर रक्त के नाम से ही उमा थपदेश दिया जाता है। वह मरज क स्थान मेल्ली और पहा में उत्सम होता है॥३॥४॥इम होने से भर में भारापन-निगम होना-गोन की याधुमर, मम्मा- यभर-~-पानी-~याम-ग-म-महिमाम्य गन्य नंगा भुग ।
रक्तपिन रोग का निदान ]
होना-ज्यर के प्रभाव मे लाल हल्दी का सा और हरे वर्ण का होना-नेम
प्रादि मे नील, लोहित और पोत बरणों का विवेचना न करना, स्वप्न में उन्माद
फे धर्म वाला होना ये सभी होते हैं या हो जायगे ॥२॥६॥७।।
ऊर्ध्व नासाक्षिकस्यमेंढयोनिगुदैरध ।
कुपित रोमकूपश्च समस्तैस्तत्प्रवत्तं ते ॥
ऊर्ध्व साध्य कफाद्यस्मात्तद्विरेचनमाधितम् ।
बद्धौपधस्य पित्तस्य विरेको हि वरोषधम् 18
यनुबन्धी कफो यत्र तत्र तस्यापि शुद्धिकृत् ।
कपाया स्वादको यस्य विशुद्धौ श्लेष्मला हिता ॥१०
कटुतिक्तकपाया वा ये निसर्गास्कफावहा ।
अधा याप्यञ्च नायुष्मास्तत्प्रच्छर्दनसाधकम् ।।११
अल्पौषधच पितस्य वमन नवमोपधम् ।
अनुबन्धिबलो यस्य शान्तपित्तनरस्य च ॥१२
कपायश्च हितस्तस्य मधुरा एवं केवलम् ।
क्फमारुतसस्पृष्टमसाध्यमुपनामनम् ॥१३
असह्य प्रतिलोमत्वादसाध्यादोपधस्य च ।
न हि सशोधन किञ्चिदस्य च प्रतिलोमिन ॥१४
शोधन प्रतिलोमञ्च रक्तपित्त ऽभिसजितम् ।
एवमेवोपशमन सशोधनमिहेष्यते ॥१५
ससृष्टपु हि दोपेपु सवथा छर्दन हितम् ।
तत्र दोपोन गमन शिवास्त्र इव लक्ष्यते ।।
उपद्रवाश्व विकृति फलतस्तेषु साधितम् ॥१६
नाक-नेत्र-कान और मुख स ऊपर तथा मेद-योनि और गुदा से
नोचे समस्त रोगो के छिद्रो के द्वारा यह कुपित होकर प्रवृत्त हुमा करता है ।
॥८॥ अपर के भाग में जो रोग होता है वह साध्य हुमा करता है क्योकि
यह कफ स होता है और विरेचन कराने से साधित होता है। बद्धोपच पित्त
- २२८ [ श्री गरुडपुरा प्रतत कासवेगे च ज्योतिपामिव दर्शनम् । कफादुरोल्परुड्मूनि हृदय स्तिमित गुरु [15 कण्ठे प्रलेपमदन पीनसच्छा रोचकाः । रोमहर्षी धनस्निग्धश्लेष्मणाश्च प्रवर्तनम् ॥ युद्धाद्यः साहसस्तस्तं. सेवितरययाबलम् । उरस्यन्तःक्षतो वायुः पित्त नानुगतो बली ११० कुपितः कुरुते कास कफ तेन सशोणितम् । पीत श्यावञ्च शुष्कञ्च अथित कुपित बहु ॥११ प्ठीवेत्कण्टेन रुजता विभिन्नेनैव चोरसा । सूचीभिरिव तीक्ष्णाभिस्तुद्यमानेन शूलिना ॥१२ दुसस्पर्शन शूलेन भेदपीडा हि तापिना। पर्वभेदज्वरश्वासतृष्णावस्वर्यकम्पवान् ॥१३ परावत इवोत्कूजन्पानशूली ततोऽस्य च । कफायर्वमन पक्तिवलवर्णश्च हीयते ॥१४ जिम समय मे काय (बांसी) का बहुत अधिक वेग होता है तो उसमे ज्योतियो का दर्शन-सा हुमा करता है । कफ से वक्षः स्थल में थोडी पोडा होती है, माथे में दर्द और हृदय स्तिमित हो जाना है ॥८॥ परठ में प्रदेप मौर पीडा-पी नस, छदि और प्ररोचक, रोम हप तथा घना और चिकनः कफ को प्रवृत्ति ये सब होते हैं ।। ६ ।। युद्ध आदि उन,उन साहमिक कार्यों के करने से यथा बल न होने के कारण उर मे अन्दर क्षत हो जाता है तथा पित्त से अनु- गत वायु बलवान हो जाता है ।। १० । वह कुपित वायु खांसी उत्पन्न कर देता है और उससे कफ में रुधिर पाने लगता है वह पोत-श्याव (काला)--- शुभकथित घोर बहुत ही कुपित हो जाता है ॥ ११॥ उर स्थल के विभिन्न होने के समान रुज युक्त कण्ठ से उस कफ को थूका करता है। इसमें तीक्ष्ण मुझ्यो चुभने के समान पीडा युक्त पोर शून वाला मनुष्य हो जाता है, ।। १२ । दुख के स्पस करने वाले शूर मे भेदन जैसी पीडा होती है और बहुत ताप का अनुभव हुमा करता है | शरीर के पर्वो में भेदन-ज्वर-वास- -
[ २२६
फास रोग का निदान ]
तृष्णा-निस्वरता और कम्प वाला मनुष्य होता है ॥ १३ ॥ पवूनर की तरह
फीस वाला मनुष्य उस्कूजन करता है और उसकी पसलियो मे शूल होता है ।
इसके अनन्तर खांसी वाले पुरुष को क्फ मादि से वमन हो जाया करता है तथा
उसकी शक्ति-उल पोर वरणं का क्षय होता रहता है ।।१४।।
क्षीरणस्य सासृङ्मूत्रत्व श्वासपृष्ठकटिग्रहः ।
वायुप्रधानाः कुपिता धातवो राजयक्ष्मणः ॥१५
कुर्गन्ति यक्ष्मायतने कासं ष्ठीवेत्कर्फ ततः ।
पूतिपूयोपमं पीतं मिथ हरितलोहितम् ॥१६
सुप्यते तुद्यत इव हृदयं पचतीव च ।
अकस्मादुपणशीतेच्छा वह्वशित्वं वलक्षयः ॥१७
स्निग्धप्रसन्नवक्त्रत्वं श्रीमद्दर्शननेत्रता।
ततोऽस्य क्षयरूपाणि सर्वाण्याविर्भवन्ति च ॥१८
इत्येप क्षयजः कासः क्षीणानां देहनाशनः ।
याप्यो वा बलिनां तद्वत्क्षतजोऽपि नवी तु ती १६
सित्यतामपि सामर्थ्यात्साध्यादौ च पृथक्क्रमः ।
मिथा याप्याश्च ये सर्ने जरसः स्थविरस्य च ॥२०
कासश्वासक्षयच्छदिस्वरसादादयो गदाः ।
भवन्त्युपेक्षया यस्मात्तस्मात्ता त्वरया जयेत् ।२१
जय वह इस तरह प्रत्यन्न क्षीण हो जाता है तो उमको रक्त के सहित
पेशाव होता है । वाम का गेग, पृष्ठ भाग मोर कमर में पीना होती है । राज.
यदमा रोग के बन जाने से उसकी समस्त धातुऐं वायु को प्रधानता वाली
होकर प्रत्यन्त दुपित हो जाती हैं ॥ १५॥ जर यएमा रोगरा स्थान होता है
तो उममे सामी होती है और फिर वह बफ को पूरता रहता है ।
भी दुर्गन्ध से युक्त मयाद के तुत्य पीले रङ्गहरे और मोहित रज से मिमा
हमा होना है ॥ १६ ॥इस दशा में उसका हृदय मुप्त तपा तुपमान माहोपर
परता सा रहता है । सचानक हो कभी गर्मी और कभी सोतको इन्चा होती
है । ऐमा रोगी मधिक गाने वामा होता है मोर मोबन सारो जाया
गरुडपुराण , - महता महता दोनो नादेन श्वमिति क्वथन् । उद यमानः सरव्यो मत्तर्पभ इवानिशम् ॥१४ शास से पीडिन पुरुष शयन करता हुशा बड़ी ही कठिनाई और क्लेश से सोता है जब घबरा उठता है तो वह वैटा हो जाता है उसी समय में उसे बुछ स्वस्थता प्रतीत होती है । उसको आँखें ऊपर को चढ जाती हैं और ललाट प्रदेश में पसीना हो जाया करता है। वह अत्यन्त ही मात्ति से उत्पीडित हो जाता है 11 विशेष रूप से मूखे हुए मुख वाले उस पुरुष को बार-बार श्वास चलता है और कम्प से युक्त वह उष्णता की माकांक्षा किया करता है । मेघो से होने वाले जल, शीत भार पूर्व को वायु और श्लेष्मा बढाने वाली वस्तुमो से यह श्वास का रोग अत्यधिक वृद्धि को प्राप्त होता है ॥१०॥ जो बलवान मनुष्य होता है उसका यह स्तमक श्वास कुछ साध्य तथा हटाये जाने के योग्य होता है। ज्वर मूळ चाले का प्रथम प्रकार का वास शोनोपचारो से शामिन नही होता है ॥११॥ कास पौर श्वास वाला शीणं ममों के छेदन की पीडा युक्त, पछौने के साथ मूच्छित हो जाने वाला, बानाद वाला, वरित भाग में दाह के अनुभव वाला, मोचे की भोर दृधि रखने वाला, चढी हुई माखो वाला, स्निग्य और रक्त लोचन वाला, सूखे हुए मुख वाला, प्रलाप (प्रनयंक वचन) करने वाला, दैन्य से युक्त, नष्ट कान्ति वाला, चेतना मे शून्य बहुत बहुत ध्वनि के साथ प्रत्यन्त दीन होता हुमा कठिनाई से श्वास लेना है । उद्धू यमान और सरस्य सर्वदा मत्त पम की मौति रहता है ॥१२॥१३॥१४॥ प्रतष्टज्ञान विज्ञानो विभ्रान्तनयनाननः । अक्ष समाक्षिपन्बद्धमूत्रवर्चा विशीर्णवाक् ॥१५ शुष्ककण्ठो मुहुरचैव कर्णशङ्ख शिरोऽतिरुक । यो दीर्घमुन्वसित्यूचं न च प्रत्याहरत्यधः ।।१६ लेष्मावृतमुखथोष. ऋद्धगन्धवहार्दितः । ऊबंदिग्वीक्षते भ्रान्तमक्षिणी परितः क्षिपन् ॥१७ मर्मसु विद्यमानेयु परिदेवी निरुद्धवाक् । एते सिद्धप युरख्यत्ता व्यत्ताः प्राणहरा ध्रुवम् ॥१९
हिक्का रोग निदान ]
[ २३३
जिसका ज्ञान और विज्ञान एक दम नष्ट हो गया है और जो विशेष रूप
से भ्रान्त नेत्रो तथा मुख वाला है। मक्ष को समाक्षिप्त करता हुमा वद्ध मूत्र
एव वर्चम वाला है । जिसकी वाणी विशीर्ण प्राय हो गई है ।।१५।। गला सूखा
हुमा है और बार-बार कान-शङ्ख और शिर में अत्यन्त पीडा होती है । जो
बहुत लम्बा ऊपर को श्वास तो लेता है किन्तु नीचे की ओर फिर प्रत्याहरण
नही किया करता है ॥१६॥ श्लेष्मा (कफ) से प्रावृत मुख तथा श्रोत्र वाला
है-क्रुद्ध वायु से पीडित है, अपनी मांखो को सब ओर फैकता हुमा ऊपर की
दिशा में ही देखता है और भ्रान्त-सा रहता है ॥१७।। मम स्थानों में छिद्यमान
होकर अत्यन्त परिदेवन करने वाला है जो बोलने म असमथ सा होकर बोलता
हुपा रुक जाता है। ये सब अव्यक्त सिद्ध होते हैं व्यक्त निश्चय ही प्राणो के
हरण करने वाले होते हैं ।।१८।।
१३४-हिक्का रोग निदान
हिक्कारोगनिदानञ्च वक्ष्ये सुश्रु त तच्छणु ।
श्वासकहेतु प्राग्न प सख्या प्रकृतिसश्रया ॥१
हिक्का भक्ष्योद्भवा क्षुद्रा यमला महतीति च ।
गम्भीरा च मरुत्तत्र त्वरयाऽयुक्तिसेवितै ॥२
रूक्षतीक्ष्णखराशान्तरन्नपाने प्रपीडित ।
करोति हिक्का मरुतो मन्दशब्दा क्षुधानुगाम् ।
सम सन्ध्यान्नपानेन या प्रयाति च सालिजा ॥३
प्रायासात्पवन कद्व क्षुद्रा हिक्का प्रवर्तयेत् ।
जनुमूलात्परिसृता मन्दवेगवती हि सा ॥४
वृद्धिमायासता याति भुक्तमात्रे च मार्दवम् ।
चिरेण यमलगर्या हिक्का सप्रवर्तते ॥५
परिणामा मुखे वृद्धि परिणामे च गच्छति ।
कम्पयन्नी शिरो ग्रीवा यमला ता विनिर्दिशेत् ॥६
प्रलापच्छद्यतीसारनेत्रविप्लुतजृम्भिता ।
यमला वेगिनी हिक्का पा
.---- Ina
२३४ ] [ श्री गरुडपुराण । भगवान् धन्वन्तरि ने कहा है सुथुत ! पब हम हितमा ( हिचकी) रोग के निदान के विषय में बताते हैं। तुम इसका श्रवण करो। इस रोग का प्राग्रूप श्वास के हेतु वाला ही होता है । इमको सस्या प्रकृति के सश्रय वाली है ॥१॥ हिकका भक्ष्य से उत्पन्न होने वाली-शुदा-यमला--महवी पौर गम्भीरा होती है। प्रयुक्त सेवन किये हुए स्वग के साथ रूक्ष–नोक्षण-सर- प्रशान्त मन और पानो के द्वारा प्रपीड़ित होने वाला वायु हिक्का को उत्पन्न कर देता है । यह मन्द शब्द वाली शुधानुगा होती है और सम सन्ध्याम पान से जो चलती है वह पन्नजा होती है ॥ २॥३ ।। आयास से कद होने वाला वायु शुद्ध हिचकी को उत्पन्न कर देता है। यह हिचकी जत्रु के मूल से परिसृत होती हुई मन्द धेग वाली वह होती है ॥४॥ यह मायास (श्रम) से वृद्धि को प्राप्त हो जाती है और भोजन करने मात्र से मृदुना को पास होती है। चिरकाल से यमल वेगों के द्वारा जो हिचकी राप्रवृत होनी है मुख में परिणाम पाली परि पाम मे वृद्धि को प्राप्त होनी है । गिर और ग्रीवा को कम्पित करती हुई जो हिचकी होती है उस हितका को यमला कहते हैं ॥२६।। प्रलाप-दि-प्रती- सार-नेत्र विप्लुन पोर जृम्भा वाली हिचकी यमला पोर वेग वाली तथा परि- रणाम से सयुत होती है ।।७।। ध्वस्त शङ्खयुग्मस्य थतिविप्लुत चक्षुप. ! स्तम्भयन्ती तनु वाच स्मृति सज्ञाञ्च मुञ्चती। तुदन्ती मार्गमारणस्य कुर्वती ममंघट्टनम् । पृष्ठतो नमन साऽऽयं महाहिक्का प्रवर्तते ॥६ महाशूला महाशब्दा महावेगा महाबला। पक्वाशयाच्च नाभेर्वा पूर्ववत्सा प्रवत्तते ॥१० तद्र पा सा मह्त्कुज्जृिम्भणाङ्गप्रसारणम् । गम्भीरेण निदानेन गम्भीरां तु सुसाधयेत् ।।११ आद्य वर्जयेदन्ये सवंलिङ्गाञ्च वेगिनीम् । सर्वस्य सञ्चितामस्य स्थविरस्य व्यवायिनः ।।१२ यक्ष्मा रोग का निदान ] । २३५ व्याधिभिः क्षीणदेहस्य भक्तच्छेदकृशस्य च । सर्वेऽपि रोगा नाशाय नत्वेव शीघ्रकारिण. । हिक्काचासो यथा तो हि मृत्युकाले कृतालयौ ॥१३ भ्र शव के युग्म को ध्वस्त जिसवा कर दिया है और शृति विप्लुन चक्षु वाला जो हो गया है ऐसे पुस्प के शरीर को स्तम्भित करती हुई वाणी. स्मृति पोर सज्ञा को छुडा देने वाली, मागंमारण का तोदन करने वाली तथा माँ का दाहन करती हुई होनी है और पीछे से जिसमें नमन हो है मार्य । वह महा हिरा होकर प्रवृत्त होती है । ८६॥ इम हिच में महान् शूल होता है और यह महान शब्द वालो होती है, बहुत अधिक वेग वाली तथा महान बल मे सयुन होती है। यह पक्वाशय से अथवा नाभि से उठकर पूर्व की भांति ही प्रवृत हुमा करती है ।।१०।। इस रूप वाली हिचकी जो होती है वह भाई और अङ्ग का प्रस्तरण मधिक किया करती है गम्भीर नाद से गम्भीर उसको सुसाधित करे ॥११॥ पाच जो दो हैं उनको दजित करे और अन्य जो होती हैं वे सब लिङ्गो से वेग वाली होती है। सबकी सञ्चित को तथा व्यवायी धृद्ध, व्याधियो से क्षीण देह वाले, भक्तच्छेद से पृश पुरुष के सभी रोग नाश करने वाले हुमा करते हैं किन्तु इस प्रकार से शीघ्र देह के नाम करने वाले नहीं होते हैं जिस तरह से हिचकी और वाम ये दो रोग देह को -ष्ट करने वाले होते हैं क्योकि ये दोनो तो मृत्यु के समय में भी हर एक के रामुत्पन्न हो जाने व ले ही होते है । जब मोत हाने को होती है तो अर्व श्वास चलने लगता है और हिन को पाकर ही प्राण पखेरू प्रयाण किया करते हैं ।।१०।१३|| १३५--यक्ष्मा रोग का निदान अथातो यक्ष्मरोगस्य निदान प्रवदाम्यहम् । अनेकरोगानुगतो बहुरोगपुरोगम ॥१ राजयक्ष्मा क्षय शोपो रोगराडिति कथ्यते । नक्षत्राणा द्विजानाञ्च राज्ञोऽभूद्यदय पुरा । यच्च राजा च यक्ष्मा च राजयक्ष्मा ततो मत ॥२ २३६ ] [ थी गरुडा देहौषधक्षयकृतेः क्षयान्ते सम्भवेच्च स. । रसादिशोपरणाच्छोपो रोगराडिति राजवान् ॥३ साहस वेगसरोध. शुक्रोज स्नेहसक्षयः । अन्नपानविधित्यागश्चत्वारस्तस्य हेतव ॥४ तैरुदीर्णोऽनिलः पित्त व्यर्थञ्चोदीर्य सर्वतः । शरीरसन्धिमाविश्य ताः शिरा प्रतिपीडयन् ।।५ मुखानि स्रोतसा रुद्धा तथंवाति विसृज्य वा। मध्यमूर्ध्वमस्तिर्यग्व्यथा मञ्जनये द ॥६ रूप भविष्यतस्तस्य प्रतिश्यायो भृश ज्वरः । प्रसेको मुखमाधुर्य मार्दव वह्निदेहयो ७ भगवान श्री धन्वन्तरि ने कहा-अब इसके अनन्तर हम यक्ष्मा रोग के निदान को बतलाते हैं । यह यक्ष्मा रोग ऐसा होता है जिसके साथ पीछे लगे हुए बहुत से रोग हुमा करते हैं और इसके होने के पहिले भी कितने ही रोग हो जाया करते हैं । इस तरह पहिले पोर पीछे भने गो को साथ लेकर ही यह महान् यक्ष्मा नाम वाली व्याधि मनुष्य को हुमा करती है । यह राजयक्षमा रोग क्षय और गनुष्य का शोषण करने वाला होता है इसीलिये समस्त रोगी का यह राजा है-ऐसा ही कहा जाया करता है । इसका नाम राजयक्ष्मा इसी. लिये पडा है कि यह पहिले समय मे मक्षत्रो, द्विजो और राजाम्रो को ही होता था। जो राजा है और यक्ष्मा है- इसी से राजयक्ष्मा नाम धारी यह रोग हुमा है ॥१॥२॥ देह और प्रौषध का क्षय करने वाला यह होता है तथा क्षय जब हो जाता है तो उसके अन्त मे यह समुत्पन्न होता है। इससे रसादि सभी का पूर्णतया शोषण होता है इसी कारण मे इसको शोप भी कहते हैं। रोगो का यह राजा है इसो से 'राज'-शब्द इसके नाम के साथ मे लगा हुमा है ।।३।। इस राजयक्ष्मा महान् व्याधि के उत्पन्न होने के चार मुस्य हेतु हुमा करते हैं। उनके नाम हैं-साहस अर्थात् करने न करने के योग्य हर काम मे बुरी तरह से पिल पड़ने की हिम्मत करना-वेग सरोध प्रर्थात् भूख-प्याम मोर मलादि का नत्सगं करने मादि के जो वेग शरीर मे हुमा करते हैं उनका रोक कर रखना यह + यक्षमा रोग का निदान ] [ २३७ सरा इम रोग की उत्पत्ति का हेतु होता है । वीयं, भोज पोर स्नेह का शरीर से क्षीण हो जाना भी इसका एक हेतु होता है । अन्न-पान की विधि का त्याग पर देने से भी यह दुर्वलता होकर रोग पैदा हो जाया करता है ||३||४॥ इन चपर्युक्त चारो प्रकार के कारणो से वायु उदोग हो जाता है और वह पित्त को वदीयं कर देता है फिर वह शीर को सन्धि मे प्रवेश करके समस्त शिरामो को पीडित करता हुपा ममी स्रोतो के मुखो का रोध कर देता है और उसी प्रवार से सर्वत्र प्रति विमृश होकर ऊध्यं भाग, मध्य भाग, अधोभाग और तियं. भाग मे हृदय को या उत्पन्न कर दिया करता है । ॥६॥ होने वाले इस रोग का जो भारम्भ में स्वरूप बनता है वह यह है कि जुकाम होता है और फि उसी प्रतिश्याय में प्रशान्त अधिक तेम ज्वर हो जाता है। प्रसेक, मुख का मिस मोर वह नया देह का मादय होता है ॥७॥ लोल्पमान्निपानादौ गुचावशुचिचोक्षण । मक्षिकातृरण फेशादिपातः प्रायोन्नपानयोः ॥ हल्लामदिररुचिरस्नातपि वलक्षाय । पाण्योरुवाःपादास्यबुध्यक्षणोरतिशुक्लता ME बाहाः प्रतोदो जिह्वाया काये वैभत्स्यदर्शनम् । म्श्रीमद्यमासप्रियता घृणिता मूद्ध गुण्ठनम् ॥१० नमकेगास्थिवृशिश्व स्वप्ने चाभिभको भवेत् । पतन कृपालासाहिापियापदपक्षिभि ।।११ येगाम्यिनुषभम्मादिनरौ गधिरोहणम् । शुन्यानां ग्रामदंगाना दगंन गुप्यतोऽम्भम' । ज्योतिदिन दवाग्नीना जनतास महीमहाम् ॥१२ पौनगर परमूदंरजोरनि । म्यनियामसांगावपादिका मांगे ॥१३ यिने पाद परयो सन्धिरणे भर्यात पर । रूपारागानि जामले रायमणः ॥१४ २३८ ] [ घी गरुडपुराण मार्ग पोर अन्न-पान प्रादि में पञ्चलना तथा शुधि में अशुचिता कई देसना---मक्षिका-तृण पोर वेशादि का पात प्रायः अन्न मोर पान में होता है। In हल्लास-दि-मचि मोर अस्नात होने पर भी बन की क्षीराता- पाणि-ऊरु-वक्ष स्थल-पाद-मुख-कुदिक्षनेत्र इन शरीर के मङ्गों में प्रत्यन्त शुक्लता हो जाना ये मब चिह्न इस रोग मे हो जाया करते हैं । दोनो बाहुमो में प्रतोद अर्थात् पीडा तथा जिह्वा और शरीर में बीभत्सता का दिशा. लाई देना-स्त्री प्रमङ्ग, मदिरा पान की अोर दिल का झुकाव होना, पूणिना, मूद्ध गुएठन, नापूर-फैश मौर अस्थि की वृद्धि, इम प्रकार के स्वप्न देखना जिनमे अपना अभिमान हो, कृरलास, सर्प, बन्दर पो पक्षिशे का पान देखना वेदा, पस्थि, तुप, भस्म तथा वृक्ष पर समाधिरोहण देखना, शून्य ग्राम देगी का तथा जन को सूना या देखना, दिन मे सारो का दिसनाई देना भोर दावाग्नि से जलते हुए वृक्षो का देखना ये मब इस रोग में पोषित मनुष्य को हुप्रा परता है ॥१०॥११॥१२॥ पीनम-वाग-ससी-स्वरमूर-सरचि-ऊचं नियाम- संशोप-प्रधादि योगत होते हैं ॥१३॥ पातं भागों में मोर पियो में पोडा का होना और ज्वर का रहना भी इस रोग में होता है । राजयक्षमा महान रोग के एकादशप हमारते हैं ॥१४॥ . तेपामुपद्रवान् विद्यात्कण्ठध्वंमपरी रुजः । म्भाजमर्द निष्ठीयवलिमान्याम्यपूनिता ॥१५ तत्र वाताच्चिर.पाश्चमूनच मागमदनम् । फएटरोध स्वरभगो पित्तात्पारामपाणिगु॥१६ दाही निसारो गृपद्धदिरागन्धो जरों मद. । पफादगेचायरिणामाणिगौग्यम् ॥१७ प्रसेपः पीनगमाग म्बरभेदोपहिता। दोपमंन्दामलस्वन शीपरोपरफोत्याः ॥१८ सोतीमुगेगु संपु धातुप स्वल्लग। यिदाही गम म्याने मान्यन्ये पाया. ॥१८ यामा रोग का निदान । [२३६ पच्यते कोष्ठ एवान्नमम्लयुक्त रसयुतम् । प्रायोऽस्य क्षयभागाना नेवान्नं चाङ्गमुष्टये ॥२० रसो हास्य न रक्ताय मासाय कुरुते तु तत् । उस्तब्धः समन्ताच केवल वर्तते क्षयी ॥२१ उनके जो उपद्रव होते हैं उनको समझ लेना चाहिए, कण्ठ के ध्वंस करने वाली पीडा, भाई का माना, शरीर के अङ्गो का टूटना, निठीवन, माग्न की मन्दता, मुम्स में दुर्गन्ध का रहना यह सब इस व्याधि में रोगी को हुमा "रता है ॥१॥ उममें जव वान प्रकोप होता है तो उससे सिर में पौर 'T भागों में धूल अधिक होता है-गरीरावयवी में टूटन होती रहा करती । गला एक जाता है, स्वर का भ्रश हो जाया करता है। अब पित्त का सिरोप होता है तो पैर और हायो में दाह होता है-स्त होते हैं-रक्त गरता है -छदि-गुण में पास, उबर और मद हो जाते हैं । कफ का प्रकोप दम ग में होता है तो हम परोचकता, धर्दि, खांती मोर मङ्गि में भारापन हो गता है ॥१६॥१७॥ प्रतेक, पोनन, श्वास, स्वरभेद, अग्नि का कम होना ये सब रक्षरण इन दोषों से हो जाया करते हैं। वायु के मन्द हो जाने मे चोय (मूजन) नेप और अफ की उल्वणता हो जाती है । इममे ममस्त स्रोतों के मुग एक जाया करते हैं पौर शरीर की सभी धातुएं स्वर हो आया करती हैं । मन में विशेष बाह होता है। इनके अतिरिक्त पम्प भी पहुत-ऐ उपद्रव हो जाया करते हैं। ११८११६॥ मोह में जो मा पहुँचता है वह मम्न से सयुत रमों के द्वारा परि. राको प्रास हुपा करता है किन्तु इम रोग वाले पुरए ये मभी भाग धोरा हो माते हैं। इसनिय नमसा साया हुपा म अनी को दुटि नहीं रिया करता है। ॥२०॥ जो भी मुक्त पाणं या रम बनता है उममे न तो फिर मागे घमार रक्त ही बनता है मौरन मांग बना करता है। सब पोर मे उस्ताप होकर मर्थात् पोपण गोगमः मिपाको पाने पर बह गयन आप वासा ही होता रहगा है ॥२१॥ लिङ्गीप्यमेष्यतिक्षीण व्याधौ पटकरणक्षयम् । वर्गबत्माधव नरपि ततोऽन्यथा ॥२२
२४० ]
। श्री गरुडपुरार
दोपय॑स्तै समस्तश्व क्षयात्सर्वस्य मेदसाम् ।
स्वरभेदो भवेत्तस्य क्षामो रूक्षश्चल स्वर ॥२३
शूकपर्णाभकण्ठत्व स्निग्धोष्णोपशमोऽनिलात् ।
पित्तात्तालुगले दाह शोपो भवति सन्ततम् ।।२४
लिम्पन्निव क कण्ठ मुख घुरघुरायते।
स्वय विरुद्ध सर्वैस्तु सवलिङ्ग क्षयो भवेत् ॥२५
धूमायतीव चात्यर्थमुदेति श्लेष्मलक्षणम् ।
कृच्छ्रसाध्या भयाश्चात्र सर्वैरल्पञ्च वर्जयेत् ॥२६
जब ये चिह्न स्वल्प स्वरूप म होत हैं तभी वह प्रत्यत क्षीणता प्राप्त
करने लगता है। इस व्याधि म पट करण क्षय होता है । इसलिये उसको सर्भ
से वजित होना चाहिए और क्षोणता से बचने के लिये माधन करने चाहिये,
अन्यथा यह परिणाम होता है कि इन समस्त दोषा के अलग-अलग या सबके
मिल जाने पर कुपित हो जाने से मेदो का क्षय हो जाता है। उसका स्वर भेद
होता है पोर इसका रोगी पत्य त क्षाम-रूक्ष एव चल स्वर वाला हो जाया
करता है ।।२२।२३॥ शूकपर्ण के समान कण्ड हो जाता है तया बात से स्निग्धता,
एव उष्णता का उपशमन हा जाया करता है। पित्त के प्रकोप से तालु पोर
गले मे बडा भारी दाह होता है और निरन्तर शोपण होता रहा करता है ।२४
कफ के प्रकोप से उसे ऐसा प्रतीत होता है मानो गना लिप्त सा हो रहा है और
मुख म कफ की घुरघुराहट सवदा होती रहा करती है। इन समस्त दोपो के
प्रतिकून हो जाने पर सभी प्रकार के चिह्न उसको हो जाते हैं और उस रोगी
का क्षय होता रहता है ॥२५॥ उसे प्रत्य त धुमा से घुटग की भांति अनुभव
हता है यही श्लेष्मा के लक्षण उमको प्रकट होकर किया करते है । ये क्षय इम
प्रकार के हैं जो बहुत ही कठिनाई स साध्य हुमा करते हैं। इसमें सभी को
अल्पो से जिन कर देना चाहिए ॥२६।।
१३६-अतीसार रोग का निदान
अतीसारग्रहण्योश्च निदान वच्मि सुथुत ।
दोपयंस्तं समस्तैश्च भयाच्छोकाच्च पविध ॥१
-
अनीसार रोग का निदान ]
[ २४१
अतीसार स सुतरां जायतेऽत्यम्बुपानतः ।
विशुष्कान्नवसास्नेहतिलपिष्टविम्ढक.॥२
मद्यरुक्षातिमात्रादिदिवसादिपरिभ्रमात् ।
कृमिम्यो वेगरोधाच्च तद्विधैः कुपितानिलः ॥३
विभ्र सयत्यधो रक्त हत्वा तेनैव चानलम् ।
व्यापन्निशकृत्कोष्ठपुरीपद्रवतादय. ॥४
प्रकल्पतेऽतीसारस्य लक्षणं तस्य भाविनः ।
भेदी हृद्गुदकोष्ठेपु गात्रस्वेदो मलग्रहः ।।
प्राध्मानमविपाकश्च तत्र वातेन विज्वरम् ।
स्वल्पाल्प शब्दशून्याढ्य विरुद्धमपवेश्यते ॥६
रुक्षा सफेमस्वच्छ ग्रथित वा मुहुमुहुः ।
तथा दग्ध्वा गुदामास पिच्छिल परिकर्त्तयन् ।
सशुष्कभ्रष्टपायुश्च हृष्टरोमा विनि.श्यसन् १७
भगवान श्री धन्वन्तरि ने कहा-हे सुधुन ! अब हम अतीसार पोर ।
ग्रहणी रोगो के निदान अर्थात् मूल कारण को बतलाते हैं । ये रोग तीनो व्यस्त
दोषो के प्रकोप से तथा सबके मिश्रित होकर प्रकुपित होने से, भय के कारण से
पौर शोक से उत्पन्न होने वाला छ प्रकार का होना है ।।१।। यह जो प्रतीसार
होता है वह सुतरा प्रत्यधिक जल के पीने से हो जाया करता है । विशेष रूप
से शुष्क अन्न, वसा, स्नेह, तिल, पिष्ट पौर विरुद्धको से यह हो जाता है ।।२।।
मद्य, रूक्षा, प्रत्यधिक मात्रा मादि पौर दिवस के मादि मे परिभ्रम से, कृमियो
के उत्पन्न होने से तया वेगो के रोग लेने से और इसी प्रकार के अन्य कारणो
से वायु कुपिन हो जाता है ॥३॥ ऐसा पिन हुमा वायु उमी के द्वारा अग्नि
का हनन करके रक्त को नीचे की भोर विभ्र शित कर देता है । व्यापरित करके
मन मल कोष्ठ मोर पुरीप की द्रवता मादि कर दिया करता है ।।४॥ होने वाले
उमका लाण प्रतीसार कहा जाता है । हृदय, गुदा भोर कोटों में भेदन, मात्र
स्वैर भोर मन प्रहा हो जाता है ॥५॥ उसमे वान से माध्मान, मविपाक,
वियर भौर स्वरूपाय द शून्यता से युक्त विरुद्ध उपविष्ट होता है ॥६॥ रुक्ष,
धनीमाररोग का निदान ] [ २४३ निकाल दिया करता है । जीघ्र ही उपण और प्रविप्लव को वायु निवारण कर दिया करता है ॥ ११ ॥ दात पौर पित्त इन दोनो दोपों के प्रकोप से जो रोग उत्पन्न होना है उसमें समान ही लक्षण भी हुमा करते हैं मोर इमी भौति प्रोक के कारण होने वाले रोग में होना है । संक्षेप में यह मतीमार साग और निरा. मक दो प्रकार का होता है अर्थात् एक तो ऐमा प्रतीसार होता है जिसमें साथ ही प्राम (क्या अपरिपक्व रम) हुमा करता है और दूसरा विना पाम घाला होता है ।। १२ । जो माम मे युक्त प्रतीमार होता है उसमे मल दुर्गन्ध से मुक्त होता है और भारोप, विमा, भाति (पोहा) और प्रत्येक में गुक्त रहा परता है। इसके विपरीत विना प्राम याला है। यफ में कोई भी मस्जित नहीं होता है।॥ १३॥ अतीगार के हो जाने पर जो इमरे निवारण करने के लिये विदोप यन करने वाला नहीं होता है वह ग्रहगी रोग का निवार बन जापा परता है। पधिर समय तक भतीमार के रहने पर पामन करने वाली जो मग्नि होती है उसका निर्माण पर गमाप्ति हो जाता है ॥१४॥ सामं कृग्निरामं वा जीणं येनातिमार्यते । मोतिमारोऽतिपरगादागुकारी स्वभावतः ।। सामगीरणंम जीगान जीर्णो पाव तु नैव च । १५ चिम्यग्रहणीदोप. सश्चयनोपवेगयेत् । म धनुर्मा पृथग्दोपं. मन्निपाताच्च जायते ॥१६ प्रानपानम्प गदन चिरात्पवनमन्पक । प्रमेको वक्नोरम्बमाचिस्मृटममो भ्रम ॥१७ प्रायद्धादरला यदि कग प्यनुपूजनम् । मामान्यलक्षगा याश्यं भूमयन्तमका ज्वरः ।।१८ मूर्दा शिविष्टम्भ अपयु पार पादयो । रान्द्रानिलात्तानुशोस्तिमिर कयाः स्मन ॥ पात्रोंगराणीवाना तोदयविमूचिरा १६ माले जि पसेपु हात्तषणापरियत्तिपा । जणे जीपति नाघ्मान मुक्त स्वास्थ्य समस्नुते ॥२० २४४ ] [ श्री गण्डपुरा कच्चे अपरिपका रप ग्राम से युक्त मल अथवा प्राम से रहित जोरणं जिसके द्वारा प्रसारित किया जाता है वह प्रतीसार यति सारण करने से प्राशु- फारी स्वभाव से ही हुआ करता है । साम अर्यात प्राम से युक्त शीर्ण होता है और वह अगोणं ही हुआ करता है । जब वह जीणं हो जाता है पक्व नहीं होता है ।। १५ । चिरकाल तक अतोसार के रहने पर ग्रहणी का दोप समुत्पन्न हो जाता है और यह सञ्जय को उपवेष्टित क्यिा करता है। यह सग्रहणी का रोग भी चार प्रकार का होता है । वात-पित्त-कफ इन तीनो दोपी के प्रकोप से अलग अलग होने वाले तीन भेद हैं और एक भेद वह होता है जिसमें तीनो दोपो का मनिपात होता है ।। १६ ।। इस ग्रहणी का प्राक् रूप जो होता है उसमे शरीर के प्रङ्गो मै सादन हुप्रा करता है, और बहुत देर मे थोडा पवन हुमा करता है । इसमे प्रत्येक मुख की विरसता-~-अरुचि-प्यास और श्रम होना है ॥ १७ ॥ उदर में प्रावद्धता~दि और कानो मे गुनगुनाहट का रहना वरावर रहा करता है। इस व्याधि का साधारण लक्षण यह है कि शारीर मे कृशना रहती है। भूमक-तमक ज्वर-मू -शिर और अरमों मे विष्टम्भ--यमथु हाथ तथा पैरो मे होता है । वात से जब यह रोग होता है तो उसमें तन्द्रा रहा करती है-तालु मे शोपण होता है-अखिो के सामने मधेरा भोर कानो म पाशज होती रहा करती है। पाच भाग--अरू में पक्षण-गरदन मे पीडा और प्रति तीक्ष्ण विसूचिका हाती है ।। १८ ।। १६ ।। ममस्त रोगो में जब वृद्धि होती है तो शुपा और तृष्णा का परिकार्तन हो जाना है । जब जीर्ण होता है तो प्राध्मान को भी जोएं कर दिया करता है । मुक होने पर स्वास्थ्य का लाभ किया करता है ॥२०॥ वातावृद्रोगगुल्मार्श प्लीहपाण्डुम्त्वसज्ञिता । चिरादु स द्रव शुष्क तुन्दार शब्दफैनवत् ॥ पुन पुनः मृजेद्धच्च: पायुरुच्छ वासकासवान् ।।२१ पोतन पीतनोलाभ पाताभ सृर्जात द्रवम् । अत्यम्लोद्गारहत्व ठदाहारुचितृडदित ॥२२ [ २४५ मदादित्य रोग का निदान ] दलेष्मणा पन्यते दुःखे मलश्छदिररोचका. । आस्योपदाहनिष्ठीवकासहृल्लामपीनसाः ॥२३ हृदय मन्यते स्त्यानमुदर स्तिमित गुरुम् । उद्गारो दुष्टमधुरः सदनं संप्रर्पणम् ॥२४ सम्भिन्नश्लेष्मसश्लिष्टगुरुवर्चः प्रवर्तनम् । अकृशस्यापि दीर्वत्य सजे सवदर्शनम् ॥२५ यात से हृद्रोग-गुल्म-प्रश-प्लीहा-पाण्डु और असज्ञिता होती है । चिरकाल पर्यन्त दुख का अनुभव हुमा करता है । द्रव (ढीला)-शुष्क-तुन्दार शब्द और भागो से युक्त बार-बार पायु वच्च का उत्सृजन किया करता है और वह उच्छ वास भोर सांमी के उपद्रवो से वह व्यक्ति समन्वित होता है ॥२१॥ पित्त से पीलो भौर नीली प्राभा वाले द्रव का उत्सगं किया कन्ता है और अत्यन्त खट्टी डकारो से युक्त-हृदय और कण्ठ मे दाह-प्रचि भर तृपा से पीडित रहता है ।। २२ ।। श्लेष्मा से मल पचता है और दि तथा अरो- चकता होती है । मुख मे दाह-निष्ठीव-खांसी-हल्लास भोर पोनस हो जाते हैं ॥ २३ ॥ हृदय स्त्यान और उदर स्तिमित तथा भारी मलुम होता है । दाप युक्त मधुर डकार होती हैं-शरीर मे पोडा मोर सम्प्रहपंरण होता है। ।। २४ ॥ सम्भिग्न वफ से सश्लिष्ट जब होता है तो गुरु वर्ष की प्रवृति होती है । शरीर कृश नहीं होने पर भी कमजोरी का अनुभव होता है। सभी दोपो से युक्त रोग मे सब लक्षण और उपद्रवो का दर्शन हुमा करता है ॥२५॥ १३७-मदादित्य रोग का निदान वक्ष्ये मदात्ययादेश्च निदान मुनिमापितम् । तीष्णाम्लरुक्षसूक्ष्माद्यव्यवायाशुकर लघु ॥१ विकाशि विपद मद्य मेदसोऽस्माद्विपय्यय । तीक्ष्णोदयाच दिव्युक्ताश्चित्तोपतापिनो गुणा.॥२ जीवितान्ता प्रजायन्ते विशेषोत्कर्पत्तिनः । तीक्ष्णादिभिगुणर्मद्यान्मान्द्यदीनौजसो गुणा. ॥३ पदादित्य रोग का निदान ] [ २४७ च्छा किया करता है ।। ७ ।। मरण से भी परतर दशा को प्राप्त हो जाने ना यह पापी धर्म-अधर्म, सुख-दुस, मान--प्रपमान, हित-हित को कुछ भी नही जानता है और शोक तथा मोह से प्रात्त होकर शोक मोहादि से युक्त हो जाता । समोद के मोह की मूर्छा मे अपस्मार के सहित अर्थात् स्मरण और ज्ञान की शक्ति को खोते हुए नीचे की भोर भूमि पर गिर जाया करता है। अधिक भोजन करने वाले और पाहार किये हुए बलवान् लोग अत्यन्त मद युक्त नहीं हुआ करते हैं ||८|| वातात्पित्तत्कफात्सर्वैर्भवेद्रोगो मदात्यय । सामन्यलक्षण तेषा प्रमोहो हृदयव्यथा ॥१० विभेदप्रतत तृष्णा सोम्यो ग्लानिज्वरोऽरुचि । पुरोविबन्धस्तिमिर कास श्वास प्रजागर. ।।११ स्वेदोऽतिमात्र विष्टम्भ श्वयथुश्वित्तविभ्रमः। स्वप्न नेवाभिभवति न चोक्तश्च स भापते ॥१२ पित्ताहाहज्वरस्वेदो मोहो नित्यञ्च हृभ्रमः । श्लेष्मणदिहल्लासनिद्रा चोदरगौरवम् ॥१३ सर्वजे सर्वलिङ्गत्व ज्ञात्वा मद्य पिबेत्त य । सर्वञ्च रुचिरञ्चास्य मतिध्व सकविनिये ॥१४ भवेता पायिन काठे द्रव्ये तस्याविशेपत. । मारताच्छ लेप्मनिष्ठीवण्ठशोपोऽतिनिद्रता ॥१५ शब्दासहत्व तच्चित्तविक्षेपोङ्ग हि वातरुप । हत्कण्ठरोग सम्मोह यासतृष्णावतिज्वरा ॥१६ निवर्तेद्यस्तु मद्यभ्या जितात्मा बुद्धिपूर्वकृत । विकार क्लिश्यते या तु न स गागरमानस ॥१७ वात-पित्त मौर यफ इन समस्त दोपो से यह मदात्यय रोग हुआ करता है । इस व्याधि पा साधारण लक्षण यही होता है कि इस रोग पाले मनुष्यों को प्रकृष्ट मोह और हृदय म व्यथा हो जाता है ॥ १०॥ विभेदन का विरतार-तृष्णा-सौम्य-नानि-उन-प्रचि-पुरोविवग्य-तिमिर-
२४८ ]
[ घी गरुडपुराण
खांसी-श्वास-प्रजागरण--स्वेद और प्रत्यधिक विष्टम्भ-श्वयथुचित्त मे-
विभ्रय--स्वप्न की भांति अभिभव से युक्त होना ये सभी लक्षण मदात्यय रोग
में हो जाते है और इस रोग वाले पुरुष से कुछ कहा भी जाये तो वह कुछ भी
बोलता नहीं है ।॥ ११॥ पित्त के प्रकुपित होने से जो रोग होता है उसमें दाह.
ज्वर स्वेद (पप्तीना)---मोह और नित्य ही हृदय में भ्रम होता है। कफ मे
जो यह रोग उत्पन्न होता है उसमे इस रोग के रोगी को छदि-हल्लास--
निद्रा-पेट में भारापन होता है । सभी दोपो से प्रकोप के कारण जब यह रोग
होता है तो सभी दोपो के लक्षण दिखलाई दिया करते हैं-यह जान कर ही
जो मद्य पोता है उसको मति का ध्वस करने वाली विक्रिया में इसको सभी
कुछ रुचिर प्रतीत हुआ करता है । इसके पीने वाले व्यक्ति को काष्ठ और द्रष्य
भीविशेषता प्रतीत नही होती है। वायु से श्लेष्मा--निष्टीव-कण्ठ शोप और
प्रति निद्रा का माना-शब्द को सहन न करना-चित्त विक्षेप-पग मे बात
पीडा-हृत्काट रोग-सम्मोह-श्वास-तृष्णा-धमन मोर ज्वर होते हैं ॥१२॥
॥ १३ ॥ १४ ॥ १५ ॥ १६ ॥ जो मद्य से निवृत्त हो जाता है वह जितात्मा
और पूर्व बुद्धि वाला होता है और वह शारीरिक एव मानसिक विकारो से
क्लेशित नही होना है ॥१७॥
गरुड़ महापुराण
उत्तरार्ध
(प्रेतकल्प)
१-धर्म कथन
नारायणं नमस्कृत्य नरञ्चैव नरोत्तमम् ।
देवी सरस्वती व्यास ततो जयमुदीरयेत् ॥१
धर्मदृढवद्धमूलो वेदस्कन्धः पुराणशाखाव्यः ।
क्रतुकुसुमो मोक्षफल. स जयति कल्पद्रुमो विष्णुः ॥२
भवत्प्रसादादवैकुण्ठत्रैलोक्य सचराचरम् ।
भया विलोकित सर्वमत्तमाधममध्यमम् ॥३
भूर्लोकात् सत्यपर्यन्त पुर याम्य विना प्रभो ।
भूर्लोकः सर्वलोकाना प्रचुरः सर्वजन्तुभिः ॥४
मानुष्य तन भूताना भुक्तिमुक्त्यालय शुभम् ।
अत सुकृतिना लोको न भूतो न भविष्यति ॥५
गायन्ति देवा किल गीतकानि धन्यास्तु ये भारतभूमिभागे ।
स्वर्गापवर्गस्य फलार्जनाय भवन्ति भूय पुरुषा सुरत्वात् ।।६
मानुपत्व लभेत् कस्मात् मृत्यु प्राप्नोति तत् कथम् ।
क्रियते क सुरश्रेष्ठ देहमाश्रित्य कुत्रचित् ।।७
भगवान् श्री नारायण को प्रणाम करके, नरो मे परमोत्तम नर को
Tम करके, भगवती सरस्वती का मभिवादन करके तथा भगवान श्री व्यास
२५० ] [ थी गरुडपुराण देव को प्रणाम करके फिर जय-इस शब्द का उधारण करना चाहिए ॥१॥ जो भगवान् विष्णु कल्पद्रुम के सदृया हैं उनकी जय हो इस वल्पम वृक्ष का दृढ धर्म से बद्ध होने वाला मूल है-वेद ही इस कल्पद्रुम के स्कंध है और पुराण रूपी शाखामो से यह सम्पन्न है। जो क्रतु किये जाते हैं वे हो इस कल्पद्रुम के कुसुम हैं और परम पुरुपायं मोक्ष ही इसका सर्वोत्तम फल है ॥२॥ श्री ताय ने कहा-मैंने आपके प्रसाद से वैकुण्ठ लोक-त्रैलोक्य, चर प्रौर पचर के सहित सब देख लिया है जो कि उत्तम-मध्यम और अधम है । हे प्रभो | भूलोक से सत्य लोक पर्यन्त सभी का अवलोकन किया है किन्तु याम्यपुर अर्थात् यमराज के नगर को नहीं देखा है। यह भूलोक समस्त जन्तुमो से सभी लोको से प्रचुर है ॥ ३ ॥ ४ ॥ यह मनुष्य लोक मानुष जीवन प्राणियो के भोग भोर मोक्ष का परम शुभ स्थान है। प्रतएव सुकृत करने वालों का लोक ऐसा उत्तम है जो कभी न हुआ है पोर न भविष्य में भी कभी होगा ॥ ५॥ देवगण सब मिल कर गीतों का गायन किया करते. हैं कि जो लोग इस परम पवित्र भारतवर्ष की भूमि के भाग में उत्पन्न हुए हैं घे परम धन्य अर्थात् महाभाग्यशाली हैं । स्वर्ग और मपवर्ग ( मोक्ष ) के फलो के प्रजन करने के लिये अर्थात् प्राप्त करने के वास्ते देवगण भी अपने देवस्य का त्याग कर पुा भारतवप में मनुष्य जन्म ग्रहण किया करते हैं ॥६॥ हे सुरथेष्ठ । यह मानुप जीवन किससे प्राप्त होवे मार फिर कैसे मृत्यु को प्राप्त होता है ? कही पर देह का आश्रय ग्रहण करके क्या किया जावे ? ७॥ मृते क्व यालीन्द्रियाणि ह्यस्पृश्य स कथ भवेत् । स्वकर्माणि कृतानीह कथ भोक्तु प्रसपति ।। प्रसाद कुरु मे मोह छेत्तमहस्यशेपत । विनतागर्भसम्भूत काश्यपस्तव वाहन Ile इति प्रोततरो भूत्वा कथयस्व यथातथम् । यमलोके कथ यान्ति विष्णुलाके च मानवा ॥ प्रेतमुक्तिप्रद मार्ग कथयस्व प्रसादत ॥१० धर्मपार कथन [ २५१ के वैनतेय महाभाग शृणु सर्वं यथातथम् । प्रीत्या कथयतो यस्मात् सुहृदस्ति भवान् मम ।।११ परस्य योपितं हत्वा ब्रह्मस्वमपहृत्य वै । अरण्ये निर्जने देशे भवन्ति ब्रह्मराक्षसाः ॥१२ हीनजाती प्रजायन्ते रत्नानामपहारकाः । य यं काममभिध्यायेत् स तल्लिङ्गोऽभिजायते ।:१३ नेन छिन्दन्ति शस्त्राणि नेन दहति पावक. । न चैन क्लेदयन्त्यापो न शोपयति मारुतः ।।१४ मनुष्य मृत हो जाने पर इसकी समस्त इन्द्रियाँ कहां चली जाया करती हैं और यह स्पर्श न परने के योग्य कैसे हो जाता है ? अपने किये हुए कर्मों का भोग करने के लिये बसे गमन किया करता है ? भाप मुझ पर प्रसन सोइये और इस मेरे अज्ञान जनित मोह का पूर्णतया छेदन करने के लिये माप योग्य होते हैं । विनता के गर्भ से समुत्पन्न काश्यप पापका वाहन है। इमलिये अधिक प्रसन्न होकर ठीया-ठीक पहने की कृपा कीजिएगा। ये मानव यमलोक मे तो कंगे जाया करते हैं और विष्णु के लोक मे frस प्रकार से पहुंचा करते हैं ? पाप प्रसन्नता पूर्वक प्रेस भाव से मुक्ति प्रदान करने वाला मार्ग क्या है-इसको बतलाइये ॥ ॥ ६॥ १०॥ भगवान् श्री कृष्ण ने कहा--हे महान भाग्यशालिन् । हे वैन तेय ! आप मेरे परम सुहृत हैं इस कारण से मैं तुमको परम प्रोति के साथ यह सभी बतलाता हूँ उसका तुम ठीक- ठोक प्रवरए करो॥११॥ जो पुरुप किसी दूमरे की यो का अपहरण किया करते हैं या किसी ब्रह्मस्व प्रर्यात् ब्राह्मणो को सम्पत्ति का हरण करते हैं ये किसी निर्जन वन में ब्रह्मराक्षस हुमा करते हैं । १२ ।। जो मनुटर रत्नो पा अपहरण करते हैं वे किमी हीन (मोच) जाति वाले के यहाँ जन्म लिया करते * जिम-जिप कामना का अभियान किया करता है वह उमी के लिङ्ग से क्त उत्पन्न होता है।॥ १३ ॥ यह प्रात्मा तो नित्य एवं प्रविनाती है। इम कोशाग्न घेदन नहीं लिया परते है और अग्नि इमरा दाद महीं पर माता
२५२ ]
[ धो गरुडपुराण
है । जल इसको क्लेदित नहीं करता है तथा वायु इसका शोषण नहीं किया
करता है ॥१४॥
वक्चक्षुर्नासिके को गुदी मूत्रपुरीषयोः ।
अण्डजादिकजन्तूना छिद्राण्येतानि सर्वशः ॥१५
नाभेस्तु मूद्ध पर्यन्तमूर्ध्वच्छिद्राणि चाष्ट वै।
सन्तः सुकृतिनो मा ऊर्ध्वच्छिद्रण यान्ति ते ।।१६
अश्छिद्रण ये यान्ति ते यान्ति विगति नराः ।
मृताहाद्वार्षिक यावद्यथोक्तविधिना खग ॥१७
कार्याणि सर्वकर्माणि निर्धनैरपि मानुषैः ॥१८
देहे यत्र वसेज्जन्तुस्तत्र भुक्ते शुभाशुभम् ।
मनोवाक्कायजं नित्यं तत्र तत्र खगेश्वर ॥१६
मृतः सुखमवाप्नोति मायापार्शनं बध्यते ।
पाशबद्धनरस्येह विकर्मणि मनो अमेत् ।।२०
वाक्-चक्षु-नासिका-दोनो कान-गुदा और मून त्याग करने वाली
इन्द्रिय ये सभी भण्डज आदि जन्तुप्रो के छिद्र मात्र ही होते हैं ।। १५ ।। नाभि
से लेकर मस्तक पर्यन्त ऊपर के माग मे पाठ छिद्र हुमा करते हैं । जो सन्त
एव पुण्यात्मा पुरुष होते हैं इन फवं छिद्रो के मार्ग से ही जाया करते है
॥ १६ ॥ नीचे के छिद्रो के मार्ग से जो जाते हैं वे मनुष्य विगति को प्राप्त
होते हैं । हे खग ! जिम दिन मे मृत्यु हो उस दिन से वर्ष पर्यन्त जितने भी
कर्म होते है वे सब कम यथावत् उक्त विधि के अनुसार निधन मनुष्यों के द्वारा
भी मृतक के अवश्य ही करने चाहिए ॥ १७ ॥ १८ ।। जिस देह मे भी यह
जन्तु निवास किया करता है वहां पर हो शुभ मोर प्रशुभ का भोग किया
करता है । हे खगेश्वर ! मन-वाणी पोर गरीर से समुत्पन्न सबको यहाँ-वहाँ
पर ही निरय भोग किया करता है ॥ {|| मृतात्मा सुख की प्राप्ति किया
करता है भोर मापा के पाशो से बद्ध नहीं होता है। जो पाशो से बद्ध मनुष्य
होता है यहाँ पर उसका गन विकाग में भ्रमण किया करता है ॥२०॥
जन्मान्तर गति कथन ما -- २५३ । २-जन्मान्तर गति कथन एवं ते कथितं ताक्ष्यं जीवितस्य विचेष्टितम् । मनुष्याणां हितार्थाय प्रेतत्वविनिवृत्तये ॥१ चतुरशीतिलक्षाणि चतुर्भदैश्च जन्तवः । अण्डजा. स्वेददाश्च व ह्य द्भिज्जाश्च जरायुजाः।।२ एकविंशतिलक्षाणि वण्डजाः परिकीतिताः। स्वेदजाश्च तर्थ वोक्ता उद्भिज्जाश्च कमेण तु ॥३ जरायुजास्तथाऽसंख्या मानुपाद्याः प्रचक्षते । सर्वेषामेव जन्तूनां मानुपत्वं हि दुर्लभम् ॥४ पञ्चेन्द्रियनिधानं तु बहुपुण्यरवाप्यते । ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा ह्यन्त्यजजातयः॥५ रजकश्चर्मकारश्च नटो वरुड़ एव च । कर्तभेदभिल्लाश्च सप्त ताश्चान्त्यजातयः ॥६ म्लेच्छडुम्बविभेदेन जातिभेदात्रपोदश। जन्तूनामिह सर्वेषां भेदानं व सहस्रशः ।। भगवान श्री कृष्ण ने कहा-हे तार्य ! इस प्रकार से हमने तुमको जीवित प्राणी का विचेष्टित घतला दिया है जोकि मनुष्यों के हित सम्पादन फरने के लिये और प्रेतत्व से छुटकारा पाने के लिये होता है ॥१॥ चौरासी लाख योनियां हैं। उनमे चार प्रकार के जन्तुगण जन्म ग्रहण किया करते हैं- कुछ तो उन चार प्रकार के जन्तुमो मे अण्डे से जन्म लेने वाले भएज होते हैं । कुछ स्वेदज जीव हैं जिनका जन्म स्वेद ( पसीना ) से ही हुमा करता है । कुछ नदिभज्न होते हैं जो जमीन से उद्भेदन कर वृक्षादि के रूप में जन्म लेते हैं। पोर चौथी प्रकार के वे जन्तु हैं जो जरा मे लिपटे हुए प्रति जेर से ढके हुए अपन होते हैं जो मनुष्य मादि हैं। ये जरायु कहे जासे हैं ॥२॥ इनमें इक्कीस लाख भएहज जन्तु यताये गये हैं। उसी प्रकार से स्वेदज पौर उभित्र भी ग्राम से रहे गये हैं । जो जरायुज मनुष्य प्रादि हैं वे असख्य कहे २५४ - [ श्री गरुडपुराण जाते हैं । इन समस्त प्रकार के जन्तुओ मे मनुष्य जन्म अत्यन्त दुर्लभ होता है- ॥ ३॥ ४ ॥ यह पांचो ज्ञानेन्द्रियो का निधान मनुष्य जन्म बहुत अधिक पुण्यो के संचय से प्राप्त हुमा करता है । इस मनुष्य योनि में भी ब्राह्मण-क्षत्रिय- वैश्य-शूद्र और अन्त्यज ये जातियां होती है ॥५॥ अन्त्यन जातियां ये सात जातियाँ मानी गई है-रजक (घोबी)-चर्मकार (चमार)-नट-वरुड़-कवतं-भेद पौर भील ये उनके नाम हैं ॥ ६ ॥ म्लेच्छ पोर इम्ब के विशेप भेद से जातियो के भेद तेरह होते हैं । यहाँ पर समस्त जन्तुमो के सहस्रो भेद होते हैं ॥७॥ हारो मैथुनं निद्रा भय क्रोधस्तथैव च । सर्वपामेव जन्तूनां विवेको दुर्लभः परः ।। एकपादादिरूपंश्च दश भेदा हि मानवाः । कृष्णसारो मृगो यत्र धर्मदेशः स उच्यते ।। ब्रह्माद्या देवताः सर्वे मुनयः पितरः खग। धर्मः सत्यञ्च विद्या च तत्र तिष्ठन्ति सर्वदा ॥१० भूतानां प्राणिनः श्रेष्ठा प्राणिनां मतिजीविनः । बुद्धिमत्सु नराः श्रेष्ठा नरेषु ब्राह्मणाः स्मृताः ॥११ ब्राह्मणेषु च विद्वांसो विद्वत्सु कृतबुद्धयः । कृतबुद्धिपु कर्तारः कर्तृषु ब्रह्मवादिनः ॥१२ मानुष्यं यः समासाद्य स्वर्गमोक्षप्रसाधकम् । द्वयोर्न साधयेदेकं तेनात्मा वञ्चितो ध्रुवम् ।।१३ इच्छति शती सहस्र सहस्री लक्षमीहते । कतु लक्षाधिपती राज्य राज्येऽपि सकलचक्रवत्तित्त्वम् ।।१४ माहार (भोजन करना)-मैथुन ( स्त्री जाति के साथ रमण करना) निद्रा (नीद लेना) --भय पोर क्रोप ये सभी जन्तुप्रो को हुमा करते हैं किन्तु विवेक का होना परम दुर्लभ होता है ।। ८ ।। एक पाद मादि रूपो से मानवो के दा भेद होते है । जहाँ पर कृष्ण सार मृग होता है वह धर्म का देश का नाता है ।। ६॥ है खग! ब्रह्मा से प्रादि लेकर सम्पूर्ण देवगरण, सब मुनि मण्डल मोर पितृगण-धर्म--सत्स पोर विद्या ये सब वहाँ पर ही सर्वदा जन्मान्तर गति कथन [ २५५ - स्थित रहा करते हैं ।। १० ॥ प्राणियो को समस्त भूतों में श्रेष्ठ माना जाता है पोर प्राणियो में भी जो मति ( वुद्धि ) के उपयोग से जीवन बिताने वाले हैं थे श्रेष्ठ होते हैं । उन बुद्धिमानो में भी मनुष्य श्रेष्ठ होता है और मरो मे भी प्राह्मण सर्वश्रेष्ठ कहा गया है ॥ ११ । ब्राह्मणो में जो विहान विधा सम्पन्न होता है वह श्रेष्ठ होता है। विद्वानो में भी कृत बुद्धि येष्ठ है तथा कृत बुद्धियो ये कर्ता ( करने वाले ) और कर्मामो मे ब्रह्मवादी श्रेष्ठ होते हैं ॥ १२ ।। यह मनुष्य योनि मे जन्म प्रास करना जोकि स्वग मोर मोक्ष का प्रसाधक है । इन दोनो मे से जिसने किसी भी एक की साधना नहीं की है जिसने निश्चय ही मनुष्य जन्म ग्रहण करके भी अपनी मारमा वा प्रवञ्चन ही किया है ॥१३॥ मनुष्य का स्वभाव होता है कि जिसके पास सौ रुपये होते हैं वह सहन की इच्छा करता है और जिसके पास सहम हो जाते है वह लक्ष का अधिपति होना पाहना है जो लक्ष का स्वामी बन जाता है वह एक विशाल राज्य प्राप्त करने की इच्छा रखता है और राज्य भी प्राप्त हो जाये तो चक्रवर्ती सम्राट बनने की लालसा इंदय मे हुमा करती है ॥१४॥ चक्रधरोऽपि सुरत्व सुरत्वलाभे सकलसुरपतित्वम् । भवितु सुरपतिरूवंगतित्व तथापि न निवर्तते तृष्णा ॥१५ तृष्णया चाभिभूतस्तु नरक प्रतिपद्यते । तृष्णामुक्तास्तु ये केचित्स्वर्गवासं लभन्ति ते ॥१६ श्रात्माधान पुमान् लोके सुखी भवति निश्चितम् । शब्दः स्पर्शश्च रूपञ्च रसा गन्धश्च तद्गुणाः ।। तथा च विषयाधीनो दुखी भवति निश्चितम् ॥१७ पुरङ्गमातङ्गपतङ्गभृङ्गमीनाहताः पञ्चभिरेव पञ्च । एक प्रमादी स कय न हन्यते यः सेवते पञ्चभिरेव पञ्च । पितृमातृमयो वाल्ये यौवने दयितामयः । पुत्रपौत्रमय पश्चान्मूढो नाममयः क्वचित् ॥१६ लोहदारमयं. पाश पुमान्यतो विमुच्यते। पुत्रदारमये. पाशं यद्धो नव प्रमुच्यते ॥२० २५६ ] | श्री गरुडपुराण मृत्योर्न मुच्यते मूढो बालो वृद्धो युवापि वा। सुखदुःखाधिको वापि पुनरायाति याति च ॥२१ एक साम्राज्य का अधीश्वर मानव सुरत्व के पाने की अभिलाषा करता है तथा सुररव के पद की प्राप्ति हो जाने पर सुर पति इन्द्र के पद को चाहना उत्पन्न होती है । सुरपति के पद को भी पाकर उर्ध्वगति होने की इच्छा जागृत हो जाती है और यह तृष्णा बढती हुई चली जाया करती है और इस तृष्णा को शान्ति नहीं हुमा करती है ॥ १५॥ तृष्णा से अभिभूत जन्तु नरक की प्राप्ति करता है । जो इस पिशाचिनी तृष्णा से कोई मुक्त होते हैं वे स्वर्ग का निवास प्राप्त किया करते हैं ॥ १६ ॥ जो पुरुष इस लोक मे मारमाधीन हैं वही निश्चित रूप से सुखी होता है । शब्द-स्पर्श-रूप-रस और गन्ध ये उसके गुण होते हैं। जो पुरुष विषयो के मधीन होता है वह निश्चित रूप से दुखी होता है ।। १७ ॥ कुरङ्ग (हिरण)-मातङ्ग (हाथी)-पतङ्ग-भृङ्ग (भौंरा) मोर मीन (मछली) ये पांचों एक-एक ही विषय मे इतने उन्मत्त होकर सेवन करने वाले होते हैं किन्तु मनुष्य एक ही ऐसा प्रभावी होता है कि जो पांचो इन्द्रियो से पांचो विषयो के सेवन मे निमग्न रहा करता है तो यह क्यो नहीं हनन किया जावे ॥ १०॥ यह मानव बचपन मे तो पिता-माता के वात्सल्य में हया रहता है-यौवन में पत्नी के प्रणय पाश में बद्ध हो जाता है। इसके पश्चाद वाघंका मे पुत्र-पोत्रादि के स्नेह मे डूबा रहता है । इसे अपने पूरे जीवन मे प्रात्मामय होने का कोई भी मरसर ही नहीं होता है मत मात्म चिन्तन कभी भी नहीं किया करता है ।। १६॥ लौह मोर काष्ठ की पाशो से बंधा पुरुप विगुक्त हो जाया करते हैं किन्तु यह पुत्र और पत्नी की पाश ऐसी हैं कि इनसे बंधा हुमा पुरुप कभी भी छुटकारा नही पा सकता है ॥२०॥ यह मनुष्य मूढतावा मृत्यु से कभी भी मुक्त नही होता है चाहे बालक हो- युवा हो मया वृद्ध हो । प्रधिक सुख या दुख से मुक्त होपर यहां से चला जाता है मर्याद मर जाता है और फिर यह माय र जन्म प्रहण विमा करता है। प्रथति पाचागमन परापर लगा रहता है-- मोक्ष नहीं होता है ।।२१।। एक: प्रजायते जन्तुरेक एव प्रलीयते । एको हि भुक्त सुकृतमेक एव च दुप्कृतम् ॥२२ - - जन्मान्तर गति कथन ] । २५७ सर्वपां पश्यतामेव मृतः सर्व जहाति च । भृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्ठसमन्वितम् ॥२३ बान्धवा विमुखा यान्ति धर्मस्तमनुगच्छति । गृहेष्वर्था निवर्तन्ते श्मशाने मित्रबान्धवाः ।।२४ शरीरं वह्निरादत्त सुकृत दुष्कृत व्रजेत् । शरीर वह्निना दग्धं कृतं कर्म सहस्थितम् ॥२५ शुभं वा यदि वा पापं भुड क्त सर्वत्र मानवः । अनस्तमित आदित्ये न दत्त धनमथिनाम् ॥२६ न जानामीति तद्वित्तं प्रातः कस्य भविष्यति । रोरवीति धनं तस्य को मे भर्ता भविष्यति ॥२७ न दत्त द्विजमुख्यानां नाग्नौ तीर्थे सुहृज्जने। पूर्वजन्मकृतात्पुण्यायल्लब्ध वहु चाल्पकम् ॥२८ यह जीवात्मा अकेला ही उत्पन्न होता है और एक ही इस लोक से प्रलय को प्राप्त होता है अर्थात् मर कर भी अकेला ही चला जाता है। मह जो कुछ भी सुकृत कर्म करता है उसका फन या जो कुछ भी पाप कर्म करता है उसका कुफल भी यह अकेला ही भोगता है। इस भोग में भोर पावागमन में कोई भी अन्य साथी नहीं होता है ॥ २२॥ सभी लोगो के देखते हुए जब इसका समय मा जाता है मृत्यु को प्राप्त होकर चला जाया करता है और सभी कुछ यही छोड जाता है। उस समय में विशाल वैभव मोर प्रारणो से भी अधिक प्रिय मित्र-बन्धु कोई भी आहे नही माते हैं । गृत पारीर को काठ और लोठ से समन्वित कर पर्याद दाह करके या दफना कर वान्धव लोग छोड़ कर विमुख होते हुए चले जाते हैं। उस समय में यदि कुछ धर्म का काम किया है तो वही उसके साथ जाया करता है। धन, वैभव तो घर में ही रह जाता है मौर मित्र तथा बान्धय श्मशान में छोडकर वहीं से चले जाते हैं ॥ २३ ॥ ॥ २४ ॥ इस पागेर को माग्न ग्रहण कर नष्ट कर देती है केवल मुहत और दुष्कृत ही जो उसने अपने जीवन में किया है साथ जाया करता है । धन- बारा मौकरीर वह्नि से जला हुप्रा सब नष्ट होकर केवल क्यिा हुमा २५८ ] [ श्री गडपुराण काल में एक मात्र कर्म साथ में रहता है ॥ २५ ॥ शुभ कर्म हो या पाप क हो उसका फल प्रकेसा ही मानव सर्वत्र भोगा करता है। सूर्य के पर न होने के समय में याचको को धन का दान नही किया है-मैं यह नहीं जानता हूँ कि यह धन जिसका सञ्चय किया है वह कल प्रात' किसका होगा? धन भी बराबर रुदन करता है कि क्ल मेरा स्वामी कौन होगा? ।। २६ । पूर्व जन्म के किये हुए पुण्य के पल से जो भी अधिक या कम धन प्राप्त किया है उसे न तो ब्राह्मणो को दान मे दिण और न मग्नि की सेवा में हवन के रूप में ही समर्पित किया है-न कोई उस धन से तीर्थाटन किया और न किसी मित्र मादि के हित में ही व्यय किया या उसका विनियोग उप. कारार्थ किया है ॥२८॥ तदीदृशं परिज्ञाय धर्मार्थे दीयते धनम् । धनेन धार्यते धर्म श्रद्धायुक्त न चेतसा ।।२६ श्रद्धाविहीनो धर्मस्तु नेहामन च वृद्धिभाक् । धर्मात्सञ्जायते शर्थों धर्मात्कामोऽभिजायते ॥३० धर्म एवापवर्गाय तस्माद्धर्म समाचरेत् । श्रद्धया धार्यते धर्मो वहुभिर्थिराशिभि ॥३१ अकिञ्चना हि मुनय. श्रद्धावन्तो दिवङ्गता.। प्रश्रद्धया हुत दत्त तपस्तप्त' कृतच यत् ॥ प्ररादित्युच्यते पक्षिन्प्रेत्य नेह न तत्फलम् ॥३२ सो इस धन को ऐसी स्थिति वा भली भांति ज्ञान करके धर्म के लिये धन का विनियोग पिया जाता है। श्रद्धा युक्त चित्त से धन के द्वारा धर्म को धारण किया जाता है ।। २६॥ जो बिना श्रद्धा के घम किया जाता है उससे न तो यहाँ कुछ वृद्धि होती है और न परलोक में ही उसका सहारा प्राप्त होता है । धर्म से ही अर्थ होता है और धर्म से ही काम होता है ॥३०॥ धर्म ही पपवर्ग के लिये सहायक होता है । इसलिये धर्म का माचरण करना घा हए । श्रद्धा से पमं धारण किया जाता है अत्यधिक पन के समूह से धर्म को अछि नही किया जाता है ॥ ३१ ॥ भविञ्चन मुनिगण श्रदा वाले होने - दान फल कथन ] [ २५६ के कारण स्वर्ग गामी हुए थे । मुनियो के पास कुछ भी धन नहीं था। धन का कुछ भी महत्व नहीं है- महत्त्व है श्रद्धा का-सा ही धन-धर्म का निर्वाहक होता है। प्रथद्धा से हवन किया हुघा-तपस्या की हुई मोर जो कुछ भी किया गया है वह सभी असत् कहा जाता है। हे पक्षिन ! मरने के पश्चात ऐसे हवन-दान-धर्म पोर तप से कुछ भी फल प्राप्त नहीं हुप्रा करता है । यह सब व्ययं ही हो जाता है ।।३२।। ३--दान फल कथन कर्मणा केन देवेशं प्रेतत्वं नव जायते । पृथिव्या सर्वजन्तूनां तन्मे ब्रूहि सुरेश्वर ॥१॥ शृणु वक्ष्यामि सझेपास्कियाञ्चैवीर्वदैहिकीम् । स्वहस्तेनैव सा कार्या मोक्षकामस्तु मानवः ॥२ स्त्रीणामपि विशेषेण पञ्चवर्षाधिके शिशी। वृपोत्सर्गादिकं कर्म प्रेतत्वविनिवृत्तये ॥३ वृपोत्सर्गादृते नान्यत्किञ्चिदस्ति महोतले । जीवन्वापि मृतो वापि वृपोत्सर्ग करोति यः ।। प्रेतत्व न भवेत्तस्य विना दानविना मख.४ कस्मिन्काले वृपोत्सर्ग जीवन्वापि मृतोऽपि वा । कुर्यात्सुरवरश्रेष्ठ ब्रूहि मे मधुसूदन । किं फल तु भवेज्जन्तोः कृत. श्रादं स्तु पोडशं. ॥५ अकृत्वा तु वृपोत्सर्ग कुरुते पिण्डपातनम् । नोपतिष्ठति तन्छे यो दत्त प्रेतस्य निष्फलम् ॥६ एकादगाहे प्रेतस्य यस्य नोत्सृज्यते वृपः । प्रेतत्व सुस्थिर तस्य दतै. श्राद्धशतैरपि ॥७ श्री गन्द ने कहा-हे सुरेश्वर ! हे देवेश ! ऐसा कोनसा कर्म है जिसके करने से प्रेतय की प्राप्ति नहीं होती है ? पाप कृपा करके मुझे यही बताइये कि जिस कम से पृथ्वी में समस्त जन्तुप्रो को प्रेतरव न हो ॥१॥ श्री भगवान् । २६० ] [ श्री गरुडपुरार ने कहा-मब हम ऊर्व देह से सम्बन्ध रखने वाली प्रौवं वैहिकी क्रिया मर्या, देह के नाश हो जाने पर की जाने वाली क्रिया सक्षेप में बतलाते हैं उसका श्रवण करो। मोक्ष की कामना रखने वाले मानवो को वह अपने ही हाथ से सम्पन्न करनी चाहिये ॥२॥ स्त्रियो को भी शिशु के पांच वर्ष से मषिक हो जाने पर विशेष रूप से वृष का उत्सर्ग मादि कम प्रेतत्व के निवारण करने के लिये करना चाहिए ।।३। इसी महीतल मे वृष के उत्सर्ग से अधिक मर्थात इसके बिना अन्य कुछ भी नही है । जीवित रहते हुए प्रथवा मृत होने के बाद जो वृष का उत्सर्ग करता है उसे बिना किसी अन्य दान मौर मखो के हो मर्थात् यज्ञादि किये बिना ही प्रेतत्व नहीं होता है ॥४॥ गरुड ने कहा-हे सुरवरों में श्रष्ठ | हे मधुसूदन यह वृष का उत्सग (स्याग ) किम समय में जीवित अपया मृत की दशा मे करना चाहिए ?-यह कृपया बतलाइये । इसका जतु को तथा पोडश श्रासो के करने का क्या फन होता है ? ॥५॥ श्री कृष्ण भगवान ने कहा-वृप के उ सर्ग के बिना अर्थात् बिजार छोडने के बिना जो कोई भी पिण्डो का पातन करता है उसका कुछ भी धैय प्रेत को दिया हुमा नहीं होता है और वह सब निष्फन ही होता है ॥६॥ मृत्यु के ग्यारहवें दिन जिस प्रेत के लिये वृप का उत्सर्ग नहीं किया जाता है उसको प्रतत्व सुस्थिर होता है च हे उसके लिये सैकडो ही श्राद्ध क्यो नही दिये जावें ॥७॥ पुत्रा यस्य न विद्यन्ते न माता न च बान्धवा । न पत्नी न च भर्ता च कथ स्यादौलदैहिकम् ॥ केन मुक्ति प्रपद्यन्ते नरा नायर्यो गतापद । एतन्मे सशय देव छेत्तुमर्हस्यशेपत. 18 अपुत्रस्य गतिर्नास्ति स्वर्गो नंव च नैव च । येन केनाप्युपायेन पुत्रस्य जननश्चरेत् ॥१० सपुत्रा वा ह्यपुरो वा नरी नारी पतिस्तथा । जीवन व स्वय दुर्म्यान्मृतो ह्मक्षयमाप्नुयात् ।।११ यानि यानि च दानानि स्वय दत्तानि मानवै । तानि तानि च सर्वाणि ह्य पतिष्ठन्ति चामत. ॥१२ दान फल कथन ] [ २६१ गरुड ? गति होती व्यञ्जनानि विचिनाणि भक्ष्यभोज्यानि यानि च । स्वय हस्तेन दत्तानि देहान्ते चाक्षय फलम् ॥१३ गोभूहिरण्यवासासि भोजनानि पदानि च । यत्र तन बसेज्जन्तुस्तक तनोपतिष्ठति ।।१४ कहा-जिस पुरुष के कोई भी पुत्र न हो मोर माता और कोई घर भी न हो-पली भर्ता मादि भी कोई न हो उसके लिए प्रौवं दैहिक कर्म कैसे हो सकता है । क्योकि इसे करने वाला तो कोई रहता ही नही है ॥८॥ हे भगवन् , ऐसे गतापद नर और नारी रिस प्रकार से मुक्ति को प्राप्त होते हैं । यह मेरा बहुत अधिक सशय है। कृपाकर इसका निवारण करने मे पाप योग्य होते हैं ॥६॥ श्री भगवान ने कहा-जो पुन से रहित है उसकी तो नहीं है। उसे स्पर्ग तो पास ही नहीं होता है। किसी भी उपाय से पुत्र की उत्पत्ति तो अवश्य ही करनी चाहिए ॥१०॥ जो मयुर है पर्थात् “पुर से रहित होता है वह चाहे नर हो या नारी हो उसे जीवित रहते ही स्वय अपनी पौवं दैहिको क्रिया कर लेनी चाहिये जिससे मृत होकर वह अक्षय पद को प्राप्त कर लेवे ॥११॥ जो भी कोई दानादि मानवो के द्वारा स्वय दिये गये हैं वे सब मागे उपस्थित रहा करते हैं ॥१२॥ विविध भांति के विचित्र व्यञ्जन मौर भक्ष्य भोज्य पदार्थ जो स्वय हाथ से दिए गए हैं वे सब देह के अन्त हो जाने पर प्रक्षय फल प्रदान किया करते है ।।१३।। गो, भूमि, सुवरणं वस्त्र भोजन और पद ये सभी यह जन्तु जहाँ जहाँ पर भी वास किया करता है वहाँ वहाँ पर ही उपस्थित मिला करते हैं ।।१४।। यावत्स्वास्थ्य शरीरस्य तावद्धर्म समाचरेत् । मस्वस्थ प्रेरितश्चान्यनं किंचित्कर्तु मुत्सहेत् ११५ यावत्तस्य मृतस्येह न भूत चौर्वदेहिकम् । वायुभत क्षुधाविष्टो भ्रमते च दिवानिशम् ॥ कृमिकीटपतङ्गो वा जायते म्रियतऽपि स । असद्गर्भ बसेत्सोऽपि जात सद्यो विनश्यति ॥१७ २६२ ] [ श्री गरुडपुराण यावत्स्वस्थमिद शरीरमरुज यावज्जरा दूरतो । यावच्चेन्द्रियशक्तिरप्रतिहता यावत्क्षयो नायुप । प्रात्मश्रेयसि तावदेव विदुपा काय्य प्रयत्नो महान् । सदीप्त भवने हि कूपसनन प्रत्युद्यम कीदृश ॥१८ जब तक इस शरीर में स्वस्थता विद्यमान रहती है तभी तक धर्म का पाम कर लना चाहिए । जब यह स्वय अस्वस्थ हो जाता है तो फिर अन्यो के द्वारा प्रेरित होकर कुछ भी करने का नत्साह नही किया करता है पर्यात उस अशक्तावस्था मे इससे कुछ भी नहीं बन पडता है ॥१५॥ इस लोक में मृत जन्तु का जव तक मौवं दैहिक कम नहीं होता है तब तक यह क्षुधा से प्राविष्ट होकर वायुभूत होता हुमा रात दिन भ्रमण किया करता है ॥१६॥ प्रयका कोई कृमि, कीट या पतङ्ग बनकर उत्पन्न होता है पोर मर जाया करता है। वह ऐसे असत् गभ म वास किया करता है कि तुरन्त ही विनष्ट हो जाता है ॥१७॥ अतएव जब तक यह शरीर रोगो से रहित है और जब तक वुढापा इसको प्राप्त नही होता है, जिस समय तक इसको इन्द्रियाँ अप्रतिहत शक्ति से सम्पन्न रहती हैं मोर प्रायु का क्षय नही होता है तभी तक विद्वान् मोर शोनयुक्त पुरुष को अपनी मात्मा के कल्याण के लिए महान् प्रयत्न करना चाहिए । जब पर में अग्नि लगवर खूब प्रदीप्त हो जाती है उस समय उमे बुझाने के लिये कुएं का खोदने का उद्यम वरना क्या कर सकता है ? अर्थात् वह उद्यम तो प्यय सा ही होता है। जब तक कुप्रा तैयार होगा तब तक अग्नि सभी को भस्मसात् कर देता है ॥१८॥ ४-श्रीर्घ दैहिक क्रिया कथन और वृपोत्सर्ग स्वहस्तं किं फल देव परहस्तैश्च तद्वद । स्वस्थावस्थैरसज्ञ विधिहीनमथापि वा ॥१ एका गो स्वस्थचित्तस्य ह्यस्वनस्थस्य च गोशतम् । सहस्र नियमारणस्य दत्त चित्तविवर्जितम् ॥२ मृतस्यैव पुनर्लक्ष विधिहीनञ्च निष्पलम् । तीर्थपात्रसमायोगादेका वै लक्षपुण्यदा ॥३ मोध्वं दैहिक क्रिया कयन और वृपोत्सगं ] । २६३ पात्रे दत्त खगश्रेष्ठ हहन्यहनि वद्धते । दातुर्दानमपापाय ज्ञानिनां न प्रतिग्रहः । विपशीतापही मन्य वह्नि किं दोपभाजिनौ ।।४ दातव्य प्रत्यह पाने निमित्तेपु विशेषतः । नापाने विदुषा किञ्चिदात्मन. श्रेय इच्छता ॥५ अपात्रे सा च गौर्दत्ता दातार नरकं नयेत् । कुलकविंशतियुत गृहीतारञ्च पातयेत् । देहान्तरं यदावाप्य स्वहस्तसुकृतञ्च यत् ॥६ धन भूमिगत यद्वत्स्वहस्तेन निवेशितम् । तद्वत्फलमवाप्नोति ह्यहं वच्मि खगेश्वर ॥ गरुड ने कहा-हे देव ! अपने ही हाथो से किये हुए का क्या फल होता है और दूसरी के द्वारा किये हुए का यया फल है ? स्वस्य पवस्था में रहते हुए या अस्वस्थ एव सज्ञा शून्यो के द्वारा किये हुए का क्या फल है ? जो कुछ भी किया जाये वह विधि से रहित हो तो उसका पया फल होता है ?--यह कृपया सब बताइये ।।१।। श्री कृष्ण ने कहा-जो स्वस्थ वित्त वाला हो उसकी दान की हुई एक गो और जो अस्वस्थ चित्त वाला है उसकी दी हुई एक सौ गौ-मरगे के जो निकट हो उसकी दी हुई एक हजार गो का दान बराबर होता है क्योकि उम ममय तो उसका चित्त स्थिर ही नहीं रहता है । मृत होने पर एक लाख गो का दान बराबर होता है। जो दान मादि विधि से रहित है वह तो बिल्कुल फल से शून्य हुमा करता है । तीर्थ और सत्पात्र के समायोग होने पर एक ही गो का दान एक लाख गौ के दान के समान पुण्य फल के देने धाला हुमा करता है । दान में पात्र और स्थान का बड़ा महत्व होता है ॥२३॥ हे खगश्रेष्ठ | सत्पात्र में दिया हुआ दान दिनो-दिन बढा करता है। माता का दान प्रपाप के लिये होता है ज्ञानियो का प्रतिग्रह नही होता है । विप और शीत का सपहरण करने वाला दह्नि मन होता है फिर क्या दोष है ? ॥४६ प्रति- दिन पान में ही दान देना चाहिए और विशेष परके निमित्त में भी दान देवे । जो अपना थेय चाहता है उसे विद्वान् पुरुष को कभी भी किमी प्रपात्र को दान २६४ ] [ श्री गरुडपुराण - नहीं देना चाहिए ॥१॥ यदि किसी सस्पानता से रहित पुरुष को गौ का दान दिया जाता है तो वह दाता को नरक में ले जाता है। जो दान ग्रहण करता है उसके भी इकोस कुलों का वह पातन किया करता है। अपने हाथ से जो भी सुकृत किया गया है वह दूसरे देह में प्राप्त होता है ।।६॥ जिस प्रकार से अपने हाथ से भूमि में रक्खा हुमा धन प्राप्त होता है उसी तरह फल की प्राप्ति हुमा करती है । हे खगेश्वर ! मैं यह बतलाता हूँ॥७॥ अपुत्रोऽपि विशेपेण क्रियश्च वीर्वदेहिकीम् । प्रकुन्मिोक्षकामश्च निधनश्च विशेपतः ॥ स्वल्पेनापि हि वित्तेन स्वयं हस्तेन यत्कृतम् । अक्षयं याति तत्सर्वं यथाज्यञ्च हुताशने 16 एका एकस्य दातव्या शय्या कन्या पयस्विनी। सा विक्रीता विभक्ता वा दहत्यासप्तमं कुलम् ।।१० तस्मात्सर्व प्रकुर्वीत चञ्चले जीविते सति । गृहीतदानपाथेयः सुखं याति महाव्वनि ॥११ अन्यथा क्लिश्यते जन्तुः पाथेयरहितः पथि । एव ज्ञात्वा खगश्रेष्ठ वृपयज्ञ समाचरेत् ।।१२ अकृत्वा म्रियते यस्तु सपुत्रोऽपि न मुक्तिभाक् । अपुत्रोऽपि हि यः कुर्यात्सुखं याति महापथे ॥१३ अग्निहोत्रादिभिर्यज्ञनिश्च विविधरपि । न तां गतिमवाप्नोति वृपोत्सर्गेण या भवेत् ॥१४ जिसके कोई भी पुत्र न हो वह भी विशेष रूप से अपनी मौर्य दैहिकी क्रिया करे । जो मोक्ष की कामना करने वाला है और विशेष रूप से निधन हो उसे भी मौवं देहिको क्रिया अवश्य ही अपने माप ही करनी चाहिए ।।८।। चाहे बहुत थोडा ही धन हो उमी से अपने माप स्वयं हाथ से जो कुछ भी किया गया है वह सब भक्षय होता है, जिस तरह मग्नि में दिया हुअा मर्यात् हवन किया हुमा घृत अक्षय होता है ।।६। एक को एक ही कन्या, शम्या और पय. स्विनी देनी चाहिए। यदि उसका कोई विक्रय तथा विभाग करता है तो वह माध्वं दैहिक क्रिया कथन पोर वृपोत्सर्ग ] [ २६५ सान कुनो का दाह किया करता है ॥१०॥ इस कारण से गह सभी कुछ अपने इस चंचन एवं अस्थिर जीवन में हो कर लेना चाहिए जिसने जीवित रहते हुए हो दान का पाथेय ग्रहण कर लिया है वह मरने के पश्चात् उस यमपुरी के महामार्ग मे सुख पूर्वक गमन किया करता है ॥११॥ जैसे कोई मार्ग मे खाने की सामग्री से रहित मनुष्य यात्रा मे दुःखित होता है वैसे ही यह जन्तु भी दान के पाथेष से रहित होकर सदा क्लेश भोगा करता है । हे खा श्रेष्ठ ! इस प्रकार से समझ कर वृष यज्ञ का समारम्भ करना चाहिए ॥१२॥ जो इस वृपयज्ञ को न करके यो हो मृत्युगत हो जाता है वह चाहे सुन्दर पुत्र वाला भी क्यों न हो किन्तु मुक्ति को प्राप्त नही किया करता है। जो बिना पुत्र वाला भी हो और इस वृपयज्ञ को कर लेना है वह उस महामार्ग मे सुख पूर्वक गमन किया करता है ।।१३॥ अग्निहोत्र प्रादि से, यज्ञो से और विविध प्रकार के दानो से भी मनुष्य उम गति को प्राप्त नही होता है जो गति वृपोत्सर्ग से प्राप्त हो जाती है ॥१४॥ सर्वोपामेव यज्ञानां वृपयज्ञस्तथोत्तमः। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन वृपयज्ञ समाचरेत् ॥१५ कथयस्व प्रसादेन वृपयज्ञक्रिया तथा । कस्मिन्काले तिथो कस्यां विधिना फेन तद्भवेत् ।। कृत्वा कि फलमाप्नोति ह्य तन्मे वद साम्प्रतम् ॥१६ कात्तिकादिपु मासेपु ह्य त्तरायणगे रवी । शुक्लपक्षे तथा कृष्ण द्वादश्यादिशुभे तिथौ। शुभे लग्ने मुहूर्ते वा शुचौ देशे समाहित ॥१७ ब्राह्मणन्तु समाहूय विधिज्ञ शुभलक्षणम् । जाहोमस्तथा दानः प्रकुर्याद्दहशोधनम् ॥१८ पूण्येऽह्नि शुभनक्षत्रे ग्रहान्देवान्समर्चयेत् । होमं कुर्य्याद्यथाशक्ति मन्त्रंश्च विविधैः शुभैः ॥१६ ग्रहाणां स्थापन कुश्या पूजनञ्च खगेश्वर । मातृणा पूजन कुर्याद्वसोर्धारान्च कारयेत् ॥२० 1 [ श्री गझटपुगए ह्नि संस्थाप्य तत्र व पूर्णहोमञ्च कारयेत् । शालग्रामञ्च संस्थाप्य वैष्णव श्राद्धमाचरेत् ॥२१ समस्त प्रकार के यशो में वृषयज्ञ सबसे उत्तम यज्ञ होता है । इसलिये सम्पूर्ण प्रयत्न से वृपयज्ञ को करना चाहिये ॥१५॥ गरुड ने कहा-भगवन् ! कृपाकर वृषयज्ञ की सम्पूर्ण क्रिया का वर्णन कीजिये । किस समर में और किम तिथि में, किप विधान से इसे किया जाता है ? इसके करने से किरा फन को प्राप्ति होती है ?--यह सब अब मुझे बतलाइये ॥१६॥ श्रीकृष्ण ने कहा- कातिक प्रादि मापो में जब कि सूर्य उत्तरायण हो जावें-शुक्न पक्ष में प्रयवा कृष्ण पक्ष में द्वादशी प्रादि शुभ लिपि के दिन, शुभ लग्न मे पोर उत्तम मुहूर्त मे, किसी पवित्र स्थल में समाहित होकर स्थित हो जाना चाहिये ॥१७॥ फिर किसी विधि के ज्ञाता शुभ लक्षणो से समन्वित ब्राह्मण को बुलवा कर जाप, होम और दानो के द्वारा सर्व प्रथम देह का शोवन करना चाहिये ॥१८॥ पुण्य दिन में और शुभ नक्षत्र में समस्त ग्रहो का तथा देवतानो का प्रचंन करे । अनेक' शुभ मन्त्री के द्वारा शक्ति भर होम करना चाहिये ॥१६॥ हे खगेश्वर ! ग्रहो की स्थापना करे और उनका सविधि पूजन करे । पोडश मातृकामो का यजन करके वसुधारा करे ॥२०॥ वहाँ पर हो अग्नि की स्थापना करके पूर्ण होम कराये। भगवान शालग्राम को सस्थापित करके वैभव याद्ध करे ॥२१॥ वृपं सम्पूज्य तव वस्त्रालङ्कारभूपणैः । चतस्रो वत्सतर्यस्ता. पूर्व समधिवासयेत् ॥२२ प्रदक्षिणां प्रकुर्वीत होमान्ते तु विसर्जयेत् । इम मन्त्र समुच्चार्य ह्य त्तराभिमुसं स्थितः ॥२३ धर्मस्त्वं वृषरूपेण ब्रह्मणा निर्मितः पुरा । वृपोत्सर्गप्रभावेण मामुदर भवाणवात् ।।२४ अनेनैव वृपोत्सर्ग रुद्रकुम्भोदकेन तु । दर्भमूले घट स्थाप्य उदकं शिरसि न्यसेत् ॥२५ अभिपिच्य शुभमंगैः पावनविधिपूर्वकम् । तेन क्रीड़ेति मन्त्रेण वृयोमर्गे कृते सति ॥२६ -- मौवं दैहिक क्रिया कथन पौर वृपोत्सर्ग ] २६७ प्रात्मश्राद्ध तत कुाद्दत्त्वा चान्न द्विजोत्तमे। उदके चैव गन्तव्य जल तन प्रदापयेत् ॥२७ यदिष्ट जीवितस्यासीत्तद्द्याच्च स्वशक्तित । सुतृप्तो दुस्तर मार्ग मृतो याति सुखेन हि ॥२८ वहाँ पर ही उपयुक्त समस्त क्रिया परने के पश्चात् वृप का पूजन करे घोर वस्त्रालङ्कारो से सुसज्जित करे । चार वत्सतरियो को पहिले लाकर उनका अधिवाम करे ॥२२॥ प्रदक्षिणा करे और होम के अन्त मे निम्नावित मन्त्र का उच्चारण करता द्वया उत्तर मोर मुख करके स्थित हो विसजन करे । मन्त्र -पाप धर्म हैं ब्रह्मा ने पहिले वृप के रूप में आपका निर्माण किया था। अब तृपोत्सर्ग के प्रभाव स मुझको इस ससार रूपी समुद्र से उद्धार करो ॥२३॥२४॥ शुभ मन्त्री के द्वारा जो कि परम पावन मन्त्र हैं, विधि के सहित अभिषेक करे। फिर 'तेन क्रीड"-इस मन्न से वृपोत्सग किये जाने पर फिर अपना याद करे और किसी श्रेष्ठ द्विज को अन्न दान करे। फिर जलाशय पर जाकर वहां जन देवे ॥२५॥२६॥२७॥ जो अपने जीवित का इष्ट हो उस पार्य को भी यथाशनि देना चाहिये। इस प्रकार से सुतृप्त होवे। ऐसा करने पर जद्र भी मृत होगा तो यमपुरी के महान् दुस्तर मर्ग मे परम सुख से चना जाता है । ॥ २५ ॥ यावन्न दीयते जन्तो श्राद्धञ्च कादशाह्निकम् । स्वदत्त परदत वा नेहामुत्रोपतिष्ठति ॥२६ त्रयोदश तथा सप्त पञ्च त्रीणि यथाक्रमम् । पददानानि कुर्वीत श्रद्धाभक्तिममन्वित ॥३० तिलपात्राणि कुर्वीत बोरिण पञ्च च सप्त वा । ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाद्गामेकाञ्च प्रदापयेत् ॥३१ वामे चक्र प्रवर्त्तव्य त्रिशूल दक्षिरे तथा । माल्य दत्त्वा तथैवास्य वृपमेक विमर्जयेत् ॥३२ एकोद्दिष्टविधानेन स्वाहाकारेग्ण बुद्धिमान् । कुर्यादेकादशाह तु द्वादशाह प्रयत्नत ॥३३ ।
[ श्री गरुडपुराण सपिण्डिीकरणादविकुच्छिाद्धानि पोडश । ब्राह्मणान्भोजयित्वा तु पददानानि दापयेत् ॥३४ कासोपरि सस्थाप्य ताम्रपाने तथाच्युतम् । बस्मरणाच्छाद्य तयस्थमध्यं दद्याच्छुभे. फलः ॥३५ जब तक एकादशवें दिन का श्राव जन्तु को नहीं दिया जाता है चाहे वह अपने पाप से ही किया जावे या दूसरे के द्वारा दिया जावे । इसके बिना यहाँ और परलोक में उपस्थित नहीं होता है ॥२६॥ त्रयोदश तथा सात-पांच पौर तीन यथा कम श्रद्धा-भक्ति से युक्त होकर पदो का दान करना चाहिए । ॥३०॥ तीन, पांच भयवा सात तिल के पात्र बनाये और दान करे। पीछे भ्राह्मणों को भोजन करावे मोर एक गो वा दान करे ॥३१॥ वाम भाग में चक्र बनावे पौर दक्षिण मे त्रिशूल करे फिर माल्य इसको देकर एक वृप का उत्सर्ग करना चाहिए ॥३२॥ बुद्धिमान पुरुष को एकोदिष्ट विधान से स्वाहाकार से एकादशाह करना चाहिए तथा फिर प्रयत्न पूर्वक द्वादशाह करे ॥३३॥ पिण्डी कर्म करने से मर्वाक ही पोडश श्राद्ध करे। ब्राह्मणों को भोजन करा कर उन्हे पदो का दान देवे ॥३४॥ कार्पास के ऊपर सस्थापित करके तान के पात्र में प्रच्युत् भगवान को वस्त्र रो माच्छादित करे, शुभ फलो से वहाँ पर स्थित को मध्य देवे ॥३॥ नावमिक्षुमयी कुर्यापट्टसूत्रण वेष्टितम् । कास्यपाने घृत स्थाप्य वैतरण्या निमित्तकम् ॥३६ नावमारोहयेद्गन्तु पूजयेद्गरुडध्वजम् । अात्मवित्तानुसारेण तस्या दानमनन्तकम् ॥३७ भवसागरमग्नाना शोकतापोमिदु खिनाम् । धर्मप्लवविहीनाना तारको हि जनार्दन ॥३६ तिललोह हिरप्यञ्च कास लवण तथा । सस्पनरय वितिय एलामा पत्तसमृराम् २०३६ तिलपानाणिकर्षीत शय्यादानश्च कारयेत् । दीनानाथविशिष्टम्यो दद्याच्छक्त्या च दक्षिणाम् ।।४० प्राध्य दैहिक क्रिया कथन और वृपोत्सर्ग । [ २६६ एव यः कुरुते तार्य पुत्रवानप्यपुत्रवान् । स सिद्वि समवाप्नोति यथा ते ब्रह्मचारिण: ॥४१ नित्य नैमितिक कुर्याद्यावज्जीवति मानवः । यत्किञ्चित् कुरुते धर्ममक्षय फलमाप्नुयात् ।।४२ एक इशुमयी नौका की रचना करावे । यह सूप से येष्टित कांसे के पात्र में वैतरणी नदी के निमित्त त स्थापित करना चाहिए ॥३६॥ उप नौका से गमन करने के लिये भरूढ़ करावे और भगवान् गरुडध्वज का पूजन करे । अपने धन की शक्ति के अनुमार उसके मनन्त दान होते हैं ॥३६॥ निपात्रों का दान करे और शम्पा का दान करे। दीन, मन थ और विशिष्टों को यया. शक्ति दक्षिणा देनी चाहिए ॥४०॥ इस प्रकार से जो सम्पूर्ण विधि को साङ्ग सम्पादित किया करता है, हे तार्थ ! वह चाहै पुत्र वाला हो या अपुत्री हो, जिस तरह ब्रह्मचारी प्राप्त किया करते हैं वैसे ही सिद्धि को प्राप्त करता है । ॥४१॥ मनुष्य जब तक जीवित रहता है उसे सभी नित्य कम और नै मत्तिक कर्म करने चाहिए। जो भी कुछ मनुष्ध धर्म करता है 34 मर फर प्राप्त किया करता है ॥४२॥ तीर्थयात्रावतानाञ्च श्राद्ध सावत्सरादिके । देवतानां गुरूणाच मातापिनोस्तथैव च ॥४३ पुण्य देय प्रयत्नेन प्रत्यहं वर्द्ध ते खग। अस्मिन्यज्ञे हि यः कश्विद्भरिदान प्रयच्छति ॥४४ तत्तस्य चाक्षय सर्व वेदिकायां यथा किल । यथा पूज्यतमा लोके यतयो ब्रह्मचारिणः ॥४५ तथैव प्रतिपूज्यन्ते लोके सर्वे च नित्यशः। वरदोह सदा तस्य चतुर्वक्त्रस्तथा हरः ।।४६ ते यान्ति परमान्तकानिति सत्य वचो मम । पारर्णमास्याञ्च रेवत्या नीलमेक प्रमुञ्चयेत् ।।४७ सकान्तीना सहस्राणि सूर्यपर्वशतानि च । कृत्वा यत्फलमाप्नोति तद्व नीलविसर्जने ॥४ २७० । [ श्री गरुडपुराण' वत्सतरी प्रदातव्या ब्राहाणेभ्यः पदानि च । तिलपात्राणि देयानि शिवभक्तद्विजेषु च ।।४६ तीथों को यात्रा-बत प्रादि को शपिक श्राद्ध में देवतामों के और गुरुप्रो के तथा माता-पिता के लिये जो किया जाता है देने के योग्य पुण्य प्रयत्न पूर्वक प्रतिदिन वृद्धि को प्राप्त होता है हे खग ! इस वृपोत्सर्ग यज्ञ में जो कोई भी बहुत अधिक दान देता है उसका यह सभी अक्षय हो जाता है जिस प्रकार से वेदिका में किया हुमा कम अक्षम होता है । जिस तरह लोक मे यति वर्ग और ब्रह्मचारी गण पूज्यतम होते हैं उसी भाति ये दान देने वाले सभी लोक मे पूजित हुमा करते हैं पोर में तथा ब्रह्मा एव हर मदा नित्य ही उमको वरदान देने वाले होते हैं ।। ४३ ।। ४४ ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ वे लोग सब परम श्रेष्ठ लोको मे गमन करते हैं--यह मेरा वचन बिल्कुल पत्य एवं धूव है । पूर्णमासो तिथि के दिन और रेवती नक्षत्र में एक नील का विसर्जन करे ॥४७॥ सहस्रो संक्रान्ति मोर सेकडो सूर्य पर्व करवे जो फल प्रा होता है वही एक नील के विसर्जन करने का पुण्य-फल हुमा करता है ॥ ४८ ।। ब्राह्मणो को वसतरी का दान करना चाहिए और पद भी देवे--तिलो से परिपूर्ण पात्रो का दान करे । जो ब्राह्मण शिव के भक्त हो उनको दान करे ॥ ४६॥ उमा महेश्वर व परिधाप्य प्रयत्नतः । अतसीपुप्पसंकाशं पीतवाससमच्युतम् ।।५० ये नमस्यन्ति गोविन्दं न तेपां विद्यते भयम् । प्रेतत्वान्मोक्षमिच्छन्ति ये करिष्यन्ति स्वकियाम् ॥५१ एतत्ते सर्वमारयातं मया स्वञ्चौवं दैहिकम् । यच्छु त्वा मुच्यते पाविष्णुलोकं स गच्छति ॥५२ श्रु त्वा माहात्म्यमतुलं गरुड़ो हपंमागतः । भूयः पप्रच्छ देवेश कृत्वा चानतकन्धरम् ।।५३ उमा और महेश्वर का प्रयत्न पूर्वक परिधान करके अलपी के पुप्प के सदा-पीत वस्त्र धारी भगवान् प्रच्युत गोविन्द को जो नमन किया करते. हैं उनकी भी भय नहीं होता है । जो प्रेतत्व से छुटकारा पाने की इच्छा मोध्यदैहिक दिसम्कार ] [ २७१ रखते हैं ये अपनी क्रिया को करेंगे ॥ १०॥ ५१ ।। मैंने तुमसे यह मय अपनी पोय हिर प्रिया वा पूर्ण वणन कर दिया है। इसका जो प्रयाण करता है पह पापों से मुक्त हो जाता है और पन्त में विष्णु लोक में जाता है ।।५२ ।। दगमा मसीय अतुल माहात्म्य को मुनवर गार बहुत हो हर्पित हुए और फिर पपकी पारा मानत करपे उगने देवेश्वर से पूछा या ॥ ५३॥ ५ श्री दहिक कर्मादि संस्कार भगवन्न हि मे सर्व यमलोकस्य निर्णयम् । प्रमाण विस्तरं तम्य माहात्म्यश्च मुविस्तरम् ॥१ शृणु तादयं प्रवक्ष्यामि यमलोकस्य निर्णयम् । प्रमागकानि मर्वागिा भुवनानि च पोडम ॥२ पउगीतिसहस्राणि योजनाना प्रमाणत.। यमलोषस्य चाधा अन्तगे मानुपम्य च ॥३ मुरत दुटन यापि भुक्त्या लोके ययाजितम् । गर्गयोगातदा वश्चिद् व्याधियत्पद्यते राग ॥४ निमित्तमात्र सर्वपा कृतरानुमारतः । यो यस्य विहिनो मृत्यु ग त भ बमवाप्नुयात् ॥५ पर्मयोगात्तदा देही मुन्धरयन निज यषु । सदा भूमिगत पुदिगोमयेनोपलिप्य च ॥ तिसादी विगीर्याप मुगे स्वयं विनिक्षिपेत् । तुलमीरानिधो गया शालग्रामशिला तया 19 एम सामादिमूक्त व मरण मुक्तिदायकम् । पजामायणं विशेष प्रेतप्रामगृहे ।।
२७२ ] [ श्री गरुडपुराण का मार्ग छयाप्ती हजार योजन के प्रमाण वाला है। इतना सम्बा इन दोनों लोकों का प्रकार होता है ।। २ ।। ३ ।। इस लोक में जो भी सुकृत या दुष्कृत किया है उसका फल भोग करके हे सग ! वमं के योग से उसे मृत्यु के प्राप्त होने के लिये कोई रोग उत्पन्न हो जाया करता है ॥ ४ ॥ किये हुए कर्म के अनुसार सभी को कुछ व्यापि मादि मृत्यु का एक निमित्त मात्र हुमा करता है। जिसको जिस भी समय में मृत्यु के पाने का योग विदित है वह उसको उमी समय में निश्चित रूप से प्राप्त होता है ॥ ५॥ कर्मों के योग से यह शरीरधारी जीव अवश्य ही इस अपने पांच भौतिक शरीर का त्याग किया करता है। उस समय मे जबकि इस शरीर को त्याग कर परलोक गमन का समय प्राप्त होता है गोवर से भूमि का लेपन कर उसे भूमि पर ही ले लेना चाहिए ॥ ६ ॥ इधर-उधर भूमि में तिल पोर डाभों को फैला देना चाहिए मोर मृत्यु को प्राप्त होने वाले के मुख मे सुवरणं डाल देना चाहिए। उसके समीप में तुलमी को रक्खे तथा भगवान शालग्राम को विराजमान करे । इस प्रकार से सामवेद के सक्तो का श्रवण कराते हुए जो मृत्यु होती है वह मुक्ति को प्रदान कराने वाली हुमा करती है । प्रेत के प्राण गृहो मे सुवर्ण को शलाकाम्रो का विक्षेप करे ॥७॥८॥ एका वक्त्रै तु दातव्या घ्राणयुग्मे तथा पुनः । अक्षणोश्च कर्णयोश्च व देये यथाकमा II अथ लिङ्ग तथा का चैका ब्रह्माण्डके क्षिपेत् । करयुग्मे च कण्ठे च तुलसीञ्च प्रदापयेत् ॥१० वस्त्रयुग्मञ्च दातव्य कुकुमश्चमतर्यजेत् । पुष्पमालायुत कुदिन्यद्वारेण सन्नयेत् ॥११ पुत्रस्तु बान्धवः सार्द्ध विप्रस्तु पुरवासिभिः । पितु, प्रेतगतं पूत्रः स्कन्धमारोप्य वान्धवः ॥१२. गत्वा श्मशानदेशे तु प्राङ मुखञ्चोत्तरामुखम् । अदग्धपूर्वा या भूमिश्चितां तत्र व कारयेत् ॥१३ मौवं दैहिक धर्मादि सस्कार - २७३ श्रीखण्डतुलसीकाष्ठममित्पालाशसम्भवाम् । एव सामादिसूक्तं च मरण मुक्तिदायकम् ॥१४ एक दलाकाको मुख में देवे। दो प्राणों में देवे । पाखों में मोर वानों में दो दो यथाक्रम र पसे । इसके पश्चात् एक सिन में देखें और एक को प्रान्ड मे विक्षिप्त कर देवे । मृत्यु को प्रात होने वाले के दोनों हापों में और वष्ठ में तुलमी रवसे ।। १ ॥ १० ॥ उस मृत को दा वस्त्र धारण कर वे और युकुम तथा प्रसती के द्वारा उममा यजन घरे। पुष्पों को मामामों से युक्त करके उसे अन्य द्वार से भली भांति ले जाना पाहिए ॥ ११॥ पुत्र को पपन वायवो फे माप विप्र को पुरवासियों के माप प्रत्गत पिता को पन्धों पर भारोपित करे और इस ऐति से उसे कान में पहुंचाये ॥१२॥ यह! मशान में पहुंच कर जो भूमि पहिले प्रदग्ध हो वही पर पूर्वाभिमुम या उत्तरा- भिमुमदाह करने के लिये चिता की रचना करे ॥ १३॥ उम मिता में श्री म-तुम्ममी काय भोर पलाश की समिधामों को लगा कर fafe करे। म प्रकार से सामादि मूक्तो के पाठ पूर्वक जो मृत्यु एव दाह व में होता है यह मुक्ति प्रदान करने वाला होता है ॥१४॥ विमलेन्द्रियराङ्घाते चैतन्ये जडतागते । प्रचलन्ति तत प्राणायामनियटवत्तिभि ॥१५ धीभस्म दारण रूप प्रारण पण्टममाधिते । पेनमुगिरते सोऽपि मुस लालावुल भवेत् ॥१६ दुगत्मानश्च ताहयन्ते विधर पाशवेष्टिता । सुमेन कृतिनस्तत्र नीयन्ते नारनायक ॥१७ दुगेन पापिनो यानि यममार्ग सुदुर्गमम् । यमगतुभुजो भूत्वा सङ्गचक्रगदादिभृत् ।।१० पुण्यपमरतान्सम्यवस्नेहान्मिनवदामरेत् । पाहूय पापिन मर्यान्यमो दराडेन तर्जयेत् ॥१९ प्रलयाम्बुनि?पो वचनादिममप्रभ. । मरिपम्यो दुगराध्या विद्य रोज समय ति ॥२०
[ श्री गरगण
योजन प्रायविस्तारदेहो रद्रोऽतिभीपग ।
लोहाघरो भीम पापारिणदुराति ॥२१
उग
मिस इन्द्रियों के समूह प्रौर मंतन्य ये जस्ता यो प्राप्त होने पर हम
पधार निषटयर्ती यामो में प्राण प्रषित हो जाति है ॥१५॥ गिम समय
में निमे याले प्राण वएठ गत होते हैं उस मृत होने वाले जन्तु का रूप बन
हो योभरम और दारुग्ण हो जाता है। उसके मुग से भाग निपलन लगी है
घोर मुप में लार भर जाया करतो है ॥ १६ ॥ जो बुध म मा वाले होते हैं
पे यम के दूतो ये द्वारा ताहित होते हैं और पाशो में बाध लिये जाया करते
पोर जो पुण्यारमा होते हैं वे स्वगं य दूतो के द्वारा यहुन ही गुल पूर्वक वो
में ले जाय जाया करते हैं ॥ १७ ॥ पापी लोग वहन हो यष्ट सहन करते हुए
यमपुरी के महान विशाल मार्ग की यात्रा पूरी किया करते हैं ।
यह याम मार्ग बहुत दुगम होता है। यहां पर यमराज चार भुजाओं वागे
निगम न रहते हैं जा प्रपन चाो हायो म स-चन भौर गदा मादि
मायुधो को धारण किये रहते हैं ॥ १८ ॥ जो पुण्य कर्मों में रति रसन वाली
अत्माऐ होती हैं उनम पे बहुत ही स्नेह के साथ एक मित्र की भांति प्राचा
किया करते हैं । जो पापी टोत हैं उ हैं उस सुदुर्गम यमगज के मार्ग मे बढे
हो दुस के साथ जाना पड़ता है और उहे यमराज अपने निकट बुलाकर दण्ड
से तजित किया करते हैं ॥ १६ ॥ यमराज की ध्वनि ऐसी भयानक हाती
है जैसे प्रलय काल मे होने वाले मेघ की गर्जना होती है। उसके शरीर को
कान्ति पञ्जन गिरि के समान एक दम कृष्ण वणं वानी है-महिष ( भैसा )
उनका वाहन है बहुत ही कठिनाई के साथ उनके सामने ठहरा जाता है तथा
विद्युत् के तेज के सदृश उसके शरीर की युति होती है ॥ २०॥ उसके शरीर
का विस्तार तीन योजन के प्रमाण वाला है ( एक योजन ४ कोश का होता
है ) यमराज का स्वरूप अत्यन्त रौद्र एव भीषण होता है। हाथ मे एक लोहे
का दण्ड धारण किये रहते है-परम भयानक पोर पाश हाथ में रखने वाले
हैं । यमराज की प्राकृति बहुत ही भय देने वाली होती है ॥२१॥
प्राध्य दैहिक कार्मादि सस्कार रक्तनेनोऽतिभयदो दर्शन याति पापिनाम् । अगुष्ठमात्र पुरुपो हाहा कुर्वन्व लेवरात् ।।२२ यद व नीयते दूरौर्याम्यर्वीक्षण स्वक गृहम् । निविचेष्ट शरीर तु प्रारमुक्त जुगुप्सितम् ।।२३ अस्पृश्य जायते तूर्ण दुर्गन्ध सर्वनिन्दितम् । विधावस्थाऽस्य देहस्य क्रिमिविभस्मरुपत ॥२४ को गर्व क्रियते ताय क्षरण विध्व सिभिर्नर । दान वित्ताद्यो न कुर्यात्कोत्तिधमी तथायुप. ॥२५ परोपकरण कायादसारात्सारमुद्धरेत् । तस्यैव नीयमानस्य दूता. सन्तजयन्ति हि ।।२६ दर्शयन्ति भय तीव्र नरकाणा पुन पुन । शीघ्र प्रचल दुष्टात्मन् त्वं यास्यसि यमालयम् ।।२७ कुम्भीपाका दिनरकान्त्वा नयिष्यामि माचिरम् । एवं वाचस्तदा शृण्वन्वन्धूना रुदित तया ॥२८ उच्च हहिति विलपन्नीयते यमकिङ्करै । मृतस्योक्रान्तिसमयात्पपिण्डान् क्रमतो ददेव ॥२६ मृतस्थाने तथा द्वारे चावरे तायं कारयेत् । विश्रामे काष्ठचयने तथा सञ्चयने च पट, ।।३० यमराज के नेत्र रक्त वर्ण के होते हैं जिन्हे देखने से ही प्रत्यन्त भय लगता । पापी लोग उन्हें देखते ही डर से कारने लगते हैं। यह एक अंगुष्ठ मात्र कलेवर वाले यमराज के सामने जन्तु हाहाकार करने लगते हैं ॥ २२ ॥ यमराज के दूतो के द्वारा जिस समय अपने घर को देखते हुए इसे ले जाया जाता है प्राणो से मुक्त यह शरीर अत्यन्त बुरा एव चेष्टा होन हो जाया करता है ।। २३ ।। प्राणों के निकलते ही यह शरीर शीघ्र स्पर्शन करने के योग्य हो जाता है । इसमे दुगंध निकला करती है और सभी को यह बहुत युग लगने लगता है । इस मृत शरीर की फिर तीन प्रकार की दशा होती है-कृमि- विट और भस्म ये तीन अवस्था हुमा करती हैं। कीडे हो जाते हैं या कोई २७६ ॥ [ श्री गरुडपुराण जानवर खाकर विड् (मल) बनता है अथवा जला देने पर इस को भस्म हो जाती है ।। २४ ॥ हे ताक्ष्य ! एक ही क्षण मे अच्छा-मला मनुष्य विध्वस हो गाया करता है। ऐसे क्षणभर में विध्वम को प्राप्त होने वाले मनुष्यो का गर्व करना व्यर्थ ही है। ऐसे क्षणभगुर शरीर का मभिमान क्या करना है ? जो अपने धन से दान नहीं करता है पोर इस मनुष्य शरीर की मायु से कीति तथा धर्म का अर्जन नहीं करता है उस शरीर से क्या लाभ है ? इस सार शून्य शरीर से दूमरी की भलाई करना ही एक सार का संग्रह है उसे अवश्य ही करना चाहिए । इस प्रकार से यमपुरी को ले जाये जाने वाले इसको यम के दूत बुरी तरह धमकाते हैं और फटकार लगाया करते हैं ।।२।।२६।। वे पापियो फो बारम्बार नरको का प्रत्यान तीव्र भय दिखाते हैं । वे कहा करते हैं-"अरे पो दृष्टारमा । शघ्र चल, तुझको यमराज के पुर में जाना होगा ॥ २७ ॥ हम तुझको बहुत ही शीघ्र-कुम्भीपाक मादि नरको मे ले जायेंगे"। इस सरह से यमदूतो से फटकारे खाने वाला वह अपने बियुक्त बन्धु-बान्धवो का इधर घर में होने वाले रुदन को सुनता रहता है । यह भी जब यमदूतो के द्वारा पाश से बांधकर वरवस ले जाया जाता है तो हाय हाय करके बहुत ऊंचे दर "से विलाप करता है । उसे अपने शरीर को और भरे पूरे घर को जिसमे सभी पग्विारी लोग हैं छोडते हुए महान क्लेश होता है। मृत को उत्क्रान्ति के [समय मे क्रम से छ पिंह देने चाहिए ॥ २८ ॥ ॥ २६ ॥ जहां उमकी मृत्यु होती है उम स्थल पर-~घर के द्वार पर-प्रांगन मे-योच में जहां उसे विश्राम देते हैं उस स्थान पर-काष्टो के चपन मे और संचयन में इस तरह सेछ जगह पिंड देना मावश्यक है ॥३०॥ शृणु तत्कारण ताक्ष्य पपिण्डपरिकल्पने। मृतस्थाने शवो नाम तेन नाम्ना प्रदीयते ॥३१ तेन भूमिर्भवेतुष्टा तदधिष्ठातृदेवता । द्वारदेशे भवेत्पान्थरतेन नाम्ना प्रदीयते ॥३२ तेन दत्तन तुम्यन्ति गृहवास्त्वधिदेवताः । चत्वरे खेचरो नाम तमुद्दिश्य प्रदीयते ॥३३
"
मोल दैहिक कर्मादि संस्कार )
[ २७७
तेन तत्रोपघाताय भूतकोटि: पलायते ।
विश्रामे भूतसज्ञोऽय तेन नाम्ना प्रदीयते ॥३४
पिशाचा राक्षसा यक्षा ये चान्ये दिशिवासिनः ।
तस्य होतव्यदेहस्य नंवायोग्यत्वकारका ॥३५
हे ताय ! इन उपयुक्त में स्थलो पर पिट देने का क्या कारण है ?
उसका भव तुम श्रवण करो । मृत के स्थान पर उसका नाम होता
है प्रतएव उस नाम से पिह दिया जाता है ।। ३१ ।। इसके देने से यह भूमि
तुष्ट होती है। द्वार देश में इसलिये पिंड प्रदान किया जाता है कि उसके
पधिष्ठातृ देवता तुधि को प्राप्त होते हैं । मार्ग में वह पान्थ होता है इमलिये
उसी नाम से पिट दिया जाता है ।। ३२॥ इमसे गृह के वास्तु-प्रषिदेवता
सन्तुष्ट होते हैं । प्रांगन में उसका सेपर नाम है अत. उसी का उद्देश्य करके
पिड यातन किया जाता है ॥ ३३ ॥ इससे वहाँ पर उपयात के लिये भूतकोटि
पलायन करती है । विश्राम में यह भूत सशा वाला होता है अतः इसी नाम
से सिंड प्रदान किया जाता है ॥ ३४ ॥ पिसाच-राक्षस-यक्ष पोर अन्य
जो दिशिवासी होते हैं उस होतव्य देह के अयोग्यत्व करने वाले नही होते
हैं ।। ३५ ॥
चितामोक्षप्रभृति च प्रेतत्वमुपजायते ।
चिताया साधकं नाम वदन्त्येके सगेश्वर ॥३६
केऽपि त प्रेतमेवाहुर्यथा कल्पविदस्तथा ।
तदा हि तत्र तमापि प्रेतनाम्ना प्रदीयते ॥३७
इत्येव पञ्चपिण्डे हि शवस्याहुतियोग्यता।
अन्यथा चोपघाताय पूर्वोक्तास्ते भवन्ति हि ॥३८
उकामे प्रथम पिंड तथा चाद्ध पथेन च ।
चिताया तु तृतीय स्थालय पिंडा पल्लिता |
विधाता प्रथमे पिंडे द्वितीये गरुडध्वजः ।
तृतीये यमदूताश्न प्रयोगः परिवीतित ॥४०
२७० - [ श्री गएराण दत्त तृतीये पिण्डेऽस्मिन्देहदोपः प्रमुच्यते । अाधारभूतजीवस्य ज्वलन ज्वालयेचिताम् ॥४१ ससृज्य चोपलिप्याथ उल्लिख्यो त्य वेदिकाम् । अभ्युक्षीय समाधाय वह्नि तत्र विधानतः ॥४२ पिता मोक्ष प्रादि प्रतत्व उपजात होते हैं मतः पिता मे कुछ लोग माधक नाम तमका हे खगेश्वर कहा करते हैं कुछ लोग उसको प्रेत ही पहने हैं ये कल्प के वेत्ता होते हैं उस समय में भी वहाँ पर 'प्रेत '-इसी नाम से पिड का प्रदान किया जाता है ३६॥ ३७ ।। इस प्रकार से ये पांव हि राव को पाहुति को योग्यता के होते है अन्यथा ये जो पूर्व में कहे गये हैं वे सब उपधात के लिये हुमा करते हैं ।। ३ ।। उत्क्रामण मे शव के उठाने के समय में प्रथम रिड होता है तथा दूसरा पिंड मार्ग के प्राधे समाप्त हो जाने पर दिया जाता है और तीसरा पिंड चिता मे समारूढ करने के समय में दिया करते हैं । इस तरह तीन पिंड कल्पित किये जाया करते हैं। प्रथम पिंड मे विधाता-द्विनीय पिंड में गरुडध्वज और तीसरे पिंड मै यमदूत-इस प्रकार से प्रयोग कहा गया है ।। ३६॥ ४० ।। हम तीसरे पिण्ड के देने पर वह देह के सम्पूर्ण दोषो से प्रमुक्त हो जाया करता है। जीव के आधार भूत इस देह को फिर अग्नि चिता में जला दिया करता है ॥ ४१ ॥ ससृजन करके उपलेपन को और उल्लेखन करके उद्धरण करे फिर वैदिका का अभ्युक्षण वहां पर वह्नि का समाधान करे और विधान के सहित लावे ॥४२॥ पुष्पाक्षतः सुसम्पूज्य देवं कव्यादसनकम् । त्व भूतकृज्जगद्योने त्व लोकपरिपालकः ॥४३ सहारकारकस्तस्मादेन स्वर्ग मृत नय। एव व्यादमम्यर्च्य शरीराहुतिमाचरेत् ॥४४ अद्ध देहे तथा दग्धे दद्यादाज्याहुति ततः । लोमम्यस्त्वनुवाक्येन कुर्याद्धोम यथाविधि ॥४५ चितामारोप्य त प्रेत हुनेदाज्याहुति ततः। यमाय चान्तकायेति मृत्यवे ब्रह्मणे तथा ॥४६ पौर्व दैहिककर्मादि सम्बार ] २७६ जातवेदोमुखे देया ह्ये का प्रेतमुसे तथा । ऊवं तु ज्यालयेद्वह्नि पूर्वभागे चिता पुन ॥४७ अस्मात्त्वमधिजातोऽसि त्वदयं जायतां पुन. । असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहा ज्वलति पावकः ॥४८ एवमाज्याहुति दत्त्वा तिल मिश्रा समन्त्रकाम् । ततो दाहः प्रकर्तव्य: पुत्रेण किल निश्वितम् ॥४६ फिर कव्य'द सज्ञा वाले देव का पुष्प-प्रक्षती से भली-भाति पूजन रे भोर प्रार्थना करे--माप ही मृत्यु के करने वाले हैं और माप इस जगत् की योनि है । माप इस समस्त लोक वे परिपालक हैं ।। ४३ ॥ प्राप सहार करने वाले हैं । इससे हमारी यह विनती है कि इस मृतक की पारमा को वर्ग में ले जाइये। इस रीति से क्रव्याद पी प्रम्यर्चना एवं प्रार्थना करके फर शरीर की पाहुति करे ।। ४४ ॥ जव मृतक का प्राधा देह जल जाये तो हत की आहुति देवे । ' लोमस्यः '--इस नुवाक्य मे यथाविधि होम करना पाहिए ॥ ४५ ॥ उस प्रेत को चिता पर समारोपित करके घृत पी म हुनिया पारा हवन करे । यम के लिये-अन्तक, मृत्यु और ब्रह्मा के लिये माहूतियाँ वे ॥ ४६ ।। एक माहूति जात वेदा (अग्नि) के मुख में देवे तथा एक प्रेत है मुख में देनी चाहिए । इसके ऊपर अग्नि को जलावे और चिता के पूर्व भाग + अग्नि को जलाना चाहिए ॥ ४७ ।। इससे तुम भधिजात हुए हो सो यह पुनः जायमान हो । यह स्वर्ग के लिये और लोक के लिये स्वाहा है अर्थात् माहुति समर्पित की जाती है । पावक ज्वलित होता है ॥ ४८॥ इस प्रकार मन्त्र के सहिन तिलो से मिश्रित घृन की माहुति देनी चाहिए । इसके मनन्तर माह पुत्र के द्वारा निश्चित् रूप से करना चाहिए ॥४६॥ रोदितव्य ततो गाढ एव तस्य सुसं भवेत् । दाहस्यातस्तर जन कृत्वा सञ्जयन क्रियाम् ॥५० प्रेतपिड प्रदद्याच्च दाहात्तिशमन खग। तेन दूता. प्रतीक्षन्ते त प्रेत बान्धवार्थिनम् ।।५१ २९० -- [ श्री गरुडपुगण दद्यादनन्तरं काय्यं पुत्र: स्नानं सचेलकम् । तिलोदकं ततो दद्यानामगोत्रण चाश्मनि ॥५२ ततो जनपदः सर्वतव्या करताड़नी । विष्णुविष्णुरिति ब्र याद्गुणैः प्रेतमुदीरयेत् ॥५३ इसके पश्न र खूब गहराई के साथ रुदन करे। इस प्रकार से उस मृतक जन्तु को मुख होता है । दाह करने के मनन्तर वहां पर सञ्चयन की क्रिया का सम्पादन करे ॥ ५० ॥ हे एग! प्रेत को पिंड प्रदान करे जोकि दाह की पीड़ा का विनाश करने वाला होता है । इससे दूत प्रतीक्षा किया करते हैं उम बान्धवों के प्रर्थी प्रत की भतएव इसे बाद मे देना चाहिए । इसके पश्चात् पुत्रों को वस्त्रों के सहित स्नान करना चाहिए । इसके पश्चात् नाम मोर गोर का उच्चारण करके तिलोदक देवे। घर में सब जन पदो के द्वारा करताउनी देनी चाहिए। तीन बार विष्णु का उच्चारण करे और प्रेत के गुणों का उदीरण (बस्तान) करना चाहिए ॥५१॥५२॥५३॥ जनाः सर्वे समास्तस्य गृहमागत्य सर्वशः । द्वारस्य दक्षिणे भागे गोमयं गौरसर्पपान् ॥५४ निधाय वरुणं देवमन्ताय स्ववेश्मनि । भक्षयेनिम्बपनारिण घृत प्राश्य गृह ब्रजेत् ॥५५ केचिद्द 'धेन सिञ्चन्ति चिन्तास्यानं खगेश्वर । अथ पातं न कुर्वीत दत्त्वा चाथ जलाञ्जलिम् ॥५६ श्लेप्माश्र बान्धवमुक्त प्रेतो भुङ्क्त यतोऽवशः। अतो न रोदितव्य हि क्रिया कार्या स्वशक्तितः ॥५७ दुग्धञ्च मृन्मये पात्र तोय दद्यादिनत्रयम् । सूर्येऽस्तमागते ताय वलम्याश्चत्वरे तथा ॥५८ बद्ध समूढहृदयो देहमिच्छन्कृतानुगः । श्मशानश्चत्वरं गेहं वीक्षन्याम्य. स नीयते ॥५६ गर्तपिडान्दशाहानि प्रदद्याच्च दिने दिने। जलासल्यः प्रदातव्याः प्रेतमुद्दिश्य प्रत्यहम् ॥६० प्रोवं दैहिक कर्मादि सस्कार [ २८१ तावद्ध द्धिश्च कतंच्या यावत्पिड दशाह्निकम् । पुत्रेण हि क्रिया कार्या भार्यया तदभावत ॥६१ इसके अनन्तर सभी मनुष्य जो दाह कर्म के लिय श्मशान तक गये थे समान रूप से घर पर लौट कर पावें। द्वार के दक्षिण भाग में गोवर और श्वत सपंय ( सरसो) रख कर पर के भीतर वरुणदेव का अन्तर्धान परे । नीम के पत्रों को भक्षा करे पोर घृत वा पान करके घर को जाना माहिए ॥ ५४॥ ५५ ॥ हे सगेश्वर । कुछ लोग दूध से चिता का सिध्यन विया करते हैं । जलाञ्जलि देकर प फिर मथुपात नही करे ।। ५६ ।। बान्धवी के द्वारा छोडे हुए श्लेष्माथुनों को प्रेत विवश होकर खाता है । इमोलिप रुदन नहीं करना चाहिए मोर पपनी शक्ति से समस्त क्रिया का मम्मादन करे ।।५७ । मिट्टी के पात्र में दुग्ध मोर जल तीन दिन पर्यन्त देवे। हे ताक्ष्यं । सूर्य के पस्त हो जाने पर बलमी में तथा चत्वर में इस क्रिया को करे ।।१८।। पासो से बद्ध एव समूढ हृदय वाना कृनु होकर देह की इच्छा रसना हुमा मनान चत्वर भोर पर को देवता हुप्रा यम ये दूनो के द्वारा ले जाया जाता है ।।६।। दिन-दिन में प्रति प्रतिदिन गत्तं पिण्डों को दश दिन तक देवे पौर प्रेत या उद्देश्य करके प्रतिदिन जनाजलि देनी चाहिये । ६०॥ तब तक वृद्धि करे जब तर दशाहिर कम होवे पर्यात् दश दिन म किये जाने वाली क्रिया होवे । यह सभी क्रिया पुन के द्वारा ही की जानी चाहिय । यदि पुत्र न होवे तो उसके प्रमाय में मार्या को करनी चाहिय ॥६॥ तदभावे च शिष्येण शिप्याभाव सहोदर । श्मशाने चान्यतीर्थ वा जन पिडच दापयेत् ॥६२ प्रोदनानि च सक्न् श्च शावमूलफनादि वा। प्रथमेहनि यद्दद्यातददद्यादुत्तरेऽहनि ।।६३ दिनानि दश पिंडानि पुर्वन्त्यत्र मुतादय.। प्रत्यह ते विसज्यन्ते चतुर्भागः सगोतम ॥६४ भागद्वय तु देहाय प्रोत्तिद भूतपञ्चकम् । तृतीय यमदूतानाचतुर्थेनोपजीवति ।।६५ । यो गरुड २८२ ] अहोरावस्तु नवभि. प्रेतो निप्पत्तिमाप्नुयात् । जन्तोनिप्पन्नदेहस्य दशमे तु भवेत्क्षुधा ॥६६ न द्विजो नव मन्त्रश्च न स्वघा वाहनाशिपः। नामगोत्र समुच्चार्य यद्दत्तन्त्र दशाह्निकम् ॥६७ दग्धे देहे पुनर्देह प्राप्नोत्येव खगेश्वर । प्रथमेऽहनि यः पिंडस्तेन मूर्दा प्रजायते ॥६८ ग्रीवास्कन्धौ द्वितीये तु तृतीये हृदयं भवेत् । चतुर्थेऽह्नि भवेत्पाणिर्नाभि पञ्चमे तथा ॥६६ पष्ठे च सप्तमे चैव कटिगुह्य प्रजायते । ऊरू चाष्ठमके चैव जान्वड ध्री नवमे तथा ॥७० नवभिदेहमासाद्य दशमेऽह्नि भवेत्क्षुधा। देहभूतः क्षुधाविष्टो गृहद्वारे स तिष्ठति ॥७१ यदि भार्या भी न हो इसके प्रभाव में शिप्य को क्रिया करनी चाहिये। शिष्य के अभाव में सहोदर भाई करे। श्मशान मे, अन्य तीर्य मे जल पोर पिण्ड दान करे ॥६॥ मोदन, सत्तू, शाक-मूल पोर फन प्रथम दिन मे जो सावे वही उसके दूसरे दिन में भी खाना चाहिये ।।६३॥ यहाँ पर सुत मादि को दश दिन तक दश पिण्ड करने चाहिये । प्रतिदिन हे खगोत्तम ! चतु- र्भागो में उनका विभाग दिया जाता है ॥६४।। दो माग तो देह के लिये होते हैं जो पांच भूतों के प्रीति देने वाले होते हैं। तोसरा भाग यम के दूतो का होता है और चौथे से उपजीवित होता है ॥६५॥ नौ ग्रहोगत्रो ( दिन-रात्रियो ) मे प्रेत निष्पत्ति को प्राप्त होता है । जब जन्तु को देह की निष्पत्ति हो जाती है तो दशम दिन में इसको भुघा लगा करती है ॥६६॥ उसमें द्विज, मन्श, स्वधा अथवा प्राशिप कुछ भी कहने की मावश्यकता नहीं है। केवल नाम मोर गोत्र का उच्चारण करके दशवें दिन में जो भी कुछ दिया जावे हे सगेश्वर ! देह के दग्ध हो जाने पर वह प्रेत पुन. देह की प्राप्ति किया करता है। प्रथम दिन में जो पिण्ड दिया जाता है उससे इसका मस्तक उत्पन्न होता है ॥६॥६वा द्वितीय मे गरदन और कन्धे होते हैं। तीसरे मे हृदय बन जाता है। चौथे दिन
मोवं दैहिक कार्मादि सम्बार ]
[ २८३
पाटिण, पाचवें मे नाभि, छटे और सातवें मे कटि (कमर) मोर गुह्य बनते
है । पाठवें दिन में दिये हुए पिण्ड से जानु (घुटने) और पैर तथा नवम दिन
में यह बन जाया करते हैं ॥६६॥७॥ इस प्रकार से नो पिण्डो से वह प्रेत
अपने पूरे देह को प्राप्त करके दशम दिन मे उसे भूख उत्पन्न हो जाती है। वह
प्रेत देहधारी के स्वरूप में होकर क्षुधा से भाविष्ट होता हुमा घर के द्वार पर
स्थित हो जाया करता है ॥७१।।
दशमेऽहनि यः पिंडस्तं दद्यादामिपेण तु ।
यतो देह समुत्पन्नः प्रेतस्तीव्रक्षुधान्वितः ॥७२
अतस्त्वामिपवाह्य तु क्ष धा तस्य न नश्यति ।
एकादशाह द्वादशाह प्रेतो भुङक्ति दिनद्वयम् ॥७३
योपितः पुरुषस्यापि प्रेतशब्द समुच्चरेत् ।
दीपमन्न जल वस्त्रमन्यद्वा दीयते तु यत् ॥७४
प्रेतशब्देन यद्दत मृतस्यानन्ददायकम् ।
त्रयोदशेऽह्नि वै प्रेतो नीयते च महापथे ।।७५
पिण्डज देहमाथित्य दिवाराणो क्षुधान्वितः ।
मार्गे गच्छति स प्रेतो ह्यसिपनवनान्विते ॥७६
क्षुत्पिपासदितो नित्य यमदूत प्रपीडितः।
अहन्यहनि स प्रेतो योजनाना शतद्वयम् ॥७७
चत्वारिंशतया सप्त अहोरात्रेण गच्छति ।
गृहीतो यमपाशस्तु जनो हाहेति रोदिति 11७८
स्वगृह सम्परित्यज्य याम्य पुरमनुव्रजेत् ।
क्रमेण गच्छति स प्रेत पुर वैवस्वत शुभम् ॥७६
दाम दिन में जो मामिप से पिरस देवे तो जिससे देह समुत्पन्न हुआ है
वह त तीव्र शुधा से युक्त हो जाता है ॥७२॥ इमलिये मामिप से मावास
उसको भूख नष्ट नहीं हुमा करती है । पारहवें मोर बारहवें दिन में यह प्रेत
दो दिन साया करता है ॥७३॥ स्त्री हो या पुरुष उसको प्रेत शल से हो उचा.
रण करे । दीप, अन्न, जल, वसमयमा अन्य जो वृध भी दिया जाता है, प्रद
२८४ 1 । श्री गटपुगए इस शब्द से जो कुछ भी दिया जाया करता है उससे उस मृत प्राणी को बहुते भानन्द उत्पन्न होता है । तेरहवें दिन में वह प्रेत उस यमपुरी के दिशाल मा मे ले जाया जाता है ।।७४।७शा पिण्डो से समुत्पात देह को प्राप्त कर दिन-रात भूख से युक्त मसि पन के धन से संयुत उस मार्ग में वह प्रेत जाता है ।।७६॥ वह नित्य ही भूख, प्यास से पीडित होकर यम के दूतो से सताया जाता है। प्रतिदिन वह प्रेत दो सौ योजन तक चला करता है। इस तरह मैतालीस दिन- रात मे यह चलकर जाता है । यम के पामो से गृहीत होता हुआ यह हाहाकार करके गैया करता है ।।७७७८। अपने घर का स्पा करके यम के पुर को जाया करता है । इस प्रकार से फ्रम से यह प्रत धर्मराज के उस शुभ नगर को जाता है | याम्य सौरिपुरं सुरेन्द्र भवनं गन्धर्वशैलागम । रं कौञ्चपुरं विचित्र भवन बह्वापद दुखदम् । नानानन्दपुर सुतप्तभवन रौद्र पयोवर्पण। शीताढ्य बहुभीति धर्मभवन याम्य पुरश्चानतः ।।८० त्रयोदशेति स प्रेतो नीयते यमकिङ्करः। तस्मिन्मार्ग जत्येको गृहीत इव कर्कट ।।८१ तथैव स व्रजन्मार्गे पुत्र पुत्र इति व वन् । हाहेति क्रन्दते नित्य कीदृश तु मया कृतम् ।।८२ मानुषत्व लभे कस्मादिति व ते प्रसर्पति । महता पुण्ययोगेन मानुपं जन्म लभ्यते ॥८३ तच प्राप्य न प्रदत्त याचकेभ्य स्वक धनम् । पराधीनमभूत्सर्वमिति ब्रूते स गद्गदः । किङ्कर पोड्यतेऽत्यथं स्मरते पूर्वदेहितम् ॥८४ सुखस्य दुखस्य न कोऽपि दाता परो ददातोति कुबुद्धिरेया । पुराकृत कर्म सदैव भुज्यते शरीर हे निस्तरय स्वया कृतम् १८५ वह यमराज का पुर--सौरि नगर प्रर्थात् सूर्यपुर-सुरेन्द्र का भवन- गन्धों के शेन का आगम (प्राना)-फर कौश्च का पुर विचित्र भवनों वाला पौवं दैहिक कर्मादि मम्कार ] [ २८५ जहाँ बहुत-सी भापतियो भरी हुई हैं और परम दुःख देने वाला है। अनेक प्रकार के माझादो ( रुदन ) मे पूर्ण वह पुर है जहाँ सुतत भवन है और वह रोद्र है । परापर पानी की वर्षा होती है, शीत से युक्त, बहुत से भगो से परि- पूर्ण, पाम से युक्त जिसमे भवन है ऐसा वह यमराज को नगर भागे मिलता है 1500 तेरह दिन में यह प्रेत यही ले जाया जाता है प्रोर यम के से जाया करते हैं। उन विशाल बडे लम्बे मार्ग में कर्फट की भांति पपड़ा हमा बोला ही जाया करता है ।।८१॥ उम मार्ग में वह जाता हमा 'हा पुत्र ! हा पुत्र !'-इस तरह स विचार करता हुमा और हाहार घर में गदन परता हमा निस्य माता है और कहता रहता है कि यह मैंने कैगा पाप लिया है। जिसमे यह कष्ट मुझे हो रहा है । म मुझे फिर यह मनुष्य शरीर को प्राप्त होगा? यही वहना हुघा वह दौड लगाता 'प्राता है। बहुत ही बडे पुण्यों के योग से यह मनुष्य शरीर प्राप्त हुमा करता है ।।३।। मैंने इस मनु शरीर घोप्रा करके भी पाचरों को पपना धन दान में नहीं दिया था। अब तो सभी घुछ पराये अधीन हो गया है, मय मैं पा पर सासा हूँ?-ऐसे वह गद्गद होकर बरावर बोलता रहा करता है । यम के दूनों के द्वारा यह मूब पोहिर किया जाना है तब वह परने पहिले देह मो मब बातो का स्मरण किया परता है | इस गुपया और दुख का दूसरा अन्य कोई भी देन वाना नहीं है। दूसरा हमे दुग देता है-1 विचार एर पृद्धि का ही होता। यह पाली पहिने जाम में पिय हुए ही कमों का फल सदा भोगा रहा है। हे पार! तू गया है उस पव भाग। यह सभी सेरा ही रियादमा है ॥ ५५॥ मया न दस न त हुनागने तपो न नप्त हिमशेलगहरे । न सेचित गाजमहो मााजल सगेर है निम्नरय स्वया पृतम् ।८६ जलाबको नय ताहि निज मनुष्यहतो पशुपभिनये । गोतृनिस्तान कृत हि गोचर शरीर है निम्नरय स्वया पृतम् म नित्यदान न गमालिक प्रत न येदान न च मागुम्नाम् । पुराना पटोन प सेविनोदारीर निस्तरण स्ययानम् ८८
। श्री गरुडपुर
मासोपवासनं च शोधित वपुश्चान्द्रायणी नियमच सुव्रते ।
नारीशरीर बहूदु खभाजन लब्ध मया पूर्वकृतविकर्मभि ॥८६
उक्तानि वाक्यानि मया नराणा मत्त शृणुष्वावहितो हि पक्षिन् ।
स्त्रीणाञ्च देह त्ववलम्ब्य देही ब्रवीति कर्माणि कृतानि पूर्वम् ।
उसे उस समय में यह ज्ञान होता है और फिर पश्चात्ताप किया करता
है कि मैंने कभी कुछ भी दान नहीं दिया-मैंने अग्नि में हवन भी नहीं किया-
कोई भी तपश्चर्या नहीं की कि किसी पवत पर या सागर तट तपा गुफा में
बैठकर कुछ तप ही कर लेता। की मैंने गङ्गा का जैसा महा पावन जन का
सेवन भी नहीं किया था। हे शरीर । तूने जैसा भी किया है उसे अब त भोग।
ये राव तेरे ही किये हुए का फल है ॥६६॥ मैंने किसी निजल स्थान में कोई
जलाशय नही बनवाया है जिसमे मनुष्य पशु भोर पक्षी सद जलपान कर
सकते । गाया की तृप्ति के लिए मैंने गोचर भूमि भी नहीं बनाई थी हे शरीर
तूने जैसा किया है अब उसका निस्तारा तू स्वय ही कर ||८७॥ मैंने नित्य
कुट भी दान नहीं किया न मैंने गौओ का माह्निक ही कभी किया था। कभी
वेदो का दान नहीं किया न मैंने कभी किसी भी शास्त्र की पुस्तको का ही दान
किया है। मैंने पहिले कभी किसी का इष्ट नहीं किया और न किमी की सेवा
ही की है। प्रदता मैंने ऐसे माग का कभी गमन नहीं किया था। हे शरीर ।
तूने जैसा भी जो कुछ किया है उसका फल प्रब तुझ ही भोगना है ।।८८॥
मासो के उपवास के द्वारा मैंने कभी अपने शरीर का शोधन नहीं किया । मैंने
चा द्रायण मादि का नियम एव व्रतो के करने का कष्ट नहीं उठाया था । मैंने
बहुत-से दुखो का प्राधार नारी के शरीर को पूर्व कुत विकमों से प्रत किया
था II हे पभिन् ! मनुप्यो के उस उत्पीडन पाने के समय में ऐसे पश्चात्ताप
मोर दुख से भरे शब्द होते हैं। मैंने तुमको यह सब बता दिया है। भव तुम,
सावधान होकर मुझसे सब श्रवण करो। यह देहधारी स्त्रियों के शरीर का
भवलम्बन लेकर
पूव
में किये हुए कमों को बोला करता है ॥१०॥
- .. यमलोक वर्णन । २८७ ६-यमलोक वर्णन एव प्रचलते प्रेतस्तत्र मार्ग खगेश्वर । कन्दितश्च व दुःखार्तः श्रान्तश्चाकुललोचनः ।।१ सप्तदशदिनान्येको वायुमार्गरण गच्छति । अष्टादशे स्वहोरात्रै पूर्व याम्यपुर ब्रजेत् ॥२ तस्मिन्पुरवरे रम्ये प्रेतानाच गणो महान् । पुष्पभद्रा नदी तत्र न्यग्रोधः प्रियदर्शनः ॥३ पुरे तत्र स विधामं प्राप्यते यमकिङ्करः । जायापुत्रादिकं सौख्य स्मरते तत्र दुखितः ।।४ कन्दते करुणेर्वाक्यैस्तृपात: श्रमपीडितः। स्वधन स्वसुखानीह गृहपुप्रधनानि च ॥५ मृत्यमित्राणि धान्यञ्च सर्व शोचति वै तदा । क्षुधातस्य पुरे तस्मिन्किङ्करस्तस्य चोच्यते ॥६ कत्र धन क्व सुता जाया क्व सुहृत्क्व स्वमीदृशः । स्वकर्मणाजितं भुव मूढ़चेतश्विर पथि ॥७ श्रीकृष्ण ने कहा -हे सगेश्वर ! इस उपयुक्त प्रकार से यह प्रेत यम. पुरी के म गं में चला करता है । वह कन्दन करता रहता है-दुख से बडा ही प्रात्त होता है -यक जाता है और इसके नेत्र व्याकुल हो जाया करते हैं ।। यह सत्रह दिन तक वायुमार्ग से जाता है अठारहवें दिन मे फिर पूर्व यायपुर फो जाया करता है ॥२॥ उम परम रम्य पुर मे प्रेतो का एक महान समुदाय होता है। वहां पर पुष्पभदा नाय वाली एक नदी है मौर एक वट का वृक्ष है, जो देखने में बहुत प्रिय लगता है ||३|| उम पुर में यम के किङ्कारों के द्वारा ठमे विधाम प्राप्त कराया जाया करता है। वहाँ पर फिर वह प्रेत अपनी स्त्री मोर पुत्र प्रादि के सुख का स्मरण करना है और बहुत दुखित होता है ॥४॥ कहाणा से मरे हुए महा पहा इमा वह वहां पर रोता है। व्यास से पीड़ित होता है और पकान से अत्यन्त दुःवित हुआ करता है । उस समय में वह अपने धन, माने मुस, गह, पुत्र, भृर, मित्र, घान्य प्रोर भतुन बमव-पुम्पत्ति के छूट .
1 - २५९ ] [ थो गरुडपुर । जाने का शोच किया करता है । उस पुर में क्षुधा से दुःखित इससे यम के के द्वारा कहा जाता है ॥२६॥ यम के किरो ने कहा--अरे । हे मूर्ख ! गई बीती बातो का यहाँ क्या स्मरण करके यो रो रहा है। यहाँ तेरा वह कहाँ है ? न तेरे पुत्र हैं और न भार्या ही है । यहाँ तेरा कोई मित्र भी नहीं । तूने जो जैसा कर्म किया है उसे इस लम्वे मार्ग मे बहुत काल पर्यन्त भोग । तू बहुत ही मूळ चित्त माला है ॥७॥ जानासि सम्बलवश बलमध्वगाना नो सम्बलाय पतित परलोकपान्थ । गन्तव्यमस्ति तव निश्चितमेवमस्मिन्मार्ग हि चात्र भवत क्रयविक्रयौ न । यमगीताभव वाक्य नैव मत्यै घत त्वया । एवमुक्तस्तत सर्वेर्हन्यमान. स मुद्गरै ।। अन दत सुतै पौत्र स्नेहाद्वा कृपयाथवा । मासिक पिण्डमश्नाति तत सौरिपुर ब्रजेत् ॥१० तर नाम्ना तु राजा वै जङ्गम. कालरूपधृक् । त दृष्ट्वा भयभीतस्तु विश्रामे कुरुते मतिम् ॥११ उदकञ्चान्नसयुक्त भुइक्त तस्मिन्पुरे गल। निभि पक्षस्तथा पिण्डस्तत्पुर स व्यतिम मेत् ।।१२ सुरेन्द्रनगरे रम्ये प्रेतो याति दिवानिशम् । ततो वनानि रौद्राणि दृष्ट्वा क्रन्दति त स ॥१३ भीपणे क्लिश्यमानश्च बन्दत्येव पुन पुगे । मासद्वयावसाने तु तत्पुर स व्यतिकमेव ।।१४ तू यह जानता है कि मार्ग मे चलने वालो का चन सम्बल के ही अधीन होता है। हे परलोक के मार्ग में गमन करने वाले राहगीर । तेरे पास सम्बल के लिये कुछ भी नहीं है । तुझे शात है कि इस महान विशाल मार्ग की यात्रा तो निश्चित रूप से पूरी करनी हो है । यहाँ पर तुझे कोई भी क्रय और विक्रय करने का साधन नहीं है अर्थात् पहिले से ही कोई इस मार्ग की यात्र यमलोक वर्णन ] २८६ करने का सुकून जगा सम्बल नही है तो प्रब कुछ भी नहीं किया जा सकता है ।।।। अरे पो प्राणी ! क्या तूने मनुष्य लोक मे रहकर यमगोत के वाक्यो का श्रवण नहीं किया है ?" इस प्रकार से उन मब यमदिरो के द्वारा कहे जाने पर यह जन्तु मुद्गरों से ताडिन किया जाता है | यहाँ पर पुष तथा पौत्र मादि के द्वारा स्नेह से जो पिण्डदान दिया जाना है उसी दया करके दिए हुए मामिक पिएड का यह भक्षण किया करता है और इसके अनन्तर सोरिपुर प्रर्थात् यमराज के नगर में गमन करता है ॥१०॥ वहाँ पर नाम से तो वह राजा है किन्तु वैसे जङ्गम काल के रूप को धारण करने वाला है । उसको देखकर भय से हरकर विश्राम करने में अपनी बुद्धि किया करता है ॥११॥ उस पुर में जाकर जल से युक्त प्रश्न का भक्षण करता है। तीन पक्षो में तीन पिण्डो से यह उम पुर में समय काटता है । मुरेन्द्र के सुरम्य नगर में प्रेम दिवा. निश जाता है । इसके पश्चात् वह भयानक वनो को देखकर क्रन्दन किया करता है ॥१२॥१३॥ बडे भीषण परिणामो से क्लेश भोगना हुमा यह बार-बार रुदन करता है। इस तरह दो मास वे अन्त तक वह उस पुर में समय काटता तृतीये मासि सम्प्राप्त गन्धर्वनगरे शुभे । तृतीयमासिकं पिण्ड तर भुक्त स गच्छति ।।१५ दालागमे चतुर्थे च मासि याति यगेश्वर । पतन्ति तत्र पापाणा प्रेतस्योपरि पृष्ठन ॥१६ चतुर्थमामिक श्राद्ध भुक्त्वा तत्र मुगी भनेत् । स गच्छति तत. ऐन र मासे तु पञ्चमे ॥१७ पञ्चममासिक पिएड भुइक्त नम पुरे स्थितः । कनपाएमासिक क्रौञ्च पन्चभिः सामासिकः ॥१५ तय दत्तन पिएडेन श्राद्धनाप्यायितस्ततः । मुहूर्ताद्ध तु विधाभ्य कम्पमान सुदु सितः ॥१६ तत्पुरतु परिरपज्य तजितो यमकिट्टर। प्रयाति चिमनगर विनियो नाम पार्थिवः ॥२० २६० ) [ श्री गरुडपुराण यमस्येवानुजः सौरियंत्र राज्यं प्रशास्ति हि। तत्र पण्मासपिण्डेन तृप्तः सन्कृष्यते नरः ॥२१ अब तीसरा मास प्रारम्भ होता है तो शुभ गन्धर्व नगर में वह जापा करता है और यहां तीसरे मास का पिण्ड खाता है ॥१५॥ हे खगेश्वर ! चौथे मास में जलागम में यह प्रेत जाता है। वहाँ पर इस प्रेत की पीठ पर मौर ऊपर पापाण गिरते हैं ॥१६॥ चतुएं मास के दिए हुए श्राद्ध को खाकर यह सुखी होता है । इसके पश्चात् वह प्रेत पाय मास में कर को जाया करता है । ॥१७॥ उस कपुर में पाचवें मास में दिये हुए पिएड को खाकर मुल पाना है। इसके मनन्तर ऊन पाण्मासिक मर्यात् माढ़े पांच म स का दिया हुआ थाद्ध प्राप्त करता है ॥१६॥ उसमे दिये हुए पिण्ड से यह प्रेत आप्यायित (तृप्त) होता है मोर माधे मुहूर्त तक विश्राम करके फिर कापता हुआ पत्यन्त दु:खित होकर उस पुर का त्याग करता है तथा यम के दूनो के द्वारा फटकारें खाता हुमा यह प्रेत चित्र नगर मे जाया करता है। वहाँ विचित्र नाम वाला राजा होता है। ॥१६॥२०॥ यह यमराज का ही छोटा भाई सूर्य का पुत्र है जो कि इस राज्य का शासन किया करता है। वहाँ पर फिर छ: मास में होने वाले श्राद्ध के पिएड से तृष्टि प्राप्त करता है और वहां से भी यमदूतो के द्वारा इमै खीना जाता है ॥ २१ ॥ मार्गे पुन पुनस्तस्य वुभुक्षा जायते भृशम् । मदीयपुत्र पौत्रौ वा वान्धवः कोऽपि तिष्ठति ॥२२ ददाति कश्चिन्मा सौख्य पतित शोकसागरे । एव विलपतो मार्ग वार्यमारणस्य किङ्करै ॥२३ आयान्ति सम्मुखास्तत्र कैवर्तास्तु सहस्रश । वय त्वा तारयिष्यामो महावैतरणी नदीम् ।।२४ शतयोजनविस्तीर्ण पूयशोणितपूरिताम् । नानापक्षिसमाकीर्णा नानाझपशतवृताम् ॥२५ येन तन प्रदत्ता गौर्विष्णुलोकञ्च सा नयेत् । न दत्ता चेत्खगश्रेष्ठ वैतरण्यां स मज्जति ॥२६ - यमलोक वगन । २६१ स्वस्थावस्थे शरीरे तु वैतरण्या व्रत चरेत् । देया च विदुपे धेनुम्ता नदी ततुमिच्छता ॥२७ अदरया मज्जमानस्तु निन्दति स्व स मूढधीः । पाथेयार्थ मया किञ्चिन्न प्रदत्त द्विजातये । न तप्त न हुतं जन स्नान न कृत शुभम् ॥२८ मार्ग मे इमो बार-बार बहुत भूख लगा करती है और यह कहा करता है कि ससार मे मेरा कोई पुत्र-पौत्र या वान्या उपस्थित होगा तो शोक सागर में पड़ा हुआ कोई उनमे मे मुझे सुख देगा, हम प्रकार से विलाप करता हपा जाता है और यम के दूतों के द्वारा वारयमाण होना है। यहां पर महतो मोप- इसके सामने पा जाया करते हैं और वे कहते हैं कि हम तुमको इम मागे माने वाली महान् यंतरणी नदी से पार करा देंगे ॥२२।२३।२॥ यह महा वैतरणी नदी एक्सो योजन के प्रमाण वाली है । यह पूप ( मवाद ) और रक्त मे भरी हुई होती है । इममे पनेक प्रकार के पक्षीगण घिरे हुए रहा करते हैं और बहुत-से विशाल मत्स्य भो इसमे रहते हैं ॥२५॥ जिसने संमार में वास करके गो का दान किया है वह गो उस नदो से पार कराकर विष्णु नोक को से जाया करती है। है सग श्रेष्ठ! यदि गौ दान नहीं दिया है तो फिर यह उस वैतरणी मे मस्जित हो जाया करता है ॥२६॥ जब तक यह गरीर र दस मे रहे नभो वैतरणी का घन कर लेना चाहिए। यदि उग महा नदी वंतग्रणी को तर पर पार होने की या रसता है नो किमी विद्वान् मात्र यो धेनु या सर पवश्य ही धरना वहिए ॥७॥ गोदान न करे 37 नदी में डूबना हमा यह मूर उप ममय अपन मारी भूल पर पश्चात्ताप रिया करता है। उम यह सोचता है पेप के लिए प्रति मा म माजन एप गुग पाने पे लिये प्राह्मणी को मैंने कुछ भी नही दिशयान मैंने कोई नर पिया मोर गहन तपा जाप ही पिया है और न तोर्यादिना स्नान हो पनी रियासपने पर जोर गमन पे मार्ग में गुग प्रा करने के लिये कुछ भी गर्म नही पिया है।॥ २०॥ याहा कर्म चरित मूढ भुइयाध ताहाम्। हा देव इति समूढो भीपरोस्ताडपते हृदि २६
२६२ ]
श्री गरुडपुगर
पाण्मासिकन्त्र यच्छाद तत्र भुक्त्वा प्रसपंति ।
तार्य तत्र विशेषेण भोजयेच्च द्विजान्शुभान् ।।३०
चत्वारिंशत्तथा समयोजनानां शतद्वयम् ।
प्रयाति प्रत्यह ताय ह्यहोरात्रैण कर्पितः ॥३१
सप्तमे मासि सम्प्राप्त पुर बध्वा पद प्रजेत् ।
तत्र भुक्त्वा प्रदतं यत् सप्तमासिकसम्भवम् ॥३२
तत् पुर स व्यतिक्रम्य दुःखद पुरमाश्रयेत् ।
महद् दुखमनुप्राप्य स्वमार्गे याति वै पुनः ।।३३
मास्यष्टमे प्रदत्तं यत् तत्र भुक्त्वा स गच्छति ।
नवम मासिक भुडत नान क्रन्दपुरे स्थितः ॥३४
नानाक्रान्दगणान्दृष्ट्वा क्रन्दमानान् सुदारुणान् ।
स्वयञ्च शून्यहृदयः समाक्रन्दति दुखितः ॥३५
उस प्रेत से फिर यम के किसर कहत है-प्ररे मूढ ! तूने जैसे भी कम
किये हैं अब उन सबके फलो का भोग कर। अब पछतावे और रोने-धोने से
का होता है ? यह कहते हुए यमदुनो के द्वारा बडी भोपपता के साथ हृदय
पर ताडित किया जाता है और वह "हा देव !"--यह कहकर ता रहता है।
॥२६॥ फिर वहाँ छ. म.स के दिये हुए थाद्ध को खाकर प्रागे को दौड लगाता
है । है तार्य ! वहाँ पर विशेष रूप से शुभ द्विजो को भोजन कराना च हिए ।
॥३०॥ यह इस तरह से दिन-रात मे कर्षित होता हुमा प्रतिदिन दो सौ सैता-
लीस योजन जाया करता है ॥३१॥ सातवें माप के प्रारम्भ होने पर पर बांध-
कर पुर को जाया करता है और वहाँ पर मातवें मास का दिया हुप्रा श्राव
' का अशन किया करता है ॥३२॥ फिर इम पुर से निकल कर मस्यन्त दुःख
देने वाले एक पुर का प्राश्रय लेता है। वहाँ बहुत भारी दु.ख भोग कर पुनः
अपने मार्ग में चलता जाया करता है ॥३३॥ पाठवें मास में जो श्राद दिया
जाता है उसका भोजन करके फिर वह अगे जाता है। नवम मास मे दिये हुए
पिण्ड का भशन करके नानाकन्द पुर में स्थित होता है ॥३४॥ वहाँ पर क्रन्दन
(इन) करते हुए परम सुदारण नानाकन्द गणो को देखकर स्वय शून्य हृदय
वाला होता हुआ दुःखित हाकर क्रन्दन किया करता है ॥३५॥
यमलोक बन 1 [ २६३ विहाय तत् पुर प्रेतो याति तमपुर प्रति । सुतप्तनगर प्राप्य दशमे मासि सोऽथ ते ॥३६ भोजनैः पिण्डदानस्तु दत्त-तत्र मुखी भवेत् । मासि चंकादशे पूर्णे रौद्र स्थान म गच्छति ।।३७ दर्शकमासिक भुक्त्वा पयोवर्पण मिच्छति । मेघास्तत्र प्रवपंन्ति प्रेताना दु:सदायकाः ॥३८ न्यूनाब्दिक तु यच्छ्राद्धं तत्र भुक्त सुदुःखितः । सम्पूर्ण च ततो वर्षे प्रेत. शीतपुर व्रजेत् ॥३६ शोताढ्यनगरं तत्र महाशीत प्रवर्तते। शीतात: क्षुधितः सोऽपि वीक्षते हि दिगो दश ॥४० अस्ति मे बान्धव. कोऽपि यो मे दु ख व्यपोहति । किङ्करास्त वदन्त्येव क्व ते पुण्य हि तादृशम् ।।४१ श्र त्या तेषां तु तद्वाक्य हा देव इति भापते : दैवञ्च प्राकृत कर्म यन्मया मानुपे कृतम् ।।४२ एव सञ्चिन्त्य बहुशो धैर्यमालभते पुनः । चत्वारिंशद्योजनानि चतुर्यतानि वै तथा ।।४३ धर्मराजपुर दिव्य गन्धर्वाप्सर सकुलम् । चतुरशी तिलाश्च मूर्तामूर्तरधिक्षितम् ॥४४ उस पुर ना त्याग करके फिर वह त तप्तपुर की ओर जाया करता है। उम सुनत नगर में पहुंच पर दशम माम में दिये हुए थाम को साता है। भोजन मौर सिंह दानो से जोकि दिये गये हैं वहाँ पर यह मुखी होता है। एकादरा के पूर्ण हो जाने पर-वह प्रेत सेंद्र स्थान में जाता है ॥ ३६॥ ३७॥ फिर यह क मामिक का मशन फर पयो ६पंगा की इच्छा दिया करता है। वहाँ पर मेघ वर्षा क्यिा करते हैं जो प्रेतो रो दुध देने वाले होते हैं। ॥ ३८॥ यहाँ पर म्यूदित जो श्राव होता है उसे ह व दुसर होता हुमा साता है । फिर वर्ष के सम्पूर्ण हो जाने पर यह प्रेन शीतपुर में जापा परता है ।। ६६ ।। यह शोत से युक्त नगर होता है मोर वहाँ पर महान् गीत
२६४ ]
[ श्री गरुडपुराण
"
रहा करता है । शीत से दुखित तथा क्षुधा से पोडित यह दशों दिशानों को
मोर देगा करता है ।। ४० । वह सोचता है कि मेरा कोई बान्धव है जो
मेरे इस दु.ख को दूर हटावे। उस से यम के दूत कहा करते हैं-" तेरा ऐपा
पुण्य कहाँ है ? जो तेरो पीडा का निवारण हो । उनके ऐसे बचन श्रवण कर
के वह
"हादेव!"
'-यह कहकर चिल्लाता है। मैंने मनुष्य लोक में देव
और प्राकृत कर्म जो कुछ भी था वही किया है अर्थात् कोई शुभ कर्म किया
ही नही है । इस प्रकार में बहुत-मा चिन्तन करके फिर धीरज बांध लेता है।
फिर चौवालीस योजन के विस्तार वाला धर्मराज का पुर प्राता है जो परम
दिव्य होता है और गन्धर्व तथा अप्सरानो के गण से सकुल (घिरा हुमा) होता
है। चौगसी लाख मूतं और भमूतों से वह अधिनित होता है ।। ४० ॥ ४३ ।।
॥४२॥ ४४ ।।
द्वादशैव प्रतीहारा धर्मराजपुरे स्थिताः ।
शुभाशुभं तु यत् कर्म ते विचार्य पुनः पुनः ॥४५
श्रवण। ग्रहाण. पुत्रा मनुष्याणाच चेष्टितम् ।
कथयन्ति तदा काले पूजताऽपूजता. स्वयम् ॥४६
नरस्तुष्ट श्र रुष्टश्च यत् प्रोक्तञ्च कृतञ्च यत् ।
सर्वमावेदयन्ति स्म चित्रगुप्त यमे यथा ॥४७
दूराच्छुचरणविज्ञानं दूरादर्शनगोचरम् ।
एवञ्चेष्टास्तु ते सर्वे स्वर्भू:पातालचारिणः ॥४८
तेषां यत्नास्तथैवोग्राः श्रवणा. पृथगाहयाः।
एव तेषां शक्तिरस्ति मत्ये मोपकारिका ॥४६
व्रतैनिश्व यस्तेपा पूजये दिह मानवः ।
जायन्ते तस्य ते सौम्या. सुखमृत्युपदायकाः ।।५०
धर्म गज पुर मे बारह प्रतीहार स्थित रहा करते हैं शुभ मोर प्रशुभ
जो भी कर्म मृत प्राणी (प्रत) के होते हैं उनपर वे बार-बार विचार करके
निर्णय किया करते हैं । ब्रह्म के पुत्र श्रवण मनुष्यो के चेष्टित पर्थात् कर्म को
उस समय में पहते हैं। स्वयं पूजित मोर अपूजित होते है ॥ ४५ ॥ ४६॥
श्रावण गण चरित्र । २६५ - तुष्ट तथा रुष्ट मनुष्यो के द्वारा जो कहा गया है । वह सभी कुछ यम और चित्र- गुप्त मे मावेदित कर देते हैं ।। ४७ ।। दूर से श्रवण करने का विशेष ज्ञान मौर दूर से देखने का प्रत्यक्ष जमा ज्ञान का होना इनको होता है। वे सभी ऐसी चेष्टा वाले हमा करते हैं । वे स्वर्ग भूमि और पाताल में चरण करने वाले होते हैं।। ४८ । उनसे सब यन्त्र भी वैसे ही उग्र हुमा करते हैं। श्रवण ये इनका एक पृथक नाम होता है। उनकी ऐभी विशेष शक्ति हुमा करती है जो मनुष्य लोक मे मनुष्यो को उपकार करने वाली होती है ।। ४६ ॥ यहाँ पर जो मनुष्य व्रत तथा दानो के द्वारा उनकी पूजा किया करता है उसके लिय वे बहुत ही सौम्य होते है और सुख से मृत्यु के देने पाले हुपा करते हैं ॥५०॥ -श्रावण गण चरित्र एको मे सशयो देव हृदयेऽतीव वर्तते । श्रवणा कस्य पुनाच कथ यमपुरे स्थिता ॥१ मानुपैश्च कृत कर्म कस्माज्जानन्ति ते प्रभो। कथ शृण्वन्ति ते सर्वे कस्माज्ज्ञान समागतम् ॥२ कुन भुजन्ति देवेश कथयस्व प्रसादत । पक्षिराजवच श्रुत्वा भगवान् वाक्यमब्रवीत् ॥३ शृणुप्त वचन सत्य सर्वेपा सौख्यदायकम् । तदह कथयिष्यामि श्रवणाना विचेष्टितम् ॥४ एकीभूत यदा सर्व जगत्स्थावरजङ्गमम् । क्षीरोदसागरे पूर्व मयि सुप्त जगत्पती ॥५ नाभिस्थोऽजस्तपस्तेपे वर्षाणि सुबहून्यपि । एकीभूत जगत् सृष्ट भूतग्रामश्चतुर्विधम् ॥६ ब्रह्मगा निर्मित पूर्व विष्णुना पालित यदा। रुद्र सहारमूत्तिश्च निर्मित ब्रह्मरणा तत ॥७ गरुड ने कहा-हे देव ! मेरे हृदय में एक बड़ा भारी सशय होता है। ये श्रवण किसके पुत्र हैं और ये यमपुर मे क्यो रहा करते हैं? ॥१॥ है ] [ श्री गण्डपुगण प्रभो ! मनुष्यो के द्वारा किये हुए कर्मों को ये कैसे जान लिया करते हैं ? यह ऐसा ज्ञान उन्हें वहां से प्रा गया है ? हे देवेश ! यह भी कृपा कर बताइये कि ये लोग कहाँ खाया करते हैं ? पक्षिराज के इस वचन को सुनकर भगवान् ने यह वाक्य कहा--२ ॥ ३ ॥ श्री कृष्ण बोले--हे गरुड ! अब तुम मेरे सत्य वचनों का श्रवण करो जोकि सभी के लिये सुख देने वाले हैं। मैं श्रवणो के विचेष्टित को बतलाता हूँ ॥ ४ ।। इस समस्त जगत् के पति मेरे क्षीर सागर मे शयन करने पर जब यह स्थावर ( प्रचर ) प्रोर जङ्गम ( चर) जगत् एक- भूत हो गया था अर्थात् सभी कुछ मुझ में लीन हो गया था उस समय मेरी नाभि के कामल में स्थित प्रज ने बहुत वर्षों तक तपश्चर्या को थी। फिर एको. भूत चार प्रकार का जगत् मृजन किया गया था जोकि भूतो का एक समुदाय पा॥ ५॥ । पहिले ब्रह्मा ने इसका निर्माण किया था पौर विष्णु ने इस निर्मित जगत् का पालन किया था तथा रुद्र इसके सहार करने वाली मूक्ति थी। इसके बसन्तर ब्रह्मा ने निर्माण किया था ॥७॥ वायु. सर्वगत मृष्ट सूर्य्यस्तेजोविवृद्धिमान् । धर्मराजस्तत. सृष्टश्चित्रगुप्तन सयुतः ।। सृष्ट वेवमादिक सर्व तपरतपे तु पनः । गतानि बहुवारिण ब्रह्मणी नाभिपङ्कजे ॥ यो यो हि निमितः पूर्व तत्तत्कगं समाचरेत् । फरिमश्चित् समये तत्र ब्रह्मलोक समन्यितः ॥१० रुद्रो विप्रास्तथा धर्मः शासयन्ति वसुन्धराम् । न जानीमो वय किश्चित्लोकस्यमिहोच्यताम् ॥११ इति चिन्तापराः सर्वे देवा विममृगुस्तदा । सचिन्स्य ब्रह्मणो मन्त्रं विवुध.प्रेरिस्तदा ॥१२ गृहीत्वा युगपमागि पो मृजवादगात्मजान् । तेजोरागीन् विगालाक्षान् ब्रह्मणो वचनात्तु ते ॥१३ यो यं वदति लोकेऽभिमन् मुभ या यदि चानुभम् । प्रापयन्ति सत. मीघ्र ग्रह्मणः कसं गोधरे ॥१४ श्रवण गण चरित्र [ २६७ युक्त धर्म. सर्वत्र गमन करने वाले वायु का सृजन किया गया था। तेज की निवृद्धि मे युक्त सूर्य का सृजन किया था । इसके अनन्तर चित्रगुप्त से राज की सृष्टि की गई थी।। ८ ।। इस प्रकार से इन सबका सृजन करके पज ब्रह्मा ने तप किया था । नाभि से समुत्पन्न कमल मे ब्रह्माजी को तपस्या करते हुए बहुत-से वर्ष व्यतीत हो गये थे ।। || जो-जो पहिले सिमित हुए थे वे अपना-अपना कर्म का प्रापरण करते थे। वहीं पर किमी समय में ब्रह्म लोक से समन्वित गद्र-विष्णु तया धर्म इम वसुन्धरा का शासन करते थे। हम सब लोक के कृत्य को कुछ भी नही जानते है प्रतएव यह बतलानो। इस प्रकार से इस चिन्ता से युक्त समस्त देवो ने परस्पर परामर्श किया था। देवो के द्वारा प्रेरित होकर उस समय मे ब्रह्मा के मन्त्र सचिन्तन करके कुशा के पत्र लेकर बारह पात्मजो का सृजन किया था। जोकि बारह पुत्र तेज के राशिभूत थे पोर विशाल नेत्रो वाले थे । ब्रह्मा के बचन से वे सब इस लोक मे जो भी कोई जिसको कुछ योलता है वह शुभ हो पथवा अशुभ हो उस सबको तुरन्त वे ब्रह्मा के कानो में पहुंचा दिया करते हैं ॥१०॥११॥१२॥१३॥१४॥ दूराच्छवरणविज्ञान दूरादर्शनगोचरम् । सर्वे शृण्वन्ति यत् पक्षिस्तेनैव श्रवणा मता ॥१५ स्थित्वा चैव तथाकाशे जन्तूनाम्चेष्टितं तु यत् । तज्ज्ञात्वा धर्मराजाने मृत्युकाले वदन्ति च ॥ धर्मश्चार्थच कामञ्च मोक्षञ्च कथयन्ति ते ।।१६ एको हि धर्ममार्गश्च द्वित्तीयश्चार्थ मार्गकः । अपरः काममार्गश्च मोक्षमार्गश्चतुर्थ कः ॥१७ उत्तमाधर्ममार्गेण वैनतेय प्रयान्ति हि। अर्थ दाता विमानस्तु अश्व कामप्रदायकः ॥१८ हसयुक्तविमानश्च मोक्षकाक्षी प्रसर्पति । इत्तर: भादवारे ह्यामिएश्वनानि च ॥१९ पापाणं कण्टकं. क्लिष्ट पाशबद्धोऽय याति । यः कश्चिामानुपे लोके श्रवणान् पूजयेदिह ।।२० २९८ ] । श्री गरुडपुराण दूर से ही सभी कुछ के श्रवण करने का विशेष ज्ञान प्राप्त कर लेन और दूर से ही सभी कुछ के देख लेने का विशेष ज्ञान प्राप्त करना यह इनकी विशेष शक्ति थी । हे पक्षिन् ! से सभी कुछ सुन लिया करते हैं अनएव इनका नाम श्रवण कहा गया है ।। १५ । माकाश मे ही स्थित होकर समस्त जन्तुपो के कर्मों को जान या देख लिया फरते हैं और मृत्यु के समय में उन सबको धर्मराज के प्रागे ने बतला दिया करते हैं। वे पम-~मर्थ-वाम और मोक्ष के विषय में भी सब कुछ कह दिया करते हैं ।। १६॥ एक धर्म का मार्ग है- दूसरा अर्थ का मार्ग है-तीसरा काम का मार्ग है और चौथा मोक्ष का मागं होता है ।॥ १७ ॥ हे बननेय ! वे सम उत्तम और प्रधम माग से जाया करते है। जो सर्य का दाता होता है यह विमानो के द्वारा गमन करते हैं। काम के प्रदायक सञ्चो के द्वारा प्रयाण करते हैं। जो मोक्ष के प्राकाइ क्षी होते हैं वे हमो से युक्त विमानों के द्वारा प्रयाण किया करते हैं। इतर लोग परी से ही मसिपत्र वनो में होकर पाषाण कण्टको से क्लेश भोगते हुए पाश से बद्ध होकर गमन किया करते हैं। जो कोई मनुष्प इस मनुष्य सोक में श्रवणो का यज नाचन करता है उसकी पढ़नी पक्वान से परिपूर्ण और जल से मरी पूरी होती है । हे खगेश्वर । प्रतएव वहाँ पर मेरे माथ श्रवणो का पूजन करना चाहिए ॥१७॥१८॥१६॥२०॥ वर्द्धनी जलसम्पूर्ण पक्वान्नपरिपूरिता । श्रवणान् पूजयेत्तत्र मया सह खगेश्वर ॥२१ तस्याह तत्करिष्यामि यत्सुरैरपि दुर्लभम् । सम्भोज्य ब्राह्मणान्भक्त्या एकादश शुभान्शुचीन ॥२२ द्वादशं सपालत्रञ्च मम प्रीत्येव पूजयेत् । देव. सर्वेश्च सम्पूज्या स्वर्ग यान्ति सुखेप्सया ॥२३ तैः पूजितरहं तुष्टश्चित्रगुप्त न धर्मराट । तैस्तुष्ट मंत्पुर यान्ति लोका धर्मपरायणाः ॥२४ श्रवणानाञ्च माहात्म्यमुत्पत्तिञ्चेष्टितं शुभम् । शुणोति पक्षिशार्दूल स च पापैर्न लिप्यते ।। इह लोके सुख भुक्त्वा स्वर्गलोके महीयते ॥२५ प्रेतोद्देश्य से विविध दानो का फल ] २६६ उसके हित के लिये मैं वह सब कुछ कर दिया करता हूँ जोकि देवो के लिये भी-दुर्लभ होता है । परम शुम ग्यारह ब्राह्मणो को जोकि प्रतीव पवित्र हो भक्ति भाव के साथ भली-भांति भोजन करावे। बारहवें ब्रह्मण की पत्नी के सहित मेरो प्रीति के लिये ही पूजा करे । ये समस्त देवो के द्वारा सम्पूज्य होते हैं और सुख को इच्छा से स्वर्ग को जाया करते हैं। उनके पूजित होने से मुझे परम तोप होता है और चित्रगुप्त के द्वारा धर्मराट सन्तुष्ट होते हैं । उन सबके तुष्ट होने से धर्म परायण लोग मेरे पुर में जाया करते हैं। श्रवणो के इस माहात्म्य को-उत्पत्ति को प्रौर शुभ चेधित को है पक्षिशार्दूल । जो श्रवण करता है वह पापो से कभी भी लिप्त नहीं होता है । इस लोक में सम्पूर्ण सुखो का उपभोग करके अन्त मे स्वर्ग लोक मे प्रतिष्ठित होता है ॥२१॥२२॥ ॥२३॥२४॥२५॥ -प्रेतोदेश्य से विविध दानों का फल श्रवणाना बच. श्रु त्वा क्षरण ध्यात्वा पुनर्यमः । यत्कृतञ्च मनुप्यश्च पुण्य पापमहनिशम् ॥१ तत्सर्वञ्च परिशय चित्रगुप्तो निवेदयेत् । चित्रगुप्तस्तत सर्व कर्म तस्मै वदत्यथ ॥२ वाचैव यत्कृत कर्म कृतश्च व तु कायिकम् । मानसश्च तथा कर्म कृत भुड क्त शुभाशुभम् ॥३ एव ते कथित तार्य प्रैतमार्गस्य निर्णयम् । विधान्तकानि सर्वाणि स्थानानि कथितानि ते ।।४ तमुद्दिश्य ददात्यन्न सुख याति महाध्वनि । दिवारान तमुद्दिश्य स्थाने दीपप्रदो भवेत् ।।५ अन्धकारे महाघारे स्वपुत्त लक्षजिते। दी ध्वनि च ते यान्ति दीपो दत्तश्च यनर ॥६ कात्तिके च चतुर्दश्या दोपदान सुखाय वै । अथ वक्ष्यामि सक्षेपाद्यममार्गस्य निष्कृतिम् ॥७
३०० ]
। श्री गपुराण
--
भी बुरा-
भगवान श्री कृष्ण ने पहायवों के वचनो को सुनपर फिर ए
मात्र ध्यान कर फिर यम, मनुप्यो में द्वारा महानंदा में जो भी पाप मोर पुर्थ
लिया है उग मयको जान पर विमगुप्त यो निवेदन पर देता है । इसम अनन्नर
चित्रगुप्त उमो समान को को उम मोलते हैं । वाणी से जो कुछ
भला कर्म दिया है सगा गरीर के द्वारा जो भी कर्म किया गया है और मन
से जो कर्म का चिन्तन किया है वह चाहे शुभ हो या अशुभ हो उसका वह
प्रत भोग विया करता है ॥ १ ॥२॥ ३।। हे गरुड | इस प्रकार में वही
पर प्रेत के माग का निर्णय हुपा करता है और वह राय कहा जाता है।
विधान सभी स्थान तुझे बता दिये गये हैं। इसका नद्देश्य करके ही मन
या दान किया करता है जिसमे उस परम विशाल यमपुरी के मार्ग में छह
सुख यूर जाता है। जिन मनुष्यों ने शेपो का दान किया है वे उस महा घोर
स्वपूर्त एप लक्ष वजित मन्धकार में दीप्त मार्ग में जाया करते हैं। उसी का
उद्देश्य करके दीपो का दान पिया जाता है ॥४॥५॥ कार्तिक मास में।
चतुर्दशी के दिन में जो दीपों का दान किया जाता है वह उस समय में सुष
के लिये होता है। इसके मनन्तर में सोप से यम के मार्ग की निकृति बतलाता
-
वृपोत्सर्गस्य पुण्येन पितृलोक स गच्छति ।
एकादशाहपिएडेन शुद्धदेहो भवेत्ततः॥८
उदकुम्भप्रदानेन विकरास्तृप्तिमाप्नुयु ।
शम्यादानविमानस्थो याति मार्ग खगेश्वर 18
तदिने दोयते सर्व द्वादशाहे विशेषत ।
त्रयोदश वरिष्ठानि वस्तुवन्ति पदानि वै ॥१०
यो ददाति मृतस्येह जीवन्नेवात्महेतवे ।
तयाश्रितो महामार्गे बनतेय स गच्छति ॥११
एक एवास्ति सर्वत्र व्यवहार खगेश्वर।
उत्तमाघममध्याना तत्तदा वर्जन भवेत् ॥१२
प्रतोद्देश्य मे विविध दारो का फल ] ३०१ यावद्भाग्य भवेद्यस्य तावन्मार्ग प्रकीय॑ते । स्वय स्वस्थेन यद्दत्त तत्राधिक्य करोति तत् ॥१३ मृते यवान्धवेदंत तदाश्रित्य सुखी भवेत । इत्युक्तो वासुदेवेन गरुडस्तमथाब्रवीत् ।।१४ वृपोत्मगं जिमके विषय मे पहिले पूर्ण विधान बता दिया गया है। इसके पुण्य के प्रभाव से प्रेत पितृ-लोक में चला जाता है। मारहवें दिन के पिंड दान से देह की शुद्धि हो जाया करती है ।। ८ ।। उदक के कुम्भ के प्रदान करने से किकर लोग तृप्ति को प्राप्त हुप्रा करते हैं। हे खगेश्वर । शय्या के दानो से यह प्रत विमान में स्थित होकर उस मह न मार्ग की यात्रा किया करता है ॥ ६ ॥ उम दिन में सभी कुछ का दान किया जाता है। चारहवें दिन मे विशेष रूप से तेरह विशेष वस्तुओ वाले परम वरिष्ठ पदो का दान दिया जाता है ।। १० ॥ जो यहां मृतक के लिये दान करता है तथा जीवित हो रहते हुए अपने निये दान किया करता है । उसी प्रकार से प्राधित होता हुवा है वैनतेय । उम महामार्ग में वह गमन किया करता है ।। ११॥ हे वगेश्वर । भर्वत्र एक ही व्यवहार होता है। उम समय मे उत्तम-मध्यम और प्रथमो का धर्जन हुआ करता है ।। १२ ।। जिसका जितना भाग्य होता है नमी प्रकार का वैसा मार्ग प्रोत्तिन किया जाता है। स्वय ही स्वस्थता की दशा में जो दान किया है वहां पर वह अधिक कर देता है । मृत होने पर बान्धवो के द्वारा जो दिया गया है उसका मात्रय पाकर वह मुस्खो होता है। इस प्रकार से सुदेव भगवन के द्वारा पहे गये गरुड ने फिर उनसे कहा था । कस्मात् पदानि यानि तै किविधानि त्रयोदश। दीयन्ते देवदेवेश तद्वदस्व यथातथम् ॥१५ छयोपानवस्त्राणि मुद्रिका च कमण्डलुः। प्रासन भाजन व पद सप्तविध स्मृतम् ।।१६ प्रतास्ता यो होद्रो दह्यन्ते येन मानवा । छादानेन सुच्छाया जायते प्रेत तुष्टिदा ।।१७ ३०२ [ श्री गरुडपुराण - असिपत्रवने घोरे शर्कराकण्टकयुते । अश्वारूढास्तु ते यान्ति ददति ये ह्य पानहीं ॥१८ प्रासन भाजनञ्च व यो ददाति द्विजातये । सुखेन भुञ्जमानस्तु पथि गच्छेच्छनैरपि ॥१६ बहुधर्मसमाकोणे मार्गे ने तोयजिते । कमण्डलुप्रदानेन सुखो भवति निश्चितम् ॥२० मृतोद्देशेन यो दद्यादुदशन तु ताम्रजम् । प्रपादान त्रस्य यत् फल सोऽश्नुते फलम् १२१ गरुड ने कहा-है देवी के भी देवेश । वे तेरह पद क्यो दिये जाया करते हैं और वे किस प्रकार के होते हैं ? यह पाप मुझे कृपा कर ठीक ठीक बनाने की उदारता करिये ।। १५ ॥ श्री कृष्ण भगवान् ने कहा-~-ये पद सात प्रकार के हुमा करते हैं-छत्र-उपानत्-~वस्त्र-मुद्रिका-कमण्डलु---आसन् मोर पात्र ये मात वस्तुऐ दान को होने से यह भी सात प्रकार के होते हैं ॥ १६ ॥ वहाँ पर जो भीषण प्रातप होता है जिससे मनुष्य साप में दग्घ हो जाया करते हैं छत्र के दान से उम समय में बहुत अच्छी खाया हो जाती है जोकि प्रत की तुष्टि को प्रदान किया करती है ॥ १७ ॥ वह मार्ग परम घोर है और असिपनवन मे युक्त होता है। बालू और कांटो से भी युक्त रहा करता है उस मार्ग मे बो उपानह (पाद त्राण) का दान करते हैं वे अश्व पर प्रारूड होकर गमन किया करते हैं ॥ १८ ॥ जो विप्रो को मासन और पत्रो का दान करते हैं वे मुख पूर्वक खाते-पीते धीरे २ रा मार्ग की यात्रा किया करते हैं ।। १६ ॥ यह मार्ग' बहुत से धर्मों से समाकीर्ण होता है और जल से रहित है उसमे कम डलु के दान से प्रेत निश्चित रूप से परम सुखी होता है। ॥ २० ॥ मृतक के उद्देश्य मे जो ताम्र का पात्र जल से परिपूर्ण करके दान देता है उसे एक सहस्र प्रपा (प्याऊ) के दान का जो पुण्य फल होता है वह प्राप्त हो जाता है । २१॥ यमदूता महारौद्रा कराला कृष्णपिङ्गला । न पीडयन्ति दाक्षिण्णाद्वस्त्राभरणदानत ॥२२ प्रेतोद्देश्य से विविध दानो का फल ) सायुधा बहुरूपास्तु नामार्गे दृष्टिगोचरे । प्रयान्ति यमदूताश्च मुद्रिकायाः प्रदानत: ॥२३ भाजनासनदानेन ह्यामान्न जनेन च । श्राज्ययज्ञोपवीताम्यां पदं सम्पूर्णतां व्रजेत् ११२४ एवं मार्गे गम्यमानस्तृषार्तः श्रमपीडितः । घटान्तदानयोगेन बन्धुदत्त न नित्यशः ।। महिपीरथगोदानात्सुखी भवति निश्चितम् ॥२५ मृतोदेशेन यत् किञ्चिद्दीयते स्वगृहे विभो । स गच्छति महामार्गे तद्दत केन गृह्यते ॥२६ गृह्णाति वरुणो दान मम हस्ते प्रयच्छति । अहञ्च भास्करे देवे भास्करात्सोऽनुते फलम् ।।२७ विकर्मण प्रभावेण वशच्छेद. क्षिताविह। रावे ते नरक यान्ति यावत्पापस्य सक्षय. २८ यम के दूत महान् गेद्र अर्थात् भगानक स्वरूप वाले होते हैं । ये बहुत ही कराल, कुपण तथा पिङ्गल धरणं वाले हैं किन्तु वे वस्त्र तथा पामरणों के दान से दाक्षिण्य से उस प्रेत को पीडा नहीं दिया करते हैं ।। २२॥ आयुशे के सहित-बहुत प्रकार के स्वरूपो वाले यम के दूत मुद्रिका के प्रदान करने से प्रमाणे मे दृधिगोचर नही होते हैं ।२३१ पोत्र और सन के दान से-प्रमान प्रोर भोजन से--घृत तथा यज्ञोपवीत से पद सम्पूर्णता को प्राप्त होता है ॥२४॥ इस तरह मार्ग मे गमन करता हुआ प्य रा से दु.खित एव श्रम से पोडा वाला प्रत बन्धु घों के द्वारा नित्य दिये हुए घटान दान के योग से तथा महिण-रथ और गोदान से निश्चित रूप से सुखी होता है ॥ २५ ॥ गरुड ने कहा--हे विभो । मृतक का उद्देश्य करके अपने घर में जो कुछ भी दान किया जाता है वह सभी कुछ उस महान विशाल यमपुरी के मार्ग मे चला जाता है तो उसके दिये हुए किस के द्वारा ग्रहण किया जाता है ? ॥ २६ ॥ धो कृष्ण भगवान ने कहा-उस दिये हुए दान को वरुण देवता ग्रहण किया करते हैं भौर फिर मेरे हाथ में दे दिया करते हैं। मैं फिर उसको भुवन भास्कर वेसूर्यदेव को ग ३०४ ) [ थी गरुडपुराण दे देता हूँ और भास्वर मे उसे वह प्रेत प्राप्त किया करता है और उसका फल भोगता है ॥ २७ ॥ विक्म के अर्थात् बुरे कर्मों के प्रभाव से यहाँ भूलोक में घश का उच्छेद अर्थात् नाश हो जाया करता है और जब तक उस बुरे कर्म द्वारा समुत्रम पाप का क्षय नही होता है वे सभी लोग नरको में निवास किया करते हैं और नाना प्रकार के अराह्य उत्पीडन भोगा करते हैं ॥२८॥ कस्मिश्चित्सुखरूपेण महिपासनसस्थितः । नरकान्वीक्ष्य धर्मात्मा नानाक्रन्दसमाकुलान् ॥२६ चतुरशीतिलक्षाणां नरकाणा स ईश्वरः । तेपा मध्ये श्रेछनमन्धौरेयास्त्वेकविशतिम् ॥३० तामिस्र लोहशंकुञ्च महारौरवशाल्मलीम् । रोरवं कुण्डलम्पूतिमूर्तिक कालसूत्रकम् ॥३१ सन्ततं लोहतोदञ्च सविष सप्रतापनम् । महानरक कोकोल सञ्जीवञ्च महापथम् ।।३२ अवोचिमन्धतामिन कुम्भीपाक तथैव च । असिपत्रवनश्च व पतनञ्च कविंशकम् ।।३३ येपां तु नरके घोरे गतान्यब्दशतानि । सन्तति व विद्यत दूतत्व ते प्रयान्ति हि ॥३४ यमैन प्रेपितास्ते में मानुपस्य मृतस्य च । दिने दिने प्रगृह्णन्ति दीपमन्न घटादिकम् ॥३५ किमी स्थान पर बडे ही सुख पूर्वक महिप के पासन पर विराजमान धर्मात्मा धर्मराज अनेक प्रकार के रुदन से समाकुल नरको को देखकर वहाँ सस्थित रहते हैं । वह चौरासी लास नरको के अधिपत्ति हैं। उन ढेर सारे समस्त नरकों में सबसे ऊंची श्रेणी के प्रबलतम नरक इक्कोस होते हैं उनके नाम ये होते हैं-तामिस-लोहराकु महारोरव-शाल्मली-रौरव कुण्डलम् पूति मूर्तिक- काल सूत्रक---सन्तत--लोह सोद-सविष-संप्रतापन-महान रक-बोल- सजीव--महापथ-प्रनीचि-सन्ध तामिस-कुम्भीपाक-मसि पत्र वन--- पतन ये कुल इक्कीस हैं ।। २६ ॥ ३० ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ जिनको उस तोद्देश्य से विविध दानों का फल 1 ३०५ और नरक में सैकडौं वर्ष व्यतीत हो जाते हैं। उनके सन्तति नहीं होती है वै कर्म के करने वाले हो जाया करते हैं ॥ ३४॥ वे सब यमराज के द्वारा पित होकर मृत मनुष्य के प्रतिदिन दीपक-अन्न और घट आदि को ग्रहण हमा करते हैं ॥३॥ प्रतस्यैव प्रयच्छन्ति मन्नकामस्य सत्त.पः । मासान्ते भोजनं पिण्डमेकमिच्छन्ति तत्र व ॥३६ तृप्ति प्रयान्ति ते सर्व प्रत्यञ्च व वत्सरम् । एवमादिकृत. पुण्यः क्रमतो वत्सर ब्रजेत् ॥३७ ततः सवत्सरस्यान्ते प्रत्यासन्ने यमालये। बहुभीतिपुरे रम्ये हस्तमात्र समुत्सृजेत् ।।३८ दशभिदिवसर्जात त देह दशपिण्डजम् । जामदग्नेर्यथा राम दृष्ट वा तेजः प्रसर्पति ॥३६ कर्मज देहमाश्रित्य पूर्व देहं समुत्सृजेत् । अ गुठमात्रः पुरुष; शमीपत्र समारुहेत् ।।४० व्रजस्तिष्ठन् पदकेन यर्थव केन गच्छति । यथा तृणजलोकेय देही कर्मानुगोऽवशः ॥४१ वासासि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपरारिण। तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि गृह्णाति नवानि देहि ।।४२ तृष्णा से युक्त और अन्न की कामना करने वाले प्रेत को ही दिया करते हैं । मास के अन्त में वहाँ पर एक डि भोजन की इच्छा करते हैं ॥३६॥ वै सब प्रतिदिन माल भर तक तृप्ति को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार के किये हुए पुरयो के द्वारा क्रम से एक वत्सर व्यतीत हो जाया करता है ।। ३७ ।। इसके अनन्तर एक वर्ष के अन्त मे यमालय के निकट पा जाने पर उस बहुत से भयो में हस्न मान का समुत्सर्जन करे ॥ ३८॥ दश दिनो में दश पिंडो मे समुत्पन्न उस देह में श्रीराम को देख कर जमदाग्नि के पुत्र परशुराम की भांति तेज प्राप्ति होता है ॥ ३६॥ कामो से जन्य देह को पास कर फिर वाले रम्य पुर
[ श्री गरुडपुराण
ध: पूर्व देह का त्याग कर देता है। यह एक अंगूठे के घरावर पुरुष शमी के
पत्र पर ममारूट हो जाता है ॥ ४० ॥ एक पैर से चलता है-स्थित होता है
और एक से ही गमन किया करता है । जैसे तृणजनो का होता है वैमे हो
यह देही कर्मों का प्रमुगमन करने वाला अवश हुमा करता है ॥ ४१ ।। जैसे
कोई मनुष्य अपने पुराने जोरणं-शोरणं वस्त्रो का त्याग करके पुन नूनन वस्त्रो
को अपने शरीर पर धारण कर लिया करता है उसी भांति यह देही जीवात्मा
अपने पूर्व शरीरो का ग कर प्रन्य नवीन शरीरो को अपना भावास स्थल
धनाता हुमा उन्ह धारण कर लेता है। मनुष्य के शरीर की मृत्यु भी यही
घस्तु एवं स्थिति होती है। मनुष्य का देह भनित्य है और इसका त्याग अवश्य
ही हाता है। मामा नित्य एव अविनाशी है वह इसी तरह अपना चोला
घपला करता है। ४२॥
६-यमपुर वन
वायुभूत क्षुधाविष्ट कर्मज देहमाश्रयेत् ।
त देह स समासाद्य यमेन सोऽपि गच्छति ॥१
चित्रगुप्तपुर तर योजनाना तु विशति ।
कायस्थास्तत्र पश्यन्ति पापपुण्ये च सर्वश ।२
महादानेषु दत्तेपु गतस्तत्र सुखी भवेत् ।
याजनानाञ्चतुविशत्पुर वैवस्वत शुभम् ॥३
लोह लवणकास तिलपात्रञ्च ये कृतम् ।
सेन दत्तन तृप्यन्ति यमस्य पुरवासिन । ४
तर गत्वा तु ते सर्वे प्रतिहार वदन्ति हि।
धर्मध्वजप्रतीहारस्तत्र तिष्ठति सर्वदा ।।५
सप्तधान्यस्य दानन प्रीतो धर्मध्वजो भवेत् ।
तत्र गत्वा प्रतीहारो व्रते तस्य शुभाशुभम् ॥६
अपसजस्या पापसात सुप्रतिमा जना।
पश्यन्ति च दुरात्मना यमरूप गरदम् ॥७
यमपुर बर्णन ] भगवान श्रीकृष्ण ने कहा-यह देही जीवात्मा वायु के समान है और शुग से प्राविष्ट रहता हुमा कर्मज इस देह का माश्रय लिया करता है। वह उस देह को प्राप्त कर स्थित रहता है पोर यम के द्वारा यह भी गमन करता है ॥१॥ वहाँ पर वीस योजन के प्रमाण वाला चित्रगुप्त पुर है। यहाँ कायस्थ जाति के लोग सम्पूर्ण पाप और पुष्ण का लेखा जोखा किया करते हैं ॥२॥ महादानी के दिये जाने पर वहाँ पर गया हुमा प्राणी सुखी होता है । चौबीप योजनों के विस्तार वाला वैवस्वत गुभ पुर होता है ॥३॥ जिन्होंने लोह, लवण, कान मोर तिलपात्र का दान किया है। इसके देने से यमराज के पुर में निवास करने वाले तृप्त हुप्रा करते हैं ।।४। वहाँ पर वे सब जाकर पहिले प्रति- हार को बोलते है । वहाँ पर धर्मध्वज प्रतिहार सवंदा स्थित रहा करता है ।। सात धान्यो के दान से धमध्वज प्रतिहार प्रसन्न हुप्रा करता है। जाकर वह प्रतिहार उसके सब अच्छे बुरे कर्मों को बतलाता है ॥६॥ पमराज का जो स्वरूप है उसे सन्त और सुकृत करने वाले लोग अच्छा देखा करते हैं मोर दुरात्मा लोग उपी धर्मराज के रूप को बहुत ही दुरामद अर्थात् भयावह देखा करते हैं ।।७॥ त दृष्ट्वा भयभीतस्तु हाहेति वदते जन । कृत दान तु यमत्येन भय विद्यते क्वचित् ॥८ प्राप्त सुकृतिन दृष्ट्वा स्थानाच्चलति सूर्यज । एप मे मण्डल भित्त्वा ब्रह्मलोक हि गच्छति ।। दानेन सुलभो धर्मों यममार्गे सुखावह । एप मागों विशालोऽत्र न केनाप्यनुगम्यते ।।१० दानपुण्य विना सम्यड, न गच्छेद्धममन्दिरम् । अस्मिन्मार्गे तु रौद्र च भीपणा यमकिङ्करा ||११ पाशदण्ड परा घोरा सहस्राणि च पोडश। एकरस्य पुरस्याग्न सहस्र कञ्चतिष्ठति ॥१२ पापिन प्राप्य पाच्यन्ते उदके यातनाबरा । गृहन्ति मासमामान्ते पादशेप तु यद्भवेत् ॥१३
३०९ ]
[ श्री गरुडार।
मोध्वंदैहिकदानानि यनं दत्तानि काश्यप ।
महाकष्ट न ते यान्ति यस्माद्दे यानि शक्तित ॥१४
धमराज के उस परम भयानक स्वरूप को ही देखकर प्राणी भय से
हरकर हाहाकार करने लगता है । जिन मनुष्यो ने दान किया है उ हे कहीं भी
कुछ भय नही होता है 1८1कोई सुकृती जन्तु जिम समय यमराज के सामने
उपस्थित होता है तो उसे माया हुमा देखकर यमराज अपने स्थान से चलित
हो जाते हैं कि यह मेरे मण्डल का भेदन करके ब्रह्मलोक को गमन करता है।
॥६॥ दान से धर्म सुलभ होता है जो कि यमपुरी के मार्ग मे सुख देने वाला
हुमा करता है। यह इतना विशाल भर्थात् लम्बा मार्ग है जहाँ मन्य कोई भी
अनुगमन नही किया करता है ॥१०॥ दान पुण्य के बिना धर्मराज के मन्दिर
मे भली भांति नही जाया करता है। यह माग बहुत ही रौद्र होता है और
इसमे महामीपण यमराज के विद्धर रहा करते हैं ॥११॥ ये सब पारा मौर
दष्ठ के धारण करने वाले हैं और सोलह महल होर हैं। एक एक पुर के मगे
एक-एक सहस्र स्थित रहते हैं ॥१२॥ पापी को प्राप्त करके यातना के करने
वाले जल मे पाचन किये जाते हैं । प्रत्येक मास के म त मे जो पाद शेप हो।
है उमका ग्रहण करते हैं ॥१३॥ है क श्यप : जिन्होने पौध दैहिक दाग नहीं
दिये हैं वे गहान् बष्ट से जाया करते हैं। इसलिये पौध्व दैहित दान अपनी
शक्ति के अनुसार अवश्य ही देने चाहिये ।।१४।।
प्रदत्त्वा पशुवद्याति गृहीतो वधबन्धनै ।
एव कृत च सपश्येत न नर कृतकर्मणः ॥१५
दैविकी पतृकी योनि मानुषी वाथ नारकीम् ।
धर्मराजस्य वचनान्मुक्तिभवति वा तत ॥१६
मानुष्यञ्च तत प्राप्य सुपुत्रे पुरता व्रजेत् ।
यथा यथा कृत यमं ता ता योनि प्रजेन्नर ॥१७
तत्तथैव हि भुषानो विचरेत्सर्वलोक्त ।
प्रशाश्वत परिज्ञाय सर्व लोकान्तर सुसम् ॥१८
यदा भवति मानुष्य तदा धर्म समाचरेत् ।
कृमयो भस्म विष्ठा वा दहाना प्रकृति सदा ।।१६
यमपुर वर्णन 1 [ ३०६ अन्धकूपे महारौद्रे दीपहस्त: पतत्यपि । यदा पुण्यप्रभावेण मानुप्यं जन्म लभ्यते ॥२० यस्तं प्राप्य चरेद्धम स गच्छेत्परमा गतिम् । अपि जानन्वृथा धर्म दुखमायाति याति च ॥२१ जातीयतेन लभते किल मानुपत्वं तत्रापि दुर्लभतरं खग भो द्विजत्वम् । यस्तन्न पालयति लालयतीन्द्रियाणि तस्यामृत क्षरति हस्तगत प्रमादात् ॥२२ प्रौर्य दैहिक दानो को न देने वाला एक पशु की भांति ग्रहण किया हुआ वध भोर बन्धनो से पूर्ण कष्ट भोगता हुमा वहा जाया करता है। ऐसा होने पर वह मनुष्य जिसके कर्म किये गये हैं वह सव कुछ भी नहीं देखता है। ॥१५॥ धर्मराज के वचन से दैविकी, पैतृकी, मानुपी अथवा नारकी पोनि प्राप्त होती है अथवा इन सबसे छुटकारा पाकर मुन्नि हो जाती है ॥१६॥ मानुष्य भदि मनुष्य योनि में जन्म पाकर सुपुत्र में पुत्रता को प्राप्त होये। यह मनुष्य जैसा जैसा भी कर्म करता है उस-उस योनि को प्राप्त किया करता है। तालयं यह है कि सर्वदा कर्मों के अनुसार ही जीवन को प्राप्ति होती है ॥१७॥ पौर उसी प्रकार से भोगो को भोगता हुमा सभी लोकों में वह जीवात्मा विवरण किया करता है । लोकान्तर का समस्त सुख का परिज्ञान करके जो कि पाश्चन नहीं होता है फिर जब यह मनुष्य जीवन प्रास करता है तो उस समय में इसे धर्म का पाचरण करना चाहिए। इस मानव शरीर को सदा तीन ही गति होती है, वे तीन कृमि, भक्ष्म अथवा विष्ठा ये हैं ॥१८॥१६॥ महारोद्र प्राय यूप में दीपक हाथ में लेने वाला भी पतित हो जाता है। जप महान पुण्य का प्रभाव होता है तभी यह मनुष्य देह मिना करता है ॥२०॥ जो हरी प्राप्त करके धर्म या पाचरण करता है वह परम गति को प्राप्त कर लेता है। यह सब कारता हुमाको हत्य कोपर्श समता है सो माता रहता है और चला जाया करता है । दुप मे नितान्त निवृत्ति भी नहीं होती है ॥२१॥ यह मानुषत्व सेकडो जातियों के बाद बड़ी कठिनाई से प्राप्त होता है मतएव ३१० -- । श्री गरुडपुराण - इम मनुष्य योनि को ही परम दुर्लभ बतलाया जाता है। इस मनुष्य जन्म को भी पाकर हे खग ! द्विजत्व की प्राप्ति तो और भी पधिक दुर्लभ होती है। जो मनुष्य पौर उममे भी द्विज जीवन पाकर उसका यथार्य रूप से पालन नहीं करता है और केरल अपनी इन्द्रियो के सुख में निमग्न रहता है, उसके हाथ में रखा हुमा ममृत उसके प्रमाद के कारण ही हरित हो जाया करता है अर्थात उत्तम गति के प्राप्त करने का भमृत के समान सुयोग उसके हाथ से नापरवाही के कारण यो ही नष्ट हो जाया करता है । तात्पर्य यह है कि यह मनि दुतंभ मनुष्य जीवन व्यर्थ ही नष्ट हो जाता है ॥२२॥ १०-प्रेत पीड़ा वर्णन ये केचित्प्रेतस्पेण तत्र वास लभन्ति ते। प्रेतलोकाद्विनिमुक्ताः कथ भुजन्ति किल्विपम् ॥१ चतुरशीतिलक्ष व नरकः पप्युपासिता । यमेन रक्षिनाश्च व दूतंश्च व सहसंघा ॥२ विचरन्ति कथ लोके नरकाच्च विनिःसृताः । रक्षिता रक्षपालश्न विचरन्ति दियानिशम् । पक्षीन्द्रग विद पृष्टो लक्ष्मीनायोऽयदिदम् ॥३ पधिराज शृणुप्प त्वं यथा प्रेताभरन्ति थे। परस्वहरणार्था ये पल्यन्वेषणतत्पग: ।।४ तथैव मर्यपापिष्ठा प्रारमजान्वेपणे रताः । विचरन्त्यगरीरास्ते सुरिपपामादिता भृगम् ॥५ बन्दीगृहविनिमुशा यया पश्यन्ति जन्तवः । सपा नश्यन्ति ते प्रेता यषं फरया सहोदरे ॥६ पितृदागगि मन्पन्ति तन्मागंच्क्षालया। पितृमागां गृन्ति पपिकांम्तमग इव ॥ र ने रहा- पीई रा पर ा रो माया में नियम पियानो, प्रेग मोरी मेमो, मोर अपने हिर प्रेत पीडा वर्णन ] [ ३११ पापो को किस प्रकार से भोगा करते हैं ? ॥१॥ चौरसी सास नरको में रहते हुए और यमराज के द्वारा रक्षित होते हुए तथा सहसों यम के दूतो के निरी- क्षा में रहकर वे नरक से निकल कर कैसे लोक मे विचरण किया परते हैं ? क्योकि वे तो रात दिन रक्षा करने वालो के द्वारा रक्षित रहने वाले होते हैं । इस प्रकार से पक्षियो के स्वामी गरुड के द्वारा पूछे गये, भगवान लक्ष्मीनाथ यह बोले-श्रीकृष्ण ने कहा-हे पक्षिराज | जिस तरह से वहाँ प्रेतगण विच. रण पिया पारते हैं उसका तुम अब श्रवण करो। जो पराये धन के हरण करने वाले हैं और पत्नी के अन्वैपए में तत्पर रहने वाले हैं तया भारमजान्वेषण मे रति रखने वाले सब महा पापिष्ठ वे बिना ही शरीर वाले भूप-प्यास से पीरिन होकर बहुत ही दुसित होकर रिचरण पिया करते हैं ॥२॥३४॥५॥ बन्नीगृह से विनिमुक्त जन्तु जिस तरह नष्ट हो जाया करते हैं उमी नाति देवगण मी सहोदर का वध करके नाश को प्राप्त हो जाते हैं ॥६॥ पितृगण के द्वारी का रोध कर दिया करते हैं तथा उनके मार्ग के छेदक हो जाते हैं । वे पितृगण के भागों को मार्ग में पपियो को तस्वरोपी भाति प्रहण पर लेते हैं ॥७॥ स्ववेश्म पुनरागत्य मूत्रोत्सर्ग विशन्ति ते । तत्र स्थिता निरीक्षन्ते रोगशोकादिना जनम् ॥ ज्वररूपेण पीडयन्ते ह्य कान्तरामिपेण तु । चिन्तयन्ति सदा तेषामुच्छिष्टादिस्थलस्थिता. II. आरमजाना छल लोके भूतजातश्च रक्षिताः। पियन्ति तम पानीय भोजनोच्छिष्टयोजितम् । सदा पापरता पापा एव पीडा प्रकुर्वते ॥१० फा पुर्वन्नि ते प्रेता केन रूपेण कम्य फिम् । शायन्ते केन विधिना जल्पन्ति न वदन्ति या ॥१ एव छिन्धि मनोमोह मम पेदिन्छमि प्रियम् । एलिकाले होकर प्रेत जायते बह ॥१२ स्युल पोइयत्प्रेत परं छिदेश पीडयेन् । जीवश्च मुरते स्नेह मृतो दुष्टत्यमाप्नुयात् ।।१३ [ धी गराडपुराण रुद्रजापी धर्मरतो देवतातिथिपूजक । सत्यवाप्रियवादी च न स प्रेतश्च पीडधते ॥१४ अपने घर मे फिर पावर घे मूनोरमग में प्रवेश किया करते हैं । वहाँ पर सस्थित होकर रोग प्रोर शोक प्रादि के द्वारा जनो को देखा करते हैं ||८|| ज्वर के रूप म एकान्तरा के बहाने से पीडित किये जाते हैं। उच्छिष्ट मादि के स्थलो मे स्थिर होते हुए उनका समा चिन्तन लिया करते हैं ।।।। प्रात्मनों के छल को लोक म भूत जातो के द्वारा रक्षित हुए भोजन के चच्छिए से योजित पानी को वहाँ पर पीते हैं । सदा पाप कर्मों में रत रहने वाले पापी इस प्रकार से पीडा प्राप्त किया करते हैं ।१० मरुट ने कहा-वे प्रेत पाप किस रूप सहितका पया कैसे किया करते है ? वे किस विधि से जाने जाते हैं और से बोलते या कहा करते हैं? हे प्रभो। यदि मेरे प्रिय करने की कृपा करते है तो यह जो मेरे मा म बडा भारी मोह है उसका छेदन करने का अनुग्रह करें । है हृषीकेश। इस कलिकाल मे तो बहुत से प्रेत होते हैं। श्रीकृष्ण भगवान ने कहा- अपने कुल को पीडा दिया करता है। दूसरे को कोई छिद्र देखकर पीडा दिया करता है। यह जीवित रहता हुया तो स्नेह करता है कि तु मरने के बाद दुष्टता को प्राप्त हो जाता है ।।११।१२।१३।। जो रुद्र के मन्त्र का जाप करने वाला होता है, धग में रति रखने वाला है देवगण तथा अतिथियों के सत्कार एव यजन करने वाला है और सत्य व्रत को धारण करने वाला तथा प्रिय बालने वाला है वह प्रतो के द्वारा कभी भी पीडित नही किया जाता है अर्थात् उक्त प्रकार के व्यक्ति पर प्रेत की पोडा कभी नही हो सकती है ॥१॥ गायत्रीजाप्यनिरतो वैश्वदेवरतो गृही। थाद्धकृत्तीर्थसेवी च न रा प्रतैश्च पोयते ॥१५ सनक्रियापरिभ्रष्टो नास्तिको देवनिन्दक । असत्यवादनिरतो नर प्रेत प्रपीड्यते ॥१६ कलौ प्रतत्वमाप्नोति तााशुद्धक्रियापर । कृतादौ द्वापर यावन्न प्रेतो नव पीडनम् ॥१७ प्रेतपीडा वर्णन ] [ ३१३ बहूनामेकजातीनामेकः सौख्यं समश्नुते । एको दुष्कृतकर्मा च ह्य कः सन्ततिवजितः ॥१८ एकः सपीडमते प्रेत रेकः पुत्रसमन्तिः । एकस्य पुत्रनाश: स्यात्पुत्रो न लभते सदा ॥१६ विरोधी वन्धुभि साद्धं प्रेतदोपोऽस्ति तत्र वै । सन्ततिर्नेव दृश्येत समुत्पन्नो विनश्यति ।। पशुद्रव्यविनाशश्च सा पीड़ा प्रेतसम्भवा ।।२० प्रकृतिश्च विवर्तेत विद्वेपः सह बन्धुभिः । अकस्माद्यसनप्राप्तिः स पीड़ा प्रेतसम्भवा ॥२१ जो गायत्री मन्त्र के जर मे निरत रहा करता है और जो गृहस्थी बलि चश्वदेव करने वाला है, श्राद्धो के करने वाला, तीर्थ का सेवी होता है वह भी कभी प्रतो के द्वारा नही सताया जा सकता है ॥१५॥ जो सब प्रकार की क्रियानो से परिभ्रष्ट होता है प्रर्थात् जिसमें कोई भी कर्म को क्रिया नहीं होती है--जो ईश्वर की सत्ता को नही मानता है, जो देवगण की निन्दा करने वाला होता है, जो सदा मिथ्या भाषण करने में ही डूबा रहा करता है अर्थात् हर समय ही प्रनगल झूठ बोलता है ऐसा मनुष्य प्रेतो के द्वारा सताया जाया करता है ॥१६॥ हे वाय ! इस कलियुग में जो प्रशुद्ध क्रियागो में महनिश तत्पर रहा करता है वही प्रेत योनि को प्राप्त होता है। सत्ययुग और द्वापर पर्यन्त युग में कोई भी प्रेतत्व को प्राप्त नही होता था और न किसी को प्रपीड़ित हो किया जाता था ॥१७॥ एक जाति वाले बहुतप्तो का एक ही सुख प्राप्त किया करता है। कोई एक दुष्कृत कर्मों का करने वाला होता और कोई एक ही सन्तति से रहित होता है ।।१८॥ प्रेतो के द्वारा एक सीडित किया जाता है। एक पुत्र से समन्वित होता है । एक के पुत्र का नाश हो जाता है और वह सदा पुत्र की प्राप्ति नही किया करता है ॥१६॥ जहाँ बन्धुओ के साथ पापस मे विरोध होता है वहाँ पर ही प्रेत का दोप हुपा करता है। वहाँ मन्तति भी दिखाई नही देती है और हो भी जाती है तो विनष्ट हो जाया करती है ॥२०॥ प्रेत से होने वाली पीडा में पशुपो का नाश और द्रव्य का विनाश हुमा करता [ श्री गहडपुराण - है। प्रकृति ही विवर्तित हो जाया करती है भोर स्वभाव के परिवर्तन होने, बन्धुमो के साथ विप हो जाया करता है। अचानक ही व्यसनों का सम गम उपस्थित हो जाया करता है-यह सभी प्रेत के द्वारा की जाने वालो पीडा हुमा करती हैं ॥२१॥ नास्तिक्य व्रतलोपश्च महालोभस्तथैव च । दम्भश्च कलहो नित्यं सा पीडा प्रेतसम्भवा ॥२२ मातापित्रोश्च हन्ता च देवव्राह्मणदूषकः। हत्यादोषमवाप्नोति सा पीडा प्रेतसम्भवा ।।२३ नित्यकर्मविमुक्तश्च जपहोमविवजितः । परद्रव्यापहर्ता च सा पीड़ा प्रेतसम्भवा ॥२४ तीथं गत्वा परासक्तः स्वकृत्यञ्च परित्यजेत् । धर्मकायें न सम्पत्तिः सा पीडा प्रेतसम्भवा ॥२५ सुभिक्षे कृपिनाश. स्याद्व्यवहारो विनश्यति । लोके कलहकारी च सा पीड़ा प्रेतसम्भवा ।।२१ मार्गे तु गच्छतश्च व पीडयेद्वाथ मण्डली। यश सपीड्यते प्रतैरिति सत्य वचो मम ॥२७ होनजातिषु सम्बन्धो हीनकर्म करोति च । अधर्म रमते नित्यं सा पीडा प्रेतसम्भवा ॥२८ प्रेत के द्वारा उत्पन्न जो पीडा होती है उसमें नास्तिक पने की भावना पैदा हो जाती है-जितने नियम एवं प्रत होते हैं वे सब छूटकर उनका एक दम लोप हो जाता है-हृदय मे एक महान लोभ उत्पन्न हो जाया करता है-- दम्भ मौर क्लह नित्य प्रति होता है ।। २२ ।। प्रेत से समुत्पन्न पोडा यह क्यिा करती है कि वह व्यक्ति अपने ही माता-पिता का हनन एव ताडन करने लगता है-देवता तथा ब्राह्मणों को टूपित किया करता है-पराये घन का अपहरण करने वाला हो जाता है ।२३। प्रेत से उत्पन्न जब पीडा किसी को होती है तो वह नित्य कर्म को छोड देता है-मन्नो का जाप, होम सब छोड़ देता है-हत्य के दोष का भागी हो जाता है ॥ २४ ॥ तीर्थों में जाकर भी परम असत्त प्रेत पीडा वर्णन ] [ ३१५ हो जाता है और अपने कृत्य को त्याग देता है-धर्म के कार्य में सम्पत्ति का विनियोग नहीं करता है ये सब बातें तभी होती हैं जब कि किसी प्रेत के दाग पीडा होती है ।। २५ ॥ प्रेत का जब किसी पर प्रभाव होता है तो उसका ऐसा नाश होता है कि सुभिक्ष पे भी कृप का नाश हो जाता है और जितना भी सद्व्यवहार होता है वह सब विनष्ट हो जोया करता है। लोक मे कलह करने वाला हो जाया करता है ॥ २६ ।। मार्ग में गमन करते हुए पीडा उत्पन्न हो जाती है अथवा प्रेतो के द्वारा मण्डली फो प्रपीडित किया जाता है । यह सब मेरा पूर्णतः सत्य बचन है ॥ २७ ॥ प्रेत के द्वारा जब किसी को पीडा होती है तो उसका हीन जाति वालो में सम्पर्क होता है और बह हीन कर्मों को किया करता है । सर्वदा अधर्म में उसकी रति होती है ॥२॥ व्यसन व्यनाशः स्यादुपक्रान्तञ्च नश्यति । चौराग्निराजभिर्हानि. स पीड़ा प्रेतसम्भवा ॥२६ महारोगोपपत्तिश्च स्वतनो: पीड़नं तु यत् । जाया सपीड्यते यत्र सा पीड़ा प्रतसम्भवा ॥३० श्रुतिस्मृतिपुराणेषु धर्मकायेषु चैव हिं। अभावो जायते येपा सा पीडा प्रेतसम्भवा ॥३१ देवतीर्थ द्विजातीना भावशुद्धचा न मन्यते । प्रत्यक्ष वा परोक्ष वा दूपयेत्प्रेतभावतः ॥३२ स्त्रीरणा गर्भविनाश स्थान पुष्प दृश्यते तथा । बलाना मरण यत्र सा पीडा प्रेतसम्भया ॥३३ पुष्प प्रदृश्यते यत्र फल नव प्रदृश्यते । विरोधो भार्यया साद्धं सा पीडा प्रेतसम्भवा ॥३४ भावशुद्धया न कुरुते श्राद्ध सावत्सरादिकम् । स्वयमेव न कुर्वीत सा पीडा प्रेतसम्भवा ॥३५ ऐसे बहुत से व्यसन लग जाया करते हैं कि उनमें मपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति का विनाश कर देता है और स्वय उपकान होकर नर हो जाया परता है । चोर-अग्नि और राजा के द्वारा हानि होती है-ये सभी उपद्रव - [ श्री गरुडपुरा प्रेत के द्वारा की जाने वाली पीड़ा से हुमा करते हैं ।। २६ ।। किसी गैग की उत्पत्ति-अपने शरीर की पीड़ा का होना-अपनी स्त्री का सताय जाना--ये सभी बातें प्रेत के द्वारा होने वाली पीड़ा से हुआ करती हैं if३०॥ श्रुतिस्मृति और पुराणो मे तथा धर्म के कार्यों में प्रश्रद्धा तथा प्रभाव का होना जिनको हो जाता है वे सब प्रेतों के द्वारा उत्पन्न हुई पीड़ा से ही हुमा करते हैं ॥ ३१ ॥ देव तीर्थ और द्विजों को शुद्ध भावना से नहीं मानना मौर प्रत्यक्ष रूप से या परोक्ष रूप से प्रेत भाव के कारण इनको दूषित किया करता है ॥ ३२ ॥ स्त्रियो के गर्भ का विनाश हो जाता है तथा रजो दर्जन ही नहीं होना है । बालको का मर जाना ये सब उपद्रव प्रेतो के द्वारा उत्पन्न होने वाली पीडा के कारण हुमा करते हैं ॥ ३३ ॥ पुष्प जहां दिखाई देता है वहाँ फल नहीं होता है और मपनी भार्या के साथ विरोष रहना--ये सभी प्रत के द्वारा हो सम्भव होते हैं ॥ ३४ ॥ सांवरसर धाद्ध खाना-पूरी के लिए करता तो है किन्तु प्रेत को पीड़ा के कारण उसके भावों में शुद्धि नहीं रह करती है। स्वयमेव कुछ भी नहीं करता है यह प्रेत पीड़ा से ही होता है ।३५॥ कलहो घातकाश्च व पुत्राः शत्रुमिवात्मजाः । न प्रीतिर्न च सौस्यश्च सा पीड़ा प्रेतसम्भवा ॥३६ गृहे दन्तकलिश्चव भोजने कोपसंयुतः । परद्रोहमतिश्चैव सा पीड़ा प्रेतसम्भवा ॥३७ पित्रोर्वाकां न कुरुते स्वपत्नी न च सेवते । परदारापकी च सा पीड़ा प्रेतसम्भवा ॥३८ विकर्मणा भवेत्तो विधिहीन क्रियस्तथा। तत्काले दुष्टसंसर्गावृपोत्सर्गाहते तथा ॥३६ दुष्टमृत्युवमाद्वापि ह्यदग्धवपुषस्तथा । प्रेतत्वं जायते ताक्ष्यं पीउधन्ते येन जन्तवः ।।४० दाहक्रियादिलोपश्च खट्वादिमृतिदोपतः । प्रेतत्व मुस्थिरं तस्य यावचेष्टादिविवजितम् ॥४१ लत पीडा वगान - 1 ३१७ एवज्ञात्वा खगश्रेष्ठ प्रेतमुक्ति समाचरेत् । यो वे न मन्यते प्रेतान्मृतः प्रेतत्वमाप्नुयात् ।।४२ जिसके यहां प्रेत के द्वारा पीडा दी जाती है वहां रात-दिन कलह रहता है और पुत्र एक शत्रु के ही समान पात करने वाले हो जाया करते हैं। न वहां कोई मापसी प्रीति भाव होता है और न कोई सुख ही हुमा करता है । ३६ ॥ जिसके घर में दन्त कलह हो मोर भोजन के समय में कोप का मावेश होता हो-सदा दूसरों के साथ द्रोह करने की बुदि रहे--ये सभी दुप्परिणाम प्रेत के द्वारा दी हुई पीडा से हुआ करते ।। ३७ । जिस पर रेत का असर होता है वह माता-पिता के बचन का पालन कभी नही करता है और अपनी पत्नी में रमण नही करता है। ऐसा पुरुप पराई स्थियों के अपकर्षगा किया करता है ॥ ३८॥ विकमों के कारण ही प्रेत होता है । तथा अधि से मू य क्रिया करने वाला होता है । दुध के उस समय मे ससर्ग से. वृपोत्सर्ग क न करने से प्रेतत्व की प्राप्ति होती है ।। ३६ ।। दुष्ट मृत्यु के कारण भी प्रेत योनि मिलती है तथा मृत के शरीर के दाह न होने के कारण भी प्रेतत्व की प्राति होती है । हे तक्ष्य ! इसी कारण से जन्तुप्रो को सताया जाता है।॥ ४० ॥ दाह आदि की क्रिया का जहाँ लोप होता है तथा खाट पर हो जिसकी मृत्यु हो जाती है उसका प्रेत होना सुनिश्रित ही समझना चाहिए जो प्रेतत्व की दशा ऐसी होती है कि वाणी और चेष्टा मादि सब से शून्य हुमा करती है ।। ४१ ।। हे खगधे ! इस तरह से जान कर मत को मुक्ति करनी चाहिए। जो मादमी प्रेतो को नहीं मानता है वह मर कर स्वयं प्रेतत्व को प्राप्त हो जाता है ॥४२॥ प्रेतदीप कुले यस्य सुख तत्र न विद्यते । मति प्रीति रतिर्बुद्धिलक्ष्मीः पञ्चविनाशनम् ॥४३ तृतीये पञ्चमे पुसि वशच्छेदोऽभिजायते । दरिद्रो निधनश्लव पारकर्मा भवे भवे ॥४४ ये केचित्प्रेतरूपा धिकृतमुखहशो रोद्रदष्टाः कराला मन्यन्ते नब गोत्र सुतदुहितृपितृभ्रातृजायाश्च बन्धून् ।
३१८ ] [ श्री गरुडपुरा" कृत्वा काम्यञ्च रूपं सुखगतिरहिता भापमारणा यथेष्टं हा कष्ट भोक्त कामा विधिवमपतिताः संस्मरन्ति स्वपापम् ।। जिसके कुल मे प्रेत का दोष विद्यमान रहा करता है वहाँ सुख नही रहता है । उस कुल मे बुद्धि-प्रीति-रति-मति और लक्ष्मी इन पांचों का विनाश हुआ करता है ।। ४३ ।। तीसरे तथा पांचवें पुरुष ( पीढी ) में वंश का उन्छेह भी हो जाया करता है और ऐसा पुरुप जन्म-जन्म मे बहुत दरिद्र एव धन से हीन तथा पाप कर्म करने वाला होता है ॥ ४४ ॥ जो कोई भी प्रेत के रूप वाले होते हैं उनके मुख पोर नेत्र विकृत हुमा करते हैं अर्थात् बहुत विकराल होते हैं । रौद्र ( भीषण ) दाढी वाले होते हैं तथा बहुत कराल ( भयानक स्वरूप से युक्त ) होते हैं। ये अपने गोत्र को भी कुछ नहीं माना करते हैं और सुत-पुत्री-पिता-भातृजाय (भाभी) तथा बन्धुपो को भी नहीं म ना करते हैं । ये लोग अपनी इच्छा के अनुरूप अपना स्वरूप बना लिमा करते हैं । ये सुखमय गति से रहित होते हैं अर्थात् इनकी योनि मे कुछ भी सुख नही मिलता है । ये प्रत गण जो चाहे सो बोलते रहा करते हैं । ये "हाय हाय ! बडा कष्ट है-हम कुछ खाना चाहते हैं, भूपे'-गाग्य वश हम अब प्रेत योनि मे मा गये है"-ऐसा बित्न ते-चीखते रहते हैं और अपने किये हुए पागे का स्मरण किया करते हैं जोकि मनुष्य के रूप में रह कर किये थे ॥४५॥ ११-प्रतों का स्वरूप और चरित्र मुक्ति यान्ति कथं प्रेतास्तदह प्रष्टुमुत्सुकः । यन्मुक्तौ च मनुष्याणा न पीडा जायते तु सा ॥१ एतश्च लक्षणदेव पीड़ा प्रैतसमुद्भवा । तेषां कदाभवेन्मुक्ति प्रेतत्वं न कथ भवेत् ॥२ प्रेतत्वे हि प्रमाणञ्च कतिवर्षाणि सङ्खधया। चिर प्रेतत्वमाप्नोति कथ मुक्तिमवाप्नुयात् ॥३ मुक्ति प्रयान्ति ते प्रेतास्तदहं कथयामि ते । यद्यत्कुर्वन्ति ते प्रेता: पिशाचत्वे व्यवस्थिताः ।।४ प्रेतों का पET पोर चरित्र ] तेपा स्वरूप वक्ष्यामि चिह्न स्वप्नं यथातथम् । क्षुत्पिपामादितास्ते वं प्रविशेयु स्ववेश्मनि ॥र प्रविष्टा वायुदेहेन शयानान्स्वस्ववशजान् । तत्र लिङ्गानि यच्छन्ति निदिशान्ति खगेश्वर १६ स्वयम्वकलपाणि स्वबन्धू स्ते प्रयान्ति वै । गजो हगो वृपो भूत्वा दृश्यन्ते विकृतानन. 19 गरुड ने कहा-है भगवन् ! ये प्रेत योनि में रहने वाले किस तरह मुमुक्ति को प्राम किया करते हैं ?-प्रय मैं यह प्रापसे पूछने के लिए उम् ता रसता है। निमकी मुक्ति हो जाने पर फिर मनुों को उनके द्वारा की हुई वह पीडा नहीं होती है ॥१॥ हे देव । इन नालो से यह भात हो है frयह प्रेत के द्वारा उत्पन्न की हुई पीडा है तो फिर यह बताया उनसीहा नण पत्र की है ? पोर मनुष्य को प्रेतय rम प्रकार में नहीं होता है ? प्रतल पे होने पर सम्या मे रितने वर्षों का प्रमाण होता है ? निरान तक यदि प्रेतरव प्रार करता है तो फिर उमकी मुक्ति कैमे हुपा करती है ॥३॥ श्री भगवान ने कहा- प्रेत जैसे प्रेतत्व मे छुटारा पापा ने हैं उसे भय हम तुमको तनाते हैं। जो-जो भी वे प्रेत पिया करते हैं उसमे वे निशाप जमे उपस्थित हो जाया करते हैं ॥४॥ पर हम उना मामा-वित और स्वप्न भी ठीr-ठी पतमाते है । भूगोर गमे आप पोतिर पे पाने पर में प्रवेश दिया गते हैं ॥५॥ ये अपने वागु हस मे निमित देश में प्रविष्ट हो जाते हैं मर्यात् इनका दह एप प्रकार की व युजमा है जो Frशिमीको पिपाई न दिया परता है। यहां पर मे गोने हामी मानोंोहे एगप्रा ऐमे गिल दिया करते है frजिनमे वे प्रने प्रा निदेपर देये ।। ये अपने पुत्र, बसर और अपने पापुमोर पामते है पाहापो, प, पर A+ पुगवाने हो जाते है ॥७॥ पया विपरीत वा पारमानव विषम्यम् । उहिंगत पश्यति तु गः म प्रेतं पोपते भृग 110
३२०
]
श्री गरुडपुरार
निगडबध्यते यस्तु बध्यते बहुधा यदि ।
अनञ्च याच्यते स्वप्ने कुरुते पापमात्मना । |
भुञ्जमानस्तु य स्वप्ने गृहीत्वाऽन्न पलायते ।
आत्मनस्तु परस्यापि तृपार्तस्तु जल पिवेत् ।।१०
वृषभारोहण स्वप्ने वृषभ सह गच्छति ।
उत्पत्य गगन याति तीर्थ याति क्षुधातुर ॥११
स्वकलत्र स्ववन्धु श्च स्वसुत स्वपति विभुम् ।
विद्यमान मृत पश्येत्प्रेतदोपेरण निश्चितम् ।।१२
यस्त्वपो याच्यते स्वप्ने क्षुत्तृपाम्या परिप्लुत ।
तीर्थ गत्वा ददेत्पिण्डान्प्रेतदोपर्न सशय ॥१३
निर्गच्छतो गृहादात्री स्वप्ने पुत्रास्तथा पशून् ।
पितृभ्रातृकलत्राणि प्रेतदोपं स पश्यति ॥१४
जो शयन के विपरीत अथवा अपनी पारमा का विपर्यय देखता है मौर
उठकर देखा करता है प्रर्यान् स्वय को नीचे भोर शय्या को अपने ऊपर में
उठने के समय दिखाई देता है वह प्रेतो के द्वारा बहुत पोस्ति किया जाता है ।
14। यदि कोई वहुधा रस्सियों या जजीगे से बांधा जाया करता है और
स्वप्न में मन को याचना जो कोई करता है-अपने द्वारा पाप करता है-स्वान
मे खाता हुमा अपने मापको देखता है और मन को ग्रहण कर भाग जाता है-
अपने तथा दूसरे के जल को अत्यन्त प्यास से दुखित होकर पी लेता है जो
स्वप्न म वृषभ पर सवारी किया करता है और बलो के माय गमन करता है-
जो उछल कर प्राकामा म जाता है तथा भूख से उत्पीडित होकर तीर्थ मे जाता
है-अपनी स्त्री को, अपने व घुओं को, अपने पति को पौर विभु को, विद्यमान
को मृत देखता है तो समझ लेना चाहिए कि यह सब स्वन में देखना प्रेन के
द्वारा उत्पन्न दोष से ही मिश्रित रूप से होता है ॥१।१०।११।१२॥ जो स्वप्न
में भूख भोर प्यार से बहुत प्रारी होकर जल की याचना किया करता है. पौर
सोपं में जागर पिण्डों का दाह दिया करता है ऐसा स्वप्न म देखना भी प्रेत
दोषो के पारण ही हुभा परता है-इगमे तनिक भी राशय नहीं है ।।१३।।
पंतो का स्वरूा और चरित्र ] ३२१ ( गनि मे गृह से स्वप्न में जो निकलते हुए पुत्रों को तथा पशुणे को देखा करता है, अथवा अपने पिता को, भाई को और पत्नी को निकलते हुए देखना है-- यह सब मी प्रत के दोषों से ही होता है कि उसे इस तरह के स्वप्न दिसलाई दिया करते हैं-ऐसा समझ लेना चाहिए ॥१४॥ चिह्नान्येतानि पक्षीन्द्र गण काय निवेदयेत् । कृत्वा स्नान गृहे तीथ श्रीवृक्षे तर्पणञ्चरेत् ॥१५ कृष्णधान्यानि सम्पूज्य प्रदद्याद्वेदपारगे। सवविघ्नानि सत्यज्य मुक्त्युपाय करोति यः ॥१६ तस्य कर्मफल माघु प्रेततृप्तिश्च शाश्वती । शृणु सत्यमिद ताय यो ददाति स तृप्यति ॥१७ प्रात्मैव श्रेयसा युज्येत्प्रेतस्तृप्ति व्रजेच्चिरम् । ते तृप्ता शुभमिच्छन्ति स्वात्मवन्धुषु सर्वदा ॥१८ अन्ये पापा दुरात्मान क्लेशयन्ति स्ववशजान् । निवारयन्ति तृप्तारते जायमानानुपद्रवान् ।।१६ पश्चात्ते मुक्तिमायान्ति काले प्राप्त तु पुत्रत । सदा बन्धुपु यच्छन्ति ऋद्धिं वृद्धि खगाधिप ।।२० दर्शनाद्भापरणाद्यस्तु चेष्टनात्पीटनाद्गतिम् । न प्रापयति मूढात्मा प्रेतशाप स लिप्यते ॥२१ हे पक्षीन्द्र 1 इन समस्त चिह्नो को किसी गणक पनि ज्योतिपी को बतलाना चाहिए और घर मे या तीर्य में स्नान करके श्रीवृक्षा पर तर्पण करना चाहिए ।।१३। विसी वेद के पारगामी 'पर्यात् पूर्ण विद्वान को भली-भांति पूजन करके कृष्ण पान्य का दान करे । समस्त विघ्नो रा त्याग करके जो प्रेत को मुक्ति का उपाय करता है उसे ऐसा ही करना चाहिए । उनके इस कर्म का बहुत उत्तम फल होता है मोर प्रेत को निरन्तर होने वाली इपसे तृप्ति हो जाती है। हे गरु । तुम इसका अच्छी तरह से प्रवण कर लो-यह मेरा वचन बिल्कुल सत्य है। जो ऐसा दिया करता है तो वह इससे पूर्णत. तृप्त हो जाया परता है ।।१६-१७॥ दान और तपंण करने वाले को मारमा ही श्रेय से ३२४ । ॥ थी गरुडपुराण गायश्या ह्ययुत जप्त्वा दशाशेनैव होमयेत् । कृत्वा विष्णुबलि पूर्व वृपोत्सर्गादिका क्रिया ॥३२ सर्वोपद्रवहीनस्तु सर्वखोख्यमवाप्नुयात् । उत्तम लोकमाप्नोति ज्ञातिप्राधान्यमेव च ॥३३ पितृमातृसमो लोके नास्त्यन्यदैवत परम् । प्रभु शरीरप्रभव प्रत्यक्षदैवत पिता ॥३४ हितानामुपदेष्टा च प्रत्यक्षो गुरुदेवता । अन्या या देवता लोके शरीरप्रभवा मता । ३५ उम समय मे अन्य भी भूत-प्रेत अथवा पिचाशो के द्वारा वह कभी भी नहीं सताया जाया करता है जो पितृगण का उद्देश्य करके परम शुभ नारायण-बनि किया करता है उसे फिर कोई भी बाधा, पीडा नही, देती है । ॥ २६ ॥ वह ममस्त पीडामो से विमुक्त हो जाया करता है-~~यह मेरा बचन पूर्ण सत्य है । जहां पितृगण के द्वारा की हुई पीडा होती है वह अन्य किसी भी कृत्य से युक्त नही हुमा करती है ।। ३० ।। इसलिये सम्पूर्ण प्रयत्नो के द्वारा पितृगण का परम भक्त एवं उनकी भक्ति में परायण होना चाहिए। मवम या दशम वष मे जो पितृगण के उद्देश्य से पुरुप दश हजार गायत्री मन्त्र का करके उस जप का दशम अश होम करे पोर पहिले विष्णु बलि और वृपोत्सग मादि की किया करे तो सम्पूर्ण उपद्रवो से हीन होकर सभी प्रकार के सुखो की प्राप्ति किया करता है । अन्त में परम उत्तम लोक की प्राप्ति करता है शाति मे प्राधान्य भी उसे प्राप्त होता है ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ ३३ ।। इस ससार में अपने माता-पिता के समान अन्य कोई भी देवता नही है । पिता इस शरीर के देने का कारण है प्रतएव वद प्रत्यक्ष देवता होता है । पिता न होता तो यह पर ही प्राप्त नही होता ॥ ३४ ॥ हितो से युक्त कर्मों के करने का उपदेश देने पाला गुरु भी प्रत्यक्ष देवता है। इनके अतिरिक्त अन्य जो लोक मे देवता हैं ये जाप सद हम शरीर से ही होने वाले होते हैं |॥३५॥ शरीरमेव जन्तूना नरक्स्वगंमोक्षदम् । शरीर सम्पदो दारा मुना लोका सगातना ॥३६ - प्रतत्त्व प्राप्ति का कारण और उनका पाहार [ ३२५ यस्य प्रसादात्प्राप्यन्ते कोऽन्य. पूज्यतमस्तत. । एव सश्चिन्त्य हृदये पितृणा यः प्रयच्छति ॥ तत्सर्वमात्मना भुड क्ते दान वेदविदो विदु ॥३७ पुन्नाम्नो नरकाद्यस्मात्पितरं वायते तु यः । तस्मात्पुत्र इति प्रोक्तः स्वयमेकस्त्वहं वे ॥३८ अपमृत्युमृतौ स्याता पिता माता च कस्यचित् । धर्म तीर्थ विवाहादि श्राद्ध सावत्सर त्यजेत् ॥३६ स्वप्नाध्यायमिम यस्तु प्रेतलिङ्गन दर्शितम् । य पठेच्छृणुयाद्वापि प्रेतचिह्न न पश्यति ॥४० यह शरीर ही मुग्यतया जन्तुप्रो के नरम-स्वर्ग तथा मोक्ष का प्रदान करने वाला होता है । ऐसा यह उत्तम शरीर-सम्पत्ति-दाग-सुत-सनातन लोक प्रादि सभी कुछ जिसके प्रसाद से प्राप्त होते हैं उससे मन्य कोन सर्वाधिक पूजा के योग्य हो सकता है ? इस प्रकार से अपने हृदय में भली-भांति चिन्तन करके जो पितृगण के उद्देश्य से दिया करता है उस दान को सरिमा के द्वारा मुक्त किया जाता है-ऐसा वेद के विद्वान् कहते हैं भोर समझते हैं ॥३६॥ ॥ ३७ ॥ पुग्नाम वाले नरक से जो अपने पिता का कारण किया करता है इसलिये उसे 'पुत्र'-इस नाम से कहा गया है । मैं स्वय एक ही हूं-ऐसा बोले ।। ३८ ॥ किसी के माता-पिता अपमृत्यु से मृत हुए हो उसे धर्म-तीर्थ, विवाह मादि मे तथा वार्षिक श्राद्ध करना चाहिए। इस स्वप्नाध्याय को जो प्रेत लिङ्ग से दिखाया गया है जो पठन-प्रवण करता है वह प्रेत चिह्न को नहीं देखता है ॥३६॥४०॥ १२-प्रतत्व प्राप्ति का कारण और उनका आहार सम्भवन्ति कयं प्रेता केन मृत्युवराङ्गता। कीदृक्तपा भवेद् प भोजन किं भवेद्विभो ॥१ मुप्रीतास्ते कथ प्रेताः क्व तिष्ठन्ति सुरेश्वर । प्रमन्नः कृपया देव प्रश्नमेन वदस्व मे ॥२ ३२६ । [ थी गर ये केचित्पापकर्माणः पूर्वकर्मवशानुगा । जायन्ते ते मृता. प्रेताः शृणुष्व त्व वदाम्यहम् ॥३ वापीकूपतड़ागानि ह्यारामञ्च सुरालयम् । प्रपा सद्यः सुवृक्षाश्च तथा भोजनशालिकाः॥४ पितृपैतामह धर्म विक्रीणाति स पापकृत् । मृतः प्रेतत्वमाप्नोति यावदाभूतसप्लवम् ॥५ गोचरं ग्रामसीमाश्च तडागारामगह्वरम् । वर्पयन्ति च ये लोभात्प्रेतारते सम्भवरित हि ॥६ चाण्डालादुदकात्सावाह्मणाद्वंद्य तात्तथा । दष्ट्रिभ्यश्च पशुम्यश्च मरण पापकर्मणाम् ।।७ गरुड ने कहा-है विभो ! कृपा कर मब यह बनलाइये कि ये किसके द्वारा मृत्यु गत हुए किस प्रकार से प्रेत हो जाया करते हैं ? उन प्रतो का स्व. रूप कैसा होता है पोर उनका भोजन क्या हुमा करता है? ॥ १॥ हे सुरेश्वर ! वे प्रेतगण परम प्रसन्न किस तरह होते हैं भौर किस स्थान में रहा करते हैं ? है देव ! आप प्रसन्न होते हुए मेरे इस प्रश्न का उत्तर प्रदान करने की कृपा करें ।। २ ।। भगवान् श्री कृष्ण ने कहा-जो कोई पाप कर्मों के करने बाले होते हैं और अपने पूर्व जन्म के कर्मों के वश में जो पडे होते हैं अर्थात् पहिले जन्मो मे जो बुरे-मले कर्म किये हैं उनके वश वर्ती होते हुए वे मृत होकर प्रेत उत्पन्न हुमा करते हैं । मैं सब बतलाता हूँ तुम इसका श्रवण करो ।। ३ ।। वापी (वावडी)-कूप (कुमा)-तडाग (तालाब)-आराम (बाग)- देव स्थान-प्रया (प्याऊ)-सुन्दर फल छाया समन्वित वृक्ष और भोजनशाला इनका एवं पिता-पितामह के समय से चले माने वाले धर्म का जो स्वरूप बिग ड देते हैं अर्थात् नष्ट भ्रष्ट कर दिया करते हैं वे पाप के करने वाले होते हैं पोर मर कर वे प्रेतत्व को योनि प्राप्त किया करते हैं पौर जव तक भूत सप्लव (महा प्रलय) होता है तब तक प्रेत योनि में रहा करते है ॥ ४ ॥ ५ ॥ गोचर भूमि --ग्राम को शीमा-तानाव-माराम पौर गह्वर ( घना जगल )- इनका जो वर्ष लोम मे किया करते हैं वे प्रेत हो जाते हैं ॥६॥ पाप युक्त प्रतत्त्व प्राप्ति का कारण और उनका माहार ] [ ३२७ .. । कर्म करने वालो को मृत्यु चाण्डाल से-जल से- -पर्प दंशन से--ब्रह्मण से- बिजली से-दाढ वाले जीवो से और पशुप्रो से हुमा करती है। उपयुक्त जिनकी मौत होने के कारण होते हैं वे पापी होते हैं ॥७॥ उद्बन्धनमृता ये च विपशस्त्रहताश्च ये। आत्मोपघातिनो ये च विसूच्यग्निहताश्च ये 115 महारोगमृता ये च पापरोगश्च दस्युभिः । असस्कृतप्रमृताश्च विहिताचारवजिताः ॥ वृपोत्सर्गादिसस्कारलुप्त': पिण्डेश्च मासिकः । यस्यानयति शूद्रोऽग्नि तृणं काष्ठं हवीपि च ॥१० पतन पर्वतादिभ्यो भित्तिपातेन ये मृताः । रजस्वलादिदोपैस्तु न भूमी म्रियते यदि ॥११ अन्तरिक्षे मृता गे च विष्णुस्मरणवर्जिताः । सूतकादिपु सम्पर्का दुष्टशल्यमृतास्तथा ।।१२ एवमादिभिरन्यैश्च कुमृत्युवशगास्तु ये । ते सर्वे प्रेतयोनिस्था विचरन्ति महीस्थलीम् ॥१३ अवोदाहरन्तीममि तिहासं पुरातनम् । युधिष्ठिरस्य सवाद भोप्मेण सह सुव्रत। तदहं कथयिष्यामि यच्छ्र त्वा सोख्यमाप्नुयात् ॥१४ जो उन्धन के होने के कारण मृत हो जाते हैं-जो पाप के कारण से होने वाले रोगों से मृत्यु के ग्रास बन जाते हैं जो डाकू तथा चोरों के द्वारा मार दिये जाते है-जोगदत ही मृत्यु गत हो जाते हैं तथा अपने शास्त्र विहित आचर से रहित होते हैं । वृपोत्सर्ग के संस्कारो के लोप होने से तथा मासिक पिंडो के लुप्त हो जाने से बुभूक्षित दशा में रहते है-जिसके लिये शूद्र पग्नि, तृण, काष्ठ पौर हवि का साहित्य लाया करता है-जो पर्वत प्रादि समुच्च स्थान से पतन होने से मर जाते हैं तथा भीत-मकान मादि के नीचे दबकर मौत के मुह में चले जाया करते है---जो रजस्वला प्रादि के दोपों से भूमि में नही मरते हैं-नो अधर ही अन्तरिक्ष मे मृत हो जाते हैं-जो ३२८ ] [ श्री गरुडपुराण F भगवान विष्णु के स्मरण से रहित होते हुए मर जाते है-सूतक पादि सम्पर्क वाले तथा दुष्ट तल्प मादि से जो मृत होते हैं--एवमादि तथा म भी मृत्यु के हेतु जिनके ऐसे ही हुमा करते हैं वे सब कुमृत्यु के वशीभूत गये हैं । ऐसे कुमौत से मरने वाले सभी प्रेत योनि में स्थित होकर इस भू- मण्डल मे विचरण किया करते हैं । हे सुवन । अब हम तुम्हारे समक्ष मे एक परम प्राचीन इतिहाम बतलाते हैं । यह युधिष्ठिर का भीष्म के साथ सम्बाद में पाया था। उसे मैं तुमको श्रवण कराता हूँ। इसे सुन कर तुमको परम सुख प्राप्त होगा ।।८। से ॥१॥ केन कर्मविपाकेन प्रतत्वमुपजायते । केनोपायेन मुच्यन्ते तन्मे यूहि पितामह ।।१५ अह ते कथमिष्यामि सर्वमेतदशेपत । यच्छ त्वा न पुनर्मोहमेव यास्यसि सुव्रत ॥१६ येन यो जायते तो येन चैन विमुच्यते । प्राप्नोति नरक घोर दुस्तर दैवतरपि ।।१७ सतत श्रवणाद्विष्णो पुण्यतीर्थानुकीर्तनात् । प्रेतभावा विमुच्यन्ते अापत्सु प्रेतयानिपु ।।१८ श्रू यते हि पुरा वत्स ब्राह्मण सशितव्रत । नाम्ना सन्तप्तक. ख्यातस्तपोऽर्थे वनमाथित ॥१६ स्वाध्याययुक्तो होमे च योगयुक्तो दयान्वित । स यजेत्सकलान्यज्ञान्युक्त्य' काल क्षिपेनिजम् ॥२० ब्रह्मचयें रादा युक्तो युक्तस्तपसि मार्दवे । परलोकभये युक्तः सत्ये शोचे तु नित्यश ॥२१ घमराज गजा युघापुर ने भीष्म पितामह से पूछा था-हे पितामह । किम कम के विपाक होने से प्रेत को योनि प्राप्त हुआ करती है और वह फिर किम उपाय के करने से छूटा करती है ? इसे मुझे बतलाइये । तब राजा युविनिर के इस प्रश्न पो सुनकर भीष्म पितामह बोले-~-भीष्म ने कहा-मैं. इम तुमको पूर्ण रूप म बतलाता है । ई मुव्रत । इसका श्रवण कर इस ? प्रकार प्रेतत्व प्राप्ति का कारण और उनमा माहार । [ ३२९ से फिर तुमको कभी मोह ही नही होगा ॥ १५ ॥ १६ ॥ जिस कारण से जो कोई प्रेत हो जाता है प्रोर जिस कारण से इस से मुक्ति प्राप्त किया करता है और देवों के द्वारा भी दुस्तर पोर नरव को प्राप्त किया करता है ।। १७ ।। निरन्तर भगवान् विष्णु के परम पुण्य तीर्थों के अनुकीर्तन करने से तथा श्रवण करने से प्रेस भाव से विमुक्ति हो जाती है जोकि प्रेत योनि परम आपत्ति स्वरूप हुप्रा करती है ॥१८॥ हे वरा ! ऐसा सुना जाता है कि प्राचीन समय में पहिले सशित व्रत वाला संतप्त नाम वाला एक ब्राह्मण प्रसिद्ध था जोकि तप करने के लिये वन मे माश्रय करने वाला था ॥ १६॥ यह स्वा. घ्याय से युक्त और होम मे योग से सयुत-दया से समन्वित था । वह युक्ति से अपने समय का क्षेय करता हुप्रा समस्त यज्ञो का यजन किया करता था ॥ २० ॥ वह सवंदा ब्रह्मवयं मे युक्त रहा करता था पोर मादंवत्र तपश्चर्या में युक्त रहता था। उसे पग्लोक का भय रहा करता था और नित्य ही सत्य तथा शौच में स्थित रहता था ॥२१॥ युक्तो हि गुरुवाक्ये च युक्तस्त्वतियिपूजने । मात्मयोगेषु यो युक्तः सर्वद्वन्द्वविवजितः ॥२२ योगाम्यासे सदा युक्त ससारविजिगीपया । एववृत्तसमाचारो मोक्षाकाक्षी जितेन्द्रियः ॥२३ वहून्यब्दानि विजने वने तस्य गतानि वै। तस्य बुद्धिस्ततो जाता तीर्थानुगमन प्रति ॥२४ पुण्यस्तीर्थजलरेव शोपयिष्ये कलेवरम् । स तीर्थ त्वरितं स्नात्वा तपम्वी भास्करोदये ॥२५ कृतजाप्यनमस्कारो ध्यानच्चक्र जगद्गुरो । एपस्मिन्दिवसे विप्रो मार्गभ्रष्टो महातपाः ।।२६ ददर्श त्वरितो गच्छन्पच्च प्रेतान्मुदारुणान् । अरण्ये निर्जने देगे कष्टके वृक्षवजिते १२७ पञ्चताधिकृताकारान्दृष्ट्वा वै घोरदर्गनान् । दृष्ट वा सन्त्रस्तहृदयस्तिष्ठन्मीलित लोचनः ॥२८ [ श्री गरुडपुराण मे - . वह गुरु के वचनो म सर्वदा युन रहा करता था तथा प्रतिषियों को पूजन में निरत रहता था। वह मारम योगो मे युक्त रहा करता था और सभी द्वन्द्वो से रहित था ॥ २२ ॥ इस समार की विजिगीपा अर्थात् जय प्राप्त करने की इच्छा मे वह सदा योगाभ्यास मे युक्त रहता था। इस प्रकार के चरित्र मोर समाचार पाला वह मोक्ष की इच्छा वाला और विशेष रूप से इन्द्रियों को जीतने वाला था ॥ २३ । इस तरह से रहते हुए उस वियावान जङ्गल में उसको बहुत-से वर्ष व्यतीत हो गये थे। इसके अनन्तर उपका विचार तीयों अनुगमन करने को उत्पन हुमा था ।। २४ ।। उसने सोचा कि अब मैं परम पवित्र तीर्थों के जल से ही कलेवर का शोषण करूंगा। वह तीर्थ मे शीघ्र स्नान करके भगवान् भास्कर के उदय काल में वह तपस्वी जय भोर नमस्कार करके जगद्गुरु का ध्यान किया करता था। एक दिन उम मार्ग से भ्रष्ट महा तपस्वी विप्र ने शीघ्रता से गमन करते हुए अत्यन्त दारुण पांच प्रतो को देखा जबकि वह उस कांटो से परिपूर्ण निर्जन वृक्षो से रहित बन में थे ।। २५ ।। २६ ॥ २७ ॥ इन पांचो प्रतों को जोकि बहुत ही भयानक दिख- लाई देने वाले, विकृत प्राकार वाले थे, देखकर वह सन्त्रस्त हृदय वाला हो गया था और अपने नेत्र मूंदकर एक ही स्थान पर स्थित हो गया था ॥२८॥ अवलम्ब्य ततो घऱ्या त्रासमुत्सृज्य दूरत । पप्रच्छ मधुराभापी के यूय विकृता भृशम् ॥२६ किञ्चाशुभ कृत कर्म येन प्राप्ता स्म वैकृतम् । कथ वा एककर्माण प्रस्थिता कुन निश्चितम् ॥३० स्वं स्वं कर्मभिरुत्पन्न प्रेतत्व नो द्विजोत्तम । परद्रोहरता सर्वे पापमृत्युवराङ्गता ॥३१ क्षुत्पिपासादिता नित्य प्रेतत्व समुपागता । हतवाक्या वय सर्वे नष्टसज्ञा विचेतस ।३२ न जानीमो दिश तात विदिशञ्चातिदु सिता । गच्छाम कुत्र व मूढा पिशाचा कर्मजा ययम् ॥३३ प्रतत्त्व प्राप्ति का कारण प्रौर उनका आहार ] न माता न पितास्माकं प्रेतत्वं कर्मभिः स्वकः । प्राप्ताः स्म सहसा त दुःखोद गसमाकुलाः ॥३४ दर्शनेन च ते ब्रह्मन्ह्लादिताप्यायिता वयम् । मुहूत्त तिष्ठ वक्ष्यामि वृत्तान्त सर्वमादितः ।।३५ इसके मनन्तर कुछ समय में पीरज का सहारा लेकर मोर अपने भय को दूर कर उनसे उसने मधुर भाषण करते हुए पूछा था-पाप इतने विकृप्त स्वरूप वाले कोन है ? ॥ २६ ॥ प्राप लोगो ने ऐसा क्या अशुभ कर्म किया था जिसके कारण से ऐमा यह विकृत स्वरूप प्रापको प्राप्त हुपा है ? आप लोग सभी पांचो क्या एक ही जैसा कर्म करने वाले हैं जोकि किसी एक निश्चित स्थान पर रवाना हो रहे है ? माप कहाँ को प्रस्थान कर रहे हैं वह कौन-सा स्थान है ? ॥ ३० ॥ तो ने कहा-हे द्विज श्रेष्ठ ! हम सबको सपने-अपने कर्मों के ही कारण यह प्रतत्व की योनि प्राप्त हुई है। हम सब पराये द्रोह → में रति रखने वाले थे और पाप पूर्ण मृत्यु के वशगत हो गये थे ॥३१॥ अब हम सब क्षुधा और पाम से पीडित नित्य ही रहा करते हैं मोर इस प्रतत्व को प्रात हो गये हैं । हम सब हत वाक्य है और नष्ट सज्ञा वाले पर्थात् मूच्छिरा तया पसावधान चित्त वाले हो रहे हैं ॥ ३२ ॥ है तात ! हम इस समय मै इतने इ.खिर हो रहे हैं कि दिशामो और विदिशाओ को भी नहीं पहिचान रहे हैं । हम प्रब कहाँ जावे ?-इसे भी नही बता सकते हैं क्योकि इसमे भी हम मूढ हो रहे हैं । हम कर्मों से उत्पन्न हो जाने वाले पिशाच है ॥ ३३ ॥ हमारा न कोई पिता है और न कोई माता है । हम अपने ही कर्मों से प्रत योनि में आ गये हैं। और जब इस योनि में प्रा गये हैं तो सहसा दुःख के उद्वेग से परम व्याकुल हो रहे हैं। हे ब्रह्मन् ! मापके दर्शन से हम लादित (प्रसन्न) मोर अत्यन्त तृप्त हुए हैं । मुहूर्त मात्र प्राप यहाँ ठहरिये तो हम सब मादि से अपना पूर्ण वृत्तान्त मापको बता देगे ॥३४॥३।। सस प्रारित साम एप सुकीनुष्या स्मृतः । शीघ्रगो रोहकारचव पञ्चमो लेखकरतथा ।। एव नाम्ना च सर्वे व सम्प्राप्ताः प्रेतता वयम् ॥३६ थी गम्ड़पुरा प्रेतानां कर्मजातानां कथ वै नामसम्भवः । किञ्चित्कारणमुद्दिष्टं येन ब्रूत स्वनामकान् ॥३७ मया स्वादु सदा भुक्तं दत्त पय्युपितं द्विजे । तेन पय्युपितं नाम जातं मे ब्राह्मणोत्तम ॥३८ सूचिता बहवोऽनेन विप्रा अन्नादिकांक्षया । एतत्कारणमुद्दिश्य ह्यप सूचीमुखः स्मृतः ।।३६ गान गच्छति विप्रेण याचितः क्षुधितेन वै। एतत्कारणमुद्दिश्य शीघ्रगोऽय द्विजोत्तम ॥४० एकाको मिष्टमश्नाति देवं पत्र्यञ्च नित्यश. । ब्राह्मणानामभावन रोहकस्तेन नोच्यते ।।४१ 'पुराय मौनमास्थाय याचितो विलिखन्महीम् । तेन कर्मविपाकेन लेखको नाम नामतः ।।४२ उन पांचो प्रेतो में से एक ने कहा-मैरा नाम तो पर्युपित है अं यह दूसरा जो है उसका नाम सूची मुख है-तीसरा शोघ्रग, चौथा रोहक अं पांचवा लेखक नाम वाला है। इस प्रकार से इन सब नामो वाले हम प्रताप को प्राप्त हुए हैं ॥ ३६ ।। ब्राह्मण ने कहा-कर्म से उत्पन्न होने वाले प्रेतों के नाम कैसे उत्पन्न हुए हैं अर्थात् इनका नाम कैसे रखा गया है ? इसका कुछ कारण अवश्य ही होगा जिससे कि आप अपने नामो को बता रहे हैं। ॥ ३७॥ प्रेतराज बोला--मैंने हमेशा स्वाद् युक्त भोजन किया था और जो बामी भोजन होता था वह बाहाण को खिला दिया था। हे ब्राह्मणोत्तम ! इसीलिये मेरा नाम पप्यु पित पड गया है ॥ ३८ ॥ इग प्रेत ने भन्नादि की माकाह पा से बहुत से विप्रो को सूचित किया था इसी कारण का उद्देश्य करके यह मूची मुख इस नाम से कहा गया है ।। ३६ ! भूखे ब्राहाण के द्वारा जव इममे याचना की जाती तो ग्रह शीघ्रता से चला जाया करता था । इमो कारण के उद्देश्य मे हे द्विजोत्तम ! इसका नाम शीघ्रग पड़ गया है ॥४०॥ ब्राह्मणो के प्रभाव के कारण यह देवता और पितृगण सम्बन्धी मिष्ट पदार्थ । को प्रकला ही निश्प मा जाया करता था इस कारण से इसे रोक कहा जाता
प्रता प्राति का कारण और उनका पाहार ]
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।। ४१ । यह पहिले जब याचना किया करता था तो मौन होकर न
पर लिखने लगता था उसी कर्म के विपाक से इसको लेखा इस नाम में रहा
जाता है ।। ४२ ॥
प्रेतत्व कर्मभावेन प्राप्य नामानि च द्विज ।
मेपाननो लेखकोऽय रोहक पर्वतानन ॥४३
शीघ्रग. पशुबक्नन सूचक सूचिवक्त्रवान् ।
पर्यु पितो बलग्रीवः पश्य रूपविपर्ययम् ॥४४
धृत्वा मायामय रूप विद्रुता नरकावात् ।
मर्वे च विकृताकारा लम्बोष्ठा विकृतानना ॥४५
वृहच्छरीरदशना वक्रास्याः स्वेन कर्मणा ।
एतत्ते सर्वमाख्यात प्रेनत्वे कारण मया ।।४६
ज्ञानिनो हि वय सर्वे सजाता दर्शनात्तव ।
यदि ते श्रवणे श्रद्धा पृच्छास्मान्यद्यदिच्छसि ॥४७
ये जीवा भुवि जीवन्ति सर्वेऽप्याहारमूलकाः ।
युप्माकमपि चाहार थोतुमिच्छामि तत्त्वत ।।४८
यदि ते श्रवणे श्रद्धा आहार श्रोतुमिच्छसि ।
अम्माक तु महाभाग शृणुष्व सुसमाहितः॥४६
है द्विज । माँ की भावना से प्रेतत्व प्राप्त किया और नाम भी प्रास
हुए हैं । यह लेवफ मैप के समान मुख वाला है और रोदक पर्वत के तुल्य मुग्व
वाला है ॥४३॥ शीघ्रग का मुख पशु के समान है और मूचा मूची जैसा मुग
वाला है । पर्युषित बलग्रीव है। इस तरह इन सबके रूप या विपर्यय है उसे
तुम देख लो ।।४४॥ इस माया से परिपूर्ण रूप को धारण कर हम नरक में
सागर से विद्रुत हुए हैं। हम सभी विकृत प्रापार वाले, लम्बे मोठी में युक्त
बिगडे हुए मुमो वाले हैं । हम बडे शरीर पोर तो वाले हैं, रेदे मुख से
अपने ही कमी के कारण है । मैं यह मत्र प्रेतत्व प्राप्त करने का कारण
को बना दिया है ॥४॥४६॥ तुम्हारे मन मे हम मय जान पात्र हो गये
। यदि नुमको प्रण करने की इच्या है मौर श्रद्धा है जो हममें और युछ
३३४ ] [ थी गरुडपुराण पूछिए ।॥४७॥ ब्राह्मण ने कहा-इम मही मण्डल में जो भी जीव हैं उन सभी का मूल माहार होता है क्योकि माहार के बिना कोई भी जीविन नहीं रह सकता है । मब मैं पाप लोगो का भी क्या प्रहार है ?-यह तत्त्व पूर्वक श्रवण करना चाहता हूं ॥४८॥ प्रेतगण बोले-यदि तुम्हारी श्रवण करने की इच्छा है और हमारा प्राहार सुनना चाहते हो तो हे महाभाग हमारा आहार क्या होता है ?--इसे सावधान होकर सुनो ॥४ कथय प्रेतराज त्वमाहारश्च पृथक् पृथक् । इत्युक्ता ब्राह्मणेनेदमूचु प्रेता पृथक् पृथक् ।।५० शृणुष्वाहारमस्माक सर्वसत्त्वविहितम् । यच्छ त्वा गर्हसे ब्रह्मन् भूयो भूयोऽपि कुत्सितम् ॥५१ श्लेष्ममूत्रपुरीपेश्च रेचकै समलं सह । उच्छिष्टश्च व पक्वान्नं प्रेताना भोजन भवेत् ॥५२ गृहारिण त्यत्ताशोचानि प्रकीर्णोपस्कराणि च । मलिनान्यपि भूतानि प्रेता भुजन्ति तत्र वै ।।५३ नास्ति शौच गृहे यस्य न सत्य न च सयम । पतितैर्दम्युभिर्भुड क्त प्रेता भुञ्जन्ति तत्र वै ॥५४ बलिमन्त्रविहीनानि हामहोनानि यानि च । स्वाध्यायव्रतहीनानि प्रेता भुञ्जन्ति तत्र वै ॥५५ न लज्जा न च मर्यादा यन वै कुत्सितो गृही। सुराश्चैव न पूज्यन्ते प्रेता भुञ्जन्ति तन वै ॥५६ यन लोभो ह्यतिक्रोधा निद्रा शाको भय मद । पालस्य क्लहो माया प्रेता भुजन्ति तत्र वै ॥५७ भर्तृहीना च या नारी परवीयं निपेवते । वीर्य्यमूरसमायुक्त प्रेता भुजन्ति ता वै ॥५८ ग्राह्मण ने कहा है प्रेतराज । माप अपना पृथक् पृथक् पाहार वत. लामो । ब्राह्मण के द्वारा इस तरह मे कहे गये वे प्रेत अलग-अलग बोले ॥५०॥ प्रेत बाले-माप हमारे माहार का प्रवण करो जो सब प्रकार के सत्त्वो से त्व प्राप्ति का कारण और उनका माहार ] - वैशेष रूप से बुरा होता है । हे ब्रह्मन् ! उमे प्राप सुन करके बारम्बार उमकी नन्दा करेंगे कि वह ऐसा कुस्मित होता है ॥५१॥ श्लेष्मा (कफ), मूत्र, पुरीप ( मल ), रेचक ( वमन किया हुअा पदार्थ ) ये सब मन सहित तथा उच्छिष्ट (झूठे) पक्वान्न इनसे प्रेतो का भोजन हुमा करता है ।।५२।। जिनमे शौच छोड़ा गया हो और पवित्रता से रहित हो, जिनमे मनवा प्रादि उपस्कर बिखरे पडे हैं, मलिन गृह इन भूत-प्रेतो के भोजन करने के स्थान हुमा करते हैं। ये प्रेतगण हम सभी वहां पर भोजन किया करते हैं ॥५३॥ जिस घर में प्रत्यन्त पवित्रता नही होती है, न सत्य है और न किमी प्रकार का कोई संयम ही होता है जो पतित पोर दस्युमो के द्वारा मुक्त होता है उसी स्यन या घर में प्रेतगण भोजन किग करते हैं । ५४।। जो घर बली मन्त्र प्रौर होम से रहित हुमा करते हैं तथा स्वाध्याय भौर व्रतो से हीन हुमा करते हैं प्रेत लोग वही पर भोजन करते हैं । ॥५५॥ न किसी तरह की कोई लज्जा होती है और न कोई मर्यादा का ही पालन किया जाता है तथा जहाँ पर गृहस्थी पूर्णतया कुत्ता ( बुराई ) से युक्त रहा करता है एव सुगरण का कभी भी कोई यजन-प्रचंन नही किया जाता है वही पर प्रेतगगा भोजन करते हैं ॥५६॥ जिस जगह अत्यन्त लोभ, प्रतीय कोय, निद्रा की प्रचुरता, शोक का बाहुल्य, भय की विशेषता पौर मद की मधिकता तथा प्रालस्य. कलह और माया का प्राधिक्य हुमा करता है उन्ही परो तथा स्थानो मे प्रेत भोजन क्यिा करते हैं ॥५७।। स्वामी से रहित नारी पर पुरुप के साथ रमगा पर उसी के वीय का सेवन किया करती है वहाँ वीर्य- मूर स सम युक्त उसी पदार्थ को प्रेतगण वाया करते हैं ।।५।। लज्जा मे जायते तात वदतो भोजन स्वकम् । यत्स्त्रोरजो योनिगत तल्लिहामो द्विजोत्तम ।।५६ निविण्णा. प्रेतभावेन पृच्छामि त्वा दृढव्रतम् । यथा च न भवेत्प्रेतस्तन्मे वद तपोधन । नित्य मृत्युवरं जन्तोः प्रेतत्व मा भवेत्ववचित् ।।६० उपयागरता नित्य कृच्छ्रचान्द्रायणे रत. । किमन्य. सुकृतः प्रेत न प्रेतो जायते नरः ॥६१ थी गरुडपुर इष्ट्या चैवाश्वमेघादीन् दानं दत्वा तु यो नरः । मठारामप्रपादीनां गौप्ठ्यादेशं व कारकः ॥६२ कुमारी ब्राह्मणांश्च व विवाहयति शक्तितः। विद्यादोऽभयदश्च व न प्रतो जायते नरः ।।६३ पतितान्नेन भुक्त न जठरस्थेन यो मृतः । पापमृत्युवशाद् यो वे सप्रेतो जायते नरः ॥६४ मयाज्ययाजकश्च व याज्यानाञ्च विवर्जकः । कुत्सितैश्च रतो नित्यं स प्रेतो जायते नरः॥६५ ब्रह्मस्वं देवद्रव्यञ्च गुरुद्रव्यं हरेत्तु यः । कन्यां ददाति शुल्केन स प्रेतो जायते नरः ॥६६ मातरं भगिनी भार्या स्नुपां दुहितरं ततः । अदृष्टदोषात्त्यजति स प्रेतो जायते नरः ॥६७ हे तात ! मुझे अपना भोजन बताते हुए भी बड़ी भागे लज्जा है। है । है द्विजोनम ! जो रज स्त्री की योनिगत होता है हम उमी को चाटा करते हैं ॥५६॥ पब हम इस प्रेतभात से बहुत ही विरक्त हो गये हैं और दृढ बत वाले पापसे पूछते हैं। हे तप के धन वाले महाभाग ! ऐसा उपाय बताइये जिससे मुझे यह प्रतभाव न रहे, जन्तु यो नित्य ही मृत्यु का हो जाना भी परम श्रेष्ठ है किन्तु यह प्रेतत्व कमी भी न हो-यह नित्य की मौत से भी बुरा है ।। ॥६०॥ ब्राह्मण ने कहा-नित्य उपवासो में रति रखने वाला और कुच्छ चान्द्रा- यण आदि महाव्रतो का करने वाला पुरुप हे प्रेत ! कभी भी प्रेतत्व को प्राप्त नही हुआ करता है फिर अन्य सुकृतो को कोई प्रावश्यक्ता ही नही है ॥६१॥ जो पुरुष प्रश्वमेध प्रादि यज्ञो का यजन करके दान देता है तथा मठ-मागम मोर प्रपा (प्याऊ) प्रादि का एवं गोष्ठी आदि का निर्माण किया करमा है । जो अपनी शक्ति के अनुसार कुमारी कन्याओ का तथा ब्राह्मणो का विवाह करा देता है । जो विद्या का दान करता है और जो किसी के भय की मुक्ति कर उसे अभय का दान क्यिा करता है वह पुरुप कभी प्रेत की योनि प्राप्त नही किया करता है ॥६३।। किसी भी पतित पुरुप के अन्न को खाकर उस भन्न को अपने
प्रेतत्व प्राप्ति का कारण और उनका आहार ]
[ ३३७
उदर में रखते हुए ही मृत हो जाता है । उस पापयुक्त मृत्यु के वश भूत होता
हुप्रा वह नर अवश्य ही प्रेत हो जाया करता है ।।६४॥ जिमका यजन नही
कराने के योग्य हो उसका
याजन तथा जो यजन के योग्य हो ननका वजन
करने वाला एव नित्य ही कुल्लित कों में रति रखने वाला नर प्रेत हुमा
करता है ॥६५॥ जो ब्राह्मण का धन, देवता का द्रव्य और गुरु को सम्पति का
हरण किया करता है और शुल्क लेकर अर्थात् धन प्राप्त करके जो कन्या का
विक्रय किया करता है वह मनुष्य प्रेतत्व प्राप्त करता है ॥६६॥ प्रानी माता,
भगिनी, म र्या, स्नुषा ( पुत्र वधू ) तथा पुत्री को कोई दोष बिना ही देखे त्याग
देता है यह मनुष्य भी प्रेत हो जाता है ॥६७।।
भ्यासापहर्ता मिनध्र परदाररत सदा ।
विश्वासपाती कूटश्च स प्रेतो जायते नर ॥६८
भ्रातृध्रग्ब्रह्महा गोन सुरापो गुरुतलग।
कुलमार्ग परित्यज्य ह्यनृतेपु रादा रत ।
हर्ता हेम्नश्च भूमेश्व स प्रतो जायते नर ॥६६
एव वदति विप्रे च अाकाशे दुन्दुभिस्वन ।
पपात पुष्पवृष्टिश्च देवमुक्ता द्विजोपरि ।
पञ्च देवविमानानि प्रेतानामागनानि च ।
स्वयं गता विमानस्ते पुण्य सम्भाष्य त मुनिम् ॥७१
तस्य विप्रम्य सम्भापात्पुण्यसहीतनेन च ।
प्रेता पापविनिमुक्ता पर पदमवाप्नुयु ॥३२
इदमाख्यानक श्रुत्वा कम्पितोऽश्वत्थावत् ।
मानुपाणा हितार्थाप पुन पृच्छति पक्षिराट् ॥७३
न्यास ( परोहर ) के अपहरण करने वाला अपने मित्रों से द्रोह करने
वाला पोर सदा पराई म्बियो में रमण करने वाला, विश्वास का पात करने
याला और कूट पुरुष प्रेतरव की प्राहि करता है ॥८॥ भाई मे द्रोह करने
पाला, प्राह्मए का हनन मरने वाला, गो का वध क्त, मदिरा का पान करने
बाला, गुरु की शम्मा पर गमन करने वाला भोर मरने कुल के परम्परागत मार्ग
३३८
[ श्री गरुडपुराण
का त्याग कर जो मदा मिथ्या कम तथा मिथ्या भापगण में रति रखता है एव
भूमि पोर सु णं या हरण करने वाला पुरुप है वह भी अवश्य ही प्रेत होता
है ॥६६॥ श्री भीष्म पितामह ने कहा-जिम समय इस तरह से उन पांचो प्रतो
से वह ब्राह्मण कह रहा था उसी ममय मे पाकाश मे देवो की दुन्दुभि की ध्वनि
हुई और देवो के द्वारा छोडी हुई पुप्पो को वृष्टि उस द्विज पर हुई थी ।।७।।
देवतामो के पांच विमान उन पांचो प्रेतो के लिये मा गये थे। उम महामुनि
के साथ थोडे समय तक यह जो परम सुन्दर सम्भाषण किया था इसी के महा-
पुण्य से वे सब देखते-देखते स्वर्ग को चले गये थे। सभापण और सत्पुरुष के
सङ्ग का कैसा पद्भुत माहात्म्य हुप्रा करता है ॥७१॥ उस विप्र क माथ सम्भा.
पग से पोर पुण्ा कम के मोतन से वे प्रेत पापो से निगुक्त हो गये और
परम पद को प्राप्त हो गये थे ॥७२॥ इम पाख्यान का श्रवण करके पक्षियो का
राजा गरुड पीपल के पत्र की भानि कम्पित हो गया और मनुष्यो के हित के
लिये उमन फिर पूछा था । ७३।।
१३ --मृत्यु के कारणों का वर्णन
नाकाले म्रियते कश्चिदिति वेदानुशासनम् ।
स्मान्मृत्युमवाप्नोति राजा वा थोनियोऽपि वा।
यदुक्त ब्रह्मणा पूर्वमतृत तत्प्रदृश्यते ॥१
वेदैरुक्त तु यद्वाक्य शतञ्जीवति मानव ।
तलालौ न च दृश्येत कस्मादेव समादिश ॥२
साधु साधु महाप्राज्ञ यत्त्व भक्तोऽसि मे दृढ ।
श्रू यता मत वाक्यन्तु नानापापविनाशनम् ॥३
विधातृविहितो मृत्यु शीवमादाय गच्छति ।
त प्रवक्ष्यामि पक्षीन्द्र काश्यपेय महाद्यु ते ॥४
मनुष्यः शतजीवी च पुरा वेदेन भापितम् ।
विकर्मण. प्रभावेण शीघ्रञ्चापि विनश्यति ॥५
वेदानम्यसते नैव कुलाचार न सेवते ।
पालस्यात्कर्मणा त्याग कुरुते पापमाचरन् ।।६
मृत्यु के पारणो का वर्णन ] [ ३३६ यत्र तत्र गृहेऽश्नाति परक्षेचरतो यदि । एतैरन्यश्च बहुशो जायते ह्यायुपः क्षयः॥७ गरुड देव ने कहा-हे भगवन् ! वेदो का यह तो अनुशासन है कि कभी कोई भी प्रकाल मे नही मग करता है फिर राजा अथवा श्रोत्रिय किस प्रकार से मृत्यु को प्राप्त होता है ? क्या ब्रह्मा ने पाहिले जो कुछ भी कहा है वह मिथ्या दिखलाई देता है ? ॥१॥ वेदो ने जो यह गक्य कहा है कि मानव मौ वर्ष तक जीवित रहता है यह वात प्रब इन कराल कलियुग के समय में नही दिखलाई दिया करती है। इस प्रकार से यह विपरीतता क्यो किम कारण मे हो रही है ? कृपा कर इसे समझाइये ॥२॥ श्री भगवान ने कहा-हे महान पण्डित ! बहुत अच्छा प्रश्न किया है, यह ठीक है । तुम मेरे बडे ही हड़ मक हो पतएव मेरे निम्न वाक्य वा श्रवण करो जो कि अनेक प्रकार के पापो के नाश करने वाला है |॥३॥ विधाता के द्वारा निहित क्यिा हुआ मृत्यु मोघ्र ही प्राकर चला जाता है । हे पक्षियो के स्वामिन् । हे काश्यपेय । हे महान युति वाले ! मैं इमे प्रब बतलाता है ॥४॥ मनुष्य वस्तुन सो वर्ष पयंत जीवित रहने वाला है जो कि पहिले वेद भगवान् न वहा है। युरे कर्मों के प्रभाव से वही सौ वर्ष तक जीवित रहने वाला मनुष्य शीघ्र ही विनष्ट है ॥५॥ यह मानव वेदो का अभ्यास नही किया करता है और अपने कुम चले आने वाले माचागे का भी सेवन नहीं करता है। इसमें पालस्य इतना भर गया है कि उसके कारण से यह अपने कर्तव्य कर्मों का त्याग कर दिया करता है तथा पाप को या माचरण करता रहता है॥६॥ जहां-तहां दिल में पाया वही खा लिया करता है और खाने-पीन दुध भी भले-बुरे पा इसके दिल में विचार नही होता है। पराये क्षेत्र में पर्यात दूसरे को नारी में रति परता है तो ऐसे ही कम में तथा हमी भांति में प्राय पुरे कर्मों से मनुप की पायु का क्षय हो जाया करता है ।।७।। प्रथधानमशुचिमजप त्यक्तमङ्गलम् । त यति सुरासक्त ब्राह्मण यमशामनम् । ८ प्ररक्षितारं राजान नित्य धर्मविजितम् । फूर व्यसनिन मूर्ग वेदवादयहिप्कृतम् ॥ जाया करता ३४० -- श्री गरुडपुगण प्रजापीडक सन्तप्त राजानं यमशासनम् । प्रापयन्त्यपमृत्युव युद्ध चंय परामुखम् ॥१० स्वकर्माणि परित्यज्य निपिद्ध वैश्य आचरेत् । परकर्मरतो नित्य यमलोक स गच्छति ॥११ शूद्रः करोति यत्किञ्चिद्विजसेवाविवजितम् । करोति कर्म यच्चान्यद्यमेनालोक्यते सदा ॥१२ स्नान दानञ्जपो होमः स्वाध्यायो देवतार्चनम् । यस्मिन्दिने न सेव्यन्तै वृथा स दिवसो नृणाम् ।।१३ अनित्यमध्र वं देहमनाधारं रसोद्भवम् । अन्नपिण्डमये देहे गुणानेतान्वदाम्यहम् ।।१४ श्रद्धा न रखने वाले-प्रशुचि (अपवित्र), जाप न करने वाले, मङ्गल- मय शुभ कर्मों को त्याग देने वाले, मदिरा पान में मासक्ति रखने वाले ब्राह्मण मो यमरान के शासन में पहुँवाया करते हैं ।।८जो राजा प्रजानन की रक्षा न करने वाला होता है पौर नित्य ही धम से रहित रहा करता है-क्रूर व्य मनो में लिप्त, मूर्ख और वेद वाद रो बहिष्कृत, प्रजा को प्रपीडित करने वाला सन्ताप देने वाले राजा को यमराज के दण्ड भोगने को प्राप्त करा देते हैं। जिमकी अपमृत्यु होती है तथा जो युद्ध में पराड मुव होता है उस राजा को यम के शासन में जाना पहता है ॥१०॥ जो वैश्य अपने शास्त्रोक्त कर्मों का स्याग करके निपिद्ध कर्मों का पाचरण करने वाला होता है तया सदा पापयुक्त कर्मों का करने वाला होता है वह वैश्य भी यमराज के लोक मे जाया करता है ॥११॥ जो शूद्र द्विजगण को सेवा को त्याग कर जो कुछ भी दिल मे भाया कर्म किया करता है वह यमराज के यहां पहुंच कर उसके शासन का भोग भोगता है ।।१२।। स्नान, दान, जा, होन, स्वाध्याय, देवो का अर्चन आदि जिम दिन मे नही क्येि जाते हैं वह पूग दिन मनुष्यो का व्यर्थ ही व्यतीत हुप्रा फरता है । ये उपयुक्त कर्म प्रत्येक दिन मे अनिवार्य रूप से करने के योग्य होते हैं ॥१३॥ यह मानव का शरीर तो प्रनित्य है, मध्र व है अर्थात् कब तक यह बना रहेगा, इसका कुछ भी निश्चर नहीं है। यह देह किसी भी माधार से युक्त [ ३४१ मृत्यु के कारणो का वर्णन ] नहीं है। इस देह को उत्पत्ति रस से ही हुमा करती है और यह प्रश्न के एक पिण्ड से परिपूर्ण होता है । ऐसे इस देह मे इन गुणो को मैं बताता हूँ ॥१४॥ यत्प्रात सस्कृतं साय नूनमन्न विनश्यति । तदीयरससपुष्ट काये का नाम नित्यता ।।१५ गत ज्ञात्वा तु पक्षीन्द्र स्वकर्मवन्धन वपुः । पापनिदहन पुभिः कार्यं भवति नाशनम् ।।१६ अनेकजन्मसम्भूत पातक त्रिविधं कृतम् । यदा हि मानुपावाप्तिस्तदा सर्व पतत्यपि ॥१७ मनुष्योदरवासी च यदा भत्रति पापभाक् । अण्डजादिषु भूतेषु यत्र तत्र प्रमर्पति । १८ मानुपे जन्मनि कृते तत्र तत्र समाप्नुयात् । अवेक्ष्य गर्भवासाश्च कर्मजा गतयस्तथा ।।१६ आधयो व्याधयः क्लेशा जरारूपविपर्ययः । गर्भवासे तु यज्ज्ञान जात मासातु सप्तमात् ॥२० तेन पश्यति सर्व तु प्राकृत यच्छुभाशुभम् । गर्भवासाद्विनिमुक्तो ह्यज्ञानतिमिरावृत ॥२१ न पश्यति खगश्रेष्ठ वलभाव समाश्रित । यौवने वनितान्धश्च य. पश्यति स मुक्तिभाक् ॥२२ जो अन्न प्रातःकाल मे रास्कार करके बनाया जाता है और रक्षमा रहे तो वह पाक किया हुआ मन सायङ्काल तक निनय ही बुम जाया करता है । उसो भन्न के रस से इस शरीर को सपुष्टि होती है। जिसके कारण की ऐसी दगा है उसके द्वारा होने वाले कार्य म्वरूप शरीर में कमे नित्यता हो मस्ती है ? ॥१॥ हे पक्षीन्द्र । अपने वर्मो के बन्धन से युक्त इम शरीर को तो गत समझ कर मनुष्यो को अपने कृन पापो का नाश नया दहन अवश्य ही इम पारीर द्वारा करना चाहिए ॥१६॥ यही इम गरीर का मुरुप कार्य होना है। पहिले भनेक जन्मो में समुमन पातक तीन प्रकार के होते हैं। जब वह जन्नु मनुष्य जन्म को प्राप्त करता है तभी वे सब पानक पाकर इसके ऊपर गिरते 1 ३४२ ] । श्री गपुराण हैं ॥१७॥ मनुष्य के उदर मे पाम परो वाला ज तु जब पापो का भागी होता है तब यह भएडज आदि भूतो में जहां-तहाँ प्रसपण frया परता है ।।१८।। मानुप जन्म परने पर वहाँ-वहाँ प्राप्त किया करता है। गर्भ क वामों को तथा पों स जाग गनियो पो देशकर, प्राधि ( मान 'मक व्यथा ) व्याधि (रोग), फ्लेश और वृद्धावस्या मरका विपर्यय इन मवरी भली भांति भवेक्षण किया करता है। गर्भास म जो जान उससन्न होता है वह सातवें मारा म हो हो जाया फरता है। उस समय से फिर वह गभ का वासी सभी कुछ शुभ पौर अशुभ प्राकृत को देखा करता है। जब गभ वे वास से निमुक्त होकर यहाँ जन्म कर लेता है तभी उसे अज्ञान का भन्धकार मावृत कर लेता है ॥२०॥२१॥ हे पग- थेष्ठ । फिर तो यह बालभाव म माश्रित होकर कुछ भी नहीं देखता है-यौवन म प्यारी पत्नी के प्रणय मे अन्धा हो जाता है उसे कुछ भी अन्य उस समय नहीं मूझता है। जो कोई उस समय में उक्त बाता को देखता या समझता है यह निश्चय हो मुक्ति प्राप्त करने वाला होता है - १४-अशौच और प्रेतकृत्य वर्णन प्राधानान्मृत्युमाप्नोति बालो वा स्थविरो युवा सधनो निर्धन व सुकुमार कुरूपवान् ॥१ अविद्वाश्च व विद्वाश्च ब्राह्मण स्त्वितरो जन । तपोरतो योगशीला महाज्ञानी च यो नर ॥२ महादानरत श्रीमान्धर्मात्माऽतुलविक्रम । विना मनुष्यदेह तु सुखञ्च न तु विन्दति ॥३ प्राक्तनै कर्मपाकैस्तु सुख प्राप्नोति मानव । प्राधानात्पञ्चवर्षाणि स्वल्पपापैविपद्यते ।।४ पञ्चवधिको भूत्वा महापार्विपद्यते। योनि पूरयते यस्मान्मृतोऽप्यायाति याति च ॥५ व्रतदानप्रभावेण चिरञ्जीवति मानत्र । कृष्णस्य वचन थ त्वा गरुडो वाक्यमब्रवीत् ॥६ प्रशोच और प्रेतकृत्य वर्णन ] मृते बाल्ये कथं कुर्यात्पिण्डदानादिकाः क्रिया. । गर्भेषु च प्रपन्नानामाचूडाकरणाच्छिशो ७ कृते चूड़े व्रतादर्वाक मृतस्य को विधिः स्मृतः । गरुडस्य वचः थ त्वा विष्णुर्वचनमब्रवीत् ।। भगवान श्री कृष्ण ने कहा-बालक हो-युवा हो या वृत हो माधान से मृत्यु को प्रास हुप्रा करता है अर्थात् यह गर्भ मे पाता है और जन्म ग्रहण करता है तो इसको मृत्यु भी अवश्य ही होती है। चाहे धन से पूर्ण सम्पन्न हो या धन से रहित निर्धन हो-भले ही पूग मुकुमार हो अथवा कुरूप वाला हो-घाहे बिना पढ़ा लिखा अविद्वान् हो किम्बा पूर्ण विद्या से परिपूर्ण महान विद्वान् हो-भले ही ग्राह्मण जाति मे समुत्पन्न होने वाला परम धेठ हो या कोई हीन जानि मे जन्म लेने वाला मन्य हो या जो भी कोई मनुष्य तपस्या में रत रहने वाला योगाभ्यास के स्वभाय से समन्वित- महान् जान से युक्त होता है तथा महादान करने मे रति रखता है वह श्रीमान्-धर्मात्मा पौर अतुल विक्रम सम्पन्न होता है। बिना इस मनुष्य देह से पारण निये कभी सुग्प को प्राप्ति नही हुमा करती है ॥१॥ २॥ ॥ प्राक्तन अर्थात् पुराने पहिले जन्मो मे किये हुए वो के विपाक से यह मनुष्य मुख पारा किया करता है । पापान अर्थात् गर्भ मे माने से पांच वर्ष तक तो छोटे २ पापो में पह विपन्न होता है ।। ४ । जव यह पाँच वर्ष में प्रधिक मायु वाला हो जाता है तो फिर महान् पापों से विपत्तियों का भोग पिया करता है मृा होता है और फिर पा जाया करता है प्रधान समार से मर घर घला जाया परता है पोर फिर जन्म लेकर यही पा जाता है इस तरह यह योनियों को पूरी करता रहता है ।। ५॥ यतो मोर दानो के प्रभाय से ही यह मान चिर मान तक जीवित रहा करता है । इग प्रगर वे भगवान् श्री कृष्ण वे बचों पा श्रवण पर फिर गरड यह वायय बोले ।। ६ ।। गाहन महा-है भगवन् ! बाल्यावस्था में मृत्यु गत हो जाने पर उगो लिये पिण्ड दान प्राति की त्रिपा विम प्रसार रोपनी पारिए । गर्मों में आये हुए विपा जब राम गृहाण सरकार न होनय ता और गृहार दिये जाने के पवार जो मन हो जाता ३४४ ] [ श्री गरुडपुराण है उसके लिये क्या विधि-विधान होता है ? गरुड के इस वचन का श्रव कर भगवान् विष्णु ने कहा-॥७॥ यदि गर्भो विपद्यत सवन्ते वापि योपितः । यावन्मासगतो गर्भस्तद्दिनानि च सूतकम् ॥ तस्य किञ्चिन्न कतव्यमात्मन श्रेय इच्छता । ततो जाते विपन्ने तु प्राचूडाद्भुवि निक्षिपेत् ।।१० दुग्ध देय यथाशक्ति बालाना तुष्टिहेतवे पाचूडात्पञ्चवर्षे तु देहदाही यथाविधि ॥११ दुग्ध तस्य प्रदातव्य बालाना भोजन शुभम् । पञ्चवर्षस्य कर्माणि स्वजातिविहितानि च ॥१२ कुत्तिस्मिन्मृते सर्वमुदकुम्भादिपायसम् । दातव्यञ्च खगश्रेष्ठ ऋणसम्बन्धवस्तु स १३ जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु, व जन्म मृतस्य च । स्वल्पायुनिधना भूत्वा रतिभुक्तिविजित ॥१४ श्री कृष्णा ने कहा-यदि स्त्री के गभ का स्राव हो जावे या गर्भ का पात हो जाता है तो जितने दिन या मास का गर्भ होता है उतने ही दिनो का सूतक अर्थात् मृत का शौच उमको हुप्रा करता है ।। || उसके लिये अपने श्रेय की इच्छा मे कुछ भी नहीं करना चाहिए । गभ के द्वार से बाहिर जन्म ग्रहण कर लेने पर मृत्यु गत होता है तो जब तक चूडा कर्म न हो तब तक तो उमको भूमि मे गाढ देना चाहिए ।। १० ।। उस मृतात्मा की तुष्टि के लिये यथा शक्ति वालको को दूध पिलाना चाहिए। चूडा कर्म के संस्कार हो जाने के पश्चात् तो पांच वर्ष मे उसका यथानिधि दाह संस्कार करना चाहिए ॥ ११॥ उसकी भी तृप्ति के लिये दुग्ध देवे तथा छोटे २ बालको को परम शुभ भोजन भी देवे । पाँच वर्ष के बालक के अपनी जाति मे विहित सभी कर्म करने माहिए । उसने मृत हो जाने पर सभी जल का कुम्भ मादि पायस देना चाहिए । हे खग घेट । वह ऋण मम्बन्धक होता है । अर्थात् कोई ऋण देने वाला ही होता है जो उसे लेने के लिये ही इस सम्बन्ध से समुत्पन्न होकर [ ३४५ प्रशोच और प्रेतकृत्य वर्णन ] हां से चल बमा करता है ॥ १२॥ १३ ॥ जो जन्म प्रण किया करता { उसकी निश्चय ही मृत्यु होती है और जो मृत्यु गत होता है वह अवश्य हो पुन. जन्म ग्रहण किया करता है-ऐसा यह इस संसार में ज-तुप्रो के लिये एक परम ध्र व नियम होता है। जो स्वल्प पायु वाला ही मर जाता है वह निधन होकर रति भोग से रहित रहा करता है ॥१४॥ पुनजन्म विशेज्जन्तुस्तत्माद्देय मृते शिशौ । कर्तव्य पक्षिशार्दूल पुनर्देहक्षयाय वै ।।१५ एव मे रोचतेऽदत्त्वा जायते निर्धने कुले । पुराणे गीयते गाथा सर्वथा प्रतिभाति मे ॥१६ मिष्टान्न भोजन देय दानशक्ति सुदुर्लभा । भोज्ये भोजनशक्तिस्तु रतिशक्तिर्वर स्त्रिया ॥१७ विभवे दानशक्तिश्च नाल्पस्य तपस फलम् । दानाद्भोगमवाप्नोति सौख्य तीर्थस्य सेवनात् ॥ सुभाषणात्परे लोके विद्वाश्च धर्मवित्तम ॥१८ प्रदत्तदानाच भवेद्दरिद्रो दरिद्रभावात्प्रकरोति पापम् । पापप्रभावान्नरफ प्रयाति पुनर्दरिद्रो पुनरेव पापी १६ वह जन्तु पुन जन्म में प्रवेश किया करता है इसलिये शिशु के मृत हो जाने पर हे पक्षिशार्दूल | उसके पुनर्देह के क्षय के लिये करना चाहिए और पन देना चाहिए ॥ १५ ॥ मुझे यह प्रिय लगता है कि उसके लिये भी अवश्य ही करे । जो उसको एक छोटा शिशु समझ कर कुछ भी नहीं दिया करते हैं वह निधन बुल में जन्म लेता है। पुराण में यह गाया गाई जाती है और मुझे सर्वपा ठोक प्रतीत होती है ॥१६॥ भोजन में मिष्टान देना चाहिए। दान को शक्ति बहुत ही सुदुभ होती है। भोजन के योग्य पदार्य प्राप्त हों और उन्हें भोजन करने की शक्ति भी प्राप्त हो- रति करने की शक्ति विद्यमान हो मोर गुन्दरी नारी भी प्रा हो-मय प्राश हो पोरयंभव होने पर दान देने की शक्ति भी हृदय में विद्यमान हो-ये सर याती का होना frमो [ श्री गरुडपुराण भी साधारण एव रहा तप का फन नहीं होता है पर्थात् इन सब वस्तु में और शक्तियो का पाना महान तपश्चर्या का ही पुण्य फल हुमा करता है। दान से ही भोगो की प्राप्ति होती है। सुन्दर भाषण से परलोक में विद्वान और धर्म के ज्ञाता होते है ॥१७॥ ॥१८॥ दान के न देने से दरिद्रता होती है तो उस भवस्था में यह जीव पाप कर्म पिया करता है। पापो के प्रभाव से नरको की प्राप्ति होती है। फिर यह दरिद्र होकर जन्म लेता है और पुन: घनाभाग वश पाप कर्म किया करता है तथा पापी बन पाता है। तात्पर्य यह है कि दान करना महान् शुभ कर्म होता है ॥१९॥ १५-प्रेतकृत्य और पुनानिर्णय अत.पर प्रवक्ष्यामि पुरुपस्य विनिर्णयम् । जीवन्वापि मृतो वापि पञ्चवधिको हि यः ॥१ पूर्णे तु पञ्चमे व पुमाश्चैव प्रतिष्ठितः । सर्वेन्द्रियाणि जानाति रूपारूपविनिर्णयम् ॥२ पूर्वकर्मविपाकेन प्राणिना वधवन्धनम् । विप्राद्यानन्त्यजान्सन्मिापम्पारयति ध्र वम् ॥३ गर्भ नष्ट क्रिया नास्ति दुग्ध देय शिशो मृते । घटाश्च पायरां क्षीर दद्याद्वालविपत्तित. ॥४ एकादशाहे द्वादशाहे वृपोत्सगंविधि विना। महादानविहीनन्तु कुमारे कृत्यमाचरेत् ॥५ कुमाराणाञ्च वालाना भोजनं वस्त्रवेष्टनम् । बाले वा तरुणे वृद्ध घटो भवति देहिनाम् ॥६ भूमौ निक्षेपण बालमावर्षद्वयमेव च । ततः परं खगोष्ठ देहदाहो विधीयते ॥७ वहा-इमके मागे में पुरुष के विषय मे विशेष रूप से निर्णय करता हूँ जो पांच वर्ष से अधिक बड़ा होता है वह जीवित हो या मृत हो उसका वर्णन किया जाता है ॥ १॥ पांचवें वर्ष के पूर्ण हो जाने भगवान् श्री कृष्ण ने
प्रेतकृत्य और पुनानिर्णय ]
पर पुरुष प्रतिष्ठित हो जाया करता है । वह सभी इन्द्रियो को जानता है और
उसे रूप तथा अरूप का भी विशेप निर्णय हो जाता है ॥२॥ पूर्व जन्मो
मे किये हुए कर्मों के विपाक से ही प्राणियो का यह संसार का बन्धन हुमा
करता है। विप्र से प्रादि लेकर अन्त्यज पर्यन्त सभी माप को यह निश्चय
पार कर देता है ।। ३ ।। गर्भ के नष्ट हो जाने पर तो कोई क्रिया के करने का
विधान ही नहीं है। रिशु की अवस्था मे मृत हो जाने पर दूध देना चाहिए ।
जब बालक का स्वरूप प्राप्त कर लेवे तो उसके निमित्त घट-पायम-क्षीर ये
सभी देना चाहिए जिसमे उमको तुष्टि एव तृप्ति होती है ॥४॥ एकादशाह
मे अर्थात् ग्यारहवें दिन मे पौर द्वादशाह मे वृपोत्सगं विपि के बिना महादान
से विहीन कृत्य कुमार के लिये करना चाहिए ॥ ५॥ कुमारो और वालो
यो भोजन तथा नेष्टन वस्त्र का दान करे। बाल प्रयवा तरुण तया वृद्ध पे देह
धारियो को घर होता है ।। ६ ॥ दो वर्ष तक के बच्चे को तो भूमि में गड्ढा
करके निक्षेपण पर देना चाहिए । हे सग । इससे बड़ी उन पालो के
देह का दाह करने का विधान होता है ।।७।।
शिशुरादन्तजननावदाल. स्याद्यावदाशिसम् ।
पथ्यते सर्वशास्त्रपु कुमारो मौञ्जिवन्धनात् ॥८
मृतो हि पञ्चमे वर्षे प्रयत. सवतोऽपि वा।
पूर्वोक्तमव क्त्तव्यमोहते दश पिण्डजम् ॥
स्वल्पकमप्रसङ्गाच्च स्वल्लाद्विपययन्धनात् ।
स्वल्पे वपुपि वासाच क्रिया स्वल्पामपीच्छति ॥१०
यावच्च पञ्चवर्षे तु वालवस्य भवेन्मृतिः ।
यद्यद्यस्योपजीव्य स्यात्तत्तद्दे यमिहेन्दति ॥११
ग्रह्मवीर्योद्भवा पुया देवर्षीरणाच वल्लभाः।
यमेन यमदूतश्च मन्यन्ते निश्चित्तं सग ॥१२
बालो वृदो युवा वापि वयो भवति देहिनाम् ।
गुम दुग समाप्नोति देही सयंगम्विह ॥१३
३४८
[ या गरुडपुरा
-
परित्यज्य तदात्मानं जीरगन्त्वचमिवोरगः ।
अगुप्ठमायपुरुपो वायुभूत. क्षुधादितः ।।१४
तस्मा यानि दानानि मृते तस्मिन्सुनिश्चितम् ।
जन्मत. पञ्च वरिण भुक्त दत्तमसस्कृतम् ॥१५
जब तक दाँत नही निकलते हैं तब तक वह शिशु कहा जाता है । जव
तक चूडा कम नही होता है वह बाल इस नाम से पुकारा जाया करता है ।
मौन्जी वन्धन होने से समस्त शास्त्रो मे वह 'कुमार'-इस नाम से सम्बोधित
किया जाया करता है ॥८॥ पांचवें वर्ष मे मृत चाहे वह अव्रत हो या सव्रत
हो पूर्व मे कहा हुमा ही कर्तव्य कर्म दश पिण्डज करना चाहिए ine |
स्वल्प कर्म के प्रसङ्ग से मोर स्वल्प विषयो के बन्धन से स्वल्प उम्र में या
शरीर में वास करने से वह स्वल्प ही क्रिया भी चाहा करता है । अर्थात् छोटे
के लिये वही क्रिया करने की..मता नहीं होती है । ॥ जब तक
बालक पांच वर्ष मे रहता है और उसकी मृत्यु हो जाती है तो जो-जो भी
उसके जीवन मे उप जीव्य पदार्थ हो वही-वही दान स्वरूप मे उमको तुष्टि एव
तृप्ति के लिये पवश्य हो देने चाहिए । मृतात्मा यही इच्छा भी करता है ॥११॥
ब्राह्मण के वीर्य से समुत्पन्न पुत्र और देवर्पियो के प्रिय जो होते हैं वे यमराज
तथा यम के दूतो के द्वारा रास्कृत हुमा करते हैं । हे खग ! यह बिल्कुल निश्चय
है ॥ १२ ॥ देह धारियो मे बालक हो-वृद्ध हो अथवा युवा हो ये तीन ही
अवस्था हुआ करती हैं । यहाँ पर सवंगन देही अर्थात् सभी में रहने वाला
मात्मा सुख और दुख की प्राप्ति किया करता है ।। १३ ॥ जब इसके परलोक
गमन का समय उपस्थित होता है उस समय मे यह मात्मा इस अपने शरीर
को इस तरह त्याग देता है जैसे कोई सपं अपनी कंचुली का परित्याग कर
दिया करता है जबकि उसे जीर्ण समझ लेता है। फिर प्र गुष्ठ प्रमाण वाला
पुरुष वायुभूत होकर क्षुधा से प्रत्यन्त पीडित हुआ करता है । इसीलिये उसकी
तृप्ति के निमित्त उमवै मृत हो जाने पर दानादि अवश्य ही देने चाहिए-यह
मुनिश्चित सिद्धात है । जन्म से पांच वर्ष तक बिना सरकार किया हुआ ही
, वह साता है ॥१४॥१५॥
[ ३४६ तकृत्य और पुनानिय ] पञ्चवधिके वाले विपत्तियदि जायते । वृपोत्सर्गादिक कर्म सपिण्डोकरण विना ॥१६ पहन्येकादशे पुत्रः कुच्छ्रिाद्धानि पोडश । उदकुम्भप्रदानन्तु अन्यदानानि यानि च ।।१४ भोजनानि द्विजे दद्यान्महादानानि शक्तितः । दीपदानानि यत्किञ्चित्पञ्चवर्षाधिके सदा ।।१८ कत्तंच्य तु सगश्रेष्ठ कियादि प्रेततृप्तये। यदा न क्रियते सर्व पिशाचत्वं स गच्छति ॥१६ एवं कृते तु स प्रेतस्ततो याति परा गतिम् । पुनश्चिरायुर्भूत्वा च फुले सस्य वसेद् ध्र वम् ॥२० सर्व सौख्यप्रदः पुत्रः पित्रोः प्रीतिविवर्द्धनः। प्रात्मा चै जायते पुष इति वेदेषु निश्चितम् ॥२१ पाँच वर्षको अवधि पाले बालक की यदि मृत्यु हो जाती है तो माईगरण पर्म के बिना पृपोत्सर्ग प्रादि मंकरे ।१६। पारहवें दिनमे पुत्रोपोडश मारने चाहिए । उसके पुम्भ का प्रदान तथा अन्य जोभी दान हो वे देव ।१७ ग्रामगोको भोजन कराधे पौर महापान जोभी हो अपनी पक्ति के अनुमार उ.ई करे। दीप दान करे और सदा पांच वर्ष से अधिक उम्र वाले के लिये जो कुछ भी हो वहगः सभी परे ॥१८॥ हे पगठ! प्रेत की पूर्णतया मृप्ति के लिये किया पागि पारनी चाहिए। जब ये क्रिया पोर देय दान मादि मभी नहीं लिया जाता है तो यह प्रेत फिर पिशाम की योनि को प्राप्त पर लिपा करता है।।१८।। ऐगा मव कुछ कर देने पर तो यह प्रेत फिर परम गति से प्राप्त हो जाता है और फिर चिर पाय होकर उमरे तुम मे निधय ही निवाम प्रिया सरना है ।। २० ॥ पितृगण की प्रीति पा यहाने दागा पुष गुव प्रसार गुगो यामा होता है। येसे में यह निभयप बहा गया है कि रही भारमा पुषप मे जमा हुमा करता है ॥२१॥ प्रायासमेक हि यथा चन्द्रापिली तयं । पटादि षाम रटना कोच तत्समम ॥२२ ३५० ] [ श्री गरुडपुराण आत्मा तथैव सर्भपु पुत्रेषु विवरेत्सदा । या यस्य प्रकृति पूर्व शुक्शोणितसङ्गमे ॥२३ तस्य तद्भावयोगेन पुत्रास्तत्कर्मकारिणः । पितृरूप समादाय कस्यचिज्जायते सुत ॥२४ पितृत. कामरूपश्च गुणज्ञो दानतत्पर. । ईदृश कोऽपि लोकेऽस्मिन्न भूतो न भविष्यति ॥२५ अन्धादन्धो न भवति मूकान्मूको न जायते । वधिरादधिरो नव मूर्खान्मूर्यो न जायते ॥२॥ पोरसक्षेत्रजाद्याश्च पुगा दशविधा. स्मृताः । सगृहीतसुतो यश्च दासीपुनश्च तेन किम् ॥२७ का का गतिमवाप्नोति जातैमृत्युवशङ्गतः । भवन्ति दुहितरो यस्य दौहिनो न भवेत्सुतः । श्राद्ध तस्य तु क कुरामा न तद्भवे ॥२६- जिम तरह प्राकाश एक है और जैसे चन्द्र तथा प्रादित्य होते है । घटादि मे सभी पृयक दिसलाई दिया करते हैं किन्तु रूप मे वे सभी समान ही होते है ।। २२ ।। उसी तरह यह मात्मा सदा समस्त पुत्रो मे विचरण किया करता है । रजो वीर्य का जब गर्भाधान के समय मे सगम होता है उस समय मे जिसकी जो प्रकृति होती है उसके उसो भाव के योग से पुत्र उस कम के करने वाले होते हैं । क्सिी का पुत्र पितृरूप को लेकर समु पश्न होता है ॥२३॥ ॥२४॥ पिता से छारुप गुणो । ज्ञाता और दान में परायरा होता है । इस प्रकार का लोक में कोई भी न हुआ और न होगा ही ॥ २५॥ किसी प्राधे पिता से कभी कोई अन्धा तथा मूक पिता से मूक पुत्र नहीं होता है। वहरे से वहरा और मूर्ख पिता से मूख पुष भी नभी उत्पन्न नहीं हुआ करता है ॥२६॥ गरुड ने कहा-हे भगवन् । मौरस और क्षेत्रज प्रादि दश प्रकार के पुत्र कहे गये है। पौर जो सगृहीत सुत होता है तथा दासी पुत्र होता है उसम क्या ।। २७ ॥ इन सबके उत्पन्न होने से मौर मृत्युगत हो जाने से कौन- सोन मी गार को प्राप्त होता है ? जिम के लदक्यिों हो होती है। उस दुहिता होना है 7 प्रेतकल और पुनानिर्णय । ।।३२ "फा पुन दौहित्र (धेवता) तो पुन नहीं होता है। उसका घाद्ध किसको करना पाहिए ? रा येवल पुत्रियो वाले पाद्ध की यया विधि होती है ? ॥२८॥ मुखं दृष्ट्वा तु पुत्रस्य मुच्यते पैतृकारणात् । अन्ये क्षेत्रादयः पुना मुक्तिमानप्रदायकाः ॥२६ कुति पार्वण श्राद्धमौरसो विधिवत्सुतः । कुर्वन्त्यन्ये तथा श्राद्धमेकोद्दिष्ट सुता नव ॥३० पौत्रस्य दर्शनाज्जन्तुमुच्यते स ऋणत्रयात् । लोकान्ते च दिव प्राप्तिः पुत्रपौत्रप्रपौत्रकै. ॥३१ ब्रह्मपुत्र उन्नयति रागृहीतस्त्वधो नयेत् । थाद्ध सावत्सर कुर्वन्जायते नरकाय सर्वदानानि देयानि ह्यन्नदानानि व खग। रागृहीतसुतेनैव ह्य कोद्दिष्ट न पार्वणम् ॥३३ भगवान श्री कृष्ण ने कहा-पुत्र के मुख का दर्शन करने ही से जो पतृक एक ऋण रहता है उससे मनुष्य छुटकारा पा जाया करता है। अन्य जो क्षेत्रादि पुत्र होते हैं वे तो फेयन मुक्ति मात्र के प्रदायक हुमा करते हैं ॥ २६ ॥ जो बोरस पुत्र होता है अर्थात अपनी सो पानि परिणीता पानी से उत्पन्न होत व ला पुत्र है उसे पर्षणबाद विधि पूर्वक र रना चाहिए। अन्य जो नौ प्रकार के पुत्र है उन्हे एकोदिष्ट श्राद ही करना चाहिए ॥३०॥ जब मनुष्य पौत्र का दर्शन कर लेता है तो वह फिर देव मण, ऋषिरण और पितृप इन तीनो सरह के ऋणो से युक्त हो जाया करता है । पुष-पौत्र पोर प्रपोय के प्राप्त होने पर वह इस लोक के अन्त में दिवलोक को प्राप्त हो जाता है ।। १ ।। ब्रह्म पुत्र उन्नयन किया करता है और जो सगृहीत पुष होता है वह अधोभाग मे ले जाया करता है। सावत्सर श्राद्ध करता हुआ वह नरक में जाता है ॥ ३२ ॥ है मग ! सगीत मुन के द्वारा अन्य सम्पूर्ण ज्ञान तथा अन्न दान देने चाहिए किनु एकोदिष्ट और पादण थाद्ध नही करना चाहिए ॥३३॥ प्रत्यन्द पितृमातृभ्या श्राद्ध कृत्वा न लिप्यते। एकोद्दिष्ट परित्यज्य पार्वण कुलो यदि ॥३४ ३५२ ] [ भो गरुडपुराण तदात्मान पितृश्चैव स नयेद्यमशासनम् । सगृहीताश्च ये केचिद्दासीपुत्रादयस्तथा ॥३५ तीर्थे गत्वा तु यः श्रद्धमामानञ्च ददेविजे। रागृहीतसुतो भूत्वा पाक व प्रयच्छति ॥३६ वृथा श्राद्ध विजानीयाच्छूद्रान्नेन यथा द्विजः । तेन दत्तं न गृह्णन्ति पितामहमुखाश्च ये ।।३७ ऐव ज्ञात्वा सगश्रेष्ठ हीनजातिसुतान्त्यजेत् । यस्तु प्रव्रजिताज्जातो ब्राह्मण्या शूद्रतश्च य. ॥३८ द्वाविमौ विद्धि चाण्डाली स्वगोत्राद्यस्तु जायते । स्वजातिविहितान्पुत्रान्समुत्पाद्य खगेश्वर ॥३६ तैः सुवृत्तः सुखं प्राप्तो दुर्वृत्तं नरक व्रजेत् । हीनजातिसमुत्पन्नः सुवृत्तः सुखमेधते ॥४० कलिकलुपविमुक्त पूजितः सिद्धसङ्घमरचमरमाला- वीज्यमानोऽसरोभिः । पितृशतमपि बन्धून् पुत्रपौत्रप्रपौत्रानपि नरकनिमग्ना- नुद्धरेदेक एव ।।४१ प्रति वर्ष माता-पिता के लिये श्राद्ध करने वाला पुस्प कभी लिप्त नहीं होता है । यदि एकोद्दिष्ट श्राद्ध का परित्याग करके पार्वण श्राद्ध करता है तो अपने मापको मोर पितृगण को भी यमराज के शासन मे ले जाता है। पौर जो संगृहीत सुत है तथा कुछ दासी पुत्र प्रादि है उन्हें तीर्थ मे जाकर जो श्राद्ध करे उसमे कच्चा ( अपरिपक्व ) मग्न द्विज को देना चाहिए । सगृहीत सुत होकर पाक का भी दान देता है ॥ ३६॥ श्राद्ध को वृथा ही समझना चाहिए जिस प्रकार से शूद्रान्न से द्विज होता है उसी भांति उसके द्वारा दिये हुए को पितामह मुख जो होते हैं ग्रहण नही किया करते हैं ॥ ३७ ॥ हे खग ! इस तरह से जान कर जो हीन जाति के पुत्र होते हैं उनका त्याग कर देना चाहिए । जो प्रजित से (सन्यासी से) ब्राह्मण मे उत्पन्न हुमा या शूद्र से समु- स्पन्न हुमा है ये दोनो चाण्डाल समझने चाहिए और जो अपने गोत्र वाले से प्रतकृत्य और पुनानिर्णय ] । उत्पन्न होता है वह भी चाण्डाल होता है । हे खगेश्वर । अपनी जाति से विदित पुत्रो को समुत्पन्न करके उन सुन्दर माचरण वालो से ही मनुष्य सुख को प्राप्त किया करता है । जो दुराचारी होते हैं उनसे मरक की प्राप्ति हुआ करती है। जो हीन जाति से भी समुत्पन्न हो और चरित्र एवं माचार से अच्छे होते हैं उनसे भी सुख की वृद्धि होती है ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ ४०॥ कलियुग के क्लुप (पाप) से विमुक्त होता हुआ सिद्धो के समुदायो के द्वारा पूजित होकर तथा अप्सरानो के द्वारा देवी के चमरो से वोज्यमान होकर अर्थात् चमर दुराये जाने वाला संकडो की संख्या में पितृ गण तया बन्पु वर्ग और अपने पुत्र पौत्र तथा प्रपौत्रों को भी ऐसा यह एक ही पुरुप नरको मे निममा रहने दालो का उद्धार कर दिया करता है ॥४१॥ १६ - सपिण्डीकरण तथा श्राद्ध सत्य व्रहि सुरश्रेष्ठ कृपा कृत्वा ममोपरि । मृतानाञ्च व जन्तूना कदा कुर्यात्सपिंडनम् ।।? सपिंडत्वे कुतो यान्ति ह्यसपिंडे कुतो गतिः । केन चैव सपिंडत्व झोपु सा वक्त मर्हसि ॥२ पतिपत्नी सपिण्डत्व प्राप्नुतः कथमुत्तमम् । जीवभत्तरि नारीणा सपिण्डीकरण कुत. ॥३ भर्तलोके कथ याति स्वर्गलोके सुरेश्वर । अग्नयारोहे वथ श्राद्ध वृपोत्सर्गन्तु तद्दिने !!४ घटदान कथ कार्य सपिण्डीकरणे कृते । कथयस्व प्रसादेन हिताय जगता प्रभो ॥५ सत्य हि क्ययिष्यामि सपिडीकरण यथा। वर्ष यावत्खगष्ठ मार्गे गच्छति मानव ॥६ तत पितृगणे साद्ध पितृलोके स गच्छति । तस्मात्पुत्र पत्तं व्य सपिडीकरण पितु ॥७ गरुड ने यहा-है सुरो में परम श्रेष्ठ | आप मेरे ऊपर कृपा करकै यह सत्य २ वताइये कि जो जन्नु मृा हो जाया करते हैं उन मपिण्डन निया श्री गरुडपुराण किस समय में करनी चाहिए ॥ १॥ सपिण्डत्व होने पर वे कहाँ जाया करते है भोर सपिण्डत्व न होने पर उनकी कैसे गति होनी है ? स्त्री और पुरपो में किसके द्वारा सपिएडत्व होता है-यह सब वतनाने के योग्य होते है ।॥ २॥ पति और पत्नी किस तरह से उत्तम सपिण्डस्य को प्राप्त होते हैं । भर्तार के जीवित रहने पर नारियो वा मपिएडस के से होता है ? |॥ ३ ॥ हे सुरेश्वर ! यह नारी स्वर्ग लोक में अपने स्वामी के निकट भर्तृलोक मे किस प्रकार से जाया करती है ? अग्नि में प्रारोहण करने पर श्राद्ध कैसे होता है और उस दिन मे वृपोत्सर्ग किस तरह रो हुमा करता है ।।४॥ सपिराडी करण करने पर घट का दान करो किया जाता है ? हे प्रभो ! जगत् के लोगो के हित के लिये पाप प्रसन्न होकर यह सब वर्णन करिये ॥ ५ । श्री भगवान् कहा- मैं सर्वथा रास्य २ बतलाता हूँ कि जिम तरह से ससिंडीकरण वर्म पिया जाता है। हे खगश्रेष्ठ ! एक वर्ष पयन्त यह मानव मृत्यु गन होने के पश्चत् उस महान् दिशाल मार्ग की यात्रा करता रहता है ॥ ६॥ इसके अन तर फिर यह पितृगण के साथ पितृ लोक मे जाया करता है । इससे पुत्रो के द्वारा पिता का सविडो करण कर्म करना चाहिए ।।७।। सवत्सरेण तु सम्पूर्ण कुर्यापिडप्रवेशनम् । पिंडप्रवेशविधिना तस्य नित्य मृताह्निकम् ।। निश्चित पक्षिशार्दूल वन्तैि पिण्डमेलनम् । सह पिण्डे कृते प्रेतस्तो याति पराङ्गतिम् ।। तन्नाम सपरित्यज्य तत पितृगणो भवेत् । त्रिपक्ष वाथ पण्मासे मेलयेच्च पितामहै ॥१० ज्ञात्वा वृद्धिविवाहादि स्वगोत्रविहितानि च । विवाह नैव कुर्वीत मृते च गृहमे धिनि ॥ भिक्षुभिक्षा न गृह्णाति यावन्न कुर्यात्सपिण्डनम् ॥११ स्वगोवशुचिस्तावद्यावत्पिण्ड न मेलयेत् । मेरानात्प्रेतशब्दश्च नियतत सगेश्वर ॥१२
सण्डिीकरण तथा श्रास ]
अानन्त्यात्कुलधर्माणा पुंसां चैवायुपः क्षयात् ।
अस्थिरत्वाच्छरीरस्य द्वादशाहः प्रशस्यते ॥१३
निरग्निकः साग्निको वा द्वादशाहे सपिंडयेत् ।
द्वादशाहे त्रिपक्ष वा परमासे वत्सरेऽपि वा ॥१४
एक सवत्मर के सम्पूर्ण हो जाने पर पिड प्रवेश न करना चाहिए ।
पिंड प्रवेश की विघि से उसका नित्य मृताह्निक होता है ।।८।। है पक्षिशार्दूल !
वर्ष के अन्त मे पिंडो का मेलन निश्वत् रूप से होता है। सिंहो के साथ कर
देने पर फिर वह प्रत परम गति को प्राप्त हो ज या करता है ॥६॥ फिर वह
प्रपना 'प्रत'-इम नाम का परित्याग करके पितृ गण हो जाया करते हैं ।
तीन पक्ष में अथवा छ मास मे पितामहो के माथ उनका सरिडी वरण फर्म
करके मेलन अवश्य ही कग देना चाहिए ॥ १० ॥ अपने गोत्र मे वृद्धि पोर
विवाह प्रादि को जानकर जोकि म्वगोत्र में विदिन हो तो गृहमेधी क मृत हो
जाने पर विवाह नहीं करना चाहिए । जब नब सपिठी करण क्रिया नहीं होती
है पौर मृत जन्तु प्रेत रूप में विद्यमान रहता है किसी भिक्षु को भी उस घर से
भिक्षा नही ग्रहण करनी चाहिए ॥ ११॥ अपने गोत्र म तव तक अशुचिता
रहा करती है जब तक विंडो का मेलन नही होता है अर्थात् सपिडी करण
क्रिया सम्पन्न नही हुप्रा करती है । हे खगेश्वर I fiडो के में न हो जाने से
प्रेत शब्द की निवृत्ति हो जाया करती है ॥ १२ ।। कुलो के धर्मों की अन-तता
होने से प्रयात अत्यधिक सख्या वाले कुनो मे धर्म हुआ करते है और पुरुषो
को मायु को क्षीरगना हाने के कारण से तथा इस शरीर की कोई भी स्थिरता
के न होने से सपिंडी करण के कर्म को करने के लिये द्वादशाह अर्थात् बारहवा
दिन ही परग प्रशस्त होना है ॥ १३ ॥ चाहे मृतात्मा निरग्निक हो अथवा
साग्निक हो बारहवें दिन में उमा kिडी करण कर देना चाहिए। य सभी
काल ठोक है-द्वादशवें दिन मे--तीन पक्ष मे-छ माम में प्रथवा रामर
के अन्त में पिंडो का मेनन कर देवे जिरा मृत जीव की प्रेत मजा मिटर
पितृ सज्ञा प्राम हो जाये ॥१४॥
.५८ ] । श्री गरुडपुराण 1 सभी उम एप अपने के पुत्र से ही पत्र याने होते हैं-ऐगा मनु ने वहा है। ॥ २३ ॥ यदि सभी भाई ऐसे हो नि विमी के भी कोई पुत्र न हो तो फिर मृत त्मा को पत्नी के द्वारा ही मपिटी करण यमं करना चाहिए अथवा किसी स्विज के द्वारा तथा पुरोहित थे द्वारा उसे पूर्ण करा देना चाहिए ॥ २४ ॥ जिनका पूरा करण संस्कार हो गया हो उप पुत्र के द्वारा भी पितृ श्राद्ध करा देधे । वह केरल स्वधाकार का उच्चारण करे और अनाधिकारी उम समय तक होने से वेद के अक्षरो का उच्चारण नहीं परे। स्त्री का सरिडी करण स्वामी प्रादि तीनो के द्वारा सम्पन्न होना चाहिए ॥५॥ पितृ की तरह भाई के पुत्र के द्वारा तथा छोटै सहोदर के द्वारा सम्वत्मर से प्रति या इसके उर्व मे मथवा सम्वत्सर के पूर्ण हो जाने पर सपिडी करण परे ॥ २६ ॥ जिन प्रेतो का सपिंडी करण हो गया है फिर उनके लिये कोई पृथक् किया नही होती है । हे वत्स ! सपिंडन किये जाने पर फिर उनका पृथक्त्व विदित हो जाता है । अर्थात् पिंडो के मिल जाने पर उनको पृथकता ही नही रहत है अतः अलग से कुछ करना भी अनावश्यक होता है ।। २७ ॥ जो कोई फिर उनका पृथक् पिंड किया करता है वह पितृ घातक हो जाता है। यदि फिर कोई पृथक् पिंड प्रादि करता है तो उसे पुन. सपिंडना करनी चाहिए ॥२८॥ सपिंडीकरण कृत्वा ह्य कोद्दिष्ट करोति यः । प्रात्मानञ्च तथा प्रेत स नयेद्यमशासनम् ॥२६ वर्ष यावरिक्रयाः सर्वा. प्रेतत्वविनिवृत्तये । ताः सर्वाश्च कतः कुर्यान्नामगोत्रेण धीमता ॥३० घटाद्य भोजनं नित्य दीपदानानि यानि च । सपिंडीकरणे वृत्त एकस्यैव तु दापयेत् ॥३१, , अन्नं पानीयसहितं सख्या कृत्वाब्दिकस्य च । दातव्य ब्राह्मणे पक्षिन्घटादेनिष्कय तथा ॥३२ पिडान्ते तस्य सकल्पो वर्षाद् वृत्तिः स्वशक्तित: । दिव्यदेहो विमानस्थः सुतृप्तो धर्मशासने ॥३३ जीवमाने च पितरि न हि पुत्रे सपिण्डता । स्त्रीणां सपिण्डन नास्ति भर्तृमातरि जीवति ।३४ - ३५६ साटोकरण तया श्रद्ध - मृता माता पिता तिष्ठेज्जीवेदपि पितामही । सपिण्डन तत कुर्यात्प्रपितामह्या सहैव च ॥३५ सरिकीरण पर्म करने के पश्चात् यदि कोई एकोद्दिष्ट धाद्ध किया रता है वह सपने मापको और प्रेन को दोनो को यम के शासन का अधिकारी ना दिया करता है ।। २६ ।। एक वप पर्यन्त प्रेतत्व की निवृत्ति के लिये मिस्त क्रियाऐ हुमा करती हैं। वे सम्पूर्ण क्रियाएं धीमान् पुरुष के द्वारा नाम-गोत्र के द्वारा एक बार ही कर देनी चाहिए ॥ ३० ॥ घटादि षा दान- नोजन-नित्य दीप दान और जो भी अन्य दान आदि हैं वे सभी सबिडीकरण के पूर्ण हो जाने पर एक ही जगह करने चाहिए क्योकि फिर पृथपत्व तो रहता ही नहीं है ।। ३१ ॥ वर्ष की सरया करके ब्राह्मण को पानी के साथ अन्न देना च हिए तथा हे पक्षिन् । घटादि का निष्क्रय देना चाहिए ॥ ३२॥ डि के मन्त मे उसका सङ्कल्प करे और वर्ष मे अपनी शक्ति के अनुसार वृत्ति परे । इससे वह जन्तु दिव्य देह धारण कर विमान में स्थित होकर धम शागन में भली-भांति तृप्त होता है ।। ३३ ॥ पिता के जीवित रहते हुए पुत्र मे सण्डिना नही होती है । अपने स्वामी को माता के जीवित रहते हुए स्मियों की संपि. डता नही हुआ करती है ॥ ३४ ॥ माता की तो मृत्यु हो जाये और पितृ स्थित रहे तथा पिता मही भी जीवित होवें तो ऐसी दशा म प्रपिता मही के साथ ही सपिंडी कर देना चाहिए ।।३।। सत्य सत्य पुन सत्य श्रूयता वचन मम । न पिएडो मेलितो येषा मृताना तु नृणा भुवि ।।३६ उपतिष्ठन्न वै तेषा पुत्र दत्तमनेकधा । हन्तकारस्तदुद्देशे श्राद्ध नैव जलाञ्जलि १३७ हुताश या समारूढा चतुर्थेऽह्नि पतिव्रता। तस्या भर्तृ दिने काय्यं वृपोत्सर्गादिसूतकम् ॥३८ पुनिका पतिगोना स्यादधस्तात्पुनजन्मत । पुनानुत्पाद्य पश्चात्त सापि गौने बजेत्पितु ॥३६ ] [ घी गरुडपुराण पतिपल्यो सदकत्वं हुताशं.याधिरोहति । पुरेणेव पृथक्श्राद्ध क्षयाहे तस्य वासरे ॥४० अपुत्रौ चेन्मृतो स्याता एकचित्या समेऽहनि । पृथक्थाद्ध न कुर्वीत सपिण्ड पतिना सह ॥४१ पृथपिण्डे तु सयोज्य दम्पती पतिना सह । स लिप्यति महादोपैरिति सत्य वचो मम ॥४२ यह मेरा वचन पूर्णतया सर्वथा सत्य है-इसका तुम थवरण करो, इस भूमण्डल मे मरे हुए जिन पुरुषो का पिण्ड मेलित नहीं किया जाता है अर्थात् सपिण्डता नहीं की जाती है उनके पुत्रो के द्वारा अनेक बार भी दिया हुप्रा सनको भी नही पहुंचता या मिलता है । उसके उद्देश्य मे हन्तकार है श्रद्धा कुछ पौर जलाअलि नही होते है ॥३६॥३७॥ जो पतिव्रता चौथे दिन में अग्नि में समारूढ हो जावे उसका उसके स्वामी के दिन में ही वृपोत्सर्ग प्रादि सूतक करना चाहिए ॥३८॥ जो पुत्री होती है वह पाणिग्रहण के पश्चात् अपने पति, के गोम वाली हो जाया करती है। जो पति का गोत्र होता है पही उसका भी हो जाता है । पुत्र जन्म के पीछे पुत्रों को समुत्पन्न करके वह भी पीछे से पिता के गोत्र में चली जाया करती है ॥३६॥ पति और पत्नी जब एक ही अग्नि मे अर्थात् पिता मे मधिरोहण करते हैं तब पुत्र के द्वारा ही क्षय होने के दिन में पृयक् श्राद्ध करना चाहिए ॥४०॥ यदि पति-पत्नी दोनो बिना पुत्र वाले ही मृत हो जावें और एक ही चिता में सम दिन मे हो दाह किया जाये तो उसका पृथक् श्राद्ध नही करे क्योकि पति के साथ ही सपिएडना हो जाती है ॥४१॥ दम्पती हो और पति के साथ पृथक् पिण्डो का ऐसी दशा में सयोजन करे तो वह करने वाला पुरुष महान् दोषो से लिप्त हो जाया करता है-यह मेरा वचन बिल्कुल सत्य है ।।४२।। एकचित्या समारूढो म्रियेते दम्पती यदि । एकपाक प्रकुर्वीत पिण्डान्दद्यात्पृथक्पृथक् ॥४३ वृपोत्सर्ग नवथाद्धपृथक्थाद्धानि पोडश । घटादिपददानानि महादानानि यानि च । वर्ष यावत्पृथक्कुर्यात्प्रेतस्तृप्ति बजेचिरम् ।।४४ सपिण्डीकरण तथा श्राद्ध ] एकगोत्रमृतानाञ्च स्त्रिया वा पुरुषस्य वा । स्थण्डिलञ्च कत. कु-दोमं कुर्यात्पृथक्पृथक् ॥४५ एकादशेह्नि यच्छाद्ध पृथविपण्डान भोजनम् । पाक्येन पतिस्त्रीणां अन्येपाञ्च विहितम् ॥४६ एकेनैव तु पाकेन श्राद्धानि कुरुते बहु । विकिरं वेकत. कुर्यात्पिण्डान्दद्याद्वाहून्यपि । तीर्थे वाऽपरपक्षे वा चन्द्रसूर्यग्रहे तथा ॥४७ नारी भर्तारमासाद्य कुरणपं दहते यदि । अग्निदहति गात्राणि ह्यात्मान नैव पीड़येत् ॥४८ दह्यते धम्यमानानां धातूनां हि यथा मलम् । तथा नारी दहेदेह हुताशे ह्यमृतोपमे ।।४६ एक ही चिता मे समारूढ होकर यदि दम्पती मरते हैं तो एक पाक गरे मोर दोनो के लिये पृथक्-पृथक् पिण्डो को देवे । ४३॥ वृपोरतर्ग-नयश्राव पोर पोहसन-घटादि पदो का दान एवं जो भी मन्य महादान मादि होयें वे राय पृथक् पृथक् ही परे। जब तक पूरा वर्ष समाप्त हो सब मनग-पग हो परे। इमरो प्रेत को बहुत समय पर्यन्त तृमि हुमा करती है । जो एक हो गोम के हो मोर मर जायें पाहे वे पुरप हो या मी हो तो स्याण्डिस तो एक बनावे विन्तु उनके लिये होम पृयर पृथर करना पाहिये ॥४॥ ग्यारहवें दिन में जो धाद दिया जाता है उनमें अलग पिण्ड मोर भोजन देवे । पति पोर पत्नी के लिये शो एक ही पाक पिया जा सकता है रितु इनके अतिरिक्त मोई हो तो उनका एक ही जगह पर पाक करना भी निपिट एवं दूपित हपा करता है ॥४॥ एकही पान पर एक ही पाक करफे जो बहुत रोपाल परता है वही पर विकिर तो एक ही करे मोरपिएर पहा-मे देरे । ऐसा ही में अपवा अपर पक्ष में तपा मद मोर सूर्य के ग्रहण में करना चाहिये ॥४॥ मारी पाने म्यामोरो पारर यदि सो कुगर (मृत देह) गदार करे तो पग्नि परीर महोपा दाहरिया कमी उमको मारमा को पुछ मी पोहा नहीं करती। ॥४॥ मिरगे यमा को जाने वामी गातुमा । मप ही दापमा ३६२ ] [ थी गरुडपुराण करता है उमी तरह से अमृत के समान मग्नि में नारी स्वामी के देह का है दाह किया करती है ॥४६॥ दिज्यादौ दिव्यदेहस्तु शुद्धो भवति ते यथा । तप्ततैलेन लोहेन वह्निना नावदह्यते ।।५० तथा सा पतिसयुक्ता दह्यते न कदाचन । अन्तरात्मा मृतस्तस्मिन्मृतेऽप्येकत्वमागताः ॥५१ भर्तृ सङ्ग परित्यज्य याऽन्यत्र म्रियते यदि । पतिलोक न सा याति यावदाभूतसंप्लवम् ॥५२ नारी सुतान्परित्यज्य मातर पितरं तथा । मृत पतिमनुव्रज्य सा चिर सुखमाप्नुयात् ॥५३ दिव्यवर्षप्रमाणेन तिस्रः कोटयोऽद्ध कोटय. । तावत्काल वसेत्स्वर्गे नक्षत्र: सह सर्वदा ॥५४ तदन्ते च मृते लोके कुले भवति भोगिनाम् । महाप्रीतिमवाप्नोति भर्ना सह पतिव्रता ॥५५ एव न कुरुते नारी धर्मोढा पतिसङ्गमम् । सप्तजन्मनि दुखार्ता दुःशीलाऽप्रियवादिनी ॥५६ सा नारी गृहगोधा वा गोघा वा द्विमुखी भवेत् । स्वभरि परित्यज्य परसानुवत्तिनी ॥५७ दिव्यादि मे दिव्य देह जिस प्रकार से शुद्ध होता है तप्त तेल से, लौह से पोर वह्नि से वह प्रवदग्ध नही होता है ॥५०॥ उसी भांति पति से वह नारी कभी भी दग्ध नही हुआ करती है । उसके मरने पर मृत अन्तरात्मा सयुक्त एकस्व को प्राप्त हो जाता है ।।५१॥ मपने पति के सङ्ग का त्याग कर जो नारी यदि की अन्यत्र मरती है तो जब तक भूत सप्नव (प्रलय) होता है तब तक वह नारी पनि नोक को प्राप्त नहीं होती है ॥५२॥ जो नारी अपने पुत्रो को, माता को पौर पिता को त्याग करके अपने मृत पति का अनुगमन किया करती है अर्थात् पति के साप ही प्राणों को त्याग दिया करती है वह नारी चिरकाल तक सुख की प्राप्ति किया करती है ॥५३॥ दिव्य वपों के प्रमाण से साढे तीन [ ३६३ सपिण्डीकरण तथा श्राद ] रोह दर्ष के समय तक सर्वदा नक्षत्री के साथ वह स्वर्ग में निवास प्राप्त करती है ।।५४।। उसके अन्त में मृन होने पर वह भोगियो के लोक मे और कुल में होती है। वह पतिव्रता नारी अपने भर्ता के साथ महान् प्रीति का लाभ प्राप्त किया करती है ।।५५ । धर्म पूर्वक विवाहिता ना । इस प्रकार से पति का संगम नहीं करती है वह सात जन्मो तक दुख से पीडित होती हुई दु शीला पोर मप्रियवादिनी होती है ।।५६।। यह नारी गृह गोधा-गोधा अथवा द्विमुखी हुप्रा करती है जो अपने स्वामी का त्याग करके पराये पुरुष को मनुवत्तिनी रहा करती है ॥५७॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन स्वपति सेवयेत्सदा । कर्मणा मनसा वाचा मृते जीवति तद्गता ॥५८ जीवमाने मृते वापि किल्विप कुरुते तया । तेन नाप्नोति भर्तारं पुनर्जन्मनि दुर्भगा ॥५६ यदेवेभ्यो यत्पितृभ्योऽतियिभ्यः कुर्याद्भभ्यिर्वन सत्कियाञ्च । तस्यात्यद्ध केवलानन्यचित्ता नारी भुड क्ते भर्तृ शुश्र पर्यव ।।६० एव कृते तु सा नारी भतृ लोके वसेच्चिरम् । यावदादित्यचन्द्रो च तावद्देवोपमा दिवि ॥६१ पुनश्चिरायुपी भूत्वा जायेते विपुले कुले । पतिव्रता तु सा नारी भर्तृ दु ख न विन्दति ॥६२ सर्वमेतद्धि कथित मया तव खगेश्वर । विशेष कथयिष्यामि मृतस्यैव सुखप्रदम् ॥६३ द्वादशाहे कृत सर्व वर्ष यादत्सपिएडनम् । पुनः कुर्यात्तथा नित्य घटान्नं प्रतिमासिकम् ॥६४ कृतस्य करणं नास्ति प्रेतकार्याहते पुन. । चेत्करोति पुनः सम्यक्पूर्व कृत्य विनश्यति ॥६५ मृतस्यैव पुनः कुर्यात्प्रेतोऽप्यक्षयमाप्नुयात् । प्रवर्वाग्वृद्धश्च करणारपक्षिराज सपण्डिताम् ॥६६
[ श्री गरुडपुरा
३६४ ]
पूर्वोक्तक सर्वविधि सुयुक्त सपिण्डन यो हि करोति पुत्र ।
तथापि मास प्रति पिण्डमेकमन्न राकुम्भ सजलञ्च दद्यात् ।।६७
इसलिये मभी प्रकार के प्रयत्लो से नारी को अपने स्वामी का सदा
सेवन करना चाहिए। जब तक स्वामी जीवित रहे तब तक मच्छी तरह कम,
मन और वचन से उसकी सेवा करे और मरन पर उसके ही साथ अनुगमन
कर ॥५८॥ जीवित रहने पर या मृत हो जाने पर जो सदा किल्विप किया
करती है अर्थात् पापाचरण करती | इसका परिण म यह होता है कि वह
दुर्भाग्य वाली फिर दूसरे जन्म मे स्वामी की प्राप्ति नही किया करती है ॥५६॥
जो स्वामी देवो के लिये, पितृगण के लिये, प्रतिथियो के लिये भम्पचंन मोर
सत्क्रिया किया करता है उस सब सत्कर्म का आधा भाग केवल अनन्य चित्त
वाली नारी स्वामी की शुधूपा से ही प्राप्त किया करती है ॥६०। इस प्रकार
से भर्ती की थूपा से नारी पति लोक में चिरकाल तक निवास किया करता
है और जब तक ये चद्र और सूय स्थित रहा करते हैं तब तक वह दिवलोक में
देवता के समान रहती है ॥६१॥ इगके अनन्तर फिर चिरायु होकर वे दोनो
किसी विशाल कुल में जन्म ग्रहण करते हैं। वह पतिव्रता मारी कभी भी अपने
स्वामी के दुख को प्राप्त नही किया करती है ॥६२॥ हे खगेश्वर । सभी
बुछ मैंने तुम्हारे सामने वणन कर दिया है। सब मागे मृत को सुख प्रदान
करने वाला विशेष मैं बतलाऊँगा ॥६३।। बारहवें दिन म किया हुप्रा सब जय
तक वप का सपिण्ड न हो उसे पुन करे । नित्य घटान और प्रतिमासिक करे ।
॥६४॥ प्रेतकाय के बिना किये हुए को पुन नहीं किया जाता है । यदि पुन
भली भांति दिया करता है तो पूव कृत्य सब नष्ट हो जाता है ॥६शा मृत का
ही पुन इस प्रकार से करना चाहिये। इससे प्रेत अक्षय को प्राप्त हुना करत
है । हे पक्षिराज । वृद्धि के करने से अर्शक (पश्चात्) सपिण्डा करे । पूर्व में
बग्गिन सम्पूर्ण विधि को यथोचित रूप से सपिण्डीकरण जो पुत्र दिया करत
है तो भी प्रति मास में एक पिण्ड, अन्न, जल से परिपूर्ण कुम्भ मादि देन
साहिए ॥६६६७॥
प्रसव से मुक्तिः ।
१७-पत्त्य से मुक्ति
कथ प्रेता वसन्त्यत्र कीहररूपा भवन्ति च ।
महाप्रेता पिशाचाच के के कर्मफलं प्रभो ॥१
सर्वेषामनुकम्पार्थ बेहि मे मधुसूदन ।
प्रेतत्वान्मुच्यते येन दानेन सुकृतेन हि ।
- सर्व कथय मे देव मम चेदिच्छसि प्रियम् ॥२
साधु पुष्ट स्वया तार्य मानुषारणा हिताय वै ।
गुप्वावहितो भूत्वा यद्वच्मि प्रेतलक्षणम् ॥३
गुम्याद्गुह्य र ह्यतन्त्राख्येय यस्य कस्यचित्
भक्तस्त्व हि महावाहो तेन ते कथयाम्यहम् ॥४
पुर) रेतायुगें ताक्ष्यं राजासीद्वभु वाहन ।
महादयपुरे रम्ये धर्मनिष्ठो महाबल १५
यज्वा दानपति श्रीमान्ब्रह्मण्य साधुसम्मत ।
शोलोदारगुणोपेतो दयादाक्षिण्यसयुत ॥६
पना पालयते नित्य पुनानिव महाबल ।
स कदाचिन्महावाहु गया गन्तुमुद्यत ।
गरुड ने कहा- हे प्रभो । मत गहाँ पर कैपे निवास किया करते हैं
और उनके विस प्रकार के स्वरूप होते हैं ? महा प्रेत मोर पिशाच सिन किन
कर्मों के फनों मे हुमा करते हैं । १६३।। हे मधुसूदा। सभी प्राणियो के कार
अनुकम्पा करने के लिये यह मेरे सामने वसान कीजिये । इस भीषण प्रेतत्व से,
कौनसा दान तथा मुकृत है, जिसके करने से मुक्ति हुप्रा करली है ? हे देव ।
यदि मेरे प्रिय करने को आपकी इच्छा हो तो यह सभी मुझे बनाने की कृपा
कोजिये। श्रीकृष्ण ने कहा~हे तक्ष्य ! तुमने यह प्रश्न तो बहुत सुन्दर
किया है । इससे मनुष्यो का परग हित होगा 1 अब तुम अत्यन सावधान होकर
श्रवण करो, मैं प्रेत दे सम्पूर्ण लक्षण बतलाता हूं ||३॥ किन्तु यह बहुत ही
गोपनीय से भी गोपनीय विषय है, इसे च है जिस किसी के सामने नहीं 58
बी गरुडपुराण चाहिए । हे महाबाहो ! क्योंकि तुम मेरे भक्त हो, इसीलिये मैं तुमको यह सब बतलाता हूँ ॥४॥ हे ताक्ष्यं । पहिले प्रेस युग एक बभ्र वाहन नाम वाला राजा था। वह परम सुन्दर महोदय पुर में रहता था और बहुत ही धर्म मे निष्ठा रखने वाला या तया महान् बनवान् था ॥५॥ वह यजन करने वाला, दानपति. श्रीमान्, ब्रह्मण्य अर्थात् ब्राह्मणों की रक्षा करने वाले और साधु- सम्मत था। शील और उदारता के गुणों से युक्त या तथा दया एव दाक्षिण्य ( कोसल ) से समन्वित था ॥६॥ वह महान बलवान् राजा अपनी प्रजा का पालन पुत्रो को भौति ही किया करता था। किसी समय में वह बडी-बडी भुजामो वाला राजा शिकार खेलने के लिये जाने को तैयार हुआ था ॥७॥ वन विवेश गहन नानावृक्षसमन्वितम् । शार्दूलशतसजुष्ट नानापक्षिनिनादितम् ॥८ वनमध्ये तदा राजा मृग दूराददृश्यत । तेन विद्धो मृगस्तीवो वारोन सुदृढेन च ॥ वाणमादाय त तस्य स वनेऽदर्शन ययौ। शोरिणतस्रावमार्गेण स राजाऽनुजगाम ह ॥१० ततो मृगप्रसङ्गन वनमन्यद्विवेश स । क्षुत्क्षामकण्ठोनृपति श्रमसन्तापमूच्छित ॥११ जलस्थान समासाद्य साश्व एव व्यगाहत । पीत्वा तदुदक शीत पद्मदन्याधिवासितम् ।।१२ ततोऽवत सलिलाद्विमलाद्वभ्र वाहन । न्यग्रोधवृक्षमासाद्य शीतच्छाय मनोहरम् ॥१३ महाविटपिन घूर्णपक्षिसपातनादितम् । वनस्पतीना सर्वेपा केतुभूतमवस्थितम् ॥१४ वह राजा एक मत्यन्त पने जङ्गल मे प्रवेश कर गया था जो कि अनेक तरह के विशाल वृक्षों से समन्वित था और जिस वन में सैकड़ों पार्दूल रहा। करते थे। वहाँ पर विविध भौति पे पक्षियों की मधुर ध्वनि हो रही थी। उस वन के मध्य में उस वभ्र वाहन राजा ने दूर से ही एक मृग को देखा था।
। ३६७ प्रेतत्व से मुक्ति ] उम राजा ने सुदृढ तीक्ष्ण वाण के द्वारा उस तीव मृग को वैध दिया था। वह स्वप विद्ध होकर उस वारण के साथ ऐमा प्रष्ट हो गया कि कही भी फिर दिखलाई नही दिया था। वाण के लगने से जो उसके शरीर से रक्त का स्राव हुप्रा था उसे देखते हुए उसी मार्ग से वह राजा भी उसके पोचे चला गया था । 1810॥ इसके मनन्नर उस मृग की तलाश करने के प्रसङ्ग से वह मन्य एक वन में प्रवेश कर गया था। उस समय में राजा से प्रत्यन्त पीडित हो गया था। उसका गला एक दम सूख मया था पोर श्रम के सन्ताप से मूछिन-सा हो गया था ।।११।। इसके पश्चात् उसे एक जलाशय मिला। वहाँ पर उसने अपने अभ के सहित उस जल का प्रवगाहन किया था। उस जलासय का परम शीतल पौर पनो को गन्ध मे मविद मित जल का पान करके वह वधू वाहन उस विमल जल से अवतीर्ण होकर एक वट का वृक्ष यहां था उसके नीचे पा गया था। उस परम मनोहर वृक्ष को बहुत ही शीतल छाया थी। वह वट महान् विसाल था और घूर्ण पक्षियो के समूह की ध्वनि हो रही थी। वह वट वृक्ष वहाँ पर ऐमा स्थित हो रहा था मानो समस्त वनस्पतियो का वह केतु भूत हो ॥१२॥१३॥१४॥ तं महातरुमासाद्य निषसाद महीपतिः । अथ प्रेत ददर्शासो क्षुक्ष पाव्याकुलेन्द्रियम् ॥१५ उप्कच मलिन रुक्ष निर्मास भीमदर्शनम् । स्नायुबद्धास्थिचरण धावमानमितस्तत. ॥१६ अन्यैश्च बहुभि. प्रेत समन्तात्परिवारितम् । स दृष्ट्वा चागत घोर विस्मितो वभ्र वाहन ॥१७ प्रेतोऽपि दृष्ट्वा ता घोरामटवीमागत नृपम् । तदा हृष्टमना भूत्वा तस्यान्तिकमुपागमद ।।१८ अबवीत्स तदा ताक्ष्य प्रेतराजो नृप वचः । प्रेतभावो मया त्यक्त प्राप्तोऽस्मि परमा गतिम् । स्वत्सयोमान्महाबाहो नास्ति धन्यतरो मम ॥१६ ३६८ [ पी गमगण कृष्णस्प करालाक्ष त्वं प्रेत एव दृश्यसे । कथयस्व मम प्रीत्या यथामतितत्यतः ॥२० फथयामि नृपयेष्ठ सर्वमेवादितस्तव । प्रेतत्वे कारणं श्रुत्वा दयां वातु ममाहंसि ॥२१ उस परम विशाल वृक्षा के पास पहुंच कर वह राजा यहां पर मंठार विधाम लेने लगा था। इसके पनन्तर उसने वहाँ पर एक प्रेत को देखा था जो कि भूख और प्यारा से ध्यान इन्द्रियों याला हो रहा था ॥१५॥ ऊपर की पोर उसके केस पडे हो रहे थे, अत्यन्त मैला-बुचला उसका रूप पा, बहुत ही रूसा, यिना मांस वाला, भयानक दिखलाई देने वाला, स्नायुमों से वद पब्धि. चरण याला और इधर-उधर दौड़ लगाता हुपा था। उसके चारो पोर अन्य भी बहुन-रो प्रेत उसे घेरे हुए थे। मेने उसे आते हुए रात्रा ने देखा जो कि घोर रूप वाला था। उसे देखकर राजा को वहा विस्मय हुमाया ॥१६॥१७॥ प्रेत को भी उस मति घोर जङ्गल में पाये हुए राजा को देखकर बड़ी प्रसनता हुई थो और प्रसन्न चित्त होकर वह प्रेत उस राजा समीप में उपस्थित हो गया था ॥१८॥ हे तादयं ! उस समय में वह प्रेतराज राजा से बोना है महा- वाहो ! मैंने पाज मापके सम्पर्क को पाकर अपना प्रेत भाव त्याग दिया है और मैं परम गति को प्राप्त हो गया हूँ। मेरे समान कोई भी अन्य धन्यतर नहीं है ॥१६॥ राजा ने कहा-काले स्वरूप वाले तया विकराल नेत्रो वाले तुम तो प्रेत की भांति ही दिखलाई दे रहे हो । मेरो प्रीति के लिये पाप जो भी यथार्य बात हो उसे अत्यन्त तत्व पूर्वक रतलामो ।।२०। प्रेत ने कहा---- हे नृप श्रेष्ठ ! अब में सब कहता हूँ। पापको यह सब कुछ विदित हो नहीं है। इस प्रेतत्व प्राप्त होने के कारण को सुनकर माप मेरे ऊपर दया करने के योग्य होते हैं ।।२१॥ वैदिश नाम नगरं सर्वसम्पत्समन्वितम् । नानाजनपदाकोरणं नानारत्नसमाकुलम् ।।२२ नानापुण्यसमायुक्त नानावृक्षसमाकुलम् । तत्राहं न्यवसं भूप देवार्चनरतस्तथा ॥२३ M
प्रेतत्व से मुक्ति 1
वैश्यजात्या सुदेवोऽह नाम्ना विदितमस्तु ते।
हव्येन तपिता देवा कव्येन पितरो मया ॥२४
विवधनयोगैश्च विप्रा सन्तपितास्तथा।
प्राहाराश्न विहाराश्च मया व सुनिवेशिताः ॥२५
दीनानाथविशिष्टभ्यो मया दत्तमनेकधा ।
तत्सर्व विफल तात मम देवादुपागतम् ॥२६
न मेऽस्ति सन्ततिस्तात न सुन्न च बान्धव ।
न च मित्र हि मे तादृग्य करोत्यौवंदैहिकम् ॥२७
प्रेतत्व सुस्थिर तेन मम जात नृपोत्तम ।
एकादश त्रिपक्षञ्च पाण्मासिकमथाब्दिकम् ॥२८
प्रतिमास्यानि चान्यानि एव श्राद्धानि पोडश ।
यस्यैतानि न दीयन्ते प्रेतश्राद्धानि पोडश ॥२६
प्रेतत्व सुस्थिर तस्य दत्त. श्राद्धशतैरपि ।
एव ज्ञात्वा महाराज प्रेतत्वादुद्धरस्व माम् । ३०
एक वैदिश नाम वाला नगर है जो कि सब तरह की सम्पत्ति से परि-
पूर्ण और नाना प्रकार क रत्नो स समाकुल है तथा अनेक जन दों से घिरा
हुपा है । बहुन पुग्यो से समन्वित तथा भनेक वृक्षो से समाकुन है। हे राजन् !
वहाँ पर मैं देवो की मचना मे परायण होकर निवास किया करता था ।।२२।।
॥२३॥ मैं वैश्य जाति में उत्सन्न हुमा था और मेरा नाम सुदेव थ -यह पापो
विदित होवे । मैंने हन्य के द्वारा खूब देवो को तृप किया था पोर भव्य मस्ति-
मण की तृप्ति भो को यो ॥२४॥ भनेक प्रकार के दानों के योग से मैंने पिता
को भी सन्तृम किया था। मैंने माहार भोर विहार भी सुनिवेशित किये थे।
॥२५॥ दीन और अनाथ लोगों को विशेष छप में मैंने अनेक भानि के दान
मादि दिये थे। हे तातं ! मेरे भाग्य से यह सभी कुछ विफल हो गया है ।।२६॥
है तात । मेरे कोई मनति नहीं है, न मेरा कोई सुहन है मोर न कोई मेरा
वान्या ही है। गेरा कोई मिन नही है पोर न कोई मेरा ऐमा हो है जोfr
मेरी ओ दहा क्रिया करे प्रान मरने के पश्वार होने वले पद-एहसान
३७०
। श्री गपुरार
प्रादि कम करे । हे नृपोत्तम ! इससे मुझे यह प्रेतत्व प्राप्त हुपा है और अब य
प्रेत सुस्थिर हो गया है। एकादश, त्रिपक्ष, छ मास का पौर वार्षिक तथा
प्राय प्रति मास मे होने वाले श्राद्ध जो कुल सोलह होते हैं जिम मृत जन्तु को
थे पोडश श्राद नहीं दिये जाते हैं जो कि प्रेतत्व के मुक्ति के लिये होने के
कारण तश्राद्ध कहे जाते है, उसका प्रेतत्व सुस्थिर हो जाया करता है चाहे
फिर सैकडो ही पास क्यों नहीं दिये जावें, उसका प्रेतत्व नही जाता है। है
महाराज ! इस प्रकार से प्राप मेरी दशा को जानकर अब इस प्रेतत्व से मुझे
छुडवाइये और मेरा उदार भाप करिये ॥२७ से ३०॥
वर्णानाञ्चापि सर्वेपा राजा बन्धुरिहोच्यते ।
सन्मां तारय राजेन्द्र मणिरत्न ददामि ते ॥३१
यथा मम शुभावाप्तिर्भवेन्नृपवरोत्तम ।
तथा कार्य महावीय्यं कृपा यदि ममोपरि।
प्रात्मनश्च कुरु क्षिप्र सर्वमेवोध्यदैहिकम् ।।३२
फर्य प्रेता भवन्तीह कृतरप्यौवदैहिकैः ।
पिशाचाश्च भवन्तीह कर्मभि. फैश्च तद्वद ॥३३
ब्रह्मस्वं देवद्रव्यञ्च स्त्रीणां वालधनं तथा ।
ये हरन्ति नृपश्रेष्ठ प्रेतयोनि लभन्ति ते ॥३४
तापसीश्च स्वगोत्राञ्च अगम्याञ्च भजन्ति ये ।
भवन्ति ते महाप्रता अम्बुजानि हरन्ति ये ||३५
प्रवालवचहारो ये च वस्तापहारकाः।
तथा हिरण्यहर्तारः संयुगेऽसम्मुखे हताः ॥३६
कृतघ्ना नास्तिका रौद्रास्तथा साहसिकाः शठाः ।
पञ्चयज्ञविनिमुक्ता महादानरताश्च ये।
एवमाद्यं महाराज जायन्ते प्रेतयोनय. ॥३७
राजा तो सभी वर्गों का वन्धु होता है-ऐसा इस लोक में कहा जाना
है। हे राजेन्द्र ! भाप मुझे तार दो-मैं प्रापको एक परमोत्तम मणिरत्न समः
f.त करूंगा ।।३१॥ हे नृपवरोत्तम ! जिस प्रकार से मुझे शुभ गति की प्राप्ति
[ ३७१ तत्व से मुक्ति ] से जावे वैसा ही आपको करना चाहिये । है महावीर्य ! यदि आप मुझ पर कृपा करे तो बहुत ही प्रच्छा होगा। माप मेरे मौर्य दैहिक कम के साथ अपना मी पौवं दैहिक सब कर्म शीघ्र ही वरिये ॥३२॥ राजा ने कहा--- पहाँ पर मौवं दैहिक कर्मों के किये जाने पर भी प्रत कैमे हो जाते हैं और किन कमाँ से पिशाच इम मही मण्डल मे हो जाया करते है ? यह सब मुझे पाप बतलाइये ॥३३॥ प्रेतराज ने कहा-जो ब्राह्मण का पन, देवोत्तर सम्पत्ति स्त्रियों का पन तथा व लकों का धन हरण किया करते हैं, हे नृपयेष्ठ ! वे लोग प्रेत की योनि को प्राप्त किया करते है ॥३४॥ जो लोग किमी तापसी नारी-- अपने गोत्र घली स्त्री और जो गमन करने के प्रयोग्य नारी हो इनका सेवन किया करता है वे महा प्रेत हो जाते हैं। जा पुरुष कमलों का हरण करते हैं तपा प्रवाल और हीरों का अपहरण किया करते हैं, वस्त्रों का हरण करते हैं तथा सुवर्ण का हरण करते हैं, जो युद्ध मे भर्समुख होते हुए हत हो जाते हैं । ॥३५॥३६॥ किये हुए को नहीं मानने वाले, ईश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं करने वाले रोद, साहसिक, शठ, पांचों प्रकार के यज्ञो से रहित होकर महादान में रति रखने वाले जो होते हैं वे इन तथा ऐसे ही अन्य कारणों से प्रेत की योनि में उत्पन्न हुपा करते हैं ॥३७॥ कथं मुक्ता भवन्तीह प्रेतत्वात्कृपया वद । कथ चापि मया कार्य्यमोवंदैहिकमात्मन. । विधिना केन तत्कायं सर्वमेतद्वदस्व मे ॥३५ शृणु राजेन्द्र सक्षेपाद्विधि नारायणात्मकम् । सुवर्णद्वयमाहृत्य मूत्ति तत्र प्रकल्पयेत् ।।३६ नारायणस्य देवस्य सर्वाभरणभूपिताम् । पीतवस्त्रयुगच्छन्नां चन्दनागुरुचिताम् ।।४० स्नापिता विविधस्तोयरधिवास्य प्रयत्नतः। पूर्वे च श्रीधरं देवं दक्षिणे मधुसूदनम् ॥४१ पश्चिमे वामन देवमुत्तरे च गदाघरम् । मध्ये पितामहं पूज्य तथा देव महेश्वरम् ॥४२ ॥ श्री गठपुगए - ? राजा ने कहा-यहाँ पर इस तस्व से कैसे मुक्त हुमा करते हैं ? कृपा पर यह भी मुझे माप बतलाइये। मुझे अपनी मौर्य दैहिकी क्रिया कैसे, किस विधि से करनी चाहिए-यह भी माप मुझे सभी कुछ बतलाने की कृपा करें। 11३८|| प्रेतराज ने कहा- हे राजेन्द्र प्राप सब नारायणारम विधि को सक्षेप से श्रवण करिये । सुवर्ण हय लाकर वहां पर दो सोने की मूत्तियो का निर्माण करावे ।। ३६ । ये मूतिया भगवान् नारायण की हैं और इनको समस्त पलारी से भूपित करे। दो पीत वर्ण के वस्त्र इनको धारण करावे और उस वस्त्र से उन प्रतिमामा का समाधान कर देवे तथा फिर चन्दन और प्रगुरु से उन्हे भली-भांति चचित कर देना चाहिए ।। ४० ॥ अनेक प्रकार के तीथ जलो से उनका स्नान करावे और प्रयत्न पूर्वक फिर इन प्रतिमापो का अधिवास करे । पूर्व दिशा में श्रीधर देव को, दक्षिण मे मधुसूदन को, पश्चिम में व मनदेव को, उत्तर मे गद घर देव को, मध्य में पितामह को तथा महेश्वर रेत को विराज सान कर पी करनी चाहिए ॥४१॥४२॥ तत प्रदक्षिणीकृत्य अग्नौ सन्तर्प्य देवता । घृतेन दना क्षोरेण विश्वेदेवास्तथा नृप ।।४३ तत स्नातो विनीतात्मा जपमान समाहित । नारायणाग्रे विधिवत्स्वा क्रियामोध्वंदैहिकीम् ।।४४ आरभेत विनीतात्मा क्रोधलोभविवजिन । कृत्वा श्राद्धानि सर्वाणि वृपस्योत्सर्जन तथा ॥४५ प्रयोदशाना विप्रारणा दद्याच्छपाण्युपानही । अगुलीयकरत्नानि भाजनासनभोजन ॥४६ सानाश्च सोदका देया घटा प्रेतहिताय वै । शम्यादानमयो दत्वा घट प्रेतस्य निर्वपेत् ॥४७ नारायणति स्व नाम सपुटस्थ समुच्चरेत् । एव कृत्वाथ विधिवत्पदा शुभफल लभेत् ॥४८ एव सजल्पतस्तस्य प्रेतस्य विनतात्मज । सेनाऽ जगामानुपद हस्त्यश्वरथमकुला ॥४६ प्रेतत्व मौचनार्थ घटादि दान - [ ३७३ ततो वले समायाते प्रेतोऽर्शनतां ययौ। तस्मादनाद्विनिःसृत्य राजापि स्वपुर ययौ १५० स्वपुर स समासाद्य सर्व तत्प्रेतभापितम् । चकार विधिवच्छंव ऊर्ध्वदेहादिकं विधिम् ॥५१ • इसके मनन्तर प्रदक्षिणा करके पोर अग्नि में देश को संतृप्त करके अर्थात् पृत, दधि, क्षीर के द्वारा अग्नि में देव प्रीति एव तृप्ति के निमित्त पाहू. तियां देकर उन्हे भली-भांति तृम करे । हे नृप ! फिर विश्व देवानो को मतृप्त करे ॥४३॥ इसके पश्चात् विनीतामा होता हुमा स्नान करे और पूर्णतया साब. धान होकर भगवान नारायण के मागे जाप करता हुमा मपनी विधि पूर्वक औवं दैहिकी क्रिया को अर्थात देह के त्याग करने के बाद में होने वाली किया को करे । इस कर्म को जब बारम्भ करे तो बहुत ही विनयशीन रहे और क्रोध तथा लोभ से रहित होकर हे ) ग्राहाणों को छन (छाता), उपानह (पद- भाण) अंगुलीयक (मगूठी), रल, पाय (बरतन), धामन मोर भोजन मादि के द्वारा तृप्त करे मोर ये वित्र संख्या मे तेरह हो चाहिए। प्रत के हितार्थ पन्न के तथा जल के सहित घट देवे । इसके अनन्तर काम्या पा धान देकर प्रेत के घट का निर्वपन करे ॥४४१४५॥४६॥४७॥ नारायण-यह अपने नाम का उच्चारण करे जो कि सपुरस्य हो। इस प्रकार से सम्पूर्ण पमं विधि-विधान पूर्वक करके मक्ष शुभ फल को प्राप्त करे ॥४॥ हे विनिता के पुग! इस प्रकार से उम प्रेत के दास कहने पर हाथी, रथ और मवाद परिपूर्ण सेना वहाँ पर पोधे से मा गई थी ।।४ ।। इसके मनन्तर उस सेना के वही माते ही वह प्रेत महष्ट हो गया था। उस वन से निकल कर वह राजा दक्ष वाहन भी अपने पुर को चला माया था। अपने नगर में पाकर उम राजा ने वह ममस्त निया विपिपूर्वका सम्मान को यो जो राजा को अपने तनाई पो मार देह में प्रभार होने पानी प्रिया विधिपूर्वक को पो ॥५॥११॥ १८-प्रेतच मोचनार्थ घटादि दान मपामनुपम्पायं हि मे मधुसूदन । प्रेतत्वान्मुच्यते येन दानेन मुशतेन वा ॥१ -- [ यो गरुड शृणु दानं प्रवक्ष्यामि सर्वाशुभविनाशनम् ॥२ सन्तप्तहाटकमय घटक विधाय ब्रह्म शकेशवयुत सह लोकप क्षीराज्यपूर्णविवर प्रणिपत्य भक्त्या विप्राय देहि तव दानशत किमन्यं ॥३ किमेतत्कथित देव विस्तरेण वदस्व मे । भूम्या प्रक्षिप्यते कस्मात्पञ्चरत्न कुतो मुखे ॥४ अधस्तादास्तृतदर्भा पादौ याम्या व्यवस्थिती। किमर्थं मण्डल भूम्या गोमयेनोपलिप्यते ॥५ गरुड ने कहा-हे मधुसूदन ! समस्त प्राणियो के हित करने के जिस दान के करने से तथा सुकृत से प्रेतत्व से मुक्ति होती है यह कृपा घतलाइये ॥१॥ भगवान् श्री कृष्ण ने कहा--हे गरुड । मैं अब सब । के विनाश करने याला दान बतलाता हूं उसका तुम श्रवण करो ॥२॥ भाति तपाये हुए सुवर्ण के पट की रचना करा कर लोक पालो के ब्रह्मा--ईश मोर भगवान् केशव से युक्त घट को क्षीर-घृत से भरकर भक्ति-भाव से प्रणाम करके ब्राह्मण को दान करे। यह एक ही बहुर दान है फिर अन्य संकडो दानो का कोई भी प्रयोजन ही नहीं रहता है । गरुड ने पाहा-हे देव ! मापने यह कैसा दान अभी मुझे बतलाया है ? माप विस्तार पूर्वक कहिए । किस लिये भूमि में मौर मुख मे पांच रत्न प्रक्षेप किया जाता है ।। ४ ।। भूमि पर नीचे दर्शों का मास्तरण तथा दिशा में शव के पैरो का व्यवस्थित किया जाना तथा भूमि को गोमय मे है मोर मण्डल की रचना मादि का करना यह सब किस लिये किया जाया है ॥५॥ किमर्थ स्मयंते विष्णुविष्णुसूक्तञ्च पठ्यते । किमर्थ पुत्रपौयाश्च तिष्ठन्ति तस्य चाग्रत ॥६ विमर्थ दीपदान स्यात्किमयं विष्णुपूजनम् । किमर्थमातुरे दान ददाति द्विजपुङ्गवे ॥७ -- पुषोत्पादक फल और मुक्ति के उपाय ] वन्धुमित्राण्यमिवारिण क्षमापयति तत्कथम् । तिला लोह सुवर्णञ्च कास लवण तथा ।।८ सप्तधान्य क्षितिर्गावो दीयन्ते केन हेतुना। कथञ्च म्रियते जन्तुमृते तस्य कुतो गति ॥ अतिवाह शरीरञ्च कथ विश्रमते तदा। सर्वमेतन्मया पृष्टो हि लोकहिताय वै ॥१० उस समय में भगवान विष्णु का स्मरण तथा विष्णुसूक्त का पाठ किस के लिये किया जाता है। उसके मागे सभी पुत्र और पौत्र क्यो स्थित होते हैं ? ॥ ६ ॥ दीपो का दान और विष्णु का पूजन किस के निमित्त नस समय में किया जाता है ? आतुर द्विज पुङ्गव को किस की प्राप्ति के लिये दान दिया जाया करता है ॥७ ।। बन्धु, मित्र और ममित्र सभी किस लिये और क्यो क्षमापन किया करते हैं तिल-लोह-सुवर्ण-कार्पास-लवण-सात धान्य- भूमि-गी इन सबका दान किस लिये उस समय में किया जाता है । यह जतु से मृत होता है और उसके देह को त्याग कर मर जाने पर कैसे गति हुमा करती है ॥८॥६॥ प्रति वाहन किये हुए उस शरीर को उस समय में क्यों विश्राम दिया जाता है ? हे भगवन् । मैंने जो ये सब बातें पापसे पूछी हैं इन सबका उत्तर माप कृपा करके समस्त लोक की भलाई के लिये प्रदान करें ॥१०॥ १६-पुत्रोत्पादन फल और मुक्ति के उपाय साधु पृष्ट त्वया भद्र मानुपाणा हिताय वै । शृणुष्वावहितो भूत्वा सर्वमेवोवं दैहिकम् ॥१ सम्यग्विभेदरहित श्रुतिस्मृतिसमुख तम् । यन्न दृष्ट सुरै सेन्द्र योगिभिर्योगचिन्तकै ॥२ गुह्याद्गुह्यतर वत्स नाख्यात कस्यचित्क्वचित् । भक्तस्त्व हि महाभाग तेन ते कथयाम्यहम् ॥३ अपुनस्य गतिर्नास्ति स्वर्ग नैव च नैव च । येन केनाप्युपायेन कार्य जन्म सुतस्य च ॥४ किम तरह २७६ ] [ धी गाहपुराण तारयेत्रकरकात्पुत्रो यदि मोक्षो न विद्यते। दाहः पुत्रेण कर्तव्यो ह्यग्निदाता च पौत्रकः ।।५ तिलदर्भश्च भूम्यां वैकुण्ठे तत्र मतिर्भवेत् । पञ्चरत्नानि वक्त्रे तु तेन जीवः प्ररोहति ॥६ सुलेप्या गोमयैर्भू मिस्तिलान्दर्भाश्च निक्षिपेत् । तस्यामेवातुरो मुक्त. सर्व दहति दुष्कृतम् ।।७ भगवान् कृपए ने कहा-हे भद्र ! तुमने ये सद व ते बहुत ही ठीक पूछी हैं । इनसे मनुष्यो का बड़ा हित होगा? अब तुम बहुत ही सावधान होकर श्रवण करो। मैं पौवं दैहिक सभी कर्म बलाता हूं ॥१॥ भली भौति विशेष भेदो से रहित और श्रुति तथा स्मृति से समुघृत विपय जिसके इन्द्र के सहित देवी ने तथा योग के चिन्तन करने वाले योगियो ने भी फर्भ नही देखा है । हे वत्स ! यह परम गोपनीय से भी अत्यन्त गोपनीय है । इरे अब तक कभी भी कही किसी को नही बतलाया गया है । हे महाभाग ! तुम मेरे परम भक्त हो इपीलिये प्राज मैं तुमको यह सब बतलाता हूं ॥ २ ॥ ३ । जिसके कोई पुत्र नही होता है उसको स्वर्ग में कोई भी गति किसी भी भाति नही हुमा करती है-यह बिल्कुल पूर्णतया सत्य कयन है। इसलिये जिस किर्स भी उपाय से पुत्र के जन्म होने का उपाय अवश्य ही करना चाहिए ॥४॥ यदि मोक्ष नही होती है तो पुत्र नरक से उद्धार कर दिया करता है। शव क दाह पुत्र को करना चाहिए मोर पोत्र भी पग्नि देने वाला होता है ।।५। भूमि में तिल मोर दों के विकरण करने से उस समय पुण्ठ मे मृतात्मा के बुद्धि हो जाया करती है। पांच रन जो मुख मे डाले जाते है इससे जीव क प्ररोहण होता है ।। ६ ॥ गोमय (गोवर) के द्वारा भली भांति लोपी हुई भू होनी चाहिए फिर उस पर तिल तथा डाभों (कुशा) का निक्षेपण - करे। उस भूमि पर जो साधकर मृत्यु वाला मातुर प्राणी है उसको लिटा देना चाहिए इससे उसके समस्त दुप्यतो का दाह हो जाता है। अर्थात् सब पाप एव तु धर्म बोकि अपने जीवन मे उमने किये हैं दग्ध हो जाया करते हैं ॥७॥ ।
- पुत्रोत्पादन फल और मुक्ति के उपाय । दर्भतूली नयेत्स्वर्ग पातुर तु न राशय । तिलास्तत्र क्षिपेद्वाथ दर्भ पूलिकमध्यत.।। सर्वत्र वसुधा पूता यन लेपो न विद्यते । यत्र लेप. स्थितस्तन पुनर्लेपेन शुध्यति ।। यातुधानाः पिशाचाश्च राक्षसा क्रूरकर्मगा.। अलिप ह्यातुर मुक्त विशन्त्येते वियोनय गा१० नित्यहोम तथा श्राद्ध पादशौच द्विजे 'तथा । मण्डलेन विना भूम्या कृतमप्यकृत भवेत् ।।११ प्रातुरो मुच्यते नवामण्डलेन विना भुवि । ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च पीहुंताशन एव च ॥१२ मण्डले चोपतिष्ठन्ति तस्मात्कुर्वीत मण्डलम् । अन्यथा म्रियते यस्तु वृद्धो बालो युवापि वा ॥१३ योन्यन्तर न गच्छे स क्रीडते वायुना सह । तस्यैव वायुभूतस्य नो श्राद्ध नोदकक्रिया ॥१४ उस पातुर प्राणी को पनि मृत्यु गत जन्तु को वह दर्भ को तूनी स्वर्ग में ले जाया करती है-इसमें रज मात्र भी सशय नहीं है । वहा पर दमों के पुलिकामो के मध्य मै तिलो का भी क्षेषण बरे ॥८॥ नहीं पर कभी लेपन नही हुमा है यह तो सभी भूमि पुद मानी जाती है और जहाँ पर पहिले से भूमि लिपी हुई है वहाँ पर वह पुन. गोमय पे द्वारा लेपन परने मे ही पून एव शुद्ध हुपा करती है ।। ६ ।। मातु ध्यान ( राक्षस )-पिमाय मौर गाम जोकि र समो के वरने वाले हुमा करते हैं ये हिना सिपहुए स्पान पर परे रहन याने पातुर के अन्दर प्रवेश कर जाया परते हैं और ये वियोनि हो जाते हैं ॥१०॥ नित्य होम-श्राद-दिव २ पादी पाच बिमा मरम भूमि में क्यिा हमा भी न पिया हमा अर्षा पपं हो जाया करता है ॥११॥ इमलिये पातुर (मृत्युगत) प्राणी को महल में बिना भूमि में भी नही छोडना माहिए । ब्रह्मा-विष्णु-:-श्री मोर नागन (पि देवना) ये गब मंप में उपस्थित हुमा रते हैं । इमपिये महम पपश्य ही परना क ३७८ ) । श्री गरुडपुराण चाहिए। बिना मंडल के तो जो भी वृद्ध-युवा मोर बालक मर जाता है की अन्यन्तर को नहीं जाता है वही पर वायु के साथ क्रीड़ा करता रहता है। इस प्रकार से उस धायुभूत के लिये न तो कोई श्राद्ध का ही विधान है और म उदक क्रिया ही होती है ॥१२॥१३॥१४॥ मम स्वेदसमुत्पन्नास्तिलास्ताऱ्या पवित्रकाः। असुरा दानवा दैत्या विद्रवन्ति तिल. स्थितः ॥१५ एक एव तिलो दत्तो हेमद्रोणतिलैः समः । तपणे च तथा होमे दत्तो भवति चाक्षयः ॥१६ दर्भा रोमसमुत्पन्नाः तिलाः स्वेदेपु नान्यथा । प्रयोगविधिना ब्रह्मा विश्व वाप्युपजीवनात ॥१७ सव्ययशोपवीतेन ब्रह्माद्यास्तृप्तिमाप्नुयुः । अपसव्येन तृप्यन्ति पितरो देवदेवताः ॥१८ दर्भमूले स्थितो ब्रह्मा दर्भमध्ये नु केशवः । दर्भाग्रे शङ्करं विद्यात्त्रयो देवाः कुशे स्थिताः ।।१६ विप्रा मन्त्राः कुशा वह्निस्तुलसी च खगेश्वर । नेते निर्माल्यता यान्ति भोग्यमाना. पुनः पुन: ॥२० कुशाः पिण्डेपु निर्माल्या ब्राह्मणाः प्रेतभोजने। मन्त्राः शूदपु पतिताश्चितायाञ्च हुताशनः ॥२१ हे तार्य ! ये तिल मेरे देह से समुत्पन्न हुए हैं अतएव ये पवित्र करने वाले होते हैं । इन तिलो के वहाँ पर स्थित रहने से सब असुर-दानव मौर देत्य वहां से भाग जाया करते हैं ।। १५ । एक ही दिया हुमा तिन सुवर्ण के एक द्रोण परिमाण वाले तिलो के समान होता है। तर्पण तथा होम में दिया हुमा निल तो अक्षय हो जाण करता है ॥ १६॥ ये दर्भ गेमों से समुत्पन्न होने वाले हैं । निल स्वेदों में होते हैं—इसमे अन्यथा कुछ भी नहीं है। इनके प्रयोग करने की विधि के द्वारा ब्रह्मा ने विश्व का जीवन किया था ॥ १७ ॥ मध्य यज्ञोपवीत बाला होकर वमं करने से ब्रह्माद्य सब नृति को प्राप्त होते हैं। मपसर यज्ञोपवीत करके तपंग-याद करने से पितृगण और देव देवता . - पुत्रोत्पादन फल पोर मुक्ति के उपाय [ २७६ ! तृमि को प्राप्त होते हैं ।। १८ ॥ दर्भ के मूल मे ब्रह्मा स्थित रहा करते हैं भोर दर्भ के मध्य भाग में भगवान् केशव रहते हैं। दर्भ के मम भाग में शहर रहते हैं । इस भौति कुशा मे तीनो देवनाम्रो की स्थिति समझनी पाहिए ॥ १६ ॥ हे सगेश्वर ! कुगा में एक विशेषता और है और यह यह है कि- दुशा-विप्र-मन्त्र-वह्नि और तुलसी ये सब कभी भी निर्माल्य नहीं होते हैं चाहे इनका बार-बार भी भोग्य क्यो न क्यिा जावे ।। २० ।। पुसा जब पिंटो पर रख दी जाती है तो वह निमाल्य हो जाती है मोद ग्राह्मण प्रत के भोजन से निर्माल्यता को प्राप्त हो जाया करते हैं। शूद्र के अन्दर पड़े हुए मत्र तया चिता में डाली हुई मग्नि भी निर्माल्य हो जाते हैं ॥२१॥ तुलमी ब्राह्मणा गावो विष्णुरेकादशी सग । पञ्चप्रवाहणान्येव भवाब्धी मज्जतां सताम् ॥२२ विष्णुरेकादशी गगातुलसीविप्रधेनवः । असारे,दुर्ग संसारे पट्पदी मुक्तिदायनो ॥२३ तिलाः पविग्रमतुल दर्भाश्चापि तुलम्यपि । निवारयन्ति चतानि दुर्गति प्राप्तमातुरम् ।।२४ हस्ताम्याञ्च घृतदर्भस्तोयेन प्रोक्षयेद्भवम् । मृत्युकाले क्षिपेद्दर्भान्कारयेदातुरम्य च ॥२५ दर्भपु क्षिप्यते योऽसौ दर्भस्तु परिवेष्टिन. । विष्णुलोक स वं याति मन्महीनोऽपि मानवः ॥२६ हे मग । तुमसी-य हाए-गौ-विष्णु पौर एकादशी ये पाप म समार पो ममुद्र हरते हुए मस्य पुरुषों के प्रबहरा (नाम) मा पर है ॥ २२ ॥ भगवान् विष्णु-एमादमी तिथि-गगा-मुमो-वित्र और पनु ये हम मार हीन दुर्गरूप समार मे पट.पो पर्षात नामों का गमुदाय मुक्ति देने वाली होती है ॥ २३ ॥ निर पनुग्म पवित्र हो-हमीप्रसार मेभं पोर तुममो भी काम पवित्र है। ये सब दुति होने कामे आतुर भा गृत प्रारणो को दुर्गनि मे निवारण पर दिया है ॥२४॥ हामो रामों में उस मर मिरा प्रोurm TAL wify। मा
३००
[ घी गरजपुराना
के समय में मातुर के निकट उन दों को शिप्त कर देना चाहिए मा पातुरे
को उन पर डाल देवे ॥ २५ ॥ जो दों पर प्रक्षिप्त कर दिया जाता है और
दों से परिवेष्टित होता है वह मानव मन्मो से होन होकर भी सीमा विष्णु
सोक को जाया करता है ॥२६॥
दर्भतूलीगत प्राणी संस्थितो भूमिपृष्ठतः।
'प्रायश्चित्तविशुद्धोऽसौ ससारे सारसागरे ॥२७
गोमयेनोपलिप्त च दर्भस्यास्तरणे स्थिते ।
तत्र दरोन दानेन सर्व पाप व्यपोहति ॥२८
लवरण सद्दश दिव्य सर्वकामप्नद नृणाम् ।
यस्मादन्नरसाः सर्वे नोत्कटा लवण विना ॥२६
पितृणाञ्च प्रिय भाव्य तस्मात्सर्व प्रदं भवेत्।
विष्णुदेहसमुत्पन्नो यतोऽय लवणो रस ॥३०
एतत्सलवररा दान तेन शसन्ति योगिन.।
ब्राह्मणः क्षपियो गैश्यः स्त्रीणा शूद्रजनस्य च ॥३१
आतुरस्य यदा प्राणान्नयन्ति वसुधातले ।
लवण तु तदा देय द्वारस्योद्घाटन दिव. ॥३२
दर्भो की तूली पर रहने वाला प्राणो जोकि भूम के पृष्ठ भ ग पर
स्थित रहता है वह इस सारो के सागर ससार मे प्रायश्चित्त से पूर्ण तया विशुद्ध
हो जाता है ।। २७ ।। गोमय से लिपे हुए दर्म के मास्तरण पर स्थित होने
पर वही जो भी दान दिया जाता है उससे सम्पूर्ण पापो का ध्यपोह ( नाश)
हो जाता है।॥ २८ ॥ लवण (नमक) के सदृश मनुष्यो का सब कामो के
प्रदान करने पाला अन्य दिव्य रस नहीं है। लवण के 'बिना सब मनो के रस
उस्फट नही हुमा करते हैं ॥ २६॥ यह पितृगण को भी परम प्रिय होन
चाहिए। इसमे यह सर्वप्रद होता है क्योकि यह लवण रस भगवान् विष्णु के
देह से समुत्पन्न होने वाला रस है ॥३०॥ योगी गण लवण के सहित यह
दान परम प्रशस्त कहा करते हैं। ब्राह्मण-क्षत्रिय-न्य-शूद्र जन मातुर
के अब वमुघा तन मे प्राणो को ले जाते हैं उस समय में दिवलोक के द्वार को
उद्याटित करने के लिये लवण देना चाहिए ॥३१॥३२॥
[ ३८१
प्रेत सौम्यकर दान ।
२०-प्रेतसौख्यकर दान
शृणु ताक्ष्य प्रवक्ष्यामि दानानां दानमुत्तमम् ।।
रोन दत्तन प्रीणन्ति भूर्भुवःस्वरिति क्रमात् ॥१
ब्रह्माद्या ऋपयः सर्वे शङ्कराद्यमरास्तथा ।
इन्द्राद्या देवता: सर्वे दानाद्वै प्रीतिमाप्नुयुः॥२
देयमेतन्महादानं प्रेतोद्धरणहेतवे ।
रुद्रलोके चिर वासस्ततो राजा भवेदिह ॥३
रूपवान्सुभगो वाग्मी श्रीमानतुलविक्रमः ।
विहाय यमलोक स. स्वर्ग तायें प्रगच्छति ॥४
तिलाश्च गां क्षिति हेम यो ददाति द्विजोत्तमे ।
तस्य जन्माजितं पाप तत्क्षणादेव नश्यति ॥५
तिला गावो महादान महापातकनाशनम् ।
तद्वय दीयते विप्रे नान्यवर्णे कदाचन ॥६
कल्पित दीयते विप्रे तिला गावश्च मेदिनी।
अन्येषु नैव वर्णपु पोष्यवर्ग कदाचन ॥७
भगवान् श्री कृष्ण ने कहा-हे ताय ! अध में सब दानों में उत्तम
दान बतलाता हूँ तुम उसका श्रवण करो। जिस के देने से भू:-भुव: स्व:--
ये क्रम से प्रसन्न एव सतृप्त होते हैं ॥१॥ ब्रह्मादि सब ऋषिगण-मुरादि
गमस्त प्रमरगण पोर इन्द्र प्रादि सब देवप्ता ये सभी दान से प्रीति को प्राप्त
हमा करते हैं ।। २ ।। प्रेतत्व के उद्धार के लिये यह महा दान अवश्य ही देना
चाहिए। इससे रुद्र लोक में विर कात पर्यन्त निवास होता है और इसके
पक्ष त् संसार में राजा हुमा करता है ॥३॥ हे ताक्ष्यं ! परम का-लावण्य
घाला-मुन्दर माग्य से समन्वित-वामी (घोलन पाला)--श्री सम्पन्न पोर
पतुल विक्रम पाला वह यमलोक का त्याग करके सीधा स्वर्ग को जाता है।
॥४॥ जो किसा' श्रेष्ठ ब्राह्मण को तिल-गो-भूमि-मुषणं दाम
करता है उसके जन्म जन्मान्तर के पट्टे हुए पाप उसी माए में न हो जाया
३८२ ।
[श्री गपुराण
करते हैं ॥५॥ ति पर गौ-ये महादान हो जोकि साधारण ही पाप
नहीं प्रायुत महान पातको रे पापों को नाश कर दिया करते हैं। ये दोनों पदापों
का दान यल प्रारमण को ही देने चाहिए। अन्य दणं वाले यो कमो भो न देवे
॥ ६ ॥ तिल-गो-पियो इनका सगुल्प करके विन को दान बरे। पन्य
वर्ण वालो को सपा अपने पोषण के योग्य किसी वर्ग को कभी भी इन उपयुक्त
वस्तुपो का दान नहीं देवे ||
पोष्यवर्ग तथा स्योपु दान देयमकल्पितम् ।
प्रातुरे चोपरागे तु दान देयमगेपतः ।
पातुरे दीयते दान यावद्द होपतिष्ठति ।
जीवता च पुनर्दत्तमुपतिष्ठत्यसवृतम् ।।
सस्य सत्य पुनः सत्यं तद्दत्त विकलेन्द्रिये ।
यज्ञानुमोदते पुत्र तच्च दानमनन्तकम् ।।१०
प्रतो दद्यात्सुपुत्रेण यावज्जीवत्यसो चिरम् ।
अतिवाहस्तथा प्रेतो भोगांश्च लभते यतः ।।११
अस्वस्थातुरकाले तु देहपाते क्षितिस्थिते ।
देहे तथातिवाहस्य परतःप्रीरानं भवेत् ॥१२
तिल लोह हिरण्यञ्च कार्पास लवण तथा ।
साधान्य क्षितिर्गाव एक पावन स्मृतम् ॥१३
तारयन्ति नर गावस्त्रिविधाच्चैव पातकाद ।
हेमदानात्सुखं स्वर्ग भूमिदानान्नृपो भवेत् ।।
हेमभूमिप्रदानाच्च न पीड़ा नरके भवेत् ।१४
पोप्य वर्ग को और स्त्रियो को जोभी कुछ दान देवे वह कल्पित न करके
ही देना चाहिए । पातुर को और ग्रहण के समय मे तो सभी को पूर्ण दान
देने चाहिए ॥ ८॥ अातुर मे जो दान दिया जावे वह तभी तक देवे जब
क यह देह उपस्थित रहे । जीवित रहते हुए के द्वारा पुनः दिया हुमा असवृत
कर उपस्थित होता है |॥ ६॥ यह सर्वथा सत्य है भोर पूर्णतया सत्य है
क विकलेन्द्रिय को वह दिया हुआ जोकि अनुमोदित किया जाता है अनन्त
प्रेत सौश्यकर दान ] न होता है ।। १० । इसलिये सत्पुत्र के द्वारा जब तक वह जीवित रहा करता है तभी तक दान देना चाहिए जिससे कि प्रतिवाह प्रेत भोगो को प्राप्त करता है ।। ११, अस्वस्थ भोर प्रातुर के समय मे-देह के पात हो जाने पर तथा देह के भूमि पर उतार लेने पर प्रतिषाह का मागे प्रीएन ( संतृति ) होता है ॥ १२ ॥ तिल-लोह-सुवर्ण-काम ( वस्त्र )-सवरण-~-सातों प्रकार के धान्य-भूमि-गो ये सब एक से एक अधिक पावन दान होते हैं। ऐसा कहा गया है ।। १३ ।। गौ तीन प्रकार के पातक से मनुष्य को तार दिया फरती है । हेम (सोना) के दान से स्वग मे सुख प्रास होता है पोर भूमि के दान से नूप होता है । हेम-भूमि के दान देने से नरक में कोई पीड़ा नही होती है ॥१४॥ सर्वेऽपि यमदूताश्च यमरूपातिभीषणाः । रावे ते वरदा यान्ति सप्तधान्येन प्रीरिणताः ॥१५ विष्णोः स्मरणमात्रेण प्राप्यते परमाङ्गतिम् । भूमिस्थं पितर दृष्ट्वा अर्दोन्मीलितलोचनम् ॥१६ तस्मिन्काले सुतो यस्तु सर्वदानानि दापयेत् । स्वस्थानाचलिते श्वासे दान यच्चातुरे ददेत् ॥१७ अश्वमेधो महायज्ञो कला नाहंति पोडशीम् । धर्मात्मा स च पुत्रोऽपि देवताभिः प्रपूज्यते ॥१८ दापयेद्यस्तु दानानि ह्यातुर पितर प्रति । लोहदानञ्च दातव्य भूमियुक्त न पाणिना ॥१६ यम भीम स नाप्नोति न गच्छेत्तस्य वेश्मनि । युठार मुसल दण्डः सङ्गश्च छुरिका तथा ॥२० एतानि यमहस्तेपु निग्रहे पापकर्मणाम् । तस्माल्लोहस्य दान तु भातुरे सतत ददेत् ॥२१ स्पर्म में भी यम के दूत यम के जैसे स्वरूप वाले पोर महान् भीषण होते हैं गिन्नु वे सब सात प्रसार के पान्य सान से परम प्रमान होरर पर : देने वाले हो जाया करते है ।। १५ ।। भगवान विष्णु के स्मरणं मात्र, ३०४ ॥ श्री गरुडपुगण से परम गति की प्राप्ति की जाया करती है । भूमि पर स्थित प्राधी माद मुदी हुई मोर प्राधी खुली हुई आँखों वाले अपने पिता को देखकर उस समय में जो पुत्र उपयुक्त सभी दानो को दिलाता है तथा श्वास के अपने स्थान को छोडकर वहाँ चल देने पर जो उस पातुर की दशा में दान देता है या उस समय किमी प्रातुर ( दुखिया) को दान देता है. उस दान को बराबरी क्या उसकी सोलहवी कला को भी महान् मश्वमेघ यज्ञ भी प्राप्त करने के योग्य नहीं होता है । वह पुत्र भी परम धर्मात्मा है पोर देवो के द्वारा पूजित होता है ।। १६ ॥ १७ ॥ १८ ॥ जो अपने मातुर (मरणासन्न) पिता के प्रति दानो को दिलवाता है लोह का दान भूमि युक्त हाथ से देना चाहिए ॥ १६॥ वह अंति भीम यम को प्राप्त नही होता है और उसके घर मे अर्थात यमपुरी मे भी नहीं जाया करता है । कुठार-मुसल-दण्ड-खग-छुरिका ये सब मायुध यमराज के हाथो में पाप कर्म करने वालो के निग्रह करने के लिये रहा करने है । इसलिये पातुर के प्रति लोह का दान निरन्तर देना चाहिए ॥२०॥२१॥ यमायुधाना सन्तुष्टयं दानमेतदुदीरितम् । गर्भस्था शिशवो ये तु युवान स्थविरास्तथा ॥२२ एभिन्न विशेपैस्तु निर्दहेयु स्वपातकम् । कुरिणा सार्वसूत्रापा शण्डा मस्त्विनुर्वरा ॥ शवला श्यामदूताश्च लोहदानेन प्रीणिता ॥२३ पुना. पात्रास्तथा बन्धुः सगोत्र सुहृद स्त्रिय ददन्ति नातुरे दान ब्रह्मघ्ना सुसमाहितम् ॥२४ पञ्चत्वे भूमियुक्तस्य शृणु तस्य च या गतिः । अतिवाह पुनः प्रेतो वर्षस्य सुकृत लभेत् ॥२५ पादादूर्ध्व कटी यावद् तावद् ब्रह्माधितिष्ठतिः। ग्रीवा यावरि भे शरीरे मनुजस्य तु ॥२६ मस्तके तिष्ठते रुद्रो व्यक्ताव्यक्तो महेश्वर । एकम स्त्रयो सेदा ब्रह्मा विष्णु महेश्वरा ॥२09 अह प्राणिशरीरस्थो भूतग्रामचतुष्टये । पर्माधर्मे मति दद्यात्सुखदु से कृताकृते ॥२८ [ ३८५ प्रेत सौख्यकर दान ] जन्तोर्बुद्धि समास्थाय पूर्वकर्माधिवासिताम् । अहमेव तथा जीवान्प्रेरयामि च कर्मसु ॥२६ स्वर्ग मोक्षश्च नरक यान्ति च प्रारिणनस्तथा। स्वर्ग स्थनरकस्थाना श्राद्धं राप्यायन भवेत् ।। तस्माच्छ्राद्धानि कुर्वीत विविधानि विचक्षणः ॥३० यमराज के मायुधो की सन्तुष्टि के लिये यह दान बताया गया है । गर्भ में स्थित रहने वाले बच्चे-शिशु-युषा तथा वृद्ध इनके द्वारा विशेप दानो से अपने पातको का निर्दहन करना चाहिए । कुरिणा-सार्व सूत्राप- शएड-मक-अनुवंर-शवल और श्याम दून लोह के दान से परम प्रसन्न होते हैं ॥ २२ । २३ ॥ पुत्र-पौत्र-बन्धु-सगोय-सुहृद मौर स्त्रियां जो भी इनमे से पातुर के लिये धन नही दिया करते है वे ब्रह्मघ्न होते है। यह दान भी सुक्षमाहित होना चाहिए अर्थात् विधिवत् सावधानी से दिये जाये ॥ २४ ॥ पञ्चत्व प्राप्त होने पर अर्थात् मर जाने पर उस भूमि से युक्त की जो गनि होती है उसका श्रवण करो वह प्रतिवाह प्रेत एक वर्ष के सुकृत को प्राप्त किया करता है ॥ २५ ॥गे से ऊपर कटि पर्यन्त ब्रह्मा अधिष्ठित रहते हैं । से ऊपर ग्रीवा तक मर्थात् नाभि से लेकर गरदन पर्यन्त मनुष्य के शरीर में हरि प्रतिष्ठित रहा करते हैं ॥ २६ ॥ व्यक्त भोर प्रध्यक्त महेश्वर रुद्र मस्तक मे स्थित रहते हैं। सिद्धान्तत इन तीनो की प्रतिमाएं ही पृपक २ हैं वैसे ये तीनो ही एक है । तीन मूत्तियो के स्वरूप में जब ये अलग र होते है तो ब्रह्मा- विष्णु भौर महेश्वर ये इनके तीन नाम हो जाते हैं ॥ २७ ॥ मैं प्राणियो के पारीर स्थित रहता हूँ । भून माग चतुण्य में अर्थात् चार प्रकार के भूनी फे समुदाय में मैं धर्म-प्रथम में-सुख-दुम में पोर मृत-अकृत मे मति देनr हूँ॥ २८ ।। पूर्व कर्मों के द्वारा मधियामित जन्तु की युति को समास्थित करके मैं ही स्वय कमों के करने में उस भानि मे जीवो को प्रेरणा दिया परता है ॥ २६ ॥ इमसे प्राणी वर्ग फिर स्वर्ग-मोक्ष मोर नरक में प्राप्त हुपा बरते हैं । जो स्वर्ग में स्थित रहते हैं अथवा नरको में वेदना सहन पिया परते हैं उन सबको श्रादो के द्वारा सन्तृप्ति हुमा करतो है । प्रतएव विषमण पुरुप को विविध माति के शास्त्रोक्त याद अवश्य ही करने चाहिए ॥३०॥ कमर
३८६ )
। श्री गरुडपुरार
मत्स्य कूर्मो वराहश्च नरमिहोऽथ वामन ।
रामो रामश्च कृष्णश्च बुद्ध कल्किस्तथैव च ॥३१
एतानि दश नामानि स्मर्तव्यानि सदा बुध ।
स्गच व स वै याति च्युत स्वर्गाच्च मानव ॥३२
लब्ध्या मुखञ्च वित्तञ्च दयादाक्षिण्यसयुत ।
पुषीनसमायुक्तो जोवेत् स शरदा शतम् ॥३३
पातुर च ददेन्न्यास विरगुपूजाञ्च कारयेत् ।
अष्टाक्षर महामन्न जपेद्वा द्वादशाक्षरम् ॥३४
पूजयेच्छुकलपुष्पैश्च नैवेद्य घृतपाचित ।
तथा गन्धश्च धूपैश्च श्रुतिसूक्त रनेकश ।।३५
विष्णुर्माता पिता विष्णुविष्णु स्वजनवान्धवा ।
यन विष्णु न पश्यामि तत्र मे कि प्रयोजनम् ॥३६
जले विगु स्थले विप्णुविष्णु पवतमस्तके ।
ज्वालामालाकुले विष्णु सव विष्णुमय जगत् ।।३७
वयमापो वय पृथ्वी वय दर्भा वय तिला ।
'वय गावो क्य राजा वय वायुवय प्रजा ॥३८
मत्स्य-कूर्म-वराह -नरसिंह-वामन-राम-श्रीराम-कृष्ण-बुद्ध और
कल्कि ये दशावतागे के दश नामो का बुधो का सदा स्मरण करना चाहिए।
वह मानव स्वग से च्युत होता हुमा भी पुन स्वग को ही जाया करता है।
॥ ३१ । ३२ ॥ यह पुरुष सुख भौर सम्पत्ति को प्राप्त कर के दया एप दाक्षिण्य
युक्त होता हुभा पुत्र एव पौत्र मादि स समवित होकर सो वप की पूण
मायु का भोग करके जीवित रहा करता है ।। ३३ ॥ मातुर म ग्यास वे भोर
श्री विष्णु का पूजन करावे । मष्टाक्षर मात्र अथवा द्वादशाक्षर म ( आ नमो
भगवत वामुदवाय ) का जाप करे ।। ३४ ॥ घृत मे परिपात्रित नैवेद्यो के द्वारा
मोर गुक्ल वरण के सुचित पुष्पा में-गय-पूर गौर भनेक शुरयुक्त सूक्तो के
द्वारा पूधनाचन करना पाहिए ॥ ३५ ॥ विरगु भगवान् ही माता है और
विरगुही पिता है तथा स्वजन एव वा पद भी विष्णु ही हैं। जहाँ पर विष्णु
पंत मौख्यकर दान ३८७ -- का दर्शन में नही करता हूं वहां मेरा कुछ भी प्रयोजन नहीं है ।। ३६ ॥ जल मै-स्थान मे-पर्वतो की चोटियो मे-ज्वाला माला कुल मे सर्वत्र भगवान् विष्णु विद्यमान हैं और यह ममस्त जगद ही पूर्ण विष्णुमय है अर्थात् विष्णु के हो स्वरूप वाला है । हमही जल-पृथ्वी-दर्भ-तिल-गो-राजा-वायु पोर प्रजा हैं अर्थात् ये विभिन्न स्वरूप में हम ही विद्यमान हैं ॥३७॥३८॥ वयं हेम वयं धात्य वयं मधु वयं घृतम् । वय विप्रा वयं देवा वयञ्च व स्वर्भूभुवः ॥३६ अहं दाता अहं ग्राही अहं याजी अह कनुः । अहं कर्ता यह हा अह धर्मो अहंगुरुः ॥४० धर्माधर्मे मतिं दद्यां कर्मभिस्तु शुभाशुभैः । यत्कर्म कुरुते क्वापि पूर्वजन्माजितं खग ॥४१ धर्मे चिन्तामहं कर्ता ह्यधर्मे यम एव च । यतीनां कुरुते सोऽपि धर्मे मुक्ति ददाम्यहम् ॥४२ मनुजानां हितं तार्य अन्ते वैतरणी नदी। तया निहत्य पापौघ विष्णुलोक स गच्छति ।।४३ यह सुन के स्वरूप में भी हम है-धान्य-मघु-पुत-विप्र-देवगण पोर भू-भुवः-पौर स्व. -- यह सव भी हम ही हैं। अर्थात् इन विभिन्न स्वरूपों में स्थित होकर हम ही दिसलाई दिया करते हैं। दान देने वाला- दानो का ग्रहण करने वाला-यमो का यजन पर्ता-यश-पर्सा-हा--- धर्म मौर गुरु ये सभी मैं ही हूँ। इस सब कुछ कयन का तात्पर्य यही है कि इस जगत् में जो भी कुछ जिम हप में स्थित है वह मभी मेरा हो स्वरूप है ॥ ३६॥ ४० ॥ हे राग ! जीवों के शुभ पोर पशुभ कर्मों के मनुमार में ही पमं पोर प्रथमं मे बुद्धि को प्रेरित पिया करता है। जो भी कोई बुध धर्म लिया करता है वह पपो पूर्व जन्म में जो अग्नि करता है उसी में अनुमार परवा है । पमं में मैं चिनासा रना है और प्रधर्म में यमरा वरना है। पर भी पतियो का करता है। में धर्म में मुक्ति देता ॥४१॥४२॥ है -
३८८ ]
[ श्री गरुडपुराण
साक्ष्य ! प्रल में मनुष्यो का हित वनरणी नहीं है। उमरे द्वारापापों का
निहन न करफे वह विष्णु लोक को प्राप्त हुआ करता है ॥४३॥
वालत्वे यच्च कौमारे वयः परिगतो तथा ।
पूर्वावस्थाकृत यध्व यच्च जन्मान्तरेष्वपि ॥४४
यनिशाया तथा प्रातयन्मध्याह्नपराल्योः ।
सध्ययोर्यत्कृत पापं कर्मणा मनसा गिरा ॥४५
दत्त्वा वर सकृदपि कपिला सर्वकामिकाम् ।
उद्धरेदन्तकाले सा ह्यात्मान पापसन्चयात् ॥४६
गावो ममाग्रत. सन्तु गावो मे मन्तु पृष्ठन. ।
गावो मे हृदये नित्य गवां मध्ये वसाम्यहम् ।।४७
या लक्ष्मी. सर्वभूताना या च देवे व्यवस्थिता।
धेनुरूपेण सा देवी मम पाप व्यपोहतु ॥४८
बाल भाव में जो कुछ किया है तथा कौमारावस्था मे और अवस्था
के परिपाक होने की दशा में प्रति वृद्धावस्था में जो कुछ किया है। पूर्व
अवस्था मे मोर अन्य पहिले जन्म जन्मान्तरों में जो भी कुछ किया है। रात्रि
में-प्रात.काल मे-मध्याह्न और अपराह्न में जो भी कुछ किया है तथा दोनो
मन्धि कालो में जो भी कुछ मन-वाणी पोर वर्षों के द्वारा किया है इन सभी
प्रकार के पापो के सञ्चय से मनुष्य उद्धार की प्रमि कर लेता है यदि उसने
मन्तकाल में परम श्रेष्ठ ममस्त कामनाप्रो यो पूर्ति करने वानी कपिना गो का
दान कर दिया है। वह अपनी प्रात्मा का सब पाप-कर्मों में उद्धार कर लिया
करता है । वही गो वतरणो से उद्धार कर देती है ॥ ४४ ।। ४५ ।।१४६ ।।
गौऐ मेरे मागे रहा करती हैं भोर गौऐ हो मेरे पीठ पीछे होवें। गोऐ मेरे
सदा हृदय में नित्य ही निवास करती है और मैं गोपो के हो मध्य में निवास
करता हूँ। जो लक्ष्मी समस्त प्राणियो को है पोर जो देव मे व्यवस्थित है
धही धेनुरूप मे देवो मेरे सम्पूर्ण पापो का ध्यपोहन करे । इस प्रकार से गो के
दान के समय मे चिन्तन करना चाहिए ! ऐमा करने से परम श्रेय होता है।
॥४७॥
[ ३८६
शारिरिक स्थान निर्णय और चतुर्विध शरीर ]
२१-शारीरिक स्यान निर्णय और चतुर्विध शरीर
ये नरा पापसयुक्तास्ते गच्छन्ति यमालयम् ।
अन्तकाले च गौर्दत्ता हनन्तफलदा भवेत् ।।१
पादक्रमप्रमाणाब्द स्वर्गे वसति भूमिदः ।
अश्वारूढाश्च ते यान्ति ददते ये ह्य पानही ॥२
अत्यातपथमयुता दह्यन्ते यन मानवा ।
छत्रदानेन व प्रेता विचरन्ति यथासुखम् ॥३
तमुद्दिश्य ददेदन्न तेन चाप्यायितो भवेत् ।
अन्धकारे महाघोरे प्रमूर्ते लक्ष्यवजिते ।।
उद्यातेनैव ते यान्ति दीपदानेन मानवा ॥४
आश्विने कात्तिके मासि माधे मासि मृताश्च ये।
चतुर्दश्याञ्च दीयेत दीपदान सुखाय वै ॥५
प्रत्यहञ्च प्रदातव्य मार्गेपु विपमे नरै ।
यावत्सवत्सर वापि प्रेतस्य सुखलिप्सया ॥६
कुले मार्गे च शुद्धात्मा प्रकाशत्वञ्च गच्छति ।
ज्योतिपामपि पूज्योऽमो दीपदानरतो नर ७
श्री भगवान ने कहा-जो मनुष्य पाप कर्मों स युक्त हुआ करते हैं वे
यमालय को जाते हैं । प्रनाल मे दान की हुई गो अनन्न फल प्रदान करने
वाली होती है ।। १ ।। भूमि के दान करने वाला पुरुष पैरो के क्रम के प्रमाण
वाले वर्षों तक स्वर्ग में निवाम किया करता है । जो उपानहो का दान करते
हैं वे जन्तु अश्व पर प्ररूढ होते हुए परलोक म जाया करते हैं ॥ २ ॥ जिम
मार्ग म भत्यन्त उप पातय से मानव दाह को प्राप्त किण करते हैं और प्रम से
भति भ्रान्त हो जाते हैं उमम सुत्र के दान वरन सप्रेन गण सुखपूवर विचरण
किया करते हैं ॥३॥ उरादरा उद्देश्य करवे अन्न का दान करना चाहिए
उसमे प्रेत माघामित (सन्तृप्त) होता है। दीपो के दान करने से मनुष्य उम
महान् घोर लक्ष्य से हीन प्रमूर्त अन्धकार में प्रकाश से युक्त होकर यात्रा दिया
३६० ] [ श्री गरुडपुराण करते हैं ॥ ४ ॥ जो माश्चिन--कात्तिक मोर माघ मारा मे मृत्युगत होते है। उन सुख प्राप्त करने के लिये चतुदश) + नि म दीप दान करना चाहिए ।। 4 ।। विषम में मनुष्यो व द्वारा गार्गों में प्रातदिन प्रेत क सुत की नाह से जब तक यप पूगा हा दीप दान करना चाहि, ।। ६ ।। कुल मे और मार्ग में जो शुद्ध पात्मा वाला होता है, जो मनुष्य दापो के दान में रति रखने वाला है वह ज्योतियो में भी परम पूज्य हुपा करता है ॥७॥ प्रामुखोदड्मुखो दीपो देवागारे द्विजालये । यो ददाति मृतस्येह जीवन्नप्यात्महेतवे ॥ स गच्छति महामार्गे सर्वक्लेशविजित १८ प्रासन भाजन भोज्य दीयते च द्विजातये । सुखेन भुञ्जमानस्तु सुख गच्छति वै पथि ॥ कमण्डलुप्रदानेन तृपित पिवते जलम् । भाजन चान्नदानञ्च कुसुम चागुलीयकम् ॥१० एकादशाहे दातव्य प्रेतो याति पराङ्गतिम् । त्रयोदशपदानीत्थ प्रेतस्य शुभमिच्छता ।।११ दातव्यानि यथाशक्ति प्रेतोऽमौ प्रोणितो भवेत् । भाजनानि पदञ्च व कुम्भांश्च व योदश ।।१२ मुद्रिका वस्त्रयुग्मञ्च तथा छत्रमुपानही । एतावन्त पदार्था हि प्रेतोद्देशेन दापयेत् ॥१३ वृपोत्सर्गे कृते तार्य प्रेतो याति पराङ्गतिम् । योऽश्व रथ गज वापि वाहाणे यदि दापयेत् ।।१४ स्वमहिन्मोऽनुसारेण तत्तत्सुखमवाप्नुयात् । नानालोकाविचरति महिपी यो ददाति च ॥१५ इस लोक में जो कोई मनुष्य पूर्व की ओर मुख वाला या उत्तर की घोर मुख वाला दीप किसी दवालय में या द्विजालय में दिया करता है चाहे फटा, उदरपणे, पारिता रहा हुए भा है। पल्याण के लिय है। वह महामार्ग को यात्रा में सब प्रकार के क्लेशो से रहित होता हुमा यात्रा शारीरिक स्थान निर्णय और चतुर्विध शरीर ] । ३६१ दिये जाते हैं। किया करता है ॥ ८ ॥ प्रामन--भोजन-भाजन द्विजाति के लिये दानो में इसका परिणाम यह मोता है। कि सुख से खाता हुमा मार्ग में जाया करता है ॥ ६ ॥ कमराउलु के दान करने से तृपित होकर जल पीया करता है । भाजन ( पात्र ) और अन्न का दान-कुसूम तथा अंगूठी का दाग ग्यारहवे दिन मे करना चाहिए। इससे प्रेत परम गति को प्राप्त किया करता है। तेरह पद इस प्रकार रो प्रेत के वल्पना की इच्छा से देने चाहिए और इन पदों को अपनी शक्ति के अनुसार ठीक विधि से देवे । इनक देने से प्रेत परम प्रसन्न होता है । भाजन-पद और तेरह कुम्भ मुद्रिका-दो वस्त्र-छत्र-उपानह (पदनाण) य इतने पदाथ है जो कि प्रेत के उद्देश्य से दिलाने चाहिए ।। १० ।। ११ ॥ १२ ॥ १३ ॥ हे त य । वृपा रसर्ग पे करने पर प्रेत परम गति को प्राप्त होता है जो अश्व--रथ अथवा गज ब्राह्मण को दान मे देता है वह अपनी महिमा के अनुरूप उस उमी सुख की प्राप्ति किया करता है । जो महिपी को देता है वह नाना लोको मे विचरण क्यिा करता है ॥१४॥१५॥ यमवाहस्य जननी महिपी सुगतिप्रदा। ताम्बूल पुष्पदानेन याम्याना प्रीतिवद्धनम् ॥१६ तेन सप्रीणिता सर्वे तस्मिन्वलेश न कुर्वते। गोभूतिलहिरण्यादिदानानि निजशक्तितः ॥१७ मृतोद्देशेन यो दद्याज्जलपात्रञ्च गृण्मयम् । उदपानसहस्रस्य फलमाप्नोति मानव ॥१८ यमदूता महारौद्रा कराला कृष्णपिङ्गला । न भीपयन्ति त ताय वस्त्रदाने कृते राति ॥१६ मार्ग वै गम्यमानस्तु तृपात्तं श्रमपीटित । घटान्न दानयागेन सुखी भवति निश्चितम् ॥२० शय्यातूलोपट्टयुता दद्याद्देवद्विजातये । तया प्रेतत्वमुक्तोऽसौ मोदते सह दैवतै ॥२१ ३६२ ] श्री गरुडपुराण यमराज के वाहन ( महिप ) भैसा की महिषी (भैस ) माता होती है मतएव वह सुगति के प्रदान करने वाली होती है । ताम्बूल और पुप्पो के दान से यमल क के यात्रियो के सुख की वृद्धि होती है तथा वे परम प्रसन्न हुपा करते हैं ॥ १६ ॥ इससे वे सभी प्रोशित अर्थात् प्रसन्न होकर उस मार्ग में कोई भी क्लेश प्राप्त नही किया करते हैं । गो-भूमि-तिल-सुवर्ण प्रादि के दान अपनी पूर्ण शक्ति से मृतक के उद्देश्य से दिया करता है और मिट्टी का सुन्दर पात्र जल से पूर्ण करके दान किया करता है वह एक सहस जल के पात्रो के फल को प्राप्त किया करता है ॥ १७ ॥ १०॥ यमराज के दूत महान् रौद्र मर्यात् भयानक स्वरूप वाले होते हैं-कगल मोर कृष्णा एव पिङ्गल वर्ण वाले हुमा करते हैं । हे ताक्ष्यं । बस्त्रो के दान करने पर वे महान् भीषण यम के दूत उसको नही डराया करते हैं ।। १६ ॥ उस यम पुरी के महान् विशाल माग में गम्यमान (जाता हुमा) प्यास से दुखिन मोर श्रम से पीडित होता है उसके लिये जो घट और भन्न का दान किया जाता है उससे वह निश्चित रूप से सुखी होता है ।। २० ॥ तूली भोर पट्ट से युक्त शय्या देव द्विजाति के लिये दान में देनी चाहिए उससे यह प्रेलरव की योनि से मुक्त होकर देवो के साथ भानन्द का लाभ किया करता है ॥२१॥ एतत्त कथित ताय दानमन्त्येष्टिवर्मजम् । अधुना कयिप्येऽह देहे मृत्युप्रवेशनम् ॥२२ जातस्य मत्यलोकेऽस्मिन्प्राणिनो मरण ५ वम् । पूर्वकाले मृताना तु प्राणिनाञ्च रागेश्वर ॥२३ सूक्ष्मो भूत्वा त्वसौ वायुनिर्गच्छत्यस्य तद्गलात् । नवद्वार रोमभिश्च जाताना तालुरन्नात् ॥२४ पापिष्ठानामपानेन जीवो निनामनि ध्रुवम् । पुणप पतते पश्चाग्निगं ते मरुदीश्वरे ॥२५ यालाहत पतत्येव निराधारो यथा द्रम । पृथिव्या लीयते पृथ्वी आपश्चच तथाप्मु च ।।२६ शारीरिक स्थान निर्णय मोर चतुर्विध शरीर ] [ ३६५ तेजस्तेजसि लीयेत समीरे च समोरणः । अाकाशे च तथाकाग सर्वव्यापी तु शङ्करे ।।२७ तर कामादय. पञ्च काये पञ्चेन्द्रियाणि च । एते तार्य समाख्याता देहे तिष्ठन्ति तस्कराः ।।२८ है ताक्ष्यं ! यह तुम्हारे सामने अन्त्येष्टि कर्म में उत्पन्न दान का वर्णन पद कर दिया है । अब इसके मनन्तर देह मे मृत्यु के प्रवेश को घतलाता है। ।। २२ ।। यह अटल सिद्धान्त है कि जो मनुष्य लोक मे उत्पन्न हुआ है उसकी मौत निश्चित स्प से होती है । हे खगेश्वर ! पूर्व काल में मृत प्राणियो का यह चायु मूक्ष्म होकर उसके करठ से निकल जाया करता है। जिन्होंने जन्म ग्रहण किया है उनके प्राण वायु निकलने के अन्य भी मार्ग है। इस देह में नो द्वार हैं-रोम और तालु रन्ध्र है-इनसे भी प्राण प्रयास किया परते हैं ॥२३॥ ॥ २४ ॥ जो पापी होते हैं प्रौर घोर पाप कमी के करने वाले है उन जीव पपान मार्ग से निश्चय ही निकलता है। इम वायु के स्वामी अर्थात् प्राण के निपल जाने पर पोछे यह कुणय (मृत देह-गव) पडा रहा करता है ।। २५ ।। काल से पाहत होकर अर्थात् काल का कलित होता हा यह मृत देह बिना माधार धाले वृक्ष की भांति गिर जाता है। इस पांच भौतिर पारीर का पृथिवी तस्व का भाग तो इस पृथ्वी में लीन हो जाता है-जन का भाग जापर जल मे लय होता है। तेज-तेज मे-पायु-वायु में और भाषाश-मापारा में लीन हो जाता है। सर्व व्यापी पकर में लीन होता है ॥ २६ ॥ २७ ॥ इम परीर में कामादि पांच और पांच इन्द्रियो । हे वाद ! ये इस देह मे तस्फर बताये गये हैं ॥२८॥ कामक्रोधौ पहझारो मनस्तव नायकः । सहारपश्च कालोमो पुण्यपापेन सयुतः ॥२६ जगतश्च स्वरपञ्च निमित स्वेन फमंगा। गच्छेद्देहं पुनः सोऽपि मुकृतंदुतगुंतम् ॥३० पन्चेन्द्रियगमायुक्त मवलंविषय: मह । प्रविवेश नये गेहे गृहे दग्धे यया गृही ॥३१ [ श्री गरुडपुराण शरीरे ये समासोना सम्भवे सर्वधातवः । भूत्र पुरीप तद्योगाये चान्ये धातवस्तथा ॥३२ पित्त श्लेष्मा तथा मज्ज्जा मास मेदस्तथैव च । अस्थि शुनश्च स्नायुश्च देहेन मह दह्यते ॥३३ एतेपा कथिता ताक्ष्य सस्थिति सर्वदेहिनाम् । क्थयामि पुनस्तेषा शरीरञ्च यथा भवेत् ॥३४ एकस्तम्भस्नायुबद्ध स्थूणाद्वयविभूपितम् । इन्द्रियश्च समायुक्त नवद्वार शरीरकम् ॥३५ राम-क्रोध और अहङ्कार उनमे यह मन इन सबका नायक (मुखिया) होता है । यह काल सबका महारक होता है जो पुण्य और पाप से मयुत होता है ।। २६ ॥ इस सम्पूर्ण जगत् का स्वरूप अपने ही कर्म के द्वारा निर्मित हुमा है । इसके पश्चात् यह जीवात्मा इस शरीर को त्याग कर पुन यह सुकृत सया दुष्कृतो युक्त भन्य देह को प्राप्त किया करता है ॥ ३० ॥ जिस तरह कोई गृती पपने पहिले घर के जल जाने पर तथा अग्नि से दग्ध हो जाने पर रहने के लिये किसी नवीन घर में प्रवेश किया करता है वैसे ही समस्त विपयो के सहित पांचो इन्द्रियो से युक्त यह जीवात्मा भी नूतन देह मे प्रवेश किया करता है ॥ ३१ ।। ममुत्पन्न शरीर म समस्त धातुएं समास्थित रहा करती हैं--मूत्र और मल भी रहता है तथा उसके योग से मय जो पातु हैं वे भी रहा करती हैं ।। ३२ ॥ पित्त-श्लेष्मा (क्फ)-मज्जा-मास-मेद-अस्थि-शुक्र पोर स्नायु ये सभी इस देह के साथ ही दग्ध हो जाया करते हैं । ३३ ।। हे ताक्ष्य । इन राब देह पारियों की ऐसी ही सस्थिति हुप्रा करती है जो कि तुमको सब बतलादी है। अब मैं तुमको यह बतलाता हूं कि इनको शरीर कसे प्राप्त होता है ।। ३४ ॥ एक स्तम्भ वाला जो कि स्नायुमो के जाल से भली भांति सबद्ध हो रहा है और स्थूणाद्वय से अलत है । यह शारीर सबद्रियो से युक्त मोर नो द्वारों वाला होता है ।। ३५।। विपर्यश्च समाकान्त कामनोधसमाकुलम् । रागद्वपसमावीर्ण तृष्णादुर्ग तिसयुतम् ॥३६ शारीरिक स्थान निर्णय और चतुर्विध शरीर ] लोभजालपरिच्छिन्नं मोहवस्त्रेण वेष्टितम् । सुबद्ध मायया चैव चेतनाधिष्ठित पुरम् ॥३७ पाटकौशिकसमुत्पन्न पुर पुरुषसभितम् । एतद्गुणसभायुक्त शरीर सर्वदेहिनाम् ॥३८ तिष्ठन्ति देवताः सर्वा भुवनानि चतुर्दश । प्रात्मान ये न जानन्ति ते नराः पशवः स्मृताः ॥३६ एवमेव समाख्यात शरीर ते चतुर्विधम् । चतुरशीतिलक्षारिण निर्मितानि मया पुरा ।।४० स्वेदजा उद्भिज्जाश्चैव अण्डजाश्च जरायुजाः । एतत्ते सवमाख्यात यत्पृष्टोऽह त्वयानध ॥४१ यह मानव का शरीर विभिन्न विपयो से समाक्रान्त और काम-कोष मादि से घिरा हुपा होता है अर्थात् इसमे काम तथा क्रोध पूर्णतया भरे रहा करते हैं । इस शरीर में किसी के प्रति राग और किसी के पति द्वेष भरा रहा करता है । इस शरीर में एक तृष्णा अर्थात विषयो के भोगो की पिपासा ऐसी भरी हुई रहा करती है कि उसकी दुगति से यह समन्वित रहता है ॥३६॥ इस मानव के शरीर में लोभ का बहुत विशाल जाल बिछा हुमा है जिससे रह परिच्छिन्न रहता है तथा मोह रूपी वस्त्र से यह ढका लिपटा रहा करता है। ससार की वस्तुप्रो में अपने पन का मिथ्या ज्ञान इसे लपेटे हुए रहता है । इसो को मोह कहते हैं । यह शरीर माया से अर्थात् " में मेरा-तू तेरा"- इस प्रकार के प्रपञ्च से अच्छी तरह बँधा हुमा है। यह शरीर रूपी नगर एक चेतन तत्व के द्वारा अधिष्ठिन होता है ॥ ३७ ।। पाट कौशिक समुत्पन्न अर्थात् छ कुशाम्रो से उत्पन्न होने वाला यह पुर पुरुष के सश्रय से है । इस प्रकार के गुणगरण से समायुक्त शरीर सभी देह धारियो का हुमा करता है । समस्त देवता स्थित हैं और चौदह भुवन हैं । जो मनुष्य अपनी मात्मा के स्वरूप को नहीं जानते हैं वे निरे पशु ही कहे गये हैं ।। ३८ ।। ३६ ।' इसी प्रकार से पार प्रकार के शरीरो का वर्णन तुमको बता दिया है। ये चौरासी लाख शरीर होते हैं जिनका निर्माण मैंन पहिले ही कर दिया है ।।४।। युक्त होता
[ श्री गरष्ठपुगण
चार प्रकार के शरीरो में स्वेदज होते हैं जो पसीने से ही उत्पन्न हण करहे
हैं। नदिज्ज होते हैं जो जमीन का भेदन करपे वृक्षादि जड जीव पैदा होते
हैं । स्वेदजो में जूमा मादि भाते हैं । सीसरे प्रणुज होते हैं जो अण्डे के रूप
में उत्पन्न होकर फिर उनमे से शरीर प्राप्त किया करते हैं जैसे पक्षी आदि हैं।
चतुर्ष प्रकार के शरीर जरायुज होते हैं जो जेर में लिपटे हुए माता के
उपर से उत्पन्न होते हैं जेरो मनुप्य आदि हैं। है प्रनय ! तुम्हारे सामने यह
सभी बतला दिया है जो कि तुमने मुझसे पूछा था ॥४१॥
२२-देहनिर्णय और उत्पत्ति
बाथमुत्पद्यते जन्नुभूतग्रामचतुष्टये ।
त्वचा रक्त तथा मांस मेदो मज्जास्थि जीवितम् ॥१
पारिगपादौ तथा जिह्वा गुह्य केशा नखास्तथा ।
सन्धिमार्गाश्च बहुगो रेखानानाविधा तथा ॥२
कामक्रोधौ भय लज्जा भनो हर्पः सुखासुखम् ।
चित्रित छिद्रितं वापि वसाजालेन'वेष्टितम् ॥३
इन्द्रजालमह मन्ये संसारेऽसारसागरे ।
कर्ता कोऽत्र महाबाहो सर्व वद मम प्रभो ॥४
कथयामि पर गुह्य कालोद्धारविनिर्णयम् ।
येन विज्ञातमात्रेण सर्वज्ञत्व प्रजायते ॥५
साधु पृष्ट त्वया लोके यदिद जीवकारणम् ।
वैनतेय शृणुष्व त्वमेकाग्रकृतमानसः ।।६
ऋतुकाले तु नारीणा त्यजेद्दिनचतुष्टयम् ।
तिष्ठत्यस्मिन्ब्रह्महत्या पुराकृतसमुद्भवा ॥७
गरुड़ ने कहा-हे भगवन् । इस भूत समुदाय के चतुष्टय में यह जन्तु
कैसे समुत्पन्न हुआ करता है ? त्वचा-रक्त-मास-मेद---मज्जा-अस्थि मौर
जीवित-हाथ-पर-जिह्वा-गुह्य-केश-नख-जोडो के मार्ग तथा अनेक
प्रकार की रेखाएं -काम-क्रोष-भय-लज्जा-मन-हर्ष-सुख-दुख
यह सब चित्रित तथा छिद्रित है और वमा के जाल से वेष्टित है ॥ १ ॥२॥
देह नाप और उत्सति । . ॥७॥ । ३ ॥ इस सार शूर सपार के सागर में मैं तो शोरको रचना को एक दिपाल (जदू) जैना ही मानता हूं। हे प्रभो । ह महान् वाहुयो वाले । इम शरीर के निर्माण करने वाला कौन है-यह सब भार बतलाने को कृपा करे ॥४ श्री भगवान ने कहा- मैं तुमको काल के उसार का विनिर्णय कहता हूं जोकि परम गोपनीय है । इसके ज्ञान प्राा कर लेन मात्र से ही मनुष्य को सर्वशत्व हो जाया करता है । मर्यान् इसके जानने से फिर वह सभी कुछ का नाता हो जाता है।॥ ५॥ हे गरुड | तुमने यह बहुत ही पन्छा प्रश्न किया है कि लोक में यह जो जीव का कारण है । हे वैनतेय । अब तुम एकाग्र मन वाने होकर इसका श्रवण करो ॥ ६ ॥ नारियो को जब माप म ऋतुकार हो सो चार दिन प्रारम्भ के त्याग देने चाहिए। इन चार दिनो म नाग्यिो पर पहिले उत्पन्न की हुई ब्रह्म हत्या स्थित रहा करती वैधा शमात्ममुत्साय्य चतुर्थोशेन दत्तवान् । तावन्नालोक्यते वक्त्र यावत्पापञ्चतिष्ठति ॥ प्रयमेहनि चाण्डाली द्वितीये ब्रह्मघातिनी। तृतीये रजको प्रोक्ता चतुर्थेऽहनि शुध्यति । सप्ताहास्पितृदेवाना भवेद्याग्या व्रतार्चने । सप्ताहमध्ये यो गर्भस्तत्सम्भूतिमलिम्नुचा ॥१० मासु पुत्रा जायन्ते स्त्रियोऽयुग्मासु रात्रिषु। सप्तकमुत्सृज्य ततो युग्मेषु सविशेत् ॥११ डिभर्तु निशा स्त्रोणा सामान्यात्समुदाहता । का चतुदरामी रात्रिर्गर्भस्तिष्ठति तत्र चेत् ॥१२ गभाग्यनिधिस्तन पुनो जायेत धार्मिक । मा निशा तत्र सामान्यन लम्येत कदाचन ॥१३ मापस सम्मकाया गर्भातराहमान । पञ्चमेऽहनि नारीणा गोल्ममाधुय्य भोजनम् ॥१४ विना मर्थात् बल्ला ने इन्द्र से इम ब्रह्म हत्या को हटा कर इमा च यो को दे दिया था। इसीनिये तब तक इन नारियों का तु!
२६८ । प्रा गरुडपुराण 1 में मुख भी नहीं देखा जाता है जब तक कि वह ब्रह्म हत्या का पाप इनमें स्थित रहा करता है ॥ ८॥ ऋतु कान में प्रथम दिन मे यह च ण्डाली के समान होती है-दूसरे दिन में ब्रह्म घातिनो हुमा करती है-तीसरे दिन में यह नारी धोबिन के तुल्य हुपा करती है इन तीन दिन के समाप्त हो जाने पर चौथे दिन में नारी स्नान करके शुद्ध हुमा करती है ।।६॥ एक सप्ताह से यह नारी प्रत तथा अर्चन मे पितृगण मौर देवो के निमित्त वर्म के योग्य हुआ करती है । इस सप्ताह के बीच में जो गर्म होता है उसको समुत्पत्ति मलिम्लुचा हुमा करती है । पर्थात् चौह फर्म से युक्त होती है ।। १०॥ युग्म रात्रियों मे जो गर्भ स्थिति होती है उससे पुत्र को उत्पत्ति होती है और प्रयुग्म रात्रियो मे जो गर्भ का माधान होता है उसमे कम्या उत्पन्न हुमा करती है। ऋतुकाल के प्रथम दिन से युग्म पोर प्रयुग्म को गणना मानी जाया करती है । प्रतएव ऋतुकाल के प्रथम सप्ताह का त्याग करके दूसरे सप्ताह मे युग्म रात्रियो में गर्भाधान करना चाहिए ॥ ११ ॥ साधारण रूप से नारियो के गर्भ धारण करने की सोलह ऋनु-निशा बनाई गई हैं । जो यदि चौदहवीं रात्रि में गर्भ की स्थिति हो जाती है तो उस गर्भ से गुण भौर सौभाग्य से समायुक्त परम घामिक पुत्र हुआ करता है । वह रानि सामान्य पुरुषो के द्वारा कभी प्राप्त हो नही हुमा करनी है ।।१२॥१३।। बहुधा जितने भी गर्भ होते हैं वे पाठ दिन के ही मध्य में हुप्रा करते हैं । पांचवें दिन मे नारियो को गौल्म माधुर्य/ भोजन होना चाहिए ॥१४॥ कटुकारञ्च तीक्ष्णञ्च साज्य युवतिभोजनम् । स्त्री क्षेत्रमौषधी पात्र वीज वाप्यमृताशनम् ॥१५ तत्र वप्ता नर. सम्यग्जन्तुस्तत्र निषिच्यते । तस्याश्च वातपो वर्ण्य. शीतल केवल चरेत् ।।१६ ताम्बूलगन्धथीखण्ड. सम सङ्गः शुभेम्हनि । निषेकसमये यादृड् नरचित्ते विकल्पना ॥१७ ... तादृक्स्वभावसम्भूतिजन्तुर्वसति कुक्षिग । मुक्रशोरिणतसयोगे पिण्डोत्पत्ति प्रजायते ॥१८ देशनिय और उत्पत्ति ) [ ३१६ बर्द्ध ते जठरे जन्तुस्तागपतिरिवाम्बरे । चैतन्य बीजरूपे हि शुक्र नित्यं व्यवस्थितम् ॥१६ काम चित्तञ्च शूक्रञ्च यदा ह्य कत्वमाप्नुयुः । तदा द्रवमवाप्नोति योपागर्भाशये नरः ।।२० रक्ताधिक्ये भवेन्नारी शुक्राधिक्ये भवेन्नरः । शुकशोरिणतयो साम्ये गर्भ पण्डत्वमाप्नुयात् !!२१ त्रियो मे युवतियो का भोजन बटुकार-तीक्षण और घृत सहित होता है । स्त्री क्षेत्र है-प्रौषधी पान है और अमृताशन बीज होता है ॥ १५ ।। वहां पर पुरुष उस बोज का वपन करने वाला है । वहां पर भली भांति जन्तु का निषेक होना है। उमको प्रातप का वजन है । केवल शीतल का चरण करे । १५ ॥ ताम्बूल-गन्ध और श्री खण्ड के साथ का शुभ दिन मे राज करे । निपेक के समय मे पुरुष के चित्त मे जिस प्रकार विशेप कल्पना होती है उमी प्रकार के स्वभाव से युक्त जन्तु की समुत्पत्ति होती है जो कि कुक्षि मे स्थिन रह कर निवास किया करता है । पुरुष के वीर्य और स्त्री के शोणित ( रज) के सयोग से ही गर्भ-ण्डि की उत्पत्ति हुप्रा करती है ।। १७ ।। १८ ।। प्राश में चन्द्रमा की भांति वह जन्तु नित्य ही पेट मे घडता रहता है। बीज रूप वीर्य में यह चैतन्य नित्य ही व्यवस्थित रहा करता है ॥ १६॥ काम-चित्त और शुक्र (वीर्य) जब ये तीनो एक्त्व रूप को प्राप्त हो जाते हैं उस समय मे नर स्त्री के गर्भाशय मे द्रवरूप को प्राप्त हना करता है ।२०। रक्त अर्थात् स्त्री के रज की अधिकता होती है तब नारी होती है और शुक अर्थात् पुरुष के वीयं को अधिक्ता होती है तो पुत्र होता है । शुक्र और शोणित दोनो हो जब समान होते हैं तो गर्भ पएडत्व को प्राप्त हो जाता है मर्थात् ऐसी दशा में स्त्री तथा पुरुष न होकर नपुंसक उत्पन्न हुप्रा करता है ॥२१॥ अहोरात्रेण कलिल बुख़ुद पञ्चभिदिने । दशमेऽह्नि भवेन्मांसमिश्रधातुसमन्वितम् ।।२२ घनमासञ्च विशाहे गर्भस्थो वर्द्ध ते कमात् । पञ्चविंशतिपूर्णाह बल पुष्टिश्च जायते ।।२३ -- [ श्री गण्डपुराण तथा मासे तु सम्पूर्ण पञ्च तत्वानि धारयेत् । भासद्वये तु सम्पूर्णे त्वचा मेदश्च जायते ॥२४ मज्जास्थीनि गिभिर्मास केशा गुल्फश्चतुर्थ के । करणौ च नासिकावुक्षी जायेते मासि पञ्चके ॥२५ कराठरन्ध्र तया पृष्ठ गुह्याख्य मासि सप्तमे। अङ्गप्रत्यङ्गसम्पूर्णो गर्भो मासरथाष्टमि ॥२६ नवमे मासि सम्प्राप्त गर्भस्थस्य रति स्वयम् । इच्छा सञ्जायते तस्य गर्भवास विनि सृतो ।।२७ नारी वाथ नरो वाथ नपु स्क वाभिजायते । नवमे दशमे वापि जायते यश्च भौतिक ॥२८ प्रसूतवायुनाऽकृष्ट पीडया विह्वलीकृत । क्षितिर्वारि हविर्भोक्ता पवनाकाशमेव च ॥२६ एभिभूतै पीडितस्तु निबद्ध स्नायुबन्धन । त्वचास्थिनाड्या रामाणि मासञ्चवाय गज्वमम् ।३० एते पञ्च गुणा प्राक्ता मया भूमे सगेश्वर । यथा पञ्च गुरगा आपस्तथा शृणु च काश्यप ॥३१ एक दिन और रात्रि में वह गर्भ प्रारम्भ मे कलिल के स्वरूप में होता है । पांच दिन मे वह वुल बुल्ला बन जाता है। दशमे दिन में वह मास मे युक्त लोयडा जैसा हो जाया करता है ॥ २२ ॥ वीस दिन मे घने मास वाला गर्भ में स्थित क्रम से बढता है । पच्चीस दिन में उसमें कुछ बल और पुष्टि होती है ।। २३ । इसी प्रकार से एक मास के पूरा हो जाने पर यह पांचों तत्त्वों को धारण कर लेता है। दो मास का समय पूरा हो जाने पर उस गर्भस्थ में त्वचा तथा मेद समुत्पन्न हो जाया क ते हैं ।। २४ ।। तीन मास में मज्जा और अस्थियों एव चौथे मास में देश और गुल्फ पैदा हो जाते हैं । पांचवें मास में दोनो कान, कुक्षि, नाक उत्पन्न होत हैं ।॥ २५॥ कण्ठ का छिद-पीठ---गुह्यन्द्रिय ये सब सप्तम मास मे होते हैं। शरीर सम्पूर्ण अङ्ग मोर प्रत्यक्ष माठवें मास में उत्पन्न होकर गर्भ पूर्ण हो जाया करता है ॥२६॥ मिला हुमा धातु देहनिर्णय और उत्पत्ति ] [ ४०१ नवम माम के सम्प्राप्त हो जाने पर गर्भस्थ की स्वय रति और इच्छा समुत्पन्न हो जाती है कि वह गर्भ के वास से विनि मृत हो जाये ॥ २७ ।। इसके अनन्तर वह नर हो या नारी अथवा नपुमक. हो उत्पन्न हो जाया करता है। नवम माग में अथवा दश मास मे वह उत्पन्न हुप्रा करता है और जो भौतिक शरीर होता है वह प्रसूत को वायु से प्राकृष्ट - होता हुप्रा पीडा से मिलन होता है। भूमि-वारि--हवि भोक्ता (अग्नि-वायू पोर आकाश ये पांच भून हैं इनसे पोडित और स्नायुप्रो से बँधा हुआ तथा त्वचा-नाडियाँ--रोम और मास ये पांच इसमें गुरण बताये गये हैं मोर हे खगेश्वर ! ये पांच गुण भूमि के हैं इसी प्रकार से पांच गुण जल के भी होते है उन्हे भी हे काश्यप ! तुम मुझमे श्रवण करलो ॥२८॥२६॥३०॥३१॥ लाला मूत्र तथा शुक्र मज्जा रक्तञ्च पञ्चमम् । अपा पञ्च गुणा प्रोक्ता ज्ञातव्यास्ते प्रयत्नतः ॥३२ क्षुधा निद्रा च तृष्णा च पालस्य कान्तिरेव च । तेज. पञ्चगुण ताय प्रोक्त सर्वन योगिभि ॥३३ धावन श्वसनञ्चैव पाकुञ्चनप्रसारणम् । निरोधः पञ्चम प्रोक्तो वायो पञ्च गुणा स्मृता १३४ रागद्वपी तथा लज्जा भय मोहस्तथैव च । इत्येतत्कथित ताक्ष्य वायुज गुणपञ्चकम् ॥३५ घोपश्छिद्रारिण गाम्भीर्य श्रवण सर्वसथय । श्राकाशस्य गुणा: पञ्च ज्ञातव्यास्ताक्ष्यं यत्नतः । ३६ थोन त्वक्चक्षुपी जिह्वा नासा बुद्धीन्द्रियाणि च । पाणिपादौ गुद वाक्चोपस्थ कर्मेन्द्रियाणि च ।।३७ इडा च पिङ्गला चैव सुषुम्ना च तृतीयका । गान्धारी गजजिह्वा व पूपा चंव यशः तथा ॥६८ अलम्बुपा कुहूश्च व शालिनी दशमी तथा। पिण्डमध्ये स्थिता ह्यता. प्रधाना दश नाड़यः ॥३६ ४०२ ] [ श्री गरुडपुराण लाला (लार)-मूत्र-शुक्र (वीय)-मज्जा और पांचवें रक्त ये पाच' गुण इस भौतिक शरीर में जल के हुमा करते हैं सो इन्हे भी भली भांति समझ लेना चाहिए ॥ २२ ॥ क्षुधा (भूख)-नीद-प्यास-मालस्य और कान्ति तथा तेज ये पांच गुण हे ताक्ष्यं । योगिमों ने सवत्र पग्नि या तेज के बताये हैं ॥ ३३ ॥ घावन (दौडना)-श्वास लेना-भाकुञ्चन ( सिकुड जाना )-प्रसारण (फैल जाना) और निरोध (एक जगह रुक जाना) ये पांच गुण इस शरीर वायु के होते है जो कि ज्ञाता पुरुपो के द्वारा बताये गये हैं ॥ ३४ ॥ राग (किसी से प्रेम करना)-द्वेष-लज्ज'-भय और मोह हे ताक्ष्य ! ये पाच गुण भी वायु से ही उत्पन्न होने वाले होते हैं ॥ ३५ ॥ ध्वनि करना-छिद्रो का होना गम्भीरता-सुनना और सबका सश्रय हे तार्य 1 ये पांच गुण आकाश तत्त्व के इस शरीर म जान लेने चाहिए ।। ३६ ॥ इस शरीर में पांच ज्ञान प्राप्त करने वाली इद्रियां होती हैं उन्हे युद्धोद्रिय-इम ताम स कहा जाया करता है और वै थोत्र-त्ववा-चक्षु-जिह्वा और नासिका ये हैं। इनके अतिरिक्त इस मानस के शरीर म पांच कर्मेन्द्रिय अर्थात् काम करने वाली इन्द्रियां होती हैं उनके नाम हाय--पर-गुदा-वाक् और उपस्थ ( गुह्यन्द्रिय ) ये होते हैं ॥ ३७ ।। इस शरीर में दश प्रधान नाडियां होती हैं उनके नाम इडा -पिङ्गल सुषुम्ना-गाधारी-गजा जिह्वा-पूपा-यशा-अलम्बुपा-कुह और शसिनी ये होते हैं जाकि इस मनुष्य के पिंड के मध्य में स्थित रहा करती हैं ॥ ३८ ॥ ॥३६ ॥ . प्राणोऽपान रामानश्च उदानो व्यान एव च । नाग कूर्मश्च कृकरो देवदत्तो धनञ्जय ॥४० इत्येते वायव प्रोक्ता दश देहेषु सस्थिता । केवल भुक्तमनञ्च पुष्टिद सर्वदेहिनाम् ।।१ नयति प्राणदो वायु शरीरे सर्वसन्धिषु । पाहारो भुक्तमात्रस्तु वायुना क्रियते द्विधा ॥४२ सम्प्रीवश्य गुदे याति पृथगन्न पृथग्जलम् । ऊर्ध्वमग्नेजल कृत्वा तदन्नञ्च जलोपरि ॥४३ - देह निर्णय और उत्सत्ति ] । ४०३ अग्नेश्चाधः स्थितः प्राणो ह्यग्नि तं तु घमेच्छनः ।. वायुनो धम्यमानोऽग्निः पृथक्किट्ट पृथग्रसम् ।।४४ मलादशभिः किट्ट भिन्न देहात्पृथग्भवेत् । कर्णाक्षि नासिका जिह्वा दन्ता नाभिगुद वपुः ।।४५ नखा मलाश्रयञ्चेदं विण्मूत्र वेत्यनन्तरम् । मुक्रशोणितसयोगाद्देहः पाट्कोशिक. स्मृतः ॥४६ इस शरीर' में दश प्रकार की यायु स्थित रहा करती है उनके नाम ये हैं-प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाम, कूमं. कूकर, देवदत्त और धन- अय ।।४०।। इतनी ये दश प्रकार की वायु देह मे स्थित रहने वाली बताई गई हैं। खाये हुए प्रन्न को जो समस्त देवारियों को पुष्टि का देने वाला है उसे केवल प्रारण देने वाला वायु सब सन्धियो मे ले जाया करता है । जो प्राहार खाया जाता है उसको यह वायु दो भागो मे कर दिया करता है ।।४१॥४२॥ गुदा में प्रवेश करके अन्न पृथक् और जल पृयय हो जाया करता है । अग्नि के ऊपर जल को करके उसके ऊपर उस खाये हुए अन्न को कर देता है और उस ग्राम के नाचे स्थित प्राण वायु धीरे-धीरे उस अग्नि का धमन किया करता है। प्राण वायु के द्वारा धमन किया हुआ जठराग्नि उस भुक्त अन्नादि पदार्य के रम को अलग कर देता है और उसका किट्ट भाग ( फुजला ) है उसे अलग कर दिया करता है । बारह प्रकार के मल होते हैं । वह किट्ट भाग (फुजला) इम शरीर से भिन्न होकर निकला करता है। भोजन का सार भाग नो रस ही होता है जिससे इस देह को पुष्टि एव वृद्धि होती है। वे बारह मल कान मांख, नाक, जीभ, दौत, नाभि, गुदा, वपु ( शरीर ), नख, मलाश्रय, विष्ठा और मूत्र ये होते है अर्थात् इन से बाहिर हुमा करते हैं । शुक और शोणित के संयोग से विरचित यह देह "पाट् कोपिक"-इस नाम से कहा गया है ॥ ४३ से ४६ ।। रोमकोटिस्तया तिस्रो ह्यर्द्ध कोटिसमन्विता । द्वात्रिंशद्दशनास्तत्र सामान्याविनतासुत ॥४७ विंशतिस्तु नखाः केशानिलक्ष मुखमूर्ध्वजाः । मास पलसहस्र के सामान्याहसस्थितम् ।।४८ ।
श्री गरुडपुराण रक्त पलशतं ताक्ष्य बदमेतत्पुरातन । पलानि दश मेदश्च त्वचा चैव तु तत्सम ॥४६ पल द्वादशक मज्जा महारक्त पलत्रयम् । शुक द्विकुडव ज्ञेय शोणित कुडव स्मृतम् ॥५० श्लेष्मणश्च पडद्धञ्च विण्मून तत्प्रमाणतः । । एप पिण्ड. समाख्यातो वैभव सम्प्रचक्ष्महे ॥५१ ब्रह्माण्डे ये गुणा सन्ति शरीरे ते व्यवस्थिता. । पातालभूपरा लोकास्तथा द्वीपा: ससागरा.। प्रादित्याद्या ग्रहा. मर्वे पिण्डमध्ये व्यवस्थिताः ।।५२ पादाधस्तु तल शय पादोवं वितल तथा । जानुभ्या सुतल विद्धि जवासु च तलातलम् ॥५३ तथा रसातलञ्चोर्वोगुह्यदेशे महातलम् । पाताल कटिसस्थ तु पादतो लक्षयेद्बुध ॥५४ इस शरीर में माढ़े तीन कोट रोमो की श्रेणी होती है । इसमे बत्तीम दौत हुप्रा करते हैं। हे विनिता के पुत्र | ये सामान्य रूप से सभी के शरीगे में इनकी संख्या बताई गई है ॥४७॥ धीस इसमे नख होते हैं और मुख तया मस्तक मे हाने व ले देश तीन लाख हुमा करते हैं। सामान्य तथा इस शरीर में एक सहस्र पल मांस हुआ करता है जो कि इममे स्थिन रहना है ॥४८॥ एक सौ पल इस देह में रक्त होता है, ऐसा हे तार्य । पुरातन पुरुपो ने यह सब बताया है। दश पल समे मेद होता है और त्वचा भी मेद के ही समान हुमा करती है ॥४६॥ बारह पल मज्जा होती है। महा रक्त तीन पल हुप्रा फरता है। दो कुडव शुक्ल होते है और शोणित एक कुडव होता है ।।५।। नेपमा छ पल होता है और उस आघा विट और मूत्र होता है जो उसके प्रमाण से हुआ करता है । इस प्रकार का यह पिण्ड कहा गया है। अब इसमा वैभव बतलाते हैं ॥५। इस समस्त ब्रह्माण्ड में जो मो गुण होते हैं वे सब इस मानव के शरीर में रिपत हुप्रा करते हैं । पाताल, भूधर, ला, दीप पौर सागर, मादित्य से मादि लेकर समस्त ग्रह इम पिएड के मध्य में स्थित रहा देह निर्णय पोर उत्पत्ति ] । ४०५ रते हैं ॥५२॥ पादो से नीचे तल जानना चाहिए और पैरो से ऊपर वितल, गनुओ से सुतल समझो तथा जांघो मे तनातन है ।।५३॥ ऊल्मो में रमातल और गुह्य देश में महातल, कटि प्रदेश में स्थित पाताल है। इस प्रकार मे बुध रुप को देखना चाहिए ॥५४॥ 1- भूर्लोक नाभिमध्ये तु भुवर्लोक तदुर्द्धत । स्वर्लोक हृदये विन्द्यात्कण्ठदेशे गहस्तथा ।।५५ जनलोक वक्त्रदेशे तपोलोकं ललाटके । सत्यलोक महारन्ध्र भुवनानि चतुर्दश ।।५६ त्रिकोणे सस्थितो मेरुरध कोरणे च मन्दर. । दक्षिणे चैत्र कैलासो धामकोगे हिमाचल ॥५७ निषधश्चोर्ध्वभागे तु दक्षिणे गन्धमादनः । रमणो वामरेखाया सप्त ते कुलपर्वताः ॥५८ अस्थिस्थाने स्थितो जम्बु शाक मज्जासु मस्थितम् । कुशद्वीप स्थितो मासे कौञ्चद्वीप, शिर स्थित. ।।५६ त्वचाया शाल्मलीद्वीपो गोमेदो रोमसञ्चये। नखस्थ पुष्करद्वीप सागरास्तदनन्तरम् ॥६० नाभि के मध्य में भूर्लोक है । उमके ऊपर भुवर्लोक है। हश्य में स्वर्लोक है तथा कण्ठ देश में महर्लोक है ॥५५।। मुख प्रदेश मे जनलोक है मौर ललाट में तपोलोक है । महारन्ध्र मे सत्यलोक स्थित रहता है । इस तरह से इस देह मे चौदह भुवन विद्यमान रहा करते है ॥५॥ त्रिकोण मे मेरु पोर अध:कोण में मन्दर स्थित है । दक्षिण मे कैलास है तथा वाम कोण मे हिमाचल महागिरि है ॥५७॥ ऊर्ध्व भाग मे निषध है पौर दक्षिण भाग मे गन्धमादन है । वाम रेखा में रमणगिरि है। इस प्रकार मे ये सातौ कुल पर्वत इस देह में स्थित रहते हैं ॥५८ । अस्थियों के स्थान मे अम्बु द्वीप होता है पोर मचामो मे शाम द्वीप है । मांस में कुश द्वीप है भोर शिर मे कोज द्वीप स्थित रहा करता है। ॥५६॥ त्वचा में शाल्मली द्वीप है तथा रोमो के सञ्जय में गोमेद है। नखो। ।
४०६ [ थी मरुडपुराण रिथत पुष्प र हीप है। इससे मर इस देह में सागरों की स्थिति बताई ज है ॥६॥ क्षीरोदश्च तथा मूने क्षोरे क्षीरोदसागर. । सुरोदधि श्लेष्मसस्थो मज्जाया घृतसागरः ॥६१ रसोदधि रसे विन्द्याच्छोरिणते दधिसागरम् । स्वादूदकश्च विट्स्थाने गर्भोद शुक्रस स्थितम् ॥६२ नादचक्रे स्थित सूर्यो बिन्दुचक्रे तु चन्द्रमा । लोचनाम्या कुजो ज्ञ यो हृदये च बुध. स्मृतः ।।६३ विष्णुम्थाने गुरु विन्द्याच्छुक शुक्रो व्यवस्थित. ॥६४ नाभिस्थाने स्मृतो मन्दो मुखे राहु स्मृत. सदा । पादस्थाने स्मृत. केनुः शरीरे ग्रहमण्डलम् ॥६५ विभक्तच समापात पापादतलमस्तका। उत्पन्ना ये हि ससारे नियन्ते ते न सशयः ।।६६ बुभुक्षा च तृपा रौद्रादायोद्भूता च मूर्छना । यत्र पीड़ामित्वमा रौद्रा: सपवृश्चिकदशजा. ॥६७ तप्तवालुकमध्येन प्रज्वलद्वह्निमध्यत । केशग्राहैः समाक्रान्ता नीयन्ते यमकिकरैः ॥६८ मूत्र में क्षीरोद है और क्षीर मे क्षीरोद सागर है। श्लेष्मा में स्थित सुरोदधि है तथा मज्जा मे घृत सागर स्थित रहा करता है ॥६१॥ रस मे रसो. दधि पौर शोरिणत मे दधि सागर जान लेना चाहिए। विट् स्थान मे स्वादूद एव शुक्र मे सस्थित गर्भोर है। इस तरह ये सब सागर इस शरीर मे स्थित रहा करते हैं ।।६२॥ प्रब आदित्य प्रादि सब ग्रहों की स्थिति बताते हैं-नाद चक्र में सूर्य स्थित रहते हैं और विन्दु चक्र मे चन्द्र ग्रह की स्थिति है । दोनो नेत्रों मङ्गल तया हृदय मे बुध स्थित रहा करता है ।।६६॥ विष्णु के स्थान मे गुरु रहते हैं और शुक में शुक्र ग्रह की स्थिति रहती है ॥६४॥ नाभि के स्थान में शनि का निवास है तथा मुख म सदा राहु विराजमान रहा करता है । पैरो.. के स्थान में केतु ग्रह की स्थिति रहती है । इस प्रकार इस शरीर में ग्रह मण्डल 1 देह निर्णय मोर उत्पत्ति ] [ ४०७ विराजमान रहा करता है। पाद तल से मस्तक पर्यन्त विभक्त इस शरीर का वर्णन किया गया है। जो इस सप्तार में जन्म प्रहण करके उत्पन्न हुए हैं वे सभी अवश्य ही मृत्यु के ग्रास हुमा करते है-इसमे तनिक भी सशय नहीं है। ॥६॥६६॥ भूख और प्यास प्रादि में होने वाली मूच्छंना गैद्र से होती हैं । जहाँ ये पीडायें हैं वहाँ सर्प, बिच्छुनों के दशन से उत्पन्न रौद्र है ।। ६७॥ तपी हुई बालू के मध्य में और जलती हुई पाग के बीच मे होकर यम के दूत चोटी पकड कर घेरे हुए वहाँ ले जाया करते हैं ॥१८॥ पापिष्ठास्त्वधमास्ताऱ्या दयाधर्मविजिता । यमलोके वसन्त्येव कुट या जन्म च विद्यते ॥६६ एव सञ्जायते ताय म] जन्तु स्वकर्मभि । श्रायु कर्म च वित्तश्च विद्या निधनमेव च । पञ्चतानि हि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यव देहिन ॥७० पर्मणा जायते जन्तु कर्मणव प्रलीयते । सुख दुख भय क्षेम कर्मणवाभिपद्यते ॥७१ अधोमुख चोर्ध्वपाद गर्भाद्वायु प्रकर्षति । जन्मतो वैष्णवी माया सम्मोहयति सत्वरम् ।।७२ स्वकर्मकृतसम्बन्धो जन्तुर्जन्म प्रपद्यते । सुकृतादुत्तमो भोगी भाग्यवान्सुकुले भवेत् ।।७३ यथा दुष्कृतकर्मा हि कुले हीने प्रजायते । दरिद्रो व्याधितो मूर्ख पापकृदु खभाजनः । त्तलक्षण जन्तो कथित ऋषिपुनक ।।७४ हे त क्ष्यं । जो बडे भारी पापिष्ठ पुरुप होते हैं और महान् प्रधम होते है जिन दया और धम नाम मात्र को भी नही हुमा करते हैं वे उस यमराज के लोक में निवास किया करते हैं और उनका जन्म कुटी मे हुआ करता है। ॥६६॥ हे गरुड ' : इस प्रकार से इम मनुष्य लोक मैं यह जन्तु अपने ही किये हुए कर्मों के विपाक के वशीभूत होकर जन्म ग्रहण किया करते है। मनुष्य की आयु उसका कर्म, धन, विद्या मोर मृत्यु ये क्व-कितना और किस प्रकार के ४०८ ] थी गरुडपुराण होगे ?-इन सब पांचो बातो को जब यह जीवात्मा गभं में स्थित रहा करता तभी मृजन हो जाता है ॥७॥ कर्म के भनुमार ही जन्तु का जन्म होता है और कमों के अनुरूप ही उसका लय अर्थात् मृत्यु हुमा करती है । सुख, दुम, भय, क्षेम ये सभी कर्मों के अनुकूल ही हुपा करते हैं 100 नीचे की भोर मुख वाले तथा जरर की तरफ पैरों वाले इसको वायु गर्भाशय से सीचकर लाता है। जन्म होते ही यह वैष्णवी माया इसको बहुत शीघ्र सम्मोहित कर दिया करती है ॥७२॥ अपने कर्मों के अनुसार सम्बन्ध वाला यह जन्तु जन्म ग्रहण किया करते हैं। यदि उसके कुछ सुकृत होते हैं तो वह उत्तम कुल में जन्म लेकर भोगो के भोगने वाला होता है और बड़ा भाग्यवान् हुमा करता है ॥७३॥ यदि दुष्कृत मे युक्त कर्म होते हैं तो धह हीन कुल में जन्म लेता है और मदा दरिद्र तथा व्याधियो से अमित, महान् मूख एव पापो के करने वाला मोर पूरण दुखो का पात्र हुपा करता है। हे ऋषि के पुत्र । मैंने यह सब इस प्राणी की उत्पत्ति का लक्षरण तुमको बता दिया है ॥७॥ २३-- यमलोक विवरण यमलोक कियन्मात्र लोक्ये सचराचरे। विस्तार तस्य मे ब्रहि अध्वा चैव कियान्स्मृत ॥१ के के पापै कृतदेव केन वा शुभकर्मणा । गच्छन्ति मानवास्तन कथयस्व जनार्दन ॥२ पडशीतिसहस्रारिए योजनाना प्रमाणत । यमलोकस्य चाध्वान हन्तरा मानुषस्य च ॥३ घ्मातताम्रमिवातप्तो ज्वलन्दुर्गो महापथ. । तत्र गच्छन्ति पापिष्ठा मानवा मूढचेतस ॥४ कएटकास्तीदरणकाश्च व विविधा घोरदारुणा । सत्तु वम क्षितियाप्त हुताशश्व तथोल्वण ॥५ वृक्षच्छाया न तत्रास्ति यत्र विथमते नर । गृहीतकालपार्शस्तु कृत क्मभिरुत्वरण ॥६ । ४०१ यमलोक विचरणं ] तस्मिन्मार्ग न चान्नाद्य येन प्राणान्प्रपोपयेत् । जलं न दृश्यते तत्र तृपा येन विलीयते ।।७ गरुड ने कहा-हे भगवन् ! इस चर भौर प्रचर से युक्त लोक्य मे यमलोक कितना विस्तृत है और उसका पूर्ण स्वरूप तथा विस्तार बतलाइये भोर यह भी बताने की कृपा करें कि उसका मागं कितना कहा गया है ? ॥१॥ है जनार्दन देव ! किये हुए किन-किन पापों के द्वारा प्रथवा शुभ कर्मों से मनुष्य यहाँ जाया करते हैं यह भी वर्णन कीजिए ॥२॥ श्री भगवान् बोले-इस मनुष्य लोक मोर यमलोक के बीच का अन्तर छयासी हजार योजन का है। इतना ही लम्बा यमपुरी का मार्ग होता है ॥३॥ घमाये हुए तान के समान तप्त जलता हमा दुर्ग कठिन वह महा पथ होता है। वहाँ पर उस महा मार्ग में अत्यन्त पापी मूढ चित्त वाले मानव जाया करते हैं ॥४॥ वे मार्ग ऐसे भीषण हैं कि उनमे बहुन तीक्ष्ण कांटे होते हैं और वे भी अनेक प्रकार के घोर एय दारण हमा करते हैं। इन कण्टो से उस मार्ग की भू में व्याप्त रहती है तथा उसमें महान उल्वण प्रग्नि रहा करती है ।।५।। उस मार्ग में वृक्षों का बिल्कुल प्रभाव । वहाँ ऐसी कोई छाया नहीं है जहाँ पर मनुष्य विश्राम कर लेवे । किये हुए प्रत्यन्त तीव्र एवं उल्त्रण कर्मों के द्वारा मनुष्य कालपाश से बंधे हुए रहा करते हैं ।।६।। उम मार्ग में भोजन के योग्य अन्न आदि कुछ भी नही होता है जिसके द्वारा मनुष्य अपने प्राणो का पोषण कर मके । वहाँ उस महा विशाल मार्ग में कही भी जल दिखलाई नहीं देता है जिसे पान कर प्यास को शान्त किया जा मके 1॥७॥ क्षुधया पीडितो याति तृपया च महापथि । शीतेन कम्पितः क्वापि यममार्गेऽतिदुर्गमे 11 यद्यस्य यादृश पाप स पन्यास्तस्य तादृशः। सुदीना. कृपणा मूढा दुखाताम्तरन्ति वै 18 रुदन्ति करुणं केचित्केचिद्रोद्र वदन्ति । प्रात्मकर्मकृतोपस्तप्यमाना मुहुर्मुहुः ॥१० ४१० ] श्री गरुडपुगए ईदग्विधः स वै पन्था विज्ञ यो दारुण. खग । वितृष्णा ये नरा लोके सुखं तस्मिन्वजन्ति ते ॥११ यानि यानि च दानानि दत्तानि भुवि मानवैः । तानि तान्युपतिष्ठन्ति यमलोके पुरःसरम् ॥१२ पापिनां नोपतिष्ठन्ति दत्ता श्राद्धजलाञ्जलिः । भ्रमन्ति वायुभूताश्च ये क्षुद्राः पापकमिणः ॥१३ ईदृशं वत्मं वै रौद्र कथित तव सुव्रत । पुनश्च कथयिष्यामि यमलोकस्य या गतिः ।।१४ उस महापथ में मनुश्य क्षुधा और प्यास मे पीडित होकर गमन किया करता है। कहीं पर इतना अधिक शीत उस मार्ग मे होता है कि उसके कारण काग्ने लगता है और उस दुर्गम यमपुरी की यात्रा करता रहता है ॥८॥ वह महामाग सभी के लिये समान नहीं हुमा करता है । वह तो जिसका जैसा पाप होता है उस जन्तु के लिए उसी प्रकार का मार्ग हो जाया करता है। प्रत्यन्त दीन, कृपण और मूढ होते हैं वे दुःखों से ध्याप्त होकर उसे पार किया करते है ।।९।। कुछ लोग मार्ग की असह्य वेदना से रुदन किया करते हैं-कुछ ऐसे लोग भी हैं जो रोद्र भापण किया करते हैं और अपने किये हुए पाप कर्मों का स्मरण करके बार-बार सन्तप्त होते रहते हैं ॥१०॥ हे खग ! वह मार्ग इस प्रकार का बहुत ही दारुण होता है । जो मनुष्य विना तृष्णा वाले होते हैं वे उम मार्ग मे सुख पूर्वक गमन किया करते है ॥११॥ इस भू-नोक में मनुष्यो के 'द्वारा जो-जो भी दान दिये जाते हैं वे-वे सब गमगोक में आगे ही मिला करते हैं ॥१२॥ दी हुई श्राद्ध की जलाअलि पापियो को वहां नहीं उपस्थित हुमा करती है। जो क्षुद्र पाप कर्मों के करने वाले होते हैं वे वायुभूत होकर इधर- उपर भ्रमण किया करते हैं ।।१३।। हे सुन्दर व्रत वाले ! यमलोक का मार्ग इस तरह का महान् रौद्र स्वरूप वाला होता है जिसका वर्णन हमने तुम्हारे सामने कर दिया है। अब मैं फिर यमलोक को जो गति होती है उसे तुमको बतलाता हूँ ॥१४॥ याम्यनैऋतयोर्मध्ये पुरं वैवस्वतस्य च । सर्व वज्रमय दिव्यमभेद्य यत्सुरासुरः ।।१५ . - यमलोक विवरण [ ४११ चतुरस्र चतुरिं सप्तप्राकारतोरणम् । स्वय तिष्ठति तस्यान्तर्यमो दूतैः समन्वितः ॥१६ योजनाना सहस्र हि प्रमाणेन तु दृश्यते । सर्व रत्नमय दिव्य विद्य ज्ज्वालार्कवर्चसम् ॥१७ तद् गृह धर्मराजस्य विस्तीर्ण काञ्चनप्रभम् । पञ्चविंशप्रमाणेन योजनानि समुच्छ्रितम् ॥१८ वृत स्तम्भसहस्र स्तु वैदूर्यमणिमण्डितम् । मुक्ताजाल गवाक्ष तु पताकाशतभूषितम् ॥१६ घण्टाशतनिनादाढ्य तोरणाना शतैर्वृतम् । एवमादिभिरन्यैश्च भूपरंगभूपित सदा ।।२० तत्रस्थो भगवान्धर्म आसने नियमे शुभे । दशयोजन विस्तीर्णे नीलजीमूतसन्निभे ॥२१ याम्य पार नैऋत्य दिशामो घे मध्य मे यमराज का पुर है । वह पूरा नगर वज्रमय, अत्यन्त दिव्य और सुर तथा प्रसुगे के द्वारा भी भेदन न करने के योग्य है 11१५॥ वह नगर चौकोर, चार द्वारो वाला पौर सात प्राकार मोर तोरणो से युक्त है। उस पुर में यमराज स्वय भीतर अपने दूतो से समन्वित होकर रहा करते है ।।१६।। वह यमराज का पुर एक सहस्र योजनो के प्रमाण वाला है और वह सब परम दिव्य रत्तो से पूर्ण है तथा विद्युत् की ज्वाला एव सूर्य के वर्चम के सदृश देवीप्यमान है ॥७॥ वह धर्मराज का घर अति विस्ती तथा सुवरणं को प्रभा के समान प्रभा वाला है । पच्चीम योजन प्रमाण की उसकी ऊंचाई है ॥१८॥ सहस्रो स्तम्भो से युक्त एव पैदूर्य मरिणयो से मण्डिन है । उस नगर में मोतियों की लडियो क जाल लगे हुए है---मुन्दर गवाक्ष (झरोके) हैं और संक्डो पताकाओ से वह विभूपित है ॥१६॥ यमराज के नगर मे सैकडो घण्टे लगे हुए हैं जिनकी टन-टन" की घोर ध्वनि से सारा पुर निनादित रहा करता है । सकडो तोरणो से वह युक्त है। एवमादि तथा अन्य विविध भूपगो से वह मदा विभूषित रहता है ॥२०॥ वहाँ पर भगवान् धर्मराज स्थित रहा करते हैं। उनका पासन परम शुभ है और वे नियमो मे समास्थित रहते हैं ।
४१२ ] [ श्री गरुडपुराण वह उनका मासन दश योजन विस्तार वाला और नील जीमून ( मेघ) तुल्य है ॥२१॥ धर्मज्ञो धर्मशीलश्च धर्मयुक्तहितो यमः। भयद. पापयुक्तानां धमिणाञ्च सुखप्रद ॥२२ मन्दमारुतसयोगविविधैरुत्सवस्तथा । व्याख्याभिर्बहुभियुक्तः शववादित्रनिस्वनैः ॥२३ पुरमध्ये प्रवेशे तु चित्रगुप्तस्य वै गृहम् । पञ्चविंशतिसख्यानां योजनानां प्रमागतः ।।२४ दशोच्छ्रितं महादिव्य लोहप्राकारवेष्टितम् । प्रतोलीशतसञ्चारं पताकाशतशोभितम् ॥२५ दीपिकाशतसंकीर्ण गीतध्वनिसमाकुलम् । चित्रितं चित्रकुशले श्चित्रगुप्तस्य व गृहम् ॥२६ मणिमुक्तामये दिव्य प्रासने परमाद्भुते । तत्रस्थो गण्यत्यायुर्मानुषेष्वितरेषु च ।।२७ न मुह्यति कथञ्चित्सः सुकृते दुष्कृतेऽपि च । जन्मनोपाजित यावत्सदसति तस्य तत् ।।२८ धर्मराज धर्म के पूर्ण ज्ञाता है और उनका स्वभाव भी धर्म से युक्त होता है । धर्मराज धर्म से युक्त हित वाले हैं। जो पाप कर्मों से युक्त प्रणी होते हैं उनको भय देने वाले हैं पोर जो धर्म से युक्त जन्तु होते हैं उनको वे सुख प्रदान करने वाले हुमा करते हैं ॥२२॥ मन्द वायु के संयोग से युक्त तथा अनेक तरह के उत्सवो से परिपूर्ण, बहुन तरह की व्याख्यानो से सम्पन्न बोर शरद तथा बहुत से वादियो की ध्वनि से पूणं वह गुर होता है ॥२३॥ यमराज से पुर मे प्रवेश करने में चित्रगुप्त का गृह माता है जो पच्चीस योजनो के प्रमाण वाला है ॥२४॥ चित्रगुप्त के गृह की ऊँचाई दश योजन है और यह महान दिम है तथा लोह के प्राकार (परकोटा) से वेष्टित है अर्थात् चारों और लोहे की दीवार बनी हुई है। इस गृह में एक सो प्रताला (गो) है जिनम सञ्चार होता है और सो पताकामों से शोमा युक्त है ।।२।। सक्दो दीपिकाओं से यह गृह सहोणं । [ ४१३ यमलो विवरण ] या चारो पोर इसमे गीतो की ध्वनि भरी रहा करती है। बडे कुशल चित्र. रो के द्वारा चित्रगुप्त का गृह चित्रित किया हुप्रा है ।।२६॥ उस गृह मे एक यन्त प्रभुत मरिणयो पौर मोतियों के द्वाग निर्मित परम दिव्य आसन है न पर विराजमान चित्रगुप्त मनुष्यो तथा इतर प्राणियो की मायु की गणना 'या करते हैं ॥२७॥ वह सुकृत प्रौर दुष्कृत में भी किसी समय मे किसी भी कार से मोह को प्राप्त नहीं होते हैं । जन्मो में उपाजित उसका फर्म सद् हो भिमत् हो जितना भी होता है उस पर भली-भांति विचार किया करते हैं। तो पर्म मठारह दोषो मे रहिन इसका किया हुआ होता है उसे यह लिख लेते चित्रगुप्त के घर से पूर्व दिशा मे जर का महाम् गृह होता है ॥२८॥२६॥ दशाष्टकोपरहित कृत कर्म लिखत्यसो । चित्रगुप्तगृहात्प्राच्या ज्वरस्यास्ति महागृहम् ॥२६ दक्षिणे चापि मूलस्य लूताविस्फोटकस्य च । पश्चिमे कालपाशस्य अजीणंस्यारुचेस्तथा ॥३० मध्यपीठोत्तरे ज्ञया तया चान्या विसूचिका । ऐशान्या व शिरोऽत्तिः स्यादाग्नेच्या चैव मूच्र्छना ॥३१ प्रतिसारस्तु नंत्या वायव्या दाहसज्ञकः । एभि. परिवृतो नित्य चित्रगुप्त स तिष्ठति । यत्कर्म क्रियते यश्च तत्सर्व तु लिसत्यसो ॥३२ धर्मराजगृहद्वारि दूतास्तायं तया दिशि । तिष्ठन्ति पापकर्माण पीड़यन्तो नराधमान् ॥३३ यमदूतमहापार्शस्ताड्यमानाश्च मुद्गरे । बघ्यन्ते विविधः पागः पूर्वकर्मकृतंनंराः ॥३४ नानाप्रहरणचव नानायन्त्रस्तथापरं । पोदयात पापकर्माणः क्रक. याप्ठयद्विधा ॥३५ पिनगुप्न में ग्रह मे दक्षिण में शूम पभिम दिशा में बामपास, प्रमोणं धार पक्षिा ग्रह है ॥३०॥ मध्य पोट उत्तर में विमिरा (1) रो स्थिति जाननी पाहिए । ऐलान प्रौरसूता विस्फोटक । श्री गरुडपुरा वेदना पौर प्राग्नेयो दिशार में गूछना स्थित है ॥३१॥ नैऋत्य दिशा मे परि.- सार भौर वायन्य उपदिशा में दाह सजा बाली व्याधि रहा करती है । इस प्रकार से इन सब रोगो मे निस्प हो पावृत रहने वाले चित्रगुप्त वही समास्थित होते हैं । जिन्होंने जो भी कम किया है या क्यिा करते हैं उन सबको यह चित्र. गुप्त लिखा करते हैं ॥३२॥ हे ताक्ष्यं । धर्मराज के गृह के द्वार पर दिशाओ में दूत स्थित रहा करते हैं और जो मधम नर पाप कर्म करने वाले होते हैं उन्हे वे दूत बराबर पोटा दिया करते हैं ॥३३॥ मनुष्य अपने पहिले किये दमों के कारण से उन दूतों के द्वारा भनेक प्रकार के पाशो से बांध दिये जाया करते हैं तथा महापाशो से मोर मुद्गगे से वे अच्छी तरह ताड्यमान ( पीटे हुए ) हुमा करने हैं ।।३४॥ अनेक प्रहरणो से तथा दूसरे प्रकार के विविध यन्त्रो से मौर क्रकचो से पाप कर्म करने वाले प्रताडित एव दो भागो मे काष्ठ की भौत कर दिये जाते हैं ॥३॥ अन्ये च ज्वलमानस्तु अङ्गार. परितो भृशम् । पूर्वकर्मविपाकेन श्रायन्ते लोहपिण्डवद ।।३६ क्षिप्ताश्चान्ये घरापृष्ठे कुठारेण च कत्तिता । कन्दमानाश्च दृश्यन्ते पूर्वकर्मविपाकत ॥३७ केचिनिगढपाशैश्च तेलपाकस्तथापरे । हन्यन्ते यमदूतश्च पापिष्ठाः सुभृश नरा ॥३८ ऋणानि प्रार्थयन्त्यन्ये देहि देहीति कोटिश । यमलोके मया दृष्टा स्वमास भक्षयन्ति हि ॥३६ इत्येव वहवस्ताय नरकाः पापिना स्मृता । किमेभिविस्तरप्रोक्तं सर्वशास्त्रेषु भापित । दानोपकार वक्ष्यामि यथा तत्र सुख भवेत् ॥४० अन्य पापी लोग जलते हुए अङ्गारो से चारो मोर पूर्वकृत कर्मों के विपाक से लोहे के पिण्ड की भांति अत्यन्त तपाये एव गर्म करके सताये जा हैं ॥३६।। कुछ दूसरे पाप कर्मों के करने वाले भूमि के ऊपर फेंके गये कुठार द्वारा वित्तित (काटे हुए) दिये जाते हैं मोर वे अपने पहिले कर्मों के विपाक के धर्माम लक्षण दन करते हुए यहाँ दिखलाई देते हैं ॥३०॥ कुछ पापिष्ठ लोग निगड पाशो से बद्ध होते हैं और कुछ दूसरे लोग तैल में पाको के द्वारा हनन किये जाते हैं। यम के दूत अधिक पापियो को इस प्रकार से बहुत ही ज्यादा ताहित करते हैं ॥३८॥ अन्य लोभ 'हमको कुछ दो-हमको फज दे दो"-इस तरह पाहकर करोडो को सख्या मे सूरण की प्रार्थना किया करते हैं। यमलोक म मैंने स्वय देखा है कि नाग यही मांस का भक्षण किया करते हैं ।।३९।। है ताक्ष्यं । इस तरह से पापियो वो अपन किये हुए पुरे कर्मों का फल भोगने के लिये बहुत से मरक बतलाय गय हैं। इन सबका बहुत अधिक विस्तार पूर्वक वर्णन करने मे या प्रयोजन है क्योकि ये सब तो सभी शास्त्रो मे बताये गये हैं। अब हम दानोपकार के विषय म वर्णन करते हैं जिससे कि वहाँ पर प्राणियो को सुख माप्त हो सके ॥४॥ २४-धर्माधर्म लक्षण शृणु ताओं यथान्याय धर्माधर्मस्य लक्षणम् । सुकृत दुष्कृत नृणामग्ने धावति धावति ॥१ कृत तप प्रशसन्ति त्रेताया ज्ञानसाधनम् । द्वापरे यज्ञदानञ्च दानमेक कलौ युगे ॥२ गृहस्थाना स्मृतौ प्रोक्तान्धर्मानालपता तथा । इष्टापूर्त स्वया शक्त्या कुर्वता नास्ति पातकम् ॥३ वृक्षास्तु रोपिता येन नडागादि जलाशया । कृता यन हि मार्गेऽस्मिन्सुख याति स मानव ॥४ हिमे तुपारशीताभ्या पीडयत न यमालय । तप्यमान सुख याति इन्धनानि ददाति य ॥५ तृप्ता विभूपिताश्चैव गन्धपुष्पसमन्विता भूमिदान सुख यान्ति सवकामश्च पूरिता, ॥६ सुवर्णमणिमुक्तादिवस्त्राण्याभरणानि च । तेन सर्वमिद दत्त येन दत्ता वसुन्धग॥७ [ भी गण्डपुराण भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है साक्ष्य ! मब तुम न्याय के अनुसार घेएं और अधर्म का लक्षण श्रवण करो। मनुष्यो का सुकृत पौर दुष्कृत भागे दौर लगाया करता है ॥१॥ पक्-पृथक युगो मे पृथक पृथक् माधन हुपा करते हैं । कृतयुग मे तपश्चर्या करने को प्रशसा की जाती यो-वेता मे ज्ञान ही कल्याण का साधन माना जाता था। द्वापर युग में यज्ञ-यागादि का करना तथा दान देना मात्म कल्याण का साधन होता था मोर कलियुग मे केवल एक दान ही धर्म का साधन माना गया है ॥२॥ स्मृति में बनाये हुए धर्मों का पालन करने वाले गृहस्थी को अपनी शक्ति से इष्टापूर्ति करने वालो को कोई पातक नहीं होता है ।॥ ३ ॥ जिसने वृक्ष मादि का आरोपण किया है, तडाग पादि जलाशयो का निर्माण कराया है। इसके पुण्य का यह फल होता है कि मनुष्य इस यमपुरी के महामार्ग मे सुख पूर्वक गमन किया करता है ॥४॥ जो ईधन का दान किया करता है वह हिम मे तुषार और शीत सं यमालय मे कभी पीडित नहीं होता है, वह तपना हुमा उस शीतकाल में भी बहुत ही सुख पूर्वक जाया करता है ॥५॥ भूमि के दान के द्वारा पति तृप्त एवं गन्ध तथा पुष्पों से संयुत होते हुए परम समलंकृत होकर समस्त कामनामो से परिपूर्ण हो सुख के साथ गमन किया करते हैं ॥६॥ भूमि के दान का बहुत अधिक महत्व होता है जिसने इस बसुन्धरा (पृथ्वी) का दान दिया है उसने सोना, मरिण, मोती भादि सब प्रकार के रत्न तथा वस्त्र भोर माभरण इन सभी का दान कर दिया है ॥७॥ यानि यानि च दानानि कृतानि भुवि मानवै.। यमलोकपथे तानि तिष्ठन्त्य समोपतः ।।८ व्यञ्जनानि विचित्राणि भक्ष्यभोज्यानि यानि च । विधिना ददते पुत्र: पित्रे तदुपतिष्ठति ॥ प्रारमा के पुत्रनामा हि पुत्रस्माता यमालये। नरकात्पितर बायेतन पुत्र इति स्मृतः ॥१० अतो देयञ्च पुरण श्राद्धमाजीवितावधि । अतिवाहस्तदा प्रेतो भोगाश्च लभते हि सः ।।११ नर्माधर्म लक्षण दह्यमानस्य प्रेतस्य स्वजनयैर्जलाञ्जलि। दीयते प्रीतरूपोऽसौ प्रेतो याति यमालयम् ॥१२ श्रापक्वे मृण्मये पात्रे दुग्ध दद्याद्दिनत्रयम् । काष्ठत्रय गुणवंद्ध्वा प्रेतप्रीत्यै चतुष्पथे ।।१३ प्रथमेऽह्नि द्वितीये च तृतीये च तथा खग। आकाशस्थः पिबेदुग्ध प्रेतो वायुवपुर्धर ॥१४ इम भू-मण्डल में मनुष्यो के द्वारा जो-जो भी दान किये जाते हैं वे सभी यमलोक के उस महा मार्ग मे पहिले से ही पहुंच कर समीप में उपस्थित हो जाया करते हैं ॥८॥ विविध भांति के अद्भुत व्यजन तथा भक्षण करने के योग्य पदार्थ और भोज्य वस्तुएं जो भी पुनो के द्वारा पिता के हितार्थ विधि पूर्वक दान किये जाते हैं वे भी मब यहाँ रामुपस्थित हुमा करते है ॥६॥ मात्मा ही पुत्र के नाम वाला होता है अर्थात् स्वय ही पुत्र वे स्वरूप में हमा करता है । पुत्र जो भी दानादिक करता है वह भी मानों स्वय हो किया करता है । अतएव यमालय मे पुत्र प्राण करने वाला होता है । पु नाम नरक का है उसरो जो तारण किया करता है इसी से 'पुत्र' '-यह नाम कहा गया है ॥१०॥ इसी लिये पुत्र के द्वारा जब तक वह जीवित रहे पिता के निमित्त मे प्राद्ध देना चाहिए। प्रतिवाह यह प्रेत उस समय मे भोगो का लाभ किया करता है ॥ ११ ॥ दाह किये गये प्रेत के अपने जनो के द्वारा जो जन की प्रालि दी जाती है वह प्रेत परम प्रसन्न होता हुमा उससे यमालय को गमन क्या फरता है ।। १२ ।। बिना पकाय गये मिट्टी के पात्र में तीन दिन तक दूध देना चाहिए और तीन काष्ठो डोरी में बांधकर प्रेत को प्रीति के लिये चौराहे पर रख कर उस पर वह दुग्ध पात्र रग्रना चाहिए । प्रथम द्वितीय और तीसरे दिन में उसे इमो प्रकार से मा देवे । है सग! पाकाश में स्थित वायु के शेर को धारण करने वाला वह प्रेत उस दूध का पान पिया करता है और प्रमन्न होता है ॥१३॥१४॥ पतुर्थे सञ्चय काम्यः सर्वम्नु सह गोत्र । सत. सश्चयनादूपं गङ्गास्मों विधीयते ।।१५ ४१८ [ श्री गण्डपुराण द्वितीये च तृतीये च चतुर्थे वापि साग्निकः । अस्थिसञ्चयनादूवं दद्याज्जलाञ्जलि तत. ॥१६ न पूर्वाह्न न मध्याह्न नापराले च सन्धिपु। प्रात प्रथमयामेपु दद्यादाद्यजलाञ्जलिम् ॥१७ पुरण दत्तस्तैः सर्वोत्रज. सह वान्धवे । स्वजात्यः परजात्यैश्च देय पाद्यजलाञ्जलिः ॥१८ गन्तव्य नैव विप्रेगा दातु शूद्र जनाजलिम् । निवृत्ताश्च यदा तीराल्लोकाचारस्ततो भवेत् ॥१६ पञ्चत्वञ्च गते शूद्र यः काष्ठ नयतै चिताम् । अनुव्रजेत्तथा विप्रस्त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ।।२० विराने तु ततः पूर्णे नदी गत्वा समुद्रगाम् । प्राणायामशत कृत्वा घृत प्राश्य विशुध्यति ॥२१ चौथे दिन मै सबके द्वारा जिनमें गोत्र में उत्पन्न होने वाले भी सय सम्मिलित हो सञ्चय करना चाहिए प्रर्थात् अस्थियो का सञ्चय करे । इसके अनन्तर सञ्चयन के पश्चात् गङ्गा का स्पर्श किया जाता है। अर्थात् गङ्गठ में उनका प्रवाह किया जाता है ॥ १५ ॥ दूसरे-तीसरे और चौथे दिन मे भी माग्निको के द्वारा प्रस्थि--सञ्नयन से ऊपर फिर जलालि देनी पाहिए ॥ १६ ॥ पूर्णह्न में मध्याह्न मे-अपराह्न मे पोर सन्धिकालों में नहीं देवे व क प्रातः काल के प्रथम प्रहरी मे ही जनाजलि दे देनी चाहिए ।। १७ ॥ आध जलाजलि पुत्र के द्वारा ही देनी चाहिए। इसके मनन्तर उन सबके द्वारा जो गोत्रज हो-बान्धव हो और अपनी जाति के हो तथा पर जाति के हो जलाञ्जलि देनी चाहिए ॥ १८ ॥ शूद्र को जलाञ्जलि देने के लिये विप्र को कभी नहीं जाना चाहिए । जय तीर से निवृत्त होते हैं तो इसके अनन्तर लोकाचार हुमा करना है ।। १६ ! सिो शूट वणं वाले व्यक्ति के पञ्चत प्राप्त हो जाने पर अर्थात् मर जाने पर जो चिता के लिये कार ले जाar है तथा विप्र उसके पीछे पीछे जाता है तो यह तीन रात्रि तक अशुचि हो जाया करता है ।। २० ॥ तीन राधियो के पूण जाने पर समुद्र मामिनी नदी माधम लक्षण ] में जाकर एक सौ बार प्राणायाम करे और घृत का प्राशन करे तब यह विशुद्ध हुआ करता है ॥२१॥ शूद्रो गच्छति सर्वेषु वैश्य स्त्रिपु द्वयेऽपरः । गच्छति त्वेषु वर्णेषु विप्रो दातु जलाञ्जलिम् ।।२२ अधरोत्तरवस्त्राभ्या वस्त्रग्रन्थिन्च दापयेत् । एकवस्मः प्रदद्यात्त सदर्भञ्च तिलाललिम् ॥२३ यदा दातुञ्च गच्छन्ति दन्तधावनपूर्वकम् । त्यजन्ति गोग्रजाः सर्वे दिनानि नर काश्यप ॥२४ जलाञ्जलि यदा दातु गच्छति द्विजसत्तम । यस्मिन्स्थाने मिलेद्यस्तु अध्वन्यपि गृहेऽपि वा ।।२५ विश्लेपस्तु ततः स्थानादादाहा द्विहितो बुध । स्त्रीजनश्नाग्रतो गच्छेत्पृष्ठतो नरसश्चय: ॥२६ तत पाचमन कायं पापारणोपरि संस्थित । यावाश्च सर्पपान्दूर्वा पूर्णपाने विलोकयेत् ॥२५ प्राशयेनिम्बपनाणि स्नेहस्नान समाचरेत् । गोत्रजेन च कर्तव्य गृहान्न नव भोजयेत् ॥२८ शूद्र सभी वर्गों में जाता है--वैश्य तीन वर्षों मे जाया करता है- क्षत्रिय दो म भोर विप्र अपने ही वर्णो मे जलाञ्जलि देने को जाया करता है ।। २२ ।। अथो वस्त्र मोर उपरि वस्त्रो से वस्त्र की प्रन्थि दिलावे । एक ही वस्त्र याला दों के सहित तिलान्जलि देवे ॥ २३ ।। जिस समय मे जलाञ्जलि देने के लिये जावें तो दांतुन मादि करके ही जाना चाहिए । हे काश्यप ! गोत्रज सब नौ दिन को त्याग दिया करते हैं ॥ २४ ॥ द्विज श्रेष्ठ जिस समय में जलाञ्जलि देने के लिये जाता है तो जिस स्थान मे जो भी मिले-माग में और गृह में भी उस स्थान से दाह से लेकर बुध जनो के द्वारा विश्लेप बताया गया है । स्त्री जनो को प्रागे अर्थात् पहिले जाना चाहिए और उनके (पाच) में पुरुषों के समुदाय को जाना चाहिए ॥ २५ ॥ २६ ॥ इगके अनन्नर पापाण के कार सस्थित होते हुए पहुँचने वालो को प्राचमन करना चाहिए। पृष्ठ ४२० श्री गमागण और जितनी भी मर्पय हो उन्हें सपा दूर्ग (दूम) को पूर्ण पात्र में विलोकन परे ॥ २७ ॥ नीम पत्र सपो माने पाहिए पिर नेह स्नान करे। हमय पन व किमी गोत्रज दे द्वारा पाने की व्यवस्था परनी चाहिए। उम दिन पर मा मन नहीं साना नाहिए ॥२८॥ भुञ्जीत मृण्मये पात्र उतानञ्च विवर्जयेत् । मृतपस्य गुणा ग्राह्या यमगाया समुद्गिरेत् ॥२६ शुभाशुभी च घ्यायन्तः पूर्वकर्मोरसञ्चिती। अलब्धेन च देहेन भुइक्त सुकृतदुष्कृते ॥३० वायुस्पो भ्रमत्येव वायुः कुटपा रा गच्छति । दशाहे कर्म क्रियते जायते तेन मा कुटी ॥३१ क्षुधाविभ्रममापन्नो दशाहे यो न तर्पित । पिण्डेस्तस्य तदाऽन्नश्च प्राकारी भ्रमते तु स. ॥२ दिनमय वसेत्तोये अग्नी चापि दिनत्रयम् । आकाशे च वसेत्त्रीणि दिनमेकच वासवे ॥३३ गृहद्वारे श्मशाने वा तीर्थे देवालये तथा। यत्रादौ दीयते पिण्डस्तत्र सर्वान्समापयेत् ॥३४ एकादशाहे यच्छ्राद्ध तरसामान्यमुदाहृतम् । चतुर्णामपि वरना गुद्धये स्नानमिप्यते ॥३५ मिट्टी के बरतन में ही भोजन करे मोर उत्तान का विशेष रूप से वर्जन कर देवे । उनान याह जल को कहते हैं। जो पुरुप मृत्युगत हुपा है उसके गुरणो को ग्रहण करे मर्थात् गुणो का बखान करना चाहिए। तथा यमराज की गाथा को कहना चाहिए ॥ २६ ॥ मृतात्मा के पूर्व कमों के द्वारा उप सञ्चित किये गये शुभ और अशुभ मा ध्यान करे। अप्राप्त देह के द्वारा अपने सुकृत तया दुष्कृतो का भोग किया करता है ।। ३०॥ मृत प्राणी वायु स्वरूप होकर भ्रमण किया करता है और वह वायु कुटी में जाती है। दशवें दिन में जो दश गाव का कर्म किया जाता है उससे वह कुटी उत्पन्न हुमा करती है ॥३१॥ भुया के विभ्रम को पास होने वाला दसवें दिन मे जो तृप्त नहीं किया जाता पापमं लक्षण ] [ ४२१ चम समय में वह उगये पिएहों के साथ भौर वह अन्न या कार में भ्रमण रिया करता है ।। ३२ ।। तीन दिन तब जल में निवास करता है मौर फिर मार तीन दिन तक रहता है। पाकाम में तीन दिन पर्यन्त याम करता है पौर एक दिन बातव में रहता है ॥ ३३ ॥ घर के द्वार पर-मशान में-तीर्थ में पौर देवालय में जहां पर भी मादि में पिण्ड दिया जाता है वहाँ पर यह मक को गमापित किया करता है ॥ ३४ ॥ ग्यारहवें दिन में दो बार पिया जाता है वह सामान्य बताया गया है। चारों वर्गों की शुदि पे मियै स्नान परना ही अभीष्ट होता है ।।३।। कृत्वा चंपादगाह तु पुन स्नात्वा शुचिर्भवेत् । न भवेच्च यदा गोत्री परोऽपि विधिमा चरेत् ।।३६ स्त्री वापि पुरुष कनिदिष्टये कुरुते मियाम् । श्राद्ध पृत तु वस्त्रं स्तानि त्यक्त्वा गृह विगत् ॥३५ भगोत्रश्च मगोत्री या नगेनाम्बप्यपापिए। प्रयमेनानि य कुर्यात् ग दमाह ममापयेत् ॥३८ प्रशौच यावदेव म्यात्तापरिमोरप्रिया । चतुर्गामपि वनामेपर विधि [मृत ॥३॥ एकादगाई प्रैतम्य दद्यापिठ ममन्त्ररम् । मिधान्न नम्प दानपरापूमादा . द्वारप्रतिमास्यानि भालान्यानो तथा। विध गमगपरित गाया। मागप्रति प्रशगम मृतारे गामगि मगा। ग माम प्रपोग पागादा 10 घमाधम लक्षण ] । ४२३ दशी तिथि ऊनका होती है । और नवमी म जो मृत हुआ है उसकी भी चतुदशी तिथि लन का होती है। यह िक्ता जाननी चाहिए। कुशल पुरुष के द्वारा म त्यष्टि कम म इनका विचार आवश्यक है ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ एकादशाह मे जो नद्धरित हो और प्रेत के उद्दश्य से पाक पिया गया हो उस अन्न को चौराहे पर त्याग देवे और फिर स्नान करना चाहिए ॥ ४६ ॥ हे द्विजोत्तम । समस्त देवगण शम्या के दान की प्रशसा किया करत हैं। यह जीवित तो अनित्य है फिर पाछे कौन देगा? ममस्त ब धु गण और पिता आदि तभी तक हैं जब तक यह मनुष्य जीवित रहा करता है । मरने क पश्चात् मृतो क म तर का जान कर एक ही क्षण मे सारा स्नेह निवृत्त हो जाया करता है। मृत पुरुप इतनी दूर कही का कही हो जाता है कि फिर उससे भट ही नहीं हो सकती है---यह प्र तर समझ कर फिर गहरा स्नह भी एक दम जरा सी देर म श्वाम निकलने के साथ समाप्त हो जाया करता है ॥ ४७ ॥ ४० ॥ अपनी मदद करने वाला अपना ही प्रात्मा होता है अर्थात् अपना कल्याण स्वय अपने ही द्वारा किया जा सकता है। अपनी आ मा का प्रध पतन भी हम अपने ही द्वारा असतम करके किया व ते है प्रतएव प्रपो हम आप ही रिपु बन जाते हैं। प्रतएव जीवित रहते हुए ही पुप्पो का सञ्चय करना चाहिए-यही सोच विचार कर धम का स्मरण कर॥४६॥ मृताना क सुतो यचेत्त्छुभशय्या सतूलिकाम् । एव जीवति सवस्व स्वहस्तनव दापयेत् ॥५० तस्माच्छय्या समासाद्य सारदारुमयी शुभाम् । दन्तपत्रचिता रम्या हेमपट्ट रलकृताम् ।।५१ रक्तलिप्रतिच्छन्ना शुभशीर्पोपधानकाम् । प्रच्छादनपटीयुक्ता गन्धधूपाधिवासिताम् ।।५२ तस्या सस्थाप्य हैमञ्च हरि लम्या समन्वितम् । घृतपूणच कलश तव परिवल्पयेत् ॥५३ ताम्बूल कु कुमाक्षाद कपूरागुरुचन्दनम् । दीपकापानही छन चामरासनभाजनम् ॥५४ । यो गापुराण दान पाव पु स्थापयेद्भक्त्या गप्त धान्यानि च हि । शयनस्थन्च भवति यच स्यादुपकारकम् ॥५५ भृङ्गारकादर्शपचवणं वितानशोभितम् । शम्यामेवविधां कृत्वा ब्राह्मणाय निवेदयेत् ।।५६ सपत्नीकाय सम्पूज्य स्वर्लोपासुसदायिनी । वस्य: सुशोमनः पूज्य चोलक परिधापयेत् ॥५७ मृत पुरुषो के निमित्त कोन सा ऐसा सत्पुत्र है जो तूलिकापों मे युक्त महत माछो दाय्या का दान रिया करता है? तात्पर्य अाधी शय्या का विरना ही कोई सपूत पिया करना है मन्यया साना पूरी मान सब करते हैं । इम प्रकार से जीवित दशा में हो सर्वस्व या दान पपने ही हाय से सविधि मच्छी तरह से कर सेना पाहिए ॥ ५० ॥ प्रतएव सान की लकड़ी की बनी हुई बहुत ही अच्छी शय्या बनवा कर जोकि दन्त पनी से चित हो-परम सुन्दर हो भोर मौने वे पट्टो में स्वतंत हो। तथा रक्त तूलि से प्रतिन्छिन की हुई पोर बहुत अच्छे तषिये वाली ढांपने पे वस्त्र से युक्त कराये मोर उसे गन्ध घूप से मधिवासित करावे । उम पर सुवरणं की निर्मित श्री हरि की तया लक्ष्मी की प्रतिमा को विराजमान करे। वहां पर ही एक घृत से भरा हुमा कनश भी परि कल्पित करे ।। ५१ ।। ५२ ॥ ५३ ।। ताम्वूल-कुंकुमा क्षोद--पूर-गुरु चन्दन-दीपन-उहानह-छा (छाता )-धमर- पासन-भाजन (पात्र) मादि समस्त साहित्य-सामग्री उस शाम्या के पास में स्थापित करे तथा पूरणं भक्ति भाव के साथ सातो धान्य भी वहां पर स्थित करने चाहिए । ये सब शय्या पर डायन करने वाले के उपकारक पदार्थ होगे ॥ ५४ ॥ ५५ ।। भृङ्गारक ( भारी )-प्रादर्श (पीसा ) मोर पांच वणों से युक्त वितान से उसे शोभित भागये। इस प्रकार की शय्या को सुसम्पन्न कराके फिर ब्रह्मण के लिये दान में देवे ॥ ५६ ।। ब्राह्मण को उसकी पत्नी के महित समाहूत कर उसका भली भांति पूजन करे। इस तरह करने से यह स्वर्ग लोक में सुख प्रदान करने वाली होती है । ब्राह्मण को पूजा परम सुन्दर वस्त्र प्रादि से करे और चोलक उसे धारण करावे ॥१७॥ शम्या धर्म लक्षण ततोऽय॑श्च प्रदातव्यः पश्वरलजलाक्षतः । यथा कृष्ण त्वदीया हि अशून्या क्षीरसागरे ॥५८ सय्या भूयान्ममापीय तथा जन्मनि जन्मनि । एव तल्प तथा कृष्णं क्षमाप्य च विसर्जयेत् ॥५६ एकादशाहे सम्प्राप्त विधिरेपः प्रकीर्तितः । ददाति यदि धर्मार्थ बान्धवो बान्धले मृते ॥६० तरतेराप्यायितः प्रेतः परलोके सुखी भवेत् । विशेषमन पक्षीन्द्र कथ्यमान मया शृगु ॥६१ उपयुक्त तु तस्यामीद्यत्किञ्चिद्धि गृहे पुरा। तस्या गात्रं च यल्लग्न वस्त्र भाजनवाहनम् ।।६२ अभीष्ट यच्च तस्यासीत् तत्मवं परिकल्पयेत् । पुरन्दरपुरे चैव सूर्यपुत्रालये तथा ॥६३ उपतिष्ठत्सुख जन्तु शय्यादानप्रभावतः । पीडयन्ति न त याम्या पुरुषा भीषणाननाः ।।६४ इसके अनन्तर मध्य देवे जो कि पांचो प्रकार के रत्न, जल और अक्षतो से युक्त हो । इमक अनन्तर निवेदन करे, हे कृष्ण । जिस प्रकार से क्षीर सागर मे पापकी शय्या प्रशून्य रहा करती है वैसे ही यह मेरे शम्या भी जन्म जन्मा- न्तरो मे होये, इस प्रकार से तल्प प्रौर श्रीकृष्ण से क्षमा याचना करके फिर उमे विराजित करना चाहिए ॥५८।५६।। एकादशाह के प्राम होने पर यह विधि बनाई गई है यदि कोई बन्धु प्रपन यान्यव के मृत हो जाने पर धर्मार्थ ऐसा दान किया करता है ॥६॥ उन-उन दानो से परम प्राप्यायित (तप्स) प्रेत परलोक में मुखी हा करता है । हे पक्षीन्द्र । इममे जो विशेष तत्व की बात है उसे मैं कहता हूँ तुम उमका श्रवण करो ॥६॥ उम मृत पुरुष के जो कुछ भी पदार्थ पहिले घर में उपयोग में होने वाले हो मोर उस गाय में जो भी सलग्न हुए हों जैसे कोई यम्घ, भाजन और वाहन अदि होते हैं। उम मृत पुरप को जो भी प्रिय मोर अभीष्ट हो उस सबको परिवल्पित कर देना चाहिए मर्यान् दान में दे देदे । इममे इन्द्रदेश की पुगेम तथा यमराज के नगर में वह जन्तु युछ
[ था गरुडपुर
शम्या के दान के प्रभाव में मुग पूर्वक रहा करता है। वहां पर यमराज
महा भीषण दून उमको पीडित नहीं किया करते हैं ॥६२।६३६६४॥
न धर्मेण न गीतेन वाध्यते स नरः क्वचित् ।
शम्यादानप्रभावेण प्रेतो मुच्येत बन्धनात् ॥६५
अपि पापसमायुक्त. स्वर्गलोक स गच्छति ।
विमानवरमारूढः सेव्यमानोऽप्यरोगण. ॥६६
प्राभूतसंप्लवं यावत्तिष्ठेत्पातकजितः ।
नवकं पोडशश्राद्ध शम्यां संवत्सरक्रियाम् ॥६७
भर्या कुरुते नारी तस्याः श्रेयो भवेदिह ।
उपकाराय सा भर्जीवन्ती च मृता तथा ॥६८
उद्धरेज्जीवमाना सा पति सत्यवती सती।
स्त्रियोदद्यान्न शयने पुयो वापि गुणान्वितः ॥६९
प्रेतस्य प्रतिमा हैमी कु कुमञ्चवमञ्जनम् ।
वस्त्र भूपां तथा शय्यामेव कृत्वा च दापयेत् ॥७०
उपकारकर स्त्रीणा यद्भवेदिह किञ्चन ।
भूषण तत्र सलग्न वस्त्रभोगादिकञ्च यत् ।।७१
तत्मवं मेनयित्वा तु स्वे स्वे स्थाने निधापयेत् ।
पूजयेल्लोकपालाश्च ग्रहदेवान्विनायकम् ।।७२
इम दान के प्रभाव से वहाँ प्राणी घाम मौर शीत से भी बाधित नहीं
होता है । पारया के दान का ऐमा विशेष प्रभाव होता है कि वह प्रेत बन्धन से
मुक्त हो जाया करता है ॥६५॥ च हे पापो से भी युक्त क्यो न हो किन्तु इस
दान का ऐमा प्रभाव होता है कि वह स्वग लोक में गमन क्यिा करता है।
विमानी में प्रति श्रेष्ट विमान पर समारूद होता है और पराऐ उमकी मेवा
करती हैं ।।६६। जब तक भून सप्नव ( प्रलय कान ) होता है तब तक वह
समस्त पातको से रहित होकर वो पर समास्यिा रहा करता है। जो नागे
अपने स्वामी के लिये नवक, पोडश श्राद्ध गस दात पोर मम्वत्सर की समस्त
किया किया करती है उम नारी का इस लोक में भी परम श्रेय हुप्रा करना है।
[ ४२७ धर्माधर्म लक्षण - रह नारी जीवित रहती हुई अथवा मृत अपने स्मामी के उपकार के लिये हो होनी है ॥६७।६८॥ वह मारी जीवित रहती हुई परम सत्य वाली भोर राती होन के कारण अपने पति का उद्धार किया करती है। स्त्री को शय्या का दान करना चाहिए अथवा गुणो से युक्त पुत्र हो तो उसे शय्या का दान करना पाहिए ॥६६॥ प्रेत की सुवर्ण की प्रतिमा निर्मित करा कर उसे कु कुम अमन, वस्न, भूपण इन सबसे सयुत करके शय्या वा दान दिलाना चाहिए । १७०॥ यहाँ पर जो भी कुछ स्त्रियो के उपकार करने वाला होबे वह भूपण उराम मंलग्न करे मोर जो वस्त्र मादि भोग के योग्य पदार्थ हो यह सब मिला कर अपने-अपने म्यान पर रखे और सब लोकपालो को, ग्रहो को, देवगणो को था गणेश को पूजित करे १७११७२।। तत शुक्लाम्बर स्नात्वा गृहीतकुसुमाञ्जलि इममुच्चारयेन्मन्न विप्रस्य पुरतो बुध ॥७३ प्रेतम्य प्रतिमा ह्यपा सर्वोपकरणयुता । सवरत्नसमायुक्ता तब विप्र निवेदिता ।।७४ प्रात्मा शम्भुः शिवा गौरी शक सुरगरण सह। तस्माच्छाया प्रदातव्या एप आत्मा प्रसीदतु ॥७५ प्राचार्य्याय प्रदातव्या ब्राह्मणाय कुटुम्बिने । गृहीत्वा ब्राह्मण शय्या काऽदादिति च कीत्तयेत् ॥७६ वहुभ्यो न प्रदेयानि गोह गयन स्त्रिय । विभक्तदक्षिणा ह्यते दातार पातयन्ति ते ७७ इसके अनन्तर शुक्ल वरण के वस्त्र धारण करने तथा स्नान करके हाथो मे पुष्पो की अञ्जलि ग्रहण करके बुध को विप्र के मामने इस निम्न मात्र को उच्चाराम परे ॥७३॥ यह प्रेत की प्रतिमा है जो मम्पूर्ण उपकरणों से युक्त है और ममस्त रहनो मे समन्वित है । इस ह विप्रदेव । प्रापकी सेवा में समर्पित किया गया है ।।७४।। प्रात्मा गम्भु, शिव , गौरी और मु ममुदाय के साथ इन्द्रदेव इमलिय यह शय्या दी जाती है कि यह पात्मा प्रगत होवे ॥७॥ कुटुम्र वाले आचार्य ब्रह्मण वे लिये शय्या का दान परे । याहारण शय्या या
४२८ ।
। धी गरुडपुराण
धान ग्रहण करके किसने यह शय्या दी है-इमका बर्तन करे। गौ, गृह, शय
और स्त्री ये वस्तुएं बहुतो को नही देनी चाहिए। विभक्त दक्षिणा वाले थे
सब दान देने वाले का प्रध पतन कराया करते हैं। इसका तात्पर्य यह होता है
कि उपयुक्त वस्तुमो का दान किसी एक ही मुयोग्य सत्पात्र के लिये करना
चाहिये ।।७६७७॥
एव यो वितरेत्ताक्ष्य शृणु तस्य च यत्फलम् ।
साग्न वर्षशत दिव्यं स्वर्गलोके महीयते ॥७८
यत्पुण्यश्च व्यतीपाते कात्तिक्यामयने तथा ।
द्वारकायाञ्च यत्पुण्यश्चन्द्रसूय्यग्रहे तथा ७६
प्रयागे नैमिषे यच्च कुरुक्षेत्र तथाई दे।
गङ्गाया यमुनायाञ्च सिन्धुपागरसङ्गमे ।।८०
शम्यादानप्रभावेण तत्तत्फलमवाप्नुयात् ।
यत्रासौ जायते जन्तुर्भुत तत्र व तत्फलम् ।।८१
कर्मक्षये क्षितो जातो मानुप शुभदर्शनः ।
महाधनी च धर्मज्ञः सवशास्त्रविशारद. २
पुन स पाति वैकुण्ठ मृतोऽसो नरपुङ्गवः ।
दिव्य विमानमारुह्य अप्सरोभि समावृत ।
अझै मौ हव्यकव्येषु पितृभि सह मोदते ।।८३
हे साक्ष्य । इस रीति मे जो वितरण किया करता है उसके करने से
जो फल होता है उसका तुम श्रवण करो। वह मागै पाने वाले दिव्य सौ वर्ष
तिक स्वर्ग लोक मे प्रतिष्टित होकर सुखोपभोग करती है ॥७८ । जो
पात मे, कात्तिकी पूणिमा मे, प्रयन मे, द्वारका में होता है तथा जो पुण्य चन्द्र
मौर सूर्य के ग्रहण के समय मे होता है ।।७६|| प्रयाग मे, नैमिष क्षेत्र में, कुरु-
क्षेत्र मे, भकुंद मे, गङ्गा में, यमुना में मार सिन्धु तथा सागर के सङ्गम में जो
पृण्य होता है वही पुण्य शरपा चे दान के प्रभाव से प्राप्त हुण करता
है', नाहीयक सहसा है यहाँ पर है। उपना फल भी मोगा करता
है ८०१८॥ कर्मों के क्षय हो जान पर यह शुभ दशन मानव भूमि पर उत्पन्न
पुरय व्यती-
[ ४२६
थाद विधान वर्णन ]
मा करता है। जब यह इस भूमि पर जन्म ग्रहण करके भाता है तो बहुत
वडा पनी, घर्ग का पूर्ण ज्ञाता और मब शास्त्रो का महान् पण्डित होता है ।
यह मनुष्यो में परम श्रेष्ठ पुरुष यहां मनुष्य जीवन के सुम्पो का उपभोग कर
पुन: मृत होकर बैकुण्ठ लोक मे प्राप्त होता है । जब यह यकृष्ठ को जाता है तो
एक दिव्य पर समारूढ होकर अनेक अप्मरामों के द्वारा ममावृत होकर जाया
करता है । यह फिर हव्य मोर कथ्यो मे योग्यता प्राप्त करने वाला होकर पितृ.
Tण के साथ मोद प्राप्त किया करता है ।।८२२८३॥
२५-श्राद्ध विधान वर्णन
अपरं मम सन्देह कथयस्व जनार्दन ।
पुरुपस्य च दृष्ट वा वै मातर मृतिमागताम् ।।१
पितामही जीवति च तथैव प्रपितामही ।
वृद्धप्रपितामही तद्वन्मातृसक्त पिता तथा ॥२
पितामहप्रपितामही वृद्धश्च प्रपितामह ।
फेन सा मेल्यते माता एतत्व थय मे प्रभो॥३
पुनरुक्त प्रवक्ष्यामि सपिण्डीकरण सग।
उमा लक्ष्मीमहावाणी सेवाभिमलयेद्ध वम् ।।
प्रय. पिउभुजो ज्ञेयास्त्याजका प्रय. स्मृताः
जय पिंडानुलेपाच दशम. पक्तिसग्निधौ ॥५
इत्येते पुष्पा स्याता पितृमातृकुलेषु न ।
तारयेद्यजमानस्तु दशपूर्वान्दशापरान् ॥६
सपिठ म भवेदादौ मपिडीकरणे कृते ।
अन्त्यस्तु त्याजनोज यो वृद्धस्तत्प्रपितामह 10
गाड ने पहा- जनार्दन । मुझे एक पौर मोह हो गया है उसे
पाप पपा पग्लिए । यह मन्देह पुराण को मृत्यु से प्रात मामारी देगारी
गया है॥१॥ प्रभो ! तिमही-प्रपितामही और दृर प्रपितामही जीवित
हैं सपा मार मा पिता-पितामह मोर पृर प्रतिमा भी जोषित है
४३० ] [श्रो गरुडपुराण तो ऐमी दशा में सपिण्डी वरण कर्म में वह माता किम के माप मेलित जाती है ? इसे कृपा कर समझाइय ॥ २ ॥ ३ 11 भगवान् श्री कृष्ण ने कहा- मी हे खग । पहिले कहे हुए इस सपिएडी करण को फिर बतलाता हूँ। माता को उमा--लक्ष्मी और सरस्वती के साथ सम्मिलित करना चाहिए ।। ४ ।। तीन पिहों के उपभोग करने वाले जानने चाहिए और याजक भी तीन बताये गये हैं । तोन पिडानुलेप होते हैं तथा दशवा पक्ति सन्निधि मे होता है ॥५॥ पिता और माता वे कुलो में य इतने पुरष स्यात हैं। यजपान 'दश पूर्व के और दश भागे होने वाले पुस्पो (पोडिपो) को तार दिया करता है । ॥ ६ ॥ सपिंडी करण करने पर आदि मे यह मपिंड हाता है। जो अन्त्य होता है वह त्याजक होना है जमे वृद्ध प्रपिता मह है ॥७॥ अन्त्यस्तु त्याजको यस्तु लेपक प्रथमो भवेत् । लेपकस्त्वन्तिमो यस्तु स भवेत्पक्तिसन्निधौ ।। यजमाना भवेदेका दशपूर्वे दशापरे । इत्येते पितरो ज्ञया एकविंशतिशाश्वता ॥ विधिना कुरते यस्तु ससारे श्राद्धमुत्तमम् । ददते नात्र सन्देह शृणु तस्यापि तत्फलम् ।।१० पिता ददाति पुनान्वै गोधनञ्च पितामह । हेमदाता भवेत्सोऽपि यस्तस्य प्रपितामह ॥११ कृते थाद्ध गुणा ह्यते पितृरणा तर्पणे स्मृता । दद्याद्विपुलमन्नाद्य वृद्धस्तु प्रपितामह ॥१२ यस्य पु सश्च म] वै विच्छिन्ना सन्तति खग। स बसेन्नरके नित्य पडू मग्न करी यथा ॥१३ योन्यन्तरे हि या जातो वृक्ष पक्षी सरीसृप । न सन्ततिविनाशेऽपि मुच्यते नरकाध्रुवम् ॥१४ अत्य जो स्याजक होता है तो लपक प्रथम होता है । यो लेपक अन्तिम होता है तो पति मनिधि म होता है ।। ८ ।' एक यजन करने वाला यजमान है पोर दश प्रथम पुरुष पौर दश मागे होने वाले पुरुष इस प्रकार से ये सब द विधान वर्णन ] । ४३१ र मिल कर इकाीस शाश्वत पितृगण होते हैं उन्हे समझ लेना चाहिए ।।६।। । इस संसार में विधि के साथ उत्तम प्राद्ध किया करता है वह फल प्रवक्ष्य । देना है-इसमे कुछ भी सन्देह नही होता है उसका भी यह फन अषण रो॥ १० ॥ पिता पुत्रो को देता है-पितामह गोधन देता है। जो उसका पितामह होता है वह हेम (मुवर्ण) पा देने पाना होता है ॥ ११ ॥ श्रास करने पर ये गुण होते है जो पितृगण के तर्पण होने पर हुआ करते है। गो युद्ध प्रपितामह होता है वह सन्तृप्त होकर विपुल (बहन) पन्न प्रादि दिया रते हैं ।। १२ ।। हे खग ! जिस पुरुष को इग मनुष्य लोक में सम्नति विभिन्न हो जाती है वह नित्य हो नरक में दल-दल में निमग्न हामी घे तरह निवास दिया करता है ॥ १३ ॥ जो दूगरी योनि में जैमै वृक्ष-पक्षी पौर सरी मर्प मादि में सस्पन्न हो गया है यह मन्तति के विनाश होने पर भी निधय हो नरक से मुक्ति नही पाया करता है ॥१४॥ प्राचार्यस्तस्य गिप्यो वा दूरतोऽपि हि गोग्रज । नारायणलि पुत्तिस्योद्द गेन भक्तिन ॥१५ विमुक्त सर्वपापेभ्यो मुक्त. स नरकाव्यम् । म्वर्ग च स वसेन्नित्य नात्र कार्या विचारणा ॥१६ प्रादौ कृत्वा धनिष्ठाञ्च एतन्नक्षयपञ्चकम् । रेवत्यन्त मदा तस्य अशुभ मर्वदा भवेत् ॥१५ दामस्ता न यर्सभ्यो विप्रादिमवंजातिपु । दीयते न जल 67 प्रगुभ मवंदा भवेत् ।।१८ लोकयाना न फत्तंव्या दु मार्शः पजना यदि । गन्नपानन्नर तम्प वर्तव्य सर्वमन्यथा ॥१६ पुत्राणा गोमिणा तम्य मन्नापी व पजायते । गृहे हानिर्भवेतम्य प्राओषु मृतम्य च ॥२० नयापि क्षमध्ये तु दाहन विधिपूर्वर मानुपागा रिसार्याय सस्य मातिमारणात् २१ [ श्री गपुगंग ऐसे पुरुष का आचार्य या उसका कोई शिष्य भयका दूर मे रहने वाला कोई गोत्रज उसके उद्देश्य से भक्ति-भाव के साथ नारायण बलि करता है तो यह सब तरह के पापो मे विमुक्त होता हुपा निश्चय ही नरक से छुटकारा पा जाता है और फिर वह नित्य ही स्वग म जाकर के-निधास प्राप्त किया करता है-- इसमे कुछ भी विचार करने की आवश्यक्ता नही है ।। १५ ।। १६ ॥ मादि मे घनिष्ठा और इस से लेकर रेवती के रात तक पांच नक्षत्र सदा उसके लिये अशुभ होते हैं । इम पञ्चक में विप्र प्रादि सम्पूर्ण जातियो मे दाह नहीं करना चाहिए । इन पांचो नक्षत्रो मे जल भी नहीं दिया जाता है क्योकि यह भी सर्वदा अशुभ होता है ।। १७ ॥ १८ ॥ इस तमय मे लोक यात्रा भी नहीं करनी चाहिए। यदि कोई स्वजन दु ख से प्रात्त हो तो पञ्चको क पश्चात् उसका सभी कुछ करे । नही तो उसके पुत्रो को और गोत्र वालो को सन्ताप उत्पन्न हो जाता है । इन उक्त नक्षत्रो म मृत होने वाले के घर में भी हानि होती है ।। १६ ।। २० ।। तो भी नक्षत्रो के मध्य मे विधि पूर्वक दाह हो जाता है । तुरन्त आहुति के कारण से मनुष्या के हित के लिय ही वह होता है ।२१। सद्य आहुतिद पुण्य तीर्थ तद्दाह्यमुत्तमम् । विनियमित कायो मन्त्रंस्तु विधिपूर्वकम् ॥२२ शवस्य तु समीपे च क्षिप्यन्ते पुत्तलास्तत । दर्भमयाश्च चत्वार क्षमन्नाभिपूजिता ।२३ ततो दाहश्च कर्तब्ध तैश्च पुत्तलक सह । सूतकान्ते तत पुन कुर्य्याच्छान्तिकमुत्तमम् ।।२४ पञ्चकेपु मृतो योऽमौ न गति लभते नर. । तिलान्गाञ्च हिरण्यञ्च तस्योद्द शे घृत ददेत् ।।२५ विप्राणा दीयते दान सर्वोपद्रवनाशनम् । सूतथान्ते सुतैरेव स प्रेतो लभते गतिम् ॥२६ भोजनोपानही छत्र हेम मुद्रा च वाससी । दक्षिणा दीयते विप्रे भवपातवमोचनी ॥२७ [ ४३३ घाद्ध विधान वर्णन ] यूनो वृद्धस्य वालस्य पञ्चकेपु मृतस्य च । विधान यो न कुर्वीन विघ्नस्तस्य प्रजायते ॥२८ सद्य पाहुति के देने वाला पुण्य है । उमका दाह तीर्थ मे परम उत्तम होता है । विप्रो के द्वारा मन्यो से विधि के सहित यह कार्य नियमित होना है। शव के समीप मे इसके अनन्तर दर्भो से पूर्ण चार पुत्तल नक्षत्रों के मन्नो द्वारा अभिपूजित करके प्रक्षिप्त किये जाया करते हैं ।।२२।२३।। इपके पश्चात् उन पुत्तलको के सहित उस शव का दाह करना चाहिए । जब इस मृतक का आशौच समाप्त हो जाय तब पुत्र को उन पञ्जका की उत्तम मविधि शान्ति भी करनी चाहिए ।।२४॥ पञ्चको मे जो मनुष्य मर जाता है मुगति को प्राप्त नहीं किया करता है। उस मृतक के उद्देश से तिल, गो, सुवर्ण और घृत का दान करे । ॥२५॥ विप्रो को जो दान दिया जाता है उससे सभी प्रकार के उपद्रो का पूर्णतया विनाश हो जाया करता है । सूनक के अन्त मे पुत्रो के द्वारा इस प्रकार पञ्चक शान्ति के लिये विप्रो को दान देने पर वह प्रेत सुगति को प्राप्त हो जाता है ॥२६॥ भोजन, उपानह (जूनी), छाता, सुवर्ण मुद्रा, वस्त्र, और दक्षिणा ये सब जिम ममय विप्र को दिये जाते हैं तो इस समार में होने वाले पातको से मोचन (छुटकारा) हो जाया करता है ॥२७।। चाहे कोई युवा हो या वृद्ध हो तथा बालक हो यदि धनिष्ठ दि पांच नक्षत्रो म मर जाना है तो उसकी शान्ति अवश्य हो कगनी चाहिए। यदि कोई पञ्चक-शान्ति के विधान को प्रमाद से, प्रश्रद्धा से या अन्य किमी भी कारण से नहीं करता है तो उसको विन मवश्य ही हो जाया करते हैं ॥२८।। अष्टादर्शव वस्तूनि प्रेतश्राद्ध विवर्जयेत् । प्राशिपो द्विगुणा दर्भा स्वस्त्यस्तु प्रणवस्तथा ॥२६ अग्नीकरणमुच्छिष्ट श्राद्ध व वैश्वदविकम् । विकिरश्च स्वधाकार पितृशब्दो न चोच्यते ।।३० अनुशब्द न कुर्वीत नावाहनमयोल्मुकम् । प्रासीमान्त न कुर्वीत प्रदक्षिणाविमजनम् ॥३१
४३६ ]
[ श्री गरुडपुराण
शातिसम्बन्धिनामेव व्यवहार गगेश्वर।
विलुप्य जातिधर्मश्व प्रेत पापेन लिप्यते ।।४७
इम भांति से यदि शव या विधान नहीं दिया जाना है तो वहाँ पर
पिशाचो का परिभव उत्पन्न हो जाता है। रात्रि में शव के निर्गमन करने में
खेचर मादि का भय होता है । विमी भी समय मे गन यो मूना नही छोड देना
पाहिए । सम्पर्श करन में दुर्गनि हानी है ॥४२॥४३॥ ग्राम के मध्य में प्रेत के
स्थित रहने पर प्रात् गांव में विसी गृतर का शव ग्वा रहे मोर कोई अपनी
इच्छा से मान को खा लेता है तो वह प्राप्त मास पी ही मानि हुमा फरसा है।
पौर जो जन पीता है वह जल खून के सहा होता है ॥४४।। ताम्यूल का
चर्वण करना, दन्त घावन, भोजन और ऋतुकाल का सेवन करना य काम
ग्राम के मध्य में प्रेत स्पित हाने पर अर्थात् जब तक मृतक का दह ग्राम में
रहे वजित कर देवे। इसी तरह पिण्डो का पान भी न करे ॥४५॥ स्नान,
दन, जप, होम तर्पण और देवो का पूजन परना ये भी मव ग्राम के मध्य में
प्रेत के रहते हुए करना व्यर्थ मर्यात् फल शून्य हुमा करते हैं । जाति के धर्म से
इनका करना निष्प्रयोजन होता है । है खगेश्वर । ज्ञाति मोर सम्बन्धियो क
व्यवहार को तथा ज्ञाति के धम को विलुम परक प्रेत पाप म लिप्त होना
है ॥४६॥४७
२६-तीर्थ माहात्म्य और अनशन व्रत
कस्मादनशन गुण्यमक्षय गतिदायकम् ।
स्वगृहन्तु परित्यज्य तीर्थे वै म्रियते तु य ॥१
अप्राप्य तीर्थ म्रियेत गृहे मृत्युवराजत ।
भूत्वा कुटीचरो यस्तु स का गतिमवाप्नुयात्।।२
सन्यास कुस्ते यस्तु तीर्थे वापि गृहेऽपि वा।
क्थ तस्य प्रकर्त्तव्य अप्राप्त निधने तथा ॥३
नियम यत्कृत देव चित्तभङ्गो हि जायते ।
केन तस्य भवेत् सिद्धियंत्कृतैरन्यथाकृतः ॥४
- तीर्थ माहात्म्प और अनशन व्रत [ ४३७ कृत्वा निरशन यो वै मृत्युमाप्नोति कोऽपि चेत् । मानुपी तनुमुत्सृज्य मया तुल्यो विराजते ॥५ या पन्त्यहानि जीवेत व्रते निरशने कृते । अनुभिस्तानि तुल्यानि समग्रवरदक्षिणे ॥६ तीर्थे गृहे वा सन्यास नीत्या चेम्रियते यदि । प्रत्यह लभते सोऽपि पूर्वोक्ताद्विगुण फनम् १७ गरुड देव ने प्रश्न किया कि जो अपने गृह का परित्याग करके तीर्थ म जाकर मरता है उसका अनशन करना कैस अक्षय पुण्य होता है और सुगनि का प्रदान करन वाला भी हुप्रा करता है ॥ १ ॥? मिमी तीथ में न पहुंच पर घर में ही मृत्यु क वशोभून जो हो जामा है और कुटीचर सयामी होकर रहता है वह किस गति को प्राप्त हुप्रा करता है ॥२॥? जो पुरुप किमी तीर्थ स्थल मे या गृह म म याम धारण कर लेता है और निधन ( मृत्यु ) + प्रणाम होने पर उसका किस प्रकार से करना चाहिए ।३।। ह देव । जिम नियम प करने पर चित्त का भङ्ग हो जाता है तो उसके हाने पर किम उमको सिद्धि हुप्रा करती है । उन व क्यि जान पर या अन्यथा विय जान पर ? श्री भगवान् ने कहा-यदि कोई भी निग्शन करक मृत्यु का प्राप्त किया करता है वह इस मनुष्य का परित्याग करके मरे तुल्य हाकर विगप्रमान रहा करता है ।। ५ ।। निरयन वन करने पर जितन दिन तक जीवित रहता है वे दिन ममस्त वर दक्षिण ऋतुप्रा ये महश हुमा करते ॥६॥ यदि कोई पुरुप तीर्थ मे या घर म सन्यास प्राण करव मृयु को प्राप्त होता है ता वह भी प्रतिदिन पहिन बताय हुए से दुगना पन प्राप्त करता है ॥७॥ महारोगोपपत्ती च गृहीतग्नशने मृत । पुनर्न जायत गेगा दववद्दिवि मोदत ॥८ प्रातुर सन्म सन्याम गृहाति यदि मानव । पुनर्जातश्च सयुक्तो भवद्रागंश्च पात ॥ ग्रहन्यहनि दाव्य ब्राह्मणानाञ्च मोजनम् । तिलपाय यथाशक्ति दीपदान गुगर्ननम् ॥१० ४४० ] [ यो गरुडपुराण मोर पोछे कभी भी मिथ्या भाषण नहीं करना चाहिए और सब प्रकार से धर्म का माचरण करना चाहिए ॥२१॥ तीर्थ गत्वा त य कोऽपि पुनरायाति वै गृहे । अनुज्ञात. शुभविप्रै प्रायश्चित्तमयाचरेत् ॥२२ दत्त्वा सुवर्णदानानि गोमहीगजवाजिनः । तीर्थ यदि लभेद्यस्तु मृत्युकाले स भाग्यभाक् ।।२३ गृहात्प्रचलितस्तीर्थ मरणे ममुपस्थिते । पदे पदे तु गोदान हिसा नो वर्तते यदि ।।२४ स्वगृहे यत्कृत पाप तीर्थ स्नानविशुध्यति । तत्र देयानि दानानि पक्षयानि सदा खग ॥२५ कुरुते तत्र चेलाप वज्रलेपसम हि तत् । क्लिश्येत्पापर्न सदेहो यावच्चन्द्रार्कतारकम् ॥२६ आतुरे सति देयानि निर्धनरपि मानवः । गावस्तिला हिरण्यश्च सप्तधान्य विशेपत. ॥२७ दानवन्त नर दृष्ट्वा हृष्टा. सर्वे दिवौकस । ऋपिभिः सह धर्मेण चित्रगुप्त न वै तथा ॥२८ तीर्थ में जाकर जो कोई फिर घर में प्राता है तो उसे विप्र गण की प्राज्ञा प्राप्त करके प्रायश्चित्त करना चाहिए ।। २२ ।। सुवर्ण का दान-गो- भूमि-हाथी पोर प्रश्च का दान देकर जो कोई मृत्यु के समय मे तीर्य का लाभ प्राप्त करता है तो वह बडा भाग्यशाली होता है ।। २३ ।। मृत्यु काल के उपस्थित हो जाने पर जो अपने घर में किसी तीथं को चल दिया है और यदि कोई भी हिमा का भाव विद्यमान नहीं होता है तो उसके एक एक कदम पर गोदान का पुण्य-फन हुप्रा करता है। २४ ॥ अपने घर में जो भी कुछ पापा. चरण किया है वह सभी तीर्थ के म्नान करके विशुद्ध हो जाया करता है । हे खग । ती मे दिये हुए दान मदा अक्षय हुमा करते हैं ॥ २५ ॥ यदि तीर्थ में पहुंचार कोई पापका कम किया जाता है तो वह वचलेप मर्यात प्रत्यत मुदृढ़- हो जाया करता है। उन पापो में जब तक मूय प्रौर चन्द्र स्थिर रहा करते ની माहात्म्य भौर अनशन प्रत ] है तब तक उन तीर्थ मे किये हुए पापो से यह जीवात्मा वतैश भोगा करता है-इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है ॥ २६ ॥ प्रातुर की अवस्था प्राप्त होने पर दान हीन मनुष्यो को भी गौ-तिल-सुवर्ण और विशेष रूप से सात धान्यो का दान अवश्य करना चाहिए ।। २७ ॥ दान शील नर को देख कर सब दवगण परम प्रसन्न होते हैं। समस्त सृपीगण धर्मराज और चित्रगुप्त को भी बहुत हप हुअा करता है ॥२८॥ स्वतन्त्र हि धन यावत्तावष्टि समर्पयेत् । पराधीन मृते सर्व कृपया को हि दास्यति ॥२६ पिनुद्दे शेन ये पुर्धन विप्रकरेऽपितम् । आत्मन साधन तस्तु कृत पुत्रप्रपौत्रक १३० पितु शतगुण पुण्य सहस्र मातुरुच्यते । भगिन्य शतसाहस्र सोदये दत्तमक्षयम् ॥३१ यदि लोभान्न यच्छन्ति काले ह्यातुरसज्ञके । मृता शान्ति ते सर्वे कदा. पापिनस्तथा ॥३२ अतिक्लेशेन लब्धस्य प्रकृत्या चञ्चलस्य च । गतिरेकव वित्तस्य वानमन्या विपत्तय ॥३३ मृत्यु शरीरगातार वसुरक्ष वसुन्धरा । दुश्चरित्रेव हसति स्वपति पुत्रवत्सलम् ॥३४ उदारो धामिक सौम्य प्राप्यापि विपुल धनम् । तृणवन्मन्यते तायं प्रात्मान वित्तमित्यपि ॥३५ न चंवोपद्रवस्तस्य मोहजाल न चेन हि। मृत्युवाले न च भय यमदूतसमुदयम् ॥३६ समा महवाणि न सप्त व जले दयमग्नी तपने च पोडगा। महाहवे पष्टिरशीनिगोग्रहे धनाश भारत चाक्षया गति ॥३७ जितना धन वमन है उअना मब विप्र की सेवा म मरिन पर देन पाहिए । मृतु हो जान पर तो गभी कुछ जो भी तुम्हारा है पराये मधीः हो जायगा पिर TI पर कोन दगा ॥ २६ ॥ अपने पिता के सारण हो ४४२ ] [ श्री गटपुगड के उद्देश्य से जिा पुत्री ने धन पो विप्रो के हाथ में दान म्प मे भपिन रिय है उन पुत्र-पौत्रो ने अपनी पात्मा का साधन सम्पन्न पर लिया है ॥३०॥ पिता के उद्देश्य से दिये हुए का शनगुग्ग फर होता है। माता के लिये दिया हुपा हजार गुना होना है-भगिनी के लिये दिया हुपा सो सहम गुना और सगे भाई के उद्देश्य से दिया हुमा मक्षय होता है ॥ ३१॥ यदि लाभ में वशीभूत होकर पातुर की सजा वाले के समय मै नहीं देते हैं तो मृत होकर वे सब कदभ और पापात्मा मोचा करते हैं अर्थात् पपशोच ही किया करते हैं ।। ३२ ।। अत्यन्त क्लेश के द्वारा प्राप्त होने वाले और प्रकृति से चञ्चल इम धन की एक ही उत्तम गति दान करना है और पन्य सब विपत्तियां ही है । ॥ ३३ ॥ शरीर की रक्षा करन वाले पुरुप को मृत्यु मोर घन की रक्षा करने वाले का यह वसुन्धरा पुत्र पर प्रेम करने वाले अपने पति को दुष्ट चरित्र वाली स्त्री के समान हमा करती हैं ॥ ३४ ॥ ज्दार-पामिक और सौम्य भी पुरुष विपुल धन प्राप्त करके हे ताक्ष्यं । उस बहुत से धन को और अपने मापको भी एक तृण की भांति समझा करता है ॥ ३५॥ ऐसे उस पुरुष को कोई भी उपद्रव नहीं होता है-न कोई मोह का जाल होता है भौर मृ यु के समय माने पर उसे किसी भी प्रकार का भय भी नहीं होता है जो कि यमदूतो के द्वारा समुत्पन्न पाम तौर पर सबको हुमा करता है ।। ३६ ॥ एक हजार सात वर्प जल मे-एक सहस्र ग्यारह अग्नि मे और एक सहस्र सोलह तपन मे--- साठ महाहव मे और प्रस्सी मनाशक गोग्रह मे हे भारत। उसकी अक्षय गति होती है ।।३७॥ २७- उदकुम्भ प्रदान विधि उदकुम्भप्रदान मे कथयस्व यथातथम् । विधिना केन दातव्या कुम्भास्ते कतिसस्यया ॥१ किलक्षणा केन पूर्णा कस्मै देया जनादन । कस्मिन्काले प्रदातव्या प्रेततृप्तिप्रदायका ॥२ सत्य ताक्ष्य प्रवक्ष्यामि उदकुम्भप्रदानकम् । प्रेता शैन दातव्यमन्नपानीयसयुतम् ॥३ उदयुम्भ प्रदान विधि ] . मानुपस्य शरीरे तु अस्थ्नामेव तु सञ्चयः । सख्यातः सर्वदेहेपु पष्टयधिकशतत्रयम् ॥४ उदकुम्भेन पुष्टानि तान्यस्थीनि भवन्ति हि । एतस्माद्दीयते कुम्भः प्रीति. प्रेतस्य जायते ॥५ द्वादगाहे च पण्मासे विपक्षे वाथ वत्सरे । उदकुम्भाः प्रदातव्या मार्गे तस्य सुसाय वै ॥६ सुलिप्त भूमिभागे तु पक्वान्नजलपूरिता. प्रेतस्य तत्र दातव्यं भोजनञ्च यदृच्छया ॥७ थी गरुड देव ने निवेदन किया-हे भगवन् ! जल कुम्भ के दान के विषय में ठीक-ठीक मुझो ममभाइये । थे जल में कुम्भ संख्या मे कितने होने चाहिए और किम विधि से उनका दान करना चाहिए ? ॥१॥ है जनो को पीडा में मदन करने वाले ! वे कुम्भ किस स्वरुप के होते हैं मोर किसमे पूर्ण विये जाते है तथा किराको वे दान में देने चाहिए ? वुपा फर यह भी बताइये-उनका दान किम ममय में करना चाहिए जिससे ये प्रेत की तृप्ति में करने वाले होते हैं ? ॥२॥ श्री भगवान ने उत्तर दिया-हे ताप्यं ! यह गर्वथा तुम्हारा पूछना सत्य एवं यथार्य है। मैं अब उद दुम्म के प्रदान के सम्बन्ध मे यतताता हूँ। प्रेत के उद्देश्य मे प्रप्त पोर जल म समन्वित कर के हो दान करना पाहिए । ॥३॥ इस मानव के शरीर में पम्पियो ( हड्डियों ) के संचय को हो गया। किया जाये ता तीन गो माठ होती हैं ॥१॥ उद पुम्न मे ये मधिया परिपुष्ट हुपा करती है। पतिय ही कुम्म दिया जाता है और इसमे तारमा यो म प्रता हुपा करती है ।।५।। उम प्रेस को यमपुरी के महा माग के लिय द्वादशाह मे, परमाम मे, विपक्ष में प्रौर उम दिन मे उदयुम्भ पाहिए ॥६॥ भूमि के भाग यो भनी मानि मीर उम पर पयमान मोरवन मे पूरित करके उर पुम्भो । दान गरे। यहां पर यहधा से प्रेतारमा भोपन भी देना पाहिए ॥७॥ सुप्रीतम्तेन दागेन प्रेतो याम्यः मह अनेन । द्वादमा यिोग घटान्दाग यमान् 15 की प्राप्ति ४४४ ॥ [ श्री गरुडपुराण एकापि वर्धनी तत्र पक्वान्नजलपूरिता । विष्णुमुद्दिश्य दातव्या सङ्कल्प्य ब्राह्मणाय वै ॥ एका वै धर्मराजाय तेन दत्तेन मुक्तिभाक् । चित्रगुप्ताय चैका तु गतस्तत्र सुखी भवेत् ॥१० पोड़शाा प्रदातव्या माषान्नजलपूरिताः । उत्क्रान्तिश्राद्धमारभ्य श्राद्ध पोडशके कृते ॥११ पोडश ब्राह्मणांव व एकैकं विनिवेदयेत् । एकादशाहात्प्रभृति देयो नित्य घटाब्दकः ॥१२ पक्वान्नजलसम्पूर्णा यावत्सवत्सर दिनम् । एकाच वर्तनी तत्र वशपात्रोपरिस्थिताम् ॥१३ वस्त्रराच्छादिताञ्चैव सयुक्ताञ्च सुगन्धिभिः । ब्राह्मणाय विशेपेण जलपूर्णा प्रदापयेत् ।।१४ अहन्यहनि सङ्कल्प्य विधिपूर्व घट खग। ब्राह्मणाय कुलीनाय वेदव्रतयुताय च ।।१५ सत्पात्राय प्रदातव्या न मूर्खाय कदाचन । समर्थो वेदवित्ताढयस्तरणे तारणेऽपि च ।।१६ उम दान से परम प्रमन्न होता हुप्रा प्रेत यम के दूतो के माथ उप पर- लोक के महान् माग मे गमन किया करता है। बारहवें दिन में विशेष रूप से बारह घटोका दान करे ।।। एक वर्धनी भी उस दिन में पक्व अन्न-जल से परिपूर्ण कर भगवान् विष्णु का उद्देश्य करके मड़ल्प करके ब्राह्मण को देवे । हा एक धर्मराज के लिये देवे । इमके देने से मुक्ति का भागी होता है। एक चित्रगुप्त का उद्देश्य करके भी देनी चाहिए जिससे वहाँ जाने पर वह मुख वाला होवे ॥१०॥ माप अग्न और जल मे पूरिन करके पोडश अध्यं देने चाहिए। उरक्रानिधान या प्रारम्भ करसे पोडशक श्राद्ध करने पर सोलह ब्राह्मणो को एक-एक निवेदिन परे । एकादशाह मे लेार वर्ष भर निस्य घट देवे ॥११॥१२॥ सम्वत्सर में जितने दिन हो उतने ही घट पाच अन्न जल में पूरित करके देवे पौर एक वंशपात्र ऊपर में स्थित करके देये ॥१३॥ उम वघंनी को वस्त्रो न तीर्य और मोक्ष क्थन ] [ ४४५ , 1 ममाच्छादित करे और मुगन्धिन पदार्थों मे संयुन करे फिर विशेष रूप से जन से पूर्ण करके ब्राह्मण के लिये दान देवे ॥१४॥ हे खग ! दिन प्रतिदिन पङ्कल्प करके विपि के साथ घट को किसी अच्छे कुल में उत्पन्न और वेद-प्रत में युक्त ब्राह्मण के लिये दान करना चाहिए। यह दान किमी सत्पात्र को ही देवे, मूर्ख ब्राह्मण को नहीं देना चाहिए ! ऐसे किमी सुयोग्य विप्र को दान देवे जो वेद के धन से सम्पन्न हो पौर स्वय तरण मे तथा अन्य के तारण मे समर्थ होवे ॥१५॥१६॥ २८-दान तीर्थ और मोक्ष कथन दानतीर्थाश्रित मोक्ष स्वर्गञ्च वद मे प्रभो। केन मोक्षमवाप्नोति केन म्वर्ग वसैच्चिरम् । केनामौ च्यवते जन्तु स्वर्लोकात्सप्तलोकतः ॥१ मानुप्य भारते वर्षे त्रयोदशसु जातिषु । सम्प्राप्य म्रियते तीर्थे पुनर्जन्म न विद्यते ॥२ प्रयाध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका। पुरी द्वारावती ज्ञया सप्तता मोक्षदायिकाः ॥३ सन्न्यस्तमिति यो ब्रू यात्प्राग कण्ठगतैरपि । मृतो विष्णुपुर याति पुनर्जन्म न विद्यते ।। सकृदुचरित येन हरिरित्यक्षरद्वयम् । चद परिकरस्तेन मोक्षाय गमन प्रति ।।५ कृष्ण कृपणेति कृप्रोति यो मा स्मरति नित्यश । जल भित्वा यथा पद्म नरकादुद्धराम्यहम् ।।६ शालग्रामशिला यत्र पापदोपक्षयावहा । तत्सन्निधानमरणान्मुक्तिस्तत्र न सशयः १७ तादर्य ने कहा-हे प्रभो ! दानो तथा तीर्थों के प्राश्रित मोक्ष और स्वर्ग पा वर्णन मेरे सामने करने की कृपा करिये । किममे मृतात्मा मोक्ष की प्राप्ति करता है और किसस स्वर्ग का निवाम पाया करता है और किस कारण से यह ४४६ [ श्री गरुडपुराण जन्तु स्वलोक और सप्तलोन से च्यवन किया करता है प्रर्थात् च्युत हो जाता, है ? ॥१॥ श्री भगवान् यो-भारतवर्ष में तेरह जातियो मे मनुष्य जन्म पाकर जो तीर्थ में प्राण त्याग किया करता है उसका पुनर्जन्म नही होता है । ॥२॥ अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, काञ्ची, अवन्तिका, द्वारावती, पुरी ये सात पुरी योक्ष प्रदान करने वाली बताई गई हैं ।।३।। प्राणों के कण्ठ गत होने पर भी जो "मन्न्यस्तम्" अर्थात् सन्यास किया है-ऐमा जो बोलता है वह मृत होकर विष्णुपुर को चला जाया करता है और फिर उसका जन्म ससार मे नही होता है अर्थात् मोक्ष होकर पावागमन से छुटकारा पा जाता है |॥४॥ जिसने एक बार भी "हरि" हम भगवन्नाम के दो अक्षरो का उच्चारण किया है । उसने मोक्ष प्राप्त करने के लिये परिकर बद्ध कर लिया है अर्थात् कमर कमकर यह पूरी तरह से तैयार हो हो गया है-ऐसा समझ लेना चाहिए ॥५॥ कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण-इस तरह मेरे नाम का बारम्बार उच्चारण करके जो नित्य ही मेरा स्मरण किया करता है उसका मैं जल का भेदन करके कमल जैसे बाहर निकल कर अपना सौरभ, सौन्दर्य प्रदान किया करता हूं वैसे ही उस पुरुष का नरक से उद्धार कर दिया करता हूँ ॥६॥ समस्त पापो के दोपो के क्षय करने घाली शालग्राम को शिला जहाँ पर विराजमान हो और उसकी सन्निधि में को, अपने प्राणो का परित्याग करता है उसकी निश्चय ही मुक्ति हो जाती है इसमें लेश मात्र भी मन्देह नहीं है ॥७॥ शालग्रामशिला यत्र यत्र द्वारावती शिला । उभयोः सङ्गमो यत्र मुक्तिस्तत्र न संशयः ।।८ रोपणापालनात्सेकानम स्पर्शनकीर्तनात् । तुलसी दहते पाप नृरणा जन्माजित खग 16 ज्ञानहदे सत्यजले रागद्वपमलापहे । य. स्नातो मानसे तीर्थे न म लिप्येत पातकः ।।१० न काष्ठे विद्यते देवो न शिलाया न मृत्यु च । भावे हि वराते देवस्तस्मादभावो हि कारणम् ।।११ प्रातः प्रातः प्रपश्यरित नर्मदा मत्स्यघातिन. । न तेषां शुद्धिमायाति चित्तवृत्तिर्गरीयसी ।।१२ ४४७ सान तीर्थ और मोक्ष क्यन ) यादृशी नित्तवृत्तिः स्यात्तादृक्कर्मफलं नृणाम् । परलोके गतिस्ताक्प्रतीतिः फलदायिका ॥१३ गुर्वर्थे ब्राह्मणार्थे च स्त्रीणा वालवधेषु च । प्राणत्यागपरो यस्तु स वै मोक्षमवाप्नुयात् ॥१४ तुलसी का बड़ा भारी माहात्म्य होता है। सुलसी के पौधे के रोपण करने से, तुन भी वृक्ष के सेचनादि से, पालन करने में, इसके केवल मीचने से तुनमी को नमस्कार करने से, इसके स्पर्श मात्र करने में और तुलसी के गुण मथा महिमा के कथन करने से हे सग! यह तुलमी मनुष्यो के जन्म-जन्मान्तर के अजित पापो को जला दिया करती है ।1८18 शान रूगे ह्रद (जलाशय) में, गत्य रूपी जल मे जो कि राग और प क मनो पा अपहरण करने वाला है, ऐगे मानस स्वरूपी नीर्थ में जो स्नान करता है यह पातको से कभी भी लिप्त नही हुमा करता है ।।१०।। देवता न तो पाठ में है न शिला में है, न मृत्तका पे ही रहता है । देव तो भावना में रहा करते है। मनुष्य की भावना जहाँ भी होगी वही देव मासात् स्वरूप में व्यक्त हो सकते हैं। प्रतएव भाय ही सबका मुग्ध पारण होता है ॥११॥ नित्य ही प्रामाल ही में मत्स्यो में घात करने पाने लोग नर्मदा का दर्शन किया करत है प्रिन्तु उनो हृदय की दूपित भावना होने के कारण उनी गरीयको चित्त वो वृत्ति कभी भी शुद्ध नहीं होती है। ॥१२॥ जिग प्रकार की मनुप्या वो चित्त यो नि होती है पंसा हो उनके कर्मों का फल भी हुमा करता है और फिर परलोर उनको पनि भी उमी तरह की होती है क्योरि प्रतीति ही फन देन वानी होती है ।।१३। गुम लिये, ब्राह्मण के लिय, बियो के सि पोर या पषों य लिय जा भपन प्रागों के स्याग पग्ने को मयर हो जाना है यह प्राणी निश्चय ही मोक्ष की प्राति निया परता है ॥१४॥ अनाने मृतो यस्तु पिमुक्त गधन्धन। दत्या दानानि विनैम्प गये मोक्षमवाप्नु गत् ॥१५ एते .मोक्षमार्गाध स्वर्गमास्तिथैव च । गोग्रहे देशविध्वरी देनाधविषामु च ॥१६ .
४४८ [ श्री गरडपुराण जीवित मरणञ्च व उभयो श्रेष्ठमुच्यते । जीवित दानभोगाभ्या मरण रणतीर्थयो. । १७ उत्तमाधममध्याश्व वध्यमानाञ्च प्रारिमन । प्रात्मान सम्परित्यज्य स्वर्गवास लभन्ति ते ॥१८ हरिक्षेने कुरुक्षेने भृगुक्ष ने तथैव च । प्रभासे श्रीफले चैव अर्बुदे च निपुष्करे ॥१६ भूतेश्वरे मृतो यस्तु स्वर्गे वसति मानव । ब्रह्मणो दिवस यावत्तत पतति भूतले ।।२० वर्पवृत्तिञ्च यो दद्याद्ब्राह्मणे व्रतसयुते । स सर्व कुलमुद्ध त्य स्वर्गलोके महीयते ॥२१ अनशन करने मे जिसको मृत्यु हो जाती है वह गभी प्रकार के बन्धनों से विमुक्त हो जाया करता है । विप्रो को दान देकर वह मोक्ष की प्राप्ति किया करता है ।।१५।। ये सभी मोक्ष के प्राप्त करने के मार्ग हैं । इसी भांति स्वग प्राप्त करने के भी माग होते हैं । गौओ के ग्रहण करने मे, देश के विध्वस होने मे, देव, तीयं की विपत्तियों में जीवित रहना तथा मरण प्राप्त करना दोनो ही प्रेष्ट होते हैं । दान और भोग से जीवित और रण भूमि तथा तीर्थ में मृत्यु का होना श्रेष्ठ होता है। वध्यमान प्राणी जत्तम, मध्यम और अधम तीन प्रकार के हुमा करते हैं। वे प्रात्मा का त्याग करके स्वग के निवास का लाभ किया करते हैं ॥१६।१७।१८।। हरिक्षेत्र कुरक्षेन, भृगुक्षेत्र, प्रभास क्षेत्र, श्रीफल, प्रदुंद मौर त्रिपुष्कर क्षेत्र मे तथा भूतेश्वर में जो मृत्युगत होता है वह मनुष्य स्वर्ग मे वास किया करता है। और ब्रह्मा का जब तक एक दिन पूरा होता है तब तक उसको स्वर्ग मे निवास प्राप्त होता है। इस अवधि के समाप्त होने पर वह पुनः मूतन पर गिर कर पाता है ॥ १६॥२०॥ वन से सयुन ब्राह्मण को जो कोई एक वप की पूरी वृत्ति का दान करता है अर्थात् पूर वर्ष भर के खाने-पीने का सामान देता है वह अपने मम्पूग कुल का उद्धार करके अन्त में स्वर्ग लोक में प्रतिष्ठिन हो जाता है ॥२१॥ कन्या विवाहयेद्यस्तु ब्राह्मणे वेदवित्तमे। इन्द्रलोके वसेत्सोऽपि स्वकुल परिवेष्टिनः ॥२२
[ ४४६
पान-तीर्थ और मोक्ष कथन ]
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महादानानि दत्त्वा च नरस्तत्फलमाप्नुयात् ।
वापीकूपतडागानामारामसुरसद्मनाम् ॥२३
जीर्णोद्धारं प्रकुर्वाणः पूर्वकत्तु: फल हि यत् ।
तस्यैव द्विगुण पुण्य लभते नात्र संशयः ॥२४
कर्णकराठाङ्ग लीवाहु भूपणं चित्रवर्णक
गृहोपकरणयुक्त गृह धेनुसमन्वितम् ।।२५
शोतवातातपहरमपि यत्र कुटीरकम् ।
कृत्वा विप्राय विदुपे प्रददाति कुटुम्बिने ॥२६
तिस्रः कोटयर्द्धकोटीश्च समा स्वर्गे महीयते
या स्त्री सवर्णा सशुद्धा मृत पतिमनुव्रजेत् ।
सा मृता स्वर्गमाप्नोति वारणा पूर्वसख्यया ।।२७
पुत्रपौत्रादिक हित्वा स्वपति याधिरोहति ।
स्वर्ग लभते तो नोभौ कुलस्त्रिभिः समन्वितो ॥२८
जो वेदो के ज्ञाता ब्रह्मा को क्या देकर उसका विवाह कर देना है
वह भी अपने समस्त कुलो से परिवेष्टित प्रति समन्वित होकर इन्द्रलोक मे
निवाम किया करता है ।।२२॥ महादानो वो देकर मनुष्य उनके फलो की प्राप्ति
किया करता है। याबदो, कुणा, तालाब, उद्यान पोर देशालय इन सबका या
इनमें से क्मिी एक का जीर्णोद्धार करने वाला मनुष्य, इनको जिमन पहिले
बनाया था उमका जो पुण्य-फन होता है उसमे द्विगुण पुण्य प्राप्त करता है-
इसमे कुछ भी सन्देह नही है ॥२४॥ गठ-गण-म गुनि पौर बाह के चित्र.
विचित्र भूपणो से युक्त-गृह में उपयोगी ममस्त प्रावश्यक उपकरणों में गम-
बिन-दूर देने वाली धेनु से सयुन-शीत, पान और मातप के हरण करने याने
कुटोर वाले गृह का निर्माण कसार निमी कुटुम्बी विद्वान ब्राह्मण को जो
दान में देता है वह पुरुष माढ़े तीन करोड वर्ष पर्यन्त स्वर्ग में प्रतिदिन रहा
करता है। जो मवर्णा एय गम्मा प्रसार मे शुद्ध स्त्री मृत पनि का पनुगमन
विया करतो है पर्थात् उमी के माय गती हो जाती है वह मरपर पूर्वोन. मग
वाने माई तीन रोडवों तस्वगं में निवाम किया करती है ॥२॥२६॥२७॥
४५० ] ! श्री गगापुराण जो पुत्र-पौमासिका याग पर अपने ही पति की चिता में अधिग्रहण करती है ये दोनो ही मी-पुरुष पाने तीन कुलो ६ महित स्वर्ग की प्राप्ति करते हैं॥२८॥ कृत्वा पापन्यनेकानि भत्तृ'द्रोहे मतिः मदा। प्रक्षालयति मर्वाणि या स्व पत्तिमनुबजेद ॥२६ महापापममात्राग भर्ता दुष्कृतो भवेत् । तस्याप्यनुयता नारी नागयत्सर्व किल्विपम् ॥३० ग्राममात्र तु यच्चान नित्यदान करोति य.। छनचामरसयुक्त स विमानेऽधिगच्छति ।।३१ यत्कृत हि मनुष्येण पापञ्च मरणान्तिकम् । तत्सर्व नाशमायाति वर्पवृत्तिप्रदानतः ॥३२ भूत भावि वर्तमान पाप जन्मत्रयाजितम् । प्रक्षालयति तत्सवं विप्रकन्याविवाहनात् ॥३३ जा अनेक पापो को करके सर्वदा अपने पति के द्रोह में बुद्धि म्या करती थी वह भी यदि अपने मृत पनि का अनुगमन कर लेती है तो अपने मम्पूर्ण पापो का प्रक्षालन कर लिया करती है ॥२६॥ यदि उपका पति जो मारी अपने पति का अनुगमन करती है महान् पापो के प्राचरण करने वाला भी हो पोर पूर्णतया दुष्कृती हो तो भी वह प्रनुनना नारी उपके भी पागो का प्रक्षालन कर दिया करती है ॥३०॥ जो ग्राम मात्र को ही नित्य अन्न का दान किया करता है वह छत्र और चमगे मे मगन्वित विमान में अधिरोहरण कर स्वर्ग को जाया करता है। जो वर्ष भर की वृत्ति विपी का दिया करता है उसने प्रारम्भ से मृत्यु तक जो भी कुछ पाप किया है वह सब नाग को प्राप्त हो जाया करता है ।।३१॥३२॥ विमी विप्र की कन्या का विवाह करा देने से तीन जन्म का भूत-भवि और वर्तमान सम्पूर्ण पाप का मनुष्प प्रक्षालन कर दिया करता है ।।३३॥ दशकूपसमा वापी दशवापीसम मरः। दशाना सरसा साम्य प्रा तार्क्ष्य विनिर्जले ॥३४ पशोच विधि कथनम् । [ ४५१ प्रपापि निर्जले देशे यदान निधने द्विजे। प्राणिना यो दया धते स भवेल्लोकनायक ॥३५ एवमादिभिरन्यश्च सुकृतः स्वर्गभाग्भवेत् । सर्वधर्मफल प्राप्य प्रतिष्ठा परमा लभेत् ।।३६ फल्गु काय्यं परित्यज्य सतत धर्मवान्भवेत् । दान मत्य दया चेति सारमेतज्जगत्नये ॥३७ दान माधु दरिद्रस्य शून्ये लिङ्गम्य पूजनम् । अनाथनसस्कारकोटियज्ञफन लभेत् ॥३८ दक्ष कुनो के निर्माण करा देने के तुल्य पुण्य एक बावडी के निर्माण कराने का होता है । दश वावडियो में समान एव सर होता है और दश मगे. वरी के ममान किमी बिना जन वाले स्थान में एक प्याऊ के निर्माण का पुण्य होता है ।।३४।। प्रपा (प्याऊ ) वहाँ ही बनवानी चाहिए जहाँ जल का प्रभाव हो पोर दान उसी ब्राह्मण को देना चाहिए जो निघा हो । जो प्राणियो पर दया किया करता है वह लोक का नायक होता है ॥३५॥ एवमादि पुप्यो से तथा अन्य सुवृतो स मनुष्य स्वग के निवास का अधिकारी हुआ करता है । सब धर्म दे फल वो प्राप्त कर परम प्रतिष्ठा को प्राप्त किया करता है ॥३४॥ फल- शून्य व्ययं के काय का त्याग यार निरन्तर धर्म के करने वाला होना चाहिए । इम जगत् में दान--सत्य और दया ये तीन ही सार वस्तु हैं ॥३७॥ दरिद्र को दान देना, शून्य में लिङ्ग का पूजन करना घोर अनाथ व्यक्ति के प्रत सरकार का बरना-इनसे एक करोड यज्ञो क करने का फन प्राप्त हुमा करता है ॥३८॥ २६---अशीच विधि कथनम् मूतकाना विधि हि दया कृत्वा ममोपरि । विवेकाय हि चित्तस्य मानयाना हिताय च ॥१ मृते जन्मनि पक्षीन्द्र सपिण्डाना हि सूनकम् । चतुर्णामपि वर्णाना मर्वकविवर्जनम् ॥२ उभयत्र दशाहानि कुलस्याशु विवर्जयेत् । दान प्रतिग्रह होम स्वाध्यायञ्च निवत्तं येत् ॥३ ४५२ [ श्री गरुड़ देशकाल तथात्मान द्रव्यं द्रव्यप्रयोजनम् । उपपत्तिमथावस्था ज्ञात्वा शौच प्रकल्पयेत् ॥४ मृते पती वनस्थे च देशान्तरमृतेषु च । स्नान सचैलं कर्त्तव्य सद्य. शौच विधीयते ॥५ स्रावगर्भाश्च ये जीवा ये च गर्भाद्विनि सृना। न तेपामग्निसस्कारो नाशौचं नोदकक्रिया ॥६ कारवः शिल्पिनो वैद्या दासीदासास्तथैव च । राजानो राजभृत्याश्व सद्यः गोचानुकारिणः ॥७ गरुड ने कहा [-हे भगवन् ! अब मानवो के हित के लिये और चित्त के विवेक के वास्ते मुझ पर कृग करके मूतको को विधि बताने को उदारता कीजिए । श्रीभगवान् ने कहा -हे पक्षीन्द्र ! किसी को मृत्यु और जन्महोने पर जो मपिंड पुरुष एव स्त्री होते हैं उनको सूतक हुमा करता है । इन ज त का गौच और मृत का शोच की दशा में चारो वर्णो में मम्पूर्ण प्रकार के कर्मों का विशेष रूप से निषेध हुमा करता है ॥१॥२॥ दोनो प्रकार के सूतक में दश दिन कुल के दान प्रतिग्रह-होम और स्वाध्याय अर्थात् वेदो का अध्ययन इनका शीघ्र वर्जन कर देना चाहिए ॥ ३॥ देश-काल-मात्मा-द्रव्य प्रयोजन-उत्पत्ति और अवस्था इनका ज्ञान करके शौच को प्रकल्पित करे ॥४॥ वन में स्थित पति के मृन हो जाने पर मोर अन्य देश में मृत्यु गन होने पर वस्त्रो के सहित ग्नान करना चाहिए । इमी से तुरन्त शुटि हो जाया करती है ।। ५॥ जिन जीवो के गर्भ का स्त्राव हो गया है और जो गर्भ से विनिः मृत हो गये हैं उनका न तो कोई अग्नि सस्कार होता है और न उदा क्रिया ही की जाया परती है ।। ६ ।। कार लोग (कारीगर)-शिली (दस्तकार)-वैद्य-दामी- दास-राजा लोग और भृत्य वगं ये तुरन्त ही शोध के अनुकारी हो जाते हैं ।। ७॥ सव्रतो मन्त्रपूतश्च पाहिनाग्निनृपस्तथा। एतेपा सूतक नास्ति यस्य चेच्छन्ति ब्राह्मणाः ।।
[ ४५३ मगौच यिधि कथनम् ] प्रसवेन गृहस्थानां न कुत्सिङ्करं द्विजः । दशाहाच्छुध्यते माता अयगाह्य पिता शुचि. ॥६ विवाहोत्सवयज्ञ पु अन्तरा मृतसूतके । पूर्वसङ्कल्पित द्रव्य भोज्य तन्मनुरवीत ॥१० सर्वेपामेवमाशौच मातापित्रोस्तु मूतकम् । सूतक मातुरेव स्यादुपस्पृश्य पिता शुचि ।।११ अन्तर्दशाहे चेत्स्याता पुनर्मरणजन्मनी । तावत्स्यादशुचिवितो यावत्तस्य दशाह्निकम् ।।१२ क्षुधिते नियमादान यात विप्रे निवेदयेत् । तर्थ व पिभिः प्रोक्त यथाकाल न दुप्यति ॥१३ दान परिपदै दद्यात्सुवरणं गा वृप द्विज । क्षत्रियो द्विगुण दद्याद्वेश्यस्तु विगुण तथा ।।१४ वन से युक्त-मन्त्री से पवित्र-अहित अग्नि वाला-और नृप इनको मूनक नही होता है और जिनको ब्राह्मण चाहते हैं उनको भी मूतक नही होता है ॥८।। द्विज को प्रसव के द्वारा सङ्कट नही करना चाहिए। माता की शुद्धि दश दिन में होती है और पिता प्रघगाहन करके शुचि हो जाता है ॥९॥ विवाह-उत्सव और यज्ञो मे मध्य मे मृतक के सूतक हो जाने पर पूर्व सङ्क. ल्पित जो द्रव्य है उराको उपभोग मे ले पाना चाएि-ऐसा महाप मनु कहा है ॥ १० ॥ सबको प्राशौच होता है और माता-पिता को सूतक होता है । मूनक माता को ही होता है । पिता तो उपस्पर्शन करके शुद्ध हो जाया करता है ॥ ११॥ दशाह के मध्य मे यदि अन्य क्मिी का मरण या जन्म हो जाता है तो विप्र तब तक अशुचि रहता है जब तक उसका दशातिर कर्म पूर्ण होता है ।। १२ ।। क्षुधा से युक्त को नियम से दान और पार्टी को तथा कि यो देवे । उमी प्रकार में ऋषियो ने कहा है तो काल के अगुमार दोप नही होता है ॥ १३ ॥ परिपद में दान देवे । द्विज को गौ-सुवर्ण भोर वृप का दान करना चाहिए । क्षत्रिय को दुगुना ब्राह्मण से दान देना चाहिए और वंय को तिगुना दान देना चाहिए ॥१४॥ ने
४५४ ]
[ श्री गरुडपुराण
चतुर्गुण तु शूद्रेण दातव्यं ब्राह्मणे धनम् ।
एवञ्चानुक्रमेणैव चातुर्वण्यं विशुध्यति ॥१५
सप्ताष्टमन्तरे शीणों व्रतसंस्कारजिते ।
अहानि सूतक तस्य अदाना सख्यया स्मृतम् ।।१६
ब्राह्मणार्थ विपन्ना ये नारीणा गोगृहेषु च ।
आहवेषु विपन्नानामेकरान हि सूतकम् ।।१७
अनाथप्रेतसस्कार ये कुर्वन्ति नरोत्तमाः।
न तेपामशुभ किञ्चिद्विप्रेण सहकारिणा ।।
जनावगाहनात्तं पा सद्य. शुद्धिरुदाहृता ॥१८
विनिवृत्ता यदा शूद्रा उदकान्तमुपस्थिताः ।
तदा विप्रेण द्रष्टव्या इति वेदविदो विदुः ॥१६
शूद्र को चतुर्गुण ब्राह्मण को धन देना चाहिए। और इसी ६णित क्रम
के अनुसार चागे वर्ण शुद्ध हो जाया करते है ॥ १५ ॥ सातवें और प्रा०
मास में यदि गर्भ शीर्ण हो जाता है जो कि व्रत सस्कार से रहिन सात या
प्राठवें वर्ष मे मृन हो जाता है तो वो को सख्या के अनुसार ही उमका उतने
दिन का सूतक होता है ।। १६ ।। ब्राह्मणार्थ मे अर्थात् ब्राह्मणो के हित मे-
नारियो की भलाई के लिये-गोमो के लिये और युद्धो में जो विपन्न हो जाते
हैं अर्थात् मर जाया करते हैं उनका सूतक केवल एक रात्रि का ही होता है
।। १७ । जो श्रेष्ठ मनुष्य किसी अनाथ पुरुष के प्रेन-सस्कार को करते हैं उन
को
कुछ
भी अशुभ नहीं होता है । सहकारी विप्र के द्वारा जल मे अवगाहन
(स्नान) करने से ही तुरन्न उनको शुद्धि बतलाई गयी है ।। १८ । जब शूद्र
विनिवृत्त होकर जल के समीप में उपस्थित हो जाते है उम समय में विप्र के
द्वारा उन्हें देखना चाहिए---ऐमा देयो के वेत्ता विद्वान् लोग कहते है ।।१६॥
३०-~अपमृत्यु फल
भगवन् ब्राह्मणाः केचिदपमृत्युवशङ्गताः
कथ तेपां भवेन्मार्गः कि स्थान का गतिर्भवेत् ॥१
[ ४५५ अपमन्यु फल ] किञ्च युक्त भवेत्तेषां विधानश्चापि कीदृशम् । तदह श्रोतुमिच्छामि ब्रू हि मे मधुसूदन ।। प्रेतीभूते द्विजातीनां सभूते मृत्युवकृते ॥२ तेपा मार्ग विधि स्थान विविध कथयाम्यहम् । शृणु ताय पर गोप्य कृत दुर्म रणे तु यत् ॥३ लघनर्ये मृता विप्रा दष्टिभिर्धातिताश्च ये । कण्ठपाहिविलग्नाश्च क्षीणाश्च गुरुघातिनः ॥४ वृकाग्निविपविप्रेभ्यो विसूच्या चात्मघातकाः । पतनोद्वन्धनजले मृताश्च शृणु सस्थितिम् ॥५ यान्ति ते नरके घोरे ये च म्लेच्छादिभिर्हताः। श्वशृगालादिभिः स्पृष्टा अदग्धा. कृमिसकुलाः ॥६ उल्लवितमृता ये च महारोगैश्च ये मृताः । लोकेऽसत्यास्तथा व्यङ्गा युक्ता पापेन योपितः ।।७ चाण्डालादुदकात्सद् ब्राह्मणा | तादपि । दष्ट्रिभ्यश्च पशुभ्यश्च वृक्षादिपतनान्मृताः ॥ उदक्यासूतकशूद्ररजकादिविदूपिता । तेत पापेन नरकान्मुक्ता: प्रेतत्वभागिन' 16 ताय ने कहा-हे भगवन् । कुछ याह्मण यदि अप मृत्यु के वशगत हो जाया करते है तो उनका मार्ग कैसे होता है-उनका क्या स्थान है और उनको क्या गति हुमा करती है ? उनके लिये वया युक्त होता है और उनका विधान भी कैसा हुमा करता है ? हे मधुसूदन ! मैं अब यह श्रवण करना चाहता हूँ । पाप कृपा करके मुझे यह वत'नाइये । द्विजातियो के प्रेत हो जाने पर और मृत्यु से विकृत होने पर क्या होता है और उस दशा में क्या करना १॥२॥ श्री भगवान ने कहा- उनका मार्ग-विधि और विविध स्थान में अब तुमको बतलाता हूं । हे तायं ! तुम इसे सुनो, यह विषय बहुत ही गोपनीय है जो कि दुर्मरण करने पर होता है ।। ३ ॥ जो विप्र लघन परके मृत हो जाते हैं और जो दाढों वाले हिंस पसुप्रो के द्वारा मार दिये जाते चाहिए?
। श्री गरुडपुगण हैं. ---कण्ठ ग्राही विलग्न अर्थात् फांसी लग कर जो मरते हैं जो क्षीण होकर मरते हैं जो गुरुग्रो की पात करने वाले है-वृक (भेडिया )-मग्नि और विप्रो से विसूच्य होते हैं तथा भात्म पात करने वाले हैं-गिर कर उद्वन्धन से और जल में जिनकी मृत्यु हो जाती है उनकी जो स्थिति होती है उसका श्रवण करो ॥ ४ ॥ ५ ॥ जो म्लेच्छ प्रादि के द्वारा हत होते हैं वे सब घोर नरक मे जाया करते हैं । कुत्ता-शृगाल ग्रादि के द्वारा स्पर्श किये हुए-अदग्ध पौर कृमियो से सकुल भौर कीहो से घिरे हुए जो उल्लधित मृत हो जाते हैं और जो महा रोगो के द्वारा मृत्यु गत होते हैं । लोक मे जो असत्य हैं--व्यङ्ग हैं अर्थात् विगत अङ्ग वाले हैं पौर स्त्रियों के पाप से युक्त हैं । चाण्डाल से- जल से-सर्प से--ब्राह्मण से--विद्युत् से-दाढ वाले जानवरो से-पशुओ से और वृक्षादि के ऊपर से गिर कर जो मृत होते हैं । उद्या (रजस्वला स्त्री)- मूनक-शूद्र और रजक प्रादि से जो विदुषित हो जाते है। उस पाप से वे नरक से मुक्त होते हुए प्रेतत्व योनि के भागी हुमा करते हैं ॥६RIEN - न तेपा कारयेद्दाह सूतक नोदकक्रियाम् । न विधान मृताद्यञ्च न कुर्यादौर्य दैहिकम् ॥१० तेपा तायं प्रकुर्वीत नारायणबलि क्यिाम् । सर्वलोकहितार्थाय शृणु पापभयापहाम् ॥११ पण्मास ब्राह्मणस्याथ विमास क्षत्रियस्य च । सार्द्ध मास तु वैश्यम्य सद्य: शूद्रस्य सा भवेत् ॥१२ गङ्गाया यमुनायाञ्च नैमिषे पुष्करेषु च । तडागे जलपूर्णे वा ह्रदे वा विमले जले ॥१३ वाप्या कूपे गवा गोष्ठ गृहे वा प्रतिमालये । कृष्णाग्र कारयेद्विप्रविधि नारायणात्मकम् ।।१४ उनका दाह नहीं जाना चाहिए-उनका कोई मूतक नही होता है मौर न इनकी कोई उदक क्रिया ही होनी है। इनका मृताद्य कोई विधान नहीं है मौर न प्रीवं दैहिक हो उनका कुछ कम करना चाहिए। हे ताक्ष्यं ! उनके लिम नारामण वलि की क्रिया करनी चाहिए। यह समस्त लोक के हित के लिये ४५० परमृत्यु पल ] होती है और पपो के भय को अपहरण करने वाली है। इसका सुम भवरण करो ॥ ११ ॥ ब्राह्मण कोमा नियको तीन मास की डेढ़ मास पौर शूद्र को वह तुरन्त ही होती हैं ॥ १२ ॥ गङ्गा मे-यमुना में- नमिप मे-पुष्कर मे-जल से पूण सडाग मे प्रथवा विमल अल बाले हुद मै-वावटी मे-कूप मे-गोमो के गौष्ट में प्रथवा देवालय मे पा श्री कृष्ण की प्रतिमा फे मागे यह नारायणात्मक बलि की विधि त्रिो के द्वारा करानी चाहिए ॥१३॥१४॥ पूर्णे तु तर्पण कायं मन्यः पौराणवैदिकं । सर्वोपधिकृतश्च व विष्णुमुद्दिश्य तर्पयेत् ॥१५ कायं पुरुपसूक्तन मन्त्र , वैष्णवैरपि । दक्षिणाभिमुखो भूत्वा प्रेत विष्णुमिति स्मरेत् ।।१६ अनादिनिधनो देव शङ्खचक्रगदाघर । अध्यय पुण्डरीकाक्ष प्रेतमोक्षप्रदो भवेत् ।।१७ तर्पणस्यावसाने तु वीतरागो विमत्सर । जितेन्द्रियमना भूत्वा शुचिमान्धर्मतत्पर ॥१८ दानधमरतश्च व प्रणम्य वाग्यत शुचिः । यजमानो भवेत्तार्य शुचिर्वन्धुसमन्वितः ॥१६ भक्त्या तत्र प्रकुर्वीत श्राद्धान्येफादर्शव तु । सर्वकर्मविधानेन एफकार्यसमाहित ॥२० तोयत्रीहिपदान्दद्याद्गोधूमाश्च प्रियङ्गवान् । हविष्यान्न शुभा मुद्रा छनोप्णीपञ्च चेलकम् ॥२॥ दापयेत्सर्वशस्यानि क्षीरक्षौद्रसमन्वितम् । वस्त्रोपानहसयुक्त दद्यादष्टविध पदम् ।।२२ नारायण मलि के पूर्ण हो जाने पर पौराणिक पोर वैदिक मन्त्री के गि सर्पण करना चाहिए । सोधिष्टत के द्वारा भगवान् विष्णु का उद्देश्य करके तर्पण करे ।। १५ । पुरष सूक्त के द्वारा प्रथवा पणव मन्त्रों के द्वारा दक्षिण की भोर मुख करके प्रेत विष्णु का स्मरण परे ॥ १६॥ जिसका थी गरुडपुराण - सभी प्रादि नहीं है और न कभी भी निधन ही होता है ऐसे शख, चक्र और गदा के धारण करने वाले देव जो अव्यय हैं मोर पुण्डरीक के समान नेत्रं याले हैं वे भगवान् विष्णु प्रेत की मोक्ष के प्रदान करने वाले होवें ।। १७ । तपंण के पन्त मे वीतराग होने वाले प्रर्यात वैराग्य युक्त-मात्मयं से रहित- इन्द्रियो मोर मन के जीतने वाला होकर शुचिता से युक्त-धर्म में तत्पर होव धान और धर्म मे रति रखने वाला होकर मौन व्रत वाला एक शुद्ध हो प्रणार फरे । है ताक्ष्य । यजमान बन्धुओ से युक्त शुचि होवे ॥ १८॥ १६ ॥ भक्ति भाव से वहाँ पर एकादश श्रादो को करे । सम्पूर्ण कर्मों के विधान से एक है कार्य में सावधान होकर रहे ॥ २०॥ जल ब्रीहि और पदो को देवे । गोधू' और प्रिपङ्गव-हविष्मान-शुभ मुद्रा-छत्र-उणीप---चेलक दिलावे । सर्भ धान्यो को देवे । क्षीर-क्षौद्र से समन्वित वस्त्र और उपानह से युक्त पाठ प्रका का पद देना चाहिए ॥२१॥२२॥ दापयेत्सर्व विप्रेभ्यो न कुत्पिक्तिवञ्चनम् । भूमौ स्थितेषु पिण्डेपु गन्धपुष्पाक्षतान्वितम् ।।२३ दातव्य सर्वविप्रेभ्यो वेदशास्त्रप्रमाणतः । शङ्ख पात्रेऽथवा ताम्र तर्पणञ्च पृथक पृथक ॥२४ वाताधारेण सयुक्तो जानुभ्यामवनी गत । स चादौ दापगेदऱ्या एकोद्दिष्ट पृथक पृथक ॥२५ प्रापो देवी मधुमती प्रादिपिण्डे प्रकल्पिता। उपयामगृह तोऽसि द्वितीये च निवेदयेत् ॥२६ येनापावकवामत्क तृतीये पिण्डकल्पना । ये देवा स चतुर्थे तु समुद्र गच्छ पञ्चमे ॥२७ अग्निज्योतिस्तथा पष्ठे हिरण्यगर्भश्च सप्तमे। यमाय त्वष्टमे ज्ञेय यज्जाग्रन्नवमे तथा ।।२८ दशमे या. फलिनीति पिण्डे चंकादशे तत। भद्र कर्णेभिरिति च कुर्यापिण्डविसर्जनम् ॥२६ अपमृत्यु फल । [ ४५६ कृत्वैकादशदेवत्य श्राद्ध कुर्यात्परेऽहनि । विप्रानावाहयेत्पश्चादयं दद्याद्विशारदः ॥३० सभी विप्रो को दिलघाना चाहिए । इनमै पक्ति भेद नही करे। भूमि में स्थित पिण्डो में वेद शास्त्र के प्रमाण से गन्ध-पुष्प और अक्षत से युक्त सभी विप्रो को देना चाहिए । शव में-पात्र मे पथवा ताम्र में पृथक-पृथक् तर्पण परे ॥ २३ ॥ २४ ॥ वाताधार से सयुक्त हो जानुप्रो ( घुटनो ) से भूमि पर ति होकर आदि में उसे अर्घ्य देना चाहिए । एकोद्दिष्ट में पृथक्-पृथक् अध्यं देवे ।। २५ ।। प्रादि पिण्ड मे "पापो देवी मधुमती "- इसरो प्रकल्पित करे पौर दूसरे पिण्ड में " उपयाम गृही तोऽसि "-इससे निवेदन करना चाहिए ॥ २६ ॥"येना पावक घामक्त "--इससे तीसरे पिण्ड की कल्पना करे तथा "-इससे चौथे पिंड को देवे । समुद्र गच्छ "-इससे पांच पिड देवे ॥ २७ ॥ ॥ अग्नि ज्योति '-इससे छटवा पिंड और हिरण्य- --इससे सातवां पिट निवेदित करे । " यमाय "-इसमे मष्टम रिट -इससे नवम पिंड देवे ।। २८ ।। "या फलिनी" इससे दशा और " भट्ट कर्णेभिः"-इससे एकादश पिंड का विसर्जन करना पाहिए ।। २६ ।। इस प्रकार से एकादश करके दूसरे दिन मे श्राद्ध करना चाहिए । विप्रो का आवाहन करना चाहिए और इसके पीछे विशारद को प्रय . ये देवा स " . गर्भश्च" और "यज्जाग्रन् " - देना चाहिए ॥३०॥ विद्याशीलगुणोपेतान्स्वकीयमुकुलोत्तमान् । अव्यङ्गाश्च प्रशस्ताश्च हि वान्कदाचन ॥३१ विष्णु. स्वर्णमय. कार्यों रुद्रस्ताम्रमयस्तथा। ब्रह्मा रौप्यमयस्तत्र यमो लोहमयो भवेत् ॥३२ सीसक तु भवेत्प्रेते अथवा दर्भक तथा । यमाय वेति मन्त्रेण सहित सामवेदिनम् ॥३३ अग्न प्रायाहि मन्त्रेण गोविन्द पश्चिमे न्यसेत् । अग्निमीलेति मन्येण पूर्वेणेव प्रजापतिम् ॥३४ यो गागण - -- होत्या इति मन्यण दक्षिणे स्थापयेथमम् । मध्ये च मण्डलं कृत्या स्थाप्यो दर्भमयो नरः ॥३५ ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रो यमः प्रेतस्तु पञ्चमः । पृथक्कुम्भे ततः स्थाप्यं पञ्चरत्नसमन्विते ॥३६ वस्त्रयज्ञोपवीतानि पृथङ्मद्रायुतानि च । जपं कुर्यास्पृयवतम ब्रह्मादौ देवतासु च ॥३७ जो विप्र विधा-धील मोर गुण से युक्त हों और सपने कुम मे उत्तम हो नया अध्यक्ष एवं प्रास्त हो उनको कमी वजित न करे । विष्णु की प्रतिमा मुवंण को बनवावे सपा रुद्र की प्रतिमा तानमय करावे भार ब्रह्मा चादी के निर्मित कराव तथा यम सौह का बनवावे। प्रेत में शीशा हो या दों का होवे । " यमायला '--इस मन्त्र से साम वैदी को-" भान मायाहि "-इस मन्त्र मे गोविन्द को पश्चिम में न्यस्त करे मोर " प्रग्नि मोल"-इस मन्त्र से पूर्व दिशा में प्रजापति को स्थापित करना चाहिए ॥ ३१ ॥३२॥ ३३ ॥ ३४॥ "पेरवा"-इस मन्त्र से दक्षिण दिशा में यम को स्थापना करे मोर मध्य मे मएल करके दर्भमय नर की स्थापना करनी चाहिए ॥ ३५ ॥ ग्रहा- यिष्णु-रुद्र-यम और पांचया प्रेत इनको इसके अनन्तर पाच रनो से पुक्त पृयक कुम्म में पापित करना चाहिए ॥ ३६॥ वन-यज्ञोपवीत मुद्रा मे युक्त पृथक् रयो । यहाँ पर उप मो पृथक् करे जो कि ब्रह्मा आदि देवताओं के लिये पञ्च धाद्धानि कुर्वीत देवतानां यथाविधि । जलधारा ततः कुर्य्यात्पिण्डे पिण्डे पृथक् पृथक् ॥2 शङ्ख वा ताम्रपाने वा अलाभे मृण्मयेऽपि वा। तिलोदक समादाय सर्वोपघिसमन्वितम् ॥३६ प्रासनोपानही छत्र मुद्रिकाञ्च कमण्डलुम् । भाजन भोज्यघान्यञ्च वस्त्राण्यष्टविध पदम् ।।४० ताम्रपानं तिलः पूर्ण सहिरण्य सदक्षिणम् । दद्याबाह्मणमुख्याय विधियुक्त खगेश्वर ॥४१ [ ४६१ अपमृत्यु फल । ऋग्वेदपाठके दद्याज्जातशस्यां वसुन्धराम् । यजुर्वेदमये विप्रे गाञ्च दद्यात्पयस्विनीम् ॥४२ सामगाय शिवोद्देशे प्रदद्याद्वस्त्रधीतकम् । यमोद्देशे तिलान् लोह ततो दयाच दक्षिणाम् ॥४३ पश्चात्पुत्तलकः कार्य सीपधिसमन्वितः । पलाशस्य च वृन्ताना भाग कृत्वा च काश्यप ॥४ कृष्णाजिन समास्तीच्य फुशश्च पुरुषाकृतिम् शतभयपष्टियुतवृत्त प्रोक्तोऽस्थिसञ्चयः ।।४५ विन्यस्य तानि वध्नीयात् कुशरङ्ग पृथक् पृथक् । चत्वारिंशच्छिरोभागे प्रोवायाञ्च दश न्यसेत् ।।४६ विंशत्युर-स्थले देय विशतिर्जठरे तथा । ऊरुद्वये शत दद्यात् कटिदेशे च विशति ॥४७ विधि पूर्वक देवतामो के पांच श्राद्ध करे । इसके मनन्तर हि डि पर पृथक पृथक् जलपारा करनी चाहिए । शह पर या ताम्र पत्र पर पोर इन दोनो के लाभ न होने पर मृष्यमय पर सौषधि से समन्वित तिलोदक पाकर हे खगेश्वर । फिर मुख्य प्राह्मण के लिये प्रासन-उपानह-छत्र-मुद्रिका-कम- ण्डलु--भाजन-भोग्य, धान्य पोर वस्त्र इस तरह भाठ प्रकार का पर तिला मे परिपूण ताम्र का पात्र जिसमे मुदणं पोर दक्षिणा भी हो विधि पूर्वक दान देना चाहिए ॥ ३० ॥ ३९ ॥ ४० ॥४१॥ ओ अग्वेद का पाठक ब्राह्मण हो उमे शस्यो पो समुस्पा करने वाली भूमि का दान करे। जो यजुर्वत्र का ज्ञाता विष हो उसे दूध देने वाली गौ का दान करे ॥ ४२ ॥ मामधेद के विद्वान द्विज को शिव के उद्देश्य से यस्त्रयोतक का दान देवे । यम के उद्देश्य से तिल- मोह और दक्षिणामा दान करना चाहिए ॥४३॥ मारप ! इस मन. मर सोपधि से समन्वित पुत्तलक बनाना चाहिए । पलाश (1) के वृन्तों पा भाग करे । कृष्ण मशिन (मृग पम) को विधार एम पृष्प को पानि पे तोन मो साठ थियो दुनो से मञ्चित रे । इतनी हियों का मन पतापा गया है ॥४॥ ॥ उनका विम्याम प प्रा मंगोरे -
।
४६२ ]
[ श्री गरुडपुरार
अलग बाँधे । चालीस शिरोभाग में-प्रोवा मै दशों न्यास करे ॥ ४६॥ र
स्थल मे बीस-उदर में बीस-दोनो उमो मे सौ और हटि देश में बी
मस्थियो का बन्धन करे |
दद्याच्चतुष्टय शिश्ने पड् दद्याद् वृषणद्वये ।
दश पादागुलोभागे एवमस्थीनि विन्यसेत् ॥४८
नारिकेल शिर स्थाने तार दद्याच्च तालुके ।
पञ्चरत्न मुखे दद्याज्जिह्वाया कदलीफलम् ।।४६
प्रन्पु वालुकां दद्याद् वाह लीक घ्राणे चैव हि ।
बसाया मृत्तिका ददयाद्गोमूत्र मूनके तथा ।।५०
गन्धक घातवे देय हरिताल मन शिलाम् ।
यवपिष्ट तथा मासे मधु शोणिते चैव हि ॥५१
कैरोपु च जटाजूट त्वचायाश्च मृगत्वचम् ।
पारद रेतसः स्थाने पुरोपे पित्तल तथा ॥५२
मन शिला तथा गा तिलकल्कश्च सन्धिपु।
कायोस्तारपत्रश्च स्तनयोश्च व गुञ्जको ॥५३
नासायाँ शतपत्रच कमल नामिमण्डले।
वृन्ताक वृपण दद्याल्लिङ्ग स्याद्गृञ्जन शुभम् ॥५४
घृत नाम्या प्रदेय स्यात् कौपीने च नपु स्मृतम् ।
मौक्तिक स्तनयोमूनि चु कुमेन विलेपनम् ।।५५
पूरागुरुधूपैश्च शुभर्माल्य सुगन्धिभिः ।
परिधान पट्टसूयं हृदये स्यमक न्यसेत् ।।५६
शिश्न में चार-पभों में ई-पैर को प्रगुलियो रे भाग में दश
मस्थियों का विन्याम करना चाहिए । पुत्तल निर्माण करने के लिये शिरोमाग
में नारियल देव और सासु मे तार देना चाहिए । मुष में पांचों रान पोर रिहा
में ला पत्र देना चाहिए ॥ ४० ॥ ४६॥ मनो में बातु या देवे मोर
प्राण में पाक देना चाहिए । धमाधान में मृतिका तथा मूत्र स्थान में
गोमूत्र ६ ॥ ५० ॥ पानु निये गापा-हरिनाम मोर मनमिल देवे ।
[ ४६३ अपमृत्यु फल : स के स्थान पर यवपिष्ट पौर शोणित मे मधु देवे ॥५१॥ केशो के स्थान जटाजूट और स्वचा मे भृग की त्यचा देवे । वीयं के स्थान में पारद देवे गग पुरीप क स्थान में पित्तन दधे ॥५२॥ सम्पूर्ण गात्र मे मैनमिल और धियो मे तिल का हक देना चाहिए । कानो के स्थान म नाड पत्र तथा नो में गुरुजा फल लगाना चाहिए ॥ ५३ ॥ नातिका में शत पत्र भोर नाभि ण्डल मे कमल-वृपण के स्थान मे वृत्ताक (वैगन) और लिङ्ग के स्थान म ञ्जन (गाजर) देने ।। ५,४ ।। नाभि में घृत देवे और कौपीन मे प्रपु देवे । तनो मे मोक्तिक ( मोती ) तथा माथे मे फुकुम स विलेपन करना चाहिए । । ५५ । कपूर-मगुरु और धूप देवे तथा सुगन्ध युक्त सुन्दर मालानो में मुम- गरा करे । परिधान क लिये यह सूत्र देवे और हृदय में नमक देथे ॥५६॥ ऋद्धिवृद्धिभुजी द्वौ च मेत्रयोश्च वपदिकाम् । सिन्दूर नेत्रकोणेप ताम्बूलायुपहारके 1 ५७ सर्वोपघियुता प्रेतपूजा कृत्वा यथोदिताम् । साग्निपश्चापि विधिना यज्ञपानारिण विन्यसेत् ॥५८ दामादेवी पुनन्तु मे इम मे वरणेति च । प्रेतस्य पावन कृत्वा शालग्रामशिलोदक ॥५६ विष्णुमुद्दिश्य दातव्या सुशीला गो पयस्विनी महादानानि देयानि तिलपान तथैव च ॥६० ततो वैतरणी देया सर्वाभरणभूपिता। वर्तव्य वैष्णव श्राद्ध प्रेतमुक्तपथमात्मना ।।६१ प्रेतमोक्ष तत कुद्धिरि विष्णु प्रकल्पयेत् स्व विष्णुरिनि सस्मृत्य प्रेत त मृतमेव च ॥६२ मग्निदाह तत पुर्यात् सूतक तु दिनययम् । दशाह गतपिण्डान पतंच्या विधिपूर्वम् । रावं वविधि युयदिव प्रेत स मुक्तिभार ॥६३ मादि-दि की दानों मुजाएं बनाये मोर नत्रो मे पका (ग) मगाये । मनोरोगो में मिपूर मग थे। ताम्बूम आदि उपहारों द्वारा - " ४६४ ] [ धी गरुडपुराण सवोपधि से युक्त योक्त प्रेत की पूजा करके साग्निको के द्वारा विधि पूर्वक यज्ञ पात्रों का ग्यास करना चाहिए ।। २७ ॥ १८ ॥ "शन्नो देवी पुनन्तु मे, हम मे वरुण "--इन मन्त्रो से शालग्रम शिला के जल से प्रेत को पावन करके भगवान विष्णु का उद्देश्य करके अत्यन्त सीधे स्वमाव वाली दुधारू गो का दान करना चाहिए। महा दान भी देवे तथा तिल पात्र का दान करे ॥५६॥६० ।। इसके मनन्तर वैतरणी का दान करे जो समस्त प्रामरणो से विभूषित होवे । अपने द्वारा प्रेत को मुक्ति के लिये वैष्णव धान करना पाहिए ॥११॥ इसके अनन्तर प्रेत को मोक्ष को करे और हार एव विष्णु को प्रकल्पित करे। माप विष्णु है-ऐसा मस्मरण करके उस मृत प्रेत को ही मग्नि दाह करै । इस दाह का तीन दिन तक सूतक होता है । दशाह और गत पिड ये सब विधि पूर्वक करना चाहिए। एक वर्ष को मवधि में होने वाला जितना भी कर्म रलाप हुमा करता है वह सभी इस प्रकार से करना चाहिए सो वह प्रेत मुक्ति के प्राप्त करने का अधिकारी हो जाता है ॥६२॥६३।। ३१-भूमि-स्वर्ण गोदान फल यथा धेनुसहस्रपु वत्सो विन्दति मातरम् । एव पूर्वकृत कर्म कर्तारमनुगच्छति ॥१ प्रादित्यो वरुणो विष्णुब्रह्मा सोमो हुताशनः । धूलपाणिश्च भगवान भिनन्दति मूमिदम् ॥२ नास्ति भूमिसम दान नास्ति भूमिसमो निधि। नास्ति सत्यसमो धर्मो नानृतात्पातक परम् ।।३ अग्नेरपत्य प्रथम हिरण्य भूर्वेष्णवी सूर्यसुताश्च गाव । लोक्प्रय तेन भवत्प्रदत य काञ्चनमाञ्च महीं प्रदद्यात् ।।४ श्रीएयाहरति दानानि गाव पृथ्वी सरस्वती। नरपादुदरन्त्येते जयवापनदोहनात् ।।५ कृत्वा यहूनि पापानि रोद्राणि विपुलान्यपि। अपि गोदानमाग्रेण भूमिदानेन शुष्यति ॥६ ४६५ मपमृत्यु फन अकर्तव्य न कर्तव्यं प्राणः कण्ठगतैरपि । कर्तव्यमेव कर्त्तव्यमिति वेदविदो विदुः ।।७ मि के तुल्य भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा-जिस प्रकार से सहस्रो धेनुमो मे बछडा छूटकर अपनी ही माता के पास जाकर लगता है और उसी का दूध पीने लगता है उसी भांति पूर्व जन्म-जन्मान्तर मे किया हुमा कर्म उसके करने वाले को ही प्राप्त होता है अर्थात् उसे ही पौर अवश्य हो भोगना पडता है ॥१॥ प्रादिस्य, पण, विष्णु, ब्रह्मा, सोम, हुताशन मौर भगवान् शूनपाणि भूमि के दान करने पाले का अभिनन्दन करते हैं ।।२।। भूमि के दान के समान पोर निषि कोई भी नहीं है। सत्य के समान कोई धर्म नहीं पोर प्रसस्य से बडा पोई पातक नही है ॥३॥ प्रथम अग्नि का प्रपश्य हिरण्य, वैष्णो भू, सूर्यमुगा गो उसने लोपत्रय का दान कर दिया है जो काश्चन, गो और मही का दान किया करता है ॥४॥ जो गो पृथ्वी और सरस्वती इन सीन दानो का माहरण करता है। ये जप, वापन मोर दोहन से नरक से उतार किया करते हैं ॥५॥ बहुत सारे महान शैद एवं भीपण पापो को करके भी केवल एक गौ के दान म तथा भूमि के दान से मनुष्य शुरू हो जाया करता है ॥६॥ वेदो के नि लोगो का यही कथन है कि जो करने के योग्य कर्म नहीं है उस मातंग कर्म को प्राणों के कण्ठगत हो जाने पर भी कभी नहीं करना चाहिए और जो ममु. वित कर्तव्य है वही करना चाहिये ।।७।। अधर्मप्रवर्सने वै पाप गोसहस्रवधतुल्यम् । वृत्तिच्छेदेपि तथा वृत्तिभरणे लक्षधेनुफनम् ॥ वरमेकापि सा रत्ता न तु दत्त गवा शतम् । एका हुत्वा शत दत्वा न तेन समता भवेत् ॥ स्वयमेव तु यो दद्यात्स्वयमेव तया हरेत् । स पापी नरक यानि यावदाभूतरानवम् ॥१० मचानमेपेन तया पूतः स्यादक्षिणायता। पत्तिागिते दोने ग्राहाग्गे रक्षित यया ॥
[ धो गरुडपुराण न तद्भवति वेदेषु यज्ञ च बहुदक्षिण । यत्पुण्य दुर्वले विप्रे ब्राह्मणे परिरक्षिते ॥१२ ब्रह्मस्वरसपुष्टानि वाहनानि वलानि च । युद्धकाले विशीर्य्यन्ति सिकतासेतवो यथा ॥१३ स्वदत्ता परदत्ता वा यो हरेत वसुन्धराम् । पष्टिवर्पसहस्राणि विष्ठाया जायते कृमि ॥१४ मधर्म की ओर प्रवृत्ति के करने में ही एक सहस गो के वध के समान पाप होता है। तथा वृत्ति के छेदन करने में भी ऐसा ही पाप होता है। वृति के करने में एक ला घेनु क दान का फन प्राप्त होना है ॥८॥ एक गो का दिया हुआ दान भी परम श्रेष्ठ होना है और मो गो का दान भी उनना श्रेष्ठ नही हाता है । एक का हरण करक सो का दान देना भा उमकी समता नहीं करती है ॥६जिस गो का दान स्घ्य करे भोर स्वय ही उमका हरण कर लेवे तो वह एमा पापी हो जाता है कि जब तक भून सप्लब होता है तब तक नरक म निवाम करना पडता है । १०॥ विना वृत्ति के कशित दीन ह्मण के रक्षित करने पर जैसा जो महान् पुरुष होता है वह दक्षिणा से युक्त अश्वमेघ यज्ञ के करने स भी पवित्र नहीं होता है ।।११॥ वेदो म बहुत अधिक दक्षिणा वाल यज्ञ मे भी उतना पुण्य नहीं होता है जैसा कि किसी दुबल ब्राह्मण के परिरक्षण करने पर होता है ।।१२।। ब्रह्म स्वरस से पुष्ट वाहन मोर बल युद्ध के काल म सिकता के सतुनों क समान विशीर्ण हो जाया करते हैं ॥१३॥ अपने ही द्वारा दी हुई तथा किसी अन्य के द्वारा प्रदान की हुई भूमि का जो अपहरण दिया करता है वह इम महापाप के प्रभाव से साठ हजार वष पर्यन्त विद्या का कीडा रहा करता है अर्थात् मल के कृमि के रूप म जन्म ग्रहण किया करता है ॥१४॥ ब्रह्मस्व प्रणयादमुक्त दहत्यासम्म कुलम् । तदेव चौर्यरूपेण दहत्याचन्द्रतारकम् ॥१५ लोहचूरश्मिचूरणञ्च विपञ्च जरयेद्बुध । ब्रह्मास्त्र विपु लोकेषु क पुमाञ्जरयिष्यति ।।१६ 1४६७ होती है मोरजप, होमोस यात्रा पमपुनीन नहीं दिया गत है। अपमृत्यु फन ] देवद्रव्यविनाशेन ब्रह्मस्वहरणेन च । कुलान्यकुलता यान्ति ग्राह्मणातिक्रमेण ॥१७ ग्राह्मणातिक्रमो नास्ति विप्रे विद्याविजिते । ज्वलन्तमग्निमुत्सृज्य भस्मन्यपि न हूयते ।।१८ सक्रान्ती यानि दानानि हव्यकव्यानि यानि च । सप्तकल्पक्षय यावत्तावत्स्वर्गे महीयते ॥१६ प्रतिग्रहाध्यापनयाजनेषु प्रतिग्रह श्रेष्ठतम वदन्ति । प्रतिग्रहाच्छुध्यति जाप्यहोमन याजक कर्म पुनन्ति वेदा. ।।२० नित्यजापी सदा हामी परपाकविवजित । रत्नपूर्णामपि मही प्रतिगृह्य न लिप्यते ॥२१ किमी भी ब्रह्मा के धन को जो बडे प्रेम मे उपभोग किया करता है वह अपने सार कुलो का दाह कर दिया करता है। यह ही ब्रह्मस्व (ग्राह्मण फा पन) यदि पारी के रूप म उपभाग करता है तो वह जब तक चन्द्र पोर तारागण विद्यमान रहते हैं तब तक दाह किया करता है ॥१५ । लोहा पूर्ण नया पत्थर ये चूगा और विष को बुध पुरष पमा जाते हैं कि तु ब्रह्मस्व इतना उग्र हाता है कि इसको तीना लोको म कोन पुरुप पना सकता है ? पात् ऐसा काई भी शक्तिशाली नहीं है ॥१६॥ देवता क द्रव का विनाश घर दन स पोर ब्रह्मस्व व हरण करने से तया ग्रह्मग का अतिक्रमण करने म कुल य पुल प्रवुलना अर्थात विनाम को प्राप्त हो जाते हैं ॥१७॥ विद्या स रहित वित में प्राणातिकम नहीं होता है । जलती हुई पग्नि पायाग कर भस्म म हवन परन के समान ही विद्या विहीन ब्राह्मण का दानादि रना होता है। सक्रान्ति र अवसर पर जो दान होत हैं मोर जो दृष्य-नथ्य होते हैं उनका पुश्य- फ्ल मा एसा प्रभार हाता है कि मान यसो हा जब तर क्षय हाता है तब तक यह दान दाता स्वर्ग लोक म प्रतिष्ठिन रहा करना है ॥१९प्रतिपद, मध्या पन और याजन इनम प्रतिग्रह गयम अघि हाता है । प्रतिग्रह स बुद्धि
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४६८ ]
[ श्री गरुडपुगए
॥२०॥ नित्य जप करने वाला, सदा होम करने वाला परिपाक से जिन रस्नों
से परिपूर्ण पृथ्वी का भी प्रतिग्रह लेकर लिप्त नही होता है ।।२१।।
३२--विविध श्राद्ध कथन
जलाग्निविधिना भ्रष्टा प्रव्रज्यानाशकच्युता ।
इन्द्रियाणा विशुध्यर्थं दत्त्वा धेनु तथा वृषम् ।।१
कनद्वादशवर्षस्य चतुर्वाधिकस्य च ।
प्रायश्चित्त चरेन्माता तथान्योऽपि च वान्धव ॥२
अतो वालतरस्यास्ति नापराघो न पातकम् ।
राजदण्डो न तस्यास्ति प्रायश्चित्त न विद्यते ।।३
रक्तस्य दर्शने जाते आतुरा स्त्री भवेद्यदि ।
चतुर्थे हविप स्पृष्ट्वा वस्त्र त्यक्त्वा विशुध्यति ॥४
पातुरे स्नानमुत्पन्न दश कृत्वा ह्यनातुर. ।
स्नात्वा स्नात्वा स्पृशेदेन तत. शुद्ध स पातुर ॥५
प्रत्यब्द श्राद्धमथ ते कथयामि खगोत्तम ।
प्रत्यब्द पार्वरो व कुर्याता क्षेत्रजौरसौ ॥६
एकाद्दिष्ट प्रकुर्याता प्रत्यब्द प्रति केन तु ।
यदय हि मृत साग्नि पुनो वापि तथाविध ॥७
भगवान् श्रीकृष्ण ने महा-अल मग्नि की विधि से प्रष्ट पोर प्रमज्या
नागर से च्युत जो हैं उनको इन्द्रियो को विशुदि के लिपे धेनु का दान करके
सपा वृष को देकर करे ॥१॥ जो बारह वर्ष से कम हो भौर चार वर्ष स अधिक
हो उसका प्रायश्चित्त उमकी माता को करना चाहिये या कोई उमका प्राय
पायद भी कर सकता है ।।२। इससे छोटा जो बालक है उसका न हो कोई
अपराध ही होता है और न कोई पातक ही हुमा करता है। ऐसे छोटे बालक
को कोई भी राजा के बारा दिये जाने वाले दण्ड का विधान नहीं होता है और
में कोई प्रावित ही हुमा करता है ॥३॥ रज के दर्शन होने पर यदि स्त्री
मातुर हो जाती है तो चतुर्ष दिन में हषि का पर करके यात्र वा स्याग करके
विविध श्राद्ध कथन ] यह युद्ध हो जाया करती है ॥४॥ मातुर में उत्पन्न स्नान होता है । दश करके, पनातुर म्नान करके इसका स्पर्श करे । इसके अनन्तर वह प्रातुर शुद्ध हो जाता है ॥५॥ हे खगोतम ! अब हम प्रति वर्ष होने वाले श्राद्ध के विषय मे तुमको पतला रहे हैं। प्रति वर्ष पार्वण के द्वारा ही क्षेत्रज पोर पोरम पुत्रो को श्राद्ध करना चाहिए ॥६॥ प्रति वर्ष किमी के द्वारा एकोद्दिष्ट श्राद्ध करना चाहिए । यदि यह मृत हो गया हो तो साग्नि पुत्र अथवा उसी प्रकार का पुत्र प्राद करे ॥७॥ प्रत्यव्दं पार्वण तम कुर्यातां जोरसौ । अनग्नयः साग्निका वा पितरोऽपि तथा मृताः ।। एकोद्दिष्ट तथा कार्य क्षयाह इति केचन । दर्शकाले क्षयो यस्य प्रेतपक्षेऽथवा पुनः 116 प्रत्यब्दं पार्वण कायं तेषां सर्वैः सुतैरपि । एकोद्दिष्टमपुत्राणां पुसां स्याद्योपितामपि ॥१० कर्तव्ये पार्वण श्राद्ध अशौच जायते यदि । प्रशौचगमने प्राप्त कुर्याच्छाद्ध ततः परम् ॥११ एकोद्दिष्टे च सम्प्राप्त यदि विघ्नः प्रजायते । मासेऽन्यस्मिस्तिथौ तस्या कुर्याच्छाद तथंव हि ॥१२ तूष्णी थादश्च शूद्राणा भाायास्तत्सुतेन वा । फन्यायाश्च द्विजातीनां मनुरेतद्विनक्षते ॥१३ एयकाले गतामूनां बहूनामयवा द्वयोः । मन्त्रेण स्नपनं फुाच्छाद फुत्पृिथक पृथक् ॥१४ पूर्वकस्य मृतस्यादो द्वितीयस्य तसः पुनः । तृतीयस्य ततः पश्चात्सनिपातेप्ययं गमः ॥१५ रोवर और प्रौरम पुत्रों को प्रति वर्ष पारंग पार रना पाहिए । गाहे सिर पनि हो या मातिर हो जो भी मा हो गये है उनरा पार पाला माहिये ॥८॥ पुरा विमानों का मन है हिदिए राप दिन में पता पादित दाम में निगा राप होता पारिर प्रेत पक्ष में प्रतिवर्ष - [ श्री गरुडपुराण उनके समस्त पुत्रो के द्वारा पार्वण श्राद्ध करना चाहिए । जिनके कोई भी पु' न हो उनका चाहे वे पुरुष हो या स्त्री हो सबका एकोद्दिष्ट श्राद्ध करना चाहिए । ॥६।१०॥ पार्वण श्राद्ध जो कि कर्तव्य है उस समय में यदि देवात् कोई भी किसी प्रकार का प्रशोच हो जाता है तो उस प्रशौच के दूर हो जाने पर शुद्धि करके फिर श्राद्ध करना चाहिए ॥११॥ और एकोद्दिध थाद्ध के सम्प्राप्त होने पर यदि कोई प्रशौच आदि का ऐमा ही विघ्न पा जाता हैं तो फिर दूमरे मास में उमी तिथि मे श्राद्ध करे किन्तु किसी भी दशा मे समय टल जाने पर श्राद्ध का लोप नही करना चाहिए ॥१२॥ शूद्रो का श्राद, भार्या का श्राद्ध अथवा उसके पुन के द्वारा किया हुमा श्राद्ध, कन्या का श्राद्ध और द्विजातियों का श्राद्ध तूम्रगी भाव में ही करना चाहिए--ऐसा महर्षि मनु ने कहा है ॥१३॥ एक ही समय में जिन बहुत-मे मनुष्यो का अथवा दो का देहान्त हुमा हो उनका मन क द्वारा स्वपन करे और पृथक् पृथक् श्राद्ध करना चाहिए ॥१४) पहिले जो मृतक हुप्रा हो उसका पहिले और फिर दूसरे का, तीसरे का फिर एक स थ जिनका .. निपात हुमा हो उनका इसी क्रम से श्राद्ध करे ॥१५॥ ३३-नित्य श्राद्ध कथन नित्यधाद्ध हि गन्धाय द्विजानभ्यर्य शक्तित । सर्वानिपतृगणान्सम्यक्सदैवोद्दिश्य पूजयेत् ॥१ आवाहन स्वधाकार पिण्डाग्नौ करणादिकम् । ब्रह्मचर्यादिनियमान्विश्वे देवास्तथैव च ॥२ नित्यथाद्ध त्यजेदेतान्भोज्यमन्मञ्च कल्पयेत् । न दद्यादक्षिणाञ्चैव नमस्कारविसर्जयेत् ।।३ देवानुद्दिश्य विश्वादीन्दद्याच्च द्विजभोजनम् । नित्यश्राद्ध तदेवेति देवश्राद्ध तदुच्यते ।।४ मातु श्राद्ध तु पूर्व स्यात्वहिन्येव पैतृकम् । उत्तरेऽहनि वृद्धस्य मातामहगणस्य च ॥५ मरे मनन्तर नित्य भादो वा विवेचन दिया जाता है। श्री भगवान मित्य श्रद वथन ] - कहा -नित्य श्राद्ध में अपनी शक्ति के अनुसार गन्धाक्षन पुष्पादि के द्वारा द्वजो का प्रवचन करके समस्त पितृगणो का भली-भांति उद्देश्य करके पूजन रना चाहिए ॥१॥ प्रावाहन, स्पधाकार, पिएडाग्नि मे करणादिक, ब्रह्म- वर्यादि नियम तथा विश्व देवानो को इन मवको नित्य श्राद्ध में त्याग देना वाहिए और भोज्य अन्न की कलाना करनी चाहिए । दक्षिणा नही देनी चाहिए केवल नमस्कार करके ही विसर्जन कर देवे ।।२।३॥ विश्वादि देवो का उद्देश्य करके द्विजी को भोजन देवे। उसी को नित्य श्राद्ध कहा जाता है। अब देवश्राद्ध बतलाया जाता है ॥४॥ माता का श्राद्ध पहिले होता है । दिन में ही पैतृक कमें होता है । नत्तर दिन में वृद्ध मौर मातामह गण का श्राद्ध होता है ।।५।। पृथग्दिने न शक्तश्चेदेकस्मिन्नेव वासरे। थाद्ध त्रय प्रकुर्वीत वैश्वदेवव्रतत्रिकम् ॥६ पितृभ्य कल्पयेत्पूर्वं मातृभ्यस्तदनन्तरम् । मातामहेभ्यश्च ततो दद्यादित्यं क्रमेण तु ॥७ मातृश्राद्ध तु विप्राणामलाभे तु कुलान्विता । पतिपुत्रान्विताः साध्व्यो योपितोऽष्टौ च भोजयेत् ॥८ इष्टापूर्तादिकारम्भे तदा श्राद्ध समाचरेत् । उत्पातादिनिमित्तेपु नित्यश्राद्धवदेव तु ॥ नित्य देव तथा वृद्ध काम्य नैमित्तिक तथा। श्राद्धान्युक्तप्रकारेण कुर्वन्सिद्धिमवाप्नुयात् ॥१० पलग दिन में श्राद्ध करने की शक्ति न हो तो एक ही दिन में वैश्वदेव तोन व्रतो के तीनो श्राद्धो को कर देना चाहिए ॥६॥ पहिले पितृगण के लिए पौर फिर मातृ वर्ग के लिये कलित करना चाहिए। इसके मनन्तर मातामह मादि के लिये इसी क्रम में याद देना नाहिए ।।७॥ माना के बाद में विप्रो के माम न होने पर दुतो रो अन्वित तथा पति पौर पुत्रो से युक्त पाठ परम मावी स्त्रियों को भोजन कराना चाहिए ॥८॥ जब इष्टापून मादि मा पारम्भ हो उस ममय में श्राद्ध करना चाहिए। उत्पात पादि निमित्तो के होने पर नित्य याद मी भांति हो करना चाहिए । निस्य श्राद, दैव, वृद्ध, काम्य तथा मिति ४७२ । । यी गरुडपुगए श्राद इतने प्रकार के होते हैं । इन सबको यथोक्त विधि-विधान से करने वाल मनुष्य अवश्य ही सिद्धि की प्राप्ति किया करता है ॥१०॥ ३४-मनुष्यों के कर्म-विपाक कथन सुकृतस्य प्रभावेण स्वर्गो नानाविधो नृणाम् । भोगसौख्यादिरूपञ्च बल पुष्टि पराक्रम. ॥१ सत्य पुण्यवता देव जायतेऽत्र परत्र च । सत्य सत्य पुनः सत्य देववाक्य तु नान्यथा ॥२ धर्मो जयति नाधर्मः सत्यं जयति नानृतम् । क्षमा जयति न क्रोधो विष्णुर्जयति नासुर ॥३ एतत्सत्य मया ज्ञात सुकृताच्छोभन भवेत् । यथोत्कृष्टतम पुण्य तथा कृष्णपरो भवेत् ॥४ एकञ्च थोतुमिच्छामि पापयोनिश्च जायते । येन कर्मविपाकेन यथा निरयभाग्भवेत् ॥५ या या योनिमवाप्नोति यथारूप प्रजायते । तन्मे वद सुरश्रेष्ठ समासेनापि काक्षितम् ॥६ शुभाशुभफलस्ताय मुक्तभोगा नरास्त्विह । जायन्ते लक्षणैर्यस्तु तानि मे शृणु काश्यप ॥७ गरुड ने कहा-मनुष्यो को किये हुए सुकृत के प्रभाव से अनेक प्रकार का स्वर्ग प्राप्त होता है । हे देव ! इस लोक में पोर परलोक मे पुएप शाली लोगों को मोग-सौल्प आदि स्वरूप वाला-बल-पुष्टि-पराक्रम मोर सत्य उत्पन्न हो जाता है । यह सत्य है भोर सपंथा सत्य है पोर पूर्ण रूप से सत्य है क्योंकि देव वाक्य कभी भी भन्यथा नही हुमा करते हैं ॥१॥२॥ धर्म की जय होती है मधम की नहीं होती -सदा सस्य को विजय होती है मिथ्या भी नहीं होती -क्षमा जयशील है क्रोध नहीं-विष्णु विजयी होते हैं 'सुर नहीं ॥ ३ ॥ यह मैंने बिल्कुल जान लिया है कि सुकृत से भलाई होती जितना उत्कृष्ट तम मर्यान् सबरी उच कोटि रा पुण्य होगा वैसा ही पण [ ४७३ मनुष्यों के कर्म विपाक कथन - रायण होगा ॥ ४ ॥ अव में केवल एक बात और सुनना चाहता हूं कि जिस म के विपाक से पाप योनि में उत्पन्न होता है और जिस प्रकार से वह नरक IIस का अधिकारी बन जाता है ॥ ५॥ जिस-जिस योनि को वह प्राप्त किया करता है और जिस रूप वाला होता है। हे सुरो में परम । यह मेरा प्रभीष्ट प्रश्न है इसका उत्तर कृपा कर मुझे देवें ? ॥६॥ भगवान् श्री कृष्ण ने कहा-है ताक्ष्यं ! इस समार मे शुभ मोर अशुभ कर्मों के फलो के त्याग कर देने से मनुष्य भोगो से मुक्त होते हैं। हे काश्यप । जिन लक्षणो से वे उत्पन्न हुआ करते हैं उन्हें तुम पब मुझमे श्रवण करलो ॥७॥ गुरुरात्मवता शास्ता राजा शास्ता दुरात्मनाम् । इह प्रच्छन्नपापाना शास्ता वैवस्वतो यम. 11 प्रायश्चित्तेवजीर्णेपु यमलोके ह्यनेकधा । यातनान्ते विमुक्तास्ते अनेका जीवसन्ततिम् ME गत्वा मानुपयोनो तु पापचिह्ना भवन्ति ते । तान्यह तव चिह्नानि कथयिष्ये सगोत्तम ॥१० गन्ददोऽनृतवादी स्यान्मूकश्च व गवानृते । ब्रह्महा च क्षयी कुष्ठी श्यावदन्तस्तु मद्यप. ॥११ कुनखी स्वर्णहारी च दुश्वर्मा गुरुतन्पग । सयोगी होनवर्ण स्यात्काकोऽनिमन्त्रभाजनात् ॥१२ दिगम्बरा दुराचारा सर्वदेवावनिन्दका । यान्ति ते नरके घोरे ये च मिथ्या वदन्ति हि ॥१३ अन्न पम्युपित विगै प्रयच्छन्वुजना यजेत् मात्सर्यादपि जात्यन्धो जन्मान्धः पुस्तक हरन् ।।१४ पारम पानो के लिये शामन करन बापा गुरु होता है चोर को दुरात्मा दृष्ट मोग है उनके ऊपर राजा सामन रिसा करता है । म ममार म जो दिर पाप परने वाले है या जिनके पाप कम प्रगट नहीं हो पाते हैं जना पामा देवश्वन यमराज मारता है !"5॥ भित्तोरे मजीणं रहने पर यमलो मे पार मे मारनामो को भोगन के अन्त में नोवा ४७४ ] श्री गरुडपुगए की सन्तति से वे विमुक्त होते हैं । फिर उन्हें मानुष योनि मिलती है तो उस भी वे पूर्व कृत पापो के चिह्नो से युक्त हुमा करते हैं। हे खगोत्तम ! भव हा उन पापो के चिह्रो को तुमको बतलाते हैं ॥६॥ १०॥ जो पहिले मिध्या भापी होता है । गोपी के लिये भनृत बोलने वाला मूक (गूगा) होता है । जं ब्राह्मण की हत्या करने वाला होता है वह क्षय रोग का शिकार होता है प्रो. कोढी होता है । मद्य पीने वाला श्याव दल अर्थात् काले दांतो वाला होता ॥ ११ ॥ सुवरणं के हरण करने वाला कुनसी (बुरे नरखूनो वाला) होता है जो गुरु पत्नी मामी पहिले होता है वह टोप युक्त चमं वाला हुपा करता है जो सयोगी होता है वह हीन वणं वाला हुमा करता है। बिना निमन्त्रणा व भोजन करने वाला काक (कोमा) होता है ॥ १२ ॥ दिगम्वर ( नगे)-बु माचार वाले और समस्त देवों को निन्दा करने वाले और जो मिथ्या भापर किया करते हैं वे घोर नरक मे जाया करते हैं ॥ १३ ॥ विप्र को पर्यु पिर (बासी) भन्न प्रदान करने वाले कुब्जता प्राप्त किया करते हैं । मात्मयं ( डाह प्रादि से जात्यन्ध होता है और पुस्तको का हरण करने वाला पुरुष जाम । ही प्रन्या होता है ॥१४॥ फलानि हि हरन्नित्य म्रियते नात्र सराय. । मृतो वानरता याति तन्मुक्तो गलगण्डवान् ॥१५ अदत्तभक्षमश्नाति अनपत्यो भवेन्नरः । वणिक्चैव महामूढ सर्वदर्शननिन्दक. ॥१६ न जानाति धर्मतत्त्वं स पतेखोरसागरे । हरन्स्वर्ण भवेद्नोधा गरदः पवनाशनः ॥१७ प्रव्रज्यागमनात्पक्षिन्भवेन्नरपिशाचकः । चातको जलहर्ता च धान्यहत्ता च मूपकः ॥१८ अप्राप्तयौवना सेव्य भवेत्सप इतिश्र तिः । गुरुदाराभिलाषी च कृकलासी भवेद् वम् ॥१६ जलप्रस्रवण यस्तु भिन्द्यान्मत्स्यो भवेन्नरः । अधिक्रयान्विक्रयन्यै विकटाक्षो भवेन्नरः ॥२० मनुष्यो के कम-विपाक कथन । [ ४७५ कुयोनिनिन्दको हि स्यादुलूकः स्त्रीप्रवञ्चनात् । मृतस्यैकादशाहे तु भुजानः श्वाभिजायते ॥२१ जो नित्य ही फलो का हरण करता है वह मर जाता है-इसगे संशय नही है । मृत होकर वह वानर को योनि प्राप्त करता है और इससे मुक्त होकर गलगण्ट रोग वाला हुआ करता है ।। १५ ।। जो बिना दिये हुए भक्ष पार्यों को सा जाता है वह मनुष्य सन्तान हीन हुमा करता है और महा गूढ बनिया होता है जो कि समस्त दर्शनो की निन्दा किया करता है ॥ १६ ।। वह धर्म के तत्त्व को नहीं जानता है और उसका घोर सागर में पतन हो जाता है। सुवर्ण की चोरी करने वाला गोधा की योनि प्राप्त करता है और विप देने याला सर्प होता है ॥ १७ ॥ प्रव्रज्या के गमन से है पक्षिन् ! नर पिशान होता है । जल के हरण करने से चातक और घान्य के हरण से मूपय होता है ॥ १८ ॥ जिरा नारी को यौवन की प्राप्ति न हुई हो उसका सेवन करने से सर्प की योनि प्राप्त हुप्रा करती है-ऐसा श्रुति कहती है। जो गुरु की पत्नी के साथ गमन की इच्छा रखने वाला पुरुप निश्चय ही कुकलास होता है । १६ ।। जो मनुष्य जल के प्रस्रवण का भेदन करता है वह मत्स्य होता है। जो विक्रय न करने के योग्य पदार्थों का विक्रय किया परता है वह नर विक्ट नेत्रो वाला होता है ।। २० ।। कुयोनि की निन्दा करने वाली स्त्री का प्रवञ्चन करने से उलूक (उल्लू) हा करता है । मृतक के ग्यारहवें दिन मे भोजन करने वाला पुरुष कुत्ता की योनि प्राप्त किया करता है ॥२१॥ प्रतिश्रु त्य द्विजेभ्योऽर्थमददन्जम्बुको भवेत् । सर्प हत्वा भवेदुष्टः शूकरो विड्वराहकः ॥२२ परिवादाद्विजातीना लभते काच्छपो तनुम् । लभेद्दवलकस्तार्य योनि चाण्डालसज्ञकाम् ॥२३ दुभगः फल विक्रेता वृपश्च वृपलीपति । मार्जारोऽग्नि पदा स्पृष्ट्वा रोगवान्परमास भुक् ॥२४ सोदागमनात्पण्ढो दुर्गन्धश्च सुगन्यत् । यद्वा तद्वापि पारक्य स्वल्पं वा यदि वा वहु ।। -
४७६ ]
! श्री गरुडपुराण
हृत्वा व योनिमाप्नोति तैत्तिरी नात्र सगय. ॥२५
एवमादीनि विह्नानि अन्यान्यपि सगेश्वर ।
स्वकर्मविहितान्येव दृश्यन्ते मानवादिपु ॥२६
एव दुष्कृतकर्ता हि भुक्त्वा च नरकान्क्रमात् ।
जायते कर्मशेपेण ह्य क्तास्वेतासु योनिपु ॥२७
ततो जन्मशत मत्त्यः सर्वजन्तुपु काश्यप ।
जायते नात्र सन्देह. समीभूते शुभाशुभे ॥२८
बचन देकर अर्थात् प्रतिज्ञा करके द्विजो को घन आदि न देने वाला
गीदड होता है । सर्प का हनन करके मल खाने वाला शूकर हुप्रा करता है
॥ २२ ।। जो द्विजातियो को निन्दा किया करता है वह कछुप्रा का शरीर
प्राप्त किया करता है । हे तायं ! जो देवलक (पुजारी) होता है वह चाण्डाल
संज्ञा पाली योनि को प्राप्ति किया करता है ॥ २३ ॥ फलो के विक्रय का करो
वाला दुर्भागी और वृपली (शूद्रा) का पति वृप हुमा करता है। मग्नि को पैर
से स्पर्श करने वाला मनुष्य मार्जार (बिल्लो ) होता है तथा पर मांस का
खाने वाला रोगी होता है ।। २४ ॥ सौदर्या अर्थात् सगी बहिन के साथ गमन
करने से पुरुष पण्ढ (नपु मक) होता है और सुगन्धित पदार्थों के हरण
करने
से दुर्गन्ध वाला होता है । जो कुछ भी दूसरे का थोडा हा या बहुत हो हरण
करने से तत्तिरो योनि प्राप्त हुग्रो करती है-इममे कुछ भी संशय नही है
॥ २५ ॥ हे सगेश्वर ! इस प्रकार के पूर्व जन्म मे किये हुए पापो के चिह्न
होते हैं । इनके अतिरिक्त मन्य भी लक्षण होते हैं जो मानव मादि प्रारिणय
मे अपने क्येि हुए कर्मों से ही हुमा करते हैं ।। २६ ।। इस प्रकार से दुष्को
के करने वाला प्राणी भोग कर पौर क्रम मे नरहो की यातना सह पर शेष
जो भी कम रह जाया करते हैं उनके भोगने के लिये इन निकृष्ट योनिय
मे जीवात्मा जन्म घारगा किया करता है।॥ २७ ।। हे काश्यप ! इगके मन.
नर यह जन्तु मैप डो नाम धारण करके जो कि ममस्त जन्तुप्रो के होते है
फिर शुभ अशुभ कर्मों के समान होने पर इसे मनुष्य योनि प्राप्त होती है-
इसमे कुछ भी सशय नहीं है ॥२८॥
[ ४७७ - मनुष्यों के कर्म विपाक कथन स्त्रीपु सयोः प्रसङ्ग च विशुद्ध शुक्रशोणिते । पञ्चभूतसमोपेतः सुपुष्ट: परमः पुमान् ॥२६ धारणा प्रेरण दु खमिच्छा संहार एव च । प्रयत्नाकृतिवश्व रागद्वेपो भवाभवी ॥३० तस्येदमात्मान सर्वमनादेरादिमिच्छतः। स्वकर्मवद्धस्य तदा गर्भे वृद्धि हि विन्दति ॥३१ पुरा मया यथा प्रोक्त तव जन्तोहि लक्षणम् । एव प्रवत्तंते चक्र भूतग्रामे चतुर्विधे ॥३२ समुत्पत्तिविनाशश्च जायते तार्क्ष्य देहिनाम् । ऊर्ध्वा गतिस्तु धर्मेण नधर्मेगा ह्यधोगति: ॥३३ जायते सर्ववर्णाना म्वकर्माचरणात्सग । देवत्वे मानुषत्वे च दानभोगादिका क्रिया ॥३४ यद्यदृश्य वैनतेय तत्सर्व कर्मज फलम् । पुकर्मविहितो घोरे कामक्रियाजिते शुभे॥ नरके पतितो भूयो यस्योत्तारो न विद्यते ।।३५ ग्ली पोर पुरुप के प्रसङ्ग होने पर तथा शुक्र ( यो ) पोर शोणित (गत-रज) के विशुद्ध होन पर यह पांच तत्वों से (पृथ्वी-माज-रोज- जल- यु) ममन्वित-परम पुष्ट पुरुष अाम विण परसा है ॥ २६ ॥ पारणा-प्रेग्णा- दु.ग-इच्छा-हार-प्रयान-प्राकृति-य-राम- प-भय-अभय-यह गय प्रनादि और मालिकोटा रने वाले अपने मंगे पर उमर ममय गर्भ में पति या प्राप्त होने ६ ॥ ३० ॥ ३१॥ पहिल मैन को सुपको जानु रे बाण मनमाय है।म प्रकार में चार प्रसार भूत प्राम में यह पत्र सपना है ॥ ३२ ॥ ६ तार ! देश पारियो की जाति होतो है पौर विमान भी होता है । धम मे नि मा गामिनी होती है और आप गपयोगनिहुमा बसी है ॥ ३५॥ है पा ! पमान पणा की देवर पौर मानुपात में पान माँ के पापण मे दान एष भाग पा को मिाही * १४ ॥ोय ! जो-जो पाय है यह मर मा में गाय पर होगा [ श्री गरपुरा है। कुस्मित कों से मिहिन पाम शिया मे मजिन प्रमुभ एवं घोर नरर पतित होता है जिसका कि फिर कोई भी प्रतिकार नहीं होता है ॥३॥ ३५ -विविध पाप कथन भगवन्देवदेवेश कृपया परया वद । दान दानस्य माहात्म्य वैतरण्याः प्रमाणकम् ॥१ या सा वैतरणीनाम्नो यमद्वारे महासरित् । यत्प्रमारणा च सा देवी शृणु ता मे भयावहाम् ॥२ रातोयोजनविस्तीर्णा पृथुत्वे मा महानदी। दुर्गन्धा दुस्तरा पापष्टमानभयावहा ॥३ पूयशोणिततोयाट्या मासकर्दमसकुलो । पापिन ह्यागत दृष्ट वा नानाभयममागतम् ॥४ दृश्यते सत्वरं तोय पात्रमध्ये यथा धृतम् । कृमिभि सकुलं पूय वज्रतुण्डैः समाहृतम् ।।५ शिशुमारश्च मत्स्याचं वंजकतरिकायुतः । अन्यश्च जलजीवैश्च हिंसकर्मासभेदिभिः ॥६ तपन्ते द्वादशादित्याः प्रलयान्ते यथा हि ते । पतन्ति तन वै मा क्रन्दमानास्तु पापिनः ॥७ गरुड ने कहा-हे देवो के भो देवेश्वर । हे भगवन् ! माप प्रब परम कृपा करके दान मोर दान का माहात्म्य तथा वैतरणी का प्रमाण बतलाये ? ॥१॥श्रो भगवान ने कहा--जो वैतरणी नाम वाली एक महान नदी है वह यमराज के द्वार पर है। उमका जितना प्रमाण है उसे तुम मुझसे श्रवण करो। वह वैतरणी देवी वहृत हो भय देने वाली है ॥ २ ॥ वह वैतरणी नदो सौ योजन के विस्तार वाली है पृथुत्व मे वह एक सबसे बडी महा नदी है। उम नदी में बहुत अधिक दुर्गन्ध माती है और वह बहुत ही कठिनता से पार किये जाने वाली है। पापियो को उसे देखने मात्र मे हो वडा भय लगा करता है ॥ ३ ॥ उस वैतरणी नदी में पूय ( मवाद )-रक्त प्रौर जल भरा हुआ ।
७६ - विविध पाप कथन रहता है तया मांस को कीचड़ भरी हुई है । आये हुए पापो को देखकर माना प्रकार के भय आ जाते हैं ॥४॥ उसमे शीघ्र ही जल ऐमा दिखलाई दिया करता है जैसे किसी पात्र में रखा हुमा हो । पूय ( मवाद ) कृमियो से घिरा हमा रहना है तथा वच तुण्डो के द्वारा समाहृत होता है ॥ ५॥ शिशुमार--- मत्स्य मादि-वज्र कतरिका और अन्य मास भेदी हिंसक जल के जीवों से यह वैतरणी परि पूर्ण रहती है ।। ६ ॥ यहाँ पर दारह सूर्य जिस तरह प्रलय फै माल मे सपा करते हैं वैसे ही ताप देते हैं। यहाँ पापी नाम उसमे गिरते, रोने-चिहनाते है मोर क्रन्दन करते हैं ॥७॥ हा भ्रात: पुन मातति प्रलपन्ति मुहुमुहुः । प्रतरन्ति निमज्जन्ति तत्र गच्छन्ति जन्तवः ।। चतुविध प्राणिगणद्रप्टच्या सा महानदी। तरन्ति तत्र दानेन चान्यथा ते पतन्ति वैद मातर येऽत्रमन्यन्त प्राचार्य गुरुमेय च । नवमन्यन्ति ते मूढाम्तेपा वागोऽय सन्ततम् ।।१० पतिव्रता धर्मशीला व्यूढा धर्म विनिश्रिताम् । परित्यजन्ति ये मूढास्तेपा वासोन्म सन्ततम् ॥ विश्वासप्रतिपन्नाना स्वामिमित्रतपस्विनाम् । म्यीवालविरवादीना छिद्रमन्येपन्ति हि ॥ पच्यन्ते पूय मध्ये तु ग्रन्दमानाम्तु पापिन. ॥१२ प्राप्त बुभुक्षित चित्र या विघ्नायोपसपंति । फुमिभिभक्ष्यते तत्र गावदाभूनमनवम् ॥१३ माझगाय प्रनित्य यथार्य न दाति य । याविध्यगय रानीगामी च पंगुनी ॥१४ कथाभकरच सूटगाक्षो म मपर । प्राहम नास्ति यो व सं राम्य यामीन मागतम् ॥१५ पागामा मनु रिम मममी में मिले । भाई! गुर होम.!"-गार युगे रह प्रमाप दिला 0 . - - ४८० [ श्री गरुडपुगड़ हैं। उस नदी में प्रसरण करते हैं-डुबकियां लगाते हैं और रुदन करते हुए जन्तु उममें जाया करते है ।। ८ ।। वह महानदी चार प्रकार के प्राणियो से युक्त देखी जाती है । व: पर दान से ही लोग उसे पार किया करते हैं अन्यथा वे सब उममे गिर जाया करते हैं ॥६॥ जो अपनी माता का तिर- स्कार किया करते हैं और पपने प्राचार्य और गुरु का अपमान करते हैं उन महा मूढ मानवो का इम पतरणी नदी में निरन्तर वास रहा करता है ॥१०॥ घम शीला-विवाहिता मौर धर्म में विशेष निश्चय वाली पतिव्रता पत्नी वा जो त्याग कर देते हैं उन मूढो का निवास इस वैतरणी में सर्वदा रहा करता है ॥ ११॥ विश्वाम मे स्थित रहने वाले स्वामी-मित्र-उपस्वी-स्त्री-बालक और विकल मादि या जो छिद्र खोजा करते हैं वे महा पापी प्राणी क्रन्दन करते हुए पूय (मवाद) के बीच में पच्यमान होकर नारकीय यातनाऐ सहन किया करते हैं ।। १२ ॥ विमी भूखे ब्रहाण को प्राप्त हो जाने पर जो विघ्न उपस्थित करता है वह वहां पर जब तक भूत-सप्लव होता है अर्थात् महा लय होता है तब तक कृमियो के द्वारा साया जाया करता है ।। १३ ॥ जो किसी प्राह्मण को प्रतिश्रुत करके फिर ८थार्थ नही दिया करता है और जो यन का विध्वस करता है तथा राज्ञी का गमन करता है और जो चुगली दिया करता है-कथा का भङ्ग करने वाला है-भूठी गवाही देता है-मद्य पान करता है तथा जो बुलाकर फिर भाषण नहीं करता है उस मनुष्य पा वास भी इस वैतरणी मे निरन्तर रहता है ।।१४।।१५।। . अग्निदो गरदश्च व स्वय दत्तापहारक । क्षेत्रसेतुविभेदी च परदाप्रधर्पक ॥१६ ब्राह्मणो रसविक्रता तथा च वृपलीपतिः । गोधनस्य तृपातस्य विभेदं कुरुते तु य ॥१७ कन्याविदूपकश्च व दान दत्त्वा तु तापकः । शूद्रस्तु कपिलानो ब्राह्मणो मांसभोजका ॥ एते वमन्ति सततं मा विचारं कृथा. क्वचित् ॥१८ [४८१ - विविध पाप कथन कृपणो नास्तिक क्षुद्रः स तस्या निवसैरखग । सदामी सदा क्रोधी निजवाक्यप्रमाणकृत् ।।१६ परोक्तच्छेदको नित्य वैतरण्या वसेच्चिरम् । यस्त्वहङ्कारवान्पाप स्वविकत्थनकारक ।। कृतघ्नो विश्वासघाती वैतरण्या वसे चिरम् ॥२० कदाचिद्भाग्ययोगेन तरणेच्छा भवेद्याद । सानुकूला भवेद् येन तदाकर्णय काश्यप ॥२१ अग्नि लगाने वाला--विप देने वाला-स्वय दान करके फिर उसका अपहरण करने वाला-क्षेत्र तथा सेतु ( पुल ) का भेदन करने वाला-पराई स्त्री के साथ प्रधर्षण (वलाकार) करने वाला-ग्राह्मण होकर ग्म का विक्रय करने वाला---गृपली (शूद्रा) स्त्री का पति विप्र-जो गो धन का तथा प्यास से पारी का विभेद करने वाला है-कन्या को विशेष रूप से दूषित करने वाला- दान देकर ताप देने वाला-शूद्र होकर कपिला गौ का पान करने वाला और माह्मण होकर माम खाने वाला ये मव उम महा भयावह वैतरणी नदी म निरन्तर निवास क्यिा करते है -इसमें कहीं भी कुछ अन्यथा विचार नही है ॥ १५ ॥ १७ ॥ १८ ॥ हे खग । जो कृपण है-नास्तिक है प्रौर क्षुद्र प्रकृति वाला है वह सम वैतरणी में वास किया करता है। जो मदा क्रोध करने वाला है-प्रमप करने वाला है और अपने ही वाक्य को प्रमाण मानने वाला है तथा जो दूसरे के क्थन का छेदन करने वाला है यह नित्य ही वैतरणी में चिर काल तक निनाम किया परता है। जो बहुत ही प्रहद्वार वाला मोर अपना विकत्थन करने वाला पाती है तथा कृतघ्नी और विश्वासघाती पुरुप होता है वह वैतरणी म बहुत अधिक समय तक निवाम किया करता है ॥१६॥ ।। २० ।। कदाचित भाग्य के योग से यदि तरण करन की इच्छा होती है तो जिसके द्वारा वह सानुकूल होती है उमे हे काश्यप | प्रब श्रवण करो ॥२१॥ अयने विपुवे पुण्ये व्यतीपाते दिनक्षये। चन्द्रमूर्योपरागे च सक्रान्ती दगंवामरे ।।२२ ४८२ ] [ श्री गरुडपुगए अयने पुण्यकालेषु दीयते दानमुत्तमम् यदा कदा भवेद्वापि श्रद्धा दानं प्रतिधू वम् ।। तदेव दानकालः स्याज्जाता सम्पत्तिरस्थिरा ॥२३ अस्थिराणि शरीराणि विभवो नय शाश्वत.। नित्यं सन्निहितो मृत्यु- कर्तव्यो धर्मसञ्चयः ।।२४ कृष्णां वा पाटला वापि दद्याद्व तरणी शुभाम् । हेमशृङ्गी रौप्यखुरी कांस्यपात्रोपदोहनीम् ।।२५ कृष्णवस्त्रयुगच्छन्ना सप्तधान्यसमन्विताम् । कापसिद्रोणशिखरे ग्रासीन ताम्रभाजने ॥२६ यम हैम प्रकुर्वीत लोहदण्डसमन्वितम् । इक्षुदण्डमय बद्ध्वा नडुप दृढबन्धनैः ॥२७ उडुपोपरि तां धेनु मूर्य्यदेहसमुद्भवाम् । कृत्वा विकल्पयेद्विद्वान्छनोपानत्समन्विताम् ॥२८ विषुव अयन मे-पुण्य व्यतीपात मेदिनक्षय में--चन्द्र पौर मूर्य के ग्रहण मे सक्रान्ति में-दर्शवासर मे-प्रयन मे और पुण्य कालो में जो कुछ उत्तम दान दिया जाता है । अथवा जब कभी दान के प्रति श्रद्धा । होता है वह ही द न का काल अस्थिर सम्पत्ति हो जाती है ॥ २२ ॥ २३ ॥ ये शरीर भी प्रस्थिर है और विभव भी सदा रहने वाले नहीं होते हैं। मृत्यु नित्य ही सनिहित रक्षा करता है इसलिये धर्म का सञ्चय अवश्य ही करना चाहिए ॥ २४ ॥ इरा महानदी वैतरणी मे निस्तार पाने के लिये तारण कराने वाली वैतरणी गौ का दान करना चाहिए चाहे वह श्यामा गो हो या हो । ऐमी किमी शुभ गो का दान करे । गौ के सोग मुवर्ण से मण्डिन हो मोर उसके खुर चांदी से म रए होने चाहिए। उसके दोहन के लिये वोसे का एक पान भी उसो माय देना चाहिए ।। २५ ।। कृष्ण वरण के दो पुत्रो से उमे मान करे । उसके माथ सात प्रकार के धार भी देवे । कार्यास द्रोए सिखर पर जान पाप मे प्रियन एक हेप (मोने ?) घम बनाये को लोह २६.3 में युक्त हो । ईस के दण्डों से पूण एक उडुप बनाकर उमे दृढ बन्धनो से बांध भाव पाटला ४E३ - मिविध पाप कयन वे । उस उडुप के ऊपर मूर्य देह से समुत्पन्न उस धेनु को करके जोकि छत्र और उपानह मे समन्वित हो, इसका दान किमी विद्वान् को देवे ॥ २६ ॥ । २७ ॥ २८ ॥ अंगुरीयकवासासि ब्राह्मणाय निवेदयेत् । इममुच्चारयेन्मन्त्र संगृह्य सजलान्कुशान् ॥२६ यमद्वारे महाघोरे थत्वा वैतरणी नदीम् । तत्त कामो ददाम्येना तुभ्यं वैतरणीच गाम् ।।३० विष्णुरूप द्विजश्रेष्ठ भूदेव पङक्तिपावन । सदक्षिणा मया तुभ्यं दत्ता वैतरणी च गोः ॥३१ गावो ममाग्रतः सन्तु गावो मे सन्तु पृष्ठतः । गावो मे हृदये सन्तु गवां मध्ये वसाम्यहम् ॥३२ धर्मराजश्च सर्वेश वैतरण्याख्यका तु गाम् । सर्व प्रदक्षिणोकृत्य ब्राह्मणाय निवेदयेत् ॥३३ पुच्छ सगृह्म धेनोश्च अग्रे कृत्वा तु ये द्विजम् । घेनुके त्व प्रतीक्षस्व यमद्वारे महाभये ॥३४ उत्तारणार्थ देयेशिवतरण्यै नमो नमः । अनुबजेदद्विज यात सर्व तस्य गृह नयेत् ।।३५ प्रगुलीयत्र (म गूरी) पौर वस्त्र जान के महित युगाऐ मेगर निम्न मात्रा धारण करना हमा प्रह्मग्ण ये लिये शन देये ॥ २१ ॥ मन्त्र- यमद्वार पर नोरि महान् पोर यरूपयामा है बरगी मदीना परके मैं उसमें पार होने की इच्छा वाना। इमोमिये ग वैतरणी गोश दान मुमरी परता हूँ ॥ ३० ॥ हे दिन घे ! पाय म्यान पाने । पप हम भू मान देना है और पति रे पावन करने वारे । मानिये पक्षिणा महागातरमो मो में पारा में दी। ॥ ॥ मग भिना frit गोरे मेरे पाम पौर नीदे। मेरे हार में भी गारे निसाम पौरोपों मार की निगरिया ॥ ॥ गों ty धर्म को मारतो नाम हपी गो गो गयी प्रशिता पर यवश ४८४ ] [ श्री गरुडपुराण पीछे ग्राह्मण को दान मे देवै ॥ ३३ ॥ फिर धेनु को पूछ ग्रहण करके और प्र ह्मण को पागे करके निवेदन करना चाहिए--हे नुके ! उस महान् भयानक यमराज के द्वार पर तुम मेरी प्रतिक्षा करना ।। ३४ ॥ हे देवेशि ! महानदी मे उत्तारण प्राप्त करने के लिये वैतरणी मापके लिये मेरा वारम्बार नमस्कार है । उस द्विज के पीछे-पीछे गमन करे और सब कुछ उसके घर में प्राप्त करा देवे ॥३५॥ एव कृते वैनतेय सा सरित्सुखदा भवेत् । मर्व कामानाप्नुवन्ति ददते ये च मानवा. ॥३६ सुकृतस्य प्रभावेण सुखञ्चेह परत्र च । स्वस्थे सहस्रगुरिणतं पातुरे शतमम्मितम् ॥३७ मृतस्यैव तु यदान परोक्षे तत्सम स्मृतम् । स्वहस्तेन ततो देय मृते कः कस्य दाम्यति ॥३८ दानधर्मविहीनाना कृपण जीवित क्षिती। अस्थिरेण शरीरेण स्थिर कर्म समाचरेत् ॥ अवश्यमेव यास्यन्ति प्रारणा प्रारिणका इव ॥३६ इनीदमुक्त तव पक्षिराज विडम्बन जन्तुगणस्य सर्वम् । प्रेतस्य मोक्षाय तदोवंदैहिक हिताय लोकस्य- शुभार्थबोधनम् ॥४० हे वैनतेय ! इस प्रकार मे करने पर वह महानती मुख देने वाली हो जाती है । जो मनुष्य ऐसा दान करते हैं वे समस्त कामनाओ की प्राप्ति किया करते हैं ।। ३६ ॥ सुकृत् के प्रभाव से इम लोक में और परलोक में है । स्वस्थ रहने हुए स्वय जो भी कुछ सुकृत किया करता है उसका पुण्य फल सहस गुना होता है। प्रातुरावस्था में जो भी कुछ सुकृत कराया जाता है उसका पुरय-फल मौ गुना होता है ।। ३७ ।। मृन हो जाने पर परोक्ष में जो दान-पुण्य उमके निमित किया जाता है वह उसी के समान बतलाया गया है । भत्तएक अपने हाप से ही सक्ष शान पुरय करना या देना चाहिए-यही मबसे उत्तम है । मर जाने पर कौन विम्व लिये दिया करता है? ।। ३८ ।। जो गनुष्य सुख होता [ ४८५ वविध पाप कथक ) सन पौर धर्म से विहीन हुमा करते हैं उनका जीवन इस भू मण्डल मे कृप- पता से पूर्ण होता है । यह शरीर तो सदा स्थिर रहने वाला नही है प्रतएव इस शरीर से स्थिर कर्म जो दान-पुण्य है वह अवश्य ही करना चाहिए । ये प्राण तो अवश्य ही एक दिन मेहमान की भांति चले ही जायगे ॥ ३६ ।। है पक्षिराज ! यह मैंने तुमको सब जन्तुगण को विडम्बना बतलादी है। प्रेत की मुक्ति के लिये उसकी मौवंदहिक क्रिया-कलाप लोक के हित के लिये भी है पौर यह शुभ अर्थ का ज्ञान कराने वाला है ॥४०॥ एव विप्राः समादिष्ट विष्णुना प्रभविष्णुना । गरुडः प्रेतचरित श्रुत्वा सन्तुष्टमानसः ॥४१ व्रततीर्थादिकं पुण्य पुनः पप्रच्छ केशवम् । ध्वात्वा मनसि सर्वेश सर्वकारणकारणम् ॥४२ ऋपय सर्वमेतत्तु जन्तूना प्रभवादिकम् । मया प्रोक्त हि वै मुक्त प्रेतस्य चौवंदैहिकम् ॥ निदान वच्मि लोकाना हिताय परमौषधम् ॥४३ लाभस्तेपा जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजय. । येपामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः ॥४४ विष्णुर्माता पिता विष्णुविष्णु स्वजनबान्धवः । येपामेव स्थिरा वुद्धिन तेषाँ दुगतिर्भवेत् ॥४५ मङ्गल भगवान्विष्णुर्मङ्गल गरुडध्वजः । मङ्गल पुण्डरीकाक्षो मङ्गलायतन हरिः ।।४६ सूतजी ने कहा-हे विप्रगण ! प्रभविष्णु भगवान् विष्णु ने इस प्रकार से समादेश किया था। गरड इम सम्पूर्ण प्रेत के चरित्र को श्रवण कर परम सन्तुष्ट मन वाला हो गया था ॥ ४१ ॥ फिर मन में गमरत कारणो के भी कारण सब के स्वामी का मन मे ध्यान करके व्रत मोर तोयं प्रादिक पुय कार्य के विषय मे भगवान् केशव से पूछा था ॥ ४२।। है ऋणि गण ! जन्तुषो का यह सब प्रभव मादि मैंने वतला दिया है भोर प्रेत की मुक्ति के लिये दे के समाप्त हो जाने के बाद में होने वाला मोर्ध्वदेहिक कर्म भी बतला दिया [ धी गरुडपुगए - है । भव लोको के हित के लिये जो निदान है और परम पोषध स्वरूप है उ बतलाता हूँ ॥ ४३ । जिनके हृदय तल मे इन्दीवर के समान श्याम वर्ण वा. भगवान् जनार्दन विराजमान रहते हैं उनको ही लाभ होता है-~उनकी विज होती है। ऐसे लोगो का पराजय तो कभी हो ही नहीं सकता है ।। ४४ ।। भगवान विष्णु वस्तुत माता-पिता और स्वजन एव वान्धव है । जिन मनुष्यो की बुद्धि इस प्रकार की स्थिर रहा करती है उनकी कभी भी दुगति नही होती है ॥ ४५ ।। भगवान् विष्णु का स्वरूप मङ्गलमय है और गरुडध्वज गङ्गल रूप है । पुडरीकाक्ष भी मङ्गल रूप हैं हरि पूर्णतया मङ्गलो के आधार है। ॥ ४६ ॥ हरिर्भागीरथी विप्रा विप्रा भागीरथी हरि । भागीरथी हरिविप्रा सारमेतज्जगत्त्रये ॥४७ सर्वेपा मङ्गल भूयात्सर्वे सन्तु निरामया । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुखभाग्भवेत् ॥४८ इति गरुडपुराणे प्रेतकल्पे प्रजाना हितमभिहितमादौ सूतपुत्रेण पुण्यम् । कनुकरणगताना नैमिपे सन्मुनीना श्रवणगतमकुर्वन् कि विजानाति मत्यं ।।४६ हरि-भागीरथो और वि तथा विप्र-भागीरथी पोर एव हरि भागीरथी. हरि पौर विप्र तीनो जगत् श्री हरि भगवान् ने कहा-हमने यह गरुड पुगण विधि के साथ तुमको भली भांति समझा दिया है। इस परम पुयमय गरुड महा पुराण को जो भी कोई श्रद्धा-भक्ति के भाव से पढना है और इसका थवरण क्यिा करता है वह पुरुष भी इस ससार के सर्वदा जन्म-मरण के पावागमन के बन्धन से मोक्ष प्राप्त कर भगवान् की समिषि मे यि निवास किया करता है । ५२॥
उपसंहार परलोकवाद और स्वर्ग-नर्क हिन्दू धर्म को विशेषतामो में से एक परलोक्वाद भी है मौर वह भार- तीय धर्म मे प्रवाहित प्रध्यात्म धारा का एक सुदृढ प्रमाण है । हम सभी जानते हैं कि सामान्य मनुष्य का ध्यान मुख्य रूप से भोजन, वस्त्र, प्रावाम, मनोरञ्जन पादि की तरफ जाता है और यदि उसकी ये प्रावश्यकताएं इच्छानुवून रूप म पूरी हो जाती हैं तो फिर उसे ईश्वर और परलोक प्रादि की याद कदाचित् ही आती है । यह हिन्दू धम के प्राचीन ऋषि-मुनियो की ही महत्ता थी कि उन्होने किसी प्रकार का भौतिक स्वार्थ न होने पर भात्म तत्त्व और उमके साथ ही परलोक तत्त्व को अच्छी तरह छान डाला और उसमे से ऐमें ऐसे अमूल्य मणि- मुक्ता ढूंढ ढूंढ कर निकाले जिनके बल पर प्राज भी अध्यात्म-क्षेत्र मे हमारा गौरव स्थिर है। परलोक का सिद्धान्त पुनजन्म मे सम्बन्धित है। जो लोग प्रात्मा की अमरता और उसके भिन्न भिन्न स्थूल रूपो म प्रकट होन के विधान को समझ सकने मे प्रसमथ होते हैं, वे परलोक के स्वरूप को भी नहीं जान सकते । इमो. लिय ससार क दो बहु प्रचलित धम ईमाई और मुसलमान स्वर्ग और नर्क का नाम लेने पर भी उनके विषय में किसी तरह का स्पष्ट वर्णन नही कर पाये। उन्होने मरने के बाद प्रात्मा का अस्तित्व स्वीकार किया, पर साथ में यह भी कहा कि शरीर से पृथक् होने के पश्चात् उसे एक शून्य स्थान में बन्द कर दिया जाता है । जब 'कयामत' आयेगी तो भगवान् सब मनुष्यो को अपने सामने खडा करके उनके कर्मानुमार दण्ड या पुरस्कार देंगे। सार रूप से यह बात समोप- जनक हो सकती है, पर इससे यह प्रक्ट नहीं होता कि इमा प्रचार करने वालो ने इस समस्या को ठीक तरह से समझा था । वास्तव म पुनजन्म को स्वीकार दिये विना पात्मा की अमरता मोर मरने के बाद शुभ तथा अशुभ कमों के फल भोगने की बात का कोई प्रर्य ही नही है ।
४८८ ] [ श्री गरुडपुराए हिन्दू शास्त्रो में इस विषय का विस्तृत रूप से विवेचन किया गया है उनमें मात्मा को अमरता को एक प्रकाट्य तथ्य के रूप में स्वीकार किया गय है और वनलाया है कि वह विभिन्न योनियो में प्रकट होकर विकास की यात्र को पूरा करती है। यह भारतीय मनीपियो की योग-दृष्टि की ही शक्ति थी कि उन्होने यह सिद्ध कर दिया कि केवल मनुप्यो मे ही नहीं पशु-पक्षियो, कीट. पतगो तक में एक ही मात्म-तत्त्व व्याप्त है । उन्होने जीवात्मा के रूप में उसका पथकता भी स्वीकर की पौर यह भी कहा कि शुभ मोर पशुभ कर्मों के फल स्वरूप उसका उत्थान और पतन भी होता है । उन्होने बताया कि मनुष्य मे वह शक्ति है कि जिससे वह शुभ कर्म करते हुए चाहे तो भगवान् के समक्ष पदवी प्राप्त कर सकता है और साथ ही पाप-कर्म करके अपने को नाली के कीडे को स्थति तक भी गिरा सकता है । मनुष्य के हाथ में इतनी बडी शक्ति होने का विश्वास उसके लिये एक बहुत बडा सबल है और इसी के प्राधार पर यहाँ ऊँचे से ऊचे अध्यात्म शक्ति सम्पन्न महापुरुषो का माविर्भाव हो' सका है। मरणोपरान्त जीवन- मरने के बाद मास्मा का क्या होता है और किस प्रकार वह उत्तम और नीच गति को प्राप्त होती है ? इसक मूल सिद्धान्त को स्वीकार करते हुए भिन्न-भिन्न विद्वानो ने उसका वरएन विविध प्रकार से किया है जिसमे प्रत्यक्षत वढा अन्तर जान पडता है 'ठोपनिषद्' मै नचिकेना ने आत्म ज्ञान पी जिज्ञामा करते हुये यम से पूछा पा--- येय प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नाममस्तीनि चके । एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाह वराणामेप वरस्तृतीय. ।। प्रत्--" मृतकों के सम्बन्ध मे जो यह सशय है कि कोई पहता है कि मरने के पश्चात् मारमा जीवित रहती है और कोई कहता है कि मारमा भी जिवित नहीं रहती । मैं इसका वास्तविक रहस्य जानना चाहता हूँ मौर, यही तीसरा वर मापसे मांगता हूँ। . - - सिंहार ] ४८६ इससे विदित होता है कि अब से हजारो वर्ष पूर्व प्रायं सभ्यता के रम्भिक काल में ही ऋषियो को इम समस्या का निर्णय करना आवश्यक नि पडा था कि प्रात्मा अमर है अथवा नाशवान है ? और यदि अमर है तो रने के पश्चात् उसको किन परिस्थितियो मे रहना पडता है ? ' कठोप-निपद्' ऋषि ने इसका जो विवेचन किया है वह सवथा तर्क और बुद्धि सङ्गत है और इससे बढकर मात्मा के स्वरूप की व्याख्या करने में जो आज तक कोई मर्थ नहीं हो सका है । उन्होंने कहा- न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नाय कुतश्चन्नि वभूव कश्चित् । अजो नित्यः शाश्वतोय पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ।। अणोरणीयान्महतो महीया नात्मास्य जन्तोनिहिते गुहायाम् । तमक्रतु पश्यति वीतशोको धातु प्रसादान्महिमानमात्मनः । (क० १-२-१८, २०) अर्थात्- प्रात्मा न जन्म लेना है, न मरता है, वह तो नित्य है। यह न किसी के द्वारा उत्पन्न हुमा है और न उसके द्वारा कोई उत्पन्न किया जाता है । वह तो अजन्मा, नित्य, सदा रहने वाला प्रोर सनातन है। शरीर के नष्ट किये जाने पर भी वह नहीं मरता ।। १८ । जो व्यक्ति प्राणी के हृदय के अन्तरतम भाग में निहित सूक्ष्मातिसूक्ष्म प्रौर विशाल परमेश्वर के प्रश रूप इस जीवात्मा और उसको महिमा को देख पाता है वही पूर्णतया कामना, दुख भोर शोक से रहित होकर परमात्मा का कृपा पात्र होता है।" वास्तव में प्रात्मतत्त्व इतना सूक्ष्म है कि मानवीय स्थूल इन्द्रियो अथवा यन्त्रो से उपको मिसी प्रकार नहीं जाना जा गकता, न प्रमाणित किया जा सकता है । हमारे ऋषियो के कथनानुसार तो वह मानवीय विचार-क्षेत्र से भी बाहर का विषय है इसलिये उन्होने उसके विषय मे स्वमतानुसार कुछ कह कर अन्त मे 'नेति-नेति' कह दिया है। इसका पाराय यही है कि प्रात्म तत्त्व इतना सूक्ष्म मोर साथ ही महान् है कि मानव बुद्धि उसे पूर्ण रूप से जानने का दावा कदापि नही कर सकती।
४६. ] [ श्री गरुडपुराण । यही कारण है कि पुराणकारो ने इस विषय मे तक, बुद्धि और प्रमाण के अतिरिक्त करना से बहुत अधिक काम लिया है और उसे ऐसा रूप दिया है जिसमे सामान्य व्यक्ति भी उसके सम्बन्ध में कुछ अनुमान कर सके पोर उसे अपने जीवन-ध्यवहार में काम ला सके । जब यह बात सिद्ध हो चुकी है कि मात्मा अमर है और उसका लक्ष्य क्रमशः ऊँचा उठना है, तो उन्होंने लोगो को वही शिक्षा दी है जो इस लक्ष्य के अनुकूल और स्वाभाविक है। योगिर अनेक अवसरो पर अपनी दिव्य-दृष्टि में अनेक व्यक्तियो के भूत, वर्तमान पोर भविष्य की जानकारी प्राप्त कर उसे प्रपट भी किया है। इन सबके प्राधार पर ही पुराणो में प्रात्मा के उत्यान, पतन, शुभ-अशुभ कर्मों के परिणाम और स्वर्ग-नर्क के विषय मे वर्णन किया है पोर उसी पर हमारे यहाँ की सामान्य बनता पूर्ण विश्वास रखती है। गरुड-पुराण' को गणना परलोक वर्णन की दृष्टि से सर्व प्रथम है यह मुख्य रूप से इसी के लिये प्रसिद्ध है और अनेक प्रदेशो को हिन्दू जनता द्वारा श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता है। इसमे अधिकाश यमलोक मे पापियो को मिलने वाले कष्टो का वर्णन किया गया है और उनसे बचने के लिये दान आदि का विधान बतलाया गया है। इसके प्राधार पर अनेक प्रालोचको ने इसका महत्व घटाने की चेष्टा की है और कहा है कि ये बातें दान के लोभी ब्रह्मणो को गढो हुई है. इससे विश्वसनीय नही मानी जा सकती । यह तो हम भी जानते हैं कि पुराणो के वर्णन में अनिशयोक्ति की शैली से क म लिया गया है और अनेक स्थानों मे कवि-कल्पना की बहार भी दिखाई गई है। पर इन कारणों से कोई तथ्य झूठा या सच्चा नहीं हो सकता। विद्वान् लोग बिना किसी कदिनाई के यह समझ सकते हैं कि उनका कितना प्रश वास्तविक है और कितना कवि कल्पना का । इस दृष्टि से विचार करके कितने ही माधु- निक विद्वानों ने मृत्यु को वास्तविकता और परलोक मे जीव को स्थति के सम्बन्ध मे गहराई से दिनार किया है और कितने ही ऐसे तथ्यो तथा सिद्धान्तो वा प्रतिपादन क्या है जो घोडेसे हठधर्मो प्रवृत्ति वाले लोगों को छोड र प्राय. सभी लोगो को उचित जान पडने हैं। यदि उनके विचारों का निष्पक्ष [ ४६१ उपसंहार ] . पात होकर मनन किया जाय तो मनुष्य की मृत्यु विषयक धारणा में बड़ा परिवर्तन हो जाता है और जो बात आज हमको एक बहुत बडी विपत्ति अथवा सर्वनाश की तरह जान पढ़ती है वही एक स्वामाविक और उपयोगी परिवर्तन को तरह प्रतीत होने लगती है। इसका विश्लेषण करते हुये एक विद्वान का कहना है- एक दृष्टिकोण से यह भी कहा जा सकता है कि मृत्यु वास्तव में शोक का अवसर न होकर पानन्द का विषय है । पर यह दृष्टिकोण तब प्राप्त हो सकेगा जब हम जीवन-मरण की समस्या को भौतिक देह की दृष्टि से नही, परन् उसके भीतर निवास करने वाले ' देही ' (पारमा) को दृष्टि से देखने की कोशिश करेंगे । देही अथवा जीव का इस शरीर में रहना ऐसा है, जैसा किसी फो चारो तरफ से खूब बांध-छोह देकर किसी मधेरी कोठरी में बन्द कर देना इस शरीर रूपी कोठरी मे जहां-तहाँ बहुत छोटी-छोटो, मैली-कुचैली खिड़कियां लगी हुई हैं । जब जीव शरीर को छोडकर बाहर निकल पाता है तो वह अपने भापको इन बन्धनो से पृथक पाता है । यद्यपि इस शरीर के छूटने पर भी जीव के ऊपर और कई पर्दै (कोष) लगे रहते हैं, तो भी जो सबसे भद्दा स्थूल पर्दा है उससे उसकी रिहाई हो जाती है । इस प्रकार जीव की दृष्टि से इस शरीर का झूटना प्रानन्द का ही अवसर है ।" मनुष्य का पारलौकिक जीवन कैसा होता है. इसको समझने के लिये मावश्यकता है कि हम विभिन्न स्वरूपो के सम्बन्ध में कुछ जानकारी हामिल करे । यह तो सभी जानते है कि हमारा स्थूल शरीर नाशवान है, पर उसके "नष्ट हो जाने पर भी दो म श बचे रहते हैं एक 'जीवात्मा' (ईगो) मोर दूसरा 'पारमा' ( मोनाड ) । तीसरा देहात्मकजीव ( परसनैलिटी ) कहा जाता है जो परिवर्तनशील होता है । मनुष्य के मृत्यु काल और परलोक-जीवन या निर्णय बहुत कुछ इस बात द्वारा होता है कि वह अपने इन तीन रूपो में से किस रूप को प्रधानता देता है । इस सम्बन्ध मे उपयुक्त लेखक का मत है- " यदि हम अपने पाप मपनी प्रात्मा के स्वरूप में जानने लगें, जैसा कि प्रात्म ज्ञानी लोग करते हैं, तो उस हालत मे हम अपने पापको जन्म-मरण ४६२ । थी गठपुराण " से बिल्कुल परे पायेंगे । उम स्थिति में हम भी भगवान कृष्ण की तरह पहा सकते हैं कि न तो हम जन्म लेते हैं, न मरते हैं। पर वह अभी हम लोगो के लिये बहुत दूर की बात है । मृपि, महात्मा और तत्व ज्ञानी पुरुषो को ही ऐसा अनुभव प्राप्त होता है । हम तो अभी अपने आपको भली-भांति जीवन के स्वरूप में भी नही जानते । यदि हम जानते होते तो मृत्यु हम लोगो को ऐसे भयकर स्वरूप में नहीं दीख पडती। उस समय हम पुनर्जन्म की वास्तविकता समझते तथा मृ यु को केवल एक परिवर्तन के रूप मे समझते । माज कल हम इस सम्बन्ध में जो इतना अधिक दु ख अनुभव करते हैं उसका प्रधान कारण यही है कि अभी हम अपने को देहात्मक-जीव के रूप में ही जानते हैं । पुनर्जन्म के प्रमाण- Personality इतना ही क्यो अाज कल ससार में ऐसे लोगो को भी कमी नहीं जो 'जडवाद' मे ही विश्वास रखते हैं और पुनजन्म, परलोक धादि की बातों को 'भ्रम' अथवा 'निरर्थक' बतलाते हैं। इनम से कुछ लोग तो विज्ञानवादी बनने के लिये ऐसा भाव प्रकट करते है और कुछ विचार शून्यता के कारण इस विषय पर कुछ सोच समझ सकने की शक्ति ही नहीं रखते । पर इन दिनो एक तो कितने ही खोज करने वालो ने दश और विदेशो को पुनर्जन्म की ऐसी घटनामो पर प्रकाश डाला है कि जिनकी प्रत्यक्षता स कोई इनकार नहीं कर सकता । और दूसरा प्रमाण उन बच्चो का है जो तीन चार वप की पायु बडे-बडे ग्रन्यो अथवा विभिन्न भाषामो पा ज्ञान रखते हैं । इस सम्बन्ध में हिन्दी के प्रसिद्ध दैनिक 'माज' क ८ मई १९४० क अङ्कमे नीचे लिखा समाचार छपा था- "यनारा जिला के एक गांव का लडका जिसकी आयु गुश्किल से ६ वर्ष की होगी, शेक्सपियर के समस्त ( ३६) नाटको के अध्याय के मध्याय मुह अचानी सुना देता है । इस लडके का नाम 'कप्पा बुरुद ' है । वह मंग. रेली, फ्रेंच, मराठी, तेलगू, हिन्दी, काकाणी प्रादि कई भाषाओ का विद्वान है जिन लोगो ने उसको देखा है उन सभी ने एक स्वर से यह स्वीकार किया है - उपसहार ] 'के उसको प्रतिभा बड़ी विलक्षण है। वह ईमा के ५५ वर्ष से पूर्व से लेकर प्रयतक की सभी ऐतिहासिक घटनाप्रो पर फाफो प्रकाश डालता है । अन्तर्राष्ट्रीय राजनैतिक परिस्थिति पर जब लोग उससे वार्तालाप करते हैं तो ऐसा जान पडता है कि मानो वह राजनीति का कोई प्राचार्य हो । बुरुद स्वयं अपनी इस विलक्षण प्रतिभा के विषय मे उदासीन है। उसका कहना है कि 'एम० ए० उसने बहुत पहले पास कर लिया है। अधिकाश व्यक्तियो की सम्मति है कि वह पूर्व जन्म मे अच्छा विद्वान् रहा होगा। इसी तरह पब से पचास-साठ वर्ष पूर्व जो 'मास्टर मदन' नाम का एक घालक हुमा या वह चार वर्ष की आयु मे ही भारतीय सङ्गोत का उत्तम शाता बन गया था और बडे-बडे समारोहो मे मन को मुग्ध करने वाला गायन करता था। वह राग-रागनियो पोर सङ्गीत-शास्त्र की अनेक थारीक बातो के सम्बन्ध मे अन्य सङ्गीताचार्यों से बात-चीत भी करता था । जब कि हम देखते हैं कि मच्छे, समझदार बडी मायु के लडके वर्षों तक अभ्यास करके 'मातो स्वगे' का ज्ञान पोर थोडे से राग-रागनियों का अभ्यास पर पाते हैं, तब एक चार-पांच वर्ष की आयु के बालक का सङ्गीत शास्त्र-मर्मश होना और इस क्षेत्र मे बरसो तक नाम हामिल कर सकना सिवाय पूर्व जन्म को विधा और प्रतिभा के पोर किसी तरह सभव नही जान पडता । प्रेत-योनि का अस्तित्व- 'गरुड-पुराण' का मुख्य विषय 'प्रेत-योनि' से मम्बन्धित है। अन्य पुराणो में भी प्रेतो के सैकडो उपारपान मिलते है । हम यह हगिज नही कहते है कि वे सब ज्यो के त्यो ठीक है या उम प्रकार की घटनायें प्रवक्ष्य हुई है। वे तो सामान्य-जनता को धार्मिक तथा नैतिक शिक्षा देने के उद्देश्य से किसी भी छोटी या बडो घटना को उपदेशप्रद को क्यामी का रूप देकर प्रस्तुत किये गये हैं। पर अनेक लोग प्रेतो के अस्तित्त्व से ही इनकार करते है और उसे मनभिन व्यक्तियो का भ्रम प्रथवा कुछ लोगो की मनगढन्त बातें पलाते हैं । ऐगे मोगो को सम्मान पर विचार करने के लिये या मावश्यक है कि प्रेत- योनि ' के विषय में सथ्यो ओर तो वे धार पर विवेचना की जाय।
४६४ ] [ श्री गरुडपुराण सबसे प्रथम विचारणीय बात तो यह है कि यदि हम प्रात्मा के प्रारत में विश्वास रखते हैं और उसका पुनर्जन्म होना भी मानते हैं तो यह भी पता लगाना होगा कि क्या प्रत्येक मनुष्य मरने के पश्चाद उसी समय दूसग जन्म ले लेता है। अभी तक जिन बालक-बालिकाओ ने अपने पूर्व जन्म की घटनायें बतलाई है उनकी जांच करने से ज्ञात हुपा है कि प्रायः सभी मृता- त्मामो के जन्म लेने में गर्भकाल के नो महीने से कुछ महीने या वर्षों का अधिक समय लगा है । इमसे विदिन होता है कि वे प्रात्माऐ बीच के समय में किसी अन्य स्थान में रहती हैं । यह कोई जरूरी बात नहीं कि उनके रहने के दूसरे स्थान पृथ्वी की तरह ठोस ( स्थूल रूप वाले ) हवा, पानी, वनस्पति, प्रावास गृह यादि से युक्त हो। मरने के बाद भात्मा जिस सूक्ष्म शरीर से सम्बन्धित रहती हैं वह स्वय छाया की तरह, वायु से भी हलका रहता है, इसलिये उसे टिकने के लिये किमी स्थूल जगत् को तनिक भी पावश्यकता नही होती। ये स्थान किस तरह के होते हैं अथवा छाया शरीरी आत्माएं किस स्थति में रहती हैं इस सम्बन्ध में विद्वानो ने विभिन्न प्रकार के अभिमत प्रकट किये हैं । उनमे से दो-तीन का साराश नीचे दिया जाता है- "परलोक-जीवन के रहस्य को समझने के लिये तीन विषयो का कुछ ज्ञान प्राप्त करना यावश्यक है--(१) स्वर्ग-नरक अर्थात् प्राकृतिक लोको से मया अभिप्राय है ? (२) मनुष्य को प्राध्यात्मिक रचना केसी है ? ( ३ ) किम क्रम में मनुष्य को मृत्यु के पश्चात् जीवन व्यतीत घरना पडता है ? मृत्यु के बाद के जीवन को समझने के लिये नीचे के तीन लोको-- भू, भुवः और स्वः की स्थिति को कुछ अधिक स्पट रूप से समझना मावश्यक है, साधारणतः हमारे जीवन का विशेष मम्वन्ध इन्हीं तीन लोगों से रहता है। भू-लोक के दो प्रपान विभाग है--स्पूल पोर सूक्ष्म । इसबै सूक्ष्म विमाग को 'ईपरिय विभाग' भी कहते हैं । भुव लोक ये भी सीन प्रधान विभाग हैं, लेकिन उनपे विस्तार में जाना प्रावश्यक नहीं है । इमी मुवलोक के कुछ भाग को 'नरक पहते हैं । म्वों ने भी दो विभाग हैं-मूक्ष्म प्रोर स्थूल । स्यूल विभाग [ ४६५ उपसंहार ] प्ररूप विभाग ii रूप-विभाग या स्वर्ग कहते है और सूक्ष्म विभाग को कहते हैं। " वैज्ञानिक दृष्टि से मृत्यु का तात्पर्य स्थूल तथा छाया-देह के सम्बन्ध वेच्छेद से है। समस्त जीवन यह सम्बन्ध रादा लगा रहता है, केवल मृत्यु के द्वारा ही छूटता है । इस सम्बन्ध मे यह जान लेना आवश्यक है कि मृत्यु का समय मनुष्य के लिये बहुत महत्व का होता है । भगवान् कहते हैं कि मरने के समय जिसका जसा भाव होता है यह वैसी ही गति को प्राप्त करता है- यं य वापि स्मरन्भाव त्यजत्यन्ते कलेवरम् । त तमेनेति कौन्तेय सदा तद् भाव भावितः ।। (गीता ८-६) मर्थात् हे अर्जुन ! यन्त समय मे जो जिसको स्मरण करता हुमा पारीर-त्याग करता है, उसी भाव से सदा भावित होने के कारण वह उसी के पास पहुंच जाता है।" माधुनिक अनुसंधान करने पाले मनीषियों ने पता लगाया है कि भन्त समय के महत्त्व का प्रधान कारण यह है कि मृत्यु के कुछ देर पहले प्रामृ तिक रूप से मनुष्य मे ऐमी शक्ति मा जाती है, जिसकी वजह से जन्म से लेकर मरने के दिन तक की अपनी सारी कार्यवाहियों भोर सारे सम्बन्धों को वह देख सकता है । इस लोक से प्रस्थान करने के पूर्व जोष मानो अपने इस जन्म- मरण के लेसे का हिसाब-किमाव समझता है । अपनी कारवाईयो का महत्व पूर्ण सिंहावलोकन करता है । इस कारण अपने सभी जीवन-त्यों का निचोड़ उसके ह्य में बैठ जाता है और उमी के अनुसार उसको गति होती है। निये किसी को मृत्यु होते समय हमारा यह परम पराप्य है कि हम मृतक के समोप हल्ला-गुल्ला मोर रोना-पीटना न कर उसके समीप शान्तिपूर्ण तथा उस भावो से पूर्ण वातावरण मनाये रणे । "मगर वाणी' नामक पुस्तक के सेराक ने इस सम्बन्ध में कहा है- " पृथ्वी से एक रगेड मील की दूरी पर मा8 नरक सोक है । इनमें पापियों इस - मृत्यु को [ पी गरुडपुराण को दण्ड देने को व्यवस्था है । वे साधारण नहीं है और उन में अत्यन्त तीन यन्त्रणा दी जाती है । मृत्यु के बाद मनुष्य का स्थूल शरीर यही छूट जाता है मोर वह सूक्ष्म शरीर से अन्तरिक्ष मे पहुंच जाता है । इस सूक्ष्म-देह मे उसके तीन घह पोर तीन ही मस्तक होते हैं, पर तीनो मे पर केवल दो ही होते हैं । क्त्तव्यनिष्ट पोर पवित्रात्मा सीधे स्वर्ग को चले जाते हैं। जिन्होने संसार मे सामान्य जीवन बिताया है और कोई बडा पाप नही किया है वे पुनः पृथ्वी पर ही जन्म ग्रहण करते हैं । पापियो को प्रेत योनि में लाखो वर्ष तक लुढकना पडता है और उसके बाद भी उसको तरह-तरह की योनियो मे जन्म और शृङ्खला भ्रमण करना पडता है।" प्रेतों का स्वरूप और कार्य- 'गरुड पुगरण' में प्रेतो के बहुत से उपारयान दिये गये हैं जिनमें उनके वीभत्स स्वरूप और क्र र कर्मों का वर्णन बडे विस्तार के साथ किया गया है । पर उसमें प्रतिशयोक्ति का विशेष पुट होने के कारण हम एक प्राधुनिक विद्वान प० रामदास गोड एम० ए० के लेख के माधार पर प्रेतो के स्वरूप का विवेचन करे गे । पडित जी विज्ञान के प्रोफेसर थे और बहुत वर्षों तक सुप्रसिद्ध 'विज्ञान' मासिक पत्र का सम्पादन करते रहे थे। उन्होने अनेक प्रकार को परीक्षायें करके तथा अन्य विदेशी लेखको के मत का विश्लेषण करके प्रतो के विषय मे कुछ मुस्य बातें प्रकट की थी- "स्थूल देह धारियो की भांति मूक्ष्म देहधारी प्रेत भी शब्द उच्चारण करते हैं, पर वे हमको सुनाई नही पडले । कारण जिस तरह उनका शरीर सूक्ष्म होता है उसी प्रकार उनका वायु-मण्डल भी सूक्ष्म होता है. जिसका स्पन्दन हमारे कानो तक नहीं पहुंचता । पर किसी-किमी व्यक्ति को प्रेत का शब्द सुनने और उराका रूप देखने की शक्ति प्राप्त हो जाती है। उस समय उनको जो सुनाई या दिखाई देता है, वह उन्ही के पास बैठे दूसरे मनुष्य को कुछ भी मालूम नहीं देता। प्रेत शरीर को स्पर्श शक्ति भी हमारी स्पर्श शक्ति से भिन्न है। हम ध्यापनही है। मावार में लगने वाले प्रतो सभी विश्वाम नहीं दिया जा सकता। मानव सगार में पदिटा प्रदर्शन करने वाले मोमें में नम्मे होंगे तोप्रेत-समार में निन्यानवे से भी प्रषिकहोग। जो प्रेत रक्त, केपी प्रकृति वाले प्रेत शुद्ध, माधि पाषं पसन्द करते है। परन्तु यह नियम उपसहार ] [ ४६७ तो स्पर्श से ठण्डे-गरम और कडे-नरम का पता लगाते हैं, पर किसी व्यक्ति पर प्रेतावेश होने को अवस्था मे देखा जाता है कि आविष्ट शरीर के पास को वायु का मारने और काटने का भी प्रभाव पडना । इससे यह अनुमान होता है कि प्रेत शरीर के सर्वाङ्ग में समाया रहता है तव उमका कुछ प्रश त्वचा के बाहर भी फैला रहता है। पर यह भी देखा जाता है कि जब मशावेश होता है तब मनुष्य स्यूल शरीर के किसी एक भङ्ग में ही प्रेत शरीर संकुचित हो जाता है । इससे यह जान पडना है कि साधारणतया प्रेत शरीर स्थूल शरीर से बड़ा और वायु की तरह फैलने भौर सिकुडने वाला होता होगा । प्रेत शरीर का विवेचन करते समय यह बात हमेशा ध्यान मे रखनी चाहिए कि जिस प्रकार प्रेतावस्था का वायु मण्डल सूक्ष्म होता है उसी प्रकार उसके पृथ्वी, जल, अग्नि तथा प्रकाश आदि तत्व भी सूक्ष्म होते हैं । परलोक-विज्ञान के ज्ञातानो ने प्रेतो के रूप-दर्शन को विधि भी निकाली है और उनके फोटो लिये हैं । यातना-भोगो नीच-प्रेतो के रूप बडे भयकर होते हैं, परन्तु अच्छे प्रत मपिक सौम्य रूप के होते हैं। यह मच है कि परलोकवादी-चक्रो मे प्रेतो का रूप देखना सम्भव होता है, पर यह हगिज नही कहा जा सकता कि प्रेतो का जो रूप देखने में माता है वह उनका वास्तविक रूप ही होता है । प्रेत धकार प्रौर उजाला-दोनो में बराबर देख सपते हैं, क्योकि प्रेतो के विचरने का समय घनघोर मधेरी राधि भी होती है पौर दिन को चिलचिलाती दोपहरी भो । पूर्ण भोर पल्प मावेश ये भवमर पर प्रेतो ने यह प्रमाण दिया है कि ये मनुष्यो गे वहीं अधिक देखने की शक्ति भी रखते मोप प्रवृति के प्रत गन्दी से गन्दी चीज खाने में भी घृणा नहीं करते।
५०० ] [ श्री गरुडपुराण लगता है । पर जब यह नष्ट होना चरम सीमा पर पहुंच जाता है भोर एक ' साथ होता दिखलाई पड़ता है तब हम उसे 'मृत्यु' वह देते हैं । कर्मों के संस्कार और प्रारब्ध- मब हम इस बात को समझ सकते हैं कि यह ससार मूल रूप से अविनाशी है और इसमे हमको जो छोटे या बडे परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं उनका आशय किसी पदार्थ या शक्ति का पूर्णतया नष्ट होना नहीं है, वरन् एक प्रकार का रूपान्तर होना ही है। इसके पश्चात् स्वभावतः यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि एक शरीर के नष्ट होने पर जो प्रात्मा किसी अन्य शरीर मे जन्म लेनी है उसका पूर्व जन्म के कर्मों से कुछ सम्बन्ध रहता है या नहीं ? भारतीय शास्त्रो ने 'कर्मफल' के सिद्धान्त को अटल और अकाट्य रूप से स्वीकार किया है । 'कम प्रधान विश्व कर रखा' की उक्ति मे यहां के सभी लोगो का पूर्ण विश्वाम है। यहाँ के ऋषि-मुनियों ने मानव-जीवन की भली-बुरी घट. नामो को केवल एक जन्म के ही कर्मों का फल नहीं बतलाया है वरन् ये उसका सम्बन्ध अनेक जन्मो के कर्मों से जोड़ते हैं । 'कम' मोर प्रारब्ध की समस्या पर विचार करते हुये लोकमान्य तिलक ने अपने 'गीता रहस्य' मे हिन्दू धर्म का सिद्धान्न इस प्रकार प्रकट किया है। "यह सच है कि कम-प्रवाह अनादि है और जब एक बार कर्म का चक्कर शुरू हो जाता है तब परमेश्वर भी हस्तक्षेप नहीं करता। तथापि अध्यात्म शास्त्र का यह सिद्धान्त है कि दृश्य सृष्टि वे वल नाम-रूप या , कर्म ही नहीं है, किन्तु इन 'नाम रूपात्मक' प्रावरण के लिये प्राधारभूत एक आत्म रूपी स्वतन्त्र और पविनाशो ब्रह्म मृष्टि है तथा मनुष्य को प्रात्मा उस नित्य एव स्वतन्त्र परब्रह्म का ही प्रश है । मनुष्य जो भी अनुचित प्रथवा परपीटा दायक कार्य करता है उसी से यह अशुभ कर्म बन्धन में बंधता है। मनु भगवान् ने इनके तीन भेद किये है-कायिक, वाचिक मोर मानसिक । व्यभिचार, हिसा, चोरी को कायिक पाप कहा है, क्टु मिथ्या, ताना मारना मोर मसंगत घोसना-इन पारो को हाचिन पाप बतलाया है-परद्रव्याभिलाषा, दूसरो - उपसंहार - [ ५०१ का प्रहित चिन्तन और व्यथं प्राग्रह करना-इन तीनो को मानसिक पाप कहते है । सब मिलाकर दस प्रकार के प्रशुभ या पाप कर्म बतलाये गये हैं (मनु० १२-५,७)। "परन्तु अन्य विद्वानोने समस्त मानवीय कोको तीन अन्य विभागोमे बांटा है-(१) सनित (२) प्रारब्ध और (३) क्रियमाण । किसी मनुष्य द्वारा इसक्षण तक किया गया जो कर्म है-चाहे वह इस जन्म में किया गया हो या पूर्व जन्म मे, वह मब 'सचित' अर्थात् 'एकत्रित' कर्म कहाजाता है । इसी सचित' को मुछलोग 'अदृष्ट' भी कहते हैं। इन सब कर्मों का फल एक दम भोगना असम्भव है, क्योकि फल की दृष्टि से ये परस्पर विरोधी अर्थात भले और बुरे दोनो प्रकार के हो सकते हैं। उदाहरणार्थ कोई सचित कर्म स्वर्गप्रद और कोई नरकप्रद भी होते है, इसलिये इन दोनो के फलो को एक माय ही भोगना सम्भव नही है-इन्हे एक के बाद एक भोगना पडना है। प्रतएव 'सचित' में से जितने फर्मो का फल भोगना पहले शुरू होता है उतने ही को प्रारब्ध ' कहते हैं । 'सचित' में से जिन कर्मों का फल भोगना अभी प्रारम्भ नहीं हुआ है उनको 'अनारब्ध-कर्म' का नाम दिया गया है। सचित मे से जो कम 'भारम' बन चुके हैं उनको भोगे चिना टूट- कारा नहीं है-'प्रारब्ध कमणा मोगादेव क्षयः।' जय एक बार हाथ से बाण छूट जाता है, तर वह लौटकर नही पा सकता, अन्त तक चला हो जाता है। ठीक इसी तरह 'प्रारब्य' कर्मों की अर्थात् जिनके फन का भोगना शुरू हो गया है, उनकी भी अवस्या होती है । जो शुरू हो गया है उसका अन्त होना हो चाहिए, इसके सिवा दूसरी गति नहीं है । परन्तु अनारध' कार्य वर्म का ऐसा हाल नहीं है-इन सबका ज्ञान से पूर्णतया नाश किया जा सकता है।" मोमासा-शाम्प वालों ने फर्मो के चार भेद माने हैं-नित्य, नैमि. त्तिक, काम्य पौर निपिन । इनमे से नित्य कर्म (सध्या मादि) के म घर से मामा का पतन होता है और नैमित्तिक कर्म तभी करने पर है जब मायमगता पड़ती है । इसलिये मोमासकों के मतानुसार इन दोनों को करना तो पावश्यक ही है । शेप रहे काम्य पोर निपिद स्यं । इनमें में निपिटा " ५०२ ] [ थी गरुडपुराण . के करने से पाप लगता है इसलिये उनको न करना चाहिए। काम्य कर्मों के करने से उनके फल भोगने के लिये फिर जन्म लेना पड़ता है, इसलिये इन्हे भी न करना चाहिए। इस प्रकार भिन्न-भिन्न कर्मो के तारतम्य का विचार करके यदि मनुष्य कुछ कर्मो को छोट दे और कुछ को शास्त्रोक्त रीति से करता रहे, तो वह अपने माप मुक्त हो जायगा । इस शास्त्रीय विवेचन द्वार विदित होता है कि कर्म फल प्राकृतिक नियम के अनुसार स्वभावत: सस्कार रूप मे प्रात्मा के साथ लिपटा रहता है और एक जन्म के कर्मों के प्रभाव से प्रागामी जन्म मे भी नये-नये कर्म होते रहते हैं और कर्म-शृङ्खला अनन्त काल तक चलती रहती है। केवल वे थोडे से व्यक्ति जो प्रनासन योग और ज्ञान-साधन द्वारा कर्म-बन्धन को बिल्कुल काट देते हैं वे ही कर्मों के बन्धन से छुटकारा पा सकते हैं। इस प्रकार जब हमने कर्मफल, परलोक और पुनर्जन्म को मान लिया और यह भी मालूम हो गया कि हम जैसा कृत्य करेंगे वैसा ही अच्छा या बुरा फल प्राप्त होगा तो इस दृष्टि से सृष्टि में स्वर्ग और नरक का मानना भनुचिन नहीं है, फिर चाहे उनको स्थूल अथवा सूक्ष्म लोको के रूप में माना जाय, प्रथया भली या बुरी परिस्थितियो के रूप मे, अथवा प्रानन्द या कष्टप्रद मान- सिक स्थिति के रूप में । हमने अभी तक वैज्ञानिको के द्वारा शुक्र, मङ्गल, वृहस्पति प्रादि ग्रहो का जो आनुमानिक वर्णन सुना है, उससे यह ख्याल किया जा सकता है कि शायद वहां किसी अन्य प्रकार के निकृष्ट जीवधारी हो जिनको अत्यधिक गर्मी, दम घोटने वाली विषाक्त दायु अथवा हड्डियों को कडकहा देने वाली ठड को सहन करना पड़ता हो। फिर यह भी आवश्यक नहीं कि जिन स्थानो को 'नरक' कहा गया है वे गय स्थल रूप में ही हो । आत्मा का धारीर वायु से भी हलका होता है । वह विशाल अन्तरिक्ष के किसी भी कोने मे रहता हुमा अपनी भावनानुसार तरह तरह के फ्टों और यन्त्रणाम्रो को अनुभव करना हो तो इममे भी कुछ मसम्भव नहीं है । यदि पृथ्वी के जीएमओं वो वहां जाकर ऐसे हफ्त सरतपस्या में रहना पडे तो यह पौराणिक नरफों के यणंन के अनुगार हो होगे।
उपसंहार ] - व्यभिषार, मपान, परान पाक्षिदोशे में लिप्त रहने ६, पर सारी रिपोटों [ ५०३ इसके अतिरिक्त हम पृथ्वी पर भी पागलो, उन्मादियो, महाभ्रष्ट भाच. रण वालो को जो दशा देखते हैं वह भी नरक वाम से कम नही है। हमने ऐसे नरतन धारियो को गन्दी नाली का पानी पीते, वहाँ पडे हुए रोटी के टुकडो आदि को खाते देखा है । 'अघोरी' नामधारी वितने ही व्यक्ति मल-मूम पौर अन्य अत्यन्त घृणित पदार्थ खा जाते हैं और असह्य गन्दगी की हालत में बने रहते हैं । अन्य ऊपर मे मामान्य श्रेणी के मनुष्य जान पड़ने वालो के भी भाचरण ऐमे भ्रष्ट और गन्दे होते है कि वे गुप्त रूप से अत्यन्त गन्दे और घृणोत्पादक पदार्थो का सेवन करने में ही तृप्ति अनुभव करते है । ऐसे मस्तिकीय भयवा मानसिक विकृति वाले व्यक्तियोको सरुपा पृथ्वी पर करोडो हैं पोर सज्जन तथा बुद्धिमान लोगो की दृष्टि में दे नारकीय जीवन ही ध्यतीत करते हैं। काम, क्रोध, मोह, महङ्कार प्रादि वे कारण भी अनेक व्यक्तियो को मानसिक दशा ऐसी मस्त-व्यस्त और यन्त्रणादायक बन जाती है कि प्रत्यक्ष में बैंगवपूर्ण स्थिति में रहने पर भी वे अपने अन्तः क्षेत्र में महा अशान्ति और का अनुभव परते हैं। यदि मापने राज्य-परियारी में मम्बन्धित कहानी-उपन्याग प्रादि के रूप में लिखे गये यांनी को पता हो तो पाप जान सकते है कि ऊपर से प्रामोद-प्रमोद में रहते हुये इन लोगों के हृदय में कितनी भयचर पग्नि जलती रहती है पौर अनेक बार नमवा दुष्परिणाम हत्या- आरमपात मादि कैरो भयङ्कर परयो पोर दृशो के रूप में प्रवट होता है। हमने एकाध नयाति को यह कहते सुना है कि महाशय, भाप निगाह में तो हम बडे माधन-मम्पन्न और मुभी हैं, पर विपरीत प्पागरिक और अन्य परि- स्थितियों के कारण हमारे वित्त में तो प्रायः यह प्रात रहता है कि रिमो प्रकार मर पर इन मापत्तियो गे गुटकारा पा जायें । इस परिस्थिति का सा से प्रत्यक्ष उदाहरण प्रमर्गका का देश है जो गगार में मब में अधिक मालदार पामोद प्रमोद के गाधनों मे युक्त पोर विषय भोग गामधी मद प्रभार बन्धनों में मुन माना जाता है। वहाँ करोडो स्त्री-पुष्प वाहन्द भाव में के अनुसार प्रारम हत्यापों को गंया भी यहीं पर मयमे ज्यादा है। जलन । घी गरुडपुरा इस तरह हम यदि ससार नोच मनोवृत्ति पौर विकृत मस्तिष्क दान व्यक्तियो के वाह्य पोर अन्त जीवन में भी तो स्पष्ट जान पडेगा कि ये नार कोय' जीवन ही व्यतीत कर रहे हैं और मरने के पश्चात् भी उनको ‘सुर्गात कदापि प्राप्त नहीं हो सकती। वे वास्तव में 'नरक' ये ही अधिकारी हैं मो मरणोपरान्त घे कही भी क्यो न रहे उनको नारकीय षष्ट ही सहन कर पडेंगे । 'गरुड पुराण' के लेखक ने रूपक और अलङ्कार युक्त ‘नरक वर्णन •द्वारा जो चेतावनी दी है, उस पर ध्यान देकर यदि वे दुराचरणो को त्या कर सुमार्गगामी बन सकें तो यह उनके लिये कल्याणकारी ही होगा ।