Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Raag Marugandha
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राग
मरूगन्धा
(राजस्थान के सृजनशील शिक्षकों की विविध रचनाओं का संकलन)
शिक्षा विभाग राजस्थान
के लिए
सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर
द्वारा प्रकाशित
मरगन्धा
सं.रामप्रसाद दाधीच
सूर्य प्रकाशन मंदिर,बीकानेर
© शिक्षा विभाग, राजस्थान, बीकानेर
प्रकाशक
शिक्षा विभाग, राजस्थान के लिए
सूर्य प्रकाशन मन्दिर,
बिस्मों का चौक, बीकानेर
आवरण एवं कला पक्ष : तूलिकी
मूल्य : रपये उन्नीस पैसे अस्सी मात्र
संस्करण . प्रथम, 5 सितम्बर 1988
मुद्रयः
गचिका प्रिण्टर्स
नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032
RAAG-MARUGANDHA
(vividh) Edited by
RAMPRASAD DADHICH,
PRICE R.19.80P.
आमुख ८ साहित्य में लगाव रखनेवाले रचनाशील अध्यापको की ये पांच पुस्तके आपके हाथों में सौंपते हुए मुझे प्रसन्नता हो रही है। शिक्षक दिवस प्रकाशन योजना के रूप में हमारे राज्य की जो एक शानदार परम्परा सन् 1967 से बराबर चली आयी है, उसी की अगली कडी में इस साल की इन पांच पुस्तकों का प्रकाशन किया गया है। शिक्षको के द्वारा लिखी गयी रचनाओ को सामने लाने के लिए शिक्षक दिवम से अधिक मुमंगत अवसर और कौन-सा हो सकता है । वालको को पढ़ाने के साथ-साथ मौलिक लेपन में लगना भी एक तरह का शिक्षण कर्म ही है। साहित्यकार हमारे समाज के शिक्षक ही तो होते है। उनके अनुभव समाज मे रहनेवाले मानवीय विचारो, गुणो-अवगुणों आदि को लेकर एक तरह का सवाद होता है, जो व्यापक रूप में चलता रहता है, और व्यक्ति तथा समाज के संस्कारों को संवारता रहता है। साहित्य-लेखन समाज की शिक्षा का एक अनौपचारिक प्रयास है । मुझे खुशी है कि हमारे राज्य के अध्यापक अपनी समाजपरक चेतना के लिए रचनाशील रहते है और अभिव्यक्ति के तरह-तरह के माध्यमों पर काम करते है। मुझे बताया गया है कि राज्य के अनेक अध्यापक देश की स्तरीय पत्र-पत्रिकाओ मे भी लिखते है और उनका अपना स्वतन्त्र साहित्य भी प्रकाशित हुआ है । यह जानकर मुझे अपार सुख मिला है कि इस दिशा मे उन्हें सन् 1967 मे विभाग द्वारा शुरू की गयी इस 'शिक्षक दिवस योजना' से पर्याप्त दिशा मिली है । मैं चाहता हूँ कि साहित्य की सभी विधाओ मे गति के साथ लिखनेवाले कलम के धनी अध्यापकगण शिक्षक दिवस योजना के तहत प्रकाशित होनेवाली पांचो पुस्तको की अगली कड़ी को इतनास्तरीय बनाये कि उनकी रचनाओ पर राज्य के विद्यालयों मे और साहित्य संस्थाओं मे गोष्ठियां आयोजित की जाये। इसके लिए वे अभी से
प्रयत्न मे लग जाये ताकि अगले वर्ष के प्रकाशनो में उनकी वर्ष के दौरान लिखी
गयी प्रतिनिधि रचना ही प्रकाशन मे आये।
इस वर्ष प्रकाशित होने वाली पांच पुस्तके ये है :
1. सहस्रधार (कविता सकलन) स ज्ञान भारिल्ल
2. राग मरुगन्धा (हिन्दी विविधा) स. रामप्रसाद दाधीच
3. वदळाव (राज विविधा) स सूर्य शंकर पारीक
4. क्षितिज पार (कहानी संकलन) स. नासिरा शर्मा
5 आकाश के फूल (वाल साहित्य) स. रत्नप्रकाश शील
इनके सम्पादन का जिम्मा उठानेवाले अतिथि सम्पादकों, प्रकाशकों और
रचनाशील अध्यापको को धन्यवाद । जिन अध्यापकों की रचनाएं इस वर्ष प्रकाशन
मे न आ सकी, वे निराश न हो, वरिक अपने लेखन की धार को और अधिक
तराशने की कोशिश करे।
शिक्षक दिवस, 1988
Mii
(ललित के. पवार)
निदेशक,
प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा
राजस्थान, बीकानेर
सम्पादकीय प्रस्तुत सकलन का सम्पादकीय लिखते समय मुझे रूस के सुष्यात अवार कवि रमूल हमजातोव के एक वक्तव्य की कुछ पक्तियों का स्मरण हो रहा है। अपने कृतित्व के विषय में अपना स्पष्टीकरण देते हुए उन्होंने लिखा है- 'मेरी राहे हमेशा ही सीधी-सादी नहीं रही, हमेशा ही मेरे वर्ष चिन्तामुक्त नहीं रहे। मेरे समकालीन, तुम्हारी ही तरह मैं भी अपने युग की हलचलें, दुनिया की उथल-पुथल और बडी महत्वपूर्ण घटनाओं के भंवर मे रहा हूँ। हर ऐसी घटना लेखक के दिल को मानो अकशोर डालती है । लेखक किसी घटना को गुशी और गम के प्रति उदासीन नहीं रह सकता । थे बर्फ पर उभरनेवाले पदचिह्न नहीं, बल्कि पत्थर पर की गयी नक्काशी होते है । अब मैं अतीत के बारे में अपनी सारी जानकारी और भविष्य के बारे में अपने सभी खयालों को एक तार में पिरोकर तुम्हारे पास भा रहा हूँ, तुम्हारे दरवाजे पर दस्तक देता हूँ और कहता हूँ- मेरे अच्छे दोस्त, यह मैं हूँ। मुझे अन्दर आने दो।' रमूल हमजातोव के इस ईमानदार आत्मकथन की रोशनी में जव में प्रस्तुत संकलन के अध्यापक-लेखकों की रचनाओं का प्राकलन करता हूँ तो एक विचित्र प्रीतिकर सुखानुभूति से मैं अभिभूत हो जाता हूँ। आजीविका की दृष्टि से पूर्णकालिक अध्यापक के उत्तरदायित्व का वहन करते हुए, हृदय और मानस से सृजनधर्मी रचनाकार की भूमिका का निर्वाह करना वास्तव मे अत्यन्त गुरुतर कर्म हैं । सृजनधर्मी भी ऐसे, जिन्होंने अपने अतीत की गरिमा पूर्ण अस्मिता को विस्मृत नहीं किया और समकालीन हलचलपूर्ण ययापं के प्रति पूरी जागरूकता रखी हो। मानो हमजातोव की तरह वे भी हमारे वर्तमान युग के दरवाजे पर दस्तक देते हुए कह रहे हैं -'मैं तुम्हारे पास बा रहा हूँ। मैं हूँ। मुझे अन्दर आने दो। अध्यापक यों ही समाज और राष्ट्र का निर्माता होता है और जब वह सोभाग्य से सृजनधर्मी लेखक को भूमिका में आ जाता है तो उसका यह दोहरा व्यक्तित्व - समाज और राष्ट्र को निश्चित रूप से जीवन की नयी दिशाएँ देता है । शब्द का अनोघ शस्त्र अध्यापक-लेयक के हाथ मे अमंगल का अविराम ध्वंस और मंगल का का अविराम मृजन ही करता है । हमजातोव ने ही कहा है - 'महज शब्द नाम को कोई चीज नहीं है । वह या तो शाप है या बधाई, मुन्दरता है या पीड़ा, गन्दगी है या फूल, झूठ है या सच, प्रकाश है या अन्धकार ।' अध्यापक का अनुभव-ससार वड़ा विराट होता है। वह अपने विद्यार्थियों में अपने समय और अपने समय के विराट समाज के दर्शन करता है। वह अपनी धरती, अपने परिवेश और अपने इर्द-गिर्द के घटनाचक्र का साक्षी होता है और तब उसके भीतर का सृजनशील लेखक ऐमी साहित्य सृष्टि करता है जो केवल अर्यवान ही नहीं होती, सर्वथा प्रामाणिक भी होती है। इस सकलन की प्राय. सभी रचनाओ का सत्य यही है । स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् हमारी सामाजिक सरचना न केवल विसंगत और वंयम्य अस्त हुई अपितु लड़खडा गयो । लोकतन्त्र, समाजवाद, सामाजिक समता और मानवीय अधिकारो के जो संकल्प हमारे शासक वर्ग ने किये वे कितने आधे-अधूरे रह गये और उनके स्थान पर धर्म, जातिवाद, सम्प्रदायवाद, और क्षेत्रवाद के प्रेतों ने राष्ट्र के मंच पर किस प्रकार की विध्वंस लीला भचायी यह कठोर सत्य इस संकलन जेषकों को आँख से ओझल नहीं हुआ। मही लेखकीय प्रामाणिकता है। विचारात्मक निबन्धों में, संस्मरण और रेखाचित्रों में, रिपोर्ताज और लघु कथाओ मे अध्यापक लेखकों ने इसी व्यथा को चित्रित किया है। हास्य-व्यंग की रचनाएँ तो इरा सरम की सटीक साक्षी है। इस संकलन के लेखक क्योकि पहले अध्यापक हैं और बाद मे लेषक अतः शिक्षा से सम्बद्ध समस्याओ, शिक्षा प्रणाली, शिक्षा और शिक्षक के घटते मान-भूत्यों पर उन्होंने खुलकर लिखा है। वे इस स्थिति नियति के स्वयं भोक्ता हैं अत. यह चित्रण बड़ा आत्म-स्पर्शी है । मानव जीवन के विघटित होते मूल्यो पर जो चिन्ता इन अध्यापक-लेषकों ने व्यक्त की है, वह बड़ी सहज और स्वाभाविक है। अध्यापक और फिर लेखक को मानवीय मूरयों पा गिमटना, विसजिन होना और ध्वस्त होना पीडा नहीं देगा तो और किसको देगा ! व्यग और हास्य के माध्यम से जो तल्प अभिव्यक्तियां इस सारी स्थिति को लेकर इन लेषकों ने की है तथा हमारे वर्तमान समाज और शासन तन्त्र पर जो उन्होने मारक प्रहार किये हैं, वे प्रशंसनीय हैं । निर्भीकता अध्यापक और लेखक को पह्ली पहबान है। उनकी यह पहचान इन रचनाओ मे मौजूद है। इन रचनाओ का विषय-फलक भी बहुत ध्यापक है । अपने अतीत, अपने इतिहास और सांस्कृतिक परम्परा से लेकर ज्ञान- विज्ञान की मूक्ष्मातिसूक्ष्म संवेदना तक इन लेखको की दृष्टि श्याप्त है जो उनकी रचनाओं को जीवन्त बनाती है।
यह तो सम्भव नहीं लगता कि इस छोटे से सम्पादकीय में इस कृति में संकलित सभी रचनाओं पर समीक्षात्मक टिप्पणियाँ हो । किन्तु कुछ रचनाओ का उरलेख करने का लोभ में छोड़ नहीं पा रहा हूँ। विषय-वस्तु की उपादेयता और गम्भीरता के साथ भाषा, शैली और संरचना की दृष्टि से भी ये बहुत अच्छी रचनाएं कही जायेंगी। रचना, यदि यह साहित्यिक सृजन है तो उसमें साहित्यिक प्राजलता-परिष्कृति होनी चाहिए। इन रचनाओ में मुझे उसके दर्शन हुए है। हथेली पर रैक (शीताशु भारद्वाज), सब माटी की माया है (गोपाल प्रसाद मुद्गल), संस्कृति की धड़कन भारतीय संस्कृति (गिरधारी लाल व्यास), जीवन मूल्यों की शिक्षा (रूप नारायण कावरा), वनवासियो की कला (रवीन्द्र डी. पण्डया), समकालीन हिन्दी कहानी का व्यक्तिवादी यथार्थ (सरला भूपेन्द्र), रचना- त्मक काम (गणेश तारे), गरीवदास का विपाद-लोक (भगवती लाल व्यास), अपेक्षा स्वर्ग की (रामस्वरूप परेश), अभी तो मैं मरा नही (गौरी शकर आयं), हम अंग्रेजों के जमाने के अफसर है (भगवतीलाल शर्मा) इत्यादि ऐसी रचनाएँ हैं जो विषय की गहराई तक जाकर स्थितियो का विश्लेषण-विवेचन करती है। इन रचनाओं में लेखक की पारदर्शी दृष्टि और उसकी सूक्ष्म संवेदनशीलता के दर्शन होते हैं। इस सकलन मे अपनी विधागत प्रकृति से कुछ रचनाएं लघुकाय है । लेखको ने भी अपनी सश्लिप्ट रचना शैली से उन्हे और भी लयुकाय बनाया है । 'सवा रुपये में भूत, भविष्य और वर्तमान' (श्याम मनोहर व्यास), गरीवी गांव की (निशान्त), महाकाल की मिनी कहानियां (गन लाल व्यास), प्रार्थना (भगवन्त राव गाजरे), वनदेवी (विष्णु लाल जोशी), पूर्व दिशा वही है (विमला डोरथी), आत्म स्पर्श (विश्वम्भर प्रसाद शर्मा) इत्यादि रचनाओं मे चिन्तन को सूक्ष्मता, कल्पना का लालित्य और भाषा शिल्प का सौष्ठव स्तुत्य है। सबसे बड़ी बात इन रचनाओं में यह है कि इन लेखकों को चिन्ता का केन्द्र विन्दु मनुप्य है, मनुष्य का सर्वतोभाव कल्याण। यहां यह स्पष्ट करना आवश्यपः प्रतीत होता है कि इस कृति मे संकरित जिन रचनाओं का इस सम्पादकीय में उलोप नहीं हुआ, वे किसी दृष्टि में भी हल्की अथवा निम्न स्तर की नहीं है। उनकी अपनी विशेषताएं हैं। ऐसी रचनाओ के लेखक कृपा कर, किसी प्रकार का हीन भाव अनुभव न करें। कुछ शब्द इम सकलन में संकलित रचनाओ की चयन प्रक्रिया के विषय में भी कहना जरूरी है। हिन्दी गय की विविध विधाओ पर केन्द्रित इस सकलन के लिए शिक्षा विभाग से मुझे कुल एक सौ दो अध्यापको की एक सौ पचास रचनाएं प्राप्त हुई थी। इनमें करीब बीस महिला लेखिकाओं की रचनाएँ भी थी। पुस्तक को पृष्ठ सीमा करीब एक सौ गाठ पहले से ही निर्धारित थी। अब यह सहज ही करपना की जा सकती है कि चयन की प्रक्रिया कितनी दुष्कर व कठिन रही होगी। फिर गद्य की सभी विधाभो को प्रतिनिधित्व देने का प्रश्न भी मस्तिष्क में था । वस्तु, दृष्टि, भाषा और शिल्प जैसे कुछ आधार-बिन्दुओं का चयन का विषय बनाकर प्राप्त रचनाओ के तीन-चार वाचन के पश्चात ही इन रचनाओ को अन्तिम रूप से स्वीकार किया है । इस प्रक्रिया में अनेक अच्छी रचनाएँ छोड़नी पड़ी है। मैं यह भी दावा नहीं करता कि जो रचनाएँ इस संग्रह में प्रस्तुत की जा रही हैं, वे चरम श्रेष्ठता को प्रतीक-रचनाएँ है । सम्भव है, मुझसे भी कही भूल हुई हो । अत जिन विद्वान् अध्यापक बन्युओं की रचनाएँ इस संकलन मे नहीं आ पायी, वे पृष्ठों की सीमित सरया की मजबूरी के साथ मैरी निर्णय बुद्धि को भी दोषी समझ सकते है । किन्तु मैं इतना विश्वास उन्हे अवश्य देना चाहूंगा कि उनकी रचनाएँ किसी भी प्रकार हीन कोटि की नहीं है । सृजन शिल्प की सामर्थ्य के साथ वे निश्चित रूप से दृष्टिवान लेखक है । अध्यापक-लेखको की ढेर सारी इन रचनाओं को देखकर कुछ सुखद अनु भूतियां भी हुई। एक तो यह कि वे गद्य की अधुनातन सभी विधाओं में पूरी विश्वसनीयता के साथ सृजन कर्म मे जुटे है । रिपोर्ताज आज हिन्दी मे विरल ही लिखे जा रहे हैं, पर अध्यापक वर्ग इसमे भी पीछे नहीं है । इसी प्रकार रेखाचित्र, संस्मरण व डायरी की विधाओं मे भी अध्यापक वन्धु सृजन कर रहे है । व्यंग और हास्य की रचनाएं सर्वाधिक संख्या में प्राप्त हुई। इससे यह सकेत मिलता है कि जीवन की असह्य यातना और कठोरता को दरगुजर कर, किस पर वर्तमान सन्न और व्यवस्था पर हँसा जा सकता है। व्यंग का प्रहारात्मक शक्ति से भी ये अध्यापक-नेखक परिचित है और उन्होने अपनी इन व्यग-रचनाओ से मौजूदा तन्य, प्रणाली और भ्रष्ट आचरण पर तीखा प्रहार किया है। हाँ, एक अभाव मुझे खला। वह यह कि विज्ञान, तकनीक, नृवंशशास्त्र, समाजशास्त्र जैसे विषयो पर रचनाएं नगण्य ही रही। ये विषय आज जीवन के अवश्यम्भावी अंग हैं । इन विषयों को लेकर भी लिखा जाना चाहिए। इस पुस्तक के सम्पादन में अपनी भूलो के लिए क्षमा मांगता हुआ और शिक्षक बन्धुओ के निरन्तर सृजन कर्म मे निरत रहने को शुभाशंसा करता हुआ मै रसूल हमजातोव के शब्दो से ही अपना यह सम्पादकीय समाप्त करना चाहूंगा- 'मेरे एक दोस्त ने एक बार कहा था-अपने शब्द का मैं खुद मालिक हूँ चाहूं उसे पूरा करूं, चाहूं तो न करूं। मेरे दोस्त के लिए तो शायद ऐसा ही ठीक रहे, मगर लेखक को तो अपने शब्दो, अपने वचनों, अपने शापो का स्वामी होना पाहिए।' 93, यवत सागर कॉलोनी, जोधपुर (पर०) (रामप्रसाद दाधीच)
क्रम
निबन्ध
हथेली पर रंक 15 शीतांशु भारद्वाज
सब माटी की माया है 19 गोपाल प्रसाद मुद्गल
गजर बज उठा 21 पुष्पलता कश्यप
संस्कृति की धड़कन भारतीय संस्कृति 26 गिरधारी लाल व्यास
शंकराचार्य की शिक्षा दृष्टि 32 व० ना० कौशिक
प्रतिभा-स्वरूप विश्लेषण 36 गिरवरप्रसाद बिस्सा शास्त्री
जीवन मूल्यों की शिक्षा 39 रूपनारायण कावरा
वनवासियों की कला 42 रवीन्द्र डी० पण्ड्या
विलक्षण व्यक्तित्व के धनी अज्ञेय 46 हनुमान दीक्षित
हिन्दी काव्य में राष्ट्रीयता के स्वर 50 विद्या पालीवाल
समकालीन हिन्दी कहानी का
व्यक्तिवादी यथार्थ 55 सरला भूपेन्द्र
हास्य-व्यंग्य
रचनात्मक काम 63 गणेश तारे
गरीबदास का विपाद लोक 66 भगवती लाल व्यास
यमलोक का अंग्रेजी विभाग 71 जानकी प्रसाद पुरोहित
राइटर बनने के चन्द नुस्खे 74 देवप्रकाश कौशिक
कुत्ता आदमी 77 दीनदयाल शर्मा
हम अंग्रेजों के जमाने के अफसर हैं 79 भगवतीलाल शर्मा
अपेक्षा स्वर्ग की 83 रामस्वरूप परेश
साहित्य साधना 89 अर्जुन अरविंद
मूर्ख-शास्त्र 90 जगदीश प्रसाद सनी
एकांकी
अग्रोदय विद्यालय 96 पिलोक गोयल
अभी तो मैं मरा नही 102 गौरी शकर आर्य
संस्मरण
पण्डित जी 113 प्रेमपाल शर्मा
सवा रुपये में भूत, भविष्य और
वर्तमान 119 श्याम मनोहर व्यास
रेखाचित्र
लाल बन्धु 21 राधेश्याम सिंघल
रिपोर्ताज
गरीबो गांव की 125 निशान्त
मण्टू 128 गोपाल प्रसाद मुद्गल
चिन्तन
प्रार्थना 130 भगवन्तराव गाजरे
मन का उफान 132 जयसिंह चौहान जौहरी
तत्सत् 134 विश्वनाथ पण्ड्या
बनदेवी 136 विष्णुलाल जोशी
आत्म-स्पर्ष 138 विश्वम्भर प्रसाद शर्मा
पूर्व दिशा वही है 139 विमला डोरथी
असतो मा सद्गमये 141 वैजनाथ शर्मा
विविध
उड चला लेकर पैगाम 144 उमा चतुर्वेदी
अफसोस 148 मोहन योगी
महाकाल को मिनी कहानियां 149 छगनलाल व्यास
कला-सृजन 152 रमेश गर्ग
हम, हमारे अपने और हमारी
दुनिया 155 काशी लाल शर्मा
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राग मरुगन्धा
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हथेली पर रैक 0 शीतांशु भारद्वाज जी हां, हथेली पर रंक ! चौकिये नहीं जनाब , हथेली अर्थात् हाथ और रेक मायने पत्र-पत्रिकाएँ रखने की वस्तु । जव 'ठेले पर हिमालय' रक्खा जा सकता है तो हथेली पर रैक नही रक्खा जा सकता क्या? सरकारी कार्यालयों और सार्वजनिक संस्थानों में हर कही आपको अनेक प्रकार के रैक दिखायी देंगे । फाइलों से लदे-फेदे रैक, स्टेशनरी से सटे हुए रैक, पुस्तकों से सजे हुए रैक, टेलीफोन रखने के रैक ! किन्तु कुछ रैक ऐसे भी होते हैं जिन्हें हम 'मिनी रैक' कह सकते हैं यानि हथेली पर जमे हुए रंक ! तो आइये साहब, आज हम आपको डाक-तार विभाग के इन्ही मिनी रकों से परिचित करवाते हैं। क्या आपका ध्यान डाक से आयी हुई पत्र-पत्रिकाओं की ओर भी गया है ? आपने कभी सोचा कि एक नन्हें-से मूचनात्मक पोस्ट कार्ड से लेकर वजनी मैगजीन तक यह सारी डाक किन-किन प्रक्रियाओं से होती हुई आप तक पहुँचती है ? आप नहीं जानते ? चलिये, कोई बात नहीं । हम आपको इस सबसे परिचित करवाने जा रहे हैं। चलिये, हम आपको महानगर के एक क्षेत्रीय डाक वितरण केन्द्र की ओर ले चलते हैं । सामने ही सड़क के किनारे लाल रंग का जो बोर्ड टंगा हुआ है, उसके माथे पर साफ-साफ अक्षरों में लिखा हुआ है~-'डाक और तार घर' । बोई के समीप पहुँचने पर आपको वही एक ओर मिनी अंको में देश के प्रमुख डाकघरों की पिन कोड संख्या भी दिखायी दे रही होगी। देश भर में ऐसे अनेक डाकघरो का जाल-सा विछा हुआ है। हम लोग जिन पत्रो को लेटर बक्स में डाला करते हैं, सर्व प्रथम उन्हें एक गहरे नीले रंग के थैले में कैद होना पड़ता है। उसके बाद वे प्रधान डाकघर में सॉर्टरों हथेली पर रैक/15 1 के हाथों में पहुंचते हैं। यहां उन्हे अलग-अलग नामापितकों में रखा जाता है। जमके याद रेल-डाक या माग उन्हें गाय रटेगनी तर पहुंचाया जाता है । हूं गेद है कि कुछ घण्टो के लिए उन्हें साये बन्द ना में भी घुटना पड़ता है । पितु पतो गे स्वतन्त्र होते ही उन्हें फिर में गॉर्टरों में हायों में पहुँचना होता है । माटेर त्वरित गति में उन गेलते हुए उनकी छटाई फरने सगने हैं। ''और, जब ये पत्र-पत्रिकाएँ महानगर व्यया फिगी नगर के प्रधान डा. घर में पुन, पलों में बन्द होकर डामाड़ी में गवार होकर क्षेत्रीय वितरण केन्द्र में पहुंचती होंगी तो फिर क्या प्रतिक्रियाएँ होती होगी! आप यह सब जानने को उत्सुक होगे। तव साहब सारे पत्र, पक्टिम और पत्रिकाएँ थलों में निफल-निकालकर एने फर्श पर सांस लेने लगते हैं । यहाँ भी सॉर्टर वन्धु उन्हें अलग-अलग रैकों पर रपने लगते हैं । उसके बाद वे मिनी रनों पर सो जाने लगते हैं। जी हाँ, मिनी र यानी कि डाकियों को हलिया ! इन वन्धुओं की बाँधी हथेलियां दो-ढाई घण्टे के लिए रकों का कार्य किया करती हैं। वह देवि ! 'डास तार घर' के हॉलनुमा कमरे के अन्दर झांककर तो देखिये ! यहाँ बैंची पर बैठे हुए मभी वर्दीधारी डाकिये अपनी हथेलियों पर रंग जमाए हुए हैं। वे उन पर अपने क्षेत्र की हार जमाते जा रहे हैं । एक नन्हें मैं पोस्ट कार्ड में लेकर भारी भरकम पत्रिका तक सभी तो वितरण-क्रम में लगते का रहे हैं । इन लोगों को अपनी सुविधा अनुसार ही यह सारी हाक वितरित करनी होती है। ---फकीरे ! कोई डाकिया अपने सहकर्मी को आवाज देकर उसी के पास जा पहुंचता है। अगले ही क्षण वह हाथ में लिए हुए एक मुई-तुड़े पोस्ट कार्ड के बारे में उससे पूछताछ करने लगता है : मह मूलचन्द वही है न, जो पीपल के नीचे रेहड़ी लगाया करता है? -हाँ कबूतर ! मुस्कुराकर फकीरा नाम का डाकिया विना देखे ही अपनी हथेली के रंक की डाक को उलटने-पुलटने लगता है। उस वेचारे को इतनी फुर्सत ही कहा कि वह अपने साथी की ओर आंग उठाकर भी देखे! सुबह-शाम दोनो ही समय माप इन डाक वितरण करने वाले बन्धुओं की हथेलियों पर जमे हुए रैकों को देख सकते हैं। हर समय आप उन्हे पुलटते हुए ही देखते पायेंगे । हेल्पर छोकरा कभी उन्हें पानी पिला जायेगा तो कभी उनके आगे छटी हुई डाक को रख जायेगा। और, ये भाई हैं कि मुंह चलाते हुए तेजी से अपना काम करते जायेंगे। किमी के मुंह मे कोई चुटीली बात निकल गयी तो वहां हंसी के चन्द ठहाके गूंज उठते हैं । --चलिये ! चलिये ! तभी सहायक पोस्टमास्टर अपनी कलाई घड़ी देखने डाक को उलटते. 16/ राग मरुगन्धा लगते हैं, ममय हो गया है। वे उन लोगो को समय का अहमाम कराने लगते है । ऐसे में भी ये वधु खड़े-पडे ही उमी प्रकार अपनी डाकः समेटते रहते हैं । पोस्ट- मास्टर ने कुछ ज्यादा ही सरती दिखायी तो वे बाहर जाकर किमी पेड की छांह के नी। बैठकर या फिर किसी चाय की दुकान पर बैठकर हथेली पर पड़ी रैक की डाक का तालमेल बिठलाते रहेगे । वह देखिये साइकिलो का यह काफिला किधर चचा ? अगले चौराहे से सारी साइकिलें अलग-अलग दिशाओं की ओर मुड़ जाती हैं । सभी को तो डाक वितरण की जल्दी है । सुबह की डाक बांटकर उन्हें शाम की डाक भी तो बांटनी है न ! -~-भय्या । हमाली चित्ती ! बस्ती की कोई बालिका तुतलाकर पूछती --ऐ भया । कही से बुढिया माई का स्वर आता है। उसे अपने बेटे के पत्र की प्रतीक्षा है। ऐ भाय ! हमारी डाक? कोई और कहता है । इन डाक वितरकों के लिए ये सारे सम्बोधन चिर-परिचित है। सर्दी हो या गर्मी, वे निरन्तर अपने कर्तव्य-पालन मे ही लगे रहते हैं । सूर्य सिर के ऊपर तना तपने लगा है। पमीने में नहाता हुआ एक टाकिया किसी मकान की तीसरी मंजिल पर बढ़ता है। सीढियां चढ़कर वह बुरी तरह से होप, जाता है । माथे का पमीना पोछकर वह द्वार पर लगी कॉलबेल के बटन को दबाता है। भड़ाय-मे कोई साहबान दरवाजे पर आ खड़े होते है । डाकिया मुस्कुराकर उन्हे डाक थमाने लगता है । सूरी साव, अगर नीचे जीने पर लेटर बॉक्स लगवा दे तो। -लेटर बॉक्स? सूरी साहब के माथे पर बल पड जाते हैं, अपने बजट में ऐमी कोई व्यवस्था नहीं है। डाकिया बिना किसी टिप्पणी के चुपचाप नीने उतर आता है। सोचिये तो साहब, अगर उस डाकिये के स्थान पर आप होते तो ? हो सकता है आप सूरी साहब से लड़ते । सुबह-सुबह आपका मूड खराब हो जाता है। तब तमाम दिन आप हर किसी से लड़ने-झगड़ते रहते । भाइये, लगे हाथ आपको बड़े रैकों की झलकी भी दिखलाते चलें। सामने ही जो बीस मंजिली इमारत है न! जी हां, वही दायें वाजूवाली। उसकी तीसरी मंजिल के कमरा नम्बर 315 का एक दृश्य देखिये । --ओए ओ सरदारे ! एक बाबू साहब अपनी सीट पर बैठे-बैठे ही दूर स्टूल पर ऊँपते हुए सरदारसिंह चपरामी को आवाज देते हैं, तुझे नौकरी करनी है या नही? -~-क्या बात है बाबू साह्म? चपरासी वही आ बड़ा होता है। हथेली पर रंक/17
गराध्यापट नम्बरमा पानिपाल ! माय मात्र ही मन
गटे हुएमी और गोल ले।
चपरागी उग रंक पर पान दाने गया।
व या गाहर भी धन्य है। जिग पान गागांतीम ही गाने है.
उमी के लिए हर बडा नागगी मो आयान देकर अपने नाम चुनाग है।
गणरागी गो आवाज द भी नया नहीं गान! या गायन पूगे गुविधा
जो मिली हुई है। और, ए हमारे द्वारा
भागांमागे न जाने
रितने ताने उलाहने गुना हो मिता का। पर हिमालय' किसी पविकी
कारपना हो गरती है किन्ग गाय झा विनरत मधु तो गपमुष ही हनियों पर
क जमा रहने है। यायिक माग गरसार मेयाध उकित को यही
लोग नरितार्य करने आ रहे हैं ।
18/राग मगन्धा,
सब माटी को माया है गोपाल प्रसाद मुद्गल एक दिन बांस में लोहे के तारों से कसी दराती युदबुदाने लगी--"मैं सबसे ऊपर है। धुमाददार पंद मह । घान्दार । चमनदार । मेरी मारकाट मे ॐ ॐ भी नहीं बच पाते । मेरा अस्लिल सबगे ऊपर।" ग बात को सुनार लोहे का चल जाता हुआ तार, तार-तार हो गया । उगगे नहीं रहा गया । वन खाता हुआ तार दोला-"अरी दरांती, तू अपनी ही अपनी गाती रहेगी या मरे की भी मुनेगी । और नौलार देव । मब मेरी लांट की माया है ! मैने ही नो नो ऊँग आसन पर घंठाया है । मेरे बल पर ही तो तू मार कर रही है। ऊँचा आगन पाकर दतनी मत इतरा नीचे वाले का भी ध्यान म। अगर नोने वाले का ध्यान नहीं रखा तो तू ओधे मुंह गिरेगी । माटी पर गिरकर माटी में मिल जायेगी।" बाम ने दोनों की बात सुनी । उससे नहीं रहा गया । तन कर बोला --"मैंने तुम दोनों की बात सुन ती है । वात गुन ली है । दरांती, तुझे पता है तेग ऊँचा आमन कोन पर टिका है ? पता है नीव कौन है ? तार, तू भी गुग, तू किस पर इठला रहा है। नरें बल कोन पर तगे है ? तू कौन के बल पर टिका है ? गू भी ऊपर देख रहा है। तनिक झुककर नीचे को भी देव । तुम दोनो मेरे चढ़ाए चडे हो।" तीनों की शेखी मुनकर, डंगी को हाथ में थामे हुए आदगी से नहीं रहा गया। बोला--"तुम तीनो अपने मुंह मिया मिटू जब तक यनते रहोगे? दिल्ली के धंसरा कब तक मारते रहोगे ? मेरे हायो की तरस भी तो देखो। मेरे हाथों ने ही तो तुम्हारे हाथ मजबूत किये हैं। तुम तीनो नीचे की तरफ देखो। मेरे हाथ ढील छोड दे तो तुम तीनों ढीले पड़ जाओगे । जो कुछ है सब मेरे दम का जमूडा है।" आदमी को शेखी सुनकर माटो के कण बोले- "अरे बलधारी, तू भी तो नीचे की ओर देख तू कहाँ टिका है । तेरा अस्तित्व किसने है ? तू बड़ा है पर बड़ा सब माटी की माया है / 19 " बना विगगे है आदमी को माटी फे. गाणी की गुभन हुई। यह हिल गया। गिर पाता बंट गया । इगी छोड़ दी। योग, गार और दगती घडाम गे औधे मुंह गिर गई। तार तीला पड़ गया। दरांनी गुरु गयी। गय हेकदी भूल गये। माटी बोली, "तुम्हारे आमार अलग-अलग है । यल अलग-अमग है। काम अलग-अलग है, लेकिन जन्मदात्री गौन है ? तुम्हाग वल गान है ? और तुम्हारी सो विगात हो क्या, मय जीवो का आधार कौन है ? परी मांगी, पि.र अपनी-अपनी बात पाहो।" मर गमन गये और एक स्वर में मोल पर- "सब माटी की जाया है। सब माटी की काया है। गय माटी की माया है।" 20/राग भरुगन्धा गजर बजउवा 2 पुप्पलता कश्यप मित्र मण्डली पीने-पिलाने को बैठी। तभी परियोजना अधिकारी विकाम बोला: "आज राव बारी-बारी में बतायेंगे, उन्होंने पीना कब और कैसे शुरू किया? उसके पीछे कोई कारण रहा है, तो उसे भी!" मव मित्र हरे-हुरे करके हम पढ़े और ममर्थन में टेवल पीटने लगे। एडवोकेट बसन्त : "हीयर-हीयर ! सबगे पहले में ही बयान करता हूँ। तो भाइयो ! यह तो आप सबको मालूम ही है मैं जात का ठाकुर हूं।" "हां, हो, भइया, आपके पुरखे गांव के राजा हुआ करते थे। गाँव मे बनी तुम्हारी गढ़ी में कई बार हम मुर्गे और दारू की गोट भी जीम चुके है ! तुम्हारा भी गांव में आज भी वही सामन्ती रुतवा है।" वसन्त ने अपनी बात आगे वदायी । "हमारे यहां हर अवसर पर शराब पीने और पिलाने का रिवाज है, माका चाहे खुशी का हो, या फिर गमी का यह हमारे भोजन का एक आवश्यक अग है।" फोरमैन माबिर : "शराब के विना तो ठाकुरो के यहां कोई मान-मनुवार ही नहीं ! सभी सामाजिक-धार्मिक अंडो-टाणो (अवमरो) पर इसका प्रयोग जरूरी गिलाम भरे जा रहे थे। नमकीन मीक कवाय, सलाद और तले हुए काजू की प्लेटों पर हाथ साफ हो रहे थे । बसन्त : "गांव में दूसरी कई जातियाँ, जिनमे पिछडी और दलित जातियां भी है, शराब का अपने सामाजिक जीवन के रोत-रिवाजों और व्यवहारो मे प्रयोग करती रही है, करती है।" : "यह सामाजिक प्रतिष्ठा और सम्पन्नता का प्रतीक रही है !" गजर बज उठा/21 "बड़े-बडे निराकों-शायर्ग, बुद्धिजीवियो, विद्वानो और कलाकारों के लिए यह प्रेरणा, अनुभूति और संवेदना का माध्यम रही है । साहित्य और मभी इतर कला इसमे सम्पृक्त है।" "एक बार हम लूप केनाल पर पिकनिक मनाने गये थे। आप लोगो को तो पता है, वहां कितना शानदार डाक-बंगला है। हम चार दोस्त थे, वही ठहरे। चौकीदार को पैग देकर व्यवस्था के लिए बोल दिया। बोनिस्कॉट, हाईलैंड चीफ, शिवाज, रोगल औरनक गेज को बोतले हमने पहले ही अपने माय रख ली - कडाके की ठण्ड के दिन थे। पीना शुरू किया ही था कि पानी बरसने लगा। सभी बिजली भी चली गयी। चौकीदार मोमबत्तियां रखा गया था, हमने जला ली। पीते-पीते न जाने कितना वक्त बीत गया था, तभी चौकीदार की नवोढा औरत उधर आ निकली। वह शायद चिन्ता के मारे अपने आदमी का पता करने आयी थी। हमने देखा- अच्छी कद-काठी और कमो हुई देह को नैन-नक्म में खूबसूरत औरत है। यह शायद इस लाल परी का ही कमान था कि वह कुछ ज्यादा ही लग रही थी। पानी अब भी वन्द नहीं हुआ था।" मभी स्तब्ध वैठे सुन रहे थे। "और फिर मारी नैतिकता धरी रह गई और एक बहाव हमे उस अन्धे कुए की ओर ले गया जहाँ अमर शगवी लोग पहुंच जाते हैं । "उग वक्त तो हम चारो के सिर पर यह चढ़कर बैठी थी!" "फिर क्या हुआ ?" "इसके पश्चात् जग औरत ने घोडी की न ज्यादा, फांसी लगाकर मर गयी थी।" "अरेरेरे ! फिर तुम लोगों का क्या बना!" "किसी तरह मित-मिलाकर, मुलह-सफाई से, और कुछ दे-दिसाकर केस रफा- दफा करवाना पड़ा था और क्या!" "भई, ये बडी जालिम और वेमुरव्वत चीज है" बृज ने गहरा उच्छ्वास फेंकते हुए कहा। "इगी के फेर में राजाओं के राजपाट चले गये । राजा से रंक बन गये बचारे !" "मेरे माय भी एक हादमा गुजर चुका है। तव हॉस्टल में थे। चढते गून उमर यो । एक हफे में पीर आ रहा था रिगस्ते में तिमी को छेड़ बैठा। दिल गायू हो जाने की बात है ! कुछ ही दूर नवा होऊंगा शिपाय में उसका भाई भा गया । फिर क्या था फाजदारी हो गया। पुलिस कैम बन गया, और खामी परेगानों के बाद छुटकारा हुआ, वाफी फजीलत उठानी पड़ी थी।" यह थज था। 22/राम मगन्धा "दारू के नशे में अक्सर झगड़े-फसाद हो जाते हैं । दारु पीकर अदावत भी निकाली जाती है।" चमन माथुर बोल पड़े। यतेन्द्र शर्मा : "भई, हमने तो शोक-शौका में सीखी थी । शुरू मे ब्राह्मणत्व के सस्कार आड़े आये लेकिन फिर यह मोचकर कि युनिवर्सिटी मे दोस्तों में बौड़म और पोंगा पण्डित बनना पड़ेगा, मो नाक पकड़कर चढ़ा गये !" "अब तो तुम पूरे ड्रम ही हो गये हो! अच्छे-अच्छो को पीछे छोड़ चुके हो। तुमको तो तब तक चाहिए जब तक पीकर पूरे बदमस्त-भून नहीं हो जाते ।" गगन ने उमकी तारीफ में पुल बनाया। सभी उठाकर हम पड़े। "क्या कह साली चढती ही नहीं है !" यतेन्द्र ने नाटकीय मुद्रा में कहा । "अव तुग इसे नही, यह तुम्हें पीने नगी है गण्डत प्यारिये।" यह ठेकेदार डालू था। "मूग्य कर कांटा हो रहे हो पण्डता ! अब तुम्हें यार इतनी नहीं पीनी चाहिए। तुम्हारा लीवर बहुत सराव हो चुका है । तुममे टी पी के भी मिम्म्स हैं।" टा दलपत ने उसे डापटरी हिदायत दे डाली। "छोडो यार, मूड मत सराव करो।" कहते शर्मा ने एक बूंट में ही आधा गिलास खाली कर दिया । विकास • "मैंने तो इगसे तब यारी की भई, जब मेरे मभी यार मुझे छोट- छिटका गये थे। पिताजी की अचानक मृत्यु ने मुझे वेहाल और हक्का-बक्का करके छोड दिया था। बेकारी में पत्नी भी मायके जा बैठी थी। किराये का मकान । पिताजी कर्जा छोडकर मरे थे। अपनी पारिवारिक-सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाने के लिए ही उन्होंने कर्जा लिया था। उनके प्रोविडेप्ट फण्ड में भी कुछ नहीं था। घर में विधवा माँ, अनव्याही जवान वहन, पढ़ रहे छोटे भाई, सभी मुझे मर्द बनकर कुछ कर दिखाने के लिए झकझोर रहे थे । शराब से मुझे परिस्थितियों का सामना करने की हिम्मत मिलती थी। यार लोग शराव जरूर पिला सकते थे लेकिन कोई मदद करने से कतराते थे।" "शराब चूहे को भी शेर बना देती है ! आज यही शराब मेरे शेर को बड़ी- बड़ी रिश्वतें डकार जान और स्टेनों से चुहल करने का बकायदा हौसला देती है, क्यों?" घेवर ने मंग्योक्ति जड़ी। और एक जोर का ममवेत ठहाका गूंजा था। "भई वात को समझा करो! इम मेल-वेडील जिन्दगी के विरोधाभासी. विसंगतियों और विट्टपताओं को झेलने-गहने और मतलबपरस्त, फरेबी-धिनीनी दुनिया में जिन्दा रहने के लिए कोई तो महारा-~-भरोसे का साथी चाहिए। यहाँ टूटे-भटके दिलो की साथी एक अकेली शराम है।' "पार ज्यादह भावुक होने और कविता गरने की जरुरत नहीं है। लौं, और गजर बज उठा/2:
लो!"मि. सिंह ने उसके खाली गिलास को पुनः भरते हुए कहा। "दोस्तो ! मेरा और कंप्टन जोजेफ का तो काम ही ऐसा है कि पाराव के दिना चलता नहीं ! मुझे दुको के साथ बेहद उबाक और थका देने वाले लम्बे लम्बे स्टी पर चलना होता है, और कैप्टन को ऐसे एरिया भी मिल जाते है, जहाँ फैमिली नहीं रख सकते । वहाँ गराब ही वीवी-बच्चों को याद को मुलाती है !" यह सरदार महासिंह था जिसके अपने कई ट्रक है और वह खुद ट्रकों के माथ रूट पर चलता है, ड्राइव भी करता है। "पाकिस्तान की पिछली लड़ाई में मुझे कन्धे पर जो गोली लगी थी उसमें अभी भी कभी-कभी चीसे चलती है । शराब पीने से बड़ी राहत मिलती है । लड़ाई के दिनो में और वैसे भी जब दिमागी टेन्शन बहुत बढ़ जाता है, शराब काफी होमता देती है । इसके पीने से मौत का डर और शरीर की थकान दोनों से सुकून मिलता है।" कैप्टन जोजफ ने अपनी कैफियत चमान की। "भई मने कब शुरू कर दी पता नहीं चला ! पिताजी पीते थे ! उन्हें देखकर मुझे भी पीने की ललक उठनी थी। फिर कुछ दोस्तों की सोहबत से चोरी-छिपे चालू हो गये " ओवरमियर गगन अरोड़ा ने कहा। "और करते-कहते बेटे पक्के खिलाडी हो गये!" किसी ने वात को गति दी। सभी हरा पड़े। और पण्डत बोल पड़ा "दोस्तो! हमारे यहाँ तो शराबखोरी को बड़ी शानदार परम्परा रही है। हमारे देवता सुरा के कारण ही शायद सुर कहलाते थे । पण्डित-पुरोहित ऐसे यज्ञ करवाते थे जिनमे घी की जगह शराब की आहुति पडती थो। श्रोतामणि ऐते हो यज्ञो में मैं एक था। दुर्गा, भैहं जो देवी-देवताओ को शराब चढती है और जिम प्रसाद मानकर ग्रहण किया जाता है।" "तभी तुम पण्डत्त होकर इसी से आचमन करते हो, क्यो!" डॉक्टर को इम फन्ती पर फिर में एक जोरदार ठहाका पड़ा। "मुझे तो भई अपने बिजनस ताल्लुकात वनाने और निभाने के लिए शराम का सहारा लेना पड़ता है ! तुम जानो आजकल पार्टियों से सौदा पटाने और उन्हें ऐण्टरटेन करने के लिए शराब एक जरूरी अंग बन गया है । मरकारी अफसरों और मर्मचारियों से काम पटाने के लिए भी आजकल शराब की बोतल एवं 'काकटेल पाटियो माध्यम वन गमी है। कई बार जो काम नोटों के बण्डल से नहीं होता है यह भराव फे प्याले मे गहन ही में हो जाता है। आज हाला यह है कि कैसा भी पाम हो, विना माध्यम क नहीं होता।" "आज मद्यपान एक पशन हो गया है।" "यह तो आधुनिक योर प्रोगेमिय होने को निशानी है भई ! मिलनमारिता 24/राग मरगन्या सभी हम और सोमियल होने के लिए शराब का इस्तेमाल जरूरी है। आज के युग में शासन में बैठे लोग हो या नौकरशाही में, सभी इसके मतवाले हैं।" "वैसे, मै तो स्वास्थ्य के नाम पर जाम पीता हूँ। वम एक या दो पेग भूख जाग्रत करने के लिए। फिर खाना खाकर मो जाता हूँ, मच बहुन मीठी और गहरी नीद आती है । वर्ना तुम जानो, आज की तनाव भरी जिन्दगी में सुख की नीद किगे नमीव है " घेवरचन्द प्रधान ने कहा। "हाँ भूव ही तो जगाते हो तुम, पेट की और तन दोनो की भूख पडे । हमी मानो झरने लगी थी। "मैंने तो कालेज में रीटा के प्रेम में पडकर उसकी बेवफाई के गम को गलत करने, उसे भुलाने के लिए पीना शुरु किया था।" "और आज भी तुम उमी का नाम ले-लेकर पानी की जगह दारू पी रहे हो ।" फिर ठहके मूंजे। "तुम क्यों पीते हो भाई । तुम्हारी 'होम मिनिस्ट्री' तुम्हारी इस लत को लेकर बहुत नाराज रहती है । हम दोस्ती को छुट गालियां निकालनी है, आवारा-बदकार और जाने क्या-क्या कहती-सुनती है । रात को तुम्हे अपने पास फटकने तक नहीं देती। घर में तुममे कोई वोलता नही । माना भी उठकर नौकर खिलाता है और तुम्हारा बिस्तर वाहर लगता है।" वृज ने डालू की ओर मुखातिब होते कहा । बात खत्म होते-होते बड़े जोर के यहकहे गुरू हो गये थे । "दारू नहीं, तो क्या वापड़ा अव दूध पीना शुरू कर दे!" हेमो फिर फूट - पड़ी। बैठक, आधी रात गुजर जाने के बाद ही कही जाकर वर्खास्त हुई ! तर एक दूसरी बैठा शुभ हुई। अपने मालिकों-अफसरो की सेवा-चाकरी करने वाले टहलिये, हाली और मानी बचे-खुो माल पर टूटकर पड़े, और शीघ्र ही मवाली बन गये थे। सारी थकावट उतर चुकी थी। अब तो बम और ही सलय लगी थी। उधर, इनकी औरतों और बच्चो को हादमो दुर्घटनाओ, कर्ज, वीमारी, भूप और जलालत के हर वक्न के दुःस्वप्नों के दौरे पड़ते रहते हैं। फिर, इस समय के स्फूर्त चहरे सुबह बुरी तरह अलमाये होगे, मुदंनी और स्यापा उन पर गहरा पुता होता । 'दारूड़िया' होने के टोहके पड़ेंग, स्वभाव में चिड़चिड़ापन और व्यवहार मे फूहडपन लबालब मिलेगा, और ये लोग अपने कर्तव्य से पनाह चाहते-डोलते फिरेगे। . गजर बज उठा/25 विपारामना संस्कृति की धड़कन भारतीय संस्कृति गिरधागे नाल व्याग गरति गागय ममाज ने आग ने प्राप्त भौतिक तथा धनारिया उन्नतम मूल्यो को अभिव्यक्ति है जो आगे मे आग आने वाले भविष्यों में विगित होती चली जायेगी। अनेक विनारको ने उगे अनेक स्पा में देखा है। साधारणतया 'मंगनि' और 'गम्यता' गन्दी का प्रयोग एक ही अर्थ में कर दिया जाना है । कुछ विचारन दर्शन को गंथति का अग मात्र मानते हैं तो दार्गनिर दर्शन को गम्हति या जनर गिर करने में लगे है। 'तममो मा ज्योतिर्गमय' यो भावना का उद्भव निश्चय ही तय हुआ होगा जव मनुष्य ने पहले-पहल आग पैदा करने की कुशलता प्राप्त कर ली, स्वर को अर्थवत्ता प्रदान की, हाथों को श्रम का नाम बना लिया, हिंगा पगुता को वश मे करने के मामूहिक प्रयास में सफलता हामिल कर लो। विकास का क्रम चल पड़ा। भौतिक और साथ ही माथ वैचारिक विकाग का चक्र आग बबने लगा, अपितु आगे बढ़ने की एक अनवरत गतिशीलता प्राप्त कर लो। इतिहाम वनने लगा, मस्कृति बनने लगी, गन्यता बनने लगी, बर्बरता इन्मानियत में ढलने लगी। युग-युगों याद सस्टति का स्वरप परिभापित करने के लिए विचारों का, मम्बादों का, विवादों का संकलन किया जाने लगा। प्रत्येक देग ने अपनी संस्कृति पर देनमार्क छाप दिया--मिय की संस्कृति, यूनान की संस्कृति, नीन को संस्कृति, भारत की संस्कृति आदि । देश के य.त्तर्गत फिर जातियों की जातियों की और जनजातियो आदि को सस्कृतियों का विवेचन किया जाने लगा। अचलो के अनुसार आचलिकताओं की संस्कृतियो को रेखाकित किया जाने लगा। युगीन मस्कृतियो के विश्लेषकों ने मामान्य और विशेष यग-गस्कृतियो । चालू 26/राग कर दिया। दास प्रथायुगीन सस्कृति, सामन्तकालीन मस्कृति, पूंजीवादी और ममाजवादी सस्थति को ध्याध्याएँ की जाने लगी। साम्प्रदायिकों ने हिन्दू सस्कृति, आर्य सम्कृति, अनार्य मस्कृति, मुस्लिम मस्कृति आदि-आदि पर अपनी मोहरे लगानी चालू कर दी। पि की सस्मृति, पालन की सस्कृति, शिल्प सस्कृति, कला सस्कृति, संगीत संस्कृति, नाहित्य-संस्कृति, गुफा संस्कृति, गिरि-संस्कृति, पाटी सस्कृति और पता नहीं और भी कितनी ही संस्कृतियां है। सम्हतियाँ इतिहास को गुदीचं यात्रा में समाज द्वारा रचित, उपयुक्त और जगली पीढ़ी को हस्तान्तरित वे भौतिक और आध्यात्मिक मूल्य और साधन है जो जीवन्त परम्पराएं बनकर हमारे विकामो का माक्षात्कार करती हुई हमारे साथ चलती रहती है । जैन इतिहास मे एक रामग्रता अनवरतना और सार्वभौमिकता होती है, क्षेत्रीयता और ऊर्वगामिना होती है वैगे ही संस्कृति में भी ममग्रता, अनवरलता और सार्वभौमिकता होती है, क्षेत्रीयता और ऊध्र्वगामिता होती है। परिवर्तन- कागे प्रकृति गति के अग-प्रत्यग को बनाती-संवारती रहती है। संस्कृति मानव को ममान प्रयत्नो मे उत्तान एका ममान धरोहर है । वह मिले-जुले प्रयासो का प्रतिफलन है। संस्कृति मय के लिए मवका महयोग दान है, एक मिलाजला एकीकृत गयोग है । जो सस्कृति कमी विदेशी समझी जाती थी वह भी जब किमी मे आवर मिल जाती है तो उसमें एकमेकता आ जाती है। ऐसे मे पृथकता लुप्त हो जाती है। गगे पुरानी स्थानीय संस्कृति समृदतर होकार अधिक निपर उठनी है । सस्कृति की गतिशीलता के विपय में डॉ. भगवतशरण उपाध्याय का निम्मा- कित उद्धरण फिनना सार्थक प्रतीत होता है 'जब भारत ने चीनी तीर्थयात्रियों को वे अमूल्य हम्नलिखित ग्रन्थ दिये जिनकी चीन में नवदीक्षितो को दिये जाने के लिए प्रतिलिपियों तैयार की जाती थी, तब एक चमत्कार घट गया । और तब बुद्ध के उपदेशों भरे उन ग्रन्यों के प्रचार के लिए कागज के माथ ब्लॉक बनाकर पाई का आविष्कार हुना, उधर कोरिया में टाइप बने जिनको जापान ने पूर्णता प्रदान की। कागज और छापेखाने ने योरप की यात्रा फी और यद्यपि अरब घुडसवारी की वाग शार्ल मार्ता ने पोत्या के युद्ध से रोक दी, इन आविष्कारों ने वाइविल के स्थानीय भाषानुवाद प्रस्तुत और प्रमारित करने में महायता की और मुधार (रिफार्मेशन) आन्दोलन के लिए गहरी आवश्यकता थी। चीनी जाल, भारतीय गणित और आयुदिनान और यूनानी दर्शन के अध्ययन दमिश्क और बगदाद के यन्तुरा-हिकमा में सुरक्षित और अनूदित होकर अरबी द्वारा पोरा में मानवतावादी और माई विरोधी ग्रीसमंमन 'पेगन'ममाजी में पहुंचाये गये। नाविको के कुतुबनुमा (फम्पान) के अद्भुत परिणाम उम समय दोहराये गये जब चीन में बनी यारद का उपयोग इंग्लाडरे यादगाह हेनरी सप्तम मंस्कृति की घड़यान भारतीय संस्कृति /27 पिधारापमा निकर संस्कृति की धड़कन भारतीय संस्कृति गिरधारी लाल व्यास रास्कृति मानव समाज के आज ता के प्राप्त भौनिक तथा वनाकि उच्चतम मूल्यो की अभिव्यक्ति है जो आग में आगे आने वाले भविष्यों में विकगित होती चली जायेगी। अनेक विचारको ने उमे अनेक पो में देखा है। माधारणतया 'सस्कृति' और 'मभ्यता' शब्दो का प्रयोग एक ही अर्थ में कर दिया जाता है । कुछ विचारमा दर्शन को सस्कृति का अग गात्र मानते है तो दार्गमित्र दर्शन को सस्थति का जनक गिद्ध करने में लगे है। 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' की भावना का उद्भव निश्चय ही तब हुआ होगा जब मनुष्य ने पहले-पहल आग पैदा करने की कुशलता प्राप्त कर ली, स्वर को अर्थवत्ता प्रदान की, हाथों को श्रम या माधक बना लिया, हिमक पशुता को वश मे करने के मामूहिक प्रयास में सफलता हामिल कर ली। विकाम का श्रम चल पड़ा । भौतिक और माथ-ही-माय बैचारिक विकास का चम आगे बढने लगा, अपितु आगे बढने की एक अनपरत गतिशीलता प्राप्त कर ली। इतिहाम बनने लगा, मस्कृति बनने लगी, सन्यता बनने लगी, वर्वरता इमानियत में ढलने लगी। युग-युगों बाद संस्कृति का म्यरुप परिभापित करने के लिए विचार्ग का, मम्वादो का, विवादों का मालन किया जाने लगा। प्रत्येक देश ने अपनी संस्कृति पर ट्रेनमा छाप दिया--मिग की संस्कृति, यूनान की संस्कृति, चीन की मस्कृति, भारत की सहति आदि । देश के अन्तर्गत फिर जातियों की उपजातियों की और जनजातियों आदि को सस्कृतियो का विवेचन किया जाने लगा। अंचती के अनुमार आचलिकताओं को सस्कृतियों को रेखाकित किया जाने लगा। युगीन संस्कृतियों के विश्लेपकों ने गामान्य और विशेष युग-सस्कृतियों पर तर्क देना चालू - 26/ राग महगधा सांस्कृतिक विशेषताओं का व्यावहारिया प्रभावशाली रूप हस्तगत हुआहै । वैनानिक अर्थ मे इसमें वे मभी तथ्य उपस्थित है जो पारस्परिक वादान-प्रदान मे सीने जाते है। इसमें भापा, नियम-परम्परा, रीति-रिवाज और मम्थाएं सभी निहित है। सस्कृति मानव-ममाज को सार्वभौमिक विशेषता है । पशु-ममूह में मौखिक भाषा नहीं होती। सस्कृति के आदान-प्रदान और स्फुरण का जो माध्यम है वह उन्हें नहीं मिलता। इसी से संस्कृति एक मानवीय विशेषता मानी गयी है और इसकी उत्पत्ति मानव की उच्च योग्यता में है जो वह अनुभव गे ग्रहण करता है और अपने अनुभव, ज्ञान और शिक्षण की प्रतीको द्वारा जिसमे भाषा मुख्य है, आदान-प्रदान करता रहता है । मानव के शिक्षण का मुख्य विषयवस्तु सत्य का अन्वेषण है और यह शिक्षा द्वारा एकत्रित और संक्रमित होता रहता है। शिक्षण का परिणाम प्रत्येक समूह की संस्कृति का विकास होता है। संस्कृति-मापेक्षवाद मे मभी क्रियाओं और मूल्यों को उनके सस्कृति-प्रसंग में देखा जाता है । व्यक्ति जिम संस्कृति में पला है उसी सस्कृति के प्रभावानुसार वह व्यवहार करता है। इस प्रकार एक संस्कृति में पले व्यक्ति का व्यवहार दूसरी संस्कृति में पले व्यक्ति के व्यवहार से भिन्न होता है। नयफायडवाद के अनुसार व्यवहार तथा व्यक्तित्व के निर्माण का आधार उस देश और कात की संस्कृति है । इधर संस्कृतिवाद मनुष्य की सामाजिक प्रकृति पर बल देने और सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप व्यक्ति को ढालने की ओर इगित करता है। संस्कृति के विषय में यह माना जाता है कि वह चेतना, नैतिकता और अभि- रुचि का विकास और परिशोधन है, वह सभ्यता के विकास की विशिष्ट अवस्था ममाजवादी क्रान्ति का महत्त्वपूर्ण अनिवार्य अंग होता है मांस्कृतिक क्रान्ति । सांस्कृतिक क्रान्ति समाज में आमूल परिवर्तनो को वाहक बनती है । शीघ्रातिशीघ्र निरक्षरता का उन्मूलन किया जाता है तथा शिक्षा के पाठ्यक्रम को वैज्ञानिक समाज- वाद की विषयवस्तु देकर पुनर्गठित किया जाता है । जीवन्त परम्पराओ का रक्षण और रूटियो का उच्छेदन किया जाता है । आर्थिक, सामाजिक और राज- नैतिक सगठनो का पूर्णतया जनवादीकरण किया जाता है । मनोरंजन के स्तर को ऊँचा उठाया जाकर उसके गाधनों को आम लोगो तक पहुंचाया जाता है। लोक- संस्कृति और लोककलाओ को और अधिक विकसित किया जाना है। इन सबका उद्देश्य एक शोपविहीन गमाज की संस्कृति को आधारभूमि तैयार करना होता है जिससे एक उन्नत जन-जीवन जीनेवाली नयी पीढी पैदा हो मके । सभी समाजवादी देशों ने अपने-अपने तरीकों से इस प्रकार की सास्कृतिक क्रान्तियाँ सम्पन्न करने में मफलता प्राप्त की है। जबकि गर समाजवादी देश अपने सांस्कृतिक स्तर को ऊँचा उठाने में नाकामयाब रहे हैं। क्योयि वैज्ञानिक तकनीकी त्रान्ति हासिल करने पर संस्कृति की घड़कन भारतीय संस्कृति /29 ने अपने बरलो के किले और गता तोड़ने के लिए किया। यह दानूय और साबा के युद्ध-क्षेत्रों में उतनी ही निर्णयकारी सिद्ध हुई जितनी कनयाहा में । वास्तव में चीन की चाय, लातिनी अमरीका की नम्यार, वैथिलोनिया के ग्रह-बिछु, कोन्स्तान्तीन द्वारा आविष्कृत ग्रहनामी सप्ताह का कलेण्डर सारी दुनिया में फंसे । विज्ञानों के उदय और प्रसार के साथ उनसे विचारों की उस प्रगति के चरण-चिह्न मिलते हैं जो विश्वव्यापी हो गये है । इतिहास और संस्कृति ने ऐगे पक्ष विकमित किये जिन्होन स्थानीय इकाई तक रहना अस्वीकार किया और एक प्रकार की समग्रता धारण की। सचार साधनो ने राष्ट्रो और जनगण तथा उनको सस्कृतियों, उनकी जीवन-प्रणालियो और भावनाओ में एक अन्तर्भूत एकात्मकता पैदा कर दी है।" (भारतीय संस्कृति के सोत-प. 3-4) अव यह एक परिपाटी-मी चल पड़ी है कि भौतिक सस्कृति अर्थात् उत्पादन के साधन, उत्पादन की तकनीक और अन्य प्रकार की भौतिक सामग्री और आध्या• त्मिक संस्कृति अर्थात् विज्ञान, कला, साहित्य, दर्शन, नीतिशास्त्र, शिक्षा आदि को अलग-अलग करके देखा जाने लगा है । सस्कृति एक ऐतिहामिक परिघटना होती है और उसका विकाग मामाजिक-आर्थिक मरचनाओं के फतस्वम्प निर्धारित किया जाता है । किन्तु उसका अपना स्नतन्त्र अस्तित्य भी होता है जो दूसरो को प्रभावित करता है। वर्गीय ममाज-व्यवस्था में संस्कृति भी द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया का प्रतिनिधित्व करती है किन्तु वर्गहीनता आने पर उसमे पुन एफम्पता आने लगती है । शिक्षाविदो में कई चिन्नको ने अन्त सांस्कृतिक शिक्षा (Intercultural education) पर जोर दिया है जिसमे तनाव, पूर्वाग्रह और विदो-मतभेदों को एक स्थिति तक सीमित और सयमित किया जा सके। इसके अन्तर्गत रचनात्मक कार्यक्रम से वर्गभदो का गुणावगुण-विवेचन करते हुए सामुदायिक जीवन मे सहयोग की भावना विकसित करने का प्रयास किया जाता है। विद्यालय में विभिन्न गमुदायों के बालक-बालिकाओ को धामिक और जातीय भेद-भावों को भुलाकर मिलकर काम करने तथा मेलने पर विशेष बल दिया जाता है। अन्त.प्रेरित क्रिया अथवा स्वत स्फूर्त क्रिया (self activity) इसका एक महत्त्वपूर्ण अंग है। यह क्रिया कर्ता के स्वयं के निर्देशन और निश्चय से उत्पन्न होती है । यह क्रिया चेतनास्तर से नीचे उत्पन्न होनेवाली सहज क्रिया तथा वाह दबाव के फलस्वरूप उत्पन्न होनेवाली क्रिया में एकदम भिन्न हो जाती है। अधिगम एक प्रकार की अन्त-प्रेरित क्रिया का स्प होता है। सस्कृति से तात्पर्य गमूह विशेप के सभी विशिष्ट मानव-मूल्यों से हैं। केवल भाषा, कला, विज्ञान, कानून, नीति, धर्म इत्यादि ही नहीं, बल्कि इसमें इमारतें, औडार, यन्त्र, यातायात योजनाएँ इत्यादि भी सम्मिलित है, जिनमे आध्यात्मिक- 28/राग मरुगन्धा सास्कृतिक विशेषताओं का व्यावहारिक प्रभावशाली रूप हस्तगत हुआहै। वैज्ञानिक अर्थ में इसमें वे सभी तथ्य उपस्थित है जो पारस्परिक आदान-प्रदान से सीवे जाते है। इममे भापा, नियम-परम्परा, रीति-रिवाज और संस्थाएं सभी निहित हैं। मस्कृति मानव-समाज की मार्वभौमिक विशेषता है । पशु-ममूह में मौखिक भापा नहीं होती। सस्कृति के आदान-प्रदान और स्फुरण का जो माध्यम है वह उन्हें नहीं मिलता । इमी से संस्कृति एक मानवीय विपता मानी गयी है और इसकी उत्पत्ति मानव की उच्च योग्यता में है जो यह अनुभव से ग्रहण करता है और अपने अनुभव, ज्ञान और शिक्षण की प्रतीको द्वारा जिसमें भापा मुख्य है, आदान-प्रदान करता रहता है । मानव के शिक्षण का मुख्य विषयवस्तु सत्य का अन्वेषण है और यह शिक्षा द्वारा एकत्रित और संक्रमित होता रहता है। शिक्षण का परिणाम प्रत्येक समूह की संस्कृति का विकास होता है। संस्कृति-सापेक्षवाद में मभी क्रियाओ और मूल्यों को उनके सस्कृति-प्रसग में देखा जाता है । व्यक्ति गिस संस्कृति में पता हे उमी सस्कृति के प्रभावानुसार वह व्यवहार करता है । इस प्रकार एक संस्कृति में पले व्यक्ति का व्यवहार दूसरी संस्कृति में पले व्यक्ति के व्यवहार से भिन्न होता है। नवफ्रायडवाद के अनुसार व्यवहार तथा व्यक्तित्व के निर्माण का आधार उस देश और काल की संस्कृति है। इधर संस्कृतिवाद मनुष्य को सामाजिक प्रकृति पर बल देने और सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप व्यक्ति को ढालने की ओर इगित करता है। सस्कृति के विषय में यह माना जाता है कि वह चेतना, नैतिकता और अभि- रुचि का विकास और परिशोधन है, वह सभ्यता के विकास की विशिष्ट अवस्था समाजवादी क्रान्ति का महत्त्वपूर्ण अनिवार्य अंग होता है मांस्कृतिक क्रान्ति । मांस्कृतिक क्रान्ति ममाज में आमूल परिवर्तनो की वाहक बनती है। शीघ्रातिशीघ्र निरक्षरता का उन्मूलन किया जाता है तथा शिक्षा के पाठ्यक्रम को वैज्ञानिक समाज- वाद की विषयवस्तु देकर पुनर्गठित किया जाता है। जीवन्त परम्पराओं का रक्षण और रूठियों का उच्छेदन किया जाता है । आर्थिक, सामाजिक और राज- नैतिक संगठनों का पूर्णतया जनवादीकरण किया जाता है । मनोरंजन के स्तर को ऊँचा उठाया जाकर उसके साधनों वो आम लोगों तक पहुंचाया जाता है। लोक- संस्कृति और लोककलाओं को और अधिक विकसित किया जाता है । इन सबका उद्देश्य एक शोपणविहीन गमाज को सस्कृति की आधारभूमि तैयार करना होता है जिससे एक उन्नत जन-जीवन जीनेवाली नयी पीढ़ी पैदा हो सके। सभी समाजवादी देशों ने अपने-अपने तरीकों से इस प्रकार की सांस्कृतिक क्रान्तियाँ सम्पन्न करने में सफलता प्राप्त की है । जवकि गर समाजवादी देश अपने सांस्कृतिक स्तर को ऊँचा उठाने में नाकामयाब रहे हैं। क्योंकि वैज्ञानिक तकनीकी शन्ति हासिल करने पर संस्कृति की घड़कन भारतीय संस्कृति / 29 भी जय मा मालिनी पानी शिमोश प्रधान व्यवस्था में गम्भव होनही माली, नयना गामा ममान मत मातृतिराग तर पोप्राप्त नहीं कर गाना। मेर अबभागामनीटाय। भाग गीपाति विर में जाद-भोगोनिक प्रति भी और जनमानम प्रकृति भी। में यहां विनार में पाया जायमानानी प्रतीत होती । अना पीले आये। गाय भी थे और वर्ष भी। नहाने गदग मागीमाएं गांधकर प्रदेश किया, लडे-गिरे भी और परम समान पाय देश की जनता ने उन्हें अपनी बाही ग गोरिया । उन्होने दिगा भी, लिया भी। कुल मिलाकार अनेक गंगानियो का पर गवगुण मनुए भाग्नीय गमति के पग निमर गया। इगलिए भारतीय गति भी अपनी अनुपग ऽपि निए पियपटल पर दृष्टि- गोचर हुई। यह गंनि अन्तहीन विभिन्न जातीय एकायों का एक रायुक्ताक्षर है। जातीयतानों और विजातीयतानी की भावनामा एला मा एक स्पृहणीय संगम है। विश्व संस्थति को भारत का योगदान को मानी नही रता। यह भी गच है कि विश्य गे उगने गंमतियों के उप में बटोरा भी बहुत है। गिगो को अपने में समेट गेने की क्षमता इग देश की जनता से वटकर और किमी देश की जनता में नहीं रही। अथवा यों कहा जा गाता है कि उसके गहज स्वाभाविक गौन्दर्यात्मा आकर्षण में गि बिना ओर्ग यो चैन नहीं मिला। आत्मगान करने की जा क्षमता और प्रतिमा ने सबको अपना भिय, अपना अन्तरंग यगा अला। आग्नेयी और आस्त्रिक, सुमेरी और असुरी, गुर्जरी और हण, इलामी और योरोपीय नादि मभी से भारत ने लिया है और अन्यों को अपना बहुत कुछ दिया भी है । वेद और वैदिक साहित्य, आयुविज्ञान, महाकाव्य, रगकर्म, गगौत, गुहाचित्र, शिलालेग, शिल्प और तारतुकला, गणित, भौतिकी, ज्योतिविज्ञान, शिक्षा और समाजव्यवस्था, अर्थशास्त्र व नौनि-न्याय-योग आदि सभी माध्यमों में भारत ने विश्व को प्रभावित किया है । शर, पदव, दुपाण, आभीर, गुर्जर, मुस्लिम, अंग्रेज आदि मभी जातियों का योगदान भारतीय संस्कृति को समृद्ध करने में समुनिल कप मे प्राप्त हुभा है । मिजो गालिय हमारी अपनी अमूल्य धरोहर है तो दूसरी और हमारे माहित को शेक्स्पीयर, मिटन, मिल आदि ने भी पूरी तरह प्रभावित और समृद्ध किया है। क्या अग्रेजी भाषा के माध्यम से हमने नटे और मिलर, सेसिंग और हर्डर, सो और वोल्टेयर, हाइने और हा गो, गोगान और पुश्किन, मावर्ग और ऐगास, तुर्गनेव और तोलस्तोय, सेनिन और बुगारिन, गोकी भोर शोलोमोव, फास्ट और फास्ट तथा अन्य किन्तु प्रेरणास्पद साहित्यकारो का आत्मीयकरण नहीं क्यिा? 30/राग महगन्धा मान्ति और विश् बधुत्व की भावना को टोम और रचनात्मक यापक आयाम देने में आधुनिक विश्य मे भार का एक महत्वपूर्ण स्थान है जिस पर हम भारतीयों को ही नहीं, अपितु दुनरो को गी गौरव का अनुभव हो रहा है। उसके साथ यह भी नहीं है कि शान्ति के दुश्मनों का हमें भी शिकार होना पड़ रहा है । यह ठोर ही पहा गया है कि भारत ने शून्य (0) के अंर का ज्ञान देकर विज्ञान को एक अनुपम यस्तु प्रदान की, सीवायत और माथ्य का दर्शन देकर भौतिकवादी दर्शन की आधारशिला रखी, वेदान्त देवर भावयादी दर्शन को एक विशिष्ट प्रकार का चरमोत्कर्ष प्रदान किया, रंगभेद मिटाने के आन्दोलन का सूत्रपात जननायक महात्मा गांधी ने किया, टनिरपेक्ष आन्दोलन के माध्यम में विश्वशान्ति की पक्षधरता को भारत के प्रथम प्रधानमत्री जवाहरलाल नेहरू ने परिपुष्ट किया और गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अन्तरतम को सुविवामित करने का भारत का गीत-मन्देश दुनिया के कोने-कोने में पहुंचाया। शान्तिनिकेतन, भारत का सूक्ष्म रुप आज भी प्रतीक म्प मे सस्कृति सूत्र प्रदान कर रहा है। भारतीय संस्कृति विश्वसंस्कृति का हृदय है- उमका अन्तरग । यही उनकी घडवान है। ७० संस्कृति की धड़कन भारतीय संस्कृति /31 शिक्षा, कल्प, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष एवं व्याकरण इन सभी अध्ययनों में D.ना. कौशिक पर वेदागो मे शिक्षा का स्थान प्रथम है- शिक्षा कापी निरक्तं च छन्दो ज्योतिपमेव च । पष्ट व्याकरण पेति येदागानि विदुर्बुधा. । शंकराचार्य की शिक्षा दृष्टि (पा.शि. 52) उच्चारण की शुद्धता मर्वोपरि रही है । अशुद्ध उच्चारण अर्थ को ही नही उच्चारण कर्ता को क्षति पहुंचाता है । शुद्ध वाणी से आयु बढती है । स वाग्वजो यजमान हिनस्ति । वालक शंकर मै ध्यान को एकाग्र करने की अद्भुत क्षमता थी। दस वर्ष तक अध्ययन और अपनी मौलिक सूझ द्वारा तत्त्व ग्रहण की अद्भुत क्षमता ने इन्हे जगद गुरु बना दिया। स्वय शङ्कर ने कोई शिक्षा पद्धति नहीं दी। उनया ममप्र व्यक्तित्व अपने में एक विचार है। समता, सर्वज्ञता एव कात्म्य-योध ही सभ्यज्ञ दर्शन है - वह परमात्मा बाहर, भीनर, सर्वत्र है- उमे पाना ही तृप्ति है। जीवन के सौ में भी अधिक पक्षी पर उन्होंने शिक्षा विषयक ठोस विचार दिये। अक्षर विद्या ब्रह्मविद्या सक उनका सीधा कथन जन-कल्याण निमिस रहा है । किमी वस्तु या ताव को समझाकर उसका भाष्य शंकराचार्य की विशेषता है। अद्वैत ही परम माक्षात्कार है-श्रम, मोह, सशय दैत के परिणामस्वरूप हैं। 'मवं तल्विद प्रस' शङ्कर का मत है कि शिक्षा-परमपिता का अद्वैत ज्ञान है । पुरुषार्थ द्वारा ही परम श्रेय की प्राप्ति है। विद्या में अमृत तत्त्व प्राप्त होता है-- विद्ययामृतमश्नुते। स्थिर बुद्धि को प्राप्त होना शिक्षा का उद्देश्य है । स्माध्याय बुद्धि द्वारा लोक 32/राग मगन्धर किये। लिगे- समूत्र-माप्य, उपनिपद् भाप्य, गीता भाप्य, भादि अनेक वैदिक और पौराणिक ग्रयों के भाष्य के अतिरिसत-प्राविटा, जार विद्या, आदि पचामा प्रकार की विद्या का उल्लेग किया। कोई भी विद्या ब्रह्म और शान में मिल नहीं है । शिक्षा के राष्ट्रीय पक्ष से दृष्टिगत रप भारत की चारो दिशा में-प्रमश. बद्रीनाथ मठ-उनर में, कानी परम मठ-दक्षिण मे, जगन्नाथ पुरी पूर्व में, द्वारका मठ-पश्चिम में स्थापित शिक्षा के परम लक्ष्य में ब्रह्म के अतिरिखत व्यावहारिक जगत में औदार, सहिष्णुता और त्याग को ब्रह्म प्राप्ति का आधार कहते थे। सर्वस्व त्याग की भावना ही जीवन को प्रघर करती है । उन्होंने एक कापालिक को उसकी तात्र निधि के लिए अपना सिर देना स्वीकार कर लिया था- यहाँ कहना अगंगत न होगा नि निश्चित अवसर पर वलियो पर जब सिर विच्छेद के लिए कापालिक ने खड़ा उठाया उमी गमय इनके एक शिष्य पद्मपाद ने कापालिक का वध कर शकराचार्य के प्राणों की रक्षा की। अनवरत अध्ययन द्वारा उन्होंने गलतम यदिक बधो का भाप्य कर विश्व का उपकार किया। कांध्यातव्य-निर्णय सुम और दुय को व्यक्तिपरफ बताया, विद्या त्रिकालज्ञ होनी चाहिए। मनु से शंकराचार्य प्रभावित रहे है। मपामपि चैतेपामात्मज्ञान परं स्मृतम् । - (मनु 12-85) - शिक्षा और गुरु की प्रतिष्ठा उनके लिए सर्वोपरि रही हैं । बिना गुरु के शान नहीं है- गकार. सिद्धिद. प्रोक्तोरेफः पापस्य हारकः । उकारो विष्णुरव्यक्त सितयात्मा गुरु: पर।। (तन्नसार) ('ग' सिदि देने वाला, 'र' कष्ट हरण करने वाला 'उ' अव्यक्त विष्णु रूप है । ऐसा गुरु है । मोक्षमूल गुरो. कृपा । सर्व गुरुमयं जगत् ।) शकराचार्य ने शिक्षा के उद्देश्यों को शाश्वत जीवन मूल्यों को संज्ञा दी । कर्म के विषय में उनकी मान्यता थो-तत्व ज्ञान मे स्थूल सृष्टि तक प्राकृत संसार ब्रह्म को हो कर्म सृष्टि है। समस्त क्रियाकलाप ब्रह्म रूप ही है। मनुष्य सर्व कर्म करता हुआ भी कर्म मुक्त है । समग्र सृष्टि सूत मे मूत के ही मणकोवत परम ब्रह्ममय (गी. 7.7.) मयि सर्वमिदं प्रोत मूने मणिगणा इच । किसी भी स्थिति में ज्ञान की सत्ता बनी रहती है चाहे वह अल्पश रूप में हो या सर्वन रूप में यह सर्वज्ञ दृष्टि ही तत्त्वज्ञ की दृष्टि है। यही कारण है कि ब्रह्म 34/ राग मरुगन्धा में ब्रह्म भिन्न कुछ नहीं है । जिज्ञासु या साधक आधे अधूरे पुरुषार्थ को त्याग पूरे प्राणपण में अपने स.पूर्ण व्यक्तित्व द्वारा प्रभु का वरण करता है- ऐसी ही स्थिति में परम पिता परमात्मा का यथार्य स्वरूप प्रकट हो जाता है। वैराग्य और विवेक जीवन के दो आधार स्तम्भ है । वेदान्त 'मैं' का उत्तर देता है, जगत और उसके नियामक की बात करता है । यही विचार व्यक्ति को व्यक्ति से भर उठाते है । गुरु के द्वारा हो यह सम्भव है । ऐने मे रागद्वेप स्वत निर्मूल हो जाते हैं। यही मत्ल का साक्षात्कार है । शंकर इसी मत्य के मूत्रधार है । यही उनका जीवन था। वर्तमान सन्दर्भ में शकराचार्य की शिक्षा की प्रासगिकता को स्वीकार किया जाफर उच्च शिक्षा के क्षेत्र में यह स्पष्ट हो ही जाना चाहिए कि ये कैरियर स्कूल तात्कालिक उपयोगिता दे सकते है। यतः आवश्यकता है वैचारिक स्कूलो की, विद्वत्ता का मार्तण्ड चिन्तन और अध्ययन पाहता है । करियर एज्यूकेशन का शान से मम्बन्ध नहीं है। देश की वर्तमान शिक्षा न पूर्णतया कैरियर आधारित है और न ही ज्ञानात्मक । यही कारण है कि विद्यालय से विश्वविद्यालय तक मे शिक्षा के अतिरिक्त सब कुछ सम्भव है- अव्यवस्था और डिग्री शिक्षा ने प्रमाण पत्री मनुप्यों का निर्माण किया। शिक्षा के इतने प्रचार-प्रमार के पश्चात् असन्तोष, अनिश्चितता का एक सैलाब उमड़ा पड रहा है । असद्भाव और निर्दोप स्त्री बच्चों तक की हत्याओं से वर्तमान में समाचारपत्रो की सुर्खियाँ, दुर्यसनों के शिखर और चोरी से शवों तक के अगी का व्यापार-मेरे समक्ष शिक्षा एक प्रश्न चिह्न के रूप में उपस्थित है। शंकराचार्य ने जो स्वरूप दिया उसमें है व्यक्ति का संस्कार । आज एक बार सुन. उसी सस्कार को दृढ करने का प्रश्न उपस्थित हो गया है। शिक्षा वह है जो व्यक्ति में शुभ कर्म की अपेक्षा रखती है, उसके व्यवहार में सम्यक् दर्शन को जन्म देती है। शिक्षा एक प्रजातन्त्रात्मक स्वभाव है । अथर्वा ने स्पष्ट किया-उद्यानं ने पुरुप नावयनाम् (8-1-6 अथर्व) याने मनुष्य जार उठ नीचे न गिर । शंकर ने अपनी शिक्षा में एक ही बात दी-- सगच्छध्वं सवदध्यम्। शंकराचार्य का शिक्षा दर्शन वर्तमान शिक्षा सस्कार के लिए अनिवार्य है- समानी य: आकूतिः समाना हृदयानि कः। समानमस्तु वोमनो यथा यः सुसहासति ।।--ऋक् हो सभी के मन तथा सकल्प अविरोधी सदा। मन भरे हो प्रेम से जिसमे बढ़े सुख सम्पदा ।। - -- . शकराचार्य की शिक्षा दृष्टि/35 प्रतिभा-स्वरूप विश्लेषण ) गिरवरप्रसाद विस्सा शास्त्री - कवि-सम्मेलन के मंच पर क्रमशः कपिनन कवितामा का पाठ करके सहदय रसिक- जनो को आल्हादित कर रहे थे। उन्ही रमिकों में मम्मिलित होने का मुझे भी मौभा य मिला। में प्रत्येक कवि के मुगारविल गे कविता का आनन्द ले रहा था, और मन-ही-मन सोच रहा था कि मैं भी इस नायिकी मानि एक सविता बनाऊँ। मने टूट-फूटे अक्षरो को जोड़ने का नाम किया, परन्तु उम कषि की भांति गफलता नहीं प्राप्त हो सकी। मैंने मोपा, नाघिर ऐसी कौन-सी यस्तु उस पवि में निहित है, जिगगे उगके मुग ने रसमयी, आनन्दम्पी और अलासमयी पविता निःसृत होती है। यकायक मेरे मस्तिष्क में आया, अरे यह तो केवल कपि की प्रतिभा है। प्रतिभा क्या है और उसके विषय में पूर्व और पश्चिम के विद्वानों की क्या धारणा है, उगका मैने गम्भीर अध्ययन किया। यही अध्ययन प्रस्तुत निबन्ध का प्रतिपाद्य विषय है। पौर्वात्य एव पाश्चात्य काव्यशास्त्र में प्रतिभा का महत्वपूर्ण स्थान है । 'प्रतिभा में मूल शब्द है 'भा' जिसका सीधा अर्थ है - चमक । विभिन्न उपसर्गों के समायोग से प्रभा, आभा, प्रतिभा आदि अनेक शब्दो का निर्माण होता है। प्रतिभा शब्द का अभिप्राय ऐसी ज्योति अथवा प्रकाश-विशेष हो जाता है, जिसके द्वारा किसी विशिष्ट वस्तु का स्वरूप प्रतिभासित हो उठे। सस्कृत के साहित्यशास्त्र एव दर्शन- शास्त्र में प्रतिभा का विश्लेषण किया गया है । काव्याचार्यों में दण्डी, वामन, रुद्रट, भट्टतौत, अभिनवगुप्त, कुन्तक, महिमभट्ट, राजशेखर तथा मम्मट आदि ने प्रतिभा का प्रत्यक्ष विवेचन किया है। आचार्य दण्डी ने प्रतिभा या प्रतिमान को पूर्ववासना के गुणो से सम्बन्धित प्रतिपादित किया है तथा वामन ने प्रतिभा को कवित्व का मूल वीज अंगीकार -36/-यग मरुयन्धा -रते हुए उसको जन्म-जन्मान्तरगत सस्कार विशेष माना है । अभिनवगुप्त ने भी अभिनवभारती' में प्रतिभा को प्राक्तन सस्कार ही स्वीकार किया है । भट्टतीत तथा नभिनवगुप्त ने उमे प्रज्ञा का एक विशेष प्रकार माना है (प्रज्ञा नवनवोन्मेपशालिनी तिभा मता)। नव-नव जन्मेप करने वाली प्रना का नाम प्रतिभा है। दूसरे शब्दो प्रतिभा प्रज्ञा का वह प्रकार है, जो स्पो का सृजन अथवा उद्घाटन करती है । अभिनवगुप्त ने प्रतिभा की व्याख्या को 'ध्वन्यालोक लोचन' में विशद रूप से तिपादित किया है कि सामान्य रूप की सृष्टि करने वाली शक्ति सामान्य प्रतिभा गौर रमात्मक रूपो की सृष्टि करने वाली शक्ति कवि प्रतिभा है । रुद्रट ने यह भी पष्ट किया है कि कवि प्रतिभा रसात्मक रूपो की सृष्टि किस प्रकार करती मनसि यदा सुसमाधिनि, विस्फुरणमनेकधाभिधेयस्य । अक्लिप्टानि पदानि च विभान्ति यस्यामसो शक्तिः।। अर्थात् समाहितचित्त में जिसका उन्मेप होने पर प्रसन्न पदावली मे अभिधेय मर्थ का अनेक प्रकार से स्फुरण होता है, वही शक्ति अथवा प्रतिभा है । यही मन्तव्य मि भट्ट को भी स्वीकार्य है, यथा--- रमानुगुणशब्दार्थ चिन्तास्तिमित वेतसः । क्षणं स्वस्पस्पर्शोत्या प्रजव प्रतिभा कवेः ॥ आचार्य कुन्तक ने कहा है कि "प्रतिना वह शक्ति है जिससे कि प्रयत्न के बिना ही शब्द मे कोई अपूर्व सौन्दर्य स्फुरित ना दिखायी देता है । उपर्युक्त विवेचन के अनुमार संस्कृत माहित्य शास्त्र में प्रतिभा का विवेचन नम्न रूप में प्रस्तुत किया है कि मानव मस्तिष्क की मौलिक एव वौद्धिक शक्ति का नाम है प्रज्ञा, जो जन्म-जन्मान्तर के संस्कारों का परिपाक् है। प्रज्ञा के विविध प एवं कार्यक्षेत्र है। इनमे से एक रप है प्रतिभा, जिसका कार्य है, नव-नव रूपी का उन्मेप तथा सृजन करना । प्रतिभा का भी एक विशिष्ट रूप है- कवि प्रतिभा, जो रसात्मक रूपों का सृजन करती है। हेमचन्द्र आदि आचार्यों ने उसके दो भेदों विधान किया है, जन्मजात एवं कारणजन्य । इनको सजाया औपाधिक भी कहा गया है । पण्डित जगन्नाथ का भी यही मत है । ये सहजा प्रतिभा को जन्मान्तरगत मस्कार और औपाधिक को व्युत्पत्ति तथा अग्यास का परिपाक् मानते हैं । पाश्चात्य विद्वानों ने प्रतिभा के स्वरूप का विशद विवेचन मनोविज्ञान शास्त्र के अन्तर्गत किया है। मनोविज्ञान की पृष्ठभूमि पर प्रतिभा का अर्थ है- असाधारण कोटि की मेधा अथवा असामान्य सहजगक्ति। अत. मनोवैज्ञानिक धरातल पर प्रतिभा सामान्य नियमो और मादि रीतियो के बन्धन से मुक्त एक असाधारण देवी- शक्ति है, जिसका कार्य है सृजन अथवा आविष्करण । मनोविज्ञान का यह विवेचन भारतीय काव्यशास्त्र के विवेचन से मूलत : भिन्न नहीं है, क्योंकि भारतीय काव्य- प्रतिभा-स्वरूप विश्लेषण / 37 शास्त्र के प्रतिनिधि आचार्यों के पूर्व उद्धृत मन्तव्यों का साराश भी प्राय: यही है कि प्रतिभा एक असाधारण जन्म-जन्मान्तरगत दैवीशक्ति है, जो नियतिकृतनियमरहिता है, और जिसमे अपूर्व वस्तु निर्माण की क्षमता है । फायड आदि अनेक मनोविश्लेषकों ने प्रतिभा की नये सिद्धान्तो के आधार पर व्याख्या को है । वे प्रतिभा का मूल उद्गम अब वेतन और तन मन और नतिक चेतना के संघर्ष को मानते हैं। हमारे अवचेतन और चतन मन के बीच तीव्र संघर्ष होता है, वही सघर्ष जितना अधिक तीव होगा उसकी प्रतिभा उतनी प्रखर और प्रबल होगी। इस प्रकार मनोविश्लेपण शास्त्र के नाचार्य प्रतिमा की असाधारण तथा अतिमानवीय विशेषताओ का कारण अवचेतन के इस प्रच्छन्न सपा में खोजते निष्कर्ष रूप से हम कह सकते है कि भारतीयशास्त्र ने प्रतिभा के तत्त्व को देवी वरदान या प्राक्तन सस्कार का परिपाक कहकर सन्तोप धारण कर लिया था, तथा पश्चिम के आस्तिक दर्शन ने इसे देवी स्फुल्लिग मानकर अपनी जिज्ञामा का समा- धान कर लिया, तथा आधुनिक युग के भौतिक वैज्ञानिक शास्त्री ने इसे अवचेतन मन के अन्तर्द्वन्द्वो मे उद्गम खोजने का प्रयत्न किया है । वास्तव में प्रतिभा मानव व्यक्तित्व का एक रहस्यमय अग रही है, और समय-समय पर दार्शनिको एव साहित्यकारो ने इसको सफल ध्याच्या करने का सप्रयत्न किया है। प्रतिभा विषयक एक तथ्य तो शाश्वत सत्य है कि प्रतिभा अन्त.करण की एक असाधारण शक्ति है, अथवा वह एक प्रकार की अन्त. सस्कारों की परिपाक मूति है। .. 38/ राग मरुगन्र्धा जीवन मूल्यों की शिक्षा 0रूपनारायण काबरा - शक्षा का मूल प्रयोजन व्यक्ति को बेहतर इन्सान बनाना है, जो उदात मानवीय गुणों से युक्त हो, जिम्मेदार नागरिक हो, विश्व बन्धुत्व और समता भावी समाज का पक्षधर हो और तीव्र गति से बदलती इस दुनिया में मानवता के कल्याण एव 'वकास हेतु अपना योगदान देने को तत्पर हो, सक्षम हो अन्य प्रयोजन तो शिक्षा ने पुरे कर दिये-व्यक्ति को विज्ञान और तकनो- लॉजी के गहनतम ज्ञान से समृद्ध कर दिया, भौतिक सुख एव समृद्धि के नये आयामो स उसे अवगत करा दिया पर न हो सका तो मान यही कि वह अन्तर्निहित मानवीय गुणों को समझे, उन जीवन मूल्यों को व्यवहार में लाने की क्षमता अर्जित करे, जिनसे वह अच्छा इन्मान बन सकता है । आज का इन्मान चांद-सितारों तक जा सकता है पर उसे नहीं आता है धरती पर इन्सान की तरह खड़ा होकर चलना। आज का ससार वैज्ञानिक उपलब्धियो का युग है। विज्ञान के आविष्कारों ने अपरिमित शक्तियां प्रदान की है और इन्ही के आधार पर हमारी भौतिक सुख- मुविधाएँ बढ़ गयी हैं। भौतिक साधनो को होड़ ने मंसार मे कई समस्याओ को जन्म दिया है। आर्थिक विषमताएं बढ़ रही है। सभी प्रकार की अनंतिकताएं जीयन मूल्य बन गयी हैं । चोरी, बलात्कार, धोखा-धड़ी, नकली दवाएँ, खाद्य- पदार्थों में मिलावट, हत्या आदि आज के युग की दैनिक चर्चा का अंग बन चुकी है । मत्य, दया, प्रेम, महानुभूति, अभय, अहिंसा, दान, क्षमा, उदारता, साहस आदि जो मानव जीवन के आवश्यक जग हे, ये नाज के युग में लुप्त होते जा रहे है। जव शालाओं में पढ़ाये जानेवाले विपयो के माध्यम मे मानवीय मूल्यों को उभारा जाये तो सत्पं, शिवं, सुन्दरं को भावना का प्रमार होगा एवं चित्तवृत्ति में बदलाप आयेगा। जीवन मूल्यों की शिक्षा/ 139 वैज्ञानिक आज के विकास के कारण भविष्य की बड़ी भयावह स्थिति का वर्णन करते हैं । जवकि आनेवाले संकड़ो वर्षों में विश्व मे अधिक रेगिस्तान होंगे, अधिक जगल नष्ट होगे, अधिक कल-कारखाने होंगे और अत्यधिक प्रदूपण होंगे। औषधियों मनुप्य के कल्याण हेतु है पर ओपधियों के बड़े-बड़े कारपाने वायु-मण्डल को प्रदूपित कर नयी बीमारियों को जन्म देते है । और औषधियां स्वय भी एक बीमारी को रोकती है तो दूसरी नयी वीमारी को जन्म देती है। आइन्स्टीन ने कहा था हम एक तरफ विकास के गाधनो को बढ़ा रहे है वही दूसरी ओर हम हमारे उद्देश्यो मे भ्रमित भी होते जा रहे है और विनाश के साधन तैयार कर रहे हैं । जाणविक परीक्षणों के प्रदूषण विश्व को विकृत और विकलाग बनाते जा रहे हैं । यह बात स्पष्ट है कि जब तक बालक के मस्तिष्क का विकास सही रूप से नहीं किया जाता है तब तक अच्छे भविष्य की कापना करना व्यर्थ है। अत आज इस बात की सर्वाधिक आवश्यकता है कि शिक्षा में भावात्मक पक्ष पर सर्वाधिक महत्व दिया जाये व मानवीय मूल्यो का शिक्षण हर ममय दृष्टि मे रहे। आज का वालक जय यह देखता है कि ब्रप्ट आचरण करनेवाले भौतिक सुख- मुविधाओ से सम्पन्न है तो उसको मानवीय मूरयो से विरक्ति हो जाती है । शिक्षा के माध्यम से हम वालक मे सच बोलने की प्रवृत्ति वो जागृत करते है परन्तु वह अपने घर तथा समाज मे चारो ओर झूठ का साम्राज्य देखता है । दूकानदार पिता का पुत्र, पाठशाला मे ईमानदारी का पाठ तो पढ़ता है परन्तु वह कम तोलना, मुनाफाखोरी, रिश्वतखोरी को कला अपने वातावरण में रात-दिन देखता है । ऐसी परिस्थिति मे अध्यापक को जागरूक रहकर इस बात को प्रमाणित करने का प्रयत्न, घटनाओं के माध्यम से, अवश्य करना चाहिए जिसमें यह प्रतीति पायी जाये कि वर्तमान समाज की इन अनंतिकताओं का प्रभाव व्यक्ति पर कितना बुरा पड़ता है । नकली दवाओं के वेचने से पैसा अवश्य मिलेगा परन्तु उनका उपयोग कितना घातक होता है । इस प्रकार के दृष्टिकोण से सब कुछ स्पष्ट किया जाये तो बालक को सही शिक्षा देने में हम मफल हो सकेंगे। अव प्रश्न यह है कि मूरयों की शिक्षा कौन दे ? क्या आज का अध्यापक इतना सक्षम है ? आज हमे शिक्षको के दृष्टिकोण मे परिवर्तन लाने के उपाय करने होंगे। साथ ही भविष्य में सक्षम शिक्षाको को ही इम क्षेत्र में प्रवेश देना होगा। ये मूल्य हमे किसी अलग विषय के रूप में नहीं वरन् पूरे शैक्षिक ढांचे में समाविष्ट करने होगे । विषयों में पहले से ही मूल्यों का समावेश तो है पर हमने उस पर ध्यान नही दिया। केवल पाठो को पढ़ने तक ही हमारे लक्ष्य मीमित रहे । अब हमें उम पक्ष पर बल देना है, जीवन मूल्यों को उभारना है । सारे मूल्य एक दूसरे से सम्बन्धित है और बच्छ जीवन के आधार तत्व है। सत्य, धर्म, प्रेम, शान्ति, सहिष्णुता और अहिंसा ये पांच मूत्य ही मूल मूत्य है। 40/ राग मरुगन्धा पंचतन्त्र की कहानियाँ, ईम्प की कहानियाँ, हितोपदेश, पौराणिक कथाओ, रामायण, महाभारत, वौद्ध जातकों, जन कथाओं के माध्यम से जीवा मूत्यो को हम बच्चों के मानस में स्पष्ट कर सकते हैं पर जब तक आचरणों में वे मूल्य नहीं आयेंगे तब तक वालक अमित ही रहेंगे। और एक ब्रमित बालक अच्छाई की अपेक्षा बुराई की तरफ ही वड़ेगा। बालको की पढ़ाई का कोई भी विषय ऐसा नहीं है जिसमें मानवीय मूल्यों की शिक्षा देने का अवसर न हो। अलग से पाठ्यक्रम बनाकर भूयो को नहीं पढ़ाया जा सकता। हमारे जीवन की घटनाओं के माध शिक्षण प्रसगो और मूल्य शिक्षा को सम्बद्ध करना होगा। यदि गिक्षक नै स्वय मैतिक यातो और मूल्यों को हृदयंगम कर लिया है तो यह इन्हें छात्रों तक सम्प्रेषित कर सकेगा। विद्यालय का परिवंश जितना अनुशानित, शान्त, रचनाशील, न्याय संगत, महयोगात्मक एव सहानुभूतिमय होगा, उतनी ही आसानी मे वालक जीवन-मू यो को ग्रहण कर मकेगा । वस्तुतः विद्यालय विशाल समाज का लघु संस्करण ही तो है, अत बुनियादी मानवीय मूयो का बीजारोपण, अकुरण वही किया जाना चाहिए। पर मूल्य शिक्षा देने का एक मात्र अभिकरण विद्यालय ही नहीं है अपितु हमारा घर, परि- वार, परिजन, अभिभावक, समाज, प्रभुता सम्पन्न लोग, राजनेता, सामाजिक कार्यकर्ता सभी को यह काम करना है और पूरे मामंजस्य के साथ । जीवन मूल्यों को शिक्षा/ 4 वनवासियों की कला रवीन्द्र डो. पण्ड्या दक्षिणी राजस्थान आदिवासी बहुल क्षेत्र है। यहाँ की कोरी नग्न पहाड़ियो के आँचल में वमे वनवासियों की झुग्गी-झोपड़ियों की दीवारों पर पने मिति रेखाकन अपना विशिष्ट जाकर्षण प्रस्तुत करते है । शहरी सभ्यता के प्रभाव से व नित्य नये घरों के बनने में यहाँ के वनवासी भीलो की प्राचीन भित्ति चित्ररकन परम्परा प्रायः समाप्त होती जा रही है, किन्तु सहर से दूर एकान्त जगलो एव पालों में बसे आदि- वारियो की झुग्गी-झोपड़ियो में शुद्ध भीली संस्कृति के दर्शन होते हैं । कुछ समय पूर्व मुझे आदिम जाति शोध-सस्थान, उदयपुर के सौजन्य से “बागड़ प्रदेश के वनवासियों की कला" पर चापक शोध-सर्वेक्षण करने का मौका मिता था। लगभग दो हजार से अधिक दूर-दराज के वनवामियों को झुग्गी-झोपड़ियो में गया। बांसवाड़ा जिले का कुशलगढ, सज्जनगढ़, घण्टाली, आनंदपुरी क्षेत्र--जिसका विस्तार गुजरात एवं मध्य प्रदेश की सीमाओं तक है । इन इलाको में प्रवेश पाते ही देखता चला जा रहा था-"वाम व मिट्टी एव गोवर के सहारे बनी वनवासियो की झुग्गी-झोपड़ियाँ, बॉस की डण्डियो पर खड़ा उनका मकान, एक ही प्रवेश द्वार, ऊपरी छत नीष तक झुकी हुई जी सागवान के पतो या लम्बी धाम के तिनकों या सपरेली से ढकी ऊपरी छते। अन्धेरी झोपड़ियों में रोशनी एवं हवा मात्र ढके हुए पत्तो या सपरेलों के छिद्रों में ही आ-जा सकती है । भीलो की झुगी-सोपड़ियों में एक दो टूटी-फूटी चाटिया, मिट्टी एव पापाणो के वर्तन, अनाज पीसने की हाथ की चक्की, छत की लकड़ी के सहारे लटकता बांस का गुंथा पालना, फटो-पुरानी गुदड़ियां, घर की दीवारों पर लगी चूंटियो के महारे लटकते रोती के औजार तीर कमान, बन्दूक, कुम्हाड़ी, गोफण, धारियाँ, मछड़ी पकड़ने की 'यू' आकार की वॉस की लकड़ी पर गुंधी हुई मछली की हाल, भाटा माड़ने की बनी काष्ठ की 42/यग मरुगन्धा 'कावरोट', नाय भामग्री (घी, दुध, आटा, रोटी) रखने को मिट्टी से निर्मित सन्दकनुमा कलात्मक 'सोहरी' । घर के बाहर पानी का स्टैण्ड, जिस पर दो डण्डो के सहारे पड़ा नालनुमा खजूर का मोटा तथा जिस पर रखे हुए पानी के काले मटके, छतों से लटकती हुई मॉस की टोकरियां, घर के आंगन में पहरा देता स्वामीभक्त उनका 'कुता' आदि वनवामियों के जीवन संघर्ष की जीती जागती कहानी प्रस्तुत कर रहे थे। काठ एव माटो जिनकी छत्र-छाया का जाधार है अत्यधिक निर्धन एव राघर्प- स्त जीवन के बावजूद उनकी झुग्गी-झोपड़ियाँ नीम की तुली एवं रामजी रग से विविध रेखाकनो, भित्तिचित्रों में अलत थी। कला मानव के साथ पैदा हुई और प्रकृति के कण-कण से उसका पालन हुआ। ज्यो-त्यो सभ्यता का विकास होता गया, कला उतनी ही सुन्दर रूप धारण करने लगी। कला का इतिहान मानव जीवन के इतिहास में सम्बन्धित है। चित्रकला तो मानव समाज अत्यन्त प्राचीन काल में परिचित है । गुफावामी आदिमानव के मनोभावो ने भी भीतों पर रूप को अवतरित किया और आज का सभ्य समाज भी अपने गुप्त-सुप्त, ऊर्ध्व-मुप्त मनो-विचारो को चित्रित करने का प्रयास करता जा रहा है। मानव मन के विकास का बहुत कुछ इतिहात चित्रकला के अध्ययन में ही ज्ञात हो सकता है । चित्रों के द्वारा तनाव-मन के भाव माकार होते है और वे अपनो अमूर्तता छोड़कर आकार ग्रहण कर लेते है तब फिर मानव के एकाकी मन का मूनापन चित्रों से दूर होने लगता है। कला के द्वारा विराट भगवान् की सर्व सुलभ अनुकृतियाँ भक्तों के लिए अमूल्य निधि बन जाती है। युगों-युगों में अज्ञात के अंधेरे में डूबे इस आदिवासी बहुल क्षेत्र मे वसने वाले यादिवामी भी अपनी मनोगत भावनाओं की दीवारों पर चित्र बनाकर प्रकट करते है । आज भी इन आदिवासियों में भित्ति चित्रण की परम्परा विद्यमान है। घर में विवाह प्रसंग पर जहां एक ओर वाजे बजेंगे कि दूसरी ओर भीलों को रमणियां मिट्टी की दीवारों पर अनेक सलोने चित्रो को अकित करने लगती है। भारतीय महिलाओं ने प्राचीन लोक-कला को अब तक बचाये रक्षा है। घर का मुख्य द्वार देवी-देवताओं तथा पशु-पक्षियो की रेखानुकृतियो से आकर्षक बन जाता है। मनोहरता की वृद्धि के साथ दैत्यों और दानवो को प्रसन्नता प्राप्ति के लिए मंगलमय अवसरोपर चित्रों का चित्रण करना इन आदिवासियों में आवश्यक अग माना जाता है । इनका प्रायः यह मानना है कि--शुभ प्रसंगों में यदि भूत-पिशाची की अर्चना न की जाय तो वे युद्ध होकर उत्पात करते है । आदिवासियों को बड्या का कथन है कि कई देवता मोर बनकर विचरते रहते है, तो कुछ हिरण, घोड़ा, तोता, चीता, सर्प, बिच्छू आदि का रूप धारण कर संसार की सुपमा को देखते रहते है। अतः विवाह प्रसगों पर पुर जन्म के अवसर पर तथा देवी-देवता की पूजा के बनवासियों की कला/.43 उपलक्ष्य मे दीवारों पर प्रागण मे आदिवासी अपनी कोमल तूलिका ग सामान्य रंगों के सहारे चित्रण करते रहते है। धार्मिक त्योहारो, विवाह प्रसगी पर स्त्रियां एव पुरुष अपनी झु-गी-झोपडियो को संवारने-सनाने में लग जाते हैं। घर का आला, कोना, बाहर का चौपट, चबूतरा, भीत या दीवारो की किनारी, धान की कोटियो, हाथ की चक्की के थाले, मिट्टीवनी सन्कनुमा नोहरी/वोक्स/इन सभी को लेपने के बाद ने कोरा नहीं छोड़ा जाता। अनपट आदिवामी शिल्पियो की गर्जनात्मकता एवं कांगल को देखकर आश्चर्य होना स्वाभाविक है। आज का कुशल चितेरा विना उपकरणों के सहज रूप में भीली चित्राकन नहीं कर मकता। इस प्रदेश के भील-चित्रकार सहज रूप में आत्म संचरित रेखाओं की लयात्मकता द्वारा विभुजाकार, वृत्ताकार, पट्कोण, अष्टकोण, खड़ीगड़ी, आड़ी-तीरछी आदि रेखाओ के माध्यम से विविध रूपाकारो का सृजन करते है। रूपाकारों का समानुपात, सरलता व क्रम-बद्धता देखकर आश्चर्य होता है । भीलो की झुग्गी-झोपडियों की दीवार चाहे ऊबड़-खाबड़ हो या चाहे ममतल, विविध रूपाकारी से ढक जाती है। वनवासियों की प्रमुख कृतियाँ गोदराज, महाराज, मायरत जिले स्थानीय बागडी भाषा में 'भराड़ी' के नाम कहा जाता है । यह चित्र विवाह प्रसग का प्रमुध शुभ चिन चिन्नु है। यहाँ के कुछ आदिवासी गांवों में भराडी' का रेखाकन घर का वड़ा जामाय ही अकित कर सकता है, इस तरह का रिवाज भीलों में प्रचलित है। कहीं-कही भीलो के मरदार -~-ढोली चित्राकन का कार्य करते हैं। भीलों की अन्य कृतियो मे मोर, तोता, वर- वधू की आकृतियों, नानने-कूदने की आकृतियां, पशुपक्षियो का रेखाकन, चिड़ियाओ की आकृतियां, सूर्य, चन्द्र, तारे, स्वस्तिक चिह्न, हथेलियों के छ आदि सफेद खडियां या रामजी रग से अंकित करते है । नीम की तुली चियाकन का प्रमुख साधन है। शोध-सर्वेक्षण के दौरान भीलों के प्रमुख शिल्पियो में साक्षात्कार करने का अवसर मिला, जिनमें महिला शिल्पी भी शामिल हैं। कुशलगढ़ क्षेत्र की अनपढ़ आदिवासी महिला शिल्पी श्रीमती काली (आयु 40 वर्ष) की मिट्टी से निर्मित उनको कलात्मक कोठियां, मिट्टी को बनी 'सोहरी' जिस पर उभारी अश्वारोही की आकृतियाँ, विविध रूपाकारों से सुसज्जित मिट्टी फी कोठियां देखने योग्य है। श्रीमती काली की अनक कृतियाँ क्षेत्रीय भीलो की झोपड़ियों में देखी जा सकती है। इनकी कृतियाँ शैली आदि-मानव कालीन कता की ओर सकेत करती है। घण्टाली क्षेत्र की 80 वर्षीय आदिवासी महिला, श्रीमती गोमलीवाई द्वारा निर्मित आज से 40 वर्ष पूर्व को बनी कलात्मक मिट्टी की कोठी (7'.84') देखने मे आयो । अनाज की इम कोठी का वाह्य भाग ज्यामितिक आलेपनो, अश्व पर 44/राग मरुपन्धा मवार पुरुषाकृतियों को मिट्टी से उभारकर इसे सुसज्जित करने का प्रयास किया है । उभारी गयी आकृतियों आदिमानव कालीन कला के जीते-जागते उदाहरण प्रस्तुत करते है। आनन्दपुरी (भुखिया) क्षेत्र का गफल भील चित्रकार श्री सरदार है । विवाह प्रसग पर भराडी', मायरत, सूर्य-चन्द्र, मोर आदि आकृतियो को चित्रित करने का कार्य करता है। हलद (हा दी), श्वेत खडियाँ या चावल, रामजी रग उसके प्रिय रंग है। श्री सरदार का दम वर्षीय बालक इस प्रदेश का एक सफल वाल-कलाकार है। डूंगरपुर जिले के 'शीथल' ग्राम का श्री हीरा भील राजस्थान राज्य के मफल भीली चित्रकारों में से एक है। अपने घर के बाहर बनी एक सौ फीट लम्बी दीवार पर लाल मिट्टी का लेपन कर श्वेत खडिया एव गिली वॉम की डण्डी से विविध विपयो के चित्रों को उसने रेखाकित किया है । चित्रों के कम मे चौकीदार को आकृति का अंकन कर बाद में त्रिशूल धारी एव तलवार लिए पुरुषाकृतियाँ, नृत्यरत आकृतियां, शिकार के दृश्य, माताजी की आकृतियां, पिता अपने दो पुत्रो को पन्धो पर धैठकर नाचते हुए का चित्र आदि यहाँ चित्रित है। श्री हीरा भील की चित्रशाला देखने योग्य है। इम प्रदेश के भीलों के माडणे, भित्तिचित्र, मिट्टी मे उभारी आरतियाँ, विविध रूपाकारों, विणेपकर उनके रंग-रेखाओ के अध्ययन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वनवामियो की कला प्राचीन कालीन कला से मेल खाती है । प्रागैति- हासिक कालीन कला, शैलचित्रों के सकेन उनकी फला परम्परागों में देखें जा मकते है । शोध-सर्वेक्षण के दौरान यह देखने में आया कि इस क्षेत्र की आदिवासी कला समृद्ध होते हुए अब प्रायः समाप्त होती जा रही है । शहरी सस्कृति भीलों की झोपड़ियो के प्रदेश द्वार पर जा खड़ी हुई है । लुप्त होती आदिवासी कला-सस्कृति को बचाये रखने एव संरक्षण हेतु राज्य सरकार भोली चित्रकारो, वाष्ठ एवं शिल्पकारों की कलाओ के लिए प्रोत्साहन पुरस्कारो की शुरुआत करे। इससे उनमे कला की प्रवृत्ति जाग उठेगी और कला के संस्कारों का नवीन शुभारम्भ होगा। वनवासियों की कला/45 शोध मोर समीक्षात्मक निवाय विलक्षण व्यक्तित्व के धनी अज्ञेय O हनुमान दीक्षित लक्ष्मीकान्त वर्मा ने एक जगह लिखा है, 'अनेय नाम की व्याख्या कठिन है । अज्ञेय का अर्थ है एक ऐना चट्टानी इन्छा-शक्ति का व्यक्ति, जो इतना द्रवित रहनेवाला है कि वक्त या एका-एक क्ष्ण जीने की जिनीविपा से ओत-प्रोत जीवन को पूरी तरह निचोडकर एक विन्दु मे मिन्धु को समाहित करनेवाला हो।' अशेप का जीवन उस सदानीरा नदी की तरह है जो पहाड़ो से उतरकर नित नयी राहों का अन्वेषण करती हुई कलकल बहती है। हिन्दी माहित्य में निराला के बाद बहुमुखी प्रतिभा के धनी अज्ञेय ही थे। कविता, कहानी, उपन्याम, निबन्ध, आलोचना, पत्रकारिता, मापादन आदि मभी क्षेत्रों में अज्ञेय छाये रहे। ऐमा बहुत कम होता है कि कोई आदमी इतने लम्बे समय तक उच्च शिखर पर बैठा रहा हो। उतार-चढाव अनिवार्य है । मगर यहां प्रकृति भी उनकी तरह मौन रहकर देखती रही तथा अजेय भरपूर जिन्दगी जीते हुए अन्तिम सॉन तक साहित्यिक गतिविधियो के केन्द्र में रहे। अज्ञेय ने अपने जीवन काल में जितना विरोध सहा, दूसरे साहित्यकार ने महा होगा, लेकिन इस लगातार विरोध एवं आसोचना के बीच भी अज्ञेय विना किमी उत्तेजना के प्रान्त चित्त, मौन रहकर मन्नाटे का छन्द दुनते रहे। में सभी ओर मे घुला हूँ। वन-सावन-सा अपने में वन्द हूँ मन्द में मेरी समाई नहीं होगी मैं सन्नाटे का छन्द हूँ। अक्षेय एक ऐसे आदमी में जो सदैव अपनी शवों पर जीते और जिन्होंने मायद ही किसी 46/राग भंगाधा अपनी मान्यताओं के लिए भले ही तरह-तरह की आलोचनाएं झेली, पर समझौता नहीं किया। वे सदैव कवि की तरह से जिये । फोटोग्राफी, वागवानी, बढ़ईगिरी से लेकर यायावरी तक में कविता जैसी पूर्णता मिलती है । प्रकृति तथा मानवीय अस्तित्व की मूलभुत चीजे अज्ञेय की कविताओं में बार- वार आती है । बानगी देखिए-'मरुस्थल में चट्टान' कविता में, चट्टान से टकरा कर हवा- उसके पैरो में लिख जाती है लहरीले सौ सौ स्प। और तुम्हारे रूप की चट्टान मे लहराता टकराकर मैं? अपने ही जीवन की पालू पर अपनी गॉगो से लिख रह जाऊँगा। अज्ञेय का लेपन मामूली दग का न था। जैसा कि प्रख्यात पत्रकार प्रभाप जोशी ने एक जगह लिखा है, 'अज्ञेयजी के बराबर ज्ञान-विज्ञान और साहित्य जाननेवाले लोग मुट्ठी भर भी नहीं रहे होगे। जैसा साहित्य उन्होंने लिखा वैसा वही लिख सकते थे। यह रचनात्मक ऊर्जा ही उनकी मबसे बड़ी शक्ति थी। अपने जीवन में जितने मौन थे, रचना में उनका यह मौन कुछ ज्यादा ही भरा हुआ है। 'बालू के घरौदे' कविता देखिए - वालू के घरोंदे बनाये है तीन बालको ने उन्हें नहीं पता है कि इस बालुका मे ये कण है जिनके विकिरण से आरम्भ होती है प्रक्रिया संसार के सभी घर्रादों के विनाश की बालुफा से खेलते हुए तीन बालक मागर का स्वर : जल के कि रेत के मानव ही मानव की तीसरी आँख है तुम्हारी आँख बन्द क्यो है, देवता? ऐसे आधुनिक हिन्दी माहित्य के विलक्षण प्यक्तित्व, जिनका पूरा नाम सन्धिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय था, का जन्म 7 मार्च 1911 को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के कसया में हुआ था। अज्ञेय की प्रारम्भिक शिक्षा लखनऊ व जम्मू में हुई। 1927 मे लाहौर के फार्मन कालेज में वी. एससी. में प्रवेश लिया। इसी अवधि में इन्होंने रघुवंश, रामायण, मारलो, लाँगफेलो, विटमेन, एलियट आदि को पढ़ा । इसी दौरान इनका क्रान्तिकारियों--आजाद, सुखदेव से सम्पर्क बना। 1930 में अन्य साथियों के साथ गिरफ्तार हुए। लाहौर, अमृतसर, दिल्ली जेल मे यातनाएँ भोगी। यही पर इन्होंने चिन्ता', 'शेपर एक जीवनी', विलक्षण व्यक्तित्व के धनी अभय/47 'कोठरी की यात'आदि पुस्तकों की रचना की। इसके पश्चात 1936 में 'सनिक' के सम्पादकीय से जुड़े। 1937 में यनारमीदास चतुर्वेदी के आग्रह पर 'विशाल भारत' में काम किया। दूसरे महायुद्ध के दौरान आकाशवाणी में काम किया । 1940 में प्रथम विवाह मन्तोष मे हुआ जो अमफल रहा। 1943 में सेना में भर्ती 4 1946 में अलग हुए । दूसरा विवाह कपिलाजी में किया। 1950 तक 'प्रतीक' का सम्पादन किया। विदेश भ्रमण हेतु यूरोप तथा जापान गये। केलिफोनिया विश्वविद्यालय बर्कले में भारतीय संस्कृति के ध्यायाता रहे। वहीं पर इला डालमिया ने परिचय । मन् 1964 में "दिनमान' का मम्पादन किया। 1967 में आस्ट्रेलिया व यूरोप का पुन भमण किया। इसके बाद जोधपुर विश्वविद्यालय में 'तुलनात्मक माहित्य के आचार्य केम्प में कार्य किया। 1976 में जर्मनी की यात्रा की। 1977 में दैनिक नवभारत टाइम्स का म-पादन किया। 1978 में उनकी कृति 'कितनी नारों पर कितनी पार' पर ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। इसी पुरस्कार राशि से अनेयजी ने वत्मल निधि की स्थापना की, जिससे लेखक शिविर आदि आयोजित किये जाते है । कुछ अर्से पूर्व इनको युगोस्लाविया के 'स्वणं माल' पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 4 अप्रैल 1987 को दिल्ली मे चिर निद्रा में लीन हुए। अज्ञेय अपने जीवन की अन्तिम सांम नक लिखते रहे और हिन्दी माहित्य के भण्डार की श्रीवृद्धि की। उनकी प्रमुख कृतियां इस प्रकार है । काव्य - भाजदूत, चिन्ता, इत्यलम्, हरी घाम पर क्षण भर, बावरा अहेरी, इन्द्रधनुप रौदे हुए ये, अरी ओ करुणा प्रभामय, आंगन के पार द्वार, सुनहले शैवाल, कितनी नावो में कितनी बार, क्योकि मैं उसे जानता हूँ, मागर मुद्रा, पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ, महाय्क्ष के नीचे, नदी की बाक पर छाया, ऐमा कोई घर आपने देखा है, नदानीग। कथा साहित्य-विपथगा, परम्परा, कोठरी की वात, शरणार्थी, जयदोल, ये तेरे प्रति रूप, सम्पूर्ण कहानियां, उपन्यास-शेखर : एक जीवनी, (दो भाग) नदी के द्वीप, अपने-अपने अजनबी। निवन्ध और पत्र-विशकु, सवरग, आत्मनेपद, हिन्दी साहित्य : एक आधुनिक परिदृश्य, सब रग और कुछ राग, आलवाल, लिखि कागद कोरे, अद्यतन, जोग लिखी, सवत्सर, स्रोत और मेतु, व्यक्ति और व्यवस्था, अपरोक्ष, युग सन्धियो पर, धारा और किनारे, स्मृति लेखा, कहां है द्वारका, छाया का जगन । नाटक-उत्तर प्रियदर्शी। यात्रा साहित्य--अरे यायावर रहेगा याद?, एक बूंद सहसा उछली। डायरी-भवन्ति, अंतरा, शाश्वतो। इसके अलावा आपने अनेक पुस्तको का सम्पादन व अनुवाद किया। 48/राग मरणमा
अजेय उतने ही आधुनिक हैं जितने पुराने । यदि काल को ठहरा हुआ मानकर
हम अज्ञेय को देखेंगे तो शायद अनेय हमसे छूट जायेंगे। काल को निरन्तरता के
साप अशेय को देखना होगा। रघुवीर सहाय के शब्दो में, 'आज तक किमी
विशेषज्ञ ने यह नारा नहीं दिया है कि रचना के धर्म को रचना से अलग कर देना
चाहिए। पर बीसवीं सदी के ममाप्त होते-होते प्रयत्न यही हो रहा है। इन खतर
से लड़ने के लिए अजेय का एक जीवन और चाहिए। क्योकि इस लड़ाई के मन के
हजार चेहरे हैं। जो जड़ों से तोड़कर जीवन को फिर नये सिरे मे अधर में स्वास्ति
करनेवाली संस्कृति का आक्रमण बढ़ता जा रहा है। अमेय इस आक्रमण केबिनाक
प्रदर्शन तो नहीं करते थे पर उन सस्कारो को मान्यता देते थे जो इंसान को
रोकनेवाली चेतना कर्षि के भीतर जगाते थे।'
टी. एस. एलियट कहते हैं, 'घर वह है जहाँ से हम यात्रा शुरू करते है।
अज्ञेय उम पर मे चले गये उन्ही के शब्दों में-
मेरा पर
दो.दरवाजों को जोड़ता है
मेरा पर
दो दरवाजों के बीच है
उस पर में:
.
किधर में भी को
तुम दरवाजे से बाहर देख रहे होंगे
सुम्हे पार का दृश्य दीव जागा
पर नहीं दोगा।
मैं ही मेरा पर हूँ।
मेरे घर में कोई नही दवा
मैं भी क्या
मेरे पर में रहता है
मेरे पर में
जिधर मोमोग"
Ro,'
हिन्दी काव्य में राष्ट्रीयता के स्वर Oविद्या पालीवाल हिन्दी काव्य मे राष्ट्रीयता के स्वर की वात प्रारम्भ करने से पूर्व हृदय मे स्वर्गीय माखनलाल चतुर्वेदी की ये पक्तियाँ प्रतिध्वनित हो रही हैं : चाह नहीं मैं मुरबाला के गहनो मे गूंपा जाऊँ। चाह नहीं प्रेमी माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ। मुझे तोड़ लेना बनमाली उस पथ पर तुम देना फेक । मातृभूमि पर भीश चढ़ाने जिस पथ जाये चीर अनेक ।। मातृभूमि पर अपने प्राणों की आहुति चढ़ानेवाले वीरों की चरण-रज हेतु अपना अस्तित्व पुप्प रूप में समर्पित करनेवाली आत्मोत्सर्ग की कितनी बलवती भावना अभिव्यक्ति हुई है। ऐसे एक-दो नही, अनगिन राष्ट्रीय भावनाओं से सुवासित पुष्प हिन्दी काव्य की अमूल्य धरोहर है। हिन्दी काव्य के आदिकाल से ही राष्ट्रीय धारा वीर रमात्मक काव्य के रूप में पल्लवित होती रही है। चाहे यह धारा जाति विशेष के गौरव को व्यक्त करने वाली रही हो किन्तु इससे हिन्दू-गौरव एवं संस्कृति के संरक्षण को दृष्टि से राष्ट्रीयता के स्वर पोपित हुए है ! महाराणा प्रताप के चरित्र को लेकर अनेक कवियों ने मुक्त रूप से स्वर प्रदान किये हैं। "अस लेगो अगदाग' "फूल प्रताप सी" महाकवि भूषण ने प्रताप के सन्दर्भ में यगोगाया के रूप में अनेक कक्ति व छप्पय आदि लिखे जो राष्ट्रीय विचार के पोषक हैं। आधुनिक युग में राष्ट्रीय विचारधारा का परिवतित रूप सामने आया। वीर रस की कविता के रूप में जो राष्ट्रीय भाव व्यक्त हो रहे थे, वे जागरण एवं शान्ति 50/राग मरुगधा का स्वरूप लेकर प्रेरणा के मन्त्र वने। "जब ब्रितानी सरकार ने इस देश पर पूर्ण रूप से अधिकार कर लिया और आतंकपूर्ण राज्य अपना विगुल बजाने लगा" अंग्रेजों के हम गुलाम बन गये थे"आकण्ठ डूवे हुए"त्राण का नाम नहीं । ऐसे समय में हमारे साहित्य ने अलख जगायी-शब्दों के संस्पर्श ने राष्ट्रीयता के भावो को उद्दीप्त कर एक सामूहिक चेतना की लहर को उद्वेलित किया। निःसन्देह साहित्यकार व कवि एक युगचिन्तक और दार्शनिक होता है। वह समाज के रूप का निर्धारण करता है, मीमांसा करता है, उसे अधिकारों के प्रति जागरूक करता है और न्याय दिलाने हेतु अथक प्रयास करता है । अस्तु, साहित्य- कार समाज एवं राष्ट्र का सृजेता है। जो कार्य बड़ी से बड़ी ताकत नहीं कर सकती वह कार्य लेखनी करती है । कवि वाणी की पुकार उसे सदैव जागत करती रहती "अधिकार खोकर बैठना यह महा दुष्कर्म है। न्यायार्थ अपने वन्धु को भी दण्ड देना धर्म है। हर व्यक्ति में नया जोश, नया उत्साह एवं नयी स्फूर्ति का उदय हुआ। तिलक के "स्वाधीनता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है" के उद्घोष के साथ ही जन जागरण को नहर छा गयी। इधर बंकिम बाबू के 'वन्दे मातरम' की धुन ने जैसे सदियों से सुप्त देश को जागृत कर दिया। यह स्वतन्त्रता संग्राम का प्रेरक बना रहा। जिस देश के पीछे न जाने कितनी मां को गोद सूनी हो गयी, कितनी महिलाओं के मांग के सिन्दूर धुल गये, वग भंग आन्दोलन के समय जो गीत धरती से आकाश तक गूंज उठा, बगाल की खाड़ी से जिसको लहरे इंगलिश चैनल पार कर ब्रिटिश पालियामेण्ट पहुँच गयी ऐसे गीतकार, साहित्यकार, शब्द सृजेता को शत-शत नमन है। स्व. इकवाल का 'सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तो हमारा के स्वर गूंज उठे। समूचे भारत में राष्ट्रवाद का आन्दोलन बिखर गया तथा इस भावना से अनुप्राणित हो स्व. माखनलाल चतुर्वेदी, सोहनलाल द्विवेदी, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, दिनकर, बालकृष्ण शर्मा नवोन आदि कवियों ने सुपुप्त भावनाओं को उद्वेलित कर जागरण के स्वर मुखरित किये, जिससे देश दीर्घकालीन परतन्त्रता से मुक्त होकर स्वतन्त्रता का नव विहान जीने लगा एव आदमी स्वदेश प्रेम की मधुरं गन्ध में आनन्दित हो माखनलाल चतुर्वेदी का सम्पूर्ण साहित्य राष्ट्रीय विचारधारा से पूर्ण है। उन्होने आजीवन राष्ट्रीयता के गान गाकर अपने आपको राष्ट्र का अमर सैनिक प्रमाणित किया है। श्री चतुर्वेदी की 'जवानी कविता उत्साह का संचार करती है- उठा। 1 हिन्दी काव्य में राष्ट्रीयता के स्वर/51 . . .. द्वार वलि का खोल चल भू डोल कर दे एक हिम गिरि एक सिर का मोल कर दे मसलकर अपने इरादी सी उठकर दो हथेली है कि धरती गोल कर दे रक्त है ? या है नसों में क्षुद्र पानी जांच कर तू सीस देकर जवानी प्राण मेरे साथ हैं उठ री जवानी राष्ट्रीय धारा के कवियो मे वालकृष्ण शर्मा नवीन का स्वर प्रखर रूप में उभरक आया है। 'चंदने दो बलि जीवन को गीत गानेवाला कवि क्रान्ति से कहता है. एक वार वस और नाच तू श्यामा। हमारे राष्ट्रीय कवियो ने पुरातन युग-पुरुषों के चरित्रों के उदाहरण देकर जनता में विश्वास और आस्था जागृत करने का कार्य किया है- सियाराम शरणं गुप्त कहते है- प्राप्त इसे दूर के अतल से, सत्य हरिश्चन्द्र की अटलता। लब्ध इसे ताराग्रह मण्डल से, श्री प्रह्लाद की अनन्त भक्ति समुज्ज्वलता ।। कवि निराला ने भी देव प्रतीको के माध्यम से राष्ट्रीय भावों की अभिव्यक्ति की है- क्या यह वही देश है भीमार्जुन आदि का कीति क्षेत्र चिरकुमार भीष्म पताका ब्रह्मचर्य दीप्त उड़ती है आज भी जहां के वायुमण्डल में उज्ज्वल अधीर और चिर नवीन ? श्रीमुख से कृष्ण के सुंना था जहां भारत में गीता गीत सिंहनाद मर्मवाणी जीवन संग्राम की सार्थक समन्वय ज्ञान कर्म भक्तियोग की। इसी प्रकार 'जागो फिर एक वार' आदि काव्य धाराओं के द्वारा जन जागृति का सन्देश दिया है। 'कविवर द्विवेदी 'का 'वन्दन के इन स्वरों मे एक स्वर मेरा' बहुत लोकप्रिय हुआ है । कवि ने अनेक जागरण गीत गाये हैं- जागो हिन्दू जागो मेरे भारतवासी जननी की जंजीरें बजती . . मुगल मराठे 52/ राग मरुगन्धा । -- जाग रहे कड़ियों के छाले 'सुना रहा' हूँ तुम्हे भैरवी जागो मेरे सोने वाले कविवर श्री रामनरेश त्रिपाठी ने भी राष्ट्रीय विचारधारा से ओतप्रोत काव्य का सृजन किया है। अपनी पवित्र भारत भूमि के प्रति तादात्म्य कवि की इन पंक्तियों में मुखरित हुआ है- करेगे क्या लेकर, अपवर्ग हमारा भारत, ही सुख स्वर्ग नही है किसी लक्ष्य पर ध्यान चाहिए केवल स्वप्न समान इसे तज़ कर क्या तरु निर्मूल करेंगे लेकर किंशुक फूल प्रकृत पुरुषों का जीवन मूल चाहिए केवल घर का रूल कविवर गुप्त भी ध्वज वन्दन करते हुए पुकार उठे- इस ध्वज पर जूझे जन का ध्यान जहाँ है आता मस्तक ऊँचा होने पर भी मन भर-भर आता धरती का धानी आँचल लहरे। यह पुण्य पताका फहरे ।। श्री गुप्त की 'भारत भारती' राष्ट्रीय कृति है और इसी कारण इन्हें राष्ट्रकवि की उपाधि से सम्मानित किया गया। राष्ट्रकवि ने इस कृति का सृजन कर भारत- वासियों को अपने अतीत के झरोखो में झांककर अपनी ओजस्विता, गौरव-गरिमा को पुनः ग्रहण करने हेतु प्रेरित किया है । कविवर पन्त ने जाग्रत भारत की वन्दना इस प्रकार की है- स्वर्ग खण्ड ऋतु परिक्रमित आम्र मंजरित, मधुप गुजरित कुसुमित फल-द्रुम पिक कल-कूजित उर्वर अभिभूत है। दस दिशि हरित, शस्य श्री हर्पित पुलक राशिवत है। जन भारत हे जागृत भारत हे। अस्तु, राष्ट्रकवि, भारतेन्दु, सियारामशरण गुप्त, सुभद्राकुमारी चौहान, इकवाल, माखनलाल चतुर्वेदी, द्विवेदी, नवीन, दिनकर, निराला, पन्त, महादेवी, हिन्दी काव्य में राष्ट्रीयता के स्वर/53 हरिऔध, उदयशंकर भट्ट, जगन्नाथप्रसाद मिलिन्द आदि समग्र शीपस्य साहित्य- कारों ने हिन्दी काव्य को राष्ट्रीयता की भावना का अवगाहन कराया है। राजस्थान का कवि भी पीछे नहीं रहा। इस प्रान्त में जन जागरण एवं क्रान्ति का शंखनाद फूंकनेवाले विजयसिंह पथिक के राष्ट्रीय भावना युक्त गोत की ध्वनि से यह भूमि गूंज उठी थी। श्री पथिक, केसरी सिंह वारहरू, माणिक्यलाल वर्मा, जयनारायण व्यास, गोकुल भाई भट्ट, हीरालाल शास्त्री, काला बादल आदि ने जनता को नेतृत्व देने के साथ-साथ जन मन को उजित कर जूझते रहने की बलवती प्रेरणा दी है। साहित्यकार/काव्यकार को सूक्ष्म दृष्टि सामयिक स्थितियो का चिन्तन कर सदैव राष्ट्रीयता के स्वर को अपने अन्तर में अभिव्यक्त करती रही है और यह अभिव्यक्ति पथा अवसर मुखरित होती रही है और होती रहेगी। इसमें मानव जीवन को शक्ति प्रदान करनेवाले साम्य, साधना, न्याय, स्वाधीनता आदि मूल्यों की प्रतिष्ठा की गयी है। अन्त में यही कहूँगी- इस माटी के लिए जियेंगे मिट जायेंगे बन अभिमान रे। तन मन धन सवइमको अपित मेरा देश महान रे॥ 54/राग मरुगन्या समकालीन हिन्दी कहानी का व्यक्तिवादी यथार्थ सरलो भूपेन्द्र कहानी समसामयिक जीवन की सही पहचान प्रस्तुत करती है । व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार ने जब व्यक्ति को निराश कर दिया तो इसी निराशा ने विद्रोह का विकास किया। इस स्थिति में परम्परा का विद्रोह और आदर्शों का खण्डन व्यक्ति ने अपना लक्ष्य निर्धारित किया। इस प्रक्रिया मे व्यक्ति को खालिस निराशा हाथ लगी। उसमें अनास्था की प्रवृत्ति घर कर गयी और व्यक्ति अविश्वासी हो गया। इससे सम्बन्धों मे बदलाव आया और व्यक्ति स्व-केदित हो गया। इस कारण व्यक्ति मे टूटन, अनास्था, भय, अविश्वास, निराशा, निरीश्वरवादिता, व्यक्तिवादिता, व्यक्ति स्वातन्त्र्य, अर्थवादिता, नवीन मूल्यों की प्रतिष्ठा, चयन को स्वतन्त्रता प्रभृति प्रवृत्तियां विकसित हुई जिनकी अभिव्यक्ति समकालीन कहानी मे उपलब्ध है। इन्ही प्रवृत्तियों के आधार पर हम समकालीन कहानी की व्यक्तिवादी भगिमा को समझ सकते है। यह भगिमा परिवर्तन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद शुरू हुआ था जो समकालीन साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियो में स्थान पाता गया । साठोत्तरी कहानी के प्रमुख लेखक हैं-भीष्म साहनी, ज्ञानरंजन , महीपसिंह, गिरिराज किशोर, दूधनाथसिंह रवीन्द्र कालिया, ममता कालिया, सुधा अरोड़ा, निरुपमा सेवती, कृष्णा मोबती, दीप्ति खण्डेलवाल, मणिका मोहिनी, मृदुला गर्ग, रमेश उपाध्याय, काशीनाथसिंह, गंगाप्रसाद विमल, महेन्द्र भल्ला, कामतानाय, हेतु भारद्वाज, रामदरश मिश्र, सूर्यवाला, गोविन्द मिश्र, जगदीश चतुर्वेदी, बदीउज्जमा, से० रा० यात्री, रमेश बक्षी, मंजुल भगत, हिमांशु जोशी, मणिमधुकर, ईश्वरचन्दर, राजी सेठ, यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र, मोहरसिंह यादव, आलमशाह खान, स्वयप्रकाश शर्मा प्रभृति । इन समस्त कहानीकारों की कहानियों में समसामयिक परिवेश का जीवन्त तनाव अकित है समकालीन हिन्दी कहानी का व्यक्तिवादी यथार्थ /55 और वह जितना जीवन्त है उतना ही व्यक्ति-अस्तित्व-चिन्ता-सम्पन्न भी। व्यक्तिचेतना को एक प्रमुय प्रवृत्ति ईश्वर के प्रति अनास्था है जो हमें साठो- तरी कहानी के अधिकांश कहानीकारो में प्राप्त होती है। ईश्वर है या नहीं इसका ध्यक्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इसके स्पष्टीकरण में कहानी लेचिका सुधा अरोडा के कथन--" -"ईश्वर है या नहीं होता, मैं नहीं जानती कि वह है या मर चुका है क्योकि मैं दार्शनिक नहीं हूँ। पर ईश्वर के आश्रित रहकर गतिशीलता को हम अवरुद्ध कर देते है और जीवन यही सपाट-समतल होते-होते रह जाता है" से स्पष्ट होता है कि यक्ति ईश्वर को उन्नति के मार्ग मे बाधक स्वीकारता है। मुधा जी की समस्त कहानियो मे ईश्वर के प्रति अनास्था एवं अनादर का ही भाव व्यक्त हुआ है। इनकी कहानी 'बगैर तरागे हुए' का नायक अपनी प्रेमिका का इन्तजार करते-करते मां को याद करता है । उसे याद आता है कि उसकी मां रामायण का पाठ किया करती थी और तत्पश्चात चि ह के लिए लाल रिवन रख देती थी। उसी प्रकार का लाल रिवन जब वो अपनी डायरी में देखता है तो डायरी के पन्ने पर प्रेमिका का नाम लिख देता है । स्पष्ट है कि वो रामायण से अधिक महत्व अपनी प्रेमिका से सम्बन्धित डायरी को देता है। इस प्रक्रिया में ईश्वर के प्रति घोर अनास्था का भाव व्यक्त हुआ है। ज्ञानरंजन की कहानियों में भी ईश्वर के प्रति अनास्था तथा प्रतिकार की भावना मिलती है । उनको 'सम्बन्ध' कहानी में नायक का कथन-~~-'कई बार मुझे ईश्वर को भद्दी गालियां देने का ताव भी आया लेकिन यह सोचकर रह गया कि संसार के अधिकाश लोगों को अब ईश्वर से कोई प्रयोजन नहीं है । (फेन्स के इधर-उधर : ज्ञानरंजन, पृष्ठ 118) नौशेयो आवाज मे ईश्वर की मृत्यु की घोषणा उस काल की कहानी में कई- कई बार हुई। इसी प्रकार गिरिराज किशोर की कहानियां 'एक ईश्वर की मौत' एव पोलीसड़क' में भी ईश्वर के प्रति अनास्था का भाव व्यक्त हुआ है । एक ईश्वर को मौत' कहानी का नायक हिन्दू अनाथालय छोड़कर. आता है तो अधीक्षक उसको विदा देते हुए कहता है-“ईश्वर तुम्हारी मदद करेंगे।" अधीक्षक को इस बात ने उसे विश्वास दिलाया कि ईश्वर सबकी रक्षा करता है परन्तु जीवन में ईश्वर ने कभी उसका साथ न दिया । जीवन से संघर्ष करता हुआ वह सिर्फ एक चपरासी बन सका । आज वह भी हाथ से निकल गयी। उसका विवाह उस लड़की से न हुआ जो उसे पसन्द थी। जिससे उसका विवाह हुआ उससे भी तलाक हो गया और ऐसी स्थिति में वह ईश्वर के प्रति उपेक्षा का भाव लिए मुस्करा पड़ा~'उम रोज फिर मैंने उस बात पर विश्वास करना चाहा परन्तु मै उस पर हंस भर सका।...मेरे जो बिना धर्म का एक ईश्वर था"वह धीरे-धीरे मरता गया और अब बिल्कुल मर गया है। (चार मोती वे आव. गिरिराज किशोर पृष्ठ 33) 56/राम महगन्धा ललित शुक्ल की कहानी 'बोजी' की संध्या पी. एम. टी. की परीक्षा में फेल होने पर देवो कोदानवी घोपित करती हुई कहती है-'यह देवी है, तो मैं तो नहीं मानती। मेरे लिए इन्होने दानवी का रोल अदा किया है। मैं चूर-चूर कर डालूंगी।' ('कहानी आजकल मे संकलित ललित शुक्ल : 'बीजी', पृष्ठ 302) और उसने संगमरमर की प्रतिमा को चूर-चूर कर डाला । स्पष्टत व्यक्ति का ईश्वर को गालियां देना, उसे मृत घोषित करना व्यक्ति मे व्याप्त अनास्था की प्रवृत्ति को व्यक्त करता है। सामान्यतया साठोतरी कहानी के समस्त कहानीकारों ने प्राचीन रूढ़ियों, मूल्यो और मान्यताओ का विरोध किया है और साथ ही नवीन मूल्यो का समर्थन किया है। मूल्यों का आधार मानवीय स्वतन्त्रता ही है। यह प्रभाव व्यक्तिवादी चेतना का ही परिणाम है । आज पारिवारिक सम्बन्ध टूट रहे हैं, परम्पराएं एवं मान्यताएं बदलती जा रही है। यही नहीं अपितु सम्पूर्ण व्यवस्था बदलती जा रही है । एतद् सन्दर्भ मे मन्नू भण्डारी की 'यही सच है', 'मैं हार गई', "त्रिशंकू', वदीउज्जमा की 'पुल टूटते हुए', मेहरुन्निसा परवेज को 'गलत पुरुष', ज्योला मिलन की 'चीख के आर-पार', मजुल भगत की 'गुलमोहर के गुच्छे' तथा 'कितना छोटा सफर' जैसी कहानियां उल्लेखनीय हैं। इन कहानियों की नायिकाए परम्पराओं के प्रति मोह-ग्रस्त नहीं है वरन् उनका अपमान कर उन्हे अस्वीकार करती हैं। इस अस्वीकार में वे बड़े ही द्वन्द्व की स्थिति से गुजरती है। 'आग' कहानी की नायिका अपने अतीत को भुला देना चाहती है क्योकि वह निरर्थक है इसलिए वह सोचती है - 'आज वह उन्हें जला डालेगी, उसने सोचा, जव किसी निर्णय के बारे मे वह देर तक सोचती है, निर्णय बदल जाता है। डायरियां पड़ी रहती हैं, तो उसे लगता है, बीता हुआ सब कुछ जिंदा है (बगैर तराशे हुए, सुधा अरोड़ा, पृष्ठ 142) अन्त मे द्वन्द्वात्मक स्थिति से गुजरने के बाद वह डायरियां नष्ट कर देती है : इससे अहसास होता है कि डायरियां नष्ट नही की गयी, अपना अतीत नष्ट नहीं किया गया बल्कि वे परम्पराएं जो निरर्थक हैं उन्हे नष्ट किया गया है। - रामदरश मिश्र की कहानियो मे भी प्राचीन मूल्यों के प्रति तीव्र विद्रोह दिखाई पड़ता है। मुक्ति' नामक कहानी में टाइपिस्ट पिता अपनी पुत्रियो का विवाह न कर आर्थिक स्तर पर सम्पन्नता प्राप्त करने, मकान बनाने आदि कार्यों के लिए उनसे नौकरी करवाता है। चन्दा नामक लड़की इसका विद्रोह कर किसी युवक के साथ घर से भाग जाती है, तो एक व्यक्ति मशीन का पुर्जा बनने से बच गया...' कथन के माध्यम से लड़की के भाग जाने का समर्थन करके नवीन मूल्यो को स्वी- कृति प्रदान करने के माध्यम से चेतना को अभिव्यक्ति मिली है। मणिमा मोहिनी की कहानी 'तलाश' में नायिका का उस मार्ग की तलाश करना जो उसे वैवाहिक समकालीन हिन्दी कहानी का व्यक्तिवादी यथार्थ /57 . . जीवन से छुटकारा दे सके, नवीन मूत्यो की प्रतिष्ठा करना ही है। निरुपमा सेवती की कहानी 'सव में से एक' की नायिका का कथन 'बहुत पहले ही मैंने पूरी तरह इन्कार कर दिया था और पिताजी ने नाराज होकर भंया के पास मेरा खर्च तक भेजना बन्द कर दिया। महीनो बीत गये हैं मैंने मां बाप की सूरत नहीं देखी, ना ही अपने शहर गयो।' (कहानी आजकल मे संकलित, पृष्ठ 32) नवीन मूल्यों के प्रति आस्था को ही अभिव्यक्त करता है। आज कोई भी मा. बाप अपनी इच्छा को वच्चो पर लाद नहीं सकते अन्यथा बच्चे उन्हें अपने व्यक्तित्व के विकास मे वाधा जान अलग हो जाते हैं क्योकि उनका अपना भी कुछ अस्तित्व है। 'आज तक हम सब भाई एक-एक करके यहाँ से चले गए तो फिर लौट कर आये क्या.? देखो न कैसी घुटन सी हो रही है ? ऐसा लगता है जैसे यहाँ एक साँचा हो जो हमें अपने अनुरूप ढालने के लिए उद्यत हो । एक मनुष्य की महत्वा- काक्षा मुंह वाए हमे निगल लेना चाहती हो, जैसे हमारी अपनी आकांक्षा, आशाए ही न हो, जैसे हम कोई अस्तित्व ही न रखते हो, जैसे हम गीली मिट्टी हो जिसे अपनी आकांक्षा के चाक पर चढाकर कोई अपने अनुकूल ढाल लेना चाहता हो। (कजा आर. श्यामसुन्दर, उद्धृत : कहानी आजकल, पृष्ठ 146) चन्द्रप्रकाश पाण्डेय की कहानी 'जंग' में भी पालतू पक्षी मारले पर पिता पुत्र से वन्दूक छीन लेता है। उसी की प्रतिक्रिया स्वरूप-"सनत दूसरे दिन शहर चला गया। वहाँ कानून पढ़ रहा था। काफी दिनों तक लौटकर नही आया। जिस जगल मे चिड़ियो के शिकार पर ही प्रतिबन्ध हो वहाँ- लोटने का क्या सवाल है.. " यहाँ प्रतिवन्धों के अस्वीकार में चेतना की व्यक्तिवादी भंगिमा अभिव्यक्ति पा रही है। ऐसा ही अस्वीकार वोध कराने वाली कहानियां 'इस शहर में' (आशीष सिन्हा), मड़िये' (शिवप्रसाद सिंह), 'जमीन से हटकर' (हेतु भारद्वाज), 'सपाट चेहरे वाला आदमी' (दूधनाथ सिह), 'दो कहानियों के बीच' (शशिप्रभा), 'कच्चे मकान' (निरुपमा सेवती) हैं। इन कहानीकारो के अस्वीकार में इस बात की स्वीकारोक्ति है कि "नये मनुष्य के अस्वीकरण को फ्रायड के मनुष्य के नैसर्गिक असामाजिकता, उसके स्वभावों के अपरिवर्तनीय अहवाद के सिद्धान्त ने भी प्रेरित किया है।" (समाजवादी समाज मे व्यक्ति : ग. स्मिवि, पृ. 82) इसी प्रकार मनहर चोहान को कहानी 'विपरीतीकरण' में पीढ़ियों के संघर्प और नयी पीढ़ी की निजता के आधार पर व्यक्तिचेतना को प्रतिष्ठित किया गया है। आज व्यक्ति व्यक्तिगत सम्बन्धो में अर्थ को अधिक महत्त्व दे रहा है । आर्थिक स्थिति को विषमता ने समस्त परम्परागत मूल्यो को तोड़कर रख दिया है। 'रबर- चण्ड' कहानी में एक मध्यवर्गीय परिवार का चित्रण है, जहां घर का खर्च एक मात्र पुत्र चलाता है। उसके विदेश जाने के निर्णय मे वृद्धा मां के परम्परागत मूल्य, उसकी परम्परागत दृष्टि एकदम बदल जाती है। वह मां जो कभी बेटी का नोकरी 58/राग मरुगन्धा - करना पाप समझती थी स्वयं उसे नौकरी करने के लिए कहती है । इतना ही नहीं आब पति-पली सम्बन्ध का आधार भी अयं है। आज की नारी अबला नही, जो पुरप काअधिपत्य स्वीकार कर ले। वह आत्मनिर्भर है इसलिए वह अपने-आपको पुरुष से कम नहीं समप्तती। गिरिराज किशोर की कहानी 'झाक वाला घोड़ा निकर वाला साईस' की रीता का कथन-"आप पुरुष लोग समझते हैं, जो कुछ बाप कमाकर लाते हैं उसके कारण हम लोग आपका सम्मान करते हैं और इसी कारण आप लोग अपने आपको स्वतन्त्र रय पाने में समर्प हैं। लेकिन आज व्यक्ति- गत सम्बन्धों का भी आर्थिक महल अधिक है। अगर मैं आपसे छ. गुना कमाती हूं तो छ गुना ही बड़ी भी हूँ।" (पेपरवेट : गिरिराज किशोर : पृष्ठ 101) इतना ही नही अर्धाभाव के कारण पत्नी अपने पति को छोड़कर किमी अन्य व्यक्ति के साय भी चली जाती है । शैलेश मटियानी की कहानी 'उठाईगीर' की गुलाबो अपने पति भोला को इसीलिए छोड़ जाती है । इस बात की पुष्टि भोला के निम्नलिखित कथन से होती है-~~"सो तो रोड वंठ चुकी। यर, इन्तजार करती मेरा, तो भी भूखों मर चुकी होती । मुझसे तो छूटना था, उसे मुर्दा छूटने से जिन्दा छूटना भला।" (उठाईगोर : शैलेश मटियानी, संकलित- कहानी आजकल, पृष्ठ 23) व्यक्ति को चाहे कितने ही संघों का सामना करना पड़े; चाहे वह भूखा मर रहा हो मगर वह अपनी स्वतन्त्रता पर चोट कभी नही सह सकता। किसी के अहसान तले दबना नहीं चाहता क्योकि वह किसी की गुलामी स्वीकार नही कर सकता। स्वतन्त्र रहकर वह भूखा ही प्रसन्न है।..."तुम ज्यादा से ज्यादा चार सो तक की नौकरी का इन्तजाम कर दोगे, फिर? फिर तो तुम्हारे अहसान से इतना दवा रहूंगा कि कभी भी अपनी जुड़े हुए हाय गुल नहीं पाएंगे।" (अलेक्लेण्डरःप्रवणकुमार वन्धोपाध्याय, संकलित कहानी आजकल, पृष्ठ 127) यह कह कर कहानी का नायक नौकरी नहीं स्वीकारता क्योकि स्वतन्त्रता ही उसका मूल्प है। सुरेश सिन्हा ने भी सम्बन्धो के बदलाव के माध्यम से व्यक्ति चेतना को अभि- व्यक्ति दी है। उनकी कहानी 'रूड़ियो से उतरता मूरज' में इसे स्पष्ट किया गया गया है--"शेखर ने चिल्ला-चिल्लाकर कहा, वे 'भाई बहन नहीं हैं ""सम्बन्ध तो मानने से होता है न, शब्दों से नहीं, मैं केवल शब्दों के सम्बन्ध को मानने को तैयार नहीं कि वह मेरी बहन है, वह मेरा भाई है, "रिश्ते तो मन के होते है "सम्बन्धो के लिए विश्वास जरूरी होता है और शताब्दियों से चले आ रहे ये कोढ-मानदण्ड नहीं मानेंगे।" (सीढ़ियों से उतरता सूरज : सिन्हा, संकलित-सारिका, मार्च 1969, पृष्ठ 75) परम्परागत मूल्यों के प्रति बदली हुई जीवन-दृष्टि महेन्द्र भल्ला 'एक पति के नोट्स' (लन्बी कहानी) रवीन्द्र कालिया को 'नो साल छोटी बीबी', भीष्म साहनी की 'चीफ की दावत', शिवप्रसाद की 'कर्मनाशा की हार',' ममता - समकालीन हिन्दी कहानी का व्यक्तिवादी यथार्य/59 जीवन से छुटकारा दे सके, नवीन मूल्यों को प्रतिष्ठा करना ही है। निएपमा सेवसी की कहानी 'गर में गे एर' को नापिका का फमन बहल पहले ही मैंने पूरी तरह प्रकार कर दिया था और पिताजी नागर हरभंया के पाम भेग गमंतरजना बाद कर दिया। महीनों शीत गये है मन मा वापरी गरन नही देगी, ना ही अपने गहर गयी।' (कहानी भारत में गमित, पूछ 32) नवीन मूल्यों के प्रति आस्था को ही अभिनगा करता है। पात्र कोई भी मा. बाप अपनी इच्छा को वन्नों पर लाद नहीं मरी अन्पपा ने उन्हें अपने प्पक्तित्व के विकास में वाधा जान अलग हो जाते हैं स्पोकि उनका अपना भी नुछ अस्तित्व है। 'आज तक हम गव भाई एक-एक करके महा में पले गए तो फिर नोट कर बाये क्या? देयो न मी घुटन मी हो रही है? ऐमा सगता है जैसे यहाँ एक साचा हो जो हमें अपने अनुरूप मानने के लिए उस हो । एक मनुष्य को महत्वा- काक्षा मुंह बाए हमे निगल लेना चाहती हो, जो हमारी अपनी आकांक्षा, आगाए ही न हो, बसे हम कोई अस्तित्व हो न रगत हो, जो हम गीली मिट्टी हो निम अपनी नाकामा के चार पर चढ़ाकर कोई अपने अनुकूल द्वान लेना चाहता हो । (कजा : आर. श्यामसुन्दर, उद्धत : कहानी आवरत, पृष्ठ 146) चन्द्रप्रकाश पाण्डेय की कहानी 'जग' में भी पालतू पक्षी माले पर पिता पुत्र बन्दूक छीन लेता है। उमी को प्रतिक्रिया स्वरूप-~"सनत दूसरे दिन शहर चला गया। वहाँ कानून पढ़ रहा था। काफी दिनो तक लोटकर नहीं आया। जिस चंगत मे चिड़ियो के शिकार पर ही प्रतिबन्ध हो यहाँ नौटने का क्या मवाल है" " यहाँ प्रतिवन्धो के अस्वीकार में चेतना की व्यक्तिवादी भगिमा अभिव्यक्ति पा रही है। ऐसा ही अस्वीकार बोध कराने वाली कहानिया 'इस शहर में (आशीप मिन्हा), 'भेड़िये' (शिवप्रसाद सिंह), 'जमीन से हटकर' (हेतु भारद्वाज), 'सपाट चेहरे वाला आदमी' (दूधनाथ सिंह), 'दो कहानियों के बीच' (शशिप्रभा), 'कच्चे मकान' (निरुपमा सेवतो) हैं। इन कहानीकारों के अस्वीकार में इस बात की स्वीकारोक्ति है कि "नये मनुष्य के अस्वीकरण को फ्रायड के मनुप्प के नसर्गिक असामाजिकता, उसके स्वभावों के अपरिवर्तनीय अहवाद के सिद्धान्त ने भी प्रेरित किया है।" (समाजवादी समाज में व्यक्ति : ग.स्मिनाव, पृ. 82) इसी प्रकार मनहर चौहान की कहानी 'विपरीतीकरण' में पीढ़ियों के संघर्ष और नयी पीढ़ी की निजता के आधार पर व्यक्तिचेतना को प्रतिष्ठित किया गया है। आज व्यक्ति व्यक्तिगत सम्बन्धो मे अपं को अधिक महत्त्व दे रहा है । आर्थिक स्थिति को विषमता ते ममस्त परम्परागत मूल्यों को तोड़कर रख दिया है । 'रबर- बैण्ड' कहानी में एक मध्यवर्गीय परिवार का चित्रण है, जहाँ घर का खर्च एक मात्र पुत्र चलाता है। उसके विदेश जाने के निर्णय से वृद्धा मां के परम्परागत मूल्य, उसकी परम्परागत दृष्टि एकदम बदल जाती है। वह मां जो कभी वेटी का नौकरी 58/राग मरुगन्धा . करना पाप समझती थी स्वयं उसे नोकरी करने के लिए कहती है । इतना ही नहीं आज पति-पली सम्बन्ध का आधार भी अर्थ है। आज की नारी अवला नहीं, जो पुरुषकाअधिपत्य स्वीकार कर ले। वह आत्मनिर्भर है इसलिए वह अपने आपको पुरुष से कम नहीं समझती। गिरिराज किशोर की कहानी 'फाक वाला घोड़ा निकर वाला साईस' की रीता का कथन-"आप पुरुष लोग समझते हैं, जो कुछ आप कमाकर लाते हैं उसके कारण हम लोग आपका सम्मान करते है और इसी कारण आप लोग अपने आपको स्वतन्त्र रख पाने में समर्थ है। लेकिन आज व्यक्ति- गत सम्बन्धों का भी आर्थिक महत्व अधिक है। अगर मैं आपसे छ. गुना कमाती हूँ तो छ. गुना ही बड़ी भी हूँ।" (पेपरवेट : गिरिराज किशोर : पृष्ठ 101) इतना ही नही अर्थाभाव के कारण पत्नी अपने पति को छोड़कर किसी अन्य व्यक्ति के साथ भी चली जाती है । शैलेश मटियानी की कहानी "उठाईगीर' की गुलाबो अपने पति भोला को इसीलिए छोड़ जाती है । इस बात की पुष्टि भोला के निम्नलिखित कथन से होती है-"सो तो रड बैठ चुकी ।. खैर, इन्तजार करती मेरा, तो भी भूखों मर चुकी होती। मुझसे तो छूटना था, उसे मुर्दा छूटने से जिन्दा छूटना भला।" (उठाईगीर : शैलेश मटियानी, सकलित- कहानी आजकल, पृष्ठ 23) व्यक्ति को चाहे कितने ही संघर्षों का सामना करना पड़े, चाहे वह भूखा मर रहा हो मगर वह अपनी स्वतन्त्रता पर चोट कभी नहीं सह सकता। किसी के अहसान तले दबना नहीं चाहता क्योकि वह किसी को गुलामी स्वीकार नहीं कर सकता। स्वतन्त्र रहकर वह भूखा ही प्रसन्न है ।।.."तुम ज्यादा-से-ज्यादा चार सौ तक की नौकरी का इन्तजाम कर दोगे, फिर? फिर तो तुम्हारे अहसान से इतना दवा रहूंगा कि कभी भी अपनी जुड़े हुए हाथ. खुल नहीं पाएंगे।" (अलेक्लेण्डरःप्रवणकुमार बन्धोपाध्याय, संकलित कहानी आजकल, पृष्ठ 127) यह कह कर कहानी का नायक नौकरी नहीं स्वीकारता क्योकि स्वतन्त्रता ही उसका मूल्य है। सुरेश सिन्हा ने भी सम्बन्धों के बदलाव के माध्यम से व्यक्ति चेतना को अभि- व्यक्ति दी है। उनकी कहानी 'रूडियों से उतरता पुरज' में इसे स्पष्ट किया गया गया है-"शेखर ने चिल्ला-चिल्लाकर कहा, वे 'भाई बहन नहीं हैं "सम्बन्ध तो मानने से होता है न, शब्दों से नहीं, मैं केवल शब्दों के सम्बन्ध को मानने को तैयार नहीं कि वह मेरी बहन है, वह मेरा भाई है,"रिश्ते को मन के होते हैं: "सम्बन्धी के लिए विश्वास जरूरी होता है और शताब्दियो से चले आ रहे मे कोढ-मानदण्ड नही मानेगे।" (सीहियों मे सरता सूरज : सिन्हा, संकलित-सारिका, मार्च 1969, पृष्ठ 75) परम्परागत मूल्यों के प्रति वरली हुई जीवन-दृष्टि महेन्द्र भल्ला 'एक पति के नोड' (लत्री कहानी) रखीन्द्र कालिया की 'नौ साल छोटी वीबी', भीष्म साहनी को 'चीफ की दावत', शिवप्रसाद को 'कर्मनाशा की हार', ममता समकालीन हिन्दी कहानी का अक्तिवादी यथार्थ/59 . 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L कालिया की एक अदद औरत', स्वयं प्रकाश को 'वर' जैसी कहानियों में भी रेखा: कित की जा सकती है। आज व्यक्ति वैयक्तिक धरातल पर ही सोच-विचार करता है। जो कुछ भी प्राप्य है वह सिर्फ उसका है, निजी है। उसमे से किसी और को भी कुछ प्राप्त हो, यह वह कभी स्वीकार नहीं करता। महीपसिंह की कहानी 'युद्धमन' मे कोहली साहब का कथन इस स्थिति को स्पष्ट करता है-"दन्हें लगा दो ये सब लोग उनके आगत को बांट लेगे, नोच-खसोट लेंगे। वह आगत जो सिर्फ उनका है, एक मात्र उनका । जिसमे वे किसी भी हिस्सेदारी नहीं चाहते।" (घिराव, महीपसिंह, पृष्ठ 71) हिस्सेदारी चाहना तो दूर की बात है आज व्यक्ति अपने जीवन में किसी का हस्त- क्षेप भी पसन्द नहीं करता, वह स्वतन्त्र रहना चाहता है। कुलभूषण की कहानी 'अजू और राजीव' में अंजू के कथन से यह स्पष्ट है- ".. समाज का हस्तक्षेप किसी प्रकार भी न होने दे अपने जीवन में। क्योकि हस्तक्षेप को मंजूर करना गुल की निशानी है, जो आजाद इन्सान कभी- मजूर नही कर सकता।" (अचूं और राजीव : कूलभूपण, सकलित-कहानी आजकल, पृष्ठ 318) व्यक्ति जव स्व-केन्द्रित होने लगता है, तो वह अपने परिवार मे ही अजनवी बन जाता। एकाकीपन का यह अहसास उसे घुट-घुटकर जीने पर विवश कर देता है। 'रक्तपात' कहानी का नायक अपने घर जाता है जहां उसकी छोड़ी हुई पत्नी और मां है। मां बेटे की चिन्ता में अव पागल हो चुकी है। पत्नी पुनः पति का सामीप्य पाना चाहती है पर वह कुछ नही कर पाती। ऐसी स्थिति में नायक को अह- सास होता है कि "अपने घर में वह एक अतिथि है और अपने परिचित कोनों, घरो, घरो को दोवारो तार्को, सीढियों को नही, छू सकता। हर कही एक बाध्यता है." एक न जाने कैसी दिवश खिन्नता।" ('सपाट चेहरे वाला आदमी' नाम सग्रह का प्रथम फ्लैप : दूधनाथ सिंह, पृष्ठ 122) समकालीन हिन्दी कहानी में अलगाव की व्यक्तिवादी मुद्रा को चित्रित करने वालो मे प्रमुख कहानीकार निर्मल वर्मा, रामकुमार, शिवप्रसाद, गोविन्द मिश्र, राजी सेठ, पानू खोलिया, रमेश बक्षी, मणि मधुकर हैं। एकाकीपन के दर्द की जीवन्त अभिव्यक्ति को युवा कहानीकार सत्यनारायण की कहानियों में भी देखा जा सकता है। व्यक्ति चेतना ने आज व्यक्ति को स्वतन्यता का महत्त्व वसूवी समना दिया है आब व्यक्ति स्वतन्त्रता में विश्वास रखता है। वह कोई भी निर्णय स्वय सेना चाहता है और उस पर दा रहना चाहता है, परिणाम को चिन्ता वह नहीं करता कोकि व्यक्ति का यह मानना है कि यदि परिणाम पर विचार किया जाये तो वह कभी कुछ नहीं कर पायेगा । इमी सन्दर्भ में अन्विता अग्रवाल की कहानी 'फा- फाइट' मी नापिका सोचती है-"यदि उसे रिवायर मिल जाये, तो सच उसका हाय एक क्षण को भी नही काप । फिर उसका परिणाम भले ही को बुछ हो । वह 60/राम मरगन्या होना देखना चाहती है। क्या होगा परिणाम के बारे में सोचकर? कम-से-कम वह तो हो पायेगा जो यह चाहती है। परिणाम देखती रहेगी तो कभी कुछ नहीं कर पायेगी।" (फड़फड़ाहट : अन्विता अग्रवाल, संकलित-धर्मयुग-13 अक्टूबर, 1969, पृष्ठ 28) स्वतन्त्र निर्णय के क्रियान्वयन के पश्चात् आत्मा कितनी सन्तुष्ट होती है यह इसी कहानी की नायिका की स्थिति से स्पष्ट है-"दूसरे ही क्षण उसे लगा कि उसने जो कुछ किया है वह ठीक ही किया है । उसने वह कहा है जो कहना चाहती थी। बिना चाहे कुछ नहीं किया है। उन्हें बुरा लगता तो' लगा करे।" (फड़फड़ाहट : अन्विता अग्रवाल, सकलित-धर्मयुग 13 अक्टूबर, 1969, यिका पर -दीम ता है तो है। इसी वह 'अपना फैसला नहीं बदलेगा और किसी को अपने अन्दर नहीं आने देगा कि उसका स्वत्व हो जाता रहे।" (दूसरे के पर: श्रीकान्त वर्मा, सकलित-अकहानी, मम्पादक द्वय : श्याम मोहन श्रीवास्तव, सुरेन्द्र अरोड़ा) और इस निर्णय के पश्चात उसे लगता है कि- "अव वह विल्कुल स्वाधीन है। उसने अनुभव किया कि उसके अन्दर एक भयकर आत्मविश्वास जाग उठा है और वह समर्थ है।" (दूसरे के पर : श्रीकान्त वर्मा, संकलित-अकहानी, सम्पादक द्वय श्याम मोहन श्रीवास्तव, सुरेन्द्र अरोड़ा, पृष्ठ 57) स्पष्टता व्यक्ति अपने स्वतन्त्र निर्णयो द्वारा अपने अस्तित्व को सार्थकता प्रदान करना चाहता है। इसलिए वह समूह में अपने स्व को समाहित करना नहीं चाहता। इसी कारण सुरेश सिन्हा की कहानी"एक अपरिचित दायरा का मदन सोचता है-"वह घर छोड़कर चला जायेगा, पर अपने अस्तित्व को खण्डित नहीं होने देगा'। इस बड़े शून्य में वह अपना विलय नहीं होने देना, उसका स्वत्व अर्थ रखता है।" (कई आवाजों के बीच :सुरेश सिन्हा : पृष्ठ 38) इन सबके अतिरिक्त साठोत्तरी कहानी मे व्यक्ति चेतना को उपलब्धि के रूप में रवीन्द्रनाथ कालिया की 'डरी हुई औरत', 'बड़े शहर का आदमी', 'बेशर्मी', तथा 'नौ साल छोटी पत्नी', ममता कालिया की 'अपत्नी', रमेश उपाध्याय की 'तनाव', काशीनाथ सिंह की 'आखिरी रात', 'सुख' और 'वेटिंग रूम' आदि कहा- नियों में स्थापित रूढ़ियो और मान्यताओं के प्रति एक नये दृष्टिकोण का भाव है । मानवीय चेतना को नकारने वाली व्यवस्था के प्रति विद्रोह का भाव है जो व्यक्ति- चेतना के कारण ही आया है। आज भी कहानी में व्यक्ति चेतना हमे कभी सम्बन्धों समकालीन हिन्दी कहानी का व्यक्तिवादी यथार्थ /61 - . 1 । के नवीन रूप मे तो कभी सम्बन्धहीनता में प्राप्त होती है। साठोत्तरी कहानीकारो ने नयी कहानी के शीर्षक के नीचे व्यक्ति और समाज को आमने-सामने रखकर व्यक्ति चेतना को यथार्थ रूप में चित्रित करने का प्रयास किया। इन कहानियो मे व्यक्ति का आत्मवोध एवं परिवेश दोनों ही जीवन्त जान पडते हैं। समसामयिक कहानी में सामाजिक परिवेश के सम्बन्ध में व्यक्तिचेतना को और अधिक प्रखर रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास हो रहा है। आज के कहानी कार व्यक्ति चेतना की उन सब तहाँ तक जाना चाहते हैं जो व्यक्ति चेतना को पूर्ण सार्थकता प्रदान कर सकती हैं तथा व्यक्ति और समाज के स्वस्थतम रिश्ते निर्मित कर सकती है। जब भी किसी कहानी में आचरण की स्वच्छता धूमिल होने लगती है तो व्यक्तिवादी भगिमा का रुण रूप सामने आने लगता है। हिंदी की नयी और समकालीन कहानी मे ऐसा अनेक बार हुआ है और इतस्ततः जारी है। इसलिए कहानीकार को यह मद्दे नजर रखना ही होगा कि "आदमी का व्यक्तित्व अनिवार्यतः सामाजिक सम्पकों और सामाजिक कार्यकलाप की प्रक्रिया मे निर्मित होता है और वह अच्छा हो या बुरा, अति प्रतिभाशाली हो या साधारण मयं, वह सदा अपने आसपास के जीवन को अपने आत्मसात किये एक व्यक्तित्व और इसीलिए व्यक्तित्व बना रहता है। और इसका विवेचन हर कोई कर सकता है कि वह किसी तरह का व्यक्ति है।" (समाजवादी समाज में व्यक्ति : ग. स्मि!व, पृ. 17) इस प्रकार समकालीन कहानीकार जीवन के साथ कहानी को सम्बद्ध करके चल रहा है। जीवन को सूक्ष्म पहचान और संघर्ष की आन्तरिक पकड़ के भीतर रवीन्द्र कालिया की 'नो साल छोटी पली', ममता कालिया की एक अदद औरत' गिरिराज किशोर की 'पेपरवेट', दामोदर सदन को शमशान', पृथ्वीराज मोगा की 'वह कोई एक', राजी सेठ की 'तीसरी हथेली, वदीउज्जमा की 'पुल टूटते हुए और' 'चौथा ब्राह्मण', शिवप्रसाद सिंह की 'भेड़िये, से. रा. यात्री की 'केवल पिता', ज्ञानरंजन को 'आत्महत्या', 'पिता' इत्यादि कहानियां बदली हुई दिशा और परि- वर्तित प्रकृति की कहानियां हैं। आज की कहानी व्यक्ति यथार्य के निरन्तर तल्स होते जा रहे अनुभव के करीब आती जा रही है। इस धारा के लेखकों की यह महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। ०० 62/राग मरुगन्धा हास्य-व्यंग्य ਹਰੀਸਨ ਕਸ जगणेश तारे कई दिनों से सोच रहा था कि कुछ रचनात्मक लिखू, सो देश के सेवार्थ मेरी रचना- त्मक रचना प्रस्तुत है । अव रचनात्मक का मतलब तो आप समझते ही हैं। रचना- स्मक याने रचनात्मक...समथिंग कंस्ट्रक्टिव...नॉट डेस्ट्रक्टिव । अब कंस्ट्रक्टिव भी नही समझते क्या? लगता है चुगी के स्कूल में पढ़े हो। मैं समझता हूं कि प्रत्येक लेखक और कवि.को कुछ ऐसा लिखना चाहिए कि देश का भला हो, देश पर जो सदैव विदेशी ताकतों का दवाव बना रहता है वह कम हो। यह तभी हो सकेगा जब देश ताकतवर होगा। देश तभी ताकतवर होगा जब सरकार ताकतवर होगी । अतः सरकार के हाथ मजबूत करना हमारा प्रथम पुनीत कर्तव्य है । इस 'शाश्वत चिन्तन' को प्रारम्भ करने से पूर्व मैं मेरे और सरकार के पवित्र एवं पनिष्ठ सम्बन्ध को स्पष्ट कर, दूताकि "मिसभण्डरस्टेण्डिग' न हो, यदि आप समझते है कि मैं सरकारी कर्मचारी हूं तो आप ब्रुटि पर हैं । सत्य यह है कि मैं भी आप जैसा एक समझदार, सजग नागरिक हूँ जो हर चुनाव मे सुप्त अवस्था से जागकर वोट देता हूँ और सरकार बनाता हूँ। मेरा दावा है कि मै जिसे वोट देता हूँ वही सरकार बनाता है। मैं जानता हूँ कि मैं किसे वोट देता हूँ, यह आप जान ही नहीं सकते। अत: यह, मानना ही पड़ेगा कि मैं ही सरकार बनाता हूँ...अर्थात् 'गवर्नमेण्ट मेकर' है। चूंकि सरकार मेरी है अतः उससे कोई विरोध सम्भव नहीं है, अव विरोधी आये दिन चिल्लाते रहते हैं, 'सरकार ने किया ही क्या है?' तो भइये सीधी-सीधी बात है-सरकार ही माई बाप है, सरकारही पालनहारी है। सरकार ने हमें पानी दिया, सरकार ने बिजली दी। अब 'वाटर वस',और 'इलेक्ट्रीसिटी बोर्ड' तो सरकार के मानोगे कि वे भी विरोधियो को पीती है ? सरकार ने हमें फ्री मे हवा दी, उसका बापड़ो एक पैसा भी नहीं लेती । सरकार ने फैक्ट्री चलाने रचनात्मक काम/63 , वालों को लाइसेन्स दिया । फैक्ट्री वालों ने प्रदूपण किया। सरकार ने तव पर्यावरण का अर्थसमझाया । पर्यावरण समझने वालों को पंसा दिया, पैसे ने सेमीनार करवाई। सरकार ने फोटू खीचकर टी० वी० पर दिखाई । इतना सब सरकार ने किया और विरोधी पूछते हैं सरकार ने क्या किया? मैं पूछता हूं विरोधियों ने अब तक क्या किया? नारे लगाये, यूनियनें बनवायी, हड़ताल करवायी, उत्पादकता कम करवाई, सरकारी कामो मे अडंगे लगाये, जगह-जगह अशान्ति फैलायो, लोगो की भावनाएं भड़काई । विरोधी ध्यान रखे, जगह-जगह कलेक्ट्रेट पर जाकर वे नारे लगाते है, वह कलेक्ट्रेट किसने खुलवायो?...सरकार ने। अव मरकार कलेक्टर ही नियुक्त नहीं करती तो ये विरोधी कहाँ नारे लगाते, कहाँ ज्ञापन देते, कहाँ धरना देते? हो जाती न सय दुकानदारी ठप्प । अजी, कलेक्ट्रेट तो दूर जिन सड़को पर ये विरोधी जुलूस निका- लते हैं, वे सडके सरकार ही तो वनवाती है। उसमे जगह-जगह कुछ स्पीड ग्रेकर रखवाती है कि वाहन वाले कुछ सम्हल कर चले । चाहे जिस वाहन से टकराकर एक्सीडेट न करें, असावधानी से खड्डे में ही गिरें और भविष्य में पुनः खड्डे मे गिरने के लिए बचें । अत सरकार मरने वाले को जीने की प्रेरणा देती है। फिर भी कोई मरने पर ही उतारू हो तो सरकार ने उसको भी वचन्नेइन्तजाम कर छोडा है। जगह-जगह अस्पताल खोल रखे है । डाक्टर-नसें रख छोड़ी हैं। अस्पताल में दवाई न मिले तो प्रायद्वेट दवाइयों की दुकानें खोलने की परमीशन दे रखी है। "आगे सुनो, सरकार ने जगह-जगह स्कूल खुलवाये और कहा पढो मेरे लाल । पढ़ लिखकर विद्वान वनो और पत्रिकाओं-अखवारो में लिखो। किन्तु लोगो ने पढ़ लिखकर सब गुड़ गोवर कर दिया। चार किताबें क्या पढ़ ली, जिसने पढाया उसे ही आँख दिखाने लगे (मेरी बिल्ली मुझसे ही म्याऊ)। सरकार ने अखबारों को कागज दिया। कहा, लो छापो । लोग' औरतों को जिन्दा जला रहे हैं, सता रहे हैं, सती बना रहे हैं । पर ये अखवार वाले भी न जाने क्या छापने लगे अंट-शट । पता नहीं क्या-क्या दलीले देने लगे । इन्हे यह पता नहीं कि ये जो छाप रहे हैं उसके लिए कागज कौन देता है ? छापने के लिए प्रेस आयातित' करने की परमीशन कौन देता है ? प्रेस लगाने की जगह कौन देता है ? पागल कहीं के हद दर्जे के अहसानफरामोश, इतनी सी बात नहीं समझते कि यदि सरकार रजिस्ट्रेशन ही कैसिल कर दे या फिर कागज का कोटा ही घटा दे और कह दे कि आज तो एक ही कागज मिलेगा तो छाप लेगे ये अखवार? दिन-भर लाइन में खड़े रहेगे सरकारी दफ्तरो के बाहर, एक कागज के लिए और जव खिड़की तक नम्बर आयेगा तो पता चलेगा कि बाबू चाय पीने गया है या फिर 'लंच टेम' है ! पर पता नहीं लिखने की छूट दे दी तो सब मर्यादा भूल बैठे। अरे भाई ठीक है। लिखो, परं खाल में तो रहो। - सरकार के पक्ष मे मेरे पास ऐसे-ऐसे धामू आ!मट है कि तबीयत झक हो जाये । 64/राग मरुगन्धा.
पर मैं कौन मरकार का पीआरो (पी० आर० ओ०) हूँ जो पचड़े में पडूं। मैं जानता हूँ कि मेरी मीधी-सीधी बातों को लोग चाग समझ नहीं पाएंगे। जो व्यापारी बुद्धि के लोग है वे कहेंगे- देखो सरकार को चापी लगा रहा है, पुरस्कार का जुगाड़ बिठा रहा है । जो वाल की पाल निकालने वाले है, वे कहेग- अच्छा व्यग करा रहा है । तो भय्ये मुझे कोई पुरस्कार नहीं चाहिए क्योंकि सरकार ने जो कुछ हवा, पानी, विजली दे रखी है वही सबसे बड़ा पुरस्कार है । और रही व्यंग की वात तो इसकी जिम्मेदारी तो शरद जोगी, के० पी० गवसेना, हरिशकर परसाई की है। मेरे जैसे की क्या विसात कि मैं व्यग लिखू। मैंने तो रचना लिखकर प्रमच पीडा मे मुक्ति पायी है । अपना दायित्व पूरा किया है। देश को नाकतवर बनाने के लिए टोम कदम उठाया है। ०० रचनात्मक काम/65 गरीबदास का विषाद-लोक भगवती लाल व्यास . गरीबदाम वरद मुफलिसीराम मोहल्ला अमुविधागंज साकिन गाँव इण्डिया पाँच साल में एक बार दिखायी देने वाले वैलट पेपर पर छपे चुनाव निशानो को हाजिर- नाजिर जान कर शपथपूर्वक घोपणा करता हूँ कि जो भी रहूंगा सच-सच कहूंगा। सब के अलावा कुछ कहने का सवाल ही पैदा नहीं होता क्योकि पिछले इकतालीस चरमो में सत्य के पर्यावरण में सांस लेते-लेते पैतृक सम्पत्ति के रूप में प्राप्त एकमात्र चीज~असत्य के जीवाणुओं का भी स्थायी रूप से सत्यानाशीकरण हो चुका है। सुबह अखबार खोलता हूँ तो उसमे से पतला-सा, पीला-सा एक कागज उड़कर दूर जा पड़ता है जैसे हर वमन्त ऋतु मे वसन्त मुझे देखते ही विदककर दूर जा बड़ा होता है । मगर उड़ने वाली यह चीज एक इश्तेहार है। इसमे यह बताया गया है कि मेरे लिए जरूरी मॉउन कपडों को जो यो तो बहुत कीमती हैं पर विक्रेता पर देवी सकट आने से आधे से भी कम दामो पर 'लुटाया' जा रहा है। पहले राम-नाम की सूट होती थी अब लूट भी कपड़ो की और पसोट भी कपड़ो की। सोचता हूं जब चारो तरफ चीजो की कीमतें बन रही हो तर यह वस्त्र-विता इतने कम दामों पर कपडे वेचकर अघनगे हिन्दुस्तान को ढकने का प्रयत्न कर रहा है। कितना भला आदमी है वैचारा! इस निहायत निर्मम युग मे कही तो माया-ममता बची है तभी तो धरती अपनी धुरी पर घूम रही है, वरना रसातल मैन सिधार जाती! मेरा मन उस अदेसै अपरिचित वस्त्र-विप्रेता के प्रति नमन-मुद्रा धारण कर लेता है। इससे अधिक मेरी जेब मेरे मन को करने की छूट नहीं देती वरना वह भी कर गुजरता। मुबह के कामो से फारिंग होकर दफ्तर के लिए रवाना होता हूँ। एक भोड़ भरे पौराहे को पार करने के बाद ज्यों ही लम्बी मड़क पकहता हूं कि किनारे यहा एक मासूम-सा लड़का एक गुनावी कागन मेरे हाय में थमा देता है। उसके हाप में ऐसे - 66/राग मरगन्धा ही गुलाबी कागजों का अच्छा-खामा पुलिन्दा है। मैं लडके को अच्छी तरह देखता हूं और उसके दिये हुए कागज को कस कर मुट्ठी में पकड़ लेता हूँ। लगता है जैसे किसी पतझर ने पास ने गुजरते समय को गुलाब का गुलदस्ता थमा दिया हो । समय भी मेरी तरह जल्दबाजी में रहता है । वह हाथ के गुलाब की भीनी-भीनी गन्ध भी तभी महसूस करता है जब वेचारे गुलदस्ते की सारी हेकड़ी निकल जाती है- मेरी मुष्ठी में इस समय मौजूद इस गुलाबी कागज की तरह। मौका देख कर मैंने वह परचा पढ़ डाला । संयोग है कि यह भी एक इश्तेहार ही था। इसमे यह चिन्ता व्यक्त की गयी थी कि मैं भी उम व्यक्ति की तरह लख- पति क्यों नहीं हो जाता जिसने एक सौ आठ पोस्टकाडों पर विशेष देवता के नाम लिख अपने मित्रों-रिश्तेदारों को इस हिदायत के साथ भिजवा दिए थे कि वे भी ऐसा ही करे। उनमे से एक नास्तिक व्यक्ति ने ऐसा नहीं किया तो उसकी जवान भैस मर गयी, घर में आग लग गयो, लड़की की सगाई छूट गयी यानी उस पर मुसीवतो का पहाड़ टूट पड़ा । अन्त में लिखा गया था कि इस परचे को पढ़ने वाले हर शस्म से यह अपेक्षा की जाती है कि वह कम-से-कम ऐसे ही पांच सौ परचे छपवा कर बंटवाने का बन्दोवस्त करे। मात दिन में उमे गड़ा धन मिले, लॉटरी खुले या व्यापार में वेशुमार मुनाफा हो । अगर पढ़ने वाले शख्स ने ऐसा नहीं किया तो उसी तरह मुसीवतो का पहाड़ टूट पड़ेगा, जैसा एक सौ आठ पोस्टकार्ड नहीं भेजने वाले पर टूट पड़ा था। मेरे मामने अव वह गुलाबी कागज नहीं था। उसकी जगह एक तरफ एक लाख रुपये का डर था दूसरी तरफ मुसीवतो का पहाड़ था। दोनों मेरी तरफ ललचायी आँखो से देख रहे थे। सोचने लगा, क्या करूं? मन ने कहा- 'गरीवदास ! कर लेने दो इस बार मुसीवतो के पहाड़ को ही अपने मन की । अगली बार जेब में जब कम-से-कम मौ रुपये खर्च करने लायक होगे तब लाख रुपये के ढेर से बात कर लेना।' मैंने जेव टटोल कर देखो। पांच रुपये का एक मुड़ा-तुड़ा नोट और लंच मे विना दूध की चाय पीने के लिए अठन्नी का एक सिक्का था। मैने बुझे स्वर से मुसीवतो के पहाड़ की ओर देखते हुए कह दिया- 'वेलकम मिस्टरमाउण्टेन, वेलकम ।' एक दिन मेरे लेटर बॉक्स में डाक के साथ एक सफेद परचा निकला। सफेद रग हमारे देश के नेताओं को भी बहुत प्रिय है और मुझे भी। मैं इसे एक सांस में पढ़ गया । परचा शिक्षण-सस्था की प्रबन्धकारिणी समिति की ओर से जारी किया गया था। परचे में एक स्थानीय अखबार में छपे इस वक्तव्य का खण्डन किया गया था कि उस शिक्षण संस्था के अध्यापक गण हड़ताल पर है। अभिभावको को सम्बोधित इस परचे में कहा गया था, सभी अध्यापक हमेशा की तरह निष्ठा के साथ अपना कार्य कर रहे हैं इसलिए अभिभावकों को शिक्षक यूनियन की तरफ से जारी अपील पर गौर नही करना चाहिए तथा अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भेजना । गरीवदास का विषाद-लोक /67 चाहिए । मैंने मुख की सांस ली क्योंकि मेरा कोई बच्चा उम महंगी संस्था में नही पढ़ रहा था। फिर यह परचा मेरे लेटर बॉक्स में क्यों ? मुझे लगा कि यह किसी भावो गौरव का मूषक है। सम्भव है अगले साल मैं उस स्कूल का सम्मानित अभिभावक वन जाऊँ । दम विचार मात्र में मैं पुलकित हुए बिना न रह सका । मैंने अपनी धर्मपत्नी को भी यह ममानार दिया तो वे भी बहुत गुश हुई। उन्होंने कहा- 'क्या पता स्कूल के प्रिमिपल साहब ने नहीं यह परचा लेटर वॉफ्म मे छुड़वाया न हो। तुम लालू का फार्म तो पिछले तीन गाल में भर रहे हो, इस स्कूल में दाखिले के लिए !' मैं श्रीमतीजी के भोलेपन पर निहाल हो गया। यकायक मुझे उस लड़के की याद हो आयी जो बीच सड़क के किसी काले संगमरमर की स्टेचू की तरह पडा गुलाबी परचे वाट रहा था। उसका मेहनताना तय था और परचे बांटने की विधि परचे वटवानेवाो उसे भली तरह समझा चुके थे। परचे बांटनेवाले को इससे क्या मतलब कि कोन मे लेटर बॉक्सयाले का वच्चा अमुक स्कूल में पढ़ रहा है या नही, कौन से माहब को परचा पटने के बाद दफ्तर जाने की बजाय पांच सो परचे छपवाने सीधे प्रेस जाने की नदी मनी । पर बांटना उनका कम है आगे पर बांटनेवाले का राम जाने, उसका गम-धर्म जाने । शाम का पाना खाने के बाद बाजार में बंधवाकर लाये पान की पुड़ियाँ पोली तो निखा पाया, "पिछले कुछ दिनों में देगी, कलाती, मद्रास और मीठे पत्तों के दामों में भारी बढोतरी हुई है। अब तक तो हम पाटा सहन करके भी हमारे ग्राहकों की सेवा कर रहे में मगर अब यह सम्भव न होगा, लिहाजा अगली पन्द्रह तारीख से हर तरह के पान की कीमत में हम पचीस पैसे की वृद्धि कर रहे हैं। हमें पूर्ण विश्वाम है कि हमारे कृपालु ग्राहक हमेशा की तरह हमारा सहयोग करते हुए बराबर भेवा का अवसर देगे। भवदीय, सेफ़ेटरी, पान मर्चेन्ट एसोशिएशन।" इस अविश्वसनीय यबर पर विश्वास करके पान-विक्रेताओं का मनोवल बढ़ाने के अतिरिक्त और कोई चारा मेरे पास न था। अगर चारा होता तो वही या लेता। दुकानदारो की धौस और पान माथ-साथ क्यो साता? एक सुहानी भोर का जिक और कर दूं। घर में कई दिनों से हरी सब्जी बनी थी तथा उम रोज कुछ मेहमान भी आनेवाले थे। घर में से फरमान जारी हुआ कि आधा किलो भिण्डी, आधा किलो गवार फली, आधा किलो पालक, पाव भर टमाटर और एक लौकी ले आऊँ। इस फरमान के माथ ही प्लास्टिक की नफीस- सी ढक्कनदार टोकरी और दम रपये का भारतीय रिजर्व बैंक का वायदा-पत्र' बड़े कायदे के साथ मुझे थमा दिया गया। मैं आपमे सच कहता हूं, पिछले दस दिनों से इतने बड़े नोट का सान्निध्य मेरी जेव को प्राप्त नहीं हुआ था। इसलिए पत्नी को 68/राग मस्गन्धा इस अयाचित उदारता से मैने स्वयं को काफी गौरवान्वित महसूस किया। दस रूपये का नोट जेव में डालकर मैं सब्जी मण्डी की तरफ उसी तरह चल पड़ा जैसे सेना का कोई ऊँचा अधिकारी सलामी लेने परेड ग्राडण्ड की तरफ चल पड़ता है। सब्जी वाजार में पहुंचकर ज्यो-ज्यों में सब्जियों के भाव पूछता गया मुझे अपनी असलियत समझ में आती गयी । अन्ततोगत्वा आधा किलो हरे प्याज, पाँच सात मिर्च, थोड़ा धनिया और पाव भर टमाटर लेकर बुझे मन से अपने कृषि प्रधान देश के सब्जी मार्केट से लौटने लगा। विचार आया कि अगर मेरा देश कृषि प्रधान न होकर सब्जी प्रधान होता तो कितना अच्छा रहता। ये दिन तो न देखने पड़ते ! तभी नजर दीवार पर चिपके एक बड़े पोस्टर पर पड़ गयी। लिखा था- "क्या आप जीवन से निराश हो चुके हैं ? क्या आप खोया हुआ आत्मविश्वास और ताकत पाना चाहते है ? तो मिलिये होटल 'धागड़-बिल्ला' के कमरा न. 171 मे देश के जाने-माने हकीम होशियारचन्द्र से। हकीम साहव आजकल विदेशों में ही इलाज करते है मगर हमारे विशेष आग्रह पर केवल दस दिन के लिए स्वदेशी भाइयो के उपचार के लिए पधारे हैं । आपके शहर में केवल तीन दिन का मुकाम है इनका । समय शाम के चार बजे से रात के आठ बजे । हमारी विशेषताएँ- गरीबो का इलाज मुफ्त और हर मरीज के लिए सलाह एकदम फो। मौके का फायदा उठाना न भूले।" अभी-अभी भोगे सब्जी-सत्रास से मैं बुरी तरह निराश हो चला था। पोस्टर पढ़कर मैने तय किया आज शाम को ही हकीमजी से मिलूंगा। गरीबो का इलाज मुक्त करनेवाला और हर शप्स को फी सलाह देनेवाला हकीम जरूर दरियादिल होगा। वह मेरे सब्जी-सकट का जरूर कोई-न-कोई माकूल हल सुझायेगा ताकि दोनो वक्त दाल से तो कुश्ती न लड़नी पड़े। मैं पोस्टर में छपे हकीमजी के चित्र को मन-ही-मन प्रणाम कर उठा। शाम को धूम आने का बहाना बनाकर मै घर से सरक लिया और पहुँच गया होटल 'वागड़ बिल्ला।' हनीम साहब के सेवक ने मुझे एक टोकन थमा दिया। टोकन पर मेरा नम्बर लिखा था । थोड़ी देर में आवाज पड़ी मरीज न. 18 । मैं अपनी जगह से उठा और चिक उठाकर कमरे में दाखिल हो गया । हकीम साहब ने मुझे सिर से पैर तक गौर से देखा और फिर अपनी बड़ी-बड़ी मूंछों पर हाथ फेरते हुए पूछा- 'गरीव हो?' 'जी नही, गरीबदास हूं..' मैने विनम्र होकर कहा । 'ठीक है, ठीक है ! कितने गरीब हो?' 'में कुछ समझा नहीं।' 'अरे भाई, इसमें समझना क्या है ! गरीबी की सीमा-रेखा से ऊपर हो कि नीचे हो?' गरीबदास का विषाद-लोक/69 'जी मैं गरीवी की सीमा रेखा के समानान्तर ईन नोचे न अपर।' 'ठीक है । क्या तकलीफ है?' 'जी, वो आपने लिया था कि जो लोग जीवन से निराश हो गये हैं - सोया हुआ आत्मविश्वास और ताकत ।' हकीम साहब खांसने लगे। सी रुकी तो तौलिये से मुंह पोंछकर बोले- 'हाँ, यह हुई न कोई चात। तो तुम गरोव नहीं हो। भता गरीव आत्मविश्वास क्यों चाहेगा? गरीच के लिए जात्मविश्याम का न होना गुदाई नियामत है वरना देश में पूनी क्रान्ति हो सकती है। रही बात जीवन से निराश होने को, सो वह भी तुम नही हो । अगर निराश हो गये होते तो यहाँ किंम आशा से जाते' जाओ, हमारा टेम पराव मत करो। तुम न तो गरीव हो न निराश ! अलवता कोई ठग मालूम पड़ते हो। अरे भाई परेमप रवास । उन्नीस नम्बर को जियो तो जादी - तो यह मी हकीम साहब को मुफ्त सलाह । मैं सलाह को अपनी जेब भेट्स कर बाहर आ गया। रास्ते में पब्लिक पाकं पड़ता था। वहां कोई सिद्ध पुरष भाषण दे रहे थे- 'भाइयो, एक दुनिया वह है जिशमे आप हैं, एक दुनिया वह है जिसमें आप होना चाहते हैं । इन दोनो दुनियाओं के बीच बड़ी जबरदस्त खाई है। आप पूरी जिन्दगी खपा दीजिए मगर यह पाई पटेगी नहीं। हो, हमारे बताये तरीके से आप इस खाई को राई को तरह मसल सकते है। अपने नपनो की दुनिया में जा सकते हैं, उसे पा सकते है, जहाँ न राग है न प है, न पाप है न पुण्य है, न अच्छा है न बुरा है। जहां सब कुछ आनन्दमय है। वहां पहुंचकर आप खुद अनुभव कर लेंगे कि आपके और आपके आनन्द के बीच कोई तीसरी चीज है ही नहीं। इस आनन्द लोक मे प्रवेश बहुत आसान है। हम शीघ्र ही आपके नगर में 'आनन्द- साधना-केन्द्र' खोजने जा रहे हैं। जो भाई मेम्वर बनना चाहे हमारे कार्यालय में अभी प्रवचन के तुरन्त बाद पधार जाएं और शुल्क जमा करवा दे। वहाँ से आपको हमारा लिटरेचर और साधना-केन्द्र की नियमावली नि.शुल्क प्राप्त होगी। यह अवसर हाथ से न जाने दै वरना बाद में पछताना पड़ेगा। अनायास मेरा हाथ अपने जेब में चला गया वहाँ कुल अस्सी से मौजूद थे। मुझे लगा कि आनन्द लोक के मुख्य द्वार से मैं एक बार फिर विपाद-लोक में धनिया दिया गया हूँ। . 10/राग मगधा यमलोक का अंग्रेजी विभाग जानकी प्रसाद पुरोहित हमारे एक परम मित्र पड़ोसी हैं श्यामजी मिश्र। बड़े सवेरे हमारे साथ चाय पीने का उनका दैनिक कार्यक्रम है। कई बार हमने और श्रीमतीजी ने उनके इस दैनिक आतिथ्य से ऊबकर मन-ही-मन उन्हें गालियां दी, उन्हे हतोत्साहित करने के लिए अप्रत्यक्ष रूप से झिड़कियां भी दी। इन सबके बावजूद उनके उत्साह मे कोई कमी नहीं आई। एक प्याने चाय में वे हमें दुनिया-भर को राजनीतिक हलचलों से अव- गत करा देते है। उनके आगमन के बाद हम समाचार-पत्र पढ़ने की आवश्यकता ही नहीं रहती। अतः हमने श्रीमतीजी के रोष को दूर करने के लिए श्यामजी को भेंट किये जाने वाले चाय के प्याले की जगह समाचार-पत्र लेना बन्द कर दिया। मिश्रजी अपने सस्कारों के कारण हिन्दी के प्रति अगाढ़ प्रेम रखते है। देश मे हिन्दी के सम्बन्ध में जब भी कोई विवाद उठता है, उस दिन उनकी चर्चा का मुख्य विषय भी वही होता है। हम तो उनको बातो को कान बन्द कर सुनने के अभ्यस्त हो चुके हैं। कल बडे सधेरे मिश्रजी महाराज के आगमन से हम समझ गये कि आज कोई-न-कोई विशेष बात है। आते ही हमने चाय के प्याले से उनका सत्कार किया। आधा प्याला पो लेने के बाद बोले, "मास्टरजी, आज बड़ा अद्भुत स्वप्न देखा मैंने।" सदा की तरह उनकी बात पर बिना ध्यान दिये हमने कहा, "सुनाइए।" "मास्टरजी, स्वप्न क्या, मुझे तो यह सत्य-सा ही लगता है। हम तो आज यमलोक से लौटकर आए हैं।" श्यामजी के अगले वाक्य ने हम पर कुछ प्रभाव डाला। हमने व्यग्रता से पूछा, "क्यों, क्या हो गया?" "अजो, अंग्रेजी महारानी ने तो यमलोक मे भी अपना राज्य जमा लिया।" 1 यमलोक का अंग्रेजी विभाग/11 "कमे?"हमने पूछा। श्यामजी बोले, "मास्टरजी, रात को मैं मदा की भाति भग-बूटी लेकर सोया ही था कि मेरे सामने दो भीमकाय काले रंग के व्यक्ति आ पड़े हुए और मुझे अपने साथ चलने को कहा। अधिक पूछ छि करने पर मालूम हुआ कि मेरी आयु समाप्त हो चुकी है अत: वे मुझे लेने आये हैं । सचिवालय के कर्मचारियो जैसो. पोशाक देखकर मुझे पहले तो उन पर विश्वास नहीं हुआ। मैंने छाती कड़ी कर भय- मिश्रित आवाज में कहा, ' कौन हो तुम? यमदूतो के नाम से मुझे डराकर मेरा अपहरण करना चाहते हो ? मुझे ऐसा-वैसा यजमानो मित्र न समझना, मैंने बहुत पुराण-पोथो का अध्ययन किया है। मैं जानता हूँ कि यमदत्त कैसे होते हैं । चुपचाप चले जाओ यहाँ से, अन्यथा ।" एक यमदूत ने बड़ी नम्रता से उत्तर दिया, "मिथ जी महाराज, अब यमलोक में उन पुराण-पोथो की भी व्यवस्था नहीं रही। यह लीजिए, आपके नाम का आदेश।" और उमने एक पत्र निकालकर मेरो छाती पर रख दिया । कोई उपाय न देखकर मैं उनके साथ हो लिया। थोडी ही देर मे हम विद्युत प्रकाश से जगमगाते एक विशाल भवन के सामने पहुंचे। भवन के अन्दर और बाहर बड़ी चहल-पहल थी। भवन के द्वार पर हिन्दी को छोड़कर अनेक भाषाओ में बड़े-बड़े अक्षरों में कुछ लिखा हुआ था। मैंने यम- दूतो से पूछा, "यह क्या लिखा हुला है ?" "यमलोक"-उनमें से एक ने कहा। "हिन्दी में क्यो नहीं है ?" मैंने पूछा। 'हिन्दी सैक्शन उधर है ।" पूर्व की ओर संकेत करते हुए उसने कहा। यमदूतों ने मुझे भवन के अन्दर ले जाकर आधुनिक ढंग से बने एक बड़े कमरे के सामने बैठा दिया। थोड़ी ही देर में घण्टी बजी और अन्दर ले जाकर कोट-पेट पहने एक बड़े अफसर के सामने प्रस्तुत किया गया। कमरे के अन्दर का वातावरण अब तक यमलोक के बारे में पढ़े-सुने वातावरण मे बिल्कुल भिन्न था। कमरे की व्यवस्था और सजावट किसी केन्द्रीय मंत्री के कार्यालय से कम नहीं थी। अफसर ने भर्रायो आवाज मे मुझमे कुछ पूछ। किन्तु मैं उसकी भाषा समाा नहीं सका। एक यमदूत ने कहा, "इण्डियन ।" इस पर पारा में ही बैठे बाबू ने मेरी ओर देखकर कहा, "क्या नाम है ?" "श्यामजी मिश्र" मैने कहा। वायू ने कागज की एक विट पर कुछ लिखकर यमदूतों को दे दिया और कहा 'हिन्दी सेक्शन !" यमदूत मुझे लेकर हुए बाहर आ गये। विशाल भवन की कई गलियों को पार करते हुए मुझे एक-दूसरे कमरे के सामने ले जाया गया । अर 72/ राम मगन्धा . सब कुछ मेरी समझ में आ रहा था। कमरे के बाहर हिन्दी में लिखा हुआ था : यमदत कार्यालय, हिन्दी-विभाग, भारत मुझे कमरे के अन्दर प्रस्तुत किया गया। सामने धोती पहने एक दुबला-पुतला व्यक्ति बैठा हुआ था। कमरे का वातावरण पहले कमरे से बिल्कुल भिन्न था। उम व्यक्ति ने मुसरो पृष्ठा-"क्या नाम है ?" "श्यामजी मिथ।" मैंने दवे स्वर में उत्तर दिया। पास मे बैठे दूसरे व्यक्ति ने कई रजिस्टरो के पो पलटे । बड़ी परेशानी के साथ उसने कहा, ' इम नाम के व्यक्ति की तो अभी 30 वर्ष की आयु शेप है।" दुबले-पतले व्यक्ति ने साश्चर्य उराकी तथा मेरी ओर देखा। उसने घंटी बजाई। एक व्यक्ति कुछ फादले लेकर आया। दुबले-पतले कार्यालयाध्यक्ष ने फाइलो के पन्ने उलट-पुलटकर एक कागज निकाला और जोर-जोर से बोलते हुए लिखा- "श्यामजी मिश्र नाम के एक व्यक्ति की उम्र अभी 30 वर्ष की और है । अत: आदेश रद्द किया जाकर आगे कार्यवाही का आदेश दिया जाए।" कागज लेकर एक यमदूत कमरे के बाहर चला गया। मुझे सामने रखी एक तिपाई पर बैठ जाने के लिए कहा। थोड़ी ही देर मे टेलीफोन की घंटी बजी और किसी साहब ने झिड़कते हुए कुछ कहा। कार्यालयाध्यक्ष ने टेलीफोन रखते हुए बड़े बाबू को बुलाया तथा ऊँचे स्वर मे कहा, "कैसा काम करते हो तुम? मुख्य कार्यालय का क्या ऑर्डर था और तुमने उसका क्या अनुवाद किया ? केयरलेस कही का..." यमदूत मुझे कमरे से बाहर ले आये। मैने पूछा, "भाई, क्या बात है ?" "अजी, आजकल के छोकरों को कुछ आता-जाता तो है नही, डिग्री लेकर बाबू बन जाते हैं। श्याम और मिश्र को दो आत्माओं को लाना था, ऑर्डर भूल से भारत संक्शन में आ गया तो बाबू ने आँप बन्द कर श्याम मिश्र को लाने का आदेश जारी कर दिया। परमात्मा को धन्यवाद देते हुए मेरे मुंह से निकल पड़ा--'हे राम !' राम के साथ ही मैंने देखा कि मैं अपने बिस्तर पर करवट बदल रहा हूँ। मिश्रजी की घटना समाप्त होते ही हमने उनकी ओर एक अतिरिक्त चाय का प्याला बढ़ा दिया। rut .. यमलोक का अंग्रेजी विभाग | 73 - राइटर बनने के चंद नुस्खे देवप्रकाश कौशिक - बहुत से लोग लेखा या कवि वनने के लिए लालायित रहते हैं। बड़े लेखकों को रायल्टी, कवियो के कवि-सम्मेलन के रेट सुनकर उनके मुंह में पानी आता है। यदि आप भी कहानीकार, नाटककार, करि आदि वनना चाहे तो हम आप को मदन कर सकते हैं । राइटर बनने के चन्द नुस्से हाजिर है। सबसे पहले तो आप आने दिमाग से यह बात निकाल दीजिए कि राइटर जन्मजात होते हैं । पहले होता होगा किसी जमाने मे, लेफिन आज के इस लिवरत निकड़मी युग में बिना जन्मजान गुण हुए कोई भी व्यक्ति राइटर या रचनाकार बन सकता है। अव स्वयं तय कर लीजिए कि आप क्या लिखना चाहते हैं - कहानी, उपन्यास, कविता या अन्य कुछ। यदि आप कहानी लिखना चाहते हैं तो किसी भी घटना का बयान कर दीजिए । घटना न हो तो बिना घटना के लिय लीजिए ! पटना न हो तो और भी अच्छा क्योंकि घटना-रहित कहानी आधुनिक कहानी होती है। पांच-सात पेन रंगने के बाद यदि को धरती मधुर या कर्कग स्वर में आपको पुकारे तो तुरन्त कहानी को छोड़कर उनकी सेवा में उपस्थित हो जाइए । उनकी सेवा करने फे पश्चात कहानी वहां छोड़ी थी, वहीं उसका अन्त कर लिए। अन्तहीन अंत मानिस कहानी की सबसे बड़ी विशेषता है। इस बार कहानी को कोई नाकर्षक शीर्षक देगालिए। इसको चिन्ता न करें किसीक तुपा जो कुछ भी आपने लिया है उसमें सम्बन्ध है या नहीं। यदि सम्मान न होगा तो माएका मोर्पर प्रयोगवादी तथा आधुनिक होगा। आपने कई भाकर्षक शीपंक पड़े-मुने होंगे- एक वायलन समुद्र किनारे, तुमने क्यों कहा में मुन्दर है. गुन्दर तो तुम हो मा!, यह फिर नहीं आपो धादि। a 74/राम मगन्या इस बात का भी ध्यान रखें कि कहानी के नाम के साथ-साथ आपका नाम तथा पता भी आकर्षक होना चाहिए। यदि आपका नाम सुन्दर न हो तो आप उसे सुन्दर बना सकते है। मान लीजिए कि आपका नाम घसीटाराम शर्मा है तो आप इसे जी० राम शर्मा लिख सकते हैं। शर्मा को सरमा, चन्द्र को चन्दर (कृष्ण चन्दर की तर्ज पर) लिखने की स्टाइल भी काफी पॉपुलर हो रही है । कवि बनना है तो अच्छा-सा उपनाम चुन लें। कुछ लोग तो लोकप्रिय कवियों के उपनाम ज्यों का त्यो लगा लेते हैं क्योंकि उपनामो का पेटेण्ट तो कोई है नहीं। शायद इसीलिए एक से अधिक नीरज, नीरद, आवारा आदि उपनाम देखने को मिलते है। पता भी आकर्षक होना चाहिए। बिना मकान वदले भी आप पते में परि- वर्तन कर उसे आकर्षक बना सकते हैं। भले ही आप भैसों के तबले में रहते हो, निवास का नाम लिखिए अनामिका, गजल, मधुवन, सत्कार आदि । हाँ, अपने ईजाद किए पते में पोस्टमैन को जरूर अवगत करा दें जिससे कि डाक आपको मिलती रहे । उपन्यास लिखना चाहें तो कहानी का भाकार पन्द्रह-वीस गुना बढ़ा दें। बस उपन्यास भी तैयार । इण्टरव्यू भी आज की पापुलर विधा है। नेता, अभिनेता-अभिनेत्री, लेखक, कवि-किन्ही का भी इण्टरव्यू ले लीजिए । अधिकाश व्यक्ति तो इण्टरव्यू देने को लालायित ही रहते है । कुछ इनने उतावले हो जाते है कि इण्टरव्यू देने आपके घर पर खुद चले जाएंगे, इण्टरव्यू के कच्चे धागे से बन्धे हुए । आठ-दस प्रश्न उनसे पूछिए तथा उत्तर नोट करके फोटो सहित भेज दें पत्रिका में। बस आपका इण्टरव्यू गिना किसी खास दिक्कत के तैयार हो गया। आर यदि इण्टरव्यू लेने ही न जाना चाहें तब भी परेशानी की कोई बात नहीं । पत्र में प्रश्न भेजकर उसके उत्तर प्राप्त कर लें। कोई आपसे यह नहीं पूछो वाला है कि आपने मिलकर इण्टरव्यू लिया है या नही । बहुत से लोग तो स्वयं ही प्रश्नों के उत्तर लिखकर इण्टरव्यू लिख । पुस्तकों की समीक्षा भी चाहे तो लिख लीगिए । इसके लिए पुस्तक पढने की आवश्यकता नही । बस उलट-पलटकर देख ले, भूमिका पढ़ ले, उपलब्ध हो तो उसी पुस्तक की समीक्षा पढ़ लें । दो-चार गुण दो चार दोष लिख लें, बस हो गई समीक्षा तयार । जब अशोक कुमार 'हम लोग'टी०वी० सीरियल देखे बिना उसकी समीक्षा कर सकते हैं तो आप क्यों नहीं? रचना छपने के तुरन्त बाद विभिन्न नामो से उसकी प्रशंसा उसी पत्रिका के 'सम्पादक के नाम पत्र स्तम्भ मे लिख भेजिए। ऐसा करने से उस पत्रिका के अगले अंको में आपका स्थान रिजर्व हो जाएगा। यदि इतने नुस्खे आजमाने के बाद भी सम्पादक आपकी रचना सखेद लौटाने की धृष्टता करे तो दो चार रचनाएँ उसे और भेजिए । यदि फिर रचना लौटा दे राइटर बनने के चद नुस्खे /75 तो उस पत्रिका में छपी कुछ रचनाओं को वखिया उधेड़कर पोस्ट-मॉर्टम कर डालिए और 'सम्पादक के नाम पर' स्तम्भ मे भेजिए। दोप तो किसी भी रचना में खोजे जा सकते हैं । मुझे आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास है कि सम्पादक आपको रचना प्रकाशित करेगा। इन नुस्खों के आजमाने से आप को निश्चित सफलता मिलेगी। 16/राप मगाया , .. कुत्ता आदमी है 0 दीनदयाल शर्मा शीर्षक पढ़कर चौंकिए नहीं, क्योकि पशुगणना वालो ने अब कुतो को भी पशुओं की श्रेणी में रख लिया है। हो सकता है भविष्य में कुत्तो को जनगणना में भी शामिल कर लिया जाए। चूंकि मैंने जबसे होश सम्भाला है कुत्तों को आदमी ही समझता आ रहा हूं। शायद आपको हंसी आ रही है मेरी इन बातो पर । लेकिन जनाव, कुछ गहराई मे झाककर देखिए । फिर आप मान जाएंगे कि मैं वात तो सोलह आने सही कर रहा हूँ कुत्ते को आदमी कहना इतना बुरा नहीं है जितना कि आदमी को कुत्ता कहना । क्यों सही है न मेरी बात । हाँ तो अव सुनिए । कुत्ते में "वो" क्या नहीं है जो आदमी में है और आदमी में वो क्या चीज है, जो कुत्ते मे नही है । कुत्ते के सींग नहीं होते । कुत्ता नीद कम लेता है । कुत्ता एक-दूसरे पर भौंकता है। मौका मिलने पर काट भी लेता है । कुत्तो में एकता नहीं है। कुत्ता चमचागिरी कर लेता है । कुत्ता भरे बाजार में दिन-दहाड़े एक-दूसरे की इज्जत आसानी से लूट लेता है। कुत्ता कमजोर को खदेड़ देता है । कुत्ते की सूंघने की शक्ति बड़ी तेज होती है। कुत्ता पालतू भी है और जनसंख्या बढ़ाता है तो खाने के मामले में भी पीछे नहीं है, सब कुछ चलता है। घर-घर मांगकर खाने में शर्म महसूस नहीं करता। उपर्युक्त सभी गुण आदमी में नहीं होते क्या? अव तो मान गए मेरी बात कि कुत्ता आदमी होता है। ये तो था तुलनात्मक अध्ययन । इसके अलावा कुछ और भी तथ्य हैं, जिसमें बादमी कुत्ते से दो कदम आगे ही है। मसलन आदमी के पूंछ होती है, कुत्ते की पूंछ से भी बड़ी। बादमी के चार को वजाए छ: पैर होते हैं। फर्क इतना है कि चार कुत्ता आदमी है।77 काठ के और दो उम अपने । सनद रहे, इ.में "आम आदमी" को शामित नहीं किया गया है। कुत्ता "कुता" होने के बाद भी ईमानदार है। यह न झूठ बोलता है, न झूठ आश्वामन देता है और न ही चोरी करता है। नहीं तो परिम के एक होटल मे यह तभी कभी नहीं लगती कि स्वागत है कुत्तों का । इस होटल में कुतों के प्रवेश पर कोई प्रतिवन्ध नही है। यही नहीं, होटल के अन्दर एक बड़ा-मा बोर्ड भी लगा है, जिस पर लिया है-~"हम कुत्तों के प्रवेश की अनुमनि देते हैं, क्योकि ये अपने जूतो को चमकाने के लिए परदो का इस्तेमाल नहीं करते । वे चमचे एकत्र नहीं करते और जाते समय न ही होटल की चादरें ले जाते हैं । आप अगर मेरे विचारों से सहमत नहीं हैं तो ना सही, लेकिन इस बात से तो वाकिफ हैं कि आदमी को कुत्ता बनने में कितनीक देर लगती है। 78/गमगाया हम अंग्रेजों के जमाने के अफसर हैं D भगवतीलाल शर्मा कुछ वर्ष पूर्व मैंने एक फिल्म देखी थी। उसमें एक जेलर का चरित्र था । उसका एक संवाद था-हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं । निर्माता ने इस बेहूदे चरित्र का सृजन मात्र दर्शको को हेमाने के लिए किया था, और वह इसमे पूरी तरह सफल भी रहा था पर आज बहुत दिनो बाद यह बात समझ में आई, कि नही, निर्माता का मकसद मान हेमाना नही था बल्कि कुछ और था और वह यह बताना था कि इस देश में, हमारे अपने इस आजाद देश में, हमारे खून से सोचे और हमारी मांस मज्जा से बने इस देश में, इसी देश का आदमी इसी देश के आदमी पर, जो रिश्ते में भाई होते हैं, अंग्रेजों के जमाने का अफसर ही बना हुआ है । तब वह सम्बाद हमने की चीज नहीं रही, सिर धुनने की चीज बन गया। बात यह हुई कि एक मास्टर साहब अपनी कन्या को शादी के लिए दौड़-धूप कर जी०पी० एफ० का ऋण स्वीकृत करा लाए । दौड़-धूप का मतलब बताने की ज्यादा जरूरत नही है । दौड़ते हुए और देवताओं के धूप देते हुए; यही इसका मतलब है। ऑफिम से बिल भी बन गया। ट्रेजरी से निकलवा भी लिया, अफसर से एन्केश भी करवा लिया और मेरे सामने धर भी दिया-ला दीजिए सर, आज हो जरूरत है । मैंने बिल लिया, जिस्टर मे लिखा है कि बैंक जा रहा हूँ और स्कूल से निकल गया। बिल लेकर ऑफिस आया । अधिकारी जब तक केश कराने वाले के हस्ताक्षर प्रमाणित न कर दे, बैंक बिल लेता ही नहीं। ऑफिस मे छोटे साहब, जिन्हें इस काम के लिए रख छोड़ा है, ये नहीं । यो साहब मिलते भी नहीं । उनका मिलना जरूरी भी नही। मिल जाए तो वे साहब भी क्या हुए ! यों इधर एक कहावत है जहाँ राणाजी, वही उदयपुर । सो जहाँ हम अंग्रेजों के जमाने के अफसर हैं / 79 - साहब, वही दफ्तर मय वह दफ्तर कहाँ है, यह देखना अपनी ड्यूटी है। वैसे हमारे उस ऑफिस में भी वर्ण व्यवस्था है। हमारी किस्मत ही ऐसी है कि हम एक व्यवस्था से निजात नही पाते, उससे पहले दूसरी व्यवस्था किनी चणं यो लिए हानिकारक नहीं है, क्योकि यह पूरी तरह गमाजवादी कही न कहीं जन्म ले लेती है पर हमारी यह कार्यालय वर्ण व्यवस्था व्यवस्था के आधार पर विकसित हुई है। यह मावो का ससार है। इसमे चार वर्ण है---बड़ा साहब छोटा साहब, बाबू साहब और यावी माहव । इस खाली साहय को आप कोई भी भाहब बनाकर अपना काम बना सकते है, क्योकि यह बैठता जरूर स्टूल पर है, पर बड़ी-बड़ी कुगियों का काम करा देने की ताकत रखता है। हम भी मास्टर साहब हैं, यानी हम भी साहब है, मगर हम ऐसे साहब है कि जैसे लोकतय में जनता राजा होती है । दूसरे उन साहयो का सम्बन्ध किसी जनता से तो होता नहीं, सो हम ही इनकी जनता है । ये हमारे साथ व्यवहार भी उतना ही उत्कृष्ट करते है, जितना राजा प्रजा के साथ किया करता था। हमारा वेतन बित देते समय ये हमारी ओर ऐसे ही देखते हैं जैसे हम पर खुश होकर हमें इनाम वौट रहे है। तो मैं छोटे साहब के लिए पूछता हुआ वादू साहब की सेवा में उपस्थित हुआ ? कहता है कि मैं हैडमास्टर हूँ पर इन बाबू साहब के लिए मात्र इनकी जनता हूँ सो उन्होने महरवानी कर मेरी ओर देखा और सोचा-जैसे कि राज- काज में विघ्न डालने का अपराधी हूँ और मेरे लिए कौन-सी सजा तजवीज करनी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी गलती न हो और शेप जनता को भी इबरत मिले । मैं धवराकर वहां से भाग छूटा । मगर भागकर जाता कहाँ ! दरवाजे पर, जहाँ खाली साहब कभी बड़े और कभी बैठे रहते है । कभी आने वाले का इस्तकबाल करते और कभी उनसे सलाम लेते है, आकर खड़ा हो गया उन्होंने दो मिनट, पांच मिनट, दस मिनट मुझे देखा, फिर वहाँ अनधिकार खड़े होने का सवाल पूछा । मैने बता दिया कि हे श्रीमान् ! जो गति गाँव की ओर मुंह करने पर गोदड़ की होती है, वही गति इस समय मेरी हो रही है । वे बड़े दयात सज्जन थे, बोले-~~अनी श्रीमान् दफ्तर मे बड़े साहब विराजमान हैं और आप यहां खड़े हैं। समय बड़ा कीमती होता है, यानी उसे गंवाना नही चाहिए । मैं तरकम से निकलने की तरह वहाँ से छूटा और धनुप से निकलने की तरह बड़े साहब के कमरे में घुसा । (बड़े माहब माफ करना, कमरा मैंने कह दिया वह तो दरवार-ए-खास है। वैसी ही सजावट, वैसा ही सिंहासन वैमे ही आसन ।) और यह देखकर महान् आश्चर्य हुआ कि आज बड़े साहब दफ्तर में हैं। यह सोचकर उससे भी बड़ा आश्चर्य हुआ कि आज मेरी किस्मत कितनी जोर में है। -- 80/राग मरगन्धा मैंने अपने-आपको बड़े साहब के सामने नतमस्तक खड़े पाया। विल हाथ में नहीं होता तो हाथ भी बधे मिलते मेरे । बिल उनकी ओर बढ़ाया है । चिर- परिचित बिल-आदमी नौकरी में आकर सबसे पहले उसी से अपनी पहचान पक्की करता है, वहीं । देखा, फिर भी पूछा उन्होंने क्या है ? मैंने कहा-बिल है। उन्होंने पूछा-"तो मैं क्या करूँ ?" मैंने कहा-"मेरे हस्ताक्षर प्रमाणित कर दीजिए।" उन्होंने आदेश दिया-"शर्मा साहब (छोटे साहब) के पास जाओ।" मैं बोल नहीं सका । बोलने की मनाही नहीं है, पूरी आजादी है । पर वडे साहब हो, चाहे छोटे साहब, वाबू साहव हो चाहे वाली साहब, कोई भी साहब हो, उनके सामने बोलना नहीं चाहिए । वोलना मुंह जोरी में माना जाता है। मेरी दशा उस गुलाम की तरह है, जिसके कोड़े पड़ते हैं, पर मुंह से सिसकी नही निकलती। जानता है. सिसकी निकालने से माहव बहादुर नाराज होंगे और नाराजी मे कोड़ों की सजा घोड़ों की टापों में बदल जाएगी । साहब बड़े हैं, उनकी बड़ी बुद्धि में यह बात कैसे आ सकती है कि छोटे साहब होते तो पागल कुत्ते ने नहीं काटा मुझे कि उनके पास लाता। मैं एक मिनट खडा रहा । उन्होने हाथ हिलाकर कहा कि मैं इस काम के लिए नही हूँ और चेतावनी दी कि भविष्य में इस काम के लिए मुझे परेशान नहीं किया जाए । और कहा कि बिल यहाँ रख दो। मतलब यह था कि बिल यहाँ रख दो और भीड़ खाली करो, यानी वही कि मेरे अंगना पे तुम्हारा क्या काम है । बाहर बैठो, इन्तजार करो, अपनी किस्मत कितनी सिकन्दर है, इसका टेस्ट करो। अब मैंने देखा कि छत पर टॅगा पंखा बड़े साहब को हवा कर रहा है। इधर उनकी हुजूरी मे छोटे साहब विराजमान हैं, उधर बाबू साहब आसीन हैं • मध्य में खाली साहब हाजरी उठाने को तत्पर हैं । कमरे के वातावरण में कुछ पर पूर्व निकलते हंसी के ठहाकों की गूंज है। मैं कहाँ आ गया? यह अपना ही ऑफिस है क्या? यहाँ अपने संरक्षक बैठे हैं क्या ? मैं बाहर निकलकर कार्यालय का नाम पढ़ता हूँ, और तसल्ली कर लेता हूँ कि मैं गलत ऑफिस में नहीं घुसा हूँ। मैं दरवाजे पर खाली साहब के खाली पड़े स्कूल पर बैठ जाता हूँ। अभी वे आएंगे और उठा देंगे, फिर कहाँ बैठेगे? इस ऑफिस में मास्टरो के बैठने के लिए जगह नहीं है । हो भी क्यों ? अपने ही ऑफिस में मास्टर लोग यदि बैठ जाएंगे तो खड़ा कोन रहेगा! वे खड़ा रहने के लिए ही है । हर मेज, हर कुर्सी, हर स्टूल सामने उन्हें खड़ा ही रहना है । वे खड़े नही रहेगे तो उस संसार का साहबी माहौल ही खतम हो जाएगा। और फिर आप यहाँ क्या कर रहे हो मास्टर साहव ? आपको तो स्कूल मे होना चाहिए, आने वाले साहबो की खातिर-तवज्जो के लिए। मेरी किस्मत थी कि मुझे उठाने कोई आया नहीं। क्योकि उस वक्त वे खाली साहब बाबू साहबो के लिए चाय सिगरेट लेने गए थे। के हम अग्रेजों के जमाने के अफसर हैं/81 दिल मेरा बड़े साहब की मेज पर पड़ा है। जाने का साहर का मूड आ जाए, जाने कब साइन हो जाए, और जाने कब मेरे पास आजाए। मैं यहाँ न मिला और खाली साहब बिल पुनः बड़े साहब की सेवा में पहुंचा पाए कि संबंधित गायव है, तो लो, फिर करो पेशी, बड़े साहब के दरबार में। सौभाग्य से इस काम के लिए उनके पास समय को रमी भी नहीं है। गोया उनका जन्म इसी एक काम के लिए हुआ है-इसी काम के लिए, सी एक नेक काम के लिए। इसलिए यही बैठे रहो । पेशाव-पानी भी यन्द रयो। में बैठा हूँ, वही स्टूल पर । मेरा दिल बड़े साहब की टेबल पर पायल कबूतर की तरह फड़फड़ा रहा है। क्या बिगड़ जाता उनमा ? काम कितना-सा पा? हाय हिलाकर मुझे नटने मे, मुंह चोलकर दो पात पूछने में उन्होंने जितना कप्ट उटाया, जितना समय गंवाया, उसका एक अश भी उस काम में नहीं लगता। वे भी खुम, में भी खुश । लेकिन क्यों करे ऐसा, उनका मूड ही नहीं बना वैसा । कोई आपकी जबरदस्ती नहीं, उनकी मरजी। करे तो करें, न करें, तो न करे। वे आपके गुलाम नही । वे अफसर हैं, और अफसर भी बंग्रेजों के जमाने के हैं। बाप सोच रहे होगे कि मैं उस स्टूल पर कितनं आराम से बैठा हूँ, पर मैं हो जानता हूँ मैं उस बिल को कितनी असह्य प्रसव पीड़ा भोग रहा हूँ, जबकि बिल बड़े साहब के गर्भ में चल रहा है। 82/राग मंगन्धा अपेक्षा स्वर्ग की रामस्वरूप परेश - । यह भी कोई समय था उसके आने का। रात के दो बज रहे थे कमबख्त कमरे मे आ धमका। ऐसे समय में न उधार मांगने वाला आ सकता और न आयकर अधि- कारी। ऐसे निश्चित समय में लाल-लाल आँखों से घूरते हुए कड़ककर मुझे खड़े होने का आदेश दिया। मैं एक वारगी पुलिसमैन की-सी उठी हुई नुकीली मूंछों को देखकर घबरा गया। उसने कहा मैं तुम्हें लेने आया हूँ। मैं वोला, "लेने तो आज तक हमें कोई आया ही नही, हम तो मामूली आदमी हैं, सदा बुलाए ही जाते हैं।" वह कड़ककर बोला-"मजाक करते हो। जानते नही यह तुम्हारा अन्तिम समय है और तुम्हारे सामने खड़ा है यमदूत।" मैंने हाथ जोड़कर कहा--"आप महान हैं, सर्वशक्तिमान हैं, मृत्यु देवता के आज्ञाकारी सेवक हैं...।" इतने विशेषणों का प्रयोग यह सोचकर किया कि कम्पाउण्डर को डॉक्टर कहने पर वह मरीज का विशेष ध्यान रखता है, पुलिस चौकी के सिपाही को थानेदार का सम्बोधन थोड़ा विनम्र बना देता है, तथा मामूली चपरासी को चतुर्थ श्रेणी का अधिकारी कहते ही वह बॉस की सारी कमजोरियां खोलकर रख देता है तो शायद यमदूत पर भी इस प्रक्षेपास्त्र का कोई असर हो। मैंने कहा-''आप चाहें तो अभयदान भी दे सकते हैं और मोहलत भी। अभी बच्चे छोटे हैं, नगर पालिका का चुनाव आने वाला है, दो-तीन दिन में वेतन मिलने वाला है।" शायद वह थोड़ा प्रभावित हुआ और बोला-"कुछ भेट-पूजा दो तो कुछ समय की मोहलत पर विचार किया जा सकता है।" "भेट-पूजा," मैंने आश्चर्य से पूछा। "हा-हाँ, मृत्युलोक का आदमी और भेंट-पूजा शब्द पर इतना आश्चर्य ! तुम तो ऐसे पूछ रहे हो जैसे भ्रष्टाचार समाप्त होने की खबर सुनी हो । क्या अपने - अपेक्षा स्वर्ग की/83 + राष्ट्रीय धर्म को भी नहीं जानते, इसी गुण के कारण ही तो वसुधैव कुटुम्बकम् जैसी उदार भावना पैदा होती हैं।" "समझा-समझा" मैंने कहा । एक मिनट में लौटने के लिए कहकर बराबर के कमरे में गया। इधर-उधर खोज-बीन के बाद एक दस रुपये का नोट मिला। वह लाकर मैंने उसे थमाते हुए उसको मुख-मुद्रा पहचानने का प्रयत्न किया । उसने त्योरियां वदली, “वाह ! मुझे चपरासी के स्तर की रिश्वत देते हो । अफसर के स्तर की रिश्वत देते तव तो कुछ समय की मोहलत देने पर विचार भी करता। भला इतने से पैसों के लिए अपना ईमान क्यों बिगाडू ?" "पर साहब इतने पैसों में तो पुलिस का सिपाही भी कुछ समय तो दे ही देवा है।" मैंने विनम्नता से कहा "आप तो जानते ही हैं कि आज 29 तारीख है और ऐसे समय दस रुपये का नोट सौ के बराबर है। नौकरी पेशा आदमी इन दिनो में नक्सल पंथी हो जाता है। महीने का पहला सप्ताह वह पूंजीपति होकर गुजारता है और दूसरा समाजवादी होकर, तीसरे में कम्युनिस्ट बन जाता है और चौथे मे ?" उसने बीच ही में टोककर कहा--"वस-बस बन्द करो अपना भाषण और चलो मेरे साथ, हमेशा के लिए इस दुनिया से। मैं विवश था, क्या करता ! दर- वाजे से बाहर निकल आया, जिज्ञासा थी इसलिए पूछ लिया- "यमदूतजी । यमलोक का तो हवाई मार्ग है ना?" : "हाँ-हो, और क्या पैदल जाएगा!" "पैदल तो आजकल कोई तीर्थ यात्रा भी नहीं करता। मेरा कहना यह है कि अव वायुयान से यात्रा और यमलोक को यात्रा में कोई अन्तर नहीं है, फिर लाश भी कनिष्क विमान के ब्लेक बॉक्स की तरह मिले तो मिले।", वह यह सब सुनने के मूड में नहीं था। पलक झपकते ही मुझे यमराज के सम्मुख खड़ा कर दिया । एक सज्जन मेरे आगे खड़े थे। उनकी वेशभूषा से लगता, था कि वे कोई नेता थे। यमराज ने कड़ककर मेरे आगे खड़े नेता से कहा- "हमारा दूत तुम्हे लाने गया और तुम उसे मिले, ही नहीं । यह विलम्ब से पहुँचने का क्या कारण है ?" मेरे आगे वाले सज्जन अपनी दूधिया टोपी को तनिक ठीक करते हुए होठो पर मिश्री घोलते हुए बोले-"श्रीमान्, हम नेता हैं, जलसा हो या उत्सव, घाटन हो या शोक-सभा, सबसे विलम्ब से पहुंचना हमारी सांस्कृतिक, परम्परा है। परम्परा का उल्लघंन करना हमारे सम्मान के खिलाफ है।" , "वाह ! कैमी परम्परा है तुम लोगों की? क्या जनता ऐसे लोगों को माफ कर देती है।" यमराज ने पूछा। "जनता। हमारे देश की जनता बड़ी समझदार है। मैं मन्त्री बना ही था। एक उद्घाटन समारोह में जाना पड़ा । समय ठीक अपराह्न ३ बजे था, मैं ठीक समय । 3 84/राग भरुगन्धा . पहुँचा। तो क्या देखता हूं कि आयोजक दौड़-धूप में लगे हैं । कोई शामियानाला रहा है तो कोई कनात, दरीवाले दरी विछाने में व्यस्त हैं, लाउडस्पीकर वाले.." "तुमने क्या इसे सभा समझा है जो भाषण दे रहे हो?" जो कहना है जल्दी कहो । यमराज ने बीच में टोकते हुए कहा। "श्रीमान्, यह मेरा समय पर पहुंचने का पहला और अन्तिम अवसर था। इसके बाद मैंने कभी ऐसी भूल नही की। जनता की भी मानसिकता विकसित हुई है समय पर पहुँचने वाले को अच्छा नेता नहीं समझा जाता और आप जानते हैं कि इस छोटी-सी बात के लिए कोई क्यो अपनी प्रतिष्ठा गिराए।" "ठीक है, तुम्हे नरक में जाना पड़ेगा।" "पर क्यों साहब, मैंने तो समाज-सेवा को है, लोगो की सदा भलाई ही की है।" नेताजी ने गिड़गिड़ाते हुए कहा। "एक व्यक्ति कल आया था। वह बता रहा था कि तुमने बाढ़ मे डूबते हुए लोगों को छटपटाते हुए हैलिकॉप्टर में बैठकर देखा । वह तो बेचारा पेड़ पर चढ़ गया था, तब कुछ देर के लिए बच गया था, वर्ना." "पर श्रीमान् हमने ही तो कहा था कि पेड़ लगाओ। हमारी नीतियों के कारण ही तो वह बच गया था।" "नहीं, तुम्हें नरक में जाना होगा" यमराज ने कहा। "मुझे तो एक सम्मान समारोह में जाना है। लोग मेरी प्रतीक्षा कर रहे होगे।" "सम्मान समारोह रुक गया होगा। इस वक्त लोग तुम्हारी शोक-सभा मना रहे होगे।" यमराज बोले। "मुझे जाने दीजिए साहब, वर्ना मेरा फूल मालाओं का, अभिन्दन पत्र छप- वाने का, फोटोग्राफरों, और जल-पान आदि का सारा पैसा बेकार चला जाएगा। उन सबका मैंने ठेका दे रखा है।" "तुम बड़े काइयाँ आदमी हो, तुम्हें माफ नही किया जाएगा, यमदूत इसे नरक में डाल दो।" एक यमदूत नेताजी को घसीटता हुआ एक ओर ले चला। अब को मेरी वारी थी। मैंने हाथ जोड़कर कहा, "मैंने कभी कोई गलत काम नही किया । अब इसकी सजा दें या इनाम, यह आप पर निर्भर करता है।" यमराज बोले-"तुम्हें भी नरक में जाना पड़ेगा।" मैंने कहा-"हमारे देश मे ऐसा समाजवाद अभी नहीं आया है, एक नेता जहां गए हैं, वहां एक मामूली आदमी को क्यों भेज रहे हैं? मुझे किसी अन्य स्थान पर भेजिए वर्ना नेताजी नाराज होंगे और वैसे मैंने नेताजी जितने महान् कार्य किए भी नहीं हैं।" "तुमने जीवन-भर सब अच्छे काम किए ?" "जी हाँ, मैंने अपनी समझ में सब अच्छे काम किए। सदैव सच वोला ईमान- अपेक्षा स्वर्ग को/85
दारी का निर्वाह किया."
"क्या तुम इतना कुछ करने के बाद चन से जिए?"
"जी नही, लोगों ने मुझे बेवकूफ समझा और मुझे सदैव परेशान किया
गया।"
"तो इसीलिए तुम्हें नरक में भेजा जाएगा। जब सत्य और ईमानदारी से
तुम श्रेष्ठ नही समझे गए और सदैव दुःखी रहे तो अब कौन-से स्वर्ग की अपेक्षा
करते हो?"
मैं उनको देखता रह गया, यमदूत मेरी बाँह पकड़कर घसीटने लगा।
861 राममाया
साहित्य साधना ० अर्जुन 'अरविन्द' उम्मेदीलाल ने विद्यार्थी-काल में पढ़ा था कि साहित्यकार समाज का पथ-प्रदेशक होता है, साहित्यकार महान् होता है। तभी से मन में यह बात बैठ गयी कि उन्हें साहित्यकार ही बनना है, महान् बनना है। उम्मेदीलाल हिन्दी-साहित्य के विद्यार्थी थे। कॉलिज में उत्सव था। मुख्य अतिथि के रूप मे एक प्रसिद्ध साहित्य- कार को बुलाया गया था। मुख्य अतिथि का जिस शान से सत्कार हुआ, उमें अपनी आँखो से देखा तो उम्मेदीलाल की भावना और भी प्रवल हो उठी। उन्होने भी सुना था कि साहित्यकार के ठाठ बहुत ऊंचे होते हैं । बंगला. कोठी, मोटर और सेवक आदि मभी कुछ होते हैं । एक रचना प्रकाशित होने पर कई सो पारिश्रमिक के मिलते है । कवि-सम्मेलन मे जाने पर दो हजार रुपये और प्रथम श्रेणी का किराया। पुस्तक प्रकाशित होने पर हजारों रुपये की रॉयल्टी घर आती है । जहाँ जाओ सम्मान-ही-सम्मान । फिर साहित्यकार तो वह हस्ती है, जिसे मरने के बाद भी पीढ़ियो तक याद किया जाता है। तुलसीदास, कालिदास, सूरदास जैसी हस्तियों को लोग आज भी नहीं भूले है। तभी ने उम्मेदीलाल के मन-मस्तिष्क में भी भावना बलवती हो गयी कि उन्हें भी साहित्यकार बन दिखाना है और अपने कस्वे, जिले, प्रान्त और देश का नाम रोशन करना है। विद्यार्थी-काल, से ही उम्मेदीलाल को लेखन का जोश चढ़ने लगा। उन्होने लिखने का प्रयत्न किया, परन्तु यह कार्य उन्हें दुरूह लगा। फिर भी उन्होने माहस का दामन नहीं छोड़ा। अपने हिन्दी के प्रोफेसर से मार्गदर्शन प्राप्त किया। राह कुछ आसान होती लगी। उसी वर्ष उनको एक रचना पहली बार कॉलेज-मैगजीन मे छपी। अपने नाम के साथ छपी रचना देखकर उम्मेदीलाल को एक नशा-सा छा गया। हर किती.को पह कॉलेज-मैगजीन दिखाते और अपनी रचना पर प्रशंमा साहित्य-साधना/87 प्राप्त करने की आशा में उस व्यक्ति का पीछा नहीं छोड़ते। स्नातक परीक्षा मे उम्मेदीलाल ने प्रथम श्रेणी प्राप्त की। उनके सहपाठी मित्र ने कहा-"उम्मेदोलाल, चलो, दोनो आई० ए० एस० का फार्म भर दें।" "अपने राम को गुलामी पसन्द नहीं । अधिकारी भी बन जाओ तो क्या है, जीवन-भर पराधीन रहना होता है। मुझे तो साहित्यकार वनकर समाज की सेवा करना है।" और उम्मेदीलाल ने रात-रात भर जागकर साहित्यिक पुस्तकों और पत्रिकाओ का अध्ययन-मनन शुरू कर दिया। कुछ रचनाओं का प्रसव उनकी लेखनी से हुआ। अपनी रचनाएं उन्होंने देश की शीर्ष-पत्रिकाओं में प्रकाशनार्थ भेजी, लेकिन सम्पादक के अभिवादन तथा खेद सहित वापस लौट आयीं। निराशा ने उनके हृदय की चौखट पर अड़ने का बहुत प्रयास किया, परन्तु उम्मेदीलाल ने उसे अपने पाम फटकने भी न दिया। उनकी मान्यता थी कि एक दिन सफलता अवश्य उनके चरण चूमेगी। वही से उम्मेदीलाल को साहित्य-साधना शुरू हो गयो । बीसों कहानियाँ उन्होंने लिख डाली और दो-चार उपन्यास भी। उनकी रचनाओं मे प्रवाह था, गहनता थी, लालित्य था और समकालीनता थी, पर किसी बड़ी पत्रिका में उनका प्रकाशन न हुआ। कुछ लघु पत्रिकाओ ने सम्मान सहित उनका प्रकाशन किया। उनकी रचना-धर्मिता की समीक्षा हुई। फिर एक उपन्यास भी प्रकाशित हुआ, परन्तु प्रकाशक रॉयल्टी मार गया। दस वर्ष तक अनवरत साहित्य-साधना के पश्चात् उम्मेदीलाल ने अनुभव किया कि उन्होंने बहुत कुछ पाया तथा बहुत कुछ खोया है। इस बीच वह एक अदद पत्नी के पति और तीन बच्चों के पिता बन चुके थे। घर अभावों तथा दरिद्रता से पूरी तरह अंट चुका था। फिर भी मन में एक सन्तोष था कि उन्होंने साहित्य-साधना का पवित्र कार्य किया है। समाज को 'कुछ दिया है, यही क्या कम है ? इसी आत्म-तुष्टि के सहारे उनको लेखनी अनवरत चलती रही। उम्मेदीलाल सपने देखते और उन्ही सपनों के सहारे आगे बढ़ने का प्रयल । करते रहे। आदमी सपनो के सहारे आखिर कब तक जी सकता है? उम्मेदीलाल का सपना तब टूटा जब आठ वर्षीया बड़ी पुत्री दवा के अभाव में मृत्यु का शिकार बन गयी। सुन्दर और युवा पत्नी दरिद्रता से संघर्ष करती हुई मात्र कंकाल दिखने लगी। शेष दो बच्चे भी कुपोषण के शिकार हो गए और वे स्वयं भी असमय वृद्धा. वस्या की गिरफ्त में आ गए। उम्मेदीलाल स्वप्न से जागे तो बहुत देर हो चुकी थी। अब तो राजकीय-सेवा में प्रवेश पाने की आयु भी निकल चुकी थी। उनका सहपाटी मित्र आई० ए. । 88/राग मगन्धा एस० अधिकारी बन चुका था और अब विभागीय आयुक्त के पद पर नियुक्त था। वह जब कस्बे में आता तो उसके पत्नी तथा बच्चों के ठाठ निराले होते । मित्र सुविधाभोगी था और उम्मेदीलाल अभावों की मार सहते-सहते टूट चुके थे। वह आक्रोश, पश्चात्ताप और विद्रोह की आग में जलने लगे। गृहस्थी की नौका डूबने को धी। किसी तरह उसे बचाना ही था । अन्तिम आशा लेकर उम्मेदीलाल एक प्रकाशक के पास गए-"मेरे कुछ उपन्यास प्रकाशित कर दें!" किसी तरह साहस जुटाकर वोले-"हो सके तो कुछ अग्रिम दे दीजिए।" प्रकाशक अनुभवी था। वह उम्मेदोलाल की प्रतिभा से परिचित था। उसने उम्मेदीलाल को सिर से पांव तक देखा। फिर मुस्कराकर बोला--"उम्मेदी- लालजी, आपके उपन्यास सतही लेखन की उत्कृष्ट रचनाएँ है, लेकिन उन्हें मैं प्रकाशित नही कर सकता।" '"क्यों?" "इन्हें आजकल पढ़ता कौन है ? अगर आप लेखनी से कुछ अर्जित करना चाहते हैं, तो वह लिखिए, जिसे आज के छात्र, महिलाएं और औसत श्रेणी के पाठक पसन्द करते हैं । मैं समझता हूँ, आप अच्छा और खूब लिख सकते हैं। यदि आप वैसा उपन्यास लिख सकें तो मैं अभी पांच सौ रुपये आपको आधा एडवांस दे सकता हूँ। उपन्यास आप पन्द्रह दिन में दे सकते हैं। आप चाहें तो हर महीने आपका एक उपन्यास छप सकता है।" उम्मेदीलाल अच्छी तरह समझते थे कि प्रकाशक कैसा उपन्यास मांग रहा है। प्रकाशक का प्रस्ताव स्वीकारने को उनका मन तनिक भी न था, यह दूसरे ही क्षण उनकी आंखों के आगे सौ-सौ के पांच नोट फड़फड़ा रहे थे। पत्नी की साड़ी बच्चों के लिए दूध, दवा, रोटी"। अनायास उम्मेदीलाल के मुख से शब्द निकल गये--- मैं पन्द्रह दिन से पूर्व ही आपको उपन्यास दे दूंगा।". ' उसी दिन उम्मेदीलाल का लेखक मर गया पर उम्मेदीलाल जीवित हो गए। प्रकाशक हर उपन्यास पर उन्हें अच्छी राशि देने लगा। उनके उपन्यासं का संस्करण बीस हजार से कम न होता। सैक्सी-पत्रिकाओ में भी उम्मेदीलाल की कहानियों की भरमार होने लगी। दो ही वर्ष में उम्मेदीलाल ने स्कूटर खरीद लिया है । पत्नी की सुन्दरता और यौवन फिर से लौटने लगा है और बच्चे नई पोशाक मे स्कूल जाने लगे हैं। : . साहित्य साधना) 89 मूखं-शास्त जगदीश प्रसाद सैनी ... मैट्रिक भी मेरी मूर्खता ने मुर्खता पर शोध करने का सपना देखा था। प्रस्तुत 'मूर्ख-शास्त्र' उसी का साकार रूप है। इसमे विभिन्न सोतों से मूर्योपयोगी सामग्री का संग्रह कर समाज के मूर्ख नैतिक पक्ष को मोखिक ढंग ने प्रस्तुत किया गया है। 'मूर्ख-शास्त्र' के प्रणयन में मैं अपनी मूर्खता का सदुपयोग करने में कहा तक सफल हुआ हूं, इसका निर्णय तो सुधी-मूर्ख ही करेंगे। भूर्खता वह है जो मूर्ख द्वारा की जाती है । और मूखं वह होता है जो मूर्खता करता है। पहले मुर्गी या अण्डा' के अंदाज में अब सवाल यह उठता है कि पहते मूखं पैदा हुआ कि मूर्खता ? विना मूर्ख के मूर्खता पैदा कैसे होगी और बिना मूर्खता के किसी को मूर्ख कहा जा सकता है ? फिर भी भूखं और मूर्खता को 'गिरा-अरथ जल-वीचि सम' अभिन्न नहीं माना जा सकता। मूर्खता करने वाला मूर्ष ही हो, यह जरूरी नहीं है। बड़े-बड़े बुद्धिमानो और विद्वानों ने सूचनाएं की हैं। कहते हैं न्यूटन ने छोटी और बडी बिल्ली को निकालने के लिए एक ही वक्से में छोटे-बड़े दो छेद बनाए थे। एक महान दार्शनिक घड़ी को खोलते पानी में डालकर अण्डे मे टाइम देखता रहा। क्या इन महानुभावों को मूर्व कहा जा सकता है ? जैसे कई लोगों को पाण्डित्य के बिना पडितजी कहलाने का सौभाग्य प्राप्त हो जाता है वैते ही कई दुर्भाग्यशालियों को मूर्खता किए बिना भी मूर्ख का खिताब मिल जाता है। हाँ, इतना अवश्य है कि जैसे ज्ञान की चरम सीमा पर पहुँच कर ज्ञाता और शेय एक हो जाते हैं वैसे ही मूर्खता की चरम सीमा पर पहुंचकर मूर्ख और मूर्खता का भेद मिट जाता है। मूर्धता का इतिहास बहुत पुराना है । अनुसंधानकर्ता विद्वान मूों ने मूर्खता 90/ राग मगन्धा के ऐसे अवशेष खोज निकाले हैं जिनसे प्रमाणित होता है कि मूर्खता मानवता से भी पुरानी चीज है । मूर्खता का शिकार होने के लिए जब धरती पर मानव का आविर्भाव नहीं हुआ था तव पशु-पक्षी मूर्ख होते या बनाये जाते थे। गीदड ने शेर को मूर्ख बनाकर कैसे कुएं में कुदा दिया, गंगदत्त नामक मेढक ने प्रियदर्शन सर्प को कैसे फंसा दिया, वेर खानेवाले वन्दर का मोठा कलेजा खिलाकर अपनी प्रिया को खुश करने की इच्छा रखनेवाले मगर को उसके बन्दर मित्र ने कसे मूर्ख बनाया बादि प्राचीन कथा-साहित्य की कहानियां इस तथ्य को प्रमाणित करती है। मूर्खता को मापने के भी लोगों के अपने-अपने मीटर हैं । मैं मूर्ख समझा जाता हूँ क्योंकि मैट्रिक फेल हूँ हातांकि हमारे जीवन चाचा बी०ए० पास होकर भी लडका को 'लङका' लिखते हैं, शादी को 'सादी' बोलते हैं, सुमित्रानन्दन पन्त के नाम के साथ 'श्रीमती जोड़ते हैं, हिमालय को अफीका में बताते है, राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ और संयुक्त राष्ट्र संघ को एक ही समझते है । पर चूंकि वे वी०ए० पास हैं, इस- लिए मूर्खता के सारे रेकार्ड 'बोट' करने के बावजूद लोगों की नजर में वे मूर्खता- लेविल से उतने ही ऊँचे हैं जितनी सी-लेविल से एवरेस्ट की चोटी । इसी प्रकार मास्टर की नजर में छात्र मूर्ख हैं क्योकि वे उनकी गलत-सलत वातो को चुपचाप न मानकर प्रश्न करते हैं। छात्रों की दृष्टि में मास्टर मूर्ख हैं क्योकि वे उन्हे विना पडे ही पास नहीं करते। मास्टरों के लिए हेडमास्टर 'सुपर- केक है क्योकि वे उन्हें पढ़ाने के लिए कहता है। हारा हुआ नेता जनता को मूर्ख कहता है क्योकि वह उसे मूर्ख होने की वजह से वोट नहीं देती। कालावाजारियो के लिए ईमानदार इन्स्पेक्टर मूर्ख है क्योकि वह घूस खाकर उनके केस को रफा-दफा नही करता। मेरे एक स्वजाति बन्धु ने रहस्योद्घाटन किया कि हमारी जाति मूर्ख है क्योंकि उसमें जातिवाद नही है। एक मित्र के पिता एक दिन दुःखी होकर कहने लगे--'तुम्हारा यह दोस्त तो मूर्ख है। इसे समझाओ न ! कहता है-दहेज बिल्कुल नही लूंगा। वेवकूफ कही का!' मतलव.यह कि किसी को मूर्ख मानने के सम्बन्ध मे मुण्डे-मुण्डे मतिभिन्ना है। मूर्ख-शास्त्रियों एव मूर्खता के अधिकृत विद्वानों की राय में मूर्य होना बुरा नही मूर्खता जाहिर है का निर्माण किया है, होना है तो चुप रहा जाये- 'दूरात शोभन्ते मूर्खा वस्त्राभूषणं भूषितः तावत शोभा मूर्खस्य यावत् किंचित न भापते ।' इस निर्देश का पालन न करने की वजह से मैं कई बार दण्डित हो चुका हूं। एक बार अपने हिन्दीवाले मास्टर साहब से पूछ बैठा --'गुरुजी, 'बकरी' को "वक' क्यो नही लिख सकते ?' बस, फिर क्या था? उन्होने झट मुझे पहचान मूर्ख-शास्त्र/91 - लिया-'तुम मूर्ख हो ! मुर्गा बन जाओ!' वेशक मन मे मूर्य और 'जूण' मे दुखी कोई नहीं होता। जैसे आँखे ससार को देख सकती हैं पर युद को नहीं, वैसे ही संसार-भर की मूर्खता को देखनेवाले मूर्ख को भी अपनी मूर्खता नजर नही आती। हर मूर्ख को यह मुगालता है कि मेरे अलावा सव मूर्ख है। हालांकि ऐसे मौके भी आते हैं जव लोग अपनी मूर्खता को सरेआम स्वीकारते है । पर यह स्वीकारना सिर्फ मुंह से ही होता है, मन से नहीं। उनके लिए अपनी मूर्खता की सार्वजनिक स्वीकारोक्ति अपनी महत्ता को उद्घोषणा का साधन मात्र होती है । 'जो कुछ हुआ, उसकी सम्पूर्ण जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते हुए, नैतिकता के तकाजे के कारण मैं अपने पद से त्याग-पत्र देता हूं।' कहने वालो का वास्तविक आशय यह होता है-'जो कुछ हुआ मेरी नही औरो की मूर्खता से हुआ। यह मेरी महानता है कि मैं उनकी मूर्खता का जिम्मा अपने ऊपर लेता हूँ। चूंकि मैं इस धरा-धाम पर अनैतिकता के विनाशार्थ अवतीर्ण हुआ हूँ अतः नैतिकता की स्थापना के लिए मैं औरो की मूर्खता की वेदी पर अपने पद का बलिदान करता हूँ। ससार मेरे इस त्याग को जाने, माने और इतिहासकार शहीदों की सूची मे मेरा नाम दर्ज कर ले।' अपनी महानता को मूर्खता के पैकेट में 'पंक' करके पेश करने की प्रवृत्ति भी नयी नही है । सूर-तुलसी केशव जैसे महाकवियो ने अपनी मूर्खता स्वीकार की मैं मूरख जनम गंवायो - सूर वरन तुलसीदास किमि, अति मति मन्द गवार-तुलसी, . तिन भासा कविता करी, जडमति केसवदास-केशव . हर कोई जानता है कि ये कवि वास्तव मे महान थे, मूर्ख नही, अतः इन स्वीकारोक्तियो मे उनकी विनयशीलता ही प्रकट होती है, मूर्खता नही । पर उनकी नकल करते हुए आज जो मूर्ख है वे भी अपनी मूर्खता का इजहार इस शान से करते हैं जैसे तो वाकई मूर्ख न हो। सभा-सम्मेलनो के अध्यक्ष पद से बोलनेवाले अधिकाश लोग अपनी जिस मूर्खता का दावा करते है वह प्रायः सही हुआ करता है- 'मुझे अकिंचन को आपने जो गौरव दिया, मैं उसके योग्य नही था।' पर मन मे वह स्वय को न केवल इस गौरव के योग्य ही मानता है बल्कि उसका एकमात्र अधिकारी भी समझता है । लोग भी उसके सच को झूठ मानकर उसकी महानता और विनय- शीलता को सराहते नहीं थकते। मूओं की एक 'कैटेगरी' है-'निर्मित मूर्ख।' यह मूर्यो को जरा हल्की 'क्वालिटी' है । निर्मित मूर्ख मूलतः मूर्ख नहीं होता, बनाया जाता है । वह ऐसा भोला प्राणी होता है सहज विश्वास कर लेता है। फलतः चतुर-चालाक किस्म के लोग उसे मूर्ख बनाकर अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं । मूर्ख बनाने की कला का 92/ राग मरुगन्धा इतिहास भी काफी पुराना है । समुद्र-मन्थन के समय दानवो को मूर्ख बनाया गया, देवताओं ने दधीचि को मूर्ख बनाया, रावण ने सीता को छला, भस्मासुर ने भोले बाबा की बुरी गत बनायो, इन्द्र-चन्द्र ने गौतम ऋषि को मूर्ख बनाकर अहिल्या की अस्मत लूटी और जुए के खेल में मूर्ख बनाकर कौरवो ने पाण्डवो का राज्य हड़पा । कहने का मतलव यह है कि 'देव-दनुज-नर-नारि-मुनि' में से कोई भी मूर्ख बनने से नहीं बचा । मूर्ख बनाने को आधुनिक पद्धति का सूत्रपात अंग्रेजो ने किया । उन्होंने 'मूर्ख बनाओ, राज करो' की नीति अपना कर राज किया और जाते-जाते विभाजन के रूप मे हमारी मूर्खता का बेहतरीन तोहफा हमे थमा गये । आज तो मूर्ख बनाने की कला अपने चरमोत्कर्ष पर है । जो इस कला मे जितना माहिर है, वह जीवन में उतना ही सफल होता है। अतः हर कोई 'मूर्ख बनाओ' अभियान में जी-जान से जुटा हुआ है । शायर नौसिखियाओं को मूर्ख बनाने की कला में प्रशिक्षित करने के लिए ही प्रति वर्ष 'फर्स्ट-अप्रैल-फूल' जैसे भूर्ख महोत्सव मनाये जाते हैं और महामूर्ख सम्मेलन जैसे समारोह आयोजित किये जाते है। महामूर्ख सम्मेलनो की मूर्खता का स्तर काफी ऊँचा होता है। बड़े-बड़े लोग खुशी-खुशी स्वेच्छा से मूर्खता का वरण करते है और अवसरानुकूल वेश-भूषा से सज्जित हो, मूोचित गरिमा धारण कर बड़ी शान से मंच पर विराजते है। यहाँ मूर्खता भी पद्मश्री, पद्म- भूषण, पद्मविभूषण जैसे अलंकरणो का प्रतिरूप बन जाती है.। सम्मानित लोग फूले.नहीं, समाते और जिन्हें. मूर्ख बनने का 'चान्स' नहीं मिलता वे हाय मलकर पछताते है । जैसे शिवजी के अंगो पर लगी श्मशान की राख भी शोभाकारी और पावन हो जाती है, वैसे ही ऐसे अवसरों पर मूर्खता जगत की महान हस्तियो का साहचर्य पा.स्वयं धन्य हो उठती है। , ' , । भले ही राष्ट्र-प्रेमियों के रहते राष्ट्र-विरोधी तत्त्व खुल कर खेलते रहे हों, पर मूर्खता का इतिहास साक्षी है कि मूर्खता-प्रेमियों ने मूर्खता-विरोधी तत्वों को कभी , नही वख्शा है । ईसा, सुकरात, गांधी आदि का जो हन हुआ, उसे सभी जानते हैं ता कोई नया मसीहा जन्म पा जाता है, जो हाथ मे मूर्खता ध्वज उठाकर नारा लगाने लगता है-'दुनिया के मूर्यो ! एक हो । तुम कुछ नही खोओगे, सिवा अपनी अक्ल के। हे मूर्ख शिरोमणियो! आज तुम अपनी गौरवशाली मौखिक परम्परा को: विस्मृत किये हुए हो । देखो, आज हमारी मूर्खता पर सकट के बादल मंडरा रहे है। जो इस संकट की घड़ी में मूर्खता के लिए बलिदान करने के लिए तैयार नहीं, वह कायर है, मूर्खता के नाम पर कलंक है । हमारा उद्देश्य है एक स्वतन्त्र मूर्ख समाज ; का निर्माण-~जिसमें मूर्खता के सिवा और कोई न रह सके, मूर्खता के अलावा अन्य किसी धर्म का माननेवाला न रहे । हमारी मातृ-भाषा मूर्खता के अलावा अन्य कोई । मूर्ख-शास्त्र/93 भाषा न पढ़ाई जाये। अपने उद्देश्य की प्राप्ति हेतु हमें मूर्खतापूर्ण ढंग से मूर्खता आदोलन चलाना है । एक मूर्खता-वाहिनी का निर्माण करना है, जो मूर्खता-विरोधी ताकतो से टक्कर ले सके। वोलो, 'मूर्ख एकता जिन्दावाद । जातिवाद, सम्प्रदाय वाद, क्षेत्रीयवाद, भापावाद आदि सभी वादों की जड़ मे मूर्खतावाद ही है, जो जंगल की आग की तरह भड़कता और फैलता है। मूर्खता का नशा सव नशो से खतरनाक है। सामाजिक, आर्थिक, सास्कृतिक पुनरुत्थान को जगह जमाना मूर्खता के पुनरत्थान की नियति को ढो रहा है। मध्यकाल से लेकर प्रागैतिहासिक काल तक की तमाम मूर्खताओ के जखीरे का भार लादे वैज्ञानिक युग के मानव को जर्जर नौका रक्त सागर मे डूवती उतराती इक्कीसवी सदी का किनारा पाने छटपटा रही है । एण्टी-मूर्खता शक्तियो की स्पष्ट चेतावनी के वावजूद कि-'खीर न खाज खारी रे वाला मूर्ख न कीजे मिन्त' आज सबसे ज्यादा मित्र मूों के ही मिलेंगे। मूर्खता से परहेज करनेवाला समाज में अकेला और अलग-थलग पड़ जाता है । मूर्खता का अक्ल से सनातन वैर रहा है । इसीलिए मूर्ख कोअक्ल के पीछे लट्ठ लिए फिरने वाला कहा गया है । यह लट्ठ अक्ल के साथ-साथ अक्ल वालों को भी कपाल-क्रिया कर सकता है । इसी खतरे को ध्यान में रखते हुए विद्वान भूर्खाचार्यों ने सख्त हिदायत दे दी है-'मूर्ख न दीजे सीय।' मगर मूर्खता के विरुद्ध संघर्ष करने वालों ने किसी खतरे की परवाह नहीं की। अपनी सीख जारी रखी। मेरी दृष्टि में साहित्य का सूत्रपात ही मूर्खता के खिलाफ सीख देने के निमित्त हुआ है। कबीर आदि ने निर्भीक होकर तमाम तरह की मूर्खताओ की जिस निर्ममता से धज्जियां उड़ाई है वह साहित्य के मूर्खता मंजक स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है। आदमी-आदमी के बीच कृत्रिम, भेद पैदा करने के लिए उन्होंने पोगा पण्डितों और कठमुल्लाओ की मूर्खता को समान रूप से सताड़ा- 'दुइ जगदीश कहाँ ते आये, कहो कौन भरमाया?' यह भेद-भाव, यह द्वत ही सबसे बड़ी मूर्खता है । इस मूखंता की चक्की के दो पाटो के वीच आज भी आदमी और आदमीयत बुरी तरह पिस रही है और किसी 'कबीरा' को रोना ही नही आ रहा। भूखों का एक महत्त्वपूर्ण प्रकार है-'समझदार मूर्य' जैसे चोरी के धन्धे में सर्वाधिक ईमानदारी चलती है वैसे ही मूर्यता के. कामों मे समझदारी को सबसे ज्यादा दरकार होती है। समनदार मूर्य वह मूर्य होता है जो मूर्यता को समझदारी गे सम्पन्न करता है। बड़े-बडे पूंसयोर, मिलावट और कालाबाजारी करने वाले, जुनापर और वेश्यालय चलाने वाले, अपहरण, बलात्कार और हत्या करने वाले, दहेज के लिए बहुओं को जलाने वाले, बैंक लूटने वाले, बड़े-बड़े काण्ड, पपले और पोटाले करने वाले मूर्यो की इसी श्रेणी में बाते हैं। ये बड़ी-बड़ी रेकार्ड बोट' और 94/राग मरुगन्धा 'ब्लण्डर' मूर्खतायें ऐसी समझदारी से करते हैं कि अव्वल तो पकड़ में ही नहीं आते, किसी तरह पकड़े भी गये तो बाइज्जत बरी हो जाते हैं। मूर्खता के लिए विभिन्न प्रतीकों के प्रयोग का प्रचलन है । इन प्रतीको मे भंस का महत्त्वपूर्ण स्थान है। अकल बड़ी या भैस' मे अकल के विरोध में भैस को रखने का मकसद उसे मूर्खता का प्रतीकत्व प्रदान करना ही है। इसीलिए समझदारी ने "भैस के आगे वीन बजाने' का डट कर विरोध किया है । कुछ लोग मूर्ख का प्रतीक लट्ठ को मानते हैं । वच मूर्ख के लिए 'लाप', 'मूसलचन्द' (मूसल भी लट्ठ का ही परिष्कृत परन्तु सशक्त रूप है) आदि सम्बोधनों का प्रयोग इस मान्यता की. पुष्टि करता है। तब तो 'जिसकी लाठी उसकी भैस' की व्यवस्था इस प्रकार होनी चाहिए-'मूर्खता पर मूखों का जन्मसिद्ध अधिकार है। कभी-कभी ऊँट को भी मूर्ख का प्रतीक बनने का गौरव प्राप्त हो जाता है। 'अकल के तोडे ऊंट उभाणा' लोकोक्ति से यह बात प्रमाणित होती है । इस सम्बन्ध मे पशुओं में गधा और पक्षियो मे उल्लू सर्वाधिक 'लक्की' प्राणी रहे हैं। मूर्खता ने इन पर कहाँ तक कृपा की है यह तो शोध का विषय है पर जन सामान्य से लेकर मूर्खता के प्रकाण्ड पण्डितों तक ने इन दोनों को मूर्खता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करने में अपनी उदारता का भरपूर परिचय दिया है । किसी को बड़े-से-बड़े मूर्ष के रूप में सम्मानित करना हो तो उसे 'गधा' कह दो, बात बन जायेगी। कवियो के प्रतीक जरा 'रिफाइण्ड' है । तुलसी ने इस सम्बन्ध में नारी को 'ओब्लाइज' किया है --'समुझि नारि जड़ सहज अयानी।' बिहारी ने उस आदमी को मूर्खता का प्रतीक माना है जो ‘हाथिन को वौपार' नही करता और इत्र के गुण-दोष नही जानता। गनीमत है कि वे साहित्य में 'आम आदमी' का झण्डा हिलानेवालों के जमाने में पैदा नही हुए वर्ना छठी का दूध याद आ जाता । कवीर ने अन्धता को मूर्खता का प्रतीकत्व बख्शा है- 'जाका गुरु भी आंधला, चेला परा निरन्ध ।' मूर्खता के कारणों का विश्लेषण करते हुए समझदारो.ने मूरों के खोपड़े में भूसा से लेकर गोवर तक भरा होने को परिकल्पनाएँ को है । इन परिकल्पनाओ का आधार शायद मूर्खता का भैस से सम्बद्ध होना हो सकता है। लोगों का अनुमान है कि मूर्यो के खोपड़े मे भैस सूक्ष्म रूप में विराजमान रहती है जो भूसा खाकर गोबर करती रहती है । इन परिकल्पनाओ की सत्यता को परखने के लिए प्रयोग जारी हैं । समय के साथ-साथ जहाँ मूर्खता का चहुंमुखी विकास हुआ है वहाँ मूर्खता के मानदण्डों में भी प्रगति हुई है। आज मूर्ख वह है जो ममय का पाबन्द है, जो अपने कर्तव्य का पालन निष्ठा से करता है, जो किसी को धोखा नही देता, जो चालबाज और धूर्त नहीं है, जो धूंस नही खाता है, जो सिफारिश नही मानता है, जो भाई- भतीजो का ध्यान नहीं रखता है, जो मौके का फायदा नहीं उठाता है, जो बहती गगा में हाथ नहीं धोता है। । ०० मूर्ख-शास्त्र / 95...
अयोदय विद्यालय
त्रिलोक गोयल
पात्र
० स्वामी अग्रोहाचार्य -अग्रोहा तीर्थ के पीठासीन
• चौधरी चन्द्रसेन-अग्रोहा तीर्य के प्रशासक
श्रेष्ठि लक्ष्मीचन्द अग्रोहा तीर्थ के नगर सेठ
• विद्यानन्द सरस्वती अग्रसेन विश्वविद्यालग के कुलपति
• सरदार शीलसिंहअग्रोहा तीर्थ के महादण्ड नायक
• दिव्य दृष्टि-गुरुकुल माता (छात्रावास प्रबन्धिका)
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स्थान
अग्रोहा तोय : वर्तमान हरियाणा राज्य में नवनिर्मित नगर, अग्रवाल समाज के
संस्थापक महाराजा श्री अग्रसेन को प्राचीन राजधानी । अप्रसेनजी को
गणराज्यों का प्रथम गणपति, समाजवाद का प्रवर्तक, समन्वय का प्रतीक,
सत्य, अहिंसा, न्याय, वीरता, त्याग-तपस्या का पालक माना जाता है।'
उन्होंने कई रूदियों को तोड़ा तथा नवनिर्माण कगये।।
अग्रोहा तोयं में स्मित भन्म अग्रमेन मन्दिर के प्रा अनौ-
पचारिक बैठक! मभी पात्र स्थान बैठे हैं।
धिकारियो से बहुत ऊपर होता है, क्योकि धर्म, समाज औ सत्ता तीनों का सम्यक समन्वय और मार्गदर्शन आप जैसे त्यागी-तपस्वी ही करते हैं। आप हम सभी के लिए श्रद्धेय व वदनीय है। अतः कृपया बैठे-बैठे ही अपनी बात कहे। अग्रोहाचार्य : (वैठते हुए) काश ! आज राष्ट्र में सर्वत्र यह पारस्परिक विश्वास, सद्भाव और विनम्रता का वातावरण होता । महाभागो! आप सभी इस विराट देश और वृहद् समाज के कर्णधार है। स्वतन्त्रता के पश्चात, विशेष रूप से विगत तीन दशको से मैं यह अनुभव कर रहा हूं कि साम्प्रदायिकता, उच्छं खलता, सामाजिक कुरीतियां, भूख, गरीबी, भ्रष्टा- ... चार आदि ने सम्पूर्ण वातावरण को प्रदूषित कर दिया है । जनजीवन त्रस्त होता जा रहा है, सुख-शान्ति का नामोनिशान नहीं है। शीलसिंह : महाराजश्री का फर्माना विलकुल दुरुस्त है। अभी हाल ही में अपने राज्य की सीमा पर बस यात्रियों की नृशंस हत्याएं की गयी है। देश के .. : कोने-कोने में धर्म-सम्प्रदाय, भाषा-भूपा, क्षेत्रो के नाम पर खून-खरावा हो रहा है । आदमी, आदमी नहीं रहा, राक्षस हो गया है । लक्ष्मीचन्द : इधर भूख-गरीवी-महंगाई-वेरोजगारी, उधर अकाल, नशा, हड़ताले, फैगन परस्ती, विदेशी बैंकों में काले धन का संचय, आदि दिनोंदिन बढने लगे हैं। चन्द्रसेन : : ऊपर से नीचे तक चारों ओर भ्रष्टाचार व्याप्त है। अधिकारियो द्वारा अपराधियों को सरक्षण, वोटो की राजनीति, गुण पूजा नहीं, व्यक्ति पूजा, ' मैं, मेरा परिवार, मेरा दल पहले देश पीछे, यह गहित भावना, श्रम के प्रति- हीनता, छात्र आन्दोलन, अपना दोप, अपनी असफलताएँ दूसरों के मत्ये थोप देना और पराया श्रेय स्वयं ले लेना, ऐसे विनाश के सारे ही लक्षण एक माथ प्रकट हो रहे हैं। दिव्यदृष्टि : अन्धविश्वास, कुरीतियां, स्पर्धा और झूठी शान ! कोढ़ में खाज दहेज, जिसके कारण निरपराध ललनाओ के जलने-जलाने के पैशाचिक कर्म इस देश-समाज को रसातल में पहुंचाकर मानेंगे। विद्यानन्द : लक्षणों और परीक्षणो द्वारा अनुभवी लोग रोग तो जान जाते हैं, आप लोगों ने भी जान लिए हैं पर वात निराशा की नहीं, रोगों के निवारण की है । समस्याओं के निराकरण की है । घोर अन्धकार में दीया कोन जलाये? कैसे जलाये? अग्रोहाचार्य : आघात जड़ पर करना चाहिए कुलपति विद्यानन्दजी ! निवारण की स्थिति तो बाद की है, हमे कारण ही नष्ट करना होगा जिससे रोग अनोदय विद्यालय/97 .
- उत्पन्न ही न हो। न रहे वास न बजे वांसुरी। इन सबका दोषी है कौन? वह दोपी है "शिक्षण' ! शिक्षण शरीर में सचरित होनेवाले उस रक्त के समान है जो देह के हर भाग को पोपित करता है । यदि वह शुद्ध है तो शरीर पुष्ट होगा, यदि वह अशुद्ध है तो शरीर रुग्ण ! विद्यानन्द : आपका कथन शत प्रतिशत सही है गुरुदेव ! गुरुकुल वे ढलाई खाने हैं, जहां देश का भविष्य ढलता है। विद्यालय वे पावन मन्दिर है जहां सजीव पत्थरो को घड कर देव मूर्तियां बनायी जाती है। शीलसिंह : (व्यन्य से मुस्कराकर) ये ढलाई खाने आज देश का भविष्य वना नहीं रहे, विगाड़ रहे हैं । देव प्रतिभाएं नही, दानवों की मूर्तियां घड़ी जा रही हैं । राष्ट्र की नीव होती है युवा-शक्ति, विद्यार्थी वर्ग! आज यह भूली- भटकी पीढी प्रलयंकर शकर की तरह महाविनाशक हो रही है । अग्रोहाचार्य : माखन मथने से ही निकलता है ! तो अब आप सब लोग इस निष्कर्ष पर पहुँच गये हैं कि शिक्षा ही राष्ट्र की आधारशिला है, रीढ़ है ! जिस देश की शिक्षा दोपपूर्ण होगी उसकी उन्नति और जिसकी निर्दोष होगी उसकी अवनति हो नहीं सकती। चन्द्रसेन . आश्चर्य है कि सत्य का सूर्य हम अब तक क्यों नहीं देख पाये ! अपेक्षित सफलताएँ न मिलने पर झण्डे, पण्डे, डण्डे, हथकण्डे सब कुछ बदलने पर मर्ज बढ़ता गया ज्यों-यो दवा की। रोग मिटे तो मिटे कसे? दर्द पेट में और बाम मली जा रही है सर पर । आगे बढ़ने की जगह पिछड़ रहे हैं, और सुनहरी सपना देख रहे हैं। लक्ष्मीचन्द. ..पर चौधरी साहब ! क्या झण्डे पण्डे बदलने के साथ-साथ शिक्षा नीति को नहीं बदला गया? चन्द्रसेन : हाँ बदला तो गया है । कई बार बड़े-बड़े शिक्षा आयोग बैठाये गये हैं ! राधाकृष्णन आयोग, कोठारी आयोग बगैरह पर दुःख यही है कि परिणाम वही ढाक के तीन पात। दिव्यदृष्टि : इसलिए कि संस्कृति, नीति, जीविका विसरी, यही मूल मे भारी भूल । शिक्षा और परीक्षा मे हो, रोटी-विमल कमल का फूल ।। तक्षशिला, नालन्दा देखो, देखो ऋषियो के आश्रम । साधन सीमित, साध्य उच्च हो, हटे विदेशी शिक्षा क्रम । ऐसी शिक्षा हुए विना राम-कृष्ण, लव-कुश हो नहीं सकते । आज विद्यार्थी का अर्थ विद्या की अर्थी ले जानेवाला हो गया है । विद्यानन्द : और अब तो हमारे युवा प्रधानमन्त्री शिक्षा मे आमूल चूल परिवर्तन 93/ राग मरुगन्धा । करने के लिए नयी शिक्षा नीति चालू कर रहे है । दस जमा दो की पद्धति, गरीब देश में करोड़ो की लागत के नवोदय विद्यालय । शायद इस शैक्षिक क्रान्ति से कुछ बदलाव आये! अग्रोहाचार्य : बदलाव जरूर आयेगा! वह बात दूसरी है कि वह शुभ होगा या अशुभ । इसका निर्णायक होगा समय। सुसंस्कार, विनयं दे विद्या, शिक्षक को सम्मान मिले। विकसित हो मस्तिष्क-हृदय, साहित्य-कला के सुमन खिले ।। गुरु में गुरुता हो, आदर्श चरित्रों का निर्माण करे। श्रम, शुचिता, स्नेह, समता हो तब यह हिन्दुस्तान तरे॥ आदर्श और व्यवहार का तालमेल हुए विना काम नहीं चलने का ! अग्रोहातीर्थ में ऐसी शिक्षा चलानी है, जो महाराज श्री अग्रसेन को समता, ममता और क्षमता को अपनाकर कीर्तिमान स्थापित कर सके। विद्यानन्द : उस सशिक्षा का स्वरूप जानने के लिए ही तो हम सब उत्सुक है आचार्य प्रवर। अग्रोहाचार्य : (मुस्कराकर) आप विद्यानन्द है (दिव्य दृष्टि की तरफ संकेत कर) मातः श्री दिव्य दृष्टि हैं, शिक्षा क्षेत्रका आप लोगों का पर्याप्त अनुभव है। शिक्षा नीति कैसी हो इस सन्दर्भ में आपने अपनी कविताओं के माध्यम से मेरी भावनाओं के अनुकूल ही प्रकाश डाला है। जिस तरह में झांसी की रानी उसी तरह अग्रोहा is हो, रोटी और कमल का फूल। दिव्यदृषि र देश और विका और विद्यानन्द पात्मिकता, सन्तुलित 11 NUK अग्रोहाचार्य : गुरु को गुरु बनना होगा, गुरु बनाना होगा। गुरु का अर्थ है बड़ा, महान । एक साधारण पेट भरने वाले, जीव से उसे ऊपर उठना होगा, आदर्श बनकर बताना होगा। शीलसिंह : (हंसकर) हम तो सिपाही है. महाराज ! तट मार भाषा जाननेवाले, गूढ तत्व की बाते क्या जाने ! आप तो स्पष्ट आदेश दीजिए कि किस- किमको क्या-क्या करना है। अग्रोदय विद्यालय /99 अग्रोहाचार्य : (आदेशात्मक स्वर मे) चौधरी साहब ! आप इस देश के प्रशासक हैं, सबसे अधिक दायित्व आप पर आता है। आप अपने क्षेत्र में कुछ 'अग्रोदय विद्यालय खोले जिनमे साधनोपर कम साध्य पर अधिक वल दिया जाये। निर्जीवों और सजीवों पर अधिक ध्यान दे। आदमी से बड़ा कुछ नहीं है, जनहित को सर्वोपरिमाने, विद्यालय आत्म निर्भर, अध्यापक आश्वस्त और छात्र राजनीति से दूर हो। आवश्यकतानुसार सभी से योगदान ले । सवको लगे कि ये शालाएं हमारी है । चन्द्रसेन : (नतमस्तक हो) जो आज्ञा गुरुदेव ! प्रशासक, पूंजीपति और जनसेवी सस्थाएं मिलकर शीघ्र ही इसकी व्यवस्था करेंगे। अग्रोहाचार्य अग्रोहा विश्वविद्यालय के कुलपति श्री विद्यानन्दजी सरस्वती और गुस्कुल माता श्रद्धेया दिव्यदृष्टि जी, एक पखवाड़े भर में ऐसी शिक्षा नीति निर्धारित करे, पाठ्य-क्रम और विधान वनायें जो मस्तिष्क से अधिक हृदय का विकास कर सके। सवको सुख, सुविधाएं और सन्तोष मिले । भविष्य के प्रति निश्चिन्त हो । मात्र वर्तमान जीवी न होकर दूर तक देख सकें। वच्चे-बच्चे मे यह भावना भरे कि परिश्रम और ईमानदारी से बडा कर्तव्य नही है और सबके प्रति अपनत्व रखने से पुनीत न कोई पुण्य है, न धर्म ! आदर्शों को व्यावहारिक बनाना और मानवीयता को महत्व देना है। आवश्यकता समझे तो समय-समय पर मुझसे परामर्श लेते रहे ! मेरी कुटिया के द्वार सदैव आप लोगो के लिए खुले हैं। दिव्यदृष्टि : आपने देश, समाज के लिए जीवन-हवन किया है पूज्यपाद ! आपका 'मार्ग-दर्शन हमारे लिए अमोघ वरदान होगा। विद्यानन्द : आपने हमारा मार्ग सुगम और प्रशस्त किया है, आपको साधुवाद है ! सब कुछ आपके आदेशानुसार ही होगा ! अग्रोहाचार्य : और सरदार शीलसिहजी !' आपको अनुशासन और शान्ति बनाये रखना है । इसके विना किसी प्रकार का विकास नहीं होता । पारस्परिक विश्वास होना बहुत जरूरी है। जहां अपराधियो, को. दण्डित और अयोग्यों की भर्त्सना करना आवश्यक है,वहां प्रतिभा सम्पन्न और योग्य व्यक्तियो को ... आवश्यक है! + - . कर प्रोत्साहित नगा .
वह सुविधा भर जुटा दें कि हर हाय को काम और हर मुंह को निवाला)
मिल सके ! जव जीवन का अस्तित्व खतरे में नहीं होगा, जव शिक्षा में
शक्ति और आकर्षण होगा तो कौन हतभागी बहती गंगा में हाथ नहीं
धोयेगा!
लक्ष्मीचन्द : सत्य वचन महाराज ! पटरी से उतरी गाड़ी को एक बार लाइन पर
लाना ही कठिन है, फिर तो वह सरपट दौड़ेगी !
अग्रोहाचार्य : तो सब कुछ निश्चित हुआ ! सबके लिए दिशा निर्धारित हुई ! हर
व्यक्ति अपने-अपने काम में जुट जाये, सफलता निःसन्देह है। कार्य की
योजना बनाओ, योजना पर कार्य करो! ईश्वर कल्याण करे।, बोलिए
श्री अग्रसेन महाराज की"
जय।
अग्रोहाचार्य : अग्रोहा नरेश को...
सव:
सव:
जय।
पटाक्षेपः
००
1
अग्रोदय विद्यालय / 101
अभी तो मैं मरा नहीं गौरीशंकर आर्य पान : रावण "लंका का राजा भगवान शंकर स्थान : एक वन प्रदेश समय : दिन [सामने परदे पर जगल का दृश्य है । दूर एक नगर दिखायी दे रहा है, जिसके एक भाग मे रावण का पुतला रस्सियो से बंधा दिखायी देता है । एक वृक्ष के नीचे रावण पद्मासन लगाये नेत्र वन्द किये."ॐ नमः शिवाय" का जाप कर रहा है । सामने लाल कपड़ों से बंधी दो पुस्तकें एक चौकी पर रक्खी हैं । रावण ने धोती और मूल्यवान उत्तरीय धारण कर रक्खा है। मस्तक पर मुकुट है । भुजवन्ध, बड़े मोतियो की मालाएँ तथा जनेऊ दीख रहे है। धोती के ऊपर कमर मे केसरिया दुपट्टा अलग से बंधा है । ललाट पर त्रिपुण्ड है । मूछे गहरी और मुड़ी हुई तथा केश कन्धों के पीछे लटके हुए। पौराणिक पारम्परिक वेप मे भगवान शंकर का प्रवेश] शंकर : लंकेश ! हम मा गये वत्स ! आज इतनी व्याकुलता से क्यो याद किया? रावण: (चौंककर नेत्र खोलते हुए भगवान शिव के चरणो में दण्डवत प्रणाम के prin 102| राग मरुगन्धा । : साथ-साथ) पाहिमाम् आशुतोप, पाहि माम् ।। यकर : उठो वत्स, तुम्हारा कल्याण हो । आज तुम्हारे मन में इतनी पीड़ा क्यों है ? ऐसा तो कभी नहीं हुआ। चारों वेद-वेदाग और पडदर्शन मे पारंगत "दशानन जैसी सर्वोच्च प्रज्ञा-उपाधि से अलंकृत, परमवीर दशग्रीव को इतनी व्यथा हो जाना, आश्चर्य है। रावणः प्रभो, उधर देखिए ! आज आश्विन शुक्ला दशभी है न । विजयादशमी के नाम पर मेरा पुतला जलाया जाने वाला है। प्रति वर्ष यही होता है। स्वामी ! मेरा ऐसा अपमान क्यो है ? क्या दोप है मुझमें ? शंकर अकारण कोई कार्य नहीं होता लंकेश ! जिस व्यक्ति में अभिमान, दम्भ, आत्मश्लाघा की लिप्सा, और परदारा-हरण जैसे दुराचरण के दर्शन हों उसका तो अपमान ही होगा न । रावण : (व्यथित स्वर में) यह ''यह आप कह रहे हैं भूतेश्वर, अब मैं क्या निवेदन करूं। 'प्रभो, आप मेरे उपास्य भी हैं और पूज्य गुरु भी। कृपा करके आप ही मुझे मेरे दोषों से अवगत करा दीजिए, क्योंकि मनुष्य अपने अवगुण स्वयं नहीं देख सकता। मुझे मेरे अपराध एक-एक कर बताइए देव ! कि वे क्या है और उनका प्रमाण क्या है । स्वामी, दाह-दण्ड-प्राप्त अपराधी को अपने दोष-विमोचन का अवसर प्रदान करना न्याय संगत ही माना जाएगा। शकर : भारत के रामभक्त तुम में कितने और किस प्रकार के दोष देखते हैं यह तो वे ही जानें किन्तु सामान्यतः तुम पर अभिमान, दम्भ, आत्म प्रशंसा, हठ और परस्त्री-हरण जैसे आरोप लगाये जाते हैं । किन्तु सबसे बड़ा दोष तो श्रीराम से विरोध करना माना जाता है। राम-विरोधी तो भारतीय जन-गण-मन सहन नहीं कर सकता। रही प्रमाण की बात, नो रामकथा के बहु-प्रचलित और चर्चित अन्य दो ही हैं। महर्षि वाल्मीकि की 'रामायण' और महाकवि तुलसी का "गमचरित मानस"। इनमें भी संस्कृत में होने से रामायण सबके लिए नहीं रही, जबकि प्रामाद से पर्णकुटी तक राम- चरित मानस को पताका फहरा रही है । तुम्हारा पुतला जलानेवाले लोग प्रापः रामचरित मानस के ही अध्येता है। अतः प्रमाण के लिए वही ग्रन्थ उनके सामने रहता होगा। यण और स्वयं तुलसी के अनुसार यह वही "मानस" है, जिसे आपने रचा और आदरपूर्वक अपने मानस मे रख लिया था। फिर सुसमय आने पर आपने माता पार्वती को मुनाया था । तुलसी ने कहा है- अभी तो मैं मरा नहीं/ 103 रचि महेस निज मानस राखा। अवसर पाइ सिवा सन भाया ।। शंकर तुम्हारा कयन सत्य है। रावण प्रभो, यद्यपि मै उक्त दोनों पावन ग्रन्थ साथ मे ले आया हूं, परन्तु आपसे अधिक सत्य प्रमाण अब और क्या होगा। हे महेस, क्या इस सेवक को आप कृपा करके निज दोप-विमोचन का अवसर प्रदान करेगे? किन्तु पहले मैं श्रीचरणों से अभय की कामना करता हूँ। शकर - तुम अभय हुए पुत्र, निस्संकोच अपनी बात कही। रावण (प्रणाम करके) अनुगृहीत हुआ देव । "क्षमा करो प्रभो, यदि रामचरित मानस के आधार पर ही मुझ पर आरोप लगे है तो उसी ग्रन्थ के प्रमाणो से मै दोष-विमोचन की अनुमति चाहता हूँ। अस्तु विषय प्रवेश से भी पूर्व दो बाते कहना चाहूंगा। प्रयम-मैं और मेरा भाई कुम्भकर्ण दोनो आपके ही तो सेवक थे। शीलनिधि राजा की कन्या को प्राप्त करने की हास्यास्पद चेप्टाएँ जव महर्षि नारद ने की थी तो उनकी वानर मुखाकृति को देखकर हम दोनो हंसी नहीं रोक सके और मुंह से कुछ निकल ही पडा- तह बैठे महेश-गन दोऊ। विप्र वेष गति लखइन कोउ ।। करहिं कूट नारदहिं सुनाई। नीकि दोन्हि हरि सुन्दरताई।। रीझहिं राजकुरि छबि देखी। इन्हहिं बरिहिं हरि जानि विशेपी॥ अन्त मे असफलता से खिन्न नारद ने हमे देखकर श्राप दे दिया-- होउ निसाचर जाइ तुम कपटी पापी दोउ । इस शाप को सुनकर हमने उनके चरणो मे पड़कर क्षमा मांगी और अपना परिचय दिया तो नारदजी ने हमे त्रिलोक विजयी और बलवान बनने का वरदान दे दिया। भला नारद की वाणी कभी असत्य हो सकती है ! अतः वही हुआ। हर-गन हम, न विप्र मुनिराया। वड़ अपराध कीन्ह, फल पाया ।। श्राप अनुग्रह करहु कृपाला । बोले नारद दीन दयाला ।। निसिचर जाइ होउ तुम्ह दोऊ । वैभव विपुल तेज बल होऊ ॥ भुजबल विश्व जितब तुम जहिआ। धरिहहिं विप्नु मनुजतन तहिआ॥ समर मरन हरि हाथ तुम्हारा । होइहहु मुकुत, न पुनि ससारा। और दूसरी बात यह, कि यदि में श्रीराम का विरोधी न वनता तो उनके हाथो मेरी मृत्यु नही होती और तव महर्षि नारद की वाणी भी असत्य 104 / राग मरुगन्धा हो जाती। अतः वह तो भवितव्यता ही थी, जिसका मुझे ज्ञान था। अब मैं अपने दोप-विमोचन के लिए सादर नम्र निवेदन कर रहा हूँ कि मानस मे मेरी वाणी प्रथम वार तव सुनायी देती है जब जीवन भर के लिए कुरूप कर दी गयी मेरी बहिन सूर्पनखा ने मेरी भरी सभा मे विलाप किया और मैने अपना बल बताकर उसे धैर्य दिया। और मैं करता भी क्या। मेरे स्थान पर कोई और होता तो शायद वह यही तो कहता कि वहिन रो मत, मै यह कर दूंगा- वह कर दूंगा आदि। परन्तु मुझे गहरी चिन्ता हो गयी थी। यो तुलसी ने भी मेरे लिए इतना ही कहा सूपनहिं समुझाइ करि, बल बोलेसि वहु भौति । गयउ भवन अति सोच वस, नीद परहिं नहिं राति ।। चिन्ता का कारण यह भी था कि खर-दूषण जैसे महावीर श्रीराम ने मार डाले थे परन्तु प्रसन्नता भी यी कि पाप-योनि से मुक्ति का समय शायद आ गया है। मुझे नारदजी का वरदान याद आ गया कि विष्णु के अवतार से ही मेरा मरण रणभूमि में होगा। मै सोचने लगा कि- खर दूपण मोहिं सम बलवता । तिन्हहिं को मारइ बिनु भगवंता॥ सुर रंजन भजन महि भारा । जो भगवंत लीन्ह अवतारा ।। तो मैं जाइ वैर हठि करऊँ। प्रभु सर प्रान तजे भव तरऊँ। होइहिं भजनु न तामस देहा । मन क्रम वचन मन्त्र दृढ़ एहा। तामसी वृत्तियो के कारण ईश्वर-भजन और भक्ति सम्भव नही जानकर ही मैंने मन, वचन और क्रम से हठ और शत्रुता करने की दृढ-प्रतिज्ञा कर ली थी। और इसी कारण तो मैंने सीता देवी का हरण किया था क्योकि इसी कुकृत्य मे तो राम मुझे प्राणदण्ड दे सकते थे। मैंने इन्द्रपुत्र जयन्त का प्रसंग सुन लिया था कि राम अपनी प्रिया सीता को कष्ट पहुँचानेवाले को कभी क्षमा नही करते है । क्षमा करे देव, मानस रचकर भी शायद आपको याद नहीं है । यो आपने देख लिया होगा। तुलसी गवाह हैं कि सीता को स्पर्ण करने के पूर्व मैने उनके चरणों मे मन-ही-मन प्रणाम किया था। सुनत वचन दससीस रिसाना । मन महुँ चरन वदि सुख माना। और यह ढंग मैंने स्वयं श्रीराम से ही सीखा था, जब उन्होने आपका धनुष तोड़ा था- गुरुहिं प्रणाम मर्नाह मन कीना । अति लाघव उंठाइ धनु लीना ।। और, अविनय क्षमा हो प्रभो, जब आपका विवाह हो रहा था तो वरासन 1 अभी तो मैं मरा नहीं/ 105 पर बैठने से पूर्व आपने भी अपने उपास्य श्रीराम का स्मरण (नमन के साथ) किया था। माता पार्वती को देवताओ ने भी मन में ही प्रणाम किया था। बैठे सिव विप्रन्ह सिर नाई। हृदय सुमिरि निज प्रभु रपुराई। जगदम्बिका जानि भव भामा । गुरन्ह मनहिं मन कीन्ह प्रनामा ।। अस्तु, मैंने भी माता सीता को मन-ही-मन प्रणाम कर लिया था। जिसके चरणों मे प्रणाम कर लिया जाए उसमें पली भाव कैसे हो सकता है ! एक प्रमाण और भी है स्वामी। वाल्मीकि की साक्षी प्रस्तुत है। हनुमान जर सीताजी की पोज में लंका आये तब उन्हें मेरे अन्त.पुर की प्रत्येक स्त्री की पूरी जांच पडताल करनी पड़ी। क्योकि उन्होंने गीता को देखा ही नहीं था। अतः यह ऐसी स्त्री की तलाश में थे,जो यहाँ बलपूर्वक रसपी हुई हो! परन्तु 'आत्मश्लाघा मत समाना पूज्य, "वहाँ उन्हें न तो "पूर्व कामा" [मेरे महल में आने से पूर्व यह अन्य किसी की कामना कर रही और न "अन्यकामा" [मेरी पत्नी बनने के बाद भी किसी अन्य को चाहती हो] ही रमणी मिली। सभी ने स्वेच्छा से मेरा वरण किया था। क्या इससे मेरे आचरण का कोई पवित्र सकेत नहीं मिलता? दोनों प्रन्यो के दो प्रमाण सेवा मे सादर प्रस्तुत हैं, देव ! श्री राम का विरोधी में क्यो बना और माता सीता के प्रति मेरे क्या भाव थे यह मैंने निवेदन किया। अब आपका ध्यान में आदर पूर्वक विभीषण की तरफ आकृष्ट करना चाहता हूँ। यदि मैं राम का विरोधी ही होता तो क्या अपने भाई विभीषण को श्रीराम का स्मरण कारते या उनकी भक्ति करते सह मकता था! सीता-हरण के पूर्व से ही वह प्रति प्रातः उठकर श्रीराम-नाम का जाप करता था । उसके भवन के द्वार पर रामा- युध के चिह्न अकित थे। तभी तो लका में छिपकर आये हनुमान ने यह सब देखा था--- रामायुध अकित, गृह सोभा, बरनि न जाइ। नव तुलसिका वृद तह देखि हरष कपिराइ॥ -मन सहूँ. तरफ़ कर कपि, लागा ! तेही समय विभीषन जागा । राम नाम तेहि मुमिरन कीन्हा । हृदय हरप कपि, सजन चीन्हा ।। माकर: यह भी तो सम्भव है कि तुम्हे विभीषण की गतिविधि शात न हो। 106/राग मरुगन्धा 1 . 3 +2 रावण : समझ गया स्वामी, यही सही, किन्तु जब हनुमान लंका को जलाकर चले गये तब भी क्या मैंने अपने नगर का अवलोकन नहीं किया होगा ! अपने परिजनों को संभाल नही की होगी ! भूतभावन, मैने अपनी आँखो से देखा था कि लका में केवल विभीषण का घर ही अछूता वचा था। जारा नगर निमिष एक माही । एक विभीषन कर गृह नाही ।। मुझे सारी लंका को जली हुई और केवल विभीषण का घर बचा देखकर क्रोध और शका हो जाना अस्वाभाविक तो नही था। इसी आवेश में मैंने उसकी किसी बात पर ध्यान नहीं दिया तो यह सहज स्वाभाविक है स्वामी । परन्तु वास्तविकता तो वही थी कि मैं किसी भी व्यक्ति की ऐसी बात सुनना और मानना नहीं चाहता था जिसमें सीता को वापस लौटा देने की सलाह हो, क्योकि सीता को प्राप्त करते ही श्रीराम मुझे पमा करके लौट जाते। फिर मेरा मरण उनके हाथो कैसे होता? यही कारण था कि मैंने माल्यवन्त, विभीषण, मन्दोदरी आदि किसी की बात नही मानी । लंका दहन से सारे राक्षस मन-ही-मन घवरा उठे थे। उन्हे आशंका हो गयी थी कि अब सब मारे जायेंगे. निज-निज गृह सब करहिं विचारा । नहिं निसिचर कुल केर उबारा॥ मन्दोदरी को भी नगरवासियो की घबराहट की सूचना मिली तो मेरे महल मे पहुंचते ही उसने भी वही बात कही- तात राम नहिं नर भूपाला । भुवनेश्वर कालहु कर काला ।। देहु नाथ प्रभु कहुँ वैदेही । भजहु राम बिनु हेतु सनेही॥ भला मैं उसे कैसे समझाता कि मैं स्वयं राम के हाथों मरना चाहता हूँ और मेरे इस कथन को वह कैसे सह सकती थी ! इसलिए मैं उसको यह कहकर चल दिया- . रे कॅपहि लोकप जाको त्रासा । तासु नारि सभीत बड़ि हासा ।। इसके अतिरिक्त मैं उसका मन प्रसन्न करने के लिए क्या कह सकता था। राज्य सभा में गया तो वहाँ भी विभीषण का वही उपदेश मिला। उसको देखते ही मेरे मन में एक विचार आ गया कि विभीषण ही मेरी मृत्यु का रहस्य जानता है। जब तक यह मेरे पक्ष में है श्रीराम मेरा वध नहीं कर सकेंगे। "आपका ही तो वरदान था प्रभो। अतः मैंने उसके उपदेश पर भयकर बनावटी क्रोध प्रकट कर उसे लात मारकर घोर अपमानित करके अभी तो मैं मरा नही / 107 i (सकेत मे) श्रीराम से मिल जाने और रहस्य कह देने की वात कह दी थी। [ताकि अपमानित होकर विभीषण आत्महत्या कर ले या अन्यत्र चले जाने के बजाय सीधा मेरे शत्रु राम के पास चला जाए और मेरी मृत्यु से अपमान का बदला चुका ले] कहसि न खल अस को जग माही। भुजवल जाहि जिता मैं नाही ।। मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहिं कहु नीती॥ और प्रभो, मेरी चाल काम कर गयी। जव श्रीराम मेरे मस्तक काटते. काटते थक गये तो उन्होने विभीषण की ओर देखा। तभी विभीषण के मुख से निकल पड़ा- नाभि कुण्ड पियूप वस याके । नाथ जिअत रावण बल ताके ।। वस, फिर क्या था श्री राम ने इकत्तीस वाण एक साथ छोड़े और- सायक एक नाभि-सर सोपा । अपर लगे भुज-सिर करि रोपा। और उसी समय मेरे जीवन का अध्याम समाप्त हो गया। शकर : हाँ, यह सब मुझे याद है किन्तु तुम्हारे दम्भ का एक उदाहरण तो है ही। जव श्री राम समुद्र पर पुल बांधकर लका के किनारे आ पहुंचे तव तुम्हे चिन्तातुर हो युद्ध या सन्धि का कोई भी उपाय सोचना था, किन्तु तुमने पर्वत-शिखर पर नृत्य सगीत का आयोजन किया । यह दम्भ नही तो क्या था? रावण : हे त्रिपुरारि, आप स्वय रणपण्डित है। मैं क्या निवेदन करूं, आप मेरी वात को प्रगल्भता समझ लेगे फिर भी मेरा निवेदन है कि यो ही राज्य- सभा के बीच मैने यह सूचना मुनी कि राम इस पार आ गये तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। मै विश्वास ही नहीं कर सका कि समुद्र पर पुल बन गया। इसी घबराहट मे मैंने दस वार पूछ लिया। जैसे किसी अति प्रिय के अनिष्ट की सूचना पर कोई पूछता जाता है- क्या वह अमुक नाम? उनका पुत्र? वह गोरा लम्वा-सा? क्या वही जो अभी कल ही लोटा है ? आदि । मेरी इस घबराहट को सभासदो ने भांप लिया । और युद्ध काल मे राजा की यह घबराहट अन्य का साहस नष्ट कर देती है। इसी घबराहट से उत्पन्न मेरे नागरिको तथा सेना नायको के गलित उत्साह को पुनर्जीवित करने के लिए अपनी निर्भयता और उपेक्षा का स्वाग मुझे भरना पड़ा था। इससे मेरे वीरो का गिरा हुआ मनोवल फिर उठ गया। यह आवश्यक था स्वामी। 108/राग मरुगन्धा - र शकर ( नराकर) वहुत चतुर और दक्ष राजनीतिज्ञ हो तुम दशानन ! अच्छा अव और कुछ कहना है तुम्हें ? रावण : एक विनम्र निवेदन और है आशुतोष । मेरा वध जब श्री राम ने किया उस समय आप और पितामह ब्रह्मा वहीं कही उपस्थित थे, ऐसा रामभक्त कवि तुलसी ने लिखा है। मृत्यु के समय मेरा तेज याने आत्म ज्योति श्रीराम के मुखारविन्द में समा गयी थी जिसे देखकर आप दोनों बहुत प्रसन्न हुए थे । मेरी मृत्यु के दृश्य को कृपया याद कीजिए। धरनि धसइ धर धाव प्रचण्डा । तव सर हति प्रभुकृत दुइ खण्डा । तासु तेज समान प्रभु-आनन । हरपे देखि सभु चतुरानन ॥ हे गिरिजापति, कृपया वताइये, सम्पूर्ण रामचरितमानस में भाई कुम्भकर्ण को छोडकर कौन भाग्यशाली है जिसकी आत्मा परमात्म रूप श्रीराम में मिल कर एकाकार हो गई ? शंकर : निस्सन्देह, इस प्रसग मे तुम से वंडा भाग्यवान कोई नही है। रावण : अनुगृहीत हुआ प्रभो (हाथ जोडता है), तव फिर मैं पापी दुराचारी कहाँ रहा ? सारे जीवन भर के तथाकथित अवगुणों के उपरान्त भी जब श्रीराम ने मुझे अपनी आत्मा मे समेट लिया तो अब मैं अपराधी, पापी, दुराचारी कहाँ रहा ? गगा मे मिल जाने के बाद गन्दी नाली भी पूज्या हो जाती है देव ! जिसे स्वय श्री राम ने अपने हृदय मे बसा लिया उसका अपमान क्या श्री राम का ही अपमान नही?, शकर श्री राम का अपमान करने वाला मेरा भी घोर शत्रु है (त्रिशूल', उठाते है) वोलो, क्या दण्ड दे दूं इन लोगों को? रावण : (चरणो मे पड़कर) शान्त महाकाल, शान्त हो जाइये ! क्या आप भी मेरे मन की पीड़ा को समझना नहीं चाहेगे ? शकर : क्या चाहते हो तुम रावण : हे मदन-मंद-मोचन, मैं इन लोगों को दण्डित देखना नहीं चाहता क्योकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं, यदि आत्मश्लाघा नहीं मानी जाए तो ': मेरा निवेदन है कि इन्हें आप सद्बुद्धि प्रदान कीजिए। मेरा पुतला जलाते समय ये सब श्री राम का नाम लेकर उनको जय तो वोलते है, मैं भी तो यही चाहता हूँ कि भारत के नर-नारी प्रत्येक प्रवास मे श्री राम के नाम का उच्चारण करे। वर्ष भर में एक दिन ही सही मुझे अपमानित करने के बहाने ये लोग श्री राम का स्मरण तो कर लेते है यही मेरा परम सौभाज्य है। परन्तु मेरी पीड़ा तो कुछ और है । श्री राम के राज्य की कल्पना करते वाले ये असमझ लोग दो पल मेरे राज्य को ही देख लें। क्षमा हो महेश, अभी तो मैं मरा नही/ 109 ? + . हनुमान ने जव प्रथम वार लका देखी तो वह भी चकित हो गये थे। गिरि पर चढ लका तेहि देखो । कहि न जाइ अति दुर्ग विशेषी॥ अति उत्तग जलनिधि चहुँ पासा । कनक कोट कर परम प्रकासा॥ -वन बाग उपवन वाटिका सर कुप वापी सोहही। नर नाग सुर गधर्व कन्या रूप मुनि मन मोहही ।। कहुं माल देह विसाल सैल समान अति वल गर्जही। नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुविधि एक एकन्ह तर्जही ।। मेरे नगर का परकोटा सोने का बना था। इससे यह तो सिद्ध है ही कि मेरे राज्य मे स्वर्ण (धन) की अति थी। मेरे देश के युवक पर्वत के समान विशाल दृढ़ वक्ष वाले थे, मेरे राज्य मे जहाँ जसी आवश्यकता थी, तालाब, कुए, बावड़ियां आदि भरी थी। सभी जातियो को कन्याएँ निर्भय होकर विचरती थी। उनकी निडर अवस्था के कारण ही उनका रूप खिला हुआ रहता था और...(गर्दन झुकाकर मुस्कराट के साथ) कुछ लोगो का तो ऐसा भी मानना है कि मैंने वृद्ध लोगों के लिए भी ऐसी समुचित व्यवस्था कर दी थी कि वे भी पौष्टिक सन्तुलित आहार के कारण 'नाना' बन जाने की आयु में भी अखाडो मे मल्ल युद्ध किया करते थे। अकाल मृत्यु न होना ही यम का मेरे अधीन होना था । कही अग्निकाण्ड न हो, दावा न भभक उठे यह मेरी अग्नि पर विजय थी। समय पर आवश्यकतानुसार वृष्टि हो, यही मेरा भय था वरुण को। न आंधी आए न प्राणवायु में कमी हो-इसी रूप मे वायु मेरी शरणागत थी। मेरे राज्य को ये कुछ अच्छी बातें ही सीख लेते भारतवासी । हे स्वामी क्षमा करें-मैं लगे हाय कह रहा हूँ.-"कहउँ स्वभाव न कुछ अभिमानू" क्योकि इसी एक उक्ति के कारण मानस के अन्य पूज्य पात्र आत्मालीपा दोष से बच गये हैं। शकरः बस केवल यही चाहते हो? रावण : हाँ, इतना भी और कुछ अधिक महत्त्वपूर्ण भी, अवढरदानी ! शंकर और महत्त्वपूर्ण क्या है ? रावण : सबसे मूल्यवान यह निवेदन कि-"मैं कितना पापी हूँ" इस पर न्यायपूर्ण विचार करके मे मेरा पुतला जलाएं...और... शकर देखो दशानन, जहाँ तक मैं सोचता हूं, तुम्हारे प्रति जो राम भक्तों में रोष है वह परस्त्री हरण के कारण है। फिर सीता तो जगदम्बा हैं। रावण : अवस्य प्रभो, जगज्जननी सीता श्री राम की प्रिया हैं और सीता श्री राम के चरणों की श्रद्धानत सेविका हैं । परन्तु जिस महिला को श्री राम प्रणाम 110/राग मरुगन्धा करे वह ऋषि पली तो देवी सीता से भी अधिक पूजनीया होना चाहिए. Tो नाम । शकर : अवश्यमेव, भला यह भी कोई कहने की बात है। रावण : हे महादेव, कहने की बात तो यह है कि गौतम जैसे महर्षि की पलो अहल्या के साथ धोखे से समागम कर लेने वाला मघवा आज भी, आसन पर आसीन है और उसके कुकृत्य में सहयोग बिताया सकलंक होकर भी महिलाओं के ही द्वारा पूजा जाता है कि स्वामी, कि उच्चतम कहाने वाले नीच-कर्मी कभी दोपी नहीं होते। नर नही अमरों का शासक निकृष्टतम पाप करके भी आदरणीय रहता है। उसके दोष देखे नहीं जाते। उसके अवगुण सुनना अपराध है और उसके पाप के प्रति बोलना द्रोह है । यदि पुतला ही जलाना है तो उस इन्द्रास- नासीन देवराज का जलाया जाए ताकि भारत में दिन-प्रति-दिन बढ़ते नारी के प्रति अत्याचार जल सक, भस्म हो सके। हे त्रिलोचन, यदि तुलसी इस विषय मे थोड़ा भी लिख जाते तो भारत का बड़ा कल्याण होता। किन्तु वह मर्यादा पुरुषोत्तम के भक्त थे। उनकी लेखनी पूज्य के प्रति सीमा का उल्लंघन नही कर सकती थी । अतः महर्षि वाल्मीकि को साक्षी सुनिए- उन्होने गौतम के मुख का श्राप सुना था जो इन्द्र को 'विफल' (अण्ड कोप रहित) कर गया था। मम रूप समास्याय कृतवानसि दुर्मते । अकर्तव्यमिदं यस्माद् विफलस्त्वं भविष्यसि ।। हे चन्द्रचूड़, मुझ पर न्याय कीजिये, पाहि माम्, पाहि माम् । शकर हम प्रसन्न हुए वत्स, हम तुम्हे वरदान भी देंगे और तुम्हारे प्रति अकारण द्वेष रखने वालो को दण्ड भी देंगे। रावण : (शकर के चरण पकड़कर) नही मेरे आराध्य, उन्हें दण्ड नही सुबुद्धि प्रदान कीजिए क्योकि वे तो मुझे मरने ही नहीं दे रहे हैं। जिस अभिमान, आत्म- श्लाघा, दम्भ, दुराचार और परस्त्री-हरण आदि दोपो का नाम राक्षस रावण है उसे तो वे लोग स्वयं अपने भीतर छिपाये विचरते हैं। मेरी पीड़ा यही तो है कि राम के द्वारा अन्त कर देने पर भी राम के भक्त मुझ रावण को मरने नहीं दे रहे हैं। मेरी मुक्ति नहीं हो पा रही है प्रभो। किसी व्यक्ति का मात्र पुतला जलाने से वह व्यक्ति कभी नहीं मरता। ये लोग इतनी-सी बात भी नही समझते । हो...अभी आपने वरदान की बात कही। प्रभो! ..बस मेरे बहाने इन्हे सुबुद्धि दीजिए कि ये प्रतिवर्ष जितना धन मेरा पुतला बनाकर जलाने मे नष्ट करते हैं उससे जहां आवश्यक हो चिकित्सा- ... अभी तो मैं मरा नही/ 111 .
लय, विद्यालय, अनाथालय, अपगालय, गौशाला, कुएं, तालाब, सड़के आदि बनवा दिये जाएं । इस प्रकार अभाव कम होगे तो राम-राज्य पास आता प्रतीत होगा। संन्य बल बढ़ाया जाए ताकि आतंक, अत्याचार, अपहरण आदि समूल नष्ट हो जाएं । वस, रावण मर जायगा। शंकर : तथास्तु-लेकिन मेरे राम और राम के भक्त रावण का जो अपमान किया गया और किया जा रहा है उसका दण्ड-विधान यह है कि जब तक तुम्हारी कल्पना का राम राज्य इनकी समझ में नहीं आए तुम अमर रहोगे। जिन अवगुणों के कारण तुम्हारा अपमान होता है वे अवगुण जहां जिस तन-मन में होंगे वही दशानन का निवास होगा। तुम भी कामदेव की भांति अनंग होकर असंन्यानन बने विचरण करोगे। तुम्हारा कल्याण हो। (अन्तर्धान हो जाते हैं) (रावण नतमस्तक हाथ जोड़कर प्रणाम करता है) (पर्दा गिरता है) ०० 112/राग मरुगन्धा संस्मरण पण्डित जी प्रेमपाल शर्मा सामने विछा मखमली लॉन, चमेली और जूही की बेल पर चपल शिशु की भांति टुकुर, टुकुर झाकते सफेद फूल, आसमान पर रंगोली रचते बादल, तालाब के ऊपर बरसात की बून्दो से बने सुरमई कैनवास पर उभरे, धुंधलाए रूपाकार, गड़गड़ाहट की आवाज के साथ सब कुछ गायब हो जाता है। स्मृति की बुलेट ट्रेन सर से उन्हे चालीस साल पहले खीच ले जाकर खड़ा कर देती है। सामने एक गांव, वाश-पद्धति से बने लेण्डस्केप की तरह उभरता है । शिवमन्दिर का शिखर, सैयद का थान, रुतवा नदी, कीचड़ मे लोटती . भसे, चुहल करती लड़कियां, अमराई, तालाब, करोदे की झाड़ियां, धान के खेत, कुरलाते सारसो के वीच एक गाँव, किनारे पर घर, द्वार पर नीम का वृक्ष, पर ऊंचाई पर । रात के बारह बजे हैं । पण्डित जी के घर लौटने का यही समय है । वे पूरे गाँव का दुःख-दर्द सुनकर, विचार-विमर्श कर लौटते हुए बड़बड़ा रहे हैं । क्या हो रहा है इस गांव को? क्यों लड़ते हो तुम? कुछ नहीं पड़ा है इसमें । आधी घोतो पहने, आधी कन्धे पर डाले, जिसके नीचे श्वेत जनेऊ, माथे पर लगा त्रिपुण्ड कुछ पुंछ गया, है। गौरवर्ण, उन्नत ललाट, बड़ी-बड़ी आंखे । अभी वे आवाज लगाएंगे-मियाँ जी, अजी खां साब ! दरवाजा खोलो। वे अपने सबसे छोटे पुत्र को खां साब के नाम से, पुकारते है। चौपाल से मूंज की खाट निकाल, गोरी गाय के पास डाल, तारों को निहारते पण्डित सो जाएंगे। चार बजे वाल्टी खड़केगी, कीर्तन और रामचरितमानस के पाठ के साथ पण्डितजी व उनके परिवार का दिन प्रारम्भ होगा। पण्डितजी पंचायत का काम करेगे, पौरोहित्य प्रामों में भ्रमण करेंगे। बच्चे विद्यालय चले जाएंगे। घर मे रह जाएगी उनको पतोहू। पण्डितजी ग्राम पंचायत के प्रधान भी पण्डित जी/113 त्याग और सादगी को प्रतीक गांधी टोपी, खद्दर का कुर्ता, घुटनों तक धोती,. पर मे चमरौधा, हाथ में लाठी, मझोला कद, अण्डाकार चेहरा, कसरती शरीर, महर्षि दयानन्द सरस्वती से कुछ-कुछ साम्य, प्रभावशाली आवाज के स्वामी पण्डित राम- स्वरूप यद्यपि तीसरी पास ही है फिर भी स्वाध्याय के बल पर ज्योतिप, पौरोहित्य, दर्शन, काव्य का ज्ञान प्राप्त करने के साथ-साथ एक अच्छे पण्डित या कवि ही नहीं अपितु सच्चे देशभक्त कर्मठ समाज सेवी के रूप मे भी लोगो के हृदय पर शासन ही नहीं कर रहे वरन हृदय परिवर्तन करने का प्रयास भी कर रहे हैं। चौपाल के बाहर खाट पर बैठे ठाकुर लोचन सिंह हुक्का गुडगुड़ाते, गन्ने के फैले खेतो के पार देखते कहते हैं। अंग्रेजो के विरुद्ध किसानो ने 'लगान मत दो' आन्दोलन छेड़ा तो पण्डित इस इलाके के अगुआ बने। 250 बीघे जमीन किसे कहते हैं ? लल्लू पण्डितजी ने देश की आजादी की लड़ायी मे 250 बीघे जमीन की कुर्वानी दी। सभा हो रही है। पण्डितजी शेर की तरह दहाड़ती आवाज मे लोगो को ललकार रहे है । अंग्रेजी राज को पुलिस खड़ी देख रही है । क्या मजाल जो पण्डित को गिरफ्तार कर ले। - 'ये सात समन्दर पार से आये लाल मुंह वाले लालची बन्दर क्या मांगते हैं हम से? लगान। क्यों मांगते हैं ? लगान । जमीन हमारी, खेत हमारे, मेहनत हमारी, देश हमारा, फिर यहाँ ये विदेशी क्यों ? ये हमारे यहाँ आये, हाथ जोड़कर गिड़-" गिडाये, भैया! व्यापार करने दो, हमारे बाल बच्चों पर दया करो। हमारी बिल्ली और हमी से म्याऊँ। इन्होंने फूट का लाभ उठाया । अब भारत जाग गया है । जागा है अब हिन्दुस्तान, भारत का मजदूर किसान, हम लगान नहीं देंगे, नहीं देंगे। मारेंगे,'मरेगे, नहीं डरेगे, नही डरेगे । हमारा' हक स्वतन्त्रता; स्वतन्त्रता । समवेत स्वरों से गूंजता आकाश-स्वतन्त्रता, स्वतन्त्रता । पण्डित को 250 बीघे जमीन से बेदखल कर दिया। छ: महीने का वारण्ट निकला पण्डितजी बनजारों के डेरे में बनजारे बने.अंग्रेजी पुलिस को अंगूठा दिखाते रहे। तुम्हारे घर के दो दरवाजों की तरह पण्डित के दिल के भी दो खाने थे। एक परिवार का खाना, एक देश का बड़ा, परिवार का छोटो खोना, पद को लालसा से बड़ी सेवा की ललक । देश की एकता की ललक साम्प्रदायिक सद्भाव की भावना। गांव के पास सिकलीगरों का डेरा लगा है। गांव के लोग चोरी छिपे, हथियार वनवा रहे हैं । वत्सम, भाले, वर्जी, फरशे । पण्डितजो को पता लगता है । वे मना करते हैं । चौपाल पर मीटिंग करते हैं। -क्या जरूरत पड़ गयी हथियार बनवाने की, वोलो? -पण्डित के सबसे बड़े पुत्र क्षेत्रपाल स्वतन्त्रता आन्दोलन में बनारस में जेल 114/राग मरुगन्धा १ रा । . -- काट चुके है । बोले-'गुण्डों के आक्रमण से बचने के लिए हथियार जरूरी हैं। -ये अविश्वास क्यो? क्या मुसलमान हमारे भाई नहीं? -मुसलमान हमारे भाई हैं। परन्तु गुण्डे न हिन्दू होते हैं न मुसलमान, वे सिर्फ गुण्डे होते हैं। तो यह वोलिये कि गुण्डों और आतताइयों से मां बहनों की इज्जत व अपनी आत्मरक्षा के लिए हथियार बनवाए जा रहे हैं। मुसलमानों का नाम क्यो? क्या खैराती और बुन्दू तुम्हारे मित्र नहीं ? -मैं अपनी इस भूल के लिए क्षमा चाहता हूँ। कह, क्षत्रपाल ने सिर झुका दिया था। छतों पर पत्थरो और इंटों के ढेर जमा किये जा रहे थे। औरतों की कमर में हर समय चाकू और हंसिए से रहते। पण्डितजी ने सभी मुसलमान परि- वारो को सुरक्षा के लिए विश्वस्त व्यक्ति तैनात कर दिये थे। बाहरी व्यक्तियों के गांव में प्रवेश के लिए नाकेबन्दी कर दी थी। आज भी वह साम्प्रदायिक सद्भाव कायम है। ri अचानक वे कुर्सी पर बैठे-बैठे रोमाञ्चित हो उठे। प्रथम स्वतन्त्रता दिवस जिस समय उनकी उम्र मात्र छः साल थी आज भी अपनी सम्पूर्ण भव्यता के साथ स्मृति पटल पर अंकित है। चौपाल में रखी मेज के चारों पायों से खपच्चियां बांधकर तिरगे पतगी कागज से मण्डप बनाया जा रहा है ! अन्दर मेज पर रेशमी कपड़ा बिछाया जाकर उस पर फोटो सजाये जा रहे हैं । बन्दनवार, फूलों की झालरें, उस समय वे 'मिस्टर गौड़', अपनी बाल सुलभ जिज्ञासा को रोक नही पाकर अपनी बहन से पूछ बैठे। -वहना ! जि का है रह्योऐ। ---तू नाइ जानतु जि देशु आजादु है रह्योऐ. -जि आजादु का होतुऐ? -मोइ का पतो भैया कैरए के देशु आजादु भयौऐ जा मढ़इया मे काऐ उसने उत्तर न देकर पास जाते भैया क्षेत्रपाल से पूछा- भया जा में काऐ। उस समय मिस्टर गौड़ को विठाकर, बताया। देखि, जितोएं महात्मा गांधी, जिनेहरू, जि नेता जी सुभाषचन्द्र बोस, जि बालगंगाधर तिलक। मिस्टर गौड़ ने छै. वर्ष की अल्पायु में नेताओं का परिचय पा लिया था। मिस्टर गौड़ की आँखें तरल हो जाती हैं। 177.5117. पन्द्रह अगस्त 1947 F-." सिर पर रखा, मण्डप/हर घर के बाहर मण्डप उतरता है। लोग नेताओ के पण्डित जी/ 115 दर्शन कर हाथ जोड़ते है । मिस्टर गौड़ की माताजी घण्टा घड़ियाल के साथ आरती उतारती हैं। लोग शहीदो के चित्रों के चरण स्पर्श करते है। पीछे हैं गांव के आवाल, वृद्ध, नर-नारी हाथों में विरगे झण्डे लिए । भया क्षेत्रपाल और मंगलसेन गा रहे यह पुण्य पताका फहरे मुक्तवायु मण्डल में अपनी मानसे लहरी लहरे। विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झण्डा ऊंचा रहे हमारा। . समवेत स्वर-यह मानस लहरी लहरे यह पुण्य पताका फहरे झण्डा ऊंचा रहे हमारा भारत माता की जय । नेताओं की जय जयकार से ध्वनित होता वायुमण्डल । पीछे नारियों का समवेत स्वर । भाभी नेतृत्व कर रही हैं । मेरे चरसे का टूटे न तार चरखवा चालू रहे । समवेत स्वर-चरखवा चालू रहे । कितना भव्य, कितना जीवन्त, कितना जोश, कितनी उमंग । वह सब कहाँ गया? परसो ही तो पन्द्रह अगस्त मनाया था। एक औपचारिकता जिसे निभाना था। एक राजकीय आदेश जिसको अनुपालना करनी थी। वह जनता वह जन कहाँ था ? जिसके लिए लड़ाई लड़ी गयी। वह जीवन्तता कहाँ गयी? मिस्टर गौड़ का' मने रोने रोने को हो आया था। 'पगले ! उस समय एक विदेशी से देश को मुक्त कराने का उल्लास था। आज अपने-अपने स्वार्थों को कारा मे कंद रहने का कुहासा है।' अन्दर से कोई बोलता है। यादो के कुहासे से स्वयं को मुक्त करने मिस्टर गौड़ घास के लॉन मे चक्कर काटने लगते है। आज रिमझिम बरसात मे उन्हे अपना गांव रह-रहकर याद आ रहा है । झूले, मल्हार, रस की फुहार, शीतल बयार, धरती की गन्ध, भरती सुगन्ध, वरगद की छांव जैसा गांव ! यादो के सारस फिर उड़ने लगते हैं धान के सहराते सेतो पर । जव से स्वतन्त्रता दिवस मनाया है वे बहुत उदास है। पण्डितजी को भी उन्होने इसी तरह उदास देखा था । लेकिन यह बहुत बाद की बात है। प्रान्त मे विधायिका' के चुनावो की सरगर्मी है। 'पण्डितजी । हम सबका विचार है कि आप इस बार चुनाव मे खड़े हो' पण्डित नेकीराम, नेत्रपाल और श्री निवास बोलते हैं। -मैं क्यो? तुम क्यों नहीं । जवान हो, जोशीले हो। मैं तुम सबके साथ हूँ। मैं 116/राम मरुगन्धा I - ता •ान का निर्माण, सड़क ठीक करवाना, कुंओ मे लाल दवा का छिड़काव, वीमारों को सेवा, सुरक्षा टोलियां, विकास समिति, श्रम, सहयोग, एकता जीवन के मूलमन्त्र। घर मे साधु सन्तों का आगमन निरन्तर होता रहता । शंकाएँ और शास्त्रार्थ । गृहस्थ मे.रहते हुए भी वीतरागः "वी ई ई त 55 ग । दिल के अन्दर कही कुछ टूटता है। छनाक् स्मृतियों को रोल मस्तिष्क की पुली पर घूमती फ्रीज़ हो जाती है। मिस्टर गौड धम से कुर्सी पर बैठ जाते हैं । जैसे सब कुछ जम गया है। मां, बहन, भाभी के करुण क्रन्दन से रुदन करता आकाश। सहमे-सहमे रुदन करते लोग। रोता हुआ मंगलसेन फूस लेने दौड़ पड़ता है । आंगन में फंस पर पड़े शादी-शुदा सत्ताईस वर्षीय युवा वेटे क्षेत्रपाल के शव को चूम पण्डित बोल उठे ‘हरि इच्छा. बलीयसी'। सस्कार की तैयारी करो। निर्विकार, शान्त, सौम्य चेहरे पर वही ओज, उदासी की एक रेखा तक नहीं । आठ वर्ष की उम्र में मृत्यु का प्रथम साक्षात्कार । मक्खनलालजी की शंका आज भी हृदय पर कील- काक्षरो की भांति अकित है। और अकित है,पण्डित राम स्वरूप जी का उत्तर, जो मिस्ट ग्डतजी बोल पड़े- क्यों उदास हो ! जबकि मृत्यु अटल है। यह ससार तो. एक नाटकघर है। हम सब अभिनय कर रहे हैं । पिता, पुत्र, भाई, वहिन, पति, पत्नी । अभिनय समाप्त फिर वही ।' तो दम मो? गरण, हर वस्तु का निर्माण -1 लेकिन पहले तो क्षेत्रपाल गांव में पाठशाला चलाता था वह तो गया । अब दूसरा अध्यापक बालकों की शिक्षा के लिए खोजना पड़ेगा। मेरा विचार है जब तक कंचन पाल को स्थाई नौकरी न लगे तो उसे रख ले ।, दस रुपये शिक्षा प्रसार कार्यालय से मिल जायेगे। चालीस रुपये चालीस बालकों से । साना हमारे यहाँ खाता रहेगा। उस समय मिस्टर गौड़ ने व्यावहारिक दर्शन के प्रथम पाठ के साथ- साथ समाज सेवा का महत्व समझा था। पण्डितजी जीवन भर पढ़े-लिखे वेरोज- गार लड़के लाते रहे, विद्यालय चलाते रहे। पर जाकर पुत्र से वातकर, घरवाली से गणें मारकर मिस्टर गौड़ बिस्तर पर लेटे बादलो मे आंख मिचौनी मेलते चांद को देख रहे हैं। मस्तिष्क के धन पटल के बीच स्मृतियों की लुका छिपी । पण्डित जी/117 सावन के महीने में भी उनके अन्दर गाँव का फागुन उतर आता है। पड़ताव ढोलक, हारमोनियम पर शुद्ध पिंगल के नियमों में ढले भजन गाते मंगलसेन, लालाराम । हो सकता है मिस्टर गौड़ के अन्दर कवित्व के वीज वही से पड़े हो। 10 वर्ष की उम्र मे ही वे वाणिक-मानिक गण, गतागत का ज्ञान पा चुके थे। पण्डितजी उन्हे मेहमानो के समक्ष कविता सुनाने के लिए प्रेरित करते । पण्डित- जी होली, दिवाली हर त्योहार पूर्ण उल्लास से मनाते। उन्होने अपने पुत्रो को सम्पत्ति नहीं सस्कार दिये । जीते जी कोई भी मुकदमा कचहरी मे दर्ज नहीं होने "दिया। उनका जीवन पिता के दिये संस्कार, मां के प्यार, गुरुजनो को शिक्षा, समाज और साहित्य के प्रभावों का प्रतिफलन है-~वे सोचते है। रक्त रंजित वोटों की राजनीति, क्षुद्र स्वार्थों के कारण गांव मे फूट पड़ने लगी, नकवजनी के साथ-साथ पशु खुलने लगे, जोरू और जमीन के कारण झगड़े बढ़ने लगे । पंचायत का अनुदान पाने के लिए उनसे भी रिश्वत मांगी जाने लगी तो वे अन्दर तक हिल उठे। 'गौड़ ने पण्डितजी को रास्ते चलते बड़बड़ाते सुना था-' 'क्या इसीलिए लडाई लड़ी थी कि भाई-भाई का दुश्मन बन जाय ? अरे यह तो नहीं सब मिलकर देश का विकास करें, सद्भाव और भाईचारा बढ़ायें, रिश्वत, भ्रष्टाचार, बेईमानी दुराचार करोभाई करो, सत्ताको लाठी से तोड़ दोसवकी कमर, नोच लो देश की खाल, हमाम में सब नगे हैं। रामस्वरूप तू मूर्ष है पगते ! क्यो हवा मैं चाबुक फटे- कार रहा है। इस नक्कार खाने मे तेरी आवाज कोन सुनेगा ! सन्नाटे को तोड़ती आवाज कौन सुनेगा ! कौन सुनेगा !' कह वे वज्जर भूमि मे खड़े किसी पेड़ की जड़ में बैठ रो पड़ते। फिर करुण स्वर में गाते है 'चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ वेगाना।' जो जवान बेटे की मौत पर नहीं रोया, वह अपने सपनों के देश पर रो रहा था। लोग कहते पण्डित पगला गए है। एक ठण्डी सुबह गीता पाठ करते-करते यह सपूत अपने प्रभु में लीन हो गया। उनका नाम स्वतन्त्रता सेनानियो में कही नही है। लेकिन लोगों के दिलो में उनकी याद आज भी जिन्दा है। 17 118/राग मरुगन्धा सवा रुपये में भूत, भविष्य और वर्तमान श्याम मनोहर व्यास त्रिकालदशिता की अनुभूतियां मानव को सदैव से उद्वेलित करती रही है। भूत- भविष्य व वर्तमान रहस्यों के घेरे में हो रहे हैं । यदि कोई तान्त्रिक या ज्योतिषी हमारा हाथ देग्दं कर या अन्य क्रिया से हमारा भूत, भविष्य और वर्तमान टेप- रिकार्डर की तरह सुना दे तो हम निश्चित ही स्तम्भित हो उठेगे। आखिर क्या रहस्य है इसके पीछे ! एक आप बीती घटना है । मई सन् 1987 में जयपुर गया था। एक दिन अकस्मात् ही घूमता मैं एक राजमार्ग से गुजर रहा था। गोविन्ददेवजी के मन्दिर से कुछ ही दूर पर, विसातियों की कई छोटी-छोटी दुकानें लगी रहती है। इन्ही के बीच मुझे एक तान्त्रिक साधु दिखाई पड़ा। सिर से पैर तक लहराता, रंग उडा, मटमैला काला चादर, कण्ठ में लटकी बीसियो नीली-हरी-पीली-कत्यई मालाओ का जाल, सिर पर त्रिपुण्डमय तिलक, घने घुघराले बाल, दातो मे ठुको जगमगाती मोने की कीलें, नेत्रों मे एक चमक और हर पल बुदबुदाते होठ-जय शकर, जय भैरव, जय बजरंग आदि । पास ही एक काले पर्दे पर अकित मुर्दे को खोपडी, उसके फैली एक हथेली का चित्र, काच लगे चौखटे मे लगी वीसियो अखबारी कतरने जिनमे तान्त्रिक की प्रतिभा का उल्लेख था। इन सबसे प्रभावित मैं तांत्रिक के पास आ पहुंचा। मेरे नमस्कार करने पर वह मुस्कराया। 'आपकी फीस !' मैंने पूछा। 'केवल सवा रुपया। उसने निर्विकार भाव से कहा । मैने इधर-उधर देखा, इस भय से कि कही कोई परिचित मेरी मूर्खता पर हम न पड़े कि पढ़ा-लिखा होकर फुटपाथ पर बैठने वाले साधु से अपना भविष्य जानना चाहता है । मैंने सवा रुपया भेट चढाकर अपना हाथ उसकी ओर बढ़ा दिया। सवा रुपये में भूत, भविष्य और वर्तमान / 119 उसने यान्त्रिक तत्परता से मेरी दोनोहथेलियों पर एक लेप लगाया, एक कोरे कागज पर दोनों हाथों को छाप ली और पर्दे के पीछे चला गया। जव लौटा तो वह किसी टेप की तरह चालू हो गया। टूटी-फूटी हिन्दी में उस तान्त्रिक ने मेरे शंशव से लेकर मेरे उस दिन तक के भूत- भविष्य-वर्तमान को प्याज के छिलकों की भांति छील कर मेरे सामने रख दिया। यह देखकर मे अवाक रह गया। नौकरी, वीमारी, पारिवारिक उलझने सबके बारे में सही-सही बता दिया। अन्त मे उसने कहा कि मैं एक सप्ताह तक बस मे यात्रा न करूं। मैंने तात्रिक के आदेश का पालन किया। ट्रेन से ही उदयपुर गया। जिस दिन उदयपुर आया उसके एक दिन पहले जयपुर से उदयपुर आने वाली रात की बस काकरौली के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गयी थी । आठ व्यक्ति घटना स्थल पर ही मर गए थे। तान्त्रिक को चेतावनीने ही उस दिन मेरी प्राण रक्षा की। तान्त्रिक ने यह भी बताया-'वेटा शिक्षा विभाग में रहकर तुम साहित्य सेवा करोगे । कलम ही तुम्हारी मित्र वनेगी।' तात्रिक की यह वात भी अक्षरशः सत्य है । विगत पच्चीस वर्षों से मे साहित्य- साधना मे जुटा हूँ । एक दर्जन से ऊपर पुस्तके भी प्रकाशित हो चुकी हैं। बाज भी सोचता हूँ-सवा रुपये मे भूत, भविष्य और वर्तमान की जानकारी कितनी सस्ती मिली। सवा रुपये में तो आज आधा किलो दूध या एक समय का भोजन भी नहीं मिलता है। आज जहां तान्त्रिक व ज्योतिषी झूठी-सच्ची बाते बता कर लाखों रुपये लोगो से ऐठ लेते रहे हैं, वहां इस सवा रुपये को क्या कीमत भला ! तान्त्रिक से साक्षात्कार का वह चमत्कारिक अनुभव मेरे लिए सदैव अवि- स्मरणीय रहेगा। 120/ राग मरुगन्धा रेखाचित्र लाल बन्धु राधेश्याम सिंघल F " यूं तो ससार मे तरह-तरह के प्राणी मिलकर विछुड़ जाते हैं परन्तु प्रत्येक को याद नहीं किया जाता। हाँ, यह भी सत्य है जो विलक्षण प्रतिभाएं लेकर इस जगती तल पर आते है उन्हें पल-पल पर याद भी किया जाता है। लाल वन्धु उन्हीं प्रतिभावानों में हो तो कोई सन्देह नहीं । उनका बहुआयामी प्रभावी व्यक्तित्व कदापि भूलने लायक नहीं। लोगों की जबान पर हर समय चड़े रहने वाले लाल बन्धु तो ख्याति प्राप्त विश्वसनीय फर्म की तरह मशहूर हैं । वे ऐसे होनहार दो व्यक्ति हैं, जो हर जगह नही मिल सकते। लाल बन्धु हैं तो सामान्य अध्यापक ही, परन्तु अपनी बुद्धिमत्ता,प्रभावी व्यक्तित्व तथा स्वाभिमान के धनी होने के साथ भाईचारे मे अटूट आस्था से सबके लाल बन्धु वन गये हैं। कोई छोटा हो या वड़ा, उन्हें लाल बन्धु नाम से ही सम्बोधित करता है। बहुतों को उनके नाम का पता नही, जब भी उनके बारे में बातचीत होगी तब लाल वन्धु कहेगे। दूसरी मजेदार वात यह भी है कि यह दो का सम्मिलित सम्बोधन है परन्तु कही एक हो तो भी लाल बन्धु उच्चारण करेगा। इसमे कही भी सन्देह नहीं कि वे लोकप्रिय हैं । दूसरी बात यह भी है कि वे दोनो लम्बे-लम्बे कद के सुडौल श्यामल गौर किशोरो की तरह वन-ठनकर चलते हैं तो लोग उन्हें देखकर राम-लक्ष्मण से तुलना करने लगते हैं। किसी दिन दुग्ध धवल वैश- भूषा धारण कर आए तो लोग हंस जैसी जोड़ी को उपमा चलते-चलते दे जाते हैं। यह सब उनके आकर्षक व्यक्तित्व की ही देन है। मही रूप से देखा जाय तो एक ने इतिहास दूसरे ने संस्कृत से एम. ए. किया है तृतीय श्रेणी से । परन्तु वे दोनो राजनीति के तो बड़े गुरु माने जाते हैं। आये दिन जाने कहाँ से तरह-तरह के समाचार पकड़ के लाते हैं "अमुक थानेदारको भ्रष्टा- लाल बन्धु / 121 चार के मामले में निलम्बित कर दिया। वो डाक्टर मस्ती मारता था भ्रष्टाचार निरोधक विभाग द्वारा रंगे हाथ पकड़ लिया गया। देख लो तहसीलदार को, गया। जिलाधीश ने ऐसी डांट पिलाई कि प्राण निकल गये । कहने का मतलव, ऐसा होआ खड़ा करना कि लोग मान जाते हैं कि भैया लाल बन्धु कह रहे हैं सत्य भी हो सकता इन्ही समाचारों पर एक दिन प्रधानाचार्य महोदय ने कहा, "आप लोगों को पुलिस सेवा में होना था। शिक्षा में ऐसे समाचारो का क्या असर पड़ता है । आपने इस विभाग मे आकर बड़ी भूल की। लाल बन्धु,दो होते हुए एक की तरह रहते । एक पर एक ग्यारह की कहावत चरितार्थ होती। दो तन एक प्राण की उपमा तो अक्सर सभी देते। इसी कारण जब भी कोई वात. गुजरती, ताल ठोक दोनो एक हो जाते । सारा ससार एक ओर हो जाय वे दोनो टस से मस नहीं होते। धुन के पक्के, हाथ के सच्चे, कर्मठ लाल- वन्धु ने हलचल मचा दी। लोग भय खाते और कतराते। -पुराने ऐतिहासिक आल्हा-ऊदल की तरह भ्रष्टाचार विरोधी वीर लाल बन्धु ने अपने हाथ कई भ्रष्टाचार के गढ़ सर करके जीत का डंका वजाया। उस बार कोप-कार्यालय में भारी अन्याय बढ़ रहा था। अध्यापकों के कोई भी बिल बिना लिये दिये पास नहीं हो रहे थे। जो आता वही रोता-भ्रष्टाचार खाये जाता है सरेआम । कोई सुनता ही नही । कोप-कार्यालय को कोई देखता ही नहीं,। सुनकर लाल-बन्धुओं को काला सांप-सा डस गया। आव देखा न ताव, अड़ गये जिलाधीश से। हजारों रुपये भ्रष्टाचार में अजित करने के प्रमाण प्रस्तुत कर दिये। जिला- धीश महोदय मान गये । तुरत-फुरत हवाई सर्वेक्षण की तरह जिलाधीश ने पूरे का पूरा स्टाफ रफूचक्कर कर दिया। लोगों को पता चला, प्रचार प्रसार हुआ, लाल- बन्धुओ ने यह भण्डाफोड़ कराया है। सवको राहत की सांस मिली। एक बार जिला शिक्षा अधिकारी महोदय विद्यालय का सुपरविजन करने आये थे। सभी साथी अपनी-अपनी डफली अपना-अपना राग रोने लगे। तव लाल वन्धुओ ने सारे राग रग छोड़कर द्वितीय वेतन श्रृंखला मे पदोन्नति की बात उठायी। जिला शिक्षा अधिकारी खाली स्थानों का अभाव प्रदर्शन कर टाल गये सारे प्रश्न । लाल बन्धु भी विष-का-सा घुट पीकर चुप हो गये। कुछ दिनो वाद द्वितीय वेतन श्रृंखला में रिक्तियां भरने अन्तर-जिला स्थाना- न्तरण तथा राज्यादेश धड़ाधड़ होने लगे। लाल वन्धु चौक पड़े कि इस जिले में अनावश्यक बाढ़ की तरह स्थानान्तरणों से यहाँ प्रमोशन होगा ही नहीं। वह चश्म- दोद देख भी रहे थे। लोग वड़ी भागदौड़, गठजोड़ नेतागीरी की शरण ले देकर अपना फन्दा फिट करने की जुगाड़ वनाने दिन-रात एक कर रहे थे। लाल बन्धुओ का तब पता चला जब न्यायपालिका ने द्वितीय वेतन शृंखला को समस्त रिक्तियो पर स्टे आदेश देकर ताला डाल दिया। जिला शिक्षा अधिकारी दंग हुआ। साथ ही । 122/राग मरुगन्धा यसनातरण की धमकी दे डाली। प्रधानाचार्य को भी फुसलाकर दबाने की कोशिश की। वे ठहरे लाल बन्धु ! न्यायपालिका से जोंक की तरह चिपट गये। और तब छूटे जब प्रमोशन उसी स्थान पर हो गया। वधाई देनेवाले लोगों से कहते : अधिकार खोकर बैठ रहना, यह महा दुष्कर्म है। न्यायार्थ अपने बन्धु को भी दण्ड देना धर्म है। लाल बन्धु घर-बाहर सर्वत्र एक जैसा आचरण करते। दो मतवाले सिंहों की तरह बलिष्ठ व्यक्तित्व में झूमते हुए जब चलते तव समाज के कितने ही दादा गुण्डे उनके कदम चूमते । कोई सामने पड़ता ही नही था। परीक्षा के अन्तिम चरण में एक सीधे से गणित के अध्यापक का कुछ असामाजिक तत्वों ने अपमान कर दिया । पूरा शिक्षक वर्ग कतराने लगा मदद करने से। कारण यह कि अपमानकर्ता प्रतिष्ठित घर से सम्बन्धित था। वह किसी भी कर्मचारी का बिस्तर गोल करा सकता था। वहाँ कोन गवाही देकर कोढ में खाज जैसा रोग कण्ठ लगाये। लाल-वन्धु ही फौलादी सोना खोलकर सामने आ गये। वेधड़क हो घोषणा करने लगे-"शिक्षक का स्वाभिमान मर गया तो उसमे क्या शेष रहेगा? हमें संघर्ष करना ही होगा। यदि कोई लाट साहब आतंकवाद के बल पर शिक्षकीय गौरव को ठेस पहुंचाता है तो द्रोणाचार्य और चाणक्य भी हैं जो उसको तहस-नहस करने में नहीं चूकेंगे।" कुछ अध्यापक तो घबराये, कुछ की मुट्ठी मे जान आयी परन्तु वह तो हंसते कमल की तरह उभरे और दो सेकिण्ड में वही असामाजिक तत्त्व धराशायी हो गया और अपमानित होकर गुरुजी की चरण रज सिर पर रखने लगा। घृणा अपमान का दृश्य बदला और क्षमा दया का वातावरण बन गया। लाल वन्धु की सराहना होने लगी। कहने का मतलब, नाटकीय दृश्यों की तरह लाल बन्धुओं के आदर्श क्रियाकलाप होते रहते । समाज मे बढते स्वार्थ पर कटाक्ष करते । जिस समाज में भाई चारा, सत्य और अहिंसा का गला घोटनेवाले निर्मम होकर मनमानी करने लगते है उस समाज का पतन होता है। इनका खरा स्वभाव बड़ा सुहावना लगता। • एक वर्माजी का रिटायरमेण्ट समारोह होना था परन्तु उनके कार्य व्यवहार से सभी बड़े मायूस थे । कोई भी उनका सम्मान कर विदा करना नहीं चाहता था। स्वय प्रधानाचार्य भी उनके काले कारनामो का चित्रण कर मुंह फेरना चाहते थे। वर्माजी की जन्मजात आदत खां-म-खां की आलोचना करके बुरा बनना था। कोई विदाई पार्टी की तो वात दूर, साथ एक गिलास पानी पीना भी अच्छा नहीं मानते। वर्माजी लाल बन्धुओ के गुरु रह चुके थे इसलिए लाल बन्धु गुरु-निन्दा सहन करने में असमर्थ थे। वातावरण बदलने हेतु भाग-दौड़ शुरू हुई और एक बहुत बड़े लाल वन्धु / 123 जुलूस के आयोजन की तैयारी हुई। सौ दो सौ रुपया गांठ से फूंककर अभिनन्दन पत्र प्रकाशित करवाये। वर्माजी बड़े प्रसन्न दिखायी पड़े। पूरे समुदाय के समक्ष उनको अवगुण गाथा भूलकर गुणगाथा सुनाई पड़ी। लोग तालियां बजा-वजाकर हंसते और कहते--- धन्य हैं लाल बन्धु, ऐसे बुरवार का भी स्वागत करा रहे हो। वर्माजी भी मान गये जो प्रशसात्मक शब्द कभी नही कहते आज लाल वन्धुओ को धन्यवाद दे गये। अभिनन्दन पत्र में वर्णित प्रशंसा पर स्टाफ मे चर्चा हुई, लालबन्धु का करिश्मा कहकर सन्तोष की श्वांस ली। जनसस्या गणना के अवसर पर स्थानीय उपखण्डा- धिकारी ने मीटिंग को । वहां लालवन्धुओ के पांवो मे एक गरीब आ लोटा, रोता फिफाता बोला, "जैसे तैसे प्रभु ने एक बच्चे का मुंह दिखाया, वह भी मिट्टी के तेल की कमी के कारण अन्धेरे मे दो दिन से पड़ा है। लाल बन्धु मीटिंग को छोड़ उस गरीव के साथ जाकर उपखण्डाधिकारी से कहने लगे। यहां ब्लेक मार्केट का बोल- वाला है । एक लीटर भी तेल नहीं मिलता। देखोगरीब का बच्चा दो दिन से अन्धेरे मे पांव पीट रहा है। खण्डाधिकारी ने सारे डीलर टटोल डाले। तेल कहाँ रखा था। वहाँ तो ब्लेक था। आया नहीं कि गया नहीं । सारे डोलर्स की सिक्यूरिटी जब्त के आदेश हो गये और उस गरीब को जीप में विठाकर दूसरी जगह से तेल दिला दिया। लाल बन्धु पत्र-पत्रिकाओं के लिए कविता कहानी लिखते और वह प्रकाशित भी होती। जब कभी कविगोष्ठी का आयोजन होता तव चार पक्तियां बड़े सरल स्वभाव से पढ़ते : चाह नही हो भामिन को पद पायके जग में नाम कमाऊँ। चाह नही अधिकारिन को पद पायके में अधिकार जमाऊँ।। चाह नही धनवानजु होय के मैं तव वैठि के जीप घुमाऊँ। चाह यही बस जीवन की तन देश की खातिर भेंट चढ़ाऊं।। वह अक्सर कहते, देश में स्वार्षी तावो का योलयाला है। सन् 1947 से पूर्व फ्रान्तिकारी और राष्ट्र भक्त पैदा होते थे। आजकल तो भारतमाता ने पमचा और देशद्रोही पैदा करना शुरू कर दिया है। इसलिये भाई और बहिनो, मावधान, देग के लिए कमर कसकर गामने आओ, वरना राष्ट्रीयता का अभाव होकर अन्धेरा होने वाला है। आजकल लाल बन्धु कम दिगई पड़ते हैं । सारी चहल-पहल भुन्ध-सी हो गयी है । मुना है कि दुर्घटनाग्रस्त होने के कारण अस्पताल में भर्ती हैं । जो मुनता है वही नोपाव मिलने भागता है। 124/राग मर ra :11. रिपोज गरीबी.गाँव की निशान्त , . 4 रीबी कम हो गयी 'क-एक बैठके पक्की "साह ! भामूली जमीन वालों के पास ट्रैक्टर हो गये है। पहले से ज्यादा गल्ला पैदा होने लगा है। काम-धन्धा वढ़ा है और खेतीहर मजदूरों को भी अधिक काम मिलने लगा है ! गरीब से गरीब गांव वाले के पास भी एक टेरीकाट का कुर्ता जरूर है । (पाँच-दस को छोड़कर) सब साबुन की टिकिया से नहाते है । साबुन भले ही कपड़े धोने का ही क्यों न हो ? कई मिडल पास और मैट्रिक पास हो गये हैं। पांच-दस वी. ए. और एम. ए. भी, फिर भी गांव के आदमी के पास पैसा और फुर्सत नहीं है । आज गाँव में छोटा या मध्य दर्जे का कोई किसान ऐसा नही, जिस पर सरकारी और गैर-सरकारी ऋण नं हो। आज से बीस-पच्चीस साल पहले गांव का आदमी जरूर पस और फुसंतवाला. था,। जब वह बैलो से खेत जोतता था, कच्ची नालियों से सिंचाई किया करता था, तब वह ठसक से बाजार जाता था और खाती को खेतोड़ में बैठकर कहकहें भी लगाता था। आगे गांव में दूध नहीं बेचा जाता था। दूध-पूत एक समान गिने जाते थे । लेकिन अब दूध बेचने से भी पूरा नहीं पड़ता। लोग आर्थिक रूप से ही गरीब नहीं हुए हैं। नैतिक रूप से भी गरीब हो गये हैं। गांव में इक्का-दुक्का चोर तो सदा ही हुआ करते थे। मैं बहुत छोटा था तब पिताजी के साथ खलियानो में रख- वाली के लिए सोया करता था। गांव में एक-दो चोरी छुपे पानी भी अपने खेत में तोड़ लेते थे। लेकिन अब तो अच्छे-अच्छे लोगों की नीयत डोल चुकी है। गांव की साँझी पक्की नालियो के नाकों में लगी, सरकारी लोहे की चादरें सभी गरीबो गाँव को/125 "EI17 S लोग अपने-अपने घर ले आये है । कच्ची नालियां थी तो नाके मिट्टी से आसानी से पूर दिये जाते थे। लेकिन अब पक्की नालियों के नाके बांधना टेढी-खीर हो गया है। पक्की नाली की वजह से फावड़े से लेने के लिए आस-पास कही मिट्टी भी तो नही मिलती। फिर पक्को नाली में पानी का बहाव भी तो तेज होता है। चादरें चुराने का भी लोगो को दुहरा लाभ हुआ। एक तो दस-पन्द्रह सेर लोहा घर आया। दूसरा नाका कच्चा होने से पानी टूटने लगा और हराम के पानी से खेत को क्यारी, दो क्यारी सीलने लगीं। पिछले दिनों गांव के एक वुड्ठे किसान ने रास्ते मे सूनी खड़ी एक साइकिस को नरमे की ऊंची-ऊंची फसल में छुपा दिया, साइकिल का मालिक आया और पूछ- ताछ की तो उसी किसान को पकड़ लिया कि बता साइकिल कहां है ? अभी यहाँ और कोई तो आया भी नही? दो चार लोग और भी इकट्ठे हो गये। कुछ कहा- सुनी, कुछ गर्मा-गर्मी हुई तब उस किसान ने घिसियाते हुए साइकिल निकाल कर दी-- मैं तो यूं ही मजाक कर रहा था। उसके कथन में कितना सत्य था। सब जानते हैं, साईकिल का मालिक अपनी जिद्द छोड़ देता और हाथ झड़काकर घर आ जाता तो साईकिल से हाथ धो बैठता। उक्त किसान ने गांव में कभी कोई चोरी नहीं की, अलबत्ता उसके लड़के जरूर सब्जी इत्यादि को चोरी के लिए गांव में बदनाम हैं। लेकिन अव तो वह भी "! क्या जमाना आया है। लोग अपने घोलो में धूड़ गिराने के लिए मजबूर हो गये हैं। गांव की गरीबी का एक और उदाहरण: पिछले दिनो गांव मे एक सीमान्त किसान के मैट्रिक पास लड़के तुलसी को जब मैंने एम. एल. ए. को एम. पी. और एम. पी. को एम. एल-ए. कहते सुना तो मुझे कोई हैरानी नही हुई। मैं जानता था, तुलसी मैट्रिक पास तो जरूर है लेकिन इस बेचारे को पढे-लिखे को दुहराने के लिए फर्सत कहाँ मिली ? मैं जानता था उसके बाप ने उसे मैट्रिक पास करने से पहले ही ब्याह दिया था। घर मे तगी तो थी ही। ब्याह कर देने से और बढ़ गयी। वह भाई-बहनों में भी सबसे बड़ा था। इसलिए चिन्ता-फिकर उसे शुरू से ही थी। बाप जवानी के दिनों में शराबी रहा और बुढापे मे आकर बीमार रहने लगा। उसे अपनी गृहस्थी के भार के साथ-साथ अपने बाप की गृहस्थी का भार भी उठाना पड़ा घर मे, कही आने-जाने और ठगाने को पैसा नहीं था। इसलिए मैट्रिक करने पर भी उसे कही नौकरी नहीं मिली। अपनी दो बीघा भूमि से क्या होता? इस- लिये गांव के बड़े किसानो के यहाँ दिहाड़ी मजदूरी करने लगा। दिहाड़ी करते- करते इन्ही बड़े किसानो को पांच सात बीफा भूमि चौये हिस्से और वेगार पर 'बाहने लगा। घर वाली भूमि का काम खत्म होता तो वेगार का काम होता और वेगार से 126/राग मरुगन्धा . ६ छुट्टी मिलती तो अपने खेत-क्यार का काम तैयार मिलता। कहने का अर्थ यह है कि खेती-बाड़ी के धन्धो और घर-गृहस्थी की चिन्ताओं ने उसे सब कुछ भुला दिया। सब कुछ जानते हुए भी मैंने उसे टोका-तुलसी तुम तो पढे हो, फिर भी एम. एल ए. और एम पी. का फर्क नही समझते? तभी पास खड़े उसके भाई ने कहा- भूल गयी सव राग रंग भूल गयी जखड़ी (लोक-गीत) याद रही तीन चीजें लून, मिर्च, लकड़ी ऊपर का यह कवित गांवो में गरीव घर की औरतो के लिए सटीक बैठता रहा है लेकिन अब तो यह तुलसी पर भी पूरा 'ढुक' रहा था। एक यह तुलसीराम ही क्यों? न जाने कितने ही तुलसीराम होगे जो पढ़- लिखकर भी अनए से गये-बीते है। हमारी सरकार अधिक से अधिक लोगो पढ़ाने के लिए चिन्तित है। वह प्रौढ़ शिक्षा, अनौपचारिक शिक्षा, रेडियो, टी. वी. इत्यादि के माध्यम से ज्ञान का विस्फोट- कर रही है, लेकिन गांव का आदमी इस विस्फोट के बावजूद भी कुछ नहीं जानता। क्या लोगों को शोषण मुक्त किये. बिना, थोड़ी फुर्सत दिये विना, शिक्षित करना भी बेमानी नहीं है ?:, 11 1" T गरीवी गाँव की / 127 मण्टू गोपालप्रसाद मुद्गल जाड़े के दिन हैं। लोग बंद कमरों में सुख की नीदं सो रहे है । कमरे भी एयरकंडीशडे । कहीं हीटर लगे हैं । रजाई ओठ रखी हैं वगुला से भी उजली। अलग-अलग पलंग हैं। अलग-अलग विछोने । जाड़ा घुसे तो कैो घुसै? ऐमे भर जाड़े में मेरे घर के सामने मण्टू घोसी चौड़े में सो रहा है। चार बांसों पर तीन टूटी टीन डाल रखी है। टूटी खाट है । तीन पाये तो हैं चौथा है ही नहीं । चोये पाये के स्थान पर चार-पांच इंट लगा रखी है। खाट पर टाट विछा रखा है। ओढ़ने को केवल दो चादर हैं । उनके ऊपर एक टाट डाल रखा है । मष्टू गरीबी के बोझ से इतना दबा हुआ है कि खाट भी वोझिल हो गयी है। चौड़े मे मण्टू है और चौड़े मे ही है उसकी भंस । भैसों पर उसने टाट डाल रखे हैं। समाजवाद साकार दिखायी पड़ रहा है। टूटी खाट पर ही उसका बेटा नसरू सो रहा है । दूसरी खाट है ही नहीं। ओढ़ने-विछाने को कुछ है ही नहीं। दोनों बाप-बेटा एक हीपाट पर गड्ड-मड्ड हो रहे हैं। बटिया भी इतनी सकरी कि करवट बदलना भी दूभर। फिर करवट बदलने की किसको फुरसत है । दिन-भर की मेहनत से थककर चकनाचूर जो हैं । बिना यपकियों के नीद दवोच लेती है । सच है, नीद न देखे टूटी याट । मष्टू अपने घर से दूर नयी कॉलोनी में रह रहा है। अपनी भैसो के लिए किराये पर एक खाली प्लाट ले रखा है। चारो ओर विलायती ववूल लगे हैं । इनसे भंसों की रखवाली हो रही है। मैं जब सवेरे यूय मेने जाता हूँ तो देखकर द्रवित हो उठता हूं। उसको दो पदरों में सोता देखकर हिल जाता हूँ। पदो पर पड़े टाट को कमवस्त कुतिया के पिल्ले पीकर नीचे गल देते हैं । उसमे वे लिपटकर उसकी पाट के नीचे सो रहे 128/राग महमन्धा हैं । इच्छा नही करतो कि मष्टू को जगाऊँ, किन्तु बैंड टी के लिए दूध लेने वाले और भी तो आ धमकते हैं । कोई-न-कोई उसे जगा ही देता है। मुझसे नहीं रहा जाता । मण्टू से पूछ बैठता हूँ, "भले आदमी ! तुझे इतना भी ध्यान नही-पिल्ले तेरे टाट को खीचकर ले गये। वे तेरी खाट के नीचे टाट पर सो रहे हैं।" मण्टू के उत्तर को सुनकर मैं और भी पिघल जाता हूँ। वह आंखों को मलते हुए टूटे-फूटे शब्दों में सहज रूप से कह उठता है, “ये पिल्ला भी तो राम के जीव हैं। मेरा बेटा नसरू तो खाट पर सो रहा है । ये तो विचारे खाट के नीचे पड़े हैं।" मेरे प्रश्न का हल मिल जाता है। मण्टू ऊपरवालों को नही नीचे वालो को। देखकर जिन्दा है। ipi .. मष्ट्र/ 129
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होता, वह तो सच्ची आत्मा की सही पुकार है। प्रार्थना अन्धविश्वास नहीं बल्कि वास्तविक पात्मा की सच्चाई है। अर्थ से रहित हमारा स्तोत्र-पाठ प्रार्थना नही है वक र्थना का आमन्त्रण निश्चय ही हमारी आत्मा की व्याकुलता का द्योतक है। यह पश्चा- त्ताप का भी एक चिह्न माना जाता है। यह प्रार्थना हमारी अधिक अच्छे और अधिक शुद्ध होने की आतुरता को सूचित करती है । अतः हमें अपना कोई भी काम बिना प्रार्थना किये नही करना चाहिए। क्योकि मनुष्य का सबसे बड़ा सहारा ही प्रार्थना है। प्रार्थना किसी भी नाम से की जा सकती है। क्योकि उसका वाह्न तो मात्र भक्तिपूर्ण हृदय ही है । ईश्वर के असंख्य नाम हैं, हमे जो भी नाम रुचिकर लगे उसी की अर्चना या प्रार्थना कर सकते हैं । प्रार्थना वाणी से नहीं हृदय से होती है। हमारे सारे प्रयल प्रार्थना के बिना अधूरे ही रह जाते हैं, अतः जीवन में प्रयत्न के साथ-साथ प्रार्थना भी अनिवार्य ही है। यह प्रार्थना मात्र नम्रता को पुकार ही नहीं है वह आत्मावलोकन एवं आत्म- शुद्धि का आधारहै । मत. प्रत्येक धर्म का सार प्रार्थना ही है। इसे धर्म और मानव- जीवन का मार्मिक अंग माना जाता है। इसके लिए कोई कठोर या जटिल नियम नहीं बनाया जा सकता है। न ही निश्चित समय नियत किया जा सकता है । यह तो अपने-अपने स्वभाव पर निर्भर है तभी तो विद्वानों ने प्रार्थना को प्रातःकाल की कुजी तथा सायंकाल की सांकल कहा है। गांधीजी ने कहा था- "मुझे जो भी शान्ति या सफलता मिली है, वह सब प्रार्थना के द्वारा ही। क्योकि इसमें ईश्वर के साथ सह- कार हो जाता है। मनुष्य सदैव ही प्रार्थना के द्वारा प्रभु की कृपा और सहायता से अपनी दुर्बल- ताओ पर विजय प्राप्त कर सकते है । हमारे विचार यदि भ्रमित हो, हमारा पथ यदि भ्रष्ट हो, तो,इन दोनो की शुद्धता के लिए, इनकी पवित्रता के लिए तथा इनकी सात्त्विकता के लिए हार्दिक प्रार्थना.एक संजीवनी बूटी है । अत. अव: तक के किये .पना और भी रथ - लको मे यह संस्कार शैशव अपस्या से हो डाल देना चाहिए। विद्यालय प्रार्थना को सही सच्चा तथा प्रभावी रूप देकर हम वालक के साथ न्याय कर सकेंगे। ': आइए! आज से ही हम सच्चे भाव और सच्चे मन से प्रार्थना कर जन-जन के कल्याण की कामना करे और मनाकी मलिनता दूराकरं सर्वेश्वर में सबके उदय को भावना करें। प्रभु सबको ही सद्बुद्धि प्रदान कर सलथ पर अग्रसर करे, यही मंगल कामना है। ! प्रार्थना / 131 1 चिन्तन प्रार्थना Dभगवंतराव गाजरे प्रार्थना जीवन की मूलभूत आवश्यकता तथा आध्यात्मिक जीवन का प्राण माना जाता है। प्रत्येक धर्म का प्राण और सार भी प्रार्थना को ही बताया गया है। प्रार्थना से आत्मशुद्धि और आत्मनिरीक्षण होता है, अतः मानसिक और आत्मिक शान्ति के लिए प्रार्थना को अत्यावश्यक ही नही अनिवार्य माना गया है। इसी प्रार्थना मे असीम शक्ति निहित है । इसे हम अपने इष्ट के समक्ष नम्रता की पुकार कहते हैं । अतः मनुष्य को चाहिए कि वह प्रातःकाल उठने के बाद अपना दिन-भर का कार्य सदैव ही प्रार्थना से शुरू करें और उसमें इतनी आत्मा उडेलें कि वह शाम तक निरन्तर हमारे साथ बनी रहे। अपने उपास्य के समक्ष अपनी दुर्बलता और अयो- ग्यता को स्वीकार करना ही सच्ची प्रार्थना है। कहा गया है कि प्रार्थना और सदिच्छापूर्ण प्रयल कभी व्यये नहीं जाते। वे सदैव सार्थक ओर सफल ही होते हैं। एतदर्थ मानव-जीवन की सफलता ऐसे ही प्रयत्नों पर निर्भर करती है। फल तों ईश्वराधीन ही है। प्रार्थना आत्मा का भोज्य पदार्य है। यह प्रार्थना ईश्वर को लिया गया अन्तर्मन का पत्र ही है। जिसमे न कागज चाहिए, न कलम, न दवात ओर न शश्न हो । मात्र एकाग्रता हो उसमें पर्याप्त है। प्रार्थना का अर्थ सत्य का आचरण या सदाचरण है । जब तक जीव मात्र के साथ हमे एकता अनुभव न हो, तब तक प्रापंना व्यर्थ ही है। प्रार्थना जिह्वा में नही हृदय में भी होती है। इसीलिए गूंगे, तोतले तथा मूल भी प्रार्थना कर सकते हैं । उममे भाषा नहीं हार्दिक भाव चाहिए । जहाँ निष्काम कर्म का गाकार रूप हमारे नामने आकर उपस्थित हुआ, वहां प्रार्थना उसी कर्तव्य में आकर ममा जातो है । प्राधना मे कभी विभाजन नही हो सकता, यह मवके लिए तथा मयं धर्म के अनुपापियों के लिए है। प्रार्थना कार्य कभी याचना करना नहीं 130/राग मागन्धा होता, वह तो सच्ची आत्मा को सही पुकार है। प्रार्थना अन्धविश्वास नहीं बल्कि वास्तविक आत्मा को सच्चाई है। अर्थ से रहित हमारा स्तोत्र-पाठ प्रार्थना नहीं है और न शरीर को भूखों मारला सही अर्थ मे उपवास है । बापू ने कहा था, "सात्विक और सहृदय तथा सरल भाव से निकलनेवाली प्रार्थना ही सही प्रार्थना है।" प्रार्थना का आमन्त्रण निश्चय ही हमारी आत्मा की व्याकुलता का द्योतक है। यह पश्चा- त्ताप का भी एक चिह्न माना जाता है । यह प्रार्थना हमारी अधिक अच्छे और अधिक शुद्ध होने को आतुरता को सूचित करती है। अत. हमें अपना कोई भी काम बिना प्रार्थना किये नहीं करना चाहिए। क्योकि मनुष्य का सबसे बड़ा सहारा ही प्रार्थना है। प्रार्थना किसी भी नाम से की जा सकती है। क्योकि उसका वाहन तो मात्र भक्तिपूर्ण हृदय ही है । ईश्वर के असंख्य नाम हैं, हमें, जो भी नाम रुचिकर लगे उसी को अर्चना या प्रार्थना कर सकते हैं । प्रार्थना वाणी से नही हृदय से होती है। हमारे सारे प्रयल प्रार्थना के विना अधूरे ही रह जाते हैं, अतः जीवन में प्रयत्न के साथ-साथ प्रार्थना भी अनिवार्य ही है। यह प्रार्थना मात्र नम्रता को पुकार ही नहीं है वह आत्मावलोकन एवं आत्म- शुद्धि का आधार है । अतः प्रत्येक धर्म का सार प्रार्थना ही है। इसे धर्म और मानव- . तथा सायंकाल की सांकल कहा है। गांधीजी ने कहा था- "मुझे जो भी शान्ति या सफलता मिली है, वह सब प्रार्थना के द्वारा ही। क्योकि इसमें ईश्वर के साथ सह- कार हो जाता है।" , - मनुष्य सदैव ही प्रार्थना के द्वारा प्रभु की कृपा और सहायता से अपनी दुर्वल- ताओ पर विजय प्राप्त कर सकते हैं । हमारे विचार यदि भ्रमित हो, हमारा पथ यदि भ्रष्ट हो, तो.इन दोनों की शुद्धता के लिए, इनकी पवित्रता के लिए तथा इनकी सात्विकता के लिए हार्दिक प्रार्थना, एक सजीवनी बूटी है । अतः अव तक के किये गुये गलत कार्यों के लिए अथवा भूलों के लिए प्रायश्चित कर, आगे के लिए प्रार्थना हे और 'ईतभी 'मनोरथ लकों ... ani को सही सच्चा जया प्रभावी रूप देकर हम चालक के सायं न्याय कर सको। माइए आज से ही हम सच्चे भाव और संध्ये मन में प्रार्थना कर जन-जन के कल्याप को कामना करे और मन की मलिनता दूर कर सर्वेश्वर से सबके उदय की भावना करे। प्रभु सबको ही सद्धि प्रदान कर समय पर अग्रसर करे, पहीं मगन कामना है। 0.. प्रार्थना /.131 T मन का उफान जयसिंह चौहान 'जौहरी' यह जो मूल्यवान वस्तु मुझे तुम्हारे द्वारा उपलब्ध हो रही है मैं किंचित चिन्तन में हूँ कि इसकी कीमत तुमको चुकाऊँ तो कैसे और तुम यह कीमत लोगे तो कैसे ? तुम जो गुजरते हो अपनी डलिया में कई तरह के सुन्दर फूल और मालाएं लेकर मेरे समीप से, उस काल में अनकही खुशबू से निहाल हो जाता हूँ। मैं कई दिनों से सोच रहा हूँ, तुम्हारे द्वारा मुझे दी जाने वाली इस अमोघ वस्तु की कीमत की अदायगी के विषय में । चूंकि दुनिया पैसा देकर फूल खरीदती है, किन्तु मैं फूल नही खरीदना चाहता । फूल लेकर जिस उद्देश्य की पूर्ति दुनिया करना चाहती है, मैं अनायास विना कीमत चुकाये ही प्रतिदिन अपने स्थान पर बैठा उसको प्राप्ति कर लेता हूँ। चाहे वह महक एक क्षण को ही क्यो न हो, मुझे रससिक्त कर देती है। मेरे हौसले को मूल्यवान कर देती है । जब मैं एक दिन तुम्हें इसकी कीमत चुकाने की बात कलंगा, तुम कई तरह के प्रश्न मेरे सम्मुख उपस्थित कर दोगे; और मैं शायद निरुत्तर हो जाऊँगा । उस समय तुम भी कह सकते हो, "भाई तुम फूल ही क्यो न मरीद लिया करते मुझसे।" परन्तु मैं तो फूल घरीदना ही नहीं चाहता। इसलिए नहीं कि मेरा पुशबू अधिगति का उद्देश्य बिना फूल परीदे ही पूर्ण हो जाता है वरिक मैं तो यों कहूँगा कि फूलो को हाय लगाकर उनकी कोमलता और उनकी स्वच्छता में मैं खिलवाड़ नहीं करना चाहता। फूलों को छूने से वे मैले होते हैं । क्षण-राण अपनी मोहकता, कोमलता, और सौन्दर्य को योनेवाले पुप्पो को मैं अपनी ओर से हापों में लेकर उन्हें और क्यो अरावन कल, मैना कसं, नष्ट करूं। ऐसी धारणा से मैं सदैव फूलों से दूर रहना चाहता हूं, बचना चाहता हूँ, उनको छूना नहीं चाहता। परन्तु उसकी कीमत ययावत पकाना चाहता हूं, जिसका नाम मैं मम्बी अवधि में संगातार लिये जा रहा हूँ। 132/राग मगन्धा प्रकृति ने ओस की बूंदों को सजाने के लिए कोमल पखुड़ियों का विधान किया है । मोतियों को सहेजने के लिए सीपियो के गर्भ को रजत प्लावित स्निग्ध-श्वेत किया है । फूलों को संवारने के लिए टहनियों के आलम्बन से बढ़कर और कोई हो नहीं सकता। हम लोग तो उन्हें छूकर अपवित्र कर देते हैं । हाँ, तो मैं अपने विषय से परे नही जाऊंगा । एक अवसर की वाट देख रहा हूँ कि उस दिन मेरे रन्ध्रों में रिसकर अपने विपुल वैभव से मुझे उद्वेलित और अभि- भूत कर देनेवाली अभिमन्त्रित सुगन्ध का मूल्य चुकाने के लिए मैं तुम्हे आमन्त्रित करूंगा। दुनिया पुष्प खरीदकर उसका पैसा चुकाती है। मैं अनायास प्राप्त की गयी सुगन्ध की कीमत चुकाना चाहूंगा। आकस्मिक ही सही, मैंने उस वस्तु का उपभोग अवश्य किया है । और मेरी अन्तरात्मा यह महसूस करती है कि मैंने किसी से कोई वस्तु ली है । उसकी अदायगी कीमत के रूप में, पैसे के रूप में मुझे करनी है। इस विषय मे यदि मैं चुप हो जाता हूँ तो मेरी आत्मिक नैतिकता के पतन का प्रश्न बनता है, जो मुझ तक ही सीमित रहता है। .. इधर यह भी मुझे ज्ञात है कि प्रत्यक्ष रूप मे मेरे सामने कोई उस सुगन्ध की कीमत का लेनदार नही है, परन्तु ऐसा सोचकर मैं अपनी आत्मा से जुड़े कर्तव्य से च्युत ही होऊँगा। सेण्ट खरीदनेवाले हजारो रुपये खर्च कर उसका उपभोग करते ही हैं । मैंने भी तो खुशबू का उपभोग किया है । यों देखा जाय तो कुछ परिस्थिति में लोग वस्तु उधार लेकर भी उसका मूल्य चुकाने से मुकर जाना चाहते । मुझे अपनी अन्तरात्मा अन्तर-नैतिकता के साथ अभिप्रेरित किये है, कीमत चुकाने के लिए। फिर चाहे ऊपरी नैतिकता का मुखौटा लगानेवाले लोग, चाहे मेरे इस कर्त्तव्य को विवेकशून्य और मेरी इस धारणा को तथ्यहीन ही क्यो न घोपित कर दे! कभी-कभी लोग किसी से कोई वस्तु खरीदकर उसकी कीमत नही चुकाने के हथकण्डे में अपनी ऊपरी (दिखावटी) नैतिकता वहाल रखना चाहते हैं, परन्तु मेरे मन मे सुगन्ध को अप्रत्यक्ष प्राप्ति पर उसकी प्रत्यक्ष अदायगी को लेकर आनन्द का सागर उफान मार रहा है। १ मन का उफान / 133 तत्सत् विश्वनाथ पण्ड्या अस्ति और नास्ति के वीच मानव चेतना सृष्टि के आरम्भ से लेकर द्वन्द्व ग्रस्त है। सृष्टि के रहस्य के प्रति जिज्ञासा भाव ने मानव दर्शन को दो भागों में विभक्त कर दिया। एक आस्तिक, जो सृष्टि से इतर किसी महासत्ता को, परमसत्य को स्वीकार करता है एवं-दूसरा नास्तिक, जो भौतिक जगत को ही सत्य मानता है। इस जगत के सिवाय वह किसी अन्य सत्य 'को नकारता है। लेकिन अब तक न तो ईश्वरवादी सत्य को प्रत्यक्ष कर पाये हैं और न ही अनीश्वरवादी सत्य को झुठलाने के ठोस प्रमाण जुटा सके हैं। इन दो मतो के अनुयाइयों को लेकर दृष्टिपात किया जाय तो कहने को तो धार्मिक लोग संख्यात्मक दृष्टि से अधिक है पर वस्तुतः वे जिस ईश्वर में या धर्म में विश्वास करते हैं उसके बारे में यथार्थ ज्ञान उन्हे भी नहीं है । वे सत्कारवश धार्मिक हैं या वंश, जाति, देश या परिस्थितियो के कारण ही वे किसी महासत्ता के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं । उसे ज्ञान नही, अन्धानुकरण ही कहा जा सकता है। दूसरी ओर यह कटु सत्य है कि तथाकथित बौद्धिक वर्ग को अनीश्वर- वादियो ने ही ज्यादा प्रभावित किया है, क्योकि वौद्धिक वर्ग, जिसे आजकल हम भ्रमवश विज्ञानवादी कहते है, सत्य का प्रमाण चाहते है और इन दिग्भ्रमितो को मिय्या नकों से नास्तिक दर्शन ने सम्मोहित कर लिया है। उन्होंने ऐसे कई प्रश्न खड़े किये जिनका आस्तिक दर्शन के पास उत्तर नहीं है। प्रश्न उठता है कि कब तक सत्यासत्य पर व्यक्ति चिन्तन ही करता रहेगा। क्या यह मान लिया जाय कि इस जगत के परे कोई सत्य नाम की वस्तु नही हो सकती? उधार का घृत पोकर सुषी बनने के सिद्धान्त को स्वीकार कर लिया जाय? इस दर्शन को मान लेने में तो कोई वाघा नहीं है पर इसके माध ही कई 134/राग मंगन्या प्रश्न मानस मे एक साथ उठते हैं, समाधान चाहते है । पाश्चात्य सभ्यता या इसके समर्थक लोग जो 'इदम् सत्यम्' के प्रवल समर्थक हैं, सारी सुख सुविधाए एवं विलास को छोडकर नंगे पर, मुड़े सिर, भगवे वस्त्र, 'हरे राम हरे कृष्ण' की धुन मे मस्त किसी रहस्य मे डुबकियां लगाते हैं तब हमें वाध्य होकर कुछ सोचना पड़ता है । यहां से फिर हमारे ठहराव को, हमारे द्वन्द्व को एक दिशा मिलती है, एक गति मिलती है। सत्य की खोज में अब तक कई पथिक आगे बढ़े। चाहे वे, चाहे उनका पथ, उनका चिन्तन कोई भी रहा हो, पर विडम्वना यह हुई कि जो जहाँ रुका, जहाँ थका, वही उसने अपने विषय की घोषणा कर दी और आगे का पथ बन्द मा कर दिया। आज हम विश्व मे सारे धमों और अनुयायियों में मत-वभिन्य पाते हैं। इसका मूल कारण हमारी अधूरी यात्रा ही है। सृष्टि के रहस्य के प्रति जिज्ञासा भाव ने हमे यह महसूस करवाया है कि इस सृष्टि का सर्जक, नियन्त्रक तत्व अवश्य होना चाहिए, जो सृष्टि के पूर्व और पश्चात सदा विद्यमान रहता है । उस सत्य की खोज का मुख्य आधार धर्म है । सत्य साक्षा- त्कार के साधन स्वरूप जिस उपादान का हम सहारा पाते है वस्तुत. वही धर्म है । आज हम धर्म नाम से जिस तत्व को अभिहित करते है वह वास्तव में धर्म नही सम्प्रदाय है । धर्मअन्धानुकरण नहीं हो सकता, धर्म अविवेकी नहीं हो सकता, धर्म देश, काल या व्यक्ति की सीमा में आबद्ध नहीं हो सकता है। महत् साध्य का साधन क्षुद्र नहीं हो सकता। धर्म को तर्को से सिद्ध नहीं करना पड़ता, धर्म की रक्षा के लिए तलवार की आवश्यकता नहीं होती है। आज धर्म का जो स्वरूप हम देख रहे हैं वह हमारे मिय्याभिमान का पर्याय है ! यह सत्य है या वह । यह व अवस्था हमारे अज्ञान के कारण है । सृष्टि की कोई भी वस्तु अपने दो रूपों मे नहीं हो सकती। ज्ञान-अज्ञान, प्रकाश-अन्धकार, सुख-दुःख, जीवन-मरण, सत्य-असत्य युग्म नही है। एक का अस्तित्व दूसरे के अभाव के कारण है । सत्य के होने का प्रमाण हमारा अन्त करण है जिससे वेद, उप- निषद और पुराण उद्भूत हुए हैं । सत्य इन्द्रियातीत, गुणातीत एवं रूपातीत है। सत्य की मात्र अनुभूति हो सकती है । आत्मा और सत् स्वरूप परमात्मा को एक बहती हुई सरिता और सागर के उदाहरण से सिद्ध किया जा सकता है । सरिता को मागर के साक्षात्कार के लिए अपने अस्तित्व को विलीन कर ही देना होता है और सत्य के माक्षात्कार पश्चात् सरिता अपना ही अस्तित्व नही रखतो फिर वह सागर * की विराटता को कैसे प्रमाणित करेगी। चाहे वेदकालीन ऋपि हो या उपनिपद्- कालीन चिन्तक, चाहे भक्त हो या कोई भी, सत्य साधक जव ध्यानमान अपनी अगुली ऊपर उठा देता है तो हमें यह स्वीकार करना पडेगा कि. उसे सत्यानुभूति हुई है और उमको उठी हुई अंगुली यह अभिव्यक्त करना चाहती है कि 'तत्सत'। . तत्सत् / 135 वन देवी 0 विष्णु लाल जोशी जेठ को दुपहरी । सर्पाकार पगडण्डी, उडती धूत। चिलचिलाती धूप मे आँखे चुधियाता हुआ मैं बांध के किनारे पैदल जा रहा था। सूखा बाँध । नन्न पहाड़ियां। सांय-सांय करती हवा । दूर-दूर तक मनुष्य तो क्या, पशु-पक्षी भी नजर नहीं - आते। पहाड़ी के ढलान पर किसी का करुण क्रन्दन सुनायी दिया। मैं उत्सुकतावश उसी दिशा की ओर बढ़ने लगा, जिधर से आवाज आ रही थी। पास जाकर देखा, एक कोमलांगी अपनी काया को फटे चीथड़ो मे छिपाकर वृक्ष के तले बैठकर सिसकियां ले रही थी। " तुम कौन हो देवी ! क्यों विलाप कर रही हो? मैं वन देवी हूँ पथिक । मै रमणीय स्थानो मे भ्रमण करती हूँ। यह स्थान, जो तुम निर्जन और सुनसान देख रहे हो कभी बहुत रमणीय था। वांध में भरा हुआ लवालव पानी । अठखेलियां करती हुई लहरे। उड़ते हुए पक्षियो का कलरव गान । पहाड़ों पर बवूल, नीम और संजना के हरे-भरे वृक्ष । पलाश और सदावहार गुलमोहर के मनभावन फूल और उनसे आती हुई भीनी- स्वार्थी मनुष्य ने अपने अहकार के नशे में चूर होकर मेरे रमणीय क्रीड़ा- स्थल उजाड़कर तहस-नहस कर डाले । मैं मनुष्यो की अज्ञानता पर आंसू बहा रही हूँ । देखो, स्वार्थी मनुष्यों ने मेरा क्या हाल बना दिया है ? मानव अपनी कररतो से बाज नहीं आ रहा है । वह घड़ायह वृक्षो को काट रहा है । जगलो को उजाड़ रहा है। अपने आपको सभ्य कहलाने का दम्भ भरनेवाले ओ मानव । तुमने अपने मनोरंजन के लिए वन्य प्राणियो की अनेक प्रजातियों को ही सन्त नष्ट कर डाला। अपने स्वार्थ के लिए दूसरो की जान लेना, क्या यही सभ्यता है ? भीनो महक। 136/ राग मरुगन्धा चारों तरफ सूखा पड़ा है । सरोवर सूखे पड़े हैं । मनुष्य एक-एक बूंद पानी के लिए तरस रहा है । पशु चारे के बिना दम तोड़ रहे हैं । गरीबों को दो जून रोटी भी नसीब नहीं होती । प्रदूषण का प्राणलेवा विष फैलता जा रहा है। प्रकृति से नाता तोड़कर तुम्हें क्या मिलेगा? भयंकर महाकाल के दुष्परिणाम तुम भुगत रहे हो। फिर भी तुम्हारी आँखे नही खुली । महाकाल आनेवाले कल के लिए नागाह कर रहा है। चेत जाओ ! अव भी समय है। समय रहते चेत जाओ वरना आनेवाली पीढ़ियो को देने के लिए तुम्हारे पास दुःख, संघर्ष और यातनाओं के मिवाय कुछ भी शेष नहीं रहेगा। बनदेवी/ 137, वन देवी विष्णु लाल जोशी जेठ की दुपहरी । सर्पाकार पगडण्डी, उड़ती धूल । चिलचिलाती धूप मे आँखें चुधियाता हुआ मैं बांध के किनारे पैदल जा रहा था। सूखा बांध । नन पहाड़ियो। सांय-सांय करती हवा । दूर-दूर तक मनुष्य तो क्या, पशु-पक्षी भी नजर नही आते। पहाड़ी के ढलान पर किसी का करण क्रन्दन सुनायी दिया। मैं उत्सुकतावश उसी दिशा की ओर बढ़ने लगा, जिधर से आवाज आ रही थी। पास जाकर देखा, एक कोमलागी अपनी काया को फटे चीथड़ों में छिपाकर वृक्ष के तले बैठकर सिसकियां ले रही थी। तुम कौन हो देवी ! क्यो विलाप कर रही हो? मैं वन देवी हूँ पथिक । मैं रमणीय स्थानों मे भ्रमण करती हूँ। यह स्थान, जो तुम निर्जन और सुनमान देख रहे हो कभी बहुत रमणीय था। वांध मे भरा हुआ लवालब पानी । अठखेलियां करती हुई लहरें। उड़ते हुए पक्षियों का कलरव गान । पहाड़ो पर बवूल, नीम और संजना के हरे-भरे वृक्ष पलाश और सदाबहार गुलमोहर के मनभावन फूल और उनसे आती हुई भीनी- स्वार्थी मनुप्य ने अपने अहकार के नशे में चूर होकर मेरे रमणीय श्रीड़ा- स्थल उजाड़कर तहस-नहस कर डाले । मैं मनुष्यो की अज्ञानता पर आंसू बहा रही हूँ। देखो, स्वार्थी मनुष्यो ने मेरा क्या हाल बना दिया है ? मानव अपनी करटूतो से बाज नहीं आ रहा है । वह धड़ाधड़ वृक्षो को काट रहा है । जगलों को उजाड़ रहा है। अपने आपको सभ्य कहलाने का दम्भ भरनेवाले ओ मानव तुमने अपने मनोरंजन के लिए वन्य प्राणियों को अनेक प्रजातियों को ही सहर नष्ट कर डाला । अपने स्वार्थ के लिए दूसरो की जान लेना, क्या यही सभ्यता है ? । भीनी महक। 136/ राग मरुगन्धा चारो तरफ सूखा पड़ा है । सरोवर सूखे पड़े है। मनुष्य एक-एक बूंद पानी के लिए तरस रहा है । पशु चारे के बिना दम तोड़ रहे हैं। गरीबो को दो जून रोटी भी नसीब नही होती ! प्रदूषण का प्राणलेवा विष फैलता जा रहा है। प्रकृति से नाता तोड़कर तुम्हें क्या मिलेगा? भयंकर महाकाल के दुष्परिणाम तुम भुगत रहे हो । फिर भी तुम्हारी आँखे नही खुली । महाकाल आनेवाले कल के लिए आगाह कर रहा है। चेत जाओ! अब भी समय है। समय रहते चेत जाओ वरना आनेवाली पीढ़ियो को देने के लिए तुम्हारे पास दुःख, संघर्ष और यातनाओं के मिवाय कुछ भी शेष नहीं रहेगा। वनदेवी / 137 आत्म-स्पर्श विश्वम्भरप्रसाद शर्मा जीना एक कला है । सुरम्यता है । होनी चाहिए सुरुचि । जीवन महकता है। एक सरसता, सौम्यता प्रतिक्षण जीवन रस बरसाती है। दिव्य भावों के साथ । ठुमक- ठुमककर क्षण मुस्कराते है । इन नन्हे वाल अबोध क्षणो में कोई धीरे से जन्म लेता नन्ही-तुलिका से आत्म-स्पर्श ज्ञान-चित्रों को उकेर देते हैं । मुस्कराती रेखाएं प्यार से कुछ कह रही हैं। हम मन-ही-मन मुखर हैं । अन्तर्मन ज्योतिर्मय है। जीना एक मजा है, मजा आ गया जीने का । कुछ ऐसे ही भाव उमड़ते है । बरसती हैं; कला-मंजूपा के पृष्ठों पर । मैं नन्हें बच्चों की तूलिका को झूमकर चूमता हूँ। एक स्पर्श सुवासित हो आन्तरिक सौन्दर्य को जन्म देता है । क्यो ऐसा ही है न ! उमड़ते भाव । झूमती-चूलिका और वरसते चित्र एक नयी दृष्टि को नये आयाम से नये जगत को जन्म देते हैं । मन्त्र-मुग्ध है। बाल अबोध मण्डली । जीने का ज्ञान नही ! जी रहे है; भान नही पर जीने का जो आनन्द होना चाहिए। अवोध क्षण अपने मे कितने सुबोध हैं। जिन्दगी इन रेखाओ मे स्निग्ध है। वस ! एक लमहा हमे प्यार करता है । यह हम ही जानते हैं । मन-ही-मन मधुर-मधुर सपना सोता है। इन रेखाओ में । सचमुच रेखाओ मे जीवन बोलता है । रेखाएं बोलती हैं। 138/यग मरुगन्धा पूर्व दिशा वही है विमला डोरथी । - . उदात्तीकरण-औदार्य का गुण । संस्कार-युक्त जीवन बनने पर जिस सौन्दर्य का निर्माण होता है, भीतर की सुन्दर व्यवस्था बनती है। यह उसी का परिणाम है। ईश्वर ने हमें शक्ति और उत्साह दिया है। इनकी सुन्दर व्यवस्था और उपयोग हमें करना है । अतः अपने पास जो वस्तु है, उसका रक्षण करना, तरतीब से रखना, ठीक तरह से उसका उपयोग करना आना चाहिए। यदि यह न आता हो तो वस्तु के रहते हुए भी वहां सौन्दर्य नही । केवल अच्छे वस्त्र से काम नही चलता, उसका ठीक तरह से उपयोग भी आना चाहिए । ज्ञान का सौन्दर्य उपयुक्त है । अतः सौन्दर्य अनुभुक्त है। हमारे पास शक्ति है, वह सब हम धन्धे, व्यापार या नौकरी में व्यय करते हैं। हमारे पास उत्साह है, वह सुबह से शाम तक हम व्यस्त रहकर समाप्त करते हैं। विपयो का उदात्तीकरण नहीं करते। श्रीमदाद्यशंकराचार्य ने विषयों को व्यापक रूप में दार्शनिक दृष्टिकोण से देखा है । हमने विषय के अर्थ को स्त्री-पुरुष सम्बन्ध तक मर्यादित कर लिया। विषयों का उदातीकरण-भाव ही जीवन सौन्दयं तक ले जा सकता है । ईश्वर ने हमें अनन्त विकार भी दिये है। ईश्वर-प्रदत्त विकार हमने किस तरतीब से रखे, उनका उपयोग कैसे किया, मूल प्रश्न यही है। जिसने स्वयं के भीतर अच्छी रीति से विचारों की रचना की, उनको उपयोग मे लिया, उसी के पास सौंदर्य आया। ऋषियो को विकारों को संभालना, उनका उपयोग करना आता था। एक भी ऋषि ऐसा नही हुआ, जिसे क्रोध नही आया, फिर भी वे मुक्त हुए । असल में उन्होंने सभी विकारो को जीवन मे ठीक रीति से संजो रखा था, ठीक तरह से उसे प्रयुक्त करते, उपभोग करते, इसीलिए उनके जीवन मे सौन्दयं दिखायी दिया। पूर्व दिशा वही है / 139 वाल्मीकि का जीवन सुन्दर या । उनका जीवन अनुपभुक्त था। दूसरे किसी को उस सौन्दर्य का उपभोग लेने को नहीं मिलता था, कारण, उन्हे इसका ज्ञान ही नही । जिस सौन्दर्य की अपनी सुगन्ध है, वही आत्मिक सौन्दर्य है। उसी को स्वान्तः सुखाय कहते हैं । यही अनुभुक्त सौदर्य है। इस आनंद के वैभव को नहीं बढ़ाकर हम कृपण बन गये । वाल्मीकि के पास अधिक करुणा होगी हमारे पास कदाचित कम। प्रश्न कम या अधिक का नहीं ! जो शक्ति हमे मिली है, उसको रखा कैसे, कैसे उसका उपयोग किया, प्रश्न यह है ? उन्होंने अपनी शक्ति और उत्साह को यथा समय और यथास्थान प्रयुक्त किया । इसीलिए, उनके जीवन मे एक भिन्न सुगन्ध मिलती है । वस्तु अल्प प्रमाण में होते हुए भी अच्छा ससार चलाकर दिखानेवाली गहिणी अच्छी है, ऐसा कहा जाता है। विपुलता से भी कभी-कभी मनुष्य घबरा जाता है । कहता -'मैं इन सबका क्या करूं'। उस विपुलता को संभालना, हस्तगत करना, उपयोग करना, यही जीवन की कला है । ऊंचाई विचारो की होनी चाहिए । जीवन की होनी चाहिए। कर्तव्य के नाते कुछ करना, यह एक सामान्य बात है । 'विकासार्थ करना', इसमे जीवन की ऊंचाई है। 11 सकता। कुछ नहीं है । उदार मनुष्य भिखमगे को अच्छे लगते है, फिर वह व्यक्तिगत भिखारी हो या सामाजिक भिखारी-(रॉयल वेगर)। ये सभी सौन्दर्य उपयुक्त है। मानव का विकसित किया हुआ सौन्दर्य ही अनुपभुक्त है अर्थात उसका उपभोग कोई नही वेदान्त कहता है जीवन मे न कुछ कमाना होता है, न कुछ गंवाना होता है, जो प्राप्त है उसी को संभालना, उपयोग करना, मनुष्य का काम है । ऐसा उदात्तीकरण हो जाने पर अविद्या चली जाती है । आत्मिक सौन्दर्य खिल उठता है । 'उदयति दिशी यस्यां भानुमान संव प्राचि'-जिस दिशा मे सूर्य उदय होता है, वही पूर्व दिशा है । दिशाओ की पराधीनता सूर्य को नहीं । ०० - 140/ राग मरुगन्धा
4
असतो मा सद्गमय
PRT 1. :
बंजनाथ शर्मा
T
1
शीर्षक वेदमन्त्र का एक अंश है । उस वेदमन्त्र का जिसमे मानव की भावनाओं एवं
कर्मों का स्वरूप और जीवन का सार निहित है। लाखों पुजारियो; करोड़ों विद्या-
थियो' और उनके शिक्षकों को पूरी तरह कण्ठस्थ है । प्रतिदिन दुहराना ही पड़ता
असतो मा सद् गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।'
मृत्योर्माऽमृतम् गमय ।
... शब्दों का अपना स्थान है, अपना ही क्रम और अर्थ की अपनी गहनता । मृत्यु
का भय उसी को सताता है जो अज्ञानी है और अज्ञानी वही है, जिसे सतासत् को सूझ
नही। मृत्यु का भय संसार का महानतम भय है । संसार में शायद ही कोई ऐता सन्त
हो जिसे यह भय न सताता हो। मृत्यु के भय की इस कसौटी पर हम सभी अज्ञानी
हैं। हम सभी ने सामान्यतः वे ही पुस्तकें पढ़ी हैं, जिनमें इस भय से मुक्ति का मार्ग
मिलता ही नहीं। इसलिए पढ़-लिखकर भी हम जीवन को सार्थकता के सन्दर्भ में
अज्ञानी हैं । इसलिए बाबा कबीर जब कहते हैं कि.-.:
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पण्डित भया न कोय।
'ढाई आखर प्रेम फा, पई सो पण्डित होय ।।
तो वे ठीक ही कहते हैं।
जीवन-मरण सृष्टि का क्रम है । पलता ही रहेगा। यह क्रम सार्वभौमिक और
सार्वकालिक है । इस क्रम में कोई अन्तर भी नहीं आया। अनादि काल से चलता
बा रहा है और चलता ही रहेगा। जिसने जन्म लिया है उसे मरना ही पड़ेगा।
असतो मा सद्गमय/ 141
-
फिर अमरत्व कहाँ ? और फिर, जिस मृत्यु के भय से मभी भयभीत हैं, उस भय से यदि छुटकारा मिल भी जाय, जो आया है उसे जाना न पड़े, तो सृष्टि का क्रम ही मिट जाय । इस भू-पटल पर ऐसा कोई दिखायी भी नहीं देता जो जन्म लेने के बाद मरा न हो। सभी का मरना सुनिश्चित है। अरवों, वरवों लोगों ने जन्म लिया, जिये और चले गये। कोई जानता तक नहीं । कुछ की कहानियाँ इतिहासों मे अवाय लिखी हैं। कुछ इने-गिने ऐसे भी हैं, जिन्हे इस संसार से विदा हुए सदियों बीत गयी, परन्तु आज भी जन-जन की जवान पर जीवित है। यही अमरत्व है। इस अमरत्व को चाहते सभी हैं, पर पाते कुछ बिरले ही हैं। यह अमरत्व यों ही नही मिल जाता । बड़ा त्याग चाहता है । त्याग, उसका जो हमे भाता है; त्याग, उसका जो हमें सुहाता है। माना और सुहाना दोनों ही व्यक्ति और परिस्थिति सापेक्ष्य हैं ! जो देखने मे सुन्दर और खाने में स्वादिष्ट लगे वह हमे भाता है; जो सुनने में सुहावना, सूंघने में सुगन्धित और स्पर्श से कोमल प्रतीत हो, वह हमें सुहाता है। परन्तु सुहाने और भाने की यह शास्वत पहिचान नहीं। किसी को सिनेमा के गीत सुहाते हैं तो किसी को भगवान के भजन । ये सव ज्ञानेन्द्रियों के विषय हैं । ज्ञानेन्द्रियो पर जब मान, मत्सर, मोह, काम, क्रोध, मद, लोभ आदि भौतिक आकर्षणो से उत्पन्न भावनाओं का आवरण पड़ जाता है तो, हमे ससार का वास्तविक रूप दिखायी नहीं देता। जो दिखायी देता है वह आवरणमय है, वास्तविक नही अवास्तविक है । अवास्तविकता को वास्तविकता मान बैठना ही सबसे बडा भ्रम है, अज्ञान है । अज्ञान ही अन्धकार है और पतन का प्रमुख कारण भी। सच्चा ज्ञान कुछ और है । वह शारवत है, उसका अन्त नहीं होता। यह ज्ञान पुस्तको के पठन एवं श्रवण मात्र से प्राप्त नहीं होता। वह ज्ञान इन इन्द्रियों से परे का विपय है । उस परे को पार करने के लिए चिन्तन, मनन और मन के चक्षुओं को खोलने की आवश्यकता है, जप, तपकी आवश्यकता है । माला की मनियों के उस जप को नहीं जिसके लिए वावा कबीर मना करते हैं। साफ साफ शब्दों में कहते हैं- जप माला पातिलक, सरन एको काम। मन कांचे नाचे वृथा, साँचे राचं राम । वह तो काठ की माला के माध्यम से मन के फिराने की बात कहते हैं। कविरा माला काठ को, कहि समुझावे तोहि । मन न फिराव आपुनो, कहा फिराव मोहि ।।' मन का फिराना ही सच्चा ज्ञान है।"मन को फिराना किससे? मन का फिराना 1- उस लोभ, मोह, मत्सर आदि से जो मन और अन्धकार मे सच्चा प्रकाश पाने ही नहीं देते । इसीलिए वेदाभ्यासी कहता है--तमसो मा ज्योतिर्गमय । यह अक्षुण्ण प्रकाश-तेल और वाती का नहीं, बिजली का नहीं, चांद और मएल का भी नहीं। यह प्रकाश कुछ और ही है । यह कभी बुझता नहीं। इस पर , . 142/राग मरुगन्धा आंधी, तूफान जैसे प्राकृतिक प्रकोपों का भी प्रभाव नहीं पड़ता। इस प्रकाश को कोई बावरण भी नहीं ढक पाता। बड़ा अद्भुत है यह प्रकाशासह किसी को दिखायी नहीं देता। इसकी तो केवल अनुभूति होती है। वह अनुभूति जो बड़ी अलौकिक है। इस अनुभूति को बिरले ही कर पाते हैं और जो कल से उन्हें यह बाह्य जगत बन्धन जान पड़ता है, असत् जान पड़ता है। उन्हें और असत् का भेद साफ दिखायी देने लगता है। यह भली-भांति, समझने लगते । इन्टर सुख, सुख नही, भुलावा है । उनके लिए यह संसार एक कान लान जिसकी कोई सीमा नही, जो स्वतः ढीला और कड़ा होता रहता है। इसे काटना कठिन है परन्तु असम्भव नहीं। इसे सत् और असत् के वीच.भेद स्थापित कर सत साथ चलने तथा असत् के मार्ग से मन को मोड़ने से ही काटा जा सकता है । परन्तु यह कौन बताये कि क्या सत् है और क्या असत् ? इसके लिए. सच्चे गुरु की आवश्यकता है । इसीलिए बाबा कबीर की नजर मे 'गुरु' गोविन्द से बड़ा है । गुरु गोविन्द दोउ खड़े, काके लागूं पायें। 'बलिहारी गुरु आपने, जिन गोविन्द दियो बताय ।।' बाबा तुलसी के शब्दों में यह समझाना गुरु का ही काम है कि- "परहित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीडा सम नहिं अधेमाई-7 . . 'परहित सत् है और परपीड़ा असत् । परहित की भावना से प्रेरित सहयोग ष्ट्रप्रेम, राष्ट्रभक्ति, समाज-सेवा ५५ '५. असत् है। सत् में ही ईविर का वास है और ईश्वर को देखना ही अलौकिक आनन्द की अनुभूति । प्रभु बड़े पारखी हैं । अज्ञानवश किये गये उसके असत् कर्मों के लिए भी उसे क्षमा कर देते है । उसके दोपों पर ध्यान तक नहीं देते। 'जहां दया तहँ धर्म है, जहां क्षमा तहे आप। और क्षमा में ही है । ये ही सत् हैं । वेद- -1९17 के इन गुणों को भूले नहीं अपितु इनका अनुसरण करे। वह प्रभ से प्रार्थना करता है 'असतो मा सद् गमय। 12:22 असत् ही अज्ञान है, अन्धकार है और अज्ञान ही मृत्यु । इसके विपरीत सत् ही ज्ञान है, प्रकाश है और सच्चा ज्ञान ही अमरत्व। जिसको भावनाएं सत् है, जिसकी क्रियाएँ सत् है, वही सच्चा ज्ञानी है और वह कभी मरता नही, अमर है। ++TETS" - असतो मा,सद्गमय / 143 आत्मकथा उड़ चला लेकर पैगाम - 0 उमा चतुर्वेदी । 1 जी हाँ, जाना पहचाना हूँ। मैं तरह तरह के पैगाम लेकर उड़ता हूँ। सुबह हो या शाम बस उड़ता ही रहता लेकर पैगाम। जी हाँ यही मेरा काम. है । नही जान पाए न मुझे ! जाने भी तो कसे; मैं तो अपने आपको एक अदना सा खिदमतगार मानता हूँ। फिर आज के युग मे मेरी पहचान समाजवाद के प्रचारक के रूप में वन पायी है । क्या तो गरीव और क्या अमीर सभी मुझे चाहते हैं । काम ही कुछ ऐसा करता हूँ जिससे मेरी पूछ होती है। आप माने या न मानें पर यह सही है कही तो मैं खुशियो का खजाना लुटाता हूं, कही से आंसुओ की सौगात पहुंचाता हूँ। कही बिछुड़े दिलों को मिलवाता हूँ तो कहीं आहों की सिसकारियां सुनवाता हूं। मैं एक जगह से दूसरी जगह पहुंच कर अपनी अन्तिम यात्रा का पड़ाव लगाता हूं। इसके बाद मैं उस पतग की तरह हो जाता हूँ जो दांव पेच में उलझकर पहली और अन्तिम बार अपना सब कुछ दांव पर लगा चुकी हो। धड़कते दिलोको धड़कन सुनता हूं। विरह मे जलनेवाली विरहिणी की विरह गाया का रुदन देखता हूँ। प्रेमी-प्रेमिकाओ को हृदय तत्रो के तारों की प्रकार सुनता हूँ। गरीबों को गिड़गिड़ाहट और अमीरो के मालामाल होने को मनझना. हट भी देखता हूँ। इसके बावजूद भी मैं जितना पचाता हूं उसकी मिसाल कही नही मिलेगी। लोगों को कानोंकान रूबर तक नहीं होती कि मैं क्या लेकर आया 1 प्रतीक्षारत स्त्री पुरषो के कलेजो पर उस समय छुरिया चल जाती हैं जव में समय पर नहीं पहुंचाया जाता। मैं जब अपने अन्तिम पड़ाव पर पहुंचता हूं तो मुझे पानेवाला सन्तोप को सांस लेता है। भिन्न-भिन्न स्थानो से बाये मेरे सभी 144/राग मरुगन्धा नाई बहन भी मेरे साथ होते हैं। उनमें से कई को शक्लें देखकर ही पानेवाला उस कहावत को चरितार्य करता है कि लिफाफा देखकर ही जैसे वह मजमून भांप गया - मेरी जिन्दगी एक लम्बी यात्रा के वाद दम तोड़ देती है। मनुष्य की जिन्दगी लम्बी होती है पर पानी के बुलबुले की तरह दम तोड़ देती है। लोग कहते हैं दुनिया चमक देखती है, पर में कहता हूँ दुनिया नवीनता देखती है। वात अस्तित्व की है । जब किसी का अस्तित्व ही दांव पर लगा दिया जाये तो यह क्या तो चमक देखेंगा और क्या नवीनता । कोई भी पानीदार व्यक्ति यह पसन्द नहीं करेगा कि उसकी जिन्दगी गे खिलवाड़ की जाये। लेकिन में तो जान हूँ, मेरो जिन्दगी का कोई हिमाव-फिताव नही । जव जिन्दगी का चिराग दूसरों की भलाई करते-करते धुंभा उगले तो यह उसकी जिन्दगी का दूसरा पक्ष है। मुझे भी अपनी जिन्दगी की पात्रा पर निकलते वक्त बड़ो धेरहमी से ठपा-टप टप्पे लगाकर कालिय पोत दी जाती है। इस निर्दयता पूर्ण व्यवहार को देखकर मैं मिहर उठता हूँ। फिर सोचता हूं व्यवस्था पक्ष सदयता के हाथों को काठपुतली नहीं है वेरहमी । और निर्दयता व्यवस्था की गाड़ी के दो पहिए हैं जिसे तत्परता के कोड़े में चलाया जाता है। व्यवस्था के मनालको से मुग्ने कोई शिकायत नही । यह तो मात्र उनका फर्ज है। सोनिए, भला ऐमा कौन नौकर होगा जो चाकरी की चाकरी करे और बदले म धडाधड़ टणे को मार सहन करके भी ईमानदारी से नौकरी यजाए? जिस तरह का गफ लोग मेरे साथ करते हैं उमका नजीर इस दुनिग में मिलना मुश्किल है पर क्या रिया जाये, यही मेरी निति है यह मानकर मन्तोप कर देता है। में अपने वास्तविक रूप में जीना पाहता हूं पर मोग मुझे मुगोटे लगाकर जीने को मजबूर करने हैं । पशु-पक्षियों से मुमे अत्यधिक नगार है। इसलिए मैं उनके मुगोटे लगाकर आनन्द महमूम करता रहा। इसके बाद तो मेरा अस्तित्व हो चंट गमा | मैं विविध स्पा ग्ना दिया गया। नेताओं, करियों, महापुरुषों और सन्तों की मारिया प्रचारक बनकर घूमता रहा । भव पुरातत्य की वस्तुओं का मुखौट पगाकर प्राचीन मस्कृति का उपोपा बन गया हूँ। आप माने या न माने पर मेरा बहरहम पिपा रुपस मुझे फपोहता है, परसपा कम्पपस्या पक्षका महोतकापा है. अमनिए चर रह जाता हूं। पानही मिन मनहून पारी में मेरा जन्म हुनाशि में विविध सपा मसति रापरक रनकर अपने कुन की रा ही जा रहा है। इस प्रकार अपनी यश गि तिनही है। सामने है ! इनलिए कि मेरे गुन रा रखना नोभीररमारना नहीं है। सपनाकर पंगान/145 मेरी इस वंश वृद्धि में राष्ट्रीय आय में वृद्धि जरूर होती है लेकिन इतना होने पर भी कोई नहीं जानता कि मैं कितना दुःखी हूं। दूसरी तरफ लोगो ने जनसल्या वढाते रहने का वीडा उठा रखा है। वे कोड़े-मकोड़ो की तरह वढते जा रहे और अपनी वशवृद्धि पर फूले नहीं समा रहे है । और तो और राष्ट्रीय आय में कमी करने पर तुले हुए है । इसके दुष्परिणामो को वे नहीं जानते । मुझे तो लगता है कि मेरी बंशवृद्धि की रामकहानी और लोगों को वंशवृद्धि की कहानी अगर इसी तरह दोहराई जाती रही तो अगली शताब्दी के आने तक जाने क्या कहर ढायेगी ! स्वामी-भक्त कहलाने वाला कुत्ता अपने मालिक के आने पर उसके पांवो मे लौटता है, पाव चाटना है, और अपने आनन्द की अनुभूति करता है। मैं जब इस स्थिति को देखता हूँ तो अपने भान्य पर रोना आ जाता है कि जब लोग मुझे चूमने के बजाय मेरी पीठ चाटकर एक जगह टिका देते हैं, मैं समझ जाता हूँ कि अब मुझे लम्बी यात्रा पर भेजने के लिए अन्ध कूप में धकेला जायेगा । इस समय मुझे दुःख जरूर होता है लेकिन मैं अपने कर्तव्य से विमुख नहीं होता । उस अन्ध कूप में विभिन्न स्थानों पर जानेवाले अन्य भाई भी वहाँ अपना रोना रोते हुए मिल जाते है, जो विविध प्रकार के मुखौटे लगाए हुए होते है। मैं अपना दु.ख भूलकर उनके दर्द को सुनने में तल्लीन हो जाता हूँ। उन्धकूप की यातना झेलने और आत्मोत्सर्ग करने व इच्छुक अपने भाइयों से मैं यही कहता हूँ कि तुम विविध आकार-प्रकार, रूप-रग और सज- धनवाले बनकर अपने जीवन की अन्तिम यात्रा पर जा रहे हो, तुम्हें पाकर लोग सुख-दुःख की अनुभूति करेगे। तुम्हारे त्याग और कर्तव्य की मन-ही-मन प्रशसा करेगे । अन्धकूप के अन्धकार को जिसने पा लिया वह राष्ट्रवीर अमरता के प्रकाश का भागीदार बन जाता है । इसलिए चिन्ता मत करो और जीवन के सत्य को पहचानो । अन्धकार के वाद प्रकाश आता है वही प्रकाश हरेक को चरमोत्कर्ष की ओर ले जाता है। दुनिया की चकाचौंध मैंने खुली आंखों से देखी है। यह भी देखा है कि हमे हथियार बनाकर लोग कैसे-कैसे खेल खेलते है। लोगो की स्वार्थपरता ने मेरा अस्तित्व ही डांवाडोल कर दिया। काश मनुष्य अगर स्वार्थलोलुप न होता तो इस तरह की यातनाएं तो नहीं झेलनी पड़ती। मैं ही नही अपितु मेरे सभी भाई बहन मनुष्यो को इस निष्ठुरता को देखकर सिहर उठते है। जिस तरह सांड को दागा जाकर सूरज मांड की पहचान बनाई जाती है उसी प्रकार अन्धकूप से निकालकर मुझे छापा जाता है और लम्बी यात्रा पर जाने का परमिट दे दिया जाता है। सोचिए नोटों में और हम में कितना अन्तर है ! उन्हें न तो दागा जाता है न मोहर लगाई जाती है। मैं वह समय भी याद कर रहा हूं जब राजा महाराजाओ, नवाबो, वादशाहो ने कबूतर पालकर उन्हे प्रशिक्षित किया था। उस समय कबूतर में इतनी सूझ-बूझ - ." 146/राग मरुपन्या चोर समझ-बूझ थी कि प्रेमी का सम्वाद उसकी प्रेयसी को ही पहुंचाते थे या सेना का मवाद राजा महाराजा या नवाव-बादशाह को ही पहुंचाते थे लेकिन बाज वह वात नही है । उस कबूतर के लिए तो आज भी प्रतीक चिन्ह के रूप में प्रचार- प्रमार का मोटो बना रखा है । शान्तिप्रिय कबूतर को भी लोगों ने नहीं छोडा नो औरो को क्या बात कहूं। अव इतना जान लेने के बाद यह तो जान हो गये होंगे कि मै कोन हूँ। न जान पाये हो तो अपने इष्ट मित्रो को पत्र लिखिए फिर देखिए किस फुर्ती से मैं उनके ममाचार अपने मोने मे दवाकर लाता हूँ। मैं ही तो हूँ आपका मित्र-पत्र। miRinm/17 लघुकथा अफसोस मोहनयोगी -अकाल ऐसा पडा कि सभी पशु-पक्षी, मनुष्य अकाल की चपेट में आ गये। मनुप्यो को दो जून की रोटी नसीव होनी मुश्किल हो चुकी थी। गांव में सरकार ने अकाल-राहत कार्य शुरू करवाया था। तालाव की खुदाई हो रही थी। इसी गांव का मोतीदान मेट वना था। -जव किसी को थोड़ी देर हो जाती या टोकरी मे मिट्टी कम होती थी तव वह भली-बुरी कहता था। सुनने वाला सिर्फ आँख दिखाकर ही रह जाता था। यही मोती पहली मे साथ पढने आता था। पांच पढ़ लिया, मानो मीर मार लिया। • गांव के शंकर ब्राह्मण का लड़का प्रेम ग्यारहवी पढकर अध्यापक बन चुका था। उन दिनो वह गांव के उसी विद्यालय में अध्यापक था। प्राथमिक विद्यालय पचायत समिति के अधीन था। दूसरे अध्यापक पास के गांव से पढ़ाने आते थे। --एक रोज गाँव वाले अध्यापक ने पिटायी कर दी। क्योकि मैं पढ नही रहा था। स्कूल की छुट्टी हुई और मैं रोता हुआ घर गया। माँ को मभी कुछ कहा और जोर-जोर से रोने लगा। मां ने मोती के घर जाकर उसे पूछ-ताछ की। हमारी तो पहले से ही बात तय की हुई थी। उसने आग मे घी का काम करने वाली बाते ही कही थी। माँ मेरी वाह पकडे चल पडी-स्कूल की ओर'.. -मां स्कूल पहुंचते ही पिटाई करने वाले अध्यापक के साथ झगडा करने लगी थी। मैं मां का हाथ पकड़े रो रहा था । सभी अध्यापक इकट्ठे हो चुके थे। माँ ने तब पीछा छोडा जव सभी अध्यापको ने माफी चाही थी। फिर क्या था? मैं दूसरे रोज स्कूल गया । अध्यापको ने मेरी तरफ ध्यान नहीं दिया। मै खेलता, नगडा रहता था। चार वर्ष तक पहली कक्षा में फेल होता गया। अन्ततः मुझे विद्यालय छुड़वा दिया गया था। अव गांव मे 'प्रौढ शिक्षा केन्द्र' खुला है । मेरी उम्र भी सोलह वर्ष की हो चुकी है मैं पढ़गा55555। मां ने झकझोरा-"छोरा ! देख, दिन कितना चढ आया है । क्या आज काम पर नही जायेगा" सभी आंख खुल चुकी थी। ? ०० 148/रगा मरुगधा महाकाल की मिनी कहानियाँ छगनलाल व्यास विज्ञान रेडियो शुरू करते ही कानो में आवाज पड़ती है--'कम पानी "कम सन्तान " पानी की एक-एक बूंद वचाइये इससे किसी को राहत मिल सकती है." जीवनदान मिल सकता है।' हूँ"क्या महाकाल है! खून का स्थान पानी ने ले लिया है। पहले विज्ञापन आता था-'खून की एक-एक बूंद कीमती है। इससे किसी का जीवन बच सकता है "रक्तदान महादान ।' पानी"'वास्तव में इस वर्ष खून से भी महगा हो गया है और अभी तो मई- जून में इसके दर्शन भी दुर्लभ होंगे क्योकि अभी से दो-दो तीन-तीन दिन से पानी आ रहा है तब फिर क्या आशा रखें! किसी भी शहर में पधार जाइये "रोटी मिल सकती है लेकिन पानी नहीं... राशन से पानी" वॉटर ड्रेन...पानी की चोरी"पानी के लिए एफ० आई० आर० दर्ज.."बच्चों को बस्ते के साथ पानी की केतली होटलो पर चाय के साथ पानी मांगकर शमिन्दा न करें जैसी नवीन बाते इस महाकाल में ही तो सामने आयी ! कुछ दिनों बाद विज्ञापन आने शुरू होंगे सफाई/निर्माण कार्य के साथ स्नान पर पावन्दी और शायद आतंककारी को पकड़ने पर इनाम की भांति स्नान करते हुए पकड़ने पर भी इनाम की घोषणा का भी विज्ञापन निकलने के आसार हैं। । चोरी और सीना जोरी प्रायः सवेरे उठते ही श्रीमतीजी 'चाय' बनाती नजर चढ़ती। लेकिन अब यह मात्र स्वप्न रह गया। अब तो उनसे भी पहले हमे जगना होता है। पानी की महाकाल की मिनी कहानियां / 149 लाइन में खड़े रहने के लिए "तेवर चढ़ाकर जिसकी लाठी उसी की भैस मुहावरे को चरितार्थ करने के लिए''जब तक नल से एक-एक बूंद गिरती है तब तक आशा अमरधन की भांति आंखे फाडे बैठे रहते हैं। फिर दूध का ख्याल आता है । हर दूध वाले से पूछना पड़ता है-दूध है ? -उनके कानो पर जूं तक नहीं रेगती.."। मानो नेतागीरी का प्रशिक्षण ले रहे हो कि जनता की आवाज पर ध्यान मत दो। खैर"कोई 'हाँ' कहकर साइकिल के ब्रेक लगाता है तो हम फूले नहीं समाते । जब एक लीटर की फरमाइश करते है तो तोप की जगह तमचे की भाँति पाव लीटर मिलता है' दूध परखते हुए-भाई साहव इसमे पानी अधिक है। पानी । कहाँ पड़ा है पानी "लोगो को तो पीने को नहीं मिलता और आपको दूध में मिला हुआ दिखता है ...। दे दो वापस। नही 'नही' कर हम रखते है क्योकि हम चाय के आदी हैं। चोरी और सीना जोरी का इससे अच्छा उदाहरण क्या हो सकता है। हम दूध के पानी में पानी मिलाकर चाय-शक्कर को गिराकर चाय पी आत्म- सन्तोप करते है... पहली तारीख 'स्नान करते हुए पकड़े जाने का भय' के कारण हम शरीर पर गीला कपड़ा फेरकर ऑफिस जाने लगे तो श्रीमतीजी ने एक तारीख होने से आवश्यक सामान की सूची पकड़ायी। दफ्तर से वेतन उठाया, साथ मे रेजगारी की पोटली भी। लौटते वक्त हम किराणा स्टोर पर पहुंचे और भाव सूची देखकर हतप्रभ रह गये-तेल 35/- मिर्चे 25/- धी-स्टॉक मे नही "दूध का डिव्या-स्टॉक समाप्त, गेहूँ 3/50 से 4, चावल 8 में 15/- तक, जीरा 45/-.""देखते-देखते दुकानदार से पूछा- सेठ साहब ! क्या ये आज के भाव है ? -'हां जनाव.. और कई चीजो के भाव बढकर भी है। क्या करे वाबूजी? महाकाल है "छपने सूं भी खोटो..।' हम नगम्य चीजे लेकर कोयले की दलाली पहुंचे। कोयले पांच रुपये प्रति किलो। कोयले वाला समझाने लगा-'अभी तो पेड़ लगाओ अभियान चल रहा है." बड़े होगे • काटेंगे • कोयले होगे और शायद भावो मे कमी।' सभी के लिए रेजगारी दिखायी तो वह ऐसे देखने लगा मानो उसकी तौहीन की हो । गड़ी-गली मम्जी दो रपये पाय से कम नही और महगी सम्जी तो पांच । 150/ राग मरगन्या
रुपये पाव भी।
सब्जी वाले के बाद सीधे घर पहुंचे तव तक मात्र एक सौ रुपये बचे थे और वह
रेजगारी बच्चो को भी पसन्द नही"लेकिन क्या करते हम""!
रेडियो शुरू किया तो सुनायी दिया-कम से कम चीजें खरीदे ताकि गृहस्थी
की गाड़ी डगमगा न जाये
हमने निर्णय किया सिर्फ गेहूँ और नमक खरीदा जायें 'पानी के पैसे चुका
दिए जायें बाकी सभी चीज अगले वेतन से महाकाल की छाया तक बन्द । बाकी
चारा ही क्या था।
००
महापाल को मिनी कहानियाँ / 151
कला-सृजन D रमेश गर्ग (4-12-87) अव मैं फिर एक बार पत्थर बीनने लगा हूँ। लगता है फिर कोई चित्र का सृजन होना है । सबसे पहले मैंने एक साधारण पत्थर लिया जिस पर मुझे कोई आकृति दिखाई दी। उसके बाद रेल लाइन के पास पड़ी हुई कंकरीट में से मैने तीन- चार पत्थर उठा लिये और अनुभव करने लगा था कि इन छोटे-से पत्थरी मे और प्रकृति को बड़ी-से-वडी चट्टानो में कितनी समानता है- मुझे यह भी लगा कि बड़े से बड़ा कलाकार भी प्रकृति के इन्ही अशो को लेकर अपनी मनोकामना पूरी करता होगा- मेरे हाथवाले इन पत्थरो में और किसी कलाकार की महान कला- कृति में न तो कोई भिन्नता है न कोई विशिष्टता, बल्कि मुझे तो यह भी लगा कि प्रकृति से भिन्न रहते हुये भी जो कलाकार अपनी कृति को विशिष्ट समझते है वे प्रकृति की इस ऊंचाई तक पहुंच पाते भी है या नहीं। (15-12-87) मुझे ऐसा लगने लगा कि क्यों न अधिकपत्थर चुनकर अधिक से अधिक अपनी तृप्ति कर डालू-कहीनदी या समुद्र की यात्रा पर चला जाऊँ और विशिष्ट पत्थरो की खोज करूं। पर मैंने देखा कि विशिष्टता-हीरे और मोती में या साधारण पत्थरो मे समान है-पूब बडी-बड़ी चट्टाने या विचित्र पत्थरो की खोज मेरी प्रवृत्ति को विशिष्टता की ओर मोड़ रही है जव कि प्रकृति का एक-एक कण मुझे समान रूप से उत्कृष्ट लग रहा था। 152/ राग मरुगन्धा (10-1-88) मैं अपनी कला यात्रा मे बरावर यह महसूस करता रहा कि प्रकृति में विखरे एक-एक कण हम मनुष्य सहित समान रूपी ही है। मैंने बहुत पहले कभी बादलों मे-- पहाड़, नदी चट्टाने या मानवीय आकृतियां जव देखी थी तो मुझे लगा था कि यह पृथ्वी और उस पर स्थित मानव भी उस युनिवर्स की ठीक ऐसी ही छटा है जैसी मै बादलो में देख रहा हूं- मुझे यह भी आभास हुआ था कि प्रकृति की इस छटा को देखने के लिये मैं उपयुक्त पात्र नही हूं बल्कि एक व्यापारी हूं जो गंगा या टेन्स नदी के किनारे खड़ा हुआ भी प्रकृति को देखते समय इसलिए जल्दी करता है कि जिससे अधिक से अधिक नोट बोनने में कही कोई कमी न रह जाये- (20-1-88) मैने सर्वप्रथम अण्डाकार पत्थर को लेकर यह धारणा बनाई थी कि यह गोल मटोल पत्थरमेरे उस पड़ोसी की तरह है जिसका पूरा शरीर तीन छोटे-मोटे इन गोल पत्थरो को रखने के वाद हूबहू दिखाई देता है। फिर दूसरे पिचके हुए पत्थर को देख- कर मैं उस सम्भ्रांत व्यक्ति को याद कर रहा था जिसको मैने कल ही ध्यान से देखा था। उसकी एक आँख मे खराबी है और दूसरी आंख चश्मे से ऐसी उभर जाती है कि बच्चे किसी अनजान व्यक्ति को उस रूप में देख ले तो डर जाये। तभी मैंने सामने से आते हुये ऐसे व्यक्ति को देखा जिसके वाये हाथ का गाल इतना पिचक गया कि उसके मुख की रेखा कान से जाकर मिलती थी-इन अंग प्रत्यग लोगों को देखकर मुझे यह अहसास हुआ था कि कला के प्रारम्भिक विद्यार्थी का यह ज्ञान कि 'आंख के सीध मे आँख होती है' यहाँ आकर व्यर्थ सिद्ध हो जाता है। (22-1-88) अव मेरे पास सफेद चिकना माबल का पत्थर किसी गोरी चिट्टी जवान लड़की के लिए--और मुडा-तुड़ा बल खाया हुआ पत्थर सघर्ष खाये हुए श्रमिक के लिए था और साथ मे यह चिन्तन कि एक विशिष्ट कश्मीरी स्त्री में और अन्य कश्मीरी ही स्त्रियो मे कोई अन्तर होता है या नही-हम लोगो को सभी एक सी दिखाई देनेवाली ये स्त्रियां क्या अन्तर रखती होगी। दूसरे मिस्टर एक्स का प्रतिनिधित्व करने वाला यह पत्थर मुझे भारत भूमि में ही मिल पायेगा या दूर-दराज अमेरिका मे भी प्रकृति का रूप समान मिलेगा-'प्रकृति' भौगोलिक सीमा में बध नहीं पाती तो फिर एक जगह विशेष के लोगों की चमड़ी और आँख, नाक की बनावट दूसरे लोगो मे भिन्न कैसे होते हैं और ऐसा है तो भौगोलिक प्रभाव इन पेड़-पौधो पर या पत्थरो पर भी भिन्न पड़ता होगा' मुझे एक बार तो सम्पूर्ण पृथ्वी के मनुष्यो को 'रेवड़ के रूप में एक से लगनेवाली कला-सृजन / 153 और फिर हजारो भेडों मे से अपनी भेड़ की मालिक द्वारा अलग से पहचान कर पाने की मन-स्थिति से गुजरना पड़ा कि प्रकृति के अश सर्वत्र समान होते हुये भी भिन्नता न रखते होते तो अपनी चीज को पहचानने में ही भारी मुमीवत का सामना करना पड जाता। (28-1-88) अव मेरी नजर कभी लोह-लक्कड़ की दुकान मे उस गोरी युवती का पार- दर्शी "ओब्जेक्ट' ढूंढने मे, कभी डामर की मुड़ी-तुड़ी टकियो पर, कभी एक साथ पडी हुई बोरियो में और कभी सड़क के किनारे लगाई गई फेस पर रेगजीन वेचने वाले की दुकान पर और कभी नाई की दुकान पर ढेर लगे हुये वालो पर इसलिए टिकती है जिससे मैं यह जान सकू कि ये एक से दिखने वाले चेहरे रंगों में और अपने स्वरूप में कैसे-कैसे भिन्न होते जाते हैं । (30-1-88) अव तीन या चार चित्रो का सृजन मेरे विचाराधीन है—भौतिक दुनिया में "कला-सृजन" हो जाना भी मुश्किल काम है- मेरे इस काम मे दूसरों का कोई सहयोग नहीं है बल्कि यह शिकायत है कि मैं जीवन का बहुमूल्य धन और समय आखिर इसमें क्यो नष्ट करता हूँ इन दिनो मेरी रुचि सफेद मोटी चीनी के मग पर, प्लास्टिक के सल खाये हुये जूतो पर, कत्थई रग को रेगज़ीन पर-मुलायम पानी छानने की जाली पर, पीली मिट्टी के रग के लकड़ी के गट्ठ पर और सख्त स्टील की छड़ो पर इमलिए है कि मैं जो चित्र बनाना चाहता हूँ उनमे से एक 'भ्रूण' का, दूसरा घने पखो से ढके हुये नर-मादा पक्षियों का और तीसरा अनेक ऐसी मानव आकृतियो का है जिससे ये चित्र जीवन की कहानी कह सके कि प्रारम्भ से लेकर वीच के आपसी सम्बन्धो को व्यक्त करते हुए-जीवन के मच पर लोहे की छड़ो पर इसलिए लटक गये हैं कि प्रकृति में सब दूर एक से दिखने वाले सब माननीय चेहरे बहुत सूक्ष्म रूप से एक से होते हुये भी कैसे-कैसे भिन्न हो गये हैं। (4-2-88) संयोग से जिस स्थान पर बैठा हुआ जहाँ से सृजन कर रहा हूँ वह घने बाजार के बीच छूटे हुये एक कब्रिस्तान का मैदान है जहाँ से मैं अपने चुने हुये रगो का और आकारो का मामने वाली दुकानो से दिणई पड़ने वाली वस्तुगो से मेल बैठा रहा हूँ के नाम पर सृजन क्या नौचित्य रखता है.?... 154/गग मम्गन्धा हम, हमारे अपने और हमारी दुनिया काशीलाल शर्मा 11 अक्टूबर 87 रविवार । केनेडा के सुन्दर शहर माण्ट्रियल का हवाई अड्डा। रात्रि के 7-15 बजे । ज्योही ईस्टर्न एयर लाइन्स की उड़ान से यहां उतरा तो देखता हूँ कि कुछ यात्री ही यहां होने से अन्य हवाई अड्डों की तरह यह हवाई अड्डा कम व्यस्त दृष्टिगत हुआ, किन्तु मुझे यहां आव्रजन की जांच आदि का कार्य कराना था, पंक्ति में आगे बढ़ते रहे आव्रजन अधिकारी ने पूछा, "भारत से कव आये हो" - "अभी नही, वीस रोज पहले अमेरिका की यात्रा कर रहा हूँ," उत्तर था। "कितने दिन ठहरेगे?" उत्तर था : "मात्र दो-दिन।" “कहाँ ठहरेगे?'' "अन्तर्राष्ट्रीय संस्था सर्वास की सदस्या कुमारी केरोल वयार के यहाँ।" फिर भी अधिकारी बार-बार मेरे चेहरे की ओर देखकर सशकित हो कुछ-न-कुछ प्रश्न करते रहे। खैर । जब उन्हे विश्वास हो गया; कह उठे; 'ओ के. हेव नाइस ट्रिप ।' मेरे पास मात्र एक हेण्ड वेग था, शीघ्र ही वाहर वॉज़ मे आया और दूरभाष पर बात करना चाहा तो केनेडियन मुद्रा के 'पच्चीस सेण्ट' का सिक्का डालना था। वहां एक बैंक था वह बन्द हो चुका था अतः एक छोटे से रेस्तरॉ की व्यवस्थापिका से अमेरिकन डालर के बदले कुछ केनेडियन सिक्के लिये । केनेडियन क्वार्टर का सिक्का डालकर दूरभाष पर बात हुई । सयोगवश कुमारी केरोल से बात हो गयी। "नमस्ते ! कुमारी केरोल।" "मैं काशोलाल शर्मा बोल रहा हूँ। "हम आ गये है । क्या आप हमे लेने आ सकती हैं ?" हम, हमारे अपने, और हमारी दुनिया /155 . उत्तर था : "नही मि. शर्मा । मेरे पास कार नही है । आप शीघ्र ही आजाइये, मुझे अभी मेरी सहेली के साथ बाहर जाना है। दो घण्टे के बाद हम लौटेंगी।" इतने मे ही सयोग से एक टैक्सी चालक हमे वार-वार उसको टैक्सी में जाने हेतु कह रहा था। आखिर हमने निश्चय कर लिया, पता बताया तो वोल उठा: -ओह ! हचिसन रोड, यह तो मेरे पास में ही है। मैं उधर होकर ही जाऊँगा। आप चलिये देरी न करिये। उसको अधिक जल्दी हमे सशकित भी कर रही थी। खैर । हमने अमेरिकन डालर देना तय किया और प्रस्थान किया ! टैक्सी चालक मार्ग मे प्रश्न करता रहा। "आप भारत से आये है ?" उत्तर था, "हाँ ! पर बीस दिन पहले ! अमेरिका में घूम रहे हैं । और यहां से परसो फिर अमेरिका जाकर वहां से उन्नीस अक्टूबर को भारत के लिए प्रस्थान करेगे?" "आप हिन्दू हैं ? सिक्ख या मुसलमान?" थोड़ा रुका और तपाक से मैंने उत्तर दिया, "हम मात्र इन्सान हैं।" इ.सान को मात्र इ.सान के रूप में जानना ही अच्छा है। फिर प्रश्न था, "फिर भी आप इनमे से कुछ पर तो विश्वास करते ही होंगे।" उत्तर दिया, "विश्वास था, अब भी है, पर जब धर्म ने इन्सान को इसान से वॉटना व मारना शुरू किया, आस्था नष्ट होगयी। धर्म इन्सान को इन्सान से जोडने के लिए है, यदि यह तोड़ता है वह धर्म नही।" फिर प्रश्न था, "अच्छा तो बताइये वहां आपसे झगड़ा होता है।" मेरा उत्तर था, "झगड़े तो सामान्यता सभी जगह होते है, आपके देश में नहीं 11 होते ?" + -. मैने इस विषय को बदला और कहा, "अब कितना दूर है वह स्थान?" उत्तर था, "अव आनेवाला ही है।" मैंने कहा, "कभी भारत आइये । स्वागत है।" "हाँ ! आना चाहता हूँ। किन्तु पैसों की व्यवस्था करनी पड़ेगी। भारत देखूगा अवश्य।" इतने मे हचिसन रोड पर मकान सं. 5950 के आसपास हम आ गये, मकान ढूंढ़ते ही टैक्सी चालक को किराया देकर हमने ऊपर सीढ़ी पर जाकर घण्टी बजायो। कुमारी केलोर को सहृदय वाणी "यस, कमिंग" ने हमे सन्तोप दिया। कुमारी केलोर दुबली-पतली किन्तु एक साहसिक एवं संघर्षों को जीवन का शृंगार समझने वाली नारी के रूप मे दृष्टिगत हुई। 156/ राग मरुगन्धा आपस मे मिलने की औपचारिकता हेतु स्वागत वधन्यवाद शब्दो का उच्चारण कर अपना कमरा देखा, नाश्ता किया और वे अपनी सहेली के साथ, जिसने भारत को दो बार लगमग 6 माह तक देखा था, वाहर घूमने चली गयी। हमने अपना स्थान पाकर शान्ति लो किन्तु टैक्सी चालक के प्रश्न अव बार-बार मस्तिष्क मे आ रहे थे; आखिर क्या बात है ? केनेडा के लोग भारतीय से मिलते ही इतने सशकित हो प्रश्नों की झड़ी क्यों लगा देते हैं ? इतनी क्या आशंका भरी हुई है यहाँ भारत के बारे में? क्या हमने यहां आने की गलती की है ? इस देश को जिसे हम अमेरिकी महाद्वीप का सिरमौर समझते है वहाँ क्या हमारे भारतीय भाई भी कही संशकित तो नहीं ? कौन बाँटता है आखिर हम लोगों को? कौन फैलाता है यह नफरत का विप? जो हमें हमारे अपने लोगो से भी बाहे मिलाने के बजाय सन्देह के घेरे में वलात् धकेल देता है। मुझे वह दुखद स्मरण हो जाता है, जव 1 अक्टूबर को अमेरिका के मिल्वा की शहर में एक भारतीय रेस्तरॉ में भारतीय भोजन करने के बाद मैं एक अन्य बार को तरफ मुडता हूँ तो एक नवयुवक सरदार को जो वहाँ के विश्व विद्यालय में अध्ययनरत है; अकेला बैठा हुआ शीघ्रता में भोजन करते हुए देख तपाक से कह उठता हूँ। "कहो ! सरदार भाई कैसे हैं आप? इधर अकेले क्यों खाना खा रहे है ? उधर हमारे साथ आ जाते !" नवयुवक विद्यार्थी बहुत विनम्र एवं शिष्ट लगा, किन्तु उसकी कृत्रिम मुस्कान ने मेरे हृदय को कचोट लिया, गले मिले। पढ़ाई आदि के बारे मे बात की, तो आत्म- विश्वास से सभी बाते बतायी। मैंने उनके शुभ भविष्य के लिए मंगल कामना की व उत्तर मे धन्यवाद शब्द पाकर हमारे अमेरिकी अतिथेय व भारतीय साथियों के साथ हम बाहर आये। 'मुझे दुख हुआ यह जानकर कि जहाँ हमारे गाँव व आस पास के किसी व्यक्ति से भारत में ही सुदूर कही मिलते तो अपनापन जागृत हो जाता है, और दुख-सुख । ? । +- - मानव मस्तिष्क अपने विकास की चरम सीमा पर पहुंचने का दावा करता है वही हृदय की दूरी की साई को क्यों गहरी करने को उन्मुख है ? आखिर हम लोग किनसे प्रभावित हैं ? उन लोगों से, जो हम अपने लोगो से तोड़ने का दुस्साहस करते हैं ? वे लोग जो इन्सान को इन्सान से घृणा करने का प्रोत्साहन करते हैं ? मुक्ष पुनः स्मरण आया वह दिन, जब मै मई 1970 में अध्यापक दल मे चयनित होकर अमेरिका दो माह के प्रवाम हेतु गया था। अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन के केन्द्रीय पुस्तकालय मे कुछ देर अध्ययन कर जब मैं लिपट से लौट रहा हम, हमारे अपने और हमारी दुनिया / 157 था तो सयोग से मेरे साथ एकमात्र पाकिस्तानी भाई और लिफ्ट में थे। मैंने अपना ही समझ पूछा । आप कहाँ से हैं ? उत्तर था, "आपके पड़ोसी देश से।" आश्चर्यान्वित हो मैंने फिर पूछा-पड़ोसी देश ! कौन-सा पड़ोसी देश? उत्तर था, "पाकिस्तान।" थोड़ा अधीर हो वोल उठा, मेरे भाई पाकिस्तान को आप पड़ोसी देश कहते है ? आपके इस उत्तर ने मेरे हृदय को आघात पहुंचाया है। पाकिस्तान मेरा पड़ोसी देश ! यह तो मेरा भाई देश है। पहले हम एक थे। हमारी वही चिनाव, झेलम नदियां वही करांची, लाहौर शहर जहां भारत को आजाद कराने के लिए हम लोगों के साथ कुरवानियां दी है, हमारे बचपन मे अपने भारत के नक्शे में हम सिन्ध बिलोचिस्तान बनाते थे। इतना सुनते ही वह पाकिस्तानी भाई गले मिल गया, और मेरा नाम पूछकर कह उठा: 'शर्माजी इस प्रकार की प्रेम की बातें कौन करता है ?' जितने,मे लिपट से धरती स्थल आ गया, और वे आग्रह कर बोले, "शर्माजी मैं यहां इन्जिनियर हूँ, मेरे घर आज चलकर मेरे परिवार के साथ रहेंगे तो मुझे खुशी होगी।" वही व्यक्ति जो कुछ क्षण पहले मुझसे बात करने में भी संकोच कर कम-से- कम उत्तर देकर लिफ्ट से जल्दी बाहर हो अपना रास्ता लेने को तत्पर था, वह मुझे अपने घर ले जाने को आतुर था। खैर ! मैने अपनी विवशता प्रदर्शित की और फिर कभी अवसर मिलने पर दर्शन का सौभाग्य मिलेगा, ऐसा सोच हमने अपना- अपना रास्ता लिया! ये दोनों उदाहरण तो अपने लोगो के है, और अब मैं चलता हूँ मेरी सात विदेश पात्राओ के अनुभवो से जो कुछ प्राप्त हुआ:- सन् 1970 मे मैंने जिस आतिथय अमेरिकी परिवार में एक माह बिताया था, जन्हे कभी-कभी चियमय तिथि पत्र भेजता रहता हूँ। एक बार उस तिथिपत्र को मैंने रूस द्वारा प्राप्त एक पत्रिका के आवरण मे लपेटकर भेजा था, और जब मैं 82 मे अपनी दूसरी अमेरिकी यात्रा में उनसे मिला तो पहला ही उनका प्रश्न था व प्रश्न के साथ उपालम्भ भी, "काशी ! तुम रूसी पत्र पत्रिकाएँ पढ़ते हो?" उत्तर था : हाँ ! क्या बुराई है। इसमे साहित्य तो पढ़ना ही चाहिए। पर बापको यह कैसे पता लगा? उन्होंने मेरे उम तिथिपत्र के आवरण का हवाला देकर कहा-रून मै दासता है, स्वतन्त्रता नही । लोकतन्य नही साम्यवाद है ! मेरा निवेदन था, आप किमसे प्रभावित हैं ? राजनीति से ! क्या अमेरिका में मर कुछ ठीक होता है । अमेरिका सब कुछ ठीक करता है । आपको यहाँ गासन व मोगों से कोई शिकायत नहीं ? मेरो मान्यता है । हमें गुने मस्तिष्क से सब कुछ पड़- 158/राग मागन्धा कर समझकर अपने विवेक से निर्णय लेना चाहिए। दुनिया के सभी राजनेता विश्व मे शान्ति-सद्भाव व पारस्परिक मित्रता की बात दोहराते है तो फिर भी शान्ति एक समस्या क्यों है ? आप, हम तो अपना निर्णय ले सकते है-उसी देश अमेरिका के शिकागो शहर में एक विशाल भवन के नीचे एक नवयुवक कागज ने गत्ते पर(हनी एण्ड होमलेस प्लीज हेल्प मी) भूखा व वेघर वार हूँ कृपया मदद करे--लिखा। जबकि इसी वर्ष जुलाई मे रूस यात्रा के दौरान मेरे एक डाक्टर साथी ने मुझसे कहा, "क्या हम यहाँ किसी घर व परिवार को देख सकते हैं ?" मैंने कहा, "क्यो नही चलिये इसी सामने के घर में, जहाँ वह महिला अपने बच्चे को लेकर प्रवेश कर रही है।" हमने उस महिला के पीछे मात्र सकेतो से उनके घर में प्रवेश किया, टूटी-फूटी न्सी व अग्रेजी मिश्रित भाषा में सभी वात की, वच्चे को गोद में लेकर प्यार कर एक रुपये का भारतीय सिक्का दिया और घर देख आये । उक्त महिला के पति ने भी हमारा हार्दिक स्वागत किया। शिकागो की सड़को पर गोरे व काले लोगों का प्रदर्शन देखा जिसमें वे दक्षिणी अमेरिका के विरुद्ध नारे लगा रहे थे--"फी मण्डेला" मण्डेला को मुक्त करो। इधर अफगानिस्तान में रूसी हस्तक्षेप की बात होती है, जबकि अमेरिका निकारा. गुहा, वियतनाम, काँगो, व कोरिया मे मात खा चुका है। इधर इंगलैण्ड ने, जो एक समय संसार मे अपने शासन में सूर्यास्त.नही देखने का दम्भ रखकर आज दक्षिणी अफ्रीका के बारे में मौन धारण कर रखा है । केनेडा के प्रधान मन्त्री का वह स्पष्ट आवेदन कि वह राष्ट्र मण्डल सम्मेलन में दक्षिणी अफ्रीका के बारे में किसी की नाराजगी की परवाह न करने का साहस दिखाते हैं । मैं इसे एक शुभ प्रयास हो, मानूंगा कि आज विश्व की दो शक्तियां नाभिकीय शस्त्रो के नियत्रण हेतु किसी शान्तिपूर्ण समझौते की ओर प्रयासरत है ! किन्तु क्या इनका राजनैतिक दम्भ मानव जाति की सेवा हेतु अपनी कुंरवानी कर सकता है ? क्यो देते हैं ये लोग दुनिया को शस्त्र? क्या इससे भूखे लोगो का पेट भरेगा? हमे सेतों में अनाज पैदा कर मानव जाति को भूख से सन्तुष्ट करना है या शस्त्र बांटकर मानव जाति का ह्रास करना है । क्या हम दूसरे विश्व युद्ध की उस भयानक घटना को विस्मृत कर गये, जहाँ धर्म व राजनीति के दम्भ पर मुस्कराते बच्चों व हेनते परिवारों को मृत्यु वंकरो मे डालकर अस्थियो का ढेर लगा दिया गया। क्या आज वीसवी सदी की सभ्यता के दम्भ में चूर इन्सान इन्सानियत का मार्ग अपनाने का एहसाम करने में अक्षम है ? हो सकता है, पाठक स्वीकार न करें आज विश्व की मानव जाति के दो भयानक दुश्मन है धर्म और राजनीति । हमें अपने विवेक को जाग्रत करता है। ०० हम, हमारे अपने, और हमारी दुनिया /159 गढ़ कोटा । सम्पर्क-सूत्र- शीताशु भारद्वाज : 138, विद्या विहार, पिलानी गोपाल प्रसाद मुद्गल . परियोजना अधिकारी प्रौढ़ शिक्षा, भरतपुर पुष्पलता क.यप : राजकीय वा. मा. विद्यालय महामन्दिर, जोधपुर गिरधारी लाल व्यास 'छबीली घाटी, बीकानेर अ.ना कौशिक बिहाणी शिक्षा महाविद्यालय श्री गंगानगर गिरवर प्रसाद विस्सा शास्त्री : व. ब. रा उ. मा. विद्यालय अनूपगढ़ रूपनारायण काबरा : चौधरी भवन, जोबनेर रवीन्द्र डी पण्डया : ज.मा. उ. मा. विद्यालय खड़गदा, (डूगरगढ) हनुमान दीक्षित . रा. उ. प्रा. विद्यालय नं.1, नोहर' विद्या पालीवाल : एफ/38 पोलो ग्राउण्ड, उदयपुर सरला भूपेन्द्र : एस. पी. आर. सहरिया उ मा. वि. कालाडेरा गणेश तारे:प्राचार्य, एलवर्ट आइस्टाइन स्कूल, सिटी पैलेस भगवतीलाल व्यास : 35, खारोल कालोनी फतहपुरा, उदयपुर जानकी प्रसाद पुरोहित : जी. डी. रा. उ. मा. वि. रामगढ़, शेखावाटी देवप्रकाश कौशिक : राज. उ. मा. विद्यालय सैपऊ (धौलपुर) दीनदयाल शर्मा 130-31, सैक्टर-12, हनुमानगढ़ जं. भगवतीलाल शर्मा : उ. प्रा. वि. कश्मीर (चित्तौड़गड), रामस्वरूप परेश : पीरामल उ.मा. विद्यालय बगड़, (झुझुनू) अर्जुन 'अरविन्द'. काली पलटन रोड, टोक जगदीश प्रसाद सनी : प्र. अ. राज. मा. विद्यालय, प्रीतमपुरी (सीकर) त्रिलोक गोयल .आवाल उ.मा. विद्यालय, अजमेर गौरीशंकर आर्य : कवि कुटीर चौमहला झालावाड़ प्रेमपाल शर्मा:प्र.अ. राज मा विद्यालय खैरव (पाली) आम मनोहर व्यास . 15, पंचवटी, उदयपुर राधेश्याम सिंहल : रा. उ. मा. विद्यालय सैपऊ (धौलपुर) निशान्त : द्वारा श्री वसन्तलाल हेमराज पीलीवंगा रमेश गर्ग : रा उ. मा. विद्यालय निन्बाहेड़ा मोहन योगी : फेफाना, जि. श्री गगानगर छगनलाल व्यास : रा. मा. विद्यालय भूती (जालौर) 'भगवन्तराव गाजरे . सी. 21, आदर्श कालोनी निम्बाहेड़ा जयसिंह चौहान जौहरी : जौहरी सदन काव्य वीथिका कानोड, (उदयपुर) विश्वनाथ पण्डया : मुक्तागन जेठाना (डूगरपुर) विष्णुलाल जोशी :प्र.अ. प्रा. विद्यालय, वल्लभनगर, उदयपुर विश्वम्भर प्रसाद शर्मा विद्यार्थी : विवेक कुटीर, सुजानगढ़ विमला डोरथी: रा.उ.मा.वालिका वि.भीमगज मण्डी कोटा वंजनाथ शर्मा : लोक तिलक. शि. प्र. महाविद्या. टबोक उमा चतुर्वेदी : सैफियाह उ. मा. वि. प्रतापगढ़ (चितौड़गड) काशीलाल शर्मा : सी-35, राधाकृष्ण नगर भीलवाडा : .
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रामप्रसाद दाधीच
चार दशको से हिन्दी एव राजस्थानी की सभी विधाओं
मे सृजनरत वरिष्ठ साहित्यकार ।
प्रकाशित कृतियां : कुहुकिनी, किशोर भारती, अजन्मा का
दर्द, स्वर लहरी, खंडिता, स्वप्नबिम्ब, शब्द जो भ्रम है,
अभी तो मैं जिंदा हूँ।
जोधपुर विश्वविद्यालय के वरिष्ठ एसो० प्रोफेमर पद
से सेवानिवृत्त तथापि शोध एव लेखन कार्यों में सलग्न ।
'लोक माहित्य शोध' अर्धवार्षिकी एवं 'रंगयोग' का
सम्पादन । लोक साहित्य केन्द्र, जोधपुर के संचालक ।