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Paraashara Smrxti

Paraashara Muni · 2006/04/7

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॥ श्रीगणेशायनमः ॥ अथ ॥ लघुपाराशरीस्मृतिप्रारंभः॥ .. अथातो हिमशैला देवदारुवनालये। व्यास मेकाग्रमासीन मपृच्छन्नृषयःपुरा ॥ १॥ मानुषाणांहितधर्म वर्तमाने कलो युगे । शौचाचारं यथावञ्च वद सत्यवतीसुत॥२॥ तच्छुत्वा ऋषिवाक्यंतु सशिष्योग्न्यर्कसन्निभः । प्रत्युवाचमहातेजाः श्रुतिस्मृतिविशारदः ॥३॥ न चाहंसर्वतत्वज्ञः कथंधर्मवदा म्यहम् । अस्मत्पितैव पृष्टव्य इतिव्याससुतोऽवदत् ॥ ४ ॥ ततस्ते ऋषयःसर्वे धर्मतत्वार्थकांक्षिणः। ऋषिव्यासंपुरस्कृत्य परब्रह्मदेवर्षिगण गुरु चरणन शिर नाय । पाराशरि भापा करौं विधि हरि हर उरलाय ॥१॥ पूर्व कालमें हिमाचल के शिखरपर देवदारुके तरुवरों से अलंकृत बनके विषय पवित्र स्थान में एकाग्र चित्त बैठे हुए श्रीव्यासजी महाराजसे ऋषियों ने प्रश्नकिया ॥ १ ॥ भोश्री व्यासजी ! कलियुग के वर्तमान होने पर जो धर्म, शौच, तथा आचार मनुष्यों को हितकारी है वह यथा वत् ( विधि पूर्वक ) हमसे कहिये ॥ २॥ तदनंतर शिष्यों सहित श्रुति स्मृति के यथार्थ जानने वाले महातेजस्वी अग्नि सूर्य के समान प्रकाशमान श्रीव्यासजी ऋषियों के बचनको सुनकर बोले ॥ ३ ॥ मैं सब धर्मों के तत्वोंको नहीं जानता किस प्रकार धर्मकहूं अतएव हमारे पितासे पूछना चाहिये इसप्रकार व्यासजीने कहा ॥ ४ ॥ तव धर्म तत्वके जानने की इच्छा करने वाले वे

२
अ०१
लघुपाराशरी।
गताबदरिकाश्रमम् ॥ ५॥ नानापुष्पलताकीर्णं फलपुष्पैरलं
कृतम् । नदी प्रस्त्रवणोपेतं पुण्यतीर्थोपशोभितम् ॥६॥ मृग
पक्षिनिनादाढ्यं देवतायतनावृतम् । यक्षगंधर्वसिद्धैश्च नृत्य
गीतैरलंकृतम् ॥ ७ ॥ तस्मिन्नृषिसभामध्ये शक्तिपुत्रंपराश
रम् । सुखासीनंमहातेजा मुनिमुख्यगणावृतम् ॥ ८॥ कृतां
जलिपुटोभूत्वा व्यासस्तुऋषिभिःसह । प्रदक्षिणाभिवादेश्च
स्तुतिभि:समपूजयत् ॥६॥ अथसंतुष्टहृदय:पराशरमहामुनिः।
आहसुखागतंब्रहीत्यासीनोमुनिपुंगवः ॥ १० ॥ कुशलं
सम्यगित्युक्त्वा व्यासःपृच्छत्यनंतरम्॥यदिजानासिमभक्तिं
स्नेहाद्वाभक्तवत्सल ॥ ११॥ धर्मकथयमेतातअनुग्राह्योह्यहंतव
श्रुतामेमानवाधर्मा वाशिष्ठा:काश्यपास्तथा॥ १२ ॥ गार्गीया
गौतमीयाश्च तथा चोशनसास्मृताः । अत्रेबिष्णोश्चसंवती
इक्षादंगिरसस्तथा ॥१३॥शातातपाच्चहारीताद्याज्ञवल्क्यात्त
सब ऋषि व्यासजी को आगे करके बदरिकाश्रमको गये ॥५॥ वह आश्रम
नाना प्रकार के पुष्पोंकी लताओंसे परिपूर्ण फल पुष्पोंसे अलंकृत नदी
और झरनों से विभूषित पवित्र तीर्थोंसे शोभित ॥ ६ ॥ मृगऔर पत्तियों
के शब्दोसे पूरित देवमन्दिरों से आवृत, यक्ष और गंधोंके नृत्य गानसे शो-
भित और सिद्ध गणोंसे अलंकृत था॥९॥ उस आश्रममें ऋषियोंकी सभाके
विषय मुख्य मुनि गणोंके मध्य में सुख पूर्वक बैठे हुए शक्ति ऋषिके पुत्र
मुनिबर पराशरजीका महातेजस्वी ॥ ८ ॥ व्यासजीने ऋषियों सहित
हाथ जोड़ प्रदक्षिण अभिवादन और स्तुति पूर्वक पूजन किया ॥ ९ ॥
तदनंतर संतुष्ट है हृदय जिनका ऐसे महा मुनि पराशरजी बोले कि तुम
भली प्रकार कुशल पूर्वक आये ॥ १० ॥ कुशल प्रश्न के अनन्तर सब प्रकार
कुशल है ऐसा कहकर व्यासजी ने पूछा किहे भक्तवत्सल यदि आप मेरी भक्ति
जानते हैं तो या मेरे स्नेह से ॥ ११॥ हे तात!स्नेह पूर्वक मुझ से धर्मों का वर्णन
कीजिये क्योंकि मैं आप का कृपापात्र हूं अतएव आप को मुझ पर अवश्य
कुपा करनी चाहिये मैंने स्वायंभुव मनु, वशिष्ठ, कश्यप ॥ १२ ॥ तथा गर्गा-
चार्य गौतम, शुक्राचार्य, अत्रि तथा विष्णुऋषि, संवर्त, दक्ष, अंगिरा ॥ १३ ॥

विशिष्टधर्म शास्त्र । भाटी० थैवच । आपस्तवकृताधर्माः शंखस्यलिखितस्यच ॥ १४ ॥ कात्यायनकृताश्चैव तथाप्राचेतसान्मुनेः । श्रुता येतेभव प्रोक्ताःौतार्था मेन विस्मृताः ॥१५॥ अस्मिन्मन्वंतरेधर्माः कृतत्रेतादिकेयुगे । सर्व धर्माः कृतेजाताः सर्वेनष्टाः कलौयुगे ॥ १६ ॥ चातुर्वर्यसमाचारं किंचित्साधारणं वद । चतुर्णामपिवर्णानां कर्तव्यं धर्मकोविदैः॥ १७ ॥ बहिधर्मस्वरूपज्ञ सूक्ष्मंस्थूलंचविस्तरात्।व्यासवाक्यावसानेषु मुनिमुख्य पराशरः॥१८॥ धर्मस्यनिर्णयप्राह सूक्ष्मस्थूलंचवि स्तरात् ॥ १६॥ वक्ष्यमाणधर्मतत्व ग्रहणायश्रोतृसाबधानतांविधते॥ शृणुपुत्रप्रवक्षामि एवंतुमुनयस्तथा । कल्पेकल्पेक्षयः सत्याब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ॥२०॥ श्रुतिस्मृतिसदाचार निर्ण तथा शातातप, हारीत, याज्ञवल्क्य, आपस्तंव, तथा शंख, लिखित ॥ १४॥ कात्यायन, वाल्मीकि आदि ऋषियों के कहेहुए धर्मशास्त्र और आप के कहे हुए वेदोक्त धर्म श्रवण किये हैं वे संपूर्ण धर्म मुझ को विस्मरण नहीं हुए हैं ॥१५॥ किंतु इस मन्वंतर के विषय कृत युग और त्रेतादि युगों के जोर धर्म थे उन २ युगों में शक्ति विशेष होने के कारण उन उन धर्मों का वर्ताव रहा और अब कलियुग में शक्ति की हानि होने के कारण वे सम्पूर्ण धर्म लुप्त होगये ॥१६॥ अतएव चारों वर्गों का पृथक् २ मुख्य धर्म तथा चारों वर्णो का मिश्रित धर्म [ सत्य बोलनाचोरी नकरना पर स्त्रियोंको मातृवत् देखना, हिंसा नकरना इत्यादि धर्म जो सब वौँको कर्तव्यहैं उनको मिश्रित धर्म कहतेहैं वर्णन कीजिये ॥ १७ ॥ भोःधर्म स्वरूपके जानने वाले चारों वर्गों में धर्मके जानने वालों करके करने योग्य जो सूक्ष्म और स्थूल धर्म, उनका विस्तार पूर्वक वर्णन कीजिये व्यासजी के वचन के अनंतर मुनिवर पराशरजी ॥ १८ ॥ सूक्ष्म और स्थूल धर्मोका निर्णय विस्तार पूर्वक वर्णन करने लगे वक्ष्य माण धर्मोंका तत्व ग्रहण करनेके लिये श्रोताओंको सावधान होना चाहिये ॥ १९ ॥ हे पुत्र ! तथा हे मुनियों ! सुनो कल्प २ में प्रलय होताहै तथापि ब्रह्मा विष्णु शिव विद्यमान रहते हैं और वे सर्वदा ( सब कल्पोंकी आदिमें) श्रुति स्मृति और सदा चारका निर्णय करतहैं लघुपाराशरी। भा०टी० तारश्चसर्वदा। नकश्चिद्वेदकाच वेदस्मर्ताचतुर्मुखः॥२१॥ तथैवधर्मान्स्मरतिमनु:कल्पांतरेंतरे । अन्येकृतयुगेधर्मास्त्रेता यांद्वापरेपरे ॥२२॥अन्येकलियुगेनृणां युगरूपानुसारतः(युग रूपानुहासतः इतिपाठांतरम् )।तपःपरंकृतयुगे त्रेतायांज्ञान मुच्यते ॥२३॥ द्वापरे यज्ञमेवाहु दीनमेवकलौयुगे । कृतेतुमा नवाधर्मास्त्रेतायांगौतमास्मृताः ॥२४॥ द्वापरेशंखलिखिताः कलौपाराशरा:स्मृताः।त्यजेदेशंकृतयुगे त्रेतायांग्राममुत्सृजेत् २५द्वापरेकुलमेकंतु कर्तारंतुकलौयुगोकृतेसंभाषणादेवत्रेतायां स्पर्शनेनच ॥ २६॥ द्वापरत्वन्नमादाय कलौपततिकर्मणा । में वेदका कर्ता कोईनहीं, ब्रह्माजी कल्प की आदिमें पूर्ववत् वेदको स्मरण करके मनु तथा ऋषियोंके द्वारा प्रकाशित करते हैं ॥ २१ ॥ और कल्प २ के विषय जो २ मनु होते हैं वेभी उसी प्रकार पूर्वकी नाई धर्मों को स्मरण करके प्रवृत्त करते हैं । युगोंके अनुसारशक्तिकी वृद्धि और हानि के कारण कृत युग में मनुष्यों के धर्म और प्रकार के रहे त्रेतामें और प्रकार के और द्वापर में और प्रकार के रहे ॥ २२ ॥ अव कलियुग में मनुष्योंकी शक्ति के अनुसार ऋषियों ने और प्रकारके धर्म वर्णन किये हैं । कृतयुगमें शक्ति विशेष होने के कारण तप श्रेष्ठ रहा त्रेता में ज्ञान ॥ २३ ॥ द्वापर की विशेषता रही, अव कलियुग में शरीरादिक की शक्ति न्यून होने के कारण केवल दान की अधिकता है । कृतयुग ( सत्ययुग ) में मनुजी के धर्म मुख्य रहे त्रेतामें गौतमके ॥ २४ ॥ द्वापर में शंख और लिखित ऋ. षियों के कहे हुए धर्म मुख्य रहे और अब कलियुगमें पराशर के कहे धर्म अत्यंत उपयोगी हैं। संसर्ग दोष लगने के कारण कृतयुग में पाप करनेवाले के देशकोभी त्याग देतेथे, त्रेतामें ग्रामको ॥ २५ ॥ द्वापर में पाप करने वाले के कुल मात्रको छोडदेतेथे और अव कलियुग में केवल कर्ता को छोडते हैं। कृत युग में पापी के संभाषण ही सेपतित होजाता था त्रेता स्पर्श से ॥ २६ ॥ द्वापर में अन्न लेकर पतित होताथा और अब कलियुग में कर्म करके पतित होता है । कृतयुग में तत्काल शाप लगता अ०१ ५ विशिष्टधर्म शास्त्र । कृतेतारक्षणिकःशापस्त्रेतायांदशभिर्दिनः ॥ २७॥ हापरेचैक मासेन कलौसंवत्सरेणतु।अभिगम्यकृतेदानं त्रेतास्वाहूयदी यते ॥ २८ ॥ द्वापरेयाचमानाय सेवयादीयतेकलौ। अ भिगम्योत्तमंदान माहूयैवतुमध्यमम् ॥ २९ ॥ अधमंयाच मानाय सेवादानंतुनिष्फलम्। जितोधर्मोह्यधर्मेण सत्यंचैवा नृतेनच॥३०॥जिताश्चौरैश्चराजान: स्त्रीभिश्चपुरुषाजिताः सीदंतिचाग्निहोत्राणि गुरुपूजाप्रणश्यति॥ ३१ ॥कुमार्यश्च प्रसूयंते तस्मिन्कलियुगेसदा ।कृतत्वस्थिगताःप्राणास्त्रेतायां मांसमाश्रिताः ॥३२॥ हापरेरुधिरंचैवकलौ त्वन्नादिषुस्थिताः। युगेयुगेचयेधर्मास्तत्रतत्रचयोहजाः॥३३॥ तेषांनिंदानकर्तव्या युगरूपाहितेद्विजाः।युगेयुगेतुसामर्थ्य शेषमुनिविभाषितम्। था त्रेता में दश दिन में ॥ २७ ॥ द्वापर में एक मासेमें शापका फल होता था और अव कलियुग में वर्ष भर में शाप फलता है। कृतयुग में श्रद्धाकी अधिकता के कारण आप जाकर दान देते थे त्रेता में बुलायकर श्रद्धापूर्वक देते थे ॥ २८ ॥ द्वापरमे याचना करने वाले को श्रद्धा करके देते थे और अब कलियुग में सेवा कराकर दान देते हैं । आपजाकर दानदेना उत्तम है बुलाकर देना मध्यम ॥ २९ ॥ याचना करनेसे देना निकृष्टदान है और सेवा कराकर दान देना निष्फल है । कलियुग में धर्मका अधर्मसे पराजय होजाताहै और सत्यका झूटसे पराजय होताहै ॥ ३० ॥ राजाका बहुधा चोरोंसे पराजय होता है और पुरुषोंका स्त्रियोंसे तिरस्कार होताहै कलियुग में अग्निहोत्र और गुरुपूज नादि नष्टप्राय होजाते हैं ॥ ३१ ॥ कलियुगमें कुमारीभी संतान उत्पन्न करतीहै कृतयुग में प्राण अस्थि गतथे और त्रेतामें मांसके आश्रय रहे ॥ ३२॥ द्वापरमें प्राण रुधिरके आश्रयथे और अब कालि युगमें अन्नादिक में स्थितहैं अर्थात् अन्नादिक की प्राप्ति न होनेसे प्राण नष्ट होजातेहैं प्रत्येक युगमें जोर धर्महैं और उन युगोंमें युगानुरूप जोर ब्राह्मण हैं ॥३३॥ उनकी निंदा नहीं करनी चाहिये क्योंकि आचरण करनेवा ले वे ब्राह्मण युगानुसार हैं । जिस२ युगमें जैसी२ सामर्थ्य रही वैसेही लघुपाराशरी। था टी० ॥३४॥पराशरेणचाप्युक्तं प्रायश्चित्तंविधीयते । अहमद्यैवतत्स मनुस्मृत्य ब्रवीमि वः ॥३५॥ चातुर्वर्ण्यसमाचारं शृण्वंतु षिपुंगवा: । पराशरमतंपुण्यं पवित्रपापनाशनम् ॥३६॥चिंति तंब्राह्मणाथार्य धर्मसंस्थापनायच । चतुर्णामपिवर्णानामाचा रोधर्मपालकः॥३७॥ आचारभ्रष्टदेहानां भवेद्धर्म पराङ्मुखः । षट्कर्माभिरतोनित्यं देवतातिथिपूजकः।हुतशेषतु जानो ब्राह्मणोनावसीदति ॥३८॥ संध्यास्नानंजपोहोमो देवतानां च पूजनम्।आतिथ्यवैश्वदेवं च षट्कर्माणिदिनेदिने ॥३९॥ इष्टो वा यदि वा द्वेष्योमूर्खः पंडितएव वा। संप्रातविश्वदेवांते सोऽतिथिःस्वर्गसंक्रमः ॥४०॥ दूराच्चोपगतंश्रांतं वैश्वदेवउप प्रायश्चित्तादि धर्म मनु गौतमादि मुनीश्वरोंने वर्णन किये ॥ ३४ ॥ अब मैं पराशरजी के कहे हुए संपूर्ण प्रायश्चित्तादि धर्मोको स्मरण करके तुमसे कहताहूं ॥ ३५ ॥ हे मुनीश्वरों परम पवित्र पापोंका नाश करने वाला पराशर जीका संमत चारों वर्णोंका आचारजो ॥ ३६ ॥ ब्राह्मणोंके नि- मित्त तथा धर्म स्थापन करने के लिये चिंतन किया गयाहै । तिसको श्र- वण करो आचार चारों वर्णोके धर्मों का पालन करने वालाहै क्योंकि आचरण विना किये केवल धर्मके कथनमात्र हीसे धर्मका पालन नहीं हो सक्ता ॥ ३७ ॥ जिनका देह आचारसे भ्रष्टहै अर्थात् जिन्होंने धर्मा चरण का त्याग करदियाहै उनसे धर्म परांमुख होजाताहै । जो ब्राह्मण नित्य षट् कर्ममें निरत देवता और अतिथियोंका पूजन करने वाला और होम क शेषका भोजन करने वाला है वह दुःखको प्राप्त नहीं होता ।। ३८ ॥ स्नान पूर्वक संध्योपासन तथा गायत्र्यादि मंत्रोंका जप, हवन, देव पूजन, अतिथि सेवा और बलि वैश्व देव, येषट् कर्म नित्य करने चाहिये॥३९॥ मित्र हो वा शत्रु मूर्ख हो वा पंडित अतिथिके लक्षणों से संपन्न जो पुरुष वलि वैश्वदेव के अंत में आवै उसकी सेवा करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है ॥ ४० ॥ दूर से आया हुआ और थका हुआ जो पुरुषवलि वैश्वदेव के अंत में आकर उपस्थित हो उसको अतिथि जानना चाहिये जो कभी अ०१ विशिष्टधर्म शास्त्र। स्थितम् । अतिथिंतविजानीया न्नतिथिंपूर्वमागतः॥४१॥ नैकग्रामीणमतिथिसंगृहीतकदाचन ।अनित्यमागतोयस्मा त्तस्मादतिथिरुच्यते ॥ ४२॥ अतिथितत्रसंप्राप्तं पूजयेत्स्वाग तादिना। तथासनप्रदानेन पादप्रक्षालनेन च ॥४३॥ श्रद्ध याचान्नदानेन प्रियप्रश्नोत्तरेण च । गच्छतश्चानुयानेन प्रीति मुत्पादयेद्गृही ॥४४॥ अतिथिर्यस्यभग्नाशो गृहात्प्रतिनिव तते । पितरस्तस्यनाश्नंति दशवर्षाणि पञ्च च ॥ ४५॥ काष्ट भारसहस्रेण घृतकुंभशतेन च। अतिथियस्यभग्नाशस्तस्यहो मोनिरर्थकः ॥४६॥ सुक्षेत्रेवापयेद्वीजं सुपात्रेनिक्षिपेद्धनम्। सुक्षेत्रे च सुपात्रेचद्युतं दत्तननश्यति॥४७॥नपृच्छेद्गोत्राचर गंनस्वाध्यायंश्रुतंतथा।हृदयेकल्पयेद्देवं सर्वदेवमयोहिसः४८ पहिलेभी आया हो वह अतिथि नहीं है ॥ ४१ ॥ एक ग्राम के रहने वाले को आतिथ्य के लिये कभी ग्रहण न करै क्योंकि पहिले कभी उसका दर्शन नहीं हुआ है इसकारण से उसे अतिथि कहते हैं ॥ ४२ ॥ अपने स्थान पर प्राप्त हुए अतिथिको कुशल प्रश्नादि पूर्वक आसन देकर और चरण प्रक्षालन करके पूजन करै ॥ ४३ ॥ गृहस्थी को उचित है कि श्रद्धा पूर्वक अन्नदान देकर और प्रेम पूर्वक कुशल प्रश्नकर के जाते हुए अतिथि को कुछ दूरतक पहुंचाकर प्रीति उत्पन्न करै॥ ४४ ॥ जिसके घरसे अतिथि निराश होकर फिर जाताहै उसके पितर पंदरह वर्षतक उसके दियेहुए श्राद्ध संबंधी अन्नादिकों को ग्रहण नहीं करते ॥ ४५ ॥ जिसके स्थानसे अतिथि निराश गयाहो उसका सहस्र भारकाष्ठ और सौ कलश घृतसे होम करना निरर्थकहै ॥ ४६॥ वीज को अच्छे खेत में वोवै और धनकादान सुपात्र कोदे अच्छेक्षेत्रमें वोया हुआअन्न और सुपात्रको दिया हुआदान नष्ट नहीं होता ॥ ४७ ॥ अतिथि से गोत्र आचरण तथा आपने किन २ शास्त्रों का अध्ययन वा श्रवण किया है इत्यादिक प्रश्न न करै क्योंकि अतिथि देवस्वरूप होता है इसकारण उसे देववत् जानकर उस का सन्मान करै।।४८॥

लघुपाराशरी । भा०टी० अपूर्वः सुव्रती विप्रो ह्यपूर्वश्चातिथिस्तथा। वेदाभ्यास रतो नित्यं त्रयो ऽपूर्वे दिनेदिने ॥ ४६ ॥ वैश्वदेवेतुसंप्राप्ते भिक्षु केगृहमागते। उद्धृत्यवैश्वदेवार्थ भिक्षांदत्वाविसर्जयेत् ॥५०॥ यतिश्चब्रह्मचारी च पक्वान्नस्वामिनाबुभौतियोरन्नमदत्वाच भुक्त्वाचांद्रायणंचरेत्॥५१॥दयाच्चभिक्षात्रितयं परिवादब्रह्म चारिणाम् । इच्छया च ततोदद्याविभवेसत्यवारितः ॥५२॥ यति हस्तेजलं दद्याद्भक्ष्यं दद्यात्पुनर्जलम् । तद्भक्ष्यं मेरुणा तुल्यं तज्जलं सागरोपमम् ॥ ५३ ॥ यस्यच्छत्रं हयश्चैव कुंज रोहसमृद्धिमत्ाऐंद्रस्थानमुपासीत तस्मात्तनविचारयेत्॥५४॥ वैश्वदेवकृतंपापंशक्तोभिक्षु यंपोहितुम्।नहिभिक्षुकृतं दोषं वै सुबूती अर्थात् यम नियमादि युक्त तथा कुछ चांद्रायणादि व्रतोंकाकरने वाला ब्राह्मण, और अतिथि, तथा वेदाभ्यासी, ये तीनों दिनर अपूर्व ही हैं अर्थात् ये तीनों नित्यसन्मानके योग्य हैं ।। ४९ ॥ यदि वलिवैश्वदेवके आरंभ करने के समय कोई भिक्षुक अर्थात् संन्यासी वा ब्रह्मचारी तथा अतिथि अपने स्था- न पर आवे तौ वलिवैश्वदेवके निमित्त अन्नको अलग करके शेष अन्नमें से भिक्षा देकर भिक्षुकको विसर्जन करै ॥ ५० ॥ यति और ब्रह्मचारी ये दोनों पक्वानकी भिक्षाके अधिकारीहैं उनकों अन्न दिये विना भोजन करके चां- द्रायण व्रत करनेसे शुद्ध होताहै ॥ ५१ ॥ संन्यासी और ब्रह्मचारियों को तीन भिक्षा अवश्य देनी चाहियें यदि अधिक ऐश्वर्य मान् हो तो निरंतर इ- च्छा पूर्वक भिक्षा दे ॥ ५२ ॥ यति के हाथ में प्रथम जल दे तदनंतर भिक्षा दे फिर जल दे ऐसा क्रम है वह भिक्षा का अन्न सुमेरुपर्वत के तुल्य है और वह जल समुद्र के तुल्य है ॥ ५३ ॥ जिस संन्यासी के पास छत्र और हाथी घोडा आदि वाहन हों और वह समृद्धिमान् इंद्र के स्थान का अनुभव करता हो तो उसको संन्यासी न विचारै अर्थात् ऐसा संन्यासी सन्मान करने योग्य नहीं है॥ ५४ ॥ वलि वैश्यदेव संबंधी पाप को भिक्षुक दूर कर सकता है भिक्षुक के सन्मान करने से वलिवैश्व देवकी विधि में कुछ त्रुटिरह जावेतो वह पाप भिक्षुक ( अतिथ्यादि जिनका वर्णन पूर्व होचुका ) के सन्मान करने से शांत होजाता है परंतु वलि वैश्वदेव के कारण भिक्षुक का सन्मान सम्यक् प्रकार से न हो तो उसके दोष को वलि वैश्वदेव नष्ट नहीं कर ९ विशिष्टधर्म शास्त्र । श्वदेवोव्यपोहति ॥५५॥ अकृत्वा वैश्वदेवतु ये जंतेद्विजात यातेषामन्नं न जीतकाकयोनिबजतिते॥५६॥अकृत्वावैश्वदेवं तुर्भुजंतेये द्विजाधमाः। सर्वेते निष्फलाज्ञेयापतंतिनरकेऽशुचौ ॥ ५७ ॥वैश्वदेवविहीनाये आतिथ्येनवहिष्कृताः । सर्वतेन रकंयांति काकयोनिबतिच ॥ ५८ ॥ शिरोवेष्ट्यतुयोभुक्ते दक्षिणाभिमुखस्तुयः॥ वामपादकरःस्थित्वा तद्वैरक्षांसिभु जते ॥ ५६ ॥ यतये कांचनंदत्वा तांबूलंब्रह्मचारिणे । चौरे भ्योप्यभयंदत्वा दातापि नरकं ब्रजेत्॥६०॥ शुक्लवस्त्रं च या नंच तांबूलं धातुमेव च । प्रतिगृह्यकुलंहन्यात्प्रतिगृणहातिय स्य च ॥ ६१॥ चौरोवायदिचांडालःशत्रु पितृघातकः। वैश्व देवेतुसंप्रासोऽतिथिः स्वर्गसंक्रमः ॥ ६२ ॥ नगृहातितुयो विप्रः अतिथिंवेदपारगम् । अदत्तंचान्नमात्रंतुभुक्त्वाभुंक्तेतु सक्ता ॥ ५५ ॥ जो ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य वलि वैश्यदेव विना किये भोजन करते हैं वे काक योनि को प्राप्त होते हैं अत एव उनके अन्न का भोजन करना योग्य नहीं है ।। ५६ ॥ जो द्विजाधम बलि वैश्व देव किये विना भोजन करते हैं उनके सब कर्म निष्फल होजाते हैं और वे अशुचि नाम नरकमें पड़ते हैं ॥ ५७ जो वलिवैश्वदेव क्रिया करके हीन हैं और अतिथि सेवाभी नहीं करते वे संपूर्ण पुरुष नरक को प्राप्त होतेहैं और नरक भोगनेके पश्चात् काक योनिको प्राप्त होते हैं ।। ५८ ॥ जो मनुष्य शिरको वस्त्रादिसे वेष्टित करके तथा वाम चरण पर हाथ धरकर दक्षिण दिशाको मुख करके भोजन करते हैं उसको राक्षसी भोजनकहते हैं अर्थात् वह भोजन तामसी होजाता है ॥५६॥संन्यासीको सुवर्ण अादिक धनका दान करनेसे तथा ब्रह्म चारी को तांबूल देनेसे और चोरोंको अभय दान देनेसे दाताभी नरक को प्राप्त होता है । ६० ॥ संन्यासी आदिक श्वेतवस्त्र, वाहन, और तांबूल तथा ध- नादिक का प्रतिग्रह लेकर अपने और जिस से प्रतिग्रह लेते हैं उस के भी कुलका नाश करते हैं ॥ ६१ ॥ चोर हो वा चांडाल शत्रु होवा पित घाती जो वलिवैश्व देवकेसमयप्राप्त हो वह अतिथिस्वर्गप्राप्ति कराने वाला है।६२।। २ १० लघुपाराशरी । भा०टी० किल्विषम् ॥६३॥ ब्राह्मणस्यमुखक्षेत्रनिरूपममकंटकम् । बा- पयेत्सर्ववीजानिसाकृषिः सर्वकामिका ॥६४ ॥ सुक्षेत्रेवापये हीजंसुपात्रेनिक्षिपद्धनम् । सुक्षेत्रेचसुपात्रेचद्युतंतन्नविनश्य ति ॥ ६५ ॥अब्रतापनधीयानायत्रभैक्षचराविजाः॥ तंग्राम दंडयेद्वाजा चौरभक्त प्रदोहिसः ॥ ६६ ॥ क्षत्रियोहिप्रजा रक्षन्शस्त्रपाणिः प्रदंडवान् निर्जित्यपरसेन्यानिक्षितिधर्मे ण पलयेत् ॥६७॥ नश्रीः कुलक्रमायाता भूषणोल्लिखितापि वा। खड्गेनाक्रम्य जीतवीरभोग्यांवसुंधराम् ॥ ६८॥ पुष्पं जो ब्राह्मण वेद पारंगत अतिथिको ग्रहण नहीं करते और उसे विना अन्न जल दिये भोजन करतेहैं वे पापका भोजन करतेहैं अर्थात् वे पुरुष पापी हैं ॥६३॥ब्राह्मण का मुख अनुपम कंटकादिसे रहित उत्तमक्षेत्रहै उसमें संपूर्ण वीजों को वोवै वह, ब्राह्मणके मुखरूपी कृषि संपूर्ण कामना रूप फलोंकी उत्पन्न करने वाली है ॥ ६४ ॥ पुरुषको उचित है कि श्रेष्ठ क्षेत्रमें बीज बोवै और सुपात्रको धनका दानदे अच्छे खेतमें और सुपात्र में बोयाहुआबीज नष्टनहीं होतां ॥६५॥ जिस ग्राममें ब्रत और वेदाध्ययन रहित ब्राह्मण भिक्षा वृत्ति करते हैं उस ग्रामको राजा दंड दे नहींतो वहराजा चोरोंको भागदेने वाला होगा क्योंकि-जिस प्रकार धर्मानुसार प्रजा राजाको षष्टांश भाग देती हैं उसी प्रकार तपस्वी ब्राह्मणोंको क्षत्रियादिकोंसे भाग मिलना चा- हिये यदि क्षत्रियादिक ब्राह्मणोंकी अजीविका सेवादिक न करेंगे तो ब्रा- ह्मण अवश्यही भिक्षा वृत्ति करेंगे अतएव बेग्राम बासी क्षत्रिय वैश्यादिक राजा करके दंड देनेके योग्य हैं ॥६६॥ क्षत्रिय हाथ में शस्त्र ग्रहण किये हु- ए दुष्टोको उग्र दंड देकर प्रजाकी रक्षा करता हुआ शत्रु सेनाको जी- त कर पृथ्वी का धर्म से पालन करै ॥ ६७ ॥ अपने कुलके क्रमानुसार पा प्त हुई जो लक्ष्मीहै वह लक्ष्मी बीरता नहोनेके कारण स्थिर नहीं है और न भूषण धारण करनेसे क्षत्रियकी शोभा होती है किन्तु पृथ्वी शूरबीर राजाओं करके भोगने योग्यहै अतएव खड्ग करके जीती हुई भूमिको भोगै ॥ ६८ ॥ जैसे माली उपवनमेंसे पुष्प फलादिकोंको ग्रहण करता

अ०१
११
विशिष्ट धर्मशास्त्र ।
पुष्पं विचिनुयान्मूलच्छेदं न कारयेत् । मालाकारइवारामे न
यथांगारकारकः ॥ ६६ ॥ लाभकर्मतथारत्नं गवां च परि
पालनम् । कृषिकर्मचवाणिज्य वैश्यवृत्तिरुदाहृता ॥ ७० ॥
शूद्रस्यद्विजशुश्रूषा परमोधर्मउच्यते । अन्यथाकुरुतेकिंचि
तद्भवेत्तस्यनिष्फलम् ॥ ७१ ॥ लवणं मधुतैलंचदधित
कंघृतपयः । नदुष्येच्छूद्रजातीनां कुर्यात्सर्वेषुविक्रयम् ॥७२॥
बिक्रियन्मद्यमांसानिह्यभक्षस्य च भक्षणम् । कुर्वन्नगम्या
गमनंशूद्रःपततितत्क्षणात् ॥ ७३ ॥ कपिलाक्षीरपानेन वा-
ह्मणीगमनेन च।वेदाक्षरविचारेण शूद्रस्यनरकं ध्रुवम् ॥७४॥
इतिश्रीपाराशरीयेधर्मशास्त्रे प्रथमोऽध्यायः॥१॥
किन्तु अनि लगाने वालेकी नाई वृत्तोंका मूल छेदन नहीं करता उसी प्र-
कार राजाको उचितहै कि प्रजासे थोड़ा२ अपना भागलेकर प्रजाकी रक्षा
करै सर्वापहारी नहो ॥ ६९ ॥ ब्याज लेना, रत्नोंका क्रय विक्रय करना,
गोपालन अर्थात् गौओंकी रक्षा करना और उनसे जो वृषभादिक उत्पन्न
हों उनको बेचकर आजीविका करना, खेती और व्यापार करना यहवैश्य
की वृत्तिहै ॥ ७० ॥ ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य इन तीनों वर्गों की सेवा करके
निर्वाह करना शूद्रका परम धर्म है, अन्य क्रियाओं के करनेका शूद्रको अ-
धिकार नहीं है॥ ७१ ॥ लवण मधु (शहत ) तैल तथा दही मट्ठा और घृत
दुग्धादि संपूर्ण रसोंके वेचनेसे शूद्र जातिको दूषण नहीं लगता ॥ ७२ ।।
मच वा मांसकोवेचनेसे और अभक्ष्य वस्तु केभक्षण करने से तथा अगम्या स्त्री
में गमन करने से शूद्र तत्काल पतित होजाता है ॥ ७३ ॥ कपिला अर्थात्
सुवर्ण केसे रंग वाली गौ का दुग्धपान करने से और ब्राह्मणी में गमन करने
से तथा वेदाक्षरका विचार करने से शूद्र को निश्चय नरक की प्राप्ति होती है।।७४।।
इतिश्री पराशरीये धर्मशास्त्रे भाषाटाकायां प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

१२ are लघुपाराशरी। भा०टी० अतः परं गृहस्थस्य कर्माचारं कलौ युगे । धर्मसाधारणं शक्त्याचातुर्वाश्रमागतम् ॥ १॥ तं प्रवक्ष्याम्यहं पूर्व परा शर वचोयथा। षट्कर्मसहिताविप्रः कृषिकर्म च कारयेत्॥२॥ क्षुधितंतृषितंत्रांतवलीवई नयोजयेत् । हीनांग व्याधितं क्लीवं वृषं विप्रोन वाहयेत् ॥३॥ स्थिरांगनीरुजंतृप्तसुनषं ढ वर्जितम् । वाहयेदिवसस्या पश्चात्स्नानं समाचरेत् ॥ ॥ ४ ॥जपं देवार्चनं होमं स्वाध्यायं चैवमभ्यसेत् । एकद्वि त्रिचतुर्विप्रान्मोजयेत्स्नातकान् द्विजः॥ ५॥ स्वयंकृष्टतथा क्षेत्रेधान्यैश्चस्वयमर्जितैः । निर्यपेयंचयज्ञांश्चकृतुदीक्षांचका रयेत् ॥ ६॥ तिलारसानविक्रेयालोहलाक्षादयस्तथा ॥ वि प्रैश्चफलपुष्पानिनीलरकांशुकानिच ॥ ७॥ ब्राह्मणश्चेत्कृषि कुर्यात्तन्महादोषमाप्नुयात् । हलमष्टगवंधयपंड्गवंमध्यम इसके अनंतर कलियुग में गृहस्थके कर्म आचार और यथा शक्ति चारों वर्ण तथा चारों आश्रमोका मिश्रित धर्म ॥ १ ॥ जैसाकि--पराशरजीने कहा है वर्णन करते हैं । जो ब्राह्मण पट कर्म करके युक्त हो और कृषि करता हो ॥ २ ॥ वह भूखे प्यासे और थके हुए वैलको हलमें न जोडै॥ अंगहीन, रोगी, तथा नपुसक वैल को न जोतै ॥ ३ ॥ जो दृढ अंगवाला रोग रहित तृप्त ( छकाहुआ ) पुष्ट और नपुंसकता रहित हो उस वृषभको मध्यान्ह पर्यंत जोत कर कार्य ले अधिक कार्य न ले उसके उपरांत स्नानादिक कर्म करै ॥ ४ ॥ जप देवपूजन और होम तथा वेदाध्ययनका अभ्यास करतार है एक दो तथा तीन वा चार स्नातक ( पूर्ण ब्रह्मचर्य करके गृहस्थाश्रम को प्राप्त होने वाले ) ब्राह्मणों को भोजन करावै ॥ ५ ॥ जो धान्य अपने जोते हुए खेत में उत्पन्न हुए हों अथवा अपने परिश्रम से संचय किये हों उन धान्यों से पंचयज्ञों को करता रहै और विशेष यज्ञादिकों को भी करै ॥६॥ ब्राह्मणों को उचित है फि तिल और संपूर्ण प्रकार के रस तथा लोह लाक्षा- दिक फल घुप्प तथा नील वा रक्तवर्ण के वस्त्रों का विक्रयन करै ॥ ७ ॥ ब्राह्मण को खेती करने में बडा पाप होता है परंतु जिस हल में आठ विशिष्टधर्म शास्त्र । १३ स्मृतम् ॥ ८॥ चतुर्गवं नृशंसानांद्विगवंवृषघातिनाम् । द्विग ववाहयेत्पादं मध्याह्नेतुचतुर्गवम् ॥९॥पंड्गवंतुत्रियामाहे ऽष्टभिः पूर्णतुवाहयेत् । नयातिनरकेष्वेवं वर्तमानस्तुवहिजः ॥ १०॥ दानंदयाच्चवैतेषां प्रशस्तंस्वर्गसाधनम्। संवत्सरेण पत्यापंमत्स्यघातीसमाप्नुयात्॥११॥ अयोमुखेनकाष्टेनतदेका हेनलांगलीपाशकोमत्स्यघातीच व्याधःशाकुनिकस्तथा॥१२॥ प्रदाता कर्षकश्चैव पंचैतेसमभागिनः। कंडनी पेषणी चुल्ली उदकुंभी च मार्जनी ॥ १३ ॥ पंचसूना गृहस्थस्य अहन्य हनिवर्तते वैश्वदेवोवलिभिक्षा गोग्रासोहंतकारकः ॥ १४ ॥ वृषभ हों वह हल धर्मपूर्वक उत्तम है और छह वृषभ वाला मध्यम है ॥ ८ ॥ हल में चार वृषन जोतने वाले दयाहीन समझे जाते हैं और दो वृषभ जोतने वाले गोहिंसक हैं ॥ दो वृषभ वाले हल से प्रहर भर दिन चढेपर्यंत जातै और चारवृषभ वाले से मध्यान्ह तक जोते ॥ ९ ॥ छह वृषभों को हल में जोत कर तीसरे प्रहर पर्यंत कार्य ले और आठवृषभ वाले हल से सायंकाल तक जोतै । इस प्रकार वृत्ति करने वाला ब्राह्मण नरक में नहीं जाता।॥ १०॥ ऐसे ब्राह्मणो को दान दे वह दान प्रसंशनीय और स्वर्ग का देने वाला है। जो पाप वर्षभर में मत्स्यघात करने से होता है ॥ ११ ॥ वही पाप जिस हल के काष्ट के अग्र में लोहा लगा हो उस हल से जोतने वाले को एकही दिन में होता है । विना अपराध फांसी देने वाला, मत्स्यघाती मृगादिकों की हिंसा करने वाला तथा पक्षियों का घात करने वाला ॥ १२ ॥ और जो कृषी करने वाला ब्राह्मण दान न देता हो ये पांचों पाप करने में समान हैं ओखली, चकी, चूल्हा तथा जल भरे हुए पात्रों के रखने का स्थान और बुहारी ॥ १३ ॥ इनपांचों वस्तुओं के द्वारा नित्यप्रति हिंसा होती है यदि गृहस्थी नित्यप्रति बलिवैश्व देव और देव पूजन करता रहै और अतिथ्यादिकों को भिक्षा देता रहै और भोजन करने से पहिले जो भोजन रसोई में बने हों उन सब में से थोड़ा २ भोजन गौत्रों को भी सत्कार पूर्वक दिया करै तथा देव पितरों के निमित्त भी सोलह ग्रास की हत कारनिकाल कर सुपात्र ब्राह्मण तथा गौ आदिक को दिया करै ॥ १४ ॥ ।

लघुपाराशरी।
भा०टी०
गृहस्थः प्रत्यहंकुर्यात्सूनादोषैर्नलिप्यते । बृक्षंछित्वामहीं भि
वाहत्वा च कृमिकीटकान् ॥ १५ ॥ कर्षकः खलुयज्ञेन स
व पापैः प्रमुच्यते ।यो नदद्याद्विजातिभ्योराशिमूलमुपाग
तः ॥ १६ ॥ सचौरः सचपापिष्ठो ब्रह्मघ्नंतविनिर्दिशेत् ।
राज्ञे दत्वातुषड्भागंदेवानांचैकविंशकम् ॥ १७ ॥ विप्राणां
त्रिंशकं भागं सर्वपापैःप्रमुच्यते ॥ क्षत्रियोपिकृर्षिकृत्वा देवा
विप्रांश्चपूजयेत् ॥ १८ ॥ वैश्यः शूद्रस्तथा कुर्यात्कृषिवाणि
ज्यशिल्पकम् । विकमकुर्वतेशूद्रा द्विज शुश्रूषयोज्झिताः॥
॥ १९ ॥ भवंत्यल्पायुषस्तेवैनिरयं यांत्यशंसयम् । चतुर्णाम
पिवर्णनामेषधर्मःसनातनः ॥ २० ॥
इतिपाराशरीये धर्मशास्त्रेद्वितीयोऽध्यायः ॥२॥
तो वह गृहस्थी ऊपर कहे हुए हिंसाओं के दोष से लिप्त नहीं होगा।
कृषि करने में वृक्षों का छेदन और पृथ्वी का भेदन (विदीर्णता) होता है
और हल के द्वारा कृमि इत्यादिक असंख्यजीव जंतु मरते हैं ॥ १५ ॥ इन
पापों से छूटने के निमित्त खेती करने वाले को यज्ञादिक अवश्य करने चाहिये।
जो कृषी करने वाला अन्न की राशि का प्रथम भाग सुपात्र ब्राह्मणो को नहीं देता
॥१६॥ उसे चोर और महापापी तथा ब्रह्म हिंसा करने वाले के समान जानना
चाहिये । कृषि करने वाला छठाभाग राजा को दे और इक्कीसवां भाग
देवतों के अर्पण करै ॥ १७ ॥ और तीसवां भाग ब्राह्मणों को दे तो वह
संपूर्ण पापों से छूटता है । यदि क्षत्रिय खेती करै तो वह भी इसी प्रकार
देवता और ब्राह्मणादिकों का भाग दे ॥ १८ ॥ वैश्य और शूद्रभी कृषि
वाणिज्य और शिल्पकर्म करै जो शूद्र वाह्मण क्षत्रिय वैश्यों की सेवा का
त्याग करके निषिद्ध कर्म करते हैं ॥ १६ ॥ उनकी आयु स्वल्प होती है
और वे नरक को प्राप्त होते हैं इस में संदेह नहीं। चारौं वर्गों का यही सनातन
धर्म है ॥ २० ॥
इतिश्रीपाराशरीये धर्मशास्त्रे भाषाटीकायां द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

अ०३ १५ विशिष्टधर्म शास्त्र अतःशुद्धिप्रवक्ष्यामिजननेमरणेतथा। दिनत्रयेणशुद्ध्यतिबा ह्मणा:प्रेतसूतके ॥ १ ॥ क्षत्रियोद्वादशाहेनवैश्य पंचदशा- हकैः । शूद्रःशुपतिमासेनपराशरवचोयथा ॥ २॥ उपवासे नविप्राणामंगशुद्धिश्चजायते । ब्राह्मणानांप्रसूतौतुदेहस्पर्शी विधीयते ॥ ३ ॥ जातौविप्रो दशाहेन द्वादशाहेन भू- मिपः । वैश्यः पंचदशाहेन शूद्रो मासेन शुद्ध्यति ॥ ४ ॥ एकाहाच्छुद्ध्यतेविप्रोयोग्निवेदसमन्वितः । श्यहाकेवलवेद स्तुहीनोहिदशभिर्दिनैः ॥ ५ ॥ जन्मकर्मपरि भ्रष्टः संध्योपा सनवर्जितः । नाम धारकविप्रस्तुदशाहंसूतकीभवेत् ॥६॥ अजागावोमहिष्यश्चब्राह्मणीनवसूतिका । दशरात्रेणसंशु ध्येद्भुमिस्थंचनवोदकम् ॥ ७ ॥ एकपिंडास्तुदायादाःपृथ इस के अनन्तर जन्म और मरण में जो सूतक और आशौच होता है उस की शुद्धि को कहते हैं । मृतक के आशौच में ब्राह्मण तीन दिन में शुद्ध होते ॥ १॥ और क्षत्रिय बारह दिन में शुद्ध होते हैं । वैश्य पंद्रह दिन पर्यंत अपवित्र रहता है और शूद्र की शुद्धि एक मास में होती है ऐसा पराशर जी का बचन है ॥ २ ॥ ब्राह्मणों के अंग की शुद्धि उपवासादिकों करके होजाती है। और जिन ब्राह्मणों के स्थान में जन्म का पुत्रादिक के सूतक हुआ हो उन ब्राह्मणों के देह स्पर्श करने का दोष नहीं है ॥ ३ ॥ जन्म सूतक में ब्राह्मण दस दिन में और क्षत्रिय वारह दिन में तथा वैश्य पंद्रह दिन में और शुद्र एक मास में शुद्ध होता है ॥ ४ ॥ जो ब्राह्मण वेद पाठी हैं और नित्य अग्नि होत्र करते हैं वे एक दिन में ही शुद्ध होजाते हैं और जो केवल वेंदही कर के युक्त हैं वे तीन दिन में शुद्ध होते हैं और जो वेद तथा अग्नि होत्र दोनों कर के हीन हैं वेदश दिन तक अशुद्ध रहते हैं ॥५॥ जो व्राह्मण अपने जन्म समय से ही नित्य नै मित्तिकादिक कर्मों से हीन हैं और संध्योपासन भी नहीं करते ऐसे नाम धारक ब्राह्मण ( जो केवल नाम मात्रही से ब्राह्मण कहलाते हैं ) दश दिन पर्यन्त अशुचि रहते है ॥ ६ ॥ वकरी, गाय, भैंसें तथा प्रसूता वाह्मणी और भूमिपर स्थित वर्षा का नवीन जल ये सब दश दिन में शुद्ध होते हैं ॥ ७ ॥ सपिंडदायाद अर्थात् .. लघुपाराशरी । भान्टी० ग्दारनिकेतनाः । जन्मन्यपिविपतौचतेषांतत्सूतकंभवेत्॥८॥ तावत्तत्सूत्रकंगोत्रेचतुर्थ पुरुषेणतु । दायाद्विच्छेदमाप्नोतिपं चमोवात्मवंशजः ॥ ६ ॥ चतुर्थेदशरात्रंस्यात्षण निशापुंति पंचमे । षष्ठे चतुरहाच्छुद्धिः सप्तमेतु दिनत्रयात् ॥ १० ॥ भृग्वग्निमरणे चैव देशांतर मृते तथा । वालेप्रेते चसंन्यस्ते सद्यः शौचविधीयते ॥ ११ ॥ देशांतरमृत: कश्चित्सगोत्रः श्रूयतेयादि । नत्रिरात्रमहोरात्रंसद्यःस्नात्वाशुचिर्भवेत्॥१२॥ देशांतरगतोविप्रःप्रयासात्कालकारितात् । देहनाशमनुप्रा- तस्तिथिर्नज्ञायतेयदि ॥ १३ ॥ कृष्णाष्टमीत्वमावास्याकृष्णा चैकादशीचया। उदकंपिंडदानंचतत्रश्राद्धंचकारयेत्॥१४॥ धनादिक का भागलेने वाले जो पुत्र पौत्रादिक होते हैं उन के स्थान पृथक २ हों तो भी जन्म और मरण में उनको आशौच होता है ॥ ८ ॥ गोत्र में भी दशही दिन तक का सूतक रहता है चौथी पीढ़ी तक की संतान अर्थात् एक प्रपितामह तककी संतान एक गोत्र में कहलाती है पांचवींपादी वाला पुरुष धनादिक के भाग का अधिकारी नहीं है इसलिये उसे दश दिन तक का सूतक नहीं होता क्योंकि चौथीपीढ़ी के उपरांत बंशसंज्ञा होती है ॥ ॥ चौथीपीढ़ी वाला पुरुष दश दिन में पांचवीं पीढ़ी वाला छह दिन में छठी पीढ़ी वाला पुरुष चारदिन में और सातवीं पीढ़ी वाला तीन दिन में शुद्ध होता है ॥ १० ॥ जो पुरुष पर्वत से गिरकर तथा अग्नि में जलकर मृत्यु को प्राप्त हुआ हो अथवा जिस की मृत्यु परदेश में हुई हो उसके सूतक में और बालक वा संन्यासी की मृत्यु होने में शीघू शुद्धि होती है ॥ ११ ॥ यदि कोई सगोत्री देशांतर में मृत्यु को प्राप्त हुआ हो तो तीन दिन का आशौं- च नहीं होता किंतु जब उसकी मृत्यु का वृत्तांत श्रवण करै तब शीघ्र स्नान करने से एक दिन रात में ही शुद्ध होजाता है ॥ १२ ॥ जावाह्मण परदेश में जाकरकालवश से मृत्युको प्राप्त हुआ हो यदि उसके मृत्यु की तिथि ज्ञात नहो ॥ १३ ॥ तो कृष्णपक्ष की अष्टमी वाअमावास्या तथा कृष्णपक्ष की एकादशीको उसके निमित्त जलदान और पिंड दानत था श्राद्ध करै ॥ १४ ॥ जिन बालकों के दांत नहीं जमेहों और जो गर्भ विशिष्टधर्म शास्त्र । अजातदंताये वाला ये चगर्भाद्विनिःसृताः । नतेषामग्निसं- स्कारोनाशौचं नोदकक्रिया ॥ १५ ॥ यदिग विपद्मेत स्त्र वतेवापि योषितः । यावन्मासस्थितो गर्भो दिनंतावत्तु सूत कम् ॥ १६ ॥ आचतुर्थाद्भवेत्स्राव: पात: पंचमषष्ठयोः । अतऊर्ध्वप्रसूतिः स्यादशाहं सूतकं भवेत्॥१७॥दन्तजाता ह्यजाताश्च कृतचूडाश्च संस्थिताः । अग्निसंस्करणं तेषां त्रिरात्रमशुचिर्भवेत्॥१८॥आदंताजन्मतःसद्य आचूडान्नशि की स्मृता । त्रिरात्रमुपनीतस्यदशरात्रमतः परम् ॥ १६ ॥ ब्रह्मचारी गृहे येषां हूयते च हुताशनः। संपर्क चेन्नकुर्वति न तेषां सूतकं भवेत् ॥२०॥ संपर्कादुष्यते विप्रो जनने मरणे तथा । संपर्काच्च निवृत्तस्य न प्रेतं नैवसूतकम् ॥२१॥ से उत्पन्न होतेही मृत्युकोप्राप्त हुएहों उनका अग्निसंस्कार और आशौच तथा जलदान नहीं होता ॥ १५ ॥ यदिगर्भ स्त्राव तथा गर्भपात हो तोजि तने मासका गर्भ हो उतनेही दिनोंका सूतक होताहै ॥ १६ ॥ यदि चारमासमें गर्भगिरै तौ उसे गर्भस्रावकहते हैं और पांचवें वा छठे मासमें गर्भ गिरनेको 'गर्भपात' कहते हैं । तदनंतर छटे मासले दशमें मास पर्यंत प्रसव कहलाता है प्रसवमें दश दिनका सूतक मानना उचित है ॥ १७ ॥ जिन वालकोंका चूडाकर्म होगया हो उनके दांत जमे हों वा न जमे हों उन वालकोंकी मृत्यु होने में अग्नि संस्कार करना चाहिये और तीन दिनका आशौच मानना उचित है ॥ १८ ॥ दांत जमने से पूर्व मृत्यु हो तो शीघ्र स्नान मात्र से शुद्धि होजातीहै और चूडाकर्म से पहिले मृत्युहो तो एक दिन रात में शुद्धि होती है । यज्ञोपवीत होने से पूर्व मृत्यु हो तो तीन दिन में शुद्धि होती है और यज्ञोपवीत होने के अतंतर दश दिनमें शुद्धि होती है ॥ १९ ॥ जिन के घरमें कोई पुरुष ब्रह्मचारी हो तश जिनके घर नित्य प्रति अग्नि होत्र होता हो और प्रसूता स्त्री से स्पर्शादिक न करते हो तो उनको सूतक नहीं होता ॥ २० ॥ जन्म और मरण में ब्राह्मण प्रसूता स्त्री और मृतक के स्पर्शादिक करने से दूपित होता है जो स्पर्शादिक नहीं करता उसे जन्म वा मरण में सूतक नहीं होता ॥ २१ ॥ शिल्पत्ति करने वाले ३ .. .. .. लघुपाराशरी। भा०टी० शिल्पिनाकारुका वैद्या दासी दासाश्च नापिताः । राजानः श्रोत्रियाश्चैव सद्यः शौचाःप्रकीर्तिताः ॥ २२ ॥ सबतो सत्र पूतश्च आहिताग्निश्चयो द्विजः । राज्ञश्च सूतकं नास्ति स्नानपूताः प्रकीर्तिताः ॥ २३ ॥ प्रसवे गृहमेधीतु न कुर्या संकरं यदि। दशाहाच्छुद्ध्यतमातात्ववगाषिताशुचिः॥२४॥ सर्वेषां शावमाशौचं मातृ पित्रोस्तु सृतकम् । सृतकं मातु रेवस्यादुपस्पृश्य पिताशुचिः ॥ २५ ॥ यदि पन्यां प्रसूतायां संपर्ककुरुतेद्विजः । सूतकं तु भवेत्तस्य यदि विप्रश्ववेदवि त् ॥ २६ ॥ संपर्काज्जायते दोषो नान्यो दोषोस्तिवे हिजे । तस्मात्सर्व प्रयत्नेन संपर्कवर्जयेदुधः ॥ २७ ॥ विवाहोत्सवयजेषु त्वंतरामृतसूतके । पूर्व संकलपितं कारुक (हलवाई आदिक) तथा वैद्य, दासी तथा दास, नाई, राजा और वेद पाठी ये सम्पूर्ण शीघ्र शुद्ध होजाते हैं ॥ २२ ॥ जो ब्राह्मण बूतोंकरके युक्त तथा यज्ञोंकरके पवित्र है और नित्य अग्निहोत्र करता है उस ब्राह्मण को तथा राजा को सूतक नहीं होता क्योंकि यह सब स्नानहीकर के पवित्र होजाते हैं ॥ २३ ॥ यदि गृहस्थी वर्ण संकर सन्तानको उत्पन्न न करे तो प्रसव में माता दश दिन में शुद्ध होती है और पिता स्नानमात्र से शुद्ध होजाता है ॥ २४ ॥ मृतक का आशौच तो कुटुम्बमात्र को होता है, और जन्मसूतकमाता पिता दोनों को होता है, तिस में भी सूतक विशेष कर के माताही को लगता है क्यों कि-पिता तौ केवल आचमन करने ही से शुद्ध होजाता है ॥ २५ ॥ जो ब्राह्मण प्रसूता स्त्रीसे संसर्ग करता है उसे सूतक अवश्य होता है, चाहे वह वाह्मण वेदों का जानने वाला भी क्यों न हो ॥२६॥ ब्राह्मण को संसर्गही से दोष होता है यदि वह संसर्ग न करै तौ कुछ दोष नहीं होता, अतएव संपूर्ण यत्नों करके विद्वान् को संसर्ग का त्याग करना चाहिये ॥ २७ ॥ यदि विवाह उत्सव, और यज्ञादिकके मध्य में किसी सपिंडादि के मृत्यु होने के कारण सूतक हो जाय तो पहिले से संकल्प किया हुआ द्वब्य जो किसी को देने के निमित्त रक्खा है दूषित नहीं . . " विशिष्टधर्म शाम १९ द्रव्यं दीयमानं न दुष्यति ॥ २८ ॥ अंतरा तु दशाहस्य पुनर्मरण जन्मनी । तावत्स्याद शुचिर्विप्रोयावत्पूर्व न गच्छति ॥ २६ ॥ ब्राह्मणार्थं विपन्नानां गवार्थ प्राणदायि- नाम् । आहवेषु विपन्नानामेकरात्रमशौचकम् ॥३०॥ द्वावि मौपुरुषौ लोके सूर्यमंडल भेदिनौ । परि वाड् योग युक्तश्च रणे चाभिमुखोहतः ॥ ३१ ॥ यत्र यत्र हतः शूरः शत्रुभिः परिबेष्टित: अक्षयाँल्लभते लोकान् यदि क्लीव न भाषते॥३२॥ संन्यस्तं ब्राह्मणं दृष्ट्वा स्थानाञ्चलति भास्करः । एषमेमंड लंभित्वापरंस्थानप्रयास्यति ॥ ३३ ॥ यस्तु भन्नेषुसैन्येषु वि द्रवत्सुसमंततः। परि त्रातायदागच्छेत्स च क्रतु फलं लभेत् ॥ ३४ ॥ यस्यक्षतावृतंगात्रं शरमुद्गर यष्टिभिः । देवकन्या स्तुतंबीरंहरंति रमयंतिच ॥ ३५ ॥ देवांगना सहस्राणिशूर होता है ॥ २८ ॥ यदि दश दिन के मध्य में किसी दूसरे पुरुष का जन्म वा मृत्यु हो तो ब्राह्मण उसी समय तक अशुचि रहता है जिस समय तक पहिले पुरुष के जन्मवामृत्युसे अशुचि रहता॥२९॥जिनकी मृत्यु ब्राह्मण और गौ के निमित्त हुई हो अथवा जो संग्राम में मृत्यु को प्राप्त हुए हों उनका आशौच एक दिन रात का होता है ॥ ३० ॥ संसारमें ये दो पुरुष सूर्य मण्डलको भेदनकरके ब्रह्म लोकको जाते हैं एक तौ योगकरके युक्त संन्यासी और दूसरा जो रण में सन्मुख स्थित रहकर मृत्यु को प्राप्त हुआ ॥ ३१ ॥ शत्रुओं से घेरे जाने पर भी जो शूरवीर नपुंसकता के वचन नहीं बोलते वे चाहे जिस (शुद्ध वा अशुद्ध ) स्थान में मारे गयेहों परन्तु निश्चय अक्षय लोकों को प्राप्त होते हैं ।। ३२ ॥ संन्यासी ब्राह्मण को देखकर सूर्य भी अपने स्थानसे चलायमान होजाता है कि यह मेरे मंडलको भेदन करके परमपद को प्राप्त होगा ॥ ३३ ॥ जो रण में ( शस्त्र प्रहारादिक से व्याकुल होकर ) भागती हुई सेनाकी रक्षा करता है वह यज्ञके फलको प्राप्त होताहै ॥ ३४ ॥ रणमें जिसका शरीर शूल, मु- द्र ( मूंगरी ) और यष्टि ( लाठी ) आदिकों से क्षत(भग्न)हुआहो उसवीर को देवकन्या लेजाती हैं और रमण करती हैं ॥ ३५ ॥ संग्राममें मृत्युको प्रा- २० लघुपाराशरी। भा०टी० मायोधनेहतम् । त्वरमाणाःप्रधावंति ममभर्ता ममेतिच ॥ ॥३६॥ ययज्ञसंधैस्तपसा च विप्राः खर्गेषिणोयत्रयथैवयांति । क्षणेनयांत्येवहितत्रवीराःप्राणान्सुयुद्धे नपरित्यजन्ति ॥३७॥ जितेनलभ्यतेलक्ष्मी मृतेनापि वरांगनाः । क्षणध्वंसिनिका यस्मिन्काचिंतामरणेरणे ॥ ३८ ॥ ललाटदेशेरुधिरंश्रवच्च यस्याहवेतु प्रविशेतवक्रम् । तत्सोमपानेन किलास्यतुल्यं संग्रामयज्ञे विधिवच्च दृष्टम् ॥ ३९ ॥ अनाथंब्राह्मणं प्रेतं ये वहंति दिजातयः। पदे पदे यज्ञफलमा नुपूाल्लभंतिते॥४०॥ नतेषा मशुभं किंचित्पापं वा शुभकर्मणां । जलावगाहनाते षांसद्यः शौचविधीयते ॥ ४१ ॥ असगोत्रमबंधुंच प्रेतीभूतं सहुए शूर वीर को देखकर सहस्रों देवांगना 'यह मेरा पतिहो, इस प्रकार कहती हुई शीघ्रता पूर्वक दौड़कर उसके पास आती हैं ॥ ३६ ॥ स्वर्गकी इच्छा करने वाले ब्राह्मण अनेकों यज्ञ और तपके द्वारा जिस प्रकार (वि- मानादिकों का सुख भोगते हुए ) जिस स्थान ( स्वर्ग) को प्राप्त होते हैं उसी प्रकार ( आनंद युक्त ) उस (स्वर्ग) स्थानको रणमें प्राणत्याग कर ने वाले वीर क्षणमात्रमें प्राप्त होजाते हैं ॥ ३७ ॥ रणमें विजय प्राप्त होनेसे लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है और मृत्यु प्राप्त होनेसे देवांगना ( अप्सरा) ओंकी प्राप्ति होती है फिर युद्ध में मृत्युको प्राप्त होनेसे इस क्षणभंगुर देहकी क्या चिंता है ॥ ३८ ॥ संग्राममें जिस वीरके मस्तकसे रुधिर बहकर मुखमें प्रवेश करै उसके निमित्त बह रुधिरका पान करना संग्राम रूपी यज्ञमें विधिपूर्वक सोमपान करनेकी समानहै इसमें संशय नहीं ॥ ३९ ॥ जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, बैश्य, मृत्युको प्राप्त हुए अनाथ ब्राह्मणको अपने स्कंधपर धारण करके ले जाते हैं उनको क्रमानुसार एकर चरणपर एक २ यज्ञका फल प्राप्त होताहै अर्थात्-मृत्युको माप्तहुए अनाथ ब्राह्मण को जोस्मशानमें लेजाते हैं उनको बहुत पुण्य प्राप्त होताहै ॥ ४० ॥ जो मृत्युको प्राप्तहुए अनाथ ब्राह्मणको स्कंधपर धारण करके चलते हैं उन सत्कर्म करने वाले पुरुषोंको कुछ पाप वा अशुभ नहीं होता, केवल जलमें स्नानही करनेसे उनकी शीघ्र शुद्धिहो जातीहै ॥ ४१ ॥ जो अपना सगोत्र वा बंधु नहो ऐसे मृत्युको प्राप्त हुए

अ०३
२१
विशिष्टधर्म शास्त्र
द्विजोत्तमम् । वहिवाच दहित्वाच प्राणायामेनशुद्ध्यति ॥
४२ ॥ अनुगम्येच्छयाप्रेतं ज्ञातिमज्ञाति मेववा। स्नात्वास
चैलं स्पृष्टबाग्निंघृतं प्राश्यविशुद्ध्यति ॥ ४३ ॥ क्षत्रियं मृत
मज्ञानाडाह्मणो यो नुगच्छति। एकाहमशुचिर्भूत्वा पंचगव्ये
नशुद्ध्यति ॥४४॥ शवं च वैश्य मज्ञानाद्ब्राह्मणो ह्यनुग-
च्छति । कृत्वाशौचं द्विरात्रंच प्राणायामान् षड़ाचरेत्॥४५॥
प्रेतीभूतंतुयःशूद्रं ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः । अनुगच्छेन्नीयमानं
त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ॥ ४६ ॥ त्रिरात्रेतुततःपूर्णे नदीं गत्वा
समुद्रगाम् । प्राणायामशतंकृत्वा वृतंप्राश्य विशुद्ध्यति ॥
॥४७॥ तस्माद्धिजोमृतंशूद्रं नस्पृशेन्नचदाहयेत् । दृष्टेसूर्याव
लोकेनशुद्धिरेषा पुरातनी ॥ १८ ॥
इतिपाराशरीये धर्मशास्त्रेतृतोयोऽध्यायः ॥ ३॥
श्रेष्ठ ब्राह्मणको स्कंधपर धारण करके लेचलने से तथा उसको दाह करने
के आशौचसे केनल प्राणायामहीके करनेसे शुद्ध होजाताहै ॥ ४२ ॥ जि-
स मृतकहुए पुरुषके पीछे अपनी इच्छासे जाथ यदि वोह पुरुष अपनी जातिका
हो वा अन्य जातिकाहो परन्तु उसके पीछे जायतो जानेसे वस्त्रों सहित
स्नान करके अग्नि कास्पर्श करै और घृत चाखै तवशुद्ध होजाताहै ॥४३॥
जो अज्ञानी ब्राह्यग मृतक क्षत्रियके साथ जायतो एकदिन अशुचि रहकर
तदनंतर पंचगव्यसे शुद्ध होताहै ॥ ४४ ॥ अज्ञानी जो ब्राह्मण मृत्युको प्रा
सहुए वैश्थके साथ जायतो दोदिन रात अशुचि रहकर छह प्राणायाम कर
नैसे शुद्ध होताहै ॥ ४५ ॥ जो ज्ञानहीन ब्राह्मण मृतक शुद्रके साथ जाय
तो तीनदिन पर्यंत अशुद्ध रहताहै ॥ ४६ ॥ फिर तदनन्तर तीन दिन के
पश्चात् समुद्र गामिनी नदीके तटपर स्थित होकर सौ प्राणायाम करके औ-
रघृत का भोजन करके शुद्ध होताहै ॥ ४७ ॥ इस कारण से ब्राह्मण मृतक
शूद्र का स्पर्श तथा दाह क्रिया न करै । मृतक शूद्रका दर्शन करके सूर्य
नारायणका दर्शन करने से शुद्धि होतीहै ॥ ४८ ॥
इतिपाराशरीये धर्मशास्त्रभाषाटीकायां तृतीयोऽध्यायः ॥३॥

लघुपाराशरी। भा०टी० अतिक्रोधादात्मानंबाद्देषाद्वायदि बाभयात्। उद्ध्नीयास्त्री पुमान्बागतिरेषाविधीयते ॥ १ ॥ पूयशोणित संपूर्णवेधेत मसि मज्जति । षष्ठिवर्षसहस्राणि नरकंप्रतिपद्यते ॥ २ ॥ नाशौचं नोदकं नाग्निं नाश्रुपातं च कारयेत् । वोढारोग्निप्र दातारः पाशच्छेदकरास्तथा ॥ ३ ॥ तप्तकृच्छ्रेणशुद्ध्यंतीत्ये वमाहप्रजापतिः।गोभिर्हततथोद्धंब्राह्मणेनतुघातित्रम् ॥४॥ संस्पृशंति तु ये विप्रा बोढारश्चाग्निदाश्चये । अन्यये चानुगं तार:पाशच्छेदकराश्चये ॥ ५ ॥ तप्तकृच्छ्रेणशुद्धास्ते कुर्युवा ह्मण भोजनम् ॥ अनुडुत्साहितांगांचदद्युर्विप्रायदक्षिणाम्।। त्र्यहमुष्णपिवेद्वारि व्यहमुष्णपयःपिवेत् । व्यहमुष्णंपिवेत्सर्पि युंभक्षेदिनत्रयम् ॥ ७॥ षट्पलंतुपिवेदंभस्त्रिपलंतुपयः जो पुरुष वा स्त्री अतिक्रोध तथा द्वेषसे अथवा लोक भयादिके कारण से अपने आप को फांसी आदि देकर मारडाले तो उसकी गति इस प्रकार की होती है ॥ १ ॥ वह पीब और रुधिर से परिपूर्ण अंधकार युक्त तम ना- मक नरक में डूबता है और उस नरक में साठ सहस्र वर्ष पर्यंत निवास करता है ॥ २ ॥ उसका आशौच, नहीं मानना और जलक्रिया वा अग्नि- क्रिया वा अश्रु पात नहीं करना उसकेले जानेवाले और दाह कर ने वाले और पाशच्छेदन ( फांसी काटना) कर ने वाले ॥ ३ ॥ तप्त कृळू ब्रत से शुद्ध होते हैं यह ब्रह्मा जी ने कहा है | जिस को गौवों ने मारा हो वा जो फांसी को प्राप्त हुआ हो अथवा जिस को ब्राह्मणों ने मारा हो॥४॥जो ब्राह्मण उस मृतक को स्पर्श करते हैं वा श्मशान को ले जाते हैं तथा दाह कर ते हैं अथवा उसके पीछे जाते हैं या जो पाशच्छेदन करते ॥ ५ ॥ वे तप्त कुछ ब्रत कर के और सुपात्र ब्राह्मणों को भोजन करा कर तथा सुपात्र ब्राह्मण को एक वैल और गौ दक्षिणा देकरशुद्ध होते हैं ॥६॥ अब तप्त कुछ ब्रत की विधि कहते हैं । तप्त कृछू ब्रत कर ने वाला पुरुष तीन दिन पर्यंत छह२ पल उष्ण जल पीवे तदनंतर तीन दिन पर्यंत प्रति दिन चार२ पल उष्ण दुग्ध पान करै उसके पश्चात् तीन दिन पर्यंत एकर पल उष्ण घृत पान करै फिर तीन दिन तक वायु का भोजन करै अर्थात् -एक पल ४ तोले का होता है ।। १ अ०४ २३ विशिष्ट धर्मशास्त्र । पिवेत् । पलमेकंपिवेत्सर्पिस्तप्तकृच्छं विधीयते ॥ ८॥ योवै समाचरोहितः पतितादिष्वकामतः। पंचाहंवादशाहं वा द्वाद शाहमथापिवा ॥९॥ मासाईमासमेकंवा मासद्वयमथापि वा। अब्दार्द्धमब्दमेकंवा भवेदुवंहितत्समः ॥ १०॥ त्रिरा प्रथमेपक्षेद्वितीयकृच्छ्रमाचरेत् । तृतीयेचैवपक्षेतुकृच्छ्रेसां तपनंचरेत् ॥ ११ ॥ चतुर्थेदशरात्रंस्यात्पराकःपंचमेमतः । कु र्याच्चांद्रायणं षष्ठे सप्तमेवैदव द्वयम् ॥ १२ ॥ शुद्ध्यर्थमष्टमे चैव षण्मासा कृच्छ्र माचरेत् । पक्ष संख्या प्रमाणेन सुव न्यपि दक्षिणा ॥ १३ ॥ ऋतुस्नातातुयानारी भर्तारंनोप सर्पति । सामृतानरकंयाति विधवाचपुनःपुनः ॥ १४ ॥ ऋ- तुस्नातांतुयोभार्या सन्निधौनोपगच्छति । घोरायांभ्रणहत्या निर्जल व्रत करै यह तप्त कृछका विधान है ॥७॥८॥ जो ब्राह्मण विना इ- च्छा पतितादिकों से दिन१०दिन वा १२दिन।।९॥अथवा १५ दिन तथा एक वा दो मास तथा छः मास एक वर्ष अथवा एक वर्ष से अधिक समय पर्य न्त संसर्ग करै तो एक वर्ष से अधिक संसर्ग करने से वह ब्राह्मण उसी के के तुल्य पतित होजाता है ॥ १० ॥ यदि पांच दिन पतितादिकों से संसर्ग हो तो उसकी शुद्धि के निमित्त तीन दिन पर्यंत उपवास करै और जो दश दिन संसर्ग रहे तो कृच्छ्वत करै बारहदिन संसर्ग रहै तो तप्त कृच्छू करै ॥ ११ ॥ पन्द्रहदिन संसर्ग रहने में दश दिन पर्यंत उपवास करै और एक मास पर्यंत संसर्ग रहै तो पराक बूत करै दो मास संसर्ग होनेपर चा- द्रायण बूत करै और छः मास संसर्ग होनेपर दो चांद्रायण करै ॥ १२ ॥ यदि एक वर्ष पर्यंत संसर्ग रहै तो छः मास तक कृच्छ्र व्रत करै और और जितने पक्षसंसर्ग रहाहो उतनेही सुवर्ण की दक्षिणा दे तवशुद्धहोता है, पूर्वोक्त प्रकारसे पहिलापक्ष ५ दिन का ऐसेही १० । १२ । १५ । दिन १ मास । ३। मास । ६ । मास । और १ वर्ष के क्रमसे ८ पक्षजानो ॥१३॥ जो ऋतु के पश्चात् स्नान करके स्त्री भर्ता के समीप नहीं जाती वह मृत्यु के अनंतर नरक को प्राप्त होती है और नरक भोगने के पश्चात् वारंवार विधवा होती है ॥ १४ ॥ और जो पुरुष अपनी ऋतुस्नाता स्त्री के समीप नहीं १ लघुपाराशरी। भा०टी० यां युज्यते नात्रसंशयः ॥ १५ ॥ दरिद्रं व्याधितंधूर्त भर्तारं यावमन्यते । साशुनी जायते मृत्वा शूकरीच पुनःपुनः॥ १६॥ पत्यौजीवतियानारी उपोष्य व्रतमाचरेत् । आयुष्यहरतेभ- तुःसानारीनरकंबजेत् ॥ १७ ॥ अपृष्ट्बाचैव भर्तारं याना- रीकुरुतेव्रतम् । सर्वतद्राक्षसान्गच्छे दित्येवमनुरवूबीत्॥१८॥ बांधवानां सजातीनां दुर्वृत्तंकुरुतेतुया । गर्भपातंचयाकुर्यान्न तां संभाषयेत्क्बचित् ॥ १६ ॥ यत्पापंवह्महत्यायां द्विगुणंग र्भपातने । प्रायश्चित्तंनतस्यास्तितस्यास्त्यागोविधीयते॥२०॥ ओघवाताहतंवीजं यस्यक्षेत्रेप्ररोहति । सक्षेत्रीलभतेवीज नबीजीभागमहति ॥ २१ ॥ तद्वत्परस्त्रियःपुत्रौ द्वौसुतौ कुंडगोलको । पत्यौजीवतिकुंडस्तु मृतेभर्तरिगोलकः ॥ २२ ॥ जाता वह बडीघोर गर्भहिंसा के पाप से युक्त होता है इस में संशय नहीं है ॥१५॥ जो स्त्री अपने दरिद्री, रोगी, वा धूर्त भी पति का अनादर करती है वह मृत्यु के पश्चात् वारंवार कूकरी वा शूकरी की योनि को प्राप्त होती है। १६ ॥ पति के जीवित रहते जो स्त्री निराहार व्रत करती है वह पति की आयु को न्यून करती है और मृत्यु को प्राप्त होकर नरक को प्राप्त होती है ॥ १७ ॥ जो स्त्री पति की विना आज्ञा लिये व्रत करती है उसका फल राक्षस लेजाते हैं अर्थात् वह व्रत निष्फल होता है ऐसा मनुजी ने कहा है ॥ १८ ॥ जो स्त्री अपने वांधवों से अथवा अपने जाति वालों से दुरा चरण करती है तथा जो स्त्री गर्भपात करती है उसस्त्री से कभी संभाषण न करै ।। १६ ॥ जितना पाप ब्रह्महिंसामें होता है उससे द्विगुणा पाप गर्भपात करने में होता है उसका प्रायश्चित्त नहीं है अतएव उस स्त्री का त्यागही करना योग्य है ॥ २० ॥ जल और वायु के वेग से किसी मनुष्य का वीज किसी दूसरे मनुष्य के खेत में आकर उत्पन्न होजावै तो उस बीज के फलका भागी खतवालाही होता है बीजवाले को भाग नहीं मिलता ॥ २१ ॥ इसी प्रकार कुंड और गोलक ये दो पुत्र जो परस्त्री से उत्पन्न होते हैं उस स्त्री केही पुत्र हैं वीर्यदान करनेवालेकेनहीं । पति के जीवित रहते जार जात पुत्र को कुण्ड कहते हैं और पति की मृत्यु होने के पश्चात् जारजात पुत्रको गोलक कहते हैं ।। २२ ॥ औरस क्षेत्रज तथा दत्तक और कृत्रिम २५ विशिष्टधर्म शास्त्र । औरसः क्षेत्रजश्चैव दत्तः कृत्रिमकः सुतः। दद्यान्माता पिता वापि स पुत्रो दत्तको भवेत् ॥ २३ ॥ परिवित्तिःपरीवेत्तायया च परिविद्यते । सर्वेते नरकं यांति दातायाजकपंचमाः॥२४॥ द्वौ कुच्छौ परिवित्तेस्तु कन्यायाःकृच्छ्रएवच । कृच्छ्रातिकृच्छौ दातुस्तु होता चांद्रायणं चरेत् ॥ २५॥ कुब्ज वामन पंडेषु गद्गदेषु जडेषु च । जात्यंधेबधिरे सकेन दोषःपरिविंदतः। ॥२६॥ पितृव्यपुत्रः सापत्नः परनारीसुतस्तथा । दाराग्नि होत्रसंयोगे न दोषः परिवेदने ॥ २७ ॥ नष्टे मृते प्रत्रजिते क्लीवे च पतिते पतौ ॥पंचस्वापत्सुनारीणां पतिरन्यो विधी यते ॥ २८ ॥मृते भर्तरिया नारी ब्रह्मचर्यव्रतेस्थिता।सामृता यहभी पुतहैं । माता वा पिताने जो पुत्र किसी पुरुषको दियाहो वोह दत्तक पुत्र कहलाताहै ॥ २३ ॥ परिवित्ति और परिवेत्ता तथा जो कन्या परिवे- ता से विवाहीजाय, कन्यादान करने वाला और याजक [विवाह कराने वाला ] ये संपूर्ण पुरुष नरकमें जाते हैं। बड़े भ्राता के विवाह होने से पूर्व छोटे भ्राता का विवाह होतो वडे भ्राताको परिवित्ति और छोटे भ्राता को परिवेत्ता कहते हैं ॥ २४ ॥ जो बड़े भ्राताके विवाह होने से पहिले छोटे भ्राताका विवाह हुआ हो तो उसके दोषकी निवृत्ति के निमित्त वे दोनों भ्राता दो २ कृच्छ्ब्रत करें और वह विवाहित कन्या एक कृच्छ्रब्रत करै और कन्यादान करनेवाला कृच्छ्र और अतिकृच्छू व्रत करे और होता चां द्रायण व्रत करै ॥ २५ ॥ जो बड़ा भ्राता कुबड़ा, बौना, नपुंसक अथवा स्पष्ट न बोलनेवाला मूर्ब तथा जन्मांध और वहिरा वा गूंगाहो तो परिवे दन का दोष नहीं है ॥ २६ ॥ यदि चचा वा ताऊ का पुत्र, सपत्नीका पुत्र अथवा अन्य स्त्री से उत्पन्न हुआ पुत्र बड़ा भ्राता हो तो सन्तानोत्पति वा अग्निहोत्र के लिये विवाह करलेने में कुछ दोष नहीं ॥ २७ ॥ जिस कन्या का वाग्दान होगया हो और विवाह न हुआ हो, ऐसी दशा में उसका प- ति यदि नष्ट होगया हो ( अर्थात्-कहीं चला गया हो और पता न लगै ) वा मृतक होगया हो, या सन्न्यासी हो जाय अथवा नपुंसक हो तौ इन पांच आपत्तियों में उस कन्या का दूसरे पतिके साथ विवाह कर देना चा- हिये ॥ २८ ॥ पतिके मृत्युको प्राप्त होने के अनंतर जोस्त्री ब्रह्मचर्य नियममें ४ २६ लघुपाराशरी। भा०टी० लभते स्वर्गयथाते ब्रह्मचारिणः ।। २६ ॥ तिनः कोव्यो कोटीच यानिलोमानिमानवे । तावत्कालं वसेत्स्वर्गे भर्तारं यानुगच्छति ॥ ३० ॥ व्याल ग्राही यथा व्यालं वलादुद्धरते विलात् । एवं स्त्रीपतिमुद्धृत्य तेनैव सह मोदते ॥ ३१ ॥ इतिपाराशरीये धर्मशास्त्रे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४॥ वृकश्वानशगालादि दष्टोयस्तुद्विजोत्तमः स्नात्वा जपेत्स गायत्री पवित्र वेदमातरम् ॥१॥ गवांशृंगोदकस्नानात्महा नद्योस्तुसंगमे । समुद्रदर्शनाद्वापिशुनादष्टःशुचिर्भवेत् ॥२॥ वेदविद्या ब्रत स्नातः शुनादष्टो द्विजोयदि । सहिरण्योदके स्नात्वाघृतं प्राश्य विशुद्ध्यति॥३॥सब्रतस्तुशुनादष्टो यस्त्रिरात्र स्थित रहतीहै वह मृत्युहोने के पश्चात् इसप्रकार स्वर्गको प्राप्त होती है जैसे ब्रह्मचारी स्वर्गको प्राप्त होते हैं ॥ २६ ॥ पतिकी मृत्यु होनेके अनंतर जोस्त्री सती होकर पतिके साथ जातीहै बोहस्त्री जितने मनुष्यके शरीरमें रोम होते हैं उतने वर्ष पर्यंत स्वर्गवास करतीहै अर्थात् सतीत्री साढे तीन करोड वर्ष पर्यंत स्वर्गमें निवास करती है ॥ ३० ॥ जिस प्रकार सर्पको पकड़ने वाला ( सपेरा ) सर्पको वलकरके विल (भट्टे ) मेंसे निकाल लेताहै इसी प्रकार वहस्त्री अपने पतिका पापोंसे उद्धार करके उसके साथ आनंद करती है।॥३१॥ इतिश्रीपाराशरीयेधर्मशास्त्रेभापाटीकायांचतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ ) जिस ब्राह्मणको भेड़िये, कुत्ते, तथा गीदड़ आदिने काटाहो वह स्नानकरके गायत्री का जपकरै क्योंकि-गायत्री परम पवित्र और वेदोंकी माताहै ॥१॥ जिसको श्वान आदिकोंने काटाहो वह गोशृंगसे शुद्ध कियेहुए जलसे स्नान करनेसे तथा पवित्र नदियों के संगममें (जहां दोपवित्र नदी मिली हों) स्नान करने से अथवा समुद्रका दर्शन करने से भी शुद्धहोजाताहै।।२।। यदि वेदाध्ययन रूप व्रत करके युक्त ब्राह्मणको कुत्तेने काटा हो तो वह सुवर्ण से शुद्ध किये हुए जल से स्नान करके औरघृत भोजन करके शुद्ध होता है ।। ३ ।। जो नाम तीन दिन का बूतकर रहाहो और उसको कुत्ताकाटै विशिष्टधर्म शास्त्र। . मुपावसेत् । घृतं कुशोदकं पीत्वा ब्रतशेष समापयेत् ॥ ४ ॥ अवतःसबतोवापि शुनादष्टो भवेद्विजः । प्रणिपत्यभवेत्पूतो वित्रैश्चक्षु निरीक्षितः ॥ ५ ॥ शुनाघातावलीढस्य नखैर्वि लिखितस्यच । अद्भिः प्रक्षालनं प्रोक्तमग्निना चोप चूलनम् ॥ ६ ॥ ब्राह्मणी तु शुनादष्टा जंबुकेन वृकेणवा । उदितंग्रह नक्षत्रं दृष्ट्वासद्यःशुचीभवेत् ॥ ७॥ कृष्णपक्षे यदा सोमोन दृश्येत कदाचन । यांदिशं ब्रजते सोमस्तांदिशं चावलोक येत् ॥ ८ ॥असबाह्मणके ग्रामेशुनादष्टो द्विजोत्तमः । वृष प्रदक्षिणी कृत्यसद्यःस्नात्वा शुचिर्भवेत् ॥ ६॥चंडालेनश्व पाकेन गोभिर्विप्रैर्हतोयदि ।आहिताग्निर्मूतो विप्रो विषणा स्मा हतो यदि ॥ १० ॥ दहेत्तं ब्राह्मणं विप्रो लोकाग्नौ मंत्र वर्जितम् । स्पृष्ट्वा चोह्य च दग्ध्वा च सपिंडेषु च सर्वदा ॥ ११ ॥प्राजापत्यं चरेत्पश्चाद्विप्राणामनुशासनात् । दग्ध्वा तो वह घृत और कुशोदक कापान करके तब शुद्धहोता है॥४॥जिस ब्राह्मण को कुत्तेने काटाहो वह व्रतीहो अथवा अबूती परंतु ब्राह्मणों को प्रणामकरके उनकी दृष्टिमात्र से शुद्ध होजाता है ॥ ५ ॥ जिसको श्वानने चाटा हो वा सूंघा हो उसे जलसे प्रक्षालन करै और अग्नि से तप्त करैतौ शुद्धिहोतीहै।६।। जोवाह्मणी को श्वान, शृगाल, तथाकादि ने काटाहो तो वह उदय होते हुए सूर्यचंद्रादि ग्रहों और नक्षत्रों का दर्शन करनेसेही शुद्ध होजाती है ॥७॥ जोकदाचित् कृष्णपक्षमें चंद्रमाका दर्शन नहो तोजिस दिशामें उसदिन चंद्रमा उदय हों उसदिशा कादर्शन करै ॥८॥ जिस ग्राममें श्रेष्ठ ब्राह्मण न हों और किसी ब्राह्मण को कुत्ता काटै तो वह स्नान पूर्वक वृषभ की प्रदक्षिणा करके शीघ्र शुद्ध होजाता है ॥९॥जो अग्निहोत्री ब्राह्मण चांडाल वा श्वपचके हाथसे मारा गया हो अथवा उसेगा काब्राह्मणोंने मारा हो तथा उसनेस्वयं विष खाकर आत्म घात किया हो ॥ १० ॥ तो उसके सपिंडों में से जो पुरुष उसकी क्रिया करै वह उस ब्राह्मण को बिनामंत्र के लौकिक अग्नि में दाह करै और उसे स्पर्श करके तथा उसके विमान को उठा के और उसे दाह करके ॥ ११ ॥ ब्राह्मणों की आज्ञा से प्राजापत्य व्रत करै और दाह करने के अनन्तर उसकी अस्थि २८ लघुपाराशरी। भा०टी० स्थाीन पुनर्नीत्वा क्षीरैः प्रक्षालयेद् द्विजः ॥ १२॥ स्वेनानि ना स्वमंत्रेण पृथगेतत्पुनदेहेत् । आहिताग्निजि: कश्चित्त वसन्काल चोदितः ॥ १३ ॥ देहनाशमनुप्राप्तस्तस्याग्निर्व सते गृहे । प्रेताग्निहोत्र संस्कारः श्रूयतांमुनि पुंगवाः ॥१४॥ कृष्णाजिनंसमास्तीर्य कुशैस्तु पुरुषाकृतिम् । षट्शतानिशतं चैव पलाशानां च बुंततः॥ १५॥ चत्वारिंशच्छिरेदद्याच्छत कंठे तुविन्यसेत् । वाहुभ्यांदशकं दद्यादंगुलीषु दशैवतु॥ १६॥ शतं तुजघनेदद्या द्विशतंतूदरे तथा । दद्यादष्टौ वृषणयोः पंचमेढ़ेतुविन्यसेत् ॥ १७॥ एकविंशति मूरुभ्यां द्विशतंजा नुजंघयोः । पादांगुष्टेषुषड्दद्या द्यज्ञपात्रं ततोन्यसेत् ॥ १८॥ शम्यां शिश्ने विनिक्षिप्य अरणिं मुष्कयोरपि । जुहूं च- दक्षिणे हस्ते बामे तूपभृतं न्यसेत् ॥ १६ ॥ पृष्ठे तूलूखलंद- यों को दूध में धोवै॥ १२॥ फिर उन अस्थियों को मंत्र पूर्वक अपनी [गार्हपत्य] अग्नि में पृथक् दाह करै हे मुनीश्वरों ! जो अग्नि होत्री बाह्मण प्रदेश में काल बश से ॥ १३ ॥ मृत्युको प्राप्त हुआ हो और उसकी अग्निहोत्र करनेकी अग्नि उसके घर पर स्थित हो तो उसका अग्नि संस्कार जिस प्रकार होना चाहिये सो श्रवण करो ॥ १४ ॥ चिताकी भूमि पर कृष्णमृगचर्म को वि- छायकर उसके ऊपर कुशाओं का पुरुषाकार बनाबै और उस कुशा पुरुष पर सातसौ ढाककी डालियें इस प्रकार स्थापन करै ॥ १५ ॥ चालीस तो शिरपर स्थापन करै और सौ कंठ में, दश भुजाओं पर धारण करै और दश अंगुलियों पर रक्खै ॥ १६ ॥ और सौ नाभि पर तथा दोसौ उदर पर स्थापन करै और आठ डालिये दोनों वृषणों (अण्डकोश ) पर और पांच लिंग पर रक्खै ॥ १७ ॥ इक्कीस ऊरु नितंबों [ के नीचे ] और दोसौ जानु और जंघा ओं पर और छह चरण के अंगूठों पर धारण करै । तदनन्तर अग्निहोत्र के पात्रों को स्थापन करै ॥ १८ ॥ शिश्न में शम्या को और अण्डकोश में अरणिको स्थापन करै, दक्षिण हस्त में जुहू [नुवा ] और बाम हस्त में उपभृत को स्थापन करै ॥ १९ ॥ पृष्ठतल में उल्लूखल और मूशल रक्खै और

अ०५
२९
॥
विशिष्टधर्म शास्त्र
द्यात्पृष्ठेच मुशलंन्यसेत् । उरसि क्षिप्य दृषदं तंडुलाज्य ति-
लान्मुखे ॥ २० ॥श्रोत्रे तुप्रोक्षणीं दद्या दाज्यस्थाली चच
क्षुषोः। कर्णेनेत्रे मुखेघाणे हिरण्यशकलं न्यसेत् ॥ २१ ॥
आग्नहोत्रोपकरण मशेषं तत्र विन्यशेत् । असौ स्वर्गाय
लोकाय स्वाहेत्ये काहुतिं सकृत् ॥२२॥ दद्यात्पुत्रोथवा भ्राता
प्यन्योवापिचवान्धवः। यथा दहन संस्कारस्तथा कार्य विच-
क्षणैः ॥ २३ ॥ ईदृशंतु विधिकुर्याद् ब्रह्म लोक गतिस्मृता
। दहतियेद्विजास्तंतु तेयांति परमांगतिं ॥ २४ ॥ अन्यथा
कुर्वते कर्म वात्म बुद्धयाप्रचोदिताः। भवत्यल्यापुषस्तेवै पतं
ति नरकेऽशचौ ॥ २५॥
इतिश्री पाराशरीये धर्मशास्त्रे पंचमोध्यायः॥५॥
अतःपरं प्रवक्ष्यामि प्राणिहत्यासु निष्कृतिम् । पराशरेणपू
वर्वोक्तांमन्वर्थे पिचविस्तृतां ॥१॥ क्रौंच सारस हंसांश्च चक्र
हृदय में दृषद् (सिल ) स्थापन करै तथा मुख में चावल घृत और तिल॥२०॥
और कर्ण में प्रोक्षणी और आंखों में आज्यस्थाली स्थापन करै और कर्ण,
नेत्र, तथा मुख और नासिका में सुवर्ण का खण्ड रक्खै ॥ २१ ॥ इस प्रकार
अग्निहोत्र की सम्पूर्ण वस्तु वहां पर स्थापन करके उस मृतक अग्निहोत्रीका
पुत्र वा भ्राता तथा जो कोई उसका बांधव हो वह "असौवर्गाय लोकाय
स्वाहा,, इस मंत्र से एक आहुति दे तदनन्तर दाह संस्कार की विधि के
अनुसार उसकी दाह क्रिया करै ॥ २२ ॥ २३ ॥ इस प्रकार विधि करने
से उस मृतक को ब्रह्म लोककी प्राप्ति होनी है और जो ब्राह्मण उसको
दाह करते हैं वे भी परम गति को प्राप्त होते हैं ॥ २४ ॥ जो अपनी बुद्धि
के अनुसार अन्यथा कर्म करते हैं वे स्वल्यायु होते हैं और अशुचिनामक
नरक को प्राप्त होते है ॥ २५ ॥
इति श्री पाराशरीये धर्मशास्त्रे भाषाटीकायां पंचमोध्यायः ॥५॥
इस के अनंतर प्राणिमात्र कीहिंसा का प्रायश्चित्त कहते हैं जोकि पाराशर
जीने पूर्व वर्णन किये हैं और मनुजी ने भी विस्तार पूर्वक कहे हैं ॥ १ ॥

३० लघुपाराशरी। भा०टी० वाकं चकुक्कुटं । जालपादं च शलभं हत्वाहो रात्रतः शुचिः ॥ २ ॥ बलाकाटिद्विभौ वापि शुकपारावतावपि । पाठीम बकघाती च शुद्धयते नक्तभोजनात् ॥ ३॥ बृक काक कपो तानांसारी तित्तिरघातकः । जलमध्यउभे संध्येप्राणायामेन शुद्धयति ॥ ४ ॥ गृध्रश्येनशशादीनामुलूकस्यचघातकः । अपक्वाशी दिनंतिष्ठेद्रात्रौमारुतभोजनः ॥ ५ ॥ चटकाया मयूरस्य कोकिलाखंजरीटके । लाविकारक्तपक्षेषु शुद्धयते नक्तभोजनात् ॥६॥ कारंडव चकोराणां पिंगला कुर रस्य च भारद्वाजादिकंहत्वाशिवंसंपूज्य शुद्ध्यति ॥७॥ भेरुंडचा षभासांश्च पारावतकपिंजलौ पक्षिणां चैवसर्वेषामहोरा त्र मभोजनम् ॥ ८ ॥ हत्वा मूषक माजीर सर्पाजागर कुंड कुंज सारस,हंस,चकुवा,कुक्कट और जालपाद अर्थात् जिन पक्षियों के चरण जुडे हुए हों तथा टिड्डी इन मे से किसी को मारकर एकदिन रातके उपवास से शुद्ध होता है ॥ २ ॥ वालकी ( वगली) टटीरा, तोता तथा पारावत मछली और वगला इन में से किसी भी जीव की हिंसा करने वाला नक्तभोजन व्रत (दिन में भोजन न करना रात्रि में एक बार भोजन करना) से शुद्ध होता है ॥ ३॥ भेडिया काक कबूतर मैना तित्तर इन में से किसी जीव की हिंसा की हो तो दोनों संध्याओं के समय जल में स्थित होकर प्राणायाम करने से शुद्ध होता है ॥ ४ ॥ जिसने गिद्ध, वाजः खरगोश तथा उलूक ( उल्लू) की हिंसा की हो वह दिन भर पक्वान्न भोजन न करै और रात्री में वायु भक्षण करके स्थित रहै अर्थात्--कुछ भोजन न करै ॥ ५ ॥ चटका मयूर कोकिला ममोला तथा लाविका ( वटेर ) और लाल पंख वाले पक्षियों में से किसी एक की हिंसा हुई हो तो नक्तभोजन ब्रत से शुद्ध होता है ॥ ६ ॥ मुर्गावी चकोर चाम चिड (चिमगादर ) टटीरी तथा पपीहा इन में से किसी का बध हुवा हो तो शिव जी का पूजन करने से शुद्ध होता है ॥ ७॥ भेरुंड नीलकंठ, भास, और पारावत,कपि जल तथा सम्पूर्ण पक्षियों में से जिसने किसी एक की हिंसा की हो वह एक दिन रात निराहार ब्रत करने से शुद्ध होता है ॥ ८ ॥ चूहा विल्ली अ०५ विशिष्ट धर्मशास्त्र। भान् । कृसरंभोजयेद्विप्रान्लोहदंडचं दक्षिणा ॥६॥ शि शुमारंतथागोधां हत्वाकूर्मचशल्लकम् । वृताकफलभक्षी वा प्यहोरात्रेणशुद्धयति ॥ १० ॥ वृकजम्बुकऋक्षाणां तरचूणां च घातकः । तिलप्रस्थंद्विजेदद्याद्वायुभक्षोदिनत्रयम् ॥११॥ गजस्य च तुरंगस्यमहिषोष्ट्रस्यघातने । प्रायश्चित्तमहोरात्रं त्रिसंध्यमवगाहनम् ॥ १२ ॥ कुरंगंवानरंसिंह चित्रंव्याघ्रं च घातनम् । शुद्धयतेसतिरातेण विप्राणांतर्पणेन च ॥ १३ ॥ मृगरोहिद्वराहाणां भवेर्वस्तस्यघातकः। अफालकृष्टमश्नीया दहोरातमुपोष्यसः॥१४॥ एवंचतुष्पदानां च सर्वेषांवनचा रिणाम् । अहोरात्रोषितस्तिष्ठेजपन्वैजातवेदसम् ॥ १५ ॥ शिल्पिनंकारुकशुद्ध स्त्रियं वा यस्तुघातयेत् । प्राजापत्यद्वयं सर्प अजगर तथा जल सर्प इन में से किसी की हिंसा हुई हो तो सुपात्र ब्राह्मणों को खिचडी का भोजन कराने और लोह दंड की दक्षिणा देने से शुद्ध होता है ॥ ९॥ शिसुमार गोह तथा कच्छप और शिल्लू सांप इन मेंसे किसी एकको मारकर वा बैंगनके फलको खानेवाला अहोरात्रबूत करनेसे शुद्ध होता है ॥ १० ॥ भेडिया गीदड ऋच्छ तथा व्याघ्र को मारकर सुपात्र ब्राह्मण को एक प्रस्थ तिलदे और तीन दिन पर्यंत निर्जल व्रत करै तो शुद्ध होता है । ( प्रगट हो कि एक प्रस्थ ६४ तोले का होता है )॥ ११ ॥ हाथी, घोड़ा, भैंसा तथा ऊंटकी हिंसा होगईहोय तो अहोरात्रव्रत करै और तीनों संध्याओं के समय स्नान करै ॥ १२ ॥ मृग, वानर तथा सिंह,चीता वा व्याघ्रकी हिंसा करके तीनदिन पर्यंत उपवास करै और सुपात्र ब्राह्मणों को भोजन निमावै ॥ १३ ॥ जिसने मृगरोहित ( मृगी या रोहू मछली) सूकर तथा भेड़ और वकरेकी हिंसा की हो वह अहोरात्र उपवास करें और विना हलसे जोतेहुये अन्न ( नीवारादि ) को भक्षण करके शुद्ध होता है इसीप्रकार संपूर्ण चतुष्पद और वनचर जन्तुओं में से किसी एक जन्तु की हिंसा करनेवाला गायत्री का जप करताहुआ अहोरात्र व्रत करै ॥ १५ ॥ शिल्पी, कारक ( कारीगर ) शूद्र तथा स्त्री को मारनेवाला पुरुष दो प्राजा ३२ लघुपाराशरी । भा०टी० कृत्वावृषैकादशदक्षिणा ॥ १६ ॥ वैश्यवाक्ष नियंवापि निर्दो षयोभिघातयेत् । सोतिकृच्छ्रद्वयंकुर्याद्गोविंशदक्षिणांददेत् ॥१७॥ वैश्यं शूद्र क्रियासक्तं विकर्मस्थं विजोत्तमम्। हत्वा चांद्रायणतस्य शिद्गाश्चैवदक्षिणा॥ १८ ॥ चांडालंहतवान् कश्चिद्ब्राह्मणोंयदिकंचन । प्राजापत्यंचरेत्कृच्छ गोयंदक्षि णांददेत् ॥ १९ ॥ क्षत्रियेणापिवैश्येन शूद्रेणैवेतरेणच । चां डालस्यबधेप्राप्ते, कृच्छ्रार्द्धनविशुद्धयति ॥ २० ॥ चोरःश्व पाक इचांडालो विप्रेणाभि हतोयदि । अहोरात्रोषितः स्ना त्वापंचगव्येनशुद्ध्यति ॥ २१ ॥श्वपाकंचापिचांडालंविप्रःसं भाषते यदि । द्विजसंभाषणं कुर्यात्सावित्री च सकृज्जपेत् ॥ २२ ॥ चांडालैः सहसुप्तं चत्रिरात्रमुप वासयेत्। चांडालैक प थंगत्वा गायत्री स्मरणा च्छुचिः ॥ २३ ॥ चांडाल दर्शने स पत्य व्रत कर के ग्यारहवृषभों कादान करने से शुद्ध होता है ॥ १६ ॥ नि रपराधी वैश्य वा क्षत्रिय की हिंसा करके दो अतिकृव्रत करे और बीस गौ दक्षिणादे ॥ १७ ॥ अपने धर्मकी क्रिया में आसक्त वैश्य वा शुद्रको तथा कुकर्मी ब्राह्मण को मारकर चांद्रायण व्रत कर के तीस गोदान करने शुद्ध होता है ॥ १८ ॥ जो किसी ब्राह्मण से चांडालकी हिंसा दुई हो तो वह कृच्छ्र और प्राजापत्य व्रत करके दो गौ दक्षिणा दे ॥ १९ ॥ जो क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र अथवा किसी अन्य जाति ने चांडाल की हिंसा की हो तो वह अर्द्ध कृच्छ्बत करके शुद्ध होता है ॥ २० ॥ जो किसी ब्राह्मणने चोरी करनेवाले श्वपच वा चांडालकी हिंसा की तो वह स्नान पूर्वक अहोरात्रव्रत करके पंचगव्यपान करने से शुद्ध होता है ॥२१॥ यदि कोई ब्राह्मण श्वपच वा चाडालसे संभाषण करै तो वह ब्राह्मण दूसरे ब्राह्मण से संभाषण करके एकबार गायत्री मंत्र का जप करै ॥ २२ ॥ जो चांडालों के साथ एक स्थान वा एक वृत्तकी छाया में सोया हो तो तीन दिनरात पर्यंत उपवास करै । और एक मार्ग में चांडालके साथ चल स्नान करै और (जितने चरण चला हो उतने गायत्री मंत्रोंका स्मरणकर ने से शुद्ध होता है ॥ २३ ॥ चांडालका दर्शन करके शीघ्र सूर्यका दर्शन से विशिष्टधर्म शास्त्र द्य आदित्य मवलोकयेत् । चांडालस्पर्शनेचैव सचैलं स्नान माचरेत् ॥ २४ ॥ चांडालखातवापीषु पीत्वा च सलिलं हि- जः । अज्ञानाच्चैकनक्तेन वहोरात्रेण शुद्ध्यति ॥ २५ ॥ चांडालभांडं संस्पृष्ट्वा पीत्वा कूपगतं जलम् । गोमूत्र या वकाहारस्त्रिरात्राच्छुद्धिमाप्नुयात् ॥ २६ ॥ चांडालघट संस्थंतु तत्तोयंपिवते द्विजः। तत्क्षणाक्षिपतेयस्तु प्राजापत्यं समाचरेत् ॥२७॥ यदि न क्षिपते तोयं शरीरे यस्य जीर्यति। प्राजापत्यं न कर्तव्यं कृच्छ्रे सांतपनं चरेत् ॥ २८ ॥ चरेत् सां तपनंविप्रः प्राजापत्यमनंतरः । तदर्धतु चरेद्देश्यः पादं शूद्र स्यदापयेत् ॥ २६ ॥ भांडस्थमंत्यजानां तु जलं दधिपयापि करै और चांडालका स्पर्श करके बस्त्रों सहित स्नान करै तब शुद्ध होता है ॥ २४ ॥ यदि ब्राह्मग क्षत्री वा वैश्य विनाजाने चांडालकी बनाईहुई वावड़ी में जलपान कर ले तो एकवार रात्रि में भोजन करके (दिनमें भोजन न करके) एक दिन रातमें शुद्ध होताहै ॥ २५ ॥ जिस कुवे में चांडाल के पात्र से छुआ हुआ जल गिरा हो उस कुए के जलको पीकर तीन दिन पर्यंत गो- मूत्र पान और यव का भोजन करने से शुद्ध होता है ( इससे प्रकट हुआ कि जिस कुएमें यवनों का पात्र जो चांडालके समान हैं पड़ता हो उस कुए का जल भी अपेय है जो ब्राह्मण चांडालके घडेका जल पीकर त- काल उगल देवा वमनकरके निकालदे तो वह प्राजापत्यव्रत से शुद्ध होता है ॥ २६ ॥ २७॥ सदि उस जलको न उगले और वह जल शरीर में परजाय तो शाजापत्यमे शुद्ध नहीं होता कृच्छ्र सांतपन करनेसे शुद्ध होता है ॥ २८ ॥ ब्राह्मणको उसकी शुद्धिके निमित्त कृच्छू सांतपन करना चाहिये और तत्रियको प्राजापत्यत्रत करना चाहिये । वैश्यको उसकी शुद्धिके निमित अर्थप्राजापत्य करना उचित है और शूद्र चौथाई प्राजापत्य करनसेही शुद्ध होजाताहै ॥२९॥ जोब्राह्मण, क्षालय, नया वैश्य अन्त्यजों ( रजकादिकों ) के पात्रका जल, दही तथा दुग्ध विनाजाने पान करले तौ ब्रह्मकूर्च उपवास करनेसे शुद्ध होता है और शूद्र एकदिन उपवास करने

॥
लघुपाराशरी।
भाटी
वेत् । ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रश्चैव प्रमादतः ॥ ३० ॥
मकूचोंपवासेन हिजातीनां तु निष्कृतिः। शूद्रस्यचोपवासे-
न तथादानेन शक्तितः ॥३१॥ भुंक्त ज्ञानाद्विजश्रेष्ठश्चांडा
लानंकथंचन । गोमूत्रयावकाहारो दशरात्रेण शुद्ध्यति ॥
३२॥ एकैकं ग्रासमश्नीयाद्गोमूत्रे यावकस्यच । दशाहनिय
मस्थस्य व्रतंतत्तु विनिर्दिशेत् ॥ ३३ ॥ अविज्ञातस्तु चांडालो
यत्रवेश्मनितिष्ठति । विज्ञातउपसंन्यस्य द्विजाः कुर्युरनुप्र-
हम् ॥३४॥ मुनिवनोगतान्धर्मान्गायतोवेदपारगाः । पतंत
मुद्धरेयुस्तं धर्मजाःपापसंकटात् ॥ ३५ ॥ दध्नाचसर्पिषा
चैवक्षीरगोमूत्रयावकम् । भुंजीतसहभृत्यैश्च त्रिसंध्यमवगा-
हनम् ॥३६ ॥ यह जीतना च व्यहं जीत सर्पिषा ।।
श्यहंक्षीरेणभुंजीत एकैकेनदिनत्रयम् ॥ ३७ ॥ दधि-
से तथा यथाशक्ति सुपात्र ब्राह्मणको दान देने से शुद्ध होता है ॥ ३० ॥
॥३१॥ जो ब्राह्मण अज्ञान से चांडालका अन्न भोजन करले तौ दशदिन
पर्यंत गोमूत्र और यवका भोजन करनेसे शुद्ध होता है ॥ ३२ ॥ प्रतिदिन
दश दिन पर्यंत गोमूत्र और यवका एक २ ग्रास भक्षण करके नियम में
स्थित रहकर व्रत को समाप्त करै तौ दश दिन में शुद्ध होता है ।। ३३ ।।
जो विना जानेहुए किसीके घर पर चाण्डाल स्थित हो और वह घरवाला
उसके जाननेके अनन्तर उसे निकालदे तौ जिसके घर पर चाण्डाल रहा
था उस पर ब्राह्मण कृपा करें ॥ ३४ ॥ अर्थात् मुनियोंके मुखसे कहे हुए
भर्गोको गायकर वेद पारंगत धर्मज्ञ ब्राह्मण पतित होतेहुए उस पुरुष
को पापके दुःखसे उद्धार करें ॥ ३५ ॥ अव उस पतितका प्रायश्चित क-
हते हैं, अपने कुटुम्ब और भृत्यादि सहित दधि घृत और दुग्धके साथ
यवान्न भोजन करै और गोमूत्र पान करै॥ तथा त्रिकालमें स्नान करै तौ शुद्ध
होता है ॥३६॥ तीन दिन दहीसे खाय और तीन दिनघृतके साथ भोजन
करै और तीन दिन दुग्धसे भोजन करै एकरसे तीन दिन भोजन करै॥३॥

विशिष्टधर्म शास्त्र । क्षीरस्य त्रिपलंपलमेकं घृतस्यतु । दुष्टस्यान्नं न भुंजीत नोच्छिष्टं कृमि दृषितम् ॥ ३८ ॥ भस्मनातु भवेच्छुद्धि रुभयोः कांस्यताम्रयोः । जलशौचन वस्त्राणां परित्यागेन मृण्मयम् ॥ ३९ ॥ कुसुंभगुडकार्पासं लवण तैल सर्पिषी॥ द्वारे कृत्वातु धान्यानि दद्याद्देश्मनि पावकम्॥४०॥ एवंशुद्ध स्ततः पश्चात्कुर्याद्राह्मणतर्पणम् । त्रिशतं गावृष चैकं दद्या विप्रेषु दक्षिणाम् ॥ ४१ ॥ पुनर्लेपनखातेन होमजा येन शुद्ध्यति।आधारेण च विप्राणां भूमिदोषो न विद्यते॥४२॥ चांडालैः सह संपर्क मासं मासार्द्धमेवबा । गोमूत्रयावका हारो मासार्द्धन विशुद्ध्यति ॥ ४३ ॥ रजकी चर्मकारी च जिस पुरुषका अंतःकरण दुष्ट हो उसका अन्न तथा उच्छिष्ट अन्न और जो कृमि आदिकोंने दृषित किया हो ऐसे अन्न का भोजन न करै । दही दूध तीन २ पल और घृत एकपल इसप्रकार भोजन करै ॥ ३८ ॥ अब जिस स्थानमें चांडाल स्थित रहा हो उस स्थानमें स्थितद्रव्यों की तथा उस स्थान की शुद्धि कहते हैं। कांसी और तांबे की शुद्धि भस्मसे होती है, और वस्त्रों की शुद्धि जल से होती है तथा मृत्तिका के पात्रों का त्यागदेना उचित है ॥३६॥ कुमुम्भ, गुड, कपास और लवण, तैल, घृत तथा धान्यादिकों को धरके द्वारसे बाहर निकालकर घर में अग्नि देदे अर्थात्-घरकी संपूर्ण भूमि को अग्नि से तप्त करै ॥ ४० ॥ तदनन्तर घर को गोमयादि से शुद्ध कर के और आप पूर्वोक्त व्रतसे शुद्ध होकर उस घर में सुपात्र ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हें तीनसौ गौ और एक वृष दक्षिणा में दे ॥ ४१ ॥ लीपने, खोदने, तथाहोम, जपइत्यादिक करनेसे भी भूमि शुद्ध होती है और ब्राह्मणों के आधार ( आसानादिक ) से भूमि दोष नहीं होता अर्थात् यदि लिपीहुई भूमीके ऊपर ब्राह्मण बैठजाय तो भूमी अशुद्ध नहीं होती अन्य जातिकी स्थितिसे भूमी अपवित्र होतीहै इसकारण उसे फिर शुद्ध करना चाहिये ॥ ४२॥ जो १ मास वा ? पक्ष पर्यंत चांडालोंके साथ संसर्ग रहै तो अर्द्ध मास पर्यंत गोमूत्रपान और यवाहार करने से शुद्ध होता है ॥ ४३ ।। यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य तथा शूद्रके धरमें धोवन, ३६ लघुपाराशरी । भा०टी० लुब्धकी वेणुजीविनी । चातुर्वर्णस्यतरहे ह्यविज्ञातालु तिष्ठति ॥ ४४ ॥ ज्ञात्वातु निष्कृतिं कुर्यात्पूर्वोक्तस्थाद्ध- मेवतु । गृहदाहं न कुर्वीत शेष सर्व च कारयेत् ॥ ४५ ॥ गृहस्याभ्यंतरं गच्छेच्चांडालोयदिकस्यचित् । तमागाराद्वि- निःसार्यमृद्भांडंतुविसर्जयेत् ॥ ४६॥ रसपूर्णतुमृद्भांडं न त्य जेत्तुकदाचन ।गोमयेनतुसभित्रैर्जलैः प्रोक्षेद्ग्रहंतथा॥४७॥ ब्राह्मणस्यत्रणद्वारे पूयशोणितसंभवे । कृमिरुत्पद्यतेयस्यपाय- श्चित्तंकथंभवेत्॥४८॥ गांभूत्रपुरीषेण दधिक्षीरेणसर्पिषा। यहंस्नात्वा च पीत्वा च कृमिदष्टःशुचिर्भवेत्॥ ४६॥क्षत्रियो पिसुवर्णस्यपंचमाषान्प्रदायतु । गोदक्षिणांतु वैश्यस्याप्युप वासं विनिर्दिशेत्॥ ५० ॥ शूद्राणांनोपवासः स्याच्छूद्रोदाने- चमारी तथा लुब्धकी ( ब्याधकी स्त्री) अथवा बांसका कार्य करनेवाली बिनाजाने रहै ॥ ४४ ॥ तो जानने के पश्चात् जो प्रायश्चित्त पहिले चांडाल के अज्ञात स्थितरहनेमें कहा है उससे आधा प्रायश्चित्त करै केवल गृहदाह न करै और संपूर्ण प्रायश्चित्त करै॥४५॥ यदि किसीके घर के भीतर कोई चांडाल चलाजावै तौ उसे घर से बाहर निकाल कर मिट्टी के पात्रों को त्यागदे ॥ ४६ ॥ जो मिट्टीके पात्र घृतादिक रसोंसे परिपूर्ण हों उनको न त्यागे । तदनंतर गोमय ( गौका गावर ) और जल से घर को लीपै ॥ ४७ ॥ (प्र०) यदि ब्राह्मणके व्रग में पीव और रुधिर हो और कृमि उत्पन्न होजायँ तो उस का प्रायश्चित्त क्या है ॥४८॥ (उत्तर) जिस ब्राह्मणको ब्रण में कृमिने काटाहो वह गोके मूत्र गोवर, दही, दूध और घृतमें तीनदिन स्नान करके और इन्हींपांचों वस्तुओंको मिलाकर पान करनेसे शुद्ध होता है।॥४६॥और यदि क्षत्रियके व्रणमें कृमिपडगयेहो तो सुपात्र ब्रह्मगको पांच माशे सुवर्णदान देकर तथा वैश्य गोदान आर उपवास करके शुद्ध होताहै ॥५०॥ शुद्धको उपवास करने की आज्ञा नहीं है वह केवल दान देन हीसे शुद्ध होजाता है । जब ब्राह्मण “अच्छिद्रमस्तु" ऐसा वचन उच्चा- विशिष्टधर्म शास्त्र। नशुद्ध्यति। अच्छिद्रमितियद्वाक्यंवदंति क्षितिदेवताः॥५१॥ प्रणम्यशिरसाग्राह्यमाग्निष्टोमफलंहितत् । जपच्छिद्रंतप- च्छिद्रं यच्छिद्रं यज्ञकर्मणि ॥ ५२ ॥ सर्वभवतिनिश्छिद्रं ब्राह्मणेरुपपादितम् । व्याधिब्यसनिनिश्रांत दर्भिक्षह्यथवाभ- ये ॥५३॥ उपवासोबतोहोमोदिजसपादितानि वा । अथवा ब्राह्मणास्तुष्ठाः सर्वेकुर्वत्यनुग्रहम् ॥ ५४ ॥ सर्वान् कामनवा प्नोतिबिज संपादितैरिह । दुर्वलेऽनुग्रहः प्रोक्तस्तथा वैवा- लवृद्धयोः॥५५॥ततोऽन्यथाभवेदोष स्तस्मान्नानुग्रहः स्मृतः। स्नेहाहायदि वा लोभाद्भयाद जानतोपिवा ॥ ५६॥ कुर्वत्यनु- ग्रहं येतु तत्पातेषु गच्छति॥स्वस्थस्यमूढा कुर्वति वदंत्यनि- यमंतुये ॥५७॥ ते तस्य विघ्नकर्तारः पतंति नरकेशुचौ॥ स्व यमेव ब्रतं कृत्वा ब्राह्मणयोवमन्यते॥५॥ वृथा तस्योपवासः रण करैं तब मस्तक नवाय कर और प्रणाम करके उस वचनको ग्रहण क- रनेसे अग्निष्टोम यज्ञका फल होता है । जप, तथा तपमें अथवा यज्ञमें छिद्र हो ॥५१॥५२॥ और ब्राह्मण उसे “अच्छिद्र मस्तु" कहदें तो वह सम्पूर्ण कर्म निष्छिद्र होजाता है। व्याधि, व्यसन, थकावट तथा दुर्भित अथवा किसीका भय हो तौ ॥ ५३ ॥ जो उपवास, ब्रत तथा होम इत्यादिक ब्राह्मणोंकी आज्ञासे कियेजावें और वे विधिपूर्वक न होसकें तब यदि सम्पूर्ण ब्राह्मण प्रसन्न होकर उस उपवासादि करनेवालपर अनुग्रह करके "अच्छिद्रमस्तु" यह वचन कहैं ॥ ९४ ॥ तो उन उपवासादिकों से संपूर्ण कामनाओं की प्राप्ति होती है । दुर्वल तथा बालक और बृद्ध के ऊपर कृपा करनी योग्य है ।। ५५ ॥ इनके सिवाय और किसी पुरुषपर बूत होम आ- दिको अनुग्रह करनेसे दोष होता है । स्नेहसे वा लोभसे अथवा भयसे तथा अज्ञान से ॥ ५६ ॥ जो अनुग्रह करते हैं व उस पतितके पाप भागी होते हैं । जो मन्दबुद्धि पुरुष स्वस्थोंके लिये नियमका उपेदश नहीं करते ॥ ५७ ॥ उनके प्रायचित्तमें विघ्न करनेवाले वे पुरुष अशुचि नाम नरक में गिरते हैं जो पुरुष वाह्मण से आज्ञालिये बिना अपने आपही प्राय त्रिचत्तके निमित्त बत करते हैं ।। ५८ ॥ उनका बूत निष्फल होता हे उन ॥

लघुपाराशरी। भा०टी० स्यान्न स पुण्येनयुज्यते। स एव नियमोग्राह्योयमेकोपिवदेद द्विजः ॥ ५६ ॥ कुर्याद्वाक्यं द्विजानांतु अन्यथा भ्रूणहा भवेत् ब्राह्मणा जंगमंतीर्थ तीर्थभूता हि साधवः ॥६०॥ तेषांवाक्यो दके नैव शुद्ध्यंतिमलिनाजनाः । ब्राह्मणा यानि भाषते मन्यते तानिदेवताः ॥ ६१ ॥ सर्वदेवमयोविप्रो नतद्वचनमन्यथा। उपवासोबतचैव स्नानंतीर्थजपस्तपः ॥ ६२ ॥ विप्रैःसंभाषि- तं यस्यसंपूर्णतस्यतत्फलम् । अन्नाद्यकीटसंयुक्त मक्षिकाके- शदूषिते ॥ ६३ ॥ तदंतरास्पृशच्चापः तदन्नंभस्मनास्पृशेत्। भुंजानश्चैवयोविप्रः पादहस्तेनसंस्पृशेत् ॥ ६४ ॥ स्वमुच्छिष्ट मसौभुक्तेयो भुंक्तेभुक्तभाजने । पादुकास्थोनभुंजीत पर्यक- स्थास्थितोपिवा ॥ ६५ ॥ श्वानचांडालदृक्चैव भोजनंपरि को उस बूतका पुण्य नहीं होता। जिस नियम (व्रत ) के करने के निमित्त एक ब्राह्मण भी आज्ञा दे बह नियम करने योग्य है ॥ ५९ ॥ श्रेष्ठ ब्राह्मणों का वाक्य अवश्य मानने योग्य है उनका बचन उलंघन करने से गर्भ हिंसा का पाप होता है वाह्मण जंगम ( घर बैठे कृतार्थ करनेवाला ) तीर्थहै और साधु भी तीर्थ हैं ॥ ६० ॥ मलिन (पापी पुरुष) उन ब्राह्मणोंके वाक्यरूप जलसे शुद्ध होतेहैं। उत्तम बाह्मण जो वचन कहते हैं उसे देवताभी मानते हैं ॥६१॥ वेदाभ्यासी सदाचारयुक्त ब्राह्मण सर्वदेव मय हैं, उनका बचन मिथ्या नहीं होता वे ब्राह्मण जिसके उपवास बूत, तथा स्नान, तीर्थ अथवा जप तप इत्यादि को ॥ ६२ ॥ यह संपूर्ण हो ऐसा कहदेते हैं उन उपवासादिकों के करनेवालेको पूर्णफल प्राप्त होता है जिस अन्नादिको कृमि वा मतिका (मक्खी) आदिने दूषित किया हो तथा केश पडा हो तो उसे निकालकर ॥ ६३ ॥ जलसे हाथधोवै और उस अन्नपर किंचिन्मात्र भस्म डालै तौ वह अन्न शुद्ध होताहै जो ब्राह्मण भोजन करताहुआ हाथसे चरणको स्पर्श करताहै अथवा भोजन कियेहुये पात्रमें भोजन करता है वह अपना उच्छिष्ट भोजन करता है खड़ाऊंपहिरेहुए तथा पलँगपरबैठेहुये अथवा खड़ेहोकरभोजनकरै।।६४॥६५।। जिस भोजन परवान बा चांडाल की दृष्टि पडीहो उसे त्याग दे। जो अन्न विशिष्ट धर्मशास्त्र। वर्जयेत् । यदन्नप्रतिषिद्धस्यादन्नशुद्धिस्तथैव च ॥६६॥ यथा पराशरेणोक्तंतथैवाहं वदामिवः । शृतंद्रोणाढकस्यान्नं काक श्वानोपघातितम् ॥ ६७ केनेदंशुद्धयते चेतिब्रह्मणेभ्योनि- वेदयेत् । काकश्वानाबलीढंतु द्रोणान्नं न परित्यजेत् ॥६८।। वेदवेदांगविद्विप्रैर्धर्मशास्त्रानुपालकैः । प्रस्थाद्वात्रिंशतिनो णः स्मृतोद्विप्रस्थाढकः ॥ ६९ ॥ ततो द्रोणाढकस्यान्नं श्रुतिस्मृति विदोविदुः । काकश्वानावलीढं तु गवाघ्रातं खरेण वा॥७०॥ स्वल्पमन्नं त्यजेद्विप्रःशुद्धिोणाढके भवेत् ॥ अन्नस्योद्धृत्य तन्मानं यच्चलाला हतंभवेत्॥७॥सुवर्णोदक मभ्युक्ष्यहुताशेनैवतापयेत् हुताशननेसंस्पृष्टसुवर्णसलिलेनच निषिद्ध हैं और उनकी शुद्धि ॥ ६६ ॥ जिसप्रकार पराशर जी ने कही है उसी प्रकार मैं तुम्हारे प्रति कहाताहूं । जो द्रोण और आढ़कभर शृतअन्न ( द्रवपक्वान्न जैसाकि खीर इत्यादि ) को काक वा श्वना ने दूषित किया हो तो ।। ६७ ॥ उस अन्नको ब्राह्मणोंके निवेदन करके उनसे पूछे कि यह अन्न किस प्रकार शुद्धहोगा जो शुद्धिवे वतलाबें बही शुद्धि उस अन्न की करै । जो द्रोण भर अन्न को काक वा श्वानने चाटा हो तो उस अन्न कास्याग नहीकरै किन्तु ब्राह्मग उसकी जैसी शुद्धिवतलावें वैसी शुद्धि करले ॥६८॥ बेद और वेदांगके जाननेवाले और धर्म शास्त्र के अनुकूल आचरण करने बाले ब्राह्मणों ने कहा है किवत्तीस प्रस्थका एकद्रोण होताहै,और दो प्रस्थका आढक कहाजाता है॥६९॥द्रोण और आढकभर अन्नको जो काक वा श्वानने चाटाहो अथवा गौ वा गधेनेसूंघा होतो ॥७०॥ उसमें से किनिन्मात्र अन्नको त्याग करदेनेसे शुद्वि होजाती है, ऐसा श्रुति और स्मृति के जाननेवालोने कहा है ॥ जितने अन्नमें उसकी राल टपकी हो उतने अन्नको निकाल कर शेषको ॥ ७१ ॥ सुवर्णके जलसे छिड़ककर अग्निसे तप्त करै । क्योंकि- अग्नि से सन्तप्त करने से, सुवर्णका जल छिड़कनेसे और ब्राह्मणोंके वेदो- स्चारण करनेसे वोह अन्नभक्षण करने के योग्य होजाता है । घृतादिक स्नेह १-आउ तोलेकी ? प्रसूति और ६४ प्रसूतिका १ आडक होता हैं।

लघुपाराशरी।
भा०टी०
॥ ७२॥विप्राणां ब्रह्मघोषेण भोज्यं भवति तत्क्षणात्॥ स्ने-
हो वा गोर सो वापि तत्रशुद्धिः कथंभवेत् ॥ ७३ ॥ अल्पं
परित्यजेत्तत्र स्नेहस्योत्मवनेनच ॥ अनलज्वालया शुद्धि
गोरसस्य विधीयते ॥ ७४ ।।
इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे षष्ठोऽध्यायः॥६॥
अथातोद्रव्यशुद्धिस्तु पराशरवचोयथा । दारवाणान्तु
पात्राणांतक्षणात् शुद्धिरिष्यते ॥ १॥ मार्जनाद्यज्ञपात्राणां
पाणिनायज्ञकर्माण ॥ चमसानांनुवाणां च शुद्धिरुष्णेनवा-
रिणा ॥ २ ॥ भस्मनाशुद्ध्यते कास्यंताम्रमम्लेन शुद्धयति।
रजसाशुद्धयतेनारी विकलंयानगच्छति॥नदीवेगेनशुद्धयेत
लेपोयदि न दृश्यते ॥ ३ ॥ वापीकूपतड़ागेषुदूषितेषुकथं
चन ॥ उद्धृत्यवैकुम्भशतंपंचगव्येनशुद्धयति ॥ ४ ॥ अष्ट
अत्रवा गोरस ( दुग्धादिक ) यदि अशुद्ध होगये हों तो उनकी शुद्धि किस
प्रकार होती है ॥ ७२ ॥ ७३ ॥ उसमेंस थोडासा निकाल कर स्नेहादिक
को उछाल कर शुद्ध करै और गोरसको तप्त करके शुद्ध करले ॥ ७४ ॥
इतिश्री पाराशरीये धर्मशास्त्रे भाषाटीकायां षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
अब इसके अनन्तर द्रव्यों की शुद्धि जिसप्रकार पराशरजीने कही है
वर्णन करते हैं । काष्ठ के पात्रों की शुद्धि उनको छी डालनेसे होजाती
है ॥ १ ॥ और यज्ञ के कर्म में यज्ञपात्रोंकी शुद्धि हाथसे मार्जन करदेने से
होती है । तथा चमस और नुकी शुद्धि उष्ण जलसे होती है ॥ २ ॥
कांसी के पात्र भस्म से और तापू पात्र खटाई से शुद्ध होते हैं । जो स्त्री नीच
जाति से संगै न करै तौरनो वती होकर शुद्ध होजाती है। और यदि नदी
में किसी अशुद्ध वस्तु का लेपन होयतो वोह वेग अर्थात्-प्रवाहसे शुद्ध
होती है ॥ ३ ॥ वापी कूप तथा तड़ागादिक किसी प्रकार से अशुद्ध
होगयेहों तो उनमेंसे सौघडे जल निकालकरपंचगब्यसे शुद्ध होते हैं ॥ ४ ॥

.. विशिष्टधर्म शास्त्र । वर्षा भवेगौरी नववर्षा च रोहिणी । दशवर्षाभवेत्कन्या अत ऊर्ध्व रजस्वला ॥ ५॥ प्राप्ते तु द्वादशेवर्षे यः कन्यां न प्रय- च्छति ।मासि मासि रजरतस्याः पिवन्ति पितरोऽनिशम् ॥ ॥ माताचैव पिताचैव ज्येष्ठोधाता तथैव च । त्रयस्तेनरकं यान्ति दृष्ट्वाकन्यां रजस्वलाम ॥७॥ यस्तांसमुद्हेत्कन्यां ब्राह्मणो मदमोहितः। असंभाष्यो ह्यपांक्तेयः सविप्रोवृषली पतिः॥८॥ यः करोत्येकरात्रेण वृषलीसेवनं हिजः। सभक्ष्य भुग्जपन्नित्यं त्रिभिवविशुद्ध्यति ॥ ६॥ अस्तंगतेयदा सूर्ये चाण्डालं पतितस्त्रियम् । सूतिकांस्पृशतेचैव कथंशुद्धिर्वि- धीयते ॥ १०॥ जातवेदं सुवर्ण च सोममार्गविलोक्य च । ब्राह्मणानुमतश्चैव स्नानं कृत्वाविशुद्ध्यति॥११॥स्पृष्ट्वा रज- स्वलान्योन्यंब्राह्मणीब्राह्मणी तथा।तावत्तिष्ठन्निराहारात्रिरा- आठ वर्षकी कन्या को गौरी और नौ वर्षकी को रोहिणी कहते हैं और दश वर्षकी कन्या कहलाती है उसके उपरांत रजस्वला होती है ॥ ५ ॥ जो पुरुष वारहवें वर्ष तक कन्यादान नहीं करता तो उसके पितर प्रत्येक मासमें उस कन्याके रजका पान करते हैं ॥ ६ ॥ रजस्वला कन्याको देखकर माता पिता और बड़ा भ्राता ये तीनों नरकको प्राप्त होते हैं ॥ ७ ॥ जो ब्राह्मग अज्ञानसे उस कन्याको विवाहै उससे संभाषण करना योग्य नहीं वह वृषलीपति कहाता है अतएव पंक्तिसे बाहर करने योग्य है ॥८॥ यदि कोई ब्राह्मण एक रात्रिभी बृपलीका सेवनकर तौ भिक्षान्नभोजन और गायत्री मंत्रका जप करता हुआ तीनवर्ष में शुद्ध होता है ॥ ९ ॥ (प्र०) जो ब्राह्मण सूर्य अस्त होने के अनंतर चांडाल पतित ( अपने कर्मोंको छोड़कर अन्य जातिका कर्म करनेवाला ) वा मृतिका स्त्रीका स्पर्श करै तौ किसप्रकार शुद्ध होता है।।१०॥ (उ०) ब्राह्मणकी आज्ञासे स्नान करके तदनंतर अग्नि सुवर्ण और चन्द्रमाका दर्शन करें यदि उस समय चन्द्रोदय न हुआ हो तौ जिस दिशामें चन्द्रमा हो उस दिशाका दर्शन करै ॥ ११ ॥ जो दो रजखला ६ ४२ लघुपाराशरी। भा०टी० त्रेणैवशुद्ध्यति ॥१२॥ स्पृष्ट्वारजस्वलान्योन्यब्राह्मणीक्षत्रिया तथा।अर्द्धकृच्छूचरेत्पूर्वी पादमेकं त्वनन्तरा ॥१३॥ स्पृष्ट्वा रजस्वलान्योन्यं ब्राह्मणी वैश्यजा तथा । पादहीनं चरेत्पूर्वा पादमेकमनन्तरा ॥१४॥ स्पृष्ट्वा रजस्वलान्योन्यं ब्राह्मणी शूद्रजा तथा । कृच्छ्रेण शुद्ध्यते पूर्वा शूद्रा दानेन शुद्ध्य ति॥ १५ ॥ स्नाता रजस्वलायातु चतुर्थेऽहनि शुद्ध्यति । कुर्याद्रजोनिवृत्तौतु दैवपित्र्यादिकर्म च ॥ १६ ॥ रोगेणय- द्रजः स्त्रीणामन्वहंतु प्रवर्त्तते ।नाशुचिः सा ततस्तेन यस्मा द्वैकारिकं मतम् ॥ १७॥ साध्वाचारा न तावत् स्याद्रजो यावत्प्रवर्तते । रजोनिवृत्तौ गम्या स्त्री गृहकर्मणि चैव हि ॥ १८ ॥ प्रथमेहनि चाण्डाली द्वितीये ब्रह्मघातिनी । तृती- ये रजकी प्रोक्ता चतुर्थेऽहनि शुद्ध्यति ॥१६॥ आतुरे स्ना. ब्राह्मणी परस्पर स्पर्श करें तौ प्रत्येक तीनदिन व्रत करनेसे शुद्ध होती है ॥१२॥ यदि ब्राह्मणी और क्षत्रिया रजस्वला होकर परस्पर ( आपस में ) एक दूसरीको स्पर्श करलेय तौ ब्राह्मणी अर्द्धकृच्छ्र और क्षत्रिया चतुर्थांश (चौथाई कुच्छू करकै शुद्ध होती है ॥१३॥ यदि ब्राह्मगी और वैश्यकी पुत्री रजस्वला होकर परस्पर एक दूसरीको स्पर्श करलेय तौ बाह्मणी पादोन (पौन ) कुच्छ व्रत करकै और वैश्यपुत्री चौथाई कृच्छ्रव्रत करकै शुद्ध होतीहै ॥ १४ ॥ याद ब्राह्मणी और शूद्रपुत्री रजस्वला होकर परस्पर एक दूसरीको स्पर्श करलेय तौ ब्राह्मणी पूर्ण कृच्छ्वत करके और शूद्रपुत्री दान करके शुद्ध होतीहै ॥१५॥ रजस्वला चौथे दिन स्नान करकै शुद्ध होती है और रजकी निवृत्ति (रुकावट) होनेपर देवकर्म तथा पितृकर्म करै ॥ १६ ॥ रोगके कारण जिस स्त्रीके प्रति दिन रजःस्राव ( रजकानिकलना ) होय वह स्त्री उस रजसे अपवित्र नहीं होती है क्योंकि वह रज विकारका है ॥ १७ ॥ जवतक रजकी प्रवृत्ति रहती तबतक स्त्री सत्कर्ममें अधिकारिणी नहीं होती है, और पति के सहवास योग्य तथा गृहके कार्य करनेके योग्य भी नहीं होती है ॥ १८ ॥ स्त्री रजस्वला होने पर प्रथमदिन चाण्डाली सदृश, द्वितीयुदिन ब्रह्महत्यारीकी सदृश,तृतीय दिन रजकी ( धोविन ) की सदृश और चौथेदिन शुद्ध होजातीहै ॥ १९ ॥ ७ विशिष्टधर्म शास्त्र। अ०७ न उत्पन्ने दशाकृत्वो ह्यनातुरः । स्नात्वा स्नात्वा स्पृशेदेनं ततः शुद्ध्येत् स आतुरः ॥२०॥ उच्छिष्टोच्छिष्टसंस्पृष्टःशुना शूद्रेण वा द्विजः । ऊपोष्य रजनीमेकां पंचगव्येन शुद्ध्य ति ॥ २१ ॥ अनुच्छिष्टेन शूद्रेण स्पर्श स्नान विधीयते । ते- नोच्छिष्टेन संस्पृष्टः प्राजापत्यं समाचरेत् ॥ २२ ॥ भस्मना शुध्यते कांस्यं सुरया यन्न लिप्यते । सुरामात्रेण संस्पृष्टं शुध्यतेऽग्न्युपलेपनैः ॥ २३ ॥ गवा घातानि कांस्यानि श्व- काकोपहतानि च । शुद्ध्यन्ति दशभिः क्षारैः शूद्रोच्छिष्टा- नि यानि च ॥ २४॥ गण्डूपपादशौचं च कृत्वा वै कांस्यभा जने। षण्मासान् भुविनिक्षिप्य उद्धृत्य पुनराहरेत् ॥२५॥ आयसेष्वपसारेण सीसस्याग्नौ विशोधनम् । दन्तमस्थित- रोगयुक्त स्त्री रजस्वला होजाय और यदि रुग्ण अवस्था में ही उसके स्नान का दिन आजाय तो कोई नीरोग व्यक्ति क्रमसे दशबार स्नान कर २ कै उसको स्पर्श करै तब वह रोगयुक्त स्त्री शुद्ध होजाती है ।। २० ।। यदि किसी उच्छिष्ट (जूठेमुख ) शूद्र अथवा श्वानसे स्पर्श करकै कोई पुरुष किसी ब्रा- ह्मणको स्पर्श करलेय तौ वह ब्राह्मण एकरात्रि उपवास करनेके अनन्तर पञ्चगव्य भक्षण करकै शुद्ध होताहै ॥ २१ ॥ अनुच्छिष्ट शूद्रके स्पर्श होजाने पर ब्राह्मणको स्नान करनेका विधान हैं और यदि कोई उच्छिष्ट शूद्र स्पर्श करलेय तौ प्राजापत्य व्रत करै ॥ २२ ॥ जिस कांसीके पात्र में मदिराका स्पर्श न हुआ हो वह भस्मसे ( राखसे मांजने पर) शुद्ध होजाता है और यदि मदिराका स्पर्शमात्रभी होगया होय तौ वार २ अग्निडाल कर मांजने से शुद्ध होता है ॥ २३ ॥ गौओं करकै सूघेहुए, काकके चोंचलगाएहुए और श्वान करके चाटे हुए तथा शूद्र के उच्छिष्ट [ जूठे ] करेहुए कांसीके पात्र दशवार खटाई आदिक्षार पदार्थसे रगड़कर धोनेसे शुद्ध होते हैं ॥२४॥ यदि किसी कांसीके पात्रमें गण्डूष [ कुल्ला ] कराहोय या पैर धोये होय तो उस पात्रको छःमास पर्यंत पृथ्वीमें गड़ा रक्खै और तदनन्तर उखाड़ कर व्यवहार में लावै ।। २५ ॥ लोहपात्रको दूर कर देनेसे और सीसेके लघुपाराशरी । भाटी था शृंगंरौप्यं सौवर्णभाजनम् ॥ २६ ॥ मणिपात्राणि शंख- श्चेत्येतान् प्रक्षालयेज्जलैः । पाषाणे तु पुनर्वृष्टिरेषा शुद्धि- रुदाहृता ॥ २७॥ मृण्मये दहनाच्छुद्धिर्धान्यानां मार्जनाद- पि ॥ २८ ॥ अद्भिस्तु प्रोक्षणं शौचं वहूनां धान्यवाससा म्॥प्रक्षालनेन त्वल्पानामद्भिः शौचविधीयते॥२६॥वेणुवल्क लचीराणांक्षीमकापासवाससामाऔर्णनेत्रपटानांच प्रोक्षणा च्छुद्धिरिष्यते।३०)मुंजोपस्करशूर्पाणांशणस्यफलचर्मणामातृण काष्ठादिरज्जूनामुदकाभ्युक्षणंमतम्॥३१॥ तूलिकाद्युपधानानि रक्तवस्त्रादिकानि च।शोषयित्वार्कतापेनप्रोक्षणाच्छुद्धतामि- युः ॥ ३२ ॥ मार्जारमक्षिकाकीटपतंगकृमिदर्दुराः। मेध्या- मेध्यं स्पृशन्त्येव नोच्छिष्टान्मनुरवीत् ॥३३॥ महीस्पृष्ट- पात्रको अग्नि में तपाने से तथा दांत अस्थि, सींग, चांदी, सुवर्ण, मणि और पत्थरके पात्र एवं शंखके जलसे धोलेने पर शुद्धि होजाती है और पाषाण के पात्रको जलसे धोनेके अनन्तर मांजभी लेना चाहिये, ऐसा करने पर ही शास्त्रमें उसकी शुद्धिकही है ॥२६॥२७॥ मृत्तिकाके पात्रको जलानेसे और धान्योंकी मलकर धोनेसे शुद्धि होती है (अथवा परित्याग करदेना चाहिये) ॥ २८ ॥ बहुतसे धान्य और वस्त्रोंकी जल छिडकलैने मात्रसे शुद्धि होतीहै आरै थोडे धान्य तथा वन्च होयँ तो उनकी धोनेसे शुद्धि होती है ॥२९॥ बाँस, बल्कल ( भोजपनादि ) , फटे वस्त्र, रेशमीवस्त्र, सूतीवस्त्र ऊनीवस्त्र, और नेत्रपट 'सनके वस्त्र , की प्रक्षालन करने से शुद्धि होती है ॥ ३० ॥ मूंज, उपस्कर ( शिल-बटनी-ऊबली आदि ), शूर्प ( छाज ) सन,फल, चर्म, तृण, काठ, रस्सी इनकी जल छिडकनेसे शुद्धि होती है ॥ ३१ ॥ तोसक तकिया आदि शय्याकी सामग्री लालवस्त्र आदि धूप में सुखाकर जल छिडकनेसे शुद्ध होजाते हैं ॥३२॥ विडाल मतिका कीट, पतंग, कीडे और मेंडक, यह सब सदा शुद्ध अशुद्ध बस्तुओं का स्पर्श करते हैं, इस कारण इनके स्पर्शसे कोई वस्तु अपवित्र नहीं होती है, ऐसा मनुजीका मतहै ॥ ३३ ॥ जो जल पृथ्वीको स्पर्श करकै अन्यत्र क अ०७ विशिष्टधर्म शास्त्र । वा गतं तोयं यश्चाप्यन्योन्यविनुषः । भुक्तोच्छिष्ट तथा स्नेहं नोच्छिष्टं मनुरवीत् ॥३४॥ ताम्बूलेक्षुफले चैव भुक्त स्नेहानुलेपने । मधुपर्के च सोमे च नोच्छिष्टं मनुरवीत् ॥ ३५ रथ्याकर्दमतोयानि नावः पन्थास्तृणानि च । मारु- तार्केणशुद्ध्यन्ति पक्केष्टकचितानि च ॥ ३६ ॥ अदुष्टाः सन्त- ता धारा वातोद्भूताश्च रेणवः । स्त्रियोवृद्धाश्च बालाश्च न दुष्यन्ति कदाचन ॥ ३७ ॥ चुते निष्ठीवने चैव दन्तोच्छिष्टे तथानृते । पतितानां च संभाषे दक्षिणं श्रवणं स्पृशेत् ॥३८॥ अग्निरापश्च वेदाश्च सोमसूर्यानिलास्तथा । एतेसर्वेऽपि विप्राणां श्रोत्रे तिष्ठन्ति दक्षिणे ॥३९॥ प्रभासादीनि ती- र्थानि गंगाद्याः सरितस्तथा। विप्रस्य दक्षिणे कर्णे सान्नि- ध्यं मनुरब्रवीत् ॥ ४० ॥ देशभंगे प्रवासे वा व्याधिषु व्य- जलमें मिल गयाहै और जोएकसे उछटकर अन्यके ऊपर गईहुई छीटें हैं यदि भुक्तोच्छिष्ट(भोजन करकैजूठा वचाहुआ) होयतौभी अपवित्र नहीं होता है इसी प्रकार भुक्तोच्छिष्ट तेल भी अशुद्ध नहीं होता है ऐसामनुजी कामत है ॥३४॥ ताम्बूल, इक्षुफल [ गन्ना] , जिसमें से कुछ कार्यमें लायागया है ऐसा तैल और अनुलेपन ( चन्दनादि ) मधुपर्क तथा सोमरस में उतिष्टता नहीं होती है ऐसा मनुजीका कथन है ॥ ३५ ॥ रथ्या [ गली-मार्गआदि ] की कींच और जल, नाव, मार्ग और तृण तथा और पक्की ईटोंकी चिनाई यह सब वायु और सूर्य के संयोग से शुद्ध होते हैं ॥ ३६॥ चारोंओर फैली हुई जलकी निर्मल धारा और बायुसे आकाशमें उड़ाई हुई धूलि, वृद्ध स्त्री और वालक यह कदापि दूषित (अपवित्र) नहीं होते हैं।॥ ३७॥ छींकलैने पर, थूकनेपर, दांतोंसे किसीअंगके उच्छिष्टहोजानेपर, असत्य बोलने पर और पतितोंके साथ भाषण करनेपर दाहिनकर्णका स्पर्श करै, क्योंकि अग्नि, जल, वेद, चन्द्रमा, सूर्य, वायु यह सब ब्राह्मणोंके दाहिने कर्ण में स्थित रहते हैं ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ प्रभास आदि तीर्थ, और गंगा आदि नदियें ब्राह्मणके दक्षिण कर्णमें निवास करती हैं, ऐसा मनुजीका कथन ॥ ४० ॥ देशका नाश होनेके समय, परदेशमें रोगयुक्त होनेपर और , लघुपाराशरी। भा०टी० सनेष्वपि । रक्षेदेव स्वदेहादि पश्चाद्धर्म समाचरेत् ॥४१॥ येन केन च धर्मेण मृदुना दारुणेन वा । उद्धरेदीनमात्मानं समर्थो धर्ममाचरेत् ॥४२॥ आपत्कालेतु सम्प्राप्ते शौचाचरं नचिन्तयेत्।आत्मानमुद्धरेत्पश्चात्स्वस्थोधर्मसमाचरेत्॥४३॥ इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे सप्तमोऽध्यायः ॥७॥ गवां बन्धनयोक्तेषु भवेन्मृत्युरकामतः । अकामात्कृत- पापस्य प्रायश्चित्तं कथं भवेत् ॥१॥ वेदवेदांगविदुषां धर्म- शास्त्रं विजानताम् । स्वकर्मरतविप्राणां स्वकं पापं निवेदयेत् ॥२॥ अत ऊर्व प्रवक्ष्यामि उपस्थानस्य लक्षणम् । उप- स्थितो हि न्यायेन व्रतादेशनमर्हति ॥३॥ सद्यो निःशंसये आपत्तियोंके समय प्रथम सब प्रकार से अपने शरीर की रक्षा करै तदन- न्तर धर्माचरण करै ॥ ४१ ॥ अपने ऊपर आपत्ति आनेपर कोमल बा कठोर जिस किसी उपायसे भी होसकै प्रथम अपने दीन (आपत्ति ग्रस्त ) आत्मा का उद्धार करै, तदनन्तर समर्थ होकर धर्माचरण करै ॥ ४२ ॥ आपत्तिकाल के प्राप्त होनेपर शौचाचार का विचार न करै, प्रथम अपना उद्धार करें तदनन्तर स्वस्थ होकर धर्माचरण करै ॥ ४३ ॥ इतिश्रीपाराशरीये धर्मशास्त्रे भाषाटीकायां सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ यदि कोई गौ (वैल-या-गैया) वाँधनेके खूटेमें बंधी हुई (किसीप्रकार की अज्ञात पीडाको पाकर ) अकामतः मरणको प्राप्त होजाय तो तिस अकामकृत पापका प्रायश्चित्त किसप्रकार होना उचित है ? ॥ १ ॥ वेद वेदांग के जानने वाले, धर्मशास्त्र के पारदर्शी, सदायाग यज्ञ औ याजन ( यज्ञ कराना ) आदि अपने कर्ममें तत्पर ब्राह्मणोंसे अपना पाप कहै ॥ २ ॥ यहांसे आगै, वह पापी पुरुष धर्मज्ञ ब्राह्मण के पास किसप्रकार जाय सो कहते हैं-न्यायमार्गसे अपने पास आये हुए पापी को ब्राह्मण बत की आज्ञा दें ॥ ३ ॥ यदि पाप का निश्चय होजाय तो धर्मज्ञ ब्राह्मणों , विशिष्ट धर्मशास्त्र। पापे न भुंजीतानुपस्थितः । भुंजानो वईयेत्पापं पर्षयत्र न विद्यते ॥ ४ ॥ शंसये तु न भोक्तव्यं यावत्कार्यविनिश्चयः। प्रमादस्तु न कर्तव्यो यथैवाशंसयस्तथा ॥ ५ ॥ कृत्वा पापं न गृहेत गुह्यमानं विबर्द्धते । स्वल्पं वाथ प्रभूतं वा धर्मवि- दभ्योनिवेदयेत् ॥ ६॥ ते हि पापकृतां वैद्या हन्तारश्चैव पा- प्मनाम् । व्याधितस्य यथा वैद्या बुद्धिमन्तो रुजापहाः॥७॥ प्रायश्चित्ते समुत्पन्ने ह्रीमान् सत्यपराणः। मुहुरार्जवसम्पन्नः शुद्धिं गच्छेत मानवः ॥८॥ सचैलं वाग्यतःस्नात्वा क्लिन्न- वासाः समाहितः । क्षत्रियो वाथ वैश्यो वा ततः पर्षदमा- ब्रजेत् ॥६॥ उपस्थाय ततःशीघ्रमातिमान् धरणी ब्रजेत् । गात्रैश्च शिरसा चैव न च किंचिदुदाहरेत् ॥ १०॥ सावि. व्याश्चैव गायत्र्याः सन्ध्योपास्त्यग्निकार्ययोः । अज्ञानात्कृषि- के अर्थ उस पाप को विना निवेदन करे भोजन न करै यदि परिषत् (धर्मज्ञ ब्राह्मणोंकी मण्डली) के समीपविनाजाय भोजन करलेय तौपाप की बृद्धि होती है॥४॥ यदि पापमें संदेहहोय तौ जबतक निश्चय न होजाय तबतक भोजन नकरै, और जबतक निश्चय न होय तबतक असावधानभी नही रहना चाहिये ॥५॥ कियाहुआ पाप थोड़ा हो चाहें अधिक हो उसको कदापि छिपा नहीं किन्तु धर्मज्ञ ब्राह्मणों से निवेदन करदेय, क्योंकि-छिपानेसे पापकी वृद्धि होती है ॥ ६॥ जिस प्रकार बुद्धिमान् वैद्य रोगीपुरुषके रोगको नष्ट कर- देता है तिसी प्रकार योग्यपुरुषके अर्थ अपना पाप निवेदन करनेपर वह उस पापको नष्ट करदेता है ।। ७ ॥ ( परिषद् की आज्ञाके अनुसार ) पाप करनेवालेका उचित प्रायश्चित्त होजानेपर (पापकी दारुण ) लज्जासे युक्त सत्यत्रत परायण, सरलस्वभाव पुरुष शुद्धि को प्राप्त होता है ।। ८ ।। क्ष- त्रिय हो चाहें वैश्य हो, पापका संसर्ग होतेही मौन धारण करकै वस्त्रौंसहित स्नान करै और तिस गीले वस्त्रको पहिनेहुएही मावधानतासे परिषद्के पासजाय ॥ ९ ॥ जहांतक होसकै शीघ्रताके साथ परिषदके समीप जाकर विनयपूर्वक शिर और शरीरसे पृथ्वी में प्राप्त होय अर्थात् साष्टांग प्रणाम करै और कुछ कहै नहीं ॥ १० ॥ जो वेद और गायत्री को नहीं जानते ४८ लघुपाराशरी। भा०टी० कारो बाह्मणा नामधारकाः ॥ ११ ॥ अवतानाममंत्राणां जातिमात्रोपजीविनाम् । सहस्रशः समेतानां परिषत्वं न विद्यते ॥ १२ ॥ यद्वन्ति तमोमूढाः मूर्खाधर्ममतहिदः । तत्पापं शतधा भूत्वा तद्वक्तुरधिगच्छति ॥ १३ ॥ अ- ज्ञात्वा धर्मशास्त्राणि प्रायश्चित्तं ददाति यः । प्रायश्चित्ती भवेत्वृतः किल्विषं परिषद्रजेत् ॥ १४ ॥ चत्वारो वा त्रयो वापि यं ब्रयुर्वेदपारगाः । स धर्म इति विज्ञेयो नेतरैस्तु सह स्त्रशः॥ १५॥ प्रमाणमार्ग मार्गन्तो ये धर्म प्रवदन्ति वै तेषामुद्विजते पापं सद्भूतगुणवादिनाम् ॥ १६ ॥ यथाश्मनि स्थितं तोय मारुतार्केण शुद्ध्यति । एवं परिषदादेशान्नाशये देव दुष्कृतम् ॥ १७॥ नैव गच्छति कतारं नैव गच्छति परि- पदम् । मारुतार्कादिसंयोगात्पापं नश्यति तोयवत् ॥ १८ ॥ हैं, सन्ध्योपासना और अग्निमें आहुतिदान नहीं करते हैं । सदा केवल खेती का कार्य करनेमेही तत्पर रहते हैं वह नाममात्रके ब्राह्मण हैं॥ ११॥ व्रत मन्त्रसे रहित और जाति के नाममात्रसे जीविका करनेवाले जो वा- मण हैं वह सहस्रों इकट्ठे हों तो भी परिषद नहीं कहासक्तीहै ।। १२॥ अज्ञानरूप अंधकारसे मूढ धर्मशास्त्रके न जाननेवाले मूर्खवाह्मण प्रायचित्तकी व्यवस्थादें तो पापी पापसे छूटजाता है परंतु वह पाप सौगुना होकर ब्यवस्था दैनेवालोंके शरीरमें प्रवेश कराते हैं ॥१३ ॥ जो धर्मशास्त्रको न जानकर प्रायश्चित्तकी व्यवस्था देते हैं, पापी पुरुष तौ उस ब्यवस्था के अनुसार शुद्ध होता है परन्तु वह पाप व्यवथा देने वाली उस परिषद् के शरीरमें प्रवेशकरता है ॥१४॥ चार अथवा तीन वेदवेत्ता ब्राह्मण जो व्यवस्था देते हैं वहही धर्म है अन्य सहस्रों पुरुषोंका वाक्यभी धर्म नहीं होसक्ता ॥ १५ ॥ प्रमाणके मार्गको ढूँढते हुए जो धर्म शास्त्र की व्यवस्था देते हैं, उनसे पाप भय मानता है और वहही वास्तविक धर्मके कहनेवाले हैं ॥ १६ ॥ जिस प्रकार शिला पैस्थित जल वायु और सूर्यके द्वारा सूख जाताहै तिसीप्रकार परिषद्की आज्ञा [ ब्यवस्था ] से पापोंका समूह नाशको प्राप्तहोता है॥ १७। वायु और सूर्यके संयोगसे सूखे हुये जलकी समान पाप नष्ट होजाते हैं और न वह पापकर्ताके

अ.८
४९
विशिष्टधर्म शास्त्र।
चत्वारो वा त्रयो वापि वेदवन्तोऽग्निहोत्रिणः । ब्राह्मणानां
समर्था ये परिषत्सा विधीयते ॥१९॥ अनाहिताग्नयो येऽन्ये
वेदवेदाङ्गपारगाः। पंच त्रयो वा धर्मज्ञाः परिषत् सा प्रकीर्ति-
ता ॥ २० ॥ मुनीनामात्मविद्यानां द्विजानांयज्ञयाजिनाम्।
वेदवतेषु स्नातानामेकोऽपि परिषद्भवेत्॥२१॥ पंचपूर्व मया
प्रोक्तास्तेषां चासंभवे त्रयः । स्ववृत्तिपरितुष्टा ये परिषत्सा
प्रकीर्तिता ॥ २२ ॥ अत ऊर्ध्व तु ये विप्राः केवलं नामधार-
काः । परिषत्वं न तेष्वस्ति सहस्रगुणितेष्वपि ॥ २३ ॥ य-
था काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः । ब्राह्मणास्त्वनधी-
यानस्त्रयस्ते नामधारकाः ॥ २४ ॥ ग्रामस्थानं यथा शून्य
यथा कूपस्तु निर्जलः। यश हुतमनग्नौ च अमन्त्रो ब्राह्मण-
स्तथा ॥२५॥ यथा षंडोऽफलः स्त्रीषु यथा गौरुषराफला। यथा
शरीर में रहते हैं न परिषद्के शरीर में प्रवेशकरते हैं।॥१८॥वेदज्ञ,अग्निहोत्र करने-
वाले ब्राह्मगोंमें समर्थ पांच वा तीन पुरुषों की परिषद कहाती है॥ १९ ॥ वेद
वेदांगके पारगामी जो धर्मज्ञ ब्राह्मण आहिताग्नि (अग्निहोत्र करनेवाले ) नहीं
हैं, ऐसे पांच वा तीन पुरुषोंके समूहको परिषद् कहते हैं ॥२०॥ ध्यान धारणादि
के द्वारा आत्मतत्वको जाननेवाले मुनि, यज्ञ करनेवाले और देवताओं-
के व्रत करनेवाले तथा स्नातक [ वेदाध्ययनके अनन्तर समावर्तका अंग-
रूप स्नान करनेवाला ] इनमेंसे एक पुरुषभी परिषद् होसक्ता है ॥२१॥
पर कहचुके हैं कि-पांच ब्राह्म गोंकी परिषद् होतीहै, परन्तु वेदज्ञ पांच
ब्राह्मण न मिलैं तो शास्त्रोक्त निजवृत्तिमें सन्तुष्ट तीन ब्राह्मणोंकी भी परिषद्
होसक्ती है ।। २२ ॥ इनके सिवाय जो केवल नाममात्र ब्राह्मण हैं ( वेदज्ञ
नहीं हैं) वह सहस्रों हों तौभी परिषद् नहीं होसक्ती ॥२३॥ जैसा काठका
हस्ती, जैसा चर्म रचित मृग, वेदको न जाननेवाला ब्राह्मण भी तैसाही है,
यह तीनों केवल नाममात्र धारण करनेवाले हैं ॥ २४ ॥ जैसा शून्य ग्राम,
जैसा निर्जल कूप, और जैप्सा अग्निरहित भस्मके ढेरमें हवन करना नि-
फल है, तैसेही वेदमन्त्रों को न जाननेवाला वाह्मण भी निष्फलहै ॥ २५॥

.. लघुपाराशरी। भा०टी० चाज्ञे फलं दानं तथा विप्रोऽनृचोऽफलः॥२६॥ चित्रं कर्म यथा नेकैरंगैरुन्मील्यते शनैः। बाह्मण्यमपि तद्वत्स्यात्संस्कारैर्विधि पूर्वकैः ॥ २७॥ प्रायश्चित्तं प्रयच्छन्ति ये द्विजा नामधारकाः। ते हिजाः पापकर्माणःसमेता नरकं ययुः ॥ २८ ॥ ये पठन्ति द्विजा वेदं पञ्चयज्ञरताश्च ये। त्रैलोक्यं धारयन्त्येते पञ्चे- न्द्रियरताश्रयाः ॥ २६ ॥ संप्रणीतः श्मशानेषु दीप्तोऽग्निः सर्वभक्षकः । तथैव ज्ञानवान् विप्रः सर्वभक्षोऽपि दैवतम् ॥३०॥ अमेध्यानि च सर्वाणि प्रक्षिपन्त्युदके यथा। तथैव किल्विषं सर्व प्रक्षेतव्यं द्विजेऽमले ॥३१॥ गायत्री रहितो विप्रः शूद्रादप्यशुचिर्भवेत् । गायत्री ब्रह्मतत्वज्ञाःसंपूज्यन्ते द्विजोत्तमाः॥३२॥ दुःशीलोऽपि द्विजःपूज्यो न शूद्रो विजिते- जैसे नपुंसकका स्त्री संभोग निष्फल होता है, जैसे ऊपरभूमि निष्फल है और जैसे मूर्खको दानदेना निष्फल है तैसेही वेदमंत्रोंको न जाननेवाला ब्राह्मण निषद्ध है ॥ २६ ॥ जिसप्रकार चित्रकारीका काम बहुतसे अंग- प्रत्यंगोंके गठनसे क्रम करके उन्मीलित होता है तिसीप्रकार विधिपूर्वक करेहुए गर्भाधानादि संस्कारोंसे ब्राह्मणत्व प्रकाशित होता है ॥ २७ ॥ जो नाममात्रके ब्राह्मण प्रायश्चित्तकी व्यवस्था देते हैं वह पापकर्मी हैं और सब नरकगतिको पाते हैं ॥ २८ ॥ जो ब्राह्मण वेद पढ़ते हैं और जो पञ्चयज्ञ करनेमें तत्पर रहते हैं वहही त्रिलोकीको धारण करते हैं और पञ्चेन्द्रिय परायण मनुष्योंके आश्रय हैं ॥ २९ ॥ जिस प्रकार मंत्रोंसे संस्कार किया हुआ अग्नि श्मशानमें सर्वभोक्ता है तिसी प्रकार ब्रह्मज्ञानके द्वारा संस्कार- को प्राप्तहुआ ब्राह्मण सर्वभुक् और देवरूप होता हैं ॥ ३० ॥ जिसप्रकार संपूर्ण अपवित्र पदार्थ जल में डालेजाते हैं तिसीप्रकार संपूर्ण पापोंको निर्मल ब्राह्मणमें डालै ॥३१॥ गायत्री रहित ब्राह्मण शूद्र की अपेक्षाभी अपवित्र है, गायत्री और ब्रह्मतत्वज्ञ ब्राह्मण श्रेष्ठ और पूजनीय है ।। ३२॥ ब्राह्मण दुःशील होय तो भी उसकाही पूजन करै, शूद्र जितेदिय होय तो भी उसका पूजन न करै, कौन पुरुष दूषित अंग गौको त्यागकर मुशीला गर्दभी [ गधैया ] विशिष्टधर्म शास्त्र। न्द्रियः । कः परित्यज्य दुष्टांगां दुहेच्छीलवतीं खरीम् ॥३३॥ धर्मशास्त्ररथारूढा वेदखड्गधरा द्विजाः।क्रीडार्थमपि यद्युः स धर्मः परमः स्मृतः॥३॥चातुर्वेद्योऽविकल्पी च अङ्गविद्ध- मपाठकः। त्रयश्चाश्रमिणो मुख्या परिषदेषा दशावरा ॥३५॥ राज्ञांचानुमते चैव प्रायश्चित्तं द्विजो वदेत् । स्वयमेव न वक्तव्या प्रायश्चित्तस्य निष्कृतिः ॥ ३६ ।। ब्राह्मणांश्च व्य- तिक्रम्य राजा यत्कर्तुमिच्छति । तत्पापं शतधा भूत्वा रा- जानमुपगच्छति ॥३७॥ प्रायश्चित्तं सदा दद्यादेवतायतना- ग्रतः। आत्मानं पावयेत्पश्चाज्जपन् वै वेदमातरम् ॥३८॥ सशिखं वपनं कृत्वा त्रिसंध्यमगवाहनम् । गवां गोष्ठे वसेद्रा- त्रौ दिवा ताः समनुब्रजेत् ॥३९॥ उष्णो वर्षात शीते वा मा- रुते वाति वा भृशम् । न कुर्वीतात्मनस्त्राणं गोरकृत्वा तु श- को दुहैगा ? अर्थात् कोई नहीं ॥ ३३ ।। द्विज धर्मशास्त्ररूप रथपे चढ़कर और वेदरूपी खड्ग को धारण करकै हास्यसेभी जो कुछ कहदै उसको परम धर्म जानै ॥ ३४ ॥ चारों वेदोंका वेत्ता, निश्चित ज्ञान सम्पन्न वेदके अंगोंका पारदर्शी और धर्मशास्त्र पढानेवाला इकलाही श्रेष्ठ परिषद् होसक्ता है, प्रधान आश्रमी दश हों तौभी मध्यम परिषद् होती है ॥३॥ राजाकी आज्ञाके अनुसार ब्राह्मण व्यवस्था देय, अपने आप कदापि व्यवस्था न देय ॥ ३६॥ बाह्मणकी सम्मति लिये विना राजा कोई ब्य- वस्था देदेय तो उस पापीका पाप सौगुना बढकर राजाके शरीरमें प्रवेश करता है ॥ ३७॥ देव मंदिरके सन्मुख बैठकर ब्राह्मण व्यवस्था देय,तद- नन्दर वेदमाता गायत्रीका जप करके अपनेको शुद्ध करै ॥ ३८ ।। प्रायश्चित्त करने के समय प्रथम शिखा सहित शिरका मुण्डन करावै, त्रिकाल में स्नान करकै दिन में गौके पीछे २ फिरै और रात्रि के समय गोशाला में शयन करै ।। ३६ ।। गरम वायु चलै, चाहैं शीतल वायु चलै, चाहें आँधी चलती होय और चाहै वर्षा होती होय परन्तु अपनी स्क्षाकी ओर ध्यान लघुपाराशरी। भाटी क्तितः॥४०॥ आत्मनो यदि वान्येषां गृहे क्षेत्रेऽथवा खले । भक्षयन्तीं न कथयेत्पिवन्तं चैव वत्सकम् ॥४१॥ पिवन्तीषु पिवेत्तोयं संविशन्तीषु संविशेत् । पतिनां पंकमग्नां वा सर्व प्राणैःसमुद्धरेत् ॥ ४२ ॥ ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा यस्तु प्राणान्प- रित्यजेत् । मुच्यते ब्रह्महत्याद्यैर्गोप्ता गोर्ब्राह्मणस्य च ॥४३॥ गोवधस्यानुरूपेण प्राजापत्यंविनिर्दिशेत् । प्राजापत्यन्तु यत् कृच्छ्रे विभजेत्तञ्चतुर्विधम् ॥४४॥ एकाऽहमेकभक्ताशी एकाहं नक्तभोजनः । अयाचिताश्येकमहरेकाहंमारुताशनः ॥४५॥ दिनद्वयं चैकभक्तो द्विदिनं नक्तभोजनः । दिनद्वयमयाची स्याद् द्विदिनं मारुताशनः ॥४६॥ त्रिदिनं चैकभक्ताशी त्रि- दिनं नक्तभोजनः। दिनत्रयमयाचीस्यानिदिनं मारुताशनः न देकर शक्तिके अनुसार गौ की रक्षा करै ॥४०॥ अपने या अन्यके घर में, अथवा खेतमै अथवा खल (पैर ) में यदि गौ धान्यादि कुछ खाती होय तौ कुछ वोले नहीं, बछडा गौ का दुग्ध पीता होय तौ भी कुछ न कहै ॥४१॥ गौके जलपान करलैने पर जलपानकर,गौ के शयन करने पर शयनकरै, गौके गिरपडनेपर अथवा पंक कीच] में अदनानेपरसवप्रकारसेशक्तिकरकै उस को उठावै॥४२॥गौ और ब्राह्मणकेलिये जोपुरुष प्राणत्यागकरताहै,प्राणोंकोल गाकर भी गौ और ब्राह्मणों की रक्षा करनेबाला वह पुरुष ब्रह्महत्यादि सब प्रकार के पापोंसे छूट जाता है ॥ ४३ ॥ गोवधके प्रायश्चित्तके निमित्त एक प्राजापत्य व्रत करनेकी व्यवस्था देय, प्राजापत्य नामक कृच्छू ब्रतको चार भागमें विभक्त करै ॥ ४४ ॥ एक दिन एक भुक्त [ एक पाक भोजन करै ], एक दिन रात्रि में भोजन करै, अयाचित [बिना मागाहुआ] पदार्थ भोजन करै और एक दिन बायुसेवन करकै रहै ॥ ४५ ॥ दूसरे प्रकारके भाजापत्यका यह नियम है कि-दो दिन एक भुक्त रहै, दो दिन रातिमें भोजन करै, दो दिन अयाचित वस्तु भोजन करे और दो दिन बायु सेवन करकै रहै ॥ ४६॥ तीसरे प्रकारके प्राजापत्यका यह नियम है कि--तीन दिन एक भुक्त रहै, तीन दिन रात्रिमें भोजन करे, तीन दिन अयाचि. तपर्दाथका भोजन करे और तीन दिन वायु सेवन करकै रहै ॥ ४७ ॥ चौथे विशिष्टधर्म शास्त्र । ॥४७॥ चतुरहस्त्वेकभोजी चतुरहं नक्तभोजनः । चतुर्दिनम- याचीस्याच्चतुरहं मारुताशनः ॥४८॥ प्रायश्चित्ते ततश्चीणे कुर्याद्राह्मणभोजनम् । विप्राय दक्षिणां दद्यात्पवित्राणि ज- पेद्दिजः॥ ४६॥ बाह्मणान् भोजयित्वा गोनःशुद्धो न संशयः ॥ ५०॥ इतिश्रीपाराशरीये धर्मशास्त्रेऽष्टमोऽध्यायः॥ ८॥ तु गावां संरक्षणार्थाय न दुष्येद्रोधवंधयोः। तद्वधंतुनतविद्या कामात् कामकृतं तथा॥१॥ अंगुष्ठमात्रः स्थूलोवा वाहुमात्रः प्रमाणतः। आर्द्रस्तुसपलाशश्च दण्ड इत्यभिधीयते ॥२॥ दंडादूर्ध्वयदन्येन प्रहारायदिपातयेत् । प्रायश्चित्तं तदाप्रो- प्रकारका प्राजापत्य यह है कि-चार दिन एकभुक्त रहै, चार दिन रात्रिमें भोजन करै, चार दिन अयाचित वस्तु भोजन करे और चार दिन वायुसेवन करकै रहै ॥ ४८ ॥ ऐसे चारों प्रकारके प्राजापत्य व्रतका अनुष्ठान पूर्ण होने पर ब्राह्मणोको भोजन करावे और दक्षिणा देय, ब्राह्मण पवित्र मंत्रोंका जप करें ॥ ४९ ॥ ब्राह्मणोंको भोजन कराकै गोवध करनेवाला शुद्ध होजायगा इस में कोई संशय नहीं है ॥५० !! इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे भाषाटीकायामष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ Anands रक्षा करनेकी इच्छासे यदि गौको बांधाजाय अथवा रोककर रक्खाजाय तो दोष नहीं है, उस अवस्था में गौका मरण होजाय तौभी बह कामकृत वा अकामकृत गोवध नहीं कहाजासत्ता ॥१॥ अंगूठेकी समान स्थूल (मोटा) एक हाथका लम्बा, गीला और पत्तों से युक्त वृत्तकी शाखा दण्ड कहाती है ॥ २ ॥ इस कहेहुए दण्डकी अपेक्षा बड़े दण्डेसे जो पुरुष गौको ताड़ना करै नौं उसको मायश्चित्त करना चाहिये और यदि उम प्रहार से गौका लघुपाराशरी। भारी तंद्विगुणं गोवधेचरेत् ॥३॥ रोधवंधनयोक्ताणि घातश्चेति चतुर्विधम् । एकपादं चरेद्रोधेहीपादौ वंधनेचरेत् ॥ ४॥ यो- लेषुतुत्रिपादं स्याचरेत् सर्वनिपातने। गोघाटेवागृहे वापिदुर्ग बप्यसमस्थले॥ ५॥ नदीवथसमुद्रेषुखातेप्यथदरी मुखे। दग्धदेशस्थितागावः स्तंभनाद्रोध उच्यते ॥६॥ योक्तदा मकडोरेश्चकंठाभरणभूषणैः । गृहेचापि वनेवापिवद्धः स्या दगोम॑तोयदि ॥७॥ तदेवबंधनं विद्यात्कामाकामकृतं च. यत् । हलेवाशकटेपंक्तौ पृष्ठेवापीडितोनरैः॥ ८॥ गोपतिर्म त्युमाप्नोतियोक्कोभवतितद्वधः । मत्तः प्रमत्तउन्मत्तश्चेतनो वाऽप्यचेतनः ॥६॥ कामाकामकृतोक्रोधोदडैहन्यादथोप लैः । प्रहृतावामृतावापितद्धिहेतुर्निपातने ॥ १०॥ मूर्छितः पतितोवापिदंडेनाभिहतः स तु । उत्थितस्तु यदागच्छेत्पंच सप्तदशाथवा ॥ ११॥ ग्रासंवायदि गृण्हीयात्तोयं वापिपि. मरण होजाय तौ दुगना प्रायश्चित्त करै ॥ ३ ॥ रोध--बन्धन-जोत--और घात इन चारप्रकारसे गौको पीड़ा देने पर प्रायश्चित्त करै । गौको रोकने पर एक पाद, बाँधने पर दो पाद, जोतने में तीन पाद और प्रहार से प्राणबध करने में संपूर्ण चतुष्पाद प्रायश्चित्त करै, गौओंको चरानेके स्थानमें, गृहमें, घेरमें, दुर्गम स्थानमें, नदीमें, समुद्रमें गड़हेमें, गुहामुखमें, और जलते हुए स्थानमें स्थित गौ रोकने से मरण होजाय तो उसको रोध कहने हैं ॥ ४ ॥ ५ ॥ ६ ॥ रस्सी, जोतकी रस्सी और घण्टा आदि कण्ठके भूषणसे बंधेहुए गौ (बैल या गैया ) का घरमें अथवा बनमें मरण हो- जाय तो उसको बन्धन कहते हैं, यह दो प्रकारका होता है एक कामकृत और दूसरा अकामकृत ॥ ७॥ यदि मत्त, प्रमत्त, उन्मत्त, चेतन वा अचेतन होकर कामकृत ( इच्छासे ) या अकामकृत (अनिच्छासे ) क्रोधकरकै दंड या पत्थरके द्वारा गौके ऊपर प्रहार करै, उससे अत्यन्त पीड़ित होय या गौ मरणको प्राप्त होजाय तो उसको निपातन वामहार के द्वारागोबध कहते हैं। दण्डके प्रहार से पीड़ित होकर यदि गौ मूर्छित होजाय या गिरपडै और ७ विशिष्ट धर्मशास्त्र। वेद्यदि । पूर्वव्याध्युपसृष्टश्चेत्प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥ १२ ॥ पिं डस्थेपाद मेकंतुी पादौगर्भसंमिते । पादोनं व्रतमुद्दिष्टंह- स्वागर्भमचेतनम् ॥ १३ ॥ पादेंगरोमवपनं द्विपादेश्मश्रुणो पि च । त्रिपादे तु शिखावर्ज सशिखंत निपातने॥१४॥पा- देवस्त्रयुगं चैव हिपादेकांस्यभाजनमात्रिपादेगोवृषदद्या च्च- तुर्थेगोद्दयंस्मृतम् ॥१५॥ निष्पन्नसर्वगात्रस्तु दृश्यतेवासचे- तनः । अंगप्रत्यंगसंपूर्णोगुिणंगोत्रतंचरेत् ॥१६॥पाषाणो नैवदंडेन गावोयेनाभिधातिताः । शृंगभंगेचरेत्पादं दौपादौ नेत्रघातने ॥१७॥ लांगूलेपादकृच्छ्न द्रौपादावस्थिभंजने । त्रिपादंचैवकर्णेतु चरेत्सर्वनिपातने ॥ १८ ॥ शृंगभंगेस्थि भंगे च कटिभंगेतथैव च । यदिजीवतिषण्मासान्प्रायश्चित्तं फिर उठकर चलने लगै अर्थात्-गौ यदि प्रहारकी पीड़ासे मुक्त होजाय तौ प्रायश्चित्त नहीं होता है ।। ८॥९॥ १०॥ ११॥ १२ ॥ पिण्डरूप गौका गर्भ नष्ट करनेपर एक पाद, गर्भमें स्थित बछड़ेके हाथ पैर आदि अंग उत्पन्न होगए हों उसको नष्ट करने पर दोपाद,और चेतनताहीन पूर्णशरीरगर्भके वत्सकोनष्ट करने पर तीनपाद ब्रतका अनुष्ठान करै ॥ १३ ॥ एकपाद ब्रत करने में शरीरकरोम दूरकरै,दो पाद प्रायश्चित्त में श्मश्रु (दादीमूछ) पर्यन्त मुण्डन करावै पादोन ( पौन ) प्रायश्चित्तमें शिखाको छोड़कर समस्त मुण्डन करावै औरनिपातन अर्थात् चतुष्पाद पूर्ण प्रायश्चित्त करना होय तो शिखासहित संपूर्ण मुण्डन करावै ॥ १४ ॥ एकपाद प्रायश्चित्तमें वस्त्रका जोड़ा, दोपाद प्रायाश्चत्त में कांसीका पात्र, पादोन (पौन ) प्रायश्चित्तमें एक वृष और चतुष्पाद पूर्ण प्रायश्चित्तमें दो गौ देय ॥ १५ ॥ अंग प्रत्यंग युक्त गौके संपूर्ण चेतनगर्भ को गिरानेसे गोवधसे दूना प्रायश्चित्त करै ॥ १६ ॥ पाषाण अथवा दण्ड से प्रहार करके जो पुरुष गौके सींग तोड़देय तौ एकपाद और नेत्र फोड़देय तौ दोपाद व्रत करै ॥ १७ ॥ उस प्रहारसे पूंछ तोड़ देय तौ एक पाद कृच्छ्रब्रत, हड्डी टूटजाय तो दोपाद कृच्छ्व्रत, कान टूटजाय तौ तीन पाद कृच्छ्घ्रत और संपूर्ण शरीर भग्नहोजाय तो पूर्णचतुष्पाद ब्रत करे॥१८॥ सींग टूटजाय, हड्डी टूटजाय अथवा कमर टूटनाय और उसके अनन्तर लघुपाराशरी। भाटी. नवियते॥१९॥त्रणभंगे च कर्तव्यःस्ने हाभ्यंगस्तु पाणिना। यवसश्चोपहर्तव्यो यावद्ढवलोभवेत् ॥ २०॥ यावत्संपूर्ण सर्वागस्तावत्तं पोषयेन्नरः। गोरूपंबाह्मणस्याग्रे नमस्कृत्य विसर्जयेत् ॥ २१ ॥ यद्यसंपूर्ण सर्वांगो हीनदेहोभवेत्तदा। गोधातकस्यतस्याई प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ॥ २२ ॥ काय लोष्ठकपाषाणैः शस्त्रेणैवोद्धतोबलात् । व्यापादयतियोगांतु तस्यशुद्धिं विनिर्दिशेत् ॥ २३ ॥ चरेत्सांतपनंकाष्ठे प्राजाप- त्यंतुलोष्टके । तप्तकृच्छंतु पाषाणे शस्त्रेणैवाति कृच्छूकम्॥२४॥ पंचसांतपनेगावः प्राजापत्ये तथालयः । तप्तकृच्छ्रे भवत्यष्टा वतिकृच्छेत्रयोदश ॥ २५ ॥ प्रमापणेप्राणभृतां दद्यात्तत्प्रति रूपकम् । तस्यानुरूपंमूल्यं वादद्यादित्यवीन्मनुः ॥ २६ ॥ यदि गौ छःमास पर्यन्त जीवितरहै तो प्रायश्चित्त नहीं होता है ॥ १९ ॥ प्रहार से गौके शरीरमें घाव होजाय तो जबतक वह अच्छानहीं होय तबतक अपने हाथसे उस ब्रण में घृत तैलादि लगाता रहै, वह गौ जिस समय पर्यन्त दृढ़ और बलवान् न होय तबतक उस के लिये हरी हरी घास लालाकर खिलावै ॥ २० ॥ जबतक गौ नीरोग नहीं होय तवतक उसका पोषणकरै तदनन्तर ब्राह्मण को नमस्कार करकै उस नीरोग गौको छोड़देय ॥ २१ ॥ उस गौके अंग यदि पहलेकी समान पूर्णरीतिसे आरोग्यनहीं होय, शरीर का कोई अंगहीन रहजाय तो गोहत्या पापके प्रायश्चित्तसे आधा प्राय- श्चित्त करै ।। २२ ॥ कोई उद्धत पुरुष काष्ठ (काठ ) लोष्ठ (ईट डेला आदि) पाषाण अथवा शस्त्रसे वल पूर्वक (जवरदस्ती ) गोहत्या करै तो वह किस प्रकार शुद्ध होसता है सो कहते हैं ॥२३॥ काष्ठसे हत्या करने पर सान्त- पन व्रत, लोष्ठसे हत्या करने पर प्राजापत्य व्रत, पाषाणसे हत्या करने पर तप्तकृच्छ्र और शस्त्रसे गोहत्या करनेपर अतिकृच्छ्र व्रतका अनुष्ठान करै ॥ २४ ॥ सान्तपन व्रतमें पाँच गौ, प्राजापत्यमें तीन गौ तप्तकृच्छ्र में आठ गौ और अतिकृच्छू व्रतमें तेरह गौ दान करना चाहिये ॥ २५ ॥ गौ आदिके प्रायश्चित्तके परिमाणके अनुसार उसके अनुरूप ( उसी परिमाण की ) गौ आदि पुण्य करै अथवा उसकेही अनुसार मूल्य (कीमत) देदेय, भगवान् मनुजीका ऐसा कथन है ॥ २६ ॥ भार वा गाडी आदि विशिष्टधर्म शास्त्र । अन्यत्रांकनलक्ष्मभ्यां वाहनेमोचनेतथा।सायंसंगोपनार्थ च नदुष्येद्रोधबंधयोः ॥ २७ ॥ अतिदाहेतिवाहे च नासिकामे दतथा । नदीपर्वतसंचारे प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ॥ २८॥ अतिदाहेचरेत्पाद हौपादोवाहनेचरेत् । नासिक्येपादहीनंतु चरेत्सर्वनिपातने ॥ २६ ॥ दहनात्तुविषयेत अनड्वान्यो क्लयंत्रितः। उक्तं पराशरेणैवोकपादं यथा बिधि ॥ ३० ॥ रोधनं बंधन योक्लं भारः प्रहरणं तथा । दुर्ग प्रेरणयोक्तं च निमित्तानि वधस्यषट् ॥ ३१ ॥ बंधपाशसुगुप्तांगो म्रियते यदि गोपशुः । भवने तस्य पापःस्यात्प्रायचितार्द्धमर्हति ॥३२॥ न नारिकेलैनच शाणवालैनचापिमौजैनच बन्ध | खलैः । एतैस्तु गावो न निबंधनीया वध्वातु तिष्टेत्परशुं गृही त्वा ॥३३॥ कुशैः काशैश्च बध्नीयाद् गोपशु दक्षिणामुखम् ॥ लेचलने के लिये चरनेको छोडनेके लिये और सायंकालको रक्षाक लिये गौके शरीरमें यदि कोई विशेष चिन्ह करनेको रोध वा बन्धन कराजाय तो उससे कोई दोष नहीं होता है ॥ २७ ॥ दाग देने के समय यदि अधिक दग्ध होजाय, अति अधिक वोझ लेजाने के लिये लादाजाय यदि नाथा जाय, अथवा यदि कष्टदायक नही पर्वतके मार्गसे लेजाया जाय तो प्रायश्चित्त करना चाहिये ।। २८ ॥ अधिक दग्ध करने पर एकपाद अधिक वोझा लादने पर दो पाद नासिका छेदने पर तीन पाद और एक साथ इन सब पापोंके करने पर पूर्ण चतुष्पाद प्रायश्चित्त करै ।। २९ ॥ वन्धनकी दशामें अथवा खुले हुए दुहनेके समय गौ का मरण होजाय तौ विधि पूर्वक एक पाद प्रायश्चित्त करै,ऐसा पराशर ऋषिने कहा है ॥३०॥ रोध, बन्धन, योत ( जोतना ) , अधिक भार लादना, प्रहार और जोत- कर नदी पर्वतादि दुर्गम स्थानोंमें लेजाना, इन छःओंमें प्रत्येक वधका कारण है ॥ ३१ ॥ यदि कोई गौ रस्सी में बँधे हुए प्राणत्याग करदेय तौ गृहके स्वामीको अर्द्धकृच्छ्र व्रत करना चाहिये ॥ ३२ ॥ नारिकेल (नारियल) की रस्सी, सनकी रस्सी,पूँजकी रस्सी अथवा लोहेकी जंजीरसे गौ अथवा वृषको कदापि न बाँधे और यदि वाँधै तौ फरमा हाथमें लिये सर्वदा समीप बैठा रहै ॥ ३३ ॥ गौ अथवा अन्य पशुको दक्षिणगुख कर कै कुश अथवा काँप , ५८ लघुपाराशरी। भान्टी पाशलग्नाग्निदग्धेषु प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥ ३४॥ यदि त त्रभवेत्काष्ठं प्रायश्चितं कथं भवेत् । जपित्वा पावनी देवी च्यते तत्र किल्विषात् ॥ ३५ ॥ प्रेरयन् कूपवापीषु वृक्षच्छे देषु पातयन् । गवाशनेषु विक्रीणस्ततःप्राप्नोतिगोवधं ॥३६॥ आराधितस्तु यः कश्चिद् भिन्नकक्षो यदाभवेत् । श्रवणहृद यं भिन्नमग्नोवाकूपसंकटे ॥३७॥ कूपादुत्क्रमणेचैबभनोवा ग्रीवपादयोः । सएवमियतेतत्र त्रीपादांस्तु समाचरेत्॥३८॥ कूपखाते तटीबंधे नदीबंधे प्रपासु च । पानीयेषु विपन्नानां प्रायश्चित्तं न विद्यते॥३६॥ कूपखातेतटीखातेदीर्घखातेत वच । स्वल्पेषु धर्मखातेषु प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥ ४० ॥ से बाँध, यदि उसमें अग्नि लगकर पशुका शरीर जलजाय तो प्रायश्चित करने की विधि नही है ॥ ३४ ॥ यदि उस स्थानमें तृण होयें और उस रस्सीमें लगीहुई अग्नि तृणोंमें लगकर पशुका प्रणान्त करदेय तौ पवित्र करने बाली गायत्री का जप करकै पापसे मुक्ति होती है ॥ ३५ ॥ कूप अथवा तालावमें गौको प्रेरण करनेपर, बृत्त काटकर गौके ऊपर डालने पर अथवा किसी गोभक्षकके हाथ गौ वेच देने पर पूर्ण गोहत्याका पाप होता है ॥ ३६ ॥ विपत्तिसे उद्धार करनेके लिये सवप्रकारकी चेष्टा करने परभी यदि पूर्वोक्त किसी कारणसे गौ का वक्षस्थल, कान अथवा हृदय का कोई भाग भग्न होजाय, अथवा यदि गौ किसी कूप आदि में गिरपडे और उसको तिसकूपमें से निकालनेके समय पैर अथवा ग्रीवा टूटनाय और इसकारण तत्काल या कुछकालके अनन्तर गौ का मरण होजाय तो उस के पापसे मुक्त होने के लिये तीनपाद प्रायश्चित्त करै ।। ३७॥ ३८ ॥ कूप के समीपके गडहे (चौवच्चे ) में सरोवर नदी के बँधे हुए घाट पै, प्रपा (पौ) ओं पै जलपान करने के लिये जाकर यदि गौ का मरण होजाय तो किसी प्रकार का प्रायश्चित्त करनेकी विधि नहीं है ॥३६॥ कूप के समीपका गडहा, नदी वा जलाशय के समीप का गडहा, दीर्घखात (वडागडहा) वा साधारण जल पीने का गडहा इन में गिर कर गौ का मरण होजाय तो उसके निमित्त किसी प्रकारका प्रायश्चित्त न करै ।। ४ २|| विशिष्ट धर्मशास्त्र । ५६ वेश्मडारे निवासेषुयो नरःखातमिच्छति । स्वकार्य गृहखातेषु प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ॥ ४१ ॥ निशि बंधनिरुद्धेषु सर्प व्याघ्र हतेषु च ।अग्निविद्युदिपन्नानां प्रायश्चित्तं न विद्यते 1॥४२॥ ग्रामघातेश घेण वेश्मभंग निपातने। अतिवृष्टिहता- नांच प्रायश्चित्तं न विद्यते॥४३॥ संग्रामेपहृतानांचये दग्धावे श्मकेषु च । दावाग्निग्रामघातेषु प्रायश्चित्तं न विद्यते॥४४॥ यंत्रितागो चिकित्सार्थ गूढगर्भविमोचने । यत्नेकृतेविपद्येत प्रायश्रितं न विद्यते ॥४५॥ व्यापन्नानांवहूनांचरोधनेबंधने- पिवा । भिषमिथ्याप्रचारेण प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ॥४६॥ गोवृषाणां विपत्तौ च यावंतः प्रेक्षका जनाः ॥ अनिवारयतां घरकेदारपर अथवा घरके भीतर यदि कोईगडहा खोदै,अथवाअपने प्रयोजनके लिये वा सर्वसाधारणके निमित्त वा स्थान बनाने के निमित्त गडहा खोदै और यदिउसमें गिरकर गौ का मरण होजायतौ प्रायश्चित्त करनाचाहिये।॥४१॥रात्रि में गौ को वाँध कर रोककैरखलेनेपरयदि सर्पकेकाटनेसेवाअग्नितथावजूाघात (विजली गिरने ) से यदि उस गौका मरण होजाय तो प्रायश्चिचकर ने की आवश्यकता नहीं है ॥ ४२ ॥ यदि वाणों से ग्राम पीडित होय, घर टूटकर गिरपडै वा अतिवृष्टि होय इन तीनोंमें किसी कारणसे गौका मरण होजाय तो प्रायश्चित नहीं होता है ॥ ४३ ॥ जो गौ संग्राम मे, घरमें अग्नि लगने के समय ग्राम को किसी के घेर लेने पर वादावाग्नि (दौं) से भस्म होजाने में मरण को प्राप्त होय उनका प्रायश्चित्त नहीं होता है ॥ ४४ ॥ यदि चिकिस्सा करनेके लिये गौ को किसी प्रकार की पीडा दीजाय अथवा ( दृषित ) गर्भ दूर करना होय, उसमें शक्तिके अनुसार यत्न करने परभी यदि गौ का मरण होजाय तो प्रायश्चित्त नही होता है ।। ४५ ॥ बहुत सी गौ अथवा वैलों को यदि एक स्थानमें बाँधकर वा रोककर रक्खा होय,और यदि अनभिज्ञ ( अनजान ) चिकित्सकसे चिकित्सा करानेमें गौ वा वृषभ का मरण होजाय तो गोवध का प्रायश्चित्त करै ॥ ४६ ॥ गौ अथवा वैल की अपमृत्यु (अकालमृत्यु ) के समय जो अपने नेत्रोंसे देखकर भी उस को तिस आसन्न मृत्युसे भाटी ६० लघुपाराशरी। तेषां सर्वेषां पातकं भवेत् ॥ १७॥ एकोहतोयैर्बहुभिःसमे- तैर्नज्ञायतेयस्यहतोभिघातात् । दिव्येनतेषामुपलभ्यहंतानि वर्तनीयोनृपसन्नियुक्तः ॥ ४६॥ एकाचेबहुभिः काचिदेवा- झ्यापादिता क्वचित् । पादं पादं तु हत्यायाश्चरेयुस्ते पृथक् पृथक् ॥ ४९ ॥ हतेतुरुधिरं दृश्यव्याधिग्रस्तः शोभवेत् । लालाभवति दृष्टेषु एवमन्वेषणं भवेत् ॥ ५०॥ ग्रासार्थचो- दितोवापि अध्वानं नैव गच्छति । मनुनाचैवमेकेन सर्व शास्त्राणि जानता। प्रायश्चित्तं तुतेनोक्तं गोनश्चांद्रायणं चरेत् ॥ ५१॥ केशानां रक्षणार्थाय द्विगुणवतमाचरेत् । द्विगुणे व्रतआदिष्ठे दक्षिणाद्विगुणाभवेत् ॥ ५२ ॥ राजा वा राजपुत्रोवा ब्राह्मणो वा बहुश्रुतः । अकृत्वावपनंतेषां छुटाने की चेष्टा नहीं करते हैं उन सबों को गोहत्या के पापका भागी होना पडता है ॥ ४७॥ यदि बहुत से पुरुष एकत्र इकट्ठे होकर किसी गौ अथवा वैलके ऊपर डेले पत्थर आदि फैंककै पीडा दें और उससे यदि पशुका मरण होजाय और हत्या करने वाले का निश्चय न होसकैनौ राजा अपने कर्मचारियों के द्वारा उनमें से प्रत्येक को शपथ दिलाकर उस पशुकी हत्या करने वाले का निश्चय करै ॥ ४८ ॥ यदि बहुतसे पुरुषोंके आघातसे किसी एक गौ का मरण हुआ होय तो उन प्रहार करने वालोंमें प्रत्येक को अलग २ गोवधका चतुर्थांश प्रायश्चित्त करना चाहिये ॥ ४९ ॥ गौ का मरण होने पर उसके रुधिर के चिन्ह से हत्याकारी को जानै अथवा उन सबमें जो रोगी होजाय, दुर्वल ( शुष्कमुख ) होय, देखतेही मुख से लार टपकने लगै जो ग्रासके निमित्त प्रेरणा करने पर भी मार्गको न जाय इस प्रकार हत्याकारी का अन्वेषण करे, सर्वशास्त्रों को जानने वाले अद्वितीय भगवान् मनुने गोहत्यामात्र में चान्द्रायण व्रत का अनुष्ठा करने की व्यवस्था दी है ॥ ५० ॥ ५१ ॥ गोहत्या के प्रायश्चित्तके समय जो केश रखना चाँहै उस को द्विगुण प्रायश्चित्त करना चाहिये और द्विगुण प्रायश्चित्त की द्विगुण दक्षिणा भी देनी चाहिये ॥ ५२ ॥ राजा, राजपुत्र वा बहुज्ञानी ब्राह्मण केशोंका मुंडनन कराकरभी प्रायश्चित्त करसक्ता विशिष्टधर्म शास्त्र । ६१ प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेन् ॥ ५३॥ यस्यनहिगुणन्दानकेश श्वपरिरक्षित: तत्पापं तस्य तिष्ठेतत्यक्त्वाचनरकंब्रजेत् ।।४। यत्किंचित् क्रियतेपापं सर्वकेशेषु तिष्ठति । सर्वान्केशान्स- मुद्धृत्य छेदयेदंगुलिदयम् ॥ ५५ ॥ एवंनारी कुमारीणां शिरसोमुंडनस्मृतानस्त्रियांकेशवपनंनदूरेशयनासनम्॥५६॥ नचगोष्ठेवसेद्रात्रौनदिवागाअनुब्रजेत् । नदीषुसंगमेचैव पर- एडेषुविशेषतः॥५७॥नस्त्रीणामजिनंबासोबतमेवंसमाचरेत् । त्रिसंध्यं स्नानमित्युक्तं सुराणामर्चनं तथा ॥ ५८ ॥ बन्धु मध्ये व्रतंतासां कृष्ण चांद्रायणादिकं । गृहेषु सततं तिष्ठेच्छु चिनियममा चरेत् ॥५९ ॥ इहयोगीबधं कृत्वा प्रच्छादयि- तुमिच्छति । सयाति नरकं घोरं काल सूत्रमसंशयम् ॥६०॥ विमुक्तो नरकात्तस्मान्मर्त्यलोके प्रजायते । क्लीवोदुःखी च ॥ ५३ ॥ जो पुरुष केश रक्खै और द्विगुण प्रायश्चित्त न करै वा द्विगुण दक्षिणा नहीं देय तो उस का पाप नष्ट नहीं होता है और ऐसी व्यवस्था देनेवाला नरकगतिको प्राप्त होता है ॥ ५४ ॥ जो कुछ पाप किया जाता है वह सव केशोंमें वास करता है इसकारण संपूर्ण केशोंको हाथ में पकड कर अग्रभागके दो २ अंगुल केश कटवा देय ॥ ५५ ॥ यह व्यवस्था केवल कुमारी और सधवा ( जिन का पति जीवित है ऐसी) स्त्रियोंके निमित्त ही है, इन स्त्रियोंके संपूर्ण मुण्डन और दूर स्वतन्त्र शयन अथवा स्वतन्त्र भोजन विधान नहीं है ॥ ५६ ॥ यह स्त्रियें रात्रिमें गोशालामें शयन और दिनमें गौके पीछे २ गमन न करै, विशेष करकै नदी पै, जनसमूह केस्थानमें और जंगलमें जाना उनके लिये अनुचित है ॥ ५७ ॥ स्त्री कदापि मृगचर्म न ओढे, तीनों कालमें स्नान और देवपूजन करै ॥६८ ॥ स्त्रियें कृच्छ्रचान्द्रायण आदि व्रतोंको वान्धवोंके मध्यमें ही करें, उनको सदागृह में स्थित रहकर सकल पवित्र नियमों को पालन करना चाहिये ॥ ॥१९॥ जो इस लोकमें गोवध करके उसको गुप्त रखने की इच्छा करता है, निः सन्देह वह कालसूत्र नामक घोर नरकको प्राप्त होता है ॥ ६ ॥ उस भयानक नरक से छूटने पर भी उसको फिर मनुष्य योनिमें जन्म , १ लघुपाराशरी। भा०टी० कुष्टी च सप्तजन्मानिवैनरः॥६॥तस्मात्प्रकाशयेत्पापंस्वधर्म सततंचरेत्। स्त्रीबालभृत्य गोभृत्येष्वति कोविवर्जयेत् ॥६२।। इतिश्रीपाराशरीये धर्मशास्त्रे नवमोऽध्यायः ॥९॥ ॥ चातुर्वर्णेषु सर्वेषु हीयं प्रोक्ता तु निष्कृतिः।अगम्या गमने चैव शुद्धौ चांद्रायणं चरेत् ॥ १॥ एकैकंहासयेद्द्यासं कृष्णे शुक्ले चवद्धयेत् । अमावस्यां न भुंजीतोष चांद्रायणे विधिः ॥ २ ॥ कुक्कुटांगप्रमाणं तु ग्रासं वै परिकल्पयेत् । अन्यथा जात दोषेण न धर्मो न चशुद्ध्यते ॥ ३ ॥ प्रायश्चित्तेत- तश्चीर्णे कुर्याद्राह्मण भोजनम् । गोइयंवस्त्र युग्मंच दद्याद्वि- प्रेषु दक्षिणाम् ॥४॥ चांडालीवाश्वपाकींवा ह्यनुगच्छतियोहि धारण कर वहिरा, दुःखी और कुष्ठरोगी होकर क्रमसे सातजन्म विताने पडते हैं ।। ६१ ॥ इसकारण पाप करके उसको कदापि छुपावै नहीं, प्रकाश करदेय, और स्त्री, चालक भृत्य, गौ तथा ब्राह्मण के ऊपर कदापि कोप न करै।। ६२ ॥ इति श्रीपाराशरीये धर्मशास्त्रे भाषाटीकायांनवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ ब्राह्मण क्षत्रियादि चारों वर्ण के पापसे छूटनेका उपाय कहते हैं । अगम्य स्थानमें गमन करने पर जो पाप होता है चान्द्रायणव्रत का अनुष्ठान करके उससे मुक्तिहोती है ॥१॥ कृष्णपक्षमें प्रतिदिन एक २ ग्रास कमकरै और शुक्लपक्षमें प्रतिदिन एक २ ग्रास बढ़ावै, अमावास्याके दिन कुछ भोजन न करै यह चान्द्रायणकी विधि है ॥ २ ॥ ग्रास मुर्गीके अण्डेकी वरावर बडा वनावै जो पुरुष इसके अन्यथा करै उसको न शुद्धजाने न धर्माचरण करनेवाला जानै ॥ ३ ॥ प्रायश्चित्त का कार्य यथावत् होजाने पर ब्रह्माणों को भोजन करावै, और प्रत्येक ब्राह्मणको दोगौ तथा एक जोड़ा बन दक्षि णा देय ॥ ४ ॥ ब्राह्मण, चाण्डाली वा श्वपाकी के विषं गमन करने पर अ०१० विशिष्टधर्म शास्त्र। जः ॥ त्रिरात्रमुपवासीच विप्राणामनुशासनात् ॥५॥स शिखंवपनं कृत्वा प्राजापत्य द्वयंचरेत् । ब्रह्मकूर्चततःकृत्वा कुर्याब्राह्मण तर्पणम् ॥६॥ गायत्रींच जपन्नित्यं दद्याद्गोमि- थुनद्वयम् । विप्रायदक्षिणांदद्याच्छुद्धि माप्नोत्य संशयम ॥ ७ ॥ गोद्वयंदक्षिणांदद्या च्छुद्धिं पाराशरोब्रवीत् ॥ ८ ॥ क्षत्रियोवाथवैश्योवा चांडलींगतोयदि । प्राजापत्य द्वयं कुर्याद्दद्याद्रोमिथुनंतथा । श्वपाकीमथ चाण्डालीं शूद्रोवैय- दिगच्छति ॥६॥ प्राजापत्यं चरेत्कृच्छं चतुर्गो मिथुनंददेत्।। ॥ १०॥ मातरंयदिगच्छेत्तु भगिनीं स्वसुतांतथा । एतास्तु मोहितो गत्वा त्रीणिकृच्छाणि संचरेत् ॥ ११ ॥ चांद्रायण त्रयंकुच्छिश्नच्छेदेन शुद्ध्यति । मातृष्वसृगमेचैव आ- स्ममेनिकृतनम् ॥ १२ ॥ अज्ञानेनतुयोगच्छेत्कुर्याच्चांद्राय- ब्राह्मणकी आज्ञाके अनुसार तीनरात्रि उपवास करै ॥ ५ ॥ फिर शिखा सहित मुण्डन कराकर दो प्राजापत्य व्रत करै, तदनन्तर विधिपूर्वक ब्रह्मकूर्च ( गौकामूत्र, दधि, दुग्ध, घृत और कुशोका जल इन सवको विधिपूर्वक पान ) करकै, भोजनादिसे ब्राह्मणों को तृप्त करै ।। ६ ।। तदनन्तर निरन्तर गायत्रीका जप करै बाह्मणको गोमिथुन ( एक गौ एक बैल ) दक्षिणा देकर निःसन्देह शुद्धिको प्राप्त होता है ॥ ७ ॥ दो गौ दक्षिणा देकर शुद्धि होती है ऐसा पाराशरजीका कथन है क्षत्रिय अथवा वैश्य यदि चाण्डाली से गमन करें तौ ॥ ८ ॥ दो प्राजापत्य व्रतकर और ब्राह्मणको गोमिथुन दानदेय शूद्र यदि श्वपाकी वा चाण्डालीसे गमन करै तौ ॥ ९ ।। एक प्राजापत्य कृच्छ्र वूत करै और ब्राह्मणको चार गोमिथुनदान देय ॥ १० ॥ अपनी माता, भगिनी और पुत्री के विर्षे अज्ञान से गमन करकै तीन कृच्छ्र ब्रत करै ॥ ११ ॥ तदनन्तर वह पुरुष तीन चान्द्रायण व्रत करके अपनी लिङ्गेन्द्रियको काटडाले और माताकी वहिनके विषै गमन करकै भी लिंङ्गेन्द्रियको काटडालनेपरही शुद्धि होती है ॥ १२ ॥ अज्ञानसे यदि माताकी बहिनके वि गमन करै तौ दो चान्द्रायण व्रत करै , , लघुपाराशरी । भा०टी० णयम् । दशगोमिथुनं दद्याच्छुद्धिं पाराशरोऽब्रवीत् ॥ १३॥ पितृदारान्समारुह्य मातुरातांच भातृजाम् । गुरुपत्नीस्नुषां चैवभ्रातृभार्यातथैव च ॥ १४ ॥ मातुलानी सगोत्रांच प्रा- जापत्यत्रयंचरेत् । गोद्वयं दक्षिणांदत्वा मुच्यते मात्रसंश- यः ॥ १५ ॥ पशु वेश्यादि गमने महिष्युष्ट्रीकपींस्तथा । खरीच शूकरी गत्वा प्राजापत्यं समाचरेत् ॥ १६॥ गोगामी च त्रिरात्रेण गामेकां ब्राह्मणेददेत् । महिष्युष्ट्र खरीगामीत्व होरात्रेण शुद्धयति ॥ १७ ॥ डामरेसमरेवापि दुर्भिक्षेवाजन क्षये बंदिग्राहे भयार्ते वा सदास्वस्त्री निरीक्षयेत् ॥ १८ ॥ चांडालैः सहसंपर्क या नारी कुरुते ततः ॥ १६ ॥ विप्रान्दश वरान्गत्वा स्वयंदोषं प्रकाशयेत् ॥ १६ ॥ आकंठसंमितेकूपे गोमयोदककर्दमे । तत्रस्थित्वा निराहारा त्वहोरात्रेण नि- और ब्राह्मणोंको दश गौ और दश वृषभ दान करकै देय तब शुद्धि होती है ऐसा पाराशरजीका कथन है ॥ १३ ॥ जो पुरुष पिताकी स्त्री ( सौतेली माता), माताकी सखी, माताकी पुत्री, गुरुकी स्त्री, पुत्रकी स्त्री, भाताकी स्त्री, मातुल (मामा) की स्त्री तथा अपने गोत्रकी किसी कन्याके साथ गमन करै वह तीन माजापत्य व्रत करे और तदनन्तर दो गौ दक्षिणा देय तब निःसन्देह शुद्ध होजाताहै ॥ १४ ॥ १५ ॥ पशु, वेश्या, महिपी, (भैंस), उष्ट्री ( ऊंटनी), वानरी, गर्दभी और शूकरी से गमन करकै प्राजापत्य व्रत करै ॥ १६ ॥ गौके विर्षे गमन करने पर तीन रात्रि उपवास करकै ब्राह्मणको एक गौदान देय । महिषी, उष्ट्री और गर्दभीके साथ गमन करनेवाला एक रात्रि दिन उपवास करके भी शुद्ध हो जाता है ।। १७ !! मारामारी काटाकाटी के समय, युद्धके समय, दुर्भिक्षके समय, जनक्षय ( हैजा महामारी आदि ) के समय भयप्राप्त होनेके समय और कोई आक्रमण (हमला) करनेवाला बन्दी करकै लेजाय उस समय, सदा अपनी स्त्रीकी ओर दृष्टि रक्खै ॥ १८ ॥ जो स्त्री किसी चाण्डालके साथ सहवास करै वह दश श्रेष्ठ ब्राह्मणोके पास जाकर अपना दोष प्रकाशित करै ॥ १९ ॥ गोबरके जल और कीच से भरेहुए कूप में कंठ पर्यंत मग्न होकर बिना भोजन करेहुए तहां एक रात्रिदिन रहकर निकल अ०१० विशिष्टधर्म शास्त्र । एकमेत् ॥२०॥सशिखं वपनंकृत्वा भुजीयाद्यावकौदनम् ॥ त्रिरात्रमुपवासित्ता त्वेकरात्रं जलेवसेत् ॥ २१ ॥ शंखपुष्पी लतामूलं पत्रंवाकुसुमंफलम् । सुवर्णपंचगव्यंचक्काथयित्वा पिवेजलं ॥ २२ ॥ एकभक्तंचरेत्पश्चाद्यावत्पुष्पवतीभवेत् । व्रतंचरतितद्यावत्तावत्संवसतेबहिः ॥ २३ ॥ प्रायश्चित्तेतत- श्वीणेकर्याद्राह्मणभोजनम् । गोद्वयंदक्षिणांद्याच्छुद्धिःपारा शरोब्रवीत् ॥२४॥ चातुर्वर्यस्यनारीणांकृच्छंचांद्रायणबतमा यथाभूमिस्तथानारीतस्मात्तांनतुदूषयेत् ॥ २५ ॥ बंदिग्राहेण याभुक्ताहत्वावधावलाद्भयात् । कृत्वासांतपनंकृच्छ्रे शुद्धये- त्पाराशरोब्रवीत् ॥ २६ ॥ सकृद्भुक्तातुयानारीनेच्छंतीपापकर्म भिः। प्राजापत्येनशुद्ध्येतऋतुप्रस्रवणेनच ॥ २७॥ पतत्यर्द्ध आवै ॥ २० ॥ तदनन्तर शिखा सहित समस्त शिरका मुण्डन कराकै आधेपके हुए यव भोजन । र, तदनन्तर तीन रात्रि उपवास करकै एक रात्रि जलमें वास करै ॥ २१ ॥ फिर शंखपुष्पी औधिकी जड़, पत्ते, फूल, फल और सुवर्ण तथा पञ्चगव्य इन सबको एकत्र पीसकर औटावै, तिसका जल पान करै ॥२२॥ तदनन्तर जबतक रजस्वला होय तबतक एक अनका पकाहुआ भोजन दिन में एक बार पात्र और जबतक यह व्रत पूर्ण नहीं होय तब तक घरसे बाहर निवास करै ॥ २३ ॥ इसप्रकार प्रायश्चित्तकी समाप्ति होजाने पर ब्राह्मणों को भोजन कराकर दो नौ दक्षिणा देय इसप्रकार प्रायश्चित्त करनेपर शुद्धि होती है ऐसा पाराशरजीका कथन है ॥ २४ ॥ चारोंवाँकी स्त्री दोषयुक्त होनेपर कृच्छ्चान्द्रायण व्रत करें, भूमि और स्त्री दोनों समान हैं इसकारण उनको दृषित न करै ॥ २५ ॥ जो स्त्री बंदी करकै अन्यकें द्वाग उपभोग करीगई है, अथवा प्रहार करकै कैद करकै, भय दिखाकर और बलपूर्वक ( जबरदस्ती) अन्य पुरुषों करके जो स्त्री भोग करीगई है, पाराशर कहते हैं कि वह स्त्री कृच्छ्र सांतपनब्रत करके शुद्ध होती है ॥ २६ ॥ जो स्त्री स्वयं इच्छा न करतीहुई पापकर्म पुरुषों क- रकै बलपूर्वक एकबार भोगीगई है वह प्राजापत्यत्रत करकै और ऋतुधर्म होनेपर शुद्ध होजाती है ॥ २७ ॥ जिसकी स्त्री सुरा ( मदिरा ) पान करती 8 लघुपाराशरी। भाटी शरीरस्ययस्यभार्यासुरांपिवेत् । पतिताई शरीरस्यनिष्कृति नविधीयते॥२८॥गायत्रींजपमानस्तुकृच्छ्रे सांतपनंचरेत्॥२९॥ गोमूत्रंगोमयंक्षीरंदधिसर्पिःकुशोदकम् । एकरात्रोपवासश्च कृच्छं सांतपनस्मृतं ॥ ३० ॥जारेण जनयेदगर्भ मृतेत्यक्ते गतेपतौ । तांत्यजेदपरेराष्ट्रे पतितां पापकारिणीम्॥ ३१ ॥ ब्राह्मणीतुयदागच्छेत्परपुंसासमन्विता । सातुनष्टा विनिर्दि- ष्टा न तस्यागमनं पुनः ॥ ३२ ॥ कामान्मोहाच्चयागच्छेच्य- क्त्वा बन्धून्सुतान्पतिं । सापिनष्टा परेलोके मानुषेषुविशे- षतः ॥ ३३ ॥ मदमोहगतानारी क्रोधादण्डादिताडिता । अद्वितीयंगताचैव पुनरागमनं भवेत् ॥३४ ॥ दशमेतु दिने प्राप्त प्रायश्चित्तं न विद्यते । दशाहं न त्यजेन्नारी त्यजेन्न- है उसका आधाशरीर पतित होजाताहै और जिसका आधाशरीर पतित होजाताहै उसकी शुद्धि नहीं होतीहै अर्थात् निःसन्देह नरक गति प्राप्त हो- तीहै ॥ २८ ॥ कृच्छू सान्तपन ब्रत करने के समय निरन्तर गायत्रीका जप करता रहै ॥ २९ ॥ गौका गोबर--मूत्र--दूध-दही-घृत और कुशका जल पान करकै एकरात्रि उपवास करमा, कृच्छ्र सान्तपन कहाताहै ॥ ३० ॥ पतिके परदेश जानेपर अथवा पतिको त्याग करके या पतिका मरण होने के अनन्तर जोत्री अन्य पुरुष संयोगसे गर्भ धारणकरै उस पतित पाप चा- रिणीको अन्य राज्यमें जाकर छोड़ आवै ॥ ३१ ॥ यदि कोई ब्राह्मणी पर पुरुषके साथ चलीजायती उसको नष्ट जान, वह फिर लौटकर पतिके घरमे नहीं आसक्तीहै ॥ ३२ ॥ काम अथवा मोहके वशीभूत होकर कोई स्त्री पति, पुत्र और बांधवोंको त्यागकर चलीजायतौ वह परलोकमेंविशेषतः मनुष्यसमाज [इसलोक में नष्ट होजातीहै ॥३३ ॥ जो स्त्री मद वा मोहसे अथबा क्रोधसे दण्डसे ताडन करनेसे विनाकिसीके पासजाके चलीआवे॥३४॥ यदि उस स्त्रीको गयेहुए दश दिन होजाय तो प्राचिश्त्त करना नहींचाहिये क्योंकि दश दिनतक स्त्रीको न् त्यागे परन्तु ना सुनी जायतो उसको ७ *०१० নিমাগম হা। ष्टांश्रुतांतथा ॥३५॥ भर्ताचैवचरेत्कृच्छं कृच्छार्द्ध चैव वा- न्धवाः । तेषां भुक्त्वा च पीत्वा च अहोरात्रेण शुद्ध्यति ॥ ३६ ॥ ब्राह्मणीतु यदा गच्छेत्परपुंसाविवर्जिता । गत्वापुं- भिःसमंयाति त्यजेयुस्तांतुगोत्रिणः ॥ ३७॥ पुंसोयदिगृहं- गच्छेत्तदाशुद्धंगृहंभवेत् पितृमातृगृहंयच्चजारस्यैवतुतद्गृ- हम् ॥ ३८॥ उल्लिख्यतद्गुहंपश्चात्पंचगव्येनसेचयेत् । त्य- जेच्चमण्मयंपात्रंवस्त्रंकाष्ठंचशोधयेत्॥३९॥संभाराञ्छोधये- सर्वान्गाकेशैश्च फलोद्भवान् । ताम्राणि पंच गव्येन कां- स्थानिदश भस्माभिः॥४०॥प्रायश्चित्तंचरेहिप्रोब्राह्मणैरुपपादि तम्।गोयंदक्षिणांदद्यात्प्राजापत्यद्वयंचरेत्॥४१इतरेषाम होरात्रंपंचगव्यंचशोधनम्। उपवासैःपुण्यैःस्नानसंध्यार्च नादिभिः ॥ ४२ ॥जपहोमदयादानःशुद्ध्यन्तेब्राह्मणाःसदा। त्यागदे ॥ ३६ ॥ उस स्त्रीकापति कृच्छ्रब्रत और पतिके बांधव अर्द्ध कृच्छ्र व्रत करें और उनके घर जिसने भोजन कियाहो वा जलपान कियाहो वोह अहो रात्रसे ( एकरातदिन भोजन न करने) से शुद्ध होताहै ॥ ३५ ॥ जो ब्राह्मणी निषेध करने परभी ( अन्य ) पुरुषके संग चलीजाय वह यदि दूसरे पुरुषका संग करके शीघ्र उसी अपने पतिके समीप आवे तो सगोत्री उसे त्यागदें ॥ ३७॥ यदि वह जार पुरुषके घरमें चलीआवै तो वह घर और उस स्त्रीके पिता-और माताका घर अशुद्ध होजाते हैं ॥ ३८ ॥ उस घरको खोदकर पीछे पंचगव्यसे छिड़के और मिट्टीके पा- त्रोंको फेंकदे वस्त्र तथा काष्ठके पात्रोंको शुद्ध करै ॥ ३९ ॥ तथा फलकी सामग्रीयों को गौके चँवरसे, तांबेकी वस्तुको पंचगव्यसे और कांसीकी वस्तु को दशबार भस्मलगाकर शुद्ध करना चाहिये।।४॥वह ब्राह्मण ब्राह्मणोंके कहेहुए प्रायश्चित्तको करै और दो गौ दक्षिणा दे तथा दो प्राजापत्यव्रत करै ॥४१।। और इतर बन्धु अहोरात्रव्रत करके और पंचगव्य पानकरकै तथा उपवास-व्रत-पुण्य--स्नान--संध्या---पूजन-आदिने और जा- होम-दया-दान-इनसे ब्राह्मण आदि शुद्ध होते हैं-आकाश-पवन अग्नि .

६८ लघुपाराशरी। मा० टी० आकाशवायुरग्निश्चमेध्यंभूमिगतंजलं ॥ नदुष्यंति चदर्भा- श्चयज्ञेषुचमसास्तथा ॥ ४३ ॥ इतिपाराशरीयेधर्मशास्त्रेदशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ अमेध्यरेतोगोमांसंचांडालान्नमथापिका । यदिनुक्तंतुवि प्रेणकृच्छ्रे चांद्रायणंचरेत् ॥१॥ तथैवक्षत्रियोवैश्यस्तदर्धत समाचरेत् । शद्रोऽप्येवयदाभुंक्तप्राजापत्यंसमाचरेत् ॥ २ ॥ पंचगव्यंपिवेच्छूद्रोब्रह्मकूर्चपिवेद्विजः। एकद्वित्रिचतुर्गाश्च दद्याद्विमाद्यानक्रमात् ॥३॥ शूद्रान्नंसूतकस्यान्नमभोज्यस्या न्नमेवच । शकितं प्रतिषिद्धानं पूर्वोच्छिष्टं तथैवच ॥ ४ ॥ यदि भुक्तं तु विप्रेण अज्ञाना दापदापिया । ज्ञात्वा समाच- रेत्कृच्छं ब्रह्म कूर्चनु पावनं ॥५॥ व्यालनकुलमार्जारै रन्न और पृथ्वी में पड़ाहुआ जल तथा कुशाये इस प्रकार अशुद्ध नहीं होते जैसे यज्ञोंमें चमसा (पात्र विशेष) अशुद्ध नहीं होताहै ॥ ४२ ॥ ४३ ॥ इतिपाराशरीयधर्मशास्त्रे दशगोऽध्यायः ॥ १० ॥ अशुद्ध पदार्थ, वीर्य, गौका मांस और चांडालका अन्न यदि इन वस्तुओं को ब्राह्मण ने भक्षण करलिया हो तो उसकी चांद्रायणव्रत करनेसे शुद्धि होती है ।। १ ॥ तथा यदि क्षत्रीने इनको खालियाहो तौ अर्द्ध चांद्रायणव्रत करै और शूद्रभी इसीप्रकार खाले तो भाजापत्यव्रत करकै शुद्धि होती है ॥ २ ॥ और शूद्र पंचगव्यको पानकर और द्विज ब्रह्मकूर्चको पीवै और ब्राह्मण आदि चारों वर्ण क्रमसे एक दो तीन और चार गौओंका दान करें ॥ ३ ॥ शूद्रका अन्न सूतकका अन्न और अभोज्य (जिसका भोजन करना मने हो) का अन्न जिसमें कुछ अशुद्ध आदिकी शंका हो वह अन्न निषिद्धों का अन्न और उच्छिष्ट अन्न ॥ ४ ॥ इन अन्नोंको अज्ञानसे वा बिपत्ति पड़ने के शय ब्रह्मा व लानकर कृच्छ्बत करै और पवित्र क- रनेवा द्रमा भी करं ॥ ५ ॥ सांप नाला बिलाव इन्होंने जिस अन्नको उच्छिष्ट ( जूठा ) किया हो तिल और कुशाका जल छिड़कने से - अ०११ विशिष्टधर्म शास्त्र। मुच्छिष्ठितं यदा । तिलदर्भो दकैःप्रोक्ष्य शुध्यते नात्र सं. शयः ॥६॥ शूद्रोप्यभोज्यंभुक्त्वान्नं पंचगव्यन शुद्ध्यति। क्षत्रियोवापि वैश्यश्च प्राजापत्येन शुद्ध्यति ॥ एकपंक्त्युपविष्टानां विप्राणांसहभोजने । यद्य कोपित्यजेत् पात्रंशेषमन्नं नभोजयेत् ।। ८॥ मोहाद्भुजीतयस्तत्रपंक्ताबु- च्छिष्टभोजने । प्रायश्चित्तं चरेद्विषः कृच्छं सांतपनेतथा ॥६॥ पीयूषश्वेतलशुनं घृताकफलगंजने । पलाई वृक्षनिर्यासंदे- वस्वंकवकानिच ॥ १० ॥ उष्ट्रीक्षीरमवीक्षीरमज्ञानाद्ध जते- द्विजः। त्रिरात्रमुपवासेनपंचगव्येनशुद्ध्यति ॥ ११ ॥ मंडूक भक्षीयत्वातुमूषिकामांसमेवच ।ज्ञात्वाविप्नस्त्वहोरात्रंयावका न्नेनशुद्ध्यति ॥ १२ ॥ क्षत्रियश्चापिवैश्यश्चक्रियावंतौशुचि- बतौ। तद्गृहेषुद्विजै ज्यहव्यकव्येषुनित्यशः ॥ १३ ॥ घृतं क्षीरंतथातैलंगुडतैलेनपाचितम्। गत्वानदीतटेविप्रोभुजीया- उस अन्नकी शुद्धि होती है इसमें संशय नहीं है ॥ ६ ॥ शूद्रभी अभोज्य अन्नको खाकर पंचगव्यसे शुद्ध होता है और क्षत्रिय और वैश्य यदि अ- भोज्य अन्नको खाले तौ प्राजापत्य व्रत करनेसे शुद्ध होते हैं ।। ७ ।। संग भोजन करते और एक पंक्तिमें बैठेहुए ब्राह्मणों में से यदि एक ब्राह्मण भी पात्रको त्याग दे अर्थात्-भोजन करतेसे खड़ा होजायतो सब ब्राह्मण शेष अन्नको न खाय ॥ ८॥ उस पंक्तिमें उच्छिष्ट भाजनको जो अज्ञानसे खाताहै वह ब्राह्मण सांतपन कृच्छ्र प्रायश्चित्त करै !! ९ ॥ पेवची-स्वेत लहसन-वेंगन गाजर ( सलजम ) वृतका गोंद-देवताका द्रव्य कवक (पृथवीकी ढाल ) ॥ १० ॥ ऊंटनी और भेड़का दूध इनको जो द्विज अज्ञानसे खाताहै यह तीन रात्रि उपबास और पंचगव्य से शुद्ध हो- ताहै ॥ ११ ॥ मेंडक और मूसेके मांसको जानकर ब्राह्मण खतौ अहो- रात्र जौं खाकर शुद्ध होताहै ॥ १२ ॥ जो क्रिया वाले क्षत्रिय वैश्य और शुद्ध व्रत ( आचरण ) करते हैं उनके घर हग और कव्य ( यज्ञ और श्राद्ध) में सदा भोजन करें ।। १३ ॥धी-दूध-तेल-तेल से पका गुड़ लघुपाराशरी। भा०टी० त्शूद्रभाजने ॥१४॥ मद्यमांसरतंनित्यं नीचकर्म प्रवर्तकम् । तंशद्वर्जयेद्विप्रः श्वपाकमिवदूरतः ॥ १५ ॥ द्विजशुश्रूषणर तमद्यमांसविवर्जितम् । स्वकर्मनिरतन्नित्यंतं शूद्रन्नत्य जेद्दिजः॥ १६ ॥ अज्ञानाद्भुजतेविप्राः सूतकेमृतकेपिवा । प्रायश्चित्तं कथंतेषांवर्णेवणेबिनिर्दिशेत्॥१७॥ गायत्र्याऽष्टसह- सूण शुद्धिःस्याच्छूद्रसूतके । वैश्ये पंच सहसूण त्रिसहसेण क्षत्रिये ॥ १८ ॥ ब्राह्मणस्य यदा भुंक्ते द्वेसहसू तुदापयेत् । अथवावामदेव्येन साम्ना चैकेन शुद्ध्यति ॥ १६ ॥ शुष्कान गोरसंस्नेह शूद्रवेषेण आहृतं । पक्कं विप्रगृहे भुंक्ते भोज्यंत मनुरब्रवीत् ॥ २०॥ आपत्कालेतु विप्रेण भुक्तं शूद्रगृहे यदि। मनस्तापेनशुद्ध्येतद्रुपदांवासकृजपेत् ॥ २१ ॥ दासनापि तगोपालकुलामत्रार्द्धसारिणः। एतेशूद्रेषुभोज्यान्नायश्चात्मा इनको नदीके तटपर जाकर शूद्रके पात्र में भी खाले ॥ १४ ॥ जो शूद्र मदिरा और मांसमें रत हो और नीच कर्म में वर्तता हो उस शूद्रको श्वपाक के समान दूरसेही बर्जदे ॥ १५ ॥ द्विजोंकी सेवा में तत्पर मदिरा और मांस विवर्जित और अपने कर्ममें तत्पर जोशूद्र उनका ब्राह्मण त्याग न करै ॥ १६ ॥ जो ब्राह्मण अज्ञानसे सूतक बा मृतकमें जीमतेहैं उनका प्रायश्चित्त वर्णरमें कैसे कहाहै ॥ १७ ।। शूद्रके सूतकमें आठ हजार गायत्री से, बैश्यकेमें पांच हजार गायत्रीसे और क्षत्रिय केमें एक हजार गायत्री से शुद्धि होतीहै ॥ १८ ॥ यदि ब्राह्मणके सूतकमें खायतो दोहजार गायत्री जपै अथवा बामदेव ऋषिके कहेहुए एक सामवेदसेही शुद्ध होताहै ॥१९॥ शूद्रका अन्न और गोरस और स्नेह ( घी आदि ) येसव यदि शूद्रके घर से लाकर ब्राह्मणके घरपर पक्वकर खायतो वह भोजनके योग्यहैं यह मनुजीने कहाहै ।। २० ॥ यदि आपत्काल में ब्राह्मणने शूद्रके घर भोजन करलिया होय तो मनके पश्चात्तापसे शुद्ध होताहै वा एकबार द्रुपदामंत्रको जपै ॥ २१ दास-नाई-गोपाल कुलका मित्रअर्द्धसीरी (किसानका साझी ) इतनों का और अपने आपको ऐसे निवेदन करदे किमैं आपकाहूं, उसका अन्न भो- अ०११ ७२ विशिष्टधर्म शास्त्र । नंविधीयते ॥२२॥ शूद्रकन्यासमुत्पन्नोब्राह्मणेनतुसंस्कृतः । असंस्काराद्भवेद्दासः संस्कारादेवनापितः ॥ २३ ॥ क्षत्रिया- च्छूद्रकन्यायांसमुत्पन्नस्तुयःसुतः। सगोपालइतिख्यातोभो- ज्योविप्रैर्नसंशयः ॥ २४ ॥ वैश्यकन्यासमुद्भूतोब्राह्मणेनतु संस्कृतः । सह्यर्द्धिकइतिज्ञेयोभोज्योविप्रैनसंशयः ॥ २५ ॥ भांडस्थितमभोज्येषुजलंदधिधृतपयः । अकामतस्तुयोभुक्ते प्रायश्चित्तं कथंभवेत् ॥ २६ ॥ ब्राह्मणःक्षत्रियोवैश्यः शूद्रो- वाउपसर्पति ब्रह्मकूर्चीपवासेनयाज्यवर्णस्यनिष्कृतिः॥ २७ ।। शूद्राणांनोपबासः स्याच्छुद्रोदानेनशुद्ध्यति । ब्रह्मकूर्चमहो- रात्रं श्वपाकमपिशोधयेत् ॥ २८ ॥ गोमूत्रंगोमयंक्षीरंदधि सर्पिः कुशोदकम्।निर्दिष्टपंचगव्यंचपवित्रं पापशोधनम्॥२६॥ गोमूत्रंकृष्णवर्णायाःश्वेतायाश्चैवगोमयम्। पयश्चतामवर्णा यारक्तायागृह्यतेदधि ॥ ३०॥ कपिलायाघृतंग्राह्यं सर्वकापि जनके योग्य है ।। २२ ॥ जो संतान ब्राह्मणसे-शूद्रकी कन्यामें पैदाहो यदि उसका संस्कार न होयतो वह दास ( धीमर ) और संस्कार होयतो नापित (ना- ई ) होताहै ॥ २३ ॥ क्षत्रियसे जोपुत्र शूद्रकी कन्यामें पैदाहो उसे गोपाल कहते हैं उसके यहां ब्राह्मण निःसंदेह भोजन करें ॥ २४ ॥ वैश्यकी कन्या में जो पुत्र ब्राह्मगसे पैदाहो और जिसके संस्कार भी हों उसे अर्द्धिक कहते हैं उसके यहांभी ब्राह्मण निसंदेह भोजन करै ॥ २५ ॥ जिनका भोजन अ- नुचित है उनके पात्रमें रक्खे जल-दही-घी-दूध-इनको जो खाताहै उ- सका प्रायश्चित कैसे हो ॥ २६ ॥ ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र जो खांय तो यज्ञ के योग्य तीनों वर्गों का प्रायश्चि ब्रह्ममूर्च उपवाससे शुद्ध होता है ॥२७॥ और शूद्रोंको उपवास नहीं करना चाहिये किन्तु शूद्रदानसे ही शुद्ध होता है अहोरात्र का उपवास श्वपाकको भी शुद्ध करसक्ता है ॥२८॥ गोमूत्र-गो- बर-दूध-दही-धी-कुशाका जल--यहपवित्र और पापोंका नाशकरनेवाला पंच- व्य कहा है ॥ २९ ॥ काली गौका गोमूत्र, सपेद गौका गोबर, तांबेके रंग- की का दूध, लालगौका दही ॥३०॥ कपिलाका घी लेना अथवा कपिला- लघुषाराशरी । भा०टी० लमेववा । मूत्रमेकपलंदद्यादंगुष्टाई तुगोमयं ॥ ३१ ॥ क्षीरंसप्तपलंदद्याधित्रिपलमुच्यते । घृतमेकपलंदद्यात्पल मेकंकुशादकम्॥३२॥गायत्र्यादायगोमूत्रंगंधहारेतिगोमयम्। आप्यायस्वतिचक्षीरंदाधिकाठणस्तथादधि ॥ ३३ ॥ तेजो सिशुक्रमित्याज्यंदेवस्यत्वाकुशोदकमापंचगव्यमृचापूर्तस्थाप येदग्निसन्निधौ ॥३४॥ आपोहिष्टेतिचालोड्यमानस्तोकेति मंत्रयेत् । सप्तावरास्तुयेदर्भाअच्छिन्नायाःशुकत्विषः॥३५॥ एतैरुद्धृत्यहोतव्यंपंचगव्यंयथाविधि । इरावतीइदंविष्णुर्मा नस्तोकेचशंवती ॥ ३६ ॥ एताभिश्चैवहोतव्यंहुतशेषंपिवेद हिजः आलोड्यप्रणवनवनिर्मथ्यप्रणवेनतु ॥ ३७॥ उद्धृत्य प्रणवेनैवपिवेच्चप्रणवेनतु । यच्चगस्थिगतंपापंदेहतिष्ठतिदे- हिनाम् ॥ ३८ ॥ ब्रह्मकूर्चदहेत्सर्वयथैवाग्निरिवेन्धनम् । प. वित्रंत्रिषुलोकेषुदेवताभिरधिष्ठितं ॥ ३६ ॥ बरुणश्चैबगोमू- गोमयेहव्यवाहनः । दानवायुःसमुद्दिष्टःसोमःक्षीरेघृते- ही के सववस्तु लेवे, एक पल गौमूत्र आधे अंगूठे भर गोमय॥ ३१॥ सातपल दूध तीन पल दही एक पल घी और एक पल कुशाका जल हो ॥ ३२ ॥ गायत्री पढकर गोमूत्र ले गंधदाग इस मंत्रसे गोवर--आप्यायस्व इस मंत्र- से दूध दधिक्रावण इमसे दही ले ॥ ३३ ॥ तेजोसिशुक्र इस मंत्रसे घी दे- वस्यत्वा इम मंत्रमे कुशाका जल-इसप्रकार ऋचासे पवित्र करेहुए पंचगव्यको अग्नि के समीप रकावै ॥ ३४ ॥ आपोहिष्ठा इस मंत्रमे चलावें मानस्तोके इ- स मंत्रमे मथे कमसे कम सात और जिन के, अग्रभाग हो और जो तोते की रंगकी हैं ॥ ३५ ॥ उन कुशाओंमे उठाकर बिधिमे पंचगव्य का होम करै इरावती--इदंविष्ण-मानस्तांके, शंवतो ॥ ३६ ॥ इन ऋचाओं से होम करै और शष को द्विज पान कर जोंकार से ही चलाकर और ओंकारसे मथकर ।। ३७ ॥ और ओंकार से उठाकर--डोंकारसेही पीवे, जो त्वचा और हाड़ोंमें देह धारियों का पाप टिकता है ॥ ३८ ॥ उसको ब्रह्म कूर्च इमप्रकार दग्ध करता है जेले अग्नि ईधनको भस्मारतीहै तीनों लोकोंमें पवित्र और देवताओं से अधिष्ठित । जिसमें देवता रहें ) पंचगव्य होता है ॥ ३९ ॥ गोमूत्र में वरुण-गोवर में अग्नि-दधिमें पवन दूधमें चंद्रमा ७ अ०११ विशिष्टधर्म शास्त्र । रविः ॥ ४० ॥ पिवतःपतितंतोयंभाजनेसुखनिःसृतम् । अपेयं तद्विजानीयात्वा चांद्रायणं चरेत् ॥४१॥ कूपेच पतित दृष्ट्वा इसृगालौ च मर्कटं। आस्थ चादि पति- ताः पीत्वा मेध्या अपोद्विजः ॥ ४२ ॥ नारं तु कुणपं काकं विड्वराह खरोष्टकं । गावयं सौप्रतीकं च मयूर खड्गकं तथा ॥ ४३॥ वयाधमाःतहवा कूपे यदि निमज्जति । तडा- गस्याऽपिदुष्टस्य पीस्यादुदयदि ॥४४॥ प्रायश्चित्तं भवे. घुस क्रमेणतन सर्वशः । विप्रः शुद्ध्यत्रिरातत्रण क्षत्रिय स्तु दिनद्वयात् ॥ ४५ ॥ एकाहेन च वैश्यस्तु शूद्रो नक्तेन शुद्ध्यति । परपाक निवृत्तस्य परपाकरतस्यय ॥ ४६ ॥ अपचस्य व क्वान्नं द्विजश्चांद्रायणं चरेत् । अपचस्यतुय यदानन्दातुरस्त्रकुन्तः फलं ॥ ४७॥ दाताप्रतिगृहीताचद्वौ- तौनिरयगामिनो । गृहीत्वाग्निं समारोप्यपञ्चयज्ञान्न निर्व- पेत् ॥ ४८ ॥ परपाकनिवृत्तोसौमुनिभिः परिकीर्तितः । पं. घीमें सूर्यका निवास कहा है ॥४०॥ जल पीते हुए मनुष्य के मुख से निकलाहुआ जल पात्र में गिरपड़े तो बह जल पीने के अयोग्य है यदि उसे पलेि तो चांद्रायणब्रत करै ॥ ४१ ॥ कूप में पड़े हुए कुत्ता गीदड़ वंदर हाड चर्म इन- को देखकर और उस अशुद्ध जलको पीकर ॥ ४२ ॥ और का देह कौभा विष्टा मुकर गया ऊंट गाय ( नीलगाय ) हाथी मोर गेंडा ॥ ४३ ॥ भेड़िया रील्ल सिंह ये यदि कूपमें डूबसाय और निषिद्ध तालाव का जलभी यदि पियाजाय तो ।। ४४ ॥ सब पुरुषोंका क्रमसे यह प्रायश्चित्त है कि ब्राह्मण तीन रात्र, क्षत्रिय दा दिनके उपवास शुद्ध होता है॥ ४५ ॥ वैश्य एक दिनके, उपवाससे शूद्रनत ( गतका भोजन ) ले शुद्ध होता है जो दूसरेका बनाया हुआ न खाता हो और जो खाता हो ऐसे दो प्रकार के ॥ ४६ ॥ अपचका अन्न खाकर द्विज चांद्रायण व्रतकरै अपचको दान जोदे उसके दाताको फल नहीं होना ॥ ४७ ॥ वोह दाता और ग्रहण क- रनेवाला यह दोनों नरक गामी होते हैं आंग्नहोत्रका नियम करके ग्रहण पंच यज्ञ नकरै ॥ ४८ ॥ दूसरों का पकाया हुआ अन्न न खावे इसको मु- m ॥ और मनुष्य १

लघुपाराशरी।
भा०टी०
चयज्ञान्स्वयंकृत्त्वापरान्नेनोपजीवति ॥ ४६ ॥ सततंप्रातरु-
स्थायपरपाकरतस्तुसः । गृहस्थधर्मोयाविनोददातिपरिवर्जि-
तं ॥ ५० ॥ पिभिर्धर्मतत्त्वज्ञेरपचः परिकीर्तितः। युगेयुगे
तुये धर्मास्तेपुतयुचयेहिजाः ॥ ५१ ॥ तेषांनिंदानकर्तव्यायु.
गरूपाहितेद्विजाः । हुंकारंब्राह्मणस्योक्त्वातूंकारंचगरीयसः
॥ ५२ ॥ स्नात्वातिष्ठन्नहः शेषमभिवाद्यप्रसादयेत् । ताड-
यित्वात्रणेनापिकंठेवध्वापिवाससा ॥ ५३ ॥विवादेनापिनि-
र्जित्यप्रणिपत्यप्रसादयेत् । अवगूर्यवहोरात्रंत्रिरात्रंक्षितिपा-
लने ॥ ५४॥ अतिकृच्छंचरुधिरेकृच्छोभ्यंतरशोणिते । न-
वाहमतिकृच्छ्रीस्यात्पाणिपूरान्नभोजनः ॥
५५ ॥ त्रि-
रात्रमुपवासःस्यादतिकृच्छःसउच्यते।सर्वेषामेवपापानांसकरे-
समुपस्थिते ॥५६॥ दशसाहस्त्रमभ्यस्तागायत्रीशोधनपरम् ।
इतिपराशरेधर्मशास्त्रएकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
नियोंने इसे परपाक निवृत्ति कहा है और जोआप पांचयज करके पराये
अन्नसे जीवे ॥ ४९ ॥ और निरंतर प्रातःकाल उठकर परपाकमें रतहो
और गृहस्थ धर्म में जो ब्राह्मणहो और दानसे वर्जिहो अर्थात् नले ॥ ५० ॥
धर्म तत्वके ज्ञाता ऋषियोंने उसे अपच कहाहै युगारमें जो धर्म हैं औरयुगर
मे जो द्विगहैं ॥५१॥ उन ब्राह्मणोंकी निन्दा नहीं करनी चाहिये क्योंकि वे ब्रा-
ह्मण युगके अनुरूप हैं अत्यन्त बड़े ब्राह्मण को हुंकार और त्वंकार ( हूं वा
तू ) कहकर ॥ ५२ ॥ जितना दिन शेषहो उतने दिन स्नानकर बैठा रहै
और नमस्कार करके प्रसन्न ( राजी ) करै वृणसभी ब्राह्मणको ताड़नकर
और ब्राह्मणके कंठो बस्त्रभी बांधकर ।। ५३ ॥ और ब्राह्मणको विद्यासे
जीतको नमस्कार करके प्रसन्न करै और झिटक कर अहोरात्र और पृ.
थ्वीपर गिराकर त्रिरात्र उपवास ॥ ५४ ॥ और रुधिर निकाल नेपर अ-
तिकुच्छू-और रुधिर न निकाले तो कृच्छू करे-जोनौ ९ दिनतक अं-
जलि भर अन्नखायाजाता है वह अतिकुच्छू होता है ।। ५५ ॥ वा तीन रात उप-
स करै उसे अति कृच्छ्र कहते हैं यदिसब पापोंका संकर होजायतो।। ५६ ॥
दश हजार गायत्रीका अभ्यास परम शुद्धि करने लगा है।। ५७ ॥
इतिपाराशरीयेधर्मशास्त्रे भाषाटीकायां एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥

७ । अ०१२ विशिष्टधर्म शास्त्र। दुःस्वप्नदिपश्येत्तुवांतेवाक्षौरकर्मणि । मैथुनप्रेतधूवेज स्नानमेवायपोगाने ॥ १ :। अज्ञानात्प्राश्यविगमूत्रंसुरासंस्पृ- टमेवच । पुनः संस्कारमहतित्रयोवर्णाद्विजातयः ॥ २ ॥ अजिनमेखलादंडाभैक्षचर्याब्रतानिच । निवर्ततेदिजातीनां- पुनः संस्कारकाणे ॥ ३ ॥ विएभूत्रस्यचशद्ध्यर्थप्राजापत्यं समाचरेत् । पंचगव्यंचकुर्वीतस्नात्वापीत्वाशुचिर्भवेत्॥४॥ जलाग्निपतनेचैवप्रवज्यानाशकेषुच । प्रत्यवासितवर्णानांक- द्धिर्विधीयते॥५॥प्राजापत्यद्वयनैवतीर्थाभिगमनेनच । वृषैकादशदानेनवर्णाःशुद्ध्यंतितेत्रयः॥६॥बाह्मणस्यप्रवक्ष्या मिवनंगत्वाचतुष्पथे । सशिखंवपनं कृत्वाप्राजापत्यद्वयंच- रेत् ॥ ७ ॥ गोइयंदक्षिणांदद्याच्छुद्धिं पाराशरोऽब्रवीत् । मुच्यतेतेनपापेनबाह्मणत्वंचगच्छाति ॥ ८॥ स्नानानिपंच पुण्यानिकीर्तितानिमनीषिभिः । आग्नेयंवारुणब्राह्मवायव्यं वमन, तौरकर्म, मैथुन, प्रेतका धुआ, इनका स्वप्न देखे तो स्नान कहा है ॥ १ ॥ अज्ञानसे विष्ठा, मूत्र और जिसमें मदिरा मिलीहो डसको खा- कर तीनों द्विजाति फिर संस्कारके योग्य होते हैं ॥ २॥ द्विजातियोंके फिर (दुवारा ) संस्कार कर्म में मृगछाला ( मूंजकी ) कोंदनी दण्ड, भिक्षाका मांगना ये सब निवृत्त होजाते हैं ॥ ३ ॥ विष्टा और मूत्र इनको खाकर प्राजापत्य करै और पंचगव्य वनावे स्नान करके पंचगव्यको पीकर शुद्ध होता है ॥ ४ ॥ जल और अग्निमें पड़ते और संन्यास धर्मको जो नष्ट करें उन प्रत्यवासित (धर्मसे पतित ! वर्गों की कैसे शुद्धि कीजाय ॥ ५॥ दो प्राजापत्यसे तीर्थोंकी यात्रासे, ग्यारह बैलके दानसे वे तीनों ( तत्री वैश्य शूद्र ) वर्ण क्रमसे शुद्ध होते हैं ॥ ६ ॥ ब्राह्मणका प्रायश्चित्त कहता वोह बनमें जाकर चौराहेमें शिखा समेत मुंडन कराकर दो प्राजापत्यव्रत करै ॥ ७ ॥ और दो गौ दक्षिणा दे यह शुद्धि पाराशर ने कही है फिर ब्राह्मण उस पापसे छूटता है और ब्राह्मण होजाता है ॥ ८ ॥ बुद्धिमानोंने पांच स्नान पनित्र कहे है-१ अग्नेय २ वारुण ३ ब्राह्म ४ बागव्य ५ ७६ ७ लघुपाराशरी। भाटी० दिव्यमेवच ॥ ६ ॥ आग्नेयंभस्मनास्नानमवगाह्यतुवारुणं। आपोहिष्ठतिचवाझं वायव्यंगोरजः स्मृतं ॥ १० ॥ यत्तुसात पवर्षेणस्नानंतदिव्यमुच्यते । तत्रस्नात्वातुगंगायांस्नातोभ- वतिमानवः ॥ ११ ॥ स्नातुंयांतहिजंसर्वेदेवाःपितृगणैःसह। वायुभूतास्तुगच्छंतितृषार्ताः सलिलार्थिनः ॥ १२ ॥ निरा. शाश्तेनिवर्ततेबस्त्रनिष्पीड़नकृते ॥ तस्मान्नपीडयेस्त्रम- त्वापितृतर्पणं ॥ १३ ॥ रोमकूपेष्ववस्थाप्ययस्तिलैस्तपयेस्पि तृन् ॥ तर्पितास्तेनतेसर्वेरुधिरेणमलेनच ॥ १४ ॥ अवधु नोतियः केशाननालाप्रस्चश्तेहिजः। आचामेद्वाजलस्थो पिवाह्यः सपितृवतैः ॥ १५॥ शिरः प्रावृत्यकंठंबामुक्तकक्ष शिखोपिवा । बिना यज्ञोपवीतेन आचांताप्यशुचिर्भवेत् ॥ १६ ॥ जलेस्थलस्थो नाचामेजलस्थश्च बहिःस्थिले। उभेस्पृ. दिव्य ॥ 8 ॥ भस्मके स्नानको आग्नेय, जलकेको वारुण, आपोहिष्ठा इन तीन ऋचाकेको ब्राह्म, गौओंकी रजकेस्नान को दायव्य कहते हैं॥१०॥ और वर्षाके समय धूपभीनिकलरही हो उससमय मेघकी बूंदोंसे जो स्नानकियाजाता है उसे दिव्यकहते हैं क्योंकि उससमय स्नान करके मनुष्यको गंगाके स्नानका फल होता है ॥ ११ ॥ जिस समय द्विज स्नान करने को जाताहो उस समय सब देवता पितरों के गण तृषासे पीडित हुए जलके लिये वायुका रूप धरकर चलते हैं ॥ १२ ॥ यदि तर्पणसे पाहेले बा (धनी ) नेवाडडाले तो वे निराश होकर लौट आते हैं जिससे पितरों का तर्पण किये विना वस्त्र को न निचोड़े ॥ १३ ॥ रोगों पर तिलों को रखकर जो मनुष्य पितरोंका तर्पण करता है उसने रुधिर और मलसेपितर वृत किये ॥ १४ ॥ जो द्विज स्नान करके केशोंको कम्पाता है वा केशों में से जल टपकाता है और जलमें खडा वा बैठा आचमन करता है वोह मनुष्य पितर और देवताओंसे वाह [. इनके कर्मके अयोग्य ] है ॥ १५ ॥ शिर वा करउको फेर कर और कक्ष लम्बा] शिखाको खोलकर अथवा जनेऊके विना जो आचमन करता है वोह आचमन करके भी अशुद्ध होता है ॥ १६ ॥ स्थलमें बैठा मनुष्य जलमें बैठा स्थलमें आचमन न करै किन्तु दोनों जगह बैठा दोनों जगहही अ०१२ विशिष्टधर्म शास्त्र । टवासमाचामे दुभयत्र शुचिर्भवेत् ॥ १७ ॥ स्नात्वा पीत्वा क्षते सुप्तेभुक्त्वारथ्योपपर्पणे ॥ आचांतः पुनराचामेहासो विपरिधायच ॥ १८ ॥ क्षुतनिष्ठीवनचैवदंतोच्छिष्ठतथाऽनृते पतितानांचसंभाषेदक्षिणश्रवणंस्पृशेत् ॥ १६ ॥ भास्करस्य करैः पूतंदिवास्नानंप्रशस्यते । अप्रशस्तनिशिस्नानराहारन्य- प्रदर्शनात् ॥ २०॥ मरुतोवसवोरुद्रा आदित्याश्चाथदेवताः । सर्वेसोमेप्रलीयंतेतस्माद्दानंतुसंग्रहे ॥ २१ ॥ खलयज्ञविवाहेच संक्रांतीग्रहणेतथा । शर्वादानमत्येवनाऽन्यत्रतुविधीयते ॥ २२॥ पुत्रजन्मनियज्ञेवतथाचात्याकर्मणि । राहोश्चदर्श नेदानप्रशस्तनान्यदानिशि ॥ २३ ॥ महानिशातुविज्ञेयामध्य स्थंप्रहरद्वयं। प्रदोषपश्चिमौयामौदिनवनानमाचरेत्॥२४॥ चैत्यवृक्षश्चितिः पूयश्चण्डाल लोमविक्रयी। एतांस्तुब्राह्मणः आचमन करै [ अर्थात् जहां बैठा हो तहांही ] तो शुद्ध होता है ॥ १७ ॥ आचमन किये पीछे यदि स्नान करके और जल पीकर छींककर सोकर खाकर अथवा गली में चलकर वा वस्त्र पहन कर फिर आचमन कर ॥ १८ ॥ छींकना, दातोंका उच्छिष्ट, अथवा झूठ बोलना, वा पतितोंके संग संभाषण करना इनमें दाहिने कान का स्पर्श करले । सूर्यको किरणों से पवित्र जोदिनका स्नान यह पवित्र और राहु के दर्शन (ग्रहण ) को छोडकर रात्रिका स्नान अधम कहा है ॥ २० ॥ मरुत, आठ बसु, ग्यारह, रुद्र, और बारह सूर्य और देवता ये सब ग्रहण के समय चन्द्रमामें लीन (छिपे ) होते हैं नि म ग्रहण में दानदे ॥ २१ ॥ खलियान, विवाह, संक्राति, और ग्रहण, इनों रात्रिमें दान कहा है अन्यत्र नहीं है ॥ २२ ॥ पुत्रका जन्म, यज्ञ, पृतकके कर्म, राहुका दर्शनइनमें रात्री को दान उत्तम कहा है अन्य कर्ममें नहीं ॥ २३ ॥ रातिकबीचके दो २ पहरोंको महानिशा कहाहै इससे प्रदोष ( सूहिमा ) मे पिछले प्रहर में दिनके समान स्नान करै ॥ २४ ॥ चैन्यका वृक्ष [ निसे बौद्धके मतवाले पूजते हैं ] चिता राध, चांडाल, सोमलता को बेचने वाला, इनका स्पर्श करके ब्राह्मण ] १९ ॥

७८ लघुपाराशरी। भाटी पृष्ट्वासबासाजलमाबिशेत् ॥ २५ ॥ अस्थिसंचयनात्पूर्वरु- दित्वास्नानमाचरेत्। अन्तर्दशाहेविप्रस्ययूद्धमाचमनंस्मृतम् ॥ २६ ॥ सर्बगंगासमंतोयंराहुग्रस्तेदिबाकरे । सोमयतथै बोक्तंस्नानदानादिकर्मसु ॥ २७॥ कुशै:पूतंभवेत्स्नानंकुशे नोपस्पृशेद्विजः। कुशेनचोद्धृतंतोयंसोमपानसमभवेत्॥२८॥ अग्निकार्यात्परिभ्रष्टाः संध्योपासनवर्जिताः । वेदंचैवानधी- यानाः सर्वेतेवृषलाःस्मृताः ॥ २९ ॥ तस्माद्बुषलभीतेन ब्राह्मणेनविशेषत: । अध्येतव्योप्येकदेशोयदिसर्वनशक्यते ॥ ॥ ३० ॥ शूद्रान्नरसपुष्टस्याधीयमानस्यनित्यशः । जपतोजुह्व तोवापिगतिरू‘नवियते ॥ ३१ ॥ शूद्रान्नं शूद्रसंपर्कः शूद्रेणतुसहासनं । शूद्राज्ज्ञानागमश्चापिज्वलंतमपिपातयेत् ॥ ३२ ॥ यःशूद्रयापाचयोन्नत्यंशूद्रीचगृहमेधिनी । वर्जितः पितृदेवेभ्योरौरवंयातिसद्विजः ॥ ३३ ॥ मृतसूतकपुष्टांगंद्वि- वस्त्रोंसहित स्नान करै ।।२५॥ अस्थि संचयनसे पहिले रोकर स्नानकरै ब्राह्मणों को मरने से दशदिन बीते पर आचमन करना कहा है ॥२६॥ जिस समय राहु सूर्य वा चन्द्रमा को ग्रसे उस समय स्नान दान आदि कौमें सब जल गंगाके समान कहे हैं ।२७। स्नान कुराओं से पवित्र होता है और कुशासेही द्विन आचमन करै क्योंकि कुशामे उठाया जल सोमपान करने के तुल्य होताहै।।२८।। जो ब्राह्मण अग्निहोत्रसे भ्रष्ट और सन्ध्योपासनसे वर्जित हैं और वेदको नहीं पढते वे सब शूद्र कहे हैं ।। २९॥ इसकारण शूद्र होजानेके भयसे ब्राह्मण विशेष कर यदि सब वेदको न पढसके तो वेदका एक देशही पढने योग्य है ॥ ३० ॥ जो ब्राह्मण शुदके दिये अनके रससे पुष्टहो प्रतिदिन अध्ययन जप, होम करते हुए भी उस ब्राह्मणको ऊर्द्ध [ बैकुण्ठ ] गति नहीं होती। ३१ ॥ शुद्रका अन्न शूद्रका सम्पर्क ( मेल ) शूद्रके संग एक जगह बैठना शूद्रमे ज्ञानलेना, ये प्रतापीको भी पतित करते हैं ।। ३२ ॥ जो द्विन शूद्रीसे भोमन वनवाताहो वा जिसकी शूद्रीस्त्री हो वहद्विज पितर और देवताओंसे वर्जित है और रौरव नरकमें जाताहै ॥ ३३ ॥ मृतकके स्तकसे जिसका अ०१२ विशिष्टधर्म शास्त्र । जंशूद्रान्नभोजिनं। अहंसन्नविजानामिकांकांयोनिंगमिष्य- ति ॥ ३४ ॥ गृधोद्वादशजन्मानिदशजन्मानिशकरः । श्वयो नौसप्तजन्मानिइत्येवंमनुरब्रवीत् ॥३५॥ दक्षिणार्थतयोविप्रः शूद्रस्यजुहुयाद्धविः । ब्राह्मणस्तुभवेच्छुद्रः शूद्रस्तुब्राह्मणोभ- वेत् ॥ ३६ ॥ मौनत्रतंसमाश्रित्यासीनोनबदेडिजः। भु. जानोहिवदेद्यस्तुतदन्नं परिवर्जयेत्॥३७॥ अर्द्धभुक्तेनुयोबिन स्तस्मिन्पात्रेजलंपिबेत्। हतंदैवंचपियंचात्मानंचोपघातये- त्॥३८॥ जानेषुतुविप्रेषुयोरोपात्रंविमुंचति समूढःसचपापिष्ठो ब्रह्मघ्नः सखलूच्यते ॥३९॥ भाजनेषुचतिष्ठत्सुस्वस्तिकुर्वति- येद्विजाः। नदेवास्तृप्तिमायांति निराशाः पितरस्तथा ॥४०॥ अस्नात्वावैनमुंजीतअजश्वाग्निमज्यच नपर्णपृष्ठे जीत रात्रौदीपंविनातथा ॥ ४१ ॥ गृहस्थस्तुदयायुक्तो धर्ममेवा अंग पुष्ठहो और जो शूद्र के अन्नको खाताहो मैं नहीं जानता किवह किस२ योनिने जायगा ॥ ३४ ॥ परंतु मनुने ऐसे कहाहै किबारह जन्मगीय, दश जन्म सूकर, सात जन्मतक कुत्तेकी योनिमें जन्म लेता है ॥ ३५ ॥ जोब्रा- ह्मण दक्षिणाके लिये शूद्रकी हविः ( साकल्य ) का होम करै वह ब्राह्मण शूद्र होताहै और वह शूद्र ब्राह्मण ॥ ३६ ॥ मौनव्रतको धरके जो द्विज बैठे वह न बोले, और जो भोजन करता बोले वह उस अन्नको त्यागदे॥३७ आधा भोजन किये पीछे जो द्विज उसी भोजनके पात्रमें जल पावे उसका देवता ओंका और पितरोंका कर्म नष्टहै और वह अपने आत्माकोभी नष्टकरताहै।। ३८॥ जो ब्राह्मणों के भोजन करते हुए पहिले पात्रको छोड़ता ( खड़ा होता ) है वह मूढ बड़ा पापी और ब्रह्म हत्यारा कहाहै ॥ ३९ ॥ भोजन करते हुए जो ब्राह्मण स्वस्ति ( कल्याणहो ) कहते हैं उसपर देवता तृप्त नहीं होते और पितरभी निरास होजाते हैं ॥४०॥ बिना स्नान किये, और बिना अ- ग्निके पूजे, भोजन न करै और पत्तेकी पीठपर और गत्रिमें दीपकके बिना भोजन नकरै ॥ ४९ ॥ दया वाला गृहस्त धर्मकीही चिन्ता करें अपने पो- प्ये बर्ग (पुत्र वा भृत्य आदि ) इनके प्रयोजनकी सिद्धिके लिये बुद्धिमान लघुपाराशरी। नुचिंतयेत् । पोष्यवर्गार्थसिद्ध्यर्थन्यायवर्तीसबुद्धिमान्॥४२॥ न्य यापार्जितवित्तन या अन्यायनतुयोजीवे त्सवकर्मबहिष्कृतः ।। ४३ ।। अग्निांश्चकपिलासत्री राजा. भिक्षुर्महोदधिः। दृष्ठमात्राःपुनंत्येते तस्मात्पश्येत्तु नित्यशः ॥४४॥अराणंकृष्णमाारंचदनंसुमणिंघृतं । तिलान्कृष्णा- जिनंछागं गहेचैतानिरक्षयेत् ॥ ४५ ॥ गवांशतंसैकषयत्र- तिष्ठत्ययंत्रितं । तत्क्षेत्रं दशगणितंगोचर्म परिकीर्तितं॥ ४६ ।। ब्रह्महत्यादिभिर्मयों मनोवाकायकर्मभिः। एतद्गोचर्मदाने- नमुच्यतेसर्वकिल्वषैः ॥ ४७ ॥ कुटुंबिनेदरिद्रायश्रोत्रिया यविशेषतः । यद्दानंदीयतेतस्मैतदानं शुभकारकं ॥ १८ ॥ वापिकूपतड़ागाद्यैर्वाजपेयशतैर्मखैः :। गांकोटिप्रदानेनभूमि हर्तानशुद्ध्यति ॥ ४६॥ अष्टादशदिनाद|क्स्नानमेबरजख सदैव न्यायसे वः ॥ ४२ ॥ न्याय मे संचय किये द्रव्यसे अपनी रक्षा करनी जो अन्यायमे जीता है वह मर धर्मोंसे बाहर ( अनधि कारी) है ॥ ४३ ॥ अग्निकी चिाने ( होम , जो करे, कपिलागौ, यज्ञ करने वाला भिक्षुक, समुद्र, य दखने ही पवित्र करते हैं तिससे इनको नित्य दे. खै ।। ४४ ॥ अगणि, काला बिलाच, चंदन, उत्तम मणि, घी, तिलकाली मृगछाला, बकरी, इक घमें रक्षा करै ।। ४५ ॥ जहां सौगौ और एक वैल ये दशगुने अर्थात् श हजार गो और दशवल, बिना वांधे टिके उस क्षेत्रको गोचर्म कहते हैं ॥ ४६ ॥ इम गोचर्म मात्र भूमिके दानसे मनुष्य मम बाणी देह और कर्मोंमे किंय ब्रह्म हत्या आदि पापोंसे छूटता है ॥ ४७ ॥ कुटुंबी, दाग्द्र, विशेषकर, वेदपाठी इनको जो दान दिया जाता है वही शुभका करने वाला है ।। ४८ ॥ भूमिका हरने बाला मनुष्य वावड़ी-कूप तालाब आदि से और सौ १०० वाजपेय यज्ञों से और कोटि गौ देनेसे भी शुद्ध नहीं होता ।। ४९ ।। यदि जो दर्शन से अठारवें दिन से पहिले प्रा- गे कहे चांडाल आदि का स्पर्श रजस्वला स्त्री करै तौ स्नान ही करै और अठारह दिन से आगे तीनरात उपवास करै यह उशना मुनिने , राजा, ॥

अ०१२ .. विशिष्टधर्म शास्त्र । ८१ ला। अतऊर्वत्रिरात्रंस्थादशनामुनिरबतीत् ॥ ५० ॥ युग युगद्वयं चैवत्रियुगंचचतुर्युगम्।चांडालसूतकोदक्यापतिताना मधःक्रमात् ॥ ५१ ॥ ततःसन्निधिनात्रेणसचैलंस्नानमाच- रेत् । स्नास्वावलोकयेत्सूर्यमज्ञानास्पृशतेयदि ॥ ५२ ॥ विद्यमानेषुहस्तेषुब्राह्मणोज्ञानदुर्बल: । तोयंपिबतिवस्त्रेणश्व योनौ जायते श्रुत्रं ॥ ५३ ॥ यस्तु क्रुद्धःपुमान्बयाज्जायां यस्तु अगम्यतां । पुनरिच्छतिचेदेनां विप्र मध्येतु भावये- त् ॥ ५४॥श्रांतःकद्धस्तमोंधोवा क्षुत्पिपासा भयादितः। दा- नं पुण्यमकृत्वाबाप्रायश्चित्तं दिनत्रयम् ॥ ५५ ॥ उपस्पृशे- विषवणं महानयुपसंग । चीतेचैत्रगांदद्याद्ब्राह्मणा- भोजयेदश ॥ ५६ ॥ दुराचारस्यविप्रस्यनिषिद्धाचरणस्य. च । अन्नं भुक्त्वाद्विजः कुर्यादिनलेकमभोजनं ॥ ५७ ॥ सदाचारस्य विप्रस्य तथावेदांग वेदिनः। भुक्त्वान्नं मुच्यते कहा है ॥ ५० ॥ यदि चार दिन पाठ दिन बारह दिन सोलह दिन क्रम- से चांडाल सूतिका रजस्वला पतित रजस्वला इनके ॥ ५१ ॥ समीप रहै तौ बलों सहित स्लान करै यदि अज्ञान से स्पर्श भी कर ले तो स्नान करके सूर्य का दर्शन करै ।। ५२ ॥ हाथोंके विद्यमान रहते जो अज्ञानी ब्राह्मण पात्र में मुख लगाकर जल पीता है वह निश्चय करके कुत्ताकी योनि में पैदा होता है ॥५३॥ जो मनुष्य क्रोध में आकर अपनी स्त्रीको ऐसा कहै तू मेरे गमन करने के योग्य नहीं है और फिर उस स्त्रीकी इच्छा करै तो इसवातको ब्राह्मणों को सुना दे ॥ ५४ ॥ थका-दा क्रोधी अज्ञानसेन्धाक्षुधा और प्यासले दुःखी वह ब्राह्मण दान और पुश्य न करै तो तीन दिन प्रायश्चित्त करै ॥ ५५ ॥ और त्रिकाल महानदी [ गंगाआदि ] के संगम (मेल) में स्नान और आ- चमन करे और प्रायश्चित्त किये पीछे निकाल गोदान करै और दश ब्राह्मण जिमावे ॥५६ ।। दुराचारी और निषिद्ध आचरण के करनेवाले ब्राह्मण अन्नको खाकर द्विज एक दिन भोजन न करै ।। ५७ ॥ उत्तम आचरण का कृती और वेदांत का जाननेवाला ब्राह्मण के अन्न को खाकर मनुष्य अहो- लघुपाराशरी । भा०टी० पापादहोरात्रांतरान्नरः ॥५८॥ ऊोच्छिष्टमधोच्छिष्ट मन्त- रिक्षमृतौतथा।कृच्छ्त्रयं प्रकुर्वीत आशौच मरणेतथा॥५६॥ कृच्छं देव्ययुतं चैव प्राणायामशतद्वयं । पुण्यतीर्थेनाशिराः स्नानं द्वादशसंख्यया ॥६०॥ द्वियोजनं तीर्थयात्रा कृच्छ्रमकं प्रकल्पितम्। गृहस्थः कामतः कुर्याद्रेतसः स्खलनं यदि ॥१॥ सहस्रंतुजपेद्देव्याः प्राणायामैत्रिभिःसह । चतुर्विद्योपपन्न- स्तु विधिवद्ब्रह्मघातके ॥ ६२ ॥ समुद्रसेतु गमनं प्रायश्चित्तं समादिशेत्॥६३॥सेतुबंधपथेपथेभिक्षांचातुर्वण्यात्समाचरेत् । वर्जयित्वा विकर्मस्थान् छत्रोपानहवर्जितः । अहंदुष्कृत- कर्मावै महापातककारकः ॥ ६४ ॥ गृहद्वारेषु तिष्ठामि भि- क्षार्थीब्रह्मघातकः । गोकुलेषु वसेच्चैव ग्रामेषु नगरेषुच॥६५॥ तपोवनेषुतीर्थेषु नदी प्रस्रवणेषुच । एतेषुख्यापयेन्नैनः पुण्यं गत्वातु सागरं ॥ ६६ ॥ दशयो जन विस्तीर्ण शतयो- रात्र के अन्तर में पाप से छूटता है ॥ ५८ ॥ ऊर्ध्व [ बड़े ] के उच्छिष्टको वाअधः (छोटे) के उच्छिष्ठको और अन्तरिक्ष में जो मरै उसके अशौचके अन्नको और मृतकके अशौचभोजनको खाकर तीन कृच्छू व्रत करै ॥ ५९ ॥ दश हजार गायत्री-दोसै २०० प्राणायाम-और पवित्र तीर्थ में वारह बार शिर भिगोकर स्नान, ये एक कृच्छूका फल देते हैं ॥ ६० ॥ और दो योजन तक तीर्थकी यात्राको भी एक कृच्छ माना है-यदि गृहस्थी पुरुष अपने वीर्य को गिराता है ॥ ६१ ॥ वह तीन प्राणायाम करै और एक हजार गायत्री जपै-विधि से जो चारों विद्याओं से युक्त हो और ब्रह्महत्या करै तो ॥६२ ॥ उसे सेतुबंधरामेश्वर पर जाना प्रायश्चित्त बतावे और वह सेतुबंधके मार्ग में चारों वर्गों से भिक्षा मांगे ॥ ६३ ॥ कुमार्गियोंको छोड़ दे और छत्री जूता नरक्खै और ऐसे कहै कि मैं खोटे कर्मका करनेवाला और महा पातकीहूं ॥६४॥ मैं ब्रह्महत्यारा मिक्षाके लिये तुम्हारे घरके द्वारपर खड़ा हूं और गोशाला ग्राम नगर इनमें बसे॥ ६५ ॥ तपोवनों में तीर्थोंमें नदीके जहां प्रवाह हों वहां इन में अपने पापको जताता हुआ पवित्र सागर पर जाकर॥६६॥ दश योजन अ०१२ विशिष्टधर्म शास्त्र । जन मायतं । रामचन्द्र समादिष्टं नल संचय संचित॥७॥ सेतुंदृष्ट्वासमुद्रस्य ब्रह्महत्यांब्यपोहति । सेतुंदृष्ट्वाविशु- द्धात्मात्ववगाहेतसागरं ॥ ६८ ॥यजेतवाश्वमेधेनराजातुट- थ्वीपतिः । पुनः प्रत्यागतोवेश्मवासार्थमुपसर्पति ॥ ६६ ॥ सपुत्रः सहभृत्यश्चकुर्याद्ब्राह्मणभोजन।गाश्चैवैकशतंदद्या- च्चातुर्विद्येषुदक्षिणां ॥७० ॥ब्राह्मणानांप्रसादेन ब्रह्माहातु विमुच्यते विध्यादुत्तरतोयस्यसंवासःपरिकीर्तितः ॥७१॥ परा- शरमतंतस्यसेतुबंधस्यदर्शनात्। सवनस्थास्त्रियंहत्वा ब्रह्मह- त्यानतंचरेत् ॥ ७२ ॥ सुरापश्चद्विजः कुर्यान्नदींगत्वासमुद्र- गां। चांद्रायणेततश्चानु कुर्याबाह्मणभोजनं ॥ ७३ ॥ अ- नडुत्सहितांगांच दद्याद्विप्रेषुदक्षिणां । सुरापानंसकृत्कृत्वाअ- ग्निवर्णासुरांपिबेत् ॥ ७४ ॥ सपावयेदिहात्मान मिहलाकेप- रत्रच । अपहृत्यसुवर्णतु ब्राह्मणस्यततः स्वयं ॥७५॥ गच्छे- चौड़ा और सौ योजन लंबा रामचन्द्रजीके कहने से नलवानरके बनाये हुए ॥ ६७ ॥ समुद्रके सेतुको देखकर ब्रह्महत्याको दूरकरता है सेतुको देख विशुद्ध मन होकर सागरमें स्नान करै ॥ ६८ ॥ और पृथ्वीका पति राजा ब्रह्महत्या करै तो अश्वमेध यज्ञ करै फिर लौटकर घरमें वास करने के लिये आवे ॥६६॥ पुत्र और भृत्यों समेत ब्राह्मणोंको जिमावे और चार विद्यावाले ब्राह्मणोंको सौ १०० गौ दक्षिणा दे ॥ ७० ॥ब्राह्मणोंकी प्रसन्नता से ब्रह्महत्या से छूटजाता है विन्ध्याचल से उत्तर जो वसता है ॥ ७१ ॥ उसे पाराशर ऋषिने सेतुबंध का दर्शन कहा है-प्रसूति में, टिकी स्त्रीको मार कर ब्रह्महत्यामें कहेहुए व्रतको करै॥७२॥मदिरा पीनेवाला द्विज समुद्रमें जाने वाली नदीपर जाकर चांद्रायण व्रत करके ब्राह्मणोंको जिमावे ।। ७३ ।। एक बैल सहित एक गौ ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे-एक बार मदिराको पीकर अग्नि के समान हैं रंग जिसका (अत्यन्त उष्ण) ऐसी मदिराको जो पीवे।।७४॥ वह इस लोक और परलोक में अपने आत्माको पवित्र करै ब्राह्मणके सुवर्णको चुराकर आपही ॥ ७५ ॥ मूसलको अपने मारनेके लिये लेकर राजा ८४ लघुपाराशरी। भाटी न्मुशलमादाय राजानंस्ववधायतु।ततःशुद्धिमवाप्नोतिराज्ञाऽ- सौमुक्तएवच ॥ ७६ ॥ कामतस्तुकृतंयत्स्यन्नान्यथावधम- हति । आसनाच्छयनाद्यानात्संभाषात्सहभोजनात् ॥७७ ।। संक्रामंतीहपापानितैलर्विदुरिवांभसिचांडायणंयावकंचतुला पुरुषएवच ॥ ७८ ॥ गवांचैवानुगमनं सर्वपापप्रणाशनं । एतत्याराशरंशास्त्रंश्लोकानांशतपंचकम् ॥ ७९ ॥ द्विनब- त्यासमायुक्तधर्मशास्त्रस्यसंग्रहः । यथाध्ययनकर्माणिधर्मशा- स्वमिदंतथा ॥५०॥अध्येतव्यंप्रयत्नेन नियसंस्वर्गकामिना । इतिश्री पाराशरेधर्मशास्त्रेसकलप्रायश्चित्त निर्णयोनामद्वादशोऽध्यायः॥१२॥ के समीप माय-किर राजा से मर कर यह शुद्ध होता है और मुक्तिको भी प्राप्त होता है ।। ७६ ॥ यदि जानकर करा होय जो मारनेके योग्य है अन्यथा नहाँ है-एक जगे आसन से सोने से-गमन से बोलने से संग भोजन से ॥७॥ इस प्रकार पाप लगते हैं जैसे जल में तेलकी बूंद-चांद्रायण-यावक (जौंको से रूाना) और तुलापुरुष ॥ ७८ ॥ गौओं के पीछे गमन--ये सब पापोंको नाश करनेवाले हैं यह पराशर ऋषिका कहा धर्मशास्त्र जिस में पांचसौ ५०० ॥७९॥ बानवे ९२ श्लोकहैं और धर्मशास्त्रका यह संग्रह ( इकट्ठा करना) जैसे अध्ययन के कर्म हैं नाही यह धर्मशास्त्र है ।। ८० ।। स्वर्गकी इच्छा करनेवाले पुरुषको यह यत्न से पढ़ना चाहिये । इतिश्री पार रीये धर्मशास्र सकलप्रायश्चित्तनिर्णयो नामद्वादशोऽध्यायः । समाप्तोऽयंग्रन्थः। श्रीयुत शिवलाल गनेशीलालकी आज्ञाके विना कोई महाशा छापनेका साहस न करें

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Paraashara Smrxti

Author
Paraashara Muni
Title
Paraashara Smrxti
File name
Parashara Smruti
Text
OCR done
Citation
1818
Published
2006/04/7
Publisher
Laskminarayana Press,mumbai(bombay)
Language
Sanskrit
Pages
92
Library
Canegie Mellon Univeristy
Classification
Ecclesiastical Law. Canon Law. Religious Law
Keywords
Hindu religious law as expounded by Seer parashara
DLI number
486229
Barcode
1990020102818.00
Scanning centre
ASR, Melkote
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
Not Available
VMLT id
i9PZqzv6uwc
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