Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Kandalpur Ke Rajkumar Bhagwan Mahaveer
Front matter
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णमो अरिहंतारगं, पामो सिद्धार, मो आयरियारणं,
णमो उवज्झायाग, णमो लोएसब्वसाहरणं,
एसो पंच णमोकारो, सत्यपावयास हा च सन्लेसिं, पडणं हाई मंगलं।
WUSTINE கோடை
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कुण्डलपुर के राजकुमार
भगवान महावीर
मुख्य वितरफ:-
सीक्रेट सविस कार्यालय एण्ड प्रेस
३३/२० हरी नगर, मेरठ पहार
५४७८
प्रथम संस्करण-जून १६७१
द्वितीय
-सस्टूबर १९७१
मूल्य दो रुपया
पुस्तक
लेखक
।
मुण्डनपुर राजकुमार भगवान महावीर
-जयप्रमशर्मा
प्रमात पाकेट बुक्स, हरी नगर, मेरठ शहर ।
सविस प्रेस, मेरठ शहर ।
प्रकामा
-
मुद्रका
कुन्डलपुर के राजकुमार भगवान महावीर
प्रस्तुत कर्ता-जयप्रकाश शर्मा
* इतिहास कृतज्ञ है कि युद्ध और हिंसा के कालिमा की
गहन राह पर भगवान महावीर जैसे महान् तीर्थकरों
का अहिंसा वर्धक जीवन स्वर्ण की सी प्रभा लेकर
मार्ग प्रशस्त कर रहा है ।
x विश्व कृतज्ञ है कि विश्व की जनता में समभाव, भाई
चारा, अहिंसां और संयम का प्रतिमान उपस्थित करने
वाले भगवान महावीर भी विश्व की जनता मे से ही
एक थे।
* भारत कृतज्ञ है कि उसकी गोदी मे ऐसा महान्
उज्जवल सितारा ज्ञान का पूजी भूत होकर उतरा,
उसकी माटी में खेला, उसकी नदियो का जल पिया
और अपनी महानता से भारत को महान् बना गया ।
* प्रातः स्मरणीय महावीर स्वामी भगवान वर्तमान का
जीवन चरित्र भक्तों के लिये अमृत है, भारतीय जनता
के लिये संजीवन है और विश्व की भटकती जनता के
लिये जगमगाता प्रकाश स्तंभ है।
* पच्चीस शताब्दी पूर्व भारत की धरती को उस महान्
तीर्थकर का स्पर्श मिला था। अब जब कुछ ही वर्षों
मे इस महान तीर्थकर के निर्वाण को पच्चीसवीं
शताब्दी समारोह मनाया जायेगा तो उस कार्य में छोटा
सा अनुष्ठान है इस पुस्तक का प्रकाशन जिसे यशस्वी
उपन्यासकार एव पत्रकार श्री जयप्रकाश शर्मा ने बड़े
मनोयोग से लिसा है।'
.
धर्म का आडम्बर ही या वासना का कुठारा धारा सा पार हिसा की काली करतूते हो या समाज में असमानता का बोध"भारत को गर्व है कि जब विश्व के राष्ट्र मृत्यु के नाम से हो चिन्तित हो जाते थे आणिक राग रंग के लिए मां अपने ही वेटे दी प्रेमिका बनने में भी नहीं हिचकती भी मनोरजन के नाम पर खोपड़ी को मशाल जलाकर रथों की दौड़ की जाती भो और नृशपता का तंगा नाच दिया जाता था। भारत की ही पुण्य भूमि में भारत की मिट्टी को चन्दन का सा गौरव प्रदान करने के लिये पहली बार प्राणीमान समता क्ष्या ममता और अहिंसा का नाव उपस्थित करने के लिये, हिंशा को अहिंसा से जीतने के लिये, प्राणीमात्र फो ईश्वर तक पह- चने के लिये ही नहीं स्वय परमद प्राप्त रहने का अह- सास कराने वाले भगवान महावीर वर्तमान २४ तीर्थ कर के रूप में अवतरित हुये थे उनकी पुण्य जीवन गाथा दीनहीन में नवजीवन असंयमी पोर कामुक जीवों मे सयम श्रीर निष्ठा पैदा कर देती है उनकी स्मृति का यशोगान करने वाले तीर्थ महान हो गये, मधुर हो गये।
जहां जहां लगवान के चरण पड़े : बाटी चन्दन हो गई मेरे देश की धरतो, भारत की थरती गौरवमयी धरती है। विशिष्ट है यहां कि ऋतुयें, विशेष है यहां की धरती । कवियो ने प्रगर यह कहा है कि इस देश की मिट्टी चन्दन से भी ज्यादा पवित्र है तो उसमें कोई प्रतियुक्ति नहीं । पूरे संसार का इतिहास युद्ध, मारकाट से भरपूर इतिहास की कहानी कहता है, मगर भारत का गौरवशाली इतिहास कृतज्ञ है उन महापुरूषो का, जिन्होने भारत भूमि पर जन्म लेकर भारत के इतिहास के वे स्वणिम पृष्ठ भी सजो दिये जिनके गौरव को लेकर भारत विश्म मे अपनी गरिमा से चकाचौंध पैदा कर सकता है । भारत की शस्य श्यामला धरती, जिसकी मिट्टी में महापुरुषों फी सुंगध शामिल है भारत का वह वायुमडल जिसमे महान दिव्य प्रात्माओं का वाणी पोज सम्मिलित है प्राज भी अपने अन्तर में सैकड़ों विशिष्ट स्थान संजोये हुये है। लगता है कि पूरा भारत एक बहुत बड़ा उद्यान है भोर उसमें जगह जगह सुरभित पुष्पों से अच्छादित गल्प गुच्छ के रुप में तीर्थकंर प्रस्फुरित हो रहे है इन तीर्थो मैं कुछ विशिष्ट तीर्थ उस महान तीर्थकंर की स्मृति का गुणगान करते है जिसकी २५ वी निर्वाण शताब्दी मनाने की तयारी हो चुकी है घोर इन पंक्तियों का लेखक अपने इन सीमित पृष्टों मै उस प्रातः वन्दनीय महान तीर्थकर की भनुपम गाथा करने का प्रयास कर रहा है। पान्दन गांव से लेकर को प्रस्तुत -- ..कुण्डलपुर के साकेत, श्रेमाल, वैशाली, वीर भूमि, राजग्रह, मृगग्राम, मिथिलापुरा बैलगाम, दहा गांव, चांदनपुर, पुरिमाताल, पाकवीर, पफोस, नवल. शिला दहीगांव, तेपुर, चम्मा, गौर्वक ग्राम, गुणावा, कोल्लाकस- निवेश (कोल्यनगर), कुमारीपर्वत खण्ड गिरि, उदयगिरि, अपापा- नगरी पावरं पुर),अहिच्छेदन आमल कल्या अल्मिरा,उज्जैन,कम्पिला, कर्ण सुवर्ण, काकन्दी, और कुण्डलपुर तथा कुण्डग्राम में भगवान महावीर की सिद्धान्त सुरभि बिखरी है । भक्त जन निरस्तर देश के कोने कोने से प्राकर इन इन तीर्थों की मिट्टी को चन्दन से भी ज्यादा पूज्य मानकर माथे पर लगाते है। भगवान महावीर के उपदेशो को स्मरण करते हैं । जब पूरा विश्व अर्थ की दौड़ में बदहवास सा नाच रहा है, उत्तेजना और वासना को दौड़ लगी है, स्वार्थ और शोक के लिये हिंसा को नितकर्म में शामिल कर लिया गया है । ऐसे ही क्षणो मे दूर दूर से आये यात्री, इन पुण्य स्थलियों में जाकर शपथ लेते है कि वे हिंसा नही करेंगे । झूठ नहीं बोलेगे। अनावश्यक परिग्रह नहीं करेंगे । वे मतलब सग्रह करके अन्य लोगो को असुविधा नही पहुचायेंगे । और अपने पर नियन्त्रण करेंगे । अपनी प्रात्मा पर नियन्त्रण करेंगे। क्योकि भगवान महावीर ने उस सत्य को प्राज से पच्चीस शताब्दी पूर्व जान लिया था कि तप, निष्ठा और मनुष्य के कर्म ही उसके वास्तविक संगी है । मृत्यु, वुढापा, दुख से घबराना मूर्सता है । जो जैसा करता है वैसा उसे भोगना ही पड़ता है। जीवन का उद्देश्य जीना नही विश्व के अन्य लोगों को जीने देना है। जो सिर्फ जीने के लिये पाहम्बर, पाप, और ननाचार करता है उसे भी मृत्यु के मुख में जाना होता है और इन फर्मों की कहानी सिर्फ एक जन्म में समाप्त नहीं होनी । अत्याचारी मौर ।
राजकुमार & दुराचारी व्यक्ति केवल यह सोच कर छूट नहीं जा सकता कि मरना तो है ही । मरने से पूर्व जो मरजी आये किया जाये। जैसे मरजी आये जिया जाये, मर ही तो जाना है । जीवन मरण मुख्य नही । मुख्य हैं आवागमन से मुक्ति । प्राज जो कुछ हम भोग रहे है, वह भाज की कमाई नहीं, पिछले कर्मों का प्रताप है, लेकिन भविष्य मे क्या होगा वह आज पर निर्भर है । सर्व प्रथम भगवान महावीर ने ही बतलाया कि मनुष्य के, प्राणी मात्र के कर्म प्रधान है। किसी ने ठीक ही कहा है-भगवान महावीर तप प्रधान संस्कृति के उज्जवल प्रतीक है। भोगों से भरे हुए इस संसार मे एक ऐसी स्थिति भी सम्भव है, जिसमे मनुष्य का अडिग मन निरन्तर संयम प्रोर प्रकाश के सानिध्य मे रहता है । इस सत्य की विश्वस- नीय प्रयोगशाला भगवान महावीर का जीवन है । वर्धमान महावीर गौतम बुद्ध की भाति नित्तांत ऐतिहासिक व्यक्ति है। माता पिता के द्वारा उन्हे भी हाड़ मांस का शरीर प्राप्त हुआ था । अन्य मानवों की भाति वे भी कच्चा दूध पीकर बड़े हुए थे। किन्तु उनका उदार मन पालौकिक था। तप और ज्योति । सत्य और अनर्थ के संघर्ष में एक बार जो मार्ग उन्होने स्वीकार किया, उस पर दृढ़ता से पर रखकर हम उन्हे निरन्तर आगे बढ़ते हुए देखते है । उन्होने अपने मन को अखन्ड ब्रह्मचर्य को आच मे जैसा तपाया था, उसको तुलना में रखने के लिये अन्य उदाहरण कम ही मिलेंगे। जिस प्रध्यात्म केन्द्र मे इस प्रकार की सिद्धि प्राप्त की जाती है.. उसको धाराय देश और काल मे निसयौम प्रभाव डालती है। भगवान महावीर का जीवन वास्तव मे इससे बढ़कर रहा है।
१० कुन्डलपुर के अतुलनीय, भव्य, सार्थक और ऐसा कि लेखनी लिख नहीं सके। वारणी बोल नही सके । मगर इसके बावजूद भी वसन्त श्रावे गये, पतझड़ विदा लेते गये। भारत की पुण्य भूमि भारत का अनुपम घायु-मण्डल""प्रभु के चरण रज से पुलकित हो, प्रभु की वाणी से गौरव प्रदान करता हुआ आज भी भटकरो प्राणियो को मुक्ति को राह दिखा रहे हैं। वहां जहा इस प्रकार की दिव्य प्रात्माओं के चरण पड़ते हैं, वहां की मिट्टी चन्दन बन जाती है। फिर मेरा देश क्यों न कृतज्ञ होगा । इस महान तीर्थकर के प्रति जिसके वरण रज्ज से यहाँ की मिट्टी चन्दन से भी अधिक पवित्र, प्रतुलनीय एवं यशस्वी हो. गई है और समता, सामत्यता एवं सरलता का जो, पथ आलोकित हुमा"उससे न जाने कितने प्राणी मुक्ति की राह पर पहुंच पुके हैं। वह पथ भालोकित रहै, भगवान वर्द्धमान का जीवन, भगवान वर्तमान का उपदेश और मादेश जनमत मे सुचिता, पवित्रता और उन्मुकता का भाव भरते रहे और ये महान तीर्थ जो भगवान महावीर के घरण रण से पवित्र हैं "आग भी कोटि कोटि जन- मानस में सुचिता पोर गरिमां भरी सत्यता वांट रहे हैं । उस महान शान्ति पुंज से सिंचित है जिनकी गरिमा की भव्यता से प्रभावित होकर कवि का अन्तर बोल ही उठा--- ललाट में एक अनुपम ज्योति है, प्रसन्नता भानन में विराजती । मनोलता शोभित अंग अंग में, पवित्रता है पद पद्म भूमती । (श्री अनूप शर्मा यत्त वृद्धमान से (महाकाव्य) से सागार and) लेकिन यह गरिमा कोई प्रभात सुपा नहीं । राप मोर है राजकुमार महातप की कठोर साधना का परिणाम है। जिसका ध्येय संसार फा सुख नही, ऋप सिद्धि नही मुक्ति को वह अकाटय पाह है जिमको महज मानव ही नहीं, विपंच और स्यावर गति के एक इन्द्री से लेकर पांच इन्द्रो के सभी जीव केवल अपने कर्मी के कारण उपयुक्त और अनुपयुक्त है। सांसारिका प्रावागमन से छुटकारा, उद्देश्य भरा जीवन तया, जन्म जरा मृत्यु सबके प्रति समान भाव का बोध कराने वाले भगवान वर्तमान का जीवन चरित्र युगों युगों तक प्राणी मात्र में निरकर नई चेतना का प्रसार करता रहेगा। उस महान जीवन गाथा की कुछ झाकियां अगले पृष्ठो परप्रांकित करने से पूर्व मंगलाचरण के रूप मे उस अभिनन्दनीय महान तीर्थकर के चरण रज से कृतार्थ शाति और शुचिता के प्रतीक तीयों का स्मरण करना भी प्रावश्यक होगा जहा समूचे भारत, से दूर और पास से शहर पीर देहात से स्त्री और पुरुष, बच्चे और बूढे श्रद्धा के सुमन लेकर पाते है । प्रति मन, दुःखी हृदय, मगर उत्साहित उमंग से पुलकित रोम रोम भव्य शुचिता के प्रागार मे पाकर प्राणदायिनो शान्ति का अनुभव करते है । अनुभव करते हैं.''उस गरिमा का स्पर्श जो लगभग पच्चीस शताब्दी बीतने के बाद भी अजर और अमर है और भटके हुए प्राणियो को राह दिखा रही है। युद्ध नहीं शाति, हिंसा नहीं अहिंसा, तिरसा नहीं सन्तोष, वासना नहीं संयम, उत्तेजना नहीं सहजता का सन्देश , देने वाले इन सारपूर्ण उपदेशों की आवश्यकता जितनी प्राज है उतनी कभी नही थी। अस्तित्व, संघर्ष, भापाधापी, व्यापार और सांसारिक सुख जुटाने को न मिटने वाली होड़ ने जिस तामसी वृत्ति को जन्म दिया है."उसका अपरिहार्य करने के लिये गूजती है। प्रार्थना कुण्डलपुर के स्वर में स्तुतियां और नमोकार मन्त्र । अपने आप स्मृति हो जाती है उस दिव्य, विराट और युक्ति- प्रद आदेशों की जिनको लोक पर चलकर साधारणतम जीव भी एक के बाद एक सीढ़ी पार करता है। एक के बाद दूसरी गति को छोड़कर मनुष्य देह धारण करके अरहंत पद पर पहुंचकर जन्म जरा और मृत्यु से ही नहीं आवागमन के कम से छूटकर महानतम पद का गौरव प्राप्त कर मुक्त हो जाता है । पथ प्रशस्त है उस मंजिल का जहां कत्तव्य बोध है । मगर कर्तव्य के मार्ग में स्वार्थ, हिंसा, झूठ, चोरी, परिग्रह नहीं पाता । पाती है भावना, शील और सदाचार, शांत और त्याग और उनको अपना कर प्राणी मुक्त होता है। समाज अपनाता है, देश अपनाता है तो वह गरिमा को बुलन्दियों को छूता है । क्योकि जब तक देशवासी संयम, नियम असरार व्यवहार में शुचिता, पवित्रता, गरिमा और अहिंसा का बोध रहेगा। उनकी ओर विश्व प्रांख उठाकर भी नहीं देख सकता और जिस समाज में हिंसा का वोलवाता होता है। वैमनस्य और लालसा, वासना और उत्तेजना चरम सीमा पर होती है। उसको युद्ध रत होना हो पड़ता है । गवाह हैं रोम के वे साम्राज्य जहां क्षणिक लालसा के लिये मां बेटे को वासना का शिकार बनाने से नहीं चूकती थी। सोपड़ियों को मशालें जलाकर मनोरंजन होता था और छल प्रपंच से युनत जीवन को सार्थक जीवन माना जाता था। यह रोम साम्राज्य ही क्या ? आताताई और प्रत्याचारी राजापों का अन्त हो गया । साम्राज्य नही बचे, प्राक्रमणकारी लोट पोट हो गये।
राजकुमार १३ इतिहास के काले पृष्ठ भी विस्मृति के कंगार में गिर गये । मगर दिव्य महान पथ के प्रदर्शक का पथ अभी भी आलोकित है और सदैव पालोकित रहेगा । क्योकि कर्म छूटते है । कषाय मिटती हैं। पाप समाप्त होते है और हिंसा पर अहिंसा, काम, क्रोध, मद, लोभ पर संयम, सन्तोष सदैव विजयी होते आये है और होते रहेगे। पवित्रता के प्रतीक, भगवान महावीर की चरण रज से कृतज्ञ ये महान तीर्थ, जिस गरिमायुक्त वातावरण को अपने अन्तर में संजोये हुये है । उस वातावरण के युग में पहुंचने के लिये हमे समय की कई खाईयां पार करनी होगी"लगभग पच्चीस शताब्दी पूर्ण तव विश्व में दुःखमा-सुखमा काल का अन्तिम पांव खिसक रहा था, सुख पर दुख हावी हो रहा था । ऐसी स्थिति में सम्पन्नता संयम पर हावी होती है और उस काल में कुछ ऐसी ही स्थिति थी। भारतवर्ष में अर्थ संकट नहीं था । भोजन, वस्न को फमी नहीं थी। मगर दास प्रथा थी। व्यापार दूर दूर तक फैलता जा रहा था। मगर सम्परता ने लोगो को पापयंक में फंसा दिया था। शिक्षा का प्रचुर प्रभात होते हए भी विलासता थी और कामुकता की मात्रा, वासना की भूख सीमा लांघ गई थी। स्त्रोत्व की हीनता और नैतिक मर्यादा अपना बन्धन छोड़ चुकी थी। शीलधर्म का अस्तित्व मिट चला था । प्रनापार बढ़ रहा था। गन्धर्व विवाह, बलात्कार और अपहरण ही नहीं, नगर में फैले सार्वजनिक स्नानग्रह, सभाग्रह और नाटय शालायों में ग्रामोद प्रमोद कामुकता की सीमा को लांघ चुका था। और इनसे भी दूर अलग
गुन्डलपुर के
नैतिकता और धर्म, संयम और शनुशासन महज दिखावे को
घात हो गई पी।
मोडम्बर बढ़ रहा था।
दैहिक सुख, सांसारिक सुख और जीभ के स्वाद के लिये घोर
मनथं हो रहे थे।
पशु वध की परम्परा सीमा लांघ चुकी थी।
स्वार्थ उभरकर सब मोर छा रहा था। दिसावे के लिये
किया गया धर्म याचरण प्रपर हो रहा था।
उस वक्त स्वयं जैन धर्म की क्या स्थिति थी इस विषय में
स्वयं एक जैन लेखक ने लिखा है।
'इस संघर्ष में धर्म की बुरी दशा थी। धार्मिक अराजकता
पहुं ओर फैली हुई थी । एक नहीं वरिक संभवत तीनसो तरेसठ मन.
मतान्तर प्रचलित थे । लोग हैरान थे । अज्ञान अन्पकार में गहे
हुए जान ज्योति पाने के लिये लालयित थे । पो विभिन्न विचार
धारागें वह रही थी। (१) श्रमण पारा और १२) नागा
परम्परा । धमरण परम्परा को राजधय मिला था। अधिकांग
क्षत्रिय इन अमरणों को अपनाते थे। श्राजीयक खलक प्राचीन
पन बौद्ध यादि साम्प्रदाय इनमें
मुख्य थे। जैन श्रमण पराग
क्षीय धारा में चली आ रही थी। मगरण अन्तिम तीर्थकर
की प्रतीक्षा में थे। इसलिये विशेष प्रदात धर्म प्रतिपा अपने को
तीपर घोषित करने का मो. नंवरण नहीं कर सके थे। किन्तु
पाठ की डी एक तरी चटती है। शातिर उनका पतन
भपश्यमभावो था । योगों में गायन नाका घोर रिकार:
मो का उल्नेस तीन सिरिय) नाम मे लिया।
राजकुमार । काश्यय मस्किरि गोशालिपुत्र संजय वैदीत्वपुत्र, अजित के शकम्बली पकुट कात्यामन और शाक्य पुत्र गौतम बुद्ध प्रमुखमत प्रवर्तक थे । यद्यपि इनके सिद्धान्त प्रायः लचर थे। परन्तु उस क्रान्तिमय काल में जो भी व्यक्ति ब्राह्मण वाद के विरुद्ध खड़ा होता था । लोग उसी को अपना लेते थे। पूर्ण काश्यय एक दिगम्बर साधू था। दिगम्बर वह इसलिये रहता था । कि नग्न भेप मे मान्यता अधिक होगी । उनको पता था कि मनुष्य जो कार्य स्वयं करता है अथवा दूसरो से करवाता है । वह उसकी आत्मा नहीं करती और न कर- वाती है । (एवम् प्रकार्य अप्पा) अर्थात् वह अक्रिवादी थी। सभ. बत काश्यय ने भगवान पार्श्वनाथ द्वारा प्रतिपारित निश्चय धर्म का अवलम्बन लिया। उसने व्यवहार को ताक मे उठाकर रख दिया । निश्चय तप की उपेक्षा प्रात्मान कर्ता है, न भोक्ता है। वह शुद्ध बुद्ध है । परन्तु संसार मे वह शरीर बन्धन मे है, इसलिये निश्चय एकान्त उपादेय नहीं है। संखलिगोशाल भी पूर्ण काश्यय की तरह दिगम्बर वेश में रहता था। श्री देवासेन प्राचार्य ने लिखा था । कि पूर्ण पोरे मस्किरि दोनों ही पार्श्वनाथ जी को शिष्य परम्परा के मुनि थे जो भृष्ट हो गये थे। श्वेताम्बीय शास्त्रो मे मंखतिपुत्र गोशाल को स्वय भगवान महावीर का शिष्य उनकी धास्य अवस्था का बतलाया है। उस साधना फाल में भगवान मौन से रहे थे। वह गोशाल को कैसे शिष्यत्व देते जव कि वे स्वयं गुरुपद को प्राप्त नहीं हुये थे। फिन्तु शक नहीं कि पूर्ण काश्यय घऔर मस्फिरि गोशाल प्राचीन जैन धर्म भगवान महावीर के जैन धर्म से अवश्य सम्बन्धित थे। इन दोनों मत प्रदर्शकों का पापस में गहन सम्बन्ध था, और गोशाल ने जैनियो के पूर्वगत ग्रन्थों कुन्डिल पुर के के आधार से अपने मत के सिद्धान्तों को नियत किया था। जब भगवान महावीर स्वयं तीर्थकर हो गये और उनके गणघरी नवदी. क्षित ब्राह्मण इन्दमूति गौतम हुये तब गोशाल यह सहन नहीं कर पाये वह पुराने दिगम्बर मुनी थे । जैनियों के पुरातन ग्यारह अंग और कुछ पूर्व शास्त्रों को जानते थे, फिर भी उन्हे गण घर पद नहीं मिला वह रुष्ट होकर श्रावस्ती आप और अपने को तीर्थकर बत- लाकर लोगों को उपदेश देने लगे कि ज्ञान से मोक्षय नहीं होता। ज्ञानी और अज्ञानी संसार में नियत काल तक परिभ्रमण करते हुये समान रीति से दुख का अन्त करते है । देव या ईश्वर कोई है ही नहीं इसलिये स्वेच्छा पूर्वका शुन्य का ध्यान करना चाहिये । लोगों ने गोशाल की यह नयी बात ध्यान से सुनी और उसके अनुयायी भी हो गये किन्तु तीर्थकर महावीर रूपी ज्ञान सूर्योदय होते ही वह हत प्रभ हो गया । गोशाल को अपनी करनी पर पर- पाताप हुमा और वह वुद्धि भ्रष्ट होकर मृत्यु को प्राप्त हुप्रा उसके श्राजीवक मत की गणना प्रज्ञानमत में की गई है। पौर समाज व्यवस्था पर भी इसी लेखक के मान्य विचार है- - । परन्तु पुरातन ब्राह्मण परम्परा हिंसा पूर्ण यज्ञ प्राप्त प्रादि फरने में ही मग्न थी। वर्णाश्रम धर्म का मनमाना अर्थ करके ब्राह्मण-ब्राह्मण ऐतर वर्गों पर घोर प्रत्याचार कर रहे थे। शुद्र पौर स्त्रियां वो मनुष्य नहीं समझे जाते थे । जन एवं बौद्ध ग्रयों में ऐसे कई प्रमंग जिनमें जात्याभिमान के घातक परिणाम चिन्हित हैं । चिन्हह्मभुत जाउक से स्पष्ट है कि पान्डालों को रास्ता निका- लना भी दुश्वार था। यादफा प्रमाण योर वैश्य हिमयों पोटो घान्हाल रास्ते में जाते मिले । धियों ने हमे अपान माना-पानी राजकुमार आंखो को जल से धोकर शुद्ध किया और उन चान्डालो को खूब पिटवाकर उनकी दुर्गति की... और... पशुमत को पराकाष्टा वासना तृप्ति का साधन बना हुआ था । - निर्दोष दीन असहाय पशुओं के रक्त से यज्ञ की वेदी लाल- लाल हो रही थी। पशु की बलि देकर लोग यह समझते थे कि देवता प्रसन्न हो गये है। और वे यजमान की मनोकामना पूर्ण करेगे। मगर ऐसा होता कही नही था । हां, पुरोहित समुदाय को दान दक्षिणा इसमे खूब मिलती थी । इस भयानक हिंसा प्रवृत्ति ने उस समय सज्जनो के दिल को दहला दिया। (श्री कामता प्रसाद जैन कृत भगवान महावीर से साभार उधृत दान से और यज्ञ से बुरे कर्मों के प्रभाव को समाप्त करने की प्रवती ने दुष्कर्मो को बढावा दे दिया था। पाखन्ड और ढोग की बन पाई थी और वासनामय प्रामोद प्रमोद अनगिनतरूप में विकसित हो रहा था । कही पशुयज्ञ कही हर योग, कही पाखन्ड और ढोग । तो ऐसी स्थिति मे देश का एकीकरण कैसे हो सकता था। यह सच था कि अन्यायी राजा को पद से हटाने का अधिकार था, और राजा को प्रजा ही चुनती थी, मगर एक सार्वभौम सत्ता फो संजोने वाला चकृवृत्ति राजा का प्रभाव सदैव खलता रहता था और पूरा देश छोटे छोटे गणराज्यों और सघ में बंटा था । जिनमें - प्रमुख थे। (। घग (२) फलिंग ३) उत्तरीय कौशल (४) मगध (५) मल्ल्य (६) शाक्य और लिच्छवि गणराज्य ।
कुन्डलपुर के
लिच्छवि गणराज्य मे पाठ क्षत्रिय कुल के प्रतिनिधि राजा
को पदवी से विभूपित थे, मगर उनमे प्रमुख लिच्छवि ही थे। इस
गरणराज्य की राजधानी वैशाली थी वैशालो के मासपाम ही
कुन्डलग्राम कुन्डलपुर आदि बसे थे ।
लिच्छवि नामक राज्य संघ में जिस राजा का प्रभुत्ल था ।
उसका नाम था, चेटक । चेटक के पुत्र सिंह भद्र के नौ भाई और
सात बहनें थी।
भाई थे ! धन, प्रभास, प्रभंमत, अकेक, तुपंचम, मुदत्त, गुलं-
भोज, दत्तभद, उपेन्द्र ।
सात वहनें थी ? चन्दना, ज्येष्ठा, चेलनी, प्रभावती सुप्रभा,
मृगावती और सबसे बड़ी विशला ।
पन्दना और ज्येष्ठा घाजन्म ब्रह्मचारिणी रही । चेलनी
मगध के सम्राट को व्याही गई। प्रभावती कच्छ प्रदेश के राजा
तदगत की पटरानी बनी।
सुप्रभा दर्शारण देश की रानी हुई।
मृगावतो शाक्यो नरेश शतानिक, को व्याही गई और
वत्सराज उदयन की मां बनी।
सबसे बड़ी बहन थी त्रिशला..
अपरिमित ज्ञान पया, फरणा, ममता का भरपूर भंडार रिये
यह विदूपी कहलाती थी, विदेहदत्ता । महावीर भगवान की पूज
माता होने का गौरव इसी महान नारी को मिला था और उन्होंने
कवि को इस उक्ति को चरितार्थ कर दिसलाया था।
जननी जने तो भक्त जन, केदाता के मूर।
नहीं तो माता यांम रह, पाहे गपाये नूर
..
राजकुमार
देश की स्थिति समाज की दशा और धर्म मे पाडम्बर इतना
वढ़ गया था कि वास्तव मे लोग बाट जोह रहे थे। भगवान महा-
वीर के प्रागमन की।
क्योकि जब जब धर्म के प्रति अरूचि बढती है, धर्म का विनाश
होता है. हिंसा अहिंसा पर सवार होती है, कही कोई ज्योति प्रस्-
फुटित होती है।
गर्मी के बाद वर्षा का आना स्वाभाविक है । भगवान महावीर
का यागमन भी इसी प्रकर प्रतीक्षित था और निरीह जनता,
प्राणी टकटकी लगाये देख रहे थे।
:- मुन्डलपुर ! लिच्छवि गणराज्य में पाठ क्षत्रिय कुल के प्रतिनिधि राज को पदवी से विभूपित , मगर उनमें प्रमुख लिच्चपि ही थे। इस गणराज्य की राजधानी वैशाली घो वैशालो के प्रासपाम हो पुन्हलग्राम कुन्डलपुर आदि बने थे। लिच्छवि नामक राज्य संघ में जिस राजा पा प्रमुत्व था। उसका नाम था, चेटक । चेटक के पुत्र मिह भद्र के नो भाई और सात हने थी। भाई थे ! धन, प्रभास, प्रभमन, अकेजक, तुम, गुदत्त, गुम- भोज, दतम, उपेन्द्र। सात यह थी ? चन्दना, ज्येष्ठा, चेलनी, प्रमावती सुप्रभा, मृगावती और सबसे बड़ी निशला । पन्दना और ज्येष्ठा प्राजन्म ब्रह्मचारिणी नही । घेतली मगध के सम्राट को व्याहो गई । प्रभावती कच्छ प्रदेश के राजा तदगन की पटरानी बनी। सुप्रभा दर्शाग देश की रानी हुई। मृगावतो शाक्यो मा प्रतानित को गाही गई और वत्सराज उदयन की मां बनी। सबसे बड़ी बहन थी विशता" अपरिमित शान पपा, धारणा, ममता का भरपूर नंगार लिये यह विदूपी कहलाती थी, विदेहदत्ता । महावीर नगवान को पृश्य माता होने का गौरव इसी महान नारी को मिला था और उन्होंने कवि की इस उपित को परितार्थ पर दिरालाया था। बननी जने तो भक्त जन, पदाता के नहीं तो माता पांगर, थारे गयाने गर ।
राजकुमार
१६.
देश की स्थिति समाज की दशा और धर्म मे पाडम्बर इतना
वढ़ गया था कि वास्तव मे लोग बाट जोह रहे थे। भगवान महा-
वीर के आगमन की।
क्योकि जब जब धर्म के प्रति अरूचि बढ़ती है, धर्म का विनाश
होता है. हिंसा अहिंसा पर सवार होती है, कही कोई ज्योति प्रस्-
फुटित होती है।
गर्मी के बाद वर्षा का आना स्वाभाविक है । भगवान महावीर
का श्रागमन भी इसी प्रकर प्रतीक्षित था और निरीह जनता,
प्राणी टकटकी लगाये देख रहे थे ।
२ प्रभू लाये इरा जग में मंगल प्रशात" । भगवान महावीर का जन्म जिस परिवार में हुआ वह ज्ञात क्षत्रियों का प्रसिद्ध घराना था। इस घराने का मुख्य स्थान बैंगाली फुन्डग्राम वरिणयगांव, कोल्लग, प्रादि में विकसित धा । कहा जाता है कि प्राज जो वसाद नानक गांव जिला मुज्जफरपुर मे है. यहां और उसके प्रान पास महानगर वैशाली था । वैशाली के निकट ही कुन्टग्राम और परिणय ग्राम बसे थे । एक तरह से वे वैशालो फेही भाग थे । यही कारण था कि कुन्उग्राम में, भर्यात गुन्डलपुर मे जन्म लेने के बावजूद भी वे वैगातिय कहलाये। उस समय तो कुन्डतपुर को शोभा ही और कुछ पो । एक तो भगवान महावीर के जन्म को सम्भावना से नातुयें पावन हो गई थी समयानुसार तु धातो जातो थी । दूपरे कुन्डलपुर को जनता पोर शारा दोनों ही धर्म प्राय थे । मंगमी जीवन तरही दिन पर्या प्रादि ने पुन्उलपुर के वातावरण तो बड़ा मनोरम कर दिया था। गुन्जनपुर के राजा सिद्धार्थ राज सवा और रानी श्रीमती के होनहार, यशस्वी और वीरपुत्र थे। गिहार्य का विवाह तिच्या के प्रधान राजा चेटक को पुनो मिराला प्रियकारिणी में हुआ था। धनिय राना हिदाय विद्वान और उनके शासन में प्रना मुम्भी धी। संगम जीवन का महानागं प्रगया और उनीको मारमा मारानी शिमला पिया कारिता समा गयर शान मोठिमी में मटताता। - राजकुमार २१ भगवान महावीर जव गर्भ में थे, तव ही से उनकी दिव्य प्रतिभा की झलक मिलती थी ज्ञान गोष्ठियो में अजीब अजीब वर्चायें होती थी। भगवान महावीर का पूरा जीवन इस बात का साक्षी रहा है कि परिश्रम जीवन का अंग है । अगर परिश्रम आदमो करे संयम का जीवन जिये तो वह पाप मुक्त होकर कर्मों से दूर व पंचपर- मेष्टी का पद पाकर अरहंत हो सकता है । 'उनके सारे प्रयास एतिहासिक एवं कातिकारी रहे थे उन्होने शुरू से ही जिन क्रातिकारी विचारो को अपने मन मे धारा था उसकी जिम्मेदार थी उनकी माता। उनको संसार में लाने वाली गौरवशाली महिला जिसके कुशल प्यार ने महावीर स्वामी को तीर्थ कर बनने की प्रेरणा दी। तीर्थकर भगवान महावीर की जन्म घात्री त्रिशला प्रियकारिणो से किसी ने निम्न प्रश्न पूछे जिनके उत्तर देते हुये उन्होने-अपनी विद्वता का परिचय दिया था। उन से पूछा गया- सत् पुरुष कौन होता है ? 'धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष पुरुषार्थों को जो सिद्ध करके निर्णि पाये वही सत् पुरुष है। ॐ और कायर कौन होता है ? जो व्यवित मनुष्य जन्म पाकर भी धर्म, अर्थ, काम मोक्ष. प्रादि पुरुषार्थों को सिद्ध न कर सके, निवार्ण प्राप्त न कर सके वही है फायर। मनुष्यों मे सिंह होता है क्या ? हां हां क्यो नही । जो मनुष्य इन्द्रियों के साथ काम के हाथी फो पराजित फरफे जमी हो जाये वहीं सिंह समान पुरुष है। और
२२
कुन्डलपुर के
जो पुरुष सच्चे धर्म को छोड़कर गलत आचरण करता है यह
निम्न है।
अच्छा, विद्वान कौन हैं ?
विद्वान वह है जो शास्त्रों को जानकर पाप में रत नहीं होता
मोह मे नहीं फंसता । विपयो से पराजित नहीं होता वही विद्वान
है । महिलामों में श्रीप्ट विदेहवत्ता विशला प्रियकारिणी की विद्वता
इन्ही उत्तरों से झलकती है । नगवान का गौरव यया स्थिर करने
मैत्रिणला प्रिया कारिणो का प्रयास निरुतर बना रहा था।
मा का पद सदैव ही महानता का द्योतक होता है । और फिर
मिशला प्रियकारिणी को तो अपने पद का उत्तरदायित्व बहुत पहले
से हो गया था। एक रात जब प्रात.काल होने में कई प्रहर बाकी
धे तो रानी को सोलह सपने दिखाई पड़े।
इन सोलह सपनों में उन्हें निम्न रूप दिसलाई पढ़े :-
( १ ) सालत धार दांत पाला हाथी
। २ ! पालतू सफेद वैल
(३ , श्री पौर लक्ष्मी का दर्शन
। ४ } उघनता हुमा सिंह
{ ५ । दो सुन्दरमदार के फूलो को गाला
१६) उदस्त चन्द्र
(७) सूर्य
(८)ी मलिया
यो पले
। १०) मरोपर
११ । सगुन
(१२) मिसन
राजकुमार २३ . - CH. ( १३ ) विमान १४ } नागभवन (१५) रत्नभन्डार (१६ । बगैर धुये वाली आग ये सोलह के सोलह सपने शुभ भविष्य के सूचक थे । स्वयं राजा सिद्धार्थ ने इन सपनों का फल इस प्रकार व्यक्त किया था:- उन्नत चार दात वाला हाथी होने वाला बालक तीर्थकर होगा ! C पालतू सफेद बैल पालतू भाग्यशाली सफेद बैल का फल यह होना चाहिये कि बालक बहुत बड़ा धर्म प्रचारक बनेगा। आकाश की ओर उछलता हुमा सिंह होने वाला बालक भतुल वीर होगा, पराक्रमी होगा। श्री और लक्ष्मी का दर्शन इस बात का द्योतक है कि बालक का राज्य पर अधिकार रहेगा। ® दो सुन्दरमदार मालायें इस बात का प्रतीक है कि होने वाला सुगन्धमय शरीर का धारक यशस्वी होगा। चन्द्र और सूर्य का दर्शन इस बात को व्यक्त करते है कि होने वाला वालक मोह के अन्धेरे को समाप्त करके अज्ञान का नाश करेगा और ज्ञान फा सूरज विकसित करेगा। 0 मधलियो का जोडा इस बात की अोर सकेत करता है कि वह अनन्त सुख प्राप्त करेगा। ।
२४ सुन्उलपुर के @दो घटे दो घंटे का अर्थ यह है कि वह मंगलमय, सुन्दरतम होते हुये भी ध्यानी व्यक्ति होगा। 0 सरोवर सरोवर का दर्शन भगवान महावीर के जीवन के सबसे बड़े पर्म की पोर बोध करता था। जिस प्रकार सरोवर सवसी प्यास बुझाता है उसी प्रकार यशस्वी भगवान प्राणो मात्र को ज्ञान की प्यास को दूर करेंगे । इसमें कोई सन्देह नहीं । -- ॐ समुन्द्र aa- जिस प्रकार समुन्द्र प्रयाह होता है उसी प्रकार भगवान महावीर फा गान भी कोई सीमा न रसेगा प्रतिज्ञान का अपरिमित सागर। विमान दर्शन देव पुरप ही विगानों का प्रोग करते हैं। पाने वाला मता- पुरुप भो स्वर्ग से विमान पर पा रहा है। नागभवन गू साप सगाने का पहरा देते है । मगर सपने में नागमयन फा मन यह है कि यह स्थान मुख्य तीर्य में परिवरित हो जायेगा। रत्न मन्धार मानव जोगन के मागे बड़े रल उसके गुण होने नगगन महावीर सभी मानवीय गुणों से परिपूर्ण होंगे। 9 वर घुये के होने पालो अनि पा गर फर लिग प्रकार अनि गायबर दामी उनी प्रशर भगवानगीर गामों साक्षाको दप्राप्त गरे । गत मादीर नामा मामी गया IF I TET मा गगनद गिरी। गुन्दर ममीर बनना अग्नि में पाया " राजकुमार २५ थी। संकेत महान करने लगे। उस समय की सभी बातें शुभ शुभ घटना का द्योतक होता है । फिर यहां तो साक्षात भगवान महावीर पधार रहे थे। धीरे धीरे सभी ग्रह नक्षत्र उच हो गये । चैत शुक्ला त्रयोदशी को उस साल सोमवार पड़ा । चन्द्रमा उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र पर प्रा टिका । आकाश निर्मल । ऋतुओं मे बसन्त का सौरम और मस्त भंवरो से भरपूर फूलों की वर्षा "अचानक दम्भी बजने लगी। धन घोर गंभीर स्वर प्रसन्नता के आहुलाद में बदल गया। राजराती त्रिशला प्रिय कारिणी राज माता बन गई। भगवान महावीर अवतीर्ण हो गये। जैन शास्त्रों का कथन है कि भगवान महावीर के जन्म के समय चौथे काल दुखया सुखया में, ७५ वर्ष ३ मास शेष रहते थे। भगवान के जन्म का उत्सव स्वर्ग के देवेन्द्रों को खींच लाया। दस दिन तक उल्लासमय पर्व होते रहे। दिये जलाकर ज्योतिमय पर्व मनाया गया। दान पुण्य और मुक्ति की लहर दौड़ गई। राज्य के समस्त वन्दीजन छोड़ दिये गये । कहा जाता है कि सोधर्म इन्द्र ने बाल प्रभु को सुमेरू पर्वत स्थित रत्नमयी पान्डूक नामक शिला पर ले जाकर अभिषेक किया । अनेक प्रकार के दिव्य वस्त्र पहनाकर निर्मल जल से तिलक किया । सुगधित मालायें पहनाकर नमस्कार किया और भगवान का नामकरण वीर के रूप में किया। ऐसा लगता था जसे भगवान महावीर के आगमन के साथ प्रभू के साथ साथ मगल प्रभात हो गया था । और वास्तविकता भी यही थी कि उनकी स्तुति करते हुये दिव्य प्रात्मानो ने कहा था-'जिस प्रकार सूर्य की अनुपस्थिति मे कमल नहीं खिल सकते। उसी प्रकार प्रापके रूचिर वचनो के बिना तत्ववोध भी नही हो सकता । और तो और भव्य आत्माओं को भी · वह तत्ववोध २६ कुन्तपुर के कठिन है। आपकी अन्तरात्मा कठिनता से रहित है । धाप महान् विभूति सम्मन्न ऐसे झिलमिलाते रत्न हैं, जिनके प्रकाश से प्राणीमात्र प्रालोक्ति होते हैं । मौर वास्तविकता यह थी कि जब से भगवान गर्मस्य हुये धे कुन्डलपुर के भाग्य ही खुल गये थे। घर में, नगर में, राज्य में धन और घान्य को देहद वृद्धि हुई थी। इन वृद्धि के कारण उनके पिता ने उन्हें जो नाम दिया वह था वर्तमान । निरन्तर वृद्धि- धन धान्य ती। सुन्ध सम्पदा की। क्यों न हो ! सुदूर दक्षिण से घाने पाता मलयनित का झीका पूरे वातावरण को नुरभिमय फर देता है । फिर भगवान महावीर तो तीर्थकर धे । जब उनके पिता ने उनका नामकरण उत्सव मनाया होगा तो वह शोभा देखते ही दनती होगी । रामा के प्रांगण में सुबह से मृग वीणा उमलकर गायक और नका पधार गये थे । उन्होंने मधुर मार सरना पर मर दिया था। धनधान्य से पूर्ण जव जनपद के यासियों ने गुगा कि उगो राजा के यहा पुषहमा है तो वे गले पजाते पचार । उस राजापा जो बिना मांगे दान देता था। उस परत पी शोभा या मल- गीय रही होगी पर प्रसन्नता से बधाई मंगल गावे प्राम पानी पुगपुर में प्रवेश कर रहे रोगे । घना पा सोयी गमा मंटन, महोमादियों से पौभित , पुलों से मातापित गमा रोदस्य मोर मांगा मार्ग पर मन गुमायो वाली गाटे । भधारे ग्रामदानो टाटीबायपर पर शोगा नि, पाप सरनी को सामने।
राजकुमार २७ - आह क्या रूप था। पपूर्व गोरा रंग था। बालक के गाल ऐसे जैसे वसन्त के फूल खिल रहे हो। सूरज और चांद दोनों की छवि उसके चेहरे पर पड़ रही थी और ऐसी कोमल' भावना बाल भगवान के चेहरे पर नाच रही थी कि देखने वाले मुग्ध हो गये । सौभाग्य से मंडित मुखचन्द्र से दृष्टि उठाने को मन ही नहीं करता होगा। और चकित से ग्रामवासी देखते होगे उस राजकुमार को जिसको कमनीयता में फूल भी शरमा जाये। उस वक्त रोज माता के सुख का क्या ठिकाना । प्रसन्नता से गद्गद् मन- ओज और उछाह से भरा मन । और उत्सव की प्रविणत शोभा- चकित से देखते प्रजाजन विभोर हो उठे। वे अनुभव कर रहे थे संसार मे शान्ति भरे दिन आ रहे है। प्राणीमात्र के सुख के लिये चितित राजकुमार एक एक को ध्यान से देखते हुये सबका ध्यान केन्द्रित कर रहे थे । बन्दी मुक्त हो गये। प्रजाजन हर्षित हो उठे। राज्य भर मे शान्ति । सब सुखी। धन धान्य की तो जैसे वर्षा हो रही थी। और दूर कुन्डलपुर से दूर हिंसा के त्रास मे दुखी आर्द पशु राह देख रहे थे । कब आयेंगे भगवान । वह मगल प्रभात जो कुन्डल पुर मे आ चुका है उसे लेकर कब पूरे विश्व का प्राणीमात्र को सुख की ओर शान्ति को राह बतलायेंगे। अज्ञान दूर करेंगे । कब --
२८
गुन्टल पर
।
उन्हें देखकर एक विद्जन गुणी ग्राहक ने कहा था-हे राजन।
प्रापका सुपुत्र यल फोति और धर्म मे अपूर्व होगा। सारे संस्कार
इसके लिये वृथा से हैं। क्योकि लक्षण यह दीसा रहे है कि
यह वालफा सिद्ध प है। इसके लिये चिन्ता फरना है
क्योंकि यह अपने ही ढंग की धर्म योजना चालू करेंगे।' जिम
व्यक्ति ने घे पणा की थी वह एक साधू थे। सुविज्ञ । देखने से
जानकार लगता था और वयोवृद्ध भी था।
ज्योतिपियों ने वाराक के
ग्रह देसकर घोपणा की थी कि
यह बालक ऐसा प्रतापी भी होगा कि उसका या पांद और सितारे
सुनाया करेंगे। संसार की क्रान्ति लाने मे अग्रगण्य पद बाजर
तेजस्वी, पूज्यनीय और प्रादरणीय रहेगा।
पौर प्रभू भगवान महावीर ! जो इस संसार में भटो प्रारली
माम यो राह दिसाने, उनके दुसरोगी पाली रात को गमा
प्रमात में बदलने के लिये आये ये ये मय पुर जानार जी
मुस्करा रहे थे । मंगल प्रभात मा चुका था और धर्म के मासम्पर
मे पिनते जीव उस मंगल प्रभाव को देखने को सासमिती
--
प्रभू जन्म, नामपर मादि मा समारोह मंगल प्रभात पो
मंगल ध्वनि के रूप में निता और पमिमा पागौरममा
५
-
कुन्डलपुर के राजकुमार अध्यातम जगत
३ । के चक्रवृति
चक्रवृति सम्राट का पद प्राप्त
करने के लिये क्रिया शील हुये.....
भगवान का एक और नाम रखा गया ।
सन्मति ।
कहते है तब भगवान बाल अवस्था में ही थे कि उन्हे झुले या
पालने मे लिटाया हुआ था। भगवान की परीक्षा के लिये कहो
या शका निवारण के लिये आकाश मार्ग से दो ऋषि आ गये ।
नाम था सजय और विजय । उनको रिद्धी सिद्धी प्राप्त थी। उनके
मन मे शकाये थी। भगवान के समक्ष शका निवारण के लिये
पाना चाहते थे सो पा गये । लेकिन यह क्या, भगवान के दर्शन
मात्र से उनकी शंकायें दूर हो गई । दिव्य दर्शन का प्रभाव ऐसा
ही होता है । उन्होने शका निवारण होते ही भगवान को एक
नाम दिया । यह नाम था सन्मति ।
वीर।
वर्तमान!
फवियो की दृष्टि मे भगवान का नाम पड़ा-'नाय कुल नन्दन ।'
ज्ञात पुत्र ।
और माता से पाये नाम थे विदेह, विछेह दित्र, वैशालिक ।
प्रतिवीर।
निग्रन्य।
महतिवार अर्थात् भगवान महावीर । परम तीर्थकर, अन्तय
कुन्डलपुर के
।
.
का रमय-महामान्य ब्राह्मण वसुध बांधव । और वे नाम आग
है जिनसे साधारण भक्तों ने पुकारा था ।
उनके पिता राजा सिद्धार्थ के विषय में जिन शास्त्रों ने स्पण्ड
लिखा है कि सूर्योदय के बाद सिद्धार्थ राजा जब अवृत शाला में अर्थात
व्यायामशाला मे जाकर व्यायाम करते थे । व्यायाम अर्थात् शरीर
लोच, मास्तोलन । इसके बाद मल्लयुद्ध में जुट जाते थे ! इस
व्यायाम और मल्लयुद्ध से परिश्रम होना स्वभाविक है । परिश्रम
कर लेने के बाद दो प्रकार के तैल यथा सहस्त्र पर (एक हजार
द्रव्यों में पका तेल) और रात पक (सो द्रव्यों में पफा' तेल की
मालिश कराते थे । यह तेल रुधिर प्रीतिकर, दीपन भोर वल की
वृद्धि कराने वाला होता था व्यायाम के बाद वे स्नान करते थे।
स्नान के बाद देवोपासना भी होती थी। तदनन्तर दैनिक कार्य
क्रम
(कल्प सूत्र से साभार)
महावीर स्वामी का बाल्य जीवन का जितना उल्लेख मिलता
है वह अनुकरण के योग्य है । आठ वरस की साधारण अवस्था
में भगवान वर्तमान ने संकल्प लिया था।
वे जोवों पर दया करेंगे।
सदा सच बोलगे।
चोरी नहीं करेंगे।
बह्मचर्य का पालन करेंगे।
अपनी माकांक्षानों को सीमित रखेंगे।
जीवों पर दयो, सत्य भापरण, चोरी न करना, ब्रह्मचर्य का
पालन और आकांक्षायें सीमित रखने का अर्थ हुमा कि भगवान
महावीर ने पांचों व्रतों का पालन करने का व्रत ले लिया था।
राजकुमार
इसका अभिप्राय यह नहीं है भगवान महावीर का जीवन
नीरस रहा । वे निर्भीक नही थे । उसकी निर्भीकता की चर्चाये तो
देवलोक मे इन्द्र तक पहुंच गई।
कहते है कि इन्द्र के दरबार मे एक दिन भगवान महावीर के
परोपकार की चर्चा हो रही थी।
सब प्रानन्द से सुन रहे थे !
मगर एक दैव इस चर्चा को सुनकर न रह सका । उसका
मन ई से जल उठा ।
बोला-'प्रभी जाना है।'
'कहा।
'नीचे।
उस समय महावीर वद्ध मान अपने मित्रो के साथ आंख
मिचोनी का खेल खेल रहे थे।
अचानक वाग मे एक विषघर प्रगट हुआ।
काला नाग ।
फन उठाये।
क्रोध और क्षुमित विषभरी फुकार से महावीर स्वामी के
सखा मित्र भयभीत हो गये ।
मगर भगवान महावीर तो जरा भयभीत नहीं हुये उन्होंने
बड़े धैर्य से उस काले नाग को बस मे कर लिया।
भगवान महावीर के कोशल से पराचित हो देव को अपनी
वास्तविकता बतलानी पड़ी और भगवान की यश गाथा गाता हुआ
पह
अपने घाम चला गया।
जो तीर्थकर जन्म से होते हैं उनकी विशेषतायें कुछ और
होती है, ये विशेषतायें संख्या मे दस है, जिनका उल्लेख शास्त्रो मे
कुन्डलपूर के इस प्रकार किया गया है- १. शरीर मलमूत्र रहित । २. पसीना लोप। ३. रक्त, मांस, दूध के समान । ४. वज वृभपताराच सेहनन । ५. समचतुरस्त्र संस्थान ! ६. रूप अद्गुत । .. सुगन्धित शरीर। ८. शरीर में १०८ लक्षण । ६. अनन्तवक्ता। १०. धीर गम्भीर वाणी। स्वयं महावीर सात हाथ के सुन्दर वलिष्ट युवक के रूप में अवतरित हुये थे। ऐसी यौवन श्री मिली थी कि राजा रानो अपने पुत्र को देखकर फुले नहीं समाते थे। युवावस्था को देख विशला प्रियकारिणी की ममता ठिठक उठी। मां की बेटे के प्रति दूसरी मनोकामना सुन्दर वधु होती है। स्वयं बड़े बड़े राजारों के घराने इस महान तीर्थकर राजकुमार के लिये अपनी लाडलियां देने को प्रस्तुत थे । एक दिन मुअवसर देख कर पहले तो राजमाता ने अपने पति से मंत्रणा को फिर उनकी सहमती पाने पर वर्द्धमान,से वोली-~'बेटा, फलिंग देश के महाराज जितशुत्र अपने लाव लशकर सहित कुन्डग्राम प्राये हुये है। उनकी यशोदा नाम की राजकुमारी बड़ी सुन्दर है । हम उसे अपनी पुष वधु बनाना चाहते हैं।' 'पया मां?' 'तात, यह हमारा अहोभाग्य है कि मिलीग्य पूज्म होने के
परई राजकुमार
लिये संसार मे अवतरित हो गये है । वत्स, तीनों लोक के प्राणी
तुम्हारे एक मात्र दर्शन के प्रति ललाइत रहते है । हम तो तुम्हें
देखक - जीती है। हमारी एक इच्छा है वत्स उसे पूरी कर दो।
तुम हमारे पुत्र हो। हम तुम्हे पुत्र वधु के साथ देखना चाहते
1
'मां'
'वत्स बोलो । इच्छा पूरी करोगे न हमारी ।
'मा समय कहां है।"
'क्यों बेटा ?'
'जरा घर से बाहर निकलो मा। देखो तो संसार की कैसी
दशा है । एक दम दुदशा-न शील शेष है न धर्म । लोग काम
क्रोध मोह लोभ पोर परिग्रह के वश हो रहे हैं। श्रवकों की बात
छोड़ो साधू भी रगगी फे मोहमाया वश हो रहे हैं । सुन नहीं रही
यज्ञ मे अति दुखी कटते पशुप्रो की पुकार । धर्म के नाम पर होने
पाले ढोग, श्राडम्बर और दुखी जनो का हाहाकार ।'
'मैं जानती ह वत्स । तुम अवश्य ही लोक का कल्यारण फरोगे
मगर अभी तुम्हारी अवस्था ही क्या है ? तुम पर यौवन श्रीमोहित
है । यह ब्रहस्थ प्राश्रम मे प्रवेश करने की प्रायु है । यह अवस्था
है जब श्रावक बनकर ग्रहस्थ धर्म का आर्दश उपस्थित करो।'
'मां'
'घत्स।'
'पाप पाहतो तो ठीक है। मगर इस शरीर का भरोसा
क्या ? जर मुझे इस संसार मे काना नहीं तो मैं क्यू स्त्री मोह
मे पर
'और मा।'
कुन्डल पुर के
त्रिशला प्रियकारिणी।
वह साधारण नहीं तीर्थकर भगवान महावीर की मां थी।
विद्वषो।
विदेह दत्ता।
उनके सामने संसार के दुख इण्टि गोचर होने लगे।
अन्धा विश्व ।
अन्धा धर्म।
स्वार्थ और आडम्बर ।
उन्हें मालूम था कि शील उठ चुका है ।
काम ओर वासना से पीड़ित निर्लज्ज होकर गलत आचरण
में रत है । ब्रह्मचर्य का प्रास्तित्व मिट रहा है ।
और लोगों के मन मे यह धारणा घर करती जा रही है कि
पाप को यज्ञ द्वारा दान द्वारा खत्म किया जा सकता है । पशुओं
फी वलि देकर लोग समझते थे कि उन्होने अपने पापो का मैल
धो डाला है।
राजकुमार सही कहते हैं। फाय तो क्षण भंगुर है।
वे
राजकुमार
के निश्चय पर प्रप्रसन्न नहीं
थी कि वह सही रास्ते पर चलने को उद्यत है । उन्होने राजमार
के इस निश्चय का अनुमोदन किया ।
वेचारे कलिग नरेश!
उनकी राजकुमारी यशोदा-
वेचारे निराश होकर लौट पड़े 10
कुछ शास्त्रो का (श्वेताम्बरीय शास्त्रों का मत है कि
भगवान महागेर का रागा समरवीर की कन्या यगोश के साथ
हुई। वे जानती
-- राजकुमार . व्याह हुआ था और एक पुत्री का भी जन्म हुआ था । मगर ऐसा लगता है कि श्वेताम्बरीय पास्त्र बौद्धों से ज्यादा प्रभावित होते दोख पड़ते हैं और उन्होने महावीर स्वामी का परित्र गौतमबुद्ध के सद्रश्य रचने का प्रयास किया था । और वह तत्कालीन नही कभी समय बाद जोड़ा गया मालूम होता है । क्योकि श्वेताम्बरीय शास्त्रो मे प्रमुख कल्पसूत्र और प्राचारत्रि सूत्र में इसका उल्लेख नही है । हुमा यह कि श्री भगवान के मोक्षगामी होने के बहुत वर्षों के अनन्तर विदेह देश मे घोर अकाल पड़ा था । फलतः उनके अनुयायी जो जीवित बच सके दक्षिण की ओर चले गये। उनके अनुयायियो के तितर बोतर हो जाने से धार्मिक सामग्री लुत हो गई और इस प्रकार जो अलग अलग लोक किदन्ती के आधार पर सामग्री प्राप्त हुई है उसमे अधिकांश इस बात की गवाही देते हैं कि भगवान बाल ब्रह्मचारी ही थे । लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भगवान निष्कम होकर हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहे । वे इस प्रकार इस ससार में रहे जैसे फमल जल में रह कर भी जल से ऊपर रहता है । जब तक वे ग्रहस्थ में रहे, अपने पिता का कुशल' सहयोगी की भाति राज काज मे हाथ बंटाते रहे। लेकिन वे हमेशा निश्चय करके सोचते रहे कि धन हमे सुखी नही बना सकता । स्वास्थ्य हो या भाक्ति सुख उनमे नही है। सुख है फेवल प्रकृति मे ! वही हमको सुख स्वा- स्थ्य, धन, दीर्घ श्रायु प्रादि वस्तुये प्रदान कर सकती है। पगर सच्चा सुख इनमे भी नही है। संसार सुरा क्षरण भगुर हैं- गगर प्रात्मिक सुख । पही तो वारतविक सुख है।
कुन्डल पुर दे सके। । मान लीजिये साधारण पत्थर पीर बहुमूल्य होरा दोनो ऐसे व्यक्ति के हाथ मे है जो नेत्र होन है । वह उन दोनों की ज्योति नही देख पाता । उसके लिये तो दोनों ही बराबर है । अतः ज्ञान का होना आवश्यक है सम्यक ज्ञान जो आत्मा को परमपद पर ता मे सहायता भगवान महावीर तो उसी सन्देश को घर घर पहुंचाने पाये थे । वे उस पावन समय की तलाश कर रहे थे जब वे प्रार्दमा का कल्याण करने के लिये इस जग से ऊपर हो उठेगे । भगवान महा. वीर का जन्म जात क्षत्रीय कुल मे हुया था । क्षत्रीय परमरा मे जोखिम उठाना पर्तव्य समझा जाता था अतः जब भगवान महावीर ने तोस वर्ष की अवस्था में आकर अपने मन की व्यया को समझा और विचार किया कि उनके तीन ज्ञान नेत्र हैं। वे अ.त्मज्ञानी है इसके वावजूद उन्होने तीस साल का अपना अमूल्य समय ग्रहस्य के पचड़ो मे खो दिया। अब उन्हे वगैर देरी के महासंयम धारण करना होगा। वक्त भा गया है- जव वे घर द्वार छोड़ दें। और त्याग, सयम और रत्यानुष्ठान को ग्रहण करेंगे। राजकुमार को वैराग्य हो गया। माघमाउ फी दशमी । शुक्लपक्ष"चटता हुप्रा चांग शुभ घड़ी लेकर आ पहुंचा था ! राजकुमार महावीर अनुष्ठान के लिए प्रस्तुत हो गये । और भरी सभा में उन्होने मांसारिक सुग छोड दिये । परमगुव पाने के लिए उन्होंने सासारिक सुप त्याग दिये। को गस्ताद, मध प्रटानिला, काटिग लिया
६७
रजकुमार
1
राजमहलो की रसभरी महिलायो का हास परिहास ।
देहिक सुख ! सांसरिक सुख ! राजकीय वैभव छोड़ कर
भगवान महावीर ने दीक्षा ली।
सब जानते थे, कैसी विहविलता का समय है ! कुन्डलपुर का
राजकुमार विश्व का राजकुमार ! पालोक शिखा होने जा रहा है।
वह सबको रास्ता दिखलायेगा। विश्व के प्राणी इसकी शरण में
आकर दीक्षा ग्रहण करेगे । मगर फिर भी वियोग वेला बेचैन
करने वालो ही थी । ज्ञान की शिखा को प्रज्वल्लित करने के लिये
धात्म त्याग करना पड़ता है, और भगवान महावीर ने तो सर्वस्व
त्याग कर दिया ।
सबसे अधिक विहवल हो रहा था माता का हृदय । विदेह
दत्ता त्रिशला प्रिय कारिणी जानती थी कि भगवान महावीर ने
उनके घर जन्म लेकर उन्हे गौरवमण्डित किया है उन्हें अधिक
दिनो तक रोका नही जा सकता।
और क्षत्रिय वश की परम्परा है कि युद्ध के लिये वेटो को
हंस हंस कर विदा करती हैं ।
फिर उनका लाडला तो विश्वविजयी होने जा रहा है।
एक लोक कथा है कि एक राजा ने अपने समस्त शत्रुनो को
जीत लिया । मगर उसके मन की लोप्सा भरी नही । उसने अपने
मंत्री और सेनापति को बुलाकर कहा-'मन्त्रीवर' मैं अब दूसरे ग्रह
मे अपनी सेना भेजना चाहता हू ।' उन मन्त्री और सेनापति मे
सबसे अधिक समझदार मन्त्री था। वह शांति प्रिय था और राजा
को युद्ध नीति से अक्सर तंग घाता था । बोला-'राजन ! दूसरे
उपग्रह पर सेना भेजने की आवश्यकता नहीं हैं।'
.
-
३५
कुन्डल पुर के
'इसका अर्थ है कि कोई पराजित होने वाला शेप है।'
'हा राजन !'
'सेनापति उस पर आक्रमण कर दो ।'
'राजन उस पर आक्रमण सेना नहीं करेगी ।'
'क्यों?
'उस पर आप आक्रमण करेंगे।'
'इतना भयानक शत्रु है कि हमें प्राक्रमरण करना होगा।'
'जी।'
'उसका नाम बतलानो।'
'राजन गरीवी को जीतना है । दुख को जितना है । बीमारी हो
जीवना है । मनुष्य को तो सब जीत लेते है । पाप मनुष्यों हो
परेशानियों को जोतिये । सव द्विक् विजय करते है पाप भी हि
विजय कीजिये । ऐसी की उस सीमा तक बीमारी न हो । दुर
न हो । गरीवी न हो । कुमाघरण न हो और अगर आप यह जीत
सके तो मैं अपने आप को कृतार्य मानूंगा । इतिहास यापका
कृतज्ञ होगा।
हिंसा की लड़ाई से अहिंसा का युद्ध सदेव भयंकार, संघर्षपूर्ण
होतो है मगर उसके परिणाम बड़े सुलद हैं। वह सम्राट निरन्तर
जीवन भर इस लड़ाई को लड़ता रहा और वह ताई कमी नहीं
रुकी।
भगवान महावीर भी ऐसे ही युद्ध के सैनिता पन पर जा
रहे थे ।
पुण्डलपुर का राजयुमार विश्व के पुखणे, प्राणीमान को पर
पानियों के भवभय को जीतने के लिये निकलना था कमा-
वि था कि उस वक्त लोग वन्दना फररो, देव पुर वर्ग करने
प्रोर इन्द्र उनका सम्मान में सुति गाते । शादी का EITIE
।
राजकुमार
३६
---
दीक्षा के समय लोकान्तिर देव कुण्डलपुर आये थे भोर उन्हें
नमस्कार करके बोले थे-'हे देव, हमारा प्रणाम स्वीकार करो।
प्राप पूज्य है । आप इसलिये पूज्य है कि पाप मोह रूपी कीचड़
में फंसे हुये जीवों को अपने ज्ञान का सहारा देकर बाहर निकालेंगे।
आप नये तीर्थ का निर्माण करेंगे। इसलिये हे देव हम भापको
नमस्कार करते है।
राजा और प्रजा ।
सज्जन और विज्ञजन ।
सभी इस समारोह मे उपरिथत थे। सभी कल्याणकारी उत्सव
मे मौजूद थे।
युवक महावीर वैराग्य के लिये प्रस्तुत हुये।
और उस समय भगवान ने अपनी सारी सम्पत्ति दान कर
-
दी।
शास्त्रों में लिखा है कि जिस प्रकार सूर्य के प्रा जाने, से
धूप मे आग तापने का
मोह समाप्त हो जाता है उसी प्रकार
भगवान महावीर को अपनी सम्पत्ति का मोह समाप्त हो गया
था ।
एक एक करके वे सभी वस्तुओ से वंचित हो गये।
फिर वे चन्द्रप्रभा नामक पालकी पर सवार हुये । पालकी में
चारों भोर रत्न मंडित थे।
युवक महावीर के सम्मान मे हर्ष ध्वनि हुई ।
विदा करने वालों के मन मे पाहलाद भी था और नेत्र जल से
परिपूर्ण थे । प्रहलाद इसलिये थे कि भगवान अपनी यात्रा पर
जा रहे है । और नेत्र जल से परिपूर्ण इसलिये थे कि यह सुन्दर
राजकुमार जो पूरे कुण्डलपुर के दासियो के जीवन में समा गया
कुण्डलपुर के दूर था। - था । जो उनके सुख दुख का अंग बन गया था, जिसकी छवि देखकर वे जिन्दा रहते थे, वह छवि उनसे दूर जा रही है । जिसको वे अपने शासक अपने राजा के रूम मे याद करना चाहते थे वह उनसे फिर भी वे प्रसन्न थे जयनाद कर रहे थे। चन्द्रप्रभा पालकी कुण्डलपुर के राजपथ से गुजरकर नागखन्ट वन उद्यान की ओर मुड़ गई। विदा राज प्रसाद विदा माता पिता विदा राज वैभव विदा नगर ! अन चन्द्र प्रभा पालकी उद्यान में पहुंच गई थी। 'भगवान पालकी से उतर पड़े।' सामने की रफाटिक शिला पर मणी जड़े थे । और उसके निकट ही था अशोक का सम्पन्न वृक्ष । राजकुमार अब राजकुमार नही रहे ! उन्होंने अपने प्राभूपण उतारने शुरू प्राभुपण उतर चुफे तो वस्त्र- वे शिशुवेश में हो गये। एक क्षण पूर्व का राजकुमार घगते धरण राजामों राजा, चक्रवृत्ति सम्राटो के सम्राट पद भागीन धरने को उसो किये। - भगवान मतमोर उस गिलासन पर विराज। उगमा मुह उत्तरी मोरया । उन्होने समरत गिद्ध परमेली को मार
४१
राजकुमार
--
किया और महा प्रतिज्ञा की कि वे २८ मूल गुणों का पालन
करने का प्रयास करेगे ।
अठाईस मूलगुण"
पांच महावृतो का पालन । पांच महाव्रत है:
१. अहिंसा
२. सत्य
३. अस्तेय
४. ब्रह्मचर्य
५. अपरिग्रह
पाच महाव्रतो का पालन करने का वृत लेकर उन्होंने पांच
समिति को स्वीकार किया था:-
(६. अगर चलना ही होगा तो वे चार हाथ की जमीन देखकर
चलेंगे।
(७) फेवल कल्याणकारी वचन बोलेंगे । बहुत संक्षिप्त और
वहुत कम ।
(८) समभाव से बगैर बुलाये भिक्षा बेला पर शुद्ध आहार
फरना।
(६) ज्ञान के उपकरण, अर्थात पुस्तको को देखभाल कर
रखना उठाना ।
।१०) मलमूत्र के लिये केवल वह स्थान प्रयोग किया जायेगा
जो हरित न हो और जहां कोई पीर जीव न हो।
इन मूल गुणों के नाम है:-
(१) ईर्षा समिति
(२) भाषा समिति
(३) एयण समिति
-
४२
कुन्डलपुर के
(४) प्रादान निक्षेपण समिति
(५) प्रतिष्ठापना समिति
दस उपरोक्त मूल गुण के बाद आवश्यक है-
--मनचाही वस्तु का स्पर्श न करना
-मनचाही वस्तु न खाना
----मनचाहे हाथ न देखना
--मनचाही गन्ध न सुघंना
-मनचाहा संगीत न सुनना !
इनके शास्त्रीय नाम है-
-इन्द्री विरोध, वैसे-
(१) स्पर्श विरोध ।
१२) रतना विरोध ।
(१३) चक्षु विरोध ।
(१४) धारण विरोध।
(१५) फर्ण विरोध।
संयम की सोलहवीं सीढ़ी का नाम है। सामयिक रामगाव
रखना । कोई मरे या जिये, कोई माये या जाये । मिले या विध,
मित्रता निभाये अथवा शनुता, सुसी मन हो या दुःसी मन । भूग
प्यास की बाधा हो या यज्ञान । हर एक सम्मान राना साथिया
कहलाता है । न राग नपा
प्रगले दो वन्दना स्वर मूल गुण हैं । जैसे-
(१७ तीर्घ फरों की स्तुति ।
गुरू
प्रादि को नमस्कार!
भगवान महावीर ने अन्य जिन मूल गुणों को पालने का
लिया, इस प्रकार -
(१०) देव
४
राजकुमार
-अयोग्य का त्याग करेंगे।
--एक नियत समय देह से ममता त्यागकर खड़े हो जायेंगे।
-नियत अन्तरान के बाद उपवास रख कर अपने हाथो से
अपने वाल उखाड़ना ।
-शरीर पर वस्त्र नहीं रखना ।
*और निम्न त्याग।
-वस्त्र आदि का।
-स्नान का ! सुरमा आदि डालने का त्याग।
-दातीन भादि का त्याग ।
*शाव के विषय मे कहा गया है कि शुद्ध एकांत स्थान पर
केवल एक करवट से लेटना ही आवश्यक है।
अन्य दो भोजन के विषय में है । यथा-
-~-खड़े होकर अंजुली मे लेकर भोजन करना।
-भोजन केवल एक समय करना ।
-भोजन करने के समय के विषय में भी निर्देश है । कहा गया
है फेवल एक समय भोजन करना है। इसका उपयुक्त समय है,
सूर्योदय से तीन घड़ी बाद और सूर्यास्त से तीन घड़ी पूर्व के बीच
का समय । इन मूल' गुणों के शास्त्रीय नाम है-
। १७ , चतु विंशतिस्तव ।
(१८) वन्दना।
(१६ ) प्रतिभ्रमण।
( २०) प्रत्याख्यान ।
( २१ ) कार्योत्सर्ग ।
( २२ ) केश लोच ।
( २३ ) अचेलक ।
४४ कुन्डलपुर के ( २४ । अस्नान। ( २५ ) क्षिति कायन । ( २६ ) अदन्त धावन । ( २७ ) स्थित भोजन । ( २८ ) एक समय का भोजन । भगवान महावीर ने इन मूल गुणो का पालन करने का व्रत लिया घोर ढाई दिन के लिये उन्होने तुरन्त मनशन प्रारम्भ पर दिया ! ध्यान लीन होकर दे मूल गुणो को ग्रहण करने लगे। सोना कुन्दन हो रहा था । तप की अग्नि भगवान महावीर के पन्तर को पवियतम करने में जुटी हुई थी भोर कुन्डलपुर के राज- कुमार अध्यात्म पो संसार के चक्रवृति सम्राट से बड़ा पद पाने ये लिये कार्यशील हो गये थे।
30
कुन्डलपुर के राजकुमार बने
केवल ज्ञानी
प्रारणी ले दुःख दूर हुए : उज्जवल
प्रकाश ज्ञान को पाकर सभी मन
मयूर हुए
जय यात्रा शुरू हो गई । दूर हो गया कुन्डलपुर । नजदीक
याता गया कूल्यपुर।
कूल्यपुर मे भगवान महावीर का प्रथम पड़ाव था । भगवान
महावीर ने वही के कुल नायक से पहला प्राहार प्राप्त
किया । वहा से भगवान दशपुर पाये और दशपुर से शुरू हुई
निर्जन पयो को याना । दुरुह वनो से होकर जाने वाला मार्ग
साधना के योग्य था। बारह वर्ष तक वे घनघोर जगलो मे रहकर
तप करते रहे।
इस तप का नियम था । तीन दिन से अधिक वे एक जगह पर
नही व्हरते थे । हा, जब वर्षा हो तो एक जगह रहकर वह
चातुमास बिताते थे।
पहता पातुमास उन्होने प्ररिथ गाम मे बिताया था और
फिर अगला पातु माम बीता था नालन्दा मे ।
पम्पा पुरो।
पृष्ठ चम्मा
फन्टलर
मे
याइये 'इन चातुमासो के स्थानों के विषय मे जरा निहा
जानकारी प्राप्त कर लें। भगवान महावीर ने सबसे पहले प्रस्थ
ग्राम को आकृत किया था। यह प्रदेश इसी से प्रसिद्ध
हो गया।
कुन्डलपुर (बड़ा गांव' अयवा नालन्दा एक ही स्थान का नाम
है। घटो शताब्दी में यहां शांतिनाय जो फा मन्दिर बनवाया गया,
जिससे यह महा तीर्थ हो गया।
चम्पापुरी अंग देश की राजधानी थी। बिहार के
भागलपुर से लगभग तीन मील दूर यह स्थान भगवान महावीर
के कारण तीर्थ हो गया । बाज जहां पर भागलपुर स्थित है, वह
से चौबीस मील दूर पत्यर घाट के पास आज भी ए7 गाव है ।
उसका नाम है धम्मापुर ।
पृष्द पन्ना और भछोया भी यही निनट मे नही होगी। यता-
स्मिा का वर्तमान नाम ऐया है। यह इटावा से साइन मोल
दूर स्थित है । रासह तो माज भी बहु परिचित है। उन म
उन स्थानो का वर्णन करें ज्हां भगवान कोवा के पागल
पीते थे तो उन कठिन प्रदेशों की बात भी याद मा पानी सत?
जहां भगवान के माय अन्याय हुमा था। इनमें प्रमुग है लाद।
लाल बंगान के धोनापुर जिो में स्थित वाग्ग गा के पागा
श्रेष्ठ वर को प्रसार कष्ट सहने पड़े थे।
शिकारी कुत भगवान पर हो गये।
पोरशष्ट कारी दिन ।
राजकुमार ४७ mano लज्जा." और फिर शारीरिक कष्ट । मगर भगवान महावीर थे मूलगुरण के धारक ! उन्होने प्रतिज्ञा की थी कि वे इन मूलगुणो की रक्षा करेगे । और उन्होने की। उन दिनो भारत में प्रार्य और अनार्य दोनों एक दूसरे के प्रति अच्छा भाव नहीं रखते थे। और यह स्थान था प्रनायौं का इसलिये 'वीर श्री' को प्रपार फष्ट सहना पड़ा। और इस कष्ट ने उन्हे मांज कर परिष्कृत कर दिया । अविचलित मन से जव भगवान उनके दिये कष्टो को सहते रहे तो आखिर वे भगवान की अहिंसा से प्रभावित हुये । आज तक उन्होंने सुना था कि हिंसा का जवाव हिंसा होता है । साधारण पशु को भी ठोकर मारने पर गुर्राने की प्रादत होतो है । शिशु भी रोकर विरोध प्रकट करता है । मगर भगवान का समय ज्यो का त्यो जारी रहा । पाखिर अहिंसा की जीत हुई। वे अनार्या जो कि भगदान को कष्ट पहुचाने मे ही अपना वड़प्पन समझ रहे थे धीरे धीरे भगवान के पराक्रम से परिचित हुये। उन्होने भगवान के सामने अपनी पराजय स्वीकार की। महावीर स्वामी के चरणो मे गिरकर क्षमा मांगी। फिर भगवान महावीर मुड़े उत्तर प्रदेश के गोरखपुर की ओर शोर श्रावस्ती होते हुये प्राये कौशाम्बी ! कौशाम्बी को धरती प्राज भी सती पन्दना के उद्धार की कथा कहती है । और इस बात का संफेत पारती है कि किस प्रकार भगवान महावीर ने सती चन्दना फा उतार किया। फोन पी यह पन्दना ।
सुन्दनपुर
दिन थे।
जरा स्मृति स्टोलिये, राजा चेटका की सबसे छोटी या
महारानी राजमाता त्रिशला प्रिय फारिणी की सबसे छोटो बहन ।
सारे विश्व की घटनायें कर्म प्रस्थान होकर पलती है । एक परिवार
में जन्मी त्रिशला, उसी मे मृगावती और उसी परिवार को राज
दुलारी श्री चन्दना । मुन्दर सुकुमार ! विधाता ने ऐसा रूप दिया
पा कि फल्पना लजा जाये। छोटी थी इसलिये प्रपिक ताली भी
घो । मगर संयमी थी और संयम के कारण चेहरे पर अपूर्व गौरव
झलकता था।
वसन्त के
मधुर
फूल खिल रहे थे । भोरे गुनगुना रहे थे । और चन्दना उन
फूलो की क्यारियों मे प्रफुलित सी घूम रही थी।
एक विद्याधर ने देसा ।
फूलो मे फूलो की रानी घूम रही है-यह देखकर विधापर
का मन डोल उठा।
उसने पन्दना को उठाया और उद पता धाकार मे।
पाहां गन्दगा फनी वर?
पोर मार्ग भी पादचारी मागको
पपने पाल सौर सयम को बचार रम सपतीची।
उसी गोल और रायमको उसने बनाकर ग लिया । म
धर्म पर कायम रही। विधाघर जयरबत्ती जगला भी
इससे पूर्व पी विधापरी या गई। परवग होस या उगार
पने जंगलों में छोट गया।
पोर न जंगल, नरपोमग शिवाकार पदमा
और मामी बारी ।
rirat fगामी :
राजकुमार
दी। और उसे लेकर अपने सरदार के पास पहुंचा । चन्दना सोचती
घी
यह
भोला भाला भील उसकी नैय्या पार लगा देगा और भील
भी समझता था कि सरदार तो राजा होता है। राजा प्रजा
का अहित नहीं कर सकता है। मगर भील सरदार तो चन्दना को
देख कर ही फिसल उन ।
उसका रूप भील सरदार को सहन नहीं हुमा ।
'तुम्हारा नाम क्या है ?
'चन्दना।'
'रानी बनोगी ?'
'फिसकी ?'
'मरी-
'तेरी?
-
'शर्म नहीं पाती बकवास करते !
'वकवास नही, चन्दना रानी'
'खबरदार जो मेरा नाम अपनी जुवान पर लाया तो।'
'क्यो ?'
'इसलिये कि मैं सती हूं-'
'मोह !'
'हां
'मैं तुझे पास दूंगा।'
'सहतूंगी।'
'तेरी चमड़ी उधेड़ दूंगा।'
'फिर क्या होगा---
'तुझे मरने पर मजबूर कर हंगा।'
अन्दा 'फिर ?' 'तुझे मार दूंगा।' 'हर आदमी को मोव से मरना ही पड़ता है। सुनी गई वह भावना !' 'क्या? 'राजा रानी छत्रपति हायिन के असवार। मरना सबको एक दिन अपनी अपनी वार- उस भील सरदार ने चन्दना सतीको नास देने में कोई सर नहीं छोड़ो। मगर चन्दना एक शीलवती नारी थी। उसे गरना स्वीकार था, मगर धर्म से वेधर्म होना स्वीकार नहीं पारिर तंग माफर यह भील सरदार उसे फौगाम्बी के पौराहे पर ले पाया। उन दिनों दास प्रथा थी। मुद्रामो में नारी बिकती थी । पौराहे पर योगी लगती थी। वेधारी चन्दना उमकी भी चोली लगाई गई। उभी यहां कपमान नगर से गुजर रहे थे। पन्दना मा हुए उनसे देता न गया। उन्होंने उमका मुरार गुमाया मोर घर से मामे । मर्म की बेटी बनाएर उसमा झालन पालन किया। मार टनमो पत्नी चन्दना मोम को देशभर ठगी मी रह गई मा दुनिया में इतना भी होता है। दाम, मेरो मारो नहीं करने लगे है। मगर ऐसा मातो- दिन नारीको सोर .. ।
। राजकुमार उसे यह दुख ऐसा नहीं होगा। चन्दना दासी है दासी रहेगी। घर तो हमेशा ही घर वाली के संरक्षण में चलता है। फिर यह तो मात्र दासी है । सेठानी ने उसे अपने ढंग से सताना शुरू कर दिया। वेचारी चन्दना कोसती थी उस घड़ी को क्यों फूलों के प्यार ने उसे मोहा । क्यो वह अकेली उद्यान में घूमने आई । वह राजा चेटक की बेटी । उसकी बहन मृगावती इसी कोशाम्बी नरेश की रानी है। लेकिन भाग्य तो सबका जुदा जुदा है । उसी जुदा भाग्य के कारण तो उठाने पड़ रहे है। भगवान महावीर उन दिनों कोशाम्बी में पधारे हुये थे। उस रोज उन्होने नियम किया था कि यदि मुड सिर से बंधन में जकड़ी कोई युवती छाज मे आहार देती हुई मिलेगी तो वे ग्रहण फरेंगे अन्यथा नही। भगवान महावीर पाहार लेने आ रहे है, इस समाचार का गुहार भगवान महावीर के जयजयकार से हुआ। महावीर स्वामी की जय ! इस जय निनाद को सुनकर पन्दना जो सूप (छाज) में कोदो के दाने लिये खड़ी थी। अनायात सामने आ गई। भगवान की मधुर छवि देखकर उसने मन ही मन नमस्कार किया । उसे क्या पता था कि प्राज उसका भाग्य खुल रहा है। स्वयं महावीर स्वामी उससे माहार लेने आ रहे हैं । श्री वर्तमान पुराण ने इस घटना का उल्लेख करते हुये लिला: --
५२
पृन्दमपुर से
सो
वह तक जोद वन वोद, तन्दुल सोर गयो अनुमोद।
भारी पान हेमामय सोप, परम तने फावहां न हो।
भगवान महादीर जब स याहार को लेने के लिये गा !
तो यह फीदो के दाने नीर बन गये।
भगवान महावीर ने हाली से फलाहार ग्रहण किया।
ठीक उसी प्रकार से भगवान राम ने मिलनी के बेर
स्वाये थे । भगवान श्री कृष्ण ने बिदुर के घर माग पात माया
था । और जिस प्रकार मयार्दा पुस्पोतम ने पहिल्या का उभार
किया पा, हनी प्रकार अनायास हो चन्दना का उद्धार हो गया।
जिस पासी को हाथ झा पाहार प्रभू ने स्वीकारा था, उसकी
फीति पूरे नगर में फैल गई ।
फोन है वह देवी ?
स्वयं रानो गृगावती उससे मिलने पाई।
उसे बधाई देने प्राई फि उसे गई है कि उसके राज्य मैं गी
दासिया भी, जिनसे भगवान पाहारते हैं !
मगर गनी ममारती ने देखा तो देखती रह गई।
--
ही छोटी बहन !
अटक की राजदारी।
उसको प्रिय बहन, पन्दना । मनापास रानो भगालो
मानों में माना गये।
उसकी बहन ! म त में !
रानी ममापतो अपनी बानो मामलों में गई।
रानी पदना बीमार्गमा परमो TRE
मगीर को समापीठानी बE !
राजकुमार अनेक पल आये उन परीक्षाओं की घड़ी के जब भगवान ने अपने को स्थिर किया। भगवान महावीर का रूप अतुलनीय था । उनके रूप को देखकर लोग चकित हो जाते थे। एक बार जब वे गंगा को रेती से गुजर रहे थे तो पुष्प नामक ज्योतिषी ने उनके पैरों की थाप से अनुमान लगाया कि गुजरने वाला व्यक्ति जरूर कोई वकृवृति सम्राट होना चाहिये । मगर जब वह आगे बढ़ा तो उसने देखा कि अशोक वृक्ष के नीचे भगवान प्रभू खड़े थे। वह और उनके निकट पाया। भगवान के माथे पर मुकट चिंह थे। भुजाघों मे चक चिन्ह । तो क्या शास्त्र झूठे हैं । मेरा सामुद्रिक शास्त्र झूठा है ।.. फिर अनायास उसे जब वास्तविकता का प्राभास हुआ तो वह पवित रह गया । यह तो २४ वें तीर्थकर थे । वे तीर्थकर- जिनका मांस और रूधिर दूध की तरह होता है । सास लेने से फमल की गन्ध चारो ओर फैलती थी। शरीर मे न कोई रोग हो सकता है। पूरा शरीर पसोने और मलमूत्र आदि से रहित था। ऐसे व्यक्ति के सामने चक्रवृति सम्राट क्या ! आखिर पुष्प को समझ पाती गई । उसने अपनी भूल सुधारी और भगवान को प्रणाम करके पले गये। ऐसे रखवान मे कामवासना न हो ऐसा हो ही नहीं सकता। इस बात की परीक्षा लेने के लिये एक बार स्वर्ग की देवागनाये उतर पाई। वे भगवान की परीक्षा लेना चाहती थी। जानना चाहती थी कि कामदेव से भी सुन्दर राजकुमार वद्ध मान मे रति का प्रभाव कसे हो सकता है।
सपना
बसन्त बिसरा था। भगवान सुनदर दान से गुजर रहे।
उन देव कन्यामों ने मार भगवान के सामने नृत्य करना शुरू कर
दिया।
अनुपम नृत्य
अनासाधंगार और
अन्तर में समा जाने वाला फोमल पगं से भरपूर हाव भार ।
घजीव दृश्य था। भगवान महावीर के समक्ष दे नाच रही हों।
इतरा रही थी एक एक करके सारे वार किये गो।
नव्य"
शृंगार
कामकटाक्ष ।
प्रालिंगन का प्रयास।
पारोर का प्रदर्ग।
देशर्म से बेगर्म हरकत । पत्थर से पत्थर इदम पाला
शिव जाये । मगर भगवान महावीर को बालाचारी थे। उनके
सामने ये सब निरर्थेश था। उन्होंगे तो शाम को जीतगार माग..
विजयी पो पानी पाई थी। ने देव बाला रिकार प्राधिर
हवाम हो गई और प्रसार होकर लौट गई।
भगवान मदानीर राजकुमार ! मुन्टार के गल में
पुष । मगर इस यात पा हात उन्होने बानी नतो उठाया।
पर पतनाना गाला रामर में किये रामपुर
एस्कमा बोना स्यनाय का पंग सा में 427
पोपा पौरपर तो पानही
।
Cr पारfr: र
?
.
राजकुमार
खेत के पास ध्यानस्थ हो गये । निकट के खेत में एक फिसान खेत
जोत रहा था । जब शाम हुई तो उसे भैसे दुहने के लिये घर जाना
आवश्यक लगा। उसने बैल भगवान महावीर के निकट छोड़
दिये और स्वयं गाव की भोर हो लिया।
उसके जाने के बाद बैल स्वतन्त्र हो गये।
वे न जाने कहा चले गये।
भगवान महावीर तो ध्यानस्थ थे । उन्हे यह जानकारी नहीं
थी कि बैल थे भी । और थे तो गये कहा
किसान आया ।
वेलो के विषय मे पूछा । भगवान का उत्तर उसे प्रसन्न नही
कर पाया।
वह सारी रात जंगल में अपने बैल तलाश करता रहा।
थका मादा जब यह सुवह खेत मे तोटा तो उसने देखा
भगवान महावीर तो ध्यानस्य है और उनके चरणो मे वे दोनों
वल बैठे हैं । वह सारी रात इन्ही वैलो को ढूंढता फिरा था,
इस कारण उसके गुस्से का ओर छोर न था। वह सोचने लगा
यह साधू तो पाखंडी है । इसने मुझसे छल किया है । मैं इसे मजा
चखाता हूँ।
और उसने भगवान को ताड़ना देना शुरु किया ।
भगवान महावीर न तो पहले कुछ बोले थे न अव ।
जैनशास्त्र कहते है कि यह अत्याचार इन्द्र से न देखा गया।
यह दौड़े हुये प्राये प्रोर बोले, 'अरे यह कैसा घोर अन्याय कर रहे
हो । क्या तुम नहीं जानते यह कौन है ।'
'जी नहीं।"
'मूर्ख' यह तो राजकुमार वर्द्धमान है जो अपना सर्वस्व त्याग
--
-
है
कर साबू हुये हैं । अगर इन्हें पाउन्ट हो परना होता तो मनाने
राज महल छोड़फर ही क्यों मा।'
किसान को जब इस स्थिति का पता सगा को परमा
मिन्न हुया । उसने भगवान से क्षमा याचना पो । मगर भानपान
ने उसे पास के अवसर पर भी नहीं कहा कि यह मूर्ग है । उन्हें
भला क्या पढ़ी जो वे उसके पैल मे दिल चरगे लेंगे।
क्योंकि भगवान यह भूल चुके थे कि उनका प्रतीत पास
था। वे स्वयं ऐसे हैं, वे राजवंगव भोगते पाये है, य, गाय भोगना
ही व्यर्थ था । और इससे उनके ध्यान मे पन्तर पता था।
बारह वर्ष तक भगवान मौन सापना करते रहे । म वीर
उन्होंने अहिंसा पी शक्ति के नये माप दण्ड उपस्थित दिये।
यह मारह साल भगवान ने घूम फिर फर बिताये थे, और
घुमने फिरने में नही मान्छे लोग मिले थे। पहा दुष्टों की गला
भी कम नहीं थी।
भगवान महावीर को दुष्ट लोगों ने माम उपगर्ग गरी दिय ।
एक बार भगवान उज्जैन नगरी में पा पथे। मौरी
यति मुस्तक समशान में प्रतिमा योग धारण पार गरेको हो।
पशु बलि के लिये विण्यात दहा महापान की तो भो ।
शमशान में भय नाम र पुरपा पार पा । जम जगदमन
को पाकर उसे घोर पारच या मापही नीति
के प्रति उसकागोपनी दगीमा महान TRY ar
पा और उसने दो दो गाना
पर मी शिपायों पार मा मोर को
मोई कमी नार न तो मार AIR नशि
सापा, बारा
me
राजकुमार
ܕܐ
कुछ नहीं है । उनके कर्मों का वास हो हरहा था । मोहनीय पर्म
क्षीण हो रहा था। इस कर्म के क्षीण होते ही उनमें समतारस हो
गया था। सुख दुख उनके लिये सब एक समान होता था ।
अगर कोई साधारण व्यक्ति होता तो उसे असहनीय पीड़ा का
अनुभव होता मगर उन्हे ऐसा नहीं हुआ। वे तो वरनीय पागको
निस्तेज कर रहे थे। अतः साधना और त्याग के पथ पर पै राम
कुछ सह गये और उफ तक न की।
हर रात का सवेरा होता है।
हर दिन को शाम होती है।
हर आदि का अन्त होता है।
आखिर वह भव नाम का रूद्ध भी अपनी करनी पो गरी
थक गया।
उसे अपनी भूल' अनुभव हुई।
अहिंसा ने हिंसा पर विजय पा ही ली ।
उसने अपनी पराजय स्वीकार की।
अपनी खड्ग छोड़ कर उसने भगवान के परणों में गहागोर
स्वामी का जयघोष किया।
यह अहिंसावत धारी बना और भगवान महावीर ain
ज्ञान प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त हो गया । किन किसी भी
दृष्टि मे जनहित को वे भुला नहीं पाये अस्थि ग्राम गे जब उनी।
पहला चातुमास व्यतीत किया तो यहा नर बलि रोने गारो गक्ष )
पाशविक मनोवृति को समाप्त कर दिया ।
यक्ष हिंसा मे विश्वास करता था ।
मनुष्यो की बलि लेता था । भगवान महानोर ने अपने घाहि-
तीय सहनशील शान्त स्वभाव से उसका हिसामुख बन्द गर दि
a
---
उसकी उरता मिट गई।जो जनता को गार देने में साना
वह सब उनको समयवान ने लगा।
इनपलर की घटना का उल्नेश ताम्दी mem
है। यहा को जनता पोर नगरवाती एक सांप से रहेगी।
भगवान महावीर वहां गये ।
उन्होंने उस विपने सांप का विष समान्त मारो सोगों को
अभयदान दिया।
महावीर स्वामी की इस कठोर माधना T विषय या प्रमा
धान ! प्राणी मात्र का त्याग्ग घोर 37
पद में
जन, उचतम पावन एवं पूज्यनीय बना ल्यिा ना।
उसमा मान येत्या मस्तिमाको मा। हामी
सपण मान दियावान था। वे हर योगी की भारीरको
उल्टा गोपाबाटने में शिलार महीने में होने
शरीर को मार गाय गेना पारले कि माता
प्रगापाता घटना उनके जान न मिलन और
सबसे वो शत या पोलिगमा गा होतो
सालना पाली भो, पौरपति समय भी
भगवान गातार दो पानी राम प्रगति कर सो
सानी पी।
५.
भगवान महावीर की
संथ यात्रा
महावीर संघ : महावीर प्राथिका
संघ
और महिला
दलित प्राणियों के अभ्युदया
की महान गाथा,
उत्कर्ष
और आखिर तपस्या का परिणाम दृष्टि गोचर होने लगा।
बारह साल की कठोर साधना ने भगवान महावीर की प्रात्मा को
महान कर दिया था। उन्हे केवल ज्ञान और सर्वदधता प्राप्त हुई
बारह साल की घोर तपस्या के बाद एक दिन भगवान महावीर
बिहार के जम्भ्रिक गांव की ओर आ निकले। यहा पर मनोहारिणी
वन राशि को भेद कर ऋजुकुला नदी बहती है । भगवान महावीर
उसी नदी के किनारे एक गहरे साल वृक्ष की छाया मे पड़ी शिला
पर विराजमान थे । इस वक्त उनकी सम्पदा थी-अठारह हजार
शोल, चौरासी लाख गुण ओर तीन धर्म ! जिनके प्रताप से उनका
जय घोष प्रारम्भ हो गया। मोहनीय, दर्शनावारणी, ज्ञानवरो
पोर अन्तराय कर्म का विनाश होते ही उन्हे केवल ज्ञान प्राप्त हो
गया । और इसके तुरन्त बाद भगवान महावोर ने अहिंसा से हिंसा
पर विजय मारना शुरू कर दिया। वे जम्भिक से विपुलाचल पर्वत
को पोर पाये और वहा उन्होने प्रथम प्राप्त की।
उन दिनो मगध में जो लोग रहते थे वे इस बात मे विश्वास
नही करते थे कि पशुप्रो को धर्म के लिये मारा जाये तो कोई
पनर्थ होता है । वे पशुओं की बलि देते और इसमे कोई बुराई
.
६०
दररे
नहीं नमस्ते । उनका प्रमुख व गुर्मा शामिल कर
और प्रतिष्ठित व्यक्ति था। उसके दोपनियां पीएम
सुनना और दूसरी का नाम सरोया।
मुलगा से उसके दो पुत्र हुये जिनो मरा: नाम
और अग्नि भुति ने । दूसरी पत्नी ने एक पुः मा इमाम
पा वायू भूति । ये तीनों भाई बाब विद्वान थे और अपनी
विद्या पाचदा गर्व था।
इन्द्र गुलि प्रपने भाईयो में सबने भधिक योग्य या पाश्री
सम्पन्न करने का यथेष्ट गीति प्राप्त कर रहा था।
थे कि यह एमा योग्य और प्रतिभाशाली व्यक्ति, दि में Fit
प्रकार पराजित किया जा सके तो यह भगवान गrform
सिन्द होगा! नलिने उन्होंने पारद मिलती
भूति की गत कराने जा रहे थे। पत्र में जो
उन्होंने अगर नमूनको बाहोला।
पहां जा पानी ?
जहर उगले पक्ष में शामिल होने पर
यामागे मोरया Tan. “न का
मिनीपोमोरोपायाको का: ।
पगने पर पता पलानिन रो*
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है
। । . राजकुमार गौतम के निस्ट पाकर कहा-'महाराज मैं आपके समक्ष अपनी एक सयस्या लेकर आया हूँ । घटना इस प्रकार घटी कि मेरे गुरु पाये देव ने मुझे एक श्रलोक तो सुना दिया । मगर अर्थ नहीं सुना इससे पूर्व वे ध्यानस्थ हो गये । मैंने आपकी विद्वता की ख्याति सुनी है। क्या आप बता सकेंगे।' 'अवश्य !' 'आपका बड़ा उपकार होगा।' अलोक क्या है ! इन्द्र ने निम्न श्रलोक कह सुनाया : त्रैकाल्यं द्रव्यपटंक सकलगणितगणाः सत्यदार्थानवेव, विश्वं पंचस्तिकाय व्रत समितिषिदः सप्तरत्वानि धर्मः सिद्ध मार्गस्वस्पं विघि जनित फलं जीवष्टकामलेश्या, एतान्यः श्रद्धाति जिनवचनरतो युक्तिगामी समव्यः !! और पूछा आप बताइये :- त्रिकाल कौन से हैं ? छ द्रव्य क्या है। पंचास्तिकाय क्या होते । तत्वो से क्या मतलब है ? छः लेष्यायें क्या है । अव तो इन्द्रभूति चक्कर में पड़े । उन्हे तो कुछ भी पता न था। 'तुम्हारे गुरु को मालूम है ? 'अवश्य?' 'तो चलो प्रापके गुरु से ही पूछ ।' भगवान पराजित है।' 'हो ! भोर यदि तुम्हारे गुरु ने इसका समुचित समाधान } किया तो मैं भी उनका शिष्य हो जाऊंगा। भगवान महावीर ने उनकी शंका का निवारण कर दिया ।
.
भगवान महावीर ने अपने प्रवचन में 1-
मात्मा प रस.गंध होन है । उक्लिी ने नहीं देता।
हर मनुष्य उमले प्रस्तिस्य से परिचित है।
पंच भूत हैं: पृथ्वी, जल, वायू प्रति मौर भागान
विग्य में जो दस्त है उसमा का नाम नहीं होता और पर
नहीं है उनमा पाभी पोई अस्तित्व नहीं है।
ह मिमा है । सारवान है। शरीर पुगता है और धागा
पोय । जय हम पिसी मृत व्यक्ति का मार मार से गो
पुदगल पदगल रहता है। शरीरमादिनी विलीन
रहमा २ मगर पारमा दूसरा शरीर मारमा पर लेती है।
सात तत्वों का गिरनाले हुए भगवान महातीर मामले में
बसलाय हिसात पत्म इमापार है
राजकुमार
पौर अशुभ कर्म कर रहा है जो पूर्व जन्म मे कर्म किये उनका भोग
इस जन्म मे मिल रहा है और जो इस जन्म में कर्म किये जा रहे
हैं वे अगले जन्म मे मिलेगे । जीव इन कर्मों के अनुसार ही सुखी
और दुखी है।
और अशुद्ध अवस्था में निम्न गतियों में भ्रमण करता है।
जैसे :-
-
(क) देव गति
(ख) मनुष्य गति
(ग) नरक गति
(घ) त्रियंत्र गति
राग द्वेष के कारण दुख उठाता है। वह चार कषायो के
वशी भूत होकर तीन प्रकार से अपने ऊपर कर्मो का मैल चढ़ाता
है तीन क्रियाये इस प्रकार है :-
(१) मन
(२) वचन
(३) काय
चार कपाय को, जीव को गतियो मे भ्रमण करने पर बाध्य
फरती है उनके नाम इस प्रकार है :-
(क) क्रोध
(ख) मान
(ग) माया
(घ) लोभ
इन कषायो से पाठ प्रकार के कर्म पाकर चिपट जाते हैं।
टोक उसी प्रकार जैसे तेल से भरे शरीर पर धूल के कण भाकर
चिपट जाते है, उसी प्रकार जो जीव कपाय में रत रहता है अर्थात
-
।
Tार
पोप मान मारा लोन मेगा सता यो पाग निम्न मा
प्रारौप प्राकर एक निश्चित समय निकाला।
मानो या पूल असरने पर मिट जाती है और "
सापरलारने पर और ति जानी। इन हि को
मा निम्न नाम देगार पुकारा जाता है-
৪) গাব
17 वंध
(
सारा
(4) निरा
य) और योपन
पनं संग में माठ होते हैं मोर MEETर हैं---
(1) दर्शगा पली
(२) शान वर्णी
(1) मोदीय
(४) मनुगम
(५) गोय : गावापनीर शोर माननीय
(5) गोर
नमो नम: ।
राजकुमार
•६५
लाने वाला था।
भगवान महावार ने उन्हे अधिक व्याख्या करते हुये बतलाया
कि जिस प्रकार गन्दे तलाव को स्वच्छ करने का सबसे बड़ा
तरीका यही है कि गन्दा पानी उसमे जाना रोका जाये। अत:
पहने वार्मो का पाना रोक कर फेवल शुभ नर्म किये जाये ताकि
प्राणी मोक्ष की तरफ अग्रसर हो सके। नतः पंचास्ति क्या हे,
इसका विवेचन है कि निम्न पान पचास्तिकाय कहलाते है, यथा :-
(१) पुदगल
(२) धर्म
(३) अधर्म
(४) प्राकाम
(५) जीवन
पुद्गल, धर्म, अधर्म, भाकाश, जीवन जीव से पाचोसीन हैं ऐलो
सुन्दर गाया सुनने पर इन्द्रभूति अपने भाईयो समेत भगवान की
HT मे जाया और उसी जन्म मे अपने कमों का फल भोग पर
मोक्ष को प्राप्त हो गया।
भगवान की व्याख्या से लोगो के मन के और मस्तिष्क के
बंर कपाट खुल जाते है।
तभी तो स्वामी सागान्तभद्र प्राचार्य ने उसके विषय में कहा
था:
वीर, प्रभू तुम महावीर
पद रज पाकर वीर तुम्हारा
सौभाग्य शाती वगन्युरा
पना तो वह भाग घोर
दोपो का उपतन
-
-
+
कुन्डलपुर के ज्ञान विकास, हुया हिंसा का सर्वत्र नाश । अहिंसा व्रत और अभय दान सहित, विहार हुआ यूगुण पूर्ण और दोप रहित जैसे पर्वत-मिति का लिये प्रवहान करता है, शुभ लक्षणात गज मत दान । आज' जो विहार है उसे बिहार नाम देने का श्रेय भावान महावीर को है । भगवान महावीर ने जिस जिस जगह सबसे अधिक अपने विहार स्थापित किये वह समूचा प्रदेश बिहार प्रदेश वन गया। किन्तु इसका यह अर्थ कदापि नही है कि उनका कार्य- क्षेत्र केवल विहार तक सीमित था । बल्कि काशी, कोशल, कौशल्य, कुसंव्य, अश्वष्ट, साल्य, विर्गन, पंचाल, भद्रकार, पाटच्यक, भौर, मत्स्य, कनीय, सरसेन, कार्थक, कलिंग, दुरूजांगल, कैकय, आत्रेय, काम्बोज, वाल्हीक भवन, श्रुति, मिन्ध, गांधार, मूरमीरू, दशेरुक, बाडबाग, भारद्वाज, तार्ण कार्ण, प्रच्छाल, ग्रादि प्रदेशो मे जनता को धर्म की ओर अग्रसर किया। अगले तीस वर्ष भगवान ने जनता के हित में व्यतात किये और एक महामात्यक प्रादर्श से भरपूर पूजनीय तीर्थकर के सर मे उनके अनुयायियो की संख्या बढती चली गई । पामतौर से दो प्रकार के अनुयायी भगवान को शरण प्राते थे :- १) ग्रहत्यागी (0) ग्रहवासी ग्रहत्यागी भगवान महावीर के साथ साथ भ्रमण करते थे। और इस प्रकार महावीर स्वामी के संरक्षण में विकास पाने वाले में चार प्रकार के सदस्य थे। जैसे :- - .
राजकुमार - (७) मोर्य पुत्र मुनी प्रार्जका श्रावक श्राविका भगवान के जो वरिष्ठ शिष्य थे वे गणधर कहलाये । ये एक तरह से भगवान के प्रवक्ता थे। उनके नाम इस प्रकार है:- {१) इन्द्रभूति । २) अग्निभूति (३) वायुभूति (४) गुचिदत (५) सुधर्म (६ मोइव्य (८) अकम्पन (६) अचल (१०) मेदार्य । ११) प्रयास ये सभी के सभी ऋद्धियो से सम्पन्न थे और प्रथम पांच गगण- घर लगभग दोहनार एक सो तीस शिष्यो का उत्तर दायित्व सम्हाले थे। छटे गतवें के पास चार सौ पच्चीस और शेप चार के पास हर एक के पास छ• सो पच्चीस शिष्यो का दायित्व था इस प्रकार चौदह हजार शिष्य निरन्तर धर्म प्रसार मे रत रहते थे । ये सभी महा विद्वान तपस्वी महिमावान थे ग्रहस्थ अर्थात श्रावको की संग्या डेढ लाख और श्राविकयो की सस्था तीन लाख अठारह हजार से अधिक थी। सती चन्दना जो भगवान की कृपा से मुक्ति पा गई थी स्त्री गध अर्थात मार्जका संघ को संचालिका थी। प्रार्जका सघ उस युग की सबसे बड़ी उपलब्धी थी। चन्दना ज्येष्ठा प्रादि विकायें प्राजिका संघ की शोभा थी। वे महान सयम और तप का जीवन व्यतीत करती थी। ऐवल एक खद्दर की सफेद साड़ी में उन्हे गर्मी-सर्दी काटनी होती थी। रूप से मोह नही था । माजिका संघ उनके लिये था, जो यात्म मोह का हनन फरफ जीवन बिता सके। दे उदासीन भाव से स्वयं अपने केस लोष परती पी। पह महानती थी । उसका दर्जा भी मुनो से ।
६८
कुन्डलपुर के
कमना।
संसार से ऊबी, दुरूयारी, जिन्हे ससार ने स्थान नहीं दिग,
उन्हे प्राजिका संघ स्थान देता था।
आजिका सच वास्तव में महिलाओं के लिये श्रेष्ठ स्थान था !
उसी मे भद्रा नाम की एक तपस्वी 'हो, जिसने श्रावस्ती गे प्रसिद्ध
वीद्ध प्राचार्य सारी पुत्र से तर्क किया था।
इतनी विदुषी महिला का पुराना जीवन'..
भद्रा का पुराना जीवन मोड का जीवन था । वह राजगह के
प्रमुख कार्मचारी की बेटी थी । अनायास ही उसकी नजर फेसा
नाम के डाकू पर पड़ी । केसा बहुत सुन्दर जवान था । उसके
मजबूत शरीर, पुष्ट, पुट्ठों को देखकर वह मोहित हो गई।
मोहपाश बढ़ता गया ।
मन मे निश्चय किया वह शादी करेंगी तो सिर्फ इसी से
व्याहगी तो केवल केसा से।
और अन्त में उसने उसे पति रूप मे पा भी लिया।
मगर वैवाहिक जीवन तो जैसे एबाव बन गया ।
ने निश्ना पर नसे दुख हुया ।
'उसने गलत निशान दिया था। मासे प्यार नहीं करता
था। केसा प्यार करता का रसके प्राभूषणो को । उगे उसके रस
से कोई सरोकार नही था उसे सरोकार का उन धन से जो उसका
था।
विवाह सल नहीं हुत्रा दाम्पत्य जीन मह मे बाग गया
और भद्रा को वेराग्य हो गया। लेकिन जाये तो गाहों । मेरा टा
था, आ रहा । मां बार की बगैर मर्जी से की शादी, वे नों
जनरामी। मामोर घोर भतार ।
ही काम नही।
राजकुमार
-
कोई रोशनी नहीं-
तव एक रौशनी दिखलाई पड़ी प्राजिका संघ का झिलमिलाता
प्रकाश उसके सम्मुख आकर नाचने लगा। वह निहाल हो गई।
संसार से उदासीन वासना से ठगी भद्रा, अपने पति से प्रतिग्रह से
अपने शरीर से उदास होकर माजिका सघ मे नाई।
प्राभुषणों न्ना बोझा उतार फेंका ।
उतार फेंके वे रेशमी वस्त्र जिनसे उसका रूप देवता बनता
था, और खद्दर की स्वच्छ साड़ी पहनकर उमने स्वय अपने केसो
का लोच किया। माजिका सब की शरण मे माकर उसके कर्म
उससे बिछुड़ते गये । उसकी आत्मा निर्मल होती गई। क्योकि इस
संघ का एक ही मत्र था।
महावीर का धर्म आचरण करने वाला हर ग्रहस्य श्रावक है ।
ब्राह्मण हो या शुद्र
स्त्री हो या पुरप
श्रावक, श्रावक है-उसके सिर मे क्या मणी लगी होती है।
भगवान महावीर ने पापा चार का बड़ा अनूठा विशलेप किया
पा। उन्होने बतलाया-
'पाप क्या है ?
'जीव को अशुभ प्रगति ।
'अशुभ प्रणति क्या है।
'जो अपने को अप्रिय है वह दूसरे को भी नप्रिय होना
पाहिये।'
'प्रति ?'
'पाप पांच प्रकार के हैं।'
'फोगदौन?'
मुन्डलपुर के
'हिंसा, भूल, चोरी, कुशीत, परिग्रह ।'
भगवान महावीर के पाच आदेश थे-
(१) किसी की हत्या मत करो।
(२) झूठ मत बोलो। ऐसा सच भी न कहो जो पोरों को
अप्रिय लगे।
(३) किसी की गिरी पड़ी चीज मत उठाओ।
(४) वेवल अपनी पत्नी पर सन्तोप व्यक्त करो ! जगत को
सभी स्त्रिया आपको मा बहन जैसी ही प्रादरणीय है । भोग्या
नही।
(५, आवश्यकता से अधिक किसी वस्तु का संचय मत करो।
मनुष्य जो कुछ सोचता है व उसे अभिव्यक्त करने के लिये
महावीर स्वामी ने ६ लेशायें व्यक्त की है। वे इस प्रकार है-
कुपण
नील
कापोत
पीत
पक्ष
गुनल
इसको किस प्रकार समझा जा सकता है, इस विषय में एक
द्रष्टान्त प्रस्तुत है । मान लीजिये के ६ व्यक्ति हरे भरे ग्राम के पेट
के पास जाते हैं और उसके उपयोग छः को विभिन्न प्रक्रियाये परत
फरते हैं । यथा---
पहली प्रतिक्रिया (कृष्ण) पूरा पेड़ जड़ से उखाड़ लें।
दूसरी प्रतिक्रिया (नील) : पेड़ की प्रावश्यकता नहीं है, राने से
फाम पल सकता है।
राजकुमार
तोसरी प्रतिकिया (कापोत) : टहनियां ही काट ली जायें ।
चौथी प्रतिकिया (पीत) टहनी क्यो तोड़ी जाये केवल उन्हे
हिलाकर पाम तोड़ लिये जाये ।
पांचवी प्रतिक्रिया पक्ष : जो पके घाम है उन्ही को तोड़ने
से काम चल सकता है।
छटवी प्रतिक्रिया (शुक्ल) : केवल काम ही तो चलाना है न ।
नीचे जो ग्राम पड़े है उन्ही से काम चला लिया जाये !
महावीर स्वामी ने दान के विषय मे भी अपनो व्याख्या देते
हुये मूले करके व्यक्तियो को बतलाया था कि दान चार प्रकार का
-
--
(क) अभयदान
(ख) ज्ञानदान
(ग, प्रोपधिदान
(घ श्राहारदान
सुपान को उपरोक्त दान देने से और मनोयोग से देव
पूजन
फरने से अशुभकर्मों का नाश होता है और पुण्यकर्मों का उदय
होता है धीरे-धीरे कर्म लोप होते हैं। फर्म लोप हो जाने के बाद
निर्जरा की स्थिति से होता हा प्राणी मोक्ष को प्राप्त होता है
भवभय से छूट जाता है और फिर उसे जन्म जरा मृत्यु का कोई भी
भय नहीं सताता। वह पावागमन के बन्धनो से मुक्त हो जाता
| मुक्त हो जाता है। उसकी मुक्तता सन्देह नही दान किन को
देना चाहिये इस विषय में कहा गया है----
उत्तमपात्र-निग्रन्थ गुरू
मध्यमपात्र-निनन्य एलक ब्रह्मचारी
.
७२
कुन्टलपुर
जघन्य पात्र-व्रती और श्रावका
प्राणी मात्र को कल्प और दया का दान देना आवश्यक है
दान का विकास और ज्ञान का दान देना भी हर हालत में अष्ट
है। जैन धर्म निर्पिद दोनों मे निम्न दान मानता है-
स्वर्ण
हाथी गऊ
कन्या
दास और दासी
इन दोनो में व्यक्ति को अपने बड़प्पन का बोध होता है ।
अतः यह एकदम निकृष्ट कोटि का दान है। इन दोनो से वचना
ही श्रेयस्कर है । दान केवल
सुपात्र
को देना ही जमता है।
६
महावीर स्वाली
स्मृति के झरोखे में
शिक्षा की दृष्टि से
-
राजग्रह की धरती बड़ो पावन है बड़ा सौभाग्य है उसका जब
भगवान इस प्रोर से गुजरे उसे भगवान की चरण रज अवश्य ही
मिली है श्रोणिक ने इस जगह भगवान की कई बार वदना की है
और हर बन्दना के बाद शंका समाधान
भी
एक बार भगवान ने वहा---'राजन !' प्रर्हन्त का ध्यान
प्रावश्यक है।'
घोणिक ने पूछा-भगवान हर समय यह तो सम्भव नही है
धर्हन्त भगवान साक्षात विराजमान हो ।, भक्त शरीर जीवन्मुक्त
भगवान का सामीप्य सदैव नहीं कर सकता--'भगवान ने उसकी
शंका समाधान करते हुए कहा था-~~'तुम ठीक कहते हो। चौथे
काल में ही वेवल ज्ञानी अर्हन्त के दर्शन सम्भव है । आगे ऐसी भी
स्थिति श्राराती है कि जब महापुरुष नही जनमे । ऐसी स्थिति से
परोक्ष रीति से वन्दना पारनी चाहिये । परोक्ष रीति से मूर्तियों
का महत्व फेवल इतना है कि सन एफान हो जाता है। और उस
एकान मन से हमारा ध्यान संसार की उहा मोह से हट कर एका-
चता की पोर लग लाता है।'
भगवान की इस व्याख्या का उनके अनुयायियों ने ध्यान रखा
सौर ऐसा अनुमान किया जाता है कि कुपानयुग
के लिये मूर्तियो का गठन शुरू हुना है। मगर मारुति नन्दन प्रसाद
से जैन सम्प्रदाय
कुन्डलपुर के तिवारी के प्रकाशित एक लेख में कहा गया है। 'जैन धर्म मे मूर्ति पूजा और मूर्ति निर्माण की परम्परा का प्रादुर्भाव मोर्य युग से ही होना निश्चित हो गया था । इसका प्रमाण पटना के समीप लोहानीपुर से प्राप्त मौर्य युगीन एमकदार मालेप से युनत जैन तीर्थकरो की निवस्त्र प्रतिमायें। ये मूर्तियां आजकल पटना संग्रहालय में संगृहीत है। पि.स तीर्थकर का प्रकन उनका अभिप्रेत था, यह किसी प्रकार के लेख या लांछन नादि के अभाव मे बता पाना सम्भव नहीं है। जनों का सर्वप्रथम शिलागत अंकन मायागपट्टों के रुप मे पर्व-कुपारण युग मे प्रारम्भ हुा । इन यायागपट्टों का निर्माण वर्गाकार पूजा शिलाफलको के रूप में किया जाता था, जिसमें अष्टमांगलिक चिन्हों से ग्रावेष्टित तीर्थकर माकृति को मध्य में पदमासनस्थ चित्रित किया जाता था। यहा किसी प्रकार के उल्लेख के यह निश्चय कर पा सपना सम्भव नहीं है कि किस तीर्थकर का प्रकन उसका प्रभीप्ट धा । कुपाण युग मे ही पादपीठ पर तीर्थकरो के नामोल्लेख का परम्परा प्राविभूत हुई जिससे चित्रित तीर्थकर की पहचान सम्भव हो सकी । साथ ही प्रत्येक तीर्थकर के दोनो पार्श्व मे दो गाधर ओर पीठिका पर धर्मचक्र या पूजन दृश्य भी प्रदगिरा किंग जाने लगा । विकास की अगली शृंखला में गुप्त युग मे समस्त तीर्थकरो के अलग अलग लांडण (प्रतीक) निर्धारित किये गये और क्रमशः अनेक सहायक प्राकृतियों को सम्बद्ध के रुप मे संपूजित किया जाने लगा, यथा शासनदेवता गन्धर्व, किन्नर, उपाराम, मित्र हन्ति. युगल, वृपभों या मृग का एक युगल, सिंह पोठिका, पावर, कंवल्ग- वृक्ष और ढोल बजांती एक मानव प्राकृति । फलतः प्रतिमाला- क्षणिक दृष्टि से तीर्थकर प्रतिमाएं कालगत विकास के परिणाम भभाव मे - राजकुमार स्वरूप अत्यन्त क्लिष्ट होने लगी। 'तीर्थकर प्रतिमानो के विकास की इन्ही अवस्थानो से गुजरने के उपरान्त अपनी पूर्णता की स्थिति मे महावीर प्रकन की निम्न- लिखित विशेषतायें होती थी। महावीर प्रतिमाये पूर्णतः नग्न, नासाग्रदृष्टि ओर कायोत्सर्गमुद्रा मे खडी खड्गासन) या ध्यान मुद्रा मे प्रासीन (पद्मासनस्थ) होती थी । महावीर विवो मे यदा- कदा वस्त्रो का कुछ अश भो प्रदर्शित किया जाता था, जो श्वेता- म्बर सप्रदाय से सम्बन्धित होने का सूचक होता है। अधिकाश मूर्तियो के वक्षस्थल पर श्रावत्म चिन्ह प्राप्त होने के साथ ही हस्ततल एव सिंहासन पर धर्मचक्र और उप्णीष तथा ऊर्णा (भौहो के मध्य का रोम गुच्छ के चिन्ह भो प्राप्त होते है। साथ ही प्रभावली प्रोर दोनो पाश्वो मे शासन देवतात्रो के अतिरिक्त अन्य फई सहायक प्राकृतिया भी अंकित की जाने लगी। सिहासन के दोनो योर मिह और उसके मध्य मे उनका विशिष्ट लाछन उत्कीर्ण होता था । उनके कर्ण स्कन्धो तक लम्बे और भुजाए घुटनो तक प्रसारित होतो थी । उन्हे युवरू रूप मे अष्टप्रतिहार्यो (दिव्यतरु, सिंहासन, छत्र, मण्डल, दुन्दुभि, सुरपुष्पवृष्टि, चावरयुग्म, दिव्यध्वनि) मे से किसी एक से युक्त दिखाना चाहिये । ठीक इन्हीं विशेषतामो का प्रतिपादन वराहमिहिर ने वृहत्संहिता मे किया है : आजानु लम्बबाहुः श्रीवत्सोक प्रशान्तमूर्तिश्व । दिग्वासा तरुणो रूपवांश्च कार्वोऽर्हता देवः ।। (वृहत्सहिता ५८ अध्याय) महावीर का विशिष्ट लांछन सिंह और जिस वृक्ष के नीचे उन्हे कोवल्य की प्राप्ति हुई । वह शाल वृक्ष है । उनसे सम्बद्ध यक्ष :
उउ.पुर के । मातगं और यक्षिणी पदमा या सिद्धापिका है । निम्मो में येन मेन इनके विरधारी के रूप मे मगल सम्राट भोगिक या विग्नसार को भी मंकित किया जाता था। महावीर की कई प्रारम्भिक मूर्तियों मथुरा के कंकातो टी पर हुए उत्वनों द्वारा प्रकाश में आई हैं। इस स्थल से पूर्व कुपाण युग से लेकर मध्य युग तक की जैन प्रतिमानो के उदाहरण उपलब्ध हुए है। यहां से प्राप्त महावीर चित्रण, जिनमे मुख्य प्राकृति बोधिवृक्ष के नीचे प्रासीन है, की निम्पित पहचान दिया- दास्पद है । यहां से उपलब्ध एक मूर्ति में, राजकुमार सो बीतने वाली यत्रयुक्त एक प्राकृति और उसके तीन सेवको को शिक्षा दे. रही है । सम्पूर्ण दृश्य की प्रोर बागे घोर एक सिंह पीपं प्रदभित किया गया है, जिसका मण्डन प्रास्मेनियन शैली मे हुगा है । गंपुरा से प्राप्त होने वाले एक अन्य चित्रण मे एक बालक को जालानों क कीर्तिमुख से युक्त प्रदर्शित किया गया है । इस प्रतिमा का मेवत शीर्प भाग ही जवशिष्ट है । इसी स्थान में एक अन्य मनोशगादा कद प्रतिमा प्राप्त होती है। इन समस्त चित्रणो की पहचान मान के आधार पर एयूरर महावीर कान से करते हैं जो स्नियन स्वीकार्य नहीं है। मथुरा से उपलव्ध दो अन्य पूर्णतः नग्न और मनोज्ञ विम्बो में तीर्थकर को अपने लांछन सिंह के साथ उता किया गया है, जो स्वतः उसके महावीर फन होने का मुंच है। इसी स्थल से २४ तीर्थकरों का सामूहिक प्रदान करने वाला एक उदाहरण उपलब्ध हुया है, जिसमे गहन चिन्तन मे लीन महावीर को मध्य मे ध्यान मुद्रा में एक प्रासन पर भासीन प्रदर्शित किया गया है। महावीर के दोनो पाश्वों व ऊपर की गोर गन्य २९ तीथंकरों को नामित किया गया है । पाठ पर उनीगणं मिल- राजकुमार ७७ - । भाकृति से मध्य की प्रतिमा के महावीर अंकन होने को बल मिलता । मुख्य प्राकृति की शावलि गुच्छों के रूप में दिखाई गई है। समूचा मंचन एक अनुपम सौंदर्य का पुज बन कर रह गया है । पीठिका पर उत्कीर्ण लेख सर्वथा अपूर्ण और अपठनीय है, किन्तु लिपिशास्त्र के माधार पर इसे पांचवी सदो ईस्वीरी कृति माना गया है। एक अन्य आसीन चित्रगण मे पोठिका पर थकित सिंह इसे महावीर प्रतिमा बतलाता है पद्मासनस्थ और भामण्डल युक्त के महावीर के दोनों ओर दो व्याल प्राकृतिया प्रदशिन है । सिंहों के मध्य दो घुटने टेके उपासक माकृतियो का धर्म-पक्रकी वन्दना करते हुये चित्रण मनोहारी है । एक अन्य मूर्ति मे प्रदर्शित दो यातियो में से एक की निश्चित पहचान पीठिका पर उत्कीर्ण सिंह के आधार पर महावीर से की गई है । महावीर प्रतिमा अपने चैत्रवृक्ष के नीचे आसीन है । वेप-भूपा और लिपि से मूर्ति का निरिक्त काल दसवी से बारहवीं शताब्दी के मध्य अनुमानित होता है। मथुरा से ही प्राप्त होने वाने दो अन्य कनों की पहचान पीठिकानो पर उत्कीर्ण सिंहो के आधार पर महावीर से की गई हैं। दोनो ही भान देवदूतो, भुजायो में पुष्प मालानों के प्राचार उडायमान गन्धवों की प्राकृतियो से यावेष्टित है । महावीर दी एक पन्य कृपाणयुगोन पद्मासन मुद्रा में विराज मान प्रतिमा को पीठिका १६ इन्च ऊंपी। यमुना नदी से प्राप्त हुई है, जो सप्रति मयुरा संग्रहालय में (क्रमांक २१२६) संगृहीत है। पादपीठ पर खुदे मधूरे लेख में वर्धमान का सष्ट नामोल्लेख होने पावजूद यह प्रतिमा तिकित नही है। कंकाली टोले से ही ध्यान मुद्रा मे मातीन महावीर प्रतिमा (३ फुट ४ इन्च ऊंची) का ए प्रौर भग्नावगेप उपलब्ध होता है, जो संप्रति मथुरा संग्रहालय । { ७८ कुन्डलपुर के की निधि है । लेसयुक्त पादपीठ पर चित्रित संक्षिप्त प्रकि,म्भों पर धर्मचक्र स्थित है, जो पाठ पूजों द्वारा पं देर हो रहा है ये तम्भ- वतः मूर्ति के दान कर्तामों की प्राकतियो का फर करती हैं, दया राम साहनी ने इस पर उत्कीर्ण बुपारा कालीन लेख के प्राधार पर इसे कुपारण संवत् के ८४ वें वर्ष (. ६. ई०) मे तिथ्यकित किया है । मथुग मंग्रहालय (क्रमांक ५३६) मे संकलित मया से ही गूजर घाटी म्यान से प्राप्त एक मध्ययुगीन चित्रण मे कायोतर्ग मुद्रा में खडी मुख्य प्राकृति को अन्य २३ तीर्थकर प्रयोग वेष्टित प्रदर्शित किया गया है। बहुत सम्भव है कि में अव- स्थित मूत नायक को प्राकृति पूर्व प्रतिमानों के सदग ही महावीर का अंकन करतो हो । मथुरा संत्र हाय (जी. . ) में स्थित कशाली टीले से उपलब्ध होने वाली महावीर को एक प्रतिमा में देवता को ध्यानमुद्रा मे प्रासीन प्रदर्शित किया गया है । देवता का काति मण्डल कमल पंगुडियो के अलारणो वाला है गोर गो केगों की सविशेष संगाजना गुच्छको के रूप मे प्रदर्शित है। महावर का चित्रण करने वालो एक गुप्तयुगीन (टो) मूर्ति भारत कताभवन, वाराणसी, मे मगृहीत है । वाराहनी से प्राप्त इस प्रतिमा में देवता को ऊची पीठिका पर ध्यानमुद्रा में आमीन चित्रित किया गया है। पीठिका के मध्य में उत्तीर्ण गर्म- चक्र के दोनो पौर दो मिहों का प्रदर्शन इस प्रतिमा को नलागेर अपन से पहचान की पुष्टि करता है । पीठिन के दोनो शोरो पर चित्रित दो तीर्य कर इस अंकन की अपनी विशेषता है इस नयनाभिराम चित्रण में महावीर के दोनों पानी में दो माठियो फो उसमोरणं किया गया है, लो नम्भवतः मामन देवगा है। महापौर के मृाउनाम प्रगित संगीन माम को दोनों ओर दो राजकुमार उड्डायमान गन्धवो का चित्रण ध्यानाकर्पक है । देवता की केश- रचना गुच्छको के रूप मे निर्मित है । गुप्तयुगीन समस्त विशेषताओं से युक्त इस महावीर प्रतिमा के मुखमण्डल पर प्रदशित मदस्मित, शाति व विरक्ति का भाव प्रशसनीय है। मध्ययुगीन खजुराहो मन्दिर मे भी महावीर का एक मनोज्ञ विम्ब कायोत्सर्ग मुद्रा में उत्कीर्ण है, जिसमे पूर्णतः नग्न महावीर को उनके विशिष्ट लक्षण सिंह से सम्बद्ध रूप मे चित्रित किया गया है, देवता की गुखाकृति पर शाति पौर सौभ्यता का भाव सुस्पष्ट है मस्तक पर सर्पफणो के घटाटोपों से युक्त देव पार्श्व मे खड़े उपासक देवताग्रो से प्रावेष्टित हैं। साथ ही अन्य कई सहायक प्राकृतियों को सयोजना भो मनोहारी है । महावीर की एक अन्य पद्मासनस्थ प्रतिमा देवगढ के मन्दिर न० २१ मे प्राप्त होती है, जो शैली के अाधार पर :० -११ वी सदी में प्रतिष्ठित प्रतीत होती है । कमल सदृश अलकरणो के प्रभामन्डल से युक्त मून नायक की प्राकृति के दोनो पावों में उनके शासन देवता त्रिभग मुद्रा में खड़े हैं । देवता के शीर्पभाग पर पुन. दो आमीन तीर्थकरों का बिम्ब उत्करर्ण है । भामन्डल के ऊपर तीन श्रेणियों में विभक्त त्रिछत्र ये दोनों ओर हाथों मे पुष्पमाल लिये उड्डायमान विद्याधर भी चित्ताकर्षक रुप से विद्यमान है । देवता के नेत्रों और भौहों का अंकन मनोहर है । पादपीठ के नीचे दो सिंह प्राकृतियों को भी सजित किया गया है। नासन के नीचे लटकता हुआ फलफ इस मूर्ति की विशिप्ता है 'महावीर की वलुए प्रस्तर मे निमित एक विशिष्ट प्रतिमा जिसका अर्ध-ऊर्ध्व भाग ही शेप है, संप्रति बोस्टन संग्रहालय मे • स्थित है । यह ऊर्ध्वकाय प्रतिमा सूक्ष्म निरीक्षण से नग्न रही पुस्लिपुर के . प्रतीत होती है । प्रतिमा की ऊंनी देशरचना वास्तव में काकी साधु प्रकृति की भूचा है । महावीर के योग-गुच्छक उनके लापों पर लटक रहे है। वक्षस्थल पर तीर्थकरों का विशिष्ट चिन्ह श्रीवत्स उत्तीर्ण है । मस्तक के ऊपर प्रदर्शित निछत्रे, अगोदा नीर कुछ प्राकृतियो से वेष्टित है। नूति के वाई व दाई मोर बदलो से प्रकट होने वाले विद्याधर युगल को पूजा-गाम गयों सहित मध्य से मोर नढ़ते हुए प्रदर्शित किया गया है। देवता के स्कन्धो के समीप दोनो पावों में दो पिहो का चिन डा० कुमार स्वामी ने इस प्रतिमा को निश्चित रस में महावीर अंकन से पहचानकर इसे ६ वी शती ईस्वी मे तिदिन दिया है । शंली व निर्मिती के धावार पर मा प्रतीत होता है कि यह प्रतिमा सम्भवतः तुन्देलखन्ड उत्तरी भारत, रो उपलब्ध हुई होगी।' भगवान महावीर के निम्न तीर्थो पर मा सुन्दर शोनाग्य ऐनि- हासिक दृष्टि से गणना योग्य मूर्तियां है:- x हिछेच्द्रा : बरेली के निस्ट x इलोरा ४ एहाला-यह प्रदेश वीजा जिले में प्राचीन प्रायपुर है। गन् ६३४ में कवि रविर्कीति ने भगवान महावीर का मदिर निर्मित कराया था। महावीर स्वामी की प्राचीन प्रतिमायें देने योग्य है । कवि रवि कीति ने पातुक्य राजा पुलकेगी ये दर- बार में सत्यापितम्मान प्राप्त किया था x मोरियो :-या बलगम) के निस्ट में महावीर स्वामी का दर्शनीय मन्दिर। ४ मापनी: -रनि निकामनामशान गग- ..
राजकुमार वान महावीर को प्राचीन मूर्ति स्थापित है। इस स्थान की प्रसिद्धि 'पुरणवीर' को प्रतिमा के रूप में स्थित है। x कुन्डलपुर : यह क्षेत्र भविश्य तीर्थ के भन्तर्गत पाता है महावीर स्वामी की प्रतिमाये के मतिरिक्त यहां जो पहाड़ी पर सरोवर है उसे वर्तमान सरोवर कहा जाता है । x ग्वालियर : इसका प्राचीन नाम गोपीपुर है । यहा के किले में भी अनेक जिन तीर्थकंरो की मूर्तियां है, उनमे भगवान महावीर की प्रतिमायें भी है। x चित्तोड़ : चित्तोड़ का प्रसिद्ध कीति स्तम भगवान महावीर के एक प्राचीन मन्दिर का मान स्तम्भ है। 'x चन्देरी : यह स्यान झासी जिले में स्थित है यहा की दर्शनीय तीर्थकर मूतियो मे भगवान महावीर को मूर्ति बेहद लावण्यमयी, श्रद्धायुक्त मोर प्राभा से भरपूर है। x जयपुर और भरतपुर के जैन मन्दिरो मे स्थित महावीर स्वामी की मूर्तिया। x तिरूमलय पर्वत : दक्षिणी भारत में स्थित इस स्थान पर भगवान महावीर स्वामी को हाय की मिट्टी की मूर्ति अति सुन्दर है। x तेरपुर : यह स्थान हैदराबाद आंध्र प्रदेश के जिला उस्माना बाद में स्थित है। यहां भगवान महावीर की साढे तीन हाथ को सुन्दर मूर्ति स्थित है। x दही पाव : यह क्षेत्र जिला शोलापुर में है मन्दिर में श्री महायोर स्वामी की मूर्ति स्थापित है। मन्दिर का मानस्तम शिखिर मीलों से दिखाई पड़ता है। x पफोसा: जिला इलाहाबाद स्थित इस प्रतिश्य क्षेत्र मे प्रभास
८२
है
कुन्डलपुर
पवंत नाम का तीर्थ है। कहा जाता है यहां के मन्दिर मे जो
भगवान महावीर की प्रतिभा है वह चौथे काल की है।
x पाकवीर : जिला मानभूम साढे सात फुट ऊंची भगवान
महाबोर की यह मूर्ति खड़गासन भीरम के नाम से पूजी
:
जाती है।
x शन्त्रुज्य : सौराष्ट्र स्थित प्रमुख जैन तीर्थ। यहां भी भगवान
महावीर को मूर्तियां उपस्थित !
४ महावीर जी : चान्दन गाव स्थित जयपुर राजस्थान ना
अतिश्य तोर्थ क्षेत्र । महावीर जी के विशाल मन्दिर में भगवान
महाबोर की सुन्दर भव्य. दिव्य मूर्ति स्थापित है। यह गति
एक ग्बाले द्वारा भूगर्भ से खोदो गई यो । भरतपुर दोधान
श्री जाधराज जी ने वृहत मन्दिर बनवा र मूर्ति को प्रतिष्ठित
किया था । इस चमतकारिक मूर्ति में हर भागनुक की या
युक्त मनोकामना पूरी करने की शक्ति है।
इसके अलावा भगवान महावीर स्वामी से सम्बन्ध मे जा
कई स्थानो पर लेख मानाम, स्तम्भ लेस वापस आदि मिलते
हैं।
७
प्रभुका मार्ग : सबका मार्ग
सहन शक्ति : समभाव : और .
उदार अतिशय
अतिशय करणा बाला
सुन्दर, सहज, मुक्ति का मार्ग
भगवान महावीर स्वामी के अनुयायियो की संख्या का ओर
छोर न था। मगर जिन महत्व पूर्ण व्यक्तियो ने उनके पावन
पथ को स्वीकार किया उनमे आम जनता, विद्वान, धर्म भिक्षुषों
के अलावा सबसे अधिक सख्या बड़े बड़े राजा महाराजा सेठ साहू-
कारो की थी।
कौशाम्बी के नरेश शतनिक ने भगवान से दीक्षा लेकर साधू
बनना स्वीकार किया था पौर वे मुनि हो गये । उदयनरायन
चना ।
बनारस मे जिस शत्रु ने भगवान की विनय भक्ति से अभ्यर्थ
नापो थी और वहां के ग्रहस्क सूर देव तथा चल अपनी पत्नी सहित
श्रावक का व्रत लेकर भगवान की शरण मे पाये थे। राजकुमारी
मुन्डिका ने भी धाविका बनाना स्वीकार क्यिा था ।
पलिंग देश के राजा जित शत्रु के अलावा, पुण्ड, वंग और
सास लिपि प्रदेशो मे भी भगवान के अनुयायी बने थे। मगर
भगवान क्षेत्र समूचा भारत था। मैसूर के राजा जीवधर ने
भगवान फा सुरमलय नामक उद्यान मे स्वागत लिया था।
उनको भावभक्ति से प्रम्यर्शन की तथा दीक्षा लेकर मुनि हो
-
--
मुन्टलपुर के
गये ।
श्रावस्ती के नरेश प्रसेनचित ने भगवान महावीर का स्वागत
किया और उनकी महारानी मल्लिका ने एक समारह बनवार
समर्पित किया।
विदेह प्रदेश की राजधानी । मिथिला, पोलापपुर के गजा
विजय सैन सौर अंग देश के सम्राट कुनीफ ने सम्मा में गगवान
का स्वागत किया । कुनीक उन्हे कौशाम्बी तक पहुचाने गया था।
चम्पा में ही रागा हिवाहन ने दीक्षा लेकर सघ संरक्षण स्वीकार
किया।
मालवा-
राजस्थान।
उज्जैन।
के
पंचनद की राजधानी तक्षशिला।
सौर देश की राजधानी मथुरा"
पांचाल को राजधानो कम्पिला।
मगर भगवान महावीर का कार्य क्षेत्र बढ़ता ही गया। रंगन
राजकुमार प्रादरस पारस्प, पांचों यूनानी भवन योसा कोई
संख्या नही, सध्या का कोई मोर पोर नहीं। भगवान गोदन
अनगिनत अनुयायिनों में इतिहास पुगप भी हैं ।
एश है श्रेणिक विम्बसार !
बढ़ी अनुपम कया है इनकी ! ये जन्म से भगवान के भरत
नहीं थे। इनके पिता राजा उपभोणिपा ने उनको मगध से देग
निकासा दे दिया तो यूं ही घूमते रहे और फिर मठ में लापर
बौद्ध दन गये । धूमते इये वै सुदूर दक्षिण के कापीपुर में जा
पहुंचे। मेवानो मोर गुगल ही मतः उन्हें यहा मीनही राज
राजकुमार सम्मान प्राप्त हो गया । राजपुरोहित की कन्या नन्द श्री इन पर मोहित हो गई । राजपुरोहित सोमशर्मा स्वयं इनका बड़ा प्रादर फरते थे अतः इनका प्रथम विवाह राजपुरोहित सोमशर्मा की कन्या नन्द श्री से हुआ। इनके बड़े लड़के का जन्म इसी रानी से हुप्रा था। करल के नरेश मृगाक ने भी अपनी लड़की विलासवती से इनका विवाह सम्मान के साथ किया । जब श्रोणिक के पिता मर गये तो पिलातपुत्र मगध के सिंहासन पर बैठा । मगर शासन सूत्र न सम्भला और वे जैन साधू हो गये । फिर धोगिक ने प्राफर राज्य सम्भाला। उनकी पटरानी महारानी चेलनी बनी। उस वक्त तक श्रोणिक जैन धर्म से द्वाप रखते थे और एक बार जब वे शिकार खेलने गये तो जगल मे जैन साधू यमघर को तपस्या में रत पाया। क्योंकि श्रोणि विम्बसार को जैन धर्म से हप था प्रता तपस्या रत साधू उन्हे महज ढोंग दिखलाई पड़ा। पौर उन्होने पाच सौ शिकारी कुत्ते उस साधू पर छोड़ । दिये। जैन साधू क्षमा शीलता के अवतार होते है। क्षमा अपने में घड़ी शक्ति है । निरीह पशु कितने ही खूखार हो, क्षमाशीलता से प्रभावित शिकारी कुत्त यमघर मुनि के चरणों में लौटने लगे। प्राश्चर्य ! घोर मारपर्य। ऐसा न भी देखा था, न कभी सुना था। प्रोणिक ने सोचा, हो सकता है यह भी इन साधुप्रो की कोई -
कुन्दलार से
माया होगी, इसलिए राजा और उद्विगन हो उठे।
उन्होंने तरकश से तोसे वाण निकाल कर मारे।
मगर फिर आश्चर्य हुमा ।
पाए भी विफल हुये।
अब तो राजा श्रोणिक का गुस्सा और पड़ गया। जरूर यह
कोई मायावो पाखन्डी है । भल्ला कर उन्होने एक मरा हुआ साा
उस तपस्वी के गले में डाला और रानो पेजना को जाकर प्रश्नो
सारी बातें बतलाई । रानी चेनना को दुख हुमा । बोनी-'पारको
क्या मालूम"
'पाखन्छ ।'
'वह पाररान्डी नही हो सकता। अगर पाखन्डी होता तो उसमें
इतनी क्षमाशीलता न होती। आपने शिकारी कुत्ते इस प्रकार
हताश न होते । अापके वाण साली न जाते ।।
'तो..."
'यह उपसर्ग सह रहे होगे। हाय मापने कितना पार कमा
लिया है।'
'क्या यह पाप है।'
'बेसक पाप है। कैसे प्रायश्चित करेंगे इस पाप का ?'
'मैं नहीं मानता यह पाप है । यह सा गा गय होगा।'
'जरूर होगा !'
'अच्छा पनते है । अगर साधु यहां हुमा । और उसने उस
सहा होगा तो हम प्रायापित करेंगे।'
'पलिये।'
राजा पोर रानी दोनो मीनगर में गो । मुनि यार:
पहले की भानि नपारा करर नीतिया :
८७
राजकुमार
-
थी और उन लाखों चीटियों ने मुनि के शरीर को घायल कर
दिया था। ध्यान टूटा नहीं था। रानी की आंखो से आंसू बह
निकले । प्राह कैसा घोर अनर्थ है । रानी ने चीटियों को हटाकर
मुनि के शरीर पर चन्दन का लेप किया। मुनिवर ने जब समझा
कि उपसर्ग टल गया है तो उन्होने आखें खोली ।
सामने राजा था ।
राजा के साथ रानी थी।
रानी ने मुनि श्रष्ट को नमस्कार किया।
मुनि ने राजा और रानी दोनों को समान भाव से धर्म वृद्धि
प्रार्शीवाद दिया।
इतनी क्षमाशीलता' ऐमी करुणा मूर्ति । उपसर्ग सह लेने
बाद न सुख, न दुख । राजा दंग रह गया ।
उसक, मन पश्चाताप और ग्लानि से भर गया। जैन धर्म का
स्वरुप अब समझ मे आया। उसने , मुनिवर की यथेष्ट पूजा की
और फिर विपुलाचल पर पाये भगवान महावीर को सपरिवार
जाफर वन्दना की।
फिर जो एक बार वे भगवान की शरण आये तो उनका जीवन
हो वदल गया। कहां वे जैन धर्म के द्वोपकारी, कहा उनके देखते
देखते कई कुमार वनवासी मुनी हो गये ।
श्रोणिक विम्बसार ने महाराज महावीर स्वाण के साथ सबसे
अधिक सतसग किया था और ऐसो ऐसी शंकाओ के समाधान
खोजे थे जो काल वश प्राज नही है । अथवा इस विश्व मे इतने
पाप नहीं होते । उनमे से कुछ शकाये है उनके समाधान के साथ
प्रस्तुत है।
घरिणक ने पूछा-'महामान्य श्राप तो बड़ी कम प्रायु मे
-
करने
सन्यास की घोर प्रवत हो गये। जब प्रापको भोग की समस्त
सामन्त्री प्रस्तुत पो तो ग्रागते उसका भोग को नहीं किया।'
'राजन ! भोग नाम का सुन्य अलग है। साज लगी हो तो
मनुष्य को साज मे ही प्रान्नद पाता है। मुत्ता हड्डी पवार
मानन्द लेता है । मगर जब दोनो में सुन सून होता है तो रोते हो
है। वासना मे मानन्द पाता है न ।'
'हां स्वामी !'
'तो ज्वर माक्रान्त व्यक्ति वासना का मानन्द मयों नहीं
लेता ?
'प्राप प्रभु धन्य हैं । अब समका'
'क्या?'
'दासता मे
'तुमने बिल्कुल सही समझा राजन ? दासता में पदापि मुरा
नही मिलना । सबसे बड़ी प्राजादी मात्मा की आजादी । उस
शाजादी को पाने के लिये देर पया सबेर मया । केवल माना जन्म
ही ऐसा है जब शुभ कर्मों द्वारा मौर फर्मों के योग से वंचित होकर
मनुष्य परम पद पर पहुंच सकता है तो फिर उसमे देरी करने
का क्या अभिप्राय ? क्यों देरी की जाय।
'भगवन माप सही कहते हैं । पापको वागी रात्प हैं। मगर
मात्मा का कल्याण फाहे मे है।'
'कर्मों के विनाश होने में ।'
'पोर तीर्थाटन !'
'अगर यह तो मनुष्य के अन्तर से पन निगम म । जिस
प्रकार हमारे देश में लोग तीर्थ मरद है। गंगा और गमावरी में
मुख नहीं ।'
राज.मार
स्नान करते हैं । संसार के भीरु प्राणी पर्वत, वन वृक्ष, चैत्य, यक्ष,
इन्द्र मादि को देव मानकर उनकी शरण में जाते है। किन्तु यह
सहक मंगलदायक नही, शुभ नहीं । जो स्वयं विनाशशील है वह
दूसरे को क्या बचा सकता है। धर्म, जो कर्मों के बन्धन से छुटकारा
दिला सके वही श्रेष्ठ है वही उत्तम है । उसी की शरण में जाने
से सब कर्मों का विनाश होगा, संघर होकर निर्जरा घोर मोक्ष का
उपादान होगा तो कल्याण होगा।'
क्षेणिक भगवान के इन वचनो को सुनकर गदगद् हो गये !
मन शब्दो मे जो कल्याण कारी प्रोज भरा था वह और कहा मिल
सकता था।
उनके ही राजकुमार
राजकुमार थे अभय ।
अभय राजकुमार भगवान महावीर स्वामी के उपदेशो से बड़े
प्रभावित हुये । भगवान ने उसके पूर्व जन्म का चिट्ठा खोलकर
पतला दिया कि वह कौन था। क्या करता था।
भगवान ने बतलाया पूर्व जन्म मे वह ब्राह्मण का पुत्र था
और वेद के पठन पाठन के लिये घूमा फिरा करता था । मगर
मूढ़ताप्रो मे फमा रहता था।
'मूढ़ता किसे कहते है ?'
'पाच प्रकार की मूढ़तायें होती है ।' कहकर भगवान ने पांच
मूढ़तानो का उल्लेख किया :
(१) पाखड़ मूढता
(२) देव
मूढता
(३) तीय मूढ़ता
(४) जाति मूढ़ता
(५) धर्म मूढता
६० दुख या दे अभय कुमार भी इन मुडतानों मे फंसायूम रहा था उस्मा संग एक श्रावक ो संग हो गया और उसने बताया कि मित्र तुम जो पाखड मूढता, देव मटना, तीय मूढ़ता और जाति महता तया धर्म मृडता में अपने को सजोये पूमते हो यह नितान्त गरा और व्यर्थ है । सुनो इस दुनिया मे कोई सूर या कोई देव ऐसा नहीं है जो किसी को सुष । सुरा या दुख केवल मनार अपने अच्छे या बुरे कर्म लाते हैं। जो जीव अच्छे कर्म भरता। वह पुण्य सचित करके सुग्न भोगता है और जो बुरे गाम करता, उसके पाप संचित होते है । वह दुख भोगता है । अच्छा बतजाम्रो तो देवता प्रशंसा मे सुश हो जाये और निन्दा र नागर यह गाना देवता। फिर देवता और मनुष्य में अन्तर ही क्या था ? मगर तो पूरे संसार का रक्षक है । ऐसा तो किसी जनपद तमामर भी नहीं हो सकता। उस भावक या संग पाकर यह बालग उच्च फर्म परवाना इस जन्म में तुम्हारे यहां जन्मा है। अभयकुमार को यह गुन पर ही मेराग्य हो गया। उसने महाबोर स्वामी के सम्मुख सिर मुकाया पौर प्राम की कि नगवान महावीर उसे अपनी शरण में ले। मगर यावश्पर होता है कि यार दुरदीशा तो उसके माता पिता सहमत हो, यतः गणधर ने मनाया किया करती नमो. पहले माता पिता को तैगर मार ने । गती स्तमसोमाया' भगवान महावार और नगर पी इस बात को भी राममा अभय ने गिरोधार्य पिया और गुन्त दिन बाद देश निमार की सभा में उपस्थित हो । राजसभा में प्रारमीन भरा पूर्वप मामा नFETE पिया दोर सयोमा ।
राजकुमार भापण करने लगे कि सब दातो तले अंगुली दबालें । इसके बाद उन्होने सुयोग पाकर पिता से मुनि हो जाने की इच्छा व्यक्त की। 'तात।' श्रोणिक विम्बसार का स्वर कातर हो उठा । वे नही चाहते थे कि जिस राजकुमार को अब तक सुखो की शैया मिली है, उसे तप के कठोर प्रासन पर सोने की अनुमति दी जाये । मगर जब उन्होने स्वय राजकुमार को अपने निश्चय पर दृढ देखा तो उन्होने सहमती दे दी। राजकुमार अभय को स्वयं भगवान महावीर ने प्रवजित किया श्रोणिक ने खूब मगलो उत्सव मनाया । राजकुमार अभय मुनि होकर तपस्या में लीन हुये और कमों का नाश करके केवल ज्ञान को प्राप्त हुये । पोवल ज्ञान हो जाने पर राजकुमार अभय दूर देशो में घमं फा उपदेश देते गये और फिर मोक्ष गामी हुये । श्रोणिक विम्बसार के दूसरे पुत्र थे मेघकुमार पाठ रानियो के पति थे ! सुखपूर्वक रहते थे। उनका साग समय ग्रामोद प्रमोद मे बीतता था वे इतने सुख मे जीवन व्यतीत करते थे कि उन्हे बुढ़ापे की चिन्ता ही न थी। एक समय अनायास भगवान महावीर राजग्रह के उद्यान मे पधारे थे। लोगो की टोली की टोली समुदाय फा समुदाय उनको वन्दना के लिये जा रहे थे। मेघकुमार भी भगवान को वन्दना करने लगे । भगवान का प्रवचन सुनकर मेघ- कुमार का मन प्रसन्न हो गया । मन निर्मल हो गया। भगवान के चरणो मे गिरकर बोला-'भगवान प्रापने मेरी प्रार्स खोल दी। मैं आपकी दीक्षा पाहता हू--' भगवन महावीर मौन रहे ।
भ
पुन्डलपुर में
मेषकुमार को जो एक बार वैराग्य मूक गया सो सूझ गया।
उसने एक बार जो निश्चय कर लिया यह निश्चय मटन था।
माता पिता के मन पर इस बात का गहरा सदमा लगा । उन्होंने
पहले समझाया वुझाया, फिर माठों पत्नी मेघामार को रिमाने
छा गई।
मगर जिसे वैराग्य का चसका लग जाये उसे कोई लोभ कोई
भाकपंग नहीं रोक सकता था।
उसके कानों में तो भगवान का स्नेह भरा रोग अमृा गुन
रहा था । उसके कान जो एक बार उपदेश मुन नुते थे वे प्रय
कोई योर स्वर लहरी नहीं सुनना चाहते थे । उसे सुनाई पा रहा
घा ।
जीतिये--अगर जोत सको तो अपनी इन्द्रियों को जीतो।
घर्य रखिये । रागद्वप समाप्त कीजिये।
और कमों को समाप्त कीजिये...
मौर जव राजा ने देखा कि मेघ कुमार किसी भी प्रकार इस
संसार में रहने को तैयार नहीं है तो उसे अनुमति दे दी।
मां ने कहा-बत्स तुम्हे जन्म जरा और मृत्यु का भगवान
है तो उसे जीत कर ही छोड़ना । म परामान करना । गर्ग में
काम लेना । घबराना नहीं। प्रमाद को अपने पास मग पटकने
देना । जिस पर तुम जा रहे हो उस पथ पर जाने वाले को
मां पूजनीय हो जाती है। तुमने मुझे मादरणीय एवं पूजी
बना दिया। टा, पहिराक वीर बनना।'
मां का दुलार, मां का लेह, मां का मार्शीदारगर मार
भगवान महावीर मे अनुपाची बन गो। भर मेगामार मा
मिथे। सेमो पर सोने वाला राजमार अ६ रानामार ने
राजकुमार
६३
था वह मात्र भिक्षु था । उस शैय्या पर नही द्वार के निकट करवट
लेकर रयन करता था ! नाते जाते साधुप्रो के माने जाने से उनको
कष्ट होता था । और ये साधू । ये भिक्षु ! जब मैं राजकुमार था
तो मेरा फितना अादर करते थे और अब ये उन्हे दीन मानते
तुम्हारा प्रासन
मां का दुलार याद आने लगा।
पिता का प्यार ठकठकाने लगा।
और मेघकुमार ने सोचा भगवान से प्राज्ञा लेकर घर चला
जाये ! वे भगवान के सम्मुख पहुचे ।
मगर भगवान तो अन्तयामी थे । तुरन्त बोले-'साम्रो मेघ
कुमार क्या घर जाना चाहते हो ?'
'जी ?"
'तुम्हे यह खलता है कि साधुप्रो के समूह
मे
अन्त मे है ?"
'जी-
'भिक्षुमो की उदासीनता खिल रही है ।'
'जी-
लेफिन पत्म यह प्रावश्या हैं ।'
'क्यो कर प्रेभु ।'
'वे साधू मुनिजन जो आपके साथी है। वे साधना के पथ पर
हैं । और साधना मे वार्ता नही मौन भापेक्षित है ?
'जी।'
'चे
जानबूझ कर तुमसे उदासीन है।'
'क्यों कर प्रभु-
'इसलिये कि तुम समभाव रख सको । तुम अच्छे और बुरे में
६४
कुन्डलपुर के
भेद कर सको। जो दीक्षा ले लेते है उन्हे सुख दुख दोनों वरावर
है । कोई हंसे या रोये । कोई निन्दा करे या प्रशंसा, तुम्हे समभाव
रहना है । उपसर्ग भी हो तो सहन करने है।
'भगर भगवान ।'
'वत्स अब तुम्हें याद नहीं है। तुम्हारा तीसरा जन्म क्या था
पर मैं जानता हूं । अव से तीसरे जन्म मे तुम एक हाथी थे । एक
दिन भयानक झभोवत उठा । दिशाये भ्रमित होने लगी । याद
'नहीं।'
जानते हो फिर क्या हुआ !!
'नहीं तो।'
'जानना चाहते हो न ?'
'हां प्रभू आपकी कृपा हो तो ।'
'दिशायें भ्रमित हो गई । तुम भूल गये तुम्हें कहां जाना है
और एक दलदल मे जा फंसे । तुम बार बार निकलने का प्रयास
करते थे मगर तुम बार बार दलदल मे फंसते जाते थे भूखे प्यासे
अध मुखे । आनायास ही तुम्हारे वैरी वहां आ गये वे प्राकर तुम
पर धुांधार प्रहार करने लगे । आखिर तुम्हे प्राण छोड़ने पड़े ।
मगर प्रारण छोड़ते वक्त तुम्हारे मन मे एक दुर्भावना थी।
'क्या प्रभू ।'
'कि बदला लेना है । बदला-
"फिर क्या हुआ प्रभू ?
'इस दुर्भावना ने तुम्हे फिर विन्ध्याचल की पहाड़ियों में हाथी
बना दिया।'
'दूसरी बार भी।
राजकुमार 'फिर क्या हुमा प्रभू 'हां वत्म- ?' 'वनो मे भाग लगती रहती है । दावानल कहते हैं उसे । तुम अक्सर दावानल से बचने के लिये सुरक्षित स्थान खोजते थे । एक बार बड़े जोर की प्राग लगी। धू धू करती प्राग जंगल को जला रही थी । तुम जब भाग कर सुरक्षित स्थान में पहुचे तो वहां और भी पशु तुम से छोटे लेकिन जब भाग लगती है तो पशु तक आपस का वैर भूल भी भूल गये वह पुरक्षित स्थान तुम्हारा खोजा हुआ था, लेकिन उसमे जंगल के सभी जीव खड़े थे। थे। पशु। जाते है । तुम , 'फिर क्या हुप्रा प्रभू " 'खडे खडे तुम्हे खाज लगी । तुम झुक कर खुजलाने लगे। और जब खुजला कर तुम पुन पर रखने के लिये आगे बढे तो देखा कि वहां एक खरगोश अपनी जान बचा रहा था ! तुम्हे उस निरीह सरगोश के प्रति फरुणा उपजी । तुम जानते थे कि यदि तुमने पैर रखा तो उसकी जान चली जायेगी। तीन रोज तक लगातार तुम उस खरगोश की खातिर तीन पर से खड़े होकर उसका जीवन बचाते रहे । जब दावानाल शांत हुग्रा तो सव जीव जन्तु अपनी अपनी राह लगे तो खरगोश भी चला गया । तुम्हारा सारा वदन अवाड़ गया था। तुम घडाम से गिरे और तुम्हे इतनी चोट आई कि फिर तुम फिर शरीर त्याग कर रानी के पेट मे घा घुसे। उस प्रतिश्य फरुणा के कारण और पशु योनि मे भी जो तुमने समभाव दर्शाया तो उसके कारण तुम्हे यह योनि मिली। आश्चर्य है कि पशु योनि मे तुमने जो समभाव दर्शाया अब उस कुन्डलपुर के के मन समभाव से दूर जा रहे हो । क्या यह दीनता तुम्हें शोभा देती है । तुम अहिंसक वीर बने थे । प्रहिंसक वीर बने रहो । तुम्हारा यस्त्र ही समभाव है । उस पस्त्र को त्यागो। तुम्हारा नाम मेघ है । तुम मेघ के समान ही धीर वीर उधार और गम्भीर बनो। सहन शील समभावी बनो। जो रास्ता, जो पथ तुमने 'घूना है वह सहनशील समभावी पोर सेवा धर्मी बनने से ही प्राप्त हो सकता है।' मेम राजकुमार की सलुसता धुल गई। कायरन जैसे मिट गया- उसने पुनः दीक्षावृति ली और अपना तपोमय अन्तिम जीवन व्यतीत किया ऐसा था भगवान का मार्ग जिस पथ पर एक नही अनेक पथिक चलकर अपनी भगवान महावीर स्वामी ने जिन मिद्धान्तों का प्रति पादन किया उनमें निम्न बातें भी शामिल थी- (१) पाप आचरण मत करो। पांच पापों की चर्चा हम कर चुके हैं। 'पांच पापों को छोड़ने के बाद काम समाप्त नहीं होता, प्रारम्भ होता है । भगवान महावीर ने अपने प्रवचनों में तीन बातों पर बल दिया था। तीन तत्व थे- सम्यक दर्शन। (०) सम्यक् (३१ सम्यक् चरित्र । सम्यक दृष्टि क्या हैं ? सर्वज्ञ, अरहंत देवों में विश्वास, धर्म के प्रति मास्था और राह लग गये! . - -
राजकुमार
-
अनन्त गुणो के प्रति श्रद्धान ही सम्यक दृष्टि है। सम्यक् दृष्टि
होना प्रावश्यक है । सम्यक् दृष्टि न होने के कारण बड़े कष्ट
• सहने पड़ते है ।
श्रोणिक विम्बसार के एक और युवराज का नाम था वारि-
पेण । उनकी माता थी चेनली, भगवान महावीर की मौसी ।
वारिपेग में एक तपस्वी श्रावक के गुरग
थे । वे अत्यन्त गुरगवान
और सम्यकतत्वो थे। एक बार उनके कर्म समाप्त होने का समय
प्राया।
चर्तुदशी के दिन उपवास करने के लिये शमशान मे जा
विराजे ।
उसी दिन एक घटना घटी ।
उसी नगरी मे विद्य त नाम का एक चोर रहता था।
उसकी प्रेमिका थी नगर वधु सुन्दरी ।
विद्य त उस पर जान छिड़कता था । सभवतः इसी बात को
प्रभाव से मने एक बार कहा---'राजा---'
के प्यार करते हो ?'
art'
'सबूत।'
'शाज्ञा दो।'
'अगर प्यार करते हो तो मुझे रानी चेलनी का हार लाफार
देपो।
'मस्तिका ठीक है।
'बिल्कुल ।'
'यह असभन ।'
६८ कुन्डल पुर के 'तो प्यारे मेरा प्यार मिलना भी असंभव है।' 'अजीब बात है।' 'सोच लो।' प्यार अन्धा होता है । और विद्युत तो था भी विद्युत जैसा चपल । अपने कौशल से अाखिर वह हार ले ही आया । हार चुराना आसान था । मगर पचाना नहीं । रास्ते में कोतवाल ने उसको जगमगाहट से चौक कर पूछा- 'ये क्या है रे ।' 'ना कुछ नहीं । और वह तेजी से शमशान की ओर भागा । वहा राजकुमार वरियेण तप कर रहे थे। विद्युत वह हार उनके पास पटक कर चलता बना । पीछे पीछे सिपाही लोग दौड़ते हुये आये और वह हार राजकुमार के पास बरामद हुआ । कोतवाल चोर को पाकर प्रसन्न हुमा । उसने यही समझा कि हार चुरा कर चोर पाखन्ड कर रहा है । उसे पकड़ कर न्यायालय में पेश किया । थोरिणक विम्ब- सार सोच रहे थे कि ऐसा कैसे हो सकता है कि वेटा मां का ही हार चुरा ले । मगर समस्त गवाहिया उसके खिलाफ पड़ रही थी। और न्याय कहता था कि यदि प्रमाण मिलते है तो अपराधी को दण्ड मिलना ही चाहिये । अपराधी को दण्ड दिये जाने का विधान है। महाराजा श्रोणिक विम्बसार ने मृत्यु दण्ड दिया। वे न्याय की तुला के समक्ष बैठे थे । पुनीत न्याय तुला की शपथ लेकर बैठे थे। हृदय कड़ा कर श्रोणिक विम्बसार ने वारिपरण को दान्डालो के हवाले कर दिया।
राजकुमार ६६ - चान्डाल वध के लिये शामशान ले गये । मगर यह क्या ! वध के लिये हाथ नही उठ रहा था । फरसा नही उठ रहा था। एक देव, मगध की इस न्याय व्यवस्था को देखकर प्रसन्न हो उठा । उसने राजकुमार वारिपेण पर पुष्प वर्षा की। पुष्प वर्षा । और हत्या की निवरता । यह चर्चा सवत्र फैलती चली गई। भोगिक विम्बगार स्वय वारिपेण के निकट पाये । श्राफर घोले-'वता, हमे विश्वास था कि तुम चारी नही कर सक्ते । मगर न्याय तो अन्धा और बहरा होता है। वह केवल सबूत देखता है । और वे सबूत कहते थे कि तुमने चोरी की है । भगवान को अनुकम्पा है कि तुम निर्दोष पाये गये । हम तुम्हे लेने पाये है पुत्र चलो चले। 'नहीं।' 'यो देटा।' 'फोन बेटा और किसका देटा।' 'यह क्या कह रहे हो पुर।' 'बिगुल ठोक बाह रहा है। संसार मे न कोई किसी का पिता है न माता । सब स्वार्थ के नाते है। मैं शमशान मे भक्ति फर रहा था। और यह चोरी का मारोप मेरी नजर मे उपसर्ग पा । मैंने निश्चय कर लिया था कि यदि इस उपसर्ग से बच गया तो निश्चय ही में भगवान के परम पद के लिये महावार स्वामी की शरण मे जाऊंगा।'
१००
कुन्डलपुर के
'तो'
'मैं भगवान महावीर के संघ का मुनि सदस्य बनूंगा।'
'धन्य है।
माता-पिता दोनों ही पुत्र के इस निश्चय पर फूले नहीं समाये ।
वह जानते थे कि वारिषेण दृढ़ निश्चयी व्यक्ति है यह सही है
कि उसकी पत्नियां अनुपम तेजोमय और सुन्दर है, मगर जो व्यक्ति
परम पद मोक्ष का उम्मीदवार बने उसके लिये शय का बड़ा
मूल्य है । कहा गया है कि वृत भंग होने की अपेक्षा अग्नि प्रवेश
ही ज्यादा स्कर है। शील से व्रत को नष्ट करके जीना किसी
काम का नहीं है।'
वारिपेग ने प्रभू का मार्ग स्वीकार कर लिया।
महावीर स्वामी ने कहा था
सहावीर स्वामी और पाज का
विश्व
द
महावीर स्वामी के पावन उपदेशा का मनोबल पाज भी इस
दुखमा मुखमा मात्र के प्राणियो को अतिश्य वल दे रहा है ।
जितनी जरुरत महावीर स्वामी के पावन उपदेशो की पाज
है उतनी कभी नहीं रही। यू हमेशा रही अन्धेरे मे चमकती एक
प्रखर लौ की भाति महावीर स्वामी का दिखलाया हुआ मार्ग
प्राणीमात्र को मुक्ति की राह पर चलाता पा रहा है । हर क्षण
लगता है कि महावीर स्वामी का पालन उपदेश हमे एथ दिखला
रहा है । पथ है यहिंसा का, पथ हे मानव मात्र की दया का !
हर प्राणी-
देव हो या नर!
पशु हो या नियेयगति का जीव ।
घोर यास्थावर !
हर व्यक्ति प्राणी । हर जीव एफ सी पीड़ा महसूस करता
है। हर एक का एक ही लक्ष्य है, मुक्ति !
मुक्ति, मुक्ति"
ससार के प्रावागमन से छुटकारा । मानव मात्र के प्रति दया
का व्यवहार पोर फर्मों का निष्कासन, फर्मों से दूर, दुष्कर्मो से
पहार स्वामी का एक दिन एप है। मगर पर एहर पष
१०२
कुन्डलपुर के
बहुत सुन्दर और मनोरम पथ । यू अहिंसा का रास्ता भगवान
बुद्ध ने भी दिखलाया था-
मगर उनकी दया सीमित थी मानव मात्र तक ।
पशुओं पर क्या करना महावीर स्वामी ने ही सिखलाया और
आज जब विश्व दुखमा-सुखमा काल के अर्न्तगत फैशन, भ्रष्ट
प्राचरण की चरम सीमा पर बढ़ रहा है तो भगवान महावीर
स्वामी का पथ और आलोकित कर रहा है, विश्व के प्राणियो का
भारत में ही नहीं भारत से बाहर भी महावीर और जिन देवके
असंख्य अनुयायी नित्य महावीर स्वामी के उपदेशो , पर चलने का
प्रयास कर रहे है।
भूठ नहीं बोलना।
चोरी नहीं करना ।
धन संग्रह नही करना।
मानव मात्र के लिये नहीं सबके लिये प्राणीमात्र के लिये दया
का प्रचार करना ही सबसे बड़ा धर्म बन रहा है । तभी तो जगह
जगह वे लोग जो पशु मांस खाते नही अघाते थे। आज शाका-
हारी होने का व्रत ले रहे है । प्रकृति की ओर लौटते हुये ये विश्व
के जीव प्रकृति के रक्षक बनने का प्रयास कर रहे है, और महावीर
स्वामी का वह सार्थक उपदेश कित्रियेय गति का जीव भी परमेष्ठी
क महान पद को प्राप्त करके संसार के आवागमन से मुक्त हो
सकता है, पाज के प्रजातंत्र युग की पहली मजबूत बुनियाद है ।
मगर अभी हम, विश्व और विश्व के प्राणी भगवान महावीर के
बतलाये मार्ग पर चल नहीं पा रहे है। इसका महज कारण है
हमारे कर्म, हमारे जीवन में पाये हुये दुप कर्म, कपाय और पाप ।
पाप मुक्त होना है।
-
...
-
মারমা 1 -- कसाय से दूर होना है। और दूपकों के उदय को रोकना है । महावीर स्वामी के इस पथ का अनुसरण करने वाला हर जीव चाहे वह त्रियेय गति का होया देव, एक समान अधिकार रखता है कि वह आवागमन के कष्टों से मुक्ति पाकर आत्मा मे जीन हो जाये । श्रात्म विश्वास का इससे बड़ा विवेचन और क्या हो सकता है कि हम सब केवल अपने पापो और कर्मों के कारण छोटे या बड़े । हमारा जीवन पाप, कर्म, और कपाय ने अतिरजित कर दिया है, अन्यथा हम एक ही शक्ति के पुन्ज है, जो मोक्ष गति की और अग्रसर है। महावीर स्वामी के इन पावन उपदेशो का सार आज पूरे विश्व को ग्रहण करता है, और यदि विश्व के प्राणी मात्र इस उपदेश को ग्रहण कर लें तो न कोई भूखा रहे व नंगा । न छोटा रहे न बढ़ान सीमा के लिये युद्ध हो न रक्तपात । परिग्रह न करने के कारण उन सभी प्राणी मात्र की रक्षा हो सकती है, जिनको नित पीड़ा दी जाती है। मांस के लिये पशुवध, अधिक मुनाफे के लिये मिलावट और अधिक मुल्क समृद्धि के लिये राजनैतिक उखा पछाड़ मे विदेश में होने वाला रक्त पात रूक सकता है । पासू कुन्दन भगवान महावीर के मार्ग मे वर्जित है । भगवान महावीर के उपदेश विश्व को सिखलाते है- सयमी जीवन जियो। इन्द्रियो पर नियन्त्रण रखो। फेवल इन्द्रियो के स्वाद के लिये न किसी को पीड़ा पहुंचानो १०४ कुन्डलपुर के । न त्रास दोन वष करो। परिग्रहण से बचो ! आपकी संचित सामग्री का उपभोग आपके लिये नही, उन वेसहारा लोगों के लिये है, जो इन सुविधात्रो के लिये तरस रहे है। उनकी पीड़ा को समझ कर उनको यथेष्ट सम्मान और सुख मिलना ही चाहिये । वे हमारे सुख के सबसे बड़े साझीदार है। संसार भर के बड़े राष्ट्र केवल अपने देश वासियों के स्वार्थ के लिये अपने आपको बड़ा बताने के लिये ऐसी राजनैतिक विचार धारा को शोषण कर रहे हैं, जो विश्व को विश्वयुद्ध के फगार पर ला सकती है । कोरिया और वियतनाम इसके साक्षात उदा- हरण हैं। भगवान महावीर स्वामी का उपदेश ग्रहण करके विश्व इस भयपूर्ण विश्वयुद्ध से बच सकता है और हर प्राणी अपने प्राप एक संयमित जीवन जोकर अपने कर्मों को नष्ट करके सचुलता की एफ-एक सीढ़ी चढ़कर परमपद पर पहुंच सकता है। इन उपदेशों को सूदुर विश्व के कोने-कोने मे पहुंचने से प्राणीमात्र की रक्षा हो सफेगी । सांसारिक सुखी जीवन भोग कर परमपद की प्राप्ति हो सकती है । क्योंकि भगवान महावीर स्वामी के उपदेशों का सार प्राणीमात्र पर दया भाव रखने में है जहाँ जहाँ विश्व दुखमा-सुखमा काल को पहुंच रहा है ।, शारीरिक सुख की होड़ बढ़ रही है । फैशन बढ़ रहा है । और वहां प्राणी में क्ष्या नहीं, परिवार का सुख नहीं शान्ति नहीं अशान्ति का सम्राज्य फैल रहा है। -दूर पश्चिमी देश। -मस्यंदा के नाम पर तनहा राग अलापने वाले देश।
राजकुमार १०५ शान्ति के नाम पर युद्ध का आश्रय देने वाले देश आज इस- लिये मानसिक रूप से दुखी है, संत्रस्त है, वहा हर साल प्रकृति के प्रकोर होते है, भोपण हत्या कान्ड होते है, क्योकि वहा कर्मों का उदय बड़ी तेजी से हो रहा है । दुष्कर्म-कपाय और पाप पूरित कर्म । इन कर्मों से बचने का एक ही मार्ग है-पापों को दूर करने का एक ही रास्ता है कि विश्व महावीर स्वामी के उनसद् उपदेशों को वह वंचित है । और जिनके बगैर उसे भयकर त्रासका जीवन जीना पड़ रहा है। पूरे विश्व के सामने एक ही मार्ग है कि वह महावीर स्वामी फे बतलाये उस मार्ग पर चले जिसने पाप नहीं कमाय नही कर्म नही केवल है स्वाधाय सयम । अपूर्व त्याग महान् बलिदान और पात्म सिद्धी का मार्ग इसी मे विश्व का कल्याण है। ग्रहण करे जिनसे
AS
प्रधागी का प्रवृत्त ही इस
प्रसार संसार का सार है
इस दुखी भूमन्डल पर शान्ति
और सुख का प्रकाशदीप है।
भगवान महावीर स्वामी की कल्पना करते वक्त अांखो के
सामने एक अतभूत प्रहलादकारी दृश्य तिच जाता है। भगवान
महावीर की प्राप्त मूर्तियां तो उनके रूप को चित्रित करती ही है,
यदि थोड़ा सा चिर ठिकाने करके उस रूप की कल्पना की जाये
तो मन गद्गद हो जाता है । कल्पना कीजिये उषा काल की-
दूर क्षितिज मे सूरज उदय हो रहा है।
नदी का प्रवाह, धीमा, मन्थर होते हुये वीणा के तारो की
आंति झकृत हो रहा है।
.
प्रातःकाल:
अर्थात् पक्षियो के कलख से भरपूर एक सुहानी सुबह जब
बसेरा लिये पक्षी उड़ते है भोजन फी खोज मे और बसेरा लिये
यात्रो प्रत्यूत होते है नई यात्रा के लिये ऐसे क्षरणो में सघन
साल वृक्ष के नीचे प्रफुल्लित मुख लिये एक पुरुष श्रेष्ठ मग्न सढ़े
हैं। अतहष्टि से व्याप्त उनके व्यस्त ने किसी प्रोर नही
जाते । और उस स्थान से गुजरने वाले व्यक्ति पूरते है । 'कोन
हैं ये ?'.
'कुन्डलपुर के राजकुमार।
'राजकुमार।
--
राजकुमार १०७ । 'हा।' 'हाय । क्या प है। इन्होने सन्यास यो लिया है ! 'स्वेच्छा से । • 'यानी कोई दुख नहीं।' 'नहीं।' कोई परेशानी नही। "बिल्कुल नहीं-' उत्तर दिया जाता है इन्हे संसार के सभी सुख प्राप्त थे । स्वेच्छा से सन्यासी बने हैं। 'स्वेच्छा से कौन सन्यासी बनता है ?' जिन्हे परलोक, इहलोक सुधार कर मोक्ष को कामना होतो tho इस उत्तर मे वाकई मे सार है। भगवान वर्धमान का संसार कुछ ऐसा ही था। उन्हें कोई सांसारिक दुख नहीं था। कोई पीड़ा नही थी। वे राजघराने मे जन्मे थे और एश्वर्य की गोद में पलकर बड़े हुए थे । स्वेच्छा से सारी सम्पति का दान करके किचन रहने का व्रत लिया था । क्योकि वे ये महसूस करते थे कि संसार जो भोग क्षेत्र और कर्म क्षेत्र दोनो है । फेवल अज्ञान हो गहरी गुफा है । उनके मन- सार समस्त लोक मोह अन्धा हो रहा है। वे सोचते थे इस लोक मे फेवल वे ही धन्य हैं जिन्होने तृष्णा रुपी विपबेल को उतार कर फेंक दिया है । जीव और नाश पतन की ओर बढ़ रहा है। उसके इस पतन को रोकने की सामर्थ किसी में भी नहीं है । न भार्या में न बंधू वर्ग में। मोह हमारे जीवन की सबसे बड़ी विपवेल है-भगवान महावीर ने इस बात को एक तरह नहीं हर तरह, हर प्रकार से
कुन्डलपुर के
स्पष्ट किया था। महावीर स्वामी ने यह स्पष्ट कर दिया था कि
जो कुछ हम सोचते है, करते हैं उस सवका परिणाम हमको
भुगतना ही पड़ता है और सम्भवतः यही सोचकर उन्होने इस
संसार को त्याग करके इन तत्व उपदेशो को पुष्ट किया था कि:-
केवल सर्वज्ञ और सर्वदर्शी ही दिशा भ्रमित सांसारी जीवो
को उपदेश दे सकती है।
ऐसा उपदेश ही सत्य उपदेश हो सकता है ।
समाज निर्माण करना है तो उसका आधार स्तंभ व्यक्ति ही
है । केवल पुरुष अथवा स्त्री ही ऐसी मौलिक इकाई है जिसके
कारण समाज वनता, बिगड़ता अथवा विकसित व पतनशील होता
.
अतः व्यक्ति का सुधार ही समाज सुधार है । जब तक व्यक्ति
अपने आपको सतुतित नहीं करता उसे कोई राह नहीं मिल सकती
व्यक्ति के सुधार से ही उसकी प्रात्मा का सुधार होता है और
उस सुधार से ही वह अपने जीवन को उन्नत अथवा अवनती की
राह पर डालता है।
जिन बातो को प्राविष्कार करफ आज हमारे समाज शास्त्री
समाज नेता और समाज सुधारक फूले नहीं समाते उनको अपनी
खोज मानते है । वे बातें कार्य के रुप में भगवान महावीर ने आज
से ढाई हजार वर्ष पूर्व कह दी थी।
ढाई हजार वर्ष
जब ईसा नहीं हुए थे।
सानाजायों संसार घना मोर मिटा । लोग 'माथे पोर बले
गये।
राजकुमार किसी ने सच कहा है, समय भागते हये घोड़े के उन सिर के वालों की भाति होता है जिसे पकड़ा नहीं जा सकता। समय नहीं रुकता घड़ियां टिक टिक करते घन्टे घनघनाते आगे ही बढ़ते पले जाते हैं । महावीर स्वामो की पच्चीडवों निर्वाण शताब्दी का समारोह यायोजन करने को तैयारी विश्व कर रहा है उनकी वाणी उनके उपदेशों का अमृत बाज भी उतना गरिमामय पावन और पवित्र है जितना उस समय था बल्कि आज के युग में जब दुखमा- सुखमा काल चल रहा है तो भगवान महावीर स्वामी के उपदेश अधिक सारमय हो गये हैं। कवि वर्ग ने महावीर स्वामी के अवतरण को मरद ज्योत्सना के अवतरण को संज्ञा देते हुये कहा कि जिस प्रकार शरद ज्योत्सना का प्रभाव उसका रूप और उसकी परिगति सभी कुछ सुखद होती है उसी प्रकार महावीर स्वामी का प्रादुभाव महावीर का आगमन उनकी वाणी, उनके उपदेश, उनकी स्थापना ही शरद ज्योत्सना की भांति निर्मल स्वच्छ और मानन्ददायी है। महावीर स्वामी को स्वतन्त्रता का प्रथम मेवानी कहना चाहिये । रुढि और गलत परम्परा का सशक्त विरोधी एक सवल सेनानी जिन्होंने हाई हजार साल पूर्व ही अपनी मधुर महान् वाणी से कहा था-'मानव तो क्या कोई जीव भी न किमी का अच्छा कर सकता है न बुरा ! सब स्वच्छन्द है। सब स्वाधीन है प्राधीन है तो मिर्फ अपने ! अपने कर्मों के भावीन होकर मनुष्य सुख या दरा पाता है मनुष्य से देवता प्रथयां नियम और नरक को गति का जीव बनता है। प्रतः महावीर स्वामी का यह कपन शतप्रतिशत सही है कि
११०
कुन्डलपुर के
-
प्राणी मात्र ज्ञान का सहारा ले । ज्ञान के आश्रय में आने पर पता
लगेगा कि
(क। काल कौन सा है ?
(ख) उसका कौन सा जन्म है ?
(ग) उसका निजि क्या है ?
(घ) उसका आचरण क्या है ?
(च) हितकारी कर्म क्या क्या है ?
(छ उसका भविष्य कहां सुरक्षित है ?
ज) उससे अलग और क्या क्या है ?
इन प्रश्नो का सही उत्तर पाने पर ही प्राणी मात्र अपनी
हितचिन्तना कर सकता है । जान सकता है कि उसे क्या फरना है।
कब करना है और कैसे करना है। आपने देखा होगा कि समय
पाने पर ही कुछ कार्य सम्पन्न होते है । जैसे वक्त पाने पर ही
सही समय पर डाला हुअा बोज फल देगा। अथवा नहीं। उसी
प्रकार यथा समय किये गये कर्म ही जन्म और मृत्यु के पावागमन
से मुक्त कर सकते है।
महावीर स्वामी का उद्देश्य किसी नये धर्म की स्थापना
करता नहीं था। उन्होने तो उन्ही सिद्धान्तों की स्थापना की थी
जिसे उनसे पूर्व २३ तीर्थकर कर चुके थे।
महावीर स्वामी ने इस मूल तत्व की स्थापना की कि देह के
साथ देही का अन्त होता है, ऐसा लगता है। शंका हो सकती है
कि देही (आत्मा) है क्या ? उसे किसने देखा है। उन्होंने
कहा-यद्यपि स्थूल नेत्रों से प्रात्मा दिखाई नहीं देती। क्योफिन
तो उसका कोई रूप है न उसका कोई रस न उसमे कोई गध पाती
।
राजकुमार है और न ही उसका कोई रंग है । परन्तु मानवी अनुभव उसका अस्तित्व प्रमाणित करते है । प्रात्मा शरीर से अलग है क्योकि वह पंच भूतो की उपज नहीं । शरीर तो पंच तत्त्र का है । जल, वायू पृथ्वी, अग्नि और आकाश । मगर इनमें से कौनसा पदार्थ चेतन हैं । किसमे जानने देखने का गुण विधमान है । जब इसमें वह गुण नही तो फिर उसमे जिनको यह बनाती है। यह गुण कैसे प्रा सकता है। महावीर स्वामी ने एक सबसे महत्वपूर्ण मिद्धान्त का प्रति- पादन किया कि विश्व में जो वस्तु है उसका कभी विनाश नहीं हो सकता । जो वस्तु नही है उसका कभी अस्तित्व नहीं हो 'सकता । प्रात्मा के विषय मे उन्होंने कहा- 'नाश देह का होता है। शरीर का नही ! देह पुद्गल है और देही चेतन जब शव का दाह संस्कार होता है पुद्गल पुद्गल ही रहता है और चेतन लोक में दूसरा शरीर धारण कर लेता है। 'अगर ऐसा नही हो तो जानते हो क्या होगा?' 'मनुष्य का ज्ञान भी खटित हो जाये ?' . मनुष्य का ज्ञान भी पांच भागो मे टूट जाये । ऐसा नही था । ज्ञान अखन्ड है और उसका अनुभव भी एक अखन्ड वस्तु करती भव एक शका उठती है कि प्रात्मा पहले थी या नहीं। जोवारमा यदि लोक भ्रमण नहीं करती होती तो नवजात शिशु अनायास ही माता के स्तनो का पान कैसे करने लगता। क्योकि यह उसके पुराने जन्म का संस्कार है ।
कुन्डलपुर से
से
भीर इन्द्रियों का आभास श्रात्मा ही पाती है। अनादि काल
पुद्गल के बन्धनों में पड़ा हुया शरीर में कैद हुमा जीव भुभा-
शुभ कर्म कर रहा है । जीव ने पूर्व जन्म में कर्म किये थे और
इस जन्म में भी कर्म संचित कर कहा है । इन संचित झमों का
अच्छा या बुरा फल वह स्वयं
सुखी या दुसी
बनता है।
भुगतता है और
-
व्रत उपवास और तपस्या के द्वारा इन कर्मों को निर्जरा हो
जाती है और शरीर बन्धन मुक्त हो जाता है। जप मन वचन
काय द्वारा जीव संवर अवस्या को प्राप्त हो जाता है तो कर्म
संचित नहीं होते और संवित हुये कर्मों का तपस्या से नाश हो
जाता है । इस प्रकार के कर्मों के आने के रस जाने से और पुराने
कर्मों के क्षय हो जाने से संसार का पावागमन छुट जाता है।
कर्म पाना दुख धाना है।
कर्म क्षय ही दुल क्षय है।
जब दुख मिटता है तो वेपनाये मिस्ती और वेदना कमिट
जाने मे सब दुषों की निर्जरा हो जाती है।
एक प्रश्न भगवान महावीर स्वामी से अक्सर दिया जाता
रहः कि-भगवन ! प्राप एका राजकुमार थे। प्रापको सभी
सुख एवं सुविधायें उपलब्ध थी। फिर भी आपने मुनि त धारण
किया । आखिर क्यो ? युवावस्था में तो हर एक ही धानन्द भोगता
है । आपको भोग एवं उपयोग की सामग्री उपलब्ध थी। फिर
आपने से क्यो नही भोगा।'
भगवान महावीर ने इसका उत्तर देते हुये बताया था दि.
जिले मागन्द पार भोग कहा जाता, वारता में तो नासमन बी
-
राजकुमार कैसा। और इन्द्रिय सुख - - है वही है नाश की जड़ ! जवानी में दीवाना बनफर जो भोग प्रथवा इन्द्रिय सुख उठाता है, वह वास्तव में अपना सबसे बड़ा अहित करता है जानते हो दुनियां मे सारे झगड़े काहे पर होते । कंचन और कामिनी । (जर पोर जोरू)। तो जो झगड़ा कराये उसमें सुख तो उस तलवार की धार पर पड़े शहद को भांति होता है जिसे लालच करके व्यक्ति घाटना तो है, मगर हर क्षण उसे जान का खतरा पड़ा रहता है । 'जो सार को सार उपादेय को उपादेय और प्रसार को प्रासार. मानते हैं वही सार के अधिकारी है, यूं इस ससार में बड़े-बड़े कैद खाने बन्धन है । मगर वास्तविक बन्धन तीन है:- (१) धनासक्ति (२) स्त्री मे प्रासक्ति (४) पुत्र सम्पति की कामना धासक्ति पर जग ध्यान दीजिये । घर क्या है । मूल्य न हो तो कुछ भी नहीं । और स्त्री-उसका अन्त बुढापे से होता है, और जब मृत देह सूख जाता है तो उस में पाशक्ति नहीं रहती। धन स्वर्ण और रूप सुन्दरी वास्तव में उस सीमा तक ही सुहाते है । जब तक इन्द्रिया दश में नहीं होती जब इन्द्रिया वश में हो जाती है तो यह सुख साधारण दुख में बदले दिखलाई पड़ते है रोगी व्यक्ति खोज मे पानन्द लेता है उसी प्रकार पित्त के बुमार ग्रस्त व्यक्ति को लड्डू अच्छा लगाता है, रोग मे तो वह पोर भी घच्छा लगने लगता हैं । मगर क्या वे हितकारक होते है, नहीं वे हितकारी नहीं होने गुत्ता हड्डो घुसता है । खून निकल पाता पह उसी सून को चूसकर मानन्द लिये जाता है । इन्द्रिया क्या है? --
मुन्मलपुर के
,
-
ये वास्तव में क्षणिक सुख हैं। इस प्रकार महावीर स्वामी
अपनी वाणी से उन सभी बातो की प्रति स्थापित स्थापना की 5
प्राणी मात्र के लिये आवश्यक है महावीर स्वामी प्राणी माय
स्वतन्त्रता हामी थे । वे हर प्राणी की स्वतन्त्रता के इतने उ
समर्थक थे, कि उनकी सहन शक्ति भगवान बुद्ध से भी बड़ी च
थी। भगवान बुद्ध का क्षेत्र था सिर्फ मानव समुदाय और महाव
स्वामी का क्षेत्र था, पर अचर, गोचर अगोचर, नगम, ती
गतियों ।
उन्होने उन सिद्धान्तों को व्याख्या की जो सनातन जिद ।
के सिद्धान्त थे । भगवान प्रादिनाथ से लेकर भगवान पार्श्वन
तक सभी तीर्थकरो ने इन्ही प्रार्दगो की प्रतिष्ठा और प्रति स्थाप
की थी। भगवान महावीर ने कहा था-'जियो और जीन दा
इस सिद्धान्त को इस शानदार ढंग से लागू किया गया लिन
दृष्टि में नर और कुजर और चोटी सब एक समान थे । पत्रि
उसी व्याख्या को चित्रित करते हुये लिखा है।
राजारानी छत्रपति हाधिन के असवार ।
मरना सबको एक दिन अपनी-अपनी पार ।।
जब इस देह को समाप्त होना है तो फिर इसका मोह पर्य
देह का मोह नही रहेगा तो मनुष्य मोह छोड़ देगा।
महावीर स्वामी ने परमोत्कृष्ट करने के लिये शुद्ध भावनामो
मन मे स्थान देने का आग्रह किया है ये भावनायें है-
(१) आत्मा है इसका अनुभव करो और इसमें निरंतर
करते रहा ।
(२) प्रापको प्रात्मा से वडो प्रात्मायें इस सार में विध
है, उसका समुचित सादर करो।
(३, पहचर्य का पालन करो। संसार में माली पता
राजकुमार
अापके लिये है । शेप महिलायें मां की तरह पूजनीय है। उनका
प्रादर करो।
(४) भात्मज्ञान रिथर को रखने के लिये पठन पाठन में
निरसर रूप से लगे रहना चाहिये। इससे ज्ञान की वृद्धि होती
धात्या की सत्ता रवीकार करने के बाद संसार की सभी
बताए विनाश की ओर ले जाती है, इसलिये देवल नान की सत्ता
में विश्वास करते हुये संसार रो विरक्त रहना।
(६) विश्नत रहने के लिये श्रावश्यक है त्याग, फ्रोध मद, मोह
पोभ माधिसायों में अपने पापको अलग रखना ही घोप्यफर है,
भगवान महागर का पाथन था कि अविच प्रवृति होना ही सबसे
प्रायम्यस कार्य है।
(७) घारमा का अनुभव कर लिया। महान आत्माओं का
पादर पर लिया । ब्रह्मचर्य का पालन भी हुआ । संसार से विरक्त
भी हो गये । विरक्त होने के लिये त्याग भी फर लिया । मगर इन
सप को स्थिर रखने के लिये प्रावश्यक है 6प । तप क्या है ?
इन्द्रियो का दिरोष और अपहेत मे लवलीन होना।
इस प्रकार हम इन सात बातों को इस प्रकार भी फह सकते
(प) सीत
(ख) विनय
(ग) शील
(छ) समवेग
(का) पात्म अनुभव
(घ) ज्ञान
घोर तप
6प को कई सोढ़ियां है जैसे-
(म) अभ्यास
१२०
कुरनपुर के
पहुंचायो । न उन्हें मारो न पराधीन करो।
भगवान महावीर के जीवन दर्शन का दूसरा सून है कि हर
जीव अपने जीवन का स्वयं निर्माता है । वह धरने जीवन को
जैसा चाहे वैसा बना सकता है। उसका स्वभाव भाजाद रहने का
है, अतः उसे स्वाधीन ही रखिये ।
ऐसी मनोरम, मन को अपाह शान्ति में ले जाने वाली पाणी
का अक्षरो मे लिखा पावन उपदेश जब तक इस परती पर पांद
सितारों की पुषिट है मनुष्य का मार्ग दर्शन करता रहेगा।
१०
महानिर्वाण का पय
कर्म गति से दूर है मुक्त
आकाश और स्वच्छन्दता से
भर पूर खुला है महा मुक्ति
द्वार:
.
भगवान महावीर फे फर्म धीरे धीरे छटते जा रहे थे । सर्वज्ञ,
फेवल ज्ञानी कर्म शून्य होते जा रहे थे और यह निश्चित था कि
आयु फर्म छुट जाने के बाद भगवान पावन परम मोक्ष गति को
प्राप्त होगे । मोक्ष गति का अर्थ है मुक्ति । यूं तो हर व्यक्ति जो
इस ससार मे आया है यह अपनी भायु के बाद इस संसार से विदा
लेता है । लेकिन एक तो विदा ली जाती है एक शरीर से दूसरे
शरीर में जाने के लिये । एक भव से दुसरे भव में जाने के लिये ।
मगर भगवान महावीर स्वामी का इस संसार से विदा लेने का
अर्थ था फि सदैव के लिये इस संसार के आवागमन से
मुक्ति । भगवान महावीर साधुओं के संघ सहित एव स्थान
पर तो रहते नहीं थे । निरन्तर घूमने रहना ही उनका वक्ष्य था ।
भगवान महावीर अपने गणधर समेत प्राखिर एक दिन उस
निदिष्ट स्थान पर पा ही पहुचें जिसे इतिहास में अमर होना था ।
बिहार प्रान्त का पवित्र स्थान पावापुर ।
स वक्त इस स्थान की सभी देखने योग्य-घी । प्रकृति
लपुर
ने नया गार किया था। दोषों बोलना भरोगरबाही
सुन्दर था बोर चारों और विकन्ति था राजकीय उचान मनोहर ।
भगवान महावीर उत्ती उद्यान में विराजे ।
उन दिनो पावापुर के हस्तिनात । शुभ प्रागमन की
काफी दिनों से बादली जा रही थी । सय भगवान मदार
पधारे है इससे बड़ी बात क्या हो सकती है।
दर्शनी की पियासा जसा उमड़ पड़ी।
राज मागों को स्वच्छ किया गया था। गुगमित ना से
धुले राज मार्ग स्वागत मे को गई मजावट और दर तक मुगः
धातावरण राज परिवार सहित जना ने भगनानीदना हो।
पौर भगवान महावीर
जनके तीर्थ कर मिद्ध और जानी होने का प्रभार पर
ओर सब तरफ प्राप्त या ।
सिंह और हिरण एक घाट पानी पियें। दूर दूर तर हिंगा
का नाम नहीं।
और गुख ही मुख"
घोर सुख व्याप्त !
सुवासित पयन मन्द मन्द मुग्लान के साथ किसी होने का
महान्
कार्य की सुनता दे रहा था।
भगवान महावीर के समस्त निमूद थे।
कार्तिक कृष्णा पो पनु'दशी प्रापची । यि सन्तु समय
जय चन्द्र स्वाति नक्षत्र पर था तो भगवान को अब समोगरा
को छोड़कर एकात में मार पितन हो रहे में, मटि को मा
तय
राजकुमार हुये। देवताओं को अवधिज्ञान से ज्ञान हुघा कि भगवान, महावीर को मःक्ष प्राप्त हो गया है। सब ने इ॥ मगल पर्व पर खुशियाँ मनाकार, महादोर स्वामी को नमस्कार करके उनके पवित्र पार्षद शरीर को अर्मव्यर्थना की। कृष्ण पक्ष को काली रात अनायास ही प्रकाश पुन्ज से फट पड़ो । चारो ओर जगमगाता, पंजो भूत प्रकाश फैल गया । उस धक्त विधमान सभी चराचर ने उस पूजी भूत 'प्रकाशवान ज्योति पो सहज और महान श्रद्धा से देखा । वह एक दिव्य पालोक की भांति एक प्रत्यक्ष अनुभव ण। स्वयं धनेन्द्र ने प्राकर भगवान की वन्दना की । उनके शरीर की धान्येष्ठी कारके उस स्थान पर स्तूप बना दिया। उत्तरी भारत के अठारह गणराज्यों समेत काशी कौशल नरेश मो मल' गणतन्त्र राजसंघ, और नौ लिच्छवि गणराज्य के राज्यो मे इस पवित्र पर्व पर दीपमालिका जलाकर, पवित्र घी के दीपस जलाये और अपनी प्रसन्नता व्यक्त की। तब से लेकर अब तक भगवान महावीर के इस पावन परम चरम पद की प्रति के उपलक्ष मे समूचे भारत में प्रति वर्ष कार्तिक कृष्ण पंचदशी को, अमावस्या की कालो रात को दीपमलिका का उत्सव मनाकर अपनी श्रद्धा ध्यक्त करती है। भगर वह दीपावली तो कुछ और ही ढंग की रही होगी, जय भगवान महावीर ने पावापुर मे मोक्ष पद प्राप्त किया था । - माज पावापुर, अपापनगरी अतिश्य श्रवा से भनी भूत तीर्थ क्षेत्र में परिवर्तित हो गया है ।
११४ पच्चीस शताब्दी से निरन्तर भारत और विदेश की जनता मायापुर जाफर भगवान महावीर को सपना प्रगान प्रेषित करती श्रद्धा मुक्त होकर उस रज को माये से लगाते है जो भगवान के आगमन से तो पदिन हो ही गई थी, साय हो उनके निर्वाण से उसकी गरिमा में चार चांद लग गये। भक्तों ने इस नगरी का नाम रखा है अपार नगरी । जहां पहुंच कर पाप अपने पाप नष्ट हो जाते हैं। निर्वाण योर मी तो महिमा ही अलग है जलमंदिर को महाद्वार तक पदयने पर ही गात अनुपम शान्ति महसूस करता है। पावापुर का यह तीर्ण धान के खेती के बीच लहाहाता कमल के सरोवर के बीच स्थिति जल मन्दिर की शोभा देराने योप। पावापुर का यह तीर्थ जहां भगवान महाबोर के पावन पर चिन्ह विधमान हैं । एक ऐसे घालाब के योष में स्थित है । जिसके पानी में मछलियां स्वच्छन्दता पूर्वक विभाग करती है। अगर इस सुन्दर तालाब में जहां कमल ही जमल है। उस पुन द्वार पार करके भगवान का पवित्र मन्दिर प्राता है। एक छोटे से प्रकोप्ट मे भगवान महावीर के घरण कि बोध पाने सा में चिन्दित है । दाये बाये उनके विशिष्ट गण पर इन्द्रमृति गरापर और सुधर्म स्वामी को परण पादुका प्रतिलित है। पकिन परण चिन्हों को देखकर दूर पोर पास रो माये यामी पो पर सुख मिलता है। भगवान के चरणों में वै पर उसे शांति मा भाभास होता है, वो परम पद को घाँद का छोटा गा मामाय प्रस्तुत करती है, मौर स्मृति हो पाती मार से पलोगों भाडाम्मी पूर्व के भारत की। जब पर हिंसा, धर्म के सिने पी। हो। ।
राजकुमार
पाप करते थे और यज्ञ में पशुओं की बलि देकर समझते थे उनके
पाप क्षमा हो गये है । तब एक माशा की किरण कुन्डलपुर
में
दिखलाई पड़ी।
भगवान महावीर को प्रागमन ।
आगमन से पूर्व माता त्रिशला प्रियकारिणी को सोलह शुभ
स्वप्त।
भगवान महावीर का जन्म ।
उनका शेराव !
सुवद राजक्षी भोग।
विवाह के लिये प्राये प्रस्ताव और माता त्रिशला प्रिया
कारिणी का प्रफुल्लित होना ।
भगवान महावीर का विवाह के प्रति दृष्टि कोण और ग्रह
त्याग ।
बारह साल का तमोमय जीवन ।
चीत्र वीच मे थाने दाने उपसर्ग । परेशानियां और उनमे
फेवल मौन वत । सहज समभाव । इन्द्रियो का दमन और दमन ।
--अन्तत. केरल जान की प्राप्ति ।
-~-महावीर महासंघ को स्थापना ।' बारह गणधरो की
नियुक्ति कौर प्रथम बार महिलामो एव शुद्रो के साथ सरल और
सौभ्य व्यवहार।
-कौन भूल पायेगा चन्दना के उद्धार को और फोन भूल
पायेगा उस भारत दिगदिज्य को।
भगवान महावीर स्वामी तुम परण जहां हा पर, 4r
से हिंसा पासन्द और पाप समाप्त हो गये।
मर
-
.
पाखंड और विमूढतायें जो अब राज देश हो, जनपद को
देणगसियो को जकड़े हुये थी उनका विनाश हुमा और सध्यु
सद्भाव उभर कर भाया ।
भगवान महावीर ने महान परिम के मापने के लिये यौन
मा प्रस्तुत किये थेः
(ক) মানি বল
(द) नैतिक चरित
(ग) मानसिया उनमता
और भगवान महावीर के डार यह तीनो से
लागू होती । महावीर मामी ने ही प्रथम बार जान पानि
बंधन तोडकर दर अग्याची को सम्मानित भादगा।
भगवान महावीर के बताये पर कर रही
मोक्ष को प्राप्त हो मरता है । उन्होने रहेको पोट पर पाया।
रासार नारामा नारा मो मे भरार Triजियोने
तृष्णा रूपी विपोल को मै उगार ६ गरीर और
गोराग अलग है। जो नदोनों पो RTE
से ही गती करते हैं। इन्द्रिय सुरा मनुष्य का पी को और
बीचता है और ज्यों ज्यों लालगा तो लो त्यो प्राणीमा
पाप पंछ में पंसता जाता है।
इन्द्रिय सुग की प्रति दुराशा जमघट । मंयम, पाप से मार
हो जीवन मात्मा को परमात्मा के निकट पपाता है। भीर
परमात्मा का ही स्वम मोर कामे पनन गंन पान्डमा
मनन्त पी और अनन्त नुस भरा।
मां को बोता है यही पाया है। माँ भारती
राजकुमार - से वह देव, मनुष्य, त्रिपेय अथवा नरक जाति का भागो बनता है और वहा के सुख दुख भोगता है। महावीर स्वामी ने प्रथम बार जीद परमात्मा के निकट ले जाकर खड़ा कर दिया। उन्हें पहली वार महसूम हुआ था कि उनमे और परमात्मा मे कोई अन्तर नहीं । वे चाहे तो मनुष्य परमात्मा के पद पर पहुंच सकते है और चाहे तो उस पद से बहुत नोचे नरक गति तक जा सकते है । जन्म के वन्धन से छूटने का एक ही मार्ग है वह है मोक्ष जो रत्न त्रय धर्म से मिलता है और रत्न अय धर्म के लिये भावश्यक है। सम्यक् दर्शन सम्यक ज्ञान सम्यक् परिम और इन तीनो की प्राचार शीला है अथवा बुनियाद है। -अहिंसा -इन्द्रियो का निग्रह -सयमी जीवन -सन्तोष भरा मन -सहन शक्ति से भरा समभाब सच्चे मानवो की भाति महावीर स्वामी ने इस शास्था को महान् गौरव दिया कि परम सुख मोक्ष प्राप्त करने के लिये केवल मनुष्य जीव हो अकेला जीव है । देवगति, विपंच गति अथवा नरक गति में भटकने वाले जीव के लिये यह संभव नहीं है कि वह जो मोक्ष गति पा सके । मोक्ष अथवा परम सुख पाने के लिये मनुष्य गति पाना ही प्रावश्यक है । अतः महाकवि रवीन्द्रनाथ टगौर झा साधन और महावीर स्वामी का कथन एक सा है : on- --
१२८
पुलपुर
सवार थोपरि मानस सत्य
अर्थात् मनुप्य सब सत्यों से ऊपर है और हमारे अधिकार
दार्शनिक इस बात को दोहराते घाये है कि मनुष्य जन्म बड़ी
मुश्किल से मिलता है। इस जन्म का सही सही उपयोग होना
चाहिये । ज्ञान जो कर्म को हटा सके वह सर्वोपरि होता है चोर
केवल अकेला ज्ञान ही मनुष्य को परम पद पर पाया साता है।
महावीर स्वामी ने इस प्रमत्य का भांडा फोड़ दिया किया
धनदान, पशुदान स्त्री अथवा पगादान द्वारा अपने पारों मा
विमोचन करवा सकते है उन्होंने पन बान को पूर्ण ढंग से गनत
कर दिया कि मवमे बड़ा दान अभयदान मार एक जीव को
पारा देकर दूसरे का मुम्ब अथवा पार्शी वाद नहीं ले माये ! पन
दान, फे बाद ग्राहार दान, और थान पान ही परम
भाग
मे अपना पन शुद्ध कर सकते है मन को मैमिटा माते, मगर
जो पाप कर्मयप में हो गये उन्हे मिटाने के लिये पाप दाग
लिये गये काम हो या पायेंगे । स्वर्गाहोरे, पन्ने, गंगार यो
मे महलपूर्ण हैं मगर जान की दृष्टि में नहीं पोनिका दाम
स्यान वह धन्तो है जिन पर मनुष्य का नया गितार होगा
पाया। आर यदि किसी को दान दे ते नोकरी
दया अथवा करणारा दान करते हैं, हम प्रमाला प्रारका
दान नहीं दे सकते। पणा दा दान पभगदान, हामार मान र
सबसे बड़ा शानदान
पहत्य मांसारिक बन्धनों में कार भी जो लोय ना मुनि
का सामान टा सामने यह कहार भगवान महावीर पनी
भतिशय धारपा परिकम विगा गायी माना
१२६
राजकुमार
थे कि ग्रहस्थ सरलता से सारा सान शारा धर्म घथवा सारी इन्द्री
निग्रह एक दिन मे नहीं कर सकते । इसलिये उन्होने ग्यारह
सीढ़ियां, अथवा ग्यारह प्रतिमा स्थापित की थी । लो इस प्रकार
(१) दर्शन प्रतिमा
अण्ठ मूल गुण धारना फरके सात व्यसन एवं अभ्यक्ष्य का
त्याग प्रयम प्रतिमा है । शुद्ध सम्यक दर्शन के पाठ मंगो का पालन
पारना भी इसी प्रतिमा मे शामिल है।
(२) व्रत प्रतिमा
प्रथम प्रतिमा को सफलता पूर्वक प्राप्त करके प्रावक दूससे
प्रतिमा में प्रवेश करता है । इस प्रतिमा मे निम्न व्रतों छा पालन
करता है ।-
(क) पाच मरणुव्रत
(स। तीन गुण व्रत
(ग) पार शिक्षा व्रत
इन प्रों को लेफर जब सन्तोष पूर्वक सफलता पा लेता है
को तीसरी प्रतिमा माती है।
(३) सामयिक प्रतिमा
सुबह, शाम मोर दोपहर नियमित रूप से सामयिक घरमा ।
सब जीवो के प्रति समभाव रखना । गुस्ता पास नहीं । फटकने देना
छामथिए हिमा है।
१३०
कुन्डलपुर के
(४) प्रषौ बोपचास प्रतिमा
मन और वचन शुद्ध हो जाने पर कार्य की ओर ध्यान जाना
आवश्यक हैं और अब महिने में केवल चार दिन आहार जन्म का
त्याग कर, धर्म ध्यान, भक्ति, शास्त्र स्वाध्याथ मे समय विताना ।
इस प्रतिमा का अर्थ हुमा कि सब इन्द्री संयम प्रारम्भ ।
(५) सचित त्याग:-
ऐसे हर फल जिनमे जीव होने की शंका हो उनका त्याग
करना।
N
(६) रात्रिमुक्त त्याग:-
रात को सर्व प्रकार के प्राहार का त्याग करना । इसी प्रतिमा
के अन्तर्गत वह दिन मैथुन आदि का भी त्याग फरता है । अव
तक उसका रतिभोगो पर कोई विशेष प्रतिबन्ध नही था लेकिन अब
सेक्स क्रियाओ पर भी अंकुश पारम्भ हो गया।
(७) ब्रह्मचर्य प्रतिमाः-
मन वचन और कार्य के ब्रह्मचारी होना । केवल ब्रह्म में लीन
होने का उद्देश्य सामने रख कर ब्रह्मचर्य का पालन करना ।
(८) बारम्भ त्यागः-
अर्थात त्याग की शुरुआत । इस प्रतिमा से श्रावक सम्पत्ति से
मोह करना छोड़ना शुरू करता है और फिर अगली प्रतिमा तक
त्याग समाप्त करता है ...
(९) परिग्रह त्याग प्रतिमाः-
राजकुमार
१३१
-
पाकर विकसित होती है और श्रावक अपने शरीर के वस्त्र छोड़
फर सब कुछ त्याग कर देता है।
(१०) अनुमति त्यागः-
दसवी प्रतिमा के अन्तर्गत श्रावक संसार से विमुख होकर
सांसारिक कार्यों में अपनी अनुमति तक देना छोड़ देता है । संसार
के कार्यों से उदासीन होकर केवल परोपकार जैसे कार्यों में रत
होता है।
(११) उदिष्ट त्याग प्रतिमा:-
इस प्रतिमा से त्याग की सीमा और बढ़ जाती है। वह घर
पर भोजन लेना त्याग देता है और घर का त्याग करता है तथा
दो विशिष्ट सीमा पार करता है । जैसे:-
(१) छुल्लक : खन्ड वस्त्र धारण करना।
(५) एलक: फेवल लंगोटी लगाना ।
इस प्रकार कोई भी मनुष्य , अपने आपको एक सीमा पार
पारके दूसरी सीमा तक पहुचने व दूसरी के बाद तीसरी सीमा तक
जाने से पाठिनाई अनूभव नहीं करता और इन्द्रियो का दमन करो,
पार्मों का विनाश पारता हुमा ऐसी स्थिति मे पा जावा है जद
यह शिशु बन जाता है।
न शोकन राग ।
न द्वपन ईा।
न लज्जा न सोच ।
इन्द्रियों को जीतकर पह कामजयी घनता है, लज्जा को जीत
पर पहनन होता है। नग्न होना उ पाठ की निशानी है फि
कुन्डलपुर के . - उसने इन्द्रियों को जीत लिया है। कामजयी हो जाता है । उसे नग्न अवस्था में रहते हुये भी अपनी नग्नता का बोध नही होता । धीरे धीरे कर्म समाप्त होते है और यदि केवल आयु कर्म शेष रहे तो मनुष्य जोति को सार्थक करके मनुष्य मोक्ष को प्राप्त होता है। महावीर स्वामी के जीवन में भी वह शुभ वेला या पहुंची थी। कार्तिक कृष्ण की अमास्या को उस दिन मंगलवार था । ईस्वी पूर्व १२७ की १४ सितम्बर को जब पौ फट रही थी, सूर्योदय हो रहा था । तो भगवान महावीर स्वामी की निर्वाण बेला मा पहुची थी। १४ सितम्बर ईस्वी पूर्व ५२७ महाकवि अनूप के शब्दों मे ही सुनिये उस वेला का वर्णन- दिनेश प्रारूण्य दिगन्त में लसा विलोक मिथ्या जनक से धिपे उषा न आई नभ में, धारत्रि में जिन धर्म चक्र का कुशेश्यो से, चक्रवाक से शिलीमुखों से, नभ संगमादि से स साधू साध्वी जनमोद युक्त थे महष्ट थे श्रावक श्राविका :सभी मुहूर्व में धर्म प्रभात हो गया मिटि कि हिंसा घनघोर यामिनि उल्कक से पाप जतक से हुये समस्त प्रस्तंगन अन्तरिक्ष मे प्रभाव छाया,
.
राजकुमार
पोर फिर
विनोधिता जीवन
सुप्रभात
मे
जगी विहंगावली सी सभी प्रभा
पतु दिश चारू निनाद यू उठा
जिनेन्द्र की जै-जय जैन धर्म की
x
X
X
पाया शाश्वत वार जो प्रथित १ है हिसा-निशा नाश मे,
सो वारेश उगा कि जो न अघ का है लेश भी छोड़ता,
प्रागी ससृति के समुत्थित चले,
जो धर्म-पायेय ले,
यात्रा जीवन की सभी कर रहे भा-बाल वृद्धावसार ।
ऐसा मार्ग प्रपारा, न जिसने है प्राधि-शंका कहीं,
छायी भवर-मध्य जैन-मत को प्रानन्द-भादम्बिनी।
देतो सोल्य बसन्त के पवन-सी सामायिकी-साधना,
काम-क्रोध-मदादि-कटक विना सन्मार्ग है धर्म का।
भयो ! है यह मेदिनो शिविर-सो जाना पड़ेगा फाभी,
प्रागे का पप ज्ञात है न, इससे सद्बुद्धि प्राये न भयो ?
ले लो साधन धर्म के, न तुमको व्यापे व्यथा अन्यया,
है जैनेन्द्र-पदारविन्द-तरणी संसार-पायोधि पी ।
(महापावि अनूपशर्मा कृत महाकाव्य बूद्धनान से सामार
१-प्रसिद।२-स्त्री।३-मेघ-माला।
उप-संहार भगवान महावीर की यशस्वी गाथा के नियत पृष्ठों का मन्तिम छोर पा पहुंचा है। भगवान महावीर की यशस्वी गाया, उनके उपदेश तो एक महा समुन्द्र है । उस समुन्द्र में सीप नहीं, सब मोती ही है। उन मोतियों को पाने का मोह किसको नहीं होता । जब इस छोटी सी पुस्तिका के अन्तिम पृष्ठ लिखे जा रहे है तो लेखक को अपनी लिखी पूर्व पंक्तियां याद आ रही है कि मेरे देश की धरती, भारत की धरती गौरवमयी धरती है । इस धरती से महा पुरुष पैदा हुये जिन्हों ने विश्व को नया चिन्तन नयी राह दी। और वे तीर्थकर पैदा हुये जिन्हों ने भारत भूमि को ही मपने मोक्ष का स्थान चुना । ऐसी नसुन्धरा से किसे प्यार न होगा। पगले वर्षों में भगवान महावीर के निवीण की पच्चीसवी शताब्दी का पर्व मनाया जायेगा। उस पवं मे भारतवर्ष फिर विश्व को नया सन्देश देगा । विश्व की प्रांखें अभी भी भारत पर लगी है । गंगा के पावन बाटों पर, तीर्थों की धरती पर विदेशी श्र पी नजर पा रहे है । कौन है ये लोग ये उस सम्पन्न उर्वरा देश के नागरिक है जिन्हे भोजन कीचिन्ता नहीं । वाहन की चिन्ता महीं । चिन्ता होती है मानसिक शान्ति की। कहाँ है वह शान्ति ? कहां है वह सुख प्रात्म सुख के दीवाने हिप्पी एल. एस. डी. मे सुख ढूंढते है मुख ढूढते हैं वेहोशी मे और वे जितने इस सुन की भोर भाम रहे है उननी ही मृग वृप्या बढ़ ।
राजकुमार । उनकी टोलियां भारत के हर जोर पर देखी जा सकती है। सिर मुन्डाये भक्तो के रूप मे कृष्ण की गोपियो के रूप में और मात्मा की अवहेलना करने वाले रोगियों के रूप में। क्या पच्चीसवीं शताब्दी का समारोह इन्हे राह पर ला सफता है। क्या एक वार भारत विश्व को यह बता सकता है कि प्रात्मा की भाति बेहोशी मे नही त्याग मे है । इन्द्रियो का दमन ससार का सबसे बडा सुख है । सयम सबसे बड़ी प्रौषधि है और सहन करने फो शक्ति मबसे बड़ा परहेज । प्राने दाला पावन पर्व निश्चित रूप से हमे यह करने की भाषित प्रदान करेगा। इस प्राशा के साथ इन पंक्तियो का लेखक पाप से विदा लेता है और विश्वास दिलाता है कि यदि सुयोग उपस्थित होते रहे तो इस पावन पर्व पर इस दिशा में कुछ और प्रयास प्रस्तुत करुंगा। परा पुस्तिका में अनेको धर्म ग्रत्यो घोर विद्रजनों का सहयोग सम्मलित है । लेखक उन सभी जाने माने लेखको के प्रति और भारतीय ज्ञानपीठ के यशस्वी नियामक श्री लक्ष्मी पन्द जन के प्रति अपनी विनम्रता लायन करके अपने अल्पज्ञान के प्रति चितित सभक्त प्रल्पनान के कारण इसमे कोई गलत उल्लेस हो गया हो, जिसे सुविज्ञ जन सुधार फर पढे और लेखक को सूचित करें ताकि भागामी सस्वारगो मे सुधार कर दिया जाये । जयप्रकाश शर्मा हाग प्रभात पाकेट दुनस हरी नगर मेरठ।
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राजकुमार মাল স্বাস্থ wo- लोए, रणमोकार मंत्र- णमो अरिहन्तारणं, णमो सिद्धाणं । णमो पाइरियारण, रामो उवज्झायाण ॥ रगमो सव सोहणं । नोट-इस मंत्र में पाच पद्य है। यह मंत्र तीन श्वांसों में धीरे-धीरे और शुद्ध बोलना चाहिये । पहिले दो , पद्य पहिले श्वांस मे, तीसरा और चौथा पद्य दूसरे श्वास मे, और पांचगं पद्य सोसरे श्वास मे वोलें । णमोकार मत्र को तीन बार, पाप वार या नो बार बोलना चाहिए । रगमोकार मंत्र का प्रथं- अरिहन्त प्रभु को नमस्कार हो, सिद्ध प्रभु को नमस्कार हो, प्राचार्यों को नमस्कार हो, उपाध्यायो को नमस्कार हो और वो मे सब सच्चे साधुनों को नमस्कार हो । चतारि दन्डा-- ‘चत्तारि मंगल, अरिहन्त मंगल, सिद्ध मा. साहु मगलं, फेवलि पणत्तो 'धम्मो मंगलं पत्तारि लोगुतमा, अरिहन्त लोगुत्तमा, साहु लोगुत्तमा, फेवली पणत्तो पम्मी पत्तारि धरणं पन्जामि, परि न्त स सिद सरण . पुणे फेलो पणत्तो - ram २om Inte ३ -- दर्शन विधि प्रातः उठकर स्नानादि नियाओं से निवृत होकर शुद्ध वस्त्र पहिन श्री मन्दिर जी जाकर देव दर्शन करना चाहिये । श्री मन्दिर जी मे जाते समय घर से लोग, बादाम, चावल प्रादि सामग्री साफ करके ले जाना चाहिये । चलते समय रास्ते मे ये ध्यान रहे कि हमारा पैर किसी गन्दी वस्तु पर न पड़े और हमारे पैर से किसी जीव का घात न हो जाये । मन में भगवान का ध्यान रखना चाहिये । श्री मन्दिर जी में जाकर यथा स्थान पर जूते और मौजे उतार दें। ध्यान रहे कि चमड़े की पेटी व घड़ी का पट्टा आदि भी उतार कर ऐसे स्थान पर रखें, जो वेदी के सामने न दिखाई दें। अब जल से अपने पैर और हाय धोकर वेदी गृह मे दर्शन के लिए जायें । वेदी गृह मे जाते समय द्वार पर खड़े होकर इस प्रकार बोलना चाहिये- ॐ जय, जय, जय, जयविल हि जयनिसहि, जयनिसहि। सब वेदी गृह में प्रवेश फर ऐसे स्थान पर खड़े हो जिससे किसी दूसरे दर्शन करने वाले को बाधा न हो। पहिले नमोस्तू नमोस्तू नमोस्तू बोलते हुए नमस्कार करना चाहिये । फिर सीभे खडे होकर नीचे लिखे पाठ बोलने चाहिये। - - राजकुमार दर्शत पाठ लोए, ar रगमोकार मंत्र- णमो अरिहन्तारणं, णमो सिद्धारणं । रामो पाइरियाण, रामो उवझायारणं ।। रामो सव्व साहुणं । नोट-इस मंत्र में पाच पद्य है। यह मंत्र तीन एवासों में धीरे-धीरे और शुद्ध बोलना चाहिये । पहिले दो पद्य पहिले श्वांस मे, तीसरा और चौथा पद्य दूसरे श्वास मे, और पांचवां पद्य सोसरे श्वास में वोलें । णमोकार मंत्र को तीन बार, पाप वार या नो बार बोलना चाहिए । गमोकार मंत्र का प्रथं- को नमस्कार हो, सिद्ध प्रभु को नमस्कार हो, भाचार्यों को नमस्कार हो, उपाध्यायो को नमस्कार हो और वोगा में सब सच्चे साधुनो को नमस्कार हो । पत्तारि दन्डा-- 'पत्तारि मंगलं, परिहन्त मंगलं, सिद्ध मंगलं साहू मगल, देवलि पणत्तो धम्मो मगल । घसारि लोगत्तमा, अरिहन्त लोगुत्तमा, सिद्ध लोगुतमा, साद लोगतमा, फेपली पणत्तो घम्मो लोगुत्तमा । पत्तारिसरणं पन्जामि, परि न्त सरणं पन्जामि, स्ति सरण पजामि, साहु सरणं पजामि, मोपतो पणत्तो धम्मो सररणं पन्जानि। अरिहन्त प्रभु ६
कुन्डलपुर के
चत्तारि हडकका अर्थ--
मंगल पार होते हैं । (1; अरिहंत मंगल है, (२) सिद्ध मंगल
है, (३) साधु मंगल है, ४, केवली भगवान के द्वारा प्रणीत धर्म
मंगल हैं।
लोक में उत्तम चार होते है। (१) अरिहन्त लोक मे उत्तम है,
(२) सिद्ध लोक मे उत्तम है, . , साधु लोक में उत्तम हैं, (४)
केवली भगवान द्वारा प्रणीत धर्म लोक मे उत्तम है।
मैं चार की शरण को प्राप्त होता है : (:) मैं श्री अरिहन्त
भगवान की शरण को प्राप्त होता हू, (२) मैं श्री सिद्ध भगवान
की शरण को प्राप्त होता हू, (३, मैं साधुनो को शरण को प्राप्त
होता हूं, (४) मैं केवली भगवान द्वारा प्रणीत धर्म की शरण को
प्राप्त होता हू
श्री चौलील तीर्थकरों की स्तुति
.
श्री आदिनाथ अषित सम्भव सुमरो जी प्रभु अभिनन्दना ।
चरण जिन जी के शीश धर-धर करुजी पल-पल बन्दना ।।।
श्री सुमतिनाथ पदम प्रभु जग तरण तारण सुपार्श्व जो।
श्री चन्दा प्रभु जी के चरण बन्दत मिटत यम की त्रास जी ॥२॥
श्री सुविधिनाथ सुदेव शीतल |याश मिभुवन ईश जी ।
श्री वासु पूज्य जी के पश्ण निशदिन रहे मेरो शीश जी ॥॥
श्री विमलनाथ अनन्त धर्म जी का ध्यान नित उठ मैं घर ।
श्री शांति प्रभु जी के चरण फरसत फिर चौरासी ना स्लू॥४॥
श्री कुन्धनाथ, अरह जिनेश्वर, मल्लि घशरण शरण हैं।
श्री मुनिसुव्रत स्वामी जी के पत्त पावों हरत जन्म मन्या में ॥५॥
राजकुमार - श्री नमिनाथ, प्ररिष्ट नेमि, पारस पारस घ्याइए। श्री महावीर स्वामी जी के परण वदत निर्भय शिव मुख पाइए ।।६।। छोड़ सकल मिथ्यात्व को गुरू धर्म की परीक्षा करो। देव अरिहन्त नाम जप-जप मोक्ष मारग पग घरो ॥७॥ सदा जी मगल होत जपत्या ये चोदीसी का नाम है। पहे तिलोक ऋपि जान निश्चय महामुखो की खान है ॥८॥ अव नीचे लिखा श्लोक पढ़कर साथ लायी हुई सब सामग्री चढ़ानी चाहिए- उदका चन्दन तन्दुल पुष्प कश्चरू सुदीप सधूप फल प्रघं कैः । धवल मगल गान खाकुने जिन गृहे जिन नाम अह यजे ॥ पो३म हरी श्री भगवज्जिन सहस्त्रनामे भयो अध निर्वापामीत स्वाह । सामग्री पढाने के बाद नमस्कार करें फिर स्तुति पढ़ते हुये वेदी के चारो घोर घूमकर तीन परिक्रमा देनी चाहिये । परिक्रमा देते समय दारो दिशाम्रो मे भगवान की तरफ मुंह करके गिरो- न्नति देनो पाहिये पर्थात् जुडे हुए हायो को मस्तक के पास ले जाकर नमस्कार करना चाहिए । परिकमा देते समय ध्यान रहे कि पदि कोई नमस्कार कर रहा हो, तो उसके भागे से न चलें। या तो एक जायें या उसके पीछे से होकर चलें। परिक्रमा के बाद गन्दोधक मस्तक पर, सर पर तया गने आदि पवित्र स्थानो पर नाभि से जार लगाना चाहिये । गन्दोधक नीचे न गिरने पाये। इससे घधिनये होती है । गन्धोधन कानसी पंगुली के पास वाली मंगुली और बीच को भ गली से हो ना चाहिये । पूरा हाय पर्थात पानो भलो नदी गो साधेि । - सुन्डल पुर के परिक्रमा स्तुति - तुम दर्शन मैं तुम घरण कमल गुण गाय । बहु विधि भक्ति करी मन लाय ।। जनम जनम प्रमु पाऊँ तोहि । यह सेवा फल दोजे मोहि ॥ कृपा विहारी ऐसी होय । जामन मरन मिटादो मोय ॥ वार बार मैं विनती करू । तुम सेवां भवसागर तरू' । नाम लेत सब दुख मिट जाय । . देखे प्रभु प्राय ॥ तुम हो प्रभु देवन के देव । मैं तो करूं चरण तव सेव ।। मैं आयो दर्शन के काज । मेरी जन्म सफल भयो आज ।। र्शन करके नवाऊ शीश । मुझ अपराध क्षमहु जगदीश ॥ सुख देता यही तुम्हारी बान । मो गरीव की विनती, सुन लोज्यों भगवान ॥ दर्शन करते देव का, आदि मध्य अवसान । सुरगन के सुख भोग कर, पावं मोक्ष निदान ।। जैसी महिमा तुम विषै, और परै नहिं फोर ! जो सूरज में जोत है, नाश गरग नहीं सोय ।। दुख मेटना, . ..
राजकुमार
नाथ तिहारे नामत, अघ छिन माहिं पलाय ।
ज्यों दिनकर परकाशते, अन्धकार विनशाय ।।
धौर प्रशंसा क्या करूं, मैं प्रभु बहुत अजान ।
दर्शन विधि जानो नही, शरन राखि भगशन ।।
विन मतलव बहुत तिरे, तार देव स्वमेव ।
मेटो कारज सफल कर, कर देवन के देव ।।
मेरी तो तोसे वन्वी, का से करू पुकार ।
उत्पश्चात् शास्त्र स्वाध्याय करें और शास्त्र स्तुति पढ़कर शास्त्र
जी फो नमस्कार करना चाहिये । प्रतिदिन नमोकार मंत्र को एक
पाला अर्थात् १०८ बार जपना चाहिये । प्रत्येक कार्य मे जो दोष
लगता है वह १०८ प्रकार का होता है । अतः जाप करने से वह
घोर पाप दूर होता है।'
शास्त्र स्तुति
योर हिमाचल ते निकसो. गुरू गौतम के मुख फुन्ड ढरी है ।
मोह-महापल भेद पली, जग, की जड़ता तप दूर फरी हैं ।
शान-पयौ निधि माही रली, बहु - भंग तरंगनि सो उछरी है ।
ता सुचि शारद-गंग नदी प्रति, मैं अजुलि फार शीश धरी है ।।
या जग मन्दिर मे अनिवार, अज्ञान-अन्धेर छयो अति भारी।
श्री जिनकी धुनि दीप शिखामय, जो नहीं होत प्रकाशन हारी ।।
तो वि.स भाति पदारथ-पाति, फहा लहते ? रहते अविचारी।
या विधि संत पहे पनि है, पनि है जिन-बैन बड़े उपकारी ।।
जिन-बाणी के ज्ञान से, सूझे लोकालोक ।
सो वाणी मस्तक चढे. सदा देत हूं धोक ।।
हे जिन-वाणी भारती, तोहि जपू दिन रैन ।
जो तेरा शरना गहे, सो पावे सुप चैन ।
प्रस्तुति
प्रभु पतित पावन मैं अपावन चरण आयो शरण जी।
यो विरद प्राप निहार स्वामी मेटो जामन मरन जी ।।
तुम ना पिछानो धान मानो देव विविध प्रकार जी।
या बुद्धि सेती निज न जानो भ्रम गिनो हितकार जी ॥१॥
भव विकट बन मे कर्म बैरी ज्ञान घन मेरो हरो।
तब ईष्ट भूलो भ्रष्ट होए अनिष्ट गति धरतो फिरो॥
धन घड़ो यो धन दिवस योही, धन जनम मेरो भयो ।
अब भाग मेरो उदय भायो दर्श प्रभु जी को लखि लयो ।।२।।
छवि वीतरागी नग्न मुद्रा दृष्टि नाशा प धरें।
वसु प्रतिहार्य अनन्नत गुण युत कोटि रवि छवि को हरें ।।
मिट गयो विमिर मिथ्यात मेरो उदय रवि प्रातम भयो।
मो उर हर्ष ऐसो भयो मनु रंक चिन्ता-मरिण लयो ॥३॥
में हाथ जोड़न नाऊ मस्तक बीनऊ तुम चरण जी।
सर्वोत्कृष्ट त्रिलोकपति जिन सुनहू तारन तरन जी।
नाचहुं नहीं सुवास, पुनि नरराज, परिजन साथ जी।
'बुद्ध' जाचह तुम भक्ति भव-भव दीजिये शिवनाम बी ॥४॥
राजमार
दया कर दया कर दया धर्म धारी।
हम आये हुए है शरण मे तुम्हारी साटेका
नहीं हमने अपना समय सार जाना ।
सदा पर पदार्थो मे अपनत्व माना ।।
उन्हे याद करते रहे रात दिन हम ।
जिन्हें सर्वदा के लिए था भुलाना ।।
अहो. मून मे ही रही भूल भारी ।
हम श्राये हुए है शरण मे तुम्हागे ।।2,31
प्रभु
कर्म मेरे घिरे पास्यवो से।
रही प्रीति मेरी सदा प्रथा में !!
मिलेगा उन्हें देव निस्तार करें ।
यहे लोक सागर में परी॥
सम्भालो विवया यह नया लागे।
हम धाये हुये हैं या
सुलभ हो मुझे भेद विकार प्राना।
पृथक पुटगार मनाना 11'
पारू पात्म चिन्तन तामा
घरममा पार॥
कृपानाथ मुनगदसा।
Timr
-
१४४
कुन्टलपुर के
सुना देव तारन तरन नाम तेरा ।
इसी से लिया है चरण में बसेरा ।।
तुम्ही सुप्रभातम
तुम्ही हो सवेरा।
तुम्हीं ने प्रभु कर्म पथ को निवेरा ।।
कहां तक कहे नाथ महिमा तुम्हारी।
हम आये हुए हैं शरण में तुम्हारी ।।४।।
PM
-
श्री महावीर स्तुति
-
महावीर प्रभु
के चरणों में,
-
श्रद्धा के
कुसुम चढायें हम।
उनके आदर्शों को अपना, जीवन की ज्योति जगायें हम ।।,
तप संयम-मय शुभ साधन से, आराध्य चरण पाराधन से ।
बन मुक्त विकारों से सहसा, अब प्रात्म विषय फर पाये हम ॥१॥
दृढ़ निष्ठा नियम निभाने मे, हो प्राण बनि प्रण पाने मे ।
मजबूत मनोबल हो ऐसा, कायरता कभी न लायें हम ॥२॥
यश लोलुपता पद लोलुरता, न सतायें कभी विकार व्यथा ।
निष्काम स्व पर कल्याण काम, जीवन अर्पण कर पाये हम ॥३॥
गुरुदेव शरण में लीन रहे निर्भीक धर्म की बाट बहें ।
अविपल दिल सत्य अहिंसा का, सुग्थ
दिखायें
प्राणी-प्राणी सह मंत्री सझे, ईर्या मत्सर भभिमान तजें।
काहनी करनी इकसार बना, तुलसी तेरा पथ पायें हम ॥५॥
दुनियां को
हम ॥४॥
(राजन) वार जन्म सच्चे हैं वो सच्चे त्रिशला को पास के पारे । सारे जग के परम हितू, सितार्थ कि नजदुलारे ।। टेका। हम कैसे महिमा गायें, नहीं पार गुणों का पाये । पुन्टलपुर मे जन्म लिया पावन देश विहार किया ।। वंत सुतरेप शुभ थी घड़ी, नरकों मे भी शाति पड़ी। तीन लोक मे पानन्द चाया, इए वीर के जय जय फारे ॥१॥ हिंसा ज्याला गड़क रही, जब सारी दुनिया तड़क रही। तब पीर प्रभु ने घाफर के, और दया धर्म पतला कर ॥ हिसा दूर भगाई भी, पौर जुल्म की फरी सफाई भी। पुद जीवो जीने दो सर फो, जोर से वीर पुकारे ॥२॥ प्रो स्याहाद उमझाया पा, सिद्धान्त फर्म पतलाया था। पोनर मार्म करे, उसका फल दो खुद ही परे ।। सुख र दाता कोई नहीं, पर्वा भोपना चाप सहो । मात्म ही परमात्म हो, जो फर्म का मल उतारे || वीर प्रभु दिपारी है, लोका लोक निहारी हैं । न राम और शनी, रिती कोर का देश नहीं ।। - 4-
कुन्डलपुर के
भजन नं०२
वीर स्वामी का सुन्दर श्रधर पालना ।
सज रहा है सिद्धारथ के घर पालना।
जिसमें रेशम फी सुन्दर पड़ी डोरियां ।
सम्धे मोती लगाये-बहू पोरियो ।
है मुशोभित यह सुन्दर अधर पालना । वीर० ।
मुनझुना माता त्रिशलावती ले रही ।
वीर के हाथ मे हंस के जब दे रही ।
देव देवी ने मिल कर झटोका दिया।
त्रिशला माता ने देवो को हुक्म दिया ।
हिलने दो बेखबर बेसतर पालना ।
वीर का हिल रहा बेखत्तर पालना । वीर० ।
देव इन्द्रादि मिल पुष्प बरसा रहे ।
सारे नर नारी हृदय मे हरपा रहे ।।
देखने जा रहा हर बसर पालना । वोर० ।
सन्म उत्सव का दिन मिल मनाओ सभी।
पह 'किशन' ने लिखा है अमर पावना । पीर० ।
-
राजकुमार
भजन नं. ३
महादीर स्वामी, हो अन्तर यामी ।
हो त्रिशला नन्दन, काटो भव फन्दन ।।
गते ही पन मे, तप कोना वन मे।
धरश दिखाया, भूल न जाना ।।
पार लगाना, कृपा निधाना ।
महिमा तुम्हारी, है जग मे न्यारी ।।
सुधि लो हमारी, हो व्रत के घारी ।।
पन खण्ड तप करने वाले, केवल ज्ञान के पाने वाले।
सद् उपदेश सुनाने वाले, हिंसा पाप मिटाने दाले ।।
हो तुम कष्ट मिटाने वाले, पशुवन बन्धन छुडाने वाले ।
स्वामी प्रेम बढाने वाले, हो तुम नियम 'सिखाने वाले ॥
पूरण तप के करने वाले, भगतो के दुख हरने वाले ।
पादापुर मे पाने वाले, स्वामी मोक्ष के जाने वाले ।।
भजन नं. ४
देखकर हृदय
मरिगयों के पालने में स्वामी महादोर पूलें।
रेशम की डोरी पनी मोतियो में गुथया ली।
त्रिशला माताजी खड़ी
में फूलें ।। मणि
पुटकी बजाय रही हंस के खिलाय रहीं ।
राजा निद्धारथ मगन होके राज-पाट को भूनें ।। मरिण.
कुण्डलपुरवासी सारे बोले है जय जयकारे ।
दर्शन फर प्रेम से महाराज के चरणो मे भूले ।। मरिग
इन्द्रादि देव माये शीश परणो को भुकाये ।
'पिराना' के हृदय को मटर ने तगी सारी भूलें ॥ मसि.
१४८
गुन्डलपुर के
भजन नं. ५
महावीर दया के सागर तुमको लाखो-प्रणाम ।
श्री चांदनपुर वाने तुमको लाडो प्रगान ।।
पार करो दुखियों की नैग ।
तुम दिन जग मे फोन खिवया ।।
मात पिता न कोई भैया।
भगतो के रखवाने तुमको लाखों प्रणाम । लहा.
जब ही तुम भारत मे पाये ।
सवको प्रा उपदेश सुनाये ।।
जीवो के प्रा प्रारग बचाये ।
बन्ध छुड़ाने वाले तुमको लारणो प्रणाम ।। महा०
सब जीवों मे प्रेम बढाया।
राग द्वेष सवका धुडवाया ॥
हृदय से शनान हटाया
एम वीर मतवाले तुमको लाखो प्रणाम ।। महा.
समोशरण में जो कोई माया ।
उसका स्वामी परण निभाया ।
नव सागर से पार लगाया।
भारत के उजियारे तुमको लाखौं प्रणाम ।। महा०
'किशनलाल' को भारी गधा ।
सदा रहे दर्शन का प्यासा ।।
धर्म पुरा देहली में यासा ।
महो पुरा चाले तुमको लामो प्रवाम !! महा.
.
।
राजकुमार
हो।
मजन नं. ६
सव मित के आज जय कहो श्री वीर प्रभु
मस्तक झुका के जय कहो श्री वीर पभु की । । टेक
विघ्नो मा नाण होता है लेने से नाम में।
माला सदा जपते रहो श्री वीर प्रभु की । । सब...
ज्ञानी बनो धानी बनो बलवान भी पनो ।
अझलक सम बन के कहो जय वीर प्रभु की । । सब
होकर स्वतन्त्र धर्म की रक्षा सदा करो ।
निर्भय बनो अरु जय कहो श्री वीर प्रभू की।। सव"
तुझायो भी अगर मोक्ष की इच्छा हुई है 'दास' ।
उस पाणी पं श्रद्धा करो श्री पोर प्रभु की । । सब...
मजन नं. ७
है और तुम्हारे द्वार पर एफ दर्श भिखारी प्राया है।
मनु
दर्णन भिक्षा पाने को दो नयन कटोरे लाया है।।
नही दुनिया मे कोई मेरा है माफत ने मुझको घेरा है।
प्रभु एक सहारा तेरा है जग ने मुझको ठुकराया है ।।
धन दौलत को छु यह नहीं परनार छूटे परवाह नहीं ।
मेरी इच्छा तेरे दर्शन की दुनिया से वित्त घबराया है ।।
मेरी बीच भवर मे नया है स तू ही एक दिवया है।
लाखो को ज्ञान शिखा तुमने भवसिन्धु से पार उतारा है।।
घापस मे प्रीत व प्रेम मही तुम दिन अब हमको चैन नहीं ।
अब तो तुम प्राफर दर्शन दो रिलोको नाय प्रकुलाया है।।
जिन धर्म फलाने को भगवन कर दिया है मन धन पन ।
नष-युवक मण्डल अपनामी सबा का भार उठाया है।।
.५० कुन्डलपुर के भजन नं.८ वीर क्या तेरी निराली शान है । देख के दुनियां जिसे हैरान है । । टेक ।। जाने क्या जादू भरा है आप मे । हर वशर को आपका ही ध्यान है। । वीर० ॥१॥ सैकड़ो मीलों से आते हैं यहां । दर्श बिना तेरे दुनिया हैरान है । । वीर० ॥२॥ जिसने जो हसरत तुम्हें जाहिर करी । आपने पूरा किया अरमान है। । वीर० ॥३॥ जो भी बाया अापके दरवार मे। उसको मुह मांगा दिया वरदान है।। वोर० ॥४॥ जीव हिंसा को हटाया आपने । सारे जीवों पर तेरा अहसान है । 1 बीर० ॥५॥ रास्ता मुक्ति का बतलाया हमें। तेरा मयनु सारा हिन्दुस्तान है । । वीर० ॥६॥ फाम धेनु सी है ज्योति आप मे । वो ही शक्ति पाप में परधान है। । वीर० ॥७॥ है दया 'फरना धर्म इन्सान का। यीर स्वामी का यही फरमान है । वीर० 11 'राज' में भी इनायत की नजर । प्रापके सम्मुख खड़ा नादान है । वोर० !६! १ - -
राजकुमार
भक्तो के प्रारण पुकार रहे जय हो जय त्रिशला नन्दा की।
वालो के स्वर मे लहर उठी जय हो जय त्रिशला नन्दन की।
मर रही पाप से दुनिया थी जब तुम दुनियाँ में आये थे।
जब हूक हृदय से टकराई पशुमो के करुणा क्रन्दन की । ।
यो त्रिगला नन्दन दररणो मे लेलो मेरा बन्दन लेलो।
ये भाव की प्याली भरी हुई लाया हू केशर चन्दन की । २।
प्रहिमा की धारा छलक पड़ी विपुलालच गिरवर से छल ।
दुनियाँ इक स्वर से बोल उठी जय महावीर दुव भजन को १३॥
वो राह बता दो हमको भी बन जाऊ शिवपुर का राही ।
वह डगर कोन चलकर अंजन को पदवी मिलो निरजन की 11
तेरी करुणाकी किरणो से जिस जिसने थी करुणा पाई।
सव पधिने मोक्ष के हुए फाट गोरी कर्मों के पन्धन का ।।५।।
सजन नं.
,
मन हर तेरी मूरतिया मस्त हुप्रा मन मेश।
तेरा दर्श पाया पाया, तेरा दर्श पाया ॥ टेक ।।
प्यारा-प्यारा सिंहासन अति भा रहा, मारहा ।
उस पर रूप अनूप तिहारा छा रहा छा रहा ।
पद्यासन अति तोह रे नैना निरख प्रति चित्त ।
ललचाया, पाया तेरा० ॥
प्रभु भक्ति से भव के दु.ख मिट जाते है जारी है,
पापी तक भी भवसागर तिर जाते है जाते है ।।
शिद पद वोही पाया रे शरणागत में लगे बोकी
फुन्धमपुर के
भाया, पाया तेरा०॥
सांची कहूं खोई निधि मुझको मिल गई, मिल गई।
उहको पाकर मन कीखियां
प्राशा पूरी होगी रे माशा लगाये 'वृद्धि तेरे !
द्वारा माया-पाया, रा०॥
खुल गई
खुल गई।
.
सजन २०१०
घोरा पोरा में पुकारू तेरे घर के सामने ।
मन तो मेरा हर लिया महावीर जी भगवान मे ।।
मोहिनी छवि को दिखादो पब मेरे भगवान मुझे।
मेरी पर्वा हम करेंगे, हर वशर के सामने । वोरा०
सूबते श्रीपाल को तुमने
बचाया है प्रभो।
द्रोपदी की लाज राखी फौरव-दल के सामने गोरा
हारका बनकर सरस पब खा लिया उस सेठ फो।
उसने सुमरण किया महावीर जी के नाम को। वोरा०
चित्त हम सबका भटकता, वीर के दीदार को।
पर जोर से देखा करू, में मेरे घर के सामने ॥ थोरा०
भजन नं० ११
हमें पीर स्वामी तुम्हारा सहारा ।
कुन्डल पुर के राजा सिद्धारथ का प्यारा ।
जो दर्शन दिये
दुनारा
भी देना।
पह निषालावतिनी के पालोदा तारा
राजकुमार
मुना करता था जो तारीफ स्वामी।
तो वैसा ही पाया नजारा तुम्हारा १२।
जब मुस्कराहट अजव शान तरी।
मज नूर तुम्हारा है स्वामी तुम्हारा ।।
जो छीना है दिलको न दिल को हटाना ।
हटा लोगे दिलको न होगा गुजारा १४
पारो सेवको की महावीर रक्षा ।
है सब प्राणियो को सहारा तुम्हारा १५
दया हमपे करना दया के हो सागर ।
फरोगे तुम्ही भवसागर से पारा १६॥
सिदा प्रेम के हम पे देने को है क्या।
झूका बस यह चरणो मे शीश हमारा ७॥
.
सजन नं० १२
यह दिन पा मुसारका शुभ थी घड़ी, जर जन्मे थे महावर प्रभु।
एव नरया में भी थी शानि पड़ी, जद जन्मे थे महावीर प्र॥
निधि चैत नुतेरस प्यारो घो, यह पन्य कुण्डलपुर नगरो ।
सिदाई पिना निशता उरसे, वे सन्मे घे महावीर प्रनु ।
-
१५४ उन्जापुर के F जन धर्म कर्म था नष्ट हुमा, पाचार जगत का विगड़ना। तब शुद्धाचार सिखाने को, वे जन्मे थे महावीर प्रनु । जब यज्ञ मे लाखो पशुप्रो का, होता धा नलिदान महा । तब हिंसा दूर हटाने को वे जन्मे महावीर प्रभु। जव कर्ता वाद अज्ञान बढा, मिद्धातमको भूल गये। तब स्यादाद समझाने को, वे जन्मे थे महावीर प्रभु । जब भटक रहे थे भव बन मे, गिवगह नजर नहीं पाता था। तब मुह का मार्ग बताने को, वे जन्मे थे,महाबोर प्रभु। मजल नं० १३ कुण्डलपुर के श्री महावीर भज प्यारे तू श्री महावीर । जय महावीर जय महाबोर मज प्यारे तू श्री महायोर । मुक्ति नायक श्री अतिवीर, जय जय वर्षमान गुण पीर । त्रिशना नन्दन गुगण गम्भीर, राय सिद्धारय । सुन धीर । मोह महानल को तुम वोर, कर्म जलद को हरा समीर। तप कर तोर कर्म जंजीर, केवल जान नहा बलवीर । दे उपदेश हरी जग पीर, शिवपुर पहचे भव फे तीर सजन २० १४ मेरे भगवान मेरी यही झारा है। पार कर दोगे वेडा यह विश्वास है। मन के मन्दिर मे प्रांसो के रस्ते तुझे । मेरे भगवान लाना पड़ा है मुझे । मेरे दिल न जाना या परदामहै। तेरे रहने को मन्दिर बनाया है मन । तेरे नररणो पेअरपन किया तन व धन। मेरे दिल से न जावागे यह विमान है। प्रेम की डोर से बाघ कर प्रभा। मन ने मन्दिर मे उगा तुमओ विभो ।
तुमको जाने न दूंगा न अयकाश है ।
भजन नं० १५
तेरे दर को छोड़कर, किस दर जाऊ मैं ।
सुनता मेरी कौन है, जिसे सुनाऊ मे ।
जबने नाम भुनाया वीरा, लाखो कष्ट उठाये हैं।
न जाने इस जीवन अन्दर, कितने पाप कमाये है।
मेरे दुष्ट कर्म ही मुझको, तुमसे न मिलने देते हैं।
जब मैं चाहू दर्शन पाना, रोग तब ही वह लेते है।
छोटा दो प्रभु ज्ञान का शरण मे ग्राऊ मैं ।।
मोह मिथ्या में पड़कर स्वामी नाम तिहारा भूला था ।
जिमको समझा था मुख मैंने दुख झा गोरखधवा था ।
मोह माया को छोड़कर शरण खडा हू मैं ।
बीत चुसी सो बीत चुको अब शरण तिहारी आया हूं।
पर्शन भिक्षा पाने को दो धो नैन कटोरे लाया हू।
मन में अपना ज्ञान का दीप जलाऊ मैं ।
सुनता मेरी कौन है किसे सुनाऊं मैं ।
भजन नं० १६
महावीर स्वामी मैं क्या चाहता में ।
फरत प्रापका पामरा चाहता हूं।
मिली तुमको पदवी जो निर्धारण पद को ।
कि तुझ जैसा में भी हुआ पाहता हूँ।
फसा हूँ मैं ववकर मे प्रावागमन के ।
कि अब इससे होना रिहा चाहता हू
दया फर दया कर तू मुझ पर दयालु ।
दया चाहता हू दया चाहता हूँ ।
बुरा है भला हू वधम हूँ कि पाणे।
क्षमा कर तू मुझ पं क्षमा चाहता हूँ ।
।
। - प्रारती जय सन्मति देवा प्रभु जय सन्मति देव । घोर महा अति वोर प्रमुजी वर्तमान देवा ! टेक। त्रिशला उर अवतार लिया प्रभु मुर नर हरपाये। पन्द्रह मास रतन कुण्डलपुर धनपत बरसाये । जय० । शुक्ल त्रयोदशी चैत्र मास की, प्रानन्द करतारी । राय सिद्धारय घर जन्मोत्सव, ठाठ रचे भारी । पप. ! तीस बरस तक रहे पर में, बाल ब्रह्मचारी। राज त्याग कर भर यौनन मे, मुनि दीक्षा धागी। नय० । द्वादश वर्ष तर लिया दुर, विधि घरपूर लिया। झल के लोकालोक ज्ञान में, मुख भरपूर लिया । जय० । फातिक श्याम अमावस के दिन पाकर मोक्षले! पवं दिवाली चला तगी से, घर घर दीप जाले । नय० । घीतराग सर्वन हितपी, शिव मग परमानो। हरिहर ब्रह्मा नाय तुम्बी हो, जय जय अविनामी । जय० । दीनदयाला जग प्रतिपाला, सुर नर नाग गजे । सुमरत विघ्न टरें इक दिन मे पाता दूर भो । जन० । प्वोर, भोल, चाडाल उभारे, भत्र दुःदाम हो। पतित जान "शिवराम' उभारो है जिन शरण नही । ज70 1 - यह विधि मगल प्रान्ती कीजे, पंच परम पद भज सुनोगे ।टे, प्रथम प्रारती श्री जिनराजा, भवधि पार लतार नि। 2, दूजी पारनी गिद्धन केरी, सुमरन परत मिटे नव जरी । म.. सोजी मारती सुर मुनिन्दा, जना, मरण, दु: दुरा चौपी मारतो जो जमाया, दर्शन र पार पनामा, पाचवी भारती साधु नुम्हारी, शुमति विनाम गिन.. घटी गारद प्रतिमा पारी मावा दन्दू मानना चाती भारतीयो जिनवारा', 'धानत' स्वर्ग मृस्ति दान । - 3 - p नाजकुमार (महावीर क्र. सार महानी) सुनो मुनो ए दुनिया वालों हावीर की अमर कहानी । सुनो तास वर्षका विरामानन्दन सम्माति घर से निकला। सिद्धारध नृप मा प्रिम र वह कर्मचाटने निहला । राजपाट परिवार त्याग के बह जगल मे माया । चादर भीतर हया दिगम्बर जान ध्यान ध्याया। सुनो। घोर तपस्या करके उसने बारह वर्ष विताये। फर्म जाट के केवल पाया सव प्राणी हर्षाये । पशो में नर पशु माते थे गाकर पीव्रतमाये । मोह नीद मे जगा जगाकर सम्यक ज्ञात कराये । नुनो । धर्म उपदेश देकर जग को सुखमय उमे बनाया म्याद्वाद का पाठ पढाके हठ का भूत भगाया। मनाक्ष माग पतलाकर प्रभु ने प्रारगो मुस्त करवाया। पानापुर के बीच सरोवर धन तज शिव पाया । सुनो पापू ने भी शिक्षा ले देण मुक्त करवाया। घला गया जो वीर लोट नग मे माया । सत्य अहिमा जान रूप जो वीर ने धर्म ग्ताया । सिद्ध व हे सुनों ने उसको भक्ति से अपनाया । सुनो सुनो। चांदलपुर महावीर मण्डलपुर के श्री महावीर, भज प्यारे तू जय महावीर । लय महावीर जय महावीर, भज प्यारे तू जय महापोर । चरण पुजें चादनपुर तीर, जहा नदी बहती गम्भीर । उस टीले की ही तस्वीर, जहां दिया गैया ने नीर । हा पड़ी भवत पर भोर, तहा हरी हृदय पी पीर । पमान स्वामी प्रति वीर, सन्मति वीर श्री महादीर । भावजागो गो पामों धोर, हो न गाने 'हिमन' दिलगीर । -
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पूरपुर के
भवा के फूल
वोरा वीरा मैं पुकारू तेरे दर के मामले ।
मन तो मेरा हर लिया महावीर जी भगवान ने ॥
मोहिनी छवि को दिखा दो घर मेरे भगवन मुझे।
तेरी चर्चा हम करेगे, हर वशर के सामने । वीरा०
दूदते श्रीपाल को तुमने बचाया है प्रभो !
द्रोपदी को लाग राखो दौरव दल के सामने । वीरा.
हार का बनकर सरप जब सा लिया उससेठ को।
सोमा ने सुमरन किया मडावीर जी के नाम को । पौरा०
चित्त हग सबका भटकता वीर के दीदार को।
कर जोड़कर देखा कर मैं तेरे दर के सामने । वीरा०
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एक प्रेम-पुजारी गया है चरणों में ध्यान लगाने पो।
भगवान तुम्हारी मूरत पर श्रद्धा के पुन चढाने को ।।
तुम विशला के दृग ताने हो पतितो के नाच रहार हो ।
तुम चमत्कार दिलाते हो, भत्तों का मान पायाने फो। १ !
तुम्हारे वियोग मे हे स्वामी हाय व्या वरती जाती।
भारत में फिर से भाजायो, जिनधर्म का रंग जमाने हो।
उपदेश धर्म का देकर के फिर, धर्म सिखादी भारत को।
शानो एक बार प्रभु पासो, रिला का नाम मिटाने हो।
प्रनु तुमरे मस्त भरते है, रे नाम भी हर मरने
'मिजोजो' नित्य करता है, प्रभु मायनंग पान दो।४
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राजकुमार १५६ - श्री महावीर चालीसा (शमशागद निवासी रव० पूरनमल कृत) दोहा-सिद्ध -मूह नमो सदा, अरु सुमिर अरिहन्त । निर श्राकुल निर्वाध हो, भए लोक के अन्त । मगल मय मगल करन, वर्धमान महावीर । तुम चिंतत चिंता मिटे, हा प्रभु चर्म शरीर । चौपाई) जय महावीर दया के सागर, जय श्री सन्मति ज्ञान उजागर । शोत चदि मूग्त प्रति प्यारी, वेष दिगम्बर के तुम धारी । फोटी भानु ने प्रति छवि छाजे, देखत तिमिर पाप सब भाजे । महावली अरि कर्म विदारे, जोधा मोह सुभट को मारे । काम क्रोध तजि छोड़ी माग, क्षण मे मान दषाय भगाया । रागी नदी नही तू द्वापो, वीतराग तू हित उपदेगी । प्रभु तुम नाम जगत मे सोचा, सुमि रत भागत भूत पिणाचा । राक्षरा यक्ष डादिनी भागे, तम चितत भय कोई न लागे । महा शूग का लो तन धारे, होदे रोग शसाध्य निवारे । नाल फराल होय फणधारी, विष को उगले क्रोध कर भारी । महाकाल सम फर डसन्ता, निविप करो प्राप भगवन्ता। महामत्त गज मद को झार भगे, तुरन्त जब तोहि पुारे। फार हाट मिहादिक प्राव, ताको है प्रभु तुही भगावे । होर प्रजल अग्नि जो जार, तुम प्रताप शीतलता धार । मामलधार भरि युद्ध लडन्ता, तुम दृष्टि हो विजय तुरन्ता । पचन प्रचण्ड पन्ने भय भोरा, प्रभु तुम हरी होय भय पोरा । झारखण्ड गिरि अटवी मांही, तुम बिन शरण तहा कोउ नाही । पजपात परि धन गरजावे, मूसलाधार होय तडकादे । होय पुत्र दरिद्र सन्ताना, सुमिरत होय फुधेर समाना । पन्दी-गृह में पन्ना जन्जीरा, पट सुई नि मे सब शरीरा । .
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मुकापुर
घन्ड गरि यूज घरावं, तारि सिहारन तली सिने
न्यायाधीश राज दमागे, विजय रे हा मारी !
हर लाल दूप्ट मिलन्ता अमृत सम प्रभु पो तुम्ता ।
चढे जहर जीवादी इसन्ता, निविप क्षण में पाप करता।
एक सहस दसु तुमरे नामा, जन्म रियो मुन्रपुर नामा ।
सिद्धारथ नर सुत पहलाए, विशना मात उ गदारे ।
तुम जननत भयो लोक अशोका, अनहद न्द सिंह गोगा।
इन्द्र ने नेत्र सहन करि देखा, गिरि समेर dि अभिषेखा।
कामदिक तृष्णा मंसारी, तज तुम भए बाज खनारी ।
अथिर जान जग अनित विमारी, दालपने प्रभु दीक्षा धारी।
शाति भाव घर कर्म विकागे, तुरतहि चल मान गये।
जड़ चेतन प्रय जग के सारे हस्त रेउपत् तू हैं निहारे ।
लोक अलोक द्रव्य पट्ट जाना, द्वादशाम पाय माना।
प्पा मिटा पालेशा, दया धर्म देबर मा ।
व्हयत और कुवादि दंगे, रहने न दिये एक हो ।
CURR Vाल व जिगराई, चांदनपर प्रनता ।
क्षण मे तोपिन गदि हटाई, भाता के राम सदा सहाई।
मूरख नर नादि घन्टर ज्ञाता, सुरत पोटित होप दिया।
पशु पज
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परे पाठ पालीस दिन नित
दावोसहि धार।
एवं धुप मुगम पडि श्री महावीर गार ।
समदरिद्रो होय ग्रह, जय नदि मान ।
नाम नंश जग में हो, होप हुवेर समान । ६ ।।
MARAN
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