Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Veer Aur Viranghanaye
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Expurgated Edition
ऐतिहासिक
वीर और वीराङ्गनाएँ
लेखक
परमानन्द शास्त्री,
एम ए एम ओ एल
डी ए वी कालेज, लाहौर
प्रकाशक
सूरी ब्रदर्स
प्रकाशक और पुस्तक विक्रेता
गणपत रोड, लाहौर
मूल्य १)
प्रकाशक- श्री मदनलाल सूरी, सुरी ब्रदर्स, गनपत रोड, लाहौर मर्माधिकार सुरक्षित है। मुद्रक- एस०सी० लख रमेश प्रिंटिंग वर मोहनलाल रोड,
निवेदन
भारतवर्ष के इतिहास में ऐसे ऐसे चोर और वीराङ्गना
उत्पन्न हुई है, जिहोने अपनी वीरता और समुज्ज्वल ममिन
का उस आदर्श हमारे सामने रखा है। उनके वीर रस
परिपूर्ण चरित्र के अध्ययन से हमारे निर्मल हृदयो मे वीरता
का सचार होने लगता है, मूसी नाड़ियों में साहस और
उत्साह को रक्त धारा यहने लगती है। उनके सचित्र को
पढ कर हमारे चरित्र का सुधार होता है, उन जीवन यनता
है और आत्मा समुन्नत होती है ।
इस छोटी सी पुस्तक में प्राचीन काल से लेकर भारत
को वीरता और उसके अतीत गौरव के दशन कराने का प्रयास
किया गया है जो कि परीक्षार्थी विद्यार्थीयों को अधिक
शिक्षाप्रद और लाभदायक सिद्ध हो सकता है। यदि यह
पुस्तक विद्यार्थियो के हृदयों मे वीरता को तरङ्ग तथा देश
और जाति के प्रति अटूट प्रेम उत्पन्न कर सकी तो लेखक
अपना परिश्रम सफन समझेगा।
मुझे पूर्ण आशा है कि हिन्दी भाषा के प्रेमी जन इस
छोटी सी पुस्तक को अपनाने की कृपा करेंगे।
परमानन्द
केवल टाइटल के पृष्ठ जगजीत इलैक्ट्रिक प्रैस मोहनलाल रोड, लाहौर मे छपे।
विषय-सूची
श्रीकृष्ण
चीरवर अर्जुन
३१-५२
शिवाजी
सयोगिता
७१-८७
रानी दुर्गावती
८-१०५
रानी सारन्धा
७०-१२८
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वीर और वीरांगनाएँ
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श्रीकृष्ण कई विद्वानों का विचार है कि श्रीकृष्ण के जन्म को लगभग ५००० वर्ष हो चुके हैं । उस समय शूरसन-कुलोत्पन्न राजा उपसेन का उत्तर भारत में राज्य था । मथुरा उसकी राजधानी थी। उग्रसेन वहा प्रतापी, वीर, नीति-परायण और विद्या-व्यसनी राजा था। उसका स्वभाव बहुत ही सरल था । उस समय मथुरा धन-धान्य से परिपूर्ण और वाणिज्य-व्यापार का केन्द्र था। उपसेन के पुत्र का नाम कम था, जो बड़ा ही कुटिल, दुराचारी ओर अत्याचारी था । वह मगधदेश के राजा जरासन्ध का जामाता था। उस की सहायता से कस ने अपने पिता को राज्य से च्युत कर दिया और स्वय राजगद्दी पर बैठ गया । कस यों तो बडा चीर, पराक्रमी और शक्तिशाली राजा था, पर उसकी वीरता शक्ति-हीन प्रजा पर ही काम आती थी। उसके दुराचरण ओर अत्याचारों से प्रजा भयभीत रहती थी । उसके राज्य में उसके अपने-पराये सब तग थे। उसने अपने वश की मान मर्यादा फो मिट्टी में मिलाया।
४
AYA
वीर और वीराङ्गनाएँ
द्वार सुले पडे हैं और पहरे वाले गहरी नींद में खुर्राटे ले रहे
हैं। इस अवसर को पाकर वसुदेव पालक को लेकर कारा-
वास से बाहर निकल पडे और कुछ दूरी पर यमुना नदी के
तट पर आ गए । यमुना नदी में प्रवेश करते ही अांधी
बद हो गई, श्राफाश-मण्डल स्वच्छ होने लगा, तारे चमकने
लगे और नदी का भीपण प्रवाह कम हो गया । प्रकृति का
सारा प्रकोप शिथिल पड गया । वसुदेव विना किसी कष्ट के
यमुना के पार पहुँच गए।
वसुदेव उसी क्षण गोकुल मे गोपी के सरदार नन्द के
पर पहुचे । अकस्मात् नन्द-रानी यशोदा के गर्भ से भी उसी समय
एक कन्या उत्पन्न हुई थी । वसुदेव ने अपने जिगर के टुकडे
उस बालक को नन्द के हाथ में दे दिया और उसकी कन्या को
अपनी गोद में लेकर पुन कसके कारागृह मे लौट आए । रातो-
रात यह
घटना हुई, किसी ने कुछ न देसा और न
सुना । प्रात फाल होते ही फस प्रसव-सवाद सुनते ही
दोडा आया । बहिन देवकी ने बार-बार प्रार्थना की-
"यह तो कन्या है, इसे जीने दो, यह तुम्हारा क्या बिगाड़ेगी,
पर निष्ठुर कस ने एक न सुनी । लडकी को उसके हाथों से छीन
कर पत्थर पर दे मारा।
"
इधर कस उस कन्या के रक्त से अपने हाथ रजित कर
रहा था, उधर गोकुल मे यशोदा के पुत्र उत्पन्न होने के
उपलक्ष्य में बाजे बज रहे थे । बधाइयाँ देने के लिए नन्द
श्रीकृष्णा
५
के घर गोपियों और गोपो का तांता बँध गया । इम से
पूर्व वसुदेव की ज्येष्ठ पत्नी रोहिणी के गर्भ से बलराम
का जन्म नन्द के घर हो चुका था । यशोदा के पुत्र की
साँवरी-सलोनी सूरत देखकर पुरोहित ने उसका नाम कृष्ण
रख दिया।
बाल्यावस्था
काल क्रम में दोनो भाई कुछ-कुछ बडे हो गए। पहले घुटनो
चलत थे, अब पाओं चलने लगे । दोनों भ्राता एक साथ खेलते ।
उनकी विचित्र बाल-क्रीडा, मुस की मधुर मुसकराहट और
वाल्य-सुलभ चचलता से सपूर्ण परिवार परम आनन्द में मन
रहता । ये दोनों बालक ज्यो-ग्यो बडे हुए, उनकी चपलता भी
बढती गई । उनमें कृष्ण विशेषत चतुर और माखन-प्रिय थे।
अपने घर में ऊसल नीचे रखकर उस पर खडे हो छींके
पर रखे हुए वासन से मापन चुरा कर मुँह में डाल लेते और
वेचारी यशोदा छडी लेकर पीछे दौड़ा करती । कृष्णा छोटे-छोटे
वरडों की पूँछों को पकड कर उनके पीछे दौड़ा करते, बछडों के
साथ लुढ़कते घिसरते बहुन दूर तक चले जाते । धीरे-धीरे कृष्णा
को चपलता अधिक वह गई, यहा तक कि वे गोपियों के दूध-दही
के बासन उलट देते । ईद या पत्थर से मासन की मटकियों
को फोड देते । इस तरह नाना प्रकार के उत्पातों से कृष्ण ने
गोपो के नाकों दम कर रखा था। यशोदा ये घर उलहनों
की भरमार आने लगी । वह कृष्ण को दुरकारती, कृत्रिम
वीर और वीराङ्गनाएँ जाते, हिंसक पशुओं का सामना किया करते। और उन्हें मार कर घर लौटा करते । वृन्दावन में 'माण्डी' नामक विशाल वट वृक्ष के नीचे कृष्ण यन्य बालकों का दल धना कर मल्ल. युद्ध किया करते थे। उन दिनो मल्ल-विद्या का वडा प्रचार और सम्मान था । कृष्ण और बलराम इस कला की पूर्ण- शिक्षा पाकर मल्ल-विद्या-विशारद घन गए । प्रजवासी श्रीकृष्ण के अद्भुत कार्य-कलापो को और अद्वितीय चल-पोरप को देसकर कहने लगे कि वे कोई साधारण जीव नहीं हैं । उनके मन में यह रढ विश्वास हो गया कि विपत्ति में श्रीकृष्ण सदा ग्रजवासियों की रक्षा फ्रेंगे । एक दिन वृन्दावन के निकट भीपण आग लग गई। अग्नि की प्रचण्ड ज्वालाएँ आकाश को छूने लगों । श्रीकृष्ण ने तब अपना अपूर्व पराक्रम दिसा कर अग्नि को शान्त कर दिया और ग्वाल-चालकों के प्राणों की रक्षा की । तव से समस्त प्रजवासी उनके भक्त बन गए। श्रीकृष्ण उनके प्राण थे, मान ये और ध्येय थे । अव श्रीकृष्ण का शौर्य-यश मब अगह फैल गया । मथुरा मे भी सब जगह श्रीकृष्ण की चर्चा होने लगी। . कस के कानो तक भी कृष्ण के अतुल पराक्रम की कथा पहुच चुकी थी। उसे यह भी विदित हो गया था कि उमके प्राणों का वैरी वृन्दावन मे विद्यमान है । उसने कृष्ण की जान लेने के लिए बड़े बड़े बली योद्धा गक्षस वृन्दावन में भेजे, पर कृष्ण के आगे सब को मुँह की खानी पड़ी । जो कोई श्रीमा कृपा फे भाग लेने के लिए उममे उलमता उसे प्रागाने के बरले दने पटते । 'प्रय कम फे भय का ठिकाना न रहा । वह कृष्णा को मार डालने के लिए नाना प्रकार ये पड्यन्त्र रचने लगा। कैस का पड्यन्त्र श्रीकृष्ण और बलराम के असीम पल-पराक्रम की कथा स्थान-म्यान पर फैल चुकी थी । इनका नामधाम फब गुप्त रह सकता था । जन साधारगा फहते कि ये साधारण गोप- फुमार नहीं हैं। इनमें कोई देवी शक्ति विद्यमान है। उनकी लम्बी भुमाएँ, उन्नत ललाट और विशाल नेत्र कह रहे हैं कि ये दोनों पालक जन्म स गोप नहीं हैं। सन लोग यह अनुमान करते और कहते कि ये पालक नन्द फे नहीं, वसुदेव के ही पुत्र हैं । यह जन-प्रवाद फैलते-फैलते फस के कानों तक भी पहुच गया । जिम बात का पहिले उसे सन्देह था, अव उमे उसका निश्चय होने लगा । अपने मस्तक पर हाथ धर कर कस बैठा ही था कि नारद मुनि ने महल में प्रवेश कर कहा-“हे राजन् सावधान हो जाइए। देवकी का आठवां पुन तुम्हारा शीघ्र हो अन्त कर देगा। जिस कन्या को तुमने शिला पर दे मारा था, वह देवकी की कन्या न थी, नन्द की कन्या थी। नारद मुनि यह कहकर चले गए, कस के हृदय पर तो तीर लग गया । उसकी व्याकुलता अधिक बढ़ने लगी । उसे वसुदेव के पड्यन्त्र पर कोध आने लगा ।, अव पड्यन्त्र रचना क अतिरिक्त कस के पास कोई अस्त्र शस्त्रन . 1hw- १२ वीर और वीराङ्गनाएँ हुई । शक्ति-शाली बलराम ने उसे भी भूमि पर पटक कर मार डाला । यह दृश्य देखकर दर्शक चकित हो गए। श्रीकृष्ण-बलराम की जय-जय होने लगी । इस जय-जय के साथ कस के क्रोध का पारा भी चढ गया । उसने अपने भृत्यों को आदेश दिया-"देखते क्या हो, इन छोकडों को छली वसुदेव और देवकी के साथ पकड कर कारागृह मे बन्द कर दो"। ये शब् कस के मुँह से निकले ही ये कि श्रीकृष्ण ने तुरन्त सिंहासन पर कूट कर उस को पालों से खोंच अंखाडे में धकेल दिया । भूमि पर बार-बार पटकने से कस अचेत हो गया, और यमलोक में पहुँच गया। हुआ। अत्याचारी कस की मृत्यु पर सव जगह हर्ष प्रकाश होने लगा । चारों ओर शान्ति का राज्य स्थापित श्रीकृष्ण-बलराम ने अपने माता-पिता देवकी और वसुदेव को प्रणाम किया । यदु-पशियों को अभिवादन कर श्रीकृष्ण ने फस के पिता उग्रसेन को राज्य-सिंहासन देना चाहा परन्तु उग्रसेन पुत्र-शोक से विह्वल होकर कहने लगा-"यह राज्य मेरे लिए किस काम का, मैं तो ईश्वर-आराधन के लिये वन में जाना चाहता हु । इस राज्य की बागडोर श्राप सँभालिए"। श्रीकृष्ण ने हाथ जोड़ कर प्रार्थना की-"तात । राज्य पर मेरा कोई अधिकार नहीं । यह गद्दी आपकी है, जिसे कस ने अन्याय ओर बल से आप से छीन लिया था। मैंने श्रीकृष्ण फम को राज्य-लोभ से नहीं मारा। उसने तो अपने कर्मों स यह गति प्राप्त की है। उसके भाग्य में यही लिसा था। मै तो निमित्त मान हूँ । आप अपना राज्य लीजिए, अपनी प्रजा मे अपना धर्म-राज्य स्थापित कीजिए"। ये शब्द कह पर श्रीकृष्ण ने उग्रसेन के सिर पर राजमुकुट रख दिया। श्रीकृष्णा के कहने पर अनेक देव तुल्य लोग जो कस ने बन्दी कर रखे थे, कारागृह से मुक्त कर दिये गए । मथुरा का सौभाग्य पुन जाग उठा । चारो ओर मुख समृद्धि दीसने लगी । इसक अनन्तर श्रीकृष्ण-बलराम उज्जयिनी में सांदीपनी ऋषि फ आश्रम में विद्या पदन के लिये भेज दिये गये, जहाँ उन्होंने सॉटीपनी पि से बद शास्त्र तथा शस्त्र-विद्या की शिक्षा प्राप्त की। युद्ध की घटनाएँ उज्जयिनी स पूर्ण शिक्षा पाकर श्रीकृष्ण-बलराम मथुरा लोट पाए । वसुदेव-देवकी क आनन्द का ठिकाना न रहा । उनका घर एक प्रकार का मन्दिर बन गया । दिन में उनके घर अनेकन्नर-नारी श्रीकृप्या-चलराम के दर्शन करन आते । मथुरा में सर जगह उनका यश बसान किया जाता । मथुरा का राजसूत्र भी उनके हाथ में था। महाराज उग्रसेन राज्य-कार्य मे उनकी सम्मति लिया करते थे। उनके बल पर महाराज को बडा गर्व था। कस की मृत्यु के बाद उसकी दो रानियॉ अस्ति और, वीर और वीराङ्गनाएँ धनुर्विद्या का ऐसा अद्भुत चमत्कार दिसाया कि जरासन्ध की सेना को सिर पर पाँव रस कर भागना पड़ा। अभिमानी जरासन्ध का गर्व टूट गया । वह प्राण बचाकर बची हुई सेना के साथ भाग निकला। गोमन्त पर्वत को छोड श्रीकृष्ण-बलराम आगे बढे । उन्होने दक्षिण ममुद्र-तट पर अपनी राजधानी बनाई, जिसका नाम द्वारिकापुरी रसा । यह पुरी पहाडों से घिरी हुई थी । वहीं सुदृढ प्राचीर और दुर्ग वनवाए गए । राजप्रासाद, देवालय और सुरम्य भवन तैयार कराए गए । जगह-जगह सुन्दर उद्यान और उपवन बनाए गए । असत्य यादव उस नगरी में रहन लगे। अब श्रीकृष्ण की आयु पच्चीस वर्ष की हो गई थी। उनके माता-पिता विवाह की चिन्ता करने लगे । जैसे श्रीकृष्ण अद्वितीय रूप-गुण सम्पन्न थे, माता-पिता भी यही चाहत ये कि वधू भी वैसी ही होनी चाहिये । विदर्भ के राजा भीष्म की कन्या रुक्मिणी श्रीकृष्ण के गुणों पर मुग्ध थी। वह श्रीकृष्ण के ही चरणो की सेवा करना चाहती थी। इधर श्रीकृष्ण भी उस गुणवती को ही पत्नी बनाना चाहते थे, पर पिता अपनी कन्या को जरासन्ध क कहने से चेदिदेश के राजा शिशुपाल को देना चाहते थे। स्वयवर के घुछ काल पहिले रुक्मिगीन अपने आप को श्रीकृष्ण के अर्पण कर दिया । उसे लेकर श्रीकृष्ण द्वारिकापुरी में पहुंच गए। शिशुपाल मुँह देसता ही रह गया।
श्रीकृष्णा - MAN सुदामा से भट अर श्रीहष्ण द्वारिका मे शक्तिमाली राज्य स्थापित कर आनन्द से रहने लगे। दिन दिन नफ राज्य-वभव की पू होने लगी। सारे देश में उन क पुण्य-प्रताप, यन और पराम: चर्चा होती थी। पर उन्हें अपन शार्य और धन-वैभव का तनि भी अभिमान न था। वे तो दुखियो और दरिद्रों की सहाय करने में अपना जीवन साथ सममत थे । सुदामा श्रीकृष्णा फ परम-मित्र य । व अध्ययन-फाल सांदीपनी गुरु क पास श्रीकृष्ण फ सहपाठी थे। सुदामा शार: फ बडे पण्डित धे, परन्तु दुर्दैववश अत्यन्त निधन थे । इतन होने पर भी व जितन्द्रिय और बस सन्तापी प्राधाग्य थ । वे अपन दीन अवस्था में भी सन्तुष्ट रहत थे और किसी क भाग हाथ पसारन पुरा समझत ये। एक दिन उनकी स्त्री न उनस कहा--"प्रायनार श्रीकृष्ण श्राप सहपाठी और पुरान मित्र है । उन्होन कई दोन- दरिद्रों को अपने उदार-गान से मालामाल कर दिया है । एक बार आप भी उनके पास जाइय ना सही। सम्भव है, आपके भी भाग्य खुल आँय" । उत्तर म सुदामा न कहा-"तुम्हारा फहना मान कर जाता हूँ। मुझे धन की इतनी लालसा नहीं है जितनी कि मित्र के दर्शन की। मैं उनके दर्शन-मात्र से अपने आप को कृतकृत्य समदूंगा" ! ऐसा कहकर सुदामा उसी फ्टी धोती, जीर्ण कुर्ती और शीर्ण पगड़ी में द्वारिका की ओर चल पड़े ।
वीर और धीराननाएँ जाते समय ब्राह्मणी ने श्रीकृष्ण की भेट के लिए भुने हुए कुछ चावल बाँध दिये। यथासमय सुदामा द्वारिका पहुँच गये । श्रीकृष्या के दिव्य भवन के भीतर वे बधडक धुस गये । अन्त - पुर में पहुँच कर उन्होंन श्रीकृष्ण को पर्यत पर लेटे हुए देखा । रुक्मिणी पास खडी हुई पसा कर रही थी । सुदामा को देखते ही श्रीकृष्ण पर्यवछोडकर नीचे खड़े हो गये और स्वागत करने के बाद अपने प्रिय मित्र को छाती से लगा लिया । रुक्मिणी तो इस मेल-मिलाप को देख कर चकित होगई। इसके बाद श्रीकृष्ण ने सुदामा को आदरपूर्वक अपने पर्यत पर बैठा लिया। श्रीकृष्ण अपने दीन सुहृद् की दारण दरिद्रता को देख कर दुःसी हुए । उनकी आँखों से अश्रुधारा वहने लगी । वे अपने मित्र को आश्वासन देते हुए कहने लगे-"मित्रवर । इस अवस्था में इतने वर्ष होगए, श्राप यहाँ पहले ही क्यों न चले आए। आपने कई वर्ष दुख और विपत्ति में व्यतीत कर हाले । शोक, मैं आपकी कुछ सेवा न कर सका" । इसके बाद रुक्मिणी पॉव धोने के लिए जल ले आई । श्रीकृष्ण ने प्रेम और श्रद्धा से स्वय मित्र के चरणों का प्रक्षालन किया, और हँसी मे सुदामा से पूछा-"भाभी जी ने कुछ भेंट तो मेरे लिए अवश्य भेजी होगी। यह कह कर श्रीकृष्ण ने सुदामा की बगल मे छिपाई
श्रीकृष्ण
हुई पोटली को उससे छीन लिया और उसमे बंधे हुए
चावलों को सोलकर बड़े प्रेम से चबाने लगे। रुक्मियी
ने भी उसमें से श्राधा भाग ले लिया । श्रीकृष्णा उन चावलों को
खाकर कहने लगे-"कैसे स्वादिष्ट हैं । ऐसे चावल आजतक मुझे
नसीब न हुए थे" । इस प्रेम-व्यवहार को देख कर सुदामा बडे
प्रसन्न हुए। एक दिन और रात सुदामा उस राजमहल में बडे सुख
से रहे। दूसरे दिन सुदामा जैसे आए थे वैसे ही साली हाथ चल
पडे । वे आशा लेकर श्रीकृष्ण के पास आए थे, निराश होकर
लौट गए । अन्त में मन को धैर्य देकर कहने लगे-"अच्छा
हुआ, कुछ न मिला । धन मिल जाता तो उन्मत्त होकर भगवान्
को भी भूल जाता।
सुदामा कुछ समय के अनन्तर अपने ग्राम में पहुँचे । वहाँ
पहुँच कर सुगमा के आश्चर्य का ठिकाना न रहा । उन्हों ने
अपनी टूटी-फूटी झोपडी की जगह एक नवीन सुन्दर भवन बना
हुआ पाया । वह भवन धन-धान्य से परिपूर्ण था। उनकी
म्त्री सुन्दर वस्त्र और भूपणो से सुसज्जित होकर उन की बाट
जोह रही थी । सुदामा इस रहस्य को भाँप गए और बार-बार
श्रीकृष्ण का धन्यवाद करने लगे।
शत्रुओं का हनन
यद्यपि जरासन्ध ने मथुरा पर आक्रमण करना छोड़
दिया था, तथापि उसने छोटे-छोटे राजाओं को भीत कर
उन्हें कारागृह में डाल रखा था | उसके अत्याचारों से
वीर और वीराङ्गनाएँ
दुखी होकर प्रजा भी त्राहि त्राहि कर रही थी। उसके
अत्याचार से सब राजा भयभीत रहते थे । राजाओं ने मिलकर
श्रीकृष्ण से अपनी प्राण-रक्षा की प्रार्थना की । उसी समय
राजसूय यज्ञ के सम्बन्ध मे पाण्डवों के ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिर ने
श्रीकृष्ण को हस्तिनापुर बुला भेजा ।
।
श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव की बहिन कुन्ती पाण्डवों की
माता थी। इसलिए युधिष्ठिर ने उस महान् यज्ञ के विषय में
अपने सम्बन्धी श्रीकृष्ण जैसे महान् पुरुप को सम्मति लेना
आवश्यक समझा । युधिष्ठिर के बुलाने पर श्रीकृष्ण हस्तिनापुर
श्राए । राज-सभा में राजा युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से
पूछा-"नारद मुनि राजसूय यज्ञ करने के लिए प्रामह
कर रहे हैं। आप मेरे भाइयों को जानते हैं । क्या मैं
इस यज्ञ को पूर्ण करने की योग्यता रखता हूँ ? क्या मेरे भाई
राजसूय यज्ञ के पहले सर जगह विजय प्राप्त कर सकेंगे ? कृपया
आप अपनी सम्मति प्रदान कीजिए।
उत्तर में श्रीकृष्ण ने कहा-"राजन् । आप इस यज्ञ की
अवश्य तैयारी करें।
आप गुणी हैं, प्रतापी है, चक्रवतर्ती
सम्राट् बनने के योग्य हैं, परन्तु इस यज्ञ में एक बडी
भारी अडचन की सभावना है । जब मगघदेश
का राजा जरासन्ध जीवित है,
राजसूय यज्ञ नहीं करने देगा । उस अत्याचारी राजा के पास
असख्य मेना है । कई राजा उससे भयभीत होकर उसके
तक
तक
वह आपको
श्रीकृष्ण २१ के घाट -- न चरणों की सेवा करते हैं । रणभूमि में उसे मृत्यु पहुँचाना बहुत कठिन है । वह केवल द्वन्द्व-युद्ध में मारा जा सकता है। मैं ने एक युक्ति सोच ली है । यदि आप अपने भाई भीम और अर्जुन को मेरे माय भेजें तो मैं अपनी युक्ति में सफल हो सकता हू"। युधिष्ठिर ने प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण की बात को स्वीकार कर लिया । अपने भाई भीम और अर्जुन को उना साथ जाने की आज्ञा दे दी। मगधदेश जाने से पहिले सपने प्राहाण का रूप धारण कर लिया । वे बिना किसी बाधा के जरासन्ध के राजमहल में पहुंच गए। जरासन्ध उन तेजस्वी प्राह्मणों को देख कर उठ सडा हुआ । उन का यथोचित सत्कार किया। उन्हें प्राझगा समझ कर अर्घ्य देने के लिये आगे पढा, परन्तु श्रीकृष्ण ने अर्ध्य लेना स्वीकार न किया । भरासन्ध सशङ्क होकर पूछने लगा-'क्या आप प्राक्षण- नहीं है? आप मेरा अर्ध्य क्यों अङ्गीकार नहीं करते" । ये शब्द कह कर जरासन्ध उन्हें सन्देह की दृष्टि से ताकने लगा। तब श्रीकृष्ण ने कहा-"जरासन्ध । हम क्षत्रिय है और ब्राह्मण-वेष धारण कर तुम्हारे पास आए हैं । तुम हमारे शत्रु हो। हम जब तक शत्रु से अपना कार्य सिद्ध न करा लें, तवनक उससे किसी प्रकार की भेंट स्वीकार नहीं कर सकते" । जरामन्य चकित होकर पूछने लगा - 'मै तुम्हारा शत्रु कैपा?
२२ वीर और वीराङ्गनाएँ मुझे याद नहीं कि मैंने कभी आपका कुछ अनिष्ट-चिन्तन किया हो। श्रीकृष्ण ने कहा-"जरामन्ध । तुमने अनेक राजाओं को कारागृह में यन्द कर रखा है, और तुम उन्हें नरमेध यज्ञ को उनि बनाना चाहते हो । हम तुम्हारा आतिथ्य स्वीकार कर इम महापाप के भागी नहीं बन सकते। हमारा यहा आने 'का प्रयोजन यही है कि हम तुम्हे यमलोक, भेज दें। मेरे साथ ब्राह्मणवेप-धारी ये दो धीर भाई-- भीम और अर्जुन है । मेरा नाम श्रीकृष्णा है, तुम मुझे तो जानते ही हो । अब तुम उन बन्दी रामानों को छोड़ दो, या हममें से किसी एक के साथ युद्ध करने के लिये तैयार हो जाओ।" जरासन्ध क्रोध में आकर कहने लगा- "तुम्हारे साथ क्या लड़ना है। तुम तो रण से भाग जाते हो । यह बेचारा अर्जुन भी क्या लडेगा। इस लघु शरीर अर्जुन से लड़कर क्या मैं अपना अपमान कराऊँ ? हाँ, इस भीम- काय भीम से लइ सकता हूँ । इसे कह दो कि इस अखाडे में आजाय"। - अखाडे में भीम और जरासन्ध की कुश्ती होने लगी। अत्यन्त क्रोध में आकर पैंतरे बदल-बदल कर वे द्वन्द्व युद्ध कर रहे थे। जब भोम ने जरासन्ध को थका हुआ पाया तो उसने जरासन्ध के दोनों पाँव पकड कर उसे अखाडे में पटक दिया ओर सो क्षण उसका एक पाँच अपने पाँव से दया कर ओर AAJ श्रीकृष्ण दूसरे को ऊँचा करके उसे चीर डाला। घमण्डी जरासन्ध का घमण्ड टूट गया। इसके अनन्तर श्रीकृष्ण ने फारावास में पडे हुए राजाओं को मुक्त करा दिया । सब राभानो न हाथ जोड़ कर श्रीकृष्ण के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की। मगध देश से विदा होने से पहिले श्रीकृष्ण ने जगसन्ध फे पुग्न महदेव को उसका राज्य दे दिया । भीम द्वारा अत्याचारी रासन्ध के वर से श्रीकृष्ण का यश दश-देशान्तरों में फैल गया। अब युधिष्ठिर के चक्रवर्ती सम्राट् बनने के लिए मैदान साफ हो गया । युधिष्ठिर के भाइयों ने चारों दिशाओं में निमय पाई । सघ राजाओं ने युधिष्ठिर को सार्वभौम राजा स्वीकार कर लिया । घडे समारोह के साथ अब राजसूय यज्ञ की तैयारी होने लगी । इन्द्रप्रस्थ धन-वैभव से परिपूर्ण हो गया । बडे बडे ऋषि मुनि यज्ञ-कार्य सम्पन्न करने के लिए निमन्त्रित किये गये । अनेक गजा भी उस यज्ञ म उपस्थित थे । बयोवृद्ध पूज्य भीष्म ने अपनी सम्मति दी कि सब राजाओं में श्रीकृष्ण ही ज्ञान-वृद्ध, बल वृद्ध और धन-वृद्ध है, इसलिए पहले उनकी ही पूजा होनी चाहिये । पहले उनको अर्घ्य दान देना चाहिये, परन्तु चेदिदेश का राजा शिशुपाल क्रोध में प्राकर कहने लगा--- "यह अन्याय है। हम इस अन्धेर तथा पक्षपात को सहन नहीं कर मस्ते । श्रीकृप्या वयोवृद्ध नहीं है। सर्व-प्रथम उसकी पूजा नहीं होनी चाहिये । मैं बल से इस बात का
२४
वीर और वीराङ्गनाएँ
विरोध करूँगा" । शिशुपाल श्रोध मे पागल होकर अपना
बल दिसान लगा । यज्ञ मे हलचल मच गई । वह
श्रीकृष्ण को ललकार कर कहने लगा-"यदि बल-वृद्ध हो,
तो मैदान में आ जाओ । मैं अभी तुम्हे मृत्यु के घाट
उतारता हूँ" । श्रीकृष्ण पहले से ही उस आततायी और
विद्रोही शिशुपाल स तग थे। उन्होन अपने प्रसिद्ध सुदर्शन चक्र से
उसी क्षण उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। राजसूय यज्ञ
इस घटना के अतिरिक्त निर्विन समाप्त हुआ।
सन्धि-दूत श्रीकृष्ण
महाभारत के युद्ध के लिए कौरवों और पाण्डवों की
तैयारियों हो रही थीं । अन्य नृपतिगया भी अपने अपने मित्रों को
सहायता देने क लिए उद्यत हो रहे थे । युद्ध के परिणाम के रूप में
देश की सभ्यता और संस्कृति का सर्वथा नाश दिखाई दे रहा था।
श्रीकृष्ण ने जान लिया था कि इस युद्ध का परिणाम बहुत ही
बुरा होगा । उन्होने दूत बनकर कोरवो के पास जाने की इच्छा
प्रकट की । उस महापुरुप ने दोनो दलो को सन्धि कराना अपना
कर्तव्य समझा । श्रीकृष्णा भारत-देश को उस विध्वस
से बचाना चाहते थे । भारत-देश की डूबती नैया को बचाने
के लिए श्रीकृष्य हस्तिनापुर की ओर रवाना हुए।
हस्तिनापुर में श्रीकृष्ण का अच्छा स्वागत हुप्रा ।
वे एक दिन अपनी फूफी कुन्ती के पास ठहर कर दूसरे
दिन कौरवों की सभा में पधारे । सभा में श्रीकृष्ण ने
श्रीकृम्प : कहा-"मेरे यहाँ आने का उद्देश्य यह है कि कौरव और पाण्डव आपस में सन्धि कर लें । इस युद्ध से क्षत्रिय-युल का सहारहोगा, पृथ्वी वीर-रहित हो जायगी, और लाभ कुछ नहीं होगा। पाएडवों ने तेरह वर्ष तक वनवास तथा अज्ञातवास कर के अपनी प्रतिज्ञा का पालन किया, अब कौरवों को अपन फर्जन्य से ध्युत नहीं होना चाहिये । पाएड प फेवल पांच गांव लेकर सतुष्ट रह सकते हैं। अब पाएडवों के साथ यदि न्यायोचित ध्यपहार किया जाय, तो चे कौरवों के पिछले सय अपराध तमा करने को तैयार है" । सधि फी न्यायपूर्ण इन शतों का सभी लोगों ने अनुमोदन किया । भीष्म, द्रोण, विदुर और धृतराष्ट्र ने बहुत समझाया, पर दुर्बुद्धि दुर्योधन ने एक न मानी । अन्त म श्रीकृष्ण ने अपने उद्देश्य की मिद्धि में विफल होकर रोप से कहा कि अय युद्ध फ सिवा और कोई उपाय नहीं। गीता का उपदेश महाभारन के युद्ध में श्रीकृष्ण अर्जुन क सारथि बने । उस प्रवीण सारथिने अर्जुन के रथ को दोनों ओर की सेनाओं के बीच में लाकर सड़ा कर दिया। चारो ओर दृष्टि डालने से अर्जुन के रोंगटे सड़े हो गए । अपने गुरुजनों, सम्बन्धियों और मित्रों को मारने के विचार ने उसे भयभीत कर दिया। उसके हृदय में मोह ने घर कर लिया। लड़ाई में उसे अपने कुल का सहार और अधर्म ही दोसने लगा। यह क्षत्रिय धर्म से तथा अपने कर्तव्य से मुँह मोडने लगा, और अन्त मे गाण्डीव छोड़कर रय पर निश्चल होकर बैठ गया। .
२६,
वीर और वीराननाएं
अर्जुन को इस दशा में देखकर श्रीकृष्ण समझाने लगे। उन्होंने उसे
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विश्व और विश्वात्मा, ज्ञान और प्रज्ञान का भेद बतला
कर फर्धव्य-पालन करने का उपदेश दिया । यही श्रीकृष्ण का
उपदेश 'भगवद्-गीता' के नाम से प्रसिद्ध है। भगवद्-गीता क
सार सक्षिप्त रूप में नीचे दिया जाता है।
श्रीकृष्या अर्जुन को कहने लगे कि युद्ध से विमुख होन
क्षत्रिय का धर्म नहीं। इस शरीर के लिये शोक-मोह करन
व्यर्थ है । यह शरीर नश्वर है, फेल आत्मा अमर है। इन
आत्मा का न कभी जन्म हुआ है और न ही यह आत्मा शरी
के छूट जाने पर कभी मरती है। इस आत्मा को न शस्त्र का
सकते हैं, न आग भस्म कर सकती है। क्षत्रिय के लिए युर
ही स्वर्ग का द्वार है । ऐसे युद्ध से स्वार्थ और परमार्थ दोनों सिर
होते हैं । हार-जीत और सुख-दु ग्व की चिन्ता न करना ।
सच्चा ज्ञान है और यही साख्य-योग का सार है।
-
.
मनुष्य को फल की इच्छा नहीं करनी चाहिए। उसका
कर्चव्य कार्य करना है । उसे अपने कार्य में तत्पर रहना
चाहिये । युद्ध का परिणाम भला हो या बुरा, युद्ध करने
वाले मरेंगे या जीयेंगे यह चिंता व्यर्थ है । मनुष्य
को फलाफल की आशा छोडकर फेवल अपना फत्तव्य
करना चाहिये । उसे निस्पृह, निस्वार्थ, निरहार
और निर्मय होकर अपने कार्य में सलन रहना चाहिये ।
पालन
श्रीकृष्ण इसी का नाम कर्म-योग है। श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि विषयों की ओर ध्यान मत दो, मन की इच्छाओं पर नियन्त्रण रखो। इद्रियो को वश में रसो और सुप-दुख की परवाह न करो- ऐसी स्थिति से ही परम-पदवी मिलती है । इस स्थिति में यदि मनुष्य का शरीर छूट जाय, तो ब्रह्म की प्राप्ति होती है। कर्म करना आवश्यक है । कर्म से कोई छूट नहीं सकता। श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि मैं फर्म करना छोड दूँ, तो सारा ससार कर्म करना छोड दे । इस संसार का शीघ्र नाश हो जाय । अपने वर्ण, कुल, स्वभाव, सस्कार, आत्मा की प्रेरणा और शास्त्र की आज्ञा से जो निश्चित् होता है, वही फर्म है, वही धर्म है । अपने धर्म का पालन करते हुए शरीर छोड देना परम पुरुषार्थ है । जो सब कर्मों को ब्रह्म के अपंण करके अहकार छोड कर करता है, वह पार में नहीं फँसता, जैसे कि कमल के पत्ते पर पानी का कोई प्रभाव नहीं होता। श्रीकृष्ण कहते हैं कि आत्मा हो बधु है, आत्मा ही शत्रु । आत्मा को ऊपर उठाने से उन्नति होती है, नीचे गिराने से पतन । यह मन बड़ा चञ्चल है, अभ्यास और वैराग्य से इस मन को स्थिरता होती है। ब्रह्म की प्राप्ति एक ही जन्म में नहीं होती, कई जन्मा तक उसके लिए परिश्रम करना पडता है। फनेच्छा युक कर्म का त्याग करना ही सन्यास है।
३० वीर और वीराङ्गनाएँ मृत्यु पर्यन्त वे परोपकार के कामों में ही लगे रहे । आततायी राजाओं का सहार कर उन्होंने शान्ति की स्थापना की। दीन- दलित और दुखित जनों का दुख दूर किया । धर्म-मर्यादा की स्थापना की । राज-धर्म और क्षात्र-धर्म के मर्म को समझाया । गीता के उपदेश से उनका नाम अमर है । समस्त ससार उस उपदेश का सम्मान करता है। योरोप और अमेरिका के विज्ञानवादियो ने उस उपदेश को सर्वश्रेष्ठ माना है । इस उपदेश को हृदयगम करने से अज्ञानियों के अज्ञान, दु सियों का दुख और दुर्बलो को दुर्वलता दूर हो जाती है । यह वह ज्ञान है, जिससे मनुष्य की आत्मा उन्नत और शान्त होती है । मनुष्य इस ज्ञान से दुखों से व्याप्त जगत को सुख का धाम बना लेता है।
वीरवर अर्जुन
महाभारत
के पात्रों में पाएडवों की श्रेष्ठता सर्वमान्य है।
पाण्डवों में भी महारथी अर्जुन की ख्याति सबसे अधिक है।
महाभारत काल को व्यतीत हुए कई सहन वर्ष हो गए, पर उस
वीर-शिरोमणी की समुज्ज्वल-कीर्ति आज भी ससार में चमक
रही है। अब तक श्रीकृष्ण का नाम भारत निवासियों की जिह्वा पर
रहेगा, तब तक महायोद्धा अर्जुन की कीसिं-पताका फहराती रहेगी।
अर्जुन के चरित्र से पता लगता है कि प्राचीन समय में भारत शौर्य
के उच्च-शिखर पर पहुचा हुआ था और उसकी सभ्यता ससार
में सर्वश्रेष्ठ समझी जाती थी।
बाल्यावस्था
प्राचीन काल में भारतवर्ष में विचित्रवीर्य नाम का एक राजा
राज्य करता था। उनके धृतराष्ट्र और पाएडु नामक दो पुत्र थे ।
उस सुरज
धीर और वीराङ्गनाएँ
युधिष्ठिर के आदेश से सुरक्षा तैयार हो गई। दिन में
सो पाण्डव वारणावत की चहल-पहल देसा करते, पर रात में वे
में अपने अस्त्र-शस्त्र बाँध कर सावधान होकर सोया
फरते । अन्तर कृष्णपक्ष की वह काल-चतुर्दशी आ पहुँची। उस
दिन कुन्ती ने ब्राह्मणों को भोजन कराया । सयोग से एक
भीलनी भी अपने पाँच पुत्रों के साथ उस लाक्षागृह में भोजम
करने आई । सबने खूप भर-पेट साया । रात्रि हो गई, झझावात
चलने लगा। आकाश में घने-धने धन घोर गर्जन करने लगे।
मूसलाधार वृष्टि होने लगी । भीलनी और उसके पाँच हटपुष्ट
पुत्रों का बाहर निकलना कठिन था। घोर अन्धेरी रात में
कुम्मी पुरोचन ने अवसर पाकर आग लगा दी । लाक्षागृह
ऐसे जलने लगा जैसे लका-दहन हो रहा हो । पाण्डव तो
सुरङ्ग के मार्ग से बाहर निकल गए,
पर वेचारी भीलनी
और उसके पुत्र जलकर भस्म हो गए । प्रात काल हड़ियों
का ढेर देखकर सबने समझा कि पाण्डव माता-सहित
भस्म हो गए।
दुर्योधनादि इस घटना के वृत्तान्त सुन कर आमोद-प्रमोद
फरने लगे। उनके घर घी के दीपक जलने लगे। अब
राज्य का नि कण्टक सुख-भोग करेंगे-इस विचार से वे फूल्ने
न समाते । उवर युधिष्ठिरादि सुरङ्ग के रास्ते बाहर निकल
फर, गङ्गा को पार करके वन में मारे-मारे फिरने लगे।
वे और प्यास से व्याकुल थे । उनके अग-यग ढीले
पड़ गए थे। उन्हे निकट हो एक नगरी दिसाई दी । उसका नाम
एकपका नगरी
या | वहाँ पहुबने से पहिले उन्होंने
वाला
वीरवर अर्जुन
३७
वृक्षों की छाल के कपडे पहनकर और मृगचर्म धारणा करफे तपम्बी
साधुओं का सा रूप बना लिया। वे उस नगर में एक प्राक्षाण के
घर अतिथि बन कर रहने लगे । कुछ दिनो के अनन्तर उस
मामण फे घर एक ओर नाह्मण अतिथि प्राया । वह प्राहाण
दूरदर्शी था । उसने घाट-घाट का पानी पिया हुआ था।
देश-विदेश की नवीन यातों से वह मयको मुग्ध कर दिया
फरता था। उसने पाएडवा से कहा-"में अभी पाञ्चाल देश से
श्रारहा हूँ। वहा रामा द्रुपद की कन्या द्रौपदी का स्वयवर होन
कन्या वडी रूपवनी और गुणवनी है । साक्षात् लक्ष्मी
और सरस्वती प्रतीत होती है । तीनों लोकों में ऐसी सुन्दर
ललना कदाचित ही हो जो रूप और गुण में उसकी तुलना कर
सफे"। ऐसी मनमोहनी बातें सुन कर पाएडव यड़े उत्कण्ठित
हो उठे । माता की आज्ञा लेकर उन्होंने पाञ्चाल देश की ओर
प्रस्थान किया।
मार्ग में गड़ा के तट पर चित्ररथ नामक एक गन्धर्व
सपरिवार स्नान कर रहा था । पाण्डवों को नट की ओर बढत
देख कर उसने उन्हें ऊँची आवाज में कहा-"सावधान, इधर न
आना मैं कुरेर का भाई हूँ। यदि मुझे क्रोध आ गया तो पल-भर
में तुम लोगों को अचेत कर दूंगा” । अर्जुन इस दर्प-भरो
बात को सुन कर लाल अंगारा हो गया । दोना एक दूसर
अपने अपने बल की परीक्षा करने लगे ।
अर्जुन ने अग्निबाण छोड कर चित्ररथ क दर्प को चकना-
चूर कर दिया । अर्जुन की अतुल वीरता दसकर चित्ररथ
को मुंह की खानी पड़ी। अन्त में उसने अर्जुन से मित्रता
३८
वीर और वीराङ्गनाएँ
कर ली और उसे 'चाक्षुष-विद्या' सिखाई । इस घटना
के अनन्तर मब भाई आमोद-प्रमोद करते सुस से घूमते हुए
पाञ्चाल देश पहुँचे।
स्वयंवर
द्रौपदी के स्वयवर में उपस्थित होने के लिये आए हुए
भिन्न-भिन्न देश के राजाओं और वीर योद्धाओं की खूब
चहल-पहल थी । स्पयवर के अवसर पर नगर की शोभा अपूर्व
दिखाई देती थी। वडे बडे तोरण बनाये गए थे, उन पर जयमालाएँ
बाँधी गई थीं और भिन्न-भिन्न रग को पताकाए लगाई गई थीं।
सजे-धजे मण्डप
मगध का राजा जरासन्ध, चेदि-पति
शिशुपाल ओर द्वारकाधीश बलराम अपने अनुज कृष्य
के
साथ विराजमान ये । अन्य कई राजाओं के बीच दुर्योधन,
कर्ण आदि भी विद्यमान थे । जो स्थान ब्राह्मणों के लिए नियत
था, वहा भी ग्राम वारियों का-सा वेष धारण किए हुए पाण्डव
जा विराजमान हुए।
स्वयवर की शर्त निरालो यो । महाराजा द्रुपद ने ऊपर
एक घूमते हुए चक्र में एक मछलो लटका रखी थी । चक्र के
साथ वह मछली भी घूम रही थी। चक्र के नीचे तेल से भरा हुआ
एक फडाह रखा हुआ था जिसमें मछली का प्रतिबिम्ब पड़ रहा था।
उस के निकट एक बहुत भारी धनुष और कुछ वाण रखे गये थे।
शर्त यह थी कि जो वोर नीचे तेल में परछाई देखते हुए मछली को
वीरवर अर्जुन
३६
आँस को पास रखे हुए धतुप वा से थींध देगा, वही द्रौपदी की
वर-माला का अधिकारी होगा।
धनुष का चिल्ला चढाने और लक्ष्य भेद करने में उन
दिनों अर्जुन ही निष्णात समझा जाता था । उसको कीर्ति
देश-देश में सपफे कानों तक पहुँच चुकी थी। द्रुपद भी अपनी
पुत्री प्रौपदी के लिए अर्जुन जैसा धनुप-धारी और पुरपार्थी
पति
चाहता था । सय वस्तुएँ सुसज्जित होने पर स्वयवर
फा कार्य प्रारम्भ हुआ। धृष्टद्युम्न अपनी भगिनी द्रौपदी को
सब राजाओं का परिचय देने लगा। द्रौपदी भी सुनहली
वर-माला लिए योग्य पति को पाने की प्रतीक्षा में खड़ी थी।
परिचय के बाद एक-एक करके सत्र राजा धनुष के निकट
श्राए पर उन में से एक भी लक्ष्य भेद न कर सका । कई
तो उस गृहद् धनुष को हिला तक भी न सके । सनफे बाद
फर्ण उठा, परन्तु द्रौपदी ने
कहा सूतपुत्र
के साथ विवाद
न करूँगी । वह भी लजा कर लौट गया । मण्डप के सब
चीर अपनी अपनी हार मान गए । रगशाला में सन्नाटा छा
। उसी
प्राहाण-रूपधारी अर्जुन उठा ।
उसने बिना किसी परिश्रम के धनुप उठा लिया और एक
ही सीर से मछली की आँख को बींध दिया। ज्योंही वह नीचे
गिरी, त्यों ही सब ओर उस ब्राह्मण का जयजयकार होने लगा।
उस रङ्गभूमि में चारों ओर भानन्द के वाजे बजने लगे। जय-जय
-
गया
वीर और वीराङ्गनाएँ
शब्द के साथ प्रसन्नवदना द्रौपदी ने कमल के समान कोमल
हाथो से अर्जुन के गले में वर-माला पहना दी।
उस ब्राह्मण की विजय को सब राजाओं ने अपना
अपमान समझा । जब उनसे और कुछ न बन सका, तो बेचारे
द्रुपद पर ही धावा बोल दिया । ब्राह्मण को कन्या देकर उसने
इनका अपमान किया है-इसलिए वे उसी पर टूट पडे ।
यह देस अर्जुन ने वही धनुप उठा लिया और लगा सब के
छक्के छुडान । जन झगडा बढने लगा, तय कृष्ण ने दोनों ओर
के वीरों को युक्ति से समझा-बुझा कर शात कर दिया।
अर्जुन अपनी नव वधू को ले कर अपने भाइयों के
साथ माता के पास आ गए । इधर माता कुन्ती घर में आई
हुई लक्ष्मी को देख कर बडी आनन्दित हुई, परन्तु द्रुपद महा-
राज इस कारण व्याकुल थे कि द्रौपदी एक दरिद्र ब्राह्मण के
पल्ले पडी है । जब द्रुपद को पता लगा कि द्रौपदी का पति
पाएडयो का विचला भाई स्वय अर्जुन है, तो उसके हर्प का
पारावार न रहा । उसने दहेज में अर्जुन को बहुत सम्पत्ति और
अनेक रत्न दिये।
राज्य-प्राप्ति
धृतराष्ट्र और दुर्योधन आदि को जब यह सूचना
मिली कि द्रौपदी ने स्वयवर में अर्जुन को ही वरा है
और अब पाण्डव रत्न धन आदि से सम्पन्न हो गए हैं, तब उनकी
प्रचुर-शक्ति को समझ कर धृतराष्ट्र ने उन्हें विदुर द्वारा
.
वीरवर अर्जुन हस्तिनापुर में बुलवा लिया और विदुर की अनुमात से उन्हें साएडवप्रस्थ का राज्य दे दिया । पाण्डव अपनी माता पुन्ती और द्रौपदी को साथ लेकर पाण्डरप्रस्थ में राज्य करने लगे । उन्होंने अपने देश को विस्तृत किया । काशी द्रविड, फलिङ्ग, प्रभृति देशों को जीत लिया। उनका कोप श्रम धन- धान्य से भरपूर था। नारद मुनि को सम्मति से उन्होंने बड़े समारोह से राजसूय यज्ञ किया। राजसूय यज्ञ में उनका अपूर्व ऐश्वर्य देख फर दुर्योधन आदि फिर दुखी होने लगे । उनका पना-मनाया ग्वेल निगड गया । उनकी सारी आशाओं पर पानी फिर गया । विप की गाँठ दुर्योधन फिर छल कपट की सोचने लगा। राजसूय यज्ञ में सब राजाओं ने युधिष्ठिर को सम्राट् स्वीकार किया है. --इस बात से दुर्योधन को अधिक सताप होता था । फूट बुद्धि शकुनि के परामर्श से दुर्योधन पारडयों को राज्य-च्युत करने का षड्यन्त्र रचने लगा। द्यूत-क्रीडा शकुनि का प्रस्ताव मफल हो गया । दुर्योधन सहमत हो गया कि पाण्डवों को हस्तिनापुर में घुलवाया जाय और अत-क्रीडा मे उनका सारा राज-पाट छीन लिया जाय । राकुनि चौपड़ पासे के खेलने में पृथ्वी-भर में बड़ा पारङ्गत्त अमझा जाता था । इसलिए यह निश्चय हुआ कि शकुनि दुर्योधन का प्रतिनिधि वनकर खेलेगा।
४२
वीर और वीराङ्गनाएँ
पाण्डवों को पासा खेलने का निमन्त्रण भेजा गया ।
सरल-स्वभाव क्षत्रिय युधिष्ठिर, जो अपने आपको इस खेल
में निपुण समझता था, फब इन्कार कर सकता था।
पाण्डव द्रौपदी सहित हस्तिनापुर आ पहुँचे । यथा समय
ग्वेल आरम्भ हुआ । इस भाग्य की बाजी को देखने के
लिए धृतराष्ट्र, भीम, द्रोण और अन्य कई राजा भी समा में
उपस्थित थे। पासे चलने लगे और युधिष्ठिर की हार पर हार
होने लगी। युधिष्ठिर ने मुक्ता, मणि, सोना, चाँदी ही नहीं, किन्तु
अपने राज्य को भी दाँव में लगा दिया और सब कुछ हार गया।
अन्त में अपने आप और अपने भाइयो को भी एक-एक करके
दाँव में लगाया, पर पासा फिर भी उलटा ही पडा, परिणाम
यह हुआ फि युधिष्ठिर ने अपने आपको और भाइयों को
भी दासता की सांकल में बांध दिया। शैतान के कान कतरने वाले
शकुनि की बातों से उत्तेजित होकर इत्युद्धि युधिष्ठिर घर की
लक्ष्मी द्रौपदी को भी उन लम्पटों के हाथ दे बैठा । अर्जुन लहू
के चूंट पीकर रह गया, पर बडे भाई को क्या कुछ कह सकता
था । उस अवसर पर भीम और अर्जुन का धैर्य सराहनीय था।
अब दुर्योधन की पौ-बारह हो गई, वह आनन्द से नाचने
लगा । दुष्ट दुःशासन दुर्योधन के सकेत से द्रौपदी का
अपमान करने लगा । द्रौपदी हाहाकार करने लगी ।
हाथ जोडकर, अपने मान की रक्षा के लिए 'सभा के लोगों
से प्रार्थना करने लगो, पर किसी को हस्तक्षेप करने का
धीरवर अर्जुन साहस नहुधा । अन्त में दयामय श्री भगवान के स्मरण के अतिरिफ उसे कोई पाश्रय न रक्षा । भयर भीम भी अपने दांत पीस कर रह गया। उसने भी भरी सभा में ललकार कर कहा-"मे इस अपमान का पदला अवश्य लूंगा । रणभूमि में दु शासन की छाती चीरफर उसफा रस-पान क्रुंगा और मैंने इस गदा स दुर्योधन की जांघ न तोड गा तो मुझे भीम न कहना।" द्रौपदी के इस अपमान को देखकर सब राजा दुर्योधन और दु शासन की निन्दा करने लगे। इस निन्दा से धृतराष्ट्र पुछ विचलित हुए । पाण्डवों को उनका राज्य, और धनादि वापस देन को उद्यत हो गए, पर दुर्योधन घर में आई लक्ष्मी को कब छोड़ सकता था । अन्त में यह निश्चय हुआ कि धूत- मोड़ा फिर आरम्भ की जाय। शर्त यह हुई कि जिस पक्ष की हार हो। वह बारह वप तक वनों में रहे और एक वर्ष अज्ञातवास करे । यदि अज्ञातवास विदित हो जाय तो बारह वर्ष तक फिर वन में रहे। युधिष्ठिर ने यह बात स्वीकार करली, पर उसके भाग्य खोटे ये। उसके भाग्य में वन में मारा मारा फिरना लिसा था। वह फिर हार गया और उस हार के बाद पाण्डव द्रौपदी समेत बन की ओर चल पडे । धन्य हैं युधिष्ठिर के वे भाई, जिन्होंने बड़े भाई के कार्य में यूँ वक नहीं की । वे धर्म के बन्धन में जकड़े हुए थे । नहीं तो अफेला अर्जुन ही कौरवों का समूल- उच्छद कर सकता था। ।
४४ वीर और वीराङ्गनाएँ । - चनबास मार्ग में नाना प्रकार के कष्ट उठाते हुए पाण्डव 'काम्यक वन' में पहुँचे । घुछ मास वहाँ रह कर पाण्डवों को विदित हुआ कि वहा से कुछ दूर 'द्वैतवन' वडा सुन्दर स्थान है। पास ही निर्मल जल का सरोवर है । चारों ओर फल-फूल पर्याप्त हैं । सुन्दर पक्षियों क सुहावने गीत से वह स्थान बहुत ही रमणीय है । निदान, पाण्डवो ने वहाँ जाकर अपना निवास स्थान बना लिया। उनको दखकर बड़े-बड़े ऋषि, मुनि, योगीजन भी वहाँ आने लगे। प्रभु-भजन और कीर्तन होने लगा। सबफे चित्त शान्त हो गए । ऐसे शान्त वायु-मण्डल के होते हुए भी द्रौपदी के हृदय में दिन-रात अपमान का शूल चुभा करता । वह इस अपमान को कब भूल सकती थी । वह चार-पार अर्जुन और उसके भाइयों को भीरु और निर्लन्न कहकर फटकारा करती । पाण्डव 'किं कर्त्तव्य विमूढ़' की भाँति चिन्ता में प्रस्त बैठे ही थे कि व्यास जी वहाँ आ निकले । उन्हें दिलासा दिया । एकान्त में जाकर युधिष्ठिर को 'प्रतिस्मृति' नाम की विद्या सिखाई । यह वह विद्या है जिसके प्रभाव से दृष्ट और अदृष्ट दृष्टिगोचर हो जाता था । व्यास जी ने युधिष्ठिर से कहा कि तुम इस विद्या को अर्जुन को सिखा कर उस शङ्कर, इन्द्र, वरुण ओर फुयेर के पास दिव्यास्त्रों को ग्रहण करने के लिए भेजो। उन्हें प्राप्त करके ही अर्जुन पड़े से बड़े शत्रुओं को जीत लेने में समर्थ उन्होंने जगन प्रत्यक्ष होगा।
वीरवर अर्जुन श्रमज युधिष्ठिर की आज्ञा से अर्जुन गाण्डीव कन्धे पर रखकर उत्तर की ओर चल पडे । हिमालय और गन्ध- मादन के शिखरों को पार क्यिा । इन्द्रकील पर्वत पर पहुँच कर मन-मोहक वन की शोभा को देखकर मुग्ध हो गए। वहीं मृगछाला बिछायी, रढमनस्क होकर कठोर तपस्या करने लगे। वृक्षों से जो पचे और फल गिरा करते, उन्हीं से वे अपनी उदर-पूर्ति क्यिा करते । अन्त में इन पदार्थों को भी त्याग दिया । केवल हवा खाकर, ऊपर को बाँहे उठा, पाँव के अंगूठे के सहारे खडे रह कर तपस्या करने लगे। इस भयकर सप को देखकर भगवान् शकर आकर्षित हुए। गुप्त-रूप में अर्जुन की बार-बार परीक्षा ली और अर्जुन परीक्षा में पूरा उतरा । प्रसन्न होकर त्रिनेत्रधारी शकर ने अपना 'याशुपत' नामक अमोघ अख अर्जुन को दिया। इस घटना फ अनन्तर अलोकिक प्रकाश हुआ । कुबेर, वरुण आर इन्द्र देवता अर्जुन के समीप उपस्थित हुए । उन्हों ने उसे दिव्यास्त्र दिये । इन्द्र अजुन को स्वर्गलोक म ले गया । वहाँ समुचित सत्कार फ बाद उसे वन नामक अस्त्र के चलाने का अभ्यास कराया । स्वर्ग में रहकर अर्जुन ने चित्रसेन नामक गन्धर्व स गाना, बनाना और नावना मी मोख लिया था । कई वर्षों के बाद अर्जुन इन्द्र से विदा लेकर अपने भाइयों के पास लौट आया। सब भाई अर्जुन देवी असो क पान को कथा सुनकर बड़े प्रसन्न पीर और चीराङ्गनाएँ हुए, परन्तु जब दुर्योधन आदि कौरवों को पता लगा कि अर्जुन ने दिव्यास्त्र प्राप्त कर लिए है, तो सनफे कलेजों पर साँप लोटने लगे। - अज्ञातवास किसी प्रकार बारह वर्ष बीत गए। श्रय पाएडवों ने अज्ञात- वास की तैयारी को । मत्स्य देश जाने का विचार किया । उस देश में पहुंचने से पहिले उन्हों ने अपने अस्त्र-शस्त्र शमी वृक्ष पर छिपा दिये थे । मत्स्य देश ( वर्तमान धौलपुर के पश्चिम की ओर ) के राजा विराट के पास जाकर वेश बदल कर रहने लगे । सब ने अपना दूसरा नाम रख लिया। युधिष्ठिर राजा के दरबारी बने, भीम रसोई घनाने वाले, अर्जुन विराट राजा की पुत्री उत्तरा को नृत्यगीत सिखाने वाले, नकुल अश्व-रक्षक, पशुपाल सहदेव गोरक्षक, ओर द्रौपदी रानी की दासी बनी । 'इधर पाण्डव गुप्तरूप से अपने अज्ञातसवास के दिन पूरे कर रहे थे, उधर दुर्योधन के दूत पाण्डवों की सोज में आकाश-पाताल एक कर रहे थे । अन्त मे सब दूत हार मान कर घेठ गए । त्रिगत देश का राजा सुशर्मा विराट को अपना शत्रु समझता था । उसने दुर्योधन और उसकी सेना की सहायता से मत्स्य देश पर आक्रमण कर दिया । सुशर्मा ने विराट की सेना को भगा दिया और प्रभूत धन और असख्य गाएँ छीन ले गया। विराट को भी उसने बन्दी बना लिया।
वीरवर अर्जुन उस समय पाएडवों के प्रज्ञातवास का एक पर्प समाप्त हो चुका था। द्रौपदी ने अपनी स्वामिनी विराट की रानी से कहा कि इस अवसर पर यदि उत्तर (विराट का पुत्र) बृहन्नला (अर्जुन) को सहयता से शत्रु का सामना करे तो विपत्ति टल मफती है । उत्तर- कुमार वृहन्नला को अपना सारथी बनाकर रणभूमि में उतर पडा, पर भीष्म, द्रोण आदि वीरों को देखकर रण से भाग गया । अर्जुन दौड फर उसे वापस लाया । शमी के घृक्ष से अपने अस्त्र शस्त्र उतरवा कर अर्जुन ने उत्तर से कहा कि ये सब अस्त्र-शस्त्र पाण्डवों के है । जब उत्तर ने धृहन्नला को अर्जुन जाना तब उसकी जान में जान आई । अर्जुन ने गाण्डीव पर ात्यचा चढाकर शनुओं को कँपा देने बाला देवदत्त नामक शव बजाया। दुर्योधन की सेना पर तीर वरसाने शुरू किये। कौरव उस बाण वर्षा के सामने ठहर न सके। अर्जुन गाए छीनकर और विराट को छुडाफर मत्स्य देश वापस आ गया। राजा विराट पाएडवों के परिचय मे बड़ा प्रसन्न हुआ । उसने उनका उचित सम्मान किया और अनुचित काम कराने के कारण उन से क्षमा याचना की। कुरुक्षेत्र वनवास और अज्ञातवास दोनों समाप्त हो गये । अब पाण्डव आधा राज्य प्राप्त करने के लिए यत्न करने लगे। उन्होंने हस्तिनापुर में अपना दूत भेजा पर दुर्योधन दूत की क्या परवाइ करता था । दुर्योधन बार-बार यह कहता- । - ४८ । वीर और वीराङ्गनाएँ "अज्ञातवासपूर्ण होने से पहिले ही मैंने अर्जुन को देख लिया है। मैं आधा राज्य कभी भी नहीं दे सकता । युद्ध के बिना जौ-भर भी भूमि में पाण्डवों को नहीं दूंगा। दूत से ऐसा सन्देश सुनकर पाण्डवों ने युद्ध के लिए अपनी कमर कस ली । दुर्योधन तो पहिले ही युद्ध का इच्छुक था। दोनों ओर से तैयारियां होने लगी। दोनों ही दलों में बडे-बडे योद्धा एकत्र होने लगे। श्रीकृष्ण यादवो में पर्वमान्य थे । दुर्योधन और अर्जुन श्रीकृष्णा जी को अपने-अपने पक्ष में लाने के लिए एक ही समय द्वारिका पहुँचे । उस समय श्रीकृष्ण सोए हुए थे । दुर्योधन ने शयनगृह में पहिले प्रवेश किया और कृष्णा के सिरहाने बैठ गया। फिर अर्जुन गया और श्रीकृष्ण के पैंताने बैठकर उनके जागने की प्रतीक्षा करने लगा। जय श्रीकृष्ण जी जगे तब उन्होने पहिले अर्जुन को और फिर दुर्योधन को देखा । यथोचित आदर- भाव के साथ आने का कारण पूछा । जब युद्ध के लिए उन्हें तुला हुआ देखा, तब श्रीकृष्ण ने बड़ी प्रेरणा की कि भारत को इस विनाश से बचाना चाहिए, पर दुर्मति दुर्योधन वह अपने दुराग्रह से न टला । अन्त में श्रीकृष्ण ने अपनी सम्मति देना व्यर्थ समझ कर दुर्योधन को उसकी इच्छा के अनुसार अपनी नारायणी सेना उसकी महायता के लिए दे दी और स्वय अर्जुन की इच्छा से रण में उसका सारथी यनना स्वीकार किया। कनमानता था
वीरवर अर्जुन
४६
श्रीकृष्ण इम नर-सहार फो रोकने के लिए युधिष्ठिर की
ओर से हस्तिनापुर 10 और फिर सन्धि का यह प्रस्ताव
उपस्थित किया कि पाण्डव फेवल पांच गांव लेकर ही सन्तुष्ट
हो जायेंगे । पर दुष्ट दुर्योधन सुई की नोक के घरावर भी भूमि
दने के लिए तैयार न था। इसी को कहते है--विनाशकाले
विपरीतयुद्धि।
कुरुक्षेत्र में दोनों ओर की सेनाए पहिले से ही सन्नद्ध
थों । दुर्योधन की सेना ग्यारह अक्षौहिणी और पाण्डवों
को सेना सात अक्षौहिणी यतलाई जाती है । दोनों ओर से
भयकर शस बजने लगे । हाथियो की चिंघाड और घोडो
की हिनहिनाहट से आकाश गूंज उठा। अर्जुन के कहने पर
श्रीकृष्ण ने रथ को दोनों सेनाओं के बीच में सडा कर दिया।
अर्जुन को यह देख कर बडा दुख और शोक हुआ कि अपने
सगे-सम्बधी-प्राचार्य, मामा, ससुर भाई, भतीजे और मित्र
आदि रणागण में कट जाने के लिये तैयार सडे हैं। अर्जुन
अपना गाण्डीव और बाण छोड़ कर श्रीकृष्ण की ओर मुडकर
कहने लगा-"मैं इस श्राधे राज्य के लिये अपने सम्बन्धियो
का सहार नहीं कर सकता। इस भयानक नर-हत्या करने
की मुझ में शक्ति नहीं । मेरे अग कम्पित हो रहे हैं, होठ
सूख रहे हैं, मेरा सिर घूम रहा है, अपना वश-क्षय करके मैं इस
* एक क्षौहिणी सेना में २१८७० हाथी, २१८७० रथ, ६५६०१
घोदे और १०६३५.दल होते हैं।
५२
वीर और वीराङ्गनाएँ
तक भारत का नाम और उसका इतिहाम रहेगा, अर्जुन का
नाम इतिहास के पृष्ठों से कभी नहीं मिट सकता । यह वह
वीर था, जिसने महाभारतकाल में अपने असाधारण कार्यों
से, अपनी अद्वितीय वीरता से, पिता, गुरु, भाइयो और
मित्रों के प्रति सत्कार और प्रेम-प्रदर्शन से अपना नाम
उज्ज्वल किया । बाल्यावस्था से ही प्रतिपतियों के प्राघात
पर आघात सहे । अर्जुन की जीवन-याना कण्टकाकीर्ण
दुर्गम पथ पर रही, पर वह कभी भी विचलित न हुआ । अपने
कर्तव्य-पालन का उसने एक असाधारण श्रादर्श हमारे सामने
रखा । दिग्विमय में जो कुछ उसने हस्तगत फिया, अपने
बडे भाई युधिष्ठिर को अर्पण कर दिया । युधिष्ठिर की शक्ति
और प्रभुता बढाने में ही वह अपनी महचा समझता था।
कर्मवीर अर्जुन के द्वारा ही अत्याचारी दुर्योधनादि के आतक
से निपीडित जनता का उद्धार हुआ । उसके बल पर धर्मनिष्ठ
युधिष्ठिर ने धर्म-राज्य स्थापित किया और भारत को एक
सूत्र में पिरोकर एक महान् राष्ट्र का निर्माण किया ।
.
शिवाजी शिवानी मातृवश और पितृवश दोनों ओर से राजपूत थे । मातृवश में शिवाजी के नाना यादवराव दक्षिण में यादववश के प्रसिद्ध राजपूत थे । पितृपक्ष से वह उदयपुर* के प्रसिद्ध राणा के वश में उत्पन्न हुए थे जिसमें बडे-बडे शूर- वीर योद्धा पैदा हुए और जो वश बहुत काल तक स्वतन्त्र रहा। शिवाजी के पिता का नाम शाहजी और माता का नाम जोजोबाई या । इनका जन्म 'शिवनेर' दुर्ग में हुआ था। शाहजी अहमदनगर के बादशाह की ओर से दिल्ली के सन्नाट के विरुद्ध लगातार युद्ध में लड़ते रहते थे । जीजीपाई स्वतन्त्रता-प्रिय और धर्म भोरु नारी थी । वह अपने पति पर इसलिए क्रुद्ध *मिस्टर जस्टिस रानाडे ने अपने मरा इतिहास में लिखा है कि पितृपच से शिवामी उदयपुर के राणा-वंश में से थे।
५६
वीर और वीरागनाएँ
आस-पास के किलों को हस्तगत करने के लिए उनका मन
छटपटाता रहता । वे अपनी शक्ति को बढाने के लिए चारों
ओर से प्रयत्न रकने लगे।
पूना के पश्चिमी भाग में करीब २० मील दूर 'तोरण
नामक एक पहाडी किला या । शिवाजी ने अपने मावली
साथियो की सहायता से उस दुर्ग को अपने अधीन कर लिया।
सौभाग्य से किले का सण्डहर सोदते हुए एक खजाना भी
मिल गया, जिससे शिवाजी ने शस्त्र गरीद कर एक दूसरे
किले की नींव रखी । तोरगा के दुर्ग से तीन मील दूर दूसरा
किला वैयार हो गया, जिसका नाम राजगढ रखा गया । यह
किला सदैव शिवाजी के अधीन रहा ।
इन किलों को लेकर शिवाजी ने कल्याण पर आक्रमण
कर दिया । उन दिनो कल्याण एक बड़ा भारी अन्दरगाह
था । शिवाजी ने उसे लूटा और उसके साथ और नगरों को भी
अपने अधीन कर लिया । यहाँ लूट में एक परम सुन्दर
युवती पकड कर शिवाजी के पास लाई गई शिवाजी
को सम्मान पूर्वक उसके सम्बन्धियों के पास
भिजवा दिया । इस
विजय से उत्साहित होकर मरान
बडी सरया में शिवाजी के भरडे के नीचे आने लगे । शिवाज
ने अन्य कई किले अपने राज्य में मिला लिये। इसी तर
शिवाजी फी शक्ति प्रतिदिन बढने लगीं। उनके पास अ
७ हजार अश्वारोही ओर १० हजार पैदल सिपाही हो गए
शिवामी
५८
कारावास
शिवाजी की फल्याया की लूट और फिलों को अपने राज्य में
मिलाने की सूचना यीभापुर के सुलतान आदिलशाह के पास पहुँच
गई । वह फ्रोध से अधीर हो गया । उसके मन में यह सन्देश
होने लगा कि ये प्राममण शिवानी के पिता शाहजी की
प्रेरणा से हो हो रहे हैं । सुलतान ने शादी को डॉट उपद
कर कहा कि तुम अपने पुत्र को पत्र द्वारा ऐस उत्पात
मचान मे रोको, परन्तु शिवाजी ने पिता पर का कोई
भी उत्तर न दिया । लय शाहजी सुलतान से फहने लगे
कि शिवानी से मा कोई सम्बन्ध नहीं है । वह मरी
आज्ञा का पालन नहीं करता । सुलतान ऐसी पातों पर फैसे
विश्वास कर सकता था। उसने उसी समय आशा दे दी कि
शीघ्र ही शाहजी को अँधेरी फोठरी में द फर दिया भाय ।
एक छेद फे पिना उस कोठरी फे सय द्वार पन्द करा दिये जाएँ।
यदि शिवाजी उपद्रव मचाना बन्द न करें, तो वह छेद भी बन्द
कर दिया जाय।
जर शिवाजी को अपने पिता के कैद होने का समाचार
मिला तो वे घडे भारी असमजस में पड़ गए कि अब क्या
होगा। एक ओर तो पिता का जीवन सक्ट में था और दूसरी
स्वतन्त्रता की आशा-लता के सूखने का भय था । उस
समय तक शिवाजी ने मुगलों के राज्य पर हाथ नहीं डाला था,
इसलिए दिल्ली के सम्राट शाहजहाँ शिवाजी से प्रसन्न थे।
ओर
माग गए । जिन सैनिकों ने प्रागो की रक्षा की प्रार्थना
वीर और वीराङ्गनाएँ
पालकी में बैठकर नियत स्थान
पर पहुँच गया
शिवाजी भी समय पर वहाँ पहुँच गए। दोनों ने मलमल
के सादे कपडे पहने हुए थे । वे दोनों परस्पर मिलने के लिए आग
वढे । शिवाजी कद में जरा छोटे थे। और अफजलखा लम्बा था
उसने शिवाजी को बगल में दवा कर ज्यों ही कटार से उन्हें कत्ल
करना चाहा त्यों ही शिवाजी ने उस की दाहिनी पसलियों में
अपना 'बघ न' घुसेड दिया, जिससे तुरन्त उसके प्राण
पग्वेरु उड गए । और वह उसी क्षण धडाम से भूमि पर गिर
पड़ा । क्या कुछ करने आया था,
अफजलखाँ शिवाजी के कान कतरना चाहता था, पर
शिवाजी ने उसी के कान कृतर लिए । अफजलखाँ के
गिरने पर अकस्मात् मरहठे शत्रुओ पर टूट पडे । तब
अनेको ने आत्म-समर्पण किया और कई प्राण बचाकर
क्या कुछ हो गया।
की, उनके साथ शिवाजी ने दयाभाव से व्यवहार किया और
वे प्रसन्नता-पूर्वक उसकी सेना के अग
शाइस्ताखां का आक्रमण
इसके पश्चात् शिवाजी का वम मुग्रल-मा
बन गए।
शिवाजी । शिवाजी ने कई मुगल नगरों को लूट लिया । इम अपमान को देश औरगजेय का फोफानल प्रचण्ड रूप से धपक उठा। उसने कहा, "अय निश्चय ही इस पहाड़ी चूहे को पैरो तले कुचल दूगा" । मम्राट का मामा, शाइस्ता औरगाबाद से एक महती सेना लेफर दत्तिा की ओर बढा। उसकी सेना एक लाग्य से कम न थी। ऐसा विदित होता था कि एक सम्पूर्ण नगर धागा बोलने के लिये आगे बढ़ रहा हो । जिन मुगल किलो पर शिवाजी ने अधिकार कर लिया था, वे मन शाइस्ताखां के हाथ आ गए । विना फ्सिी विन-बाधा के पूने पर भी अधिकार हो गया । शाइस्तासां पूने के लाल- महल में रहने लगे। उसकी सेना पूने पे चारो ओर छाननी डाल कर रहने लगी । शिवानी से सावधान रहने क लिए पूने पे फाटक पर पहरेदार सड़े कर दिये गए । शिवाजी ने दो सौ मनुष्यो की को । सर बारातियों को बादशाही सिपाहियो को वरदी पहनाई गई । एक युवक को दूल्हा फ वन पहना दिय गये । नगाडो के साथ दूल्हा पूने की ओर बढने लगा । आधी रात थी। शिवाजी ने पांच सौ मनुष्यों को विभिन स्थानो पर नियुक्त कर दिया । वे स्वय वीस बारातियों को साथ लेकर लाल-महल म सुस गए । राम-प्रासाद मे मदिरा के दौर चल रहे थे। खाँ और उसके मित्र धे-सुध पड़े थे । बारातियो के पहुंचते ही माजप्रासाद फ अन्त पुर में चीत्कार होने लगा। नयकर मार-काट प्रारम्भ हो गई । भारी हलचल मच गई। एक बारात तयार तुमुल
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वीर और वीराङ्गनाएँ
शाइस्ताखॉ अपनी उगली कटा कर भाग निकला । तब मुगलों की
छावनी बिसर गई । सव पीठ दिसावर प्राण बचाने लगे।
-
बन्दी
जय औरंगजेब के पास शाइस्ताखॉ की हार का समाचार
पहुँचा तो उसकी नींद हराम हा गई । क्रोधज्वाला से वह
सतत जलने लगा । तत्क्षण उसन महाराजा जयसिंह और
दिलेरखा को तैयार किया, वे दोनो सेनापति बहुत बड़ी सना
के साथ शिवाजी को परास्त करने के लिये चल पड़े । रायगढ़ के
पास सन्धि के प्रस्तार पर चर्चा होने लगी । राजा जयसिंह
ने शिवाजी को लिख भेजा कि यदि आप को राजपूत
फ बट की बात पर विश्वास हो तो निर्भय होकर हमारे
पाम चले पाये । मै आप को बादशाह से क्षमा करा दूगा
और इस बात का यत्न करूगा कि शाही दरवार मे आपका
आदर-सत्कार किया जाय और उच्च पदवी भी दी जाय ।
शिवाजी जयसिंह की बात पर विश्वास करक दिल्ली जान
के लिये तैयार हो गए। उन्हें यह भी आशा थी कि दिल्ली जान
से उन्हें बडा लाभ होगा । उनकी धारणा थी कि औरंगजेब
मुझे दक्षिण का राज-प्रतिनिधि नियुक्त कर देगा । दिल्ली
जाने से पहिले शिवाजी अपने आठ प्रधानों पर राज्य-भार
घोड स्वय अपन पुत्र सम्भाजी और कुछ सैनिकों को साथ ले
दिल्ली । पहुँच गए। उस समय दिल्ली में एक
भारी दरवार की तैयारियां हो रही थीं । औरङ्गजेय
बडे
~~~~ दरवार शिवाजी ने अपने सम्पूर्ण शत्रुओं को वश में कर लिया था । एक शिवाजी का ही अधिक सटका लगा रहता था, अब वह भी दरबार में स्वय उस्थित हो गया | दरबार में शिवाजी विराजमान तो हुए, पर उनक बैठने का स्थान तीसरे दर्जे मे नियत किया गया । में उनकी उपेक्षा की गई । यह अनादर और अपमान मराठा सरदार के हृदय में कण्टक के समान चुभने लगा। उनकी नसो में राजपूती रक्त उबलने लगा। वे उमी समय मर्माहत हो दरबार को छोड चाहर चले गए । दिल्ली से भाग जाना कठिन था, क्योकि उन्हें नजरवन्द रखा गया था । दूसरे दिन शिवानी ने अपने आप को पहरेदारो स घिरा हुआ कारावास मे पड कर शिवाजी अपने उद्वेग को रोक कर रह गए । दूसरो पर विश्वास करान वाली अपनी मूर्खता पर पश्चात्ताप करने लगे । फिर व कारावास से मुक्त होने के उपाय सोचने म अपने दिन व्यतीत करने लग । एक दिन बीमारी का बहाना कर इलाज करवाना प्रारम्भ कर दिया । योडे ही दिनी के बाद यह बात प्रसिद्ध कर दी कि बीमारी दूर हो गई है । उस स्वस्थता , हर्प में कारावास मस्जिदो क पुजारियो बार मुल्लाप्रो के पास मिठाइयो के टोपरे भजे जाने लगे । पहरेदार मिठाई से अपन पेट भर कर मस्ती में आ गए । इस अवसर को पाकर शिवाजी मिठाई के एक टोकरे मे स्वय बैठ कर और दूसरे में अपने पुत्र पाया। मन के स मन्दिरों और
वीर और वीराङ्गनाएँ
सम्भाजी को बैठा कर चम्पत हो गए । नगर के
वाहर
घोड़ों
पर सवार हो मथुरा की ओर हवा हो गए । मथुरा से अपनी
दाढ़ी मूंछ सफाचट करा साधु का रूप बदल आगरा और
घनारस आदि स्थानो में घूमते हुए दक्षिणा पहुँच गए।
सिहगढ़
शिवाजी ने दिल्ली से वापिस आते ही मुगलों के साथ
की हुई सन्धि को तोड़ दिया और एक-एक , करके सब
किले सुगमता से अपने अधीन कर लिए । सूरत पर धावा कर
शिवाजी ने बहुत-सा धन एकत्र कर लिया । इस के बाद उन्हो
ने अपने परम-मित्र तन्नाजी को साथ ले सिंहगढ के किले पर
धावा बोल दिया । उस दुर्ग मे औरगजेब ने राजपूत सेना
नियत कर रखी थी । तन्नाजी केवल ३०० सैनिको के साथ किले
फे ऊपर चढ गए । किले की सारी सेना में सनसनी फैल
गई । राजपूतो से दो-दो हाथ होने लगे । किले में
मरहठे सूब डट कर लडे । अन्त मे विजय शिवाजी की
ही हुई । सिंहगढ का दुर्गम दुर्ग शिवाजी के हाथ में आया,
परन्तु जिस समय शिवाजी ने सुना कि तन्नाजी मारे गए
तो अत्यन्त दुखित हो कहने लगे कि हा शोक । सिंहगढ तो
हाथ आया, परन्तु सिंह हाथ से जाता रहा ।
राज्याभिषेक
दिल्ली से लौट कर आठ वर्ष मे शिवाजी दक्षिण में एक
शमिशाली सम्राट घन गए । बीजापुर ने उनकी स्वाधीनत
शिवाजी
स्वीकार कर ली थी ! बीजापुर और गोलकुण्डा दोनो कर
देने लगे। अन शिवाजी की सत्ता और अधिकार स्थिर रूप
से बढ़ने लगा । दक्षिण में विजयलक्ष्मी हाथ बाँधे सड़ी
यो । श्रव मुविशाल प्रदेश पर उनका शासन होने लगा ।
शिवाजी को श्रव महाराज की पदवी मिल गई । मरहट्टा
सरदार छत्रपति शिवाजी कहलाने लगा । उसने अपने
नाम का सिका चलाना शुरू कर दिया । मन् १६७४ में
शिवाजी के राज-तिलक की तैयारियां होने लगीं । बडे
श्राडम्बर और समारोह मे उनका राज्याभिषेक हुा । शिवाजी
ने स्वर्ण का तुलादान किया । वह सोना ब्राह्मणो में चॉट
दिया गया। सन् १६८० मे स्वतन्त्रता देवी का परम-उपासक
छत्रपति शिवाजी स्वर्गपुरी को पवित्र करने के लिए इस मसार
-
से चल बसा।
राज्य-व्यवस्था
प्रतिकूल परिस्थितियो क होने पर भी शिवाजी के राज्य
की भी वृद्धि न हो सकी। उन्हो ने विजित भागों की मुचारु रूप
से शासन व्यवस्था कर दी थी। शासन कार्य चलाने लिए
कई सस्थाओं की रचना की गई थी। उसने शासन व्यवस्था को
चार भागो में विभक्त किया था-(१) श्रष्ट प्रधान मण्डल, (२)
मुल्की व्यवस्था, (३) किले और (४) सेना ।
अष्ट-प्रधान-मण्डल में आठ मन्त्री नियत किए गए थे,
वे मन्त्री अपने अपने अधिकारानुसार मिलकर राज-काज
RAVE
वीर और वोराङ्गनाएँ
तैसे मुक्त किया जाय । वे अपने काल की परिस्थिति के
मूर्तिमान स्वरूप थे। उन्होंने केवल मुष्टि-भर मरहट्ठों को लेकर
साहसिक जीवन का प्रारम्भ किया, सस्य कठिनाइयों का
सामना किया और विपत्तियो के पारावारों को पार किया। सेना
में वे सबके अगुआ होत थे । अफजलखा से भय रहने पर
भी शिवाजी स्वय उससे मिलने गए । शाइस्तासाँ के महल
मे भी वे स्वय जा घुसे। अपने भुजवल से उन्होने एक विशाल
दिन्दू-राष्ट्र स्थापित कर दिखाया-एक नवीन महाराष्ट्र राज्य
की नींव रसी।
शिवाजी का उत्तम शील भी उनकी सफलता का एक
मुख्य कारण था । उनमें किसी प्रकार का व्यसन न था ।
शिवाजी पर-स्त्री को अपनी माता और पहिन के समान
जानते थे, निर्धन और दुर्बल को किसी प्रकार का कष्ट न
देते थे । वे अपने काल के अद्वितीय व्यक्ति थे । उनकी
सेना में सर जातियों और सब धर्मों के लोग यहा तक कि
मुसलमान भी, शामिल थे, पर किसी कर्मचारी ने उनके साथ
विश्वासघात नहीं किया । किसी ने छल-कपट का व्यवहार
न किया
। सब सेवक-जन विश्वास-पूर्वक उनका आदेश
मानते थे।
शिवाजी उदार विचार के धार्मिक पुरुप थे। हिन्दूधर्म से
उनकी इतनी प्रीति थी कि उस पर प्राण तक न्योछावर
फर देने को सदा उद्यत रहते थे । वे तो इस्लाम
धर्म का भी उचित सम्मान करते थे । यदि कुरान शरीफ़
पान के लिए अपने प्राणों की कुछ परवाह न करते थे।
विश्वास होता था । वे प्रचण्ड धाशावादी थ। निराशा तो
होती है। उनमें एक बात सबसे बढकर यह है कि ये
स्वाभिमान-प्रिय थे । शिवाजी अपने मान के लिए,
शिवाजी
६६
कमी उनके हाथ में श्रा जाता तो उसे श्रादर-पूर्वक किसी
मुसलमान भाई को दे देते थे।
शिवाजी निस्वार्थ होकर स्वदेश का उद्धार करने में तत्पर
रहते थे। उन्हें अपने निज के महत्व का कुछ भी विचार न
था । दिन रात अपने देश को स्वतन्त्र करने की धुन में लगे
रहते थे। अपने कर्तव्य के पालन में सदा सलग्न रहते थे ।
सुम्ती और आलस्य को वे मनुष्य जीवन के लिए बहुत ही
धावक समझते थे।
शिवाजी अपने समय के एक महान राजनीतिज्ञ पुरुष थे।
राजनीति के मर्म को वे खूब समझते थे। वे साहम का उपयोग
दृग्दर्शिता और चातुर्य के साथ करते थे। यह उन्हीं का काम
था कि प्रवल मुगल सम्राट् के चगुल में फस कर भी वे वहा
से सुरक्षित भाग निकले । इन गुणो के कारण हो शिवाजी
अपने कार्य मे सदा सफल रहे । उन्होने महाराष्ट्र देश फे
मस्तक को समुन्नत किया । उन्हें अपनी सफलता में पूर्ण
उन्हें छू तक नहीं गई थी।
शिलाजी के इतिहास के मनन करने से अनेक बातें ज्ञात
গঘনী
ruravu
वीर और वीराङ्गनाएँ ।
हुई, पर उनके प्राचार-विचार में प्राकाश-पाताल का अन्तर
जयचन्द स्वार्थी, अहकारी और विलासी था, इसके
विपरीत पृथ्वीराज स्वातन्त्र्य-प्रिय और कर्तव्य-परायण
था । एक अत्यन्त र्स था तो दूसरा अत्यन्त घुद्धिमान् ।
यद्यपि पृथ्वीराज अवस्था में छोटा था, पर पढ़ने-लिखने और
युद्ध कला में वह जयचन्द मे बढा-चढा था । जब कभी
पृथ्वीराज को प्रशसा होने लगती, तो जयचन्द ईर्ष्या से
जला करता । साहसी, उत्साही और समझदार होने के
कारण राना अनङ्गपाल पृथ्वीराज मे अधिक प्यार करते थे।
वे पृथ्वीराज की वीरता के कामों को सुनकर आनन्द से पुलकित
हो जाते थे।
वृद्ध अनगपाल ने अपने देहावसान से पहिले ही दिल्ली
का गज्य पृथ्वीराज को और कन्नौज का राज्य जयचन्द को
सौप दिया था। जयचन्द इस प्राशा से फूला रहता था कि मैं
बडा हूँ, बडा राज्य मुझे मिलेगा, परन्तु उसका मनोरथ पून
हुधा । लहू का चूंट पीकर अपना-सा मुँह लिये जयचन्द को
दिल्ली के महलों को छोड़ना पड़ा और परिवार सहित कनौज
.
जाना पड़ा।
यौवन
उस समय पनौज के राजा जपचन्द की एक कन्या थी,
उस समय सयोगिता छोटो थी । बाल्यावस्था में अधिक समय वह पृथ्वीराज के पास ही रही थी । पृथ्वीराज उसे प्रेम से रामायण, महाभारत, इतिहास आदि की वीरनाथाएँ सुनाया फरता था । कनौज में रहते हुए भी सयोगिता पृथ्वीराज के उस प्रेम को भूली न थी। वह पृथ्वीराज को देखने के लिए सयोगिता जिसका नाम सयोगिता था। सूर्योदय-दर्शन से प्रतिक्षण प्रफुलित होने वाली पद्मिनी के समान यौवन की बहार से प्रतिदिन वह खिलती जा रही थी। उस कन्या की कान्ति, उसका रूप और लावण्य अद्वितीय था। सौन्दर्य में देवताओं की कन्याओं को उसने मात कर दिया था । गुणो में भी वह अनुपम थी। उसे देखकर उसके माता-पिता का हृदय प्रसन्नता से भरा रहता था । उसके विवाह के लिए बडे-बड़े राजाओं के दुत राजदरबार में उपस्थित होते थे। पर योग्य वर का मिलना कठिन-सा हो गया था।ज्यों ज्यो मयोगिता को प्रायु बढ रही थी, त्या त्यों राजा और रानी की चिन्ताभी चटनी जाती थी। उन्हें चिन्ता के कारण राजसी सुस्वादु भोजन भी फीका लगने लगा । जब जयचन्द कन्नौज पहुँचने के लिये दिल्ली छोड रहा था, लालायित थी। राजा जयचन्द ने अयोगिता को नृत्य-कला सिखाने'
पीर और वीराङ्गनाए
और कई रग-बिरने वस्त्रों और भाँति भाँति के भूपयों को
पहनाने के लिये तैयार खडी रहती। किंतु सयोगिता राज-प्रासाद
के
सुख
के लिये लालायित न थी। वह बडी साहसी
स्त्री थी और इसी लिये वह माहसी और पराक्रमी पुरुष की
ही पत्नी बनना चाहती थी। उसे अब खेद होता कि मैं पिता
फे मन को दुसी करके यहा आई । राज-सभा में पिता का
कितना अपमान हुआ है-इस बात को स्मरण कर उसे
बडा दुस होता ।
राज प्रासाद के सुख-ऐश्वर्य में भी
उसका चित्त अशान्त था। प्रियतम पति का पूर्ण प्रेम पाकर
भी वह चिन्ता में निमग्न रहती । इस अवस्था में उस
ने पिता का आशीर्वाद लेने के लिए एक दूत भेजा।
आशीर्वाद के बदले पिता ने यह शाप भेजा कि जिस राज्य
के लिये तूने कन्नौज के राज-वश को क्लङ्कित किया है, वह राज्य
ही नष्ट हो जाय।
इस शाप को सुन कर सयोगिता सटपटाने लगी, पर
क्या कर सकती थी । पृथ्वीराज के साथ शत्रुता बढ जाने से
पिता ने स्वार्थ से
लडकी पर यह कुठाराघात किया, इसका
उसे बडाद
सन्धि
ने बडी भारी सेना एकत्र कर फिर
। पृथ्वीराज उस समय
N
A
सयोगिता
MARNA
.
मम थे। प्रेम-प्रवाह में बहते हुए पृथ्वीराज को सयोगिता ने रण
के लिए उत्साहित किया। उन्हें अपने हाथों से कवच पहनाया,
अपनी वाणी से देश पर मर मिटने के लिए लोगों को उत्तेजित
किया । पृथ्वीराज उसी समय तैयार होगए। पहले की तरह अन्य
अनेक सामन्त भी उसकी सहायता के लिए आ गए । जयचन्द
के पास भी दूत भेजा गया, पर उसने दुन को वापिस भेज दिया।
जिसका हृदय ईष्या से भरपूर था, वह फिर कैसे महायता का हाथ
बढा सकता था। भारत वर्ष विदेशियों के आक्रमण से लुट जाय,
नष्ट हो जाय, उसे क्या पड़ी थी कि औरों के लिए चिन्ता की
गठरी सिर पर उठाये। वह तो अपना उल्लू सीधा करना
जानता था।
तिरौरी के मैदान में फिर दोनों दलों की सना एकत्र हो
गई । इस बार गोरी अधिक तैयारी करके आया था । भयङ्कर
युद्ध होन लगा। पृथ्वीराज रणभूमि में शत्रुओं पर सिंह की
तरह कूद पडा । गाजर मूली की तरह उनक सिर काटने लगा।
गोरी के सरक्षक उस तीक्ष्ण तलवार की घात से सदा के लिए
भूमि पर सो गए । पृथ्वीराज की विजय हुई और गोरो बन्दी
बना लिया गया।
गोरी सम्मान-पूर्वक दिल्ली लाया गया । उसे राज-सभा में
सडा किया गया । लना और चिन्ता में डूबा हुआ वह सोच
रहा था कि अप मेरी क्या दुर्दशा होगी। उसका साहस
'दम की भांति विलीन होने लगा। उसके शरीर के
इस
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वे दोनों
वीर और वीराङ्गनाएँ
फी नीचता और स्वार्थपरता से पृथ्वीराज की छाती फटने लगी।
जयचद सयोगिता का पिता होते हुए भी कितना नृशस और
देश-द्रोही था, जिसने केवल पृथ्वीराज से बदला लेने के लिए ही
योरी को अपने देश पर आक्रमण करने के लिए निमन्त्रित किया।
तृतीय अाक्रमण
गोरी वडी भारी सेना लेकर तीसरी बार तिरीरी के मैदान
में
आ डटा । वहाँ जयचन्द ने भी गोरी की सहायता करने
के लिए अपना डेरा लगाया,
पृथ्वीराज और संयोगिता
अपने देश को इस आपत्ति से बचाना चाहते थे
वेश यदल पर जयचन्द की छावनी में आ गए । रात्रि का
समय था, सयोगिता अपने पिता की क्रोधाग्नि के सामने
थर-थर काँप रही थी। अपने जामाता और लडकी को देख कर
जयचन्द अंगारे उगलने लगा । सयोगिता अपने देश को
इस उत्पात से बचाने के लिए पिता से अपने अपराधो के लिए
क्षमा मांग रही थी, पर जयचन्द का हृदय स्लेह से शून्य था।
उसने दिल सोल कर लड़की को फटकारा । यह देख कर
पृथ्वीराज की आँखें जोश स लाल हो गई , पर उस समय वे क्या
कर सकते थे।
ऐसे निरादर फी कुछ भी परवाह न करते हुए पृथ्वीराज
और सयोन्तिा सिर नवा कर बोले-"महाराज ! यदि
श्राप दिली का राज्य लेना चाहते हैं तो हम आपको अर्पण
२
लहरें उठने लगी। समरसिंह तलवार के वार से मारे गए।
सयोगिता
करने के लिए तैयार है। यदि आप हमें पन्दी बना पर रखना
चाहते हैं या दिल्ली के राज्य से बाहर निकाल कर जङ्गलों
में भेजना चाहते है तो हम उसके लिए तैयार हैं। पर
हमारी एक प्रार्थना को स्वीकार कीजिए-इस देश को विदेशी
यवनों के हाथों से बचा लीजिए । यदि यवनो ने दिल्ली अपने
अधीन कर ली, तो, समझ लीजिए, वे लोग जहाँ जायगे, वहीं
की ईट-से ईट बजा देंगे।"
'इस युद्ध के बाद देखा जायगा'---जयचन्द फे ये शब्द
सुनकर सयोगिता और पृथ्वीराज मस्तक पर हाथ रख कर अपनी
राजधानी में वापिस आ गए । उनका सारा प्रयत्न, सारी प्रार्थना
और सारा त्याग निष्फल गया।
युद्ध प्रारम्भ हुा । जयचन्द और गोरी एक तरफ थे,
पृथ्वीराज, समरसिंह तथा दूसरे सामन्त दूसरी ओर ।
पृथ्वीराज और दूसरे वीर अपनी जान हथेली पर रख कर
रंगभूमि में प्रवेश करने लगे। बड़े वेग से तलवारें चलने लगी,
सहस्रों सैनिक कट-कट कर गिरने लगे । रुधिर की नदी में
दिये । दिन-भर खड्ग
पृथ्वीराज की तलवार ने असख्य शत्रुओं के सिर काट
चलाते-चलाते पृथ्वीराज थक
गए थे। अन्त में वे भी शत्रुओं द्वारा मारे गए । पृथ्वीराज की
देह पृथ्वी पर गिर पड़ी, पर उनकी खड्ग-युत-मुट्ठी ढीली
न पही।
रानी दुर्गावती
पन्द्रहवीं और सोलवी शताब्दी में भारतवर्ष के मध्य
। प्रान्त के उत्तरी भाग में गोंड-जाति राज्य करती थी । गॉड
जाति की अधिकता के कारण इस देश का वह भाग उस समय
गोंडवाना के नाम से विख्य त था। इस सुविस्तीर्ण प्रान्त में
'गढनगर' तत्कालीन शासकों को राजधानी थी । समय के
हेर-फेर से इस समय गहनगर का नाम-निशान मिट गया है ।
वर्तमान जबलपुर से तीन मील की दूरी पर उस नगर के राज
प्रामादो के टूटे-फूटे स्तम्भ दृष्टिगोचर होते हैं । प्राय ८०० वर्ष
पूर्व मदनशाइ नामक गोड राजा ने एक सुविशाल और सुन्दर
महल बनवाया था, जो आज भी कुछ अच्छे रूप में विद्यमान
है और 'मदन महल' के नाम से प्रसिद्ध है ।
* श्राइने अकरी में भी यह बात मिलती है कि मध्यमान्त
का उत्तरी भाग गौढों से मरा हुअा था और वह प्रान्त गोंडवाना के
नाम से प्रसिद्ध था।
पीर दुर्गानी पन्द्रदी शताब्दी पं अन्न मे उम मान्न मे महापली समामिद गरेश राज्य परते थे। पुर में प्राय ५ मील फीरी पर उन्होंने 'जोगग' नामफाफ मुष्ट दुर्ग धारया या। उमी में सुन रह कर गमा मप्र मनिह राम कार्य करते पे। काका गम्य-प्रयन्ध प्रशमनीय था । यह राज्य उम ममय सम्पत्ति और सुशामन पी ष्टि में उन्ननि फे शिसर पर पहुँचा हुआ था। यहाँ सम्पतन्त्रना या गएडा लहराया करता था। जप समामसिंह की मृत्यु हुई, उस ममय मनका पोता दलपति- शाह सिंहासन पर बैठा । वह भी समामिह की तरह महापरा. ममी या । वह अपन गज्य में न्याय-नीति से व्यवहार पिया फरता था। प्रान्त भर में उमकी शुभ काति-पताका फहरा रही थी। उमये पल-वैमर, न्याय नीति और अद्भुत पराप्रम को देव कालीन अन्य राजा भी उमरा ममुचित सम्मान किया करते थे। पचल एक भूपति, निमका नाम शालिपाइन था, दल- पतिशाह पाविरोधी था। शालिवाहन महोया का राजा था । वह उथवश में उत्पन्न होन के कारण अपने आपको उच्च-अधिपति समझता या। प्रसभ्य जाति फ रामा दलपतिशाह की महिमा उसे स्वीकार न थी । पर शालिवाहन में इतनी शक्ति भी न थी के बद अपने भुज-पल से दलपतिशाह को अपने अधीन कर सकता । वह उस अमर की ताक मे था कि जर दलपति- बाह समाज के सम्मुस अपमानित हो सक। कई वर्षों से
६२
वीर और घीरागनाएँ
FLA
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और पति-सेवा-परायण आर्य रमणी को पाकर बड़े प्रमन्न थे।
दुर्गावती की प्रार्थना से शालिवाहन छोड दिये गये और उन्हें
महोगा का राज्य भी लौटा दिया गया ।
गृहलक्ष्मी को प्रसन्न र दलपतिशाह राजलक्ष्मी
को प्रसन्न रखने के लिए परिश्रम करने लगे। मन से
पहिले उन्होंने मण्डला-नामक अपनी पुरानी राजधानी छोड़ी।
दमोह जिले के सिंगौरगढ़ नामक
स्थान को राजगानी
धनाया। यह स्थान राज्य-मण्डल के ठीक मध्य में था और
इस का दुर्ग सुदृढ़ और सुविस्तीर्ण था, इस लिए दलपतिशाह
ने राज्य-कार्य के लिए इस स्थान को बहुत उत्तम समझा।
अब राज्य कार्य बडी उत्तमता से चलने लगा । प्रजा दलपति-
शासन से बडी सन्तुष्ट थी । राज्य
में
किसी प्रकार का अत्याचार न किया जाता था। धन-धान्य
बहुत होने से प्रत्येक व्यक्ति प्रसन्न दीसता था। दलपति-
शाइ प्रना के साथ पुत्र सदृश व्यवहार करते थे और प्रजा
भी उन्हे पिता ममम कर उन की आज्ञा
। इस तरह राना और प्रजा के मध्य प्रेम-व्यवहार
६ पाने लगा।
कुछ काल के बाद दुर्गावती का एक सुन्दर पुत्र
उत्पन्न हुा । पुत्र का नाम वीरनारायण रखा गया ।
उम पुत्र रत्न को पाकर पति-पत्नी की प्रसन्नता का
पारावार न रहा । वे अपने को बड़े भाग्यशाली समझते
शाह के
पालन करती
HA
वीर दुर्गावती
और कृपानिधान परमात्मा को हार्दिक धन्यवाद देते । अब
उनके दिन पुत्र के लाड-प्यार में व्यतीत होने लगे, जिससे
उन्हें अकथनीय सुस मिलने लगा । पर कठोर और निर्दयी
विधाता को उनका सुख दीर्घ काल तक स्वीकार न था ।
सौभाग्य-सूर्य मध्याह्न काल में ही अस्त हो गया । चार-पांच
वप ही सुख से व्यनीत हुए कि राजा दलपतिशाह बीमार पड
गये । वीमारी वढती ही गई, ज्यों ज्यों दवा की। अन्त
वह
बीमारी उनक प्राण ले गई । सारा राज्य प्रपने अत्यन्त प्रिय
शासक पे वियोग दुस मे डूब गया ।
यौवनावस्था मे दलपतिशाह अपनी पत्नी को मझधार मे
छोड़ गये । दुर्गावती पति के साथ सती होना चाहती थी
पर सूने राजसिंहासन के भार को कौन सँभाले । अल्प पयस्फ
शिशु का फौन पालन-पोषण परे । दुर्गावती पड़ी दुविधा
मे पड गई । इन प्रश्नो ने दुर्गावती को राजपूत रगगियों के
सदृश सती न होने दिया । विवश होकर उसने सती होने का
सरप छोड दिया । उसने अपने पर्तव्य को समझा, ओर
धैर्य का आश्रय लिया । अपने वर्तव्य में निगम पार
पुत्र-वात्सल्य में उसने अपने पारगा शोक को गुला
दिया । पिता की मृत्यु के बाद मुगार धीरमागमा
राज्य का अधिकारी था
ने उस बालक का यथाविधि राज्याभिषेक कर
श्रत
राज्य फे
६६
वीर और धीगगनाएँ
h
उस
समय
।
अपने पति की मृत्यु के बाद महागनी ने समय समय
पर राज्य का भी विस्तार किया । केवल अपन पति के
कमाये हुए यश को स्थिर ही नहीं रसा, अपितु उस की अधिक
वृद्धि की । अवसर मिलने पर महारानी समीपस्थ प्रान्तों पर
आक्रमण किया करती और जीत पर अपने राज्य मेनिला
लेती । महारानी ने
मालवाधिपति
बाज बहादुर के देश को जीत कर भूपाल श्रादि कई प्रान्त अपने
राज्य में मिला लिये।
१२ वर्ष तक महारानी दुर्गावती शान्तिपूर्वक अपने देश
पर शासन करती रही । उस के सुचारू शासन से प्रजा अत्यन्त
सन्तुष्ट थी। देश धन-धान्य से भरपूर था। राज्य में किसी प्रकार
की कमी न थी। महारानी की कीर्ति अन्य प्रान्तों में फैल चुकी
थी । उस के बल और ऐश्वर्य का ममाचार निकटस्थ यवन
शासनों के कानों तक पहुँच चुका था। उन की मार्जार-दृष्टि श्रय
इस समृद्धिशाली देश की ओर पड़ने लगी। वे उसे हडपने के
लिये दिन रान युद्ध की तैयारियों करने लगे।
उस समय दिल्ली पर अक्बर बादशाह राज्य
वह सम्पूर्ण भारत को अपने आधीन करना चाहता था ।
भारत के एक छन मम्राट बनने की उस में प्रबल अभिलापा
थी । भारतवर्ष के मान चित्र को बार बार देख कर वह इस
विचार में पड़ा रहता कि पहले क्मि सि देश को हस्तगत
फिया जाय । उस की इच्छा थी कि सिकन्दर के समान
करता था।
विस्तार के लोभ से दूसरों की सम्पत्ति को हस्तगत करने रानी दुर्गावती ६७ प्रभुता और कुबेर के समान ऐश्वर्य हाथ श्रा आय । उसने भारतीय अन्य शामकों को भिन्न भिन्न उपायों से अपने आधीन कर रखा था। किसी की लडकी लेकर, किसी को धन देकर, किसी को कुछ भूमि अर्पण कर, किसी पर चढाई पर, किसी न क्मिी उपाय से उसने अनेक गजात्रों को अपनी छत्रछाया के नीचे ला रखा था । महाराणा प्रताप को छोड बडे बडे वार राजपूत उसकी प्रॉस के इशारे पर चला करत थे । जब अकबर ने दुर्गावती के ऐश्वर्य की गाथा सुनी, तो उसक कान खडे होगये । लोभ न उसक दिल क अन्दर घर फर लिया। वह आश्चर्य मे पड़ कर सोचा परता कि एक स्त्री अपन राज्य का इतना विस्तार करे और वह इतनी अतुल सम्पत्ति की स्वामिनी हो ? इस ईर्ष्या से जल कर अक्घर ने तत्क्षण अपने सेनापतियो को आदेश दिया कि एक बड़ी भारी सेना तैयार पर गोडवाना की ओर भेजी जाय । सम्राट् के आदशा- नुसार आसपसा महती सेना लेकर गोंडवाना की ओर चल पड़ा। सम्राट् प्रकार ने एक विधवा और अनाथ स्त्री पर आक्र- मण कर दिया । महारानी न सम्राट् क साथ किसी प्रकार का द्वप उत्पन्न न लिया था । बिना किसी कारण या 'अपराध के अकबर न धावा बोल दिया। न्याय पार औचित्य को तिलमिलि देर समट अकबर न केवल अपन राज्य के के लिए चढाई की । जब दुर्गावती को प्रारमण १०० वीर और वीराङ्गनाएँ था। इस पलक को धोने के लिए उस ने फिर विपुल सेना के साथ श्रासारखाँ को तैयार किया । फिर धोर युद्ध होने लगा। पहली जीत से रानी और उस की सेना का साहस द्विगुणित हो गया था, इम लिए वे अधिक उत्साहित हो अपने प्राणों को हथेली पर रख कर लडने लगे। दुर्गावती की प्रपल सेना के श्रागे मुगल सेना उस युद्ध में भी न ठहर सकी। मुगलों ने फिर अपनी पीठ दिसा दी । आसपखाँ उस हार से अत्यधिक लजित हुा । और अकबर को अपना मुँह न दिसा सका। उस हार के बाद सम्राट अकबर और श्रासफखाँ चिन्ता मे पड कर सोचने लगे कि अब क्या किया जाय । दाम और दएड से उहें फुछ सफलता न मिली थी। अब उहोंने कूट नीति का आश्रय लेने का निश्चय दिया। गोंडवाना में भेद काबीज बोया गया। उस बीज की जड़ें इतनी पुष्ट और प्रथल हो गई कि वलती दुर्गावती उन्हें उखाडने में समर्थ न हो मकी। गोंडाना में बदननिह नामक एक जागीरदार रहता था । वह प्रजा पर मनमना अत्याचार किया करता । प्रतिदिन के दुराचार से प्रना बडी नग थी। रानी के पास शिकायनों की भरमार पहुँचने लगी। रानी ने प्रजा की बात पर वाभिह की जागीर राज्य के साथ मिला ली। बदन- सिंह शोध स जलता हुआ मम्राट अकबर के पास पहुँचा। उसे गोंडवाना का सम्पूर्ण भेद दे दिया।
wwwww anMAAN रानी दुर्गावती १०१ इधर वदनसिंह अपना पैर निकालने के लिये अस्तर के कान भर रहा था, उधर दूपरा देशद्रोही गिरधारीसिंह, जो दुर्गा- वती का सरदार था, सेना को निरुत्साह करने का प्रयत्न कर रहा था। यह भी प्रभा पर अत्याचार किया करता था। देश में स्थान- स्थान पर फूट का बीज बोया करता था। रानी ने निरश होकर उसे अपने जिले में नज़रनन्द कर दिया। राज्य में गृह कलह होने लगा। घर के ही आदमी देश में शत्रु हो गये । देश की दशा बिगडने लगी । दुर्गावती इस भेदभाव को देखकर भयभीत होने लगी, पर उसने अपना साहस न छोड़ा। वह प्रत्येक परिस्थिति के लिये उन्यत रहमी । वह अपन देश की रक्षा के लिये अपने और अपने पुत्र तक के प्राणों को आहुति फरने के लिये हर समय तैयार रहती थी। अकरर ने अब तीसरी बार ६०,००० सैनिकों के साथ प्रासफ खाँ और सेनापति अब्दुलमजीद साँ को गढमडला की थोर भेजा । देश-द्रोही बदमिह भी उनके माय था। मार्ग-प्रदर्शक बन कर उसने शत्रुओं को गुप्त-मागे का पता दिया । इम प्रारमण पर दुर्गावती ने अपने विश्वस्त सैनिको को एकत्र किया । मन्त्री श्राधार्गसंह और कुमार वीरनारायण भी रानी के साथ थे। सेना को तीन भागों में विभक्त किया गया। एक भाग की नायिका स्वय रानी बनी और बाकी दो भागो फ वीरनारायण बने। दोनो सेनाएँ रणक्षेन में जुट गयीं । एक ओर नायक आधारसिंह और
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१०४
वीर और वीराङ्गनाएँ
और झट अपनी छाती में भोंक दिया । महारानी उसी समय
सदा के लिए रणशय्या पर सो गई । गोंड वीरो ने उस के मृत
शरीर को उठा लिया और माता और पुत्र दोनों के शवों की
यथोचित दाह-क्रिया की।
रानी की मृत्यु के बाद भी गोंड वीर जान तोड पर लडते
रहे, पर वे असस्य मुगलो के माथ कव तक लड सकते थे । श्रत म
आसफखां की विजय हुई । गोडवाना पराधीन हुआ, अकबर की
अतृप्त अभिलापा पूर्ण हुई । बदनसिंह और गिरधारीसिंह
को क्या मिलना था ! उन का भी सिर तलवार से पृथक
फर दिया गया।
उपमहार
दुर्गावती का जीवन-चरित्र स्वर्णाक्षरों में लेख-द्ध होने
योग्य है । भारत के इतिहास में ऐसी कोई भी स्त्री हिसाई नहीं
देती, जिम ने अपने पति के मरने के बाद अपने आप को इस
तरह देश के लिये बलिदान कर दिया हो । वह जीवन-पर्यन्त
देश का उद्वार करती रही, देश के लिए डनी रही और
अन्त में देश के लिए ही होम हो गई । यो तो पई भारतीय
त्रियों न अपनी वीरता दर्शाई है, पर दुर्गावती की वीरता अधिक
सराहनीय है । किस पर पानीवन प्रापनियों के पर्वत टूटते रहे
पर दुर्गावती अपने पर्त्तव्य से, अपने लक्ष्य से तनिक भी विचलित
न हुई । स्वतन्त्रता के मूल्य को यह अच्छी तरह समझती थी।
स्वतन्त्रा के लिए वह अपने खून को, अपने पेट से
रानी दुर्गावती
१०५
पगहुए पुन के खून को भी तुच्छ समझती थी। उसका शरीर
तोरों से छलनी हो गया, आँस बन्द हो गई, पर अन्त समय
तक वह रयाभूमि में डटी रही । जब तक भारत का
इतिहास रहेगा, दुर्गावती का नाम, उसका त्याग, उसकी
वीरता और बलिदान की कया सदा अमर रहेगी।
रो
1
भूलना न चाहिए । प्रजा की रक्षा करना हमारा परम
१०८
वीर और वीरागनाएँ
अनिरुद्ध शत्रुओं का सामना करने के लिये अपने प्राण हथली
पर रख कर दुर्ग के बाहर चले जाते तो शीतला देवी जल
विहीन मीन की तरह तडपा करती थी। कई बार वह
रो कर अनिरुद्ध से कहा करती-"मुझ दुखिया के जीवन ।
प्राणनाथ | मैं आपके बिना नहीं रह सकती । यह सुन्दर
शीश महल, ये सुन्दर वस्त्र और सुस्वादु भोजन आपके
विना निस्सार हैं । मुझे अपने पास ही रखिए । मुझे अपनी
सेवा से वचित न कीजिए । जहा आप जाएँगे, मैं छाया की
तरह आपको अनुगामिनी बनूंगी । आपके साथ प्रत रख कर
कन्द-मूल सा कर अपना जीवन व्यतीत करूगी । आपकी
चरण सेवा से अपना जीवन सफल करूगी।"
अनिरुद्ध रुद्ध कण्ठ से कहा करते-"प्राणों से प्रिय शीतले ।
देवी, मैं क्या करू, शत्रु हाथ धो कर पीछे पड़े हुए हैं।
इस दुर्ग की ईंट से ईंट बजाने के उपाय करते रहते हैं।
पूर्वजों ने अपने प्राणो से इस दुर्ग की रक्षा की है । यदि
मैं इस दुर्ग की गुफा में छिप कर बैठ जाऊँ तो फिर
हमारा नाश दूर नहीं । जिस प्रजा के हम सरक्षक कहलात
हैं, वही प्रजा हमें सदैव कलङ्कित करेगी । हमे अपना फर्तव्य
धर्म है । यदि तू युद्ध मे लडना जानती, तो मैं तुझे सदैव
अपने साथ ही रखता।
-
रानी सारन्धा १०६ पति की आज्ञाकारिणी शीतला क्या कर सकती थी । 1 ठण्डी साँस लेकर बैठ गई। जैसा कि आर्यनारी का धर्म है, उसने भी अपने आपको पति की इच्छा पर छोड दिया । पति जिस तरह प्रसन्न रहे, उसी तरह अपने मन को प्रसन्न रख कर निश्चिन्त बैठ गई। एक दिन अनिरुद्ध युद्ध के बाद घर लौट आया । उसका मुस उदासीन नजर भाता था । उसके भीगे वस्त्रों से पानी की बूंदें भूमि पर टपक रही थीं। पति के दर्शन कर शीतला के जी का बोझ हलका हुआ । जब वह ईश्वर का धन्यवाद करती हुई पति को लोचनों में रख कर प्रसन्नता से झूम रही थी, तव सारन्धा ने भैया की विकल दशा को देख कर प्रश्न किया - "भ्राता जी, आपके कपड़े फैसे भीगे १" अनिरुद्ध ने सिन मन से उत्तर दिया-"अभी नदी तैर कर आया हूँ"। सारन्धा ने फिर प्रश्न किया-"आपके अस्त्र' कहाँ हैं, और आपकी सेना कहाँ है ?" अनिरुद्ध ने अपना मुख नीचे कर उत्तर दिया- "सेना रगाशय्या पर सो गई। शीतला तो यह बात सुन र मन में पड़ी प्रसन्न हुई कि ईश्वर की कृपा से पति जी कुशलपूर्वक घर वापिस आ गए पर सारन्धा नीली पीली होकर कहन लगी--"अपनी मृत- सेना को रण में छोड़ कर अपने प्राण लेफर तू यहाँ भाग आयगा--ऐसी आशा तुझ से कदापि न थी। तू ने अपने
११०
-
वीर और वीराङ्गनाएँ
तुच्छ जीवन की रना की, पर पूर्वजों के नाम को
बट्टा लगा दिया।"
अनिरुद्ध अपनी वहिन को यह फटकार सुन कर लज्जा
और ग्लानि से क्षुब्ध हो गया । इस धिकार-वाक्य ने उसे
सचेत करदिया । अपनी वहिन की ओर मुस
करके कहने लगा-
“वहिन ! अब मैं सँभल गया । तू ने मुझे सावधान कर
दिया। मैं शत्रुओं का सामना करने के लिए फिर जाता हूँ" |
यह कह कर वह उलटे पैगें वापिम चला गया।
शीतला देवी उसके पीछे दौड़ने लगी, पर अनिरुद्ध
बिजली की तरह तुरन्त विलीन हो गया । शीतला दुर्ग
के एक कोने में बैठ कर आसू बहाने लगी । उसके
नयनों से आँसुओं की झड़ी लगी देख
आ गई । शीतला उसे निकट प्राई देस क्रोधानल से
जन कर कहने लगी-"क्या तुम्हें भैया का नाश इतना प्यारा है ?"
सारन्धा ने हँस कर कहा-"हाँ"।
शीतला का क्रोध अधिक भडक उठा, कहने लगी-
"तुम्हारा अपना पति होता, तो उसे अपनी आँग्वों के
सामने ही रसा करतीं" ।
सारन्धा बोली-"यह कभी न होता । मैं उसकी छाती
में कटार मार कर वाहिर निकाल देती" | फिर बोली-
"ममय आने पर यह भी देस लेना" |
कई दिन बीत गए । अनिरुद्ध शत्रुओंपर विजय पाकर
घर लौट आया । इम + वाद शान्ति का राज्य
सारन्धा वहाँ
-
R
नाम
रानी सारत्या
१११
हुआ । अव अनिरुद्ध को सारन्धा की चिन्ता सवार होने
लगी। उस समय युवती सारन्धा विवाह-योग्य हो गयी थी।
उन दिनों में सारे बुन्देलखण्ड में चम्पतराय का बोलबाला
हो रहा था। उस वीर-पुरुष को स्वतन्त्रता से अधिक प्रेम
था। बुन्दलखण्ड के महाराज स्द्रप्रताप के फुल में उसका जन्म
हुआ । उसके पिता का
भगवानदास था, उसे
महोवे में फुल ३५०) वार्पिक की जागीर मिली थी । उस
थोडी-सी आय से उसका निर्वाह होना कठिन था । इस
लिए उसने छोटा-सा दल बना कर इधर-उधर डाका डालना
प्रारम किया। धीरे-धीरे उमकी शक्ति बढती गई, उसने
बड़ी भारी सम्पत्ति एकत्र कर ली। फिर उसने देश की रक्षा
का भार भी अपने सिर पर ले लिया। देश के बहुत से स्वतन्त्रता-
प्रिय लोग उसके मडे के नीचे श्राफर देश का उद्धार करने
में जुट गए और अपना नायक मानने लगे।
अनिरुद्धसिंह ने वीर चम्पतगय को ही सारन्धा लिए
योग्यवर समझा । सगाई की बात चली और चम्पतराय
ने स्वाधीनता-प्रिय सारन्धा को अपनी पत्नी बनाना स्वीकार
कर लिया । बडे समारोह से उनका विवाह-उत्सर सम्पन्न
हुआ । सारन्या का मनोरथ भी सफल हुश्रा न उस का
पति स्वतन्त्रता-देवी का उपासक है और बुन्देलखण्ड में एक
प्रसिद्ध और वीर-व्यक्ति माना जाता है।
चम्पतराय युद्ध-कला मे बडा प्रवीण था । वह अनसर
११२
वीर और वीरागनाएँ
1
पाकर शत्रुओं पर आक्रमण किया करता था। मुगल सम्राट
ने उसे पकड़ने के लिये कई वार सेना भेजी, पर उसका प्रयत्न
सफल न हुआ । अन्त में तग आकर मुगल सम्राट ने बली
बहादुर और अब्दुल्लासों को सेनापति बनाकर वडी भारी सेना
भेजी । यद्यपि चम्पतराय ने अपनी वीरता का पूर्ण परिचय
दिया, पर अन्त में उसको अपनी हार माननी पड़ी और मुगल
सेना से उसने सन्धि कर ली । चम्पतराय ने दिल्ली जाना
स्वीकार कर लिया। सम्राट् चम्पतराय को देख कर और उसकी
वीरता का हाल सुन बड़े प्रसन्न हुए। दरवार में उसका अच्छी
तरह से स्वागत और सम्मान किया गया।
उस समय कुम्हारगढ का दुर्ग अजेय रह गया था ।
मम्राट् की ओर से चम्पतराय को आदेश दिया गया कि वह
इस दुर्ग पर आक्रमण करे और अपनी वीरता दिसाए ।
उस समय चम्पतराय ने आक्रमण करना स्वीकर कर लिया।
वहाँ जाकर अपनी सेना सहित चम्पतराय ने दुर्ग को घेर लिया
और अपनी जान की बाजी लगाकर दुर्ग को भी जीत लिया।
सम्राट् तथा उनके युवराज दाराशिकोह इस जीत से बडे प्रसन्न
हुए। उन्होंने चम्पतराय का यथोचित श्रादर-सत्कार किया और
उसे कोंच की बहुमूल्य जागीर पुरस्कार स्वरूप में सौप दी।
चम्पतराय अव दिल्ली मे शान्ति से जीवन व्यतीत करने
लगा। राज्य के ऐश्वर्य को पाकर वह अपनी मातृभूमि को भूल
गया। भोग-विलास के सुप मे अपने दिन पूरे करने लगा।
महलों में नाच-गान से अपना दिल बहलाने लगा । पर
-
+
.
M
रानी सारन्धा
सारन्या यह ऐश का मामान दम फर फुटा करती।। मन
नमी
मसोस कर रह जाती थी। जब से वह दिल्ली आई थी,
से उसका मन दुखी रहने लगा या उमा मुख को कान्ति
लुलसी हो गई थी। पति को अन्य देश के विलास-सुम
में आसक्त देस मन ही मन कुदा करती और घण्टों एक कोने
में बैठ कर रोया करती थी।
एक दिन चम्पतराय ने प्रेम से पूछा-"प्राणप्रिये ।
क्या बात है कि तू यहाँ सदैव उदास रहती है। क्या तू मुझ से
अप्रसन्न है"?
सारन्धा ने नेत्रों से आँसू बहाते हुए उत्तर दिया-"मैं
उदास नहीं रहनी, मेरी आकृति ही ऐसी है"।
चम्पतराय-"मैं यह सत्य नहीं मानना । महोये का यह
प्रफुल्ल मुख-कमल यहाँ कैसे मुरझा गया ? क्या तुझे मेरा सुख
अच्छा नहीं लगता ? जय से में यहाँ आया हूँ, न माने,
तुम्हारे मुस की श्री कहा छिप गई । तुम्हारा यह प्रेम, न मालूम,
कहाँ विलीन हो गया।
सारन्धा-~"मेरा प्रेम प्रापय साय जैसा अपनी मातृभूमि
में था, वैस ही यहाँ भी है। आर्य-नारी का प्रेम पति के साथ
सदैव बना रहता है । उम प्रेम वैलि को कोई काट नहीं
सकना । यदि मैं यहाँ उदास रहती हूँ तो इसका एक विशेष
गरण है। यदि आप मुद्ध न हो और आपकी आज्ञा हो तो
में निवदन कर दें।
AM वीर और वीराङ्गनाएँ को अपने साथ मिला लिया। जन उनकी समिलित सेना धौल- पुर के पास चम्बल क तोर पर पहुँची, तो सामने देखा गया कि दाराशिकोह एक महती सेना लिये तैयार खड़ा है। इतनी भारी शाही सेना को देख कर औरङ्गजेन की सुव- बुध उड गई। उसके लिये दारा पर विजय पाना टेढ़ी खीर थी। वह आश्चर्य मे पड कर सोचने लगा कि पर क्या किया जाय । उसने लड़ाई से पीछे हटना भी ठीक न समझा । दिल्ली के सिंहासन का लोभ उसे पीछे कहाँ जाने देता था। इस दुविधा में पड़ कर औरङ्गजेब ने चम्पतराय को यह पत्र लिसा-"आप वीर पुरुप हैं, बुन्देलखण्ड की जान हैं । मैं महासागर के भंवर में पड़ा हुआ हूँ । इस निपत्ति के समय सिवा आप के मेरा कोई आश्रय नहीं । खुदा फे लिए मेरी इस मॅझधार में डगमगाती हुई नौका को पार लगा- इये । अगर आपने मेरी सहायता की, तो मैं आपका सदैव कृतज्ञ रहूँगा"। इस पत्र को पाकर चम्पतराय बार-बार पढ़ने लगे। पढते ही दिल्ली का वह ऐश्वर्य-भोग, वह रागरंग उसके मन की बालों के सामने चक्कर लगाने लगा। दिल्ली में कैसे आनन्द से दिनकटी होती थी । इस तरह दिल्ली की याद रह- रह कर उसके मन को चञ्चल करने लगी । परन्तु सारन्धा का भय और उसकी अप्रसन्नता उसे डॉवाडोल कर देती । जब चम्पतराय दिल्ली छोड कर महोये वापिस आए, उस समय दारा के साथ का विरोध बढ गया उस
रानी सारन्धा
११८
अपने वैर शोधन के लिये चम्पतराय ने यह अच्छा अवसर
देसा । उसने औरगजेय को सहायता देने की स्वीकृति भेज दी।
परन्तु जर सारन्धा के कानो मे यह समाचार पड़ा तो
वह जल गई। तुरन्त पति के पास आ कर पूछने लगी-
"क्या यह सत्य है कि आपने औरंगजेब को सहायता दने का
पत्र भेज दिया है ?"
चम्पतराय--"हाँ, यह सत्य है"।
सारन्धा-"आप के लिए यह उचित नहीं था। मुझे आप की
उतावली अच्छी नहीं लगती । आपका यह कार्य देश के
लिए कुठाराघात सिद्ध होगा । यह समय अपनी शक्ति बढाने
का है, न कि व्यर्थ खर्च करने का । देश की स्वतन्त्रता
का इस तरह सत्यानाश हो जायगा । क्या हमारे लिये यह
ठीक है कि हम दूसरो को अपने अधिकार से वचित करें ?
गद्दी का अधिकारी दारा है, न कि औरङ्गजेन । औरङ्गजेय के
इस उद्याग को मैं धर्मानुकूल नहीं समझती । आप औरङ्गजेष
को सहायता दे कर फेवल महापाप मूल्य ले रहे हैं"।
चम्पतराय ने हस कर कहा-"तुम पगली को क्या पता कि
इस समय किस राजनीति का आश्रय लेना है"।
सारन्धा ने क्रोध में आकर उत्तर दिया,--"उस राजनीति को
कुएँ में डालो, जिस में धर्म की पुट नहीं" ।
चम्पतराय-"प्राणप्रिये । तुम सत्य कहती हो पर अव
क्या कर सकता हूँ। वचन दे चुका हू । वचन मोडना तो अम
ठीक नहीं !
PAL वीर और वीराङ्गनाएँ को अपने साथ मिला लिया। जब उनकी समिलित सेना धौल- पुर के पास चम्बल क तोर पर पहुँची, तो सामने देखा गया कि दाराशिकोह एक महती सेना लिये तैयार खड़ा है । इतनी भारी शाही सेना को देख कर औरङ्गजेब की सुध- बुध उड गई। उसके लिये दारा पर विजय पाना टेढ़ी खीर थी। वह आश्चर्य मे पड कर सोचने लगा कि अब क्या किया जाय । उसने लडाई से पीछे हटना भी ठीक न समझा 1 दिल्ली के सिंहासन का लोभ उसे पीछे कहाँ जाने देता था। इस दुविधा में पड़ कर औरङ्गजेब ने चम्पतराय को यह पत्र लिसा--"आप वीर पुरुप है, घुन्दलखण्ड की जान हैं । मैं महासागर के भंवर में पड़ा हुआ हूँ । इस विपत्ति के समय सिवा औप के मेरा कोई आश्रय नहीं । खुदा के लिए मेरी इस मॅझधार में डगमगाती हुई नौका को पार लगा- इये। अगर आपने मेरी सहायता की, तो मैं आपका सदैव कृतज्ञ रहूँगा। इस पत्र को पाकर चम्पतराय बार-बार पढने लगे। पढते ही दिल्ली का वह ऐश्वर्य-भोग, वह रागरंग उसके मन की बालों के सामने चक्कर लगाने लगा। दिल्ली में कैसे आनन्द से दिनफटी होती थी। इस तरह दिल्ली की याद रह- रह कर उसके मन को चञ्चल करने लगी । परन्तु सारन्या फा भय और उसकी अप्रसन्नता उस डांवाडोल फर देवी । जर चम्पतराय दिल्ली छोड़ कर महोय वापिस आए, उस समय दारा के साथ का विरोध बढ़ गया - था रानी सारन्धा ---"प्राणप्रिये । तुम सत्य कहती हो पर अब अपने वैर शोधन के लिये चम्पतराय ने यह प्रच्छा अवसर दसा । उसने औरगजेब को सहायता देने की स्वीकृति भेज दी। परन्तु जर मारन्धा के कानों में यह समाचार पड़ा तो वह जल गई। तुरन्त पति के पास आ कर पूछने लगी- "क्या यह सच है कि आपने औरगजेन को सहायता देने का पर भेज दिया है ?" चम्पतराय--"हाँ, यह सत्य है"। सारन्धा-"आप के लिए यह उचित नहीं था। मुझे श्राप की उतावली अच्छी नहीं लगती । आपका यह कार्य देश के लिए कुठाराघात सिद्ध होगा । यह समय अपनी शक्ति बढाने का है, न कि व्यर्थ खर्च करने का ! देश की स्वतन्त्रता का इस तरह सत्यानाश हो जायगा । क्या हमारे लिये यह ठीक है कि हम दुसरो को अपने अधिकार से वचित करें ? गद्दी का अधिकारी दारा है, न कि औरङ्गजेब । औरङ्गजेब क इस उद्योग को मैं धर्मानुकुल नहीं समझती । आप औरङ्गजेब दिया,-"उस राजनीति को है । वचन मोड़ना तो - को सहायता दे कर फेवल महापाप मूल्य ले रहे हैं। चम्पतराय ने हस कर कहा-"तुझ पगली को क्या पता कि इस समय किस राजनीति का आश्रय लेना है"। सारन्धा ने क्रोध में आकर उत्तर कुएँ मे डालो, जिस मे धर्म की पुट नहीं"। चम्पतराय- क्या कर सकता हूँ। वचन * ठीक नहीं"।
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"
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वीर और वीराननाएँ
हुए ! दारा अपनी जान बचा कर लाहौर और मुलतान की ओर
भाग गया । अपनी पत्नी की वीरता देख चम्पतराय चकित
हो गये । उसका तो अग अग प्रफुल्लित हो उठा।
इस विजय के बाद जर औरगजेब की सेना ने लूटना
श्रारम्भ कर दिया तब चम्पतराय की दृष्टि एक सुन्दर घोडे
पर पड़ी । यह घोडा सज्ञाविहीन अपने स्वामी शाही सेना
के सेनापति बलीबहादुर के पास खड़ा अपनी दुम से उसकी
मक्सियाँ उड़ा रहा था। घोडे की यह स्वामि-भक्ति देस चम्पतराय
फा जी भर आया। उसे भी सुन्दर घोड़े रखने का बडा शौक था।
हुक्म हुआ कि जो इस घोडे को पकड कर लायगा उसे बहुत
इनाम दिया जायगा । कई बुन्देलो ने यत्न किया पर घोडा
किसी के हाथ न आया । अन्त में बड़े प्रयास के बाद वह
घोड़ा सारन्धा के हाथ लगा।
तब औरंगजेय भारत-सम्राट् बन गया था। उसने चम्पतराय
को अनेक उपहारों से प्रसन्न कर दिया | उसे
प्रोडछे से
बनारस तक का प्रान्त दे दिया । अब वह मनसबदार वन
गया । चम्पतराय फिर विलास-सामग्री को, पाकर रागरंग में
आसक्त होने लगा । वह सारन्धा के मातृ-भूमि के प्रेम को,
उसक सद-विचारों को बिल्कुल भूल गया।
बैचारी सारन्या फिर शोक-सागर में डूबने लगी । मेरा
पति इस देश के राजा का दास बन कर रहे-इस बात का
उस बड़ा दुख होने लगा। वह दिन-रात इस अधेड-बुन में
पड़ी रहती। इस चिन्ता में न उसे अन्न अच्छा लगता और न
पानी हो । वह बार-बार पति से कहा करती-"मुझे वनों में
-
रानी सारन्धा
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रहना स्वीकार है, बन के पत्ते साकर, मरने का पानी पी
कर कण्टकाफीर्ण शय्या पर मो कर अपने दिन पूरे कर
लूगी, पर इस दिल्ली में अन्य राजा की छत्रछाया में रहना
म्वीकार नही । आपके जीवन पर मुझे गेना आता है कि
आप अपने कर्तव्य को, अपने आदर्श को और अपनी मातृभूमि
को भूल गए।
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रण में उसने
हमारी नायिका की तृतीय घटना हमारे दिलों को हिला देने
वाली है । उस घोडे के कारण उस पुगल का अन्त अब निकट
है। यह प्रन्तिम घटना इस प्रकार है-
सेनापति बलीवहादुर स्वरथ हो गया
जो वीरता दिवाई थी, औरगजेब उससे बहुत प्रसन्न हो गया ।
वह सुन्दर और समझदार घोडा उसक हाथ से निकल गया,
इस बात का उसे बहुत दुस था। एक दिन चम्पतराय का
लड़का उस घोड़े पर सवार हो कर बलीबहादुर के घर के पास
वाली सड़क पर जा रहा था
। इस अवसर को देग्य कर
चलीवहादुर के आदमियों ने लड़के से घोडा छीन लिया ।
बेचारे लडके ने घर का रास्ता लिया, घर आकर माता को
सारा हाल कह दिया।
यह बात सुनते ही रानी सारन्धा अगार उगलने लगी ।
वह तुरन्त ही कुछ सैनिक ले बलीबहादुर पे घर की ओर
बवाना हुई । उमफे पहुंचने से पहिले ही सेनापति उसी घोडे
पर सवार हो कर दरबार में चले गए थे। सारन्धा भी उसी दम
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वीर और वीरागनाएँ
दरबार में बैघडक पहुँच गई । सारन्धा को युद्ध के लिये तैयार
देस दरबार में हलचल मच गई। उस दरबार में ही सारन्धा
ने सरोप बलीवहादुर मे कहा-"मेनापति | चम्बल युद्ध में तो
आप अचेत पडे थे, आपके शरीर पर मक्सिया भिनभिना रही थीं,
परन्तु शोक और लज्जा का स्थान है कि आपने एक छोटे से
चालक पर अपनी वीरता दिखाई।
वलीनहादुर ने भी गुस्से मे श्राफर कहा- 'किसी गैर को
मजाल नहीं कि वह मेरी चीज़ को अपने काम मे लावे"।
माग्न्धा-"वह चीज अब आपकी कैसी। अब तो वह मेरी
चीज है । मुझे वह युद्ध में मिली थी। अब आपका उम 'पर कुछ
अधिकार नहीं | आप जैसे सेनापतिको यह नियम जानना चाहिये"
वलीवहादुर-"मुझे यह नियम मालूम है । पर उस घोडे के
बदले अपना सारा अस्तबल देने के लिये तय्यार हूँ"।
सारन्धा-"मुझे स्वीकार नहीं । मुझे अपना घोडा वापिस
दीजिए"।
बलीवहादुर-"वह घोडा नहीं मिल सकता। उसके तौल के
जवाहिरात कहो तो में देने को तय्यार हूँ"।
सारन्धा-“यदि मुझे अपना घोडा वापिस नहीं मिलता तो मैं
इमका निर्णय तलवार से करूँगी।
मारन्धा के म्यान से तलवार निकलते ही बुन्देले भी
अपनी अपनी तलवार निकालने लगे । सन्नाट अपने सिंहा-
मन पर बैठे यह कुतूहल दम्ब रहे थे । अब वे सभल फर
थान
,
+
रानी सारन्या
योने-"रानी माहिया
को मायदा की वय
जरत है । आपका घोडा मिल भायगा, पर यात्रा कामन
पती पडेगी।
सारन्धा--"ओ पुष्प दन को तैयार है।
मन्नाट-"क्या अपनी जागीर भी।
सारस्था-"यह भागीर मरे मामने सुध पीन"।
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१२६
चीर और वीराङ्गनाएँ
जाने से इस दुर्ग की स्त्रियों और बच्चे तो बच जायगे।
ये बेचारे गेहूँ मे धुन की तरह, क्यों पिसें । हम पर
जो बनेगो, निपट लेंगे । जन उसली में सिर दिया तो
मसल वा डर क्या" सारन्धा के कहने पर चम्पतराय
सैयार हो गया । सारन्धा अपने पति को पालकी में सुला
कर उस अंधेरी रात में कुछ साथियो के साथ दुर्ग के
गुप्त द्वार से बाहर निकल गई।
सारन्धा रोगी पति को साथ ले कर जगलों में भटकती रही।
तीन दिन तक उन्होंने अन्न के दर्शन भी न किये । उन्हें
कहीं भी आप्रय न मिला । एक दिन बन मे सहसा शाही
सेना का कोलाहल सुनाई दिया । सारन्धा वहीं रुक गई।
युन्देल वीरों ने अपनी नलवारें सींच ली । अपने स्वामी के
प्रति अपनी अतिम सेवा समझ वे दिल खोलकर लडते रहे।
।
-
चम्पतराय ने अपनी डोली से बाहर निकल कर
धनुप की प्रत्यञ्चा चढ़ाई, पर धनुप हाथ से गिर पड़ा।
ज्वर के कारण शक्तिहीन पम्पतराय का कलेवर कॉप रहा
था। वह तत्क्षया धरती पर गिर पड़ा । पति की यह दशा
देस सारन्धा का पाखो से अश्रुओ की धारा बहने लगी।
उसे शीतलादवी का रोना भी याद आ गया । उसने अपने
पति को गोद में बैठा लिया । पति को यम के द्वार पर
पड़ा देख सारन्धा साधारण स्त्रियों की नाई इतवीर्य हो गई।
फहीं मेरी आर्खा क सामने शत्रु मेरी स्त्री को स्पर्श न
कर बैठ-इस विचार से चम्पतराय ने अपना अन्त करने के
"
रानी मारल्या
लिए तलवार की ओर हाथ बढ़ाया पर उस समय हाथ में भी
आगे बढ़ने की शक्ति न थी। इस मिया को देस मारन्धा ने
तुरन्त तलवार उठा ली, उसकी नोक अपनी छाती में लगा ली।
चम्पतराय ने तत्क्षण सारन्धा को रोक कर कहा-
सारन्धा ! मुझे शत्रुओं का कैदी मत बना। क्या तुम सहन
कर सकोगी कि तुम्हारे भरने के बाद तुम्हारा पति दिल्ली में लोहे
के पिंजरे मे बन्द रहे । अब यह तुम्हारी आन किधर गई।
सारन्धा--"भगवान् बन्दी होने से पहले मृत्यु दे दें"।
चम्पतराय-"तब मेरी यह अन्तिम याचना है कि यह
तलवार पहले मेरी छाती मे घुसेड दो।"
इस बात को सुनकर सारन्धा की आँसो के आगे अन्धकार
छा गया। वह असमजस में पड़ गई । आर्य पत्नी के लिए
यह अनोसी बात थी कि अपन हाथो से पति का गला काट,
पर थान के लिये वह अपने पति को भी न्योछावर करना
जानती थी । ज्यो ही शाही सेनापति चम्पतराय को बन्दी
बनाने के लिये आगे बढ़ा, उसी पल में सारन्धा की तलवार
धमकी, चम्पतराय की छाती में प्रविष्ट हो गई।
यह अपूर्व वीरता देस मुगल सेनापति दांतों तले उंगली
दवा कर सडे रहे । कहने लगे-"रानी साहिबा । माफ
कीजिए । अब जो कुछ आप हुक्म करेगे, हम बना लाएँगे"।
सारन्धा- 'इस बन में काफी लकडी पडी हुई है। कोई
बुन्देला मिले तो हमारे मृत शरीरो की चिता
आग लगवा देना। इस मे आप की मिहरबानी होगी"
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