Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Ishopanishat Hindi Vigyanbhasya Khand-ii

Sharma,motilal · 2012/08

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(२) गया था। साथ ही में कमेटी से लिखितरूप में यह प्रतिज्ञा की गई थी कि "५ सहस्र रु० की लागत के हिन्दी-वैज्ञानिक अन्य स्थानीय श्रीवालचन्द्र ई० प्रेस से प्रकाशित कर दिये जायगे। तदनुसार एक यार के भीतर भीतर हमनें लगमग २॥ सहब के व्यय के दो खण्ड प्रकाशित कर दिए हैं। लिखित प्रतिज्ञानुसार व्यय के हिसाब के साथ प्रकाशित खण्डों की १०० प्रतिएं कमेटी की सेवा में मेन दी गई है। बाकी बचे हुए ऋण से भी हम शीघ्र ही मुक्त होने का प्रयास कर रहे हैं । इस सम्बन्ध में कमेटी से, विशेषतः श्रीमतीलेडीलक्ष्मीवाई, एवं रानासाहव श्रीमुकन्दलाननी से यह विनम्र निवेदन करना चाहते हैं कि कमेटी में जो दव्य हमें प्रदान किया था उसका उपयोग पूर्वकथनानुमार प्रकाशन सम्बन्धी सामान में होगा है । ऐसी स्पिति में प्रकाशन जैसा परिष्कृत होना चाहिए या, नहीं होसका है । कमेटी द्वारा प्राप्त सामान से किस प्रकार संकट प्राप्त वन कर इम दो खण्ड कमेटी के सामने रखने में समर्थ होसके हैं, इस का पूरा विवरण "हमारी यात्रा, और वैदिकस हिस" नाम के वक्तव्य से कमेटी को विदित होगा । इन सब संकटों के रहते हुए भी कमेटी को हम विश्वास दिलाते हैं कि अग्रिम वर्ष की समाप्ति तक जैसे भी बनेगा, हम शेष ऋण से मुक्त होने का प्रयास करेंगे । हमें श्राशा है-लेडी साहिवा, एवं राजाप्ताहब हमारी विषम परिस्थिति को लक्ष्य में रखते हुए भविष्य में भी रम साहित्य पर इसी प्रकार अनुप्रदृष्टि बनार सखेंगे । के अनन्तर "उपनिषविज्ञानभाष्यभूमिका" का प्रयम खण्ड प्रकाशित होगा । यह भूमिका २०० पृष्ठों में सम्पन्न हुई है । इसी लिए इसे भी दो खण्डों में ही प्रकाशित करने का निश्चय किया है । इस में निम्न लिखित विषयों का समावेश हुया है- . . इस -१००१ 1-प्रारम्भिक वक्तव्य-- २-पनपाउरहस्य------ ३-उपनिपन गन्द का अर्थ-१०० ४-या उपनिषत् वेद है ! -१२० भूमिकाप्रथमखण्ड । (लगभग २४) UP HB NYATHS UBRART tattoos (५)-!-उपनिपदों में क्या है ! S.No- (६)-२-उपनिषद ज्ञान का अधिकारी कौन है ? (७)---उपनिपत हमें क्या सिखाती है ? (८)-४-औपनिपद शान के प्रवर्तक कौन थे ? (२)-५-प्राह्मण-आरण्यक-उपनिपत में परस्परमें भूमिकादितीयखण्ड क्या सम्बन्ध है? (१०)-६-श्रुतिशष्दमीमांसा, एवं एकेश्वरवाद पर एक दृष्टि। ( लगभग ५०० पृष्ठ) प्रकाशित दोनों खण्डों के सम्बन्ध में हमें अपने प्रेमी पाठकों से यह निवेदन करते हुए सजा का अनुभव होता है कि प्रकाशन में अशुद्धियों को आवश्यकता से अधिक स्थान मिला है । कारण इसका यही है कि अध्ययन के कार्य में संलग्न रहने कारण हमें समय बहुत ही कम मिलता है । साथ ही में अर्थसम्बन्धिनी जटिल समस्या के कारण हम इस कार्य के लिए स्वतन्त्र व्यक्ति रखने में भी असमर्थ हैं । इन्हीं सारी परिस्थितियों को लक्ष्य में रखते हुए पाठक उक्त अपराध के लिए हमें क्षमा प्रदान करेंगे, यही निवेदन कर हम अपनी संक्षिप्त प्रस्तावना समाप्त करते हैं। प्रीयतामनेनात्मदेवतेति-शम् . पालगुन कृष्ण १३ शिवरात्रिः वि० सं०१९९० विद्भिविधेयः- मोतीलालशर्मा,भारद्वाजः जयपुर-राजधानी (अन्धसमास्ति) ईशोपनिषत्-हिन्दीविज्ञानभाष्य-द्वितीयखण्ड की विषयसूची QIDIO अथ - प्राकृतात्माधिकरणे- अव्यक्तात्माधिकरणम् १ (१ पृष्ट से १५१ पृष्ठ पर्यन्त) . विषय पृष्ठसंख्या विषय पृष्ठसंख्या * ३ " * ६--अद्वैत की मीमांसा ७---सजातीय-विजातीय-स्वगतमेद c-~-कल्पित अद्वैतवाद 1--अनीश्वरवादप्रधान जगन्मि- * १ ५ --प्रकृतिवैभव --अधिकरणस्वरूप ३- अव्यक्तात्मातरूपनिदर्शन १--मूलमन्त्र २---मन्त्र का अक्षरार्थ ३--विश्व की द्विनियति ४---द्वन्द्वमान की व्यापकता ५--एकत्र-अनेकर " २ ध्यावाद १०-विश्व का मूल ११--सत्यमुलक विश्व की सत्यता ३ | १२-अमृत मृत्युमय विश्व . ६ women vasnawwwww विषय पृष्ठसरया विषय पृष्ठसस्या १० " " १३-नाम रूप की स यता ६ १७-मन्त्र का प्रतिपाच विषय १४--जगन्मिथ्यात्यवाद की अशास्त्रीयता ७ १८-मनसम्पधी सोपाधिकभार १५-जगत् की सत्यता के समर्थक १९-याहिति एस आधान सम्बन्ध নিসায় २०-मन्त्रोपात्त यज्ञकम १६-मामा के स्वरूपधर्म १० २१-विद्याकर्ममय अन्य इति-विषयोपक्रमः " मन्त्रार्थसम्बन्धिनी-त्रयीवेदनिरुक्तिः (१२ पृष्ठ से ३० पर्यत) पृष्ठसरया विषय विषय पृष्टसस्या १८- " " M 1 --ज्ञानसाधक वेद २--मला से सर्वप्रथम वेद का प्रादुर्भार -वेद के चार विभाग --अग्निवेद, सोमनेद ५--यमितत्व का निर ६--दाव-दाशमार -तेज-स्नेहमार ---याग्निमयी मटिं र-कर्मपुहल -क्रिया श स्वरूप ११-कम्पन एव गति का तार- म्य ( हल-चल) -यग्निपिण्डा मर शरीर १३-प्राणाग्नि का विस्रसन १४-उम्मीच्या अग्नि १५-प्राण-भूत मैद से अग्नि के दो विवर्त" १६-विशक्लनधमा यमि १५ १७-सकोचधमा सोम १८-रयि-प्राण " " " विषय पृष्ठसंख्या विषय .पृष्ठसंख्या २३ २४ " " २५ " " " " " " १९-- अग्नीपोमात्मकं जगत् २.--सत्याग्नि,देवाग्नि,भूताग्नि २१– अग्नित्रयी (वयीवेद) २२ –सोमवेद (अथर्वद ) २३-सायतन-निरायतन सोम २४-यामवेदोपक्रम २५-उक्थ-ब्रह्म-साम २६-प्रात्मवेद में त्रयीवेद २७-प्रतिष्ठावेदोपक्रम २८-प्रतिष्ठात्रयी २६-धतिखरूपनिर्वचन - असतोधृति ३१--सतोधति ३२-प्रतिष्ठावेद में त्रयीवेद ३३-ज्योतिर्वेदोपक्रम ३४--पञ्चज्योति ३५-मूलज्योति ३६-सत्यज्योति ३७- ज्योति, चेतना, पानंद ३८-सच्चिदानन्दधन वेद ३९-अग्निवेदविवर्त १०-अनन्तवेद ११-त्रयोगर्भित भूतप्रपञ्च १५५२-प्राजापत्यवेद ४३-वेद से प्राप्ति -वेदि, वेद, यज्ञ, प्रजापति " | १५-पुष्करपण १६ | ४६-भर की उत्पत्ति -चतुर्मुखब्रह्मा :-क्षीरसमुद्र १७ | १६-सरखती ५०-नारदऋपि ५१-~सरखान् समुद्र ५२-प्राकृतिक अग्न्याधान अग्निहोत्र दर्शपूर्णमास चातुर्मास्य पशुबन्ध ज्योतिष्टोम २० अग्निचयन ५९--कृष्णाजिन २१ ६०-मातानयज्ञ ६१. महापृथिवी २२६२-प्रजापति के रम २३ ६३–नियति वेद ६४-मूर्तिभाव म " " " " " " " 4 , २१ .

[] विपय पृष्ठसंख्या विपय पृष्ठसंख्या ६५-गतिमान ६६-तेजोमार ६७–वेदतालिका त्रयीवेटनिरुक्ति-समाप्त मन्त्रार्थसम्बन्धिनी-अथर्ववेदनिरुक्तिः (१ पृष्ट से ४६ पर्यन्त) . विषय पृष्टसख्या विषय पृष्टसरया ३६ ३६ समन्वयमूलाराष्टि -प्राणामितोम --भिन्नसत्ता १४--सत्सानि १५~~यज्ञाग्नि - " " ३२ १५- " " " " ३७ ८-- ४-दाम्पत्यमान ५--एमाफी न रपन -विरानि स्ति ७- चातुपपुरुष -इन्दितमस्तु नपुन्मक माम १०-मयुपसि "-पेद से परमितान १२-नियनिपाइ "-शामि १६-प्रमाग्नि (प्राणानि) १७-देवानि (मागानि) -भूताग्नि (अन्नादाग्नि) १९-वानराग्नि (लाग्नि) -विवरण-प्रतिष्ठा २१-रूप-विकास ३१२०-पाक-लिएन 2-अग्निप्रजापति ३५२४--ग्रामोपत्ति २५-~मरीची की पत्ति २६-मर यी उपद्धि " " E ३ " । " विषय पृष्ठसंख्या विषय पृष्ठसंख्या ४२-बलाण्ड का उदय 1 २७--पदा की उत्पत्ति २८--परिश्रमजन्य थन्नु २९-ललाट से स्वेदोत्पत्ति ३०-प्रेम के प्रश्न " " ३१-शोक के अधु " " " " १३-धाराबल की उत्पति ४४--जायावल की उत्पत्ति १० ४५-प्राणी के चार जन्म ४६---याप्तिया की उत्पति १५--कमल-निरुक्ति ४९-अलभाव ४९-जीवनश्लोत्पत्ति ५०--जीवनशक्ति ४२५१-मृतबल । उत्पत्ति ५२--सप्तत्व की व्यापकता ५३--सुवेद का प्रादुर्भाव ५४--स्वेदवेद ४३५-बल-सुबह "५६-गोपयश्रति अथर्ववेदनिरुति-समाप्त ३२-प्रेमविपत ३३-वात्सल्यभाव ३४-श्रद्धाभाव ३५-स्नेहभाव ३६-काममाव ३७.-रतिभाव ३८-बन्धन-मुक्तिरहस्य ३६-महामाया १०-अनतिप्रश्न ४१-ईभरेच्छा " " " ४८ " " मन्त्रार्थप्रकरण (५० पृष्ठ से ११५ पर्यन्त) विषय पृष्ठसंख्या विषय पृष्ठसंख्या १---सृष्टि के अनुबन्ध २---भृगुतम्य ३---झार और मधुररस -भर्जनशीलतत्व विषय पृष्टसंख्या विपय पृष्ठसंख्या 17 " " " ५--रेत का भूगुभात्र न्यरुणपुत्र-मुगु ७--दीपशिखा-अगिरा -दीपप्रमा-भूगु -मृद्गु ५१ | २८-'श्रय-अवीक' अपी २९-सर्वप्रयमज वेद ३०-गायत्रीमात्रिक वेद ३१-पौरुषेय वेद ५२ ३२--प्रात्वण्ड ३३-पोषाण्ड ३४-यशोऽण्ड ३५-रेतोऽण्ड ३६-व्योम " १०-प्राणवायु " " " " ५४ ११--पवमान वायु •१२----मातरिया बायु १३-सविता यायु १४-दिग्मेद से वायुविभाग १५-पातपायु १६-पयमान, पायक, शुचि १७--अपप्राणहाप १८--भपासून ११-गल्याप्रयोग २०-भागीय का संकमण २१--पपीगिरा १२--गुनमा मार्ग २३-प्रमा वा पेर म २५-मधुरसानी २१-पारानी २६-मासस २७-air ३८-प्रसाण्ड ३५-सूर्यनारायण ४०-सत्सावतार ४१--मल, वेद, प्रयी, अग्नि ५२-मुबम, सुवेद, श्रर्य, सोग " " 11 " १५ | ४३-पिया, हिपनि, घाफाश, पाक, जू.६. - काम, गति, यार, प्राण, पद ४५-अमृत-मयांकाश ४६-अमृत-मर्यगर ५६ ४७- देवता १८-१६ भूतम् १४-पुष्प पर्ने गम् ५०-या " " विषय पृष्ठसंख्या विषय पृष्ठसंख्या ५१-व्याख्यातामों का मातरिश ५२-पारमेष्ठप मनोता " ५.:-पड्मा " " " " . " " . ६.७५--भूपृष्ठ-अव्यय ६५' ७६--सूत्र-सूत्रवायु ६२ ७७-चक-यजुर्वेद ७८- -मिट्टी-दरभाग ७६-दण्ड-ध्रुवनियति ८०-पानी-पापोमपब्रह्म ८१--कीलक-विश्वनामि ६३ | ८२---घटात्मक-मलाण्ड ८३---उखारूप-अह्माण्ड -भूलोक-बुघ्न ८५--मुवोक-उदर ८६--खोक-मुख ८७--धटनिर्माता, विश्वनिर्माता में स्पा, ८-अनेजदेजत का एकनसमन्वय गतिस्थिति का समन्वय ២ १०-मनसो जवीयः २१-देवसृष्टि ६५ १२--इन्द्रियदेवता १३-पूर्वमर्पद २४-देवताओं का पराभव . १५-महतोभूत मायी महेश्वर १६-मन्त्र के तीन पाद ७१ १७-मन्त्र का चौथा चरण " ५४-इन्द्रपत्नी ५५-बाड्मयमूत ४६--वेदयाकू ५७-~-आकाशात्मिका वाक् ५८--पाटकौशिक विवर्त ५१--प्रारमन्त्री प्रजापति -अनेजदेजत् ६१--अवयवगति ६२--अवयवीमति ६३--उमयगति ६४--गतिस्थिति का दिग्दर्शन ६५--कुम्भकार प्रजापति ६६-प्रजापति का धरातल ६७--घट का निमित्त कारण उपादानकारण ६२-" सहकारीकारण ७०--बौद्धघट 07--घटस " " " " " M " ७२-घटोत्पा ७३- --पिठरपाक ७४--कुम्भकार-अक्षर " [ज] विषय पृष्टसंख्या विषय पृष्ठसंख्या ७१ " " " " " " " " " " ५-रेत तन्त्र -योनितर १८०-रेतोधातत्व १०१-सृष्टिप्रवत्तक शिवायु १०२-सृष्टिनिवर्तक यमवायु १०३-पिएडनिर्माता मातरिया १०४-पिण्डशन की व्याप्ति १०५-पृथिवी-युलोक १०६-मातरिश्वा का कर्म ०७-अपाशर १०८-मातरिश्वा और वराह १०९-ज्ञानज्योति ११०-स्खयोति "१-पर-योति ११२-रूपज्योति ११३-आदिवराह ११४-यज्ञवराह १५-पेतमाह ११६-द्रलपराह १७-एमपवराह ११८-साप ११२-याराही उपान 100-गोधमूर्तिकर १२१-वराहलला ७६ १२२-पान और शूकर १२३-अन्त्यज और शूकर पशु १२४-मलविशोधक अन्त्यज १२५-मलविशोधक शकरपशु १२६-सा लिए पुरुप हैं १२७-मन्त्रप्रमाण १२८-श्रीसायणाभिमत अर्य १२६-सन पुरुष लिए है ३०-सायणभाष्य और कर्मकाण्ड १३१-सायणभाष्य में विज्ञानदृष्टिका अमाव" १३२-मन्नशब्द का निर्वचन १३३-ऋट् मन्त्रसम्बन्धिनी आत्मविप- पिणी भावना का उपक्रम ७८ १३४-सायम्भुन ब्रह्माता १३५-सौर दैवात्मा " " 7 " १ " " २३६-पार्थिव भूतात्मा १३७-उपनिषदों का प्रारमा १३८-त्रयीनेद वा यात्मा १३९-आगम शास्त्र का श्रात्मा ७५ | ४०-केनोपनिषत् की सम्मति १४-ज्ञान-काम-धर्मात्मा ७६ | ११२-श्रामविकास का दिग्दर्शन " " " " " 40 ₹१ " . ८१ " " " " M " " ८७ चिपय पृष्ठसंख्या विषय पृष्टसंख्या १.४३-यात्मविवत्तपरिलेख १६६-क्षरोपासना १४४-त्रिपात् पुरुष की विभूति ८२ १६७-काण्डत्रयी १४५-आत्मविश्चों की व्याप्ति ८३/१६८-उपनिषत्काल की उपासना १४६-त्रिपात् अक्षरपुरुष १६६-उपासना का यर्य १४७-निपात क्षरपुरुष १७०-उपासना का अर्थ १४८-एक ही मामा के तीन विवत ८५ | १७१-मृत-मूर्तिब्रह्म १४९-चेतनसृष्टि ८६ / १७२-नही की उपासना १५०-अईचेतनसृष्टि १७३-अङ्ग की उपासना १५१-घचेतनसृष्टि १७१-उपासना का प्रथमस्तम्भ १२ १,५२-बलात्मसृष्टि १७५-उपाना का द्वितीयस्तम्भ १५३-दैवात्मसृष्टि " | १७६-पीपल-बट-तुलसी घादि की उपाना " १.५४-भूतात्मसृष्टि १७७-भगवत्प्रतिमाओं उगसना १५५-प्रथमाधिकारी १७८-शालग्राम की उपासना १५६-मध्यमाधिकारी १७६-त्रिमूर्ति श लगाम १५७-उत्तमाधिकारी १८०-वदासीनभाव १५८-सर्वभूतान्तरात्मोगसना "१८१-प्रकृतिभाव १५६-हिरण्यगर्भोपासना 1८२-विकृतिभाव १६०-अश्वत्योपासना १३-स्त्रीरूप ब्रह्मागा १६१-प्रोकारोशसना १८१-क्षेत्र में वोयाहुति १६२-उद्गीयोपासना १५-विश्वयोनि १६३-प्रणवोपासना १६६-विज्ञानवेत्ता कवि १६४-अध्ययोपासना १८७-वृद्धशब्द की व्याख्या १६५-अक्षरोपासना १८८-वैदिक भारपान CE ८९ " 11 " " [a] विपय पृष्ठसंख्या विषय पृष्टसंख्या " " " -रेत ११-योनितत्व १००-रेतोधातन्त्र १.०१-साटिप्रवर्तक शिपायु १०२-सृष्टिनिरर्तक ममवायु १०३-पिण्डनिमीता मातरिया १०४-पिण्डशब्द की व्यान्ति १०५-पृथिवी-धुसोक १०६--मातरिश्मा का कर्म " हैं ৩৩ " " " 11 ७१ १२१-वराहलीला ७२ | १२२-पवन और शूकर १२३-यन्त्यज और शकर पशु १२४-मलकिशोधक अन्यज १२५–मलविशोधक शूकरपशु १२६-सव खिएं पुरुष १२७-मन्त्रप्रमाण १२८-श्रीसायणाभिमत अर्थ ७३ १२६-सत्र पुरुप लिए है १३०-सायणभाष्य और कर्मकाण्ड १३१-सायणमाम्य में विज्ञानदृरिका श्रमाव" १३२-मनशब्द का निर्वाचन १३३-ऋङ्मनसम्बन्विनी प्रात्मविप- यिणी भावना का उपक्रम ७८ १३४-खायामुपमहागा १३५-सौर देवारमा " " १०७-भाशा १०८-मातरिश्या और बाद १.०१-ज्ञानज्योति ११०-सन्योति "१-परल्योति ११२-रूपग्योति 11३-श्रादिवराह १११-यमपराद १५-रनगराइ १९६-मसयराट 1.20-मराह ११-फरपन ११२-पारादी उसनद १२-बोधानिमार " 1 "१३६-पारि भूतात्मा {१३७-उपनिषदों का भामा १३८-प्रयीवेद या श्रामा १३९-भागम शास्त्र का यामा ७५ | १४०-येनोपनिषत् की सम्मति 122-ज्ञान--काम-यात्मिा ७६ | ११२-मामविकास या दिग्दर्शन " " " " " CO " " ८४ " . " " विषय पृष्ठसंख्या विषय पृष्टसंख्या १.४३-श्रात्मवियत्तपरिलेख दा १६६-क्षरोपासना १०. १.४४-त्रिपात् पुरुष की विभूति ८२ १६७-काण्डत्रयो १४५--यास्मवियत्तों की व्याप्ति ८३ | १६८-उपनिषत्काल की उपासना १४६-त्रिपात् अक्षरपुरुष १६९-उपासना का अर्थ १४७-त्रिपात क्षरपुरुष १७०-उपासना का अर्थ १४८-एक ही प्रात्मा के तीन विवत ८५ | १७१-मूर्त-मूर्तिब्रह्म १५६-चेतनसृष्टि ८६ / १७२-मनी की उपासना १५०-गाईचेतन सृष्टि १७३-मन की उपासना १५१-अचेतनसृष्टि १७१-उपासना का प्रथमस्तम्भ १२ १५२-ब्रह्मात्मसृष्टि ७ १७५-उपाना का द्वितीयस्तम्भ १५३-दैपाध्यमृष्टि १७६-पीपल-बट-तुलसी आदि की उपाना " १५४ -भूतात्मतृष्टि ९७७-भगवत्पतिमाओं उगसना १५५-अपमाधिकारी १७८-शालग्राम की उपासना १५६-मध्यमाधिकारी ५७६-त्रिमूर्ति श लग्राम १५७-उत्तमाधिकारी १८०-उदासीनभाव १५८-सर्वभूतान्तरात्मोगसना १-१-प्रकृतिभा १५६-हिरण्यगर्भोसना १८२-विकृतिभाव १६.-अश्वत्योपासना १८३-स्त्रीरूप ब्रह्मात्मा १६१-प्रोङ्कारोपासना १८४-क्षेत्र में बीयाहुति १६२-उद्गीयोपासना १८५-विश्वयोनि १६३-प्रणयोगसना १८६-विज्ञानवेचा कावि १६४- ३४-अध्ययोपासना १७-बृद्धशद की व्यापा १६५-भक्षरोपासना " , FC " " " " " " 11 " " १८८-वैदिक पाख्यान " । म] ARAN पृष्ठसंख्या " " " . " " " " " विषय पृष्ठसंख्या थिपथ १६१-पितुष्पितासत १६२११-संकोच-विकास १९-रश्मिविपरिणीभावना २१२-नि:सीमभाव शत्रुता का प्रवत्तक " का उपक्रम २१३-एति-प्रेति १२१-यात्मा-प्राण-पशु २१४-समिदाग्नि १९२-परोरजाप्राण १७ २१५-सामिधेनी १९३-भाग्नेय-सौन्यप्राण २१६-भूगुजयी १९४-स्थूलभूत २१७-अगिरानयी १९५-पुरुषप्रजाति २१८-स्त्री का पुरुपर १९६-कविभृगु २.६-पुरुष का स्त्रीस्व १२७-विराट् पुत्र २२०-स्त्रीकामुक पुरुप १९८-रश्मिमार २२१-पुरुषकामुका स्त्री २११--स्त्रीरूप रश्मिएं १८ २२२-मंगलग्रह २००-शुक्रविपयिणीमानना २२३--मकरराशि और मंगल का उपक्रम २२४-मकरध्वज (काम) २०१-थचेतन अग्नि २२५-पुरुष की प्रजननशकि २०२-प्रचेतन सोम २२६-शुक्रताव ०३ २०३- याज्ञिकीसृष्टि २२७-मीनराशि भी शुक्र २०४-मैथुनीसृष्टि २२८-मीनवज [काम] २०५-परपनत्री २२१-शसितस्य २.६-शरीररचनामेद २३.-शिरताप २०७-याश शरीर २.:-शोमल शरीर २०१-सोप एक २१-मानेपोषित " " " " " " " " " " " २३१-शिवशहिः का समन्वय २३२ शीतत्तु और अन्तःपृष्ट "२३३-पीपातु और अन्त पृष्ठ "] २३४-प्रकृति का वैषम्य . " " ". . " " " " २५५-प्रजोत्पत्तिक्रम विषय पृष्ठसंख्या विषय पृष्ठसंख्या २३५-अमिप्रधान पुरुपशरीर १०४ २४९-पितुष्पितासत् १०७ २३६-सोमप्रधान पुरुषात्मा " | २५०-ऋड्मन्त्रार्योपसंहार २३७-सोमप्रधान स्त्रीशरीर २५१-एक्यामरुन् २३८-घाग्निप्रधान स्त्री का आत्मा २५२-योनि में शुक्राहुति २३६-त्री का सौम्य भ्रूण २५३-रेतोधा मातरिश्वा २४०-पुरुष का आग्नेय भ्रूण २५४-वायुवाहिनीनाडिए २४१- भ्रूण-सीभ्रूण २४२-त्रिसत्य देवता १०५ / २५६-अधिदैवतसंस्था २४३-प्रजननकर्म का त्रित्वभाव " | २५७-मन्त्रार्थसहति का उपक्रम २४४-प्रयमाक्रमण २५८-दशिनी विराट २४५-द्वितीयाक्रमण ११२ २४६-ड्मन्त्रसंगति १०६ | २६०-पुण्डीर वयम्भू २४७-कविपुत्र का रहस्यार्थ १०७ / २६:-प्रनेजदेजत् प्राकृतात्मा २४-जायाभाग २६२-शान्तात्मा मन्त्रार्थप्रकरण-समाप्त । " २५६-मन्त्रार्यक्रम " " . अव्यक्तात्माधिकरण में ब्रह्म-कर्मसंबन्धाधिकरण (११७ पृष्ठ से १५१ पपन्त) -~-सम्बन्ध प्रतिपादकमन्त्रपरिलेख ११७ २---सम्बन्धनिरुक्ति का उपक्रम --प्रकृति के द्वारा विश्वनिमीण ४.-ब्रह्म-कर्ममय मव्यय ५-विश्वात्मा-मझ " " [] विषय पृष्ठसंख्या १२० " " " " " " २१-प्रारब्धसम्बन्ध ३०--श्रौद्भाविकसम्बध ४-सातानिकसम्बन्ध ३२- विवसम्बध ३३-बैंकल्पिकसम्बध ३४-ऐन्किसम्बन्ध ३५-औपणादिकासम्बन्ध ३६---परिणामी सम्बन्ध ३७–रसानुवृत्तिमसम्बध -सायोतिषसम्बन्ध 38-थोपादानिकसम्बन्ध १०-सानामिकसम्बन्ध ४-धाकभिकसचारीसम्बन्ध ४२-प्रमालम्पन -प्रभरविल- " विषय पृष्ठसंख्या ७----महा-शुक-विश्स ८--यमृत-ब्रह्म-शुक विश्व ---ईश के प्रतिपाच विषय १०-अव्यक्तनिरूपकमन्त्र ११---विकृतितत्यनिरूपकमन्न १२० १२-कारिक्तावनिरूपरमात्रभाग १३-कारणताचतुष्टयी १४-चतुष्पाद थारमा १२१ १५-चतुष्पात ब्रह्म १६-थरारा गायत्री १७.--गापरब्रह्म की व्यापयता १८-यापरिलेस १२२ १६---प्रकृतिपुरुषनिरूपणानिया इशोपनिषत् -धिवरणयी २१-मनों या विषयानुमार विभाग চায়েল १२३ २२-पिपारिता 1:-राय निवासा १२६ २५-दार्शनिक पहिया सम्बन्ध -५-गुमायध २६-मितपम यंध २७-तिरसम्बन्ध २८-निगान्ध " C " " यना नानिलयना-प्रभाषा चरत्वमम्मट २) ४३-~प्रमालम्पनन्य-प्रमाविलयन प्रमपृयश्चराय सम्पन्न (२) ४४-प्रमगलम्बन वालम्बन प्रमाविलयनय, प्रमय- चायमापन्ध (३) १२. ४५-प्रमयानालन्दन -प्रमगरिसपनार- प्रमरपाचस्यसम्बन्ध (1) " MAAS ATIYA PORAN " " " " ग " " " ASHtm..... विषय पृष्ठसंख्या विषय संख्या ४६-प्रभवालम्बनत्व-प्रभवविलयनत्य ६५-"तदेजति०" मन्त्र का प्रक्षरोध ? प्रभवापृयक्चरस्त्यसम्बन्ध (१) १३, ६६-कृतामा मनुष्य ४७-प्रमवालम्बनवानालम्बनात- ६७-अकृरमा मनुष्य प्रभवविलयनवाविलयनत्व-प्रभव ६:-सव का तारतम्य पृपक्चरत्वाप्स्यक्चरत्वसम्बन्ध (६)" |६६-विषयानुगताबुद्धि ४८-सम्बन्ध में संशय १३४ ७७-अयुक्त मनुष्य १६८ १६-खरूपसम्बन्ध (४) ७१-सर्वज्ञान विमूढमनुष्य ५०-पर्यासवृत्तित्वसम्बन्ध (१) ७२-सम्बन्धभेददृष्टि ५१-धन्धाभतिकृतियसम्बन्ध (५)." ७३-निष्ट द्वयी १३६ ५२--प्रभिन्नसत्ताककार्यकारणभाव- ७१-भेदवाद का निराकरण ५३--(0) कार्य कारण ५४- (२) कारण कार्य में है ७६-मार्यादिकजीव ५५--() कार्य-कारण भिन्न है ७७-प्रायाहिकजीव ५६-~~ (१) कारण ही कार्य है ७८-पुष्टजीव १७- (५) कार्य कारण से अभिन्न है, UE-पुष्टिमार्ग किन्तु कारण कार्य से भिन्न है। -युक्तयोगी ५८- (६) कारण में कार्य अध्यस्त है |८१-युखानयोगी ५६-ब्रह्म कर्म में प्रतिष्ठित है (१)१३६ ८२-यपाजातमनुष्य ६०-कम्म मन में प्रतिष्टि है (२) " ८३-ब्रह्म-कर्ममयी उपासना ६१-ब्रह्म कर्म परस्पर मिल हैं (३) ४-सर्वत्र आत्मभावना ६२-ब्रह्म ही कर्म है (४) ८.-कुम्भकार का चत्र, ,६३–मझ कर्म से भिन्न है, किन्तु ८६-मन्त्रार्थसाति फर्म प्रम से अभिन्न है (५) ८७-अनिर्वचनीयसम्बन्ध १४३ ६४-प्रम में कर्म भास रहा है (६) ८८-प्रोतमोतभावसम्बन्ध १३५ / ७५-विधेयमात्मा " " " " " ८०- " . " 1 [] -------ww " " " " " विषय पृष्ठसंख्या विपय पृष्ठसंख्या -अन्तरान्तरीभारसम्बन्ध १०६-मन्नार्थोपसंहार २०-आधारावेयभावसम्बन्ध १०७-७ मन्त्राथों क्रिम २१-भेदसम्बन्ध १०८-सर्वत्रणामभावना १२-अमेदसम्बन्ध "१०९-मोहकलिलावृद्धि २३-भेदाभेदसम्बन्ध ११०-मोहमूलकशोक २४-मन्त्रार्थोपसंहार ११५ १११-शोकनिवृत्युपाय २५-यात्मनस में कर्मका समन्वय १२-अद्वैतभावकीउपासना १६-स्थूलारुन्धति-याय ११३-"विमानता" शब्दरहस्य १५० १७-६ ठमन्त्रार्थोपक्रम ११४-सामान्यज्ञान १०-मन्त्रका अक्षरा १२५-तास्थिकज्ञान १५-प्रत्यक परागवल ११६-कलौ वेदान्तिनः से १००-युष्मदस्मदप्रत्ययगोचरविषय- १७-"इदमित्यमेव" विषयी ११-उपलालन १०१-ज्योति भावरण ११२-भेदबुद्धिका पारयस्तिक निराकरण " १०२-नि दास्तुतिमात्र १४७ | १२०-प्रातिभासिकद्वैत १०३-विजुगुप्सा १२१-व्यावहारिकद्वैत १.०४-रागद्वेष "१२२-पारमार्थिकअद्वैत १.५-यानन्दनाहि १४८ | १२३-मन्द्रापितहार सम्बन्याधिकारसमाप्त " " " " " " इति-भव्यतात्माधिकरणं समाप्तम [] - अर्थ पाकृतात्माधिकरणे- २- महदात्माधिकरणम् (१५३ पृष्ठ से २५१ पृष्ठ पर्यन्त ) पृष्ठसंख्या १६६ " १६७ M " " " " विषय पृष्ठसंख्या विषय --मइदस्वरूपनिदर्शन १५४ | २१-वेद और प्रजापति २-अष्टादरागायत्री १५७ | २२-प्रजा भोर प्रजापति ३--प्रसप्रजापति के आठ अवयव २३-सुवेद और श्लोक चत्वारिंशतकलपरमाविराट् १५० | २४-वेद और सुवेद ५----सहस्राक्षरा पिरान २५-विनकम्मी -अनाधृष्ट हद १५६ | २६- विश्वकर्मा के अभिजामित्र -प्रजापति के तीन भवपत्र २७-कामप्रयज्ञ --मूलमन्त्र २८-दर्शपूर्णमासविज्ञान --मन्त्र का अक्षरार्थ २५-प्रतिषत-अनुचर -मन्त्रार्थ और प्राचीनव्याख्याता १६० ३०-मधुवृष्टि १.-प्रकरणसंगत मन्त्रार्थ ३१-व्यापक पूर्णिमा १२-शुमशम्द के प्रयोग ३२-नाकस्थान १६२ | ३३-त्रिगुणति महान् १४-मायाभिमत शुनाशन्द १६३ | ३४-प्राणमयी अदिति १५-सायणाभिमत शुभशब्दाय ३५-पुण्याइकाल १६-शुक्र की २७ स्थानों में व्यान्ति १६४ | ३६-६ रज १७-शुक्रम्-और शुक्रः १६५ ३७--परोरजासत्य १८-सम्प्रदायवाद से शानि ३०--परम-मध्यम-अवमधाम १९-उपादानकारगता १६६ --मारमा, पद, पुनःपद २०-वृष्टि का माधार ४०--प्राजापत्यसंस्था " " . " " " " १७१ " - wwwww विषय पृष्टसरया विषय पृष्टसरया १७७ ४१---श्रुतिसमन्वय ४२--परमप्रजापति ४३-प्रतिमा प्रजापति ४४-याभणीवार ४५--जगतःपितरी १६--यन्न अन्नादसम्बन्ध " " " " ४७--समुदायसम्बन्ध " " ४८--थायरसम्बन्ध " " १.२ ६५-सहुति १७३ | ६६-श्राप की आहुति ६७-भातरिश्वा जुहोति ६८-मातरिश्वा दधाति १७४ ६२–स पर्यगात् ७०-पर्याय सम्बध ७१--पाय वी अवैज्ञानिस्ता ७२--सस्कृतसाहिय पर कलक १७५ | ७३-शास्त्रों की नियतार्थता ७४–एकदेश की समानना ७५-शुक वीर्य-रेत का पार्थक्य ७६-बल का वैज्ञानिमसरूप ७७-श ७८-पराक्रम का ७१-प्रसवीर्य १७६ ८०-नवीय ८१-विवीय ८२-वर्ण प्रयाण ८६-देवमाग " " " " " ग ४५-स्त्रीपुरुषसम्पध ५० -महाविस्फोटन ५१-समयसम्बध ५२-उदरभुक्तिसम्बध ५२-अग्नि अग्नि का सम्बध ५४-पानी पानी का सम्बन्ध ५५.-अग्नि शनी वा सम्पय ५६-पृथिवरसम्बन्ध ५७-निरयरसम्बध ५८-फोटक्सम्बन्ध ५-सुष्टिधरमयध ६.--रपि प्राणसम्बन्ध ६-परोनप्रियदेवना ६२-ईसा की व्याप्ति ६३---यापक मझ ६.--रेत की व्याति " " " " " " " " " ८४-मनभाग ८५--दैवीसम्पत् १७७ | ८६-आसुरीसम्पत् ८७-ब्रह्मचर्यनिरुक्ति ८९-गुर का मर्य " " " १६१ [2] पृष्ठसंख्या १८४ 1 " ..आग्नेयरेत-शुक्र " " -घनरेत " " २७-भ्रूण " " " विषय पृष्टसंख्या विषय ८९-रेत का अर्थ १८१ | ११३-दीना वस्थापन शुक्र १० -वीयरक्षा " ११४-विरोधपरिहार ११-उपादानद्रव्यत्व ११५-सब कुछ वही है ११६-सब कुछ उसी में है -सौम्यरेत-रेत ११७-प्रवत्य का विकास १८२ ११८-पसाचत्य २५.--सरलरेत ११८-कर्माचत्य १६--चित्प्राण १२०-मायामेतां तरन्तित " | १२१-शुक्रातिवर्तन २८--प्रजननकर्मके अवरोधक दोष १२२-'तत्'-विज्ञान १६-पितृदोपनियतकथाद्धकर्म १२३-कर्म में प्रवृत्ति १००-सारषदेत १२४-क्षाशस्मिका अविधा १.१-प्रवादितरेत १२५-प्रवरात्मिका विद्या १०२-शुक् और शुक १२६-प्रमियबन्धन सम्ब-र १०३-शुक्रग्रह १३ १२७-विश्वदुर्ग १२८-दुर्ग की इंटे १०५-मन्न रेत १२६-मागची ईश्वर १०६-शुक्र-रेत के पड्विकल्प १३०-शिपिविष्ट प्रजापति १०७-भारमयोनि १८४.१३१-तीन च्योतिए १०८-प्रकृतियोनि १३२-चित्यना १०५-विकृतियोनि १३३-पितेनिधेयब्रह्म ११०-सर्वम् १३४-बीजचिति १९९-सृधिमूल "२३५-देवचिति ११२-सटिबीज २१६-भूतचिति " . " . । १०४-अत्ताशुक्र " १८८ " " " " " " विषय पृष्ठसंख्या पृष्टसंख्या १११ " विषय १७-ज्योतिष्ण यौति. १३८-आत्मा-शरीर ३१-श्रामग्राम १४९-देवनाम १४१-भूतमाम १४२-प्राम-पुर १४३-आत्मपरिमल १४४-फूट १५-पुल " " . " " " " " १८८१६१-५-प्राणमात्रा १६२-५-प्रझमात्रा १८२ १६३-सप्तदशराशि १६४-साहसी १६५-बीज-कारण-आरम्भक १६६-निवृत विराट १६७-निकल यात्मा १६८-विकलपद १६६-रिकलपुन पद १७०-नल प्रजापति १७१-न्यूनविराटप्रजापति १७२-यकृतभार १७३-वृतभार १७४-नास्त्यकृतातेन ११० | १७५-काम-कर्म-गुरु ७६-मारना-पासनासरकार १७७-याधिमारिकजीम 1७-यथाजातजी २७-प्रत्रमम १८०-घमियम १११०१-वमयर १०२-पुरणाम "|३- पार्म -मनावित्रीय १२४ 1 " " " ११५ ৭৪৩-হি १४५-परण्य प्राम का रहस्याय १४२-यारण्यपशु १५.-मध्यप १५१-मायास्मिक सं1 (ग्राम) १५२-पारिधिमा (पुर १२चाप निराय १५:-नियापन्द १५५-पश्चामरापूतयR १५६-नामपीमानक मापाय ११७-दिप ११८-पिपाशमान १५५-Jian १६.-.भूतनाम " " " " " " ध] पृष्ठसंख्या २०० " २१०-महब्रह्म " २०१ " " २०२ " " विषय पूनसंख्या विषय २८५-नियतकावित्यिकजीव १९६ | २०९-पापोमय महान् १९६-निस्पजीव ९८७-सामयिकाजीव "|२१६-पञ्चपर्वाविश्व १८-मात्माभिमानीदेवता २१२-अमृतविभाग १८६-प्रकृतिका क्षोम " २१३-मर्यविभाग २६०-अवतार की आवश्यकता २१४-बहुबलैकमतरम् १९१-अनासक्तयोगोईश्वर १९७ २१५-प्रजापतिः १९२-त्रिकावार २१६-पजुर्ब्रह्म १६३-धविधामयशुक्र २१७-काम-कर्म-शुक्रः १६४-कामनाओंकासमुद्र १६% २१-शुक्र को चतुद्री व्याप्ति १६५-माजापत्यबल्शा २१६-विश्व शुक्र १९६-सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म १२९ | २२०-यज्ञमुलासृष्टि १९७-अनन्तमहेश्वर २२१ शुक्र का दइरोचरभाव १९८-उर्घमूल अश्वत्य २२२-वाङ्मय स्वयम्भू (१) १९९-हृदयस्थान और ऊर्षभाव २२३-धापोमय परमेष्ठी (6) -विरवोपक्रमस्पान " | २२१-धगृताग्निमय सूर्य (4) २०१-विश्खोपसंहारस्थान २२५-माग्निमय सूर्य (४) २०२-सोम का उदय २२६-भारोमय चन्द्रमा (५) २०-योगमाया " | २२७-वाङ्मयी पृषिवी (६) २०४-शुक की सामान्य व्यादित २२८-मन्त्रार्थोपक्रम २०५-मस की शुक्रता २००२२१-कायत्व २०६-सुब्रह्म का रेतय २३०-प्रेरणव २०७-महान् की महत्ता | २३१-सोयुत्व २०८-मूर्तजगत् २१२-अशुद्धत्व " " " प रिले खाः " २०५ २०६ " " विषय पृष्ठसंख्या पृष्ठसंख्या विपय " २३२-पाप्मविद्धत्व २०४-अकायाव २३५-याणव २३६-अस्नाविरत्व २१०-२०७ ० १ " २० २३७-शुद्धत्व १ २३८-अपापविद्धत्व २३९-कवि २४०-मनीयो २४१-परिभू २४२-खयम्भू २४३-कवि का महाकाव्य २४४ ४-यथार्थनिम्माण २४५--त्रिगुणमीमांसा २४६-पगुणकमहान् २४७-मृावशिरोमयमहान् २४८-मन्त्रापर्योपसंहार इति प्राकृतात्मधिकरणे महदात्माधिकरणम् २१० " २११ -० ३ प्रय प्राकृतात्माधिकरण विज्ञानात्माधिकरणाम् (२१५-३०१ पर्यन्त ) पृष्ठसंख्या पि पृष्ठसंन्या विषय १--विहानामानानिदर्शन २१५.६.६ ३-~-संसरजम्म २--पराधमानारसा २१18---सुपरी [१] www पृष्ठसंख्या पृष्ठसंख्या विषय १२२ " C--- 7 " २२३ " का " 17 विषय ५--महासुपर्ण ६--सयम्भुमूलासृष्टि ७--सूर्यमूलासृष्टि --पृथीवीमूलाष्टि ---प्रथमासृष्टि १.-द्वितीयासृष्टि ११-तृतीयासृष्टि १०–ोदारविद्या १३-उद्गीथ विद्या १४-प्रणाविद्या १५-मालविश्व १६-वैष्णवविश्व १७-माहेश्वरविश्व १८-पुराणसम्बन्ध ११-ज्ञानमूर्तिब्रह्मा २०--क्रियामूर्तिविष्णु २१-अर्थमूर्तिशिम २२–त्रिमर्सिविराट २३-प्राणान्तकपर २४-गर्महिषति २५--कुमारशिराभरद्वाजमत २६-कासायन पाल्हीस्मत २७-भद्रकाप्यमत २८-भद्रशौनकमत २१७/२९-घडिशमत २१८ | ३०-वैदेहजनकमत 1-कश्यपमत ३३-धन्त्रतरिमत ३३-चकरमत ३४-शार्कराक्ष्यमहषिमत २२० ३५-आरुणिमत ३६-ज्ञानप्रधानसृष्टिक्रम ३७-क्रियाप्रधानस्थितिक्रम ३८-अर्थप्रधानदृष्टिकम ३र-शिरोभूलासृष्टि ४०-दृदयमूलासृष्टि "४१-पादमूलासृष्टि १२-हिरण्यगर्भविद्या ४३-सुत्या-चित्या १४-पाइको व यनः १५-अग्निचिति १६-वायुविति ४७-श्रादित्यचिति ४-सास्यचिति ४१-पिण्टस्थिति २२२ | ५०-स्वयमातृण्णाचिति ५-विश्वव्योतिचिति "|५२-साध्यदेवता 1 २२४ 1 1 " " " " - 1 २२६ " विषय पृष्ठसंख्या पृष्ठसंख्या विषय " " २३४ 1 २३५ " ७७-घूमकेतु - ऋक्संहिता ७-महाभारत में घूमकेतु ८०-मृत-अग्निपुत "-शशिभासमानाः ५२-अमिगोल २३-सूर्य के उपग्रह २२१८४-उपग्रहोंकी स्थिति ८५-धारावाहिक सृष्टिक्रम " " १३- -पोडशीदन्द्र ५४-प्रजापक्तिकपुत्र १५-यात्मज्योतिप्रसार ५६-ज्येष्ट श्रेष्ठद्वन्द्र ५७-दृदयेन्द्र ५८-सर्वोत्कृष्टशिलय ५१-इन्द्रमहिमा ६०-गरमधाम ६.-यामधाम ६२-विज्ञानधनसूर्य ६३---बानशक्तिमयमय्ये ६४--क्रियाशनिमयसूर्य ६५...-चर्यशशिपयसूर्य দখলাপিয়া ওবাই ६७-सिलमाय " " SC " " " " :-तेजोमेघविचार ८७-केन्ट एवं लालाप्सके विचार -पूर्व-पधिमविज्ञान की तुलना ९-सरप कायरतार १०-म) गम्मन्न्सीद २१-सायन २३. २२-पर्याप्त २३२ १३-देवानां मियं धाम ४-संवसर पद कार्य २५-संगमर की वेला १६-पिती परिश्रमण १७-पासपाचा संसर 10-मनुप्राधान्यानुप्राहयामाय २५-भूत-न-योनि २१३ १४-पापाना " ६८-सरोमति ६२--मरिद-दरा ७०-चराग 31--पितु २-गरम ०३-~-गोगपति ४१-या " " " २१ t I . " -गा: " विपय पृष्ठसंख्या विषय पृष्ठसंख्या । २४३ " १०१-आधिदैविकसंस्था १०२-अष्टौ बुद्धयः १०३-धमलक्षण १०४-ज्ञानलक्षण १०५-धैराग्यलक्षण १०६-ऐश्वर्यलक्षण " " " " ०७-३ " " " " 1 २३% १२५-उत्तमज्योति १२६-विष्टपस्वर्ग १२७-महाविप १२८-विष्णुविष्टप १२९-इन्द्र विष्टप -त्रिविष्टपस्वर्ग १३१-मयाइयज्ञ १३२-अहर्ग १३३-एदरिंशस्वर्ग १३४-सासरप्रतिमा १३५-प्रतिष्ठास्तोम १३६-परमस्तोम १३७-सप्तदशस्तोम १३८-सप्तदशप्रजापति १३९-यज्ञात्मक विष्णु १४०-विष्णु के तीन विक्रम १४१-अनस्यविश्व २४१ १४२-स्वाराज्य यन्त्र १४६-नाकस्वर्ग १४४-सौम्यविद्युत् १४५-अमानवपुरूष २४२ | १४६-स्वार्यानि " १४७-स्वरसाम २१३ १४८-सूर्यग्रहण २००-अज्ञानलक्षण १०-आसक्तिलक्षण -अनैश्वर्यलक्षण १.११-प्रामाण ११२-देवीसम्पद ११३-अवामाण ११४-मासुरीसम्पत् २१५-इन्द्रसन्तान १.१६-अहोरात्रे ११७-सम्पत्परिलेख ११८-विद्यायुद्धयः ११६-अविद्याबुद्धयः १२०- अभिनिवेशलक्षण १२१-अर्द्धज्ञानजनितमोह १२२-परामृष्टजीव " " " " " " " " " " १२३-अपरापृष्ट ईश्वर १२४-प्त थे देवस्वर्गाः [म] पृष्टसंख्या विषय २४८ " " " " । " " १४१-त्रिणाचिकेतस्वर्ग १५०-वर्गवरुण १५१-धरणप्रतिष्ठा १५२-धरणएकविंशः १५३-सम्भ १५४-मुनहरीरय १५५-सानध १५६-अगानि १९७-घरमामा १५-उदा ५५-समुन १६०-घर १६१-मुरा १६२-पृश्मो रोरगति १६३-रांपममुद्र १९४-वृष्टिमय सरगम १६५-सपी 1६६-नगुना १६७-म्पिान 1६८-शाल १६-रिमार १७1-मार्ग 10t-first १७२-A पृष्ठसंख्या विषय २४५ | १७३-वसिष्टाश्रम १७४-सूर्यसदन १७५-विज्ञानभान १७६-सौगैरराष्ट १७७-साइवीरिया २५६ / १७-अमरावती "| १७६-देवाधिपतिइन्द्र १८०-सुधर्मा ११-भैरुपहनामा स्वर्गीयपक्षी १८२-मेमाष नामक स्वर्गीयहाथी "१८३-अपराजितादिक ॥१८४-ऐन्द्रधाम १८५-प्राग्मेर (पामीर ) १८६-कान्निमनीगमा १८७-प्राग्योतिनगर २४७/२८-मद्रगिरि-चन्द्रगिरि -देययजनभूमि १९०-उत्तरगम १२१-पालवरामील १०-प्रायसापानी ३-मयमषानान १९४-मोनिया १९५-पी १९६-पापपर " " " " " " " " " " " VIDYA VIYA BHAR संख्या..... TA " २५५ । २२२-निमेषगति " " " २२५-मास निर्वचन " २५८ " " " " विषय पृष्ठसंख्या विषय १६७-चतुर्भदमण्डल २५० २२०- १६८-भौतिकधरुण २२१-महापथ ९९१-ज्ञानप्रधान सत्वगुण २००-निगाप्रधान रजोगुण " २२३-अशुः पन्थाः २०१-अर्थप्रधान तमोगुण २१४-प्रज्ञान-विज्ञान २०२-अजाप्रकृति २०३-सत्वादधि महानात्मा २२६-पूर्णिमा-अमावास्या २०४-ज्ञानानन्दविकास " | २२७-श्राधिदैविक जगत् २०५-त्रिगुणवैभव २५१/ २२८-"वाण" धरातल २०६-लोकदष्टा सूर्य २२८-स्तन इवाललम्ये २०७-प्रात्मदा विज्ञानात्मा २३०-इन्द्रयोनि । २०८-चाक्षुप पुरुष २३१-पाप्यात्मिकी पूर्णिमा २०६-श्रामविवों के प्रभव, प्रतिष्ठा २३२--जामदवस्था (पूर्णिमा) योनि, श्राशयों का निदर्शन २५२-२५४ | २३३-जामत प्राणाग्नि २१-मामप्रभवादि परिलेख नं० २३१-श्राध्यामिकी अष्टमी २११-इन्द्रियप्रमवादि परिलेख नं०२ २३५-अवस्थायी परिलेख कार-कमीमप्रभवादि परिलो. नं. ३ २३६-वागरमी २१३-शरीरममवादि परिलेख नं ४ २३७-स्वप्नावस्था (अष्टमी) ३१४-शिखाधारण रहस्य २५.३ | २३८-आध्यात्मिकी अमावास्या २१५-विज्ञान शिव " | २३:-सुक्षिकाल (ममावास्या) २१६-अमूलपुरुप २१:-वस्यचित्त २१७-स्वस्तिक एव चतुर्भुन " | २४१-उक्यविज्ञान २१८-भूकेन्द्र २५६ / २४२-दक्षिणचतु २१६-अपानमाण २४३-अनूम-प्रतीकदृष्टि 7 17 १ 7 " " " " [य] विषय पृष्ठसंख्या " " " पृष्ठसंख्या विषय २६० | २६८-मोहकलिलाबुद्धि २६९--वासनासंस्कार २७०-चान्दविवत २६१ / २५१-मनोविवर्त २७२-वासनाचिन २७३-थासक्तिनिर्वचन २०४-संस्कारों की दृढ़ता २६२ | २०५-चिरकालिकत्व में मूल २७६-उभयात्मक मनः २७७-योकःसारीहन्द्र २७८-संकल्पविकलात्मकमन २७६-स्पिरलादि 100-रिदविग्य २६३ | २८१-संस्कारविल्य " २६७ " " " २६८ २४४-विज्ञानोपासना २४५-इन्द्रपत्नी २४६-विज्ञानप्रदर्शन २१७-तेजोनाड़ी २४०-यह-यहम् २४१-माण्डलिकपुरुष २५०-दीपशिखा २५१-असंग-ससंगमाय २५२-चिदानन्द २५३-शनाया (युभुक्षा) २५१-इन्द्रियवृत्ति २५५-परावि खानि २५६-इन्द्रियातीताम्म २५७-विश्यानन्द २५८--यानन्दोमोका २५१-यानन्दका खुमार २६०-मा मानन्दायामि २६१-विमानन परिपश्पनि २५१-मुगःसविषेश २६३-गको भितिए २६४-यशमन २६५. परिणाम २५६-मान जोनिगिन " " "" । २६६ " " " " २०२-मनुप्यानल दाण २०३-कामलक्षण २६४ : २८४-गलक्षण २८५-देपलाण २६५ | २८६-त्रोधमण ॥ २८५-मनोदभार २८८-स्मृतिविक्षन मर-युदिनाश "Re-गाए .६५२५-मालागार " " . ".

विषय पृष्ठसंख्या विषय पृष्ठसंख्या २७२ २९२-विद्या-अविद्योपक्रम २९३-मन्त्रार्थोपक्रम २७१ । २१४-मन्त्रप्रकरणसङ्गति २७२ | २९५-विषयसंगतिप्रकरणसमाप्त " मन्त्रार्थप्रकरणा प्रथममन्त्रार्थप्रकरण (२७३ पृष्ठ से २७८ पृष्ठ पर्यन्त ) - प्रससंख्या " " " " " २७७ ६. " विषय पृष्ठसंख्या विषय --प्रथममन्त्र (१० मन्त्र) २७३ / १४-नेति-नेति समन्वय २--मलार्थ १५-अस्तीत्येव --विद्या-अविद्यादर्शन १६-प्रथमार्थोपसंहार -ज्ञायते-क्रियते १७--द्वितीयार्थोपक्रम -स-योति परयोति २७४ | १८-विद्या-अविद्यासे मिन्न --मघवाइन्द्र १६-धीराः -कारपिताक्षेत्र २०-द्वितीयायोपसंहार --कर्ममयविज्ञान २१-संहिता का मन्त्र र--मई सूर्य इवाजनि २७५ २२-तृतीयायोपक्रम 10-अन्यत-विद्यया २३-भ्रान्तमतनिराकरण ११-धन्यव-अविद्यया २४-विद्यापतिकर्म १२-शब्दातीतमारमा २५--ज्ञानगमितानिया १३-नेति-नेति "] २६-तृतीयार्थोपसंहार प्रथममन्त्रार्थसमाप्त " " २७० " " F [ल] MPARAN द्वितीयमन्त्रार्थप्रकरण (२७८ पृष्ठसे २८८ पृष्ठ पर्य-त) - पृष्ठसंख्या २८४ " " " २८५ " " " " --कर्म क्षत्रिय --मनावरुण ग्रह २८-पत्रियशून्यनाह्मण २८१ | २९-माह्मणशत्यत्रिय " " " विषय पृष्ठसंख्या विपय १---द्वितीयम व (१ मन्त्र) २७८ २१-सिविललाइन (ज्ञान) २--कर्मप्रपञ्च २७६ | २२-मिलिट्री लाइन (कर्म) ३--ज्ञानमूलककर्म २८० | २३--शतपपश्रुति ४--विज्ञानमूलकाम २४---मित्र और वरुण ५--यज्ञानमूलककर्म २५-यभिगन्ता ब्राह्मण -योगसंसिद्ध २६-- -योगानुयायी कर्मठ ८--सरियानुयापी ज्ञानी --तिविधा निष्ठा १. कर्मटों की दुर्दशा २०--मनोरल ११-येऽविद्यामुपासते ३१-प्राणवत १२- नाग का दम्म २८२ ३२- अहोरात्रह १३-मिशवार ३३-मंत्रपहः १४-उभयतः पनन ३५-रात्रिधारुणो १५-नमार्ग का भूयोऽधशरय 1६-ममान ताप शरणम् १७ -यास्याः पविताभिमानिनः १८-धर्मस 11-मास (अन) २.-एपस (पान) २८६ " " " " " " " १५-नागपत ३ | ३६-पिट्सविध २७-योनिमा ३०-सारण-मत्रिय-येश्य -হুংখ্য १०-चाणक्यपुरोधा २८७ " " " " [व] विपय पृष्ठसंख्या २८७ ४१--पसाब-बङ्गाल ४२-सनातनीआर्यसमाजी ४३-विद्वन्मण्डली-राष्ट्रवादी पृष्ठसंख्या विषय २८७ १४-दोनों की भ्रान्ति १५-देश की दुर्दश ४६- य उ विद्यायां रताः द्वितीयमन्त्रार्थसमास " " २८८ तृतीयमन्त्रार्थप्रकरण (२८८ पृष्ठसे ३०३ पृष्ठ पर्यन्त ) " " " " विषय पृष्ठसंख्या विषय पृष्ठसंख्या १- तृतीयमन्त्र (११ मन्त्र) २००४-प्रकृतिसिद्धत्व ने:१ २६१ २---ज्ञाननिष्ठा १५-अनासक्तकर्मयोगा नं.५ ३--कर्मनिष्ठा १६-कारम्भत्रैष्ट्यब -०६ २६२ -बुद्धियोगनिष्ठा १७-जीवनयात्रानिर्वाहकब नं. ७ ५-~-कुरु कर्म वं १९-श्रबन्धन यहार्यकर्म ----अभियन्ता श्रीकृष्ण १५-प्राकृतिकयज्ञ ७--कर्ता अर्जुन २०- - अधिदैवत-अध्यात्म-अधिभूत -अर्जन की धान्ति २१-भग्नौ सोमाइतिर्यज्ञः २६४ --भ्रान्ति का निराकरण २२-सोमताय की व्याप्ति -सर्वकमयागलक्षणसंन्यास २३-मारण्य ११-नैको पायाव नं.१ २१० २४–प्रायोपन्न १२-फार्मसंन्यासधैश्यय नं०२ १३-कर्मपरित्यागाशक्याव नं. ३ २६-अलादयज्ञ " " " " " २५-वाग्यज्ञ " " [] Arunaamww पृष्पसंख्या २७ " " " " " " " विषय पृष्ठसंख्या विषय २७-अन्नयज्ञ २६४४७-शरीरत्रयी -विश्वयज्ञ ४८-ऋतस्य प्रथमजा २६-अनुगमश्रति १६-प्रहिता संयोगः ३०-प्रजापतियज्ञ ५०-उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वम् ३१-यज्ञेन यज्ञनय जन्त ५.१--व्यक्ति-समाजस्थिति ३२-यज्ञ से प्रजोत्पत्ति ५२.-यज्ञकर्म की अबन्धनता ३३-प्रजाशब्दनिर्वाचन ५३--संन्यासलक्षण ३४- चातुर्वण्र्यसृष्टि २१६५४--यम्भण्येवाधिकारस्ते ३५-यागशब्दनियंचन ५५-~-फलाशा की बन्धकता ३६-देवपूजा ५६-हेतापी-फले नेषु ३७-देवसगमन "५७-कुवनापि न लिप्यते ५८--माते सगोऽस्त्वकर्मणि ३६-भूतसम्बन्धी दानयज्ञ ५६-युद्धियोग पर आक्षेप ४०--देवसम्बन्धी सगमनयज्ञ --श्रादेपसमाधान ११-आमसम्बन्धी पूजायज्ञ ६१--बुद्धिमहिमा ४२---पुरोडाश (आहुतिदन्य) ६२--उत्याध्याकाक्षा ४३-३३ देवता, ५ भूत २१७ ६३-उत्यिताकाक्षा ४४-यायित तावदारमा २५--प्रसार्थक १५-आत्मसमर्पयज्ञ ६५--समावलक्षण बुद्धियोग १६-"या" शब्दनिर्वाचन ६६--प्रकरोणपसंहार तृतीयमन्त्रार्थसमान " ३८-देवदान " " " " " " ३०१ " " " " . इति प्राकृतात्माधिकरणे-विज्ञानात्माधिकरणम् समान ३ [प] प्रय प्राकृतात्माधिकरणे प्रज्ञानात्माधिकरणम् ( ३०५ पृष्टसे ३४६ पृष्ठपर्यन्त ) ३०७ | १८-1 " " " " " " " . " " " " " विषय पृष्ठसंख्या विपय पृष्ठसंख्या १--प्रशानात्मस्वरूपनिदर्शन ३०५-३०६ | १७--गायन पुरुष का द्वितीयपर्व ३११ २---पिपयोपक्रमः तृतीयपर्व ३---अधिकरण संगति चतुर्थपर्य -सृष्टिक्रमानुसार संस्था विभाग ३०० २०- पश्चमपर्व ५---अध्यात्मानुसार संस्था विभाग पष्टप ६----पितरमाण २२-- सप्तमपर्व -पिततिथि अहमपर्व -योपिदग्नि २४--गायनपुरुपपरिलेख -दशेष्टि २५--सम्भूलि-पिनाशात्मक चन्द्रमा ३१३ १०-शतपपनुति २६--गतित्रयी ११-अमावास्या माम ३०१ २७--चन्द्रपिण्ड १२--आख्यान रहस्य २६-हिरण्यगर्भ महा १:गायत्रो चै पुरुषः २६- याप्परूप पानी १४--ईश्वर: - जीवा ३०--यहाराह १५---गायत्रं प्रस 2-त्रिप्राण से चन्द्रोपक्षि १६--गपत्रपुरुष का प्रथमपर्व ६११ ३२--महाण्डपुराए " " " " " [स] विषय पृष्ठसंख्या ३२२ ३२३ . " " " " " - पृष्ठसंख्या विषय ३१५ | ५७--सर्वाधिष्टाता चन्द्रमा ५९–अन्तरंग प्रकृति ३१६ ५६-सृष्टिसावि ६०-पुरुपाग्नि ६१-आमाग्नि "६२-सुतो भवति ३१७ | ६३--चन्द्रिकामय चन्दमा १८ ६४-पुरुष-प्रकृति ३१९ । ६५-स-बल ६६--अग्नि-सोम ३२० ६७-सर्वमन्नम् ६८-सवमन्नादः ६६-मन्त्रश्रुति ७०-प्रत्यक्षदृष्टि ७१-पुण्डीरस्वयम्भू ७२-जाक्संहिता २२१!७३-मन्त्रसंगति ३२१ " ३३-~-पुराणसंगति ३४--सोमो राजा ३५---मौमब्रह्मा ३६-गन्धर्वनगर ७--अत्रिपुत्र चन्द्रमा ३८-महाभारत ३९-महाभारतसंगति -ऋक्संहिता ४१--संभूति-विनाशोपक्रम ४२---याविर्भाव-तिरोभाव ४३-उदय-यस्त ४४-संसृष्टिसम्बन्ध ४५-सत्तारस ४६--अयं घटोऽस्ति १७---सत्ता का अनुग्रह 26---सत्ता का निग्रह १६---सचा की विध्युति ५०-भय की उत्सति ५१-विमति सम्बन्ध ५२-- समिकीमावे ५३--सम्--भूति ५४--उदयारा "५५--उद-चपन ५६-पिनारायस्या " " " ३२५ " " ३२७ ३२० ७४-प्रज्ञानामा ७५-श्राधिदैविक चन्द्रमा ७६-श्राध्यामिक चन्द्रमा ७७-विश्व और जगत् ३२२ | ७८-संयती-मन्दसी योदसी -जन-स्नेहन ८०-हृदय-परिधि " " " " [] । , विषय पृष्ठसंख्य पृष्ठसंख्या । विषय १०४-संभूतमात्मा १०५-आत्महत २१-उस्थ-अर्क 7 " १०६-प्रेतात्मा -- । ३२६] १०७-अथुमुखपितर १०८-पिण्डदानलक्षणश्राद १.० १०१-श्रद्धास्त " ५ -- " ५८- ३३११११-दिव्यविरलरस ११२-अहंभाव की च्याप्ति ३३२/११३-सहासि " " 7 --संकोच-विकास ८३-अङ्गिरात्रकी ८४-भृगुनयी ८५-दशविधसोम ८६-पञ्चायययज्ञ ८७-पद्यानिविधा -शिवत्तमो रस: ९-अयस्याविभाग १०-करयपप्रजापति २१-दक्षप्रजापति २२-दक्षत २३-दक्ष की ६० कन्याएं -दाक्षायगिए १५-निषतसमय २६-मोसम ऋतु २७- भारोहावरोहकम २८-प्रन्थिबन्धन ६-पापविमोक १०० फौषीतकिश्रुति । ११-विचक्षणवरमा । २०२-शिवतत्र १०-संचर-प्रतिसंचर " " hd - का - ३४० १९४-पितर ११५-अन्नमयमन १६-भविद्याशुक्र "११७-पुन सम्भूति "११८-चान्द्रनादी ९१९-सौरयतस्थिति १२०-भैगुण्यभाव १२१-मानाविभाग १२२-चिदंश-सोमांश १२३-मज्ञापेता-धी ३३५ | १२०-चिन्मन " | १२५-रवोवसीयसमन " | १२६-सर्वेन्द्रियमन 11 ३४१ " " . - ३४२ [व] विषय पृष्ठसंख्या विषय पृष्ठसंख्या ३१२ १२७-अनिन्द्रियम्न १९८-प्रानमन ३४२ / १२४-नियतविषय १३०-महर्षि ऐतरेय " विषयसंगति-समाप्त पृष्ठसंख्या विषय पृष्ठसंख्या विषय -प्रयममन्वार्थ --१३-~३४४ | ३--तृतीयमन्त्रार्य- -३१७---३४८ -द्वितीयमन्त्रार्थ--३४५---३४६ प्राकृतात्माधिकरणे प्रज्ञानात्माधिकरणं समाप्तम् प्राकृतात्माधिकरणे प्राणात्माधिकरणा- पठसंस्था २५२ विषय पृष्ठमाल्या विषय {प्राणागासानिधन-३४-३५० ५-अयसपामा -सिंहावलोकन १५१।६--पसाय पर 1-~-मामा-पद-पुनारदप २५१] 0---प्रमापदेसम्प ---मुपटकाति " MAKAAAAmm IS........... विषय BHAR 4 " " ---महेश्वर १०-प्रश्वत्यवृक्ष ११-सहस्रबल्शा १२-मूलमाग १३-मध्यभाग १४-अन्तमाग १५--भोक्ता १६- ---मावद १७--साक्षीसुपर्ण १८-भोक्तासुपर्ण " " " " " " " १९--उपेचर पृष्ठसंख्या विषय पृष्ठसंख्या ३५३ | ३३-अदितिगर्भ से देषोत्पत्ति " | ३४- योगेवोपनिषत् " ३५--प्रतिष्ठावादेवता --स्तोमविभाग ३७--देवविभाग ३९--सर्वभूतान्तरात्मा ३९--अमृत-ब्रह्म देव-भूत -शुद्धिसंस्कार ४१-स्मातसंस्कार १२-~श्रौतसंस्कार ४३-सयुक्-सखा १४---ईश्वरजगत् परिलेख ३५८ १५--जीवजगत्परिलेख ३५४ ४६-एप सर्वभूतान्तरात्मा ६० ४७--मोक्तात्मविवत १८--सत्यधर्म १६-प्रकरणसंगति ३६१-३६४ ५.-हिरयमयपात्र ३६४-३६५ ५१-पूपकले १२-असवप्राण १३-ऋषि "५४-समर्पिप्राण ३६५ | ५५-प्राणविभूति ३६६ "! ५६-बागेवात्रि " । " " " २.--महेश्वर २१--परमेचर २२--योन्यन्तरगमन २३-अजन्माचारमा २१-अमिः सर्वा देवताः २५--अमृत-मृत्यु २६--चित्यानि २७-चितेनिधेयाग्नि २८-पिण्डपृपवी २९--महिमापृथिवी ३०--कृष्णार्जुन ३१--पुष्करपर्ण ३२--देवमातादिति " 77 - ।

[s] wamiAM घिपय पृष्ठ संख्या विषय पृष्ठसंख्या ३७१ ५६-शूद्रणं " ३७३ . M " ७८- " ५७-एकर्पिप्राण ३६७ | ७१-उपास्य-उपासक " ५८-पूषा ७२-छायामयीक्षा ३६८७३-त्रिविधजीव ६०-व्यदन्तकपूपा ७४-प्राण-व्यान-अपान ६५-रेवतीया ६२-पृथिवीपूपा ३६९ ७६-अनिर ६३ –सूर्यापा ७७-अनिल ६४-वायुप्पा -ज्ञानान्मुक्तिः ६५-एकषिप्राजापत्य ७६-चायुरनिलममृतम् ६६-यमप्राजापत्य --भूतचिति ६७- सूर्यप्राजापत्य ८१-प्राणचिति ६८-पूपन् ८२-देवचिति १३--पायो पूपा ८३-मन्त्रार्योपसंहार ७०-कल्यागतमरूप इति प्राकृतात्माधिकरणे प्राणात्माधिकरणं " 1 समाप्त -:

[के ब्रह्म] प्रथ प्राकृतात्माधिकरणे शरीरात्माधिकरणम् ६ ( ३७६ पृष्ठसे ३८६ पृष्ठपर्यन्त ) पृष्ठसंख्या " " " ४--८१ मङ्गल " " " विषय पृष्ठसंख्या विपय --शरीरात्मस्वरूपनिदर्शन ३७६-३७८ हृदय २--मसान्त शरीर ३७९ १०--नाभि -इह चेदवेदीत ३०० ११--ब्रह्मपन्यि १२--सप्तवितस्तिकाय -पुरुप परिमाण १३--श्राधिभौतिक पुरुप १४--भस्मान्तविश्व ७---ब्रह्मरन्ध्र ३८१ १५-ऋतु-कृत ए---काठ १६--प्रकरणोपसंहार इति प्राकृत स्माधिकरणे शरीरात्माधिकरणं समानम् -प्रादेशमित प्राण " ३८२ ३८४ प्रथ प्राकृतात्माधिकरणे उभयोः सत्यात्मनोरग्निना-ऐकात्म्यम् (३८४ पृष्ठ से ३८६ पृष्ठ पर्यत्न) विपय पृष्ठसंख्या विषय -जीव-अझसत्य ३०४ ३--जीव-देवताय २--ईघर-ब्रह्मसत्य ४- - ईश्वर-देवसाय पृष्ठसंख्या -- [पं प्रा] विषय पृष्ठसंख्या पृष्टसख्या विषय ३८५ ३८६ " --सत्यप्रतिष्ठा ६--वयुन ७----वय ---बयोनाध र---जातवेदा -अन्नभेद ११--ययुनाधिष्ठाता भग्नि १२--प्रकरणोपसंहार " " " वाजसनेयोपनिपत्-विज्ञानभाष्यं सम्पूर्णम् उपनिपत निष्कर्ष (३८७ पृष्ठ से ३९२ पृष्ठ पर्यन) पृष्टसंख्या विषय दृष्टसंख्या ३८० " ३१० विषय --भोगासक्तमन २--चित्त की अस्थिरता ३-महाराज ययाति १--६ भादेश वाक्य ५--प्रथम श्रादेश " ६---द्वितीय आदेश ७--तृतीय श्रादेश --चतुर्थ श्रादेश --पञ्चम आदेश १०-पष्ट यादेश ६--- ૨૨ ओं शान्तिः शान्तिः!! शान्तिः!!! MILARIA

प्रकृतिवैभव
"
"मयाव्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्'
प्राकृतात्माधिकरण
प्राण-आप-वाक्-अन्न-अनादमयः प्राकृतात्मा विश्वात्मा
४-१-१-अनेजदेक मनसो जवीय
५-२-२-तदेजति तन्नजति
अव्यक्तात्माधिकरण
६-३-३-यस्तु सपीणि भूतानि
७-४-४-यस्मिन् समर्माणि भूतानि
८-५ --१-स पर्यगाच्छुक्रमकायम्
महदात्माधिकरण
१-६-१-अन्घतम प्रविशन्ति
१०-७-२-अन्यदेवाहुधिया
विज्ञानात्माधिकरण
११-०-३-विद्या चाविद्या च
१२-४-१-अन्ध तम प्रविशन्ति
१३-१०-२-अन्यदेवाहु सम्भवात् → प्रज्ञानात्माधिकरगा
२४-११-३-सम्भूतिं च विनाश च
१५-१२-१-हिएमयेन पात्रण
१६-१३-२-पन्नेकर्षे
प्राणात्माधिकरण
१७-१४-३-गुनिलममृतम्
१- अथेद भस्मा-त शरीरम्
शरीरात्माधिकरण
१०-१५-१-- अग्ने नय सुपया
राये
अग्निदेव की सर्वता
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम्

पूर्णमदः
पूर्णमिदम
१-शान्तात्मा
अधिदैयतम् →→
मध्यात्मम्
ब्रह्मसत्याक्षर:-
ब्रह्म-कर्ममयः प्राकृतात्मा स्वयम्भूः
अव्यक्तात्मा
१
स्वयम्भूः
+------44
शान्तात्मा
( अव्यक्तात्माधिकरणे शान्तात्मा )
वेदावच्छिन्नो वेदमूर्तिर्विद्याकर्ममयात्मा
विन्धेश्वरः
अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनदेवा प्राप्नुवन् पूर्वमर्पत् ।
तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिवा दधाति ।
(ईशोपनिषत् ४ मन्त्र)

अव्यक्तस्वरूपनिदर्शन सर्वादिश ऊर्ध्वमधश्च तिर्यक प्रकाशयन भाजते यनयान् । एवं स देवो भगवान वरेण्यो योनिस्वभावानधितिष्ठत्येकः ॥ १!! यच स्वभाव पचति विश्वयोनिः पाच्यांश्च सर्वान् परिणामयेयः । सर्वमेतद्विश्वयवितिष्ठत्येको गुणांश्च सर्वान् विनियोजयेद्यः ॥ २ ॥ तद्वेद गुह्योपनिपत्सु मूढ तद् ब्रह्मा घेदयते ब्रह्मयोनिम् । य पूर्व देवा ऋषयश्च तद्विदुग्ते तन्मया अमृता वै वभूवुः ।। ३ ।। गुणान्वयो यः फलकर्मकर्ता कृतस्य तस्यैव स चोपभोक्ता । स विश्वरूपत्रिगुणस्त्रिया पाणाधिपः सञ्चरति स्वकर्मभिः ॥ ४ ॥ अनायनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् । विश्वस्यैकं परिपेषितारं ज्ञात्वा देव मुच्यते सर्वपाशैः ॥ ५ ॥ स तन्मयोऽमृत ईशसंस्थो ज्ञः सर्वगो भुवनम्यास्य गोप्ता । य ईशेऽस्य जगतो नित्यमेव नान्यो हेतुर्विद्यत ईशनाय ॥६॥ एप देवो विश्वकर्मा महात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः । हृदा मनीपा मनसाऽभिक्लुप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ७ ॥ छन्दांसि यज्ञाः क्रतयो व्रतानि भूतं भव्य यच्च वेदा वदन्ति । अस्मान्मायी सजते विश्वमत तस्मिंश्चान्यो मायया सनिरुद्धः ॥८॥ यो योनि योनिधितिष्ठत्येको यस्मिन्निदं स च विचति सर्वम् । तमीशानं वरदं देवमीच्यं निचाय्येमा शान्तिमत्यन्तमेति ॥६॥ विश्वतधनुरुत विश्वतो मुखो विश्वतो वाहुरुन विश्वतस्पात । सं बाहुभ्या घमति संपतत्रैर्यायाभूमि जनयन् देव एकः ॥ १० ॥ अव्यक्ताव्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । राव्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥ A अव्यक्तादीनि भूनानि व्यक्तमध्यानि भारत ! अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥१॥(गी० २।२८।) अव्यक्ताद व्यक्तगः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । राध्यागमे प्रलीयन्ते बचाव्यतसंज्ञके ॥२॥ (गी.८।०८) प्रकृति स्वामवद्यभ्य विसजामि पुनः पुनः । भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्षशात् ।। ३ ।। (गी० १६१) मपाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम हेतुनानन कौन्तेय ! जगविपरिवर्तते ॥ ४॥ (गीः ।।१.) त्रार्य से सम्बन्ध रखने वाला बहिरङ्ग विषय समाप्त होगया। मन मन्त्र- प्रकरण बारम्भ होता है । पुरुष प्रकरण का भी नाम ते लोकाः' इत्यादि मन्त्र आवरणतन्त्र का निरूपण करता है। आवरणतन्त्र विच है। इसी विचावरण से भात्मप्रकाश रहता हुआ भी तिरोहित हो रहा है । इस भारणतन्त्र के सम्बन्ध में प्रश्न उपस्थित होताहै कि-मावरणतन्त्र , का प्रवर्तक कौन है ? विशुद्ध अव्यय पुरुष तो केवल भारमकाम बनता हुआ साप्तकाम, अतएव निष्काम है । ऐसी अवस्था में विशुद्ध अव्यय से श्रावरणरूप विश्व की प्रवृत्ति हो-पह :संभव . नहीं है । इसी प्रश्न का समाधान करने के लिए 'अमर्यार इत्यादि मन्त्र के अव्यवहितोचरेकाल में ही निम्नलिखित मन्त्र हमारे सामने आता है। अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा प्राप्नुवन् पूर्वपर्पत् । तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति । "वह ( कोई ) एक ( विलक्षण तत्व सर्वथा) कम्प रहित है । (वह) मनसे भी अधिक) बैग वाला है। पदिन से ही (सर्वत्र ) व्याप्त उस तत्व को देवतालोग प्राप्त करने में प्राकुनामा विषयोपक्रम | ईश पनिपन - । 1 असपर्थ है । वह तत्व दौड़त हुए देवनाग्रा का स्वयं बैठा बैठा ही अतिक्रमण कर रहा है । ऐस इम तत्व में मारिवा (नाम का नविशेष) अप् नाम के पदार्य को रखता है" यह है मन्त्र का अक्षरार्थ। श्रुति क तो है कि एक तत्व ऐसा है जो सदा के लिए ठहरा हुआ है एव यही तत्र एक क्षण के लिए भी ठहरा हुआ नहीं है। यह एकान्तत शान्त है, एकान्तत अशा त है। दोनों धर्मों से वह नित्य आक्रा त है। उभयधर्मापन्छिन्न प्रस्तुतत्व एक है । इस प्रकार श्रुत एक ही तत्व में सपा विरुद्ध दो भानों का सभिवेश पतला रही है । ऐसा कौनसा तर है जो निरन्तर चल भी रहा है, एव ठहरा भी दुश्रा है, जो अनेजत् भी है,एव मनसे भी तेज दौड़ने वाला है । इस या उत्तर है यही अध्ययपुरुप । अध्यय श अमृतरूप विद्याभाग तथा हिथर (अनेनन् । हे, मृत्युरूप वर्मभाग सर्पया घर है ! अपनी इन्हीं दोनों नियतियों से वह ससारमें व्याप्त हो रहा है । ससार चलाचत है । बनना-विंगड़ना ससार या स्वाभाविक धर्म है । इसी द्विनियति से यह विश्व भी ट्रिनिपति' नाम से प्रसिद्ध हो रहा है । विश्व के बनना (स्थिति-इदाम) और गिदना (गति-अन्यथास्य) यही दो रूप (रग) है, अतएा लोभापा में विश्व के लिए- 'दुनिशा दुरगी' यह श्राभाणक प्रसिद्ध है । निरुक्त क्रमानुसार द्विनियति शब्द ही दुनिया' बन गया है । यहा एप बनता है, एक गिड़ता है । एक रोता है, दमरा हसता है । एक सोता का जाता है । एक सेवक है, दूसरा स्वामी है । एक पति है, दूसरी पत्नी है । एक मोता है। दूसरा भोग्य है । एक बाला है दूमरे खिलोने हैं। इस प्रकार भारद्वयावच्छिना अव्यय की सृष्ट में सुपादु ग्य, पुण्यापुरुष, अच्छा युरा, सय मिथ्या, दिन रात, रयाह सफेद, गुरू शिष्य. राजा प्रजा, विद्वान् मूर्य राघरफ आदि मैद से सब इसी द्विनियतिमात्र का साम्राज्य है। अन्यय या दियाभाग रसप्रधान है, यमभाग बलप्रधान है । रसमाग यमृत है, बलभाग मयुहै। यदि मापुर मारे पल उम धमनाप रस समुद्र में प्रविष्ट हो जाते हैं, उन्मुग्ध । A-. बन जाते हैं तो गई। घायय विनियनिमपादा से बाहर निकलता हुअा 'परात्पा' बन जाता है, जेगा शिपागनिस में चिन्तार से बतलाया जाचुगहै।(देसिए ई.उ प्र स २५५-२६४)।

आत्तात्मा विषयापक्रय ईशेपनिषत् ॥ w- यही सीमित क्लावच्छिन्न वनता हुआ, अतएव द्विनियतिमात्र का प्रयक बनता हुआ अव्यय कहलाने लगता है, जैसा कि पुरुषनिरुक्ति में स्पष्ट कर दिया गया है । ( देखिए ई. प्र- २६५-२८५ पृ.) वलभाग सर्वथा क्षणिक है, दोभ ही इस का स्वरूपधर्म है । इसी प्रात्यन्तिक होम से अव्ययपुरुष 'सत्' कहलाने लगता है । रसभाग सर्वयाः अक्षण है। शान्ति इस का स्वरूपधर्म है । इसी प्रात्यन्तिक शान्ति से यह 'सत्' माम से व्यवहृत होने लगता है । नित्य अशान्तिगर्भित नित्य शान्त अमृत-मृत्युरूप सदसत् तत्व ही भोकार ( ईश्वर ) है, वही अहंकार ( ईश्वरांशभूत जीवाव्यय) है, वही अहस्कार ( विश्व ) है । यही रामानुज सम्प्रदाय का विशिष्टाद्वैत है । इस प्रकार तत्व दो हैं, परन्तु आश्चर्य है-कहलाते हैं दोनों 'एक' । ऐसा क्यों ? इसका उत्तर अपनें यत्र से पूछिए । वस्त्र में वपड़ा है, सूत है, रुई है, कपास है, मिट्टी है, जल है, तेज है, वायु है, आकाश है, प्राण है, मन है, विज्ञान है, आनन्द है, अनन्त ( परात्पर ) है । वस्त्र में इतनी चीजें, फिर भी वस्त्र एक कहलावे, ऐसा क्यों ! यस जो उत्ता इस 'क्यों' का है, यही उत्तर पूर्व के 'क्यों' का है। . । अद्वैततत्त्व के वास्तविक मर्म को न समझने वाले कुछ एक दार्शनिकों का कहना है कि "यदि रसवत् बल को शाश्वत एवं वस्तुसन ( एकपदार्थ ) मानलिया जायगा तो भदैत का समूल विनाश होजायगा । अतः नाम रुप कर्मान्मक विश्व को सर्वथा मिथ्या ही सपझना चाहिए । केवल रसतत्व मत्य है । और सारा प्रपञ्च मायिक है, मिथ्या है। इस प्रकार-'अनृतं दे तु मायिके' कहते हुए नामरूपात्मक विश्व को असत्य मानने वाले " असत्यमपतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् " (गी० १६०८रलो०) भगवान् के इस कथन के अनुसार धनीश्वरवादी कल्पित अद्वैतवाद की रक्षा के व्याज से इस बल की शाधतता पर प्रहार करना चाहते हैं। उनके प्रति हमारा यही कहना है कि थोड़ी देर के लिए अम्युपगमवाद से हम अद्वैतरक्षा के लिए कर्ममय विश्व को आपके कथनानुसार मिथ्या मान लेते हैं । यह मानलेने पर भी वल स्वीकार करने से जो आपत्ति हमारे ऊपर आती है, उस आपत्ति से आप भी नहीं यच सकते । सासारिक पदार्थों में स्वगन, सजातीय, विजातीय भेद से तीन प्रकार के मेद . - ३ प्राकृता-मा विपक्रम ईशोपनिषत् ॥ । । हुआ करते हैं । अश्व और मनुष्य का मेद विजातीय भेद है। मनुष्य-मनुष्य का भेद सजातीय भेद है। एक ही मनुष्यशरीर में कान-नाक-मुख हाथ-पैर आदि शरीरावयों का पारस्परिक भेद " स्वगत " भेद है । ब्रह्मतत्व इन तीनों मेदों से पृथक् माना जाता है, जैसा कि-" एकमेवा- द्वितीयं ब्रह्म" इत्यादि वचनों से स्पष्ट है । विजानीय मेद को हटाने के लिए एकम् ' कहा है, सजातीय भेद को हटाने के लिए ' एवं ' कहा है, एवं स्वगत मेद की व्यावृत्ति के लिए 'मदिनीयम् । कहना पड़ा है । इस पर हमारा यह कहना है कि हम उसे सजातीय-विजा- तीयमेदशून्य तो मानते हैं, परन्तु आपके माने हुए अद्वैतब्रह्म के स्वरूपानुसार उसे स्वगतमेद शून्य नहीं माना जासकता । कारण स्पष्ट है 1 "निस विज्ञानमानन्दं ब्रह्म" "सत्यं ज्ञा- नमनन्तं ब्रह्म" के अनुसार उसमें सना-चेतना-मानन्द यह तीन पर्व खतःसिद्ध हैं । अस्ति (सत्ता ), भाति (चेतना), प्रिय (धानन्द) यह तीन पर्व मापके ही माने हुए हैं। इस एक ब्रह्म का तीन तरह से भान होरहा है । क्या भातिमूलक मैद अमेद का प्रतिबन्धक नहीं है ? यदि हां तो इस विप्रतिपत्ति को हटाने का श्राप के पास क्या उपाय है ! यही सत्तादृष्टि । उक्त विप्रतिपत्ति का निराकरण करते हुए श्राप कहते हैं कि-"यद्यपि ब्रह्मतत्त्व सत्ता-चेतना- आनन्द रूप से तीन तरह से भासित होता है, परन्तु सत्ता तीनों की एक है। भातिभेद है का कारण नहीं है, अपि तु सत्तामेद द्वैत का कारण है । ऐसी अवस्था में सत्तामेदमूलक खगत- मैद का प्रकृत में समावेश नहीं होसकता" । क्या यह उत्तर ( हम नाम रूप को मानते हुए) नहीं देसकते ! अवश्य देसकते हैं । बल की भाति होती है, सत्ता एक है। पूर्वोक्त वस्रोदाहरण पर ध्यान दीजिए। मन प्रागा वना है,प्राण आकाश बना है, आकाश वायु,वायु अनि,अग्नि जल, जल मिट्टी. मिट्टी कपास, कपास रुई, रुई सन, सूत कपड़ा, एवं कपड़े से वस्त्र बना है । प्रति- मंचरक्रम का आश्रय लेते हुए पदि आप प्रन्थिबंधन तोड़ते जायगे तो उक्त सब पदार्थ श्राप एक ही वस्त्र में प्रत्यक्ष देख लेंगे । इन सब अनेक भातियों के रहने पर भी-"वाचारम्भरण विकारो नामय मृनिकत्येक मत्यम्" के अनुसार पूर्वपूर्य कारण सत्ता ही उत्तरोत्तर कार्य में प्रतिष्ठित होती है । इस एक मयाभार से अनेक मातियों के (प्रतीतियों के ) रहने पर भी . । - ४ प्राकृतात्मा । ईशोपनिषत् । विपयापक्रम अब एक कहलाता है । यही अवस्था यहा है । बलतरच अनेकरूप से प्रतीत हो रहा है साथ ही में उपाधिभेद से सत्ताभाव का भी पार्यक्य प्रतीत हो रहा है, परन्तु परमार्थतः सत्तारस एवं है । अतः नामरूपप्रवर्तक बसपदार्य को मानतेने से अद्वैततस्त्र में कोई बाधा उपस्थित नहीं होती । ऐसी अवस्था में कल्पित अद्वैतवाद की रक्षा में प्रस्त होकर नामरूपात्मक विश्व को मिथ्या मानना सर्वया मिथ्या है । " अनृते दे तु मायिक " " ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या " यह प्रमाण किस शास्त्र के हैं, यह पता न लगा । सम्पूर्ण वेदवाङ्मय में गीता में. वेदान्तसत्रों में कहीं भी विश्व को मिथ्या नहीं बतलाया है। विश्व को मायिक अवश्य बतलाया है , परन्तु माया- बल मिथ्या है- यह किस आधार पर मान लिया गया, यह समझ में न आया । यदि भार बुरा न मानें तो हमें यह कहलेने दीजिए कि भारतवर्ष का उन्नति का समूल विनाश यदि किसी ने किया है तो वह यही कल्पित जगन्मिथ्यावाद है । "संसार मिथ्या है-आमा सत्य है, मांसा- रिक कर्म बन्धन के कारण है। इन अनुचित एव अशातीय भावनाओ ने कर्मण्य भारतवर्ष को सर्वथा अकर्मण्य बना डाला है । पाठकों को हम यह विश्वास दिलादेते हैं कि आप के शाखों में कहीं भी जगत् को मिथ्या नहीं बतलाया गया है , अपि तु यह विश्व को ब्रह्म की विभूति मान रहा है। । , . सत्य ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" के अनुसार विश्व का मूलप्रभव ब्रह्म सत्ता चेतना-श्रानन्दलक्षण बनता हुधा 'सत्य' है । इधर- ब्रह्मवंद सर्वम्' यह श्रुति सत्यब्रह्म के कार्यभूत विश्व को 'ब्रह्म' मान रही है । एक सत्यपूत महर्षि की कृति जब सत्य मानी जाती है तो सत्यमूर्ति मा-की कृतिरूप विश्व को कैसे मिथ्या माना जासकता है । कारण के गुण ही तो कार्य के आरम्भक (स्वरूपसम्पादक) बनते हैं । जब कारण सत्य है तो कार्य कैसे मिथ्या होसकता है । 'अहं सर्वस्य पभवो मत्तः सर्व प्रवर्तते' (गीता १० श्र.८ रलो.) के अनुसार सत्यमूर्ति अव्यय से सारा विश्व बना है। भव्यात ब्रह्म ही व्यक्तरूप में आकर विश्व कहलाने लग गया है । ऐसा विश्व मिथ्या होगा-यह कौन विश्वास करेगा ! ममवाशो जीवलोके जीवभूनः मनातनः' (गीता१५.७रलो.) 'एकाशेन स्थितं सर्वप' 'त्रिपाद्म उदैव पुरुषः पादो । १ या ईशोपनिपत 5. विपयोपक्रम प्राकृतामा म्यहाभवत् पुनः' 'पुरुप एवंटें म यदभूनं यच्च भाव्यम्' 'पंक वा इद विवभूव सर्वम्' 'तमेकं सन्तं विभा बहुधा वदन्न' इत्यादि श्रुतिस्मृतिएं जब स्पष्ट शब्दों में ब्रह्मकारणतावाद को पुष्ट करती हुई विश्व को ब्रह्म की विभूति मान रही हैं तो ऐसी अवस्था में विश्व को मिथ्या मानना क्या निरी कल्पना नहीं है । अपि च सृष्टि होती है प्रजापति से । प्रजापति को सृष्टिकामना से तपाया करनी पड़ती है । उम की चिरकाल की तपश्रया से विश्व उत्पन्न हुआ है, जैसा कि - 'प्रजापत्तिया इदमन एक-आसीत् । मोऽकामयत बहुम्स्या- म्पजायेय. भूमानं गन्छेग. स तपोऽतप्यन' (जै० उ० ११४६।१ ) इत्यादि श्रुतियों से स्पष्ट है । साधारण मनुथ्य परिश्रम करके यदि किसी वस्तु का निर्माण करता है तो लोक में उस का आदर होता है । ऐसी स्थिति में जगन्नियन्ता ने तपश्चर्या से जिस विश्व का निर्माण किया उसे एक हेला से मिथ्या बतला देना सचमुच अपराध है, अपराध ही नहीं अक्षम्य अपराध है | अपिच-'अहं ब्रह्मास्मि' 'योऽहंसोऽसौ' इत्यादि रूप से उपनिषच्छुतिएं अई पदार्थ को 'ब्रह्म' मानती हैं । "उमयं हैतदने मनापतिरास-मत्यै वामृतञ्च" (शत १०॥ को.१२.१४ा. १६.) इत्यादि ब्राह्मणश्रुति उस अहं प्रजापति को अमृत मृत्युमय मान रही है । श्रीती उपनिषत् के आधार पर चलनेवाली स्मार्ती उपनिषत् (गीता) 'अमृन चत्र मृत्युश्च सद- सन्चाहमर्जुन' इत्यादि रूपसे सष्ट शब्दों में ब्रह्म को उभयधर्मावच्छिन्न बतला रही है। ऐसी स्थिति में ब्रह्म के मृत्युप्रधान विरस को मिथ्या मानना साहस नहीं तो और क्या है । जिस नामरूपमय विश्व को आप मिथ्या मान रहे हैं, देखिये श्रुति उसी के लिए अपने क्या विचार प्रकट करती है- । "अगं बादं नाम रूप कर्म । तेपा नाम्नां वागित्येतदेपामुक्यम् । अतो हि सर्वाणि नामान्युत्तिष्ठन्नि । एतटेपां साम, पतद्धि मैनापभिः सपम् । एनेटपा प्राम, पद्धि मर्याणि मामानि विति । अथ झपागों चतु" । भय कर्मणामात्मा (गरीरम) मटेनद प्रयं मटेकमयमात्मा | प्रामा- एकः सन्नेनत्रयम् । तदेतदमृतं .............. H40400... । .

प्राकृतारमा 1 ईशोपनिशन विषयोपक्रम सत्येन छन्नम ! प्राणो काऽअमृतम् । “नामरूप सत्यम्” । ताभ्या- पर प्रागाछन्न"- (शतः १४ का०।३।१४वा०) इति । जिसप्रकार हमने स्पष्ट शब्दों में 'नामरूपे सत्यम्' इस रूपसे स्वय वेद में नाम रूपा मक विश्व की सन्यता बतलाई है, क्या विश्व को मिथ्या सिद्ध करने वाला कोई वास्य श्राप चतला सकेंगे। नहीं तो क्यों थापके काल्पनिक मत का आदर किया जाय । 'असत्यम- प्रविष्ट ने जगदाहुरनीसरम' के अनुसार क्यों नहीं आपको 'मनीश्वरवादी' माना जाय । रामानुज सम्प्रदाय के अनुसार क्यों नहीं आपको 'पन्छन्नवौद्ध' कहा जाय । समस्या बड़ी जटिल है। आज जगन्मिथ्यात्माद पर प्राय सभी विद्वानों का दृढ अभिनिवेश है । उनके इस मन्तव्य के विरोध में कुछ भी कहना आपत्ति को निमन्त्रण देना है । फिर भी सत्य सिद्धान्त सय ही रहेगा । उपर की पद्धियों से केवल दोम प्रकट कर देना दूसरी बात है, एच शास्त्रीय विचार से निर्णय पर पहुंचना दूसरी बात है। हम आज स्पष्ट शब्दों में यार्या वर्त के सभी विद्वानों को यह बाला देना चाहते हैं कि जगन्मिथ्यावाद अशास्त्रीय है । 'ग्राम सत्र जगन्मिथ्या' वाक्य का शास्त्र से कोई सम्बन्ध नहीं है । प्रस्थानत्रयी का कोई भी वास्य जगत् को मिथ्या नहीं बतला रहा । विश्व के लिए 'अनृत' शब्द अमरय आया है। परन्तु इस अनुत शब्द का अर्थ भी मिथ्या नहीं है, जैसा कि विचार उपस्थित होने पर प्रकट होगा । नीरदीरविवेकियों के सम्मुख कुछ एक वचन उपस्थित कर दिये जाते हैं । यह वचन विश्व ईश्वर की कृति है-ईश्वर ही अपनें मशरूप से विश्व बना है । अतः तदंशभूत विश्व तवरूप ही है' इस सिद्धान्त का स्पष्टीकरण करते हैं । विद्यानों का यह कर्तव्य होना चाहिए कि वे इन चनों का समन्वय कर चिरकाल से चली माने वाली जगन्मिध्यात्यनिषयिणी मिथ्या भ्रान्ति का निराकरण कर देश को निष्काम कर्मयोग में । प्रवृत्त करें।

प्राकृतात्मा 7 ईशोपनिषत - विपयोपकम १-"सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म यो वेद निहितं गुहायाम् " (ले० उ०१)। २-" स एवाधस्तात् , स उपरिष्टात्, स पश्चात्, स पुरस्तात् , स दक्षिणतः, स उत्तरतः, स एवेद सर्यम्-- ( नहींवेदं सर्यम् )" (छ. उ. ७२५।१ । ३-" पुरुष एवेदं सर्वम्-यभूतं यच्च भाव्यम् " ( यजुः सं० २०१२) । ४- एक वा इदं विबभूव सर्वम् " ५- प्रजापते न त्यदेतान्यन्यो विश्वा रूपाणि परिता बभूव " ( यजुः १०।२०) । ६ --" एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्यग्नि यमं मातरिश्चानमाहुः" , ऋ.सं. २०६४।५६ )। ७- " ब्रह्म बनं ब्रह्म सवृक्ष आसीत् , यतो यावापृथिवी निष्टतक्षुः" '(तै.ना.२।८।।६) ८-" तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेयामृतमुच्यते तमिश्लोकाः श्रिताः सर्वे " (कठ. रा६१) 1- यो देवानां प्रभवोद्भवश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः" ( श्वेता. उप. ३।१ ) । 10.-" पोडशफल: प्रजापति: " ( शत० ७२।२।१७) । ५१-" एप ह प्रजानां प्रजापतिर्यद्विश्वजित् " (गो० पू. ५१० )। १२-" प्रजापति ह्येवेदं सर्वमनु प्रजायते " (श० ४।५।३।१३)। १३-" प्रजापतिर्लोकानन्यतपत् । तेषां तप्यमानाना रसान् प्राबृहत्-अग्निं पृथिव्याः, वायुमन्तरिक्षात् , अादित्यं दिवः" (छां० उ० ४१७))1 १४-" प्रजापति विश्वकर्मा " ( श० ७४।२ ।। १५-" इमे लोकाः प्रजापतिः" । श० ७५।२७) । १६-" द्यावापृथिवी हि प्रजापतिः” (श०५२६)। १७-" से बाहुन्या धमति सम्पत्तीवाभूमी जनयन देव एकः" (ऋक् 1:1-11३)। 14- सर्वमु झेवेदं प्रजापतिः" (श० ५।११।४ )। 11-" त्रिपादूर्य उदैव पुरुषः पादोस्येाभवत् पुनः " ( यजुः ३।४)। २०. “प्रजापतित्त्वेवेदं सर्व यदिदं किश्च" (....., . ) २१-" य पको जातवानीशत ईशनीभिः साल्लोकानीशत ईशनीभिः" (वे. उ. 11 । ८ प्राकृतात्मा विषयोपक्रम ॥ ईशोपनिषत् ॥ " २२-"क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः "वे. १।१०)। २३-" य एको वणों बहुधा शक्तियोगात् वर्णाननेकान् निहितार्थो दधाति (वे० ४११)1 २४-" अहं सर्यस्य प्रभवो मत्तः सर्व प्रवर्तते " (गी० पृ. - )। .५-" ममैयांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः" (गी०)। २६-'मत्रः परतरं नान्यत् किश्चिदस्ति धनंजय" (गी० ७1७11 २७-" विष्टम्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् " । गी० १०।१२ )। २८-" नामरूपे सत्यम् " ( श० १४ का0 | ३१४) । २९-"ऐतदास्यमिदं सर्व, तत् सत्यं, स यात्मा" (छा० उ० ५८१७) । ३.-" तस्माद् वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः, आकाशाद्वायुः, वायोरग्निः, अग्ने- रापः, अभ्यः पृथिवी, पृथिव्या घोषधयः, प्रोषधीभ्योऽन्नं, अन्नाद्रेता, रेतसः पुरुषः । स वा एप पुरुषोऽन्नरसमयः + ++ ++ अन्नादै प्रजाः प्रजायन्ते याः काश्च पृथिवीं श्रिताः । सर्व वै तेऽन्नमाप्नुवन्ति, येऽन्नं ब्रह्मोपासते । अन्नं हि भूतानां ज्येष्ठम्' (ते. उ०११-५-1 ३१-"यदै किश्च प्राणि स प्रजापतिः" (शत० ११ । ६।३।। ३२-"मनोमयोऽयं पुरुषो माः सत्यः" (बृ० प्रा० ५ अ० ६ वा.)। ३३-"अचमयं हि सोग्य मनः" (छा० उ० ६७१।। ३४-"पोडशकलः सोम्य पुरुषः" (डॉ० उ० ६७१)। ३५-"रूपं वै प्रजापतिः + + + 1 नाम वै प्रजापतिः" (तै० मा . २।२७१)। ३६-"प्रजापतिः प्रजा असृजत । स ऊर्येभ्य एव प्राणेभ्यो देवानसृजत, येऽयाश्चप्राणा- स्तेभ्यो माः प्रजाः + + + तस्य ह प्रजापतेरर्थमेव मर्त्यमासीदभ्रमममृतम्" (शत० १०/१२१-२-)। ३७-"स प्रास्येनैव देवानसृजत, तस्मै स ससृजानाय दिवेवास । अथ योऽयमवाङ्माणः, तेनासुरानसृजत । तस्मै ससृजानाय तम इवास" शत० ११११।६।७-८1)1 ३८-"एपो ह देवः प्रदिशोऽनु साः पूर्वो ह जातः स उ गर्भ अन्तः । स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रसङ्जनास्तिष्ठति सर्वतोमुखः ॥ (श्वे० उ० २११६) ।

* ईशोपनिषत् । विषयोपक्रम प्राकृतात्मा -- उक्त सत्यमीमांसा से प्रकृत में हमें यही बतलाना है कि रस वलरूप विद्या-कर्म दोनों पारमा के स्वरूपधर्म हैं । अभिन्नसत्ताभाव के कारण दोनों एकतत्व है । विद्याभाग स्थितिमूर्ति होने से सर्वथा कम्प रहित है । इसी विद्याभाग को सदा में रखकर श्रुतिने 'मनेजत्' कहा है। कर्मभाग गतिरूप होने से 'एज' है ! उन दोनों विरुद्धमावों से द्वैत का भ्रम न होजाय, अतः एकत्त्वव्यवहारमूला उसी सत्तातत्त्व की ओर लक्ष्य रख कर श्रुति न 'एकम्' कहा है । अने- जत्-और पजत् दोनों उस एक के उदर में समाविष्ट हैं । मध्यस्थ 'एकम्' दोनों का सम्बन्ध, सूत्र है । इसी रहस्य को में : रखकर "अनेज-एकम् -मनसो जबीया" यह क्रम रखा गया है । इस प्रकार स्पष्ट ही इस मन्त्र का विद्याकर्ममयाव्ययप्रतिपादकरच सिद्ध होजाता है । यदि इस मन्त्र में तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति' यह वाक्य न होता तो अवश्यमेव प्रकरणवत् यह द्वितीय प्रकरण भी विश्वोपहित (वेदोपहित ; शुद्ध अव्यय का ही निरूपक मान लिया जाता । परन्तु उक्त चतुर्थ चरण ही उस के वेदयुक्त सोगधिक भाव की ओर हमारा ज्यान माअर्पित करता है। लक्ष्य उस स्पितिगतिमत् विलक्षण तत्व में मातरिश्वा नाम का तत्त्व विशेष अप् का आधान करता है। श्राधान का अर्थ है माहिति । एक पालम्बन पर दूसरी वस्तु का रखा जाना ही माहिति किंवा प्राधान है। वैदिक परिभाषानुसार जिस पालम्बन पर वस्तु का अाधान होता है, जिस पर वस्तु प्राहित होती है. यह अत्ता ( भोक्ता ) बनता हुआ 'मन्नाद' नाम से व्यवहृत होता है, एन पाहित होनेराला पदार्थ 'माहुनि' कहलाता है । बाहिति शब्द ही परोक्षभापा में चाइति है , यही अन्न है । उदर थन्नाद है, यहाँ माहित अन्न अन्न है। दोनों का समन्वित मप ही यज्ञ कहलाता है। उदाहरणार्थ सूर्य अन्नाद है, उस पर श्राहित, अतएव पाहिति नाम से प्रसिद्ध चन्द्रमा ( सोम) थाति है । यही प्राकृतिक (आधिदैविक) नित्ययज्ञ है। इसी प्राधानामय यज्ञ का स्परम्प यतलाती हुई श्रुति कहती है- 'म व या मोऽनाग्निरेव सः । तस्मिन् यतकिमाभ्यादधति-पातिए एवाम्य ताः । मानियो वै ना माहुनय इत्याचक्षते परोक्षम । मादित्यो ।

प्राकृतात्मा या ईशोपनिषत् ।। विपयोपक्रम के वा भत्ता, तस्य चन्द्रमा (सोमः) एवाहितयः , चन्द्रमसं ह्यादित्ये आदधति" (शत० १०६३।१-२) प्रकृत मन्त्रभाग यही यज्ञक्रम बतला रहा है। प्राचीन भाष्य अनुसार अप् का अर्थ है कर्म, मातरिश्वा का अर्थ है सूत्रयायु । सूत्रवायु उस अनेजदेजत् नाम के परमात्मतत्व में कर्म का भाधान करता है। वैज्ञानिक दृष्टि से अप् आहुति द्रव्य है, मातरिश्वा भी एक खतन्त्र तत्व है, जैसा कि भागे जाकर स्पष्ट होचायगा । इस अबाहुति से यह भव्ययपुरुष यन- पुरुपरूप में परिणत होजाता है । पुरुष जबतक यज्ञ का आश्रय नहीं लेता, तबतक प्रजोत्पत्ति नहीं होसकती । कारण 'सह यज्ञाः प्रजाः सृष्टा ' (गी. ३।१०) के अनुसार प्रजा- सृष्टि का मूल उपक्रम यज्ञ प्रजापति ही है। अप् की आहुति होती है, इससे यज्ञस्वरूप निष्पन्न होता है । उधर हमारा शुद्ध अव्यय- पुरुष भोक्तभोग्यलक्षण अन्नअन्नादात्मक यज्ञ से सर्यया बहिर्भूत है । क्योंकि यज्ञ का पहिला मुल श्रापोमय परमेष्ठी है । आपसे ही यह होता है । यज्ञमूर्ति परमेष्ठी का अप् नाम का पुरंजन प्राणमय थेदपुरंजन से उत्पन्न होता है । स्वयम्भू का प्राण ही 'ब्रह्मनिश्वसित' वेद है । 'सोड पोऽस् नत वाच एव लोकाउ' के अनुसार इसी वेदवाक् से पानी उत्पन्न होता है । ऐसी अय- स्था में वेद हो तब अय् तस्य का विकाश हो, अप हो तब मातरिश्वा द्वारा उस अन्ययनल पर अप् का श्राधान हो । अतः मानना पड़ता है कि मन्त्रगत अव्यय प्रम वेदमय ही है । वेदमूर्ति श्रव्यय पर ही अबाहुति सभव है । वेदमय अव्ययब्रह्म हो, दुसरे शब्दों में अन्ययावच्छिन्न वेद ही इस मन्त्र का मुख्य प्रतिपाद्य विषय है । अव्यय स्वयं विद्याकर्ममय है । अतएव इस के था- स्महर के पञ्चीकृत प्राणभाग से प्रकट होनेवाला घेद भी अवश्य ही विद्याकर्ममय है । वेद में जो विद्या-कर्म का भाग है, षद अव्यय के विद्या-कर्म का ही अनुग्रह है । वेद क्या पदार्य है ! यह अपौरुषेय है, अथवा पौरुषेय ! आदि प्रश्नों के सम्बन्ध में बड़ा मतभेद है । इन सव विषयों का विवेचन भाष्यभूमिका में किया जाचुका है। अतः प्रकृत में मन्त्रार्थ से सम्बन्ध रखने वाले वेदपदार्थ का ही स्वरूप पाठकों के सामने रखा जाता है। इति-विषयोपक्रमः -- 14 मन्त्रार्थसम्बन्धिनी-त्रयीवेदनिरुक्ति:- प दार्थज्ञान का साधक तत्व वेद है | " भयं घटः" "अयं पटः" इत्यादि- रूप से जिसके द्वारा पदार्थ की उपलब्धि होती है, वह उपन्धि ही वेद है , जैसा कि पूर्व की वेदनिरुक्ति में विस्तार से बतलाया जाचुका है । वेद का जन्म किंवा आविभाव आत्मक्षर से होता है । श्रामक्षर की (मर्त्य) ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि, सोम यह पांच कलाएं हैं । सृष्टिनिर्माण करना ब्रह्मा का काम है । परन्तु जब तक यह ब्रह्मतत्व प्राणमय वेदक्षार को अपनी प्रतिष्ठा नहीं बना लेता, तब तक यह सृष्टिनिर्माण में सर्वथा असमर्थ रहता है। सृष्टिनिर्माता है ब्रह्मा, परन्तु साधन (उपादान है वेद । अतएव मन की इच्छा से ब्रह्मा से सर्व प्रथम वेद का ही प्रादुर्भाव होता है । उस प्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित होकर ब्रह्मा विश्व निर्माण करता है, जैसा कि पूर्व की विश्वनिरुक्ति में विस्तार से बतलाया गचुका है। . वेदमन्थों के मक्तो को यह सुविदित है कि वेदतत्त्व अस्, यजुः, साम, अथर्व मेद से चार भागों में विभक्त है । चतुर्दा विभक्त वेदतत्व विज्ञानदृष्टि से अमि-सोम मेद से दो भागों में विभक्त है। अग्निवेद पहिला वेद है, सोमवेद दूसरा वेद है। वह तत्व जो दाहक होता हुआ केन्द्र से निकलकर विविध अवस्थानों में परिणत होता हुआ, उत्तरोत्तर विशकलित होता रहता है, यही अग्रगामी होने से 'अग्नि' कहलाता है। आगे चलना, आगे बढ़ना इसका खाभाविक धर्म है । परोक्षभाषानुसार यह अमितत्त्व ही अग्नि' नाम से व्यवहृत होता है- ( देखिए शत० ६ का प्र०१ अ १ बा०।११ ३०)। वह तत्त्व जो दाश होता हुभा प्रधि (परि- घि) से केन्द्र की ओर पाता दुना प्रधि की ओर जाते हुए दाहक अग्नि में आहुत होकर अग्नि अग्निः कस्मात् अग्रणीभवति, प्रम यशेष प्रणीयते, अव नयति सन्नममाना, स्नोपपति, न स्नेक्ष्यनि" [पा. नि. ५. दै. कां० ३-४-५-11 I.. न प्राकृतात्मा सा ईशेपनिपत प्रयीवेद --veev । - को स्वस्वरूप से सुरक्षित रखता है, वही सुत (आहुत ) होने से म्यते' इस निर्वचन के अनु- सार सोम नाम से प्रसिद्ध हैं । सोम स्नेहतत्त्व है, अग्नि तेजतत्त्र है । स्नेहतरत्र की प्रतिष्ठा स्थि- तितत्त्य है, तेजतत्व की प्रतिष्ठा गतितत्त्व है । स्थिति--गति ही धागे जाकर स्नेह-तेज रूप में परिणत होजाती है । प्रत्येक पदार्थ स्थिति-गति-स्नेह-तेज इन चारों की समष्टिमात्र है, जैसा कि आगे जाकर स्पष्ट होजायगा । संसार में आप जितनी भी मूर्तिएं देख रहे हैं, वे सब अग्निमयीं हैं । अग्नि ही मूर्ति का निर्माण करता है । दूसरे शब्दों में अग्नि ही वस्तु का स्वरूप है । वस्तु (पदार्थ) गुणकूटो द्रव्यम्' इस दार्शनिक सिद्धान्त के अनुसार कर्म का पुद्- गल है। यह कर्म कर्म एवं किया भेद से दो भागों में विभक्त है । एक एक क्रिया किया कह- लाती है, ऐसी अनेक क्रियाओं की समष्टि 'कर्म' नाम से व्यवहृत होती है । अनेक क्रियाओ के संघात से एक कर्म ( काम ) पूरा होता है । उदाहरणार्थ भोजन निर्माण एक कर्म है । इस कर्म को सिद्धि के लिए इंधन - अग्नि-पानी-पाटा-नमक-फरकार आदि अनन्त क्रियाएं करनी पड़ती हैं । 'रसोई तै पार होगई' यह एक कर्म संपन्न होगया । इस कर्मसंपत्ति के लिये तदवयचभूत अवान्तर कितने ही कर्म करने पडे । यस महाकर्म सिद्धि के लिए क्रियमाण अवान्तर कर्म क्रिया नामसे, एवं अवान्तर कर्मों से निष्पन्न कर्म कर्म नाम से व्यवद्दत झिया जाता है । एक ही कर्म की दो अवस्थाएं होजाती हैं । इसी क्रियासंतानरहस्य को लक्ष्य में रख कर अभियुक्त कहते हैं- गुणभूतरवय समूहः कमजन्मनाम् । बुद्भया प्रकल्पिताभेदः क्रियेति व्यपदिश्यते ।। 'वाक्यपदी) कर्म की क्रिया अवस्था क्षोभयुक्ता है, कर्मावस्था शान्तयत् है । हल-बल क्रिया है । यिति कर्म है । स्वस्थान पर स्थिर रहते हुए चलना हिलना है, इसे ही कम्पन कहते हैं। स्वदेश का परित्याग करते हुए आगे बढ़ना चलना है, यही गति है । इस प्रकार क्रियाभाव कम्पन-भोर गति दो भायोमें परिणत रहता है । इसी अभिप्राय से इस का 'हलचल' शब्द से अभिनय किया जाता है । कहना यह है कि यातुमात्र में एक स्थिरभाव है, एक चलभाव है।

॥ ईशोपनिषत् ।। वयोवेट प्राकृतात्मा निरन्तर उस पदार्थ में से उसके परमाणु निकला करते हैं, इसी ( परमाणुविनिर्गमा) अपस्या का नाम क्रिया है । वस्तुपिण्ड कर्म है। शरीर पर दृष्टि डालिये । शरीर अग्निपिण्ड है। आप शरीर को जहा छते हैं, गरम पाते हैं । यह अग्नि के प्रत्यक्ष दर्शन हैं । इस अग्निमूर्ति शरीर से प्राणाग्नि का निरन्तर विवसन होता रहता है । इन्द्रियजन्य परिश्रम, रोमकूप आदि से प्राणा- नि खर्च होता रहता है । इसी कमी को पूरा करने के लिये साय प्रातः अन्नाहुति ( भोजन ) की आवश्यकता होती है । शरीरपिण्ड अग्निमय है, जो वस्तु खर्च हो रही है यह भी अग्नि है। इस प्रकार पिण्डरूप कर्म विश्वसनलक्षण क्रिया दोनों का अग्निमयत्त्व सिद्ध होजाता है । वस्तु- पिण्ड कर्म है, यह भी अग्नि है । वस्तुपिण्ड में होने वाला व्यापार किया है, यह मी अग्नि ही है। इस प्रकार संसार में जितने भी कर्म है, उन सब का अग्निमयत्व मान लेना पड़ता है । अग्नि की इसी कर्मव्यापकता को लक्ष्य में रखकर "विश्वानि ( सर्वाणि ) कमाण्ययमग्निः" (शत. ग्रा. रा. १५ अ०।१ वा । १२ क ) यह कहा जाता है । दम अमुक वस्तु देख रहे हैं, इस याक्य का 'देखना' कर्म से ही तो सम्बन्ध रखता है । परिवर्तनरूपाक्रिया, एव पुद् गला वस्थापन्न कर्म ( वस्तुपिण्ड ) हो तो दृष्टि के विषय वनते हैं । दृष्टि विषयक सारे कर्म अग्नि- रूप हैं, दूसरे शब्दों में इन कर्गों का प्रपतक, किंवा स्वरूप सम्पादक अग्नि दी है। इसी रह- स्य को लक्ष्य में रखकर निम्रन्थु ( निधन्दु ) शास कहता है- . । 4. । के "यस किश्चिद्दाष्टिविपयकमग्निकम्मैव तत्" ( या नि० दे० का० ७८३) सर्वकर्मप्रवर्तक, सर्वकर्ममूर्ति इस अग्नि की प्राण-भूत मैद से दो अवस्थाए हैं । प्राणाग्नि अमृताग्नि है. यही देवता है । भूतानि माग्नि है, यही भूत है । वस्तुपिण्ड भौतिकाग्नि है, पिण्ड- गत निराकार प्राणाप्ति देवता है । प्राणाग्नि क्रिया है भूताग्नि कर्म है । इस प्रकार ससार सारे मूत, एय सपूर्ण देयता "सर्वाणि वाऽएप भूतानि. सर्वान देवान् गर्मी विभर्चि, यो. ऽग्निं विपत्नि" (शतः मा. २ का । ५ श्राग्रा० । ६२ क- ) के अनुसार अग्नि मय दी है। इस थन्नादाग्नि की सत्ता सोमाहृति पर निर्भर है । जब तक सोमाहुति होती रहती है तभी तक अग्नि स्वस्याप में प्रतिष्ठित रहता है । भूताग्निमय प्राणाग्नि ही मृतिम्पमें परिणत हमा है । परन्तु पिच्चास कीजिर जब तक इस में सोम की अाहति नहीं होगी, तब तक बह प्राकृतात्मा - ईशोपनिपत् ॥ त्रयीवेद मूर्ति कभी प्रतिष्ठित न रहेगी । कारण-अग्नि तेजोमय होता हुआ विशकलनधर्मा है । यह ठहरना जानता ही नहीं । उसमें निरन्तर गति होती रहती है । वह मूर्ति का निर्माण नहीं करता, अपि तु उस के स्वरूप को विशकलित करता है । परन्तु स्नेहगुणक सोम इस में आहुत होकर इस की विशकलनशक्ति का स्तम्भन कर देता है । इस सोमसम्बन्ध से अग्नि को बाध्य होकर मूर्तिरूप में परिणत रहना पड़ता है | यह सोम अग्नि में आहुत होकर अग्निमय बनकर ही मूर्ति सत्ता का कारण बनता है. इसी आधार पर अग्नि को मूर्ति का अधिष्ठादा मानलिया जाता है। परन्तु वस्तुतः यह मूर्तिभाव सोम की कृपा पर ही निर्भर है । जिस प्रकार अग्नि 'प्राण' कह लाता है, एवमेव सोमतत्त्व 'रयि' नाम से व्यवहृत होता है। रयि ( सोम ) ही मूर्ति बनता है, इसी आधार पर - ' तस्मान्मूतिरेव रयिः' (प्रश्नोपनिषत् १ प्र० ५ क० ) यह कहा जाता है । सोमतत्त्व थाहुति द्रव्य है, अत एव भोक्ता अग्नि की अपेक्षा इसका स्थान ( दर्जा) नीचा माना जाता है । यह सब कुछ होते हुए भी सोम अग्नि का अभिन्न मित्र है, अन्तरंग सखा है। अपने छोटे दर्जे के इसी सोम सखा के कारण प्रज्वलित होकर यह अग्नि ही वेदत्रयी का प्रमय वनता है, जैसा कि मन्त्रश्रुति कहती है- अग्निजागार तसृचः कामयन्ते, अग्नि गार तमु सापानि यन्ति । . अग्निीगार तमयं सोम माह तबाहमस्मि सख्ये न्योकाः ।। (ऋक् सं० ५।११।१५) उक्त अग्नि-सोम के निरूपण से प्रकृत में हमें यही बतलाना है कि सम्पूर्ण भौतिक विश्व में अग्नि-सोम का साम्राज्य है, जैसा कि 'अग्नीपोमात्मकं जगत्' इत्यादि से स्पष्ट है । स्वयम्भू-परमेष्ठी आदि विश्वके पांच पर्व हैं। पांचों में स्वयम्भू सत्याग्निमय, सूर्य देवाग्निमय, पृषियी भूताग्निमयी है । परमेष्ठी और चन्द्रमा सोममय हैं, जैसा कि शुक्रनिरुक्ति में विस्तार से वतलाया जाचुका है। इस दृष्टि से भी विश्व का थग्निसोममयत्व सिद्ध होजाता है। इनमें अग्नि- घेद वेदनयी है, सोमवेद चौपा अथववेद है । अग्नि की अग्नि-वायु-आदिन्य यह तीन भवस्याएं हैं, अतएव अग्निवेद ऋक्-पजुः-साम मेद से तीन भागों में विभक्त होजाता है । । - प्राकृतात्मा त्रयौवेद * ईशोपनिपन ॥ N www सोमतत्य दिक्मोम(निरायतन सोम) भाम्बर सोम (सायनन सोम) भेद से दो भागो में विभक्त है। अतएव सोमवेद-योरागिरा मथर्वाङ्गिरा भेद से दो भागो में विभक्त होजाता है। दोनो की समष्टि अथर्ववेद हे । त्रयीवेद की प्रतिष्ठा अग्निमुर्ति ब्रह्मा है, दूसरे शब्दो में त्रयीवेद पिता पर प्रतिष्ठित है, एवं सोमवेद ब्रह्मा के ज्येष्ठपुर अयय पर प्रतिष्ठित है, जैसा कि आगे जाकर स्पष्ट हो जायगा । सोपवेद को थोड़ी देर के लिये छोड दीजिये, अग्नि वेद पर दृष्टि डालिए । यह अग्निद प्रात्मा प्रतिष्ठा, ज्योति, भेद से तीन भागों में विभक्त है । आत्मवेद यजुर्वेद है प्रतिष्ठावेद ऋग्वेद है एव ज्योतिद सामवेद है। यह तीनों ही वेद पूर्वप्रति- पादित मन-प्राण-मार के त्रिवृत्करण से त्रयीभाव से युक्त हैं । तीनों में से सर्वप्रथम सर्व- प्रधान आत्मरूप यजुवेद को ही लीजिए। १-यात्मवेदः ( यजुर्वेदः- ऋग्यजुःसाममयः ) 'स वा एप आत्मा वाडमयः प्राणमयो मनोमय के अनुसार आत्मा मन-प्राण- गङ्मय है । इसी का नाम विद्यागभित अन्ययात्मा ( कर्मात्मा) हे । आत्मा की इन तीनो क्लाओं से क्रमश रूप-कर्म-नाम इन तीन गर्य कलाओं का उदय होता है । मन रूपमात्र का उक्थ हे । मन ही पियरूपाकाराकारित बनता है दूसरे शब्दों में सारे रूप मन से ही उठते है, अतएय हम मन को रूपों का उस्य (मभवम्यान) मानने के लिए तय्यार है । मन ही रूपों को धारण करता है पिपयाकार मन पर ही प्रतिष्टित रहता है अतएप इसे सत्र रूपों का ब्रह्म (विमति रूपाणि) कहा जासकता है । अश्य-मनुष्य-घट-पट आदि सन इस परस्पर में सर्वथा मिन है । परन्तु इन भिन्नों में मन अभिन्न रूप से व्याप्त है, सब रूपों मं समान है, सम है, बन मन को ही रूपों का साम (मासानभूमि कहा जामकता है | इस प्रकार यतो उनिष्ठन्नि संगगि कपाणि, विभनि गत् समाणि रूपागि, सम यत् मषु भूतेपु"इस निर्वाचन प्रक्रिया के अनुसार हम या मा की मनोकलाको रूपों का उक्थ-ब्रह्म- माम लक्षण प्रामा माननें के लिए तयार हैं । इसी प्रकार आमा यी प्राणकला कमों की उक्य के ।

प्राकृत त्मा या ईशोपनिषत् | अपीवेद . माझ-साम है. वाक्कला नामों का उपय-ब्रह्म-साम है । नाम-रूप-कर्म भेद से वह एक मा- स्मतत्व तीन भागों में विभक्त होरहा है । तीनों मिलकर एक आत्मा है | इस मात्मा की मनो. कला में उक्यभाव प्रधान है, ब्रह्म-साम भाव गौण हैं, प्राणकला में ब्रह्मभाव की प्रधानता है, उक्य-साम गौण हैं , एवं वाक्कला में साम की प्रधानता है. उक्थ ब्रह्म गौण हैं । इस गौणमुख्य भाव के कारण तगादन्याय से हम मन को उक्थ कहसकते हैं, प्राण को ब्रह्म कह सकते हैं, एवं याक् को साम कहसकते हैं । यह उक्थ ऋक् है, प्रक्ष यजु है, साम साम है। इस प्रकार उक्य-ब्रह्म-साम मैद से प्रारमरूप यजुर्वेद में तीनों वेदों का समन्वय होजाता है। - १-प्रतिष्ठावेदः (ऋग्वेदः-ऋग्यजुःसाममयः) दूसरा है मतिप्दावेद । इसीका नाम ऋग्वेद है। यह प्रतिष्ठातत्त्व प्रात्मभूमि, असतोध- ति, सतोपति भेद से तीन भागों में जिभक्त है । मन-माण-वाक् की अव्याकृतावस्था का माम- सत्ता है , यही आत्मा है । प्रत्येक वातु पर इस भारमलक्षण सत्तामा का अनुग्रह है। प्रत्येक वस्तु अतिमागम्न है । सूर्य स्वरूप से विद्यमान है. पृषी है, हम हैं, इस प्रकार प्रत्येक पदार्थ का पदार्थत्व सुरक्षित रखने वाला जो अस्तिभार है-स्यसत्ता है. इसी का नाम आत्मभृति' (आत्म प्रतिष्ठा-श्रामसत्ता) है । हम (प्रत्येक पदार्थ) मन को धारण करते हैं, प्राण को, एवं वाक् को धारण करते हैं । इसी घृति से हम हैं। अहमस्मि' (मैं हूं) यही तो आत्मधुति किंवा- स्वकृति है। जो वस्तु सत्ताशून्य होती है वह अन्य सत्ता के अनुपह से सत्तावत् बन जाती है । उदाहरणार्य-घट पहले न या, वह असद या. नालि रूर था. अभाव के गर्भ में विलीन पा | कुम्भकार मिट्टी में फुलाल द्वारा अपनें मनप्राणवाङ्मय मात्मा के प्राधार पर हस्तप्रयोग से बल डालता है। कुम्भकार के बौद्धजगत् में प्रतिदिन, भतएव तदाकाराकारित (घटकारा- कारित) मन प्राण वाक् की सहायता से दण्ड-चक्र-वीरादि साधनों द्वारा यह असत् घट যুনাল। त्रयीवेद ॥ ईशोपनिषत् ।। wwwvwwse . मृत्तिमा में स्थित स्त्ता को ग्रहण कर सत्तायुक्त बन जाता है । घट में जो सत्ता है. यह मिट्टी से श्राई हुई है । असत् घट मृत्सत्ता से सत् बन रहा है । इसी सत्ता की अपेक्षा से 'घट उत्पन्न हुआ' यह व्याहार होता है । थपूर्वसत्ताधारण को ही 'जन्म' कहा जाता है । उत्पन्न वस्तु अपनी प्रकृति ( उत्पादक ) में ही प्रतिष्ठित रहती है। अतएव इस प्रकृतिसत्ता को 'असतो धृति' कहा जाता है जैसा कि-'याचारम्भगा विकारो नामधेय मृत्तिकेत्येव सत्यम्" इत्यादि से स्पष्ट है | सस्वरूप से हम यात्मधृति रूप हैं, एव शरीर असतो धृति रूप है । जीवात्मसत्तारूप प्रामधृति से असत् शरीर सत्तायुक्त बन रहा है । यही दूसरी प्रतिष्ठा है। । तीसरी सतोवृति है । जल भी सत् है, घट भी सत् है । सत घट में सत जल भरा दुश्रा है, यही सतेधृति है । हम भूपृष्ठ पर प्रतिष्ठित हैं, पुस्तक मेज पर रक्खी है । अस्तियुक्त पदार्य प्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित रहते हुए अन्य प्रतिष्ठा पर प्रतिष्ठित हो रहे हैं । महाप्राण अल्प- प्राण की प्रतिष्ठा है । अन्नाद अन्न की प्रतिष्ठा है । शरीर वस्त्र की प्रतिष्ठा है । हमारा प्रतिष्ठा घर है, घर की प्रतिष्ठा भूपिण्ड हैं, भूपिण्ड की प्रतिष्ठा पानी है, पानी की प्रतिष्ठा अग्नि है अग्नि नि प्रतिष्ठा वायु है, वायु कि प्रतिष्टा आकाश है, पाराश की प्रतिष्ठा सौम्यप्राण है, प्राण की प्रतिष्ठा मन है, मन की प्रतिष्ठा विज्ञान है थानन्द सत्र की प्रतिष्ठा है । इस प्ररार यह प्रतिष्टा उत्तरोत्तर के सद्भावों को अपनें में प्रतिष्ठित व्यती है . अतएर हम इसे ' सतोवृति' कहने वेलिये तय्यार हैं । इसी को परप्रतिष्टा भी कहा जासकता है । यही तीसरी प्रतिष्ठा है। . पुरुषप्रनिष्टा श्रामभूति है, प्रकृतिप्रतिष्ठा असतो प्रति है, एव पिवृतिप्रतिष्ठा सतोमृति है । पुरुष ही प्रति है, प्रकृति ही व्यतापस्या में श्राकर प्रिति बहलाने लगती है । फलत उक्त तीनों प्रतिष्ठा का प्रततोगत्वा-'आत्मविमृति' (प्रात्मप्रतिष्ठा ) पर ही पर्यपसान सिद्ध हो जाता है। तीनों प्रतिष्ठा प्रतिष्ठा है । प्रतिष्ठाताय 'ब्रह्म' है । ब्रह्मतत्व प्राण है, जैसाकि पूर्व के भारमयेद में बतलाया जानुका है । यह वही प्राण है जो सप्तपुरुपपुरुषात्मक ब्रह्मग्नजापति के प्राकृतात्मा - ईशोपनिषत् । । प्रयीवेद. तप से प्रकट होता है । "ब्रह्म व सर्वस्य प्रथमजम" "ब्रह्म वे सर्वस्य मतिष्ठा" के अनुसार ब्रह्माक्षर से समुद्भूत यह प्राणप्रतिष्ठा साक्षात् वेद है । जैसे अप्प्रकृतिक अक्षर विष्णु से उत्य- न होनेगाले भाव लोक कहलाते हैं, एवमेव प्राणप्रकृतिक ब्रह्माक्षर से प्रसूत प्रतिष्ठाभाव वेद नाम से प्रसिद्ध हैं। पूर्वप्रतिपादित इन तीनों घृतियो में आत्मधृति ऋग्वेद है । क्योंकि भागे की सारी प्रतिष्ठाएं भारमप्रतिष्ठा पर ही प्रतिष्ठित रहती हैं । असतोवृति-सतोधृति दोनो का प्राधार यात्मप्रतिष्ठा है । यजु-ओर साम अक् पर प्रतिष्ठित रहते हैं । अतएव सर्वप्रतिष्ठारूप इस अरमप्रतिष्ठा को हम याश्य ही ऋग्वेद कह सकते हैं । प्रस्ताव ऋग्वेद है, ऋक् ही उपकम है । आत्मप्रतिष्ठा ही इतर प्रतिष्ठानों का प्रस्ताय (उपक्रम ) स्थान है । असतोवृति यजुर्वेद है । कार्य में कारण सत्ता का योग हो जाना ही असतोधति है । कारणसत्ता कार्य में आहुत हो जाती है । दोनों का यजन होता है। अतः 'यजनात्' से इस असतो पति को हम अवश्य ही यजुर्वेद कहने के लिये तय्यार हैं । एवं शेष सतोधृति सामवेद है | साम का 'ऋचा समं मेने' यह लक्षण है । यामधृति ऋक् है । अन्य यो घारण करने वाली भामसत्ता ही सतो- धृति है । अ.त्मधृति ही प्रागे जाकर सतोधृति बन जाती है। संतोधृति ऋग्रूपा यात्मभृति से समभावापन्न है, अतः इसे सामवेद कहा जासकता है। इस प्रकार ऋग्वेदरूप प्रतिष्टावेद में प्रतिष्ठात्रयी के कारण ऋक-यजु-सामारिका वेदत्रयी का उपभोग सिद्ध होजाता है । -- ३-ज्योतिर्वेदः (सामवेदः-ऋग्यजुःसाममयः) तीसरा है ज्योतिर्वेद । 'सबै तेजः सामरूपं शश्वत' के अनुसार ज्योति ही सामवेद है । ज्ञानज्योति, भूतज्योति, ससज्योति मैद से ज्योतितत्न तीन भागों में विभक्त है । यात्मज्योति ज्ञानज्योति है | मूर्य-चन्द्र-विद्युत-नक्षत्र-अग्नि-भेद से पञ्चधी विभक्त ज्योति भूतग्योति है । ज्ञानज्योति ही भूतन्योति की प्रतिष्ठा है । ज्ञान ही भूत की आधार भूमि है । ज्ञानज्योति से ही भूतज्योति प्रकाशित रहती है, अतएव इस ज्ञानज्योति को 'ज्योतिपांज्योति ।

" प्राकृतात्मा प्रथीवेद | ईशोपनिपन् । (ज्योतियों की भी ज्योति) कहा जाता है । भूनज्योति पाच है, इसी बहुत्त्र की अपेक्षा से ज्योतिषां' कहागया है । इसी मूलग्योति का निरूपण करती हुई उपनिषछुति कहती है- न तत्र सूर्यो भानि न चन्द्रनारक नेपा विद्युतो भान्ति कुनोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सवै तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ।। । वात यथाय है । जबतक हम में ज्ञान है, तभी तक सूर्य-चन्दादि हमारे लिए प्रका- शित हैं । यदि ज्ञान विलुप्त है तो सारे विश्व में हमारे लिये अन्धकार है । इसी आधार पर पान्तीय भाषा में "माप मरा तो जग पाल (पनय)" यह किंवदन्ती प्रचलित है । इस ज्ञान- ज्योति से प्रकाशित भूतज्योतियों का मूलाधर सूर्यज्योति है । इसका चक्षुरिन्दिय पर अनुप्रह होता है । तीसरी सबज्योति नामरूपात्मिका है । नामरूपात्मक घटपदादि में जो भाग विरोप नाम से प्रसिद्ध है, वही अमृत है । यही त र विज्ञानभाषा में 'माण' नाम से प्रसिद्ध है । यह अमूनभाग घट-पटादि समस्त पदार्थों में समान है, विशेष रूप से व्याप्त है । यही विशेष (अमृतत्व) नामरूप की कृपा से विशेष बन कर 'प्रयं घटः' 'अयं पट.' इत्यादि रूप से पृथक् पृथक् प्रतीत होने लग गया है । यदि नामरस का परित्याग कर दिया जाता है तो वह अमृततत्य औपाधिक विशेषभाव से पृथक् होता हुआ अप्रतीति का विषय बन जाता है। नामरूप के बिना वह सर्वथा तिरोहित है | नामरूप से परिच्छिन्न होकर ही यह प्रकाशित होता है । अतएव अन्त को प्राधादित करने वाले, किन्तु उसे मातिरूप से प्रकाश में लाने वाले नामरूप को इम अवश्य ही 'ज्योति' कहने के लिए तथ्यार है । विषयोपक्रम में बतलाए हुए सत्सनियन के अनुसार नामरूपाग्मिका ज्योति सत्यज्योति है । जैसा कि निम्न श्रुति से सष्ट होजाता है- "तदेतदमृ सत्पन छन । नायरूपे सस्यम् । साभ्यामयं प्राणश्छन्नः" (शत. १४ वा०) इति । २.

त्रयीवेद . प्राकृतात्मा ईशोपनिषत् | । इन्हीं तीनों ज्योतियों के कारण ज्योतिर्मय देवताओं को त्रिसत्य कहा जाता है । उक्त तीनों ज्योतिए विश्व में परस्पर में नित्य सम्बद्ध है । ज्ञानज्योतिर्मय प्रात्मा (विज्ञानात्मा) सुपुस्ति- काल में जब पुरीतति नाड़ी में चला जाता है तो वह भूत -एवं सत्यज्योतियो का प्रत्यक्ष करने में असमर्थ होजाता है । सूर्य-चन्द्र-अग्नि-वाक्-धात्ममेद से पञ्चज्योतिर्मय यह ज्ञानज्योतिर्धन जीवात्मा भूतज्योति के सहारे ही अध्यात्मसंस्था में प्रतिष्ठित रहता है । आदित्यज्योति से ही - यह तत्तत् कमों में प्रवृत्त होने के लिए समर्थ होता है । तदभाव में चन्द्रमा, चन्द्राभाव में अग्नि, अग्नि के अभाव में वाक्, सर्वाभाव में आत्मा है । परन्तु विना सूर्यादि ज्योतियों के यह अधिक समय तक नहीं ठहर सकता, जैसा कि 'असुर्या नाम ते लोकाः' इसादि मन्त्रभाष्य में विस्तार से बतलाया जाचुका है । शारीरप्राणों के केन्द्रभूत हृदय में जो विज्ञानज्योति है, वही आत्मा है । भूतज्योतिर्घन सूर्य द्वारा अध्यात्म में प्रविष्ट होने वाला यह प्रात्मा खप्रभवरूप ज्योतिर्मय सूर्यादि के बिना कैसे प्रतिष्टित रह सकता है । इसी प्रकार नामरूप के विना भी शुद्ध ज्ञानात्मा का विकास असंभव है । नामरूप को छोड़ देने पर ज्ञानात्मा निर्विकल्पकभाव में परिणत होता हुअा मातिजगत् से बाहर निकल जाता है । ऐसी अवस्था में हम कह सकते हैं कि उपर्युक्त तीनों ज्योतिएं परस्पर में ओतप्रोत रहकर ही उपलब्ध होती हैं । इन तीनों में मूलप्रभव ज्ञानज्योति प्रस्तावस्थानीय होने से ऋग्वेद है । विषयावसानभूमिरूपा सत्य- ज्योति सामवेद हैं । दोनो का यजन (सम्बन्ध) कराने वाली मध्यपतिता भूतज्योति यजुर्वेद है । इसप्रकार ज्योतिलक्षण सामवेद में ज्योतित्रयी से वेदत्रयी का भोग सिद्ध होजाता है । मात्मा, मतिष्ठा, ज्योति इन तीनों में प्रतिष्ठा सनातत्व है, ज्योति चेतना है, आत्मा आनन्दधन है। सचाश्रयमात्र सत् है, चेतनाश्रय चिद है, अानन्दाश्रयभाव मानन्द है । विश्वातीत विशुद्ध अन्यप के सत्ता-चेतना-यानन्द के आश्रय से प्रतिष्ठित रहने वाला विश्व- मूर्ति मजापति भी सच्चिदानन्दधन है, तदंशमृत जीवात्मा भी सच्चिदानन्द है, ईश्वरांशभूत विश्व भी 'सच्चिदानन्दम्' है । सचिदानन्दघन ईश्वर-जीव-विश्व इन तीनों के 'सत्ता-चेतना आनन्द यह तीन वेद हैं । सुतरां वेदत्रयी का भी सच्चिदानन्दत्व सिद्ध होजाता है । यही ब्रह्म । २१ प्राकृत त्मा सा ईशोपनिषत् ॥ जयीवेद . - है, यही सर्वत्र व्याप्त है, यही सब कुछ है, इसी में सब कुछ है । यह है मौलिकवेद । इन तीनों में आनन्दात्मकवेद ही (यजुर्वेद ही) पहिला पुरजन है । यही सृष्टि का मूलप्रभव है । यह अनेजत् है, मनसो जबीयः है, एकम् है । आगे का सारा प्रपञ्च इसी अव्यक्त वेद से उत्पन्न होता है, उत्पन्न होकर इसी प्रतिष्ठित पर रहता है, अन्त में इसी में विलीन होजाता है- अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तपध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना । अग्निवेदविवर्त अग्निवेदस्योकेदः (मूलवेदः ) १-यात्मवेदः ..."मानन्दः :..."आनन्द:--- यजुर्वेदः -प्रतिष्ठावेद""""""सत्ता ....."सत् ऋग्वेदः ....चेतना "चित् -- सामवेद मनिमयो मूलवेदः ३-ज्योतिद.. ऋग्वेद. a 1 - → २ । उक्यम् -1 - उक्थवेदः बझ -२-ब्रह्मवेद यजुर्वेदः आत्मवेदः-वेदत्रयात्मक साम -३-सामवेद सामवेद यजुर्वेदः १ यजुरमिः पामा-१-यात्मधृतिवेदः ऋग्वेद शृति --असतोतिवेद यजुर्वेद. प्रतिष्ठावदः वेदत्रयात्मक विशृति. -३ सतोप्रतिवेद ऋग्वेदः २ ऋगमिः । थामा-1-ज्ञानज्योतिदः, ऋग्वेद मूतानि-२-मनज्योतिदः यजुर्वेदः नामम्पे :- सत्य-योतिदः सामवेदः । ज्योतिवेदो वेदत्रयात्मक सामवेदः ३ सामामि -- सामवेदः ३ - -- १२ प्राकृतात्मा - ईशोपनिषत् ।। त्रयीवेद । आत्म-प्रतिष्ठा-ज्योति तीनो मिलकर एक वेद है। तीनों का समुचित रूप ही हमें उपलब्ध होता है । प्रत्येक वस्तु की हमें अस्तिरूप से उपलब्धि होती है । अस्ति सत्तातत्त्व है, यही प्रतिष्ठावेद है । वस्तु है-यह हम जानते हैं । यह ज्ञानज्योति ही चेतना है | चेतना ही ज्योति र्वेद है । जो वस्तु है, जिस का हमें ज्ञान होता है, ज्ञानसत्ता का प्रतिष्ठाभूत वही तीसरा वस्तु- तत्त्व 'रस' है । यही प्रिय है, यही आनन्द है, यही यात्मा है , यही प्रामवेद है । अस्ति- भाति-मिय की समष्टि ही वस्तूपलब्धि है । यही त्रयीवेद है । संसार का प्रत्येक पदार्थ वेद है, 'अनन्त व्यक्तिएं हैं, अनन्त वेद हैं। समष्टिरूप से एक ही वेद है। उपलब्धिरूप यह 'सच्चिदानन्दात्मकवेद' नामरूपकात्मक भौतिक पदार्थ के आधार से ही प्रतीति का कारण बनता है। यदि अस्तिमत् पदार्थ में से नामरूपामक भूतभाग को हटादिया जाता है तो स्वस्वरूप से निराकार रहता हुधा वेद तिरोहित हो जाता है । उपलब्धिरूप वेद को आप जब भी देखेंगे, भूत के आधार पर ही देखेंगे । त्रयीवेद के आधार पर प्रतिष्ठित रहने वाला नामरूपकर्मप्रपञ्च सर्वथा असत् रहता दुभा भी उस वेद अस्ति से अस्तिवत् प्रतीत होने लगता है । संसार में आप जो कुछ 'अस्ति' 'अस्ति' कर के देख रहे हैं, विश्वास कीजिए वह सब त्रयीगर्भित वेद ही है । वही अस्ति अमृत है, जो अमृत है वही है । साथ ही में नामरूपकात्मक मत्यमाग भी वही है । क्योंकि मनप्राणवाङ्मय प्रस्तिभाग ही तो नामरूपकर्म का प्रभव है । इसी वेदविज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है- "स त्रा धाव विद्यायां सर्वाणि भूतान्यपश्यत । एतद् वा अस्ति । एतद्धि-अमृतम् । यद्धचमृतं तद्धयन्ति । एतदु तत्-यन्मय॑म् । अय्यां वाव विद्यायां सर्वाणि भूतानि- प्रतिष्ठितानि " (शत० १०।६।१।२।) इति । वेदतत्त्व को मानापत्य कहा जाता है । ब्रह्मप्रजापति से उद्भूत वेद वास्तव में प्राजापत्य है । पुरुष ( मनुष्य ) प्रजापति से उत्पन्न केशलोमादि जैसे पुरुष को चारों ओर से वेष्टित कर प्राकृतात्मा ॥ ईशोपनिपत् ।। प्रयौवेद लेते हैं, एवमेव प्रजापति से उत्पन्न प्राजापत्यवेद प्रजापति को केन्द्र बनाकर इस के चारों ओर व्याप्त हो जाता है । सम्पूर्ण विश्व इस प्राजापत्यवेद से आप्पायित रहता है । इसी प्राजापत्य. वेद का दिग्दर्शन कराती हुई श्रुति कहती है- १-"प्रजापतिरिदं ब्रह्म वेदानां संसृजते रसम् । तेनाहं विश्वमाप्यासं सर्वान् कामान दुहां महत् ॥ (ऐ. आ. y" २-"महाननं कर्म चा, निष्केवल्यं शस्त्रं वा संसजे, तेन सर्वफलमाप्नुयाम, सर्वाश्च कामान् सम्पादयेयम् ।' ३-"पानापयो वै वेदः" (तै० बार ३३७ ) । ४-"प्रजापतेर्वा एतानि श्मशूणि यद् वेद (त० वा० ॥३॥५) । ........... उक्त ब्रह्मप्रजापति अपनी वेदविभूति के कारण वेदि, वेद, यज्ञ, प्रजापति, भेद से चतुःसंस्थ बन जाता है । उदाहरण के लिए पार्थिवप्रजापति की संस्थाओं का विचार करिए । पृथिवीस्वरूपसमर्पक सप्तपुरुषपुरुषात्मक अग्नि प्रजापति है, जैसा कि विश्वनिरुक्ति में बत- लाया जाचुका है । भूपिण्ड निम्मीण की इच्छा रखने वाले इस अग्निप्रजापति की सब से पहिले 'पुष्करपर्ण' पर दृष्टि जाती है। पुष्करपर्ण इस की पहिली प्रतिष्ठा बनती है । पार्थिवप्रजापति ( ग्रहा) पुष्करपण पर प्रतिष्टित होकर ही पार्थिवष्टि निर्माण में समर्थ होता है अतएष पाणिव ब्रह्मा को 'पद्मभूः कमलोदभवः' यादि नामों से व्यवहृत किया जाता है । इसी - धार पर पद्मपुराणादि में भूपिण्ड को चतुर्दनकमत्र माना गया है । पानी में वृन्तद्वयात्मवा- सूक्ष्मातिसूक्ष्म हरितपय की जो 'काई है, जो कि काई श्रागे जाकर शैवाल रूप में परिणत होजाती है, यही 'पुप्फरपर्ग' है । पुष्करपर्ण का शब्दार्य है-पानी का पना । श्रारम्भ में मा की प्रतिष्ठाभूत पप का क्या त्यरूप है । पायगुवनको फे आदि प्रवर्तक कौन थे? इत्यादि सियों के प्राप्यात्मिक, प्राधिदैविक, प्राधिभौतिक पस्यों को जानने के लिए शवस्प विज्ञान माप देखना चाहिए। २४ प्राकृतात्मा ॥ ईशोपनिपन् । प्रयीवेद । पानी के ऊपर पानी से ही इसका निर्माण होता है । पानी प्रतिष्ठाशून्य है, ऋन है । पाए इसमें जो भी डालेंगे विलीन होजायगा । सब से पहिली प्रतिष्ठा यही पुष्करणपर्ण है । ऋत- पानी का पहिला सत्यरूप पुष्करपर्ण है । सशरीर-सहृदय भाव को ही विज्ञानभाषा में सस कहा जाता है। पवतक पानी में हृदयमाव न था। परन्तु पुष्करपर्णरूप दो वृन्तवाली काई में पिएडभाव का उदय होजाने से हृयदभाव प्रकट होजाता है । 'प्रजापतिश्चरति गर्भ के अनुसार प्रजापति हृदय में प्रतिष्ठित होकर ही सृष्टिनिर्माण में समर्थ होता है । इस प्रजा- पति की पहिली प्रतिष्ठाभूमि यही पुष्करपण है । पुरभाव में हृदय है, हृदय प्रजापति की प्रतिष्ठा है । उक्त पर्ण पुरभाव का स्वरूपसमर्पक बनता हुआ ही 'पुरकरत्वात्' पुष्करपर्ण नाम से व्यवहृत होता है । इसमें प्रतिष्ठित प्रजापति ( हृदयशक्ति केन्द्रदल ) ही पार्थिवसृष्टि का कारण बनता है । अभी मुद्भाव का उदय नहीं हुआ है । पुष्करपर्ण में अभी पानी ही प्रधान है । पानी ही घनताभाव में आकर सकेन्द्र बन गया है । इसी आधार पर-'पापो वै पुष्करपणम्' (शत० ६।४।२।२। यह कहा जाना है । आपोमय पुष्करपर्ण की प्रतिष्ठा आपोमय पारमेष्ट्य विष्णु है । विष्णुकी नाभि में पुष्करपर्ण प्रतिष्ठित है, पुष्करपर्ण पर ब्रह्मा अतिष्ठित है , ब्रह्मीं पर सब कुछ प्रतिष्ठित है। सब की प्रतिष्ठा होने से जहां ब्रह्मा को प्रतिष्ठा कहा जाता है, वहां इसकी भी प्रतिष्ठा होने से आपोमय विष्णु को प्रतिष्ठा की भी प्रतिष्ठा कहा जाता है। विष्णु की नाभि से पुष्करपण निकला है । उसी पर प्राण-पाप-वाक्-मन्नान्नादरूप चतुर्मुख ब्रह्मा प्रतिष्ठित हैं। वह आपोमय पानी स्थूल पानी नहीं है, अपि तु अम्भः नाम का वायुमय पानी है। इसी में सप्तरसात्मवा दुग्ध का उदय होता है, अतएव इसे क्षीरसमुद्र कहा जाता है। प्रतिसंचरक्कम में वायु शेष रहजाता है, वायु गतिशील है, सर्पणशील है । इसी शेष पर विष्णु प्रतिष्ठित हैं । यह वायुमय पानी जिस ऋषि (प्राण ) से उत्पन्न होता है, वह 'नारद' नाम से प्रसिद्ध है। वणवान जैसे अनुष्टुप् है, स्वरवाक जैसे बृहती है, एवमेव धनिवांक सरस्वती नाम से प्रसिद्ध है ! जैसे पार्थिवसमुद्र 'अर्णय' कहलाता है, स्वायम्भुवसमुद्र नभवान् कहलाता है, एवमेव पारमेष्ठय वैष्णव समुद्र "सरस्वान्' नाम से प्रसिद्ध है । इसी में ध्वनिप्रव- २५ प्राकृतात्मा KI इशापानपात् ॥ प्रयीवेद .. " तिका सरस्वती वाक् प्रतिष्ठित है । स्वर-वर्ण दोनों इसी धनिवार पर प्रतिष्ठित हैं । यही वाग्- ददी सृष्टि की मूलप्रवर्तिका है। यह आपोमयी पनि वाक् स्वप्रभा उसी नारदऋषि ( प्राण) पर प्रतिष्ठित है । इसी महासृष्टि विज्ञान को प्रसादभाषा में प्रकट करते हुए पुराण में कहा है- "क्षीरसमुद्र में शेप शय्या पर विष्णुभगवान् सो रहे है । उन की नाभि में से कमल निकल रहा है । कमल पर चतुर्मुख ब्रह्मा विराजमान हैं। यह नारों वेदों से सृष्टिनिर्माण कर रहे है। विष्णुभगवान के मातक की ओर नारद खडे हुए है उनके हाथ में वीणा है' प्रकृत में उक्त निदर्शन से हमें यही बतलाना है कि सप्तपुरुषपुरुपात्मक प्रजापति ( अग्नि) के व्यापार से सर्वप्रथम पुष्करपणे उत्पन्न हुआ, वहीं प्रजापति की, किंवा सारे पार्थिव विश्व की पहिली प्रतिष्टा बना । इसी रहस्य को लक्ष्य में रख कर श्रुति कहती है- यत् पयपश्यत सरिरम्य मध्ये-उर्वीमपश्य जगतः प्रतिष्ठाम । नन पुप्फरम्यायतनादि जात पर्ण पृथिव्यायतन हरामि ॥ (ले० प्रा० १।२।१ ) इति । यत्री पुष्परपर्ण आगे जाकर रुद्रायु की रूवाता, पानी की ग्निग्धता के परस्पर के संसृष्टि सम्बन्ध से उत्तरोत्तर घनभार में परिणत होता हुथा भूपिण्डरूप में परिणत हो जाता है। प्रजापति के येद से पानी पदा दृथा, पानी से पुष्करपर्ण उत्पन्न हुआ, वही घनावस्या में प्रापर भूपिण्ड उनगया । इस भूपिण्ट के केन्द्र में प्रजापति प्रतिष्ठित हो गये । यही पृथिवी वेदमूर्ति प्रजापति के सम्बन्ध से वेदि' नाम से प्रसिद्ध हुई । इस येदि पर यग्निरूप नही त्रयी वेद प्रतिष्टित हुथा । पार्थिव अग्नि साक्षात् वेद है । अग्निमय वह वेद सत्यमूर्ति है । इस सत्या. रमोटरसप उन्य प्रजापति के रूप प्राणदेवताओं के द्वारा ( इसी वेदि पर ) यज्ञ होता है। मेमाइति होने से यही अग्निवेद २१ स्तोम पर्यन्त वितत जाता है । पार्थिव पिण्डामि अम्पायान ।, विनोमान्दिन यःमरया अग्रिहोत्र है, पश्चदशस्नोमान्छिन यज्ञमस्या प्राकृतात्मा ॥ ईशोपनिषत् ॥ वयोवेद बह दर्शपूर्णमास है, सप्तदशस्तोमावन्छिन्न यज्ञसंस्था चातुर्मास्य एवं पशुबन्ध है, एवं यही ज्यो. तिष्टोप है । एकविंशस्तोमावच्छिन्न यज्ञसंस्था अग्नियज्ञ किंवा चयनयज्ञ है । इस प्रकार स्तोम- भेद से पार्थिव यज्ञसंस्था उक्त विभागो में परिणत हो जाती है। इसी अग्नीपोमात्मक यज्ञ प्राजापत्य वेद एकविंशस्तोमपर्यन्त व्याप्त हो जाता है । त्रिवरस्तोम तक अग्निमय ऋग्वेद है, पञ्चदशस्तोम तक वायुमय यजुर्वेद है, एकविंश तक आदित्यमय सामवेद है । यही मूलवेद का वितान है । इसी वितान सम्बन्ध मे उक्त पार्थिव यज्ञसंस्था वितानयज्ञ आतानयज्ञ आदि नामों से प्रसिद्ध है। अग्निवायुरविभ्यातु त्रयं ब्रह्म सनातनम् । बुदोह यज्ञसिद्धयर्थ-ऋग्- यजुः-सामलक्षणम् ॥ ( मनुः १।२३ ) इत्यादि मानवसिद्धान्त इसी पार्थिव यज्ञमात्रिक मानापसवेद का स्पष्टीकरण करता है। इस वेदतत्व की प्रतिष्ठा पिण्डपृथिवी, एव अमृता पृथिवी है । याज्ञिक परिमापा के अनु- सार चिस्याग्निमय भूपिण्ड ' कृष्णाजिन' कहलाता है, एवं चितेनिधेयाग्निमयी महापृथिवी पु- करपर्ण नाम से प्रसिद्ध है । ( देखिए शत० ६।४।११९) । पिण्डपृथिवी में छन्दोवेद प्रतिष्ठित है, तत् सम्बन्धी पापियज्ञ- प्रातानयज्ञ' नाम से प्रसिद्ध है। भूपिण्ड वेदि है, महापृयि- श्री महावेदि है । प्रजापति केन्द्र में प्रतिष्ठित रहता है, यह अनुपद में ही बतलाया जाचुका है । हृदयस्थित हु-द-यम्-रूप, अन्तर्यामी नाम से प्रसिद्ध ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र का नाम ही प्रजापति है । अग्नि-सोमाक्षर वेद हैं । यह अग्नि सोम उस हृय प्रजापति से अभिन्न हैं । इन्द्र ही ब्रह्मगर्मित होकर अग्नि बनता है, विष्णु ही ब्रह्मगर्मित होकर सोम कहलाने लगता है। थतएव अन्तर्यामी हुद्य प्रजापति के अवयरभूत, विश्वस्वरूपसम्पादक अग्नीपोमात्मक वेद को हम पारप ही प्रजापति के 'श्मश्रु' कहने के लिए तय्यार हैं । हृदयभाव का नाम ही सत्य है । इस सत्य अन्तर्यामी का निवर्तभूत वेद मी अवश्यमेव सत्य है । प्रजापति सस, इसका वेद सत्य, वेदमय विश्व सस-ससे सर्व प्रतिष्ठितम् ।। यही सत्यवेद यज्ञद्वारा मावेदि के आधार पर २१ तक व्याप्त होता है । इस प्रकार वह सत्यप्रजापति सत्य (वेद) के द्वारा पानी प्राकृतात्मा त्रयाद ॥ ईशोपनिषत् ॥ उत्पन्न करता हुआ पृथिवीरूप वेदि को उत्पन्न कर यज्ञसपत्ति से युक्त होता हुआ-वेदि-वेद. गन-प्रजापति मैद से चतुष्कल बनजाता है । इसी वेद रहस्य को प्रकट करते हुए निन्नलि- खित श्रौत वचन हमारे सामने पाते हैं। .-"एप प्रजापतियद हृदयम्, एतद् ब्रह्म, एतत् पर्वम् । तदेतत् व्यत्तरं-ह द-यमिति । तद्वै तदेतदेव तदास ससमेव" (श० ११।४।) २-ने देवा सबै ससमवदन् । तद्यत् तव सय त्रयी सा विद्या । ते देवा अवयन-यज्ञं वै कृत्वा ससं तनवाम" (श० २०५१) s-"वया (खेदेनो वेटिं विविदुः पृथिवी लया यज्ञो जायते विश्वदानिः । अन्,ि यज्ञमन्येपि विद्वान् सया होता संतनोसमासान् ॥ (तैबा०३।७४) ४-"अप वेढः पृथिवीमध्यविन्दन गुहासती गहने गह्वरपे । स विन्दतु पजमानाय लोकपच्छिद्रं यन्झ भृरिका करोतु ॥" • प्रा. ३७६) ५-"वेदेन चै दवा अमुराणां वित्त वैद्यमविन्दत । तद् घेदस्य वेदलम्, भूमिरेव वेदिः । साया इयं सदैव वेदिः " इत्यादि 'स-एव वेदि।' इस वाक्य के सर्वशब्द से सर्वभूतप्रपञ्च अभिप्रेत है । इसकी प्राप्ति उसी प्रयीविद्या के उदर में हुई है। तभी तो पति-त्रया पार विद्यायां सर्वागिा भृतान्य- पयन' यह कपन चरितार्य होता है । यह प्रजापति वेदि-वेद-यज्ञ-इन तीन कलाओं से नष्पत बनना हुआ इस मामुग्न के केन्द्र में पृ. १०-यो म्प तीनों भुवनों का शारता बनता था श्रतर्यामी नाम से प्रसिद्ध होरहा है । यह अन्तर्यामी जिस नियति गूगसे प्राकृतात्मा । ईशोपनिषत् ।। , प्रयीवेद । न . । चराचरभावमय विश्व का शासन कर रहा है, उसका यही नियतिसूत्र, विज्ञानदण्ड वेदपदार्थ है । इस वेदसीमा के बाहर कुछ भी नहीं है । जिसका वेद नहीं वह भी-न स वेदः, स वेदः । जो सब कुछ जानता हुआ भी वेदतत्व नहीं जानता, वह भी न स वेद, न स वेद । इसी वेद से वेदि और यज्ञरूप विश्व का निर्माण हुआ है । विनिर्माण के लिए इसे सर्व प्रथम पानी ही उत्पन्न करना पड़ता है । स्वायम्भुव ब्रह्मनिवसित वेदप्रजापति के काम-तप- श्रम से सूबेद नाम से प्रसिद्ध अथर्वा नाम का अप्तत्त्व उत्पन्न होता है । इसी मिथुनभाव से त्रीवेद सृष्टि करने में समर्थ होता है, जैसा कि आगे जाकर स्पष्ट होजायगा। । उपथ मूलवेद का ऋक् भाग छन्दोवेद है. इससे मूर्ति का (पिण्ड का) निर्माण होता है । सामभाग वितानवेद है. इससे महिमाभाव की खरूपनिप्पत्ति होती है । एवं यजु भाग ग्सवेट है, यही गतिभाव का अधिष्ठाता है । इन तीनों वेदो की गूलप्रतिष्ठा आहुतिरूप ब्राह्म- वेद (अथर्ववेद) है । इन्हीं चारों मौलिक वेदोका निरूपण करते हुए महर्षि तित्तिरि कहते हैं- ऋग्भ्यो जाता सर्वशो मूर्तिमाहुः सागतिर्याजुपी व शश्वत | सर्वं तेजः सामरूप्यं ह शश्वत् सर्व हेदं ब्रह्मणां हैव सृष्टम् ॥ (ले० प्रा.३।१२।१।१-२)। ऋग्भिः पूर्वाह्यो दिवि देव ईयते यजुर्वेदे तिष्ठति मध्ये प्रहः । सामवेदेनास्तपये महीयते वेदैरशून्यस्त्रिभिरेति सूर्यः ॥ (ले० ३.१ १)। मनप्राणवाक् के त्रिवृद्भाव के कारण उक्त तीनों वेद ऋग्-यजुः-साम मैदसे तीन तीन भागो में विभक्त हैं। इन सबका विशद निरूपण उपनिषद्भाध्यभूमिका में किया जाचुका है, अत. प्रकृत में इनके नाममात्र का दिग्दर्शन करा दिया जाता है। २६ प्राकृतात्मा प्रयीवेद ईशोपनिषत् ।। १-छन्दोवेदः-मूर्तिः :0""""उक्यम्→नेने 'ऋग्वेदः २-सवेदः-मध्यस्थो वायुमयोऽग्निः ब्रह्म ---> →यजुवः ३-वितानवेदः-महिममण्डलम् "साम→→→ सामवेदः मूलवेदः १ 4....... १-छन्दोवेदः-(ऋक्) १-विष्कभः- अग्वेदः १ २-परिणाह:-सामवेदः --यजुर्वेदः तदित्यं ऋड्मये छन्दोवेदे वेदत्रयोपभोगः ............. २-वितानवेदः- साम)- १-पूर्वपूर्यमण्डलम् । "ऋग्वेदः २२-उत्तर-उत्तरमण्डलम्" "सामवेदः तिदित्यं साममय वितानवेदे वेदत्रयोपभोगः ३-ऋज (अकुटिला) रेखा"..."यजुर्वेदः ....... ३-रसवेदः-(यजः) १-उत्तरोत्तर हसीभवन्तो विष्कम्भाः-ऋग्वेदः ३ २-उत्तरोतरं घृद्धिान्ति मण्डलानि-सामवेदः तिदित्यं यजुर्मये रसवेदे वेदत्रयोपभोगः ३-तयोरन्तराले प्रतिष्ठितानि वाक्-यजुर्वेदः प्राणमनासि इति-त्रयीवेदनिरुक्तिः • इस विषयका संचिप्त विवेचन फल्पाण मासिक पत्र के वेदान्त-पक्ष में वेद का वरुप विचार नाम के लेख में रिकस चुका है।

मन्त्रार्थसम्बन्धिनी-अथर्ववेदनिरुक्तिः दत्रयी का निरुपय समाप्त हुआ। अब क्रमप्रास चौथे अर्थववेद का खरूप बतलाया जाता है। पूर्व के वेदत्रयी प्रकरण से यह मान लेना पड़ता है कि केवल वेदतत्त्व (वेदत्रयीरूप केवल अग्नि ) सृष्टि करने में असमर्थ है । सृष्टि अग्नि-सोम के समन्वय पर निर्भर है | कारण सृष्टि संसृष्टिभाव से सम्बन्ध रखती है । एवं संसृष्टि परस्पर में विजातीय योपावृपामाण पर निर्भर है । योपा रयि नाम से, वृपा मागा नाम से प्रसिद्ध है । इधर ऋक्तामरूप वयोनाध से सीमित व्यरूप यजुर्वेद प्राणात्मक बनता हुआ केवल 'वृपा' रूप है , अग्निमय है । भाग्नेप- माणप्रधान ( ब्रह्माग्निरूप ऋषिप्राणप्रधान ) यह वृपावेद सर्वया प्रसंग है। ऐसी अवस्था में इस असंग वेदप्रजापति से तब तक सृष्टि नहीं होसकती, जब तक कि 'योषा' नामक संसग धप्तत्त्व (रयि) उत्पन्न नहीं होजाता । अतएव सृष्टिकामुक त्रयीमय उस ब्रह्मप्रजापति को सब से पहिले पानी ही उत्पन्न करना पड़ता है । सृष्टिकामना से प्राण तुब्ध होजाता है । प्रत्येक कामना फलसिद्धि पर्यन्त प्राणक्षोभ का कारण बनी रहती है, यह सर्वानुभूत विषय है । चही क्षुब्ध प्राणाप्ति संघर्ष के कारण अब्रूप में परिणत होजाता है। इस का यह अर्थ नहीं है कि प्रबुत्पत्ति के अनन्तर प्राणाग्नि रहा ही नहीं । यह कार्यकारणभाय ऊर्णातन्तु ( मकड़ी का जाला) के समान है । मकड़ी अपने एक प्रदेश से जाल बनाती है । वही (पांशिकरूप से) जाल बनती है, परन्तु उस का स्वरूप ज्यों का त्यों बना रहता है, जैसा कि खरूप जालोत्पत्ति से पहिले या । इसी को “अभिन्नसत्ताक कार्यकारणमाव" कहा जाता है । यही अवस्था यहां है । वेदप्राण का जो भाग क्षुब्ध हो जाता है, वह पानी बन जाता है, शेष भाग ज्यों का त्यो खस्वरूप से प्रतिष्ठित रहता है । इस प्रकार अशनाया के प्रभाव से क्षोभ द्वारा सर्वप्रथम पानी उत्पन्न होता है । एक ही प्रजापति प्राण-आप मेद से दो भागों में विभक्त हो जाता है। माणभाग पा है , पुरुप है, पति है । प्रभाग योपा है, भी है, पनी है। इसी दम्पती प्राकृवात्मा - ईशोपनिषत् ॥ अथर्ववेद के मिथुनभात्र से प्रजा उत्पन्न होती है । प्रजापति की इस इच्छा का- “एकाफी न रमते, तद्वितीयमैच्छत्-पतिश्च पत्री च " इत्यादि रूप से अभिनय किया जाता है। इसी सृष्टि- विज्ञान को लक्ष्य में रखकर भगवान् मनु कहते हैं- यत्तत्कारणमव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम् । सविसरः स पुरुपो लोके ब्रह्मति कीत्यते ॥२॥ (मनुः १।११। ) तदाविशन्ति भूतानि महान्ति सह कर्षभिः। पनश्वावपर्वः सूक्ष्मः सर्वभूतकृदव्ययम् ||गा ( मनुः १।११) नेपामिदं तु सप्तानां पुरुपागा महौजसाम् । मुक्ष्पाभ्यो मूर्तिमात्राभ्यः संभवत्यन्ययाव्ययम् ॥३॥ (मनुः १३१६१) सर्वेषां तु सनापानि कर्माणि च पृथक् पृथक् । वेदशब्देभ्य एवादी पृथक संस्थाश्च निर्ममे IIEI (मनु १।२१।) सोऽभिध्याय शरीरात स्वात् सिमनुर्विविधाः मजाः । अप एव ससनादौ तामु चीनमवाटजद ॥५॥ ( मनुः ।।1) द्विधा कृत्वात्मनो देइमन पुष्पोऽभवत् । अर्दन नारी तस्यां म विरानमयजत् प्रमुः ॥ ६॥ पनुः ॥३१) उप्त मानव मिशान के अनुसार पोषण के मिथुन से सर्वप्रथम विशद पुरुष उत्पन्न होता होता है, दूसरे शब्दों में यह यही उम मिथुनभान से पिराप बन जाता है । इस विराट समाप मागे जाकर स्पष्ट होगा, पहिले भान या विचार करिए। मनट के अा-माप-यजु यह तीन नियतं बनालाप है। इन तीनों को क्रमशः महदुश्य- पात्रत-नपान नामों में पान किया जाता है। उदाहरण के लिए सूर्यपिण्ड (मर्वि- महाप, मौरप्रमाल (रनिमाडल ) महान है, सूर्यकेन्द्र में रहने वाला दिशी- भर मानि पुग्यो । उनी यो 'गियगर्भपनापनि' 'हिरगमपपुष्प 'गानुप- - पाकृतात्मा ा ईशापानपत् ॥ अथर्ववेद - पुरुष' 'मादित्यम्य परं भाः' इत्यादि नामों से व्याहत किया जाता है, यही मौलिकतत्व है। ऋक् साम इस यज्ञपुरुष की प्रतिष्ठा है । इसी त्रयीविद्या का निरूपण करती हुई चोनिश्रुति याहती है- यदेतन्मण्डलं तपति-तन्मदुक्थम, ता ऋचः, स ऋचां लोकः । प्रथ यदेतदचिर्दीप्यते, तन्महावतम् । तानि सामानि, स साम्नां लोकः । अथ य एप एतस्मिन्मण्डले पुरुषः, सोऽमिः, तानि यजूंपि । स यजुपां लोकः । सैपा प्येव विद्या तपति" (शत. १०१५।२।१-२)। शुक्साम क्योनाध है, यजु अय है । वस्तुपिण्ड का विष्कम्भ ( व्यास ) ऋक् है। वस्तु के चारों मोर का घेरा ( परिणाह ) साम है । व्यास को त्रिगुणित करदेने से वस्तु का घेरा बन जाता है। दूसरे शब्दों में वस्तुपिरड का घेरा वस्तुपिण्ड के व्यास से तिगुना होता है, इसी आधार पर साम का 'त्रिचं साय' । तीन न का एक साम-तीन व्यासों का एक परिणाह ) यह लक्षण किया जाता है । इस व्यास और परिणाह से देटित वस्तुतत्व यजु है । जिस प्रकार उदर में अन्न प्रतिष्ठित रहना है, श्यमेव यजु (यस्तुत३) अक्माम रूप व्यास और परिणाह में अन्तर्मुक्त रहता है । इस मुक्तिभाव को लक्ष्य में ग्खकर ही यजु को वय ( अन्न,) नाम से व्यवहृत कर दिया जाता है । यय शब्द अन्न शब्द का ही पर्याय नहीं है, जैसा कि ग्रा- चीनों में यय का अर्थ मन्न किया है। अन्नधर्म की समता के कारण ही यजु को वय कहा • जाता है । अपि च जिस प्रकार पार (पींजरा) में रहने वाला पक्षी पार से, निकल कर घाफाश में इधर उधर संचरण करता रहता है, एवमेव असामरूप पन्जर में प्रतिष्ठित रहने घाला गतिमूर्ति यजु बितानभाव से खमहिमामण्टल में विचरण किया करता है, इस पक्षिखरूप साधर्य से भी वय (पक्षी) कहागया है । इस वय को बंधन में रखने वाले, सीमित रखने चाले प्रायतनरूर ऋक् साम हैं, अतएव इन्हें 'धयोनाय' (चय का बंधन करने वाला कहा जाता है । वयोनाध और यय की समष्टि वयुन' नाम से व्यपढ्न होती है । प्रत्यक वस्तु बथुन . । 10 । -- प्राकृनामा अथर्ववेद on ईशोपनिपत anwar-..- है । वयुन में क्य-ययोनाध दो विभाग हैं, वय यजु है, वयोनाध ऋक्साम है, प्राक्साम यज में श्रोतप्रोत रहते हैं । इसो रहस्य को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है- "ते यदा स्तुवते. यदानुशंसति, अथास्मिन्नेत वपद्कृते जुहोति । तदेनमेप रसोऽप्येति । न वै महाव्रतपिदं स्तुतं शेते, इति पश्यन्ति । नो महदुवथमि- ति । अग्निमेव पश्यन्ति । प्रात्मा ह्यग्निः । तदेनमेतेऽउभे रसो भूत्वापीत मृमच साम च । तदुर्भ ऋक्लामे यजुरपीत" (शत०१०।१।१।६) इति । यह सिद्ध होजाता है कि केवल पायतनरूप अक्साग सृष्टि करने में असमर्थ हैं। ऋक्सामरूप व्यास परिणाह से कोई वस्तु उत्पन्न नहीं हो सकती । न्यास मध्यरेखा है, परिणाह चारों भोर की रेखा है । यही रेखामक किंवा लेखात्मक एक पुर ( सीमाभाव ) है। इस पुर में प्रतिष्ठित यजुरग्नि 'पुरि शेने' के अनुसार पुरुष है , यही सृष्टिकता है । नपुंसक ऋक् साम सहकारी मात्र हैं । ऋक्सामरूप छन्द से छन्दित यजुपुरुष 'द्विब्रह्म' है । यत्- और जू दो प्रक्षों को समष्टि यजु है, जैसा कि प्रागे जाकर स्पष्ट हो जायगा । यत् भाग वायु ( प्राण ) है, जू भाग याक् (थाकाश ) है। इस यत्रूप प्राणवायु के व्यापार से जूरूप भययाक भाग ही सुन्ध हो यर अरूप में परिणत होता है , जैसा कि 'सोऽपोऽसजत चाच एव लोकात् । वागेव साऽज्यत' (शत. ६ । १ ।१ । ७ ।) इत्यादि श्रुतियों से स्पष्ट है। यागग्नि सुन्ध होकर पानी बन जाता है, इस का प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि यदि शोर से अथवा वेगान्तर से शारीरप्राणानि सुन्ध हो जाता है तो उसी समय पसीने निफस पड़ते हैं। - शरीर में बुत्पत्ति तीन प्रकार से होती है । परिश्रम करने से पानी उत्पन्न होजाता है । ग्रोक से पानी उत्पन्न होता है, एवं प्रेम से पानी उत्पन्न होता है । परेप्रमजनित पानी 'वेद' फइसाता है, शेष दोनों शोकाय, मानु माम से प्रसिद्ध है । इन तीनों पानियों के अतिरिक एफ चौपा हाभाविक पानी निरन्तर रोमकूपों से निकसा करता है। मन-मुखलासा-का-वि ३४ प्राकृतात्मा अथर्ववेद सा इशापानपत् । ज्या rum.. आदि में जो अद्रता है यह यहां स्वाभाविक पानी है। इस प्रकार अध्यात्मसंस्था में अबु-पत्ति की चार धाराएं हैं। 'मराप.' इस सिद्धान्त के अनुसार यह चारों पानी अग्नि से ही उत्पन्न होते हैं । परन्तु इन चारों के स्वरूप में बड़ा अन्तर है । कार्यरूप थम् के अन्तर से मानना पड़ता है कि इन के कारणाग्नि में भी भाश्य ही अन्तर होगा। प्रसंगोपात्त वह अन्तर जान लेना भी अनुचित न होगा। । । . . अग्नितत्व सत्य और यज्ञ भेद से भागों में विभक्त है । सत्याग्नि मौलिक अग्नि है, यज्ञाग्नि यौगिक अग्नि है । विशुद्धावस्था सत्याग्नि है, मिश्रावस्या यज्ञाग्नि है । सत्याग्नि अमृतप्रधान है, पज्ञानि मृत्युप्रधान है | याज्ञिक परिमापा के अनुसार सत्यामि चितेनिधेयाग्नि है, यज्ञाग्नि चित्या- ग्नि है । 'मद्ध हवै प्रात्मनो मर्त्यमासीममृतम्' यह प्रसिद्ध है । मौलिक अग्नि ब्रह्म ( Physics ) है, मिश्नाग्नि यज्ञ ( Chemistry ) है । ब्रह्म ही यज्ञ की प्रतिष्टा है-'ब्रह्म ह वै संवस्य प्रतिष्ठा' । सुप्रसिद्ध यजुरग्नि (वेदाग्नि ) ही सत्याग्नि है। 'पझं कृत्वा सन्य तनवामहै' के अनुसार इस वेदाग्नि के आधार पर ही यज्ञाग्नि का वितान होता है । इस वेदाग्नि की भागे जाकर तीन अवस्थाएं हो जाती है। स्वयम्भू इस की प्रथम विकासभूमि है, सूर्य दूसरी विकासभूमि है, भूपिण्ड तीसरी विकासभूमि है। एक ही सत्याग्नि तीन स्थानों में प्रति- ठित होकर भिन्न भिन्न नाम रूपों में परिणत हो रहा है। इन्ही तीन विक्तों के कारण सत्य- मात्र 'त्रिसत्य' कर लाता है। स्वयम्भू में प्रतिष्ठित वेदाग्नि ब्रह्माक्षर के सम्बन्ध से ब्रह्मामि कहलाता है, सूर्य में प्रतिष्ठित यही सत्याग्नि सौर प्राणरूप देवताओं के सम्बन्ध से 'देवाग्नि' नाम से, एवं भूपिण्द्र में प्रति मत यही सत्याग्नि भूत सम्बन्ध से 'भूनाग्नि' कहलाता है। प्रकृत्य पेक्षया स्ययम्भू माणमय है, अतएव ब्रह्मग्नि को 'प्राणाग्नि' कहा जाता है । यही मूल प्रकृति है, अतएन इसे 'माकृताग्नि' भी कहा जाता है । सूर्य वाड्मय है, अतएय देवाग्नि को 'वागप्नि' कहा जाता है। वैधयज्ञ की प्रवृत्ति इसी से होती है, अतएव इसे याज्ञिक परिभाषानु सार 'वैधानि' भी कहा जाता है । भूपिण्ड अन्नादमय है, अतएव भूताग्नि को 'अन्नादाग्नि पाहा जाता है । भूपिण्ड में ही पञ्चपशुमाणों का विकास होता है, अतएव तत्सम्बन्ध से इसे . -- -- .

प्राकृतमा शाशोपनिपन अथर्ववेद LAnam । 'पायमानि भी कहा जाता है । सायम्भुव अग्नि प्रनिश्वसित वेद है, सौर अग्नि गायत्री- मानिक वेद है, पापिन अग्नि सत्यवेद किंवा यज्ञमात्रिकवेद है । इस प्रकार एक ही वेदानि किया सत्याप्ति तीन भागों में विभक्त हो रहा है । दूसरा है यज्ञाग्नि । इस का विकास अन्नादानि नाम के पार्थिव सत्याग्नि से होता है । पार्थिव सत्याग्नि तत्व वितत होक. अग्नि-वायु-आदित्य इन तीन प्रस्थानों में परिणत हो जाता है। अन्न दाप्ति अयान प्रधान है, अन्नादयायु व्यान- प्रधान है, अनाद आदित्य प्राणप्रधान है । मन्याय व्यानाग्नि के आधार पर अगन-प्राणानि का वर्पण होता है । यह घपण तीनों का यत्रन है यही पज्ञ है। इस से वैश्वानर नाम के यज्ञाग्नि पा प्रादुर्भाव होता है । धन्नाटाग्नि यो हमने पानि बतलाय है । इस की मूल थोर तूल मैद से दो श्रयस्याएं हैं । मल अन्नादान भूपिण्ड के केन्द्र में प्रतिष्ठित होता हुआ प्रजापति नाम से प्रसिद्ध है । इस अग्निरस या उप गमन होता है । यही अग्निरस किंवा सत्याग्नि पृथिवी के २१ स्तोग तक व्यहो कर धन-तरल-विरन इन तीन श्रयस्थानों में परिणत होता हुम्मा भग्नि-गाउ-मादित्य फइलाने लगता है। स्वप पृथिरी में स्तोपोलोय किंवा तीन विश्व है। इन तीनों के नर (नायक ) यही अग्नि-पायु-आदिता है। उक्त यति इन तीनों मिश्चनरों के पण उपन होता है, अतः इसे वैश्वानर' पहना न्यायप्राप्त है । इस प्रकार एक ही अग्नि की अमृत-मृगु भेद से दो परस्याएं, अमृताम यातन श्रस्थानों की अपेक्षा से चार घरापार हो जाती हैं, जैसा कि-"चतुर्दा विहितो ह या अग्रेऽमिरास" (शत । १)सदिसेपर है। -सत्याशि: (अमृनामि:)-प्रमा :-ज्ञानि. (याग्नि:-सिम् भारमन्त्री-प्रमातिः १-मनन:-मानि:-मापनागिन .."सापपुर. मतनिमितवेदः ] २- नि:- यामान-गग्निः -सौर:--पानीमाधिययः भूतान:-पनादाग्निः पाशुगनि, पापिंप:-पामाविषयेदः सामिः -नगर-नि:-मानि:-श्राप्ति-तानवेदः यज्ञानिः ..-- ?

पाकतामा ा ईशोपनिषत् ॥ अथर्ववेद । . - इन चारो अग्नियों के कार्य सर्वया नियत हैं । विधरण और मतिष्ठा यह दो काम खाय- म्भुव महानि के हैं । क्षरपुरमाणुओं को एक स्थान पर बद्ध रखना विवरण है , पदार्थ को संघ- टित रखना विधरण है । यह काम प्राणरूप ब्रह्माप्ति का है, अतएव प्राण को विधर्म का जाता है। प्रत्येक वस्तु में एक प्रकार का टहराव होता है । पाषाणादि में यह टहराव अधिक है। ठूलादि (कई-हवा श्रादि) में ठहराव कम है । विद्युत् में शोर भी कम है । पदार्थों में तार- तम्य से रहने वाला यह ठहराव ही प्रतिष्ठातत्व है । 'ब्रह्म सर्वस्य प्रतिष्ठा के अनुसार प्रतिष्ठाधम महानि का ही है । प्रतिष्ठा और विधरण महाग्नि के साक्षात् दर्शन हैं । दूसरा है देवाग्नि । रूप घोर विकास यह दो धर्म सौर देवाग्नि के हैं । पुष्पकालिका मागे जाकर पिक- सित होती है, खिल जाती है, खस्य मनुष्य का चेहरा खिला रहता है । वस्तुभाव का यह प्रसादभाव ही विकास है, इसका प्रयत्तक इन्द्रप्रधान सौर अग्नि ही है। सारी प्रजा सूर्योदय से विकसित होजाती है । गत्रि के तम से संकुचित पदार्थ सौर प्रकाश से खित' पड़ते हैं । सौर- इन्दमय अग्नि ही 'रूपं रूप मघवा बोभवीति के अनुसार सप्तरूप किं वा अनन्त.रूपों रंगों) का अधिष्ठाता है। अतएव सूर्य को 'पृष्णि' कहा जाता है । रूप और विकास देवाग्निं के साक्षाव धर्म हैं । तीसरा है पार्थिव भूताग्नि । पाक भी विलयन इसके साभाविक धर्म है । दस प्रकार के सीमों में एक सोम ‘दृष' नाम से प्रसिद्ध है । इस वृत्र सोम की धन-तरस-: विरल-गुगा मेद से चार अवस्थाएं हैं । यही रारों अवस्थाएं विज्ञानभाषा में क्रमशः ध्रुव-धर्म- वरुण धर्म इन नामों से प्रसिद्ध हैं । इनमें धुवसोम प्रश्मासोम कहलाता है। पाषाणादि धन पदार्थों की स्वरूपनिम्पत्ति इसी बरेमासोम से होती है। तरलसोम तरलता का प्रवर्तक है ।.पानी-घृत आदि में इसी की प्रधानता है । वायु-प्राण आदि में विल सोम की प्रधा- नता है । श्रात्मा में गुणसोम प्रतिष्ठित रहता है । अरमासोमप्रधान अन्नादामि पदार्थों का परि- पाक करना है, तानसोममय यही ऋग्नि पदार्थों को पिघला देता है । कर अग्नि की पाका, वस्था है, पिघला हुआ कपूर अग्नि की वित्तयनारस्या है। श्री ही संघात करता है, अग्मि हो विलयन, करता है, जैसा कि 'अपां संघातो विलयनं च तेजः-संयोगात ०६०) से स्पष्ट प्राचतामा । ईशोपनिषत् 18- अथर्ववेद है। यह दोनों धर्म अन्नादाग्नि के हैं | चौथा है मिश्र.वस्थापन यज्ञाग्नि नाम का वैश्वानराग्नि । ताप चोर दाह.यह दो इसके खाभाविक धर्म हैं । गामी मालुम होना-वस्तु को जला यातना दोनों काम वैश्वानर के हैं । हम शरीर को जहां से छते हैं गरम पाते हैं । यह वैश्वानर के साक्षात दर्शन हैं। पूर्वोक्त तीन सत्याग्नियों में न ताप है, न दाह है । मौलिक अग्नि में ताप-दाह का नितान्त अभाव है । ताप और दाह धर्पणाधीन है । संघर्ष से ही ताप उत्पन्न होता है, संघर्ष से ही दाह होता है । सत्याग्नि निराकार है । उसमें संघर्ष कथमपि संभव नहीं हैं । संघर्ष होता है पार्थिव ठूलानियों में । इसी से ताप दाहलदण वैश्वानर उत्पन्न होता है । इस प्रकार इन पों से युक्त चारों यग्नि विश्व का स्वरूप संपादन कर रहे हैं। अग्निः-प्रजापतिः २-विधरणम् प्रशामिः स्वायम्मुकः २-प्रतिष्ठा १.विकासः P- देवाग्नि:-सौरः -सत्याप्तिः (भक्तनिः) २-रूपम् १-पाक: पर्द प्रजापरामनो पर्यमासीददममतम् । २-पिलपनम् भूनानिः-पायियः १-ताम: व्याप्रि-मैदानाः पद्यामिः ( कमि) प्रातामा ईशोपनिषत् ॥ ज्यद HindiAnm RANA . इन चारो थामियों से चार प्रहार फा भिन्न भिन्न पानी उत्पन्न होता है । कारण पानी उ- रसन्न करना अग्नि का स्वाभाविकधर्म है । स्वायम्भुव ब्रह्माग्नि से पारमेष्टय अम्भ नाम का पानी उत्पन्न होता है। यही पवित्रतम पानी भागीरथी या वरूपसमर्पक बनता है। सौर देवाग्नि से मरीचि नाम का पानी (दिग्य परनी) उत्पन्न होता है । यही दिव्यपानी यमुना जल का स्वरूप समर्पका बनता है । पार्थिव भूनाग्नि से मर नाम का पानी उप्तन्न होता है , ए अान्तरिक्ष्क्ष चान्द्र प्राणमय वैश्वानर से श्रद्धा नाम का पानी उत्पन्न होता है । इहीं चारों या स्वरूप बतलाते हुए महर्षि ऐतरेप कहते हैं- . "मात्मा या इदमें एवाग्र प्रासीना यत् किश्चन मिपत । स ईचत-जोकान्नु सजा इति स इमॉल्लोकादसजन- अम्भो मरीचिर्मरमापः भदोऽम्मः परेण दिवं चौः प्रतिष्ठा । मन्तरितं मरीचय :। पृथिवी मरः । या प्रस्तात्ता प्रापः (श्रद्धा या मापः " (ऐ० उ० ॥ ०१-२- ) इति । M . यह है बाधिदैनिक जगत् की लिपति । " यदेवेह तदमुत्र-पदमुत्र तदन्विह" के थन- सार उक्त चारों अग्गिएं हमारे शरीर में भी प्रतिष्ठित हैं । एवं यहाँ भी इन चारों से चारों पानी - स्पन होते हैं। किसी कार्य सिद्धि के लिए मनुष्य जब परिश्रम करने लगता है तो इस से खाय- मुव प्राणाग्नि दुग्ध हो पड़ता है । प्रतिष्ठाभाव शिथिल होने लगता है। अतएव परिश्रम के अ- नन्तर पकान मालुम होने लगती है। प्राणाग्नि के विवरणशक्ति, और प्रतिष्ठागति के हासही फा नाम थकान है। इस परिश्रम से सबसे पहिले ललाट पर पसीने भाते हैं, जैसा कि अनुपद में ही स्वेदवेदोत्पचि में बतलाया जाने वाला है । अत्यधिक परिश्रम से सारे शरीर में पसीने चुनें लगते हैं। प्राणाग्नि के तप से पसीने निकलते हैं, यही कार्यसिद्धि की प्रथमभूमिका है। इसी आधारपर लोक में "अमुकने अमुक कार्य के लिए पसीना बहाया है"-अनी ! पसीने की कमाई है। ऐसी किंवदन्तिएं प्रचलित हैं । शिरोगुदा स्वायम्भुवी है। अतएव तत्मविष्ठ साग्नि के घोभ से सर्वप्रथम सन्नाट में ही पसीने भाते हैं। . ३॥

प्रारमा ॥ ईशोपनिषत् ॥ মুখৰ av Ava -A - - यदि मनुष्य प्रेमविभोर होजाता है तो अम् निकल पड़ते । इन्ही को 'प्रेमाश्रु' कहा जाता है । प्रेमानु से आत्मा में एक प्रकार का शान्ति का उदय होता है । यह सौगग्नि की कृपा है। सौराग्नि बुद्धि का अनुमाहक है । मुद्धि योर मन साथ रहते हैं। बौद्धसौर मासके घर्षण से मन पा आघात होता है । मन पिघल पड़ता है। वही मनोग अश्रुरूप में परिणत होकर माखों से बह निकल पड़ा है। प्रेम कैसा-दिव्य, पवित्र. साविक । मनप्रधान प्रेम जहाँ दुःष का कारण है, का बुद्धिप्रधान प्रेम आनन्द का कारण है । लौकिक विषयप्रेम दु ख का प्रत्र- तक बनता हुआ शोक में ही अन्तत है । तीमरा है पार्थिव भूनामि, कि या पाशुपग्नि । यही पशुपति रुद्र है। यह अर्थशक्ति के अधिष्ठाता है. भूनाति हैं । रलाना इनका लाभाविश्कर्म है, मतरत्र-'सोऽरोदीत तदुरुद्रस्य रुद्र बम' के अनुसार रोदनर्म के अधिष्ठाता यह पार्थिव भूनाग्नि रुद्र नाम से प्रसिद्ध हैं अयंजात में (सांमारिक विषयों में प्रत्यधिक मामक्ति रखने से मोह का उदय होता है । यह मोह विज्ञानशक्कि सोरअग्नि) को निर्बल बनता हुगा म्न को पबल बनाता हुआ सजातीय सम्बन्ध से अर्थशक्ति प्रवर्तक पार्थिव भूताग्नि का अनुप्राहक वनता दुधा पार्थिनप्रमि को नुन्ध कर डालना है । इस क्षोभ से जो रोद पानी जम्न्न होता है, वही शोकाश्रु नाम से प्रसिद्ध है। यदि यह प नी शरीज में ही रह जाता है तो वैचित्य (पागल- पन) राजयमा अादि रोग उत्पन्न होजाते हैं । दुख के प्रायन्तिक वेग से यही रुद्र संहार के कारण यनजाते हैं । जिसे रोना आता हो, उसे जीभर के शेलेना चाहिये । खूब भश्रुपात पारने च हिए । इससे शरीर हलका होजाता है । जो मनुष्य इन मासुत्रों को पी जाते है-वे भरप लेगी बन जाते हैं । चौपा वैश्वानराग्नि है। नादि की उत्पत्ति इसी अग्नि से होती है। उक्त अनिची से पाठकों को यह विदित होगया होगा कि पानी थग्नि से उत्पन्न होता है। मीन के मनन्तर वर्मा का भागमन प्रकृतिसिद्ध है । अग्नि में ताप है, पानी में ताप नहीं. दादा है। वस्तुनः अग्नि ही तो पानी यना है, अतएय पानी को ठदा अग्नि (उंदी आग.) जाना जाता है। प्रकापरता से विचार यारिए । परिश्रम-प्रेम-गोफ मेद से अभ्यामसंस्था में शीन ही प्रकार के पानी प्रधानरूप से उत्पन्न होते हैं । ललाट येह परिश्रमजन्य है । इसका ५० प्राकृतारमा अथर्ववेद II इशोपनिपत - A----- -andwwwww । प्रभव स्वायम्भुव अग्नि है । शरीर में मलद्वार से नाभि पर्यन्त पृथिवीलोक है, यही परितगुहा है। हृदय पर्यन्त अन्नरिक्षलोक है, यही उदरगुहा है । हृदय से यण्ठ पर्यन्त द्युलोक है, यहीं उरोगुहा है, यही सूर्यलोफ है। मरतक चौथा पारमेष्ठ यलोक है, यही गिरोगहा है, यही खयम्भू भगवान् प्रतिष्ठित हैं । इसी ब्रह्मप्रजापति की सत्ता से केशान्तस्थान 'ब्रह्मरन्ध' नाम से प्रसिद्ध है । परिश्रन से इनके वाक् भाग पर श्राघात होता है, पानी उत्पन्न होजाता है । इसी का नाम पसीना है। इसी को हमनें 'अम्भः ' कहा है । सूर्य देवाग्निमय बतलाया गया है । इसी को शुक्राग्नि भी कहते हैं । ग्रहप्रकरण में चन्द्रमा 'मन्यी' ग्रइ नाम से, सूर्य शुक्रग्रह नाम से प्रसिद्ध है । प्रेमानन्द में एवं शोक में दोनों में अग्नि शुन्ध होता है । इस से मन पिघल जाता है । यद्यपि मनोस सभी इन्द्रियों से निकलता है, पर- न्तु इसका प्रधान विनिर्गन स्थान चनु ही है । अतएव चतुश्च बिन्दुको मानस ( लोकभाषा में 'माण या' नाम से प्रसिद्ध ) यहा जाता है । अतएव दोनों पानी मन के द्वारा चक्षु से ही बाहर निकलते हैं । मन चान्द्र है । चन्द्रमा सोम रसमय है, यत्ति है । यदि पवित्र सौर अग्नि का इस पर आघात होता है तो चा-द्रमन छैन होता है । इस द्रुति में प्रेमका उद्रेक है । अतएव इसे 'प्रेमरस' कहा जाता है। इस रसका प्रसरण कुल पांच भागों में विभक्त है। ये पांचों रसना- वस्थाएं श्रद्धा-वा-पल्प-स्नेह-का-रनि इन नामों से प्रसिद्ध हैं । हमारा मनोरस यदि गुरू- पिता-माना-ज्येष्टभ्राता विद्वान्-तपस्त्री-आदि पूयों की ओर जाता है तो इस परानुयोगिक- भवम्मतियोनिक प्रेम को 'श्रद्धा' कहा जाता है। यदि हमारा मन पुत्र-सेवक-प्रादि छोटी की मोर जाता है तो यह प्रवरानुयोगिक परमतियोगिक प्रेम वात्सल्य कहलाता है। इन दोनों में एक का शासन ऊंचा है, एक का नीचा है। श्रद्धा में प्रेम करने वाला अंबरकाक्षा में है, जिन के साथ प्रेम किया जाता है. चे उच्चकक्षा में हैं । बारसल्य में प्रेम करने वाला उहाहा में है, जिन के के साथ प्रेम किया जाता है, वे अयस्कक्षा में हैं । दो अभिन्नमित्रों का पारस्स- रिक प्रेम 'स्नेहनाम से प्रसिद्ध है । यह प्रेम 'समानप्रतियोगिक समानानुयोगिक' है। पहां दोनों समान हैं । श्रद्धा-वात्सल्प-स्नेह तीनों प्रेमों में प्रेम करने वाले भी चेतन है, एवं ४१ प्राकृत मा शोपनिपन ॥ अथर्ववेद AnkA । जिन के साथ प्रेम किया जाता है वे भी चेतन है । परन्तु पुस्त-कान-वित्तादि अन्य स्थावर संपत्ति के साथ जो हमारा प्रेम है, उसमें फ्रेवल पाम' या विकास है । जडवस्तु के साथ प्रेम करना ही काम है । उता चारों प्रेमों का यदि एक ही स्थान में समावेश होता है तो-रति' नाम के अपूर्यभार का उदय होता है। रतिप्रेम के अधिकारी विश्व में केवल दो ही हैं । खो और ईश्वर इन क्षे के साथ ही रतिप्रेम घटित होता है । स्त्री को हम घर की अधिष्ठात्री सगमते हैं । गृहलक्ष्नी को हम श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं साथ ही में पुत्रादिवत् स्त्रीपर हमारा घासल्यभाव मी रहता है। श्री एक सन्मित्र की भाति उचित परामर्श देने वाली जीपनसङ्गिनी है। सर्वथा जड़ स्त्री के केशपाश, नासिमा, मोह, कपोल वेशभूषा-नुपुर पनि आदि के साथ मनुष्य का जो प्रेमाकर्षण है, वह कामरूप है । यही रति है । जब तक यह रति स्त्री के साथ है, तब तक सं. सार है, बंधन है । यही रति यदि ईश्वर के साथ होजाती है, जोकि रति भक्तसंप्रदाय में में माभक्ति' नाम से प्रसिद्ध है तो मुक्ति है । बंधन मुक्ति का रहस्य है । अन्नादरुद्राग्नि के आघात से जो पानी निकलता है, यही शोकाश्रु है । प्रवृतिमण्टल में इसी रुद्राग्मिजन्य पानी से रजत (चांदी ) का निर्माण होता है । चादीरद के श्रासुओं से बनी है। इसी लिर-'यहि- पिरजत नदेयम्' यह आदेश है । बर्हि में यदि यजमान रजत दक्षिणा दे देगा तो, एक वर्ष के भीतर भीतर यह महाप्रयाण कर जायगा । इसी लिए रजतदक्षिणा का निषेध किया गया है। इस प्रकार अनेक दृष्टियों से पानियों की उत्पत्ति का विचार किया जासकता है । यह तो हुई प्रासगिक चर्चा । अब चलिए प्रकृत विषय की ओर । अभी केवल वेद- मृति स्वायम्मुर प्राणमय यजुरग्नि का साम्राज्य है। अग्नि ऋजुःपन्या है। इसका प्रदेश नियत है । इस यजु के बाक् माग से जो तस्य उत्पन्न हुआ वह ऋजु न रहा, अपितु व्याप्त होगया । पानी की बुद्ध याप जहां भी डालेंगे, वह नियत प्रदेश में न रहकर चारों थौर फैल जायगी । इसी श्राप्ति, किंवा व्याप्तिधर्म से यह उपन्न ताच 'पाप' नाम से व्यवहृत हुआ है । वेदत्रयी याभाग से उत्पन्न इस 'माप' किंवा 'मप्' ताव में नाया-धारा-पाप-जीवन-ऋत भेद से पांच प्रकार के बल उत्पन्न होते हैं । इन सबकी भाशसभूमि महामाया नाम का बलकोश । ४३ प्राकृतामा ईशोपनिषत् ।। ঘৰৰ . . है, जैसा कि पूर्व की परात्परनिरुक्ति में बतल या जाचया है | इन पांचों दलों की उत्पत्ति में भाने छा ही प्रधान कारण है । 'उसे ऐसी इच्छा ही क्यों हुई, ! यह अनतिप्रश्न है । हम भोजन ययों करते हैं ! इसका उत्तर है-हमें भोजन की इच्छा होती है इसलिए । पर तु- भोजन की इच्छा क्यों हुई? इस प्रश्न का उत्तर देने में हम असमर्थ हैं । अधिक से अधिक 'ईश्वरेन्छा' कहकर पीछा छुड़ालिया जाता है। जब हम हमारी इच्छा का ही उत्तर नहीं दे सकते तो ईश्वरेच्छा के सम्बन्ध में क्या कहा जासकता है । ईश्वरतत्त्व अनुमान सिद्ध है । क्रिया से (बहियाणा से) प्राण का अनुमान होता है, क्योंकि विना प्राण अन्तर्व्यापार-यक्ष- कृति) के बाग्व्यापार नहीं होसकता । प्राणन्यापार विना इच्छा के संभव नहीं है । सम्पूर्ण विश्व क्रियामय है | इसका संचालन प्राण से होरहा है । प्राण का उद्गम स्थान इच्छा है। साथ ही में यह सब निर्माण हमारी इच्छा से कोई सम्बन्ध नहीं रखता । अतएव मानना पड़ता है कि सृष्टिनिर्माण में जो कुछ पैचित्र्य उत्पन्न होता है, वह सब प्रजापति की इच्छा पर निर्भर - है। वह जैसा जैसा चाहता है, वैसा वैसा ही बना डालताहै। तभी तो ईशावास्यमिदं सर्वम्' इस वाक्य को यथावत् चरितार्थ होने का अवसर मिलता है। पूर्वोक्त जायादि पांचों बलों का - आधारभूत पार उसी की इच्छा से उत्पन्न हुआ। वेद प्रजापति, किंवा वेदावच्छिन्न पोदशी प्रजापति कामना द्वारा अपने वेद के वाक् भाग से सर्व प्रथम पानी उत्पन्न करता है । पानी उत्पन्न कर 'घय्या विद्यया सहापः प्राविशत् शत० ६।१।१२।) के अनुसार उत्पन्न यापो- मण्टल के गर्भ में प्रविष्ट होजाता है । इससे मण्डल (मह्माण्ड ) का उदय होजाता है- भागडं समवर्त्तत' । इस प्रकार अप्प्रविष्ठ प्रजापति भागे की सृष्टि कामना से प्रेरित होकर सृष्टंपुपयोगिनी 'मैं पानियों से संसार को अपने ऊपर धारण करूं' यह कामना करता ह । उसी क्षण सत्यकाम सत्यसंवरूप प्रजापति की उक्त इच्छा से उस पानी में फा घृतिथल (प्रतिष्ठा बल) उत्पन होजाता है। यही प्रतिष्ठाबसं गोपथादि श्रुतियों में 'शारा- । यल' नाम से व्यबढ़त हुआ है । वास्तव में सातो लोकों को पानीने ही धारण कर रक्खा है। लोक सबकी प्रतिष्ठा है, लोक की प्रतिष्ठा प्राप् है । थाप पुरंजन ही तो लोसृष्टि का अधिष्ठाता है-'सर्वगप्पु प्रतिष्ठितम् ।। - -- एक प्रकार r प्राकृतात्मा अथर्ववेद का ईशानिपन् ।16- . । धारायल को उम्पन्न करने के अनन्तर- इन पानियों से सब कुछ उम्पन्न कर इस इच्छा का उदय होता है । इस इच्छा से पानी में प्रजनन शहित आजाती है। सचमुच संसार एवं संसार में रहने वाले पटार्थमात्र की उत्पति पानी से ही होता है। शुक्रतत्व उत्ति का कारण है । शुक्र पानी का ही रूपाता है । फेन-मृत्-सिकता-शर्करा-अय-हिरण्य सब पानी से बने हैं । पानी प्रोपधि बना है, श्रीपधि शुक बना है । इस प्रकार प्रजाष्टि का मूलोगदान भी पानी ही है, जैसा कि-छान्दोग्य को 'इति तु पञ्चभ्यामाहुनाकापः पुरुपयचसो भव ति' इत्यादि पञ्चाग्निविद्या में स्पष्ट है । यह दूसरा बल ही विश्व एवं विश्वप्रजा की उत्पति का कारण है, अतएर 'जायते अस्यां' इस निर्वचन से इस यल को 'जायायल' कहा जाता है। विशुद्ध जायावल तबतक सृष्टि करने में असमर्थ है, जब तक कि वह अग्निरूप पुरुपयल को भरने में प्रतिष्टित न करले । जायारूप शुक्रमाय नी मानरिया की प्रेरणा से उस अग्निवेद को पाने गर्भ में प्रतिष्ठित कर लेता है। ऐसा नगर्भित जाया पानी ही प्रजननधर्मा है । सी स्वयं जाया है, सौम्या है। सोममय जायात्रल ही ली का उगदान कारण है। अग्नि पुरुष है । यही इस जायाभाव से वेष्टिन गभगत शोणित है । खी का (गर्भाशयगत ) शोणित साक्षात् अग्नि है । यह जागभाव से नित्य वैष्ठित है। अय पुरुष के शुक यो लीजिये । शुक्र सोमरूप जाया है। शुक्र में रहने वाली गर्मा पुरुष है । नीयत् पुछप भी जाया है । घोपपातिक यात्मा सर्वप्रथम पुस्पशरीरस्य शुभाच्छिन्न इसी माया में गर्भधारण करना है । यही प्राणी या प्रएमजन्न काह- साता है। पुरुष के सयां शार या गुरु पुरुषाकार यो अपना प्रायतन यनाकर ही रोहित में थान होता है। शर के जिरा प्रदेश का शुक्र पाहुत नहीं होता. उपन्न प्रजा में उसी मा को यमी रह जाती है । शुकदास माता के गभीराय में प्राणी का प्रतिहत होना इसका सरा नन्म है । १० मास के अनन्तर एकामान् के प्रत्यावात से गर्भ का भूमिाथ हो जाना इस पामरा जन्म है। पौरमा संचारों से निर्धतामा वन नाना चौघा जम्म है। 'पद्धएपं या इदं सवंग' के अनुसार इस चतुर्थ जन्म में प्राणी सर्वत्र मात्र यो प्राप्त होता है। रस को सदर में मार मावि मीशा पदरो है - - प्राकृतात्मा ईशापानपत् ॥ अथर्ववेद Rovvv VY - माद वाः पुरुपे ह या अयमादितो गर्मो भवति यद्रेतः । तदेतत् सर्वेभ्यो- ऽङ्गेभ्यन्ते नः संभूतमात्मन्येवात्मानं विभति" (ऐ. प्रा. २।५।।) जायावलोत्पत्ति के अनन्तर 'मैं इन पानियों से उत्पन्न विश्व में एवं पजा में अवरूप से व्याप्त होजाऊं' यह इच्छा होती है । इच्छा के अव्यवहितोत्तरकाल में ही पानी में आजिवन उत्पन्न होजाता है । पानी की अप्-वायु-सोम यह तीन अवस्थाएं । फैलना इस प्रपत्रयी का खाभाविक धर्म है । संसार के इतर पदायों को श्राप जिस नियत प्रदेश में रख देंगे, वे उस स्थान से आगे नहीं बढ़सकेंगे । परन्तु पानी-हवा-सोम में यह बात नहीं है। एक बिन्दुमात्र पानी भी जहां गिरेगा वहां से आगे फैल जायगा प्रजापति किस रूप से विश्व । व्याप्त हो रहे हैं ? इसका उत्तर यही पानी है। श्ररूप से प्रजापति सब पर व्याप्त हैं. अम् : से ही सब का संवरण कर रक्खा है । अतएव 'सर्वमानोत तामादापः 'यदहणोत् न- ( शत० ६।१।१।७) इत्यादि के अनुसार इस तत्य को-आप-चारि इत्यादि । नामों से व्यवहन किया जाता है । अप्तत्त की उग (रम स्थिर नहीं है, बहती हुई है, अत- एवं व्याप्तिलक्षणा है । इसरस का प्रसत्रण ही व्याप्ति में प्रधान कारण है। अतएव पानी को 'सन्त्-िइरा गस्य ' के अनुसार 'सरिर' कहा जाता है । सरिद ही सलिल नाम से प्र- सिद्ध है । यद्यपि यह ठीक है कि यही पानी लोकरूप में परिणत होकर द्रुतभाव को छोड़देता है, उस समय यह सरिर नहीं रहता । पान्तु लोकसृष्टि के पहिले तो यह सरिर ही रहता है । ध्यय की इसी पूर्णवस्था को लक्ष्य में रखकर-'पापो वा इदम सलिलमेवास' (शत. ११।१६।११ यह कहा जाता है । 'कस्मै देवाय हविपा विधेम' ( यजुः सं० १३१४) के अनुसार वेदमूर्ति भव्यक्त, अतएव अनिरुक्त नाम से प्रसिद्ध प्रजापति 'क' नाम से व्यवहृत होता है। यह क (अनिरुक्त ) प्रजापति पानी उत्पन्न कर सर्वत्र व्याप्त होता हुआ, दूप्तरे शब्दों में पानी के कारण सर्वप्रजापति किंवा निरुक्त बनता हुआ 'मलम्' संपत्ति से युक्त हो जाता है । क- प्रजापति की कामना को अलम्' बनाने वाला यही पानी है । अतएव "कं (अनिरुक्तमना- पति) मन (संवभावयुक्त ) करोति" इस व्युत्पत्ति से पानी को 'कमल' कहा जाता - ईशोपनिषत् ॥ अथर्ववेद प्राकृतात्मा है। उधर कमल नाम का एक पुष्प भी है। कमलपत्र ही पुष्करपर्ण है, जैसा कि त्रयीवेद- निरुक्ति में बतलाया जाचुका है। यह भी यापोमय है । यही वेदमय अनिरुक्त प्रजापति की पहिली प्रतिष्ठा है । अतः इसे भी 'क-भलं करोति' से कमल कहना अन्वर्थ बन जाता है। लोकसृष्टि का अधिष्ठाता पानी ही है । लोकन्तु भुवने जने के अनुसार लोक का ही नाम गुवन है । पानी ही लोक है, अतएव पानी को 'भुवन' नाम से भी न्यवहृत किया जाता है । बतलाना यही है कि पानी में थाप्तिलक्षण तीसरा 'मापोवन' उत्पन्न होता है । - - । आपोबल के धनन्तर -'मैं इन पानियों से जीवन का संचार कर-पदार्थों में जीव- नीय शक्ति डालूं' इस इच्छा से पानी में चौया जीवनवल उत्पन्न होता है । वस्तु की स्वस्व- रूप में जो स्थिति है, वही उस वस्तु का जीवन है । स्थितिविच्युति का नाम ही मृत्यु है । टहरी हुई यस्तु में जो गतिप्रवाह है. वही जीवन का सूचक है। प्रतिष्टावल के उन्छिन्न हो जानें से जिस समय गतिबल उत्क्रान्त हो जाता है, उसी क्षण मृत्यु का साम्राज्य होजाता है । इस मृत्युमाव को रोकने वाला यही प्राप्यप्राणरूप वायु है । यह कल्याणकर है, आपोमय प्राण ही कल्पाण ( जीवन । का अविष्ठाता बनता हुया आपोमय होने से साम्बसदाशिव' नाम से प्रसिद्ध है। यही शिव जीवनसचा की प्रतिष्ठा हैं । यही जीवनीय रस है । इसी के लिये 'पो वः शिवतमो रसम्तम्य मानयने ह नः' ( पनुः सं. ११ । ५१ ) यह कहा जाता है । दम प्राण को जीनसत्ता का कारण समझने हैं । परन्तु वास्तव में धप्तत्व का जीवनीयरस ही जीयन फा हेतु है । जब तक प्राण में यह रस रहता है, तभी तक जीवन है । मनुष्य १५ दिन तक अनके पिना बीमित रह सकता है, परन्तु पानी के बिना जीवन धारण करना अशक्य है। मन के मरनाने से मृत्यु नहीं होती, प्राण निकलने से मृत्यु होती है । इस प्राण का रक्षक यदी पायरस है । 'प्राणामय एंवतस्मिन् पुरे नापति' (प्र. उ. ४ । ३ पद भगमित प्राणानि सतत जागृत रहता है । इस प्रकार प्राण में जीवनीय शसि दालने गाला मागेरस ही 'नीरनरन' नाम से प्रसिद्ध है। . के अनुसार ४६ प्राकृतात्मा अथववेद ईशोपनिषत् ॥ , । पांचवां ऋतबल है। इसी मृत्तबल को 'परिश्रित' मी कहा जाता है। आपो वै परिश्रितः शत.।४।३।र)के अनुसार प्रत्येक पिण्ड इस ऋतबल से यात्रान्त रहते हैं। ऋत के उदर में मूर्ति प्रतिष्ठित रहती है। प्रत्येय. पिण्ड को स्वस्वरूप से प्रतिष्ठित रखना मृतबल का मुख्य काम है। वस्तुपिण्ड सत्य है । वह अत से घिरा रहता है । स्वयं पिएड के भी प्रत्येक परमाणु ऋतरूप हैं। इस प्रकार अन्ततोगत्या ऋत पर ही सब कर पर्यवसान हो जाता है। 'ऋतं नात्येति किमान यह सिद्धान्त प्रसिद्ध है। → इस प्रकार प्रजापति की इच्छा से चाङ्मय स्वायम्भुव पानी में जाया-धारा-आप-जीवन- ऋत यह पांच बल उत्पन्न हो जाते हैं । इन पाचों बलों से ही पायज्ञमजापति का पाङ्का- रज्ञ स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित है। गोपथब्राह्मण के आरम्भ में ही इन बलों का विवेचन हुआ है। १-"यद्भिवी अहमिदं सर्व धारयिष्यामि यदिदं किञ्च" " इति 'धारा' २-"अद्भिवी इदं सर्व जनयिष्यामि यदिदं किञ्च इति 'जाया ३--"अद्भिया इदं सर्व-माप्स्यामि यदिद किञ्च" --- इति 'आप' सर्वमप्सु प्रतिष्ठितम् ४-"ऊ-वा अपां रसः । ऊ जीवनम् " →→→ इति 'जीवनम्' ५-"ऋतं भूमिरियं विता" इति 'भूतम्' १-"सर्वमप्सु प्रतिष्ठितम्"-इति-धारावलम् २-'सर्वमद्भपः प्रजायते” इतिजायावलम् । “आपो वै सर्वे देवाः । जाय- ३---"सर्यमापोमयं जगत्" --इति--आपोवलम् मानो वै जायते एताभ्यो देवता- १- आपोमयः प्राणः" इति--जीवनवलम् भ्य इति निगमो भवति । ५-'ऋतं नात्येति किश्चन"--इति-ऋतबलम् सबसे पहिले क्या था ! उत्तर है 'वेदमय पाणमूर्ति असत् नाम से प्रसिद्ध सप्तपुरुष- पुरुषात्मकस्वयम्भू सत्य प्रजापति' । 'एकाकी न रमते द्वितीयमैच्छत् पतिश्च पनीच . ४७ प्राकृनात्मा का इशोगनिपत ।। अथर्ववेद EMAA - - । के अनुमार सृष्टिकामना से उसने तप और श्रम किया । इससे उसके प्राण में क्षोभ उत्पन्न हुआ । क्षोभ से दूसरे विष्णु नाम के अदर की सहायता से दूसरीवस्तु उत्पन्न होगई । उस दूसरी वस्तु का क्या नाम है ? उत्तर है 'सुवेद' । यदि कोई मनुष्य परिश्रम करता है तो सर्व- प्रथम उसके ललाट पर स्वेद [पसीने] उत्पन्न होते हैं । अत्यधिक परिश्रम से सारे रोमगतों से पसीने चूने लगते है, जैसा कि पूर्व में बतलाया जाचुका है । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है- "स भूयोऽश्राम्यत्-भूयोऽतप्यत । भूय आत्मानं संतप्तम्य- सर्वेभ्यो रोमगतभ्यः पृथक् खेदधाराः प्रायन्दत"--( गो० वा० ५० १।१ )। स्वयम्भूप्रजापति से उत्पन्न इसी सुवेद का नाम 'अथावेद' है । अप्तत्त्व ही अथर्व है। त्रयीवेद अग्निमय होने से उग्र है । यह अप्वेद किंवा सोम्वेद शान्त है । अग्निवेद ही आंशिक रूप से पनी बनकर शान्त बन जाता है । यही इसका सुष्टुभाव है, अतएव इसे 'सुवेद' (शांतवेद) नाम से व्यबद्दत करना अन्वर्थ बन जाता है । इसी सुवेद को परोक्षप्रिय देवता अपनी स्वाभाविक परोक्षभाषा में 'स्वदनेद' नाम से व्यवद्वत करते हैं। स्वेद को पसीना कहा जाता है । यदि आप सीधी भाषा में अथर्ववेद का स्वरूप पूंछना चाहते हैं तो इसका उत्तर है-आपके ललाट पर पाए हुए पसीने । ब्रह्मप्रजापति के स्वेद ही का नाम 'अथर्ववेद' है । प्रयीब्रह्म प्रथमज था, यह दूसरा है । त्रयीब्रह्म अग्निमूर्ति है, यह आपोमूर्ति किंवा सोममूर्ति है । अयीब्रह्म वृपा है, यह योषा है । वह प्राण है, यह रयि है । यह है विश्वनिर्माता-दम्पती । इसके मिथुन भाव से सर्वप्रथम विराट् पुरुप उत्पन्न होगा, विराट से आगे की सृष्टिएं होंगी । अप योपातत्व, वेदनयीरूप वृषातस्य दोनों ही सृष्टि के प्रभव हैं. एवं प्रभव को 'ब्रह्म' कहा जाता है । ऐसी अवस्था में हम उक्त दोनों तत्वोंको 'ब्रह्म' कह सकते हैं । एक वेदब्रह्म है, एक मुपदग्रह्म है । त्रयोवेद ब्रह्म नाम का ब्रह्म है, अथर्ववेद सुब्रह्म नाम से प्रसिद्ध है | जैसा कि-'प्रश्नच या इदमग्रे सुब्रह्म चाम्ताम्' पड्विंशना.१।१।१) इत्यादि से स्पष्ट है । यह है चौपे अथर्ववेद का सक्षिप्त दिग्दर्शन । मुब्रह्म में भागे जाकर पूर्वोक्त जाया धारादि बल उत्पन्न होते हैं । यही यल याज्ञिकी एवं मैथुनीसृष्टि के अनुमाहक है। ज्यों ज्यों नवीन नवीन पदार्थ - ।

प्राकृतात्मा अथववेद २॥ ईशोपनिषत् ।। उत्पन्न होते जाते हैं, त्यो त्यो प्रजापति की-'एकोऽहं बहुस्याम्' यह कामना पूरी होती जाती है । यही इसका भूमाभाव है , भूमाही थानन्द है । प्रत्यक्षदृष्ट विश्वभूमा प्रजापति के आनन्द के साक्षात् दर्शन है । इप्ती सारे रहस्य को लक्ष्य में रखकर सामश्रुति कहती है- "ब्रह्म ह वा इदमम यासीत्, स्वयं तु-एकमेव । तदैक्षत-महदै यक्ष-तदेकमेवारिम,हन्ताहं मदेव मन्मा द्वितीयं देवं निर्मम-इति । तदभ्यश्राम्यत्, अभ्यतपत् , समतपत् | तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य संतप्तस्य ललाटे स्नेहो यदादमजायत-तेनानन्दत् । तमब्रवीत्-मइदै यज्ञ सुवेदमविंदामह इति | तबदन्नवीत्-महदै यज्ञ सुवेदमविदामह इति, तस्मात् सुवेदोऽभवत् । तं वा एतं सुवेदं सन्तं स्वेद इत्याचक्षते परोक्षण । परोक्षप्रिया हव हि देवा भवन्ति प्रत्यक्षद्विपः। + + + ++ + स भूयोऽश्राम्यत्, भूयोऽतप्यत्, भूय आत्मानं समतपत् । तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य संतप्तस्य सर्वेभ्यो रोमगर्नेभ्यः पृथक् वदवाराः प्रास्यन्दत । ताभिरनन्दत् । तदब्रवीत्-आभिर्दा अहमिदं सर्व धारयिष्यापि यदिदं किश्च, पाभिवी अहमिदं सर्व जनयिष्यामि यदिदं किश्च, अभिर्वा अहमिदं सर-माप्प्यामि यदिदं किञ्च, इति । तदप्रवीदाभिर्वाः तस्माद् धारा प्रभवस्त. द्धाराणां धारात्व, यञ्चासु घिपते । तघदरवीत्--आभिर्वा० तस्माज्जाया अभवातबायानां मायावं, यच्चासु पुरुषो जायते, यब पुत्रः पुनामनरकमेकशततारं तस्मात् त्राति पुत्ररतत् पुत्त्रस्य पुत्र- स्वम् । तघदब्रवीत्-श्राभिर्वा० तस्मादापो अभवंस्तदशमत्वम् । आप्नोति ह वै सर्वान् कामान् यान् कामयते' इति । (गोपथब्राह्मण पूर्वभाग १ प्र०।१-२-०) इति-अथर्ववेदनिरुक्तिः मन्त्रार्थसम्बन्धी-वेदप्रकरण समाप्त । ।

मन्त्रार्थ प्रकरण । टिकामुक ब्रह्म के-इच्छा तर श्रम से सुब्रह्मतत्व में सर्वप्रथम जाया धारा, माप, जीवन, ऋत,यह पांच बल उत्पन्न होते हैं, जैसा कि पूर्वप्रकरण में बतलाया जा- चुका है। अयोधन प्रजापति का पहिला कार्य सुब्रह्म था, पञ्चबलोत्पति दूसरा कार्य है । इच्छा-तप-श्रम का विश्राम नहीं है। तीनों व्यापार निरन्तर होते रहते हैं। फलतः नए नए पदार्य उत्पन्न होते रहते हैं । इच्छातपादि सृष्टि-अनुबन्धों से आगे जाकर भृगुतत्व उत्पन्न होता है । उत्पन्न होने वाले आपोमय ब्रह्म में क्षार और मधुर यह दो रस उत्पन्न होते हैं। मधुररस आप का स्वरूपधर्म है, एवं क्षारस ( लवणरस ) श्रापित धर्म है। पानी में दोनों कैसे हैं ! इस प्रश्नसमाधि के लिए पसीने पर दृष्टि डालिए । पसीना सुवेद किया सुमझ है । पसीने में उक्त दोनों रस हैं, परन्तु हमारे पसीने में लवण रस की प्रधानता है । कारण हमारा शरीर पार्षिरमाग प्रधान है, एवं पृथियी के मूल उपादानों में 'मृत' नाम से प्रसिद्ध धारमाग की प्रधानता है । श्रतएव पार्षिय समुद्र क्षारप्रधान ही होता है । मधुररस अस्सल्स गाना है, अतएव प्रायः हमारा पसीना किसी वस्तु को उत्पन्न नहीं कर सकता । यदि पत्यधिक मात्रा से पसीना चूने लगता है तो उस में मधुारस थधिकमात्रा से संघठित होजाता है। यह किसी पास्यान में गिर कर सृष्टि का कारण बन जाता है । योपारूप हमारे पसीनों के साप जय पायुगत पृपानि का सम्बन्ध होता है तो इस योपा गृपा के मिथुनभाव से पसीनों में सूक्ष्मवीटाणु उत्पन्न होजाते हैं, जिनका कि दूरयीक्षण यन्त्र श्ययया माइक्रोसकोप ( English ) से प्रसव रिया जासकता है । स्वायतार पवनपुत्र के पदी संचित पसीनों से ( मत्स्यगर्भ में) सुप्रसिद्ध मारप्पन का पाम हुया था। इस प्रकार दीपप्रजापति के स्वेद में दोनों रस उप- पोरें । अतएव तत्प्रमय परजापति में भी दोनों की सच्चा माननी पड़ती है । अन्तर पास इतना है कि पदा (भा में ) मधुरम की प्रशनता है, फारस अत्यापमाया में है । पारए पाए है।मारे में पीहर घनाद (पपिपी) की प्रधानता थी, उस में पञ्चीयन प्रारा । ५० प्राकृत त्मा माशोपनियत । भृगु-अङ्गिरा RAMMAnima WANA vo- । की प्रधानता है । पञ्चीकृत प्राण में भी क्षारस्वरूपसमर्पक अन्नाद भाग (पार्थिव भाग) है, परन्तु अत्यल्पमात्रा में । इसी प्राजापत्य पानी से गांगेय पानी की स्वरूप निष्पत्ति हुई है, अतः पार्थिव पानियों की अपेक्षा गांगेय पानी प्रतिमधुर है, यह साक्षात् सोम है, अमृत है, जीवनीय रस है, दोष ( कोटाणु ) नाशक है । इसी शान्त मधुर- अमृत रसभाग से भृगुतत्त्व का विकास होता है । भर्जनशील तत्व ही भूगु है । इस भूगु की धन-तरल-विरल मेद से तीन श्रयस्थाएं होजाती हैं । घनावस्या पाप नाम से, तालावस्था वायु नाम से, एवं विरलावस्था सोम नाम से प्रसिद्ध है । दूसरे शब्दों में घनायस्थापन भृगु पाप, तरलायस्थापन्न भृगु वायु, विरला- यस्थापन भृगु सोम नाम से व्यबढ़त होता है। अप् तच का मधुररस ही सृष्टि का उपादान बनता है । अतएव इसे 'रेत' [ उपादानद्रव्य-शुक्र ] कहा जाता है। वही रेत वेदाग्नि से संतप्त बन कर भृगु रूप में परिणत होता है। इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है- "ता अपः सृष्ट्वाऽन्वैतत, तानु स्वा छायामश्यत् । तमस्येक्षमाणस्य स्वयं तोऽस्कन्दत् । तदप्मु मसतिष्ठत् । तास्तत्रैवाभ्यश्राम्यव, अभ्यतपत, सम तपत् । ताः श्रान्तास्तप्ताः संननाः सार्द्धमेव रेतसा द्वैयपभवन् । तासा- मन्या अन्यतरा अतिलवणा अपेया अम्बादयः । ता अशान्ता रेतः समुद्र वृत्वाऽनिष्ठन् । अथेतराः पेयाः स्वाट्य शान्तास्तत्रैवाभ्याम्यत्, अभ्य तपत, समतपत । ताभ्यः श्रान्ताभ्यस्तप्ताभ्यः मतप्ताभ्यो यदूत मासीत्, तदभृज्यत । यदज्यत तस्माद् भृगुः समभवन, तद्भगोम॑गुत्वम् । भृगुरिव वै सर्वेषु लोकेषु भाति य एवं वेद'-(गो० पू० ॥३-) इति । 'वायुगपश्चन्द्रमा इसते मृगवा' [गो० पू० २।८] । उक्त भृगुतत्य में पारमेष्टय प्राप्य प्राण [वरुण] की प्रधानता रहती है । श्रापोमय रेत ही भृगु- रूप में परिणत होताहै, अतएव 'तं वरुणो न्यगृहीत, तस्मात् स मृगुवांरुणि ऐ० बाल- ३।३१1) इलादि के अनुसार इसे वारुणि ( वरुणपुत्र ) माना जाता है । खसोमशक्ति से यही धर्चि [प्रकाश] रूप में परिणत होता है । दीपशिखा अंगिरा है, दीपप्रभा मृगु [जलता हुश्रा - प्राकृतात्मा का इशा गनपत 15 मुगु-अभिरा - । सोम] है, इसी आधार पर 'अथिपिभृगुः, संबभूव, अङ्गारेवगिराः सम्बभूष' (""") इत्यादि कहा जाता है सोमशक्ति से ही यह पदार्थों का संहनन[संघात-एकीकरण]करता हुश्रा गनिशील बनता है, अतएव 'विभ्रत्-गन्छनि' इस निर्वचन से इसे भूदगु' कहा जाताहै । भृगु ही परोक्षभाषा में भृगु नामसे प्रसिद्ध है । संकोच इसका खाभाविकधर्म है । तरला. वस्थापन भृगु को हमनें वायु 'बतलाया है । इस वायु की [भार्गवायु की] माण-पबमान- मातरिश्चा- सविना यह चार अवस्थाएं हैं । चारों के भिन्न भिन्न कर्म हैं । श्वासप्रश्वासरूप प्राणवायु 'परमान' है । यह पवमानवायु (Oxygen ) और अम्भ नाम का प्रथम प्रार ( Hydrogen दोनों संसृष्ट होकर स्थूल पानी के उपादान बनते हैं, दूसरे शब्दों में पवमान और अम्भके रासायनिक संयोगसे पीने का पानी उत्पन्न होता है। यही पानी म्रियमाण-मुछित होने से पर' [माणा] नाम से प्रसिद्ध है । दूमरा है मातरिश्वा वायु । संकेतभाषा के, अनुमा माता पिण्ड का नाम है. पिता महिमामण्डल का नाम है । पिण्ड को पृथिवीशब्द से, घु शब्द से व्ययन किया जाता है । सभी पिण्ड पृथिवी हे.सभी महिमाए धौ हैं। सुप्रसिद्ध पृथिया की तरह सूर्य-पामेष्ठी-खयम्भू श्रादि सभी विएड पृथिवी हैं । जिप्त पर आप प्रतिष्ठिन हैं, उसी का नाम पृथिवी नहीं है, अपितु वेदिका नाम पृथिवी है. आधारभूमि का नाम पृथिवी है । वेदमर्ति प्रजापति की प्रतिमा का नाम पृथियो है । इस परिभाषा के अनुसार वयम्भू-परमेष्ठी-मूर्य-चन्द्रपा-पृथिवी-पइ पांचों पिण्ड पृथिवी हैं, पांचों ही पृथिवी होने से 'माता' हैं इस माता के चारों ओर व्याप्त रहने वाला भागय वायु ही मानरिणा' है, जैसा कि धागे जाकर स्पष्ट होनायगा । अभी फेवल यही समझ लेना पर्याप्त होगा कि पिण्ड के चारों मोर व्याप्त रहने याला पिण्डस्वरूपसमर्पक एवं रक्षाका मात्र वायु ही 'मानरिमा' है । जो माग गाए सांप्तारिक पदार्थों को कार्यका गभाय के लिए प्रेरित करता है, यह प्रा. पिता पापु ही तीमा 'सवितागयु' है। बिना सबिना यायु की प्रेरणा के योई भी प्राण. कोई भी परतु गृष्टपुन्मुस नहीं पन रामती । इसी माधार पर-'सपना व देवाना मसरिना यह कहा जाता है । एवं निस यागु से पिप के पदार्य गतिशीत भने हुए है, प्रयागसंस्था में जो महिमा को । । .

प्राकृतात्मा । ईशोपनपन II भृगु अनिए - - वायु प्राण-अपान-च्यान-समान-उदान मेद से पन्नधा विभक्त होकर तादि संचार का कारण बनता है. ही चौथा प्राणायु है । साधारण मनुष्य जिसे वायु कहते हैं, जिसका त्वगिन्द्रिय से हम प्रत्यक्ष करते हैं, जिसके आघात का अनुभव होता है, जिससे मेघ-जल-वृक्षादि विध्य- मान होते हैं वह वायु उक्त चारों भार्गव वायुधों से सर्वथा पृथक् तत्व है। इस सर्वानुमत वायु को 'वात'वात भावात भेषजम् । नाम से व्यवहृत किया जाता है। भार्गववायुचतुष्टयी प्राण- रूपा है, यह वातवायु भौतिक है । भार्गववायु के साथ साथ ही एक घंगिरावायु का विकास और होता है। अंगिरा से रुद्र वायु का विकास होता है। रुद्र से ११ प्रकार के मरुद्वायु का विकास होता है-मिरुतो रुद्रपुत्रासः), महत् वायु का विकार मारुव है. यही वातवायु है । इसी को 'समीरण' कहा जाता है । इसी का हम प्रत्यक्ष कर रहे हैं । वात वायु से सर्वया विभक्त गौलिक भार्गव वायुथों में से प्राणवायु प्रजापति के पूर्वभाग में (पूर्वादिक् में । उक्यरूप से प्रतिष्ठित रहता है। यहां प्राणवायु का खजाना है। यहां से निकल कर प्राणवायु सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त होता है । अतएव पूर्वदिक्स्थ सूर्य के लिए 'पाणः प्रजानामुदपत्येष सूर्य: [प्र० उ०11] यह कहा जाता है । मातरिश्वा वायु दक्षिण दिशा में उक्यरूप से प्रतिष्टित रहता है । यहां से निकल कर यह सर्वत्र न्यान हुआ पिण्डसृष्टि का स्वरूप संपा- दक बनता है । पश्चिमदिशा में पत्रमान वायु उक्थरूप से प्रतिष्ठित रहता है । इसी पवमान के लिए- परमानो हरित माविवेश' (शत० २।२।५।५।) यह कहा जाता है। एवं चौथा सविता उनरदिशा में उत्परूप से प्रतिष्ठित रहता है। उक्त चारों वायुओं में से पवमान नाम का वायु सौर ब्रह्माण्ड में आकर रुद्रसंसर्गसे परमान- पावक शुचि यह तीन रूप धारण कर लेता है। घोरगर्ति रुद्र के सम्बन्ध से यद तीनों वायु घोररूप में परिणत होते हुए घोराग्नि नाम से प्रसिद्ध होगाते हैं । एकादशमर्चि पशुपति (महा- देव ) की सोम आदि आठ मत्तिएं शिव है , पवमानादि तीनों रुदति है, धरतनू है। पवमान भूपिण्ड से संक्रान्त रहता है, पावक अन्तरिक्ष में व्याप्त रहता है, एवं शुक्र नाम से प्रसि. द सूर्यमण्डलरूप घुलोकस्य शुचि है । प्राणवायु हमें पूर्व से मिलता है, मातरिया दविल से, - .

प्राकृतात्मा 01 इशागनपत । भृगु-जिरा । - पयमान पश्चिम से, एवं संविता उत्तर से मिलता है । चारों वायु भार्गव हैं। गारों का उत्पति- स्थान [ सूर्य से जार ) आपोमय परमेष्ठिमण्डल है। यहा से सौरमण्डल में आकर उक्त दिशा- त्रों में क्रमश: उक्य रूप से प्रतिष्ठित होकर उक्त वायु रोदसी त्रैलोक्य के स्वरूपसंपादक । , - धनते हैं। प्राण-पवमानादि चारों घायु. सोम, आप तीनों भूगु हैं । इस भृगु से मागे जाकर मा- या प्राण का विकास होता है । पानी का जो भाग भृगुरूप में परिणत होने से शेष रह जाता है. वही 'अथ-धर्याक्-परिशिष्यते' के अनुसार 'अथर्वा' कहलाता है । यही परिशिष्ट प्रथा- भाग आगे जाकर अगिरा रूप में परिणत होता है । तात्पर्य यह है कि पानी में हमनें मधुर और क्षार मेद से दो रस बतलाए हैं। इन में मधुररस भृगुरूप में परिणत होता है, शेष क्षारभाग थर्या कहलाता है। आप पानी को जमीन पर डाल दीजिये । उसका सोमप्रधान मधुर रस तो सूर्यरश्मिगत मधुप्रिय (सोमप्रिय) इन्द्रप्राण द्वारा श्राकर्पित होकर घुलोक में चला नायगा, इसी को पानी का सूखना कहते हैं । पानी के बाप्परूप में परिणत होकर उड़जानें से जमीन पर एक मुफेद सा धब्बा रह जाता है, यह साक्षात् क्षार है । मूत्र में क्षार विशेष मात्रा में रहता है. अतएव इसमें क्षारभाग अधिक मात्रा से रहता है । मधुरस मधुरूप युलोक के सजातीय श्राकर्षण से घुलोक में चला जाता है, क्षारमाग क्षारप्रधान पृथिवी के थाकर्षण से यहीं रह जाता है । इसी परिशिष्ट क्षार का नाम 'अथवा' है, यही अथर्वा अंगिरा फा जनक है। दूसरे शब्दों में पारुण पानी का मभु भाग भृगु का जनक है, क्षारभाग भयर्वा की प्रतिष्ठा है । मधुररस एव क्षारस भृगु-और अथर्वा नहीं है, अपि तु इन रसोंमें रहनेवाला 'प्राण मृगु और अपर्वा है । प्रत्यक प्राणी के स्वेद में दोनों रस हैं । इन में मधुररसा पन्छिन भार्गव प्राण तो पुलोक में जाता रहता है, एवं दाररसायच्छिन्न प्रयाप्राण यही इसी के साप रह जाता है । मनुष्य के वस्त्रों में, रहने के मकान में, जहा जहां यह मनुष्य जाता है उन सन स्थानों में अथर्वा प्राण अनुशयम्प से ध्यान रहता है । इसी अथर्वासून के थाधार पर तान्त्रिक मोर कृत्याप्रयोग करने में समर्थ होते हैं। प्राणियों में धानप्राणी (कुत्ता) इरा अथर्वा- पाकृतात्मा - ईशेपनिषत् ॥ भृगु-गिरा । . प्राण का परिज्ञाता है । जिस रास्ते से चोर भागता है। उस रास्ते में उसका अपर्वा भाग्य अनु- शयरूप से प्रतिष्ठित होता जाता है । कुचा अपनी प्रणेद्रिय से अथर्वा गण को पहिचानता इथा चोर का पता लगा लेता है। अथवांपारण का आगरा से सम्बन्ध है । मानेष भागेर। रुधिर में व्याप्त रहता है । इस रक्त सम्बन्ध से एक ही अर्थासूत्र सतानधारा में प्रतिष्ठित होता दुभा जनन-मरणाशौच का संक्रामक बनता है । अधर्वासूत्र द्वारा एक की भैपवित्रता सारे वंशधरों में व्याप्त होजाती है। यह निराकारसूत्र यद्यपि चर्मचतुओं से नहीं दिखलाई पड़ता, पास्तु इसके कार्यों से इसकी सत्ता स्वीकार करनी पड़ती है । आपका कोई सम्बन्धी आपसे पान्सौ कोप्स पर रहता है । यदि उस पर कोई विपत्ति आती है तो तत्काल श्रापका हृदय व्याकुल हो पड़ता है । यह उसी अथर्वासूत्रसम्बन्ध की महिमा है । विदेशस्थ बन्धु यदि आपको याद करता है तो आपके हिक्का (हिवकी) चलने लगती है। उसके नाम लेते ही हिचकी बंद हो जाती है, यह अनुभूत विषय है। छोटे बच्चों का मन मया सूत्र सोम की प्रधानता से कोमल रहता है। एवमेव सौम्या स्त्री का भी अथर्वाप्राण निर्बल रहता रहता है, अतएव बच्चों एवं त्रियों पर कृत्याप्रयोग अधिक एवं शीन सफल होजाता है । ( देखिए शत. १४ । ६।७।१।। पर्वा अंगिरा की विकासभूमि है, अतएव अंगिरा को 'प्रशिरा' नाम से भी व्यवहृत किया जाता है । एक ओर भृगु है दूसरी ओर अंगिरा है. मध्य में अथवा है ! मध्यपतित अथर्वा का प्रशनरूप से अगिरा के साय, गौणरूप से भृगु के साथ सम्बन्ध है । अतएव तन्मध्यपतित- न्याय से दोनों को अपर्वा मानलिया जाता है । भूगु-प्रशिरात्मक यह अपर्या सुब्रह्म है । यह उस वेदमूर्ति ब्रह्म की सबसे पहिली सन्तान है, ज्येष्ठ पुत्र है। प्रयीवेद की प्रतिष्ठा न भृगु है न अंगिरा है, अपि तु समतिरूप अथर्वा है । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है- ब्रह्मा देवाना प्रथमः सबभूव विश्व य कर्ता भुवनस्य गोना। स ब्रह्मविद्या विद्यापतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय पाह (मुण्डक० ११११)। + इस विषय का विग्रद विवेचन भद्धविज्ञानान्तार्गत प्राशौचविशन में देखना चाहिए। ५४ प्राकृतमा दशोपनिपन भृगु-अगिरा DAApe 1 अथर्वा रूक्ष है, क्षार है । इससे अगिता का विकास होता है, अगिरासे अग्नि का विकास होता है। उधर मृगु स्नेह तस है, मधुररस है । अथर्वा की प्रतिष्ठा यही भूगुवेद है । प्रद एक भृगु को हम सोमवेद की प्रतिष्ठा कह सकते है । परन्तु आग्नेयी अथर्वात्रयी त्रयीवेद की प्रतिष्ठा बनती है । दूसरे शब्दों में त्रयीवेद अवस्थात्रययुक्त अग्नि, वायु, आदित्य भेदभिन्न अहिरा पर ही प्रतिष्ठित है । अग्वेिद की प्रतिष्ठा अग्निरूप अहिरा ही बन सकता है। । ऊपर बतलाया गया है कि मध्यपतित अथर्वा दोनों में अन्तर्भूत है। प्रतएव परमार्थतः भृगु अहिरा यह दो तत्व बच जाते हैं । एक मधुप्रधान है तो दूसरा दार प्रधान है । सीधी भाषा में एक (भृगु) मीठा पानी है तो दूसरा (अगिरा। खारापानी है। जिस भूप्रदेश में भूगु की प्रधानता रहता है. यहां कूपादि का पानी मीठा होता है, एवं जहा अहिरा की प्रधानता रहती है. वहा खारागनी मिलता है। दोनों ही आपोमूर्ति होनेसे 'अन' है, मृगु भी ऋत है. अङ्गिरा भी ऋत है । आपोमय (मावगिरोभय परमेष्टी ऋत है - "मृतमेव मायेष्टी" । यद्यपि पार- मेष्ठप मण्डल में मृगु और भगरा दोनों भापोमय होते हुए ऋत ही हैं, परन्तु आगे जाकर सिौरब्रह्माण्ड में जाका] अगिरा सत्यरूप में परिणत होजाता है । भूगु [आप-वायु-सोम } सदा त प्रधान ही रहता है । ऋत अगिरा सत्स का प्रभय बनला हुमा सत्यत्ति है भूग ऋत है । स्वयम्भू प्रजापति के तप से उत्पन्न होने वाले यही ऋत सत्य (भूगु-अजिरा) अहो- गत्र के परिप्तवरूप संवसरात्मक सूर्य के जनय हैं । यही दोनों 'यसव' नाम से प्रसिद्ध रोदसी समुद्र के, एवं चाशपृथित्रीरूप रोदसीत्रैलोक्य के जनक हैं । इसी ऋतसत्यविज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है- 1 ऋतं च सत्यं नाभीद्धानपसोऽध्य नापत तनो रायनायत ननः समुद्रो भगवः ॥ ममुटादगाबादपि समत्परो भजायन ! अहोरात्रागि वियदिश्वस्य मियतो नगी प्राकृतात्मा या ईशोपनिपत - भृगु अनिर। Anni Tum . मूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् । दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः ।। ३ ॥ (अक्सं० १० मंः । १९० सूक्त । इति । प्रया को हमनें ब्रह्मा का ज्येष्ठ पत्र कहा है । यही अथर्वा अमि-यम-प्रादित्य रूप में परिणत होकर भूः-भुवः स्वः इन तीन लोकों का प्रवर्तक बनता है । यही 'रोदसीशम' है । यह 'अथ-अाक्' रूप अथवा से उत्पन्न हुआ है, अतएव रोदसी को 'अवमधाम' 'अष- राय आदि नामों से व्यवद्दत किया जाता है । अथवी उत्पन्न होने वाला अग्नि-यम-आदि- स्यरूप त्रयीवेद दूसरा वेद है। यही वेद सौरसस्था का स्वरूपसमर्पक बनता हुआ गायत्री- मात्रिक' नाम से प्रसिद्ध होता है। त्रयीविद्या को साथ लेकर थापोमय समुद्र में प्रविष्ट होने बाला पुरुष प्रजापति सर्वप्रथम इस अग्नित्रयीवेद को उत्पन्न करता है । विश्व की अपेक्षा स्वा- यम्भुवब्रह्मनिश्वसित वेद प्रथमन, एवं हमारी सौरत्रिलोकी की अपेक्षा यह वेद सर्वप्रथमज है । अनिश्चसित वेद पुरुषाविनाभूत पुरुषस्वरूपसमर्पक बनता हुआ अपौरुषेय था, परन्तु यह गायक वेद इस वेदमूर्ति पुरुष प्रजापति से उत्पन्न होने के कारण पौरुषेय है । हिरण्मयमण्डलस्थ त्रयी- घन जिस सूर्य को आप देख रहे हैं, हमारे ब्रह्माण्ड में सब से पहिले इन्हीं हिरण्यगभभगवान् का प्रादुर्भाव होता है | इसी सौरवेदत्रयी की उत्पत्ति का क्रम बतलाती हुई वाजिश्रुति कहती है- "तस्यां ( अपौरुषेपवेद ) मतिष्ठायां प्रतिष्ठितोऽतप्यत | सोऽपोऽस- जत वाच एव (वेदवाच एव ) लोकात, बागेत्र साऽसृज्यत । सोऽका पयत-आभ्योऽदभ्योऽधिप्रजायेयेति, सोऽना ( अपुरुपविधया ) त्रमा विद्यया सहापः प्राविशत्, तत पाण्डं समवर्तत । तदभ्यम- शत्-अस्स्विति । अस्तु-भूयोऽस्तु-इत्यव तदनवीव । ततो ब्रह्मैव • प्रथमसृज्यत नय्यके विद्या- गायनिमात्रिको बदः]" [शत० ६.१।१।१०] 1 ॥ इशापनियन । मुगु-अहिरा पाहतारमा त्रयीविद्या ही प्रजापति का पहिला मावण्ड है । अनन्ता क्रमशः पोपाण्ड, यशोएड. रंतोऽण्ड भेद से तीन अएड और उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार एक ब्रह्म चार अण्डों में परिणत होकर साम्' वनजाता है । चारों अण्डों की समष्टि ही एक रोदसी ब्रह्माण्ड है इसी का नाम सौरमण्डल किंवा सौरत्रिलोकी-(सौरजगत) है । सायम्भुव वैश्वरूप्य [महिमामण्डल] व्योम (परमाकाश) नाम से, पारमेष्ठ्य वैश्वरुप्य समुद्र नाम से व्यवहृत होता है, एवं सौर वैश्वरूप्य ब्रह्माण्ड नामसे प्रसिद्ध है । यह ब्रह्माण्ट उस आपोमय पारमेष्ठय समुद्र के गर्भ में बुबुदरूप से प्रतिष्टित है । एवं पारमेष्टय समुद्र वयामु के वैश्वरूप्य में (परमाकाश में) बुबुदरूप से प्रतिष्ठित है । जैसे ब्योम का अधिष्ठाता ब्रह्मनि- श्वसितवेदावच्छिन्न खयम्भू है, समुद्र का अधिष्ठाता सुब्रह्मावच्छिन्न परमेष्टी है, एवमेव इस ब्रह्माण्ड के अधिष्ठाता गायत्रीमात्रिकवेदावच्छिन्न भगवान् सूर्यनारायण हैं । यह ब्रह्माण्ड के प्रथम अधिष्ठाता है । इन्हीं का निरूपण करती हुई श्रुति कहती है । हिरण्यगर्भः समय-ताग्रे भूतस्य जात. पतिरेक आसीत् । सदाचार पृथिवीं चामुतेमा कस्मै देवाय इविपा विधेम ।। । यजुः० सं० १३१४) "मप्रयम वेढमयम्बयम्भू ब्रह्म का आविर्भाव होता है. अनन्तर उसके वाम्भाग से आपोपय मुनम का आविर्भाव होता है । मुब्रह्म मुगु एवं अगिरामय है । आप-बापु मोन भृगु है, भग्नियमादिस अंगिरा हैं । ६ओं की सपष्टि प्राप है । इनमें से आपोमय भगिरा से गायत्रीमात्रिक वेद उत्पन्न होता है । अंगिरा स उत्पन्न यह वेढतत्व मूर्यरूप में परिणत होकर उसी मावशिरोमय अपसमुद्र में प्रतिष्टित होरहा है । वेदमय सस स्वयम्भू या परिना अवतार पानी है । इस पाप का पदिला अवतार गायत्रीमात्रिक नाम • इस विषय प्रविण रिवेपन दिरपपगभगवान्ला मुरहोपनिषत् विज्ञानमाय में देखना चाहिये ।

प्राकृतात्मा भृगु-अङ्गिरा - ईशोपनिषत् ॥ nanam का सबवेद है" यह पूर्व के सन्दर्भ से भलीभाति सिद्ध होजाता है । साथ ही में यह भी सिद्ध होजाता है कि "आपोपय परमेष्ठी ऋन है । ऋत में ही सारा सस्पविन्ध प्रतिष्ठित है ऋत परमेष्ठी का कोई भी अतिक्रमण नहीं कर सकता" । इस विज्ञान को लक्ष्य में रखकर निम्न लिखित श्रुतिवचन हमारे सामने आते हैं- 1-"तद्यत् तत् सत्यमाप एव तत् । भापो हि वै सत्यम् । अप एव तस्य [ब्रह्मनिश्चसितवेदसत्यस्य ] अग्रमकुर्वन् । तस्माद्यदवापो यन्ति- अयेदं सर्व जायते यदिदं किंच" ( शत. ७ का. । ४।१।६। कं.) । २-"ऋतमेव परमेष्ठि ऋतं नात्येति किंचन । ऋत समुद्र माहित ऋते भूमिरिय श्रिता ।। " ३-'आपो मृग्बगिरोरुपमापो मृग्वशिरोमयम् । अन्तरते त्रयोदा भृगनगिरसः श्रिताः॥" ४- आप एवेदपग्र आसुः । ना प्रापः सत्य [ गायत्रीमाधिकवदसत्यं ] अम- ज्यत । सत्य ब्रह्म, ब्रह्म प्रजापति, प्रजापतिर्देवान्, ते देवा सत्यमित्यु- पासते । तदेतत् व्यतरं सत्यमिति । स इत्येकमतरं. तीत्येकमतरं, अमित्येक- मक्षरम् । प्रथमोचमेऽक्षरे ससं मन्यतोऽनृतम् । तदेतदनृत सयेन परिगृहीतं सत्यभूयमेव भवति । तत् तत् सत्यमसौ स प्रादित्या" । [शत० १४ का०11६१-२] ब्रह्म-वेद-यी-अग्नि-सब अमिनार्थक हैं । सुब्रह्म-मुवेद-अधर्व-सोम यह सब अमिन्नार्थक हैं । मन्त्रोपात एजत्-अनेजत् तत्व वही अझनिश्चसित वेद है । पूर्वप्रतिपादित चतुर्विध मार्गन वायुनों में से अन्यतम मातरिश्वा ही मन्त्रगत मातरिश है । इसी मातरिश्मा से भाप की उस अनेजदेजद्रूप ब्रह्म में आनुति होती है । इसी से सारे विश्व का स्वरूप सम्पन्न होता है। 'पाप' तत्व का स्वरूप निर्वचन होचुका । सभव है पाप 'आप' के स्वरूप विस्तार ५६ प्राकृतारमा का इशापनिपत ॥ भृगु-अगिरा - से घबड़ा गये होंगे । अतः इस प्रकरण को थोड़ी देर के लिये यहीं छोड़ दीजिये, एमं ब्रह्म पर दृष्टि डालिये। पूर्व प्रतिपादित मन्त्रार्थ सम्बन्धी वेदनकरण से विज्ञ पाठकों को यह भलीभाति पिदित होगया होगा कि ब्रह्मनिश्चसित स्वायम्भुव त्रयीवेद का यजु माग ही सृष्टि का मौलिक तत्व है । ऋक्साम सहकारी मात्र हैं । यजु पुरुष है, ऋक्साम नपुंसक है , केवल छन्दोरूप है । ऋक् सामावच्छिन यजुर्वेदविद्या-कर्ममय अव्ययपुरुष की विकासभूमि है; अतएव इसे 'पुरुष' शब्द से व्याहत किया जाता है । यह यजुपुरुष द्विब्रह्म की समष्टि है । वस्तुतः इस का नाम 'यज्जू' वेद है । 'जूराकाशे सरस्वत्या पिशान्यां यवने स्त्रियाम्' इस कोश के अनुसार 'जू' शब्द आकाश का वाचक है, एव यत् शब्द वायु का वाचक है । यह वायु चतु विभक्त पयमान- मातरिया आदि भार्गवमायु, एवं वातनायु आदि से सर्वथा भिन्न वस्तु है । यहा का वायु शद्र ऋषि नाम से प्रसिद्ध असत प्राण का वाचक है । यह यत्रूप प्राणपायु विशुद्ध गतिरूप है, यही अव्यय के कर्मभाग का विकास है, जूरूप आकाश विशुद्ध स्थितितत्त्व है, यही अव्यय के विद्याभाग का विकास है । 'यथाकाशगतो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्' ( गी....) के अनुसार स्थितिरूप प्राकाश, एवं गतिरूप वायु नित्य अविनाभूत हैं । विद्या, स्थिनि, प्राकाश, वाक्, जू, यह सब शब्द अभिन्नार्थक है । कर्म, गति, वायु. प्राणा, यत्, यह सघ शब्द अभिन्नार्थक है । यत्-और जू-इन दोनों ब्रह्मों की समष्टि यज्ञ' वेद है | यही यज्' शब्द परोक्षप्रिय देवताओं की परोदभाषा में 'यजुर्वेद' नाम से प्रसिद्ध है । इसी यजुर्वेद का निर्वचन करती हुई याजिश्रुति कहती है- "अय वाव यजुर्योऽयं पवते । एष हि यन्नेवेदं सर्व जनयति । एवं यन्तमिद- मनु प्रजायते तस्माद् वायुरेव यजुः । अयमेवामाशो जूः, यदिदमन्तरि- क्षम् । एतं ह्याकाशमनु जयते । तदेतद्यजुर्वायुश्च, अन्तरिक्षंच, यच्च, जुश्च । तस्माद्यजुः । +xx । तदेतद्यजुक्सामयोः प्रतिष्ठितम, अक्- सामे वहता" (शत. १० को. | ३ । ५॥ १-२ ।। इति । । ६० प्राकृतात्मा । ईशोपनिपत् । " यत् भौर जू दोनों ही अमृत-मृत्यु मेद से दो दो भागों में विभक्त हैं। अमृत जू अमृता- काश है, अमृत यत् अमृत प्राण है | मर्त्य जू मांकाश है, मयं यत् मर्त्यप्राण है । मर्त्य की प्रतिष्ठा धमृत है | अमृताकाश इन्द्र नाम से प्रसिद्ध है, अमृतप्राण प्राण नाम से प्रसिद्ध है। मयाकाश वाक् नाम से, मर्यप्राण वायु नाम से प्रसिद्ध है. दोनों अविनाभूत हैं । अमृता- काशरूप इन्द्र, और प्राण से देवसृष्टि होती है, माकाशरूप वाक् ( जिसे इन्द्रपत्नी भी कहा जाता है ), एवं मर्यवायु से भूतसृष्टि होती है । देव और भूत दोनों सृष्टियों के उपादान अभिन्न हैं, अतः देव-भूत का अविनाभाव सिद्ध होजाता है । गौण-प्रधानता की अपेक्षा से 'इयं देवता' 'इदं भूनम' यह मेद व्यवहार प्रचलित है । वस्तुतः न देवता भूत के विना रहता. एवं न भूत देवता के बिना प्रतिष्ठित रहता । इस प्रकार अपनी मर्यकला से भूतसृष्टि का, अमृत- कला से देवसृष्टि का अधिष्ठाता बनता हुभा मुक्सामावन्छिन यजुपुरुष ही सब कुछ बन रहा है-'पुरुष एवेदं सर्वम्'। उपनिषदर्प का समन्वय करने वाले व्याख्याताओंने मन्त्रगत 'मानरिश्वा' वायु को 'सूत्र- वायु' समझा है । कहना नहीं होगा कि वैज्ञानिक पदार्थों के पृथक्करण को न समझने के कारण कैसी कैसी भयङ्कर भूल होजाती हैं। सूत्रवायु तो हमारा यत् नाम का प्राणवायु' है। इसी को सूत्रात्मा कहा जाता है । 'वायु 3 गौतम मत मूत्रम्' शत. १४ का. ६१७।५।) से स्वायम्भुव वेदमूर्ति सूत्रयायु ही अभिप्रेत है । सूत्रात्मा खयम्भू का गनोता है, । देखिए ई० वि० भा०१६६ पृ० ) । ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्ररूप हृदयानरो की समष्टि अन्तर्यामी है, अमिसोम की समष्टि, किं वा सोमगर्भित अग्नि सूत्रामा है । अग्नि सत्यवेद है । यही मूत्रसत्य है। उधर मातरिश्वा मार्गश्वायुरूप बनता हुआ परमेष्ठी का मनोता है। - यजुर्वेद विश्व का उपादान होने से ब्रह्म है। इसमें दो कलाए हैं, अतएव यह 'द्विब्रह्म का सहकारी, इसी से उत्पन्न होने वाला सुवेद सुब्रह्म है । भूगु अङ्गिरा के अवस्या मेदों से यह सुब्रह्म भाप, वायु. सोमममि, यम. प्रादिस इन ६ भागों में विभक्त है । अगएव इस ६१ प्रकृतमा शाशोपनिषत् । স্ব-স্বনি . , 'आपब्रह्म' को हम 'पइब्रह्म' नाम से व्यवहृत कर सकते हैं । हिब्रह्म के समन्वय से सब कुछ उत्पन्न हुआ है । द्विब्रह्म का (म। वाग्भाग (इन्द्रपत्नी) उसी प्राणरूप यत् के व्यापार से पानी वना है । यही पानी अम्भ है, वाय्यानक है । अतएव पाञ्चभौतिक सृष्टिकम में इसे 'वायु कहा जाता है ! 'अनेरापः' यह सिद्धान्त सर्वविदित है । एवं-"तस्य रा एनस्याग्रेवागेवोपनिपन" शन, १० का.1 ५। १ । ११] के अनुमार मोकाशबाबा (इन्द्रपनी) माक्षात् ब्रह्माग्नि है । वही तो प्राणव्यापार से तुब्ध होकर अमरूप वाय्वारमक पानी के रूप में परिणत हुआ है जैसा कि-'वागेव सासज्यत' इत्यादि रूप से पूर्व में स्पष्ट कर दिया गया है । इस वायुभय पारमेष्टय समुद्र के गर्भ में इसी के अङ्गिराभाग से देवाग्नि नाम से प्रसिद्ध गायत्रीमात्रिक अग्नि उत्पन्न होता है । यही पौरुपेय वेदाग्नि है. यही मूर्य्य है, 'त्रयीमयाय त्रिगुणात्मने नमः' । सौर रविमएं मरीचि' नाम से प्रसिद्ध हैं। इनके घर्षणसे मर पानी उत्पन्न होताहै । मूदित मरीचि अग्नि ही मर पानी है • सौराग्नि से उत्पन्न यही पानी आगे जाकर क्रमश पाप-फेन-मन- सिफता-शर्करा-परमा-प्रय-हिरण्य रूप में परिणत होता हुआ भूपिण्ड का स्वरूपसम- पंक बनता है। इसप्रकार वह एक हो जू-मियांकाश-मयावाको बार (आकाश) वायु, अग्नि, पानी, मिट्टी. इन पाच रूपों में परिणत होजाता है । पावों भूत वाङ्मय है | तभी तो-'अपो बागेवेदं सर्वम्' (ऐ०या. ३।१।६) 'वाचीमा विश्वाभुवनान्यपिता' (ते. ना.२||१५) यह कहना चरितार्थ होता है । प्रजापति (पोडशी) उल वेद का आमा है । शब्दतम्मावारूप अतएव शब्दनाम से व्यवद्दत वेदवाक् उस अात्मप्रजापतिरूप ब्रह्मा के निवास हैं, यही वेद- याक् धाकाश है, यही विच का मत है । इसी वेदमूला, श्रतएव वेदमयी सृष्टि का निरूपण करते हुए ऋषि कहते हैं- तस्मादा एतस्मादात्मन श्रागः सम्भूतः । अाकाशावायुः, यायोरनिः । अप्रेरापः । अदभ्यः पृथिवी' [त. उ. २।१] प्राकृतात्मा ईशोपनिपत् ॥ मुगु-अङ्गिरा یبو به یه به ما प्रजापतिरात्मन्धी पाटकौशिकमिदंसर्वम् ६६८ -ब्रह्माक्षरः प्राणमयः पाडशीप्रजापतिः-'यात्मा' २-१-यव-गर्भितो जूः-स्वयम्भूः---→अाकाशः (आकाश ) ३-२-आपोमयं सुब्रह्म-परमेष्ठी--->वायुः ( वायु ) ४-१-त्रयीघन: -सूर्यः शरिम् (५-४-मुन्छिता आपः-चन्द्रमा- -आपः [जल] (६-५-मृण्मयी------पृथिवी---पृथिवी पृथिवी ] --अनिः [तेज ] --- -- - . 'भनेजदेकम् , इत्यादि मन्त्र यजुर्ब्रह्म का निरूपण करता हुश्मा इसी धामन्त्री प्रजापति का विश्लेषण करता है । यजुर्ब्रह्म का अनेजत् भाग सोराधिक विद्याभाग है, एजत् भाग सोपाधिक कर्मभाग है । चलाचलरूप विषाकर्ममय अव्यय ही यजु है । इस यजुर्बा की ब्याप्ति कहां तक है ? उत्तर है 'मायावल । जहां तक मायी महेश्वर व्याप्त है, वहां तक वेदतत्व व्याप्त है। तभी तो उसे 'बेदिमूर्ति' शब्दसे व्यवहृत किया जाता है। जहां तक मायी अव्यय व्याप्त है, वहाँ तक तत्सप्रकृतिभूत अक्षरात्मक्षर व्याप्त हैं । सुतरां प्रात्मक्षर के प्राणरूप विदारक्षर से संपन्न पञ्चीकृत प्राणपञ्चजन के विवर्तमूत वेदपुरखन की सत्ता वहां तक सिद्ध होजाती है । इस मायाचक्र को सामने रखिए, मन्त्र का अर्थ कीजिए, स्पितिगतिरूपा सारी वस्तुस्थिति स्पष्ट होजायणी। संसार में गतितत्त्व भवयंवगति, अवयवीगति, उभयगति भेद से तीन भागों में विभक्त है । रथचक्र की गति उभयगति है । रथ का पहिया (अवयवी) भी चलरहा है, एवं पहिये के अवयव भी चलरहे हैं। कुमार के चक्र [चाक्] की गति अवयवगति है । चक्र जरा भी नहीं चलता, अवयव जरा भी नहीं ठहरते । पूर्वदेश परित्यागपूर्वक उचरदेश का संयोग करना ही प्राकृतात्मा - ईशोपनिषत् ॥ भूगु अङ्गिरा गति है । चक्र अपने नियत कीलक से अणुमान भी नहीं चलरहा । वह एक स्थान पर ही रहता हुआ घूम रहा है । वह क्या घूम रहा है, उस के अवयव घूम रहे हैं । एवं मातकधृत मक की गति अपयवीगति है । हम ट्रेन में बैठे हुयें चल रहे हैं । हमारे प्रत्यय नहीं चल रहे, अपि तु हम (अयययी) चलरहे हैं । इन तीनों गतियोंमें से प्रकृतमन्त्र केवल अवयगति का निरूपण करता है । मायावाच्छिन्न वेदघन ईश्वर सर्वया स्थिर है । वृक्षवत् स्तब्ध है । एव ईश्वाशरीर में प्रतिष्ठित यच्चयावत् पदार्थ. पदार्थों के परमाणु परमाणु गतिशील हैं । व्यापकदृष्टि से ससार सर्वथा स्थिर है, अचलरूप से खड़ा है । व्यष्टिदृष्टि से सब अस्थिर हैं। यदि व्यक्तिभार को छोड़कर आप विश्व को अपनी दृष्टि में लायेंगे तो वह आपको सर्वथा स्थिर दिखाई देगा, व्यक्तिभाव को सामने रखने से यही गीतशील मिलेगा। अवयवी स्पिर है, अवयव चल हैं, यही तात्पर्य है। प्राप्त महर्पियों की दूरदर्शिता का जब हम विचार करने लगते हैं तो हमें आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है । निगूढतम जिस श्रध्यात्मविद्या के स्वरूप को यथावत् पहिचानना बड़ी कठिन समस्या है, ऋषियोंने म्यानहारिक ( लौकिक ) यान्तों द्वारा उसे इतना सरल बना रखा है कि उसे समझने में एक बालद्धि भी सहन में ही समर्थ होजाय । कुम्भकार (कुम्हार ) लोकमाषा में प्रजापति' नाम से प्रसिद्ध है । घट-उदशरागादिमृण्मय पात्रों का निर्माण करने गाले, वण से शुद्ध मनुष्य का ऋपियोंने 'प्रमापति' नाम रक्खा, जो कि प्रजापति शब्द त्रिभुवन- पिता धाता (ईश्वर) का वाचक है । साधारण दृष्टि से विचार करने पर कुम्भकार की इस प्रजापति सज्ञा में कोई विशेष महत्व नहीं मालूम होता । परन्तु जब इस सज्ञा का सूदमेक्षण किया जाता है तो प्रतीत हो जाता है कि कुम्भकार यास्तव में प्रजापति का अवतार है । जैसी स्थिति सृष्टिनिर्माता ईश्वर प्रजापति की है, ठीक वैसी ही स्पिति इस प्रजापति (शब्द) की है। घटनिर्माण प्रक्रिया में कुम्भकार, मिट्टी. दगड, चक्र, मूत्र, भूपिगड, पानी, यह सात उप- करण अपेक्षित हैं । इस कारणसमष्टि से घटमार्य उत्पन्न होता है । इन में भूपिण्ड कुम्भार एवं चफ (चाम] का भाधार है । युग्मकार भी जमीन पर पैरता है, स च मी कील के भाधार पर भूपियद्धपर रहता है। युग्मकार निमित्तारण है, घट बनाने वाला है। सूत्र-दण्ड ।

प्राकृतात्मा पटनिर्माण या ईशोपनिषत् ।। . असमायिकारण हैं , मिटी उपादान कारण है, पानी सहकारीकारण है । कुहार मिट्टी पानी डालकर उसको पिन्दमान बनाकर पिण्ड बना लेता है । अनन्तर चक्र के समीप नियत स्थान पर बैठकर चक्रपर मृतपिण्ड रख देता है | अनन्तर कीलक से बद्ध चक्र को दण्ड से बड़े वेग से घुमाता है । घूमते हुए चक्र पर रक्खे हुए मृपिण्ड में हस्तकौशल से अपने बौद्वघट [खयालीघट) या भाकर देता जाता है । थोड़ी देर में घट उत्पन्न होजाता है । निर्माण होने के अनन्तर सूत्र [डोरी-अथवा चीवर-चिथड़ा) से घट को चक्र से पृथक कर भूपृष्ठपर सूखने के लिए रख देता है। सूख जाने पर अग्नि द्वारा उसे पकाता है । अग्नि सम्बन्ध से घट का विनाश हो जाता है। अग्नि से पहिले घट के मृल्परमाणुधों को विशकलित कर डालता है । इस अग्निविशकलन से परमाणुओं की सन्धि में प्रतिष्ठित पानी धूम्र वनकर उल्कान्त हो जाता है। इसी विशकलन प्रक्रिया का नाम न्यायदर्शनानुसार 'घटस्वंस' है । पानीको निकाल कर सधियानों में स्वयं अग्नि अन्तर्याम सम्बन्ध से प्रतिष्ठित होजाता है। इस अग्निसंधान से रलयपरमाणु दर्शन के शब्दों में घरतघट पुनः संहित होता हुआ परिपक बन जाता है। इस प्रकार इस पिठरपाक के अनन्तर घट सर्वात्मना संपन्न हो जाता है । घट का स्वरूप [भाकार] सभी को विदित है । ऊपर की थोर गोलाकार मुख होता है, मध्य में विपुलोदर होता है, पैंदा उठा हुआ होता है, यह तो हुई इस [कुम्भकार] प्रजापति की सृष्टि । अब चलिए उस ईश्वर प्रजापति की भोर । । . । - - भारतत्व कुम्भकार [निमित्त कारण] है । पञ्चकोशात्मक अध्ययना भूपृष्ठ [आलम्बन] है। पूर्वोक्त सूत्रवायु ही सूत्र है । यजुर्वेद चक्र है। इसी वेद का क्षर मर्मभाग मिट्टी [उपादान] है । प्रजापति की धुरनीति दण्ड है , इसी को अनदण्ड' कहाजाता है। सुप्रसिद्ध धापोमझ पानी [सहकारी कारण है । विश्वनाभि में [केन्द्र में) यह यजुश्चक्र बद है। इस की स्थिति ठीक कुझार के चक जैसी है। चक्र खूब ही घूम रहा है,परन्तु समुदाय [अवयव सर्वपा स्थिर है । इस चक्र पर प्रजापति परवेदरूप ममियट रखता है । यह परवेद वही इमारी मातारमा ईशोपनिषत् ॥ घनिम्माता । सुप्रसिद्ध गायत्रीमाधिकवेद है । यही वेद भागे जाकर घटरूप में परिणत होता है । भू-मुका- यः तीनों लोकों की समष्टि एक घट है । यही विश्वमूर्ति घट चयन यज्ञ में 'उख़ा' नाम से प्रसिद्ध है। भूलोक इस का बुभ्न ( पंदा है, मुत्रोंक उदर है, युलोकोपलक्षित सूर्य मुख है। एक संन्सर पर्यन्त इस घट में अग्नि रखा रहता है । अनन्ता उस का चयन होता है । त्रैलो- स्यरूप उखा (घट) के परमाणु परमाणु में अग्निचिति हो जाती है। यही चिति संधिस्थानों से पाच भागों में विमाप्त हो जाती है । पिति से घट सगमता संरल हो जाता है। इसी प्राजा. पत्य घट फा दिग्दर्शन कराती हुई अग्मिरहस्यश्रुति कहती है- १-इम चे लोका उखा' [श० ७५२०१७) २-'मानापसमेतत् कर्म यदुखा' [श० ६.३ [शतः ६७१।२३।। ७१५।२२॥ ६।२।२।२४] . प्रजापति से निर्मित सारी पार्थिव प्रजा घटसरूप में परिणत होकर ही प्रतिष्ठित हो रही है। इस प्रकार कुम्भकारसष्टि एवं प्राजापत्यमुष्टि दोनों समानधर्मी है । इसी सृष्टिरहस्य के शिक्षण के सिर ऋषियों ने कुम्भकार की 'प्रजापनि' संहश रखती है । स्वयं मार्कण्डेयने कुम्भ फार फे घक से मनारिया या सरूप पहियानते हुए कुम्भकार को अपना गुरु माना था । सयमुव नोकरी इस प्रजाति के पकता है, यही साप इस यनुम्पक का है। यह गोल है तो 'सनः पाणिपाद पन्' के थमुसार यह भी यत्तसरत है। यह घूमता हुया ममुदाय परो पिर है तो पद भी प्राध्या एजद बनता मा समुदापाटपा धनेनत् है । मानो हमारा पद (कुमार) प्रजाति वा (पर) प्रजापति के साथ रपदी कर रहा है । इसी धाधार पर परियो "घटान| निर्मातुनिमुश्नरियातुप फल" या ति प्रचलित है। । से न धसने पासा पाक, मोर पसने पाले भरपा एक ही स्थान पर है, इसी प्रकार म पसने मामा भर पसने गमा पन दोनों पा एफ. ही विन्दु पर धमकी मामा रिटार से एक है, परमेर यत् भार न के दो दोने पर भी पजु.

प्राकृतमा - ईशापनिषत् ॥ अनेजदेगत् । मंझ एक है । यह एक ही तत्य जू की अपेक्षा से सर्वथा अनेजत् है, यत् की अपेक्षा से वही एजत् है । वही एजत् है, वही अनेजत् है । वह मन से भी जवीय तेन दौड़ने वाला] है। पाधिभौतिक जगत् में तेज चलने वाला वायु है । भाध्यानिका जगत् में वायु से भी शीघ्रगामी मन है। इन दोनों में यही गति आई हुई है। जिस यत्प्राण के प्रागमन से वायु योर मन जब शीम गामी बन जाते हैं तो उस यत् के गतिवेग का क्या कहना है । यह तो स्वयं गतिरूप ही है । इस स्वयंगति की गतिमान् घायु भीर गतिमत् मन कैसे समता कर सकते हैं | मन में इ-द्र- पियुत् है, विशुदिन्द्र गतिशील हं 1 मन में प्रतिष्ठा ब्रह्म [स्थिति भाग]की अल्पता ही मन की द्रुत- गति में मुख्य कारण है । उधर वह शुद्ध गतिरूप होता हुआ सचमुच 'मनसो जवीय: है बात यथार्थ में यह है कि अनेजदेजत् की समष्टि से आध्यात्मिक एवं माधिभौतिक प्रपञ्च का निर्माण होता है । फलनः आधिभौतिक एवं आध्यात्मिक पदाथों में [ प्रत्येक में ] स्थिति-गति दोनों भावों की सत्ता सिद्ध होजाती है । आप जितने भी गतिमान् पदार्थ देख रहे हैं, विश्वास कीजिए (गतितारतम्य से) उनमें थोड़ी बहुत स्थिति अपरय है , जितने भी स्थितिमत् पदार्थ हैं उन सबमें (स्थिति के तारत-य से) गति अवश्य है । विशुद्धगति-और विशुद्धस्थिति- रूप पदार्थ न प्राधिभौतिक जगत में है, न प्राध्यामिक जगत् में । कारण इनका आदान हियतिगति की समष्टि है । कहीं पति तत्व प्रधान है तो कहीं गतितत्त्व । परन्तु हैं प्रत्येक में दोनों । यदि स्थिति में से गति को सर्वथा निकाल दिया जाता है तो यह स्थिति गतिरूप में परिणत हो जाती है । एवमेव यदि गति में से स्थिति सर्वया निकल जाती है तो यह गति हियति- रूप में परिणन हो जाती है। उदाहरण के लिए ५ मनुष्य थपने घर से ठीक नियत समय पर एक साथ बगीचे के लिए रवाना होते हैं । इनमें कुछ प्रादमी तो जल्दी पहुंच जाते हैं, कुछ . देर में पहुंचते हैं । इसका क्या कारण ! उत्तर यही होगा कि जो शीन चला वह शीघ्र पहुंच गया, जो मन्दगति से चला वह देर से पहुचा । इसा अर्थ यह हुआ कि जिसनें जल्दी मन्दी पैर उठाए वह जन्दी पहुंचा, एवं जिसनें धीरे धीरे पैर उठाए वह देर से पहुंचा । निधर्ष यह हुया कि जिसने अपने पैरों में हियति कम रक्खी एवं गति अधिक रखखी वह जन्दी पहुंचा, - अनेजदेखत् प्राकृवारमा मा ईशापलिपन ॥ जिसनें गति कम रक्खी एवं स्थिति अधिक रखी वह देरसे पहुंचा । इस स्थिति-गति के तार तम्य से गति में अन्तर होगमा । मान लीजिए एक व्यक्ति जहाँ घंटेभर में पहुंचा वहां दूसरा भाध घंटे में, तीसरा १५ मिनिट में, तीसरा पांच ही मिनट में पहुंच गया.। लीजिये चौपा श्रादमी दो मिनिट में ही पहुंच गया। पाश्चर्य-पांचवां तो एक ही मिनिट में जा पहुंचा । एक मिनिट में पहुंचने वाला ऐसे वेग से चला कि उसनें कब पैर रक्खा, कब उठाया यह अनुमान लगाना ही कठिन होगया । वह ठहरता सा न दिखाई देकर चलवासा ही दिखलाई दिया । फलतः यह सिद्ध होगया कि अपने घर से एक मिनिट में पहुंचने वाले व्यक्ति की गति (चाल) में स्थिति (ठहराय) बहुत कम थी , तभी तो वह एक मिनिट में पहुंच गया । कल्पना कर लीजिये, जिस भपस्थिति में नियत स्थान पर पहुंचने में एक मिनिट जायगा, यदि वह अल्पस्थिति भी उप्स की गति में से निकाल दी जाय तो क्या होगा । ऐसी स्थिति में उसे एक मिनिट भी न लगेगा. अपि तु एक क्षण में ही वह वहां पहुंच जायगा । एक क्षण में नहीं पहुंचेगा, अपितु जिस क्षण में यह घर रहेगा उसी क्षण में बगीचे में मिलेगा। इस प्रकार स्थिति के सर्वया निकल जाने से उसकी गति स्थितिरूप में परिणत होजायगी। क्या ऐसा होना संभव है ! नहीं । यतिगति दोनों की समष्टि से उत्पन्न होनेवाले मनुष्य में (मनुष्योग्लक्षित पदार्थमात्र में) शुद्गति नहीं रह सकती । उस में अश्य ही स्थिति रहती है । ऐसा तत्व तो केवल वह प्रजापति ही हो सकता है । मन में पोपी बहुत लिपति है, परन्तु उस विशुद्धगति में पति के भात्यन्तिक प्रभार जरा भी ठहराय नहीं है, तभी यह एक ही क्षण में यहां-वहां-ऊपर-नीचे-सर्वत्र उपलब्ध हो जाता है । प्रजापति के पतिरुन, अतएव म्यापक इसी गतिरहस्य को लक्ष्य में रखकर- .'मनसो जवीप' कहा गया एक पुस्तक मेज पर रक्सी हुई है। पुस्तक स्पिति (ठहरार)-भाव से भाकान्त है । परन्तु विज्ञान कहता है कि भाप इसे चलती हुई सममिए। पिारूप से प्रतीयमान पुस्तक एक । पण में चारों ओर नारही है । यह गतिममष्टि ही एक दूसरी गति से अद्ध होती हुई दिपतिमान में परिणत होती है। माप पूर्व में बेटे हैं । पुस्तक प्रापसे पश्चिम स्वखी हुई है। से प्राकृतात्मा 21 ईशोपनिषत् ॥ अनेजदेजत् MoranMAVANI .MAA mranAmain Arr arman ramananee annown यदि थाप पुस्तक को अपनी योर लावगे तो पुस्तक की पश्चिमागति निकल जायगी । दूसरे शब्दों में जबतक पश्चिमदिग्गति को आप पुस्तक में से निकाल न देंगे, तब तक पुस्तक पूर्व की ओर न प्राराकेगी । इस प्रकार स्थित पुस्तक में से गति के निकाल देने से पुस्तक की स्थिति गतिरूप में पाणित होजायगी । निदर्शन मात्र है। संसार में जितने भी स्थिर पदार्य हैं, वे निरन्तर चारो ओर चल रहे हैं यदि चारो ओर की गति निकाल दी दायगी तो पदार्थ की स्थिरता सर्वथा उत्क्रान्त होजायगी । यह पदार्य गतिगर्भ में विलीन हो जायगा । इस निददर्शन से बतलाना यह कि विशुद्धस्थिति एव विशुद्धगति उस मूलगल का ही स्वरूप है। यद्यपि सता- दृष्टि से उसे भी त्रिशुद्धगति, स्थितिरूप नहीं माना जासकता । कारण दोनो तत्त्व भयिना- भूत है। विश्व और उस के पार्थस्य समझने के लिए बौद्धजगत् में उस की विशुद्धता की भावना की जासकती है । इसी बौद्ध प्रत्यय को लक्ष्य बना कर ऋपिन-'मनसो जवीयः' यह कहा है । इस से बतलाना केवल यही है कि सम्पूर्ण विश्व में उसके जैसा तो यही है । . पूर्वकथनानुसार वही ज्योतिर्मयी देवसृष्टि का प्रवर्तक है । देवता प्राणधन है । प्राण स्वयं गतिरूप अवश्य है, परन्तु इस का विकास सूर्य में होता है । देवता भी इतर पदार्यों की तरह एक पदार्थ है । अतः गतिरूप प्राण की प्रधानता रहने पर भी इन में स्थिति का प्रात्यन्तिक प्रभाव नहीं माना जासकता । जब प्रजापति के पश्चात् उत्पन्न होने से प्राणघन देयतामों में धाशिकरूप से स्थिति विद्यमान है तो प्राण की प्रधानता से दौड़ते हुए भी देवता उस पूर्वप्रतिष्ठ ( पूर्वमर्षत् ) प्रजापति को कैसे प्राप्त कर सकते हैं । अध्यात्मपद में इन्दिएं देवता हैं । मुख्य- प्राण का विकास ही इन्टिएं हैं । आत्मा हृदय में प्रतिष्ठित है । हरस्थ यात्मप्रकाश इन्द्रियदेव. ताथों में पाता है । इन्द्रियों के द्वार बाहमख हैं । ऐसी अवस्या में प्राणेन्द्रमूर्ति प्रज्ञानमन से संचालित इतस्ततः सांसारिक विषयो की ओर अनुधावन करने वाले इन्द्रियदेवता उस पूर्वमर्पत धात्मतस्य को प्राप्त करने में कैसे समर्थ हो सकते हैं। यह पूर्व है, यह पर है । इसी रहस्य को रखरर उपनिषत् कहती है- ।

प्रावृवात्मा । ईशापनिपत अनेजदेजत् । पसभि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूस्तस्पात् पराङ् पश्यति नान्तरात्मन् । कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैतदाहत्तचतुरमृतत्वमिच्छन् ॥ किट० उ०२।१११) इसी अभिप्राय से- नैनदेवा आप्नुवन् पूर्वमर्पन' यह कहा गया है । यह इन्द्रियातीत है, इन्द्रियागम्य है, यही तात्पर्य है। श्रात्मा हृदय में है, देवता उससे पर है । तो क्या देवता [ इन्द्रियों ] और देवताओं के विषय में ( भौतिकपदार्थों में ) श्रात्मा नहीं है ! इसी प्रश्न के समाधान को लक्ष्य में रखती हुई श्रुति मागे जाकर कहती है—'तद्धावतोऽन्यानोति तिष्ठत्' । देवता उसे पकद कैसे सकते है, जब कि वह स्वस्थान में बैठा बैठा ही दौड़ लगाने वाले देवताओं के आगे से आगे प्रतिष्ठित रहता है। अनेजत् दृष्ट्या वह तिष्ठत् है, एजत् दृष्टया देवताओं का अतिक्रमण करने वाला है, जैसा कि पूर्व में स्थिति गति का तारतम्य बतलाते हुए कहा जाचुका है। वह सर्वया व्यापक है । उम्र के श्राशय में सब कुछ प्रतिष्ठित है, परन्तु वह पिसी में प्रतिष्ठित नहीं है । ' न वह नेपुते मयि । रस का तात्पर्य यह है कि प्राधेय श्राधार के विना नहीं रह सकता, किन्तु आधार स्वरूप से प्रतिष्टित रहसकता है। उसे थायय की अपेक्षा नहीं होती । अबतक के मारे प्रपञ्च का निष्कर्ष यही हुथा कि " महामायावच्छिन्न ईश्वरस्वरूप यजुर्ब्रह्म भी ईश्वरवत् महामायावच्छिन्न होता हुमा व्यापक है।" यह मूलवेद महेश्वर का निश्वसित है । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है- "एवं वा भरेऽम्य महतो भृतम्य ( महेश्वरस्य] निपसिनमेनाग्वेदी यजुर्वेदः सामोदा+++ प्रत्ययतानि मणि निश्चमितानि" [श: १४।३।४।१०] नि । परतोमन यही मायी महेभर है। नर्ति ये से कोई स्थान रित नहीं है । यह एक तिभाग पाहुया मदायक [पापा । टम का एक भाग साया थाई एक 1 - प्राकृतारमा । ईशोपनिषत् ॥ रेतयोनिस्तीमा । श्रात्यन्तिक चर है । यही यजुर्ब्रह्म नाम का द्विब्रह्मप्रजापति है । इसी का निरूपण करते हुए मन्त्र के तीन पाद हमारे सामने आते हैं । विश्वनिर्माण प्राप् की बाहुति से होगा । वह इस प्रजापति का चौथा पाद है । तीन पाद विश्वके श्राधार किन्तु विश्वातीत हैं । इस नित्य सिद्ध- विपाविभूति विज्ञान को लक्ष्य में रखकर मन्त्रकृत प्रापि ने तीन पादों से तो विशुद्ध ब्रह्म का निरूपण किया है, एवं एक [चौथे ] पाद से विश्व का निरूपण किया है। यही तो मन्त्र का मन्त्रत्व है. यही वेदवाणी का उत्कर्ष है। "मनेजदेकं मनसो जवीयो, नैनुद्देवा प्राप्नुवन् पूर्वमर्पत् । तद्धावतोऽन्यानत्यति तिष्ठत्" """ उक्त त्रिपानमन्त्र सृष्टि के मूलाधार का निरूपण करता है । सृष्टि संसृष्टिभायपर निर्भर है । संसृष्टि ही यज्ञ है, एक में दूसरे का माहुत होना ही यज्ञ है, अग्नि में सोम का प्राधान करना ही यज्ञ है । इसी विश्वात्मक यज्ञशद का निरूपण करता हुआ निम्न लिखित चतुर्थपाद हमारे सामने आता है- "तस्मिन्नपो मातस्थिा दधाति" RN.I.HI...... द्विब्रह्म नामक यजुर्ब्रह्म के जूभाग से तप-श्रम-द्वारा पब्रिाह्म नाम का अब्ब्रह्म [ सुबह ! उत्पन्न हुआ, यह कहा जाचुका है । प्रकरणसंगति के लिए केवल यही समझलेना पर्याप्त होगा कि पदार्थ को उत्पत्ति में [ चाहे वह चेतन हो, या अचेतन ] योनि, रेत, रेतीश इन तीनों भावों की अपेक्षा रहती है । रेत उत्पत्ति का कारण है, उपादान कारण है । परन्तु विशुद्ध' रेत सृष्टि करने में असमर्थ है । अन्य प्रतिष्ठा मे प्रतिष्ठित होकर ही यह प्रजनयिता बनता है। बीज ही वृक्ष बनता है, इसमें कोई सन्देह नहीं । परन्तु भूगर्भ में प्रतिष्ठित हुए बिना यह मज- नन कर्म में असमर्थ है। इस प्रकार जो द्रव्य वस्तु का उपादान बनता है-यह तो रेत है, एवं * “त्रिपादूर्ध्व उदैत् पुरः पादोत्येहामवत् पुनः" (प.सं० ।

प्राकृनात्मा रेतयोनिरतोधा ा शोपनिषत् ।। जिस प्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित होकर यह भानी प्रजनशक्ति को विकसित करने में समर्थ होता है, वह प्रतिष्ठा भूमि योनि है बीजरूप रेत भी है, योनिरूप भूगर्भ भी है । परन्तु फिर भी काम नहीं चलता । बीन को भूगर्भ मे टालनेवाला तीसरा पदार्थ विप्ता-यीजयपन करने वाला और होना चाहिए। यही तीसरा तत्त्व रेत का योनि में थाधान करता हुया-रतोधा' नाम से प्रसिद्ध है। चैधयज्ञ में अग्नि योनि है, सोम रेत है, याहुति देने वाला अर्यु रेतोधा है । रेत का आधाता योनि में रेत का श्राधान करता है, तदनन्तर ही प्रजासृष्टि, किंवा पदार्थोत्पत्ति होती है । सृष्टि- कामुक दिब्रह्म प्रजापति सृष्टिनिर्माण करना चाहता है । सृष्टिप्रक्रिया में रेत-रेतोग-योनि तीन भाव अपेक्षित है। इधर प्रजापति के पास सिवाय अपने आप के ( ब्रह्माग्निरूप पजुब्रह्म के) दूसरी वस्तु का थभार है 1.इस अभाव की के लिए ( कामना की कृपा से ) उसे अपने घापको ब्रह्म सुब्रह्म इन दो रूपों में परिणत होना पड़ता है। एक भाग से वह ब्रह्म बनता है, एक भाग से सुनम बनता है । ब्रह्म यजु है, सुब्रह्म पाप है । यजु अग्नि है, यही थीनि है । श्राप सोम है, यही रेत है । सुप्रसिद्ध भार्गव मातरिश्वा नामक वायु रेतोधा है । भारतिरूप आपो- ब्रह्म में थाप-पायु-सोम-अग्नि-यम आदित्य यह ६भाग बतलाए गए है । इन में अंगिरा नाम का यम वायु- 'यमा वै अवसानस्येष्टे' ( शत. ७।१।१।३) के अनुसार [ रुद्रमूर्तियम ] सृष्टि का प्रवर्तक नहीं, अपि तु निरर्तक है, विच्छेदक है । सृष्टि शिवायु से होती है । शिवायु वही भार्गववायु है । इसकी प्राण-पवमान-मातरिक्षा-सविता इन चारों अवस्थानो का पूर्व में निरूपण किया जाचुका है । इन चारों में पिण्डस्वरूपसमर्पक मातरिधा वायु की प्रारूप रेत का याधान करता है । पूर्व प्रतिज्ञानुसार मातरिश्वा के सम्बन्ध में कुछ कहना यावश्यक गया है। माता पृथिवी का नाम है, पृथिवी शब्द पिण्टमात्र का उपलक्षण है, जैसा कि पूर्व में यतलाया जानुका है । प्रत्येक पिण्ड अग्निमय है। यह अग्नि चित्य चिनेनिधेय भेद से दो भागों में विभक्त है । वित्ययग्नि से वस्तुपिण्ड बनता है, चितनिधेय से बहिर्मण्डल का स्वरूप सम्पन्न होता है। इन दोनों में चित्पपिण्ड को सकेतभापानुसार 'पृथिवी' कहा जाता है, एवं चितनिधेयमण्टल को दिव्यमाण के समावेश से 'धुनोक' कहा जाता है । इस प्रकार प्रत्येक ।

प्राकृतात्मा ईशोपनिषत् ॥ वराहावतार women 1 । वस्तु में पिण्डपृथिवी, महिमायो इन दो भावों की सचा सिद्ध हो जाती है । सविता, माण, पय- मान इन तीनों मार्गश्वायुतत्त्वों का महिमामण्डल से सम्बन्ध है । महिमामण्डल में तीनों प्राण- वायु व्याप्त होकर पिएड पर अनुग्रह करते हैं । इधर महिमा का विकास वित्यपिण्ड के प्राचीन है । विना पिण्ड के महिमा नहीं, एवं विना मातरिया के पिएद्ध नहीं । माता [पृथिवीरूप पिण्ड] के चारों ओर व्याप्त रहने वाला था यायु ही मातरिश्चा है । पिण्ड निर्माण करना, निर्मित पिण्ड को खवरूप में सुरक्षित रखना यह दोनों कार्य मातरिश्वा के है । आपोमय समुद्र में भाग्नेय वायु के प्रवेश से पानी का भाग घन हो जाता है। घनावस्थापन यही पानी 'अपांशर' [पानी की थर-मलाई] नाम से प्रसिद्ध है । यह घन परमाणु भूपिण्ड के उपादान बनते हुए पार्थिवपरमाणु' नाम से पबढ़त होते हैं। इन्हीं के लिए--'अद्यः पृथिवी' यह कहा जाता है । यह प्राप्यपरमाणु, किंवा पार्थिव परमाणु उस आपोमय समुद्र में ऋतरूप से इतस्ततः व्याप्त रहते हैं । उस परिस्थिति में वही मातरिश्वावायु (जो कि ईश्वर प्रजापति का अवयव रूप होने से साक्षात् प्रजापति है) चलता है वह समुद्र में फैले हुए उन पार्थिव परमाणुओं का संकलन कर-उन पर ध्यान होता हुआ उन्हें पिण्डरूप में परिणत कर देता है । एककालाव- च्छेदेन विशलत सब परमाणुगों को संकलित करना इसका पहिला काम है, सालित कर पिण्टावस्थापन उस पदार्थ के चारों ओर वेष्टित होजाना इसका दूसरा काम है । यदि मातरिश्था वायु एक ही समय में चारों ओर से परमाणुओं का संकलन न करे तो, दूसरी ओर से परमाणु इतस्ततः निकल जांप 1 ऐसी अवस्था में पिण्डस्वरूपनिमीण प्रसंभय होजाय । चूंकि यह मात- रिचा वायु एक ही काल में मृत्परमाणुयों का बारों 'मोर से संवरण कर उस संकलित भावा- पन्न पिण्ड के चारों ओर स्थिरूप से व्याप्त होजाता है, प्रतएव 'राई' कहा जाता है। "हणुने-( संशणुने ) इनि वरः, अहोति-दति-अहा, वरश्चासौ अश्चति वराहः" वराह शब्द का यही निर्वचन है । इस महाविश्व में स्वयम्भू-परमेष्टी-सूर्य-चन्द्रमा पृथिवी यह पांच महापिण्ड माने जाते हैं । परिभाषा के अनुसार ज्ञानज्योतिर्मय सब पिण्ड स्वयम्भू नाम से, भग्यो. तिर्मय सब पिण्ड परमेष्ठी नाम से, स्वज्योतिर्मय सब पिण्ड सूर्य नाम से, परज्योतिर्मय सर पिण्ड 1 ७३ प्राकृतात्मा । ईशानिपत। पराहावतार से चन्द्रमा नाम से, एवं रूपयोतिर्मय सब पिण्ड पृथिवी नाम से प्रसिद्ध हैं । सतलोकात्मक विश्व में असंख्य पिण्ड है । नक्षत्रपिण्ड ही यसंख्य है। इन सब पिण्डों की जातिए उक्त प्रकार पांच ही हैं । अतः यच्चयावत् पिण्डों का स्वयम्भू परमेष्टी आदि पांच महापिण्डों में अन्तर्भाव समझलेना चाहिये । पांचों पिरादों का स्वरूप इसी मातरिश्वा नाम के वराहघायु से संपन्न हुमा है । यदि प्रजापति बराहरूप धारण न करते तो श्रापोमय समुद्र में परमाणुरूप से व्याप्त पांचो ही भूपिण्ड सदा के लिए पानी में डूबे रहते । इसी वराह की कृपा से भूपिण्ड का उद्धार होता है । अतरव पृथिवी को वाह की पत्नी माना जाता है । स्वयम्भू श्रादि शंचों भूपिण्डों का स्व- रूप भिन्न भिन्न है, अतएव तत्त्वरूप समर्पक, तत्सलिए वराह भी पञ्चधा विभक्त होता हुया पांच स्वरूप धारण करलेता है । वे पांचों बराह क्रमशः आदिवराह, यज्ञवराह, श्वेतवराह, ब्रह्मवराह, पम्पवराड इन नामों से प्रसिद्ध हैं। विश्व का आदिपर्व स्वयम्भू है, अतएव तत्सम्बन्धी वराह 'मादिवराद' नाम से प्रसिद्ध है । 'नस्मिन्नपो मातरिश्वादधानि' इस मन्त्र- भाग का मातरिश्वा पारगेष्ठय पज्ञवराह' है। यज्ञ का प्रबतक विष्णु भदर है । इस की विकासम्मि यही परमेष्टी है । अतः विष्णुमय परमेष्ठी को हम अवश्य ही यज्ञमूर्ति करने के लिए तय्यार हैं । थपि च-ममि में सोमाहुति होना ही यत्र है । अग्नि थगिरा है, सोम भृगु है। दोनों परमेष्टी के मनोना है । स्वयम्भू का बझाग्निरूप त्रयीवेद ही वाक्माग से आपोमय ( माव- निरोमय ) यक्ष बनता है, जैसा कि 'सपा यीविद्या यज्ञः' इत्यादि से स्पष्ट है । इन्ही सब कारणों से हम परमेष्ठी को यज्ञमपटल मानने के लिए तप्यार है । r - प्रजाकामुक प्रजापति सर्वप्रपम यापोमय पारमेष्ठययज्ञ को ही उत्पन्न करता है । यज्ञारा प्रना का निर्माण करता सापोमय यताय को पिण्डरूप में परिणत करनघाला मात. रिसा 'यमवराह' नाम से प्रसिद्ध है । परमेष्टी के धनन्तर स्वस्वरूप से घोरकृष्ण, परन्तु सोमा- इति से ज्योतिर्मय पना था विस का केन्द्रभूत श्वेत सूर्य है। इस का अयच्छेदक वायु 'वेन- परा' नाम से प्रसिद्ध है। प्रकृतिपत्र में पान होता है, वायु प्रश्वयु है, मादित्य उदगाना - प्रफतारमा या ईशोपनिषत् । - वराहावतार है, एवं चन्द्रमा ब्रह्मा है । इसी ब्रह्मात्मक चन्द्रमा का स्वरूपसमर्पक मातरिश्वा 'ब्रह्मवराह है । भूपिण्ड का स्वरूपसमर्पक बराइ 'एमपनराई' नाम से व्यबद्धत होता है। 'एमपं' शब्दमें 'मा-ईम-वस्' यह तीन विभाग है । ईम-भूपिण्ड की थोर इशारा है, मा-यासमन्तात् भावका घोतक है, वम् न्याप्ति का सूचक है । 'वह इस के नारों मोर यस रहा है' एमूष का यही अर्थ है । इसी पार्थिव वराह का स्वरूप बतलाती हुई श्रुति कहती है- , "तां (पादेशमात्री (पृथिवीं ) एमृप इति वराह उज्जघान । सोऽश्याः पतिः प्रजापतिः । (शत.१४।५।११)" • "सचे वराहो रूपं कृत्वा उपन्यमम्जव । ते. १।१।३।६।" मातरिया पांचों का सामान्य नाम है, आदिवराह, पज्ञवराहादि विशेषनाम हैं । वराह पायु रूप है। वायु अन्तरिक्ष की वस्तु है । जैसे पृथिवी में दधिरस ( धनरस ) का साम्राज्य है, धुलोक मधुरस या साम्राज्य है, परमेष्ठी में अमृत (सोम)का साम्राज्य है, एवमेव अन्तरिक्षगत वायु में घृतरस ( ताल रस ) की प्रधानता है- 'घृतमन्तरितस्य' ( शत............. यद्यपि बायुप्राणप्रधान घृत सभी प्राणियों में रहता है, परन्तु इस की प्रतिमात्रा 'शूकर' नाम के पशु में ही रहती है । शूकार पशु उस् वायुरूप आधिदैविक वराह की साक्षात् प्रतिमा है। जिस प्रकार कश्यप प्रजापति का यस्तार कूर्म , कछुआ ) है, एवमेव बराहप्रजापति का अवतार शूकर पशु है। अतएव इतर पशुओं की अपेक्षा शूकर में चर्बी (घृत) अतिमात्रा में उपलब्ध होती है । सब से अधिक घृत इसमें रहता है । इसी रहस्य को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है- "अग्नी ( पार्थिवानी) ह वै देवा घृतकुम्भं पवेशयाचा ततो- वराहः सम्बभूव । तस्माद् वराहो मेदुरः, घृतादि सम्भूतः" [श १८] पार्थिव अग्नि रुद्र है । यह क्रोध [मन्य] मर्ति है, इसी में घृताइति होने से शकरसरा उत्पन्न होता है । राजसूययज्ञ में दीक्षित राजा बाराहीउपानम् [श्करचर्म के जूते] पहिनता ")। । ७ प्राकृतात्मा • ईशोपनिषत् ॥ विपादिभूति -rrrrrr- पूर्व में हमने यजुरूप ब्रह्माग्नि को पुरुष कहा था एवं सुब्रह्मरूप धार को स्त्री कहा था। आज इससे ठीक विपरीत कहते हैं । अग्निरूप ब्रह्म स्त्री है, आपोमय सुग्राम पुरुष है । वह अपिपुरुष खी बन रहा है, यह सुब्रह्मस्त्री पुरुष बन रही है । इस वैपरीत्य का प्रत्यक्ष अनु- भव मनुष्य समाज में किया जासकता है। आप जिन्हें मनुष्य कहते हैं, वे सब निएं हैं, एवं जिन्हें स्त्री कहते हैं, वे सब पुरुष हैं। इसी रहस्य का प्रतिपादन करते हुए महर्षि दीर्घतमा कहते हैं- स्त्रियः सतीप्ता उ मे घुस माहुः पश्यदनगवान वि चेतदन्धः । कविर्यः पुत्रः स ईमाचिकेत यस्ता विजानात् स पितुष्पितासत् || ऋक् सं० १ मण्डल, अस्वामीयसूक्त १६४, १५ . मं० सर्वश्री सायणाचार्यने उक्त मन्त्र के प्राध्यामिक और श्राधिदैविक पक्ष मेद से दो अर्थ किए हैं। अधिदैवतपक्ष में सौररश्मियों की प्रधानता मानी है रश्मियों पर ही अर्थ घटाया है। एवं अध्यात्मपक्ष में निरस्तसमस्तोपाधिक विशुद्ध प्रात्मा साय अर्थ वा समन्वय किया है। इधर वेद के प्रसिद्ध व्याख्याता यास्कमुनिने मन्त्र को आत्मगति परक लगाया है। इस मन्त्र से हम जिस अर्य का दिग्दर्शन कराने वाले हैं. उसका किसी भाष्य से सम्बन्ध नहीं है, वह अर्थ स्वतन्त्र अर्थ है। सायगानाय ने जो अर्थ किए हैं. उनके सम्बन्ध में भी हमारी यह विप्रतिपत्ति है कि वहां पदाथों का विज्ञानदृष्टि से विश्लेषण नहीं हुआ है । केवल शब्दाडम्बर पर विश्नाम हुया है । इस कथन से हम अपने वेदप्रेमी पाठकों को यह सूचित करना चाहते है कि उपलब्ध वेदभाष्य कर्मकाण्ड की दृष्टि से भले ही उपयोगी हों, परन्तु विज्ञानदृष्टि से भाष्यार्थ अनुपयुक्त एवं यमर्यादित से प्रतीत होते हैं । उदाहरण के लिए अनशब्द को लीजिए। अन्नशब्द का ग्राह्मण अन्यों में 'मन्नमिति यक्षरम्' यह निर्वचन हुया है । माष्यकारने 'भव- इसेकमक्षर, नमिसेकमक्षरम्' यह निर्वचन किया है । विचार कीजिए क्या यह निर्वचनं ठीक है । अत्-ौर नम्-अक्षर हैं, इस सर्वविदित विषय के लिए गमीराशया श्रुतिने-'अन्नमिति- - प्राकृत रमा - ईशोपनिषत् । विपाद्विभूति ran AARA MAar w marAAAnamvir । -- पक्षरम्' कहा हो-यह बात नहीं जचती । अपश्य ही श्रुति किसी गूढ अर्थ को सूचित करती है । हमारी दृष्टि से यहा दो अक्षरों से अग्नि एव सोम अभिप्रेत हैं। पञ्चाक्षरों में ब्रह्मा विष्णु-इन्द्र-यह तीन अक्षर सहचारी हैं, अग्नी सोम यह दो अक्षा सहचारी हैं । अग्नि की विकासभूमि सूर्य है, सोम की विकासभूमि चन्द्रमा है । सूर्पचन्द्ररस के समन्वय से अन का निर्माण होता है । यह अन्न बोपधि-वनस्पति भेद से दोभागों में विभक्त है । श्रोपधियों में सौर अग्नि गौण रहता है, चान्द्रसोम प्रधान रहता है, अतएर यह मनोबल गर्द्धक हैं थतएक चन्द्रमा को प्रोरधियों का पति कहा जाता है चन्द्रमा ही मन का अधिष्ठाता है । एवमेव वनस्पतियों में चान्द्रसोम गौण, सौर अग्नि प्रशान रहता है । अतएव वनस्पतिए बुद्धिधक मानी जाती है . सूर्य ही बुद्धि का प्रवर्तक है । इसप्रकार प्रोपधि-वनस्पतिरूप उभयविध अन्न में तारतम्य से अग्नि-सोम दोनों अदारों की सत्ता सिद्ध होजाती है । श्रुति का लक्ष्य इन्हीं दो धक्षरों की थोर है, न कि आबालवृद्ध विदित अत्-थोर नम् यदरों की भोर । यही दशा उप- युत मन्त्रार्थ की है। यद्यपि विषय अप्राकृत है, तथापि शैली के परिचय के लिए रेतोय प्रकरण के सम्बन्ध से उक्त मन्त्र का वैज्ञानिक अर्थ पाठकों के सम्मुख उपस्थित किया जाता है। चात मन्त्राप के सम्बन्ध में आत्मविपयिणीमावना, रश्मिविपयिणीभावना, शुक्र- विपपिणीमावना इन तीन भावनात्रों की प्रधानता है। प्रकृत में शुक्ररिषषिणी भानना का दी सम्बन्ध है, अन सूचीफटाइ न्याय से पहिले सतेप से प्रात्मक रश्मिा मानना का ही दिग्दर्शन कराया जाता है। १-आत्माविपयिणीमावना । . भामरिषषिणीमायना के सम्बन्ध में थापको ग्रहांग्या, देवारमा, मृतात्मा इन तीन भारमवियतों को सामने रखना पदेगा । सायम्भुवमात्मा को प्रमात्मा कहा जाता है, सौर -सपा रिपर विवरन गप विधानमाम्य के प्रथम य में उपभप बामणमा में देखनापाहिये।

प्राकृतात्मा ॥ ईशापनिषत् - निपादिभूत AnAANA - आत्मा दैवात्मा है एवं पार्थिवात्मा भूतात्मा है । उपनिपदों में स्वायम्भुव आत्मा की प्रधा- नाता है, निगमशान ऋक्-यजुः साम नाम से प्रसिद्ध वेदत्रयी] में सौरमात्मा की प्रधानता है, एवं आगमशास्त्र में पार्थिव भूतात्मा का निरूपण है । मौलिक सौरपदार्थों का निरूपण करने चाला ऋग्वेद है, यौगिक सौरपदार्थों का निरूपण यजुर्वेद है, एवं सौरप्राणों का पार्थि प्राणों के साथ सम्बन्ध रहस्य बतलाने वाला वेदविभाग सामवेद है । यह त्रयीविद्या निगमशास्त्र है, इस की प्रतिष्ठा देवामा है । केनोपनिषत् में इन तीनों का विस्तार से निरूपण होने वाला है । श्रतः प्रकृत में इनके नाम मात्रों का उल्लेख कर दिया है। वहा ( केनोपनिषत् में ) 'ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिज्ञ' भूतेषु भूतेषु निचिय धीरा.' यह कहा गया है। इनमें ब्रह्म' ब्रह्मात्मा है , देवेभ्यः' दैवात्मा का सूचक है, एवं 'भूतेषु भूतेषु' भूतात्मा का सूचक है। - अव्ययपुरुषालम्यनक्षरपुरुषसाधक अक्षरपुरुष ब्रह्मात्मा है, यही औपनिषदपुरुष किं वां औपनि पदात्मा है । वाङ्मयप्राणरूप अंगीप्राण के समयाय से जिस अट्लीप्राण का उदय होता है, वह इतर प्राणों का (इन्द्रियप्राणों का आत्मा है, इसी का नाम दैवात्मा है । यही नैग- मिक प्रात्मा है । जो जिसका उपय-ब्रह्म-साग होता है, वही उसका श्रात्मा कहलाता है । यही आत्मा भूतात्मा है । इसी को प्रागमिकमात्मा कहाजाता है । इन तीनों में से प्रकृतमन्त्र थोपनिषदात्मा (महात्मा) का ही निरूपण करता है। उक्त तीनों आत्मविव एकमान्न अव्यय पुरुष की विभूति है । यही ब्रह्मात्मा है, वही दैवात्मा है, यही भूतामा है-'मनः परतरं नान्यत्' । अव्ययपुरुष की प्रानन्द-विज्ञान-मन- प्राण-वाक् यह पांच कलाएं बतलाई गई हैं । इन पांचों के प्रानन्दविज्ञान मन, प्राणवाक यह तीन विभाग हैं । प्रथम विभाग ज्ञानप्रधान ज्ञानात्मा है, दूसरा विभाग काम ( इच्छा ) प्रधान कामात्मा है, तीसराविभाग कर्मप्रधान 'कर्मात्मा' है । ज्ञानारमा ज्ञानशक्तिप्रधान है, कामारमा क्रियाशक्तिप्रधान है, कर्मात्मा अर्यशक्तिप्रधान है इसी को अन्नात्मा भी कहा जाता है । याश्चाभाय का नाम अर्थ है । भन्न की ही याचा होती है । यह त्रिभाग मौलिक विभाग है ।

प्राकृतात्मा - ईशोपनिषत् ( त्रिगविभूति Marw इसी अव्ययपुरुष से श्यागे जाकर अक्षर और यात्मक्षर का विकास होता है । महामाया के सम्बन्ध से हृदयबलरूप अक्षराक्षा का विकास होता है, जैसा कि पुरुषनिरुक्ति में विस्तार से बतलाया जाचुका है । अव्ययात्मा का कलाभूत कमीत्मा प्राणवाड्मय बतलाया गया है । इस पर कामात्मारूप मन का भी अन्ग्रह रहता है । श्रतएव श्रव्ययकर्मात्मा मन-प्राण-वाक् भेद से त्रिकल बन जाता है। कर्मात्मा का । नोभाग ज्ञानशक्तिघन होता हुआ ज्ञानात्मा है,प्राणभाग क्रिया- शक्तिधन होता हुआ कामात्मा है. एवं याम्भार अर्थशक्तिपन होता हुआ कमीत्मा है । इस भोग प्रकार अव्यय के केवल कारमा में भी मन-प्राण-घाक् मेद से उक्त तीन आत्माओं का मिद्ध होजाता है । दूसरा विभाग ज्ञानात्मा का है। आनन्द विज्ञान को ज्ञानात्मा कहा है। जिस प्रकार मध्यपतित कामरूपमन का कारमरूप प्राणवार पर अनुग्रह होता है, एवमेव मानन्द- विज्ञानरूप ज्ञानात्मा के साथ भी मन का सम्बन्ध होता है ऐसी स्थिति में अव्यय का ज्ञाना रमाभाग घानन्द-विज्ञान-मन भेद से निकल बन जाता है। यानन्द शुद्ध ज्ञानमूर्ति बनता हुना शानास्मा है, विज्ञान क्रियामय होता हुआ कमीत्मा है, मन अों की प्राधारभूमि बनता हुमा कर्मात्मा है । इस प्रकार अव्यय के केवल ज्ञानात्मा में भी मानन्द-विज्ञान-मन भेदसे उक्त तीनों पारमाधों का भोग सिद्ध होजा है । तीसरा है मध्यपतित काममय मन नाम का कामामा । जिस प्रकार प्रत्यय के थानन्द विज्ञानरूप ज्ञान माग के माथ, एव प्राण गपकर्म भाग के साथ मध्याप मन का सम्बन्ध रहता है, एवमेव मध्यात्य मन पर भी शन-यमीमा दोनों का अनुग्रह होता है। मानामा के सम्बन्ध से (थानन्द विज्ञान के सम्बन्ध से ) मन में काम ( फामना इच्छा ) का उदय होता है । 'माननन्या भोतिका' यह मिदान्त सर्वसम्मत है । यमर्मात्मा के ( प्राणग- के ) सम्पन्ध से मन में भाारगा का उदय होता है । मप्याप मन काम थावरण के सम्बन्ध में सुप दो पदता . यह क्षोम ही किया है । इस प्रकार काल मनमें ही काम-विक्षा-मावाण नसीन शृषिपों का उदय हो जाता है। मानानुगृहीत फाममयमन शानाग्मा है, कानुप्रता पाएमय मन कामा दे, पिया यही मन कामामा है। इस प्रकार फाम पिव-भाव सेनेत मप्याप मा माप मन में भी उस तोनो भाग्मानों का भोग सिम मे मय ++ शात्मा उ एकःसन् एतत् त्रयम् मामृतात्मा का ईशोपनिषत् ॥ শিমুরি ब्रह्मात्मविवच --देवात्मविवा----भूनात्मविवर्च १-यानन्दविज्ञाने -१-मनः--१-प्राणवाचो २-यानन्दः ---२-विज्ञानम्-१-२-मनः पव्ययविभूतिः ३-कामः --३-विक्षेपः -३-यावरणम् अव्ययविवतिम् ४-मनः -- ४-प्राणः -४-वाक् ५-श्रव्ययः-- ५-अक्षरः- प्रात्मतरः अक्षरविभूतिः ॥ ६-ब्रह्मा ------ ६-इन्द्राविष्णू-ॐ ६अग्नीपोमौ भक्षरविवर्तम् क्षरविभूतिः -- ७-अब्वाचौ-४७ अन्नान्नादौ १ अक्ष रविवर्तम् ब्रह्मात्मा कत्मिा धारण्यक औपनिपदयात्मा नगमिकमात्मा आगमिकमात्मा (ज्ञानकाण्डम् ) (उपासनाकाण्डम् ) (कर्मकाण्डम्) ७-प्राणः t . ----- कामात्मा . मा मग उपनिषद 2 -- प्रयं सत् एकं- अयमात्मा .

पाहतारमा पिद्विभूद या ईशापनिषत् ॥ अध्यय, अक्षर, क्षरभेद से पुरुषापरूए वह पुरुष विश्व में चेतन, अद्धचतन, अवेतन भेद से तीन विभागों में विभक्त होरहा है। चेतनसृष्टि उसका पहिला विपर्त है, इसका प्रधान अधिष्टाता क्षरयदर विशिष्ट अव्ययास्प [ज्ञानात्मा] है । अर्द्धचेतनसृष्टि इसका दूसरा विवर्त है, इसका अधिष्ठाता भव्ययक्षारिशिष्ट अक्षापुरुष [यामात्मा] है ।एव अचेतनमृष्टि तीसरा विवर्त है । इसरा थधिष्टाता अव्ययभरविशिष्ट क्षरएस्प [कर्मात्मा है । चेतनसृष्टि में अक्षरब्रह्मा,एव क्षरप्राण का सहयोग है, अर्द्धचेतनसृष्टि में इन्द्रागिणू अक्षर, एव थाप्-वाक्षर का सहयोग है । एर अचेतन सृष्टि में अग्नीसोमयतर, एस अन्नानादक्षर का सहयोग है । चेतनसृष्टि ब्रह्मसृष्टि, किंवा भारमसृष्टि है । अईचेतनमृष्टि देवसृष्टि, किंवा प्राणसृष्टि है । एव अचेतनसृष्टि भूतसृष्टि, किंवा वाक्मृष्टि है । जैमा कि निम्नलि खत तालिकाचों से स्पष्ट होजाता है। १ १-शामामा-अध्यय -ज्ञानेन-चेतनसृष्टि - अह्मात्मसृष्टि --कामामा-अक्षर -शामेनाईचेतनसृष्टि ---- देवात्मसृष्टि ३-फर्मामा-दर –कर्मणा-अचेतनसृष्टि - भूतात्मसृष्टि पोटगीपुरुपस्त्रिपात २ १-ज्ञानाना-प्रत्यय -ज्ञानेन चेतनसृष्टि ---- मझा मसृष्टि २-यामामा-यव्यय -कामेन अर्द्धचेतनमुष्टि - देगसृष्टि ३-बर्मामा-थव्यय धर्मणा अचेतनसृष्टि - भूतात्मसृष्टि सम्पयपुरुषस्त्रिात -इनामा-मामा-- - ज्ञानेन चेतनसृष्टि --मझात्मसृष्टि ३ २-यामा मना-मद्राविष्णु-यामेनाईचेतनमुष्टि - दैवात्ममृष्टि अक्षरपुरुपस्त्रिपार ३-म मानो-अमीयोमो-चमणा धचेतनाट - मनात्मसृष्टि মিয়ানুল -सा शापानपा... प्राकृवमा १-ज्ञानात्मा - प्राय:- ज्ञानेन चेतनसृष्टिः - ब्रह्मान्मसृष्टिः ४ २-कामात्मानौ-श्रव्याची कामेनावेतनसृष्टि:-- दैवात्मसृष्टिः । परपुरुषस्त्रिपाद ३-कमात्मानौ--अन्नानादौ-कर्मणा-अचेतनसृष्टिः- भूतात्मसृष्टिः इन तीन सृष्टियों का मागे जाकर सृष्टरूप में स्वयम्भू-सूर्य-पृथिवी इन तीन पिण्डों में विकास होता है । खयम्भू चेतनसृष्टि का आलम्बन है, अतएव प्रकरणारम्म में हमने ब्रह्मात्मा ' को स्वायम्मुत्र यात्मा कहा है । सूर्य अर्द्धचेतनष्टि का आलम्बन है, अतएव देवात्मा को सौरमात्मा कहा है । पृथिवी अचेतनसृष्टि वा मालम्बन है, अतएव भूतात्मा को पार्थिवभारमा कहा है । स्वयम्भू अझ है, सूर्य देव है, पृथिवी भुत है । यह उस भात्मविवों की चरम पत्र- सानभूमि है। १-ब्रह्म-खयाभूः-ज्ञानमयो-मनोमयः –ज्ञानात्मा --- ब्रह्मात्मा २-देवः-सूर्यः ---क्रियामयः-प्राणमयः-कामात्मा - देवात्मा त्रिपार्श्व उदैवपुरुषः ३-भूतम्-पृथवी-मर्थमयी -वाड्मयी-कर्मात्मा -*- भूतात्मा १-पञ्चकलाव्यय-द्विकलाव्यय-ब्रह्म---प्राणमयः- सायम्भुव मामा-ब्रह्मात्मा २-पश्चकलाक्षर--एककलान्यय-इन्द्राविष्णु-आपोमयः -- सौर मारमा ----- देवात्मा ३-पचकलदर---द्विकलाव्यय--अग्नीपोम-अनानादमय:-पार्थिव धात्मा --- भूतात्मा १-चेतनाप्रधान:--पुरुषः--- --चेतनपुरुषः -२-श्रद्धचेवनाप्रधानः-पुरुषः--पद्धचेतनपुरुषः --अचेतनप्रशन:--पुरुप:---- -अचेतनपुरुषः 'पुरुष एवेदं सर्वम् .

বিৰাৰ मायतारमा । ईशापत्तिपा ॥ प्रयय, अक्षा, क्षरभेद से पुरुषप्रयरूप वह पुरुष विश्व में चेतन, अद्धचतन, अचेतन भेद से तीन विभागों में विभक्त होहा है। चेतनसृष्टि उसका पहिला रिसर्त है, इसका प्रधान थपिष्ठाता क्षरणदरविशिष्ट अध्ययपुरष [ज्ञानामा] है । अर्द्धचेतनसृष्टि इसका दूसरा विवर्त है, इसका अधिष्ठाता अन्ययक्षाविशिष्ट अक्षरपुरष [यामात्मा] है । एव अचेतनसृष्टि तीसरा विपत है। इसका अधिष्ठाता अध्ययनरविशिष्ट दरपुरष [कर्मात्मा] है । चेतनसृष्टि में अक्षरब्रह्मा,एव क्षारप्राण का सहयोग है, अर्द्धचेतनसृष्टि में इद्रापिपणू श्रदर, एव प्राप्ताक्षर का सहयोग है । एवं अचेतन सृष्टि में प्रग्नीसोमथदर, एव अन्नानादक्षर का सहयोग है। चेतनसृष्टि ग्रसृष्टि, किंवा धारमसृष्टि है । अर्द्धचेतनमृष्टेि देवसृष्टि, किंवा प्राणसृष्टि है । एव अचेतनसृष्टि भूतसृष्टि, किंग वाक्मृष्टि है। जैसा कि निम्नलि खन तालिकायों से स्पट होजाता है। १ १-शानामा-अपय -ज्ञानेन-चेतनसृष्टि -ॐ ब्रह्मात्मसृष्टि -कामा ना-मक्षर -यामेनाईचेतनसृष्टि -:- दैवात्ममुष्टि ३-धर्मामा-पर-यमणा-मचेतनसृष्टि - भतामसृष्टि पोडशीपुरुपस्त्रिपात २ १-शानात्ना-अपय -ज्ञानेन चेतनसृष्टि - प्रमानसृष्टि २-यामामा-अन्यप यामेन पर्द्धचेननमुष्टि - देवामसृष्टि ३-यमामा-भव्यय -धर्मणा अचेतनसृष्टि -: भूनामसृष्टि मन्पपपुरुषस्त्रिात -मानामा-मामा- - ज्ञानेन चेतनसृष्टि - मसात्मसृष्टि ३ २-कामाला-दारिशु-यामेनाईचेतनसृष्टि -- दैगनमष्टि मतरपुपस्त्रिपार ३- मानो-प्रोपोमो-धर्मणा भयेनन ए मना मसृष्टि शिविभूति ईशानिपत् .. प्राकामा १-ज्ञानामा-प्राणः- ज्ञानेन चेवनसृष्टिः - मझा मसृष्टिः १ २-काम्यानधानो-अब गचौ-कामैनाईवेतन सृष्टि:- दैवात्मसृष्टिः । परपुरुषस्त्रिपात ३-कर्मात्मानौ-अन्नानादौ-कर्मणा-अचेतनसृष्टिः भूतात्मसृष्टिः इन तीन सृष्टियों का मागे जाकर सृष्टरूप में स्वयम्भू-सूर्य-पृथिवी इन तीन पिण्डों में विकास होता है । स्वयम्भू चेतनसृष्टि का पालम्बन है, अतएव प्रकरणारम्म में हमनें ब्रह्मात्मा को सायम्मुत्र आत्मा कहा है। सूर्य अर्द्धचेतनसृष्टि का पालम्बन है, अतएव देवारमा को सौरथात्मा कहा है । पृथिवी अचेतनसृष्टि का आलम्बन है, अतएव भूतात्मा को पार्थिवश्रात्मा कहा है । स्वयम्भू नझ है, सूर्य देव है, पृथिवी भूत है । यइ उक्त प्रात्मनिवनों की चरम भव- सानभूमि है। १-अल-खयम्भू:-ज्ञानमयो-मनोमयः - २-देवः-सूर्यः --क्रियामयः-प्राणमयः--कामात्मा --- देवात्मा त्रिपार्श्व उदैवपुरुषः ३-भूतम्-पृथवी- अर्थमयी -बाङ्मपी-कर्मात्मा - भूतात्मा) -ज्ञानात्मा-ब्रह्मात्मा 0- १-पथकलाव्यय-द्विकलाव्यय-ब्रह्म २-पञ्चकलादर-- [---प्राणमय.-सायम्भुव आत्मा-- ब्रह्मात्मा -एककलाव्यप-इन्द्रायिष्णु-धापोमयः -सौर प्रारमा --- देवामा ३-पञ्चकलदर----द्विकलाव्यय--अग्नीपोम--मन्नानादमयः-पार्थिव मात्मा - भूतात्मा १-चेतनाप्रधान:- --पुरुषः--चेतनपुरुषः २-श्रद्धचेतनाप्रधानः-पुरुष:--- -पईचेतनपुरुषः 1-अचेतनप्रधानः---पुरुष:--अचेतनपुरुष. "पुरुष एवेदं सर्वम् ..

प्राकृतमा मा ईशोपनिषत् ॥ নামা उक्त तीन भात्मविपतों के कारण त्रेधा विभक्त यात्मपुरुष की उपासना भी तीन ही तरह से होसकती है। समस्त उपनिषदों में उपासना के तीन ही द्वार हैं । वह आत्मपुरुष चेतन- दृष्टि से भी उपास्य है, अर्द्धचेतनदृष्टि से भी उपास्य है, अचेतनदृष्टि से भी उपास्य है । अधि- फारी मेद से उपासना मैद प्रतिष्ठित हैं । प्रथमाधिकारी अचेतनदृष्टि से उसकी उपासना कर सकते हैं, मध्यमाधिकारी पदचेतनदृष्टि से, एवं उत्तमाधिकारी चेतनदृष्टि से उसका ध्यान कर सकते हैं । यही तीनों सपासनाएं सर्वभूतान्तरात्मोपासना, हिरण्यगर्भोपासना, अश्वत्थो- "पाप्सना. नाम से प्रसिद्ध हैं । इन तीनों उपासनातस्त्रों का उपनिषदों में पृथक् पृथक् रूप से निरूपण हुचा है । विस्तारभय से अधिक न कहकर प्रवृत में केवल तीनों उपासनात्रों के तीन मन्त्र उपन्यस्त कर दिए जाते हैं- . सर्वभूतान्तरात्मा हिरण्यगर्भः अग्निी चतुपी चन्द्रमी दिरा श्रोत्रे वाग्विष्टनाश्च वेदाः । वायुः प्राणो हृदयं रिश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवीोष सर्वभूतान्तरात्मा (मुण्टर० २१४) हिरण्यगर्भः समवतताने भृतस्य जानः पतिरेक मासीत् । २ स दाधार पृथिवीं चामुतमा कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ ( यजु सं० १३१४) ऊर्जमूलोऽवामगाम्ब एपोऽश्वत्थः सनातनः । तदेव शुक्र तद् ब्रम तदेवामृतमुध्यते ।। (कट० ६१)। ३ यस्मात पर नापरमस्ति किश्चित्, यस्मानागीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित् । वृत इस स्तमो दिरि तिष्टत्पमस्तेनेदं पूर्ण पुरुषेण साम् ।। (श्वेता. ३१) सर्वभूतान्तरात्मनोपामना सयभूमूला उपासना है । स्रयम्भू विश्वरूप है, सर्गरूप है। पृथिवीपर्यन्त सातों लोक, भूत, देवता, पशु सब कुछ इसके उदर में समारहे हैं । सप्ततोक ममत्यः प्राकृतारमा प्रशासनिक उससनात्रो सम्बन्ध से ही इसे 'सप्तवितस्तिकाय' कहा जाता है । यही विश्वभर है, यही ब्रह्मात्मा है । इस विश्वरूप की उपासना करना, निरन्तर उसके व्यापक स्वरूप का चिन्तन करते रहना श्रआत्मविकास को मुख्य हेतु है । इससे आत्मज्ञान का उदय होता है, कारण यह मात्मा जीनाम्म बनता तुझा मनप्रधांना चेतमसृष्टि का अधिष्ठाता है। , हिरण्यगर्भोपासना सूर्यमूला, उपासना है। सूर्य स्वयं हिरण्यगर्भ है | सौरअग्निमण्डल हिरण्य है । इसके गर्भ में सूर्य प्रतिष्ठित है 1 हिरण्य के चारों ओर प्राप् और वाक् का स्तर है । सतत सूर्यग्यान से अध्यात्मगत देवप्राण सबल बनता है। यात्मज्ञानोपकारिणी विषाबुद्धि का उदय , होता है । कारण यह श्रात्मा कामाच्या (दैरात्मा ) बनता हुया प्राणप्रधाना अचेतनसृष्टि चा अधिष्ठाता है। . अश्वत्योपासना पृथिवीमूला है। "यह एक स्तब्ध वृक्षात् खड़ा है, वह शान्त है, मचल है" इस प्रकार से विश्व की वृक्ष (संसारवृक्ष) दृष्टि से भावना करने वाले के प्रात्मा में अर्थ. शक्ति का उदय होता है । अर्यद्वारा क्रिया पर अधिकार करता हुआ उपासक ज्ञानतत्व प्राप्त . । करने में समर्थ होजाता है। यही तीनों उपासनाएं मोडारोपासना,उदगीयोपासना,पणवोपासना नाम से भी च्यवदन कई हैं । खयम्भूमूला सर्वभूतान्तरामोपासना ओंकारोपासना है, जैसा कि श्रुति कहती है- 'भोमियतक्षरमिदं सर्वम् । तस्योपल्यानं भूतं भवद भविष्यदिति सर्वमोद्धार एव । यचान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योंकार एव' (माण्डूक्य उ० १)। "एतदै ससकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोद्वारः" [ प्र० उ० ५] । सूर्यम्ला हिरण्यगर्भागसना उदीयोपासना है, जैसा कि "य एवासी तपति तमुद्गीय. मुपासीत" (चां० उ० ३।३।१) इत्यादिरूप से स्पष्ट है । एवं तीसरी पृथिवीगला अश्वत्योपासना मणवोरासनाहै ! प्रसगोपात यह भी ध्यान रखना चाहिये कि कृत ईशोपनिपत स्वयम्भूगला मो- कारोपासना (सर्वभूतान्तरामोपासना) का निरूपण करती है, जैसा कि 'मों पूर्णमदः पूर्णमिदम्' आसमायो शकतत्मा ॥ ईशोपनिषत् । - vvv -इस प्रारम्भ के मंगलपाठ से सिद्ध है। कठोपनिपत् पृथिवीमूला प्रणोपासना (अश्वत्योगसना) का निरूपण करती है, जैसा कि, "ऊर्धमूलोऽवाशाख एपोऽश्वत्थः सनातनः' (कठ० ६॥३॥) इत्यादिरूपसे स्पष्ट है, एवं मुण्डकोपनिषत् सूर्यमुला उद्गीयोपासना (हिरण्यगर्भी- पासना) का निरूपण करती है, जैसा किं तदेतत्सरं [मादियः] मन्त्रेषु कर्माणि करयो' यान्पपरयन्” (मु० १।२।२“येनावरं पुरुषं वेद संयम्" [मु. १३२] “पत्र पंवे नत्र सूर्यः" [मु० २।१।६।], "हिरण्मये परेको पिरनं ब्रह्म निष्कनम्'' [मु० २।२।६। यदा पश्यः पश्येत रुक्मवणम्, [मु. ३३१॥३] 'बृहच तदिव्यमचिन्यरूपम्" [मु. ३।१७] " जुहो एकरि श्रद्रयाः [मु० शा०] इसादि रूर से सष्ट है। तीनों ही उपास- नाओं का लक्ष्य अभिन्न है । खयाभू को मूल मानकर पृथिवी तक प्राजाना ओंकारोगासना है। गियो को मूल मानकर खयम्भू तक चले जाने प्रणवोपासना है । सूर्य को मुल मानकर इधर पृथिवी एवं उधर स्वयम्भू तक चले जाना उद्गीथोपासना है। प्रणव भी घोंकार है, उद्गीप भी बोकार है । जो प्रणर है यही उद्गीथ है, जो उद्गीथ है वही प्रणव है। दृष्टिकोण में मैद है, फलन तीनों धात्मदृष्टि से अभिन्न हैं । इसी अमिन्नना को लक्ष्य में रखकर छान्दोग्यश्रुति कहती है-- "अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवः, यः प्रणवः स उद्गीय इति । असो वा प्रादित्य उदगीयः, एषः प्राणवः-मोम। इत होप स्वरन्नेति" (छ0 उ. ३.५.१), ओंकारोपासना अव्ययोपासना है, उदीयोपासना अक्षरोपासना है, प्रणोपासना क्षरोपा- सना है । कारण भव्यय का सायम्भुव ब्रह्मा पर, अक्षर का सौरइन्द्र पर, क्षर का पार्थिर प्रग्नि पर अनुग्रह है, जैसा कि पूर्व की तान्तिानों से स्पष्ट कर दिया गया है । इन तानों उपासनात्रों में प्रणवोपासना भृतात्मा से सम्बन्ध रखती हुई कर्मकाण्ड है, उद्गीथोपासनाव- स्मा से सम्बन्ध रसती हुई उपासनाकाण्ड है, प्रोकारोशमना अन्दामा से सम्बन्ध रखती हुई ज्ञानकाण्ड है । गीता इसी उपासना को प्रधान मानती है । कर्म का सम्बन्ध बाभय भूतभाग के सार है, उसामना देता की ही होती है, ईश्वर घनुपास्य है, केवल ज्ञानगम्य है । ।

उपासनात्रयो या ईशोपनिषत् ॥ प्राकृतात्मा www १-सर्वभूतान्तरात्मोपासना-( स्वयम्भूमूला--ब्रह्मान्मोपासना-मोकारोपासना -ज्ञानकाण्डम् - २-हिरण्यगर्भोपासना-- (सूर्यमला--दैवात्मोपासना-उद्गीथोपासना )-उपासनाकाण्टम् ३-प्रश्वयोपासना (पृथिवीमूला--भूतात्मोरासना-प्रणोपासना )-कर्मकाण्डम् , प्रौपनिषदकाल में उपासना का यही क्रम था । परन्तु कालव्यतिक्रम से ज्यों ज्यों मानव समाज का बौद् जगत् निर्बल होता गया त्यों त्यों यह प्राकृतिक तत्वों की उससना में शिथिल बनता गया । अतएव पुराणयुग में उक्त तीनों उपासनाएं प्रतिमोपासना रूप में परिणत हो गई । इस का यह अर्थ नहीं है कि प्रतिमोपासना अवैदिक है । स्वयम्भू-सूर्य पृथिवी भी तो उसी की प्रतिमा है । पृथिवीपर दृष्टि रखी जाती है, मनोयोग आत्मापर रहता है । सूर्यविम्ब प्रतिमा है, इस परं दृष्टि रखी जाती है, तद्द्वारा ध्यान सर्वव्यापक प्रात्मा का किया जाता है । निरु- क से अनिरक्त पर पहुंचना ही तो प्रतिमोपासना है । स्थूल को लक्ष्य बनाकर मूक्ष्म पर पहुंचना ही मंतिमापूजन है । "दृष्टि अन्यपर-लक्ष्य अन्य पर" इसी का तो नाम उपासना है। विशु- छ श्रमूर्त की उपासना तो बन ही नहीं सकती । उपासना मूर्तब्रह्म, किंश मूर्ति की ही हो सकती है ।कोई प्राकृतिक पृथिवी -सूर्यपिण्ड आदि मूर्तियों की उपासना करता है तो अस्मत् '' सदृश साधारण अधिकारी पृथिवी के अवयवरूप पाषाणादि की प्रतिमा को ही भगवदाराधना का साधन मानते हैं । लक्ष्य एक है, प्रकार में भेद है। पुराणनें किसी नवीन अौदिक पद्धति का अनुसरण नहीं किया है, अपि तु जो उपासना वेद (उपनिषत् ) में भगीरूप से है उसे अधिकारी वर्ग की शिथिलता से अङ्ग का रूप दे डालना है, जैसा कि निम्न लिखित वचन * से स्पष्ट है। 1- चेचनेऽष्टिः, चेतनोपासनम् । २-मईचे नेष्टि, नदचेतनाउनम् । ५-नचेतनेरिः, . सनोगसनम् । * इस रिपय का विशूट विवेचन मी विज्ञानमाप में दृष्टय है।

ईशोपनिषत् । आसनासी प्राक्तत्मा इम पारम्भ के मंगल गठ से सिद्ध है । कठोपनिषत् पृथिवीमूना प्रणवोपासना (अञ्चत्योपासना) पा निरूपण करती है, जैसा कि "ऊर्धमूलोऽवाशाख एपोऽश्वस्या सनातनः' (कठ. ६) इत्यादिरूपसे स्पष्ट है, एवं मुण्डयोपनिपद- सूपमूला उद्गीयोपासना (हिरण्यगी- पासना) का निररूपण करती है, जैसा कि तदेतत्तसं [पादियः] मन्त्रेषु कर्माणि कर्वयो' यापपरयन्” (मु० १।२।११] पैनातरं पुरुषं वेद ससम्" [मु. शिशि"यत्र पचते ना मूर्यः" [मु. २।१।६], "हिररामये परेको विरजं ब्रह्म निष्कनम्" [मु० २।२।२] यदा पश्यः पश्येत रामवगम', [मु० ॥१॥३॥] 'वृदय तदिव्यमचिन्यरूपम" [मु. ३।१।७] "सजत एका श्रदयनः' [मु०३।१०] इत्यादि रूप से स्पष्ट है। तीनों ही उपास- नाथों का लक्ष घभिन्न है । खपभू को मूल मानकर पृथिवी तक प्राजाना थोकारो गसना है। कृषियी को मूल मानकर म्ययागू प चले जाने प्रणोपासना है । सूर्य को मूल मानकर घर पृथिवी एवं उधर सपाभू तक चले जाना उद्गयोपासना है। प्रणय मी थोकार है, उद्गीथ भी बोकार है। जो प्रणव है यही उदगीर है, जो उदीय है वही प्रणा है। घष्टिकोण में मैद है, "मन तीनों प्रामष्टि से अमित हैं । इसी अमितना यो लक्ष्य में रम्पार छान्दोग्यधुति महती है-- "मय स य उदीयः म मगाः, यः प्रगावः स उद्गीय इति । मसी गा मादित्य उदगीयः, एपः प्रणः-मोम। इन पेप स्वरनि" ( उ० ३५१)।

। प्राकृवात्मा का ईशोपनिपत् ॥ उपासनाश्यी ... . . मिचन्त्यापापेपयस्य निगुणस्य गुणा मना) उपासकानां सिद्धयर्थ ब्रह्मणो रूपकल्पना || जो क्रम उक्त तीनों उपासनाओं का था, यही क्रम यहाँ (वखा गया। श्रद्ध लु उपासक यह जानते हैं कि आवित्त में उपासना के मूलस्तम्भ दो माने जाते हैं । प्रतिमा पहिला स्तम्भ है, वृक्षादि दूसरा स्तम्भ है । पीपल-बट-तुलसी फेला प्रादि वृक्षों की उपासना की जाती है। भगक्चरित्र, भगवत प्रतिमानी की उपासना की जाती है । यह प्रतिमोपासना साकार-निराकार मैद से दो भागों में विभक्त है । शालग्रामोपासना निराकारोशसना है। हस्त-पाद-उर-कण्ठादि शारीर अवयवयुक्त मर्चियों की आराधना साकारोपासना है। इस प्रकार शालग्रामोपासना, मतिमो- पासना, रातोपासना भेद से पौराणिक उपासना तीन भागों में विभक्त है । चेतन सृष्टि सदा अर्द्धन्द होती है, वर्तुल नहीं होती । पुरुष मिनुष्य] चेतन है, वह श्रद्धेन्द्र है। आधे खगोल से इमका निर्माण हुया है । इस उपासना में प्रतिमा का सरूप पुरुषाकार जैसा बनाया जाता है । यही सुप्रसिद्ध प्रतिमोपासना पहिली सर्वभूतान्तरामोपासना है । यद्धचेतनोपासना शास- 'प्र.मोपासना है, यही हिरण्यगर्भोसना है। शालामामप्रतिमा के केन्द्र में सुषण रहता है । उपर या कृष्णस्तर स्वयम्भू है। मपर्ण सूर्य की प्रतिमा है । शालग्राम सचमुच हिरण्यगर्भ है । तीसरी प्रश्चन्योपासना वृतोपासना है । शालग्रामोपासना का बड़ा महत्व माना गया है । इसमें तीन भार हैं। कृष्णभाव, रश्मिभाव, मयं भेद से शलमाम त्रिवृत् है, त्रिपात् पुरुष है । उपर का कृप्शमात्र साझाद मपभू गया है, रश्मिभान विषणु है, केन्द्रस्य सुवर्णभाव शिव है । विमति की समरि श.समामप्रतिमा है । प्रशान्तर से विचार पारेर- पिस में थामा के तीन प्रधान विपर्व है। पदिला उदासीनमात्र है, दूसरा प्रकृतिभाव दे, तीमरा विकृतिमार है। उदामीनमा 'अमृतम् ,, प्रतिमार 'ग्रह्म है, विकृतिभार 'शुका है।'न नम्प कार करगं न विद्या के अनुपा थपृनएस उदासीनमागचार्य कारण तीन th या है, मिल का है। कार्य, कारण, परसातीन भेद से एक ही पुरुष संकरमवार प्राकृतारमा का ईशा पनिषत । 71 -- - तीन भागों में विभक्त हो रहा है । इस विपाविभूति' का पूर्वके अमृतात्मसंस्थाप्रकरण में विस्तार से निरूपण किया जाचुका है। अबतक जिन तीन आत्मवितों का विविध रूप से दिग्दर्शन कराया गया है, उससारे मागप्रपञ्च को 'अमृतम्' समझिर | अभी ब्रह्म के सम्बन्ध में कुछ नहीं कहा गया है । पोडपीपुरुप में ही कई प्रकार से तीन अात्मवियों का भोग बतलाया है। ब्रामदैवात्म-भूतात्मसमष्टि रूप षोडशीपुरुष अमृतभाव है,इसीको ब्रह्मात्मा समझिए । यही विश्वालम्बन उदासीनमात्र है । प्राणादि पांच विकार हररूप पंचप्रकृति ब्रह्मभाव है, यही दैवात्मा है। वाक्- • आप-अग्नि को समष्टि विकृति भाव है, यही शुक्र है, यही भूतात्मा है, १- पोडशी पुरुषः- उदासीनभावः • अमृतम् → ब्रह्मात्मा (ज्ञानात्मा ) २- पञ्चकृतयः • प्रकृतिमावः दैवात्मा - (कामात्मा) .३-तिम्रो विकृतयः- विकृतिमावः -शुक्रम् +- भूतात्मा - ( कर्मात्मा )) -- -- उपर्युक्त इन तीनों आत्मायों के निम्नलिखित लक्षण समझने चाहिएं- १-"अव्ययपुरुषालम्पनः परपुरुषसाधकोऽतरपुरुष"]-ब्रह्मात्मा (यौपग्निपदयात्मा) २-"वाङ्मयमाणाङ्गीमाणसमवाये योऽयमङ्गीमाण:- स इतरेपा प्राणानामात्मा" देवात्मा (नैगमिकारमा ) ३-“यस्य यदुक्थं ब्रह्म च साम, तत् तस्यात्मा" -भूतात्मा (प्रागमिकथात्मा ) -200- जैसा कि प्रकरण के आरम्म में बतलाया गया है-"स्त्रियः संती:०" इत्यादि मन्त्र अव्यय-अक्षर-दररूप पोडशीपुरुष नाम के औपनिषद ममामा का ही निरूपण करता है । यह ब्रह्मात्मा वस्तुतः स्त्री है, फिर भी "अव्यपुरुप, अक्षरपुरुप, नरपुरुप” इत्यादि रूप से इसे पुरुपशब्द से व्यवहृत किया जारहा है, स्त्रीरूप अरिमा को पुरुष वर्तलाया जारहा है । इसी विपरीत व्यवहार का दिग्दर्शन कराती हुई श्रुति कहती है- स्त्रियः सतीस्ता उ मे पुंस पाहु प्राकृतात्मा सकर पवहार - ईशोपनिषत् ॥ WIN ₹ "शिर्वा-प्रागिरसो मन्त्रकृता पन्त्रकृदासीत् । स पितॄन पुनका इति- आमन्त्रयत । तं पितरोऽब्रुवन्-अपमै (रोपि) यो नः पितॄन-पुत्रका' इसामन्यसे । सोऽब्रवीव-अह वात्र पिनाहिम यो मन्त्रकृत-दति । (ते- पितर:-पुत्रोत्तरे-अश्रद्दधानाः) देवानपृच्छन्त ति देवा अब्रुवन-एप वाव पिता, यो मन्त्रकत-दति । तद्वै सः (शिशुरागिरसः)- उदजयत्" इति । (ताण्डयना १३३।२४)। प्रकृत मनने पिया के अभिप्राय से ही 'पितुप्पितासत्' यह कहा है । यह है अरम- सम्बधी प्रथम अर्थ का संक्षिप्त दिग्दर्शन । श्रा सूर्यरश्मिसायधिनी भावना का दिग्दर्शन कराया जाता है। इति-आत्मविषयिणीभावना।। १ 4- P-रश्मिविपयिणभावना विश्व द्रस्य सय हिरण्यगर्भप्रजापति है । प्रजापाने में आत्मा, प्राण, पशु यह तीन क्लार गय प्रतिष्टित रहती हैं । प्रायु माग धात्मा है, योति भाग ग्राण है, गौ भाग पशु है । यही तीन सूर्य पे मनोता है- (दविए ई उ. वि. मा २०१ पृ.) । आयुभाग यात्मा भी विवास भमि है, ज्योतिर्भाग टूना की विकासभूमि है, एय गौभाग भूत का जनप है । औलोक्य में जितने स्थूलभून हैं सर या जना सौर गौतत्व है । प्राशरूप देवताओं का विकास सौरभ्योतिभग या है। हम सब प्राणियों के आमा या प्राधार आयुभाग है । इन तीनों में प्रायुतत्व 1 में घमासा, भावा मनिषा प्रपन्चति जनिता बोगीता च पञ्चते पितर स्मृता ॥

प्रागारमा या ईशोपनिषत् ॥ संकरव्यवहार । । W 'मुख्यप्राण है, अङ्गीप्राण है । इसी को 'परोरजावाण' कहा जाना है। इसी को लक्ष्य बना- -'योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽहम्' यह कहा जाता है। इस प्रात्ममाण को-'मादित्य- स्य परं भा इस नाम से भी व्यवहत किया जाता है। ज्योतिमाग प्राणरूप देवता है। यह अग्नि-सोम भेद से दो भागों में विभक्त है । प्राग्ने पप्राणावच्छिन्न सौरसावित्राग्नि दाहक है, सौम्य- प्राणायन्छिन्न पारमेष्ठय भार्गवसोम दाह्य है। दोनों वा समन्वितरूर ज्योति है। आप सूर्य में जो प्रकाश देख रहे हैं, वह अग्नि सोम का समन्वित रूप ही है | स्थूलभूत पशुरूप है। १-यात्मा-- आयुः ( श्रात्मा) - परोरजाप्राणः २-प्राण:- ज्योतिः ( देवाः) - आग्नेय-सौम्यप्राणी सौरसस्था ३-पशुः - गौः ( भूतानि) 1- स्थूलभूतानि इन तीनों में हिरण्यगर्भ नाम से प्रसिद्ध आत्मरूप परोरजाप्राण के आधार पर ही थानेय- सौम्यप्राण प्रतिष्ठित हैं । इस अग्नि और सोम के सम्बन्ध से अविभक्त सौरआत्मा भी दो भागों में विभक्त [बत] होजाता है । प्राग्नेयप्राणवच्छेदेन यही हिरण्यगर्भ प्रजापति पुरुष है, कारण पनि को पुरुष माना गया है । एवं सौम्यप्राणवच्छिन्न यही प्रजापति स्त्री है, सोम को ही स्त्री माना है । इस दम्पति के मिथुनभाव से दशप्राणमूर्ति विराट पुत्र उत्पन्न होता है । सौरश्मिरं यद्यपि अग्निसोममयी है, परन्तु प्रधानता सोम की ही है । कारण सोम ही आहुत होकर ज्योतिर्मय बनता हुआ रश्मिरूप में परिणत हो रहा है । रश्मिभाव साक्षात् जलता हुआ सोम है । सोम स्त्रीरूप है । अतएव हम कहसकते हैं कि सौररश्मिमण्डल स्त्रीमण्डल है। परन्तु आश्चर्य है फिर भी किरण.-मयूखः-उन्नः इत्यादि रूप से इन्हें पुरुषवाचक शब्दों से व्यवहृत किया जाता है। कारण स्पष्ट है । इस रहस्य को इनका कविपुत्र जानता है । अर्थात्-अप्ति सोम के मिथुनभाव से उत्पन्न होने वाले विराट् का स्वरूप देखिर-यहां आपको स्त्री-पुरुष दोनों मात्र उपलब्ध होंगे । विराट् ज्योतिर्मण्डल है, ज्योति सोमजन्य है । सोम भृगु है, भूगु कवि हैं । भूगुसोम ही अग्नि में आहुत होकर विराट् पुत्ररूप में परिणत हुआ है, इसी भार्गव- तत्र को लक्ष्य में रखकर ऋषिनं विराट्पुत्र को 'कवि' शब्द से ब्वाह्नत किया है। अग्निसोम । - ७ प्राकृतात्मा संकरव्यवहार - ईशोपनिषत् । विराटपुत्र के पिता माता है । विराड्योति ही उन दोनों के व्यक्तीभाव का कारण है । यदि ज्योतिभाग उत्पन्न न होता तो-सूर्य में 'अग्री और सोम दो तत्व है। इसका पता ही न लगता। यही कवि का परिज्ञान है । अपने माता पिता का अभिव्यञ्जक विराटपत्र अवश्य ही पिता का भी पिता [अमिव्याक है । सूर्यविज्ञान चतुविज्ञान, किं वा चानुषपुरुषविज्ञान है। जो चानुप पुरुषविज्ञानवेत्ता [सूर्यविज्ञानवेत्ता] हैं, वेही यह समझ सकते हैं कि रश्मियों के सीरूप होने पर भी उन्हें पुरुष क्यों कहा जाता है । यही मन्त्र का दूसरा अर्थ है । अब तीसरे प्रधान अर्थ की ओर आपका ध्यान भाकर्पित किया जाता है। इति-राश्मिविषयिणीभावना ३-अथ शुक्रविषयिणीभावना अचेतन अग्नि में अचेतन सोम की भाति होना याज्ञिकसृष्टि है, चेतन अति में चैतन सोम की माइति होना मथुनीसृष्टि है। अग्नि में घृताहुति पाकिसृष्टि है, शोणित में शुक्राइति का होना मथुनीसृष्टि है । उक्त मन्त्र प्रधान रूप से मैथुनीसृष्टि का ही रहस्योद्घाटन करता ६ । मन्त्रार्थ का उपक्रन फरते हुए कहा गया था कि संसार में जितने पुरुष है, सब यास्तव में प्रिंए हैं । वीरूप होने पर भी इन्हें पुरुषों को] पुरुष कहा जाता है । एवं जितनी भी विए हैं। पे पालय में पुरुष हैं । पुरुपएप होने पर भी इन्हें स्त्रियों को सी कहा जाता है [देखिए, ६. f० मा पृ० १011 विज्ञानपरिमापा के अनुसार अग्नितत्र को गोमवार को भी पहाजाता है, यह निर्विशद मिश्य है । यह अग्नि और सोम अात्मा और . शरीर मेद से दो भागों में मित रहता है। पुरा के भौतिक शरीर का निर्माण अग्नि से होता ६, श्री के भौतिक शरीर का निर्माण सोम. से होता है । घनि यो प्रति परप कहा जाता ..

संहस्यवहार वा ईशोपनिषत् ॥ मनमा । दक्षिणादिक् है, सोम की प्रतिष्ठा उत्तरादिक् है । अतएव स्त्री को घामा यहा जाता है । पुरुष दक्षिणा है, स्त्री पुरुष का वाम भाग है । प्रति शरीर में दक्षिणपार्श्व घाग्नेय है, घामपार्श्व सौम्य है । पुरुष का शरीर अग्निप्रधान होने से कर्कश होता है, स्त्री का शरीर सोमप्रधान होने से कोमल होता है। पुरुप कर्कशाग है, स्त्री कोमलाड़ी है । इस प्रकार इस शरीर रचना की अपेक्षा से प्राग्नेयशरीरप्रधानपुरुष पुरुष है, सौम्यशरीरप्रधानास्त्री की है । इस दृष्टि से पुरुष को पुरुष कहना, एवं स्त्री को स्त्री कहना न्यायसंगत है, यथार्य है । परन्तु भात्मदृष्टया । उक्त लौकिक व्यवहार असंगत है । यात्मदृष्टि से अग्नि स्त्री का आत्मा बन रहा है, सोम पुरुष फा भामा बन रहा है । स्त्री का आत्मा (प्रतिष्ठाभाव) शोणित (रुपिर) में प्रतिष्ठित है, पुरुष का जीवनीय रस शुक्र है। शोषित अग्निवधान है, शुक्र सोमग्नधान है। स्त्री-पुरुप-नपुंसक तीनों सृष्टियों का शुक्र शोणित सम्बन्ध के तारतम्य से सम्बन्ध है । शुक्र शोसिन दोनों परस्पर भविनाभूत हैं। शुकै साक्षात सोम है, शोणित साक्षात् अमि है । सोम शीतप्रधान है, अग्नि ऊम्माप्रधान है । एक भाई है, दूसरा शुष्क है । सर्दी, आई, सोम, शुक्र, योपा, रयि सब अभिन्नार्थक है । गर्मी, शुष्क, अग्नि, भातव, वृषा, प्राण सब अभिन्नार्थक हैं । सम्पूर्ण भौतिक विश्व इन्हीं दोनों का (अग्निोम का) समन्वित रूप है, जैसा कि श्रुति कहती है- "दयं वा इदं न तृतीयमस्ति शुष्कं चैवा= च । यच्छुष्कं तदाग्नेयं, यदा तव सौम्पम् [शत. १।६।३ । २३ । ] सर्वप्रभवभूत यही अशीपोम प्रजासृष्टि के उपादान बनते हुए शुक्र-शोणित मामसे व्यय- हन होते हैं । सौम्यशुक्र स्त्री है, आग्नेय शोणित पुरुष है । यह एक माना हुन्ना सिद्धान्त है कि अग्नि अपनी चरम सीमा पर पहुंच कर भापोमय सोमरूप में परिणत होजाता है, एवमेव सोम अपनी अन्तिम प्रतिष्ठा पर पहुंच कर अग्निरूप में परिणत शेजाता है । सोम संकोचधर्मा १-सौर्य शुझम, सावमाग्नेयम् । इतरेगामापत्र भूताना सानिध्य, भरत्यनविशेषेण परोप- भासत, परस्परानुप्रात्, परस्परानुपदेशात्-" (सुश्रुत ३ न० 1)1 प्रकृतात्मा । ईशोपनिषत् - सारव्यवहार 1 है, अग्नि विकासधर्मा है । संकोच की चरमावस्था विकास की जननी है, विकास की चरमा. बस्या संकोच की जननी है । अग्नि तेजतत्र है, सोम स्नेहताव है । सीमा से अतिक्रान्त स्नेह तेज की [रुद्रभाव की] उत्पत्ति का कारण वनजाता है, सीमा से उत्क्रान्त तेज स्नेहरूप में. परिणत होजाता है ! दो मित्रों का निःसीम स्नेहभाव कभी कभी रुद्रभाव । वैरभाव) का उत्पादक देखा गया है, एवं दो शत्रुओं का निःसीम रुदभाव [वैरभाव ] कभी कभी स्नेह- भाव ( मित्रता ) का उत्पादक देखा गया है । नि.सीमता [अति] स्वरूप का घात करने वाली है। प्रत्येक वस्तु स्वसीमा में प्रतिष्टित रहती हुई ही अपनी वरूपाक्षा करने में समर्थ होती है। हा तो प्रयात में अग्नि सोम का विचार प्रक्रान्त है । अग्नि केन्द्र से निकलकर बाहर प्रधि की ओर जाया करता है, इधर सोम प्रधि से केन्द्र की भोर आया करता है । अग्नि परागति है, सोम अग्गिति है । एक जाता है, एक श्राता है । एक प्रेति [गच्छति] है, दूसरा यागम्छति है। जाते हुए अग्नि में धाता हुआ सोम माहुत हो रहा है । इसी एति-प्रेतिरूप अग्नीसोमान्मक .यज्ञ से सारे पदार्थ खसरूप से प्रतिष्ठित होरहे हैं । गमन विसर्ग है, अागमन अादान है । पादान विसर्ग ही थानीपोमात्मक यह है । अनितय का वस्तुपिण्ड से सम्बन्ध है, कारण पनि मत्य है, एवं सत्य सदा सदृदय राशरीरी ही होता है । सोम का पिण्ड की महिमारूप अन्तः रिह से सम्बन्ध है । कारण सोम ऋन है, उधर घन्तरिक्ष भी ऋतरूप परमेष्ठी है । ऋत सोम से पियडायछिन्न, किंवा पिण्टरूप अग्नि सतत श्राकान्त रहता है, इसी आधार पर-'ने भूमि- रिपश्रिता' यह कहा जाता है । पिशकलनधर्मा अग्नि को पिगडरूप में परिणत करने वाला। गकोचधर्मा पही सोम है । जबतक सोमान्न प्राप्ति में आहुत होता रहता है, तभीतक अग्नि प्रगत तित रहता है । प्रज्वलित भग्नि को याज्ञिक परिमाया में समिद्धाग्नि' कहते हैं । एति-प्रेत. र सामिनियों से बादाननिसर्गरूप संघर्प द्वारा अनि समिद रहता है। अतएर यज्ञकर्म में 'दनि पनिमाला' [एन० १६० । १1१1] के अनुसार सामिधेनी मन्त्रों से बम -A VImनि विषेचन शापय विज्ञानमाप्य के मिश्रको बामण में देखना चाहिए। । .

1339 भान्तरमा ईशोपनिपन || संकरज्यवहार hvani समिद्ध करने का विधान है। बात यथार्थ में यह है कि अग्नि अाशिरामूर्ति है , सोम भृगुमूर्ति है। प्राराको अग्नि-वायु-यादित्य यह तीन अवस्याएं है। अवायानयरक नाग्नि हृदय से फैलता हुआ भागे जाता है । पग्नि की तीनों अवस्थाएं विकसित होते होते जय चरम दशा पर पहुंच जाती है तो तीनों अग्मियों की गति विपरीत होजाती है। मायन्तिक विशकलन से ऊम्माभाव प्रवर्तक मन्थिबन्धन टूट जाता है, अग्नि शान्त होजाता है । अग्नि की यह शान्तावस्था ही विष- रीत गति का माश्रय लेती हुई सोम नाम से व्यवहृत होने लगती है । सोम प्रार-वायु-सोम इन तीन भागों में विभक्त है। तीनों क्रमश: केन्द्र की ओर याते रहते हैं । जबतक केन्द्रविन्दु पर तीनों नहीं प्राजाते, तबतक तो तीनों को प्रतिष्टित रहने के लिए पर्याप्त धरातल मिल जाता है । परन्तु हृदयबिन्दु पर आने से तीनों को एक बिन्दु पर ठहरना पड़ता है । इससे तीनों में घर्षण होजाता है । घर्षण होते ही शान्तावस्था नष्ट हो जाती है , उग्रायस्था उत्पन्न हो जाती है , इसी का नाम थग्नि है , इसको गति बदल जाती है। प्रकृत में इस अग्नीसोममाया से हमें केवल यही बतलाना है कि पाने का पिण्ड से सम्पन्न है । इसका प्रवाह प्रमाण यही है कि एक हौत्र में आप खोलता हुआ पानी भरवा दीजिये । उस पानी के [ऊ की ओर] निकलने के लिए सूक्ष्मतम छिद्रोंबाला एक फमगारा लगा दीबेर । उप्स में से निकलता हुआ पानी खण्ड खण्ड रूप में परिणत हो जायगा । इन जलकणों को श्राप शीतल पायेंगे । कारण जब तक पिएड था, तबतक अग्नि पानी में प्रतिष्टित या । पिएटभाव के नष्ट होते ही अग्नि विशालन की पराकाष्टा पर पहुंच कर सत्यभाव ( पिण्डभाव ) से च्युन होता हुअा अनरूप में परिणत हो जाता है । पूर्वप्रतिपादित मातरिया के निरूपणानुसार पिण्ड का नाम पृथिवी है, महिमा धुलोक है। पिण्डरूम पृथिवी से निकल कर अङ्गिरात्रयी युरूा महिमा मण्डल की ओर जाया करती है । अग्नि को इसी स्मारिक गति को उदय में रखकर महर्षि कहते हैं- - इत एत उदाहन दिवः पृष्ठान्यारुहन् । प्रभूनयो ययाधि द्यामनिरसो ययुः ।।

प्राकृतात्मा सा ईशापनिपत सकरवार - अगिरा तेज तत्व है तो भृगु स्नेह तप हे । यही गर्मा-मदर्दी है । सर्दी परायाणा पर पहचकर अग्नि बनती हुई वृक्षादि को जला डालती है। इधर पसाष्टा पर पहुची हुई गर्मी वणी ( पानी ) बन जाती है । सातानाग्नि [ रद्राग्नि ] शोकाश्रु का जनक है, यह पूर्व की अप वेद निरक्ति में विस्तार से बतलाया ही जाचुका है। उक्त क्यन से यह सिद्ध हो जाता है कि यमि की चरमावस्या सोम ह, एन सोम वी चर मावश्या प्रग्नि हे । स्त्री के पामरूप शोणित मे प्रवृद्धसोम ( अग्नि है, इस लिए स्त्री मान दृष्ट्या पुस्प है । पुस्प के श्रामरूप शुक्र में प्रवृद्ध प्रति [ सोम ] है, अतएव पुरुष भामटया स्त्री है । प्रकारा तर रो यों समझिर-शुक अनरस से बनता है। अन्न चा इसोम से बनता है , थत शुत्र सानात् सोम है , सोम साक्षात् स्त्री है । यह शुक्ररूप से पुरुष की प्रतिमा वना दुपा है। इस प्रतिपदृष्टि से शुक्रमय पुस्प सोममय बनता हुआ वास्तव में स्त्री है । एक -सोमम्प, प्रतएव स्त्रीरूप शुक्र पुस्प में प्रतिष्ठित है, श्रतएव पुरष स्त्री की कामना विया करता है , जैसा कि अनुपद में ही स्पष्ट होनेगाला है। अग्नि से शोणित या निर्माण होता है, अन शोणित साक्षात् अग्नि ह । अग्नि साक्षात् पुरुष है । यह शोणितरूप से स्त्री यी नरिया बनाया है। इस प्रतिपादृष्टि से शोणितमयी स्त्री अग्निमयी बनती हुई वास्तव में पुरुष है । अग्निरूप, प्रतरत्र पुरषरूप गोणित स्त्री में प्रतिनित है, अतण्य स्त्री पुरष की कामना किया परती है। स्त्री की प्रजननशक्ति प्रात्तव में प्रतिष्ठित है। यह प्रात्तव मगन नाम से प्रसिद्ध प्राप्नर पुरपमर अप्रेम प्राण से युक्त है। प्राचाराचर मगलग्रह रक्त ( लाल ) ६ । रघिर में जो नाएर गमा है, २३ मगलाण यी ही महिमा है । मगलग्रह मा राशि में पाता हुमा उच्च पहलाना है । अनाम मागनिर धार्ता में प्रतिष्टित प्राग्नेयमाम मरन' नाम से प्रसिद्ध । मरम्पत घाममय याम है । दूसरे शब्दों में स्त्री ये धाम में अग्निमुर्ति पुरुष बैग है, भतएर स्त्री पो पुग्मना होनी है । पुल्य की प्रजनन शुग में प्रतिनित है । गुरप्रीय बात और- - - मागिदरिया रायग्निमाध्य पे प्रयमय में पाप है।

भाकृतात्मा - ईशोपनिषत् ॥ करमाहार swomtamannainamaina रेत ] शुक्र नाम से प्रसिद्ध सौम्य स्त्रीमह के सौम्यप्राण से युक्त है । शुक्रग्रह श्येत है, अत- एव तन्मय शुक्र भी श्वेत है । शुक्रग्रह मीनराशि का भोग करता हुया उच का कहलाता है। अतएव शुक्ररूप शुक में प्रतिष्ठित सौम्यकाम पीनध्वज' नाम से प्रसिद्ध है । मीनध्वज सोम- मप काम है। दूसरे शब्दों में पुरुष के काम में सोममृत्तिं स्त्री बैठी हुई है, अतएव पुरुष को स्त्री कामना होती है। सोम शक्तितव्य है, सोम सम्बन्धी अग्नि शिवतत्व है । शिवतत्व शक्तिकाममय है, शक्तित्व शिवकाममय है । शिव शत पर प्रतिष्टित है, शक्ति शिव की अनुगामिनी है । सम्पूर्ण विश्व शिव- शक्तिमय है । कहने को दो तत्त्व हैं, जो शिा (अग्नि ) है वही शक्ति (सोम) है, जो शक्ति है वही शिय है । निष्कर्ष यही हुया कि शुक्र-शोपिन दृष्टि से संसार की स्त्रिएं पुरुप हैं, पुरुष खिए हैं । यह स्त्री-पुरुष का दूसरा युग्म है। . रहता है । मुख यह एक नियत सिद्धान्त है कि जिस वस्तु का बाहर का धरातल गरम होता है, उसका धन्तःपृष्ठ ठंडा होता है, एवं जो बाहर से टंदा होता है, उसका अन्तःपृष्ठ गरम होता है। प्रकृति का निरीक्षणा कीजिये । शीनत में प्रकृतिमण्डलरूप बहिर्धरातल में सदी रहती है, एवं अन्त:- पृष्ठरूप प्राणियों के शहर में गरमी का साम्राज्य रहता है । शीतकाल में हमारा जठराग्नि प्रदीप्त धूम निकलता रहता है । इसी प्रवृद्ध अग्निवल से हम शरीर पर काम्या लादि को आसानी से उठाने में समर्थ होजाते हैं । इसी प्रवृद्ध अग्नि की कृपा से अन्न अधिक खाया जाता है । इस प्रकार बाहर जहा ठंड है, भीतर गर्मी है । प्रीप्मनातु में ठीक इससे उलटा होजाता है । प्रकृति में गर्मी का साम्राज्य है, परन्तु प्रकृतिगर्भस्य अध्यात्म में सर्दी की प्रधानता है। वहीं शीतभाग पसीना बनकर बाहर निकला करता है । अग्निवत क्षीण रहता है, अतएव हम निबल रहते हैं । शीतकाल में जिस अग्निदेव की कृपा से जहां हम दो दो तीन तीन कम्बलों को प्रोदने में समर्थ वन जाते थे, वहां ग्रीष्मकाल में अग्नि की कृपा से एक मामुली चद्दर का भी मार सहन नहीं कर सकते । इस प्राकृतिक स्थितिसे प्रकृत में हमें यह 10 नाकनारमा संकरध्यवहार Bा ईशापनिषत् ॥ बजा उत्पन्न होती है । यदि केवल शुक्र शोणित का समन्वय होता है, (यदि तद्गत भ्रूणों का जो के स्त्री-भ्रण विज्ञानभाषा में योपा-वृपा नाम से प्रसिद्ध हैं मिथुन नहीं होता ) तो ऐसा मेथुनभाव व्यर्थ जाता है । आयुर्वेद का उक्त सिद्धान्त तभी ठीक होसकता है, जब कि सौम्प शुक्र में आग्नेय भ्रूण,एवं आग्नेय भार्तव में सौम्यभ्रूण की सत्ता मानली जाती है। कारण अग्नि से ही पुरुष का विकास संभव है । इसी रहस्य को लक्ष्य में रखकर प्राणाचार्य कहते हैं- आधिक्पे रेतसः पुंसः कन्यास्यादावाधिक । नपुंसकं तयोः साम्ये यथेच्छा परमेश्वरी"-(भावप्रकाश)। . अग्नि भी देवता हैं, सोम भी देवता हैं । देवता त्रिसत्य होते हैं । देवताओं का प्रत्येक कार्य त्रिभारयुक्त होता है । तीन व्यापारों से देवता सकार्यसिद्धि में समर्थ होते है । पूर्व कथना- नुसार प्रजो पतिकर्म में तीन व्यापारों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । तीन मिथुनों से मिथुन कर्म संपन्न होता है । ध्यान दीजिये--प्रजो पत्ति के लिए पहिले पुरुष स्त्रीगमन करता है। अभी दोनों के शरीरों का संयोग है । पुरुष शरीरापेक्षया आग्नेय यनता हुआ पुरुष है, स्त्री शरीरापेक्षया सौम्या यनती हुइ स्त्री है । इस प्रयमाक्रमण में सचमुच पुरुष ( पुरुष का भाग्नेय , शरीर ) स्त्री (स्त्री के सौम्य शरीर ) की ओर जारहा है । इस प्रथम मिथुनकर्म से संघर्ष द्वारा तात्कालिक वैश्वानर अग्नि उत्पन्न होता है । इस अग्निपरिताप से पुरुष के सर्वाङ्ग शरीर व्यास शुभ अंग प्रत्यंग से निकलकर पुञ्जीभूत बनकर अधोभाग द्वारा स्त्री के गर्भाशय में प्रतिष्ठित आग्नेय भार्तव में पाहत होता है। यह शुक्रशोणित का मिथुनकर्म दूसर। कर्म है। इस में शुक्र सोम है, शोणित अग्नि है । शोणित में शुक्र की आहुति क्या होरही है, अग्नि में सोम की आहुति होरही है । यही माध्यामिक यज्ञ है । इस द्वितीय कर्म में स्त्री पुरुष पर थाक्रमण कर रही है । कारण स्पष्ट है । शुक्र ही तो शोणित पर आक्रमण कर रहा है। शुक्र सौम्य होने सचमुच स्त्रीरूप है, एवं शोणित भाग्नेय होने से वास्तव में पुरुष है । और आगे यदिए । से * इस विषय का विशद विवेचन शपय विमानमाष्य के दितीय वर्ष में निकल चुका है।

प्राकनारमा all ईशापनि पत् ॥ संकरव्यवहार शोणित में रहने वाले सौम्य भ्रूणपर (स्त्रीभ्रूण पर। शुक्र में रहने वाला आग्नेय भ्रूण (मुसुरा) श्याक्रमण करता है। यह अन्तिम मिथुन है । इस में जिस की प्रधानता रहती है, उसी भूए का विजय होता है । इस अन्तिमभ्रूण में पुरुष ही (पुंभ्रूण ही) स्त्री पर (स्त्रीभूरा पर) अाक्रमण करता है । प्रथमात्रमण में पुरुष प्रधान, मध्यमाक्रमण में स्त्री प्रधान, चरमाक्रमण में पुरुषप्रधान, इस प्रकार दोनों थोर से पुरुषप्रतिष्टा की मिति से मध्यस्था स्त्री को स्वतन्त्र इच्छा नष्ट हो जाती है । जो हतभी इस प्राकृत नियम का उल्लंघन करते हैं, वे अपने साथ साथ स्त्री के स्वरूप को भी नष्ट कर देते हैं । उक्त तीनों याक्रमणों में मध्याक्रमणदृष्टि से (शोषित शुक्र की दृष्टि से ) सचमुच संसार की सब लिएं पुरुष हैं, एवं संसार के सव पुरूष नि हैं । उस मन्त्र इसी मध्यस्थिति का निरूपण करता है । अध्यात्मसंस्था-- १-यांग्मयशरीरयुक्तः पुरुषः-पुरुपः २-सौम्यशरीरयुक्ता स्त्री-स्त्री पुरुपरिचयमनुधावति-प्रथमाक्रमणं पुरुषप्रधान "पुरुष एवेदं सर्वम्" १-मोन्यं शुकम्- २-पागेयमातंत्रम्- -श्री स्त्रीपुश्यमनुधावनि-दितीयाकमणेस्त्रीप्रधानन् १-शुक्रगतः माग्नेषःभ्रणः-पुरुषः २-शो. ग. सौम्यास्त्रीभ्रणः-स्त्री पुरुषःप्रियमनुधावति-तृतीयाकमा पुरुषप्रभा उक्त तीनों म्पिनियों में से मय्य वे शुक्रगोणितभाव को तदय में ररपकर ऋषि कहते हैं- वियः सतीला उ मे घुस मा Tम रहाय पो अश्यमान् ही देग मुकना है, टांगों का अंधा इस रहस्य को क्या जागे । fair पामशमि के 'मकर-मीन' माप को ममगता है, यही यह जान सकता है कि प्राकृतात्मा g! ईशो निपत्र राहरन्यवहार Parrorwar. चास्तव में स्त्रीकाममय है, शोणित वास्तव में पुरुषकाममय है । यह दूसरा समझने वाला व्यक है कविपुरुष । यह इस स्त्रीभाव को जानता हुधा सचमुच भपने पिता का भी पिता बन रहा है। भूगु और अङ्गिरा का रहस्य जानने वाला पुत्र ही कवि है । ऐसा विद्वान् अपने पिता से भी अधिक प्रतिष्ठित माना जाता हैं । विज्ञानदृष्टि के अनुसार कवि का अर्थ है भृगुतत्व । माप- वायु-सोम को ही भृगुनस्त्र कहते हैं । पुत्रोत्पत्ति शुक्र की आहुति से होती है । सोममय शुक्र ही अग्नि शोणित में सुन (अभिपुन-आहुत) होकर पुत्ररूप में परिणत होता है । शुक्र में जो धनता है वह पानीका भाग है, शर्कराभाग सोम है, गतिभाव वायु है । इस प्रकार शर्करा (सोम) प्रधान शुक्र में श्राप-वायु-सोम तीनों तत्व प्रतिष्टित हैं । ऐमी अवस्था में हम शुक्र को अवश्य ही 'मृगु' कह सकते हैं । भृगु ही कवि है । यह कवि ( भृगुरूप शुक्र ) पुत्ररूप में परिणत होता है, श्रतः शुक्र को अवश्य ही 'कविपुत्र' कहा जासकता है। शुरु सोमप्रधान होने से पुनरूप में परिणत होता है, इधर सोम स्त्री है, अतएव तदरूप पुत्र (पुरुष) को हम अवश्य ही स्त्री कहने के लिए तय्यार है । इसी अभिप्राय से-'कविर्यः पुत्रः स ईगचिकन' (जो पुत्र कवि है वह इस रहस्य को जानता है) यह कहा गया है | कन्यासंतान में शोणित की प्रधा- नता रहती है-'कन्यास्यादात्तवाधिक' । कविपुन (शुक्रस्य पुरुषभ्रूण } ही स्त्रीभ्रूण शोणित- भ्रूण) के साथ संयुक्त होकर स्त्रीभाव का कारण बनता है । सोम ही अग्नि की ओर जाता है । कन्योत्पादक अतएव स्त्रीरूप शोणित भ्रूण का सम्यक् परिज्ञाता शुक्रभ्रूण ही है । इसी अभिप्राय से भागे जाकर श्रुति कहती है-'यस्ता विजानाद' ( कविरूप जो पुरुषभूण स्त्री- भूण को जानता है)। जिसप्रकार स्त्रीख रूपसमर्पक स्त्रीभ्रूण भाग्नेय शोणित में प्रतिष्ठित रहता है, एवमेव पुरुषखरूपसमर्पक पुंण सौम्यशुक्र में प्रतिष्ठित रहता है, यह पूर्व में कहा जाचुका है । शुक्र का माधान करने वाला पुरुष 'पिता' कहलाता है । इस पुरुष रिता का पुत्र शुक है । पुत्ररूप शुक्र ही पंभ्रूण का उत्पादक बनता है । भूणद्वारा शुनपुति देने वाला पिता माता के गर्भ में अपनी स्त्री के गर्भ में] स्वयं जन्म लेता है, भतएव 'जायते पिता स्वयं- मस्यां' इस निर्वचन से स्त्री को 'जाया' कहा जाता है। अपने पुंण से उत्पन होने वाले १०७ प्राकृत स्मा साशोपनिषत् । मूलपिय रेतोधा पिता का पिता (जन्मदाता-अमिन्यञ्जक) वास्तव में कवि पुत्ररूप शुक्र ही है। एक पोर पुंक्षण है, दूसरी ओर पिता है । मध्य में भ्रूणाधिष्ठाता कविपुत्र नानक शुक्र है । यदि यह पुत्र न होता तो पुण कभी संतानरूप में परिणत नहीं हो सकता था। दूसरे शब्दों में बह रेतोधा पिता कभी जाया में जन्म नहीं लेसकता था । पिता के जाया में चन्म का हेतु पुत्रशुक्र है, अतएव हम इसे अवश्य पिता का पिता (पुंभ्रूणरूप पिता का भी अभिव्यञ्जक) कह सकते हैं। इसी रहस्य को लदा में रखकर 'सपितुष्पिता पत्' "वह शुक्ररूप कविपुत्र पिता [प्रतिकृतिका भ्रूण] का भी उत्पादक एवं अभिव्यञ्जक बनता इया भ्रूणरूप अपने पिता का भी पिता बन गया" यह कहा गया है। यह है मन्त्रार्थसम्बन्धिनी तीसरी शुक्रविषयिणीभावना का संक्षिप्त निर्दशन । इति-शुक्रविषयिणीभावना। ३ प्रासङ्गिक ची समाप्त हुई । अय पुनः प्रकृत विपय का उहण किया जाता है । उप- निषत् के चतुर्थ चरण का उपक्रम करते हुए रेत-रतोया-योनि उत्पत्ति कर्म में इन तीन मानों का समावेश वतलाया गया है [ देखिर ई० नि० भा० १७७ पृ. ] ! इन तीनों में रेत और योनि दोनों स्थिर है, रेतोघा गतिशील है। यही अधिदैवतसंस्था में जहां-'पातरिमा' नाम से व्यवदन होता है, वहां अध्यात्मसंस्था में कही 'एक्यामरुन्' नाम से प्रसिद्ध है। योग- प्राणप्रधाना स्त्री का ग्निमय शोणित योनि है, वृपाप्राणप्रधान पुरुष का सोममयशुक्र रेत' है। यह प्राति द्रव्य है, श्रार तत्व है, मुझ है । खी का रक्त थाइति का स्थान है, अग्नि है, मय है । इस मदरूप योनि में मुना की थाहात होती है । आहुति देने वाला वायु है । * इस पथ का निराद चन 'नासदीयमूक्त विज्ञानभाष्य में देखना चाहिए । १०८ सहरव्यवहार प्राकवारमा सा ईशोपनिषत् । Vvre । यदि यह बायु शुक्र को दो भागों में विभक्त कर देता है तो यमन सन्तान उत्पन्न होती है । रेत को योनि में, सुब्रह्म को ब्रह्म में, सोम को अग्नि में,शुक्र को शोसित में माहित करने के कारण ही यह वायु 'मातरिधा' कहलाता है। माता स्त्री है, पिता पुरुष है । चायु शुस के चारों ओर वेष्टित होकर ही शुक्र की पाहुति देता है । सोमप्रधानशुका स्त्रीरूप बनता हुआ सचमुच 'गाता' है । अतएव-"मातरि (शुक्र) श्वयति (व्याप्तो भवति)" इस व्युत्पत्ति से शुक्र धाता इस रेतोधा वायु को 'मातरिश्वा' कहना न्यायसंगत होता है । रेत यश्ने आप योनि में सिक्त नहीं होता, अपि तु वायु द्वारा ही यह सिक्त होता है। स्त्रीपुरुष के मिथुनमात्र से प्रति प्रबल होजाता है। अप्ति के क्षुब्ध होते ही शरीरगत वायुवाहिनी नाडियों [धमनियों में भरा हुआ वायु स्थान- व्युत होता हुआ अग्नि से संतप्त शुक्र को स्वस्थान से च्युत कर देता है । वायु के प्रत्याघात से ही शुक्र गतिमत् बनता हुआ शोणित में माहुत होता है । इस अध्यात्मसंस्था के साथ अधिदैवत की समता का विचार कीजिए । गर्भाशयगत रुधिर को अग्नि समझिए, इसी को वेद समझिए । वेद वेदि पर ही तो प्रतिष्ठित रहता है । माता ही तो वेदि है । विब्रह्मापरपयायक अनेजदेजत् यजु को ब्रह्म समझिए । शुक्र को सोम समझिर, इसी को सुवेद समझिए, इसी को पड्- मझापरपयायक 'आप' [सुब्रह्म] समझिये । शुक्र के चारों ओर वेष्टित भार्गवयायु को 'मातरिश्मा' समझिये । इन्हीं तीनों को क्रमशः योनि-रेत-रेतोया समझिये । ब्रह्मरूप योनि में श्रापरूप रेत की वायुरूप रेतोधा मातरिश्था द्वारा पाहुति होती है । दूसरे शब्दों में मातरिश्वा श्रापतत्त्व की ब्रह्म में प्राहुति देता है, इसी से गर्भाधानपूर्वक प्रजोत्पत्ति होती है । यह है आध्यात्मिक प्रजोत्पत्तिकम 1 जैसा आप यहां [अध्यात्म में ] प्रत्यक्ष कर रहे हैं, ठीक वही स्थिति वहां [अधिदैवत में ] समझिये-"यदेवेह तदमुत्र" । -आर्तवम् [श्राग्नेयम् ] यजुर्ब्रसाग्निः [ ब्रह्म ] २-रेत:- ३-रेतोधा- ---वायुः [अनुष्णाशीतः ] ----→भागवायुः[मातरिश्था]) । --- -शुकम् [सौम्पम् - पब्रह्मसोमः[ आपः] - ततः भजोत्पत्तिः १७ प्राकृतात्मा सकरव्यवार - ईशोपनिषत् ।। अनेज-एजवरूप ब्रस यजुरग्निमत्तिं बनता हुआ यद्यपि पुरप है, परन्तु यह विश्वप्रजा का योनेस्थानीय होने से भी कहा जा सस्ता है। एसुब्रझ सोमरूप होने से यद्यपि स्त्री है, परन्तु शुक्रस्थानीय होने से ( रेतस्थानीय होने से ) यह पुरुप नाम से व्याहृत किया जा सकता है । यीविद्याधन ब्रह्म से श्राप उगन हुधा । त्रयीविद्या के साए यह आपके गर्भ में प्रविष्ट होगया । यह पहिला मात्रमण है, पहिला मिथुन है । ब्रह्माग्निरूप पुस्य सुनलसोमरूप स्त्री पर भारमण कर रहा है । आगे जाकर अध्यात्मक्रमानुसार मातरिया द्वारा वह भाप (शुक्र) उस बम (योन ) के साप सगत होता है । यह शुक्र-शोणित का दूसरा गिथुनकर्म है। मागे जारर भार्गत पुणरूप गायत्रीमात्रिम नाम के वेदाग्नि, एर ब्रह्मगर्भित सुमारूप स्त्रीभ्रा दोनों का मिथुन होता है । यही तीसरा अाक्रमण है । इस से मिथुनभाव सामना सम्पन्न हो जाता है, एय तमाल विरा-पुरुष गर्भ में घाजाता है। यह विराट् इस दम्पती यी पहिली सतान है। अधिदेवतसंस्था १-महानि (अग्नि -पुरुष ) ग्रन प्रयोऽमि अनुधावति । प्रथमाक्रमण ब्रह्म (पुरुष २-भार (सोम -स्त्री) (पुरष नियमनुभवति ) प्रधानम् १ २ १-माप (सौग्य गुर-तो-रेत) चाप –थग्निमनुधायति २-भप्ति (भाग्नेपमार्चा पुरुष -योनि)) (खापुरुषमनुधापति) दि.मान भर (स्त्री) धानम् ar १-प्रदर्भिकोऽप्रियद (पुभूयोऽग्नि --पुरुष ) अग्निपद सोपवेदमनुयायति त पाये ()- २-मानित गमोद (पीभ्रूण गोम -(प्री) र नियमन गति) प्रधानम् "ततो विराडजायत" प्राकृतामा ईशोपनिषत् ॥ मन्नार्थसङ्गति - 'भनेजदेकं मनसो जवीय इत्यादि मात्र तीनों स्थितियों में से मध्यस्थिति का ही निरूपण करता है | भग्निगर्तिब्रह्म योनिरूप से स्वस्थान में प्रतिष्ठित है। इस में मातरिश्वा द्वारा प्रापरूप रेत की आहुति होती है । दोनों के [अग्नि भौर भाप के ] मिथुन से विराट पुरुष उत्पन्न होता है , जैसा कि-'तस्यां स विराजमजत प्रभुः' इत्यादि रूप से वाहा जा चुका है। - । ब्रह्म-श्राप के मिथुनभाव से उत्पन्न अपूर्वभाव में ब्रह्म और भाप के अतिरिक्त और क्या हो सकता है ? वे दोनों पृथक् पृथक् थे, दोनों का समन्वितरूप विराट् है । अक्सामावच्छिन्न प्रल ब्रह्म है । इस में यत्-जू (एजव-अनेजत् । दो विभाग है । इस प्रकार अक्-साम यजुर्तिमय -साम-पद- मेद से चतुष्कल हो जाता है। दूसरा प्राप्तत्व है । इस की भृगु-अतिरा भेद से आप-वायु-सोम-अग्नि-यम-मादित्य यह ६ फलाएं हैं । संभूय १० कलाएं हैं। दशकल की समष्टि दश अक्षर की समष्टि है । छन्दोविज्ञान के अनुसार दशाक्षर छन्द को ही 'विराट् [दशिनीविराट ] कहा जाता है । यही विराट् सूर्यरूप से हमें प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है । सूर्य आपोमय है, इसी लिए तो-'अपांगम्भन्सीद' यह कहा जाता है , एवं अग्निमयत्त्व तो स्पष्ट ही है । यदि सूर्य में पानी न होता तो सूर्य क्षणमात्र में संसार को भस्म कर डालता । साथ ही में यदि सूर्य में अग्नि न होता तो सारा संसार समुद्रगर्भ में विलीन हो- जाता, जैसा कि प्रतिदिन क्षीण होता हुआ किसी युग में [करुपान्त में ] निःशेष बनता हुआ सौर अग्नि विशुद्ध श्राप का साम्राज्य रखता हुआ प्रलय का अधिष्ठाता बन जायगा । इसी अप्-अग्नि मनि विराट्सुर्यपुरुष [ हिरण्यगर्भप्रजापति ] से आगे की सारी सृष्टिएं होती है, जैसा कि निम्न लिखित श्रुतियों से स्पष्ट है-- :-विश्वरूपं हरिणं जातवेदसं परायणं ज्योतिरेकं तपन्तम् । सहस्ररश्मिः शतधा वर्तमानः प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः ॥ [प्रश्नोपनिषद् ११०] प्राकृतामा মপ্লেক ईशोपनिषत् ॥ २-दिवो रुक्म उरुचता उदेति दूरे अन्तरणिभ्रांजमानः | नूनं जनाः सूर्येण प्रसूता अयन्नानि कृण्वन्नपांसि ॥ [ ऋक् सं० ७ मं० । ६३ सू० । ४ गं०) ३-चित्रं देवानामुदगाचतुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः । आपायावापृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्सा जगतस्तस्थुपश्च ॥ [ यजुः सं० १३१४६] अस और सुब्रह्म दोनों अव्यक्त थे, पहिला व्यक्त यहीं स्खयोतिधन हिरण्यगर्भनाम से प्रसिद्ध विराट् पुरुष है। हिरम्पगर्भविया के उपासक महर्षि विश्व को सूर्यमूल ही मानते हैं, जैसा गि-'मुण्डकोपनिपतर्विज्ञानभाष्य' में विस्तार से निरूपित है । इस मिथुनभाव से अण्ड का उदय होता है, यही ब्रह्माण्ड सूर्य का विश्वरूप है, जैसा कि पूर्व में बतलाया जा चुका है। इसी ब्रह्माण्ड को लक्ष्य में रख कर स्मृति कहती है- तदण्डमभवद्धर्म सहस्रांशसमप्रभम् । तस्मिाझे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ॥ (मनु० १।१ )। स्वयम्भू प्रम-इस सूर्य के पिता है । सूर्य हम सब के पिता हैं। तभी तो ब्रह्मा को पिता- मह [बाबा] कहा गया है । विराट् पुरुष को अपनें गर्म में बीजरूप से प्रतिष्ठित रखने वाले, रेत योनि-रेताधारूप उस दम्पतीभार का ही 'अनेजदकम्' इत्यादि मन्नमें निरूपण हुआ है। 'मनेजदकं मनसो जीयो नैनदेवा प्राप्नुवन् पूर्वमर्पन्' 'तद्धावतोऽन्यानोनि तिष्ठत' यह गन्त्रमाग योनि का निरूपक है, 'तस्मिन्नपः' यह भाग रेत का निरूपण करता है, एवं 'मातरिया दधाति' यह मन्त्र ने रेतोया या नियेचन करता है । वेदधन ईश्वर समुदापरुप से सर्पया धनेजर है, अष्टया मन से भी नवीय है । इस प्रकार नित्य प्रशान्ति (पति) नर्मित निशान्त स्थितिमा] पेहमप ईश्वर [सर्पभ्नान्तरा मा] वृक्षात् स्तब्य खुदा है । सारा विश इण पूर्णपुरुष से पूर्ण है । स्पितिरति समष्टिरूप सध्यापक, किन्तु मायावच्छिन्न इसी तत्र - प्राकृतात्मा । ईशोपनिषत् मन्नासङ्गहि को हमने यजुर्ब्रह्म कहा है | वेदत्रयी में ऋग्वेद महोत्थ है, सामवेद महावत है, यजु अग्नि है, धृपा है, योनि है । इसी यजु के जूरूप मत्यवाक् भाग से पड्ब्रह्मरूप प्रापोब्रह्म उत्पन्न हुआ है। जहांतक यजुर्ब्रह्म व्याप्त है, वहींतक आपोब्रह्म व्याप्त है । दोनों समानायतन हैं । महा. मायावच्छिन्न विद्याकर्ममय उस व्यापक क्षराक्षरविशिष्ट अव्यय पुरुष पोडशीपुरुष] काचित्र थपर्ने सामने रखिए । इस पर पहिला वेदत्रयीरूप ब्रह्मस्तर समझिए, दुसरा पड्वब्रह्मरूप सुब्रह्म- स्तर समझिए । साथ ही में तीनों की व्याप्ति समानप्रदेश में समझिए । साथ ही में यह भी स्मरण रखिए कि उत्तर उत्तर स्तरों में पूर्व पूर्वस्तर नित्य प्रतिष्ठित हैं । 'अनेजदेकम्' से पहिला उपनिषद्भाग विशुद्ध पोडपोपुरुष का निरूपण करता है , 'अनेजदेकम्' इत्यादि मन्त्र विया-कर्ममय दूसरे ब्रह्मस्तर का निरूपण करता है , एवं पागे का-'सपर्यगाव ०' इत्यात्मक तीसरा अधिकरण तीसरे सुब्रह्मास्तर का निरूपण करता है । ब्रह्मपुरुष से उत्पन्न सुनझरूप [अप] स्त्री पुरुष पर प्रतिष्ठित थी, पति पत्नी का सम्बन्ध था, परन्तु बहिर्याम सम्बन्ध था, दोनों के शरीर मात्र मिले हुए थे । ऐसे योगरूप बहिर्याम सम्बन्ध से विश्वोत्पत्ति असंभव थी। अतएव भागे जाकर मातरिश्वा द्वारा दोनों का अन्तयाम सम्बन्ध हुआ । इन दोनों के मिथुन- भाव से जो अपूर्व तत्त्र उत्पन्न हुआ, वही-'शुक्र' नाम से प्रसिद्ध हुआ । पूर्वमें हमनें इस अपूर्वमात्र को 'विराटसूर्य' कहा था, एवं यहां शुक्र को अपूर्वभाव बतलाया जारहा है । इसमें विरोध नहीं समझना चाहिए । कारण 'शुक' ही सूर्य का जन्मदाता है। शुक्रावस्था कानाशिक प्रदेश ही धागे जाकर सूर्यरूप में परिणत होता है । अतएव-'तदाऽएप एव शुनो य एप तपति' तद्यदेष तपति तेनैप शुक्रः शत० ४ २।३१] इत्यादि रूप से सूर्य शुक्र नाम से प्रसिद्ध है । अतएव ग्रहविया के अनुसार जहां चन्द्रमा को 'मन्थी' कहा जाता है, वहां सूर्य को 'शुक्र' कहा जाता है । सौराग्नि ही अपने प्रवग्यांश से ग्रीष्म ऋतु का अविष्टाता बनता अतरस प्रीष्म ऋतु को भी [सूर्य सम्बन्ध से] 'शुक' कहा जाता है । ज्येष्ठमास 'शुक' है, आपादमास 'शुधि' है। देखिए शत० ४।३।१५]। बिराट् सूर्य को छोड़ दीजिए । अभी विराट् शब्द से केवल शुक्र का महण कीजिए । त्रयीब्रह्म एवं श्रापक्ने अन्तर्यामरूप याग सम्बन्ध से i प्राकृतात्मा. हा ईशोपनिषत् ॥ मन्त्रायंगति २-दिवो रूपम उरुचता उदेति दूरे अन्तरणिभ्राजमानः। नूनं जनाः सूर्येण प्रसूता अयन्नानि कृण्वन्नपांसि ।। [ऋक् सं० ७ मं० । ६३ सू० । ४ मं०] 3-चित्रं देवानामुद्गाचतुमित्रस्य वरुणस्याग्नेः । आनाधावाटथिवी अन्तरिक्ष सूर्य प्रात्मा जगतस्तस्थुपश्च ॥ [ यजुःसं० १३।४६) ब्रह्म और सुब्रह्म दोनों अव्यक्त थे, पहिला व्यक्त यही नव्योतिन हिरण्यगर्भनाम से प्रसिद्ध विराट् पुरुष है। हिरण्यगर्भविद्या के उपासक महर्षि विश्व को सूर्यमूल ही मानते हैं, जैसा कि-'मुण्डकोपनिपविज्ञानभाष्य' में विस्तार से निरूपित है । इस मिथुनभाव से अण्ड का उदय होता है, यही ब्रह्माण्ड सूर्य का विश्वरूप है, जैसा कि पूर्व में बतलाया जा चुका है। इसी प्रकाण्ड को लक्ष्य में रख कर स्मृति कहती है- तदगढमभवमं सहस्रांशुसमममम् ।। तस्मिभने सवं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ।। (मनु० १६)। वयम्भू मल-इस सूर्य के पिता हैं । सूर्य हम सब के पिता हैं । तभी तो ब्रह्मा को पिता- मद [याया] कहा गया है । विराट् पुरुष को अपने गर्भ में वीजरूप से प्रतिष्ठित रखने वाले, रेत-योनि-रेताधारूप उस दम्पतीभाव का ही 'भनेजदकम्' इत्यादि मन्त्रमें निरुपण दुया है । 'भनेनदकं मनसो नत्रीयो ननदेश भाप्नुवन् पूर्वमर्पत्' 'तद्धावतोऽन्यानसेनि तिष्ठत यह गन्त्रमाग योनि का निरूपक है, 'तस्मिन्नप' यह माग रेत का निरूपण करता है, एप 'मानरिया दधाति' यह मन्त्र रोग रेतोया का विवेचन करता है । वेदधन ईश्वर समुदापरूप से शरमा अनेर दे, प्रापष्टया मन से भी जयीय है । इस प्रकार नित्य ध्यशान्ति (पति) नर्मित नित्यशान्त पतिप] येदमय ईश्वर [साभूतान्तरा मा] वृक्षयत् सन्ध रादा है । साथ मित्र इस पूजाप से पूर्ण है। स्थितिगतिसमष्टिम्प सध्यापक, किन्तु मायाप्रन्सिल इसी तर .

प्राकृतारमा - ईशोपनिषत् /- मन्त्राथमाइति wwwwwww । को हमने यजुर्ब्रह्म कहा है । वेदत्रयों में ऋग्वेद महोस्थ है, सामवेद महावत है, यजु अनि है, वृपा है, योनि है। इसी यजु के रूप मर्त्यवाक् भाग से पड्मसरूप भापोब्रह्म उत्पन्न हुआ है। जहांतक यजुब्रश व्याप्त है, वहींतक आपोझ व्याप्त है । दोनों समानायतन हैं । महा. मापावच्छिन्न विद्याकर्ममय उस व्यापक क्षराक्षरविशिष्ट अव्यय पुरुष पोडशीपुरुष] का चित्र थपने सामने रखिए । इस पर पहिला वेदत्रयीरूप ब्रह्मस्तर समझिए, दूसर। पड्ञब्रह्मरूप सुब्रह्म- स्तर समम्मिर । साथ ही में तीनों की व्याप्ति समानप्रदेश में समझिर । साथ ही में यह भी स्मरण रखिए कि उत्तर उत्तर स्तरों में पूर्व पूर्वस्तर नित्य प्रतिष्ठित हैं । 'अनेजदेकम् ७' से पहिला उपनिषद्भाग विशुद्ध पोडषीपुरुष का निरूपण करता है , 'अनेजदेकम्' इत्यादि मन्त्र विद्या-कर्ममय दूसरे ब्रह्मस्तर का निरूपण करता है , एवं आगे का-'सपर्यगाव ०' इत्यात्मक तीसरा अधिकरण तीसरे सुत्रझस्तर का निरूपण करता है । ब्रह्मपुरुष से उत्पन्न सुब्रह्मरूप [अवरूप] स्त्री पुरुष पर प्रतिष्ठित थी, पति पत्नी का सम्बन्ध था, परन्तु बहिर्याम सम्बन्ध था, दोनों के शरीर मात्र मिले हुए थे। ऐसे योगरूप बहिर्याम सम्बन्ध से विश्वोत्पत्ति असंभव थी। श्रतएव आगे जाकर मातरिश्वा द्वारा दोनों का अन्तयाम सम्बन्ध हुआ । इन दोनों के मिथुन- भाव से जो अपूर्व तत्व उत्पन्न हुआ, वही-शुक्र' नाम से प्रसिद्ध हुआ । पूर्वमें हमनें इस अपूर्वमान को 'विराटर्य' कहा था. एवं यहां शुक्र को अपूर्वभाव बतलाया जारहा है । इसमें विरोध नहीं समझना चाहिए । कारण 'शुक' ही सूर्य का जन्मदाता है । शुक्रायस्था कानांशिक प्रदेश ही आगे जाकर सूर्यरूप में परिणत होता है । अतएव-'तद्वाऽएप एव शुक्रो य एप तपति' तद्यदेप तपति तेनैप शुक्रः' [शत० ४ २।३।११] इत्यादि रूप से सूर्य शुक्र नाम से प्रसिद्ध है । अतएव ग्रहविद्या के अनुसार जहां चन्द्रमा को 'पन्थी' कहा जाता है, वहां सूर्य को 'शुक्र' कहा जाता है । सौराप्ति ही अपनें नवांश से प्रीष्म ऋतु का अधिष्ठाता घनता है, थतरन ग्रीष्म ऋनु यो भी सूर्य सम्बन्ध से] 'शुक' कहा जाता है ! ज्येष्ठमास 'शुक्र' है, भागढमास 'शुचि है। देखिए शत० ४।३।१।१५]। विराट् सूर्य को छोड़ दीजिए । अभी विराट् शब्द से केवल शुक्र का ग्रहण कीजिए । त्रयीब्रह्म एवं आपके अन्तर्यामरूप याग सम्बन्ध से पढी भन्दा महत्तर सम्बन्ध से भवत्यरूप में परिणत होजाना है। इस पर पनना । पीबिन् गुरुदीपोने में मान होकर प्रजो चि फारए बगता है। पदमाश प्राकृतात्मा मन्त्रार्यमति । ईशोपनिषत् ॥ जो अपूर्वमात्र उत्पन्न हुआ, वही विश्व का उपादान बनता हुआ [ऋक्-साम-यत्-जू-धार- यायु-सोम-अग्नि-पम-श्रादित्य मेद से दशाक्षर बनता हुआ विराद्शुक्र नाम से प्रसिद्ध हुआ। जहां तक [महामायातक ब्रह्म-सुब्रह्मास्तर व्याप्त थे, वहीं तक दोनों की सम्मिलित अवस्था. रूप विराटशुक्र व्याप्त हुआ । यही पहिला अव्यक्त स्वयम्भू है । ससीम और असीम [किन्तु मायावच्छिन्न होने से परमार्थत: असीम | भेद से स्वयम्भू दो प्रकार का है ! जबतक महान् की उचि नहीं होती, तब तक पुण्डीर स्वयम्भू का उदय नहीं होता । महदुत्पत्ति से पहिले अपनी सत्ता रखने वाला शुकमूर्ति स्वयम्भू व्यापक है, महामायावच्छिन्न वनता हुआ एक है । इस महा- विश्वव्यापक महा खयम्भू के उदर में महान् को कृपा से उदित होने वाली अनन्त योगमायाओं से अनन्त पुण्डीर स्वयम्भू प्रादुन होते हैं, जिनका कि दिग्दर्शन पाठये मन्त्र में कराया जायगा। जो किसी समय दिब्रह्म गा, वही मातारिश्मा द्वारा पद्ब्रह्म [प्राप] से मिथुनभाव को प्राप्त होता दुधा 'शुक्र' कहलाने लगता है। शुक्र क्या पदार्थ है । इस प्रश्न का उत्तर है पड्नह्मगर्मिन यजुय । विश्व के उपादान फारण ही को शुरू कहते हैं। इसमें वेद-सुवेद दोनों है । दोनों का मिथुनमार ही पिच का उपादान बनता है, अतएव इस मिथुनरूप को हम अवश्य ही 'शुभ' राम्द से ब्याहन कर सकते हैं । यही व्यापक अन्यात स्वयम्भू है । यही अव्यक्त भागे जाकर न्यात महदरूप में परिणत होकर विश्व का प्रभाव-प्रतिष्ठा परायण बनता है , जैसा कि निन पचन से स्पष्ट है- भन्यता व्यक्तपः सर्वाः प्रभवन्सहरागमे । राध्यागमे प्रलीयन्ते तत्रवाश्यक्तसंप्लके ! (गी० ८।१८) भनयमा म्यार कराक से सष्टि निर्माण होता है । र पर दि शातिर । राग शरीर में व्यापक सभी शुरु प्रजापति का कारण ना मन्त्रार्यसनाधि प्राकृतात्मा ईशेपनिपत् ॥ यहां समझिए । महामायावच्छिन्न ईश्वरशरीर शुक्रमय (ब्रह्म सुब्रह्ममय) है । जैसे मिन भिन्न शुक्रा- इतियों से भिन्न भिन (पुत्र कन्यादि ] प्रजाएं उत्पन्न होती हैं, एवमेव ईश्वर शरीर में व्याघ शुक्र की मिन्न भिन्न आहतियों से भिन्न भिन्न प्रजा की उत्पत्ति होती है। ईश्वर की प्रजा के -स्वयम्भू ( पुण्डीरस्वपम्भू ) २-परमेष्ठी, सूर्य, ४-चन्द्रमा, ५-पृथिवी यह पांच विभाग हैं । पाचों की समष्टि एक विश्वप्रजा है । ऐसी अनन्त प्रजाएं (अनन्त विश्व ) उस में उस के मिन्न मिन्न शुक्र प्रदेशों से उत्पन्न होती है । इस प्रकार शुक्र भेद से अनन्त विश्वप्रजात्रों को उत्पन्न कर वह अनन्तविश्वाधिष्ठाता बन जाता है ! ईश्वरतत्व 'शुक' रूप में कैसे परिणत हो जाता है ! प्रकृत मन्त्र इसी का समाधान करता है । एवं यह शुक्र भिन्न सिन्न प्रजाओं को कैसे उत्पन्न करता है ! पुण्डीर प्रजायों का क्या स्वरूप है ! इन सब प्रश्नों का समाधान 'स पर्य- गात्' इत्यादि मन्त्र करता है । स्वयम्भू ब्रह्मसत्य है । प्राकृतिकप्राण की विकासमूर्ति होने से इसे 'माकृतास्मा' कहा जाता है । महद्रूप व्यक्त विश्व का अधिष्ठाता यह स्वयं अव्यक्त है। इसी दृष्टि से इसे 'भव्यक्तात्मा' कहा जाता है । अध्यात्मसंस्था में यही यज्यतांश शान्तात्मा' नाम से प्रसिद्ध है -( देखिए कठोपनिषत् ११३)यही ब्रह्मसत्यानर, स्वयम्भू, अन्य- तात्मा, शान्तात्मा आदि विविध नामों से प्रसिद्ध पहिला प्राकृतामा है | अब महानात्मा नाम से प्रसिद्ध दूसरे प्राकृतात्मा की मोर विज्ञ पाठक्नें का ध्यान आकर्षित किया जाता है। इति मन्त्रार्थप्रकरणम् अव्यक्तात्माधिकरणे- . विश्वविश्वात्मनोः-सम्बन्धाधिकारः (अमृतात्मना सह ब्रह्मसत्यस्य सम्बन्धनिरूपणाम् ) ब्रह्म-कर्मणोः सम्बन्धः तदेजति तन्नजति तद्रे तद्वन्ति । तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्य बाह्यतः ॥ १ ॥ माम कर्मस्यम् कर्म ब्रह्मस्थम् यस्तु सर्वाणि भूतानि-आत्मन्येवानुपश्यति । सर्वभूतेषु चारमानं ततो न विजुगुप्सते ॥ १॥ ग्रोव कर्म पस्मिन्त्सवाणि भूतानि-आत्मैवाभूद्विजानतः । तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥३ ।।

Anche ॐ ब्रह्मकर्मसम्बन्धनिरूक्तिः व्यय.पुरुष प्रकृति को भागे कर के ही विश्वनिर्माण में समर्थ होता है । प्रकृति विशिष्ट, (अत एव) सृष्टिप्रवर्चक अव्यय पुरुप के ब्रह्म और कम यह दो प्रधान विवर्च है ! पानन्द-विज्ञान-मन का समुच्चय ब्रह्मभाग है, मन-प्राण-वाक् का समन्वितरूप कर्मभाग है 1 दोनों नित्य सहचारी हैं । ब्रह्म-कर्ममय अव्यय से (प्रकृति द्वारा ) उत्पन्न विश्व में भी ब्रह्म-कर्म (ज्ञान-क्रिया ) इन दो तत्वों का ही साम्राज्य है । प्रयास करने पर भी आप ज्ञान कर्म के अतिरिक्त तीसरी वस्तु प्राप्त नहीं कर सकते । विश्वात्मा में ब्रह्मभाग विकसित रहता है, विश्व में कर्म की प्रधानता रहती है । अतः एव विश्वात्मा को 'ब्रह्म' नाम से व्यवहन किया जाता है, एवं विश्व को 'क' नाम से पुकारा जाता है । इस भेद व्यवहार का मूल कारण यही है कि अव्ययात्मा का सृष्टिरक्षीभाग मन- प्राण- वाङ्मय है । मन रूपों का उपय-ब्रह्म-साम है, प्राण कर्मों का (क्रियाओं का) उश्य- ब्रह्म-साम है, एवं वाक्तत्व नामों का उक्य-प्रम साम है। नामरूपकर्म की समष्टि ही विश्व है। अव्ययात्मा के कर्मभाग को पालम्बन मानकर शब्दतन्मात्रा द्वारा ही विश्व का निर्माण हुआ है। इस कर्मप्रधान विश्व के ब्रह्म-शुक्र-विश्व यह तीन विवर्त हैं । अव्ययप्रधान पोडशी स्वयं अमृत किं वा अमृतात्मा है । उपनिषत् के आरम्भ में (पृ. ११) एवं प्राकृता- माचिकरणान्तर्गत वेदनिरुक्ति की प्रकरणसंगति में (पृ० सं०४।१५) उपनिषत् का जो विषय विभाग बतलाया गया है, आज उसे दूसरी तरह से देखिए । कर्मगर्भित ब्रह्म ( पोडशी पुरुष ) के अमृत-ब्रह्म-शुक्र-विश्व यह चार विवर्च हैं । यही चतुप्पाग्रह्म है , जिसका कि पूर्व के चतुष्पाद्नहानिरूपणाधिकार में विस्तार से दिग्दर्शन कराया जाचुका है । प्रकारान्तर से ईशोपनिषत् इन्ही चारों ब्रह्म विद्वत्तों का निरूपण करती है । मन्नत्रयात्मक प्रथम प्रकरण. (पुरु पात्माधिकरण) भमृत नाम से प्रसिद्ध विशुद्ध षोडशीपुरुष का निरूपण करता है. | 'अनेज, देकं मनसो जवीयः यह मन्त्र ब्रह्म नामसे प्रसिद्ध भव्यक्त तत्व का निरूपण करता है । । 1१६ प्राकृवारमा या ईशापनिषत् ॥ सम्बन्धनिक 'स पयंगाच्छुकम्' इत्यादि मन्त्र शुक्र नाम से प्रसिद्ध विकृतितत्वरूप व्यक्ततत्व का निरूपण करता है , एव 'सपर्यगाव' से भागे का सारा प्रकरण विश्व नाम से प्रसिद्ध वैकारिक जगत् या प्रतिपादन करता है । इन चारों विवत्तों में अमृतामा विश्वात्मा है , विश्वका आधार है, विश्वसाक्षी है, पुरुप है । ब्रह्म [अव्यक्त] मूलप्रकृति है । शुक्र विकृति है । विकार विश्ध है। पुरुष-प्रकृति-विकृति-विकार-ही अमृत-ब्रह्म-शुक्र-विश्व है। इन चारों में पुरुष ज्ञानप्रधान बनता हुश्रा सन्म है, प्रकृति-विकृति-विकार यह तीनों विवर्त कर्मप्रधान बनते हुए कर्मका ही हैं । यद्यपि विरस केरल विकारसव का ही नाम है । तपापे विकृतिरूप शुक्र ही इसका उपादान कारण बनता है । एवं कार्यरूप विश्व उपादान कारणरूप शुक्रसत्ता से ही सत्ता युक्त बन रहा है। कारण कार्य से अभिन्न है, विकार विकृति से अभिन्न है । अतएव विकृति रूप शुग यो निफारसयरूप विश्व में ही अन्तर्भूत मानलिया जाता है। तीसरा है प्रकृतिरूप प्रम गाव ! अन्यात प्रति ही व्यक्त विकृति (शुक) को उत्पन्न कर विश्व की मूस जननी बनती है। प्रकृति यी अव्यक्ता पस्या हो तो व्यक्तभाव में परिणत होकर शुक्र (उपादान) बनती है । इन इग प्रतिरूप अन्यमा अझ का पितृतिरूप व्यक्त शुक्र में अतीव मान लिया जाता है । प्रकृति यो विकृति से पृथक् नहीं किया जासता, विकृति को विश्व से पृपक् नहीं माना जासकता। पाप में प्राीपी (निमित्तशरण) ६, निवृति उपादाकारण है, बैंकारादि विश्व कार्यरूप है । चौथा सय ममतामा प्राविनि-पिशार इन तीनों का पालम्बन बनता हुमा सर्मालम्बन है। यह पारणातीत है । परि सूचनाष्टि से विचार परने पर स्वय अमृतारमा में भी (पोडशी पुरुष भी) माय--प्रदर-मात्मवर-अमर विश्व इस प्रम से उ झारणता चतुष्टपी पी गगा पिद हो जाती है। इस विभाग में भव्यय अमृन है, भतार ब्रह्म (अन्यात प्रपी), पशुत्र (ITI), प प्रम-शुर-पिन समष्टिवारिक माप है। दसरे शो पापमापन है, पर निशार है, मामशा उपादानपारण है, एव मह-T पिएको म काम नपतपाी मौत यि के पास रामार ये पियार उt.

प्राकृतात्मा মেনিকি ईशापनिषत् ॥ - - स्थित होने पर इस क्रम को प्रधानता नहीं दी जसकती 1 'क्षरः सर्वाणि भूतानि' के अनु. सार भौतिकविश्व अव्यय-अदर की कारणता से पृथक् ही मानना पड़ता है । यह ठीक है कि प्रात्मकारणता ही चरमकारणता है , तथापि स्थूस दृष्टि से हम पोडशीरूप अमृतात्मा को कार्यकारणातीत ही कहेंगे । इस प्रकार चतुष्पाद्ब्रह्म के सम्बन्ध में प्रात्मा-विश्य भेद से दो विवर्य होजाते हैं । आत्मा भी चतुष्पात है, ब्रह्म मी चतुष्गत् है । दोनों की समष्टि श्रष्टाहर गायत्री छंद है । अतएव ब्रह्मविद् ब्राह्मण गायत्री से ही विश्व का निर्माण मानते हैं । । पुरुष-प्रकृति विकृति सब कुछ गायत्री के उदर में समाविष्ट है । गायत्री चतुण्याद् ब्रह्म की विभूति है । 'सर्वाणि इ वा छन्दांसि चतुरुत्तरारिम' के अनुसार गायत्री के प्रारम्भ में चार पाद (अक्षर) थे, परन्तु विश्नोत्पति के अनन्तर चतुष्पाद् आमनामयी गायत्री अध्यक्षा वन- जाती है । इसी बपत्रिभूति की प्राप्ति के लिए ब्रह्मविद् ब्राह्मण ब्राह्ममुहूर्त में पूर्वाभिमुख खड़े हो कर गायत्रीनहा का स्मरण किया करते हैं । गायत्री ही सब कुछ है । इसी रहस्य को लक्ष्य में रखकर छान्दोग्य श्रुति कहती है- "गायत्री वा इद सर्व-भूत-यदिदं किन्न । बाय गायत्री । वाग्या इई सई भूतम् । गायति च त्रायते च । तावानस्य पहिमा ततो ज्यायांश्च पूरूपः । पादोऽस्य सर्वा भूतानि, त्रिपादस्पामृतं दिवि । यदैनद ब्रह्म इति, इदं वाव तत्, योऽयं- चाही पुरुपादाकाशः । यो वै स पहिर्या पुरुपादाकाशा-भयं वार स योऽयमन्तः पुरुप आकाशः । यो वै सोऽन्तः पुरुष आकाराः - अयं वाव स योऽयमन्तर्हृदय प्राकाशः । तदेतत् पूर्ण अंमवर्ति, पूर्णममतिनी श्रियं लमने य एवं वेद" इति । [छान्दोग्योपनिषत् ३ प्र. १२ खं.)

सम्यानकि प्राकृतात्मा । -- ईशोपनिषत् ।। । 'प्राकृतात्या' यह शीर्षक रक्खा है । सामान्य दृष्टि से सारी उपनिषत् के दो ही विभाग है। भारम्भ के तीन मन्त्रों की समष्टि पुरुषविभाग है, आगे के ( अनेनदेकं-से भारम्भकर नम उक्ति विधेम पर्यन्त ) १५ मन्त्रों की समष्टि प्रकृतिविभाग है । प्रकृति की मागे जाकर प्रकृति- विकृति तिकारसंघ (ब्रह्म-शुक्र-विश्व ) यह तीन अयस्थाएं होजाती हैं, अतएव दूसरा विभाग तीन भागों में विभक्त हो जाता है । 'अनेजदेक०' इत्यादि चतुर्थमन्त्र प्रकृति के ब्रह्मवियर्त का निरूपण करता है । 'सपर्यगात्' इत्यादि पाठयां मन्त्र प्रकृति के शुक्रवियत्त का निरूपण करता है। एवं आगे के (अन्य तमः इस इ मन्त्र से प्रारम्भ कर 'नम उक्ति विधेम' इस १८ मन्नत) १० मन्त्रों की समष्टि प्रकृति के विश्वविवर्चभूत वैकारिकसंघ का निरूपण करती है । इस प्रकार १ (१ मन्त्र), १ (८ मन्त्र ), १ (६ से १८ तक) इस क्रम से प्रकृतिके ही तीनों विवत्तों का निरूपण हुआ है । उपनिपदुपदेश जीवात्मा (अध्यात्म ) से सम्बन्ध रखता है । जीवात्मा देवसत्य नाम से प्रसिद्ध है । जीवदेवसत्य की प्रतिष्ठा ईश्वरीय देवसत्य है । यह दोनों ही देय- सत्य विश्व के पृथिवीपर्व पर प्रतिष्ठित हैं ! देवसत्य अग्निरूप है । सोम अग्नि का जीवन है। सूर्य इस देवसत्य का आत्मा है । सूर्यप विश्व ( व्यक्त विश्य ) देवसत्य की मूलप्रतिष्ठा है । सोममय चन्द्रमा जीवनीय रस है , जीवन का साधन है , पृथिवी साधार है । इस प्रकार व्यक्त विश्व में सूर्य-चन्द्रमा-देवसत्य-पृथिवी यह चार विधत्त होजाते हैं । सूर्य भी अग्नि है, देवसत्य भी अग्नि है, पृथिवी भी अग्नि है , मध्यपतित सोमरूप चन्द्रमा भी अग्नि से ही गृहीत है। विश्व के लिए 'अग्नीपोमात्मक जगत' यह कहा जाता है । इन में अग्निकला सूर्य-देवसत्य-पृथिवी इन तीन भागों में विभक्त है । चौथी सोमकला है । इसप्रकार अग्नीपोमात्मक विश्वके सूर्यादि उक्त विवत होजाते हैं । चारों की समष्टि को हम ( अन्नसोम को अक्षा अग्नि के गर्भ में मानते हुए) अग्निशब्द से व्यवहृत कर सकते हैं । समष्टिरूप से विश्व सोमगर्मित अग्नि है, व्यष्टिरूप से वही सूर्य-चन्द्रमा-देषसत्य-पृथिवी इन चार भागों में विभक्त है । सूर्य व्यक्त विश्व का धारम्भस्थान है, पृथिवी अन्तिमायान है । मध्यमें चन्द्रमा और देवरात्य प्रतिष्ठित हैं । इन चारों व्यष्टियों का मन्ततोगन्या समष्टिरूप अग्नि पर अवसान है । इस क्रमसे । मन्त्रात्मक चौथै विश्वप्रकरण के , 1 ।

+देसराप सरप, वियो। प्राएव भूपिको देस निरूपए के लिए तीन मवरसने प्राकृारमा हा ईशोपनिषत् ॥ थान्तर पांच प्रकरण हो जाते हैं । सूर्यमकरण-चन्द्रप्रकरण-देवसत्यप्रकरण-पृथिवीप्रकरण अग्निप्रकरण इन प्रकरणों में ३ मन्त्र (२-१०-११) सुर्यकला का, ३ मन्त्र (१२-१३-१४) चन्द्रकला का, २ मन्त्र (१५-१६ यह दो मन्त्र पूरे एवं तीसरे १७ वे मन्त्र का 'वायुरनिनमः तम्' यह एक चरण) देवसत्यक्ता का , पौन मन्त्र (१७ वे मन्त्र के शेष तीन चारा ) पृथित्रकला का, एवं एक मन्त्र (अठारहवां मन्त्र) समष्टिरूप अग्नि का निरूपण करता है, जैसा कि विषयविभागप्रदर्शन में स्पष्ट कर दिया गया है । ययपि इस अनासगिक चर्चा से पाठक तुम्ध होरहे होंगे । परन्तु हम उन्हें विश्वास दिलाते है कि यह क्षोभभाव उन के लिए उपनिषदज्ञान का मार्ग अजु करदेगा । चलिए समष्टिरूप से विषयविभाग की थोर चलने हुए अपना दोम और बदाइए । उपनिषद् को श्रामवी ईश्वरप्रजापति का निरूपण करते हुए तदंशभूत अध्या मर्मस्या का निरुपण करना है । ईश्वरसंस्था पुरुष घोर प्रकृतिभेद से दो भागों में विभक्त है । विश्वनंबन्ध से पुरुष को थपर्ने कर्ममाग को आगे रखना पदता है । वयं पुरुष भी अव्यय-ध्यातर-हर मेद है बंग विमत है , एवं अव्यय का कर्मभाग भी मन-प्राण-वाक् भेद से बेवा विभक्त है । इन में मन अव्ययप्रधान है यक्षा प्राणप्रधान है, क्षर वामधान है , यह है ईश्वरविपर्नु । अन्याय नया में प्रत्ययाप मन कामना से भोगों का, प्राणम्प अक्षर का का, वाग्प हर मावर • 'मूकमती वा मुग्म है । यही सत्सरकर विश्व के प्रदत्त है। अतए दोनो में ३-३ भैर मेरमान मम रसगा। पर पूरे जोर मात्र नौ तु पयायोमन्त्र । १७ माघ के हीन चापरिक्ष में मुळ गए 1 कारण नमो देवमाप से प्रतिवाद । दिगम से यह प्रविधि मददी है, अपने एयर पाद से पर माप में परिएली है, माहिएन्सारण में जाकर सष्ट दोमाया । इस रस बोल्पा में तार दीन पारी में 70 पण या दे, एक परप या देवसाय प्रारप में ग्रन्त्रभाव है। १२४ पर यापेमारामबन्ध अनेक प्रकार से उपलब्ध होता है । उदाहरण सम्बन्धनक सम्बन्ध में मन्त्रसम्बन्धिती क्या सम्बन्ध है या सम्बन्ध है । दमरे शन्दों में यात्ममा कमविर में किस सम्पन्ध से माम प्रसिद्ध है। प्राय कारण है, रिश्य कार्य है। सोममें दम कार्यकारणभावों के सम्पन प्रावात्मा सा ईशापनिषत् ।। प्रकृत प्रकरण सम्बन्ध का निरूपण करता है । सम्बन्ध सम्बन्ध जिज्ञासा सम्बद्ध है। अत एवं प्रसंगोपात्त मन्त्रसम्बन्ध का दिग्दर्शन कराना पड़ा । पुन. प्रकृन का अनुसरण किया जाता है। यद्यपि अभी विश्व का खरूप नहीं चलाया गया है । कारण अग्नीपोमात्मक विश्व का उपादान शुक्रररूप व्यक्त महत् है, इस की मूलप्रकृति छव्यक्त ब्रह्म है । 'अनेजदेकम' से इस का निरूपण हुधा है । फिर भी ब्रह्म ही विश्व की मूलप्रकृति है । प्रकृतिः की' के अनुः सार यही व्यका पस्था में श्राफर विश्वरूप में परिणत होने वाली है। जब विश्व की मुलप्रति फा निरूाण होगया तो एक प्रकार से विश्व का निरूपण होगया । अनेजदेकम्० के अनन्ता ही ऋषिने अन्न-कर्म (पुरुप-प्रकृति) के सम्बन्ध का निरूपण करना उचित समझा है । इस प्रकरण में प्रम शब्द शोडशीपुरुष का वाचक है, कर्मशब्द पिकार ( विश्व), विकृति (शुक) गर्मिन अव्यक्त ब्रह्म वा याचक है । इस कर्ममय , अतएव कर्म नाम से (की नाम हम थायत ना का विकास उस पुरुषनाम से (पुरुष ब्रह्म के कर्मभाग से) हुमा भाग्मार कला से यह अध्यक्त ग्रह का ब्रह्म ( उपादान ) वना है । अतएव सृष्टिकर्तृत्व की अपेक्षा से उसे हम अाप ही महम कह सकते हैं । 'तत्ष्ट्वा तदेवानुमाविशत्' के अनुसार हरद्वारा अन्यात ब्रह्म को उपन्न वर बह पोडशीपुरुष (अमुतामा) इसके गर्भ में प्रविष्ट होदय है। दूसरे शब्दों में भौतिक कर्मरूप विरर में वह अमृत ब्रह्म प्रतिष्टिन होरहा है । ऐसी परि- स्थिति में यह प्रश्न उपित होता है कि इस ब्रह्म (मामा) का इस कर्म (विश्य के सी प्रापिट होकर गियर-विश्वेश-विरगधार प्रादि नामों से प्रसिद्ध हो रहा है : प्रकृन तीनों है। मी सयान जिज्ञासा को शान्त करते हैं। दर्शन शारय, अन-कर्म का सम्बन्ध ६ प्रकार से माना है । यही सम्बन्ध पविक प्रसिद्ध है । अपनी . ।

भारतमा सम्बन्धनिति या ईशोपनिषत् । लिए कुछ एक कार्यकारणभावों का विचार कीजिए। विविध कार्यकारणभावों का निरूपण करते हुए अभियुक्त कहते हैं- हेतुनिमित्तं प्रकृतिश्च योनिः भारसामने मभवोदभवौ तथा । विवर्तसंचारिरसप्रवादिकपकसपूर्व समायिका मताः || १-दीपशलाका से दीपक जल उठना है । दीपशलाका कारण है, इससे प्रचलित दीपशिखा, कार्य है। इन दोनों का सम्बन्ध हेतुसम्बन्ध' है । इसे ही 'मवर्तक' सम्बन्ध भी कहा जाता है। कैसा विलक्षण सम्बन्ध है । कारण का कार्यरूपमें परिणत होजाना उपादान सम्बन्ध है। यहां कारणरूप दीपशलाका कार्यस्वरूप साधक बनती हुई भी स्वयं दीपवाला नहीं बनती, यही विलक्षणता है। २-वायु में एक प्रकार का नोदनावल (प्रेरणावल) देखा जाता है । मोदना कार्य है, वायु कारण है । इसी वायुनोदना से वृद्धादि में कम्प होता है । मेघों का संचरण होता है। यह कार्यकारणसम्बन्ध नैमिनिक किंवा निमित्त संबन्ध नाम से प्रसिद्ध है। ३-आकाश में पक्षी उड़ रहे हैं। सा दंशन ( काट ) करते हैं। मृगशावक (हरिण के बच्चे ) उछला करते हैं । पुष्प में से गंध निकला करता है। यहां पक्षी-सर्प-मृगशावक-पुष्प यह चारों क्रमशः उड़ना-दंशन-उछलना-गंध इन चार कार्यों के कारण हैं । इनका पारस्परिक सम्बन्ध 'प्राकृतिक' (खाभाविको, किंग प्रकृति (सभाव) सम्बन्ध कहलाता है। ४-शब्द से शब्द पैदा होता है। आप अपने मुख से जो शब्द बोलते हैं, उसका आकाश में सर्वत्र व्याप्त वाक्समुद्र में श्रावात होता है । श्राघात होते ही वाक् समुद्र में उच्चारित शब्दा- काराकारित लहर उत्पन्न हो जाती है। एक लहर के प्राघात से धागेदूसरी लहर,दूसरी से तीसरीलहर, भीसरी से चौथी, पांचवीं इस प्रकार वीषियों की धारा बन जाती है । यही प्रतिपनिमांव है । यही लहर घन्य व्यक्ति के कानपर पहुंच कर शब्दोत्पत्ति का कारण बन जाती है। इसी के लिए- 'शन्देभ्यः शन्दोत्पत्तिः' यह कय जाता है। आप जो शब्द सुनते हैं वह उक्त वीचिन्याय प्राकृतारमा । ईशोपनिषत् ॥ सम्बन्ध नेक्षित - प्रतिष्ठित हैं। शिल्पी नई मूर्ति नहीं बनाता, अपि तु वह पापाणस्थित र्ति के बहिरावरण को हटा देता है । शिल्पी जिन मूर्तियों का स्वरूप जानता है, उन्हीं का स्वरूप पाषाण में से वह निकाल सकता है । ध्यान रहै-यदि शिल्ली अपने शिल्पानों से (टांकी हथोड़े से ) मूर्ति पर प्रहार कर देगा तो मूर्ति नष्ट हो जायगी । मूर्ति को बचा बचा कर ही उसे बाहर का भावारण हटाना पड़ता है। श्रावरण के प्रात्यन्तिक हटा देने से पाषाणस्थ प्रतिमा प्रकट हो जाती है । इसी का नाम सत्कार्यवाई है । जो वस्तु है, उसी की उपलब्धि होती है- यदिस्या दुपलभ्येन । यदि पापाण में मूर्ति पहिले से न होती तो सहसशिल्पी भी पापाण की मूर्ति नहीं बना सकतेथे । यदि शिल्ली ही पापाण को मूर्ति का रूप देता है तो क्यों नहीं वह पानी की मूर्ति बना लेता। इसी अभिप्राय से 'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः यह कहा जाता है। यही प्रतिमापूजन की अनादिता एवं वैदिकता है । इसी उद्भव सम्बन्ध को 'माविकसम्बन्ध' कहा जाता है । विश्व नया नहीं बनता, अपि तु अन्यलारण के भंग से प्रकट होता है। ७- भूमि से अंकुर उत्पन्न होता है। प्राणियों से नोदना बल ( प्रेरण बल ) का उदय हो ता है। रुद्र से ताप उत्पन्न होता है । पुरुष से पुत्र उत्पन्न होता है । मकड़ी से जाल उत्पन्न होता है। यहां भूमि-प्राणी-रुद्र-पुरुष-मकड़ी कारण हैं, अंकुर-नोदना-ताप-पुत्र-जात- कार्य हैं । इन का सम्बन्ध 'उद्भवसम्बन्ध' कहलाता है । इसे ही भौतिकसम्बन्ध' भी कहते हैं। यहां प्रमव का ( कारण का) नाश नहीं है, केवल प्रभत्र का एक देश प्रभव से पृथक् होकर कार्यरूप में परिणत होता है । सारा भूपिण्ड अंकुर नही बनता, साग शुक्र पुत्र नहीं बनता । सारी मकड़ी जाल नहीं बनती। अपितु भू-शुक्र-मकड़ी का एक प्रदेश ही अंकुर-पुत्र जालरूप में परिणत होता है । इसी को सांतानिकसम्बन्ध भी कहा जाता है । -पाठो विवन सम्बन्ध है। अविनपरिणामयाद ही विपर्व नाम से प्रसिद्ध है । ब्रह्म विश्व बन गया है । ब्रह्म की धास्थान्तर का नाम ही विश्व रख दिया है । अथवा विश्व ब्रह्म से पृयक पदार्य नहीं है । ब्रह्म ही विश्वासे प्रतीत होता रहा है। विश्व साक्षात् ब्रह्म है । यही । १२१ प्राकृतात्मा सा ईशोपनिषत् ॥ सम्बन्धनिति ब्रह्मनियर्स नाद है । इसी को प्रातिभासिकविवर्ग कहते हैं । विश्व ब्रह्मवत् स्वतन्त्र सत्ता नहीं रखता । विश्व की ये यस भाति है । सत्ता ब्रह्म की ही है। अथवा ससाय का ही विश्वरूप से भान होरहा है । भलातचक क्षितिजवृत्त का भी इस प्रातिमासिक विवर्त में ही अन्तर्मान है। १-खगोल में मय्यरेखा विपुत्रद्वृत्त है । जिस पर भूपिण्ड सूर्य के चारों ओर परिक्रमा लगाता है, वह वृत्त नान्तिवृत नाम से प्रसिद्ध है । तत्तत्तारापुञ्जो में विभक्त मेष-वृप-मिथुनादि राशिए राशिमृतिए है । नक्षत्रों से नक्षम पुरपो या खरूप बना हुआ है। यह सब काल्पनिक जगत है । माकाश में कोई वास्तव में गोल वृत नहीं है, क्रान्तिवृत्तरूप कोई सड़क नहीं बनी हुई है। राशियों की कोई प्रतिमाए नहीं है। केवल वरूपना है । कल्पना से वृत्तादि कल्पित है। यही विकल्प किं या वैकल्पिक सम्बन्ध है। १०-हमारा मन नई नई फ्ल्पनाए किया करता है । अपने अन्तर्जगत् में विचित्र विचित्र स्वरूपों की भावना विया करता है । यही गनोराज्य है, इसी को 'ऐच्छिर सम्बन्ध' कहा जाता है । ११-धृक्ष से पुष्प-पल उत्पन्न होते है । लौह से किड (जंग) उत्पन्न होता है । शरीर से केश लोम उत्पन्न होते हैं, शुक्र उत्पन्न होता है । यह सब 'औपपादिक सम्बन्ध हैं। १२-तैल से ली उत्पन्न होती है । शुक्र शरीररूप में परिणत होता है । शण से रासी बनती है, पर (कागज) बनते हैं । अगार से भरम उत्पन्न होता है । वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथिगी उत्पन्न होती है । यहाँ पारण ( प्रकृति ) अपने स्वरूप से चुत होता हुमा कार्य (विकृति) रूप में परिणत हो रहा है । स्वररूपान्तरमहरूप यही सम्बन्ध परिणामी किंवा परि- णामिक नाम से प्रसिद्ध है। १३-रानी से प्रोपधिर, थोपधियों से शुत्र उत्पन्न होता है । यही रसानुत्तिक किं या रसगही सम्बन्ध है। १४-पीजया-मुरा-माता-यह सब कार्य सांपोतिक समवायी सम्बन्ध में अस्तमन हैं। । १५.

प्राकृतात्मा या ईशोपनिपत् सम्बन्धनिरूक्ति १५-पानी में लहर, मिट्टी में घट, तन्तु से पट, लकड़ी से कपाट, खण से कटक, तेज- अब्धानका क्रमिक विकास इन सब का मौपादानिक किंवा उपादान सम्बन्ध में अन्तमाय है। १६-अग्नि से पानी का गरम होजाना, रुद्र से ताप शेजाना, सुवर्ण का पिघल जाना, इत्यादि सांझामिक सम्बन्ध हैं। १७-फटिकमणि पर जपापुष का राग, यह आक्रमिकसंचारी सम्बन्ध है । इसी को प्राभिवारिक सम्बन्ध कहा जाता है। १८-ऊण (मरुदी) की नाभि से तन्तु उत्पन्न होता है । मकड़ी कारण है, मकड़ी से उत्पन्न जाल कार्य है। इसी प्रकार पुरुष से केश लोम उत्पन्न होते हैं । पुरुष कारण है, केशलोम कार्य है। पृथिवी कारण है, ओषधि वनस्पतिए कार्य हैं । पिता कारण है, पुत्र कार्य है । मृत्तिका कारण है, घट कार्य है । इन पांचों ही कारणों का उपादानभाव से सम्बन्ध है। उपादानकारण- वेन पांचों की कारणता यद्यपि समान प्रतीत होरही है, परन्तु सूक्ष्म विचार करने से पांचों फा पार्थक्य स्पष्टरूप से प्रतीत होने लगता है । पहिले ऊर्णनाभि को ही सीजिए । मकदीकी नामि से उत्पन्न होने वाला जाल अपनें प्रभव (गकड़ी) से पृथक् निरावलम्ब रहता है। साथ ही में आगे जाकर यह जाल भपर्ने प्रभव (मकदी) में लीन भी हो जाताहै । इस प्रकार अपने प्रभवका यानय न लेना, प्रभव से पृथक् रहना, अन्तमें प्रभव में ही लीन होजाना, यह एक प्रकार का कार्यकारणभाव है। ऊनाभि में, प्रभवानानम्वनत्व, प्रमवपृथक्चरत्त, प्रभवविलयनत यह तीन कोटि है। केशलोम पुरुष से उत्पन्न होकर पुरुष में ही प्रतिष्ठित रहते हैं । जाले की तरह पुरुष से पृयक नहीं रहते । साथ ही में यह अपने प्रभव पुरुष से पृथक् भी होजाते हैं । इस प्रकार यहां प्रभपालादनत्व, प्रभवानालम्बनत्व दोनों धर्म हैं । जाल की तरह इनका प्रभव में विलयन नहीं होता । श्रोपधि वनस्पतिएं प्रभव (पृथिवी) में मालम्बित हैं, आलम्बित होती हुई स्वतन्त्र- रूप से ऊपर की और बढ़ती हैं, यही इनका पृथक्वरत्व है । इन्हें काट कर फेंक दीजिए, ।

नाफतारमा सम्बनिक .ral ईशोपनिषत् ॥ , । 1 में फिर भी इनका पालम्बन पृथिवी ही रहती है । मकड़ी के जाल में यह बात नहीं है । यदि उसे अलग करदिया जायगा तो माड़ी इसका पालम्वन न रहेगी। यहां प्रत्येक दशा में पृधिरी ही आलम्बन है । मकड़ी का जाल जैसे गकड़ी से पृथक् होजाता है, ओषधि वनस्पतिएं शरीरभूत पृथिवी से कभी पृथक् नहीं हो सकती । इनका विलयन पृथिवी में ही होता है । मनदी में विलयन अविलयन दोनों धर्म हैं । यहाँ केवल विज़यन ही है । पृथक्चरत्व जाल धौर भोपधियों में समान है । पुरुष से उत्पन्न केशलोम में पालम्बनत्व-मनालम्बनत्य दोनों धर्म थे, मादी में अनालम्यनत्व ही था, पृथिवी में बालम्बनत्व ही है। साथ ही में केशलोम में प्रभा . विलयनत्व है ही नहीं। प्रोपधि वनस्पतियों में प्रभवविलयनत्व ही है । मकड़ी के जाल पिलपनल अविलयनत्य दोनों धर्म में इस प्रकार तीनों में कुछ न कुछ अन्तर है। पिता पुत्र के कार्यकारणभाय में तीनों से विलक्षणता है । यहाँ पुत्र अपने प्रभाव (पिता) में प्रारम्यित नहीं है। इसका पिलपन भी मिट्टी में होता है। परन्तु जाल-प्रोपधि--केशलोम-पुत्रवत्-पदा मिट्टी से पृपक्चर नहीं है। यदि से विकूलिंग उत्सन्न होते है । यहां मी उपादान कार्य कारणमार सम्यन्य है. परन्तु यह पापों से मिलक्षण हैं । दीपशलाका से घाय दीपग जल पड़ता शलाकाग्नि पारण है, परन्तु शलाकाग्नि का यत् किचित् अंश भी दीपक में प्रविष्ट नहीं होता। युग्गारयत निमित्त पारणता का भी ऐसे स्थल में समावेश नहीं होता, एवं मृघटनर उपा. दान यारणता भी नही पानी नागपती है। पैसा विसक्षण सम्बन्ध है। उपयुस पुष एक उदाहरणों से पाटकों को यह विदित होगया होगा कि कार्यकारणभार रिमी पुरुही नियम पर प्रचित नहीं है । यदि ऐसा होता तो विरस के सारे पदार्थ ममानधर्मा होमपा उगारक तराई ममें कोई मन्देह नदी ! केरत सम्बन्ध की मिल एवं गृपया से पदापों में पिय सान होनाता है। भगएर सृष्टि का पपरगान PIRTId नमकानों पर बनना परता।

সা চাষ।
पम्बन्धनिति
- ईशोपनिषत् ॥
१-प्रसमालम्बनत्य
१-२-प्रमाविलयन वाविलयनत्र
३-प्रभवपृथक्चरत्य
"ययोर्णनाभिः सुनते गृहवे च १
04
१-प्रभवालम्बनत्व
२-२-प्रभवविलयनत्व
३-प्रमनपृथञ्चरत्व
"यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति" २
१-प्रभालाबनवानालम्मनत्व
३-२-प्रभवाविलयनत्व
३-अभयपृथरुचरत्व
"यथा सतः पुरुपात केशलोमानि" ३
१-प्रभवानालाचनव
४-२-प्रमानिलयनत्व
३-अभयपृथक्चस्व
"धा पितुः पुनः
१-प्रभवालम्बनत्व
५-२-प्रमपविलयनत्व
३-प्रभवापृथक्चरल
"यथा मृत्तिकातो घट" ५
1-प्रगनालाबनवानालम्बनाव
६-२-प्रभाविलयनवायिलपनः
३-प्रभवपृथक्वरत्वापृथक्चरल
"यथा सुदीप्नात् पावकाद्विस्फुलिङ्गामभवन्ते
६

प्राकृतामा - । ईशोपनिषत् ॥ सम्बनिक उपर्युक्त कुछ एक निदर्शनों से पाठकों को विदित होगया होगा कि विश्व में कार्यकारण- भार अनेक भागों में विभक्त हैं। ऐसी अवस्या में -'एकस्मिनु धम्मणि विरुद्ध नानाकोट्यव- गाहिज्ञानं संशयः इस न्याय के अनुसार कारण ब्रह्म और कार्य कम के सम्बन्ध में जिज्ञासा का होना स्वाभाविक होजाता है। प्रकृत में केरल 'पविकल्प सम्बन्ध' की ही प्रधानता है । इस पविकल्प सम्बन्ध के धागे जाकर १३ विवत होजाते हैं । इन १३ हों का ४-४-५ यह क्रम है । चार वरुपसम्बन्ध है, चार पर्यासतित्व सम्बन्ध है, णच अन्वाभक्तिचित्र, सम्बन्ध हैं । तेरहों का पविकल्पों में श्रन्तीव है । इसी पड्निकल्य सम्बन्ध को- 'अभिन्न- सत्ताककार्यकारणभावसम्बन्ध' या जाता है। उदाहरण के लिए एक मिट्टी के घड़े पर दृष्टि डातिए । मिट्टी से घड़ा बना है, यह सभी को विदित है । मिट्टी कारण है, घड़ा कार्य किंवा कर्म है । मिट्टीरूप कारण से उपन्न घटरूप कार्य का मिट्टी के साथ क्या सम्बन्ध अयमा मिट्टी का घड़े के साथ क्या सम्बन्ध है ! (कार्य का कारण के साथ, कारण का कार्य के साथ क्या सम्बन्ध है!) यह विचार कीजिए । मिट्टी घट की प्रतिष्टा है । मिट्टी को छोड़ कर घट कथमपि खस्वरूप से प्रतिष्टित नहीं रह सकता । ऐसी परिस्थिति में हम कह सकते हैं कि घट मिट्टी में है, यही प्रपम सम्बन्ध है । साथ ही मे घटावच्छिन्न मिट्टी घट को छोड़कर नहीं रह सकती । मिट्टी का जो भाग घट कहलाता है, यह घटरूप मृत्तिका सचमुच घट के विना नहीं रह सकती । घट के नष्ट होजाने पर मिट्टी अश्य रहेगी, परन्तु घटाकाराकारित मितीन रहेगी । घटकाररूप मिट्टी तभी तक है , जब तक कि घट का याकार विद्यमान है। ऐसी परि- स्थिति में हम कह सकते हैं कि मिट्टी घड़े में है, यही दूसरा सम्बन्ध है । घट एक स्वतन्त्र पदार्य है , मिट्टी एक खतन्त्र पदार्थ है । यदि घट और मिट्टी एक ही वस्तु होते तो-'घटमानय' ( घडा लायो ) इस धाज्ञा से मिट्टी भी लाई जासकती थी , एवं मिट्टी लायो' इस वाक्य से मृत्तिका का भी प्रानयन होसकता था, परन्तु ऐसा होता नहीं । घटशब्द से बड़ा ही लाया जाता है, मृत्तिका शब्द से मिट्टी ही लाई जाती है । अतः हम कह सकते हैं कि मिटी घड़े मे भिन्न है, यही तीसरा सम्बन्ध है । घट के परमाणु ढूंढ जाइए, मृतिय + प्राकृतात्मा सम्बन्धनिकि शा-ईशोपनिषत् ।। के अतिरिक्त उसमें आपको दूसरी वस्तु न मिलेगी । मिट्टी ही तो घटरूप में परिणत होती है। घट मिट्टी से भिन्न पदार्थ नहीं है । 'वाचारम्भगां विकारो नामधेयं मृत्तिके व सत्यम्' के अनुसार घट सत्ता वस्तुतः मिट्टी की ही सच्चा है । ऐसी परिस्थिति में घट मृत्तिका से कैसे पृथक् होसकता है । घट मिट्टी हैं, यही निष्कर्ष है । यही चौया सम्बन्ध है । मिट्टी घट के बिना भी रह सकती है, परन्तु घट बिना मिट्टी के एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकता । यही पांचा सम्बन्ध है । घट कोई स्वतंत्र पदार्थ नहीं है। मिट्टी ही घटरूप से दिखलाई देरही है । जिस प्रकारस्थाणु में पुरुष की,मृगमरीचिका में जल की, शुक्ति में रजत की, रज्जु में सर्प की भान्ति हो जाती है, एवमेव मिट्टी में घड़े की भ्रान्ति हो रही है। इसी को दार्शनिक अभ्यास कहा करते हैं । मिट्टी घड़ा नहीं है, केवल प्रतीति होरही है । जिस सम्बन्ध से सर्वथा असत् घट मिट्टी में सत्रूप से प्रतीति होरहा है, उसी को अभ्यास सम्बन्ध' कहा जाता है । यही ६ ठा सम्बन्ध है। इसप्रकार मुद्घट का कार्यकारणसम्बन्ध निम्नलिखित ६ भागों में विभक्त । । देखा जाता है। Durnnn..... 1000004.wmum १-घटो मृदि "( घड़ा मिट्टी में है )- कार्य कारणे २--मृद् घटे' - (मिट्टी घड़े में है) →कारणं कार्य ३-मृद्घटौ भिन्नौ" “(घड़ा भिन्न है, मिट्टी भिन्न है)-कार्यकारणेभिन्ने ४-मृत्तिकैव घट:............. "(मिट्टी ही धड़ा है). →कारणमेव कार्यम् ५-घटो मृतिकातोऽभिन्ना, मृत्तिका-घड़ा मिट्टी से मभिन्न है। →कार्य कारणादभिन्नग. मिट्ठी घट से भिन्न है --- कारणं तु कार्याद् निम् ६-मययस्तो घट:............... (मिट्टी में घड़ा अभ्यस्त है )- कारणे कार्यमध्यस्तम् --- तु घटतो भिन्ना उपर्युक्त यही ६ सम्बन्ध ब्रह्मकर्म में समझिए। 'तत सहा तदेवानुमाविशत्" के अनुसार वह ब्रह्म- तर कर्ममय विश्व में व्याप्त है। उधर वह कर्म (विश्व) उस ब्रहा में प्रतिष्ठित है । ब्रह्म भिन्न है, विश्व भिन्न है । ज्ञानकर्ममय ब्रह्म का कर्मभाग ही विश्व वन रहा है । ब्रह्म कर्म के भिन्न है, क्यों तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सवस्य बाह्यतः ॥१॥ (ई० ५ मं०)। सम्बन्धनिति +- N इन ६यों सम्बन्धों में प्रकृत में तीनों मन्त्रो द्वारा प्रथम-द्वितीय-चतुर्थ इन तीन सम्बों निरूपण करता है । 'यस्तु सर्वाणि.' इत्यादि मन्त्र 'कर्म ब्रह्मस्थम्' इस द्वितीय सम्बन्ध का निरूपण करता है । एवं यस्मिन्सगि' इत्यादि मन्त्र 'ब्रह्मर फर्म इस चौथे सम्बन्ध का को विशेष माना है। तीनोम से प्रपमसम्बन्ध का निरूपण करता हुमा निम्नलिखित मात्र माकृवात्मा आईशापनिपत् । कि कर्ममय विश्व के न रहने पर भी वन स्वस्वरूप से विना विश्व की अपेक्षा के प्रतिग्नि रहता है परन्तु कर्म (विश्व) विश्व से अभिन्न है । कारण कर्म ( विश्व ) ब्रह्म कारण के बिना सर्पया अनुपपन्न है। ब्रह्म में कर्म अव्यस्त है ! यही ब्रह्मकर्म का पविकल्प सम्बन्ध है । वह इममें है । यह उसमें है। दोनों अभिन्न हैं। वहीं यह है । वह इससे भिन्न है, यह उससे अमिल है उस में यह मास रहा है । १-मा कर्मस्पम् कारणं कार्यस्थम् २-कर्म ब्रह्मस्थम →कार्य कारणस्थम् ३-महामणी भिन्न →कार्यकारणे भिन्ने ४-नौर बम कारणमेव कार्यम् ५-प्रा कर्मत पृथक कारण कार्यात्पृथक् । "कायं तु कारणदपृथका ६-ब्रमणि शर्माध्यस्तम्-~कारणे कार्यमध्यस्तम् का निम्पण हुआ है । 'तदेजतिः' इत्यादि मन्त्र 'ब्रह्म कर्मस्थम्' इस प्रथम् सम्बन्ध य प्रतिपादन करना है । ६ओं सम्बधों में से उक्त तीन सम्बन्ध ही प्रधान हैं । अत ++ "कर्मत्वकर्मस्थ, मकर्म कर्मसद, भिन्नद्वयं तत्, तदभिन्नमद्वयम्- अकर्म भियत न कर्म भियते ऽध्यासोऽमृते स्यादिति पर विकल्पनाः।" (श्रीगुरुप्रणीत संशयतदुच्छेदवार कर्म तु अपर श्रुति रहीं हमारे सामने भाता है- तदेति तन्नेजति तवरे तदन्तिके । १६८ Harमा:- I इशं पानपान सम्बन्धनिकि, KTI 1. वचनता है। यह नहीं बनता है खरदार है, वह फिर समीप है-वह:साको . भीतर है यह किर मकै बाहर है। यह है मन्त्र को अज्ञार्थ । ईस मन्त्र के प्रामी विषयामा, ऋतात्मा मेद से दो प्रर्य एवं शिविता सम्बन्धी एक प्रयासकार, तीन अर्थ होताते हैं। artha विद्वान्-अविज्ञान भेद से मनुष्य वर्ग दो भागों में विभक्त है । शीशायन से अपनी पुद्धि को विद्या संस्कार से युक्त रखने वाले सदसदिवेकी विचारशील मनुष्य विद्वान् कहलाते हैं । 'खाना पीता मौन उड़ाना' .इस सिद्धान्त को परमपुरुषार्थ समझने वाले, श्मस्त्रज्ञान से शून्य लौकिक विषयों में रत यथाजात मनुष्य अविद्वान माने जाते हैं । विद्वान् मनुष्य का घात्मा कुकृष्ण रहता है, अतएव इसे 'कृतारमा कहा जाता है। विद्वान् मनुष्य का धारमा वासना मपं भौतिक संस्कारों से प्राप्त होता. हुआ 'श्रामज्ञान से वश्चित रहता है, अतएव इसे प्रक तारमा' कहा जाता है । इन्द्रियों के द्वारा रूपरसादि भौतिक विषयों का. श्रागमन होता है । भागत विषयों का संस्कार ज्ञानमय मन पर होता है। विषय भौतिक होते हुए तमोमय हैं, अतएव ज्ञान- ज्योति के आवरक हैं । इनके सम्बन्ध से ज्ञानमय मन अपनी विश्छक्ति (ज्ञानप्रकाश) से भावृत. होता हुआ जड़यत् बन जाता है । मन के साथ बुद्धि का सम्बन्ध रहता है। फलतः मन के भौतिक, भावरण से बुद्धि भी मतिन होजाती है । मलिन बुद्धिसे पुद्धियुश महानात्मा का सबभाग मलिन होजाता है । महानं पर पोडशीपुरुषरूप धामी- प्रतिष्ठिन है । मतिनसय की कृपा से छात्मा का विद्याभाग मलिन होजाता है, यही दुःख का मूल है। इसका प्रधान, कारण मलिनबुद्ध है । बुद्धि के अभ्यन्तर भाग में (इस ओर) आत्मा है, बाह्य भाग में उसे और पिय है की विषयानुगता बुद्धि मलिन होती होती हुई श्राम्यन्तर आत्मा से अयुक्त रहती है की कार्य बहिरन्तश्च भूतानामबर दरमेव च । "सूक्ष्मत्वाचदशि पदम चान्तिक च तेन गी• ५) रासुदूरे तहिनिलकेच पश्यत् रिकदेव निस्ति गुहायाम् ।। (उपनिषत् ।

.प्राकृतात्मा । * (गीता १६६ ।। . ठीक इसके विपरीत जिन्होंने विद्यासमुचित नियाम कर्म द्वारा आवरणों वादार मकर करते हुए प्रवृद्ध ज्ञानामि से सावित शावरणों को नष्ट करते हुए विशुद्ध बुद्धियोग प्राप्त कर तामा है। एक ज्ञानरम के उपासक है, शांततरर के घनुपायी है। दूसरे कर्ममय विश्व के या ईशोपनियत् ॥ सम्बनिति •वेकरूपा भावना नष्ट हो जाती है । ऐसी प्रयुक्त बुद्धि बुद्धि ही नहीं है, अविद्यामन्त्र है । बुद्धि ज्ञानसाधिका है , ज्ञानप्रवर्तकत्व बुद्धि का वरूपधर्म है । जब खखरूप रक्षक ज्ञान- योग लदण खेरूपधर्म ही नहीं रहा तो युद्धि का रहना न रहने के समान है । इसी अभि- प्राय से भगवान् कहते हैं। नास्ति युद्धिरयुक्तस्प नचायुक्तस्य भावना । न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुनः मुखम् । विषयानुगता बुद्धि अविधामयी बनकर श्रारमखरूप को आवृत कर देती है । ऐसा ही भात्मा (मनुष्य) प्रकृतात्मा कहलाता है । ऐसा मनुष्य कमी सत्कर्म में प्रवृत नहीं होता । इसे कभी आत्मविषयिणी जिज्ञासा ही नहीं होती। "यात्मा-श,स्त्र-परलोक-देवता सब दोग है। ऐसे फुतकों की यह मावासभूमि बना रहता है । रहते हुए चित् ( आत्मज्ञान ) के भाषरण से यह मचित् बन रहा है । सांसारिका विषयों को ही यह अकृतात्मा सुखसाधन समझता है । इसी अकृतामार्ग के लिए 'सर्वज्ञान विमूदास्तान विद्धि नष्टानचेतसः०' यह कहा गया है । अकृतात्मा का कर्मरूप, श्रतए। सर्पया एजदूरूप ( परिवर्तनशीन क्षणिक ) विश्व ही प्रधान पाराप्य है। लिपा है, ऐसे सिद्धावस्थापन योगी वृत्तामा हैं , यही युक्तयोगी हैं । इनकी दृष्टि उस भनेजद रूप ब्रममाग पर ही रहती है । एक छोर में युक्त योगी हैं. कृतात्मा हैं । दूसरे छोर में था उगसक हैं, गतिशील क्षणिक सांसारिक विषयों में रत है । प्रकृत मन्त्र इन्ही दोनों यो तर पना कर महता है कि जो संसारी हैं, उन की दृष्टि में यह तत्व चलता है। जो मुक्तात्मा हैं, उनकी दृष्टि में यह तस्य सर्वथा थविचाली है । अर्थात् मुतामा भनेजर को समझने मुख्य ईशापनिषत् ।। सम्पन्धानकात संसारी एजत् . . को प्रधान मान रहे हैं। सांसारिक के लिए वह भात्मतत्व दूर से दूर है, मुक्कामा के लिए वही समीप मे समीप है। सांसारिक यी दृष्टि में वह प्रात्मतत्व भीतर छुग हुभा है, मुक्तात्मा के लिए यह प्रकट है । योगियों की दृष्टि में जो सत्य है, सामान्य मनुष्यों की दृष्टि में यह असत्य है । सामान्य मनुष्यों की दृष्टि में जो सत्य है. योगी उसे मिथ्या समझ रहे हैं.. एक ज्ञानमय ग्रह के अनुयायी प्रामण है, एफ कर्ममय नमरूप विश्व के अनुयायी श्रमणक हैं। एक आस्तिकवर्ग है, दूसरा नास्तिकवर्ग है । एक विशुद्धकर्म के अनुयाई कर्मठ हैं, दूसरे विशुद्ध ज्ञान के अनुयायी ज्ञानी है । एक सांख्यमतानुयायी हैं. दूसरे योगमतानुयायी हैं । इस प्रकार 'लोकेऽस्मिन् द्विविया निष्ठा पुरा का मयाऽनय' के अनुसार लोक में दो मिन निष्ठाएं प्रचलित हैं। ५-तदेजति -अकृतात्मने ऽविदुपे कर्मणि दृष्टिः ( विश्वानुयायी )-कर्म - कृतारमने विदुषे ब्रह्मणि दृष्टिः (आत्मानुयायी )-ब्रह्म २-तन्नेजति ------ १-तदुरे - २-तद्धन्तिके अकृतात्मने ऽपिदुषे कर्मणि दृष्टिः ( पिञ्चानुयापी )-कर्म - कृतात्मने विदुषे ब्रह्मणि दृष्टिः (धात्मानुयायी)-प्रस -०- ३ १-तदन्तरस्य सर्वत्य +- अकृतात्मने ऽविदुषे कर्मणि दृष्टिः ( विश्चानुपायी )-कर्म २-तदुसर्वस्य वाह्यतः कृतात्मने विदुषे ब्रह्मणिं दृष्टिः (यात्मानुयायी)-ग्रह . सर्व विदित इन दोनों निष्ठाओं के मेदवाद का निराकरण करती हुई श्रुति कहती है कि दोनों को पृथक् समझना अज्ञान है । वही विश्व है, वही विश्वात्मा है । वही एजत् है, वही अनेजत है । यही दूर है, बद्दी समीप है । वही सबके भीतर है, यही सब के बाहर है । अर्थात् ब्रह्मगर्भित कर्मभाग से बह चल है, कर्मगर्भित ब्रह्मभाग से वह अचल है । प्र० स० कर्मदृष्टया यह दूर है, क० म० मझद्दष्टया यह समीप है । म० ग० कर्मदृष्टया यह भीतर प्रतीत 'निमा' इत्यादि शब्दों से व्यवहत किया जाता है। सिरदशा में यही विधेयामा कनानन जीव मागतिकनीक, पुटनीय भेद से इन नामों से परहन किया है । पनामा सहयोगी प्राकृतात्मा आशापनिषत् ॥ सम्दाधनिति । । होता है, क० ए० मष्टया वही सर्वत्र प्रत्यक्ष है । ब्रह्म भी वही है, कर्म भी वही है । वही शान है, यही योग है । जो ज्ञानयोग है, वही कर्मयोग है- " साख्यं च योगं च या पश्यनि स ( एर नाविकभाई) पश्गनि-( नान्यो भेदादी)" | द्वितीय अर्थ में इसी मात्र या स्पष्टीकरण है। १ -- तीसरे हैं विप्रया मा । जिस प्रकार कर्मठ धकृतामा, एवं ज्ञानी कुनामा कहलाते हैं, एसके उपासक को विषेपामा यहा जाता है । सिद्ध-साप्य दोनों अवस्थानों से पृथक् लौकिक धा में रत यकृता'मा है, साप्पदणसे गुप्त मनुष्य पियारमा है इसी को युभानयोगी' 'भारत' कदलाने सगना है । इसी फो-'युक्तयोगी' 'कुन कृत्य' य.दि नामों से व्यघटत किया जाता है। परम वैदिक शुदाइत सम्प्रदाय के प्रवर्तक प्राचार्यश्री में इन्ही उक्त तीन विभागों को मायर्यादिक: (बिनपर गरगन् या धनुपद हो चुग ) पुष्टजीप फाइसाते हैं-"भगवदनुग्रहः पोपः" । सन्ममाणमाह में पारका भटरने पाले शास्त्रविमुग यपानात जीव-'प्रावाहिक कइसने है। यही पर पानामा है । एक मगददनुमाएप पुष्टिमाय पी प्राप्ति के सिर जो साल श का अनुमान गरो र सिद्धाराणा को प्राप्त करने में यनशील बने रहते हैं, वे . Hiहिलार । भगानुपादनाशामशेत कै रम्पपदी या गंप्रदाय 'पुट्टिमार्ग' नाम से VIDYA क आत्तानमा ला देशा बानपान fST... ... Aamaha १-कृतामा-(युक्तयोगी) सिद्धास्थापन--पुष्ट (मनोमयमार्गाती २-विवेयागा (युञ्जानयोगी) - सायावस्थापन ---माय/दिक (प्राणमयमार्ग)-उपासका। ३-अकृतारमा (यथाजात मनुष्य) लक्ष्यच्युतावस्थापन-प्रायाहिक (पाङ्मयमार्ग,-धर्मठ उपासना मध्य की वस्तु है । इम में ज्ञानकर्म दोनों का समन्वय है। इसी को बुद्धियोग कहा जाता है, जिस का कि दिग्दर्शन प्रथमायोपसहार में कराया जाचुका है । मम पर दृष्टि रखते कर्म करना ही बुद्धियोग है । ब्रह्म अकर्म है, कर्म कर्म है । श्रकर्म में कर्म समझिए, कर्म में अकर्म समझिए । कर्म को धर्म में प्रतिष्ठित समझते हुए कर्म करने से कर्मजनित बन्धनमूला यासक्ति नहीं होती। ऐसा कर्म प्रबन्धन होता है। इसी अभिप्राय से भगवान् कहते हैं- - ब्रह्मण्यापाय कर्माणि संगं त्यक्त्वा करोति यः। लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ।। (गी० ५/१०)। उक्त दृष्टि से कर्ममार्ग में प्रवृत्त होनेराला पुरुषश्न ही 'विधेयात्मा' कहलाता है। इस की दृष्टि दोनों पर है । कर्मदृष्टि से वह उसे एजत्, चर, अन्त प्रविष्ट समझता है, ब्राह्मदृष्टि से वह उसी को अनेजत्-समीप-सर्वत्र व्याप्त समझ रहा है । इस अभिनभावना से धागे जाकर विवेयात्मा-'यत्तस्य सर्वमात्मयाभूतू' इस श्रुति का अधिकारी उनता हुआ सिद्धापस्या पर पहुच जाता है | रागद्वेष नष्ट हो जाता है, अद्वैतमूलक ब्रह्मानन्द प्राप्त हो जाता है । प्रकृत मन्त्र इसी भाव का निरूपण करता है। पोडशी पुरुष का अमृतप्रधान विद्याभाग समार में स्थिति बप से, एवं कर्मभाग गति- रूप से प्रत्यक्ष दृष्ट है 1 निधदृष्टया यह स्थितिरूप है, आमदृष्टया वह पिया-कर्ममय है । स्थिति गतिसमष्टि 'युजुर्वेद' है । तदवछिन्न, अतएर वेदमूर्ति नाम से प्रसिद्ध पोडशीब्रह्म हियतिगतिरूप से ही विश्व में व्याप्त होरहा है, जैसा कि 'अनेनदेकम्' इत्यादि मन्त्रभाष्य में विस्तार से प्राकृनात्मा. साबन्धनिधि 9 ईशोपनिषत् । बतलाया जाचुका है। यद्यपि स्थितिगतिमात्र तमःप्रकाशन पास्सर में अत्यन्त विरुद्ध हैं, फिर भी दोनों का एक ही बिन्दु पर समन्वय होरहा है। कैसे ! इसके लिए उसी पूर्व परिचित प्राजापत्यचक्र ( कुम्हार के चाक ) पर दृष्टि डालिए । कुम्भकार के हस्तगतरूप इन्द्र के विः- पंण द्वारा दण्ड के आघात से स्थिर कीलक पर प्रतिष्ठित रहता हुश्रा चक्र प्रयल वेग से घूमने लगता है। परमाणु परमाणु गतिशील हैं। इस प्रकार यह चक घन्टों चल ना रहता है । परन्तु आश्चर्य है कि घन्टों चलते रहने पर भी वह पाने नियत स्थान से विन्दुमात्र भी आगे नहीं चलता । हम जब भी चक्र को देखते हैं, उसी नियत स्थान पर पाते हैं । चल रहा है, इस लिए तो चक्र 'एजति' है । साथ ही में स्पानत्यागलक्षण स्थितिविज्युतिरूप गतिफल के अभाव से-'नैति' यह भी मानना पड़ता है। इस प्रकार दोनों विरुद्ध धर्म एक ही. चक्र समा रहे है । एक मनुष्य अपमें घर से दस मिनिट में विक्टोरिया गार्डन पहुंचता है ! यदि वह स्थान पर ही खड़ा रहता तो उसे गतिशील नहीं कहा जासकता था । मानें स्थान से हटने पर ही उसके लिए-'गच्छति' (जाता है) का प्रयोग होता है ही खड़ा हुआ हाथ हिला रहा है । इसके लिए लोक में -"अमुक मनुष्य अपन स्थान पर खड़ा हुआ निरन्तर हाय हिना रहा है" यही तो कहा जाता है। यहीं आप स्थिति-गति दोनों भावों का प्रत्यन कर सकते हैं । मनुष्य विलकुल नहीं चल रहा है, इसलिए 'नजाति' का समन्वय है । अवयवरूप हाय चल रहा है, इसलिए 'एजति' का समन्वय है। समुदाय स्थिर है, पापा चल हैं। दोनों विरुद्ध धर्मों का पाश्रय एक ही मनुष्य है । यही परिस्थिति यहाँ पर समझिए । प्रसवक ज्ञानमूर्या सर्वथा 'नैनति', जूप से सर्वया अचल । कर्ममा सर्वपा 'एनति'--पत्रूप से सर्वया चल । चलाचल की समष्टि ही ईश्वर है-'तदेनति तन्नै नति' । कुम्भकार का चक्र घूम रहा है, उसे श्राप देख रहे हैं । घूमते हुए चक्र की जो बिन्दु ममी भभी आपके सामने थी, लीजिर पलक मारते ही वह दूर से दूर उस छोर में चली गई। एवं जिस चकविन्दु को पाप अपने से दूर समझते थे, यह अभी भी इसी क्षण में आपके समीर भागई। सचमुच प्रतिविन्दु दर से दूर है, समीर से.समीप है-'तरे तदन्ति । एक मनुष्य अपर्ने स्थान पर ।

भावात्मक भाधाराधेयभाव ही प्रपत में अभिप्रेत है। सम्बन्धनिक जातात्मा • ईशापनिषत् ॥ । घूमता हुआ चना गतिशील अपने परमाणुनों के भीतर से भीतर है, चाइर से बाहर है । चाइर भीतर जिधर देखो उधर चक्र ही चक है। पूर्वोक्त शुभना भी ऐसा ही है-'तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सदस्य बाह्यतः' । वस्तुतातु कुम्भवार के लौकिक चक्र के साथ अलौकिक ब्रह्मचक्र की -तुलना काना सर्वया प्रसंगत है । यह गतिस्पिति तो-'रामरावणयोयुद्धं रामरावणयोग्वि' के अनुसार अनुपमेय (ल सानी- अद्वितीय) है। जितनी स्थिरता आप समझ सकते हैं, वह उससे मी शीघतम है । अापके लिए वह अचिन्त्य है, अप्रमेय है, अनिर्वचनीय है, । एकमात्र तटरप रक्षण से आप उसे जानसकते हैं । "उस की गतिविति ऐसी होगी, श्रमुक के सदृश होगी" इस प्रकार उसका स्वरूप लक्षण करलेना आपके लिए सर्वथा असंभव है। विशुद्ध श्यात्मापेक्षया ब्रह्म पिर है, विशुद्ध वर्मापेक्षया चर है। वेददृष्टया जू प्ययच्छिन्न मन स्थिर है, यदयच्छेदेन चर है। वह पितितत्व उस गतितत्व के बाहर भीतर सब घोर घ्याप्त है । यद्यपि स्थितियत् गति भी स्थिति के बाहर भीतर सब भोर विद्यमान है, परन्तु दोनों में विपतिरूप रसतत्व ही प्रधान है । अतएव 'तत्-तत्' इस रूप से उसी को बाहर-भीतर-दूर- समीप बतलाया गया है । स्थिति प्राधार है, गति श्राधेय है। अाधार की प्रधानता से भी उसी का अन्तरान्तिरीमाव मानना उचित होता है। अपि च ब्रह्मरूप स्थितितत्त्व कारण है, विश्व- रूप गतितत्य कार्य है । घाण प्रथमसचाक है, इसलिए भी अन्तरात्तरीभाव में श्रुति में तव शब्दवाच्य ब्रह्म को ही प्रधानता दी है । स्थिति आधार है, गति श्राधेय है, इसका यह अर्थ नहीं है कि पुस्तक मेजपर खखी है । टेबिल पुस्तक का भाधार अवश्य है, परन्तु टेविल पुस्तक के नीचे के भागमात्र से संदिलष्ट है । पुस्तक के बाहर भीतर टेबिल नहीं है । परस्तु यहां का माधाराधेयभाय ऐसा नहीं है । यहाँ यदवच्छेदेन स्पिति है, तदवलेदेन गति हैं । पानी में संश्लिष्ट शर्कराखण्ड जैसा आाधाराधेयमाव है । पानी अाधार है, शर्करा प्राधेय है । परन्तु दोनों मिलकर एकरूप बन रहे हैं। पानी के परमाणु परमाणु में शर्करा व्याप्त है, शर्करा के अंश प्रत्यंश में पानी व्याप्त है । पदयच्छेदेन पानी व्याप्त है, तदयच्छेदेन शर्करा व्याप्त है । ऐसा भोतमोत- । ।

माकृष्ठात्मा -- 'तदेजति' इत्यादि मन्त्र उक्त ६नों सम्बन्धों में से 'ब्रह्म कर्मस्थम्' इस प्रपम सम्बन्ध सा इशापनिषन समापनियति सिंहावलोकनदृष्टया एक बार पुनः पविकल्प सम्बन्ध पर दृष्टि टालिए । इन ६ ओं सम्बन्धों में पहिले दो सम्बन्ध एक श्रेणि के हैं। इन्हें हम 'मोनोनभावसम्बन्ध' कह सकते है । तीमरा मेद सम्बन्ध है, चौथा अभेद सम्बन्ध है, पांचवा मेदाभेद सम्बन्ध है । मैद-धमेद. भेदाभेद इत्यादि पाचों मम्बन्ध पर पर में सर्वया विरुद्ध हैं । एक ही तत्व में अनेक ( विरुद्ध ) सम्बन्ध हो नहीं सकते, परन्तु होरहे हैं । यही इस ब्रह्म-धर्म सम्बन्ध की अनिर्वचनीयता है । यही 'म यस' कि 'प्रयास' नाम क ६ठा अनिर्वचनीय सम्बन्ध है । १-नहा कर्म में अनुस्यूत है । (ब्रह्म कर्मस्यम्) २-कर्म ब्रम में प्रतिष्ठिन है । (कर्म बसस्थम्) श्रोतप्रोतभावसम्बन्ध ३-अम कर्म दोनों परस्पर भिन्न हैं (ब्रह्मकर्मणी भिग्ने) }+भेदसम्बन्ध ४-जन ही कर्मरूप में परिणत हो रहा है (ब्रीच कम) 14-अभेदसम्बन्ध "-बम कर्म से मित्र है, कर्म ब्रह्म ही है ।(ब्रह्म कर्मत.- पृथक्, कर्मवपृयका ---भेदाभेदसम्बन्ध ६-दोनों का सम्बन्ध थनिर्वचनीय है । (ब्रह्मणि कर्मा- अनिर्वचनीयसम्बन्ध पस्तम्) । पर प्रधान दृष्टि रखता हुन्ना 'कर्म ब्रह्मस्थम्' इस द्वितीय सम्बन्ध का निरूपण करता है । अम. प्रधानापेक्षया प्रकृन मन्त्र को प्रथम सम्बन्ध का निरूपक माना नासकता है-( देखिए ई०वि० मा० पृ० सं० वि० सं० १३६), एव गौणदृष्टया इसे द्वितीय सम्बन्ध का प्रतिपादक मानते हुए सम्बन्धयीझप मोतप्रोतमात्र वा दिग्दर्शक माना जासकता है । मन्त्र में सर्वत्र "तत्--त" फा उन्लेप है। वह चलता है, वह नहीं चलता है, वह दूर है, वह समीप है, वह भीतर है, पर पादरइस प्रकार प्रतिगाय के साप तत् शब्ददाय मन मी ही प्रधानता है। ब्रह्म कर्म में सावधनिति प्राकृतारमा हा ईशानिपन्न । 'ओत' हो रहा है । साथ ही में एजति, दरे,सर्वस्य वाह्यतः, इत्यादि वाक्य 'चर्म ब्रह्म में प्रोव है' इस दितीय सम्बन्ध की ओर भी हमारा ध्यान याफपित करते हैं । मन्त्र का 'तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्य बाह्यतः यह उत्तर भाग ही सम्बन्ध का निरूपण करता है । यातुतः इस मन्त्र का प्रधान लक्ष्य पूर्व के 'भनेजदेकम्' मन्त्र में बतलाए गए ब्रह्मकर्मात्मक शुक्रवरूप का ही 'तदेजति तन्नजति' इत्यादि रूप से स्पष्टीकरण है । मन्त्रो में जामिता (पुनरुक्ति) दोर नहीं माना जाता । ऐसी अवस्था में निष्कर्ष यह निकला कि 'तदेजतिः' इत्यादि मन्त्र तो पूर्व मन्त्रप्रतिपादित अर्थ का स्पष्टीकरण करता है, एवं 'यस्तु सर्वाणि भूतानि' 'यस्मिन्त्सर्वाणि भूतानि०' इत्यादि दो मन्त्र ब्रह्मकर्म के सम्बन्ध का प्रतिपादन करते हैं । इन दोनों उत्तर मन्त्रों में 'यस्तु सर्वाणि यह ६ ठा मन्त्र तो प्रारम्भ के-'ब्रह्म कर्मस्यम्-कर्म ब्रह्मस्थम्' इन दो सम्बन्धों का निरूपण करता है, एव 'यस्मिन्सारिणः' इत्यादि मन्त्र 'ब्रहीन कर्म' इस चौथे अभेद सम्बन्ध का प्रतिपादन करता है। ५ । आत्मा ब्रह्म है, इस का यह अर्थ नहीं है कि उसमें कर्म नहीं है। विश्व कर्म है, इस का यह तात्पर्य नहीं है कि इस में ब्रह्म नहीं है । दोनों में दोनों हैं, दोनों दोनों हैं । केवल प्रधानता अप्रधानता में तारतम्य है । आत्मा में ब्रह्म (ज्ञान) भाग प्रधान है, इसलिए उसे ब्रह्म कहा है। विश्व में कर्म प्रधान है , इसलिए इसे कर्म कहा है । प्रात्मा ज्ञानप्रधान होता हुआ सुसूक्ष्म है। इस का चर्मचतुओं से प्रत्यक्ष नहीं होता । भौतिक विश्व ही दृष्टि का विषय बनता है । पहिले 'विश्व पर, दूसरे शब्दों में कर्मभाग पर जाती है, अनन्तर (विज्ञानद्वारा) तदन्त - प्रविष्ट थारमतव पर दृष्टि जाती है । इसी स्थूल-सूक्ष्मभाव के क्रम को प्रधान मानकर स्थूलारु. हमारी दृष्टि स्थूल १४५ 'अहम्' ६, परागबन्न 'स्वम्' है । एक यस्मतशब्दवाच्य विषयी ब्रहा है, दूसरा युमदपद- विषय विषयी तमा:प्रकाशवत् परस्पर में अत्यन्त विरुद्ध है। प्रत्यगब्रह्म ज्ञानप्रधान है, पराग्वझ पार्मप्रधान है। इस और विषय यही दोनों क्रमशः प्रत्यम् पम् ब्रह्म है। हम (थामा) भीतर प्राकृतात्मा । ईशापानपत्र सम्बन्धनित ग्धतिन्याय से प्रकृत मन्त्र पहिले कर्म को ब्रह्म में अनुस्यूत बतलाता है, अनन्तर ब्रह्म को वर्मत्य बसलाता है । इन्हीं दोनों सम्बन्धों का निरूपण करता हुमा निम्नलिखित मंत्र हमारे सामने आता है- यस्तु सर्वाणि भूतानि-यात्मन्येवानुपश्यति (कर्म ब्रह्मस्थम्) सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते । (ब्रह्म कर्मस्थम्) (ईशोपनिषत् ६ मन्त्र) मन्त्र का पूर्याई 'कर्म ब्रह्मस्थम्' इस द्वितीय सम्बन्ध का,एवं उत्तराद्ध-'ब्रह्म कर्मस्थम' इस प्रथम सम्बन्ध का निरूपण करता है । 'सर्वाणि भूतानि कर्म है, 'सर्वभूतेषु चात्मानं ब्रह्म है। जो (प्रात्मतत्ववेत्ता) सम्पूर्ण भूतों (विश्व) को भात्या (ब्रह्म) में ही अनुगत देखता है एवं सारे मृतों में मात्मा को पतिष्ठित समझता है, वह कभी किसी से घृणा नहीं करता" यह है मन्त्र का अक्षरार्थ । जैसा कि प्रकरण के प्रारम्भ में बनलाया गया है, उक्त मंत्र दोनों सम्बन्धों का निरूपण करता हुआ प्रधानरूप से 'कर्म ब्रह्मस्थम्' इस दूसरे सम्बन्ध का ही निरुपण करता है । 'यस्तु सर्वाणि भूतानि' 'सर्वभूतेषु' इत्यादि रूप से भूत भाग को ही प्रधानता दी गई है । 'तदेजति' इत्यादि मन्त्र 'तत्' रूप से जहां ब्रह्म को प्रधान मान रहा है, यहाँ यह मन्त्र भूत भाग को प्रधान लक्ष्य बना रहा है । प्रसस्-पराम् भेद से ब्रह्म के दो विवर्त हैं । प्रत्यग्नान पाच्य विषय अझ है । विषयी प्रत्यक् है, विषय पराक् है, बाहर है । युष्मदस्मत्प्रत्ययगोचर । है, विषय बाहर है। हम शनप्रधान हैं, विषय कर्मप्रधान हैं । ज्ञान प्रकाश है, ज्योति है ।

या ईशाप-पत् ॥ सम्पधनिक्ति फर्म अप्रकाश है, भावरण है । इस प्रकार लौकिक मनुष्यों की दृष्टि में दोनों का परस्पर में अत्यन्त विरुद्ध हैं । यह विरुद्ध दृष्टि ही निन्दास्तुतिमाव की जननी है । रततिभाव का आत्मी- यता से सम्बन्ध है । निन्दाभाव का परभाव (मनामीयता से संबंध है। संसार (संसारी मनुष्य) अपने को ओर अनुगत रहता है, पराए की भोर विमुख रहता है । मनामीय वस्तु से घृणा करता है . यात्मीय से प्रेम करता है । विष्टा से मनुष्य घृणा करता है, क्योंकि इस पी दृष्टि में यह अनामीय है। इस प्रकार कर्मरूप विषय . एयं ब्रह्मरूप भामा को भिन्न भिन्न समझने चाला मनुष्य संसार में कितनों ही से राग करता है, कितनों ही से द्वेष करता है । अनुकूल चेदनीयता में रागका, प्रतिकूल वेदनीयता में द्वेषका उदय है । दोनों में बंधनमूला श्रासक्ति है । ' आसक्ति दुःख का कारण है ! स्तुति भी शोक वा कारण है, निन्दा भी शोक का कारण है । यह निन्दा-स्तुतिमाव तभी तक रहता है, जब तक कि आत्मा भौर विषयों में भेदबुद्धि रहती है। देप तमी तक है, जब तक कि वह उसे अनात्मा (अपनें से मिन्न) समझता है। एवमेव स्तुति मी परभाव से ही सम्बन्ध रखती है । यदि उसे यह विदित होजाय कि मैं उसमें हूं, यह मुझमें- है, हम दोनों एक ही चणक के द्विदल हैं. मेरा रूरूप उस पर प्रतिष्ठित है, यह मुझ में प्रति- प्ठित है तो ऐसी परिस्थिति में रागद्वेषमूलक स्तुतिनिन्दामाव का अवसर ही नहीं पाता । जब दोनों एक दूसरे की प्रतिष्ठा हैं तो कौन बड़ा, कौन छोटा, कौन निन्य, फोन स्तुत्य, कौन निंदक फोन स्तोता। इसी निन्दामूलक कुत्सितमात्र का निराकरण करती हुई, ब्रह्मकर्म दोनों में परस्पर अनुप्राह्य अनुप्राहकता का निरूपण करती हुई श्रुति कहती है कि- "तुम सम्पूर्ण भूतों को प्रात्मा में समझो, एवं सम्पूर्ण भूतों में प्रात्मा को समझो । धर्मरूप विश्व के जर जरे में अकर्मरूप ब्रह्म को व्याप्त समझो, एवं ग्राम में सर्वत्र कर्म को अनुस्यूत समझो । यदि तुम आत्मा और विश्व इस ओतप्रोतसम्बन्ध को व्यवसायबुद्धि से समझ गए तो तुम्हारा शोकमुलक निन्दास्तुति- माप से सदा के लिए छुटकारा होगया-ततो न विजुगुप्सते' । स्तुतिभाव से भामा में क्षोम का उदय होता है। यह क्षोभ ही प्रशान्ति का कारण बनता हुआ आत्मपतन का प्रवर्तक बनता है । निन्दा द्वेषमूला है, स्तुति राम्मुला है । एवं पूर्व कथनानुसार रागद्वेष का भपर्ने पार से स बुद्धिमान् मनुष्यपु स युक्तः कृतनकर्मकृत् ॥ (गी० ४.१८) प्राकृतात्मा या ईशापनिषत् ॥ सम्बन्धनिकि । । । - सम्बन्ध है। जहाँ-'यह अपना है, वह पराया है। यह भाव है, वहीं गगद्वेष है। दोनों ही मोह के उत्पादक हैं । जब तक भेद बुद्धि है, तब तक रागद्वेष है। जबतक रागद्वेष है, तब तक मोह है । जबतक मोह मिश्रित बुद्धि है, तब तक बुद्धि क्लुपित है। कलुषित बुद्धि ध्यानशून्या है । ध्यानशून्या युद्धि निर्दल बनती हुई, मन पर अधिकार रखती हुई मन की सबलता का कारण बन जाती है । सबल मन सनदोषरूप थासक्तिभाव का प्रवर्चक है । आसक्ति कामना की जननी है । कामना क्रोध का कारण है । क्रोव संमोह का पिता है । संमोह स्मृतिभ्रंश का जनक है । स्मृतिभ्रंश बुद्धिनाश का कारण है । बुद्धिनाश आत्मपतन का कारण है । यही आत्मघात है, जिसका कि पुरुषात्माधिकरण के यावरणतन्त्र में विस्तार से निरूपण किया जा चुका है। इस श्रापत्ति से बचने का उपाय है-बुद्धि की स्वरूपरता । तदर्थ रागद्वेषमूलक मोह का परित्याग अपेक्षित है 1 तदर्थ रागद्वेषमूलक ब्रह्म-कर्म की विजातीयता का परित्याग आवश्यक है। तभी परम शान्ति मिल सकती है। ज्ञान-कर्म को मिलाकर देखिए, तभी श्रानन्द है । ज्ञान की फर्म में उपासना कीजिए, धर्म की अकर्मरूप ज्ञान में उपासना कीजिए । ज्ञानपूर्वक कर्म कीजिए, कर्म को ज्ञान के आश्रित बनाइए, कर्मद्वारा ज्ञानसंपत्ति प्राप्त कीजिए । यही बुद्धिमानी है, इसी को बुद्धियोग कहते हैं । यही निःश्रेयसपन्या है । इसी श्रौतार्य का स्पष्टी करण करती हुई स्माती उपनिषद कहती है- कर्मण्यर्कर्म यः पश्पेव, अकर्मणि च कर्म यः। 4 पूर्व कपन से साधारण मनुष्यों को द्वैत का भ्रम हो सकता है । "कर्म को ब्रह्म देखो, ब्रह्म को कर्म में देखो" यह अक्षर ब्रह्म-फर्म इन दो तत्वों की सत्ता सिद्ध करते हुए में सावधानका प्रकृतात्मा ईशापा-पत् ॥ A प्रतीत हो रहे हैं । जब तक द्वैत है, तबतक काप है, जबतक कम्प है, तबतक भय है- 'द्वितीयाद वै भयं भवति । जयतक भय है, तबतक अशान्ति है-'प्रशान्तत्य कुतः सुखम् । पूर्वनिरूपणशैली से किसी को देत का भ्रम न हो जाय, बस अशान्तिमूलक इसी द्वैतभ्रम का इ उन्मूलन करती हुई श्रुति कहती है- यस्मिन्सगिा भूतानि, आत्मैवाभूविजानतः। तत्र को मोहः कः शांक एकत्त्वमनुपश्यतः ॥ (ईशोपनिषत् ७ मन्त्र) अभ्यास द्वारा बुद्धियोग ( निष्काम कर्मयोग) का साधन करते करते जिस समय आम- साक्षात्कार हो जाता है, उस समय उस युक्त योगी के लिए सारा प्रपञ्च प्रात्मा ही बन जाना है । ऐसी अवस्था से युक्त उस ज्ञानी के लिए कहां शोक है, कहा मोह है । 'यदुदरमन्तर कुरुते, अय भयं भवति" के अनुसार जबतक द्वैत है तभीतका भय है । एकात्य व्यापकता का मूल है । व्यापकता में कम्प नहीं है । एक वस्तु का अन्य स्थान की ओर झुकना ही तो कम्प है। व्यापकताव से अतिरिक्त कोई स्थान नहीं है, जहा कम्पन को अवकाश मिले । ऐसी परिस्थि- ति में श्रात्मा में स्थानच्युतिरूप भय कैसे हो सकता है । 'इदं वा इद वा' इस नानाभाव से मोह होजाता है। चित्त का वैचिप ही मोह है । मोह से विवेकशक्ति नष्ट हो जाती है । काया- कार्यविवेकता मारो जाती है। इस प्रकार मोह के साथ साथ ही शोक का उदय होजाता है । इस शोक-मोह से छुटकारा पाने का उपाय है-अद्वैतभाव की उपासना । इसी से मोहकलिल का नाश होगा । पुद्धि में विद्या का उदय होगा, तभी शोकनिवृत्ति होगी, जैसा कि स्मृति - - . कहती है- यदा ते मोहकलिलं बुद्धिय॑तितरिष्यति । बदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ।। (गी० २।५२) अमिक हिरण शिश। मनपर्म को सभी पृर पृषक सगमते भारहे हैं। पहिले সুৰক্ষন । । पानी को तुम पानी समझ रहे हो, अग्नि को थग्नि समझ रहे हो, इसी प्रकार कोरे शब्दावचा को छोड़कर जिस दिन तुम अन्तरात्मा से श्रद्वैततत्व पर विश्वारा कर लोगे, तभी शोक मोह से छुटकारा होगा। नहीं तो-'फनी वेदान्तिनः सर्व' यह वाक्य प्रसिद्ध है ही। जानना सावन झान है, इस का मन से सम्बन्ध है । विशेषरूप से-कार्यकारणसम्बन्ध परिज्ञानपूर्वक जाना विशेषान है। विशेषरूप से जानना यथार्थ जानना है । इस विजानन का बुद्धि से सम्मान करता था शोक-मोद निवृत्ति का कारण बनता है। "पूर्व के मन्त्र में तसम्बन्ध या निकाल हमा, एवं प्रवृनमन्त्र चतसम्बन्ध का निरूपण कर रक्षा" इस में विरोध नहीं राममा प्रात्मा ईशापनिषत् ॥ श्रुति का तात्पर्य यही है कि ब्रह्म-कर्म दो विवत हैं । माति दो हैं, सत्ता एक है, इसतिर परमार्थतः श्रद्वैत है । सत्तामेद ही द्वैत का कारण बनता है । श्रुति का 'विजानतः शन्द का चमत्कार रखता है। जानतः'नहीं कहा, 'विजानतः' कहा है । "ब्रह्म व्यापक है, भात्मा एवं है, कहीं भेद नहीं है। इस प्रकार केवल शब्दज्ञान जानता से सम्बन्ध रखता है । वास्तविक अनुभूततत्वज्ञान का 'विजानना' से सम्बन्ध है । श्रुति कहती है कि तुमने सारी र निषदें पढ़तीं, जीवन भर 'ब्रह्मवेदं सर्वम्' 'मात्मैवेदं सर्व-नेह नानास्ति किञ्चन' का पारा यण किया, परन्तु इस कोरे वाचिक ज्ञान से (शब्दश्रवणमात्र से ) तुम्हें तबतक कदापि शान्ति नहीं मिल सकती, जबतक कि तुम यथार्थरूप से उस ज्ञान पर प्रतिष्ठित म हो जायो । बेने । है । इदमित्यमेव' यद् विश्वास युद्धि से ही होता है । श्रद्धा करना जहां मन का काम । विश्वास करना बुद्धि का काम है । युट्रियोग ही बारमा के विद्याभाग में प्रसादगुण पा उपन यादिए। उपाणः गितमाणानां पानानामुपलाननाः। असरये वर्मनि स्थित्ता ननः सन्यं समीदते ॥ (वास्पपदी... इस निशागिदान्त के अनुसार अधिकारी भेद से अनिने देत-मईत दोनों भाई मापनियुदि का निराकर फारसी है। श्री यही है कि जिन फो समान । ईशोपनिषत् ॥ सम्बन्मनिकि समझ रहे हो, विपास करो वे दोनों तत्त्व मात्या पृषक् पृयक् प्रतीत होते हुए भी परमार्थतः अपृथक् है, दोनों में दोनों अनुस्यूत हैं । जव अधिकारी इस प्रथम श्रेणि में उत्तीर्ण होजाता है तो आगे जाकर-'यस्मिन्सर्वाणि भूतानि' इत्यादि रूप से श्रुति रहे सहे मेद का भी निराकरण कर देती है। प्रातिभासिक दैत से व्यावहारिक दैत पर लाती है । अन्ततोगत्वा पार- मार्थिक श्रद्वैत पर पहुंचा देती है । इस प्रकार प्रकृतमन्त्र 'ब्रह्मव कर्म' इस चतुर्थ सम्बन्ध का निरूपण करता हुभा ब्रह्म-कर्म के भमेद सम्बन्ध का ही दिग्दर्शन कराता है। इति ब्रह्म-कम्मणोः सम्बन्धाधिकारः माकृतात्माधिकरण- अव्यक्तात्माधिकरणं-समाप्तम् महत्स्वरूपनिदर्शन घेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादिस्सवर्ण तमसः परस्तात् । तमेव विदित्वातिमुस्युमेति नान्यः पन्या विद्यतेऽपनाय ॥ (यजुः३१०१)। अभ्यः सम्भूतः पृथिव्यै रसाच विश्वकर्मणः समवर्चतामे । तस्य त्या विदधद्रपमैति तन्मय॑स्य देवस्यमाजानमः ॥ (यजुः३।१७) । तदेवाग्निस्तदादित्यस्तदायुस्तदु चन्द्रमाः । तदेव शुक्र तद् ब्रह्म ता प्रापः स प्रजापतिः ॥ (पजः३२१)। क इमं यो निण्यमा चिकेत यासो मातृर्जनपत स्वधामिः । वीनां गर्भी अपसामुपस्पान् महान कविनिश्चरति खधाभिः ।। (ऋ० १९५१)। महा मसि महिष वृष्णयेभिर्धनस्पृदुम सहमानो सन्यान् । एको विश्वाय भुयनस्य राजा स योधया च यया च जनान् ॥ (१०३५४६१२)। नि वेवेति पलितो दूत मास्यन्तर्महाश्थाति रोचनेन । वषि विनदमि नो विचष्टे महदेवानामसुरत्वमेकम् ॥ (ऋ० १५५)। पस्या जनासो ममि सञ्चरन्ति गाव जपणामित्र अज यविष्ठः । दूतो देवानामसि मानामन्तर्महॉश्वरसि रोचनेन ॥ १.०१०।४।२)। तद्वै स प्राणोऽभवमहान् भूत्या प्रजापतिः । भुजो मुजिल्या स्वत्वा यत् प्राणान् पारा यत् पुरि ।। (शत ७।५।१।२१)। भाविः सन्निहितं गुहाचरं नाम महत्पदमत्रैतत् समर्पितम् । एजत् प्राणनिमिपञ्च यदेतजानथ सदसद्वरेण्यं परं विज्ञानाबद्दरिष्ठं प्रजानाम् ।। (मुण्डको० २।२।। महान् प्रभुयं पुरुषः सत्वस्यैप प्रवर्तक । सुनिर्मलामिमा प्राप्तिमीशानो ज्योतिरव्ययः (स्वेता०३।११)। एक जाल बहुधा विकुर्वन्तस्मिन् क्षेत्रे संदरत्येष देवः । भूयः सृच्या पतयस्तथेशा सर्वाधिपत्यं कुरुते महात्मा ॥ (श्वेता० ५।३)। य: पूर्व तपसो जातमभ्यः पूर्वमजायत । गुहां प्रविश्य तिष्ठन्त यो मूतेभिर्व्यपश्यत ॥ (कठ० ११३१६)। अशरीरं शरीरेश्यावस्थेवरिया। महान्तं विभुमामानं मत्वा धीरो न शोचति ।। (कठ० ११३।२२) : • १-अग्निः, २-सासुः, ३-श्रादित्यः, ५-चन्द्रमाः ( सोमः ), ५-गुजं ( मातरिश्चातापुः), ६-श्रापः, इत्येतेषां समष्टिस्तद् ब्रह, स प्रजापतिः वट्कलो महानामा विश्वस्य पतिः | । -- भूतं भाविष्यत् प्रस्तौमि बहुब्रह्मैकमक्षरम् महदगोन्कमक्षरम् स वेदैतत् परमं ब्रह्म धाम यत्र विश्वं निहिन भाति शुभ्रम् । उपासते पुरुष ये सकाम रते “शुक"-मवदतिवर्तन्ति धीराः॥१॥ (मुण्डक ३।२।१०। मम योनि-महब्रह्म तस्मिन् गर्भ दधाम्यहम् । संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥ २ ॥ सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः संभवन्ति याः । तासां ब्रह्म महद् योनिरहं बीजमदः पिता ॥ ३ ॥ (गीता १४ । ३ ।। . वेदं सर्वम्" के अनुसार दृश्यमान सारा प्रपञ्च ब्रह्म है । इस के पाठ अवयव हैं , एवं अष्टादरबन्द को गायत्री कहा जाता है । श्रतएव अष्टावयव महारूप सर्वप्रपश्च को हम 'गायत्रब्रह्म' कह सकते हैं, जैसा कि 'तान्येतान्यष्टौ । अष्टा- चरा गायत्री ! गायत्रं साम ! ब्रह्म उ गायत्री' (जै० उ० प्रा० १११।८1) इत्यादि सामश्रुति से स्पष्ट है । झप्रजापति (ईश्वरप्रजापति ) के यह पाठ अवयव अव्यय, अक्षर, आरमार, विकारक्षर, विश्वस्ट्. पचीकृतपञ्च पञ्चजन, पुरजैन, पुर, ! इन नामों से प्रसिद्ध हैं, जिनका कि विशद निरूपण पूर्व के प्रकरणों में किया जाचुका है । मझ के इन पाठों अवषयों में से प्रत्येक मवयत्र पञ्चकल है । इस प्रकार कल्दृष्टि से महा की मारपन या मरों से गाय मामा अनुग्म । यहाँ ५-३ का रन्तप नगि गरपाच जगदतीन तान' पद कर दिया गया है। महिया मेमोदित रातो सासन रणमरमेरयान. छिमी का नाम मलंगर मानसार AR,दिसा'यापपरामा चिरायत्याशिन पर . ३ 1 १६९१५), 'परमं सहस्रम्' (तां० प्रा० १६.६२) इत्यादि के अनुसार सर्वशन्द सरस छन्द इस के गर्भ में प्रविट है । कोई भी छन्द इस का धर्माण (अतिक्रमण) करने में सर्प तरंगना महम मनुगम होगामी लिए रानी प्राकृतात्मा মনত্মর্য का ईशापनिपत ॥ ४० कलाएं होजाती हैं । इसी चत्वारिंशत्वल छन्द को परमाविराट् महा जाता है । विराट- छन्द के दशिनीविराष्ट्र विग्निीविग-निशिनीविराट्चत्वारिंशिनीविराट् (१०-२०-३०-४०) यह चार विवर्त हैं। इनमें चत्वारिंशिनी (चालीस थक्षर की) विराट् ही परमाविराट् कहलाती है । इससे बाहिर कुछ भी नहीं है। पुरुष, अन्तरङ्गप्रकृति, विकृति, विकारसंघ (विश्व) सब कुछ इस परमाविराट् के गर्भ में निविष्ट है । पुरुषामाधिकरण के उपक्रममें परमाबिराट् का खरूप प्रा- रान्तर से बतलाया गया है-(देखिर ई०विभा०सं०७०)। अनुगम सिद्धान्त के अनुसार विराट फा कई प्रकार से समन्यय होसकता है । अतएय-'एषा वै परमा विराट् यचत्वारिंशिनी' (ता० प्रा० २१।१०।२) इस अनुगम वचन के अनुसार इस का ब्रह्म की उक्त चालीस कलाम के साथ भी समन्यय नित्या जासकता है । ब्रह्म ही 'सर्वम्' है। एवं 'सर्व वै सहस्रम्' (शतर एवं परम [ अन्तिम सीमा ] का वाचक है । अतएव इस परमभावरूपा, सर्वरूपा परभाविपट्दो आगे जाकर तागव्यश्रुतिने 'सनातरा व परमा विराट ( ता. मा. २५ । ५ ।।1) इ पनि रप से सहलादरा बतलाया है। सहस्राक्षा का अर्थ सरोदा ही है । गायत्र्यादि इतर सारे • नियतमाद से सम्बन्ध रमने बाडे वेदवचन निगम कहलात है, एक कई अनुरूप मावो काममा करन याने रपन अनुगम एलत हैं । उदाहरण के लिये 'इन्दोघे देशानामोजिष्ठो पसिष्ठः का सपन मन न्द्र का रूपए करता हुआ निगमोटि में प्रतिमा पशधा प्रीणि प्राणि पारन। - मन्यमानाचार्य या ईशोपनिपत् ॥ प्राकृतात्मा A नहीं है, यह सब से अति (धतिक्रान्त) है, अतएव इस के लिए "विराड्या अनाधृष्टं छन्दः" (शत. ८ । २।४।४-यजुः सं. १४ । १ ) यह कहा गया है । यद्यपि ब्रह्मरूप परमा- विराट् की इन चालीसों कलाओं का पूर्व में व्यष्टि रूप से उल्लेख करदिया गया है, तथापि सम. टिज्ञान के लिए इन का यहां भी दिग्दर्शन करादेना असंगत न होगा। एक बात और ध्यान में • रखिए । विराट्ब्रह्म प्रजापति है । एवं प्रजापति का "प्रात्म-प्राण-पशुसमष्टिः-प्रजापतिः" यह लक्षण है । ऐसी स्थिति में इस विराट् प्रजापति में भी ३-४-१-क्रम से आत्मा-प्राण-पशु इन तीन विभागों का भोग मानना पड़ेगा। भव्यय-अक्षर-मात्मक्षर ब्रह्म के इन तीन अवययों की समष्टि प्रात्मा है, विकार-विश्वमृद्-पञ्चजन-पुरञ्जन-इन चार अवयवों का संघात प्राण है,एवं पुर को पगु कहा जाता है, जैसा कि आगे के परिलेख से सष्ट हो जाता है । उक्त विराट्ब्रह्म का जन्मदाता तत्व ही 'शुक्र' नाम से प्रसिद्ध है । शुक्र के सम्बन्ध से ही विराट् पुरुप चालीस कलामों में विभक्त होजाता है । इसी सर्वोपादनभूत शुत्रब्रह्म का निरूपण करती हुई श्रुति कहती है- -स पर्यगाच्छुक्रमकायमत्रणमस्ताविरं शुद्धमपापविद्धम् । कविमनीपी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान व्यदधात्- शाश्वतीभ्यः समाभ्यः॥ "कार्यरहित, व्रणरहित, स्नायुरहित, अतएव अकाय-श्रवण-अस्नाविर नाम से प्रसिद्ध, अतएव शुद्ध,पाप्मा से अविद्ध शुक्र के चारों ओर यह व्याप्त होगया, दूसरे शब्दों में शुक्र को चारों ओर से घेर लिया। इस प्रकार शुक्र को चारों ओर से वेष्टित कर) कवि-मनीपी-परिभू-स्वयम्भू इत्यादि विविध नामों से प्रसिद्ध उस तत्व में (शुक्र द्वारा) यथा तथारूपं से सदा के लिए पदार्थों का निर्माण करदिया। मथात् वह तत्व पहिल शुक्र को वेष्टित करता है, एवं वेष्टिन शुक्र से विश्व का निर्माण का {५५

प्राकृतात्मा
- ईशोपनिषत्
शुकशब्द की व्याप्ति
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५-"वर्णशुक्रमुपसो वि दिद्युत" (ऋक्सं० २।२।७) ।
६-"प्रयखतीरीळते शुक्रमचिः" (ऋक्सं०३।६।३।)।
७-"इन्द्र शुक्र पित्रा सोमम्" (ऋक्सं० ३।३२।२।)।
८-"वर्णमतिरच्छुकमासाम्" (ऋक्सं० ३।३४१५) ।
--"वयोधा दृपा शुक्र दुदुहे" (ऋक्सं० ४।३।१०।)।
१०-"मपियानं मघवा शुक्रमन्धः (ऋक्सं० ४।२७१५ )।
११-"शुकं तन्वन्त भारजः" (ऋक्सं० ४।४।२।)।
१२-"प्रवायचे भरत चारु शुक्रम्" (ऋक्सं० ५।१३।३१) ।
१३-"प्रामयों भरुइच्छुकम्" ( माक्सं० २४५१०१)।
१.४-"शुक्रं तेऽन्यद्य नतं तेऽन्यत्" (अक्सं० ६।५८१)।
२५-"सकृच्छुकं दुदुहे पृश्निरूप" ( अक्स० ६६६।१।)।
१६-"तचतुर्देवहितं शुक्रमुञ्चरत्" (ऋक्सं० ७६६।१६)।
१७-'अमुं दिवि शुक्र ज्योतिरधारयः" ( ऋक्सं० ८।१५।३०) ।
१८-"शुक्रं हिरण्यमाददे" ( अक्सं० ८६।१२१)।
१९- 'परपान ऋतं वृहच्छुकम्" (ऋक्सं० २६६२४१ ) ।
२०-"दिवि शुक्रं यजत सूर्यस्य" (ऋक्सं० १०१)।
२१-"ज्योतिः शुक्रमसौ" (ऐना० ७॥१२१)।
२२-"शुक्रं हिरण्यम्" (ऐगा० १७६३१)
२३-"ज्योति शुक्र हिरगयम्" (ऐग्रा० ७.१२१)।
२४-"शुक्र होतच्छुक्रेण फ्रीणाति यत् सोमं हिरण्येन" (शत० ३।३।३।६) ।
२५-"तेजोऽसि शुक्रपस्यमृतमसि [भाज्य ry"शत० १।३११:२८।यजुः १।३१) ।
२६-"शुक्राधाप' (ऐ० प्रा० १७६३)। ।
२७-"ससं व शुक्रम्" (शत० १६३२२५।।

प्राकृतात्मा या ईशोपनिषत् I शुक्रशन्द की म्याति जिन जिन प्रकरणों में उक्त रूप से शुक शब्द प्रयुक्त हुआ है,उन उन प्रकरणों को अपने सामने रख लीजिए, उपलब्धमाप्यों को भी थोड़ी देर के लिए उपकारक समझिए, धौर फिर अर्थ कीजिए । बाप को विदित होजायगा कि शुक्र शब्द का घमुक अर्थ ही ऐसा है, जो सब शुक्र शब्दों में समान रूप से व्याप्त होसकता है। भारम्भ से ही चलिए । जिस 'शुक्रा' को उपक्रमोपसंहार के बल पर 'शुक्र' मानते हुए भाष्यकार, प्रकृत में जिसे उस अचिन्त्य निर्गुण- ब्रह्मपरक माना है, वे ही भाष्यकार सयं उपनिषत् में ही 'ते शुक्रमेतदतिवर्तन्ति धीरा' इत्यादि रूप से पदे हुए 'शुक्रम्' को "शुकम्" ही रखते हुए कहते हैं- "ये यकामा विभृतितृष्णाविर्जिता मुमुक्ष्यः सन्त उपासते, परमिव सेवन्ते, ते शुक्र नृवीजं यदेवत् मसिदं शरीरोपादानकारणमतिवर्तन्ति धीराः, धीमन्तो न पुनर्योनि मसर्पन्ति" ( मुण्डक० शा० गा० ३।२।१।। इस प्रकार यहां शुक्र शब्द से पुरुपोपादनभूत सुप्रसिद्ध शुक्र (वीर्य) या महण किया गया । है । क्या विद्वन्मण्डली-एकम नितिः शास्त्रार्थोऽन्यत्रोपकारको भवति' इस न्याय को नहीं मानती ! यदि मानती है तो क्यों नहीं गुण्डकोपात शुक्र शब्द को भी अचिन्त्य ब्रह्म परक माना जाय, अथवा ईशोपात्त शुक्र शब्द को भी क्यों न उपादानकारणपरक मान लिया जाय । सर्वश्री सायणाचार्य, वेद पर भाष्य लिखा है । सभी विद्वान् इस भाग्य का आदर करते हैं । भय देखना यह है कि उक्त ऋत्यलो में उपात्त शुक्र शब्द का उन्होंने क्या अर्थ किया है । २-"यह प्रादिस अपनी रश्मियों द्वारा समस्त भूतों के सारभूत रस (शुक्र) को ऊर्च (युलोक की ओर) लेजाता है "1 (३). "हे अमे ! तुम्हारे (आमेय) शरीर का जो शुक्र (मज्वलित तेज) चमक रहा है"। (४)-"वह आदिरा शुक्ररूप (घुलोक के) पय का दोहन करना है। (५)-“हे अग्ने ! आंदिस की तरह प्रकाशित शुक्ररूप भापको उपा मञ्चलित कर रही है "1 (६)-“हे भने- हविष्मती प्रजा (होता लोग ) आपकी शुक्र (दीसि) रूप ज्यानाओं की स्तुति करती है । (9)-हे इन्द! आप (गोदुग्म से युक्त अत- হয়ঞ্জর मान श्वेतवर्ण [मूर्य] को उत्पन्न किया" 1 [२०]-'युलोक में पूजनीय सूर्यके शुकी [दीप्तिममण्डल की ] जैसे कोई आराधना करता है"। [२१] "यह सूर्य ज्योतिर्मय हिरण्य है"। [२४]-"सो जो कि हिरण्य मुवर्णखण्ड [अशर्फी] से सोम खरीदता है, प्राकृतात्मा या ईशोपनिषत् ॥ एव) शुक्ररूप सोम का पान कीजिए । अथवा शुकामन्थीग्रह में वर्तमान, अतएव शकरुप सोम का पान कीजिए"। (८)- इन उपाओं के शुक्र (प्रकाश) रूप वर्णको (इन्द्र ने अपने तेज से) मद्ध कर दिया" । ()-"पानी वरसाने वाले सूर्य (सपा) ने भन्तरिदप स्तन से शुक्ररूप पानी को दह लिया"(१०)-' मयदा (शुसोकस्थ सौर) इन्द्रन माया. यित शुक्ररूप सोप को" (११." शुक्ररूप (दीप्तिरूप) रज को वितत करदिया" । (12) "हे (अध्वर्यु ! आपने वायु के लिए जिस चरणीय (शुक्र नाम के) दीप्न सोप का संपादन किया है"। (२३)-"जिस दीप्त पानी (शुक्र) के प्रति सूर्य चारों ओर पट होता है" । (१४-" हे पूपन् ! तुम्हारा एक शुक्र [शुक्ल] वर्ण है, एक कृष्णवर्ण है। (१५)-(वर्षाऋतु में) शुक्लरूप (शुक्ररूप) उदक म तरिक्ष से झरता है"। (२६) "देव तानों का हितैपी यह (सूर्य) निर्मन्न (शुक्र) चक्षु उदित हुआ है । (१७;-“हे इन्द्र, आपने जिस समय गुलोक में निर्मल ज्योतिर्मय सूर्य को प्रतिष्ठित किया"। [१८]- “निगल हिरण्यरूप चन्द्रमा का आदान करता है" [१६]-"पवमाननें घुलोक में दीय शुक्र है" 1 [२]-"यह शुक्र हिरण्य [ज्योति] है" । [21]-"ज्योति ही शुरूप - वह शुक्र से ही शुक्र खरीदता है"। [२५]-“हे प्राप्य ! घृत) आप तेजोमय है, शुक्र हैं। अमृत है" । [२६]-"पानी ही शुक्र है"। [२७]-"सस ही शुक्र है" 1 + + + +1 उपयुक्त प्रणाणों के अनुसार सय प्राचीनों के मतानुसार ही शुक्र शन्द रस, अनितज, पंप, पयाग, दीप्ति, सोम, ज्योति, आप, सौम, दीप्तरज, दीमसोम, दीपानी, गुग्नवर्ग शृग्नउदय निमनम्र्य,निर्मनज्योति, निर्मसचन्द्रमा, श्वेतमुर्प, टीति- मत्रमण्डम, सूर्य, हिरराज्योति, ज्योति, सोप, प्राज्य, पानी, सर-इन पदार्थों के लिए पुरुषवीय,भूत- . .

प्राकृतात्मा ईशोपनिषत् । शुकराब्द की च्याति -ي مرم به میه ای प्रयुक्त हुआ है । इन सब का पर्यवसान द्विब्रह्मगर्मित ( यजुरग्निगर्भित ) पब्रह्म ( धाप ) में हो जाता है । अस्तत्व की प्रस्था विशेष ही सोम है । सोम ही चन्द्रमा है । चन्द्रमा ही पौषधि द्वारा वीर्यरूप में परिणत होता है । “महत्तव, सोमो महिपम कार" (टक् सं० १ । १७ । ११।) अनुसार सोमाहुति से ही सूर्य में ज्योति का उदय होता है । सोममय सौर ज्योति ही हिरण्य है । पञ्चभूतों का मूल उपादान वही थाप है, यही भूतो का रस है । यही गोपशु में प्रविष्ट होकर पयरूप में परिणत होता है। यह वर्ष त है, परन्तु इसके गर्भ में सत्य यजुरग्नि प्रति- टित है, अतः यह सत्य भी है। इन्हीं सत्र परिस्थितियों के आधार पर हम कह सकते हैं कि प्रकृत मन्त्र में प्राचीनोंने 'शुक्रम्' को 'शुक्र' परक मानते हुए जो इस का विशुद्ध धात्मपरक अर्थ किया है, यह वृद्धचरितमान है । वैदिक साहित्य किसी संप्रदाय विशेष का अनुचर नहीं है । यद्यपि सभी सम्प्रदापों का मूल वेदशारन ही है किसी भी सम्प्रदाय को अवैदिक नहीं कहा जा सकता, तथापि "वेदशास्त्र में अमुक सम्प्रदाय का ही प्रधानरूप से निरूपण हुआ है। यह मानना प्रौढिवादमान है । वैदिक पदार्थों के यथानुरूप समन्वय के लिए विशुदृष्टि अपेक्षित है। यदि पहले से किसी मत पर आरूढ होकर आप वेद खाध्याय में प्रवृत्त होंगे तो सहस्र भाष्य भी आप को वेद के यथार्थ तात्पर्य से कृतकृत्य न कर सकेंगे। कुछ समय पूर्व वृत्तालय पाठशाला के प्रधान पं० एम्बार कृष्णमाचार्य द्वारा संशोधित, एवं श्रीगोपालानन्दस्वामीविरचित उपनिषद्भाव्य प्रकाशित हुश्मा है । कृष्णमाचार्य अपनी प्रस्तावना समाप्त करते हुए अन्त में । १ लिखते हैं- "इदं तु भाष्यं सरलया शैल्या प्रवर्त्तमानं सुखेनार्थमवगमयति । विशिष्टाद्वैत- सिद्धान्तमवलम्ब्यमानानामुपकारफमेतत् । यद्यप्परित नाम चवचित् चवचिद्वा- १ “सरल शैली से लिया गया यह माय सरलता से अर्थ शान कराता है । विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त का शाप्रय लेने वालों के लिए यह उपकारक है। यद्यपि कहीं कहीं वाक्य योजना में शब्दों के अयों में प्राचीन व्याख्याओं रो नाम मात्र को भेद है, तथापि विशिष्पादेत सिद्धान्त का कहीं अणुमान भी उद्धंधन नहीं हुआ है। यह माध्य सन् ३५ में निर्णय सगर प्रेस में मुद्रित हुआ है । ... ... ............ । 1 है। तदनन्तर पुरस (जीवात्यय) का विकास होता है ( देखिए ई. उ. वि.भा..सं. १००) निश्चित है। जबतक प्रजा नही, तबतक प्रजापति नही जब तक लोक नहीं, तब तक प्रा प्राकृतात्मा शुक्र क्या पदार्थ है ! इस का उत्तर है 'उपाठानकारण' । विश्व का उपादानकारण गृहीत भात्पतर"। अव्यक्ताधिकरण में हमनें यजुब्रह्मगर्भित पड्ब्रह्म को शुक्र बतलाया था, एवं यहां भव्ययाक्षरावच्छिन्न आत्मदर को शुक बतलाया जारहा है, इस में विरोध नहीं समझना चाहिए, जैसा कि आगे जाकर स्पष्ट होजायगा । चत्वारिशिनी परमाविराट के पूर्वोक्त पाठ भर- परजन ही सृष्टि का भाधार है। बिना वेद के न ईश्वरमुष्टि होती है, न जीवसृष्टि बिन्तर केवल इतना है रि ईश्वरसंस्था में पहिले पुरुष है, पुरुष से विश्व का मूल वेदतत्व प्रादुर्भत होता *आ ईशोपनिषत् ॥ যুকমার क्ययोजनायां शब्दार्येषु च भेदः पूर्वव्याख्यानतः, अथापि विशिष्टाद्वैतं तु न लेगतोऽप्यक्लिङ्कने । तदिदं युगकर्शिनां विदुषामा-नन्दायव स्यात् । क्या विशिष्टाद्वैत की पुष्टि करने के लिए ही उपनिषत् प्रकट हुए हैं ? क्या इन साम्प्र- दायिक अयों से, जो केवल कल्पना का साम्राज्य निर्माण करने वाले चतुर शिल्पी हैं, आत्म- तुष्टि हो सकती है ? यदि नहीं तो किसी भी सम्प्रदाय का आश्रय न लेते हुए . अाप हमारे साथ चलिए । हम आपको शुक्रविभूति के दर्शन कराते हैं । विषयारम्भ में कहा गया है कि चिराद्ब्रह्म का जन्मदाता शुरुतत्व है । इस शुक्रपदार्थ का सामान्य विवेचन पूर्व के शुकाधि- कार में विस्तार से किया जा चुका है । अतः यो पिन्टपेषण की आवश्कता नहीं है। केवल शुक्रसम्बन्धी विशेषभावों का ही दिग्दर्शन कराना पयाप्त होगा। कौन है ? इस का उत्तर है -- "सृष्टिसानी अव्यययुक्त. अतएव वीजावस्थापन्न भदरान यों का स्मरण फीजिए । उन बाटो अवययों में सातवे पुजन' नाम के अवयव की पांगे यलाएं वेद-लोक-मजा-वीर्य-पशु इन नामों से प्रसिद्ध हैं । इन में वेद नाम का पहिला है, एवं भारमादि में पहिले येद उत्पन्न होता है, अनन्तर वेदद्वारा योगमाया का प्रादुर्भाव होता अममात्र में अन्तर है । परन्तु विना येद के प्रजापति का रूप निष्पन्न नहीं होसकता, प्राकृतामा दर्शपूर्णमास का ईशोपनिषत् ।। MA । नहीं । जब तक आपोमय सुवेद नहीं, तब तक लोक नहीं । जव तक यजुर्वेद नहीं, तबतक सुवेद नहीं । इसप्रकार परम्परया वेद ही प्रजोत्पत्ति का कारण बनता हुआ 'प्रजापति' शब्द को अन्वर्थ बनाने में समर्थ होता है। तभी तो प्रजापति को वेदमूर्ति कहा जाता है । इस प्रजा- पति की ईश्वर-पतिपा-जीव-शिपिविष्ट भेद से चार संस्थाएं बतलाई गई हैं। इन चारों में ईश्वरप्रजापति विश्वकर्मा नाम से प्रसिद्ध है । इस विश्वकर्मा प्रजापति के समानशील-व्यसन चार अभिन्न सखा उत्पन्न होते हैं । चारों मित्र वरुण, इन्द्र, अग्नि, सोम इन नामों से प्रसिद्ध हैं। किसी समय यह पांचों पृथक् पृथक् थे । जब तक यह पृथक् पृथक् रहे, तबतक इन की विश्वनिर्माणसम्बन्धिनी कामना पूरी न हुई । फलतः इन्होंने विचार किया कि ऐसे काम नहीं चल सकता । अपने को परस्पर में मिलकर सृष्टिनिर्माण करना चाहिए। ऐसा ही हुधा । पाचों मिल गये । मिलने से कामना पूरी होगई । इन की समष्टि कर्मपूर्ति का हेतु बनी, अतएव यह यज्ञ 'कामम' नाम से प्रसिद्ध हुआ । यही यज्ञ यज्ञविज्ञानपरिभाषा के अनुसार प्रागे जाकर 'दर्शपूर्णमास' नाम से व्यवद्धत हुश्मा । अनरूप चन्द्रमा अग्निमयी पृथिवी के चारों ओर परिक्रमा लगाता है । इस की यह परिक्रमा एक चान्द्रमास में पूरी होती है । इस परिक्रमा से चान्दमास कृष्ण-शुक्ल दो पक्ष होगये । कृष्णपक्ष की अन्तिम विश्रामभूमि 'दर्श' कहलाने लगी, एवं शुक्लपक्ष की अवसान भूमि 'पूर्णिमा' कहलाने लगी । दर्शतिथि में चन्द्रमा की मृत्यु है, पूर्णिमा में युवावस्था है । शुक्लद्वितीया जन्मकाल है, शुक्लाष्टमी बचपन है, कृष्णाष्टमी वृद्धाय स्था है । इन सब भावों की मूलाधारभूमि प्रतिपत् ( पड़वा ) है । यहीं से चन्द्रमा के हास एवं वृद्धि की प्रपत्ति ( उपक्रम ) होती है, अतएव इसे 'प्रतिपत्' कहा जाता है । शेष सारे चान्द्र अहोरात्र प्रतिपद का अनुसरण करते हैं, प्रतिगत् के अनुगामी हैं, अतएव उन्हें अनुचर कहा जाता है । मतिपत्-अनुचर सांकेतिक शब्द हैं । मुलप्रतिष्ठा को प्रतिपद कहा जाता है, मला- नगत इतरभावों को अनुचर कहा जाता है । सूर्य प्रतिपत् है, रश्मिएं अनुचर हैं । चन्द्रमा प्रति- पत् है, नहाना अनुचर हैं । भाग्मा प्रतिपत् है, इन्द्रियप्राण अनुचर हैं । मस्तक प्रतिपत् है, इतर अङ्ग अनुचर हैं । गुरू प्रतिपत है, शिष्यवर्ग अनुचर है । सेनाध्यक्ष प्रतिपत् है। सेना अनुचर के प्राकृवात्मा | ईशोपनिपत ॥ दर्शपूर्णमास । भेद से तीन भागों में विभक्त है । दिन में पृथिवी का जो भाग सौरप्रकाश से युक्त रहता है, वह अदिति है । राविगत पार्थिवभाग सौरप्रकाश मे वञ्चित होता हुआ दिति है। मध्यान्ह पर्णिमा है, मध्यरानि अमागस्या है, प्रात काल शुक्लाष्टमी है, सायकाल कुणाष्टमी है । इसी प्रकार उत्तरायणमण्डल अदिति है, दक्षिणायनमण्डल दिति है । उत्तरायण उपक्रमकाल शुक्ला- एमी है, मध्यकाल पूर्णिमा है, उपसहारपाल कृष्णाष्टमी है, दक्षिणायन मध्यकाल दर्श है, निपुत्रकाल पूर्णिमा है । सारा सम्बासर पणिमारूप है, प्रकाशरूप है, सरासर पूर्व-पश्चिम सर ओर पूर्णिमा (प्रकाश) का साम्राज्य है । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है- पृणां पश्चादुत पूर्णा पुरस्तादुन्म यतः पौर्णमासी जिगाय । तस्या देवा अधि संवसन्त उत्तमे नाक इस मादयन्ताम् ।। (ले० मा० ३३१।१।) इति । पौर्णमासेष्टि का सम्बन्ध मध्य के विषुवकाल से ही है। यहीं सारे प्राणदेवता प्रतिष्ठित हैं , यही नाक स्पान है । इसी अभिप्राय से 'मध्यतः पौर्णमासी जिगायः' इत्यादि कहा गया है । यही पृथिवी का दर्शपूर्णमास है । पृथिवी सूर्य का उपग्रह है , अतएव सूर्य प्रतिपत् । है, पृथिवी अनुचर है। चन्द्रयुक्त पृथिवी को साथ लिए हुए सूर्य परमेष्ठी के चारों ओर परिक्रमा लगा रहा है । यही सूर्य का दर्शपूर्णमास है । इसी सौरदर्शपूर्णमास से परमेष्ठी रूप महान् में गुण्य- भार का उदय होता है । परमेष्ठी का वह भाग जो सौरप्रकाश से युक्त रहता है, पूर्णिमाकाल है , यही अदिति मण्डल है , यही अध्यात्मभापानुसार सत्त्वप्रधान महान् है । विरुद्ध तमोमय भाग दर्शकाल है , यही दिति मण्डल है , यही तम प्रधान महान् है । सन्धिमाग रजोमहान् सौर अदिति का निरूपण करती हुई उपनिषच्छुति कहती है- या माणेन (सौरमाणेन ) सम्भवसदितिर्देवतामयी। गुहा पविश्प तिष्ठन्ती या भूतेभिजायच ॥ (कठ० ५।७) ।

प्राकृतात्मा दर्शपूर्णमास मा ईशोपनिषत् | सूर्य परमेष्ठी का उपग्रह है, अतएस परमेष्ठी प्रतिपत् है, सूर्य अनुचर है । चन्द्रमा-पृथिवी एस सूर्य को अपने महिमामण्डल में प्रतिष्ठित रखता हुआ परमेष्ठी स्वयम्भू के चारों ओर परिक्रमा सगाता है । इस परिक्रमा से ही विन्धका स्वरूप निर्माण होता है | विश्व एक प्रकार का प्रकाश है, यही पुण्याह (ब्रह्मा का दिन-सृष्टिकाल) है । यही सृष्टिकाल अदिति मण्डल है, यही परिणमा है । प्रलयावस्था विश्वग्रभावात्मक तमोरूप दितिकाल है, यही दर्श है , यही परमेष्ठीकृत दर्शपूर्णमास है । स्वय सयम्भू स्थिर है, अतएर इसे परोरजा कहा जाता है । पृथिवीरूप भूलोकन सूर्यरूप स्वर्लोक, पृथिवी और सूर्य के मध्य का भुगर्लोक परमेष्ठीरूप जनल्लोग। परमेष्ठी और सूर्य के मध्यका महर्लोक खयम्भू और परमेष्ठी के मध्यका तपोलोक यह ६षों रज (परिभ्रमणशील लोक ) उस परोरजा सत्यलोकात्मक स्थिर स्वयम्भू के आधार पर प्रतिष्ठित हैं । उसने अपनी प्राणशक्ति से स्वयम्भू प्राण प्रधान है] ६ओं का विवरण कर रक्खा है। इसी रहस्य को लक्ष्य में रखकर मन्त्रश्रुति कहती है । अचिकित्वाश्चिकितुपश्चिदन कवीन पृच्छामि विदमने न विद्वान् । पियस्तस्तम्भ पम्पिा रजास्य नस्यरूपे किमपि स्विदेकम् ।। (ऋक्स० नासदीयसूक्त १ । १६४६६) इस प्रकार प्राणप्रधान विश्वकर्मा स्वयम्भू (ईश्वर ) प्रजापति अपनी यरुण [परमेष्ठी ], रद्र[सूर्य , अग्नि [पृथिवी], साम [च द्रमा] इन चार प्रतिमाओं से युक्त होकर दर्शपूर्णमास की प्रवर्तक धनता हुन्ना परमप्रजापति नाम से प्रसिद्ध होजाता है । इसी परमप्रजापति का निरूपण करती हुई यजु श्रुति रहती है- या वे धामानि परमाणि यापमा याम यमा विश्वकर्म-नुतेमा । शिक्षा सखिभ्यो इविपि पथावः स्वय यजस्य तन्त्र रानः ।। [यजुस १७।०१।] •एपिक विगार मित्रा 'नासदीयसन विज्ञानमा यम दरसना चाहिए । - प्राकृतारमा दर्शपूर्णमास या ईशोपनिपत् ॥ सत्य, तप, जन, मह यह चार परमधाम है, स्वः मध्यमधाम है, भुः भूः अवमधाम है। दूसरे शब्दों में स्वयम्भू परमेष्ठी परमधाम है, सूर्य मध्यमधाम है, चन्द्रमा एवं पथिवी भवमधाम है । परमेष्ठी-सूर्य-चन्द्रमा-पथिवी-यह चार उस के अभिन्न सखा हैं । इन्हें वह श्रेष्ठमित्र (स्वयम्भू) शिक्षा देरहा है । जैसा स्वरूप उस का है, जो संस्थाक्रम उप्स में है, ठीक वैसा ही स्वरूप, पही संस्थाकम उक्त चारों प्रतिमाप्रजापतियों में है । यह वर्तुल है, यह चारों भी बत्तुल हैं । यह आत्मा [हृदयभाय], पद [पिण्ड], पुनःपद [ महिमा ] भेद से निपी है, वे ही तीन तीन पर्व इन चारों में हैं । यही शिक्षण है। उक्त कामप्रयज्ञ से परस्पर में मिलते हुए पांचों सर्वरूप बन रहे हैं। इसी प्राधारपर पूर्वप्रकरणों में हमनें प्राणादि पांचों को 'साय' किंवा 'सर्व' नाम से व्यवहृत किया है [ देखिए ई. वि. भा. पृ. सं- ३२५ ] । विश्व में सर्वत्र इन्हीं सर्वप्राणादि का साम्राज्य है । प्रजापति की इन्हीं संस्थाओं का दिग्दर्शन कराती हुई वाजिश्रुति कहती है- "स ऐक्षत प्रजापतिः-इमं वा प्रात्मनः प्रतिमाममुक्षि++++ ता वाऽएताः प्रजापतेरधिदेवता अमृत्यन्त अग्नि-रिन्द्रः-सोमः परमेष्ठी प्राजाप- त्यः + + + + तत एतं परमेष्ठी पानापस्यो यसमपद्यदर्शपूर्णमासौ, ताभ्यामय मत । नाभ्यामिष्ठाऽकामयत-महमेवेदं सर्व स्यामिति स पापोऽभवत् "आपो वा इदं सर्वम्” । स परमेष्ठी प्रजापति पितरमब्रवीद-कामनं चाऽहं यज्ञमदर्श, तेन त्वा याजयानीती , तथेति । तमयाजत् । स इवा भकाम- यत -- अहमेवेदं सर्व स्यामिति , सप्राणो ऽभवत् "प्राणो वाइदं सर्वम्" स प्रजापतिरिन्द्रं पुत्रमब्रवीत् - अनेन वा काममेण + + + स बाग- भवत्, “वाग्वां इदं सर्वम् । स इन्द्रोऽग्नीपौमौ भ्रातरौ-अब्रवीत्, अनेन चां काममेणा० + + ++ अन्नाद एवान्यतरोऽभवत्, अन्नपन्यत्तरः । भन्नादएवाग्निरभवत, अन्नं सोमः। अन्नादश्च वा इदं सर्वमन्नं च । ता वा प्रयमज पा, इससे परमेष्ट्री उपन हुथा, परमेष्टी से पुण्डीर स्वयम्भू का जन्म हुआ। प्राजापत्य प्राकृतात्मा - सम्बन्ध से प्राणरूप से उदित होनाला योगमायाच्छिन्न पुण्डीर स्वयम्भू पृथक् है। मायी स्वयम्भू .. ईशोपनिपत् ।। दर्शपूर्णमास एताः पक्ष देवताः (ब्रह्मा (पाण), विष्णुः (आपः-वरुणः), इन्द्रः (पाक्', अग्निः (अन्नादः), सोमः (अन्नम् ) एताः पञ्चदेवताः) एतेन कामप्रेण यज्ञेना- जयन्त । ता यकामा ( सर्वव्याप्ति-प्राप्तिकामा ) अयजन्त, स आभ्यः काम समायत । यतकामो हवाएतेन यज्ञेन यजते, सोऽस्मै कामः समृभ्यते(शत " प्रा० ११ का।१ य० । ६ वा । १३ कर-२० क. पर्यन्त)। उक्त श्रुति की तीन चार वातों पर पाठकों को विशेष ध्यान देना चाहिए, क्योकि उन्हीं आधार पर पुण्टीरविद्या का रहस्य अवलम्बित है, जो कि आगे जाकर स्पष्ट होगा । पहिली बात तो यह है कि प्रजापति शब्द से प्रकृत में व्यापक मायावच्छिन्न मायी महेश्नर अभिप्रेत है । इस प्रजापति से क्रमश परमेष्टी, इन्द्र, अग्नि, सोम इन चार अघिदयताथों का प्रादुर्भाव होता है। इनमें श्रुतिनें परमेष्टी को प्राजापत्य वहा है । दूसरी बात यह है कि परमेष्टी ही सर्वप्रयम दर्शपूर्णमास यज्ञ करता है । परमेष्टी भागे जाकर उस पितर प्रजापति से कहता है कि मैंने दर्श- पूर्णमास नाम का कामम यज्ञ देखा है, मेरी इच्छा है कि मैं इस यज्ञ से आप का यजन करू । प्रजापति की 'तथास्तु' इस पनुमति से परमेष्टी प्राजापत्य कामप्रयज्ञ से प्रजापति का यजन करता है। परगेष्टी या स्वयम्भू प्रजापति के चारों ओर परिक्रमा लगाना ही कामप्रयज्ञ से इस प्रजापति फा यजन करना है । तीसरी बात यह है कि इस परमेष्टीकृत परिक्रमारूप यज्ञ से ही प्रजा- पति की नवीन प्राणसस्था का उदय होता है । पहिले सर्वरूप प्रापोमय परमेष्टी का उदय होता ६, अनन्तर प्राणमय स्वयम्भू का उदय होता है | मायी स्वयम्गू पृथक् तत्व है, एब परमेष्टी के परमेष्टी के द्वारा पुण्डीररूप में परिणत होने वाले इस परिच्छिन्न स्वयम्भू के लिए मागे जाकर- 'स मनापतिरिन्ट पुनमनबीच यहागया है। श्रुतिके थारम्भ का प्रजापति शब्द जहा व्यापक मायो सयाभू (महेश्वर) या पाच यहां यह आगे या प्रजापति शब्द महेश्वर साया में मुक्त पत्रेश्वर पुण्डीर म्यपाभूया याचक है । मायी अयम्भूनी इच्छासे परमेष्ठीने दर्शपूर्णमास दिया है, - 1 प्राकृतात्मा का ईशोपनिषत् - दर्शपूर्णमास है, एवं पुण्डीर स्वयम्भू की इच्छा से इन्द्र (सूर्य) अग्नि (पृथिवी ) सोम ( चन्द्रमा)ने दर्शपूर्णमास किया है । पुण्डीर स्वयम्भू की अपेक्षा से ही परमेष्ठी-सूर्य आदि प्रतिमाप्रजापति नाम से व्यव- '. हत हुए हैं । एक एक वल्शामें पांच पांच पुण्डीर हैं । इन पांचों में खयम्भू परमग्रजापति है, शेष चारों प्रतिमाप्रजापति हैं । उस व्यापक मायी स्वयम्भू के उदर में ऐसी पनपुण्टीमिका सहस (1000) प्राजापत्य बख्शाएं प्रतिष्ठित रहती हैं। मायावच्छेदेन स्वयम्भू एक है, पुण्डी- रायच्छेदेन स्वयम्भू एक सहस्त्र हैं, यही वक्तव्य है । पञ्चपुण्डीराप्राजापत्यवल्या १-"प्राणो वाइदं सर्वम्” पाणः-स्वयम्भू ब्रह्मा परमप्रजापतिः? २-"आपो वा इदं सर्वम्” आपः परमेष्ठी विष्णुः ३-"वाग्वा इदं सर्वस" वाक्-सूर्यो इन्दः प्रतिमा- ४-अन्नादो वाइदं सर्वम् अन्नादा-पृथिवी-अग्निः :-पृथिवी-अग्निः प्रजापतयः४ ५-"अन्नं वाइदं सर्वम्" अन्नम् चन्द्रमा सेमिः ऐसी सहस वल्शाओं को (टहनियों को) अपने उदर में रखने वाला मायी गहेश्वर ही ब्रह्माश्वस्थ है, जैसा कि आगे के परिलेख से स्पष्ट होजाता है। ब्रह्मावत्यरूप इसी वेदमुर्ति महेश्वर के येदभाग से सुब्रह्म रूप प्रापोमय ब्रह्म का जन्म होता है । वेद खयं द्विब्रह्म है, सुमस पडू- ब्रह्म है । पहिले वाङ्मय सत्य ब्रह्माग्नि ही था । 'पतिश्च पत्नी च' इस इच्छा से आगे जाकर यही सस-त यह दो रूप धारण कालेता है । सत्यावाक् यजुर्मम है, ऋतावाक् सुब्रह्म है । इसी को ऋग्वेदने 'माम्भृणीवार' ( आपोमयीवाक् ) नाम से व्यवहृत किया है । ( देखिए - ऋक् संहिता "प्राम्भृणीसूक्त ) यह ऋनसत्वरूप ब्रह्म सुत्रझ ही विश्वके वादि प्रवर्तक ' हैं, जैसा कि 'अनेजदेकम्' इत्यादि मन्त्रमाप्य में विस्तार से बतलाया जाचुका है । अग्निमय ब्रह्म भाप उसी सरूपमें प्राप्त करना चाहे तो यह असमन है। क्योंकि यह अन्न सामना भग्नि में प्राकृतात्मा या ईशोपनिषत् ॥ साटिकासम्बध ----- wwra । पुरुष है, पति है पिता है । आपोमय सुब्रह्म स्त्री है, पनी है, माता है । ब्रह्म महेश्वर है, सुब्रह्म पार्वती है । यही जगत् के माता पिता हैं-'जगतः पितरौ वन्दे पार्वती परमेश्वरौं' । इ ही दोनो के सम वय से आगे की सृष्टिधारा चलती है। दो वस्तुओं का सामन्य चार प्रकार से दुया करता है । चार से अतिरिक्त कोई पाचवा प्रकार नहीं है । साथ ही में यह भी ध्यान रखिए कि जैसे सम्बध सख्या निणति है, एवमेव दो तप भी सर्वथा निरिचित हैं । उन दो के अतिरिक्त तीसग तत्व प्राप को विश्व में नहीं मिल सकता । वे दोनों तर वे ही ब्रह्मरूप आग्नेयपुरप, सुब्रह्मरूप सौम्या स्त्री है। सचमुच अग्नीसोमा (मक स्त्रीपुरुष के अतिरिक्त थ य तीसरी वस्तु नहीं है ।तभी तो "अग्नीपोमात्मकं जगत्" "ट्रय वा इद न तृतीयमस्ति शुप्फ चैदाईभ । यच्छुफ तदानेय, यदाई तत् सौम्यम्" इत्यादि श्रोतवचन चरितार्थ होते हैं । यह दोनों ही तत्व विजातीय हैं । एक भोहता है, दूसरा भोग्य है। अग्नि मोक्ता है, अतएव यह अनाद नाम से, सोम भोग्य है, अतएव यह अन्न नाम से प्रसिद्ध है। दोनों का यह अन्नादानलक्षण भोक्तृ भोग्यभाव समुदाय और अवयव भेद से दो भागों में विमत है । ब्रह्म (अग्नि ) सुब्रह्म ( सोम ) रूप स्त्रीपुरुष का यदि अश्यत्र सम्बध होता है तो ऐसी अवस्था में प्राग्नेयब्रह्म "पुस्प" कहलाता है, सौम्यसुब्रह्म 'स्त्री' कहलाता है । यदि समुराय सम्पन्ध होता है, दूसरे शब्दों में सारा सोम सामना यदि अग्निवस के उदर में चलाजाता है तो उस समय यह दोनों तत्त्र स्त्री पुरष न कहलार श्रन अन्नाद नाम से व्यवहृत होते हैं । अन्न जय अन्नाद के ( सुब्रह्म जब ब्रह्म के ) उदर में चला जाता है तो उस समय पाहत होने पाले अन्न की हसत उता नष्ट होजाती है । परन्तु ऐसा होता तमी है जब कि सारा अन्न भत्ताद म पाहत होनाता है । जब आप भन्न खाते हैं तो वह पाप के शारीराग्नि में जाकर अग्निस्वरूप में परिणत होता हुआ अपना प्रातिरित्रक सरूप खो बैठता है । अब यदि उस भुक्त अन्न को 'पाहत होचुश है । वस ऐसे समुदायाहुतिसम्बध में ही उन ब्रह्म सुत्रलों को अन्नाद-अन्न वह जाता है । इस सम्बन से कोई नई वस्तु [अपूर्वभाग] उपन्न नहीं होती, अपि तु केवल ब्रह्म की भायतन मात्र बनता है, यही वृद्धि 'पुष्टि कहलाती है।

प्राकृतात्मा . का ईशोपनिषत् ॥ पूतिकरसम्बन्ध यदि समुदाय का सम्बन्ध नहीं है, अपि तु, अवयय का सम्बन्ध है तो पुष्टि नहीं सृष्टि है । इस सम्बन्ध में अवयवी निर्विकार है, केवल अवयव की चिति है । यही चितिलक्षण अवयत्र सम्बन्ध (संसृष्टिलक्षण सृष्टिसम्बन्ध) सृष्टि ( अपूर्वभावोत्पत्ति ) का कारण है । इस सृष्टिमूलक अयश्व सम्बन्ध में ही ब्रह्म एवं सुब्रह्म स्त्री-पुरुष नाम से व्यवहृत होते हैं । समुदायरूप अन्न अन्नाद के सम्बन्ध में-"यदा उभौ समागच्छना-ग्र -अत्तैवाख्यायते, नाद्यम्" इत्यादि रूप से श्रुति भन्नसचा का उच्छेद बतलाती है, एवं अवयव सम्बन्ध में अंशमात्र का उच्छेद है । उच्छेद नहीं, अपूर्वभाव में परिणति है । अतएव इस सम्बन्ध में अन-प्रसाद का प्रयोग न होकर स्त्री पुरुपशब्दों का प्रयोग होता है। इन दोनों का (स्त्री-एवं पुरुष का) अवयव सम्बन्ध तीन प्रकार से संभव है । स्त्री-खी का सम्बन्ध भी संभव है। इस अवयर सम्बन्ध से न क्षोभ होता, न सृष्टि होती। क्योंकि सृष्टि विजातीय वस्तुद्वय के समन्वय से ही होती है । स्त्री-स्त्री सजातीय पदार्थ हैं । साथ ही में सौम्य होने से दोनों अवयव आई हैं । अतएव यह मिथुनभाव सर्वया निरर्थक है । एवमेन पुरुप पुरुष (के अश्यवों) का सम्बन्ध सम्भव है । यदि दो पुरुषों का समन्यय है तो सर्वनाश है। दोनों ही थाग्नि हैं । समान वल वाले दो आग्नेय ग्रह टकरा कर जैसे महाविस्फोटन [जोकि विस्फोटन ऐन्द्रभूकम्प नाम से प्रसिद्ध है। जनक बनजाते हैं, अपया समान गति रखने वाली दो पञ्जाब ट्रेनों के सम्बन्ध से [भिड़ जाने से] जैसे महाविस्फोटन होजाता है, एवमेव ध्याग्नेय पुरुषावयों का संघर्ष विस्फोटन का जनक बन जाता है । इस सम्बन्ध में भी सृष्टि का प्रभाव है, क्यों कि दोनों ही सजातीय हैं । इस सम्बन्ध में सृष्टि तो नहीं है, परन्तु क्षोभ अवश्य है । तीसरा है स्त्री पुरुष के शुक्र-शोणितरूप अत्रयों का सम्बन्ध । इस विजातीय अवयव सम्बन्ध से ही अपूर्वभाव का उदय होता है । यही सम्बन्ध 'समन्वय' नाम से प्रसिद्ध है। इसी से सृष्टि होती है-"तत्तु समन्वयात्" । इस सम्बन्ध में अवयव को हानि होती है, अवयत्री ज्यों के त्यों सुरक्षित रहते हैं । पुरुष अग्नि है, स्त्री थाप (सोम) है । अग्नि उदर में पानी चला जाय, अग्नि अग्नि मिल जाय, पानी पानी मिसजाय, भाग पानी मिलजांय, इस प्रकार दोनों के सम्बन्ध के चार हो द्वार हैं । यदि अप्ति के उदर में पानी (सोम) चला गया के १७ प्राकृतात्मा -- -पुष्टिकर ....0000 --- ३माया सम्बन्ध) (स०स०) निरर्थक सी में प्रीष्टिनाली में पुराना बैठा दे, पुरुष में स्त्री बैठी है, जैसा कि पूर्व के भव्यक्तात्मा । ईशोपरिपत् ।..- सृष्टिकरसम्बन्ध तो पुष्टि है, यदि अग्नि अग्नि (ब्रह्म-ब्रह्म) का सम्बन्ध होगया तो विस्फोटन है, यदि पानी पानी [सुब्रह्म सुब्रह्म) मिल गए तो निरर्थक है, यदि भाग पानी का (ब्रह्मरूप पुरुषके शुक्र, सुब्रय रूप स्त्री के शोणित का) समन्वय है तो सृष्टि है । 1-स्त्रीपुरुषका समुदाय सम्बन्ध (अग्नि सोम का समुदाय सम्बन्ध)- २-स्त्री स्त्री का सम्बन्ध (सोम सोम का प्रयव सम्बन्ध) ३-पुरुप पुरुष का सम्बन्ध (अग्नि अग्नि का अवया सम्बन्ध)-~~-विस्फोटक 18-स्त्री पुरुष का अवयव सम्बन्ध (अग्नि सोम काअययन सम्बन्ध)----सृष्टिकर स्त्री पुरुष के जो प्रायव सृष्टि के उपादान बनते हैं, उन्ही को विज्ञानभाषा में योपा पा कहा जाता है । योपा वृपा शब्द साकेतिक है । प्रश्नोपनियत में इन्ही के लिए 'रवि-पाण' शब्द प्रयुक्त हुए हैं, सं यहां रयि प्राण के मिथुनभान से ही सृष्टि की उत्पत्ति बतलाई गई है-(देखिए प्रश्नोपनिषत् १ प्रश्न) । योपा यदि सर्वात्मना वृषाके गर्भ में है तो अन्न भन्नादभाव है, अपया सम्बन्ध में स्त्रीपुरुषमात्र है । योपा-वृषा के सृष्टिप्रवर्तक अवयर विज्ञानभाषा में रेत- योनिनाम से प्रसिद्ध हैं । रेन सुब्रह्म नाम के योपा का अंश है, योनि ब्रह्म नाम के धूपा का यश है । प्राप्नेय भाग योनि है, सौम्य भाग रेत है । दूसरे शब्दों में प्रत्यालिरूप यजुर्नस योनि है, सुमनारूप पद्ब्रह्म (भाप) भाग रेत है । स्थिति है कुछ और, दिखलाई पड़ता है मुझ धन्य । इसी प्राधार पर 'परोक्षमिया टय दि देवाः प्रयतद्विषः यह सिद्धान्त प्रतिष्ठित है । प्राने का प्रयेक कार्य परोक्ष (पदें) में होता है । मुत्रम फी प्रल में ग्राहुति होती है। प्राप्ति पुरुष है, मोन सी है। यह सीरूप मुत्राय पुरुष में प्रतिष्टित होरदा है, उधर पुरुषरूप मन - विकरगा में निस्तार से बतलाया जायुका है।

प्राकृतात्मा 1 ईशोपनिषत् योपा-वृपा ayurvv - विश्वखरूपसन्यादिका महामाया की जहांतक व्यान्ति है, वहां तक वेदघन वेदमुन्ति ईश्वर को व्यान्ति है । यदरच्छेदेन ईश्वर (महेपर) व्याप्त है, तदवच्छेदेनैव ग्रम (वेद) सुब्रह्म (सुवेद) व्याप्त है, एक विन्दु भी दोनों से शून्य नहीं है। दोनों में एक प्रकार से अन्न-अन्नादभाव सम्बन्ध है । अतएव यह थाहुतिसम्बन्ध सृष्टि के लिए अनुपयुक्त है । सृष्टि तभी हो सकती है, जब कि उस व्यापक ब्रह्म के किसी एक प्रदेश में व्यापक सुब्रह्म के किसी एक अवयत्र कः आइति हो । योनिभाग वृषारूप ब्रह्मका अवयर है, रेतोभाग योपारूप सुब्रह्म का अवयत्र है । इन दोनों अयपवों में मायावच्छिन्न सर्वव्यापक चलाचल (गतिस्थितिमत्) का एक अवयविशेष विशेष है, इसमें मातरिश्वा नाम से प्रसिद्ध भार्गववायु द्वारा उस ब्रह्म पर सर्वत्र व्याप्न सुब्रह्म नामसे प्रसिद्ध पड्- ब्रह्म (आप) के एक अवयवविशेष की आहुति होती है, यही अवयव रेत है । इन अवषयों के समन्वय से सारा विश्व बना है। भागे की सारी सृष्टियों में इस अवयव सम्बन्ध की ही व्याप्ति सम- भेनी चाहिए । ईश्वर सृष्टि हो, अथवा जीवसृष्टि, सर्वत्र योपापारूप ब्रह्म-सुब्रह्म के अश्यत्र सम्बन्ध की ही प्रधानता है। उदाहरण के लिए पुरुष को लीजिए । पुरुषके सबाग शरीरमें रेत व्याप्त है, उधर स्त्री के सर्वाङ्ग शरीर में योनिरूप प्रात्तव (रक्त) व्याप्त है । परन्तु सभी रेत अथवा सभी आर्तव प्रजोत्पत्ति या कारण नहीं बनता । यदि ऐसा हो तो स्त्री पुरुषका सरूप ही नष्ट हो जाय । स्त्री पुरुष पर आशिक रेत-पाव ही प्रजोत्गति का कारण बनता है । सृष्टि किस सम्बन्ध से होती है ! यह बतला दिया गया। श्रय प्रकरणसंगति के लिए एकबार श्रापका ध्यान 'अनेनदेक०' इस मन्त्रार्य की ओर आकर्षित करते हैं। वहां बतलाया गया है कि मायावच्छिन्न चलाचल सर्वव्यापक यजुर्बोरूप ब्रह्माग्नि में मात- रिश्वायायु पब्रह्मरूप श्रापोमय ( भृग्वशिरोमय ) सुब्रत की आहुति देता है । इस प्रकार 'भनजेदकम्' इत्यादि मन्त्र सामा:यरूप से व्यापक ब्रह्म में व्यापक सुब्रह्म की आहुति यंत- लाता है । परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है । पूर्वकथनानुसार साहुति में अन्नान्नादभाबमान है, एवं ऐसा सम्बन्ध पुष्टि कर बनता हुआ भी सृष्टिमयादा से बहिर्भूत है । सृष्टि अवयय समन्वय पर ही निर्गर है । अतएव "मातरिश्या एजदने जत् ब्रह्म में प्राप की आहुति देता है। इस वाक्य । १७७ प्राकृतात्मा येसा ही भयं करलेता है। परन्तु अाज हम अपने पाठकों को यह विश्वास दिलाते हैं कि सोहन - ईशोपनिषत् ॥ अवयव की आहुति का "ब्रह्म के एक योनिरूप प्रदेश में मातरिश्वावायु आपोमयब्रह्म के रेतीरूप एक प्रदेश की पाहुति देता है। यही अर्थ समझना चाहिए । यही कारण है कि श्रुतिने "तस्मिन्नको मातरिश्वा जुटोति" यह न बहकार "तरिमन्नपो मातरिश्वा दधाति" यह कहा है । आहुति सम्बन्ध समुदायसम्बन्धात्मक अन्नान्नादभाव पर निर्भर है, श्राधानसम्बन्ध अायरसम्बन्धात्मक स्त्री-पुरुषमात्र पर निर्भर है । लोकव्यवहार में मी "योनि में रेत की आहुति होती है। यह नहीं कहा जाता, अपि तु “योनि में रेत का अाधान होता है। यही कहा जाता है । अन्न- एव च वायु को होता (आहुति देने वाला) नहीं कहा जाता, अपि तु रेतीघा (रेत का याधान करने वाला) कहा जाता है । प्रश्न होता है कि 'अनजदंकम्०' इत्यादि मन्त्र से प्रतिपादित सामान्य अर्थ की उपेक्षा कर–'अवयव की अवयव में माहुनि होती है" यह विशेष अर्थ किस थाधार पर प्रमाणिक माना गया ? इसी प्रश्न का समाधान करने के लिए 'स पर्यगाछुक्रम्' इत्यादि मन्त्र हमारे सामने भाता है । मंत्र में पढ़ा हुप्रा शुक' शब्द ही उक्त प्रश्न का सना धान करता है । कैसे ? इस जिशसा को शान्त करने से पहिले शुकपदार्य का खरूप परिचय करा देना यावश्यक होगा। पदार्यविश्लेपणविज्ञान के विलुप्तप्राय होजाने के कारण विद्वानों की दृष्टि में भाजदिन शुक्र-रेत-वीय तीनों अभिन्न पदार्थ हैं, तीनों पर्याय है । परन्तु यथार्थ में शुक्र भिन्न बस्तु है, रेत अन्य वस्तु का वाचक है, वीर्य शब्द किसी अन्य ही पदार्थ का बोधक है । वीर्य और शुक्र रेत में प्रतिष्ठित हैं, इसीलिए 'तात्स्टणात्ताञ्चन्यम्' न्याय से रेत को शुक्र -वीर्यः शब्दों से व्यवद्धत कारदिया जाता है । ऐसा होने पर भी तीनों को एक ही वस्तु मान बैठना सर्वथा भ्रम है । संसहन साहित्य पर भाज एक यदा भारी फाउझर लगाया जाता है । सर्वसाधारण का यह विश्वास है कि संस्कृ मापा में एक एक शब्द के अनेक पर्याय होते हैं । फलतः जो जैसा चाहता है, स्वार्थानुसार । - - । साहित्य में एक अर्थ के लिए एक ही शब्द प्रयुक्त हुआ है । एकदेश की समानता यो लेपर पश्यपि मम्बन्ध प्रचलिन होगया है । पदार्थदृष्टिसे सव शब्द नियत भयों के ही प्रतिपादक है । - 1 बलवीयपराक्रम प्राकृत मा | ईशोपनिपत् ॥ । विष्णु-नारायण-यामन सब मिनार्थ के वाचक हैं । महेश्वर ईश्वर-परमेश्वर प्रात्मा-ब्रह्म सब शब्द पृषगयों के द्योतक हैं ! मघवा-पाकशासन-त्रा-पा-शुनाशीर-पुरंदर सब अपनें अपने अर्थों में नियत हैं । बुद्धि-मनीपा-धिपणा-प्रज्ञा-गति सब भिन्नार्थ के परिचायक हैं । जिसके लिए जो शब्द नियत है, वह उसी का बोधक हैं । पट और वस्त्र कभी पर्याय नहीं हैं | आदिन और सय कभी पर्याय नहीं है । वायु और वात, हिरण्यगर्भ धौर पद्मभूः, कभी पर्याय नहीं हैं । इसीप्रकार शुक्र-वीर्य-रेत कभी परस्पर में एक दूसरे के पर्याय नहीं हैं। तीनों में से पहिले वीर्यशब्द को ही लीजिए । रेत में रहने वाला, श्रामवल को बढ़ाने याला तत्वविशेष ही वीर्य' कहलाता है । बल-वीर्य-पराक्रम तीनों में भी भेद है। शरीरशक्ति बल है, प्राणशक्ति वीर्य है, मन की शक्ति पराक्रम है । हापी में वल की प्रधानता है। हाथी अपने भार से एक सिंह को कुचल सकता है । सिंह में वीर्य की प्रधानता है। शरीरशक्ति से प्राणशक्ति बलवती है, अतएव प्राणप्रधान (वीर्यप्रधान ) सिंह हार्थी को परास्त कर देता है । मन की ताकत पराक्रम है । दूसरे पर धाक्रमण कर उसे अपने वश में करलेना ही 'पराक्रम' है । यह मनो- वल है। पुरुष में इस की प्रधानता है । यह वल वीर्य से भी प्रबल है, अतएव पराक्रमी मनुष्य वीर्यशाली सिंह को भी एक पञ्जर (पीजरे ) में बद्ध कर देता है । इस प्रकार बल-वीर्य-पराक्रम तीनों शब्द नियत अों के वाचक हैं । आत्मा मन-प्राण-वाङ्मय माना जाता है । मन ज्ञानप्रधान, माण कर्मप्रधान, एवं वाक् अर्थप्रधान है । आत्मा की इन तीनों कलाओं के उपकारक क्रमशः ब्रह्म-तत्र-विट् नाम के तीन वीर्य हैं । ब्रह्मवीर्य ज्ञान का अनुयायी है, क्षत्रवीर्य फर्म का प्रेरक है, एवं विवीर्य अर्थशक्ति का संचालक है । ब्रह्मवीर्य का अग्नि से सम्बन्ध है, क्षत्रवीर्य का इन्द्र से, विड्वीर्य का विश्वेदेवों से सम्बन्ध है । जिस के रेतमें ब्रह्मवीर्य की प्रधानता है, उसकी सन्तान ब्राह्मण कहलाती है । क्षत्रवीर्य- प्रधान रेत क्षत्रियवर्ण का, विड्वीय प्रधान रेत वैश्यवर्ण का प्रयत्नया है । जिस के रेत में भवीर्यरूप, विन्तु सामान्यतः वीर्यरूप पूषा नाम से प्रसिद्ध पार्थिव तमोमय प्राणदेवता की प्रधानता रहती है, उस की सन्तान सच्छूद्र कहलाती है, इसी के लिए-'शूद्राश्चावरणवणाश्च' यह कहा जाता है । इन चारों वीपों के विरोची ।

प्रातात्मा मा इंशापनिषत् ॥ वर्ण-धममृति चार ही मतभाग है । इन देशविरोधी मलमागों की क्रमश: जिनके रेत में प्रधानता होती है, उन से क्रमशः अन्त्यन, अन्त्यावसायी, दायु, म्लेच्छ इन चार प्रसन्छुद्रों की उत्पत्ति होतो है । यह चारों ही अपर वर्ण हैं । वहीं भसद्ध गिरवसित कहलाते हैं । देवभाग- मलभाग ( देवीसंपत) (बासुरीसंपत्) श्रात्यजः अन्यावसायी १-ग्रामण वर्ग. (अग्नि- २.--क्षत्रिपर्णः (इन्द्रः )-- ३-वरयवर्गः (विश्वेदेवाः- : पूषा)-- चगीमृष्टिः -अवरवर्णः -दायुः →म्लेच्छः अवर्ग सृष्टि + स वा एप धारमा वाङ्मयः प्राणमयो मनोमयः १-मनः (ननि:) शानोदयापारिक-ब्रह्मवीयम् - 1.---सन्माना:-ब्राह्मगाः पाणः पिपि. ) वर्षे दयौप' पां-चत्रवीर्य ---तनपानाः-तत्रियाः 1-1R: (cir:) प्रौदगोपरिक-विमार्यम् --- मानाः-वैश्याः Trfamiri l यो दद मान सैया पदमा कि गौपार शुरु, शोर रेत में मई दुपा HAPPY रहने वाला समिति ने दम पर पामीर 'प्रान' का मान मिया है।

प्राकामा + ईशोपरिपत् । शुक्र रेत-चार्य । अब चलिए शुक्र-रेत की ओर । पुरुष के रेत का नाम शुक्र नहीं है, अपि तु अग्नि का नाम शुक्र है । शुक्राग्नि स्त्री में रहता है, रेत रूप सोम पुरुष में रहता है | शुक्र का प्रधान प्रायतन स्त्री का रज है, रेत का प्रधान आयतन पुरुष का सोमभाग है । पुरुष के रेत में जैसे उक्त वीर्य रहते हैं, एवमेव खी के रज में भी वीर्य प्रतिष्ठित रहते हैं । दोनों के वीर्य शुद्ध रहते हैं, तभी वर्णानुरूपा सृष्टि (सन्तान) होती है। वर्णरक्षा के लिए वीर्य रक्षा आवश्यक है । वर्णवीर्य के यथार्थ खरूप को यत्किञ्चित् भी न गनता हुआ, परन्तु जानने का अभिगान करता हुआ एक वैश्यवर्ण कर महान् नेता नेतृत्व के अभिमान में पड़कर अपने पुत्र का यदि एक ब्राह्मण वर्ण के नेता की कन्या के साथ विवाह करने में कोई हानि नहीं समझना तो यह उसका, एवं उसके देश का दुर्भाग्य है। हां यदि वह अपनी लड़की किसी ब्राह्मण पुत्र को देदे तो शास्त्र. दृष्टया उसका यह कार्य अनुचित न होगा, कारण ब्राह्मण इतरवर्ण की कन्या के साथ पाणि- ग्रहण कर सकता है । वीर्यरक्षा के लिए शास्त्रसिद्ध वैवाहिक मर्यादा आवश्यक है । इस मर्यादा का पालन न हुआ तो क्या होगा ! इसका उत्तर है भारतवर्ष की अधोगति । अस्तु प्रत में यही कहना है कि ब्रह्म की अध्ययभूता योनि (अग्नि) शुक्र है, इस की प्रधान प्रतिष्ठा स्त्री है। सुब्रह्म का अश्या भूत रेत (सोम) रेत है, इसकी प्रधान प्रतिष्ठा पुरुष है । योनि में रेत का आधान होता है, इसका 'शुक्र में रेत का आधान होत है' यही तात्पर्य है । इसप्रकार वीर्यवत् रेत एवं शुक्र का पार्थक्य भी भलीभाति सिद्ध हो जाता है । रेत शब्द पुरुष के सौम्यभाग के लिए ही नियत हो यह बात नहीं है। वस्तुतः रेतत्व का प्रयच्छेदक उपादानद्रव्यत्व ही समझना चाहिए । प्रजा का उपादानद्रव्य न केवल पुरुप का सौग्यमाग है, न केवल बी का धाग्नेय शोणित भाग है, अपि तु दोनों का समन्वित रूप 'ही उपादान है । ऐसी अवस्था में हम दोनों को रेत' कह सकते हैं । स्त्री का आग्नेय भाग भी उपादान होने से रेत है, पुरुष का सौग्य भाग भी उपादान होने से रेत है । परन्तु एक भाग्नेयरेत है, दूसरा सौम्यरेत है । इसी भेद को समझाने के लिए वैज्ञानिकोंने आग्नेयरेत को 'एक' शब्द से व्यवहृत किया है, एवं सौम्यरेत को पारिशेप्यात् रेत शब्द से प्रसिद्ध किया है ।

अतएर निसकोटि में प्रविष्ट रहते हुए भी श्राद्ध को धर्मशास्त्र में काम्यकर्म (पुत्रकामनासाधक) टित है, प्राणानुगृहीत यही दोनों जीवन के कारण है । इसी शुक्र-रेत-विज्ञान को लक्ष्य में से कोशकार स्पष्ट ही शुक्र को धनि बतला रहे हैं। "अग्निः शोचति, रेतो रसनि" से ही दोनों प्रमशः शुजरेत नाम से प्रसिद्ध हुए हैं। शुरु ही शोक है, शोक संताप है, संताप ताप शकृतात्मा ॥ ईशोपनिषत् ॥ धनरेत शुरु है, तरल रेत रेत है । घनता [परिपाक] अग्नि का धर्म है, तरलता पानी का धर्म है | ब्रह्म सत्याग्नि है, सुब्रह्म ऋत श्राप है । वह धन है, यह तरल है । यह शुक्र-रेत दोनों ही क्रमशः वृषा-योपाप्राण से अनुगृहीत रहते हैं । हमने शुक्र-रेत रूप योनि-रेत के समन्वय से प्रजोत्पत्ति बतलाई है । परन्तु वस्तुतः सृष्टि के मूलाधार है-योषा-वृपाप्राण । शुक्ररूप स्त्री के आग्नेय भाग में रहने वाला चितप्राण वृपा कहलाता है, पुरुष के सौम्यरेत में रहने वाला चित्प्राण योषा नामसे प्रसिद्ध है । इसी प्राण को भिषक् परिभाषा में 'भ्रूण' कहा जाता है । यदि शुकशोरिणत के भ्रूण जीवित हैं, तभी दोनों के समन्वय से प्रजोत्पत्ति होसकती है । यदि भ्रण निर्बल हैं, मच्छित हैं , नष्ट हैं तो ऐसी दशा में निरन्तर होने वाला भी शुकशोणित था मिथुनभाव प्रजोत्पत्ति का कारण नहीं बनसकता । इन भूणों की निर्बलता के, एवं विनाश के मातृदोप, पितृदोप, कर्मदोप, नाड़ीदोप, ग्रहदोप, आदि आठ दोष हैं । इन माठों की चिकि सा धर्मशास्त्र में प्रतिपादित है । सुप्रसिद्ध श्राद्धकर्म पितृदोष का निवर्तक माना जाता है। माना है । निष्कर्ष यही हुआ कि सारवद्रेत शुक्र है, प्रवाहित रस रेत है । दोनों में प्राण प्रति रखकर अभियुक्ता कहते हैं- "शुक्र तु सारवटेतो, रसो रेतः प्रवाहि यत् । प्राणेनानुगृहीते ते (शुक्ररेनसी) माणिनां जीवन विदुः ॥" शुक्र आग्नेय पदार्थ है, इसके लिए प्रमाण फी अपेक्षा नहीं है । 'सप्तादिमुना शुक्र है, ताप अमि का धर्म है । प्राय से शुरु (अग्नि ) ही 'शुक्र' बना है। शुक्र साशाद । अग्नि १मरिया रिण विचन "यादाविज्ञान" में देखना चाहिए। १२

प्राकृतारमा
शुकरेत
जा ईशोपनिपत्
है, अतएव महयज्ञ में आहुत होने वाले ४० प्रहपात्रों में से मग्निमय सौरग्रह पात्र को शुक्र
कहा गया है। इसी आधार पर निम्नलिखित वचन प्रसिद्ध है-
१-"प्रत्तात्रै शुरु (शत शा२-"रतो वा अन्नम्” (गो७ मा० पू० ३१२३)
२-"अग्निः शुचिः (शुक्र)" (तै० वा. १२)-"रतो चै सोम"(शत. ३।८।२२)
इसी शुक्र को हम भाग्नेय होने से 'तेज' कह सकते हैं-"तनो वा अग्निः" (शत. 1-
११४८1), एवं रेत को सौम्य होने से 'स्नेह' वहा जासत्ता है । एक बात और-शुत्रा में रेत,
रेत में शुक्र अनुस्यूत है। शुक्र में अग्नि प्रधान दे, तरल सोम गौण है । रेत में रोम प्रधान
है, घन अमि गौस है । इसीलिए कहीं कहीं आप रेत को शुक्र कह दिया जाता है, जैसा कि
प्रकरण के प्रारम्भ में शुक्र शब्द फी व्याप्ति बतलाते हुए कहा गया । एवमेव कहीं कहीं
अनिमय शुक्र को रेत बतला दिया जाता है। इन्ही दोनों तत्वों के समन्वय से सृष्टि होती है,
यह प्रत्येक दशा में निर्विवाद है।
१-शुक्रम् ( सारवत)-मग्निः -→
२-रेतः (प्रवाहिरस:)-सोमः--
रेतः
१-ना (सारवत् )-भग्निः---
---वृषा
२-सुब्रह्म (प्रवाहिरसः)-सोमः------
योषा
E
1-सत्यम( सारवत् )---अनिः-
२-तम्( प्रवाहिरसः)-सोमः...
→स्नेहः
दोनों के समन्वय से कैसे संसार बना है ! इस परनसमाधि के लीए निम्नलिखित प्रकरण
पर दृष्टि डालिए । सृष्टि का मूलप्रवर्तकताव अमृत-अल-शुक्र इन तीन भागों में विभक्त है।
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अमृत ना शुरु पहलाता है, सूटयुन्मुख बनकर वही 'ब्रह्म' कहलाने लगता है, एवं सृष्टि का उपादान बनर पिपत्त सृष्टि का 'बीज' है। जब तक अमृत एवं ब्रह्म सृष्टि के बीज नहीं बन जाते, तबतक तो समष्टि वेदरूप में परिणत होती हुई (वेदारच्छिन्न यनती ईई) 'शुक्र' नाम धारण वरलेती है। पियपत्रम में हमने पाया कि गृष्टिसाक्षी अव्यययुक, अतएव बीजावस्थापन अकारानुगृहीत प्रारमक्षर वो ही शुक्र वा जाता है-देसिए ई. वि.मा.पृ. रा १०)। वही यजुर्मा को शुक बतलाते हुए निरोध वा उत्यापन करते हुए इस के समाधान की प्रतिज्ञा की गई थी। अपसरप्राप्त रक्त रोिधका भी परिहार करलेना चाहिए । चीजावयापन पदर घर शुरु है, एस वी विस्थापन प्रहर दर ही यजुर्गम है | सारी सृष्टि मूर्तिप्राश्च है । मर्वि ही विश्व का सरप है । सारा विश्व मूत है। मूरिपुर है। इस पुररुप विश्व के मूल वेद लोर-प्रजा प्रादि नामों से प्रमि पुरजन ही हैं। यद्यपि इन पाचर्को पुरजनों को ही हम विच के बीजभूत होने से 'शुक्र' वह सरते हैं, तथापि पाचों में प्रपमज एवं प्रतिधारूप पहिला वेद नाम काही प्राकृतात्मा । शानिपत - इन में अमृत प्रात्मयोनि है, ब्रह्म प्रकृतियोनि है, एवं शुरु विकृतियोमि है । दूसरे शब्दों में यो समम्झिए कि आत्ममुष्टि यमृत से होती है, प्रकृतिसधि ब्रह्मसे होती है, एव विकृति पा विश्वसृष्टि शुरु से होती है । सृष्टि के यही तान विवत हैं । इन में अमृततत्व प्रायय-शहर प्रात्मन्दर भेद से प्रिकल है, ब्रह्मरत्व प्राणादि भेद से पञ्चकल है, शुक्रेनस यत्-थे भेद से द्विकल है । मिवृत् अमृत (३), पञ्चकाल ग्रह (५), विकल्शुफ ( २ ) की समष्टि ही दशिनीविराट् ( दशकलविराट ) है, यही 'सर्वमु' है । कहने को अमृत ब्रह्म शुक्र तीन पदार्थ हैं । वस्तुतः अमृत ही ब्रह्म है, ब्रह्म ही शुक्र है । सृष्टि से बर्दिमूत रहता हुआ यही तन मन वही गुरु यहलाने लगता है । मूलावस्थापन्न वही तत्त्व अमृत है, तूलावस्यापन्न वही तत्व Y है, मूल, को तूलरूप में परिणत करने के समय वही ब्रह्म नाम से व्यवहत होने लगता है । ऐसी दशा में हम कह सकते हैं कि अमृत एवं ब्रह्म यह दो आत्मविवत सृष्टि के दोनों अमृत ब्रह्म इन्हीं नामों से व्यवहत होते हैं, परन्तु वीजावस्था में आकर इन्हीं दोनों की 1 मूल प्राकृत रमा all ईशोपनिषत् विरोधरिदार । पुरञ्जन है, अतः इसी को शुक कह दिया गया है । यह वेदतत्व आमनर की सर्वप्रधाना एवं सरं प्रथम प्रोण कला का विकार है, दूसरे शब्दों में वेदनत्त की उपादानभूमि यात्मक्षा है, एवं 'याचारम्भगं विकारो नामधेयं मृत्तिकसेव ससम्' के अनुसार कार्यरूप वेद कारणरूप आत्म- दर से अभिन्न है। ऐसी स्थिति में शुक्ररूप वेद को यात्मक्षर कहा जासकता है। आत्मदर प्रकृति का गर्यभाग है, अतर अमृत भाग है । अक्षर और आत्मक्षर दोनों एक ही अमृतमृत्युमूर्ति प्रजापति के दो अपयर हैं, दोनों मिलकर एक वस्तु है । ऐसी दशा में यदि विकारदररूप वेदाभिन्न प्रात्मदर शुरु है तो यात्मक्षराभिन्न प्रक्षर भी अवश्य ही शुक्र है। साथ ही में विना अव्ययालम्बन के अक्षर क्षर भी वीजायस्पा में परिणत नहीं होसकते, अनः अक्षर-क्षवत् स्वयं श्रव्यय भी शुक्रकोटि में निविष्ट हो जाता है। तभी तो-"वही अमृत है, वही ब्रह्म है, वही शुक्र है" यह कहने का साहस किया जाता है । अध्यय ही अक्षर बनता है, वही हर बनता है, यही वेदरूप में परिणत होता है । अक्षरतत्व अव्यय के विद्यामाग या विकास है, परतत्व उसी के कर्मभाग का विकास है। वहीं अपने विद्या-कर्म भाग से वेदरूप से प्रकट होता है । वेद का यत्-(गतितत्व) भाव उसके वर्मभाग का विकास है, ज्-( स्थितितत्व ) भाव उसी के वियाभाग का विकास है । कही विद्यारूप ( अक्षररूप ) से, कहीं । कर्मरूप (क्षररूप) से, कही उमयका विदरूप) से वही सर्वत्र व्याप्त होरहा है । उससे शून्य कुछ नहीं है, सबकुछ वही है, सब कुछ उसी में है। उपर्युक्त कयन से यह कहने में कोई श्रापचि नहीं की जासकती कि यजुब्रह्मावच्छिन्न पुरुष ही शुक्र है । विश्वयम्-पञ्चजन-पुरजन आदि बहिरङ्ग अव्यक्त प्रकृति पोडपी के बिना नहीं रह सकती । अव्ययावन्छिन अक्षर क्षर ही तो यजुरूप में परिणत होकर बहिरङ्गप्रकृतिरूप मैं परिणत होते हैं । इस परमार्षदृष्टि से विचार करने पर-"सृष्टिसाक्षी अध्यययुक्त, मतपय सष्टयन्मुख वीजावस्थापन्न अक्षरतर शुक्र है" "एजन् अनेजव तत्व शुक्र है" इन दोनों पायों में कोई विरोधी नहीं रहता । यही अक्षरावच्छिन्न यजुरूप शुक्र मातंरिरवा द्वारा होने वाले श्राप के प्रधान से विश्वरूप में परिणत होता है । विश्वावस्थापन्न वही शुक्रतत्व "अश्वत्थ" पोडपी १८५ স্বযৰ - अश्वत्यरूप महेश्वर को श्राप अन्ययाक्षर दृष्टि से अमृत कह सकते हैं, प्रदरास्मतादृश्या वही ब्रह्म है, वही शुक्र है | कुछ भी कहिए-परन्तु उसे गहामाया की अन्तिम परिधि तक व्याप्त सममिर थाप को विश्वास करना चाहिए कि शुक्र-ब्रह्म-प्रमुत इन तीन नामों से पुकारा जानेवाला वह तस्य (मायी महेन्चर) अपने उदर में अनन्त (सहस) प्राजापत्य बाशाएं प्रतिष्ठित रखता हुमा एजदनेजत् रूप से खड़ा हुया है । इसी तत्' विज्ञान का स्पष्टीकरण प्राकृतात्मा 31 ईशोपनिषत् नाम धारण कर लेता है । इस अश्वत्य के ऋयय के विधा-कर्मरूप ब्रह्म-कर्म के अनुग्रह से ब्रह्माश्वत्थ कमावत्य यह दो भेद होजाते हैं । इनमें ब्रह्माश्वत्य का निरूपण कठ एवं मुण्डक- भाप्य में द्रष्टव्य है, एवं कर्माश्वत्थ का निरूपण श्राद्धविज्ञान के कर्मगति प्रकरण में हुआ है । शुत्र का श्राद्धति से ही (पञ्चपुण्डीरा प्राजापत्सवल्या) का जन्म होता है। शुक्र । सहस्रावतियों से सहसवणा- युक्त अश्वत्य का स्वरूप संपन्न होता है । अश्वत्य संसार है, इस संसारमहीरूह का बीज शुक्र- तत्व है । शुक्र का अतिक्रमण करना ही मायोपाधिशून्या परामुक्ति है । निष्कामभाव से जो इस अश्वत्थ की उपासना करते हैं, वे ही धीर गुञ्जानयोगी चिरकाल के उपासनायोग (शुद्धियोग) से युक्तयोगी बनते दुर शुक्ररूप विश्वसीमा ( मायासीमा ) से बाहर निकलने में समर्प होते हैं-"मामेव ते प्रपद्यन्ते पायामेतां तरन्ति ये" । इसी रहस्य का स्पष्टीकरण करती हुई श्रुति कहती है- स वेदैतत्परमं ब्रह्मधाम यत्र विश्वं निहितं भाति शुभ्रम् । उपासतें पुरुपं ये हाकामास्ते शुक्रमेतदतिवर्तन्ति धीराः ।। (मुण्डकोपनिषत् ३।२।१०। ब्रह्म कह सकते हैं, अक्षरात्महरायच्छिन्नयजुदृष्टि से शुक्र कह सकते हैं । वहीं अश्वत्य अमृत है, करते हुए ऋषि कहते हैं- "ऊर्ध्वमूनोऽवाक्शाग्य एपोऽवत्यः सनातनः । तदेव शुक्र चढ़ ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते । तदु नात्येति कमन । एतदै वत्" कठ०६।१।। १५१ বিকাল্পবিন্যা छतात्मा ईशोपनिषत् ॥ उक्त वचन बीजरूप उसी यजुर्ब्रह्म का निरूपण करता है । वेद को हमने सृष्टि का मूला- धार बतलाया है, एवं साथ ही में इसे क्षरावरात्मक भी कहा है । यद्यपि विश्व में भविद्यारूप (श्रावरणरूप) कर्मभाग की ही प्रधानता है, परन्तु विश्वनिमीण विना विद्या की सहायता के सर्वया अनुष्पन है । बिना ज्ञानरूप विधाके कर्म संभव ही नहीं है । धानन्द-विज्ञान-मन विद्यामाग है, मन-प्राण-वाक् फर्मभाग है । आनन्द विज्ञान के बिना साधारण मनुष्य भी कर्म में प्रवृत्त नहीं होता । श्रानन्द ही कर्मप्रवृत्ति का मूलस्तम्भ है 1 यह विद्यारूप ज्ञान प्रदर है, अविद्यारूप कर्म क्षर है । दूसरे शब्दों में अव्यय के विद्याभाग का अनुग्रह अक्षर पर है, एवं कर्मभाग का अनुग्रह घर पर है । अतएव उपनिषदोंने अक्षर को विद्या शब्द से, क्षर को अविद्यां शब्द से व्यवहृत किया है । दोनों का ईश अव्यय अपने दोनों भागों से दोनों पर शासन करता है। इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है- दे अक्षरे ब्रह्मपरे त्वनन्ते विद्याविद्ये निहिते यत्र गूदे । तरं त्वविद्या ह्यमृतं तु विद्या विद्याविद्ये ईशते यस्तु सोऽन्यः ।। (श्वेता० उ०५।१।। । -विद्यारूप अक्षर का विकास 'जु' है, कर्मरूप क्षर का विकास ' यत्' है । जरूप विधातत्व अनेजत् है, यत्रूप कर्मतत्व एनत् है। एजद अनेजन् की समष्टिरूप यजुर्ब्रह्म ही शुक्र है । सृष्टिकती इस वेदमृत्ति शुक्र को सृष्टि के प्रधान अनुबन्ध का सहारा लेना पड़ता है । यह अनुबन्ध है 'चितिसम्बन्ध' । योग. विभूति, सहचर प्रादि १३ प्रकार के सम्ब- न्धों में से प्रन्थिबन्धन नाम से प्रसिद्ध चितिसम्बन्ध ही सृष्टि का प्रधान अनुबन्ध है। एक चस्तु पर दूसरी वस्तु का चिनाव ( लोकप्रसिद्ध चेजा) ही चिति है । ईट पर इंट पर रखने से जैसे एक दुर्ग का स्वरूप बनता है, एकमेव उसी षोडशीरूप भारमधरातल पर इष्टक (इंट) रूप भौतिक विकारक्षरों की चिति से विश्वदुर्ग का निर्माण हुथा है । विश्वमूला यह शुक्रचिति- पीन, देव, भूत, मेद से तीन भागों में विभक्त है । षोडशी यामा पर पहिली चीजनिति है, प्राकनारमा । --3 ईशोपनिषत् ॥ दर्शपूर्णमा । . , बीजनिति पर देवचिति है, देवचिति पर भूतचिति है। तीनों चितियों की समष्टि विश्व है, विश्व- चिति या बालम्बन पोडशो विश्वात्मा है , आमा और विश्व की समष्टि प्रात्मन्बी ईश्वर है , इहीं दो भायों की सम्ष्टि प्रतिमाप्रजापति है । दोनों की समष्टि ही जीवप्रजापति है , एवं दोनों की समष्टि ही शिपिविष्टप्रजापति है , सर्वत्र प्रजापति का ही साम्राज्य है-"प्रजापतिस्त्वे- दं सर्वं यदिद किंच" । "श्रीगि ज्योतीपि सचते स पोडशी" के अनुसार अव्यय (इन- भ्योति ) अक्षर (कर्म-योति ) क्षर (भूत-योति ) इन तीनो ज्योतियों से वह पोडशी प्रजापति चितिनयरूप विश्वाजा के साथ संयुक्त हो रहा है । महाविश्च ईश्वर का शरीर हे हमारा (जीवा- मा) पाचभौतिक शरीर हमारा विश्व है । विश्व सृष्टरूप है, श्रामा प्रविष्टस्य है । दोनों में सृष्टनम चिसब्रह्म (म यंत्रझ) है, प्रविष्ट ग्रन चिनियाहा (अमृतनझ) है । जिमप्रकार प्रविध मा अध्यय-अक्षर-क्षरभेद से विकल है, एउमेव पित्यसृष्टब्रह्म भी बीज-देव-भून भेद से मिल ही है । षट्कल यो समष्टि ही ईश्वर है, पट्वल की सगष्टि ही जीव है-“पादकौशिष- मिदं सर्वम्" । वीजचिति पर अध्यय का अनुग्रह है, देवचिति पर अक्षर का मनुग्रह है, एक भूतचिति पर चर का अनुग्रह है । वीजनिति ज्ञानयोति है, देवचिति कर्म-योति है, भूतचिति भूत-योति है । इन विश्वरूप तीन चिस योनियों से यह विश्वात्मारूप पोडशी अपनी अव्यय- श्रदर-क्षररूप पूर्वोत तीनों व्येतियों से युक्त होरहा है। वह पोदशी विश्वरूप तीनों योनियों का प्राधार है, अतएव इसे-'ज्योतिपां योनिः' (निश्च की बीम-देव-भूतरूप तीनों व्यतियों पी योनि) कहा जाता है। ज्योतिपांज्योतिः पोडशी विश्वात्मा----विश्वम् -अन्ययः (शन योनि.) #~-~~-वीजचितिः (ज्ञानज्योतिः) २-मनरः (पर्म-यो:)--- २-देवचितिः (फर्मज्योतिः) पाकौशिकामिद ३-भृतचितिः (भूत-योतिः) (यात्मा) (शरीरम्) सर्वम् १८ प्राकृतात्मा पुर-ग्राम सा ईशोपनिषत् ।। ईश्वर की अपेक्षा जीवसंरथा हमारे समीप है, अतः प्रथम उसी की ओर भापका ध्यान श्राकर्षित किया जाता है । अध्यात्मसंस्था में आत्मा और शरीर यह दो विभाग हैं । इनमें धात्मा कौन है ? इसका उचर है 'पोडशीपुरुष' । शरीर कौन है ? इसका उत्तर है-चीन देव-भून समष्टि । भूतनाम, देवग्राम, बीजग्राम की समष्टि ही शरीर है । वीजग्राम को आत्म- ग्राम कहा जाता है । यह यात्मनाम उस प्रधान आत्मा से भिन्न है । यह एक है, यह भनेक है। यही प्रामग्राम कारणशरीर है, देवग्राम सूक्ष्मशरीर है, भूतग्राम स्थूलशरीर है । कारण- शरीर पर सूक्ष्मशरीर, सूक्ष्मशरीर पर स्थूल शरीर प्रतिष्टित है। तीनों शरीर पोटशी श्रात्मा पर प्रतिष्ठित हैं । भनेक वस्तुओं के संघ को 'ग्राम' कहा जाता है । पारितकदर्शनानुयायी जिसे 'प्रात्मपरिग्रह' कहते हैं, गीताशास्त्र जिसे 'कूट' कहता है, श्रमणक जिसे 'पुद्गल' कहते हैं, बौद्ध जिसे 'स्तुप' कहते हैं, ज्यौतिषी जिसे 'शशि' कहते हैं, लोकव्यवहार में जो 'ढेर' 'थोक'-प्रादि नामों से प्रसिद्ध है, वही विज्ञानभाषा में 'ग्राम' एवं 'पुर' नाम से व्यवहृत किया जाता है । सिंहादि वन्यपशु समुदाय बनाकर नहीं रहते, अपि तु एकाकी विचरण करते हैं, अत एव इन्हें 'अरण्यपशु' कहा जाता है । अरण्यशब्द जंगलका वाचक नहीं है, अपि तु एकाकी भाव का समर्थक है। इसीलिए एकाकीभाव से सम्बन्ध रखने वाले उपासना प्रतिपादक वेद- भाग को 'मारण्यक' कहा जाता है । उपासना 'अरतिर्जनसंसदि' पर ही निर्भर है । जंगल में शहर की तरह समुदाय नहीं रहता, श्रतएव जंगल को भी अरण्य कह दिया जाता है । वस्तुतः श्रीण्य एकत्रमाव का सूचक है । मृग धादि वन्य पशु समुदाय बनाकर रहते हैं, इसी समुदायरूप ग्रामभार के कारण मृगादि को 'ग्राम्यपगु' कहा जाता है । वस्ती में समुदाय की प्रधानता रहती है, अत एव बस्ती को भी माम कह दिया जाता है । वस्तुत: आम 'संघ' का वाचक है । "पशुंस्तांश्च के वायव्यानाराण्या ग्राम्याश्च ये" (यजुः सं. ३१ अ.। ६ मं. 1) में आरण्य-प्राम्यपशु का यदि कोई-"जंगल में रहने वाले पशु, एवं ग्राम में रहने वाले पशु" यह अर्थ कर तो विज्ञानदृष्टि से उक्त अर्थ सर्वथा अनर्थकोटि में गिना नायगा। "सिंहादि भारण्यपशु हैं, मृगादि ग्राम्यपशु हैं। यही अर्थ समीचीन होगा । बतलाना यही है कि १८६ मा पानी ६, शरीर यो सूने से जिम उन्मा (गरमी) का अनुभव होता है यह तेज है, इस भाकृतात्मा पुरम "पधात्मकमिति कस्मात् ? पृथिव्यापस्ते नोवायुराकामिति । अस्मिन पनामले पक्षात्मके शरीरे तर यत् कठिन सा पृथिवी, यद् र ता भापः पण सारे धातु मिटर पदोनोयद ही है, यह मामदे, यह याद, पदमिननिन मी घामारान एस मरे भूतों को पायना सता है। यदि व्यस्थान (अन्तर) न देता है या ईशोपनिपत् ॥ आध्यात्मिकसंव के लिए 'ग्राम' शब्द प्रयुक्त हुआ है, एवं आधिदैविकसंघ के तिए 'पुर' शब्द प्रयुक्त हुआ है। महाविश्वरूप ईश्वर का शरीर 'पुर' कहलाता है । पुर के सम्बन्ध वह 'पुरुष' कहलाता है । एव तुद्रशरीररूप जीव का विश्व 'ग्राम' कहलाता है । इसी मान के सम्बन्ध से इसे 'निकाय' किंवा 'काय' कहा जाता है । अनेक वस्तुओं की समष्टि ग्राम है, एप अनेक ग्रामों को समष्टि 'निकाय है । भूत पाच हैं, अतएव इन भूतों की समष्टि के हम 'ग्राम' कह सकते हैं । इसी प्रकार पाच देवताओं की समष्टिरूप देवनाम भी ग्राम यामग्राम भी ग्राम है । शरीर में तीन ग्राम है, अत एब इसे 'निकाय' कहा जासकता है । यही 'निकायछन्द' है-(दखिए शत. बा. ८।५।२८11) 1 निकाय ही पाय है, काय ही गई? है । पृथिवी-जन-तेज-वायु-अाफाश यह सुप्रसिद्ध पार्टीभूत ही भूतग्राम है, यही (धूतशीर है। इसी या दिग्दर्शन कराते हुए ऋपि कहते है- गरीरे का पृथिवी ? का प्राप. ? को वायुः ? किमाकागम् ? इति । अभिन है , - तने मः, यत् संपरति स बापुः, यत् मृपिरं तदाकाशम्-इत्युच्यते" (गर्भगिनित्) भरिप-मामादि धन धान पृथिर है, कफ-लाग-द-र-रुधिर-रस धादि तर प्रश्वाम पाए ६, गरीर में जितना रिस (पोल) भाग है, यह सब आकाश है, यही तापर्य है। माम-ए-गरा नट होगाने । मी घभिप्राय सेयो नापमपयोगिता पार पहा जाता है । यार-भाग-मन-प्रोष-मन-न पायो त्रयों की समाधि दी देशपथ प्राकृतात्मा सप्तदशराशि का ईशोपनिषत् -- । है । दार्शनिक ११ इन्द्रियों का इन्ही यैदिक पांच इन्द्रियों में मन्तीव है । वाक् अनिदेवता ६, प्राण वायुदेवता है, चतु मादित्य है, श्रोत्र दिक्सोम है, मन भास्वरसोम है- देखिए ऐ० ३०१ सं०)। इन देवतामों के सम्बन्ध से ही इन्द्रियग्राम देवनाम कहलाता है, इसी को सूक्ष्मशरीर कहते हैं । तोसग है वीजग्राम । यह सब में प्रधान है, यही हमारा सुपरिचित 'शुक्र' है, 1 इस शुक्रमाम किंवा चीजग्राम में विद्या-प्रज्ञा-कर्म यह तीन तत्व प्रतिष्ठित रहते हैं । ज्ञानजनित भावना संस्कार विधा है, कर्मजनित यासना संस्कार वर्म है , चिदाधार तत्व प्रज्ञा है । यह भावना वासना संस्कार ही जन्म का हेतु है । अतएव एतद्रूप नाम को चीन-शुक्र धादि नामों से व्यवहत किया जाता है । यही जन्म स्थिति भंग का कारण है, अतएव शुक्ररूप इस चीजचिति को कारणशरीर कहा आता है । इसी विषाकर्मरूप शुक्र को जन्म का भारम्भक माना जाता है । इसी अभिप्राप से "तं विद्याकर्मणी प्रचारभेते पूर्वप्रज्ञा च" “(शतः १४ कां० ७१२.३१) यह कहा जाता है। शुक्रगत प्रश्नामाग पर ही चिदंश का प्रति- विम्ब पड़ता है ! दूसरे शब्दों में चिदाभास (चित् का प्रतिविम्ब) नाम से प्रसिद्ध जीवात्मा का जन्मदाता यही शुक्रगत प्रज्ञा (सोम) भाग है इसलिए प्रज्ञामूर्ति इस शुक्र को धामग्राम कहा जाता है । पंच भूतों के सम्बन्ध से एक ही प्रज्ञा पांच भागों में विभक्त होजाती है। इस प्रकार ५ भूतमात्रा, ५ प्राणमात्रा, (इन्द्रिएं), ५ प्रज्ञामात्रा. २ विद्या थोर कर्म-इन १७ वस्तुओं की राशि से वह प्रात्मा नित्य युक्त रहता है , जैसा कि अभियुक्त कहते हैं । कामालपरो योऽसौ मोक्षवन्धैः स युज्यते । स सप्तदशकेनापि राशिना युज्यते च सः ।। (म० शान्तिप० मो० ३५१ अ० १६ श्लो०) पीन देव-भूत की समष्टि प्रात्मनपचि का कारण बनती हुई पदम' नाम से प्रसिद्ध है । १ इस विषय का विशद विवेचन शतपथावज्ञानभाष्य में देखना चाहिए । २- यम मारमा प्रपन्नो भवति तत् पदम्' इस निर्वचन के अनुसार मनमा प्रपत्तिस्थान (निवासस्थान) हो 'पद' नाम से व्यवहत होता है।

सारे धातु गिटार एकर दोजाने । पद दहीद, यह मस दे, यह यया ६, यह मिज दिन पापा जाता है। राम-पागा-चतु-श्रोत्र-मन-इन पांचों इन्द्रियों की रामशिदी समान भाकृतात्मा Amar । "पधात्मकमिति कस्मात् पृथिव्यापस्ते गोरायुराकारामिति । अस्मिन पभाग्यके भस्पि-गांसादि धन धातु पृथिवी, कफ-लाषा-द-मन-इधिर-रस भादि तरस धातु पानी दे, शरीर को हुने से जिम उप्मा (गरमी) का मनुभय होता है यह तेन है, भरा प्रथाम पाणु शरीर में जितना रिक्षा (पोल) भाग है, यह सब थामाश है, यही ताप है। दमी पाराशने कमरे भूतों को गृषक बना रसगा है। यदि म्यरधान (अन्तर) न होता ॥ ईशोपनिषत् ॥ आध्यात्मिकसंघ के लिए 'ग्राम' शब्द प्रयुक्त हुआ है, एवं आधिदैविकसंघ के लिए 'पु' शब्द प्रयुक्त हुआ है । महाविश्वरूप ईश्वर का शरीर 'पुर' कहलाता है। पुर के सम्बन्ध से है। वह 'पुरुष' कहलाता है । एवं चुदशरीररूप जीव का विश्व 'ग्राम' कहलाता है । इसी ग्राम के सम्बन्ध से इसे 'निकाय' किंवा 'काय' कहा जाता है । अनेक वस्तुओं की समष्टि 'ग्राम है, एवं अनेक ग्रामों की समष्टि निकाय' है । भूत पांच हैं, अतएव इन भूतों की समठियो हम 'ग्राम' कह सकते हैं। इसी प्रकार पांच देवताओं की समष्टिरूप देवनाम भी माम है, आत्मग्राम भी ग्राम है । शरीर में तीन ग्राम है, अत एव इसे 'निकाय' कहा जासकता है । यही 'निकायछन्द' है-(देखिए शत. बा. ८।५।२।३१) । निकाय ही काय है, काय ही शरीर है । पृथिवी-जन-तेज-वायु-प्राकाश यह सुप्रसिद्ध पांचोंभूत ही भूतग्राम है, यही रथूनागर है । इसी का दिग्दर्शन कराते हुए ऋषि कहते हैं- शरीरे का पृथिवी ? का शापः ? को वायुः ? किमाकाशम् ? इति । अस्मिन पभात्मके शरीरे तत्र यत् कटिनं सा पृथिवी, यद् द्रवं ता आपः यदुधी तत्नेनः, गद संचरति स वायुः, यत् सुपिरं तदाकाशम्-इत्युच्यते" (गर्भापनित् ) 1 - माम--मादार नष्ट दोगाने । मी अभिप्राय से नाममपयोनिति ५ भूतमात्रा, ५ प्राणमात्रा, (इन्दिएं), ५ प्रज्ञामात्रा. २ विद्या और कर्म-इन १७ वस्तुओं की (म शान्तिए० मो० ३५१ अ० १६ श्लो०) यत्र पारमा प्रपन्नो भवति तद पदम्' इस निर्वचन के अनुसार चारमा प्रतिस्थान (लवसम्म) प्राकृतात्मा १ वेब पड़ता है ! दूसरे शब्दों में चिदाभास (चित् का प्रतिविम्व) नाम से प्रसिद्ध जीवात्मा का जन्मदाता यही शुक्रगत प्रज्ञा (सोम) भाग है इसीलिए प्रशामुर्ति इस शुक्र को यात्मग्राम कहा जाता है। पांच भूतों के सम्बन्ध से एक ही प्रज्ञा पांच भागों में विभक्त होजाती है। इस प्रकार - ईशोपनिषत् 16- सदशराशि है । दार्शनिक ११ इन्द्रियों का इन्ही वैदिक पांच इदियों में अन्तर्भाव है । थाक् अनिदेवता है। प्राण वायुदेवता है, चतु प्रादित्य है, श्रोत्र दिक्सोम है, मन भाखरसोग है- देखिए २० उ० १ सं०)। इन देवतामों के सम्बन्ध से ही इन्द्रियमाम देवनाम कहलाता है, इसी को सूदनशरीर कहते हैं। तीसर है बीजग्राम । यह सब में प्रधान है, यही हमारा सुपरिचित 'शुक्र' है, । इस शुकमाम किंवा वीजग्राम में विद्या-प्रज्ञा-कर्म यह तीन तत्व प्रतिष्ठित रहते हैं । ज्ञानजनित भावना संस्कार विद्या है, कर्मजनित कासना संस्कार कर्म है , चिदाधार तत्र प्रज्ञा है । यह भावना वासना संस्कार ही जन्म का हेतु है । अतएव एतद्रूप ग्राम को चीन-शुक्र मादि नामों से व्ययस्त किया जाता है । यही जन्म स्थिति भंग का कारण है, अतएव शुक्ररूप इस वीजचिति को कारणशरीर कहा जाता है । इसी विद्याकर्मरूप शुक पो जन्म का श्रारम्भक माना जाता है । इसी अभिमाय से "तं विधाकर्मणी अन्चारभते पूर्वमज्ञाच" शत. १४ यां० ७॥२३) यह कहा जाता है । शुक्रगत प्रज्ञाभाग पर ही चिदंश का प्रति , राशि से यह श्रात्मा नित्य युक्त रहता है , जैसा कि अभियुक्त कहते हैं । कमीत्मात्सपरो योऽसौ मोतवन्धैः स युज्यते । स सप्तदशकेनापि राशिना युज्यते च सः॥ नाम से प्रसिद्ध है पीज-देव भूत की समष्टि प्रागनपत्ति का कारण बनती हुई पदम' १ इस विषय का विशद विवेचन शतपावज्ञानभाष्य में देखना चाहेए । हो 'पद' नाम से व्यवहत होता है।

युज्यते कारण है। विशामष्टि से शुक्र का स्वरूप देखिए । कारण ही धीज है । इसे शुक्र,काम, पर्म इन तीन शब्दों से पुकारा जासकता है। क्योंकि काम-कर्म-शुरु तीनों की समष्टि ही बीजविति भी सृष्टिकर्म सभव नहीं है । प्रत्येक सृष्टि में तीनों निस अपेक्षित हैं। सुष्टिकर्म का भव्यय के सृष्टिसादी मन-प्राण-याक भाग से सम्बन्ध है। जब तक इन तीनों कलाओं का समन्वय नहीं माणसे कम का, एवं बाक्स शुक्र का उदय होता है । इन तीनों में सृष्टि का पहिला बीज पाम है, कर्म दूसरा वीज है, शुरु तीसरा बीज है। ईश्वर जैसा चाहता है,जैसा कर्म करता है, प्राकृतात्मा । ईशोपनिषत् | काम कम्म शुरु १-अव्यय. २-अक्षरः "श्रात्मा ३-आत्मदरः महिमारूप पुन पद को महतोमहीयान् कहा जाता है, एवं सौन्तरतम सूक्ष्मतम आत्मतारख के लिए, 'अणोरणीयान्' कहा जाता है । महिमयुक्त शरीरत्रयी कर्मप्रधान है, श्रात्मा ज्ञानप्रधान है । ज्ञान शान्त है, निष्क्रिय है । इस ज्ञानप्रधान आत्मा के लिए उपनिषदों में 'अकृत' शब्द प्रयुक्त हुआ है, एवं कर्मप्रधान शरीर के लिए 'कृत' शब्द प्रयुक्त हुआ है । जब तक कृत वा (शरीर का ) श्राश्रय है, तब तक अकृत (आत्मा) बन्धन में है । कृत अकृत को कभी उन कृत नहीं कर सकता, जैसा कि-'नास्त्यकृतः कृतेन' इत्यादि उपनिषद्वचनों से स्पष्ट है । उक्त तीनों चितियों में से बीजचिति ही जीवसृष्टि का कारण है, एक वही ईश्वरदृष्टि का कारण है, यह कहा जाचुका है । इसी कारणता को बतलाने के लिए ऋषिनें इस का नाम पारणशरीर रक्खा है । जबतक शुक्ररूप कारणशरीर है, तब तक न जीन की मुक्ति है, एइ न (मायाविमोकलक्षणा ) ईश्वर की मुक्ति है । दूसरे शब्दो में शुक्र का प्रतिवर्तन ही मुक्ति का है। यह तीनों सृष्टि के साधारण अनुबन्ध है । दूसरे शब्दों में त्रिकाल बीजनिति के बिना को होजाता, तबतक सृष्टि ही क्या, सप्तार का कोई भी कर्म नहीं होसकता | मन से काम एवं उस कर्म से पैसी ही वस्तु उत्पम हो जाती है । “कापत समवर्शताधि मनसो रेतः प्रकृतारमा सृष्टिकोण 1 ईशोपनिषत् ॥ प्रथमं यदासीन्" (नासदीयसूक्त ) के अनुसार काम ही प्रथम बीज है । काम के होते ही कर्म [प्राण्यापार ] हो पड़ता है, कर्म से वागन्यापार होता है, नई यस्तु उत्पन होजाती है । काम ज्ञानशक्ति है, कर्म क्रियाशक्ति है, शुक्र अर्थशक्ति है । शुक्ररूप अर्थ ही पदार्थों का उपादान बनता है, अत. हम प्रधानवौज शुक को ही कहेंगे, काम कर्म को सहकारी कारस कहये । पूर्व कथनानुसार दार्शनिकों ने भावनावासनारूप संस्कार को ही सृष्टि का बीज माना है। यह संस्कार जीवसृधि का बीन अवश्य होसकता है, परन्तु ईश्वरमृष्टि का नहीं । क्योंकि वह संस्कारलेप से पृथक् है । सतत ज्ञान-कर्मानुष्ठान में रत रहने पर भी उसपर (अना- सक्तिभाव के कारण) संस्कारों का लेप (यावरण) नहीं होने पाता । उधर काम-कर्म- शुक्ररूप बीज जीववत् ईश्वर से भी सम्बन्ध रखता है, जैसा कि "सोऽकामयत, स तपोऽ तप्यत, सोऽश्राम्पत्" इत्यादि से स्पष्ट है । ईश्वरवत् प्राधिकारिक जीवों के साथ भी संस्का- ररूर बीन घटित नहीं होता । ईश्वर-याधिकारिकजीव-ययाजातजीव-इतर अवान्तर गृहिए इन सब के साथ समानरूप से युक्त रहने वाले बीज का तो-काम-कर्म-शुझमयत्वं चीन- त्वम् यही लक्षण करना पड़ेगा । प्रकृतमन्त्र में शुक्र शब्द से यही सामान्य वीज अभिप्रेत है। जीवसृष्टि के लिए दार्शनिकों में "भावना-वासना-संस्कारत्वं-बीजत्वम्" जो यह लक्षण माना है, वहां भी वैज्ञानिकों के काम-कर्म-शुक्र नीज का समन्वय हो रहा है। अपेक्षा- पुद्धि से कर्म करने पर प्रज्ञानात्मा पर संस्कार हो जाता है। उस संस्कार के अभिकम-प्रझम दो विभाग है। कवर्थकर्म प्रक्रम है, पुरुषार्थकर्म अभिक्रम है । आप अपने मकान से राम- निवास बाग जाते हैं। रामनिवास बाग पहुंच जाना पुरुषार्थफर्म है । इसकी सिद्धि के लिए श्रापको पिछला पैर उठाकर आगे रखना-इस क्रम से भगान्तर गतिरूप अनेक कर्म करने पड़ते हैं । यह सत्र मयान्तर गतिकर्म प्रक्रम हैं । लोकभाषा में जिसे 'पांवड़ा' (पैरों की गति की एका सीमा) कहते है, वही प्रक्रम है। यही प्रक्रम बार्यकर्म है । अनेक प्रक्रमों से एक अभिकम का स्वरूप संपन्न होता है। हम अपने जीवन में अनेक अभिक्रम संपादित कर देते हैं । खाना- पीना-सोना-चलना-द्रव्योपार्जन-अध्ययन-आदि सहस्रों अभिकम कर्म है । इन सब की समाधि .

प्राकृतात्मा -अव्ययः युज्यते इन तीन शब्दों से पुकारा जासकता है । क्योंकि काम-कर्म-शुक्र तीनों की समष्टि ही वीजनिति भी सृष्टिकर्म संभव नहीं है । प्रत्येक सृष्टि में तीनों नित्य अपेक्षित हैं। सृष्टिकर्म का भव्यय के मुष्टिसाक्षी मन-प्राण-याक् भाग से सन्बन्ध है । जब तक इन तीनों कलाओं का समन्वय मही एवं उस कर्म से पैसी ही वस्तु उत्पन्न हो जाती है । “कापस्तद्ग्रेसमवर्चताधि मनसो रेत: al ईशोपनिषत् ॥ काम-कर्म-शुक्र 'आत्मा ३-याक्षरः महिमारूप पुनःपद को महतोमहीयान कहा जाता है, एवं सर्वान्तरतम सूक्ष्मतम आत्मतत्त के लिए 'अणोरणीयान्' कहा जाता है । महिमयुक्त शरीरत्रयी कर्मप्रधान है, मात्मा ज्ञानप्रधान है। ज्ञान शान्त है, निष्क्रिय है । इस ज्ञानप्रधान श्रात्मा के लिए उपनिषदों में 'अकृत' शन्द प्रयुक्त हुआ है, एवं कर्मप्रधान शरीर के लिए 'कृत' शब्द प्रयुक्त हुआ है । जब तक कृत की (शरीर का) माश्रय है, तब तक अकृत (यात्मा ) बन्धन में है । कृत अकृत को कभी उप- कृत नहीं कर सकता, जैसा कि-'नास्पकृतः कृतेन इत्यादि उपनिषद्वचनों से स्पष्ट है । उक्त तीनों चितियों में से बीजचिति ही जीवसृष्टि का कारण है, एवं वही ईश्वरसृष्टि का कारण है, यह कहा जाचुका है । इसी कारणता को बतलाने के लिए ऋपिने इस का नाम कारणशरीर रक्खा है । जबतक शुक्ररूप कारणशरीर है, तब तक न जीव की मुक्ति है, एवं न ( मायाविमोकलदणा) ईश्वर की मुक्ति है । दूसरे शब्दों में शुक्र का प्रतिवर्तन ही मुक्ति का कारण है। विज्ञानदृष्टि से शुक्र का स्वरूप देखिए । कारण ही बीज है । इसे शुक्र,काम, है । यह तीनों सृष्टि के साधारण अनुयग्ध हैं । दूसरे शब्दों में त्रिकाल बीनचिति के बिना कोई होजाता, तबतक सृष्टि ही क्या, संसार का कोई भी कर्म नहीं होसकता । मन से काम का, प्राण से कम का, एवं वाक् से शुक्र का उदय होता है । इन तीनों में सृष्टि का पहिला बीन काम है, कर्म दूसरा बीज है, शुक्र तीसरा बीज है । ईश्वर जैसा चाहता है,वैसा वर्ग करता है, कर्म - 1 ईशोपनिषत् ॥ सृष्टिकोण प्रकृतात्मा मथमं यदासीन" (नासदीयसूक्त ) के अनुसार काम ही प्रथम बीज है । काम के होते ही कर्म [प्राणन्यापार ] हो पड़ता है, कर्म से वागन्यापार होता है, नई वस्तु उत्पन्न होजाती है । काम ज्ञानशक्ति है, कर्म मियाशक्ति है, शुक्र अर्थशक्ति है । शुक्ररूप अर्थ ही पदार्थों का उपादान चनता है, यत. हम प्रधानबीन शुरु को ही कहेंगे, काम कर्म को सहकारी कारस कहेंगे। पूर्व कथनानुसार दार्शनिकों में भावनावासनारूप संस्कार को ही सृष्टि का पीन माना है। यह संस्कार जीवसृष्टि का बीज अश्य होसकता है, परन्तु ईश्वरसृष्टि का नहीं । क्योंकि वह संस्कारलेप से पृथक् है । सतत ज्ञान-कर्मानुष्ठान में रत रहने पर भी उसपर (अना- सक्तिभाव के कारण) संस्कारों का लेप (भावरण) नहीं होने पाता । उधर काम-कर्म- शुक्ररूप बीज जीयवत् ईश्वर से भी सम्बन्ध रखता है, जैसा कि "सोऽकामयत, स तपोऽ तप्यत, सोऽश्राम्यत्" इत्यादि से स्पष्ट है । ईश्वरवत् प्राधिकारिक जीवों के साथ भी संस्का- ररूप बीन घटित नहीं होता । ईश्वर-आधिकारिकजीव-यथाजातजीव-इतर अवान्तर सृष्टिएं इन सब के साथ समानरूप से युक्त रहने वाले बीज का तो-काम-कर्म-शुक्रमयत्वं बीम- त्वम्' यही लक्षण करना पड़ेगा । प्रकृतमन्त्र में शुक्र शब्द से यही सामान्य बीन अभिप्रेत है । जीवसृष्टि के लिए दार्शनिकों ने "भावना-वासना-संस्कारत-चीजत्वम्" जो यह लक्षण माना है, वहां भी वैज्ञानिकों के काम-कर्म-शुक्र बीज का समन्वय हो रहा है। अपेक्षा- पुद्धि से कर्म करने पर प्रज्ञानात्मा पर संस्कार हो जाता है। उस संस्कार के अभिकम-प्रवास दो विभाग है । क्रत्वकर्म प्रक्रम है, पुरुषार्थफर्म अभिक्रम है । आप अपने मकान से राम- निवास बाग जाते हैं । रामनिवास बाग पहुंच जाना पुरुषार्थकर्म है । इसकी सिद्धि के लिए थापको पिछला पैर उठाकर आगे रखना-इस क्रम से अवान्तर पतिरूप अनेक कर्म करने पड़ते हैं । यह सब भगन्तर गतिकर्म प्रक्रम हैं । लोकभाषा में जिसे 'पांवड़ा' (पैरों की गति को एक सीमा) कहते है, वही प्रक्रम है। यही प्रक्रम ऋवर्षकर्म है । अनेक प्रक्रमों से एक अभिकम का स्वरूप संपन्न होता है । हम अपने जीवन में अनेक अभिक्रम संपादित कर देते हैं । खाना- पीना-सोना-चलना-द्रव्योपार्जन-अध्ययन-आदि सहस्रों अभिकम कर्म हैं । इन सब को समधि भावनात्म भाईशोपनिषत् ॥ वमन्यूर । न्यूह' (धर्मव्यूह) नाम से प्रसिद्ध है । अनेक प्रक्रमों से एक अभिक्रम का, अनेक अभिक्रमो से एक व्यूह का स्वरूप बनता है । यह कर्मव्यूह सहकाररूप से प्रात्मा में प्रतिष्ठित रहता है । निवृत्तिपम से प्रारब्ध अभिक्रम कर्म को छोड़कर शेष सारा कमव्यूह निवृत्त होजाता है । प्रारब्धकर्मरूप अभिकम कर्म को भोग से ही निवृत्ति होती है-"नहाभिकमनाशोऽस्ति । कहना यही है कि वर्गारात मनुष्य कर्मव्यूह से उत्पन्न वर्मसन्तान के आवापोद्वापरूप धारा- यल से जाम गरण के चक्र में फसा रहता है । ऐसे ही जीव-आपथिक जीन कहलाते है । दूसरा विभाग 'यापिकारिकजीव' का है । इनके ब्रह्माश्वास्थिक-नियतकमश्चित्यिक मेद से दो भेद हैं । ब्रह्माश्चत्यिक जीव जड हैं । सूर्य-परमेष्ठी-चद्रमा-पृथिवी-नक्षत्र आदि ईश्वराभूत जड़ धारिफारिक जीन 'ब्रह्मावरिया' हैं । यह अपने अपने नियत अधिकार से अधिरत हैं । नियतकर्माचत्यिक जीव चेन हैं। इन के भी नित्य-सामयिक मेद से दो विपत हैं । ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र-इन्द्र-वरूण-चुबेर-अग्नि-पायु-सोम-गर्धा श्रादि चेतन देवता (जो कि देवनाविज्ञान के अनुमार-मात्माभिमानीदेवता नाम से प्रसिद्ध हैं) नित्य नियतकर्मा- यत्यिक जीव हैं । इन देवताओं के अवतार, एव राम-कृष्ण श्रादि अवतार सामयिक नियत- यविधिजीव हैं । जिस उद्देश्य से अवतार होता है, उद्देश्य समाप्ति के अन्तर थरतार- पुरप सीलासवरण वर जाते हैं, इसी अभिप्राय से नारायणावतार भगवान् व्यास कहते हैं- "यापदधिकारमारियतिरापिरिकारणम्" (शा. सू० ३।३।३२१)। प्रातिश नियमों में मनुष्यसमाज के प्रज्ञापराध से जब परिवर्तन होने लगता है तो प्रकृति नुन्ध हो पढ़ती है । इस क्षोभ के श्राघात त सम्बद्ध व्यापक चिदामा का एक भाग प्रवर्य धन कर गुन्ध वातारण फो शान्त करने के लिए जीव बन जाता है । वही याधिकारिकजीव अनार यहलाता है । प्रगृति देवभेद से विभक है । यद्विषयक क्षोभ होता है, तत्प्रधान ही १' अभिमानि प्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम् , (शा गु०१११५) । इस किस का वियर सियन पश्यरि ना. म देगा पारित।

प्राकृत त्मा इच्छा-तप-श्रम - ईशोपनिषत् । । धरतार होता है । प्राकृतिक नियमसंघ ही धर्म है, धर्मविप्लव ही अवतार का कारण है। इसी अवतार विज्ञान को लक्ष्य में रखकर पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध अव्ययपुरुष के अवतारभूत अत- एव पुरुषोत्तम नाम से ही उपगीत, अतएव पूर्णावतार भगवान् कृष्ण कहते हैं- यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ! अभ्युत्थानमधर्मस्य नदात्मानं सृजाम्यहं ।। परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंत्यापनायर्याय सम्भवामि युगे युगे ॥ (गीता ७-८)। मस्तु इस अप्राकृत विषय को हम अधिक दाना नहीं चाहते। यहां हमें कर्मावत्यिक चेतन जीयों के विषय में कहना है । संस्कार कर्मरूप हैं, कर्म बिना कामना के असंभव है। कामना से कर्म होता है, तजनित संस्कारपुञ्ज ही शुक है, यही बीज है । पूर्वसंचितशुक [कर्म] का भोग होता रहता है, मागे मागे नवीन नवीन संचय होता रहता है । प्रासक्तिभावना से जीय बंधन में भाजाता है, अनासहायोगी ईश्वर 'कुर्वन्नपि न लिप्यते' । मनप्राणवाक् की समष्टि अविद्याव्यय है। काम-कर्म-शुक्र कहो, अथवा अविद्या कहो, एक ही बात है । इसी प्राधार पर काम-कर्म-शुक्रमल विश्व को विद्या मूल यहा जाता है । अक्षर विद्या है, और अविधा है- ( देखिए रवे. उ० ५११)। क्षर को प्राण कला ही यजुरूप परिणत होती है, ऐसी स्थिति में अन्ततोगत्वा शुक्रतत्व का ब्रह्माग्निरूप यजुर्ब्रह्म पर ही पर्यवसान मानना पड़ता है । शुक्र को पूर्व के चितिप्रकरण में हमनें वाक्प्रधान बतलाया है । यह वाक् ही धागे जाकर प्राप-अग्निरूप में परिणत होती हुई निकल बनजाती है । इसी आधार पर पूर्व की शुक्र- निरुक्ति में शुक्र शब्द से वाक्-आप-अग्नि तीनों का प्रहण किया है। १-मन:-काममयम् (इच्छाशक्तिः)-कामः (इच्छा) २-प्राणः-कममयः (क्रियाशक्तिः)-क्रिया (तपः) अविद्यात्मकं शुक्रम् ३-वाक्-शुक्रमयी (अर्थशक्तिः)- आवरणम्(श्रमः) १ इस विषय का विशद विवेचन गौतारज्ञानमाय के प्राचार्य रहस्य में देखना चाहिए । .

प्राकृतात्मा । ईशोपनिषत् ॥ माजापरावल्या । श्राप के सर्वाङ्ग शरीर में काम है, कर्म भी है, शुक्र भी है । परन्तु इन तीनों के भव- या ही कार्यरूप में परिणत होते हैं, इच्छा-कर्म-शुक्र तीनो का नियत भाग ही उपादान बनता है । यही परिस्थिति मायावच्छिन्न महेश्वर के शरीर में समझिर । ईश्वर के किसी नियत प्रदेश में ही सृष्टिमूला कामना वा उदय होता है, उसी प्रदेश में कर्म का उदय होता है, एवं वही शुक्र विश्व का उपादान बनता है । ईश्वर का शरीर गोलाकार है, वह सर्वतः पाणिपाद, सर्वतोऽतिशिरोमुख है । जहा तक महेश्वर व्याप्त है, वहीं तक ब्रह्मरूप शुक्र, एवं सुब्रह्मरूप रेत व्याप्त है । वह कामनाओं का समुद्र है । कामभेद से कर्म, कर्मभेद से शुक्रभेद होजाता है । नियतकाम-कर्मावच्छिन्न नियतशुक्र नियतविश्व का उपादान बनता है । उस में काम नाभेद से अनन्त शुक्र हैं । जितने शुक्र हैं, उतने ही विश्व हैं । एक एक विश्व का उत्पादक एक एक शुक्र है । अनन्त ब्रह्माधिष्ठाता महेश्वर अश्याथ प्रजापति है । उसका पञ्चपर्वा एक एक विश्व एक एका पञ्चपुण्डीरा प्राजापत्य बल्शा है । व्यापक अमायी परात्पर में माया के उदय से अच- त्थेश्वर का उदय होता है । माया अनन्त हैं, अतएव मायीमहेश्वर भी अनन्त हैं । प्रत्येक माय' गहेश्वर (अश्वन्ध) के उदर में अनन्त ब्रह्माण्ड हैं । परात्पर एक है, आगे का सारा प्रपञ्च अनन्त है । यद्यपि परात्पर मी अनन्त है, परन्तु इस की अनन्तता दिग्देशकालानवच्छेद से सम्बन्ध रखती है, महेश्वरादि की अनन्तता सख्या से सम्बन्ध रखती है । इस प्रकार यह सत्र- विभूति अनन्त है, सत्य हैं, ज्ञानमूर्ति है-"सन्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" । परात्पर असीम है। इसी असीममार को सूचित करने के लिए उसे परात्पर (ससीम पर नामक अव्यय से भी पर- असीम) नाम से व्यवहत किया जाता है । जिस प्रकार एक पट (वस्त्र) में ससीम अनन्त गोलाकार विन्दुए प्रतिष्ठित रहती हैं, एवमेव उस असीम परात्पर धरातल में गोलाकार अनन्त मायी महेश्वर प्रतिष्ठित हैं । इस विषय का विशद विवेचन ईशभाष्य प्रथम खण्ड में विस्तार से किया जाचुका है-(देखिए ई. मा. प्र. २५५ से २६४) । प्रत्येक मायी महेश्वर भवत्यमुर्ति है । अश्वाप ऊर्धमूल माना जाता है । वर्नुलवृत्त का केन्द्र प्रधि ( परिधि ) से ऊर्य माना जाता है । उस उर्घमूलरूप केन्द्र विन्दु से चारों ओर प्रधि पर्यन्त सहस्र शाखाएं निरत्ती १६८ प्रकृवात्मा ईशोपनिषत् ॥ ধাঁয়া -- हैं । प्रत्येक शाखा में स्वयम्भू, परमेष्ठी, सूर्य, पृथिवी, चन्द्रमा यह पांच पांच पुण्डी (पर्व-पोर ) हैं । उपक्रम में पुण्डीर स्वयम्भू है, उपसंहार में चन्द्रमा है, अतएव चान्द्रब्रह्मा को निधन' ( अवसानस्थानीय ) कहा जाता है । यही सब भाव मायो महेश्वर के स्वरूप पारेचायक हैं। यही परिस्थिति इतर महेश्वरों की समगनी चाहिए । तीसर विवर्ण रूगेश्वर का है । वयम्भू की महिमा में समहिम परमेष्टी, परमेठी की महिमा में समहिम सूर्य, सूर्य की महिमा में समहिम पृथिवी, एवं पृथिवी की महिमा में समहिम चन्द्रमा प्रतिष्ठित है । यही स्वयम्भू सप्तलोकाधिष्टाता ईश्वर प्रजापति है-(देखिए ई. वि. प्र. ३७८)। अब तक के सन्दर्भ से यह भलीभांति सिद्ध होजाता है कि मायी महेश्वर में सर्वत्र एकरूप । यजुब्रह्माग्नि भरा हुआ है । महेश्वर का कोई भी प्रदेश इस से शून्य नहीं है । एवमेव उसी प्रदेश में सुग्रह्म आप (सोम) भरा हुआ है, इससे भी कोई स्थान रित नहीं है । दोनों ही मायावच्छेदेन महेम्बर की तरह व्यापक हैं । इस व्यापक महेश्वर के घरातल पर प्रतिष्ठित व्यापक ब्रह्म-सुनन के जिस प्रदेश में कामना का उदय होता है, उतने प्रदेश में कर्म जनित होम से एक नया सीमाभाव उत्पन्न होता है । महामाया के उदर में उत्पन्न होने वाले इसी सीमामाय को 'योगमाया' कहा जाता है। इसकी जननी अशनाया (बुभुक्षा) है । अशनाया के भधि- टाता विष्णु है, अतएव तन्मलिका योगमाया को-"योगमाया हरेश्चैतत् तथा संमोद्यते जगत्" इत्यादि रूपसे विष्णुमाया कहा जाता है । कामजवित सीमावच्छिन्न (योगमायाव- च्छिन्न) उस नियत प्रदेश से परिच्छिन्न यह यजुस (यजुर्ब्रह्म का अंश) ही सृष्टि की योनि बनता हुश्रा शुक्र नाम धारण करलेता है, एवं उसी सीमित प्रदेश का सुब्रह्म (आप) भाग रेत नाम धारण करलेता है । ब्रह्मामकशुक्र में इसी सुब्रह्मात्मकरेत का रेतोषा मातरिया द्वारा माधान होता है। 'अनजदेकम्' का अर्थ करते समय हमने मुग्राम (श्राप ) यु ब्रह्म को शुक बत- लाया था, यहां केवल यजुर्ब्रह्म को तो शुक्र, एवं सुनझ को रेत बतलाया जारहा है । वहाँ शुक्र- रेतरूप ब्रह्म में सुब्रह्म की समष्टि को शुक्र बतलाने का कारण यह था कि साधारण मनुष्य शुफा प्राकृतात्मा या ईशोपनिषत् ॥ मझन् की महत्ता -- -- कोही उत्पत्ति का कारण समझते हैं । इन की दृष्टि में शुक्र शब्द का अर्थ उपादानकारण है. एवं यह दृष्टि किसी सीमा तक ठीक भी कही जासकती है। उपादान न केवल ब्रह्म है, न केवल सुब्रह्म । अपि तु दोनों की समष्टि उपादान है । इसी साधारण दृष्टि का स्वागत करते हुर, शुक्र का आदान अर्थ मानते हुए हमनें दोनों के समुच्चय को यहां शुक्रशन्द से व्याहत करदिया था । वस्तुतः विज्ञानदृष्टया शुक्र केवल ब्रह्माग्नि वा वाचक है, एव रेत केवल सुमन का वाचक है । इस रेत या अाधान हुआ, इससे खयम्भू का खरूप निप्पन्न हुआ । यही शुक्रमला सृष्टि का पहिला रूप है । यह योगमायारण्टिन पुण्डीर स्वयम्भू है, 'अनेजदेकर' वाला महामायाच्छिन्न, महेश्वर के रूप से समतुलित व्यापक स्वयम्भू था । वह एक है, पुण्डीर स्वयम् अनन्त (सहस) हैं । इस योगमायावच्छिन्न ससीम पुण्डीर स्वयम्भू से ही परमेष्टी का उदय होता है। यही शुकम्ला सृष्टि या दूसरा रूप है । अव्यक्त स्वयम्भू में ययपि भाप भी है, परन्तु यहाँ प्रधानता प्राण की ही है । प्राण असंगत है, असंगमाण मैथुनीगृष्टि धा पारण नहीं बनता । ऐसी परिस्थिति में प्राणमय स्वयम्भू को भी वास्तविक उपादान नहीं माना जासरता । मृष्टि का वास्तविक उपादान तो संसर्गधर्मा पापोमश परमेष्टी ही है । अतएव शुक्र (उपादान कारण मूनय) शब्द का पर्यवसान परमेष्ट्री पर ही मानना पड़ता है । यही इस शुत्र- मुचि परमेष्टी की महत्ता है । इसे 'महान्' कहा जाता है । यदि गृष्टियों की महचामा विचार किया जाता है तो सामान्य दृष्टि से अध्यक्ष स्वयम्भू को ही सब पर्यों की अपेक्षा महान (मनसे वदा) मानना मुक्तिसंगत होता है । परन्तु वैज्ञानिकों ने अन्यात पो महान् ग पाइयर परमेष्टी को मदान् कहा है। सचमुच परमेष्टी ही सपा की अपेक्षा महान् है । मामात मयम्भू प्रजापति प्राण को सर्वता-महत्ता इसी प्राजापत्य परगेष्टी पर निर्भर है। पर मटी के दामारा से ही पुराटीर सपम्भूय चाप निपन्न होता है । पहिले प्राप्तव सस बनता है, पनन्तर मारा को सता या पामर मिलता है । पानी ही प्राण की प्रतिष्टा है- 'पापोपयः मागा' । मायामगंग्या में नयतक शरीर में प्राप्त र प्रतिष्टित रहता है, तभी हो प्रा AIR से प्रीटिन रहता है, जंगा कि-'या प्रागोपापो भान्नि ताराना ।

का ईशोपनिषत् | महान् की मचा प्रारुतात्मा 9339 + - वदति" (शत० ५।३।५।१६।) इत्यादि श्रौतवचन से स्पष्ट है । माणपेक्षया पानी की यही मइत्ता है । पानी के गर्भ में प्राण प्रतिष्ठित रहता है, पहिले "आपो वा इदं सर्वम्" है, अनन्तर 'माणो वा इद सर्वम् है,-(देखिए ई० वि० भा० पृ. १५) मातरिश्या वायु के वेष्टन से ही अव्यक्त खयम्भू का उदय हुआ है। यह मातरिश्वा घायु-श्राप का ही एक अंश है । इसलिए भी प्राणमय खयम्भू की अपेक्षा आपोय परमेष्ठी को महान् यहा जासकता है । वैकारिक विश्व का उपादान भी यही है , इसलिए विश्वापेक्षया भी यही महान् है । अव्यक्त भ्रमूर्त था, यह मृत है (मूतिरेव रयिः-प्रश्नो. १ ) । सारी मूर्तिरं, दूसरे शब्दों में मूर्त जगत् इसी रविप्रधान परमेष्ठी के गर्भ में उत्पन्न हुआ है। आप कहेंगे मायी महेश्वर सर्वकी अपेक्षा मदान् है, ऐसी अवस्थामें विश्वसीमा में महेश्वर को छोड़कर परमेष्टी आदि को कैसे महान् कहा जा सकता है ? हम कहेंगे आप भूलते हैं। केवल माया से ही महेश्वर (थव्यय) का विकास नहीं होता, सृष्टिधारा में आते समय उसे भी इसी का श्राश्रय लेना पड़ता है । आत्मपुरुष इसी में गर्भधारण करता है, इसी से आगे की मूर्तिसृष्टि होती है । श्राप के आप-बायु-सोम यह तीन विव हैं । चेतना आगमन के यही तीन द्वार है । अतएव विश्व में प्राप्य-वायव्य-सौम्य तीन ही प्रकार की जीवसृष्टि उपलब्ध होती है। इस जीयसृष्टि का अधिष्ठाता भी आपोमय पर- मेष्टी ही है । इसप्रकार ईश्वर-जीव-विश्वसब कुछ इसी के आश्रित हैं-'सर्वमापोगयं जगत् । एरमेष्ठी के इसी महत्त्व को लक्ष्य में रखकर ऋषियों ने इसे 'महानात्मा' नाम से व्यवहृत किया है। इसी महब्रह्मा की महत्ता का-निरूपण करती हुई स्मृति कहती है- मम योनिमहब्रह्म तस्मिन् गर्भ दधाम्यहम् । संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥ सर्वपोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः। तासां ब्रह्म महद्योनिरहं वीजप्रदः पिता ॥ (गीता१४॥३-१)। 9339 प्राकृतारमा - ईशोपनिषत् - भूवं भविष्यत् । पश्चपर्वा विश्व के अमृत-मृत्यु मैद से दो विभाग हैं । सूर्य से ऊपर का प्रपञ्च अमृत विभाग है, सूर्य से नीचे का प्रपञ्च मृत्यु विभाग है । अक्षरपुरुप स्वयं अमृतरूप है । इस का विकास सूर्य पर्यन्त रहता है । दूसरे शब्दों में अक्षर प्रधानता सूर्य तक (सूर्य के अमृताग्नि नामक प्राणाग्नि तक) है । सूर्यपिण्ड से आरम्भ कर नीचे के सारे मयं विश्व में क्षर का साम्राज्य है । क्षर को 'ब्राह्म' कहा जाता है । यह ब्रह्मदर अनेकषा विभक्त है, विविध भावों से आक्रान्त है । इस बहुरूप वाकूट पर एक अक्षर प्रतिष्टित है । विशुद्ध अक्षर नहीं, भपि तु महद्ब्रह्म युक्त अक्षा । क्योंकि परसृष्टि का उपादान शुक्ररूप परमेष्टी नामक महद्ब्रह्म ही है । यह सूर्य से ऊपर रहता दुया अमृत प्रधान वनकर यमृताक्षर कोटि में प्रविष्ट मान लिया जाता है । इस विभाग के अनुसार पोडपीपुरुष, अव्यक्त (स्वयम्भू). महान् (परमेष्टी) इन तीन का एक स्वतन्त्र अमृत विभाग होजाता है। एवं सूर्यपिण्ड-चन्द्रपिण्ड-पृथिवीपिण्ड इन तीन का एक खतन्त्र मर्य विभाग होजाता है । । इस प्रकार एक ही शुक तत्व अमृत मृत्यु मेद से दो भागों में विभक्त होजाता है, जैसा कि पूर्व की शुक्रनिरुक्ति में बतलाया जाचुका है। इसी रहस्य को लक्ष्य में रखकर---"भूतं भविष्यत् पस्तौमि बहुब्रह्मैकमक्षरं, महदग्रह्मकमक्षरम्" यह कहा जाता है। .. १-पोडशीपुरुषः २ज्यव्यतः खयम्भूः -अमृतम्-१ ३-परमेष्टी महान् प्रजापतिः १-सूर्यपिण्डम् २-चन्द्रपिण्डम् ३-भूपिण्डम् हमारा ‘स पयंगात् ०' मन्त्र शुक्ररूप इसी महनन का निरूपण करता है। शुक्रपदार्थ यदा जटिल है, यह पूर्व के शुक्रनिरूपण से विदित दुभा होगा । इस की यह जटिलता यही मत्यम्-२ २०२ प्राकृवात्मा जा ईशोपनिषत् ।। समन्वय समाप्त नहीं होजाती ! अभी इस संबन्ध में और भी कुछ क्तव्य है। यजुर्ब्रह्म शुक्र है, यह पहिला पक्ष है। काम-कर्म-शुक्ररूप अविद्यातत्व शुक्र है, यह दूसरा पक्ष है । ब्रह्म मुब्रह्म की समष्टिरूप महद्बह्म शुक्र है, यह तीसरा पक्ष है । वाक् आप-अग्नि-अग्नि-आप-चाक भेद से शुक्र ६ है, यह चौथा पक्ष है । अपेक्षा भेद से चारों मिन्न भिन्न प्रतीत होते हैं, पर- न्तु परमार्थतः सब अभिन्नार्थक हैं । पूर्व की शुक्रनिरुक्ति में हमने चौथे पक्ष को ही प्रधानता दी है, एवं इस प्रकरण में शेष तीनों पक्षों को प्रधान माना गया है। अब इन चारों का सम- न्वय कर इस अधिकरण को समाप्त करना है। ५ सब का मूल विद्या-फर्ममय अव्ययपुरुष है, यह निर्विवाद है । भानन्द-विज्ञान-मन का समुच्चय विद्यामाग है, यही अमृत है । मन-प्राण-वाक् का समन्वितरूप कर्मभाग है, यही अविधा है, यही मृत्यु है । दोनों की समष्टि विश्व है । विश्व का मूल शुक्र ( उपादान ) विद्याकर्म ही है, पही अविद्यारूप पहिला शुक्र है । परन्तु कैसा विद्याकर्म ? विशुद्ध नहीं, अपि तु वेदरूपक्षरा- वच्छिन्न विद्या कर्म । यत् रूप मृत्यु, जू रूप अमृत ही (यजुर्बम) ही संसार का शुक्र है। यह शुक्र पूर्वकथनानुसार मन-प्राण-बाङ्मय सृष्टिसाक्षी भव्यय के वाक् माग का ही विकास है । अ. व्ययवाक् ही वेदरूप में परिणत होती है । मूलावस्थापन धार वाक् है, खलाबस्थापन्न वाक् चेद है, अतएव अव्यक्ताधिकरण में इस वेद को 'ब्रह्मनिम्यसित' कहा है । निष्कर्ष यही हुआ कि अध्ययवाक् का विकासरूप, अतएव वान नाम से प्रसिद्ध अमृत-मृत्युरूप स्वायम्भुव ब्रह्म- निश्वसित वेद ही (जिसे कि इस शुक्रप्रकरण में 'वास्शुक्र' कहा गया है) प्रथमज एवं प्रति- प्टाम्प शुक्र है.। यही की दूसरी अवस्था है। इसी पर प्रतिष्ठित होकर' मझ (क्षर ) एवं अक्षर सृष्टि के अपिष्टाता बनने में समर्थ होते हैं, जैसा कि मुण्डकोपनिपत के-'ब्रह्मा देवा. नां प्रथमः सम्बमूत्र' इत्यादि मन्त्रभाष्य में सष्ट किया गया है । वेदरूपा वाक् पहिला शुक्र है । "एकाकी न रमते तद द्विनीयमैच्छत्,पतिश्च पत्रीच" के अनुसार पार का ( यत् का) ही कुछ भाग पानी बन जाता है । यही प्राप ( जिप्स में कि भाप-पायु मादि पद्मा प्राकृतात्मा में मानी जाने वाली पृथिवी में ६ ओं शुक्रों का भोग होरहा है, जैसा कि धागे के परिलेखों सा ईशापनियत ।। शुक्रमोग हैं ) पत्नी है । वह सत्य था, यह ऋत है । इन दोनों की समष्टि ही शुक्र की तीसरी अवस्था है । 'तत् स्रष्वा तदेवानुप्राविशन्' के अनुसार ब्र. नि. वेद अस्तत्व को उत्पन्न कर इस के भीतर प्रविष्ट हो जाता है । इसी से पुण्डीरस्वयम्भू का जन्म होता है। चारों ओर आपोमय पमा व्याप्त है, बीच में वेदत्रयी प्रतिष्ठित है । आप में जो अङ्गिराभाग है उस की भनि-वायु आदित्य यह तीन अवस्थाएंबतलाई गई हैं। यह अशिरात्रयी आगेजाकर "गायत्रीमात्रिकेवद"रूप में परिणत होती है । अगिराग्नि गायत्र नाम से प्रसिद्ध है, अतएव तद्रूप वेद को 'गायत्रीमा० कहना न्यायप्राप्त है। सृष्टि यज्ञमूला है । यज्ञ की प्रथम विकास भूमि आप शुक्र है । अपर्ने ही अगिरा भाग से वह अापतत्त्र उक्त वेदरूप से प्रादुर्भूत होता है । अगिरात्रयी अग्नि है। भृगुत्रयी सोग है । दोनों का रामम्बित रूप यज्ञ है-"दुदोड यज्ञसिद्धयर्थमृग्यजुःसाम लक्षणम्" ।यही यज्ञात्मक चौया शुक्र है । प्रकारान्तर से देखिए । स्वायम्मुवी वाक् पहिला शुक्र है, पारमेष्ठ्य आप दूसरा शुक्र है, सौर अमितीप्तरा शुक्र है । तीनों ही अमृत मृत्यु भेद से दो दो भागों में विभक्त होते हुए पशुक्र संपत्ति के सम्पादक बनजाते हैं । उत्तर उत्तर की सृष्टि में पूर्व पूर्व के शुक्र अनुस्यूत रहते हैं। ऐसी अवस्था में सर्वत्र सत्र शुक्रों की सूक्ष्मावस्या मानमें पर भी विकास क्रमिक ही गाना जा- यगा । स्वयम्भू केवल वाङ्मय है । परमेष्ट्री खयम्भू के उदर में है, इसलिए यह खखरूप से से थापोमय यनना हुआ वाक् के श्रागमन से वाङ्मय भी है । सूर्य में अमृताग्नि-मर्याग्नि के साथ सार याक-माप का भी सम्बन्ध है, क्योंकि सूर्य परमेष्ठी के गर्भ है । दृष्टि क्रमानुसार पृथिवी और सूर्य के गर्म में प्रतिष्ठित अन्तरिक्षस्थानीय चन्द्रमा में पांच शुक्र हैं । एयं दृष्टि क्रमानुसार (साथ ही में हम पायिव प्राणियों की अपेक्षा से रिपति क्रमानुसार भी) सबसे अन्त से पर होनाता है। २०४

'खपभूः
-→ पांक-?-स्वयम्भुः
।
वामयः
१ वाक्स्वर
परमेष्ठी
आपोमयः
→→वाक्-आपः-२-परमेष्ठी
१ वाकस्ता
२वापरतर
३
अमृतसूर्यः
अमृतानि
--वाक्-प्राप:-अग्निः-३-सूर्यः

.
१ वाकस्तर
२श्रापस्वरः
अमृताभिस्तरः
३
मयसूर्यः (पिण्डम्)
मृत्युरग्निः
वाक-मापा-अग्नि:-अग्नि:-
४--सूर्यः
१ वाकस्तर
२प्रापरत
अमुतामिस्तर
३
मनिस्सार,
४
३
४
५
૨
१
वाक-आपा-अनि:-अग्नि:-आप
चन्द्रमाः
मापः

म.रूया.प्रा.अमक्यानिमयः
२श्रापस्तस
२
१०
वाक्-आया-अमिः
१६-पृथिवी
६
अग्नि:-आपः-वाक्
स्वयम्भूवाड्मयः
परमेष्ठीया भारोमयः
-पाप्रा अग्रतामिमयः
सत्यापोमय
प्राप:.
क.
श्रमिक
समष्टिः

मन्त्रापक्रम प्रामा जा ईशोपनिषत् ॥ , (4 - १-स्वयम्भूः-वाङ्मयः ।-वाक् ? २-परमेष्ठी-वाङ्मयः, प्रापोमयः ।-आपः २ ३-अमृतसूर्यः-वाङ्मयः, मापोगपः, अमृतानिमयः-अभिः ३ ४-मय॑सूर्यः- शापोमयः, अमृताग्निमयः, मानिमयः,-अग्निः ४ ५-चन्द्रमाः-वाड्मयः, आपोमयः, अमृताग्निमयः, मर्याप्तिमयः, मापोमयः प्रागः५ ६-पृथिवी-वाड्मयी, आपोमयी, अमृताग्निमयी, माझिमयी, मर्यापोमयी, मर्त्यवाङ्मयी-घाक् ६ -वाड्मयः, (9 (H 11) (5) (2) . (9) (2) 10) (61 में । शुक्र में आप का भाग है, अगर्भित गग्नि का भाग है, समष्टि महहह्म है । महबम अव्यक्त खयम्म प्रतिष्ठारूप से प्रतिष्ठित है। मातरिश्था वायु इस शुक्र के चारों भोर व्याप्त है । अभी सृष्टि निर्माण नहीं हुआ है । केवल मातरिया द्वारा सृष्टि के बीजभूत महद्ब्रह्मरूप शक का आविभाव हुआ है । यही मागे विश्व बनने वाला है । हमारा औपनिषद मन्त्र इसी विशुद्ध शुक्र का निरूपण करता है । मत्रार्थ सम्बन्धी उपकरणों का निरूपण समाप्त हुआ। अव मन्त्रार्य की ओर विज्ञ पाठकों का ध्यान भाकर्षित किया जाता है । मन्त्रार्थमकरण "म सुना की समष्टिरूप उस शुक्र को (सर्वव्यापक आदिवयम्भूरूप ,शुक को) मातरिया वायुनें चारों भोर से घेर लिया । इस परिच्छेद से ही यह शुक्र (जिसे कि भार्गव बायु रूप, अतएव मापोमम महद्ब्रह्म के अंश- भूत होने से हम 'महदनम-नाम से व्यवात करेंगे) सृष्टि का कारण बनता है | कुछ एक विजातीय धर्म, एवं कुछ एक सनातीय धर्मों के '२०१ वर्चते के अनुसार सात थाय पर यह एक सूत्रधारा विच्छिन्न होजाती है । इसी श्रद्धासूत्र' सा ईशापनिषत - प्राकृतारमा सम्मिश्रण से ही शुक्र सृष्टि का कारण बनता है। कारण इन्हीं धर्मों के ससर्ग से गुरु में कायत्व, व्रणत्व, स्नाविरत्व, अशुदत्त, पाप्मविद्धव आदि भावों का उदय होता है । सजा- तीय पदार्थों का सघात काममार है, विजातीय पदार्थों का योग होजाना ही वणव है, इन धों का सम्बन्ध कराने वाला सूत्र स्नायु है । इन तीनों भानों से वह अपने शुद्धरूप से वि- कृतावस्या में श्राता हुआ पाप्मविद्ध बन जाता है । जबतक शुक में उक्त चारों भागों का उदय नहीं होता, तबतक वह सृष्टिमर्यादा से बाहर की वस्तु है । अध्यात्मसंस्था में श्राप शुक्र के उक्त चारों धर्मों का साक्षात्कार कर सकते हैं। पार्थिव-आन्तरित्य-सौर तीनों सजातीय अग्नियों की (शुक्र अग्निरूप है, इसलिए अग्नि सजातीय है) इसी शुक्र पर चिति हो रही है । यह अग्निचिति ही 'काय' (शरीर) है । काय की मुलभित्ति शुक्र ही है ।शुक्र ही आधान के अन- तर गर्भरूप में परिणत होकर क्रमश वृद्धिंगत होकर शरीररूप में परिणत होता है । इस लिए हम शुरु को 'सकाप' कहने के लिए तय्यार है । विजातीय सोम का भी इस अग्निरूप शुक्र के साथ सम्बन्ध हो रहा है। सोम सम्बन्ध से ही तो योनि में आहुत शुक 'मुत' रूप परिणत होताहै । सोम से ही पुत्र 'सुत' कहलाता है । यह विजातीयभाव ही शुक्र का व्रणव है। सोम स्नेह तत्व है । स्नेहन द्रव्य में दूसरे के साथ चिपकनें का खाभाविक धर्म है । जो सूत्र यह कर्म करता है (सोम में प्रतिष्ठित) वहीं सूत्र विज्ञानभाषा में-'श्रद्धा' नाम से प्रसिद्ध है । इसी तननभार के वारण अाल्य को 'तुनय' 'सन्तान' आदि नामों से व्यवहृत किया जाता है । इसी सूत्र के आधार पर मृतप्राणी के शुक्ररूप महानात्मा के साथ अपने पुत्र-पौ. नादि के साथ घनिष्ट सम्बन्ध रहता है । इसी के द्वारा पुत्र पितृलोकस्य पितर को पिण्डदान द्वारा तृप्त किया करता है । 'सापिण्ड्य साप्नपौरुपम्' 'सपिण्डता तुापुरुष सप्तमे विनि- में के सम्बन्ध से यह शुक्र स्नायुयुक्त बनता हुआ स्नाविर' कहलाने लगता है । चौथी है १ इस विषय का विशद विरेचन प्राप्शविधान के 'गुणमोचनोपायोपनिषत्' प्रकरण में द्रव्य है ।

प्राकृतात्मा सोपाधिकशुरु का ईशोपनिषत् संस्काररूग अविधा । इसी को 'पूर्वपज्ञा' भी कह सकते हैं । इससे यह शुक्र विद्ध रहता है । अविद्या पाप्मा (मल) है । इस अविद्यारूर पाप्मा से विद्ध होकर ही यह शुक्र प्रजोत्पत्ति का कारण बना है । जबत ककामना पूर्वक कर्म किया जाता है, तब तक यह वासनारूप अविद्यासंस्कार से युक्त रहता है , एवं तभीतक प्राणी शुक्र के चक्र से विमुक्त नहीं होता । ऋषि कहते हैं कि यद्यपि शुक्र कायत्वादि धर्मों से युक्त है, शुक्र का शुक्रपना काय यादि यागन्तुक धर्मों से ही चरितार्थ होता है, तयापि इसकी जो मौलिक-प्रारम्भिक प्रातिविक अवस्था है, वह फायत्यादि चारों धर्मों से रहित है । जिस समय सृष्टि कामुक प्रजापति की ( सतपुरुषपुरुषात्मक प्रजापति की) कामना से उस शुद्ध शुक को मातरिश्वा चारों ओर से घेरता है, उस समय वह अपने शुद्धरूप में है । मभी न उसमें सजातीय समूह है, न विजातीयभार का सम्बन्ध है, न।सूत्र- भाव का उदय है, न अविद्यारूप पाप्मा का ही लेग है । यद्यपि मातरिश्वा की कृपा से आगे जाकर ही वह उक्त चारो सजातीय -विजातीय धर्मों से प्रवरय ही युक्त होने वाला है, परन्तु भारम्भदशा में तो यह सर्वथा अकाय-प्रवण-अनाविर-अपापविद्ध-श्रतएव सर्वथा शुद्ध ही है । मातरिया के सम्बन्ध से कापत्वादि धर्मों से क्यों युक्त हो जाता है ! इसका उत्तर मात- रिचा से पूछिए । मातरिश्वा कवि है, परिमृ है, स्वयम्भू है । मातरिश्वा वायु को हमन भार्गव (भृगु) वायु कहा है । भृगु कवि है, अतएव मार्गव मारिरा को कवि कहा गया है । जन्ममरण- धर्म से आकान्त विविधभावमय विश्व इसी मातरिया का काव्य (कृति) है । यदि रेतोश मात- रिचा बय में (योनि में) भाप (रेत) का आधान न करता तो विसका निर्माण असंभव था । कवि मातरिया के द्वारा होने वाले रेत के आधान से ही मर्त्य विश्व की उत्पत्ति हुई है। कल तक जो मनुष्य हंसता खेलता था, वह भाज मरगण । अत्र त्रैलोक्य में उस खरूप का पता नहीं है । यही उस कवि का महाकाव्य है। वही संचर काल में उत्पत्ति का अधिष्ठाता बनता है, पति- संचरकाल में यही विनाश का अधिष्ठाता बन जाता है । मातरिश कवि के इसी काव्य का निरूपण करते हुए महर्षि कहते हैं- २०० प्राकृतात्मा - ईशोपनिषत् ॥ विधुं दद्राणं समने यहूनां युवान सन्तं पलितो जगार । देवस्य पश्य काव्यं महित्वाधा ममार स ह्यः समानः॥ (ऋक्सं० १० १५५/५।। कामना भृगुतत्व स्नेहधर्मा है । स्नेह ही संसृष्टिलक्षणा सृष्टि का कारण है । यह स्नेहधर्म ही मार्गत्रमातरिश्वा कवि की कवित्यशक्ति है । इसी स्नेहधर्म से चितिभाव का उदय होता है । चितिसमष्टि ही 'काय' है । शुक्र का चितिलक्षण कायरूप में परिणत होजाना, मातरिश्मा की कवित्वशक्ति (स्नेहगुण ) की ही महिमा है । 'एकोऽहं बहु स्याम्' यह कामना ही विजातीय- भाव के आगमन का कारण है । इस कामना का उदय मन से होता है । मन ही 'मनीपा' है । मनीषाभाव से विजातीय परिगहों का संग्रह होता है । विजातीय परिग्रह ही 'वण' है । मार्गव मातरिश्वा यद्यपि वायुरूप होने से स्वयं क्रियाप्रधान है, परन्तु क्रिया दिना मन की कामना के सम्भव नहीं है। सुतरां मातरिश्वा में अव्यय मन का अनुग्रह सिद्ध हो जाता है । इसी से यह 'मनीपी' बना हुआ है । यइ मनीषीभाव ही कामनाओं का प्रवर्तक वनता दुभा, विजातीयधों के आगमन का द्वार बनता हुआ शुक्र के व्रणमाय का कारण बनता है । अपिच-मातरिश्धा का सारा ज्ञान एक ज्ञानमयी कृति है । बढ़े नियम से सृष्टिपर्यो का निर्माण दुपा है । सृष्टि मनमानी नहीं है । अपि तु जैसे एक बुद्धिमान शिल्पी बुद्धिपूर्वक मूर्तियों का निर्माण करता है, एवमेघ यह भी आया मन से युक्त बनता दुधा बुद्धिपूर्वक ही मूर्तिरूप (मूर्तरूप ) विश्व का निर्माण करता है | जहा मातरिश्वा कवि ( सृष्टिकती ) है, यहां यह बुद्धिमान् मी है । 'वायु गौतमवत्सूत्रम्' (शत. १४।६।७।६।के अनुसार मातरिश्मा सूत्रमार का भी प्रपनक है । इसी सूत्रसम्बन्ध से यह उस शुक के चारों ओर व्याप्त होता रमा शुक्र में सूनभान के उदय का कारण बनता है । सूत्रसम्बन्ध से यह चारों ओर व्याप्त होना हुभा 'परिमृ' (परि-चारों ओर-भू-व्याप्त रहनेयासा ) है। इस का यह परिभाव ही शक के स्नाविख्य का कारण है। व्यापक वस्तु में केन्द्र नहीं होता, विना केन्द्र काममय ।

हितात्मा या ईशोपनिषत् ॥ पामा प्रशनाया व - मन का उदय नहीं होता, बिना काममय मन के अशनाया काउदय नहीं होता, विना शनाया के विषय का, यागमन नहीं होता, विना विषय के लेप नहीं होता । लेप का कारण अशनाया है। अतएया अशनापा (भूख ) को 'पाप्मा' कहा जाता है , बैसा कि श्रुति कहती है. "नोह किञ्चनान भासीव-मृत्युनैवेदमाटतमासीत्-अशनाययो। अशनाया हि मृत्युः । तन्मनोऽकुरुव-मात्मन्वी स्याम्" इति शत०१० दि। ६) ८ . । . इस थशनाया का प्रभव मन है । मन की प्रतिष्ठा हृदय है। हृदय सीमाभाव पर निर्भर है । यह सीमाभाव मातरिश्म पर निर्भर है । मातरिरवा ही उस शुक को स्वयम्भू नाम से प्र- सिद्धं प्रयम पुण्डीररूप में परिणत करता है । इसी सीमा से स्वयम्भू चौजा' (गोलाकार) बनता है-देखिए मनु १०। ६ श्लोक) "स एप वायुः प्रजापतिः (मातरिवाख्यो वराह- प्रजापतिः) अस्मिस्त्रैष्टुभेऽन्तरिते समन्त पर्यतः" (शत.८ १३।४।१।२) के अनुसार यह मातरिया ही मायासीमातर्फ ज्याप्त शुक्र के एक प्रदेश को चारों ओर से घेर फिर इसे पुण्डीर- स्वयम्भूरूप में परिणत करता है, जैसा कि पूर्व में बतलाया जाचुका है । यही स्वयम्भूभाव सीमाभाव से सकेन्द्र, अतएव समनस्क बनता हुआ अर्शनीयारूप पाप्मा के उदया का कारण धनता है । एव इस स्वयम्भूभाव के उदय का कारण मातरिरवा है, अतः ताछधन्याप से हम इसे भी स्वयम्भू शब्द से व्यवहृत कर सकते हैं । इस प्रकार अपने कवि-मनीपी-परिभू- स्वयम्भू इन चार स्वरूपधर्मों से युक्त यह मातरिश्वा, प्रथमावस्थापन अतएव अकाय-प्रवण अनाविर-अपापविद्ध, अतएव विशुद्ध शुक्र को क्रमशः काय-त्रण-स्नाविर-पापविद्ध जना डालता है । कृविधर्म,काय का, मनीषीधर्म वा का, परिभूधर्म स्नाविर का, एव सपाभूभाव पाप्मा का प्रवर्तक है । चतुर्धर्ममूर्ति. मातरिश्वा शुक्र को, उक्त चारों धर्मों से बात करने के पश्चाद् ही, दूसरे शब्दों में कायत्वादि से युक्त शुक्र से ही वह वैकारिक विश्वनिर्माण में समर्थ होता है। r प्राकृतात्मा या ईशोपनिषत् ।। याय तापमार . सृष्टि एक प्रकार का व्यापार है, व्यापार क्रिया है। अर्यरूप शुक्र विश्व का उपादान धन- ता हुआ भी जड़ है , किपाशव्य है । क्रिया सदागति मातरिश्वा वायु का हो धर्म है । अतः 'पापातय्यतो इत्यादि रूप से श्रुतिने मातरिया को ही सष्टिकती बतलाया है। मातरिखा वाय ही अपने स्नेहनरूप करिभार से शुरूप अर्थ को कार्यरूप में परिणत करता हुआ, मन से ज्ञानयुक्त वनकर कामना का अधिष्ठाता बनता हुआ, शुक्र को ब्राणरूप में परिणत करता हुआ, परिभूमाव से शुक्र को स्नायुरूप में परिणत करता हुआ, स्वयम्भूमार से अशनाया द्वारा शुक्र को पाप्पनिद्ध बनाता दुमा उक्त लक्षण प्रर्यमूर्ति शुक्र से सदा के लिर अर्थों का ( विश्वपदार्थों का ) ययापूर्व निर्माण कर रहा है-"याथातथ्यतोऽर्थान व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समास्या" सृष्टिकर्ता मातरिश्वा कविः मनीपी →→→-- परिभूः सष्टयुपादानद्रव्यं-शुक्रम तत् • पूर्वमकायं--पश्चात्-वायम् पूर्वमत्रण- पश्चात्-त्रम् -- पूर्वमनाविर-पवाद-नाविरम् → पूर्वमपापविद्धं-पश्चात्-पापविद्धम् खयम्भूः→→ स 1-1 -गा शु-के- नसा (पपा) याज भाप देख रहे हैं, सृष्टि के प्रारम्भ में मातरिया ने वसा (यथा) ही पनापा था, एयं 'यथापूर्वकल्पयत्' इस सिद्धात के अनुसार सदा के लिये (शाश्वतीय - समाम्य) यह ऐसा ही बनाता रहेगा। उस मनीपी मातरिया की निर्माण पद्धति सदा के लिए निपत है । अग्नि या ऊचर्गपन, पानी का प्रयोगमन, वायु का तिर्यग्गमन, भूपिण्ड की प्राकृतात्मा पडूमणकमहान् ईशोपनिषत् ।। क्रान्तिवृत्त पर निपत परिभ्रमण, आदि आदि पदायों के जो नियत भाव पहिले थे वे ही आज है, एवं भविष्य में मी ऐसे ही रहेंगे । जिस परिस्थिति के लिए लोकव्यवहार में वह काम तो सालों साल ऐसा ही होता रहता है-सदा एकसार होता रहता है" यह कहा जाता है, ठीक इसी व्यवहार को सूचित करने के लिए 'याथातथ्यतो' इत्यादि कहा गया है। हम सृष्टिप्रक्रिया का प्रत्यक्ष कर रहे हैं । श्रुति को सृष्टिप्रक्रिया का स्वरूप बतलाना है । इसीलिए स्थूलारुन्धति न्याय से 'तथा यथा' यह क्रम न रखकर 'यथा तथा' यह ऋम रक्खा गया है । श्रुति कहती है कि जैसा तुम आज देख रहे हो, सदा के लिए मातरिश्चाने पैसा ही बनाया है, वर्तमान में वैसा ही बना रहा है, एवं भविष्य में वैसा ही बनाता रहेगा। वर्तमान परिस्थिति तुम्हारे सामने है, इसी से तुम भूत--भविष्यत्-स्थिति का अनुमान लग सकते हो। . है। भूपिण्ड मातरिश्चावन्छिन्न शुक्र अधिदैवत में 'परमेष्ठी' कहलाता है, अध्यात्म में यही 'महानात्मा' नाम से प्रसिद्ध है । इसमें प्रकृतिरूप सत्य ब्रह्माक्षर की अपकला की प्रधानता है। ब्रह्मसत्य के सम्बन्ध से ही हमने इसे प्रकरण विभाग में 'ब्रह्मसत्याक्षर महान्' नाम से व्यवहुत किया दर्शपूर्णमास से इस महान् में प्राकृतिभाव का उदय होता है, चान्द्र दर्शपूर्ण- से प्रकृतिभाव का, सौर दर्शपूर्णमास से महंकृतिभाव का उदय होता है । पार्थिवभाग महत् के तमोगुण का प्रवर्तक है, सौरमाग रजोगुण का प्रवर्तक है, एवं स्वायम्भुवभाग सत्वगुण का प्रवर्तक है । ज्ञानप्रधान खयम्भू ब्रह्मा सत्वमूर्सि है, क्रियाप्रधान सौरविष्णु रजोमूर्ति है, अर्यप्रधान पार्थिव भूतेशशिव तमोमूर्ति है । इस त्रिमूर्ति के सम्बन्ध से महद्ब्रह्म त्रैगुण्य से युक्त होजाता है, जैसा कि 'उपनिपदविज्ञानभाष्यभूमिका' के 'क्या उपनिषत् वेद है। १ मही महान् ८०...: यौनयों का प्रस्त है । यही प्राद का एकमात्र अन्यतम अधिकारी है । प्रमो इस विषय में बहुत कुछ वक्तव्य है । परन्तु विस्तारमय से उपेक्षा की जस्ती है 1 श्राग'को उपनिषदों में, एव विशेषतः भाद्धविज्ञान में इन विषयों का विवाद मिदेचन हुआ है।

मौकता: का ईशोपनिषत् ॥ आप मयमहानात्मा' इस प्रकरण में विस्तार से बतलाया जाचुका है । महान् को हमनें ओपोमय कहा है. 1 यह आपतत्य-आप-वायु-सोम-अग्नि-वायु-प्रादिस भेद से पेट्कल है । इनमें प्रांप के साथ आकृतिमाव का, वायु (भार्गववायु) के साथ प्रकृतिभाव का, सोम के साया प्रकृतिभावः का, अग्नि के साथ तमोगुण का, वायु (रुद्रयायु) के साथ रजोगुण का, एवं मादित्य के साथ सम्वगुण का सम्बन्ध है । इस प्रकार यह पट्कल महान्-पड्गुण बनकर पाटकौशिक विश्व का प्रभय-प्रतिष्ठा परायण बनरहा है। १-१-पार्थिवदर्शपूर्णमासाभ्यां २-२-चान्द्रदर्शपूर्णमासाम्या. ३-३-सौरदर्शपूर्णमासाभ्यां -श्राकृतिभावोदयः .. -प्रकृतिभावोदयः अहंकृतिभावोदयः पड्गुणको महान -सत्वगुणोदयः . - रजोगुणोदयः ..? । ४-१-सायम्भुवज्ञानमूर्तिब्रह्मणा ५-२-सौरक्रियामूर्तिर्विष्णुनो ६-३-पार्थिवार्थमूर्तिपशुपतिना - तमोगुणोदयः' : 'आपामयो महानात्मा १-मापः श्राकृतिमयः -प्रकृतिमयः भग २-१-वायु: ३-३-सोमः अहंकृतिमयः । श्रापो. भृग्वशिरोरूपमापो- ४-१-अग्निः भृग्यशिरोमयम्” मलिग मदिराः ५-२-यायुः तमोममः. रनोमयः -सत्वमय:-) ६-३-श्रादित्यः- ૨૨ म-धार्थीवहार प प्राकृवात्मा का ईशोपनिषत :- . प्रत्येक सृष्टि में योनि-रेत-रेतोधा तीन भावों का सम्बन्ध नित्य अपेक्षित है । सुन- सिद्ध प्राण-पाप-वाक्-अन्न-अन्नाद-इन पांचों प्रकृतियों का स्मरण कीजिए । यही पांचों क्रमशः स्वयम्भू-परमेष्ठी-सूर्य-चन्द्रमा-पृथिवी इन पांचों पयों के 'रेत' हैं । व्यापक माण योनि था, व्यापक प्राण रेत या, व्यापक मातरिश्वा रेतोधा था, इससे व्यापक स्वयम्भू का उदय हुआ । परिच्छिन्नमाण योनि था, परिच्छिन्नमाण रेत था, परिच्छिन्न मातरिश्वा रेतोषा या, इससे परिच्छिन्न पुण्डीर स्वयम्भू का जन्म हुमा । प्राणमय पुण्डीर स्वयम्भू योनि बना, आपतत्व रेत बना, मातरिचा रेतोधा बना, इससे परमेष्ठी का उदय हुआ । अब भापोमय परमेष्टो योनि बनेगा, तीसरा वाक्तस्व रेत बनेगा, मातरिश्वारेतोधा रहेगा, इससे सूर्य उत्पन्न होगा । वाङ्मय सूर्य योनि बनेगा, मातरिश्वा रेतोधा रहेगा, इससे भूपिण्ड उत्पन्न होगा । अन्नादमय भूपिण्ड योनि बनेगा, 'अन्न रेते वनगा, एवं वी मातरिश्वा रेतोधा बनेगा । इस से चन्द्रमा उत्पन्न होगा। यहां भाकर सृष्टिक्रम समाप्त होजायगा । इस प्रकार सृष्टिक्रम में रेतोधा सर्वत्र मातरिश्वा ही रहता है । ही सृष्टिपभेद से उसके नाग संप अवश्य ही बदल जाते हैं, जैसा कि पूर्वाधिकरण में वराहस्वरूपनिर्वचन में बतलाया जाचुका है। पूर्व पूर्व प्रकृति (प्राणादि) उपर उत्तर की प्रकृति (अचादि) की योनि बनती है, उत्तर-उत्तर की प्रकृतिएं (अवादि) पूर्व पूर्व प्रकृतियों (प्राणादि ) के रेत बनते हैं । अव्यक्तात्माधिकरण में व्यापक स्वयम्भू का निरूपण हुआ, इस प्रकृत महदात्माधिकरण में पुण्डीरस्वयम्भू, एवं परमेष्ठी की उत्पत्ति बतलाई गई है । इस आपोमय महान् को योनि (ममयोनिर्महद्ब्रह्म) समझिर, तीसरे वाक्तत्व को रेत समझिर, यज्ञवराह ति मातरिया को रेतीघा समझिए । इस बात के महयोनि में प्राधान होने से विज्ञानघन, अतएव विज्ञानात्मा नाम से प्रसिद्ध सहस्रांशु भगवान् सूर्यनारायण का जन्म होगा । श्रागे का अधिकरण इसी जन्मोत्सव के लिए हमारे विज्ञा- नात्मा (बुद्धि) को प्रेरित कर रहा है । इति-प्राकृतात्माधिकरणे शुक्रात्मानिरूपणम्

-
प्राकृतात्माधिकरणे-
महदात्माधिकरणं समाप्तम्

अध्यामम्
पूर्णमदः
....
पूर्णमिदम्
३-सूर्य: विज्ञानवैभव २-विज्ञानात्मा
अधिदैवतम् ।
ब्रह्मसत्याक्षर:-
विद्या-अविद्यामयः प्राकृतात्मा सूर्यः
विज्ञानात्मा
३
विज्ञानात्मा
सूर्यः
काकू
(प्राकृतात्माधिकरणे विज्ञानात्माधिकरणं तृतीयम् )
गायत्रीमात्रिकवेदावच्छिन्नः-विद्या-अविद्यामयात्मा
विश्वात्मा
१-अन्वं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः ।।
२-अन्यदेवाहुर्विद्ययाऽन्यदेवाहुरविद्यया ।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तविचचक्षिरे ।।
३-विद्यां चाविद्यां च यस्तदेदोभयं सह ।
अविद्यया मृत्यु तीर्खा विद्ययामृतमश्नुते ॥
(ईशोपनिषद् २,१०, ११, मन्त्र

२- विज्ञानात्मस्वरूपनिदर्शन एको हंसो भुवनस्यास्य मध्ये स एवाग्निः सलिले सन्निविष्टः । तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्या विद्यतेऽयनाय ॥ (श्वे० ६।१५)। स विश्वद्विश्वविदात्मयोनिः कालकालो गुणी सर्वविधः । प्रधानक्षेत्रज्ञपतिणुगोशः संसारमोक्षस्थितिबन्धहेतुः ॥ (श्वेता० ६।१६)। स तन्मयो एमृत ईशसंस्थो ज्ञः सर्वगो भुवनस्यास्य गोता । य ईशेऽस्य जगतो नित्यमेव नान्यो हेतुर्वियत ईशनाय ॥ (श्वेता० ६।१७) । पदा तमरतन दिवा न रात्रिन सन चासच्छित्र एव केवलः । तदक्षरं तत्सवितुर्वरेण्यं प्रज्ञा च तस्मात् प्रसूता पुराणी ॥ (श्वेता० ४।१८)। हिरण्यगर्भः समवर्तताने भूतस्य जातः पतिरेक मासीत् । स दाधार पृथिवीं चामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ (यजुः । यज्ञैरपर्या प्रथमः पयस्तो ततः सूर्यो तपा वेन भाजनि । श्रागा आजदुशना काव्य सचा यमस्य जातममृत यजामहे ।। (ऋक्.१८३।५) । ("तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्") यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत् परम् श्रमयं तितोपतां पार नाचिकेतं शकेमहि ॥ (कठ० १३२)। विज्ञानात्मा सह देवैरच सधैः प्राणा भूतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र । तदक्षरं वेदयते यातु सोम्य स सर्वज्ञ. सर्वमेवाविवेश ॥ (प्र० ४।११)। एतेषु यश्चरते भ्राजमानेषु यथा कालं चाहतयो याददायन् । तन्नपन्येताः सूर्यस्य रस्मयो यत्र देवानां पतिरेकोऽधिवासः ॥ (मुण्ड० ११३५)। मनोमयः प्राण शरीरनेता प्रतिष्ठितोऽन्ने हृदयं सन्निधाय । तद्रिज्ञानन परिपश्यन्ति धीरा भानन्दरूपममृतं यद्विभाति ।। (मु० २,२।७)। हिरणमये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम् । तच्छुत्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तादात्मविदो विदुः ॥ (मु० २।२१)। इस शुचिषद सुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिपदतिथिदुरोणसत् । नृपदरसहतसद्वयोमसदना गोजा ऋतजा आदिजा ऋतं वृहत् ॥ (क० २।५।२) । ८- ११- ..॥ श्रीः ॥ त्तमेव धीरो विज्ञाय मज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः । नानुध्यायादहन्छब्दान वाचो विग्लापनं हि तत् ॥ नीहारहारयनसारसुधाकराभां कल्याणदा कनकचम्पकदामभूपाम् । उत्तङ्गपीनकुचकुम्भमनोहराङ्गी वाणीं नमामि मनसा वचसा विभूस ।। व्यक्त पाण से स्वयम्भू प्रकट हुए, स्वयम्भूमारूप योनि में सुब्रह्म रूप भ भाप रेत का आदिवराहमातरिश्वा नाम के रेतोपा द्वारा श्राधीन होने से प्राजापत्य परमेष्ठी उत्पन्न हुए । अव्यक्त खयम्भू वेदाग्नि प्रधान होने से सस था, व्यक्त परमेष्ठी थप्प्रधान होने से मृत है-"ऋतमेच परमेष्ठी" | पात- रूप यही महब्रह्म 'अहं' भात्र की प्रतिष्ठा है, इसी आधार पर-'अहमस्मि प्रथमजा मृतस्य पूर्व देवेभ्यः' यह कहा जाता है । इस ऋतरूप महयोनि में तीसरे वाक् नाम के रेत की यज्ञवराहमातरिश्वा नाम के रेतोपा द्वारा आधान हुआ। इस वाक् रेत के थाधान से संवत्सरं का जन्म हुभा । यही संवत्सराग्नि आगे जाकर 'मूर्य' रूप में परिणत तुा । संवसरात्मक सूर्य आपोमय परमेष्ठी समुद्र में (जो कि पारमेष्ट्रय समुद्र 'सरस्वान' नाम से प्रसिद्ध है) विचरण करने वाला एक सुपर्ण (सुनहरे पंखवाला पक्षी) है । दक्षिणायन इस का दक्षिणपक्ष है, उत्तरायण इसका उत्तरपक्ष है, विषुववृत्त इसका आत्मा है । चन्द्रमां एथिवीं, चान्द्रजीव, पार्थिवजीव यह चारों सुपर्ण इस संवत्सर सुपर्ण के उदर में प्रतिष्ठित रहते हैं, अतएव इसे महामुपर्ण' कहा जाता है। निखिल संवत्सरात्मक इसी महासुपर्ण का निरूपण करते हुए वेदपुरुष कहते हैं- "अथ ह वाऽएप. महासुपर्ण एव यत् संवत्सरः । तस्य यान्युत्तरस्ताद्विपुवतः परमासानुपयन्ति-सोऽन्यतरः पक्षः, अथ यान् पडुपरिष्टात सोऽन्यतः, पारमा विपुपान' (शत मा० १२२२३)।

प्राकृतात्मा
हा ईशोपनिषत् ॥
सृष्टिमतवाद
१-स्वयम्भूमूलासृष्टिः प्रथमा-
- इमा विश्वा भुवनानि जुहरपिहोता न्यपीदत् पिता नः ।
स आशिपा द्रविणमिच्छमानः प्रथमच्छदवराँ प्राविवेश ॥
२-किंस्विदासीदपिष्टानमारम्भणं कतमतस्विर कयासीत् ।
यतो भूमिं जनयन् विश्वकर्मा विद्यामौर्णोन्महिना विश्वचक्षयः ॥
३-विधतश्चतुरुत विधतो मुखो विश्वतो वाहुरुत विश्वतस्पाद ।
स पाहुभ्या धमति सपतत्रैद्यावी भूमिं जनयन देव एकः ॥
५-या ते घामानि परमाणि यावमा या मध्यमा विश्वकर्मन्नुतेमा ।
शिक्षा सखिभ्यो इविपे खघावः स्वय यजस्व तन्यं वृधानः ।।
(पशु स०१७७०।१७१८-१९-२०-२१-२२-२३-२४-मन्त्र)।
.
२-सूर्यमुलासृष्टिर्दितीया
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भृतस्य जातः पतिरेक आसीत् ।
स दाधार पृथिवीं चामुतेमा कस्मै देवाय हविषा विधेम ।। (यजु ३१४)।
२-चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुमित्रस्य वरुणस्याग्नेः ।
अामायावापृथिवी अन्तरिक्ष सूर्य भात्मा जगतस्तस्थुपश्च ॥ (यजुः ३४६)।
३-येन चौरुग्रा पृथिवी च हव्हा येन स्वः स्तभित येन नाकः ।
यो अन्तरिक्ष रनसो विमानः कस्मै देवाय हविपा विधेम ॥
४-प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ता बभूव ।
यत् कामास्ते जुहमस्तन्नो अस्तु वय स्याम पतपो रयीणाम् ।।
(ऋक् स० १० म । १२१ स०)।

प्राकृतारमा । ईशोपनिषत् ।। टिक्विानपी ३-पृथिवीमूलासृष्टिस्तृतीया - १-सहस्रशीर्पा पुरुषः सहस्रातः सहस्रपात् । स भूमि सर्वतः स्मृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥ ( यजुः ३१)। २-मदितिौरतितिरन्तरिक्षमदितिर्मावा स पिता स पुत्रः । विश्वे देवा अदितिः पञ्चजना मदितिर्जातमदिविर्जनित्वम् ॥(ऋ.१८६ १०) 3-"इयं वै देव्यदितिविश्वरूपी" (ते. वा. ६७)। ४-"इयं उ वा एपां लोकानां प्रथमासज्यत" (शत०६३१) । ५-"इयं वै जगती, अस्यां हीदं सर्व जगत्" (शत०६।२।१।२६)। ६-"पृथिव्यामिम लोकाः (प्रतिष्ठिताः)" (ज० उ० १११० २)। । . इन तीनों गृष्टिविद्याओं का उपनिपदों में प्रमश. भोड्कारविद्या (स्व० पिया), उद्गीय- विद्या (सूर्यनिया), प्रणव विद्या (४० विद्या) इन नामों से निरूपण हुआ है । स्वयम्भू से मा- रम्भ मानकर पृथिवी पर अवसान मानना प्रोद्वारविद्या है, सूर्य को धारम्भ स्थान मानकर उधर परमेष्ठी मपम्भू पर, इधर चन्द्रमा एवं पृथिवी पर पर्यवसान मानना उद्गीयविद्या है, पृथिवी यो मूल मानकर सयम्भू पर थासान मानना प्रणयविद्या है | स्वयम्भू विराट् पुरुष पा मस्तक है, अतः इस पिया को 'गिरोमूलाविद्या' कहना चाहिए । सूर्य विराट् पुरुष या हदप है, अतः इसे 'हृदयमृगारिया' समझना चाहिए। एवं पृथिवी पाद स्पानीया है, अत इमे पादमूनायष्टिरिया' परना चाहिए । पुगाउने भी इग्मी तन्द पा मगर मान कर तीन प्रकार से सृष्टिविया का उपद रिया है । "नामा मे सारे विश्व का भारम्भ हुआई, साग विश्व मान" • raj पति से ही मृट सामान माना गया है-(र-.' (111) पहपुरा प्राकृतारमा निमुचि ईशोपनिषत् ॥ । का एक मत है । "विधा से सारे विश्व का निर्माण हुआ है, सम्पूर्ण विश्व वैष्णव है" यह दूसरा मत है । एवं-"महेश्वर (महादेव) से ही विश्व का जन्म स्थिति भंग हुआ है, सारा विश्व माहेश्वर है। यह तीसरा मत है । श्राप ब्रह्मपुराण को प्रथ से इति तक देख जाइए, वहां विष्णु महेश्वर भादि इतर सम्पूर्ण देवताओं को गौण बतलाया गया है, ब्रह्मा को सब का श्रादिप्रवर्तक यतलाया गया है । इसी प्रकार विष्णुपुराणने अथ से इति तक सब देवताओं की अपेक्षा विष्णु की प्रधानता का ही निरूपण किया है। शिवपुराण एकमात्र महेश्वर को प्रधान देवता मान रहा है । सृष्टिवाद के रहस्य को न सममने के कारण ही भाज उक्त भिन्न भिन्न पुराणों के प्रमाणों को उपन्यस्त करते हुए शव-वैष्णव मुष्टामुष्टि को ही परम पुरुषार्थ समझ रहे हैं। खापम्मुव ब्रह्मा ज्ञानमूत्ति है, सौर विष्णु नियामूर्ति है, पार्थिव शिव अर्थमूर्ति है । एक ही विराट् पुरुष के तीन अवयय हैं । त्रिमूर्ति को समष्टि ही प्रधान है । इस सम्बन्ध में प्रश्न यह उपस्थित होता है कि उक्त तीनों मतों में से किसे सच्चा कहा जाय ! सत्स एक हो सकता है । उधर तीनों ही मत वेदाभिमत होने से मान्य है । परन्तु मान्य होते हुए भी संदेह के जनक अदृश्य हैं । इस सदेह की निवृत्ति के लिए आपको उपवेदभूत अायुर्वेद की शरण में जाना चाहिए। संदेहरूप प्राणान्तकज्वर को निवृत्त करना चिकित्सा- शास्त्र का ही कार्य है। रज-शुक्न के मिथुनभाव से गर्भस्थिति होती है । धागे जाकर गर्म क्रमशः पुष्ट होता मास में सबिषय संपन्न बन जाता है । गर्भ के सम्बन्ध में प्रश्न उठाया जासकता है कि गर्भ में पहिले मस्तक बनता है ? अथवा पहिले हृदय का विकास होता है ? अथवा पहिले नाभि का उदय होता है ? किया पहिले पकाशयगुद या याविभीय होता है ! । इन प्रश्नों के सम्बन्ध में भिगम्बरों के भिम भिन्न मत है । कुमारशिराभरद्वाज के मतानुसार पहिले बुदिस्थ गर्भ का शिर बनता है, अनन्तर अन्य अवयवों का विकास होता है । "हृदय ही (इद- यस्य प्रज्ञान मन ही) सब इन्दियों का पालम्बन है । जब तक हृदय का विकास नहीं होता, १-"संशयारमा विनश्यति" (गीता)। हुमा माकतात्र का ईशोपनिषत् ॥ गर्मसृष्टिक्रम । तब तक चनु,श्रोत्र,प्रणादि इन्द्रियों का विकास कपमपि संभव नहीं है। इस कारण को अानो रखते हुए काङ्गायन पारहीक नाम के वैध गर्भ में सर्वप्रथम हृदय का विकास मानते हैं। भद्रकाध्य के मतानुसार नाभि पहिला भाव है । नाभि द्वारा ही मातृभुक्त रस से गर्भ की पुष्टि होती है । भद्रशौनक के मतानुसार आहार के आगमन का साधन बनता हुआ पकाशयगुद ही पहिले विकसित होता है । यडिश के मतानुसार पहिले हाथ पैरों का विकास होता है । वैदेह जनक के मतानुसार पहिले इन्द्रियों का विकास होता है । मरीचि महर्षि के पुत्र अतएव मारीचि, कि या मारीच नाम से प्रसिद्ध महर्षि कश्यप का कहना है कि यह सब परोक्ष विषय है। गर्भ का कौनसा श्रङ्ग पहिले बनता है ? यह इन्द्रियातीत विषय है, अतः इसके सम्बन्ध में-"इदमित्य- मेव" इस प्रकार निश्चयरूप से कुछ नहीं कहा जासता 1 इस प्रकार इनके मतानुसार यह विषय ही अचिन्त्य है । भगवान् धन्वन्तरि कहते हैं सारे अट्स एक साथ वनते हैं । सभी अवयव परस्पर में अन्योऽन्याश्रित हैं । अतः इनका युगपत् ही सम्भव (उत्पत्ति) मानना ठीक होता है। इसी मत को सिद्धान्त पक्ष मानती हुई चरकसंहिता कहती है- "सर्वाङ्गनिष्टचिर्युगपर-इति धन्वन्तरिः। तदुपपन्न-सिद्धत्वात् । न च तस्मात पूर्वाभिनितिरेपाम् । तस्माद्धृदयपूर्वाणां सर्वानानां तुल्यकालाभिनिर्टतिः । सर्वभावा ह्यन्योऽन्यमतिबद्धाः, तस्माद्यथाभूतं दर्शनं साधु" (चरक से। शारीर- स्थान ६ शरीरविचयाध्याय-१९ख०) इस प्रकार भायुर्वेद के मतानुसार प्राध्यामिक पुरुषोत्पत्ति में सभी भायय एक साथ उत् पन्न होते हैं, तथापि सूक्ष्मकमानुसार कुमारशिराभरदान के मतानुसार पहिले मस्तक का ही विकास गानना पड़ता है । बीजरूप से समी अश्यत्र समानकालीन होते हुए भी अंकुरदशा में पदिल मस्तक मी ही प्रधागना है। इसी प्रकार गार्कराक्ष्य महर्षि पहिले उदर का. अरुण पुत्र पहिले हृदय का विकास मानते हैं (२० था० २।१।४।) । इस प्रकार श्रुतियों में मी मन याद है । तथापि यहां सृष्टिविकासक्रममूलक मतकोत्पत्ति के ग्राथम्य को ही प्रधान गाना गया है, जगा कि श्रुति परती है- प्राकृतात्मा ममिक्रषिकाम । ईशोपनिषत् ॥ "शिरो यो अग्रे सम्भवतः सम्भवति । चतुर्दा विहिनं- वै शिरः-माणश्चक्षुः श्रोत्रं वार" (ता. वा. २२६४)! "शिरो हि प्रथमं जायमानस्य जायते" (शत० ८२४१८)। विकास भी सबसे पहिले मस्तक का ही होता है, एवं "शीपतो वाऽग्रे-जायमानो जायते" (शत० ३।४।१।१५) के अनुसार प्रसयकाल में भी पहिले मस्तक ही अमणी बनता है । शिर सचमुच सृष्टिक्रम में श्रमणी है । तभी तो जरा का प्रकोप सबसे पहिले मस्तक पर ही होता है-"यस्माच्छीर्पण्येवाग्रे पलितो भवति" (शत. ११।४।१।६) । इसी प्रयममाव के कारण प्रथमश्रेणि के उत्कृष्ट मनुष्य को शिरस्थानीय मुख्य) माना जाता है । गर्भ की स्थिति हृदय से ही रहती है, पदय ही जीवन की प्रतिष्ठा है । दृष्टिक्रम में पैरों की प्रधानता है । यही क्रम अधिदैवत में समझिए । बीजरूप से प्राण-माप वागादि पाचों प्रकृतिएं समकालीन हैं । पान्तु गृष्टि (उत्पत्ति) क्रमानुसार पहिले शिरस्थानीय स्वयम्भू का विकास होता है । इस सृष्टि- कम की अपेक्षा से स्वायम्भुव ब्रह्मा का ही सर्वप्रधानत्व है । मला ज्ञानप्रधान है। ज्ञान-अर्थ- क्रिय तीनों अन्योऽन्याश्रित हैं, तथापि प्राथग्य ज्ञान काही मानना पड़ता है । विश्व की स्थिति सूर्य पर निर्भर है । सूर्य से ही मन में त्रैगुण्य भाव का उदय होता है । त्रिगुण- भावापन्न महत् जबतक है, तबतक सृष्टि है, जब तक सूर्य है, तभी तक गुणोदय है । फलतः सूर्य का विश्वस्थितिस्थापकात्र भलीमाति सिद्ध हो जाता है । इस स्थितिक्रम के अनुसार सारे विश्व में सौर विष्णु का ही साम्राज्य है । हमारी दृष्टि पहिले पृथिवी पर पड़ती है, अनन्तर सूर्य-चन्द्रमा-परमेष्ठी की भोर हमारा ध्यान भाकर्षित होता है । इस दृष्टिक्रम के अनुसार सारे विश्व में पार्थिव पहेनर का ही साम्राज्य है। ज्ञानप्रधान सृष्टिक्रम, कर्मपधान स्थिति- अर्थपधान दृष्टिक्रम की अपेक्षा से उक्त तीनों सृष्टिविद्याश्री में कोई विरोध नहीं है । -स्वयम्भूमूलासृष्टिः-शिरोमला--सृष्टिक्रमप्रधाना ब्रह्मविद्या ( उत्पत्तिमुला प्रोङ्कारविद्या) २-सूर्यग्लासृष्टि:- :-----हृदयमूला-----स्थितिक्रमप्रधाना विष्णुविद्या( स्थितिमूला-उद्गीथविद्या) ३-पृमित्रोमूलासृष्टि:-पादमूला--दृष्टिक्रमप्रधाना महेशविद्या ( नाशमुला--प्रणवरिया क्रम ) विज्ञानकाण्ड पुराणकाण्ड उपनिषत्काण्ड संहिताकाण्ड चिकित्साकाण्ड प्राकृतात्मा <॥ ईशापनिषत 118 विश्वकेन्द्र से । प्रकृत प्रकरण उक्त तीनों सृष्टिधाराओं में से हिरण्यगर्भ विद्या नाम से व्यवहृत किए जाने योग्य सूर्यविद्या का ही निरूपण करता है । उसी का उपगृहण करना प्रकृत प्रकरणार्थ है । विद्यारममय अव्यय पुरुप विश्व के पाचों पों में व्याप्त है । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि विश्व के सभी पदार्थों में ज्ञान एव बिया (कम) की उपलब्धि होती है, जैसा कि पूर्व के प्रकरणों में विस्तार से वतनाया जाचुका है | अव्यय का विद्याभाग पदायों में ज्ञानरूप प्रतिष्ठित है, कर्मभाग किंयारूप से प्रतिष्ठित है । विश्वोपहित विद्या-कर्ममाग को 'ब्रह्म' 'कर्म' शब्दों से व्याहत किया जाता है, यही इसके दिव्यरूप है-'ब्रह्म कर्म च मे दिव्यम् । सोपाधिक वही ब्रह्म-कर्म ज्ञान-क्रिया नाम से प्रसिद्ध हैं । इस प्रकार यद्यपि स्वयम्भू-पर मेष्ठी-सूर्य-चन्द्रमा पृथिवी विश्व के इन पाचों पों में (प्रत्येक में) ज्ञान-क्रियारूप से अव्यय के विद्या-कर्म-दोनों भाग प्रतिष्ठित हैं, तथापि इन दोनों की पूर्ण विकासभूमि म यस्य सूर्य ही माना जाता है । सूर्य विश्व का कन्द्र है , इतर पर्व परिधिस्थानीय हैं । केद्र में सब शक्तियों वा पूर्ण विकास रहता है । सुतरा के द्रस्थानीय सूर्य में प्रव्यय के ज्ञानरूप विद्याभाग का, एव वर्मरूप अविद्याभाग का पूर्ण विकास सिद्ध होजाता है। यही कारण है कि विश्व के और किसी प के लिए 'विया चाविधा च यस्ते दोभय सह' यह न कह कर केवल सूर्य को ही विधा-भविद्यामक गाना गया है। अपि च 'सहयज्ञा प्रनाराष्ट्वा पुरोगाच मजापति' (गीता ३।१०) इस सिद्धान्त के अनुसार यज्ञ से ही विश्वाना का निर्माण होता है । यह यज्ञ 'सुखा' 'चिया' भेद से दो भागों में निभाता है । यही दोनों यज्ञ सपन-चयन नामों से प्रसिद्ध है । सुत्सायज्ञ सोमप्रधान है, सोम था ही सवन होता है । चिसायज्ञ अनिभधान है, अग्नि का ही चपन होता है। अग्नि में सोम की आहुति होने से अहोरात्ररूप अग्निहोत्र, कृपा-शुग्नपक्षरूप स, ग्रोग्य-पां-शीत रप चातुमास्य, उत्तरायण-दक्षिणायनरूप पशुपन्य, संवत्सर प ज्योनिष्टोम (सोमयाग-किंगाग्रहयाग) इस प्रम से सोमय पांचभागों में विभक्त होजाता दीर्ण- २२४ प्राकृतारमा सुत्या चित्या । ईशोपनिषत् - है । इन पाँच अवयवों के कारण ही सुलायन को 'पाको वै यज्ञः' (शत. १।१।३३६) के अनु- सार पाङ्क (पञ्चावयत्र) कहा जाता है। अमि में सोस की आहुति होने से प्राप्तन वृद्धि नहीं होती, अपि तु स्थिति की रक्षामात्र होती है । इस प्रकार अग्नि में सोम की आहुति होने से पाङ्ग सुल्यायज्ञ संपन्न होता है | निगरण किंवा विलयन इस सोमाहुतिरूप सुत्यायज्ञ किंश सवन- यज्ञ का खाभाविक धर्म है । अग्नि में सोम डाल दीजिए, अग्नि उसे 'निगल लायपापी जा- यगा, हुत सोम का अग्नि में विलयन होजायगा, अब सोम कहीं टुंदे से भी नहीं मिलेगा। दूसरा है चिसायक्ष । अग्नि में अग्नि की आहुति होने से इस अग्नियज्ञ का खरूप निष्पन्न होता है । श्रग्नि अग्नि का निगरण (हजम) नहीं कर सकता। अतएव इस यज्ञ में भायतन की वृद्धि होती है । यह अग्गियज्ञ भी अग्नि-वायु-प्रादिय-दो साध्य माणाग्नि के भेद से पांच ही भागों में विभक्त है । अग्निविति से पृथिवी का, वायुचिति से अन्तरिक्ष. का, आदिसचिनि से युलोक का स्वरूप निप्पन्न होता है । पृथिवी-अन्तरिक्ष की सन्धि में, अन्तरिक्ष एवं दुलोक की सन्धि में दो अग्नि और चित रहते हैं । इस प्रकार एक ही अग्नि अवस्था भेद से पञ्चचिः तिक बन जाता है । इस चितियज्ञ से तो वस्तु का स्वरूप निर्माण होता है, एवं उत्पन्न वस्तु की स्वरूप सचा मुखायज्ञ से होती है। प्रकारान्तर से यो समझिए कि उत्पत्ति सोपयज्ञ से होती है, पुष्टि अग्नियज्ञ से होती है, स्थिति सोमय्क्ष से होती है ।याद्यन्त में सोम है, मध्य में प्रापि है । सूर्य अग्निमय है, इसके उस भोर परमेष्ट्य सोम है, इस भोर चान्द्र सोम है। अध्यात्मसंस्था में इस स्पिति का प्रत्यक्ष कीजिए । शुक्र (रेत) सोम है, शोणित (योनिरूप-आय-रज) प्राप्ति है। इस रजरूप योनि में घीर्यरूप सोम की आहुति होने से गर्भ का उदय होता है । इसप्रकार उत्पत्तिकाल में सोमयज्ञ की प्रधानता है । आगे जाकर क्रमशः गर्भावषय वदने लगते हैं, यही अग्निविति है । अस्पि-मांसादि की . चिति ही अग्निचिति है, यही वृद्धि का कारण अन्नरूप-सोमाइति से इस चित्याग्निमय शरीपिण्ड की स्थिति रहती है । प्रातः-सायं होने वाले अन्नाहुतिरूप इसी दैनिक सोमयज्ञ से . शरीर स्वखरूप में प्रतिष्ठित रहता है । इसी चयन- रहस्य को लक्ष्य में रख कर वाजिश्रुतिःकहती है- . है .

प्राकृतात्मा या ईशोपनिषत् II 'पञ्चाचिति "तयत् पञ्च चितीश्चिनोति, एताभिरेवैनं तत्तनूभिश्चिनोति, पचिनोति- । तस्माञ्चितयः" (शत ६।१।२।१७)। "पञ्चतन्यो व्यत्रमन्त- लोम, स्वर, मांस, मस्थि, मज्जा । ता एवैता पञ्च चितयः" ( शत०- ६।१।२।१७) 1 "पश्च होते अग्नयो यदेताश्चितय" (शत० ६. २।१।१६।। उक्त दोनों यज्ञों में सुत्या, किंवा सोमयज्ञ का अधिष्ठाता आपोमय परमेष्ठी है, एवं चित्या किंगा चयनयज्ञ का अधिष्ठाता वाङ्मय' सूर्य है । परमेष्ठी सोमनधान है, सूर्य अग्नि प्रधान है । मुत्या सोमप्रधान है, चिया अमिप्रधान है । उत्पत्ति का मूल आश्रप जहा परमेष्ठी. पक्ष ( सोमयज्ञ ) है, वहा विकास या मूलप्रवर्तक सूर्ययज्ञ ( अग्नियज्ञ ) है। जब तक उत्पन्न वस्तु चि यरूप में परिणत नहीं होनाली, तबतक उस की उत्पत्ति अनुपत्ति के समान है । पर. मेष्टी की उत्पादपशक्ति का विकासस्थान सूर्य है । महत्परमेष्ठ' ही गर्भधारण करने वाली योनि है, परतु इस गर्भ का प्रजननरूप से विकास सौरसस्था में ही हेता है । इस से यह मान लेना पड़ता है वि सूर्य से ऊपर उत्पादक योनिरूप महदब्रह्म के रहने पर भी चित्याग्मियज्ञ के प्रमात्र से प्रजनन धर्म का नितात श्रमान है । भौतिक मर्य प्रजा की उत्पत्ति का मूल उपक्रम सूर्प दी है। इसी रहस्य यो लक्ष्य में रखकर चपनश्रुति कहती है- "चौर्वात उत्तमाः स्वयमातृराणाः, मादित्य उत्तमा विश्वज्योतिः । प्राचीन नापविश्यादित्याच-ऋतून दधाति, तस्माहर्वाची पात मृत व-मयो पजननम् । एतदर्वाचीनं तावदिवश्वादित्याच प्रजनन दधाति, तस्मादाचीनमेशातः मनायते ।स्थित ( समा) वातः पराम प्रजननम् । यावन्नो र सनाने देवास्तान्तो देवा" (शत० प्रा० ८ या । ७ भ । १ प्रा. १ क.)।' प्रजाति की उपत्ति समय (मौसम) पर होता है । समय पा ही नाम ऋतु है । तरा हेतु पिरोपों में ही तनसिरोर पदार्य उपन्न होते हैं । समष्टि ही सान्सर है । विरार 5 प्रकृतारमा ईशोपनिषत् ॥ षोडशीहन्द्र की मुलंप्रतिष्ठी सूर्य है । सुतरां संवसरात्मक सूर्य से ही प्रजोत्पत्तिक्रम का प्रारम्भ सिद्ध होजाता है। चर्तुदशविध भूतसंग की प्रवृत्ति का प्रारम्भ स्थान सूर्य ही है, जैसा कि आगे जाकर स्पष्ट हो जायगा । सूर्य से ऊपर 'ऋतुओं का प्रभाव है, अतएव ऋतुमूलक प्रजनन कर्म का भी वहां अभाव है । जिसप्रकार सूर्य से नीचे नवीन नवीन पदार्य उत्पन्न होते रहते हैं, पुराने पदार्थ नष्ट होते रहते हैं, वैसे सूर्य से ऊपर यह जन्म-मरणचक्र नहीं है । यहां तो सृष्टि के प्रारम्भ में जिन मौलिक साध्य देवादि का विकास हुआपा, वही विकास माज तक उसी रूप से विद्यमान है। दूसरे शब्दों में वहां परिवर्चन का अभाव है, यही बतलाने के लिए श्रुतिने–'यावन्नो होव स- नाने देवास्तावन्तो देवाः (शत. ८५1१।९) यह कहा है। महब्रह्म जिस चिदात्मा (अव्यय) को अपनें गर्भ में धारण करता है, उस का पूर्ण वि- कास चितिधर्मा सूर्य में ही पाकर होता है। सूर्य से ऊपर परमेष्ठी में चिदात्मा याता है, परन्तु विलयनधर्मा सोमयज्ञ के प्रभाव से वह विलीन हो जाता है, वहां केवल गर्भसत्ता है । महब के गर्भ में रहने वाले उस पोडशीपुरुष का विकास तो सूर्य में ही होता है । चिदात्मा की गर्मभूमि महद्ब्रह्म ( परमेष्ठी ) है, प्रजननभुमि सूर्य है । यही कारण है कि ब्रह्मा प्रकृतिक स्वयम्भू, विष्णु प्रकृतिक परमेष्ठी, सोमप्रकृतिक चन्द्रमा, अग्नि प्रकृतिक भ, इन्द्र मंकृतिक सूर्य इन पांचों में से इन्द्रप्रकृतिक सूर्य को ही 'पोडग्गी' कहा जाता हैं। क्योंकि पोडशीपुरुष नाम से प्रसिद्ध चिदात्मा का पूर्ण विकास केवल इन्द्रामक सूर्य में ही होता है-"प्रसौ.वै पोडशी योऽसौ (सूर्यः) तपति" (को.आ.१७/१)। इसी चिदात्मा के सम्बन्ध से इन्द्रतत्व इतर प्रकृतियों की अपेक्षा पोडशी प्रजापति की उपेष्ठ एवं श्रेष्ठ सन्तान कहलाती है। पिता का वही पुत्र ज्येष्ठ-एवं श्रेष्ठ (सुप्त) कहलाता है, जो पिता के यश को द्विगुणित करता है। जिस पुत्र से पिता का यश संसार में फैलता है, वही पुत्र श्रेष्ठ माना जाता है । ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र-अग्नि-सोम मेद से पोडशी प्रजापति के पांच पुत्र है। इन पांचों में सर्वज्येष्ठ ब्रह्मा है, सर्वकनिष्ट सोम है , बिचला पुत्र इन्द्र (सूर्य) है, इसी पुत्रने चिदात्मारूप पिता का यश मयंत्रिलोकी में फैलाया है । सूर्य के द्वारा ही विश्व में यात्मज्योति का, प्रसार १२७ प्राकृतात्मा इन्द्रमहिमा का इशोपनिषत् । हुआ है- "सूर्य आत्मा जगतम्तम्थुपश्च । इसी सुपुती के कारण प्रजापति, विश्व के सबसे ऊंचे श्रासन पर (हृदय सबसे ऊर्च कहलाता है, एवं विश्व के हृदय में ही सूर्य प्रतिष्ठित है) प्रति- ठित किया है । यही इन्द्र पुत्र का सर्वज्येष्ठत्व, एवं सर्वश्रेष्ठत्व है, इसी अभिप्राय से महाब्राह्मण श्रुति कहती है- । "सः (पोडशीप्रजापतिश्चिदात्मा) Sकामयतेन्द्रो मे प्रजायां श्रेष्ठः स्यादिति । तामस्मै स्रज (विजयमानां) प्रसमुञ्चत् । ततो वा इन्द्राय मजाः श्रेष्ट्यायाति- पन्त-तच्छिल्पं पश्यन्तः" (ता० प्रा० १६:४३|| "इन्द्रो वै देवानामोजिष्ठो, वलिष्ठः, सहिष्ठः, सत्तमः, पारयिष्णुनमः (ऐ० प्रा० ७१६) । सवै वाs. उदमिन्द्राय तत्स्थानमास यदिदं किञ्च" (शत. [82118)। "हृदयमेवेन्द्र" (शत० १२११५)। त्रैलोक्य क्या है, किसी चतुर शिल्पी का सर्वोत्कृष्ट शिल्प ( कारीगरी ) है । वह शिल्पी वही इन्द्र है । अपने इन्द्रपुत्र के इस उत्कृष्ट शिल्प पर प्रसन्न होकर ही तो प्रजापति, इसके गले में विजयमाल टाली है। इसके इसी शिरूप से प्रभावित होकर (इसका लोहा मानते हुए) ही तो प्रजानें इसे श्रष्ठ माना है-'मनाः श्रेष्ठयायातिष्ठन्त तच्छिल्पं पश्यन्सः । (१६।४।३।। राचमुच इन्द्र ऐसी ही वस्तु है । सारा विश्व इन्द्र से पूर्ण है । त्रैलोक्य में ऐसा कोई स्थान नहीं, जहां 'शुन' नाम से प्रसिद्ध इन्द्र का साम्राज्य न हो । जिसने मध्यविन्दु को पहिचान लिया, उसने सब कुछ समझ लिया । इसी लिए काशिराजप्रतर्दन को इन्द्र के अभिमानी देवतानें कहा है-'एतदेवाहं मनुष्याय हिततम मन्ये यन्मां विजानीयात" (मैं मनुष्य के लिए यही परम हित समझता हूं जो कि वह मुझे (इन्द्र को समझ जाय) (को.उ.३।१)।इन्द्र की इसी सर्व- व्यापकता, एवं सर्वोत्कृष्टता का दिग्दर्शन कराती हुई मन्त्रश्रुति कहती है- -पद्याव इन्द्र गतं ते शतं भूमिरुन स्युः। न त्वा यबिन्सहसं सूर्या भनु न जातमष्ट रोदसी ।। (ऋ० ८७०५) । 1 मानामा त्रिमूर्तिसूर्य जा ईशोपनिषत् ॥ है 1 T २-सूर्यस्येव रश्मयो दावयित्नयो मत्सरासः प्रमुपः साफमीरते । गन्तुं तवं परिसर्गास आरावो नेन्द्राहते पवते धाम किश्चन ।। (. EICEIC) ३-इन्द्रो दिव इन्द्र ईशे पृथिव्या इन्द्रो अपामिन्द्र इत् पर्वतानाम् । इन्द्रो धामिन्द्र इन्मेधिराणामिन्द्रः तेमे योगे इन्य इन्द्रः ॥ (ऋ. (०८६१०) ४-नकिरिन्द्र तदुत्तरो न ज्यायां अस्ति त्रइन् । नकिरेव यश स्वम (ऋ० १३०५) । प्रकारान्तर से इन्द्र की श्रेष्ठता का विचार कीजिए । अव्यय-अतर-क्षर की समष्टि पोडशीपुरुष है। इनमें भव्यय ज्ञानप्रधान है, अक्षर क्रियाप्रधान है, क्षर अर्थप्रधान है । ज्ञान- प्रधान अव्यय, अर्थप्रधान र दोनों का मध्यपतित क्रियाप्रधान अक्षर के साथ समन्वय है । मत. अक्षर ज्ञान-क्रिया-अर्थ तीनों विभूतियों से युक्त होजाता है । पर नाम से प्रसिद्ध मव्यय केस ज्ञानप्रधान ही है, ब्रह्म नाम से प्रसिद्ध क्षर केवल अर्थप्रधान ही है. परन्तु मध्यस्थ अक्षर ज्ञान-अर्थ के संदश में पतित होता हुआ त्रिमूर्तिप्रधान है , जैसा कि कटथुति करती है- एतद्धधेवातरं ब्रह्म (क्षरः) एतद्धयेवानरं परम् (अव्ययः) । एतद्धयेवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ (कउ० १।२।१६)। खयाभू परमेष्ठी अव्ययप्रधान हैं, चन्द्रमा पृथिवी क्षरप्रधान है, किन्तु मध्यस्थ सूर्य अवरप्रधान बनता हुआ परमगाम में प्रतिष्ठित अव्यय, अधमधाम में प्रतिष्ठिन कर दोनों का सम्राहक बनता हुआ पोडशी बन रहा है । केवल भव्यय की दृष्टि से विचार कीजिए । अव्यय का विद्यामाग अमृत है, सूर्य के उपर इस की प्रधानता है । कर्मभाग गृत्यु है, सूर्य से नीचे इस की प्रधानता है । परन्तु मध्यस्य सूर्य में दोनों का समन्वय है । विद्या-अविया दोनों के यदि आपको एक साथ दर्शन करते है तो इसके लिए विज्ञानयन सूर्य की ही शरण में जाना पदेगा। सौर कर्मभाग ही आगे जाकर भावरणरूप में परिणत होता हुमा धाम- २२६ प्राकृवात्मा भजातो ह तदि सवत्सर आम । तदिद हिरएपयाण्डं यावत् सवत्सरस्य ॥ ईशोपनिषत् । सर्वाधार छद वनकर 'अर्थ' नाम से व्यवहत होने लगता है । इस प्रकार सूर्य में शान (विद्या), क्रिया (कर्म), अर्थ तीनों की सत्ता सिद्ध होजाती है । तीनों शक्तियों का सूर्य में पूर्ण विकास है । ज्ञानशक्तिमय होने से-'धियो यो नः प्रचोदयात्' (यजु. २२।६) यह कहा जाता है । क्रिया- शक्तिमय होने से-'प्राणः प्रजानामुदयसप सूर्यः (प्र. उ. श) यह कहा जाता है । एव अर्थशक्तिमय होने से इस के लिए-'नूनं जनाः सूर्येण प्रसूताः अयनर्थानि कणपनपासि' (ऋ ,७६३४) यह कहा जाता है । इन तीनों में अर्थ का कर्म में अतीव है, अत परमार्थ में ज्ञान-कर्म भेद से दो भाग ही रह जाते हैं । ससार के जितने भी कर्म हैं, सब सूर्य के कर्म भाग से सम्बन्ध रखते हैं । एस ससार में जितनी भी ज्ञानशक्तिए हैं, वे सब सौरहान के आ- श्रय से सञ्चालित हैं । इस प्रकार त्रैलेक्य विधाता, सहस्राशु, विद्या-श्यविधात्मक सूर्य भगवान् विश्व के मध्य में प्रतिष्टित होकर प्रजापति का यश पैला रहे हैं । जिस दिन इनका लय होजा- उस दिन सब कुछ अनुपारयतम के गर्भ में विलीन होजायगा । सूर्याभावकाल राव्या गम (प्रलयागम) है, सूर्यसत्ता प्रहरागम (स्थ्यागम) है । यही प्रजापति का पुण्याह है । सर्व- शास्ता सूर्य उत्पन्न कैसे हुया ! यह प्रश्न बच जाता है । इसके समाधान के लिए निम्न लिखित सवत्सरविद्या प्रकरण पर दृष्टि डालनी चाहिए। स्मरण कीजिए उस स्थिति का, जब कि न पृथिवी थी, न चन्द्रमा या, न सूर्य या । उस समय यदि पा तो क्या था । इस प्रश्न का समाधान करती हुई ब्राह्मणश्रुति कहती है- "भापो वा इदमग्रे सलिनमेवास । ता अकामयन्त-कर्य नु प्रजायेमहीति । ता मनाम्यस्तास्तपोऽतप्यन्त तामु तपस्वप्यमानामु हिरण्मयमाण्ड सम्बभूवा यगा, । -- वेला, तावत् पर्यप्लवत । ततः संवत्सरे, पुरुषः समभवत् ।+ + + १ स हद हिरणमपाण्ड व्यरुजन् । नाइ नहि काचन प्रतिष्ठा-आस । तद्वेनमिदमेव हिर रमपाण्डं यावत् सवत्सरस्य वेलासीत्तविभ्रत् पर्यप्लवत । तानि वा एतानि .

प्रकृतात्मा ईशोपनिषत् ॥ सलिलमार पञ्चाक्षराणि तान् पञ्च‘नकुरुत, तऽइम पश्चर्तवः । स एवमिमॉल्लोकान् जातान् संवत्सरे मजापतिरभ्युदतिष्ठत् । स सहसायुजे। +++ । स आत्मन्येव प्रजा- तिमपत्त ।'+++। स ऐक्षत प्रजापतिः-सच वाऽअत्सारिप-य इमा देवता असक्षीति-स सर्वत्सरोऽभवत् । सर्वत्सरो ह वै नामैतत्-यव संवत्सर इति" (शत० ११ को० १६)। . . "पृथिवी-चन्द्रमा सूर्यादि की उत्पत्ति से पहिले सलिल (नाम से मसिद्ध) पानी ही था । पानियों ने इच्छा की कि अपन कैसे उत्पन्न होवें । इच्छानुसार उन पानियों ने तप किया, श्रम किया । इस तप-अम से तप्यमान पानियों में मुनहरी अण्डा उत्पन्न हुआ। उस समय तक सत्सर उत्पन्न न हुआ था। उस समय वह हिरण्मयाण्ड वहां तक व्याप्त,जहां तक कि भाज संवत्सरचक्र की सीमा है । एक वर्ष में वह (पुरभार से युक्त होता हुआ), पुरुप बन गया। उस (प्रापोमय प्रजापति । न हिरण्मयाण्ड की मोर दृष्टि डाली। उस समय ( उस अण्ड में ) कोई प्रतिष्ठा न थी। केवल संवसर की सीमातक पजापति उस हिरण्मयाण्ड को लिए हुए फिरता रहा। आगे जाकर पांच अक्षरों से ऋतुएं उत्पन्न की। इन ऋतुओं के सहारे आपोमय प्रजापति एक वर्ष में उठ खड़ा हुआ। आगे जाकर उसने अपनी प्रायु के हजार वर्ष तक यज्ञ किया। (इस से मजा उत्पन्न हुई , मजाति नाम से प्रसिद्ध उस प्रजा को प्रजापति ने . अपने ही शरीर पर प्रतिष्ठित किया। आगे जाकर प्रजापति ने विचार किया कि मरे ! इस प्रजनन कर्म में ) मपन तो अपना सब कुछ खो बैठे ।" मजा- पति के इसी भावनमय मण्डल का नाम “सर्वत्सर" हुआ । यह सर्वत्सर ही भान " संवत्सर नाम से प्रसिद्ध है ! ::.::; सय आपोमय पानी का साम्राज्य है । रस को "इरा" कहा जाता है । यह इरा नाम का रस ही भमि सम्बन्ध से धन मन जाता है। अभी प्रतिष्टानि उत्पन्न नहीं हुभा है, केवले ३ प्राचारमा यस्याः " 1 मान दोकर संपरो भनिए से रियसित दुभा। सारे पामेष्य समुद्र में घग्नि परमाणुना ईशोपनिषत् | सहोजामि प्राणमूर्ति ब्रह्माग्नि का साम्राज्य है । उस समय पानी का रस भाग सर्वथा प्रवहणशील है, धनप्रतिष्ठा का अभाव है। अतएर " सरिभावमयी-(पत्रवणशीला) इरा -(रसमागः) इस निर्वचन से पानी की वह प्राथमिक अपस्या " सरिर" नाम से प्रसिद्ध थी। पानी उस समय “ सलिल" था, इसका तात्पर्य यही है कि उस समय पानी का रस भाग सरिर था ( सरिर ही सलिल का द्योतक है । इधर उधर वहते रहना, यह ऋततत्त का खाभा- निक धर्म है । श्रापोमय परमेष्टो खयं ऋतरूप है, अतः इसे न्यायतः सलिल ही माना जासकता है । अभी "वह आप सर्वथा ऋत है, सय (पिण्ड '-भाव का उदय अभी नहीं हुमा है" यही बतलाने के लिए- 'आपो वा इदमग्रे सलिलमेवास' यह कहा गया है । इत थापोमय महद्मा के गर्भ में मनप्राणवाङ्मय सृष्टिसाक्षी अव्यय गर्मी बन रहा रहा है । का- मना इस का नित्मधर्म है । इसी की कामना से मातरिश्मा की कृपा से यायुरूप पानी में संघर्ष होता है । यात यह है कि मृत परमेष्ठी का पानी वायुरूप है । यह चलवायु स्थिर मातरिश्चा- वायु से घिरा हुआ है । इस स्थिर वेष्टन के भीतर गतिधर्मी वायु अपना व्यापार करता रहता है । मातरिया की सीमा तक जाकर वह यापस लोटता है। यदि सीमा न होती तो वायु को इधर- उधर निकल जाने के लिए पर्याप्त धरातल मिल जाता। उस समय संघर्ष का अवसर न भाता ।। परन्तु पिण्डखम्पसमर्पक मातरिया के वेष्टन से वायु को निकलने का अवसर नहीं मिलता । दद अपनें गतिसमान से परस्पर में टकरा जाता है । वायु के इसी संघर्ष से आग्नेय परमाणु उत्पन्न होजाते हैं । वायु का रापर्परूप बलप्रयोग ही-सहोचल' नाम से प्रसिद्ध है । यह अप्ति इसी यज से उत्पन्न हुधा है, अतएव इसे 'सहोना' कहा जाता है। इसी सहोजा अग्नि की बीजा- भाषा 'या' नाम की तीसरी प्रकृते है। यह याक्तच यही श्रापका सुपरिचित, पर्यखरूप समर्पक गायत्रीमारिकवेद है । इसी वायूरत की उस श्रापोयोनि में प्राहृति होने से उस सहोना भग्नि उपन्न दुपा है । 'भप एर ससांदी तास वीजमवायजद' इत्यादिरूप से गनुनें जिस चीन का उन्ठेरा निपा है, यह यही वापरब्रह्म है । बीजापस्थापन्न वागेत भाप में प्रारंवारमा नाईशोपनिषत् । धूमकेतू से व्याप्त होगया । मातरिश्चा द्वारा अण्ड का स्वरूप बन चुका था ।इस पापोमय अण्ड में चारों भोर अग्नि ऋतरूप से भरगया । अभी पिगड नहीं दना, वेल अग्निपरमाणुओं का उदय हुश्रा, यही हिरण्मयाण्ड कहलाय । यही अग्निपुञ्ज 'धूमकेतु' नाम से प्रसिद्ध हैं। यही धूमकेतु सूर्यपिण्ड के जनक है । इसी धूमकेतु का निरूपण करती हुई मन्त्रश्रुति कहती है- * . (1)-हरयो धूमकेतवो वातजूता उप छवि । यतन्ते धगग्नयः ।। (ऋक् सं. ८४३॥ ४)। (२)- एतेत्ये स्थगनय इद्धासः सहक्षत । उपसामिव केतवः ॥ (ऋक्सं ८४३५)। (३) अपचने साधिष्टव सौपधीरनुरुध्यसे । गर्भ समापसे पुनः ।। (ऋक्सं० ८४३६)। (४)-यदग्ने दिविजा मसि, अप्सुजा सहस्कृत । तंला गोभिवापहे ॥ ( क सं० ८।४।२८)। (५)स नो महाँ अनिमानो घूमकेतुः पुरुचन्द्रः । धिये वाजाय हिन्वतु ॥ (ऋक् सं० १११११) । (६)-यदयुक्था अरुपा रोहिता रथे वातजूता कृपभस्येव ते खः । आदिवसि वनिनो घूमकेतुनाग्ने सख्ये पारिरपामा वयं तव ।। (ऋ. ११६४/११)। (२)-वायु से प्रेरित भूमकेतुरूप अनि अन्तरिक्ष में पृथक् पृथर मार्ग से जा रहे है। (२)-पृथक् पृथक् विचरण करने वाले यह (भूमकेतुरूप) अग्निपं होताओं द्वारा समिद्ध, भनकर (यज्ञ में प्रकट होरहे हैं। (३)- अग्ने ! श्राप का निवासस्थान पानी में है ! पैसे श्राप ओषधियों पर अनुग्रह पर उनकै गर्म में प्ररिट होकर (ोषधिरूप से) उत्पन होते हैं। (४)-हे अग्ने ! श्राप चुलोक में, पर्व पानियों में रसन्न होने वाले हैं । राहोपल से श्राप (नित्य ) युक्त हैं । ऐसे आप को हम वाणी से स्तुति कर रहे हैं। (५.--(पिण्डात्मक न होने से अनिमान-परिवेदराहेत-ऋतरूप- इतस्तत. व्याट), चन्द्रकान्त के समान प्रकाशित वह धूमकेतु नाम का अनि हमारी बुद्धि एवं कर्म (सन-कर्म के लिए प्रसन्न पर्ने । - - गनुरोसरमाला में पुपाल राग) तनमा हेमी ऊपशिखा. माफमात्मा धूमकेव ला ईशोपनिषत् | वैदिक वैज्ञानिक तत्वों का बड़ी ही प्रसाद भाषा में स्पष्टीकरण करने वाले, अपान्तरतमा महर्षि के अवतार भगवान् कृष्णद्वैपायन (वेदव्यास) ने अपने सुप्रसिद्ध महाभारत ग्रन्थ में उक्त धूमकेतुनों की उत्पत्ति का बड़ा स्पष्ट प्रतिपादन किया है, जैसा कि निम्न लिखित वचनों से यष्ट है- पुरास्ति मितमाकाशमनंतमचलोपमम् ॥ भष्टचन्द्रार्कपवनं प्रमुप्तमिव संबभौ ॥१॥ ततः सलिलमुत्पन्नं तमसीवापरं तमः ।। तस्माच सतिलोत्पीडादुदतिष्टठ मारुतः ॥२॥ पया माननमन्दैि निःशब्दमित्र लक्ष्यते ॥ तमाम्भसार्यमाणं सशब्दं कुस्तेऽगिलः ॥शा तथा सलिससंरुद्ध नमसोऽन्ते निरन्तरे ।। मित्रायतलं वायुः समुपतति घोषवान् ||४|| स एप चरते वायुरर्णवोपीडसम्भवः ।। आकाशस्थानमासाच प्रशान्ति नाधिगच्छति ॥५॥ तस्मिन् वारवम्बुसंघर्षे दीसतेजा महायसः ।। प्रादुरभुगिखः कृत्वा निस्तिनिरं नमः ॥६॥ (६) अप्रै ! जिस समय काप वायुकग सम (बापुस्प हो) पोड़ों से युक्त रथ पर रम्पार होकर यो को जलो हुए निम्तने हैं, उस समय पाप का शब्द एक महा यनिष्ठ वृषभ गान जरा अनन्तर पार नलगने सारे पदार्थों में (दृदा में) अपने गमोतु माग जो रे । अग्ने ! कार के साथ मिला होजाने पर हम सभी दुसन परे । 'दम मदा भाप रियरमा माग रहा पानी पर)। - पुर का सोना हुआ मापन पत्रमा । मी मित्राय में "या नर सि' मर."

प्राकृतात्मा उपमा । ईशोपनिषत् ॥ . अग्निः पवनसंयुक्तः वं समाधिपते जलम् ॥ सोऽग्निर्माहतसंयोगाद् घनत्वमुपपद्यते ||७|| तस्याकाश निपतिनः स्नेहस्तिष्टति यो परः ॥ स संघातत्यमापन्नो भूमित्वमनुगच्छति ॥८॥ सानां सर्वगन्धानां स्नेहानां प्राणिनां तथा ॥ भूमियोंनिरिह झेया यस्यां सर्व प्रसूयते ॥२॥ (महा० शान्तिप० मोक्षध० १८३ भाररलो -१७रलो.पर्यन्त) उक्त मन्त्रवर्णन एवं व्यासवचन से पाठकों को विदित होगा कि आपोगय (वायुमय) महास- मुद्र में इतस्ततः दोलायमान प्रदीत, सौरप्रकाशयत् प्रकाशमान ऋताग्निपुञ्ज ही धूमकेतु है । 'धूमकेतूनामेकसहस्रसंस्येति-शशिवद्भासमानास्तीबा के अनुसार धूमकेतु संख्या में एक- सहस्र माने जाते हैं । यही सहन धूमकेतु पूर्वश्रुत्युक्त-'स सहस्रायुर्जज्ञे' प्रजापति की प्राथु के सहस्र विभाग है। पही अग्निपुञ्ज सूर्यपिण्ड के उत्पादक हैं । पोई एक सा धुमरेतु ( राशिमूत अग्नि ) शमशः केन्द्र में संघातभाय को प्राप्त होता हुआ सूर्यपिण्डरूप में परिणत होगया है। यह अग्निपुञ्ज परिभ्रमणशील था, अतएव तदुत्पन सूर्य भी स्वस्थान पर घूमता हुआ थपर्ने प्रभव परमेष्टी के चारों घोर परिक्रमा लगा रहा है, एवं इतर धूमकेतु सूर्य के चारों थोर परिक्रमा लगा रहे हैं । उच्चावच स्थान मैद से इन पी परिक्रमा का कात अनन्तवर्षों में विभक्त है । घूमते घूमते घूमकेतु जब सूर्य के समीप जाता है, तभी वह हमारे दृष्टिपथ में आता है । यही इस का उदय काल माना जाता है । परिभ्रमणशील धूमकेतु से उत्पन्न सूर्य के परि- भ्रमण से ही प्रचण्यांशों से आगे जाकर शनि-मंगल-बृहस्पति-देवसेना-पृथिवी-बुध-मा- उर-कपिल-दण्ड--आदि पृषक् पृथक् भनेक अग्निगोल उत्पन्न हुए हैं। यह सत्र सूर्य के है । सूय पानी के गर्भ में उत्पन्न हुया है, अतएव इन गोलों में केन्द्र में अमि है, बाहर ।

प्रायवरमा तेजोमेपविचार - ईशापनिषत् ।। । पानी है । पेन्द्रस यग्नि प्रजापति है । यह घरमदादि प्रजानिर्माण में क्रमशः सिस्त (खर्च) होता हुना कम होरहा है । जिस दिन अग्नि नि शेप होजाएगा, इन गोलों का श्रायु समाप्त होजाया । इसी कम से एक दिन सूर्य भी नष्ट होजायगा, रह जायगा यही सलिलारस्थापन केवल भापमय समुद्र । धूमकेतु उत्पन्न होगा, फिर नया सूर्य, नया विश्व वनेगा । विश्वेश्वर के इस विश्वचक्र के मनायन त प्रवाह को कौन जानसरता है । सटि की उपत्ति के सम्बन्ध में पाश्चात्त्य जगतने "तेजोमेघपिगर " ( Nebular. Iprotueev ) को प्रधानता दी है। इस सिद्धान्त के पारिष्कता केन्ट और लालाप्म पा कहना है कि "किमी समय साग विथ उष्ण वायुमय । उस समय वायुः मप विश्व चा की तरह चारों ओर घूम रहा था । आगे जाकर ममग- मय- भाग में घनमार का उदय होने लगा। बाहर के भाग के सम्बन्ध विच्छेद होजाने के पारा ज्योतिर्गोन दृट दृट र पृथक पृथक होगए । ये तप्त गोले जैसे जैसे उड़े होने गण, मे पैसे पिपलते गए, मागे जारर यह घन घनगए। इनका वाद्यभाग तो कदिन होगया, पर भीतर का भाग उष्णास्था में रहा । इस प्रकार अन्तरिक्ष में भूगोलों की टपनि हुई"। नुनमा मारिए पूर्व-पश्रिम विज्ञान की । दोनों में से कौन यथार्य में प्रपमा । “पहिले वायु था, यह दियट यना, पिएर पियन गया, फिर पटिन होगया" इस रहस्य या प्रमिक विश्लेप रिमने सब से पहिले ससार के सामने रस्सा ! उही येद- मटायान । पायाश से यायु, वायु से घन मग्नि, पन अग्नि से तरल पानी, सरस पानी से पुनः पन (प्रथिरी ) मार-इम प्रम के ( सम्माया एतस्मादामन भामाशः सम्भृतः, भा. पावादापुः, पायोगनिः, अरपः, अभ्यः पृथिवी, पृयिया भोपया, भोपपियोs: प, मन्नार पुरप:) प्रान पापियन है, हम परतों के पिता पितामा | लिन पी fr राग येद पार पर मान के निशान युग में उन मिशनाभिमानियों से पर. दलिदो यार-पाप-पार पा उद्धार नहीं कर सको, उद्धारप पर पेट गदिश विधान !! "वेद पर हिनावीनी निश्रेपमा पा:" ।

प्रातात्मा नाशापानपत। सत्यना MON प्रकृत का अनुमरण कीजिर । आपोस्य (वायुमय) प्रन,पति के गर्भ में धूमकेतुम् हिर- भयाण्ड से भागे जाकर पिण्डात्ममा सूर्य का जन्म हुआ, ऋतुओं का विकास हुँा, प्रजापति । प्रजानिर्माण में युक्त होकर ससिर' रूप समन्सररूप में परिणत होगर। गायत्री मात्रिक- वेदधन, प्रकृतिवाङ्मय, इन्द्रादरमय संतसराधिष्ठाता यही सूर्य सस्य का ममतार है । पिण्डासिर मय होने से ही यह सत्य है । आपोनय परमेठी सर्वप्रथम इसी सत्य को याने गर्भ में धारण करता है । सूर्य पानी की गहराई में प्रतिष्ठित है.--"अपां गमन्त्सी" ( शत०७।५।१।८ )।, इसी सत्य सूर्य का निरूपण करते हुए निम्न लिखित श्रौतवचन हमारे सामने आते है- । १ --"तयत् तत् ससं त्रयी सा विद्या" (शत २०५।११०)। २-"तस्यै वा ससमेव ब्रह्म" (शत २।१।४।१०) । ३--"सस मेप य एष तपति" ( शत० १४।१।२ ।। -"पापो (सौर)-देवाना प्रियं धाम" (ले० प्रा० ३।२।४।२) । उन्न होकर यह हिरएमयाण्ड चारों ओर समुद्र में घूमने लगा । आगे क्या हु मा ! सुनिए । श्राजदिन 'संवत्सर' शब्द को कालवाचक समझा जा रहा है। यदि किसी. विद्वान् से. 'सवत्सर' शब्द अर्थ पूछा जाता है तो वह उत्तर में ३६० दिन के वाचक वर्म' शब्द को प्रश्नकत्ता के सामने रख देता है । वस्तुतः संरसर शब्द काल स वाचक नहीं है, अपि तक अग्नि का वाचक है । इस संवत्सराग्नि के ही पञ्चत्तरूप पाच विवर्त हैं । जिस मार्ग पर पृथिवी. सूर्य के चारों ओर परिक्रमा लगाती है, यह मार्ग क्रान्तियत्त नाम से प्रसिद्ध है । इस क्रान्ति- गएईल में व्याप्त जो सौर अग्नि है, उसी का नाम संव सर है । यह क्रान्तिवृत्त ही सैकसर की वेना (परिधि-तट-अन्तिम सीमा) है। सूर्य से पृथिवी उत्पन्न होती है । उत्पन्न होकर सूर्य के चारों ओर घूमने लगती है । ऐसी परिस्थिति में अग्नि उत्पन्न हो तब तो सूर्य का खता सम्पन्न हो, सूर्य हो तब पृथिवी बनें, पृथिवी हो तब संव सराग्नि की सीमा हो । इसी अभिगाय से सूर्योत्पत्तिकाल की स्थिति को तदप में रखकर पूर्वश्रुते ने "उस समय संवत्सर न था, प्राकृवात्मा 'भूतडेप से मसा है, यही चराग्य है । सत्र मानिरूप से विकसित रहने वाली नाम-रूर हा ईशापनिषत् ॥ अष्टोबुद्धयः आज जो तुम संवत्सर की वेली देख रहे हो, वहां तक केवल अग्नि भरा हुआ था, एवं वह बड़े वेग से घूम रहा था" यह कहा है । पृथिवी एक वर्ष में इस अान्यात्मक संवसर के चारों ओर घूम थाती है, इसलिए संवसर शन्द वर्ष का वाचक वनता हुथा काल का वाचक बन गया है । वस्तुतः संवत्सर अग्नि का ही वाचक है। सूर्य का जन्म हुया, विद्या-कर्ममय चिदात्मा का विकास हुआ । सारा विश्च पालोरेत एवं पुलकित होगया । सूर्य में जो इन्द्रभाग है यह तो कर्म है, एवं चेतना भाग विद्या है । सौर इन्द्र रूपज्योति का (प्रकाश का) थधिष्टाता है। इसी ज्योति को भूतज्योति कहते हैं । विद्याभाग ज्ञानज्योति है । दोनों में अनुग्राह्य-अनुग्राहक सम्बन्ध है । भूतज्योति ज्ञानज्योति पर प्रतिष्ठित है, ज्ञानयोति भूतज्योति के आधार पर विकसित है । हमारी बुद्धि जैसे अध्यात्पसंस्था को प्रकाशित करने वाला मूर्य है, एवमेव वह सूर्य प्राधिदैविकसंस्था को प्रकाशित करने वाली (ईश्वर की) बुद्धि है। इसमें अविद्या-विद्या दोनों भावों का साम्राज्य है, अत एस इस में ज्योति और तम का उदय होजाता है । दोनों भाव (प्रत्येक) चार चार भागों में विभक्त हैं । ज्योतिर्लक्षण मिया भाग धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, इन चार भागों में विभक्त है, एवं तमोलक्षण अभियामाग प्रम-मज्ञान-प्रासक्ति-प्रतवर्ष इन चार भागों में विभक्त है । यी सांख्यामिमत 'मष्टौ बुद्धयः' है । विद्या का चतुदी विभक्ती योतिर्भाग अव्यय के विद्याभाग का, एवं अविया का चतुदी विभक्त तमोमाग अध्यय पामाग का अनुमाइक है। प्रानिक नित्य नियमसंघ का ही नाम धर्म है, जैसा कि पुरुषात्माधिकरण में विस्तार से पंतसापा नाचुका है-(देखिए ई. पि. मा. पृ० ....... रखने वाली चेतना ज्ञान है । उस चिगयोते का सारे भूतों के गर्भ में प्रविष्ट रहते हुए भी - घर- "") प्राकृतिक विन को प्रकाशित •समिचिन 'गीताविधानमाप्य में देखना चाहिए।

प्राकृतात्मा सर्वविजयीहन्द्र ईशोपनिषत् ॥ की समष्टि 'ऐधर्य है। नियतधर्म को श्रावृत करने वाला पाप्मा 'अर्म है । ज्ञानज्योति को श्रावृत करने वाला पामा अज्ञान है । पदार्थों में प्रन्थिबन्धन डालने वाला, रागद्वेप उत्पन्न करने वाला पामा मासक्ति है। आत्मज्योति को प्रावृत कर उसे जरूप में परिणत करदेने वाला पाप्मा 'अनैश्वर्य' है । ईश्वर के शरीर में ( सूर्य के सम्बन्ध से) दोनों का सम्बन्ध है। सूर्य अपने प्रामाण से विषाचतुष्टयीरूप देवीसम्पत् का प्रवर्तक बनता है, एवं अपाङ्माण से भविद्याचतुष्टयोरूप प्रामुरीसपत् का जनक बनता है, जैसा कि वाजसनेय श्रुति कहती है- "स पास्येनैव (मुख्यपाणात्मकमाङ्गाणेनेव) देवानमनत । ते देवा दिवमभि- पथ-प्रयज्यन्त, तद्देशानां देवत्वं-पद्दिवमभिपयाराज्यन । तस्मै मृजमानाय दिवेवास + + + + 1 अथ योऽयमवाङ्माण:-तेनासुरानगृज्यत । त इमा मेव पृथिवीमभिपद्याराज्यन्त । तस्मै सृजमानाय तम इवा स"I+ + + +1 वस्मादेतद् ऋपिणाऽभ्यनुक्तं- 'न त्वं युयुत्से कतमञ्चनाहनतेऽमित्रो मवान कश्च नास्ति । मायेत् साते यानि युद्धान्याहु द्य शत्रु न नु पुरा युयुत्से ॥" (शत० ११ कां । १४६७-८)। उक्त श्रुति इन्द्रामक सूर्य प्रजापति से ही देव-अमर सृष्टि की प्रवृत्ति बतला रही है । "देवता थोर असुर दोनों सूर्य (इन्द्र) की सन्तान हैं । ऐसी श्रयस्था में जो इन्द्र का असुरों के साथ युद्ध बतलाया जाता है, वह असंगत है" उक्त मन्त्र श्रुतिने इसी अर्थ का स्पष्टीकरण किया है। पृथिवी के सम्बन्ध से सूय में अहोरात्रभाव का उदय होता है । यह.काल में सौरमाण नामक प्राण की प्रधानता रहती है, रात्रि में पार्थिव अपानमाण की प्रधानता रहती है, इसी को मवाङ्माण कहा जाता है । पृथिवी सूर्य का ही उपग्रह है, अतः पार्थिव श्रवाहमाण को १-इस विषय का विशद विवेचन शतपथविधानमाप्य के अष्टविधदेवता निरूपण प्रकरण के सी. रदेवताप्रकरण में देखना चाहिए।

प्राकृतामा • ईशापनिषत् ॥ মুরিদান । सूर्य का ही अयाट्माण मान लिया जाता है । पृथिवी में अविद्यारूप क्षरमाग की प्रधानता है, यह पार्थिवभाग क्षरप्रधान बनता हुया भूतप्रधान है । सूर्य में विद्यारूप अक्षरमाग वी प्रधानता है। यह सौरभाग अक्षरप्रधान बनता हुआ प्राणमधान है। भूतमयी पृथिवी की परिक्रमा से आणप्रधान सूर्य तमोमय बासरीविभूति का प्रारम्भक बनता है । संवत्सरात्मक ज्योतिर्मय प्राट्- ग्राण से वहीं सूर्य देवीविभूति का स्वरूप समर्पक बनता है। दिन में सूर्य की देवी विभूति कां, एवं रात्रि में श्रासुरीविभूति या साम्राज्य है, जैसा कि श्रुति- "स यदर देवान् सरना- नाय दिवेवास, तदहरकुरुन । अथ यदस्मा असुगन् सरजानाय तम इवास, तो रात्रिमकुरुत । तेऽअहोग" इत्यादि रूप से आगे जाकर सप्ट कर दिया है । सम्पत्परिलेख । -- १-अक्षर:- क्षरः अविचा २-विद्या 1-ज्योतिः तमः ४-यह रामिः ५-भाह्माण ६- देवाः. देवतानि--- प्रयाङ्माणः सामुगः . . च भृतानि देवीसम्पत् विषाचतुष्टयी देवाश्च या अमराव उमपे प्राजापत्याः भामुरीसम्पद अविधायतुष्एपी पचक्लेश रकृतमा या ईशापनपत् ॥ । सर्यगत विद्या (ज्ञान)-भाग स्वखरूप से एकरूप ही है । केवल पार्थिवभूत के सम्बन्ध से ही इसके चार वियन होजाते हैं । पार्थिवभूत पाप्मारूप होने से विद्याप्रधान है । यह भूतभागही प्रात्मा को नियति से च्युत करता हुआ अधर्म का कारण बनता है। वहीं चिज्योति का धावरक बनता हुआ अज्ञान का. राग-द्वेश का मूल बनता हुमा पासक्ति का, एवं ग्रामविकास का प्रतिद्वन्द्वी होता था अनैश्चर्य का प्रवर्तक बनता है । संसार में जितने अधर्म होते हैं, जितना अज्ञान है, जितनी आसक्ति है, जितना विकासाभाव है, उन सब की जद सांसारिक अर्थसम्पत्ति ही है । इने चार उपाधियों के कारण स्वस्वरूप से सर्वथा निरुपाधिक वह विद्याभाग भी चार भागों में विभक्त होजाता है । इस प्रकार केवल भूत की कृपा से एक ही बुद्धि पाठ खरूप धारण कर लेती है। विद्याबुद्धयः अविद्याबुद्ध यः +---→१ अधर्म →-------+२ प्रज्ञान ३-वैराग्य -३ आसक्ति ४-ऐश्वर्य ..--→४ अनैश्वर्य चार अविद्या विपर्यपो के मूल पाच हैं । अभिनिवेश से धर्म का उदय होता है । जिसे हठ-दुराग्रह कहा जाता है, वही अभिनिवेश है । "गुरूपदेश-शास्त्र-लोकमर्यादा-मादि कुछ नहीं है । जो कुछ हम समझते है, वही ठीक है । हम भी मनुष्य हैं । हम अपना अच्छा बुरा खयं समझ सकते हैं" । इस प्रकार अपने भापको सर्वे सर्या समझ कर कल्पित सिद्धान्त बनाकर उत्पथ गमन काना अभिनिवेश है । संसार में और सब रोगों की निकित्सा समव है, परन्तु 'हम नहीं मानते' कहने वालों की चिकित्सा स्वयं ब्रह्मा भी नहीं कर सकते- 'न तु मतिनिविष्टमूर्खननचिचमाराधयेत्' । अर्द्धज्ञान ही अभिनिवेश का जनक है । २४१ * प्रास्तामा । ईशापनिषत् 18 सम्पाचपरन । । सूर्य या ही भगाट्माण मान लिया जाता है । पृथिवी में अविद्यारूप क्षाभाग की प्रधानता है, यह पार्थिवभाग क्षाप्रधान बनता दुथा भूतमधान है । सूर्य में विद्यारूप अक्षाभाग की प्रधानता है। यह सौरभाग थक्षरप्रधान बनता हुआ गणप्रधान है। भूतमयी पृथिवी की परिक्रमा से प्राणप्रधान सूर्य तमोय भामुराविभूति का प्रारम्भक बनता है । संवत्सरामा ज्योतिर्मय प्राङ्- प्राण से वही सूर्य देवीविभूति का स्वरूप समर्पक बनता है। दिन में सूर्य का देवीविभूतिका, एवं रात्रि में श्रासुरीविभूति का साम्राज्य है, जैसा कि श्रुतिनें-- "स यदस्मै देवान् ससना- नाय दिवेवास, तदहग्कुरुन । अथ यस्मा अनुगन् सरजानाय तम इवास, तां रात्रिपकुरुत । तेऽमहोग" इत्यादि रूप से भागे जाकर ससष्ट कर दिया है । सम्पत्परिलेखः-- १-भदर:- → अविद्या २- पिया -ज्योतिः तमः रातिः ७० भवादमाग . "मारमा ६- देवाः देवनानि नमुराः मृतानि 0 . देवीसम्पन चिचितुष्टमी देपाथ पा घमुराध उभषे प्रामारसा मापुरीसम्पन् अविधानतुपयी তুলনা पञ्चक्लेश का ईशाप नियत् ॥ सूर्यगत विद्या (ज्ञान)-भाग स्वखरूप से एकरूप ही है । केवल पार्थिवभूत के सम्बन्ध से ही इसके चार वियत्त होजाते हैं । पार्थिवभूत पाप्मारूप होने से प्रविद्याप्रधान है । यह भूतमाग ही यात्मा को नियति से व्युत करता हुभा अधर्म का कारण बनता है। वहीं विज्योति का पावरक बनता हुन्ना अज्ञान का. राग-देश का गूल बनता हुया आसक्ति का, एवं यात्मविकास का प्रतिद्वन्द्वी होता हुआ अनैश्चर्य का प्रवर्तक बनता है। संसार में जितने अधर्म होते हैं, जितना प्रज्ञान है, जितनी प्रासक्ति है, जितना विकासाभाव है, उन सब की जड़ सांसारिक अर्थसम्पत्ति ही है । इन चार उपाधियों के कारण खखरूप से सर्वथा निरुपाधिक वह विद्याभाग भी चार भागों में विभक्त होजाता है । इस प्रकार केवल भूत की कृपा से एक ही बुद्धि पाठ खरूप धारण कर लेती है। विद्याबुद्धयः अविद्यायुद्धयः १-धर्म ----१ अधर्म -ज्ञान -.--१२ अज्ञान ३-वैराग्य ४-ऐश्वर्य for--- ४ अनश्वर्य , ३ आसक्ति । चार अविद्या विपर्ययों के मूल पांच हैं । अभिनिवेश से अधर्म का उदय होता है । जिसे हठ-दुराग्रह कहा जाता है, यही अभिनिवेश | "गुरूपदेश-शास्त्र-लोकमर्यादा-आदि कुछ नहीं हैं । जो कुछ हम समझते हैं, वही ठीक है । हम भी मनुष्य हैं । हम अपना अच्छा बुरा स्वयं समझ सकते हैं । इस प्रकार अपने आपको सर्वे सर्वा समझ कर कल्पित सिद्धान्त बनाकर सपथ गमन काना अभिनिवेश है । संसार में और सब रोगों की चिकित्सा संभव है, परन्तु 'हम नहीं मानते' बहने वालों की चिकित्सा स्वयं ब्रह्मा भी नहीं कर सकते- 'न तु प्रतिनिधिष्टपूर्वजनचिचमाराधयेत्” । अर्द्धज्ञान ही अभिनिवेश का जनक है । २४१ प्राकृतारमा ईशोपनिषत् | पञ्चालेश माता । सबर्थी मूर्ख को समझाया जासकता है, विद्वान् सरलता से युक्तिसंगत बात को मान लेता है । परन्तु अर्द्धशिक्षितों का अनुरञ्जन असंभव है । ज्ञानलवदुर्विदग्य मचिकित्स्य हैं। श्राज भारतवर्ष में इसी अभिनिवेश का साम्राज्य है । सभी शिक्षित माने जाते हैं, परन्तु सभी पूर्ण अभिनिविष्ट है । शास्त्र की मर्यादा भी यही समझते हैं। शास्त्रों में क्या है ? इस के निर्णा- यका भी यही हैं, फिर चाहे संस्कृतवाड्मय शास्त्र में इनका चञ्चुप्रवेश भी न हो । युगधर्म के रहस्य वेत्ता भी यही हैं। तभी तो देश क्रमशः उन्नति करता जारहा है । कहना यह है कि अभिनिवेश अधर्मबुद्धि का जनक है, अधर्म नाश का कारण है । शिक्षा का अभाव धज्ञान का कारण है । विना शास्त्राप्यन के ज्ञान का आवरण नहीं हटता । रागद्वेष भासक्ति के जनक है, अस्मिता थनेश्वर्य । जो व्यक्ति निरन्तर 'हमारे पास कुछ नहीं है, कुछ नहीं है' करता रहता है, यह शीघ्र ही सारी विभूति खो बैठता है । विकास स्मित. (खिलना) भार है । श्रपर्ने श्रात्मा में सब कुछ विभूति समझना दिमतलक्षण ऐश्वर्य या वारण है। प्रत्येक दशा में अल्पता का अनुभव करना अस्मिता लक्षण अनैश्चर्य है । -अभिनिवेश से-अधर्म २- अविद्या से -मज्ञान -रागद्वेप से -आसक्ति 8-अस्मिता से -प्रनैश्चर्य पूर्व कथनानुसार ईश्वर के शरीर में पूर्वोक्त पाठ विवर्त हैं । उस में देवीसंपत भी है, मामुरीसंपर भी है । तप पि वह सखरूप से सदा विकसित रहता है । कारण इस का दही है कि यह समत्वयोग का थपिष्टाता बना हुआ है। उसमें अविषा है अवश्य, अन्यथा अपि मामूलक संसार कैसे किससे उत्पन्न होता । परन्तु समत्ययोग के प्रमाय से वह यर्ममय विश्न में सन्न होता हुआ भी अमित Malamang (मसंग) १. "लेगकर्मविपाकापरपरामष्टः पुरुषविशेष चरः" (पातञ्जल-योगदर्शन )। २४२ प्राकृतारमा उत्तमज्योति - इशोपनिषत - "सम वै देवस्खा के अनुसार देवस्वर्ग सात भागों में विभक्त हैं । इन सातों देवखगों की प्रतिष्ठा सूर्य ही है, अतएव सूर्य के लिए-"मध्ये ह संवत्सरस्य स्वर्गों लोकः" (शत.६/७४- ११ )"स्वों चै लोकः सूर्यो ज्योतिरुत्तमम् ( यजुःसं.२०।२१-शत.१रासर ) इत्यादि कहा जाता है इन सात देवखगों के अतिरिक्त तीन विष्पवर्ग और है । यह तीनों प्रमशः ब्रह्मनिष्टप, विष्णुविष्टप, इन्द्रविष्टप नामों से प्रसिद्ध हैं। तीनों की समष्टि 'निविष्टिपरवर्ग' है । पृथ्वी के '१७ ३ महर्गण से प्रारम्भ कर २५ वें अहण तक जो एक प्राकृतिक यज्ञ होरहा है, वही नवायज्ञ ( इन ग्रहणणों की समष्टिरूप) नाम से प्रसिद्ध है। इस नवाह यज्ञ के केन्द्र में ( २१ ३ महर्गण में) नवाहयज्ञाधिष्ठाता सूर्य प्रतिष्ठित है । पृथिवी के १३ अहर्गणों में से किस अहर्गण पर सूर्य प्रतिष्ठित है ! इस प्रश्न का समाधान करते हुए निम्नलिखित श्रीन वचन हमारे सामने पाते हैं- ! १-"एकविंशो वैसा लोक" (श 11४६)। -"एकविंशो वै इतः स्वर्गो लोकः" (ते. ब्रा० ३।१२।५।७) ३-"एप एवैकविंशो य एप (सूर्यः) तपति" (शत० ५/५ ३।४) । संवसरात्मक सूर्य की प्रतिष्ठा यही नयाहयज्ञ है । १७ तक पृथिवी का अपना प्राण है, १७ से २५ तक सौर संवत्सर का साम्राज्य है, इसी आधार पर-"नवाहो वै संवासरस्य मतिमा" (पड्विं. ना.३।१२। ) यह कहा जाता है । ४ प्रहरीण सूर्य से नीचे हैं, एवं महर्गण सूर्य से ऊपर है। इन दोनों चतुष्योमों की प्रतिष्ठा एकविंशस्सोमात्मक सूर्य ही "एकविंशो वै चतुष्टोमः स्तोमानां परमः" (को० मा० १११६) "मतिष्ठा वा एकविंशः स्तो- मानाम" ( ताक मा०:३।७.२ ) ! इन में १७ वा स्तोम ब्रह्मविष्टप यहलाता है। यहां तक पार्थिव अग्निप्रजापति की प्रधानता रहती है। यही ससदशस्तोमस्य अग्नि-'प्रजापतिः सप्तदशः, (ऐ० प्रा० +12) के अनुसार प्रजापति कहलाता है । यही अग्नि आहवनीय' नाम से प्र. सिद्ध है-( देखिए ऐ० प्रा० ५।२४-२६) । ससदशस्तोमस्य इस आइतनीय अग्नि में सोम । .

प्राकृतात्मा •ता ईशोपनिषत् | पिटरस w wwwwww - की आहुति होती है । इस पाहुति से यह अग्नि प्रज्वलित होकर २१ एव विश स्तोम तक व्याप्त होजाता है । इसी सोमाहुति के प्रभार से पार्थित यज्ञ की एकविंश तक व्याप्ति मानी जाती है । इस यज्ञामा विष्ण के-विकृत (६), पञ्चदश (२५), एकविंश (२२) यह तीन विक्रम हैं । वहीं तीनों विक्रमों से ( अगमणों से ) वामनविष्णु २-१५-२१ रूप पृथिवी-अन्तरिक्ष- यौ इन तीनो लोकों में व्याप्त हो जाते हैं । २१ पर विष्णु की न्याप्ति समान है । यही २१ वां स्थान 'विष्णुविष्टप' कहलाता है-"तान् विष्णुरेकविंशेन स्तोमेनाप्नोत्" ( तै० मा०. २६७।१४।२) । इसी विष्णुविष्टप यो ननस्यविष्टप् स्वाराज्ययन अ दि नामों से भी च्य हत दिया जाता है-( देखिए तै० प्रा० ३०१०१३) । यही स्वर्ग-नास्वर्ग नाम से मी प्रसिद्ध है । २१ से २५ तक इद्र विद्युत् का साम्राज्य है । इसी को सौम्यविद्युत् कहा जाता है । यही सौम्यविद्युत् उपनिषदों में-'अमानवपुरुष' नाम से प्रसिद्ध है । यही तीसरा इन्द्रविष्टप है । दूसरे शब्दों में यों सममिए कि २५ से २१ तक इद्र की प्रधानता है, २१ से १७ तक विष्णु की प्रधानता है, एव १७ से १ तक पार्थिव ब्रह्मा की प्रधानता है । पार्थिव ग्रहा मलनटिष्टा १७ वा स्तोम है, विष्णु की मूलप्रतिष्टा २१ वा स्तोम है, एव सौम्यविद्युतरूप द्र पी प्रतिभा पञ्चरिंशस्तोम है । इस प्रकार १७ से २५ तक के स्तोमों में से-१७-२१-२५ तीन तो विष्टपस्वर्गों में समाविष्ट हो जाते हैं । शेष रह जाते हैं यह ६ स्तोम । इन के साथ में २१ वें या समय माना जाता है । यह २१ या मिन है, विष्णुविष्टप् वाला २ या भिन्न है । इस मिन्नता का कारण अग्नि और विष्णु है। 1 से २४ तक ग्र्याग्नि नाम से प्रसिद्ध नाचिरेताग्नि या साम्रा य है । सुतरा मयपतित २, वें स्तोम में भी नाचिकेताग्नि की सत्ता सिद्ध दोजाती है । इस नाचिकेतामि के सम्बध से २१ या वर्गण देवखगोटि में प्रविष्ट है । उधर २१ पर विष्णु का मी प्रभुन है | विष्णु के सम्बध से वह २१ वा पिटप सर्गकोटि में मी प्रपिष्ट है । इस प्रकार २१ के दो वरूप हो जाते हैं । यही सात देवस्सों की ग्लप्रतिष्टा है । १८-१९-२० यह तीन देवस्वर्ग २१ से इधर है, २२-२३-२५ पह तीन देशमन २१ से उधर है, सय २१ या सात र देवसर्ग है । यही तीन तीन स्तोम सामनिया के २४४ प्रातात्मा स्वगंधाण का ईशोपनिषत् । । अनुसार 'स्वरसाम' नाम से प्रसिद्ध हैं । इन्हीं के कारण सूर्यग्रहण होता है, जैसा कि अन्य प्रथों में स्पष्ट है । यही सप्त स्वर्गसमष्टि 'त्रिणाचिकेतस्वर्ग' नाम से प्रसिद्ध है । यह सातों स्वर्ग क्रमशः अपोदफ, ऋतधामा, अपराजित, नाक, अधिद्यौ, प्रद्यौ, रोचन, इन नामों से प्रसिद्ध हैं । १८ से २४ तक व्याप्त रहने वाले एक ही अग्नि की सात भिन्न भिन्न अवस्थाएं हो जाती हैं । श्रीन की वे ही सातों श्रात्यारं क्रमश:-अग्नि, वायु, इन्द्र, श्रादित्य, वरुण, मृत्यु, ब्रह्मा, इन नामों से प्रसिद्ध है। इस प्रकार सप्तदेवस्वा-तीन विष्टप स्वर्ग-इन सब की समष्टिरूर नवाइयज्ञ की प्रतिमारूप सौरानिमय संक्सर अचलरूप से खड़ा हुआ है। इस संवत्सर में सभी स्त्रों का समावेश है । दूसरे शब्दों में यह स्वर्गों का टीला (पर्वत) है। अतएव इसे स्वर्गवरुण कहा जाता है । मिट्टी पापाण श्रादि का जो एक उन्नत राम्ह होता है, उसे प्रान्तीय भाषा में टीला कहा जाता है । इसी के लिए वेद भाषा में 'धरण' शब्द प्रयुक्त हुआ है । संवत्सर क्या है, वर्ग का घरुण है । प्रतिष्ठातत्व को ही धरुण कहा जाता है। सौर संवत्सर ही त्रैलोक्य की प्रतिष्ठा है । इस प्रतिष्ठा की भी गलप्रतिष्ठा एकत्रिंशस्थ श्रादित्य है, अतएव इसे भी धरुण' शब्द से व्यवहृत किया जाता है, जैसा कि वानिश्रुति कहती है-- 1 "असाववादियो धरुणा एकविंशः तयत्तमाह धरुणमिति, यदापो- ऽस्तमेति-अथेदं सर्व प्रियते" (शत० ८।४।१।१२) । "प्रतिष्ठा पै धरूणम्" ( शत०७४।५।। संवत्सर वर्गरूप धरुण (प्रतिष्ठा, है, इसलिए भी इसे स्वर्गधरुण कहा जासकता है । यही वर्गधरुण अथर्ववेद में 'स्कम्भ' (यम्या) नाम से व्यस्त हुमा है-"स्कम्भे सर्व पति- प्रित" (अधर्व सं० १०१।७३०)। यह प्रमिस्कम्भ (संवसर , अविचाली रूप से खड़ा है। यही याया-पृथिवी का पालम्बन है । इस स्कम्मरूप वर्गधरुण के ऊपर (केन्द्र में) पिररूप से सूर्य तप रहा है। संवत्सरचक्र भाग्नेय है । यही एकचत्रात्मक (एक पहिए माता) अग्निमय ४५ 3 प्राकृतात्मा का ईशोपनिषत् ।। अश्माभि मण्डल सूर्य का सुनहरी रय है । गायत्री-उष्णिक-अनुष्टुप्-वृहती-पङ्कि-त्रिष्टुप्-ज- गती नाम से प्रसिद्ध सात छन्द (सात पूर्वापरयुत्त, किंवा अहोरात्रवृत्त) रथ के सात घोडे हैं । इन घोडौं पर सूर्य सवार है । इस प्रकार नीचे वर्गवरुणरूप स्तम्भ, उस पर घोड़े, उस पर सूर्य प्रतिष्ठित है । इसी सूर्य को–'अश्मापृश्नि' कहा जाता है । अश्मा नाम के ध्रुव सोम की आहुति से ही सूर्य ज्योतिर्मय बन रहा है, जैसा कि मन्त्रश्रुति कहती है.-.. -- - महत्चत् सोमो महिपश्चकारापां यद्गर्भोऽवृणीत देवान् । भदयादिन्द्र पवमान ओजोऽजनयत् सूयें ज्योतिरिन्दुः ॥ (ऋक् सं० ६ १७४४१)। इसी सोमाहुति से सूर्य में सप्तवर्णात्मिका रश्मियों का उदय होता है । सप्तरण समष्टि ही (चित्र विचित्र घों का समुच्चय ही) पृश्नि है । इसी अरमा और पृश्नि मात्र के कारण सूर्य को 'प्रश्मापृश्नि' कहा जाता है । अपि च जिस प्रकार एक अरमा ( पत्यर ) स्थिर होता है, इसी प्रकार सूर्य खस्वरूप से अरमाखण ( पापाणलोष्ठ) की तरह घिर है, सूर्य का रश्मि भएडल पृश्नि है । पिण्डापेक्षया य भरमा है, मण्डलापेक्षया पृश्नि है । इस ‘भरमारिन सौरमण्डल के साथ उक्षा, समुद्र, भरुप, सुपर्ण इन चार भावों का सम्बन्ध है। उक्षा शब्द पभ (वैत ) का वाचक है, समुद्र शब्द पानी का वाचक है, अरुप शब्द पुरुष का याचक है,एवं सुपर्ण शब्द पक्षी का याचक है । सूर्य साक्षात् वृपभ है-'कृपभो रोरवीति' । रस-उपरस धातु-उपयातु-विष-उपविपादि की पुष्टि सूर्य से ही होती है, इसी वर्षण धर्म से इसे 'शपम' याहा जाता है । अपि च यदी गौमाण गौपशु का प्रारम्भक है । तात्पर्य यह है कि केवल वर्पणशील होने से ही मूर्य पृषम नहीं है, अपि तु, गौप्राणयष्ठेदेन सचमुच वृषभ (गो.) प है। सौर रश्मियों के संघर्ष से मसपि नाम का पानी उत्पन्न होता है। सारा रोदसी त्रैलोक्य इस पानी से न्याप्त है । जैसे पारमेष्टय समुद्र सरखान् कहलाता है, तथैर संसाराधिष्टाता पर सोर रोदसी समुद्र पर्णव नाम से प्रसिद्ध है-'ततः समुद्रो प्रर्णयः समुद्रादायादपि संबन २४५ গন্ধয়াল - ईशोपनिषत् ।। सिमानसूर्य . -- ॥ । सरों अजायत' (अक्स.१०।१५०१-२) । अपि च वर्षा का अधिष्ठाता होने से भी धादित्य समुद्रा- रमक है । सूर्य ही एकमात्र वृष्टि का भधिष्टाता है, जैसा कि श्रुति कहती है- कृष्मा नियानं हरयः सुपर्णा अपो बसाना दिवमुत्पतन्ति । त भावत्रन्त्सदनादनस्यादिद् धृतेन पृथिवी व्युद्यते ।। ( सं० ११६१ अस्यवामीम सूत्रे ४७ मं०) 'यदा खल्बसावादित्यो न्यट्र रश्मिभिः पर्यावर्तने-अथवर्षति' इत्यादि ब्राह्मणश्रुति, एवं 'आदित्याजायने दृष्टिः' इत्यादि स्मृति भी उक्त अर्य का ही स्पष्टीकरण करती है । पुरुष शब्द पोडशी यात्मा का वाचक है । पूर्व में बताया जा चुका है कि विश्वकेन्दभूत सूर्य में ही पुरुष का विकास होता है । इसी प्रात्मपुरुष को लक्ष्य में रखकर 'योऽसावादित्य पुरुषः सोऽहम्' यह कहा जाता है । त्रैलोक्य में जितना भी पुरुष (श्राम ) विपर्त है, सब का अधिष्ठाता पुरुपायन्छिन्न सूर्य ही है । गरुड़ पक्षी का जैसा साकार होता है, ठीक वैसा ही प्राकार सौर सवत्सर का है । अंतएव पूर्व में सासर को-'महानुपर्ण' (प्रैलोक्य व्याप्त गरुड पक्षी ) कहा गया है । आत्मा इसी सुपर्ण का अंश है, अतएव प्रयाणकाल में प्रात्मा भी सुपर्ण नाम से ही व्यपद्धन होता है । यह प्रेतरूप मुर्म ( जीशमा ) लोकान्तर में पक्षिात् संचरण करता है। सुप्रसिद्ध गरुड़गुराण इसी आत्मगति रहस्य का निरूपण करता है। इस प्रकार उक्षा-( वृषभ), समुद्र (अर्णव), अहर (पुरुष) सुरण-(संवत्सर) इन चार भायों से नित्य आक्रान्त वह अरमापृश्नि सूर्य थुलोक में उसी प्रकार खड़ा हुआ है, जैसे कि याफाश में निराधार ( किन्तु स्वशक्ति से भाधारयुक्त ) विमान ( वायुयान) खड़ा रहता है। रोदसी लोक्य में व्याप्त इसी विमान का निरूपण करती हुई श्रुति कहती है- - "विमान एप दिवो मध्य भास्ते भो मणिधान रोदसी अन्तरितम् । स विधाचीरभिचष्टे पृताचीरन्तरा पूर्वमपरं च केतुम् ॥ (यजुः सर १७५१) उन्ना समुद्रो अंरुषः सुपर्णः, पूर्वस्य योनि पितुराविवेश । मध्ये दिवो निहितः पृश्निरश्मा वि चक्रमे रनसत्पात्यन्तौ ।। (ऋक्० १४७।३।। । 1 7 7 प्राकृवात्मा सा ईशोपनिषत् ॥ सूर्यवदन - । "असो वा प्रादित्योऽश्मा पृश्निः । रश्मिमिहि मण्डलं पृश्निः एप इमौ लोगा- वन्तरेण तपति । स्थिरो या अश्मा पृश्निः, अन्तरेमं च लोकममुंच | विक्रम- माणो वा एप एपा लोकानामन्ताव पाति" (शत० ।।१७)। उपयुक्त प्राधिदैविक स्वर्गधरुण केवल ज्ञानगम्य है, मन से उपास्य है। चर्मचतु से अरमापृश्निरूप सूर्य के अतिरिक्त श्राप स्वर्गगरुण के और किसी अश्या को नहीं देख सकते । निस समय भूगण्टल पर देवयुग का साम्राज्य था, उस समय देवताओं ने ( मनुष्यविध भौम- देवताओं ने-जिनकी कि सत्ता प्राज सर्वथा उच्छिन्न हो चुकी है ) भीमस्वर्ग प्रदेश में उस प्राकृतिक (श्रापिदैविक ) स्वर्गधरुण की नकल में ठीक वैसा ही एक स्वर्गधरुण बनाया था। इसी प्रकार विज्ञानतचों की परीक्षा के लिए सिन्धु नद के उस पार सरस्वती नदी के समीर के टीले पर (जहा पर कि वसिष्ठ महर्षि का श्राश्नम था) एक विज्ञानभवन बनाया था। यही विज्ञानभवन 'सूर्यसदन' नाम से प्रसिद्ध हुआ है। 'द्वैते चक्रे सूर्ये ब्रह्माण ऋतुया विदुः' (सफ० १०१८५।१६) इत्यादि रूपसे भूपेद संहिता में इसका बदा विशद निरूपण है । यह भी प्रकृति की नकल पर ही बनाया गया था। विस्तारभय से इस का निरूपण प्रकृत में अनपेक्षित है । इस प्रकार उस समय की क्लायो में स्वर्गधरुण और सूर्यमदन को सर्वोच स्थान दिया जाता था। दुष्टबुद्धि असुरों की कृपा से प्राज भूमण्डल उक्त दोनों विभूतियों से वश्चित हो गया है। थोड़े से शब्दों में स्वगंधरण की मी गाथा सुन लीजिए । जिस प्रकार प्रकृति में विष्पादि वर्ग बतलाए गर है, इसी प्रकार मौम प्रहा द्वारा इस भूपिण्ड पर मिष्टपादि वर्ग व्यपरथा व्यास्थित हुई थी । इशान कोण में सौवीरराष्ट्र के अधि- ता भौम इन्द्र का सामान्य था। जो भाग अाज साइजीरिया (Sibaria) नाम प्रसिद्ध है, जिस भाग में आज तुपार पर्षण का एक का) सामान्य है, जहाँ नासिक निता त भराम्य युद्ध एक जगली मनुष्य, एवं युद्ध एक यीले पशु पक्षियों को छोड़कर कुछ नही है, वही कर पप्प भाग रिसी समय 'अपरावती' नाम से प्रसिद्ध था। यहाँ देवाधिपति इन्द्र मानी से त्रिविष्टपस्वर्ग प्राकृतात्मा सा ईशोपनिषत् । चौथा बध्नस्य- सुधर्मासभा में निर्णय किया करते थे। यहीं भेण्ड नाम का दो मरतका, एक ग्रीचा वाला अद्-. सुत स्वर्गीय पक्षी था, यही संवाछः हाथ बाले ममाथ' नाम के हाथी होते थे । इस प्रकार देवयुग में उक्त स्थान गानव सभ्यताको सर्वोच्चतम स्थान बनाया था । अोर ओर सय देव स्थानों पर अधिकार कर लेने पर भी असुर इस दिशा में मात्रमण न कर सके अतः यह 'अपराजि- तादिम्' नाम से प्रसिद्ध हुई । यही ऐन्द्रयाम पुरायुग में 'इन्द्रविष्टप' या । प्रारू ( पामीर) पर कान्तिमतीसमा युक्त प्राग्ज्योतिप नगर में ब्रह्मविष्टप था । एवं उत्तर दिशा में इन्द्र नमक के मध्य में धुत्र से नीचे के प्रदेश में भद्रगिरि-चन्द्रगिरि नाम से प्रसिद्ध दोनों पर्वतों . के मध्य में विष्णुविष्टप था । इन तीनों की समष्टि ही उस समय 'त्रिविष्टपस्वर्ग' नाम से प्रसिद्ध पी । इनमें ब्रह्म और विष्णुविष्टप के मध्य में मेरु से उत्तर १७ विष्टप या 7 यही देवताओं की देवयजन भूमि थी । देवता यहीं यज्ञ किया करते थे । उपर रूस में जो झील माज के भुयनकोष ( भूगोल ) में 'पालकश' नाम से प्रसिद्ध है , वही देव- युग में माची सरस्वती' नाम से प्रसिद्ध थी । देवतालोग इसी नदी में अवभृथस्नान (यज्ञा- तस्नान) किया करते थे, यही स्थान प्रारयविष्ठप था, यहीं स्वर्गधरुण था । यही खर्ग का परिचायक था । यहां से चारों और रास्ता जाता था। ईशान की ओर इन्द्रविष्टप का मांगे, उत्तर की ओर विष्णुविष्टय का मार्ग, पश्चिम की ओर ब्रह्मविष्टप का मार्ग, एवं दक्षिण की घोर पितृमार्ग था। जिसे घाज 'मंगोनिया' कहा जाता है, वही हमारा प्रद्यौ' नाम का पितृलोक या । इस प्रकार चारों भौर गमन के मागों से युक्त इसी (चतुष्पथ-चौराहा) में स्वर्गवरुण खड़ा या । चतुप्पय के ठीक बीच में एक चोकोर ऊंचा चबूतरा बनाया गया, इस पर बड़े शिल्प से (नीचे से बड़ा, ऊपर से क्रमशः छोटा ) एक पत्थर का स्तम्भ खड़ा किया गया, यही अश्या था। इस प्ररमा के सोंच धरातल पर प्रकृतियत् (एको प्रश्यो घहर्ति सप्तनामा-ऋक्० ११६४।२।) धातु का एक अश्य बनाकर उसके सुवर्ण के सात मस्तक बनाएं गए। इस सप्तमुख थश्व के पृष्ठ पर एक दण्ड खड़ा कर उस पर चमकता हुआ रश्मियुक्त सूर्य प्रतिष्ठित किया गया । रश्मिप्रसार के कारण ही इस का पृश्नि नाम रक्खा गया । यह बनावटी । २४६ प्राकृतात्मा 3 ईशोपनिपत् ॥ इन्द्रशिस । सूर्य दिन-रात समान रूप से प्रकाशित रहता था। चारों मागों के पथिकों को मार्ग बत- लाना इसका मुख्य काम था ! सब से नीचे चबूतरे के चारों ओर एक चतुर्भद्र मण्डल बनाया गया था। इस मण्डल के चारों कोणों में क्रमशः उता-समुद्र-अरुप-सुपर्ण यह चार वस्तुएं प्रतिष्ठित की गई थीं । एक कोण में पाषाण का वृषभ (बैल) खड़ा किया गया था। दूसरे कोण में बैल से ठीक नीचे एक गरुड पक्षी था। इस की प्राकृति ऐसी बनाई गई थी, जैसे सोमापहरण के लिए यह झपाटा मार रहा हो । तीसरे कोणमें अश्व पर एक मनुष्य बनाया गया था। उस के हाथ में एक भाला था, और यह भाला भूगर्भ में प्रविष्ट था। जिस स्थान पर माला गड़ा हुआ था, वहां से पानी निकल कर चौथे कोण में बने हुए समुद्र ( सगेवर ) में निरन्तर जाता रहता था। इसी पानी से वह तालाब सदा भय रहता था । आश्चर्य यह था कि भाले से निकले हुए पानी के निरन्तर आने पर मी उस तालाब में से ( और किसी मार्ग से पानी के बाहर निकलने का द्वार न होते हुए भी ) पानी अपनी नियत सीमा का उल्लंघन नहीं करता था। देशाधिपति इन्द्र के इस शिल्प से उस समय सास विश्व चकित था । प्राधिदैविक वर्गधरुण की इस । इन्द्र का यश सर्वत्र व्याप्त होगया था। इसी प्रतिमारूप भौतिक धरुण का निरूपण करते हुए पि कहते हैं- इन्द्रो दीर्याय चक्षसे आसूर्य रोहयदिवि । वि गोभिरद्रिमरयमव । (ऋक्सं० २१७३।)। इन्द्रो दिवः प्रतिमान पृथिच्या विश्वा वेद सवना हन्ति शुष्णम् महीं चियामननोत् सूर्येण चास्कम्भ चिस्कम्भनेन स्कम्भनीयान् ॥ प्रतिमा (ऋक्० सं० २०१११.५।। । इन्द के भागे के परिलेख से स्वगंधरुण की प्रतिमा का उक्त स्वरूप स्पष्ट हो जाता प्रतिमा शिल्प से तत्कालीन प्रजाने इन्हें सर्वश्रेष्ठ माना था, जैसा कि 'ततो वा इन्द्राय प्रमा श्रेष्ठपायातिष्ठन्त-सन्धिलं पश्यन्त्यः' इत्यादि रूप से पूर्व में कहा जाचुका है । विज्ञानघनसूर्यप्रकरण के सम्बन्ध से तत् सम्बन्धी संगसरात्मक स्वर्गधरुण फा दिग्दर्शन प्राकृवात्मा । ईशापनिषत् । अजामति । । कराया गया, अब पुनः प्रकृत का अनुसरण करते हैं । यद्यपि विश्व की योनि महद्ब्रह्म ही है, तथापि जब तक वाङ्मय सूर्य का इस के साथ सम्बन्ध नहीं हो जाता, तब तक यह सृष्टि करने में असमर्थ ही रहता है । कारण इसका यही है कि सृष्टि की प्रति सन्व-रज-तम-इन गुणों के आधार पर होती है । इन तीनों में भी सृष्टि का प्रधान मूल रजोगुण ही है । ज्ञानप्रधान सत्वगुण निष्क्रिय होने से, मर्थपधान तमोगुण जड़ होने से व्यापारमूला सक्रियसृष्टि में प्रस- मर्थ है । समर्थ है एकमात्र मध्यपतित क्रियाप्रधान रजोगुण । विध का मूल रज है। इस रज के साथ यदि सत्य की प्रधानता रहती है तो सात्विकी सृष्टि होती है, तम की प्रधानता से तामसी सृष्टि होती है , स्वयं रज की प्रधानता से रजोमयी सृष्टि होती है। ज्ञानतत्व ज्योतिर्मय होने से शुभ्र ( शुक्ल ) माना जाता है, तम श्रावरणरूप होने से कृष्ण माना जाता है, एवं मध्यपतित रज 'रक्त' है । यही सृष्टि में प्रधानरूप से अनुरक्त है-'रजोजुपे जन्मनि सत्ववृत्तये' । महत् प्रकृति इन शुक्ल-रक्त-कृष्ण मावों से युक्त अज पुरुष की अजा है। दूसरे शब्दों में 'मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भ दधाम्यहम्' के अनुसार स्वप्रकृतिभूत, अतएव 'प्रजा' नाम से प्रसिद्ध इस महत् प्रकृति से युक्त होकर ही अजपुरुष सृष्टि किया करता है । जैसा कि-'मनामेकां लोहितयुक्त कृष्णां वह्वीः प्रजाः सृजमानाः सरूपाः' (श्वेता ४।५) इत्यादि से स्पष्ट है । बतलाना यह है कि सृष्टि महर्ब्रह्म के धैगुण्पभाव पर निर्भर है, एवं यह त्रिगुणता सूर्य के दर्शपूर्णमास यज्ञ से उत्पन्न होती है , जैसा कि पूर्व के महदात्मा- धिकरण में विस्तार से बतलाया जा चुका है। सूर्य ज्ञान-क्रिया-अर्य-मूर्ति है। यही तीनों भाष महब्रह्म में सत्व-रज-तम रूप से विकसित होते हैं । सत्व-रज-तम तीनों ही गुण हैं, विषमावस्या में जाते हुए तीनों ही दोप हैं । सत्य ज्ञानभाग को विकसित करता है, इस से (ज्ञानोदय से) धानन्द प्राता है । सत्व का प्रवर्तक मूर्य ही है, अतरव-'सत्वादधि महानात्मा' इत्यादि रूप से बुद्धिरूप सूर्य को, किंवा सूर्यरूपा बुद्धि को 'सत्व' कहा जाता है-( देखिए कठोप० ६१७) । जिस जीवात्मा में सन्न की प्रधानता रहती है, उसमें ज्ञान और प्रानन्द (आत्मानन्द) कसा का विकास रहता है । सत्य (विद्यामाग) अव्ययामा के विद्यारूप मानन्द . म प्रकृतात्मा * इशापम्पित् ॥ त्रैगुण्यमार विज्ञान को विकसित करता है । जो धीर सदा प्रसन्न रहते हैं, विचारशीस है, बुद्धिमान् हैं, उनमें सत्व की ही प्रधानता है । यह सदा ज्ञान से ही परिश्रम करते हैं । इनसे शरीरायास नहीं हो सकता । जिस में वर्गप्रवणता अधिक है, काम्य कमों में, सांसारिक धन्धों में जो रात दिन प्रवृत्त रहता है, उस में रजोगुण की प्रधानता समझिए । एवं प्रमाद-मालम्य-अतिनिद्रा- अतिभोजन-निरर्थक फालयान-यह सब तमोगुण का चमत्कार है । ( देखिए गीता. 18. थ०६,७,८ रलो०)। इस प्रकार उक्त तीनों गुण प्रकृति से (सौर दर्शपूर्णमास द्वारा) उत्पन्न होकर देहस्थित जीवाव्यय को बंधन में डाल देते हैं, जैसाकि स्मृति कहती है- , सत्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः । निवन्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥ (गीता० १४।५)। इस प्रकार श्रापोयोनि में वागेत से उम्पन्न, महदब्रह्म में वैगुण्य का उदय करने वाला, यक्षररूप, अध्यय-क्षर के विद्या-अविद्या से उभयरूप बने हुए लोकद्रष्टा सहसांशु भगवान् विध के केन्द्र में प्रतिष्टित हो रहे हैं । अध्यारमसंस्था में आने वाला वही सौर भाग विज्ञानात्मा' नाम से प्रसिद्ध है। श्राधिदैविक विज्ञानात्मा ( सूर्य ) का निरूपण समाप्त हुआ, अब नाघ्या- मिक सूर्य ( विज्ञानात्मा) का दिग्दर्शन कराया जाता है । रिया-अविद्यात्मक यह सूर्य अध्यामजगत् में विज्ञानात्मा' 'बुद्धि' 'चानुपपुरुष' 'क्षेत्र- शात्मा' धादि विविध नामों से प्रसिद्ध है । प्रत्येक श्रात्मा के साथ प्रभव, प्रतिष्ठा, योनि, भाग्य, इन चार चार भावों का सम्बन्ध है । अध्यात्मसंप्या में जितने भी धारमविवर्त है, सब के प्रभवादि भिन्न भिन्न हैं । श्राध्यामिक आत्माओं का उत्पत्तिस्यान प्रभव कहलाता है। निस द्वार से यह शरीर में प्रविष्ट होते हैं, वह द्वार ही योनि है । भाकर शरीर के जिस स्यान में यह उक्यरूप से प्रतिष्टित होते हैं, वही प्रतिष्ठा है । एवं अर्क रूप से जहां तक यह व्याप्त रहते हैं, वहीं व्याप्ति स्थान प्रागय है । प्रसंगागत इन का भी दिग्दर्शन करा देना अप्रा. कृति न होगा । सब से पहिले प्राध्यामिक पोटगी पुरुष पर ही दृष्टि डालिए। श्राध्यामिक पर

बिमार व दिगे मम्म याने या पभियान रोदसी मनराम् ।
म विनावी परिचष्टे पूनावी रन्नस भया च ॥
उहरा समुद्रो यरुष मगर पूर्वस्य योनि तिराविनेश
मध्ये विनो विहिन तृप्रेगरमा विनको रजसत्पात्यन्नौ । २५
भतीजा नावित्यो प्रारमिग रतिनिहि भएपल टलि। एष दोनोकावन्नोस नपान
स्थिरोममा चि मात्र लोक सब विक्रमालले माने यात्राम-जानु
पातिशत.६ARI0RN MATE राजपमेनाबाEिmपीच
मx
ईशोपनिषत्-विज्ञानमाध्य
puiry
सर्गधरूपम्
इन्द्रो दीयि वाले सामूहियहिक दोन दि मेरयत्नात
BH
उमा
N.

माकृतात्मा ईशोपनिषत् ।। प्रमवप्रतिष्ठादि इन के श्राशय हैं । सातवां शरीर है । पाञ्चभौतिक शरीर के पांचों भूत प्रभव हैं, उत्पत्तिकाल में शुक्र-शोणित इन भूतों की योनि हैं। उत्पत्यनन्तर पञ्चभूतसमष्टिरूप पश्चविध प्रान्त (अन्न-जल-गी-वायु-शब्द) योनि हैं, इन्हीं के द्वारा भूतों का आगमन होता है। भाशय सर्वाङ्गशरीर है । पाठवां प्राणात्मा नाम से प्रसिद्ध कर्मात्मा है। इस की वैश्वानर तेजस भान यह तीन फलाएं हैं । इन में वैश्वानर का प्रभन त्रिवृत्स्तोमस्थानीय पार्थिव वितनि- धेयामि दै, योनि नाभि है, प्रतिष्टा दक्षिणपा है, भाशय सर्वाङ्गशरीर है । भान्तरि- क्ष्य पञ्चदशस्तोमस्थानीय वायु तैजसा मा का प्रमय है, हृदय से निकल कर कण्ठ तक व्यात रहने वाली तेजोनाड़ी योनि है, हृदय प्रतिष्टा है, प्राशय सर्वाङ्गशरीर है। एक- विंगस्तोमावच्छिा दिव्य मादित्य (इन्द्र ) प्राज्ञ का प्रभव है, सुपुम्णानाड़ी योनि है, भूसंवि प्रतिष्ठा है, भाशय सर्वाङ्गशरीर है । इन सब में प्रतिष्टा भिन्न भिन्न वतलाई गई है, परन्तु अन्न इन सत्र की सामान्य प्रतिष्ठा है-'सामने प्रतिष्ठिनम्' । कारण इस का यही है कि जब तर धनानि होती रहती है, तभी तक यज्ञसला है, यज्ञसग पर अश्या मजगत की सचा है-"अधियज्ञोऽहपेवार देहे देहमृतां वर" (गीता ८ । ४)। पोडशीपुरुषः --पुरुषः-- -पोडशी -सर्वम् १-धन्यतामा-यम्यहा.-- -स्वयम्भू. २-महानामा-महान् -परमेष्टी ३-विहाना मा बुद्धिः 2-प्रशानामा--मन: ---चन्द्रमाः कामामा---मोकामा (इन्द्रियाणि-मोगमाधनानि )-पृथिरी (गर्गरम्---मोगपतनम् इन्दियेभ्यः परार्या, भर्येभ्यश्च परं मनः । मनमातु परा बुद्धिबुद्धरामा पहान् परः ।। मानः परमध्यक्त, अव्यक्तात पुम्पः परः। पुमपान पर फिनित सा काठासा परागतिः।। (फटोपनिषत् १ म.। ३ ५.1१०-११) तदिद- प्राकृतारमा अमूल पुरूष सा ईशोपनिषत् ॥ उक्त प्रारमप्रपञ्चों में से प्रकृत में केवल विज्ञानामा के ही प्रमवादि का विचार अपेक्षित है । सूर्य इस का उत्पत्ति स्थान है, उत्पन्न होकर यह केशान्तद्वार से अध्यात्मसंस्था में प्रविष्ट होता है। ब्रह्मरन्ध्र नाम से प्रसिद्ध केशान्तस्यान से सतत आते रहने वाले सौरदेवमय इसी विज्ञानप्राण को प्रासुरप्राणप्रधान लौहतरिका से बचाने के लिए शिखा रखने का घादेश है। इस सुसूक्ष्मद्वार से विज्ञानशिव हृदयस्थ प्रज्ञानात्मा ( मन ) पर प्रतिष्ठित हो जाते हैं । यहां उत्थरूप से प्रतिष्टित होकर, प्रकरूप से विज्ञानप्रकाश सर्वाङ्गशरीर में व्याप्त हो जाता है। हृदयबिन्दु से आरम्भ कर सूर्यकेन्द्र तक एक नियत मार्ग बना हुया है । हृदय से नीचे पार्थिव अपानमाण का साम्राज्य है, हृदय से प्रारम्भ कर ऊपर तक सौरप्राण की प्रधानता है । यह दोनों प्राण ( पार्थिव अपानप्राण, सौर प्राणप्राण) क्रमशः पृथिवी और सूर्य केन्द्र से बद्ध हैं। यही स्थान क्रमशः प्रधास्वस्तिक एवं खस्वस्तिक नाम से प्रसिद्ध हैं । खगोलीय सौर स्वस्तिक खस्वस्तिक है, भूगोलीय पार्थिव स्वस्तिक अधःस्वस्तिक है । इन दोनों स्वस्तिकों से उभयतः परिच्छिन्न बना हुआ यह अमूलपुरुष इतस्ततः विचरण किया करता है, जैसा कि श्रुति - कहती है- . - "अन्तरिक्ष याऽअनु रक्षधरति-अमूलमुभयतः परिच्छिन्नम् । यथायं पुरुषोऽमूल उभयतः परिच्छिन्नोऽन्तरिक्षमनुचरति" ।। (शत० ब्रा० १।११२।४।। इस स्वस्तिक का दिग्दर्शन पुरुषात्माधिकरण में कराया जाचुका है-( देखिए ई. वि- मा. १४० पृ.) । प्रत्येक व्यक्ति के उक्त दोनों स्वस्तिक भिन्न भिन्न हैं । यही दोनों स्वस्तिक हमारे जीवन की प्रतिष्ठा है । सौर-पार्थिव रस से ही हम उत्पन्न हुए हैं, एवं इन्हीं रसों से जीवित हैं । जब तक वैयक्तिक स्वस्तिक शान्त रहता है, तभी तक उस व्यक्ति की स्वस्ति (शिय-कल्याण ) है । स्वस्तिमाव की प्रवृत्ति के कारण ही इन्हें 'स्वस्तिक' कहा जाता है। यह स्वस्तिकवृत्त वृत्त के सम्बन्ध से चतुर्भुज बन जाता है। सृष्टिरहस्यवेचा जानते हैं कि प्रत्येक पकृतात्मा सा ईशोपनिषत् ॥ अशु-पन्याः प्राणी का खगोल एवं भूगोल नियत है । उन नियत भागों के रसों से ही तचद प्राणियों के प्राण प्रतिष्ठित रहते हैं । इसी स्वस्तिकामना के लिए भारतीय देशधर्म में स्वस्तिक का पूजन किया जाता है । स्वस्तिक एक नहीं, दो बनाए जाते हैं । द्वार के दक्षिणोत्तर पायों में दोनों स्वस्तिक चित्र स्थापित किए जाते हैं । इन में दक्षिण स्वस्तिक अधःस्वस्तिक की, एवं उत्तर स्वस्तिक खस्वस्तिक की प्रतिमा है । इस से कहना यही है कि हृदय से नीचे रहने वाला, ब्रह्ममन्धि ( मूलद्वार ) से प्रपिष्ट होने वाला पार्थिव अपानमाण अधःस्वस्तिक की प्रतिष्ठाभूत भूकेन्द्र से नित्य वद्ध रहता है । एवमेव हृदय से ऊपर रहने वाला, ब्रह्मरन्ध से प्रविष्ट होने वाला सौरप्राण (विज्ञानात्मा ) खस्नस्तिक की प्रतिष्ठाभूत सूर्यकेन्द्र से नित्य बद्ध रहता है । जैसे नियत स्यान पर जाने के लिए नियत मार्ग बना रहता है, एवमेव प्रत्येक प्राणी के हृदय से पारम्भकर सूर्य- केन्द्र तक खस्वस्तिकरूप स्वतन्त्र मार्ग बने हुए हैं । यही मार्ग उपनिषदों में 'महापथ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है । प्रत्येक प्राणी का विज्ञानात्मा अपने अपने खावस्तिकरूप नियत महापों से प्रतिक्षण मूर्य में जाया करता है, एवं पाया करता है । एक निमेप (पलक) में यह विद्युन्मय विज्ञानप्राण सूर्य में तीन वार जाकर लौट पाता है । इस महापय में विविधवर्णयुक्त सौर रश्मिएं व्याप्त रहती हैं । दूसरे शब्दों में इस मार्ग का स्वरूप सूर्यरश्मिएं ही हैं । व्यक्तिभेद से सर्पया विभक्त इसी सुसूक्ष्म महापथ का निरूपण करती हुई श्रुति कहती है--- "अणुः पन्या विततः पुराणो मां स्पृटो अनुवित्तो मौन । तेन धीरा अपियन्ति ब्रह्मविदः स्वर्गलोकमित जय विमुक्ताः ॥ १ ॥ तस्मिन् शुक्नमुत नीलमाहुः पिङ्गलं हरित लोहितं च । एप पन्या ब्रह्मणा दानुवित्तप्ते ति ब्रह्मविद् पुण्यकृद तैनसश्च ॥ २ ॥ (शत. १४/७२). हृतप्रतिष्ठ प्रज्ञान (मन) को श्राध्यामिक चन्द्रमा समझिर, तत्प्रनिष्ट विज्ञान (बुद्धि) को सूर्य समझिए । विज्ञानामा की प्रतिष्ठा दिपस्प प्रज्ञान मन ही है। जिस प्रकार प्रकृति में प्रमव-योनि-प्रतिष्ठा-प्राशय-परित्नेख . १-प्रभवः-(उत्पत्तिस्थानम्)-ईश्वरात्मा,शुक्र योगमायाच ] "पुरुषान परं किञ्चित,सा- काठा सा परा गतिः" २-योनिः-(प्रवेशद्वारम् )-महानामा (महत्सोमः) पोडशीपुरुषः अमृतात्मा ३-प्रतिष्ठा-(स्पितिस्पानम् )-सर्वान्तरतमो दहराकाशः (अव्यक्तात् पुरुषः परः) ४-भाशयः-( व्याप्तिस्यानम् )-शरीरम् १-अभवः-स्वयम्भूः २-योनिः-शिरोगुझ ३-प्रतिष्ठा-हृदयम् १-भाशय:-शरीरम् अन्यक्तामा-(प्राकृतात्मा)१-अव्यक्तम)बझसत्याना (महतः परं ३ १-प्रभव-परमेष्ठी २-योनिः--शुक्रम् ३-प्रतिष्ठा- हृदयम् ४-थाराय: -शरीरम् -महानात्मा (प्राकृतात्मा) २-महान ) माझसत्यात्मा न (बुरात्मा (पर), १-प्रभवः-सूर्यः २-योनिः-नान्दनम् ३-प्रतिष्ठा-हृदयम् ४-श्राशय:-शरीरम् -विज्ञानात्मा (प्राकृतात्मा) ३-बुद्धिः)ब्रह्मसत्यात्मा ४ (मनसस्त परा १-प्रमय-चन्द्रमाः (अन्नम् ) २-योनि:-शुक्रम् ---प्रज्ञानात्मा (प्राकृतामा)४-मनः)बलसत्यामा ३-प्रतिष्ठा-हृदयम् ४-आशय:-शरीरम् (इन्द्रियेभ्यः पर ६ १-प्रभवः-भाखरसोमः (इन्द्रियाणि (कावच्छिन्न- २-योनिः-प्रज्ञानम् शरीरनः ) पराण्यातुः) ३-प्रतिष्ठा प्रारम्ध्रम् संकल्पविकल्पात्मकमिन्द्रिय- ४-आशयः--पञ्चन्द्रियाणि मना-2 या ७ १-प्रभवः-दिक्सोमः । २-योनि:-~-प्रज्ञानम् श्रोत्रे २ ३--प्रतिष्ठा--श्रोत्रविबरे ४-आशयः-मनः (प्रज्ञानम्)) नि-- पराण्याहुः ८ १-प्रभवः--आदित्यः २-योनि:- न:-प्रज्ञानम् ३-प्रतिष्ठा--चनुविधरे ४-आशय:-मनः (प्रज्ञानम्) चतुपी ३ का इन्द्रियाणि - त्म १-प्रभवः--वायु F २-योनिः- प्रज्ञानम् नासिके (माणः) ४ ३-प्रतिष्ठा--नासाविवरे -भाशय:-मनः (प्रज्ञानम्)j स - वाम् ५ -प्रभवः---अग्निः २-योनि--प्रज्ञानम् १० ३-प्रसिया--जिह्वा ४-याशयः-मनः (प्रज्ञानम्)

-
वैश्वानरतैजसमाजमूर्तिः-
अग्विशास्चिन्द्रकृतात्मा प्राणात्मा का
कात्मा देवसत्या -
१-प्रभवः-- एव पिंश आदित्यः ।
प्राज्ञालगा-मादित्येन्द्रः-देवसत्यः-१ प्राइः
२-योनिः-सुषुम्णानाडी
३-प्रतिष्ठा-हृदयम्
४-याशयः- शरीरम्
तैजसामा-बायु - देवरात्पः-२ तेनसः
1-प्रमया-पञ्चदशो वायु
२-योनि:-तेजोनाडी
३-प्रतिष्ठा-हृदयम्
४-माश्य:-शरीरम
त्रिकन:--कम्मात्मा देवसत्यः
वैवानरामा-अमि:-देवसन्या-३ परवानरः ।
१-प्रमत्र:-विवदशिछितनिधैयः
२--योमिः-नामिः
३-प्रतिष्टा-जाठराग्नि
१-माशय:-शरीरम

१-प्रभवः-पञ्चीकृता मृद २-योनि:-शुकशोणिते -গন্ধয় ३-प्रतिष्ठा--अग्निचित्यः ४-आशयः-शम् अस्थिमासादयो धनपदार्थाः . IN स १-प्रभवः-पार्षियापःपञ्चीकृताः २-योनि:-शुकशोणिते-आपश्च ३-प्रतिष्ठा प्रापः ४-भाशयः-शरीरम् असणासादयस्तरलपदार्थाः २ स १.-प्रभाः-पश्वीकृतोऽग्निः पार्थिवः २-योनिः-शुकशोणिते-तेजध २-प्रतिष्ठा तेजः १-आशय:-शरीरम् ऊष्मा ३ शरीर-मूलमतिष्ठा फ 15 ता --प्रभ:-पञ्चीतो वायुःपार्थिवः २-योनि:-शुकशोगिरो-आयुथ | धमन्यो बायुवाहिन्यः ।। ३-प्रतिष्ठा-बायुः ४-माशयः-शरीरम् घ न १-प्रभाः-पान माकाश गार्थिवः २-योनिः शुक्रशोणिते-शब्दय पिराति ५ ३-प्रतिष्टा-प्राकाराः ५-माशयः-शरीरम् प्रकारातारतम्य पाहतारमा या ईशोपनिषत। " प्रकार चन्द्रमा सूर्य से प्रकाशित रहता है, एवं इसी प्रकाश के तारतम्य से जैसे यहाँ प्रमावास्या, पूर्णिमा, कृष्णाटमी, शुक्लाष्टमी प्रादि भाव उत्पन्न होते हैं, ठीक इसी तरह यह . प्रज्ञानचन्द्रः विज्ञानसूर्य से प्रकाशित रहता है, एवं प्रकृतिवत् अध्यात्मसंस्था में भी प्रमी-पूर्णिमा आदि भावों का उदय होता है । अन्तर दोनों में केवल इतना ही है कि प्रकृति का मास (गहिना) ३० दिन का होता है, एवं प्राध्यामिक मास एक अहोरात्र का है । अहःकाल शुक्लपक्ष है; रात्रि- कॉल कृष्णपक्ष है । प्रकृति में क्या होता है ! पहिले इसका विचार कीजिए । सूर्य विश्वकेन्द्र में प्रतिष्टित है । चन्द्रमा पृथिवी के चारों और परिक्रमा लगाता है । जब चन्द्रमा परिक्रमा लगाते खेगाते पृथिवी के इस घोर आजाता है तो सूर्य का पूर्ण प्रकाश इस पर पड़ता है, इसी की नाम पूर्णिमा है। घूमते घूमते जब वह पृथिवी के उस घोर (सूर्य कीओर) चला जाता है तो चन्द्रमा का दृश्य भाग (पृथिवी की ओर का गार) सौरप्रकाश से वञ्चित होजाता है। सूर्य चन्द्रमा के संगम से दर्श (अमावास्या) का जन्म होता है.--'दर्शः सूयेन्दुसङ्गमः' । पृथिवी के केन्द्र से काटते हुए दक्षिणोत्तर एक रेख लेजाइए । इन रेखाओं के प्रान्तभाग में जब चन्द्रमा थाता है तो कमशः शुक्लाष्टमी, कृष्णाष्टमी का जन्म होजाता है। शुक्लाष्टमी में सायंकाल श्राधा (चतुर्य) चन्द्रमा प्रकाशित रहता है, एवं कृष्णाष्टमी में रात्रि के १२ बजे प्राधा चन्द्रमा मकाशित रहता है । पूर्णिमा में सारा चन्द्रमा प्रकाशित नहीं रहता, एवं न अमावास्या में पूरा चन्द्रमा काला रहता । अपि तु प्राकृतिक स्थिति के अनुसार प्राधा चन्द्रमाही प्रकाशित अप्रकाशित रहता है। पूर्णिमा में दृश्य आधा भाग प्रकाशित है, अदरय प्राधा-भाग अप्रकाशित है। प्रभा में पृष्ठभाग प्रकाशित है; पृथिवी की ओर का बाधा भाग अप्रकाशित है, अतएव यह नहीं दीलता। इस विपति के अनुसार अष्टमी में चतुर्थ माय को ही प्रकाशित अप्रकाशित मानना पड़ता है। परसुतस्तु सभी तिथियों में सदा ही प्राधा भाग प्रकाशित, एवं भाषा भाग प्रकाशित रहता है। हमारी घरपस्थिति के अनुसार हम एक फला-दो कला-सीन कला-इस मकार फसाविभागं मान- लेते हैं । यह है प्राधेिदविकं जगत की परिस्थिति ।

या ईशोपनिषत् ॥ स्वप्नमयीनार पाक पर थोड़ा सा प्रकाश रहता है । यही कारण है कि खप्नावस्था में मनुष्य न देख सकता, न हुन सकता, न संघ सकता, न स्वाद लेसकता, परन्तु याग्व्यापार करता रहता है । चूकि पयाप्त प्रकाश नहीं है, अतएव यह स्वप्नवाक् अनर्गल होती है "सुप्तोऽहं किल विललाप" (उदयनाचार्य कृत बुसुमाञ्जलि ) 1 स्वप्नावस्था में मनुष्य व्यर्थ वाक् का प्रयोग करता हुश्रा देखा जाता है । मन क्रमशः नीचे उतरता हुघा जब हृदयस्य विज्ञान सूर्य के समधरातल पर आजाता है तो ऊपर के त्रैलोक्य मण्डल में घोर अन्धकार हो जाता है। यही सूर्येन्दुसंगमल- कणा अमावास्या है, यही 'मुषुप्तिकाल' है । यहा वाग्व्यापार मी बंद हो जाता है । घोर निद्रा में सारी इन्द्रिएं (मुख्य प्राण को छोड़ कर) सर्वया स्तन्ध बन जाती हैं । इस प्रकार चान्द्र मन । की परिक्रमा से अध्यात्मजगत में मी दशादि का समन्वय सिद्ध हो जाता है। उक्त प्रकरण से पाठकों को यह विदित होगया होगा कि मन में जो प्रकाश है, वह वि- ज्ञानसूर्य की ही महिमा है। साथ ही में यह भी सिद्ध विण्य है कि अन्नप्रधान प्राध्यात्मिका जगत् में प्रधानता 'मन' की ही रहती है । मन ही विज्ञान की प्रतिष्ठा है । जिस का मन मर- जाता है, उसकी बुद्धि भी मष्ट होजाती है । इस का प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि मन पार्थिव अन्ना- हुति से बनता है "अन्नमयं हि सोम्य मनः" । यदि दो चार दिन अन्न नहीं खाया जाता है तो मन निर्बल होजाता है, क्षीणकाय बन जाता है । उसी समय मन पर प्रतिष्ठित रहने याला विहान भी निर्बल होजाता है, विचार शक्ति नष्ट हो जाती है "बुभुक्षितं न प्रतिमाति किंचि- २" * "स्वस्थे चित्ते बुद्धयः संस्फुरन्ति" । विज्ञान-प्रशन दोनों सपरिष्वक्त (एक दूसरे से मिले हुए ) रहते हैं । विज्ञानतव्य महद्गर्भित चिज्योति ( यात्मज्योति से प्रकाशित है, प्रज्ञान चिद्धन विज्ञान से प्रकाशित है । इन्द्रिएं विज्ञानज्योतिर्मय प्रज्ञानज्योति से प्रकाशित हैं । वि- पयनात (भौतिक प्रपञ्च ) प्रज्ञानज्योतिर्मय इन्द्रियज्योति से प्रकाशित हैं ! इस प्रकार आत्म-- ज्योति का भूतपदायों तक नितान करना विज्ञानयज्ञाधिष्ठाता एक मात्र विज्ञान का ही कार्य है। उपनिषत् प्रेमियों को विज्ञानात्मा के सम्बन्ध में बाज एक पाश्चर्यमयी स्पिति बताते हैं। पिज्ञानात्मा को वक्षरूप से जहा हमनें स्पिर बतलाया है, यहाँ अरूप से उसे सर्वाङ्गशरीर प्राकृवात्मा - स्पानपट्टी भटमी है."वागष्टमी व्रह्मणा संचिताना" (शत०१११२यहीमापकी जा ईशोपनिषत् । अवत्पात्री थव आध्यात्मिकनस्या का निचार कीजिए । दृदय से ब्रह्मरन्ध्र पर्यंत त्रैतौवय की सना समनिर । इस त्रैलोक्य का अधिष्ठाता हृदयस्य विज्ञानसूर्य है । हृदय पर मनरूप चन्द्रमा प्रति- टित है । हृदय विन्दु से थारम्भ कर ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त सोमघरातल है । इसी को 'वाण (स्थि- र यष्टि ) कहा जाता है-( देखिए प्रश्नोपनिषत् २१२१) मुखस्यान अग्निप्रधान पृथिवोटोक है। नासिकारयान वायुप्रधान अन्तरिक्षलोक है ! चनुस्यान भादिलमधान घुसोक है । श्रोत्रस्थान दिक्सोमप्रधान चौया अपोलोक है । स्वयं ब्रह्मरन्ध्र मन की अन्तिम प्रतिष्ठया है । इस प्रकार इस सोमधरातस पर इन्द्रियरूप प्रेतौश्य, किंवा चारों लोक प्रतिष्टित हैं । कसठस्थान में एक मांसपेशी अघर सटकी रहती है, इसी के लिर-स्तन इवानलम्बे' यह कहा जाता है। यहीं गललन लोकभाषा में 'फागनी' नाम से प्रसिद्ध है। उपनिषद्भाषा में यही 'इन्द्रयोनि ' नाम से व्यवहन हुई है । इस की स्थिति वाक् (मुख ) इन्द्रिय के समधरातल पर है । यही वास्तविक भूलोक है । प्रसरण से एक प्रादेश पर यह कएटबिन्दु है, कण्ठ से एक प्रादेश पर हृदय- बिन्दु है । यहाँ से मन टपर की थोर चनता है । चलते २ वारूप पृथिवी सोक को पार कर जब यह थानी यन्तिम सीमारूप ब्रह्मरन्ध्र पर पहुंच जाता है तो ऐसी भवसा इस पर उदयस्य विज्ञानसूर्य का पूर्ण प्रकाश पड़ता है। यही इस की पूर्णिमा है । इन्दिएँ एस. समय प्रकाशित मन से नीचे हैं, अतरख मन के प्रकाश से सारी इन्द्रिएं प्रकाशित हो पड़ती है। मानस प्रकाश को प्राप्त करते ही इन्दिएं अपना कार्य आरम्म कर देता है । इसी परिरमाकात- का नाम 'जाग्रदयस्था' है । वहां से मन क्रमशः नीचे उतरता है । जव वा स्थान पर प्रति है तो पर की इन्द्रियों में अन्धार जाता है । श्रोत्र का अन्दश्रवण, चनु फारूपदर्शन, रसना का स्वादमहरा सत्र भवन्द हो जाते हैं। हां मुस्प (नासा)-प्राण इस समप भी, इस समय भी क्या प्राणाम्य एवनस्मिन् पुरे नापति' (प्रश्नोप० ११३।) के अनुसार सदा ही चामना रहता है । सास-प्रश्वास घोर मुगुप्तिकाल में भी यथावत् चलते रहते हैं ।वार सन्धि- में सन्धिमानीया स्वप्नावस्या' है। इस में घोर किसी इन्द्रिप पर तो प्रकार नहीं रहता, परत पपजात (भौतिक प्रपञ्च) प्रज्ञानज्योतिर्मय इन्द्रियज्योति से प्रकाशित हैं । इस प्रकार भात्म- ज्योति का भूतपदार्थों तक वितान करना विज्ञानयज्ञाधिष्ठाता एक मात्र विज्ञान का ही कार्य है। विज्ञानात्मा को उक्यरूप से जहा हमने स्थिर बतलाया है, वहां धर्फरूप से उसे सर्वाङ्गशरीर या ईशोपनिषत् स्वप्नमयीवार बाक् पर थोड़ा सा प्रकाश रहता है । यही कारण है कि स्वप्नावस्था में मनुष्य न देख सकता, न सुन सकता, न संघ सकता, न स्वाद लेसकता, परन्तु वाग्व्यापार करता रहता है । चूंकि पयोत प्रकाश नहीं है, अतएव यह खप्नवाक् अनर्गल होती है "मुप्तोऽहं किल विललाप" ( उदयनाचार्य कृत कुसुमाञ्जलि )। खप्नावस्था में मनुष्य व्यर्थ वाक् का प्रयोग करता हुआ देखा जाता है । मन क्रमश नीचे उतरता हुआ जब हृदयस्य विज्ञान सूर्य के समधरातल पर माजाता है तो ऊपर के त्रैलोक्य मण्डल में घोर अन्धकार हो जाता है। यही सूर्येन्दुसगमल- राणा अमावास्या है, यही 'सुषुप्तिकाल' है । यहा वाग्व्यापार भी बद हो जाता है । घोर निद्रा में सारी इन्दिएं (मुख्य प्राण को छोड़ कर) सर्वया स्तम्ध बन जाती हैं । इस प्रकार चान्द्र मन । की परिक्रमा से अध्यात्मजगत में भी दशादि का समन्वय सिद्ध हो जाता है । उक्त प्रकरण से पाठकों को यह विदित होगया होगा कि मन में जो प्रकाश है, वह वि- शानसूर्य की ही महिमा है। साथ ही में यह भी सिद्ध विषय है कि अनप्रधान प्राध्यात्मिक जगत् में प्रधानता 'मन' की ही रहती है । मन ही विज्ञान की प्रतिष्ठा है । जिस का मन मर- जाता है, उसकी बुद्धि भी नष्ट होजाती है । इस का प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि मन पार्थिव अन्ना- इति से बनता है "अन्नमयं हि सोम्य मनः" । यदि दो चार दिन अन्न नहीं खाया जाता है तो मन निर्बल होनाता है, क्षीणकाय बन जाता है । उसी समय मन पर प्रतिष्ठित रहने वाला विज्ञान भी निर्बल होजाता है, विचार शक्ति नष्ट हो जाती है "बुमुक्षितं न प्रतिभाति किंचि- ३" * "वस्थे चित्ते बुद्धयः सस्फुरन्ति" । विज्ञान-प्रज्ञान दोनों सपरिष्वक्र (एक दूसरे से मिले हुए ) रहते हैं । विज्ञानतरय महद्गर्मित पिज्योति (आत्मज्योति ) से प्रकाशिन है, प्रज्ञान चिद्धन विज्ञान से प्रकाशित है । इन्द्रिए विज्ञानज्योतिर्मय प्रज्ञानज्योति से प्रकाशित हैं । नि- - उपनिषत् प्रेमियों को विज्ञानामा के सम्बन्ध में आज एक प्राश्चर्यमयी स्थिति बतलाते हैं। २५६ प्राकृवात्मा ला ईशोपनिपन् । चातुपपुस - में में व्याप्त बतलाया है । इस की व्याप्ति का पूर्ण विकास केवल दक्षिण चतुं (दहिनी आंखें ) में ही होता है, क्या यह कम पाश्चय है | हृदय से वितत विज्ञान दक्षिण भांख पर आकर आँच से बाहर निकलता है । वाहर एक प्रादेश तक ही इस की गति होती है । दृष्टि के अनुक और प्रतीक यह दो मेद हैं । सीधी दृष्टि अनूकदृष्टि कहलाती है, तिरछी दृष्टि प्रतीकदृष्टि कह लाती है । श्राप प्रतीकदृष्टि से इस चातुप पुरुष को देख सकते हैं । इस के विविध प्रकार के २१ रूप होते हैं । यह सूर्य का अंश है, सूर्य स्वयं एकविंश है, अत एव तदंशभूत विज्ञा- नाग्मा के २१ ही रूप होजाते हैं । इस पर श्राप दृष्टि नहीं ठहरा सकते । दक्षिण आँख के प्रतीकभाव से आप ज्यों ज्यों इसे देखते जायगे, त्यो त्यों यह इधर उधर दौड़ता हुआ दिखाई देगा । इसे देखना विज्ञानामा की सर्वोत्कृष्ट उपासना है । यह इन्द्रात्मक है , पुरुष रूप है । दक्षिणाङ्ग पुरूप प्रधान है, अतएव दक्षिणचनु में ही इस का विकास होता है । वामचन्तु भी प्रतीकदृष्टि से थापको एक विन्दु के दर्शन होंगे, परन्तु यह इन्द्रपरनी है । बामाङ्ग मी प्रधान है, अतः इन्द्रपन्नी का विकास यामचनु में ही होता है । उक्त विज्ञान को आप सर्पप (सरसों) के थाकार में देखेंगे । मक्षिका (मत्ती) के पर में जैसा विचित्र वर्ग (रंग) है, इस का ठीक वैसा ही रंग है । परन्तु इतना ध्यान रखिए कि आप इसे सूर्यप्रकाश (भा) में न देख सकेंगे । यह जब भी दीखेगा, पार्थिव तमोमय पूपामाण के गर्म में (छाया में) ही दीखेगा, जैसा कि आगे आने वाले 'दिरणमयेन पात्रेण ० इत्यादि मन्त्रभाष्य में स्पष्ट होने वाला है। इस का चनु से प्रादेश मात्र (१०॥ श्रङ्गुल) बाहर निकलना बतलाया गया है। वस्तुतः यह चनु से बाहर नहीं निकलता, केवल बाहर निकला हुआ दिखाई देता है। आदर्श (काव- थापना) में आप अपना प्रतिबिम्ब देखते हैं। यदि आप अादर्श से दूर हटते जाते हैं तो लापको अपना प्रतिविम्य मी काच के भीतर पीछे हटता हुआ प्रतीत होता है, ज्यों ज्यों मार काच के समीर पाते जाते हैं, त्यो त्यों ऐसा प्रतीत होता है, मानों आपका प्रतिनिश्च समीर भाता जाता है । वस्तुतः काच एक घन पदार्य है, न उस में पीछे हटने के लिए स्थान है, न मागे भाने के लिए स्थान है । प्रतिविम्ब एक ही धरातल पर प्रतिष्ठित है। केवट काच'

आध्यात्मिक अवस्थात्रयी-परिलेख --
चन्द्रमा:-
-मनः
अझरन्यम्
---
-पूर्णिमा-जामदयस्था
5
याप:
द्यौः-
नासि-
१
अन्तरिक्षम् :
पृथ्वी-(
मुखम्-
---अष्टागी-स्वप्नावस्था
-हैदयम्-
-अमावास्या-सुषुप्तिः
सूर्य:-/ विज्ञानम्

प्राकृतास्मा चातुपपुरुष डा ईशापनिषत् ॥ चीनता ही प्रागति-गतिभाव उत्पन्न कर देती है। ठीक यही स्थिति यहाँ समझिए । चतु- पटल एक प्रकार का काच है । इस पर हृदयस्थ विज्ञान का तेजोनाड़ी द्वारा प्रतिविद पड़ता है। वह जब रश्मिरूप से कण्ठस्थान में स्थित स्ययोनि (इन्द्रयोनि ) पर आता है तो के बाहर एक प्रादेश हटा हुआ मालूम होता है, क्योंकि इन्द्रयोनि हृदय से एक प्रादेश पर है । स्व- स्थान पर लौट पाने से केवल चतु पर ही प्रतिबिम्बित रहता है। इस प्रकार अनेक रूप धारण करने वाला, इन्द्रमूर्ति यह विज्ञानात्मा चक्षु सम्बन्ध से-'चातुपपुरुष', दक्षिणाक्षि सम्बन्ध से 'दक्षिणाक्षिपुरुप' नाम से प्रसिद्ध हो रहा है । सौर विज्ञानपुरुप की उपनिषत् (प्रतिष्ठा) 'मह' ( प्रकाशमण्डल ) है, इस चाक्षुषपुरुष की उपनिषत् 'महम्' (चिद्गर्भित महान् ) है। दोनों का परस्पर में घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्पादित्यपुरुष रश्मिरूप प्राणों से इसके साथ, विज्ञानपुरुष प्राणरूप रश्मियों के साथ उसी पूर्वक्ति महापथ में संयुक्त हो रहे हैं । इसी विज्ञान लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है- "तयत् तत् सत्यमसौ स आदित्यः । य एप एतस्मिन् मण्डले पुरुषः, यञ्चायं दक्षिणेऽक्षन पुरुषः, तावेतावन्योऽन्यस्मिन् प्रतिष्ठितौ । रश्मिभिरेपोऽस्मिन् प्रतिष्ठितः, प्राणैरयममुष्मिन (प्रतिष्ठितः) । (वृक्षदा० उप० ५।४।) इति । को इस की प्रतिष्ठाभूमि हृदयस्प है। जिस प्रकार एक दीपशिखा स्थिररूप से प्रकाशित रहती है, एवमेव हृदय के अप्रभाग में दीपाहिप विज्ञानप्रभु प्रकाशित हो रहा है, जैसा कि योगी याज्ञवल्क्य कहते हैं- अनन्ता रश्मयस्तस्य दीपवयः स्थितो हृदि । सितासिताः कर्बुरूपाः कपिला नीललोहिताः ॥ १ ।। अर्ध्वमेकः स्थितस्तेषां यो भित्या सूर्यमण्डलम् । ब्रह्मलोकमतिक्रम्य तेन याति परां गतिम् ॥ २ ॥ ( पाइ. स्पृ. प्रा. अ. यतिधर्ममकरण १६६-१६७ रलो.)। ६६१ प्राकवात्मा आईशोपनिषत् ॥ सुरणा यह चाक्षुषपुरुष सौर होने से असंग है, उधर प्रज्ञानामा चान्द्र होने से ससंग है। सौर अग्नि जहां तेजामथान बनता हुया असंगमाव का प्रवर्तक है, वहां चान्द्रसोम ग्नेह-- मधान बनता हुथा ससंगमात्र का प्रवर्गक है । चारुपपुरुष विद्या-अविद्यात्मक सूर्य का अंश है,फलतः इस में भी विद्या-अविद्या दोनों मागों की सत्ता सिद्ध हो जाती है। यदि यह विज्ञानामा प्रशन- मन की ओर मुक जाता है तो इस का अविद्याभाग विकसित होजाता है । कारण इस का रही है कि भौतिक विषय यावरणरूर हैं, जड़ है । इन विषयों में इन्द्रियों के द्वारा मन यासक्त रहता है। मन स्वभावतः विषयों की योर थनुभपन करता रहता है-( दौड़ लगाता रहता है ) । इस अनुधावन का कारण यही है कि मन की जीपनीय संपत्ति चिदानन्द है । विज्ञ न द्वारा माया हुआ चिदानन्द (अव्ययानन्द) ही मन का स्वरूपनिर्माता है । एवं विज्ञानशास्त्र का यह एक माना हुया सिद्धान्त है कि जिस तन्त्र से जिस वस्तु का उदय होता है, वह वातु उस प्रमक के आगमन से ही जीवन धारण करने में समर्थ होती है। मन का खरूपमंगदक चंकि भा- मानन्द है, अतः मन को स्वरूपसत्ता के लिए प्रयेक दशा में आनन्द ( सुख ) मोक्षित है। मुख की चाह करना, सुख प्राप्ति के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहना मन का स्वाभाविक धर्म है । मन की इसी मुखरणा ( सुखेन्छा ) का नाम है-'प्रशनाया', यही बुभुना है । इसे शान्त करने के लिए मन बाहर निकलता है । इस के निकलने के द्वार इन्दिए हैं । इन्द्रियों की गति पराक् ( बाहर की योर-विषयों की ओर ) है । प्रजापति ने इन्द्रियों का रुख बाहर की ओर किया है । जो ननु बाहर के रूपों को देखा करता है, वह अपने ही खरूप देखने में असमर्थ है, फिर हृदयस्थ थामा पर उम का गमन कैसे संभा है। इसी प्रकार समी इन्द्रिएं खत्ररूप को देखने में असमर्थ होतो हुई, थामदर्शन में नितान्त असमर्प बनती हुई, केवल पिपयोग में लीन रहती है, जैसा कि निम्नलिखित श्रुने वचनों से स्पष्ट है- "पगधि ग्यानि व्यगात्स्वयम्भृस्तस्मात् पराद् पश्यति नान्तरात्मन् । कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमनदात्तचक्षुरमृतत्वमिन्छन् । (क्टोपनिषद २।१।१). - ११ प्राकृहातमा का ईशोपनिषत् ।। श्रारमानन्द न तत्र चक्षुर्गच्छति, न वागगच्छति, नो मनो, न विनो, न विजानीमो, यथैतदनुशिष्यादन्यदेव तद् विदिवादयो अविदितादधि" ( केन० १ १ ३।)! विपयों में जो श्रानन्द है, वह इन्द्रियों से छाया हुआ है । विषय मानन्द का कारण नहीं हैं, अपि तु इन्दिएं यानन्द का कारण हैं । इस का प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि जबतक इन्दिर स्वस्थ रहती हैं, सबल रहती है, तभी तक विषय धानन्दमय मालुम होते हैं । इन्द्रियों के रुग्ण हो जाने पर, निर्बल होजाने पर, अथवा नष्ट होजाने पर वही विषय दुःखद वन जाते हैं । इन्द्रियों में जो चिदानन्द का विकास है, वह भी इन्द्रियों की निजी संपत्ति नहीं है, अपितु मन के द्वारा यह मानन्द इन में पाया है । फलतः इन्द्रिएं मी भानन्द का कारण नहीं हैं, अपितु मन आनन्द का कारण है । जब तक मन स्वस्थ दशा में रहता है, तभी तक देखने, सुननें, खाने, पं.ने, बोलने में मानन्द प्राता है । यदि मन किसी कारण से व्याकुल होगता है तो इन्दिएं सर्वथा स्वस्थदशा में रहती हु भी दुःख का कारण बन जाती हैं । उस समप कुछ अच्छा नहीं लगता । मन में जो आनन्द है, वह भी मन की प्रातिखिक संपत्ति नहीं है । विज्ञा- नात्मा से ही इस में चिदानन्द का आगमन हुआ है । अतएव जिसमें विज्ञान (बुद्धि का वि- कास रहता है, वहीं विषयजात से वास्तविक मानन्द उठा सकता है । बुद्धिमान मनुष्य के लिए जा चन्दनगंध आनन्द का कारण है, एफ गर्दभ के लिए वह चन्दन सामान्य काष्ठ से घधिक मुरूप नहीं रखता-'यथा खरो चन्दनभारवाही, भास्य वेत्ता न तु सौरभस्य । विज्ञान में ही भानन्द है । वुद्विनाश सर्वनाश का कारण है । जिस की प्रकल ( अवल) मारी गई, वह क्या कर सकता है । इसी प्रकार विज्ञान का प्रानन्द मी खुद की संपचि नहीं है। अपि तु सत्य नाम से प्रसिद्ध, अहंभावप्रवर्तक महद्गर्भ में प्रतिष्ठित प्रात्मानन्द से ही विज्ञान पानन्दमय बना हुआ है। जब तक 'मह' (प्रात्मा ) है, तभी तक विज्ञान है । जब अहंमा- व ( आत्मा ) मूर्छित हो जाता है, अयया शरीर से उत्प्रान्त होजाता है तो सारी अध्यात्म- संस्था उन्छिन हो जाती है। इस प्रकार अन्ततो गत्या धात्मानन्द को ही मुख्य अानन्द मान- ना पड़ता है। बात है भी ठीक । जो धन उधार लिया जाता है, उस से वास्तविक आनन्द प्राकृतात्मा - ईशोपतिपत् ।। विशेष प्रात्मा नहीं आसकता ।आनन्द तो दूर रहा, ऋणग्रस्त व्यक्ति तो उलटा चिन्ता में पड़ जाता है । प्रा- गन्तुक वस्तु यदि आई है तो-'संयोगा विपयोगान्ताः इस सिद्धान्त के अनुसार बह कभी न कभी अवश्य वापस जायगी । विषय-इन्द्रियवर्ग-प्रज्ञान (मन)-विज्ञान (बुद्धि) इन सब में हम जो आनन्द मात्रा देखते हैं, वह प्रागन्तुक है-'तस्यैव मात्रामुपादाय सर्वे उपजीवन्ति । यइ भागन्तुक भानन्द अस्थायी है, अतएय चिरशान्ति के लिए सर्यया अनुपयुक्त है । साथ ही में विषयबद्ध, इन्दियानन्द, इन्द्रियबद्ध मन का प्रानन्द, मन से बद्ध बुद्धपानन्द सब दृदयस्य श्रात्मानन्द से पराङ्मुख बने हुए हैं । अतएव बुद्धिमान, मनखी, शास्त्रों का पारंगत कोई भी वहां नहीं पहुंच सकता । इसी स्थिति का बड़े सुन्दर शब्दों में निरूपण करती हुई उपनिष- पछुति कहती है- नायमा मा प्रवचनेन लभ्यो न मेघया न बहुना श्रुतेन । यमेवेप वणुते तेन लभ्यस्तस्यैप आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ।। ( कठोपनिषत् । १।२।२२ 'सो जाने जेहि देहि जनाई महात्मा तुलसीदास के इस सिद्धान्त के अनुसार जिस दिन भामा के ऊपर थाया दुधा प्रावरण हट जाता है, उस दिन श्रादित्यवत् सतः एव वह प्रका शित हो जाता है । जिस प्रकार वायु प्रकाश उत्पन्न नहीं करता. केवल मेघायरण हटा देता है, पहिले से ही विद्यमान सौर प्रकाश अपने श्राप प्रकट हो जाना है, तपैर शास्रोपदेश - उपासना-शानयोगादि प्रामानन्द को उत्पन्न नहीं करते, धपि तु भावरण मात्र हटा देते हैं । मामा तो स्वतःप्रकाराला है, उस के लिए अन्यसाधन सर्वथा अनपेक्षित हैं। उक्त कपन से यह भी भलीमांत सिद्ध हो जाता है कि विज्ञान भामा के समीप है, प्र. तः इस में मन-इन्दियादि को अपेक्षा मानन्द की अधिक मात्रा है। तमी तो तद्विशानेन परि- पारपन्ति धीराः' यह कहा जाता है । इन्द्रिपादि यी थपेक्षा मन में अधिक भानन्द है, पों शि. मन विशाम के समीर है । भौतिक विषयों की अपेक्षा इन्द्रियों में अधिक पानन्द है, क्योंकि मिलते हैं। इन संस्कारों की कृपा से बजाय भानन्द के इसे मरणहर महादु.खागार में निमग्न रहना पड़ता है। संस्कार भूतप्रधान होते हुए क्षरप्रधान है। क्षर अविद्या है । भतएव प्रकिनारमा मा ईशोपनियन् ।। अविद्यामवामन . इन्दिये भौतिक विण्यों की अपेक्षा मन के समीप हैं। इस प्रकार विषयों में जाकर मानन्द भायन्ध मात्रा में रह जाता है। उधर भानन्द की खोज में मन इन्द्रियों के द्वारा बाहर निकल कार विषयों पर जाता है । परन्तु होता क्या है-सुनिर ! यानी मात्रा से अधिक मानन्द मिलने पर ही मानन्द भाता है-"यो वै भूमा तव मुखं, नाल्पे सुखमस्ति, भूमानमित्युपास्व" के अनुसार भूमा (वात्त-भाव में मानन्द है । यदि एक लक्षाधिपति को कहीं से १० रुपय्ये मिल जाय तो उसे मानन्द नहीं भासवता । दो लक्ष की प्राप्ति में ही यह ध्यानन्द का अनु- भर कर सकता है । जिस एक पैसे से २ वर्ष का बच्चा प्रसन्न हो जाता है, पही पैसा एक मनुष्य को आनन्द नहीं पहुंचा सकता । यही परिस्थिति यहा होती है । मन महोदय मानन्द की खोज में विषयों पर जाते हैं । परन्तु उन्हें यह मालुम नहीं है कि विषयों में जितनी सी धानन्द की मात्रा है, यह इन्द्रियों से पाई है, इन्द्रियों में जो मानन्द पाया है, वह मुझ से थापा है। भूतापेक्षया इन्द्रियों में अधिक आनन्द है, इन्द्रियापेक्षा स्वयं मुझ में ( मन में ) अधिक आनन्द है । इस प्रकार विवेक बुद्धि से वञ्चित मन धोके से विषयों पर पहुंच जाता है । वहाँ जाकर उसे पताना पड़ता है । किसी भी विषय पर मन चिरकाल तक प्रतिष्ठित नहीं रह सकता-'अतिपरिचयादवज्ञा' । घोड़े दिन रहता है, प्रभिलषित भूमानन्द मिजता नहीं, दूसरे विषय पर दौड़ता है। यहाँ भी यानन्द नहीं मिलता, तीसरे पर, चौथे पर,इस प्रकार विविध विषयों में दौड़ लगाता रहता हुधा मन तुम्ध होजाता है। यही मन या चाव्य है, यही सौम है, क्षोभ अशान्ति का कारण है-'प्रशान्तस्य कुनः सुखम्' । “गए थे चौबेजी धनने, दुबे जी रहने में भी सन्देह होगया" ठीक यह लोकोक्ति विषयासात मन पर यादन तोला पार रची चरितार्थ होती है । लेने गए थे आनन्द, मिला भावरणरूप दुःख, मशान्ति, क्षोभ । आनन्द को म्पर्य बालसा से विषयासक्त इस अविवेकी मन पो पुरधार में विषय संस्कार । . इस सस्कार शशि को 'अविद्या कहा गया है । इस भविद्यारूप भावरण से भरियामा मन २६४ प्राकृतात्मा से माग में चत्तते २ कोई मुन्दर एप देख लेते हैं, तत्काल मन पर उस की छाप (संस्कार-पास का ईशोपनिषत् ।' .मानस्किार के सेवक बने हुए विज्ञानामा का ज्योति भाग (विद्या भाग) श्रावृत होजाता है, तमोमय भाग (अविद्या भाग) प्रदत वन जाता है। प्रवृद्ध अविद्याबुद्धि के योग से अात्मा का अविद्या भाग उपकृत होता हुआ आत्मा के विद्या भाग को आवृत कर लेता है । सर्वत्र अज्ञानान्धकार का साम्राज्य हो जाता है । यही मोह का जनक है-"अज्ञानेनातं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तव" इस सिद्धान्त को कौन नहीं जानता। इस प्रकार विषयासक्त मन से युक्त बुद्धि अपर्ने अविद्या भाग की प्रबलता से मोड थी- जननी वन जाती है । इसी को 'मोदककिला' बुद्धि कहा जाता है । सारासाराविवेकता, अविमृश्यकारिता का नाम ही मोह है । 'मनसो विपयाकाराकारित्वं वासनासंस्कारः' के अनुसार मन का विषयकाररूप में परिणत होजाना ही वासना संस्कार है। मन चान्द्र है, घान्द्रसोम स्नेहधर्मा है । इसीलिए चन्द्रमा जिस नतत्र पर जाता है, वह उसी नक्षत्र का का धारण कर लेता है । भचक्र ( खगोल ) में सदा ही सभी नक्षत्र विद्यमान हैं। परन्तु व्यवहार होता है—ान अश्विनी है, आज भरणी है । इस का तात्पर्य यही है कि आज अश्विनी का चन्द्रमा है, आज भरणी का चन्द्रमा है । इस से कहना यह है कि चन्द्रमा का यह खभाव है कि यह जिसके साथ मिलता है, तदाकाराकारित बन जाता है। इसी का अंश हमारा मन है,अत- एव यह मी जिस विषय से संयुक्त होता है, उसी का श्राकार धारण कर लेता है । विषयाका- गयारित मन वासनामय है । संस्काररूप श्राकार ही (यह आवरण ही) 'वासयति-आछादयति- प्रात्मानम के अनुसार 'पासना' है । यही संस्कार कालान्तर में उपय बन जाता है । उस्य से तचद्वासनामय रश्मिसूत्र-(इम्यासूत्र ) तत्तद्विपयों के लिए निकला करते हैं । दूसरे श. हा में दक्पविनिर्गत इन थकों के द्वारा (कामनासूत्रों के द्वारा ) मन या २ उन विषयों की ओर दौदा करता है । 'खजनितसंस्कारद्वारा विपयेषु मनसो बन्धनमासक्ति के अनु इस विषययन्धन का नाम ही आसक्ति है । वासना संस्कार ही थासक्ति का जनक है । पर । " ना) संग जाती है। यही छाप थाप के मन को उस दृश्य को पुनः २ देखने के लिए भावात प्राकृतात्मा का ईशोपनिषत् | प्रजालग कप्राण vir । करती है, यही आसक्ति है । एक बात और । यदि उक्त संस्कार दृद्ध नहीं होता तो घासक्ति मी नहीं होती। संस्कार दृढमूल बन कर ही आसक्ति का कारण बनता है। इन संस्कारों को इद करने वाला है-'चिरकाल का अनुभव' । 'मनसा-मनुभवजन्यसंस्काराधानेऽनुभवस्य चिर- कालिकत्वं हेतु के अनुसार मन पर जो संस्कार आता है, यदि बार बार उसी की ओर लक्ष्य रखा जाता है तो-'स तु दीर्घकालनैरन्तयसत्काराऽऽसेवितो दृढभूमि ( योगद० समाधिपाद, १४ सू० ) के अनुसार उक्त चिरकाल के अनुध्यान से यह संस्कार दृढमूल बन जाता है । प्रयम-संस्कार भासक्ति का कारण नहीं बनता , अपि तु अनुभव द्वारा दृढ वना- या संस्कार ही भासक्तिरूप 'संग' का कारण बनता है, जैसा कि 'ध्यायतो विपयान पुंसः सँगस्तपूपजायते' (गीता २६६२) इत्यादि से स्पष्ट है । निष्कर्ष यही हुआ कि मन संस्कारों के चिरकालिक सम्बन्ध से विषयों के साथ बद्ध होजाता है । मन को हमने प्रज्ञान कहा है। प्रज्ञान में प्रज्ञा-माण यह दो तत्त्र हैं। प्रज्ञा सोमतत्व है, प्राण इन्द्रतत्व है । दोनों का तादात्म्य है । सोम ही चिदंश का ग्राहक बनकर ज्ञानमूर्ति धनता हुमा 'मज्ञा' नाम से व्यत्रत होने लगता है । मन में आप ज्ञान और क्रिया दोनों धर्म देग्यते हैं । साथ ही में यह मन रूप-रस-गंधादि भूतमात्राओं का भी अनुमाइक है । सोम-चिदंश-आण यही तीनों क्रमशः भूतमात्रा-प्रज्ञामात्रा-पाणमात्रा के अनुसाहक है । सोम भूतों का प्रवर्तक है । चिदं- रामज्ञाभाव का जनक है । प्राण इन्द्रियग्राम का उपकारक है । चिदंशयुक्त सोम प्रज्ञाभाग (ज्ञान) है, प्राण क्रिया भाग है । इस प्रकार प्रज्ञा-प्राण भेद से मन उभयात्मक बन जाता है-'उमयात्मकं मनः । प्रज्ञा-प्राण के इसी तादात्म्यभाव का निरूपण करते हुए महर्षि । कौषीतकि कहते हैं- -- "या वै प्रज्ञा स माणः, या माणः सा प्रज्ञा । सह होतावस्मिन शरीरे वसतः, सहोचितः । माशोऽस्मि वा माणात्मा । तं मामापुरमृतमित्युपास्त्र । ४,४४। तस्यैपेव दृष्टि, एतद् विज्ञानम्" ( कौपी० उप० ३।३)। २६५ प्राकृवात्मा किंवा प्रचन्द्र को योकःसारी (विषयासक्त) कैसे बतलाया गया !"। इस प्रश्न के समाधान के का ईशोपनिषत् ॥ ओकसारोन्द्र सोममयी प्रज्ञा के सम्बन्ध से ही प्रज्ञा-प्राणरूप इन्द्र 'मोकासारी बन जाता है। प्रशान- मन जिस विषय पर जाता है, स्नेहगुणक सोम के प्रभाव से वह वहीं नासक्त हो जाता है। 'जिस घर पर (विपय पर) गए, वहीं के होगए' यही 'मोकासार' है। ओक घर का बाचक है-"गृहा वा ओक!" (ऐ० ८।२६) । मन रूप प्राज्ञ इन्द्र का खाभाविक धर्म (सार) थोक ( निपयों में श्रासक्त हो जाना ) ही है, अतएव इसे श्रोकःसारी कहना न्याय संगत होता है । प्राइ इन्द्र के इसी थासक्ति मात्र को लक्ष्य में रख कर श्रुति कहती है- 'अोकासारी वा इन्द्र यत्र वा एप इन्द्रः पूर्व गच्छति-ऐव वत्रापरं गच्छति', ऐ.बा.६।१७२२)। जहां एक बार मन किसी विषय पर आसक्त होनाता है, वस बार २ उसी विषय की ओर दौड़ा करता है । ऐसा धर्म एक मात्र प्राज्ञ इन्द्र का ही है । विशुद्ध रूप से प्राणमुर्ति इन्द्र भाग है, किन्तु सोम सम्बन्ध से इसे भासक्तिमात्र से आक्रान्त हो जाना पड़ता है। मन के उक्त आसक्तिभाव के सम्बन्ध में एक प्रश्न उपस्थित होता है । "संकल्प विकला- रमक मन को हमने पूर्व में चञ्चल बतलाया है, जैसा कि 'चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमायिवस्व दम्' इत्यादि स्मार्त वचनों से स्पष्ट है । ग्रहम-परित्याग यह मन का स्वाभाविक धर्म है। वह किसी एक विषय में चिरकाल तक प्रतिष्ठित नहीं रह सकता । ऐसी परिस्थिति में मन की विषयों के साथ आसक्ति (चिरकालिक वन्धन) अनुपपन्न होजाती है । संस्कारों की चिरकाला- वस्था ही मासक्ति का मूल है, एवं दाणिक मन में चिरकालिकच का अभाव है । फिर मन को, लिए दमें चातुपपुरुप की शरण जाना पड़ेगा। त्रिशुद्ध मन वास्तव में क्षणभावापन्न है,मतएव पञ्चल है । परन्तु बुद्धि को साथ लेने से ही मन आसक्ति के चक्र में पड़ जाता है । दूसरे शब्दों में बुद्धिसहकृत मन ही प्रासक्ति या कारण है । स्थिर सूर्य से उत्पन्न बुद्धि स्थिरा है। तत्सम्बन्ध से अटिपर मन में स्पिरता का उदय होजाता है । सांस्कारिकत्व जहाँ मन का धर्म है, प चिरकानिकाव बुद्धि का धर्म है। इसी दृढ़ता को लेकर मन विषयों में रहे होजाता है इस के विपरीत उपेक्षाबुद्धि में सरकारशेथिल्प है, यही अनासक्ति का मूल है | उदासीनमाव प्राइवरमा उपेवा-यरेक्षा । ईशोपनिषत् ॥ यदि ऐसा है तो फिर एक प्रश्न उपस्थित होता है । सूर्यरूप विज्ञानात्मय (बुद्धि) को चन्द्ररूप प्रज्ञानारमा पर (मन पर) प्रतिष्ठित बतलाया गया है। मन धौर बुद्धि दोनो परस्पर में अवि- नाभूत हैं । मन कभी बुद्धि से पृथक् नहीं हो सकता, एवं बुद्धि न मन से कभी पृषक् होती। दोनों नित्य सम्बद्ध हैं, जैसा कि श्रुति कहती है- "कतम आत्मेति ? योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तज्योतिः पुरुषः ।" (पृ. आ. उ. ४१७)। 'तद्वा अस्यतदविच्छन्दा अपहतपाप्माभयं रूपम् । वयथा प्रियया स्त्रिया सपरिष्वक्तो न वाद्यं किञ्चन वेद-नान्तरं, एवमेवायं पुरुषः (विज्ञानात्मा-चानुपपुरुषः) प्राज्ञेनात्मना संपरिष्वक्तः" (बु.आ. उ. ४३३२२)। . ऐसी दशा में सदा ही सभी विषयों के साथ भासक्ति होनी चाहिए, क्योंकि संस्कारमाहक मन्न, एवं दृद्तोःपादिकाबुद्धि दोनों सदा ही सहकृत है । परन्तु हम देखते हैं कि कितने ही विपयों से मन घृणा करता है। उनके स्मरणमात्र से गन उद्विान हो पढ़ता है । इस का क्या कारण ? प्यासक्तिभूता सामग्री के रहते हुए भी वही श्रासति हो, कहीं न हो इस का क्या उत्तर : 'बुद्धिदैविध्य' । बुद्धितत्व अपेक्षा, उपेक्षा भार से दो भवों से थाक्रान्त रहता है। अपेक्षाबुद्धि से संस्कार दृढ होजाता है, उपेक्षाबुद्धि से संस्कार स्पिर नहीं होने पाता । मन को हमने क्षणिक बतलापा है । यदि मन प्रबल है तो स्थिर बुद्धि निर्बल होजाती है, ऐसी दशा में स्थिरभाव उत्पन्न नहीं होता , उपेक्षाभाव का उदय हो जाता है। यदि बुद्धि प्रबल है तो मन को क्षणिकता निर्बल बन जाती है, उपेक्षा द्वारा स्थिरभाव उत्पन्न होजाता है। इसी को लोक में गौर करना' कहा जाता है । गौर करो' इसका अर्थ है बुद्धि से काम लो, बुद्धिवल बढायो । इससे सरकार दृढ़ होगा, प्र-यया संस्कार निर्बल रहेगा। इस प्रकार इस अपेक्षा बुद्धि से संस्कार दृढमूल बन जाते हैं, यही प्रासक्ति या मुल है। ठीक । , प्राकतारमा - ईशोपनिषत् ॥ घोषमार । ही उपेक्षाभाव है । 'मनसा गृहीतविषये वुद्धचिरकालिकत्वमनुध्यानम्' के अनुसार मन इन्द्रियों के द्वारा जिन विषयों का संस्काररूप से ग्रहण करता है, यदि संस्काररूप से मागत विपयों में (अपेक्षाभाव की प्रधानता से ) बुद्धि अधिक समय तक ठहर जाती है तो वही वृत्ति 'अनुष्यान नाम से व्यवाहत होने लगती है । चिन्तन करना अनुध्यान है। इस ध्यानरूप बुद्धि के व्यापार से भागत विषय का मन के साप चिरकालिक संयोग हो जाता है, यह सयोग ही संग है, संग ही भासक्ति है। 'मनसः स्वगृहीतविषयस्य बहिर्धा परिजिघृक्षा कामः' के अनुसार संस्कारात्मक पिर- यावच्छिन्न मन का बहि,स्थित संस्कार जनक तत्तद् विषयों की ओर बार बार दोड़ना ही 'काम' है । सगरूपा भासक्ति ही काम की जननी है । यही काम प्रागे जाकर क्रोध का जनक बन जाता है । 'अनुकलसंयोगलक्षणः मुखानुशयी संस्कारो रागः, के अनुसार अभिलषित, भतएव सुख के साधनभूत विषय के साथ ही काम का सम्बन्ध होता है, यही राग है। यह विषयपरिजिघृक्षा 'रागमूला' है । एव 'पतिकलसंयोगलक्षणो दुःखानुशयी संस्कारो द्वेष के अनुसार मन का थपर्ने अवान्छित विषय के साथ (जो कि दुःख का प्रवर्चक है) मुन्ना देप है । मासक्ति दोनों में है । राग सप्पन्ध से एक मित्र के स्नेहपाश में मन जितना बद्ध रहता है, उस से यही अधिक शत्रु के साथ मन बद्ध रहता है । रावण-कंस धादि असुर इसी द्वेष बुद्धि से मुक्त हुए हैं । काम से ही राग का उदय है, वाम से ही द्वेष का उदय है । कामसमा- नाधिकरण काम ही नोध या मूल है । एक वस्तु को थाप भी चाहते हैं, उसी को एक दसरा पतित भी चाहता है । एक ही स्थान पर दो यामों का समन्वय हो रहा है । दोनों या परि- गरण एक है । इस समानाधिररणम्प याम से तथाल ऋध का उदय हो जाता है । "अभी- प्सितविषयेऽन्यायमणागडापां तदपाणिसंभावनायां गारीरानासाना तोभः शोध" के धनुमार अपने अभिनपिन पदार्थ को यदि अन्य व्यक्ति लेने यी दम्या करने लगता है तो उस पशि यो उम की प्राप्ति में मारावा हो जाती है । इस से शरीर या मग्नि शुभ हो पड़ता है । माग्नि का पद सोम ही ओर है। राग से दी पाम या उदय तुमाद, राग - ।

पाहतात কেপ্রিল ॥ शोपनिषत - ही क्रोध का उदय हुया है। दूसरे शब्दों में कामप्रतिबन्धन ही क्रोध का मूल है , यही कामप्रतिबन्धन द्वेष का मूल है । काम एक भिन्न संस्कार है, क्रोध एक भिन्न संस्कार है। दोनों का मन में सम्मेलन होता है। इन दोनों विजातीय संस्कारों के संघर्ष से एक तीसरा अपूर्व- संस्कार उत्पन्न हो जाता है, वही 'संमोह' नाम से प्रसिद्ध है । अनुभवाहितसंस्कारजन्यज्ञान स्मृति है, स्मृति ही विज्ञान बल को बढ़ाती है । संमोह से (चित्तक्षोम) से स्मरणशस्ति नष्ट हो जाती है । स्मृतिनाशसे बुद्धि (विचारशक्ति) नष्ट होजाती है। बुद्धिवंश ही विनाश का मुख्य कारण है । इसी क्रमिक मनोविज्ञान का निरूपण करते हुए भगवान् कहते हैं- यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति । तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥१॥ (गी० २१५२) । ध्यायतो विषयान पुंसः संगस्तेपूपजायते । सङ्गात् संजायते काम कामातू क्रोधोऽभिजायते ॥२॥ क्रोधाद्भवति संमोहः समोहान् स्मृतिविभ्रमः । स्मृतिभ्रंशादू बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणश्यति ॥३॥ (गी० २।६२-६३)। उपर्युक्त मनोविज्ञान से पाठकों को यह विदित होगया होगा कि यदि विज्ञानात्मा मन की ओर झुक जाता है तो वह मन पर आए हुए श्रविद्यामय भौतिक विषयसंस्कारों को दृढ़ बनाता इआ आत्मस्वरूप को प्रावृत कर देता है । बुद्धि में जो विद्या-(ज्ञान)भाग है, वह मन के सापयुक्त होकर ज्ञानेन्द्रियों का उपकार करता है । इस ज्ञानीय संस्कार को ही 'अनुभवाहितसंस्कार' कहते हैं, यही 'भावना' नाम से प्रसिद्ध है । एवं बुद्धि का अविद्या-( कर्म ) भाग मन द्वारा कर्मेन्द्रियों का उपकारक बनता है । यही कर्म जनित संस्कार 'वासना' नाम से प्रसिद्ध है । ज्ञा- न (विद्या ) संस्कार, एवं कर्म-(प्रविया ) संस्कार ही मन की और मुकी हुई उसी बुद्धि की इस विषय का वशद विवेचन गौतायिज्ञानभाष्य' में देखना चाहिए। ।

पाहतास्मा ** ईशोपनिषत् ॥ वैज्ञानिकाम कृपा से ( अभियान से ) उदमूल बनते हुए दुःखमला आसक्ति के जनक बन जाते हैं। प्रवि- पा कर्म है, जड़भाव है, दूसरे शब्दों में अज्ञान है । इस की उपासना करने वाले अन्धतम में प्रविष्ट होते हैं । परन्तु विद्या की ओर झुकने वाले उस से भी अधिक गहरे अंधकार में जाते है । कर्म उतना बुरा असर नहीं करता, जितना कि भनिष्ट 'समझ' से होता है | व्यर्थ की कल्पनाएं गनुष्य को पशु बना डालती हैं । निष्काम-बुद्धि से किया जाने याला कर्म शुद्ध विद्यार- प में परिणत होजाता है, परतु साम--विद्या प्रापरक-प्रवृत्ति कर्म से भी कहीं अधिक भयावर हो जाती है । क्योंकि कर्मजनित वासना संस्कार की अपेक्षा ज्ञानजनित भावना संस्कार भधि. क दृढ़ होता है । चोर को उतना दण्ड नहीं मिलता, जितना कि चोरी की इच्छा रखने वाले को मिलता है । कर्म ( कर्मजनित वासना संस्कार ) तो नष्ट होसकता है, परन्तु ज्ञान (ज्ञानज- नित भावना संस्कार ) सहसा नष्ट नहीं होता। आप एक व्यक्ति को बुरे कर्म से शीघ्र रोक सकते हैं, परन्तु उस के बुरे विचार ( भावना ) सहसा नहीं बदले जासकते । स्थूल की निवि- त्सा सहज है, सूक्ष्म की चिकि सा कठिन हे । इन्हीं सारे रहस्यों को लक्ष्य में रखता हुआ, विज्ञानात्मा का स्वरूाधर्म बतलाता हुआ प्रकृत विज्ञानात्माधिकरण पाठकों के सामने उपस्थित इशा है। । विहानतमप्रतिपादिक तीनों मन्त्रों में उपलब्ध होने वाली ईशोपनिषद में प्राजदिन "अन्य तमः प्रविशन्ति". "मन्यदेवाहुविद्यया. "विधां चाविद्यां च" : यह क्रम देखा जाना है। पन्तु हमारी दृष्टि से ( विज्ञानदृष्टि से ) इन तीनों मन्त्रों का प्रन्येदवाहुवि- पपा"-"अन्य तमः पविगन्ति" - "विद्यां चाविद्या च"० यह क्रम होना चाहिए । समर संस्कारों की असावधानी से यह विज्ञानक्रम बदल गया हो । पहले न्यायतः विज्ञानामा का सरूप वतना भारया है । अात्मस्वरूप परिज्ञान के अनन्तर "जो मात्मा के पयाप स्व. रूप को नहीं जानने, उन की ऐसी गति होती है। यह पहने वा ध्यसर मिलता है। सर्यात -इसलिये भारपेटेवना की इस तरह उपासना करो' यह यहना न्यायसंगत होता है।

अन्यदेवाः का ईशोपनिषत् ॥ - यही क्रम वैज्ञानिक है । वैज्ञानिक क्रम का 'अन्यदेवाहुर्विद्यया०' यह प्रयममन्त्र विज्ञानात्मा का स्वरूप बतलाता है । 'अन्धं तमः मविशन्ति' इत्यादि मन्त्र आत्मा के प्रतिपादित स्वरूप से विरूद्ध जानेवालों की अधोगति बललाता है, एवं सर्वान्त में-'विद्यां चावियांच' इत्यादि मन्त्र प्रतिज्ञात धात्मतत्व का स्पष्टीकरण करता है । इसी क्रम का समादर करते हुए निग्न लिखित मन्त्र की ओर आपका ध्यान अाकर्षित किया जाता है- अन्यदेवाहुर्विद्ययाऽन्यदाहुरविद्यया इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तदिचवक्षिरे ॥१॥ (ई. उ. १० मन्त्र) "वह आत्मनस विद्या से भी पृयक् कहा जाता है, अविद्या से भी पृथक् कहा जाता है । जिन (पारोववित्) विद्वानों ने हमारे लिए प्रात्मस्वरूप का निरूपण किया है, उन धीरों के (आत्मा के सम्बन्ध में) ऐसे ही विचार हैं-यह हम सुनते आये हैं,अर्थात् धीर वि- दानों का कहना है किवह मात्मतत्व विद्या-अविद्या दोनों स पृथक् तत्व है।" यह है मन्त्र का समते । प्रत्येक दशा में ज्ञान विषयाकाराकारित बन कर ही भासित होता है । इसी प्रकार मैं शानभाग अमृत है, कर्मभाग मृत्यु है। ज्ञान आदर्शवत् सदा एक रूप रहता है, गही इस का अमृतगाव है । ज्ञान में आने वाले कर्मरूप मिश्य निरन्तर बदलते रहते हैं, यही कर्म का प्रारुवात्मा सामान्य अर्थ । हम विश्व में समष्टि एवं व्यष्टिरूप से सर्वत्र विधा और अविद्या (ज्ञान एवं कर्म ) का साक्षात्कार कर रहे हैं । प्रत्येक पदार्थ ज्ञान-कर्ममय है । साथ ही में जहां ज्ञान है, वहां कर्म (विषय) अवश्य है । कर्मसंघातरूप विषय के विना आप अपने ज्ञान को कमी नहीं देख । प्रत्येक कर्म ज्ञानमय है । 'ज्ञायते' भी क्रिया ही है ! आप किसी वस्तु को जानते हैं, यह जानना मी कर्म है । श्राप कोई काम कर रहे हैं, उस में मी ज्ञान नित्य सम्बद्ध है । संसार में सतत प्रयास करने पर भी प्राप विशुद्ध ज्ञान एवं विशुद्ध कर्म का गर्थक्य नहीं देख सकते । इन प्राकतारमा ॥ ईशोपनिषत् ।। কাবি? मृत्युमाव है । ज्ञान विद्या है, कर्म भविद्या है । दोनों का ( सोपाधिकरूप से ) प्रत्यक्ष हो रहा है । इन दोनों का मूलाधार विज्ञानात्मा (बुद्धि ) है । विज्ञानात्मा में प्राण और चित् यह दो भाग हैं । साप ही में तीसरा सोमतत्व भी है । प्रज्ञानात्मा ( मन ) में भी हमने सोम-चित्- प्राण-यह तीन ही अवयव बतलाए थे, परन्तु इस में और विज्ञान में बड़ा अन्तर है । विज्ञा. नात्मा सूर्य की प्रतिकृति होने से चारों ओर से प्रकाशित रहता हुआ स्वज्योतिर्मयतत्व है । प्रज्ञानात्मा चन्द्रमा की प्रतिकृति होने से एक भाग से (जिस ओर विज्ञानात्मा का प्रकाश पाता है-उस भाग से ) प्रकाशित रहता हुआ परज्योतिर्मयवस्व है। साथ ही में विज्ञानात्मा का सोम पारमेष्ठय ब्रह्मणस्पति सोम है, प्रज्ञानामा का सोम चान्द सूत्र सोम है । विज्ञान और प्रज्ञान में यही अन्तर है, जो अन्तर सूर्य और चन्द्रमा में है । विज्ञान अग्नितत्वप्रधान है, प्रज्ञान सोम- तत्वप्रधान है। विज्ञान विषयों पर जा सकता है, प्रज्ञान पर विषय भाते हैं । नवीन रचना में विज्ञानन्यापार की प्रधानता है, किसी की बनी हुई रचना की प्रतिलिपि करने में प्रज्ञानव्यापार प्रधान है । सोमबत् दोनों के प्राण में मी भेद है । विज्ञानप्राण दिव्य है, प्रज्ञानग्राण प्रान्त- रिचय है । विज्ञानेन्द्र ‘मयवा' है, प्रज्ञानेन्द्र 'वृत्रहा है । इसी प्रकार विज्ञान का चिदंश महत्युक्त होने से प्रबल है, प्रशान में जो चिदंश याया है, यह विज्ञान की ही देन है । इन सब कारणों से विज्ञान-प्रज्ञान की सोम-चिदंश-प्राण तीनों कलामों का पार्थक्य, एवं पृषग्धर्मत्र सिद्ध हो जाता है । विज्ञानामा क्षेत्रात है, कारयिता है । प्रज्ञाना मा कर्चा है। इसी का प्रज्ञान की ज्ञान (प्रज्ञा), क्रिया (प्राण), अर्थ (भूत) तीनों शक्तियों का संचालक क्षेत्रज्ञ विज्ञानामा है । थपनी सोमकला से विज्ञानामा प्रज्ञानामा को भूतमात्रा (शब्द-रूप-रसादि पिपयों) के लिए, चित्कला को प्रज्ञामात्रा के लिए, एवं प्राणकाला को प्राणमात्रा (इन्द्रियार्ग) के लिए प्रेरित करता है । जब तक विज्ञान है, तभी तस प्राध्यात्मिासंस्था की स्वरूपस्थिति है । सोम. युक्त चिंदश विज्ञान का विद्या (ज्ञान) भाग है, विज्ञानानुग्रहीत प्राणेन्द्र धर्मभाग है । इस प्रकार अमृतमृत्युमय, दूसरे शब्दों में विद्या-अविद्यामय, तीसरे शब्दों में ज्ञान कर्ममय विज्ञानामा हो मापामसंस्था का उसी प्रकार प्रकाशक एव स्वरूपसमर्पक बना हुआ है, जैसे कि सूर्य है-'विज्ञातारमरे वा केन विजानीयात् । विश्व के प्रत्येक पर्व के विद्या-अविद्या भाग पर दृष्टि डालते जाइए, सर्वत्र 'इदन-दं न-दमपि न-इदमपि न यही कहना पड़ेगा । इस प्रकार न-न करते जब सारे विश्व प्रपश्व की समाप्ति होजाय, उस समय जो विशुद्ध-अगम्य तत्व पति-नहि माजमा 1 ईशोपनिषत् ॥ अपने अमृतमृत्युभाग से विश्व का प्रकाशक बना हुआ है। जब तक सूर्य है, तभी तक बह- रागम है, तभी तक विश्व है । जिस दिन सूर्य न रहेगा, उस दिन रात्र्यागम द्वारा प्रलय का साम्राज्य हो जायगा । "यह विधा (ज्ञान) है, यह प्रविधा (कर्म) है।" इस प्रकार से हम संसार में समष्टि यष्टिरूप से जिस ज्ञान-कर्म का साक्षात्कार कर रहे हैं, वह हमारे विज्ञानघन सूर्य की महिमा है-'प्रई सूर्य इवामनि' । इस प्रकार अविद्या-विद्यारूप से हम विज्ञानात्मा के साक्षात् दर्शन कर रहे हैं । यही सोपाधिक विद्या-अविद्या विज्ञानात्मा का स्वरूप है । इस स्वरूप को ( ज्ञान कर्म को शिक्षित अशिक्षित सभी जानते हैं । 'हम जानते हैं-हम करते हैं। यह अक्षर सभी के मुख से निकलते हैं। क्या सर्वविदित यही विद्या-अविद्या (सोपाधिक ज्ञान-कर्म) विज्ञानारमा का वास्तविक स्वरूप है ? क्या सभी आत्मज्ञानी हैं ! फिर तो शाखोपदेश की प्रावश्यक नाही न रही। इसी सारी जटिल समस्या को सुलझाता हुमा-'अन्यदेवाहुविद्यया०' इत्यादि मन्त्र धमारे सामने थाता है। हम सांसारिक पदार्थों में ज्ञानरूप से जिस विद्याभाग को साक्षात् कार कर रहे हैं, क्या यह प्रत्यक्षानुभूत विद्या प्रात्मविद्या है !, ऋषि कहते हैं-'अन्यत्-विद्यया । जिस अविद्याभाग का हम फर्मरूप से दर्शन कर रहे हैं, क्या वह 'प्रात्मविद्या' है।, ऋषि - कहते हैं-'अन्यत्-अविद्यया । वात असल में यह है कि श्रुति को विज्ञानात्मा' में जो विशुद्ध श्रात्मपदार्थ है, उस का परि- शान करवाना है । यद्यपि विश्व में प्रत्यक्ष दृष्ट विद्या-अविद्याभाग उसी का विवर्त है, परन्तु यह दोनों ही भाग भौतिक विश्व से संपरिष्क्त बनकर सोपाधिक बनते हुए स्वस्वरूप से च्युत हो रहे हैं। उधर विशुद्ध विद्या-अविद्यारूप श्रात्मतत्य केवल स्वानुभवैकगम्य है । वहां शब्द की गति नही प्राकृतात्मा वास्तविकतामा विज्ञान को विधा-भरियात्मक बतलाया गया है । यह पिया और भविद्या भाग बुद्धिरूप 8 ईशोपनिषत् ॥ वच जाय वही आत्मा है । उसके लिए सिवाय 'नके और हम क्या कह सकते हैं --निति- नेतीति होवाच' 'नैति-नेति कहि वेद पुकारा' । यह 'न' अभाव का बोधक नहीं है, अपितु भौतिक विश्च से सर्वया पृथक, विशुद्ध, निरुपाधिक, सर्वव्यापक धात्मतस्य का परिचायक है । इसीलिए श्रुति ने-'नेति' न कह कर 'नेति नति' कहा है। श्रुति को तटस्थलक्षण द्वारा विशुद्ध प्रात्मतत्व पर हमें लैजाना है, इसके लिए तो 'नकार' का आनय लेना पड़ा। जैसा तुम उसे (सोपाधिक) समझ रहे हो वह वैसा 'न' नहीं) है । परन्तु वह नकार भी नकार है, यह सममाना भी न भूलना । 'न' इति ति-नेति नेति ) अवगतव्यम् । वह नास्तिरूप है (अभावरूप है), यह वात नहीं है" यह समझो नेतिनति का यही तात्पर्य है । अर्थात् वह नकार नकाररूप है। अयया प्रकारान्तर से नेति नेति' वाक्य का समन्यय कीजिए । प्रथम नकार को 'अमाव' का ही वाचक समझिए। दूसरे नकार को मी अभावपरक मानिए । 'न' इसका जो 'न' है- वह ऐसा है, अर्थात् आत्मतस्य श्रभाव का भी प्रभाव है, यह तात्पर्य होगा। घटाभावाभाव असे घटसत्ता का कारण बन जाता है, एवमेव विश्वरूप प्रात्मा के प्रभाव का प्रभार भाम- सत्ता का कारण बन जाता है । ऐसी दशा में 'नेति नेति' का अर्थ होता है.---'अस्तीत्येव' (यस्तीति अवतोऽन्यत्र बुतस्तदुपलभ्यते)। इसी भाव के लिए श्रुति ने यहां 'अन्यत्' शब्द का प्रयोग किया है। मिलेगा आत्मतत्व यहीं, परन्तु कब जब 'अन्यत्' भाव को सामने रक्खोगे तब-| विश्व को विद्या विद्या मत समझो, विश्व में विद्या-अविधामा आत्मा को प्रविष्ट समझो। सोपाधिक पर दृष्टि डालते हुए 'अन्यत्' शब्द से निर्दिष्ट निरुपाधिक का अनुमय करो, यही प्रात्मा भात्मा है । सोपाधिक माग तो उसी का विश्वरूप है। जहां लौकिक मनुष्य भाग्मा के सोगाधिक (विश्वभाव) भाव को प्रधान समझते हैं, वहां धीर लोग निरुपाधिक फो ही यास्तविक श्रामतत्व कहते हैं । यही उक्त मन्त्र का पहिला अर्थ है ।। है। पियाचतुष्टयी पवियाबुद्धि है पिया चतुष्टयी, विधायुद्धि है। यह सौर विया अभियान जिन को रिचा-भरिपापक यताया गया है। यह रिचा भोर भरिया भाग बुद्रित मपिपावतुष्टपी अपिणरि है विचारनुष्टपी, पिपायुद्धि है। यह सौर रिप-मरिया प्रातारमा 1 ईशोपनिषत् ॥ शाaवित्रामा वच जाय वही आत्मा है। उसके लिए सिवायन के धौर हम क्या कह सकते हैं-'नेति. नेतीति होवाच' 'नेति-नेति कहि वेद पुकारा' । यह 'न' यभाष का बोधक नहीं है, अपितु भौतिक विश्व से सर्वपा पृथक, विशुद्ध, निरुपाधिक, सर्वव्यापक आत्मतत्व का परिचायक है। इसीलिए श्रुति ने-'नेति' न कह कर 'नेति नति' कहा है। श्रुति को तटस्थलक्षण द्वारा विशुद्ध आत्मतत्व पर इमें लेजाना है, इसके लिए तो 'नकार' का आनय लेना पड़ा । जैसा तुम उसे (सोपाधिक) समझ रहे हो वह वैसा 'न' नहीं) है । परन्तु वह नकार भी नकार है, यह समझना भी न भूलना । 'न' इति न' ति नेति नेति) अवगतव्यम्' । यह नास्तिरूप है (अभावरूप है), यह बात नहीं है" यह समझो नेतिनति का यही तात्पर्य है । अर्थात् वह नकार नकाररूप है। - श्रयया प्रकारान्तरसे 'नेति नेति' वाक्य का समन्यय कीजिए । प्रथम नकार को 'प्रभाव' का ही वाचक समझिए । दूसरे नकार को भी प्रभावपरक मानिए । 'न' इसमा जो 'न' है- यह ऐसा है, थर्षात् आत्मतत्व श्रमाव का भी अभाव है, यह तात्पर्य होगा। घटाभावाभाव जैसे घटसचा का कारण वन जाता दे, एवमेव विश्वरूप प्रात्मा के प्रभाव का प्रभा। भान- सत्ता का कारण बन जाता है। ऐसी दशा में 'नेति नेति' का अर्थ होता है-'अस्तीत्येव' (यस्तीति अवतोऽन्यत्र कुतस्तदुपलभ्यते)। इसी भाव के लिए श्रुति ने यहां 'अन्यत्' शब्द का प्रयोग किया है। मिलेगा भात्मतत्व यहीं, परन्तु कब जब मन्यन्' भाव को सामने रहोगे तवः। विध को पिया अविया मत समझे, विश्व में विया-मवियात्मक आत्मा को प्रविष्ट समन्छे । सोपाधिक पर दृष्टि डालते हुए 'यन्यत्' शब्द से निर्दिष्ट निरुपाधिक का अनुभव करो, वाही मामा मारमा है। सोपाधिक भाग तो उसी का विश्वरूप है। जहाँ लोकिक मनुष्य मात्मा के सोपाधिक (विश्वमाव) भार को प्रधान समझते हैं, यहां धीर लोग निराधिक को दी वास्तविक मामता कहते हैं । यही आ मन्त्र का पहिला घर्ष है ।। ग प्रास्तारमा - ईशोपनिषत् ॥ शान मनिता Anamviraw RAMARwanr- १-विया (ज्ञान)-सापेक्ष प्रवृत्तिकर्म" २-विद्या (ज्ञान )-निरपेक्ष प्रवृत्तिकर्म" 3-पिया (ज्ञान)-सापेक्ष निवृत्तिकर्म ४-विद्यानिरपेक्ष पिरकर्म ५-विद्यानिरपेक्षा निरर्थकाम ........00 "सत्कर्म-कर्मकारी "सत्कर्म-साधुकारी -ज्ञानमूलफर्म ""निष्कामकर्म-कर्मयोगी । विकर्म-- लौकायतिक]-विज्ञानमुलकार्क "धर्म- - यथेच्छाचारी]-प्रज्ञानमुलकर्म .................. -- इस प्रकार सम्पूर्ण विश्व में ज्ञान और कर्म का साम्राज्य हो रहा है । नेधाविभक्त ज्ञान में છે. झान, एय प्रेधाविभक्त फर्म में से कर्म ग्राह्य है, शेष विज्ञान-प्रज्ञान, एवं विधर्म-प्रक हैं, यह रहस्यवेत्ताओं का सिद्धान्त है । इस ज्ञान भोर कर्म के सम्बन्ध में भारतीय विद्वानों में चिरकाल से भिन्न भिन्न दो मत चले भारहे हैं । बर्मनच को ही प्रधानता देने वाले कर्मठों का कहना है कि श्रात्मा का अभ्युदय कर्म से ही हो सकता है। कर्म करने में ही कल्पारा है । सम्पूर्ण विश्व प्रजापति का कर्म है । उस में कर्म से ही यह विभूति प्राप्त की है। गर्म फरते नामो, झान का उदय अपने पाप हो जायगा-'तत् स्वय योगससिद्धः कानेनास्मनि विदति' । ज्ञान के लिए प्रयास करने की कोई धारश्यकता नहीं है। हमारा मुरप पेय पर्म (प्रवृत्तियम) होना चादिए । यही विद्वान् कर्मठ, कर्मयोगी, कर्मनिष्टानुपापी आदि नामों से प्रगित है। द्गग दन पहना कि धर्म से पभी अभ्युदय नही हो सपना दारा यह फटना रि प्रजापति ने कम से यह चिनिति प्रा दी है, मांगा थांगत है । प्रगापनि पिशुद्ध शानमा ६ । मदा यमं की रामानना ही नहीं है। पद तो निपशुद्ध-बुद्ध-मार है । तुम्हें जो वर्ग : पश (पिस) दिगनाई देगदा दे, गद 'स्मान' 'पाणुपुरन्' 'शुदिाजना' सांगा भाग, ममात्र है । गारा 1 एक माया या मियामा दे। दम मानो ? in ft. सामुदित न दे, गार देने वाला है। पर यह भी माने जाकर पति पर- ८.

माफतारमा निष्ठाभेद का ईशोपनिषत् ॥ . पिक) सुख कोटि में प्रविष्ट होता. हुआ दुःख का ही कारण बन जाता है। 'तीणे पुण्ये मर्त्य- लोके वसन्ति' 'नवा घेते अढा यज्ञरूपा'। कर्म कर्म है, पामा है, भावरक है। इस से ज्ञानमूर्ति प्रात्मा का निःश्रेयसभाव कथमपि संभव नहीं है । संवकर्मपरित्यागलतण ज्ञानयों- गरूप सन्यास से ही मुक्ति हो सकती है । यही ज्ञानेकवादी 'ज्ञानी' 'ज्ञाननिष्ठानुयायी' 'सांख्य भादि नामों से प्रसिद्ध है । एक कहते हैं ज्ञान श्रेष्ठ है, दूसरे कहते हैं कर्म श्रेष्ठ है । एक कहते हैं सारा कर्म छोड़ छाड़कर जङ्गल में चले जाओ, दूसरे कहते हैं रात दिन कर्म (प्रवृत्तिकम्भ) करते रहो । लोक में प्रचलित इन्हीं दो विरुद्ध निष्ठाओं का निरूपण करते हुए भगवान् कहते हैं- लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा पोका मयानघ । ज्ञानपोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥ (गीता ) उपनिषत् की दृष्टि में उक्त दोनों ही मार्ग पतन के कारण हैं । विधामार्ग भी ठीक नहीं, भविमामार्ग भी ठीक नहीं। ठीक क्या नहीं ! संभव नहीं । कर्मठ 'कर्म में प्रवृत्त होते हुए चासना संस्कार से आत्मा को श्रावृत कर रहे हैं। ज्ञानी कहलाने वाले ज्ञान में प्रवृत्त होते हुए भावना से आत्मा को प्राकृत कर रहे हैं । सकाम ज्ञानयोग, सकाम कर्मयोग दोनों ही भाव- ना-यासनासंस्कार के जनक बनते हुए बन्धन के कारण है । सर्वकर्मपरित्यागलक्षण सांख्ययोग बन ही नहीं सकता। क्योंकि ज्ञानवद् कर्म मी थात्मा का अर्द्ध (भाग) है, जैसा कि पूर्व में बत. लाया गया है। उधर कर्म भी बिना ज्ञान के अधूरा है । जो केवल कर्म के अनुयायी हैं, कुछ दिनों के लिए उन का सांसारिक वैभव अवश्य बढ़ता है, परन्तु इस प्रवृतिजनक संस्कार से प्रा. रमा भावृत होजाता है। यही प्रवृशिकर्म भागे जाकर अन्धतमरूप पाषाणादि स्पावरयोनियों का कारण बनता हुमा आत्मा को सदा के लिए अग्धतम से आवृत कर लेता है-( देखिए ई. वि.मा.पखण्ड श्रावरणतन्त्र १६१से१९३पर्यन्त) ऐसी दशा में हम कह सकते हैं कि जो केवल भनि- घारूप कर्म की उपासना करते हैं, वे भोर तम में प्रविष्ट होते हैं-"मन्ध तमः पविशन्ति येऽविषामुपासते". । - १८१ मेगास्थमा भाहतारमा ॥ ईशोपनिषत् ॥ सम्मति से युक्त मिलेगा। अन्यथा समी विद्वानों पर निर्झति (दरिद्रा) देवता की विशेष कृपा मिलेगी। क्या इसी का नाम अभ्युदय है ? क्या धर्म से यही फल मिलता है ! क्या इसी भावार पर-'यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः' यह कहा जाता है ! मावश्यकता है भान दोनों को दोनों धर्मों के अपनाने की। विद्वान उन क- मंठों से कर्म करना सीखें, कर्मठ इन विद्वानों से विद्याग्रहण करें, तभी राष्ट्र का मभ्यु- स्थान सम्भव है । केवल ब्रह्मवल ( विद्यावल ) भी कुछ नहीं करसकता, केवल क्षत्र पन (कर्मवल) भी व्यर्थ है । ब्रह्म-क्षत्र के समन्वय में राष्ट्र का कल्याण है । सिवि- ल (Civil ) और मिलिट्री (Military) क समन्वय से ही राष्ट्र का अभ्युदय है । विद्या-कर्मरूप ब्रह्म-क्षत्रवल के समन्वय से ही ईश्वर प्रजापति विश्वसाम्राज्य का उपभोक्ता बन रहा है। इसी मकृतिसिद्ध विज्ञान का निरूपण करते हुए ऋषि कहते "ग्रीव मित्रः, क्षत्रं वरुणः । अभिगन्तैव ब्रह्म, कर्ता क्षत्रियः । ते हैतेऽअग्रे नानेवासतुऽब्रह्म च क्षत्रं च । ततः शशाकव ब्रह्म मित्र ऋते क्षत्रावरुणात स्थातुम्, न क्षत्रं वरुणः-ऋते ब्रह्मणो मित्रात् । यद्ध किश्च व- रुणः कर्म चकेऽप्रसूतं ब्रह्मणा मित्रेण,न हेवास्मै तत्- समानुधे । स क्षत्रं वरुणः-ब्रह्म मित्रमुपमन्त्रयाञ्चक्रे- उप मावर्तस्व, संसृजाब, पुरस्त्वा करते, त्वदप्रसूतः कर्म करवा इति । तयेति । तो समसृजेता, तत एव मेत्रावरुगो ग्रहोऽभवत् । x+++तत्तदवक्लामेव-यद्- "; बाागोऽराजन्यः स्यात, या राजनं लभेत समृद्ध, तन् ।

प्राकृवारमा हा ईशोपनिषत् ॥ भ्रम । ": एतद्ध वेवानवक्लप्तं यत् क्षत्रियोऽब्राह्मणो भवति ।य- द्ध किचं कर्म करतेऽप्रसूतं ब्रह्मणा मित्रेण,न हैवास्मै तत् समृध्यते । तस्मादु क्षत्रियेण कर्मकरिष्यमाणेनो- पसर्तव्य एव ब्राह्मणः । सं हैवास्मे तद् ब्रह्म प्रसुत कर्मऽयते” इति - (शत० वा० ४ क । १.७० । ४ ब्रा० )। ब्रह्म मित्र है, क्षत्र वरुंगा है। आगे आगे चलने वाला ही ( भनुमति प्रदान करने वाला ही ) ब्रह्म है, का क्षत्रिय है । यह दोनों (ब्रह्म-तत्र ) पहले पृथक् पृ. थक से ही थे, अर्थात् सृष्टि से पहिले इन की सहचर अवस्था थी, ग्रन्धिवन्धनभाव न यो । उस समय (यष्टि से पहित ) ब्रह्म भिन्न तो क्ष वरुण के विना (स्वस्वर- प से प्रतिष्ठित रहने के लिए समर्थ होगया, परन्तु क्षत्र वरुण ब्रह्म मित्र के विना ख. तन्त्र रूप से प्रतिष्ठित रहने के लिए समय न हो सका। उस (एकाकी दशा में) ब्रह्म- मित्र की अनुज्ञा के सहयोग केोविना वरुणनें जो कुछ कर्म किया,वह कर्म इस वरुणक्षत्र के लिए समृद्धि का कारण न बना । ( अपने कर्म को व्यर्थ होता देख कर ) क्षत्र वरुण में ब्रह्ममित्र से मार्थना की कि ( हे ब्रह्म ! ) भाप मेरे ऊपर कृपा कर, आप मेरे पास लौट प्रा! अपन दोनों मिन नाय, मैं सदा भाप को मागे रक्तूंगा, आप जैसी भाज्ञा देंगे, तदनुकूल ही कर्म करूंगा। ब्रह्मने 'तथास्तु' कह दिया, दोनों मिल गए। ( इन दोनों के समन्वय से )-( सुप्रसिद्ध अहोरात्ररूप ) यह मैत्रावरुणग्रह संपन्न होगया। +ix++यह बात तो फिर भी बन सकती है कि ब्राह्मण बिना राना क रह जाय । यदि ग्रामण राना को पाप्त कर लेगा तो यह उस ब्राह्मगु-की समृद्धि होगी। परन्तु यह यात तो किसी भी अा-या में संभव नहीं है कि क्षत्रिप बिना प्रा- लगा क (क्षणमात्र भी) रह जाय । बिना ब्राह्मण की प्राशा क क्षत्रिय जो भी २०५ भावारमा ईशोपनिषत् ॥ त्रिवीर्य । प्राणवल है । इस में पारमेय कर्म करता है, का कर्म कभी समृद्धि का कारण नहीं बन सकता । इस लिए कम करने की इच्छा रखने वाले क्षत्रिय को अवश्य ब्राह्मण का सहारा लेना चाहिए। ब्रह्म से आदिष्ट कर्म इस क्षत्रिय के लिए अवश्य ही समृद्ध बन जाता है" । ब्रह्म ज्ञान है, क्षत्र कर्म है । ज्ञान मनोवल है, कर्म है। प्राण आपोमय है, बुद्धि सूयमयी है । आपोमय पारमेष्टय वरुणमाण क्षत्र है, विज्ञान- मय सूर्य मित्र है। दोनों के समन्वय से मैत्रावरुण रूप अहोरात्रग्रह उत्पन्न हु पा है। रात्रि के १२ वजे स मध्यान्ह के १२ वजेतक अखगोल ( पूर्वकपाल ) मित्र है । इस में सूर्य की प्रधानता रहती है-'मैत्रमहः' । दिन के १२ बजे से रात्रि के १२ वनेतक का अर्द्धखगोल ( पश्चिमकपाल ) वरुण सोप की प्रधानता रहती है- 'रात्रिर्वारुणी | अहोरात्र का परिप्लव ही विश्व का रूप है । इस प्रकार ब्रह्म-क्षत्र के समन्वय से विश्व प्रकाशित हो रहा है । इस प्रकार मन (ब्रह्म ), प्राण (क्षत्र), वाक् ( विद्) की समष्टि 'इदं सर्वम् है। यदि ब्रह्म-क्षत्र का सम्बन्ध विच्छिन्न होगा- ता है तो विप अर्थमूर्ति विश्व लयावस्या में परिणत हो जाता है । यद्यपि मा- न-कम दोनों को दोनों को अपेक्षा है । परन्तु प्रधानना ज्ञान की ही है। कारण ज्ञान व्यापक है, मूलधरातल है । जव सृष्टिरूप समृद्धि नहीं रहती, तब कर्म का तो विनयन हो जाता है, परन्तु ज्ञान स्वस्वरूप से ज्यों का सो प्रतिष्ठित रहता है । हां यदि मान का फर्म के साथ समन्यय होनाता है तो विश्वरूप से उस की समृद्धि अवश्य हो जाती है । परन्तु कर्म यदि ज्ञान का प्राश्रय छोड़ देता है तो वह अपना स्वरूप ही खो पंचना है। इसी रहस्य को पतनाने के लिए श्रुति ने तयवरुणा द्वारा प्रा मित्र की यह विश्व तीसरा वाग्वल २८५ प्राकृतास्मा - ईशोपनिषत् ॥ पुरोधा मार्थना करवाई है । ब्रह्म ही तन की योनि है-( देखिए ई. पि. भा. १खण्ड कर्तृ- तन्त्र) । मसेक कर्म में ज्ञान पहिले है, कर्म अनन्तरभावी है । तत्तवकर्मों का ज्ञान ही तत्तत् कर्मों की प्रवृत्ति का कारण बनता है । इसी ज्ञानाल के उपासक को ब्राह्मण कहा जाता क्षत्रवल के उपासक को क्षत्रिय कहा जाता है , एवं अर्थशक्तिरूप वाकतत्व के उपासक को (विडवीर्य के उ- पासक को वैश्य कहा जाता है। प्रकृविसिद्ध निस ब्रह्म-क्षत्र-विद वीयों के प्रापारपर ही भारतीयवर्णव्यवस्थासूत्र सञ्चालित है । प्रकृतिवत् प्रत्येक राजा एक एक ब्राह्मण पुरोधा अवश्य रखना चाहिए, एवं इसी के आदेशानुसार इसे कर्म में मटच होना चाहिए । चाणक्य पुरोधाने चन्द्रगुप्त को उन्नति के किस शिखर पर पहुंचा दिया था, यह सर्वविदित है। यदि ब्राह्मण को राजा का प्राश्रय न मिलेगा तो ब्राह्मण भ- पनी विद्या का विकास न कर सकेगा, परन्तु उस के स्वरूप की कोई हानि न होगी। उपर मदोन्मत्त राजा यदि ब्राह्मण को पुरोधा न यनाएगा तो वह स्वयं भी नष्ट हो- जायगा, एवं विवीर्यरूप राष्ट्र की अर्थशक्ति भी खो बैठेगा। ऐसी दशा में हमारे देशवासियों या क्या कर्त्तव्य होजाता है उस का विचार वे स्वयं करै । पंजाप क्षत्र है, बंगाल ब्रह्म है, आर्यसमाज क्षत्र है, सेना- तनधर्म ब्रह्म है। राष्ट्रीयदल क्षत्र है, विद्धन्मण्डली ब्रह्म है। भाज आवश्यकता है दोनो के समन्वय की । नर तक ऐसा न होगा, तब तक किसी भी कर्म की सिद्धि न होगी। एक घात और ध्यान में रखनी चाहिए। यद्यपि गनती दोनों की है परन्तु मधानना वियोपासको की ही है । यदि कर्मठ गलती करता है तो विद्वान का दो- प है। सत्र से पहिले देश का ब्राह्मणवर्ग अपनें काव्य से च्युत हुआ है । पहली भू- प्राकृवात्मा । ईशोपनिषत् ।.. नास्तिवृद्धि ल विद्योपासकों की है । इसी भूलने वर्णव्यवस्था का महत्व नष्ट किया है । मूर्ख का अपराध तम्य है, परन्तु विद्वान् यदि गलती करता है, वह यदि कर्तव्यकर्म से विमुख होता है तो उसका अपराध भयङ्कर है-'तता भूय इव ते तमो य उ वि- द्यायां रताः' । अविद्या के उपासक तो अन्धकार में हैं ही, परन्तु उन से भी भ- धिक अन्धकार में वे हैं, जो रात दिन विद्या की उपासना करते हुए भी कर्ममार्ग से पश्चित है । इस प्रकार प्रात्मा के अङ्गों की उपासना करने वाले दोनों ही दल लक्ष- च्युत होरहे हैं। बडी जटिल समस्या है । केवल कर्म भी बुरा, केवल ज्ञान उस से मी बुरा । एवं ज्ञान कर्म मार्ग से धातिरिक्त कोई तीसरा मार्ग है नहीं । ऐसी परिस्थिति में क्या किया जाय , कि- र मार्ग का अवलम्बन किया जाय ! इसी प्रश्न का समाधान करती हुई आगे जाकर श्रुति कहती है - विद्यां चाविद्यां च यस्तदेदोभयं सह । अविद्यया मृत्यु तीा विद्ययामृतमश्नुते ॥३॥ (ई. उ. ११ म.) रानपिविद्या नाम से प्रसिद्ध वैराग्यबुद्धियोगविद्या नाम की प्रथमा विद्या के अन्त गत प्रथम एवं द्वितीय अण्याय में भगवान् ने बड़े विस्तार के साथ ज्ञानयोगमिष्टा, एवं कर्म- योगनिष्ठा का निरुपण किया। साथ ही में 'नास्ति बुद्धिरयुक्तायः' (भगवद्गीता ) इत्यादि रूप से अर्जुन को बुद्धियोग मन्ने समझाया । भगवत्पतिपादित बुद्धियोग का घभिप्राय अर्जुन ने यह समझा कि भगान् कर्म की अपेक्षा ज्ञानमार्ग को श्रेष्ट बतला रहे हैं। 'बुदि विज्ञान ई, विज्ञान शान है' इस सार्वजनीन प्रन्यय के अनुसार बुद्धियोग को ज्ञानयोग समझ लिया गया । उधर भगगन् ने ज्ञाननिष्ठा-कर्मनिष्ठा का निरूपण कर बुद्धियोगनिष्टा पर प्रपारण का उपमहार किया था, बुद्धिपोग को ही श्रेष्ट बतलाया था, साथ ही में 'कुरु 1८८ या ईशोपनियत् । प्राकृतात्मा फर्ममार्म कर्म स्वं' इत्यादि रूप से अर्जुन को वर्णोचित कर्म करने के लिए बाध्य किया . या । कृष्णार्जुनसंवाद क्या था, ब्रह्म-क्षत्र का समन्वय था । भगवान् कृष्ण अभिगन्ता ब्रह्म थे, अर्जुन की क्षत्रिय था । ज्ञान-कर्म का एकीकरण था। इस प्रकार भगवान् ने अर्जुन को | कुछ कहा पा, वह टीक था । परन्तु इन उन्मुग्ध भतरों के वास्तविक तात्पर्य को न सम- माता हुआ अर्जुन प्रश्न कर बैठा- जो ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन । तत् किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥ (गीता३।१)। । इस प्रश्न के उत्तर में तीसरे अध्यायमें भगवान् में उसी उन्मुग्ध अर्थ को स्पष्ट किया । भगवान् ने बतलाया कि बुद्धियोग वास्तव में न कर्मयोग है, न ज्ञानयोग हैं, अपितु दोनों के समन्चितरूप का ही नाम बुद्धियोग है । बुद्धि में ज्ञान कर्म दोनों हैं । बुद्धि का ज्ञानभाग विया है, कर्ममाग अविधा है । जिन दो निष्ठाओं का हमने उल्लेख किया है, परमार्थदृटिं से दो निष्टा नहीं, अपितु बुद्धियोग नाम की एक निष्ठा है । जो सांख्य है, यही योग हैं । जो योग है, यही सांख्य है- 'एक सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति'। इस पर यदि तू प्रश्न करे कि भगवन् ! कर्म कर्म है, पावरक है । वह आवरण किए विना नहीं रह सकता, ऐसी दशा में आप मुझे कर्ममार्ग में क्यों प्रवृत्त कर रहे हैं ! इसके उत्तर में हम यही कहेंगे कि कर्मपरित्याग सर्वथा असंभव है । कितने ही कर्म (आत्मीयकर्म) ऐसे हैं, जो किसी भी दशा में छोड़े नहीं जा सकते । वैसी परिस्थिति में कर्मपरित्याग का दोंग करना अपने भापको धोका देना है । हम मानते हैं कि कितने ही कर्म अवश्य ऐसे हैं जो बंधन में डाल देते हैं, परन्तु कितने ही ऐसे भी हैं जो बंधन के स्गान में बंधनमुक्ति का कारण बनते हैं। क्या इन श्रबंधन कमों को छोड़ने में बुद्धिमानी है ! नियत कर्म छोड़े नहीं जा सकते, प्रबंधन कर्मों को छोड़ना बुरा है, फलतः सर्वकर्मपरिणागलक्षणसंन्यास का कोई मूल्य नहीं रहता । कर्म क्यों नहीं छोड़े जा सकते, इस कम्मीनिवार्यता के सात कारण हैं । । २८९ प्राकृतात्मा या ईशोपनिषत् ॥ कानिवार्य १- अभ्युपगमवाद का आश्रय लेते हुए हम थोड़ी देर के लिए यह मान लेते हैं कि सचमुच कम पावरक हैं। अच्छा इन्हें छोड़दीजिए। ऐसा करने से भविष्य के लिए आवरण बंद होजायगा । परन्तु ऐसी दशा में सचित ( संस्कारस) कर्मों को हटाने का आप के पास क्या साधन है ? ज्ञान निष्क्रिय तत्व है, मतः वह भावरण को हटाने में असमर्थ है । इस के लिए आप को बाध्य होकर नष्कर्यकर्म का आश्रय लेना आवश्क हो जायगा । नैष्कम्यसिद्धि कर्मा- रम्भ के विना सर्वथा असम्भव है । कर्मावरणनिटसर्थ नैष्कर्म्यकर्मानुष्ठानअ. यावश्यक है। कर्म की नैष्कर्मरूपा पहिली यही अनिवार्यता है । इसी के लिए मगवान् ने - 'न कर्मणामनारम्भान्नेष्कर्म्य पुरपोऽश्नुते यह कर्मसंन्यासवैय्यर्थ्य- उपर कर्मसन्यास सर्वथा व्यर्थ है। जिस प्रयोजन के लिए (भावरण के श्रासन्तिक निराकरण के लिए) कर्मसन्यास लिया गया, वह प्रयोजन तो सिद्ध हुमा नहीं, कर्म भोर छोड़ दिया, मानसी और बन गए, इस व्यर्थ के मार्ग से तुमने अपनाया हित समम रक्खा है ? रूपा यही दूसरी अनिवार्यता है । इसी क लिए भगवान ने 'नवस- न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति' यह कहा है। ३- मन-मूत्रपरिखाग, गमन, भोजन आदि निगत शारीरक कर्मों को कभी छोड़ा भी नहीं जासकता । तुम्हें परवश होकर यह सारे कर्म करने ही पड़ते हैं । जय कर्मसाग असम्भव है तो फिर कर्म परित्याग कसा ! यही कर्मपरित्यागाशक्यरूपा तीसरी अनिवार्यता है। इसी के लिए भगवान् ने-'नहि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्' यह का इ । 10 प्राकृवात्मा का ईशोपनिषत् । क्रानिवार्यता t ४-- साथ ही में छिक्का (छींक), जम्भा (जंभाई-उवासी), वासनिवास, बुभुक्षा आदि कितने ही मकृतिसिद्ध कर्म हैं । तुम निश्चय करलो कि आज से हम न छिक्का लेंगे, न जंभाई लेंगे, न भूख लगेगी । परन्तु तुमारे इस निश्चय से होगा क्या । तुह्मारी इच्छा यहां अवरुद्ध है । इन कमों में प्रकृति का हा- थ है । वह अवश्य तुम को इन कर्मों में मत्त कर देगी । अपनें समय पर तुह्मारी इच्छा की कोई अपेक्षा न रखते हुए यह प्राकृतिक कर्म हो ही पढ़ें- गे । यही प्रकृतिसिद्धलक्षण चौथी अनिवार्यता है । इसी के लिए भ- गवान् ने- 'कार्यते ह्यवशः कर्मसर्वःप्रकृतिणेः' यह कहा है । ५- भासक्ति पैदा न करने वाले अनासक्तकर्म विशिष्टकर्म हैं। बलात्कार से इन कों का निरोध किया, इन्द्रियों का संयम किया, परन्तु मन पश में नहीं है। इन्द्रियसंयम होने पर भी मन अन्तर्जगत् म इधर उधर विपयलोलुप बनता हुना भटकता फिरता है। यही मिथ्याचार है। इससे तो अच्छा यही है कि इन्द्रियों को अपना अपना कर्म करने दो, मन को वश में रक्खो। कर्म करो, मासंक्ति मत रक्खो । कर्म का परित्याग मत करो, कामना का परित्याग करो। इन अनासक्त कर्मों से इन्द्रिये अपने आप संयत वन जायगीं । यही तो इस अनासक्त कर्मयोग की विशेषता है । कर्म की यही पांचवीं अनिवायता है । मन को इन्द्रियों के आधीन मत बनामो, इन्द्रियों को मन के आधीन बनाओ, यही अनासक्त कर्मयोग है। इसी के लिए-'यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन । कर्मेन्द्रियः कर्मयोगमसक्तः सविशिष्यते' यह कहा है। कोन्द्रयाण संयम्य प नास्ते मनसा स्मरन् । इन्द्रियार्थान् विगूढारमा मिथ्याचारः स उच्यते ॥ (गीता ३३६) । । ६१ प्राकृतात्मा. ईशोपनिषत् ॥ मनिवार्यता - , ६- नियतकर्मारम्भ से आवरण हटता है, अनारम्भ से आवरण बना रहता है। इसलिए नियत कर्मों का प्रारम्भ ही अच्छा है। इस प्रकार कारम्भ-एवं कर्मसन्यास दोनों में नियतकर्म का प्रारम्भ की श्रेष्ठ सिद्ध होता है । यही कर्म की ६ ठी अनिवार्यता है। इसी के लिए भगवान ने- 'नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः' यह कहा है। • सबसे आवश्यक बात तो यह है कि कर्ममार्ग की रक्षा से ही ईश्वर की विश्वविभूति की रक्षा है। 'मुंड मुडाय भये सन्यासी के अनुसार सभी कर्म छोड़ बैठे तो सारा विश्व ही उच्छिन्न हो जाय । फिर तो शास्त्रोप- देश के श्रोता ही न रहैं , जीवनयात्रा का निर्वाह ही असम्भव हो जाय-- 'न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः' । जब कर्म से जीवनयात्रा का मुगमता से निर्वाह होता है, एवं बंधन होता नहीं, अपितु बंधन विमोक होता है तो ऐसी दशा में कौन बुद्धिमान् कर्मपरित्याग को उत्तम कहँगा । कर्म की यही सांतवीं अनिवार्यता है । इसी के लिए भगवान ने- 'शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मण' इस प्रकार सात तरंह से जब कर्म की अनिवार्यता सिद्ध हो जाती है तो ऐसी स्थिति में कर्मपरित्याग केमे बन सकता सप्तधा विभक्ता-कानिवार्यता:- १-नैष्कर्मोपाय पादनिवार्य पम् "न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्य पुरुपोऽश्नुते" २-कर्मसन्यासौपादनिवार्यत्वम् "न च सन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति" ३-कमररित्यागाशपचादनिगये वम् "नहि कश्चिवक्षणमपि जातु तिष्ठसकर्मकर" ४-प्रतिसिद्रियादनिकायंत्रम् +----"कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिनगुणैः" 1--- -→ २१२ यर्थिकर्म प्रास्तामा का ईपनिषत् ॥ --मनासतकर्मयोगबैशेष्यादनि० -कारम्भ-कर्मसंन्यासयोः कर्मा- रम्भश्रेष्ठयादनिवार्यत्वम् -७-जीवनयात्रा निर्वाहकवादनि० "कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते" "नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म न्यायो हकमा" "शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः" यह तो हुश्रा कर्म की अनिवार्यता का विचार । अब कर्म के आबंधनभाव पर दृष्टि डा- लिए । गीताशास्त्र में श्रवन्धन कम्मों को १-यज्ञार्यकर्म, २-लोकस्थितिनिर्वाहककम, ३-उपे- क्षाकृतकर्म, ४-स्वभावसिद्धसहजकर्म इन चार भागों में विभक्त किया है । विषय भावरय- कता से अधिक विस्तृत होता जारहा है। अतः प्रकृत में केवल यनाथकर्म का दिग्दर्शन करा के इस अधिकरण को समाप्त किया जाता है । यज्ञार्थकर्म (अवन्धन) आज दिन यज्ञ शब्द का केवल अग्निहोत्र-दर्शपूर्णमास-चातुर्मास्य-पशुबंध-सोम- याग-चयन भादि मनुष्यकृत यनों के साथ ही सम्बन्ध समझा जाता है । यज्ञकर्म से केवस चेदविहित यज्ञ का ही ग्रहण किया जाता है। किसी अंश में ऐसा समझन्ना ठीक भी है। परन्तु इन्हीं को यज्ञ समझना सर्वथा भूल है। यह प्राकृत-विधेयमेद से दो भागों में विभक्त हैं। नित्ययज्ञ प्राकृतयज्ञ बहलाता है । यह अधिदेवत्-अध्यात्म-अधिभृत इन तीन भागों में विभसा है । विधेययज्ञ मनुष्ययज्ञ कहलाता है। अग्निहोत्रादि सारे यह प्रकृति में हो रहे हैं । प्रकृतियज्ञ से ( जो कि अधिदैषितय नाम से प्रसिद्ध है ) अध्यात्म और अधिभूत जगत् का निर्माण हुआ है । एवं उस नित्य प्राकृतयज्ञ की प्रतिकृति पर ऋषियों ने वैध श्रौत यज्ञों का याविष्कार किया है। हम जो यज्ञ करते हैं, यह ठीक उस प्रकृतियज्ञ की नकल है। इसी आधार पर 'देवाननुविधा वै मनुष्याः'-'यदै देवा अकुर्वस्तत कराणि' इत्यादि निगम १ इन विषयों का विशद विवेचन गीताविज्ञानभाष्य के 'प्रवन्धनकमत्यागानौचित्योपनिषत्' नाम के प्रकरण में देखना चाहिए । ।

पारावारमा यज्ञार्यम या ईशोपतिपत् ॥ प्रचलित हैं । प्रकृतियज्ञ में जेसा हो रहा है, यदि तत्प्रतिकृतिभूत मनुष्य यज्ञ में उससे जरा भी विरुद्ध किया जाता है तो इसका स्वरूप विगड़ जाता है । प्राकृत-विधेय भेद से ट्रेधा विभक इन यज्ञो में से प्रकृत में सृष्टिप्रवर्तक प्राकृत यज्ञ का ही ग्रहण है। 'अग्नि में सोमाहुति' होना ही यज्ञ है । जिसमें अन्य वस्तु आहुत होती है, वही अग्नि है । बाहुत होने वाली वस्तु सोम है । सत्र में सर आहुत हो रहे हैं । सब अन्नाद है , सब अन्न हैं । इसी भग्नीपो- मात्मक यज्ञ से विश्व स्वरूप में प्रतिष्ठित हो रहा है । परात्पर-मध्यय-अतर-क्षरसमष्टि को हमने पोटशी-प्रजापति कहा है । इस पोटशी प्रजापति का अक्षर भाग ब्रह्मा-विष्णु- इन्द्र-अग्नि-सोप-इन पाच क्लाओ में विभक्त है । इनमें ब्रह्मा का जो धीरण है, वही त्रयी- वेदरूप में परिणित होता है । इस वेदोपत्ति में इन्द्राविष्णू की पद्धी ही मुख्य कारण है । इस प्रकार ब्रह्मा विष्णु इन्द्र से उत्पन्न वेदत्रयी के कारण वह पोडशी वेदमूर्ति बन जाता है । इसी आधार पर पूर्व के प्रकरणों में हमने ईश्वर को वेदमूर्ति कहा है । वेदत्रयी का यजुर्भाग ब्रह्माग्नि है । प्रत्याग्निरूप पोडशी पुरष में प्राण, अाप, वाक्, अन्न, अन्नाद इन पाचों प्रवृतियों की अाहुति होती है । यह पापों आहुति द य हैं । अतएन इन पाचों को समष्टि को हम अवश्य ही-'सोप' कहने के लिए तथ्यार है । उस ब्रह्माग्निमय पुरुष में प्राणसोम की पाहुति होने से स्वयम्भू प्रकट होता है । आपसोम की आहुति होने से परमेष्टी उत्पन्न होता है । वाक्सोम की आहुति होने से सूर्य उत्पन्न होता है । अन्नादसोम की आहुति होने से पृथिवी उत्पन्न होती है, एन अन्नसोम की याहृति होने से च'मा उत्पन्न होता है । स्वयम्भू प्राणयज्ञ है। परमेष्टी आपोया है। सूर्य वाग्यज्ञ है। पृथिवी अन्नादयज्ञ है । चन्द्रमा अन्नपद है । इस प्रकार पञ्च या निमत सोमरूण प्रकृति का पुरपाग्नि के साथ समन्वय होने से पञ्चायत विश्वया उत्पन्न हो जाता है । इसी याधार पर-पाडतो वै यज्ञः' यह कहा जाता है । यह अनुगम श्रुति है , अतएव इसके अनेक अर्थ होते हैं, जिनका कि आगे के उपनि- पदों में समय समय पर निरूपण होता रहेगा । अभी केवल इतना ही समझ लेना पर्याप्त होगा कि प्रकृति एव पुरुष के समन्वय से पचायन विधयक्ष उत्पन्न होता है । पाचों में प्राणादि पाच प्राकृतात्मा यज्ञार्थकार्म । ईशोपनिषत् ।। । देवता अधिष्ठिन हैं । ब्राह्मण ग्रन्थों में एक पाख्यान आता है कि-"प्रजापति ने यज्ञ द्वारा देवताओं को उत्पन्न किया । उत्पना देवतानों ने प्रश्न किया कि हे प्रजापति ! हम आपके यज्ञ से उत्पन्न हुए हैं। अब हमें क्या आज्ञा होती है ? उत्तर में प्रजापति ने कहा कि जो कर्म मैंने किया है वही तुप करो।मैंन यज्ञ द्वारा तुम्हें उत्पन्न किया है,तुम भी यज्ञ द्वारा नई नई प्रजाएं उत्पन्न करो । यस उसी आदेश के अनुसार देवताओं ने उस माजापत्य विश्वयज्ञ से पुनः यज्ञ किया, एवं उसके द्वारा पांचो लोकों में ( स्वयम्भू आदि में) रहने वाली प्रनामों को उत्पन्न किया । एवं देवयज्ञ से उत्पन्न हम भी पान यज्ञद्वारा ही प्रजोत्पति में समर्थ होते हैं। । तात्पर्य इस आख्यान का यही है कि विश्वयज्ञ के देवताओं का फिर परस्पर संगम होता है। इससे आगे की सारी प्रजाएं उत्पन्न होती हैं । इसी विज्ञान को । लक्ष्य में रखकर-'यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः' इत्यादि कहा जाता है। यज्ञकर्म से ही सारा विश्व उत्पन्न हुया है , इसी से सारी प्रजाएं उत्पन्न हो रही हैं , एवं इसी से आगे आगे नई नई प्रजाएं उत्पन्न होती रहती हैं । इसी प्राकृतिक नित्यसिद्ध यज्ञविज्ञान को लक्ष्य में रख- पर भगवान् कहते हैं- सह यज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच मजापतिः। अनेन प्रसविप्यध्यमेप वोऽस्विष्टकामधुक ॥ (गीता ११ )। एक को दूसरे के साथ मिलाना यजन है । इसी गेल से संसार में नए नए आविष्कार होते रहते हैं । इसी से संसार के पदार्थमात्र उत्पन्न हुए हैं। इसी से हम चाहे जो कामना सिद्ध कर सकते हैं । संसार में जड़ चेतन ऐसा कोई भी पदार्थ नहीं है जो यज्ञ न करता हो। जिस पदार्थ का यज्ञ बंद हो जाता है, वह नष्ट हो जाता है। पूर्वोक्त प्रकरण से यह भलीभांति सिद्ध हो जाता है कि स्मृत्युपाच प्रजा शब्द वातुमात्र का वाचक है । अब जरा व्याख्याताओं की लीला देखिए । उनकी दृष्टि में "ना० न० वैश्य तीन ही प्रजा हैं। प्रजा- ‘पति ने यज्ञ द्वारा इन तीन वर्गों को उत्पन्न किपा" यह है प्रना शब्द का अर्थ । प्रजापति कुछ उत्पन्न करते हैं, उस का मूल यज्ञ ही है । यह यज्ञसृष्टि चार वर्षों में विभक्त है। । . २६५ प्राकुवारमा यायकाम ॥ ईशोपनिषत् ॥ मनुष्यों में ही यह वर्ण विभाग नहीं है, अपितु पदार्थमात्र में चातुर्वर्ण्य का समावेश है । इसी अभिप्राय से सामान्यरूप से वर्णसृष्टि का निरूपण करते हुए भगवान् कहते हैं- । चातुर्वण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः । तस्य कत्तारपि मां विद्धयकतारमव्ययम् ॥ (गीता) भगवान् कहते हैं-मैन चार प्रकार की प्रजासष्टि की। इधर टीकाकार "तीन घणों को (सोभी मनुष्यों से सम्बन्ध रखने वाले ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्यों को) ही उत्पन्न किया" यह अर्थ करते हैं । कितनी भूल है । इस भूल का कारण यज्ञ का स्वरूप न समझना ही है । उन्होंने यज्ञ को हवनादि प्रसिद्ध यज्ञ समझ रखा है । किसी विशेष कारण से यह वैध यज्ञ मनुष्य ही कर सकते हैं। इन में भी ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य को ही अधिकार है । शूद्र अयज्ञिय होने से यज्ञ में अनधिकृत है । उन्होनें समझा कि इस यज्ञ से प्रजोत्पत्ति होती है । चूंकि यज्ञ करने का विधान तीन के लिए ही पाया जाता है । अतः यज्ञ से सम्बन्ध रखने वाला यहां का प्रना शब्द तीन र? का ही वाचक हो सकता है। अस्तु पराधिकार चर्चा का हमें कोई अधिकार नहीं। यहां हमें केवल अपना मन्तव्यप्रकाशित करने का अधिकार है।हम पक्ष को सृष्टि का प्रवर्तक समझते हैं । एवं प्रजा से सारे विश्व का ग्रहण करते हैं, साथ ही में उस विश्वप्रजा की सचा इसी य३- कर्मपरक समझते हैं । रासायनिक प्रक्रिया से दो वस्तुओं के मिलने पर जो अपूर्वभाव उत्पन्न होता है, वही यज्ञसृष्टि कहलाती है । यही सम्बन्ध-'याग' कहलाता है । यागस्वरूप- संपादक यह पजन (यह) देवपूजा, देवसंगमन, देवदान मेद से तीन भागों में विभक्त है। यज धातु के तीनों अर्थ हैं। भूतसम्बन्ध से दानयज्ञ होता है , देवसम्बन्ध से संगमनयन होता है , एवं भागसम्बन्ध से पूनाया होता है। उदाहरण के लिए वैधयज्ञ को लीजिए । वैध- यज्ञ (मनुष्यकृत श्रोत यज्ञ) में उन नित्य प्राणदेवताओं के लिए पुरोडारा की प्रादुति दी जाती है। इस पुरोटाश में भूत-प्राण दो माग है । दृश्य माग भौतिक है, एवं जिस तत्र के प्रा. धार पर पुगेडार दम्य साखरूप में प्रतिष्टित है, यह मारा है, यही देवता है । भूत पंचादपर शाम प्राकृवात्मा साईश परिपत् । है । प्राण ३३ अाया है । पुरोडाश में ३३ देवता हैं, ५ भूत हैं । इन में यजमान जिस देवता की भावना करके पुरोडाश की बाहुति देता है, पुरोडाश का वही देवता उल्यण होकर उस नित्य प्राकृतिक प्राणदे क्ता के साथ मिल जाता है । 'याववित्तं तावदात्मा' इस सिझा- त के अनुसार यजमान का भामा भी पुरोडाश में रहता है। पुरोडाश द्वारा यजमान का थामा भी उन प्राणदेवनाओं के साथ मिल रहा है । यही उन देवताओं के लिए यजमान का आत्मसमर्पण है , इसी का नाम पूजा है । दूसरे शब्दों में श्रात्मा को देवलोक में, देवता. थो के शासन में प्रतिष्ठित करना ही, अपने श्रापको उनकी आर घना के लिए भेट चढाना ही देवपूजा है । एव जो देव भाग है वट उन दाताओं से मिल जाता है। यह सगतिकरण है। बाकी बचता है भूतभाग । उसे देवता ले लेते हैं, परन्तु स्वाहा सम्म ध से । “न थे देवा अश्नन्ति न पिपन्ति, एतदेवामृत दृष्ट्वा तृप्पन्ति" के अनुसार दत्रता पितरमाण की तरह अन्तर्याय सम्बन्ध से इस पुरोडाश में प्रविष्ट नहीं होते, अपितु बाहर व्याप्त होते हैं । अतएर "वं- अन्होति-व्याप्नोति" इस व्युत्पत्ति से देवान्न 'स्वाहा' नाम से प्रसिद्ध है । खाडा बोलकर ही देवता ओके लिए याहृति दी जानी है। इसप्रकार एक यज्ञमें तीन विभाग हो जाते है। सर्वत्र तीनों हैं । अात्मा कारणशरीर है, देव सूक्ष्मशरीर है, भूत स्थूलशरीर है । प्रात्मा मनोमय है, देव प्राणमय है । भूत माडमय है। सारी वस्तुए (प्रजामात्र) मनप्राणगाड्मय है । तीनों भाग अयके तीनों में जाया करते हैं , अन्यके तीनो भाग इसमें माया करते हैं । इसी त्रिविधगज्ञात्मक आदान विसर्ग से सर प्रजाए अपने अपने स्वरूप में स्थित हैं। , १-भूतसम्बन्धात्- २-देनसम्ब धात्--- ३-श्रात्मसम्बन्धात्-पूजायज्ञ दानयज्ञ --स्थूलशरीरसम्म धी-मामय -सङ्गतिकरणयज्ञ -सूचशरीरस'मधी-प्राणमय ----कारणशरीरसम्म पी-नोमय स एप मनापावा- (उमयः, प्रादानविस- गात्मक स्थितियज्ञः हमारे अध्यामिक प्राण निरन्तर आपिदै नेक प्राणदेवताओं में आलुत होते रहते हैं, साप ही में ये प्राणदेवता हमारे में पाहत होते रहते हैं । प्रकृतिमण्डल अपने पदार्थ निरन्तर ह.

प्राक्तारमा या ईशोपनिषत् ॥ यज्ञायम . में देता रहता है, साथ ही में लेता भी रहता है । मैं उससे उत्पन्न हुया हूं । उत्पन्न होने वा- ले मुझ अन्न को वह खाता है, एवं भन्नरूप मुझे खाने वाले उसे मैं भी खाता रहता है। इसी विश्वयज्ञ का निरूपण करते हुए वेदमहर्षि कहते हैं- .. '। "अहमस्मि प्रथमजा ऋतस्य पूर्व देवेभ्योऽमृतस्य नाम । यो मा ददाति स इ देवमावत, अहमन्नमन्नमदन्तमदामि" (एतरेपवारण्यक" इस देवभाव के पारस्परिक संयोग को 'महितां संयोग.' कहा जाता है । वे देवना यहां भाते हैं, यहां के यहा जाते हैं, यह चक्र निरन्तर चलता रहता है । बस इस चक्र की सत्ता के लिए जो कर्म अपेक्षित है, वही-'यार्थ' कर्म कहे जाते हैं । हम उस का उन्डिष्ट खाते हैं, वह हमारा उच्छिष्ट खाता है । 'उन्छिष्टात् जज्ञिरे सर्वम्" (अथर्व ११।६।११) यह ध्रुव सिस्मिान्त है। उच्छिष्ट को प्रचार्य कहते हैं । इस प्रवर्यविद्या का विशद निरूपण पूर्व के-'ईशावास्यमिदं सर्वम्' इत्यादि मन्त्र में किया जा चुका है। यह पज्ञ आगे जाकर भूते-देव भेद से दो भागों में विभक्त होजाता है । विस्तार भय से इस का निरूपण नहीं किया जासकता । यहां सारे प्रपञ्च से हमें केवल यही बतलाना है कि यज्ञरूप मात्मा की स्थिति- रया के लिए विज्ञान सहकृत जो नाप्राप्त कर्म है, यह बंधन का कारण नहीं बनता । उसके न करने से उलटी हानि होती है। व्यक्तिस्थिति एवं समानस्थिति जिन कर्मों से हो ती है, यही यदापफार्म हैं। उन के प्रवर्तक थाप नहीं हैं, प्रकृति है । अतएव उन से सं- स्कार नहीं होता, सरपरक्षामान होती है । अतः इन्हें कभी नहीं छोड़ना चाहिए । सी पापकर्म को भरन्यनता बतलाते हुए भगवान् कहते हैं- । १ इस दिन का शिद विवचन मारिनभाष्य के -'यतकायन्धनोपनिषत्, नाम के प्रार मगता परिच!

प्राकतारमा ईशोपनिषत् ॥ যাখম । यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकेऽयं कधिनः । तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसनः समाचर ।। (गीता. शा) । मन की प्रधानता हटाने के लिए ही भगवान् नें-'मुक्तसंगः' कहा है। मन की इच्छा से जो कर्म किया जाता है, वह यज्ञार्य नहीं है । अपितु बुद्धि की प्रधानता से, दूसरे शब्दों में बुद्धियोग द्वारा जो कर्म किए जाते हैं, वे ही-यज्ञार्थ कर्म हैं, एवं वे अबन्धन हैं । पूर्व के निरूपण से यह सिद्ध हो जाता है कि कर्मपरित्याग सर्वया असंभव है । साथ ही में यह भी मान लेना पड़ता है कि केवल कर्म अवश्य ही बंधन का कारण है । कर्मपरित्याग- लक्षण ज्ञान भी निरर्थक है, कामनामय कर्म भी अनुपादेय है, 'काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्यासं कवयो विदुः' यही बुद्धियोग है। यहां एक प्रश्न उपस्थित होता है । मनुष्य तत्तत् कर्मों में तत्तत् फलाशा को लेकर ही प्रवृत्त होता है । यदि उसे यह विदित होजाता है कि अमुक कर्म करने से मुझे अमुक फल न गिलेगा तो वह भूल कर भी उस निरर्थक कर्म में प्रवृत्त नहीं होता। ऐसी परिस्थिति में मनोविज्ञान सिद्धान्त के अनुसार जो बात बन नहीं सकती, उसके लिए –'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' यह असंभन आज्ञा कैसे दी गई है इस के उत्तर में अभी यही समझ लेना पर्याप्त होगा कि मनुष्य की प्राप्यात्मिकसंस्था एक सीमित संख्या है। उस में ज्ञान-कर्मशक्तिर परिमित हैं । कारम्भदशा में ही यदि मनुष्य का ज्ञान कर्ममय आत्मा फल की ओर झुक जायगा तो इस की ज्ञान-कर्मशक्ति बट जायगी । श्राधा ज्ञानकर्म फल पर चला जायगा, आधा ज्ञानकर्म साध्य कर्म पर रह जायगा । परिणाम इस का यह होगा कि साध्यकर्म की सिद्धि के लिए जितना कर्म अपेक्षित होना चाहिए, उतना (फशांश में विभक्त हो जाने के कारण) न रहेग्य , कर्म अधूरा रह जायगा । इसलिए कर्ग- काल में फल की चर्बणा ( अनुभव ) में कर्म को खर्च न कर सामना कर्म में ही लोन होजा- मा चाहिए। ऐसा होने से फलाशा रखने की दशा में जो कर्मसिद्धि चिरकाल से सम्बन्ध रखती थी, अयमा जिस की सिद्धि में सन्देह था,फलाशापरित्याग से वह कर्म शीघ्र एवं अवश्य ही सफल बन जायगा । कर्म कभी व्यर्थ नहीं आता। यदि अग्नि पर पानी रक्खा जाय तो पानी परम 1 प्रातात्मा यज्ञार्यम । ईशोपनियत् । गरम हो जायगा । थाप यनन्यभार से कम करें, और फल न हो यह सर्वथा असभर है । प- रन्तु फल उपन्न करना पाप का काम नहीं हैं । बाप कर्म को सिद्ध कर दीजिए, प्राकृतिक नि- यम के अनुसार सिद्ध कर्म स्वय फल का जनक वन जायगा 1 फल पर दृष्टि रसना अनधिकार चेष्टा है । जो बल कर्मसिद्धि को सादन करने वाला है, उसे निरर्थक सर्व करना है । मार की प्राशा से पल उपन्न नहीं होता, अपि तु माप के कर्म से फलसिद्धि होती है । इसी अभि- प्राय से महर्षि चरक गें-'देतावीर्पः फल्ने नेर्पः' ( चरक स. सूत्रस्थान-इन्द्रियोप.स.सद्वत्तोर- देश)। यह कहा है। अमुक मनुष्य विद्वान् है, उस की इस विद्वत्ता से ईप्या करना युरा है । 'अपितु जिस धर्म से उसे विद्याफल मिला है, उस हेतुभूत कर्म के साथ ईया करनी चाहिए। अमुक व्यक्ति धनवान् है, इस पलेया से था मपतन होता है । जिस कर्म से यह धनिक बना है, उस फर्म के साथ ईप्या करने से अभ्युदय होता है । यही उन्नति का थन्यतम एवं सौर र मर्ग है । पल को कर्म सिद्धि का हेतु मत बनायो, अपितु फर्म को धर्म सिद्धि या हेतु सम- मो, यही वहना है। इस फलाशात्याग से एक तो कर्म भारय सिद्ध हो जायगा, पल मिलेगा, उस के श्राप भोका बनेंगे । दुमरा जो बदा भारी लाभ होगा उस का तो कहना ही क्या है । उ. प्रकार से फनाशात्यागपूर्वक यदि कर्म किया जायगा तो यह वर्म, एवं तजनितरल मा. मक्ति के कारण न बनेंगे-'बुन्निपि न निप्यने । फल मिला, उस का मापने भोग रिया, प. स्तु धासक्ति थी जननी भाशा के परित्याग से सर युद्ध करते हुए भी धाप भय भी यहसार, यही तो नियामयमयी विशेषना है। इसी रहस्य को लक्ष्य में पर भगवान् पाहते हैं कि तुसारा' पार मेपल धर्म में है। जब पन तुद्गारे अधिशार में ही नहीं तो पिर भाशा ही क्यों यारो हो । गगान् की इस उशि या कोई यह अर्थ न सममले कि जर फत की ही भाशा नही रो वर्ग में प्रकृति दी मे होगी । इस लिए भागे जायर भगान् यहने हैं-'मा पर्मफन- रेनुः-माने संगोऽरमणि' । धर्मग्न यो हेतु मत बनायो, पर्म यो शार्प गिनि यो मनो । सभी पा से मित्रना न यगे , उ भी तो धर्म ही है। उस मे । पर पीनामे कितना दे। ६० प्राइतारमा शोपनिषत् ।। प्रार्थनार्म में . एक आपत्ति का जैसे तैसे निराकरण किया गया, दूसरी आपत्ति और उपस्थित हो गई। निए ! फलाश थासक्ति की जननी है, इसलिए भी उसका त्याग करना चाहिए, एवं शक्ति- विभाग से वह कर्मसाधक कर्म की शक्ति कम करने के कारण भी छोड़ने योग्य है । साथ ही फलाश अनधिकार चेष्टा है, कर्मसिद्धि में इस की कोई अपेक्षा नहीं, यहां तक तो सब परि- स्थिति ठीक ठीक हो गई । परन्तु जो कामना कर्म की जननी है, उस के परित्याग का आदेश कैसे समव हुमा ? । कामना (इन्छा) के बिना यत्न नहीं हो सकता, फलतः प्रम्परया कामना का कर्मजनकत्व, किंवा कर्मप्रवृत्तिहेतुत्व सिद्ध होजाता है । उधर फलाशावत् कामना को श्रासक्ति की जननी बताया जाता है। ऐसी परिस्थिति में ऐसा कोई कर्म नहीं रहता जो बिना कामना, के संपन्न हो जाये । सभी कर्म सकाम हैं, अतएव कर्ममात्र ( सकाम बनते हुए ) आसक्ति के प्रवर्तक बनते हुए आवरणलप बंधन के कारण हैं । फलतः सन्यास का 'सर्वकर्मपरित्याग- लक्षणरूप सन्यास' इस किंवदन्ती पर ही विश्राम मानना पड़ता है । ऐसी दशा में 'कामना रहित हो कर कर्म करो' इस मादेश का कोई मुल्य नहीं है। इस विप्रतिपत्ति के निराकरण के लिए बुद्धि से काम लीजिए, विज्ञानात्मा की शरण में चलिए, समाधान हो जायगा । बुद्धि और मन की प्रधानता प्रधानता से इच्छा के दो रूप हो जाते हैं। मन की प्रधानता से बुद्धि की स्वतन्त्रता नष्ट हो जाती है, मनोराज्य शेष रह जाता है । मन चान्द्र सोममय होने से स्नगणक है । फलतः ऐसे मन की कामना अवश्य ही स्नेहधर्म के कारण भासक्ति की जननी है। उधर बुद्धि की प्रधानता से मन गौण बन जाता है । ऐसे बुद्धिप्रधान मन की कामना नेहमयी न रहकर बुद्धिसम्बन्ध से तेजोमयी बन जाती है । तेजतत्व प्रसंग है, मतएव तन्मयी कामना प्रसंगभावमयी बनती हुई आसक्ति की जननी नहीं बनती। यही तो बुद्धियोग है। कामना है; परन्तु कामना का जो भासक्तिभाव है, वह पुद्धि की कृपा से मृतप्राय है । ऐसी, .

माक्रवारमा समवयोग या ईशोपनिषत् | अवस्था में इस कामना का रहना न रहने के समान है, यही निष्कामकर्म है। दार्शनिक परिभाषा के अनुसार विचार कीजिए । दार्शनिकों ने इच्छा के उत्थाप्याकांक्षा उत्थिताकांक्षा भेद से दो रूप माने हैं। अपने माप उठी हुई इन्छा उत्थिकांक्षा है । प्रयास से उठाई गई इच्छा उत्थाप्याकांक्षा है। इन दोनों इच्छाओं का प्रथमखण्ड में निरूपण किया जा चुका है, अतः यहां पिष्टपेषण की यावश्यकता नहीं है । बुद्धिप्रधाना इच्छा प्रात्मेच्छा है, ई-चरेंच्छी है , यही उत्थाप्याकांक्षा है । मन यदि बुद्धि के भनुगत बन जाता है तो भामेच्छा अंधान बन जाती है, ऐसे मन की कामना अकामना है। यदि मन विषयों की ओर ही मुका रहता है तो प्रात्मेच्छा से पराङ्मुख होता हुआ, स्वस्वरूप से प्रधान बनता हुआ काममय बन. जाता है । यही कामना बंधन का कारण है । निष्कामकर्म में इसी कामना । परित्याग का यादेश है। ब्रह्म-कर्म दोनो श्रात्मा के स्वरूप हैं । कर्म करो-ब्रह्मार्थ, कभी बंधन न होगा । निवृत्ति- कर्मरूप अविधा द्वारा आत्मा पर भाया हुआ मृत्युरूप कर्मसंस्कार हट जायगा, अमृतात्मा का साक्षात्कार हो जाया । मृत्युरूप कर्म-(संस्काररूप कर्म-समुद्र का तरण निवृत्तिवर्मरूपा अविया से ही हो सकता है-'न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैकेऽमृतत्वमानशुः' इत्यादि में कर्म शब्द काम्यकर्म का ही वाचक है । त्याग शन्द से कामना का परित्याग ही अभिप्रेत है। कामना का त्याग ही तो वास्तविक त्याग है । कर्म छोड़ दिया, कामना यनी रही, यह तो परि-- त्याग नहीं प्राण है । निष्कर्ष यही हुमा कि मध्यस्प विज्ञानात्मा में विद्या--अत्रिया (कर्म) दोनों हैं। दोनों स्वतन्त्र होकर युरे हैं । मिलकर बंधन को हटाने में समर्थ हैं । इन दोनों के समर- माव से अव्यय के दोनों भाग समता को प्राप्त हो जाते है । यह समत्व ही सच्चा बुद्धियोग है, समत्व ही शान्ति है , शान्ति ही मारमानन्द है । ३०२ माहवारला ईशोपनिषत् ॥ उपसंहार . इस प्रकार हमारा यह तृतीय अधिकरण (पिपयक्रमानुसार चतुर्थ अधिकरण) विद्या- भविद्यात्मक सूर्य का,एवं तदेशभूत विद्या विद्यात्मिका बुद्धि का स्वरूप बतलाता हुश्मा,दोनों की समष्टिरूप बुद्धियोग का ही उपदेश देता है । श्रुति को अध्यात्म-घधिदैवत दोनों संस्थाथों का स्वरूप बतलाना अमीष्ट पा, अतएव उसने दोनों के ( सूर्य और बुद्धि के) सामान्यधर्मों सम्बन्ध रखने वाले 'विद्या-अविद्या' शब्दों का ही प्रयोग किया है। विद्या-अविवारमक विज्ञानात्माधिकरण समाप्त हुया, अब कमप्राप्त संभूति-असंभूत्यात्मक प्रज्ञानात्माधिकरण की भोर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । से इति-विज्ञानात्माधिकरणम्- -- -

भाकृतात्माधिकरणे-
विज्ञानात्माधिकरणं समाप्तम्
३

মুনি
पूर्णमदः
चन्द्रमाः
प्रज्ञानवैभव ४-प्रज्ञानात्मा
अधिदैवतम्
यापारमम्
ब्रह्मसत्यातरः-
-
सम्भूति-असम्भूतिमयःप्राकृतात्मा चन्द्रमाः
प्रज्ञानात्मा
३
चन्द्रमा:-
प्रज्ञानात्मा
(प्राकृतात्माधिकरणे प्रज्ञानात्माधिकरणं चतुर्थस् )
ब्रह्मस्वेदवेदावच्छिन्नः-सम्भूति-असम्मतिमयात्मा
यज्ञसञ्चालकः
१-अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते ।
ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्यां रताः ।।
२-अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसंभवात् ।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तदिचत्रतिरे ।।
३-सम्भूतिं च विनाशं च यस्तदेदोभयं सह ।
विनाशेन मृत्यु तीली सम्भूत्याऽमृतमश्नुते ।।
( ईशोपनिषत् १२-१३-११-०)

प्रज्ञानात्मस्वरूपनिदर्शन- १- यजाग्रतो दरमुदति देवं तदु सुप्तस्य तथैवैति ॥ दरगमं ज्योतिपां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ॥ (यजु.३४.१) । २- यत् प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्जोतिरन्तरमृतम्मजासु ॥ यस्मान्न त किश्चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ॥ (३४४२)। ५० येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत्परिगृहीतममृतेन सर्वम् । येन यज्ञस्तायते सप्त होता तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।। (३५॥३) । P- अमीय ऋता निहितास उचा नक्तं ददृशे कुह चिदिवयुः । अदब्धानि वरुणस्य व्रतानि विचाकञ्चन्द्रमा नक्तमेति ॥ (अक्.१।२४।१०)। १. चन्द्रमा अप्वन्तरा सुपर्णो धावते दिवि ॥ न यो हिरण्यनेमयः पदं विन्दन्ति विशुतो वित्तं मे अस्य रोदसी ॥ (१।१०।१।। 1- नवो नवो मवति जायमानोऽहां केतुरुपसामेसनः ॥ भागं देवेभ्यो विदघासायन् प्र चन्द्रमा स्तिरते दीर्घमायुः ॥ (ऋ. १०/८५१९) चन्द्रमा मनसो जातः (यजुः ३१।१२) ६- चन्द्रमा मे मनसि स्थित" (. ग्रा. ३।१०८५ ) । ९- तथत्तमनश्चन्द्रमाम्सः (० उ० ११२८५) ॥ १४- मनो मे, रेतो मे, प्रजा में पुनः सम्भूतिमं तन्मे त्वयि (चन्द्रमसि) । (जै. उ. २२७१४)। ११- पतन्मन भासीद, स चन्द्रमा प्रभवद । (जै० उ० २।२।२) । ।

अधिष्ठाता है । प्रत अधिकरण तीन मन्त्रों से इसी का निरूपण करता है। ॥ श्रीः॥ भूयोर्मध्ये ललाटे तु नासिकायास्तु मूलतः । जानीयादमृतं स्थानं तद् ब्रह्मायतनं महत् ॥१॥ आकाशमण्डलं वृत्तं देवताभ्य सदाशिवः । नादरूप ध्रुवोर्मध्ये मनसो मण्डलं विदुः ॥२॥ विपंचपति सूर्योऽसौ सवसमृतमुन्मुखः ।। तालुमुले स्थितमंन्द्रः मुंधां वर्षअधोमुखः ||३|| चिचे चलति संसारो निश्चलं मोक्ष उच्यते । तस्माञ्चित्तं स्थिरीकुर्याद प्रज्ञया परया विधे ॥४॥ चित्तं कारणमर्धानां तस्मिन् सति जगत्त्रयम् । तस्मिन् क्षीणे जगद क्षीणं तचिकित्स्य मयत्नतः ॥५॥ मनोरं गगनाकारं मनोऽहं सर्वतोमुखम् ।। मनोऽहं सर्वमात्मा च न मनः केवलः परः ॥६॥ मना कर्माणि जायन्ते मनो लिप्यति पातकः । मनश्चेदुन्मनीभूयान पुरायं न च पातकम् ॥७॥ मनसा मन पालोक्य वृत्तिशून्यं यदा भवेत् । ततः परं परब्रह्म दृश्यते च सुदुर्लभम् ॥८॥ मन एत्र हि विन्दुश्च उत्पत्ति-स्थितिकारणम् । मनसोत्पद्यते विन्दुर्यथा तीरं घृतात्मकम् ।।६।। । र्मदा के सभी कईर नर्मदेश्वर शङ्कर, शालग्राम के सभी ककर शालग्राम । इसी प्रकार ईश्वर प्रजापति के सभी पर्व ईश्वरप्रजापति । समष्टिरूप से भी वही सर्वता, व्यष्टिरूप से भी वही सर्वता । अंग-अंगी दोनों समानधर्मा । 'ग्री- वेदं सर्वम्' । ईश्वरप्रजापति का तीसरा पर्व ( सूर्य ) जहां विद्या-अनिद्यात्मक है, वहा यह चौया पर्व (चन्द्रमा ) सम्भूति (उत्पत्ति ) और असम्भूति का ३०७ अमावास्या । ईशोपनिपत् ॥ प्राकृतात्मा - सृष्टिक्रमानुसार सूर्य के अनन्तर पृथिवी है, सर्वान्त में चन्द्रमा है । परन्तु अध्यारमसंस्था की दृष्टि से चन्द्रमा सूर्य एवं पृथिवी के मध्य में प्रतिष्ठित है । पार्थिव प्रजा पर सूर्य एवं पृथिवी के मध्य में रहने वाले कृष्णपक्ष के अधिष्ठाता चन्द्रमा का हो अनुपह होता है । जत्र चन्द्रमा पृत्रिी के इस ओर जाता है तो ऐसी अवस्था में चान्द्रसोम का सौर इन्द्र के साथ सम्बन्ध होजाता है । शुक्लपक्ष में, विशेषतः पूर्णिमा में सारा चान्दसोम सौर सावित्राग्नि में हुत रहता है । इस शुक्लपक्षावच्छिन्न चान्द्रसोम का पृषिमी पर आगमन नहीं होता । पृथिवी के चारों ओर घूमने वाला चन्द्रमा जब पृथिवी के उस ओर (सूर्य की ओर) भागाता है तो चन्द्रमा का दृश्य भाग पृथियों की ओर अनुगत रहता है । फलतः यहां सौर रश्मिएं नहीं पहुंवने पाती । इस काल में (कृष्ण पक्ष में), विशेषतः अमावास्या में चान्द्रसोम प्रभूतमात्रा से पृथिवी पर भाकर भोपवि-वनस्पतियों में प्रविष्ट हो जाता है । यों तो पूरे कृष्णपक्ष में ही चान्द्रसोम पृथिवी पर श्राता रहता है, परन्तु जब चन्द्रमा ठीक सूर्य और पृथिवी के मध्य में जाता है तो सोम सत्मिना पृथिवी पर या जाता है । यही सूर्येन्दुसंगमकाल 'ममावास्या' नाम से प्रसिद्ध है । इस दिन चान्दसोम पार्थि र अग्नि साय निवास काता है, अतएव यह तिथि 'अग्मिना-प्रमा (सह) वसति (सोपः) इस व्युत्पत्ति से अमावास्या नाम से प्रसिद्ध है । इस अमासोम में सन्तानन्त्रपवर्तक पितरमाण प्रबुद्ध रहता है, अतएव अमावास्या विकृतिथि कहल.ती है । सोम के साथ पितर प्राण भी श्रोपथियों में प्रविट होजाता है । ओपधिर ही पुरुषाग्नि में हुत होकर शुक्ररूप में परिणत होती हैं । पितरप्राणावच्छिन्न शुक्र की योपिदमि में आहुति होने से प्रजोत्पत्ति होती है । शुक्रगत इसी पितरप्रास के सगिन्धन के लिए अमावास्या में दर्शेष्टि की जाती है । कहना यही है कि जब चन्द्रमा सूर्य एवं पृथिवी के मध्य में आता है, तभी वह अध्यात्मसंस्था का उपकारक बनता है | कृष्णपक्ष ही सोम का प्रादानकास है, इसी रहस्य को लक्ष्य में रख कर याजिश्रुति कहती है- "इन्द्रो ह यत्र त्राय वन पजहार-सो ऽवलीयान मन्यमानो नास्तुपीतीन विभ्यन्निलयाचके । स पराः परावतो जगाम । तपन्चेष्टुं दघिरे । भगिर्दै ३०८ प्राकृतात्मा - ईशोपनिषत - प्रमावाला - वताना, हिरण्यातूप ऋषीणां, बृहती छन्दसाम् । तमगिरनु विवेद । तेनैतां रात्रि सहाजगाम । ते देवा भवन-ममा वै नोऽध वसुर्वसति ।। 4. x + । ते देवा अब्रुवन्-न वा इममन्यत् सोमादिनुयात् । सोममेवामै सस्भरामति । तस्मै सोमं समभरन् । एप वै सोमो राजा देवानामन्नं यचन्द्रमाः ।स यत्रैप एतां रात्रि न पुरास्तान पश्चाइदेश, तदिमं लोकमागच्छति । स इहै- चापश्चौपधीच मविशति । स वै देवानां वसु, अन्न होपाम् । तद्यदेप एता रात्रिमिहामावसति-तस्मादमावास्या नाम" । (शत० वा. १६६१-५ )। "जिस समय इन्द्रनें वृत्रासुर के लिए (वृत्रासुर पर) बज्र फैंका-(उस समय) इन्द्र अपने आप को (चयप में असमर्थ समझते हुए) दूर से दूर भाग गए । तात्पर्य यह हुथा कि इन्दने थांख मीच कर वृत्रासुर पर वन फैंकने को तो फैंक दिया, परन्तु उन्हें यह विश्वास न था कि मेरे वन से वृत्र मारा ही जायगा । फलतः वप्रहार कर वृत्र के फिर बचकर प्रहार करने के भय से इन्द्र बड़ी दूर निकल गए । (कि इन्द्र देवता, ऋपि, छन्द आदि के अध्यक्ष थे, अतः उनके गुम हो जाने पर) इन्हें (देवताओं ने) ढूंढना प्रारम्भ किया । (ढूंढने के लिए) देव- ताओं की ओर से अग्नि गर, ऋषियों की ओर से हिरण्यस्तूप गर, एवं छन्दों में बृहती गया । अन्ततः अग्निन इन्द्र को ढूंढ निकाला । इस प्रति के साथ यह इन्द्र इरा (अमावास्या) रात्रि में लौट पाए । (अग्नि के साथ इन्द्र को लौट आया देखकर) देवता आपस में कहने लगे कि श्रान अपना यह (वसु बहुमूल्य निधिरूप इन्द्र) अग्नि के साथ निवास कर रहा है । - । चूंकि वृनयधर्म में इन्द्र की शक्ति क्षीण होगई थी, इसलिए देवताओंनें बल- प्रदान के लिए यह निश्चय वित्या कि] सोम के अतिरिक्त दूसरा पदार्थ इन्द्र तृप्त नहीं कर सकता । अपन इन्द्र के लिए सोम का ही सम्भरण करें । फलतः देवताओंने इन्द्र के लिए सोम प्रदान किया। यही वह सोमराजा देवताओं का मन्न है, जो कि अाकाश में प्रत्यक्ष दृष्ट यह चन्द्रमा है । यह जिस रात न पूर्व दिखलाई देता, न पश्चिम, उस रात्रि में वह इस लोक । ३०६ है । रसप्रधान स्नेछ, बलप्रधान तेज इन दोनों शब्दों के लिए क्रमशः रवि-भागा शब्द नियत है। व्यताव्यक्त परमेष्ठी का रसप्रधान रयिरूप स्नेहभाग ही धागे जाकर (वेदामि के सम्बन्ध से) विद्यारूप में परिणत होता है, एवं वलप्रधान प्राणरूप तेजभाग ही आगे जाकर अविधा वयम्भृ' कहा जाता है। यही गायत्रपुरुष का तीसरा पर्व, किंवा तीसरा प्रक्षर है । रसम- घाना स्थिति, बलप्रधाना गति इन दोनो शब्दों के लिए क्रमश. अनिरुक्त-निरुक्त शब्द नियत पाहतारमा सा ईशोपनिपत् ॥ गायत्रपुष्प गायत्रपुरुप का पहिला पर्व रस-बलरूप है, यही मूलपूर्व है । रस - सत् है, चल असत् है । असद्बलयुक्त सद्स की समष्टि ही पहिला पर्व है । इसी प्रथमपर्व को परात्पर कहा जाता है (देखिए ई. वि. प्र. सं.२५५ पृ.) । धागे के सात पर्य इसी प्रथम पर्व का विकास है । परात्पर का रसभाग मायाकृत अन्तश्चिति से आनन्दविज्ञानमनोमय बनता हुश्रा 'अमृत' नाम से, एवं बलभाग मायाकन वहिचिति से मनमाणबाड्मय बनता हुमा 'मृत्यु' नाग से प्रसिद्ध हो जाता है । रस का प्रथम विकास अमृत है, बल का प्रथम विकास गृायु है । रस. बलशब्द जहां परापरतत्र के लिए नियत है, यहां अमृत-मृत्युशन्द मायोपाधिक पुरुपवियर्स के लिए नियत हैं । बैसे परात्पर की रस्-नल कला सत्-प्ररात् नाम से प्रसिद्ध हैं, एवमेव पुरुष की उक्त दोनों कलायों के लिए क्रमशः विद्या-कर्म शब्द नियत है। अमृत-मृत्युरूप विचा- कर्म की समष्टि यह पुरुप (पोडशीपुरुष) उस गायत्रपुरुष का दूसरा पर्व, किंवा दूसरा प्रज्ञर है । पुरुष का रसमधान विद्यामय अमृत-भाग ही आगे जाकर 'स्थिति' रूप में परिणत होता है, एवं बलप्रधान कर्ममय मृत्युभाग ही मागे जाकर 'गति' रूप में परिणत होता है । स्पिति- गति उस रस-बत का द्वितीय विकास है । यही विकासायस्या 'वेद' नाम से प्रसिद्ध है, इसे ही हैं । अव्यक्त स्वयम्भू का रसप्रधान अनिरुक्त स्थितिभाग ही प्रागे जाकर स्वेहरूप में परिणत होता है, एवं बलप्रधान निकाल जाप में परिणत होता है । यह रमेह-तेज उस रस-यल का तृतीय विकास है । यही विकासावस्या 'सुवेद' नाम से प्रसिद्ध है, नाम से 'व्यवहन होता है । गायत्रपुरुष का यही चौथा पर्व, किंवा चौया अक्षर - यही परमेष्ठी' . रूप में परिणत होता है । यह विद्या-अविया उस रस-बल का चतुर्प विकास है । यही ३११ 1 प्राकृतात्मा । "जीवपुरुष में हैं । केवल स्वयम्भू श्रादि के नामों में अन्तर है। इस प्रकार एक ही रस-अल -ड। ईशोपनिषत् । गायत्रपुरुष विकासावस्या 'हिरण्यगर्भ' नाम से प्रसिद्ध है । इसी को सूर्य कहा जाता है । गायत्रपुरुष का यही पांचवा पर्व, किंवा पांचवा अक्षर है । रसप्रधाना विद्या, बलप्रधाना अविद्या इन दोनों शब्दों के लिए क्रमश: ज्योति-तम शन्द नियत हैं । व्यक्त सूर्य का रसप्रधान ज्योतिर्मय विद्याभाग ही आगे जाकर सम्भूति रूप में परिणत होता है, एवं बलप्रधान तमोमय विद्याभाग ही आगे जाकर असम्भूति (विनाश) रूप में परिणत होता है । यह संभूति एवं असम्भूति उस रस-बल का पांचवां विकास है । यही विकासावस्था 'विचक्षण' नाम से प्रसिद्ध है, इसी को 'चन्द्रमा' कहा जाता है। गामापुरुष का यही६ठा पर्व,किंवा ६ठा अक्षर है । रसप्रधाना संभूति, वलप्रधाना असम्भूति इन दोनों शब्दों के लिए क्रमशः उत्पत्ति-जय यह दो शब्द नियत हैं । मर्य चन्द्रमा का रसप्रधान उत्पत्तिमय संभूतिभाग ही आगे जाकर ज्ञानरूप में परिणत होता दुधा सर्वज्ञ नाम से व्यवदत होता है, एवं बलप्रधान लयरूप असम्भूतिभाव ही आगे जाकर अर्थरूप में परिणत होता हुया विराट् नाम से प्रसिद्ध होता है । इन दोनों के मध्य में एक तीसरे क्रियामय हिरण्यगर्भ तत्व का विकास और होता है । ज्ञानमूर्ति सर्वज्ञ, क्रियामूर्ति हिरण्यगर्भ, अर्थमूर्ति विराट् की समष्टि ही देवसस' नाम से प्रसिद्ध है । इस की प्रतिष्ट्रय अमृता पृथिवी है । यह उस रसबल का ६ ठा विकास है । गायत्रपुरुष का यही ७यां पर्व, किंवा ७ वां अक्षर है । अग्निमृत्ति देवसस के रसप्रधान ज्ञानभाग से आगे जाकर देवता का विकास होता है, एवं बलप्रधान अर्थमाग से भूत का विकास होता है । यह 'देवता' (प्राण) 'भूत' उस रस-बल का सातवां विकास है । यही विकासायस्था 'भूपिण्ट' नाम प्रसिद्ध है । गायत्र पुरुष का यही ८ यां पर्य, किंवा = वां अक्षर है । रसप्रधान देवता, या प्रधान भूत इन दोनों शब्दों के लिए क्रमशः अमूर्त-मृति-शब्द नियत हैं । यही आठों पर्व बल चितितारतम्प से उक्त भार रूपों में परिणत होजाता है । यही तो उस मा का महायचा महामन्य है।

प्रतिप्राण प्राकृतास्मा ईशोपनिषत् ॥ उक्त गायत्रपुरुष-तालिका से पाठकों को विदित हुआ होगा कि चन्द्रमा ही सम्भूति और विनाश का कारण है । चन्द्रमा से पहले सूर्य, सूर्य से पहिले परमेष्ठी की सम्भूति (उत्पत्ति) हो- जाती है । भूपिण्ड सूर्य का उपग्रह है । सान्त में भूपिण्ड से चन्द्रमा का जन्म होता है, शत- एव पृथिवी सूर्य का उपमह कहलाती है, एवमेव चन्द्रमा पृथिवी का उपमइ कहलाता है । पृ- थिवी में रहने वाला सूर्यविरोधी, पारदर्शकता का प्रतिबन्धक धामच्छद प्राण 'अत्रि' नाम से प्रसिद्ध है । यह प्राण वाकप्रधान है, एवं वाक्तत्व भावरण का जनक है । फलतः बाङ्- मय अत्रिपाण का भी पावरकत्व सिद्ध होजाता है । भूपिण्ड अपनें अक्ष पर घूमता हुआ इस स्वातपरिभ्रमण से दैनंदिनगति का (अहोरात्र का ) वरूप संपादन करता हुआ, सूर्य के चारों भोर अपने नियत क्रान्तिवृत्त पर घूमता हुधा संवत्सरगति (याधिक गति) का अधिष्टा- ता बन रहा है । प्रबलवेग से घूमते हुए भूपिण्ड के साथ सहस्रांशु सूर्य के अग्नि का सम्बन्ध होता रहता है। इस सौर अग्नि के ताप से पार्थिव वाङ्मय अन्त्रिमाण ( पार्थिववाङ्मप अग्निरस) द्रुत होता रहता है । पिघला हुआ यह अत्रिप्राण भूपिण्ड के साथ साथ ही भूपिण्ड से संलस रहता हुश्रा घूमना रहता है । ऐसी तीन परिक्रमात्रों के अनन्तर बह द्रुत पत्रिप्राण (अग्निरस ) सोमरूप में परिणत होजाता है । सौर अग्नि से परितप्यमान यह सोमभाग अत्रि- नेत्र से यह कर घनीभूत होता हुआ चन्द्रपिण्डरूप में परिणत होजाता है । बात यह है कि अत्रिशरीर का जितना अंश सोमरूप में परिणत होजाता है, वह उस पार्थिव वाङ्मय, श्रतएव धन अत्रि की अपेक्षा हलका बन जाता है । हलका बनते ही यह ण- र्थिव अत्रि से पृथक् होकर चारो ओर दिशाओं में ऋतरूप से व्याप्त होता हुआ पृथिवी की श्रोर ही अनुगत होने लगता है | पन्तरिक्ष में हिरण्यगर्भ ब्रह्मा नाम से प्रसिद्ध वायु चन्द्रकक्षा धरातल पर ( वायु में इतस्ततः ) व्याप्त सोमपरमाणुओं को एककालापच्छेदेन समेट कर उन्हें पुजीभूतं बना डालता है। वायु का यह पिण्डसम्पादनव्यापार पृथिवी की २१ १- रिक्रमा पर समाप्त होता है | अथात् भूपिण्ड के चारों ओर घूमते हुए सोमपरमाणु क्रमशः घन होते होते बायुव्यापार से पृथिवीं के २१ परिक्रमण के अनन्तर दरपमान चन्द्रपिण्ड रूप में परि- ।

प्राकृतात्मा
ला। ईशोपनिषत् ॥
यात्रिमाए
-
रात होते हैं । यही पिण्ड पृथिवी के चारों ओर ग्रुधरातल में घूमता हुआ दिखलाई दे रहा है।
दिन में सूर्यकिरणों द्वारा पार्थिव पानी याप्परूप में परिणत होकर यन्तरिक्ष धरातल में व्याप्त
होजाते हैं, वही पानी रात्रि में सूर्य के प्रभाव से फिर पृथिवी की ओर (ोस रूप से) गिार्ने
लगते हैं । यही अवस्था सोम के सम्बन्ध में समझिए । सोम अन्तरिक्ष में जाकर पुनः पृथिवी
पर गिरना चाहता है, परन्तु यज्ञवराह नाम से प्रसिद्ध उसी वायु से (देखिए ई०वि०ख०अव्य-
तारमाधिकरण७४पृ.)वेरित होकर पिण्डरूप में परिणत होता हुआ निगृहीत होजाता है । जिस
प्रकार आकाश में इतस्ततः व्याह केतु (अग्निपुञ्ज। क्रमशः पिण्डीभूत बनकर सूर्यरूप में परि-
णत हुए हैं-(देखिए ई०वि०सं० २३३पृ.), एवमेव इतस्ततः फैले हुए पार्थिव सोन.खण्ड ही
क्रमशः पिण्डीभूत होकर चन्द्ररूप में परिणत हुए हैं । इसी चन्द्रोत्पत्ति रहस्य को लक्ष्य में रख
कर पुराण कहता है-
पिता सोमस्य वै विमा जलेऽनिर्भगवानृषिः ।
काटकुण्ड्यशिलाभूत जवाहुमहाद्युतिः ॥२॥
मुदुश्चरं नाम तपो येन तप्तं महत् पुरा।
त्रीण वर्पसहस्राणि दिव्यानीति ह नः श्रुतम् ॥गा
तस्योरेतसस्तत्र स्थितस्यानिमिपस्य हि ।
सोमचं तनुरापेदे महाबुद्धिः स वै द्विजः ॥३॥
ऊर्यमाचक्रमे तस्य सोमवं भावितात्मनः ।
नेत्राभ्यामत्रवत् सोमो दशधा प्रोतयन दिशः ॥४॥
यदा न धारणे शक्तास्तस्य गर्मस्य ता दिशः।
ततः सहाभिः शीतांशुनिपपात वसुन्धराम् ॥५॥
पतन्तं सोममालोक्य ब्रह्मा लोकपितामहः ।
रयमारोपयापास लोकानां हितकाम्यया ॥६॥

गायत्रपुरुषपरिलेख अष्टाक्षराव गायत्री-ईश्वरफुलफोगायत्रजीवरुपोगायत्र: १-सः (सत्) २-बलम् (अस) परात्परः -परात्परः २- १-अमृतम् ( विद्या) २-मृत्युः (कर्म) षोडशीपुरुषः ----पोडशीपुरुषः १-स्थितिः (अनिरुतः) २--गतिः (निरुक्तः) स्वयम्भूः अव्यक्तात्मा 0- १-स्नेहः ( रयिः) २-तेजः (प्राणः) • परमेष्ठी - महानात्मा सूर्यः विज्ञानात्मा -- १-विद्या ( ज्योतिः) २-अविद्या (तमः। - प्रज्ञानात्मा ---- १-संभूतिः (उत्पत्तिः) २-विनाशः (लयः) 'चन्द्रमाः -. ७- --भोक्तासुपर्णः १-ज्ञानम् (ब्रह्म) २-अर्थः (कर्म) सात्तीसुपर्णः -- १-देयताः (अमूर्तम् ) २-भूतानि ( मूर्तम् ) भूपिण्डम् • शरीरम् किया । हमने सुना है कि तीन हजार दिव्य वर्ष पर्यन्त लों अत्रिन वह उग्र तप किया। सर्वया निश्चेष्ट एकाग्र रूप से स्थित ऊध्वरेता उन अषि महर्षि का शरीर महाबुद्धिशाली घालण सोमरूप में परिणत होगया । सोम की भावना करने वाले अत्रि महर्षि का वह सोम ऊपर की जब दिशाएं उस गर्मीमूत सोम को धारण करने में समर्थ न होसकी तो वह शीतांशु सोम पृथिवी की ओर गिरने लगा। सोम को पृथिवी कीभोर गिरता हुया देखकर मझाने उसे लोकक- क्रमा करवाई। गिरते हुए सोम का जो प्रवृद्ध भाग पृथिवी में गिर गया, उससे प्रोषधिएं उत्पन्न सोम जगत् के पोष्ठा है । वेदविदों में श्रेष्ठ,ब्रह्मानें चन्द्रमा को राज्य का अधिष्ठाता बनाया, मो. शकतात्मा -सा ईशापनिषत् । - বিমা स तेन रथमुख्येन सागरान्तां वसुन्धराम् । त्रिःसप्तकृत्वो ऽतिशयशावकाराभिमदक्षिणाय ॥७॥ तस्य यद्धितं तेजः पृथिवीमन्वपयत । ओषध्यस्ताः समुद्भूनास्तेजसा जनयंत्युत् ॥८॥ वाभिः पुष्णात्पर्य लोकान् प्रजाश्चापि चतुर्विधाः । पोष्टा हि भगवान सोमो जगतो हि द्विजोत्तमाः ॥८॥ ततस्तस्मै ददौ राज्यं ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः । कोजीपधीनां विप्राणापांच दिनसत्तमाः ॥१०॥ [ ब्रह्माण्डोपोद्धात ] "हे ब्राह्मणो | एक बार सोम के पिता भगवान् अत्रि ऋषिनें यज्ञ किया । ( यज्ञसिद्धि के लिए) पुरायुग में ( चन्द्रसृष्टि के बारम्भकाल में ) महातेजस्वी अत्रि महर्षिने अपने हाथों को ऊंचाकर, शरीर से स्पिर पाषाण की प्रतिमा समान बनकर 'सुदुश्वर' नाम का बड़ा उन तप ओर उठा, नेत्रों से सोमरस बह निकला, उसने दसों दिशाओं को प्रकाशित कर दिया । ल्याण के लिए अपने रस में बैठा लिया । रय में बैठा कर नझाने २१ बार उसे भूपिण्ड की परि- हुई । इन्हीं ओपधियों में चन्द्रमा चतुर्विध प्रजा का पोपण करता है । है. हिजश्रेष्ठो । भगवान् घधि और ब्राह्मणों का अधिपति बनाया-' । -'सोमोऽस्माकं ब्राह्मणा राजा"। ३१५ স্থগিমা प्राकृवात्मा । ईशोपनियत् ।। उक्त थाख्यान समानरूप से आधिदैविक (प्राकृतिक) एवं आधिभौतिक ऐतिहासिक) चरित्र का निरूपण करता है । भौम ब्रह्माने अत्रि महर्षि के पुत्र चन्द्रमा का राज्याभिषेक कर इन्हें उत्तरदिशा का दिपाल बनाया था, एवं सोम और ब्राह्मणों का लोकपाल बनाया था। आगे जाकर गुरुपत्नी तारा के अपहरण से भ्रष्टमति चन्द्रमा की उदासीनता से असुरों द्वारा यमसाधक सोमवृक्ष [सोमबल्ली] का समूल विनाश हुया । इसप्रकार गन्धर्वनगराधिष्ठाता चन्द्रमा की कृपा से भौमदेवर्ग सदा के लिए उन्छिन्न होगया । इसीलिए असुरसम्प्रदाय वाले नाज भी अपने धार्मिक कृत्यों में चन्द्रमा को ही प्रशनता देते हैं। इसी प्रकार महाभारत में भी चन्द्ररूप में परिणत अत्रि द्वारा ही अन्धकार की निवृत्ति मानी गई है, जैसा कि बादरायण कहते हैं- इत्युक्तस्त्वर्जुनस्लूणीमभृद्वायुस्तमप्रवीत् । शृण में हैहपश्रेष्ठ ! कात्रेः सुमहात्मनः ॥ १।। घोरे तमस्ययुध्यन्त संहिता देवदानवाः । अविध्यत गरेस्तत्र स्वभानुः सोममारकरी ॥२॥ अय ते तमसा प्रस्ता निहन्यनेम दानवः । देवा नृपनिगाल ! सहर पलिभिस्तदा ॥३॥ अमुरर्वध्यमानास्त क्षीगणमाणा दिवौकसः। अपरयन्त तपस्यन्तमत्रि विमं तपोधनम् ॥ ४ ॥ अपनपावन देवाः गान्तमायं नितेन्द्रियम् । भाररिपुमिक्दिो चन्द्रादित्यादिमायुमौ ॥ ५॥ वपं पायामहे चापि गत्रुभिस्तमसाटते ।.. 'नापिगावाम गानि च भपात्यायव नः मभोः ॥४॥ , .

कर) अनि कहने लगे-हे देवतायो ! तुम्ही बतलायो, में विस उपाय से तुम्हारी रक्षा करू। देवता कहने लगे,हे महर्षे ! भाप चन्द्रमा पन जाइए, एवं मंधकार का नाश करने वाले सूर्य प्राकृतारमा वा ईशोपनिषत् ॥ प्रतिमाए arvwwwwwwwwwww - अत्रिस्वाच कथं रक्षामि भवतस्तेऽनुवश्चन्द्रमा भव । तिमिरम्नश्च सविता दस्युहन्ता च नो भव ॥ ७ ॥ एमुक्तस्तदात्रि तमोनुदभवच्छशी ॥ अपश्यत् सौम्यभावाच सोमवत् प्रियदर्शनः ॥८॥ दृष्ट्वा नातिममं सोमं तथा सूर्य च पार्थिव । प्रकाशमकरोदत्रिस्तपसा स्वेन सयुगे ।। ६॥ जगद्वितिमिरं चापि मदीप्तमकरोत्तदा ॥ १० [ महाभारत अनु. पर्य. १५७ श.] । + "यह सुनकर अर्जन चुप होगया । वायु नें (पुन ) कहा कि हे हैहयवश में श्रेष्ठ ! तुम (ब) गशाम यो में सुप्रसिद्ध अनि का कर्म (चरित्र) सुनो । ( एकबार ) घोर अन्धकार में देव- दाना (देवता और असुर) एक स्थान पर सम्मिलित होकर युद्ध करने लगे । ( उस युद्ध में ) वर्भानु नाम के राहु नें सेंकडों तीरों से चन्द्रमा और सूर्य का शरीर चलनी बना डाला । हे राजाओं में श्रेष्ठ ! इस प्रकार उन महा बल तान् दानवो से पीडित वे देवता उस घोर अधकार से घिर गए । उस समय भासुरों से संत्रस्त वे देवता सर्वपा जज्जरित होगए। ( उसी श्रासर में) उन क्षीणकाय देवतओं में (एक स्थान पर) तपस्वी अत्रि को तप करते हुए देखा । सर्वथा शातमूर्ति एवं जितेन्द्रिय अपि से देवता (विनय पूर्वक) कहने लगे कि (हे महर्षे !) इस युद्ध में सूर्य और चन्द्रमा प्रसुरों द्वारा तीरों से बाँध डाले गए हैं । (आज हम सचमुच ) इस घोर धन्धकार में इन शत्रुओं से मारे जायगे । हमें इस समय जरा मी शान्ति नहीं है । हे प्रभो । आप (ही इस समयो इस भय से हमारी रक्षा कीजिए । (देवताओं की यह कातर प्रार्थना सुन अत्रिपाण प्राकृतात्मा - ईशोपनिषत् ॥ - बन जाइए । इउ प्रकार सूर्य चन्द्रमा बन कर आप इन दस्युओं के नाश का कारण वनिए । देवताओं से यह सुनकर अत्रि (तत्काल) अन्धकार दूर करने वाले चन्द्रमा बन गए । एक सोम्य- भाववत् सुन्दर बच्चे की तरह दीखने में सुन्दर उस चन्द्रमा को अत्रिने देखा । हे राजन् उस चन्द्रमा और सूर्य को अधिक प्रकाशयुक्त न देख कर उस युद्ध में अपनें तपोबल से अत्रि ने उन दोनों में अधिक प्रकाश कर दिया । इस प्रकार अधि में अपने तपोबल से संसार को अन्धकार शून्य कर दिया, सर्वत्र उजाला कर दिया। इतिहास के साथ साथ उक्त पौराणिक आख्यान में गहन विज्ञान भी छिपा हुआ है, कि निरूपण विस्तार भय से प्रकृत में नहीं किया जासकता । इन पौराणिक आख्यानों के मूल श्रौत श्राख्यान ही हैं । प्रायः इसी से मिलता जुलता आख्यान खयं संहिता में, एवं ब्राह्मण में भी उपलब्ध होता है। देखिए- १-यत्त्वा सूर्य स्वर्भानुस्तमसाविध्यदासुरः । अक्षेत्र विद्यथा मुग्धो भुवनान्यदीधयुः ॥ २-स्वर्भानोरथयदिन्द्र माया अबो दियो वर्तमाना अवाहन । गूळ्हं सूर्य तमसापनतेन तुरीयेण ब्रह्मणाविन्ददतिः ।। ३-प्राणो ब्रह्मा युयुजानः सपर्यन् कीरिणा देवान्नमसोपशिक्षन । अत्रिः सूर्यस्य दिवि चक्षुराधात् स्वर्भानोपमाया असुक्षत् ॥ ४--यं वै सुप खानुस्तमसाविध्यदासुरः अत्रयस्तमन्वविन्दन नबन्ये अशक्नुवन् ।। (ऋक् सं० ५०१8०१५-६-८५)। १-"खर्भानुई वाऽप्रामुरः सुर्य तमसा विव्याध । स तमसा विद्वो न व्य* रोचत, तस्य से मारुद्रौ-एवैतचमोऽपाहताम् । सएपोऽपहतपाप्मा तपति"। (शत०1३।२ । १-२-) ३११ रहते है। रस की व्यापकता के कारण इन सगधी बलों को परसर में प्रन्यिबंधन करने पासास्मा ईशोपनिषत् ॥ कौ की अवस्था " 1 इस प्रकार धार्यसाहित्य में चन्द्रमा की उत्पत्ति पार्थिव अग्नि से मानी गई है, एवं चन्द्रमा को सोम का पिण्ड, एवं पृथिवी का उपग्रह माना गया है । इधर वर्ममान विज्ञान के अनुसार चन्द्रमा किसी समय का एक स्वतन्त्र सूर्य है । पश्चिमी विद्वानों का कहना है कि -"किसी समय चन्द्रमा घोर उष्ण था, दूसरा सूर्य था । वह धीरे धीरे ठंडा होने लगा, कालान्तर में बाहर का स्तर ठंढा हो गया, गर्भ में मग्नि रह गया, इसी अवस्था का नाम पृथिवी हुआ । पृथिवी का वह भाग जो सर्वथा भनिशुन्य बनता हुआ पृथिवी की पकड़ से बाहर होकर पृथिवी के चारों मोर घूमने लगा, वही चन्द्रमा कहलाया" यस्तु इन मतमतान्तरों से हमारा कोई प्रयोजन नहीं है । यह बात सर्वात्मना सिद्ध है कि चन्द्रमा पृथिवी के पीछे उत्पन्न हुआ है, एवं यह पृथिवी का उपग्रह है। जब यह सिद्ध है कि चन्द्रमा सृष्टिक्रम में सब के अन्त में उत्पन्न होने वाला पर्व है तो ऐसी स्थिति में चन्द्रमा को विश्व की सम्भूति, एवं विनाश का कारण मानना कैसे संगत हो सकता है ! हम पार्थिव प्राणियों की उत्पत्ति-नाशका कारण तो फिर भी यथा कथंचित् चन्द्रमा माना जासकता है, परन्तु एकहेलपा चन्द्रमा को सम्पूर्ण विश्व का उत्पचि-परायण मान बैठना, कैसे संगत हुआ ! उक्त प्रश्न का समाधान करें, इस से पहिले संक्षेप से संभूति, एवं विनाश शब्दों का पर्थ जान लेना आवश्यक होगा। प्रकरण के बारम्भ में ही यह बतलाया गया है कि रस-चल के अवस्थातारतम्प से विश्व में विविध भाव उत्पन्न हो जाते हैं। रस और बल इन दोनों में रस प्रत्येक दशा में प्रसंग रहता है, एवं बस रस की व्यापक अवस्था में प्रसंग, एवं रस की परिच्छिन्न दशा में ससंग बन जाता है । रस की व्यापक एवं परिच्छिन्न दशाभेद से चल को चार अवस्याएं होजाती हैं। वे ही प्रारों अवस्था प्राविर्भाव, तिरोभाव, सम्भूति, चिनारा इन नामों से प्रसिद्ध है। रस व्यापक है । इस व्यापक रससमुद्र में असंख्य बत उदित होते रहते हैं, एवं अस्त होते . का अवसर नहीं मिलता । अपि तु विस प्रकार एक असीम समुद्र में चहरें उठती रहती है, एवं सम्भूति निाश प्रतिमा - ईशोपनियत् ... । उत्पन्न हो . - बैटती रहती है, इसी प्रकार उच्चावचमायापन्न वल उस संधरातल में सहचर सम्बन्ध से ठीक लहरों के समान उदित होते रहते हैं, एवं अस्त होते रहते हैं। बलों का यह सम्बन्ध प्रसंगम म्बन्ध है । प्राविभीव-तिरोभाव,उदय-अस्त यही इस सम्बन्ध का स्वरूप है । बलों का ऐसा सम्बन्ध संसृष्टिलक्षण-हृदयग्रन्थिमूलक सृष्टिसम्बन्ध से सर्वथा बहिर्भूत है । भागे जाकर माया की कृपा से रस परिच्छिन्न हो जाता है। इस परिच्छेदभाव के कारण हृदयरल जाता है । हृदयबल से सर्वप्रयम 'सत्तारस' का उदय होता है । पुरुषात्माधिकरण को पुरुष- निसक्ति में यह विस्तार से बतलाया जाचुका है कि बल की चिति से एक ही रसतत्य मानन्द-विज्ञान-मन-माण-वाक् मेद से पञ्चकोशरूप में परिणत हो जाता है-( देखिए-ई. भा.द्वि.सं.२६५से२८५पृ.) । इनमें मन-पाण-वान को समष्टि ही सचारस ह । इसी सत्ता- रस का नाम 'मस्तित्व है। यही सत्तारस सम्भूति का कारण है । यदि बल हृदन्धिसम्बन्ध से सत्तारस के उदर में श्राजाते हैं तो उस सत्तायुक्त वलसमुच्चय में अपूर्व नाम-कप-कर्म का उदय हो जाता है । वस सत्तारस के ग्रन्यिवंधन सम्बन्ध में वलों का अपूर्व नाम- रूप धारण कर लेना ही बन की 'सम्भृति' है। एवं ग्रन्बिंधन उस बलसंघात का सत्तारस से पृथक् होते हुए नाम रूप का परित्याग कर देना ही 'विनाश' है। सचार्यक भू पातु से सम्मूति शन्न निष्पन्न हुना है । 'अयं घटोऽस्ति' घट पदार्थ का यह सचालक्षण निर्यचन है। मिट्टी में जो मनप्राणवाङ्मप सत्तारस था, उसे लेकर थान घट सम्भूति का अधिष्ठाता बन रहा है । जिस दिन घट में से मिट्टी की सत्ता निकल जायगी, उस दिन घट अपने नामरूप या परित्याग कर देगा । यही घट का विनाशकार होगा। यलों पर' मचारस का अनुग्रह भी दो प्रकार से होता है । श्राप पृथिवीतल पर प्रतिषित हैं । पृथिवी की तिलक्षणा सत्ता में भापको पकड कसा है। यदि क्षणमात्र के लिए भी इस पार्थि सत्ता सभामा पियोग हो जाना है तो मामा भयाकात हो जाता है। भाप मार्ग में जा रहे हैं। विन्दु बिन्दु पर पार्षिक सत्ता पापी मनुमादिका बन रही है। वसते चसने मापकी दृष्टि किसी हद जाने से - प्रामा का ईशोपनिषत् ॥ सम्भूति-विनाय सुन्दर दृश्य पर जाती है । उसे देखने में आप इतने तल्लीन हो जाते हैं कि श्रापको मार्ग में थाने वाले गर्त (नई) का ध्यान नहीं रहता। अस्मात् पैर फिसल जाता है । उसी समय आस्मा में एक प्रकार का कम्प को पढ़ता है । यह कम्प और कुछ नहीं, केयल क्षणमात्रा के लिए पृथिवी की प्रतिष्ठारूपा सत्ता का वियोग है। यदि जानबूझ कर सावधानी से आप तीन फिट- के गहरे गर्त में भी पांच रख देते है तो भय नहीं होता, कारण इस समय भाप का लक्ष्य उस सत्ता पर रहता है । परन्तु अज्ञात दशा में यदि आपका पर फुटपाथ से सड़क पर भी गिर) जाता है तो श्रात्मा कम्पित हो जाता है, क्योंकि यहा आपकी दृष्टि सत्ता पर नहीं रहती । इस निदर्शन से बतलाना यही है कि हमारे पर पृथिवी की सत्ता का अनुग्रह रहता है। हम पार्थिव- सत्ता के गर्म में प्रतिष्ठित रहते हैं । एक मिट्टी के ढेले को आप कितना ही ऊंचा फैकिए, उसी पार्षिषसत्ता के पाकर्षण से यह तत्काल नीचे आ जायगा । इस प्रकार तल्लोक की तत्तत्प्रजाओं पर तत्तालोकों की प्रतिष्ठात्मिका सत्ता का अनुप्रह रहता है । परन्तु इस सत्तारस का हमारे साथ अधिबन्धन सम्बन्ध नहीं है, अपितु विभूतिसम्बन्ध है। इस सत्ता से हमारे में किसी यपूर्व नाम-रूप का उदय नहीं होता, केवल स्वरूपरक्षा होती है, अतएव इस सत्तारस के अनुग्रह को हम सम्भूति न कहकर 'विभूति' ही यहेंगे । कुछ मिट्टी का दिरसा गरीररूप में परिणत हो गया है । हमारा शरीर पार्थिव है । पृथिवी की सत्ता ही प्रन्थिबन्धन सम्बन्ध से अपूर्य नाम-रूपोदय की जननी बनती हुई हमारी (शरीर की) सम्भूति का कारण वनी है । हृदय एक नियत बिन्दु है। इस एकभागामिका हृदयबिन्दु के साथ पार्पिय सत्ता का जब प्रन्धिबन्धन हो जाता है, तभी अपूर्वगाय का उदय होता है। इसी अभिप्राय से इस अपूर्वावस्था को 'सम्भूति' कहा है । 'समित्येकीभावे' इस नैगमिक सिद्धान्त अनुसार 'सम्' एकीभाव का सूचक है, 'भृति' सत्ताभार का घोतक है। ऐसी भूति (सचा); जो अम्यिबन्धन द्वारा वलसमष्टि के साथ एकीभाव को प्राप्त हो जाय, वही 'सम्भूति है। भूति का एकीमाव से पृथक् हो जाना ही बस का विनाश है। बल नष्ट नहीं होता, प्रन्धि- धन से बल की उत्पत्ति मान ली जाती है, एवं प्रन्थिविमोकारस्था ही बल का विनाश मान ३२१ प्रापवारमा - ईशोपनिषत् | सम्भूति-विनाश लिया जाता है । जो बलसंघात प्रन्धिबन्धन से युक्त सत्तारस से अपूर्व नाम-रूप धारण करता हुया प्रकट हुआ था, वही ग्रन्थिबन्धन के टूट जाने से बाज उसी सत्ता के गर्भ में विलीन हो रहा है । सत्तारस को अपनें केन्द्र में रख लेना, दूसरे शब्दों में सत्ता को अपने उदर में रख लेना बल की सम्भूति है, एवं बल का सत्ता के गर्भ में चला जाना बल का विनाश माना जाता है । सत्ता नीचे है, बल ऊंचा है, बल का 'उत्-अयन' (सत्ता के ऊपर गमन) है, यही उदयावस्था है, यही सम्भूति है । उत्-अयन हट गया, चल सत्ता के उदर में लीन हो गया, यही विनाशावस्था है। इसी रहस्य को समझाने के लिए उत्पत्तिलक्षणा सम्भूति के लिए जहां ऋषियों ने 'सृष्टि' शब्द प्रयुक्त किया है, वहां विनाश के लिए 'मलय' शब्द प्रयुक्त किया है । बलों का लयभाव ही इन का विनाश है, उदयभाव ही इनकी उत्पत्ति है । सम्भूति में बलप्रधान है, विनाश में रसप्रधान है। दूसरे शब्दों में सम्भूति में सत्ता बल की अनुगामिनी बन रही है । विनाश में बल सत्ता का अनु- गामी बन रहा है । बंधन सम्भूति है, बंधनविमोक विनाश है । एक ही तत्य की अवस्था विशेष साभूति है, अवस्था विशेष विनाश है, परमार्थतः न सम्भूति है, न विनाश है—'न जायते म्रियते वा कदाचित्'। सम्भूति एवं विनाश का संक्षिप्त स्वरूप बतलाया गया, अब उक्त प्रश्न का विवेचन किया जाता है। यह प्रकरण सम्भूति-विनाशात्मक चन्द्रमा का निरूपण करता है । सम्पूर्ण विश्व चन्द्रमा से ही उत्पन्न होता है, एवं चन्द्रमा ही विश्वविनाश का कारण है । इस पर पूर्वपक्ष यह हुआ था कि विश्वपर्यों के अन्त में पृथिवी से उत्पन्न होने वाला चन्द्रमा सम्पूर्ण विश्व की सम्भूति एवं विनाश का कारण कैसे माना जासकता है ! इस प्रश्न के समाधान के लिए थोड़ी देर के लिए हमें यज्ञपुरुष की शरण में चलना होगा । पूर्व के विज्ञानात्माधिकरण में यज्ञविकर्ष का स्वरूप बतलाते हुए यज्ञपदार्थ का सरूप बतलाया गया है-(देखिए ई. वि० २ खं० २१३-३०२)। अग्नि में सोम की आहुति होने से अग्निसोम के समन्वय से जो एक मपूमाव उत्पन्न होता है, उसी का नाम यज्ञ है। इसी यज्ञ से विध में रहने वाली प्रजा ।

। ईशोपनिषत् ॥ सम्भूति विनाश प्राकतारमा । उत्पन्न होती है । इधर हम सचारस से युक्त बलसंघात को सम्भूति का कारण बतला रहे हैं। दोनों विरुद्ध भावों का समन्वय कीजिए । मनप्राणवाङ्मृतिरस सचा है, यह विज्ञानरूप चिद, एवं मानन्द से अविनाभूत है । रसमूर्ति पक्षकल, किंवा निकल सचिदानन्द ब्रह्म ही अव्यय है ।,मक्षर एवं प्रात्मक्षर नाम से प्रसिद्ध इस अव्यय की 'दो अन्तरंग प्रकृतिएं हैं। यह उस पुरुष को स्वभावभूता है, अतएव उस से अविनाभूत हैं । रसप्रधान, अतएव रसर्ति अन्तरंगप्रकृतिविशिष्ट पुरुष ही पोडशीमजापति' है । यद्यपि सम्भूति का कारण- सच्चिदा- नन्द ब्रह्म ही है, तथापि सत्ताभाग को ही प्रधान माना गया है । आनन्द और विज्ञान (चित) भी सम्भूति के कारण हैं,किन्तु गौणरूप से । अानन्द विज्ञान उस अव्यय ब्रह्म का मुक्तिसाक्षी भाग है ! मन-प्राण-वाङ्मय सत्तामाग सृष्टिसाक्षी है । मुक्ति में यह गौण है, वह प्रधान है । सृष्टि में यह प्रधान है, वह गौण है । इसी अभिप्राय से मन-प्राण -वाक् की समष्टिरूप सत्तारस के समन्या-श्रसमावय को ही संभूति एवं विनाश का कारण बतलाया गया है । मन से कामना का उदय होता है, प्राणुब्यापार उसका तप है, वाग्ठयापार श्रम है । काग्-तप- श्रम ही सृष्टि के साधारण अनुबन्ध हैं-(ई०भा०सं० ३१०४०)। वह सत्ताधन प्रजापति अक्षर मय है, अक्षर वेदमूर्ति है, वेद का यजुभाग ब्रह्माग्नि है । ऐसी दशा में सत्तौरसरूप वेद- मूर्ति पोडशी प्रजापति को अवश्य ही 'अग्नि' (वेदाग्निगुर्ति) कहा जासकता है। पुरुष साक्षात् 'अग्नि' है-"पुरुषो वा अग्निः" शत० १४१६१।११)-"ब्रह्म वा अग्निः" (को०६/५)- 'आत्मा वा अग्निः" (शत० ७३।१।२) । इस पुरुषोनि में वलप्रधामा पञ्च ग विभक्त प्रकृति की याति होती है । यह पाहूयमानी प्रकृति ही 'सोम' है । 'सुतो भवति' 'सूयते ऽनौ' 'अभिपुतो भवति' इत्यादि निर्वचनों के अनुसार अग्नि में आहत होने वाला पदार्थ ही 'सोप' है । यह सोम अग्नि में आहत होकर अग्नि को प्रदीप्त करता हुश्रा, स्वयमपि रश्मिप्रसार करता हुमा प्रदीत होजाता है, अतएव' सोम को 'चन्दमा' शब्द से व्यवहृत कर दिया जाता है । आप भन्तरिक्ष में चन्दिकामय जो पिण्ड देखते हैं उसी का नाम चन्द्रमा नहीं है । अपितु चन्द्रमा सोमतन्य हैं, चन्द्रमा शब्द सोमतत्यका ३२३ प्राकृतारमा डा| ईशोपनिपत - सम्भूति विनाश चाचक है , सोमतत्व पाहुतिद्रव्य का याचक है । इस सामान्य परिभाषा के अनुसार माहुत होने वाले जितने भी पदार्थ हैं, सब सोम हैं । एवं जिन पदायों में इन सोमरूप पदार्थों की याहुति होती है, वे सब पदार्थ 'अन्नाद' बनते हुए अग्नि हैं। पुरुपप्रजापति में रस की प्रधा- नता है, प्राण-आप-वागादि पाचों प्रकृतियों में क्ल की प्रधानता है । वह रस है, यह देख है । वह भोक्ता (अन्नाद) बनता हुआ पूर्वकथनानुसार साक्षात् अग्नि है, यह भोग्य (अन्न) बनता हुया सादात् सोम है । इस की उसमें प्राहुति होती है, रसबलात्मक अग्नीपोममुर्ति पुरुषप्रकृति का समन्वय होता है, इसी यज्ञ से विश्व सम्भूत हुआ है । सारा विश्व सोम- रूप प्रकृति की पुरुप में आहुति होने से ही उत्पन्न हुया है । अग्नि में 'पुरुप की प्रधानता रहती है, दूसरे शब्दों में रस की प्रधानता रहती है, अतएव पुरुष (मनुष्य) को प्राप्नेय बत- लाया जाता है । सोम में प्रकृति की, दूसरे शब्दों में बलतत्व की प्रधानता रहती है, अतएक स्त्री को सौम्या कहा जाता है । पुरुष-प्रकृति, रस-बल, अग्नि-सोम सब अभिन्नार्थक हैं । प्रकृति-पुरुष का समन्वय, रस-बल का समन्वय, अग्नि-सोम का समन्वय, एवं असमन्वय ही सम्भूति विनाश का कारण है । इसी रहस्य को सामने रखते हुए हम कह सकते हैं कि चन्द्रमा (सोम-प्रकृति ) ही सम्पूर्ण विश्व की सम्भूति एवं विनाश का अधिष्ठाता है। अपेक्षया सभी सोम हैं, समी अग्नि हैं । हम यदि अन्य पदार्थों के प्रत्यंशों को लेकर उन्हें अपने शारीर अग्नि में आहुत करते हुए उन ग्राहुत पदार्थों की अपेक्षा अन्नाद (अग्नि) हैं तो अन्य पदायों के लिए हम थन्न (सोम) भी हैं । हमारा रस सूर्य ले रहा है. सूर्य का रस हन ले रहे हैं। हम सूर्य से उत्पन्न हुए हैं। उस के पदार्थों को जहाँ हम खा रहे हैं, वह हमारे धातुओं का श्रादान करता हुआ आदित्य बन रहा है। इसी प्रकार प्रजा में भी एक प्रजा : सरी प्रजा के प्रत्यशों को लेती देती रहती है। सर्वत्र प्रादान विसर्गात्मक अन्नान्नादपज्ञ व्याप्त है । समी अन्न हैं, सभी सोम है। सभी अग्नि हैं, समी अन्नाद हैं-"भन्नाद- एवाग्निरभवदन्नं सोमः । अन्नादश्य वा इदं सर्वमन्नं च " (शत. ११ ॥ १।६।१६) । इसी व्यापक पग्न-अन्नादभाव का निरूपण करती हुई मन्त्रश्रुति कहती है- - - 1 १२४ प्रास्तारमा ।। ईशोपनिषत् ॥ सम्भूति विनाश - . अहमस्मि प्रथमजा ऋतम्प पूर्व देवेभ्योऽमुनस्य नाम । यो मा ददाति स इ देवेमाबदहमन्नमन्नमदन्तमद्मि ।। यह तो हुई शास्त्रदृष्टि । अत्र मसतष्टि से सोम की सम्भूति विनाश का विचार कीजिए। संभति (सृष्टि) प्रात्मा-प्रकृति-विकृति इन तीन भागों में विभक्त है । प्रात्मसृष्टि-प्रकृतिसृष्टि- विकृतिसृष्टि मेद से सम्भूतिरूपा सृष्टि के तीन विवर्त हैं । इन तीनों ही सृष्टियों का अधिष्ठाता सोमतत्व है। महदास्माधिकरण में यह विस्तार से बतलाया जा चुका है कि सोममूर्षि महान् में ही पोडशो आत्मा गर्भ धारण करता है-'मम योनिर्महद्ब्रह्म' । आत्मविकासभूमि एकमात्र महत्सोम (पारमेष्ठय सोम) ही है। प्रकृति ब्रह्म से विश्व का निर्माण हुआ है, परन्तु अप्तत्व की आहुति से । अप्तत्य साक्षात् सोम है । इस प्रकार प्रकृति का प्रकृतिःवरूप सृष्टिकर्तृत्व भी सोमसम्बन्ध पर ही निर्भर है। इसी सोमाइति से सूर्य का विकास हुधा है, इसी सोम से परमेष्ठी का विकास हुआ है, यही सोम अव्यक्त पुण्डीर स्वयम्भू का जनक है । इसी सोमाइति से भूपिण्ड निष्पन्न हुआ है । इसी सोम का प्रवृक्त अंश चन्द्रमा है। इस प्रकार आगे जाकर चन्द्रमा नाम धारण करने वाला सोम ही सम्पूर्ण विश्व की सम्भूति का कारण बन जाता है | सोम की इसी सम्भूतिलक्षणा विभूति का निरूपण करती हुई श्रुति कहती है- '- महत्तत् सोमो महिपश्चकारापां यद्गर्भोऽत्रणीत देवान् । अदयादिन्द्रे पवमान प्रोजोऽजनयत् सूर्यज्योतिरिन्दुः ।। [ऋक्.६ । १७१४१]। - अनान्समुद्रः प्रयमे विधर्मञ्जनयत् प्रजा भुवनस्य रामा। कृपा पवित्र अधि सानो अव्ये बृहत्सोमो वाटधे मुवान इन्दुः ।। [प्र.रा७४०] । ३- पवित्रभिः पवमानो नृचक्षा राजा देवानामुत मनानाम् । द्विता भुवयिपती रयीणामृतं भरत सुभृतं चार्विन्दुः॥ [ऋ. १ ॥ १७ ॥२४] । । [ प्राकृतात्मा ॥ ईशोपनियत । सम्भूति-विनारा ४- एप विश्ववित् पत्ते मनीपी सोमो विश्वस्य भुवनस्य राजा। द्रप्साँ ईरयन विदथेष्विन्दुर्वि वारमव्य समयाति याति ।। (ऋ. ६६७५६)। ५- या ते धापानि दिवि या पृथिव्यां या पर्वतेप्वोपीप्वप्नु । तभिनों विश्वैः सुमना अहेलनाजन्त्सोम प्रति हच्या गृभाय (ऋ. १६६१॥४) । ६- त्वमिमा ओपपीः सोम विश्वास्त्वमपो अजनयस्चं गा.। . त्वमा ततन्योन्तरिक्षं ख ज्योतिपा वि तमो वयर्थ ।। (ऋ।१।२२)। १- ( महानात्मा का खरूप सम्पादन करने के कारण)-महिप-(महान् नाम से प्रसिद्ध ) सोम में यह महत् कर्म (वडा भारी कर्म) किया है, जोकि पानी के गर्भ बने हुए देव- ताओं का (सौर देवताओं का) वरण कर लिया है । (यापोमय परमेष्टी मण्डल में प्रति- टित अप्तत्व की विरलापस्थारूप सोम की श्राइति से ही ज्योतिर्मय सौर देवताओं का वि- कास हुआ है, इसी अभिप्राय से "अपां यद्गर्भोऽवृणीत देवान्" यह कहा है)। (दूषित भाग को निकालने के कारण) पवमान [नाम से प्रसिद्ध इसी पारमेष्ठय ब्रह्मा- स्पति सोम] ने इन्द्र (सौर अमृतप्राण) में भोज (वलप्रद वीर्य स्थापित किया है-[तभी तो "या च का च वलकृतिरिन्द्रकम्मैव तत्” यह कहा जाता है) 1 इसी इन्दु (सोम) में सूर्य में ज्योति (प्रकाश) उत्पन्न बी है । "वं ज्योतिपा वि तमो ववर्थ" इस सिद्धान्त के अनुसार दाद्य पारगेष्टय सोम की दाहक सौर साविनाग्नि में निरन्तर याहुति होती रहती है । इसी सोमाइति से सौर मण्डल में प्रकाश होरहा है । "मा क. पगणेन रजसा वर्तमानः" इस यनु श्रुति के अनुसार सूर्य, किंवा सौर अग्नि भी स- सरूप से घोर कृष्ण [गला] है, एव "ब्रह्मा कृष्णश्च नोऽवतु-चन्द्रमा वै ब्रह्मा- कृष्णः" इस मन्त्र-ब्राह्मण श्रुति के अनुसार चन्द्रमा (सोम) भी घोर कृपा है । न अग्नि में प्रकाश है, न सोम में प्रकाश है । प्रकाश उत्पन्न होता है दोनों के समन्वय । इस समय में योनि स्थानीय अग्नि स्वस्थान पर प्रतिष्ठित रहना है । इस में रेतः . T श्रुति को सामान्यरूप से सम्भूति और विनाश का स्वरूप क्तलाना है, साथ 'ही में मज्ञानात्मा का भी निरूपण करना है, इधर प्रज्ञानात्मा का सम्बन्ध भावारमा . शोपनियात् LIBRI 'स्थानीय सोम की याहुति होती है। इसीलिए सोम को ही प्योति का प्रवर्तक माना जाता है।' यही नित्याग्निहोत्र है, यही 'जरामर्यसत्र है । "सूय्यों ह वा अग्निहोत्रम्" (शत रका. २२.५.प्रा.१६.) ॥१॥ २- पानी की वर्षा करने के कारण समुद्र नाम से प्रसिद्ध यह सोम राजा इस विशाल अन्त- रिक्ष में (त्रैलोक्य में अपनी आतुति से) प्रजा उत्पन्न करता हुआ सब का अतिक्रमण कर रहा है । तात्पर्य यही है कि छान्दोग्य उपनिप की 'पंचाग्निविद्या के अनुसार श्रद्धात्मक सोम ही क्रमशः श्रद्धा-सोम-वृष्टि (पानी)-अन्न-रेत रूप में परिणत होता इया क्रमशः शु-पर्जन्य-पृथिवी-पुरुप-योपित इन पांअस्मियों में चाहत होता हुआ "इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति" इस सिद्धान्त के अनुसार प्रजोपत्ति का कारण बनता है । अभिपूयमाण वर्षणशील वह प्रदीत सोम विशेषरूप से प्रवृद्ध होता है ॥२॥ :३- सूर्य की पवित्र रश्मियों से पवित्रतम बना हुआ, देवता मनुष्यादि प्रजात्रों का अधिपति, सम्पूर्ण सम्पत्तियों का अधिष्ठाता यह सोम मलीमाति संगृहीत होता दुप्पा पाल्याणप्रद सत्यमार्ग को धारण करता है ||३|| “४-- सर्वज्ञ, मनीषी, त्रैलोक्य का राजा यह सोम सर्वत्र व्याप्त होरहा है । यही कर्मों में अपनी शक्ति प्रदान करता है। यही सब का वेष्टन करता हुअा, कर्म सञ्चासन करता दुधा ओगे चलता है ॥४॥ (शेष दोनों का अर्थ स्पष्ट है)। निरूपण मे यह भलीभाति सिद्ध होजाता है कि वास्तव में सम्पूर्ण विश्व की सम्भूति एवं विनाश का कारण एकमात्र सोम ही है। सोम की इस व्याप्ति को तदय में रखिए ए सुप्रसिद्ध सोम (चन्द्रपिण्ड) पर दृष्टि डालिए ।' उपनिर्पत নদ । दृष्ट चन्द्रपिण्ड के साथ ही है , अतएव किसी विशेषमान का उल्लेख न कर से तात्मा का ईशोपनिपात् ।। যমুন বিনয় manav AMANAKAMA । मान्य रूप से "सम्भूति च विनाशं च" इत्यादि कह दिया गया है । सोम सारे विश्व की सम्भूति एवं विनाश का कारण कैसे है ! इस का समाधान होगया । अब यही सोम हमारे आध्यात्मिक प्रपञ्च की सम्भूति एव विनाश का कारण कैसे बनता है ! इस प्रश्न के समा- धान के लिए आपको उस व्यापक सोम ही के प्रत्यंशभूत सृष्टि के अन्तिम पर्वरूप, पृथिवी के उपग्रहभूत सुप्रसिद्ध चन्द्रपिण्ड को ही सामने रखना पड़ेगा। इस चन्द्रपिण्ड से सम्बन्ध रखने वाली सम्भूति सम्भृति एवं पुनःसम्भृति भेद से दो भागों में विभक्त है । हमारी प्राण- मिक सम्भूति का कारण आधिदैविक चन्द्रमा है, एवं उत्तरोत्तर होने वाली जन्मचक्ररूपा सम्भूति का कारण आध्यात्मिक चन्द्रमा है । प्रकृत अधिकरण प्रधानरूप से इसी आध्या- त्मिक चन्द्रमा का निरूपण करता है । आधिदैविक चन्द्रमा हमारी प्राथमिक सम्भूति का कारण कैसे बनता है ! पहिले इसी प्रश्न का विचार कीजिए। "मग्नीपोमात्मकं जगत" ( जाबालोपनिषत् ) इस श्रुति के अनुसार सम्पूर्ण जगत् (रोदसी त्रैलोक्य) अग्नीपोमात्मक है । सौरत्रिलोकी जंगम प्राणियों के सम्बन्ध रो 'जगत्' नाम से प्रसिद्ध है । विश्व और जगत् शब्द परस्पर में पर्याय नहीं है । संयती-क्रन्दसी-रोदसी इन तीनों त्रैलोक्यों की समष्टि विश्व है, एवं एकमात्र रोदसी त्रिलोकी जगत है । यह जगत् सचमुच अग्नीपोममय है । जगद्यज्ञस्वरूपसपादक अग्नि और सोम दोनों हा अनेक भागों में विभक्त है । परन्तु इतना ध्यान रखिए कि तेजन अग्नि का सामान्य लक्षण है, एवं स्नेहन सेम का सामान्य लक्षण है । एक की प्रतिष्ठा हृदय है, एक की प्रतिष्टा परिधि है। अग्नितत्व पेन्द्र में उपयरूप से प्रतिष्टित होता हुआ प्रकरूप से निरन्तर परिधि की ओर जाया करता है, एवं सोमतः परिधि से निरन्तर केन्द्र की ओर भाग करता है। अग्नि अपनें तेजनाप्रभाव से उत्तरोत्तर विगानित होता जाता है। इसी विशालन से इस की अग्नि-यम-मादित्य यह तीन प्रधान अयायाएं हो जाती है। ठीक इसके विपरीत सोमता अपने स्नेहनसभाब से उत्तरोत्तर संकुचित होता जाता है। इसी संकोच से इसकी प्राप-वायु-सोम यह तीन बार पाएं हो जाती हैं। अग्नित्रयी अगिरा है । प्रनिरा पिण्ड से निकलकर निरन्तर उपर की थोर 1

भावात्मा
नाईशोपनियत ।
उम्भूति निराश
।
जाया करता है, विशकलन की पराकाष्टा पर पहुंच ने से इसकी विकास क्रिया बंद हो जाती है ।
विकास की अन्तिम अवस्था पर पहुंचते ही अंगिरा की गति पलट जाती है । विरुद्धगतिभावापन्न
अङ्गिरा ही भृगुरूप में परिणत होकर केन्द्र की ओर धाने लगता है। केन्द्र की ओर आते
थाते जब भृगुनयी (आप-वायु-सोम) ठीक केन्द्रविन्दु पर छा जाती है तो स्नेहलक्षणा क्रिया
धवरुद्ध हो जाती है, तत्काल तीनों में संघर्ष हो जाता है । इस संघर्ष से अंगिरा का जन्म हो
जाता है । दूसरे शब्दों में केन्द्र में आकर भृगु ही अंगिरा रूप में परिणत हो जाता है । इस
प्रकार एक ही प्रजापतितत्व गति-आगति भेद से अग्नि ( अङ्गिरा ), सोम (गु ) यह दो रूप
धारण कर लेता है । जो अग्नि है, यही सोम है । जो सोम है, वही अग्नि है । अग्नि अग्नि है,
सोम पानी है । अग्नि पराकाष्ठा पर पहुंचकर पानी बन जाता है, पानी उद्गाभ की चरमावस्या
पहुंचकर अग्नि बन जाता है। इस प्रकार सम्पूर्ण जगत् में तेज-स्नेहलक्षण अग्नि-सोम का
साम्राज्य है। इनमें तेजोरूप अग्नितत्व के अग्नि, यम, प्रादित्य, सार्वपाजुप, देव, ऋतु,,
सत्य, वैश्वानर, प्राहृत, महत, उद्धृत, धिष्ण्य श्रादि अयान्तर अनेक भेद हैं । सोम के भी
अवान्तर अनेक भेद हैं । उन सब अवान्तर सोमों का १० जातियों में अन्तर्भाव माना जा
सकता है । अग्नि-सोम के इसी वैजात्य से जगत् में 4जात्य उपलब्ध होता है । सोम की ये
१० जातिए निम्नलिखित नामों से प्रसिद्ध हैं ।
!-अश्मा--( -ध्रुवः, -पत्री, ३-धरुणः, ४-धर्मः )
२-असुरः--( १-त्रः, २-नमुचिः,३-वलम, ४-जम्मः )
-अन्ना--(१-राजा, २-बाना, ३-ग्रहः, ४-हविः)
४-प्रापः--(भृगवा-अंगरिस् )।
५-सहा--(अप्रिप्रभवः )।
५-प्रोपशी:- (भनिगर्भितः)।
७-अतुः--(अंशुः)
८-पवित्रम्-(ब्रह्मणरपतिः ।
-दिक्---(सर्वव्यापका)।
१. प्रास्मा--(महान् ।
३२॥

। ईशोपनिषत् ।। सम्भूति-विनाश ममि में सोमः आहुति से पुरुष उत्पन्न होता है । इस पावतिक्रम काही नाम यज्ञ है। भतरव हम कह सकते हैं कि पुरुष की सम्भूति का कारणं यज्ञ ही है । 'पाको नै यज्ञ,' के अनुसार यह पुरुपवरूप समर्पक यज्ञ पनायव है । पुरुषयज्ञं से सम्बन्ध रखने वाले भनि के भी पांच ही प िहै, एवं सोम के भी पांच ही पर्व है । दोनों की समष्टि दशाक्षर विराद या है । उप्त महाविराट् से इस क्षुद्धविराट् का जन्म होता है-"अर्द्धन नारी तस्यां स विराममनन् प्रभुः” । यति पुरुष है, सोम सी है । दोनों पतिपत्रियों के मिथुन से उत्त महामिराट् की सम्भूति हुई है, एवं उसी से तुंदेविराट् सम्भूत हुआ है । 'पुरुषरुप अग्नि के पांचों पर्व प्रमशः घु, पर्जन्य, पृथिवी, पुरुप, योपित् इन नामों से प्रसिद्ध हैं । एवं सोम- तर के पांचों पर क्रमशः श्रद्धा, सोम, वर्षा, अन्न, रेत इन नामों से प्रसिद्ध हैं। दिव्यनोक का भग्नि पहिला अग्नि है, भान्तरिक्ष्य अग्नि दुमा थप्ति है, पार्थिव भग्नि तीसरा धग्नि है, पुरुपानि चौथा चमि है, योपिदमि पांचवां धाग्नि है । पार्थिव धाग्नि पनामि, भान्तरिक्ष्य चाप्ति तर मामि है,यही यापु है । 'वायु पृष्टया इंगे' इस वृष्टिरियासून के अनुसार पर्जन्य नाम से प्रसिद्ध चान्तरिक्षय तरलायु की वृष्टि का भविष्टाता है। दिव्य अग्नि पिरला३६२१ पम है , यही आदिसामि है । प्रतियत्रयी हो अग्नि-वायु-घादित्य है । यही पृथिरी-नाद- पु है । पुरुषाग्नि में इन तीनों अग्नियों का समुगप है । श्रग्नित्रय के संयोग से नया तापमा पाणि उत्पन्न होजाता है , यही मंचाना नाम से प्रसिद्ध है। पुरुष साक्षात् ययानर अग्नि यो प्रतिमा है । यह पारों अग्नि (पु-गम्य-पृथिवी- पुप धादिन्य-यम-मनिमय-बचाना) स. त्यति है । पपियों योपित् अग्नि ऋतम्पहै। प्रातु या साप मी ऋतानि से गंगन होता है। मी माग से थी का मामा यनता है । यो ऋताशिपयी है । मभी समयों में इसमें पानानि पा मापीर नहा दोना, और गु ऋगुमाल में ही मनाति या पियाम होता है । प्रानुमा श्री में सर मांगाती होती, ती प्रनो पनि हो । - . । - . ...

रूप में परिणत होता हुआ सर्वान्त में रेतोरूप में परिणत होजाता है । यह रेत याचि उस श्रद्धासोम की पावरी अवस्था है । ऋतुकास में स्त्री के ताग्नि में (आर्थव में) इस रेत सोम प्रास्तारमा हा ईशोपनिषत् ॥ साभूति विनाय -अगिराप्रयी -सत्यामि -- १-धु--दिव्यविरलामिक आदित्यः २-पर्जन्या-मान्तरिक्ष्यतरलाग्नि वायु: ३-पृथिवी-पार्थिवघनामिः अग्निः -पुरुषः ---अग्नित्रयसंयोगजन्मा वैश्वानरः ५-योपित्-मृतुकाले व्याप्तो ऋतामिः ऋताग्निः ]-ताग्निः -- इसी प्रकार श्रद्धातल्य सोम की विरलावस्था है, सोम तरलावस्था है, वर्षा (पानी) पना- वस्था है। तीनों की समष्टि 'भृगु' है । इन तीनों के समन्वय से अन्न का विकास होता है, थत ही आगे जाकर रेतीरूप में परिणत होता है । उक्त पाचों अग्मियों में क्रमशः इन पाचों सोमों की आहुति होती हैं । पाचवी आहुति में पुरुष उत्पन्न होता है। प्राणदेयता यज्ञ के सचालक है, याहुति देने वाले है । दिव्याग्नि में श्रद्धा सोम की आहुति होती है । चान्द्ररस का नाम ही श्रद्धा है । यह रस आपोमय है, चन्द्रमा सयं पानीयपिण्ड है, श्रद्धा का पिण्ड है । प्रत्येक पानी में यह चान्दरस प्रतिष्ठित रहता है, इसी रसमाग के लिए 'यो वः शिवतमो रस यह कहा जाता है। अपिच इसी आधार पर-'आपो वै श्रद्धा संनमन्ते" "श्रद्धा वा मेध्या- वा आप इत्यादि श्रुतिवचन प्रसिद्ध हैं । यही चान्द्रश्रद्धारस दिव्यामि में माहुत होकर सोमरूप में परिणत हो जाता है । श्रद्धा पहिली अवस्था है, सोम दूसरी अवस्था है । इस सोम की पर्जन्या- मि में याहुति होती है । इस प्राति से वृष्टिरूप स्थूल पानी'उत्पन्न होता है। यह स्थूलपानी उरा श्रद्धा नाग के सूक्ष्मपानी की तीसरी धवस्मा है। इस यपी की तीसरे पार्थिवाग्नि में आहुति होती है। ईस श्राति से 'अन्न उत्पन्न होता है । यह चौथी अवस्था है । प्राध्यात्मिक प्राणदेवतस्त्रोद्वारा (इन्द्रियों द्वारा ) इस अन्न की पुरुषाग्नि ( वैधानरसप्नि ) में प्राहुति होती है । शरीराग्नि में पाहु." त अन्नसोम रस-मल के प्रतिक निशकलन से क्रमशः रस-अमृक्-मांस-मेद-अस्थि मज्या है धाकुमारमा सम्भति-विनाश * ईशोपनिषत् ॥ की पाहुति होती है । इसी से पुरुषोत्पत्ति होती है । इस प्रकार वह भद्धारूप धप्तत्व श्रद्धा र-पो-अन्न-रेतोरूप में परिणत होता हुया पांचवीं बाहुति में पुरुषरूप में परिणत हो जाता है, जैसाकि निम्न लिखित उपनिषद्वचन से स्पष्ट है- "इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुपएचसो भवन्ति" (i० उ०५१)। उक्त यहाइस्य से यह सिद्ध होजाता है कि वह श्रद्धारूप चान्द्रसोम ही परम्यस्या पुरुष की प्रयमसम्भूति का कारण बनता है। पुरुष वस्तुमात्र का उपलक्षण है । रोदसी त्रैलोक्य में जिनने मी पदार्य हैं, सब की सम्भूति का कारण चन्द्रमा ही है । त्रैलोक्यव्यापक स्वयं साक्षि- देवसस ( साक्षीपर्ण ) भी देवसत्यात्मक चन्द्रमा से ही सम्भूत है। इतर सारे जड़ चेतन पदार्य भी इसी से उत्पन्न हुए हैं । सूर्य कायप प्रजापति है, चन्द्रमा दक्षपनापति है, चन्द्र- मा जिस चक्र पर पृथिवी की परिक्रमा लगाता है, यह वृत्त 'वक्षवृत्त' नाम से प्रसिद्ध है । यह दक्ष चान्द्रसोम से व्यास रहता है । दक्षवृत्तावच्छिन्न इस चान्द्र सोम के सूर्यसम्बन्ध से १२ विभाग होजाते हैं । १२ मास ही १२ विभाग है । चान्द्रसोमावच्छिन्न ३० राशिरूंप खगोल का एक एक प्रदेश एक एक मास है । एक संवत्सरचक्र में ऐसे १२ मास हैं । इन १२ दातापणियों के साथ सौर-कश्यपप्रजापति का भोग होता है । दिति, के भोग होने से देस, अदिति से आदिस, कटू से सर्प, विनता से गरुड़, धादि प्रजाएं उत्पन्न होती है। संसार की सारी प्रजाएं कश्या प्रजापति द्वारा इन्ही १२ दाक्षायणियों से उत्पन हुई है । घ4-अरिष्टनेमि-शिव-कृशावा-वयं चन्द्रमा-कश्यप आदि भेद से यह सोम- प्ररातल ६० मागों में विभक्त होजाता है । दक्षप्रजापति की इन ६० कन्याओं से ही सृष्टि का संचालन होता है। इन्हीं सय कारणों से हम सोमघन चन्द्रमा को अवश्य ही 'सम्भूति' का कारण मानने के लिए तथ्यार है। साथ प्रत्येक बात अपने अपने नियत समय पर उपम होती है। यह नियत समय ही खोकभाषा प्राक्रवारमा का ईशोपनिषत् ॥ सम्भूति विनाश ध्यम् । तेन ससेन तेन तपसा-ऋतुरस्सि, आर्तवोऽस्मि, कोऽस्मि, स्वमस्मीति, तमति मृजते ।। तं ब्रह्मा पृच्छति-कोऽसीति ? ते प्रतियात्-ऋतु रस्मि, आर्ततोऽस्मि । आकाशाद्योनेः संभूतो, भार्याय रेतः संवत्सरस्प तेजो- भूतस्य भूतस्य भूतस्याऽऽत्मा त्वमात्मासि । यस्त्वमसि-सोऽमहिम-इति" । (को० उ० १ ० ६ ०)। चन्द्रमा ही विचक्षण है। यही पूर्वप्रदर्शित क्रमानुसार ऋतु द्वारा रेत यनकर सब की सम्भूति का कारण बनता हुआ सर्वरूप में परिणत होता है । इसी विज्ञान के आधार पर निम्न लिखित श्रौत्र वचन हमारे सामने आते हैं- 1-"असौ चै सोमो सजा विचक्षणश्चन्द्रमाः" (को० उ० ७७।४।१०। २-"चन्द्रमा चै जायते पुनः" (ले० प्रा० ३६४)। ३-"एप वै (चन्द्रमाः) रेतः" (शत० ६१।२।४)। ४-"चन्द्रमा एव सर्वम्" (गो० ब्रा०प०० ०१५) । जो चन्द्रमा सम्भूति का कारण है, पूर्वकथनानुसार वही विनाश का सोम शिवतत्व है । जब तक यह अग्नि में प्राहुत होता रहता है, तभी तक सम्भूतिरूप शिवभाव है, तभी तक यह है । यम वायु के श्राते ही सोमसंतान टूट जाती है, यह बंद होजाता है । घलप्रन्थिएं टूट जाती हैं, रस से बल ( ग्रन्थिसम्बन्ध की अपेक्षा से ) पृया होकर घसद्रूप में परिणत हो जाता है । इसी का नाम विनाश है । जिस क्रम से संचर है, उसी कान प्रतिसंचर है । यही कारण है कि सम्भृत आत्मा शरीर छोड़ते ही पहिले सीबा च द्रलोक जाता है, चाहे यह पापात्मा हो, अया पुण्यामा । चन्द्रमा से दक्षिण-उत्तर भेद से मामाति के लिए दो मार्ग विभक्त होते हैं । यज्ञ-तप-दान करने वाले विद्यानिष्ठ पुरुषों या भारमा चन्द्रमा में पहुच फर उत्तरमार्ग में जाता है, एवं दृष्टा-पूर्व-दत्तानुयायियों का भाग्मा चन्द्रमा में जाकर दक्षिणमार्ग में जाता है। शरीर की छाया (तमोभाग ), रापि, कृष्णपक्ष। अधिष्ठाता है। से में ।

प्रथम पक्ष का समाधान हो गया, अब क्रमप्राप्त पुनःसम्भूति के अधिष्ठाता माध्यामिक चन्द्रमा उत्पन्न होते हैं, यह पहिला भोग है । हम सायं प्रातः प्रतिदिन जो अन्न खाते हैं, उस में । प्रेतपिता के श्रद्धामूत्र से युक्त पुत्र द्वारा प्रदत्त सोममय तण्डुन पिण्ड इसे चान्द्ररस से युक्त जाने में समर्थ होजाता है। अस्तु श्राद्धविषय प्राकृत है, यहां यही कहना है कि जो चन्द्रमा घन भाग (दाना) बनता है, धान्तरिक्ष्य तरलरस से शन्न में रहने वाले धृतभाग (विकनाई- स्नेहन) का उदय होता है । इसी स्नेहरस से चूर्ण (भाटे ) को गोदने से एक प्रकार का लुभाब भाजाता है। दिव्य विरवरस के भागमन से मन में मिठास उत्पन्न होता है। यह '१ इन सब विषयों का विशद विपन 'आधाविज्ञान में देखना चाहिए। प्राकृतात्मा - ईशोपनिषत् । साभूति-विनाय दक्षिणायन यह सब चान्द्रभाग हैं । शरीरज्योति, अहः, शुक्लपक्ष, उत्तरायण, संवत्सर यह सब सौरभाग हैं । चन्द्रमा में जाने के लिए प्रेतात्मा को १३ मास (चान्द्रमास) लगते हैं । यह आत्मा चिरकाल तक पृथिवी पर रहा है, अतएव इस का चान्द्र आग्मा (महानात्मा) पार्थिव आकर्षण से बद रहता है। शरीरत्यागानन्तर इधर से इसे पृथिवी ववती है, उधर से चन्द्रमा संचता है । दुर्भाग्य से यदि (पार्थिसंपत्ति में अधिक आसक्ति रहने से ) पार्थिव आकर्षण प्रवल होता है तो इसे ऊपर ( चन्दलोक में ) जाने में महा यष्ट होता है । यही कष्टावस्था 'अश्रुमुखपिपर' नाम से प्रसिद्ध है । इस समय पार्थिव आकर्षण को निर्बल बनाने के लिए चान्दबल बढ़ाना अत्यावश्यक है, इस का एक मात्र उपाय है-'पिण्डदानलक्षण श्राद्ध' । कर सरल बना देते हैं । पिण्डमोग से सबल बनता हुधा प्रेतात्मा बिना कष्ट के खलोक में उत्पादक है, वही संहारक है। प्रकरण के श्रारम्भ में यह बतलाया गया है कि हमारी प्रथम सम्भूति का कारण चन्द्रमा है, एवं पुनःसम्भूति का कारण चन्द्रप्रायशर्त प्रज्ञान मन है । इन दोनों पहों में से का स्वरूप उपस्थित किया जाता है। अध्यात्मसंस्था में दो प्रकार से चान्द सोम का भोग होता है । चाग्दसोम ही पूर्व प्रदर्शित क्रमानुसार 'रेन' बनता है । उस रेत की आहुति से दस पार्थिव-मान्तरिक्ष्य-दिव्य तीनों लोकों के रस प्रतिष्ठित हैं । पार्थिव घनरस से अन का . ३३१ प्राकृतात्मा आईशोपनिषत् ॥ सम्भूति-विनाश मधुभाग सूर्य का रस है । चौथा रस चान्द्रसोम है । इस का दिव्यरस में ही अन्तर्भाव है । मधु और रेत का घनिष्ट सम्बन्ध है । भन्न में जो एक सादविशेष (जायका) होता है, वह यही सोमरस है । विज्ञानभाषा में यही दियरस अमृत नाम से प्रसिद्ध है। कहीं कहीं इसे चौथे लोक का रस भी माना जाता है । पृथिवी-मन्तरित-धौ-दिक्-यह चार लोक हैं । इन चारों लोकों के कमशः अग्नि-वायु-आदित्य-चन्द्रमा यह चार देता अधिष्ठाता है। अग्न में अग्नि से दधि (घन) रस पाता है । वायु से घृत (तरल) रस भाता है। आदित्य से मधु (गिल) रस भाता है । एवं चन्द्रमा से अमृतरस आता है । भुक्त अा में जो पार्थिव दधिभाग (घनभाग) है, वह रस, मसक, मांस. मेद, अस्थि, मजा, शुक इन सात भागों में विभक्त है। शुक्र पर्यन्त पार्थिवरस है । पार्थिव भाग के हट जाने से केवल अान्तरिय वायु,एवं दिव्य सौर- चान्द्ररस रह जाते हैं । इन रसों की समष्टि ही 'मोज' है। योज वायुप्रधान वायव्य धातु है। आगे जाकर प्रान्तरिक्ष्य रस भी हट जाता है । इसी मधुमय विशुद्ध सोमरस का नान 'मन' है । इस प्रकार लोकरसो के तारतम्य से एक ही मुहान्नरस शुक्र-मोज--मन इन तीन रूपों में परिणत हो जाता है। पार्थिव सप्तधातुरूप शुक्र वाक्तत्व है, आन्तरिदप वायुमय भोग माणतत्व है, दिश्य प्रादित्यमय चान्द्ररस मनस्तत्व है । मर-माण-चार की समष्टिं ही 'हम' (पारमा) हैं। १-गार्थियनरस:--'पृथिवी- अमिः-दधि ]-सप्तपातवः शुकम्-बार २-मान्तरिक्ष्यतरलरस (अन्तरितम्-वायु:-मम् ]-ओजः- ३-दिव्पविरलासः–'यो:--- मादित्यः-मधु ४-दिव्यामृतरस:---(दिराः- याणः यात्मा मनः -- चन्द्रमाः--अमृतम् मनः----- ::- शुक्र भी चान्द्र है, मन मी चान्द्र है । शुक्राति से हम उत्पन्न होते हैं । इस शुक्र में रानातीय पाकर्षण सिद्धान्त के अनुसार चान्द्ररस प्राया करता है, साथ ही में अन्नद्वारा भी पुन 'पासना है। यही वासनापुञ्ज हमें भागे जन्म लेने के लिए बाध्य करता है । जब सम्भूति के चक्र में फंसा रहता है। कामनामय भविद्यापन्छिन्न मन ही आगे के जन्मों प्राकृतात्मा का ईशोपनिषत् ॥ सम्भूति-विनाश चान्द्ररस आया करता है । जो चान्द्ररस खतन्त्ररूप से शुक्र में आता है वह -सहासि माम से प्रसिद्ध है । नक्षत्र सम्बन्ध से शुक्रप्रतिष्ठ चान्द्र सोवास २८ मागों में विभक्त हो जाते हैं । यही आग्यात्मिक संतानप्रवर्तक पिनर हैं। इन का मन के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है । एवं अनद्वारा जो चान्दरस हमारे में आता है, यही पूर्वोक्त विशकलन प्रक्रिया के . अनुसार 'मन' बनता है—'अन्नमयं हि सौम्य मनः' । 'पोडशकमो वै चन्द्रमाः' ( पड्विंश मा ६) के शनुसार चन्द्रमा पोडशकल है । एक एक चान्द्र संपरसर में एक एक मनः कला का विकास होता है । इस क्रम से मम की सर्वात्मकता में आयु के १६ वर्ष लग जाते हैं । मन- खिता १६ वें वर्ष में संपन्न होती है । यही चान्द्रसोम का दूसरा भोग है । हमारा मन साक्षात् आयात्मिक चन्द्रमा है, यह अन द्वारा संपन्न हुआ है, अभद्वारा ही अध्यात्मसंस्था में खख- सा से प्रतिष्ठित रहता है । मन का उपादान चन्द्रमा है, हमारा मन चन्द्रमा में प्रतिष्ठित है, इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है- १-"तय तन्ननश्चन्द्रमाः सः" (जै० उ० १२२८५)। २-“मनश्चन्द्रमा!" (जै० उ० ३।२६)। ३-"चन्द्रमा मे मनसि श्रिता" (ते. मा० ३।१०।८.५) । ४-"यचन्मन एप स चन्द्रमाः" (शत० १०॥३।३।७)। चन्द्रमा से ( अन्नद्वारा ) उत्पन मन में स्नेहतत्वाधान वही श्रद्धारस प्रतिष्ठित है । इसी यद्वारून स्नेह के कारण हमारा मन विषयों में आसक्त होता हुआ उनके साथ बद्ध होजाता है, जैसा कि पूर्व के विज्ञानात्माधिकरण में विस्तार से बतलाया जाचुका है। यही विषयसंस्कार. तक संस्कारम्प अविद्याशुक्र मन पर प्रतिष्ठित रहता है, तब तक प्राणी भवरण ही पुनः- अतएव पूर्व के महात्माधिकरण में काम विद्या के लिए शुक्र (उपादानकारण) बनता को शुक्र बतलाया गया है । अन्थिविमोक विनाश है, प्रन्थिबंधन सम्भूति है । मामा के अस्थिधान ३३९ प्राकृतात्मा - इशोपनिषत् ॥ सम्भूति विनाश का कारण (वासनामय) मन ही है, एवं बंधनमुक्ति का कारण भी (वासनाशून्य ) मन ही है। पुनःसम्भूति एवं विनाश दोनों का कारण यही-मन है । जैसा कि अभियुक्त कहते हैं- - न देहो न च जीवात्मा नेन्द्रियाणि परंतप । मन एव मनुष्याणां कारणं यन्म-मोक्षयोः॥ शुक्र हमारा वास्तविक रेत (उपादान) नहीं है, अपितु सम्भूति का प्रधान रेत तो काम- भय हमारा मन ही है । यही पुनःसम्भूति का कारण है । इसी अभिप्राय से उपनिष- कुति कहती है- . "मनो मे, रेतो मे, मजा मे, पुनःसम्भूतिम तन्मे त्वयि (चन्द्रमसि)" । (जै० उ० श२७११४)। हमारा चन्दमा आध्यात्मिासंस्था की सम्भूति - विनाश का कारण है, उधर आकाश बिहारी ईश्वर का मन आधिदैविक संस्था की सम्भूति-विनाश का कारण है । पूर्व में चन्द्रमा शब्द को सोमपरक मानते हुए हमने सोमदृष्टया चन्द्रमा को सम्पूर्ण विश्व की सम्भूति का कारण बतलाया था, आज हम प्रत्यक्ष दृष्ट इसी चन्द्रमा को सम्पूर्ण विश्व की सम्भूति का कारण कह सकते हैं। हिरण्यगर्भ विद्या के अनुसार विश्ववेन्द्रस्य सूर्य ही विश्व का प्रभय-- प्रतिष्ठा-परायण है । सूर्य से ऊपर के स्वयम्भू-परमेष्ठी दोनों अमृतलोक सूर्य के अमृतमाग से प्रतिष्टित है, एवं सूर्य से नीचे के मर्त्यलोक सूर्य के मन्यमाग से खस्वरूप से प्रतिष्ठित हैं । प्रकार सूर्य ही व्यक्तविश्व का मूनस्कन्भ (स्तम्भ) वन रहा है । इस सूर्य को जीवित रखने वाला है, यही प्रत्यक्ष दृष्ट चन्द्रमा । सूर्य खररिमयों से पार्थिव रसों का निरन्तर प्रदान करता रहता है । उसी धादान से सूर्यप्रजापति का विसस्त भाग पूरा होता रहता है । इस कमी को पूरा करना चान्दनाड़ी पर निर्भर है । भूपिण्ड से संलग्न चान्द्रनाड़ी द्वारा ही पार्थिय रस सूर्य माहुत होते रहते हैं । जब तक चन्द्रमा है, तब तक चान्द्रनाड़ी है, जब तक चान्द्रनाड़ी है, तभी तक सौरपास्थिति है , नर तय यह है तमी तक सूर्य जीमित है - जब तक सूर्य विषयज्ञान में प्रज्ञामात्रा-माणमात्रा-भूतमात्रा यह त्रिपुटी रहती है। मन में सोम-चित्- तीन प्रकार का मनोराज्य है। पत्रकल अव्यय वाला मन सर्वालम्बन है । यह जड़-चेतन सब में समानरूप से विद्यमान है। इसी चिन्मन की अपेक्षा से भारतीय आर्यसाहित्य का सर्वच्या- नामों से व्यवहत किया जाता है। दूसरा है चान्द्रमन । 'नियतविपयस्वमिन्द्रियत्वम्' इन्द्रिय प्राकतारमा (केनोपनिषत्) के अनुसार सारी इन्दिए मन से युक्त होकर ही तत्तद्विषयभोग में समर्थ होती हैं । का ईशोपनिषत् । - सम्भूति-विनाश जीवित है, तभी तक अमृतमृत्युभय विश्व की सम्भूति है । इस प्रकार परम्परया इस सम्भूति का श्रेय एकमात्र चन्द्रमा को ही है। अध्यात्म जगत को देखिए । हम उत्पन्न हुए हैं, चन्द्रमा से | हमारी पुनःसम्भूति होती है चन्द्रमा (मन) से । एवं अपनी आयु के भोगकाल में हम जो कुछ सम्भूति (वैभव) प्राप्त करते हैं, वह भी इसी चन्द्रमा (मन) से । यदि मन नहीं हो तो हमारे विज्ञान(बुद्धि),महान, अव्य- तादि कुछ नहीं कर सकते । मन पर ही विज्ञान प्रतिष्ठित है । मन बीघ्र पात्र है । इसी पर विज्ञानसूर्य प्रतिबिम्बित होता है। विज्ञानात्माधिकरण में बतलाई गई प्रक्रिया के अनुसार विज्ञानसूर्य के दर्शपूर्णमास से ही महान् में त्रैगुण्यभाव का उदय होता है । वैगुण्य महान् ही चिदान्मा की योनि है । यदि मन नहीं तो विज्ञान नहीं, विज्ञान नहीं तो त्रिगुणभावापर्ने महान् नहीं , महान् नहीं तो चिदाभास नहीं , चिदाभास नहीं तो कुछ नहीं । यह तो हुई मन से उधर (आभ्यन्तर) की स्थिति, अब चलिए इधर की ओर । 'स उ देवो युनक्ति' से माण यह तीन कलाएं हैं । इन में चिदंश से प्रहामात्रा पर, सोमांश से भूतमात्रा पर, एवं भागांश से प्राणमात्रा पर मन का अनुमह होता है । 'न हि प्रज्ञापेना काचन धीः सिध्येव, नामाज्ञासिपम्, अन्यत्र मे मनोऽभूत्" (को-उ० ३ अ० ८ ख०) के अनुसार विना मन के इन्दिएं विषपभोग में एकान्ततः असमर्थ हैं । विना विषयान के शरीर नहीं, शरीर नहीं तो कुछ नहीं। इस चान्द्रमन को 'प्रज्ञान' नाम से व्यक्त किया जाता है। हमारी अध्यात्मसंस्था में पक चैतन्यवाद प्रतिष्ठित है। इस अव्यय मन को 'धोवसीयसमन' 'धोवस्पसब्रह्म' मादि ३३१ का ईशोपनिषत् ॥ सम्भूति विनाश प्राकृतारमा कर सकते का यह लक्षण है । समी इन्दिए अपनें अपने रूप-रस-गरादि नियत विषयो को ही भोगने में समर्थ हैं । यही इन्द्रियों का इद्रियत्व है | भोग ज्ञानसापेक्ष है । श्रश्श्य ही सब इन्द्रियों के मूल में एक ऐसा ज्ञानयन्त्र मानना पडता है कि जिसकी ज्ञान रश्मियों को लेकर इदिए वस्खविषयभोग में समर्थ बनती है । उसी ज्ञानय 3 का नाम प्रज्ञान मन है । यह सब इद्रियों या प्रभु है। बिना इस का सहारा लिए कोई भी इन्द्रिय अपना क म नहीं कर सकती । चकि यह सब इदियों में अनुस्यूत रहता है, अतएर हम इसे 'सर्वेन्द्रियमन' नाम से व्यवद्धत । इस का विषय नियत नहीं है, यह सम में है, अतएर नियतविषय लक्षण इन्द्रिय मयादा से पृथक् रहता हुप्रा यही 'अनिन्द्रियमन' नाम से भी प्रसिद्ध है। इसका सोम भाग चिदश से युक्त रहता है , अतएव इसे 'मज्ञानमन बहना भी न्यायप्राप्त होता है । एक तीसरा मन और हे । उसका पाम हे-अच्छे बुरे का अनुभव करना । मनुकूल वेदना, प्रति- कुल घेदना इस का नियत विषय है, श्रतएव यह तीसरा मन इन्द्रियकोटि में प्रविष्ट होता दुधा 'इन्द्रियमन' नाम से प्रसिद्ध है । इसी के लिए 'मनः पानीन्द्रियाणि' (अर्या) यह कहा जाता है। धातु इन सब विषयों का विशद निरूपण प्रज्ञान निरूपणामिका आगे की केनोपनिपत में होने वाला है । भन इस विषय को अधिक विस्तृत न कर केवल यही कहना चाहते हैं कि प्राणेन्द्र प्रज्ञा-सोम की समएिरूप यह सर्वेन्द्रिय, अतएव अनिन्द्रिय, प्रज्ञानमल नाम से प्रसिद्ध थनमय मन ही मव्यक्त-मस्त-पिशान-शरीर-मन्दिए-शारीरदेवता-भून- गारीरलोर आदि सब की सम्भूति का कारण है । प्रशनब्रह्म की इसी सीता का निरूपण परते हुए महर्षि ऐतरेय बहते है- . सोऽपमात्मेति उपमुपास्महे, स्तर स प्रात्मा ? इति । येन या पश्यति, पन पा शृगोति, येन वा गन्यानानिमाति, येन या पाच व्यारोति, येन या सादु ना सादु च पिनानाति, यतव-रदय, मनश्च (द्रियमनश्श), एतत् स. मानमामान, विज्ञान, ममान, मेघा, दृष्टि, पति, मंति, मनीपा, जूति , सरस अनु, रमः पामो, यग इति । सपियरनानि मज्ञानम्य नामयानि भान्ति ।

एप ब्रह्म, एप इन्द्र, एप प्रजापति, रेते सर्वे देवा, इमानि च पञ्चमहाभूतानि पृथिवी-वायु-सकाश-आपो-ज्योतीपीत्यतानि, इमानि च तुद्र मिश्राणीप थी. जानीतरणि, चेतराणि चाण्डजानि च, जारुजानि च, वेदजानि च, उद्भि- जानि च, अश्या, गावा, पुरुषा, हस्तिनो, यकिंचेदं माणि. जगमंच पतत्रि च, यञ्च स्थावर, तत् प्रज्ञानेनं, प्रज्ञाने प्रतिष्ठितम् । प्रज्ञानेनो लोकः । प्रज्ञा पतिष्ठा । स एतेन माज्ञेनात्मनाऽऽस्माल्लोकादुत्क्रम्य प्रमुष्मिन्रवर्ग लोके सवान् कामानात्वाऽमृतः समभवत्, समभवत्" ।। (ऐतरेय मारण्यक २।६।१)। संभृति एवं विनाश का क्या स्वरूप है ! अघिदैवत, एवं अध्यात्म में बदमा और मन ही सम्भूति-विनाश के अधिष्ठाता कैसे हैं ! इत्यादि बहिरंग प्रश्नों का समाधान होचुका । अब मूलमन्य की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है। उपनिपत में प्रकृत अधिकरण के तीन मन्त्रों का 'अन्धं तमः प्रविशन्ति' 'मन्यदेवाहुः सम्भवात्' 'सम्भृतिं च विनाशं च' यह क्रम उपलब्ध होता है, परन्तु विज्ञानदृष्टि से पूर्व के विज्ञानात्माधिकरण की तरह यहां भी 'अन्यदेवाहुः सम्भवाव' 'भन्यं तमः मविशन्ति' विरुद्ध जाने वालों की अधोगति बतलाता है, एवं सम्भूति च विनाशं च' इत्यादि मन्त्र प्रति. शामक प्रज्ञानात्मा का निरूपण करते हुए निम्नलिखित प्रथम मन्त्र हमारे सामने याता है- इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विवक्षिरे ॥१॥ प्राकृतात्मा सम्भूति-विनाश । ईशोपनिषत् ॥ (ई. उ० १३ मं.)। 'सम्भृतिं च विनाशं च यही क्रम समझना चाहिए । 'अन्येदवाहुः' यह प्रयम मन्त्र प्रना- नात्मा का स्वरूप बतलाना है, 'अन्धं तमः अवशन्ति' यह मन्त्र प्रतिपादित चात्मस्वरूप से पादित भात्मस्वरूप का स्पष्टीकरण करता है । इस क्रम को प्रधान मानते हुर, सम्भूति-विना- अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुससम्भवात् ।

सनात्मा का इशापनपत्र सन्तविनाय "विद्वान् बोग उस (प्रज्ञानात्मनत्व) को सम्भव से भी पृथक् कहते हैं, असंभव से मी पृथक कहते हैं। जिन वैज्ञानिकों ने हमारे लिए प्रात्मस्वरूप घतनाया है, उन धीर विद्वानों के द्वाग हम यही मुनते पाए हैं-(कि वह आमतत्व संभूति और आस- म्भूति दोनों से पृयक है" यह है मन्त्र का पारायं । सम्भूति अस्तितत्व है, असम्भूति नास्तितत्व है । सत्तारस से अनुगृहीत पदार्थ सम्भूति है, सत्तारस से प्रयुक्त पदार्थ असम्भूति है। उपति और विनाश दोनों भाव प्रत्यक्ष दृष्ट है। यह उत्पत्तिरूपा सम्भूति, विनाशरूपा श्रममूनि प्रात्मा के धर्म नहीं है । प्रशनामा में जो शाम अंश (चिदंश ) है, न वह उन होता, न उस का कभी पिनाश होता । यलों की ही रसरूप आत्मा के अनुग्रह से सम्भूति हेतो tपरित्याग्नण्याचम्या में बलों की ही श्रमभूति होती है । सम्भूति-सम्भूते दोनों बल के धर्म है । यह इन दोनों का मालम्बन वनता दुधा दोनों से पृयर है । सम्भूति घोर भस- मूी निमके पाधार पर होती है, उसे धारमा (प्रज्ञानामा) समझना चाहिए । चपेच रम-यल समिप यह थामा न केवल सम्भूति या अधिष्ठाता है , न येत भागात का भविष्टाना है । अपितु दोनों उसी के विपर्त हैं । यह असामतिरूप है, इसतिर तो उसे सही नहीं कहा जासरता । सम्मनिरप है, घनः उमे असम्भूति भी नहीं कहा जा सम्ता । सम्झी धमनी या परसार में निरोध है , पतः उसे उभपालक भी नदी पहा मासमता मी पनि में यदि उसके मम्बन्ध में युज फश जासरता है तो यही कि यह सगी-समझी दोनों से पृषर है। की ग पाणा या रममाग मी या शिष्टाला दे, यलमाग मसी या मधि- PIम रद गरा, न सुर बलाय दी है। उमा गरूप दोनों से तिर । दोनों की मी मामा । 'मनो यन्धुममनि निरवन्दिन् 'अन्तरं प्रगोरमत मायामास्तिम' सामने गा मा गगगामनन 'नागटागीयो सदागीपदानी' रातमाग वमों के अनुसार मर मर गुम्मा दोनों से पापा मापदंगे की gitima- १०.

+। कप में परिणत होजाता है। वस-रसवलयो:-सदसतोः-एकीभावः' ही सम्भूति है । सम्भूति अन्यतम में प्रविष्ट रहते हैं । बल असद (नास्ति) भाव है, नारित शून्यभाव है, शून्यभाव थम्धकार है । 'प्रसन्नेत्र स भवति असद प्रोति वेद चर' के। प्राकृतात्मा 2. ईशोपनियत् ॥ सम्भूति-विनान श्रन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्या रताः ॥२॥ (ई० उ० १२.)। जो व्यक्ति केवल असमूति की उपासना करते हैं, यह घोर अन्धकार में प्रविष्ट होते हैं, एवं इनसे भी अधिक वे मनुष्य अन्धकार में प्रविष्ट होते हैं, जो केवल सम्भूति में ही रत हैं । धर्थात् जो चार्वाकादि केवल क्षणिक बल को ही प्रधान मानते हुए संसार को शून्यं शून्यं समझते हैं, वे तो शून्यरूप अंधकार में हैं ही, परन्तु आस्तिक बनने का गर्व करने वाले जो महानुभाव क्षणिक वल का निरादर फर केवल सांसारिक अस्तिरूप विषयों में ही भासत रहते हैं । जो यह नहीं समझते कि जिन की हमने सम्भूति समझ रक्खी है, कालांतर में उन सब का नाश होने वाला है, ऐसे श्रासक्त पुरुष और भी अधिक आवरण में हैं । अपिच 'समिसकीमावे के अनुसार सम् का अर्थ है दो वस्तुओं का एकीमात्र | प्रकृत में ये दो ताय सुररिचिन रस-यल ही हैं । रस से सत्ताः, किंवा सत्तत्व अभिप्रेत है, बस से असक्तत्व अभिप्रेत है। इस असत् बल में जो सत् रस का सम्बन्ध है, वही बल की सम्भू- ति है, जैसा कि पूर्व में विस्तार के साथ बतलाया जाचुका है। सत्तारस खखरूप से सर्वपा मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यनि' के अनुसार माना है। जब तक यह बल सत्तारूप एकरस से पृथक् रहता है, तब तक एकीमात्र से शन्य रहता हुआ यह नामाभावापन्न है । यही रस से अनुग्रहीत होकर एकीमात्र को प्राप्त होता हुआ सम्भूति- सत्तास है, शुद्ध बल असम्भूति है । बल भावरण सरूप होने से तम' है । ऐसी अवस्था में असम्भूतिरूप केवल इस बल भाग की ही उपासना करते हैं, वे सचमुच श्रावरणरूप भनुसार केवल असत् के । एक है । असत्बल-'मृयोः स मो ३४३ :

प्राकृतारमा प्रकरयोपकार -सा ईशोपनिषत् 11 उपासक स्वयं असत् बन जाते हैं। परन्तु वे और भी अधिक गहरे अंधकार में हैं, जो कि केवल रसरूप सम्भूति की ही उपासना करते हैं ! रस बसलक्षण है। बिना बल के विशु- इसवत्व- मासीदिदं तमोमूतमप्रज्ञातमलक्षणम् । प्रमतर्यमनिर्देश्यं ममुप्तमित्र सर्वतः॥ के अनुसार सर्वथा भप्रज्ञात-अलक्षण-प्रमतर्य-अनिर्देश्य-असुप्त तम है । जब तक बन का आश्रय नहीं लिया जाता,तब तक खखरूप से रस अनुपाग्व्यतम है। यह तम बलतम से भी गहरा है। बल संसार का स्वरूप है, अतः इस की उपासना करने वाला, प्रावरणरूपा सांसारिक संपचि तो प्राप्त करलेता है। पान्तु विशुद्ध रसरूप सम्भूति का अनुयायी न इधर फा रहता, न उधर का । यही इस का भुयान्धकार है । एसी प्रवाया में क्या करना चाहिए? सुनिए- सम्भूतिं च विनाशं च यस्तदेदोभयं सह । विनाशेन मृत्यु ती| सम्भूत्यामृतमश्नुते ॥३॥ ( ई० ज० ११ मं० )। जो धीर विद्वान् सम्भूति और विनाश दोनों को एक बिन्दु पर प्रतिष्टित देखता है, यह विनाश से मृत्यु का तरण कर सम्भूति से अमृतत्व प्राप्त करने में समर्थ रोजाता है । मन्त्रार्य के सम्बन्ध में विशेष वक्तव्य नहीं हैं। मृत्यु ही अमृतप्राप्ति का साधन है । अतः दोनों के समु. चिनरूप यादी उपासना करनी चाहिए । निधामभान से मृत्युलक्षण संसार वी उपासना परते हुए ममून पर दृष्टि रदिए ! यही आदेश है, पही उपदेश है, यही संपत है, यही माझी उपनिरन् । । उपनिषद का प्रधान तप प्रामा है। मन व प्रत्येक प्रकरण में मन्तिम लक्ष्य भम हम पुपनण मान्मा री बन जाता है। पामसरूपपरिहान के लिए चारमसटि का सरूप भाकृतास्मा हा ईशोपनिषत. प्रकरणावर जानना भी श्राश्यक होजाता है। अतएव अगत्या उपनिषत् को इस का भी स्वरूप बतलाना पड़- ता है । यही कारण है कि उपनिषत् अात्मा-एवं शात्मसृष्टि दोनों के किसी विशेषभाव का निरूपण न कर सामान्य शब्दों का उपयोग करती है | उपनिषत् ऐसे अक्षर बोलती है, जिन से मात्मा-एवं श्रात्मसृष्टि दोनों का स्वरूप गतार्थ होजाता है । अतएव प्रकृत के तीनों गन्त्रों से जहा रसबलामक प्रात्मा का परिज्ञान होता है, एवमेव सम्भूति-विनाशमयी यज्ञरूपा चान्द्रसू. टि का भी परिज्ञान होजाता है। न केवल अधिदेवतचरित्र का ही, किन्तु अध्यात्मस्पिति का भी उन्ही शहरों से स्पष्टीकरण होजाता है । ईश्वरीय जगत की अपेक्षा से प्रकृत मकरण से ब्रह्मससाक्षररूप अन्नमय सम्भूति-विनाश के कारणभूत 'चन्द्रमा' का स्वरूपज्ञान होता है । एवं अध्यात्मजगत की अपेक्षा से मनुष्य की पुनःसम्भूति के अधिष्ठाता प्रज्ञा- नात्मा का स्वरूप परिचय होजाता है। साप ही में दोनों विश्वों के पालम्बनभूत सदसदात्म सम्भृति-विनाशरूप अमृतमृत्युमय आत्मा का बोध होजाता है । इसी सारे अज्ञानवैभव का प्रतिपादन करता हुआ प्रज्ञानात्माधिकरण समाप्त होता है । इति प्रज्ञानात्माधिकरणम्। ४

माकृतात्माधिकरशो-
प्रज्ञानात्माधिकरणं
समाप्तम्
40

पूरी मिदम्
प्राणवैभव भोक्ता-देवसत्यः
पूर्णमदः
साक्षी-देक्सत्यः
अधिदैवतम्
देवसत्याक्षरः-
अध्यात्मम्
-
ज्ञान-क्रिया-अर्थमयः-वैकृतात्मा साक्षी
प्राणात्मा
५
साक्षीदेवसत्यः-----अमृतान्नाद:-----भोक्तादेवसत्यः
(प्राकृतात्माधिकरणे प्रारणात्माधिकरणं पञ्चमम्)
यज्ञमात्रिकवेदावच्छिन्नः-ज्ञान-क्रिया-अर्थमयात्मा
मृतात्मा
१- हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।
तत्त्वम्पन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥
२- पन्नेक यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् ।
समूह तेजो, यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि ॥
योऽसावसौ पुरुषः सोहमस्मि ।।
--
३- वायुरानेलममृतम्
॥
(ईशोपनिषत् १५-१६-१७ मन्त्र)

तयोरन्यः पिप्पलं स्वासनननन्पोऽभिचाकशीति ॥ (मुण्डक० ३।१११)। ८- समाने से पुरुषो निममोऽनीशया शोचति मुझमानः। 'जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्प महिमानमिति वीवशोकः ॥ (मुण्डक० ३३१२)। AND) देवसत्यात्मस्वरूपनिदर्शन , १-- श्रमियर्थको भुवनं भविष्टो रूप रूपं प्रतिरूपो बभूव । एकस्तया सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ।। २- वायुयषको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं मतिरूपो बभूव ।' एकस्तया सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं मतिरूपो बहिश्च ।। ३- सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चालुपैर्वाह्यदोपैः । एकस्तयां सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन याह्यः ।। *- एको वी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति । तमात्मस्यं येऽनुपरयन्ति धीरास्तेषां सुख शाश्वत नेतरेपाम् ॥ { कठोपनिषत् २ ० ५ २० १-१०-११-१२ मं०)। ५- अङ्गुष्ठमानः पुरुषो मध्य भात्मनि तिष्ठति । ईशानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतदै वद । (कठ० २-४-१२) । ६- अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः । ते स्वाच्छरीराद मटन मुजादिवेपीकां धैर्येण ॥ (कठ० २।६।१७)। ७- दा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिपस्वनाते ।

- यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्ण कारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् । तदा विद्वान पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्पमुपैति ।। मुण्डक ३२११३) १०- प्राणो शेप यः सर्वभूतविभाति विजानन विद्वान् भवते नातिवादी । प्रामक्रीड़ आत्मरतिः क्रियावानेप ब्रह्मविदां वरिष्ठः ॥ (मु० ३।११३)। ११- युनानः प्रथमं मनस्तत्वाय सविता धियः । अग्नेज्योतिर्निचाय्य पृथिव्या अध्याभरत् ।। (श्वे० २।१)। १२- सहस्रशीर्पा पुरुपः सहस्राक्षः सहस्रपाद । स भूमि विश्वतो वृत्त्वाऽसतिष्ठदशाकुलम् ॥ (खे० ३११.४) ।

चार भाधिदैविक सत्यात्माओं का, एवं इन्ही के अंशभूत अन्यक्त, महान, विज्ञान, प्रज्ञान इन चार आध्यात्मिक सत्यात्माओं का पूर्व के- करण ४-मज्ञानात्माधिकरण इन चार मधिकरणों में निरूपण किया जाचुका है। हमारी स्थिति के अनुसार स्वयम्भू-परमेष्ठी-मूर्य-चन्द्रमा-पृथिवी यह क्रम . ॥ श्रीः ॥ यो देवो भग्लो यो मासु यो विसं भुवनमाविवेश ! य ओषधीषु यो वनस्पतियु तस्मै देवाय नमो नमः ॥ १। तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः । तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदापस्तत् प्रजापतिः ॥ २ ॥ चो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन् देवा अधि पिरवे निषेदुः । यस्तं न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासत ॥ ३ ॥ गुणान्वयो यः फलकर्मकर्ता कृतस्य तस्यैव स चोपभोक्ता । स विश्वरूपस्त्रिगुणस्त्रिवर्मा पागणाधिपः सञ्चरति स्वकर्मभिः ॥ ४ ॥ भङ्गुष्टमानो रवितुल्यरूपः संकल्पाहकार समन्वितो यः । बुद्धगुणेनात्मगुणेन चैव पाराप्रमात्रो ह्यपरोऽपि दृष्टः ॥ ५ ॥ एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरामा । कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ।। ६ ॥ आत्मानं रथिनं विद्धि शरीर स्यमेव तु । बुद्धि तु सारथिं विद्धि मनः प्रमहमेव च ॥ ७॥ इन्द्रियाणि हयानावविषयास्तेषु गोचरान् । मात्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्ते पातुर्मनीषिणः ॥ ८ ॥ सत्य से सम्बन्ध रखने वाले स्वयम्भू, परमेष्ठी सूर्य, चन्द्रमा, इन :-अध्यक्तात्माधिकरण, २-महदात्माधिकरण, ३-विज्ञानात्माधि- प्राकृतात्मा - ईशोपनिपत् ।। देवसत्य M है । यह पांचो पिण्ड क्रमशः प्राणब्रह्म, आपोवा, वागब्रह्म, अन्नब्रह्म, अन्नादब्रह्म इन नामों से प्रसिद्ध हैं । इन पांचों में आत्मा-पद-पुनःपद यह तीन तीन पर्व हैं । अतएव पांचों पिण्ड सहृदय-सशरीरी बनते हुए 'सत्य' हैं । इसी आधार पर इन पांचों ब्रह्मों को हमने 'सत्पात्मा' 'ब्रह्मसत्पात्मा' 'ब्रह्मसत्याक्षर' इत्यादि नामों से व्यवहृत किया है । अब तक चार ब्रह्मसत्यों का निरूपण हुआ है । पृथिवी नाम का पांचवां ब्रह्मसत्य शेष रहा है । उचित यह पा कि चान्द्रब्रह्मसत्य के अनन्तर ही उपनिषत् पांचवें पार्थिव ब्रह्मसत्य का निरूपण करती। परन्तु ऐसा न कर पार्थिव ब्रह्मसत्य से पहिले, एवं चान्द्रब्रह्मसत्य के मनन्तर श्रुतिने पार्थिव देव- सखात्मा का ही निरूपण किया है । मह्मसत्यरूप पृथिवी के भूत-माण भेद से दो विवर्त हैं । इन दोनों में भूतप्रधाना पृथिवी (भूपिण्ड) ब्रह्मसत्य है । ब्रह्म सत्यात्मक इस भूपिण्ड पर प्राणप्रधाना पृथिनी (महिमाट- थिरी) प्रतिष्ठित है । इसी प्राणमयी पृथिवी के साथ देवसखात्मा का सम्बन्ध है । देवसत्यप्रति- मामयी प्राणपृथिवी देवरूपा है । यह ब्रह्मसत्यरूप चन्द्रमा, एवं ब्रह्मसत्यरूप भूपिण्ड दोनों के मध्य में प्रतिष्ठित है । इसी प्राकृतिक स्थिति को लक्ष्य में रखकर उपनिषत् ने चान्द्रब्रह्मसत्य निरूपण के अनन्तर ही प्राणपृथिवी पर प्रतिष्ठित देवसत्यात्मा का निरूपण किया है । इस के अनन्तर बाकी बचे हुए भूपिण्डात्मक पांचवें ब्रह्मसत्यात्मा का निरूपण होगा। औपनिषद् ज्ञान के लिए जैसे शोटशी प्रजापति का स्वरूप जानना आवश्यक है, एयमेव विना ब्रह्मसय-देवसब के खरूपज्ञान के भी उपनिषदर्य का समन्वय करना कठिन है । आगे पाने वाली कठोपनिषत् में इस कठिनता का विस्तार के साथ निराकरण किया गया है । अतः प्रकृत में प्रकरणसङ्गति के लिए दो चार शब्दों में इन दोनों का परिचयमात्र करा दिया जाता है । प्रलसत्य-देवसत्य के परिज्ञान के लिए निम्न लिखित श्रौतस्पन पर दृष्टि डालिए- १५२ है, परात्पर परमेश्वर है | खपम्भू-परमेष्टी-सूर्य-चदमा-भूपिण्ड यह ईश्वर के उपकरण है, प्राकारमा जीवात्मा-और परमात्मा का युग्म माना जाता है । परमात्मा ईश्वर है, जीगत्मा जीव शोपनिषत् ॥ देवसर दो सुपर्णा सयुजा सखाया, समानं वृक्ष परिपस्वजाते । तयोरन्यः पिप्पलं स्वादत्ति, अननन्नन्योऽभिचाक्शीति ।। ( मुण्डको० ३।१।१)। "एक वृक्ष की ए शाखा के प्रमभाग पर दो मुनहरी रंग के पक्षी बैठे है । दोनों सयुक् (जोडने) है । दोनों में घनिष्ठ मित्रता है। इन दोनो में से एक पदी फल को चख रहा है, दूसरा पक्षी विना खाए उस खाने वाले की चौकसी कर रहा है।" यह है मन्त्र मा फलितार्थ । यव वृक्ष वही थाप का सुपरिचित महामायापन्छिन भमृत-ब्रह्म-शुक्रमूर्ति महेन्चररूप 'अश्वत्यक्ष' है। इस अश्वत्पवृक्ष में सहस्राल्शा (एक हजार टहनिए) हैं। प्रत्येक टहनी में स्वयम्भू-परमेष्ठी-सूर्य-चन्द्रमा-पृथिवी यह पाच पर्व (प्रन्थिए ) हैं , यही सहस्रवल्श मलाश्चत्य है । पक्षी वृक्षपर नहीं बैठता, वृक्ष की टहनी पर बैठता है। टहनी के भी थोर किसी भाग में न वेठकर टहनी के प्रागे के छोर पर वेता है । यही परिस्थिति यहा समझिए । अधययन की एक टहनी में खयाभू मूनभाग है, सूर्य म यभाग है, पृथिवी सबसे अन्त का भाग है । इसी पर दोनों पक्षी बठे हुए हैं । इन दोनों में एक पक्षी फल खाता हुमा 'मोक्का' बन रहा है। इसी को कठोपनिषत् नै 'मध्यद' नाम से व्यवहृत किया है । दूसरा पल न खाता हुआ 'साक्षी बन रहा है । भोक्ता एव साक्षी दोनो पक्षियों का स्वरूप देव- ताओं से संपन्न होता है, अतएर यह दोनों 'देवमस' नाम से प्रसिद्ध है । हैं । जी और ईश्वर केवल देवसत्य का नाम है । सयम्भू आदि उपेश्वर हैं, भञ्चत्य महेश्वर * इस अनुगम मात्र ये ६ अर्थ होते है । इन इयों का हिरण्यगर्भप्रियाप्रतिपादक मुण्डकोपनिपान में विरद्वार से निरूपाया है। ३५३ देसत्य प्रोफवारमा का ईशोपनिषत् | अव्यक्त-महान्–विज्ञान-प्रज्ञान-शरीर यह जीव के उपकरण हैं । कर्म भोगने वाला, योन्यन्तर में जन्म लेने वाला जीवात्मा केवल भोक्ता देवसत्य है। महान्-विज्ञान अव्यक्तादि का कर्मभोग से कोई सम्बन्ध नहीं । इस बात्मपृथक्करण से ही प्रात्मविषयक सन्देह निवृत्त होते हैं । 'जब जीवात्मा कर्म भोगने के लिए लोकान्तर में, किंवा योन्यन्तर में चला गया तो फिर श्राद्ध किसके लिए किया जाता है ? जब आत्मा अजन्मा है तो उस की उत्पचि कैसे बतलाई जाती है ! ऐसे ऐसे प्रश्नों का उस समय कोई मूल्य नहीं रहता, जब कि सर्वथा विभक्त धात्मसंस्थाथों का सरूपज्ञान होजाता है । श्राद्ध महानामा के लिए ही किया जाता है । कर्ममोक्ता उक्त देवसत्य ही है । पोडशी पुरुष सर्वथा अजन्मा ही है । अस्तु भागे थाने वाली उपनिपदों में इन सब विषयों का स्पष्टीकरण होता रहेगा । प्रकृत में केवल ईश्वर भोर जीय का स्वरूप ही विजिज्ञास्य है । पश्चनलों में सबसे अन्त का ब्रह्म 'अन्नाद है । अग्नितत्व को ही अन्नाद कहा जाता 'ममिः सर्वा देवता। अमिपुरोगाः सर्वे देवाः पीयन्ताम्' के अनुसार अन्नाद अग्नि ही ३३ देवताओं की मूलप्रतिष्ठा है। श्रतएव सब देवताओं के लिए अग्नि में ही आहुति दी जाती है। अग्नि ही देवताओं का मुख है। 'अद्ध ह वै प्रजापतेरात्मनो पर्समासीदर्द्धममृतम्' इस निगम के भनुसार पह प्रजापति अग्नि अमृत-मृत्यु भेद से दो भागों में विभक्त है । अमृताग्नि पाग्यामि माम से, मामि भूतानि नाम से प्रसिद्ध है । यज्ञपरिभापानुसार अमृताग्नि को 'चितनिधे- यानि एवं मायाग्नि को 'चिसामि' कहा जाता है । भूतरूप भाग्नि से भूपिण्ड का निर्माण हुमा है। पाप-फेन-मृत्-सिकना-शर्करा- ग-मश्मा-प्रय-हिरणय इन श्राट पितियों में परिणत होकर पद माग्नि भूपिण्डरूप में परिणत हुआ है, अतएव इसे 'चित्यानि' कहना श्याय संगत होता है। दूसरा अमृताप्ति, किंवा प्राणाग्नि भूपेन्द्र में उपयरूप से प्रतिष्टित रहता पमा, -( रशिग)-रुप से भूपिण्ड से बाहर निकल कर अपना एक स्वतन्त्र मण्डल बनाता जनिक पद अमृतानि व्या रहता है, यहातक या अमृतानि महत नाम से प्रसिद्ध है। पपनामिपरिभाषा के अनुसार पित्याग्निमय भूपिण्ड 'कृष्णानिन' कार 'महिमाथिवी जाकर ३३ रूप धारण कर लेता है-'अनि:सर्वा देवता"। भाग ३३ ३ स्तोम तक व्याप्त है, एवं वाक्माग (अग्निशुक्र) पृथिवी के २१ महर्गण तक व्याप्त है । 'तस्य वा एतस्यामे गेषोपनिपत्' ( शत० १०५।११) के अनुसार बाक्स्तर अग्नि है। इस अमिस्तर की ही अग्नि-वायु-आदित्य यह तीन अवस्थाएं हैं | पृथिवीपृष्ठ से प्रामवारमा महिमामण्डल में व्याप्त रहने वाले अग्नि की क्रमशः धन-तरल-विरल-यह तीन अवस्थाएं हो | ईशोपनिषत् ।। देवसत्य लाता है, एवं चितेनिधेयाग्निमय भूमण्डल 'पुष्करपर्ण' नाम से प्रसिद्ध है। इस पुस्करपर्णरूप जाती हैं । एक ही अग्नि को यह तीनों अवस्याएं क्रमशः अमि-वायु-आदित्य नान से म- सिद्ध हैं : भूपृष्ट के मण्डस की सीमा तक व्याप्त रहने वाले पाणानि के तीन विभाग कर डालिए। इन तीनों में भी अवस्थातारतम्य मानना पड़ेगा। धनाग्नि की घनावस्था के तारतम्य से आठ अवयव माने जाते हैं, प्राप्ति के यही आठ अवयय आठ वसु हैं । मध्य के तरलस्तर की ( तरलता के तारतम्य से ) ११ प्रवस्याएं हैं, यही ११ रुद्र हैं 1 अन्त के विरलस्तर की (विरलता के तारतम्य से ) १२ श्यवस्थाएं हैं, यही १२ आदित्य हैं । इन तीन व्यवस्थाओं में दो सान्ध्य प्राणों का उदय होता है । इस प्रकार अग्निज्येष्ठ आठ वमु. वायुज्येष्ठ ११ रुद्र, इन्द्रज्येष्ठ १२ आदित्य, ५ सान्ध्यमाण, संभूय ३३ देवता हो जाते हैं । एक ही पनि पहिले अग्नि-वायु-आदित्यरूप से तीन रूप धारण करता है, वही अयान्तर अथस्थानों से आगे भदियां जज्ञिरे देवास्त्रयस्त्रिंशदरिन्दम । आदिसा वसवो रुद्रा अश्विनौ च परंतप ।। (वा० रा.)। पृथिवी में बार-गौ-धौ यह तीन मनोता है । माप्य के प्रथम खण्ड में शुक्रनिरुक्ति में चाक- माप-अनि नाम के तीन शुक्ल बतलाए गए हैं-( देखिए ई० वि०१ खे० पृ० ३३७) | स्वार यम्भुव वास्तर द्यौ है, पारमेष्ट्रय मापस्तर गौ है, एवं सौर अग्निस्तर वार है । यौ-(वाक् शुक) भाग भूपिण्ड के केन्द्र से आरम्भ कर मापृथिवी के ४८ में स्तोम तक व्याप्त है । गो- थारम्भ कर 4 वें अहर्गण तक (जो कि अहर्गणों की समष्टि त्रिवस्तोम नाम से प्रसिद्ध है) धनावस्थापन अग्नि प्रतिष्ठित है। यहां से पञ्चदशमहर्गण पर्यन्त तरलावस्थापन्न अग्नि (वायु) देवतत्य प्रास्तारमा या ईशोपनिषत् । प्रतिष्ठित है । एवं यहां से २१ पर्यन्त बिरल अग्नि (इन्द्र) प्रतिष्ठित है । त्रिवृतातोम इस महिमा पृथिवी का पृथिवीलोक है, इस का प्रतिष्ठाता (अधिष्ठाता) अग्नि है । पञ्चदशस्तोम महिमा पृथिवी का अन्तरिक्षलोक है, इस का प्रतिष्ठाचा वायु है । एकविंशस्तोम महिमापृथिवी का शुलोक है, इस का अनिष्ठावा इन्द्र है । इस प्रकार केवल महिमा पृथिवी में ही स्तोममेद से त्रैलोक्यभाव का उदय होजाता है। यही पायिवत्रिलोकी 'स्तौम्यत्रिलोकी' नाम से प्रसिद्ध है । पार्थिव त्रैलोक्य में व्याप्त इन्ही तीनों अग्नियों के सर्वहुतयज्ञ से वैश्वानर-हिरण्यगर्भ- सर्वज्ञमूर्ति ईश्वरीय देवसत्य का जन्म होता है । पार्थिव निटदग्नि को आधार बना कर आन्तरिक्ष्य वायु, दिव्य इन्द्र की आहुति होने से, तीनों के समन्वय से वैश्वानर अग्नि उत्पन्न होता है । वैश्वानर अग्नि में यद्यपि त्रैलोक्य का अग्नि है, परन्तु प्रधानता पार्थिव अग्नि की है। आन्तरिदय वायु में पार्थिव अग्नि, दिव्य इन्द्र की भाहुति होने से हिरण्यगर्भ का जन्म होता है । इसमें भी तीनों हैं, परन्तु प्रधानता प्रान्त- रिक्ष्य वायु की ही है । एवं दिव्याग्नि में पार्थिव अग्नि, प्रान्तरिदय घायु की थाहुति होने से सर्वज्ञ का जन्म होता है । इसमें भी तीनों अग्नि हैं, परन्तु प्रधानता दिव्य अग्नि की ही है । भागि अर्थशक्ति का अधिष्ठाता है, अतः तत्प्रधान वैश्वानर अग्नि अर्थपूर्ति ही है । पायु क्रियाशक्ति का अधिष्ठाता है, अतः तत्प्रधान हिरण्यगर्भ क्रियामूर्ति ही है । एवं इन्द्र ज्ञान- शक्ति का अधिष्ठाता है, अतः तवाघान सर्वज्ञ ज्ञानमूर्ति ही है । वैश्वानर अग्नि का प्रभव वायु- इन्द्रगभित पार्थिव अग्नि है, प्रतिष्ठा त्रिन्स्तोम है , प्राशय (न्याप्तिस्थान) सारा त्रैलोक्य है। इसी घाधार पर-वैश्वानरो यतते 'मुर्पण' (ऋक्० १।७७.६), 'भा यो या भाषा- गृथिवीम्' (पा.नि.द.७।२३) इत्यादि वहा जाता है । हिरण्यगर्भ-घायु का प्रभव पार्थिवाशि- इन्द्रगर्भित प्रान्तरिक्ष्य वायु है , प्रतिष्ठा पञ्चदश तोम है , श्राशय सारा त्रैलोक्य है । एवं सर्वज इन्द्र का प्रभत्र अग्निवायुगर्भित दिव्य इन्द्र है, प्रतिष्ठा एकविंशात्तोम है , प्राशय त्रैलोक्प है । पदी पिदेवसमष्टि स्वज्ञान-मिया-अपशक्ति से सारे भौतिक विश्व का प्रामा बन रही है। मूतों के भविष्टाता होने से इस देवसत्य को 'सर्वभूतान्तरात्मा' कहा जाता है । केनोप- .

(प्रादेशमात्र बनकर) प्रतिष्ठित होरहा है। इसी देवसस का समरिरूप से निरूपण करती हुई सर्वज्ञभाग सहस्रशीर्ष है, हिरण्यगर्भभाग सहस्राक्ष है, वैश्वानरभाग सहस्रपात है। पर प्रतिक्षित होरहा है। मापात्मसंस्था में जीत्ररूप से यही दश अंगुल का अतिक्रमण कर पाहतारमा - ईशोपनिषत् ॥ देवसाय निषत् में जिन अग्नि-वायु-इन्द्र का त्रैलोक्य में विजय बतलाया गया है, वह यही सर्वभूता- तरात्मा है । इस देवसत्य की प्रतिष्ठा ब्रह्मसस है, ब्रह्मसत्य की प्रतिष्ठा प्रात्मसस है। धारमा के अमृत-ब्रह्म-देव-भूत यह चार वियर्व हैं । पोडपीपुरुष स्वयं अमृतात्मा है । खपग्भू-परमेष्ठी आदि पांचों पर्व ब्रह्मविवर्त है । अग्नि-वायु-इन्द्र की समष्टि देवविवर्त्त है, भूतप्रपश्च प्रसिद्ध है । यही चारों संस्थाएं अध्यात्म में हैं । इन चारों आध्यात्मिक संस्थाओं में से अमृतात्मा प्रसंस्करणीय है । ब्रह्म-देव-भूत तीनों का संस्कार किया जाता है । लौकिक शुद्धिसंस्कार भूतसंस्कार हैं, १६ स्पार्नसंस्कार ब्राह्मसंस्कार हैं , ३२ श्रौतसस्कार दैव- संस्कार हैं । इन संस्कारों से ब्रह्म-देव-भूत यह तीनो विवर्त्त शुद्ध संस्कृत बनकर ब्रह्मविभूति- मय धनजाते हैं । जैसा कि अभियुक्त कहते हैं- संस्कार संस्कृतः पूर्वैरुत्तरैरपि संस्कृतः । निसमष्टगुणैर्युक्तो ब्राह्मणो ब्रह्म लौकिकम् । ग्रामं पदमवाप्नोवि यस्मान्न च्यवते पुनः ॥ अध्यात्मसंस्था की उक्त चारों संस्थानों में अमृतसस्था के तो वे ही नाम रहते हैं , इतर संस्थाओं के नाम बदल जाते हैं । ईश्वरीय देवसत्य का सर्वज्ञ भाग यहा प्रान्न नाम से, हिरण्य- गर्भ भाग तैजस नाम से, वैश्वानर भाग वैश्वानर नाम से ही प्रसिद्ध । यही भूतामा है । इस की प्रतिष्ठा वही सर्वभूतान्तरात्मा है । यह भोक्ता सुपर्ण है, यह साती सुपर्ण है। पह कर्मकर्मा है, वह कर्मसाती है। दोनों सखा है, दोनों सयुक हैं। दोनों स्तोम्यत्रिलोकीलर ब्रह्माश्वस्थ की शाखा के अग्रभाग में प्रतिष्ठित हैं । दोनों की मूलप्रतिष्ठा भूमिण्ड है। मून-मध्य-अन्त भेद से बद त्रिपर्वा है । जिपर्वा देवसत्य पादरूप वैश्वानर भाग से भूपिण्ड । । मन्त्रश्चति कहती है-

प्राकृतात्मा
का ईशोपनियत् ।।
देवास
सहनशी पुरुषः सहस्रातः सहस्रपात
स भूमिं सर्वतस्मृत्वासविष्ठदशाङ्गुलम् ।। ( यजुः सं० २११)।
ईश्वरजगत्
१-परापरः-एक्तः
२-थव्यय:-श्कल:
३-यक्षर:-गवकल:
पोडीमजापतिः
(अमृतसत्यात्मा)
५-थामक्षा:-पनकलः
माग:--- १-सपाभूः -प्रारनामा
भाप:---
प्रायसत्यान्मा
"
वारु---- -३-पूर्यः-
ईश्वरप्रजापतिः
भत्रम्----पन्द्रमा:-
प्रपतामा
परिमारक्षिी
१-गांश:-
२-हिरण्यगर्भः याः
२-पेप.ना:---मग्निः
दिवसापापासाती
मन्यांपाद:---:.
अप्रमत्यम्

प्राकृतात्मा - ईशोपनिषत् ।। देवसत्य जीवजगत् १-परात्परः- एकल: २-यव्ययः--पञ्चकल: ३-अक्षरः---पञ्चकलः शोडपीमजापतिः (अमृतसत्यात्मा) ४-आत्मन्नरः-पञ्चकला माण:-- -१.-अव्यक्तात्मा-प्राकृतात्मा " प्रापः- २महानामा- ब्रह्मसत्पात्मा जीवप्रजापातः चाक----३-विज्ञानात्मा- " অন্ন --४-प्रज्ञानात्मा- -०- १-प्राज्ञ:-इन्द्रः अमृतान्नादः९२-तैनसः-आयुः ३-वैवानरः अग्निः देवसत्यात्मा भोक्ता 0- मीनाद :-५-शरीरम् ब्रह्मसत्यम् श १-प्रभवः-आन्तरिक्ष्य-दिव्यामिगर्मितपार्थिवत्रिवृमिः १-२-प्रतिष्ठा-त्रिवृत्तोमा वैश्वानरामिः पार्थिवः (अयशक्तिमवर्चकः) Artmn40000...re Pune....mor... ३-भाशया-स्तोम्पत्रिलोकी.... ०:--

३-सर्वश:-२१ स्तोमो द्यौः
। ईशोपनिषत् ॥
सम्भूति-विनाश
प्राकृवात्मा
१-प्रभवः पार्थिव-दिव्याग्मिगर्मित-प्रान्तरिक्ष्यो वायुः
२-२-प्रतिष्ठा–पञ्चदशस्तोमः.................
हिरण्यगर्भोवायुः-आन्तरिक्ष्यः
३-प्राशयः-स्तौम्यत्रिलोकी...............
(क्रियाशक्तिपवर्तकः)
१-प्रभवः -पार्थिव-प्रान्तरिक्ष्य-अग्निगर्भितोदिव्येन्द्रः
३-२-प्रतिष्ठा-एकविंशस्तोमः,
३-भाशयः-स्तौम्यत्रिलोकी.................
...............100.
सर्वज्ञ-इन्द्रः-दिव्यः
(ज्ञानशक्तिप्रवर्तकः)
एष सर्वभूतान्तरात्मा
स्तोमा अन्तरिक्षम
२-हिरपयग
सोम.-पृथिवी
विश्वानर
-भूपिण्डः

लक्षण किया जाता है । प्रज्ञानयुक्त चातुपपुरुपायछिन (सौरविज्ञानामावहिन ) भोका देय-, मन्त्र से आगे) इसे पढ़ा है । ऐसा व्यतिक्रम क्यों किया गया ! उत्तर स्पष्ट है | उपनिषदुप- मकरसन्नति মারাম। माईशोपनिषत् ॥ में प्रशि-वायु-इ-द तीनों ही प्राणात्मक । है अतएव गागाग्नित्रयी से संपन्न इस देवसत्य पो हम 'माणाग्मा' कहने के लिए तम्पार हैं । इन्द्रियवर्ग, प्रज्ञानमन, एवं बुद्धि के सहारे स्थूल- शरीररूप रथ में प्रतिष्टित यह रथी कर्मात्मा इस लोक की यात्रा करता है, एवं अातिया- दिकशरीररूप (स्थूलशरीररूप) रथ में प्रतिष्ठित होकर परलोक की यात्रा करता है । इस रथी कर्मभोक्ता कर्मात्मा के उस छोर में मन (प्रज्ञान)-बुद्धि (विज्ञान)-महनु-अव्यक्त-पोडशी हैं, इस छोर में शरीर है । विज्ञानात्मा सौर है । महद्गर्भित चिदात्मा के वितभाग या साक्षात सम्बन्ध चितिधर्मावच्छिन्न इसी सौ विज्ञान के साथ होता है । विज्ञान चिदात्मा से साक्षात् सम्बन्ध रखता है, अतएत 'तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीराः' यह कहा जाता है । प्राध्यात्म- संस्था में विज्ञानपुरुष ही प्रधान तत्व है। इसी विज्ञानज्योति से प्रज्ञान प्रकाशित है, इसी से देरसत्यरूप कर्मारमा प्रकाशित है । कस्मिा-मन-बुद्धि तीनो का घनिष्ठ सम्बन्ध है । विना मन-युद्धि के कर्मात्मा कर्मभोग कानें में सर्वथा असमर्थ है । अत एव मन बुद्धि को भोगसाधन होने से) गोहतास्मा में अन्तर्भूत मान लिया जाता है । इसी अभिप्राय से इस कम्मल्गिरूप देय- सत्यात्मक भोतारमा का -'आत्मेन्द्रियमनोयुक्त भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः' ( कठोपनिषत् ) या । सत्य 'प्रहम्' है, यही जीवात्मा है । चान्द्रयुक्त सौरपुरुषावच्छिन्न सादी देवसत्य 'मोम्' है, यही परमात्मा है । सौर एवं विज्ञानावच्छिन्न देवनयसमष्टिरूप साही और भोहता देयसत्य के लिए की उपनिषत् में 'सत्यधर्म' शब्द का प्रयोग किया है । अब जरा मन्त्रों की संगति का विचार कीजिए । 'हिरण्मयेन पात्रण समस्यापिहित मुखम्' इत्यादि मन्त्र चालुपपुरुष (विज्ञानगरमा) की उपासना को, दूसरे शब्दों में उसके प्रत्यक्ष करने का उपाय बतलाता है । ऐसी अवस्था में उचित यह था कि विज्ञानात्मप्रतिपादक है- १०-११ मन्त्रों के अन्त में ही (विज्ञानात्माधिकरण में हो) 'हिरण्मयेन पात्रेण.' इत्यादि पदा जाता । परन्तु ऐसा न कर ऋपिने सम्मतिविनाशात्मक प्रज्ञानाम्माधिकरण के अन्त में (१४- - कम्मरममफरगा में समावेश माना है। ऐसा क्यों ! पूर्व कपनानुसार तो पूर्व के प्रज्ञानामा- प्रकरणसङ्गति । ईशोपनिषत् ॥ प्राकृतात्मा देश प्रधानरूप से जीवात्माके खरूपज्ञान करवाने के लिए प्रवृत्त हुआ है । जीवसंस्था में- 'स वा एप विज्ञानात्मा प्रज्ञानात्मना संपरिष्वक्तः' के अनुसार विज्ञान प्रज्ञान में प्रोतप्रोत है, प्रज्ञान विज्ञान में सपरिष्वक्त है । विना विज्ञान के प्रज्ञान कुछ नहीं कर सकता, साथ ही में विना प्रज्ञान के विज्ञान मी स्वखरूप से प्रतिष्ठित नहीं रह सकता । न केवल जीवसंस्था में ही, अपितु ईश्वरसंस्था में भी यही स्थिति है । चन्द्रमा (सोम) के बिना सूर्य कभी प्रतिष्ठित नहीं रह सकता । सौरपुरुष भारूप है, ज्योतिर्मय है । इसका यह ज्योतिभाव चान्दसोमाइति पर निर्भर है । 'लं ज्योतिपा वितमो कवर्थ' के अनुसार सोम ने ही सूर्य को ज्योतिर्मय बना रक्खा है, जैसा कि पूर्व के मज्ञानात्माधिकरण में विस्तार से बतलाया जाचुका है । इसी प्रकार चन्द्रमा सौरप्रकाश से ही चन्द्रिकामय बन रहा है । यही स्थिति अध्यात्म में है । मन पर ही सौरविज्ञानपुरुष प्रतिविम्बित होता है । यदि मन न हो तो उसी क्षण विज्ञानात्मा उत्क्रान्त होनाय । ऐसी अवस्था में हम कह सकते हैं कि चानुपपुरुष का चातुपपना प्रज्ञान सम्बन्ध पर दी अपलग्थित है । निष्कैवल्य चानुपपुरुष की उपासना असभा है। क्योंकि यह कभी निष्क कल्य (एकाकी) रहता ही नहीं। इसी सारी परिस्थिति को लक्ष्य में रखकर ऋषिनें विज्ञानात्मा- धिकरण के अन्त में विज्ञानपुरुष की प्राप्ति के उपायभूत 'हिरण्मयेन०' इत्यादि मन्त्र को म पदकर प्रज्ञानात्माधिकरण के अन्त में पढ़ा है । इससे ऋषि को यही सिखाना है कि जिस चानुपपुरुष की तुम उपासना करने चले हो, यह उपासना विना प्रज्ञानमन के सहयोग के प्रसमा है । मनोयोग ही चातुरपुरुष की उपासना का आधार है । "विज्ञानात्मा यी उपासना या प्रकार बतलाने याले हिरगमेयनः' इत्यादि मन्त्र को उसी अधिकरण के अन्त में न पदकर प्रज्ञानात्माधिकरण के अन्त में वर्षों पदा ! इस प्रश्न या समाधान तो होगया, परन्तु इसी सम्बन्ध में एक प्रश्न और उपस्थित होता है । प्रकरण वि. अनुमार 'दिरगपर्यन०' इत्यादि मन्त्र का हमने माणात्माधिकरण नाम से प्रसिद्ध शिकरण में सात मन्त्र का सगायेश होना चाहिए था ! इस प्रश्न का उत्तर उपासक कर्मात्मा - भाग के ११२ प्राकृतात्मा प्रकरण नति झाइशोपनिषत् ॥ ही है । विज्ञानात्मा उपास्य है, प्रज्ञानामा उपासना का साधन है, कर्मा या उपासक है। उपासक कर्मात्मा ही मनोयोग (प्रज्ञानयोग) द्वारा उस विज्ञान पुरुष की उपासना करता है । ऐसी अवस्था में उपासक कर्मामा के साथ उस उपास्य विज्ञानात्मा का सम्बन्ध बतलाना पाय- रपक है । इसी सम्बन्ध परिज्ञान के लिए उपासनामकारप्रतिपादक 'हिरण्मयेन०' इत्यादि मन्त्र का कर्मात्माधिकरण के अन्त में समावेश करना उचित होता है । अपि च जबतक कर्मात्मा शरीर में प्रतिष्ठित रहता है, तभी तक अन्य आत्मसंस्थाएं प्रति- ष्ठित रहती है । जीवसंस्श में प्रधानता कर्मात्मा की ही है । कर्मात्म (भोक्तात्म)-प्रतिपादक कठोपनिषत् में यह पिस्तार से बतलाया जाने वाला है कि वस्तुतः जीवात्मा देवसत्यरूप कर्मात्मा का ही नाम नहीं है, अपितु कर्ममापरपायक इस भक्तात्मा का भोक्ता पना "प्रात्मेन्द्रियमनोयुक्त भोक्तेसाहुर्मनीपिण" के अनुसार बुद्धिरूप चातुषपुरुष, एवं मनोमय प्रज्ञानपुरुष के समन्वय पर ही निर्भर हैं । इसीलिए तो उपनिषत् ने मन एवं बुद्धि को कर्मात्मा के साथ निस्य सम्बद्ध माना है । यद्यपि चातुषपुरुष का जितना घनिष्ट सम्बन्ध प्रज्ञानारमा के साथ है, उतना देवसत्यरूप प्राणात्मा के साथ नहीं है, तथापि विना इसके सम्बन्ध के भोक्तारमा का मोक्तृत्व ही नहीं बन सकता । विज्ञान-प्रज्ञान एक श्रेणि में हैं, भोक्तात्मा दूसरी श्रेणि में है । प्रज्ञान-विज्ञान दोनों का सम्बन्ध इसके साथ होता है । इस देवसत्य की 'अहंता' (मा- रमता ) प्रज्ञानसंपरिष्वक्त सौरविज्ञान के भाधार पर ही प्रतिष्ठित है, जैसा कि-'सूर्य मामा- जगतस्तस्थुपश्च' इत्यादि से स्पष्ट है । देवसत्यप्रतिपादक माणात्माधिकरण के मध्य में 'हिरएमोन०' इत्यादि का पढ़ा जाना ही यह सूचित करता है कि चानुषपुरुष का सम्बन्ध प्रज्ञान-कर्मात्मा दोनों से है 1 'मैं क्या है। इस प्रश्न का उत्तर है. 'देवसस' । इस देवसत्य का 'मैं पना' उसी चानुपपुरुष पर निर्भर है। पूर्व में ही बतलाया गया है कि देवसत्य की अपेक्षा से विज्ञान का प्रज्ञान के साथ घनिष्ट सम्बन्ध है । इसी स्थिति को लक्ष्य में रखकर प्रज्ञाननिस- पण के अन्त में ही पहिले उस विज्ञान का सरूप दो मन्त्रों से बतलाकर तीसरे 'वायुरनिग- ममृतं' मन्त्रभाग से देवसत्य का सरूप बतलाया गया है । इस प्रकार इस प्रकरण के तीन - सात लोका सात पाताल, सात द्वीप, सात समुद्र, सात मरुव, सात रंग, सात छन्द, जितने भी सप्तक है, उन सत्र का प्रवर्तक एकमात्र 'सप्तपिपाण है। प्राकृतारमा । ईशोपनिषत् ॥ माणमहिमा । । अपि च प्रकारान्तर से मन्त्रार्थ का समन्वय कीजिए । सांसारिक संपत्ति हिरण्मयपात्र है , संसार सुनहरा है। सुवर्ण (संपत्ति) में धात्मतत्र को श्रावृत कर रखा है । इस हिरण्मस्थ पात्ररूप वित्तमोह से मुग्ध मनुष्य अन्तहृदय में प्रतिष्ठित सत्य आत्मतत्व के दर्शन करने में थसमर्थ होरहा है । इस पार्थिव भौतिक सम्पत्ति का अधिष्ठाता पृथिवी का अभिमानी देवता 'पूषा' है । उसी की धाराधना से भौतिक थावरण हट सकता है । जो पूपादेवतां प्रावरण का अधिष्ठाता होता है, वही आवरण दूर करने में समर्थ है । हमें प्रणतभाव से उसी पार्थिव अभिमानी देवता से प्रार्थना करनी चाहिए कि हे पूपन् ! आपर्ने स्वशक्ति से सत्यात्म- तत्व पर जो भौतिक संपत्तिरूप यावरण लगा रक्खा है, उसे हटाइए, हमारे आस्मा को भौतिक मुक्त कीजिए, जिससे कि हम आत्मस्वरूप पहिचान सकें । पूषा देवता मावरण को इटाकर सलधर्म का साक्षात्कार करवाती है, यह उक्त मन्त्र से सिद्ध हुआ । यह पूपा देवता किस प्रकार से श्रावरण हटाती है ! इस प्रश्न का समाधान करती हुई आगे जाकर श्रुति कहती है- अपने कर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन, समूह तेजः । यत्ते रूपं कल्याणातमं तत्ते पश्यामि-योसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥२॥ (ई० उ० १६०)। बंधन से . सृष्टि के मूलप्रवर्तक प्राण को 'ऋपि' कहा जाता है । वायम्भुव असवमाण का ही नाम ऋपि है। पूर्व के अव्यक्तात्माधिकरण में हमने खायम्भुव वेद को 'ब्रह्मनि धसित कहा है, एवं उस वेद के यजुर्माग को 'ब्रह्म' कहा है । उस यजु का यत् भाग ही प्राण है, यही ऋषि है । इसी से आगे की सारी सृष्टिएं होती हैं । इस ऋषिप्राण की सप्तर्षि, यर्पि, एकपि, व्यपि भादि अनेक जातिएं हैं । विश्व में उपलब्ध होने वाले एकत्य, द्वित्व- त्रिल-आदि जितने भाव हैं, उन सत्र के मूलाधार यही एकर्षि-यपि आदि ऋषिप्राण हैं । सात रस. सात उपरस, सात धातु, सात उपधातु, सात विप, सात उपविप, समाइयज्ञ, शारीर सात धातु, सम्मनाड़ी, सप्तार्चि, सप्तसमिघ, सतहोम आदि आदि प्राकृतारमा माणमहिमा ॥ ईशोपनिषत् ।। " मृत-सत्य, भग्नी-सोप, सत्य-अनृत, धावा-पृथिवी, योपा-टपा, रपि-प्राण, ब्रह्म-सुनाम, स्थिति-गति, आदान-विसर्ग, ब्रह्म-कर्म, ज्ञान-क्रिया, मूर्त-अमृत, निरुक्त-अनिरुक्त, अमृत-मृत्यु, सत्-मसन, ग्रहो-रात्र, शुल-कृष्ण, पुरुप-प्रकृति, पति-पत्री, पिता-पुत्र, स्वामी-सेवक, प्रान्मा-शरीर, भाग-पानी, अन्न-पत्र, प्रोप- घि वनस्पति, मुर्य-चन्द्र, श्रोत्रद्वय, चक्षुद्रय, पाद्य आदि आदि जितने भी देत- माव है, सब की मूनप्रतिष्ठा 'व्यपि माण ही है । प्रमोक्य, प्रेताग्नि, वीर्यत्रयी, प्रजात्रयी, वेदत्रयी, त्रिसस आदि जितने भी त्रि- मात्र हैं, उन सबका मूल व्यपियाणा है । एवं एकत्यमापापन पदार्थों की मूलप्रतिष्टा एकर्षि' प्राण है। इन प्राणों के अध्यात्म-अधिदयत-अधिनक्षत्र-अधिभूत भेद से भिन्न भिन्न कार्य है, जैसा कि भाप्यप्रयमपण्ड की विश्वनिरुक्ति में बतलाया जानुका है-( देखिर ई. पि. ना. १ ३५२-३६२)। उसी प्रकरण में साफन्ज नाम से प्रसिद्ध सप्तपिमाण का निरूपण किया गया है। इस सानिप्राण के समष्टि एवं व्यष्टिरूप से सापि-वपि-एकपि यह तीन भेद दोजाने हैं, जैसा किनिम्नलिखित तानिया से स्पष्ट होजाता है- १-१-गोतमः श्रीने यापित २-२-भावानः ३-१-विधागि ५-१-मतिः चतुपी दगतिः सप्तर्षि:(शत०१४।५।२।१।५.६७) 1-1-गमिष्टः ६-२म: नागिर पतिः ७-१- .--- .-पपिः होता हुया तमोमय है, कृष्ण है, छायारूप है । इसी पूरा प्राण के सम्बन्ध से पृथिवी को पूषा ही है, जैसा कि तेऽङ्गिरसः सूनवः (ऋक्. १०१६२१५) इत्यादि मन्त्रवर्णन से स्पष्ट है। श्रयस्था में पाकर अत्रि है, यही बामग्नि रूप है । यही अग्निमय प्राण बाकूरूप से (पागिन्द्रिय धानुसार यह एकाकी है। इसी अंगियाग्नि से (अंगिराग्नि के मयमाग की चिति से) भूपिण्ड का स्वरूप निष्पन्न हुअा है । इसी एकर्षिरूप पार्थिी बागसि, किंवा अंगिराग्नि, किंवा भत्रिका नाम 'पूपा है। धामनछदभाव के कारण यह अत्रिमूर्ति पूषामाण पारदर्शकता का प्रतिबन्धक पाकृवात्मा • ईशोपनिषत् ॥ अत्रिमाण उक्त सप्तर्षिप्राणों में से सातो भनि प्राण वाङ्मय है । यह बाङ् ( अग्निं )-मय प्राण ही मुख में प्रतिष्ठित होकर अन्न खाता है, अतएव-'अन्नमचि' इस व्युत्पत्ति से इस वाद्य प्राण को–'अत्ति' कहा जाता है । प्रति ही देवताओं की परोक्षभाषा में 'अत्रि' नाम से प्रसिद्ध है, जैसा कि श्रुति कहती है- 'बागेवात्रिः । वाचा (अग्निना) हान्नमद्यते । अनिई बैनामैतद्यदधिः । सर्वस्याचा भवति, सर्वमस्यांन्नं भवति, य एवं वेद" (शत० १४।५।२।३) । यह वाक्तत्व अङ्गिरा ऋषि है। पूर्व में जिन ऋषिप्राणों का दिग्दर्शन कराया गया है, वे अनन्त प्रकार के हैं । उन सब की मूलप्रतिष्ठा वाङ्मय अंगिरा नाम का एकर्षिप्रारण के यद्यपि मृगु-अंगिरा-अत्रि भेद से धंगिराप्राण अत्रि से पृथक् तत्व माना गया है । परन्तु पर- मार्थतः तीनों एक ही हैं । अङ्गिरा श्रग्नि ही विशकलन की पराकाष्ठा पर पहुंच कर भार्गव सोम- रूप में परिणत होजाता है । एवं अंगिरा ही चितिभाव को प्राप्त होकर धामच्छद बनता हुआ 'अग्नि' कहलाने लगता है । यही आंगिरस भविप्राण भूपिण्ड का स्वरूपरामर्पक है । इसी एक-िवाङ्मय-०)र्थिव अत्रिप्राण के द्रुत भाव से प्रात्रेय चन्द्रमा उत्पन्न होता है, जैसा कि पूर्व के प्रज्ञानात्माधिकरण में चन्द्रोहपत्ति-प्रकरण में बतलाया जानुका है । अंगिरा धामच्छद रूप से ) मुख में प्रतिष्ठित होता है --'अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं माविशत्' । अनि नाम से प्रसिद्ध यह अंगिरा ही मन्त्रगत 'एकपिमाण' है । 'प्रजापतिर्वा एक' (तै० मा० ३।५।१६।।) कहा जाता है, जैसा कि निग्न पचन से स्पष्ट है- , प्रायगरमा - शोपनिषत् ॥ पृक्षापार and- १-स शौद्रं वर्णमग्रजत पृपगाम, इयं वै पृपा, इस हीदं सर्व पुष्यति-यदिदं किच" (शत. १४४।२।२५) । याविद्या के सम्बन्ध में ब्राह्मणानन्धों में एक प्रश्न किया गया गया है कि, "माज्य (घृत ) तरल पदार्य है। इस की अग्नि में आहुति दी जाती है । इस तरल भाज्यप की आहुति से घनभावायनयुक्त पुरुप कसे उत्पन्न हो जाता है ?" । इस प्रश्न का सम- धान करते हुए भागे जाकर ब्राह्मणश्रुति में उत्तर दिया है कि-"घृत अवश्य तरल पदार्थ है, परन्तु इसमें हिग्गयगकन (सुवर्ग:खण्ड ) डानकर इस की शादुति दी जाती है। अतएव अस्थिमावयुक्त पुरुप उत्पन्न होता है। इस प्रश्नोत्तर का रहस्य यही है कि घृत शुक्र है, यह पार्थिवद्रव्य है, साथ ही में तरल है । परन्तु इस पार्थिव तरल शुक में हिरणपशक्ल- एप घनता सम्पादक सौर हिरणमय तेज प्रविष्ट रहता है । इसीसे परिमाग का निर्मारा होता है। जिस प्रजा के शुरू में सौरमाण कम होता है, उस की इहिए निवल रहती है। सौर सरसर के जितने पर है. पुरुष में उतनी ही हरिए हैं। एक एक पर्व से एक एक पहिस या निर्माण होता है । "सप्त पय गतानि विगतिश्च संवत्सरस्पाहानि च रात्र यध (७२०), इत्येतान्त पर पुम्पायीनि च मन्नानथ" (गो. मा. पू. ५.१५.1) | यार पारयाय निवान् (२२५ भारतीय विद्वान् पुश्रुत भी) दातों को ही नहीं मानते, पर किमयागापिरान गे अनुसार दान हही या प्राथमिक रूप है । याहना यह है कि परिष- निमा गोर ने न से होता है। उप शिशु में एक घर तक दांत पैदा नहीं होते। कारत गया पानिएका नगमे पापिपरा प्राए को दी प्रधानता रहता है। तर गोमाग मान नहीं हो पाता, पना. दात उपान नही हो यो गर दोन म होने पा एकमात्र कारण पापि मारा पी ही प्रगनना है। इसी माधार पर- 'तस्य दनानः पर मामाटाहादानरः पण" (पो० ६.१३) यह यहा जाता है। मारमा पर मामिदीनातागण को भी पता या पार भी TV नाम में मन है। शिवी को भी पूर्ण माना गया है। गली नंदम . - 10 प्राचामा ईशोपनियम् ॥ दृपाप्राय VU बै भी पूया नाम से ज्यबद्दत होता है। पूष्णो हस्ताभ्यासाददे नासि(यजु ५.२२ का पृषा शम्द रेवती नक्षत्र का वानक है। "सोमः पूपा च चेततुर्विश्वासां मुक्षितीनाम!(साम २।६।१०) का पूपा शब्द पृथिवी का वाचक है । "पूष्णुः पोपेण मा दीर्घायुत्वाय शतशारदाय शतं शरभ्य भायुपे वर्चसे" (तैत्ति.मा.१।२।३।१५) का पूषा शब्द सूर्य का वाचक है । "मयं पूषा योऽयं (वायुः) परने, एप हीदं सर्व पुष्यति-यदिदं किञ्च" (शत. १४।२।१११) का पूरा शब्द वायु का वाचक है । प्रकृतमन्त्र के 'पुपन्' शब्द से रेवती नक्षत्र को छोड़कर शेष तीनो (पृथिवी-घायु-सूर्य) पूपायों का प्रइण है। पृथिवी अग्निमयी है, अन्तरिक्ष यायु- मप है, सूर्योरलक्षित युलोक श्रादित्यमय है । १२ आदित्यों में से एक पूषा नाम का श्रादित्य है । प्रकृत में सूर्य शब्द से इसी श्रादित्य विशेष का प्रहण है। पार्थिव पूषा पूर्व कथमानुसार 'एकर्षि' है । रोदसी लोक्य के अन्तरिक्ष में रहने वाला पाङ्गिरस वायुरूप पूषा 'यम' है। धूलोकस्य मादित्यरूप पूपा 'सूर्य' है । एकपि (पार्थिव पूपा), यम (धान्तरिक्ष्य पूपा), सूर्य (दिव्य पूषा) तीनों ही प्राजापत्य हैं , प्रजापति की सन्तान हैं। भूपिण्ड चित्याग्निमय है। इस में चितेनि धेय अंगिरा नाम का पूषाग्नि प्रतिष्ठित है । केन्द्रस्प यही पूपा पार्थिव प्रजापति है । इसी उक्थ प्रजापति की एकपि-यम-सूर्य (आदित्य) यह तीन भवस्याएं हो जाती हैं। पूर्वप्रदर्शित देवसत्य स्वरूप में महिमा पृथिवी में रहने वाले जिन अग्नि-वायु-आदित्य इन तीन देवताओं का दिग्दर्शन कराया गया है, ये यही तीनों हैं । त्रिदस्तोम तक भग्निप्रधान एफर्पि माजापत्य,पञ्चदशस्तोम तक वायुप्रधान यम प्राजापत्य एवं एकविंशस्तोम पर्यन्त पादित प्रधान सूर्य मानापत्य प्रतिष्ठित है । एक ही मूलप्रजापति की यह तीन तलावस्थाएं है। अग्नि-वायु-आदित्य तीनों एक ही पार्थिव अंगिरा के विवर्त्त हैं, अतएव तीनों के लिए ( समष्टि दृष्टि से) ऋषि ने पहिले 'पूपन्' यह कहा है। एवं मागे जाकर इसके व्यष्टिरूप प्राजापत्य दिग्दर्शन कराते हुए--"एक ! यम ! सूर्य ! भाजापल्य" यह कहा है। सूर्य में ज्योति, गौ, भागु, पह तीन मनोता हैं । ज्योति इन्द्र है, हिरण्मयमाग है, यही देवभाग है । गौ भाग पर है, यहीं पूपा है-"परावो वै पृपा । प्रायुभाग माप है, यही । । भानों का ।

प्रामवारमा माईशोपनिषत् ।। वास्तमम --- । - वरुण है। सूर्य में पानी है, ज्योति है, पर है, तीनों की समष्टि सूप है । पयान, भनुपान, छन्द धादि पशु हैं । सूर्य देवमय है, उस लिए वइ इन्द्र है । थापोमय है, इस लिए वरुण है। पशुनय है, इस तिर 'पृपा' है ! इन तीनों में पूमाग देवता ( ज्योति-हिरयनपान-प्रार) पा पिरोधी है । पृथिरी से सूर्य तक यह एक ही पाप्राण व्याप्त होरहा है। पृथिवीपुर र एकपि है, अन्तरिदगुप्तः पूषा यम है, सर्प दिव्यलोकरण पूमा सूर्य है । नदा एकर्षिनारा (प.पि. प तमोमय दायारूर पूपाप्राण ) रहता है, यहां ऐन्द्र योनेभाग नहीं रहता । यस इसी एक पापिर पूपाप्राण को सप्प में रखकर श्रुने याइती है-हे पृपा ! भाप पृथिव्यवच्छेदेन एफपि हैं, भन्नरिक्षापच्छदैन यम हैं । दिव्यनोकावच्छेदेन सूर्य है । भापमहिपारूप से प्रमोग्प में व्याप्त हो कर, अपने प्रजापति (मृग-उस्य'-म्प को मानापत्य ( तन-मर्क) रूपों में परिग्णन कर एकर्पि-यम-ग्रादित्य भेद से मीन स्वरूपों में परिणत रहे हैं। भार स्वयं ( केन्द्रावरदेन ) प्रजापति हैं, एवं एकपि-पमादि माप के नीना कप माप के दी रिसर्गमन होने हुए पानापत्य हैं। ऐसे मार अपनी (कृष्ण) ररिभ. यों को कनार ! माय ही में प्रेनोग्य में माहिरसमय सौर लेन का (गायधर्म के दगंन के लिए ) मंगरगण कोनिर, समेटिर ! भार का जो कल्यागतम रूप में गरी देगना-देपना गाता है)नो या सौर हिरगमय पुरुष नहीं में"।

प्रसारमा कत्साएवमरूप कहती है- गर्भ का, सूर्य इन्द्रप्रधान सर्वज्ञ का खरूप संपादक है। पार्थिव पूपा प्रजापतिरूप ग्रासस शोपनिषत् | स्य कृष्णतान को, पारच्छिन्न कल्यागतमरूप को | इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति यतं कल्याणतम रूपं तत् पश्यामि । योऽसावसौ पुरुषः (हिरण्मयः) सोऽहमस्मि" (न तं पश्यामि स तु-अहमेवेति भावः)। पूर्व के सन्दर्भ का निष्कर्ष यही हुआ कि पार्थिव अंगिरा भाग पूपा है । त्रिवृत्-पञ्चदश- एकविंश मेद से इसके एकर्षि-यम-सूर्य-यह तीन प्राजापत्य रूप हैं । पूपा पृथिवी है । इसके साथ महः (दिन) का भी सम्बन्ध है, रात्रि का भी सम्बन्ध है | अहः सौर भाग है, यह चानु- पपुरुष का पावरक होने से अकल्याणरूप है । रात्रि का घोरतम भी आगन्तुक होता हुभा, अतएव चाक्षुषपुरुष का भावरक बनता हुआ भकल्याणरूप ही है । प्रातिषिक छायाभाग ही इसका कल्याणतम रूप है । चाक्षुषपुरुष को न भाप दिन में (धूप में) देख सकते, म राग्नि के अन्धकार में देख सकते : यह दीखता है-छाया में । सत्यधर्मदर्शन के लिए हमें पूषा के छायारूप इसी कल्याणतम रूप पर दृष्टि जमानी चाहिए, छायामप भूतप्रधान पूषादेवता की ही सपासना करनी चाहिए। मन्त्रार्थ के भारम्भ में हमनें- पूपन्नेक यम सूर्यः' इत्यादि मन्त्र को "पूपाप्राण का कौनसा रूप सत्यधर्म का साक्षात् करवाने में समर्थ है" इस प्रश्न का समाधान करने वाला बतज्ञाया था । वास्तव में मन्त्र उक्त प्रश्न का ही प्रधान रूप से समाधान करता है । परन्तु केवल इसी अर्थ पर मन्त्र की व्याप्ति समाप्त नहीं होजाती । अपितु उक्तार्थ के साथ साथ ही यह मन्त्र वैश्वानर-तैजस-प्राज्ञरूप जीव देवसत्य का भी निरूपण करता है । पूपा को चिस भूपिण्ड समझिए । इस पर प्रतिष्ठित निवृत्स्थानीय अग्नि एकषि है,पञ्चदशस्थानीय वायु यम है, एकविंशस्थानीय आदित्य सूर्य है । एकर्षि अग्निप्रधान वैश्वानर का, यम वायुप्रधान हिरण्य- है, जिसका कि निरूपण आगे के प्रकरण में होने वाला है । तीनों की समप्टे देवसत्य है, यही ३४१ देवाय प्राकृतात्मा । शोपनिषत् ॥ AA . प्राणात्मा है । माग्निभूतमय शरीर है। इस भौतिक पूषाभाग का यह देवसत्यरूप अमुताग्नि ही कल्याणतम रूप है । सत्यधर्मरूप विज्ञान की उपासना के द्वारा मैं इसे ही देखना चाहता हुँ। पूणा का कल्याणतम अमृतरूप 'मैं' (भोक्ता-देवसत्य) हूं, यह अमृत भाग उस ईश्वरीय भमृतपुरुष से अभिन्न है , मै उसी का प्रत्यंश हूं । १-एफर्षि प्राजापत्यः-अमृताग्निः-त्रिवृत्स्थानीयः-अग्नि:-वैश्वानरः वैश्वाः) २२-यमः--प्राजापत्य:-अमृताग्नि.-पञ्चदशस्थानीयः-वायुः-हिरण्यगर्भः तैजसः) ३-सूर्य:--प्राजापत्यः-अमृतानि.-एकाविंशस्थानीयः-इन्द्रः-सर्वज्ञः (प्राज्ञः) 'देवसरयात्मा' . वैश्वानर अग्नि-जस वायु-माज इन्द्र तीनों की समष्टि देवसस्यरूप जीवात्मा है । इसप्रकार यद्यपि 'मह' भार में अग्नि-वायु-इन्द्र तीनों प्रविष्ट हैं, तथापि हमारे में प्रधानता वायु की ही है। वायु ही हमारा वास्तविक यात्मा है । चिदामास को ही जीवात्मा कहा जाता है । चित् का प्रतिविम्व ही चिदाभास है । इस चित् का प्रतिबिम्ब-'मम योनिर्महब्रह्म तस्मिन् गर्भ दयाम्पहम्' के अनुसार महान् पर ही प्रतिष्टित है। भृगुतावही महल है । इस भृगु की माप- वायु-सोप यह तीन अवस्थाएं है । महद्ब्रह्म की इन तीन अवस्याओं के कारण ही वह महत् प्रतिबिन्त्र पानी-हवा-सोम इन तीन ही स्थानों में प्रतिष्टित होता है । अतएव जीवसर्ग प्राप्य जीव, वायव्य जीव, सौम्य जीव मेद से तीन ही भागों में विभक्त है। पानी में रहने वाले मरस्यादि जी भाप्य हैं । इन की चेतना का मूनाधार पानी ही है । यदि इई हवा में रख दिया जाता है तो इन प्राय जीवों की चेतना उप्रान्त होजाती है। दूसरा विभाग पायल्प जीयों का है । पृथिवी पृष्ठ पर उत्पन्न होने वाले जीव वायव्य ' हैं । कृमि-कीट-पक्षि- पंशु-मनुष्य-रचादि सय वायव्य जीव हैं । विना वायु के इन की जीवनसत्ता नहीं रह सकती। हम पशम्नाम पर पूर्ण है। २२ पर दी पार्थिव अमृतेन्द्र है। इसी स्थानाभिन्नता को लक्ष्य में रखकर उप- मिया ने एट के लिए पूर्ण शम्द का प्रयोग कर दिया है।

होने से हिरयमय है ।( देखिए ऐ० मारण्यक २।७)।इस निदर्शन से प्रकृत में हमें यही वैवानर से सम्बन्ध रखता है | भूतप्रधान होता हुभा यह बन्धन का कारण बनता हुआ मृत्यु- ध्यानवायु नारमा ॥ ईशोपनिषत् ॥ । बापन्य जीवों को यदि अधिक समय तक पानी में रखा जाय तो हमारी जीवनसचा उत्तान्त होजाय । तीसरा विभाग सौम्य जीवों का है। राक्षस-पिशाच-पक्ष-गंधर्व-ऐन्द्र-पैञ्य- भानापस-बाल भेदभिन्न प्रविध सत्वविशालजीव सौम्य हैं । चान्द्रसोम ही इनकी चेतना का आधार है। उक्त जीवविमागों में से उपनिषदुपदेश हम वायव्य जीवों के लिए ही प्रयुक्त हुआ है। हमारी अध्यात्मसंस्था में वायु ही प्रधान है । वैश्वानर श्रपान सम्बन्धी है, प्राज्ञभाग प्राण सम्बन्धी है, मध्यस्य वायुरूप तैजसभाग ब्यान सम्बन्धी है । जब तक मध्यस्थ व्यान वायु खखरूप में प्रतिष्ठित रहता है, तभी तक जीवनसाधक प्राणरूप वैश्वानर- प्राज्ञ प्रतिष्टित रहते हैं। नमाणेन नापानेन मयों जीवति कश्चन । इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतानुपाश्रितौ ॥२॥ जव माणमुन्नयति अपानं मसगस्यति । मध्ये वामनमासीनं सर्वे देवा उपासते ॥२॥ [ कठ ५५-३। उक्त शुति के अनुसार मध्यस्थ व्यानवायुमय तैजस ही जीवनसचा का कारण है । बीच में बैठा हुआ यह तैजस वायु इस ओर से पार्थिव रस लेता है, उस ओर से दिव्यरस लेता है । पार्थिवभाग अर्थपधान होने से मर्स है, दिव्यभाग ज्ञानप्रधान होने से अमृत है । मध्यस्य वायु इधर अनुगत बनता दुश्मा मर्सभावापञ्च है, उधर अनुगत रहता हुआ अमृतभाषापन्न है। पार्थिवरस 'इरा' नाम से प्रसिद्ध है । महर्षि ऐतरेय ने इस पार्थिव इरा रस के सम्बन्ध से ही प्रज्ञानपुरुष को 'इरामय' बताते हुए परोक्षमाव से इसे हिरण्मय कहा है । विज्ञानपुरुष भी हिरण्मय है, प्रज्ञानपुरुष भी हिरण्मय है । दोनों ही हिरण्मय हैं, केवल खरूप में अन्तर है। विज्ञानपुरुष हिरण्य (अमि) मय होने से हिरण्मय है, एवं प्रज्ञानपुरुष इसमय [पार्थिवान्नरसमय] में वाहना है कि पार्थिय मर्य भौतिक रस इरा' कहलाता है । सारा धर्यप्रपश्च पार्थिव इरामय प्राकृतात्मा अनिरवायु -al ईशानिपत् ॥ भय है । जिस पुरुष का वायुमय आत्मा पार्थिव मय इरा की ओर [ पार्थिव संपत्ति की ओर] मुक जाता है, उसका वह घायुरूप आत्मा इराप्रधान बनता हुमा मृत्युरूप बन जाता है । जब तक पार्थिव इरावित्त में आसक्ति है, तब तक अमृतत्व का अभाव है । 'नामृतत्वस्य तु-मा- शास्ति विचन' । यदि वायुमप आत्मा पार्थिव इरारस की आसक्ति छोड़कर ज्ञानमूर्ति प्राज्ञ का आश्रय लेता हुया 'अनिर' (इरा रहित) बन जाता है तो अमृतप्राज्ञ की प्रधानता से यह अमृतरूप बन जाता है-'ज्ञानान्मुक्तिः' । "देवसत्य ही जीवात्मा है । उसमें प्रधान मध्यस्थ तैजस वायु है । यदि श्राप आत्मकल्याण चाहते हैं तो अपने इस वायुप्रधान प्रात्मा को 'अनिर' बनाइए, पार्थिव संपत्ति से श्रासक्ति करना छोड़िए। अनासक्ति-योगरूप बुद्धियोग द्वारा जब आपका वायुमाग अनिर बन जायगा तो विश्वास कीजिए, मयंभाव से पृथक होता हुआ वह उसी समय-'अमृत' वन जायगा । इसी रहस्य का निरूपण करते हुए मागे जाकर ऋषि कहते हैं- - "वायुरानिलममृतम् ॥" (ई० उ० १७ म०)। ( यदा वायुः (मध्यस्थस्तैजसात्मा) अनिलो-(अनिरो-पार्थिवरसासक्तिविरहितो) भवति-प्रय स भात्मा अमृतभावयुक्तो भवति)- पार्थिव धातु इरा है, इस से भौतिक शरीर बनता है , यही वापा भूतचिति है । श्रान्तरिक्ष्य धातु वायु है, यही अोज बनता है, यही माणचिति है। दिव्य धातु इन्द्र है। इस से मन बनता है, यही देवचिति है । इस प्रकार त्रैलोक्य के तीनों चिकत्तों से अध्यात्म के उक्त तीनों विवनों का निर्माण होता है । दिव्यलोक मनोमय है, अन्तरिक्षलोक प्राणमय है, पृथिवीलोक वाङ्मय है- ( देखिए मैत्रायणीसंहिता" ')। शरीर मर्त्य है, मन अमृत है। प्राणवायु दोनों के मध्य में है । यदि यह इधर है तो मुत्पुभावापन्न है, अनिर है तो अमृत है । ३७४ प्राकृतारमा उपदार ईशोपनिषत् 112 ArAmrive १- शरीरम्-वाक्--पार्थिवधातुः---अग्निः ( मृत्युः )-इरामयः ( वायुमृत्युमयः) २-ओजः-प्राणः-अान्तरिक्ष्यं बलम्-वायु:- ३-मनः~-मनः--दिव्यंज्ञानम् ---इन्द्रः (अमृतम् )-हिरण्मयः(वायुरनिलममृतम्) इस प्रकार हमारा यह प्रागात्माधिकरण देवसत्य से भविनाभूत चातुपपुरुष की उपा- सना का उपाय बतलाता हुआ, देवसाप का निकरण करता हुआ, सान्त में उसे वायुप्रधान बतलाता हुश्रा, साथ ही में प्रात्मा के अमृतभाव के लिए. पार्थिा.विषयों में अनासक्ति रखने का आदेश देता हुया समाप्त होता है । इति-प्राणात्माधिकरणम् SB-

प्राकृतात्माधिकरण
प्राणात्माधिकरणं
समाप्तम्

पूर्णमदः
भूतवैभव
पूणमिदम्
5-शरीरम्
अध्यात्मम्
अविदवतम्-
ब्रह्मसत्याक्षरः-
वीज-दैवत-भूतमयः प्राकृतात्मा भूः
মাহী
us
-->शरीरम्
मामाद
(पाकृतात्माधिकरणे शरीरात्माधिकरणम्)
यज्ञमात्रिकवेदावच्छिन्नः-वीज-देव-भूतमयात्मा
चित्यात्मा
'अथेदं भस्मान्तं शरीरम् ।
ओं क्रतो स्मर, कृतं स्मर, क्रतो स्मर, कृतंस्मर ।।
(ईशोपनिषत् १७ मन्त्र) ।

७-"पाडु इतर आत्मा (शरीर) लोम-बड़-मांस-मस्पि-मबा" (ता. मा. ५।२१४)।
१-"तरमादितर भामा (शरीर) मेवति च फरयति च"(ता. बा.५।१10)1
१०- भूमोऽएषोऽजानां यदात्मा (शरीरम्)” (शत. ६।६।१।१०)।
SHES
शरीरात्मस्वरूपनिदर्शन
१-पश्चात्मकं पञ्चसु वर्गमानं घडाश्रयं पड्गुणयोगयुक्तम् ।
तं सप्तधातुं त्रिमलं द्वियोनि चतुविधाहारमय शरीरम् ।।
( गोपनिषत् ।
२-ख-त्रायु-ज्योति-रापश्च-पृथिवी विश्वस्य धारिणी ।।
(कैवल्योपनिषद)।
३-भस्मनिष्ठस्य दह्यन्ते दोषा भस्मानिसंगमाद ।
भस्मस्नानविशुद्धात्मा भस्मनिष्ठ इति स्मृतः ।।
(बृहज्जाबालोपनिषत)
१-अथ यैतेषां सप्तानां पुरुषाणां श्रीः, यो, रस घासीत् , तमुधं समुदौइन् । तदस्य
शिरोऽभवत् । यच्छियं समुदौहन् , तस्माधिरः । तस्मिन्नेतस्मिन् प्राणा अश्रपन्त,
तस्माद्रेयैतन्छिरः । भय पत् सर्वस्मिनश्रयन्त, तरमादु शरीरम् ॥
(शतः मा० ६ को १ प्र.१ मा. । १ के.)1
५-"आरमा यै तनूः" ( शतक ६७।२।६)।
६-"मात्मनो खेवाध्यङ्गानि प्ररोहन्ति" ( शत० ८।३।२।१५ ) ।
--"पडङ्गोऽयमात्मा (शरी) पड्विधः" (को० प्रा० २०१३)।

११-तस्मादयं सर्व एवात्मण (शरीर) उष्णः (अग्निमयः)।
तदैतदेव जीवियतश्च मरिष्यतश्च विज्ञानम् ।
उम्ण एव जीविष्यन्, शीतो मरिभ्यन्" (शत. ११)।
१२-"तत् सर्व प्रात्मा (शरीर) याचमप्येति, वाद्मयो भवति" (को, प्रा. २७)।
१३-"बाहो ह्यात्मा (शरीरम्" (शत. ६।६।२।१६।।
१४-"सतपुरुषो हायं पुरुषः [शरीरें], यञ्चत्वार मामा,
अयः पक्षाच्छानि" [शत० ६११६)।
१५-"आत्मा शरीरं] एव-उखा" (शत० ६१५३१४) ।

प्रियतम शरीर एक दिन मत्मसात् (राख की देरी) होने वाला है। यदि उन्होंने इसी शरीर में प्रतिष्ठित उक्त यात्मसंस्थाओं को न पहिचाना तो अन्त में शरीर तो एक दिन मिट्टी में मिजही जायगा, साथ ही में यह ययाजात इस जन्म-मृत्युपरम्परालक्षण दुःखार्णव से भी कभी छुटकारान पासकगे। अमृतात्मा निकल गया, रद गया भस्मान्त शरीर । विश्वास करो जो शरीर एक दिन भाम बनने वाला है, इसी मरमान्त शरीर में अमृवात्मा से अनुग्रहीत कर्मात्मा प्रतिष्ठित है। उसके खडूप को पहिचानों | कमरिमा द्वारा प्रज्ञानात्मा अन्तमन] पर, मज्ञानद्वारा विज्ञानात्मा [बुद्धिपर, विज्ञानद्वारा महानात्मा पर, महान् द्वारा ॥ श्रीः॥ महाभूतानि सत्वानि संदतानि क्रमेण च । सप्तधातुमयो देहो दग्धों योगाग्निना शनैः ॥२॥ पधाकारास्तथा देह श्राकाशादपि निर्मलः । सूक्ष्मात् सूक्ष्मतरो दृश्यः स्थूलात् स्थूलो जडानडः ॥२॥ घृतमिव पयसि निगूढं भूते भूते च वसति विज्ञानम् । सततं मन्ययितव्यं मनसा मन्थानभूतेन ॥३॥ पनिपत् का वाव्य विषय प्रापः समाप्त है । आत्मदृष्टि की अपेक्षा से अध्यात्मसंस्था में जो तात्त्विक अंश थे, उनका क्रमिक निरूपण कर उपनिषदर्थ गतार्थ है। जो संसारी उक्त धात्मवियों को न पहिचान कर केवल शरीर की आराधना में ही निमग्न रहते हुए भोग-ऐश्वयों में तल्लीन रहते हैं, जिन ययाजात मूट मनुष्यों के जीवन का एकमात्र उद्देश्य शरीर परिपालन ही है, जिन्होंने-“खाना-पीना मौज़ उड़ाना" ( eat drink and bo marry ) इसी सिद्धन्त को अपने जीवन का परम पुरुषार्थ मान रक्खा है, उन का यह . ३७४ । ईशोपनिषत् ॥ कल्याणतमम प्राकृतात्मा - अन्यक्त नाम से प्रसिद्ध शान्तात्मा पर पहुंचते हुए, पराकाष्ठा रूप उस पुरुष तत्व को प्राप्त कर अपना जन्म, एवं जीवन सफल करलो । इस दुर्लभ मानव शरीर को पाकर भी यदि तुमर्ने अपना जन्म एवं जीवन, निरर्थक ही गमा दिया तो तुमने अपना सबसे बड़ा अनिष्ट कर लिया । यही शरीर आत्मदृष्टि से तुम्हारे उद्धार का साधन है, यही शरीर तुम्हारे सर्वनाश का कारण है । इसी भाव का बड़े सुन्दर शब्दों में दिग्दर्शन कराती हुई श्रुति कहती है १-इह चेदवेदीदय सत्यमस्ति, न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः । भूतेषु भूतेषु निचित्य धीराः प्रेयात्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥ (केनोपनिषत् २।१३)। २-अस्य विवसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः । देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते ॥ (कठोप० ५।४)। ३-६इ चेदशकद् बोर्बु प्राक् शरीरस्य विस्रसः । तत. सर्गेषु लोकेषु शरीरचाय कल्पते ॥ (कठ०६४)। जिस प्रकार महाविध उस विश्वव्यापक ईश्वर का शरीर है, एवमेव हमारे जीवात्मा का यह भौतिक शरीर हमारा विश्व है । ईश्वरतत्व शरीरापेक्षया ४ अगुल का है, इधर जीपतस्य भी अपने विश्व की अपेक्षा से ८४ अंगुल का ही है। दोनों का आकार समान है, तभी तो "पुरुषो वै प्रजापतेर्नेदिष्ठम्" (मनुष्य ईश्वर के बहुत समीप है, ईश्वर से मिलता जुलता है-(शत. २।५।१।१ ) यह श्रुति चरितार्थ होती है । ईश्वर और पुरुष ही क्या, प्रत्येक प्राणी का शरीर अपने श्रगुल के परिमाण से ८४ भंगुल का ही होता है। एक ६ महीने का बच्चा भी ८१ अंगुल का ही है, एक युवा भी ८४ अगुल का ही है। कारण इस का यही है कि यात्मसृष्टि का मूल स्तम्म अद्याक्षर गायत्री छन्द माना गया है, जैसा कि पूर्व में विस्तार से बतलाया जा चुका है-( देखिए ई. उ. वि. ख. प्रज्ञानात्माधिकरण पृ. सं. ३१० से ३१३ पर्यन्त ) । "मष्टाचरा वै गामनी" इस सिद्धान्त के अनुसार गायत्री को पाठ अक्षर का छन्द माना गपा है । प्राणतय का ही नाम अक्षर है । एवं "मादेशमितः प्राण" (ऐ. पा. १।२।३) के 1 ३० अनुसार प्राणतत्व प्रादेश परिमित स्थान में अपनी व्याप्ति रखता है। अंगुष्ठ और तर्जनी को फैला दीजिए। इन दोनों के मध्य का जितना प्रदेश होगा, वही प्रादेश कहलावेगा। यह धंगुली-परिमाण की अपेक्षा से १०॥ अंगुसमित होगा, जैसा कि-"अत्यतिष्ठदशाङ्गुलम्" इत्यादि से स्पष्ट हैं । निष्कर्ष यह हुआ कि प्रत्येक प्राण की व्याप्ति १०॥ अंगुलावच्छिन्न प्रदेश में रहती है। गायत्री में ऐसे आठ प्राण. किंवा पाठ अक्षर हैं । फलतः प्रे गायत्री छन्द की व्याप्ति ८४ अंगुलमयी बन जाती है। ब्रह्मरन्ध्र से कण्ठ तक एक प्रादेश है। कण्ठ से हृदय तक दूसरा प्रादेश है। हृदय से नाभि तक तीसरा मादेश है। नाभि से प्रहापन्धिं (गुदस्थान ) पर्य्यन्त चौषा प्रादेश है। ब्रह्मग्रन्थि से गोडों की कपाली तक दो प्रादेश हैं। यहां से पाद पर्य्यन्त दो प्रादेश हैं । सम्भूय पाठ प्रादेश हो जाते हैं । इस प्रकार आठ प्रादेशों से शरीर चोरासी अंगुल का होजाता है । इन आठों प्रादेशों में श्रमशः सत्य, तप, जनत, महा, स्वा. भुवः, पृथिवी, भूः इन पाठ पर्यों का उपभोग है। ईश्वर शरीर सप्तवितस्तिकाय नाम से प्रसिद्ध है । जैसा कि--"संवेष्टिताण्डघटसावितस्तिकाया" (भागवत ) इत्यादि पुराण-सिद्धान्त से स्पष्ट है । अंगुष्ठ से कनिष्ठिका अंगुली पय्यन्त जो वितत प्रदेश है, उसे ही वित्तस्ति (विलांत) कहा जाता है । यह प्रदेश १२ अंगुल मित है । ईश्वर शरीर में भूः-सुरः- वा-महा-जनत्-तपः-सत्यम्-यह राहतोकामिका सात वितरितएं हैं । संगूय विश्वात्मक ईश्वर शरीर भी चौरासी गुल का ही हो जाता है- १२+७-८४)। जैसी स्थिति इस आध्यात्मिक पुरुष की है, ठीक वही स्थिति उस प्राधिदैविक पुरुष की है। केवल मध्यस्थ याधिभौतिक प्रपञ्च में दोनों में भेद उपस्थित कर रक्खा है । देखिए ! योऽध्यात्मिकोऽयं पुरुषः सोऽसावेवाधिदैविकः । ईवर के उना सात पदों के पाठ पर्व होजाते हैं। सात, किंवा पहिले भूपर्व के भू- परमात्मा" जाईशोपनिषत् ॥ মাযলাবি [श्रीमद्भागवत द्वि० स्कं० १.० ८ रलो०] । । - . यस्तभोभयविच्छेदा पुरुषो ह्याधिभौतिकः ।। पृथिवी दो विभाग है, जैसा कि पूर्व के प्राणाम्माधिकरण में विस्तार से बतलाया जाचुका है।

प्राकृतारमा या ईशोपनियत - मरमान्तशरीर यह पाठों ही पर्व-'अर्द्ध ह वै प्रजापतरात्मनो मर्समासीदर्द्धममृतम्' इस सिद्धान्त के अनुसार प्रगृत-मर्त्य भेद से दो दो भागों में विभक्त हैं। इन अमृत भागों की समष्टि प्रामसंस्था है,एय मत्य भागों की समरि विश्वसंस्था है । विश्व सरप्रधान है, आमा अध्ययगर्भित अन्दरप्रधान है । क्षर भूतमाग है , भूत ही भूति है, भूति ही माम है, यही भस्मान्त विच है। ठीक वही क्रम अध्यात्म में हैं । अधिदैवत की अमृतमयी यात्मसंस्था से अध्यात्मसंस्थाओं का उदय होता है, एवं विश्वसंस्था से शरीर का स्वरूप निम्पन्न होता है । विश्व का क्या स्वरूप है ! एवं विश्वांशभूत शरीर का क्या स्वरूप है ? इन सब विषयों का विशद निरूपण ईशभाष्य के प्रथमरखण्ड में किया जाचुका है-( देखिए ई. उ. प्र. सं. विधनिरुक्ति ३४७ से ३८० पृष्ठ पर्यन्त)। अतः यहां पिष्टपैपण की कोई आवश्यकता नहीं है । प्रकृत में केवल यही समझ लेना पयाप्त होगा कि हमारे शरीर का निर्माण क्यपि भूपिण्ड से हुआ है, परन्तु भूपिण्ड पञ्चात्मक, किंवा सप्त लोकात्मक है । अतः तदुत्पन्न शरीर में भी विश्व के सभी भौतिक प्रत्यशों का समावेश सिद्ध होजाता है । श्रापाद-मस्तक शरी भौतिक है। इसमें उस पाठों पवों का भोग होरहा है, जैसा कि आगे के परिलेख से स्पष्ट होजायग्न । रक्त शरीरसंस्था का निरूपण करता दुध्या ही निम्न लिखित मन्त्र हमारे सामने भाता है- 'अथदं भस्मान्तं शराम् । गों कतो स्मर, कृतं स्मर, क्रतो स्मर, कृतं स्मर ॥ (६० उ०१७ मन्त्र)। 'भय मरमान्त शरीरम्' इस वाक्प से उपनिषत् को यही बतलाना है कि मध्य का थायुरूप धारमा अनिल (अनिर) यनता हुआ अमृतमाय को प्राप्त होजाता है, परन्तु शरीर भस्मीभूत बनकर यही रह जाता है । इस प्रकार यह शोपनिषद उपक्रमस्थानीय पोडगी- पुरुष से थारम्भ पर उपसंझा स्वरूप शरीरपर्यन्त सम्पूर्ण प्रारमविभागों का संक्षेप-से निरूपण करती ई अपने-"सर्वोपनिषद" "पूर्योपनिपद इत्यादि नामों को चरितार्थ कर रही है। ३२ भावात्मा । भोर कृत यासक्ति के कारण है, भात्मानुप्राहक ऋतु एवं कृत अनासक्ति के कारण है। 'क्या - ईशोपनिषत् ॥ उपनिषदादेश समाप्त हुआ। ईश्वर-एवं जीव दोनों का खरूप हमारे सामने रखकर सन्ति में उपनिषत् हमें आदेश करती है कि "यदि तुम ज्ञानकर्ममय पूर्वोक्त आत्मवरूप का यथार्थ खरूप जानना चाहते हो तो ऋतु का स्मरण करो, एवं कृत का स्मरण करो ! अध्य- वसायवृत्ति ऋतु है । 'अहमिदं करिष्यामि' (मैं यह करूंगा ) इस मानसवृत्ति का नाम ही ऋतु है । इस ऋतु की सफलता 'दक्ष' है । कार्यसिद्धि दक्षभाव है, तदर्थ होने वाला संकल्प (इरादा) ऋतुभाय है । पहिले ऋतु होता है, अनन्तर कृतरूप दक्षभाव का उदय होता है। प्रत्येक कर्म में ऋतु-दक्ष (कंतु-वृत्त) दोनों भाव निविष्ट हैं | मनोयुक्त प्राणव्यापार ऋतु है, वाग्व्यापार कृत है, दोनों का मालम्बन मन है । मन से कामना का उदय होता है, तदनु- कुल प्राणव्यापार हो पड़ता है , तदनन्तर वाग्न्यापार होता है , कर्म सिद्ध होजाता है । प्राण- व्यापार कामनामय है, अतएव ऋतु को मानस व्यापार मी मान लिया जाता है, जैसा कि- श्रुति कहती है- "स यदेव मनसा कामयते-इदं मे स्याव, इदं कुर्वीय-इति, स एव ऋतुः।" (शत० ११११११)। "हत्म ह्ययं क्रतुमनोजवः प्रविष्टः" (शत० ३।३।१७) । । मनुष्य अपने ऋतु और कृत पर पूर्ण दृष्टि रखता है, वही आत्मबोध में समर्थ होता है । तौकिक विपय-सम्बन्धी ऋतु इरादा ऋतु है, इरादे से जो कर्म किया जाता है यह कृत है। . असत् कर्मों से निवृति इरादा था, क्या किया' इस प्रकार प्रत्येक कर्म में दोनों पर दृष्टि रक्सो । इससे सदसहियो होगा, अच्छे बुरे की पहिचान होगी । फलतः सतकार्य में प्रवृत्ति होगी। आत्मबोध के लिए प्रत्येक दशा में हमारा क्या इरादा था, इमने क्या करडाला किं नु मै स्पादिदं कृत्वा कि उ में स्वादकुर्वता । इति सचिन्त्य मेधावी सवत फम्म यात्रोत् ।।

। ईशोपनियत् ।। प्रकरणोपसंहार प्राकृतात्मा इस विचारधारा को लक्ष्य में खखो ! इस विचारधारा से कालान्तर में तुम्हें ययार्य परिस्थिति का ज्ञान होजायगा । श्रात्मज्ञान के लिए ऋतु और कृत के स्मरण से अतिरिक्त और कोई श्रेष्ठ उपाय नहीं है। श्रपि च तुमनें आत्मोपनिषत् सुनी, श्रामा का शब्दद्वारा (शास्त्रद्वारा तुझे परिज्ञान हुआ। परन्तु यह शाब्दिक ज्ञान तब तक सर्वथा निरर्थक है, जब तक कि तुम तदनुकूल ऋतु-और वृत्त का आश्रय न लो। "प्रात्मा निय है, हम और वह अभिन्न है, हम साक्षात् ब्रह्म हैं" इस प्रकार केवल मुख से शब्द कह देने से ही आत्मवोध नहीं हुआ करता । आत्मबोध के लिए जहा अात्मस्वरूप श्रवण आवश्यक है, तथैव (श्रवणानन्तर) मनन-गिधिध्यासन भी आवश्यक हैं । "आत्मारे वाय द्रष्टव्यः-(कथं दृष्टव्यः) ? श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः" । सुनो, मनन करो, अन्तरात्मा में दृढ़ करो, तभी आत्मसाक्षात्कार होगा 1 मन्तव्यः-चतुभाव है, निदिव्यासितव्यः-कृतभाव है । श्राणानुकूल संकल्प रखो, संकल्पानुकूल प्रात्मोपयोगी निष्काम कर्म करो, यही आत्मबोध के मुख्यद्वार हैं-"कृतो स्मरस्कृतं स्मर"। "अभ्यासे भूयां- समर्थ मन्यन्ते' के अनुसार पुनरुक्ति दृढता के लिए है। साथ ही में यही उपनिषत् समाप्त है, इस समाप्ति सूचना के लिए भी हिरुक्ति है । "ऋतु का स्मरण करो, कृत को स्मरण में रखो" यही कल्याण का अन्यतम मार्ग है। इति शरीरात्माधिकरणम् । --88- ६ उभयोः सत्यात्मनोरमिना-ऐकात्म्यम् स्वयम्भू-परमेष्ठी-म्य-चन्द्रमा-पृथिवी यह पाच ईश्वरीय ब्रह्मसत्य है, अव्यक्त- महान-विज्ञान प्रमान-शरीर यह पांच जीव अध्यसत्य हैं । सर्वज्ञ-हिरण्यगर्भ-वैश्वानर प्राकवात्मा II इशोपनिषत् ॥ भरिनदेव इन तीनों की समष्टि ईश्वरीय देवसत्य है,एवं प्राज्ञ-तेजस-वैश्वानर को समष्टि जीवदेवसत्य है । यह ब्रह्मसत्य धौर देवसत्य दोनों ही सत्यात्मा अग्निरूप है । देवसत्य की अस्मिता तो स्पष्ट । है । उधर ब्रह्मसत्य के पांचों पर्यों में स्वयम्भू वागरिमय है, सूर्य देव मिमय है, पृथिवी अन्नादामिमयी है । मध्यपतित परमेष्ठी एवं चन्द्रमा अनसोमरूप होन से अग्निगर्भित होते हुए अग्निरूप ही हैं । वेदाग्निमूर्ति पोडशी पुरुष भी अग्निविभूति से पृथक् नहीं है । इस प्रकार प्रा- रमा ब्रह्मसत्य-देवसत्य सब का अग्निमयत्व सिद्ध होजाता है । आत्मसत्य से प्रत्मतत्य सत्य है, मयसत्य से देवतत्य सत्य है-'सत्ये सर्व प्रनिष्ठितम् । यह सत्यतस्त्र साक्षात् अग्नि है । सम्पूर्ण भात्मविभूति का इसो अग्निरूप से निरूपण करते हुए ऋषि कहते हैं- अग्ने नय सुपथा रये अस्मान विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् । युयोध्यस्मन्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम ॥" (ईशोप० १८०)। का मोग्य मन्त्र का अर्थ स्पष्ट है । केवल 'यपुन' शब्द का अर्थ जानलेना थावरयक है । अम्भो- बाद के अनुसार सारा विश्व 'वयुन' है । सत्तादृष्टि से, भातिदृष्टि से, एवं उमयदृष्टि से श्राप जो कुछ पदार्थ प्राप्त करते हैं, एवं देखते हैं, वे सब अयुन हैं । विश्वरूप ययुन ईश्वरप्रजापति पशु है, अतएव इगुन को 'मन्न' कहा जाता है। इस वयुन में वय-योना, यह दो विभाग हैं । प्रत्येक वस्तु में वस्तु और उस का आकार यह दो भाग रहते हैं। संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं, जिस का कोई आकार न हो। इस अाकार से वह षटकूप वस्तु घिरी रहती , रहती है । अतएव वप को बद्ध रखने वाला यह श्राकारभाव 'पयोनाघ' नाम से प्रसिद्ध है। पदी वयोनाध याज्ञिक परिभाषा में 'बन्द' नाम से व्यवहृत हुआ है । ययोनाध रूप छन्द से घन्दित (सीमित) वस्तुमाव हीवप है । वय-ययोनाध की समष्टि ही वयुन है। अनन्त वयुनों की समष्टि निश्श हैं । विश्व एक महा षयुन है , विश्व में रहने वाले भयान्तर सारे वगुन खुद चयुन हैं । इन वयुनों का जानन वाला (वरूपसंपादन करने वाला), भतएव 'नातवेदा'

प्राकृतात्मा
* देशापनिपत् ॥
भूयोभूयः-नमः
नाम से प्रसिद्ध अग्नि ही है । इसी वयुनवित् विश्वमूर्ति अग्नि का खरूप बतलाते हुए
ऋपि कहते हैं-
"हे अग्ने ! श्राप संपत्ति आमसम्पत्ति-एवं विश्वसम्पत्ति) के लिए हमें अच्छे मार्ग से ले
चलिए । क्योंकि संसार की क्युनरूप जितनी भी सम्पत्ति है, श्राप ही उस सबके अन्यतम,
ज्ञाता है। हमारे भामा को कुटिल वनाने वाला [असन्मार्ग में ले जाने वाला] जो पाप्मा है,
उसे हमसे पृथक् कीजिए । हे अग्ने ! हम आपके लिए बार बार नाम: वाक् का उच्चारण करते हैं-
[आपके अन्न बनते है] "साहा-बघा-खगा-
-चौपट्-श्रीपट-नमः आदि भेद से अन्न के
कई भेद हैं । इनमें मनुष्यरूप अन्न 'नमः' है । 'हम आपको नमस्कार करते हैं। इसका
तात्पर्य यही है कि हम अापके भोग्य (अन्न) बनते है । अग्नि अन्नाद है । मन इसकी प्रसन्नता
का कारण है। आज हम स्वयं नमः' बोलते हुए इस अग्नि के नमः रूप धन्न बन रहे हैं।
इस प्रकार ब्रह्मसस-देवसयात्मभृत वयुनाधिष्ठाता, सन्मार्गप्रवर्तक इसी अग्निदेव को भूयो-
भूयः नमस्कार करते हुए यह उपनिषत् समान होती है ।
-
गों पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमुदच्यते ।
पुर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
मों शान्तिः ! शान्ति !! शान्ति !
हात वाजसनेयोपनिपत्विज्ञानभाष्यं सम्पूर्णम् ।
--

से निकले थे। पुरुद्वारा प्राप्त युवावस्था से भी जब ययाति की तृनिन हुई तो खिन्न - बना हुआ समुद्र, किंवा अपघानीय मन तत्प्रतिष्ठ नौकास्थानीय बुद्धि को चश्चल बना देता है। है। ऐसी मलिन बुद्धि कमी भात्मशान्तिलक्षणा समाधि में प्रतिष्ठित नही रह सकती । भले ही ऐसा संसारी कहने भर को अपने भाप को सुखी समझता रहै, परन्तु यदि इस से शपथ पुर- भोगों में ही प्रवृत्त रहना है। एपा कारबाही उपनिपत उपनिषत्-निष्कर्ष तत्वविवेक के अभाव से मनुष्य अपना खरूप भूलता हुश्रा यावज्जीवन फलाशापूर्वक भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् । व्यवसायास्मिका युद्धिः समाधौ न विधीयते" (गीता० २०४४) इस स्मार्ती उपनिपत् के अनुसार जो व्यक्ति भोगैश्चर्य का वास्तविक रहस्य न समझते हुए सामना पूर्वक इनमें अहोरात्र प्रवृत्त रहते हैं, दूसरे शब्दो में जिनके जीवन का चरम लक्ष्य एक मान सासारिक भोग-वैभव ही हैं, उन अविवेकी मनुष्यो का भोगासक्त मन चञ्चल रहता है । मन के साथ बुद्धि का घनिष्ठ सम्बन्ध है । दूसरे शब्दों में सोमरसमय मन पर प्रतिबिम्बरूप से बुद्धि प्रतिष्ठित है । जिस प्रकार घायु के घाघात से समुद्र से पार लेजाने वाली नौका डगमगा जाती है-(वापुनीवमिवाम्भसि-गीता), अथवा जिस तरह पानी के हिल जाने से तत्प्रतिष्ठ सूर्यप्रतिविम्व हिल पड़ता है, ठीक इसी तरह कामासक्तिस्थानीय वायु के श्राघात से चश्वत बुद्धि के साथ महान्' नाम से प्रसिद्ध 'चिच' की खाभाविक स्थिरता मारी जाती है । चित का सत्यभार उत्क्रान्त होजाता है, रजोमिश्रित तमोभाय बुद्धि और मन पर थाक्रमण फर लेता रसर पूछा जाय तो इसे वही उचर देना पड़ेगा, जो कि उद्गार काम कामी महाराज ययाति होकर भारत में उन्हें कहना पड़ा- न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णपमेव भूय एवामिनद्धते ।।

हा उपनिषनिष्कर्ष । इस प्रकार अविवेक के द्वारा दुःखाण में निमग्न प्राणियों के समुद्धार के लिए ही ईशोपनिपत् प्रवृत्त हुई है । उपनिषत् का वक्तव्यांश केवल यही है कि "तुम ईशदृष्टि से भोग मार्ग में प्रवृत्त रहते हुए निष्कामबुद्धि से यावज्जीवन कर्म करते रहो" । निष्कामभाव से कर्म करते करते कालान्तर में तुम्हारा मन अनासक्त बन जायगा, प्रज्ञा स्थिर होजायगी , मन की स्थिरता से युद्धि स्थिर होजायगी। बुद्धि की स्थिरता से वित्तप्रसाद होगा-'प्रसादे सर्व- दुःखानां हानिरस्योपजायते' । प्रकृत उपनिषत् में निम्न लिखित ६ वाक्यों पर ही दृष्टि रखनी चाहिए- १-तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा! २-मा गृधः कस्यखिद्धनम् ! ३-कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविपेत् ! ४-योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽहम् ! ५-तो स्मर, कृतं स्मर! ६–अग्ने नय सुपथा राये! १-ईश से छोड़े हुए भाग का (ही) भोग करो! -किसी की सम्पत्ति पर नियत मत डिगामो ! ३काम करते हुए ही जीवित रहने की इच्छा करो! ४-जो प्रादिस में आत्मा है, वही तुम हो । ५-अपने इरादे को लक्ष्य में रक्खो, जो करचुके हो उसे लक्ष्य में रक्खो! ६-साथ ही में अपने बल (अमिवल) का ठीक मार्ग में उपयोग करो! ३८८ निपत हैं । तुम्हें जो कुछ मिलने वाला है, वह तुम्हारा भागधेय (हिस्सा है, उसे दूसरा भोजन का गुलाम मत बनायो! व्यसनों के दास मत बनो, व्यसनों को अपना दास चनाओ! खाने के लिए जिवित मत रहो, जीवित रहने के लिए खायो ! भोजन की दासता २- तुह्मारी लिप्सा, तुझरी फलाकांक्षा, तुमारी वाञ्छा तुहारे आरमा को गिरा देगी। तुझे अन्न की दासता में अात्मसमर्पण करना पड़ेगा,कंकरों के लिए हीरों की भेट चदानी पदगा, अल्पताम के लिए सर्वख खोदेना पड़ेगा, अर्थ की दासता में तुहीं परमुखापेक्षी बनना पड़ेगा, दूसरों की भिड़किएं सहनी पड़गी । सोचो! (मन का व्यापार करो), विचा- रो (बुद्धि से कामलो)/ सोच समझकर कल्याणपष काथाश्रयलो। तुम क्यों दूसरों की संपत्ति में लिप्सा रखते हो। क्या तुम मनुष्य नहीं हो ! क्या तुहारे पास बुद्धिबल नहीं है क्या म उस सर्वज्ञानधन के अंश नही हो! हो और यश्य हो। तुमनें अपने प्रज्ञापराध (नासमझी-गलती) से अपना विभूतिभाव गला रक्खा है । उठो जागो !! वेदपुरुषा- रा प्रदत्च वर से आगे बढ़ते चलो!!! आत्मदेवना तुमारे साप है । तुझे किस का डर है, उमारे पास क्या कमी है। जानतेोभात्मदेवता कर तुलारे उपर अनुग्रह करेंगे: कर सार तुह्मारा भोग्य बन जायगा। यदि ऐसा नहीं करोगे तो- का उपनिषनिष्कर्ष । - तुम्हें अपने नौग्न में जो कुछ भोग मिलने वाला है, वह उस अन्तर्यामी की प्रेरणा से (तुम्हारे ही सञ्चित कर्मों के अनुसार) पहिले से ही नियत है । 'जात्यायु गाः' इस सिदान्त के अनुसार तुम्हारी जाति (योनि), श्रायु, और भोग तीनों पहिले से ही . नहीं बदा सकता , साथ ही में तुम दुसरे का ले भी नहीं सकते । मिलने वाला मिल ही जायगा, न मिलने वाला नहीं ही मिलेगा । विश्वास करो ! भोजन तुम्हारे जीवन के लिए है, जीवन भोजन के लिए नहीं है । भोजन को जीवन का दास समझो, जीवन को में तुम स्वयं संसार के भोजन बन जायोगे, एवं भोजन को अपना दास बनालेने से सं- . - . ३८९ -II उपनिषनिष्कर्ष तुम्हें प्रात्मबल (Will Fawor ) मिलेगा ? कब तुमारी गही छूटेगी ? कब तुम भोगों के पञ्ज से छूटोगे ? नहीं तो सुनो! ३- जो मनुष्य फल को अपने अधिकार से बाहर की वस्तु समझना हुआ अनन्यभाव से केवल कर्म में प्रवृत्त रहता है, विश्व की विभूति उस के चरणों में लौटा करती है । फल को तुम उत्पन्न नहीं करते, फल उत्पन्न होता है तुमारे कर्म से । तुम कर्मदशा में ही जय फज की चर्वण करने लगते हो तो परिणाम इस का यह होता है कि तुझारा मन दोनों तरफ बट जाता है, अनन्यता जाती रहती है। कर्मसिद्धि में जितना बल अपेक्षित है, यह बट जाता है , कर्म अपूर्ण रह जाता है । फलतः पूर्ण कर्म से सम्बन्ध रखने घाले पूर्णफल का उदय नहीं होता । इस प्रकार कर्मप्रवृत्तिकाल में फल की प्राशा रखते हुए तुम स्वयं ही फलनाश के कारण बन जाते हो । यही नहीं, फलाशासंस्कार से तुह्मारा गन लिप्त होजाता है, स्पृहा बढ़ जाती है । यदि तुम स्पृहा हटाना चाहते हो, नित्यतृप्त बनना चाहते हो तो कर्मप्रवृत्तिकाल में सर्वपा अनधिकृत फलाशा का परित्या- ग करते हुए शास्त्रसिद्ध चातुर्वण्यधर्ममूलक कम्मों में निष्कामबुद्धि से प्रवृत्त रहो। भोग- लिप्सा के लिए जीवित रहने की इच्छा मत करो, कर्म करने के लिए जीवित रहने की इरडा करो । परिणाम इस का यह होगा कि कर्म की अनन्यता से फलामिसन्धि में भी सन्देह न रहेगा, एवं फलाशा से सम्बन्ध रखने वाला संस्कार लेप भी न होगा । थरे ! तुम बिन तुन्छ फलों की प्रासक्ति में पड़े हुए हो । त्रैलोक्य की समृद्धि के अधिष्ठाता प्रादिस्य पुरुष के वंशज होकर इन तुच्छ सम्पत्तियों के पीछे दौड़ते हुए तुम अपने वंशजों की योति मिट्टी में मिला हो। सोचो तुम कौन हो, कहां से पार हो, क्या करना चाहिए था, क्या कर रहे हो। यदि तुम यह नहीं जानते कि तुम क्या हो तो सुनो, हम बतलाते हैं। । -- से प्रसिद्ध बड़े बड़े मनस्वी भी कभी कभी धोका खा जाते हैं। वे भी कभी कभी वर्णाश्नम-' धर्ममूलक आधिकारिक कर्म की उपेक्षा कर अकर्म को कर्म मान बैठते हैं, कर्म ५- तुम कर्म में प्रवृत्त होने के लिए जो इरादा (क्रतु) किश है, उसकी खूब परीक्षा कर लो। साथ ही में जो कर्म कर चुके हो उस पर दृष्टि रखो। सोचो कि भरतक हमने ॥ उपनिषधिष्क ॥ "-- सूर्य तुह्मारे सामने है । त्रैलोक्य इस के प्रकाश से प्रकाशित है । "सूर्य आत्मा जगत- स्तस्थुपश्च" (यजुः सं० ) इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार हम उसी के अंश हैं । अंश अंशी से अभिन्न है । फलतः जो यह है, वही हम हैं। हम कौन हैं" इस का यही सच्चा इतिहास है । जिन घोकेवाजों ने तुझारे इतिहास का स्वरूप विकृत कर तुमारे था- स्मपैमव का अपहरण कर रखा है, एवं जिस कल्पित इतिहास को मोहवश सत्य सम- झते हुए तुम अपनी जन्मसिद्ध खतन्त्रता से वञ्चित होरहे हो, कलङ्कित,कल्पित, कुत्सित, कुन:मय उस मिथ्या इतिहासम्रन्थ के पत्रो को जला डालो । अपने अतीत गौरव के सच्चे इतिहास का अन्वेषण करो । यह मिलेंगा तुम्हें अपने ऋषियों की घाणी में, उपनिण्दों में । वह इतिहास अजर अमर है, अतएप अमिट ।पने इस सत्य यात्म- इतिहास के बल पर तुम जन्मसिद्धा उस प्रामानन्दमूला खतन्त्रता को प्राप्त करने में समर्थ बनोगे । परन्तु इतना ध्यान रखना कि इतिहास देखने में काही प्रमाद न हो जाय । कर्म करो, परन्तु सावधानी से । श्रांख मीच कर यथेच्छाचारी मत बनना । अपि तु निम्न लिखित सिद्धान्त को सदा अपने सामने रखते हुए ही फर्ममार्ग में प्रवृत्त रहना- किं नु मे स्मादिदं कृत्वा किं नु मे स्यादकुर्वती । इति संचिन्य मेघावी कर्म कुर्वीत वा न वा ।। कर्मजाल बड़ा दुस्तर है। "किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिता, गीता) के अनुसार कपि (भृगु-सोम) वंशज, सोमगय मन का संयम करने के कारण कवि नाम । फोभकर्म मान बैठते हैं । तुम्हें चाहिए कि- giउपनिषनिष्कर्ष कुछ किया है, उससे हमाग क्श उपकार हुअा है एवं उस से समाज का क्या हित हुआ. है ! वत्तमान को मव्य बनाने के लिए अतीत को लक्ष्य में रक्खो 1 कहीं ऐसा न हो कि केवल वर्तमान के झमायात के झपेटे में श्राकर आंख मीच कर अशास्त्रीय कम्मों को शास्त्रीय मानते हुए, साथ ही में कर्ममार्ग का डिण्डिमघोष करते हुए अपना सर्वनाश करा वैठो । 'तुरस्य धारा निशिता दुरखया दुगै पथस्तत् कवयो वदन्ति । -- । . ६- तुम्हारा ऋतु ( इरादा) भी बड़ा उदाच है, अतीत मी तुम्हारा बड़ा भव्य था । परन्तु साबधान ! कहीं वर्तमान को न भूल जाना । वत्तमान में तुम्हारे पास जितनी शक्ति है, उसे ध्यान में रखते हुए ही आगे बढ़ना । लम्बे चौड़े इरादे, अतीत का गौरव ही कर्म प्रवृत्ति के मुख्य द्वार नहीं है । इसके लिए तम्हें वर्तमान वल का आश्रय लेना पड़ेगा । तुम्हारी अध्यात्मसंस्था में कर्म के प्रयनेक देवता सोमगर्भित अग्नि हैं | प्रानि अगिरा है, सोम भृगु है । यही दोनों तुहारे तप [फग्म] के सञ्चालक हैं । "भृगूणाम- शिरसां तपसा तप्यव" इस श्रोत सिद्धान्त का समादा करते हुए, भृगु-अगिरा- मय अपने शारीर थाग्नेय बल को सामने रखते हुए तदनुसार कर्म करो । यही अनि देवता तुम्हें सुपय का अनुगामी बनाने वाला है। जो व्यक्ति शक्तिसीमा का उल्लंघन करता हुआ अप्पामय कम्गों में प्रवृत्त होनाता है, वह कभी सफल नहीं होसकता । इस प्रकार ऋतु (इरादा), कृत (घतीम), अग्नि (यत्तमान शक्ति) तीनों को लक्ष्य में रखते इए, फलाण छोड़ते हुए कर्म में प्रवृत्त रहो, ऐहसौकिक, पारलौकिक दोनों विभूतिएं करबद्ध तुम्हारे सामने सही है । भों शान्तिः शान्तिः !, शान्तिः !!! VIDYA HTRAYA.

Ishopanishat Hindi Vigyanbhasya Khand-ii

Author
Sharma,motilal
Title
Ishopanishat Hindi Vigyanbhasya Khand-ii
File name
Ishopanishat Hindi Vigyanbhasya Khand-ii
Text
OCR done
Citation
1907
Published
2012/08
Publisher
Jaipur.,balchandra Kishanpol Bazar
Language
Sanskrit
Pages
429
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
312092
Barcode
99999990320914.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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