Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Vidhapati Ek Adhyayana

Dr. Randhir · 2011/03

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विद्यापति • एक अध्ययन

हिन्दो-ज्ञान विकास-प्रथमाला
तुलसी एक अध्ययन
घनानद एक अध्ययन
रामप्रसाद मिश्र
राजेन्द्रमोहन भटनागर
रणधीर श्रीवास्तव
सतोषकुमार तिवारी
विद्यापति एक अध्ययन
नये कवि एक अध्ययन
(भाग 1, 2,3)
रामचरितमानस एक अध्ययन
रामप्रसाद मिश्र

हिन्दी-ज्ञानविकास प्रथमाला
विद्यापति
एक अध्ययन
डॉ० रणधीर श्रीवास्तव
रिकेत
भारतीय ग्रथ निकेतन
2713, कचा चेलान, दरिया गज
नयी दिल्ली 110002

प्रकाशक भारतीय ग्रथ निकेतन
2713, कूचा चेलान दरिया गज
नई दिल्ली-110002
प्रकाशन वष
1991
मूल्य 6000
मुद्रक जितेद्र प्रिटस,
बावरपुर रोड, शिवाजी पाक,
शाहदरा दिल्ली 110032
VIDYAPATHI EK ADHYAYANA
Randbur Shrivastava

"wraru
विषय-सूची
7
22
38
54
विद्यापति की जन्मभूमि-मिथिला
विद्यापति-जीवन प्रसग
विद्यापति की कृतियो समीक्षात्मक परिचय
विद्यापति के काव्य मे कृष्ण तथा राधा का स्वरूप
गीति परम्परा और विद्यापति पदावली
विद्यापति की भक्ति भावना का स्वरूप
विद्यापति के काव्य मे प्रेम तथा मोदय विधान
विद्यापति के काव्य का शास्त्रीय विवेचन
विद्यापति के काव्य मे प्रकृति चित्रण
पूर्ववर्ती एव परवर्ती साहित्य के सदभ म विद्यापति का काव्य
67
90
120
127
161
175

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विद्यापति की जन्मभूमि-मिथिला मिथिला भारतभूमि का एक अति प्राचीन जनपद है। प्रागैतिहासिक काल से ही यह साहित्य, सगीत और कला का मा य केद्र रहा है । इसकी पावन गोद मे विदेहराज जनक, याज्ञवल्क्य, गौतम, कपिल और जैमिनि आदि ऐसे अनेक मनीषियो ने जन्म लिया है, जिहोने मान की अखण्ड ज्योति जलाकर भारतीय दर्शन, साहित्य, सस्कृति और सभ्यता को केवल सुरक्षित ही नहीं रखा है बल्कि उसका सम्यक प्रमार और प्रचार भी किया है। इसके विभिन्न विश्वविद्यालय, सभा भवन, गोष्ठी-सदन, मानव मनीपा और संस्कृति विषयक विशिष्ठ एव महान दार्शनिक विचार विनिमय के केन्द्र रहे हैं। यही मिथिला विद्यापति की भी जमभूमि है जिसकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रभाव प्राचीनकाल से आज तक भारत के विभिन्न भूभागों पर रहा है। वृहत् पुराण मै मिथिला के बारह नामो का उल्लेख है- मिथिला तैरमुक्तिश्च वैदेही नैमिकाननम्। मानशील कृपापीठ स्वर्णलागल पद्धति ।। जानकी जमभूमिश्च निरपेक्षा विकल्मपा। रामानकरी, विश्वभावनी, नित्य मगला ।। मिथिला नाम वेद तथा वेदोत्तर साहित्य रामायण, महाभारत, भागवत पुराण, दशकुमारचरित, रघुवंश प्रसन राघव आदि में कही भी उल्लिखित नही है । सम्भवत यह नाम मिथिला के जन्मदाता महाराज 1 हिस्ट्री आफ मिथिला, डॉ० उमेद्र ठाकुर, पृ०1 - 8 विद्यापति एक अध्ययन - मिथि के नाम पर आधारित है पि तु शतपथ ब्राह्मण के अनुसार सबसे प्राचीन नाम विधा' विदेह मध्व के नाम पर अनुमानित है । कहा जाता है कि पृथ्वी पर अग्नि को लाने का श्रेय इही को है और इन्होंने ही विदेह वश की स्थापना की थी। पुराण प्रसग के अनुसार मनु के पुत्र इक्ष्वाकु सूर्य वश के प्रथम राजा थे। उनके सहस्र पुत्रो मे विकुक्षि, निमि और दण्ड श्रेष्ठ थे। विकुक्षि से सूयवशी राजाओ का वश चला और निमि मिथिलाधिपति विदेहराज जनक के भादिपुरुष हैं। निमि के पुत्र मिषि के नाम पर ही मिथिला राज्य की स्थापना हुई जो वतमान तिरहुत का कोई न कोई भाग रहा होगा। पाणीनि ने मिथिला श की व्यारया इस प्रकार से की है-'मथ्यात शरवो यस्या' कुछ विद्वान 'म' 'थ'ल' को क्रमश जम, स्थिति और लय का प्रतीक मानते हैं। चीनी यात्री ह्वन च्याग के समय मे यह प्रदेश छोटे छोटे तीन भागों में विभक्त था-विशाला, तीरभुक्ति, वृज्जिया मियारि । डा. सुभद्र झा ने 'मिय का साथ के अथ मे ग्रहण कर मिथिला को वशाली, विदेह और अग का सामूहिक रूप माना है। कनिंघम महोदय की रिपोर्ट के अनुसार तिरहुत' का विकास क्रम है--भारहुत भारमुक्ति, तीरमुक्ति-तिरहुत । मुक्ति शब्न अत्यात प्राचीन है इस शब्द का प्रयोग प्रात या प्रदेश के अथ म होता रहा है। भोगपति गवनर' के अथ में प्रयुक्त हुआ है। तीर मुक्ति या तिरहुत प्रदेश की सपा आठवी शती में नात थी क्योकि वामन ने 'बरे द्रा तीरभुक्तिर्नाम देश का उल्लेख किया है । आधुनिक पुरातत्व विशारदा के अनुसार तो इस शब्द का प्रयोग चौथी शती मे भी प्रमुक्त हुआ है। सन् 1903 1904 के वंशाली जिला मुजफ्फरपुर की खुदाई में अनेर ऐमी मुद्रायें उपलब्ध हुई हैं जिन पर तीरमुक्ति अवित है और उन पर 1 तपथ ब्राह्मण-प्र० 141 तथा ट्राइन्स आफ एसियेट इडिया, बी०सी० ला०,पृ. 234 2 दरमग डिस्ट्रिक्ट गजेटियर, पृ०146 ३ वामन तसिंगानुशासन, पृ०18 विद्यापति की जमभूमि-मिथिला 9 गुप्तकाल की तिथियां हैं। अत इस शब्द की प्राचीनता तीसरी चौधी शताब्दि तक सिद्ध होती है। मिथिला की भौगोलिक स्थिति की चर्चा वहत पुराण के "मिथिला महात्म्य' खण्ड में पाराशर और मैत्रेयी के वार्तालाप मे आती है जिसके अनुसार मिथिला वह देश है जिसके पूर्व दिशा मे कौशिकी, पश्चिम में गण्डकी, दक्षिण म गगा और उत्तर मे हिमालय का विस्तार है। चण्ड का ने इसी कथन को छ दोबद्ध किया है जो मिथिला मे अति प्रचलित है-- गगा बहथि जनकि दक्षिण दिशि, पूव कोशिकी धारा। पश्चिम बहथि गण्डकी, उत्तर हिमवत बल विस्तारा॥ कमला, नियुगा, अमता, धेमुणा, बागमती कृत सारा । मध्य बहथि लक्ष्मणा प्रभिति से मिथिला विद्यागारा।। वतमान समय मे इस क्षेत्र के अतगत मुजफ्फरपुर-दरभगा का सम्पूर्ण जिला, चपारन और मुगेर जिला का उत्तरी भाग तथा भागलपुर और पुरनियों के कुछ अश आते हैं जो भारत की सीमा में हैं। इसके अति- रिक्त नेपाल राज्य की सीमा मे स्थित रउताहट, सरलाही, मप्नारी, मोहनारी तथा मौरग के भूभाग आते हैं । प्राचीन जनकपुर भी अब नपाल की सीमा मे ही पडता है जो दिये हुए नक्शे से स्पष्ट है। प्राचीन सदों से भी, मिथिला का सीमा विस्तार हिमालय की ओर अधिन था, की पुष्टि होती है । बौद्ध ग्रयों में इसकी सीमा का मध्य देश तक होने का सकेत मिलता है, कि तु ऐसा प्रतीत होता है कि ये सकेत गया और बनारस जो बौद्धो के पवित्र तीथ स्थल रहे हैं, के प्रति श्रद्धाभाव के कारण है। भारत का जो प्राचीन विभाजन ब्रह्मावत ब्रह्मपि देश, मध्य देश तथा आयोवत के रूप में किया गया है उससे मिथिला को अलग ही रखा गया है । याज्ञवल्क्य स्मति मे स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कतव्य पथ का दिग्दशन मिथिला केसर याज्ञवल्क्य ने किया है जिस देश में काले हिरन विचरण किया करते 1 वहत पुराण-मिथिला महात्म्य खE-VIX 2 हिस्ट्री आफ तिरहुत, श्याम ना० सिंह प०3 3 बी०सी० ला० कृत-ज्योग्राफी माफ अली बुद्धिज्म, पृ०1 10 विद्यापति एक अध्ययन पाषित सगम (1581) म स्पष्ट उल्पेस है रितीर मुहिम को दक्षिणी गौमा गगा नदी पी और सोलहयो पातान्दी अत सा गरे प्रमाण मिलते हैं । मुगल शासन काल मतिरहुत विहार प्रांत या परगना बना जिसके अतर्गत हाजीपुर मुगेर और पुरनिया पे भाग सम्मिलित थे। सन् 1875 में इसका पुनविभाजन हुआ जिसके फलस्वरूप इसपा यिपाल पूर्वी भाग दरमगा और पश्चिमी भाग मुजफ्फरपुर म आगपा । सुदूर उत्तरी भाग मुगल तपा प्रिंटिश शासको ये पहुँच से परे था अत यह नेपाल में पासका ये अधिकार म चला गया। इस प्रकार भौगोलिक दष्टि से मिथिला को भार अवस्थाओ से गुजरना पहा- -(1) विदह राज्म जिसके मुख्य अग ये विशाली और मिथिला (2) तीरभुक्ति, (5) बिहार प्रात फे मगध क रूप में और (4)मिपिला का वतमान रूप जिसके पतगत -मुजफ्फरपुर, दरमगा, चपारन और सारन वे जिले आते हैं। पुराणों के अनुमार मिथिला पा क्षेत्र पूरव से पश्चिम 96 कोस लम्बा और उत्तर से दक्षिण 64 कोस चौडा है। डा० जयकात मिश्र के अनुसार-मिथिला के क्षेत्र भारत में लगभग--19,275 वर्ग मील और नेपाल मे 10,000 यग मील है। दरभगा जिले के गजेटियर के अनुसार-सन 1934 के भूकप के पूर्व मिथिला की भूमि अत्यात उपगार पी और जावादी भी धनी थी, नदियो क किनारे की भूमि पर दूर दूर तक विस्तत धान के हरे-भरे खेत लहराते हैं और अनेक स्थानो पर बामो और आम के घने बगीचे हैं। मिथिला को भीला नदियो और तालाबो का दलदली प्रदेश कहा गया है जो वष मे केवल तीन चार महीने ही परिवहन की सुविधा योग्य रहता है । वस्तुत मिथिता नदियो और भीलो का देश है । इन नदियो ने यहां की संस्कृति और विद्या को सुरक्षित रखा है। इसकी प्रमुख नलियाँ हैं गगा, बूढी गडक, कमला, बागमती, त्रियुगा और कराई जिसके किनारो पर मिथिला के प्राचीन खण्डहर हैं भूटानी, कमला, कौगिकी (सप्त कोशिकी)।' शतपथ ब्राह्मण मे कहा गया है कि मदानीरा के उस पार की भूमि विदह मध्व के आगमन के पूर्व लोगो के पहुँच के बाहर थी, जलमग्न थी। विदेह मध्व के यनो के द्वारा भूमि को कृषि के योग्य बनाया गया। जनक विद्यापति की जमभूमि-मिथिला.., के हल जोतन वाली बात का स्रोत भी शायद यही हो । उन्होने ही पच- देवी की उपासना कर उसे प्रमन किया और, इसे रहने याग्य बताया। महाभारत मे भी इस देश को जलोद्भव की सज्ञा दी गई है जो विदेह मध्व के भगीरथ प्रयत्न की ओर सकेत करता है और आज के परिश्रमी हालेह वासियो की याद दिलाता है। मिथिला के मानस पुत्रो ने अपनी गौरव गाथा अरि के रक्त मे दुवावर तलवार की धार से नहीं, बल्लि चितन और मनन के माध्यम से मानव हृदय तथा प्रकृति के गुह्य प्रदेशों में प्रवेश कर लेखी की नोक से लिखी है । तलवार की घार की गाथा काल के प्रवाह म विलीन हो गई किंतु मिथिला की गाथा आज भी अपने आलोक से मानव हृदय के अधकार को दूर करती हुई अपने ज्ञान को यशोपताका गगन मण्डल म फहरा रही है। निस्सदेह मिथिला के राजप्रासादो, पावन आश्रमो, सुरम्य तपोवनो, गह्वर गिरि गुफाओ, एकान्त शवालिनी तीरो और बांसो की झुरमुटो और सघन आम्न कुजो से ज्ञान का अन त स्रोत प्रवाहित हुआ है । मिथिला वासियो ने सगव इस ज्ञान परम्परा की रक्षा अपनी साधना सयम और बलिदान में किया है । आश्चर्य है कि मिथिला के सभी राजवश सब समय मे एक ही सिद्धात और विचार के रहे हैं । जिस प्रकार विदेहराज जनक अपने समय में विद्या, ज्ञान तथा धम के रक्षक थे उसी प्रकार सभी परवर्ती राजवशों ने विद्वानो और पडितो को सरक्षण दिया है और स्वय भी व प्रकाण्ड पडित रहे हैं। निमि, कर्नाट कामेश्वर ठाकुर के राजवशो मे सद्धित और सरक्षित ज्ञान उत्स आज भी दरमगा राज्य के सरक्षण मे अक्षणु है। इस परम्परा का गव मिथिलावासियो को है जिसके प्रतीक स्वरूप अज्ञात कवि का यह छद उनकी जिह्वा पर निरत नतन करता रहता है- जाता सा यत्र सीता सरिदमल जला धाग्वती यन पुष्या, यत्रास्ते म िनधाने सुरलगर नदी, मरवो यत्र लिंगम। भीमा सा याय वेदाध्ययन पटुतर पडितनिराडता या, भूदेवो यत्र भूपो यजन वासमती, सास्ति मे तीर मुक्ति । मिथिलावासियों में संस्कृत भाषा के प्रति प्रगाढ़ प्रेम रहा है । सस्कृत 12 विद्यापति एक अध्ययन के अति प्रेम के कारण ही इनकी अपनी मातृ भाषा मैथिली को चिरकाल तक दिनी और उपेक्षिता का जीवन व्यतीत करना पड़ा जिसका सव प्रथम उद्धार कविवर विद्यापति ने अपनी लेखनी के स्पश से किया। तभी से यह कोकिला भाषा कोटि-कोटि कण्ठो का हार बन गई और इसके हृदयस्पर्शी स्वर से मिथिला की अमराइयां गूज उठी। प्राचीनतम अभिलेखो से स्पष्ट है कि मिथिला बहुत काल तक वेद तथा औपनिषदिक विद्या का के द्र रहा है और उत्तर वैदिककाल म सास्कृतिक विकास के जिस आदोलन का सूत्रपात हुआ उसका सूत्रधार मिथिला ही रहा । धम, विद्या और सस्कृति मे उनतशील होने के नात मिथिला और यहां के निवासी उज्ज्वल यश के भागी रहे हैं जिसकी घोषणा स्मृति सूक्तियो मे-'धर्मस्य तत्व विज्ञेय मिथिला व्यवहारत 'मे की गई है। यह नान कोष केवल दरबारो और पडितो की गोष्ठियो तक ही सीमित नही था वल्कि ममाज के निम्न वग में भी उसका सम्यक प्रकाश था । 'धम व्याध कथा इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है । प्राचीनकाल की आम धारणा थी कि धम और तत्व ज्ञान मिथिला से ही सीखा जा सकता है। मिथिला के अनेक राजे महाराजे, उनकी विदुषी रानियां स्वय श्रेष्ठ विद्वान, विदुषी और विद्वानो के आश्रयदाता रहे हैं। दाशनिक महाराज मुक्त विदेहराज और नव्य “याय के महापडित महाराज महेश ठाकुर पर कौन ऐसा मिथिलावासी है जिसे गव न होगा। कविवर विद्यापति को यह उक्ति इम सदम मे अत्यत साथक है-'अहो तीरमुक्तिया स्वभावाद गुण- गविण भवति। भारतीय पड्दशनो म कम से कम चार की नीव इ० पू० 1000 से 600 तक के बीच मिथिला मे ही पडी। गौतम कपिल कणाद और जमिनि ने कमा याय, सांस्य, वगेपिका और मोमासा की व्याख्या सर्वप्रथम यही की। ऋग्वेद के कतिपय एचाओं के द्रष्टा ऋषि गौतम राहुगण जनक मिथिला व पुरोहित ये इहोके वापर गोतम अक्षपाद पाय दान के प्रणेता प। शुक्ल यजुर्वेद सहिता के मकमनकर्ता, शतपथ ब्राह्मण व रपयिता मुप्रगिट और महान तत्ववेत्ता विदग्ध शाकल्य को शास्त्राय म पराजित पर स्वण जटित सींगवाली महल गोवें प्राप्त कर अध्यात्म जगन विद्यापति को जन्मभूमि-मिपिलान, में अपना नाम अमर करने वाले पागवल्क्य का निवास भी मिथिला के. निकट जगवन था। सारूप दर्शन के प्रणेता कपिल मुनि का ओधममधुवनीत के समीप कवरोढ ग्राम में था और चशेषिक दर्शन के प्रणेता कणाद भी मिथिला के निवासी थे। कामसू और वात्स्यायन भाष्य के रचयिता पारस्पायन और एलोप्यातिक पे प्रणेता मीमास शिरोमणि कुमारिल भट्ट जि होन वैशाली से बौद्ध विचारधारा को समूल नष्ट कर पुन वैदिक यम की स्थापना की थी, की भी जाम मूमि मिथिला हो यो। मिथिला को ही राज्य सभा मे उद्दालन, आणि, अक्षपाद, वात्स्यायन, उदोनकर तथा विदुपी शिरोमणि गायत्री और मैत्रेयी रही हैं। इसी दरबार मे ध्यास पुत्र शुकदेव और कौशिक मुनि को ज्ञानु पिपासा शात हुई है। इसी मिथिलाम जगतगुरु शकराचार्य से सफल शास्त्रार्य करने वाले महापडित मण्डन मिध और पराजित करने वाली उनकी पत्नी भारती देवी हुई थी। इसके अतिरिक्त दरमगा स्थित अधराटढ़ी ग्राम निवासी पडदर्शना- चार्य महामहोपाध्याय वाचस्पति मिश्र का विभिन्न दशन न था पर भाष्य साहित्य की अमूल्य निधि हैं। दरभगा के ही सरसिव ग्रामवासी एक और वाचस्पति मिश्र भी अनेक ग्रन्थो के प्रणेता हुए हैं जिनकी ख्याति मिथिला के कोने कोने में व्याप्त है । बौद्धमत के खण्डन करने वाले महामहोपाध्याय गगेशोपाध्याय मधुबनी के निकट मगरौनी ग्राम के निवासी थे और उनको इतिहास प्रसिद्ध पाठशाला के खडहर परियन के निकट गगराही ग्राम में अब भी विद्यमान हैं । इनके यहां बगात तथा अन्य क्षेत्री से छात्र नानाजन के लिए आया करते थे। इही के प्रमुख शिष्य 'आर्यासप्तसती' के रचयिता करियन ग्राम निवासी गोवधनाचाय हैं। बौद्ध धम के भूलोच्छेदक महान- दाशनिक उदयनाचाय भी इसी ग्राम में शिवामी और गोवधनाचाय के शिष्य थे जिनकी गर्वोक्ति से किसी भी भारतीय का मस्तक ऊंचा हो सकता है- बयमिह पदविधा तकमा वीक्षिकी वा, यदि पथि विषये बावतमाम सपथा, 1 14 विद्यापति एक अध्ययन . उदयति दिशि यस्या मानुमान सव पूर्वा, नहि तरणिरूदीते कि पराधीन वति । मथिल ब्राह्मणो के सोदरपुर वश के आदिपुरुष सुरेश्वर मिश्र का घराना भी विद्वता की दष्टि से मिथिला के इतिहास मे अमर है। विश्मा दित्य के नवरलो में एक लिंग वत्ति' व्याकरण ग्रथ के रचयिता वररुचि इमी परिवार के पूर्व पुरुष थे। इसी वश मे पातजलि वेत्ता यासदत्त मीमासक जयादित्य, साख्य शास्त्री श्रीपति, काव्यकोविद गणेश्वर, प्रसिद्ध कवि रसमजरी के रचयिता भानुमिश्र, विख्यान विद्वान हलायुध, धमशास्त्री श्रीदत्त वेदा ती भवदत्त काव्यालकारकार दामोदर और व्याकरण दशन कार पदमनाभ और नाटककार मुरारि मिश्र अपने समय के विद्वान शिरोमणि हुए हैं। राजवशावली के इतिहास पर दृष्टिपात करने से जो तथ्य सामने माते हैं उनके अनुसार सत्यात प्राचीन एव भारतीय सभ्यता, सस्कृति एवं ज्ञान के केन्द्र इस विशाल भू भाग से निमि के 56 पीढियो के वाद महाराज कृति के समय मे ग्यारहवी शताब्दि के पूर्वाद्ध के प्रारम्भ म महाराज जनक के वश की इतिश्री हो गई। इस गौरवमहित वश के अवसान के बाद सन् 1089 मे नाय देव नामक एक क्षत्री राज्य करता हुमा प्राप्त होता है जिसके वश के राजामओ ने 1334 ई० तक मिथिला पर शासन रिया। इस दासनकाल मे सरक्षित विद्वानो मे व्याख्यानामृत' के रचयिता महामहोपाध्याय श्रीकर आचाय, सरस्वती कठाभरण के पर्ता रत्नेश्वर मिश्र तथा 'पृच्छकटिक' नाटक के सुप्रसिद्ध भाष्यकार पृथ्वीधर भाधार्य अविस्मरणीय हैं। राजा शक्ति सिंह देव के प्रधानमत्री एव कवि कठहार विद्यापति के पूर्वज चडेश्वर ने सप्त रत्नाकर, कृत्य रत्नाकर, दान रत्नाकर, व्यवहार रत्नावर, शुद्धि रत्नाकर, पूजा रत्नाकर, विवाद गहस्प रत्नावर आदिग्रयों की रचना की। उही के समकालीन विद्वान रत्नागर और धीदप्त उपाध्याय, हरिनाथ उपाध्याय भव शर्मा, पति और सक्ष्मीपति आदिये। इसी के शासन काल में सम्प प्रतिष्ठ विज्ञान ग्योतिरीवर ने पचाया रज खर तपा मपिली भापा आदि महान प्रषवण रानारर की रचनारी। इसके सम्बाप मेरा० अमर नाय + विद्यापति को जन्मभूमि-मिथिला 15 झा लिखते हैं कि Vama Ratnakar of which an excellent edition has been brought out by Asiatic Society of Bengal, under the able editorship of Sunıtı Kumar Chater Jee and Pt Babua Jee Misra The Prose style of this writer chall. anges comparison with that ot 'Bana' in his 'Kadambari and 'Subandha''Vasawa Datta' 1 ब्राह्मण एव पडितो के सरक्षक एव आश्रयदाता इस वश के अतिम राजा हरिसिंह देव ने मैथिल ब्राह्मणो एव मैथिल कण कायस्थों का पजी प्रबन्ध पडिन रघुदेव झा द्वारा सग्रहीत करवाया जो मिथिला सम्बन्धी ऐतिहासिक शोधो के लिए बडे महत्त्व का है। राजा हरिसिंह देव की विरक्ति के पश्चात् सन् 1324 ई० म गयासुद्दीन तुगलक ने मिथिला को जीतकर राज्य के मत्री कामेश्वर ठाकुर को वहाँ का शासक नियुक्त किया। कामेश्वर ठाकुर ओइनवार वश क मथिल ब्राह्मण थे। इनके भी वशधरी ने साहित्य सस्कृति और पाहित्य को सरक्षण प्रदान किया। मैथिल ब्राह्मणो के सुप्रसिद्ध अलई वश की उसरौली तथा बैगनी शाखाओ के आदिपुरुष महामहोपाध्याय गदाघर मा की विद्वता पर रीझकर गयासुद्दीन न उसरौली (पटना) और फरूखाबाद (दरमगा) की जागीर उहें दी थी। महाकषि विद्यापति भी इसी ओइनवार वशी महाराजा शिव सिंह के मत्री तथा राजपडित थे जिनकी कोमलका त पदावली का प्रचार मिथिला के घर घर मे है। सुविख्यात दाशनिक एव कवि पक्षधर मिश्र विद्यापति के सहपाठी थे। बगाल के सुप्रसिद्ध नैयायिक वासुदेव सर्वभौम इनके प्रधान शिष्य थे जिनके द्वारा 'लव्य याय' वगाल म पहुंचा। मयाची भावनाथ मिश्र के पुत्र महामहोपाध्याय शकर मिश्र का ज म भी इसी समय हुआ था जिनकी प्रसिद्ध रचनायें हैं -वशेषिक सूत्रोपस्कार, अनुदानचिता मणि पियूप, गौरी दिगम्बर प्रहसन, भेद रत्न कटको द्धार रसाणव, वाद विनोद तथा छादोगाहिक । इनके मम्ब च मे यह उक्ति मिथिला मे प्रचलित है-- 1 डॉ० जयकात मिश्र कृत-हिस्ट्री आफ मथिली लिटरेचर की भूमिकाद्वारा हॉ० अमरनाथ झा, 16 विद्यापति एम अम्पया । सागर थापस्परयो सररयामस्तो गयो। पसपर प्रतिपक्षी मनोभूतो उपवापि।। मिपिसेपनियसिंह पथियो और मिठाना पोहा और स्वर्ग भी बहुत यो पसा प्रेमी और मारार थे। मह रमित प्रमों में- सगीत रत्नापर म्याग्ण संगीत, रसापय यमुपापर मार भी उसन्ध है और ये आज भी महान सपा प्रेमी प में मिपिता म पूजे जाते हैं। सोर वाणी में प्रचलित है - पोखरि रजोसरियोर गय पोखरा' राजागिय सिंह और मय छोरा विद्यापति इही में राजपति और सपा । विद्यापति की व पदपला मी एक प्रस्यात विदूषी मोर क्ययित्री थी। इसी मार महाराज मैरव सिंह ने द्वार पस्ति मुरारि मिश्र न 'अनपराय' की टीका की थी। 'सप्नपापिय के रयिता श्री दत्तोपाध्याय, धपित भक्ति में रचयिता श्रीरत मिथ क्रमा पोलहवी पदहवी ताम्दि पे श्रेष्ठ विद्वान थे। इसी काल के दरमगा स्थित देयकुती ग्राम मे बद्धमरिश्वर शिव में स्थापर वद्धमानापाध्याय श्रेष्ठ और प्रामाणिक निय पवार थे। अभिनव जयदेव विद्यापति के पूर्वज महामत गणेवर ने, दान रत्नाकर', विवाह रत्नाकर', 'पाद रलार' व्यवहार रत्नाकर आदि ग्रयो की रचना की। महमीमरि निवासी महामहोपाध्याय गोविदा ने काम प्रकाशकार मम्मट की माता के आग्रह से 'काव्य प्रकाश पर सुप्रसिद्ध भाष्य ग्रप 'प्रदीप की रचना की। कवि विद्यापति को लुम नागर याच नाम से सम्बोधित करने वाले ओइनवार वा के दौहित्र महा- महोपाध्याय केशव मिश्र ने दंतपरिशिष्ठ, 'सत्यापरिमाप' और वार भाष्य आदि ग्रयो की रचना को जो घमशास्त्र के प्रामाणिक प्रथ माने जाते हैं। इस वश के अतिम प्रसिद्ध राजा लक्ष्मीनारायण जिनका उपनाम रिपुरेश नारायण था पहितो और विद्वानो के आश्रयदाता थे। मथिली के सुविख्यात पवि गोविद झा इही के दरवार के रत्न थे। विदुपी रानी लखिमा दई का नाम मिथिला मै कौन नहीं जानता है। भैरव सिंह के अनुा राजा चद्रसिंह की पटरानी रचित 'पदाथ चद्र और विचार चई' - विद्यापति की जममूमि-मिथिला 11 न्यायविषयक सुदर मप हैं। सुप्रसिद्ध छदो अथ वाणी मूषण' के रचयिता महामहोपाध्याय दामोदर मिय राजा कीति सिंह के और 'कन्य प्रकाश पर सुप्रसिद्ध भाष्य काव्य दर्पण' के कृतिकार रत्नपाणि ठाकुर राजा शिवसिंह के दरबारी थे। उनके पुत्र रवि ठाकुर ने भी उसी प्रथ पर 'मधुमती' रामक भाष्य की रचना की। इस प्रकार मिथिला मे ज्ञान साधना लोर काय परम्परा की अनवरत धारा प्रवाहित होती आ रही है। गणेश दत कालेग, बेगूसराय के इतिहास विभागाध्याक्ष प्रो० राधा कृष्ण चौधरी लिखते हैं--Mithila had been the land of great scholars seince time immorial Vidya Patı was Native of Mithila Pre Vidya Pati Sanskrit scholars were Bhanudatta, Chandeshwar tha ur, Umapati, Goverdhana cher Graheswar Mishra, Hari Nath Upadhyay, Jyotireshwar, Ram Datta Thakur Ganesh, Vardhman or Singh Bhupat मिथिला के राजाओ, पडितो और निवासियो का पारम्परिक ज्ञान के प्रति असाधारण मोह अत्यत फ्लदायी सिद्ध हुआ है। मिथिला ने ही ज्ञान का माल सभी युगों मे प्रदीप्त रखा है। सच तो यह है कि प्राचीन रूढियो और परम्पराओ के प्रति घोर आस्था और आसक्ति जो मिथिला मे पायी जाती है उसने ज्ञान की रक्षा इस प्रकार से की है जसे सप कुण्डली मार कर क्सिी कोष की रक्षा करता है और उपयुक्त अधिकारी को उसके प्रयोग और सवद्धन का अवसर प्रदान करता है । मिथिला के ज्ञानी पडित, साधक, कलाकोविद और उनके सरक्षक और आश्रयदाता जिनका उल्लेख क्यिा गया है-वे ही उस धरती कोष के उपयुक्त अधिकारी थे और उ होने अपने जीवन स्नेह से उसे सीचकर उस धारा की अन तता की अक्षणु रखा और उसका प्रचार प्रसार कर लोक जीवन को विविध मायामी आमोद प्रदान किया। मिथिला का धार्मिक जीवन तीन शक्तियो का एक संगम विशेष है जहाँ धर्म की तीन सरिताएं सगमित होकर उसे पवित्र तीय स्थान बनाती है। मैथिल ब्राह्मणो के ललाट पर शोभित त्रिपुड इन तीनो शक्तिया की उपासना का प्रतीक है। भस्म की तीन पडी रखामें भगवान शकर की 18 विद्यापति एक अध्ययन उपामना की अभिव्यक्ति हैं, च दन की सडी रेखा भगवान विष्णु मे उनका विश्वास व्यक्त करती है और ललाट के मध्य मे स्थित सिंदुर अथवा रोली का टीका भक्ति की उपासना का प्रतीक है। यह प्रतीक सिद्ध करता है कि शिव उनके जीवन मे आधारभूत प से व्याप्त हैं। विष्णु हृदयस्थ है और शक्ति के द्रस्थ । मिथिला के लोग वर्णाश्रम घम मे सहज और अटूट विश्वास रखते हुए शिव, शक्ति और विष्णु के उपासक हैं । घम इनके जीवन की प्रेरक आस्था है प्रचार और सहार का उत्प्रेरक नही। मिथिला मे शिवोपासना का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक है। कृष्ण पक्ष चतुदशी का व्यापर व्रत पार्थिव शिवलिंग की उपासना, शिव की एक मार मुक्ति प्रदाता की मा यता और उनके क्षेत्र मे प्रचलित अनेक लौकिय प्रथायें तथा 'महेशवानी' और 'नचारी' या प्रचलन मिथिला मे व्यापर शिवोपासना के प्रमाण हैं। शिवालय और शिवरात्रि का महत्त्व तो मिपिल की ही देन है । मिथिला के अनेक सता और उपासको ने शक्ति की साधना में अपना जीवन होम कर दिया है-देवादित्य, वर्द्धमान, मदन उपाध्याय धोरेद्र उपाध्याय, गोकुल नाथ तथा राजपि मिथिलेश रामेश्वर सिंह आदि इसके प्रमाण है। मिथिला मे प्रत्येक घर मे 'गोमौनी' उसी प्रकार पाई और पूजी जाती है जस उत्तर भारत में रामचरितमानस या गीता । मिपिला अन मिद्धिपीट-उथच, जनकपुर, पुमुदेश, धाम, उपत्रस्थान आदि पाक्ति उपासना ये येद्र है। शिव मदि मुक्ति दाता हैं तो शक्ति सिदि प्रदायिती हैं। पावित मिना तो शिव यो शव कहा गया है । शक्ति की उपासना कामपिल जीवन म गहराई का अनुमान तो इसी से लगाया जा सकता है कि-चालय या विद्यारम्भ यहाँ शक्ति के मत्र से किया जाता है- माते भय तु मुप्रीता देयो गियर वामिनी। उगतपमा सोभमा पापति पति । तना ही नही भित्तिया पर पित्रित ऐप' एक तांत्रिम मिह है। मिदिमा मायर, अभिमस तथा साहित्य सभी शक्ति की उपासना से प्रभावित और अनापि भोसरात म उपसम्ध है। 1 तुम सिमी भी पुणमिनीततिप्रवीर है। - - विद्यापति की जमभूमि मिथिला 19 विष्णु की उपासना का प्रभाव मिपिला के साहित्य और जीवन पर अपेक्षाकृत कम है। यह भीतर से उत्पन नही बल्कि बाहर से ग्रहण किया हुआ प्रभाव है। भागवत, हरिवश, ब्रह्मवर्वत पुराण के प्रचलन आदि स मिथिला मे वष्णवोपासना का सकेत मिलता है। मिथिलावासी वैष्णव को विरक्त मानते हैं--विरक्त वह है जो बन्धनो से मुक्त हो, शैव होते हुए भी मछली और प्रसाद को ग्रहण न करता हो और उसके गले मे तुलसी की माला हो। ऐसे सत का वे विशेप आदर करते हैं । इस प्रकार मिथिला के धार्मिक जीवन मे शिव और शक्ति की उपासना की प्रमुखता है और विष्णु के प्रति उसम उदार आस्था है.जो यहां के निवासियों को समन्वयवादी सिद्ध करती है। मिथिला का सगीत और नृत्य प्रेम भी अनूठा है। यहां के सगीत प्रेम ने साहित्यिक अनुभूति को वाणी और स्वर प्रदान किया है। यह मिथिला के लोक जीवन का अभिन्न अग है। पूर्वी भारत का समस्त साहित्य मिथिला के इस सगीत प्रम से प्रभावित है और इसका स्वर प्रधान है। कि तु दुर्भाग्य है कि मिथिला की सगीत-नत्य विधा का सम्यक एव विस्तृत इतिहास उपलब्ध नही है । अत यहाँ के सगीत और नृत्य कला के उत्स और विकास की जानकारी के लिये कतिपय विरल प्राप्त स्रोतो से ही सतोप करना पड़ता है। जो इने-गिने अन्वेपको एव सगीत प्रेमियों के फलस्वरूप उपलब्ध हैं। चेतनाथ झा लिखित उमापति के 'पारिजात हरण की भूमिका', मुरारी प्रसाद एडवोरेट की रचना 'विहार और संगीत कला, ईशनाथ झा रचित 'विद्यापति और उनकी सगीत कला' आदि कुछ, फुटकल रचनायें हैं जिनसे मिथिला के सगीत प्रेम पर थोडा-बहुत प्रकाश पडता है । वसे इस क्षेत्र में शोध कार्य की पर्याप्त गुजाइश है। राग रागिनियो का सवप्रथम परिचय 'कार्या पद' म प्राप्त होता है। किंतु इहें विकसित तथा विस्तत विवेचन का श्रेय महाराज नाय देव (1097-1133) को जाता है जिनकी प्रमुख रचना है.--'सरस्वती हृदयोर्हार' । इसके पश्चात् मिथिला के सगीत विधा पर गीत गोविद ने प्ररयात कवि जयदेव का प्रभाव पाया जाता है जिसका उल्लेख राम कृष्ण कवि के एक लेख 'जनल आफ आन्ध्र हिस्टारिकल सोसायटी वाल्यूम I मै 20 विद्यापति एवं अध्ययन मिलता है । महाराज हरिसिंह देव के शासन काल (1296 से 1324) म मिथिला में संगीत और नृत्य कला का व्यापक विकास हुआ। इस विकास का ही परिणाम है कि तीन प्रकार के नृत्य-नत्य, पात्रनृत्य, प्रेरण नत्य की चर्चा के साथ ढोलवादक के दस गुणो, मुरजि वादक के बारह गुणों, दस रसों तथा वीस व्यभिचारी मावी की भी चर्चा की गई है। उस समय पात्रा नाम की एक नृत्यागना थी जिसका वत्तिस प्रकार की कायिक चेप्टाओ और बत्तिस प्रकार की मुद्राओ पर अधिकार था। प्रेरणानामक नर्तक भी था जिसका नृत्य की विभिन मुद्रामओ पर अधिकार था। शुभाकर नाम के व्यक्ति न नृत्य और संगीत कला पर दो पुस्तकें-'नत्य दामोदर' और 'सगीत दामोदर' लिखी थी जो राजगुरु हेमराज शर्मा के पुस्तकालय मेपाल मे आज भी उपलब्ध हैं । सगीताचाय बुद्धन का भी नाम इस क्षेत्र में मादर के साथ लिया जाता है। सगीत कला की दृष्टि से इस युग को स्वण युग की सना दी जा सकती है जिसका प्रभाव समस्त पूर्वी भारत पर व्याप्त था और आसाम, वगाल और नपाल तो आज भी मिथिला के ऋणी हैं और रहेंगे। मत्रही शताब्दि के अन्तिम भाग में मिथिला में संगीत शास्त्र के आधिकारिक व्यास्याता लोचन शर्मा (1681 ई०) मा अभ्युदय हुआ जिहोंने अपनी पुस्तक 'राजतरगिणी' में नाना प्रकार की राग रागिनियों की ऐतिहासिक और प्राविधिक व्याख्या की है। इसके पश्चात् उमापति थोर गोबिद दास ने गीत परम्परा का सुदर निर्वाह किया। उन्नीसवी शताब्दि में हर्षनाथ भा, मानु झा, चन्द्र झा ने सगीत के प्राचीन परम्परा की रक्षा की राजदरवारों तथा बबुआनो ने भी इस दिशा में महत्वपूर्ण पाप दिया है। महाराज छत्रसिंह, तत्रधारी सिंह, ललितेश्वर सिंह तथा पनौती में राजा कालिका सिंह, मनराही के शशि मा विष्णुपुरा में रामानुग्रह मा तया नदौरा के मुती महाराज सगीत क्ला के महान साधक हुए हैं। मिथिला की सगीत प्रधान भूमि के कुछ गांवो का भी इस क्षेत्र में विशेष महत्व है यथा-पचगछिया, पनिकोवा तेमाका, खडगा, योगियारा, विष्णपुरा तपा नदोरा आदि। मिथिलामी स्त्रियां भी सगीत कला मे दक्ष रही हैं। इनका सम्पूर्ण विद्यापति को जमभूमि मिथिला 21 । जीवन और समाज विविध अभिषेक ही सगीतमय है ।महादेवी लखिमादेवी और विद्यापति की पुत्र वधू चन्द्रकला तो इतिहास प्रसिद्ध हैं । यहां की सामाय स्त्रियों का भी सगीत प्रेम और उनका सगीतमय जीवन यहाँ की साहतिक धरोहर है। मध्यकालीन राजनैतिक प्रहार से संगीत कला की रक्षा यहां के ली समाज ने लोक गीतो के माध्यम से की। आज भी मिथिला मे कुछ ऐसे स्थान है जहाँ की स्त्रियां लोक कला की दृष्टि से मिथिला को गौरव मानी जाती हैं-वे स्थान हैं-खडकवसता, पाशिपुरा पिसरववादा, तरोनी, पोखरोनी केकरोढ, सौरथ, सुगौना तथा कुकुनी आदि । मिथिला की साहित्यिक सास्कृतिक और ज्ञान गरिमा से अभिमडित गौरव गाथा को झतक उपरोक्त वणन मे पाई जा सकती है। इस सम्पन मानव हृदय और उर्वर मस्तिष्क की धरोहर है मिथिला की पवित्र जल- प्रधान भूमि जिसके मानस पुत्र हैं महाकवि विद्यापति-मैथिल कोकिल जिनकी काफ्ली की अनुगूंज मिथिला की अमराइयो मे ही नहीं वहाँ के निवासियो के हृदय म भी वर्तमान है और जिसका शाश्वत स्वर कोई भी सहृदय कमनाशा नदी से लेकर हिमालय की गोद म स्थित नेपाल भी तराइयो तक सुन सकता है।

विद्यापति-जीवन प्रसग कलाकार अपनी कृतिया मे जीवित रहता है, आयु के मौमित ब धनी मे नही। भारतीय साहित्य मन्दिर के साधक मनीषी इस तथ्य को भली- भांति जानते थे इसीलिये उनकी रचनाओ मे नियोजित आत्मपरक अभि- व्यक्ति नहीं के बराबर मिलती है । अस्तु इन मनीषियो के जीवन सम्बधी सत्यो के आकलन हेतु शोधी प्रवतियो को अत तथा वाह्य साक्ष्यो का ही विशृखल सहारा मिलता है। वे तक, प्रचलित एव परम्परित मान्यताओ तथा अनुमान और कल्पना की सकीर्ण पगडण्डी पर सयत एव सावधान होकर चलते हैं और गभीर मयन चितन एव विचारविमश के पश्चात पिसी माय निष्कर्ष पर पहुचने का प्रयास करते हैं। कवि विद्यापति की जीवन गाथा भी इही माघनात्मक प्रयासो की अपेक्षा रखती है । कितु मिथिला मे प्रचलित 'पजी प्रथा' एव कवि के प्रभावशाली राजदरबारी सम्बधों के कारण विद्यापति के जीवन प्रसगो की प्रामाणिक उपलब्धि अपेक्षाकृत सरल है। नम स्थान-कवि कुलभूषण महाकवि विद्यापति का जन्म मिथिला राज्यातगत जरल परगना के विसपी ग्राम मे हुआ था। इसे गढ़विसपी भी कहते हैं। पहित रमानाथ झा राज लाइौरियन दरभगा का कथन है वि विद्यापति में पूर्वज साम त मध्य युग के प्रभावशाली जमीदार। ये हापुर उपाधिपारो महया और महाराजधिराज भी कहलाते थे इसलिये विमपो वो गढ़विसपी की सजा मिल गई हो। यह ग्राम दरमगा(दारवग) उत्तर-पूर्व रेलवर फमतोल स्टेशन निकट है। इस समय तो विद्यापति - * विद्यापति जीवन असगा 23 की स्मृति में हाजीपुर से बरौनी शाखा लाइन पर विद्यापति नगर स्टेशन का भी निर्माण हुआ है। आज भी कोई जिज्ञासु यदि कवि को जमभूमि का दशन करना चाहे तो उसे विद्यापति डीह, विद्यापति कुल देवता, आंगन से पूर्व दिशा मे बहने वाली कमला नदी तक का सुरग, विद्यापति की चौपाद्रि (चतुष्पाटी) आदि का भग्नावशेप देखने को मिल सकता है। महान्दवि एव प्रिय सखा विद्यापति के गुणोंपर रीझकर महाराज मिथिलेश शिवसिंह ने इस ग्राम को अपने राज्याभिषेक के पश्चात् उहे उपहार स्वरूप भेंट किया था। इस ग्राम को मेंट रूप मे स्वीकार करने के कारण ही महा महोपाध्याय केशवमिश्र ने विद्यापति को अति लुब्ध नागर याचक कह कर व्यग्य किया था और विद्वत मडली म उह कोसा था। महाराज शिवसिंह द्वारा आदेश ताम्रपत्र का अभिलेख इस प्रकार था-'राजरथपुर के समस्त राजकीय पदार्थों से विराजमान श्री रामेश्वरी भगवती के वर से लब्ध प्रसाद, गौरीशकर के परम भक्त रूपनारायण पदभूपित श्रीमान शिवसिंह देवजू समरविजयी जरइल तप्पातगत विसपी ग्राम निवासी सब लोगो और कृषकों को आज्ञा प्रदान करते हैं। आप लोगों को ज्ञात हो---यह ग्राम मैंने सत्कमशील अभिनव जयदेव राजपडित श्री विद्यापति ठाकुर को शासन सहित प्रदान किया। इसलिये तुमलोग इनकी आज्ञा के वशवर्ती हो कृषि मादि सभी कम करोगे। (इनि लक्ष्मणसेन सम्बत 293 श्रावण सुदि सात-गुरी) इसके अतिरिक्त इस दान पत्र मे आठ श्लोक भी हैं जिनमे प्रथम श्लोक मे दान का उल्लेख, द्वितीय से लेकर सातवें तक महाराज शिवसिंह को प्रशस्ति और आठवें श्लोक मे एक निषेधात्मक आदेश है।"2-हिन्दू अथवा मुसलमान जो कोई राजा इस विसपी गांव से कुछ ग्रहण करेंगे वे गाय, सुअर व अपने पारीर के मांस सहित सवथा अपने घम को खोयेंगे और जो अपने प्रताप स इस राजकीय कर रहित 1 अनुवाद--'जर्नल ऑफ रायल एशियाटिक सोमाइटी ऑफ वगाल से 2 ग्रामे गर्दा त मुपिन किमपि नपतयो हिदवो य तुरुस्का गो कोल स्वारममांस सहित मनुदिन मुजते स्वधमम् । (यही-ज. सो. रा. ए.

24 विद्यापनि एक अध्ययन मानते हैं। . गांव का पालन करेंगे उनपे सुयश का गान धारों ओर बहुत दिनों तक बदीजन गाते रहेंग। मिथिला म अनेक उत्यान पतन हुए कि तु विद्यापति के पशज इस्ट इडिया कम्पनी के भूमि व दोवस्त को क्रिया तब इसका भोग करते रहे इम दान पत्र को नियसन और सेटलमेन्ट के आफिसरों न जाली माना वितु महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री एव यय विद्वान इसे प्रामाणिक कुल परिचय-मैथिल ब्राह्मणो के सुप्रसिद्ध परिचयात्मक अथ पजी प्रबच म विद्यापति के वश का प्राप्त परिचय इस प्रकार है-विसपी वीजो पुरुष विष्णु शर्मा विष्णु समा सुतो हरादित्य, हरादित्य सुत कमादित्य, कर्मादित्य सुतो सर्घािवहिक देवादित्य, राजबल्लभ, भवादित्यो, देवादित्य सुता भाण्डागारिक वीरेश्वर, वातिक नैधिक धीरेश्वर महा मत्तक गणेश्वर भाण्डागारिक जटश्वर, स्थानातरिम हरदत, मुद्राहस्तक लक्ष्मीदत्त राजवल्लभ-शुभादत्त भिनमात्रिका ।" प्राप्त अभिलेखो से ज्ञात होता है कि कर्मादित्य सन् 1331 ई० मे विद्यमान थे। इनके दा पुत्र देवादित्य और भावादित्य । देवादित्य राजा हरिरिह के प्रधानमनी थे। ये बडे यशस्वी और दानशील थे। इनको तीन पत्नियों और सात पुष थे- भाण्डागारिक वीरश्वर, महावातिक नैर्वा धन धीरेश्वर, महामत्तक गणेश्वर भाण्डागारिक जटेश्वर, स्थानातरिक हरिदत्त मुद्राहस्तक लक्ष्मीश्वर तथा राजावल्लभ हरिदत्त। कवि विद्यापति ने अपनी रचना पुष्प परीक्षा मे 'सबुद्धि कया शीर्षक निबध मे इह 'सास्य सिद्धान्त परगामी' और दण्डनीति कुशल कहा है। देवगिरि के राजा ने इनकी परीक्षा लेने के लिये महाराज हरिसिंह देवज़ से एक पडित और एक भूष को याचना की थी। जव महाराज विचलित से नजर आये तो मत्री गणेश्वर ने उहें यह उत्तर देकर विदा क्यिा-'पडित न तो मेरे राज्य मे हैं न आपके, बुद्धि का फल तो आत्मभान है वह जिमे प्राप्त होता है वह जगलों में जा बसता है, रही भूख की बात तो उनकी कमी कही भी नहीं है-- थे 1शी प्रसाद जयसवाल-राजनीति रत्नाकर भूमिका, प० 19 विद्यापति-जीवन प्रसग 25 भूख को पहचान इस दोह से हो जायेगी-- सदर कर सुदर चरन, दइव सुसपति पाव, जनिकर निदा लोक मे सो पुनि मूर्ख कहाव । पावोल मानुप जनम का, पुण्य न मचित मेल, शुद्ध सुयश जनिकर न पुन, मूख कोटि मे गल ।। वोरेश्वर के पुर चण्डेश्वर पिता की मत्यु के उपरात हरिसिंह देव के प्रधानमत्री हुए और इहें 'सधिविग्रहक' और 'महया' की उपाधि मिली। व्यवहार रत्नाकर, कृत्य रत्नाकर, दान रत्नाकर, शुद्धि रत्नाकर, पूजा रत्नाकर, विवाद रत्नाकर, गहस्थ रत्नाकर, राजनीति रत्नाकर तथा शैव मानसोल्लास इन प्रसिद्ध ग्रथ हैं। ये जसे विद्वान ये वैम ही वीर भी। इन्ही के प्रयत्नो से हरिसिंह देव ने नेपाल घाटी पर आधिपत्य किया। ये पशुपतिनाथ को स्पश करने वाले प्रथम ब्राह्मण थे। देवादित्म के द्वितीय पुत्र धोरेश्वर के दो पुत्र हुए कोति ठाकुर और जयदत्त ठाकुर। जयदत्त के दो पुत्र हुए गोरीपति और गणपति। यही गणपति ठाकुर ओइनवारवशीय राजा गणेश्वर के मत्री थे जिनके एक मात्र पुन कविकुल चूडामणि विद्यापति ठाकुर हुए। गणपति ठाकुर का विवाह मातृवश की पजी के अनुसार बुधवारये मूलक श्रीधर नामक ब्राह्मण क या गांगो देवी से हुमा था जिनकी कोख से विद्यापति जैसे पवि रत्न का जम हुया जिसको पुष्टि विद्यापति के इस प्रचलित कथन से हो ती है- जन्मदाता मोर गणपति ठाकुर मिथिला देश करु वास, पच गोडाधिय शिवसिंह भूपति, कृपा करि लेल निज पास।

26 विद्यापति एक अध्ययन
विद्यापति रामवृक्ष
विष्णु ठाकुर (बीजीपुरुष)
हरादित्य ठाकुर
।
।
पर्मादित्य ठाकुर
J
देवादित्य ठाकुर (तिवादित्य) भवादित्य ठाकुर (वालादिस्म)
वीरेश्वर धोरेश्वर गणेश्वर अटेश्वर हरदत्त लक्ष्मीश्वर शुभदत्त
रामदत्त गोविद दात
हो.
जयदत्त
गोरीपति-
-गणपति विद्यापति
विद्यापति के पश्चात भी बारह पीढियो का उल्लेख मिलता है।
ग्रियसन ने अपने प्रसिस प्रथ क्रिस्टोमथी' मे विद्यापति के पूर्वजो के सात
पीढिया के नाम दिय हैं जो ऊपर की तालिका से स्पष्ट हैं। विद्यापति के
पश्चात की बारह पीदियो का नाम जो ग्रियसन ने दिया है यह मश
इस प्रकार है-~हरपति, रतिघर, रधु विश्वनाथ, पीताम्बर, नारायण,
दीनमणि, तुला, एकनाथ मैया, फणिलाल तथा बदरीनाथ ।
कवि विद्यापति के कुलपरिचम के तथ्यो से स्पष्ट है कि इनके कुल
की एक मुदीध परम्परा थी। विद्यापति क पूर्वज पाण्डित्य और राजशक्ति
के जाने माने इतिहाम पुरुष थे। लक्ष्मी-मरस्वती और राजकीय सम्मान
का ऐमा सुयोग दिरने पुण्यात्माओ को प्राप्त होता है। ऐसी सम्पन
परम्परा में जम मोर पसे विद्यापति के लिये स्वाभाविक या कि वे अपनी
कुलपरम्परा की सांस्कृतिक धरोहर की अभिवृद्धि कर अपनी यश पताका
।

विद्यापति जीवन प्रसग 27 मिथिला के गभीर गगन में फहराते। जमतिथि निणय-आदिकालीन तयामध्यकालीन कवियों की जम- तिथियो की प्रमाणिकता एकत्र करना सरल नही है क्योकि यह काय अधेरे या धुंधलके मे सूई ढूढने की तरह है । इन कवियो की रचनाओ तथा जन- श्रुतियो से प्राप्त अन्तर तथा बर्सािक्ष्यों के आधार पर ही इस प्रकार के निष्कप निकाले जा सकते हैं। कविवर विद्यापति की जन्मतिपि भी इसका अपवाद नहीं है। विद्यापति की जन्मतिथि के सम्बन्ध मे पर्याप्त मतभेद है। विद्वानो द्वारा निर्दिष्ट कुछ महत्वपूर्ण तिथियों नीचे दी जा विद्वानों के नाम विद्यापति की जमतिथि श्री रामवृक्ष बेनीपुरी- [1350 ई० थी कमलनयन झा- 11350 ई० पडित रामचन्द्र शुक्ल- 1350 और 1352 ई० के मध्य डा. अरविन्द नारायण सिम्हा- 1350 ई० महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री-1357 ई० डॉ. बाबूराम सक्सेना 1357-1359 के मध्य डॉ. उमेश मिश्र- प० रमानाथ झा 1360 ई० श्री शिवन दन ठाकुर श्री बी.के. चटर्जी- 1372 ई० श्री सतीशच द्र राय- 1380 ई० बाबू व्रजन दन सहाय-- 1382 ई० उपरोक्त तिथियों में अतिम तीन ही ऐसी तिथिया-~-1372 ई०, 1380 ई० और 1382 ई० ऐसी हैं जिनमे काल को भिनता विशेष रूप से विचारणीय है। ये तीनो तिथियां उचित नही प्रतीत होती हैं। श्री सतीशच द्र राय तथा बाबू अजनादन सहाय ने अपनी मूल स्वीकार कर ली है । अयोध्या प्रसाद खत्री द्वारा लिखित मिथिला राज्य की वशावली जिसमें 46 वर्षों को मूल अब सबमा य है। इसी वशावली के आधार पर इनकी जमतिथि 1372,80 और 82 मानी गई थी अत मूल का यह उपयुक्त वारण है। अन्य सभी तिथियां 1350 और 1360 के बीर कवि की महत्ता मे कोई अतर नही डाल सकता, क्योकि कोई महाहा 1350 मे पैदा हुया या 1360 मे इससे उसकी काव्य प्रतिभा पाकापर कवि को दिये गये विसपी ग्राम के तानपत्र से विद्यापति की जमविवि पर पर्याप्त प्रकाश पडता है। विद्यापति ने अपनी रचनाओ मे जितनी भी इस पद का यदि प्राचीन परिपाटी से अथ दिया जाय तो देवसिंह की शिवसिंह का सिंहासनारोहण इसके अनुसार 1402 ई० मे हुआ और मृत्यु293 लक्ष्मणाब्द या 1324 काब्द अर्थात 1402 ई० मे हई। महीने के अदर ववि को विसपी ग्राम दान मे प्राप्त हुआ। राज्यारोहण के समय शिवसिंह की अवस्था 50 वप वीथी। विद्यापति इनसे दो वष बह पे अत उस समय उनवी अवस्था 52 वर्ष की हुई। इस प्रकार उनकी जमतिथि 293 सक्षमणाद-52-2241 लक्ष्मणान्द---1324शकार --52-1272शकान्द या 1402 ई०-52-1356 ई.सिह तिथियां दी हैं वे सभी लक्ष्मण सवत की हैं कि तु उनके देवसिंह की मस्तु 28 विद्यापति एम अध्ययन हैं। यह 10 वर्ष का अतर शोध को हाट से महत्वपूण हो सकता है कि क्या प्रभाव पड़ सकता है । मितु प्रमाणो के आधार पर निश्चिागि के निर्णय का प्रयास किया जा सफ्ता है। इस निणय के लिये हमे किंवदतियो और प्रचलित आधार सेना पडेगा । देवसिंह की मत्यु, शिवसिंह का सिंहासनारोहण स्फुट पदों को सम्बधी पद मे लक्ष्मणाब्द और शकान्द दोनो का उल्लेख है- अनल रघ्र कर लक्खन नरवए एक समुद्द कर अगिनि ससी। चत करि छठी जठा मिली को बार वेहप्पय जाहु लसी। देवसिंह जू पुहुभि छइडडआ अद्धासन सुर राज सरू॥ होती है, जो अधिकांश विद्वानों के मत के अनुकूल है पास। अथवा उसके पास ma 10 डॉ० - विद्यापति-जीवन प्रग year अब प्रश्न यह उठता है कि 13500 के आस-पास नो तिपिया उनका कारण क्या है और उनमे विम प्रकार के भ्रम की समावनी बाबूराम सक्सेना द्वारा दी हुई तिथि 1357 से 1980 के मध्य है। 'इस तिथि का आधार है कीतिलता की भाषा का भाषा वैज्ञानिक कारण जिसमे 57 वर्षों का अतर कोई माने नहीं रखता । जहाँ तक 1360 ई० 'की बात है. इसमे दप्त वर्ष की भूल लक्ष्मण सवत तथा ईस्वी सन के बीच सवमा य अतर के अभाव के कारण है । लक्ष्मण सवत तथा ईस्वी सन थे बीच 1108 से 1119 वर्षों का व्यवधान विभिन्न ऐतिहामिक माघारो पर वीम्स, कोल हान तथा जायसवाल प्रमृति विद्वानो माना है। । विद्यापति की उक्ति भी इस भेद के पक्ष में जाती है। अन इस भेद को 11 स्वीकार कर लेने पर विद्यापति कीज मतिथि 1350 ई० ही तर्क मगत प्रतीत होती है। मिहासन पर आरूढ होने के छ महीने के भीतर ही महाराज शिव सिंह ने अपने मित्र एव राजकवि विद्यापति को विसपी ग्राम दान से दिया। दान पत्र के अन्तिम भाग मे लिखा हुआ है-"इति लक्ष्मण सवत 293 श्रावण शुक्ल सप्रत्या गुरौ।" श्रावण गुक्ल सप्तमी वहस्पतिवार बागमती तट पर स्थित गजरथ पुर प्रसिद्ध गांव दानेच्छा के उत्साह से जिनके दीघ बाहु पुलकायमान हो रहे हैं, जो अत्यत थुद्धिमान विद्यारसिफ हैं, उन वीर- घोर शिरोमणि महाराज शिवसिंह देवजू ने सभा बीच विवर विद्यापति । ठाकुर को अत्य त उपजाऊ अधिकतर योग्य पदाथ देने वाली नदी गभित । जगलों झोलो सहित सीमाबन्दी कराके विसपी नामक ग्राम और उसके शासनाधिकार दिये। -- - -- . 1 डॉ० अ० ना० सिहा-विद्यापति युग और साहित्य, पृ० 284 2 अब्दे लक्ष्मणसेन भूपति मते वहि ग्रहद् व्यक्तिते, मासि श्रावण सस के मुनितिथो पक्षे वलेक्षे गुरौ। वाग्वत्या सरित स्तरे गजरथे व्याख्या प्रसिद्ध पुरे, दिव्योत्साह विबद्ध बाहु पुलक सम्याय मध्ये सभम् ।। (दान पत्र का प्रथम श्लोक) 30 विद्यापति एक अध्ययन श्रावण शुक्ला सप्तमी वहस्पतिवार को इस ग्राम का दान कवि की ज मतिथि की ओर सवेन करता है। मिथिला मे जमदिन तथा अय उत्सवो पर तुलादान करने की प्रथा प्रचलित थी। इस तिथि और वार कोज म लेना अपने आप मे महाकवि होने का सकेत है। गोस्वामी तुलसी दास का ज म भी इसी तिथि को हुआ था। यह तिथि निश्चित ही शिव सिंह की राज्याभिषेक की तिथि नही है अत इस तिथि पर दान देकर महाराज शिवसिंह ने अपने मित्र खेलन कवि के जम दिवस का उत्सव मनाया होगा। ऊपर अकित तर्को एक तथ्यो के आधार पर निकष यही निकलता है कि विद्यापति का जम श्रावण शुक्ला सप्तमी गुरुवार सन् 1350 ई० मे हुआ होगा अत इसी तिथि को उनके जन्म की प्रामाणिक तिथि मानी जानी चाहिए। फिर भी पण्डितो तथा शोधकर्ताओ के लिये बाल की खाल निकालने की प्रवृत्ति यहां आकर समाप्त नहीं हो जाती। पारिवारिक एव दरयारी जीवन--सुदीघ वश परम्परा से लक्ष्मी और सरस्वती का अपार वैभव जैसा विद्यापति को प्राप्त था वैसा स्यात किसी अन्य कवि को नही। कवि का लालन-पालन, शिक्षा दीक्षा आदि स्वभावत ही वैभव और समद्धि की गोद मे हुआ । इनके विद्या गुरु मिथिला के प्रसिद्ध नैय्यायिक हरि मिश्र थे। इनके भतीजे पक्षधर मिश्र इनके सहपाठी थे जो बाद मे चलकर नव्ययाय के प्रवत्तक हुए। अध्ययन शील होने के कारण ये बिल्कुल कृशकाय हो गये थे। दोनो मित्रों की मेंट भी विद्यापति की अतिथिशाला म हुई थी। इस समय का दोनो मित्रों का विनोदी वार्तालाप उल्लेखनीय है-विद्यापति भोजनोपरात अपने नियमा नुसार जब अतिथियो से मिलने गये तो उस कृशकाय व्यक्ति का देसकर सहसा उनके मुख से निकल पडा --'प्राणे घुशावत फोणे सूक्ष्मत्व नोपलक्षित'--घर के कोने मे सूक्ष्मवत् कोट सदृश अतिपि सूक्ष्मतावशात नही दीख पडे । बठे हुए उस पुरुप ने तत्काल उत्तर दिया "नहि स्थूलधिय पुस सूदमे दृष्टि प्रजायते ," स्थूल बुद्धि को सूक्ष्म पदार्य नहीं दीख पड़ता। आवाज सुनकर उहोंने अपने साथी को पहचान लिया और आदर पूर्वक घर ले गये। बचपन में ही विद्यापति अपने पिता के साथ राजा गणेश्वर के दरबार विद्यापति घीवन AND 2thit मै जाया करते थे। यही उनका परिचय बेलन कवि के रूप में शिवानहर हुआ जो अवस्था में उनसे दो वप छोटे थे। यह बचपन का परिचय कालानर मे प्रगाढ प्रेम और मित्रता में विकसित होकर अमर बन गया। गणेश्वर के पश्चात जब कीति सिंह राजा हुए तो विद्यापति का प्रवेश खेलन कवि के रूप मे दरबार मे हुआ । इसी समय होने 'कीतिलता' की रचना की जिमको भाषा सस्कृत प्रकृति मिश्र मैथिली है जिसे कवि ने अवहट्ट (अपभ्रश) का नाम देकर अपनी लोक रुचि की घोषणा की थी-'देसिल बयना सब जन मिठठा, ते तैसन जम्पओ अवहट्ठा ।' देशी भाषा सबको प्रिय लगती है, यही जानकर मैंने यह रचना अवहट्ट भाषा मे की ही। इस अथ के अतिम श्लोक मे कवि ने खेलन कवि उपनाम का भी प्रयोग किया विद्यापति का पारिवारिक जीवन अत्यत सुखमय एव सतोपजनक था।इहोंने दो विवाह किया था। इनकी प्रथम पत्नी हरिवण शुक्ल की कन्या थी जिससे दो पुत्र हरपति मोर नरपति तथा दो क यायें थी। इनकी दूसरी पत्नी रघु ठाकुर की पुत्री थी जिससे एक पुत्र वाचस्पति ठाकुर और पुत्री दुल्ल हि उत्पन हुए। दुल्लाह का विवाह गांगुली परिवार में राम नामक व्यक्ति से हुआ था। इनकी पुत्रवधू चन्द्रकला महान विदुषी थी और काव्य कला मे निपुण थी जो हरपति ठाकुर की पत्नी थी। लोचन रचित राजतरगिणी मे चद्रकला का एक पद कवि की टिप्पणी क साथ मिलता है--'इति श्री विद्यापति पुत्र वध्या'। इनके पुत्र हरपति ठाकुर देवज्ञ वाधव ज्योतिष ग्रथ के रचयिता और परम विद्वान थे। ये पदसिंह के सम्मानित सभासद तथा मुद्रा हस्तक थे। प्रोफेसर रमानाथ झा ने विद्यापति के जीवन काल को दो भागो मे विभक्त किया है। इनके जीवन के प्रथम भाग का पटाक्षेप शिवसिंह के पराजय और उनके अदृश्य होने के साथ होता है तथा द्वितीय भाग शिवसिंह के परिवार सहित राज बनौली में पुरादित्य के निवास से प्रारम्भ होकर । माधुर्य प्रसव स्थली गुरुयशोविस्तार शिक्षा सखी याद्विश्व मिदञ्च खेलन कवेविद्यापतेभारती।

32 विद्यापति एक अध्ययन कवि के मृत्यु काल तक चलता है। वामेश्वर ठाकुर की मृत्यु के उपरात ओइनदारों को तीन शालार्ये हो चुकी थी। विद्यापति के जन्म 1350 ई० के समय भीगीश्वर आइन- धार राज्य में एक खण्ड के अधिपति थे। भोगीश्वर के पुत्र गनगन' जब असलान द्वारा छल से मारे गये उस ममय विद्यापति विशोर रहे होगे। 'गनमेशन' के पुत्र कोतिसिंह अपने पिता के वध का प्रतिशोध लेने के लिये पश्चिम की ओर रवाना हुए। इस योजना में पीति और शिवसिंह के साथ विद्यापति भी थे जिसकी पुष्टि कीतिलता मे वणित जोनपुर को शोभा थे होती है। कीति सिंह ने जौनपुर की सहायता से 1402 ई० मे अपना राज्य प्राप्त कर पुन सिंहासनारूढ हुए। इसी समय कीतिसिंह की कोति को अमर करने के लिये विद्यापति ने 'कोनि पताका की रचना की होगी। शिवसिंह के सिंहासनारोहण के साथ विद्यापति की काव्य फला भी यौवनावस्था का प्राप्त हुई और वे शरद पूनो को ज्योत्सना को भांति अपने काव्य की चद्रिका शिवसिंह के शासन काल मे विकीण करने लगे । यही समय रहा होगा जबकि कवि ने उद्दाम योव एव सरस प्रेम के अधिकार घि गीत लिखे होगे। महाराज शिवसिंह की प्रेरणा एव लखिमा देवी के सौदय ने इनकी कविता में चार चांद लगाये हागे । शिवसिंह का शासन काल विद्यापति के चरमोत्केप एव वैभव का काल था। उनकी काव्य की परयित्री प्रतिभा प्रेम, यौवन और सौदर्य के मधुर गीतो से सम्पूर्ण मिथिला को आप्लावित कर रही थी। इस काल में काव्य कला, गीति-कला और नृत्य कला रम ममन राजा और रानी की छत्र छाया में विकास घरमोत्कप पर थी। निश्चित ही यह तिरहुत का स्वणयुग था जिसके मुख्य उद्गाथा ये महाकवि विद्यापति। काल चक्र का प्रवाह एक सा नहीं रहता। महाराज शिवसिंह ने गौणेश्वर को पराजित किया। कवि ने उनकी यशोगाथा कतिपताका और पुरुष परीक्षा में लिखी । शिवसिंह पर पुन पश्चिम स आक्रमण हुआ । इस भयानर आक्रमण का परिणाम समवत शिवसिंह जानते में अत उहोने अपने परिवार को अपने मित्र कवि विद्यापति के साथ राज बनौली भेज दिया । आशका सच निस्सी । शिवसिंह युद्ध से वापस नहीं

विद्यापति-जीवन प्रसग 33
आ सके । आक्रामक सेना ने गजरथपुर को बुरी तरह लूटा और महाराज
शिवसिंह के राज्य का स्वर्ण काल इतिहास की वस्तु बन गयी । इसी के
साथ विद्यापति के जीवन के प्रथम खण्ड का अवसान हो गया।
कवि के जीवन के द्वितीय खण्ड वा प्रारम्भ उनके राज बनौली के
जीवन से होता है जहाँ थे पुरादित्य के सरक्षण में महाराज शिवसिंह के
परिवार के साथ बारह वप तक रहे। स्वतत्र एव उ मुक्त विहार करने
वाले कवि के जीवन मे उदासी । बादल छा गये। लखिमादवी जो
काव्य की पोषिका और प्रेरणा थी उनके जीवन उपवन की दल
और मुमन सूख गये । बारह वष तक प्रतीक्षा करने के दाद हुन
मूर्ति के साथ लखिमा देवी सती हो गई। वल्पना की जा र
दारुण स्थिति में कवि की मनोदशा की। यह पद स्मोडा
द्योतक है-
सखि ह दिन जनु काहु अवगाहै ।
सुरतक सुखे जनम जमाओल, पर।
दखिन पवन सउरभ उपभोगल पिटन 4
कोकिल कलरव उपवन पूरल, तन्दिष्ट करा
पातहि समओ फूल भमर अगोरल दाट
से फुल काट कोट उपभोपन arrh
भनई विद्यापति कलिजुग पnिni
अपन करम अपने पर grezirst
इस प्रकार कवि अपने विनम्र refer
अय रानियो को परितोष करा-mtar
बारह वष का प्रवास कवि है -
था क्योकि इस प्रवाम में न
सका न अपने मित्र frafir का मन
कवि ने 'लिखनादों या
इस वारह trickr*
शेष दिन भवनमपटराई
दरबार म सम्मान

34 विद्यापति एक अध्ययन थ। नगमा मूत्र पदमिह पौर विश्वास देवी के हाथ में था। नरसिंह तपा भरवनिह य राज्य कारा तब यह वयोवृद्ध कवि भजन पूजन में अपना दिन व्यतीत करता हुआ भक्तिमय गीता के साय यदा कदा रस के घाट भी छिडकना रहा । अत म अपना महा प्रयाण जानकर महावि पालकी पर वर घर से विदा हुआ और मा गगा की पवित्र और शीतल गाद मे सदा लिये मो गया। विद्यापति जिन जिन राजाओ, राजपुरुषो एव जय व्यक्तियो के आश्रय और सम्पर्क मे रहे उन सबने नामो का उल्लेख करके अपनी रचना के साथ उन्हें भी अमर बना दिया। शिवसिंह और लखिमा देवी के लिये तो पदावली यी रचना ही हुई, माथ ही कवि ने अय रानियो की भी उपक्षा नहीं की। पदावली उनकी कृतनता ज्ञापन की साक्षी है । कुछ उदाहरण लिये जा सकते हैं-देवसिंह हासिनिदेवी शिवसिंह, लखिमा देई, मधुमति देई मौरभ देवि मोदवती मेघादेवि, रूपनारायण, सुखदई, महेसर, रेणुका देवी आदि तया बगाल का शासक नसरताशाह, अर्जुनसिंह देवसिंह के अनुज विशेष सभामद दामोदर, दशशतावधान, ममकालीन कवि जयराम, ग्यासु दीन सुलतान, सुप्रगिद्ध सामन थीधर वा पुत्र रतिधर, जौनपुर दरबार का मुसलमान कवि बहारदी एव पदमसिंह विश्वासदेवी, कस नारायमन, राघवसिंह, रूद्रसिंह, कुमारसिंह तथा मत्री महेशर आदि । मत्यु तिथि-जमनिथि की भांति विद्यापति की मत्यु तिथि भी विद्वानो के बीच विवाद का विषय है । १० शिवन दन ठाकुर इनको मृत्यु तिथि कार्तिक शुक्ल त्रयोदगी ल० स० 329 मानते हैं। 293 ल० स० के चत्रमास की कृष्ण छठी ज्येष्ठ । नक्षत्र वहम्पतिवार को सध्या वाल मे देव सिंह परलोक्यासी हुए और शिवमिह का राज्याभिषेक हुआ। तीन वर्ष आठ महीने तक शिवसिंह ने शामन किया। तत्पश्चात वे युद्ध गये। शिवसिंह की मत्यु के 32 वर्ष बाद विद्यापति ने अपने परम मित्र गिवसिंह को स्वप्न मे देखा- गपन देखन हम शिवसिंह भूप, दतिम वरस पर सामर (भामर) रूप। ब्रह्मवान पुरान के अनुसार इस प्रकार के स्वप्न का फल आठ महीने मे मारे विद्यापति जीवन प्रसग 35 के पश्चात प्राप्त होता है । अत शिवसिंह के मत्यु के 32 वर्ष आठ महीने पश्चात् विद्यापति की मृत्यु हुई होगी। गणना के अनुसार उक्त तिथि ल०स० 329 कार्तिक शुक्ल त्रयोदसी हुई। विद्यापति ने स्वय कहा भी है-'कातिक धवल प्रयोदशि जान, विद्यापतिक आयु अवसान।' इस प्रकार विद्यापति की मृत्यु तिथि 1448 ई० के अक्टूबर मास मे शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी हुई। इसी पुण्य तिथि को परम्परा के अनुसार दरभगा जिले मे मउवाजित पुर के निकट जहाँ कवि को गगा लाभ हुआ, मिथिला मे हर वर्ष मेला लगता है। उस स्थान पर ऐतिहासिक शिवालय और पृथ्वी से स्वत प्रकट हुआ शिवलिंग आज भी विद्यमान है । इमी स्थान के निकट विद्यापति नगर स्टेशन भी बना हुआ है। कवि को अपनी मत्यु का पूर्वाभास हो गया था अत अपनी जीवन नाटिका को अवनिका का अतिम पतन जानकर उन्होंने अपनी पुत्रवधू या वया को दुल्लाहि शब्द से सम्बोधित करत हुए उनकी मां का स्नान कर निकट आने के लिये कहा-'दुल्लहि तोहर कतए छथि भाय नहुन ओ मावथ ए खन नहाय। थोडी देर बाद अपने परिजनो को अन्तिम उपदेश देकर-"प्रजाहित करना, अतिथि सत्कार मे मत चूकना और पर स्त्री को माता समझना', गगा के तीर प्रस्थान करने के पूर्व कुलदेवी विश्वेश्वरी से अनुमति मांगी। पालकी पर सवार होकर कवि चमरौधा घाट के लिये प्रस्थिन हुआ। जब गगा जी दो कोस की दूरी पर रह गई तो हठी भक्त की भांति उसने कहा-'मैं इतनी दूर से मैया के निकट माया क्या मइया मेरे लिये यहां तक नहीं आ सकती', पालकी वही रसवा दी। रात बीती प्रात होते ही गगा की धारा उस स्थान पर पहुंच गई जहां कवि विश्राम कर रहा था। सचमुच गगा मइया ने कवि की प्राथना को स्वीकार कर मृत्यु के समय परम भक्त विद्यापति को अपनी शीतल गोद मे चिर विश्राम हेतु सस्नेह से लिया। लगभग एक शताब्दि त जीवन के बसत और पतझड का सुख-दुख भोगने के पश्चात यशस्वी ववि की जीवनलीला समाप्त हो गई कितु उसको सरस वाणी जन मानस के कानो मे आज दी गंज रही है और अनत झाल तक गूंजती रहेगी और उसकी यशवद्रिका तथा काव्य कौमुदी सृष्टि 36 विद्यापति एक अध्यपन के अन्त तक अपनी ज्योत्सना से काव्य-जगत को अनुप्राणित करती रहेगी। किंवदतियाँ-महापुरुषो के साथ किंवदन्तियो का जुह जाना भारत को लोक भावना और श्रद्धा की मौलिक विशेषता है । महाकवि एव जन- नायक विद्यापति के सम्बन्ध में भी अनेक किंवदतिया प्रचलित हैं जिनमे कुछ प्रमुख का उल्लेख किया जा सकता है-- उगना-कहा जाता है कि उगना या उदना नाम का विद्यापति के पास एक भत्य था। विद्यापति की भक्ति भावना से प्रसन्न होकर स्वय भगवान शिव ही उगना के रूप मे कवि के साथ रहते थे। यह रहस्य तब खुला जब एक यात्रा मे उगना ने प्यास लगने पर विद्यापति को गगाजल लाकर दिया जब कि गगा जो उस स्थान से बहुत दूर थी। उगना के रूप मे शिव ने उनसे कहा कि यदि वह इस रहस्य को प्रकट कर देंगे तो उगना उहें छोड देगा। एक बार विद्यापति की पत्नी ने ऋद्ध होकर जलते हुए चले से उगना पर प्रहार किया। विद्यापति के मुख से अचानक निकल पड़ा 'साक्षात गिव पर प्रहार' और उगना उसी समय से गायब हो गया। विद्यापति को घोर पश्चाताप हुआ। गगा सम्बधी घटना-मृत्यु केलि पालकी पर सवार होकर विद्या- पति गगा तट के लिय चले और जब वे एक स्थान पर विश्राम कर रहे 1~-गगा की धारा स्वर वहाँ आ गई-~-इसकी चर्चा ऊपर की जा चुकी रेलवे लाइन को क्या-बी० एन० इन्स्यू रेलवे लाइन सीधे विद्या- पति की चिता पर से बन रही थी। माग माफ करने के लिये जब वक्षो की माय वाटी जानी लगी तो उनसे रक्त निक्लो लगा और रात मे मिमरने की आवाज भी सुनाई देने लगी । काय पराने वाले इन्जीनियर बीमार हा गये। अनेक बार प्रयास करने के बाद अततोगत्वा लाइन का मागवदना पड़ा। दिल्ली-गुलतान को कपा-गियसिंह को जब बदी बनावर दिल्ली मे जाया गया था तो विद्यापति उसे छुड़ाने के लिये दिल्ली पहुंचे। उहोने अपना परिषर दिया और पाम्य धमत्कार की बात बताईकि धिना देसी हुई वस्तु का वणन वे सफलतापूर र सकते हैं। मुलतान ने परीक्षा f स्वरूप सद्य स्नाता का वर्णन करने को कहा। विद्यापति की योगी से सरस्वती की धारा प्रवाहित होने लगी-'वामिनि नए सनान हेरतदि हृदय हने पर बाने।' विद्यापति को काठ के बक्स म बन्द कर कुएं में लटका दिया गया । उपर एक स्त्री झुक कर आग फूंक रही थी-विद्या पति की वाणी पुन फूट पडी-सुदरि निहुर फूक आगि तोहर कमल भमर मोर देखल मदन उठल आगि ।' विद्यापति परीक्षा में सफल हुए और शिवसिंह मुक्त कर दिये गये। ये किंवदत्तियां जनता को श्रद्धा की प्रतीक होती हैं । इस प्रगाढ बदा के आवरण में सत्य लिपटा होता है । श्री शिव प्रसाद सिंह के शब्दो म- 'यह अलकरण जितना ही अधिक घना होता है । ऐतिहासिक सामग्री का रूप उतना ही धूमिल होता है । इन निजपटी क्याओ के पेट से सत्यारा को निकालना कठिन होता है. असम्भव नहीं।' ।

विद्यापति की कृतियो का समीक्षात्मक परिचय कवि कृतिया पवि की आत्मजायें होती हैं। उनका निर्माण कधि के बहु- मूल्य प्राण रक्त से होता है, उनम उसकी अमरता निवास करती है। या पार्थिव शरीर समय आन पर नष्ट हो जाता है कि तु वह अपनी कृतियो मे अमर हाता है । इस सदभ मे अग्रेजी साहित्यकार लैम्ब का एक क्थन स्मरण तो आता है जो उसने पुस्तकालय के सम्बघ मे कहा था- 'पुस्तकालय एक विशाल शयन कक्ष है उसमे महान आत्मायें सोती हैं, जिनासु जब चाहे उह जगाकर उनसे बात कर सकता है।' विद्यापति एष बहुमुखी प्रतिभा सम्प न कवि थे । तुलमीदाम की भांति अपने समय की प्रचलित समस्त भापायो और नैलियो पर उनका पूण अधिकार पा । उनको व्यापक रचनाओं से यह बात स्वय ही सिद्ध हो जाती है। विद्यापति ने सस्कृत, अवहट्ट और मैथिली तीनो ही भाषाआ में थपनी सजनगील प्रतिमा का चमत्कार प्रस्तुत किया कि तु हि दी साहित्य मे उनका चतुर्दिक महाव मैथिली (अब हिदी की माय बोली) रचना पदावली ने पारण ही है । यहां उनकी रचनाओ का सक्षिप्त परिचय देना ही अभीष्ट है। सरत की रचनायें-सस्कृत भाषा में विद्यापति यी चौदह रचनायें उपलब्ध हैं। । भूपरिक्रमा-महाराज देवसिंह की माशा मे लिखित इस रचना मे मिपिला सनमिपारण्य तारे प्रधान तीपं स्यानो का वर्णन है। इसमें विद्यापति को कतियो का ममीक्षात्मक परिचय 39 शाप के दिनों में बलराम जो को मिथिला मे सुनाई गई कथा का भी वणन है। इस पुस्तक की हस्तलिखित प्रति एशियाटिक सोसाइटी आफ बगाल के पुस्तकालय मे सुरक्षित है। 2 पुरुष परीक्षा-शिव सिंह की आज्ञा से लिखी हुई यह एक नीति का नथ है । इस रचना का उद्देश्य नवोदित बालको को नीति का ज्ञान कराना एव काम कला मे निपुण स्त्रियो को आनदित करना है । पुस्तक की भूमिका मे चद्रतपा नगर वे पारावार नामक राजा को क्या पद्मावती के लिए सुबुद्धि ऋषि का योग्य वर ढूढने का सकत 1 इसी सदर्भ मे योग्य पुरुष के लक्षणो की भी चर्चा की गई है । जो पुरुष वीर हो, सुधी हा, विद्वान हो तथा पुरुषार्थी हा वही वास्तव में पुरुष है । पुरुषो के इन चार भेदो का चार परिच्छेदा मे अलग अलग वर्णन है। प्रथम परिच्छेद मे चार प्रकार के वीरो-दानवीर जैसे हरिश्च द्र तथा विक्रमादित्य, दयावीर-शिवि तथा हम्मीर देव, युद्धवीर-~अजुन तथा मल्लदेव, सत्यवीर-युधिष्ठिर आदि वी कथायें हैं। साथ ही इनकी विपरीत स्थिति वाले पुरुषों-~~चोर, भीरू, कृपण तथा आलसी आदि की भी कथायें हैं । द्वितीय परिच्छेद मे सुधी पुरुषों के उदाहरण तथा प्रत्युदाहरण में मप्रतिभ, मेधावी, सुबुद्धि वचक, पिशुन जमबबर तथा ससग बबर की कथायें हैं । तृतीय परिच्छेद मे विद्या निपुण पुरुषो के उदाहरण तथा शस्त्र एव शास्त्रविद्य वेदविद्य, लोकविद्य, उभयविद्य, उपविद्य, गोतविद्य, नृत्यविद्य, इ द्रजालविद्य, पूजितविद्य अवस नविद्य, अनिद्य तथा हास विध के वणन है । चतुर्थ परिच्छेद म पुरुषाथ वालो की कथायें है जिनमें तात्विक, तामस, अनुरुचि महेंद्र, मूढ़, बह्वाश, सावधान, रामानुकूल, दक्षिण नायक, विदग्ध, धूत, घस्कर, निविधि, निस्पृह तथा लब्ध सिद्ध के उदाहरण हैं। इस ग्रप की भापा अत्यत सरल और शेली रोचक है । इसकी उप योगिता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि इसका अनुवाद चदा झा द्वारा मैथिली में, हर प्रसाद राय द्वारा वगला मे और राजा काली कृष्ण बहादुर द्वारा अग्रेजी में तथा विद्यापति प्रेस लहेरिया सराय द्वारा हिदी मे किया गया है।

40 विद्यापति एक अध्ययन 3 लिखनावली-इस प्राय की रचना कवि ने अपन प्रवास काल में राज बनौली के महाराज पुरादित्य की आपा से की थी। इसम उच्च, अध समकक्ष तथा अय लोगो के लिए क्रमश 18, 28, 7 तथा 36 पत्र हैं जो समाज मे आवश्यक मभी प्रकार ये पत्न व्यवहार के ज्ञान के लिए परम उपयोगी हैं। मिथिला के पत्र व्यवहार में प्रारम्भ मे स्वस्ति लिखा जाता है और इसके पूर्व 'आजी' का शुभ चिह्न (F) श्रीगणेशाय नम की तरह प्रयोग किया जाता है और अत मे कि बहुनेति' अधिक क्या लिखू की प्रथा है। 4 शव सवस्व- इस ग्रन्थ को रचना पद्म सिंह की पत्नी विश्वास देवी की आज्ञा से हुई थी। इममे शिवोपासना पद्धति का विवेचन है । इस ग्रथ की हस्तलिखित प्रतिया रायल एशियाटिक सोसाइटी पुस्तकालय तथा दरमगा राज पुस्तकालय मे सुरक्षित हैं। 5 शव सवस्वसार प्रमाणभूत पुराण-सग्रह-इस ग्रथ मे शैव सवस्व सार के प्रमाण सग्रहीत हैं । इस ग्रथ की हस्तलिखित प्रतिलिपि भी दरमगा राज पुस्तकालय मे सुरक्षित है। 6 गगा वाफ्यावली- इस ग्रथ मे गगा पूजन विधि का विवेचन है। इस पुस्तक की रचना भी कवि ने विश्वास देवी की आज्ञा से की थी। 7 विभाग सार-इस ग्रथ की रचना महाराज नरसिंह देव के शासन काल में हुई थी। इसमे घन एव अस्थायी सम्पति सम्बधी विभाजन का विधान है। इसके अतिरिक्त इसम द्वादश पुन लक्षण विवेचन पुत्र विहीन धनाधिकार विवेचन तथा स्त्रीधन अधिकार आदि का निरूपण है । इस ग्रथ की हस्तलिखित प्रति जगदीश झा नैयायिक नवानी तामोडिया दरभगा के घर मे सुरक्षित है। 8 दानवाक्यावली--इस अथ की रचना महाराज नरसिंह देव के शामन काल मे उनकी पत्नी धीरमति देवी की आज्ञा से हुई थी। इसमे सभी प्रकार के दान कृत्यो उनके फलो, कुफलो एव पाप पुण्य का सावि घिक विवेचन है । इममे आठ प्रकार के रोगो-उमाद त्वंगदोष, राज्य क्षमा श्वास, मधुमेह, भगदर, उदर तथा मसूरी का उल्लेख है। इसमें यह भी बताया गया है कि जिस देश मे वर्ण व्यवस्था न हो वह मलेच्छ देश - विद्यापति की कृतियो का समीक्षात्मक परिचय है। दान, दान की वस्तु एव दान फल के ज्ञान के अतिरिक्त हम ये काम महत्व इस दष्टि से भी है कि इसमे संस्कृत में कुछ दुर्लभ शब्दो. भी मिलता है। 9 दुर्गाभक्ति तरगिणी-- महाराज मैरव सिंह के आदेश से लिखित इस ग्रन्थ में दुर्गा पूजन के समस्त विधानो का उल्लेख किया गया है। 10 गया पत्तलक-इस ग्रथ मे गया श्राद्ध कम के विधान का विवेचन है। इस ग्रम में राजा के आदेश का कोई उल्लेख नहीं है। किन्तु इस प्रथ का प्रसार बहुत है । इसकी हस्तलिखित प्रतियां डॉ० उमेश मिश्र, ५० 'शिवेश्वर झा लाल गज झझारपुर तथा अन्य मैथिल ब्राह्मणो के पास उपलब्ध हैं। 11 वय त्य-इस प्राय मे वष भर शुभ कर्मों का विधान है तथा नियमित दैनिक पूजा, व्रत, दान आदि के नियमों का वर्णन है । ऐसा प्रतीत होता है कि कवि ने गया पत्तलक और वष कृत्य की रचना अपनी मनातनी आस्था की प्रेरणा से लोक कल्याण के लिए थी क्योकि इनमे लेखन के लिए राजाज्ञा का उल्लेख नहीं है। इसके अतिरिक्त 'द्वतनिणय', 'गगा भक्नि अभ्युदय' तथा 'तत्राणव' आदि ग्रयो को भी विद्यापति के नाम से जोडा गया है। किंतु न तो ये उपलब्ध हैं न ही इनका कोई प्रामाणिक आधार है। कि तु इन चौदह संस्कृत ग्रथो को देखकर कहा जा सकता है कि ये सारे प्रथ जीवन की आस्थापरक व्यावहारिकता से सम्बद्ध हैं । इसीलिये वे मिथिला के जन- जीवन का अग बन चुकी हैं। अवहट्ट मे लिखित प्रथ-सस्कृत, प्राकृत तथा मैथिली मिश्रित भापा को कवि ने भवहार की सज्ञा प्रदान की है। इसे प्रचलित लोक भाषा भी कह सकते हैं। लोक रुचि का कवि होने के नाते कवि को यह भाषा सस्कृत से अधिक प्रिय थी। उसने स्पष्ट लिखा है-'देसिल बयना सब जन मिट्ठा' इस भाषा मे कवि ने 'कीतिलता' और 'कोतिपताका' की "रचना की थी। 1 कीतिलता-मथिली अपभ्र श अर्थात अवहटठ भाषा मे रचित यह पथ वीर, काव्य प्रेमी, उदार, दानी एव कवि महाराज कीर्ति सिंह 42 विद्यापति एक अध्ययन को अमर गाथा है । इस ग्रन्थ के प्रारम्भ में कामश्वर ठाकुर से घोर सिंह कोतिसिंह तक राजपुरुषो के विरुद कवि ने कहे हैं। इस प्राय का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए कवि ने कहा है-- त्रिभुवन रूपी खेत मे किस प्रकार कीति की लता फैल सकती है, यदि काव्य के स्तम्भ पर उसे मच न दिया जाय।" डॉ० अरविद नारायण सिहा क मतानुसार इस ग्रन्थ की रचना शिव सिंह के शासन काल मे हुई । रचना चाहे जिसके शासन काल में हुई हो पर इस प्राय का महत्व इतना अधिक है कि इसका अनुवाद हि दी, बगला और मैथिली तीनों भाषाओ मे हुआ है। इस ग्रन्थ का सक्षिप्त कथानक है-अलसान ने राजा गणेश की हत्या कर डाली। राजा गणे। के दोनो पुत्र वीर सिंह और की सिंह जिनके साथ विद्यापी श्री केशव तथा सोमेश्वर भी थे, अलसान से बदला लेने के लिए मां से आज्ञा लेकर जौनपुर के लिए प्रस्थान दिया तथा शासन और माता का उत्तरदायित्व उन्होने भाई राज सिंह मत्री आन द खान एव गोविन्द दत्त, मिय हमराज, योद्धा रुद्रसिंह, शिवभक्त हरदत्त, धर्माधिकारी हरिहर, नीति निपुण अमरेश झा, तथा याय सिंह राउत पर छोड़ दिया। माग मे पैदल चलते हुए अनेर कष्टो को झेल कर वे जौनपुर पहुंचे। इस प्रय मे कवि ने इस यात्रा मे लेकर कीति सिंह के राज्याभिषेक तक का सुदर एव राचक वणन किया है। माग की कठिनाइयो एव पथ में मिलने वाले लोगो का भाव कवि द्वारा इस ग्रंथ में प० 18 पर अकित है। कायस्थ , यथा- पजेि चतु दुअआ कुभट हरि हरि सबै सुभट । बहुल छाडल पाहि पांतरे बमल पामोल आंतरे मातर 1 श्रोतु तुव दानस्य कोतिसिह महीपते। करोतु कवितु काध्य भत्य विद्यापति कवि । -कौतिलता-डॉ. उमेश मिश्र, पृ० 2. 2 तिहुअन सेतिहि वोत्रि बहु वित्ति वल्ली पसनेई । अक्सर सम्मागमओ जोंसस मनोनदे। 3 पदल, 4 बौहर प्रति, बीच-बीच मे, विद्यापति की पतियो का समीक्षात्मक परिचय 43 जहाँ जाइय जेहे गाओ, भोगाई राजाक बहिडनाओ। काहु कापल' काहु धोस काहु सम्बल देल पोल। काहु पाति भेल पठि, काहु सेवक लागि भटि। काहु देल ऋण उधार, काहु करि अउ नदिक पार । काहु उबल भार बोझ, काहु बाट कल सोम । काहु आतिथ्य विनय करू, कतहु दिने बाट सतरू। इस प्रथ मे जौनपुर का वणन भी उल्लेख्य है . 'हाट करेओ प्रथम प्रवेश । अप्टधातु घटना टेंकारे, कसरी, पंसरा, कास्य केंगार, प्रचुर पौर जनपद, सम्हार सम्हीन, धन हटा, सोनहटा, पनहस्य, पक्क्वान टी, मछेहटा करेमो सुखरव कथा कहते होइब झूठ जनि गम्भीर गुर्जु रावत कल्लोल कोलाहल कान भरन्ते, मर्यादा छाडि महाणव उठ।" अर्थात् हाट मे प्रथम प्रवेश करते ही अष्टधातुओ के बतनो के निर्माण का स्वर कसेरों की दुकानो की खनखनाहट, बाजार की भीड एव उनके द्वारा उत्पन्न सामूहिक रव धन, सोना, पान, पकवान, मछली आदि के बाजार की बातचीत, लोगों को सहसा विश्वास नहीं होगा, ऐसा प्रतीत होता था मानो कोलाहल करता हुआ समुद्र अपनी मर्यादा त्याग कर चला आया तो। हाट-बाजार के वणन मे कवि ने वारवनिताओ की शृगारिक चेष्टाओ तथा हाव भाव का विशेष रूप से वणन किया है। इसके बाद पु. 20 21 पर कवि ने तुर्कों के लक्षणो का भी उल्लेख किया है। जैस- कही कोटि गदा, कहीं ब दीबन्दा कही दूर निक्कारिये10 हिंदु गदा। फही तथ्य कुजा तब्बेला पसारा, कही तीर तोम्मार दोक्कारा दारा। 1 राजा भोगीश्वर, में सामग्री, 7 ढोना, 10 निकाल बाहर करना। 2 वस्त्र, 5 मिलना, 8 सीधा, 3 भवा, 6 समूह में, 9 रास्ता पार किया, 44 विद्यापति एम यध्ययन सराके सराहे भरे ब दिया। तौलति हेरा लस्सूला पे आजू।' परी परीदे बहुत्तो गुलामो, तुरुपये तुमने मनेसो सलामा । घमाहति पोमा, पइजल्ल मोजा, भये मीर वल्लीम सइल्लार पोजा। अवे वे भणता सरावा पिवता, फ्लीमा महन्ता पला मे जिमता। वसीदा महता, मसीदा महता, वितेया पडता तुरुवका अन ता॥ पुन कवि वणन घरता है- हिदू तुरुवे मिलल यास, एवम धम्मे अओर उपहास, पतहु योग क्तहुं येद, कतहु विस्मिल कतह वेद । कतहु ओझा कतहु पोझा, कतहु नकद कतहु रोजा, क्तहूं तम्बारू कतहूँ कूजा, नतई निमाज अतहूँ पूजा। जोनपुर पहुंचने के बाद ये लोग एक ब्राह्मण परिवार मे ठहरे और प्रात एक घोडा और एक वस्त्र लेकर अत्यत विनम्र भाव से दरबार में अलसान के अत्याचारों का विवरण निवेदन किया। सुलतान इब्राहिम शाह अत्यत प्रसन्न हुआ। उसने शाही सेना को पूरी तैयारी के साथ तिरहुत जाने का आदेश दिया। सेना चल पडी। सेना के चलने के प्रभाव के वर्णन से भूपण की याद आती है- गिरि टरइ महि पडई नाग मन कम्पिया, तरणि रप गगन पथ धूलि भरे झम्पिया। तबल शत बाज कत भेरि भरे फुक्किा, प्रलय पण सद हुअ सार र व लुक्किा । इस प्रकार घमासान युद्ध करते हुए और विजय प्राप्त करते हुए । 1दोनो ओर 2 लहसन प्याज, 3 कलाम विद्यापति की कुतियो का समीक्षात्मक परिषय 45 सुलतान चला और साथ में दोनो भाई भी। मुसलमानों के साथ बढी कठिनाई से अपने कुल धम का निर्वाह करते हुए वे सभी तिरहुत पहुंचे अलसान भाग निकला। कीतिसिंह की विजय हुई। पख ध्वनि और वेदगान के साथ वोति मिह का राज्याभिषेक हुआ। कीतिलता की कथा नगर, हिदू मुस्लिम तथा युद्ध आदि के रोचध वणनों से भरी हुई है । इस ग्रथ को भापा पर सस्कृत की छाप अवश्य है किन्तु व्याकरण पर पालि और प्राकृत का प्रभाव अधिक है । कवि ने कीतिसिंह को इस अमर रचना से अमरता प्रदान की है। 2 कीर्तिपताका-अवहट्ठ भाषा मे लिखि कवि की यह दूसरी रचना है । दोहा छद मे लिखे हुए इस नथ के बीच बीच मे सस्कृत के श्लोको एव गद्य का भी यत्र-तत्र प्रयोग है। इसमे ग्रथ शिव सिंह की कीति पताका का वणन है। ग्रन्थ के प्रारम्भ मे अधनारीश्वर तथा गणेश की वदना है । मिथिलाक्षर मे लिखित इसकी एक खण्डित प्रति नेपाल के राज पुस्तकालय में सुरक्षित है। इसके लगभग बाइस पष्ठ नष्ट हो चुके हैं। इस पथ की एक प्रतिलिपि डॉ० उमेश मिश्र के पास भी उपलब्ध है । इस अथ के प्रारम्भ मै कवि ने लिखा है- पडिम मरालि बदगुणे भीपम कीर मुहेन, वाणी मुहुर महग्य रस पिअउ सुअस बलेन । उसके पश्चात् शिव सिंह के आदर्श आचरण का उल्लेख इस प्रकार है-धम्म देखी व्यवहार लोक नहि, नहई पर भेद । सबका घर उब्बाह पलटि जानि जम्मिम । बाहर दाने दलई। दरिद्द खग्गो परि पडिडअ खण्डिस । जस पउरूए पत्तापे सहि महल मण्डिअ वीर जब राज विराज भउ । तिरहुत मज्जादा बहि रहि । करि तुरुअपत्ति पअभार भरें कुरुसु को वक समस महिआ। इसके पश्चात् इस प्रथ मे शृगार वणन वा विस्तार है इसी प्रतम में कवि ने यह भी कहा है कि 'श्रेता के विरही राम ने सीता विरह के दुख को दूर करने के लिए ही कृष्ण का अवतार लिया और गोपियो के साथ रास रचाया इस, प्रसग के पश्चात सुलतान के साप शिव सिंह के युद्ध कौशल का विस्तत चित्र है। शिव सिंह की विजय एव सुलतान की 46 विद्यापति एक मध्ययन पराजय का वणन विविध उपमाओ के महारे कवि नै बडे उत्साह के साय किया है। इस प्रसग के साथ अ य को समाप्त करते हुए कवि न लिखा एवं श्री शिव सिंह देव नृपते सग्राम जात यशो, गार्यात प्रति पत्तनि (न) प्रति दिश प्रत्यकण सुनव ॥ 3 गोरक्ष विजय-यह चार अको मे ममाप्त एक नाटक है । इसकी भाषा सस्कृत मिश्रित मैथिली है। इस ग्रथ की हस्तलिखित प्रति नेपाल राज पुस्तकालय मे उपलब्ध है। इसी प्रतिलिपि के आधार पर इसरा सम्पादन सन् 1961 ई० मे डॉ० उमेश मिश्र तथा जयकात मिथ न किपा था। इसका प्रकाशन किया है मैथिली साहित्य समिति, इलाहाबाद ने। यह पुस्तक बारह पत्रो (फोलियोज) म समाप्त हुई है। मैथिली रचना 'पदावनी'-~~-मिथिला की हरी भरी अमराइया में महावि विद्यापनि की प्रतिभा की कोख से एक या रल का जन्म हुना । काव्य-मनीपिया ने इसका नाम रखा, 'पदावली'। उसे माँ मिथिला और मौसी बगाल पा असीम स्नेह मिला तथा पिता का वभवशाली सरक्षण । वैभव और विलास की कोण मे पली बालिका ने योवन की देहरी पर पाव रखा। मतुपति ने उसका स्वागत किया। उसकी परिरम्भ कुम्भ की मदिरा' का पान कर तथा नि श्वाम मलय के झोको मै झूप वह उन्मत्त हो उठा। क या के रूप गुण की सुकीति सुरभि सम्पूण देश मे फल गई। जिज्ञासु रसलोभी भ्रमर स्वत आर्मा त हा उसके परिवृत्त गुणगान करन लगे। सोदय और गुण को पराकाष्ठा ने उह उसे अपना बनाने के लिए विवश कर दिया। बग भ्रमर समूह ने उस पर अपना अधिकार घोषित किया, असम और उडीसा उपवनवासियो ने भी अपना अधिकार जताने की चेष्टा की, मैथिली रस क तो उस अपना समझते ही थे। हिंदी साहित्य की मनीषा मण्डली ने भी इस दिशा मे रागात्मक प्रयास किया और मौभाग्य में सफलता उनसहाय लगी क्योकि उम रमणी रत्न का शरीर तो मिथिला की पावन रजस निर्मित था जितु उसका हृदय हिंदी के अत्यत निक्ट या । पावन परिणम के पश्चात वह क्या विधिवत बहू बन पर मिथिला से सीता की मांति अवध पुरी को पधारी। म हिदी ने अपने ।

विद्यापति की कृतियों का समीक्षारमक परिचय 47 प्रांगण में उसका स्वागत किया, भारती उतारी और उसके सौभाग्य दीप्त भाल को स्नेह में घूम लिया। आज हिन्दी जगत ऐसी सुलक्षणा बहू को अपना कर अपने आपका घय मानता है । इतना होने के पश्चात भी क्या इममे सदेह है कि विद्यापति हिन्दी के मवश्रेष्ठ कवियो मे से एक है और राधा नपण सोदय प्रेम सुधामिक्त उनसी पदावली हिदी साहित्य की अमर निधि और प्रेरक कृति है ? महाकवि विद्यापति की समस्त पद रचनाओं के संग्रह का नाम 'पदा वली' है। इसकी उपलब्ध हस्तलिखित प्रामाणिक प्रतियो को मख्या चार है जो नेपाल, वगाल एव मिथिला के विभिन्न क्षेत्रो से उपलब्ध हुई 1 राज पुस्तकालय नेपाल को प्रति-म्ब० महामहोपाध्याय हर प्रसाद शास्त्री के प्रयत्नों से यह प्रति उपलब्ध हुई है। इसकी लिपि मथिली है और इसमे 287 पर सकलित हैं। इसकी फोटो कापी स्व० काशी प्रसाद जायमवाल तथा डॉ० अन त प्रसाद उपाध्याय ने तैयार की थी। इसका प्रथम खण्ड पटना कालेज पुस्तकालय एव द्वितीय खण्ड पटना विश्व- विद्यालय पुस्तकालय मे सुरक्षित है। 2 तरौनी ग्राम (मिथिला) में प्राप्त ताल पनादली प्रतिलिपि-~- इम प्रति का सकलन कवि के प्रपौत्र ने दिया था। इस पोथी मे समलित पदो की सरया 350 है । इस पोथो से सम्बधित सभी सूचनायें डॉ. नगेंद्र नाथ के प्रयत्नों का फल हैं। इस पाथी की मूल प्रतिलिपि उपलब्ध नही 3 रामभा पुर को पोयी-~~-यह मूल पोथी प० विष्णुदयाल मा को प्राप्त हुई थी। इसका सम्पादन श्री शिव न दन ठाकुर ने 'विद्यापति विशुद्ध पदावली' के नाम से किया था । इसका प्रकाशन मैथिली साहित्य परिषद, दरमगा के द्वारा 1941 मे हुआ था। इसमे पदो की संख्या 96 है उपलब्ध ताल पत्रो पर चार लखको के हस्ताक्षर हैं। सभी पत्र काल दृष्टि से एक तरह के नहीं हैं। डॉ. विमान विहारी मजूमदार इहै देवल दो मो वर्ष प्राचीन मानते हैं। 4 स्व० च दा झा द्वारा सग्रहीत पदावली-इस पदावली की प्रति 48 विद्यापति एक अध्ययन डॉ० उमेश मिश्र के पास है । इमे आधार मानकर होने विद्यापति पदा- वली का सम्पादन किया था और उसकी समीक्षा भी लिखी थी। इनके अतिरिक्त बगाल के विश्वनाय चक्रवर्ती द्वारा सकलित प्राचीन पोथी 'क्षणदा गीत चितामणि' जो मन 1705 ये आसपास तयार हुई थी, म विद्यापति के कुछ पद सकलित हैं। वैष्णवदास ने 18वी शतादिन के अंत म 'करुपतरु' का सकलन किया था जिसमें विद्यापति के 161 पद सकलित हैं। देशबघु चितरजन दास द्वारा 1771 ई० में सग्रहीत 'सकीत- नामृत' म भी विद्यापति के दस पद पाये जाते हैं। इस प्रकार गौडीय वैष्णव भक्तो ने भी विद्यापति के पदो को बडी सावधानी से सुरक्षित रखा मिथिला में भी लोचन कविद्वारा 'राजतरगिणी' जो कवि की मत्यु के ढाई सौ वप बाद लिखी गई, मे विद्यापति के 51 पद सगृहीत हैं 'मिथिला गीत सग्रह' म भी विद्यापति के कुछ पद मिलते हैं । ५० बलदेव प्रसाद मिश्र, श्री रमानाथ झा डॉ. जयकांत मिश्र तथा डॉ. सुभद्र झा प्रति विद्वानो के शोधी प्रयत्नी से कवि के अनेक पद उपलब्ध हुए हैं। मिथिला को गानप्रिय महिलाओ का भी विद्यापति के पदो की सुरक्षा म एतिहासिक महत्व है । पदो को शुद्धता के लिए भी हम मिथिला की स्त्रियों पर ही निभर रहना पडता है क्योकि वे ही परम्परा से उन पदो वो अति के समान सुनती और गाती आई हैं। विद्यापति पदावली के काव्य-वैभव की ओर भाजकल अनेक विद्वानो की रुचि आकृष्ट हो रही है और उनपर अनेक शोध प्रय भी लिखे जा रहे हैं। किंतु अब तक की उपलब्ध सामग्री के आधार पर विद्यापति के पदो के जो प्रमुख सरलन तैयार किए गए हैं उनमे निम्न सकलन ऐतिहासिक एवं सामग्री की प्रामाणिकता की दृष्टि से विशेष महत्व के हैं- 1 विद्यापति पदावली-नगदनाथ गुप्त (वगता मे) 2 विद्यापति पदावली-श्री अजन दन सहाय-प्रकाशक इण्डियन प्रेस, प्रयाग 3 विद्यापति खगेद्रनाथ मित्र तया विमार विहारी मजूमदार, प्रकाशित-यूनाइटेड प्रेस, पटना - aft विद्यापति की कृतियों का समीक्षात्मक परिषLAR 4 विद्यापति पदावली-रामवृक्ष बेनीपुरी तथा कुमादिगमान द झा, प्रकाशित पुस्त भण्डागले लेहरिया मरपि 5 विद्यापति पदावलीबिहार राष्ट्र भाषा परिषद द्वारा प्रकाशित अब तक के प्रकाशित सभी प्रथा मे यह सर्वाधिक प्रामाणिसानों एव विश्वसनीय है। पदावली के पद विद्यापति के जीवन-अनुभूत सवश्रेष्ठ उ मुक्त क्षणो की भावनिधियों हैं। उनके सम्मुख पदो के का विभाजन, क्रमायोजन अथवा नियोजित अवस्था विशेष के चित्रण का प्रश्न नही था। विशिष्ट "रडार' की भांति जीवन व्योम मे उडती हुई विविध कि तु रम्य झलकियो को उन्होंने स्वभावत ही ग्रहण कर लिया और अपनी करयित्री प्रतिभा से उस अनुपम काव्य चिश मे ढालकर जन मानस को विमुग्ध कर दिया। प्रतिभा को अलौकिक सम्पन्नता एव व्यापकता के कारण अनायास ही पदा वली मे व्यापक मानव जीवन की विविध व्यापार दशाओ एव सूक्ष्म वृत्तियो का चित्रण हो गया है। अध्ययन की सुविधा एव अभिव्यक्तियो के मनोवज्ञानिक विवेचन के लिए पदावली की समस्त विषय सामग्री को तीन विभागो एव अनेक प्रभागो मे विभक्त किया जा सकता है- शृगार प्रधान-निस्स देह विद्यापति की पदावली मूलत शृगार प्रधान है। इसमे तीन प्रकार के शृगार का वणन है। प्रथम-विशुद्ध शृगार के वे पद हैं जिनमे किसी भी राजा, महाराजा या देवी देवता अथवा राधा कृष्ण आदि के नामो को उल्लेख नहीं है। इन पदो म विद्यापति स्वय आनद के स्वतत्र उपभोक्ता हैं। द्वितीय-दरबारी श्रृंगार ---इन पदो म रानी लखिमादेई, शिवसिंह या मय राजा रानियो या दरबारियो के नाम हैं जिनके आश्रित या सलाहकार विद्यापति रहे थे। राधा कृष्ण के नाम में सर्वा धत कुछ पद भी जिनमे लौकिक शृगार का मांसल व्यापार अधिक मुखर है, दरबारी शृगार की ही श्रेणी में रखे जायेंगे । तृतीय-भक्ति मूलक शृगार । इस श्रेणी म उन पदो की गणना की जा सकती है जिनम राधा-कृष्ण के नामा का उल्लेख भक्तिभाव में है मोर उनके अलौकिक सौदर्य तथा दिव्य प्रेम का चित्रण है। इन पदो मे कृष्ण और राधा जयदेव परम्परा में ललित नायर एव नायिका के रूप मे .

50 विद्यापति एक अध्ययन मिश्रित तो अवश्य हुए हैं कि उनके विस्मयादियोधक देवत्व पर रख प्रधान लौकिकता के छोटे नही पडे हैं । यद्यपि इस प्रकार के वर्गीकरण की कोई स्पष्ट या दढ मीमा रेखा नही खीची जा सकती है, क्योकि ये सारे मानदण्ड सापेक्षिक हैं कितु प्रवुद्ध आलोचक के मानस क्षेत्र मे य सीमा रेखायें स्वय सिंच जाती हैं, इसे नकारा नहीं जा सकता। पदावलीको विषय सामग्री शृगार प्रधान विविध →विशुद्ध शृगार J+प्रहेलिका →दरबारी शृगार कट →भक्ति मूलक शुगार +सामयिक(युद्ध राज्यारोहण आदि) →प्रकृति चित्रण (चमत, रास आदि) भक्ति प्रधान -महेशवानी तया नाचारियां । (गिव-पावती गीत) -विनय के पद (दुर्गा सीता गौरी गगा आदि) →आत्मग्लानि के भाव तथा मनस्ताप सबधी पद पदावली मे शृगार की विषय-सामग्री अत्यन्त व्यापक है। वय सघि की अवस्था से अबुरित होकर शृगार की धारा के उन्मत्त प्रवाह मे परिणित हो जाती है और वृद्धावस्था मे के महामागर में गार के चय एवं जाता उस उद्दाम धाराका सधि, यौवन, सब गुणात्मक सोदय, विद्यापति की कृतियो का समीक्षात्मक परिचय 51 मिलन प्रसंग, सखी सभापण, कौतुक, अभिसार, छलना, मान, मानमग, विलास, बस त, विरह तथा भावोल्लास प्रभति, अभिव्यक्तियों कलात्मक, रोचक एव सहज ढग से प्रस्तुत की गई हैं। अत पदावली शृगार का अक्षय कोश है। इसमे केवल अनुभूत क्षणो की आन दमयी लहरिया ही नही बल्कि सामाजिक बधन से युक्त पारि- वारिक जीवन की सफलता के लिए मधुर निर्देश भी है । भावना के प्रबल वेग मे कवि ने समाज और लोक जीवन को व्यावहारिकता और परलोक को विस्मृत नही किया है । इन सबका समाबत गगा-यमुनी रूप ही पदा- वली के शृगार की विशेषता है । भक्ति प्रधान-काव्य के क्षेत्र मे सच्चा कवि धम और समुदाय की परिधि से परे होता है, फिर भी उसको व्यक्तिगत आस्था होती है । वह लोक जीवन में प्रचलित धार्मिक आस्था को अभिव्यक्ति प्रदान करता है और लोग धम को अपने काव्य मे स्थान देता है इसी सदम ये अनुकूल पदा- वली मे कुछ भक्ति प्रधान पद भी प्राप्त होते हैं। इन पदो मे महेशवानी और नाचारी मिथिला के लोक जीवन में बहुत प्रिय हैं और उनका झोपडी से लेकर महलो तक व्यापर आदर और प्रसार है । दुर्गा, गगा एव शिव की वन्दनाओ मे कवि की व्यक्तिगत निष्ठा अत्यन्त प्रबल है । इन पदो मे कवि की व्यक्तिगत एव लोक आस्था को स्वर मिला है और भावनायें साकार हो उठी हैं । वैदेही और गधा कृष्ण का प्रसग नितान्त कलात्मक है। किन्तु वे पद जिनकी रचना कवि ने जीवन के साध्य बाल मे पी है वै विशुद्ध भक्ति के उदगार हैं । उनमे गंवाये हुए यौवन के प्रति पश्चात्ताप है, आत्मग्लानि है और माने वाली घडियो के लिए हतासा और निराशा है। पर इस निराशा के बीच भी भगवान मे अटूट विश्वास और श्रद्धा है। ये पद सूर और तुलसी पे विनय-पदो के समकक्ष है - यया 1 'माधव हम परिनाम निरागा या 'हरिजन बिसरव मो ममिता। प०सं०241 2 माधव की कप तोहर गियान । प०स० 256 3 फुल एव फुलवारि लाओत मुरादि जतने पटामोल सुबधन वारिप०१० 257 6 कुसमित कानन कुज बसी नयनक काजर धोरमसी। प०स०261 52 विद्यापति एक अध्ययन 4 दूर दुग्गम दमसि भजेमो, गाढ गढ गूढिय गजेओ। पात साह ससीम सीमा, समर दरसमो रे । १०स० 258 5 हरि सम आनन, हरि सम लोचन, हरित हो हरिवर आगी। प०स०259 7 पिया मोर बालक हम तरुनि, कौन तप धुकलो हमे लौह सजनी । प० स०263 8 सुदरि चलि लहु पह धरना, जइतह लागु परम डरना । प०स०72 १ हम जुवती पति गेलह विदेश, लग नहि बसये पडोसिया कलेश । प०स०265 इन पदो मे कवि की वृद्धावस्था को मनोदशाओ का सु दर चित्रण हुआ है । सम्पूर्ण जीवन वैभव विलास मे व्यतीत करने के पश्चात बद्धा- वस्या मे जब ससार को नश्वरता की चेतना जागी है तो कवि विकल हो उठा है और वहीं विकलता धनी आस्था के साथ इन पदो में अभिव्यक्त विविध -इस श्रेणी में आने वाले पदो का सम्ब घ जीवन के विविध क्षेत्रो और प्रसगो से है । इसमे कवि की आतरिक व्यया, प्रेम, शिवसिंह का युद्ध, कूट, प्रहेलिका, बालविवाह, लोक प्रसग तथा मानव जीवन में होने बाले विभिन्न सस्कारो के अवसर पर गाये जाने वाले गीत हैं। इन गीतो में कवि ने लोक जीवन को धमनियो की गति को सुविज्ञ वद्य की तरह पहचाना है इसीलिए इन गीतो मे वहाँ के जन मानस को आनद विभोर कर देने की अद्भुत क्षमता है। विद्यापति को कृतिया साक्षी है कि विद्यापति एका त गायक कवि नहीं व्यक्तिगत तथा सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन का उनकी पूणता | साथ जिया था। जीवन के उत्थान पतन और सुख-दुख को पूर्ण मनोयोग के साथ भोगा था। इसीलिए उनकी रचनाओ मे समग्र जीवन को सपन अनुभूति और मरम अभिव्यक्ति है । पदावली उनकी विशेष रचना है उनको मोति का आधार स्तम्भ है । इस पदावली का सपना सात स्वरूप अपना सास रग है। यह कही भी रहे आप उसे कितनी ही विद्यापति की कृतियो का समीक्षात्मक परिचय 53 कविताओं मे छिपाकर रखिए वह स्वयं चिल्ला उठेगी-'मैं हिदी कोकिल को काफली' हूँ। जिस प्रकार हजारी पक्षियो के कलरव को चीरती हुई कोकिल की काकली आकाश पाताल को रस-प्लावित कर देती है और अपना स्वत न अस्तित्व प्रकट करती है, उसी प्रकार यह पदावली भी अपना परिचय अपने आप देती है। रामवृक्ष वेनीपुरी के इन शब्दो के साथ विद्यापति पदावली की अभ्यर्थना को मैं यही विराम देता हूँ वैसे तो साहित्य समीक्षको और साहित्य रस प्रेमियो की भावनाओ के सागर को शब्द की सीमानों में बांधना सम्भव नहीं है। + विद्यापति के काव्य में कृष्ण तथा राधा का स्वरूप राधा कृष्ण-युगल छवि की रूप गुण माधुरी का पान भारतीय समाज युग-युग से करता आ रहा है । यह युगल छवि व्यक्ति विशेष की मूर्ति नही बल्कि भारतीय संस्कृति के प्रवाह मे अग्रसर होती हुई जन मानस की ममष्टिगत भावना का मिश्र स्वरूप है । इम स्वरूप के विकास का इतिहास अत्यात विचित्र मा यताओ तथा भ्रातियो से युक्त एव मनोरजर है। काल कोश में इसका कैसे बीजारोपण हुआ, इतिहास के गोद मे इस स्वरूप ने क्तिने करवट वदले, बाहरी तथा भीतरी प्रभावो न इस स्वरूप वो कसे और कितना विकृत किया और क्से इस भावना का शृगार किया, यह मारी गाथा अत्यत रोचक है और आज भी शोध की अपेक्षा रखता है। वेदो मे द्यु लोक का अधिष्ठाता आदित्य और भू लोक तथा मध्य लोक का इन्द्र था। इद्र-कृषि, वनस्पति, दृष्टि और खाद्यानो के देवता होने के कारण 'राधानापति' हो गया। इसी समय जीवन मरण के दुख को दूर करने वाले विष्णु का भी उदय हुआ जो कालातर म इद्र से भी अधिक महत्वपूण और त्रिविक्रमनिश्वस' भुवनस्य सा-आ और राधाना पति हो गए । पाँच रात्र घम मे उनकी पूजा होने लगी और वही वसुदेव हो गए। ई०पू० पाचवी शती म पाणिनी के समय जन साधारण में यह पूजा प्रचलित थी। पतजलि ने यपन भाष्य मे विष्णु और वसुदेव कृष्ण मे कोई अतर नहीं रखा । गीता मे वसुदेव की गिनती विष्णिया मे हुई जो विष्णि यादव या सावत वध का नाम था और वसुदेव इसी वश मे 100 शती ई० पू० विद्यापति के काव्य में कृष्ण तथा राधा पास्वरूप 55 एक महान व्यक्ति हुए थे। विष्णु पुराण और वाराहमिहिर इहे कोकण या सौराष्ट्र के आसपास का निवासी मानते हैं । इनके अनुसार कृष्ण या गीता के गोविन्द आभीर नामक एक धुमक्कड जाति के वास देवता हैं। इन आभीरो का मधुपुर से लेकर आवत और मनूप तक के प्रदेशो पर अधिकार था। वतमान अहीर, जाट और गूजर इसी घुमक्कड जाति के सतान हैं । अत वर्तमान कृष्ण-विष्णु, नारायण, वसुदेव, गोपाल और गोवि के काल प्रवाह परिमार्जित सस्करण है। कृष्ण की भांति राधा मे भी ऐतिहासिक व्यक्तित्व का अभाव पाया जाता है। गोपियो मे तो यह व्यक्तित्व है ही नहीं। भागवत, विष्णु तथा हरिवश पुराण आदि प्राचीन ग्रथो मे राधा का वही कोई उल्लेख नहीं है। गाथा सप्तशती और पचतन मे 'राधा' का उल्लेख मिलता है। राधा की भक्ति का उल्लेख दक्षिण मे भी मिलता है। इन विरोधों की तह मे जाने से पता चलता है कि राधा आभीर जाति की प्रेम देवी रही होगी जिसका सम्बन्ध बाल कृष्ण से रहा होगा। कालातर मे राधा की प्रधानता के साथ भाभीरो के बाल दवता की कथा सम्बद्ध हो गई होगी। यह भी सम्भव है कि राधा आय पूर्व जाति की प्रेम देवी रही हो जिसे आर्यों ने कृष्ण के साथ जोड दिया हो। पांचरात्र और भागवत धम के विकाम के साथ राधा कृष्ण म मानवीय गुणा का आरोप हुआ और प्रेम भक्ति को प्रधानता मिली। निम्बाक ने राधा कृष्ण भक्ति का प्रचार किया जिनके अनुसार वे कृष्ण परब्रह्म की अन य सगिनी है। महाभारत और पौराणिक काल के कृष्ण विष्णु के अवतार थे। निम्बाक न ही कृष्ण के ब्रह्मत्व के साथ मधुर भावना का समावेश कर उन्हें सर्वजन सुलभ बना दिया। राधा प्रेम की अधिष्ठात्री देवी हो गई और उनमें रमराज शृगार की स्थापना हो गई और नायक- नायिका स्वरूप की सभावना बन गई। तात्रिक शाक्तो की शृगार भावना के अनुरूप भी राधा-कृष्ण शृगारिक मनोवत्ति के प्रतीक बन गये। राधा की आठ प्रधान सग्वियां आठो रसो और आय सखियां सचारी भाव की प्रतीय बन गइ और राधा और कृष्ण का यह स्वरूप साहित्य म शृगार का आदिस्रोत बन गया।

56 विद्यापति एक अध्ययन । तारपय यह है कि हिंदी साहित्य को स्पा करते-करते राधा और कृष्ण का स्वरूप दशन या तत्व वो वस्तु न रहकर सम्पूर्णतया भाव जगत की वस्तु हो गए थे । "भक्ति-प्रेम और माश्य की विचित्र सपदाओं स युक्त यह युगल मूर्ति ईश्वर का रूप तो थी किंतु उसमे वैदिक देवताओ का सभ्रम नही था। वह ग्रीक अपोलो की भांति नही थी । उसमें इस्लामी खुदा की तटस्थता नही थी, उसम था एक महज सरल घरेलू सम्बध। सखा, प्रिय, स्वामी आदि का भाव सहज ही उनमे घर कर गया। राधा कृष्ण की यह जोडी जो विकास के अनेक सोपाना को पार कर हिंदी साहित्य को उपलब्ध हुई, वह केवल रसिक भक्तो, कवियों एव उपासका के भाव लोक की आदश प्रतिमा ही नहीं बल्कि समग्र समाज की प्राण सजीवनी बन गई। राधिका के चरणो पर अनेको लक्ष्मी और कृष्ण के स्वरूप पर करोडो कामदेव को यौछावर करने की लालसा जो कवि-कुल के मन म उठती है वह उनके रूप गुण के लालित्य की तुलना मे कुछ भी नहीं है । यदि उसके पास इससे भी बडी कोई सम्पदा होती तो वह इन चरणो पर सहप और सगव यौछावर कर दता। विद्यापति के कृष्ण का स्वरूप-विद्यापति ने कृष्ण के अवतार का कारण रामावतार म राम सीता का अतप्त पारिवारिक जीवन माना है । विद्यापति के कृष्ण का प्रथम दशन पदावली मे 'नादक नद वदम्बक तरु तर धिरे धिरे मुरली बजाव' के साथ कृष्ण-व दना मे होता है । आन दकद कृष्ण नाम समेतम कृत सवेतम वादयते मृदु वेणुम जयदव की परम्परा मे धीरे धीरे मुरली बजाकर राधा को सक्त स्थल पर बुला रहे हैं। प्रतीक्षा मे आँख बिछाये 'खने खने विकल मुरारि हैं । वे मुरली धीरे धीरे बजाते है क्योकि दूसरे भी सुन सकते हैं, यह भय बना हुआ है। विकलता की तीव्रता तो दखिये-आते जाते गोरस वेचने वाली गोपियो से बार बार छते है । मुरारि की यह विकलता, यह तडपन देखकर पाठक का मन सहज ही रसिक शिरोमणि कृष्ण के राधा प्रेम की गहराई की ओर आकृष्ट हो जाता है और उनका अलौकिक रूप इस प्रेम प्रवाह मे तिरोहित हो जाता राधा से मन को भी मुग्ध कर देने वाला यह कृष्ण 'सुपुरुष' है जिसकी वे .

विद्यापति के काव्य मे कृष्ण तथा राधा का स्वरूप 57 भ्याख्या कवि ने 'पुरुष परीक्षा मे की है। उसका स्वरूप स्वप्नवत है । युगल कमल पर चौद की माला, उस पर तरुण तमाल, तमाल पर बिजली को लता, ऐसा स्वरूपवान कृष्ण मस्ती मे मथर गति से यमुना के किनारे जा रहा है । कमाल का रूप है कि प्रथम दशन मे ही वह राधिका 'हेरइत पुनि मार हरल गियान', की सुघ बुध हर लेता है । क्षण भर के लिए ही राधिका उसे देखती है और देखते ही व्याध के विषम वान से उसका हृदय विध जाता है और राधा की 'सुकृति सुफल' हो जाती है जैसा तुलसी ने 'पुण्य पुराकृत भूरि' की बात कही थी। राधा प्रयत्न करके अपन मुख को नीचे कर चरणों में टिका देती है कि तु चकोर की भाति बार बार उसके नत्र चन्द्रमा कृष्ण की ओर चले ही जाते हैं--बिहारी के बरजोर घोडे की तरह-'लाज लगाम न मानही नैना मो बस नाहि ।' माधव मधुर वाणी मे कुछ कहते हैं सुनकर राधिका कान बन्द कर लेती है कि तु मन के भाव को कौन रोक सकता है। शरीर से पसीने का प्रवाह चलने लगता है, कचुकी फट जाती है, चूडिया चटक जाती हैं, हाथ कापने लगता है, जिह्वा 'गिरा लिनि मुख पकज रोको' की स्थिति मे हो जाती है। यह है श्याम सुदर की अनुपम छवि और मिलन का राधा पर प्रभाव । फिर क्या है राधा की विकलता जाग उठती है, दशन की अतृप्त लालसा हिलोरें लेने लगती है । वह सुरपति से नेत्र और गरुण से पस की कामना करने लगती है जिससे उसको कृष्ण मिलन की साध पूरी हो सके। अभिलाषा पूरी होती है । यमुना तट पर राधा-कृष्ण का मिलन होता है। पनघट पर युगल मूर्ति को देखकर यमुना उद्वेलित हो उठती है । बनस्थली आत्मविस्मत मे खो जाती है, गोकुल की अधेरी गलियो प्रकाश से जगमगा उठती हैं, चन्द्रमा को अपने रूप की सार्थकता पर गर्व होता है और बसत अपने यौवन का सच्चा आन द पाधय हो जाता है। कि तु ससार मे सुख ने किसका साथ दिया है--एक दिन कृष्ण अपनी प्रियतमा का हाप पाड कर विदा लेते हैं और मधुपुरी के लिए प्रस्थान कर देते हैं । राधा रक हो जाती है, कृष्ण को भी चैन नहीं। राधा का संदेश सुनकर वह कह उठते 58 विद्यापति एक अध्ययन रामा हे से क्यि विसरल जाई। करे धरि माथुर मन मति मगहत, ततहि पडल मुरझाई। क्छुि गद गद सोलह सहु आसरे जे विछ पहल कर वामा ।। पटिन फ्लेवर तेजि पनि आएल, चित रहल सोई गमा।। से बिनु रात दिवस नहि भावइ, ताहि रहल मप लागी। आनि रमनि सग राज सम्पदा, भागे मठिय जइमे विरागी।। माधव ने कहा उस राधा को कम भूला जा सकता है । हाप पकड जब मैंने मथुरा जाने की अनुमति मांगी थी उसी समय वह मूच्छित होकर भूमि पर गिर पडी थी और टूट फूटे अक्षरो मे जो कुछ उस रमणी ने कहा था उसे सुनकर भी यह कुलिग हृदय चला आया पर चित्त तो वही रह गया। उसके बिना न रात अच्छी लगती है न दिन । अय रमणियो के साथ राज सपदा होते हुए भी मैं विरागी के समान है। यह है विद्यापति के कृष्ण का चित्र। वे राधा में स्वकीया भाव से अनुरक्त हैं। यही स्वकीया भाव विद्यापति की सामाजिक मर्यादा और अनुशासनप्रियता का प्रमाण है। विद्यापति म कृष्ण ललित नागर हैं, रसिक शिरोमणि है वे बोसरी ध्वनि म सकेत से उसे बुलाते हैं, कुन भवन मे रास्ता रोकते हैं, यमुना तट पर नौका से पार कराते हैं, कदम्ब के छाया म मिलते हैं । मिलकर प्रिया को सम्पूण मनोकामनाओ को पूर्ण करते हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि वे पति पत्नी भाव से राधा को सदव स्मरण करते हैं । सयोग मे उल्लास अपने पूर्ण वैभव के साथ तरगायित होता है तो वियोग का विषम ज्वर उहे सुख सपदा और अय रमणियों के बीच भी विरागी बना देता है। जीवन के इन उत्कृष्ट क्षणो मे याद आती है चचरीक जिमि चपकु बागा की भरत के स्वरूप की प्रिया का दुख देखा नही जाता वे सबकुछ त्यागकर पुन आकर अपनी प्रियतमा से मिलते हैं और उसके जीवन की तपस्या को सायक बना देते हैं। विद्यापति को राधा-कृष्ण की भांति विद्यापति श्री राधा का भी दान पाठको को सबसे पहले बदना के पद में होता है। रूप-वैभव वैचिश्य से चकित होकर कवि की वाणी मुखर हो उठती है-'देख देख राधा रूप अपार'। इस रूप को सघटना पर कवि को आश्चय होता है । करोण! उनसे विद्यापति के काव्य मे कृष्ण तथा राधा का स्वरूप 59 . अनग शत शत लक्ष्मी उसके अग-अग पर यौछावर होते हैं, 'मुरारि' मुरा राक्षस को मारने वाले कृष्ण भी उसके रूप को देखकर मुच्छित हो पृथ्वी पर गिर जाते हैं। विद्यापति की राधा सामरि श्यामा नायिका है-'तप्त- काचन वर्णाभा' है उसकी, वह 'शीतासुखेष्णु' और 'गम च सुख शीतला' है । इस अपार सोदय का प्रभाव भी अपार है। कवि की हार्दिक अभिलापा है कि वह अनुपम सु दरी राधा के पावन चरणो को अपनी गोद मे अगोर' कर रात-दिन रखें। इन चरणो को गोद मे रखकर विद्यापति अपनी पदावली की अधिष्ठात्री सोदय देवी राधा के रूपवणन का द्वार खोलते हैं। राधा के हृदय मे मनोज अकुरित होता है। किशोरावस्था और यौवन के मिलन की देहरी विशाल नेत्र वाननचारी होन लगते हैं, वचन मे माधुय, चरणो मे चपलता आती है ।धरणी पर चद्रमा प्रकट होता है। मुग्धा राधा बार- बार दपण देखती है। अगा का विकास होता है । अनग अपने बाग की रखवाली करने लगता है। सुरत बिहार की जिज्ञासा स्वभावत जाग उठती है। शैशव यौवन मे ददण्डिता है। के रह रहकर ब धन विमुक्त हो जाते हैं, औवल बार बार खिसक जाता है। मदन का प्रवेश होता है अग विशेषो को गौरव प्राप्त होता है- कटि क्षीण हो जाती है, वक्षस्थल एव नितम्बो की गुरुता बढने लगती है । चरणो की चपलता नेत्र ले लेते हैं और नेत्रो का भोलापन चरणों में समा जाता है । वय सधि क पदावली- पद राधा के विकास और मनोदशा के चित्र हैं। 'राधा किशोरावस्था की देही को पार कर यौवन मे पदापण परती है। कृशगात, पीन पयोधर, कनकलता मे मरु पा सदेश ले दूतो कृष्ण पे पास पहुंचती है। कृष्ण विमुग्ध हो मिलने के लिये चल पाते हैं। कसा अभिराम यौवन है । आनन सहज ही सुदर है। 'भौंह सुरेखल' आखें हैं, छहो अनुपग एक साथ एकत्र हो गये हैं- कि आरे । नवयौवन अभिरामा। जत देखल तत कझोन पारस छहो अनुपम इक ठामा ।। हरिन दुअरविदारिन हेम, पिक बूझल अनुमानी॥ नयन बदन परिमल गति तनाचि अओ सुललित वानी॥

-60 विद्यापति एक अध्ययन एप के प्रेम मे डूबी राधिका अपने समस्त यौवन के रूप और भाव-- संपदा को पर जय एक दिन अचानक ही कृष्ण से मिल जाती है तो जिहा गूप हो जाती है, नेत्रो से सावन की झडी लग जाती है, हृदय धक पर पोलग गाता है। बेचारी मुग्धा राधा को क्या पता था कि यह दर्शन विषमदा का कारण बन जायेगा और चितचोर एक ही दष्टि मैं राम कुछ हर लेगा। हरारेमा तो राधा ने कृष्ण को सैकडो बार देखा-कभी उसने कुज भना रास्ता रोका तो कभी पनघट पर मटकी फोडी, कभी नाव पर हामीम मागे जाकर खड़ी कर दी और कभी राधा ने स्वय हठ किया-करप पर मोहे पारे क हैया' । यमुना की टेढी मेढी पगड़ियों पर भगेका पार पाल पार हुई और वे 'नयन तरगे जनुगेलहि समाई' मानो गया तरंगोप गये । पर निष्ठुर सखियां इस बात पर विश्वास कहाँ गरती है-हिर राखी विश्वास न देई, परक वेदन पर बांट न गि मानी ऐसीही तरगो मे राधा का मन हिलोरें ले रहा था Pror संदेश मिला प्रियतम मधुपुरी जाना चाहते हैं। वियोग की भाशका राभा का हृदय विदीण हो गया। लोक लाज छोडवर स्वय ही प्रियतम मे पास गई भोर पोली-प्यारे सुनो यदि विदेश जाना ही चाहते हो तो मेरी बात सुमो 'मदि भौंरे गो गें, कोक्लि तो भगासाकी यसात अ' वरन अप सेना। उस समय हे प्यारे अपना प्राण र को भी ने प्रिया को सम्बोधित किया। पडी आंखों से गिर पड़ी। f राधा की मू सरते थे- कानमुखा, अनुमति आसक्त विद्यापति के काव्य में कृष्ण तपा राधा का स्वरूप 61 किन्तु समय आया, कृष्ण चले गये। वे राधा के विरह का अनुभव नही कर सके । कवि के अनुसार यदि राधा को इच्छा पूरी हो जाती और मर कर दूसरे जम मे राधा कृष्ण होती और कृष्ण राधा तब इस व्यथा का अनुभव कर सकते। तुलसी को सीता की भौति राधा कह उठती हैं. 'विछुरत प्रानन कीह पयाना। हृदय वड दारुण रे पिया बिनु विहरि ना जाय।' वह अपनी सहेली से चिता सजाने का आग्रह करती हैं क्योंकि इस दुख का दूसरा अत नही- सून सेज हिया सालय रे, पियारे बिन घर मोये आजि । विनती करऊ सहेलिन रे, मोहि देहि अगिहर साज ॥ इतने पर भी राधा प्रियतम को दोप नहीं देती, कसे देती भारतीय नारी को आदर्श जो ठहरी? वह अपने भाग्य को ही कोसती है-'हमर अभाग पिया नहिं दोप। कि तु कितनी वेदना है उस रमणी के हृदय मे' उसे तो वही जान सकता है जिसने स्वय अनुभूत किया हो। 'आनक दुख भान नहि जान' को पढ़कर तो स्मरण हो आता है-'जाके पर न फटे बिवाई, सो का जाने पीर पराई' और मर्म कराह उठता है। राधा का रतन धन खो गया है। राधा अपने कोही कोसती है कि यह उसके ही कर्मों का फल है । कि तु विद्यापति अपनी राधा को आशा बधाते है। राधा आशा छोडती नही पर यह आशा कब पूण होगी साच सोच कर तन-मन कराह उठता है-- लोचन पाय फेनाएल हरि नहि माएल रे, शिव शिव जिवयो न जाय आसे अस्मायल रे। राधा सदेश भेजती है-'हे काले बादल कमल सूख गया, भौंरा अब नहीं आता। प्यासा पथिक पानी भी नहीं पाता। सरोवर दिन पर दिन छिछला होता जा रहा है। समय की उपेक्षा कर यदि तुम बरसे तो क्या- 'क्या बरषा जब कृषी सुम्खाने । अवधि के दिन गिनते गिनते राधा के नाखून घिस गये, गोकुल का नाम भूल गया पर कृष्ण नही आये । राधा अपनी सखी से कहती है-हे सखी, श्याम को जाकर समझा देना-प्रेम का बीज -~-अकुर रोप कर तूने इसे मरोर डाला। वह कसे बचेगी ? तेल की बूदी तरह तुम्हारा अनुराग फैलता जा रहा है और रेत मे पड़े जल की बूद की -- किया—'कर धरू कर मोहे पारे क हैया'। यमुना की टेढी मेढी पगडडियों गिर पड़ी। प्रियतम ने उपचार किया और कहा कि मथुरा नही जाऊगा -60 विद्यापति एक अध्ययन कृष्ण के प्रेम मे डूबी राधिका अपने समस्त यौवन के रूप और भाव-- सपदा को लेकर जब एक दिन अचानक ही कृष्ण से मिल जाती है तो जिह्वा मूक हो जाती है, नेत्रो से सावन की झडी लग जाती है, हृदय धक धक धडकने लग जाता है। वेचारी मुग्धा राधा को क्या पता था कि यह दशन विषमवेदना का कारण बन जायेगा और चितचोर एक ही दष्टि मे सब कुछ हर लेगा। इसके बाद तो राधा ने कृष्ण को सैकडो बार देखा-कभी उसने का भवन मे रास्ता रोका तो कभी पनघट पर मटकी फोडी, कभी नाव पर चढा बीच यमुना मे जाकर खडी कर दी और कभी राधा ने स्वय हठ पर अनेक बार आँखें चार हुइ और वे 'नयन तरगे जनुगेलहि समाई' मानो नयन तरगो मे वे डूब गये। पर निष्ठुर सखियों इस बात पर विश्वास कहाँ करती है । सच है-'निठुर सखी विश्वास न देई, परक वेदन पर बांटन प्रिय मिलन की ऐसी ही तरगो मे राधा का मन हिलोरें ले रहा था कि एक दिन सदेश मिला प्रियतम मधुपुरी जाना चाहते हैं। वियोग की आशका मे राधा का हृदय विदीण हो गया । लोक लाज छोडकर स्वय ही प्रियतम के पास गई और बोली-प्यारे सुनो यदि विदेश जाना हो तो मेरी बात सुनो 'यदि भौरे गूजने लगें, कोकिल पचम तान छेड दे तो अनुमान करना की बसत आ गया है। वरन अपने कान भूद लेना। उस समय हे प्यारे अपना प्राण रखना और प्यासी को भी जल देना । कृष्ण ने प्रिया को सम्बोधित किया। राधिका वाहा के मुख को देख कर फूट पडी, आँखो से अथ की अविरल धार बहने लगी मूच्छित होकर पथ्वी पर राधा की मूर्छा समाप्त हुई। ऐसे प्रबोप का चित्र तो विद्यापति ही खीच सरते थे- कानमुख हेरइते भावन रमणी, फकरइ रोयत झरझरए नयनी । अनुमति मागिते वरविघुवदनी, हरि हरि शब्दे मुरूछि पडे धरनी। आनुस त पर बोषइ भान, अब नहिं माथुर करय पयान । लेई। चाहते विद्यापति के काव्य में कृष्ण तथा राधा का स्वरूप 61 १ कि तु समय आया, कृष्ण चले गये। वे राधा के विरह का अनुभव नही कर सके । कवि के अनुसार यदि राधा की इच्छा पूरी हो जाती और मर कर दूसरे जन्म मे राधा कृष्ण होती और कृष्ण राधा तब इस व्यथा का अनुभव कर सकते। तुलसी की सीता की भांति राधा कह उठती हैं- 'बिछुरत प्रानन की ह पयाना। हृदय वड दारुण रे पिया बिनु विहरि ना जाय।' वह अपनी सहेली से चिता सजाने का आग्रह करती हैं क्योकि इस दुख का दूसरा अत नही- सून सेज हिया सालय रे, पियारे दिन घर मोये आजि । विनती करऊ सहेलिन रे, मोहि दहि अगिहर साज ।। इतने पर भी राधा प्रियतम को दोष नहीं देती, कैसे देती भारतीय नारी को आदश जो ठहरी? वह अपने भाग्य को ही कोसती है-'हमर अभाग पिया नहिं दोष। कि तु क्तिनी वेदना है उस रमणी के हृदय में उसे तो वही जान सकता है जिसने स्वय अनुभूत किया हो। 'आनक दुख आन नहि जान' को पढकर तो स्मरण हो पाता है--'जाके पैर न पटे बिवाई, सो का जाने पीर पराई' और मर्म कराह उठता है। राघा का रतन धन खो गया है । राधा अपने को ही कोसती है कि यह उसके ही कर्मों का फल है । कि तु विद्यापति अपनी राधा को आशा बधाते हैं । राधा आशा छोडती नही पर यह आशा कच पूर्ण होगी साच सोच कर तन-मन कराह उठता है- लोचन धाय फेनाएल हरि नहि आएल रे, शिव शिव जिवयो न जाय आसे अरुझायल रे। राधा सदेश भेजती है--'हे काले बादल कमल सूख गया, भौंरा अब नहीं आता। प्यासा पथिक पानी भी नहीं पाता। सरोवर दिन पर दिन छिछला होता जा रहा है। समय की उपेक्षा कर यदि तुम बरसे तो क्या- 'क्या बरपा जब कृपी सुखाने । अवधि के दिन गिनते-गिनते राधा के नाखून घिस गय, गोकुल का नाम भूल गया पर कृष्ण नहीं आये । राधा अपनी सखी से कहती है-हे सखी, श्याम को जाकर समझा देना--प्रेम का बीज --अकुर रोप कर तूने इसे मरोर डाला। वह कैसे बचेगी तेल की बूद की तरह तुम्हारा अनुराग फैलता जा रहा है और रेत मे पडे जल की धूद की दुख प्रियतम का मुख देसकर दूर हो जाता है। हृदय की साध मिट जाती मिट जाती है। उसी प्रकार प्रियतम के मित जाने से विरह का विषम 62 विद्यापति एक अध्ययन तरह तुम्हारा दिया हुआ सुहाग गायब होता जा रहा है। वसत आया, ग्रीष्म आया, वर्षा आई, शरद बीता शिशिर और हेमन्त भी बीत गये पर तुम नही आये । सखी ने जाकर कृष्ण से निवेदन किया- लोचन नीर तटनि निरमाने, ततहि कमल मुखि करत सनाने । ह कृष्ण, तुम्हारे विरह म राधा नयनाथु जल मे स्नान कर रही है। एक चार तुम्हारे रूप सुधा का पान करले तभी वह जी सकेगी। सखी ने नाना प्रकार से राधा की विरह वेदना का वर्णन किया। राधा के प्रियतम सुनकर बेहोश हो गये, जब जग ता हृदय से प्रेमोद्गार की धारा फूट पडी और राधा की एक एक बात को सुधि कर रोने लगे। मखी ने आकर संदेश दिया कृष्ण आ रहे हैं । प्रतीक्षा को छोटी घड़ी का काटना भी मुश्किल हो गया मिलन की तैयारी करने लगी। वह कहती है-'प्रिय ज्यो हो आगन मे आयेंगे में मुस्कुराकर पलट जाऊगी के हंस पर हमारा आंचल पक्ड लेंगे में भावविभोर हो उठूगी- आंगने आवव जब रसिया, पलट चलब हम ईपत हसिमा । रसनागर-रमनी, क्तकन जुगति मनहिं अनुमानी। आवेशे आँचर पिया धरिये जावय हम यतन बहु करिये। राधा का खोया हुआ धन पुन प्राप्त हो जाता है । बसत का दाण है। आलिंगन से शरीर पुलकित हो जाता है । अधर सुपा के भान से विरह को पीडा सात हो जाती है। समुचित औषधि प्राप्त होने से असे व्यापि ज्वर ममाप्त हो जाता है। वह रात राधा के सोभाग्य को रात है। राधा का जीवन और यौवन दोनों सफल होते हैं। उल्लसित राधा कह , 'उठतो - बाजरजनि हम माग गवावल पेबल पियमुख पदा। जीवन-यौवन गपल परिमानल दादिति मेल निरददा। रासो जय अनुभव पूटती है तो राया कहती है- ससिनिपूछमि अनुभव मोय, से हो पिरोत अनुराग यमानत, तिलवित नूतन होय।

विद्यापति के बाव्य में कृष्ण तया राधा का स्वरूप"630 hd यही प्रीति है, वही अनुराग है जो क्षण क्षण नवन हो जिसमें बासीपन या अरुचि का कहीं नाम न हो। वह बहती है मैंने सारे जोवन उस पायो, देखा उसके वचन को सुना पर वे नित ही नवौ। लगते हैं। ऐसी अनुमति किसने की? यही तो प्रेम को सायक्ता है, प्रेम का सवस्व है.instar हजारी प्रमाद द्विवेदी के शब्दो मे-विद्यापति की राधिका आरम्भ मे अन्त तक मुग्धा किशोरी है । क्या पूर्वानुराग, क्या मान, पया मिलन,क्या वियोग सवत्र उनकी शिकायत है कि कोई उनके प्रेम को पतियाता नही, कोई उनके दुख को बांट नहीं लेता। हालांकि राह, घाट, गली, फूचे सर्वत्र उही के प्रेम की चर्चा चल रही है। इस राधिका म प्रेम का वह रूप शुद्ध भाव से फूट पड़ा है जो प्रेम-पात्र के अतिरिक्त रिसी और का नहीं देखता। विद्यापति ने राधिका की जिस प्रेममयी मूनि की कल्पना की है, उसमे विलास कलावती का रूप स्पष्ट ही प्रधान है पर उस विलास के पीछे सवत्र यह भावना छिपी हुई है कि प्रिय इससे प्रसन्न हो। राधिका का रूप भगवान के लिये है, यौवन भगवान के लिये है, प्रेम भगवान के लिय है, विलास भी भगवान के लिये है--एक शब्द म उहोंने भगवान की सतुष्टि के लिये ही विलाम कलावती का रूप धारण किया है । सारांश यह है कि विद्यापति की राधा रूप गुण की खान और सौदर्य की सजीव प्रतिमा है, एकनिष्ठ प्रेम की अधिष्ठात्री देवी है और केलि कलावती प्रेम के अवतार कृष्ण की आह्लादिनी प्रिया है। उनकी केलि मे कुतूहल है योवन उद्दाम, शृगार की लहरे तरगायित होती हैं। इनका कोमल कलेवर जितना ही सुदर और मासल है प्रेम की ज्वाला मे जल- कर मन भी उतना ही निमल हो गया है। निसदेह ये विशुद्ध शृगार की मानवी देवी हैं। ये रूप से पदिमनी, हृदय से पदम और पूर्णतया अपने नागर कृष्ण के अनुकूल हैं। भय हैं विद्यापति जि होने सौदय की देवी और देव रत्न का अनुपम काव्य चित्र खीच कर रमिको और भक्तो का मन मोह लिया है और साहित्यप्रेमियो को रमराज के प्रशात सागर मे गोते लगाने का अवसर प्रदान किया है। इस सदम मे राधा-कृष्ण सम्बध को व्याख्यायित करने वाली वैष्णव परम्परा पर भी सक्षेप मे विचार कर लेना अनावश्यक न होगा। कृष्ण 64 विद्यापति एप मध्ययन दास कविराज ने तय से ममान हो रापा तत्व का निरूपण दिया है। कृष्ण की तीन शक्तियां है उनमे से एक आहादिनी है। यह शक्ति र से प्रणय की विकार है। इस शक्ति का सार प्रेम है। प्रेम का सार भारई और भाव को पराकाष्ठा को महामाय पहते हैं। सपा महाभाव स्वरूप है, सर्वगुण सम्पन है और कृष्ण-माताओं में शिरोमणि है। राधारा पाय कृष्ण की सकल योछाओ को पूरा परना है। इसी को वे आराधना कहती हैं इसीलिये उनका नाम राधिका है। कृष्ण के अवतार के माप अशिनी राधा भी अपने तीन गुणों का विस्तार करती हैं-लक्ष्मी गण महिषी गण और पाता गण । प्रथम में उनका वंभव है, द्वितीय में प्रभाव है और सतीय मे अज देवियां हैं। राधा इही की सहायता से कृष्ण को एक का आस्वादन कराती हैं। राधा गोविदका आन द प्रदान करने वाली गोविद मोहिनी हैं। कृष्ण के अतिरिक्त इनवे लिये जीवन और जगत कुछ भी मही है। ये जगतमाता हैं, कृष्ण जगत मोहन हैं । राधा इहे भी मोहित करती हैं अत वे श्रेष्ठ हैं। ये पूण शक्ति हैं और कृष्ण पूण शक्ति मान। इन दोनो मे मगमद और उमकी गघ यो तरह अभिन सम्बध है। ये दोनो एक ही स्वरूप हैं। ये केवल लीला रस आस्वादन के लिये दो रूप धारण किये हैं। यह समस्त समार राधा का धाम है और समस्त शक्तियों उनको दासियो । राधा के गुणो और सौभाग्य की आकाक्षा सत्य भामा करती है। गोपियां इनसे ब्रजकला सीखती हैं। लक्ष्मी इनके सौदय की वांछा करती हैं, अरुघती पतित्रत सीखती है और कृष्ण भी इनक अधीन हैं । ऐसी परम श्री राधा का गुण गान शब्दों की शक्तियों से परे में हिदी वैष्णव साहित्य म कृष्ण सहघरी राधा की भावना इसी प्रकार 1 ह्लादिनी सार प्रेम, प्रेम सार भाव भावैर परमाकाष्ठा नाम महाभाव। महाभाव स्वरूपा श्रीराधा ठकुरानी, सवगुण खान कृष्णकाता शिरोमणि । -चत य चरणामत परि० 4 पृ० 24 विद्यापति के काव्य मे कृष्ण तथा राधा का स्वरूप 65 - की है। राधा रूप की राशि, सुख की खान, मानन्द की घाम तथा गील और गुणों की पुण्य सलिला हैं। जगनायक जगदीश की प्रिय, जगत की माता और जगरानी हैं। पुरुषोत्तम ही राधा कृष्ण दो रूप बना कर आये हैं। विद्यापति इनफे चरणो पर शत शत लक्ष्मी और कामदेव को न्यौछावर करते हैं। गौडीय भक्तो की राधा परकीया हैं और ब्रज भक्तो की स्वकीया। विद्यापति ने कृष्ण और राधा की काव्य सपदा को सीधे जयदेव से लिया है। जयदेव ने राधा-कष्ण के प्रेम को परकीया भाव से उपस्थित किया है। कि तु प्रेम के अबाध प्रवाह के कारण यह भाव प्राय लुप्त हो गया है। जयदेव की राधा प्रगल्भा है और कृष्ण बहुवल्लभ । वे गोपियो के साथ रमण करते हैं फिर भी राधा उही को पाने के लिये विकल रहती है और वे भी राधा के विरह मे यमुना के तट पर धूल मे लोटते दीख पडते हैं । 'गीत गोविद के प्रारम्भ मे ही जयदेव ने अपने काव्य भाव को स्पष्ट कर दिया है- यदि हरिस्मरणे सरसे मनो, यदि विलास कलासु कुतुहलम। मधुर कोमल कात पदावली, शृणुतदा जयदेव सरस्वतीम। जयदेव ने राधा कृष्ण के प्रेम मे भक्ति और शृगार की मिश्र धारा प्रवाहित की है जिसमे निश्चित ही मांसल सौ दय और मानवी अनुभूति का वेग प्रखर है । राधा और कृष्ण की इसी मिश्र परम्परा को ग्रहण किया और अपनी प्रतिभा के बल पर अभिनव राधा कृष्ण का सजन कर साहित्य जगत को कृताय कर दिया। विद्यापति के राधा और कृष्ण इसी सुदीघ वेदोत्तर एय वैष्णवी परम्परा की उपज हैं। इनमे गगन को दिव्यता और पृथ्वी पी मांसलता को भाव जगत के अनुराग से कवि ने ऐसा घोल दिया है कि वे गगा यमुगा ये सगम की तरह कुछ दूर तक तो दो दिखाई देते हैं पितु उगा माग गगा यमुना को अलग करना सभव नहीं है। इसीलिये विद्यापणिय कृष्ण लौकिक हैं अथवा अलौकिक, उनका प्रेम दिव्य है उनका मिलन एक महाशक्ति से उत्पन दो शामितमामा

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प्रेम मी प्रति और येग ये कारण दारूप एक भाव हो गये हैं, यह निर
मरना पठिन है। यस इतना ही यहा जा सकता है कि सोप और प्रेम
सोयरा जोटी पारम्परिक दिव्य मापताओ के होते हुए भी गामार
पन रे लिये सोय और प्रेम मादा पोर आलादर स्या है।
मिन होते हुए भी अमिन है और हृदया भी अमिता हो ITE

गीति परम्परा और विद्यापति पदावली । जीवन वे विराट शूग से हप और विषाद के सगीत स्रोत निरन्तर करते रहते हैं । प्रस्फुरण के इसी तत्व को सघनतम अनुभूति के साथ ग्रहण पर प्रथम चेता ने अपनी पूण त मयता की स्थिति में इसे भाषा का कलेवर दे छद विधान के सहज परिधान से संवारा तो गीति काव्य की प्रथम रश्मि से घरा पुलकित हो उठी होगी। यही कारण है कि साहित्य और सगीत की सम्बन्ध-परपरा अनादिकाल से अनवरत प्रवाहित होती आ रही है। युग बोध के अनुकल इसके स्वरूप और विधान में परिवतन अवश्य हुए हैं पिन्तु इसकी आन्तरिक एवता कभी नष्ट नहीं हुई। काव्य-क्षेत्र में यह धारा दो रूपो में प्रवाहित हुई है-साहित्यिक स्वरूप और लोकरूम में । अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार कुछ कवियो ने साहित्यिक गीति परम्परा के प्रवाह को निरन्तरता प्रदान की तो बुछ ने लोव-गीतो की परम्परा को, कि तु कुछ महान कवि ऐसे हुए हैं जिन्होंने इन दोनो स्वरूपो यो अपनी विशाल याहुओं मे समेटा है और उनके उदार हृदय से दोनो ही पाराए विपुल वेग के साथ प्रवाहित हो विद्वत महली और लोक जीवन दोनो को रससिक्त किया है। विद्यापति उन महान कवियो मे हैं जिन्होंने अपनी प्रतिभा और जीवन के व्यापक अनुभव से इन दानो गीति धाराओं को अभूतपूर्व पाक्ति प्रदान को है। यदिक युग के आपार्यों ने जो कुछ भी अनुभव किया उमे भावमय सगीत मे व्यक्त किया है । उही कामपन है देवताओं का आश्रय न तो मग या न यजुस, देवताओं का माश्रय येवल 'सामा था' अर्थात् सगीत।

68 विद्यापति एप अध्ययन प्राथना करते हुए वे कामना करते हैं कि-'मुझमे सगीत हो, कविता हो, यश हो, विद्या हो।' इसी भाव से आवायं गौह ने गीति काम्प को काव्य अर्द्धनारीश्वर कहा है । नाटय शास्त्र म गीति और याव्य की अभेद स्थिति बताई गई है और कहा गया है कि कोई भी शब्द छदाहीन या छद गन्हीन नहीं होता। 'सगीत रत्नाकर' म तो एक गीत का नाम 'गद्य' भी है । तात्पर यह है कि भाषा और संगीत का महज सम्बय है, खासकर कविता को भापा का प्राण तो राग है । सहृदय और चेतन को यही सगीतमयी अभिव्यक्ति स्वर साधकों में सगीत, लोग जीवन मे गीत और काव्य के क्षेत्र मे गीति के नाम से अभि- हित हुना। काव्य चिंतन की विकासावस्था मे काव्य दोधाराओम विभक्त हो गया-विषय प्रधान (माबजेक्टिव) और व्यक्ति प्रधान (सबैजेक्टिव) । पाश्चात्य धारणा से प्रभावित कुछ विद्वान व्यक्ति प्रधान काव्य में गीति तत्व को उपस्थिति स्वीकार करते हैं, विपय प्रधान का य मे नही। किंतु यह धारणा प्रामक है। इसे व्यक्तिवादी मनोविज्ञान ने शक्ति प्रदान की है । इस धारणा के अनुसार तो सूर तुलसी जैसे महान कवियो को अधि वाश काव्य सम्पदा गोति के क्षेत्र से बहिष्कृत हो जायेगी कि तु गीति तत्वो के आधार पर यह सम्भव नही है । कोई भी कविता न पूणतया वस्तु प्रधान होती है न व्यक्ति प्रधान । प्रो० वात्स्यायन का कथन है कि दोनो ही काव्य स्थितियों में कवि तटस्थ होता है प्रथम मे उसको तटस्थता वस्तु के प्रति होती है और द्वितीय मे व्यक्ति के प्रति वस्तु प्रधान काव्यकार का 'स्व इतना विराट होता है उसमे सम्पूर्ण विश्व का स्व समा जाता है । तुलसी का 'स्वात सुखाय' विद्यापति, सूर तथा भय महान कवियो ने काय मे लोक जीवन को अपरिमित व्याप्ति इस तदाकार व्यापार का अकाटय प्रमाण है। जहाँ 1 There is the poetry in which the poet goes out bimo self, mingles with the passion and action of the world without and deals with what he discovers there with httle reference to his own individuality An Int to the study of Lit page 96 सकता। गोति परम्परा और विद्यापति पदावली स्वर है वहा सगीत, जहाँ भाव है वहाँ गीति र इन्हललग महावियागी आनद और अश्रु की तीव्र अनुभूतियां जो स्फुरण वे लिए विजन थी। उन्ही से गीति का जम हुआ। आदिकवि के हृदय से वह 'मा निपाद' बनार फूट पड़ा। पति ने पहले वियोगी कवि के हृदय से अनजान बहते हुए उसे देखा। महादेवी जी के शब्दो मे~सम्भव है जिस पकार प्रभात को सुनहली रश्मियो को छूपर चिडिया आनन्द से चहक उठती है, जिस प्रकार मेघ को घुमडता हुआ देख कर मयूर नाच उठता है, उसी प्रकार मनुष्य ने भी पहले पहल अपने भावो का प्रकाशन ध्वनि और गति के द्वारा क्मिा होगा। यूरोपीय विद्वान एच० टी० पद का भी यही मत है कि- गीति-काव्य कविता का सर्वाधिक महज प्रकार होने के कारण निश्चित रूप से सवप्रथम उत्पन्न हुआ। काव्य के अय चेष्टाम य रूप इसके बाद उत्पन हुए होंगे। साहित्य की गीति-परम्परा अत्यत प्राचीन है। वैदिक साहित्य मे 'ऋक' और 'गाथा' इसके दो रूप मिलते हैं। 'क' देवी देवताओ की स्तुति से सम्बधित है और गाया मानवीय सुचष्टाआ की अभिव्यक्ति से । सामवेद तो गीतो का आदि सरोवर है । इस सरोवर की परम्परा परवर्ती संस्कृत साहित्य मे जयदेव के पूर्व लुप्त क्यो और कैसे रही विचारणीय प्रश्न है। सभवत आभीरो के आगमन के साथ ऐहिक भावना मे लीन अन्य जातियां भी भारत में आयी। उनकी अति शृगारिक एव मासल अभि व्यक्तियो के कारण सस्कृत गीति साहित्य का पुनीत अचल उनसे छूट गया जिस पुन पकडकर सगीत की अजस्त्र धारा प्रवाहित करने का श्रेय जयदेव के गीत गोविद को मिला। बौद्धो की घर गाथाओ मे भी गीति तत्व चतमान है । प्राकृत और अपन श साहित्य मे भी गीतो को परम्परा अविच्छिन है। युद्ध और प्रेम ही इन गीतो के प्रमुख विषय हैं साथ ही इनमे बौद्धो, जनिया और नाथों की सम्प्रदाय सम्पदा भी अक्षुण है। हिदी साहित्य का आदिकाल चारण गीतो, जि हे प्रबध गीतो की समा दी जा सकती है, से परिपूर्ण हैं । रासो काव्य तथा आल्ह खण्ड आदि शृगार और वीर परम्परा के श्रेष्ठ गीति-काव्य हैं । इस युग की साध्य वेला 70 विद्यापति एक अध्ययन गया। इहीं 1 मे मिथिला को सघन अमराइयो मे कवि कोकिल विद्यापति के गीत गूज उठे जिनको स्वर लहरी मे समस्त उत्तर भारत आप्लावित हो के प्रभाव से गीति साधको की साधना, भक्तो का भाव तत्व और उपासों की उपासना पद्धति वन गई। गीति माव्य की यह मिश्र धारा भक्तिकाल, रीतिकाल से प्रवाहित होती हुई आधुनिक काल मे छायावाद को अनुप्राणित करती हुई नव गीतवाद के कवियो के मानम को उद्वेलित किया। मानव हृदय में जब तक रागात्मक प्रवृत्ति जीवित रहेगी साहित्य मे गोति-काव्य को धारा निर तर प्रवाहित होती रहेगी। विद्यापति के बाद तो गीतो का ऐसा स्रोत प्रवाहित हुआ कि सम्पूर्ण हिंदी साहित्य गीतो से भर उठा। कबीर, तुलसी, सूर और मीरा के पद लोकमानस मे गूजने लगे। भक्तिकाल मे रहस्य और लीला गीता की प्रधानता रही। रीतिकाल में गीति काव्य का मानक बदलालौकिक शृ गार से राज दरवार और जन जीवन की धडकनें पुलक्ति होने लगी। इस युग मे रीति मुक्त कविया को छोडकर भाव प्रधान एव ममस्पर्शी गीतो का प्राय अभाव रहा। क्ला और प्रदशन का बोलबाला रहा। काव्य की आत्गा उपेक्षित रही। आधुनिक काल में बदलती हुई मनो वृत्तियो, बाह्य प्रभावो के फलस्वरूप गीति काव्य का चरम विकास हुआ। कवि सम्मेलनो का युग आया ओर गीतिकारो को सुनने के लिए कवि मची का विकास हुआ। किंतु स्वरलहरी की प्रधानता के कारण धीरे धीरे कविता की गुणात्मक वत्ति घटने लगी। वतमान स्थिति म तो ऐसा लगने लगता है कि इन मचीय कवियों ने राजनीतिक पाना पहन लिया है और कविता की मूल प्राणवत्ता समाप्त होती जा रही है । वतमान काल के सिने गीतो मे भी गीति-तत्व का अच्छा विकास हुआ है और इनकी लोकप्रियता भी बढ़ी है। गव के युग में आज गीतों का बोलबाला है । व्यावसायिक विनापन तक के लिए सुरीली तानों और प्रभावशाली गीत-टाहो का प्रयोग हो रहा है। प्रतीत होता है कि पूर्ण चकार लगाकर गीतों का आदि युग प्रत्यायत्तित हो रहा है। इन गीतो पामर्गीकरण अनेन दृष्टियों से किया जा सकता है- 1 कालक्रम को दष्टि से-इम्यू० हारिम ने भारतीय गीतों को गीति परम्परा और विद्यापति पदावली 71 चार भागों में विभक्त किया है-- (क) वैदिक गीत (३० पू० आठवी शताब्दी से चौथी शताब्दी तक)। (ख) भक्ति गीत-(३० पू० चौथी शताब्दी से पहली शताब्दी तक)। (ग) प्रेमगीत-~मिलन और विरह को अनुभूतियो से युक्त । (घ) मिश्र गीत आध्यात्मिक, रहस्य, शृगारिख तथा वासनात्मक । 2 विकास की अवस्था के अनुसार- (1) संगीत प्रधान तथा काम्य के आग्रह का अभाव । (1) सगीत-काध्य मे भेद और अलग अलग अस्तित्व । (u) विषय तथा विधान का एकीकरण कता का अभूतपूर्व विकास। 3 अभिव्यजना के आधार पर- अभिव्य जना की दृष्टि से इसके दो रूप विकसित हुए, (1) साहित्यिक गीत तथा (u) लोकगीत । साहित्यिक गीतों म भाव भाषा शैली आदि का स्वरूप सुघड एव परिमाजित होता है। जबकि लोकगीतो का रूप अनगढ, सरल, सहज और स्वाभाविक होता है । यह जीवन के समग्र भाव स्वफुरित अभिव्यक्ति होता है, उसमे भावना की माद्रता होती है, उमडन होती है और इसमे जीवन की ताजी सोधी सुगध होती है और होता है निश्च्छल निई द प्रवाह जबकि साहित्यिक गीतो को कला की पनी छेनी के अनेक प्रहार सहना होता है और औप चारिक सौदय की सीमामो मे सिमट कर उसे चलना होता है और कवि की साँचाओ मे ढलना पडता है । लोकगीत उस बीहड वन और अनन्त पारावार की तरह है जहां अभिव्यक्ति, विराटना और मौलिकता पर कोई अकुश नहीं होता, जहाँ सुरूपता और कुरूपता एक ही पालने मे झूलते हैं और मा प्रकृति उहें स्नेह से झुलाती है। पर साहित्यिक गीत उस आनद उपवन की तरह हैं जहाँ माली कवि सीमोलघन करने वाली डालियों को माय सुरुचि की सीमा मे बांधने के लिए निरपुश होकर काट देता है । लोकगीत वस्तुत उस मावि सस्कृति और समाज के प्रतिनिधि हैं 72 विद्यापति एवं अध्ययन जो नागरिक वातावरण और आरोपित क्लारमर साहित्यिकता से मुन और दूर हैं, और मूलत प्रकृति के विशाल प्रागण में निवास करते हैं । यही कारण है कि लोवगीत किसी भी देश की जन सस्कृति, विचारधारा विधन पद्धति तथा जीवन शैली की जानकारी मे साहित्यिक गीतो को अपमा अधिक सहायक होते हैं। लोकगीतो को श्रेष्ठता भावनाआ के सहज उद्रेक म होती है उनमे कला की कृत्रिमता नहीं होती जबकि साहित्यिक गीतों मे भाव कला का श्रेष्ठ समवय होता है, भाषा का परिमार्जित स्वरूप हाता है और काव्य विधान का प्रयत्नज अनुसरण । एक का स्वरूप ग्रामीण है प्रकृत है जबकि दूसरे का स्वरूप कलात्मक और नागर । 4 विषय के अनुसार पाश्चात्य विद्वानो ने विषय के अनुसार गोति काव्य को निम्नलिखित रूपो म विभक्त किया है- 1 स्तुतिपरक (Hyunns) 2 नोति या उपदेशपरक (Soloman songs) 3 राष्ट्रीय (Patriotic) 4 प्रणय गीति (Love Lyries) 5 नृत्य गीति (Ballads) 6 शोक सम्ब घी (Elegy) ? गौरव-गोति (ode) 8 उत्सव सम्बधी (Convival Lyries) १ चतुष्पदी (Sonvets) 10 सामयिक (Occasional Songs) लोकगीतों का वर्गीकरण हॉ० कृष्णदेव उपाध्याय ने लोकगीता को -~-सास्कारिक, रसानुभूतिक, ऋतु प्रधान, जाति प्रथानुसार तया श्रम या कपि काय के माधार पर विभाजित किया है। डॉ० रामनरेश त्रिपाठी ने भारतीय लोकगीतो को सरकार सम्ब थी, ऋतु सम्बपी, भिखमगो के पीत, मेला गोत जाति गीत, गीत कथायें तथा अनुभव के गीत आदि अनेक भागो म विभक्त किया है। डॉ. परमारने भारतीय लाक्गीतो को सामाय और वैज्ञानिक दो भागो म विभक्त किया है। सामाय मे जातियो, सस्कारों, प्रयाओ, धार्मिक विश्वासो, काय सम्ब पो तथा रस सम्बन्धी गीति परम्परा और विद्यापति पदावली 73 गीतो को उहोंने लिया है और वैज्ञानिक मै मुक्तक, प्रबध तथा ऐति- हासिक आदि गीतो को। कहने की आवश्यकता नहीं कि लोकगीतो की परिधि अत्य त व्यापक है। वे हमारे जीवन की हर श्वास में बसे हुए हैं । जाम से लेकर मृत्यु तक के प्रत्येक सस्कार, भावना और प्रयास मे उनकी परिव्याप्ति है। समाज के रुधिर और प्राणो की उनमे गति है। मैथिली गीतो का वर्गीकरण डॉ० तेज नारायण लाल ने जीवन के मुरय पांच आदर्शों के आधार पर किया है। यही वर्गीकरण विद्यापति के गीतो पर भी लागू होता है। वे आधार है- 1 धार्मिक-तत्र मत्र, जादू टोना, शिव, शक्ति, विष्णु की उपासना 'तथा नदी वक्ष आदि प्रकति तत्वो की उपासना से सम्बधित । 2 पारिवारिक–दाम्पत्य जीवन तथा जन्म से मृत्यु तक होने वाले सस्कारो से सम्बन्धित गीत । 3 राजनैतिक-उत्तम शासन व्यवस्था, राष्ट्रीय चेतना, वीरोपासना आदि से सम्बद्ध। 4 रहन सहन के आदश-कतन्य परायणता, सादा जीवन, श्रेष्ठ विचार तथा रीति-नीति आदि से सम्बद्ध। मिथिला में लोकगीतो की प्रचलित परम्परा म जिन गीतो की प्रथा अब भी प्रचलित है उनका सक्षिप्त परिचय इस सन्दर्भ में आवश्यक है- सस्कार सम्ब धी गीत-सोहर या सोयर-जोज मोत्सव पर गाया जाता है। सोहर शब्द सूतिका का ही अपभ्रश है । इसम लसना होरिलवा आदि का टेक होता है । इन गीतो के साथ नवजात शिशु के कल्याणार्थ देवी आदि के गीतो का भी प्रचलन है। सम्मरि-यह शब्द स्वयवर का विकृत रूप है। इसमे सीता, लक्ष्मी, उमा, रुक्मिणी, राम, जगनाथ आदि के नामो का उल्लेख होता है । लग्न गीत-विवाह से सम्बधित होते हैं। योग-वर-क्या का प्रेम सूत्र में बांधन के लिए गाया जाता है उचीती --भाजन के समय वर के स्वागत में गाया जाता है । समदाउन- सवाद या सम्बोधन का स्वरूप है-बेटी के विदाई के अवसर पर इन करुण गीतो का प्रयोग होता है। तिरहुती-मिथिला के विशेष गीत हैं - 74 विद्यापति एक अध्ययन जिसमे प्रेम की प्रगल्भता, सरलता और महजताशी अभिव्यक्ति होती है। मटीती-मृत्य गीत इसमे विधवा का करुण विलाप, दीन दशा तथा मल्ल के अवसर, शोक संवेदना के करुण प्रसग होते हैं। मिथिला मे इन गीता को रचना कम हुई है। बटगमनी मेला बाजार हाट या तीथाटन आदि पर जाते समय स्त्रियाँ इन गीतो को गाती है। इसके प्रवत्तक विद्यापति इन गीतो के प्रमुख लोक कवि हैं मंगनी राम, विद्यापति, उमापति, हरिनाथ, भानुनाथ रमापति, वशीधर, चद्रनाय, घरजपति, हर्पनाथ, दुखभजन, यदुनाथ, सहस्र राम तथा बबुजन आदि। धार्मिक गीत-धार्मिक गीतो मठ के गीत, भगवतीगीत, महेशबानी, विष्णुपद तथा नदी के गीत आते हैं। इनमे महेशबानी जिनमे शिव पावती के जीवन प्रसग हैं मिथिला मे बहुत प्रचलित हैं। इन गीतो के प्रमुख रचयिता हैं विद्यापति, हपनाथ तथा चदा मा इत्यादि । इन गीतो क अतिरिक्त बिसहरी, जगरनथुअा, ब्रह्म, देवास, झिझिया, गया, कालीबगी, हाइन चक्र झरनी तथा जादू टोना के गीत भी मिथिला में प्रचलित हैं और वतमान वैज्ञानिक प्रगति और विकास के बावजूद भी जन जीवन की उनमें अटूट विश्वास है। पेशी के आधार पर प्रचलित गीतो मे पाचर, जंत सार, रोपनी, खोदा पाटनी, पचौनी, दसोनी पंवरिया आदि के गीत प्रचलित हैं। ऋतुओ मे सम्बधित फाग घेतावर, वप्त त, मधुमावनी, वरमाइत, पावस, मल्हार, सांझ, प्रभाती तथा वारहमामा मादि गीत प्रचलित हैं । सामाजिक आर्थिक आधार पर नाचारी, योशी की बाढ अकाल प्रगतिवाद, सत्याग्रह पचायत राज, रामराज अग्रेजा को विदाई तथा अन्य जागरण गीतों का प्रचलन है । नाच के गोतो म झूमर जट्ट जट्टिन, दयामा चकेवा, रास, नआ तथा विपक्ष के नाच गीत आदि आते हैं। अय गीतो के अतर्गत-- frशु गीत, लोरी, विरहा, निगुण, कीर्तन, उदासी, ग्वालियर, नवादा तुलसी उद्यापन तया प्रदध गीत~ोरिष, सलहेस, दीनामनी रन्न गरदार आदि आते हैं। सष्ट है कि लोकगीतो पोष्टि से मिथिला के जन मानस की भूमि गीति परम्परा और विद्यापति पदावली 75 अत्यन्त उर्वक रही है । विद्यापति के पूर्व से लोकगीतो की सम्पनता की धारा प्रवाहित थी विन्तु विद्यापति ने इस परम्परा मे अपना योगदान कर इसे सुदर, भावनिष्ट और कलात्मर बनाया तथा लोक भावना से सम्पन गीतो की एक नई धारा प्रवाहित की जो उनकी लोकप्रियता के कारण सामा यतया गीति काव्य का स्वरूप अत्यत व्यापर एव सूक्ष्म है । इसे परिभाषा की परिधि मे सीमित करने का वाय सरल नहीं है। प्राचीन मारतीय साहित्य में तो काव्य से अलग इसके अस्तित्व की कल्पना ही नही थी पर पश्चिमी प्रभाव के कारण जब से इसके अलग अस्तित्व को सभावना बनी है। तब से विद्वानो तथा कला ममज्ञो ने इमे परिभाषित करने का प्रयास किया है यही आकार व्यक्तिगत अनुभूति और आत्माभिव्यजना के गीति काव्य का आवश्यक तत्व मान लिया गया कि तु परिभाषा के लिए तो समग्र दष्टि की आवश्यकता होती है। हम कुछ विद्वानो की परि. भापाआ पर विचार कर क्सिी सामाय निष्कप पर पहुंच सकते हैं- 1 गीति काव्य वह कविता है जो लायर बाजे के साथ गाई जा सके।' 2 गीति काव्य अचेतन की सहज अभिव्यक्ति है। 3 गीति काव्य कल्पना की एक गति है जिससे ससीम की आत्मा असीम से मिला का प्रयास करती है। 4 गीति काव्य ही वास्तव मे कविता है। कृति मे जितनी ही अधिक 1 A poem to be sung to the Lyre-Shepley's Dictionary of world Literary form 2 Natural product of an Unconscious Art अप्रेजी विश्व- कोश--14 वां स० 3 The lyric-a movement of fancy by which the spirit Strives to life itself from tunited to the universal H Lonze outlines of Aestheties, Page, 99

76 विद्यापति एक अध्ययन
काव्यात्मकता होती है, उसमे गीति तत्व उतना ही अधिक होता
5 गीति काव्य कवि जगत के सारे तत्वो को अपने मे समाहित करता
है। अपने व्यक्तिगत भावो के प्रभाव से उसे पूर्णतया आत्मसार
करता है और इस मात्मानुभूति को गीतात्मक शैली म अभिव्य
करता है।
6 गीति एवं लिरिकल अथवा रोमाची कविता का नाम है । म
कृति विशेष जिसके शब्द पूर्व निर्दिष्ट सगीत के अनुरूप गढे जावे
हैं अथवा जो सगीत के अनुरूप बन सके।
लिरिक अथवा गोति माय से प्रयोजन उन कवितामो से है जिसमें
कवि ने अन्तर्वादी शैली अपनाकर अपने अतर्मन की भावनाओं
का परिचय दिया हो।
8 साधारणतया गीति व्यक्तिगत सीमा म तीर सुख-दुखात्मा
अनुभूतियो का वह शब्द रूप है जो अपनी ध्वन्यात्मता म गेय हो
सके।
4 Pure poetry is that which has essenceally poetic
quality is lyric poetry
Every Composition becomes in evasingly lyrical as it
becomes more poelce
--Method and materials of lit Criticism Page 3
5 That lyrical poetry is really nothing more tha:
another name for Poetry itself, that it oncludes all
the personal and enthusiastic part of what lives and
breathes in the art of versc
-~-Encycloraedia Britanica 14th Ld Article lyrical
Poetry by llcage!
6 पेन्टर7-1938
7 गीगती-रोपण
8 धोतीमहावीर
9

गीति परम्परा और विद्यापति पदावली 77 १ श्रीमती सरोजिनी नायड़ का क्थन है--कवि केवल स्वप्नद्रष्टा नही होता है उसका हृदय विश्व भाव का मुकुर होता है । उसके उल्लास गोतो मे विश्वात्मा के मुखरित आनन्द की प्रतिध्वनि होती है और उसके विषाद-गीतो मे मानवता के अश्रु अभिव्यजित होते हैं। इन परिभाषाओ म गीति तत्व का सम्बध क्रमश लायर बाजे, कल्पना को विश्वात्मो मुखी गति, काव्यात्मकता, कवि जगत के समस्त तत्व, संगीतानुरूप रोमाची कविता, अतमन भावनाओ को अतवादी शैली, सुख-दुख अभिव्यजनात्मक ध्वनि प्रधान शब्दरूप तथा कविभाव को विश्वभाव मे स्यापित किया गया है। इन परिभाषाओ मे चाल्स, हीगेल, महादेवी एव नायडू की अभिव्यक्तियो मे अपेक्षाकृत स्पष्टता तथा व्यापकता ह और इनमे गीति तत्व के लक्षणो का सकेत मिल जाता है। इनका साराश यह निकलता है कि गीतिकाव्य वह कविता है जिसमे लोक या परलोक को भावानुभूति की सघनता, अभिव्यक्ति की तरलता मे गति एव अनुकूल ध्वयात्मकता हो। कविता भाव में सबके भाव का अतर्भाव हो चाहे वह कवि की व्यक्तिगत अनुभूति हो अथवा वस्तुगत।' व्यक्त मतो एव विचार-मथन के फलस्वरूप गीति-काव्य के तीन प्रमुख तत्व निर्धारित होते हैं--(4) ध्वनि तत्व, (ख) बिम्म अथवा अभि- व्यक्ति तत्व तथा (ग) रस अथवा रागात्मक अनुभूति तत्व । इही तत्वो के आधार पर विद्यापति के गीतो की समीक्षा अपेक्षित है । उनके गीतो में इन तत्वो का कहाँ तक समावेश है और उन्हें क्तिनी सफलता मिली है, यही प्रतिपाद्य है। - 9 'A poet is not only a dreamer of dreams, his heart is the mirror of the world's emotions, his songs of gladness are the echoes of the world's laughter, his song of sorrow reflect the tears of humanity' Sarojine Naidu Quoted by Rambriksh Benipuri Vidypati go 96

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गीति परम्परा और विद्यापति पदावली 79 (ख) बाजत द्रिगि द्रिगि धौद्रिम द्विमिया । नटति कलावति भाति श्याम सग, कर करताल प्रबंधक ध्वनिया ।। डम डम डफ डिमिक हिम मादल, रूनु-अनु मजिर बोल। विपिन रन रनि बलआ कनकनि, निबुधन रास तुमुल उतरोल ॥ बीन रबाब भुरज स्वर मडल, सारिगम पधनिसा बहुनिधि भाव । घटिता घटिता धुनि मृदग गरजनि, चचल स्वर मडल करु राव ।। स्रम भर गलित लुलित कबरी युत मालति माल विथारल मोति । समय बस त रास रस वर्णन, विद्यापति मति छोभित होति ।। (-रास, बसत 184) उदघत पक्तियो मे स्वर का प्रवाह तथा शब्दो की ध्वनि अनुपम है। यह सौ दय रीतिकालीन कवियो की तरह शब्दो की सचेष्ट कसरत मात्र नहीं है। लय एव नाद सो दय के पीछे भावाभिव्यक्ति और अभिव्यजना का भी सुदर समावेश है। न दकन दन मे कृष्ण की आनद विधायिनी मूर्ति है तो साथ ही प्रतीक्षा की घडियो मे घडक्ता हुआ उत्सुक एव भीरू हृदय भी। द्वितीय पद मे लय के साथ अलकार की छटा है तो ततीय पद मे नायक का सौदय और चतुथ पद मे बस त का नवल स्वरूप। नाद सो दय की दष्टि से देवी वदना का गीत अत्यात भव्य है। शब्दो मे नाद का सौदय, क्रुद्ध काली का रौद्र रूप और साथी विरोधी रसों का अनुपम समवय है। दूसरा गीत तो सभवत साहित्य में अपने जोड का अकेला होगा। गीत, नृत्य और सहयोगी वाद्यो का समवेत स्वर शब्दो के प्रयोग मात्र से उपस्थित कर देना विद्यापति की ही कला की विशेषता है। इसे यदि सस्वर पढा जाय तो नत्य, गीत और वाद्य का सामूहिक आर्केस्ट्रा बजने सा लगता है। विद्यापति शन्दो के चयन मे इतने पटु पे दि इनके गीतो का प्रत्येक दान्द वाछित प्रभाव डालता है। भाव भाषा और गीति की मानो यौवन- घोली और दामन का सम्बध हो। प्रेम के मनोहर स्वप्नो की भांति पद वियाम मनोहर और मधुर है। वातावरण एवं भाव के अनुकूल ही गीतो पा छद एव शब्द विधान है। मनोदगा ये अनुकूल सगीत की लहरियां विद्यापति के इशारे पर पिरवती प्रतीत होती हैं । पदावली के सभी पद 80 विद्यापति एक अध्ययन राग रागिनियो की कसौटी पर खरे उतरते हैं । राजा शिवसिंह के दरबार म कलावत नामक गायक इन गीतो की स्वर साधना करता था और उहें रागो म ढाल कर दरवार मे सुनाया करता था । डा० सुभद्र झा ने अपने 'विद्यापति गीत सग्रह' मे रागो के अनुसार पदो का सपादन किया है और उनकी सूची भी प्रस्तुत की है मालव राग-1 से 56 पद संख्या तक, धनछी 57 से 130 तक, असावरी 131 से 135 तक, मलाकी 136 146 तक, सामरी 147, हिरानी-148 154 तक, केदार 155-157 तक, कानडा 158-162 तक, कोला-163-194 तक, सारगी 196-202 तक तथा गूजरी-203 से 207 तक । इसके अतिरिक्त बस त, विभास, नाट राग, ललित, परली आदि का भी सकेत है। गोति काव्य का दूसरा मुग्य तत्व है बिम्ब । कवि अनजान विद्यायक होता है। भाषा-भाव और अलकारी को सहज योजना से वह एक नवीन सष्टि करता है। वह अपनी सूक्ष्म एव सजग कल्पना के माध्यम से पाठक के मानस पटल पर एक ऐसा सजीव भाव चित्र प्रस्तुत करता है कि उस भाव का बिम्बात्मक स्वरूप पाठक के हृदय में घर कर जाता है। भाव की यह विम्बात्मकता या अनुभूति की साकारता ही काव्य शिल्प की चरम उपलब्धि है । विद्यापति मे इस उपलब्धि के दो रूप मिलते हैं-रूपचित्रण तथा भावविम्बन । स्पचित्रण मे वातावरण पकृति अथवा मूत सौ दम भी साकार अभिव्यक्ति मिलती है और भाव चित्रण मे प्रेम प्रसंग की मिलन एव विरह सम्बधी अनेक अनुभूतिया जो नायक नायिका की परिस्थिति- जय मनोदशाआ का उद्घाटन करती हैं । यथा- वातावरण-क-निसि निसिचर भय भीम भुअगम, जलघर विजुरि अंजोर।' इम पद म भादो की भयानक रात्रि का अनुपम चित्र है। भयानक काली रात निशिचरो का आवागमन, विपघरोकार मे लिपट जाना । बालों को गडगडाहट विजली की चमक, उफनती हुई नदी का प्रवाह और ऊपर सपनघोर वर्षा। ऐसी भयानक रात में भी कृष्णाभिसारिका अभिसार के लिए समेत स्थल पर जा रही है । भित्ति पर अक्ति सप को भी देखकर हरने याली नायिका सप की मणि को हाथा से उक नेती है, विघ्न-बाधामो गीति परम्परा और विद्यापति पदावली 81 की परवाह नहीं करती-कितनी आसक्ति है, कैसा अटूट प्रेम है, कैसी भयकर मिलनोत्कठा है, कंसी वासना है और कितना साहस है ? वस्तुत वातावरण एव मनोवृत्ति के चित्र का विद्यापति का यह पद अनूठा है। दूसरा पद दखिये---'मानिनि आव उचित नहि मान । इस पद में पूर्णिमा और भ्रमर विलास का चित्र है। 'जूडि रमनि चकमक करि चानन' -~-शीतल रात्रि, च द्रमा की चमकती हुई चांदनी, 'रभसि रभसि अलि विलमि विलसि कर'--उसपर भ्रमरो का उ मुक्त विहार :-इस प्रकार के मादक और उद्दीप्त वातावरण मे सोया हुआ कामदेव भी जागने को विवश हो जाता है। भला ऐसे वातावरण मे मानिनी का मान कसे टिक सक्ता है ? सखी का यह वचन 'भाब उचित नाही मात' क्तिना सार्थक है। विद्यापति की पदावली मे ऐसे अनेक पद हैं जो मनोदशा के अनुकूल वातावरण के सजन मे समथ हैं, जैसे नायक नायिका की मनादशाओ, बसन्त तथा रास आदि के पद। 2 रूप चित्रण-(क) अम्बर विघटु अकामिक कामिनि करे कुच झापि सुछदा। (ख) सुधा मुखि के विहि निरमल बाला। (ग) कामिनि करए सनाने, हेरतहि हृदय हने पचबाने। इन पदो मे नारी सौदर्य का अति आकषक चित्र अकित है । 'क' मे नायिका का अचल वक्ष से लिपर जाता है, लाजवश शीघ्रता मे वह उसे अपने हाथों से ढक लेती है। देखिये इसमे नारी में हाव भाव तथा सहज चेप्टाओं का कैसा सु दर चित्र है। 'ख' में नायिका के नस शिख का परम्परित कि मौलिक उद्भावनाओ से युक्त मनोहारी वणन है। नाभि से उरोजो की ओर जाती हुई रोमावलि रूपी मपिणी का नि श्वास मलय के लोभ में ऊपर चढना और नासिका रूपी गरुण के भय से कुच गिरि के सधि स्थल मे छिप जाना कितना कारण एव यथाथ चित्र है। ग' मे सद्य - स्नाता का गीला सौदय कितना मादक है? वस्त्रो का मगो में वियाग क भय स चिपक जाना और अश्रु-वर्षा करना, मुख रूपी शशि के डर स केश 82 विद्यापति एक अध्ययन - जाने से रोकने के लिये हाथों को पलट कर वक्षस्थल पर रखना, सचमुच ही नूतन सो दय की सष्टि करता है। पदावली तो इस प्रकार के सौन्दय रलो की अद्भुत खान है। वय सन्धि की अवस्था से लेकर यौवन के पूर्ण विराम तक नारी-पुरुप सम्बधी ऐसा कोई सौ दय-चित्रण नहीं है जो विद्यापति की काव्य-तूलिका से अछूता रह गया हो। विद्यापति के काव्य कारूप और भाव जगत नि स देह माहित्य मे अप्रतिभ है। रसात्मक अनुभूति रीति काय का तृतीय प्रमुख तत्व है । भाव अमूत होता है । प्रतिक्रिया, प्रभाव, परिणाम और अनुभाव के द्वारा ही वह मूत बनता है। भाव की प्रवणता ही रीति काव्य का प्राण है। कवि अपनी साद्र अनुभूति को प्रकट करने के लिये विकल हो उठता ज्वार उसकी कविता मे पात्रो के माध्यम से फूट पडता है । विद्यापति का यह ज्वार राधा कृष्ण तथा अपने आश्रयदाता राजा-रानिया की पात्रता में प्रस्फुटित हुआ है। इसमे नारी पात्रों का स्थान ही प्रमुख है । भावदशा के अनेक सुखद एव दुख पूर्ण प्रसगो मे विशेषकर शृगार तथा अन्य रसो का उद्रेक हुआ है। शृगार के उभय पक्षों का विद्यापति के काव्य मे उमत्त प्रवाह है जिसमें भक्तो और रसिको दोनों को नौवायें डगमगा कर डूबने -- इसी विकलता का लगती हैं। प्रिय से प्रथम मिलन के लिए जाती हुई स्वकीया या चित्र देखिये-- 'सुदरि पलिलह पहुँ पर ना, जइतह लाज परम डरना' भय मिश्रित सकोच व ज्यगुठन में उत्कण्ठाया यह चित्र अनुपम है। 'सान परस खप्ति आंचा रे, 'पलि पनि देह दवामा ये स्पर्श से प्रिया का अपम सिसक गया और पिजली की तरह येष्टि छवि चमक उठी। मिसन प्रसगमा यह अनुयाचित्र रमिकों के हृदय का हार है। 'कर सुरिन पर प्याज'- मामिजारिका र मनामावो या मूत रूप पित्रित हुआ है । गुरजनों की दप्टि वचार यार पार पश्चिम रिलागी ओर देखना, नेत्र बद पर घर मारण आ-जा गया अनायाग ही रह रह पर मुगकुरा उगा मानिारों र्याम्न की थातुरता में प्रतीक्षा, मिमनोरठा, अरेम चापाग या स्मृति ममिता गुप्त पो अनुभूति आरिट हाती गीति परम्परा और विद्यापति पदावली 83 वियोण पक्ष में भी ये पक्निया विद्यापति वियोग शृगार वणन- कला की परिचायिका है-'कुसुमिति पानन हरि यमलमुखी'-~में विरह- विदग्धा राधा अत्यात क्षीण हो गई है । धरती का सहारा लेकर घठती है, उठ नहीं पाती। कातर दृष्टि से सखियों के सहरा की अपेक्षा करती है। पद्रमा को लज्जित घर देने वाला मुख शशि पी धूमिल रेखा मात्र बनकर रह गया है। 'लोचन नीर तटनि निरमान'-~मै अथुओ से उमने नदी या निमाण कर दिया है और उमी म निमग्न हो गई है। 'मखि मोर पिया, अबहु न आवल कुलिस हिया' अवधि के दिनो की गणना करते करते नाखून घिस गये वितु कुलिस हृदय पिया अब तक नहीं आया। इन पक्तियो में केवल राधा या वियोगिनी रूप ही नहीं, बल्कि बिम्ब रूप मे उनके विरह पूर्व समृद्ध यौवन और मरण आशका भी व्यक्त होती है। कहने की आवश्यकता नहीं कि विद्यापति के गीतो में भाव तत्व का उमुक्त प्रवाह है। यहाँ कोई बाधा नहीं । यही धारण है कि विद्यापति के गीतों का स्रोत अजस्र है, उनको अभिव्यक्ति अत्यात ममस्पर्शी है । हिदी साहित्य म धनान द भावा के उत्कृष्ट कवि माने जाते है, विद्यापति म भी अनुभूति की साद्रता और तीव्रता कम नहीं है । धनान द के नायक नायिका के बीच मिलन प्रसग में हार पहार' सा प्रतीत हाता है किन्तु विद्यापति में तो रोमांच ही पहाड सा प्रतीत होता है। स्पष्ट है कि गीति पाव्य के सभी तत्वो का व्यापक एव अनुभूति प्रधान उपयोग विद्यापति के काव्य में हुआ है। उनके काव्य की ध्वनि सपदा अदभुत है रसानुभूति अत्यन्त साद्र और सपन है, उसम त गया का अनुपम योग है और विम्ब चित्रण के लिय तो यह प्रचलित उक्ति ही पर्याप्त है-'सव ढसाहत नहीं, उघरे हात पुनम, अघटक छवि रत है, कवि अच्छर बुध कश । वस्तुन विद्यापति साहित्य जगत मे गीतो के सम्राट हैं । विद्यापति के काव्य मे लोगीत-विद्यापति पदावली साहित्यिक या कलात्मक गीतो का ही अजस्र स्रोत नहीं है बल्कि वह लोकगीता का भी अक्षय भण्डार है। मिथिला म लोक गीतो की परम्परा अत्यात प्राचीन है फिर भी विद्यापति लोक गीतो ज मदाता और उनायक दोना है। इनके पूर्व लोक गीतों का प्रचलन अवश्य था कि तु उहे न्यापस्ता और 84 विद्यापति एक अध्ययन - साहित्यिक गरिमा प्रदान करने का श्रेय विद्यापति को ही है। परि विद्यापति को लोक गीतो का सम्राट कहाँ जाये तो अत्युक्ति न होगी। लोक गीतो के स्वभाव के सम्बध मे झासिस वी० गूमर का कथन अत्यत सटीक है लोक गीतो का महत्व केवल इसी बात में नहीं है कि उनमे अकृत्रिम काव्य भावना उपलब्ध होती है। वे परम्परा की भाषा में हो अपनो अभिव्यक्ति नहीं करते बलि जन समूह की वाणी द्वारा उसका प्रकाशन करते हैं । उनमे किसी प्रकार की गोपनीयता नहीं होती। जो वस्तु जसी है उसका यथातथ्य वर्णन होता है । वे स्वतत्र हैं तथा खुली हवा की भांति ताजे हैं । वायु और सूर्य का प्रकाश उनमे कीडा करता है। डॉ० गूमर के कथन मे लोक गीत के तत्व सनिहित हैं । लोक गीत के प्रमुख तत्व है--स्वाभाविक अभिव्यजना, स्वतत्र अभिव्यक्ति, अकुश विहीन चित्रण शास्त्रीय व धनो से मुक्ति तथा सूय के प्रकाश और वायु को तरह स्फूति और उल्लास । विद्यापति के लोक गीत इन सभी सत्वा से ओत प्रोत हैं। उनके गीत लोक जीवन की व्यापक अनुभूति से स्फुटित है तथा लोक जीवन के आदश भावनामो के पोपक और जीवन पथ के पाथेय हैं। सभी वर्गों धर्मों, सप्रदायो के लोगो की इनमे सामा य रुपि है और पर्याप्त आदर भी। मिथिला में प्रचलित लोक गीतो का परिचय दिया जा चुका है। विद्यापति के लोक गीतो में विशेष प्रचलित हैं-महेशबानी, नाचारी, There is nothing 1 The abiding value of the ballad 1s that they give a hint of premitive and unspoiled poetic sensation They speak not only in the language of tradition but also with voice of multitude Subtle in their working and they appeal to the throes as they are From one voice & modern literature they arc free They are fresh with the opeo 216 and suo shire play through them डॉ० देशराज भाटी-विद्यापति पक्षायली पृ० 103 Wind गीति परम्परा और विद्यापति पदावली 85 उचीती, योग, बटगमनी तथा वसत आदि। ये लाक गीत लाक हृदय के स्पदन बन गये हैं। कुछ उदाहरण प्रस्तुत किये जा सकते हैं--(रामवृक्ष बनीपुरी पदावली से) 1 कुज भवन से निकसलि रे रोकल गिरधारी। एकहि नगर बसि माधव रे जनि कर बटमारी। (पद०स०59) 2 नाव डोलाव अहीरे, जीवइतन पाओब तीरे, खरनीरे लो। (१० स०61) ३ सुदरि चलिलहु पहुँ घरना, जइतहु लागु परम डर ना। (प०स० 72) 4 सामरि हे झामर तोरि देह । (प०स०91) ये कुछ ऐसे मनोहारी गीत हैं जो साहित्यिक वैभव से भी सम्पान हैं और उनकी आत्मा मे लोक गीतों के गुण निवास करते हैं । इनमे प्रथम में कृष्ण की प्रेममयी छेड छाड, दूसरे मे हाथ पकडकर खरधार वाली यमुना को पार कराने का मपुर आग्रह, तीसरे म कोहबर जाते समय नव वधू को सखियो का सम्बोधन और चौथे मे मिलन के पश्चात नायिका की यस्त “यस्त वेश भूपा और सूखे हुए गात की ओर सकेत है। साहित्यिक कलेवर मे लिपटे लोक गीतो की आत्मा की पहचान रसिक समुदाय कर सकता है। विशुद्ध अथवा खोटी लोक गीतो के भी कुछ उदाहरण लिये जा सकते . - 1 मोरा रे अंगनवा चनन र गछिया, ता चढि कुररए काग रे। (प०स० 222) 2 के पतिया लेए जाएत रे, मोरा पियतम पास। (प०स० 203) 3 पुटल कुसुभ नव कुज कुटिर बन, कोक्लि पचम गाव रे। (प०स० 201) 4 कोतुक चललि भवन कए सजनिगे सग दस चौदसि नारी। (प०स० 73) 5 पिया मोर बालक हम तरुनी। (प०स० 263) इन लोक गीतो मे लोक जीवन अपनी पूर्ण गरिमा और वैभव के साथ 86 विद्यापति एक अध्ययन - साकार हो उठा है। प्रेम लपेटे अटपटे' बचनो से टपकती हुई माधुरी देखने योग्य है । नायिका आगन मे च दन गांछ पर बोलते हुए कागा की बोली सन परम्परा के अनुरूप प्रिय आगमन की आशा से प्रसन होती है और संदेश वाहक कोए को कटोरे मे दूध भात दने और उसके चोच को सोने से मडान का वायदा करती है, यदि उसके प्रियतम आ जाएं। दूसरे गीत में वियागिनी प्रियतम को पाती भेजने के लिए लालायित दिखती है । तासरे गीत मे बस त का आगमन है और चौथे म सम्वियां पांचर गाती हैं। पांच गीत म लोक प्रचलित बालविवाह की वेदना है-तरुणी अपने बालक पति के कारण पश्चाताप कर रही है। इन गीतो मे लोक जीवन को अदभत झांकी है जो कवि की चेतना को लोक जीवन से जोडती है। विद्यापति के कुछ गीत तो अपन व्यापक प्रभाव के कारण लाकोक्ति का रूप ग्रहण कर लिये हैं । यथा मित्र मजूमदार-पदावली से 1 जाडल ब्राह्मण तेजए सनान, जाडल मानिनि तेजए मान। (प०स० 215) (१०स०6) (प०स०7) (प०स० 134) 2 आरति गाहक महंग बेसाह । 3 अपन बचन अपने निरवाह । 4 कूप न आवै पथिक क पास। ये उक्तियाँ पवि के मानव प्रकृति पान, लोक व्यवहार तथा लाक जीवन के विविध प्रसगो के ज्ञान की साक्षी हैं। ऐसी उक्तियो से विद्यापति की पदारली भरी पडी हैं । कवि के भक्ति मम्बधी गीतो, महेशबानियों, नाचारियो और स्तुतियो का भी घम प्राण मिथिला निवासियो मे व्यापक प्रचार है । गीत यहाँ बी पार्मिक प्रवृत्ति वाली उदार जनता थे प्राणोर सदन है और गले का हार । उदाहरणाय-रामवृक्ष बनीपुरी-पदावली स--- 1 महे। पानी-करदन हरव दुख मोर ह भोला नाय । 2 नापारी-आज नाप माहि यत एवं सुख लागत हो। ये (५०स० 243) (५०४. 24-) गीति परम्परा और विद्यापति पदावली 81 समाज। 3 स्तुति-(क) विदिता देवी विदिता हो, अविरल केस सोहन्ति । (५०स० 229) (ख) जय जय शकर जय त्रिपुरारि । जय अध पुरुप जयति अधनार (प०स० 231) (ग) बड सुख सार पाओल तुअ तीरे ।(प०स० 250) 4 भक्ति वैराग्य-तातल सैक्त वारि वि दु सम, सुतवित रमनि (प०स० 254) विद्यापति के इन गीतो का मिथिला पर कितना व्यापक प्रभाव है इसका अदाज श्री राम खेलावन पाण्डेय के इस कथन से लगाया जा सक्ता है-~-'कोई मिथिला मे जाकर तमाशा देखे । एक शिव-पुजारी डमरू हाथ मे लिये विपुण्ड रमाये जिस प्रकार--'करवन हरब दुख भोर हे भोला नाथ' गाते-गाते तमय हो जाता है, उसी प्रकार नव वधू को कोहबर म ले जाती हुई क्लकंठी कामिनियों 'सुदरि चलिलहु पहुँ घरना' नव वर वधू के हृदयो को एक अव्यक्त आन द स्रोत में दुबो देती हैं। जिस प्रकार एक नवयुवक 'ससन परस खमु अम्बर रे 'देखिल धनि देह' पढता हुआ एक मधुर कल्पना से रोमाचित हो उठता है उसी प्रकार एक बद्ध 'तातल संक्त वारि विदुसम सुतवित रमनि समाज तथा 'माधव हम परिनाम निराशा गाता हुआ अपनी धूमिल नयनो से शत शत अथ बिदु गिराने लगता है। ग्रियर्सन महोदय ने भी स्पष्ट कहा है कि विद्यापति पदावली के गीतो की लोकप्रियता कमनाशा नदी से लेकर नेपाल तक उसी प्रकार है-जैसे उत्तर भारत में तुलसी का रामचरितमानस अथवा इसाई जगत में बाइबिल के उपदेश । सच है इन गीतो मे माबाल वृद्ध, नर नारी समी के हृदयो को भाव- विभोर कर देने की अद्भुत क्षमता है। जनमानस के जीवन पर विद्यापति के इन गीतों का अम्खण्ड साम्राज्य है और विद्यापति उनके एकमात्र अधिपति है। निसदेह विद्यापति के साहित्यिर एव लोक गीत हि दो साहित्य की अमूल्य निधि हैं। यह गोति सपदा विश्व साहित्य वे किसी समृद्ध मापा के गीतो के साथ गौरव पूर्व खडी हो सकती है और गर्व- पूर्वक कह सकती है कि हम हिदी के आदिकवि मंथिल कोक्ति विद्यापति 88 विद्यापति एक अध्ययन और मी काकली हैं। गीतों की सापेक्षिक श्रेष्ठता-गीतों के सम्राट जयदेव की रचना 'गीत-गोबिद अपनी यामल कात पदावली के लिये साहित्य म अपने विस्म का अनोखा माना जाता है। विद्यापति इही से सर्वाधिक प्रभावित भी हैं कि तु कुछ क्षेत्रो में वे जयदेव से आगे हैं-जयदेव म एक ओर जहाँ वणन का विशेष आग्रह है, वहां विद्यापति मे रागात्मक आवेश की अभिव्यक्ति । अत विद्यापति के गीत गीतिकाव्य के अधिक समीप हैं। हिदी के क्षेत्र म कबीर मे भावो की तीव्रता और अभिव्यक्ति की अखण्डता तो अवश्य है कि तु सहज साहित्यिक्ता का अभाव है, वे समाज सुधारक पहले थे कवि बाद मे । तुलसी के गीति-काव्य मे भारता, हृदय की विशालता और सूक्ष्म दृष्टि के होते हुए भी, उनमे दशन, नीति और नतिकता का मार है। सूर के गीत कवि की सूक्ष्म दष्टि भावुक्ता चित्रमयता के कारण अत्यत सरस हैं वितु उनमे प्रत्यक्ष अनुभूति का अभाव है। मीरा के उद्गारो मे निश्छलता, एकनिष्ठता, प्रेम की पीर और मिलन की उत्कठा है और आत्म विस्मृति भी कि तु भाषा का अनगढपन गीतो के सहज प्रवाह मे बाधक है रीतिकालीन कविया मे रीति मुक्त कवियो को छोडकर कला का आग्रह इतना अधिक है वि उनके गीत चमत्कारो के अधिक निकट हैं । गुप्तजी ने भी गीति शैली अपनाई है कि तु उनकी प्रतिभा अपेक्षाकृत प्रब घात्मक और वर्णनात्मक है । प्रसाद के गीतो में भावात्मकटा, चित्रमयता और सगीतात्मकता तो है किंतु छायावादी शैली के कारण वे सहज बोधगम्य नही हैं। महादेवी जी के गीत आंसू से गीले तो अवश्य हैं कि तु छायावादी शैली और गहरी रहस्यात्मक वत्ति और प्रतीको की गूढता के कारण उनके सीधे सामाय हृदय पर चोट करने की क्षमता नही है । बच्चन, नीरज नरेद्र शर्मा आदि के गीत भी प्रभावशाली हैं अपने युग की निधि हैं किन्तु उनकी लोकप्रियता स्वर सधान के साथ अनुबधित है। सिने गीतो मे भी साहित्यिक तथा लोक गीतो का पुट मिलता है कि तु इनका प्रभाव पानी पर खिचे लकीर की तरह क्षणिक है। ये अधिकाशत परिस्थितिजय प्रभावात्पादकता और सस्ती लोकप्रियता ने गुलाम हैं । कि तु विद्यापति के गीत लोक एव साहित्य दोनो ही निक्पो गीति परम्परा और विद्यापति पदावली 89 पर खरे उतरते हैं । इनमे ध्वनि, अभिव्यक्ति, रस, लोक भाव एव सहजता तदाकार हो गये हैं । यदि जयदेव गीतो के सम्राट हैं तो विद्यापति अभिनव जयदेव । जयदेव के गीतो को गाते-गाते जैसे चैतन्य महाप्रभु त भय होकर नाचने लगते थे वसे ही विद्यापति के गीत तिरहुतवासियों को त मय कर देते हैं । विद्यापति के गीतो को विश्वसाहित्य के गीतो की प्रथम पक्ति मे आदर और गव के साथ स्थान दिया जा सकता है।

है। इसलिए मनुष्य यदि आन ६ चाहता है तो उसे मन को बाहा जाल से काम को ईक्षण कहते हैं प्रकृति के सम्पर मे आते ही यह माम बन विद्यापति की भक्ति-भावना का स्वरूप भक्ति की व्याख्या भक्ति के मूल मे भय, क्रिया में आसक्ति और फल मे आनद है और जगत तथा जीवन दोनो के मूल मे काम है । गोता के तीसरे अध्याय मे कहा गया है 'स्यूल भूनों में निर्मित शरीर से इंद्रिा परे हैं इन्द्रियो से परे मन, मन से परे बुद्धि और बुद्धि से परे काम है । जो जिसका पूर्वज है, जनक है वह अपनी मतति में आश्रय पाता है । काम भी सबका मूल होकर सव मे समाया हुआ है, सवत्र व्याप्त है । इमी परि व्याप्ति के कारण इसका प्रभविष्णु रूप प्रकट होता है। जाता है जो मा तक पहुंच कर तीन रूप धारण कर लेता है-जानन की इच्छा 'मनीपा' कहलाती है, सवेदन क्षेत्र में इसे 'जूति' और क्रिया क्षत्र में 'वा' कहते हैं । इन तीनो का एकीकरण बुद्धि मे होता है। काम की प्रशमा म मनु लिखते हैं---'यद का ज्ञान और बेदिक कम योग । अनुष्ठान कामना के योग्य है । काम समस्त सकल्पो का मूल है। कविवर प्रसाद के शब्दो म-'काम का मूल रूप मगण महित और श्रेयस्कर है, वितु जगत प्रपच मे पडवर काम के प्रिय और अप्रिम दो स्प हो आते निकाल कर परमात्मा मे केद्रित करना होगा क्योकि वही आन द का धाम है और यही कामना का कजस्वीकरण । मिस्तदने समवधि मनसोरेत प्रथम पदासीत । व 8 7 ST (नारदीय सूत्र)।

विद्यापति की भक्ति भावना का स्वरूप 91 भारतीय मनीपियो ने इस समस्या का निराकरण ज्ञान, कम और भक्ति के साधनो के द्वारा किया है। मान से जानना, कम से प्राप्त करने का प्रयास करना और भक्ति से उसमे लीन हा जाने का सुयोग मिलता है। आचाय सोम के शब्दा मे---'साधनो का साधन, अवलम्बो वा अवलवन, आश्रयो का माश्रय एक मात्र आनन्द स्वरूप ईश्वर है। इसी के साथ रहना, इसी के गुण गाना, इमी मे तल्लीन और मग्न होकर विचरण करना आन द है। यही भक्ति मार्ग है। काम मनोविज्ञान के क्षेत्र मे भाव कहलाता है। रचना क्रम में परमात्मा से भाव, भाव से ज्ञान तथा कम प्रकट होते हैं। विलीनीकरण में यही क्रम पलट जाता है। भक्त अपनी चित्तवत्तियो को नाम रूप के सहारे माव मे और भाव के सहारे परमात्मा मे लीन कर देता है। इसी भाव पद्धति का दूसरा नाम भक्ति योग है। कोषो के आधार पर भी यही क्रम सिद्ध होता है-अनमय कोष प्राणमय कोष मे, प्राणमय कोष मनोमय- कोष मे, मनोमय कोप विज्ञान कोप मे और विज्ञान कोप आत्म तत्व में लीन हो जाता है। इसी को श्रद्धा या भक्ति भावना कहते हैं। भक्ति का सौदय से बटूट सम्बध है। परमात्मा परम सु दर ही उसकी रचना मे भी सौन्दर्य है । उस सौ दय को हम अपने मन मुकुर के अनुकूल ग्रहण कर पाते हैं इसलिए वास्तविक सौदय को प्राप्त करने के लिए हमे अपने मन मुकुर को नान से माजना पडता है ।प्लेटो ने श्रेष्ठता क्रम मे चार प्रकार के पान का उल्लेख किया है-आभास ज्ञान, कल्पना नान, विचार ज्ञान तथा तत्व ज्ञान । इनमे प्रथम तीन साध्य हैं और अतिम साधन निरपेक्ष । कठोपनिषद् मे भी इसी प्रकार के ज्ञान का उल्लेख है--- “साधारण मनुष्य मन के दपण के अनुसार जैसा वह आभासित होता है सत्य के स्वरूप को देखता है, आदशवादी व्यक्ति उसे अपनी कल्पना के अनुरूप देखता है, गधव या कलाकार की कोटि म आनेवाला मनुष्य उसे जल मे पडती हुई परछाइ के रूप में देखता है और तत्व मानी उसे तत्व, 1 डॉ० मुशीराम शर्मा 'सोम'--भक्ति का विकास, प072 92 विद्यापति एक अध्ययन वस्तु या साक्षात् रूप में देखता है।" सौदय यो विद्वानों ने बारमनिष्ठ और वस्तुनिष्ठ दो रूपो में देखने का प्रयास किया है किन्तु आत्म विस्तार के साथ यह भेद समाप्त हो जाता है और सम्पूर्ण जगत के साथ सौदय फा तदाकार हो जाता है जिसे ब्रह्म का सौ दयं कहते हैं। यह सौदर्य है तो पारावार की तरह कि तु कवि या भक्त अपनी मीमा म विदु मे सौन्दय देखने का अभ्यासी होता है इसलिए उसी सौ दयं को हम अपनी पात्रता या पात्र के अनुसार देखते हैं । यही भक्त या कवि के अन्त करण की पुकार होती है । सुदर ही उसके लिए सत्य है और मत्य ही सुदर। इस प्रकार पितरो का आदावाद, कलाकारो की सौदर्योपासना और तत्व मानिया का अन्तिम सत्य-तीनों अपने अतीव निमल रूप को लेकर भक्ति मे समन्वित हो जाते हैं । भक्ति के कुछ अग भी होते हैं-~गीता के अनुसार मनुष्य श्रद्धा का ही बना हुआ है, वह जिसमे श्रद्धा रखता है वैसा ही वन जाता है । डॉ० सोम के अनुसार-भक्ति के रूप हैं-श्रद्धा, त्याग, यज्ञानुष्ठान, व्यवहार, वैयक्तिक विकास तथा पूण पवित्रता एव समरसता की अवस्था । जिस प्रकार शृग से बहती हुई जलधारा मागरसे मिलकर परम सुख का अनुभव करती है, उसी प्रकार जीव भी ब्रह्म से अलग होकर नाना योनि जगत व्याधियो को झेलता हुआ भक्ति माग से पूण पवित्रता और समरसता को स्थिति मे पहुंचता है तो उसे परम धाति मिलती है और वह परमानद की अनुभूति करता है। नददास ने दस प्रकारकी तथा गोस्वामी तुलमीदास ने सबरी प्रसग मे नौ प्रकारकी भक्ति का उल्लेख राम मुख से करवाया है, सतो का सग राम 1 यथाऽदर्गा तथात्मनि, यथा स्वप्ने तथा पितलोरे । यथा इप्सु परीव दश्यते, नथा गधर्य लोके छाया तपयोरिव । -(स्तोपनिषद, तीसरी वल्ली श्लोक, 5) 2 Beauty is truth and Truth, beauty That is all we know and wc aught to knon --John-Keats विद्यापति की भक्ति भावना का स्वरूप 93 कथा में रति, गुरु पद सेवा, राम गुणगान, मत्राजाप, सासारिक कर्मों से विरक्ति, सम्पूर्ण ससार को राम रूप मे देखना, यथालाभ सन्तोष, छन- विहीन होकर ईश्वर मे दृढ विश्वास । इन नो मे से एक भक्ति भी जिसके पारा हो वह प्रभु को अत्य त प्रिय होता है। इनके अतिरिक्त दास्य और सखा भक्ति की भी चर्चा की गई है । वस्तुत भक्ति तो घो का लडडू है टेढा हो या सीधा । 'प्रेम लपेटे अटपटे' केवट की भक्ति इसका सबसे सुदर प्रमाण है । भक्ति के अनेक प्रकारो मे पांच गुणा का समावेश होन के कारण मधुरा भक्ति को सवश्रेष्ठ माना गया है। भक्ति के चार फन बनाये गये हैं-स्वाधीनता, पवित्रता, विश्व वधुत्व और प्रभु प्राप्ति । मानव को ही वह सुविधा प्राप्त है कि वह नीचे भी गिर सकता है और ऊपर भी उठ सकता है इसीलिए उसका जीवन सघप सकुल है । अधो मुख होने से उसका पतन होता है, ऊ वमुख होने से उसकी प्रगति होती है। पराधीनताज य इस विनास से बचने के लिए एक हो उपाय है कि मनुष्य अपने उच्चतर ससार अवस्थित प्रमु के सामने आत्मसमपण कर दे। ईश्वर सेवा ही वास्तविक भक्ति है और मुक्ति का माग है। भारतीय साहित्य मे ईश्वर और जीव सम्न ध के दोनो रूप मिलते हैं। कहीं भक्त पति है तो भगवान पत्नी, या भक्त पत्नी है तो भगवान पति । कबीर और जायसी इसके उदाहरण हैं । वात्सल्य सम्बध का रूप में हिंदी साहित्य में मिलता है- सूर तो वात्सल्य के सागर ही कहे गए हैं। रूप चाहे जो भी हो पितु दोनों का समतुल्य आपण ही उसे पवित्र और प्रभावशाली बनाता है जैमा उदू के शायर ने कहा है-- उल्फत का मजा तब है जब दोनो हो बेकरार, दोनो तरफ हो आग, बराबर लगी हुई। वष्णव धम की अपनी विशेषता भक्ति भावना ही है। यही भावना उसे अन्य धर्मों से अलग करती है। गौडीय वैष्णव समाज और बज- वष्णव समाज दानो ही भक्ति की महत्ता, आवश्यकता जोर श्रेष्ठता की मुक्त कठ स प्रशमा करते हैं और उस ज्ञान की अपेक्षा श्रेष्ठ बताते हैं जिसका पोषण सगुणोपासक कवियो ने अपने काव्य स किया है। - 94 विद्यापति एक अध्ययन विद्यापति को भक्ति भायना-विद्यापति मूलत कवि थे । सनदायी साघु नही । पवि की भांति उनका हृदय उदार और विशाल था। यही कारण है कि उनके काव्य में सत्यालीन समस्त सम्प्रदायो की झलर मिल जाती है जिसके कारण आलोचक भ्रम में पडवर रहें सम्प्रदाय की सीमा रेखाआ मे घेरने का प्रयास परन लगते हैं । पितु उन्हें किसी सम्प्रदायक मण्डे के नीचे सडा करना उनके साथ याप नही होगा । कवि तो मयु सग्रही को भांति सभी पुप्पो वा सार सघयन कर सुधाकोष को सजन करता है। फूल विशेष की अनुरक्ति मे वह बदी नही होता। विद्यापति की भक्ति भावना या सम्प्रदाय पर विचार करते समय साहित्य ममन एव आलोचर रस्किन के एक कथन की याद आती है- 'शेक्सपियर मिल्टन की अपेक्षा कही ऊँचे कवि हैं, अत उनके धार्मिक मिद्धात अधिक सुगमता से समझ में आ जाते हैं। शेक्सपियर उस ऊंचाई से बोलता था कि वहाँ धामिक मतो को विभाजित करने वाली दीवारें छोटी मालूम पडती थी अथवा वहां मे वे रेखायें दिखाई ही नहीं पडती थी जो एक मत को दूसरे मत से विभाजित करती हैं। विद्यापति भी हम ऐमी ही ऊंचाई से बोलते प्रतीत होते हैं और इसलिए उनके काव्य मेव, वैष्णव, शाक्त आदि मतो को विभाजित करनेवाली रेखायें या तो दिखाई ही नही पडती और यदि दिखाई भी पडती हैं तो अत्यंत अस्पष्ट एव धुधली।" स्पष्ट सीमा रखा के अभाव मे विद्वानो ने विद्यापति को अपनी रुचि, आदर्ग उपलब्ध ज्ञान धारणा एव प्रमाणो के आधार पर वष्णव, देवोपासक, एकश्वरवादी, शाक्त तथा शैव आदि अनेक रूपो मे देखा है। और अपने मत को उचित सिद्ध वरन का प्रयास किया है। किसी मवमाय निणय पर पहुंचना या विद्यापति को एक ही सम्प्रदाय सीमा के अदर बांध देना कठिन ही नही बलि असम्भव भी है क्योकि जो सत्य है न ही उसे तों मे अस्तित्व मे नही लाया जा सक्ता कहा भी गया है कि तक से सत्य के सिवा सब कुछ पाया जा सकता है। - पच 1 विद्यापति वैभव-डा० गुणान द जुमाल, प० 20 विद्यापति की भक्ति-भावना का स्वरूप 95 घष्णव-विद्यापति को वैष्णव मानने वालो मे डॉ. ग्रियसन, बाबू अजनदन सहाय, डॉ० श्यामसुदर दास, प्रो. विपिन विहारी मजूमदार एव डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि के नाम उल्लेख्य हैं। नियसन के अनु- सार विद्यापति के सभी पद प्राथनायें या भजन हैं और ईसाइयों में जैसे सालमन के गीत गाये जाते हैं उसी प्रकार श्रद्धा के साथ मिथिला मे विद्यापति के गीत हि दू भक्तो द्वारा गाये जाते हैं। बाबू व्रजन दन सहाय तो इहे वैष्णव कवि चूडामणि कहते हैं । डॉ० श्यामसु दर दास विद्यापति को वैष्णव आचाय निम्बाक और विष्णु स्वामी से प्रभावित मानते हैं । राधा कृष्ण का यह रूप विद्यापति को इही आचार्यों स मिला है। प्रो० मजूमदार इहें वैष्णव इमलिए मानते हैं कि उहोने अपने हाथ से भागवत पुराण जो वैष्णव भक्ति का मूलाधार है। डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी का कथन है कि--'जो लोग विद्यापति के बारे मे कहा करते हैं कि वे शव ये अतएव वणव भक्त नहीं हो सकते, वे इस काल की उस मन स्थिति को नहीं जानते। समूचा उत्तर भारत प्रधान रूप स्मात था, शिव के प्रति उसको अखण्ड भक्ति बनी हुई थी, कि तु उसमे अपूर्व सहनशीलता का विकास हुआ था और विष्णु को भी वह उतना ही महत्वपूण देवता मानता था। शिव सिद्धिदाता थे और विष्णु भक्ति के आश्रम । धन हरि धन हर धन तव कला, वन पीत बसन खनहि मृग छाला' गीत इसी मिथ रूपा माक्षी है। पदावली के माधव सम्बोधित कुछ पद तथा घेत य महाप्रभु मे द्वारा विद्यापति के गीतो पो गारमुच्छित हो जाना आदि प्रसग विद्यापति को वणव सिद्ध करने वा प्रयास करते हैं। बगाल म अति प्रचलित महजिया सपनाय के लोग सातवा रमिस भपत' मानते हैं और विद्यापति की महानता का आधार वे इसी धष्णव वत्ति को मानते हैं । इनर अनुसार स्त्री प्रेम ही ईश्वर प्रेम है और विद्यापति के पदो में स्त्री प्रेम का सागो. पांगरणा है। इस सम्बध में एक और बात ध्यान देने योग्य है--डॉ. हजारी प्रमादिदी विद्यापति के गीतों पर पर्नाट प्रभाव भी मानते हैं . 1 D० हजारीप्रसाद द्विवेदी-साहित्य या मादि वाल, प० 39 96 विद्यापति एक अध्ययन जो मिथिला के राजा नाय देव के साथ यहां आया। अत मम्भव है कि यह वैष्णव भावना दक्षिण से रामाद के पूर्व ही मिथिला में भा गई हो। 'भक्ति द्राविण उपजी लाये रामानद' की यात तो सवमा है गौडीय वैष्णव परम्परा मे रागानुगा--मधुरा भक्ति को सवाल कहा गया है जिसमे 7 गार भाव, राधा भाव या गोपी भाव को मधुरतम माना गया है क्योकि इसमे हृदय के साथ पारीर-समपण की भी व्यवस्था है । इस दृष्टि से विद्यापति पदावली मे अक्ति प्रेम विधान इसी परम्परा के अतगत आता है। पदावली मे विद्यापति ने जो प्रारम्भ म ही राधा कष्ण की वरना की है उसमें सख्य भाव का मधुर रूप ही व्यक्त होता है। वन्दना मे वर्णित कष्ण का स्वरूप राधा के प्रेम मे अनुरक्त और विह्वल है। राधा सौदय की खान है । कवि की अभिलाषा उनके चरणों को गोद मे अगोर कर रखने की होती है, उन चरणो पर शीश रख कर भक्ति भाव से लोटने को नही, इस प्रसग मे विशेष रूप से ध्यात य है। विद्यापति के हृदय की भक्ति भावना जो दुर्गा या गगा की स्तुति मे पायी जाती है-वह इसमे कहाँ है? वैष्णव पक्ष मे दिये गये तथ्यो मे केवल डॉ० श्यामसुदर दास के मत मे ऐतिहासिक मल प्रतीत होती है पर अ य तो मे आशिक सत्य का अभाव नही है। किन्तु इनके आधार पर विद्यापति को निक्ष रूप से वैष्णव कहनातो सत्य को अस्त्रीकार करना होगा कि तु पदावली से नि सत वैष्णव भावना को अस्वीकार भी नहीं किया जा सकता है । पर स्मरण रखना होगा कि यह भावना कवि को स्वीकृत साहित्यिक परम्परा है जो जयदेव से अभिनय जयदेव को मिली थी और उसमे कवि आस्था के अनु कूल सामयिक धारायें भी समायी हुई हैं। तत्रवाद और सहजवाद का प्रभाव भी मे देखने योग्य है। तम ग्रथो के अनुसार ता मात्मा देश और काल के इसी रूप को देश काल से सो दे के रस से उसे । करता है। ।

विद्यापति की भक्ति-भावना का स्वरूप 97 भागवत संप्रदाय पर भी पडा। राधा और गोपियो के रूप मे तत्र शास्त्र का उक्त अग भी इसमें सुलभ हो गया और उत्तर काल मे राधा का स्थान कृष्ण से भी बढरर हो गया । वैष्णवो ने राधा और कृष्ण के रूप मे शक्ति- उपासना को ग्रहण करके उसे एक शुद्ध मर्यादा के भीतर कर दिया । तत्र साधना मे स्त्री अनुष्टान का साधन मात्र थी वैष्णव मत मे वह परम-पुरुष को पूर्ण करने वाली समझी जाने लगी। तत्र की परकीया एक यात्रिक भाधना थी वितु वैष्णव परकीया प्रेम का साधन थी। स्वकीया मे पर. कीया का स्थान ऊंचा है क्योकि उसमे प्रेम का वेग सहज और तीन रहता है । यह वेग विद्यापति के राधा कृष्ण मे भी कितना अधिक है, पाठक या आलोचक मे छिपा हुमा नही है । पचदेवोपासक के रूप मे-इस विचार के प्रमुख पोषक महा महोपाध्याय हर प्रसाद शास्त्री। ये इहें क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर थे पच देवताओ-शिव, विष्णु, सूय, गणेश तथा दुर्गा के उपासर मानते हैं। कीतिलता के कपिल तत्र मे शास्त्री जी ने लिखा है- आकाशस्यधिपो विष्णुरग्नेश्च महेश्वरो वायो सूय क्षिरी शो जीवनस्य गमधिप। तदनुमार पचदेवो की उपासना ही ब्रह्म की उपासना है । कि तु सूर्य और गणेश की उपासना विद्यापति मे कही भी नहीं मिलती। अय ती देवो की उपासना विद्यापति ने मिथिला मे प्रचलन के आधार पर क्यिा है । अत इहे पचदेवोपास कहना ठीक नहीं। एकेश्वरवादी के रूप मे-प्रो० जनादन मित्र हैं एकेश्वरवादी मानते हैं। इनका कथन है कि-'हिंदू देवी देवताओं के यथाष रूप से परिचित होने के कारण किसी विशेष रूप की ओर उनका भेदभाव या पक्ष- पात नहीं था। उसी भाव मे बहोंने शार और विष्णवे मिश्र रूप का और मातृ रूप में ब्रह्म का वर्णन किया है-'मल हर मल हरि भल तुम पला तथा विदिता देवी विदिता हो अविरल केश सोहन्ति' शिव, विष्णु और दुर्गा की स्तुतिया के प्रभाग हैं।' मिथजी ये अनुसार विशुद्ध दिन पम का सच्चा स्वरूप यहाँ सदैव पतमान रहा है। रामे सप्रदाय या फिरपा कमी पैदा नहीं हुआ। यही 98 विद्यापति एक अध्ययन कारण है कि मिथिला समाज म देव देवियों के भेद से किमी प्रकार की कटटरता का प्रचार नही हुआ । यह मनोवृत्ति मिथिलावासियो के स्वभाव का मग बन गई है। शाफ्त के रूप मे~4. भागवत शुक्ल पामोद ने विद्यापति को शाक्त सिद्ध करने का प्रयास किया है। इनका तक है कि 'पुरुष-परीक्षा के मगलाचरण मे शक्ति को शिव को पूज्या, विष्णु की ध्येया और ब्रह्मा की प्रणम्या बताया है। वदना के पदो में दुर्गा के प्रति कवि की अपारनिष्ठा प्रकट होती है। उ होने-'हरि विरचि-महेश शेखर चुम्म्य मान पदे आदि कहकर दुर्गा का स्तवन किया है । मिथिला के विद्वानो मे शाक्त होने को प्राचीन परम्परा है । अत विद्यापति वा शाक्त होना अत्यात स्वाभा विक प्रतीत होता है। उन्होने गाया भी है - 'जय शिव शकर जय त्रिपुरारि, जय अधपुरुष जयति अधनार ।' शय के रूप मे -विद्यापति को शव मानने वालों मे रामवक्ष बेनीपुरी, ५० शिवन दन ठाकुर और आवाय रामचद्र शुक्ल का नाम प्रमुख है। बेनीपुरी जी के तक इम सम्बध में निम्नलिखित हैं- 1 शिव की उपासना से पुत्र रत की प्राप्ति, ऐसी जनश्रुति है। 2 इनका एक पद शिव के प्रति अटूट निष्ठा को व्यक्त करता है--- आन चान गन हरि कमलासन सब परि हरि हम देवा । भक्त बछल प्रभु वान महेसर, जानि कएलि तुअ सेवा। कोई चद्र की पूजा करता है कोई विष्णु की कि मैंने सबको छोड़ कर हे बान महेश्वर भक्तवत्सल जानकर तुम्हारी ही सेवा की है। ये बाणेश्वर महादेव विसपी से उत्तर मेडया नामक ग्राम मे आज भी वतमान 3 इनके रचे गिव गीत, महेशबानी और नाचारियों का प्रचलन बहुत अधिक है। तीर्थस्थानों को जाते हुए स्त्री पुरुषों के ब3 से इनके प्रेत प्रवाहित होकर जन मानस को भाव-विभोर परत हैं। 1 मापुरी 1936-पायोद का लेख-शीष विद्यापतिमा निजी मत यासप्रदाय।

विद्यापति की भक्ति भावना का स्वरूप 99 4 स्वय महादेव जी इनकी भक्ति पर मुग्ध थे। 'उगना' नाम से इनके यहां सेवक के रूप में वे काम करते थे। निजन स्थान मे गगा जल पाकर जब विद्यापति ने बहुत आग्रह किया तो उगना के रूप मे महादेव ने कहा---'देखो तुम मेरे पूर्ण भक्त हो, मैं तुम से अलग नहीं रहना चाहता, कि तु प्रतिज्ञा करो कि यह भेद तुम किसी से भी प्रकट नही करोगे।' किंतु एक दिन जब इनकी पत्नी ने इन पर जलती हुई लकडी से प्रहार किया तो विद्यापति बोल उठे, 'अरे साक्षात शिव पर प्रहार' उगना गायब हो गया और विद्यापति पागल होकर गाने लगे--'उगना रे मोर कसए गेला, क्तए गेला शिव की दहु भेला।' प. शिवन दन ठाकुर के प्रमाण इस सदम मे निम्नलिखित हैं- उगना की किंवदन्ति, वाण महेश्वर की स्थापना, पूर्वजो कर धौव होना, कवि की चिता पर शिव मन्दिर की स्थापना, आश्रयदाता राजाओ का शव होना, पुरुष परीक्षा मे रत्नागद से शिवोपासना को प्रतिज्ञा कराना, महेश बानियो और नाचारियो का प्रचलन तथा कवि का गौरी-शकर को अपना इष्टदव मानना-"लोढव कुसुम तोइब बेलपात, पुजव सदा शिव गौरीक सात।" दुर्गा, गगा और शिव की उपासना मे जैसी अनुरक्ति, तल्लीनता और एकात्म भाव कवि के पदो मे मिलता है वैसी अनुरक्ति तथा भाव भय देवी-देवताओं के प्रति लिखे पदो मे नही है । अत शिव के प्रति कवि की निष्ठा अपेक्षाकृत अधिक प्रतीत होती है। रवि का व्यक्तिगत निष्ठा और उपासना मे शव होना अधिक तकसगत प्रतीत होता है किन्तु उनका शेय होना उनकी सकोणता नही । जिस प्रकार तुलसी परम राम भक्त थे कि तु शिवोपासना में भी उनकी रुचि थी। इतना ही नही उन्होंने तो लोक दृष्टि से राम और शिव भक्ति का समय किया 'गिव द्रोही मम दास बहावे, सो नर सपनेह मोहिन भाई' उहोने अपने इष्टदेव राम के मुख से बह- साया है। इसी प्रकार विद्यापति भी गिव के परम भक्त पे, दुर्गा और गगा की भक्ति सोगिव के साप अविच्छिन रप से जुड़ी हुई है, वितु विष्ण पे प्रति भी वे उदासीन नहीं थे। लोक कवि के रूप मे रहोंने भी सभी पार्मिक मा यतामओ का समाहार दिया है। वस्तुत उहोंने साहित्य परपरा 100 विद्यापति एक अध्ययन मे वैष्णव विचारधारा को ही राधा कृष्ण के मधुमती भूमिका वाले रूस को ग्रहण किया था और बीच बीच मे प्राय भावो और उपमानों आदि में जो शिव का विशिष्ट रूप प्राप्त हो जाता है, वह उनको व्यक्तिगतनिष्ठा का भाव हिलोर है । आचाय द्विवेदी का यह कथन नितात सत्य प्रतीत होता है कि-शिवसिद्धि दाता थे और विष्णु भक्ति का आश्रय । इस सम्ब ध मे आचाय विश्वनाथ प्रसाद का मत भी दृष्टव्य है 'विद्यापति शद थे पर इहोने वैष्णव और शाक्त सम्प्रदायो के प्रति अनुदारता का परिचय नही दिया । प्रत्युत भक्ति के जिस उ मेप मे उन्होने शिव की स्तुति की है उसी उमेष मे शक्ति और विष्णु की। रामवृक्ष बेनीपुरी का भी ऐसा ही अभिमत है-आधुनिक मथिलो की तरह ये शिव, विष्णु और चण्डी तीनो को मानते थे। मथिलो के सिर पर लगे तिलक से यह बात और स्पष्ट हो जायेगी---वे एक ही साथ भस्म, त्रिपुट धीमण्ड चदन और सिदर बिंदु धारण करते हैं । तीनो देवताओ की य निशानियां हैं। ये तीनो को समान आदर की दष्टि स देखते थे पर किसी एक सम्प्रदाय के नहीं थे। विद्यापति के व्यापक व्यक्तित्व, समन्वयकारी प्रतिभा, उदार धार्मिक भावना और लोक सग्र ही कवि स्वरूप को देखते हुए उन्हें किसी सम्प्रदाय विशेष की परिवृत म घेरा नहीं जा सकता। धार्मिक आस्था के साथ कल्पना के सरस लोक में विहार करने वाले विद्यापति प्रेम और सौंदय के अनुभव सिद्ध कवि हैं। सभी धर्मों के विचारों के सारभूत सत्य को ग्रहण परते हुए वे किसी के भी अपभक्त नही थे । यही है उनके उदार भक्ति भावारा की विशेषता । वे साहित्य परम्परा मे गौडीय वैष्णव सम्प्रदाय के निवट हैं और व्यक्तिगत घनिष्ठा मे परम शंध। निवप प म प० गिव प्रसाद सिंह के सटीर वक्तथ्य का उल्लेस किया जा सकता है-'विद्यापति का व्यक्तित्व नाना प्रकार पी विरोधी भावनाओं का स्तबम है। इस व्यक्तित्य में इस प्रकार या परस्पर विरोध सम्भवत उस युग का परिणाम है जिसमें विभिन प्रकार की देशी विदेगी विचारधाराय सपपरत पी। विद्यापति वस्तुन सम्मण काल ये कवि हैं। बेदरवारी होत हुए भी जनकवि हैं, शृगारिक होते हुए भी भक्त हैं, शव पात, नव सब कुछ होते हुए भी धमनिरपेक्ष है, सवारी ग्राह्मणवा विद्यापति की भक्ति भावना का स्वरूप 101 में उत्पन होने पर भी विवेक सत्रस्त या मर्यादावादी नही हैं। वस्तुत विद्यापति प्रमुख धर्मा कवि हैं और इनके व्य पक कवि व्यक्तित्व मे धम समा गया है, सम्प्रदाय तो प्राय लुप्त से हो गए हैं । इनके काव्य के अछोर जलधि मे भक्ति भावना को विभिन लहरियो का सौदय और आकषण तो देखा जा सकता है किंतु उनके प्रति आग्रही वत्ति कही नहीं है। उनके स्थिर अस्तित्व की व्याख्या भी नहीं की जा सकती है। तुलसी के 'स्वान्त सुखाय' की तरह 'माना पुराण निगमागम और लोक रुचि तया लोक प्रचलन विद्यापति के व्यापक कवि स्व मे समा कर काव्य की सरस घार मे रूपातरित हो गया है । अत वे धम अथवा सम्प्रदाय के धेरे में नहीं हैं-घम और सम्प्रदाय उनमे आत्मसात हो गए हैं। 1 शिव प्रसाद सिंह-विद्यापति, पृ० 4 विद्यापति के काव्य में प्रेम तथा सौन्दर्य विधान ईश्वर को सत्य, सौंदय और प्रेम का स्वरूप माना गया है। अखिल विश्व भी ईश्वर के इहीं गुणों की अभिव्यक्ति है। यही कारण है कि प्रेम और सौंदर्य की दो धारायें प्रवाहित होती हैं दिव्य एव लौकिक जो अनुभूत तो हैं पर अनिवचनीय हैं । नेत्रो, कपोलो और मस्तक की भाषा की तरह इनकी भाषा भी शब्द रहित है । सरदार पूसिंह ने जो बात 'आचरण की सभ्यता के लिए कही है वह प्रेम और सौंदर्य के लिए भी सत्य है--'न काला न नीला, न पीला, न सफेद, न पूर्वी, न पश्चिमी, न उत्तरी, न दक्षिणी, बे निशान, बे मकान विशाल आत्मा के आचरण से मौन रूपिणी सुगघि सदा प्रसारित हुआ करती है । इसके मौन से प्रसूत प्रेम, सौंदय, पवित्रता, धम तथा सारे जगत का कल्याण वर विस्तत होते हैं । इसकी उपस्थिति से मन गौर हृदय की ऋतु बदल जाती है । तीक्ष्ण गर्मी से जले मुने व्यक्ति आचरण के बादलो की वूदा बूदी से शीतल हो जाते हैं। मानसोत्पन शरद ऋतु से पलेशातुर प्राणी इसकी सुगधमय सरस बसत ऋतु के आन द का पान करते हैं। सौंदय सहज होता है कृत्रिम नहीं। यह रूपात्मक भी होता है और गुणात्मक भी। दिव्य भी होता है और मानवीय भी। प्रकति का विशाल प्रांगण तो सौदय के विविध रूपो का मडार है। इसकी विशेषता को घनानद के शदों मे ही व्यक्त किया जा सकता है-जेते निहारिये नेरे हृ नननि तेते खरी निकसे वा निकाई।' .

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104 विद्यापति एक अध्ययन 'योन । महाभारत गधहीन प्रेम की जय मनायी जाती है । उनको दष्टि मे कृष्ण के साथ प्रम प्रेम है और अ य के साथ काम । जो कुछ भी हो प्रेम हृदय का रागात्मक सबध है जो दो हृदयो को जोड़ता है और आन द की सप्टि करता है और प्रेम का कारण होता है सौंदय । प्रेम और सौंत्य काव्य के मुख्य दण्य हैं जो रसराज शृगार की ज्योत्सना के अक्षय उत्स हैं । साहित्य मे प्रेम के स्वरप का विकास-साहित्य के प्रवाह मे प्रभ सौदय के विकास का इतिहास अत्यत मनोरजक है। ऋग्वेद म यह दो रूपों मे मिलता है यम-यमी से सवाद मे, जिसमे यमी अपने भाई से प्रणय का निवेदन करती है तथा उवशी और पुरुरवा के सवाद में । प्रथम मुक्त सबध की सबलता की गाथा है और द्वितीय विवाहोपरा त प्रणय सम्बध का सुदर चित्र । इसके बाद रूप, गुण और धम पर आधारित प्रम बाल्मीकि रामायण मे मिलता है, राम और सीता के प्रसग काल मप्रेम का स्वरूप पलट गया है और प्राचीन आदश धूल चाटत दोष रहे हैं । पेम को भाव एव कल्पना लोक म ले जाने का श्रेय महाकवि कालि दास और भवभूति को है। पांचवें प्रकरण मे आते आते प्रेम खेत खलिहान और प्रकृति की गोद मे उतर आया है और गांव को गंवार तथा अल्हड युवतियो का शृगार करने लगा है। स्वकीया के स्थान पर परकीया प्रम को महत्व दिया जाने लगा है । यह भाभीर सस्कृति की देन थी। बारहवी गताब्दी के साहित्य में प्रेम के एक छत्र मम्राट जयदेव का प्रादुभाव हुआ। भक्ति और शृगार की मिश्र धारा जयदेव की इस घोषणा के साथ रह चली- यदि हरि स्मरणे मरममनो यदि विलास कलास कुतूहलम मघर कोमल कात पदावली, शृणु तद जयदव सरस्वतीम! यययानी सिद्धा में वामाचार ने इसके लिए पृष्ठभूमि तयार कर रखी यो। यद्यपाल सिंग का प्रतीर है । वयानी सिक्षा द्वारा धर्म का मोगा खावरण हातर कामाचार का खुला प्रचार किया जा रहा था। पर यान, महजिया और कोल मापना ये दुराधार से रक्षा करने के लिए भागवतमार ने गोपी-कष्ण प्रेमका चित्रण पर प्रेम और सौम्म को याराना सागर म इबने से बपाने का प्रयाम दिया था। विन्तु परवर्ती कवि अपनी विद्यापति के काव्य मे प्रेम तथा सौदय विधान 105 शृगार प्रियता के कारण उसे ले डूब । जयदेव के सबंध में श्री जे० सी० घोष का यह क्यन विचारणीय है- यदेव थे 'गीत गोविंद' को भारतीय गीतो का गीत कहा गया है । कृष्ण-राधा के प्रेम विहार का चित्रण इसमे ऐसी रद्दाम मासलता के साथ किया गया है जिमकी बराबरी करने वाली दूसरी रचना दुनिया में शायद ही मिले। फिर भी यह एक जीण गुलाब है अपने सौरभ के अति से जीर्ण ।' विद्यापति ने अपने गीतो के लिए जयदेव स सीधा प्रभाव ग्रहण किया कितु उहोने मासरा सौंदर्य के साथ धैष्णव भाव का मिश्रण कर उसे जीण हा से बचा लिया। विद्यापति के काव्य मे प्रेम विधान--प्रेम परमात्मा का स्वरूप और मानव जीवन का सार है। इसकी चरम परिणति शृगार मे होती है। शृगार को त्रिभुवन सार कहा गया है । इग 'त्रिमुवन सार' के परम मर्मी कवि हैं महन्य शिरोमणि, मथिल कोकिल, अभिनव जयदेव विद्यापति । उनब काव्य मे प्रेम और सौंदर्य का अदभुत सगम है । इनके गीतो मे सूपमा का भात प्रेम के मौभाग्य चिह्न से अरुणिम हो उठा है । विद्यापति की पदा- वली तो प्रेम की अदभुत पोथी है । जिस ढाई आखर को पढकर कबीर पहित हो गए उमी ढाई आखर ने जयदेव को अभिनव जयदेव बना दिया। पदावली के अक्षर अक्षर से सत्य आस्वाद्य प्रेम रस को बूदें ऐसी टपकती हैं जैस बसत को बौगयी आन मजरियो से सुरभि-सीकर । पदावलियेतर रचनाओ मे कथा व त पर लटकते हुए प्रेम और सौदय के ओस कण मणि मालाओ की तरह सुशोभित होती हैं। विद्यापति के काव्य मे वणित प्रेम के तीन स्वरूप है-स्वकीया प्रेम, परकीया प्रेम तथा सामाया या गणिका प्रेम। स्वकीया प्रेम में दाम्पत्य जीवन की मर्यादाओ से अभिमडित वैवाहिक जीवन का मनोरम चित्र है। प्रेम के इसी स्वरूप को विद्यापति ने बादश रूप में स्वीकार किया है और उमकी प्रतिष्ठा की है। परवीया प्रेम जिसमे नायक बहुबल्लभ होता है और अनेक रमणियो के माथ रमण करता है। इस प्रकार का चित्र विलास और भोग का चित्र है। इस चित्र पर राधा कृष्ण के नाम का मीना सा परदा है पर कही कही तो यह परदा मी लुप्तप्राय है। सामा या या गणिका के प्रेम का चित्रण विद्यापति ने बहुत अधिक तो नहीं किया है। जौनपुर वेअन्य रमणियो को पान फुल मानते हैं। घस्मर नायक है काशीश्वर 106 विद्यापति: एक अध्ययन को वेश्याओ का चित्रण करते समय यह चित्र अधिक मांसल और सगोत्र हो उठा है। अव प्रश्न यह उठता है कि यदि विद्यापति स्वकीया प्रेम को मक मानते थे तो अन्य प्रकार के प्रेम का चित्रण क्यो किया। कवि भारतीय सस्कृति में पले मर्यादावादी माह्मण था। अत स्वकीया प्रेम तो उसका धर्म था और उसकी श्रेष्ठता उसको अतरात्मा की आवाज। कि तु कवि मनोभव जगत का विचरणशील प्राणी होता है। उसके कण कण से उसका परिचय होता है मत कवि-कर्म के नाते उसने प्रेम के सभी स्वरूपो पावित्र उपस्थित किया है। इसके अभाव में समाज का दर्पण अधूरा चित्र हो वे पाता । तथापि मर्यादा की स्थापना के लिए उसने स्थान-स्थान पर इस प्रकार के प्रेम की भर्सना की है और आदर्श दाम्पत्य, सामाजिक मर्यादा तथा मनोवैज्ञानिक सत्यो की प्रतिष्ठा की है। पदावली तो प्रेम और सौंदय का तीर्थ धाम है ही कवि ने पुरुष परीक्षा कीतिलता, कौतिपताका और गोरक्ष विजय नाटक मे भी प्रेम का चित्रण किया है। 'पुरुष परीक्षा के माम प्रकरण में अनुकूल, दक्षिण तथा घस्मर नायक और उनके प्रेम की कहानी है। इसमे धम भृगार की प्रतिष्ठा है और राम सीता के प्रेम की भूरि भूरि प्रशसा की गई है। दक्षिण नायक लक्ष्मण सेन अपनी पत्नी रलप्रभा को लक्ष्मी मानते हुए भी बहुवल्लभ हैं। जयचद। इस कथा मे स्त्री के वश में रहने वाले नायक की दुगति का चित्र है। इस प्रकार कीर्तिलता मे प्रेम के ये तीनो स्वरूप चिषित हुए हैं जिनस स्वकीया प्रेम की श्रेष्ठता का स्वर मुरित होता है। वीर काव्य कीतिलता मे 'जोनापुर नगर की वारवनितामो को चित्रण है। राजमार्ग पर अपार जन समूह और दोनो तरफ बठी हुई षणिक कामिनियो । भीड इतनी अधिक है कि धक्के के कारण स्त्रिया की चूड़ियां फूट जाती हैं और वेश्याओ वापीन पयोधरो मे टकराकर सन्यासी भी अपना सयम खो बैठते हैं । यहाँ के पुरुष भी अत्यात रसिक हैं । जोनापुर स्प का बाजार प्रतीत होता है जहाँ मध्या और प्रौढ़ा तो हैं हो मुग्धा पोरी चोरी प्यार करना सीस रही हैं। कीर्तिपताका के पदह पृष्ठो म कवि भी विद्यापति के काव्य मे प्रेम तथा सौन्दय विधान 107 ने घोर मर्यादा रहित मुक्त कामाचार का वर्णन किया है और इस वणन के औचित्य के लिए राम और कष्ण को भी इसमे घसीटा है। कवि का कथन है कि त्रेता मे राम और सीता के मर्यादापूर्ण जीवन को कारण विलास भोग के सुख से वचित रहना पहा । इसी सुख को प्राप्त करने के लिए उह द्वापर मे रसिक शिरोमणि कष्ण रूप में अवतरित होना पड़ा। गोरक्ष विजय में कुछ शृगार-प्रसगो की चर्चा है जिससे पवि के शृगार सबधी दष्टिकोण का परिचय मिलता है। सासारिष सुखा की सारहीनता ही 'गोरक्ष विजय' का सदेश है। इस प्रकार विद्यापति ने पुरुष-परीक्षा मे धर्म शृगार का पोषण किया है। कीतिलता मे जोनापुर के योवन का रसमय चित्र उपस्थित किया है। कोतिपताका मे उत्तान शृगार का मर्यादा रहित चित्र है और गोरक्ष विजय मे रमणी विलास शृगार की वीभत्सता को प्रस्तुत करते हुए ससार सुख भोग की असारता पर प्रकाश डालते हुए गोरखनाथ के शब्दो में जागरण और चेतना का संदेश दिया है। विद्यापति-पदावली तो प्रेम की पोथी है। इसमे पणित प्रेम का स्वरूप विके ही शब्दों मे- सपहुँ सुनारि सिनेह, चांद कुमुद समरेह । दिवसे दिवसे घरि-जोति, सोना मेलावलि मोति । यह सुपुरुष और सुनारि का प्रेम है । चन्द्रमा और कुमुद इस प्रेम के आदश हैं। इस आदश प्रेम में पवित्रता, गभीरता, सजीवता, एकरूपता और पारस्परिकता भाय स्वत मुखर हो उठा। सच्चा प्रेम नित्य प्रति बढ़ता जाता है । जिस प्रकार स्वर्णाभूषण मे मातियो पे जडने से सौदय की अभिवृद्धि हो जाती है उसी प्रकार स्त्री पुरुष का पारस्परिष प्रेम त मयता और पवित्रता के योग मे परस्पर उसके जीवन मे श्री और सुख की सम्पदा बिखेरता रहता है। यह परस्पर मात्म समर्पणकारी एय मिष्ठ प्रेम ही विद्यापनि की पदावली का आदश है। पदावली मे प्रेम चित्रण के प्रमुख माध्यम पार हैं-(7)राधा पण का नायक नायिका स्वरूप जिसमे वैष्णव साहित्मिक परम्परा पे प्रेममा निरूपण हुआ है। किंतु इन पदो मे राधा-कृष्ण नाम का मीमा होता है। (ख) शिवसिंह, लखिमा देवी तथा अय राजा रानियो आदि से वैष्णव प्रेम भी। विद्यापति के प्रणय गीत मुक्तक गीति काव्य के सर्वोत्कष्ट 108 विद्यापति एक अध्ययन है जिससे भीतर से भक्ति यम और शृगार अधिक झाकता हुआ पनीर सबधित पद जिनमे इनके मनोरजन के लिए भोग विलास और सौंन्य के चित्र हैं। (ग) सामाय नायक-नायिया के प्रेम गीत । इन गीतों में राधा कष्ण या किसी राजा रानी के नाम नहीं है । ये गीत विद्यापति के हृदयक स्वतत्र उदगार हैं जो यौवन और शृगार के प्रवाह से अनुप्राणित है। (घ)शकर पार्वती और अब देवी-देवताओ से सबंधित पद । इन गीतों में भक्ति भावना, हास्य, मनोरजन तथा शिव के पारिवारिक जीवन की सरक आत्मीय एव सुदर व्यजना है। पदावली के अधिकाश पदो में राधा कष्ण का ही नाम प्रत्यक्ष अथवा प्रकारातर मे आया है। ये पद शृगार के उभय पक्षो के उत्कष्ट उदाहरण हैं। कुछ पदो मे रहस्यात्मक सकेत भी मिलते हैं और राधा कृष्ण का उदाहरण हैं। उनमे रसिक हृदय को समझने के लिए विशेष सामग्री है। कला और भाव दोनो दष्टियो से ये प्रेम गीत सदैव ताजे और सवित बने रहेगे । इनकी सोधी सोधी गध कभी मद न होगी। विद्यापति के प्रेम चित्रण मे प्रथम दशन में प्रेम का सुदर उदाहरण है। राधा और कृष्ण के तमत्त यौवन का सौदर्य एक दूसरे को आकष्ट करता है। प्रथम दष्टि मिलन मे ही वे एक दूसरे के हो जाते हैं। राधा कण दशन के लिये व्याकुल हैं और कृष्ण की आँखो में नीद नहीं। यदि नीद आती भी है तो वे बार-बार राधा का नाम लेकर जग जाते हैं। राधा जब कष्ण का प्रथम दशन करती है तो लाख प्रयत्ल करने पर भी अपनी दष्टि कष्ण के रूप पान से विमुख नहीं कर पाती हैं। राधा को दशा दयनीय हो जाती है। विप्रलभ परम्परा में दो दिशाओवाचित्र कवि खीचता है। राधा कभी अपने नेत्री को कोसती हैं तो कभी वशी की स्वर लहरी को वह तो अपने रूप, यौवन, जीवन आदि सभी कोकण के अभाव मे व्यर्थ मानती हैं-~-'की मोरा यौवने, को मोरा जीवने, की मोरा चतुरपने ।' बहु वल्लभकान्त की ठुकराई हुई प्रिया का अहेतुक मगलकारी और एकनिक प्रेम का चित्र भी देखने योग्य है- सहसे रमनि, रमनि वे पशु मोराहु विद्यापति के पाव्य मे प्रेम तथा सौन्दर्य विधान 109 सहिम पास, पेनने जतने गौरि मागिय स्यामि सोहाग।' इस सोहाग की कामना मे कौन ऐसी भारतीय नारी है जो अपने को पाय नही समझती प्रोपित पतिमाओ ये वर्णन में विद्यापति ने गोपिकाओं में सामूहिष विरह या वणन ही किया है जितु राया ये घिरह के तो अनेक उत्कष्ट उदाहरण मिलते हैं। प्रवत्स्यपनिका या यह चित्र वितना मार्मिक है-गाढ़ी नीद मे साई हुई गायिका मो जगावर नायक विग जाने की बात कहता है। नायिका यह सुनते ही चकित और पितातुर हो उठती है। मुख विवण हो जाता है और शीघ्रता मे उमया व्यवहार भी अस्त व्यस्त हो जाता है। मारिया ये आसन विरह का चित्र देखिये- उठ उठु सुदरि हम जाइये विक्षम, सपनहरूपनहि मिलत उदेस । से सुनि सुदरि उठलि चेहाय, पहुंग वचन सुनि वैसल ममाय । उठइय उठलि बंसलि मन मारि, विरह मातलि खसल हिय हारि। एक हाथ उबटन एकाहाथ तेल, पिय ये नमना सुदरि चलि देल । सयोग गार वे चित्रों मे नायर नायिका प्रेम का उत्कृष्ट रूप देखन का मिलता है। सयोग शृगार का तो अक्षय मडार है विद्यापति की पदावली । अभिमार प्रसग मे 'दुवर जमुनक तीर' को पार कर आने वाली नायिका का साहम और मिलन उत्कठा देखने योग्य है । साथ ही अन्य ” गार चित्रा मे 'सुदरि चलिलह पहुँ घरना', 'झापब कुच दरसाओव आध', जसे हापग 'पउनाव नीर, तइसे कांपे कि शरीर', कुजभवन ते शिकसल रे रोवल गिरधारी, नाव होलाव अहीरे, 'कर घरु कर मोहि 'पारे क हैया' आदि अत्यात सरस प्रसग हैं। चोरी चोरी प्रेम के भी अनेक चित्र मिलते हैं-'जाहि लागि गेलिए ताहि कहो लाइलहे', तापत वैरी पितु कॉहा' आदि अनेक उदाहरण हैं । लोक जीवा के सदम मे प्रेम का व्यावहारिक पक्ष भी प्रचुर मात्रा में 110 विद्यापति एक अध्ययन अभिव्यक्त हुआ है। स्प और यौवन के रहने पर तो नायक दास बना हो रहता है नितु बाद की स्थिति मे भी नायिका नायक को वस म कसे करे इसका भी सुदर चित्रण है । यया- प्रथमहि सुदरि कुटिल कटाख, जिव जोख नागर दे दस लाख। मोदे हास सुधा समनीक, अइसन पर हो कि तइसन बीक। इत्यादि 'यौवन रूप मछल दिन चारि से देखि आदर वएल मुरारि' की दवा विद्यापति ने ऊपर वाले पद मे कितना सटीक बताया है। विद्यापति के श्याम रमन-रतन हैं और राधा रमनी रत्न। इनके सयोग से रस सिधु उमड पडता है-'रस मातल दुइ बसन खसाल रे विद्यापति रस सिंधु उछलल रे।' फिर राधा के प्रेम का अनुभव क्या कहना-'सखि की अनुभव पूछसि मोय'-उनका अनुराग तो तिल तिल नूतन होय' है और इनका प्राण-मन जुड़ गया है क्योकि उहें लाखो मे एक मिल गया है। जो राधा की तप्ति की बात है वही प्रत्येक रमणी के लिये जिसका प्रियतम उससे अगाध प्रेम करता है। विद्यापति की महेशबानियो और नाचारियो म दाम्पत्य प्रेम का अभिनव रूप मिलता है। शिव और पावती की भक्ति इन गीतो को आत्मा है कि तु इन गीतो मे शिव-पावती के दाम्पत्य जीवन की अनूठी झाँकी है। वही पावती जी शिव के रूप पर मुग्ध होती हैं तो कही उनकी गृहस्थी पर उपालम्भ करती हैं बूढा बैल, डमरू और मृगछाला यही तो उनकी सपत्ति है। कभी शिव रूठते हैं तो पावतो उन्हें जगल जगल ढूढती फिरती हैं और कभी स्वय रूठकर मायके जाने की धमकी देती हैं । कहाँ पति-पत्नी का विनोद भी अपने परिवार-गणेश कार्तिकेय को लेकर चलता है । शिव के प्रति विद्यापति की भक्ति ऐमी प्रगाढ है विउ होने शिव पार्वती को मिथिला के जीवन में उतार दिया है और शिव पावती दिव्य होते हुए भी उनके अपने आत्मीय हैं । कुछ उदाहरण प्रस्तुत है-- (क) एपथ देखल कहि बूढ़ बटोही। (मित्र-मजूमदार-पद स० 791)

विद्यापति के राज्य मे प्रेम तथा सौदयं विधान 111
(ख) गोरी हर लए मेल बताही।
(रामवृक्ष बेनीपुरी-
-प०स० 237)
(ग) क्तए गेला मोरा बुढ़वा जती। (यही -~-पद स० 247)
(घ) आज नाय एक वत मोहि सुख लागल है।
तोहे सिव परि नट धेष को डमरू बजाएल है।
भलन कहल गउरा रउरा माज सुनायन है।
सदा सोच मोहि होत कवन विधि बाँचब है ।
जे जे सोच मोहि होत कहा समुझाएल है।
रउरा जगत के नाय कवन सोच ला गए है।
नाग ससरि भूमि खसत पुहुमि लोटायत है।
कार्तिक पोसल मयूर से हो घरि खायत है।
अमिय चूय मूमि खसत बधम्बर जागत है।
होत वधम्बर बाध बसह धरि खायत है।
टूटि खसत रुद्रास मसान जगावत हे।
गोरी कह दुख हो न विद्यापति गावत है।
विद्यापति के पदो मे समृद्ध लोकिक प्रेम, पारलौकिक प्रेम और
भागवत प्रेम का व्यापक समवय है। राधा कृष्ण बदना में भक्ति शृगार
फा मिश्र रूप दुर्गा, गगा, शिव के पदो मे विशुद्ध भक्ति और माधव
सम्बोधित पदो मे वद्धावस्था वा ससार भोगजनित पश्चाताप का स्वर
अत्यात प्रखर है। और उनमे कातरता, विह्वलता और निराशाजन्य
अधकार में भी अटूट विश्वास की एक विरण है। सख्या मे कम होते हुए
भी ये पद अति प्रभावशाली हैं और भक्ति भावना मे तुलसी सूर के निकट
विद्यापति के प्रेम स्रोत के सम्बन्ध मे मिथिला का लोकमुख कुछ
कहता है और गौडीय वैष्णवों का भी अपना विश्वास है। जिस प्रकार
गीत गोबिदकार जयदेव की काय प्रेरणा स्रोत उत्कल क या देवासी
पद्मावती थी, चण्डीदास की रजकिनी 'रामी थी उसी प्रकार विद्यापति
को भी आराध्या अपूर्व सुदरो 'लखिमा देवी' थी । ऐतिहासिक प्रमाणो के
अभाव मे भी सहसा इसपर मविश्वास करने का जो नही चाहता क्योकि

आधार विद्यापति के काव्य मे सोदय विधान-सौदय क्या है इस व्यक्त 112 विद्यापति एप अध्यया पदायली में व्यक्त लसिमा दयी ये प्रति अयगठित अनुरक्ति इस विवान । मेरा विश्वास है शिजिस प्रकार प्रसर तोर चुभे दिना हृदय से रक्त यी पारा प्रवाहित नही होती उसी प्रकार जब तक कविका हृदय पुष्पयाण से छलनी नहीं हा जाता तब तक पविता की प्रेम स्रोत स्विनी उसके हृदय- ग से नहीं वहतो। म पीर म स्वानुभूति का घोल जितना ही गाढा होता है गीत उतना ही मधुर और ममस्पर्णा होता है। विद्यापति ये गीतो में व्यस्त प्रेम यो अनुभूति प्रधान साद्रता का सत्र लूट पर इस घिर सत्य को यौन सहृदय अस्वीकार करेगा' तात्पय यह है कि विद्यापति के काव्य मे प्रेम का पारावार हिलार लेता है। उद्दाम यौवन और शृगार या जल है तथा तल मे भक्ति भाव को सदर सोपियां हैं। ये लहरें जब भी मर्यादा मग करने का प्रयास करती हैं कवि समुद्र देवता की भाति हाथ के इशारे से सात कर रहें लोक मानको सीमा मे डाल देता है। . करना अत्यन्त कठिन है। दानिकों ने इम और उलझा दिया है। दशन के दपण मे सौदय को समग्र झलक नहीं मिल पाती है। सौदर्य की प्रकृति को समझने के लिये सौ दय सम्बधी तीन तथ्यो को ध्यान में रखना आवश्यक है-(क) सौन्य न मूत सत्ता है न अमूत, (स) न वह वर का गुण है न गुणो का अतसम्ब घ, (ग) सौ दय पर जगत की कोई सत्ता नहीं है। मोदय को केवल वास्तविक जगत के अनुभवो से समझा जा सकता है। सो दर्य सम्बधी जितनी भी व्याख्यायें अब तक की गई हैं, ये सभी सौ दय के अनुपात मे छोटी हैं। उनमे सौदय के किसी तत्व विशेष की ही झलक मिल पाई है सम्पूण सौ दय की नहीं। सौदय को सत्य और गिर के साथ जोड कर इसकी व्याख्या का उलझा दिया गया है। सौ दयन शिव है न सत्य। वह गिव और मत्य की तरह निविकार, अतीन्द्रिय निरता, अद्वय देशातीत तथा कालातीत है। पितु सो दय मे इद्रियो के माध्यम से 'अपने' आपको ध्यक्त करने की प्रबल क्षमता है। सत्य और गिव इस "ष्टि से पगु हैं, उहें अपने आपको व्यक्त करने के लिये सौदर्य विद्यापति के काव्य मे प्रेम तथा सौदर्य विधान 113 का ही सहारा लेना पड़ता है। रूपात्मक विशिष्टताओं जैसे सामजस्य, सतुलन, अनुपात समान- रूपता तथा प्रतिकूलता आदि के आधार पर सो दर्य की व्याख्या का प्रयास किया गया है कि तु प्राकृतिक सौदय के अनेक अवयवो में इस तत्व का अमाव है कि तु वे सुदर हैं। होगेल ने प्रकृति को जड बता कर उसे सुदरता के क्षेत्र से विलग कर दिया है। क्रोचे के अनुसार मनुष्य प्रकृति मे व्यक्त अपने ही सो दय को देखकर मुग्ध होता है, यि तु जब वस्तु और चेवना का तादात्म्य होता है तो दर्पण और चेतना का भेद कहाँ रहता है ? प्रत्ययवादी मन को प्राथमिकता देते है और यथाथवादी इद्रियो की क्षमता को। सत्य तो यह है कि सौ दय एक भ्रामक शब्द है और भ्रम की गहनता पर ही इसका अस्तित्व आधारित है। सौदय को समझने के लिए हमे अपने अनुभवो पर अधिक विश्वास करना चाहिये। जिस प्रकार सोदय के साथ सत्य और शिव का गठ- बघन अनुचित है उसी प्रकार सोदय के कलात्मक पक्ष पर नैतिकता का आरोपित बधन भी उचित नहीं है। प्रकृति सोदय का कोई नतिक उद्देश्य भी हो सकता है समझना कठिन है। इसी प्रकार सौदर्य के साथ अलोकिक सत्ता सम्बघ जोडकर हम जगत के वास्तविक सौदय से हाथ धो बठते हैं । मन और वस्तु की रति श्रीडा से हम सौदय की अनुभूति करते हैं। यह सौ दर्यानुभूति केवल आनदप्रद ही नही पीडा- जनक भी होती है वस्तुत सौ दय एक भावात्मा तत्व है, वह गुण नहीं है बल्कि सम्व ध तत्व है। वस्तुयें मन सम्बध स्थापित करते ही कुछ रुचिकर मवेगो या इच्छाओ को प्रेरित करती हैं, कभी-कभी व कामोद्दीपक भी होती हैं। जब हम किसी वस्तु या गुण को सुदर कहते है तो निश्चित ही उसके धरातल म गुप्त तीव्र कामना या प्रेम को अभिव्यक्ति होती है। इसके पीछे वाम भावना यो उपस्थिति को भी अस्वीकार नहीं किया जा मक्ता। मोदय के इस दाशनिक और अनुभूति प्रधान स्वरूप की अभिव्यक्ति के मदभ मे हम विद्यापति के का य मे चिनित सौदय की समीक्षा करेंगे। इसवे का यगत रूप को समझने के लिये प्रस्तुत सरणी सहायक होगी- 114 विद्यापति एक अध्ययन सोदय + मूत (रूपात्मक) तरल अमूत (गुणात्मक) (मूत का द्रवीभूत प्रवाह) नखशिख →भाव सौदर्य अगविशेष - कल्पना सौदर्य -मागिक चेष्टायें -अभिव्यक्ति का सौन्दय -+प्रकृति का मूत स्वरूप नाद का सौदय -+समग्रता मे सोदय का सहज रूप नखशिख वणन में विद्यापति ने परम्परा का ही पालन किया है। चद, भ्रमर, पिक, दाडिम, नागिन, कमल, सिंह आदि परम्परित उपमानों को ही ग्रहण किया है कितु अपनी मौलिक प्रतिभा से इसमे नवीनता अवश्य ला दी है। इहोने नखशिख-शिखनख के साथ एक नई परम्परा जोडी है जिसमें नायिका वणन 'पीन पयोधर' से या जहाँ दृष्टि पड जाय वही से प्रारम्भ हो जाता है। नखशिख वणन की दृष्टि राधा और कष्ण के वणन का एक एक नमूना लीजिए-- राधा--माधव कि कवि सुन्दरि रूपे वेता जतन विधि आन सारल, देवल नयन स्वरूपे। पल्लव राज घरन जुग सोभित, गति गजराज भाने । कनक कदलि पर सिंह सभारल, तापर मेरू समाने । मेरू उपर दुइ कमल फनायल, नालविना रुचि पाई। मनिमय हार धार बह सुरसरि, तओ नहि कमल सुनाई। (वेरीपुरी म०स० 12) 'अद्भुत एक अनुपम माग' गीपक मूरदास का एक प्रसिद्ध पद है। माहित्य जगत मे उसकी सवमा य प्रतिष्ठा है। सूरदास से 150 वर्ष पहले रपी गई यह कविता पढपर पाठर विद्यापति की प्रतिमा का अदाज लगा सकते हैं। पल्लव राज, कनक दलि, नालविहीन वमल और हारी विद्यापति के काव्य में प्रेम तथा सौन्दर्य विधान 115 सुरसरि की कल्पना के कारण यह पद सर की अपेक्षा अधिक उत्कृष्ट हो गया है। कृष्ण का स्वरूप भो रापा से कम आकर्षक नहीं है। कृष्ण के सौदर्य को देखकर राधा को सृषि-बुधि खो जाती है । 'कमल जुगल पर चांदक माला' और उसपर तरुण तमाल का वृक्ष कृष्ण के शरीर से कैसा अद्भुत साम्य है-- कृष्ण का स्वरूपकमलजुगल पर चांदव माला, तापर उपजल तरुनत माला। तापर बेठलि विजुरी लता, कालिदी तट घिरे धलि जता। साखा सिखर सुधाकर पोति, ताहि नव पल्लव अरुणक भौति । विमल बिम्ब फल जुगलविकास, तापर कीर धीर करवास । तापर चचल खजन जोर, तापर सोपिन झोपल मोर। ए सखि रगिनि कहाव निसान, हेरइत पुनि मोर इरल गियान । (वही १०स० 36) पीन पयोधर से प्रारम्भ होने वाला नखशिख चित्रण नायिका के सौन्दय का अद्वितीय चित्र है । नायिका क्या है स्वरूप को लता है उरोज समरू पयत में समान उतुग और पीन हैं। नारी सुलभ कोमलता मे, 'पद्मिनी' का चित्र साकार हो उठा है। रीतिकालीन "क्नक छरी' नहीं 'कनक लता' है, लता मे छडी की अपेक्षा लोच और सुकुमारता अधिक होती है-- पीन पयोधर दूवरि गता, मेरू उपजल कनक लता। एकाह, एमाहुतोर दोहाई, अति अपूरब देखल साँई । मुख मनोहर मधुर रगे, फलल मधुरी कमल सगे। लोपन जुगल न ग आकारे, मधुक मातल उहए न पारे ।। - की तरह वह

116 विद्यापति एक अध्ययन
मुखरूपी कमल में लाल लाल होठ मधुरी हैं और लोचनो की उपमा,
'मधु + मातल' मृग से देकर दोध और प्रेम में विभोर अधखुली आँखों
का अत्यन्त मनोहारी चिन्न वि ने खीच दिया है।
अय प्रकार के रूपात्मक सौदर्य-अगविशेष, आंगिक चेष्टायें
गत्यात्मक सोदय, सहज सोदय, तरल सोदय तथा प्रकति सौंदय के भी
कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं-
(क) पहिल बदर सम पुनि नवरग,
दिन दिन बाढ़ए पीडए अग।
से पुनि भए गेल बीजक पोर,
अब कुच बाढल सिरिफल जोर।
(वही, प०स० 8)
(ख) हरिन इदु अरविद करिन हम,
पिक तूझल अनुमानी।
नयन वदन परिमल गति तन रुचि
अओ अति सुललित बानी।
(वही, १०स०11)
(ग) गेलि कामिनि गजहु गामिनि, विहसि पलट निहारि ।
इद्रजालक कुसुम-सायक, कुहुषि मेल वरनारि।
जोरि मुज जुग मोरि वेढल, ततहि बदन सुखद ।
दाम चम्पक काम पूजल, जइमे सरद पद।
उरहि अचल झापि चचल, आध पयोधर हे ।
पौन पराभव सरद पन जनि वेक्त कएल सुमेरु ।
(वही, १०स० 32)
प्रयन पद म कवि ने यौवन विकास का मरस इतिहास फेवल पार
माग-बदर नवरग, बोजा पार और सिरिफल से प्रस्तुत कर दिया
है। इसी प्रकार पद्मिनी के नयन, वदन, परिमल, गति, तन रवि और
स्वर को रितने प्रयत्न लाघव के साथ हरिन, दु, अरविद, परिनि, हेम
और पिव मध्यक्त कर दिया है। तीसर पद मनायिका मी कामिनी--
चेष्टाआमा गुदर चित्र है। गजगामिनि 'मुर मुमकाय' पल दतो है

- विद्यापति के काव्य मे प्रेम तथा सौन्दय विधान 117 फिर क्या है कुसुम सायक या इद्रजाल फैल जाता है। मुजामओ को मोडकर, मुख से बाल हटाना, शरदचन्द्र का उदित होना, विसकते हुए अचल से चचलता के साथ उरोजा को ढंक लेना आदि नायिका की मनो हारी चेप्टायें हैं। इनसे आगिक चेष्टायो से उत्पन तरल सौदर्य की सम्पन्न झांकी मिलती है। सौ दय का इतना श्लिष्ट और मादक चित्रण विद्यापति की ही लेखनी से सभव हो सकता है। गुणात्मक सोदय के चित्रण मे भी विद्या सिद्धहस्त हैं। रूप में साय गुण का समवय राधा और कृष्ण दोनो में ही है। साथ ही अय पात्रोम भी इसका अभाव नहीं है। राधा कष्ण एक दूसरे के रूप पर ही नही गुण पर भी मोहित हैं । कृष्ण बहु वत्लभ है कि तु राधा को इसकी चिन्ता नहीं वे तो अपने सुहाग की कामना करती हैं। उनकी मगल- कामना का उदघोष क्तिना सुदर है-कष्ण चाहे जहाँ भी रहे सुखी और सानद रह । कृष्ण भी राधा के प्यार मे अनुरक्त हैं। मथुरा प्रवास मे खाने पीने, उठने-बैटने सभी चेप्टामओ मे उ हे राधा की याद आती है। तात्पय है कि कृष्ण और राधा का सौ दय कागज का फूल नहीं बल्कि उद्यान का गुलाव है, शरद सरोवर का कमल है जिसम रूप भी है गुण भो, सौदय भी है सुधि भी। देखिये एक दूसरे के वियोग मे दोनों की क्या स्थिति है- रापा की स्थिति-लोटई घरनि धरनि धरि सोइ, खने खने सांस खने खन गेइ । खने खन मुरछई कठ परान, इथि पर की गति देव से जान । है हरि पेखलो से वरनारि, न जिवई विदु कर परस तोहार। (वही, प०स० 54) कृष्ण को स्थिति--आज हम पेखल कालिदी कूले, तुम बिनु माधव विलुठए घूले। कत सत रमनि मनहि नहि आने, किए विषदाह-समय जल दाने।

118 विद्यापति एक अध्ययन मदन मुजगम देसल कान, विनहि अमिय रस कि करब आन । (वही, प०स० 48) राधा और कृष्ण दोनो के हृदय मे प्रेम की समान अग्नि जल रही है। राधा के प्राण आकठ हैं तो कृष्ण भी घूल मे लोट रहे हैं। राधा-कृष्ण के कर स्पश बिना जीवित नहीं हो सकती तो कृष्ण को सप ने डस लिया है और बिना अमत के उनका भी जीना कठिन है। ऐसा समतुल्य प्रेम भारतीय दाम्पत्य जीवन की आदश झांकी है। कल्पना का तो अक्षय कोष कवि के पास है। मौलिक कल्पनाओ और सद्भावनामो से काव्य सौ दय, रूप सौदय और भाव सौदर्य को तो कवि निखारता ही है साथ ही शिव सम्बधी उद्भावना मे तो विद्यापति के शृगार चित्रो मे स्वण मे सुगध की कया चरितार्थ कर देते हैं। यथा-- (क) गिरिवर गरुम पयोधर पर सित, गिमि गजमोतिक हारा। काम कम्बु भरि कनक शम्भु पर ढारत सुरसरि धारा। (वही, प०स०18) (ख) मेरु उपर दुइ कमल फुलायल, नाल विना रुचि पाई। मनिमय हार धार बह सुरसरि, तओनहि वमल सुखाई। (वही, प०स० 12) (ग) उर हिल्लालित पांचर केस, चामर-झोपल कनक महे ।। (वही, १०स०४) (घ) मनमथ तोहे की कहब अनेक । दिठि अपराध परान पए पीडसि, ते तुअ कोन विवेक । (वही, प०स० 43) (ड) चिकुर गरए जल पारा, अनु मुख मसि हर रोअए अधारा। (वही, प०स० 23) इस प्रकार की सुदर कल्पनायुक्त उदभावनायें पाठक ने मन की बदमाखो को खोल देती हैं। मे विपुल धाम्य चित्र विद्यापति के काव्य यमव के रत्न है जिहें पाठय अपने हृदय की माव सम्पत्ति वनावर माज- सप अपनाये हुए हैं।

विद्यापति ये काव्य मे प्रेम तथा सोक्ष्य विधान 119
विद्यापति का सौदय चित्रण सद स्नाता और सहज समयचित्र के
उल्लेख के बिना अधूरा रह जायेगा। सद्य स्लाता के चित्रो पर तो
मिथिला की अपनी छाप है। सस्कृत-कवियो की परम्परा को अपनाकर
विद्यापति अपनी प्रतिभा से उनसे भी आगे हो गये हैं। हिंदी साहित्य में
इस प्रकार के चित्रो का नितात अभाव है। महज सोदय को समग्रता के
माथ प्रस्तुत करने मे तो विद्यापति इतने सिद्धहस्त हैं कि आंख मूद कर
बिना किसी अलकरण के ऐसे भव्य विष सोच देते हैं कि मन मत्र मुग्ध
होकर रह जाता है-
सद्य स्नाता--जाइत पेसल नहाइल गोरी,
कति सगरूप धनि आनल पारी।
केस निगरइत बह जल धारा,
चमर गरए जनु मोतिम हारा।
अलवहिं तीतल ते अति सोभा,
अलि कुल कमल वेढल मधु लोमा।
नौर निरजन लोचन राता,
सिंदुर मडित जनु पंकज पाता।
सजल पीर रह पयोधर सीमा,
पनक बेल जनि पडिगेल हेमा।
मओ नुकि करतहि चाहि किए देहा,
अवति छोडब मोहिं ते जब नेही।
ए सनि रस नहिं पाओल मारा,
इथे लागि रोए गरए जल धारा ।
(वही, प०स० 25)
स्नान कर गीले वस्त्रा मे निकलती हुई गोरी का समस्त रूप साकार
हो उठा है। रूपराशि की कोप अपूर्व सुन्दरी बालो को निगारती है,
गोले वस्त्रो मे व्यक्त वदा पर भौरे लालायित हैं। आंखें अजन के बिना
लाल हैं। गीला वस्त्र उरोजो पर सिमट कर रह गया है। इसी प्रकार
का एक देव का पद है-'पीत रग साडी गोरे अग मिलि गई देव' ।
विद्यापति के इस पद मे रूप की मादकता तो है ही, जड़ की चेतनता भी

120 विद्यापति एक अध्ययन
अदभूत है । वस्त्र भी बदन को वियोग को आशका में छोडना नहीं चाहता
क्योकि ऐसा रम उस पुन नही प्राप्त होगा। नवीन कल्पना और मौलिक
उदभावना से आपूर इस प्रकार के अनेक पद पटावली मे उपलब्ध हैं।
सहज समग्र सोदय के भी एक-दो उदाहरण देकर इस प्रसग को
दिराम दिया जाता है।
(क) चांद सार ले मुख घटना करु, लोचन चकित चकोरे।
अमिय धोय आंचर यी पोछए, दहदिसि भेल अजोरै।
(वही, प०स० 14)
(ख) सुधा मुसि के विहि निहि निरमिल बाला।
अपरूव रूप मनोभव मगल, त्रिभुवन विजय माला।
(वही, १०स० 15)
(ग) देख-देख राधा रूप अपार ।
वे विहि जपरुब रूप समारल छिति तल लावनि सार ।
(वही, २०स० 1)
(प) सहजहिं मानन सुदर रे भौंह सुरेखलि आख ।
पवज मधुपिन मधुकर रे उडए पसारल पाग्य ।
(वही, १०म० 3')
इस प्रकार कही कवि चांद का सार लेकर नायिका के रूप की रचना
करता है और उसके मुख काति से जगत मे प्रकाश फैला देता है, तो कही
बूढे ब्रह्मा को निमुवन विजयी माला पर आश्चय करता है, कही राधा के
अपार सरल रूप को देखकर चक्ति होता है तो कही श्वासा के स्पश से
यौवनाक बादलों के बीच चल चपला सा चमक जाता है तो वही
स्वभावत प्रक्तम्य ही सुदर चेहरे पर सुशोभित रतनारी आंघो की उपमा
मधुमाते भ्रमर के पास पसारने मे देता है । भ्रमर के पखो और नायिका
के पलकों का गतिशील साम्य अदभुत है, अनोखा है।
सारांश यह है कि विद्यापति सौदर्य पे विविध रूपों के चतुर चितेरे
है। गार और सौदर्य का जो अद्वितीय सम्बप है, उसे विद्यापति ने पूर्ण
पसारमक कोल एव सरसता के साप व्यक्त किया है। वस्तुत इनके
सौन्दय चित्रण की तुमना उस अमर सोदय वाटिका से की जा सकती है

विद्यापति के काव्य में प्रेम तथा सो दय विधान 121 । जिसकी ताजगी कभी समाप्त नहीं होती और जो सौर्य सुरभि का अक्षय कोप सदैव लुटाया करती है। विद्यापति को प्रेम भावना भागवत या लौकिक ? भक्ति और शृगार दोनो ही रति की सतानें है । भक्ति भगवानो मुख होन के कारण श्रेय हो गई है और शृ गार लोको मुख होने वे कारण प्रेय। भारतीय विचारो को वश-परम्परा मे भक्ति के प्रति अघी अनुरक्ति मिली है और 7 गार के प्रति विरक्ति । इसीलिए आलोचक जव इस परम्परित अनुरक्ति और विरक्ति का चश्मा लगाकर किसी कवि की समीक्षा करता है तो जमीन-आसमान एक कर शृगार को भक्ति और लौषि को अलोकिक सिद्ध करने का प्रयास करता है। शायद वह भूल जाता है कि शृगार और भक्ति मे मौलिक भेद नहीं है । शृगार के कधे पर ही चढकर भक्ति मुक्ति और मोक्ष के कोठे पर पहुंचती है और सौंदय के प्रति आक्षण शृगार का द्र बिदु है । भक्ति भी इस धम को अस्वीकार नहीं कर सकती है। मेरा विनम्र विचार है कि विशुद्ध शृगार भी उतना ही श्रेष्ठ है जितनी विशुद्ध भक्ति । अत किसी कवि या कलाकार की श्रेष्ठता उसये भक्त या शृ गारी होने मे नही बल्कि कवि या कलाकार होने मे है । उसकी श्रेष्ठता की कसौटा है ममस्पर्शी स्थलो की पहचान तथा उनकी प्रभाव- शाली अभिव्यक्ति। फिर भी विद्यापति का प्रेम भागवत है या लौकिक इस सबध मे विद्वानो की दो टोलियां बन गई हैं। एक उहें प्राण-पण से भागवत सिद्ध करने का प्रयास करती है तो दूसरी भागवत प्रेम के लिए विद्यापति के काव्य का कपाट ही बद कर देती है और उसे शृगार के अतिरिक्त और कुछ दिखाई ही नहीं देता। इस सबध मे डॉ. ग्रियर्सन, डा० केये, शारदा चरण मित्र, महमहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री, श्रीकुमार स्वामी, खगेद्रनाथ मित्र, डॉ० जनार्दन प्रसाद, डॉ. उमेश मिश्र, प० शिवन दन ठाकुर, आचाय रामचन्द्र शुक्ल, डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी तथा डॉ० रामकुमार वर्मा आदि ने तो तथा युक्तियो के साथ अपने-अपने अभिमत व्यक्त किये 122 विद्यापति एक अध्ययन भागवत होने के पक्ष मे विद्वानों के तक-विद्यापति का प्रेम भागवत है, इसका श्रीगणेश डॉ. ग्रियसन ने किया। इनके अनुमार विद्यापति के पदों की महत्ता उसकी प्रतीकात्मकता के कारण है। राधा कृष्ण वस्तुत प्रतीक हैं। राधा जीवात्मा और कृष्ण परमात्मा का। जीवात्मा परमात्मा में मिलने के लिए गिरतर प्रयत्नशील है । जीव माया के प्रपच मे फमा हुआ है । उसे ईश्वरो मुख करने के लिए गुरु उपदेश को आवश्यक्ता होती है । दूती ही गुरु है जो उसे अभिसार हेतु प्रेरित करती है और मागदशन भी करती है। एफ० एफ० केये ने भी इसका अक्षरश समथन किया है। नगेद्र नाथ गुप्त ने भी राधा कृष्ण पदावली का यही मारांश बताया है और 'रनि काजर वम भीम भुगम' कृष्णाभिसारिका वाले पद को लेकर जीव ब्रह्म और माया के प्रतीक को सायक क्यिा है । इसमे कृष्ण ब्रह्म, राधा जीव तथा वर्षा और भयानक रात्रि माया के प्रतीक हैं और दूती गुरु । डॉ० जनादन मिश्र के अनुसार भी विद्यापति ने स्त्री और पुक्ष्य के रूप मे जीवात्मा और परमात्मा की उपामना की जो धारा उस समय उमडी थी, उसमे अपने को बहा दिया। इनके समय मे रहस्यवाद मत जोरो - 1 But his chief glory consists in the mathilı dealect dealıng allegorically with the relation of soul to God under the form of love which Radha born to Krishoa Modelrn Vernacuar literature of Hinduism, page 9-10 2 VidyaPati Thakur 18 of the most fatuous Vaishnava Poets of eastern India His chief fame however, rests on his sonncts in the Mathili dealect of Bibar In these he uses the story of love which Radha bore to Krishna (F F Keay, A History of Hinduism Literature, page 28 विद्यापति के काव्य मे प्रेम तथा सौंदय विधान 123 पर था उसके प्रभाव से बचकर निकलना तुलसी की तरह विद्यापत्ति के लिए भी मुश्किल था। कुमार स्वामी भी विद्यापति के काव्य मे रहस्यभाव की ही स्थापना करते हैं, उनका कथन है-'विद्यापति का काव्य गुलाबो का काव्य है । चारो ओर से गुलाबों से परिवृत्त यह आनन्द कुज है । यहा हमे स्वग का दशन होता है। वदावन की कृष्ण लीला शाश्वत है। धदावन मनुष्य का हृदय प्रदेश है, यमुना का किनारा इस ससार का प्रतीक है जो राधा और कृष्ण अर्थात् जीव और ब्रह्म की लीलाभूमि है। वशी की ध्वनि अदृश्य सत्ता का स्वर है, यह जीव को परमात्मा की ओर अग्रसर होने का आह्वान है। बाबू अजन दन सहाय और डॉ० श्याम सुदर दास विद्यापति पदावली को वैष्णव भाव का प्रतीक मानते हैं। हॉ० श्याम सुदर दास तो इन पर निम्बाक और विष्णु स्वामी का प्रभाव मानते हैं क्योकि राधा का उल्लेख प्रथम बार विष्णु स्वामी तथा निम्बाक सप्रदाय मे ही हुआ है । विद्यापति के प्रेम को वैष्णव मानने वाले कुछ प्रमाण प्रस्तुत करते हैं जैसे विद्यापति और चडीदास की भेंट, चैत य महाप्रभु का इन पदो को गाते गाते भाव- विभोर होना, गौडीय सप्रदाय मे कीर्तन रूप में इनका प्रचलन, बजबुल्लि का प्रभाव, वग, काम, उत्कल आदि मे पदो का प्रचलन, राधा कष्ण नाम के प्रतीकात्मक प्रयोग तथा व दावन, गोकुल, कदम्ब, यमुना तट आदि का प्रयोग, लोकोत्तर प्रेम की व्यजना, जयदेव का प्रत्यक्ष प्रभाव, पचगौड के अतगत मिथिला का होना तया विनय के पदो मे माधव के प्रति आस्था और ससार से मुक्त करने की याचना आदि। लौकिक होने के पक्ष मे विद्वानो के तक-१० शिवन दन ठाकुर तथा मय विद्वानो ने विद्यापति के प्रेम को लौकिक सिद्ध करने के लिए ये प्रमाण दिये हैं-(1) उस युग मे पति रूप मे ईश्वरोपासना का अभाव था। इसका न तो किसी आलोचना ग्रथ मे समर्थन है न सकेत, (2) तांत्रिक उपासना की भांति इस उपासना का थोडा भी अनुक्रण मिथिला मे नहीं मिलता, (3) पदावली की रचना शृगार प्रधान गाथा सप्तशती आदि मथो के आधार पर हुई है, (4) रसमय शृगार की शिक्षा के द्वारा नव दम्पति पर प्रेम का स्थायी प्रभाव पदावली का उद्देश्य है, (5) पूजा 124 विद्यापति एक अध्ययन आदि के अवसर पर इन पदो का गान नही होता है (1) चैत य देव के मूच्छिन होने का कारण केवल राधा कृष्ण का नाम है, (7) कीर्तन की सृष्टि विद्यापति के 200 वर्षों बाद हुई, (8) सूफीमत को प्रौढता विद्यापति के पश्चात मिली थी,(9) रहस्यवादी ग्रन्थो की भांति विद्यापति ने रहस्य का उदघाटन नहीं किया है, (10) कोतिपताका में रामावतार के कारण की घोषणा, (11) वण रत्नाकर मे लीला सकीतन की चर्चा नहीं है, (12) 'माधव हम परिनाम निराशा' जैसे पद मिथिला मे प्रचलित नहीं हैं, (13) पदावली को कीर्तिपताका, फीतिलता और गोरक्ष विजय की पृष्ठभूमि में देखना चाहिए, (14) अनेक पदो मे चित्रित नायिकायें अपने घर, रूप यौवन तथा पति आदि की चर्चा करती हैं, (15) शिव सिंह की प्रशमा कवि ने एकादस अवतार 'नारायणो रूप नारायणो वा' करके किया है जो वैष्णव भक्त नही कर सकता, (16) पुरुष-परीक्षा मे कवि ने राधा-कृष्ण के नही बल्कि राम सीता के प्रेम को आदश बताया है, (17) विद्यापति के कृष्ण भागवत कृष्ण से भिन हैं—वे मोर पस धारी नहीं हैं करील कुजो का उल्लेख नहीं है, राधा कृष्ण प्रेम विहार में अय किमी गोपी का वणन नहीं है, राम का वणन केवल तीन पदो म मिलता है जो भागवत और जयदेव दोनों से भिन्न है। विद्यापति का राम शरद पूनो का नही बसत का है, (18) प्रचलित जन धृतियो-उगना, वाजितपुर मे समाधि पर शिव मदिर, नाचारिया, शिव गीत और मत्यु प्रसग सभी उनको शव ठहराते हैं। ये तो हुए विद्वानो मत । अब जरा देखिए विद्यापति की पक्तियाँ क्या कहती हैं। इनका ही प्रमाण विद्यापति के हृदय का प्रमाण माना जायेगा क्योकि ये वही से उपजी हैं- | कवि मह जयदेव कवि रस भह रस सिंगार। त्रिपुर सिंह सुत राज मह, तीनहुँ निमुवन मार । (कीर्तिपताका, 406) 2 रस सिंगार ससार सारे। (मि०मा०वि० पद 100) ३ ससार मार सिंगार रम, कयोनक पित्त न हर जुवति । (कोतिपतारा, . 8) विद्यापति के काव्य मे प्रेम तथा सौंदय विधान 125 7 4 ससार रत्नम् मगशावकाक्षी रत्न च, शृगार सो रसानाम । (मि. म. वि० पद, 312) 5 जौवन रतन अछन दिन पारि तावेते आदर कएले मुरारि । (रामवृक्ष बेनीपुरी, वि० 188) 6 तन विनु जीवन, जीवन पिनु तन की जीवन पिय दूरे । (मि० म०, 402) 7 वर युवति तिउपन सार (वही, 30) ९ जीवन सार यौवन रस रग। (वही, 315) ये सारी की मारी उक्तियां क्या कहती हैं बताने की आवश्यकता नही । पदावली ये इसी गुण को लक्ष्य करके डॉ० रामकुमार वर्मा ने कहा है-'विद्यापति के इस वाह्य ससार में भगवत भजन का सार कहाँ ? सद्य स्नाता में ईश्वर से नाता कहां, अभिसार मे भक्ति का सार कहा उनकी कविता विलास की सामग्री है, उपासना की साधना नहीं वे सौंदय संसार के सौंदय मे इतना खो गये हैं कि उनकी दृष्टि और किसी तरफ जाती हो नहीं। (हिदी सा० का आलोचनात्मक इतिहास, ५० 509)। डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी भी कहते है--विद्यापति ने राधा की जिस प्रेममयी रूप की कल्पना की है उसम विलास कलावती विशोरी का रूप स्पष्ट ही प्रधान है-(म0 का० पम साधना, ५० 183) आचाय शुक्ल ने तो स्पष्ट कह दिया है कि 'आध्यात्मिक रग के चश्म आजकल बहुत सस्ते हो गये हैं। (हि० सा० का इतिहास, पृ० 58) इस तरह के पक्ष विपक्ष दोनो ही दृष्टिकोणो मे कुछ एकागिता आ गई है । 'जाती रही भावना जैसी, प्रभु मूरत तिर देसी तैसी' इस प्रसग में साथ हो गया है। वास्तविकता यह है कि इस निणय म न तो प्रवत्ति को उपेक्षा की जा सकती है न विद्यापति के गीतो से मुखरित मुख्य स्वर को निश्चित ही पदावली मे भक्ति के पदो की संख्या किसी प्रकार भी सौ से अधिक नहीं होगी। इनमे प्रतीकात्मक पद भी शामिल हैं। शेष पदो में तो शृगार की अजस्र धारा प्रवाहित होती है । पदावली को तो शृगार का महाकाव्य कहा जा सकता है। इसमे प्रेम के प्रतीक कृष्ण और सौंदर्य युग ।

126 विद्यापति एक अध्ययन की देवी राधा नायक-नायिका हैं जो पुरुष और स्त्री के सामा य एवं सहज सम्बध के भी प्रतीक हैं। फिर भी इस शृगार सागर के भीतर भक्ति के मोतियो को नकारा नहीं जा सकता। रति के एक ही कोख से उत्पन शृगार और भक्ति दोनो का प्रगाढ मिश्रण पदावली मे है किंतु शृगार का रग अधिक घटक और जनमानस को भावविभोर करने वाला विद्यापति के काव्य का शास्त्रीय विवेचन (क) रसयोजना--साहित्य में रस सहृदय आस्वाद्य होता है । भरत मुनि ने कहा है 'रसान आस्वादयन्ति, हर्षादीश्वाधिगच्छति' अर्थात रस का आस्वादन किया जाता है और इससे हप आदि की प्राप्ति होती है। काव्य विषय के परिशीलन से प्रमाता की सवेदना आत्मा में विधात हो जाती है और इस प्रकार प्रमाता अपने आत्मा के ही आनद का अनुभव करता है। स्थायी भाव की आन दमय चेतना ही रस है। काव्य के अनुशीलन से जब अज्ञानवली का आवरण विशीण हो जाता है तब जीवात्मा अपने स्वाभाविक आन दमय रूप में आ जाता है और उसी आनद को रस कहते हैं । आचाय विश्वनाथ ने रस का कारण सत्योट्रेक माना है और इसका स्वरूप ब्रह्म की तरह स्व-प्रकाश, अखण्ड और चिमय है, साथ ही यह वेद्या तर स्पश-शू य है।-सत्वोभादखण्ड स्वप्रकाशान द चिन्मय , वेद्या तर स्पश शू यो ब्रह्मा स्वाद सहोदर । कि तु यह सविकल्प होता है ब्रह्मान द की तरह निर्विकल्प नही। आचाय शुक्ल ने 'हृदय की मुक्ता- वस्था को रस कहा है' और डॉ० नगेद्र ने रस को 'आनदमयी चेतना' स्वीकार कर विषयानद और ब्रह्मानद के मध्यवर्तिनी वस्तु माना है । अब देखना यह है कि विद्यापति को अपने काव्य के माध्यम से ब्रह्मानद सहोदर का आस्वादन कराने में कहां तक सफलता मिली है। विद्यापति के काव्य में शृगार रस-कवि भाव जगत के असीम लोक का पारखी होता है उसकी अतर्वीक्षणी दृष्टि मानव हृदय के गहनतम 128 विद्यापति एक अध्ययन । गह्वरों में प्रवेश कर उसके रहस्यो के उदघाटन करने क्षमता की रखती है। सुख दुख मिश्रित इही अनुभूतियो की नीव पर रवि का कला सौंध निर्मित होता है । कवि मानव हृदय के रहस्यो को देखता है, ग्रहण करता है और अपनी करयित्री प्रतिभा से काव्य माला मे पिरोकर जगत के सम्मुख भाव और रूप की रल राशि बिखेर देता है। उसके गीतो का आस्वादन कर सहृदय जगत क्षण भर के लिए मव कुछ भूल जाता है और एक ऐसे लोक मे पहुंच जाता है जहां सुख तो आनदप्रद होता ही है, पीडा का दशन भी मधुर लगता है। विद्यापति के काव्य मे शृगार रस ही अगी स्वरूप है, अय रस भी प्रसग स्वरूप आये हैं और उनको सुदर अभिव्यक्ति हुई है किंतु 'रसराज त्रिभुवन सार' शृगार की बात कुछ और ही है । कहा गया है 'कविता करके तुलसी न लसे कविता लसीपा तुलसी की कला' उसी प्रकार विद्यापति की क्ला का स्परा पा श्रृंगार स्वय सुशोभित हो उठा है । अत विद्यापति की काव्य कला गार का भी भगार है। विद्यापति पदावली मे सौंदय, प्रेम विनय और भक्ति के गीत हैं। गौडीय वैष्णव प्रभाव के कारण विद्यापति क वग प्रचलित गीतो में भक्ति रस का भी सचार माना गया है, उनमे कृष्णापित कामगधहीन प्रेम रस का पारावार है। कि तु मिथिला प्रचलित गीता मे यह धारणा नहीं है । कमनाशा से लेकर नेपाल तक उनके गीता को लौकिक शृगार के रूप मे ही जन मानस ने अपनाया है। ये गीत शृगार रम मे कैसे सराबोर हैं, आइये 'विभावानुभाव सचारि सयोगात रस निप्पत्ति' भरत मुनि का यह सूत्र जितना प्राचीन है उतना ही माय भी। रसवाद का मिद्धात भाज भी उसना ही सार्थक है, इसे वैमानिक भी मानते हैं । सचमुच रस ही काव्य की आत्मा है। विभाव के दो स्वरूप हैं -~लालम्बन और उद्दीपन । शृगार रस के आलम्बन विभाव हैं-नायक और नायिका । रसानुभूति के अनु- सार नायक या नायिका मालम्यन या आश्रय होत हैं। विद्यापति ने नायव और नायिका दोनों को ही आलम्बन और माथय रूप में चित्रित किया है क्योकि भी प्रणयानुभूति नायक में होती है तो कभी नायिकाम।

विद्यापति के काव्य का शास्त्रीय विवेचन 129 उद्दीपन विभाव है-भावो को उद्दीप्त करने वाले साधन जैसे वय सधि, यौवन, सौंदय, ऋतु परिवतन तथा प्रकृति के अय अवयव । मुस्कान, स्वेद, कप आदि अनुभाव है और सचारी भावो की संख्या तो ततीस हैं जिनमे स्मति, हप, औत्सुक्य, वीणा, विस्मय, सकोच आदि प्रमुख हैं। रस के इही अवयवों का प्रयोग जिस कवि मे जितना ही सफल होता है, रस की दष्टि से वह कवि उतना ही श्रेष्ठ हाता है । विद्यापति का एक शृगार प्रधान पद देखिये- अवनत यानन कए हम रहलिह, वारल लोचन चोर, पिया मुख रुचि पिवए धावल जनि से चांद चकोर । तत सए हठि हठि मोर मानल घएल चरन राखि । मधुप मातल उडएन पारल तइअओ पसारल पाखि । माधव बोललि मधुर वानी से सुनि मुदु मोयें कान । ताहि अवसर काम वामभेल घरि धनु पच बान । तनु पसेव पसाहति मातल पुलक तइसन जागु । घूनि चूनि भए काँचुअ फाटलि बाहु बलया भौगु । भन विद्यापति कपित कर हो बोलल बोल न जाय। राजा शिव सिंह रूपनाराएन साम सुदर काम। नायक अकस्मात नायिका के सम्मुख पड जाता है । अनुराग विह्वल नायिका तन मन की सुधि भूल जाती है। नेत्र दोडकर रूप-पान मे अनुरक्त हो जाते हैं। नायिका उह खीचकर चरणो मे लगा दती है किंतु मधुमत्त भ्रमर की तरह वे बार बार अपने पल उठाने का प्रयान करते हैं । इसी ममय कृष्ण मधुर वाणी मे कुछ कहते हैं । कामदेव पचशर से प्रहार करता है, पसीना छूटने लगता है, तन पुलक्ति हो उठता है फलस्वरूप कचुकी तार-तार हो जाती है और चूडियां चिटक जाती हैं । आन दविह्वल और लाजयुक्त मध्या नायिका के मुख से कोई शब्द नही निकलता। शृगार रस प्लावित कैसा अनूठा है यह पद । भनेक कविया की पक्तियाँ तुलना के लिए दौड पडती है- गिरा अलिन मुख पवज रोपी',-तुलमी 'लाज लगाम मान ही नैना मो बस नहिँ'-बिहारी तथा लोकगीतो में प्रचलित- यौवनार जार अगिया भमर गई, वालमा' आदि अनेक पतियो के भाव एक साथ साकार हो उठे हैं। - 130 विद्यापति एक अध्ययन नायक के मम्मुख अनुराग विह्वलनायिका सही है । उद्दीपन विभाव सम्प स्वय कामदेव पववान प्रहार कर रहे हैं। स्येद, रोमांध, कप, पुलक आदि अनुभावों को प्रदर्शनी लगी है। ग्रीणा, सोध, औत्सुक्य, हप आदि सपारी भाव हैं । रम का पारावार यादोलित हो रहा है। सबसे अधिक चमत्कार तो कचकी के तार-तार होने और चूही ये फूट जाने में है। लगता है बाहर के वधन को तोड़ने के लिए भीतर के यौवन और मानद के ज्वार ने आदोलन पर दिया हा । कौन ऐसा हृदयहीन होगा जिसके मन का जहाज इम सागर मे डगमगा कर व न जाय । यह तो एक नमूना है ऐसे अनेकों पद पदावली में भरे पड़े हैं। विद्यापति के काव्य मे सयोग और वियोग दोनों ही प्रकार के शृगार का पारावार प्रवाहित होता है। प्राय अय कवियो मे सपाग की अपेक्षा वियोगचित्र अधिक व्यापक और सजीव मिलता है स्तुि विद्यापति के काव्य मे वियोग की अपेक्षा सयोग के चित्र अधिक मिलते हैं। सयोग मे सानिध्य मोर मानिध्य में रूप वणन और शृगार चेष्टाओ का व्यापक व्यापार होता है। यही कारण है कि विद्यापति ने अपने सयोग वणनमै नखगिख,सद्य स्नाता, यौवन, प्रेम तथा अभिसार आदि का सुदर चित्र खोचा है । सूर की जैमी पहुंच वात्सल्य मे है विद्यापति की वैसी ही शृगार मे। यदि सूर वात्सल्य का कोना-कोना मांक आये हैं तो विद्यापति से भी शृगार का कोई कोना अछूता नहीं बचा है। सयोग-विद्यापति पदावली का आलम्बन राधा हैं। वय सधि की देहरी को सकोच, जिज्ञामा और विस्मय के साप पार कर वह यौवन के भवन मे प्रवेश करती है अचानक उनकी दष्टि 'मनमथ कोटि मथन करने घाले कृष्ण पर पड़ती है। फिर क्या पूछना, रूप के आकषण से हृदय का प्रेम ज्वार फूट पडता है। प्रथम दशन मे ही व हृदय हार बठते हैं और एक दूसरे को अपना सवस्व दे डालते हैं। मिलन के लिये आतुर होते हैं, छटपटाते हैं छिप छिप कर मिलते हैं सभी घाट पर, कभी कुज मे, कभी कर पकडकर यमुना पार कराते हैं तो कभी नाव का बीच यमुना मे रोक देते हैं। और फिर जब स्वकीया रूप से मिलते हैं-तब तो कवि न अपनी प्रतिभा के कैमरे से मिलन की सारी चित्रावली खीचकर रख दी विद्यापति के काव्य का शास्त्रीय विवेचन 131 है और रूप चित्रण का काव्य सौंदय फूट पड़ा है। प्रेम का वीज वय सधि के क्षर में अकुरित होता है। नायिका की आंखें कणस्पर्शी होने लगती हैं, वचन मे चातुरी आ जाती है, दपण देखना स्वभाव बन जाता है, आंचल बार बार खिप्तकने लगता है, केश खुलकर बिखरने लगते हैं, यौवनाक बदर से नवरग की सीमा पार करने लगता है, कामदव भी अपनी वाटिका की रखवाली करने लगते हैं । शंशव और यौवन मे सघष छिड जाता है, द्वद्व की स्थिति में निणय कठिन है किंतु अत मे यौवन की विजय होती है, कामदेव दुदुभि घोष करते हैं और नायिका रूप का ज्वार ले यौवन की देहरी मे प्रवेश करती है। सौंदय चित्रण में तो कवि ने यौवन का 'एक्स रे' करके रख दिया है। 'पीन पयोधर दूबरिगता कनकलता' मे वह मेरूका फल दीखता है, 'सहहिं आनन सुदर ीह सुरेखलि आँख' मे भौंहो को मदन के काजर धनु से जोडता है, 'विआरे नव यौवन अभिरामा' मे वह छहो अनुपम को एक साथ एकत्र कर देता है और भौंह तथा सुदर नासा पुट दिखाकर भ्रमर और कोर को लज्जित कर देता है । नखशिख चित्रण म कविपरम्परित उपमानो को ग्रहण तो अवश्य करता है किंतु अपनी अनोखी प्रतिभा से उनका बासी. पन दूर कर एक नई ताजगी प्रदान करता है। वय सधि मे भाव जागति और अग विकास, सौंदय मे अदभुत आकषण और फुटकर मिलन जैसे-'कुजभवन् ते निवमल रे रोकल गिरधारी' तथा 'नाव डोलाव अहोरे' आदि मे तो कवि ने सदर मावो की झांकी प्रस्तुत कर दी है, मान और अभिमान मे उसके प्रभाव को गहराई तक प्रेम की तीव्रता प्रदान की है किंतु मिलन प्रसग मे शुगार चेष्टाओं का प्रेम के रग मे भावानुभूति की क्लम डुबोकर जो शाश्वत इतिहास लिखा है वह समग्र साहित्य विश्व मे अकेला है-देखिये- सन्दरि घलिलहु पहुं धरना, चहुँदिशि मखि सब कर धरना। जाइतह लाग परम हरना, जइसे ससि छाप राहुहरना। जाइतेह हार टुटिए गेलना, मूखन वमन मलिन भेस ना। रोए-रोए अजर दहाए देलना, अदहि सिदुर मेटाय देलना ।

132 विद्यापति एक अध्ययन भनइ विद्यापति गाओल ना, दुख सहि सहि सुख पामोलना। (वे० पु०प०72) विद्यापति सकपकाई हुई भय कातर नायिका को प्रबोध देत हैं कि सुख प्राप्त करने के लिए दुख प्राप्त करना आवश्यक है। साथ ही प्रथम मिलम मे दुख फिर बाद मे सुख का भृगारिक सकेत भी है। दूसरे दौर में सखियाँ 'मुनिहुँ कचित नही धीर' वाला शृगार कर नील वसन पहिना राधा को कृष्ण के पास ले जाती हैं और छोड देती हैं। कृष्ण राधा का हाथ पकहते हैं, घूघट उठाकर राधा का मुख, देखते हैं, धीरे-धीरे नव रस सचरित होने लगता है और अब दोनो के मन मे हुलाम उठने लगता है। समवयस्क राधा-कृष्ण एक दूसरे के प्रेम और विलास मे लीन हो जाते हैं । फिर भी अभी सुरति भय राधा के मन मे बनी हुई है- नहिं नहिं करए नयन ढर लोर, कांच कमल ममरा झकझोर। जइसे हगमग नलिन कनीर, तइसे डगमग घनिक शरीर। (वही-74) नायिका बार वार अपने मुख को छिपाने का प्रयास करती है, किन्तु दादलो मे शशि छिप नहीं पाता। प्रियतम बरजोरी करना प्रारम्भ करता है और 'मोहर मुदल अछि मदन महार' को खोलने का प्रयास करता है और 'मदन पाठ' का प्रारम्भ होता है। बात-बात मे नायिका नहीं-नही परती है-'नहिं नहिं परई नयन मरि लोर, सूति रहल रहि सयनक ओर वितु नायक 4 अनुनय विनय का प्रमाव धीरे धीरे पड़ने लगता है और नायिका की स्थिति अदर से दक्षिण और बाहर से धाम है-'मनए विद्यापति नागर रामा अतर दाहिन बाहर वामा', प्रथम भोग विलास पी ऐमी सूक्ष्म दष्टि और रममय चित्र विद्यापति का ही कमाल हो सकता है-रामक और अनुमव वदिघे साथ नायिका मुम्बर होने लगी और पतुराई मरे वचन भी उस तियक मुख स निक्सने लगे-'ह हरि घले या परमय मोप, तिरि बध पाना नागा तोप' इतना ही नहीं- मनु मनु नागर नियि बघ छोर, गारित नाहि मुरत पन मोर।

विद्यापातककाव्या शास्त्रीय विपन
सुरत क नाम सुनल हम आज,
ना जानिए सुरत करए कौन काज।
सुरत क खोज करब जहाँ पाव,
घरकि अछए नहिं सखिरे सुघाव ।
वेर एक माधव सुनि मम बानि,
सखि सय खोज मौगि देव आनि ।
विनति करए पनि मा गए परिहार,
नागरि चतुर भने कवि कठहार ।
(वही, 84)
चतुत्तर नायिका कहती है सुरति हमारी गांठ मनही, क्यो खोलते
हो ? मैं पूछूगी तूटूगी, सखियों से मांगूगी तब तुम्हें दूगी, मुझे छोड दो
मेरे पास सुरति नहीं है। इस क्षेत्र म तो विद्यापति सम्भोग से भी आगे
बढ़ गए हैं। यथार्थ के इस चित्रण के लिए तो रसिक उहें दाद देंगे
और सामाजिक कोसेंगे-देखिए अग दशन लालसा और सकोच का यह
निवि ब धन हरि किए कर दूर,
एहो पय तोहर मनोरथ पूर,
हेरेन कोन सुख न बुझ विचार,
बडतुहु ढीठ बुझल बनमारि।
हमर दापय जो हेरई मुरारि,
लहु लहु तब हम पारबगारि।
बिहरि से रहस हेरन कौन काम,
सेनहिं सहबहि हमर परान ।
वहाँ नहिं सुनिए एहन परकार,
परए विलास दीप लए जार। (वही, 83)
इस प्रकार के अनेक मिलन प्रसग के चित्र विद्यापति ने प्रस्तुत किये
हैं। सच पूछा जाय तो इनका मिलन प्रसग तो मधुयामिनी की मनोहर
भाव कथा है।स्प यौवन, विलास और शृगार का ऐसा आस्वाद्य व्यापार
अ यत्र दुलभ है । नि सदेह विद्यापति सयोग के ऐसे अकेले कवि हैं और

134 विद्यापति एक अध्ययन
इनको पदावली अकेसी वृति। रीतिकालीन पवियों की लास दुहाई दी
जाय किंतु प्रेम रस का ऐसा अछोर पारावार वहाँ कहाँ, वहाँ तो रस की
छोटे मात्र हैं। वियोग के बाद मिलन का यह चित्र स्वयं अपनी कथा कहता
सखि वि पूछब अनुभव मोय
ऐहो पिरीत अनुराग बखानत तिले तिले नूतन होय ।
जनम अवधि हम रूप निहाररवु, नयन न तिरपित भेल।
से हो मधुर बोल सवनहि सूनल, श्रुति पय परसन गेल ।
सयोग चित्रण में प्रकृति के उद्दीपन स्वरूप का भी प्रयोग कवि ने
किया है। बसत उस्फुल्ल वातावरण के साप समोग रत रमणियो का
हृदय कज तो प्रफुल्ल होकर सुरभि बिखेरता ही है, कवि ने बिना भेदभाव
के सभी प्रकार की तथा सभी वय को रमणियो को रास के लिए आमंत्रित
किया है-
नाबहु रे तरूनी तजहु लाज,
आएल बसत रितु वनिक राज ।
हस्तिन चिनित पदुमनि नारि,
गोरी साँवरी बूढि-वारि।
देखिये -कृष्ण भी योवनो मत्त होकर किस प्रकार विहार कर रहे हैं-
नव वृदाबन नव नव तरुगन, नव नव विकसित फूल ।
नवल बसत नवल मलयानिल, मातल नव अलि कूल।
बिहरई नवल किशोर।
इसके अतिरिक्त स्वप्नमिलन तथा आरस्मिकमिलन का चित्र भी
देखा जा सकता है-
सुतलि छलह हम घरवा रे, गरवा मोति हार ।
राति जखन भिनु सखा रे, पिया आएल हमार ।
स्वप्न मिलन--- कर कोशल कर छपाइत रे, हरवा उर टार ।
कर पकज उर थपइत रे, मुख चद निहार।
केहनि अभागिन बैरी रे, भागलि मोरि निद।
भलकए नहिं देख पाओल रे, गुनमय गोविद।

विद्यापति थे काव्य या शास्त्रीय विवेचन 135
आकस्मिक मिलन-नहाइ उठल हम वालि दी तोर,
अगहि लागल पातल पीर।
से बेक्त भए सबल सरीर,
सहि उपनीत समुख यदु वीर।
विपुल नितम्ब अति वेल भेल,
पालटि तापर पुतल देल।
उरज उपर जब देहल दीठ,
उर मोरि वसलि हरि कर पीठ।
हंसमुख मोरए दीठ क हाइ,
तन-तनु झापइत झापल न जाई।
प्रसग और सौदय (गीला) का ऐसा कामुक चित्र दुलभ है । इन
दोनो पदों की तुलना हम देव के पदो से कर सकते हैं-
स्वप्न-पाहत उठोई उठ गई री निगोडी नीद,
सोइ गए भाग मेरे जागवा जगन मे।
संघ स्नाता-पीत रग मारी गोरे अग मिल गई देव,
श्रीफ्ल उरोज आभा आभासी अधिक सी।
नीबी उक्साय नेदु मुरु मुसकाय हैसि,
ससि मुखी विहंसी सरोवर ते निक्सी।
सारांश यह है कि विद्यापति का सयोग वर्णन अत्य त उत्कृष्ट, व्यापक,
सहज और रससिक्त है। इसमे भाव और कला का अद्भुत सम वय है ।
रूप के अगाध सौदर्य सागर के साथ साथ मानव हृदय की अनव त्तियो
का सूक्ष्म एव स्वाभाविक चित्रण है। प्रेमाकुरण से सयोगावस्था के बाहा
एव भीतरी जितने भी चित्र सभव हो सकते हैं सब का चित्रण अस्य त
कौशल के साथ विद्यापति के काव्य मे हुमा है । वस्तुत विद्यापति का
सयोग वर्णन अपरिमेय है।
वियोग वणन-वियोग के शृग से काव्य का निर्भर फूटता है । जिस
प्रकार निझर मे वेग, प्रवाह, गति, तरलता और निमलता होती है उसी
प्रकार वियोगजनित गीतो मे भावो की निर्मलता, ममस्पर्शी वेग और

136 विद्यापति एक अध्ययन - प्रेम की तरलता होती है। अथ से गीले गीत अधिक मधुर होते हैं--- 'आवर स्वोटेस्ट साम्स आर दोज दैट टेल आफ दि सैडडेस्ट थाट' शेली। धनीभूत पीडा ही गीत बन कर नि सृत होनी है। जो गीत जितना शोक संवेद्य होता है, वह उनना ही मधुर होता है । 'सुग्न एकातिक होता है उममे व्यक्ति खो जाता है, दुख व्यापक होता है, उसमे विश्व लीन हो जाता है।' यही कारण है विरह विगलित गीतो मे हृदय को स्पश करने की क्षमता अधिक होती है। वियोगावस्था में प्रेम भोग का अभाव राशिभूत हो जाता है । वास्तविकता यह है कि वियोग प्रेम चे विस्तार के लिये बहुत बडा अवकाश निकाल लेता है और विरही की भावना कण- कण में व्याप्त हो जाती है। विद्यापति वियोग चित्रण मे भी अत्यात कुशल हैं। उनका एक वियोग चित्र प्रस्तुत है- कुद कुसुम मरि सेज सुहामोन, चाद अंजोरिया राति । तिला एक सुपहुं समागम पाओल मास बरस भेल माति ।। हरि क इमे पलट मधुरपुर जाएब पुनि कइसे भेटव मुरारि । चिता जाल पडल हिनि सम, किकरति विरहिन नारि ।। एक भमर भमि बहुन कुसुमरणि, कतहुँ न ओकर व ध । बहु बल्लभ से आसिनेह बढाओल, पहल हमर अपराध ।। दिवसे दिवसे वियाध अधिकाएल, दारुन भेल पचवान । आओर बरखकत आस गमाओब समभ परल परान ।। भनइ विद्यापति सुनु वर जीवति मन चिता कर त्याग । अचिर मिलत हरि र धैरनपरि सुदिन पलटए भाग। (मि०म०१० 523) युग की नारी की हृदय व्यथा इस पद में मुखर हो उठी है। नायिका घर मे सेज सजाकर बैठी है। पूर्णचन्द्र अपनी रजत ज्योत्सना विखेर रहा है। अवेली बैठी येचारी नायिका अपने भाग्य को कोम रही है कि उसने बहुवल्लम से प्रेम क्यो बढाया ? साम ती मानसिकता देखिये -क्या एक ही भ्रमर अनेक पुप्पो से रसपान नहीं कर सकता, इस काय मे कौन बाधा दे सकता है। चांदनी रात उसके मन मे व्यथा भर बहुवल्लभ सामती विद्यापति के काव्य का शास्त्रीय विर्वचन 137 देती है। विद्यापति उसे घयं रख प्रतीक्षा करने की मलाह देते हैं कि जब सुदिन बायेगा तो उसके भाग्य पलट जायेंगे। वियोग के अश्रु से गीत का प्रत्येक अक्षर सजल है, व्यथा साकार हो उठी है। भावगाभीय और परिपेक्ष्य ने इस गीत को रस को दृष्टि से अद्वितीय बना दिया है। यह पीडा सामनी युग की तमाम नारियो की है, जो बहु वल्लभो से प्रेम करती हैं। पद मे नायिका आश्रय है, स्मृति, विपाद आदि सचारी हैं, चांदनी रात उद्दीपन विभाव है। उपक्षा और 'विवशता को व्यापक पष्ठभूमि ने रसानुभूति को अधिक साद्र और सामा य बना दिया है। वियोग शृगार की चार अवस्थाए मानी गई हैं-पूर्वराग, मान, प्रवास और करुण 1 प्रथम तीनो अवस्थायो का विशद चित्रण विद्यापति के काव्य मे हुआ है कि तु करुण वियोग के चित्रण का प्राय अभाव है । प्रथम तीन अवस्थाओ मे प्रवास का चित्र अपेक्षाकृत अधिक सजीव और मम स्पर्शी है- (क) पूर्वराग- सामर सु दर ए बाट आएल ते मोरि लागल औखि । आरति आचर साजन भेले सब सखि जन साखि। + + कि मोरा जीवन, कि मोरा जीवन, कि मोरा चतुरपने। मदन बान मुरछलि अछओ सहओं जीव अपने ॥ + + सुरपति पाए लोचन मांगो गरुण मांगओपौखि । नदक नदन हौं देखि आवओं, मन मनोरथ राखि ॥ कृष्ण के सौ दय पर रीझकर नायिका सुरपति से लोचन और गरुण से पख मांगने की कामना करती है। पूर्व राग मे मिलनोत्कठा इस पद की (रामवृक्ष वे०पु०प० 39) (ख) मान-मान के भी चित्र पदावली में अनेक हैं । आचाय द्विवेदी के अनुसार विद्यापति की राधा मान करना नहीं जानती, वह तो कृष्ण को देषकर भावविह्वल हो जाती है और उसका सारा मान पिघल जाता है। विशेषता है।

138 विद्यापति एक अध्ययन - फिर भी देखिये सखी कहती हैं- राघाका मान- मानिनि आव उचित नहीं मान । एखनुक रग एहन सग लगइछ, जागल पापच बान ।। जूडि रमन चकमक करु चाँदनि, एहन समय नहि आन ॥ एहिं अवमर पिय मिलन जेहन सुख, जकरहिं होए से जान ।। (वही, 147) कृष्ण का मान- राधा-माधव रतनहि मदिर निवसय सयनक सूख। रस रस दान दद उपजल कान चलल तब रूस।। नागर अचल कर धरि नागर, हसि मिनती कर आधा । नागर हृदय पांच सर हनलक, उरजि दरसि मन बाधा। कि तु दोनो ही पदो मै मान की प्रधानता न होकर मिलन सुख का ही स्वर प्रमुख है। दोनो का प्रेम इतना प्रबल है कि मान का भाव बीच मे ठहर नही पाता। (ग) प्रवास--प्रवाम के चित्र विद्यापति के काव्य मे अपेक्षाकृत प्रभावशाली और व्यापक हैं। राधा को प्रिय के जाने का सदेश मिलता है। वह अपनी सखी से कहती है- सखि रे बालम जितव विदेस, हमरा रग रमम लए जएबहे, लए बहे कौन सा देश । कृष्ण समझाने-बुझाने का प्रयास करते हैं कि तु राधा को धय कहाँ ? कानमुख हेरइते भावन रमनी फरह रोयत झर झर नयनी। अनुमति मागिते वरविघु वदनी, हरि हरि शबदे मुरछि परि घरनी। याकुल कत परबोध कान, अवनहि माथुर करव पयान ।। कितु क्ष्ण चले गये। प्रथम विछोह की घडियां प्राण लेवा हो गई हैं, रक का धन पो गया है, सारा ससार सूना हो गया है, आशा की डोर मे प्राण बंधा हुआ है । आँखें सूजकर लाल हो गई हैं, दिन गिनते गिनते ऊंगलियो घिस गई हैं। राधा घी मरणासन अवस्था देसकर सखी मथुरा जाती है और राधा की विरह दणा बताती है- ।

विद्यापति के काव्य का शास्त्रीय विवेचन 139 लोचन नीर तटनि निरमाने, तहिं कलामुखी करए सिनाने । वेरि एक माधव तुइ राइ जीवई, जो तुम रूप नयन भर पीवई। प्रेम की पीर दोनो हृदयो मे समान है, दोनो वियोग की अग्नि में जल रहे हैं। यह विद्यापति के विरह वर्णन की विशेषता है । यह सस्कृत साहित्य का प्रभाव है या अनुभव का यथाथ स्वरूप, कौन बताये ? राधा की दशा सुन कष्ण मुच्छित होकर गिर पडते हैं और अस्फुट वाणी मे वे जो कुछ कहते हैं उसे मलाया नहीं जा सकता- रामा हे से किय विसरल जाई। करे धरे माथर मनुमति मगइते, त तहिं पडल मुरछाई । किछु गद गद सो लहु लहु आखरे, जे किछु कहल वर दामा। कठिन कलेवर तेजि चलि आएल, चित्त रहल सोई ठामा । तुलसी वर्णित राम वियोग से इसकी तुलना की जा सकती है-'तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा, जानत प्रिया एक मन मोरा । सो गन रहन सदा तुइ पाही, जान प्रीति रस एतनेहि मोही।' विरह जनित अनेक अनुभूतियो से कवि का महार भरा हुआ है। कभी राधा को सूनी सेज सालती है ता कभी छाती पटती है तो कभी बिछुडी हुई चांद चकोर की जोड़ी को मिलाने के लिये कनर कटोरे मे का को खीर खांड दी जाती है और कभी विह्वल होकर राधा कह उठती सरसिज बिनु सर, सरबिनु सरसिज की सरसिज विन मूरे । जीवन बिनु तन, तन बिनु जीवन की जीवन पिय दूरे । (वही--191) परिणामत 'लोचन घाय फेनाएस हरि नहि आएल' की अभिव्यक्ति होने लगती है और राधा का हृदय पुकार उठता है-'मखि मोर पिया अवहु ना आओल फुलिस हिया', आशा को लता जो नयनो के नौर से राधा ने सोचा है वह अब तरण हो गई है और आँचर मे समा नही रही है। ऐसी विपान स्थिति में भी तो राधा 'जीवन रूप मछलि दिन पार' का उलाहना देती है तो कभी उनके मगल की कामना करती है-- जुग जुग जियप यस५ लाख बोस, हमर अभाग हुनक नहि दोस' और जब वसन्त 140 विद्यापति एक अध्ययन आता है कोयल पचम तान छेडने लगती है तब तो विरह असह्य हो जाता है - शरद की चांदनी, फूलो की बहार, मोर की आवाज और कोयल की कुहू सभी हृदय की वेदना को बढाने लगते है- फुटल कुसुम नव कुज कुटिर बन, काकिल पचम गावे रे । मलयानि लहिम सिखर सिधारल पिया निज देश न आवे रे । चनन चान तन अधिक उतापए, उपवन अलि उतरोल रे । और फिर क्या पूछना है राधा के दुख का ओर छार नही है- 'सखि रे हमर दुसक नही ओर' निराश होकर वियोगिनी अपने अग लावण्य को अय प्रकृतिज य वस्तुओ को सौंप देती है और कामना करती है कि उसे पुन नारी जीवन न मिले और यदि मिले तो रसिक पुरुष से उसका प्रेम न हो-- जनम होअए जनु जो पुनि होई, जुवती भय जनमए जनि कोई। होइ जुवति जनु हो रसमति, रसओ वुझए जनु हो कुलमति । इधन मागओ विहि एक पए तोहि थिरतादिहह अवसानहु मोहि । इन पक्तियो मे कुलव ती नारी के सम्पूर्ण जीवन का वियोग निष्क्ष मानो मुखरित हो गया है, जिसमें अनुभूत पीडा का स्वर प्रधान है। भारतीय काव्य शास्त्र में विरह की दस अवस्थायें मानी गई हैं- स्मरण, गुणकथन, अभिलापा, भूळ, व्याधि, उद्वेग, प्रलाप, जडता, उमाद और मरण । इन सभी दशाओ से होकर विद्यापति के काव्य विरहिणिया को गुजरना पड़ा है। बल्कि यदि ध्यान से दखा जाय तो ये सख्या दस से अधिक भी हो सकती हैं-कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं- (1) लोचन घाय फेनाएल हरि नहिं बायल (स्मति) (2) सिव सिव जिवयो न जाए आम अरुझाएल रे, (मरण) (3) मन करे तहाँ उह जाय, जहाँ हरि पाइअरे, (अभिलापा), (4) प्रेम परस मनि जनि उर लाइस रे (गुण कथन), (1) नहि बहे नयनक नीर मुरछि पढे तीर (मी), (6) किछ उपचारन माधव आन, एहि वियाघ अधिक पच वान (व्याधि), (7) एखन तखन करि दिओस गाओल छोडल जीवन आसा (उद्वेग),(8) सीसव से दुर सजनि दूर पद पिय दिन सक्ल सिंगार (प्रलाप), (9) अनसन माघव-माधव सुमरइत सुदरि भेल मपाई (उमाद), (10) किछ गद गद सो लहु-लह आखरे (जहता)।

विद्यापति के काव्य का शास्त्रीय विवेचन 141 वियोग वणन के लिए विद्यापति ने बारहमासा पद्धति का भी प्रयोग किया है । यह पद्धति शेली बहुलता, अधिकार तथा प्रकृति के उद्दीपन स्वरूप की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है देखिए-मास असाढ उनत नव मेघ पिया विसलेप रहो निरथेष । साओन मास बरस पन वारि पथन सूझे निसि अघियार । भावय मास बरसि धनघोर समदिसि कुहुकए दादुर मोर। चेहुक चेहुक पिया कोर समाय गुनमति सूतल अक लगाय । आसिन मास आम घर चीत, नाहनिकासन न भेलह हीत। कातिक कत दिग तर वास, पिय पथ हैरि हेरि मेलहु निरास । अगहन मास जीव के अत, अबहुन आएल निरदय कत । पूस खीन दिन दीरघ राति । पिया परदेस मलिन भेल पाति । माघ मास धन पडए तुसार, झिलमिल केचुआ उनत धन हार । फागुन मास पनि जीवन उचाट विरह विखिन भेस हेरओ बाट। चंत चतुरपन प्रिम परवास, माली जाने कुसुम विकास । बसाख तपे सर मरन समान कामिनि कत हनए पचबान । जेठ मास अजर नवरग, फत चहए खलु कामिनि सग। इसमें सदेह नही कि इस प्रकार के प्रयोग परम्परा पालन तथा कोशल प्रदशन के लिए किये जाते हैं। इनमे गणित की प्रधानता के कारण हृदय की बह त मयता और रमप्लावन नही मिलता है जैसा अय पदो मे है । लोकभाव, लोकवाणी और लोकगीतो के रूप मे हृदय को छूने वाले विरह गीतो का भी पदावली मे अभाव नही है ये गीत लोक हृदय से निकलने के कारण अधिक प्रभावशाली और ममस्पर्शी हैं। (क) विपत अपत तरु पाओल रे। पुन नव नव पात विरहिन नया विहल विहि रे, अविरल बरसात । (स) बाएल उमद समय बस त, दाता मदन निदारुन कात। (ग) के पतिया लएजायत रे मोरा पियतम पास । (घ) मोरा रे अगनवा चनन कर गघ्यिा, तो चढ कुररए काग र । आदि विद्यापति पदावली में ऐसे विरह चित्रो की भरमार है जो विभिन मनोदशाओ का रममय एक फ्लात्मक चित्र सीचार पाठक को भाव विभोर कर देते हैं। रीतिकालीन और उर्द के कवियो की भांति विद्यापतो .

142 विद्यापति एक अध्ययन या वियोग शृगार उहात्मा या मात्र चमत्कारिक नही है। देखिये बिहारी की नायिका सामा की डार पर झूला झूलती है । उदू का कवि कहता है-इन्तहाए लागरी मेज बन जा आया न मैं, हंस के फरमाने लगे विस्तर को झाडा चाहिये। इस प्रकार की अभिव्यक्तियों में क्षणिक चमत्कार तो अवश्य है पर विश्वसनीयता और रसमयता नहीं । मैं समझता है कि यह वपन विद्यापति का वियोग सयोग की अपेक्षा दुवल है, उचित नही है। इनम सयोग वियोग समतुल्य है, हाँ अ य कवियो मे वियोग अधिक पाया जाता है और सयोग कम । विद्यापति ने स्वय भी दोना प्रकार के जीवन का प्रचुर उपभोग किया था। डॉ. जयका त मणि कहते हैं-'सर मे भावो की विविधता सभवत विद्यापति से अधिक है पर वियोग जजर, हताश क्षीण, शियित, मरणासन, स्तन्त्र विहरिणी का वह रूप सूर मे कहा है जो विद्यापति में है। विद्यापति ने जो भरुण, कातर, सिसकिया मरा अधुगीला, क्षण क्षण क्षीण होता तारुण्य उपस्थित किया है सूर मे उसकी छाया भी नहीं आई है।' लेसकीय भावु क्ता की गुजाइश के बावजूद भी इस कथन मे सत्यता है। साराश यह है कि विद्यापति के काव्य मे शृगार रस के उभय पक्षो की पूर्ण अन्विति हुई है । शृगार के दोनो पक्ष अपने पूर्ण वैभव के साथ अभिव्यक्त हुए हैं। उनमे भाव प्रवणता और कौशल का श्रेष्ठ समन्वय है। परम्परा और शास्त्रीय विधान को कवि ने अपने मौलिक रगो से सजाया है और पाठको के लिए शृगार का समर स्रोत प्रवाहित किया है। शृगारेतर रसों को योजना-विद्यापति मूलत शृगार के कवि हैं कि तु वीर, हास्य, रोद्र, करुण, वीभत्स, अदभुत आदि रसो को भी व्यजना प्रसगत इनके काव्य मे हुई है इन रसो मे हास्य और वीर रम प्रमुख हैं और अन्य रस गौण। वीर-अवहटठ भाषा मे रचित कीतिलता और कौतिपताका मे वीर रस की व्यजना करने वाले ओजस्वी स्थलो की कमी नहीं है। उदाहरणाप दो प्रसग उद्धरित हैं प्रथम मे युद्ध का तथा द्वितीय मे विजयोल्लास का चित्र अकित है- ।

विद्यापति के काध्य का शास्त्रीय विवेचन 143 (क) दुहुदिसि पॉखर उंठ माझ सग्गाम भट्ट हो। खग्गे खग्गे सपलिअ, फुलग उफ्फल्लइ अग्नि को। अस्सवार असिधार तुरअ राउत सम टुटटई। बलक नज्ज निधात कार वच समो झुट्टई। अरि कुजर पजर सल्ल रह, कहिर धारे गए गगण भर । गए कित्ति सिंह को कन्च रसें वीर सिंह सग्राम कर। (ख) दुग्ग दुग्गम दमसि मजेलो। गढ गढ़ गूढीय गजेओ। पातिसाह ससीम सीमा-समर दरसेओ रे। + + + तरल तर तरू र रगे विज्जुदाम छटा तरगे। घोर धन सघात वारिस, काल दरसेओ रे, + + देव सिंह नरेद्र नदन सत्रु मरवइ कुल निक दन । सिंघ सम सिव सिंह राजा सकल गुणक निधान गनिजो रे । इन पदो के प्रत्येक शब्द ओज तथा वीर दप से ओत् प्रात हैं। उत्साह की धारा इन पदो से प्रवाहित है। खहगो के सघष से अग्नि की पारा। अरि कुजर पजर मे तलवार का घुसना, रुधिर से गगन मण्डल का "मर जाना, सना रूपी घटा में तलवार रूपी बिजली का चमकना वीर रस का समग्र वातावरण उपस्थित करता है। इसी प्रकार शिव सिंह का शेर की भांति झपट कर किले को जीत लेना, युद्ध का यथातथ्य चित्रण-पथ्वी का अरिमुडो से पट जाना, राजा का यश धवल चन्द्रिका को मांति प्रकाशित होना शीय और उल्लास का भव्य वातावरण उपस्थित करता है । वीर रस के पूण परिपाक के लिए आवश्यक सामग्री इन पदो मे उपलब्ध है। हास्य-शिव पार्वती का प्रसग हास्य का अच्छा उदाहरण है- भकर-भकर जे भागि भकोसथि, घटर पटरु कर गाल। घानन सो अनुराग न थिक इन, भसम चढ़ावत भाल। अथवा एहि विधि व्याहन आयो एहन बाउर जोगी। टपर टपर कए बसहा आएल खटर खटर रुण्ड माल । - 144 विद्यापति एक अध्ययन भकर भकर सिव भोग भकोसथि, हमरू सेल कर लाय । शात -हरिजन विसरवि मो ममिता, हम नर अघम परम पतिता। तुम सम अधम उधार न दोसर, हम सन् जग नहि पतिता। अद्भुत -जय जय शकर जय त्रिपुरारि, जय अघ पुरुष जयति अध नारि। - करुण-तातल संक्त वारि विदु सम सुत वित रमनि समाज तोहें विसारि मन ताहे समरपिनु, अब मझ होवे कोन काज माधव हम परिनाम निरासा । रौद्र वीभत्स-इन रसो के परिपाक के माथ ही विरोधी रसो को एक ही पद मे सफलता पूर्वक निवहित करना विद्यापति जैसे महान की ही लेखनी का कमाल हो सकता है दुर्गा बदना मे देखिए- बासर रंनि सवासन सोभित, चरन चद्रमणि चूडा। क्तओक दत्य मारि मुख भेलसि, कत सो उगिल केल कूडा। सामर वरन नयन अनुरजित, जलद जोग फुल कोका। क्ट क्ट विकट ओठ पुट पॉडरि, लिघुर फेन उठ फोका। विद्यापति के रस चित्रण म वात्सल्य रस का अभाव है। भक्त के रूप मे गगा और दुर्गा स्तुति म 'मा' शब्द के प्रयोग से वात्सल्य का पुट तो अवश्य मिल जाता है कि तु उनमे शात तथा अ य रसो की ही प्रधानता है । बगाल प्रचलित विद्यापति के पदोम भक्ति रस का भी उद्रेक है किन्तु मिथिलावासियो को इस पर विश्वास नहीं । साराश यह है कि विद्यापति मूलत शृगार रस के कवि हैं अ य रसो का प्रयोग उहोने प्रसगवा किया है कि तु उनके काव्य की आत्मा शृगार ही है। कला पक्ष-भाव काव्य पुरुष और कविता कामिनी की मात्मा है। भाषा इसे शब्द योजना का रूप प्रदान बर मय से उसफा प्राणाभिषेक करती है, छद विधान उसके सुपर शरीर की रचना करता है, अलकार उसके मन-सरसिज को विकसित कर सौरभ विखेरने के लिए प्रेरणा देता है और आभरणों से उसकी काया को अलक्त कर नाना भाति से उसके रुपयी की "भिवृद्धि करता है । यही है काव्य का अतरग और बहिरग, विद्यापति के काव्य का शास्त्रीय विवेचन 145 भाव तथा कला पक्ष-इनका श्रेष्ठ समवय ही कला और कलाकार की कसौटी है। कवि विद्यापति काव्य क्ला के अदभुत पारखी थे। उनके काव्य की पृष्ठभूमि मे अनेक प्राचीन भाषाओ की सुदीघ काव्य परम्परा का अपार वभव था एव कुलीन विद्वत परिवार एव परिवेश की प्रचुर साहित्य- सामग्री । अनेक पीढियो की सम्पन और विलासप्रवण राज शक्ति सबघ ने उनकी अत द ष्टि को अनुभव की कसौटी पर कसकर और लोक- जीवन के फिल्टर मे छानकर निसारा था। हस की भांति कवि ने नीर- क्षीर विवेक कर जन-मानस के मानसरोवर से मोती के दाने 'चुनकर प्रेम और सौंदय की जयमाल बनाई और उसे रसिक शिरोमणि राधा कृष्ण के गले मे डालकर उनके अपूव सौंदम का मिश्र शृगार किया और उन्हें प्रेम की अद्भुत होर मे बांध दिया। प्रेम और शृगार का यह जयमाल बघ ऐसा चिरजीवी है कि 600 वष व्यतीत हो गए कितु उसके पुष्प मलिन नही हुए । बल्कि उनका रग और चटक होता जा रहा है। विद्यापति की कालजयी काव्य कला की श्रेष्ठता का इससे सुदर और ग्राह्य प्रमाण और क्या हो सकता है। भाषा--विद्यापति पदावली की भाषा सबधी मतैक्य का अभाव रहा है। जितना विवाद इनकी भाषा को लेकर हुआ है उतना शायद किसी और कवि की भाषा पर नहीं। बगला, मथिली और हिंदी घाल इहें अपनी- अपनी ओर खीचने का प्रयास करते रहे हैं। बाबू नगे द्रनाथ गुप्त जो प्राच्य विधा के महार्णव कहे जाते हैं मैथिली को हिदी की एक शाखा माना है । उनका कथन है कि मैथिली का शरीर हिन्दी का और उसकी पोशाक बगला का है जिस प्रकार कोई हिदुस्तानी अग्रेजी पोशाक पहन र अग्रेज नहीं बन जाता उसी प्रकार मथिली भी हिदी को छोडकर बग भाषा की नही बन सकती है। बगला के ससग से उसमे अतिरिक्त मिठास अवश्य आ गई है। यो रामवक्ष बेनीपुरी का मत है कि-'कुछ मैथिल महाशय इन पदों की भाषा को तोड़-मरोडवर आजकल की मपिली बोली से मिलाने का अनुचित प्रयाम करते हैं । ऐसा करना पवि की आत्मा को कष्ट पहुंचाना 146 विद्यापति एक अध्ययन होगा । इनवी भाषा की दुदशा सूब हुई है-बगालियों ने उसे ठेठ अगला का रूप दे दिया है, मौरग वालों ने मोरग का रंग चढ़ाया है, बाबू वजनदन साय ने उस पर भोजपुरी की क्सई की है और आजक्ल मैथिल उस पर आधुनिक मैथिली का रग पढा रहे हैं। भगवान इनकी कोमलकात पदावली की रक्षा करे।' भाषा विवाद सवधी गहराई मे जाने से इस विवाद के तीन कारण निकलते हैं- 1 विद्यापति के ममय तक भापाओं और बालियो वे स्वरूप में पर्याप्त समानता थी अत थोडे प्रयास और कलई से एक भाषा को दूसरी भाषा सिद्ध किया जा सकता था। 2 विद्यापति के प्रभावशाली व्यक्तित्व और कवित्व के कारण दूसरी भाषाओ के लोग भी उन्हें अपना कहने मे गव का अनुभव करते ये और उसके लिए नियोजित प्रयास करते थे। 3 विद्यापति का जन्म दरभगा (द्वार वम) में हुआ था जिसके कारण बगला का मिश्र प्रभाव दृष्टिगोचर होता है । मेरी दृष्टि मे विद्यापति की भाषा हि दी है क्योकि मैथिली का शब्द महार हिदी का है और उसमें रूप और धातु साम्य का भी अभाव नहीं विद्यापति ने 'देसिल बयना अवहठठ भाषा का प्रयोग किया है। डॉ० चटर्जी इसे शोरसेनी अपभ्रश तथा शिवन दन ठाकुर मागष अपभ्रश से प्रभावित मानते हैं । ब्रजवुल्लि प्रभाव से भी इकार नहीं किया जा सकता। मैथिली और बगला दोनो का ही ज म मागधी प्राकत से माना जाता है । किन्तु मगध की भाषा पर मद्धमागधी प्राकृत का प्रमाव बौद्धकाल से माना जाता है जिससे अवधी का जम हुआ है। कालातर मे मथिली अवधी के अधिक निकट हो गई और हिदी की सगी बन गई। कवि शब्द का शिल्पी होता है वह केवल अनुकरणकर्ता नहीं होता। युग प्रभाव मे वह अन्य भाषाओ के शब्दो को भी ग्रहण करता है । सस्कत प्राकत, अवहटठ आदि के शब्दो का प्रयोग तो कवि ने किया है मुस्लिम सम्पक से आने वाले शब्दो को मो स्थान दिया है। तुलसी की भांति विद्यापति के काव्य का शास्त्रीय विवेचन 147 विद्यापति का तत्कालीन मिथिला प्रचलित समस्त मापामा और शैलियों पर अधिकार था । संस्कृत के तो वे महान पडित थे, प्राकृत और अपभ्रश उनको चेरी थी। अवहटठ रचनायें प्रमाण हैं और मैथिली में पदावली की रचना तो अप्रतिम है। विद्यापति भाषा की दृष्टि से कातिकारी कवि थे। अपने भावो को लोक जीवन मे सवव्यापी बनाने के लिए उहोने वह काति- कारी कदम उठाया जिसका अनुसरण बाद मे तुलसी ने किया। काव्य की भाषा को लोकोपयोगी बनाने का श्रेय महाकवि विद्यापति को है । वे वस्तुत दरबार मे रहते हुए मी लोक जीवन से सम्बद्ध थे और सच्चे अर्थों में लोक भाषा के जनक और लोकप्रिय लोककवि थे ! उनका साहसिक कदम 'लीक छोह तीनो चले सायर सिंह सपूत' का उद्घोप है । विद्यापति की भाषा के सबंध में प्रचलित हैं- वालपद विज्जावइ भाषा, दुइ नहिं लग्गई दुज्जन हासा। ओपरमेशर हर सिर सोहइ, इणिच्चिय नामर मन मोहई। विद्यापति पदावली की भापा की प्रमुख विशेषता है उसका अपूर्व माधुप एव अदभुत कोमलता । इसमे विद्यापति ने जयदेव का अनुसरण किया कि तु लोक भाषा के प्रयोग के कारण वे उनसे भी आगे निकल गए हैं । क्योकि लोक भाषा मे सयुक्ताक्षरी और समास पदो का अभाव होता है उसमे लोक जीवन की सहज सुध और मिठास होता है-- मोरा रे मगनवा चानन केर गछिया' या 'अब न बजाव विपिन वसिया' आदि पदो मे भाषा के अपूर्व मिठास का आम्दादन किया जा सकता है। काव्य भाषा की दृष्टि से विद्यापति की भाषा मे इन गुणा की विशेषता है- (क) सप्रेषणता-कवि जो कुछ भी कहना चाहता है उसे अधिकार पूवक अपनी भाषा शक्ति से व्यक्त कर देता है । भावो को सफल एव सहज अभिव्य जना उनको विशेषता है। प्रस्तुत पद मे विरहिणी नायिका के हृदय का भाव साकार हो उठा है- काक भाख निज भाखह रे, पहुं आवत मोरा। खीर-खोड भोजन देव रे, भरि कनक कटोरा। (ख) सगीतात्मकता एव ध्वयात्मकता-लय और नाद का अद्भुत सम वय विद्यापति के गीतो मे मिलता है। उनके सभी गीत रागवद हैं J 148 विद्यापति एक अध्ययन और उनका विधान सगीत शास्त्र के अनुकूल है। लय, संगीत, नाद से सबधित कुछ पक्तियां उदाहरणार्थ प्रस्तुत हैं--पाठक स्वय निर्णय कर - 1 सुनु रसिया अब न बजाउ विपिन सिया। बार बार चरनाविंद गहि, सदा रहव बन दसिया। रा०३० बेनीपुरी, पदावली 287 2 नदक न द कदम्बक तरु तर घिरे घिरे मुरलि बजाव। समय सकेत निदेसनि धइसल बेरि बेरि बोल पठाव । वही, 401 3 बाजत द्रिग द्विग धीदिम दिमिया। नटति कलावति भाति स्याम रग, कर करताल प्रबधक ध्वनियाँ हम डम डफ डिमिक डिमि मादल, रुन अन मजिर बोल किकिन रन रनि बला कनि कान निवुधन रास तुमुल उतरोल । बीन रबाब मुरज स्वर मडल, सरिगम पनिसा बहुविधि भाव । घटिता-घटिता धुनि मृदग गरजति, चचल स्वर महल करू राव । वही, 84 । (ग) चित्रमयता--भाव और रूप दोनो का चित्र पाठक के मानस- पटल पर खीच देने मे कवि अत्यात मिद्धहस्त है । शब्गे के सहारे कवि की कल्पना साकार होकर पाठक के सम्मुख झूमने लगती है- जोरि भुज जुग मोरि बेढल, ततहि बदन सुछद। दाम चम्पक काम पूजल, जइसे सारद चद। उरहिं अचल शाप चचल, आध पयोधर हेरू । पौन पराभव सरद धन जनि, बेकत कएल सुमेरू। नायिका स्नान कर तालाब से बाहर निकल रही है कृष्ण अचारक सामने पड़ जाते हैं । इस अवमर पर नायिका के मन के भाव और अगों के छिपाने को तत्काल चेष्टायें साकार हो उठी हैं। (प) गग्दों का सफल प्रयोग-विद्यापति शोके मर्म से परिचित थे। शन्द शक्तियो का नहें पूर्ण मान पा और सबसे अधिक कमाल हासिल पा हैं उनके वांछित प्रयोग मे । शेली न तो पविताको सर्वोत्तम पदों - विद्यापति के काव्य का शास्त्रीय विवेचन 149 का श्रेष्ठतम क्रम कहा है । यह वात विद्यापति के शब्द प्रयोग पर पूर्णतया चरितार्थ होती है । देखिये- 1 कामिनि करए सनाने हेरतहि हृदय हने पच पाने । 2 तितल वसन तन लागू मुनिहु क मानम मनसिज जागू! 3 कतन वेदन भोहि देसि मदना, हर नहिं बला मोहि जुवति जना। रेखाकित शब्दो पर ध्यान दीजिए 'कामिनी' जिसमे काम का निवास हो, जिसे देखकर काम भावना जागे, पचवान कामदेव के पांच बाण जिससे वह प्रहार करता है, 'तितल' वसन के साथ 'म मथ' शब्द का प्रयोग नायिका का गीला वस्त्र झलकता सौंदर्य मन को मघकर रख देता है तथा 'हर हरण करने वाला 'युवति' मिलन कराने वाला आदि । इन शब्दो मे चांछित अथ मानो चिपक सा गया है । अभिप्रेत अथ को प्रकट करने मे कवि को अदमुत सफलता मिली है। यदि कामिनी, पचबाने, तितल, ममय, हर और युवत्ति के स्थान पर क्रमश स्त्री, कामबाण, गीली, मनमिज, शिव और सुदरी का प्रयोग किया जाए तो पद प्राणहीन हो जाएगा और सारा पाय सौदय नष्ट । निस्सनेह विद्यापति शब्द के शिल्पी हैं, सफल प्रयोक्ता हैं । वह जो चाहते हैं भाषा वही कहती है और पाठक वही सुनता और (ड) शब्द और अथ गुण-मावानुकूल मापा का प्रयोग गुण का निधारण करता है।प्रसाद माधुय और ओज भाषा के प्रधान गुण हैं । इनका सफल प्रयोग कवि ने आवश्यकतानुसार किया है। शब्द की तीनो शक्तियो अभिधा, लक्षण और व्यजना का भी प्रयोग कवि ने किया है। प्रसाद गुण तो कूट और अति कलात्मक प्रहेलिकाओ आदि को छोडकर पदावली मे सवत्र विसरा पहा है। विद्यापति की शंली इतनी सहज और सवेद्य है कि इनके नाम की कोई क्लिप्ट या दुरूह रचना देखकर शका होने लगती है कि वह उनकी रचना वस्तुत है मो या नहीं। गोज के लिए देवी-वदना के पद तथा शिवसिंह का युद्ध आदि प्रसग अवहटठ रचनाओ को देखा जा सकता है और माधुय के लिए तो जो बात जयदेव के लिए 'कोमल कान्त पदावली वाली कही जाती है, वह अभिनव जयदव के लिए भी सत्य है । सन्द शक्तियों मे लक्षणा और व्यजना के एक एक उदाहरण है- समझता है। - 150 विद्यापति एक अध्ययन (क) क्तन वेदन मोहि देसि मदना, हर नहिं बला मोहि जुवति जना। (ख) कर घरू कर मोहि पारे क हैया, देव मैं अपरूब हारे कहैया। सखि मय तेजि अलि गेलि, ना जाने कोन पथ भेली कहैया। जाएव तुअ पासे, जाएब मोघट घाटे कहैया। प्रथम उदाहरण मे नामिका लक्षणा के माध्यम से अपनी स्थिति प्रकट कर कामदेव के भ्रम की और इगित करती है और द्वितीय पद मे अभि- घेयार्थ तो राधा की परिस्थिति और पार की प्राथना है किंतु व्यग्यार्थ है कि हाथ पकडने का अधिकार पति को ही है, राधा पति रूप मे कृष्ण को ग्रहण करना चाहती है और मोघट धाट एकात स्थल में जाकर विहार करने का सकेत देती है। (च) लोकोक्तियों का सफल प्रयोग-लोकोक्तियां लोक जीवन की कालजयी अभिव्यक्तियां होती हैं जिनमें ज्ञान और अनुभव का सार भरा होता है । विद्यापति की मापा मे लोकोक्तियो की सोधी सोधी सुगध आती है । असाढ की प्रथम वर्षा सो भूमि की भावन सुगघ लोकोक्तियों के कारण विद्यापति के पदो मे निकलती है। ये लोकोक्तियाँ भापा और भाव के रूप को तो निखारती ही हैं साथ ही वे लोक जीवन को व्यापक अनुभूति पर लोकप्रियता की मुहर लगा देती हैं। ऐसी लोकोक्तियो की सख्या तो हजारो हैं यहां वे केवल कुछ नमूने के तौरपर भी दी जा रही हैं- अवठठ भाषा मे प्रयुक्त-(1) अवसओ उद्यम लक्षिवस, अवसओ साहस सिद्धि-लक्ष्मी उद्यम मे वास करती हैं और सिद्धि साहस मे। (2) चोर घुमाइस नामक हाथे-~चोर को नाथ के बल घुमाना चाहिए। (3) छोटो तुरुषका ममको मार- --तुर्को का छोटा बच्चा भी धुडकी मारता है ।(4) महुअर बुझ्भई कुसुम रस-भ्रमर फूलो के रस को जानता है। (5) सज्जन पर उपकार मन तुज्जन नाम मइल्ल-सज्जन के मन में उपकार और दुजन मे मैल होता है।

- विद्यापति के माध्य का शास्त्रीय विवेचन 151 मथिली लोकोक्तियां-अपन वेदन तिहि निवैदिय जे पर वेदन जान, असमय पास न पूरय काम, आग जरिअ पुनि आहि काजे, मारति गाहक महा बेसाह, घीउ उधार मांग मति भोर । जइसन परहोक तइसन बीज, जेन विरह हो तेहन सिनेह, तत करिए उत फावए चोर, पर घने मागि वेमाज, पानि तैल नहिं निविड पिरीत, दूध का माखी दूती भेल । स्पष्ट है कि विद्यापति मापाचे परम ममज्ञ थे और उस पर उनका अधिकार था। वे मापा के मफल प्रयोक्ता थे। सहज ही वे भाषा से अभि- प्रेत अथ निकलवा लेते थे और माव चित्रो को पाठक के मन पर उतारकर उह रस विमोर कर देते थे। वे मापा के प्रयोग में उदारवादी थे उनके लिए शब्दो को कोई जाति नहीं थी, उनका कोई सम्प्रदाय नही था उनका तो एक ही धर्म था मावो की सफल अभिव्यक्ति, भाव और रूप चित्रो की आक्पक प्रस्तुति । छ व विधान-विद्यापति युगीन मैथिली कविताओ मे छद शास्त्र के सिद्धात प्राकृत और अपभ्रा छ द प्रणाली पर आधारित हैं। डॉ० एच० डी० वेलकर ने 'मात्रा वृत्त' और 'ताल वृत्त' मे हे विभाजित किया है। लोचन की दृष्टि मे विद्यापति आदि द्वारा रचित मैथिली गीत उस समय मिथिला मे प्रचलित देशी दौली के राग-रागिनियो के गीत हैं। इस प्रकार छद और देशी गीतो का इसमे सुदर गठबधन है। लोचन के अनुसार प्रमुख राग-रागिनियो को सख्या 25 और गीत छदो को सख्या 96 है । लोचन ने अपनी राग-तरगिनी में विद्यापति और उनके अनुयाइयो को खूब उद्ध त किया है। आधुनिक अलकारशास्त्रियो के अनुसार छ दो के दा विमाग हैं-मात्रिक तथा धण वृत्तक छद । मात्रिक मे चौपाई, दोहा, सोरठा, बरवा, उल्लासा, छप्पय, जयकरी, कुडलियां, गीतिका, हरिगीतिका, विजया, तोमर, पद्धरी, बस त, सर्वया, घनाक्षरी, रूपमाला, लावनी, सरसी तथा आल्हा आदि आते हैं और वण वत्तक में शिखरिणी, मालिनी, बस ततिलका, भुजग प्रयात, द्रुतविलवित, शार्दूल, विक्रीडित, मादाक्रा ता, तोटक, वशस्थ आदि। विद्यापति का छन्द प्रयोग इनसे छ सो वष पूर्व का है। विद्यापति ने भी लोचन द्वारा उल्लिखित गीत छ दो का प्रयोग किया - 152 विद्यापति एर भाग्यपन है जो विमिन पापसेतों में प्रमाणित (५) राममपुर पामेगमामय, गहप, गजरी, घरात, हिर, अहिरानी, पौराग, पनछी, मरासी शोसाय, मामरी, बसर, नमित, विमास, आमोग्य, मलाटी, मसार, नदिन, सारगी। (प) नेपास पाइसरा--मालय, धनधी, भगावरी, मामयी, पार, अहिरानी, कोहार, सारगी, गजरी, परती, समित मलिता, गट, दिमाग, बसन्त । (ग) रमानाप झा पाडलेरा--भूपासी, पानरा, मोतार, भालय, सहव, रामारी। विद्यापति में पदा का शास्त्रीय अध्ययन 'राग हरगिणीवार सोपन ने पिया है । उहोन पुछ ४ दो यो परिमापित करने का प्रयास दिया है रितु उनको परिमापा, वही लोचदार है। उनके अनुसार रापयीय वाराणीय घरम24 से 30 मात्रायें प्रथमाद 27 से 33 मात्रायें उत्तराद में होनी चाहिए । माषयीय वराणीय ७८ के प्रपमाद में 20 1 23 सपा द्वितीयाद में प्रति मत माग म 16 मात्रायें होनी चाहिए। (4) आT दसति पनि जाइतेहि रे मोहि उपजस रग। (27 मात्रायें, यहाँ दे' 'ओ' दीर्घ हैं) (स) पथ मोलसि पनि दामिनी सनि प्रजराज जानी। (24 मातायें) कवि लोधन की परिमापायें पूर्णतया सरी नहीं उतरती। कारण भी स्पष्ट है कि वह युग मात्राओं का उता नही या जितना राग रागिनियो का। एक से लेकर चार मात्राओ की कमी वेशी लय तथा आरोह-अवरोह मे छिप जाती थी या गायक उन्हें स्वय स्वर मे बांध लेता था। डॉ. नियसन ने भी विद्यापति पदावली में प्रयुक्त पदो का शास्त्रीय अध्ययन किया था। उनके अनुसार विद्यापति ने प्राकत, पगल दशन, छ दोदीपिका आदि प्रयो के छद नियमो का पालन नही किया है। उनके अनुसार विद्यापति ने सामाय रूप से तीन प्रकार के दो का प्रयोग किया (क) प्रथमार्ट पद में 15 मानाओ का प्रयोगबाट मुअगम अपर विद्यापति के काव्य का शास्त्रीय विवेचन 153 - पानि, दुहु कुल अप जस मगिरल आनि । यहाँ मुअग मे अ की दो मात्रायें, अगिरल मे 'अ' की एव मात्रा और ऊपर का 'उ' दीध है। (ख) प्रत्येक मे 16 मात्रायें-हृदय तोहर जानि नहीं भेला, परक रतन आनि मन देला। (ग) 28 मात्राओ वाले पद-जिनमे 16 और 12 पर यति है-- अम्बर विघटु अकामिक कामिनि, कर कुच झाप सुखदा। (16+12) असावरी मे भी 28 मात्रायें हैं जिनमे 12 और 16 पर यति है। -- चिकुर गरए जल धारा, मुख शशि डरे जनि रोजए अंधारा । (12+10) विद्यापति के छद विधान में मात्राओ की गणना में-अ, आ, इ, उ, ए, ओ, ऐ और औ इन स्वरो मे प्रथम छ दीघ और ह्रस्व दोनो तरह प्रयुक्त होते हैं और ऐ औ भइ अउ के रूप मे उच्चरित होते हैं। तात्पय यह है कि विद्यापति छद विधान के अनुसार चलने वाले नही, छ दो को उनके अनुसार चलना पडता है। इनमा छद विधान भी संगीत प्रधान है इनमे स्वरो का आरोह-अवरोह मानाओ की अपेक्षा प्रमुख हैं । वस्तुत इन सभी छ दो मे लय, माधुय और स्वर-साधना की तपस्या है। अलकार विधान-विद्यापति वाणी के सरस विधायक हैं, अलकार वादी कवि नहीं, अपवाद स्वरूप दस पांच पदो को छोडकर जिनमें दरबारी आवश्यकता के लिए पाहित्य का प्रदशन करना पड़ा है विद्यापति के काव्य मे अलकारो का प्रयोग सहज एव सवेद्य है सप्रयास नही। अलकारो के प्रयोग से कविता कामिनी की गति और भाव प्रवणता मे कही बाधा नहीं आयी है, क्योकि अलकारो का प्रयोग चमत्कार प्रदशन हेतु नही बल्कि भावोत्वप किया गया है। वे मारोपित नही कविता के हृदय से उपजे हुए । विद्यापति ने रूप चित्रण मे सहज ही उत्प्रेक्षा, रूपक उपमा आदि का प्रयोग किया है कि तु कही भी अतिशयता नही, सीमोल्लघन नहीं। इन प्रसगो मे उनकी करयित्री प्रतिभा प्रदशनी नही लगाती उनका तो अभीष्ट 'भावोत्कष या भाव चित्रण ही रहता है । वे भाव प्रदशन के लिए हृदय को 154 विद्यापति एक अध्ययन धीरवर दिखाने के पक्षम नही थे, ये अभिव्यक्तिकोस को ही आवश्यक मानते थे। इस पला म विद्यापति इतने निपुण पेपि रससिद्ध कवि की भौति एक ही साप अने अलमारों का प्रमोग पाप्योर के लिए उनके पदों में हो जाता या-देसिए महाभाव का अनूठा सगम-~ पिअरिनवयौवन अभिरामा। जत देसल तत बहए न पारल छहो अनुपम एव ठामा । हरिन इदु अरविद करिनि हेम पिम मूझल मनुमानी। नयन वदन परिमल गति सनु रुपि अ को अति सुसलित बानी। पुष जुग परसि चिकुर फुजि पसरल ता अरुमायल हारा। जा सुमेर ऊपर मिलि उगल, चांद विहुन सब तारा। लोल पोल ललित मनि फुडल, अपर बिम्ब अघ जाई। भौंह भ्रमर नासा पुट सुदर, से देखि कोर लजाई । भनइ विद्यापति से वर नागरि, भान न पावए कोई। कस दलन नारायन सुदर, तसु रगिनि पए होई। इस पद मे उपमा, उत्प्रेक्षा, ययासस्य, व्यतिरेव, अपनहुति आदि अनेक अलकारो का प्रयोग एक ही पद मे हुआ है कि तु पर लेशमात्र भी अलकार बोझिल नही प्रतीत होता है । वेनीपुरी जी के शब्दो म 'भावोत्कर्ष के झिलमिल चादर से अलकार झांकते से प्रतीत होते हैं ।' पदावली ऐसे अनेक पदो की शोभा भार से लदी हुई है। अप्रस्तुत विधानअलकारो का प्रयोग काय्य मे अप्रस्तुत विधान के माध्यम से होता है । काव्य मे जो मभिप्रेत होता है जिस भाव या वस्तु का वर्णन कवि का लक्ष्य होता है, उसे प्रस्तुत विधान कहते हैं और वस्तु को ग्राह्य और सुबोध बनाने के लिए जिस विधान वा कवि प्रयोग करता है, उसे अप्रस्तुत विधान कहते हैं । यह अप्रस्तुत विधान दो प्रकार का होता है -वास्तविक और कल्पना प्रसूत । प्रथम मे वास्तविक जगत मे विद्यमान उपमानो से कवि अप्रस्तुत विधान करता और दूसरे मे अपनी कल्पना स उत्पाद्य अलकरणों से काव्यात्मा को मलकृत करता है। विद्यापति इस क्ला मे अत्यात प्रवीण थे। उन्हें अलकारो का व्यामोह नही था कि तु उनकी प्रतिभा प्रसूत शैली म कुछ ऐसी सहज शक्ति थी कि एक एक पद.

विद्यापति के काव्य का शास्त्रीय विवेचन 155 -यथा- मे भनेफ अलकार स्वय प्रकट होकर उसकी रसमयता को बढा देते हैं। साथ ही उनमे जीवन जगत के व्यापक एव सुक्ष्म अनुभव तथा भावविधा यिनी कल्पना का ऐसा वरदान था जिससे उनकी अप्रस्तुत योजना की मौलिकता, प्रभविष्णुता तथा भावोत्कप की क्षमता सहज ही अद्वितीय हो जाती है। अप्रस्तुत की योजना सादृश्य तथा साघम्य मूलक होती है। महा- कवियो की चित्रवृत्ति साघम्य मूलक अप्रस्तुत योजना मे रमती है क्योकि वह अपेक्षाकत सजीव, हृदयग्राही और उत्कषकारी होती है। विद्यापति ने भी अधिकतर साधम्य मूलक अप्रस्तुतो का ही प्रयोग किया है--उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि इनके प्रिय अलकार हैं। 'उपमा कालोदासस्य' कथन से सभी लोग परिचित हैं कि तु लोक भाषाओं के क्षेत्र मे विद्यापति उपमा की दृष्टि से द्वितीय पालिदास हैं। मौलिक नवीन एव ताजे अप्रस्तुतो के लिए वे सचमुच बेजोड हैं- ततहि पाओल दुहु लोचन रे, जतहि गेल वरनारि। मासा लुबुघल न तेजए रे, कृपनक पाछ भिखारि। कवि की प्रवृत्ति शब्दालकारो मे कम रमी है अर्थालकार ही उसे अति प्रिय हैं--कुछ उदाहरण- उपमा- -(क) चिकुर निकरतम सम पुनु, आनन पुनिम ससी। नअन पकज के पति माओब, एक ठाम रहु बसी। अथवा---(ख) आवर विघटु अकामिक कामिनि, करे कुच झोपि सुछ दा कनक सम्मु सम अनुपम सुदर चदा। विद्यापति के कान्य मे उपमा का वैभव सवन है । उहोंने उपमान तो परम्परित ही लिए हैं कि तु उनपर कवि की मौलिक्ता का निर्मोक सदैव अभिमडित रहता है । देखिए 'क' मे नायिका के दीघ एव सघन काले फेश घोर अधकार के समान ओर मुख चद्रमा के समान यहाँ तक तो कोई नवीनता नहीं है कि तु जब कवि नमन पकज' की उपस्थिति का उल्लेख कर देता है तो उसपर कवि की मुहर लग जाती है । 'ख' मे स्तनो के लिए पकज दस - 156 विद्यापति एक अध्ययन - 'कनक सम्म को उपमा' साधारण है मौर शिव भक्ति का संकेत करता है कितु अस्त-व्यस्त आंचलो के कारण उहे हाथो से ढक लेने पर 'दुइ पकज दस चदा' मे अवश्य नवीनता है और विरोध का सौदय भी निहित है। कवि की उपमा की प्रशसा मै डॉ० दिनेश सेन कहते हैं-उपमा के लिए कालिदास विश्व साहित्य मे सवश्रेष्ठ माने जाते हैं कि तु उत्तर भारत की लोक भाषाओ मे विद्यापति को वही स्थान दिया जाए तो अत्युक्ति नही होगी। उत्प्रेक्षा-विद्यापति रीतिकालीन कवियो की तरह अप्रस्तुत की ढेर लगाकर प्रस्तुत को ढंक नहीं देते। इनके उत्प्रेक्षा सम्बन्धी प्रयोग देखने योग्य हैं- (क) दीघ केस कलाप कुटिल कोमल धन सामर, दप्प मत्त क्दप घनु गति धद्धिय चामर । (ख) ससन परस खस अम्बर रे देखल पनि देह, नव जल घर तर सचर रे, जनि बिजुरी रेह । प्रथम मे कामिनी के काले कुचित केश-कलाप सावन भादों मे उमडती कादम्बिनी की तरह काले साबले मानो दो मत कामदेव के घमर हो। द्वितीय मे श्वासा के स्पर्श से खिसके हुए वस्त्र के बीच से झांकना हुआ यौवन मानो बिजली की रेखा हो । इस रेखामान मे स्थिर एव गत्यात्मक सौंदय का सम्पूण चित्र है। रूपक-रूपक विद्यापति को अयत प्रिय है। रूदि प्रयोग के साथ कवि ने कुछ अभिनव प्रयोग भी किए हैं-देखिए- (क) रितुपति हट वे नहि परमादी, मनमष मदथ उचित मुलवादी। द्विज पिक लेखक, मति मकरदा, पाप भमरपद साखी पदा। (ख) बदन चांद तोर नयन चकोर मोर, अमिम पोवे। अपर मपुर फुल पिया मधुकर तुल, बिन मधु क्त बन जीये । रूप विद्यापति के वाध्य का शास्त्रीय157 रूपक और उपमा की सश्लिष्ट करके कवि ने नायिका का सौंदर्य नायक की चेष्टायें, प्रेम और वासना का मधुर संगम, नायर को ध्यग्रता नायिका को अनुकूल होने का सकेत आदि अनेक भावों को व्यजना या एक ही साथ करा दिया है। रुपकातिशयोक्ति- साजनि अकय कहि न जाए। धवल अरुन शशि कमहल, भीतर रहनुकाए। कलि उपर केसरि देखल के सर मेरु चला। ताहि उपर निसाकर देखल, कीर ताउपर बइसला। कीर उपर कुरगिनि देखल, चकित भमय जानि । कीर कुरगिनि उपर देखल, भमर उपर फणि। एक असम्भव आओर देखल, जल विना अरविदा। देखि सरोरुह उपर देखलि, जइसन दुतिम पदा। नायिका के नखशिख वणन की योजना कवि ने केवल उपमानो से ही की है। नखशिख वणन के और भी पद है जिनमे रूपकाशयोक्ति काव्य लिंग तथा उपमा आदि से पुष्ट किया गया है, जैसे- मेरु उपर दुई कमल फुलाइल नाल विना रुचि पाई। मनिमय हार धार बह सुरसरि, ते नहिं कमल सुखाई। इसके अतिरिक्त अन वय, विरोधाभास, यथासख्य, व्यतिरेक, एकावली, असगति, पर्यायोषित, विशेष तदगुण, अपहुति, परिकद, परि- कराकुर मोलित, समामोक्ति, दप्टात, अप्रस्तुत, प्रशसा, सदेह, अनुप्रास, पुनरुक्ति, प्रकाश, यमक, श्लेप आदि के भी अनेक उदाहरण पदावली मे है--सवका उदाहरण प्रस्तुत करना सम्भव नही-कुछ उदाहरण देखिए- एकावली- सरसिज बिनु सर, सर विनु सरसिज, नि सरसिज दिन सूरे। जीवन दिनु तन, तन विनु जीवन, कि जीवन पिय दूरे। .

158 विद्यापति एक अध्ययन असगति- सुर तरु तर जब छाया छोडल, हिमकर वरिसय आग। दिनकर दिनफले सीतल बारल, हम जियब कथ लाग । पर्यायोक्ति हृदयक वेदन वान समान, आनक दुख आन नहिं जान । तद्गुण- अनखुन माधव माधव रटइत, सुदरि भेल मधाई । ओ निज भाव सुभावहि विसरल, अपने गुन लुबधाई । परिकर- तुहु रस नागर भागर ढीठ, हम न बुझिय रस तीन की मौठ। अनुप्रास- रितुपति राति रसिक रसराज, रसमय रास रमस रस माझ। रसमति रमनि रतन धनि राहि, रास रसिक सह रस अवगात । यमक- सारग नयन बयनपुनि सारग, सारग तसु समधाने । सारग उपर उगल दस सारग, केलि करण मधुपाने । अलकार प्रदशन कवि का स्वभाव नहीं है पितु मावश्यकता पड़ने पर पाहित्य के खजाने से भी कुछ मणि राजियां कवि ने लुटा दी हैं जिसमे चमत्कारप्रिय विद्वानो तथा पाठको के लिए दिमागी कसरत की पर्याप्त सामग्री है। इसमे रीतिकालीन एव कतिपय उदू कवियो की उहात्मक वृत्ति भी मिल जाती है-कुछ नमूने देखिए- (4) (कूट)-- द्विज आहर आहर सुत नदन सुत आहर सुत रामा । बनज बघु सत सुत दए सुदरि, चललि सकेतक ठामा। रा०३० बेनीपुरी, प०१० 262 (ख) (प्रहेलिरा)- कुसमित कानन कुजेवासी, नयनक काजर घोरमसि । नख सौ लिखल नलिन दल पात, लिखि पढाओल मालर सात।

विद्यापति के काव्य का शास्त्रीय विवेचन 159 पहिलहि लिखलनि पहिल बसत, दोसरेलिसलनि तेसरक मत । लिख नहिं सकली अनुज बस त, पहि लिहि पद अछि जीवक मत । भनहि विद्यापति आखर लेख, बुधजन हा से कहए विशेष। वहीं, 261 (ग) (उहा)- अपने सांसे जाइत उडि आए। (नगे द्रनाथ गुप्त, पदावली 762) विद्यापति की इस प्रकार की चमत्कारिक रचना अनेकार्थक शब्द, अक, कुछ रूढियो, कवि प्रसिद्धियो या समयो पर आधारित हैं। विषय सवत्र शृगार ही है। शब्दालकार का प्रयोग कवि ने विशेषकर ऐसे ही पदों में किया है। विद्यापति की अलकार योजना मे परम्परित एव मौलिक अलकार विधान का मिश्र स्वरूप है । इनकी मलकार योजना कही कही तो सवथा मौलिक है किन्तु जहाँ उहोने रूढ उपमानो का प्रयाग किया है वहाँ भी अपनी मौलिकता का निर्मोक चढा दिया है यथा-'मनि कादो लपटाय रे तेकर तकर गुन जाय रे' मे माघ के कथन से श्रुति कटुत्व को दूर कर अपने स्थन मे कितना मिठास भर दिया है । 'धूलि' के स्थान पर कादो और उसके साथ 'लपटाय' शब्द का प्रयोग करके अभिव्यक्ति को माधुय एव अनुभूति से अलकृत कर दिया है । वस्तुत अलकार विद्यापति के हाथ मे कठपुतली की तरह नाचते थे। शिवनदन ठाकुर का कथन है कि गहना पहनकर कुरूप नारियां भी स दरी मालूम पडती हैं। सु दरी नारियो के गहने तो सोने म सुगध का काम करते हैं। विद्यापत्ति को श्रुति मपुर अलकारो से सुसज्जित होकर किस पद प्रेमी पाठक का मन नही हर लेती हैं । बाबा नागार्जुन के शब्दो मे विद्यापति का यश समूचे ससार मे फ्ला हुआ है। उनके गीता को विश्व की रसिक महली ने सम्मान प्रदान किया है। पिछले वर्षों में अमेरिका के एक प्रकाशक ने विद्यापति के गीतो का अग्रेजी रूपान्तर प्रकाशित किया है। मेरा विश्वास है कि विद्यापति ने अपनी कविता कामिनी को बाह्य अलकारों से समाकर 'धरनारी' नही बनाया है किंतु उसके प्रांतरित गुणों 160 विद्यापति एक अध्ययन - का उत्कप कर उसे 'घरनारी के रूप मे ही प्रस्तुत किया है । मापा, छन्द, अप्रस्तुत विधान, अमिव्यजना, शैली आदि सभी दष्टियो से विद्यापति के काव्य का फला पक्ष अभिनव है। राधा के सम्बध में की गई उक्ति- 'बडि कोशल तुअराधे किनल हाई कोरहिं आधे विद्यापति की काव्य कला पर भी लागू होती है। सचमुच कवि ने पाठको के रसिक मन को अपनी काव्य कला से खरीद लिया है। ..."

विद्यापति के काव्य में प्रकृति-चित्रण प्रकृति---कवि और काव्य- -अनुभूतिमय अतजगत और दृश्यमान वहिगत का कवि हृदय के साथ रागात्मक सम्ब घ होता है। भावो मेप सवश्रेष्ठ क्षणो मे यही सम्बध जब व्यवत होता है तो काव्य की शतधारायें फूट पड़ती हैं। इनके फूटने मे प्रकत का बहुत बड़ा हाथ होता है क्योकि प्रकति और मनुष्य का रागात्मक सम्ब ५ अनादि है। उपा की अरुणिमी, सध्या की लाली, पावस की रिमझिम, बसत मा गदराया यौवन, शरद की चांदनी, झरनो का क्लक्ल, उत्तग शिखरो का रजत मुकुट और सागर का लहराता वक्ष किसके हृदय मे भावोमियो का शृगार नहीं करते? आदिकवि बाल्मीकि वे महाकाव्य का प्रणयन प्रवति की गोद मे हुआ। महाकवि कालिदास और भवभूति ने प्रकति मे अपने काव्य का अक्षय शृगार किया, विद्यापति और चण्डीदाम ने गीतो का प्रति के नाना उपादानो मे सवारा। जायसी ने प्रकति के साथ मानव जीवन का तादात्म्य स्थापित किया। तुलमी ने नीति और उपदेश का माध्यम घनापा, अयोक्तिकाराने इसबै उपादानों का खुलकर प्रमाग किया। रीति । कालीन कवियो ने प्रारतिष उपादानो से नायक-नायिदा की भावनाओ को उद्दीप्त किया। छायावादी कवियो ने इसकी सवेद का अनुभव पिया और इसमे रहस्य ये नाना स्परे। वस्तुत प्रकृति ने अपना मुक्त पोप लुटाया है और सदश्य पथियों ने उस जी भर कर लटा ह और अपनी पविता का भृगार दिया है। प्रकति की यरल रश्मियोगवि के पट मोन मे समा नहीं पायी हैं--प्रसाद की यह उक्ति- 'फटाइप है नीलवमा, मो - 162 विद्यापति एक अध्ययन योवन की मतवाली, देख अकिंचन जगत लूटता तेरी छवि भोली भाली। कवि के मानस जगत मे सुदर तो सुदर होता ही है, असुदर भी उसकी चेतना के स्पश से सुदर हो जाता है- कवि का जीवन एक जगत है जग के भीतर जग के बाहर जग का पुण्य जहाँ सुदर है और पाप भी नही असुदर। -प्रसाद प्रकृति के इस परिवेश का उपयोग कवि साधन और साध्य दोनों ही रूपो मे करता है। साधन रूप मे प्रकृति का उपयोग उद्दीपन के लिए अलररण, पृष्ठभूमि, मानवीय भावनाओ का आरोप, उद्दीपन, प्रतीक, विम्ब, उपदेश तथा दूतादि के रूप मे किया जाता है। साध्य रूप में प्रकृति का स्वतत्र चित्रण होता है जिसे प्रकृति का आलम्बन स्वरूप कहते है। गीतिकाव्य मे प्रकृति के स्वतत्र चित्रण को मुजाइस कम होती है क्योकि इसमे विषय का विस्तार न होकर भावानुभूति की तीव्रता और अभिव्यक्ति की सघनता और प्रखरता रहती है। इसलिए इसमे प्रकृति के उद्दीपन या अलकरण स्वरूप की ही सभावना रहती है। यही कारण है कि विद्यापति के गीतिपदो मे भी शुद्ध प्राकृतिक या आलम्बन स्वरूप प्रकृति चित्रण नहीं के बराबर है। बसत आदि के कुछ चित्र इसके अपवाद हैं। प्रकति का अलकरण या उद्दीपन रूप ही इन गीति पदो मे उपलब्ध है। प्रकृति के विभिन्न एव ध्यापक उपादानो से इहोंने सयोग और वियोग के चित्रो का शृगार किया है, भावो का उत्कष किया है और अनमोल क्षणो को सजाया है। विद्यापति सहृदय कवि थे, मिथिला मे प्राकतिक सम्पदा की भरमार थी अत कवि ने उनका भरपूर प्रयोग अपनी मावश्यकता अनुसार किया है। महाकाव्य की तरह प्रकृति का स्वतत्र चित्रण नही है, उसका उठीपन स्वरूप ही गीति विधा के अनुकूल है, इसलिए इसी दष्टि से विद्यापति के काय मे प्रकति चित्रण पर विचार करना चाहिए। विद्यापति के काव्य में प्रकृति चित्रण ~हिमालय के पुनीत चरणो मे वठी मिपिला की शस्य श्यामला भूमि प्रकति की रम्य रगस्थली है । उसने उसकी रगस्थली को असरूप सरिताओं से सजाया है। शरद के पावनमी सेती मे रूपहली चांदनी वा दितान, बस त में मजरियो से लदी अमराहयां, विद्यापति के कान्य मे प्रकृति चित्रण 163 कोयल की अचूक तान, गेंदा, केतकी, मालती तथा पाटल के प्रसूनों का सुरभिसिक्त वातावरण, ग्रीष्म ऋतु की करारी लू, दरारो से भरे धान के खेत फिर धौमासे की रिमझिम और उसकी सहेली पुरवाई-काजरे रगलि रात', जलमयी परित्री, पपीहा, भोर, दादुर तथा झीगुर ध्वनि से आवृत परिवेश मिथिला के प्राकृतिक वंभव के कुछ नमूने हैं । मिथिला के इसो सौन्दर्य कानन के कोकिल हैं कवि विद्यापति। मिथिला में विद्यापति के पूर्ववर्ती कवि ज्योतिरीश्वर ठाकुर का 'वर्ण- रत्नाकर' में प्रकृति के कुछ अत्यात सुदर वणन उपलब्ध होते हैं-प्रमात, ग्रीष्म, वर्षा के स्वतत्र चित्र देखने योग्य हैं--(क) 'वायसन कोलाहल करू । नक्षत्र विरोहित मेल, चौद म्लान मेलाह, पूर्वदीश अरुणित मेल, घटवानि जलाशये मारहल, पथिक जने मार्गानुसधान कएल।' अर्थात काग बोलने लगे, सितारे डूब गये, चाँद मलिन हो गया, प्राची में लालिमा छा गई, कुलवधुए सलज्ज हो गइ, पनिहारिन जलाशय की ओर चल पड़ी और पथिक रास्ता पूछने लगे। प्रभात का क्तिना प्रभावपूण एव अथ सकुलपित्र है। (ख) दरिद्रीक हृदय अइसन सतप्ति पथ्वी मलि अछ उ भूल विपछ अइसनि जलाशए भरि गएल अछ-पथिकति पय सचार त्यजिहल दिनरा दीघवा कत्रिक सकोच-पृथ्वीक ककशता, रौद्रक तीक्ष्णता, पवनक वाछा, शीतकउत्कठा एवम्बिध ग्रीष्म समय मध्याहन छेपु।' अर्थात दरिद्र के हृदय की तरह सतप्त पृथ्वी, उमलित येरी की तरह जलाशय हो गये हैं, कुत्ता भी छायाश्रय चाहता है, दिन को दीघता, रात की लघुता, पृथ्वी की क्कशता, सूय किरणो की तीव्रता, पवन को इग्छगीत की उत्कठा ग्रीष्म काल के परिषायक हैं। इस परम्परा के होते हुए भी विद्यापति को गीतिकार होने के नाते प्रकृति के स्वतत्र चित्रण का अवसर नहीं मिला है कि तु कवि हृदय के नाते उहें जहाँ कही भी मौका मिला है वे प्रकृति के सुदर चित्र उपस्थित करने म चुके नहीं हैं। ऋतु वणन मे वसन्त और वर्षा के चित्र तो इतने सुन्दर और यथातथ्य हैं रिवेविरह और अभिसार प्रसग मे होते हुए भी ऋतुओं का स्वतन्त्र खाका खींच देते हैं। कीतिलता मे कवि कहता है- रमनि मिरमिय हमर पन्छ्स, तरणि तिमिर सहरिम, हसिय भरविन्द 1164 विद्यापति एक मध्ययन . कानन । (कीतिलता, 4646) रात बीती प्रभात हुआ, सूर्य ने अपकार फा विनार्स कर दिया और वन प्रातर मे कमले फूल उठे। मिथिला का "एक सरस चित्र देखिये- "पल्लविस कुसुमित फलिंग उपवन, चूअचम्पर सोहिम । मारद'पाण विमुग्ध महुअर, सहमानस मोहिम । बकवार साफम बोध पोपणि नीक नीव निकेतना। अति बहुत भौति विवद्द बद्दहि मुलेओ वडटो चेतना। (कीतिलता, ५0 26) अर्थात-आम' और चम्पक के उपवन' सुशोभित हैं 'फूल फलो से 'डालियाँ लदी हुई हैं। भौरे मकरद' पार्न कर गुनगुना रहे हैं, मपुर गुजन मन को मुग्ध कर रहा है। जगह-जगह तालाब हैं उनमे' सुदर घाट है, बगुला की पेंकियां उनमे विहार कर रही हैं । अनेक भव्य भवन हैं, सुंदर गलियाँ हैं, सडकें हैं जिहें देखकर बुद्धिमान भी भ्रमित हो जाते हैं। पदावली' मे तो इस प्रकार के वर्णनों की भरमार है। वर्षा और बसत के चित्र तो बहुत हैं शरद, शिशिर और हेमत अपेक्षाकृत बहुत कम हैं। ग्रीष्म का तो एक ही चित्र पदावली में मिलता है किंतु यह चित्र अत्यत सुदर है देखिए- ग्रीष्म-सूखल सरसिज मेल माल, तरुन तरनि तरु न रहल हाल । देख' दरनि दरसाद पताल, अबहुँ घरा घर घरसिन धार । जलधर जलधन गेलि असेखि, करए कृपा वडि पर दुख देखि । पथिक पियासल माव अनेक, देषि दुख मानए तोहर विधेक ।' (मित्र मजू० प० 14) सर सूख गये हैं, कमल मुरमा गये हैं, भीषण गर्मी के कारण तरुवर 'बेहात हैं, उनको आद्रता समाप्त हो गयी है। खेतो मे इतनी गहरी दरार पड गइ हैं कि पाताल दिखाई दे रहा है । जल से भर हुए बादल आते हैं दि तु घरसते नही । प्यासे पथिक पानी की खोज मे आते हैं पितु निराश " ।

विद्यापति के काव्य मे प्रकृति चित्रण,1651 लौट जाते हैं। इन सबका दुख ,देखकर ,बादलो के अविवेक की बात मन मे आती है। मानवीय स्पर्श के साथ वर्णन की दृष्टि से यह पद कवि की अनुवीक्षण शक्ति का अनूठा उदाहरण है। वर्या-वर्षा के चित्र तो अभिसार और विरह के प्रसग अनेक पदो मे मिलते हैं। ये पद देखने में स्वतत्र प्रतीत होते हैं किन्तु उनमे विरहिणी की पीडा और मभिसारिका का सच्चा प्रेम साकार हो उठता है। देखिए---- रागन अब धन मह दारुन सघन दामिनी झलकई। कुलिस पातन सबद झन झन, पवन खरतर बल गई। सजनी आज दुरदिन मेल । क्त हमर नितात अगुसरि । सकेत कुजहि गेल। तरल जलधर बरखि झर झर गरज धन घनघोर। साम मागर एकर कइसन, पथ हेरए मोर। (बेनीपुरी वि०५० 112) आकाश पर सघन मेघो का जमघट, चपला को धमक, वन निपात सै झन झन का शब्द और प्रखर वायु, सबने मिलकर रात को कितना भयानक बना दिया है। मिथिला की बरसाती रात की भयानकता भी यहाँ साकार हो रही है। नायिका सखी से कहनी है कि आज दुर्दिन है। मेरा कत सकेत स्थल पर पहुंच चुका है, वह अकेले भीगते हुए मेरी प्रतीक्षा कर रहा है, मैं कसे एक मकती हूँ। विरह प्रसग के भी कुछ पद देखे जा सकते हैं--- (क) हम पनि तापानि मदिरे एकाकिनी दोसर,जन नहिं सग। परिसा परिवेश पिया गेल दूरदेस रिपु गेल मत्त अनग। (ख) सखि,रे हमर दुखक नहि ओर।। इभर भादर माह भादर, सून मदिर मोर। झपिधन गरजति सतत मुवन, भरि बरसत्तिया। कत पाहून मामदारन, सधन सर सर हतिया। कुलिसकत सतपात मुदित, मयूर नाचत मातिया। मत्त दादुर डाक हाहुक, फाटि जायत छातिया। - , है 166 विद्यापति एक मध्ययन तिमिर दिगभर घोर यामिनि, अथिर बिजुरीक पांतिया। विद्यापति कह कइसे गयाओब, हरिविना दिन रातिया। पहले प्रसग मे नायिका मदिर मे अकेली है, प्रिय प्रवास मे है। वर्षा का परिवेश है और अनग अरि हो गया है । दूसरे पद मे भरे भादो का चित्र है। नायिका अपनी सखी से कहती है कि उसके दुखो का कही मत नहीं है-भद्दर भादो की रात, सूना महल, घनघोर गजन, चचल चपला, तेज हवा, दादुर, मोर, पपीहा की पीडक वाणी। सर्वत्र मिलन का पर्व है केवल वही अकेली है। नायिका के दुख का अत कहाँ। शब्द चयन परिवेश चित्रण, ध्वनि, नाद और विरह की अभिव्यक्ति की दष्टि से यह पद गौरव का अधिकारी है। वसात-ऋतुराज बस ते मनोज का अभिन सखा, सहचर और सहायक है। जिस प्रकार आम की डालो पर मजरियाँ, लतिकाओ पर पुष्प झूलने लगते हैं, घरा का गदराया यौवन अंगडाई लेने लगता है, उसी प्रकार कवि की जिह्वा पर कवितायें नृत्य करने लगती हैं और उनके पायल की मधुर ध्वनि 'मदन की दुदुभी' बनकर विश्व विजय की वाछा करने लगती है। वस्तुत वसत काव्य मे सबसे बड़ा उद्दीपनकारी ऋतु माना जाता है। विद्यापति ने बसन्त की छवि सुपमा का चित्रण सयोग और वियोग दोनो मे ही किया है और ऋतुराज का योवनो मत्त चित्र खीचा है। बसत पूर्वराग मे नायिका को उत्कठित करता है, अभिसार पथ पर उसे प्रेरित करता है, मान मजन के लिए उसे विवश करता है और रास में करण और गोपियों को एकीभूत कर देता है किन्तु यही बस त जब विरहिणियों पर पघशायक पलाता है तो उनका हृदय चकनाचूर हो जाता है, प्राण कठगत हो जाता है और शिव शिव करते ही रात दिन व्यतीत होता है । पदावली मे ये सभी रूप मिलते हैं कि तु बसत मोत्सव वा पित्र तथा राज्याभिषेक के अवसर पर 'चमाप्रोन करने का चित्र अत्यात अनूठे हैं । साहित्य में इस प्रसार के सुदर चित्र दुर्लम है-प्रात जगायत गुलाब घटकारी बादि रीतिकालीन अभिष्यक्तिपां इनकी जूठन प्रतीत हाती विद्यापति के काव्य मे प्रति चित्रण 167 माम माम श्री पचमी गजाइलि, नवम मास पचम हरुमाई। अति धन पीडा दुख रहपामोल, बनसपति मेल छाई है। + कनम केसुम सुति पत्र लिखिएहतु, रासि नछत कए लाला। कोफिल गनित गुनित भल जानए, रित बसत नाम पोला। (०३० पद 174) माघ मास की श्रीपचमी पूर्णगर्भा हुई। नौ महीने पांच दिन पर स्वस्थ बालक बसत का जन्म हुआ। बालक को वायु से बचाया गया, मधु घटाया गया, कमर मे सूत बांधा गया, कदम्ब के फूल का तकिया बना, भ्रमरी ने पालना गीत गाया, जन्मपत्री लिखी गई और कोयल ने नाम रखा बमल दक्षिण पवन ने किसलय मोर पुष्पराग से उसमा उबटन किया, गले में मजरी का हार पडा और मेघ ने उसकी आंखा मे काजल लगाया। ऐसा सूक्ष्म और सस्कार प्रधान वणन कहाँ मिलेगा? बालक वसात तरुण हो गया, सारे ससार पर उसका आधिपत्य हो गया और उसने अपने अभिनव सौदय सुषमा मे सम्पूर्ण विश्व को अभिभूत कर उ मत्त कर दिया। इस पद मे जन्म से लेकर युवावस्था तक के सत्यारो का मोहक चित्र कवि ने सोचा है और प्रकृति के उपादानो से उसे अनूठे हग से सजाया है। सम्पन गहस्य के घर पुत्र-जन्म के अवसर पर का समस्त हर्षोल्लास, बानर बधाई, उत्सव, अनुष्ठान मादि इस पद में प्रति परिवेश के साथ साकार हा सठे हैं। प्रकृति के महान अग्रेजी पवि दर्डसवर्ष की पक्लिया तथा 'सूमी' यादि वविताओं की तुसना कोई करके देखे और बताये कि प्राकृतिक परिवेश और मानवीय सवेदना किसम अधिक बलवती और मोहक है। देखिये राज्याभिषेक के अवसर वसत में "पमाओन' का चिन-- अभिनव पल्लव पइसक दल, धवल कमल फुल पुरहर भेल। करू मरद मदाकिन पान, अरु असोज दीप बहुबान । माई है, आज दिवस पुनमत, करिम घुमानोन राज बसन्त । सगुन सुधानर दधिभल मेत, भमि भमि भरि हतारह देल ।

168 विद्यापति - एक अध्ययन
टेसू कुसम सि दूर सम भास, केतिक धूलि विधरह पटवास ।
भनइ विद्यापति पवि कठ हार, रम वुझ सिव सिंह सिव-अवतार।
(वेनीपुरी पदा० 179)
प्राकृतिक छवियों के साथ सस्कार प्रधान मानवीय व्यापारो मे इतना
मनोहर सामजस्य विद्यापति जैसे दुर्लभ प्रतिभा सम्पन्न कवि द्वारा ही
सभव था। भारतीय जीवन मे सास्कृतिक संस्कारो का प्राकृतिक उपादानो
के सहारे इतना सुदर एव पूर्ण चित्र दुलभ है। इस प्रसग मे शीत-बस त
का वाक्य युद्ध तो देखते ही बनता है-
माई हे सीतवस्त विवाद, कओन विचारब जय-अवसाद ।
दुहु दिसि मधथ दिवाकर मेल, दुज पर कोफिल साखी देल ।
नव पल्लर्व जय पत्रक भांति, मधुकर माला मानर पाति ।
वादी तह प्रतिवादी भीत सिसिर विदु हो अतेर सीत।
कुद कुसुम अनुपमें विर्क सत, सतत जीत बेकताओ बर्स त ।
(वैनीपुरी पदा० 180)
हा अतिरिक्त बस त के ये पद भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है :-
(क)' नव व दाबन, नव नव तरु गन, नव नव विकसित फूल।
नवल बस त, नवल मलयानिल, मातले नव अलि कूल ।'
(ख) नाचहु रे तरुनी तगहुलाज, आएल बस त रितु बनिक राज ।
हस्तिनी चित्रिनी, पदुमिनी नारि, गोरी सामरी बूढ़िवारि।
(ग) मधुरितु मधुकर पाति, मधुर कुसुम मघुमाति ।
मपुर वृदावने मांझ, मधुर मधुर रस 'राज'।'
(घ) रितुपति राति रसिक रसराज,
रसमय रास रमस रम मौका
रममति रमनि रतन धन राहि
रास रसिक सह रस अवगाहि ।
(४) मलय पवन वह, वसत विजय पह,
भमर करइ रोर, परिमल नहि मोरी
रितुपति रंग देला, हृदय रभस मेला,
अनेगमगल भेलि, कामिनि करणे मेलि

विद्यापति के काम्प में प्रकृति चित्रण 169 इन पदो में प्रमश वृदावन का नवल रूप, बसन्त का नर-नारी पर प्रभाव, मधु ऋतु का माधुप, रास प्रसग और बस त विजय मुखरित है। बेनीपुरी जी का कथन है कि 'इनमा बसत और पावम का वर्णन पढकर मत्र मुग्ध हो जाना पड़ता है। इनके वमन और पावस मे मिथिला की खास छाप है । वसन्त म मिधिना की शम्म श्यामला भूमि अलकृत और दशनीय हो जाती है। पावस म हिमालय के निकट होने के कारण, यहाँ बिजलियां जोर से डरती हैं, प्राय कुलिश पात होता है। इन्होने इनका बडा ही अपूर्व वर्णन किया है।" (भूमिका, पृ. 48) माय तुओं का वर्णन-विद्यापति ने अय ऋतुओ शरद, शिशिर, हेमन्त आदि का भी वर्णन किया है किन्तु इनकी सस्या कम है। इस प्रकार के कुछ वर्णन बारहमासा मे आये है-~-वर्षा के मन और शरद के आगमन पर सधिवेलामा चित्र- गगन बलाहक' छाइल रे, वारिसकाल अतीत। करिम दिनति सौ ए आएका जाहि विनु तिहअन तीत। यावह सुमति सघातिने रे, बाट निहारन जाउ । बुदिनामदिन नहि रहे रे, सुदिवस मन हरसा। सांभरपदा उगला दरे, पदि पुनि गेलाह अकास। एसवाह पिया के आए बारे, पलटव विरहिन सांस । (मित्र मजू०५० 213) विरहिणी कहती है आकाश अब मेघ मुक्त हो रहा है। वर्षा समाप्त हो रही है शरद का आगमन हो रहा है। यह पति के मागमन हेतु विनय करती है, प्रतीक्षा के लिये सखियो को धुलाती है और कहती है कि उसका पदा आयेगा तो आकाश का पदा भी उसके लिये सुखकर होगा। स्पष्ट है कि इस पद में ऋतु वर्णन पर नायिका का भाव हावी है। गोपविजय म भी एक शरद ऋतु का सन्दर वर्णन मिलता है- पिवति तमह शनि लेखा, विकसति पदम हसति कुमुदानि ।। लघु रूप राजति तारा, गुरुरपि सीदति पयोवाहा। निमलें यादमी ने अपकार को दूर कर दिया है, कमला खिलते है। कुमुद विहसते हैं। छोटे छोटे तोरे जगमगा रहे है, बहे होने पर भी मेष - 170 विद्यापति एक अध्ययन - कांपते और छीजते हैं। पूप-माघ की अत्यधिक सर्दी का प्रभाव विभिन्न श्रेणी के लोगों पर कसा पडता है एक व्यग्य मिश्रित उदाहरण देखिये- जाडल बाम्हन तेजए सनान, जाहल कामिनि तेजए मान। जाडल राड घोपडी मार, बड पराभव पवन चाही। (मि०मजू०प० 14) उद्दीपन स्वरूप-विद्यापति के काव्य में वणित अधिकाश प्रकृति- छवि नायक-नायिकाओ के मनोभावो को उद्दीप्त करने के लिए ही हैं। कुछ विशुद्ध उद्दीपनो के उदाहरण देखिये -'पूष खीन दिन दोरघ राति 'तथा' माघ मास घन पडए तुसार, झिलमिल केचुआ उनत धन हार 'मे शिशिर की राति सयोग और वियोग मे किस प्रकार सयोगिनी और वियोगिनी को प्रभावित करती हैं । जाडे के दिनो का अत्यात स्वाभाविक प्रभाव इनमे चित्रित है। विद्यापति ने बारहमासा पद्धति पर एक ही पद मे वारहो मासो के विरहिणी के अनुभाव और मनोभाव का चित्र प्रस्तुत कर दिया है--- अश्विन का एक चिन- आसिन मास आसि घर चीत, नाह निकरुण व भेलाह हीत । सरवर खेले चकवा हास, विरहिन वैरि भेल आसिन मास। प्रकृति की एक ही उपादान का सयोग और वियोग मे अनुकूल प्रति-- कूल प्रभाव देखिये- नवल रसाल मुकुल मधुमातत, नव कोकिल कुल गाय । नव युवती गन चित्र उमआतई, नवरस कानन पाय । अथवा मोर बन-बन सोर सुनइत, बढ़त मनमय पीर + + + पप सर छुटत रे कइसे, जीमण विरहिन नारि। इन पदो मे नायिका का विरह भाव हाहाकार कर रहा है-काम के प्रहार से प्राण बचाना कठिन है। श्री रघुवंश के शब्दो मे-'विद्यापति ने सोदय के साथ यौवन को स्फुरणशील स्थिति का सकेत प्रकृति के माध्यम से दिया है। सौदर्योपासक प्रकृतिवादी प्रकति के दृश्यात्मक रूप मे यौवन की व्यजना के साप मारपित होता है, उसी के समानान्तर विद्यापति .

विद्यापति के काव्य में प्रकृति चिनण 171 मानवीय सौदय के उल्लासमय यौवन से आवपित होकर प्रकति रूप- योजना के माध्यम से उसे व्यक्त करते हैं। ये अभिव्यक्तियां सयोग में केलि और क्रीडा का अक्षय स्वप्नलोक है और वियोग में प्रेमजनित अश्रुओ काअन तपारावार। अलकार स्वरूप-विद्यापति सौदय के कवि हैं। भाव और रूप के सौदय को चित्रित करने के लिये अलकार के रूप मे प्रकति के उपादानो का प्रयोग उहोने खुलकर किया है। वैसे तो सम्पूर्ण पदावली मे प्रकृति का अलकरण रूप व्याप्त है कि तु नख-शिख वर्णन मे यह रूप अधिक उभर कर आया है- माधव कि कहव सुदरि रूपे। कतेक जतन विहि आन समारल देखत नयन मरूपे। पल्लव राज चरन जुग सोभित, गति गजराजक भाने । कनक कदलि पर सिंह सभारल, तापर मेरु समाने । इत्यादि (बे०पु०५० 12) राधा के सम्पूर्ण शरीर की रचना, कवि ने प्रकृति के उपादानो को ही एक पर एक जुटाकर प्रस्तुत किया है। सचमुच इन उपादानों को एकसाथ एकत्र कर राधा के रूप निर्माण मे विधि को क्तिना प्रयत्न करना पड़ा होगा। भावुक धगभाषी जनता के कठ स्वर मे शताब्दियो तक गाये जाने के कारण विद्यापति के गीतो मे बगीय प्रभाव आ गया है कि तु ध्यानपूर्वक देखा जाय तो मिथिला की मनोरम प्रकति बार-बार इनके झरोखो से झांक कर कहती है कि मैं मिथिला की हूं, न प्रज की, न बगाल की। इन प्रति चित्रणो में फलों फूलों और पक्षियो के नाम आये हैं, जो स्थानीय होते हुए भी परम्परित हैं और इनमे परम्परा का स्वर प्रबल है। वृक्ष-अशोक, सहकार और कदम्ब भारतीय शृगार काव्य के सुपरिचित उपादान हैं। सहकार और कदम्ब तो मिथिला प्रकति-सौ दय के प्रमुख उपादान है। आम के सघन बगीचों को यदि मिथिला की पहचान कही जाय तो अत्युमित न होगी। अशोक को भी विद्यापति ने विस्मृत नहीं दिया है- 172 विद्यापति एक अध्ययन 'कोकिल बोले साहर डार', या 'नवल रसाल मुकुल मघु मातला नव कोकिल कुल गाय', 'साहर सौर मेदिमा', साहर सौरभ गगन भरे- नमरि भमर दुहुवाद करें', 'कोमल माजरि कोकिल वास ,' तथा 'माहर मजर भमर गुजर, कोकिल पचम गाव', इस प्रकार के ये वक्ष और पक्षी विद्यापति के पदो मे आकर विरही जन के हृदय के भाव माज तक व्यक्त करते आ रहे हैं। उनका रस शिव-घट की भांति निरतर टपकता रहता है और घट कभी खाली नही होता। देखिये कामदेवता धन, धम और कुल मर्यादा कसे चुरा लेते है-धन कुल, घरम, मनोभव चोर, केमोन बुभाव मुगध पिया मोर।' कदम्ब तो राधा नायक कष्ण का प्रिय वक्ष है, उसी पर चढकर वे बांसुरी बजाते हैं, चीर हरण करते हैं, राधा की प्रतीक्षा करते (क) सांझक बेरा जमुनक तोरी, कदम्बेरि बन तरु तरी अकमि कानश कि कहब काली, सोझहि जूझल सखि कुसुम सरी ।। (ख) नन्दक न दन कदम्बक तरु तर घिरे घिरे मुरली बजाव।। (ग) एक सर ठाढ़ि कदम तरारे, पथ हेरत मुरारि । अशोक का भी प्रयोग कही-कही मिलता है-'कुद वल्ली तर घएल निसान, पाटल तण अशोक बलवान, अरुन असोग दीपाबहु आन।' फुल--विद्यापति ने नायिकाओ के सौ दय तथा उनकी अगछवि की उपमामओ को जुटाने के लिये परम्परामत रूढ़ियों के अनुसार ही मालती, केतकी, कमल, कुद, पैसू, पकुल, कुमुद आदि फूलो का प्रयोग किया है। मालती का प्रयोग नवीना तरुणी के लिये, केतकी का सुकुमारता के लिये किया गया है। कमल तो सभी मगो का उपमान है, भ्रमर तो कमल और मालती के बीच ही चमकर लगाता फिरता है और प्रेमाधिक्य में पारण पन्दी भी हो जाता है। बुन्द की उपमा नापिका से दी गई है। फेस के लाल फूलों से नखक्षा की और मुमुद तथा पन्द्र को जोटी तो प्रेमसम्म पका माया प्रतीर है। इमरे अतिरिक्त चपक माधवी, शिरीष, नाम केसरिय बेली और पारि का उल्लेख भी कतिपय पदों में हवा है। माधवीमापिका .

विद्यापति के काव्य मे प्रकृति चित्रण.173 - का उपमान है, शिरीष प्रणय सेज प्रसग मे कोमलता के लिये वणित है। पांडरि सम्भवत पाटलि का मैथिली रूप है। विद्यापति ने पीले पॉडरि का उल्लेख किया है। बस त वणन मे पाटल, तूण और लवगलता का भी उल्लेख है । एक दो पदों मे शिव प्रसग मे धतूरा का भी प्रयोग मिलता है। केतकी और धम्पक के फूलों से केश वि यास की चर्चा की गई है। फलो मे बदरि, नवरग, सिरिफल, नारिकेल, कोरिकी, बेली तथा - छोलगि से उरोजो के विकास का इतिहास लिखा गया है। अ य किसी फल पर शायद कवि की दष्टि नही पडी है-देखिये- महिल बदरि कुछ पुनि नवरग, दिन-दिन बाढल पीडए अनग। से पुनि भए गेल बीजक पोर, 'अब कुच बाढल सिरिफल जोर। पक्षी-पक्षियो मे कोयल, चक्रवाक, मोर, पपीहा और चातक का उपयोग प्रेम गीतो मे किया गया है। वायस का उल्लेख भी प्रिय के सदेश लाने के प्रसग में हुआ है और उसे सोने के कटोरे मे दूध भात देने और घोंच को सोने से मढाने का वायदा भी नायिका द्वारा किया गया है। पोयल के बिना स त का, मोर, पपीहा के बिना वर्षा का चित्र मदेव अधूरा रहता है। कौवा भी विचारी विरह विदग्धाओ को माशा प्रदान करता है । चक्रवाक का प्रयोग कुचो के लिये विशेषकर सद्य स्नाता प्रसग मे आया है। इसके अतिरिक्त गरुण, शुक, खजन, डाहुकि (पूर्वी बंगाल की चिडिया) का भी प्रयोग कवि ने किया है। इनर अतिरिवत अय जीवो-मीन, मृग, वेहरि, करि, वाजि आदि ने भी प्रयोगो की भरमार प्रभात-सध्या रामिषा वर्णन-सयोग वियोग उभय प्रसगों मे प्रभात, सध्या, पांदनी एव अधेरी रात का भी वणन मिलता है। अभिसार प्रसग में चाँदनी रात का वर्णन शुक्लाभिरमारिका के साथ, घनघोर अधेरी रात कारणाभिसारिका के माध तथा भिनुसार का प्रयोग विरहिनिया के लिय बहामार्मिक हुआ है । गौरव नापिवा के लिय नद्रज्योत्सना कमा पलानिंग' परिक्श आवरण या धाम करती है। भिनुसार हो जाने पर भी 174 विद्यापति एक अध्ययन कृष्ण नायिका को जाने नही देते या प्रतीक्षा करते रात बीत जाती है भिनुसार हो जाता है। इस प्रकार 'काजर रजलि रात' और 'निरमलि राति' नायिका के भावों की अकय महानी महते हैं । प्रभात और सध्या के वर्णन भी पदावली तथा मय रचनाओं में हैं जिनके उदाहरण पहले दिये जा चुके हैं। साराध है कि कोई भी कवि अपने प्राकतिक परिवेश से अप्रभावित नहीं रह सकता। विद्यापति जैसे संवेदनशील कवि के लिये तो यह असभव था। मिथिला जैसी प्राकृतिक वैभव के बीच रहने वाला कवि मिथिला के सौ दय से अनुप्राणित और अनुप्रेरित है। विद्यापति के काव्य में मानवीय मोर प्राकृतिक सौंदर्य एक दूसरे के पूरक बन गये हैं। विद्यापति का प्रकृति चित्रण उद्दीपन प्रधान है। राधा-कृष्ण के प्रेम जल मे भीग फर मिथिला की धरित्री प्रजमयो हो गई है और उसके प्राकृतिक परिवेश की सुषमा राधा कृष्ण के सौदय और प्रेम के साथ मिलकर स्वर्ण मे सुगन्धि बन गई है। विद्यापति की प्रतिभा ने इसमे चार चाद लगा दिया है। उनके ममस्पर्शी चित्रो ने पाठक के मानस-पटल पर प्रकृति की तूलिका से सयोग और वियोग के 'केशव कहिन जाय का कहिये' वाला चित्र खीच दिया है। परम्परा मे पूरी तरह आबद्ध विद्यापति का प्रकृति चित्रण उनकी काव्य- फला के सहयोग से मौलिक और नितांत अनूठी बन पड़ी है।

यूर्ववर्ती एव परवर्ती साहित्य के सदर्भ में विद्यापति का काव्य महाकवि रसपाहो मधुप की भाति अपने पूर्ववर्ती शान-कोश एव भाव्य वैभव में बोहह अरण्य से भाव-मधु का चयन करता है और परवर्ती युग के लिए काव्य की मथुधारा प्रवाहित करता है। किंतु इस प्रभाव ग्रहण म पविकी मौलिकता और निखरती है और काय वस्तु को नया जीवन, नये सदम और अभिनव रूप प्राप्त होता है। दाम और देय की यह मान- घीय धारा निरतर प्रवाहित होती रहती है। विद्यापति ने भी अपनी पूर्व साहित्यिक परम्परा से वस्तु और शैली को ग्रहण किया है लेकिन उनकी मौलिकता पही भी मतिन नहीं हुई है। विद्यापत्ति पर श्रेष्य-माहित्य, संस्कृत साहित्य, प्राकूल, अपभ्रश और स्थानीय साहित्य तथा अन्य सम्पर्क सूत्रों का प्रभाव देखा जा सकता है। विद्यापति के माध्य पर पूषयी साहित्य का प्रभाष- सामवेद से शास्त्रीय संगीत, राग रागिनियाँ, स्वरताल, गौत बेला प्रभाव और सहकारी वाया या स्वरूप, ०पू० प्रथम शताब्दि रचित भरत मुनि त नाट्य शास्त्र से गोत, नृत्य, नाटक, नाद,ति, स्वर, मूग्छना और ग्राम मादि का समावेश, बाहर मे आने वाली जातियोगपर्ष, किन्नर, विद्याधर आदि से गीति वाध्य मालोक-जीवन रूपतया पोपी-पाचवी शताब्दी मे स्वात साहित्य से जिसमे विशेष रूप से 'वही कुवपचासिका' में उल्लियित मालव, धनी, पनड, भैरव मादि राग रागिनियो के समावर या प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हिंदी साहित्य पर प्रभाव पड़ा है। मत 176 विद्यापति एक अध्ययन विद्यापति जो वस्तुत हिंदी के मादिकवि और सस्कृत के प्रकाण्ड पहित पे, इन प्रभावो से कैसे बचे होगे। इनके अतिरिक्त ब्रह्मवैवत पुराण तथा श्रीमद्भागवत का भी प्रभाव विद्यापति पर स्पष्ट परिलक्षित होता है। भागवत् मे वणित राधा-कृष्ण के तादात्म्य का चित्र विद्यापति के काव्य में उसी प्रकार मिलता है- अनखुन माधव माधव सुमरइत, सुदरि भेल मधाई, जो निम भाव सुभावहि विसरल, आपन गुन लुबधाई। ब्रह्मवैवत पुराण के राग का साम्य इस प्रकार है-दूराद्धावति पद्माय मधुलोमा मधु व्रत' का रूप विद्यापति मे- मालति मधु मधुकर करि पान, सपरूप जो हो गुणक निधान । अबुझ न बुझए भलहु बोल मद, भेक न पिअब कुसुम मकरद। गोपाल तापनी उपनिषद का एक प्रसग कीर्तिपताका मे आता है कि राम ने कृष्ण का रूप इसलिए धारण किया कि जिस प्रेम का उपभोग वे रामावतार मे नही कर सके उसका समुचित उपभोग कर सकें। संस्कृत साहित्य मे माघ, कालिदास, अमरूक, श्री हप, गोवधनाचाय, जगनाथ तथा जयदेव आदि से विद्यापति विशेष रूप से प्रभावित हैं। माघ पदलालित्य और अथ गौरव के लिए प्रसिद्ध हैं, सद्य स्नाता वा वर्णन किया है। विद्यापति की मद्य स्नाता भी हिंदी मे वेजोड है। दोनो की एष झांवी देखवर पाठक स्वय ही दोनो के सौंदय का सापेक्षित । महत्व का अनुमान लगा सकता है। देखिये- माघ--वासासियवसत यानि योपिनस्त शुभ्राभ्र द्युति भिरहानि नभुदेव । अत्याक्षु स्नपन गलज्जानि यानि । स्थूलाच स तिभिर रोदि ते गुचेव । अर्थात स्त्रियो ने नवीन वस्त्र धारण किये। वे वस्त्र प्रसन्न हो हंसने लगेतु जिन गोले वस्त्रा का परित्याग किया वे शोक से व्याकुल होकर अश्रु वहाो लगे । इसी प्रसग मे विद्यापति की रचना देखिये- ने जो उपमा, ।

पूर्ववर्ती एव परवर्ती साहित्य के सदभ मे विद्यापति का काव्य 177, विद्यापति-यो नुकि फरत पाहि किम देहा, अवहि छोडब मोहि ते जब नेहा । ऐसनि रसनहि पाओब मारा, इये लागि रोई गरए जल धारा। महाकवि माघ तो केवल वस्त्रो का हास और अथु सकारण दिखा कर रह गए किंतु विद्यापति के गीले वस्त्रो में अधिक सरसता और सजीवता है वे अगो मे चिपक्कर छिपने का प्रयास करते हैं और वियोग की माशका से रोते हुए प्रतीत होते हैं। निस्स देह विद्यापति का यह पद अधिक प्रभावपूर्ण और ममस्पर्शी है। कालिदाम के शृगार तिलक मे एक तोक इस प्रकार आता है-~-- यामि येषा बहुल जल देवद्ध भी मा प्रकारा! निद्रायातो ममपति रसौ क्लेशित कम दुख । बाला चाहे मनसिज मयात् प्राप्त गाढ प्रकपा । ग्रामश्चोरे रथ पहत पानिंद्रा जहीहि ॥ अपने घर मे सोये हुए पथिक से नायिका कहती है-हे पथिक निद्रा प्यागो। यह मयकर अधकारपूण रात है । भाग्य दोष से दुखी होकर मेरे पति सो गए हैं । मैं बाला हूँ कामदव के भय से थर थर काँप रही हूँ, इस गांव में चोरों का डर भी है। यही वणन विद्यापति में इस प्रकार है- हम जुवती पति गेलाह विदस, लगनहि बसए पटोसिया कलेस । सासु दोसर किछुओं नहिं जानि, आखि रतीधी सुनये न कान। जागह पथिक जाउ जा भोर, राति म हार गाम बड चोर। भरमहु मोरन देश कोतवार, काहूक वैओ नहि करम विचार । अधिपन कर अपराघह साति, पुरुष महत सव हमरे जाति। विद्यापनि ने पति को विदेश भेज, सासु को अधी बता, कोतवाल ।

178 विद्यापति एक अध्ययन पहरा नहीं देता, राजा दण्ड नहीं देता और गांव के चौधरी उसी को जानि के हैं, बताकर एक अनुकूल वातावरण की सष्टि कर दी है। ऐसा अनुकूल वातावरण और अधिकारियो की लापरवाही का चित्र कालिदास के पद म नही उमर पाया है। कालिदास के ही रघुवश मे इदुमति के स्वग गमन प्रसग मे कवि कहता है-'वह कोयल को मदु स्वर, राजहसिनी को चाल और मगियों को चितवन सौंपकर चली गई।' मेघदूत मे यही प्रसग इस रूप मे है- श्यामा स्वग चक्ति हिरणी प्रेक्षणे दृष्टिपात । वकत्रच्छाया शशिन शिखिनाम् वर्यारेण केशव । इमी माव को विद्यापति इस रूप में व्यक्त करते हैं- सरदक ससघर मुख रुचि सोपलहि, हरिन के लोचन लीला। केस पास चामरू के सोपलाह पाए मनोमव पीडा। दमन बीज दाडिम के सोपहि, पिक के सोपा ह बानी। देह दसा दामिन के सोपलाह, इसम एलहु जानी। श्रीहप के नपधचरित मे दमयती के नेत्रो के लिए जो पचवानो की उक्ति है वही उक्ति विद्यापति ने अपनी नायिका के लिए भी को तीनि बानि तिन भवन मदन जिति, अवधि रहल दुई बाने। विधि वडदारून बघए रमिक जन, सापलह तोहर नयाने । समस्क कवि की प्रसिद्ध शृगार रचना 'अमरूम तक' के दो प्रसग विद्यापति पर प्रभाव की दृष्टि स दप्टव्य हैं- मगे रचितऽपि दष्टि रधिकम् सोयटम मुद्धीक्षते, रुद्धायामपि वापि सस्मितमिद दाघानन जायते । पारश्च गमिते.पि चेतसि तन रामाच मालम्बते। दष्टविहणम विष्पति पय मानस्प तस्मिजन। नायिया परती है वि ती हुई भौहें भी उसप मामन मान पर उत्स्टा सदेपालगनी हैं, मुख पर मुस्काा छा जाती है, मन या कापरत पर भी रामाच हा याता है अत ऐम नायर रमाय मान पसे निभ समता है । मी तथ्यमायणन विद्यापति र शब्दों में दमिय-

पूर्ववर्ती एव परवर्ती साहित्य के सदमं मे विद्यापति का काव्य 179
दुरहि रहिय करिय मन आन,
नमन पियासल हंटल न मान ।
हास सुधारस तरु मुख हेरि,
बांध लेआ बांध निबि कत बेरि।
कि सखि करब घरब की गोय,
करब मान जो आइत होय।
घसमस करय रहओ हिय जाति,
सगर सरीर घरब कत भाति।
गोपहिन पारिअ हृदय उलास,
सुनलओ वदन बेकत होम आस ।
नायिका क्तिनी विवश है। ट्टकने पर भी प्यासे नेत्र उधर ही चले
जाते हैं, देखकर नीबो वधन शिथिल हो जाता है, मन का भाव छिपाये
नहीं छिपता। छाती पर पत्थर रखने पर भी हृदय कांपने लगता है, ओख
मूदने पर भी हंसी आ जाती है। ऐसी प्रेमो मत्त स्थिति मे भला मान कैसे
सम्भव है । दोनो नायिकाओ की अनुभूति, भाव प्रवणता और प्रेमो माद
मे कितना अतर है।
अभिसार के लिए जाती हुई एक नायिका का चित्र 'अमरू शतक' मे
इस प्रकार है-क्व प्रस्थितासि कर भोरू घने निशीथे।
प्राणाधिको वसति यत्र जन प्रियो मे ।
एकाविनी बन क्थ न विभेपि बाले,
न वस्ति पुखित सरो मदन सहाय ।
प्रश्नोत्तर शैली मे यह प्रसग बडा रोचक है। सखी पूछती हैं-हे
करूभोर, रात के निविड अधकार मे तू कहाँ जा रही है ? उत्तर है जहाँ
प्राणो से भी प्यारा मेरा प्रियतम है। सखी पुन प्रश्न करती है-तुम
अकेली होकर भी डरती नही हो? उत्तर मितता है-धनुष पर बाण
चढाये वामदेव मेरे महायक हैं। इसी प्रसग की प्रस्तुति विद्यापति की
पदावली मे देखिये-
निसि निसि अरे भय भीम भुअगम जलघर विजुरि उजोर।
तरुन तिमिर निसि तइयो चलसि जासि बड सखि साहस तोर।

180 विद्यापति एक अध्ययन
सुदरि कौन पुरुष घन जे तोर हरल मन जसु लोभे चलि अभिसार।
आतर दुतर नदी से कइसे जयवइ तरि भारतिन करिए झाप।
तोरा अछि पचसर, ते तोरा नाही डर, मोर हृदय वड काप।
सखी कहती है रात मे निशाचर और सप घूमते हैं, निविड अधकार
है, बिजली चमक रही है, ऐसी भयानक रात मे अभिसार के लिए जा रही
हो, तुम्हारा साहस सराहनीय है। कौन वह थेष्ठ पुरुप है जिसने तुम्हारा
मन हर लिया है। बीच म दुस्तर नदियां हैं, कैसे पार करोगी ? प्रेम मत
छिपाओ कामदेव तुम्हारा सहायक है, इसलिए तुम्हें कोई भय नही । मेरा
हृदय तो कांप रहा है। इन दोनो पदो मे ममरू की शैली सुदर है किंतु
विद्यापति की तरह भयानक वातावरण का सृजन वे नहीं कर पाये हैं और
विद्यापति तो स्वय इस अनुभव मे साझीदार लगते हैं और नायिका को
अभिसार के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
प्रिय की प्रतीक्षा करती हुई 'गाथा सप्तशती' की नायिका कहती है--
अज्ज गओति अज्जगमोति गणरीए
पढमन्वि अपियह हे कुडठो रेहाहि चित्रिलि ओ।
(गा० स० श 3/8)
ऐसी ही प्रतीक्षा की घडिया गिनते गिनते देखिये विद्यापति की
नायिका के नाखून घिस गए हैं, दीवाल भर गई है-
कतदिन माधव रहब मथुरा पुर, कवे घुचव विहि वाम ।
दिवस लिखि लिखि नखर खोवावल, विधुरल गोकुल ग्राम । या
कालिक अवधि करिअ दिमागेल, लिखइते कालि भीत भरि गेल ।
शृगार के सवश्रेष्ठ कवि गावधनाचाय की रचना 'आया सप्तशती'
मे नायिका नायक से कहती है, मैंने मान नही त्यागा है, मुझे सखियां
अकेली छोडकर चली गई हैं, यदि तुम मेरे साथ बलात्कार करोगे तो मैं
-
मर जाऊँगी-
अनुग्रहीता नुनया मामुपेक्ष्य सख्यो गता बन का हम ।
प्रसम करोसि मयित्व दुपरि वपुरद्य मोक्ष्यामि ।
इसी प्रसग को विद्यापति ने इस प्रकार वर्णित किया है-

पूर्ववर्ती एव परवर्ती साहित्य के सदभ मे विद्यापति का काम्य 181 ए हरि बले जदि परसब मोय, तिरि बघ पातक लागल तोय । तुहु रस आगर नागर ढीठ, हमन बुझिय रस तीत की मीठ। नायिका कहती है- हे हरि यदि तुम बलपूर्वक मेरा स्पश करोगे तो तुम्हें त्रिया बध का पाप लगेगा। तुम रस के आगर नागर हो और ढीठ हो। में भोली नायिका रस का स्वाद नही जानती-वह मीठा होता है अथवा कडवा । इस नायिका मे रस का स्वाद जानने की अभिलाषा स्वाभाविक है और उसे पाने का सबेत भी। इन दोनो अभिव्यक्तियो की तुलना करते हुए प० शिवन दन ठाकुर ने कहा है-'आर्या सप्नाती' की नायिका आत्महत्या की धमकी देकर बलात्कार करने से रोकती है किंतु विद्यापति की नायिका अनुमति के बिना अग स्पर्श से भी रोकती है। प्रथम प्रसग मे भय का वातावरण और अस्वाभाविक्ता का दोप है जबकि दूसरे प्रसग म मरसता है और नायक को आमत्रण भी इसलिए मेरी समझ मे यहाँ विद्यापति गोवधनाचाय से कई कदम आगे बढ गये हैं।' (महाकवि विद्यापति, प० 125) सस्कृत साहित्य में जयदेव का प्रभाव विद्यापति पर सर्वाधिक है। इसम तीन जयदेव का उल्लेख मिलता है-~गीत गोबिंदकार, प्रसन्न राधव नाटककार तथा च द्रलोक्वार। विद्यापति को प्रभावित करने वाले गीत गोबिंदकार जयदेव हैं। ये राजा लक्ष्मण सेन के दरबार मे विद्यमान थे । इनको एक मात्र उपलब्ध रचना 'गीत गोविन्द' है। सस्कृत साहित्य मे इसकी कोमल कात पदावली अप्रतिम है। इस वाव्य के सम्बध स्वय जयदेव की गर्वोक्ति है- माध्वीक चिता न भवति भवत शर्करे ककशासि, द्वाक्षे द्रक्षयति के त्वाम मृत मतपसि क्षीर-नीर रसस्ते । माद कद काना घर घरणि तल गच्छ यच्छति भाव । यावत शृगार सार शुभमिव जयदेवस्य वैदग्ध्य वाच । इसी प्रकार की विनयोक्ति अपने काव्य के सम्बध मे विद्यापति ने की है- - 182 विद्यापति एक अध्ययन बाल चद विज्जावई भाषा, दुहु नहि लग्गई दुज्जन हासा। ओ परमेसर सिर सोहइ, ई णिच्चइ नासर मन मोहा। इस गीत गोबिद का विद्यापति के काव्य पर इतना गहरा और व्यापक प्रमाव है और दोना के काव्य गुणो म इतनी निकटता और साम्य है कि विद्यापति को अभिनव जयदेव के नाम से विभूपित किया गया। गीत गोविंद और विद्यापति की तुल्य पक्तियो मे मन को मुग्ध कर लेने की अद्भुत क्षमता है- जयदेव गीत गोवि द- (क) नाम समेतम कृत सबैतम् वरदयते मदु वेणुम। (ख) ललित लवग लता परिशीलन, कोमल मलय समीरे मधुकर निकर करबित कोकिल, कूजित कुज-कुटीरे। (ग) च दन चर्चित नील कलेवर पीत वसन बनमाली। विद्यापति पदायली- (क) नदक नदन कदम्बक तरू तर धिरे धिरे मुरली बजाव । समय सकेत निदेसनि बइसलि, बेरि बोल पठाव । (ख) कुज भवन ते निकसलरे रोकल बनवारी। एकहि नगर वसि का हारे, जन कर बटमारी। (ग) नव वृदावन, नव नव तरु गन, नव नव विकसित फूल कही कही तो विद्यापति जयदेव से भी आगे बढ़ गये हैं। जयदेव का विरही नायक कामदेव के प्रति उलाहना देता है- हृदिविसल ताहारो नाम मुजगम नायक । कुवलय दल श्रेणी कठेन सा गरल धुति । मलयज रजो भेद भस्मप्रिया रहिते मथि । प्रहरन हरभ्रा तयाऽनग क्रुधा किमि घावसि । यही भाव विद्यापति म देखिये- क्तन वेदन मोहि देस मदना, हर नहिं बला मोहि जुवति जना। -

पूर्ववर्ती एव परवर्ती साहित्य के सन्दम मे विद्यापति का काव्य 183
विभुत मुपन नहि चननक रेदू,
वध छल नहिं नेतक वसन्।
नहिं मोरा जटा भार चिपुरक बेनी,
सुरसरि नहिं मोरा कुसुमक नी।
नहिं मोरा काल कूट मृग मद चारू,
फनपति नहिं मोरा मुक्ता हारू।
प्रस्तुत प्रसग मे विद्यापति का शब्द प्रयोग अधिक सटीक, सार्थक
और चमत्कारिक है। जयदेव ने 'अनग' शब्द और विद्यापति ने 'मदन' का
प्रयोग किया है । मदन सुख देने वाला होता अत विद्यापति मे विरोध का
चमत्कार आ गया है । जयदेव की नायिका कहती है हे मनग तुम हर के
भ्रम मे मुझ पर क्रोध पर क्यों प्रहार करते हो जबकि विद्यापति की
नायिका कहती है मैं हर नही बाला हूँ, मुझे इतनी पीडा क्यो देते हो।
पहले मे काम का अविवेक इगित होता है और दूसरे मे कयि की अभि-
घ्यक्ति रसिक्ता प्रधान है।
कहीं-कही तो विद्यापति ने जयदेव की उक्तियो को ज्यो का त्यो रख
दिया है-
-रजनि जनित गुर जागर-राग कसायित भलसनि वेशनम् ।
-जयदेव
-लोचा अरुन वुझल बडे भेद, रमनि उजागर गरम निवेद।
--विद्यापति
-हरि हरियाह माधव याहि माधव मा वद कैतव वादम्
ता मनुसर सरसोरुह लोचन यातव हरित विषादम् । - जयदेव
-~~ततह जाइहरि करह न लाघ, रअनि गममोहल जनि के साथ।
-विद्यापति
स्पष्ट है कि विद्यापति ने पूर्ववर्ती सस्कृत-कवियो के वाव्य का प्रचुर ।
मात्रा में प्रयोग किया है और योग्य पुष की भांति पूर्वजो को सम्पत्ति और
फीति की अभिवृद्धि है । 'गीत गोविंद का तो कवि घिर ऋणो है । कवि की
सहृदयता मधु मक्षिका के सदृश पूर्व युग-~-वाटिका के भाव-पुष्पो से रस
सचित कर अपनी अभिनव कला एवं मौलिकता से उसे अभिनव कलेवर

184 विद्यापति एक अध्ययन । और नूतन सौष्ठव प्रदान किया है । ग्रहीत पूर्ववर्ती प्रसगो पर विद्यापति की अपनी छाप है, पदावली की मुहर है। विद्यापति की लेखनी के स्परा से काव्य की आत्मा और शरीर की शोमा अधिक निखर उठी है। सस्कृत साहित्य के अतिरिक्त विद्यापति के काव्य पर मथिली तथा अपभ्र श साहित्य का भी प्रभाव कम नहीं। मथिली साहित्य में ज्योति- रीश्वर ठाकुर के 'वणरत्नाकर', 'पूत समागम', श्रीधर मिश्र सकलित 'सुदुक्ति कर्णामृत' का व्यापक प्रभाव है। सौंत्य चित्रण मे अबुरित यौवना, विरह तथा नख शिख वर्णन मे इनका प्रभाव देखा जा सकता है- -चल सरोज सुदर नयने, मानुनु कम्पय शशि वदने। ज्योतिरीश्वर -सुदरि चलि लहु पहुं घरना, जइतहि लाग परम डरना । -विद्यापति वण रत्नाकर वे सखी वणना प्रसग मे-'एके अपूर्व विश्वकर्माक्षे निमअलियाकि मुख शोमा देखि पदमे जल प्रवेश कएल, अपिक शोमा देखि हरिन वसा गएल जघ जुगल शोमा देखि कली विपरीत गति कएल, बाहु युगलक शोमा दख पदमनाल पकनिमग्न भएल ।' यही विद्या पति पदावली मे- क्बरी भए चामर गिरि कदर, मुख मय चांद अकासे । हरिन नयन भय, स्वर भये वोक्लि, गति भये गज बनवास। मुजभये कनक मणाल पक रह कर मये क्सिलय कापे । विद्यापति कह कत क्त अइसन, कहब मदन परतापे । 'सदुक्ति कर्णामत' मे सग्रहीत पदो मे भी अलमुत साम्य देखने को मिलता है- -यूना पुर सपदिकिच दुपेत लज्जा। -~-हनुमत ~-सुनइत रसक्था थापए चीत, जसे कुरगिन सुनए सगीत । -विद्यापति अकुरित यौवना-पदाभ्याम् युक्तास्तर लगतय सथिता लोचना म्याम् । श्रेणी विम्बत्यजति तनुता रोवते मध्य भागा। ~ कविराजशेखर - पूर्ववर्ती एव परवर्ती साहित्य के स दम मे विद्यापति का काव्य 185 -संसव यौवन दरसन भेल, दुहुपथ हेरइत मनसिज गेल। मदन किताब पहिल परचार, भिन जन देयल भिन अधिकार। --विद्यापति विरह-हारो ना रोपिता कठे, भया विश्लेभीरुणा, उदानी मायवो मध्ये, सरित सागर भूधरा। -दामोदर मिश्र -चिर च दन उर हारन देल, से अव नद गिरि आतर भेल । -विद्यापति विद्यापति के साहित्य पर अपभ्र श साहित्य का भी पर्याप्त प्रभाव है। राहुल जी लिखते है- देशी भाषाओ का काय अत्यत सम्प न तथा वैभवपूण है । सरक्षा, वीणापा, कहपा, लुइपा जादि सिद्धानो का प्रभाव इन पर स्पष्ट है। नाल दा इनका मुख्य केद्र था। इसवे प्रभाव में तुकात पदो की रचना कामरूप, बग, मगध एव हिमालय को तराई मे अधिक मात्रा में हुई। (हिंदी काव्य धारा-राहुल साकृत्यायन) इस साहित्य मे भैरवी, पट- मजरी, कामोर, गावडा, देवकी, गुर्जरी, मलारी, बराडा, धनछी आदि रागी का प्रयोग हुआ है जिनमे से कुछ का प्रयोग पदावली में भी मिलता - डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी विद्यापति के गीतो पर कनाट गीतो और नतको का प्रभाव मानते हैं। ये प्रभाव ना यदेव के साथ मिथिला मे आये। उनका मत है कि विद्यापति पर भागवत का प्रभाव उतना नहीं है जितना दक्षिण के कर्नाट गीत परम्परा का। प्रमाण स्वरूप कहते है कि विद्यापति का रास वणन मागवत परम्परा में नहीं है क्योकि उसमे शरदकालीन रास का वणन न होकर बसतकालीन रास का वणन है। ~मध्य कालीन धर्म साधना निष्कर्षत कहा जा सकता है कि विद्यापति ने अपने पूर्ववर्ती साहित्य- सस्कृत, मैथिली, पुरानो हि दो आदि सबसे चतुर गुण ग्राहक की भांति भावधारा का सचय अपने काव्य मे किया है कि तु उसे अपनी विलक्षण 186 विद्यापति एक अध्ययन प्रतिभा एव अप्रतिम मौलिकता के कूलो मे बांध कर उसे प्रवाह और प्रवाह की अभिनव शक्ति प्रदान की है । इस प्रवाह मे गति है, सरसता है, भावोमियो का सहज नर्तन है और जीवन को स्फूर्त करने की अदभुत क्षमता है। विद्यापति के काव्य का परवत्तों साहित्य पर प्रभाव-अपने पूर्ववर्ती साहित्य से विद्यापति ने जो काव्य सम्पदा वस्तु, भाव, भाषा और शैली के रूप मे ग्रहण किया उसका तात्कालीन लोक हृदय के साथ रागात्मक सम्बध स्थापित कर एक अभिनव अपरिमित काव्य कोप की स्थापना की और उस अक्षम कोप को अत्यत उदारता के साथ बगाल, बिहार, असम, ओडीसा, नेपाल तथा मध्य देश को वितरित कर दिया । डॉ. जयकात मिश्र का मत है कि विद्यापति मा प्रभाव पूर्वी भारत पर तो पडा है, किंतु मध्य भारत पर नही। पर यह उनका भ्रम है क्योकि मध्य दश मे बगाली वैष्णवो और गोस्वामियो के विद्यापति को बहुमूल्य थाती मध्यदेश मे आई । जोनपुर सम्बधी घटनायें तथा जौनपुर के वणन भी इसके प्रमाण हैं। विद्यापति का प्रभाव देशयापी था हाँ इतना अवश्य है कि इतिहास को अभी विद्यापति के साथ न्याय करना बाकी है। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ० फर्कहर का कथन है कि-"राधा की उपासना भागवत के आधार पर वृदावन मे 1100 ई० वे आसपास प्रारम्भ हो गई होगी और वहां से बगाल तथा अय स्थानो पर पहुंची। विद्यापति से राधा कृष्ण साहित्य की परम्परा ग्रहीत हुई और उसका पूर्ण विकास हुआ। इसी परम्परा के आधार पर हिन्दी के मध्यकाल भक्तिकाल मे स्वण युग साहित्य का सजन हुआ। रीतिकाल में पहुंच कर उसम लौकिक शृगार प्रधान हो गया और उसका स्वरूप तनिक विकृत हो गया। समस्त शृगार साहित्य के मेरु दण्ड वात्स्यायन कृत 'वाम सूत्र' की मर्यादा पाल प्रवाह के साथ ममाप्त हो गई और इसने इद्रिय-सुख, आसक्ति और अमर्यादित शृगार का स्वरूप ग्रहण कर लिया। मध्य काल के भक्त कवियो ने विद्यापति से भाव और शैली तत्वको ग्रहण किया। क्वीर की वाणी में गोविद, माधव, गिरिधर, बनवारी, मुरारि, मधुसूदन आदि नामों का उल्लेख इसी प्रभाव से अन्तर्गत है।

विर्ती एव परवर्ती साहित्य के सदभ मे विद्यापति का काव्य 187 काव्य मे माधुर्य भावना, विरह की तीव्र अनुभूति, मिलन की उत्कठा पति की अभिसारिकाओ के ही समान है। जायसी तथा अय सूफी यो मे यह मधुर भाव अत्यत माध्यात्मिक हो उठा है कि तु उनपर कता की छाप है और लोक-जीवन ही उनकी अभिव्यक्ति का साधन रामकाव्य पर इस परम्परा का गीति शली के अतिरिक्त कोई स्पष्ट व दृष्टिगोचर नहीं होता कि तु तुलसी ने इस परम्परा के प्रभाव को । पुराण निगमागम' के साथ यह कह कर स्वीकार किया है-'जो त कवि परम सयाने, भाषा जिह हरि चरित बखाने ।' तुलसी की कुछ तया मे भी साम्य देखा जा सकता है- (क) डम डम डफ डिमिक डिमि मादल, रुनुझनु मजिर बोल। किविन रनरनि बलआ कनक्नि, निबुधन रास तुमुल उतरोल। -विद्यापति (ख) कान किकिन नूपुर धुनि सुनि, कहत लखन सन राम हृदय गुनि। मानहु मदन दुदुभी दीनी, मनसा विश्व विजय कह की ही। -तुलसी इन अवतरणो में ध्वनि माम्य तो है ही भाव साम्य की भी झलव न जाती है। इसके अतिरिक्त विद्यापति वे भक्ति पदो-'माधव हम नाम निरासा', 'तातल संक्त वारिविदु सम' आदि पढ़ पर विनय- प्रया की याद आने लगती है। कृष्ण माहित्य और उनके कवियो पर भी विद्यापति का व्यापक प्रभाव प्टगोचर होता है। राधा-बष्ण चरित की गान पद्धति में जयदेव और द्यापति ने जो धारा बहाई उसी का अवलम्यन हिंदी वे कृष्ण धारा वयों ने किया। सूरदासकृत सूरमागर म कृष्ण जन्म मे मथुरा गमन की मा ही विस्तार सहित वणित है। यह वर्णन लोक जीवन म प्रचलित सिक गीति-मरम्परा काही विकसित रूप है। इन घरेलू गीतो मशृगार रमरुण रम का सुदर चित्रण मिलता है क्ति परकीया प्रेम रे गीतों म पा कृष्ण तथा भय गोपियों से नामी और मम्ब पो था आधार है। सूर र विद्यापति गीतों म साम्य के कुछ उदारण-- (क) अनसुन मायय, माधव समरइत सुदरि भेन मधाई। भो निज भाव-सुमावहि विसरल, आपन गुन सुबधाई। -विद्यापति (त) जब राधे तय हो मुए माधो, माघो रटत रहे। अम मापो होइ जात, सरत तनु रापा विरह दहे । -- --सूरदास 188 विद्यापति एक अध्ययन ~सूर आदि राधा-कृष्ण के रूप चित्रण में भी नख शिख का स्वरूप एक ही प्रकार का है- (क) माधव कि कहब सुदरि रूपे। क्तेक जतन विहि आने समारल, देखल नयन सरूपे । पल्लव राज चरन-जुग सोभित, गति गजराजक माने । कनक कदलि पर सिंह समारल, तापर मेरु समाने । --विद्यापति आदि (ख) अदभुत एक अनुपम बाग। युगल कमल पर गजवर क्रीडति, तापर सिंह करत अनुराग। हरि पर सरवर सर पर गिरवर, गिरि पर फूले कैज पराग । इन दोनो चित्रो की तुलना से प्रतीत होता है कि दोनो में पर्याप्त साम्य है--विद्यापति का पद क्ला और भाव दोनो दृष्टियो से श्रेष्ठ है जब कि सूर की भाषा अधिक परिमाणित और मधुर है। इसी प्रसग में एक और साम्य देखा जा सकता है- (क) नामि विवर संय लोम लतावलि, भुजग निसास पियासा। नासा खगपति चचु भरम भय कुचगिरि सघि निवासा । --विद्यापति (ख) नाभि परस लौ रस रोमावलि, कुच जुग बीच चली। मनहु विवर ते उरगरिंग्यो तकि, गिरि की सघि थली। -सूरदास (ग) अवनत आनन कय हम रहिलहु, बारल लोचन चोर। -विद्यापति (५) हरि मुख निरखत नैन मुलाने । वे मधुकर रुचि पकज लोभी, ताहीते न उडाने। -सूरदास उभय कवियों की अभिव्यजनायें अनूठी हैं। साम्य होते हुए भी उनकी अपनी मौलिकता है। सौ दय चित्रण अनुपम है । विरह वेदना व्यक्त करती हुई सूर की राधा भाशा मे जीवन को अरुझा कर रखती है कि विद्यापति की राधा "जियवो न जाए' पहार अत्यत मार्मिक हो उठती है। शिव शिव के प्रयोग से भाव मे और मामिक्ता आ जाती है क्योकि कामदेव से रक्षा करने के लिये गिव से अधिक उपयुक्त और कौन हो सकता है। विद्यापति और सूर को राधा दोनो नवल हैं, कृष्ण भी नषस है, ये वृदावन मे विहार करते हैं- -विद्यापति, पूर्ववर्ती एव परवर्ती साहित्य के स दम मे विद्यापीत काव्य' 189 (क) विहरई नवलकिशोर--- कालिन्दी पुलिन कुजवन, शोमन् नव नव प्रेम विभोर । " (ख) नवल गोपाल नवेली राधा, नये प्रेम रस पागे । नव तरुवर विहार दोउ क्रोहत, आपु-आपु अनुरागे । -सूरदास- विद्यापति नयन चकोर को काजर के पास से बांधकर रखते हैं तो सूरदास उसे अजन के गुन से । इतना ही नहीं देखिये विद्यापति और सूर दोनो की राधा के सौदय से लज्जित होकर रूढिगत काव्य उपमान क्सि प्रकार छिप जाते हैं- (क) कबरी भय चामर गिरि क दर, मुख भय चांद अकासे। हरिन नयन भय सर भय कोक्लि, गति भय गज बनवासे । -विद्यापति (ख) मुजा देखि अहिराज लजा यो, विवरु पठे धाय । फटि निरखत केहरि डर मायो, बन बन रहे दुराय । -सूरदास इस प्रकार के साम्यधर्मी अनेक पद दोनो की कृतियो मे ढूढे जा सकते हैं । इस शोध मे स्वत्तत्र शोध की अपेक्षा है। केवल सूरदास ही नही भक्ति आदोलन से प्रभावित रागानुगाभक्ति के सभी भक्त कवि विद्यापति से प्रभावित हैं । कृष्ण विरह की अन य गायिका मीरा भी इस प्रभाव से बची नहीं हैं। डॉ. जयका त का कहना है कि- 'मीरा के विरह मे जहाँ जहाँ जो उत्तेजना भरी स्वर झकार है। वह विद्यापति का सगीत है। मिलनो स्कठा मे जो तष्णा की छटपटाहट और भावुक्ता है, हम समझते हैं कि उस प्रेरणा की स्रोत भी विद्यापति की राधा है।' अत कबीर से लेकर मीरा तक काव्य परपरा और विशेष कर कृष्ण काव्य परपरा पर गीति- सम्राट विद्यापति के प्रभाव को अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। काव्य के क्षेत्र मे विद्यापति और रीतिकालीन कवि एक ही धरातल पर खडे प्रतीत होते हैं। राधा गोबिद का स्मरण तो बहाना मात्र रह गया था, उनका मुख्य लक्ष्य तो नायक नायिका का स्वरूप, नखशिख, हाव भाव एव श्र गारिक चेष्टामो का रसमय और चमत्कारिक वर्णन हो गया था। रीतिकालीन कवियों पर विद्यापति का प्रभाव केशव से ही माना जाना चाहिए । सद्य स्नाता का चित्र-कामिनि क्रए सनाने' की झलक देशव के इन पक्तियो मे देखा जा सकता है.- सज्जल अम्बर छोडत बने, 190 विद्यापति एक अध्ययन - छूटत हैं जल के कन घने। विद्यापति की कनकलता केशव मे सोने की लता है। विद्यापति की विरहिणो बिनु स्नेह जरइ जनुदीपे' है तो काव की-दीपशिखा सो देह है। विद्यापति मे 'पपिहा पिउ पिउ' रट कर विरहिणी को दुख पहुंचाता है तो केशव में चातक ज्यों पिउ पिउ' से विरहिणी का दुख बढ़ता है। महाकवि देव ने तो 'सक्ल सार शृगार' की घापणा कर विद्यापति के काव्योद्वेश्य को ही अपना लिया है। विद्यापति की दूती की भांति ही देव की दूती - कृष्ण से पूछ रही है- (क) जनिक एहन छनि काम-क्ला सनि सेक्यि रू विभिचार। -विद्यापति (ख) रसिक क हाई बलि पूछन हों आई, तुम्हें ऐसी प्यारी पाय, कैसे "यारी राखी जात है। बिहारी के तो अनेक दोहो पर विद्यापति की छाप है । यथा- (क) श्रवनक पथ दुहुलोचन लेल । -विद्यापति (ख) काननचारी नैन। विहारी तथा वय सघि का चित्र (ग) छुटी न सिसुता की झलक, झलक्यो जोबन अग। दीपति देह दुहुन मिलि, दिपति ताफ्ता रग। -विहारी विद्यापति के मेर उपजल कनकलता को रीतिकालीन कवि शेख और आलम ने कैसा उतार लिया है-'कनक छरी सी कामिनी' में। इस प्रकार हम केशव से लेकर ग्वाल कवि तक विद्यापति के प्रभाव को देख सकते हैं। आइने अकबरी में भी विद्यापति के नाचारियो का उल्लख है। इस प्रभाव को हम कालक्रम और परिवर्तित परिवेश के सदन में भी देखना होगा। विद्यापति, केशव और ग्बाल तीनो ही थगारी कवि थे। विद्यापति के शृगार मे हि दू दरवार का प्रभाव है, केशव मे मुस्लिम दरबार का वैभव शाली 'श्रू गार और ग्वाल के शृगार में अठारहवी शताब्दी का यथाथ चित्रण विद्यापति मे शृगारिक नग्नता परम्परा पालन के रूप म है, केशव मे वह विलास वैभव मे डूबा हुआ है जबकि ग्वाल के काल में यह नग्न श्र गार जीवन में प्रवेश कर गया है। कहना नही होगा कि विद्यापति के भक्ति भाव को परिस्थितियो के अनुकूल भक्त कवियो के भावास्फरण में स्थान मिला और शृगारी पक्ष को रीतिकालीन कवियों ने गले से लगाया। आधुनिक काल के कवियो के भी गीत विद्यापति से समानता रयते हैं। भारते दु युग मे आकर विद्यापति को गीति शैली पुन प्राणवती हो गई । मैथिलीशरण गुप्त के साकेत का एक पद विद्यापति से विस्कुल साम्य पूर्ववर्ती एव परवर्ती साहित्य के सदम मे विद्यापति का काव्य 191 रखता है । विद्यापति का पद है-'कतन वेदन मोहि देसि मदना, हो हर नहि युवति जना'। गुप्तजी का पद है- 'मुझे फूल मत मारो, मैं अबला बाला वियोगिनी कुछ तो दया विचारो।' प्रसाद की कामायनी मे 'श्रद्धा के अधखुले सौदय को विद्यापति के 'ससनि परस खस अम्बर रे, देखल पनि देह' मे देखा जा सकता है। विद्यापति के 'चांद सार ले मुख छटना करि' मे 'चचला स्नान कर आवे चांदनी पद मे जैसी' की झलक मिलती है। महादेवी के विरह मे विद्यापति की भावना का बीज है। दिनकर तो विद्यापति के क्षेत्र के ही थे, उहोने अपने अतीत से प्रश्न भी किया है--विद्यापति की लोक- 'परम्परा से प्रभावित हैं, यह बात बच्चन जी ने स्वय लेखक को लिखे गये एक पत्र में बताया है। आधुनिक सिनेमा के साहित्यिक तथा लोकधुन गीतो मे भी विद्यापति का प्रभाव है । सिने जगत के कलाकार श्री तिवारी तथा सिनहा आदि इसके साक्षी हैं। आ सम्पूर्ण हिदी साहित्य पर विद्यापति के पभाव को नकारा नहीं जा सकता। वितु यह प्रभाव उनकी मौलिकता मे बाधक नही साधक है और प्रेरक तथा मागदशक भी। विद्यापति के काव्य का प्रभाव हिदी क्षेत्रो के अतिरिक्त मिथिला बगाल, असम और उडीमा आदि के भक्ति तथा नीति काव्य पर है । अपने जीवन काल मे ही विद्यापति को दुर्लभ रयाति प्राप्त हो चुकी थी वे कीर्ति 'सिंह के लिए खलन कवि, समकालीनो के लिए सरस, सुकवि कठहार, अभिनव जयदेव आदि के नाम मे लोकप्रिय थे। लोचन कवि ने राज तरगिणी मे विद्यापति का श्रेष्ठ गीतिकार के रूप में प्रतिष्ठित किया है । इनकी लोकप्रियता के ही कारण अनेक कवियो ने अपने नामो के साथ 'पति' का प्रयोग प्रारम्भ कर दिया। गोविद दास ने तो विद्यापति की शिष्यता भी स्वीकार की थी। स्थानीय सम्पा, मिथिला की रयाति तथा चैत य महाप्रभु की वाणी पर सवार होकर विद्यापति के गीत बगान के घर घर में प्रतिष्ठित हो गये। फिर तो वगाल के कवियो मे विद्यापति के अनुकरण की होड़ सी लग गई। लोग विद्यापति के नाम से गीत लिखने लगे। इस प्रयास म भापा मे थोडा परिवतन हुआ इस परिवर्तित भापा स्वरूप को ब्रजवुलि का नाम दिया गया। डा० सुकुमार सेन के अपनी कृति हिस्ट्रो आफ ग्रजबुलि लिटरेचर मे इन कवियो का पूर्ण विवरण प्रस्तुत किया है। विद्यापति के गीतो से वक्मिचद्र तथा क्वीद्र रवीद्र भी प्रभावित थे। बगाल म विद्यापति का प्रभाव दो रूपो मे मा य है--ब्रजवलि के श्रेष्ठ प्राचीन कवि के रूप मे तथा वैष्णव गीतिकार के रूप मे। चैतय महाप्रभु भी उनका वैष्णव गीत कार के रूप मे आदर करते थे। fe 192 विद्यापति एक अध्ययन उडीसा में यह प्रभाव सोलहवी शती के प्रारम्भ मे देखने को मिलता है। गोबिद दास ठाकुर की दो रचनायें-पूजा प्रदीप इस काव्य प्रदीप इस प्रभाव की साक्षी हैं। रामान द राय की एक बजबुलि रचना है जिसे उहोने उडीसा के राजा रुद्र देव (1504-1532) ई० को समर्पित किया है। उनकी भेंट भी चैत य महाप्रभु से गोदावरी तट पर 1511 ई० मे विद्यानगर मे हुई थी। आसाम मे भी विद्यापति की रयाति गीतकार के रूप म थी। शकरदेव के प्रयासो स यहाँ ब्रजबुलि का प्रसार हुआ। असमिया के इतिहास मे प्रजबुलि का महत्वपूर्ण स्थान है । नेपाल को तो विद्यापति ने खूब प्रभावित किया था। विद्यापति के साहित्य को सरक्षित रखने का भी श्रेय नेपाल को है । मैथिली अपने प्रभाव के कारण उत्सवो मे नाटकों की भाषा बन गई और कालातर में राज भाषा बन गई और नेपाल के मल्ल नरेशो ने मैथिली के कलाकारो को अपने दरबार मे स्थान दे सम्मानित किया । विद्यापति का प्रभाव तुलसी से भी अधिक व्यापक है क्योकि उनके पाठक केवल हि दो क्षेत्र के ही नही अपितु असम, उडीसा, बगाल और नेपाल के लोग भी हैं। विद्यापति ने भक्तो को सरस गान, रसिको को प्रणय की भावमगिमा, विरही जनो के हृदय को आशा, युवको को मोदय और प्रेम की मादक मासलता और वृद्धा को आत्म ग्लानि परक स्तुतिया प्रदान की। उनके काव्य मे नर नारी सबको अपनी बाछा का फ्ल प्राप्त हुआ। ग्रियसन के शब्दो मे ही इस प्रकरण को विराम देना उचित होगा--'हि दू धम का सूय अस्त हो सकता है, समय के प्रवाह के साथ कृष्ण मे व्यक्त विश्वास और श्रद्धा भी समाप्त हो सकती है, कृष्ण प्रेम की स्तुनिया जो भव सागर पार के लिए बेडा है, उस पर से हमारा विश्वास हट सकता है पि तु वह समय कभी नहीं आयेगा जब विद्यापति के गीतो का प्रभाव मानव जीवन से हट जाय और उनके प्रति रसिक हृदयो की स्वाभाविक ललक कम हो जाय ।' प्रियसन--विद्यापति एण्ड हिज काटेम्पररीज, पृ० 31) DOD

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Vidhapati Ek Adhyayana

Author
Dr. Randhir
Title
Vidhapati Ek Adhyayana
File name
Vidhapati Ek Adhyayana
Text
OCR done
Citation
1960
Published
2011/03
Publisher
Bharatiya Grantha Niketan Dehli
Language
Sanskrit
Pages
198
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551079
Barcode
4990010031856.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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