Prakrit Bharati Academy, Jaipur
Shri Lokatatvaniryan Granth
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लो
१३
नि०
|२||
४
२
अहंकारमाथी २७॥
चैतन्यमाथी-चैतन्यमांथी अहंकार अने
अहंकारमाथी २८
पूर्व पूर्व
२८
चैतन्य २८
३
प्रवर्तते
त्रलोक्य त्रैलोक्यं
कर्म २३॥
कुमीकरणो कुब्जीकरणे १८
प्राणः
२०
प्रववते
२१॥
तंदड तदंड
२३
(पहेलीलीटीने)ोजीलीटी
समजवी २४
२४॥
द्रव्यमरूप्प द्रव्यमरूपं रूपी २७॥
(युद्धिमाथी) (हिमांथी)अहंकार अने
२
ne
११
दुःस्वा
२९
वध्यते
होतद्
३
दुःखा
बध्यते
विद्यते
जीवोना
३२
१
विद्यतं
जोवोना
CASSALAACADKI
३३॥
॥२॥
न प्रस्तावना आ ग्रंथना कर्ता श्रीमान् हरिभद्रसूरि जेवा धुरंधर आचार्य होयाथो आ ग्रंथनी उत्तमता विषे काइ विशेष कहेवार्नु होय नहि. श्री हरिभद्रसूरिए आ ग्रंथमा प्रथम वक्ता अने श्रोताओनी योग्यता दर्शाव्या बाद तथा आ जगतनुं स्वरूप, आत्मानुं स्वरूप अने कर्मनुं स्वरूप कया कया दर्शनषाळा ‘कया कया प्रकारे माने छे ते सर्व मन्तव्य दर्शाव्या बाद जैन दर्शन ए त्रणेनुं स्वरूप कइ रीतें माने छे ते दर्शावया पूर्वक अन्यदर्शनकारोनुं म- न्तव्य केवी रीते युक्तिविकल छे, अने जैनदर्शननुं मन्तव्य कइ रीते यथार्थ छे ते पण युक्ति पूर्वक दर्शावेलुं छे. आ ग्रंथना भाषान्तरनो प्रयास अनेक देशमा विहार करवाथी पोताना चारित्रवळ वडे प्रसिद्ध थयेला शा. तस्वभावो मुनिमहाराज श्रीमद् हंसविजयजीमहाराजश्री के नेओ जैनाचार्य श्रीमद् विजयानंद सूरीश्वर उर्फे श्रीमद् आत्मारामजी महाराजना मुख्य शिष्य श्री लक्ष्मीविजयजी महाराजना शिष्य छे, तेओनी प्रेरणाथी थयेलो छे. आ ग्रंथने अनुसारे जोवा जतां भाषान्तर बहुज टुंका अर्थवाळु लेखाय ते वास्तविकज छे, कारणके मारी मति अल्प होवा विगेरेना कारणथी आटलो अर्थज लखी शकायो छे. न्यायमां मारो प्रवेश नहि होषाथी तेवे स्थाने जे जे पंडित, अथवा. ' शास्त्रीओने पूछी समजीने लखेल छे . ते ते पंडित-शास्त्रीओनो आ भाषान्तर कर्ता उपकार माने छे. पूछीने निर्णय करेला स्थानमा तेमज बीजे स्थाने छअस्थताने लइने उपयोग शून्यता विगे- रेथी थयेली भूल मोटे हुँ मिथ्यादुष्कृत दउ छु अने सुझ पुरुषो ते सुधारी यांचशो. ली: चंदुलाल नानचंद मु०. सिनोर. हाल मु० अमदावाद है अर्थ : -श्री जिनेन्द्र समान शुद्ध आत्मस्वरुपी एटले सामान्य केवळीओमा श्रेष्ट श्री जिनेन्द्र - तीर्थंकर भगवानने भक्तिपूर्वक नमस्कार करी भव्य जीवोंने प्रतिबोध भा न्यायांभोनिधिजैनाचार्य श्रीमद्विजयानन्दसूरीश्वरपशिष्य श्रीमद् हंसविजयेभ्यो नमोनमः aa and श्री लोकतत्त्वनिर्णय ग्रन्थः (भाषान्तर कर्ता पं० चंदुलाल नानचंद.) जिनेन्द्रद्वन्दं जिनशासनं च, श्रीरंकितं हंसमुनि प्रणम्य व्याख्यां नृतत्त्वस्य सनिर्णयस्य, वक्ष्येऽनयां गूर्जरया गिरा वै ॥१॥ प्रणिपत्यकमनेक, केवलरूपं जिनोत्तमं भक्त्या । भव्यजनबोधनार्थ, नृतत्वनिगम प्रवक्ष्यामि ॥ १॥आर्या०॥ नंत चारित्रादि अनेक गुणयुक्त होवायी अनेक, केवळज्ञान अने केवळदर्शनयुक्त होवायी केवलस्वरुप एका सर्व जिन करवा माटे हुँ (हरिभद्र सरि) लोकतत्वनिगम एटले लोक स्वरूपनो निर्णय कहीच ॥१॥ REEN योफ. नि० भव्याऽभव्यविचारो, न हि युक्तोऽनुग्रहप्रवृत्तानाम् । कामं तथापि पूर्व, परीक्षितव्या बुधैः परिषद् ॥२॥ अर्थ:---उपकार करवाने तत्पर थयेला महात्माओने आ भव्य ( उपदेश योग्य ) छे, अने आ अभव्य छ, एवो विचार करवो योग्य नथी तोपण बुद्धिमानीए प्रथम सभानी परीक्षा तो सारी रीते करवी जोइए. प्रथम गाथामां "भव्यजन बोधनार्थ" ए वाक्य वडे आचार्य भव्य जीवने प्रतिवोध करवातुं कछु, ते वावतमां कोइ शंका करे के जगतमां उपकार करनार महात्माओ तो दरेक जीवने उपदेश आपी प्रतिबोध करे तो केवळ भव्य जीवनेज प्रतिवोध करवान केम का ? ए काना समाधानरूपे आचार्य महाराज आ गाथाना उत्तरार्धवडे कहे छे के ए वान जोके ठीक छे तोपण बुद्धिमानोए (आ जीवने उपदेश सफळ यशे के निष्फळ ! तेनो अनुमानथी सारी रीते निर्णय करवानी तीक्ष्ण बुद्धिवाळा महात्माओए) प्रथम सभानी एटले उपदेश आपवा योग्य जीवोनी परीक्षा तो सारी रीते करवी जोइए. नहितर जे रक्ष जे जमीनमां उग्याथी फळ न आपी शके ते जमीनमां तेवा क्षने वारंवार जळ- सिंचन करनार माळी जेम स्वकार्यमां निपुण न कहेवाय तेम योग्यायोग्यत्वनो विभाग जाण्याविना उपदेश आपनारआ- चार्य पण बुद्धिमान न गणाय, एटलंज नहिं पण सुघरीए वर्षाऋतुमा वर्षादयी व्याकुळ थता वानरने घर वांधवानो उपदेश आपतां वानरे खीजवाइने सुघरीनो ज माळो भागी नाख्यो, तेम अयोग्यने उपदेश आपतां कोईवार आचा- येने पण गेरलाभ थाय. वळी मोक्षसंबंधि उपदेश सिंहणना दूधनी पेठे अयोग्य श्रोतारुप अयोग्य ( सुवर्ण सिवायना वीजा) पात्रमा टकी न शके पण योग्य श्रोतारुप सुवर्णपात्रमांन टकी शके माटे श्रोतानी योग्यता अवश्य जोवी. ॥२॥ ?
बज्रमिवाऽभेद्यमनाः, परिकथने चालनीव यो रिक्तः । कलुषयति यथा महिषः, पूनकवद्दोषमादत्ते ॥३॥ जलमंधनवत् कथितं, बधिरस्येच हि निरर्थकं तस्य । पुरतोऽधस्य च नृत्तं, तस्माद्ग्रहणं तु भद्रस्य॥४॥ युग्मं॥ अर्थ:-वजनी पेठे न भेदाय एवा हृदयवाळो, उपदेश आपतां पण जे चाळणीनी पेठे खाली होय, पाडानी माफक उपदेशने डोळी नाखे, अने गळणी माफक जे केवळ दोपनेज ग्रहण करे तेवा जीवने कहेलो उपदेश जळ व- लोववानी माफक, बहेराने कहेली वातनी माफक अने अंधनी आगळ करेला नाटकनी माफक निरर्थक छे, ते कार- णथी उपदेश सांभळवामां भद्र जीवनुं ग्रहण करेलं छे. श्री नंदीसूत्रमा मगशैल पापाण, घट, चाळणी, परिपूर्णक, हंस, महिप, मेंढो, मच्छर, जळो, बिलाडी, जाहक, विप्र, भेरी, अने आभीरी ए १४ जातिना श्रोता कह्या छे, ते संक्षेपमां आ प्रमाणे- १ मगना दाणा जेवडो नानो पाषाण ते मगशैल पाषाण जेम पुष्करावर्त नामना महामेघथी अंदर जरा पण भी- जाय नहिं पण उलटो वधु चळकाटवाळो थवाथी जाणे मेघने हसतो होय तेम जे श्रोता महात्माना सेंकडो श्रेष्ट उपदेश सांभळ्या छतां लेश पण असरवाळो न याय परन्तु उलटो उपदेशकने ज जाणे अज्ञानी मानतो होय एवो मगजैल सरखो श्रोता अयोग्य छे. २ कहे ते वखत सर्व सांभळे पण पछी कंइ नहि ते छीद्रघट तुल्य, थोडं संभारे ते खंडघट तुल्य, थोडं सांभळी तेटलं संभारे ते कंठहीन घट तुल्य, अने सर्व उपदेश सांभळी सर्व संभारे ते संपूर्ण घट तुल्य श्रोता एमां छीद्रघट स- न पाय AR रखो प्रथम श्रोता अयोग्य छ, अने शेष त्रण श्रोता अनुक्रमे अधिकाधिक योग्यतावाळा. छे. ३ चाळणीमा रहेलो आटो जेम तुतं निकळी पडे तेम उपदेश सांभळे के तुर्त विसारी दे, अने शुं सांभळयु ते सं- भारवानी जरापण दरकार न राखे ते चाळणी सरखो श्रोता अयोग्य के. ४ परिपूर्ण एटले गळणी अथवा सुघरीना माळाथी जे घी गळाय ते गळणीमां अने माळामां कचरो झीलाइ अने घी निकळी जाय तेम उपदेशमाथी सार तजी केवळ दोषने ज ग्रहण करे ते परिपूर्णक सरखोश्रोता अयोग्य जाणवो. ५. इस जेम दूध पाणीने जूडें करी दूध पीए छे, तेम जे श्रोता दोषग्राही न होय पण गुणग्राही ज होय ते हंस सरखों श्रोता योग्य छे. ६ पाडो जेम जलाशय डोळी नाखे छे तेम उपदेश डोळी नाखनार श्रोता पाडा सरखों अयोग्य नाणवो. श्रोता न पोते. सांभळे के नः बीजाने सांभळवा ७ मेंढो भूमिपर ठरेला एक खोबा जेटला जलने पण मलीन कर्या विना पीए , तेम जे श्रोता. एक पद मात्र पण विनयपूर्वक पूछे ते मेंढा सरखो श्रोता योग्य गणाय के. ८ उपदेशक आचायना जाति आदि दोष बोली तिरस्कार करनारो श्रोता मच्छर सरखो अयोग्य गणाय ९. जळो जेम शरीरने दुःख दीधा विना रुधिर पीए छे तेम जे श्रोता आचार्यने दुभाव्या बिना श्रृंतझान ग्रहण करे ते जळो सरखो श्रोता योग्य छे. पीर छे तेय ने श्रोत १० बिलाडी जेय पात्रमा रहेली क्षीर पण नीचे पाडीने खाय छ तेम जे श्रोता साक्षात् गुरु पासे उपदेश सांभळे परन्तु बीजा सांभळनार पासेथी सांभळी. ले ते बिलाडी सरखो श्रोता अयोग्य जाणवो. जेम जाहक नामर्नु जानवर थोडी थोडी. क्षीर पीने पात्रना पडखा. पण आस्वादे छे, तेम जे श्रोताप्रथम प्रह- ण करेला उपदेशने पण अति संभारीने बीजुं पूछे ते जाहक समान श्रोता योग्य छे. १२ कोइ कणवीरः पर्व दिवसे चार ब्राह्मगने एक गाय आपी: तेओए एकेक दिवस दूध दोहवानो वारो बांध्यो, त्यां जेनो वारो आवे ते एम जाणे के मारे तो आजे ज दोहबानो छे, ने काले बीजो दोहशे तेथी हुँ निरर्थक घास चारो शा माटे आधु ? ए प्रमाणे दरेके विचारवाथी गाय घास चारा विना मरण पामी, तेमः श्रोताओमां पण शि- प्यो जाणे गुरुनो विनय आवेला अभ्यासी साधुओं अने सभिकनारा तथाः पूछनारा श्रावकादि करशे, श्रावकादि जाणे के शिष्यो करशे अमे केटलीवार रहेवाना छीए ? ए प्रमाणे यता केवळ आंचायनेज विटंबणा थाय माटे एवा विप्र सरखाः श्रोता अयोग्य जाणवा- १३ कृष्णना गुणग्राहीपणांनी परीक्षा करी प्रमुदित थयेला देवे ६ मासे वंगाडवा योग्य उपद्रव निवारक भेरी आपी, ते भेरीना रक्षक पासेथी अनेक धनवानोए धन आपी. एकेक कटको जळमां घसी पीवा माटे लीयो, जेथी भैरी कंथा सरखी थइ- तेम जे श्रोताओ सूत्रार्थने वच्चे बच्चे भूलो जइ वीज़ा पासेयी सूत्रार्थ ग्रहण करी करी संभारे ते भेरीनी कंथा करनार रक्षकवत् अयोग्य श्रोता जाणवो- मा गाडया
नि
लोक.
आचार्यस्यैव तज्जाडये, यच्छिप्यो नाऽववुध्यते । गावो गोपालकेनेव, कुतीर्थनावतारिताः॥५॥
किं वा करोत्यनार्याणा, मुपदेष्टा सुवागपि । तक्षा तीक्ष्णकुठारोऽपि, दुर्दारूणि बिहन्यते । ६॥
१४ घी वेचनार आभीरे भूलथी घी दळी गयाथी आभीरीने ठपको आपतां आभीरी वढी पडी, अने धीनो वि-
नाश थयो तेम आचार्यना ठपकाथी श्रोता क्रोधी थाय तेवा श्रोता आभीरी सरखा अयोग्य जाणवा.
उपर लखेल १४ द्रष्टांतोमांथी चालु ग्रंथमा आचार्य महाराजे मगशैलने स्थाने वजन द्रष्टांत आप्युं छे. शेष चा-
ळणी विगेरेनां ३ द्रष्टांत उपर कह्या प्रमाणे जाणवां. एवा श्रोताओने उपदेश फरवो निरर्थक होवाथीम अहिं आचा-
भद्रजीवोने उपदेश श्रवणना अधिकारी गण्या छे. शेष भावार्थ सुगम छे ॥ ३ ॥ ४ ॥
अर्थः-~पूर्व गाथामां अयोग्यने उपदेश आपको निरर्थक कयो ते संवन्धमा कोइ एवी शंका करे के उपदेश आ-
पवा छतां पण जो शिष्य बोध न पामे तो तेमां आचार्यनुज अज्ञान छे, कारण के गायो जो कुतीर्थमा ( जळाशयमां
नहिं उतरवा योग्य मार्गे) उतरी होय तो ते गोवाळीआएज उतारेली जाणवी. एमां जेम गोवाळीआओ गायो र-
क्षवानी विधिमा अज्ञान,छे, तेम शिष्यने वोध न थवामां अथवा कुतीर्थमां-अधर्मने विपे उतरवामां आचार्यनुज
अज्ञान होय. ॥ ५ ॥ पूर्व गाथामां करेली शंकाना समाधानमा आचार्यश्री कहे छे के श्रेष्ठ वाणीवाळो-देशना ल-
ब्धिवाळो उपदेशक पण अनार्यने-अयोग्य जीवने शुं असर करी शके ? जेम नीक्षण कुहाडावाळो (वांसलावाळो)
सुतार पण कुकाष्टने कापवामां थाकी जाय छे. अर्थात् कापी शकतो नथी. ॥६॥
| उदितौ चंद्रादित्यौ , प्रज्वलिता दीपकोटिरमलाऽपि । नोपकरोति यधामा अप्रशान्तमती शास्त्र-सद्भावप्रतिपादनम् । दोषायाऽभिनवोदीर्णे शमनीयमिव ज्वरे ॥ ७ ॥ अर्थ:-जेनुं चित्त अशान्त एटले क्रोधादिकषायो वडे व्याकुळ अने अस्थिर बनेलं छे तेवा अशान्त चित्तवाला प्राणीने शास्त्रना उत्तम रहस्यो-उत्सर्ग अपवाद इत्यादि विधिओनां तात्पर्य प्रतिपादन करवां ते. नवा उदय पामेला ज्वरवाळाने-ताववाळाने औषध आपवानी माफक दोषने माटे छे, तात्पर्य ए छे के जेनुं चित्त अने इन्द्रियो विषय- विकारथी विमुख यइ होय तेवाओने उत्सर्ग अपवादादि विधिओनुं ज्ञान मोक्षने माटे थाय छे, अने विषय विकारी अ- ने क्रोधी जीवोने एंज रहस्यो दुर्गतिमां डूबावनार 'थाय छे, माटे शिष्यने बोध नहिं थवामां कारण आचार्यन अ ज्ञान नथी पण श्रोतानी अयोग्यता छः ॥ ७ ॥ जेम चंद्र सूर्य उदय पाम्या होय, अने करोडो निर्मळ दीवा जळहळ- ता होय, परन्तु ते अंधजीवने उपकार करी शकता नथी तेम घोर अज्ञान वडे अंध थयेला प्राणीओने धर्मोपदेश पण कंइ असर करतो नथी, माटे अयोग्यने उपदेश आपको निरर्थक छे, अने ए निरर्थकतामां आचार्यन. अज्ञान कारण रूप नथी पणश्रोतानी अयोग्यता कारण छे.॥८॥ .:: १ प्रसिद्ध छे के एक प्रकारना शाखने सांभळनारा अने अभ्यास करनाराओमांयी केटलाएक सदापारी अने केटलाएक स्वच्छंदीबने छे, एटलुज नहिं पण ते स्वच्छंदने पुष्ट करवामां पण एज शास्त्रने साधन यनावे छे. SERIES
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०
एकतडागे यदत्, पिति भुजंगःशुभं जलं गौश्च। परिणमति विषं सर्प, तदेव गवि जायते क्षीरम् ॥९॥
सम्यगज्ञानतडागे, पिवतो ज्ञानसलिलं सतामसताम्।परिणमति सत्सु सम्बग, मिथ्यात्वमसत्सु च तदेव।।१०
एकरसमंतरिक्षात, पतत्ति जलं तच्च मेदिनीं प्राप्य नानारसतां गच्छति, पृथक् पृथभाजनविशेषात् ॥११॥
अर्थ:--शिष्यने वोव नहिं थवामा आचार्य अज्ञान कारणरूप नथी पण शिष्यनी ने अयोग्यता छे ते वात द्र
करवामाटे आचार्य श्री द्रष्टान्त आपे छ के--जेम एकज़ तनावमा रहेलं सारं-मीठं पाणी सर्प . अने गाय बन्ने पीए:
छे, त्या सर्वमा एज मी जळ झेररूप वनी जाय छे अने गायमां. दूधख्य वनी जाय छे. ॥ ९॥ तेनी माफक सम्य-
गजान लद तळावमा सम्यगज्ञान रूप जळ सज्जन अने दुर्जन बन्ने पीए छे, त्यां सज्जनोमां एजःज्ञान सम्यक्-सत्य-
मागेरूले परिप, अने दुजनमा एजः ज्ञान मिथ्यात्व-असत्यमार्ग रूपे परिणों छे, तो शिष्यने बोध न थवामां
आचार्यलो दोष के शिष्यनो दोष ? ॥ १० ॥ पुनःएज वातने द्रढ करवा-माटे आचार्य श्री वीजु द्रष्टांत आपे ले के--
आकाशमाथी वादनुं जळ' पडे छे, ते एकज जातना रस अथवा स्वभाववालु
स्वभाववाढू छे, ते एक रसवाळं जळ पृथ्वी उपर
पडीने जुदा जुदा पात्रना भेदथी जुदा जुदा रस--स्वभाववाछं बने छ, अर्थात् सर्पना मुखमां पडे तो झेर थाय,
स्वाती नक्षत्र योगे छीपमा पडे तो मोती थाय, खारी भूमीमां पडे तो खालं थाय अने मीष्ट भूमीमां प-
डे तो मीष्ट याय..( तात्पर्य आगलनी गाथाना अर्थमां). ॥११॥
शनमाणीओसरखीरीते उप एकरसमपि वाक्य, वक्तुर्वदनादिनिःसृतं तद्वत् । नानारसतां गच्छति, पृथक् पृथक् भावमासाद्य ॥ १२॥ स्वं दोषं समवाप्य नेक्षति यथा सूर्योदये कौशिको, राईि कंकटुको न याति च यथा तुल्येऽपि पाके कृते तद्वत्सर्वपदार्थभावनकरं संप्राप्य जैन मतं, बोधि पापधियो न यान्ति कुजनास्तुल्ये कथासंभवे ॥ १३ ॥ शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ॥ अर्थः- (तेम) वक्ताना मुखमाथी निकळेलु एकज रस-स्वभाववाढं वचन जुदा जुदा भावने पामी जुदा जुदा स्वभावे परिणमे.. अर्थात् जितेन्द्रियने वैराग्यरूपे, विषयविकारीने श्रृंगाररूपे, अने सकपायीने कषायवृदिरूपे परि- णमे तो तेमा आचार्यनो | दोष ? ॥ १२ ॥ पुनः एज वातनी द्रढता माटे बीजां द्रष्टांतो कहे छे ते आ प्रमा सूर्यनो उदय थये पण घूवड जेम देखतो नयी तेम दुर्जन माणस पोतानो दोष पामीने एटले प्रत्यक्ष यये पण दोषरूपे देखतो-जाणतो नथीं, वळी जेम सारा मग अने गांगडु मगने सरखी रीते पकवतां-रांधता पण गांगडु मग रंधाता आपवा छतां पण प्रतिबोध पामता नथी. अहिं जे मग अथवा मठ नामना धान्यना दाणा केटलाएक एवा होय के सेंकडो मण काष्ट वाळवा छतां पण रंधाता नथी परन्तु काचाज रहे.छे, ए गांगड दाणा कडेवाय छे. एवा वोने श्रेष्ठ आचार्यनो उपदेश लेश पण असर न करे तो आचार्यनो शृं दोष ? नऊESI -- ल लोक. नि हठो हठे यबदभिप्लुतः स्यान्नो विबद्धा च यथा समुद्रे । तथा परमत्ययमात्रदक्षो लोकः प्रमादांभसि बंभ्रमीति ॥ १४॥ उपजाति० ॥ यावत्परप्रत्ययकार्यधुद्धि-विवर्तते तावदुपायमध्ये । मनः स्वमर्थेषु विघटनीयं, नह्याप्तवादा नभसः पतंति ॥ १५ ॥ उपजाति ॥३॥ अर्थ:-जेम त्रापाना दोरीआ साथे जोडेलो बीजो दोरीओ समुद्रमा उपद्रववाळो होय, एटले एकनी साथे बी- जाने तणावु पडे, अने नाव साथे बांधेली नावने पण जेम समुद्रमां भटकवू पडे एटले एकनी साथे बीजी नावने पणत- णावू पडे तेम केवळ परनो विश्वास राखवामां ज निपुणता वाळो लोक प्रमाद रूपी जळमां भ्रमण करे छे. तात्पर्य के केवळ परना विश्वास उपर रहेनारो माणी स्वबुद्धिवडे हिताहित योग्यायोग्य विचारी शकतो नथी, परन्तु अ- मुके जे की, तेज सत्य हशे एम माननारो होवाथी तेने यथार्थ वस्तुस्वरूप प्राप्त थतुं नथी. ॥ १४ ॥ ते. कारणयी ज्यांसुधी परना विश्वासे कार्य करवानी बुद्धि वारंवार बदलाती रहे एटले बीजाना कहेवा प्रणाणे दोरवाया करे त्यां सुधी पोताना मनने अर्थमा ( वस्तुस्वरूप समजवामां ) विशेषतः संगठित करवू, अर्थात् ज्यांसुधी वस्तुस्वरूप यथार्थ न समजाय त्यां सुधी ते वस्तुस्वरूप विचार्या करवं, जेथी अन्ते यथार्थ वस्तुस्वरूप समजाशे. तेवा विचारवळयी पोतानामांज आप्तवादी पणु प्राप्त थशे. कारणके आप्तवाद कंइ आकाशमांथी पडता नथी, परन्तु आत्माना सेन्यक विचारबळथी आत्मामांज आप्तवाद उत्पन्न थाय छ॥१५॥(१४ मी गाथामां हठ शब्दनोअर्थ त्रापाना संभवथी लख्यो छे) -
यचित्यमानं न ददाति युक्ति, प्रत्यक्षतो नाप्यनुमानतश्च ।
तबुद्धिमान् को नु भजेत लोके, गोशृंगतः क्षीरसमुद्भवो न ॥ १६ ॥ उपजाति०॥
ये वैनेया विनयनिपुणैस्ते क्रियते विनीता, नावैनेया विनयनिपुणैः शक्यते संविनेतुम् ।
दाहादिभ्यः समलममलं स्यात्सुवर्ण सुवर्ण, नायस्पिंडो भवति कनकं छेदाहक्रमेण ॥ १८ ॥ मंदा० ॥
अर्थ-हवे उपदेशनी शरुआतमा प्रथम यथार्थ वस्तुस्वरूपनी प्राप्ति माटे युक्तिशून्य वात न मानवानो उपदेश करे छे-
जे पातने प्रत्यक्षथी के अनुमानप्रमाणथी विचारतां पण युक्ति न आपे एटले युक्तिवाळी न होय, तो लोकमां तेवी
युक्तिशून्य वात कयो बुद्धिमान् पुरुष अंगीकार करे अथवा माने ? कारण के गायना धिंगडामाथी दूध निकन्तुं
नथी (तेम युक्तिशून्य वातमांयी कंइ वस्तु स्वरूप मळतुं नथी )॥ १६ ॥ बळी जे स्वभावेज विनयवाळा होय तेवा
शिष्योज विनयनिपुण महात्माओना शिक्षणयी विनयी थाय छे, अने जे स्वभावेज विनयगुणी नथी तेवा अविनयी
'शिष्योने तो विनयनिपुण महात्माओ पण विनयवान न करी शके. जेम मेलवालं पण जो सुवर्ण होय तो अग्निआ-
दि उपक्रम वडे निर्मळ सुवर्ण थाय, परन्तु जे लोखंडनोज गोळो होय ते कंइ छेदवाथी के अग्निमां वाळवायी इत्यादि
उपक्रमयी(उद्यमयी)सुवर्ण न बनी सके. आ गाथा कहेवानुं तात्पर्य ए छे के जेम स्वभाव अविनयी शिष्य विनयीन या-
य तेम स्वभावेज युक्तिशून्य वाद युक्तिओना (कुयुक्तिओना) वणगारथी युक्तिवालो ( आप्तवाद ) न थाय,
परन्तु जे स्वभावेज सत्यस्वरूपवाळी वात (आप्तवाद ) होय तेज सत्य ( आप्तवाद ) यइ शके छे. ॥ १७॥
नि आगमेन च युच्या च, योऽर्थः तमभिगम्यते । परीक्ष्य हेमवद् ग्राहाः, पक्षपाताग्रहेण किम् ॥ १८ ॥ मातृमोदकपद् जाला, ये गृन्हत्यविचारितम् । ते पश्चात्परितक्ष्यन्ते, सुवर्णग्राहको यथा ॥ १९ ॥ श्रोतव्ये च कृती कर्णी, वाग बुद्धिश्च विचारणे । यः श्रुतं न विचारत, स कार्य विन्दते कथम् ॥ २० ॥ अर्थ:-शास्त्रने आधारे अने युक्तिने आधारे जे अर्थ समजाय ते अर्थ सोनानी पेठे परीक्षा करी ग्रहण करयो. एमां पक्षपाती आग्रह शामाटे करवो, ? अर्थात् जे वात शास्त्र अने युक्ति बन्ने बडे समजाती होय तो ते वात अंगी- कार करवामां कोइपण जातनो पक्षपात न राखवो ॥ १८ ॥ जे बालको ( अज्ञान जीवो) पत्थर विगेरेना कृत्रिम मोदकने ( लाइने ) साचो लाडु जाणी विना विचार्य ग्रहण करे छे तेओ पाछळथी ' सुवर्णग्राहक पुरुषनी माफक पञ्चानाप करे छे. तात्पर्य ए छे के जे अज्ञान जीवो विना विचार्ये शास्त्रनुं वचन साचु माने छे ते सुवर्णग्राहक पुरुष वत् पश्चात्ताप पामे छे, माटे श्रद्धा होय तोपण शास्त्रनुं वचन अंगीकार करवामां पोतानी बुद्धीनो सदुपयोग तो अव- श्य करवो ॥१९॥ कारणके (कुदरतथी ज) शास्त्र वचन सांभळवा माटे बे कान वनेला छे, वचन अने बुद्धि विचार करवामां (विचारवा माटे) बनेलीछे, छतां पण जे पुरुष सांभळेला वचनने विचारे नहिं ते पुरुप पोतानुं कर्तव्य केम समजे? २० १ सुवर्णग्राहक पुरुषy द्रष्टान्त ग्रन्थान्तरथी जाणवू. २ आ श्लोकमां शास्त्रनुं वचन विचारीनेज ग्रहण करवान कहे- वाथी शास्त्रनी संपूर्ण सत्यतामां खामी दर्शाची एम न जाणवू, परन्तु संपूर्ण सत्य शास्त्रनुं वचन पण विचारीने ग्रहण क- रवाधीशास्त्र उपर 'द्रढ श्रद्धा थवा रूप गुण उत्पन्न थाय छे. अथवा तो दरेक शात्रो सत्य नहि होवाथी पण विचारीने ग्रहण करवान कहेनानी आवश्यकता छे. डू ड नेनिरीक्ष्य विषकंटकसर्पकटिान, सम्यक् पथा ब्रजति तान् परिहत्य सर्वान् । कुज्ञानकुश्रुतिकुदृष्टिकुमार्गदोषान्, सम्यग विचारयत कोऽत्र परापवादः ॥ २१ ॥वसंततिलका॥ प्रत्यक्षतो न भगवानषभो न विष्णु, रालोक्यते न च हरो न हिरण्यगर्भः। तेषां स्वरूपगुणमागमसंप्रभावात्, ज्ञात्वा विचारयत कोऽत्र परापवादः ॥ २२ ॥वसंत०॥ विष्णुः समुद्यतगदायुधरौद्रपाणिः, शंभुर्ललन्नरशिरोस्थिकपालमाली । अत्यंत शान्तचरितातिशयस्तुवीरः, कं पूजयाम उपशान्तमशान्तरूपम् ।। २३ ॥वसंत०॥ अर्थः -मुसाफ़र जेम, मार्गमा रहेला. विष, कांटा, सर्प अने जीवजंतु विगेरे नजरे जोइने अने ते सर्व छोडीने सारे मार्गे जाय छे तेम कुज्ञान, कुशास्त्र, कुद्रष्टि अने कुमार्गरूप दोषोने छोडीने कोइ विचारवंत सन्मार्गे चाले तो सारी रीते विचारी जुओ के एमां परापवाद (परनी निंदा) Y? ॥२१॥ वर्तमानकाळमां साक्षातपणे तो नथी आदीश्वरभगवान के नथी विष्णु के नथी देखाता महादेव के नथी देखाता ब्रह्मा ! केवळ तेओनुं स्वरूप अने गुणनुं वर्णन ते ते शाखना महिमाथी जाणीने जेमां देवत्व संभवे तेने देव मानवा तेमां विचारी जुओ के परापवाद (देवनी निंदा) शुं ?॥२शावळी विचारो के विष्णु तो उगामेली गदाशखबडे भयंकर हाथवाला छे, महादेव लटकती मनुष्य खोपरीनी माला पहेरनारा छे, अने वीर अत्यन्त शान्त चरित्रना अतिशयवाला छे तो हवे कहो के अमे कोनी पूजा करीए ? शान्तं चरित्रवाळानी के अशान्त -उग्र चरित्रवाळानी ? अर्थात् शान्तचरित्रवाळा वीरनी पूजा करीए तो महादेव विगेरेनो अपवाद कर्यो केम कहेबाय ? मला FX CREEN Cer सोक. नि० ७ दुर्योधनादिकुलनाशकरो बभूव, विष्णुहरस्त्रिपुरनाशकरो किलासीत् । क्रौंचं गुहोऽपि दृढशक्तिहरं चकार, वीरस्तु केवल जगद्धितसर्वकारी ॥ २४ ॥वसंत०॥ पीडयो ममैष तु ममैष तु रक्षणीयो, वध्यो ममष तु न चोत्तमनीतिरेषा । निःश्रेयसाभ्युदयसौख्यहितार्थबुद्धे-वीरस्य संति रिपवो न च वंचनीयाः ॥ २५ ॥वसंत०॥ रागादिदोषजनकानि वांसि विष्णो-रुन्मत्तचेष्टितकराणि वांसि शंभोः। निःशेषदोषशमनानि मुनेस्तु सम्यग, वन्धत्वमर्हति तु को नु विचारयध्वम् ॥ २६ ॥वसंत०॥ अर्थः-पुनः एज अर्थ द्रढ करवा माटे ग्रंथकार कहे छे के विष्णु दुर्योधनादि दुष्टराजाओना कुळनो विनाश क- रनार थया, महादेव निश्चय त्रिपुर राक्षसनो नाश करनार यया, कार्तिक स्वामिए पण क्रौंच नामना राक्षसने द्रढन- क्ति रहित कर्यो, अने वीर तो केवळ सर्व जगत्तुं कल्याण करनार थया, तो श्री वीरनी पूजा करवामां कार्तिकस्वामि विगेरेनो अपवाद कर्यों केम कहेवाय ? ॥ २४ ॥ विष्णु विगेरे एवा यया तेथी शृं? ए शंकाना समाधानमां कहेवा- य छे के-आ मारे दुःख देवा योग्य छ, आ मारे रक्षण करवा योग्य छे, अने आमारे इणवा योग्य छे, इत्यादि विचार, ते श्रेष्ट नीति (धर्म) नथी. श्रीवीरनी बुद्धि तो सर्व जनना मोक्षना उदयवाळा सुखरूप हितना अर्थ-प्रयोजनवाळी छे माटे वीरना कोइ शत्रुओ नथी तेम कोइ वंचवा-पीडवा योग्य पण नथी. ॥२५॥ वळी विष्णुनां वचनो राग वि- गेरे दोष उत्पन्न करनारां , महादेवनां वचनो उन्मत्त सरखी चेष्टा करनारां छे, अने मुनिनां (वीरना) वचनो तो सम्यक् प्रकारे सर्व रागादि दोषने शान्त करनारां छे तो इवे विचारी जुओ के वंदना करवा योग्य कोण के ? .
- शरणरूप थयेल छे , एक ( देव ) रागी , छे , अने एक ( देव ) वीतराग छे तो अहिए बे ( देवी ) माथी पूजनीय को यथोद्यतः परवषाय घृणां विहाय, त्राणाय यश्च जगतः शरणं प्रवृत्तः रागी च यो भवति यश्च विमुक्तरागः, पूज्यस्तयोः क इह यूत चिरं विचिंत्य ॥२णावसंत०॥ शक्रं वज्रधरं वलं हलधरं, विष्णुं च चक्रायुधम्, स्कंदं शक्तिधरं श्मशाननिलयं, रुद्रं त्रिशूलायुधम् एतान् दोषभयार्दितान् गतघृणान् , यालान् विचित्रायुधान, नानाप्राणिषु चोद्यतप्रहरणान्, कस्तान्नमस्येद्बुधः ॥ २८॥ शार्दूल०॥ अर्थ:-एक (देव) दयाना त्याग करी परमाणीनो वध करवा तत्पर ययेल छे, अने, एक (देव)जगतनुं रक्षण ते दीर्घकाळ सुधी विचार करीने कहो. अर्थात् हिंसक अने रागी देव अपूजनीय होय अने दयाई तया वीतराग देव पूजनीक होय तो एमां हिंसक अने रागी देवनो अपवाद (निंदा-इर्ष्या) कर्यों केम कहेवाय ? ॥२७॥ वळी वीतराग सिवायना बीजा देवोमां दोष चिन्ह दावे छे के-इन्द्र वज्र धारण करे. छे, बळदेव इळ राखे छे, विष्णु चक्र राखे ले, कार्तिकस्वामी शक्ति (ए नामनुं शस्त्र) राखे छे, अने श्मशानमा रहेनार रुद्र त्रिशूळ राखे छे, तो दोष अने भयवडे पीडायला, निर्दय, अज्ञान, विचित्र हपिआरो राखनारा अने अनेक जीवोने. इणवा माटे उगामेला शखवाळा ए - क्रादि देवोने कयो बुद्धिमान नमस्कार करे ? अर्थात् कोइ नमस्कार करे नहि. +SHRIES लोक. ८ न यः शूलं धत्ते न च युवतिमंके समदनां, न शक्तिं चक्रं वा न हलमुशलाद्यायुधधरम् । विनिर्मुक्तं क्लेशैः परहितविधावुधतधियं शरयं भूतानां तमृषिमुपयातोऽस्मि शरणम् ।।२९॥शिखरिणी। रूद्रो रागवशात् स्त्रियं वहति यो हिंस्रो हिया वर्जितो, विष्णुः क्रूरतरः कृतघ्नचरितः स्कंदः स्वयं ज्ञातिहा । क्रूरार्या महिपान्तकृन्नरवसामांसास्थिकामातुरा, पानेच्छुभ विनायको जिनवरे स्वल्पोऽपि दापोऽस्ति कः ॥३०॥ शादल०॥ अर्थ:-जे.भगवान महादेववत् हायमा त्रिशूल राखता नयी, खोलामा कामविकार उपजावनारी स्त्री राखता नयी, कार्तिकस्वामीनी पेठे हाथमां शक्ति (ए नामन खड्ग ) राखता नयी, विष्णुनी पेठे चक्क राखता नयी, अने बळभद्रनी पेठे हळमुशळ विगेरे आयुधने पण धारण करता नयी, सर्व कलेशवडे रहित छे, अने केवळ परतुं कल्याण करवामांज जेनी बुद्धि उजमाळ छे एचा पाणीओने शरण करवा योग्य ते कपिने (श्रीवीरने) भरणेन ई भाषेलोलु-॥२९॥ जे महादेव प्रेमने वन यइ (पार्वती नामनी)खी राखे छे, 'हिंसक, लजारहित छे, वळी विष्णु अतिकर के, कृतन आचरण- बाळा छे, कार्तिकस्वामि पोते पोतानी जातियाळाओनोज दिनाश्च करनारा ले, अंपिका क्रूर, पाटाभो हगनारी, मनु- प्यना चरची मांस अने हाहना आहारनी इच्छामां व्याकुळ के, अने गणपति मदिरापाननी इच्छागलो . ए प्रमाणे दरेक देवमां दोष विद्यमान ले पण श्री जिनेश्वर देवमां कयो अल्प दोष पण विद्यमान छ ? अर्यात् श्री जिनेश्वर तहन निर्दोष होवायी तेज देव तरीके अंगीकार फरवा योग्य के. १ हिंसक इत्यादि दूषणोपाळा केवी रोते मे तेनो विस्तार ते ते देवोमा चरित्रोमांयी जाणवो. PM, HAN-K ब्रह्मा लूनशिरा हरिदृशि सरुक व्यालप्तशिष्नो हरः सूर्योऽप्युल्लिखितोऽनलोऽप्यखिलभुक् सोमः कलंकांकितः । स्वाथोऽपि विसंस्थुला खलु वपुःसंस्थैरुपस्थः कृतः सन्मार्गस्खलनाद् भवंति विपदः प्रायः प्रभूणामपि ॥ ३१ ॥ शार्दूल० ।। अर्थ:-सन्मार्गमा स्खलना पामवाथी ( सन्मार्ग छोडी कुमार्गे चालवायी) घणु करीने महापुरुषोने पण विप- त्तिओं आवी पडें छे, उदाहरण तरीके ब्रह्मां छेदायला मस्तकवाळा थ्या, विष्णु चक्षुमा रोगवाना-थया, महादेव तू- टी गयेला लिंगवाला थया, सूर्य पण (वांसला बडे ) छोलायो, अग्नि सर्वभक्षी ययो, चन्द्र कलंक वालो थयो, अ- ने इन्द्र पण निश्चय शरीर उपर रहेली ( हजार ) योनिओ वडे दुःखी थयो; माटे तात्पर्य ए छे के दुनियामां देव तरीके मनाता जीवो पण सन्मार्गथी पतित थया अने तेनुं फळ पण भोगव्यु तो एवा सन्मार्गथी पतित श्रयेला देवो पूज्यं कम गणाय? ए देवोना संबंधमां गायोक्त बनावो केवी रीते वन्या तेनुं संक्षिप्त स्वरूप आ प्रमाणे ब्रह्मानुं मस्तक केस दायु ? एक वार ३३ क्रोड देवो एकत्र थइः परस्पर मातपितातुं वर्णन करवा लाग्या. ते वखते. देवीए बललन ARCH लोक. ९ नि० युं के महेश्वरना बातपिता जणाता नथी, माटे ते इशे ज नहि, त्यारे सर्वज्ञपणाना अभिमानधी ब्रह्माना गर्दभ आ- कार वाला पांचमा मुखे कयु के हुं सर्वज्ञ जीवनां छतां पण एम कोण कहे छे के महादेवना मातपिता नथी ! हुं तेनां मातपिता जाणुं छु, एम कही ते पांचमुं मुख महेश्वरना मातपितानुं वर्णन करवा लाग्यु जेथी महेश्वरे पोतानां मातपि- तानी छानी वातने प्रगट करी देवाथी सर्व देव समक्ष कनिष्टा आंगळीना नखवडे ब्रह्मानुं पांचमुं मस्तक छेदी नाख्यु. केटलाएक एम पण कहे छे के ब्रह्मा अने विष्णुने परस्पर पोतानी म्होटाइ संबंधि विवाद थतां महेश्वर पासे आ- व्या, त्यारे महेश्वरे का के जे म्हारा लिंगनो पार पामे ते म्होटो कहेवाय, जेथी विष्णु घणे नीचे पाताळ मुधी चा- ल्या गया परन्तु लिंगनो पार न पामतां पाताळ अग्निना तापथी शरीरे काळा थया ने पाछा आवी महेश्वरने लिं- गनो पार न पाम्यानी वात जणावी, अने ब्रह्मा उर्वलोकमां घणे दूर सुधी जतां थाक्या पण लिंगनो पार न पा. म्या त्यारे लिंगना मस्तक परथी ६ मासथी पडती माला रस्तामा मली तेने लिंगनो पार प.म्यानी साक्षी पूरवा क- हेतां मागए हा कही जेथी महेश्वर पासे आवी माळानी साक्षी. पूर्वक लिंगनो पार पाम्यानी वात जणावी, पोताना अनंत लिंगनो पार पाम्यानी जूठी बात कहेवाथी महेश्वरे कनिष्टाना नखथी ब्रह्मानुं पांचमुं मस्तक छेद्यु, अने मानाने अस्पृश्य थवानो श्राप आप्यो. ॥ विष्णु नेत्ररोगी केम थया ? ॥ उर्वशी उपर मोह पामेला दुर्वासा ऋपिने उर्वशीए अपूर्व वाहनमा बेसी स्वर्ग आचवा जणाव्यु, जेथी दुर्वासाए SAMACHAR S CS रे तप करता विष्णुए नग्न स्नान करती तापसी सन्मुख सरांगद्रष्टिए देखता 7 विष्णुने अने लक्ष्मीने पाछु वळी नहिं जोवानी प्रतिज्ञा पूर्वक बळद रूपे स्थमा जोडी स्वर्ग जाय छे, लक्ष्मी स्त्री जा- ति होवाथी मंदगतीए रथ खेंचे छे जेथी लक्ष्मीने वारंवार तजना करतां क्रोधी थियेला विष्णुए पाएं वळी जोयु, जेधी पथमनी प्रतिज्ञा भंग करवाथी दुर्वासाए विष्णुने आंखमां परोणो मार्यो माटे विष्णु नेत्ररोगी यया. तापसीए श्राप आपवाथी नेत्ररोगी थया. ॥ महादेवनो लिंगछेद केम थयो ? ॥ दावन नामना तपोवनमा महादेव रोज भिक्षार्थे जतां तापसीओ साथे अनाचार करे छे. जेथी तापसोने जा- " पडतां श्राप आपी महादेवना लिंगनो छेद कों. ॥ सूर्यनुं शरोर केम छोलायुं ? ॥ सूर्यनी रत्नादेवी नामनी स्त्रीने यम नामे पुत्र थयो, ते स्त्री सूर्यना तापने सहन नहिं करवायी पोतानी प्रति- छाया (बीजु रूप) सूर्यना आवास भुवनमा स्थापी पोते समुद्र किनारे जइ घोडी रूपे रहे छे. प्रतिछायाने शनैश्चर अने भद्र नामना के पुत्र थयाः एकवार यमे बहारथी आवी प्रतिछाया पासे भोजन माग्यु, पण माए (प्रतिछायाए)न आप्यु वेथी यमे लात मारी, त्यारे प्रतिछायाए श्राप आपी, क्षय रोगी कर्यो. यमे पिताने कमु. पिताने संशय प- RECAREEKASICIANOR .
म 4 R-SCREE २० नि० उनां शानथी जोयूं तो मूळ माताने समुद्रने किनारे जोइ. त्यां जइ स्त्रीनी इच्छा नहिं छतां वात्कारे रत्नादेवी साथे क्रीडा करतां अश्विनोदेव नामना ने कुमर यया. ए बलात्कारथी रत्नादेवीए सूर्यने श्राप आपी कुष्टरोगी कों, जेबी धन्य। न्तरी पासे जवां शरीर छोलान्याथी निरोगी थयार्नु जणान्यु, तेथी देवसुतारने बोलान्यो, त्यारे सुतारे कवु के सहन करशी त्यां सुधी छोलीश, सूर्य हा कहेतां सुतार सूर्यनुं शरीर छोलवा लाग्यो परन्तु केटलाक पखत पछी सहन नहि. यतां सीत्कार कर्यों तेथी सूर्य अर्थ शरीरे छोलायलो अने वाकीना भागमां कुष्टरोगी रह्यो. वीजा कहे छे के घोडीरूप रत्नादेवी साथे वळात्कार कर्या पछी ससराने ठपको आप्यो के तमारी दिकरी मने छोडी वीजे स्थाने रहे छे. त्यारे ससराए कयु के त्हारो ताप सहन नथी यतो ते शुं करे ? जो पासे राखवी होय तो शरीर छोलावी नाख ( शेप विगत उपर प्रमाणे.) ॥ अग्नि सर्वभक्षी केम थयो ? ॥ एकवार कोइक ऋपि कोइ स्थाने जवा माटे विश्वासथी अग्निने पोतानी स्त्री सोपी बहार गयो, त्पारे कोइ बीजा ऋषिए आवी अग्निना देखतां ते स्त्री साये व्यभिचार कर्यो, त्यारवाद ते अपिए आची स्त्रीने देखतां इंगित आकारथी अनाचार जाणी अग्निने पूछतां कंइपण जवाब न आप्यो त्यारे रक्षण करवा योग्यतुं रक्षण नहि करवाथी अने पूछतां उत्तर न, आपवायी क्रोधी थयेला ऋषिए अग्निने श्राप आपी पवित्र के अपवित्र सर्व वस्तुनो भक्षी कर्यो. 3 *** १० ॥ चन्द्र कलंकी केम थयो ? ॥ अनाचारी चन्द्र देवताओना गुरु बृहस्पतिने त्यां दररोज अभ्यास करवा जता गुरुनी स्त्री उपर राग ययों आने पण थयो, ए वातनी बृहस्पतिने खबर पडतां चन्द्रने श्राप आपी कलंक वालों कर्यो. N ॥ इन्द्र हजार योनिवाळो केम थयो? ॥ एकवार गौतम मुनिने, आश्रमे इन्द्र आव्यो, ते वरखते गौतममुनि बहारः गयेला हता. इन्द्र गौतमनी सी माल्या. ने अति स्वरूप वाळी जोइ मोती बांधी क्रीडा करी, एटलापां गौतम मुनिने आवेला जाणी इन्द्र बिलाडीनु रूप लइ नासवा लाग्यो. गौतमने शक पडतां माननों उपयोग मूकी जोयुं तो इन्द्र पोतानी सौ साये अनाचार करी नासी जतो जाण्यो. तुर्तज बिलाडी रूपे नासी जता इन्द्रने श्राप आपी इन्द्रनु शरीर हजार योनिओवाडं कयु, अने पोता- ना शिष्योने इन्द्रः साथे अनाचार करवा मोकल्या पण पोते न गया. त्यारवाद देवोए पोताना स्वामि इन्द्रनी एवी दशा देखी गौतमुनीने अतिशय विनययी समजाच्या त्यारे शरीर उपर इनार योनिओने बदले हजार चक्षु का ए कारणथीज इन्द्र सहखवा नामथीं प्रसिद्ध है. 16-ERS पर हजार पोनिभोने बदले एन घंधुन नः स भगवानरयोऽपि नान्ये, साक्षान्न दृष्टतर एकतमोऽपि चषाम् श्रुत्वा वचः सुचरितं च पृथगविशेष, वीरं गुणातिशयलोलतया श्रिताः स्मः ॥ ३२॥वसंत०॥ नाऽस्माकं सुगतः पिता न रिपवस्तीर्थ्यां धनं नैव ते दत्तं नैव तथा जिनेन न हृतं किंचित् कणादादिभिः । किंत्वेकान्तजगद्धितः स भगवान् वीरो यतश्चामलं वाक्यं सर्वमलोपहत च यतस्तद्भक्तिमंतो वयम् ॥ ३३ ॥ शादुल० ॥ अर्थः-ते श्री वीरप्रभु अमारा बन्धुः नयी अने बीज़ा देवो अमारा शत्रु नयी, वळी ए देवोमांना कोई ए- क देवने पण सारी रीते प्रत्यक्ष-नजरे देखेला नथी, परन्तु जुदी जूदी जातना. विशेष परमार्थ युक्त वचन अने उ- त्तम चरित्र (सदाचार) वाळा श्री वीरने तो तेमना अतिशयवाळा (अतिश्रेष्ट) गुणो उपर अपने प्रेम थवायीज आश्रित थया छीए, ॥ ३२ ॥ अथवा बुद्ध भगवान् (श्रीवीर) कंइ अमारा पिता नथी, तेम अन्यतीर्थी देवो मारा शत्रु नथी, चंळी तेभोए जेम अमने धन आप्युं नथी तैम जिनेन्द्र देवे. पण कइ आयु नथी, तेमज कणाद वि- गरेए ( वैशेषिक मतना आचार्योप') अमारु कोइ हरी लीधुं नथी, परन्तु जे कारणयी केवळ-जगतनुं कल्याण क- रनार ते श्रीवीर भगवान ज छे, कारण के श्रीवीरनुं निर्मळ वचन-शास्त्र सर्व दोषने दूर करनारुं के ते कारणयीज अमो ते श्री वीरमभुनी भक्तिवाला छीए. RESO हितैषी यो नित्यं, सततमुपकारी च जगतः, कृतं येन स्वस्थं बहुविधरुजात जगदिदम् । कुट यस्य ज्ञेयं करतलगतं वेत्ति सकलम्, प्रपद्यध्वं सन्तः सुगतमसमं भक्तिमनसः ॥ ३४ ॥ शिख० ॥ असर्वभावेन यदृच्छया वा, परानुवृत्त्या विचिकित्सया वा। ये त्वां नमस्यंति मुनिन्द्रचन्द्र, तेऽप्यामरी संपमाप्नुवन्तिः ॥ ३५ ॥ उपजाति ॥ अर्थ:-जे वीर भगवान् हमेशां प्राणीओनुं कल्याण इच्छनारा छे. जे- जगतने निरन्तर उपकार करना छे. घणा प्रकारना व्याधिओ वडे पीडायलं आ जगत जेणे सुखी कर्यु छे, वळी जेने ज्ञेय पदार्थ साक्षात्-प्रत्यक्ष यह रहेल छे, तेथी जे भगवान हमेलीमा रहेला पदार्थनी पेठे सर्व ( ज्ञेय पदार्थने ) प्रत्यक्ष रीते जाणे. छे. अने जेना सर. खो सर्वगुणी जगतमां बीजो कोइ ( अन्यदेव ) नथी ते बुद्धने ( श्रीवीरने ) हे सजनो तमो भक्तिवाला मनथी अ- थवा भक्तियुक्त मनवाला थइ शुद्ध देवपणे अंगीकार करों ॥३४॥ हे श्रेष्ट. मुनिगणमां.चन्द्र समान श्रीवीर ! थोडा भा- वथी, अथवा संज्ञामात्रथी ( नमस्कार करवानी व्यक्त विचार न होय छतां स्वाभाविक रीते नमस्कार यह जाय तेथी), अथवा बीजानी प्रेरणाथी, अथवा नमस्कारनं फळ मळशे के नहिं इत्यादि शंकाथी पण, जे मनुष्यो तने नमस्कार करे छे ते मनुष्यो पण स्वर्गनी संपदाओ प्राप्त करे छे. अर्थात् अल्प भावादिके करेलो नमस्कार जोके श्रीव मोक्षफळ न आपे तो पण परंपराए स्वर्गनी संपदाओ आपे अने एवीज परंपराः घणो काळ चालु रहेतां भव्य जीवोने मोक्षफ- ळ पण आपे तात्पर्य छे ।। ३५॥ LI एवाज परपरा बESS लोक. १२ CARE यदा रागदेवासुरसुररत्नापहरणे, कृतं मायावीत्वं भुवनहरणासक्तमतिना । तदा पूज्यो बन्यो हरिरपरिमुक्तोऽधुवतया, विनिर्मुक्तं वीर न नमति जनो.मोहयहुलः ॥३६॥शिख०॥ त्यक्तस्वार्थः परहितरतः सर्वदा सर्वरूपं, सर्वाकारं विविधमसमं यो विजानाति विश्वम् । ब्रह्मा विष्णुर्भवतु वरदः शंकरो वा हरो वा, यस्याचित्यं चरितमसमं, भावतस्तं प्रपये॥३७मिंदाक्रान्त अर्थ:-जगतनी सार वस्तुओ हरी लेवामां आशंक्त' मुडिवाळा विष्णुए ज्यारे राग द्वेषयी दानयो अने रे. वोनां रत्न ( सार वस्तुओ ) हरवा माटे मायावीपणुं प्रगट कर्य त्यारे अधुवपणावडे नाहि मुकायेल (एटले विष्णु,प- * ण वारंवार नवा अवतार अथवा नवां मायावी रूपो धारण करनार होवायी पोते अंध्रुव) एवा विष्णु मोहवाळा पाणीओने पूजनिक अने वन्दनीक यया. कारणके जेम बाजीगर बाळकोने आश्चर्यकारी याय तेम मोहवाळा जीवोने चमत्कार देखाडनारा देव वन्दनिक पूजनिक होय, माटे एवा अति मोहवाळा मनुष्यो अधुनपणाथी रहित (माया-* वीपणाथी रहित ) श्रीवीरने नमस्कार करता नयी ॥ ३६ ॥ हवे निष्पक्षपातपणे गुणी देवने अंगीकार करवा वाटे- कहे छे के-स्वार्थ रहित, पग्नु कल्याण करवामां तत्पर, अने हमेशा अनेक रूपवाला अनेक आकारवाला विचित्र अ-F ने विषम एवा जगतने मानवडे जे संपूर्ण जाणे छे ते देव ब्रह्मा होय विष्णु होय के बरदान आपनार शंकर वार ( अथवा हरी-इन्द्र) होय, अने जेनु चरित्र अचिंत्य अने अतुल होय तेवा कोइ पण देवने हुं भावयी अंगीकार करुं हुं ॥ ३७॥ पुनः एज प्रकारनुं निष्पक्षपातपणुं आगळना श्लोकोमा जणावे ठे- १२ पक्षपातो न मे वीरे, न द्वषः कापलादिषु । युक्तिमद्वचनं यस्य, तस्य कार्यः परिग्रहः ॥ ३८ ॥ अवश्यमेषां कतमोऽपि सर्ववित्, जगद्वितकान्तविशालशासनः स एव मृग्यो मतिसूक्ष्मचक्षुषा, विशेषमुक्तैः किमनर्थपंडितैः ॥ ३९ ॥ उपजाति०॥ यस्य निखिलावदोषा, न सन्ति सर्वेगुणाश्च विद्यन्ते। ब्रह्मा वा विष्णुर्वा, हरो जिनो वा नमस्तस्मै॥४०॥आर्या०॥ अर्थ:-हवे अचिार्य पोतानी.मध्यस्थता प्रदर्शित करे छे-मारे श्री वीरमभुमा पक्षपात नयी के कपिलादि- कमां द्वेषभाव नथी, परन्तु जेनुं वचन, मने युक्तिवाडं लागे ते देवनो मारे स्वीकार करवो योग्य छे॥ ३८॥ ब्रह्मा- दिक. जे अनेक देवो छे ते सर्वमांथी सर्वज्ञ अने. केवळ जगतना कल्याण माटेज जेनुं विशाल शासन (गंभीर आ- ज्ञाओ) छे एवो तो अवश्य कोइ.एफज देव, छे, अने बुद्धिरूप सूक्ष्म चक्षुवडे ते देव कोण छे ते शोधवो जोइए. परन्तु विशेपरहित ( सामान्य जीवो, अने ए देवोंमा फेरफार न होवाथी) अथवा विशेषपणे वर्णवेला छतां अनर्थ उत्पन्न करवामां, पण्डित सरखा एवा बीजा देवो वडे. प्रयोजन छ ? ॥ ३९ ॥ जे देवमा, सर्वदोषोमांनो एक पण दोष न होय, परन्तु सर्व सद्गुणोज़ होय एवा देव चाहे ब्रह्मा होय विष्णु होय अथवा महेश्वर होय के जिन-अरिहंत होय तो तेमने पण मारो नमस्कार छ, अहिं ब्रह्मादिकने नमस्कार करवायी पण वस्तुतः श्री जिनेश्वरनेज नमस्कार जाणवो. ॥ ४० ॥ अहिं सुधीमां देवत्वादिनो उपदेश समाप्त थयो, हवे जगतनी उत्पत्ति संबन्धमां. जे विविध प्रकारना मतभेद छे ते दर्शावे छे. लोकतत्व ग्रंयनो वास्तविक मारंभ पण हवे ज थाय छे. SCREEN %154 कोक. । अथ लोकादितवत्रये प्रथम लोकतत्त्वम् ॥ (आर्यावृत्तानि) लोकक्रियात्मतत्वे, विवदन्ते वादिनो विभिन्नार्धं । अविदितपूर्व येषां, स्यादाविनिश्चितं तत्वम् ॥४१॥ इच्छन्ति कृत्रिमं सृष्टि-वादिनः सर्व एवमिति लोकं । कृत्स्नं लोकं माहेश्वरादयः सादिपर्यन्तम् ॥४२॥ नानीश्वरजं केचित् केचित्सोमाग्निसंभवं लोकं । द्रव्यांदिपविकल्पं, जगदेतत् केचिदिच्छन्ति ॥४३॥ MOREA अर्थ:-जेओए प्रथम स्याद्वादवडे निर्णित ययेलं सत्व जाण्यु नयी तेवा ( स्यादाद तत्वने नहि जाणनार.) वादीओ जगत्-क्रिया-अने आत्मतत्वना संबन्धमा भिम भित्र अर्थ विवाद करे छे ते आ पमाणे-॥४१॥ सृष्टिवादीओ ( जगतनो कर्ता माननारा) सर्व जगतने कृत्रिम (कोइए पण बनाषेलं छे एम) माने छे. अने: माहेश्वरादि मतवाला समस्त जगतने सादिसान्त (सृष्टीनो उत्पन्न करनार छे तेम कोइ. विनाश करनार पण छे एम.) माने छे ॥ ४२ ॥ केटलाएक आ जगतः इश्वरन बनावेलु नहिं एम माने थे, केटलाएक आ जगतने चन्द्र अने अग्निथी. उत्पन्न ययेलं माने छे, अने केटलाएक द्रव्यादि ६ भेदवाळु आ जगत माने छे. ए द्रव्यादि ६ मेदवाळ जगत क- या दर्शनवाळा, माने छे ? अने ते द्रव्यादि ६ भेद कया ? तेनी स्पष्टता आगळना श्लोकयी करे . ॥ ४३ ॥ १३ + म आदिवाळु ( प्रथम मनुष्य उत्पन्न थयो त्यारबाद अनुक्रमे वीजा पदार्थों उत्पन्न SH द्रध्यगुणकर्मसामान्य-युक्तिविशेषाद(न)कणाशिनस्तस्वम् । वैशेषिकमेताव-जगदप्येतावदेतावत् ॥४४॥ इच्छन्ति काश्यपीयं, केचित्सर्वं जगन्मनुष्याग्रं । दक्षप्रजापतीयं, श्रेलोक्य केचिदिच्छन्ति ॥ ४५ ॥ केचित्माहुर्मूर्ति-स्त्रिधा गतका हरिः शिवो ब्रह्मा । शंभुर्षीज जगतः, कर्ता विष्णुः क्रिया ब्रह्मा ॥४६॥ अर्थ:-वैशेषिक दर्शनना आचार्य कणादनां तत्त्व द्रव्य-गुण-कर्म-सामान्य-समवाय-अने विशेष ए भेदोयी ६ है. अथवा मूळ गाथामां "विशेषान्' पाठ होय तो अर्थ ए थाय के-कणादो (एटले वैशेषिक दर्शनवाळाओ) द्रव्य-गुण -कर्म-सामान्य-समवाय-अने विशेष ए६ने तत्व व माने , जेपीए वैशेषिकदर्शन आटला भगतने पण एटलाज तत्ववाळु माने छे, ॥४४॥ केटलाएक आ जगतने काश्यप नामना ऋषीयी पेदा ययेलं माने छ. केटलाएक आ.सर्व जगतने मनुष्यनी दक्ष नामना प्रजापतिथी उत्पन्न थयेलं माने छे ॥ ४५ ॥ केटलाएक कहे छे के एक प्रकारनी मूर्ति विष्णु महादेव अने ब्रह्मा एम त्रण प्रकारनी बनेली छे, तेमां जगतनुं कारण महादेव, कर्ता विष्णु, अने क्रिया ब्रह्मा छे. . m थइ. शके छे. अहिं " युक्ति" नो अर्थ अर्थ ". समवाय द्रव्य-गुण-कर्म सामान्य-विशेष-अने-समवाय ए ६ तत्व पैशेषिकमतमा छे. अने केटलाएक अभावने सा- तर्मु तत्व कहे के. नैयायिक अने वैशेषिकदर्शन अमुक तफावत सिवाय लगभग सरखं छे. । SEAS- १४ वैष्णवं केचिदिच्छन्ति, कचित् कालकृतं जगत् । ईश्वरप्रेरित केचित् केचिद् ब्रह्मविनिर्मितं ॥ ४७ ॥ अव्यक्तप्रभवं सर्व, विश्वामिच्छन्ति कापिलाः । विज्ञप्तिमात्रं शून्य च, इाते. शाक्यस्य निश्चयः ॥ १८ ॥ पुरुषप्रभवं केचिद्, दैवात् कोचित् प्रभावतः। अक्षरात् क्षरित केचित्, केचिदंडोहवं जगत् ॥ ४९ ॥ यादृच्छिकमिदं सर्व, केचिद् भूताविकारज । केचिचानेकरूपं तु, बहुधा संप्रधाविताः ॥ ५० ॥ अर्थः केटलाएक आ जगतने विष्णुयी बनेंल, केटलाएक काळधी बनेलं, केटलाएक. इधरनी प्रेरणावाळ (इश्वरनी प्रेरणा विना एक पांदडं पण न हाले ए, ), अने केटलाएक ब्रह्मान बनावेल माने छः ॥ ४७ ॥ कपि- (सांख्य ). मतवाला आ जगतने अव्यक्तथी (प्रकृतिथी) उत्पन्न थयेलुं माने छे. अने शाक्यमतनो निर्णय एवो छे के आ जगत् विज्ञान मात्र (जाणवा मात्र) अने शून्य (जे देखाय छे ते कंइ नहि एबुं) छे।। ४८॥ केटलाएक आ जगतने आत्माथी उत्पन्न थयेलं, केटलाएक देवना प्रभावधी उत्पन्न ययेलु, केटलाएक अक्षरमांथी' (ब्रह्मांधी) खरेलु अने केटलाएक इंडाकारमांयी उत्पन्न ययेलं माने छ; ॥ ४९ । केटलाएक आ जगतने यादृच्छिक ( अतर्कित-- अकस्मात ) उत्पन्न ययेलं, केटलाएक पंचभूतना विकारथीं थयेल, अने केटलाएक अनेक रूपवाळ माने छे, एम जग तनी उत्पत्तिमां अनेक मतवादीओ.अनेक विचारमा दोड़ेला छे. सत्व, रजस्, अने तमो गुणनी तुल्यता ते प्रकृति. ए प्रकृतिथी बुद्धि, बुध्धिथी. अहंकार, अहंकारधी स्पर्शादि १६ मो गण, अने गणमांना स्पर्शादि पांचमांथी पंचभूत पेदा था जगतनी रचना शायति in ar वैष्णव मतमा जगतनुं स्वरूप आ रीते क{ .- जरले विष्णुः स्थले विष्णु,राकाशे विष्णुमालिनि । विष्णुमालाकुले लोके, नास्ति किंचिदवैष्णवम्॥५१॥ सर्वतः पाणिपादान्त, सर्वतोअक्षशिरोमुखं । सर्वतः श्रुतिमान् लोके, सर्वमाश्रित्य तिष्ठति ॥ ५२ ।। उध्वमूलमघः शाख-मश्वत्थं प्राहुरव्ययं । छन्दांसि यस्य पत्राणि, यस्तं बेचि स वेदवित् ॥ ५३॥ ' अर्थ:-विष्णुमतवाला कहे छे के जमा विष्णु ( आत्मा.), स्थळमां विष्णु अने आकाना पण विष्णु छे. विष्णुना समूहथी व्याप्त थयेला आ जगतमा विष्णु सिवाय बीजुं कंइ नयी, अहिं तात्पर्य ए के सर्व जगत् विष्णुमय छे, जेथी विष्णुयी व्यतिरिक्त (जूदु ) जगत नयी. अर्थात् आखं जगत् विष्णु स्वरूप छे ।। ५१ ॥ सर्व बाजुर (सर्वत्र) जेना हायपगना छेडा ( एटले हायपग) छे, सर्व बाजुए नेत्र मस्तक अने मुख छ, सर्व बाजुए जेना कान छे, अने जे सर्व पदार्थमां आश्रय करी रहेला छे एचा विष्णुवालु आ जंगत छे ॥ ५२ ॥ महात्माओ ब्रमने उपर मून अने नीचे शाखावाला अविनाशी पीपळातुल्य (अर्यात् वृक्षरूप पीपळानां मूळ नीचे अने शाखा,उपर होय छे, अने विनाश स्वभावी होय छे, पण आ ब्रह्मरूप पीपळो तो उपर मूळ अने नीचे शाखावाको अने अविनाशी स्वभाववाळो) कहे छे, के जे ब्रह्मरूप पीपलानां पत्र वेदमन्त्र छे, तेवा ब्रह्मने जे जाणे ते वेद जाणनार (सर्व पदार्य जाणनार) कहेवाय, अने ए पेदनो जाणनार ते आ भगवनी जाणनार कहेवाय ए तात्पर्य,
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पुराणमा जगतनी उत्पत्ति आ रीते कही छे.-
तस्मिन्नेकार्णवीभूते, नष्टस्थावरजंगमे । नष्टामरनरे चैव, प्रनष्टोरगराक्षसे ।। ५४ ॥
केवलं गव्हरीभूते, महाभूतविवजिते । अचिंत्यात्मा विभुस्तत्र, शयानस्तप्यते तपः ॥ ५५ ॥ युग्मम् ॥
तत्र तस्य शयानस्य, नाभौ पनं विनिर्गतम् । तरुणार्कमंडलनिभं, हृचं कांचनकर्णिकम् ॥ ५६ ॥
तस्मिंश्च पद्मे भगवान्, दंडकमंडलुयज्ञोपवीतमृगचर्मवस्त्रसंयुक्तः ।
ब्रह्मा तत्रोत्पन्नस्तेन जगन्मातरः सृष्टाः ॥ ५७ ॥ आर्याभेद ॥
अर्थः-ते जगत प्रलयकाळमां ज्यारे एक समुद्ररुप थइ जाय छे ( सर्वत्र जळाकार थाय छे ) अने स्थावर तथा
बस प्राणीओ नाश पामे, देव अने मनुष्यो नाश पामे, सर्प अने राक्षसो नाशपामे अने तेम थवाथी महाभूत (पृथ्व्या-
दि स्थूळपदार्थों) रहित यतां ज्यारे केवळ आ जगत एक पोली गुफा सरखं थाय त्यारे न कळी शकाय एवा आत्मा- (
वाळा विष्णु त्यां (समुद्रमा) सूता सूता दप करे ॥ ५४॥ ५५ ॥ त्यां समुद्रमा मतेला विष्णुनी नाभीमांयी म-
ध्यान्हना सूर्यमंडळ सरखं तेजवाळु मनोहर अने सोनानी कणिकावाळु कमळ निकळयु, ॥ ५६ ॥ अने ते कमळमाथी
दंड कमंडल जनोइ मृगचर्म अन वन सहित भगवान ब्रमा उत्पन्न यया ते ब्रह्माए जगतनी माताओ ( आगळना श्लो-
कमां कहेली) उत्पन करी ॥ ५७ ॥
ब्रह्माएं उत्पन्न करेली माताओथी बनेल जगत आरीते- अदितिः सुरसंघानां, दितिरसुराणां मनुमनुष्याणां । विनता विहंगमानां, माता विश्वप्रकाराणाम्॥५॥ कद्रूः सरीसृपाणां, सुलसामाता तु नागजातीनां । सुरभिवतुष्पदानां, इला पुनः सर्वयोजानाम्।।५९यु प्रभवस्तासां विस्तर-मुपागतः केचिदेव मिच्छन्ति । केचिदन्स्यवर्ण, मुष्टं वर्णादिभिस्तेन ॥ ६. ।। कालः सृजति भूतानि, कालः संहरते प्रजाः । कालः सुप्तेषु जागति, कालो हि दुरतिक्रमः ।। ६१ ॥ अर्थः-देवसमूहनी माता अदिति, असुरोनी माता दिति, मनुष्योनी माता मनुरूपि, सर्व जातिना पक्षीओनी माता विनता, सोनी. माता कद्र, नागज़ातनासपोनी माता मुलसा, पशुओनी माता मुरभि, अने सर्व धान्यादिक बीजोनी माता पृथ्वी ॥ ५९ ॥ ए प्रमाणे ते माताओमाथी उत्पन्न थएल जे देव विगेरे तेनोज विस्तार पाम्यो छे, (अने तेथी आ जग- त बन्यु ए तात्पर्य छे) एम केटलाएक मतवाला माने छे. अने केटलाएक तो एम माने छे के प्रथम आ जगत क्षत्रिया. दि वर्णविभाग विनानुं इतुं ते जगतने तेणे (ब्रह्मादिकमांथी कोइए) वर्णव्यवस्थावालुं वनाव्यु, पण नवु जगत पनाम्यु एम नहिं अहिं माता एटले जेमांधी जेनी उत्पत्ति ते तेनी माता जाणवी. ॥ ६०॥ काळबादीओ कहे के के के काळ भूतोने (पृथ्व्यादि तत्वोने ) बनाये छे, काळ प्रजानो (पृथ्व्यादिनो) नाश करे छे, अने सुतेलाओमां पण काळ जाने के (अर्थात् माणिओ उघता होय पण ते पाणीओनों काळ तो पोतार्ने कार्य करतोज रहे है) माटे काळ निश्चय उलंघन करवा योग्य नथी ॥२॥ पापण ते अने चन्द्र - सूर्य - अग्नि - पृथ्वी - जळ - वायु - यजमान - अनजान ए आठ रूपवाळो इश्वर शान्ति मुखमा मग्न . यये- GO G छोक. १६ प्रकृतीनां यथा राजा, रक्षाथामह चोचतः। तथा विश्वस्य विश्वात्मा स जागनि महेश्वरः॥ ६२॥ अन्यो जंतुरनीशोऽयमात्मनः सुखदुःखयो । इश्वरप्रेरितो गच्छेत, स्वग वा श्वभ्रमेव च ॥ ६३ ॥ सूक्ष्मोचिंत्यो विकरणगणः सर्ववित् सर्वकर्ता, योगाभ्यासादमलिनधिया, योगिना ध्यानगम्यः । चन्द्राग्निक्षितिजलमरुत्दीक्षिताकाशमूर्ति-ध्येयो नित्यं शमसुखरतरिश्वरः सिद्धिकामैः ॥ ६४ ॥ RECE अर्थ:--वळी इश्वरवादिओं कहें छ के जेम आ लोकमां प्रजाना रक्षणमाटे राजा प्रयत्नवाळो छे, तेम आ जगतना रक्षणमाटे ते जगतनो आत्मा महेश्वर जागे हैं (अर्यात -जगत महेश्वरनी प्रेरणायी चाले छे)॥ ६२ ॥ कारणके पोताने मुख अयवा. दुःख आपवामां असमर्थ एवो आ बीजो (महेश्वर सिवायनो बीजो) नीव इश्वरनी प्रेरणाथीन स्वर्गमा के नरकमा जड शके के.. ॥ ६३ ॥ बळी इश्वरवादी एम पण कहे छ के सूक्ष्म (इन्द्रियोंने अगोचर ), अचिंत्य, न्द्रियरहित, सर्वज्ञ, सर्वकर्ता, योगना अभ्यासयी निर्मळ धुरिवाळा योगीभोवडे ध्यानयीज ओळखवा योग्य, ला मोक्षनी इच्छावाला पुरपोए निरन्तर ध्यान करपा योग्य छे. (वात्पर्य के चन्द्रादिवालं जगत इश्वरथीन बनेलं है).
ब्रह्मवादीओ आ समाणे कई छे- आसीदिदं तमोभूत-मप्रज्ञातमलक्षणं । अप्रतक्र्यमविज्ञेय, प्रसुसमिव सर्वतः ॥ ६ ॥ ततः स्वयंभूभगवा-नव्यक्तो व्यंजयन्निदं । महाभूतादितौजाः, प्रादुरासीत्तमोनुदः ॥६६॥ लोकानां स च वृष्य, मुखवाहरुपादतः । ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्य, शुद्धं च विन्यवर्तयत् ॥ १७ ॥ अर्थ:-- पहेलो आ जगत् अंधकारमय, नहि जाणी काय ए, लक्षण रहित, तर्कमा ( विचारमा ) न आवी शके एवं, नहिं जाणवा योग्य ( जेमां कोई जाणवा जेवी वस्तु नहिं एवं), अने सर्वबाजुए जाणे सइ गयेल होय एवं हतुं ॥६५॥ त्यारपछी कोइक वखत अव्यक्त ( स्पष्टपणे उपलब्ध न यई शके एवा) स्वयंभू भगवान् (ब्रह्मा) के जेनुं तेज महाभून विगेरेथी ढंकायलं हतुं ते भगवान अंधकारनो नाश करता प्रगट थया ( अर्थात् स्वयंभू भगवाने महाभूतादि आवरण दूर करी पोतानु तेज प्रकाशित कयु ॥ ६६ ॥ त्यारवाद ते स्वयंभू भगवाने (ब्रह्माए ) लोकनी वृद्धि करवा माटे ( मनुष्यसृष्टि बनायवा माटे) पोताना मुखमाथी ब्राह्मणो उत्पन्न कर्या, भुजामांथी क्षत्रीओ उत्पन्न कर्या, सायकमांथी वैश्य उत्पन्न कर्या, अने पगमांथी शूद्र उत्पन्न कर्या, (६०मी गायामां जे उत्पन्न धयेली अवर्ण सृष्टिने ब्रह्माएं वर्णादि विमाग सहित करवा कयु छे ते आ जण लोकना भावयी स्पष्ट धप ). S णमां जे स्पर्शादि पांच छे तेमांयी दरेकमांधी एकेक भूत ( तत्त्व ) उत्पन्न यवाथी पांचमांयी पांचभत नाग- ल १७ CRESCREKHA ar सांख्यमतवाळा आ प्रमाणे कहे छ- पंचविधमहाभूतं, नानाविधदेहनामसंस्थानं । अव्यक्तसमुत्थान, जगदेतत् केचिदिच्छान्ति ॥ ६८ ॥ सर्वगतं सामान्य, सर्वेषामादिकारणं नित्यं । सूक्ष्ममलिंगमचेतन, मक्रियमेकं प्रधानाख्यं ॥ ६९॥ प्रकृतेमहांस्ततोऽहंकारस्तस्माद् गणश्च षोडशकः। तस्मादपि षोडशकात्, पश्चेभ्यः पंचभूतानि ॥ ७० ॥ अर्थ:-आ. जगत् पांच प्रकारना (पृथ्वी-जळ-अग्नि-वायु-अने. आकाश ए पांच महाभूत ) मूळ तत्त्वो अनेक प्रकारनां शरीर ( रूप.) नाम अने आकारवाळु [कारणके आ जगतना पदार्थोनू रूप नाम अने आकार नियमित नपी), अव्यक्तथी-प्रकृतिथी (सांख्यदर्शनमा प्रकृतिनां अव्यस्त भने प्रधान एवां वे पर्या- य नाम के तेथी ] उत्पन्न ययेलं छे, एम केटलाएक (सांख्यदर्शनीमो) माने छे ॥ ६८ ॥ अध्यक्तनुं स्वरूप कहे छ के-ते अव्यक्त (प्रकृतिः) जगतमां सर्वव्याप्त, सामान्य (सर्वनी उत्पत्तिमा साधारण कारण), सर्वभूतोर्नु आदिकारण ( मूळ ), नित्य, सूक्ष्म, लिंग [ ओळखपानी निशानी ) रहित, अचेतन, क्रियारहित, अने एकज . ॥६९॥ ते प्रकृतिथी महान् (एटले बुद्धि), महान्थी अहंकार, अने अहंकारमांपी स्पर्शादि १६ नो गण (स्पर्शादि ६ इन्द्रिय, स्पर्शादि ५ विषय, गुदा, लिंग वचन, हाय, पग, ५ कर्मेन्द्रिय, अने मन)उत्पन्न याय छे, सत्वगुण, रजोगुण,अने तमोगुणमी जे.समावस्था ते अव्यक, प्रधान, अथवा प्रकृति कहेवाय. (पडदर्शनसमुशये). १७ + गंध - शब्द - अने स्पर्शः ) .५ . भूत , अने पुरुष ए .२५ तत्व कमां जे मूळप्रकृति ( अव्यक्त अयवा जास् . आदि गुणना विकारो ते विकृति छे , अने गुण रहित केवळ मूलप्रकृतिरविकृतिमहदाद्याः प्रकृतिविकृतयः मस।पोदशकश्च विकारो, न प्रकृतिर्न च विकृतिः पुरुषः॥७॥ गुणलक्षणो न यस्मात् कार्यकारणलक्षणोऽपि ना यस्मात् । तस्मादन्यः पुरुषः, फलभोक्ता चेत्यकर्ता चा॥७२॥ अर्थ:-सांख्यदर्शनमां प्रकृति, घुद्धि, अहंकार, ५ मुरीन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, १ मन, ५ तन्मात्रा ( रूप-रस- प्रधान एवो. पर्याय नामवाळी) ते कोइनो विकार नथी, कारण के कोइ पदार्थनु रूपान्तर नथी, अथवा जेनी उत्प- त्ति होय ते विकार कहेवाय. माटे प्रकृतिनी उत्पत्ति नहि होवायी प्रकृति. ए विकार नथी, तया बुद्धि, अहंकार, ने ५ महाभूत ए सात तत्व बीजां तत्वोनु कारण होवायी प्रकृति अने कार्यरूप होवायी विकृति पण छे, अने १६ नो गण तो केवळ विकृति-विकार ज छे, अने ए सर्वधी भिन्न पुरुष-आत्मा तो प्रकृति नयो तेम विकृति पण नयीं, ॥१॥ पुरुष ए प्रकृति नथी अने विकृति पण नथी तेनुं कारण कहे जे-जे कारणयी आत्मा सत्वादि गुणरहित होवाथी गु. णवालों नयी. कारणके सत्वादि गुण तो प्रकृतिनो धर्म छे पण पुरुषनों नहि. वळी जे कारणयी अविकृत होवायी कार्यवाळो नथी, अने प्रकृत्यादि २४ तत्वोत्पत्तिमां कारणवाळो नथी, ते कारणथी फळनो भोक्ता (वास्तविक रीते अभोक्ता पण उपचारथी भोक्ता ) अने पुण्य पापनो करनार नहि होवायी अकर्ता (कारणके कर्ता तो प्रकृतिज , अने पुरुष नो तृण पण वांकु वाळवा असमर्थ छे माटे अकर्ता) एवो पुरुष-आत्मा पूर्वोक्त २४ तत्वोथी अन्य जुदों के. आत्मा ते पुरुष छ, माटे पुरुष ए प्रकृति नर्हि तेम विकृति पण नहिं ५ तात्पर्य जान लि १८ -SACitya प्रवर्तमानान प्रकृतेरिमान् गुणान् , तमोस्तत्वादिपरीतचेतनः। अहंकरोमीत्ययुधोऽपि मन्यते, तृणस्य कुब्जीकरणोप्यनीश्वरः ॥ ७३ ।। विज्ञप्तिमानमेवैतत्, असमर्थाऽवभासनात् यथा । तैमिरकस्येह, कोशकीटादिदर्शनम् ॥४४॥ क्रोधशोकमदोन्माद, कामदोषाधुपद्रुताः । अभूतानि च पश्यन्ति, पुरतोऽवस्थितानि च ॥ ७६ ॥ अर्थ:--पुनः प्रकृति अने विकृतिथी पुरुषनीभिन्नता स्पष्ट करे छे-तमोगुणवडे अथवा अज्ञानरुप अंधकारवडे आ- वृत थवाथी (ढंकावाथी) जेनुं ज्ञान विपरीत-उलटुं थइ गयुं छे. एवो चेतन (पुरुप-आत्मा) जे एक तृणं मात्रने पण कुब्ज करवाने(वांकु वाळवाने)असमर्थ थे, तोपण अज्ञानी आत्मा “हुँ करुंछ" एम माने छे. ए प्रमाणे सांख्यदर्शनमा आ जगतने प्रकृतिथी उत्पन्न थयेलु २५ तत्ववाळु माने छ ए तात्पर्य है ॥ ७३ ॥ हवे वौद्धमतवाळा जगतनी उत्प- त्ति आ प्रमाणे कहे छे के-जेम आँखे अंधारीयां आववाथी भ्रमयी कोशकीडा (कीडानी कोइक जाती विशेष ते कोशकीडा) विगेरे दर्शन थाय छे तेम असमर्थज्ञानथी (जगतने जाणवा जेवू पूर्ण समर्थ ज्ञान. नंहि होवाथी) आ जगत विज्ञानमात्र रुपे (ते पदार्थ नहिं छतां ते पदार्थ जोउँछु एवा रुपे) देखाय छे. परन्तु वास्तविक कइ नथी. ॥ ७४ ॥ कारणके क्रोध, शोक, मद, उन्माद, काम विगेरे दोपोथी पराभव पामेला-भ्रमवाळा ययेला जीवो अभूतोने ( अवस्तुओने ) पण पोतानी सन्मुख रहेली वस्तुओरुपे देखे छे. तात्पर्य ए के के जगत कई नहिं होवा छतां पण भ्रमयी आ वस्तु जगत के एम देखे थे. ॥ इति विविधमते लोकस्वरूपम् ॥ १८ R-CAREE R and M ॥ अथ आत्मतत्त्वम् ॥ पुरुषवादीओ जगत्नी उत्पत्ति आ प्रमाणे कहे छे. पुरुप एवेदं सर्व, यद्भूतं यच्च भाव्यं । उतामृतत्वस्येशानो, यदन्नेनातिरोहति ।। यदेजति योजति, यद्दुरे यदु अतिके, यदंतरस्य सर्वस्य यदु संवस्यास्य बाह्यो, यस्मात्परं नापरमस्ति किंचिद्यस्मान्नाणीयो, न ज्यायोऽस्ति कश्चिद् वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्ण पुरुषरूपेण, सर्व एक एव हि भूतात्मा, तदा सर्व प्रलीयते ॥१॥ दावेव पुरुपौ लोके, क्षरधाऽक्षर एव च ॥ क्षरश्च सर्वभूतानि, कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥२॥ अर्थः-जे थयेलु छे, जे थवानुं छे, अथवा मोक्षपणानो अधिपति, अने जे अन्नवडे वृद्धि पामे छे ते सर्व आ- त्मा ( एक ब्रह्म ज) छे. जे हाले छे (त्रस छ), जे हालतो नथी एटले स्थावर छे, जे दूर छे, जे नजीक छे, जे आ स- बेनी अंदर छे, जे आ सर्वनी बहार छे, जेनाथी कोइ उत्कृष्ट नथी, जेनाथी कोइपण नानो नथी,जेनाथी कोइ मोटो नथी, अने ( विराटरूप होवाथी ) आकाशमां वृक्षनी माफक जे एक स्थिर रहे थे, तेज एक आत्माना रूप वडे आ सर्व जगत् पूर्ण भरेलं छे. जगतमां ज्यारे ए एकज भूतात्मा ( पुरुषरूप ) होय छे, त्यारे बीजुं सर्व (पृथ्व्यादि रूपान्तर तत्वो) ए आत्मामां लय पामी जायं छे ॥ १॥ कारणके लोकमां क्षर अ- ने अक्षर ए वेज पुरुष छे, त्यां सर्वं भूत (पृथव्यादि पांच महातत्त्वो) क्षर पुरुष छे, अने इश्वर अक्षर पुरुष कहेवाय छे. ॥२॥ A नि० १९ बीजा 'आत्मवादीओ आ प्रमाणे कहे छे- विद्यमानेषु शास्त्रेषु, श्रियमाणेषु वक्तृषु । आत्मानं ये न जानन्ति, ते वै आत्महता नराः ॥३॥ आत्मा वै देवता सर्वे, सर्वमात्मन्यवस्थितं । आत्मा हि जनयत्येप, कर्मयोग शरीरिणाम् ॥ ४ ॥ आत्मा धाता विधाता च आत्मा च, सुखदुःखयोः। आत्मा स्वर्गश्च नरकश्च, आत्मा सर्वमिदं जगत् ॥५॥ अर्थः-शास्त्रो विद्यमान होय, अने वक्ताओनो (उपदेशकोनो) पण संयोग बने छतां जे जनो आत्माने ओ- ळखता नथी ते जनो खरेखर पोताना आत्मावडे पोतेज हणायला जेवा छै ।। ॥ आत्मा एज सर्व देवो छे ( अर्याद ब्रह्मादि सर्व देवनु देवत्व आत्मामा छे ) कारण के आत्मामांज सर्व ( ब्रह्मादि देवत्व विगेरे ) रहेल छे, अने जीवोने कर्मनो संबंध पण आ आत्माज कराने छे. ॥४॥ आत्मा एज धाता (ब्रह्मा) अने सुख दुःखनो विधाता (करनार) पण आत्मा छे, स्वर्ग ते आत्मा अने नरक ते पण आत्मा छै, विशेष | कहेवू ! आ सबै जगत ते आत्माज छे ॥ ५॥ १ जे धर्म आत्मानुं अस्तित्व मानतो होय तेज आत्मवादी कहेवाय एवो अहिं संबंध नहि, पण जे धर्म अन्य इश्वरनुं कर्तापणुं नहि स्वीकारी आत्मा पोतेज कर्ता भोक्ता छ एम स्वीकारे ते अहि ( चाल प्रकरणमां ) आत्मवादी जाणवो. १९ FRESH
स्वयंभू
"
शब्द
बनाव्यों
छे
.
॥७
॥
आ
आत्माने
शस्त्रो
छेदी
शकतां
नथी
,
अग्नि
बाळी
शकतो
.
नथी
:
जळ
भी-
न कर्तृत्वं न कर्माणि, लोकस्य सृजते प्रभुः । स्वकर्मफलसंयोगः, स्वभावाविप्रवत्तते ॥ ६ ॥
आत्मज्ञानस्वभावेन, स्वयं मननसंभवात् । स्वकर्मणश्च संभूतेः स्वयंभूर्जीव उच्यते ॥ ७॥
नैनं छिंदति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकः । नचैनं क्लेदयन्त्यापो, न शोषयति मारुतः ॥ ८ ॥
अर्थ:-परमेश्वर आ लोकन कर्तापणु करतो नयी (अर्थात् परमेश्वर जगत् वनावतो नधी), तेम कर्मोने पण बना-
वतो नयी,, परन्तु सर्वे जीवोना पोतपोताना कर्मना फळनो संयोगज स्वभावधी प्रवर्त छ, अर्थात जीव करेला कर्मनो-
एको स्वभाव छ के तेवा तेवा प्रकारनी जीवप्रवृत्तिओ प्रवर्तती रहे, एमां इश्वरनो संबंध कइ नयी ॥६॥ आत्मज्ञान-
ना स्वभाववडे ( आत्मामां ज्ञान स्वभावेज रहेलं होवाथीं), अने ते ज्ञानवडे पोतानेज मनन करवानो (विचार कर-
वानो) संभव होवार्थी, अने पोतानां कर्मने उत्पन्न करवायी आ . जीव-आत्माज स्वयंभू कहेवाय 2. आ स्वयंभूश-
ब्दना अर्थ माटे श्लोकमां त्रणवार "स्वयं” अने त्रणवार भू धातु ( थी बनेला शब्द भाव-भव-ने भूति) कह्यो छे, जे-
जावी शकतो नथी अने पवन शोषी (सुकावी.)शकतो नथी, ॥ ८॥
लोक, नि अछेद्योऽयमभेषोऽयं, निरुपाख्योऽयमुच्यते । नित्यः सततगः स्थाणु-रचलोऽयं सनातनः ॥९॥ सोऽक्षरः स च भूतात्मा, संप्रदायः स उच्यते । स प्राण स परं ब्रल, स हंसः पुनपश्च सः ॥१०॥ नान्यस्तस्मात्परो दृष्टा, श्रोता मन्ताऽपि वा भवेत् । न कर्ता न च भोक्ताऽस्ति, वक्ता नैव च विद्यते ११ अर्थः-माटे आ आत्मा छेदाय नहि, भेदाय नईि, उपनाम रहित (उपाधियी थयेलां देव-नारंक इत्यादि नाम रहित ), नित्य, निरंतर ज्ञानवडे सर्व पदार्थोमां गति करनार, स्थिर, अचल, अने सनातन-शाश्वत कहेवाय छ. ॥ ॥ ए आत्माज अक्षर (अविनाशी), पंचभूत रूप, संप्रदाय रूप, प्राणल्प, परब्रह्म ररूप, हंस अने पुरुष (वि- राट पुरुप ) कवाय छे. ॥ १०॥ माटे जोनार, सांभळनार, विचार करनार, कर्ता, भोक्ता, के वक्ता ए आत्माशी वीजो श्रेष्ट कोइ नथी. अर्थात् आत्माज श्रेष्ट जोनार सांभळनार इत्यादि छे, ॥१॥ ए प्रमाणे प्रात्मवादीओ आत्मानु स्वरूप माने छे. २० ॥ इति विविधमते आत्मतत्वम् ॥ AnAmarika ॥ अथ कर्मतत्त्वम् ॥ कर्मवादीओ आ प्रमाणे कहे छे- चेतनोऽध्यवसायेन, कर्मणां संनिबध्यते । ततो भवस्तस्य भवे, त्तदभावात् परं पदम् ॥ १२ ॥ उद्धरेद्दीनमात्मानं, नात्मानमवसादयेत् । आत्मनैवात्मनो बंधु-रात्मैव रिपुरात्मनः ॥ १३॥ सुतुष्टानि च मित्राणि, सुक्रुद्धाश्चैव शत्रवः। न हि मे तत्करिष्यन्ति, यम पूर्वकृतं मया ॥ १४ ॥ अर्थ:- हवे कर्मवादीओ कर्मनु स्वरूप केवी रीते प्रतिपादन करे छे ते कहेवाय डे-चेतन पोवाना अध्यवसा- यो ( मनना परिणामो) वडे कर्मथी बंधाय छे, ते कारणथी आत्माने संसार प्राप्त याय छे, अने ते कर्मबंधना अथवा संसारना अभावथी आत्मा परमपद-मोक्ष मेळवे छे, ॥१२॥ माटे आत्माए कर्मयी दीन-दुःखी एका पोतानो उद्धार कर- वो, अने पोताने कर्मथी दुःखवाले न करवो, कारणके आत्मा एज आत्मानो एंटले पोतेज़ पोतानो बंधु, अने पोतेज पोतानो शत्रु छ, माटे पोतानो उद्धार करवो के अधोगति करवी पोतानाज- हायमा छ, ॥१३॥ कबुछ के--जो में पूर्व तेवा प्रकारच् जे सुख दुःख संवन्धि कर्म कर्यु नथी तो अति तुष्ट थयेला मित्रो अने अति क्रोध पामेला शत्रु- ओ मने ते सुख दुःख नहि करी शके ॥ १४ ॥ . PEO EURESS लोक' २१ Reso नि० XX शुभाऽशुभानि कर्माणि, स्वयं कुर्वन्ति देहिनः । स्वयमेवोपकुर्वन्ति, दुःखानि च सुखानि च ॥ १५ ॥ बने रणे शत्रुजलाग्निमध्ये, महाणवे पर्वतमस्तके वा। सुप्तं प्रमत्तं विषमस्थितं वा, रक्षन्ति पुण्यानि पुराकृतानि ॥ १६ ॥ स्वच्छंदतो नाह धनं न गुणो न विद्या, नाप्येव धर्मचरणं न सुख न दुःखम् । आरुह्य सारथिवशेन कृतान्तयानं, दैवं यतो नयति तेन पथा व्रजामि ॥ १७ ॥ अर्थ:-जीवो शुभ अथवा अशुभ कर्म पोतेज करे छे, अने तेथी दुःख अथवा मुख पोतेज भोगवे छे. ॥१५॥ व- नमां (वनस्पतिवाळी अटवीमा), रणमां (रेतीचाळा अथवा वनस्पति विनाना उज्जड भागमां), शत्रुना समूहमां, जळमां (नदी आदिक जळाशयोमा), अग्निमां, महासमुद्रमां, अथवा पर्वतना शिखर उपर रहेलोजीव सूनो-उंघतो होय, प्रमा- दी (शुद्ध) होय, अथवा विषम स्थितिमां (भयंकर स्थितिमा) होय तोपण पूर्वे करेलां पुण्य जीवनुं रक्षण करे छे. ॥१६॥ कोइ उपदेशक कहे छे के-धन, गुण विद्या, सदाचार, सुख के दुःख ए कंइ पोतानो इच्छाए जीवने केइ करी शकतां नथी ते कारणथी (ए प्रमाणे धनादि जीवने कंइ नहिं करी शकतां होवाथी) सारथीना वशवडे हुं यमनी पा- लखी ( टाठडी) उपर बेसी दैव जे मार्ग लइ जाय ते मार्गे ९ जाउं छु, ( अने जो धन विगेरे जीवने कई करी शकतां होत तो धन विगेरे वणु: मेळव्या छतां ते धन विगेरेए मने मरणयी केम न बचाव्यो ? तात्पर्य के -घj धन-गुण-विद्या-धर्माचरण • मुख के दुःख भले मेळवो, परन्तु आ जीव पूर्वकर्मना फळवी बचतो नवी ॥ १७॥ INE २१ HAG
रिक
यथा यथा पूर्वकृतस्य कर्मणः, फलं निधानस्थमिवोपतिष्ठते ।
तथा नया तत्प्रतिपादनोंचता, प्रदीपहस्तेव मतिः प्रवतते ॥१८॥
विधिविधान नियंतिः स्वभावः, कालो ग्रहा इपरकर्म देवम् ।
भाग्यानि कर्माणि यमः कृतान्तः, पर्यायनामानि पुराकृतस्य ॥ १९ ॥
यत्तत्पुराकृतं कर्म, न स्मरन्तीह मानवा । स्तदीदं पांडवश्रेष्ट ! दैवमित्यभिधीयते ॥२०॥
अर्थ:-जेम जेम पूर्वकृत फर्मनु फळ निधानमा रहेला धननी पेठे प्राप्त थाय छे तेम तेम ते ते कर्मनुं आ फळ
के एम सूचवनारी जुदी जुदी बुद्धि जाणे हाथमां दीवो राखीने आवी होय तेम प्रवर्त है, अर्थात् बुरि पण एबीन
उपजे छ के जाणे जीवने आ अमुक कर्मनु फळ छे एम प्रगट दावे छे, कारण के बुद्धि कर्मने अनुसारे होय के.
॥ १८ ॥ विधि, विधान, नियति, स्वभाव, काळ, ग्रह, इश्वरकृति, दैव, भाग्य, कर्म, यम, अने कृतान्त ए सर्व पूर्व-
करेला कर्मनां पर्यायनामो (एकार्यवाचक नामो) छे. ॥ १९ ॥ पूर्वश्लोकमां दैव विगेरे पूर्वकृतनां नागो के एम कयुं ते
वातने द्रढ करवा माटे अन्य शास्त्रीय प्रमाण दर्शाव छ के-हे पांडवोमां श्रेष्ट ! युधिष्ठिर ! जे ते पूर्वे करेला कर्मने मनु-
ष्यो आ जन्ममां स्मरण करी शक्ता नयी ते (पूर्वकृतकर्म ज) “दैव " कहेवाय छे-ए कृष्णनो उपदेश 2. ॥ २० ॥
। लोक ARRERAKe २२ -RRESSAGARS 45 स्वभाववादीओ आ प्रमाणे कहे छे--- कः कंटकानां प्रकरोति तैष्ण्य, विचित्रतां वा मृगपक्षिणां च । स्वभावतः सर्वमिदं प्रवृत्तं, न कामचारोऽस्ति कुतः प्रयत्नः ॥ २१ ॥ वाः कंटकस्तीक्ष्ण, ऋजुरेकश्च कुंचितः । फलं च वर्तुलं तस्या, बद् केन विनिर्मितं ॥२२॥ अक्षरवादीओ आ प्रमाणे कहे छे-- अक्षरात् क्षरितः काल-स्तस्माद्व्यापक इष्यते । व्यापकादिप्रकृत्यंतां, तां हि सृष्टिं प्रचक्षते ॥ २३ ॥ अर्थ:--हवे स्वभाववादीओ सुख दुःखादि विचित्रता कर्मथी नहिं पण स्वाभाविक कहेछे ते आप्रमाणे-कांटा. ओनी ( अणीओनी) तीक्ष्णता कोण करे छे ? अथवा मृगादि पशु अने पक्षीओमां विचित्रता (तफावत) कोण करे छे ? एतो सर्व स्वभावथी ज थएलुं छे, कोइनी इच्छाए कंइ वनतुं नथी, तो उद्यम शा माटे करचो ? ॥२१॥ तेनुं द्रष्टान्त कहे छे के-वोरडी वृक्षमा प्रयत्न सरखो कर्या छतां पण एज बोरडीनो एक कांटो सीधो अणीदार होयछे, अने एक कांटो वांको होय छे, अने फंळ गोळ थाय छे ते विचित्रता कोणे बनावी ? ते कहो ॥ २२ ॥ इवे' अक्षरवादीओ कहे छे के-अक्षरमांथी ( ब्रह्ममांथी) काळ खरी पडयो, तेथी ते काळ व्यापक गणाय छे, माटे जेनी आदिमां काळ अने अन्तमां प्रकृति छे तेने निश्चय सृष्टि कहे छे, (पण आ सृष्टि कर्मस्वरूपवाळी छे एम नहिं ). २२ EXSE पण इंडामांथी उत्पन्न.थयेली जाणवी ॥२५ ॥ आ समुद्रो ते इंडामांनुं अक्षरवादीओमां पण केटलाएक आ:प्रमाणे कहे के- : अक्षरांशस्ततो वायु,-स्तस्मात्तेजस्ततो जलं । जलात् प्रसूता पृथ्वी, भूतानामेष संभवः ॥ २४ ॥ अंडवादीओ आ. प्रमाणे कहे छे- नारायणपराऽव्यक्ता-दंडमव्यक्तसंभव । भंडस्यांतस्त्वमी भेदाः, सप्त दीपा च मेदिनी ॥ २५ ॥ गोंदकं समुद्राच, जरायुवापि पर्वताः। तस्मिन्नंडे त्वमीलोकाः, सप्त सप्त प्रतिष्ठिताः ॥ २६ ॥ अर्थ:--अक्षरना अंशमाथी ( आकाशमांथी). वायु उत्पन्न ययो, वायुमांयी तेज, तेजमांची जळ, अने जळ- मांथी पृथ्वी उत्पन्न थइ, पंचमहाभूतनी ए प्रमाणे उत्पत्ति यइ. माटे सृष्टिनी उत्पत्ति कमहेतुथीं नयी ए तात्पर्य ॥ २४ ॥ अंडवादीओ कहे छे के नारायणथी पर (भिम) अव्यक्त ते अव्यक्तमांथी एक इंड उत्पन्न ययु, सृष्टि- गर्भजळ जाणवू अने पर्वतो इंडामांनुं जरायु (गर्भमां थती पातळी चर्मजाळ ) छे, एवा इंडाना मध्यभागमां सात 'सोत लोक रहेला..॥२६॥ १. भू-भुवः स्वः-महः-जन-तप-अने सत्य ए सात लोक उपर अने तल-वितल-अतल-सुतल-रसातल -तलातल-ने पाताल ए ७ लोक नीचे छे.
Koice नि० लोक तहाधः स भगवा-नुषित्वा परिवत्सरं । स्वयमेवात्मना ध्यात्वा, तंदडमकरोद् द्विधा ॥ २७ ॥ ताभ्यां स शकलाभ्यां तु, दिवं भूमि च निर्ममे ॥ गाथाधः ॥ अहेतुवादी आ प्रमाणे कहे छे. हेतुरहिता भवन्ति हि, भावा प्रतिसमयभाविनश्चित्राः । भावाहते न भाव्यं, संभवरहितं खपुष्पमिव ॥ २८ ॥ २३ kee HERE अर्थ:-ते इंडामां ते आदि (नारायण) भगवाने संपूर्ण १ वर्ष वसीने पोते विचार करीने पोतेज ते इंडाना.बे भाग कर्या ॥ २७ ॥ ते वे ककडामाथी एक ककडाने स्वर्गरूपे स्थाप्यो, अने वीजा ककडाने भूमि-पृथ्वीरूपे स्थाप्यो, माटे स्वर्ग नरकादि कर्मजन्य नधी ए तात्पर्यः ।। दरेक समयमा विचित्ररूपे यनारा आ पदार्थों निश्चय हेतु विनाना छ, अर्थात् पदार्थोमां जे कइ फेरफारो थाय छे तेमां कोइ हेतु-कारण नथी (स्वाभाविक रीते यया करे ), कारणके भाव विना भाव्य न होय(एटले पदार्थ विना पदार्थपरिवर्तना न होय) अने भाव्य रहित भाव न होय, अने जो भाव न होय (एटले पदार्थनो ज अभाव होय ) तो आ सबलु भाव-भाव्य इत्यादि आकाशना पुष्पनी पेठे असत्-अ- संभवित छे. माटे विचित्रता ओ कर्महेतुथी नहिं पण स्वाभाविक छे ए तात्पर्य ॥ २८ ।। » २३ नियतिवादी आ प्रमाणे कहे छे- प्राप्तव्यो नियतिबलाश्रयेण योऽर्थः, सोऽवश्यं भवति नृणां शुभोऽशुभो वा । . भूतानां महति कृतेऽपि हि प्रयत्ने, नाऽभाव्यं भवति न भाविनोऽस्ति नाशः ॥ २१ ॥ परिणामवादी आ प्रमाणे कहे - प्रतिसमयं परिणामः, प्रत्यात्मगतश्च सर्वभावानाम् । संभवति नेच्छयापि, स्वेच्छा क्रमवर्तिनी यस्मात् ॥ ३०॥ अर्थ:-हवे नियतिवादी कहे छे के-जे शुभ वा अशुभ अर्थ नियति वन्ना वशे प्राप्त थवानो होय ते शुभाशुभ अर्थ मनुष्योने अवश्य प्राप्त थाय ज. जीवो घणो उद्यम करे तो पण जे न थवानुं होय ते नज याय, अने जे थवानु होय तेनो नाश न याय (एटले जे थवानु होय ते अवश्य थाय ज.) माटे सर्वभावो नियतिवळने आधीन छे, पण कर्म हेतु वाळा नथी ए तात्पर्य ॥२९॥ सर्व पदार्थोनो पोतपोताना स्वरूपमा रहेलो-वर्ततो परिणाम दरेक समये इच्छाविना पण थाय छे, कारणके पोतानी इच्छा तो अनुक्रमे प्रवर्तनारी होय छे, माटे वस्तुना परिणाम इच्छायी ज याय एम नहिं. अहिं इच्छाना अभावे कर्मनो अभाव सूचववाथी वस्तुगत परिणामो कर्मथीज प्रवर्ते छे एम पण नहि. ॥३०॥ * न to अनी नि० लोक २४ *CROR भूतवादीओं आ प्रमाणे कहे छे-- सत्यं पिशाचा स्म वने वसामो, भेरी करात्रैरपि न स्पृशामः । अयं च वादः प्रथितः पृथिव्यां, भेरि पिशाचाः किल ताडयन्ति ॥ ३१ ॥ गयम्-पृथिव्यपस्तेजोवायुरिति तत्वानि, तत्समुदाये शरीरोन्द्रियविषयसंज्ञा मदशक्तिवच्चैतन्य जलघुबुदवद्जीवा चैतन्यविशिष्टः कायः पुरुष इति ।। अर्थः-ए प्रमाणे इच्छाविना थता कार्यने पण लोको इच्छावडे थयेलुं माने छेते संवन्धमा एक अन्य ग्रन्थमांधी द्रष्टान्त आपे छ. के-अमे पिशाच खरेखर वनमा रहीए छीए अने हस्तानवडे-हायवडे भेरीनो स्पर्श पण करता नथी, छतां दुनियामां (वन- मां वायु आदि अन्य प्रयोगे भेरीना नाद थतां) एवी कहेवत प्रसिद्ध थइ छ के भेरीने निश्चय पिशाचो ज वजाडे छे ए प्रमाणे 'परिणामवादी कहे छे. तात्पर्य ए छे के सर्व वस्तुना परिणाम स्वतः प्रवर्ते छे, छतां इश्वरेच्छादिकथी माने छे ते असत्य के एम परिणामवादी कहे छे. ॥ ३१ ॥ हवे भूतवादी कहे छ के-पृथ्वी, जळ, अग्नि, वायु ए चार तत्त्वो छ, ते चारेना समुदायमां शरीर-इन्द्रिय-अने विषय एवां नामो पड़े छे, अने जेम महुडां विगेरे सामग्रीओ एकठी थनां मद शक्ति उत्पन्न थाय छे, तथा जळमां जेम जुदा जूदा परपोटा उत्पन्न थाय छे, तेम ए तत्वोना स- मुदायमां जूदा जूदा जीवो उत्पन्न थाय छे. तेमां चैतन्य युक्त जे शरीर तेनी पुरुष-जीव एवी संज्ञा छे ॥ ३१ ॥ NARA २४ - // भौतिकानि शरीराणि, विषयाः करणानि च । तथापि मंदैरन्यस्य, कर्तृत्वमुपदिश्यते ॥ ३२ ॥ नास्तिकमतवाळा आ प्रमाणे कहे छे- एतावानेव लोकोऽय, यावानिन्द्रियगोचरः । भद्रे वृकपदं घेतद्, यदन्ति बहुश्रुताः ॥ ३३ ॥ अर्थः-ए प्रमाणे शरीर-विषय ( स्पर्श, रस विगैरे) अने इन्द्रियो, पूर्वोक्त पृथ्व्यादि भूतनी बनेली छे तोप- ण मंद बुध्धिवाळा जीवो कहे छे के ए बीजानां बनावेला छे, ॥ ३२ ॥ ए बन्ने वक्तव्यमा पृथ्व्यादि महाभूतोयी सृष्टिरचना मानी ए तात्पर्यः ॥ जेटलो आ चक्षु आदि इन्द्रियोथी देखाय छे तेटलो ज आ लोक छे. छतां श्रुत नाम धरावनाराओ जे घणो मोटो लोक कहे छे, ते तो हे भोळी! आ 'वरुनां पगलांसरखो कहे छ,॥ ३३ ॥ १ स्वरूपवंत लहेननी उपर आसक्त थयेला नास्तिकवादीए हेमनो शास्त्रोनी श्रद्धाथी द्रढ थयेलो परलोक भय दूर करवाने अनेक परिश्रमथी निष्फळ थयो त्यारे प्रत्यक्ष अष्टान्तथी शास्त्रो जूठां छे एषो विश्वास उपजा- ववाने रात्रे ठहेन सहित नगरना दरवाजा बहार जइ बहु धूळवाळा मार्गमा पोताना आंगळां पाडयां, प्रभातमांज- ता आवता लोकोप अनुमानथी पात फेलावी के आजे तो नगर बहार वरु आवेलो हतो तेनां पगलां पडयां छे, आ फेलाती प्रसिद्धि नास्तिक वादीए पोतानी व्हेनने कही ने समजाव्यु के जेम लोको मारां आंगळांने क. रुनां पगलां कहे छे, तेम' शास्त्रकर्ताओ देख्या विनाज नरक स्वर्ग विगेरे परलोकनी कल्पना करे छे, इत्यादि रीते समजावी छहेनने विषयवासनामां आसक्त करी. - -- IECES लोक. २५ निक . तपांसि यातनाचित्राः, संयमो भोगवंचना: । अग्निहोत्रादिकं कर्म, वालक्रीडेव लभ्यते ॥ ३४ ॥ अनेकवादीओ आ:प्रमाणे कहे छे--- कारणानि विभिन्नानि, कार्याणि च यतः पृथक् । तस्मात्रिष्वपि कालेघु, नैव कर्माऽस्ति निश्चयः ॥३६॥ अर्थ:-तप करवा ए तो विचित्र प्रकारनां कष्ट छ, संयम ए-तो विषय भोगथी ठगावु छे. अने अग्निहोत्रादि क्रियाओ करवी ए. वाळक क्रीडा सरखं व्यर्थ छे, ॥ ३४ ॥ वळी अनेकवादीओ कहे छे के–जे कारणथी कारणो जूदां छ; अने कार्यों पण जूदां छे, माटे त्रणे काळ्मां कम छेज नहिं ए निश्चय छे. अहिं. कर्मज जो एक का- रणरूप होय तो तेनाथी थयेला कार्य पण सरखा होवां जोइए परन्तु तेम देखातुं नथी माटे कर्म छेज नहि।। ३५ ॥ आ वक्तव्यमां पण कर्म-निषेध स्पष्ट छे. इति कर्मतत्वम् (लोकात्मकर्मतत्वेषु पूर्वपक्षः समाप्तः) X वाळु ) छे . हवे जे रीते ए मन्तव्य युक्तिविनानुं छे ते रीते कहीश : अर्थात् ए . मन्तव्य युक्ति विनानु केवी रीते छे ? । अथ स्वपक्षे ( जैनमते) लोकादितत्व निर्णयः ।। (आर्यावृत्तानि) A- तेषामवानितिमसदृश, सृष्टिवादिनामिष्टम् । एतयुक्तिविरुद्धं, यथा तथा संपवक्ष्यामि ॥१॥ सदसज्जगदुत्पत्तिः, पूर्वस्मात्कारणात् सतो नास्ति । असतो नास्ति कर्ता, सदसद्यां संभवाभावात्॥२॥ अर्थ--ए प्रमाणे पूर्व कहेलु जे सृष्टिवादिओ इष्ट-मन्तव्य जाण्या विना अने विषम ( एटले पूर्वापर विरोध- ते कहीश ॥ १ ॥ जो आ जगतनी उत्पत्ति मानवी होय तो ते उत्पत्ति सत् के असमाथी मानवी जोइए, त्यां सत् ने असत् ए के कारणमार्नु पूर्व प्रथम कारण जे सत् तेमांथी तो जगतनी उत्पत्ति होय नहि ( कारण के जे सत् होय ते तो त्रणे काळमां एक सरखी स्थितिबाळु होय तो पछी एः सत्नु स्वरूप पलटाइने जगतरूपे केम बनी शके १) अने जो असत्माथी जगतनी उत्पत्ति मानता हो तो तेम पण नथी. कारणके असत्मांथी (जे त्रणे काळमां न होइ शके तेमांथी ) तो जगतनी उत्पत्ति करनार कोई न होय माटे जगतनी उत्पत्ति नथी समाथी के नथी असत्मांयी; का- रणके सत् के असत् ए वन्नेमांथी कोइपण वस्तुनी उत्पचिनो संभवज नथी माटे.॥२॥ i . नि० सदसत्तस्योत्पत्ति,--त्रिष्वपि कालेषु निश्चित नास्ति । खरशृंगमुदाहरणं, तस्मात्स्वाभाविको लोकः ॥३॥ मूर्ताऽमूर्त द्रव्यं, सबै न विनाशमेति नान्यत्वम् । यदेत्त्येतत्यायः, पर्यायविनाशि जैनानाम् ॥ ४ ॥ A.KACHANGE अर्थ:--पूर्व गाथामां. " असतो नास्ति कर्ता-त्रणे काळमां अविद्यमान वस्तुनो कर्ता न होय” एम कथु ते द्रढ करवा माटे कहे ? के--जे. असत् छे तेनी उत्पत्ति तो निश्चय त्रणे काळमां न होय, अहिं गर्दभना शींगडानु द्रष्टा- न्त विचार, ते आ प्रमाणे--पूर्वकाळमां गर्दभने श्रीगदा नहोतां, वर्तमान काळमां नथी, अने भविष्यमा यवानां प- ण नथी, जो ए त्रणे काळमां अविद्यमान छे तो गर्दभना शींगडांनी उत्पत्ति केम होय? अर्यात् त्रणे काळमां अविद्यमान गर्दभ शींगडांनी जेम उत्पत्ति न होय तेम असत्-त्रणे काळमां अविद्यमान जगतनी उत्पत्ति पण न होय, ते कारण- थी जगततो स्वभावयीज (त्रिकालवर्ती ) छे, ॥३॥ ए प्रमाणे जगत् सत् छे पण कर्ता नयी तो पदार्थोनी :- त्पत्ति अने विनाश जेम प्रत्यक्ष देखाय छे तेम जगतनी उत्पत्ति अने विनाश पण केम न संभवे ? आ शंकानु निरा- करण करे ? के----जगतमा रूपी अथवा अरूपी कोइ मूळ द्रव्य-मूळ पदार्थ सर्वथा विनाश पामतो नयी अर्थात् गतमांथी ते द्रव्यनो अभाव यइ जतो नथी, तेम ते मूळ द्रव्य आखं पलटाइने अन्यद्रव्य रूपे ( जीव पुद्गल पे याय के पुगल जीवरूपे ) याय एम पण बनतुं नथीं माटे जेमः मूळ पदार्थोनो सर्वथा विनाश के अन्यपदार्थ रूपे उ- * पत्ति नथी तेम जगतनो पण विनाश के उत्पत्ति नयी. अने वस्तुना उत्पत्ति विनाश जे जाणवामां आवे छे ते प्रायः .
RSS एटले अमुक अंशे अथवा अमुक अपेक्षाए जाणवा, कारण के जैनोना सिद्धान्तमा द्रव्य-वस्तु द्रव्ययी अविनाशी अने पर्यायथी तो विनाशवंत के कारण के- जैन दर्शनमां द्रव्य-गुण-अने पर्याय ए त्रणमा मूळपदार्थ के जे त्रणेकाळमां अविनाशी अने गुणोने रहेवामां आ- श्रय भूत होय छे ते द्रव्यं, ते मूळ पदार्थनो जे सदाकाळ पदार्थमा रहेवावाळो स्वभाव ते गुण, अने जे क्षणमां आवे अने क्षणमा जाय एवो स्वभाव ते पर्याय कहेवाय ,. 'जेम' जीव ए पोते द्रव्यः' छे, कारणके जीवत्व कोइपण काळे जवान नथी तेमज ज्ञानादि गुणोनु आश्रय स्थान है. ए जीवना मान दर्शन चारित्र इत्यादि गुणो कहेवाय कारण के ए. ज्ञानादि जीवद्रव्यमां सदाकाळ वर्तनारा होय छे, अने देवत्व नारकत्व इत्यादि पर्याय कहेवाय. अथवा मानादिः णना ज्ञेय आश्रयि जे जुदा जुदा विशेष भेद ते पण वारंवार पलटाता होवाथी पर्याय कहेवाय. एमां जीव द्रव्य (मूळ- स्वरूपे अरूपी) अविनाशी छे, ते अन्य पदार्थ अजीवरूपे पण न वदलाय, परन्तु जीव पणे कायम रही शेयमेदे झान गुणवडे वारंवार पलटातो. होवाथी एटले घटज्ञानी थइने पटज्ञानी धाय वळी क्षणमां दक्षज्ञानी थाय क्षणमा ज्ञानी याय क्षणमा स्वर्णज्ञानी याय इत्यादि रीते जीव ( जीवपणे कायम रहेवा छतां पण) पर्यायनी अपे- लाए विनाशी कहेवाय. अथवा देव मटी नारक थाय नारक मटी तियेच थाय इत्यादि रीते पण जीव (पर्यायनी अपे- क्षाए ) विनाशी कहेवाय. अहि द्रव्य द्रव्यत्वनी अपेक्षाए अविनाशी छे माटे द्रव्यने पर्यायनी अपेक्षाए मायः (एटले सर्वथा नहिं ) विनाशी का छे, सर्वया विनाशी तो अभावरूपे थाय त्यारेंज कहेवाय, : EXEREST नि लोक. काश्यपदक्षादीनां, यदभिप्रायेण जायते लोकः । लोकाभाव नेपा, मस्तित्वं संस्थितं कुत्र ? ॥ ५ ॥ सर्व धराम्बराय, याति विनाशं यदा तदा लोकः । किं भवति बुद्धिरव्यक्त-माहितं तस्य किं रूपम् ॥६॥ यदमूर्त मूर्त वा, स्वलक्षणं विद्यते स्वलक्षणतः । तत्र यक्तं निर्दिष्टं, सर्व सर्वोत्तमादेशः॥७॥ अर्थः-जेओना मते आ जगत काश्यप अने दक्ष विगेरेनु बनेलं छे, तेओना मत प्रमाणे विचारीए तो जगत ज्यारे हतुंज नहिं त्यारे तेओनुं अस्तित्व कये ठेकाणे हतुं ? अर्थात् काश्यप अने दक्ष क्या रहेता इता ? तात्पर्य ए छे के काश्यप अने दक्षयी जगतनी उत्पत्ति मानवी अनुचित छे ॥ ५॥ इथे सांख्य जे २ अव्यक्तयी (प्रकृतिथी)ज. गतनी उत्पत्ति माने छे तेनु निराकरण करे छे के-पृथ्वी अने आकाश विगेरे सर्व जगत विनाश पामे , त्यारे चैत- न्यनु शु थाय छे ? अने ते वखत अव्यक्तनुं स्वरूप के प्रतिपादन करेल छे ? जो कहो के ते वखते चैतन्य अने अव्यक्त केवी रीते होय ? तेनुं स्वरूप कंइ पण कही भकाय नहिं ए, वचनातीत-वचनागोचर होय छे तो ते वात पण अयुक्त छे तेनु कारण दर्शाय छे, ॥ ६॥ जे पोताना लक्षणयी-स्वभावयी। अमूर्त-अरूपी अथवा मूर्त-रूपी एवा स्वलक्षणवाळा-स्वभाववाळा पदार्थों विद्यमान छे ते ज पदार्थोंने श्री सर्वशोए व्यक्त ( एटले प्रगट स्वलक्षणवाळा ) कहेला छे, ( तात्पर्य आगळ कहेबाय छे..). ॥ ७ १ जुओ जगतउत्पत्ति संबन्धि पूर्वपक्षनी गाथा ४५ मी गाथामां को रठे के केटलाएक आ जगत काश्यप- ऋषिधी अने केटलाएक ब्रह्माना पुत्र दक्ष प्रजापतिमाथी उत्पन्न ययेलू माने छे. १ जुी पूर्व पक्षनी गाथा ४८ मी अने ६८ मी.
.. करे न यमरूपमरूपिच, यदिहास्ति हि तत्स्वलक्षणं सर्वम् । तल्लक्षणं न यस्य तु तद्वन्ध्यापुत्रवद् ग्रायम् ८ अर्थ:--अहिं द्रव्य जे रूपी अने अरूपी छे ते ( रूपीत्व अने अरूपीत्व ए.सर्व) द्रव्यनु पोतार्नुज लक्षण तेवू लक्षण जे वस्तुनुं न होय ते वस्तु बंध्या-चांझणीना पुत्रनी पेढे अविद्यमान (छे नहिं एम ) जाणवी, माटे अन्य- पण जो जगतनी उत्पत्ति हेला अथवा. जगत विनाश पाम्या बाद स्वलक्षण रहित (वचनातीत ) हतुं एम अव्यक्त ए कोई वस्तुज न होइ शके, अने जो अव्यक्त ए कोई वस्तुज न होय तो अव्यक्तमांयी जगतनी उत्पत्ति मानवी, अथवा जगत विनाश पाम्या बाद केवळ अव्यक्त रहेके एम मानवु ते कोइ रीते युक्त नथी. माटे कहो के ज. गतना अभाव वखते चैतन्य अने अव्यक्तनुं स्वरुप केवु होय छे १ रूपी होय छे के अरूपी होय के ? जो कहों के रूपी के न अरूंपी एवं होय छे तो ए.चैतन्य अने अव्यक्त रूपी के अरूपी रूप स्वलक्षण रहित होवाथी ए बन्ने कंइज वस्तु नथी तो तेनाथी धती जगतनी उत्पत्ति पण नयी ए प्रमाणे सांख्य दर्शनमां जेओ प्रकृतिथी (एटले 'अव्यक्तथी जगतनी उत्पत्ति माने छे तेओना अभिप्रायर्नु निराकरण कयु. १ सत्वगुण, रजोगुण, अंने तमोगुण एत्रण गुणनी समावस्था, पटले लगभग तुल्य होय. ते प्रकृति कदवार ए. प्रकृतिनां अव्यक्त अने प्रधान एवां बे पर्याय नाम छे. ते प्रकृतिमाथी जगतनी उत्पति अनन्तर पणे नहिं पण परंपराए थयेली छे, कारण के प्रकृतिथी प्रथम चैतन्य उत्पन्न यर ते चैतन्य (बुद्धिमाथी) स्पर्शादि १६ नो गण उत्पन्न थयो, अने ए १६ मांना जे स्पर्शादि पांच तेमांना एकेकमांथी एकेक भूत (पृथयादि तस्वनी ) उ: त्पति था अने य पांच महाभूतमांथी सृष्टिनी उत्पत्ति थहः ।।
लोक. २८ 9 नि० यद्युत्पत्तिर्न भवति, तुरगविषाणस्य खरविषाणाग्रात् । उत्पत्तिरभूतेभ्यो, ध्रुवं तथा नास्ति भूतानाम् ॥९॥ तत्र व्यक्तमलिंगा--व्यक्तादुद्भविष्यति कदाचित् । सोमादीनां तनुसंभवोऽस्ति यदि नास्ति भूतानि ॥१०॥ अर्थ-वळी अव्यक्तमाथी चैतन्य अने चैतन्यमांयी उत्पम ययेला स्पर्शादि १६ मांना पांचमांथी जे पांच म- हाभूतोनी उत्पत्ति मानी ते पण अयुक्त छे, कारणके जो गर्दभना शिंगडानी अणीमाथी घोडाना भिंगडानी उत्पत्ति । नथी यती एटले जो असत्मायी असत्नी उत्पत्ति न होय तो (पूर्व श्लोकमां वंध्यापुत्र तुल्य साबीत करेला असत् अव्यक्त अथवा चैतन्यमांयो) भूतोनी ( पृथ्व्यादि सत्नी') उत्पत्ति तो अवश्य न होय, अहिं तात्पर्य ए छे के जो असत्मांथी स्वजातीय अंसत्नी उत्पत्ति न घई शके तो परजातीय सदनी ( भूतोनी) उत्पत्ति तो संभवेज केम ? जेप नीयमांथी नींव न उत्पन्न याय तो आम्ररक्ष तो निश्चय नज उत्पन्न थाय इति भावार्थः ॥२॥ वळी आभू- तोनी उत्पत्तिना संबंधमां एम पण कहेवानु छे के लिंग ( उपलक्ष्यमाण कार्य-धर्म ) रहित एवा 'अव्यक्तमांधी व्यक्त (पंचभूतादि ) उत्पन्न थतुं होय तो सोमादिकना शरीरनी (जीवनां शरीरोनी) उत्पत्ति जो के पंचभूत न होय तो पण होइ शके. अर्थात् अव्यक्तमाथी ( अनुक्रमे चतन्य अने तेमांथी अहंकार अने तेमांयी स्पर्शादि अने तेमांधी) व्यक्त एवां पंचभूत जो उत्पन्न थइ शकतां होय तो अव्यक्तमांधी परभार्यों व्यक्त एवां जीव शरीरों केम उदा. म न थाय ? के जेथी पंचभूत उत्पन्न थया बाद पंचभूतमांपी ज वरीरोत्पत्ति मानवी पडे ? क तो वस्तुनी उत्पत्तिनो पण अभाव थाय . कारणक कोइ वस्तु उत्पन्न करवा माटे प्रथम आ उत्पन्न करवा यो असति महाभूतगणे, तेषामेव तनुसंभवो नास्ति । पशुपतिदिनपतिवत्, सोमांडपितामहहरीणाम् ॥११॥ बुद्धिमनोभेदानां, देहाभावे च संभवो नास्ति । इहापोहाभावस्तदभावे संभवाभावः ॥ १२ ॥ अर्थः-पूर्वश्लोकमां कह्या प्रमाणे पंच महाभूतनो समुदाय न होय तो * पशुपति ( महादेव ) दिनपति (मू- यं )नी पेठे ते सोम अंड ब्रह्मा अने विष्णुना शरीरनो पण संभव न होय. ॥ ११ ॥ अने शरीरने अभावं बुद्धिना भेद अने मनना भेद (. जूदी जूदी बुद्धि अने जूदो जूदा विचारवाला मन) नो. पण संभव न होय, अने बुद्धि तथा मनना अभावे इहापोह (विचारणा) पण न होय अने जो आ करवा योग्य छे माटे करूं इत्यादि विचारणा पण न होय नहिं एवो इहापोह (-तर्क वितर्क रूप ज्ञान) अवश्य होय. ॥१२॥ * महाभूत गण एटले महादेवनो भूतादिगण ज्यां न होय त्यां महादेवन शरीर पटले महादेव न होय, अ- महाभूतगण एटले जीवादिगण नहि होते प्रलयकालमा तेनो प्रकाशक सूर्य पण न होय तेम पृथ्व्यादि त- स्वरूप महाभूतगण न होय तोसोमादिकनां शरीरनोसंभव पण न होय एम एक नैयायिक पासे पूछवाथी समजाय छे. १ नैयायिको कहे छे के ज्ञान-चिकिर्षा ( करवानी इच्छा ) अने प्रयत्न ( अर्थात् जानाति इच्छति अने यतते ) ए गथी वस्तुनी उत्पत्ति छे. त्यां शरीराभावे. बुद्धि अने मननो अभाव होवाथी इहापोह रूप माननो (जानाति नो) अभाव आ श्लोकमां सिद्ध कर्यो, ने पता तेन कृतं यदि च जगत् , स कृतः केनाकृतोऽप्यबुद्धिर्वः । विज्ञया सत्य , नि० तभावेऽस्ति न चिंता, चिताभावे क्रियागुणो नास्ति । कर्तृत्वमनुपपन्नं, क्रियागुणानामसंभवतः ॥१३॥ अर्थ:-ए प्रमाणे वस्तु उत्पत्तिनो अभाव होते छते ते वस्तु उत्पन्न करवानी चिंता-इच्छा पण न होय कार- के जो उत्पत्तिज न होय तो ते वस्तुने उत्पन्न करवानो विचार पण केम होय ? अथवा बीजो अर्थ विचारतां तदभावे " एटले. बुद्धि अने मनोभेदना अभावे इच्छा न होय, कारणके इच्छा बुद्धि अने मनना संयोगे उत्पम थाय छे. ए प्रमाणे वन्ने रीते चिंता-'इच्छानो अभाव थतां क्रियागुण एटले ते वस्तुनी उत्पत्तिमा प्रयत्न करवो तेपण न झोय, अने क्रियागुणना (प्रयत्नना) अभावे कर्चा पणुं पण सिद्ध न थयु, माटे ज्यां कर्तानीज़ सिद्धि नथी त्यांज- गतनो कर्ता ईश्वरादि के एम केम कहेवाय ? ॥ १३ ॥ वळी जो ते ईश्वरादिके जगत बनान्यु, तो ते ईश्वरादिकने कोणे बनान्यो ? जो कहो के ईश्वरादिकने कोइए बनाव्यों नथी तो एम कहेवामां तमाएं अज्ञान छे, कारणके कर्ता विना जो जगत न वनी शंके तो कर्ता विना इश्वर केम बने ? जो कहो के ईश्वर तो कर्ता विना पण होई शके तो ए प्रमाणे होते. छते अहिं आ संसारनो प्रपंच पण तेवोज ( कर्ता विनानो ज) जाणवों. १-२ आ श्लोकमां इच्छानो (इच्छति नो) अने प्रयत्ननो (यततेनो.) पण अभाव करी उत्पत्तिनो अभाव सिद्ध कर्यो. * अभ्युपगम्येदानी, जगतः सृष्टिवदामहे नास्ति । पुरुषाथैः कृतकृत्यो, न करोत्याप्तो जगत् कलुषम् ॥१५॥ अपकारः प्रेताद्यैः, कस्तस्य कृतः सुरादिभिः किंवा । संयोजिता यदेते, सुखदुःखाभ्यामहेतुभ्याम् ॥१६॥ तुल्ये सति सामर्थ्य, किं न कृतो वित्तसंयुतो लोकः । येन कृतो बहुवुःखो, जन्मजरामृत्युपथि लोकः १७॥ अर्थः-ए प्रमाणे ( १. थी. १४ सुधीना श्लोकमां कह्या प्रमाणे नगतनी उत्पत्ति कोइ पण पदार्थमाथी नयी थइ एम) अंगीकार करीने-सिद्ध करीने हवे अमे एम कहीए छीए के जगतनी उत्पत्ति कोइमांयी नथी एटलुंज नहिं. पण आ जगतनी रचना पण (एटले इश्वरे बनाव्यु एम.पण)नथी, कारण के पुरुषार्यो वडे ( करवा योग्य कृत्योवडे कृतार्थ थयेल एवा आप्त-सर्वज्ञ आवा मलिन जगतने न बनावे ॥ १५ ॥ वळी प्रेत विगेरेए ( भूतादिकोए) ते जग- तकर्त्तानो शु अपरोध कयों छे के जेथी तेओने उतरता. दरज्जाना बनावी विना कारणे पाताळमा राखी दुःखमां जोड्या, अने देवादिके (सूर्यादि विमानवासीभोए ) तेनो | उपकार (अहिं " कि एटले “रों उपकार अर्थ करवो.) कर्यो छे के जेथी तेओने उत्तम बनायी स्वर्गलोकमां राखी विना कारणे सुखमां जोडया!॥ १६ ॥ जो कर्तार्नु सामर्थ्य सर्वने बनावनामा एक सरखु हतुं तो सर्व लोकने धनवान केम न करूं ? के जेथी करीने जन्म जरा अने मृत्युना मार्गमा लोकने अति दुःखवाला कर्या !
नि० अने पादि तेन कृतो लोको, भूयोपि किमस्य संक्षयः क्रियते । उत्पादितः किमर्थ, यदि संक्षेपणीय एवासौ ॥१८ क: संक्षिप्तेन गुणः, को या सृष्टेन तस्य लोकेन । को वा जन्मादिकृत, दुःखं संप्रापितैः सत्वः ॥ १९ ॥ भूतानुगतशरीरः, कुंभाद्य कुंभकृपया कृत्वा । असकृद्भिनत्ति तद्वत्, कर्ता भूतानि निस्रशः ॥ २० ॥ भवसंभवदुःखकर, निःकारणवैरिणं सदा जगतः। कस्तं व्रजेच्छरण्य, सूरिः श्रेयोर्थमतिपापम् ॥ २१ ॥ अर्थ:-जो आ जगत् आ जगत् ते ईश्वरे कयु होय तो फरीथी आ जगतनो संहार शामाटे करे के ? कारणके आ जगत जो संहारवा योग्य ज हतुं तो प्रथमथी उत्पन्न ज शामाटे कयु ? ॥१८॥ अथवा जगतनुं संहरण करवामां बनाववामां ईश्वरने शुं गुण-फायदो थाय छ ? अथवा जन्म जरा अने मरणना दुःख प्रत्ये पमाडेला प्राणीओ बडे ई- श्वरने शु गुण थाय छे ! ( अर्थात् प्राणीओने जन्मादिकनां दुःख आपवामां ईश्वरने शु लाभ याय छे ? ) ॥ १९ ॥ पंचभूतबडे व्याप्त थयेला शरीरवाळो कुंभार जेम वारंवार घट विगेरे करीने भागी नांखे छे तेनी पेठे प्राणीओनो. व- नावनार ए ईश्वर पण वारंवार प्राणीओने वनावी संहार करे तो ते निर्दय कहेवाय ॥ २० ॥ भवभ्रमणयी उपजता दुःखने उत्पन्न करनार अने हमेशां जगतना निष्कारण वैरी एवा ते इश्वरना शरणे कोण जाय ! जेम एवा कोण मा- चार्य पोताना कल्याण माटे अतिपापीने भरणे जाय! (तेम निष्कारण वैरी एवा इश्वरने भरणे कोण जाय!) ॥२१॥ ३० E स्वकृतं जगत्क्षपयतः, तस्य न बंधोऽस्ति बुद्धिरन्येषाम् । किं न भवति पुत्रवधे, बन्धः पितुरुग्रचित्तस्य २२ जगतः प्रागुत्पत्ति-यदि कर्तुर्विग्रहात्कथं तदव । अधुना न भवति तस्यैव; विग्रहात्संभवस्तस्य ॥ २३ ॥ ग्रंथकार जगत उत्पत्तिनी चर्चानो उपसंहार करी निर्णय दर्शाये है- विविधासु यथा योनिषु, सत्वानां साम्प्रतं समुत्पचिः । नित्यं तथैव सिद्धिः, पाहोकस्थितिविधिशाः २४ अर्थः---केटलाएकनी बुद्धि एवा प्रकारनी छे ( अर्थात् बीमा एम कहे छे के.)-पोताना बनावेला जगतनो पोते न विनाश करनार होय तो तेने बंध-दोष न होय, तो अमें एम पूछीए छोए के पोतेज उत्पन्न करेला पुत्रनो वध करवामां उग्र-क्रूर चित्तवाळा पिताने में दोष न होय ? अर्थात् जो पुत्रवध करनार पिता दोषीत गणाय तो जगत् संहारक ईश्वर पण दोषीत ज गणायः ॥ २२ ॥ वळी कर्ताना-ईश्वरना शरीरमांथी जेम पूर्वे जगतनी उत्पत्ति य- इ तो तेवी रीते ते ईश्वरना शरीरमांथी तेनी-जगतनी उत्पत्ति हमणां पण केम थती नथी ? ॥ २३ ॥ माटे उपर कह्या प्रमाणे सर्व विचारता अंतिम तात्पर्य एज आवे छे के-जेम वर्तमान काळमां जूदी जूदी योनीओमां जूदा जूदा जी वोनी उत्पत्ति छ तेवीज उत्पत्ति निरन्तर (भूत-भविष्यमा ) पण छे, एम जगत्स्थितिनी विधि माणनारा आप्त- पुरुषो कहे छे ॥ २४ ॥ अ
लो
नि०
एवं षिचार्यमाणाः, सृष्टिविशेषाः परस्परविरुडाः। हरिहरविचारतुस्या, युक्तिविहीनाः परित्याज्याः २५
मुक्तो वाऽमुक्तो वा-ऽस्ति तत्र मूत्तॊऽथवा जगत्कर्ता।
सदसदापि करोति हि, न युज्यते सर्वथा करणम् ॥ २६ ॥
ORGA
अर्थः-ए प्रमाणे विचार करतां जगतनी उत्पत्तिना जूदा जूदा मतभेद प्रथम दर्शावेला विष्णु अने महादेवमां दे-
वत्वना मतभेद मुजब परस्पर विरुद्ध अने युक्तिरहित छै माटे त्याग करवा योग्य छे. अर्यात् पहेला प्रकरणमा जेम
विष्णु अने महादेवमां देवपणाना मतभेद परस्पर विरुद्ध अने युक्तिरहित दर्शाव्या तेम आ जगतनी उत्पत्तिना मतभेद
पण तेवाज जाणवा ॥२५॥ माटे जगतनो वनावनार मुक्त होय के अमुक्त होय रूपी होय, के अरूपी होय, अने वि-
यमान जगत बनावे के अविद्यमान बनाये पण सर्वथा जगतनुं वन क्वापणुं ज ( अने उपलक्षणथी बनवा पणुं पण)
घटतुं नथीं तो पछी नगतनो बनावनार मुक्त छे के अमुक्त इत्यादि विवादथी शुं ! ॥ २६॥
सडाः शाश्वताः शिवाः सिद्धौं । तनुकरणकर्मरहिता , वहवस्तेषां प्रभुनास्ति २८ ॥ मुक्तो न करोति जगम कर्मणा वध्यते हि वीतरागः । रागादियुतः सतनु-निबध्यते कर्मणाऽवश्यम् २७ अर्थः-ईश्वर तो जे मुक्त ( सर्व कर्मरहित ) होय तेज कहेवाय, अने जे मुक्त होय ते जगतने बनावे न- हि. आ सिद्धान्त सांभळीने कोइ कहे के जो सकर्म होय तेंज जगत बनावे तो ईश्वरे पण प्रथम सकर्म थइने पछी जगत उत्पत्ति करी एम मानवामां विरोध के ? त्यारे ग्रन्थकारः कहे छे. के ईश्वर तो वीतराग ( सर्वथा. रहित ) होय अने जे वीतराग होय ते फर्मवडे बंधाय नहिं परन्तु जे राग द्वेष आदि सहित अने शरीरधारी जीव होय तेज अवश्यं कर्मवडे बंधाय छे तो पछी ईश्वर सकर्म थइने जगत बनावे ए केम संभवे ! ॥ २७ ॥ हवे ईश्वर कोण कहेवाय ? ते ग्रन्थकार दर्शावे छ के--जे जीवो ज्ञान अने चारित्र विगेरे आत्मगुणोवडे सम्यक् प्रकारे सिद्ध थयेला हो- य ( एटले ज्ञानादि आत्मगुणोने संपूर्ण प्राप्त कर्या होय.), तथा सिद्धिस्थानमां सदाकाळ (अनंतकाळ) अने उपद्रव रहित पणे रहेला होय, तथा शरीर इन्द्रिय अने कर्म एत्रणेरहित होय ते ईश्वर कहेवाय, एवा ईश्वरो--सिद्धो घणा छे. ( आयी ईश्वर एकज़ छे ए मन्तव्य पण असत्य जणाव्यु ). अने ते सिद्धोमां कोइ म्होटो (मोटो नानो] नथी, परन्तु सर्वे सिद्धो सरखा छ, अथवा ए सिद्धोना करतां बीजो कोइ म्होटों नथी के जेने सर्वोपरि ईश्वर तरीके स्वीकारीए, म्होटामां मोटा आत्मा तो ए सर्व सिद्धोज छे, तो पछी जगतनो कर्ता इश्वर एकज छे ते कयो? ॥२८॥ १ अर्हि छंदोभंग थाय छे. 'हि वीतरागः" ने बदले विगतरागः होय अथवा हि गतराग: होय तो छंदोभंग न थाय ? नावान CERI
कर्मजनितं प्रभुत्वं संसारे क्षेत्रतश्च तद्भिनम् । प्रभुरेकस्तनुरहितः, कर्ता च न विद्यते लोके ॥ २९ ॥
नि०
लो
वह
A
अर्थ:-हवे पूर्वगाथामां कयु
पूर्वगाथामां कडं के सिडोमां कोइ एक प्रभु (म्होटो) नथी, अथवा सिद्धोनो कोइ (प्रभु उ.
परी-स्वामी ) नथीं तेनुं कारण आ श्लोकमां दर्शाये छे के प्रभुपणु ( म्होटा नानापुणु ) तो कर्मयी उत्पन्न थयेलं
अने ते संसारमा होय छे पण कर्म रहित. सिद्धोमां एक म्होटो अने एक न्हानो होवामां शुं कारण छे ? वळी ते
प्रभुत्व ( संसारीपणामांनु कर्मजन्य प्रभुत्व ) क्षेत्रथी जूदु जूहूँ. होय छे, एटले राजानुं तेना देश जेटल, वासुदेवन त्रि-
वंड जेटलं, चक्रवतीन ६ खंड जेटलं, देवेन्द्रनुं ते देवलोकादि जेटलं ए प्रमाणे अनेक प्रकारच् छे. आ सर्व प्रभुत्व सां-
सारिक अने. कर्मजन्य छे, माटे आलोकमां--संसारमा शरीर रहित एवो एक प्रभु--ईश्वर अते ते जगतनो पण
बनावनार होय ते विद्यमान नथी. कहेवानु' तात्पर्य एके के सिद्धां. तो कोइ जगतका एक प्रभु संभवतो नथी,
अने संसारमा जाइए तो तेमां पण क्षेत्रादिभेदे अनेक प्रभु. कर्मजनित होवाथी शरीर रहित एक प्रभु जगतकर्ता
णातो नथी, जेथी जगतकर्ता प्रभु नथी मुक्तिमां के नथी संसारमा, माटे जगतकर्ता ज नयी- ॥ २९ ॥
अवगाहाकृतिरूपैः, अस्थैर्यभावेन शाश्वते लोके । कृतकत्वमनित्यत्वं, मेर्वादीनां न संभवति ॥३०॥ गुणवृद्धिहानिचित्रा, कैश्चिन मही कृता न लोकश्च । इति सर्वमिदं प्राहुः, विष्वपि लोकेषु सर्वविदः ॥३१॥ . अर्थ-शाश्वते. ( त्रिकाळवी) एवा. आ लोकमां अवगाह (उचाइ जाडाइ लंबाइ ने होलाइ ), आकार, अने. रूपवडे स्थिर होवाथी एटले अवगाहादिक त्रणे काळमां एक सरखा होवाथी मेरुपर्वत विगेरेनी उत्पत्ति के विनाश संभ- वतो नथी. अथवा बीजी रीते आ श्लोकनों अर्थ आ प्रमाणे अवगाह आकृति ने रूपवडे स्थिर होवाथी शाश्वत एवा आ लोकमां मेरुपर्वत विगैरेनी उत्पत्ति के विनाश संभवतो नथी, माटे मेरु विगेरेनो अथवा जगतनो कर्ता मानवो- योग्य नथी. ॥ ३० ॥ वळी छ गुणधि अने छ गुणहानि वडे विचित्र एवी आ पृथ्वी अने लोक कोइए ब- नावेल नथी, ए प्रमाणे त्रणे लोकमां आ दृश्य के अदृश्य सर्वे पदार्थों छ गुणध्धि अने छ गुणहानि वडे विचित्र छे अने कोइए वनाव्या नथी एम सर्वज्ञो कहे छे ॥ ३१॥ S १ छंदोभंग थवाथी स्थिर स्वभावेन संभवे. छ गुणवृध्धि एटले जैन दर्शनमां मानेली अनंतंभागवृद्धि-असंख्यभाग- वृधि-संख्यभागवृध्धि-संख्यगुणवृध्धि-असंख्यगुणवृध्धि-अने अनन्तगुणवृश्धि. ए प्रमाणे ६ गुणहानि पण जाणवी.
लोक. नि० अडाचक्रमनीशं, ज्योतिश्चक्रं च जीवचकं च । नित्यं पुनति लोका-लुभावकर्मानुभावाभ्याम् ॥ ३२ चन्द्रादित्यसनद्रा-त्रिष्वपि लोकेषु नातिवर्तन्ते । प्रकृतिप्रमाणमात्मा-यमित्युवाचोत्तमज्ञानम् ॥ ३३ ॥ सर्वाः पृथिव्यश्च समुद्रशैलाः, सस्वर्गसिद्धालयमन्तरीक्षम् । अकृत्रिमः शाश्वत एष लोकः, अतो बहिर्यत्तदलौकिक तु ॥ ३४॥ उपजातिवृत्तम् ॥ Randon अर्थ:-वळी कोइपण नेता विनानुं आ काळचक्र ज्योतिश्चक्र अने जीवचक्र (चक्र-भेद--समुदाय) लोकस्वभाव (कुदरत) अने कर्म ए बेना प्रभावथी हमेशां जगतने पवित्र करे छ, अर्थात् एत्रणे जगतमा प्रवर्ते छे, ॥ ३२ ॥ आ चणे लोकमां चन्द्र सूर्य अने समुद्र इत्यादि पोत पोतानी मर्यादान उल्लंघन करता नथी, ए स्वाभाविक अनतिवर्तनज आ आत्मा स्वभावसिद्ध छे एवा प्रकारना उत्तम ज्ञानने जणावे छ।॥३३॥सर्व(साते)पृथ्वीओ, सर्वे (असंख्य समुद्रो) अने सर्वे ( अनेक ) पर्वतो तथा स्वर्गलोक, सिद्धिस्थान (ईपत् प्रारभारा पृथ्वी-सिद्धशिला), अने आ- काश ( लोकाकाश ) ए सर्व मलीने " लोक" कहेवाय छे, अने ते लोक कोइनो बनावेलो नहि एवो अने शाश्वत ( त्रिकालवर्ती ) छे. ए लोकथी वहार जे कंई ( केवळ आकाश द्रव्य) छे, ते " अलोक " कहेवाय छे ॥ ३४ ॥ १३ 15 क ( जीवसमुदाय ) चारे गतिमा संक्षेपथी कर्मतत्व कहे छे- प्रकृतीश्वरौ विधान, कालः सृष्टिविधिश्च दैवं च । इति नामधनो लोकः, स्वकर्मतः संसरत्यवशः॥ ३५ ॥ कर्मानुभावनिर्मित-नैकाकृतिजीवजातिगहनस्य । लोकस्यास्य न पर्यव--सानं नैवादिभावश्च ॥ ३६॥ अर्थ:--हवे कर्मनु स्वरूप अति संक्षेपमा कहे छे,--प्रकृति, ईश्वर, विधान, काळ, सृष्टि, विधि, अने दैव एवा ना- रखडे छे. तात्पर्य एछ के कईश्वर विधि ए नामो लोकतांछे एम कहीये तोपण चाले, कारण के अहिं लोक एटले जीवसमूह ते पोताना कर्मथी ज्यां परिभ्रमण करें छे, ते चार गतिरूप लोकज कहेवाय ,.॥३५॥कर्मना प्रभावी निर्माण थयेली. अनेक आकृतिवाळी (संक्षेपे ८४००००० चोरासोलाख अने विस्तारथी 'असंख्य) जीवयोनिओ (जीवोने उपजवानां स्थानो) बडे अथवा (जाति एटले जन्म अर्थ होचाथी) अनेक आकारचाळा जोचोना जन्म बडे, अथवा. (जा तिने भेदवाचक गणता) अनेकः आकारवाळा जीवनी जातिओ एटले जीवभेदोवडे गहन ( अतिशय भरेला) ए- वो आ लोकनो. अन्त नथी (एटले आ लोकनो कोइपण काळे अभाव थवानों नथी) तेम आदि भाववालो पण न- थी (एटले अमुक काळे वन्यो एम पण नथी)॥३६॥ १ एक योनि ( उत्पत्तिस्थान :) अंगुलना असंख्यातमा भाग जेवढें होय तेथी लोकमां असंख्य योनिओ होय. AR नि० लोक. तस्मादनादिनिधनं व्यसनोरुभीम, जन्मारदोषनढनेम्यतिरागतुम्बम् । घोरं स्वकर्मपवनेरितलोकचक्रं, भ्राम्यत्यनारतमिद किमिहेश्वरेण ॥ ३७॥ उपजाति० ॥ अर्थ:-ते कारणथी अनादि अनन्त स्थितिवाळु कष्टबडे अति भयंकर अने अनेक जन्म रूपी आराओ वाळं दो- प (द्वेप) रूपी मजबूत नेमि (पैंडा उपरनो मोटो लोखंडनो गोल पाटो के जे पैंडाने चारे बाजूथी मजबूत वांधी राखे छेते वाट) वाळ, अति राग रूप नाभि वाळं, घोर, अने पोताना करेला कर्म रूपी पवन बडे घेरायलं(चाली रहेलु) आ लोक(सं- सार) रूपी चक्र निरन्तर परिभ्रमण करे छे, तो अहिं ईश्वरवडे शृं? अर्थात् पूर्वोक्त स्वरूप वाळो लोक कर्म प्रभावेज चाल्या करे छे, पण कोइ ईश्वर रूप अधिपतिनी प्रेरणाथी चाले छ एम नहिं ज ॥ ३७॥ aca इति श्री परमपूज्य श्रीमद् हंसविजयजीत् प्रसादेन पं-चंदुलाल कृतं श्रीलोकतत्वनिर्णयस्य ॥ गूर्जरभाषान्तरं समाप्तम् ॥ त ३४
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ॐ १५४४ ग्रन्थप्रासादसूत्रधार श्रीमद् हरिभद्रसूरीश्वरविरचित,
॥ श्री लोकतत्त्वनिर्णय ग्रंथः समाप्तः।
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'मा पुस्तक श्री जैन एडवोकेट' प्रीन्टींग प्रेसमां शा. चीमनलाल जोशलमान कार्य भी बाही
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