Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Smirti Sandarbh(part-5)

Mor Mansukhrai · 2011/08

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सी. अषिली नागी मन्दार
$ श्रीगणेशाय नमः * का सेवा में सादर IN
भवदीय
गुरुमण्डलग्रन्थमालायाः नवमपुष्पकम् :-मनमुसराय मोर
स्मृति - सन्दर्भः १
संस्कृत
श्रीमन्महर्पिप्रणीत धर्मशास्त्रसंप्रमन्यः
कपिलादिदशस्मृत्यात्मक
मोभानमक
944
श्रीनाथादिगुरुवयं गणपत पव्ययम्भवमने ।
सिद्धीचं बटुकत्रयम्पदयुगं दूतीक्रम मण्डलम् ।
वीरान्नुयष्टचतुष्कपष्टिनवकं वीरावलीपञ्चकम् ;
श्रीमन्मालिनिमंत्रराजसहितं वन्दे गुरोमण्डलम् ।।
५, क्लाइव रो,
प्रथम संस्करणम्
खस्तान्दः
१९५५

हतियाराम गुप्त
पहास प्रिटिश वर्म
1. मिनामा मोट.

GURUMANDAL SERIESimarilx........
४१
संन्द्रत
卐.
मुक्तिी नागरी
भन्सार
(तक्षप)
THE
MRITI SANDARBITA
कोकानेर
Collection of Ten Dharmashastric
Texts by Maharshis.
Volume
V949,
5. CLIVE ROW.
CALCUTTA.
Era
First Edition
5000.
Christian Era
1955.

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अयि भी धर्मशाम्रप्रगति, सहदयाः! ममुपस्याप्यते भवत्पुरम्नादिदं मनोभानस गुट- मण्डलपन्यमालाप्रकाशिनम्य नवमपुष्पम्पंगगनमाखिण्ड फपिलस्मृत्यादि भारद्वाजम्मृन्यन्नं दशस्मृनीना संग्रहात्मफम् । पूर्वमागचतुष्टयसङ्कलिनचतुश्चत्वारिंशस्मृतिभिः महलनेन संन्यपा चतुःपञ्चाशद्भवतीति अष्टोत्तरशतामृतीनां ततोऽपि समधिक- स्मृतिनामसंप्रहप्राप्त्या न्यूनमेव संख्यासठ्ठलनमिनि प्रमोदस्य परमात्ममन्तोषम्य प विषयोऽस्माकम् । अत्र विषये गवर्नमेण्टमैन्युस्क्रिप्ट लाइनरी दिलीकेन मद्रासतः, थियोसोफिकल सोमाइटी तत्त्वावधान स्थितस्य अध्यार पुस्तकालयतः, भाण्डारकर प्राच्यशोधसंस्थान पूनातः, एशियाटिक मोसाइटी कलकत्तातो वाराणसीस्वसंस्कृत महाविद्यालयाधिकृतमरवतीभवनतश्च यहूनामादर्शहस्तलिखित- पुस्तकलिपीना सवलीकरण तैरतः पुस्तकालयाध्यक्षेरधिकारिभिश्व यहुमाहाय्यं समाचरितम् ; तदर्थन्तेपामधिकाधिकमभिनन्दनं सहर्पमाभारच वयं प्रकटीो वितरामश्च तेभ्य.परः महमान धन्यवादान् । अस्मत्प्रमादालस्यादिमिः याः सम्भवन्त्यस्त्रुटयो भाग- चतुष्टयवत्परिलक्ष्यन्ते ता अत्राऽपि विदुपा दृष्टिपथिसमाया-

सम्मेलनाय द्वे स्मृती लोगाभिमाण्डयाभिधे ममधिगते ।
अनुदिनं प्रयन्नसांपेक्षस्य कार्यस्यास्य ममाप्ये पता थपि वयं
नितरामसमर्था इति विशिष्टानामप्रकाशिनस्मृतिप्रन्थाना महलने
वत्तद्मन्थाधिकारिणो महानुभावाः मतनं प्राध्यन्ते यदेकोऽपि
शम्दःसृष्टिसंरक्षणोपायपरो यदि तेषु मिलिष्यति
वयं सर्वेऽपि भविष्यामः। आशास्महे सर्वेऽपि विद्वामी मोर
पदवीभाज. श्रीमनसुखरायश्रेष्टिमहोदयस्य लेख धन्ययादप्रकाशने
प्रतिपादितानां नामावशेषतां नीतानां स्मृतिप्रन्यानां पृथक
पृथगथवा सम्मिलितरूपेणास्मभ्यं वितरणं विधाय
विधास्यन्तीति विनिवेद्य विरमाम इति ।
यन्तीति तामा मंशोधने पुन. पुनः मानिगमागमनमा
निपुगाः धीधना अपश्यन्ते। अत्र पणे नाना विपE
प्रायचित्तनित्यनैमित्तिककमांनुवानमामिनो गायन्ते मन्या-
महे यद्भयन्तः यम्ल्याणयुट्या यामागं या जगादाराप
शास्त्रप्रचाराय च दुर्लभप्रन्यप्रकाशकाय श्रीमनगुमायमौरभष्ठि-
पर्यस्य समुधोगे सुप्ठु सहयोग विधारयन्तीति ।
श्रीकरणावग्णालयस्यामीमयानुकम्पयाध्यायधि पठभाग

॥ श्रीः ॥ धन्यवाद प्रकाश सत्चित् आनन्दकन्द प्रजविहारी श्रीकृष्णचन्द्र की असीम अनुकम्पा से स्मृति-सन्दर्भ के पञ्चम भाग को कृपालु यिद्वजन की सेवा में प्रस्तुत करते हुए अत्यन्त आनन्द अनुभव हो हा है। इस भाग में निम्नलिखित स्मृतियों के लिये जो पेिक्षित प्रतिलिपीकरण के साथ सहायता प्राप्त हुई है उन भी अधिकारी महानुभावों का हम हृदय से धन्यवाद करते ! आभार प्रदर्शन करते हैं। पेलस्मृति 1-अड्यार पुस्तकालय, थियोसोफिकल सोसाइटी, मद्रास। यूलरमृति- धामित्रस्मृति-एशियाटिक सोसाइटी, फलकत्ता एवं गवर्नमेण्ट ओरियण्टल मैन्युस्क्रिप्ट लाइनरी, मद्रास । इतरमृति- यणस्मृति- डल्यस्मृति-गवर्नमेण्ट ओरियण्टल मैन्युस्क्रिप्ट लाइनरी, मद्रास स्मृति-अध्यार पुस्तकालय, थियोसोफिकल सोसाइटी, मद्रास। एवं भण्डारकर प्राच्यशोधसंस्थान, पूना । पस्मृति-अनूप संस्कृत पुस्तकालय, बीकानेर । रसस्मृति-अड्यार पुस्तकालय, थियोसोफिकल सोसाइटी, अध्यार, मद्रास। 'जस्मृतिः-एशियाटिक सोसाइटी, कलकत्ता । " " " " " " " भविष्य में इनकी गयेपणा की जाकर हमारा मार्ग प्रशन इसके माध-गाय हमारे पाt RT और ये १० गनिया इस प्रकार मनिया हो है। महामहोपाध्याय डा.पी.डी. का .. ... एल. एम. सदाय, 'फीमिल आव टेटन मानन्द "हिन्द्री आव धर्मशास्त्र में नीच लियो अनि मतियों का उल्लेख किया है। उनके अतिरिक्त विभिन्न स्थानों में गंपाद की गई गूगी में मुझे जिन नामों का उल्लेम्य मिला उन्हें में अविरल अपने सम्मान्य महानुभायों की सेया में उपम्धिन करना है जिससे हो सके:- अगस्त्य संहिता आत्रेयधर्मशास्त्र आश्वलायनधर्मशास्त्र इन्द्रदत्तस्मृति उपकश्यपस्मृति शान्ननुस्मृति छागल्यस्मृति मनपिस्मृति लोमशस्मृति हिरण्यकेशीस्मृति वैग्यानमस्मृति पैठीनमिस्मृति सोमस्मृति नारद संहिता काश्यपस्मृति व्यानपादस्मृति लस्टस्मृति वैजवापस्मृति ऋष्यशृङ्गस्मृति कवसंस्मृति ऋतुस्मृति गर्गस्मृति गार्यस्मृति चन्द्रस्मृति स्कन्दस्मृति कोशिकस्मृति। 1 ॥ ।

पुलहस्मृति याराही संहिता पडल्यस्मृति यामदेव संहिता प्रहादस्मृति शौनकस्मृति वध्रुस्मृति वैश्वानर संहिता मरीचिस्मृति शुनः पुच्छ संहिता विश्वेश्वरस्मृति शाट्यायन संहिता विश्वेश्वरीस्मृति शाकलस्मृति शाकटायनस्मृति पण्मुसस्मृति शाकलस्मृति सनत्कुमार संहिता शाट्यायनिस्मृति सांख्यायनस्मृति सत्यवतस्मृति ईशान संहिता सुमन्तुस्मृति कात्यायन स्मृति च्यवनस्मृति कार्णाजिनिस्मृति जमदमिस्मृति गालवस्मृति गवेयस्मृति छागलेयस्मृति जतुकर्णस्मृति जावालस्मृति कापिञ्जलस्मृति कणादस्मृति पष्ठ भाग में केवल दो स्मृतियां ही उपलब्ध हुई हैं ५५००, ओकोंवाली, सौगाक्षि और मार्कण्डेय । यदि समस्त धर्म- शास्त्र प्रेमी इस ओर कुछ विशेष अनुसन्धान दृष्टि से कृपा करें तो हमारे प्रकाशन कार्य में शीघ्रता होकर भारतीय जनता रा संमार को प्रकाशित स्मृति-संग्रह की प्रस्तुत की जा सकती है। स्मृति-सन्दर्भ और निरुक्त ग्रन्थों की आलोचनात्मक प्राप्ति कृति पृथक्-पृथक् व सम्मिलित रूप से भाण्डारकर अनुपम भेंट

'कामये दुःखतप्तानाम्प्राणिनामातिनाशनम्'
जीयन का मृगान में होने वाली मोटी-मोटी भूगों की
प्रतिदिन अन्ननिरीक्षण द्वारा और निगम से सीक बनाने
से है। हमारे पूर्वजों ने आम-गुगार में हिय इन मंशाप्रपन्यों
को सम्पूर्ण संमार की नियमावली कप में प्रकाशित किया।
आज की भीषण परिस्थिति में जिन महानुमायों में शास्त्रमय
जीयन से अपने शरीर द्वारा प्राणिहिन का प्रण लिया है।
धन्य हैं । पाशा करता हूं कि शास्त्र मर्यादित जीवन से हम
सभी अपना मार्ग प्रशस्त कर ममी का कल्याण मम्सादन
करेंगे। इस प्रकाशन की विशालता और अन्य महापुराणादि
फे प्रकाशन में व्याप्त रहने के कारण हमारे कार्यकर्तृवृन्द के
द्वारा अपूर्णता रह गई है उन्हें कपालु पाटक महानुभाष
शोधन कर लेंगे यह प्रार्थना है।
श्रावणी पूर्णिमा
२०१२
विद्वन्मण्डली का अनुमान
मनसुखराय मोर
लाइव रो, कलकत्ता।

श्रीगणेशाय नमः । अथ स्मृतिसन्दर्भस्थ पञ्चमभागे सङ्कलित- स्मृतीनां नामनिर्देशः २६२३ स्मृतिनामानि पृशङ्काः ४५ कपिलस्मृतिः २५२६ ४६ याथूलस्मृतिः ४७ विश्वामित्रस्मृतिः २६४५ ४८ लोहितस्मृतिः २७०१ ४६ नारायणस्मृतिः २७७० ५० शाण्डिल्यस्मृतिः २७६३ ५१ कण्वस्मृतिः २८६० ५२ दाल्भ्यस्मृतिः २६३३ ५३ आगिरसस्मृतिः नं० २... (क) पूर्वाङ्गिरसम् २६४६ उत्तरागिरसम् ३०६५ ५४ भारद्वाजस्मृतिः ३०८५ वेशेप द्र०-द्वितीयागिरसस्मृतेविषयवैशिष्ट्येनपृथगुपन्यासः " ... ...

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५५११
॥ श्रीगणेशाय नमः॥
स्मृतिसन्दर्भ पञ्चम भाग
की
विषय-सूची
कपिलस्मृति के प्रधान विषय
अध्याय
प्रधान विषय
।
पृष्ठाङ्क
कपिल-शौनक-सम्पादवर्णनम्
२५३६
कपिल एवं शौनक में पररपर वेद विषयक चर्चा
यही वेद निन्दकों का प्रकरण भी आया है (१-२०)।
वैदिककर्मणामभावकथनम्
वैदिक कर्मों का अभाव कथन ( २१-४०)।
वेदमन्त्राणां व्यत्यासेनोचारणेदोपकथनम् २५३४
वेदमन्त्रों के व्यत्यास से उच्चारण करने में दोप
होना (४१-५०)।
श्राद्धप्रकरणवर्णनम्
२५३५
श्राद्ध प्रकरण का वर्णन, नान्दीमुख श्राद्ध की प्रधा-
नता, विभिन्न श्राद्धों का सुन्दर वर्णन (५१-३००)।

अध्याय
रा
२५५७
२५६१
२५६३
प्रगान विषय
उपनयनमस्कारवर्णनम्
उपनयन संस्कार का वर्गन ( ३०१-३३३)।
प्राह्मणादिवानामेकपनीमाजननिर्णयवर्णनम् २५५६
प्राह्मणादियों का एक पशि में भोजननिर्णय
वर्णन (३३४-३५०)।
विप्रमहत्त्ववर्णनम्
विनों के महत्व का वर्णन ( ३५१-३५८)।
नान्दीश्राद्धप्रकरणवर्णनम्
नान्दी श्राद्ध करनेवाले की योग्यता व अधिकार
का वर्णन (३५६-३७४)।
दत्तकपुत्रप्रकरणवर्णनम्
दत्तकपुत्र का वर्णन और उसकी योग्यता (३७५-४२६) ।
दानप्रकरणवर्णनम्
दशविघदानों का निरूपण ( ४२७-४७६)। दान
अधिकारी जनों का वर्णन (४७७-४८७)।
दौहित्रप्राधान्यवर्णनम्
दौहित्र की सर्वत्र प्रधानता का निरूपण (४८८-५००)।
भूमिदानप्रकरणवर्णनम्
भूमिटान
२५६५
२५६६
के
२५७५
२५७७

विश्वास्त्रीणां प्रकरणम्
अध्याय
प्रधान विपय
चर्जितस्त्रीणां श्राद्धपाककरणे दोषवर्णनम् २५७६
वर्जित स्त्रियों को श्राद्ध का पाक करने में दोष
बतलाया है ( ५१६-५४०)।
विधवास्त्रीणां कृत्यवर्णनम्
२५८१
विधवा स्त्रियों के कार्यों का वर्णन (५४१-५६२ )।
सधवा विधवास्त्रीणां मीमांसा
२५८५
सधवा एवं विधवा खियों का विवेचन (५६३-६३२) ।
२५८६
अतिरण्डा, महारण्डा और पुनरण्डा आदि का
वर्णन (६३३-६५६)।
पुत्रमहत्चवर्णनम्
२५६१
पुत्र के बिना एक क्षण भी न रहे। पुत्र के महत्त्व का
विस्तार से निरूपण (६५६-६७८)।
ज्येष्टपुत्रस्प पैन्ये योग्यता
२५६३
ज्येष्ठ पुत्र की पिता के सभी उत्तराधिकारियों से
अधिक योग्यता (६७६-६६८)।
औरसपुत्रेषु ज्येष्ठत्वनिर्णयः
२५६५
औरस पुत्रों में ज्येष्ठ कौन हो इसका निर्णय (६EE-000)

प्रधान विषय
प्रा
२५६४
२६०१
२६०३
अध्याय
पये कर्मणि दीहियम्गारमन्यम्
पैथ्य कर्म में दीहिय का पुत्र के अभाव में औरण
होना (७.१-७१४)।
धर्मसेवनलागः
धर्मसेयन का लाभ (७५-७६१)।
सुतस्य कुलतारकत्वम्
पुत्र का कुलतारक होना (७६७-७८६)।
निर्दुष्टपुत्रयोग्यता
निर्दुष्ट पुत्र की योग्यता (७६०-८०६)।
दण्ड्यानामदण्ड्यानां यथायथधर्मव्यवहरणम्
२६०५
दण्डनीय और न दण्ड देने योग्य जनों का धर्म से .
व्यवहार करना (८१०-८३०)।
दण्डविधानम्
दण्डविधान वर्णन ( ८३१-८७१ ) ।
विप्रमहत्चवर्णनम्
विप्र का महत्व निरूपण (८७२-८६३)।
नानाविधदानप्रकरणम्
विविध दानों का वर्णन (4६४-६८०)।
२६०७
२६११
२६१३

पाय
[५]
प्रधान विपय
पृष्ठाङ्क
मणां प्रायश्चित्तवर्णनम्
२६२१
दुष्का का प्रायश्चित्त वर्णन (६८१-६६५) ।
फपिलानि का माहात्म्य वर्णन (६६)
कपिलम्मृति की विषय-मूची समात्र ।
वाधूलस्मृति के प्रधान विषय
त्यकर्मविधिपणनम्
२६२३
मनियों में यापूल मुनि से प्रागादि के थापार
पग पर नियम विधि पर वर्णन इन्दन किया
११.३) प्राममुद्रा में शण्या त्याग कर अगर मन से
हाथ-पैर धोकर भगवग्माण को (४)। मामुल में
मोपासा सभी कामों में धनाधिकारी रहना)
प्रातः सन्ध्या राम बारा से रेगर सूर्योदय
art wr: नारायले प्रातः मम्मा परे (1)।
माश भाग बनाने के समय सन्ध्या
रे(“नी परोपात पारन में और
म मायामों में उभरपी सरफर में दक्षिण
पोपोर मरर योगावर (८) मारे पदों

-
आचार से हीन की सब क्रिया निष्फल हैं (१८-२०)।
आचमन प्रकार-ग्राह्मण इतना आचमन ले जितना
हृदय तक स्पर्श हो, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और स्त्रियाँ
फष्ठताल तक स्पर्श करनेवाल जल से थाचमन करे।
दाय में कुरा लेकर जल पीये और आचमन करे।
(२२-२७)। अपने फाट प्रदेश तक जल में स्नान कर
यही भीगे कपड़ों से अपंग, आचमन और जप करे यदि
स्मो कप पहनकर करना दोनो पन्द्र में ये क्रियायें करें
(76-10) नावादिन पन्नधायनादिन करे । युहा
समय सजनी में मुग शरन गे प्रायभित्त
freifपों में बन्लान नहीं करना चाहिये।
अध्याय
प्रधान विषय
पृष्ठाइन
को सिकोड़ कर नाक और मुँह को वस्र से ढक कर
मलमूत्र त्याग करे (६)! जो व्यक्ति अपने शिर को
विना ढंके मलमूत्र का त्याग करता है उसके शिर के
सौ टुकड़े हों ऐसा वेद शाप देते हैं (१०)। बाद में
शोधन कर्म करे। गृहस्थ, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और
सन्यासियों का विभिन्न शौच प्रकार ( ११-१७ )। बाह्य
और आभ्यन्तर शौच आवश्यक है क्योंकि शौच व
२६२७
নাগিন
हा पन में रान काना नाहिये

अध्याय
प्रधान विषय
पृष्ठाङ्क
अस्पृश्य के छू जाने से १३ वार जल में नहाने से शुद्धि
हो। रजस्वला स्त्री को यदि ज्यर चढ़ जाये तो वह
कैसे शुद्ध हो इसके उत्तर में वाधूल ने बताया कि चतुर्थ
दिन दूसरी स्त्री उसे स्पर्श कर दश या बारह बार
आचमन कर अपने पहलेबाले कपड़ों को छोड़कर नये
कपड़े पहन ले फिर पुण्याहवाचन के साथ यथाशक्ति
दान करे (३५-४८)। भूमि पर गिरा हुआ जल
गंगा के समान पवित्र है। चन्द्र और सूर्य ग्रहण
के समय फुआ, थापी, तडाग के जल शुद्ध हैं। अपनी
शौच क्रिया से निवृत्त होकर स्नान करे दोनों हाथों
को मिला कर जल की अञ्जलि से जल में तर्पण करे
जिस तीर्थ से जल लिया जाय उसीसे जलाक्षलि देये
(४६-५६)। पूर्व की ओर मुग्म करके देवतागण को.
उत्तराभिमुग्य होकर शृपियों को और दक्षिण की ओर
मुंह करके जल में पितरों को तर्पण करे । स्नान के लिये
जाते हुए मनुष्य के पी पितरों के माय देवगण याम
रेव्याकुल जल के लिये लालायित होकर यायुरुप होकर
जाते हैं अतः देवपिपितृतर्पण किये बिना यत्र को न
मेचोड़ यदि यस निचोड़ा जाता तो वे निराश होकर
लि जाते हैं। सम्पूर्ण फी फी मिदि के लिये नदी,
पलाय,पहादी मरनों में प्रतिदिन मान करे (५७-६३) ।

स्नान करनाद का नाम mA अध्याय शुद्ध होनेपर ही नित्यकर्म सन्ध्योपासन देवर्षि पितृ देता है। स्नान के समय पहने वन से शरीर को न मले न पोछे ही इससे शरीर कुत्ते के द्वारा सूघा हुआ हो जाता है जो फिर स्नान करने से ही शुद्ध होता है स्नान मूलाः क्रियाः सर्वाः सन्स्योपासनमेव च । स्नानाचारविहीनम्य मर्वाः स्युः निफ्ला: क्रियाः ॥७॥ को उस काल में म्नान करने स ६जार माघ स्नान का फल थोर जन्म दिन के नक्षत्र में यधून पुण्यकाल, प्यतीपात और मंक्रान्ति पया में, अमावस्या को नदी मेम्नान शोटिला का उदार कर देता है। प्रातः प्रधान विषय पृष्ठा दूसरे के बनाये हुए सरोवर में स्नान करने से उम बनानेवाले के दुष्कृत (पाप) नानार्थी को लगते हैं अतः उसमें न नहावे (६४)। मोकर उठने से लार- पसीनों से भरा हुआ मनुष्य अशुद्ध है उसे म्नानादि से स्नान प्राजापत्य यज्ञ के समान है और आलस्यादि को नष्ट कर मनुष्य को उन्नत विचार और कार्यशील वना तर्पण करना चाहिये। सूर्योदय के पूर्व प्रातःकाल का (६५-६८)। मम्पूर्ण क्रियायें स्नान के अन्तगत ही हैं। रविवार [६] अध्याय प्रधान विषय पृष्ठाङ्क पड़ते। स्नान किये बिना भोजन करनेवाला मल का भोजन करता है (६६-७५) । शिव सङ्कल्प सूक्त का पाठ, मार्जन, अघमर्षण, देवर्षि पितृ तर्पण ये स्नान के पांच अङ्ग हैं (७६-७७)। जल के अवगाहन, जल में अपने शरीर का अभिषेक, जल को प्रणाम और जल में तीर्थो गङ्गादि नदियों का आवाहन फिर मनन, अघमर्पण, देवर्षि पितृतर्पण कर विधान यत- लाया गया है (७८-८६)। प्रातः स्नान का महत्त्व । अपने शरीर को पोंछने पर सूखे कपड़े पहनकर उत्तरीय धारण करे। चन्दन और तर्पण के समय इसे कादि प्रदेश में ही बांधे रखे। फिर तिलक करे। पर्वत की चोटी से, नदी के किनारे से, विशेष रूप से विष्णु क्षेत्र में मिली सिन्धु के तट पर तुलसी के भूल की मिट्टी से तिलक प्रशस्त यताया गया है (६०-१०८) । श्यामतिलक शान्तिकर लाल वश में करनेवाला, पीला लक्ष्मी देनेवाला और सफेद मोभदाता चलाया है (१०६-११० }। भगवान् पर चढ़ाये गये हरिद्रा के चूर्ण के तिलक का माहास्य ( १११) सम्पूर्ण संसार में जो कर्महीन द्विजाति मात्र हैं उनको शुद्ध करने के लिये सन्ध्या स्वयं ब्रह्मा ने बनाई। प्रातःकाल गायत्री का ध्यान, मध्याह में सावित्री

सविता को प्रकाशित करने से इनका नाम मावित्री
और संमार की प्रमवित्री याणी म्प में होने में समका
इसका नाम सरस्वती अन्वर्थ १ (जमा नाम वमा गुण)
थापोहिप्ठेत्यादि मार्जन मन्त्रों में नौ श्रोद्धार के.
माथ जो मार्जन किया जाता है उमस वाणी, मन और
शरीर के नवोंदोपों का क्षय हो जाता ६५११७.१२०)।
सायंकाल में अध्य॑ जल में न देव जहाँ सन्ध्या की जाय
वहीं जप भी हो। वेदोदित नित्यकमा का क्रिमी कारण
अतिक्रमण हो जाय तो एक दिन चिना थन्न साये रहना
चाहिये और १०८ गायत्री मन्त्र के जप दोनों सन्ध्या
और मृतक के आशीच में भी सन्ध्या कमेन
छोड़े प्राणायाम को छोड़ कर सारे मन्त्रों को मन से
अध्याग
पमान वान
और गागं
फासीमामान राना मामि।
प्रनि. म. पान और गायत्री
मन्य पं. उपमेयालेकी गायत्री मा नीलो
दमका नाम गायत्री।
प्रतिमहादप्नदोषापानकादुपपानकाय ।
गायत्री प्रोन्यते गरमाद् गायन्नं पागने मनःशा
(११२-११६)।
में विशेष रूप करे (११-१२६)।
सूतक

प्रधान विषय
[ ११ ।
अध्याय
पृष्ठा
उच्चारण करे (१३०-१३२)। देवार्चन, जप, होम, स्वाध्याय,
स्नान, दान तथा ध्यान में तीन-तीन प्राणायाम करे
(१३३-१३४)। जप का विधान प्रातः काल हाथ ऊंचे
रखकर, सायंकाल नीचे हाथ कर एवं मध्याह्न में हाथ
और कन्धे के बीच में रखकर जप करे नीचे हाथ कर
जप करना पैशाच, हाथ बीच में रखकर करने से
राक्षस, हाथ बांधकर करने से गान्धर्व और ऊपर हाथ
करने से दैवत जप होता है (१३५-१३६)।
प्रदक्षिणा, प्रणाम, पूजा, हवन, जप और
देवता के दर्शन में गले में यख न लगावे ( १४०)। दर्भा
के बिना सध्या, जल के बिना दान और बिना संख्या
किया हुआ जप सब निष्फल होता है । जप में तुलसी
काष्ठ की माला और पद्माक्ष तथा रुद्राक्ष की माला प्रशस्त
है ( १४१-१४३) । गृहस्थ एवं ब्रह्मचारी १०८ धार मन्त्र
का जाप करे। वानप्रस्थ तथा यति १००८ बार करें।
आहुति के लिये सामग्री का विधान (१४४-४५)।
गृहस्थधर्मवर्णनम्
२६३७
गृहस को सम्पूर्ण कार्य पनी सहित इष्ट है । जिस
मनुष्य को खी दूर हो, पतित हो गई हो, रजस्वला हो,
अनिष्ट या प्रतिकूल हो उसकी अनुपस्थिति में कोई
गुरुतथा

---किन लोगों से किसी भी रूप में को:-
लाये । संक्रान्ति, दोनों पक्षों के अन्त में द्वादशी में और
रात्रितथा दिन की सन्ध्या में तुलसी चयन का निषेध
(१६०)। तीर्य में मन, वाणी और कर्म से कैसा भी
पाप न करे और दान न लेवे क्योंकि
अतः अक्षम्य है। भृत (व्यवहार) अमृत सत्य कतव्य
पालन ऋत या प्रमृत से और सत्य-अनृत से जीविका
किसी वस्तु को बिना पूछे लेने से पाप (१६४)। मनुजी
ने वनस्पति, कन्द, मूल फल, अग्निहोत्र के लिये काठ,
हण और गौओं के लिये घास ये अस्तेय बताये हैं।
अध्याय
प्राधिरामयी मंगमी. को को मनी पर्न:
को प्रतिनिधि मा murTriजिया करने की
मदान्ध को माता दी है ( HE) हांगक
लिये गो पृन श्रेष्ठ या मिरगी माहित गृा मन
मिलने पर यफरी का पत और उन गय के न मिलने
पर माशान मेल का पयहार करे ( १४६ )। ममगपर
आहुति देने का माहात्म्य ( १५०-१५२ ) वेदाध को
स्या में लानेवाले मनुष्य फी निन्दा। ये प्रकार के वेदों
को बेचनेवाले का गणन (१९३-१५८) रयियार, गुम्यार.
मन्यादि चारों युगों में और मध्याह्न के याद नुलमी न
फमावे (१६१-६३)।

अध्याय
[ १३ ॥
प्रधान विपय
पृष्ठाङ्क
इसका वर्णन ( १६५-१६८ )। दूसरे के लिये तिल का
हवन करनेवाले दूसरे के लिये मन्त्र जप करनेवाले और
अपने माता पिता की सेवा न करनेवाले को देखते ही
आँख बन्द कर ले (१६१)। जो लोग निन्द्य कर्म
करते हैं उनके सङ्ग से सत्पुरुष भी हीन हो जाते है
और उनकी शुद्धि आवश्यक है ( १७०-१७४) । जो
भादेश, तीन या चार वेद के महाविद्वान् दे वही धर्म
है और कोई हजारों व्यक्ति चाहे, कहे वह धर्म सम्मत
नहीं वेद पाठी सदा पत्र
आयज्ञ करनेवाले और अपनी
इन्द्रियों को वश में करनेवाले मनुष्य तीन लोकों को
तार देते है ( १७५-१७४)।
पतित लोगों से सम्पर्क करने से मनुष्य एक वर्ष में
पतित हो जाता है (१८०)। कलियुग में सभी ब्रह्म
का प्रतिपादन करेंगे परन्तु कोई भी वेद विहित कर्मों
का अनुष्ठान नहीं करेगा (१८१)। मैथुन में त्याज्य
दिनों की गणना-पष्ठी अष्टमी, एकादशी, द्वादशी,
चतुर्दशी, दोनों पर्व अमावास्या, पूर्णिमा, संक्रान्ति कोई
भी श्राद्ध दिन, जन्म नक्षत्र का दिन, श्रवण प्रत का
समय और जो भी विशेष महत्त्वपूर्ण दिन हैं उनमें
मैथुन (खो गमन ) निपिद्ध है (१८२-१८३) । शुभ समय
में अर्यार्थी मनुष्य जिन कामों को अपने स्वार्थ के लिये

सवा मानण पद्दी जो भृण करने से ऐसे डरता है
माननेवाले को भगवद्भक्त बनने का अधिकार नहीं
(१८६)। सभे अन्धे का लक्षण-जो श्रुति स्मृति का
अध्ययन, मनन और अनुशीलन कर उनके मार्ग का
अनुष्ठान नहीं करता यह अन्धा दे (१६०-१६१)। पापी
को धर्मशाख अग्छे नहीं लगते (१२)।
लोग मरने से और नियों के मम्पक से जेसे मृनक से
पना दोनीमेदर गहना प्रामा पद जोशान्त
दो दान्तोपोजीननेवाला हो, आत्मा पर पूरा
रिधारानेवाला हो. न्दियों निपह कर चुका
होगा यह शरीर भाभांग के लिये नही
बलिम गरामा मण्या करते हुए
अध्याय
प्रधान विपय
पृष्ठाङ्क
करता है उन्हें ही यदि धर्म के लिये करे तो संसार में
कोई दुःखी नहीं रह सकता।
अर्थार्थी यानि कर्माणि करोति कृपणो जनः ।
तान्येव यदि धर्मार्थ कुर्वन् को दुःखमाग्भवेत् ।।१८६॥
भिन्न-भिन्न वस्तुओं एवं पवितों के छु जाने से स्नान
का विधान किसी वस्तु को बेचने पर स्नान का विधान
आवश्यक है ( १८४-१८८)।
श्रुति स्मृति के आदेश प्रभु की आज्ञा है इनको न
से मपं को देखकर। मम्मान में ऐसे दूर रहता है जैसे
का

प्रधान विपय [ १५ ] अभ्याय पृष्ठाङ्क उर्ध्व लोक में अनन्त सुख की प्राप्ति के लिये है (१६३-१६४)। दर्श में सूखे कपड़े पहनकर तिलोदक जल के बाहर देगीले वनों से पितर निराश होकर जले जाते हैं । ऊर्ध्व पुण्डू का माहाम्य ( १९५-२०१)। श्राद्ध के बाद ब्राह्मण भोजन का विधान (२०२)। विवाह में, श्राद्धादि में नान्दी श्राद्ध करने से, सूतक का दोप नहीं रहता (२०३)। पितृ श्राद्ध में वर्जित लोगों को देवता कार्य में बुलाने की छूट (२०५-२०६)। पित श्राद्ध में पत्रों के देने का माहात्म्य (२०७)। अलग-अलग कमानेवाले पुत्रों द्वारा पृथक-पृथक् पिव भाद्र का विधान (२०८-२१०)। सन्यासी बहुत सानेवाला, वैद्य, नामधारी साधु, गर्भयाला, (जिसकी स्त्री गर्भवती हो ) वेदों के आचरण से हीन व्यक्ति को दान और श्राद्ध में न बुलावे (२११)। गर्भ करनेवाले द्विज के लिये वर्ण्य कर्म (२११-२१७)। मान, सन्ध्या, जप, होम, स्वाध्याय, पितृ तर्पण, देव- ताराधन और वैश्वदेव को न करनेवाला पतित होता है अतः इन्हें नियम से करना प्रत्येक द्विजाति का कर्तव्य है (२१८-२२४)। ॥ वाधूलस्मृति की ..

को Hirtant niti
पीपा Drint
करने मेगा प्रामिन है।"
निहा गया प्रमाद भायानगो
प्रातिपादाचा गदार18.14.
मगय पर निन्यरमादिकाए है पर सम
लोगों पर जय पाकर अन्त में विरारे
प्रातःदान मन्ध्या और जप धयाराम
ममय पर वर्षा होतेही थी पनि श्रीमती
६षसे ही नियुक्त कमों को नियुन ममय पररने में
विभामिन
tỷ * * * * * * * * *** ***
में 4 th an art tra
Virrgi kirta
ints writt fort 1 +
सय सिद्धि मिलती है ( १५-२१)
.
(१६)।

अध्याय प्रधान विपय पृष्ठाक अधम सन्ध्या के भेद । शुचि या अशुचि हो, नित्यकर्म को कभी न छोड़े (२२-२५) । तीनों सन्ध्या काल में या तो पूर्व की ओर या उत्तर की ओर मुँह कर नित्यकर्म करे। दक्षिण या पश्चिम की ओर मुंह करके नहीं (२६)। सन्ध्या मान किये विना विद्या पढ़ना हानिकारक है, सन्ध्या काल आने पर उसे छोड़नेवाले को पाप लगता है (३०)। सोपाधि एवं अनुपाधि भेद से आधार के दो भेद-सोपाधि गुणवान् और अनुपाधि मुख्य है (३१-२६ )। गायत्री मन्त्र की विशेषता-प्रातःशय्या- त्याग के बाद पृथ्वी का वन्दन भैरव की स्तुति, दक्षिण दिशा में जाकर मल-मूत्र आदि का त्याग करे (३२) । शोच का प्रकार (५३-५६ ) । दन्तधावन और दतुक्न के लिये वनस्पतियों का परिगणन (६३)। आचमन कर स्नान करने का प्रकार (६८)। सन्ध्यादि, तर्पण का विधान (७३)। जलमान का विधान मन्त्रीमारण पूर्वक विशेष फल- दायक है। तीनों कालों में स्नान का विशेष विधान (2) स्नान करनेवाले पुरुष के रूप, तेज, बल, शोथ, आयु, आरोग्य, अलोलुपता, एवं तप की वृद्धि व दुःस्वप्न का नाश होता है। तर्पण की विशेषता (८७)। बख- धारण में यखों के महत्व का वर्णन, प्राणायाम का फेमायन्याम विधान (1..." सोने, ओढ़ने, अश्रुपात आदि से विन्न होने पर भाप- मन करे या दक्षिण कान को तीन बार पश करे। भोजन के आदि में और अन्त में निन्य आगमन करे। मानसिक आचमन में भी केशवाय नमः माधवाय नमः और गोविन्दाय नमः मन में बोलकर . . . Timi Meri Tr ristartin: Guruti irritict मिना ifrrent आगमनििमनर गुमशीन का मानना it. Tirm. मा और भागमान गार पर माना म का पर्गन-मन्त्र Tantrik और अन्त में आगमन फरे। HITAT नाम 'विधिवदाचमनस्यैरफलवर्णनम् गोकर्ण की आकृति बनाफर मंगटे और मपणे छोटी अहुली को छोड़कर अञ्जलि में जनपदन कर भागमन का विधान है इमी का फल है (२१-२३)। पूरने. चित्त शुद्धि करे (२४-३२)। २६५६

[१६]
प्रधान विपय
पृष्ठा
जनम्
२६६०
मापोहिष्ठा मयो भुवः" से मार्जन करे फिर न्यास
ऐमा करने से द्वितमात्र शुद्ध होकर ध्यान, जप,
में सब सिद्धियां प्राप्त करते हैं (३३-३६)।
(चमनविधिवर्णनम्
२६६१
यज्ञ में तीन बार आचमन का विधान है।
मात, आचमन को किन-किन स्थलों पर करना
विधि (४०-५७)।
यामविधिवर्णनम्
२६६३
जाविधिवर्णनम्
२६६५
मगायत्रीमन्ववर्णनम्
२६६७
मन्त्राणां जपे तत्तन्मन्त्रेण प्राणायामः २६६६
और अपान का समयुक्त होना ही प्राणायाम
है, इसे सन्ध्याकाल और प्रत्येक कर्म के
में मन को एकाग्र करने के लिये अवश्य करे।
उत्तम प्राणायाम, के चार मध्यम और तीन
। कहा गहा गया है (१-३)। गायत्री मन्त्र
हतियों के साथ प्राणायाम करना चाहिये

में - लं,,,, इन चीजों में पृथिव्यात्मा को गन्ध, आहाशारमा का पुया वाप्यारमा को कोदोरधोरथमतामा को ना प्रदान करे। इस पश्च- पूजा मेही प्राणायाम की सिद्धि दिमाथ और मन्नत में अन्य बन्द अध्याय प्रधान विषय .(४-५)। पहले कुम्भक फिर पूरक और फिर रेचक, इस क्रम से प्राणायाम करना इष्ट है । सन्ध्या होम काल और ब्रह्मयज्ञ में कुम्भक से आरम्भ कर प्राणायाम करे। प्राणायाम में करने योगाध्यान का वर्णन (६-१०)। दश प्रणव एवं गायत्री मन्त्र के साथ इडा और पिङ्गला को छोड़ सुषुम्ना नाड़ी से कुम्भक करे साथ मन्त्र का स्मरण बराबर होता रहे (११)। रेचक और पूरक विना प्रयास के होते हैं । कुम्भक में प्रयास करना होता है यह अभ्यास से शक्य है। अनभ्यास से शास्त्र विप का काम करते हैं, अभ्यास से वही अमृत बन जाते हैं। प्राणायाम के समय सिद्धासन से बैठे। प्राणायाम में चारों अहुली और अंगूठा काम में लेना धादिये। इम समय मन्त्र के उच्चारण के साथ-साथ हम-उम देयता की मानमा करनी चाहिये इससे विशेष फल मिलता है। धूप, थग्न्यात्मा मानमी पूजा लिनी (१२.२१) प्रामायाम का अभ्यास मिद्धासन, ।

अध्याय [ २१ प्रधान विषय पृधा करने से शीम सिद्धि प्राप्त होती है। प्राणायाम में मानसी पूजा का माहात्म्य (३०-३६)। प्राणायाम के विना सब निष्फल है। विलोम गायत्री मन्त्र का वर्णन (३७-४६)। इससे सम्पूर्ण पाप, रोग, दरिद्रता दूर विलोम गायत्री मन्त्र के बाप का फल सम्पूर्ण मन, वाणी और कर्म से किये गये पापों का नाश होना बताया है (४८-४६) । प्राणायाम न करनेवाला अप- कीणी होता है उसे प्रायश्चित्त लगता है (५०-५२)। विशेष जिन-जिन मन्त्रों का विधान आता हैं उनके साथ भी पूरक, कुम्भक और रेचक क्रम से प्राणायाम करने का विकल्प है। चार्वाक, शैव, गाणेश, सौर, वैष्णव और शाक्त जो भी मन्त्र है उन-उन से प्राणायाम की विधि फल देनेवाली है । भिन्न-भिन्न विधियों में प्राणा- याम की १०, १५,२०, २४, १३, १४ और १६ बार आवृत्ति करने की विधि हैं । वैश्वदेव में १० बार आदि में १० बार अन्त में प्राणायाम करने का विधान है। जहाँ सङ्कल्प है यहां २ यार और सभी काम्य आदि कर्मों में १०.१० घार आवृत्ति का विधान है। विलो. माक्षरों से गायत्री का प्राणायाम अनन्त कोटि गुणित फल देता है (५३-७६)।

२६६ सन्ध्यावन्दन के ममय प्रातः और सायं तीन-तीन दूमरा वाहन नाश के लिये और तीसरा असुरों के नाश के लिये और अन्तिम प्रायश्चित्ताय देकर पृथ्वी की प्रदक्षिणा से सब पापों से छुटकारा हो जाता है। गायत्री के पश्चात का वर्णन (१-२४)। अध्याय पृथ ४ ५ २६७ • नानामन्यापिनियांगणानार्णनम ५ प्रापधिनापरिधिनम् प्रधान विषय भाजनम् शिर से पैर तक "आपोहिष्टादि" मन्त्र से मार्जन का फल । अर्थ मन्त्र और पूर्ण मंत्र मार्जन दो प्रकार का है (१-५)। ऋग्यासुः साम वेद की शाखापालों का मार्जन क्रम। आपोहिष्ठादि के मन्त्र में प्रणव का उच्चारण करते हुए शिर पर मार्जन करे और "यस्यक्ष- याय जिन्वय से नीचे की ओर जल प्रक्षेप कर (६-१८)। शिर से भूमि तथा पादान्न मार्जन से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। मार्जन की फलश्रुति(१६-२७) । सार्घ्यदानगायत्रीमाहात्म्यवर्णनम् । अयं सूर्य को दे, मध्याह्न काल की सन्ध्या में केवल एक । तीन अर्घ्य में एक दैत्यों के शस्त्रास्त्र नाश के लिये २६७७

नागरी मान
intestha
[ २३ ]
य
प्रधान विपय
पृष्ठाङ्क
प्रायश्चित्तार्य की
नाना मन्त्रों के
ग एवं ध्यान का
द्विविधजपलक्षण
नैमित्तिक एवं काम
। सन्ध्या के रूप
त की चोटी पर एकान्त
'याला है (१-२)।
मूलमन्त्र से भूशुद्धि, फिर भूतशुद्धि, फिर रक्षाके लिये
बन्धन करना और गायत्री के न्यास का वर्णन
कलेक्षणात
p
राङ्गन्यासवर्णनम्
२६८५
दश यार मन्त्र का जप कर हृदय को हाथ से स्पर्श
प्राणसूक्त जपे फिर प्राणायाम करे (३१-३२)।
लोम एवं विलोम क्रम से करन्यास एवं हृदयादि-
स एवं दिशाओं का बन्धन करे ।
दाविधिवर्णनम्
२६८७
राबाहन आदि के भेद से १० प्रकार की मुद्राओं का
र, गायत्री जप के आरम्भ की २४ मुद्रा (३३-७२) ।
स्थानविधिवर्णनम्
ल्याकाल में सूर्योपस्थान का महत्व ११-२०) ।

है। नित्य होम का वजन सूतक एवं मृतक में बताया
RAVE
१
२६१८
करनेवाला अन्नदोपसे लिपायमान नहीं होना (१७-२४)।
पञ्चशूनाजनित पापों को जैसे, चुल्हा, पफी, अल
भरने का स्थान, झाडू आदि के दोषों को दूर करने के
लिये इसकी बड़ी आवश्यकता है (२५-३६)।
-वैश्वदेव को करने से सफल दोषां का निवारण होता
६पान fTT
८ देवपादिपिपानागंनम
मेयरकालनिगंगानम
पानापनुपपानम
पंचदेवमाहारगान
भदेय में मोदय (कोरी , मा.. और
फड़ये द्रव्यों को काम में न हो ( 2.0 )। नाना प्रकार
की बलि फरने से नाना प्रकार के पाप कमाकी
सिद्धियां होनी है। हितों के लिये पागही प्रम से
पलि फा विधान है। पहले उपयीन, दुमरे नियीत
• सीसरे पिरामेध के लिये थलि की जाती है। (३-१२.)।
पैश्वदेव में ताजा अन्न ही काम में लिया जाय
(१३-१६)। वैश्वदेय मन्त्र के माथ हो या यिना मन्त्र
के इसे किसी भी रूप में करना चाहिये ; क्योंकि इसको
.

गया है। वश्वदेव के काल का वणन । वैश्वदेव माहात्म्य
वर्णन (४०-८३)।
॥ विश्वामित्रस्मृति की विषय-सूची समाप्त ।।
अध्याय
प्रधान विषय
लोहितस्मृति के प्रधान विषय
पृष्ठा
विवाहामौ स्मार्तकर्मविधानवर्णनम् २७०१
विवाहामि में स्मात कमी का वर्णन । जिस स्त्री के
साथ सर्वप्रथम गार्हस्थ्य सम्बन्ध जुइता है वह धर्मपनी
है। उसके विवाह के समय की अमि का ही सभी कार्यों
में उपयोग इष्ट है ( १-११)। अन्य भार्याओं की अग्नि
गोण है उनमें वेदोक्त एवं तन्त्रोक्त प्रयोग नहीं होना
चाहिये। यदि उन्हें काम में भी लें तो अमन्त्रक ही
प्रयोग होना चाहिये (१२-१६)।
सभी स्मार्त कर्म, स्सालीपाक, प्राद्ध, या जो भी
नैमित्तिक हो वह सारा प्रथम धर्मपत्री की अनि में ही
अनेकानिसंसर्गः
२७०४
पुस अग्मियों का एकत्र संसर्ग का विधिपूर्वक

सभी कार्यों में धर्मपत्री की ज्येष्ठता मानी गई है भले
ही दुमरी पनियो अवस्था में कितनी ही बड़ी क्यों न
हो (४३.४५)। इमी प्रकार धर्मपत्नी से उत्पन्न पुत्र ही
फर्मादि करने में ज्येष्ठता प्राम करेंगे क्योंकि दूसरी,
मीमरी आदि से उत्पन्न पुत्र सोफामजद (४६-५२)।
दमपुर की ज्ञानपुर के गमान म्नभाजनना एवं
गम्पत्ति का अधिकार (५३-५४)। जिनकपुत्र नहीं
उन अपने पुत्र के लिये मनाय कानेवाले की प्रशंमा
(R.4t) धिमापुर दत्ता टिपा जायससमाज
अध्याय
प्रधान विषय
पृष्ठा
विधान (३०)। यदि मोह से दमरी पनियों की अग्नि
में यागादि का विधान किया जाय तो यह निष्फल
होता है ( ३१-३६)। दमके लिये फिर से मुख्य अमि
की स्थापना कर फिर विधान करना लिया है (३७)।
यदि धर्मपत्नी कहीं वाहाचली जाय तो यह अग्नि
लौकिक हो जाती है। अतः प्रातः मायंकाल के नित्य
हवन में धर्मपत्नी का उपस्थित रहना आवश्यक है (३८.
४२)। सीमान्तर जाने पर उस अग्नि का फिर सन्धान
(स्थापना) करना चाहिये।
ज्येष्ठादिपनीनांतत्सुतानांजप्ठ्यकानिष्ठपपिचारः
२७०७
२७०५
अपागा दत्तकविधानवर्णनम्

अध्याय
प्रधान विषय
के प्रमुख व्यक्तियों के सामने प, भाई-बन्धुओं को
युलाकर बिना पुत्र के माता को विधि-विधान से देना
चाहिये। जो पुत्र समाज के गोत्र युल में से दत्तकरूप
में लिया जाय वास्तव में वह अपने पुत्र तुल्य है और
अपुत्रक माता-पिता के लिये सर्वथा देवत्र्य कार्य के
लिये प्राहा है। उस पुत्र का औरस पुत्रों के समान ही
सारा अधिकार होता है (६५.७१)।
यदि दत्तक पुत्र लेने के बाद उन माता-पिता के
सन्तान हो जाय तो यह चतुर्थ भाग का स्वामी होने
का अधिकार रखता है (७२-७४ )। जय आदि
धर्मपत्नी के न रहने य पुत्र न होने पर दूसरी पत्नी से
जो पुत्र होगा वही ज्येष्ठत्व का अधिकारी होगा और
अवशिष्ट स्त्रियों की सन्तान कामज रहेगी (७५-८५)।
आत्मज सन्तान की ही औरसता कही गई है (८६-
८७)। यदि कोई धर्मपत्नी के सन्तान न हुई उसने पति
की इच्छा से दत्तक पुन लिया और संयोगवश फिर
सन्तान हो गई तो दत्तक पुत्र को ज्येष्ठ पुत्र के रूप में
परावर भाग मिलेगा । यदि दत्तकपुत्र और औरस,
पुत्र उपस्थित हो तो औरस पुत्र को ही पिता-माता
के और्ध्वदेहिक कर्म करने का अधिकार है (८६-६८)!

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[ ३१ ]
अध्याय
प्रधान विषय
पृष्ठाङ्क
से अपुवा विधवा स्त्री दत्तक ले ( २४३-२४४)। जो
निकट सम्बन्धी दो या दो से अधिक सन्तानवाला हो
उसका कोई-सा भी पुत्र अपने लिये दत्तक लिया जा
सकता है (२४६)। यदि कोई-सा भी लूला, लङ्गड़ा,
गूंगा, वहरा, अन्धा, काना, नपुंसक या कुष्ट का दागी
हो तो उसे लेना न लेना बराबर है (२४७)। यदि ऐसे
विकलाङ्ग दत्तक लिये गये तो मन्त्र क्रिया आदि का
लोप हो जाता है (२४८-२५२)। यदि समाज के
सभी प्रतिष्टित व्यक्ति एवं परिवार के माई-बन्धु जिसके
लिये आज्ञा दें तो वह दत्तक सफल होता है
(२५३-२५७)।
अपुत्रक का दत्तक लेना दोहित्र न उत्पन्न हो तब तक
प्रामाणिक है बाद में यदि दौहिन्न पैदा हो जाय तो
वह अप्रामाणिक है।
मनु ने दौहित्रों में बड़े छोटे में किसी एक को लेने का
विधान बताया है ( २५८-२६३ }। हां, ३ या ५०६
पुत्रों में सबसे ज्येष्ठ और सबसे कनिष्ठ को छोड़ किसी
एक को लिया जा सकता है (२६४-२६६)। यदि मोद्द
से ज्येष्ठ को दत्तक ले लिया गया तो मौसी विवाह
विधि फें याद वह अपने सगे पिता का ही पुत्र होने का
अधिकारी है दूसरे का नहीं (२६७)। ऐसा दत्तक

पृष्ठा
जो व्यक्ति धर्ममगन राज्य की प्रतिष्ठा में पूर्ण सहयोग
दोदित्र को पुषप्रहण की योग्यता (२४२)। अपने
परिवार माता-पिता, भ्रष्ट पुगप आदि की आज्ञा
अध्याय
प्रधान विषय
दौहिने सति पुत्रप्रतिग्रहाभावः
२७२२
दौहित्र होने पर पुत्रप्रतिग्रह नहीं करना, धयोंकि दोहित्र
होने से अजात पुत्र भी पुत्र ही है (२०१४)। किसी
के सम्मिलित परिवार में अविभक्त धन के भागीदार की
मृत्यु हुई यदि उसके पुत्री है और पुत्र नहीं है तो दौहित्र
ही पुत्र के समान मभी कार्यों को करने व कराने का
अधिकारी है (२५-२२८)। जो कुछ धन अपुत्रक का है
उसका सारा दायित्व उम मृतक की लड़की के पुत्र का
है (२२६-२३०)।
परधनापहारकाणां दण्डविधानवर्णनम्
२७२३
जो व्यक्ति किसी भी प्रकार से दूसरे के द्रव्य को
अपहरण करने की अनधिकार चेष्टा करे उसे राजा
स्वयं कड़ा दण्ड दे और उसे अपने देश से
बाहर निका-
रने का आदेश दे ( २३१-२३५) ।
में उन्हें रक्षापूर्वक रपना चाहिये ( २३६-२४२)
पुत्रत्वम्याधिकारितापर्णनम्
२७२५

[ ३१ ]
अध्याय
प्रधान विषय
पृष्ठाङ्क
से अपुत्रा विधवा स्त्री दत्तक ले ( २४३-२४४)। जो
निकट सम्बन्धी दो या दो से अधिक सन्तानवाला हो
उसका कोई-सा भी पुत्र अपने लिये दत्तक लिया जा
सकता है (२४६)। यदि कोई-सा भी लूला, लगड़ा,
गूंगा, पहरा, अन्धा, काना, नपुंसक या कुष्ठ का दागी
हो तो उसे लेना न लेना वरावर है ( २४७)। यदि ऐसे
विकलाङ्ग दत्तक लिये गये तो मन्त्र क्रिया आदि का
लोप हो जाता है (२४८-२५२)। यदि समाज के
सभी प्रतिष्ठित व्यक्ति एवं परिवार के भाई-बन्धु जिसके
लिये आज्ञा दें तो यह दत्तक सफल होता है
(२५३-२५७)।
अपुत्रक का दत्तक लेना दौहित्र न उत्पन्न हो तब तक
प्रामाणिक है याद में यदि दौहित्र पैदा हो जाय तो
यह अप्रामाणिक है।
मनु ने दौहित्रों में बड़े छोटे में किमी एक को लेने का
विधान बनाया है (२५८-२६३)। हां, ३ या ५, ६
पुत्रों में सबसे ज्येष्ठ और नयसे कनिष्ठ को छोड़ किसी
एक को लिया जा सकता है (२६४-२६ )। यदि मोह
से ज्येष्ठ को दत्तक ले लिया गया तो मौजी विवाह
विधि फै पाद वह अपने सगे पिता का ही पुत्र होने का
अधिकारी है दूसरे का नहीं (२६७)। ऐमा दत्तक

सन्तान क्रमशः तन्मातामह गोत्री और दोहित्र हैं
एक तन्मातामह गोत्री, दूसरा दाहित्र और
विवाह में कन्याप्रदान के समय मातामह एवं पिता
की प्रतिज्ञा के अनुसार होनेवाले सम्बन्ध से उत्पन्न
पुरमा के किमी in rain) को
दि . mir, it
को पोइ अगागात है ।
एकत्रम्ग कम्पनिमः
एक पुत्र frainfrreी
उसे करा. मानिiy()।
विधयाम्पोनपदण्टम्
जो कोई मुना और दोहित को निमार र अन्न
फो दत्तक ले उमपर रामाविशेष विधान मे दण्ड लागू
फरे ((BE-२६६)।
दौहित्रप्रशंसा
दौहित्र की प्रशंमा (२६७-३२३)।
दौहित्रैविध्यम्-
तीसरा निर्दोप
२७२८
૨૭૨૬

[ ३३ ]
अध्याय
प्रधान विपय
पृष्ठाङ्क
दोहिन की श्राद्धादि कर्म में श्रोत्रिय ब्राह्मण से
ज्येष्ठता (३३६-३४८)।
प्रत्याब्दिकाकरणे प्रत्यवायः
२७३४
प्रतिवर्ष के श्राद्ध को न करने से प्रत्यवाय होता है,
अत: जल, तण्डुल, उड़द, मूंग, दो शाक, पत्र, दक्षिणा
पात्र और ब्राह्मण ये दश श्राद्ध में उपयोग करने
की वस्तुएं हैं, एक का लोप भी वाञ्छनीय नहीं।
यदि आपत्काल हो तो उसके लिये अनुकल्प का
विधान है (३४६-३६३)।
श्राद्रव्याभावेऽनुकल्पः
मृत के दुर्लभ होने से तैल उसका प्रतिनिधि आय
उसके अभाव में दूध और उसके न मिलने पर दही यदि
ये भी न मिलें तो पिष्ट के जल से मिला कर होमकर्मा-
दिक करे। या फिर प्राप्त मधु से सब काम सिद्ध करे,
किसी भी रूप में फल, पत्र और सुद्रव्य आदि से श्राद्ध
का कार्य किया जाय।
इनके अभाव में आपोशानादिक क्रियायें जल से
और अन्न से सम्पादन कर पिण्ड प्रदान करे और जल
में विसर्जित करे अविशिष्ट को काम में लें फिर दूसरे
दिन वर्पण करे।
२७३५

aft
२७
२७६
अध्याग
सुगागिनीनां निपानमाः
हरिद्रानान विधि:
मुयागिनी वियों को 1. risiनमार
पण्डालापर्श पतंगा के प्राति Ariftari
में शीपंग्नान मा गगा हरिया के पूर्ण को जब में
प्रक्षेप कर स्नानयिमि कही है।...)
पतियतापमाः
पति की सेया पड़े में यहा गर्म (20)।
दुराचाररतां रण्डां दृष्टया प्रारमिनार्णनम् २७६
दुष्ट चरित्र युग रण्डाफ देखने गे प्रायशिल का
विधान कद्दा है(६७१-६८६)।
नानादण्ड्यकर्ममु दण्डविधानवर्णनम्
नानादण्ड्य कर्मों में दण्डविधान का वर्णन १६८-७९)।
"नयप्राप्तराज्ये सर्वेषां सुखित्ववर्णनम्
नयप्राप्त राज्य में सभी के मुग्यो रहने का वर्णन
(७१०-७२१)।
लोहितम्मतिमी --
२७६
२७६०

1.4MON THA ------- cumrahuw - अध्याय ६ - नारायणस्मृति के प्रधान विषय प्रधान विपय पृष्ठा १ नारायणदुर्वायसीः मम्बादः २७७० नारायण दुर्वासा का सम्वाद (१-६)। महापातकोपपातकपर्णनम् २७७१ महापातक और उपपातकों का वर्णन (७-१५)। प्रतिग्रहपापप्रायश्चित्तवर्णनम् २७७३ प्रतिग्रजनित पाप के प्रायचित्त का वर्णन (१६-४१)। २ युद्धिकृताभ्यामकृतपापानां प्रायश्चित्तवर्णनम् २७७४ প্রতিকূল জী প্রামকূল থাৎ ফ সাম্বির কী पणन (१.७)। ३ नानाविधदफतिनिम्तारोपापपर्णनम् ২৬৩ नाना प्रकार के पापों के निस्तार का उपाय(११)। ४ प्रायदिनचर्णनम् ২৬৬৩ प्रायभित्तों का वर्णन (१.११)। ২ ঘনিষহরিমাণিত २७७६ पाप गमापार की गनि का पर्शन (2) पापारिको दुर करने लिये महम कलशस्थापन विधान (1) ॥ s ।

२७८ २७८ सहन कलशस्नान, पञ्चवारण होम, गायत्री पुरश्चरण, धनहीन के लिये प्रायचित्त का विधान-यह शिखा महिन मुण्डिनदो पुण्यनीय में, या तालाब में, आकण्ठ जम में मनही अपमपंग जाप करे (१-१६)। [ ३८ ] अध्याय प्रधान विषय ६ सहस्रकलशाभिषेकः सहस्र कलशों से अभिषेक का वर्णन (१-७)। ७ कलौ नौयात्राद्यष्टकर्मणां निपंधः कलियुग में विधवा का पुनः उद्वाह, नाव से यात्रा, मधुपर्क में पशु को यध, शूद्रान्नभोजिता, सब वर्गों में भिक्षा मांगना, ब्राह्मणों के घरों में शुद्र की पाचनक्रिया, भृग्वनिपतन वर्जित है (१-५)। वन के पास ऋषियों का अनुरोधपूर्ण आवेदन ( ६-३३) । ८ अष्टनिपिद्धकर्मणां प्रायश्चित्तवर्णनम् धनाढ्य व्यक्तियों को आठ निपिद्ध कौ के करने से महादान और सहम ग्राह्मण भोजन इत्यादि प्राय- भित यतलाये हैं (१-१४)। ६ धनहीनाप प्रायश्चित्तवर्णनम् २७८० २७६ . नारायणामति की मंत्रित विषय-सूची ममाप्त ||

प्रधान विषय
शाण्डिल्यस्मृति के प्रधान विषय
न्याय
आचारवर्णनम्
२७६३
आचार के विषय में मुनियों का शाण्डिल्य से प्रमो-
सर (१-२२)।
द्विविधादेहशुद्धिवर्णनम्
२७६५
दो प्रकार की देव शुद्धि का शर्णन | दूसरे की निन्दा
पागम्य, विवाद, भूट, निजपूजा का वर्णन, अतिबन्ध
সষে, র ম খণ, আথ যবন, প্রশ
शान एवं दुष्टॉक गाय संभापण इत्यादि दुगों को त्याग
कर स्वाध्याय, उप में रन, मोक्ष धर्म के कार्य में
निरन्तर लगना प्रिय बोलना, मस्य एवं परदिनकारी
पचनों का धारण करना ऐमी थान-मी मुद्रियों का
वर्णन। शिर, फण्ट श्रोग्य और मामिका के मल को
दूर करना सही मांडीया मुटि यनलाई है (१८-२१)।
मानकम्म्यां हरियोपाग्य इनिर्शनम् २७६७
धमकीहानि नही करनी चाहिये,ममा ही करे। धर्म
एवं अधर्म गुपय दुल कारण। यही मना.
सन पर्म शास अन्य मय भ्रामक नया नाममघ
राजसपाही माविरद पुराण एवं पनिषदों

--
.
प्रकृति त्रिगुणात्मिका है एवं जगन की:
सम्पूर्ण संसार देव, अमुर और मनुष्य दमी के विकार
हैं। इस प्रकार सात्त्विक राज्ञम और नामम गुणां
तथा भगवद्भक्तिपरायण मनुष्य रहते हो और हिमक
देशशुद्धि का वर्णन-जहो म्लेच्छ पापण्डीन होधार्मिक
जन्तुओं से शून्य हो वह स्थान शुद्ध है (७१-८२)
में "f Atti mam
है। APRIET 1 mirrorat
गोगम: I Tight frent
माना THE LI
देय जी I Hanfor |
देया मनुष्या. पायो मृगामा।
ममे गटायर्यामुग्राय बिमा ।।
शान एवं कम से भगवान की भागना माँ-
त्तम है। यही सान है. यही मारमा पही महान
है। जो भगवान के परणाविन्दों की मंया नही
करते हैं ये शोचनीय है (४०-५६ )।
सात्विकराजसतामसगुणानां वर्णनम्
कारणभूता है।
संक्षेप से वर्णन (६०-७०)।
२७६१

ध्याय [ ४१ ] प्रधान विपय पृष्ठा भगवत्पूजन विधिवर्णनम् २८०१ सात प्रकार की शुद्धि कर भगवत्पूजापरायण होना चाहिये। प्रथम शरीर को तपस्यादि से शुद्ध करे अशक्त हो तो दान करे और दोनों में ही असमर्थ हो तो नामसंकीर्तन करना चाहिये ( ८३-६५)। उपवास, दान, भगवद्भक्तों के सेवन, संकीर्तन, जप, तप और श्रद्धा द्वारा शुद्धि होती है (६६-१०१)। पराविद्याप्रापयर्थमधिकारिगुरुशिष्यवर्णनम् २८०३ विद्या की प्राप्ति के लिये आचार्य का वरण और अधिकारी शिष्य का वर्णन ( १०२-११०)। मन, वाणी और कर्म से भी शिप्य अपने गुरु का अहित न विचारे कभी उनके सामने प्रमाद न करे किसी भी प्रकार की उद्विमता उत्पन्न करनेवाले भाव, विचार, इच्छा व कमी को न करे। शिष्य मूढ़ पाप- रत, कार, वेदशास्त्रों के विरोधी लोगों की सद्गति न करे इससे भक्ति में विन होता है (११३-१२२)। २ प्रातःकृत्पवर्णनम् २८०५ भूपियों का मानः कृत्य के विषय में प्रश्न और महर्षि शाण्डिल्य द्वारा स्नान सस्या आदि को लेकर विस्तार से प्रातः काल में कर्तव्यों का वर्णन । शव्या को छोड़ने

पूरा
अमि, गुरु, वृद्ध पुरुष और स्त्री को न देखे । अधिक
समय तक मल-मूत्र न करे केवल आकाश, दिशा, तारा,
गृह और अमेध्य यम्नुओं को देखे (१३-१४)। मिट्टी
और लिग को जल से धोये। फिर हाथ
धोकर दन्तधावन करे। खान के लिये तीथ, समुद्रादि,
तालाय, यूप ओर भरने का जल विशेष प्रयोजनीय है
(१५.२०)। जल को अद्भा में अधिक न पीटे न
। जल मंगला किया जाय और देह का मल भी जल में
मोदा जाय पिस पाहा भाकर मन्ध्या कमकलिये
सानकोपावीर का पदल (०१-०८)। मान
घरजसाथ नियमाका 2 1 -
अध्याय
प्रधान विपय
के बाद मर्व प्रथम भगवान गोविन्द के दिव्य नामों का
सङ्कीर्तन करते हुए वन और दण्डादि कमण्डलु लेकर
अपने मस्तक पर कपड़ा बांध कर मल-मूत्र त्याग करने
के लिये गांव के बाहर जाये। पेशाब, मैथुन, सान,
भोजन, दन्तधावन, यज्ञ और सामूहिक वन में मौन
धारण करने की विधि है। यज्ञोपवीन को दाहिने
फान पर टांग कर मल-मूत्र का त्याग करना चाहिये
(१-६)। मलमूल
करने में जो स्थान वर्जित हैं उनका
परिगणन (१०-१२)।
मल-मूत्र त्याग के समय, देवता, शत्रु, शिष्य,
मे

[ ४३ ]
अध्याय
प्रधान विपय
३ उपादानविधिवर्णनम्
२८१३
द्वितीयकाल में करने योग्य भगवत्पूजन आदि का
वर्णन। भक्ति का लाभ जो श्रद्धालु एवं अपवर्ग के
मुख
को जाननेवाले हैं, उन्हें ही मिलता है { १-४६ ) ।
बाह्य और आभ्यन्तर शुद्धियों का वर्णन। भोजन को
अनिदेव के समर्पण करने का वर्णन (५०-६०)! पाक में
निषद्ध वृक्षों का इन्धन जलाने के लिये परिगणन
(६१-२०८ )। निषिद्ध और प्रण योग्य वस्तुओं का
वर्णन ( १०६-२२०)।
प्राहा और निषिद्ध पय का वर्णन (२२१-१३५ )।
भोजन बनाने में कुशल सती स्त्री एवं निपिद्ध खियों के
लमण (१३:-१५०)।
स्त्री के साथ मव्यवहार का वर्णन (१५१-१५८)।
इस प्रकार भगवत्प्रीत्यर्थ उपादानों का उपयोग कर
गृहस सुखी होता है (१५८-१६३)।
४ इज्याचारवर्णनम्
२८२६
एक देव की पूजा ही इष्ट है, भगदद्भक्ति विषयक
नियमों का विस्तार से वर्णन । भागवनों की सदा पूजा
करनी चाहिये । विष्णुभक्त गृहस्थों के कर्मों का वर्णन
भगवत्पूना प्रकार, सदालों के प्रवण पठन का महत्व

-
अध्याय
होता है। शास्त्र की प्रशंसा (१-८१)।
कण्वस्मृति के प्रधान विपय
नित्यनैमित्तिककर्मणां फलनिर्णयः
प्रातःम्मरणे कात्यांना वर्णनम्
पान भक्षणच शन्देकृते प्रायश्चित्तवर्णनम् २८६६
'युगभेद से ग्रहवेना आदि ऋषियों ने कण्व ऋपि से
सनातन धमाके विषय में।
प्रभाग fm
यर्णन, योगविधि को गर्णन. पग की गंमा
५ गमावन्गयाम यांगायनम
मगपूजा करने का विधान। गोगमका यन।
मगयर के शीलागार का निरूपण ममी कमी को
भगयदर्पण युद्धि से करनेवाले मनुष्य का जन्म माल
धर्मसारवर्णनम्
धर्मकर्तव्यवर्णनम्
नित्यकृत्यवर्णनम्
२८६३
२८६६
२८६७
॥ शाण्डिल्यम्मृति की विषय-मूगी ममात ।
२८६०
२८६६
पृहा (...)

-- tar PROTaun ... ------PAT [ ४५ ] अध्याय प्रधान विषय पृष्ठाङ्क कण्व द्वारा धर्मसार का निरूपण धर्मकर्तव्यवर्णन--जिस व्यक्ति की बुद्धि ऐसी है कि क्रिया, कर्ता, कारयिता, कारण और उसका फल सब कुछ हरि है वही स्थिर बुद्धि का है, उसका जीवन सफल है ( ६-१० । परमेश्वरप्रीत्यर्थ किया हुआ कर्भ ही सफल है। सत्मइल्प एवं उसका फल (११-६१) नित्य- नैमित्तिक कमों का फल निर्णय ( ४-५०)। नित्यकृत्य का वर्णन ( ५१-७४)। प्रातःकाल में स्मरण करने योग्य कीर्त्य महानुभावों का वर्णन (४५-८०)। प्रातः शोचनानादि क्रियाओं का वर्णन ( ८१-६४ ।। गण्डूप के समय शब्द का निषेध और उसका प्रायश्चित्त का वर्णन (१५-६७)। भक्षण एवं स्त्राने के समय भी शब्द करने का निषेध (६८-१०४)। मूत्र पुरीपोत्सर्ग में गण्डूप के याद आचमन का विधान ( १०५-११६)। गृहस्थों का मृत्तिका शोच का विधान ( ११७-१२६ )। शुभकमों में सर्वत्र आचमन का विधान ( १२७-१४० )। नित्यकर्मों में उलट-फेर करने से फल नहीं होता है (१४१-१५०)। खान के समय आवश्यक पृत्य जमे सन्या, अर्य, गायत्री मन्त्र का जप देवपिपितृतर्पण, सानागतर्पण अवश्य करने चाहिये (१५१-१९८)। कण्ठमान,

T
म.न. httretirit.
rat mratri
माने मेगाको...
मा नाम
(१६१-१९७)। Alttattat६.१}।
मादी गायत्री I amrtan)
मध्याही गा मन है (10.)।
का अधिकार गायत्री महायर (1)
गन्य का शिका गणेन..." डन
मम्यपणकार गायत्री राम पन (२२१.
२४१)। सन्ध्या, गायत्री और शायरन का पर
कर नहीं मिलता (२४२१६)ल में गायत्री मन्त्र
व वैदिक कमों के करने में योग्यता का वर्णन (2300
ब्रह्मार्पण बुद्धि से ही सब कर्मा का अनुष्ठान है
एक कार्य के अनुष्ठान में कार्यान्तर (दूमराकाम) वजित
१(३२६-३२७)। उपासना का महत्व (३२८-३३४)।
CAT
(३०१-३२५)।
गार्हपत्य अग्नि की स्थापना यो
का प्राधान्य (२६८-२६६)। म प्राय का दारि
२०)। वैदिक कृत्य की सत्र में प्रधानना (२८१-३००)।

प्रधान विषय अध्याय पृष्ठाक वर्णन (३४०-३४६)। नित्य होम एवं अग्नि के उप- स्थान का विधान (३५०-३५०)। पञ्चपाक न करने की अवस्था में विकल्प का विधान (३६१-३७१)। पञ्चमहायज्ञों का निरूपण (३७२. ३८३)। ब्रह्मवेदाध्ययन में अधिकारी होने का वर्णन (३८४-३६४)। ब्रह्मज्ञान की एक साधना का उपा- सनाक्रम प्रयोग (३६५-४१४ )। अग्निहोत्र, दर्शादि एवं आप्रयण, सोत्रामणि और पितृयज्ञों का निरूपण (४१५-४२६)। घेदों के अनभ्यास से मानव-चरित्र का सांस्कृतिक विकास सदा के लिये रुक जाने से राष्ट्र की अवनति होती है (४२७-४३३)। चित्तशुद्धि के लिये वेदोक्त मार्ग ही श्रेयस्कर है (४३४-४३७)। चार पितृ कर्मों का वर्णन, उन्हें यथाशक्ति करने का आदेश (४३८- ४४३)। विविध ऋणों से छुटकारा पाने का प्रकार (४४४-४६८)। वैदिक कमों की तुलना में अन्य कार्यों का गोणत्य वर्णन एवं दिव्य भाषा की योग्यता (४६६-४७७)। नित्यनैमित्तिक कर्मों में विष्णु का आराधन वर्णन (४७८ ४८१)। दीवारण्य से मनुष्य सदा दूर रहे (४८३-४८८) । अनिष्टोम और अतिरात्रों का अनुष्ठान

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[ ४७ ] प्रधान विषय अध्याय पृष्ठाङ्क वर्णन (३४०-३४६ )। नित्य होम एवं अग्नि के उप- स्थान का विधान (३५०-३५०)। पञ्चपाक न करने की अवस्था में विकल्प का विधान (३६१-३७१)। पञ्चमहायज्ञों का निरूपण (३७२- ३८३)। ब्रह्मवेदाध्ययन में अधिकारी होने का वर्णन (३८४-३६४)। ब्रह्मज्ञान की एक साधना का उपा- सनाक्रम प्रयोग (३६५-४१४)। अग्निहोत्र, दादि एवं आप्रयण, सौत्रामणि और पितृयज्ञों का निरूपण (४१५-४२६)। वेदों के अनभ्यास से मानव-चरित्र का सांस्कृतिक विकास सदा के लिये रुक जाने से राष्ट्र की अवनति होती है (४२७-४३३)। चित्तशुद्धि के लिये वेदोक्त भार्ग ही श्रेयस्कर है (४३४-४३७)। चार पितृ कमों फा वर्णन, उन्हें यथाशक्ति करने का आदेश (४३८- ४४३)1 विविध ऋणों से छुटकारा पाने का प्रकार (४४४-४६८)। वैदिक कर्मों की तुलना में अन्य कार्यों का गौणत्व वर्णन एवं दिव्य भापा फी योग्यता (४६-४७७)। नित्यनैमित्तिक कर्मों में विष्णु का आराधन वर्णन (४७८ ४८१)। दौशिष्य से मनुष्य सदा दूर रहे (४८३-४८८) । अग्निटोम और अनिरात्रों का अनुष्ठान पृष्ठा (अमिहोत्र का विधान (५४०-५४५)। गुनि होम का विधान (५४६-४५८)। औपामन कृत्यों का यणन (२४६.५४४)। गृहस्थ के लिये नित्य कर्तव्य विधि का वर्णन (२४५१५३)। फिर इ कर्तव्य एवं अनिष्ट काव्यों का परिगगन (४५५६)। प्रातःकाल से शार्यकाल नाकाव्यों का निर्देश (१३.०३)1 गुपथ भगवान मामीनारायण का पान मरवको राप का थानेवाले ममी मम्मान्य गुणन तिमिहिनों की जा का विधान (110)" पाका विधान और उनके पानेसभी एस.)। पंकि अध्याय प्रधान विषय श्रेयस्कर है, मानसोम मंस्था के पाकयज्ञों का विधान (४८६-४६४)। इन अनुष्ठानों को न करने से प्रत्य- वायिक दोपों का निरूपण (४६५-४६७)। ब्रह्मचारी के नित्यकृत्यों का वर्णन (४६८-५०२ । जातकर्म, उपाकर्म आदि का विधान (५०३-५१३)। भिन्न-भिन्न अनुवाकों का वर्णन (५१४-२२६) । नाना काण्डों का वर्णन ( ५२६-५३७)। ब्रह्मचारी वेदप्रतों का सम्पादन कर विधिपूर्वक स्नातक धर्म में दीक्षित हो (५३८-५४६) । गृहस्थ में प्रवेश के लिये लक्षणयती नी से विवाह और उमके साथ वैदिक. चौल, प्राजापत्य, . hti) पंकि

---
--------
[ ४४ ]
अभ्याय
प्रधान विषय
पृष्ठा
पार्थ भोजन में दीप वर्णन (६०२.३०)। गृहस्थ ये
लिये पठनीय एवं करणीय विधान (१८६१३)।
कन्दमूल फल जी भश्य है उनका विधान (६१४-६१)।
यमों का प्रमान के ममान पल यर्णन (६२०-
होम के विधान का वर्णन (६३७-६५६ )।
मानणादि का पूजन (६-६७७)। अधियाह से
पुर्वी विवाद की विशेषता। सुपात्र में कन्यादान पुत्र से
मोगुणा अधिक पनाया (६७८-७००)। गोत्रपरि-
पतन के सम्बन्ध में नाना गत (७०१-०२२)। वंश के
रद्वार के लिये दत्तक पुत्र का विधान (७२३-४४३)।
दनक में दौहित्र की योग्यता (७४४-०५) श्राद्धपत्य में
निर्दिष्ट का अन्य कृत्य नियोजन में निपेध (७५६-७८६)।
एक काल में यहुन से श्राद्ध आने पर कृत्यों का सम्पा-
दन प्रकार (७८६-७८८)। प्रवेदी ब्राह्मण का माहात्म्य
(७८६-७६२ )। कण्वस्मृति का फल वर्णन ।
।। कण्वरमृति की विषय-सूची समान ।।

अध्याय
THE
नाना सम्बन्धियों के भिन्न-भिन्न दिनों में श्राद्ध का
विधान | शस्त्र इतक के श्राद्ध दिन का वर्णन (६८-७०)।
मृतक का श्राद्ध दिन अविदित हो तो एकादशी को
श्राद्ध किया जाय (७१-८०)।
आम श्राद्ध के करने का विधान (८१)। पहले
दाल्भ्यस्मृति के प्रधान विषय
प्रधान किय
दाम्याप्रति काणां धनियमः प्रभः
पोटशधादवर्णनम्
दाय से ऋपियों का धमाधम चिक मागदि.
मामशुद्धि प्रादकालादिक सम्पन्न में प्रा. टान की
लेकर दालभ्य द्वारा विशेष प्रगंमा. पिनासन का
विधान ( १-१६ । १६ भादों का वर्णन (२०११)
बाद में निपिट कमों का परिगणन (४२-५४)।
श्राद्ध में भोजन करनेयाले के लिये आट यम्नुओं का
त्याग (५५-५६)। भादकरण में पुत्र का अधिकार
(६०-६७)।
शस्त्रहतकानां श्राद्धदिनवर्णनम्
२६४
माता का श्राद्ध फिर पितरों का फिर मातामहों का
(८२-८५)। प्रपातक का लm
- स्पर्श करने

------------- [१] ध्याय प्रधान विषय से मान और भोजन करने से कृच्नसानपन का विधान । जो पाण्डाली में अफाम से गमन करे उसके लिये सान्तपन एवं दो प्राजापत्य का विधान । मकाम पाण्डाली गमन करनेवाले को पान्द्रायण और दो तमच्छ का प्रायश्चित्त करने का विधान (८६- १६)। गोहत्यायाले के लिये प्रायभित्त का विधान (१७-१०२)। रोध, यन्धन, अतियाह और अविदोह का प्रायश्चित्त विधान (१०३-१०८)। पभ की हत्या का प्रायश्चित्त (१०६.११.)। गोदोहन का नियम-दो महिने यहड़े को पिलावे य दो मास दो स्तनों का दोहन करे तथा दो मास एक वक्त शेष समय में अपनी इच्छा हो वैसे परे । चौमासी पाययेद्वत्सं द्वो मासी द्वौतनौ दुहेन् । द्वीभासी चैकवेलायां शेषं कालं यथेच्छया ॥११॥ किन-किन स्थानों में प्रायश्चित्त नहीं लगता इसका वर्णन (११२-११३) । किन-किन को प्रायश्चित्त न करने का पाप लगता है (११४)। आशौच का निर्णय वर्णन (११५-१२१) किसी हीन से सम्पर्क करने में दोष कहा है ( १२२-१२३)। सूनक और मृतक के आशौच का विधान ( १२४-१२६)।

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[३] মন বিগ मा समादिपर्णनम् २६४७ शीप मा पिरोकर गे पर्णन- गमनक বক) গাম বা মানা কথা নয়। ठाणे मरने पर सीन गाल पारशपमं का कार्य र गिरा जाय । शुटादि का वर्णन (४. | मष्टि पद नही होगी इसका वर्णन । दिन में की पाया में राशि में ही 2. पृशों में गरमी में पोपलेप. पेड़ में अलक्ष्मी ली है अत: इनका सेवन न करे ( १६४ ) । शूर्प पा, नय से उसबिन्दु काप्राण पेश यन्त्र पंका जल और पूरे के साथ युहारी इनसे पूर्वान नाश होना । (१६२) कदी भी शुद्धि की जा हो यहां-पह! निलों से होम एवं गायत्री उप से शुद्धि कही गई है (१६६) दाल यस्मनि का फल (१६७)। दाल्भ्यस्मृत्ति की विषय-सूची समात |

सूतक का
[१२]
अध्याय
प्रधान विषय
आगोगनिर्णयवर्णनम्
२६४३
याल, शिशु एवं कुमार की परिभाषा ( १३.)।
विवाह, पौल और उपनयन में यदि माना रजम्बला
हो जाय तो शुद्धि के बाद मङ्गल कार्य करे (१३१-१३०)।
कोई कार्य प्रारम्भ हो और सूतक का आशीच हो जायेतो
उम कार्य के सम्पादन का विधान (१३४ )। श्राद्धकर्म
उपस्थित होने पर निमन्त्रित ब्राह्मण आव तो
आशौच नहीं लगता व उस कार्य के सम्पादन का विधान
(२३५)।
देशान्तरपरिभाषावर्णनम्
ब्राह्मणों के भोजन करते हुए यदि सूतक हो जाय।
दूसरे के घर से जल लाकर आचमन करा देने से गुर्ग
हो जाती है (१३७)। देशान्तर में यदि कोई सपिण
मर जाय तो सद्यः स्नान से शुद्धि कही गई है (१३८)
देशान्तर की परिभाषा ६० योजन दूर या २४ योजा
अथवा ३० योजन दूर को देशान्तर बताया है य
घोली का अन्तर या पर्वत'का व्यवधान तथा महानर्द
बीच में पड़ जाती हो तो देशान्तर कहा जाता
(१३६-१४०)।
२.

अध्याय
प्रधान विषय
पृष्ठाङ्क
शुद्धाशुद्धिवर्णनम्
२६४७
आशौच का विशेष रूप से वर्णन-सूतक एवं मृतक
आशोच का प्रारम्भ कब से माना जाय इसका निर्णय ।
रजखला के मरने पर तीन रात के बाद शवधर्म का कार्य
मम्पादन किया जाय । शुद्धाशुद्धि का वर्णन (१४१-
१६३)। स्पृष्ठास्पृष्टि कहीं नहीं होती इसका वर्णन
(१६३ )। दिन में कैथ की छाया में, रात्रि में दही
एवं शमी के वृक्षों में सप्तमी में आंवले के पेड़ में अलक्ष्मी
सदा रहती है अतः उनका सेवन न करे ( १६४ )। शूर्प
(सूप) की हवा, नख से जलबिन्दु का ग्रहण केश एवं वस्त्र
गिरे हुएघडेका जल और फूड़े के साथ घुहारी इनसे पूर्वकृत
पुण्य का नाश होता है (१६५) जहाँ कहीं भी शुद्धि की
आवश्यकता हो यहां-वहा तिलों से होम एवं गायत्री
मन्त्र के जप से शुद्धि कही गई है (१६६) । दालभ्यस्मृति
के सुनाने का फल (१६७)।
॥ दालभ्यस्मृत्ति की विषय-सूची समाप्त ।।

अध्याय
आङ्गिरसस्मृति के प्रधान विषय
प्रधान विपय
पृधाडू
पूर्वाङ्गिरसम्
आङ्गिरसम्प्रति ऋषीणाम्प्रश्न:-
२६
आगिरस से भूपियों का प्रश्न ( १) धर्म का स्वरूप
वर्णन (२-४)। वैदिक कर्मों को पुराणोक्त मन्त्रों से
न फरे (५)। मन्त्र के अभाव में व्याहृतियों को
काम में लिया जाय। व्याहतियों का महत्व वर्णन
(७.१४)। जात फर्मादि संस्कारों का अतिकम होने
पर प्रायशित (१५-१)।
श्रादापाकानन्तरमागारे निर्णयः
भाटपाफ याद यदि आशीष हो जाय तो विधान।
उम किया करने में अस्यिगण को यह याधक मही
। मना (...)। पामार के पार यदि
ग्राम पाम में कोम यु हो तो पाद दुपिन नहीं होता
पाशाम्भ गे पूर्व भी यदि कोई मन्यु हो तो
बानो (14)। दशं पूर्णमास इष्टि पशुपा
धनन्नर पाद (३३)। महादी में भाट
(a) गहा में भाट (1)दोभा•
में भाट (३...) दीवार पौष में मा
२६

अध्याय
प्रधान विषय
पृष्ठा
होने से नहीं होता (४२-४३)। वैदिक कर्म का
प्राबल्य (४४)। सूतिकाशौच एवं मृतकाशीच में
वैदिक कर्म न करे, अस्पृश्यता आवश्यक है ( ४५-४८)।
सतत आशौच होने पर श्राद्ध करने के लिये उस ग्राम
को छोड़ दूसरे प्राम में जाकर श्राद्ध करे (४८-५५) ।
शिखानिर्णयवर्णनम्
२६५५
शत्रु के द्वारा छिन्न शिखा हो जाने पर गो के पुच्छ के
समान बाल रखकर प्राजापत्य व्रत कर संस्कार से शुद्धि
कही गई है ( १६-२७)। मध्यच्छेद में भी वही वात
है (५८ )। रोगादिसे नष्ट होने पर भी पूर्ववत् विधान
है (५८.६० )। ७० वर्ष की अवस्था में शिखा न रहने
पर आस-पास के वालों को शिखा के समान मान ले
(६१-६३)। पांच बार शत्रु से शिखा छेद होने पर
ब्राह्मण्य नष्ट हो जाता है ( ६४-६६)। सूतकादि से
श्राद्ध में विन्न होने से स्त्री संभोग होने पर गर्भ रहे तो
माहत्या प्रत का विधान (६६-६६)। त्रिप्रायक
श्राद्ध का वर्णन (७१-७६)। लाजहोम से पूर्व यदि
वधू रजस्वला हो तो "हविष्मती" इस मन्त्र से सो
कुम्मों के विधान से स्नान कर बस बदलने से शुद्धि
(७७.८१)। लाजहोम के बाद होने पर स्नान करा-
.

कर्ता के दूर होने पर प्रेग्यत्व करे (१३३-१३४)।
अध्याय
प्रधान विषय
पृष्ठा
कर अवशिष्ट निर्मन्त्रक विधि करे और शुद्ध होने पर
समन्त्रक विधि यथावन् करे (८०-८४)।
औपासन अभी आरम्भ न हो और दूसरे दिन
रजस्वला हो तो उसी प्रकार अमन्त्रक विधि एवं शुद्ध
होने पर मन्त्रोच्चारण के साथ क्रिया करे (८५-६३)।
आशौच में नित्यनैमित्तिक कर्मों का वर्जन (६४-६५)
इनसे प्रेतकृत्य का नाश होता है अतः वर्जित हैं (६५.
१७)। अत्यन्याय, अतिद्रोह और अनिक्रूरता कलि
में भी वर्जित है। अति अक्रम और अतिशास्त्र भी
वर्जित है (६८-१०३)।
जीवपितृक पिण्ड पितृ यज्ञ श्राद्ध का वर्णन (२०४-१०७)।
पिता यदि सन्यास ले ले तो पातित्यादि दुपित होने
पर उनके पितादि के श्राद्ध का विधान ( १०८-११७ )।
इसी प्रकार घाचा आदि की स्त्रियों का (११८-१२०) ।
गौणमाता के श्राद्ध का विधान ( १२१-१२५) । श्राद्वा-
धिकार और प्राद्धकर्ता गौणपिता के लिये भाई का पुत्र
मपनीक कृतक्रिय मी पुत्र सम्शा पाता है (१०६-२२६)।
गोत्र नाम का अनुपन्ध व्यत्यास होने पर फिर कर्म
करे (१३०-१३२)।
अनायप्रतमंस्कारेश्वमेघालवर्णनम्
२६६३

J
प्रधान विषय
अध्याय
पृष्ठाङ्क
अन्य से करने पर, चाहमात्रदान करने पर श्राद्धमात्र
होता है (१३५-६३८) । भ्रष्ट एवं पतितों का घद स्फोटन
का अधिकार (१३१-१४०)। अनाथप्रेत के संस्कार
करने से अश्वमेध यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है व
प्रेत के संस्कार न करने में दोप (१४२-१४३) । विप्र की
आशा से यतिकृत्य ( १४४-१४७)। कर्ता के निकट
होने पर अकर्तृत को फिर करे (१४८) । असगोत्रों के
संस्कार में आशौच (१४६) । माता-पिता के मृताह
का परित्याग होने पर प्रायश्चित्त ( १५०-१५१) । नदी
स्नान से निष्कृति या संहिता पाठ से ( १५२-१५६ ) ।
वेदमहिमा (१५७-१५६)। ब्राह्मण का वेदाधिकार
(१६०-१६३),
स्नान का सब विधियों में प्राधान्य (१६४) । सम्पूर्ण
कार्यों में स्नान ही मूल कारण बताया है (१६५-१६७) ।
अस्पृश्य स्पर्शनादि कर्माङ्गस्नान ( १६८-१७१ )। वमन
में स्नान (१७२) वमन में स्नान न कर सके तो वस्त्र
बदल ले ( १७३-१७४)। शाकमूलादि के धमन में
स्नान ( १७५-१७६ ) । रात्रि में वमन में स्नान (१७७)।
अपने गोत्र के छोड़ने पर अन्य गोत्र के स्वीकार करने
का दोष (१७८-१७६)। अर्धोदय, महोदय एवं योग
का विधान ( १८०-१८३)। स्त्री के पत्यन्य के साथ
चितारोहण होनेपर पुत्र का कृत्य ( १८५-२६१)।

का sirmirittar
ममता विभि मारा."
श्रीमान अमी भ म तिम
रसारमा हामी 14 1 अम.
THE
होने पर गन्त्रोचाय के मायाको
आशीष में निगमाग कमी का मन (2)
इनसे प्रेशर का नाम होगा न पनि..
१७)। अत्यन्याय, अनिदो भीर अनिमा कति
में भी पजिन है। अनि मनम और निशा भी
यजित (६८-१०३)।
जीयपिएफ पिण्ड पित या प्राट का वर्णन (१७४-१०७॥
पिता यदि सन्याम ले ले तो पानित्यादि पित होने
पर उनके पितादि के भाट का विधान ( १०८-११७ )।
इसी प्रकार घाचा आदि की स्त्रियों का (११८-२००)।
गौणमाता के श्राद्ध का विधान (१०१-१२५ ) । पाटा-
धिकार और श्राद्धकर्ता गौणपिता के लिये भाई का पुत्र
सपनीक कृतक्रिय भी पुत्र सम्क्षा पाता है (१२६-२२।
गोत्र नाम का अनुबन्ध व्यत्यास होने पर फिर कम
करे (१३०-१३२)।
अनाथप्रेतसंस्कारेऽश्वमेधफलवर्णनम्
२६६३
- पेष्यन्त मा...

अध्याय
प्रधान विषय
पृष्ट
अन्य से करने पर, वाहमात्रदान करने पर श्राद्धमात्र
होता है (१३५-१३८)। भ्रष्ट एवं पतितों का घट स्फोटन
का अधिकार (१३६-१४०)। अनाथप्रेत के संस्कार
करने से अश्वमेध यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है व
प्रेत के संस्कार न करने में दोष (१४२-१४३)। वित्र की
आज्ञा से यत्तिकृत्य ( १४४-१४७)। कर्ता के निकट
होने पर अकस्कृत को फिर करे (१४८)। असगोत्रों के
संस्कार में आशौच (१४६)। माता-पिता के
मृता
का परित्याग होने पर प्रायश्चित्त ( १५०-१५१ )। नदी
स्नान से निष्कृति या संहिता पाठ से (१५२-१५६ )
वेदमहिमा ( १५७-१५६ )। प्राह्मण का वेदाधिकार
(१६०-१६३ )।
स्नान का सब विधियों में प्राधान्य (१६४) । सम्पूर्ण
कार्यों में स्नान ही मूल कारण बताया है (१६५-१६७)।
अस्पृश्य पर्शनादि कर्माङ्गस्नान (१६८-२७१)। वमन
में स्नान (१७२ ) । वमन में स्नान न कर सके तो वस्त्र
बदल ले ( १७३-२७४)। शाकमूलादि के वमन में
स्नान ( १७५-१७६ )। रात्रि में वमन में स्नान (१७७),
अपने गोत्र के छोड़ने पर अन्य गोत्र के स्वीकार करने
का दोष ( १७८-१७६ )। अर्थोदय, महोदय एवं योग
का विधान ( १८०-१८३)। स्त्री के पत्यन्य के साथ
चितारोहण होनेपर पुत्र का कृत्य ( १८५-१६१) ।

पृष्ठाङ्क २६६६ - अध्याय प्रधान विषय स्त्रीणां पुनर्विवाहे प्रायश्चित्तवर्णनम् जातिभेद से निष्कृति ( १९२)। स्त्री के पुनर्विवाह में दोप जैसे- पुनर्विवाहिता मूढः पितृभ्रातृमुम्बः ग्यलैः । यदि सा तेऽग्विलाः सर्वे स्युर्वं निरयगामिनः ॥१६३।। पुनर्विवाहिता सा तु महारौरवभागिनी । तत्पतिः पितृभिः साधं कालसूत्रगगो भवेत् । दाता चाङ्गारशयननामकं प्रतिपद्यते ॥१४॥ यदि मूर्ख एवं दुष्ट पिता व भाई आदि के द्वारा फिर स्वी विवाहित की जाय तो वे सब नरकगामी होते हैं और वह स्त्री महारोरव नरक में जाती है, व उसका विवाहित पति अपने पितरों के साथ कालसूत्र नामक नाक में गिरता है एवं देनेवाला अङ्गारशयन नामगरले. नरक में जाता है। पुनर्विवाह के दोप निवार प्रायश्चित्त का कथन ( १६३-२०४)। भ्रान्ति से पुत्रिकादि वियाह होने पर चन्द्राय करने से स्वमात्र की शुद्धि (२०१-२८७ ) । पुत्र हो मन का विधान (००८-२११)। एक, दो, तीन चार-पांच बार विवाहिता होनेपर प्रायश्चित्त (२ २१७) । उमसे तो बेश्या की विशेषता (२१८-२२५ प्रविष्ट परपति के काय द्वारा संयोग होनेपर प्रायरि अध्याय प्रधान विषय पृष्ठाङ्क (२२५-२२७) । अग्राह्य और प्राहामूर्ति का वर्णन (२२८-२२६ ) । अग्राह्यमूर्ति का निवेद्य (२३८-२३)। भगवत्प्रसाद ग्रहण में भक्षणविधि (२३९) निवेदन- विधि ( २४०)। अत्युप्ण निवेदन करने पर नरकगामी होता है (२४१-२४२) । निवेदन प्रकार ( २४२-२४५ ) । गृहस्थस्प राबायुप्णोदकरलानवर्णनम् २६७५ निवेदित का स्वीकार प्रकार (२४६-२४७) । निवेदित वस्तु पयों को दे (२४८)। गृहस्थ द्वारा रात्रि में गर्म जल से सान (४४६-५०)। अभ्यङ्ग का विधान (२५१-२५३ )। माध्यादिक एवं सुर मान का वर्णन (२५४-२५७)। प्रातः सायं पयादि में अभ्यन्जन खान (२५८-२६२)। सोदयुम्भ नान्दी श्राद्ध में अभ्यम्जन सान (२६३-२६६)। कोशस्थित नदी स्नान से भाद्र विधान (०६७)। सङ्कल्प (२६८-२७१)। पिए श्राद्ध के व्यत्यास में फिर करने का विधान (७२)। शून्यतिथि में करने से फिर फरे (२७३-२७४ । पित भाद्ध के बाद कारण्य पाद (2014-05)। माता- पिता का भाद्र एक दिन हो तो बस से करे (२४. पाफिक भाद्र(२८.२८)। ग्रहण में मोजन निषेध पर पाल और भारों को पोरकर (RC-RE)।

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प्रधान विषय के समय अध्याय पृष्ठान (३९६)। भ्राता के पुत्र का परिप्रह (३६०-३६३)। किसी पुत्र को लेने के लिये स्वीकृति होनेपर यदि औरम पुत्र हो तो दोनों को रक्खे नहीं पाप लगता है (३६४-३६७) पुत्रदान में जो कहा गया उसे पूरा करना चाहिये (३६८-३७६)। भाई के को लेने पर दिये हुग का समाश औरस गोत्र का चौथा हिस्सा (३७६-३८०)। दत्तक से औरस उपनीत न होनेपर प्रायश्चित्त (३८१- ३८२)। भार्या पुरुष का पुत्र प्रहण (३८३-३४८) उस समय की प्रतिज्ञा पूरी न करने से दोप ( ३८६- ३६६)। सपनियों में पुत्र के ग्रहण के समय जो रहे सो यह माता दुमरी सपनी माता (३६८-३६१)। अन्य मातामहादि का स्थान ( ३६१-३६४)। सपनो का पिता मातामह नहीं (२६) मपनी माता का नर्पण (३६६-३६८)" औपरगनामा श्राद्धेऽप्रमादवर्णनम् सपघी माताकाओपासन अप्रिम भार (801 पत्री थी अनि (४००-४०१) भाई के पुत्र प्रहण की विधि (४०२-४११), विभाग में भाई परावरtart- ४१)कामा पुगेका वर्णन (११)मादि

[ ६२ ]
प्रधान विषय
पृष्ठाडू
:
अध्याय
में विशेष (४३४-४४५)। पली की वैशिष्ट्यता
(४४६-४४६) पुत्रों का ज्येष्ठ कानिष्ठ्य (४५०)।
भोगिनी (४५१)। भर्मणा, वा वातादि पत्नियों
का वर्णन (४५६-४६४)। धर्मपत्नी से उत्पन्न शिशु
का ही स्पर्श मात्र कर्तृत्व (४६५-४७१)। सन्निधि
भी स्पर्शमान करत्व (४७२-४७४)। श्राद्धादि में
अत्यन्त तृप्तिकर पदार्थ (४७-४८१)। गौरी दान
वृपोत्सर्ग व पितरों को अत्यन्त दृप्ति कर कहे है (४८२-
४८३) । जकारपञ्चक का वर्णन (४८४-४८५)। प्रहण
श्राद्ध का लक्षण (४८६-४६५)। पनस स्थापित महान्
विरोर (४६६-५०३ )। अलर्क श्राद्ध (२०४-५०८)।
थाद्धार्हदिग्यशामवर्णनम्
३००३
भाद्र फे. योग दिव्य शाक (५०६-५३०)।
पना की महिमा (१३१-५७१)। रोदन का फल
(५८)। उयांग, महिमा (१८६-०३)।
उौक को पोदने में दोष (६०४-६०५)। थियान
भाटी का वर्णन (02-१९)। १०८ पाद प्रकृति
पार. परां माद, दर्रा और आदिक मगान हैं
मन्यात भार, कान्ति धाट, मंशान्ति पुण्ययाम
(20-६४.)। मन भार में कुलप (१४१-६५४)।
जानिमादिभाद (१९६-६५७.)। महालय

अध्याय
प्रधान विपय
पृष्ठा
(६५४-६५६)। श्राद्ध देवता (६६०-६६४)। पिन्य
कों में प्रदक्षिणा न करे। शून्य ललाट रहे गृहालङ्कार
भी न करे (६६५-६६७)। मातृवर्ग में प्रदक्षिणादि
व अलकार (६६८-६७०)। श्राद्धभेद से विश्वेदेव,
सापिण्ड वर्णन (६७१-६७५ )। आशौच दश, तीन
और एक दिन रहता है (६७६-८३ )। अमादि श्राद्ध
में फर्तव्य ( ६८४-६८७)। एकोद्दिष्ट के अधिकारी
(६८८-६६३)।
अपिण्डक और मपिण्डक श्राद्ध (६६०-६६३ ।
छिपानचे श्राद्धों की संख्या का विचार (६६४-७००)।
महालय, सन्महालय में भरण्यादि की विशेषता महा.
लय का काल, यतियों का महालय, दुर्मतों का महालय
(१०१-०६)। गुमगली का श्राद्ध (१०-७१६)।
महालय से दूमरे दिन तर्पण (७१५-७२८ )। रवि के
उदय से पूर्व तर्पण ( ७१६)।
निमन्त्रणाहविनाणां वर्णनम्
३०२५
जोपपिएक भाद्र (४२०-७१२)। बाद में वैदिक
अमि के अधिफारी (७२३-२६)। अष्टकामासिक
भाद (२०७२) भार प्रयोग में निमन्त्रग के योग्य
म्पत्तियों का वर्णन (३१-१६) यदीन को निमन्वय
देने पर निपंप एवं प्रायश्चि (१)। अपने

-
अध्याय
पूजा
प्रमान विषय
शारया के प्राह्मण को ही लाग्यना (७४१-७४२.)।
श्राद्ध में अभोज्य (७५३-७६८)। यगण (GHEss)।
प्रमाद के लिये दर्मदान (1-5)। मण्डल पूना
(७-४६)। गुल्फों के नीचे धामा (७८०-७८१)।
आचमन कर्ता के पहले भोफा का आचमन देवादि के
भोजन की दिशा वरणत्रयकाल, विष्टर, अर्य, आवाहन
गन्धाक्षतादि दान (७८२-८०१)। अनौकरण फिर
सङ्कल्प परिवेपण (८०२-८१७ ) ।
परिवेपणे पौर्वापर्यवर्णनम्
३०३३
पौर्यापर्य में पहले सूप देना (८०८-८१४ )। रोन
मन्त्र यदि असमर्थ हो तो दूसरे द्वारा बोला जाय
(८१५-८१८)। गरम ही परोसना चाहिये (८१६-
८२५)। मन्त्र बोले जाय मन्त्रों की विकलता नाश
के लिये वेद का घोप ( ८२६-८४८)। शास्त्र विरोधि-
त्याज्य हैं (८४-८६०)। तिलोदक पिण्डदान नमस्कार
अर्चन, पुत्रकलबादि के साथ पितृ आदि की प्रदक्षिणा
व नमस्कार (८६१-८६८)। मध्यम पिण्ड का परि-
मार्जन कर धर्मपत्नी को दे दे (८६६-८७२), श्राद्ध
दिन में शूद्र मोजन निपिद्ध (८७३)। पिता के मोजन
के पात्र गाड़ दिये जायं (४)।

ध्याय
प्रधान विषय
पृष्ट्रात
श्राद्ध निमन्त्रितत्राह्मणपूजनवर्णनम्
उद कुम्भ (८७५-८७७) । प्रथम वर्ष तिल तणन करे
सपिण्डीकरण के बाद श्राद्धाङ्गतर्पण (८७८-८८०)। श्राद्ध
में निमन्त्रित ब्राह्मणों की पूजा का वर्णन (८८३-८६२) ।
पित्तरों के निमित्त रजत और देवता के निमित्त वर्ण मुद्रा
दे । उपस्थान और अनुमजनादि का कथन (८६३-८८७)।
कर्म के मध्य में मानाज्ञानकृन दोष का प्रायश्चित्त (
१०४ ) । उच्छिष्टादि श्राद्ध में सात पवित्र (E04-६०)।
उच्छि, निर्माल्य, गङ्गामहिमा, महानदी, नदियों का
रजस्वलात्या पुण्यक्षेत्र (६१०-६४२)। वमन (६४३-
१४५) । फिर बाध प्रकरण (६४६-६५०)।
अनुमासिक में दिए यमनमें व उदिष्ट फेन्दिर
पर्स में घिधार (६५१-६९) | एक दूसरे के स्पर्श में
(६६०-६६४)। दर्शादि में छोक आने पर विचार
(E६९-१५३)1 अपुर की असापिट्यता (E७४-७५)
पति के साथ अनुगमन में पानी का एक साथ दी
पिण्डयान (EV६-१७८) गन के ग्यारहवें दिन या दूसरे
दिन मागमन में भादृध (६८-६८। यदि
अनुपाल में हो पनि फे, माण पर तो पति की लकी
माही में हो और शुद्ध होने पर ही मौजीहिर

पंचीस वर्ष के पाद क्रियायें हों (१०६०-१०७२)। करे (१०३२-१०३४)। दर्श में बहुप्राद्घ हो तो (१०४५-१०५६)। भ्रष्ट्रक्रिया का विधान, पतित की स्याग के समय सध्यविकिरन करे (१८७६-२०७८)। बमन में पर्वा के भोजन न करने पर अर्थ तृप्ति, तिल अभ्याय प्रधान विषय गृह संस्कार करे (ECREEL)। उममा पिण्ड मयोजन (६६६), अन्यगोत्रदत्तकपुत्रकृत्पवर्णनम् माता के सापिण्ड्य न होने का बल (E-६६८)। दत्तपुर का पालक पिता का मापिण्ड्य होता है (EEET दत्तपुत्र का औरसपिता के प्रति कृत्य ( १०००-२००५)। अन्य गोत्र दत्त का सपिण्डीकरण में विधान (१००६- १००८)। कथाएप्ति ( १०१६-२००१)। श्राद्घ दिन में वय॑. ( १०२२ )। श्राद्ध के दिन दान जप न करे (१०२३-१०२७)। दर्श में मृताह के श्राद्ध को पहले करे (१०२८)। मृताह के दिन मातामहादि का श्राद्ध हो तो मन्वादिक श्राद्घ करे ( १००६-१०३१) । मृप्ताह में नित्यनैमित्तिक आ जाय तो नैमित्तिक पहले दादि को कर फिर फारुण्य प्राद्ध करे उसमें मत- मवान्दर (१०३५-१०४४)। किन्हीं का कल्प प्रकार माधान हर्पण दूसरे दिन (१०७३-१८७५)। उद्देश्य

अध्याय
प्रधान पिपय
पृष्ठा
द्रोण का विधान, दर्शश्राद्ध तर्पण रूप से तिल ही मुख्य
हैं। सभी कर्मों में जल की प्रधानता (१०७६-११५३) ।
॥ आहिरसस्मृति के पूर्वाहिरसम् की विषय-सूची समास ।।
आशिरस (२)
उत्तराङ्गिरसम्
१ धर्मपत्नापश्चिनानां वर्णनम्
विधिः (१-१०)।
२ परिषद उपस्थानलक्षणम्
२०६७
परिपद के उपस्थान का लक्षण और उसके सामने
निर्णय पूछने की विधि (१.१०)।
३ प्रायश्तिविधानम्
सत्य की महिमा य किये गये कुपयों के लिये सत्य
घोलकर प्रायभित पूछने का विधान (१.२१)।
४ परिपाटयावनिम्
प्रायधिच का भग (१२)। परिपत्र कामग
और उसके भे(१०)।

खानेवाले को भी शूद्र ही होना पड़ता है(६)।प्रति- ३०७ (६)। शूद्रान्नरस से पुष्ट वेदाध्यायी का प्रायश्चित जाता है एवं मरने पर कुत्ता होता है (4)| सारी उम्र अध्याय प्रधान पिाय ५ प्रापगिनियन्तृरुयनम् दशायरापरिषद् (१)। ननुदा ( )। विकल्पी (३)1 अगायिन (४)। धर्मपाठक (:)। आममी (६) प्रामणों की परिषद आगे प्रायभित नियन्नामों का पर्णन यताया है (१-१४)। ६ प्रायश्चित्ताचारकथनम् प्रायश्चित्त के आधार का वर्णन (१-१५)। ७ पापपरिगणनम् ३०७ 'जानते हुए भी प्रायश्चित्त का विधान पूछने पर ही करे (१२)। पापपरिगणन ( ३-७ )। पञ्चमहापात- कियों का वर्णन (८)। पतितों का वर्णन ( ८-8)। ३०७ प्रतिग्रह में प्रायश्चित्त (१)। शूद्रान्न के भोजन में प्रायश्चित्त (२)1 शूद्र की प्रशंसा कर स्वस्तिवाचन में प्रायश्चित्त (३-५)। प्रतिग्रह लेकर दूसरों को दे दे (७) । शूद्रान कै मास तक खाने से शूद्र के समान हो शूद्रानस्य गर्हितत्ववर्णनम् अध्याय प्रधान विषय पृष्ठाक प्रहकेयोग्यधान्य (१०-११)। पात्र से लेना चाहिये प्रतिमाह्य वस्तुयें ( १२-२०)। * অসংখময়সাঘব ३०७७ अभक्ष्यभक्षण का प्रायश्चित्त (१-८)। भिक्षुकों की गणना (६-१०)। कुत्ते से काटे हुए का प्रायश्चित्त (११-१६)। १० हिंसाप्रायश्चित्तकथनम् ३०७६ हिंसा का प्रायश्चित्त वर्णन ( १)। दण्ड का लक्षण (२)। गौओं के प्रहार करने से प्रायश्चित्त (३)। गायों के रोधनादि से मरने पर प्रायश्चित्त (४-५) गायों की हड़ी आदि मारने से टूटने पर प्रायश्चित्त (६-१०)। किन-किन अवस्थाओं में प्रायश्चित्त नहीं .लगता उसका परिगणन ( ११-१४)। गजादि प्राणियों की हिंसा में प्रायश्चित्त (१५-१६)। काम और कामादिकृत पापों के प्रायश्चित्त के लिये विशेष वर्णन (१६-१६)। बालक वृद्ध और त्रियों के लिये प्राय- श्चित्तविधि (२०-२१)। ११ गोवधप्रायश्चित्तकथनम् ३०८१ गोवध करनेवाले का प्रायश्चित्त वर्णन ( १-११)।

श्रध्याय
-
समाप्त।
नुष्ठानों के न करनेवालों की सभी क्रियायें निष्फल होती
हैं। दिशाओं के निर्णय से लेकर प्रायश्चित्त तक
२५ अध्यायों का संक्षेप से निरूपण (८-२०)।
[ . ।
प्रधान गि
परा
१२ कृच्छादिस्वरुपकथनम्
३०८३
प्राचिराविधि (१-४)। फन्द्रादि का सहा
फपन (५.८), प्राह्मण महिमा-
सममासम्पत्समयामिहेनयः ममुस्थितापालथमफेनयः।
अपारसंसारसमुद्रसेतयः पुनन्तु मा ब्राह्मणपादपासयः ।।
(६-१६)1
माहिरस (२) के उत्तरागिरम प्रकरण की विषय-सूची
भारद्वाजस्मृति के प्रधान विषय
१ भारद्वाजम्प्रति सन्ध्यादिप्रमुखकर्मविपये
भृग्वादिमुनीनां प्रश्नः
३०८५
भारद्वाज मुनि से भृगु, अत्रि, वशिष्ठ, शाण्डिल्य,
रोहित आदि महर्षियों ने नित्यनैमित्तिक क्रियाओं को
लेकर प्रश्न किया (१-७) 1 उन्होंने बतलाया कि नित्या-
.

अध्याय प्रधान विषय पृष्ठाङ्क २ दिग्भेदज्ञानवर्णनम् ३०८७ पूर्व पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण दिशाओं के ज्ञान की सरलविधि (१-४)। अन्य दिशाओं का परिज्ञान प्रकार (५.७७)। ३ विण्त्रोत्सर्जनविधिवर्णनम् ३०६४ मलमूत्र विसर्जन की विधि (१-८)। ४ आचमनविधिवर्णनम् ३०६७ आचमन के पूर्व जहा से जानु तक या दोनों चरणों को और हाथों को अच्छी प्रकार धोकर आचमन का विधान (१-५)। जल में खड़ा हुआ जल में ही आच- मन करे, जल के बाहर हो तो बाहर (६-७){ अंग-न्यास, देवताओं का स्मरण, आचमन कितना लेना चाहिये, बिना आचमन के कोई कर्म फल नहीं देता अतः इसका परावर ध्यान रखा जाय (८-४१)। ५---दन्तधापनविधिवर्णनम् ४००१ मुख शुद्धि के लिये दन्तधावन का विस्तार से निरूपण, दन्तधापन के लिये वर्ण्य तिथियां एवं समय तथा कौन- कौन काष्ठ माध है तथा कौन-२ अमाहा है इसका निरू- पण, मौन होकर दन्तधावन फरे (१-२५) मानविधि [ ७२ अध्याय प्रधान विषय पृधाङ्क का वर्णन (२६-३८)। ललाट में तिलक का विधान (४०-४५)। ६ त्रिकालसंध्या विधानकथनम् ४००६ एक ही सन्ध्या के कालभेद से तीन स्वरूप प्रथम काल की ब्राह्मी दूसरे की ( मन्याह्न की ) वैष्णवी तीसरे की रौद्री सन्ध्या कही गई है। यही ऋक्, यजु और सामवेदों के तीन रूप है। इनके नित्य ही द्विजमात्र को कर्तव्य इष्ट हैं। मन्ध्या की मुख्य क्रियाओं का विस्तार से परिगणन (१-६८)। गायत्री के जपविधान का फयन (६६-१४०)। गायत्री का निर्वचन (१४१. १६३)। जप यज्ञ की महिमा ( १६५-२८१ )। जपमालाया विधानकथनम् ४०२४ जपमाला का विधान और जपमाला की प्रतिष्ठा उप विधान में अर्थ का प्राधान्य और साथ में मनोयोग पूर्वक करने से ही धमिद्धि मिलती है (१.१२३)। ८ जप निषिद्धकर्मपर्यनम् अनिष्टि यमों का यगंग (१-१२)। १ गापयामाधनसमवर्णनम् ४०३८ गायत्री मापनकम की शाननं गेही मधः मिद्धि मितीत म जाना किया जाय (10) विधि। ४०३६

अध्याय
प्रधान विषय
पृष्ठा
गायत्र्या मन्त्रार्थकथनम्
४०४३
गायत्री के मन्त्र का अर्थ का विस्तार से निरूपण (१-६)।
गायच्याः पूजाविधानकथनम्
४०४४
गायत्री का पूजा विधान (१-११८ }। गायत्री
पुष्पाञ्जलि का प्रकार (१११-१२१)।
गायत्रीयानवर्णनम्
४०५६
गायत्री का ध्यान वर्णन (१-६१ )।
गापश्रीमूलध्यानवर्णनम्
४०६३
गायत्री का मूलध्यान और महाध्यान का वर्णन (९-४४) ।
। पूजाफलसिद्धये द्रव्यगन्धलक्षणवर्णनम्
पूजाफल की सिद्धि के लिये नाना द्रव्य, गन्धलक्षण
का विस्तार से निरूपण (१-६४)।
। यज्ञोपवीतविधिवर्णनम्
४०७२
यज्ञोपवीत की विधि का वर्णन निवीत और
प्राचीनावीत का लक्षण । शुद्ध देश में कपास का वीज
योया जावै, उसके तैयार होनेपर ही ब्रह्मसूत्र को विधिया
बनाया जाय। नाभि के बरावर ६६ छियानये चार
हस्ताहुल प्रमाण से बनाकर शुद्ध मन से देवगण ऋपियों
का ध्यान करते हुए इस ब्रह्मसूत्र को पहने ( १-१५४)।

अगा”
और
१६ गोपीनधारणविधिानम्
शुट होकर आगमन का आगन पर बेसि
आचार्य, गनाय, याणीदेयता. देवना, गिग और
पित का ग्मरण करे। मगवान, प्रमा, अच्युत
गद्र को भक्ति से नमस्कार करे, नयाँ सन्नुभा में पायः
इन कर यज्ञोपवीत फा धारण करे (१-३)।
१७ यज्ञोपवीतमन्त्रम्य पिन्छन्द आदीनां वर्णनम् ४१९३
यशोपयीत मन्य के भूपि छन्द देयता आदि का
विस्तार से वर्णन (१-३१)।
१८ सप्रयोजनकुशलक्षणवर्णनम्
कुशों के बिना कोई भी नित्यनैमित्तिक क्रिया का
सम्पादन शक्य नहीं अतः कौन सी ग्राह्य है और कौन
सी अग्राह्य है इसका निरूपण ( १-१३१)।
१६ व्याहृतिकल्पवर्णनम्
व्याहृतियों का विस्तार से निरूपण (१-४८)।
व्याहृतियों से सम्पूर्ण कार्यसिद्धि शक्य है (४६)।
॥ भारद्वाजस्मृति की विषय-सूची समाप्त ।।
४२०

।। श्रीगणेशाय नमः॥ * कपिलस्मृतिः * कपिल-शौनक-संवादवर्णनम् वेदनिन्दकानां दूषणम् :- पुरा तु शौनकः श्रीमान्भाविनं पतिमीक्ष्य वै। मीनोत्यंत कलो भूम्यां तिप्टेद्विप्रत्वमित्यसौ ॥ १॥ अत्यन्तं चिन्तयाविष्टः कपिलं विष्णुरूपिणमू। अवशादागतं वीदय प्रहृष्टः सत्वरं सदा ॥२॥ समुत्थायाभिवाद्यनं गामय॑मुदकं शिवम् । कल्पयित्वा नष्टश्रमं पश्चात्माक्षरित्रवीत् ॥३॥ कलो पापैकवहुले धर्मानुष्ठानव जिते । कथं तिष्ठति विप्रत्वं भूतले यद मे महन् ।॥ ४॥ संशयोऽतीव सुमहान् पर्तते छिन्धि नुमि)विभो । नितेन(शीनकेन हन(कृतः प्रश्नः कपिलः स सनातनः ॥शा स्मयं कृत्वा जगदुभता सस्मितं वाक्यमत्रवीत् । त्वं महानसि सर्वज्ञः सर्ववेदविदाम्बरः ॥६॥ अनगण्यश्च भक्तानां वरिष्ठो ब्रह्मवादिनाम् । अष्टादशानो विद्याना कोशभूतो महाद्युतिः ॥७॥ ऐकायोगत्व) नानात्वं समवायविशारदः । क्रियाकल्पविशेषज्ञः सर्वशास्त्रार्थतत्ववित् ।। ८॥

यत्परम । पनश्वरम् ।। १३॥ २२३० कारलम्मामः अयापि गुरुगणा(ज)निानः भनिमिटगः । प्रामण्यमा कमविशंपरेय पादाम्यं सगमीगीनगिनीवरं शियम्। मुस्थितं प्रभयो नो पेन तिपनि भितनि ।। १०॥ निष्कर्षमुमुम्योग (प) तस्मिन न मंशयः । अयापि सूक्ष्मं यक्ष्यामि तन्ममेकमना: भणु ॥ ११॥ अग्राह्मणेषु सर्येषु मयस्मिनमानणप्रो(नये)। नामधारकमानेषु प्रोत्रियेषु महत्स्वपि ॥१२॥ सर्वेप्यपि वैदेकपारगेषु महात्मम् । ब्रह्मत्वमेकसामान्यात्तिष्ठत्येय तन्महत्तारतम्येन न्यून चाधिकमेव च । महच्च सुवामोच्चापि दोपयुक्त गुणोत्तरम् ॥ १४॥ निदोपम(मि)ति भेदेन यहुपाभि(हि)मवेहि(स्मृतीतत् । सर्वकर्मकशून्येऽस्मिन्कलौ पापैकसले ॥ १५ ॥ कर्मानुरूपं ब्रह्मत्वं प्रतिष्ठति हि भूतले । तन्न दूप्यं दुराधर्ष युगधर्मानुरूपकम् ॥ १६ ॥ परान्नेन मुखं दग्धं हस्तौ दग्धौ प्रतिमहात् । परस्त्रीचिन्तया चित्तं कुतः (त्र) शापः कलौ युगे ।।१७॥ तिरी (रो) हितस्तत्र वेदः स्वभावात्पुनरि (रे) प्यति । कुतर्वाधितोऽत्यन्तभाषाप्रद्ध (न्य) राजते ॥१८॥ भाषाप्रध(न्योकुतर्काणामागमानो प्रचारणात् । वैष्णवानांशोभ(ना)नां पुरान्नेवाना(पुरुषाणा)दुरात्मभिः १६

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२५३१
प्रकल्पिताना शाखाणामसतां सद्विरोधिनाम् ।
प्रवाहुल्यादर्ममूलं वेदः शाजतरं भवेत् ॥ २० ॥
एवं वेदे धर्ममूले परं शांतमवस्थिते ।
तथागतमतं केचिदनुसृत्य ततस्ततः॥२१॥
कर्मोपयुक्तमात्रैकपुत्राध्ययनमात्रतः ।
सम्पूर्ण तम विप्रत्वं प्राप्तमेवेति वादिनः ॥ २२ ॥
देवो ध्येतव्यइत्युक्त तदुपर्यपि युक्तिभिः ।
यत्किञ्चित्स तु यावद्वा यत्किञ्चिच्चेत्तदा किल ॥२२॥
या(?)त्रीमात्रतःस्याद्रि यावच्चेद् ब्रह्मणे नमः ।
सततं प्रलगा(१)सवं पुनस्तेषां दुरात्मनाम् ॥ २४ ॥
अदिव्यत्यत्तत्तद्वाक्योचारणेहिभयं च न (१)।
वैदिकान्यपि कर्माणि दूपयन्ति समासु च ॥ २५॥
तदास्यतः पुनर्लोकेऽप्यल्पज्ञानां हि निश्चयः ।
बहुज्ञानी संशयोऽपि कदाचिजायते किल ॥ २६ ॥
तद्वदिकेषु शास्त्रेषु सदकर्मसु(सत्कर्मनिरतेष्वपि)।
विश्वासस्तादृशानां च जायतेऽपि च कुत्रचित् ।।२७)
वायोनिपु जातानामपि केपो दुरात्मनाम् ।
तानि प्रयुतकर्माणि दुपयन्यपि सन्ति च ॥२८॥
श्रुतिप्रोक्तानि दिव्यानि मूढाः पण्डितमानिनः ।
मूदानां तादृशानान्ते(च)शुरुत्वं समुपाश्रिता: IRel
स्वयं च वैदिकाश्चेति वदन्तः पुनरप्यति ।
कुबुद्धि चोधयन्तश्च तादृशाः दुष्टचेतन(नाः) ॥३०॥

पर्ट से भुगतान दिनु ताराः ।
अगापि मग भूपग्गा मिकमिन् ॥ ३१॥
येदिकान्गार पनि परिकारोशनः।
मागानि गोयं मम्ममा(?)मामनि ॥३२॥
शामामायानगयानि माग (1) महादिनना
मोत्रियत्वं (१) प्रथिनं दुर्लभ
मदेहिनाम ॥३३
शतजन्ममु यिमन्वं प्रारम्य तिनम्नतः ।
श्रोत्रियत्वं मिध्यति विना मममपाठकः ॥३१
यर्णक्रमविभागशः सरमायादिलक्षणैः।
सदाचार (रा) यरो घोरो प्रामभूयाय कल्पते ॥३२
तन्मन्त्रविनियोगशः तकियाकरणक्षमः ।
चतुर्मुखस्सुभूतो (समुद्भूतो) लोकेऽर्यशो जगद्गुरुः ।।
साक्षान्नारायणः सोऽयं भेद (ह) हायमाभवेन् ।
वेदो नारायणः साक्षात्तदर्थशः स एव हि ॥३०॥
सोऽयमर्थः कल्पसूत्रः प्राह्मणेन चतुर्दश।
वर्णान्यप्योजसाल्पेन तद्वर्ण (१) वासिपूर्वकम् ।।३।।
विणान् (१) वा निंद्य नाशार वामा त्रस्यात्र जहासकः ।
व्यत्यस्त मुच्चरन्व्याक (१) तर्प (ई) वत्ति केवलम् ॥३६
शतजन्मसु तं विद्यात्साक्षादैवतमागतम् ।
वेदनारायणद्रोही निर्भयेन श्रुति सताम्() ॥ ४० ॥
वाचा संस्कृतया वति(क्तिद्वाससा(?)सुरतस्सतु ।
वर्णव्यत्यासतः प्रोक्त्या वेदेऽस्मिन्ब्रह्महा भवेत् ॥४०॥

वेदमन्त्राणांव्यत्यासेनोधारणेदोपकथनम् २५ विसर्गविन्दुदीर्घाणां व्यत्यासोक्त्यावशादपि । भ्रूणहत्यामवाप्नोति स्वरादीनां तु केवलम् ।।४।। वीरहत्यां दुर्निवार्यामुश्चरन्तं तु तादृशाम् । अनधीत्यैव सूप्णीकं वेदवाक्यं शिवात्मकम् ॥ ४२ ॥ दुर्वाधीनं कारपाठं अपि तूष्णीकपाठकम् । सद्यो वे धार्मिको राजा स्वस्माद्राष्टात्प्रवासयेत् ।।४।। वेदं समुञ्चरन्तं तन्द्र तत्क्षण एव वै । जिह्वाच्छेदं तस्य कुर्यात् (धार्मिको नृपसत्तमः)। अनधीत्य पुरा वेदं या वा(अन्य)शास्त्रं श्रम(मो)पृथा १४ करोति ब्राह्मणो मूढोनरो गर्दभ उच्यते । नरगार्दभसंसगं स्नानं पञ्चाङ्ग (सं) युतम् ॥ ४५ ॥ कृत्या सङ्कल्प्य तत्पश्चात्प्राणायामशतं चरेत् । पूर्वस्मिन्जन्मनि स तु नरगार्दभसज्ञिकः ॥ ४६॥ सत्यं मृगयधाजीवः निर्धनिको नित्यकर्कशः। सत्वयं वेद चत्व (१) निरूपणक हेतवो ॥ १७ ॥ भूतले कलिना सृष्टः न कुर्यात्तेन मापणम् । अनोत्रिय ब्रह्मविद्याविषये कलहं वृथा ॥४८॥ न कुर्यादेव सोऽयं वै महाव्यामोहकारणम् । कुलादिनः कुतकार्ये(तांश्च)कुत्सिताः कालरूपिणः ॥४६ कुबुद्धयः कुवोद्धारः कुत्सिताचारकारकाः । नावलोक्यान सम्भाष्या: विप्रनामकथारकाः | सन्ध्या व सपनान्यन् प्रामस्य मदामयः (१)॥२॥ २५३४ कपिलामतिः विशेष प्रादरिने गरि घटा हटाया! दं विष्ण पानी पिना प्रारम् ॥११॥ सगुणाांग न ऑयं भर्ग मंगरपि। सर्वेामेय धमांगो मुग्न्यामांऽयमेव वे ॥२ फटी पापैकपाले. प्रादाग्यः भगिनीदितः । जीयातुश्च सन:आद भम्या कुर्यातदन्द्रितः। तम नानाविध शयं निन्यं नैमिनिकन्नया ।।४।। काम्यं चतेषु मर्वेषु प्रत्यदान्तर मदमदा(मेवय)। पित्रोदेवततम्तम्याकरणे मा एव हि ॥ ५५॥ चण्डालत्यमवाप्नोति तस्मात्तत्तुविय ३(१)। मृतयोदिवसे कुर्याच्छुद्धः सन् मक्सिंयुतः ।।६।। एवमेतद्वत्सरस्य स्थलेऽस्मिन् भक्त्या(१)भवन् । श्राद्धमनिमवर्पस्य पुत्रेति (१) वा वदेत् ॥ ७ ॥ सर्वेषां शृण्वतां मध्ये तावन्मात्रेण ते तदा । अतिनुष्टा हि पितरः ताव या श्रताद्दिला(१५८॥ किमप्य (१)मकाक्षत्तं तदाद्यन सन्ध्यके। सदाशिपः प्रयुञ्जन्त एतत्पालनसम्मुखाः ॥६॥ मलद्वार्यस्य सततं तिष्ठन्ति किल सानुगाः।। मापेभ्यः पञ्च पड्भिर्वागन्वहं मित्र मायपे(१) ॥६॥ ।

श्राद्धप्रकरणवर्णनम्
२५३५
प्रसक्त सति तैरतच्छ्राद्धकार्य कयश्चन ।
कुत्र केन कथं कस्मात्प्रभविष्यति वै तदा ।
कि कुर्मश्चेति तचिन्तापर एव स्थितो भवेत् ॥ ६॥
तावन्मात्रेण तेपान्तु नित्यमेव विधानतः।
कृतमेव भवेच्छाद्ध कीर्तनादेव केवलम् ।
समीचीनत्रीहिमापमुद्गप्रमुखदर्शने ।
एतत्तुलितवस्तूनि स्वपितृणां मृतेऽहनि ।। ६२ ।।
यनासंध्यादीप्या(1) मयातवदेन्मुदा ।
न पयस्याः समुद्दिश्य भावयेद्वा स्वचेतसा ॥६॥
शक्त्या फालेन च ततः तदर्थ यस्तुसंप्रहम् ।
फुर्यादेच स्वयं भक्त्या पितॄणां प्रीतिहेतये ।। ६४ ।।
पश्चाच्छाद्धऽप्य पूर्वम्या() रात्री कन्यस्य तद्भवेत् ।
श्यःकर्तव्यस्य तन्नाद्यात् स्थीकुर्यात्कामतःस्वयम् ॥६॥
रात्री फुताशनान्विमान्श्राद्ध चैव निमन्त्रयेत् ।
ततः प्रातबिधानेन स्नात्वा सन्ध्यामुपास्य च॥६६॥
फूत्वामिहोत्रं स्मात्तं च प्राणान्दै निवेदयेत् ।
घावायनीयस्य स्थाने वै मनिमित्ततः ॥६॥
प्रसादो भवता कार्य इति वाक्येन केवलम् ।
फेवलं लोके नैव श्रृणुयाभं दत्या भयापुनः(( ॥६॥
तूष्णी या प्रति विप्राणामेवमेप विधिःस्मृतः ।
सर्वेषा पुनरप्येपा प्रति पूर्व (६) प्रयोमनाः ॥ ६॥

म.फिलम गरपण या प्रांगा गा गागान गंगुनः । पामेकं ग मात्र गाशा गंगनम || ॥ पित्रादीनां प्रमाणवित्री रिमा मंग। विपद्वयं गया दो नागामि गा मोन् ॥ ७॥ मायन्नादिग्नदा फागों यदा पुनः प्रजायते । जानकर्म गया गुांगुयांदभ्युदयं गया ॥७२॥ सन(प)लस्य पितुम्नानं जातमात्रे विधीयते । अत्र देवं प पिये च युग्मसंख्या द्विजारमृताः ।।७३॥ फन्यापुत्रविवाहेषु प्रवेश चश्मनामपि। नानाकर्मणि (मु) चौलाना चूडाकर्मादिक तया itsent सीमन्तोन्नयने मे(च)व पुत्रादि मुखदर्शने । नान्दीमुग्वं प्रकर्त्तव्यं तत्र यद्वान् पितृनशुमान् ।।३।। कुलजं सप्तमं पूर्व पळं चाऽपि ततः परम् । पञ्चमञ्चापि यत्लेन क्रमेणेव प्रपूजयेन् ।। ७६ ।। गोत्रान्तय (तर) प्रतिष्ठस्य नाद्यास्तेपि नरो खलाः । मातामहाश्च नितरां दुर्लभाः राव सत्तरम् (?) माता पितृभ्यां तद्गोत्ररयागेऽङ्गीकार पूर्वकम् । स्व(स्वीकृतोऽयं पालकेन तद्वगं तेन चासनम् ।। ७८ ॥ तन्मातृपितृभिः साकं न तत्त्यागः पुरा कृतः । तेन तन्मातामहानां त्यागस्त्वन्याय एव हि ॥ ६ ॥ तथैव क्रियते सर्वः तेन दत्तोऽथ पापन् । त्यतमातामहः क्रूरः दत्तो वैदिकवर्मना ।। ८० ॥

श्राद्धप्रकरणवर्णनम् २५३७ नान्दीमुखे मातृवर्गः प्रपूर्यः (य) वेद शास्त्रगः । पितृवर्ग ततः पश्चाद्वगं मातामहस्य च ।। ८१॥ सर्वकर्मसु चाप्येवं शुभास्येषु विधीयते । मातृपूजा प्रथमतः पितृपूजा ततः परम् ।। ८२॥ वस्त्रभूषणयोर्दाने समनुधारणे तथा । दम्पती पूजने चापि स्त्रीपूर्वणेय चोपत्ता (त्तमा) ॥८३॥ कृतिस्सा श्रीमती पुण्या तादृशे पुण्यकर्मणि । स्यक्ता दत्तेन तूष्णीकं मोहान्मातामहाःपरे ॥ ४ ॥ सपनीका हि पितरस्त्रयस्ते देवताः पराः । त्यक्तः स्थिप्पेप्टदेवो(स्व-इष्ट)यः सोऽयमत्यन्तपापकन । कृतं दत्तं वस्तुतस्तु सूतकान्ते विलक्षणम् । एकोद्दिष्टाप्तरतस्यक्त (१) स्वीकृतगोत्रिणः ।। ८७ ॥ नरसिंहाकृतेरस्य संयोग यातुभिश्चरेत्। दरपि तथाऽऽदित्यैः प्रीतत्यस्य(१)दियुक्तयोः ॥ ८८ ॥ तद्गोत्र शर्मभिस्तात पितामहमुग्यैः सह । यस्वादिरूपः प्रमतः इत्येवं न कथचन ॥८६ ।। कुत एवमिति प्रोक्त दत्तोऽयं मिश्रगोग्यापि। पालकस्यततादानांतारास्यास्य(१) फेवलम् ॥६॥ सोकर्यशून्यशुद्ध पगोगात्राणामय गोत्रिणः । पिण्डः संयोजनमत्र बिधिरोधेन न शक्यते ॥६१ रमत्वमपि मुदत्वं भीषत्वं (1) सत्वकम् । तथा पितामहत्या प्रपितामस (दत्य) मेवप ।।१३॥

तदगोत्रियोर्ये(?)ज्येप्येयम्यु नान्यत्र कथञ्चन । कयोत्पत्ति निदान(च)ज(य)बीजं रस इतिम्मृतः ।।६ तस्यापि यनिदानं तच्छुम्मे शब्देन शब्यते । सरपापि यत्कारणंहि जीरशब्देन शन्यते(भण्यते) 11४11 तयेति पुरन्येऽपि ततः शब्दादिकाः शिवाः । तत्तद्गोत्रजपिण्डेषु भवेयुमुख्यधर्मतः ॥६॥ मध्यप्रविष्टगोत्रस्य तत्त्वं तत्साम्यमेवच। सर्वथा दुर्लभं प्राहुस्तदसाधारणा गुणाः ॥६६॥ तस्मादेनत्तादृशेषु योजयेन तु धर्मतः । तातादयस्तु गुणिनः यसुत्यादिकमुच्यते ॥६॥ गुणा इत्येय तेषां तद्विधान मंत्रवर्मना । सुखायाश्रयभूतानां तद्विधानां प्रशस्यते। गुण्यरण्य (१) भावे तस्य विधानं शास्त्रवर्मना । गुणस्य तत्कम (कथं) मंत्रतस्त्वसमञ्जसम् ।। ६६ ॥ सपिण्डीकरणाभावे प्रेतत्वं न निवर्तते । तस्मात्तदापो जपित्वा वस्यादित्येन मंत्रवैत्रिणवै) ॥१०॥ एकं समुद्दिश्य चैकोदिप्टे विधानतः । प्रति सम्वत्सरं श्राद्ध कुर्यादिति मनोर्मतम् ।।१०१ अन्यगोत्रप्रविष्टस्य सूनुश्चहार्तिगतः । मृतं स्वपितरं तस्य गोत्रेणेव क्रिया परा ।। १०२॥ छुप्यदेिय त्रिरायण मातुश्चापि तुरीयके । दिने सपिंडीकरणं सूच(त)कं च तथैव वै ।। १०३ ।। तत श्राद्रप्रकरणवर्णनम् २५३६ समनुष्ठयेमेवेति सर्वशास्त्रविनिश्चयः । मातुलादि समस्तातः भिन्नगोत्रः तथाप्रसूः ।। १०४ ।। आदिकेऽपि तयोरेकं पिडंदद्यादिति श्रुतिः। चित्तत्र पुनः प्राहुःपितरं तादृशं मृतम् ॥ १० ॥ तादृशस्तनयः पूर्वैस्तत्तातादिभिरेव वै। तद्गोत्रेोजयेन्मत्रै रन्यथास्य गतिः भवेत् ।। १०६ ॥ इति(शास्त्र)समाचोल्य प्रत्यक्दम्मयि केवलं । या वर्णन विधानेन कुर्यादित्येव चात्रवीत् ॥ १०७ ।। नमत्याश्च(१) तथा धुरा सूतकच्चे त्रिरात्रकम् । यतोभिन्नं तस्य गोत्रं गोविणामेव केवरम् ।। १०८ ।। दशरात्रं सपिण्डाना जातकं मृतकं स्मृतम् । तदिनाना तु बन्धूनां प्रत्यासत्ति प्रभेदतः ।। १०६ ।। त्रिरात्रं दक्षिणि(?)चाइदिनंच विधिनोदितम् । भिन्नगोत्रस्य पुत्रस्य तमल्पास्तत्मुतस्य २॥ ११०॥ जातफे मरणे चापि सूतकं पूर्व्यवस्मृतम् । तपित्रोरपि तस्यैवं मादा वै विटक्षणा ॥१११।। आत्रिपूर्वततम्त्येवं ततुले दैन्यता परा। निसिला समता भागान्यून्यताज्ञाभिस्तया(?) ||११|| भवंत्येति सर्वत्र निर्विवादो महानयम् । जनप्रयादः परमः सर्वशास्त्रविनिधितः ।। ११३॥ साततत्तातताताना यापदे भरेत्तु तन् । गोत्रं पुराणं अत्युक्त सवस्तं निहितं उड़म् ।। ११४ ।।

सदशानां तेननैच्यन्य प्रहेननि सूरिभिः(१) ॥१२॥ निकृष्ट नैच्यन्यं गाम्या(?)तन्महत्य यहिष्णनम् । शातिमात्र प्रहणं गोर्ण्य वैदिक कर्मणाम् ।।११क्षा वैदिकानामयोगस्यादस्वीकार्य विपक्रिनाम् । ताततत्ताततताना क्रमोक्तिःस्यायदातदा ॥११६|| तत्कुलं सत्कुलस्माम्यं लभते नात्र संशयः। पदव्यत्या पुनरपि दत्तसूनोः मृतौपितु(१) ॥११॥ भिन्नगोत्रस्य कथिता तातास्तु कुलजैस्त्रिभिः। योजयेदेव विधिना वाधकं तत्र नैव वै ॥११८।। एकोदिष्टं तस्य सूनोः त्यक्त्यावा(तातं ततःपरं। पितामहादीनां सम्यग्योजयेदेव नान्यथा ।।११।। यतो पितामहत्यागः पतिप्तिश्रततः(?)पुनः । तेनतद्वंशमात्रस्य निदानैच्येत (?) कीर्तिते ॥१२०ll यावत्प्रकृतिसंप्राप्तिपर्यन्तं धर्मतःस्मृतम् । एकस्मिन्नेव गोत्रे तु प्रवेशो यदि जायते ॥१२॥ तत्संतती ततो घोरं संकटं सुमहत्खलु । जायते तत्तादृशंतु(?)तुच्छकर्म न चाचरेत् ।।१२२।। एतद्धि तत्तुच्छकर्म प्रविष्टस्यास्य संतती। साम्यं प्रथमस्याभूतत्तत्मुतस्य ततः परम् ।।१२।। गतस्य प्रकृति चापि सपिंडीकरणात्परम् । या गोषयति पित्रादेः सत्सुत प्रमृतित्रिगोः ।।१२४॥ व्यत्पांसाद्वातसलो(?)योजायते स्ययमेव वै।

श्राद्धप्रकरणवर्णनम्
२५४१
उपन्यस्तानि तायत्तु यावरस्यात्प्रकृते:पुनः ।
संभयस्तेन गोत्रेण फुर्यात्पुत्रस्य संग्रहः ।।१२६।।
शस्येण निहतस्यैवं चतुर्दश्यं पितुः श्रुतम् ।
दक्षे महालयारत्येऽस्मिन् एकोहियाख्यवर्मना ॥१२॥
सर्वपामविशेषण एकोद्दिष्टविधानतः।
श्राद्धानि निखिलान्याहुः सपिण्डीकरण विधि ॥१२८
परं सपिण्डीकरणात्सोदयुम्भानि परमशः ।
पावर्णन विधानेन मासिकानि परेत्परम् ॥१२॥
संयत्सरविमोकान्य संततेच्छेति(१) तन्त्रमः।
अपुत्रस्य पितृव्यस्य धातुश्चेवामनन्मनः ॥१३॥
मातामहस्य सत्पल्या:साद्ध पितृपदाचरेत् ।
पित्यत्करणं सत्यति संवत्सरं मतः ॥१३॥
अत्यंतावश्यकत्वेन कारणं मदुप्यते ।
नोपासनामी सतुदमीकरणमंजमा ॥१३॥
सपियोरेय पल्याशतन्मातामदयोरपि ।
अपोकरणमित्या मशाग्नत्यदर्शिनः ॥१३॥
नियामक किमनि भरनाकांक्षा भवति।
समाधान पदयसेटयानहाय धुनोरिनम् ॥१४॥
नियनमिनिषु काम्येषु गरेप्यपि ।
लावता यापामारामनोनचानेर ५) १
अमोरम कार्यानु मातिमीततः पुर)
नई एयरपति प्रसार पुरभवत् ॥१६॥

A IN दारा श्रेवाविलययन()। ५.वि विधिना शुचिर्धम(?)यतोन्यहं ।।१४।। मियम गुरये श्राद्धमेकोद्दिष्टं न पार्वणम् । to तोनो (1) निलम्यतु । PANTHI TRY मनेविले ॥१३७ पप) लो मसग्निधों। *HER. तस्याशु मरणे पुनः ॥१३॥ Aur ) प्रश्नाकांक्षा भवेत् । १२ मारमानसनंवहिदानंच शाश्वते(१) १३८ को संभालेय इत्यामिस्थर्मवत्मना(?) ॥१३६॥ तु निर्मध्ये नैवतोदहेत् ॥१४॥ वा (तपस्पाइकुर्वन्नित्यं क्रियापरम् । सोदिका का भिदत्यं त्तावश्यकाः पराः(१) ॥१४१|| सत्यादिका स्यादितथा ग्रहण पूर्वकाः(?)। मा ती प्रदद्यात्तु वहिमथं तथा ततः । भासकिय पुत्राय स्वामिने मातुलाय च ॥ vutt (१) पकुतिदशीपद्द वत्यत्र प्राहुर्दिव्या महर्पयः ॥१४३ तप्तथा। तथा मातामहा अपि ||१४४|| प्रतिसंकल्परा(ना)ख्यकम् । विशेषोऽत्र पुनः स्मृतः॥१४॥ सरभाद्ध श्राद्रप्रकरणवर्णनम् भ्रात्रे भिगिन्ये पुत्राय स्वामिने मातुलाय च। मित्राय गुरवे श्राद्धमेकोद्दिष्टं न पार्वणम् ॥१४६।। प्रतिसंवत्सर श्राद्धेऽन्येषां नित्यं श्रुतीरितम् । धानि त्रिदेवताकानि सपिण्डीकरणात्परम् ॥१४॥ सादकुमादिकाव्येवं प्रत्या(?)तानि फानि चित् । शब्देवत्यानि पित्याणि दशान)दौनिस्मृताम्यपि ॥१४८॥ नव देवतकान्येवं व्यष्टफादीनि फेयलम् । सधेय नांदी परमा नव देवतकारमृता ।।१४।। एतेभ्योऽप्यधिक प्रोब' जीवच्छाद्धमतीय थे। विचित्रमेवं फयितं यहुदैवत्यमुच्यते ॥१५०१५ ससुरीग्यारव्यमादेशाले. कार्ये विपत्रिता । नान्पकाले. प्रा व्यमित्युपाग वृहपतिः ॥१५॥ आगत्य न्यासालले तु नेनापरप मतम् । पादानि दशादीनि म्युः सहिदानिति मूरिभिः) 11२५११ कथितानि महाभागः कानिचिनु तदेय थे। अपिण्डयानि पानि मार्शनि कंवरम् १७॥ अष्टोपररातानि 3. भाटान्येतानि मंदम। कर्तव्यत्येन त्यातानि माया पत्मनः ॥१५॥ मा द्वारा संन्यानि मामि भादान्नमंत। मासि मासि धामं सवानि ॥ हष्णपसे विशेषम विदिनानि ममागतः । अमामन () युगानन्यायालमहाला: ॥१६ करियापतिः तिमोष्ट कामा दायारावय.) की मिनाः । नंगु निन्यादाने मनवान गुगादयः ॥१४॥ महालया अटका नया नमिशिकाः स्मृताः। संकातिकृतयः निम्मिला: पातमंक्षिसाः ॥१५ गमिछाया च कथिनाः सत्कथं येतदुच्यते । हिमकाला गमामाया निमित्तान(?)मुदाहनं ।।१३।। मात्यांदीनानु(?)विजया दादीनां तु नित्यदा। लीताकाला(?)गमेनेय सरण्यानन्यया मता ॥१६॥ निश्शेपदेशलोकादिवणांगमनमात्रतः । आमतो यस्य सततं क्लीप्त्या नित्यत्वमुच्यते ।।१६।। नास्तिताह शनित्यत्व(१)मन्यस्य हिन कस्यचित् । प्रत्यद्वादिस्तु विज्ञाया अतोनैमित्तिकं हि तन् ॥१६॥ अथापि तस्याकरणेनद्यः (१) चंडालतां ब्रजेत् । पित्रोखेन (1) चाप्यस्य तत्ससमस्रन वै पुनः ।।१६।। प्रोक्तं मातामहश्राद्ध पितृश्यस्य तथैव वै। भ्रातुर्येप्टस्य तत्पल्याः गुरोरपि विशेपतः ।।१६।। येन केनाप्युपायेन पल्या अपि मृताहकम् । अनेनैव विधानेन कुर्यादेव न चान्यथा ॥१६।। न हेन्मामेनवामंत्र अग्नौ (१) करणमात्रतः। पिण्डप्रदानतो वापि कक्षदाहेन वा तथा ।।१६।। या वसेन कक्षा कंटक (१) फलेन विलोदकैः। न प्रत्यन्द घरेत्कृया चयप्येहं न(?)संशयः ।।१६।।

श्राद्धप्रकरणवर्णनम् दशांदिकं तु यच्छाद्धि तत्पतिवत्सरं । येन केन विधानेन फुर्यादित्येष चे मनुः ॥१६॥ शतोसत्यो विधानेन कुर्यादेव न संशयम् । दादि मर्वश्राद्धानि मुग्न्यान्नेन तु)मन्ततं ॥१६॥ आमादिनानुसरणममुख्यामिति बै मनुः । यदनुष्ठानं तत्सर्यानुष्ठान जायतेतराम ॥१७॥ तादर्श परमं दिव्यं शं घुयांदतंद्रितः । येनकेनाप्युपायेन प्रतिमा विधानतः ॥१७॥ पितृणां समयेऽतीय द्विजो धर्मपरोऽनिशम् । पर्शानुष्ठानमात्रेण सर्वश्राद्धानि फेयरम ॥१०॥ हतानि सम्भव येन नाय कार्या विचारणा । पविधानरहितः पेनानाप्युपायतः ॥१३॥ सभाद्वान्टनो याति पितृपादनमस्तुनःटान्नयर्जितः । आपपि पिचारमनेनैप ममाचरेत् ॥१७॥ नपर्गन न पामेन(१, मंदादिभिपिनाभिनुपा। विमरे मनि दास्यं पारमन) ||१७| गयामेनहेगना या मान्यतिलादिभिः । रक्षीदादाभियान यः पिण्डामाकरणादिभिः ॥७ दपेनापि वा पुर्यालयमापहिलोभयेन। महारथपरोपित्र: नियमरं नया पित्रो प्रत्याEिNभारतिय नाप्रमादतः । गयामा नियमममम '' [va1 कग्लिम्गनिः अष्टकारहितो मृदः पिद्रोहीति फायते । मामश्राद्धपरित्यागी गर्वकमयहिणतः ॥१६॥ सदरत्या पितृश्राद्ध सद्विमानेन फेयलम। न मुस्मिथा श्राद प्रदाप्यं कर्यचन ॥१८०! पित्याविधानेन पार्ट पियोः ममाचरेत् । एतद्धि न विधानेन सस्मिन् पातु)केवलम् ॥१८॥ कतिचिच्छाददिवसा(ना) नातटविनंतु(?)गन्छति । मासबाद विधानेन कृतं श्राद्धन्तु केवलम् ॥१८२]] पुरुषाणां देवतानां कृतं कर्मत्रयं भवेत् । स्त्री देवतानां न भवेत् तस्माच्छाद्धं तु तादृशम् ।।१८३॥ न म (कु) र्याचद्विधानेन वाधकं बहु तत्र हि । श्राद्धपार्क भिन्नगोत्रैः फारयेन्नतु सर्वथा ॥१८॥ सुता ध्व(स्वस्य पितृप्वस्य (स्वस) मुखादिभिः । गृहिण्या वा गतायान्तु फारयेदिति फेचन ॥१८॥ गुरुनोत्रियसद्विप्रवन्धुश्वश्रूजनादयः । स्युस्तास्वस्याप्यसामर्थ्य पल्या इति महर्षयः ।। स्नुपायाकैकमधुरा:(१) पितरस्संततं परम् । सुतादिपरिचारकमावसाज्ञादि (१) पाकवः ॥१. प्राप्नुवंत्यनिशं हपं यजमानपरिश्रमात् । सुखितादुःखिताश्राद्ध (१)भविष्यत्यपि केवलम् ।। ऋत्विवाभांदुश्रोत्रिये ज्यावाजकादिक संजना(१) सपनी तु पिता सर्वे स्वयं चापि स प्रिये(१) ॥१ पेप्रिमे फर्मणि तु यजमान(?)सताधिका। मयत्येय(१) कथिता स्वस्नुषा तत्समा मता ॥१६॥ वस्तुपा सा स्वस्नुपा या श्राद्धपा महात्मभिः। भिपित्ताध्यायधर्ममंत्रतंत्रक्रियादिभिः ॥१६॥ मियेन तु या नारी हिमाद्ध पासि(गोते। कमियां न पुरते जा(या)माता मोहमास्थिता ॥१६॥ । जन्मजन्मनि तरा(या)दुर्भगा पितृयातिनी । च्या दरिदा विधवा भयेदेय न संशयः ॥१६॥ It स्नुपया पाकं यया(दिलोके नराधमाः। शनाकारपिप्यन्ति पिरमाः फिल पे सप्तः ॥१६४) । स्वारयोःमादकततप्ताकनामिका(१) । ो दीर्भाग्यमापना जायते सूफरिरी पुनः ॥१६॥ यहसनेपनीरपालीपाकादिकमंमु । ति भुतिसिदा ये पिश्ये पाक सदैव दि॥१६॥ या विमानाप मद्रजोदर्शनापरं न कुर्यात्पापी(पी)त्य प्रतियत्सरम् ॥१ECH शाः पितरस्ताप (अपामान्यानिरामयाः । महासदिता नियातल्या विवानिराय ARELI पिलाः मारा प्रसंगानमनोरपाः । मपि वपनी शन्नभ दिवानिराप Iports व निर्य मोनाषिः । नियः पूर्व वा पर ना नि: Item २५५८ परित्याभूतिः अपायांगा अपिता रामयजना पिगो एरय गीय नदीजनग्मान (नये) ॥२०॥ रागारणं पाराष्ट्रायानादिगानमा)। पयोद गाम्यमतमोजनम || अपफर्णय गभानामनगंगगः । गमा म पनिकरणप्रपन्न गनायपि(?) २०४|| अत्यंतामफनातीय (?) कार्याभयति यलम् । न चेनं जन्मवैप्यर्थ प्रात्रीत्येवं न संशयः।।२०।। स्नुपानामपि पुत्राणां पितृकार्यममन्ययान् । तत्त्वं तत्कथितं सद्भिः न घेत्तन सिध्यति ।।२०६॥ पुत्राणां पितृकृत्येपु पृथिवीते तु इति मंत्रतः। तत्कृम्नद्रव्यताद्विप्रहस्तस्पर्शन(?) कर्मणः ।२०७| कारमुपितृत्वतोतीव (१) पुत्रत्वं सिध्यति सा। श्रुतिःप्राह शिया पुण्या दिव्या शातपथावया ॥२०॥ तस्मात्पुत्राः श्राद्धदिने पितॄणामतितृप्तये । तुष्टये च स्वयं पन्ना(तस्मात्ोत्सर्ववस्तु(सद् नि भाजने र निक्षिप्तानि स्वमर्यादाजनेन तु ततः परम् । . सम्यग्विलोक्य संपोश्य गायच्या कूर्चवारिणा ॥२१०॥ विप्रहस्तेन मंत्रेण - स्पर्शनं , भावशुद्धितः1.-. कारयित्वाऽतियत्नेन ,पल्यनिजलेन च ॥२११॥ दानं कुर्यात्तदन्नस्य नो , चेरसर्व तु:निएफलम् न देवैखडा(ग)पात्रेण(?) मेतपर्पटफेन :च-२२१२।। 1 श्राद्रप्रकरणवर्णनम् २५४३ नेपाल पटेनादि गव्यद्रव्येण वा 'पुनः । ते वे यवैः पुष्यकाल: पुण्यदेशेरशेषिनः ११२१३।। वीर्यः पवित्रः परमे वादा(धी)णसुमुग्नैरपि । उद्धिन च दिव्येन शिवनिमाल्यतापि या॥१४॥ यमनेनातिसौलम्यतृप्तिकारकयानुतः । राजतेन च पात्रेण महाभिमायणेन च ॥२१॥ इनिन जायते तेपो किनु समुत्रंतित्पुत्र) हानतः । कृतेन तद्विघातसंप्यूटोमणधूर्णतः २१६॥ सपन्यपि सफीपासा (नत्काल) दानतात्पननुधिया । तृनिम्माधिनाऽनीय सामाला सत्करः ॥२१॥ आलो यापि दक्ट्रिीया यातु संपादितं तु यन् । द(बदार्यामुग्रतम्मयं मयो(मी)चीनं विधानतः ।।१८।। ফাবিয়া খাথি মা মাহণি:। भरमदानपापानि मुगनः प्रीय पातु या प्रक्षाल्य प्रशिपित्या १ मंग्राममियादिना । पाए पित्यानितरामुमुपाय Ful. अनिएपमपनामा गोदाम। आएपयिनं अग्रोभिनमनादितम् ॥ पिता ने भाग म्मानन्न तयाधरेगा पापडमानेन न sirit l सानिमोहत) भोगा गोमय: TARIAN (नोमः॥

२५५०
कपिलस्मृतिः
तस्मिन्ताताहिता ये था पितरः खलु तत्क्षणात् ।
यमेन छिन्नजिताः स्युः तदोषस्य निवृत्तये ||२४||
श्राद्धान्ते वामदेवाय
महामंत्रजपः परं।
ज्ञानज्ञानेकतादृक्तादुत्पन्नाद्यस्य शान्तये ॥२२।।
उपाय:कल्पितःक्कापि वामदेवादिभिः पुरा।
तस्मात्सम्यक्प्रवक्ष्यामि श्राद्ध कर्तृ मतां पराम् ।।२२६।।
औपासनानौपचनं प्रयरंचोत्तमोत्तमम् ।
न चेत्पाकादधो यत्तत्तदन्नं होमकर्मणा ॥२२जी
समये वाप्यधिश्रित्य प्रोत्क्षाद्वास्याभिधार्य च।
हुत्याभिमृश्य तत्सर्वमन्नशाकफलादिकम् ॥२२८॥
प्रोक्ष्य मंत्रेण गायच्या व्याहृतीभिस्सतारकम् ।
स्वपत्नीकरनिर्मुक्त तत्पात्रे स्वकराम्मृते ॥२२॥
कारयित्वायस्पर्शयित्याथ(सर्व) (१) मंत्र विधानतः ।
तत्पात्रधारणं फुर्यात्प्राचीनावीतिनासिलम् ॥२३०॥
सदाभ्यपावस्पर्शी कारयित्यापि सैन्धर्व ।
यस्त्वन्तरेण संस्कृष्ट तद्विधाय
च (१) २३१॥
जलपूर्व
प्रदद्यात
पितृतीर्थन तत्परम् ।
पपप्रधानाभावेन
हामीकरणलोपतः ॥२३॥
freसदान एहीनि पुनः पादं परहनि ।
यमनग्याविण्यनष्टातेलदभयोः (१) ॥२३॥
पन्यादरिकन (?) पुनः प्राद' परेपनि ।
अनादिपराधियाना मोक्योः परम्परम् ॥२३॥

प्राद्धप्रकरणावर्णम् पृथिवीतेति मंत्रण पुनः श्राद्धं परेऽहनि । यजमानाप्रोक्षणेन इविपामनवेक्षणात् ॥२३॥ पाकात्परं तदिनेऽस्मिन्पुनः प्राद्धं परेऽहनि । पनीवचनसामों सति तस्य तु पैतृके ॥२३६।। तूटि(प्णी)करणवा(रा)हित्यात्पुनःश्राद्धं परेहनि । दनः फलानो तटुका) पन्या अपरिवेपणान् ।।२३७।। अमायनयनाकार्याद्वित्प्राणानं पदे पदे। यजमानस्य भुत्यंते पूर्व दद्य(ध्य,नमक्षणात् ॥२३॥ तत्काक्षितयअन्यान् (१) सयातरयाममर्पणात् । আবিষখান! सकीयजलपात्रतः ॥२४॥ स्वपल्यानीतसदीत (१) पानीय प्रभन्यतः । निरन्नरैक सप्ट्या पुनः भाद परेपनि २४१॥ आदिमभ्यायसानेपु संप्रयोक्षणप्रभयो। राहीत्याराजमानस्य पुनः भार पनि २४ तमोगा दीयनाशेन (१) प्रापानाविमनान् । ततःपिण्यापि(१) पुनः पादपोनि ॥४॥ पा करमे सर्दियसे पानी प्रदानमः। तम्हार गए एक स्यानमेवं न संशयः ॥arat सदिनविप्रयनेन दोमयेनानुकंवलम (१) । स्वाहायनसभा (१)न पुयोगदति ॥ शरयोगलिया पानामपि । गुरसागरण मेष रामदिनदि !

• पिनप्रगतिः । विमोहागनतः पाहाकार (1)1 , फागन विलिन मसाद निकम ॥२४॥ सन्धं पाटदिने गनाएं यान्तरपूजनम् । न कुदिय निगरी यदि गांप्रमादगः ॥२४॥ गुष्यंति यिर(विरार येनं मामार्ग परियमयेन् । दानाध्ययनदेयाश अपहोमग्रमादिकान् ॥२४॥ न कुर्याच्छादियसे प्राग्निमाणी यिमनात । संनिधाने देववियोः श्राद्ध विधिनाशुचिः ॥२५॥ अक्रोधश्चात्वरीतीय पुनः सात्वा समाचरन् । विश्वेदेवान विधाश्राद्ध नान्यान्देवान्समर्थ येत् ॥२५॥ सपिण्डीकरणे तस्मिन् विष्णुमन्वति फेन च । शिवं शैवाः समभ्यर्च्य केशवं वैष्णवा अपि ॥२५॥ श्राद्ध कर्त्तव्यमेवेति कुर्वन्ति प्रददन्ति च। न तथा वैदिका कुयुः किन्तु श्राद्धारि(?)पुनः ।।२५३।। भिन्नपाकाद्देवपूजावैश्वदेवादिकं चरेत् । देवपूजादिकं यत्तु प्रदक्षिणविधानतः ॥२५४।। यज्ञोपवीतिना कार्य पुण्डधारणपूर्वकम् । तत्पैतृकं कर्म यत्तदप्रदक्षिणपूर्वकम् ॥२५॥। . प्राचीनावीतिनाकायं नापुण्डरहितेन वै । तदेतत्कर्मयुगलं परस्परविलक्षणम् ॥२५६॥ तेजस्तिमिररेत्मततछेपेणव (१) केवलम् । एतत्कर्मककरणं , पितृपेणतत्परम् . ॥२५जा " - श्राद्धमकरणवणनम् वैश्वदेवककरणं देवपूजाकृतिश्च सा। द्वयमेतदनुष्ठानं न तु प्राणादिकं स्मृतम् ॥२८॥ अयमेव महामार्गः श्राद्धीयेऽहनि संस्थिते । पितृपूजानन्तरं तनिखिलं देयतार्यनम् ॥२५॥ प्रमयज्ञादिकं कुर्यादन्यथा तद्विनश्यति । देयता ननिर्माल्यं तबाटफरणे किल ॥२६॥ याधकानि घान्येय सम्भवन्यपि फेवलम् । महदेवाने विष्णो नंवैधायान्नमुत्तमम् ॥२६॥ सुगीज फारयित्वैव पापात्रात्तदन्यो । फुन्निवेदनमिनिनद्विधानं भूतोरिसम ॥२६॥ पो फर्मणि पुनः यायदुणसमन्यिनं । पुल्युग्मस्थितपासमादलमुत्य (१) यवनः 16 दयादिना मती भूयः तपिधायासस्थिते। तदुर विमा निक्षिप्यरानकमतInter সালে অমল সাতৰি (? খ। भाउमान्यपि शाकानि सूपातीनि पर न मग मी विधीत्यादिना । पादित विधानं सपा पार {s धर्मभेदारिदतरंग पुनः । मारप पारणं न भवदिति प परयत: Put निताद्वारा दिया। भार नसाटार वाम Rat एच कपिरम्मतिः अयशादेग भयनि सन्निादिनमोदनम् । उन्मादिरहितं पूर्व मुग्गीण सत्य पुनः IRI अान्तोन्याममायुष(?) मादयोग्यं मयिन्यति । कर्म यरेयपूजायरयं एवं सदि)महामनि IRall दैनन्दिनं प्रथिनं पाद समातियत्मरम् । नैमित्तिकमिति प्रोई नतद्वाप्यते परम् ॥२७॥ योधोनमास्यत्तचाय(?) सम्यगेयपदाम्यहम् । एतस्य फरणात्पश्चात्तत्कार्यमत val एतदाद्धः प्रकयित: नान्य इत्येव सूरिभिः । तस्माच्छाद्ध तदिनैव अकृत्वैव कदाचन ॥२३॥ कर्मान्यम्मोहतः कुत्तद्धि सद्यः प्रणश्यति । यद्वदिकोक्त तत्कर्म मिहोत्रं तयेष्टिकम् ॥२७सा दर्शश्च पौर्णमासश्च तथैवाप्रयणं पुनः। औपासनं च कृत्वैव तस्मिन्ननो ततः परम् ॥२७॥ कुर्यात्नत्याद्विकर्माद्ध' (१) इत्येव मनुशासनम् । वैदिका दुर्बलं कर्म दर्शादे श्राद्धकर्म तन् IRail अपि स्मात्तं यथा भूयः तेन वाध्यतरां भवेत् । वैदिकानन्तरं कार्यस्मातकर्मसुसन्ततं ॥२७ सर्वेभ्यःस्मातकर्मभ्यः श्राद्धमेकंमहत्स्मृवं । न साद्या(सद्यः स्मातकर्म किंतु वैदिक कर्म हि ॥२८॥ प्रत्यक्षश्रुतिमूलत्वादग्निहोत्रसमं च तत् । औपासनं च कथितं नवर्यतेन कृत्वैव(?) IRel बादमकरणपणनम् २५५५ विधिनायश्चात्तश्राद्ध () तत्परं चरेन्। मान्यकिमपि तस्कुर्याकर्मका(न्यन्तु चदिने । फर्मान्तरावशिष्टेन द्रव्येण न कदाचन ॥२८०) नेय फुर्यात् तथा श्राद्र आपत्र्यापैतधेवरत (१) (म)येयतानि नादानि जातकादीनि कारतः ।।२८।। संप्राधान्येकदा यापि शिनद्रव्येण सत्परम् । न पुर्यादेय सहसा यदि कुर्यादिनस्यताति) ॥२८२) फर्तव्यत्वेन संप्रातान्यपि कर्माणि यानि । तानि सर्वाणि भिन्नानि प्राधान्येन पृथक पृथक् ।।२८३१) शुयोतय प्रयत्नेन पूर्वशेषेण यानुना। कुर्यात्तदुप्तरं फर्म नेयं पति दि निर्णयः ॥२८॥ पुरापोला आपरोपेण नमकालेन कर्मणोः । संघात्तिकत्यो माग्यो पायतत्परम)२८॥ परमन्नोग्नुवपसरा फर्मभ्रष्टमभूतारम् । इति भूयसकाराधमपत्योपनयनंरिल ॥२८॥ सम्मात्समावशिष्ट न येन केन प यमुना । सम्मान्तरं न कुर्यादि पुर्यादिनमत्तम २८ भवत्येवन देव पादतिमाप पा) । एक देवारामन (!) ureat द्वितीयाraniयोन २ गह। २ मध्यरमाये मारनीयाममुगमम् Rell कपिलम्मतिः या यत्रैक देशगानि गया भग। प्रायामिपंगागोदादिनि येनयंग (१) real पादेय मनो नूनमभगन्नान्यया हि तत् । फर्मणः कस्यचित्तम्माग्दिनायेण कमंग: IREN अन्येषा करणंन्यायं न मयेदिनि ये मनुः । कर्मभ्योनिसिरेभ्योये सूर्यप्रमहाधिक: IRE पैतृक कर्म परममधिकंचोत्तमोत्तमम तादृशं तत् परं (फर्म ) कमशेषम्यम्नुना IRI न्यायेन शश्यते कत्तुं कथंकानिनेतरन(?) । कमांस्ते त्रिषु लोकेषु महद् ब्राह्मण्यमूलकम् ॥२४|| तस्यैवेवं महापोर संकटे समुपस्थिते । कथंतत्फुस्थिलोके (१) कलौतिवृति केवलम् ॥२६॥ विप्रत्वं श्राद्धसंध्याभ्यां कलो नान्येननिवृतिः। तस्मात्तु तवयं सम्यक् भक्त्यानुष्ट यमेव वै ।।२६६॥ अंध पंगुजदभ्राप्ताः (दृश्चातों) हीवोमूको चिकित्सकः । उन्मत्तो बधिरः काणः वैश्यःक्षत्रिय एव च ॥२६|| : भिन्नभिन्नोपनयनाः वैश्य क्षत्रिय एव च । त एते निखिला ज्ञेयाः विधर्माभि-(१)नयेजयः ।।२६८il दर्शनादिप्वयोगत्वमधादीनां स्फुटन्तरम् । तेन तत्कर्म वैकल्यं जायते किंल तेन ॥ सर्वसाम्य भवेन्नैव तेपातस्मात्सहात्मभिः ॥३००ll - उपनयनसंस्कारवर्णनम् अंधाक्ष्योविशेषण भर्तव्यास्ते निरंशका ! तेषामुपन प्राने लक्षण्यं महद्भयन् ॥३०॥ तदाभ्युदयफ सद्यः कर्तव्यत्वे न कोर्तितम् । न पूर्वेश विशेषेण ऋतवस्तूनरायणम ॥३०॥ कारसस्तु (युनुपस्तु) कालोविक्षयः नक्षयं पुण्यदेवतम् । मानं त्वलंपत्याचोपनेप्यति यलम ॥३०॥ संकल्पय विधानेन याचमय्य विधानतः ॥३०॥ यज्ञोपवीतसूत्रेण कृत्यातमुपवीतिनम्। तथायोगप्रयाग सर्व पिशेषयित ॥३०॥ भागुम्सथापिभूमाप स्वयं मंत्रक्रियाधरण। याक्षिक समिधं मूष्णीमाधापयतितत्या(?) ॥३०६॥ मूष्णीमभा समारथाप्य समंबामग्रतो था। मयं विधाने (न सदस्यं यदेव हि ॥३०॥ प्रमन्यू प्रकर्षीत हलने तमापकादिक । मस्मिन्नपि कार्य वयमेष कायदाता ३h এখন কথা জানােবন। या मणं बाधापनि तत्व.१) ॥३०॥ ज्योहगाजित गया पहायशदानंदानमणमेव । गवं प्रर्षीत पात्माध्यं पसाविषि। सानिगिलं पुन यासंकि Rell परापर्योदय नारायो रिपारणा । मुपश्यति मं पणे पूर्वाना ५११ परस्ततः। २५५८ कपिलस्मृतिः ब्रह्मचर्यमित्यादीनान्तुलोप एव प्रतिप्रश्नप्रवचननिवृत्तिस्तदनंतरम् ॥३१२।। मंत्रेप्यसावितिस्थाननामनिर्देशवर्जनं । प्रधानहोमं विधिना कुर्यादेवाखिलं क्रमात् ॥३१३।। उरेद्देशत्यागमखिलं (१) स्वयमेव वदेदपि। अथ यश्चजपादीनामन्ते ब्रह्मणि संस्थिते ॥३१४।। तूष्णी कूचं ततो गृह्य स्वयं तस्मिन् सुखेन ये। उपविश्य विधानेन गायत्री वेदमातरम् ॥३१॥ अभ्यर्चति क्रमेणव व्याहतीभिर्विधानतः । सम्यगुधारयेदुचचा प्रयत्नेनाधिकेन वै ॥३१६॥ तदधीनं फारयीत चिरकालेन यायतनू (?) । दमप्रम(य)दनेनालं वधिरस्य विशेपतः ॥३१७/ पंवघयो हात्तष्ठीवापाद्य करोगिणा । यथा योग्यं यथाशक्ति याचयित्वैवामनून ॥३१८।। अपिमर्यान्मनूराम्पमस्मृसद्विजायदन (१)। उपम्यानवानिकार्यमम्न्युपस्थानमेव च ॥३१॥ प्रतवचनंपापि सत्या शक्ती यथामति । पायोनिवरयान्माभिमादिकं तया ॥३२०॥ पार ते मनयाय १) जलपदणमाचरेत् । परयारिनत्रयान्वे(?) तु पालाशादिक मायाम् ॥३२॥ मूममावयेको विशेषत्यतेथुना । प्रधानोमाय पापण्यायोगविपाननः ॥३२॥..

माक्षणादिवानामेकपंक्तीभोजननिर्णयवर्णनम् २५६६ चम् कृत्वार्थसावित्र्या हुचेदेकाहुति तथा । स्त्रयंकृत्यासिलं कृत्यं यद्यद्योग्यं यथा तथा ॥३२॥ पश्चाचात्तकोस्मिन्नुपविष्टो (१) जनोऽयया । दधिवृते वापिसावित्रिताशलाकया(१) ॥३२४॥ लेखयित्वा प संपूज्य ध्यानाहनकर्म पी धूपदीपो विधायेवं नैवेद्य चप्रदक्षिणम् ॥३२।। नमस्कारानूनीराजनोपचारानपिलपि(१) । स्वयंपल्या तेन पापि कारयित्या व सतपरम् ।।३२६॥ सत्ताशयेद्विधानेन तेनासी प्रवान्यनाम । प्रयातीति विधिपाद सतो नित्यममी पुनः ॥३२॥ संध्याप्रयंशाभिनय क्रियया मर्वमाचरेन । प्रायोजसमुत्पना माहात्म्यादप्पम (१) परम ॥३२॥ अंतापदिजेणेय प्रायोति किल नान्यथा। न मंयकरय संस्कारो पियते सर्वथा पयं ॥३॥ सर्वसामगन्ने मजे न योग्यो ध्यपस्ययोः । বর্ষ पित्रोरेपरायमादि) ३n पदकः कर्मणि सपा प्रा (१) संस्तुपाएषः । तकी पारभितन्मंत्रोचारकोभन । सन्मंत्राप्रमार राई मूली मरेत् । लेनेव तिवा निषित साना पुनरारे समषे गारवाया। निशारशिला (मामालिस कपिलस्मृतिः वैदिक कालौकिके कृत्ये न साम्यं स्यात्तु यंधुभिः । निखिललामणरन्यः कृपया ते विमत्सरः ॥३३४ा पालनीया गोपनीया रक्षणीयाचसन्ततम् । स पंक्ति योग्य अस्पृश्याः द्विजाने नृपस्ममाः ॥३३॥ क्षत्रियश्चेत्समा वैश्याद्दूर(तानि(श्चोज्जधन्यजैः । न विप्र पंड्मा(क्ती)राजन्यः मुस्थेयोभोजनादिषु ॥३३६६ एवं राजन्य पंक्तयाञ्चेम्जोज्ञयउच्यते । उरव्यपंक्तो शूद्रोपि नोपविश्यतमो भवेत् ॥३३॥ राजन्यग्रहमुक्तौ तु ब्राह्मणस्य पृथकस्मृता । पंक्तोसदा तथा वैश्य(?)महमुक्तीनृपस्य च ॥३३॥ विप्रस्य वा पृथक् पंक्तिर्न समान्यत्रकुत्रचित(?) । पार्श्वयोरभिमुस्ये वा पश्चाद्वा पंक्तिमच्यते ॥३३॥ सततं भिन्नजातीनां पश्चान्द्रस्य नैकदा । समकालभुनः प्रोक्ता द्विजानां पंक्तिभेदतः। त्रयाणामप्येकदवभोजनंविधिचोदितं ॥३४०।। समानमु(भुक्तिमर्यादात्तत्तजातिषु संततं । अंघपंगुजड़ोन्मत्तमूकादीनां तथैव वै ॥३४॥ समा पंक्तिः कदाचिन्न फर्मन्यूना यतस्तु भिन्नपंक्तो भोजनीयाः समकालेपि सन्ततं ॥३४२|| समानकोयदि ते मौजिता: प्रत्ययायिनः ।.. मत्येवरात्र मदेहा नैवेति . प्रमादिनः ॥३४३।।. ४ विप्रमहत्ववर्णनम् २५६१ अथ पंगुजड़ोन्मचमूकादिसमभोजने । प्राजापत्यं प्रथितं प्रायश्चित्तं द्विजोत्तमः ॥३४४॥ अंधस्य मंत्रसामथ्र्य याप्यस्ति तथाप्यति । ममीक्षणादि इत्येषु यतो वैकल्यमेव तन ॥३४॥॥ पष्ट प्रत्यक्षमेतत्तु न सस्मद्विजेम्समः । पदोगमनकृत्येप वैदिका निरंतरम ॥३४६।। वैकल्यं स्पष्टमेवैतत् तद्वारा तस्य फेयलम् । मानण्यपरिपूर्तिन जहोन्मत्ती तथैव हि ॥३४॥ मूकस्य मंत्रमामान्याभायादेव निरन्तरम। मानण्यलेशोऽपि कयं तस्य स्यादिति पश्यत । माघीर्यक्षेत्रमानसमुत्पत्तिमहन्यतः । पुनानन्मंप्रकार्य न भयेदभिन्नज्ञानिकः ॥३४८॥ विध्यसम्पूर्णपिप्रत्यमपि नास्ति सकिन्छ । सुनुयपत योगेन सययस्यारमो धनः (१६४६॥ प्रादीनां विप्रसाम्य कुनी नास्तीति पदय । प्राध्यते कारणं सच तदोपनयनं मदत ॥१५॥ नुयायानतः पूर्व परयामागया. परम् । दाभदान मियाभदारिपादादिविभेदतः ॥१५॥ पेदाध्ययनभेदार या भिटाभन. । नम्बर ५ मा रम्यं नितम् ॥१५॥ सेन गरपि विहार प्रानुएनिमल। भाग्य दिवानामपिपुलंभम १५॥

11३५01
Hamari garl
मंगभग miNT. HE
गांधापना ring।
अमान ! Eins
मंयुष र मगमगा: मनपा
त्य परिणत गरिमिती ॥३॥
से गुटगोत्रियःगु गाए गमसमन।
अध्यगंगा रोग होगा शाम्प यहि ॥३१॥
अन्यगोग्रामिणाय मुगो यः पूर्वगोऽयभूत ।
परप्रदानपूर्य ये शानीनामध्यनुनया
तत्पुत्रपौत्रपयन्नं तम्य सन्मसतरपि ।
पिया मारणे मग्मिन्पैतृक ममुपस्थित
क्रमान्न शक्यते यम्मान् त्यक्तपुत्रादिकं न्यमुः।
दत्तवत्पुत्रतत्पुत्रतत्पुत्राणामतोऽखिला: ॥३०॥
वेदप्रोक्ता:क्रियारसर्या स्थानकत्तुं समझमम् ।
प्रबरोक्योग्यतायाः अमायान्न्यंगनेच्यक ॥३६॥
तत्संतती चतसृणा(त्रयाणा)स्यात्पूणा ईन्यमुत्तमम
तक्ष सम्यक् प्रवक्ष्यामि मुस्पष्टं शृणुताघुना ॥३६
त्रिष्वेप्याद्या त्यक्तपिता पश्चात्त्यक्तपितामहः ।
प्रपितामहानसंत्यागी कमात्ते वर्णिता:किल ॥३६३
तत्र यद्यपि दत्तस्तु शुद्धवत्प्रतिभाति हि ।
पित्रादित्यागशून्येन सर्वपित्र्येषु संततम् ॥३६४
॥३५॥

दानमन्यथानर्थ एव वै। व शनैःकालात्तं गृह्यन्जनसन्निधी ॥३८६|| सद्यः प्रकर्त्तव्यः व्याहृतीभितेन वै। नाय पितुर्गोत्रात् स्वत्वसंपादनाय च ॥३०॥ वेशसिद्धययं प्रतिगृह्य च तं पुनः । होमं व्याहृतीनामाज्येनाष्टोत्तरं शतम् ॥३८८।। चेति मन्त्रेण संतत्यै कर्मणेति च । जलपानञ्च कुर्यादा व तन्त्रतः ॥३८॥ ते त्वन्यसुतः कर्मणे स्वस्थकालतः । न्यं प्रभवेत्पश्चात्तज्जातस्तु स्वकं सुतम् ॥३६०॥ प्रार्थनापूर्व व्यूहयित्वाखिलानपि । इभ्य मन्त्रेण नमस्कृत्वाखिलानवकान् ।।३६|| तं सहस्र वा परं प्राञ्जलिरास्थितः। प्रपश्यन्तो परं संगृह्य मामकम् ॥३६२।। न ते यूयं कृपया स्वीयगोत्रके। चनकृयाय म्वीकृत्यानतचेतसा ॥३६॥ र्य ते वै संनिधावेव केवलम् । विधानेन कृत्वा कर्माणि शास्त्रतः ॥३६४॥ सुखादीनि मंगलार्थानि यानि वा। णि तत्पश्चात्तस्मिन्नग्नौ यथाविधि ।।३६शा नस्सर्यास्तद्गोत्रावेशकारकाः। विशादस्मन्जमिमकुमारंमहसे पिता- कपिलस्मृतिः तस्मादत्तसुतो लोके भिन्नगोत्रेषु कमसु ! विवाहादिषु तदव द्रोहिणःस्युर्न संशयः ॥३७॥ ये देवहेलनपराः संत्यत्तस्त्रीयदेवताः । स्वदेवतामकाशान्ते च्यवन्ते नात्र संशयः ।।३।। तस्मात्परां गति दिव्यां प्राप्नुवंति न चैव हि। पापीयसो भविष्यति भवेयुर्नरकालयाः ॥३७॥ तद्दाने तु यथापित्रोः सम्मति: परमा भवेत् । तन्मातामहयोस्तद्वत् सम्मतिश्चतदायदि ॥३७॥ भवेदोषो नैव भवेदितिवेदानुशासनम् । यथा संत्यत्तपित्रादिः लोके भवति निन्दितः ॥३८॥ सक्तमातामहश्चापि तथैवेति न संशयः। (तथैवस्यान्न संशय इतिपाठान्तरम् ।। दद्याता दम्पती पुत्रं गृगीयाताञ्च दम्पती ॥३८१।। सयोरेवाधिकारोऽयं तदाने तत्प्रतिग्रहे । संप्रदान तु पुत्रस्य पुत्रस्य तन्मातामहयोरपि ॥३८२।। अभ्यनुसा विशेषण यक्षिणीया तथा पुनः । पश्चापितामहादीना यन्धूनामविशेषतः ॥३८३।। सता गुरु महना मातीनाञ्च सगोत्रिणाम् । तमामवामिन पापि वणिजामधिस्य च ॥३८॥ पृपलानामपि तथा नत्यानाहात्मनाम् । सामगि वर्गानां मम्मत्या तत्समाचरेत् ॥३८।।

दत्तकपुत्रप्रकरणवर्णनम् २५६५ परिग्रहं संप्रदानमन्यथानर्थ एव वै। भवेदेव शनैःकालात्तं गृहनसनसन्निधौ ॥३८६॥ होमःसद्यः प्रकर्तव्यः व्याहृतीभितेन वै। प्रशाय पितुर्गोत्रात् स्वत्वसंपादनाय च ॥३८७|| गोत्रप्रवेशसिद्धचयं प्रतिगृहा च तं पुनः । कृत्वा होमं व्याहृतीनामाज्येनाष्टोत्तरं शतम् ॥३८॥ धर्मायत्वेति मन्त्रेण संतत्यै कर्मणेति च। हरिद्धाजलपानच कुर्यादयच तन्त्रतः ॥३८६|| एवं कृते त्वन्यसुतः कर्मणे स्वस्थकालतः । योग्योऽयं प्रभवेत्पश्चात्तज्जातस्तु स्वकं सुतम् ॥३६०॥ तज्ज्ञातिप्रार्थनापूर्व व्यूहयित्वाखिलानपि । नमो महद्भ्य मन्त्रेण नमस्कृत्वाखिलानरवकान् ।।३६११ दत्वा शतं सहस्र वा परं प्राञ्जलिरास्थितः। वदेदेवं प्रपश्यन्तो परं संगृह्य मायकम् ॥३२|| तनयं मम ते यूयं कृपया स्वीयगोत्रके। मौजीवन्धनकृत्याय म्वीकृत्यानतचेतसा ||३|| इति संग्रार्थ्य देपा वै संनिधावेव केवलम् । प्रतिष्ठाप्य विधानेन कृत्वा कर्माणि शाखतः ॥३६४॥ अभ्यञ्जनमुखादीनि मंगलार्थानि यानि था। तानि सर्वाणि तत्पश्चात्तस्मिन्ननो यथाविधि ॥३६॥ हुवेत्तदाहुतिस्सर्वास्तद्गोत्रावेशकारकाः। कुलमन्यदाविशादस्मन्जमिभंकुमार्गसहसे पित्ता- करियमति: महागामुष्यायणगी प्रारतं प्राणाम्नाचाहा। गुलगन्यदायिशादागाजमिमामाग्मोनमे पिना. महम्यामुध्यायणाय गोत्रं प्रा प्रापयाग्विाहा।। गुलमन्यदाविशादाम तमिमं सुमारं पटायपिना. महस्यागुप्यायगायगोत्रं प्राकृतप्रापयाग्नेम्वाहा । मुन्टमन्यदायिशादरमाजमिमं कुमारं तेजसे पिता महस्यामुयायणस्य गोयं प्रा प्रापयान स्वाहा। पुलमन्यदाविशादरमजमिमं कुमारं यम्से पिता- महस्यामुप्याणम्य गोत्रं प्राकृतं प्रापयाग्नेस्वाहा । कुलमन्यदाविशादरमजमिमं कुमारं हरसे पिता- महस्यामुयायणम्य गोत्रं प्राकृतं प्रापयाग्ने स्वाहा । कुलमन्यदाविशादस्मजमिमं कुमारं भ्राजसेपिता- महस्यामुयायणस्य गोत्रं प्राकृतं प्रापयाग्ने स्वाहा । कुलमन्यदाविशादरमज्जमिम कुमारमिद्रियाय पिता- महस्यामुष्यायणस्य गोत्रं प्राकृतं प्रापयाग्नेस्वाहा । कुलमन्येति मन्त्रण हुत्वैकादशसंख्यया। कृत्वा जपादि होमञ्च हरिद्रासलिलं ततः॥३६६॥ पश्चात्तु मातृभिक्षार्थ प्रायश्चित्ताद्विधानतः । एवं कृते तम्य सूनोः मौजी कर्मणि तत्परम् ॥३६ला पितामहस्य गोत्रेण संयुक्तो जातइत्यपि । सिद्धभवति शास्त्रेण नत्प्रपौत्रस्य तत्परम् ॥३६८।।

दत्तकपुत्रप्रकरणवर्णनम् २५६७ यदि जातस्सुतः सोऽयं सम्यकशुद्धो न संशयः। स योगकर्मणां योग्यस्तदायत्वे हि तत्कुले |॥३६॥ तद्योग्यता जायते च तावत् दत्तस्य संततिः। अयोग्यता कवलिता न्यंगनेच्यप्रपीडितः ॥४००ll तदायाद्य शसाम्यादि कुण्ठिता श्रीवहिष्कृतः । स्वजनकप्रसादश्रीकामुकास्तज्जनाश्रिता: ॥४०१॥ कुर्वती चातकी वृत्ति प्रतिष्ठति हि भूतले । कर्मठत्यसजातित्वतत्समत्वादिमिद्धये ॥४०२।। पित्रादीना त्रयाणाश्च क्रमोक्त:सिद्धिरुत्तमा। यदा सञ्जायते सम्यक् प्रवरस्य च तत्कुले ॥४०३।। तथैव साम्यसिद्धिःस्यान अंशभाक्त्वञ्च जायते । प्राह्मण्यश्च समीचीनं तथा यागाधिकारिता १४०४१ यथा पुरस्य तातस्य चोभयोभिन्नगोत्रता । तदेव त्रिदिनाशीचं संस्पष्ट मातुरेव च ॥४०॥ गांधर्वादिविवाहेस्तैर्यदि माता विवाहिता । तदा पितुः स्यानिदिनं तन्मृती सूतकं मतम् ॥४०६॥ मातामहस्य गोत्रेण मातुः पिण्डोदकक्रियाः। कुर्वीत पुत्रिकापुत्र एवमाह प्रजापतिः ॥४०७|| पितुश्चेन्सूतक पूर्ण तथा मातामहस्य च । मातुलस्य च तत्पल्या यतस्तद्गोव्ययं स्मृतः ।।४०८॥ यत्र मातुर्विवाह तु दानं जातन्तुतिस्मृतः)शास्त्रतः । तब सप्तपदास्यं च कर्म संजायते स्वत: || २५६८ कपिलस्मृतिः स्वगोत्राद् भ्रश्यते नारी विवाहे सप्तमे पड़े। लाजाहोमप्रधानाभ्यां प्रवेशो भगोत्रके ||४|| स्त्रीजाते सर्वकार्यककर्तृत्वाभार ईरितः । नित्यं पराधीनता च न स्त्रीस्वातन्त्र्यमर्हति ॥४१॥ वाल्ये पित्रोरधीना सा पत्युरेव तु यौवने । वापके ननयानाच स्वातन्त्र्यं न कदाचन ॥४१२।। कन्यादाता ब्रह्मलोकं पुत्रदो निरयं व्रजेत् । दाक्षिण्यमपि कामण्यं कृपा यत्र प्रजायते ॥४१३|| पितृवन्धुगुरुतिश्च तत्रापदि कुलस्य च। यदि स्यात बहुपुत्रत्वं तदैकस्यैव केवलम् ॥४१४|| स्वगोत्रिणे स्यान्यभ्रात्रे स्वकुलीनाय वै सते । च्यन्यद् करहितो लोभाशा परिवर्जितः ।।४१।। दीयमानस्य नस्यापि न्यंगनेच्ये यथातराम(?) । न भवेता तथालोच्य नस्य वृत्ति तथाढाम् ॥४१६॥ एयमेताही मम्यक् दृढयित्वेति लोकतः । गजनोऽपि यिनिधिन्य दानं कुर्यादिति शुनिः ॥४१॥ पुत्रम्य काले यहुगते ततः। केपुषिभायेर मातामहथियादतः ।।४१८।। शामानि भिन्नभिन्नानि यानि शिल सन्नतम् । मकान मनभेदेन तम्य मातामहद्वयम | अनन्या जनपनि जनको मादकम्य च। रा विहिगना बभूव रिछ कयलम Isil

दानप्रकरणवर्णनम्
२५६६
विवादोऽयं परं त्वत्र तन्मात्रस्यैव जायते ।
न तस्य संततिः प्रोक्ता भिन्नगोत्रप्रदस्य चेत् ॥४२॥
आत्रिपूर्व तत्सुतस्य तेन साकं तु पैतृके।
परं सपिण्डिमारभ्य कुमार्गः संभवेत्खलु ॥४२२||
तेन तावत्तस्य
फुले जातानामात्रिपूर्पतः।
विप्रत्वदन्यताज्ञाति भागसाम्यैक शून्यता ||४२३॥
न्यङ्गता नेच्यतातीव तन्जनाश्रयता तथा ।
तद्वन्धुमित्रपुत्रादि जनचित्तानुवर्तिता १४२४||
एता भवन्ति सततं तस्मात्पुत्रं पित्ताहता।
स्वल्पागति समीक्ष्यादौ न दद्याद्भिन्नगोत्रिणे ॥४२४॥
पश्चात्तु तावता गाढं बाधकं प्रभविष्यति।
येन केनापि दुरिमाचतुष्टयपूरुषम् ॥४२६॥
सर्वदानानि सवैध कर्तव्यानि मनोपिभिः ।
शक्ती सत्यां विशेपेण पुण्यकालेपु तेषु वै ॥४२७।।
वेदशाखपुराणादि चोदितेषु युगादिषु ।
अदिये महोदये चन्द्र सूर्योपरागके ॥४२८॥
धरादानं प्रशंसन्ति सर्वदानोत्तमोत्तमम् ।
धेनुदानं वाहदान गजदानं तदा न सः॥४२६||
रथदानं वस्त्रदानं वार्षभं दानमेव च ।
शय्यादानन्तुलादानं कल्पवृक्षात्यकं परम् ॥४३०।।
गोदानं स्नदानच पुष्पताम्बूलयोरपि ।
सुगंधं चन्दनमहो पवनोशीरसद्मनाम् ॥४३१॥

साशिभ्राण(सलिंगस्य )महामूर्त भस्मरुद्राक्षयोः पृथका५३६ मिति नारदमकान महाजनगामा पोपनामा जातिarrerगुजाम १३|| गुहागलयभीमनिनाम । हिराजगायनागिसापटमालिनाम १३३॥ धनानामपि भान्यानो मनाना पंगकामनाम । महाचन्दनकाष्ठानो कप ग्लामरीमिनाम 121 दिव्याना दयपुष्पाणा प्रमुकागो विगगनः । फलानामपि शाकानो भूगणाना विशेषतः ॥४३॥ कम्पलाना प दिव्यानो द्विपटाना मुफ्भपाम। उपणीयोत्तरधार्याणी माध्याना मुग्यासनाम ॥३६॥ तिरस्करणिकानां च गजूना दीर्घमूत्रिणाम् । शोभनोमयतो मुख्याः सवत्माया: गृथक्पुनः ।।४३५॥ गोसहस्रम्य चित्रम्य तिलपद्मस्य शूलिनः । शूलम्य दक्षिणामूर्तेरयसच्छागमेपयोः हिरण्यगर्भसंज्ञस्य लांगलस्य कपालिनः । 1४३८॥ महालिङ्गस्य लिङ्गस्य वाणलिङ्गस्य कर्मणः । ताम्रसोसादिपात्राणां दासीदामादि देहिनाम ।।४४०' पुनरन्यानि दानानि पात्रदत्तानि शास्त्रतः । कामनारहितानि स्युः ब्रह्मज्ञानाय केवलम् ॥४४१॥ पारमेश्वरतुल्यैकद्वारा नो चेत्तु वै पुनः । *. मुतानि कामतःसद्भिः तत्तकार्यकराण्यति ॥४४२) ,

दानप्रकरणवर्णनम्
यद्यत्कामनया कर्म क्रियते तत्तु तत्पुनः ।
सद्गमाच्छिद्रसगुणमलोभाशाठ्यसंयुतम् ॥४४३।।
मन्नतंत्रादिवैकल्यरहितं चेत्फलत्यदः ।
यत्किचिदङ्गलोपेऽपि काम्यं कर्म न सिध्यति ।।४४४॥
अध्यनेकाङ्गविकलं क्रियते पारमेश्वरम् ।
तत्कर्म सफलं सद्यः भविष्यति न संशयः ॥४४शा
तस्मात्सद्भिः सदाकार्य कर्ममात्रं न संशयः(निरन्तरम्) ।
परमेश्वरतुष्टयर्थ चित्तशुद्धयर्थमादृतः(मात्मनः) ॥४४६।।
स्वीयस्य दानं कुर्यात्तु नान्यदीयस्य वस्तुनः ।
न्यायार्जितस्य द्रव्यस्य प्रदाने योग्यता भवेत् ।।४४७११
अन्यायेनाजितद्रव्यं चौर्यव्यामोहनादिभिः ।
संप्राप्तमागतश्चापि दानयोग्यानि चाचरेत् ।।४४८||
कृतेन दानेन यथा
परपीडा न जायते
वृथा तथा प्रकुर्वीत दानं धर्माय तत्परः ॥४४६॥
परपीडाकरं दानं दातुस्तप्राहकस्य
उभयोनरकायैव फलिप्यनि न चान्यथा ॥४५॥
दानेन यस्य कस्यापि यथा पीडा व्यथा तथा।
दुःखमादिश्च संमोहस्तथा कुर्यान्नचेद् वृथा ॥४५१।।
न सामान्यं धनं देयं अल्पं वा महदेव वा।
सामान्यवस्तुदानेन कलि विदति तत्क्षणात् ।।४५२।।
यत्संदिग्धं परास्वाद्य संशयं वस्तु केवलम् ।
अदेयमेव सततं यत्तद्धर्मकभोगणा ॥४३॥

कपिलस्मृतिः शुद्धं मत्वेन सुस्पष्टमनाकांस्यं परैरपि । यद्वस्तु दीयते तत्तु परलोकाय युज्यते ॥४४॥ यद्वस्तु स्यात्परप्राप्यं कालेन शनस्तु तन्। अदेयं सर्वथा प्रोक्तं चोरस्ताहकरच यः ४५क्षा क्रयश्चतादृशस्यैव वस्तुनः विधिचोदितः। कर्तव्यत्वेन तद्भिन्न वस्तुनो न कदाचन ॥४६॥ राजतत्तुल्यतमृत्यतत्प्रेष्यपितृबन्युभिः । तत्समैर्यलयद्भिर्यद्दत्तं मिद्ध्यति संततम् ॥४५६ नद्भिन्नदुबलरन्यैः दत्तं यच्छास्त्रवर्मना । विशुद्धागमनं प्राप्त चेत्सिद्धथति न चेतरत् ॥४५८।। प्रदानगर्नु त्वं शास्त्रागमसुनिश्चितम् । तेनेय दत्तं मर्वत्र सिद्ध्यत्येय न चेतरत् ॥४॥ प्रनिप्रहेण लब्धाय भूमिप्रामोऽथ वर्णकः । मावास्यम्मीमनामा या विद्यासंभावनादितः ॥४६॥ तेषां प्रतिप्राहयिता यजमानस्स एव हि । कर्मा कारयिता चापि म्यामी गोता प्रयतः ४६शा म पर मयं कथिनः निमहानुप्रहादिकत् । गदि सेन नाम्नेषु वृनयो वर्णकादिषु । कारेन दनामगी या ना: पुनःग्याश्यया । पाषाणया वारि म नामा पनिरेव हि ॥४ नया तारगं वृमयो जिनवे । मामान्यनानदा नां नत्र गजा प्रमुग्मदा । यस्य

दानप्रकरणवर्णनम्
विशेषण प्रदत्ताश्चततत्तन्नाम्ना पृथक पृथक् ।
अंशभेदेन तत्रापि तदा सर्वे तथा मता: ॥४६॥
तावन्मात्रस्य कारः मिलित्वा निखिला अपि।
तस्मिन् मामे तु कर्तारो निप्रहानुप्रहादिषु ॥४६६।।
तत्तत्स्ववृत्ति' परं कर्तृत्वं पृथगुच्यते ।
स्ववृत्तिभिन्नवृत्तीनां न कर्तारस्तु ते स्मृताः ॥४६७।
भूमेामादिरूपाया दत्तया स्वेन चान्यतः ।
प्रभुराजा कथितः कर्तारोप्राहकाः स्मृताः ॥४६॥
तेह्यावश्यकस्यकार्यस्थकर्तव्यत्वे ह्यवस्थिते ।
सदा राजैव तत्कार्य कर्ता सम्यग्भवेद्ध वम् १६४६६।।
यतो हि जगतो राजा कर्ता दण्डयिता पिता।
पालकश्च गुरुभीकृत् निग्रहानुभकभूः ॥४७०11
एकद्विविचतुत्तिमत्यभेदजनाश्रयः ।
मामो यदि तदा तत्र तत्तन्मात्राधिकारिणः ॥४७॥
नाधिकस्य तु कर्तारः भवेयुरिति शास्त्रहत् ।
सामान्यबलवत्कार्ये कर्तव्यत्वेन चागते
॥४७॥
सर्वे मिलित्या कुर्वन्ति(वीरन) एकबुद्ध्यैव नान्यथा ।
स स्वामिकग्राममध्ये बृहत्कार्ये निपातिते ॥४७३||
स्वाम्युक्तवर्मना सर्वे तत्कार्य साध्यमित्ययम् ।
पक्षस्तु सर्वशास्त्राणां तत्र चापि स एव हि ॥४७४
निर्वाहकः स्यादित्येव लावालादिमतं परम् ।
अस्वामिकग्राममध्ये क्लप्तद्विजनिरन्तरे ॥४७॥

पति: न भिमप्रामिया कार्य: प्रोनगि परिमः । म्धीकागजीनागंतु गिहिविगतः । गरिमन्नामे न माग्नु कता दिन मिति ये प्रतिप्रतिपः पूर्व माना मुगापरम। अत्युत्तमाः फागुन्या गमागप्रनिप्रडी rest मरान्ममो दुलोऽयं यदि सेन गर्म कली। यियदेकायंकालेषु मकार्य:मी महात्मभिः ११७८11 ममानमपि यादं यः भुतं श्रुत्या नु शक्तिमान । तभिप्रहमकुर्याणी दुर्गनि प्रनिपते || यदि स म्यामिको प्रामग्तदा तन्मनपूर्वकम । दानमाधि प्रयचापि फुनिय न चान्यया ॥४॥ ग्रामःसस्वामिको यो या तस्मिन्ये तदनुज्ञया। क्रयादिदानकर्माणि कार्याणीति प्रचक्षते ॥१८॥ पुत्रपौत्रज्ञातिवन्धमामन्ताद्यभ्यनुज्ञया । शुद्धचित्तेन यदत्तं तत्सिध्यति हि संततम् Iran अन्वये सति भूदानं महसा यनमाचरेत् । सर्वरालोच्य सर्वेषां पर्याप्रा भूस्थिता यदि ॥४३॥ स्वगोत्रिणां सपिण्डानां समालोच्यच केवलम् । वेदशास्त्रस्मृतिन्यायाविरोधेन ततः जनमत्या ज्ञातिमत्या बंधुमत्या सहादिपु । मर्वेषां पश्यतामारान् न्यायाधरणी त्यजेत् ।।४३ समीपज्ञातिदुष्टिश्चेद् भूदानाद्भिन्नगोत्रिणाम् । शक्यते हि तदा कत्तु तदानं तु न चेञ्चरेत् ।।४८ परम् शिला

दौहित्रप्राधात्यवर्णनम्
दौहित्रसाम्यमात्रा विमता ह्यनु तस्य कुम ।
नेच्छेयुरेव धर्मेण तामिच्छन्तः पतन्त्यधः।।४८७॥
विभागा ज्ञातयस्सर्व भिन्नभिन्नाः स्मृताःपरम् ।
तत्तद्धनानां ते ते स्युःकर्तारश्चपृथगग्रहा: ॥४८८il
अपुत्रस्य धनं ज्ञातेविभक्तस्याखिलं भवेत् ।
दोहिनग्यैव धर्मेण न ज्ञातेस्तु कथंचन ॥४८६।।
ज्ञाती खलु सगोत्रस्य धनार्थ प्रेतकर्म यत् ।
तावन्मानं करोत्येव प्रत्यब्दश्च न चेतरत् ॥४६all
दौहित्रश्चेद्धनाभावेऽप्यस्य सर्वेषु कर्मसु ।
पुत्रेण समतो नित्यं स्यविवाहानिलेऽद्भुते १४६११॥
असाधारणके मुख्येऽप्यनीकरणपूर्वकम् ।
सर्वश्राद्धानि नित्यानि करोत्येवाजुगुप्सितः १४६२||
अमात्यो न तथा कापि कि करोति स्वगोत्रिण।
तस्मादभावे दोहित्रजनस्य किल सत्परम् ॥४९॥
असुतस्य धनं तत्तु प्रत्यासन्नः सपिण्डकः ।
यो या सतु गृहीयादिति वेदानुशासनम् ४६||
दोहित्राणामनेकेषा समवाये तदा किल ।
(श्राद्धानि नित्यानि करोत्ये वा जगुप्सितः)।
यो वाऽत्यन्तं निर्धनः स्यात् सधर्मेण हरेद्धनम् ॥१६॥
समवाये निर्धनानां सर्व एव यांशतः ।
पुनश्च निर्धनेष्वेपु धनिनस्तस्यतन्मनः ॥६॥

कपिलस्मृतिः
यथा भवति (वदन्ति) तद्रीतिमनुसृत्य न चान्यया ।
चरेयमिति सश्रीमान् कपिलो व्याजहार ह जा
दौहित्र एव सर्वेषां पुत्राणामुत्तमः स्मृतः ।
तत्समस्त्वौरसस्तनः सुतश्चापि तथाविधः ।।४६८il
अपुत्रो वहुवृत्तिश्रीः विभक्तो झातिगोत्रिभिः ।
वृत्तिदानं प्रकुर्वाणो यथेच्छं कर्तुमर्हति ||४||
स्वग्रामज्ञातिसामन्तादायादानुमतेन वै ।
मेघपुष्पमुवर्णाभ्यां कायं भूदानमेककम् ॥५००l
सर्वाण्यन्यानि दानानि शास्त्र स्वीयानि छंदतः।
तुष्टये परमेशस्य कार्याण्येवान्वहं यथा ॥५०१॥
यथा या कन्यकादाने गोत्रभिन्नमनन्तकम् ।
तथाच्युतपदप्रापिसाधनं कथितं
स्वगोत्रम्मुग्यतो झयं भूमिदानं पुरातनः ।
कृतं कारयितश्चापि शास्त्रज्ञैरपि नकया ॥५०३।।
उक्त प्रोत प्रगीनं च सामादि त्रितयेन च ।
अभाव पुत्रयोवंश भूमिदानं ततश्चरेत् ।।५०४।।
मनि वंशे निदान प्रयो वा तम्य नाचरेत् ।।
जाना अनिष्यमागास गाथाश्चापि देहिनः ॥५०॥
निमेवाभिमासन्नं मग्मावृत्ति प्रपालयेन् ।
अन्वये मनि पुत्राय पुत्रिकाया विशेषतः ||६०६॥
वृमि मुरं मोदारल्या निरयमाग्भवेगा।
विपक्षमा भूमिदाने रामाननयजितः ॥asil
तथा ॥२॥

गात्रभ्यो विशेषेण दद्यात् भूमि सदक्षिणाम् ।
मिदाने भ्रातपुत्राः भ्रातरःपितरस्तथा ॥८
सामहाः पितृव्याश्च प्रदूष्टारोऽपि पात्रताम् ।
रान्ति च कृपादानं प्रापकाः प्रभवन्त्यपि ॥५०॥
मात्संततिविच्छित्तौ भूमिदानं सगोत्रिषु ।
ति धर्मतो गत्या संप्रायनां दुरात्मनः ॥१०॥
पण तु विद्वांसः स्यक्तवैरो हरि स्मरन् ।
दिव ततो याति तद्विष्णोःपरम पदम् ॥५१||
रितो दानकाले न तद्दानं समाचरेत् ।
पीडाकरं दानं महारोरवदायकम् ॥१२॥
तितुष्टिकरदानं शिवपदप्रदम् ।
से शातिबन्धून्या स्वयमज्ञो बलापि वा ।।५१३।।
। भूवृत्तिबन्धुदानं सद्गतिवारकम् ।
ध्वपि विद्वत्सु भ्रातृतत्पुत्रकेप्यति ॥५१४॥
सत्सु तिष्ठत्सु नरो नारीसमोऽपिया।
गोत्रियो मूढो विद्वान्या वेदपारगः ॥१३॥
ऽपि भूमिदानं तत्तेभ्य एष समाचरेत् ।
शातिजनो नित्यमसंततिधनार्यति ॥५१६।।
क्यं भूमिरूपं झालये देयमेव हि।
रूपा विभवा मध्यप्रारसुवृत्तिका ।।१७।।
मिती साध्वी भृयमाणापि सुनता।
मि विनाज्ञातीनन्येभ्यो न निवेदयेत् ॥१८॥

. कपिलस्मृतिः परं तद्विपये तूष्णी कलहं नैय कारयेत् । .. विभक्ता विधवा साध्या देवात्संप्राप्तसकुलाः ॥११॥ अवशादागतमहावृत्तिमत्यश्वतन्मुखात् । संप्राप्त्यैकमहागवाः कुमत्यो धर्मबुद्धितः । ॥५२०११ अधर्ममेव कुर्वन्त्यः स्वजनद्व पतत्पराः। दानविक्रयकार्यकयोग्यता रहिता अपि ॥५२।। तत्कार्यको दुवोंघमहिम्नायाः खलाश्रयाः ।। ता विलोक्य प्रयत्नेन धार्मिको नृपतिः स्वयम ॥२॥ देशात्प्रवासयेत्सद्यः तत्प्रतिप्राहकानपि । विधवानामनाथानामज्ञातानां च केवलम् ॥२३॥ पाकनं तथा नाद्यान् मतीनामपि संततम् । . रंडापाकं सदात्याज्यं प्रवदंतिमनीषिणः ॥२४॥ रंडाबहुविघाझेयाः पाकायोग्याः सदा सताम् । अज्ञातानामका काचित् काचित्ाज्ञातनामका ॥२५॥ मष्टास्पृष्टा नष्टमुता सरपुत्रा घेति सूरिभिः । ना एता निम्बिया रुयाता: भूतानामधिकारकाः ॥२६॥ पाकक्रिया दूरगाश्च मर्त्तव्यास्साघुवृत्तयः । या मसारं न जानाति साक्षाता कथ्यते युधैः ।।रजा अत्यंतवाल्यमंत्रामवैधव्यात्यंतपापः । या विजानाति मारं नान्यत्किमर्पि केयलम् Ral मा विनानि विख्याता विधवा मरिश्का ! रतिमात्रेण वा. : वैधव्यं प्रतिपयते ॥el वर्जितस्त्रीणांश्राद्रपाककरणेदोषवर्णनम् २५७६ सुखदोपनिमित्तेन सृष्टायाविधमुच्यते।।। पश्चात्तु रजसो मनुः संगम्प्राप्य या वशात् ।।५३०३५ वैधव्यं समवाप्नोति सा स्पृष्टा विधवा परा। नष्टप्रजा काचिदेवं विधवान्या मनीपिभिः ॥५३।। नष्टपुत्रेति सम्प्रोक्ता चायोग्या पाककर्मणि । एवं सपुत्रिणी चापि स्वभ मरणात्परम् ॥५३२।। वैधव्यं समनुप्राप्ता सत्पुत्रविधवा स्मृता। सपुत्रा विधवा या तु तया पाकः कृतस्तु यः ॥५३३॥ सस्वीकार्यों हि निखिलः रण्डापाको न च स्मृतः । सर्या रण्डाःपाककृत्ये दूःपिता स्युर्मनीषिभिः ॥५३४॥ ताभियदि ऋता:पाकाः फर्मिणां ब्रह्मवादिनाम् । यणिकानां गृहिणा यतीना ब्रह्मचारिणाम् ।।३।। न भक्षणैकयोम्याः स्युनैवेद्याय च नाकिनाम् । वलीनामपि होमानां नालमेवेति वेदहृत् ॥३६॥ रण्डापाकेन यो मोहावताना निवेदनम् । होमं बलिं तथा भिक्षा कव्यं हव्यं न भोजनम् ।।५३७।। माझणानां स्वस्य चापि कुर्याद्वाकारयेदपि । तत्सर्व व्यर्थमेव स्याप्रत्युतप्रत्यवाय्यपि ।।५३८१ भवत्येव विशेपेण तस्मात्तासां प्रमादतः। स्थजेदेच विशेषेण पाक कृतनं विशेषतः ॥५३हा तत्कृतेन तु पाकेन यो मोहाज्ञानवर्जितः भाद्धं करोति पितरः तरक्षणात्तस्य केवलम् ॥१४॥ M भ्रातृतो भत्तू तो पापि भूमहाग्ययसराः ॥४ता भूमि वान्याखिलान्येव दानानि धनवाससाम् ॥१४॥ शक्तो सत्यां तटाकादिप्रतिष्ठा सुरसद्मनाम् ॥१४॥ पितृतो यदि भूः प्राप्ता मातृतो भ्रातृतस्तथा ॥२९ करियमुनिः प्रारान्यनिचोरेर नरा न गंशयः । ग्दा दिकका(१ मा सुमहनामपि ॥३५१ मयंगय न योगानाम्ने कर्मगु गन्मुगम् । कर्मादौ फर्ममागे था मपया नापलीरयेत् ॥ अमानलयं स्यत.मीणा मयंशाःप्रचोदिनम् । विधयाना विशेण रंडानामपि स ग ॥४३॥ न कुचित्सदमे यदि ना: पिटमातृतः । तदा ताभिविशेषेण धने.स्यीयः क्रमागतः। सतीपथैव संप्राप्त यस्य कस्य प देहिनः ॥१४॥ अपीडाजनरय धर्मः कत्तुं हि शक्यते । भूषणानां च पात्राणां शय्यामट्वान्नसाधनाम्। कुर्यादेवान्यहं भक्त्या दिव्यनामस्मृति पराम् ॥५४७१ स्नानोपवासनियमगुरुशुश्रूपणादिकम् । सद्गुरूचिवचः श्राव्यं पुराणश्रवणं तथा । वृक्षोपस्थापनं मार्गे तीर्थचयों तदा तदा । कुर्यादेव स्वबन्धूक्तवचनान्महतामपि ॥४॥ भूभिन्नमखिलं दातुं तयैव किल शक्यते । .

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विधवास्त्रीणांकृत्यवर्णनम्
२५८१
भई तो वा तदा तां कुं स्वपश्चात्सा यथा पुनः।
तत्तद्वर्गगता सम्यक् तथा यनन भीतितः ।।५५१॥
कुर्यादेव न चेत्सेयं भूमिळपि जायते ।
तीर्थकोटिसहस्रेस्तु व्रतकोटिशतैरपि ॥५२॥
यज्ञकृच्छसहस्रोधैः भूमिहन्त्री न शुद्धयति ।
न भूमिहरणापापमन्यक्किमपि न विद्यते ॥५५३||
भूमिही स्वयं राजा यत्नेन प्रविचार्य वै।
सर्वस्वहरणं कृत्वा चोरदण्डेन दण्डयेत् ॥५५४!
अपराधसहस्राणि कृतानि वनिताजनैः ।
क्षन्तव्यान्यखिलान्येव धरित्रीहरणं विना ॥१५॥
कदाचिद्विधवाताध्वी सपुत्रा भर्तृभाग्यका।
सोमपीथिन्यमिचिच्च संजाता नष्टभर्तृका १५५६।।
बहुशिप्यधनामामवती पतिमहत्वतः ।
तारशी कुलविच्छित्तौ लक्षात्यौधधुभिः ॥१७॥
संप्रार्थिता सर्वशिघ्यैः पुनरन्यमहात्मभिः।
वंशोतरणकार्याय महत्तत्सुकृताय थे 11५२८11
सर्वज्ञातिमहाबन्धुजनमत्या सगोत्रिणम् ।
प्रत्यासन्नं सुतं कृत्वा स्वकुलं स्थापयेदिति ॥५५६)
अतिगुह्यमिदं शास्त्रं प्रसिद्ध वेदशास्त्रयोः।
कण्वकाश्यपकाणादकपिल: समुदाहृतम् ॥५६॥
तादृश्येव तथा कुर्यात् नान्यावारा तु लौकिका।
या काचित्प्राकृतात्यल्पा ताक्तकरणे बहु ॥५६॥

२८२ फपिलागिः माधनं प्रवदाम्या सासु महात्मा गुमहाधनसंपगिः महमाधिमगा परा ||ll पधारा प्रामरूपाय भूमिमागस्य मंस्थितिः । मुमहाशिघ्यसंपतिः परमम्पतिरेय च ॥६३१ मयंझनूना सम्पतिः धर्मगम्पगिरीदशी। मर्वेपामप्येकदेय ममत्य कर्मपदा। संयुक्ताश्चेनथा कतुं ताहग्निचितस्मतः ॥५६४. धर्मपल्याः संघटते न चेदयान्यदेहिनः । अयं हि सनयोद्धारः मथनामिथिलो यया ॥१६॥ पुराभयत्तथा चोक्त आपः सर्वपुराणगः । उपमारहितः कोऽपि तादृश्यय हि शक्यते ।।५६६।। कत्तुं तथा तादृशेन चौपायेन च शक्यते । महद्भिस्तादृशैदिव्यैः पूर्वोक्त रखिलंगुणः ॥५६॥ चेदेकेन लोपेन सतीनामतिदुर्घटः । पुत्रोद्धार इति झेयः दरिद्राणां मुदूरतः ॥५६८1 धनप्राममहाशिष्यवन्धुश्रीक्रतुशून्यतः । न शक्यते हि रंडायाः पुत्राद्यखिलसंपदः ॥५६।। रंडानां सततं धमः उदयात्परमेय वै। नित्यस्नानं वैद्यवंधुसंनिघाव संततम् ॥५७०।। निवासो गुह्यसंभापा सच्छुभूपा सदाश्रयः। चतुर्यकालभुक्तिश्य दधिक्षीराज्यवर्जनम् ॥५७|| न विधवात्रीणांकृत्पवर्णनम् २५८३ सुगन्धवस्त्रालंकारगीतादीनां विसर्जनम् । ताम्बूलाञ्जनपुष्पाणां सन्ततं दूरवर्जनम् ॥५७२।। पटवतल्पादिशयनं शरीरोद्वर्तनं स्रजम् । अथाजन चोष्णवारिस्नानमभ्यंजनं तथा ॥५७३) पुनरन्यानि सर्वाणि वस्तूनि न च कामयेन् । दुरालापं दुष्टचितां निग्रहानुप्रहार्थताम् ॥७॥ पुण्याधिकारकल्याणयज्ञकार्यादि कर्तता। कुर्वती ताडनीया सा सत्स्वीयगुरुसजनैः १५७।। क्षारं च लवणं दिव्यं मधुरं सूपकंदरे । वर्जयित्वा विशेषेण तिक्त कटुकमेव च ॥५७६|| प्राशयेोजयेन्नित्यं प्रासानव जीवनम् । आपष्टिवर्षपयंतमेचं कालं 11५७७॥ (विशेषानयनकार्या पश्चात्कार्यानुगुण्यतः)। प्रागवृत्ति प्रकुर्वीत प्रकुर्वीत वयसश्वरमे ततः ॥५७) यथारुच्यशनं कुर्याद् गुरुवृत्तौ रता भवेत् । सा ज्ञातिगुरुवन्ध्वादिसचिन्ता निपुणा भवेत् ॥५७६|| यदि गुर्वादिसचिन्ता रहितातीव केवलम् । याजमान्य समाश्रित्य स्वीयान्मृत्यवराजडान् ।।५८०।। पितृभ्रानादिदुष्टोघान् परिवारान्विधाय च । व्याहादिकारिणीभूत्या मदीयस्याखिलस्य वै १५८११ द्रव्यरय भूमिमुख्यादेरहमेवाधिकारिणी। इत्येवं प्रवदन्ती = बालरंडाधिका सला।।५८२॥ प्रयत्नतः कपिलस्मृतिः दानादिव्यपदेशेन ववशस्थितमेदिनीम् । खजनैहियंत्येषा कुलनी परिकीर्तिता ॥५८३॥ स्वभरी कुलसंजातविद्वजनविरोधिनी । तदीयवृत्तिभूभाग्य श्रीसंपद्विनिवारिणी। स्वभरी वैकसंवन्धमात्रेणैव पुरस्कृता ।।५८४|| कुलप्रतिष्ठानाशाय पापपात्र समागता । तामेनाधार्मिकोराजा धर्मान्यक्कृत्य सत्वरः ॥५८३।। प्रवासयेन्डिक्षयेद्वा तद्वाक्यान्यन्यथा चरेत् । तदीयपरिवाराणां यथा शिक्षा समाचरेत् ॥८६॥ तामुद्दिश्य च ये मूखां जीवंति घरसंज्ञिकाः । पुरुषःपरावास्तुन्याः स्याविदो वापि गर्दभाः ॥८॥ अज्ञातास्यज्ञातिरंडाकृताभिस्ता(स्सा) मनीषिणः । एकोद्दिष्टे प्रशंसंति नवश्राद्ध पदस्वपि ॥५८८।। प्रक्षाता रण्डयाचोन्नं (१) कृतं यत्तु विशेषतः । नम(पामाद प्रशंसन्ति जीवधारेचसन्ततम ।।५८६।। श्मशानपलये पापि वैदिकायलयेऽपि च । मटायाध्यकाम्यान्नु यद् परिकल्पितम् ॥१६॥ नयोग्य पोशाक्यानां पादाना सद्गुणस्य च । परमारणेवंगुनिधिनम ||१६ अशिधारमगंशाध्वयोरपि तत्पुनः । नरामयप्राटाय नपुवा नं परम १६

पत्रा तु या नारों विधति नचोच्यते ।
तिपुत्रविहीना या विधवेत्युच्यते बुधैः ।।५६३॥
है: सूनोविनाशेऽपि या नारी सोमपीथिनी ।
मिचिस्यात्पूर्व वै तपस्विन्यपि केवलम् ॥५६||
शकुलपविष्टा चेत् तादृशस्य तु पुत्रिका ।
पाचकानदातीय विद्वजनमता सती
11५६५
दंपती समा नित्यं सर्ववंद्या रमव सा।
गरस्यात्सर्ववेदोक्तं नित्यकर्मसु केवलम् ॥१६६
धकारस्तथा तस्मात्पुत्रस्यापि परिमहम् ।
सिन्नं सपिण्डेपु विच्छित्तो संततेस्तथा ॥५६५
बहुजातिशिष्यवन्धूपकरणाय वै।
तुं शक्यतेऽतीव तेषां प्रार्थनया परम् ॥५६८
रस्ताभिस्तद्भिन्नाभिः नारीभिः ब्रह्मचारिभिः ।
FFARHA
A meen

.
करिमतिः
रंडाभिम्गादशीभि पाई मिहिनम् ।
गृहीरयजेतिरोन से पि कर्मांग ॥११
ग्नु या मोहरोयापि मानुलानी पिगनमा ।
मागणमा हाम्रो सोदरा यापया पुनः ॥४॥
पिज्यपनीमगिनी गारयो यदि मंटे।
देवगुफकापांग मामा पाक न दुष्यति ॥१०॥
निशानी रंटपाफ: न प्राश्यग्गामवेत् ।
मर्वेपामपि यणांनामाप्रमाणी विहितः ||
पनीमहोदराश्यम्यगमाशयग्भयाः ।
प्रत्रावती गुरुपनी पुरोहिनमती यदि ॥ll
श्यालकस्यसती दौहिनस्यमायां तथैव च।
मातुलानी पितृव्यस्य पत्री तम्यासहोदरी॥६६॥
मातुलस्यस्नुपा कन्या सपिण्डायाः समीपकाः।
नादृश्यो यदि तासां च पार्क रात्रिहतं तु यन् ॥६१०ll
भुक्त्या तु संकटे विद्यात् मृत्युधयमनु शिवम ।
अष्टोत्तरशनं जप्त्वा पुनः श्रीमान्भवेदयम् ॥६११
रंडा यदि स्तुपा तां वै श्वशुरोऽन्वहमेव वै।
दानमानादिसत्कार्येस्तन्मनः परितोपयन् ॥१२॥
प्रपालयेत्तां यत्नेन स्वयं पनीमजायुतः ।
तत्पालनात्तत्पदानात्तन्मनस्तोपणादपि ॥६१३।।
जन्मजन्मसुदीर्घायुः प्रजावान् धनधान्यवान् ।
नित्यारोग्यो नित्यभव्यः नित्यत्रीमान्निराकुलः ॥६१४॥

सधवाविषवाषीणांमीमांसा
भवत्येव न संदेहस्त तस्तत्तु तयाचरेत् ।
यः श्रीप्रजाधनपशुपायुभंगवत्परः ॥६१शा
स रण्डानां स्वकीयानां प्रपाल्यानां विशेषतः।
सम्मनस्तोषणं कुर्यात्तद्याचितवसुप्रदः ॥६१६॥
भवेदेवान्वहं भित्वा मुक्तोऽयं तावता श्रिया।
संवृद्धः प्रभवेदेव नाकार्याविचारणा ॥६१७॥
याः पाल्या शास्त्रतो रंडा: विहितत्वेन चोदिताः ।
आभयस्ताः प्रकथिताः तदुःशाप्रहिणोऽनिशम् ।
च्याधिदुःखंदरिदं च दीर्भाग्यमतिवर्धते ॥६१८॥
तामासृस्वसभापतीपाकं कृवंक्षपा।
प्राश्यंगत्यंतराभावात्तस्मिन्सत्यो न चाचरेत् ॥६१६॥
विश्वरतया समासीनो घीतितोमहात्मभिः ।
श्मशानामिसमोझयो गृहिणो वैदिके, जगुः ॥२६॥
विश्वस्तया समासीत जलंभयनलेपने ।
पात्रपादक्षालनाय तण्डलधारनाय या ॥६२२॥
शारूपप्रशासनाय भवेदागोमयाम्मसे।
सदानीनं जलं जातपासाना हायनान्तरे ६२)
याणयित्या मानाय फल्सयेयुस्वदान्यतु ।
मुदिरल्पा महामंदा तयायुध दिने दिने ॥२॥
भयेमीणततस्तम्माशयम विनिवर्तये ।
गरानी तेन पयमा शुभकर्म मोहमः ॥२४॥

२२८८
4
कपिलस्मृतिः
नीराजनं प्रकुर्वन्ति ये वा ते दुःखमागिनः ।
कर्ता कारयिता ती ते सर्वे स्युनर्नात्र संशयः ।।६२५॥
तेषां तु सततं कर्म नित्यस्नानात्परं सदा ।
नामस्मृतिनित्यकर्मवृद्धब्राह्मणसेवनम् ॥६२६।।
देवगृहेरंगवल्ली करणं व्रतकर्मणाम् ।
अनुष्ठानं सतीवाक्यश्रवणं
तत्समागमः ॥६२जा
सत्यांशकौव्रीहि यवमापमुद्गादिगोपनम् ॥६२।।
(समीकरणमेतेपां पयोदश्विद्यादिरक्षणम् )
समीकरणमेतेषां यस्त्रकंचुकयानिनाम् ।
चूतसारंगचामण्डशलाटूनां च संडनम् ॥६२।।
संहिताना पुनस्तेषां लवणादिमुखैःपरैः ।
यम्नुमियोंजनद्वारा तत्क्षणमुखादिकम् ॥६३०।।
निम्मिलानामपकानां पेष्ठा वहननादिकम् ।
चूर्णानामपि कल्कानां करणं कर्मकारकम् ॥६३१।।
पुनम्तेय मदा प्रोक्तं चोप्यखाचादिवस्तुषु ।
मश्यमोम्यादिए तथा मर्वयस्तुप संततम् ॥६३।।
प्रावीण्य प्रापणं निन्यं प्राक धर्म उच्यते ।
अनिरंहा महारंहा शुद्ररंडास्त्रिधापुनः ॥३३॥
घोदिता यानु नामाच स्वरूपं यष्यतेऽयना ।
अन्यगोवदत्तम्य कर विधया यदि ॥६३४||
मरेतु शैशवज्यते मातिरंदा प्रकीर्तिता।
दौडलं नाहगंन माम्यिन्या मुतं तमः ॥३॥

विधवास्त्रीणांप्रकरणम् २५८६ विश्वस्ता प्राप्य भवति महारडेति साखिलैः । महद्भिः कथित्ता पापा निरीक्ष्या भद्रदूपिणी ॥६३६।। सगोत्रदत्ततनयकलवं नष्टभर्तृ कम्। असुतं पतिसंयोगरहितं स्याचदाख्यकम् ॥६३७। तिमृणामपि चेतासामन्वहं मनुरनचीत् । मक्षणे कवलाना वा स्वातत्र्यं नेति सर्वदा ॥६३८) नित्यास्वतंत्र नारीणां विश्वस्तानां विशेषतः । तत्रापियालरंडानामेवं सत्यत्र किं पुनः १६३६॥ स्थावरे क्रयदानादिकृत्येप्यासा तु दूरतः । अधिकारस्यास्स)विज्ञेयः चोदितो निखिलागमः ॥६४०ll तस्मात्तु तत्कृतं राजा दानमादि वयं तु या। सर्व मिथ्यापयित्वैव स्वस्थाने विनिवेशयेत ॥६४१|| रंडाकृतं भूमिदानं यत्तद्यज्ञोपवीतकम् । नीराजनं वेदमन्वाशिपस्सिध्यन्ति भूतले ॥६४२॥ राजा प्रभुभूमिदाने तत्समस्सविधादिकः । राजस्वीकृतभूभागो विमादिश्च भवेदपि ॥६४३।। विशुद्धागमसंप्रात घरणी सर्वजातयः। दानकत्तुं शक्नुवन्ति विवाद रहिते यदि ॥६४४४॥ विधादान्यदत्ता या धरणीमाहफाय सा। सिट्रात्यत्र पुनोंचे स्वीकृतापि न जीर्यते ॥६॥ दानादि -

प्रावीण्य प्रापणं नित्यं प्राकट्य धर्म उच्यते।
अतिरंडा महारंडा क्षुद्ररंडास्त्रियापुनः ॥३२॥
चोदिता यास्तु तासाश्च स्वरूपं वश्यतेऽयुना।
अन्यगोत्रप्रदत्तस्य कलत्रं विधवा यदि ॥६॥
भवेत्तु शैशवज्यंते सातिरंडा प्रकीर्तिता!
दीर्घकालं ताशेन मत्रांस्थित्वा सुतं ततः ॥६३क्षा
लिगनिः
नीगनं प्रति माहे मुगमागिनः ।
का कारगिना मी हे गर्ने गुनार मंगा.
तु गर म मिन्नानार मा।
नामानिनियमभागमेनम् ॥१६॥
देयपदरंगरों का प्रकामंगान् ।
अनुमानं मनीयायन समागमः
मत्याराफीमीदि यसमागमुद्गानिगोपनम ॥६५
(ममीकरणमेत पोजिमादिरसम्)
ममीकरणमेतेषां यत्ररंगकयानिनाम् ।
चूतसारंगचारण्डालाटूना
मंडिताना
पुनस्तेपा
यस्तुभियोजनद्वारा
निसिलानामपकाना पेठा यहननादिकम् ।
चूर्णानामपि कल्कानां करणं कर्मकारकम् ॥६३१
पुनस्तेषु सदा प्रोक्तं चोप्यखाद्यादिवस्तु ।
भक्ष्यमोज्यादिषु तथा मर्ववस्तुए संततम् ॥३२॥
।
प मंडनम् ॥
लवणादिनु परैः।
नक्षणमुमादिकम ॥३॥

. - विधवास्त्रीणांप्रकरणम् २५८६ विश्वस्ता प्राप्य भवति महारटेति साखिलः। महद्भिः कथिता पापा निरीक्ष्या भद्रदूषिणी ॥६३६।। सगोत्रदत्ततनयकलत्रं नष्टभ कम्। असुतं पतिसंयोगरहितं स्यातदाख्यकम् ॥६३४ा तिसृणामपि चैतासामन्वहं मनुरववीत् । भक्षणे कवलाना या स्वातव्यं नेति सर्वदा ॥३॥ नित्यास्वतंत्र नारीणी विश्वस्तानी विशेषतः । तत्रापियालरंडानामेवं सत्यत्र किं पुनः ॥६३॥ स्थावरे ऋयदानादिकृत्येप्यासा तु दूरतः । अधिकारस्यास्स)विज्ञेयः चोदितो निखिलागमः ।।४।। तस्मातु तत्कृतं राजा दानमादि मयं तु या। सर्व मिथ्यापयित्वैव स्वस्थाने विनिवेशयेत् ॥६४११॥ रंडाकृतं भूमिदानं यत्तद्यज्ञोपवीतकम् । नीराजनं वेदमन्त्राशिपसिध्यन्ति भूतले ॥६४ा राजा प्रभुभूमिदाने तत्समस्सरियादिकः । राजस्वीकृतभूभागो विप्रादिश्च भवेदपि ॥६५३॥ विशुद्धागमसंधान घरणी सर्वजातयः। दानंकतुं शक्नुवन्ति विवादे रहिते यदि ॥४॥ विवादशून्यदत्ता या धरणीप्राहफरय सा। सिद्धगत्यत्र पुनर्नोन स्वीकृतापि न जीर्यते ॥६४५॥ दानादियोग्यतालमभूमिः पुंसो न प स्त्रियः । सर्वन्यस्य संत्रस्य तस्यैव सततं भवेत् ॥४६॥ .

५१
aftent:
भुती : प्रदान गर्ने ।
मी गर्गमा कोनि मनः॥'
गुगामेष्यनिगादाने निकाय निग जयते।
गगा गामनिमार मुरुगोन मिनः ||
माः पुरोग न मिनेनगा।
गूपदानेऽधिकार:/गा यनिमाया मंगलम् ॥६॥
इत्येवं मंग:प्रोगः निविषादेन पेन ।
पुरुषस्यापि माने निर्षियाधिकारिना ikail
यियादेत्यधिकारियं न सिद्धगि कदाचन ।।६४११॥
(पियापुणयन्मुग्राम: मानपयांपरं परम् )।
(प्रवचर्यणधियानित्यं मान्यपियियादेत्यधिका)।
पितापुत्रेणभत्रां वा नवापीग्रेग या सदा ॥६॥
स्त्रियस्सनायाः कथिताः रंडा:स्युश्चेतुरोदिताः ।
अनाथा हि कथं तामां मुवोदानेऽधिकारिता ॥६५३।।
याजनेनाध्यापनेन प्रतिप्रमुखेन च।
विशुद्धागमसंप्राप्तभूवृत्तौ च सदा द्विजः ॥६५४।।
निवसन्नित्यकर्माणि कुर्वन्धर्मेण देवताः।
संप्रीणयन्मुखैराप्तः ब्रह्मचर्यात्परं परम् ॥६५॥
ब्रह्मार्पणधिया नित्यं कृतान्यपि विभावयन् ।'
पितॄणां तनयद्वारा तहणं चतुसंगतः ॥६५६॥
अपाकुर्वन् शास्त्रमार्गात् कृतार्थः प्रभवेदपि ।
। अश्रोत्रियों न म्रियेत नाहिताग्निरसोमपाः ॥६५॥

पुत्रमहत्ववर्णनम् २५६१ अमंत्रदग्धो न भवेदमंत्रो न क्षणं भवेत् । अनाश्रमी क्षणं विठपुत्रवश्वेिदनाश्रमी ॥६८11 न भवत्येव यदि मः श्रोत्रियोऽयं विचक्षणः । तथा "तस्य सततं ब्रह्मवादित्वमेव वै ॥६५६।। भवेन्नित्याहिताग्नित्वं विधुरत्वं च नैव हि । श्रोत्रियत्वात्पुत्रगतात्कृतकृत्यः पिता भवेत् ॥६६॥ दशमार्योऽप्यपनीकस्त्वसो तनयर्जितः । तथाविधो दशसुतःस्वयमश्रोत्रियो यदि ॥६६॥ भवेदजसःपनीक: प्रोत्रियश्वेदसी ततः । नभायोऽपि न भवेदपलोकः कदाचन ॥६॥ तब घेत् ब्रझमेधाधा याययं तु विशेषतः । सपत्नीको मननिष्ठः सोमयाज्यपि चोदितः ॥६६॥ पुत्रिणःप्रोत्रियस्यान नापत्नीकत्वमुच्यते । पत्नीयत्वं तु यज्ञस्य नेनेन्द्रस्यानुवाकत: १६६४॥ चोदितं युतिवाक्येन सादरपत्नीत्वमस्य च । मोत्रियस्य सदास्तव (विशेषण पुनः मिल ॥६६॥ सद् अझमेधाभ्यायो नेदुपमारहितः परः। (संरायोषते वृतं श्रोत्रियो तो मनीपिमिः) ।।६६६॥ (सपत्नीक इतियोका पुत्रवान् पहिरोपन:). न पुत्रेण समोधर्मः पुरेण समाः।।

गरिन्प्रतिः
गर्ने गपुरलिया: सिगा: पुसमापिनाः।
ग्मुंगःम्यादयोलोकाः गाहप्ता प्रनादगः ॥६६८।।
योगी मनी पुत्रवान म्यादसोनियमद्रितः ।
गानोत्पाये यत्न मनोयामागममिः ॥१६॥
स्वकीयदेवगाण्यानं पूनान प्रागनादिभिः) ।
अदृष्टयत्नरावकेन्याई कार्य एय ये ॥६॥ll
गदुत्पत्या क्षणान्मत्यों मुच्यते फारणात्।
यगजाते तु ननये सर्वयत्नसहमतः ॥७॥
स्यभ्राराजादिपुत्रेषु पुनमेकं परिग्रहेन।
ज्येष्ठमन्त्यं ययित्या मध्यमेष्येक मुनम ॥६७२||
परिगृहविधानेन होमपूर्वादिना ततः ।
जातकर्मादि कुर्वीत तेनैवास्य मुतो मवेत् ॥६७३।।
न चेत्तुगोणपुत्रः स्यात् गौणःस्यात्तनयो यदि ।
मस्यैतत्कर्मकरणकर्तृत्वं शास्त्रतो मतम् ॥६७४ा
प्रत्यब्दकरणे चापि न तु दर्शादिकर्मसु ।
ये भ्रातृसूनवो लोके कृतमौज्यादिका अपि ॥६७५६)
कृतदाराः संगृहीताः पुनत्वेन विपस्सुते ।
तत्तकृयमात्रस्य तत्प्रत्यब्दस्य शास्त्रतः॥६७६।।
कर्तारः प्रभवेयुर्वे न चान्येपो तु कर्मणाम् ।
दर्शपातमुखादीनामतो भ्राट्सुतानपि ॥६॥
तदन्याद्भिन्नगोत्राद्वा यं कंचन गृणन्नरः।
तन्मतः, पूरणं कृत्वा तत्पुत्रस्य च संविदम् ॥६॥

ज्येष्टपुत्रश्यपत्र्येयोग्यता एवमेवं वृत्तिगेहक्षेत्रेवन्यसुनिश्चिनं । येषु तेषु च सर्वेषु मर्यादेयं मया कृता १६७६!! अधैवेति दृढं नूनं दायित्वा ततः परम् । स्वीकुर्याद्विधिनोक्तंन त्यक्त्वान्त्यं ज्येष्टमेव च ॥६८।। मध्यमेन होमेन देवव्राह्मणसंनिधौ । राज्ञि बन्धुषु चावंद्य पितरौ तस्य केवलम् ॥६८३|| भूपयित्वामीणयित्यारत्नवस्त्रगृहादिभिः । सद्दारिद्रयं चारयित्वा स्योकुर्यात्तनयन्ततः ॥६८२ यधन्यगोत्रस्तनयः संप्राद्योधवशाद्भवेत् । कदाचिययोगेन पश्चाजातरतदौरसः ॥६८|| पयसा यं कनिष्टोऽपि पिटकर्मसु केवलम् । ज्येष्ठत्वं समयानोति न कानिष्ट कदाचन ॥६८४१ सर्वथा दत्ततनयः ययोज्येष्ठः कृतक्रियः। सोमपात्यमिचिभापि जातपुत्रोऽपि केवलम् ॥६॥ सर्ववेदनिधिःशास्त्रनिपुणोऽध्यात्मवित्तमः । नदौरसेन पुत्रेणानुपनीतेन फेवलम ॥६८६॥ अनभ्यम्ताक्षरेणापि न ममाश्यादिति श्रुतिः । म एक पिटकायेषु ज्यध्यमामोत्ययंतराम् (संशयम) ॥६८७} मन्त्रीमारणसामध्यांगभावेऽप्यस्य ये सदा । सत्क- कंपुरहत्य स्वयं दत्तः कनिष्टया ॥६॥ पुर्तत सर्वपत्यानि धमाध्यं सारा स्मृनः । यानि प्रधानि प्रधानानि कागि समस्युग्तानि दत्तकः॥६८६

२५६४
कपिटस्मृतिः
नदस्तेनैव विधिना स्वमंत्रोक्त्या प्रचालयेत् ।
मर्यादेयं समाख्याता तत्कमे शास्त्रजालकः ॥६६०
परंत्वत्रविशंपोऽस्ति यदि दत्तोऽन्यगोत्रजः।
खीकृतम्नु तदापश्चाद्विभागे तुर्यभाग्भवेत् ॥६६॥
सगोत्रश्चेदयंत्यत्रतनयः श्रीमतःसतः ।
तत्पदानासहिष्णुभ्यामतिप्रार्थनयावशात् ॥
दत्तस्तत्स्यीकृतश्चेत्तु पुनश्चशपथादिभिः ।
पित्रादिकृतमर्यादः यथा वा स्यात्तथा भवेत् ॥६॥
तेनायं समभागेय न तुरीयांशभाग्भवेत् ।
पुनः कोऽपि विशेषोऽत्र स्पष्टमेव निरूप्यते ॥६॥
विभक्त भ्रातरं दीनं दरिद्र यन्धुमेव था।
अत्यंतकृपणं निम्वं पुत्री(?) दृष्ट्या कृपापरः ।।६६
तद्रक्षणाय तनयं स्वीयं दत्वा श्रियं पुनः।
दत्ते समुदरेन्श्रीमान् ततस्तस्य च देयतः ।।६६६॥
संजाताननयस्सोऽयमौरसो दुर्यलो भवेत् ।
दत्तपुत्रादिविशेयः ज्येष्ठ पत्रीमुतोऽप्ययम् ॥६६
ज्येष्ठरीगुनायेय चौरसत्वं प्रकीर्तितम्
विभागोऽपि तथा यः समस्यनेय सर्वतः॥६
धोरगम्य च दत्तम्य न्यूनत्याधिषययोस्तदा ।
यपागामम्मथैव म्याग निर्णयों धर्मतो मतः।
पुरमाहामीमायमंडी मामये यदि।
पुरतं प्रापिनमाया दुसंलः प्रभवेगुनः ॥७॥

औरसपुत्रेपुज्येष्ठता
२५६५
अपुनः प्रार्थनापूर्व दत्तोऽयं यदि तत्सुतः ।
श्रीमानेव तदा सोऽयं समभागी भवेद्धृवम् ।।७०११।
भ्रातृपुत्रं झातिपुत्रः बन्धुपुत्रोऽथ वा धनी ।
निरपेक्षोऽस्य सौभाग्य प्राहकप्रार्थनादिभिः ।।७०२||
पुत्रत्वं समनुप्रातः निर्धनस्य विशेषतः ।
दत्तश्च कृपया तूष्णोमोरसादधिकोऽप्यति ।।७०३
पुनस्सत्कुलजो न्यूनकुलाय यदि केवलम् ।
दत्तः स्यात्तु तदासोऽयं विभागे समुपस्थिते १९७०४।।
तुल्यो भवेदौरसेन न पियेषु तु सर्वदा ।
औरसो ज्येष्ठचमाप्नोति पितृकर्मणि दत्ततः ११७०५४॥
वयसा पर्यया विद्याज्ञानाभ्यामधिकोऽपि या ।
दतः पैतृकत्येषु न्यूनएव भवेद्भयम् १५७०६।।
जातेन्द्रियाणा दौर्बल्ये तुहिता सनये सति ।
अवशादसु (१) सन्देहो पुत्रप्रणमुच्यते :)
पुरयोस्तनयाभावे नष्टयोरपि वै तयोः ।
पुत्रस्य कुर्यादग्रहणमिति चेदानुशासनम् isodI
पोरे नमरि दौहित्रे सति या पुरसंग्रहः ।
सर्वशानिपिद्धश्यात् न तस्मात्तत्ममाचरेत् ११७०६।।
आपन्निवारकस्सोऽयमापत्मापुरशून्यता।
एक एव भवेन्नूनं दुहिता(दतनयो मतः ॥१०॥
दोहिने सतिपुत्रस्य पदणं शाबदूषितम् ।
धं तदिति या प्रोक्त पतः सदुष्यते ॥११॥

उपियतिः बोरियोगिमार नमनाः । उगारिता मा र भोगुनांगायः॥१॥ शामभ्यनु भायांगा. प्रमंहता। समान मनि दोदित प्रियमा पनि ७१r दोहियापतिमायण मानामादिका गुनाः । दुहितःस्यात्ममुद्रीय गद्गदगा गिरा ।।७१४॥ प्रयादिष्यन्लि ना या पितृलोर तिगुन्दर । अस्माकामुराभिग्नाम्ते यापया निमिन्टा: शिया - तर्पणे प्रायज्ञादिनित्यकर्ममु सन्ननम् । एकमेयाञ्जलिनो भ्रातृतजातयो ददुः॥१६॥ अद्यास्मनलदो जातः (तो) क्यमेतेन भूपिताः । कृतार्था नितरा जाताः युष्मत्तुल्या अभूमदि ०१७ तस्मात्तद्दत्तमुदकमस्माकं परमामृतम्। दधिसोमघृतक्षीरभेदोमाथुकसिन्धयः all नारायणपदप्रातिकारकावातिपावनाः । कुम्भीपाकमहाघोररौरवादिनिवारकाः ।।७१६।। त्रयस्त्वअलयः श्रीकाः शकुन्धराजिनः। अस्मत्सर्वोत्तमत्वस्य प्रापका: स्)तुल्य शून्यकाः ७२० यद्दीयतेऽस्मानुद्दिश्य चानेन मुवि नोऽमृतम् । अत्यल्पमपि तन्मेरुमहामन्दरसंनिभम् १७२११॥ अक्षय्यं तु वोऽनेन पुत्रादिः कोऽपिनैव हि । दौहित्र एवं नो लोफे पुत्राणामुत्तमोत्तमः ॥ - पत्र्येकर्मणिदौहित्रस्यौरसत्वम् तत्समस्त्वात्यौ)रसस्तन:(B) तजश्चापि तथाविधः । इत्युक्त्वा नर्तन चक्रुः मातामह्यादिकानगा: १७२३॥ दौहिबजनने पूर्व तस्माद्दौहित्रसंनिभः । पितृणां तृप्तिद(दो) कोऽपि नात्येय धरणीतले १७२४|| मात्रादिनयसाम्येन तपणे समुपस्थिते। तेषांच्यालिदरसोऽयमेको दौहित्र उच्यते ॥७२ तदत्तमुदकं तासा परं व्यञ्जलिसंख्यया। नवकं तत्पृथयत्त्वेन महापद्मादिसंभवम ।।७२६३१ तस्माजगति यो मोहान प्रसक्ती सर्पणस्य चेन् । दुहितातनयो मूढः(स्) तासामेकादिकालिम् ।।७२७।। सामान्यनारी युद्धया वै कुर्यादौहिमपात्रतः । तासा शेवधिहा स्यात् तरलापस्यापि पात्रताम् ।।७२८॥ प्रयात्ययं सद्य एव तस्मात्तन्न नथाचरेत् । अत्र भूयः प्रवक्ष्यामि निष्कृतार्थमिदं रहः ।।७२६॥ सापनी जननी पल्योरन्यहं घाली मते । मातामही मातृवर्गद्वयं ध्यपत्रिभाजनम् ।।३।। मर्पणपसिलप्पन (4) सर्वशाममुनिधितम् । दौहित्यपुत्रवान्नेव भवेहोके द्विजातिए १७३१।। विरोपेण ममाश्यातः (तो) भर्नु पुत्रादयोऽवरः । सपिण्डोऽपि तथैवायातवयं पतित्तदा ॥३॥ निम्म्यते घ मुस्पष्ट सपिण्डे गटु फेवलम् । पितामहल्यावस्याः पिधादिद्वारतोऽति ॥

विमना ज्ञानयो दुष्टाः भवन्त्येयानिदुःमिनः I४४१॥ विभायाः पुरतासानिधनक्षेत्रादियानुए। तन्मुखाः मन्ना से कदापनि दुराशयाः ७४२॥ नेपः परमिदं न स्यादिन्यत्र स्वर्गमि I४३|| २५६८ कपिलस्मृतिः मुसंवृद्धाः नास्य तत्र स पितुः स्वस्य वा खलु । न सन्त्येव विशेषेण तन्मुखातु सपिण्डता ।।७३४१ सपिण्डाना प्रकथिता नान्येन किल वर्मना । भ्रातूपुत्रेषु तेष्वेवं भ्रातुश्वापि पितुस्तथा ॥७३॥ सन्तिह्यवयवास्तेन भ्राता तत्पुत्र एव च । मार्गेण खीय इत्युक्ताः नतुस्यावयवरहो ।७३६।। दौहित्रे दुहितद्वारा स्वकीयावयवोद्भवे । संबन्धस्त्यधिकः स्वस्य तथा तेषु न संभवेत् ।।७३७॥ संबन्धः कोऽपि मुस्पष्टः()तस्मादेव तथादितः । दौहित्रो भ्रात्पुत्रादिभ्योऽयं स्वाययवादिभिः ।।७३८।। (णामधिकोऽवयवादिभिः) अधिकश्चेति सर्वेषु स्वकर्मसु धनादिप । नेतस्य संग्रहः कार्यः जन्मनेयायमुच्यते ।।७३६) पुप्रत्यन समश्येति परश्चेति फचित्स्थले । अतः पुत्रत्वकरणं विद्ध न्यायशाखयोः ॥४०॥ दौहित्र जननादन पवि(?)यित्तकमानसाः । दोविननादव पित नियनी निन्ति चिनावागिताः । शासनमा मिना पामरा पसंदूपमा IAll पिस्निः।

वदा। धर्मसेवनलाभः २५९६ येन केनाप्युपायेन परं तद्ग्रहणोन्मुखाः । दुरालापान्प्रकुर्वन्तः सजनैरपि निन्दिताः ॥७४।। दूपयन्तश्च तान्भूयः छी। धिक् ) स्कृताश्वापि साधुभिः । न्यपकृताः पण्डितैः सर्वैः सर्वत्रापि वृधैव हि ।।७४६।। तदुर्यनादिशतकं कुर्वन्तश्च तदा दुष्टक्रियाश्चकुर्वन्तो लयं यान्त्येव केवलम् ।।७४७॥ सर्वत्र धोमध्यस्थः कदाचित्कलिदोपतः । न सिद्धयति कलो भूयः सिद्धयत्यपि पुनः कचित् ।।७४८।। प्रायेण धर्मतो वृद्धिः ततो भद्राणि विन्दति । व्यवहारे च जयति सन्तो व्याकुलयत्यपि १७४६।। परस्खान्यपि (दि) गृहाति समूलं च विनश्यति । सदेव धर्मः परमः सेव्यो नाधर्म उच्यते ॥७॥ धर्ममार्गेण सर्वग्नः गन्तभ्यो नान्यमार्गतः । दौहित्रभिन्न यं कंचित् विना ज्येष्ठं तथैककम् ।।७५॥ संगृहीयाच तनयं मध्यस्थं सातिमेव था। भत्रभ्यनुशाभिनायाभ्यनुज्ञा पुत्रसंग्रहे | संगच्छते ज्ञात्यभावेतत्पुरस्तान युज्यते । सातिमत्याकृतं यत्तु पुत्रसंग्रहणादिकम् ॥७|| विश्वरतया घरादान मुसहरनं तु सिद्धयति । सर्वज्ञातिमतं कार्य पुत्रसंग्रहणादिकम् | पारादिपनो घेत्तन्न कार्य यदि तकृतम् । पापार्मिको राजा न्यायशामादूपितम् ॥७६शा सद्य न दयः प्रतिगृहीरन् अपि सूतकिनोऽपिया ||७६२॥ पहिणतो दूरपक्तिमुक्तानी प्रामरूपगम्। दरः प्रतिगृहारम् तनयं मंशयभ्रमे। अहर्मरमुनः पियोः दनाप्रमीनि यदन् पुनः ॥६॥ सभा निर्भयं चोरः प्रगिदः कथितो युधः । २६०० कपिलस्मृतिः सद्यस्त्वन्यथयित्वैव शास्त्रीयेनेयवर्मना। तत्कारयेज्ञातिमुखसामीचीन्यं ततः पुनः । तद्यथा योग्यदण्डश्च तत्रमध्यम उच्यते all आद्यन्त्यावेव संत्याज्यो वहुभ्रातृपु तत्सुतौ । मध्ये ज्येष्ठात् द्वितीयादि नियमो नेति चोचिरे । मोहादत्तो ज्येष्ठमूनुः स्वयंदत्तोऽथवा अडः । पतितः एवस्यादुभयभ्रष्ट ईरितः Ital उपनीतेः परं तस्य विप्रत्वं तु न सिद्धयति । यदि ज्येष्टसुतो दत्तः पितुर्वा पालकस्य वा १७६६॥ तत्कर्मयोग्यो नैवस्याद्यत्कृतं तेन तत्परम् । सलिलं पुण्यलोकैकमहापापाणसंनिभम् ॥६॥ महारोववर्माप्रयनयनं सक्रियोघहम् । तत्समाचरेत्तस्मात्पुत्रदानाही विघयाव णिविधुरदूरभार्याय(प)तिव्रताः । तत्पतिश्च कन्यकोऽनुपनीनकः । कौतुकी दीक्षितोयाऽपि प्रादकर्ता प्रदूपितः ।।७६३।। प्रायश्चिसाय मुग्गा पुनरन्ये तथा विधाः ||६|| पुषेण जानमात्रेण तातनत्तानपा Ioki न द्वयम् ॥६॥ रजस्वला न सुतस्यकुलतारकत्वम् २६०१ नन्दन्ति च प्रगायन्ति नटन्ति प्रनटान्ति च । उत्तारकोऽयमस्माकं संजातस्तनयोऽधुना ॥७६७। वदन्त परममानन्दं देवमानुपम् । आरभ्य कृत्स्नं रामं तद्विधिना श्रुतिनिरूपितम् १७६८३१ सद्यः प्राप्ता भवन्त्येव ब्रह्मानन्दातु सः परः। श्रुत्युक्तवर्मना साध्यः न फेनान्येन सर्वथा ॥६॥ यस्य कस्यापि संप्रोक्तः तद्भिवानखिलान्वरान् । आनन्दास्तस्य संभूत्या दौहित्रस्येक्षणादितः ॥७०11 प्राप्ता भवेयुः पितरः तत्कुलद्वयतारकः । तनयो दुर्लभो नृणां जातमात्रेण तेन वै ।।४७१।। एकोत्तरकुलं चापि सद्यस्तुष्ट भविष्यति । तादृशं तनयं त्वेनमेकं जातं सुतं जड़ः ।।७७२।। धनाशयान्यं कुरुते यः पितृनः स्मृत. स तु । कुतस्तथेति चेयकं सम्यगेवैदमुच्यते ॥७७३॥ सुतप्रदानोत्तरक्षणमात्रेणेव तेऽखिलाः । नधानन्दा भमकामा: ताडिता यमकिकरः || नीयन्ते नरकेष्वेव ते य उत्तारिताः पुरा । ग्राहकस्यापि पितरः तादृशांस्ताम्पितॄन वरान् १९७७५।। दृष्ट्वाति दुःखिताः सर्वे सहमानाश्च करमलम् । असह्यमिति घोरं तदीयं वै दुःसहं सरम् ।।७७६।। पुनः पुनरुदीक्ष्येव किमासीदिति केवलम् । अशक्नुवन्तस्तदुःखं स्वयं चापि तथाविधा: १९७४७|| रिमानः भोयुग नि मान मंगम नोगाम। इन्गुरुवेन पनि मानि मागम् IITE प्रदपति में दया पवागनागाराः। गररां गम गा मयं यमागरम गरम(?) avail अगीपुगि गामा पिमरी प्राहसम्म । तामादेकमुनी दगो प्राहग प्रदापिन: 11 उभयोवंशयांगपि पितृणां नरकप्रदः । तस्मादेषं मुनं दत्तपुत्रन्यंन कदाचन ॥७:१३ न स्वीयुयांदतरतेन न किंचिनग्यात्प्रयोजनम। तथा फनिष्ट तनयं नीदत्तं वैध शिशुम II७:२] पुरुषेण प्रदत्तं वा कन्यावणियति (?) प्रदम् । ब्रात्यदत्तं सूतकिना प्रदत्तं कन्यया तथा ॥७.३।। अनुवीतप्रदत्तं च सापनीमातृदत्तकम् । पितृव्यदत्तं तत्पल्या प्रदत्तं भगिनीप्रदम् ।।७४४|| पितामहादिभिर्दत्तं ज्ञातिदत्तं सगोत्रिभिः । प्रदत्तं येन केनापि पुत्रत्वेन कयञ्चन ||७८२) न स्वीकुर्याच्छ्रास्त्रदुष्टारत एते तनया जहाः। प्रदातुर्ग्राहकस्यापि महादुर्गतिदायकाः ॥७८६॥ मामकस्तनयो जातस्तावकस्त्वना मम । संमत्यवायमभवदिति वाक्येन तत्क्षणात् ॥७८७) पुत्रघ्नः प्रभवेत्सद्यः वीरहेति निगद्यते । तस्वीकर्ता भ्रूणहा स्यात् तद्दत्तो ब्रझहा परः ||७८८11 निदुपुत्रयोग्यता एवं त्रयाणामेकस्य तनयस्य परिग्रहे। प्रत्यवायो महानुक्तः तस्मात्तत्कर्म नाचरेत् १७८६।। जड़मूढान्धमत्ता ये भूकहीवाभिशस्तराः। पतिताः पामराश्चापि न स्वीकार्य विशेषतः ५७६० ज्येष्टपुत्राः पितॄणां स्युःवसभा जगतीतले। यथा तथा कनिष्ठाश्च मातृणामतिवल्लभाः ११७६१|| अतः कनिष्ठारतनया: निन्दितारस्युस्तथैव हि । पुत्रग्रहणकार्येषु यदि दत्तो मृताः सुतः १७६२|| पुनः पुत्रं न गृह्णीयादेकस्यैव सुतस्य वै । ग्रहणं शास्त्रविहितं न द्वित्तीयस्य सर्वथा ७६३|| अपविद्धस्ततोपाटो यदि भूयः सुते मनः । निर्दुष्टपुत्रा जगति य एव प्रकीर्तिताः ११७६४|| औरसः पुत्रिकापुत्रः अपविद्धश्च सूरिभिः । अन्ये तु तनया भूयः भूतले स्युर्जुगुत्सिताः ॥७६५॥ असत्कुलप्रसूतानां क्षेत्रजातिसुताः स्मृताः। महाकुलमसूतानां एव पुरोदिताः १७६६ जगुप्सा सा प्रकथिता स्वस्मिन्पश्यति जीवति। पित्रादिषु स्वकीयेषु ससुजीवत्सुतत्परः ॥७६७॥ परस्मै पुत्रकार्याय धर्मपत्न्यपणं किमु । न्याय्यं युक्त सञ्चरित्रं सर्वैस्तप्रविचार्यताम् ||६८ पांसुलानां विटानां वा सा वृत्तिरजुगुप्सित्ता। याति घोरा वागवा स्वभार्यान्यनिवेदनम् || प्रय पक्षान्तमासाहतो(र)मासात् तृतीयाद्वा चतुष्टयम् 11201 निलंत्राः मर्वकार्य कनिपुणारत मे पुनः 1160जी २६०४ कपिलस्मृतिः विना जुगुप्सां ह्रीं घोर द्वियं भीति दुरासदाम् । परसंगाप्तसद्गर्भनारी (?) ग्रहणतां भुवि ||८०० सम्पाद्य चापिगार्हस्थ्यं लोकानां पश्यतां पुरः। परवीयकसंजातगर्भिणी स्वकलत्रतः ॥८०१॥ ते जायन्ते तादृशानां पाकाः पद्मनिभेक्षणाः । का नपौनर्भवादितनया न जुगुप्सिताः ||८०२।। किंवा न जाने तद्य यं विवाहानन्तरं क्षणात्। मुहूर्ताद्याममात्राद्वा यामद्वयमत एव वा ।।८०३।। (अन्हो) अहर्दिनात्तद्वितीयाद्वितीयात्तस्य तत्परम् । पञ्चपे गोऽपि मासेभ्यो डिम्याना जननादहो। द्विपात्पशूना मालबालक्ष्यते न च किं पुनः ।।८०५।। ते चापि मनुजैः साम्यं संप्राप्य च ततः परम् । यूयं ययं प मनुजा: समा गयेति वादिनः ।।८०६।। पागधीकर्णनामादि मर्यायययसंयुताः । महात्मनात्मानं मयुलीनान लयन्ति मन्तिप। पुननिरारिष्यन्ति ध्यपदारेषु सन्ततम् ।1०ता पराजयन्गि कुन्नि नादशैरचिलं, जगन। पत्रमानि बना नादप्रिमिलानमनान 11८०६॥ म्यादा ममनः गंत्रता: गमनामहा दुधात दुगामनी दुरव धार्मिको नानिलयम ||८९/ दण्ड्यानामदण्ड्यानायथायथंधर्मव्यवहरणम् पराजयेत्ताधर्मेण त्यायेनापि समागतान् । अब्राह्मणं ब्राह्मणेन व्यवहाराय चागतम् ।।८।। अपि न्यायगत राजा व्यवहारे पराजयेत् । एवमश्रोत्रियं राजा श्रोत्रियेण सभासु चेत् ।।८१२॥ तुच्छानतुच्छः समतः सद्भिस्सत्कुलसंभवैः । वाद विवदतो नित्यं भोपयित्वा पराजयेत् ।।८१३।। दुर्बलेन स्वामिने विषदन्तं सभासु चेत् । दुर्बलं बलिन पोष्यं मदान्धो दुर्जनाश्रयात् ॥८१४|| सद्भिः सोऽयं विगर्हःस्यात् राज्ञे प्रोक्ता यथास्य तु शान्तिगर्वस्य महतः प्रभवेद्वै समष्टितः १८१५।। अश्रोत्रियोत्रिययोः विवादे समुपस्थिते । तदात्यलोनियन्यायसत्पथस्थेऽपि केवलम् ॥८२६॥ यथा वा थोत्रियजयः भवेत्सद्यः (स् ) तथा वदेत् । नित्यं सर्वत्र पूज्योऽसौ श्रोत्रियस्तेन तं नराम् ५८१७।। नाघमन्येत्पूजयित्वा प्रेपयेदेव सन्ततम् । स्वसारं भगिनी पत्नी मातरं तनयां तु वा ।।८१८॥ सायकीमभिगन्तास्मीत्यहं वादिनमुद्रतम् । विवादे श्रोत्रियं एप्ट्या नोनियं स एव वै १८१६॥ कपोलयोस्ताइयित्वासीत्कृत्य (धिकृश्य) च दिनत्रयान्। परं निरोधादुद्धृत्ययथाशक्ति पणानपि ॥८२० चतुर्विशतिसंख्याकान् द्विगुणं या चतुर्गुणम् । तस्यापि द्विगुणभूयः शतं वा तवयं तु या ।।८२१॥

मद्यः यो मुनिकाले विप्राणां म्यकामैकपुरस्कृतः ॥४३॥ कपिलस्मृतिः तस्यशक्तरानुगुण्यात् समं संप्रेक्ष्य धर्मतः । दण्डरूपेण कृत्यास्य पश्चात्तं मोचयेन्नृपः ।।८।। यो मन्येताजितोऽरमीति न्यायेनैव पराजितः । तमायान्तं पुनर्जित्या दापयेद्विगुणं दमम् ।।८२३॥ सदस्यदूपकं तूष्णीं ग्रामदूपणतत्परम् । अनपेक्ष्यस्वापराधं स्वकार्यवृजिने तया ||२४ नृपतिर्घार्मिकः पणानष्टशतं हरेत्। सकाशात्तस्य विधिना न चेदोषमवाप्नुयात् ।।८२२१ समुद्दिश्यस्वकार्य यः नूष्णीकं वेद सर्वतः । अप्रोत्रियः स्वयं (तद्वन्) सत्कर्मत्वेन विशेषतः ।।८२६॥ विद्यमानो मन्यमानः स्वयमस्येव केवलम् । सच्छ्रोत्रियाः समुद्वीक्ष्य विवादे सति केवलम् ।।८२७) पूजामोजनकालेषु स्वस्थानातानकारणान् । तदुदवनिरोद्धारं कृतशापं तथाविधम् ॥८२८|| यलेनैवाइयित्वैनं सभामध्ये परीक्षया। न्यपत्य विधिना सम्यक्छौ(धिक कृत्यैव ततः पुनः नैताशमितः फर्म परं स्यात्तु त्वया भवेत् । इति मीत्या समायुक्तं कृत्वैनं निधयेन वै 11८३०ll विशोत्तरं । शतपणान हरेनरमान संशयः। निरोध कुम्ठे मूतः तम्यदण्डपेटिका । पपणा:युदरा पुनः उमय पुनः किल ||३|| दण्डविधानम् २६०७ विशेषतः कतुपु च निरोघे मौढ्यतस्तराम् । स्वपुरस्कारतोऽतीय समष्टया तस्य निग्रहः ।।८३३॥ राक्षो निवेद्य पश्चात्तु ताडयित्वा कपोलयोः । सर्वस्वहरणं कृत्वा तमेनं राष्ट्रतो नयेत् ।।८३४!! प्राममध्ये स्वशुद्धयर्थमपकीयंकशुद्धये। क्रियाविशेषान् कुर्वन्तः महान पण्डितमानिनः ।।३।। शनेः फालेन महता धराधीशो महामनाः । शास्त्रवि यो विनिश्चित्य सत्कार्याणि ततः परम् ।।८३६।। एतदर्थ त्वया चैवमेतत्तत्समनुष्टितम् । किलेविवचनं प्रोक्त्यावी( विक कृत्य च विशेषतः ॥८३७।। तस्य शक्तानुगुणो दण्डो ग्राह्यो विशेषतः । ततः पुनरिदं वाक्यमेवमेतादृशं लघु ८३८|| स्वया न फायं कर्मेति घोधयित्वा विशेषतः। विसर्जयन्टिक्षयित्वा तथा सरोधकानपि ॥८३६॥ समष्टपा पहयो भूयः प निरपराधिनम् । छात्कारेण तूष्णीकं कार्यकाले समागते 11८४011 पाधयेयुविषदमानासनम्ज्ञात्वा धर्मनो नृपः । शिक्षयेदेय विधिना हास्या तत्काय(१)वर्म घ ॥४ पा भक् सम्यगेव शनयां सत्परं तु तन् । एक पोत्रियमामे वीया श्यता पराम् ॥८४२॥ महत्वं व्यपदेश्यं प गुरुत्वमपि मया। आचार्यत्वं पटुत्वं शारोद्य(म)अनश्वरम् ॥८४ ग्राहयित्वा विशेषेण निगलेन च संवृतम् ||४|| imferi tamAR भागलादमान it grial informiriti III ममाinuifmirmitt Frmifaftar main m। भाकित मान पटना गान TTORE पल्या पगामि गाभागमा friपाम प्रत्येप गम्गा, न गमेन प्रपूर Ineral शसानामपि गूदाना सपना कारग। सया पुनम्माहगागामयुगाना विगतः ॥८॥ किमनि पचने तम्मिन मूगीर गनुरोपमे । पचनं सन्ट्रोत्रियस्य वेदशामयिनिरिंगसम | संभाव्य सर्वदा मर्वः मयलोकोपकारकम् । ये घा विरोधिनस्तस्य ते सय दण्डमागिनः 11tail वेदविरोधिनः । यत्करोति श्रोत्रियोऽसौ वचने नैव तत्परम् ।।८५१।। न तत्कतुं मूढशतं कि शक्तः प्रभवेददी । यो भुक्तिसमये मौात् ब्राह्मणानां समर्पितम् ॥८५२।। दत्तं तथा प्रोक्षितं च मन्त्रेण परिपेचितम् । विघातयेद्रूपयेद्वा पांसुभिर्भरमभिर्मदा |८५३।। उन्छिप्टेन पुरीपेण तथा तं सद्य एव वै। भवेयुरेव सततं मृदा दण्डविधानम् २६०६ मासर्वयनरूपेण विप्रसंख्यानुरूपतः । कारयित्वा ततः पश्चात् एकविप्रस्य पटशतम् ॥८५३|| पणान् दण्डं गृहीत्वा च सर्वेपां तत्र ये तथा। भोक्तं समुपविष्टानां पृथगेयं निरीक्ष्य वै ॥४५६|| सान पणान् तान्स्यीकृत्य ता वृत्तिमुपहत्य च। तद्वामिभ्योऽय का तस्य तत्प्रत्यर्थिन एय या १८५७} देशादुचाटयित्वाथ दद्यादेवाविशङ्कतः । विप्रवृत्तिस्तु विमेभ्यः एव देया न तु स्वयम् ॥८५८॥ हदाजा धर्मपरः हरन्सद्यः पतेदधः। एवं शूद्रश्वरेत्कोऽपि तस्य दण्डो वयस्ततः ।।८५६॥ हित्या इस्ती प्रथमतः निगले वसतिस्सदा । राक्षानिष्टप्रयतारं तस्येवाकोशकारिणम् १८६०॥ तन्मन्त्रस्य च भेत्तारं सत्पनीकृतसङ्गकम् । छित्या जिहां च शिश्नं प सद्यो दूराद्विसर्जयेत् ॥८६॥ म्यतने पितः सद्भिः भोजनादिषु फर्ममु । मोहयित्या सदा यादवराधाप्यचिन्तितम् ॥८६॥ समागता समये बियादेनंय फेपलम् । दुराशया भोफामः दूरीकुर्वन्परान्दिजान ॥८॥ दापनीयस्त्वसौ सम्यक् पतुर्विरातिकान पणान् । म आगतो यदि पयं भोई पत्र प य प ४६४१ २६४ अधिकान् प्रोत्रियान् कुर्यात् न्यूनानश्रोत्रियान्सदा ॥३॥ २६१० कपिलस्मृतिः तन्न तत्र च गच्छामः(मो) न मुजिघ्यामहे ततः । इत्यस्मिन् सङ्कटेर्थे तु विवादायागतो यदि ॥८६शा मुक्तिकाले दण्डनीयः नान्यकाले तदुक्तितः । भोजनेषु ब्राह्मणानां विवादे तु परस्परम् ।।८६६॥ संजाते सद्य एवास्य शान्ति कार्या न चेवृथा। हानिस्सुमहती घोरा जायते चोभयत्र तु १८६७ विवादे तादृशे शक्तः श्रोत्रियश्चेद्विशेपवित् । बहुभिस्तु विशेषेणाविद्यरश्रोत्रियैर्युतः ।।८६८|| यदि स्युः श्रोत्रियास्सन्तः वहवस्तत्र तैस्समम् । अश्रोत्रियस्त्वं यं चैकः विवदेन तु धर्मतः ।।८६६। परेपां तु सहायेन तद्वाक्यश्रवणादिना। न कर्म कुर्यात्किमपि साहसं वचनं तथा 1ell न वदेवापि तूष्णीकं किं तु तानखिलान्द्विजान् । संश्रित्यैव प्रणत्या च प्रियोक्त्या स्वरशानयेत् ।।८।। तानेतानखिलानो चेद्धानिरस्यैव जायते । यहुनाक्षणविपः तदुःखकरणं वृथा 1८७२|| धेयसो न भयंदेव तस्मान्नतु तथा चरेत् । कर्मणा मनमा याचा प्रयत्नेन समाचरेत् । मानभानचयेन्नित्यं ब्राह्मणानेय सोपयेत् ||८७४' भोजयेबामणानेव दातेभ्योऽनिशं धनम् । सर्वदेवमयो विप्रः सर्ववेदमयो द्विजः ।।८।।

तस्मान्न
विप्रमहत्ववर्णनम्
२६११
सर्वक्रतुस्वरूपश्च सर्वतीर्थसदाश्रयः ।
सर्वत्रतानि कृच्छाणि तपोसि बाह्मणः स्मृतः ।।८७६१५
सर्व धर्मास्स एवस्याच्छादानि नियमा अपि ।
ब्राह्मणेन विना किंचिदभिप्रेतं न सिद्धयति ।१८७६१
ब्राह्मणसमं किं भूतमिह विद्यते।
यस्याश्येन सदारनन्ति हव्यानि त्रिदिवौकसः 11८७८॥
फच्यानि चैव पितरः कि भूतमधिकं ततः ।
ब्राह्मणो जगम तीर्थ प्रवक्ता ब्राह्मणासुरः ।।८७६।।
अदाहकः पावकोऽयं चापो पायुरुच्यते ।
पद्मवन्धुरयं प्रोक्तः संत्यक्तारतमयोदयः १८८०१६
सुपात्रं सर्वदा नाना शुभानामारपदः पदः ।
अभाग्याज्ञानरोगाश्री:मृत्युदारिद्रयमारकः 11८८१॥
अफर्तुमन्यथाकतुं कतुं सर्व विचक्षणः ।
दुर्यानपि सहनशान पुरते क्षणात् १८८२)
नेतग्मादधिकं तुल्यं वस्त्वस्ति जगतीतले ।
हिरण्यगर्भत्रितयदानमात्रेण तत्क्षणात् ।।८८३॥
विमत्वं परमानोति पलो मात्र संशयः।
तत् पोहशमहादानप्रविष्ट काय घाइवे 1cal
करणादेय शेषाणो दानानो फरणे पुनः ।
चूदादेर्वेदमन्त्रैरते सम्यवारयितुर्यथा ॥४८॥
विधानवस्तुप्रभवेन् सतु विप्रमुग्वन ऐन्।
क्षत्रादि गुसतश्पेत्तु न युक्त प्रभवेदि सम् ॥४८॥

पिनमान:
गुलामादी गोमाग गरमा गया।
ज
दानममन्नामानि 11
पतंग पर मां गुगारित्राण गमनम् ।
पदोगनय मार्गग अप्रियादिमुगेन मंग ilal
यिप्रग्यतुः पाटिगंगने यिग्भिः शालोऽपि सन् ।
द्विमीयादीनि दानानि पत्र प्रागनियों call
चंदीग मैय मार्गेण कुयांदवामिनारयन् ।
महादानम्य नम्मा(म्याग्य कारणादेय कंवलम् Ireall
एकम्यापि ततः मशः तच्छिएं दानमणि।
वेदमार्गेण शक्रांति कतुं तत्कम तादृशम् ।।८६."
न साक्षा दमन्त्रोक्तीः तस्य संगच्छतेतराम् ।
ब्राह्मणस्य मुवनैव तदुक्तिम्तस्य तत्र वैEEJY
संगच्छते विशेषेण न तु स्वस्य विधीयते ।
त्रिवारं तेषु सर्वेषु कृतेषु तु ततः परम् IMEIN
तदुक्तावधिकारोऽपि मम्यक् संगच्छतेऽस्य तु |
यो वा दानानि सर्वाणि महान्ति घरमे वयः 11८६it
करोति भक्त्या शूद्रोऽपि तक्षणात्तेन कायवः ।
विष्णुलोकं प्रयात्येव महिम्ना तस्य केवलम् IIEI
हिरण्यगर्मदानस्य ,चतुवारकृतस्य • तु ।
महिम्ना वृषलस्यापि मौज्यामधिकृतिर्भवेन् ||६||

नानाविधिदानप्रकरणम् २६१३ ततोऽपि कृतया मौज्या शूद्रो ब्राह्मण्यमृच्छति । तुलाष्टादशधाज्ञेया तबादी राजता स्मृता Hell चामीकरमयी पश्चात्त्रपुसीसक्योरपि । औदुम्बरमयी पश्चात् कार्पासपटयोरपि csan गुडाज्यलयणक्षीरधिशाकमयाः परा:। माध्याकतिस्तलाना पैल्याको धान्यराशिमिः ||८|| चरमा सा प्रकथिता सप्तधान्यैः पृथक पृथक् । माम्यैरपि तथारध्यः विकरुपेन मनीषिभिः 180011 घरमा सा तुला क्षेया चतुर्दशविधैकका । प्राहकस्य नाह्मणस्य सद्योरक्षस्यदायिनी ॥१०॥ प्रायश्चित्तापनोचा मा न भवेदेय सर्वथा। सर्याण्यपि च दानानि तुलादीनि तु पोटश ।।६॥ ताहशान्येव सर्याणि नात्र कायर्या विचारणा। कर्तुत्सद्यस्मर्वपापनाशद्वारय फेयरम || मुक्तिदान्येय सर्वेषां यांनामविगेपतः । एतानि परमे काले यो पा मत्यों महामना: Neel मध्ये तेपो तुलादीनामप्येकं दानमुत्तमम् । परोति सपो मुक्ति at प्रनसायुज्यरक्षणम Heall अपसादेय मनुजो लभते नात्र संशयः । परमे जन्मनि नरस्तानि दानानि मानवः ॥१०॥ फरोत्येय नपान्यग्मिन् रहस्यं तन्मयोदिनम। दानं महतकपामप्ये भनिमान्नरः | गोमयोदाम गा (द) मितीयं परिकीर्तितम् IEE) कपिरतिः शाया ग माय! गुमनामदेव हि। गु समते दिनं समायापनाम देण्यगर्भ गान (4) गोमूत्र प्रगमं मनन् । दपिपरितमन्या गृतीयमिति तस्ःि। भीरपूरिसमन्या पतु पापभनम्म् ॥ घृतेन परिमं प्रादुः पधपातम्नाशनम् । संलं हिरण्यगर्भाग्यं गतो भिन्न प्रयक्षते ॥ail मधुना पुग्तिं पुण्यमत्यन्नामानवारकम् । तर्थक्षुरमसंपूर्ण महारौरवभीतिदम् ॥१॥ नारियलोदकः पूर्ण तयाम्भ:पूर्णमेकाम् । हरण्यगर्म परमं प्राहुदिन्या महर्षयः ।।६१३॥ एवं दशविधं प्रोक्त दानं पापापनोदकम् । हैरण्यगर्भसंज्ञं तन प्राहकस्यातिभीतिहम् ॥१४॥ तद्ब्रह्माण्डफटाहास्यं दानं सर्वार्धदायकम् । चतुर्दशविधं प्रोक्त भूर्भुवस्वादिभिः पदैः ।! अतुलादिपर्दश्वापि संयुक्त सर्वसिद्धिदम् । महादानं महाभूतिदायकं पापवृन्दहम् ॥१६॥ एपां यदेककं वापि कृतं चेनिसिलं कृतम् । तत्तत्कामनया चेत्तु चरेदेव तथा तथा IIEI तूष्णीकं परमेशस्य तुष्टये चेकृतं तु तत्। कर्तु.स्सायुज्यदं सद्यः वयापि तु पुनः परम् ।।६१८॥

नानाविधदानप्रकरणम् रहस्यमेकं यश्यामि प्राहकस्त्वस्य केवलम् । रक्षस्त्वं समवाप्नोति दाता सायुज्यमृच्छति ॥११॥ गोसहमतिश्लाघ्यं गोसत्रशतसन्निभम् । नीलादिभेदतस्तत्तु सप्तरूपं प्रचक्षते ॥१२॥ स्वर्णलालसंझं तदपरं दानमेककम् । मन्यादिभिविरचितं दातुस्सर्वफलप्रदम् ॥१२॥ नंतेन तुल्यमन्यन दानं दानोत्तमोत्तमम् । कामधेन्वाख्यकं पधादेयं. सर्वगुणान्वितम् ।।२।। हरिश्चन्द्रादिभिधोरेः राजभिः समनुष्ठितम् । सर्वयज्योपविनुतमपरं दानमेककम ॥२३॥ कल्पवृक्षाय देयदेयाय परमात्मनः । अतिसंग्रीतिजनक साः फेयल्पदायकम HEEN एवं महापरादानं गोमेधशततंनिभम । सांध्येतानि दानानि कतु रेय विपूर्वकम || पूराफलदं मेयं नान्यस्येति मुनिश्चितम् । एवं मर्याणि दानानि शपथ घ फंपलम् IMEDil नयम फन्यादानदातुम्सदमादकस्य । ঘায়েল যথায়ি कृता यदि 1800 सूर्यमालपर्यन्तं तिलराशि)ता यदि। (अ)ी शिरलोकपर्यन्तम्मा राशिगतमा 18rat मत्रपितोकपर्यन्तं पालका राशिरलमा। नम्त्यासा तु या संग्ला तापपंगसान IEEll मिति: दशानामपि पू साना शानामा रिगुः माय रामा मागपगुमागिया एकोगशवानी न जुटानां महनामपि पितृशामपि गयेंगा नरकोगाम MERH गच्याश्यमममलोकायानिकारकमुच्यते । दानुग्नु सगो विमानाय पुनरेय 17 नद्मद्यमायुज्यनामा मुगिकाग्यमय वै। तम्मान्नेतत् मर्ग दानं धमों वे तत्परः पुनः १९३३॥ सदेवतत्ममं दानं लामीनारायणप्रियम् । महासन्ततिसंवृद्धिकारकं कथितं महन् ॥१४॥ यथैतदेतत् परमं निरोपपिस्तारकम् । कुर्यादानं प्रशंसन्ति तथा तत्तनयस्य च ।।१३।। दानं पितॄणामत्यन्तकलिदुर्गातिकारकम् (01 पूर्ववत् कालसंग्या च वदितव्या विशेषतः ॥६३६॥ अस्मिन्नर्थे न सन्देहः एवमाह महर्षयः । यतये कन्यकादानं रसदानं च वणिनः ॥६३जा भिक्षादानं गृहस्थाय त्रयमेतद्विहितम् । तथार्थिनं मस्करिणं वर्णिनं चान्नकामुकम् ।।३।। भिक्षार्थिनं गृहस्थं च सद्यो राष्ट्रात्प्रवासयेन् । नूष्णी भिक्षा गृणन् ग्रामे वसन्तान्भक्षयन्वृथा ॥३ER नानाविधदानप्रकरणम् २६१७ विनय वेदाध्ययनं ब्रह्मचारी विशेषतः । दण्डनीयः प्रयलेन ताहनीयस्तदा तदा ॥६४०) राष्ट्रादु (द्वासयेत्तचा ) वेदाध्ययनतत्परम् । नित्यंभिक्षार्थिनोयन्नात् शाकसूपरसादिभिः ।।६४१|| भिक्षाप्रदानात्परतः तत्समाप्ति समाचरेत् । तावनमात्रेण ते वेदाः सर्वे शास्त्राणि चाङ्गः ॥६४२॥ तथा स्मृति पुराणानि (सेतिहासानि सर्वशः)। वणिमुक्तो पसूपरसाद्यदधिगोरसाः ॥६४३। हाटकक्षितिगोरजगजवादा भवन्ति । गृहाथस्य प्रतिदिनं गुह्यो धर्मः स्वयं महान् ॥६४४ यतेर्या वर्णिनोदत्ताः लवणव्यञ्जनादयः। भुक्तिकालेऽन्यहं नृणां प्रहिणः कामधेनवः ॥६४५५॥ कल्पवृक्षा भवेयुर्हि किं चैते ररसानवः । कन्याभूस्वर्णरनाश्वगजवाहनसंचया: 11६४६॥ यतियणि प्रदत्तारते गृहिणो नरकप्रदाः । भवेयुर्मात्र सन्देहः तभ्या(स्या) दद्यादतो न तान ।।६४७॥ गृहिणं त्वन्नभिक्षायै समागतमुदीक्ष्य ना। द्वितीयेऽहनि हुंकृत्य दूरमुद्वासयेब्रुवम् ॥६४८|| प्रथमेऽहनि घेदक्षः कि कार्य क्रियते स्वया। नेतः परं न फायं स्यादित्युक्त्वा तो प्रदापयेत् ।।१४६}} गच्छेत्युदिनाटयेत्तूष्णी द्वितीयेऽहनि चन्वे । यावन्तं तण्डुलान् प्रचारिणं यतिमेव वा HAVI

पुनः।
कम्पितिः
एदया विलोशा मा पुग्दरीहासमुन् ।
नायू परणि पागं गनिमयः कान TER
जातपं न शाम मुगपगुगमनम्।
गण्डलाम पालगडाये न दगागु कदामन ।
आगलाय भिम फरमाताभिमाननु ।
तागा निन्यं धान्यमय प्रदयं करपूरितम् ॥१३॥
यदि पवाशदधिकमयत्मरणग
तदा तण्डलयोग्यापि भवेदिति भृगोमतम् ॥१३॥
प्रतश्राद्धनिमित्तन याचिती यदि या त्वया ।
तत्पूर्तिमात्रदानेन गयाबाटपलं मयेन् ।
विधयाभिरनाथाभिः यत्राय यदि याचितः ।
तन्मनः पूरणं कुर्वन्नश्यमेधफलं भवेत् ।।६।।
पष्टिवर्षात्परं तासामनायानां तु याचने ।
भिक्षायामधिकारोऽस्ति तत्पूर्व नेति चाङ्गिरा: 11
वर्णिने यतये कन्यादानं शास्त्रविहितम् ।
विशेषेण घराताम्बूलद्वयं नरकप्रदम् ।।६५८।।
अपि यत्नात् श्राद्धदिने वर्णिने देवरूपिणे ।
देया स्यादक्षिणा तस्मै न ताम्बूलमिति श्रुतिः ॥६५॥
अतिने कन्यकादानं रसदानं (a) पुत्रिणे !
यागार्थिनेज्नदानं च कोटियज्ञफलप्रदम् ॥६६॥
वैश्वदेवावसाने तु ब्राह्मणो यश्व कश्चन(कश्चन)।
क्षुधार्ता पात्रभूतस्य वियोऽन्तर्वन्य एव च ॥६६॥

कन्यका विधुरा वाला: तीर्थादिवतचारकाः। ण्डाश्च विधवास्सर्व वर्णास्तेऽपि चतुर्विधाः ॥६६॥ बन्नदानकपात्राणि चण्डालान्तानि सूरिभिः । थित्तानि महाभागः क्षुरक्षामापन्नपात्रता ॥६६३१ हादानानि चामूनि तुलादीन्यधुना पुनः । कृष्णाजिनादीनि प्रायश्चित्तादिकरपि ॥६६४|| निवानि घोराणि ग्राहकरयैव सर्वगा। मात् खोदरपूर्त्यर्थगुरुद्रोहादिकं खरम् 118 ६५॥ दृदेवसखिद्रोह कुर्याद्वापदि निर्भयम् । तुलादिमहादानद्रव्यं सर्वात्मना स्पृशेत् ॥६६॥ ब्राह्मणगोमांसं मामांसं सुरादिकम् । येदापदि पुनः तत्र द्रव्यं न(सं)स्पृशेत् ॥६६७|| उनी च भगिनी भ्रातृपनी सुतामपि । चित् कामतोगच्छेत् तुलाद्रव्यं तु न स्पृशेत् ।।६६८॥ न्मिद्यपान वा गोमांसं वापि भक्षयेत् । द्वा ब्रह्महत्यां च भ्रूणहत्या तथा विधाम् ॥६६॥ स्या तु था कुर्यात् तुलाद्रव्यं तु न स्पृशेत् । या मातरं गच्छेत् तुलाद्रव्यं तु न शेत् ॥७॥ त्तिशतश्चापि तीर्थकोटिशवैरपि । तिकृच्छ्चान्द्राद्य तद्रास्वं न नश्यति ॥१७॥ पां पुनः प्रायश्चित्तशास्त्रं पृथा भवेत् । सति तस्यापि प्रत्युत्तरमिहोच्यते ॥६७२|| मधारादिमु संगृप येन केन प्रकारतः 118011 कपिटरमृतिः आदो प्रतिवसन्तस्य वसन्ते सोमयाजिनः । संकल्पकाल आध्यस्य दैवान्नष्टश्रिया पुनः ॥६ तद्विच्छित्तिर्दशायां चेद्यन केनाप्युपायतः। कर्तव्यत्वेन चोक्तस्य सामोत्करणे तथा ilavell तस्य प्रतिवसन्तस्य तादृशं दानमेककम् । प्रतिगृह्य विधानेन तद्र्व्यस्य तुरीयकम् ॥६७५ त्यागं कृत्वा चित्तमपि तेन द्रव्येण तत्परम् । अनुष्ठितस्सप्ततन्तुः यदि तद्वत्सु चाखिलम् ॥६॥ विनियुक्त सत्र सममात्र एवान्य तादृशः। तद्रव्यं तत्पदं न स्यादेव यागाय यत्कृतम् ।।६७ सत्सवं तस्य दोपाय न भवेदेव सर्वया । प्रतसंवत्सरं यायज्जीवं चैव विधानतः ॥६७11 मंकल्पितस्य यज्ञस्य विपये ब्राझणस्य चेत् । सर्वप्रतिप्रहेणापि न दोष इति सा श्रुतिः ६|| भ्रष्टाढा पतिताद्वापि पापण्डान्नास्तिकादपि । पदालारायनान्म्लेच्छात्प्रतिगृहापि सं मनुम् ॥६८all यजेन विधियद्विप्रायमेय यस्तथा। दौनांग्यविनाशाय विच्छितो येदिवेदयोः ।।६८१॥ अनिपापादनिगलादनिनीचादनन्दितः । अप्रिटोमम्मनुष्यः प्रथमोऽय प्रथमोऽयं अनुभवेत् । मायानुवानमात्रेण दौनिय विनश्यति ॥६.८ दुष्कर्मणोप्रायश्चित्तवर्णनम् अत्यमिष्ट्रोममुरन्यान्तान् कमात्र पद्धदितः परम् । सद्रव्येणेष विधिना न्यायव्यन धर्मवित् ।।६|| यजेतत्र्यं पुरोक्तन न मार्गेण कदापन । दौमांमध्ये परिहते येन फेन प्रकारतः 116.८३|| तदुत्तरममाणों घेदनुमानस्य शून्यतः। अमापात्प्रत्यवायत्य फरणं मास्तु पूर्ववत १ECAll कर्मणो यस्य वा लोके समनुष्ठानशून्यतः । अमवेत्तत्यवायोऽयं कर्मणस्ताय केवलम् ॥६.८५|| अत्यन्तावश्यकत्येन फतव्यत्वं प्रकीर्तितम् । तदिनानां कर्मणश्चेन् करणेऽभ्युदयं परम् ।।६.८८ll पुनस्त्वकरणे तेपी प्रत्यवायो न विद्यते । पश्चपातकभिन्नाना पातकानां द्विजन्मनाम् 11888) गायत्री जप एवस्यान्निप्कृतिः शाखसमता। शतं सहसमयुतं नियुतं न्यधुंदं तथा 18500 तत्सत्कार्यानुगुण्येन व्याहृतीनो अपोऽयया । सोमातिरेकादिषु च महादानादिपु कचित् ॥६६॥ उपनीतिः पुनरपि फरकर्मसु केवलम् । परगर्मादिकं चापि कार्यमेवेति निष्कृतो IMER प्रवदन्ति महात्मानः नदीनानादिकानि च। कच्छप्रतिनिधित्वेन केचिदाहुश्च पापिनाम् ॥६EAI

म मागे।
कपिटमनः
अनुपहाग मौसमकारणाय
पुरूषण प नी(नाम शिवगं तया IFE?
गैरणयगायध्या शामा नोपनिर वा।
त्रियम्यकमिदं विष्णुपादकानारकाः स्मृताः ।।
मयंप्यपि
प त्येर कपिलेनेदीरितम् ।
धर्मशाग्नं महामारं मलोकोपकारकम् ।
पठन भगयाद्विजो नित्यमश्यमेधफल मंत्1Eli
।। इति कपिलम्मृतिम्समाना ।
ॐ तत्सद्ग्रझापणमस्तु ।

॥ श्री गणेशायनमः॥
* वाधूलस्मृतिः *
नित्यकर्मविधिवर्णनम्
वाधूलं मुनिमासीनमभिगम्य महर्षयः
प्रतिपूज्य यथान्यायमिदं वचनम यन् ॥१॥
भगवन ब्राह्मणादीनामाचारं वद तत्वतः ।
तरछ, त्वा मुनि शार्दूलरतानृपीन् प्राह धर्मवित् ।।२।।
बाह्मान्मुहूर्तादारभ्य त्रिकाले विहितं तथा ।
नित्यनैमित्तिकं चैव प्रवक्ष्यामि यथामति ॥३॥
माझ मुहूर्ते संपात सक्तनिद्रः प्रसन्नधीः ।
प्रक्षाल्य पादावाचम्य हरिसंकीर्तनं चरेत् ॥४॥
माझ मुहूर्त निद्रा च कुरुते सर्वदा तु यः ।
अशुचि तं विजानीयादनहः सर्वकर्मसु ॥ ५॥
नक्षत्रज्योतिरारभ्य सूर्यस्योदयनं प्रति ।
प्रातः सन्ध्येति तो प्राहुः श्रुतयो मुनिसत्तमाः ॥६॥
प्रातः सन्ध्या सनक्षत्रामुपासीत ययाविधि ।
सादिस्या पश्चिमा सन्ध्यामपस्तिमित भास्कराम् ।
दिवा सल्यासु फर्णस्थो ब्रह्मसूत्र उदरमुसः ।
फुर्यान्मूबपुरीपे तु रात्रौ चेहक्षिणामुखः ॥८॥

याभूलम्मतिः अयगुण्ठितसागः गदाय मेदिनीम। प्राणारये वाससायाम मलमूत्र त्यजेयुधः ।।६।। अमात्य शिरी यानु यिनं राजनि द्विजः। तच्दिरः शतधा भूयादिति वेदाः शान्ति नम 112010 उत्याय वामहम्तेन गृहीत्वा चोर्यमेट्नम । शौचदेशमथाभ्येत्य कुर्याच्छौचं मृदम्युभिः ||११|| अरनिमात्रमुत्सृज्य कुर्याच्छौचमनुद्धृते । पश्चात्तच्छोधयेत्तीर्थमन्यथा न शुचिर्मवेत् ॥१२॥ विदछौचं प्रथमं कुर्यान्मूत्रशोचं ततः परम् । पादशौचं ततः कुर्यात् करशीचं ततः परम् ॥१३॥ पञ्चधा लिङ्गशौचं स्याद्गुदशीचं विवेष्टितम् । पादयोलिङ्गवच्छौचं हस्तयोस्तु चतुर्गुणम् ॥१४॥ एतच्छौचं गृहस्थानां द्विगुणं ब्रह्मचारिणाम् । त्रिगुणं तु बनस्थानां यतीनां तु चतुर्गुणम् ॥१५॥ यदिवा विहितं शौचं तदधं निशि कीर्तितम् । तदर्धमातुरे प्रोक्तमातुरस्यार्धमध्वनि ॥१६|| विभूत्रकरणात्पूर्वमादद्यान्मृत्तिको तदा । अददानस्तु तो पश्चात्सवासा जलमाविशेत् ॥१७॥ आर्द्रामलकमात्रास्तु प्रासा इन्दुमते स्मृताः। तथैवाहुतयः सर्वाः शौचार्थे याश्च मृत्तिकाः ॥al दिविधं प्रोक्त बाह्यमाभ्यन्तरं तथा!

-
नित्यकर्मविधिवर्णनम्
सदा कार्यः तन्मूलो हि द्विजः स्मृतः ।
रविहीनस्य समस्ता निष्फला.क्रियाः ॥२०॥
नुः शुचौ देश उपविष्ट उदङ्मुखः ।
ब्राह्मण तीर्थन द्विजो नित्यमुपस्पृशेत् ॥२शा
कृतिहस्तेन मापममजलं पिवेत् ।
मधिकं पीत्वा मुरापानसमं भवेत् ॥२२॥
लिना तोयं गृहीत्वा पाणिना द्विजः।
मुकनिष्ठे तु शिष्टेनाचमनं भवेत् ॥२३॥
य शुचौ देशे प्रामुखो ब्रह्मसूत्रधृत् ()।
= कुशकरो द्विजः शुचिरुपस्पृशेत् ॥२४||
साप्तासु हृदयं ब्राह्मणः शुद्धतामियात् ।
: कण्ठतालुस्पृक् वैश्यः शूद्रः तथा नियः ॥२५॥
नण हस्तेन कुर्यादाचमनक्रियाम् ।
तत्पवित्रं तुभुवत्योच्छिष्टं तु वर्जयेत् ॥२६॥
E: पिवेत्तोयं कुशहरतः सदाऽऽचमेत् ।
कुराहस्तस्तु न कदाचिदुपस्पृशेत् ॥२७॥
दीनि तीर्थानि गङ्गाद्याः सरितस्तथा।
दक्षिणे कर्णे सन्तीति मनुरप्रवीत् ॥२८॥
सोदड्मुखो वापि समाचम्य विशुध्यति ।
पुनराचम्य याम्या सानेन शुभ्यति IRell
डासा जले कुर्यात् तर्पणाचमनं जपम् ।
सा: स्थले कुर्यात्तर्पणाचमनं अपम् ॥३०॥

पानागीने का दन्ताना काप्ठसंयोगो दहत्यासनम कुलम् ॥३al प्रातरभ्यक्तदेहस्य निष्कृतिन विधीयते ॥४ स मातोऽन्दशतं साह्न गङ्गायां नात्र संशयःrmall ratnATI ! Farmint arrett R" format arti भाt it PATTA समोर मा THINK Triram प्रभाग पा लोप पार गमामिः । भापाय प्रागुगः समापनमायोग 1.३१ आयुगनं पोषण: प्रताः पशुपनि । प्रा प्र मेधा नमो नारी ॥३२ यानु गपमम नान्या पायर्यापनम् । कुर्वीत यदि मूहान्मा नग्म पनि निः३ अलामे दन्तकामाना प्रतिपिदिनेण्यपि । अपी पोहरागण्डपः मुमशुटिभविष्यति ॥३॥ प्रतिपत्पर्यषष्ठीपु नयमी द्वादशी नया। लिसदेहोऽपि लाभ्यनं महाराज ब्राह्मणानां करोति यः। सुरया प्रायश्चित्तीयते द्वितः। द्रव्यान्तरयुत तैलं न कदाचन दुष्यति । त संसित प्रदणेऽपि न हानि l

स्नानविधिवर्णनम्
२६२७
मन्त्यश्वपाकानां पृष्ट्वा स्नानं समाचरेत् ।
रिंशत्पदादूवं छायादोपो न विद्यते ॥४२||
यस्पर्शने चैव त्रयोदशनिमज्जनम् ।
न्य प्रयत: पश्चात्स्नानं विधिषदाचरेत् ।।४।।
भिभूता या नारी रजसा च परिप्लुता ।
तस्या भवेच्छौचं शुध्यते केन कर्मणा ||४||
हनि संप्राप्त स्पृशेदन्या तु ता स्त्रियम् ।
चैलाचगाह्यापः स्नात्वा स्नात्वा पुनः रघुशेत् ।।४५||
द्वादशकृत्वो वा ह्याचामेच पुनः पुनः ।
च पाससा त्यागः ततः शुद्धा भवेत्तु सा ।।४।।
छत्तया ततो दानं पुण्याहेन पिशुध्यति ।
वाभिप्लुते नायौं संभाषेता मिथो यदि ॥४॥
सं तयोराहुरशुद्धी शुद्धिकारणम् ।
च सूतके चैव ह्यन्तरा चेतुर्भवेन् ॥४८॥!
त्या भोजनं कुर्याद् भुक्त्वा चोपवसेदहः ।
। वासुदेवस्य यः स्नाति स्पर्शशवया ॥४६||
भाः पितरस्तस्य पतन्ति नरके क्षणात् ।
व्यस्पर्शने वान्तौ अश्रुपाते क्ष्ते भगे ॥५॥
नैमित्तिकं ज्ञेयं देवपिपितृपजितम् ।
न्यम्भः समानिस्युः सर्याण्यम्भासि भूतले ॥२१॥
यान्यपि सोमार्कप्रहणे नात्र संशयः ।
त्रियः श्रोत्रियो या अपात्रं पात्रमेव का ॥२॥

याधूलस्मृतिः विप्र वो या विप्रो या ग्रहणे दानमर्हति । मवं भूमिसमं दानं सयों ब्रह्मसमो द्विजः ॥३|| सर्व गङ्गासमं तोयं ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः। प्रातराचमनं कृत्या शोचं कृत्वा यथाविधि ॥१४॥ दन्तशीचं ततः कृत्वा प्रातः स्नानं ममाचरेत । द्वौ हस्तौ युग्मतः कृत्या पूरयेदुदकाञ्जलिम् ॥१५॥ गोशङ्गमात्रमुद्धृत्य जलमध्ये जलं क्षिपेत् । येन तीर्थेन गृहीयात् तेन दद्याज्जलालिम् ॥५६॥ अन्यतीर्थेन गृहीयात्तत्तोयं रुधिरं भवेत् । पूर्वाशाभिमुखो देवानुत्तराभिमुखस्त्वृपोन् ॥५॥ पितृस्तु दक्षिणास्यस्तु जलमध्ये तु तर्पयेत् । स्नानाथमभिगच्छन्तं देवाः पितृगणैः सह ।।५८i वायुभूतास्तु गच्छन्ति तृपार्ताः सलिलार्थिनः। पीडयेद्वनमकृत्वा पितृतर्पणम् ॥६॥ निराशास्ते निवर्तन्ते वखनिप्पीडने कृते । नम्मान पीडयेद्वस्त्रं ये के च इति मन्त्रतः ।।६।। वस्त्रं चतुर्गुणीकृत्य निष्पीड्य च जलादहिः । यामप्रकोप्टे निक्षिप्य द्विराचम्य शुचिर्भवेत् ।।६।। मनुष्यतपणे चैय स्नानयम्वनिपीडने। निवीनी तु मद्विभरतया मूत्रपुरीषयोः ।।६।। नदीयु देवमातेपु गिरिप्रययणेषु च। तस्मान्न + । स्नानप्रकरणम् २७२६ यनिपानेषु न स्नाया कदाचन । नकर्तुः स्नात्वा तु दुष्कृतांशेन लिप्यते ॥१४॥ योपात्तवित्तस्य पतितस्य च वाधु पेः। लात्वा च पीत्या च प्राजापत्यं समाचरेत् ।।६।। यः खातिता. कूपा: तटाका वाप्य एव च । नात्वा च पीत्वा च प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥६६॥ यनिपानेषु यदि स्नायात्कथंचन । नेण्डान् समुद्धृत्य तत्र स्नानं समाचरेत् ॥६७। स्वेदसमाकीर्णः शयनादुत्थितः पुमान् । -चं तं विजानीयादनहः सर्वकर्मसु ॥६॥ मूलाः क्रियाः सर्वाः सन्ध्योपासनमेव च । नाचारविहीनस्य सर्वाः स्युः निष्फलाः क्रियाः ॥६॥ (पस्यु)पसि यस्नानं सन्ध्यायामुदितेऽपि वा। उपत्येन तत्तुल्यं महापातकनाशनम् ॥७०) वस्त्रेण यः कुर्यादेहत्य परिमार्जनम् । लीई भवेद्गानं पुनः स्नानेन शुध्यति ॥७॥ काले भानुवारे यो नर स्नानमाचरेत् । सनानसहस्राणि गङ्गायमुनसगमे १७२|| * वैधृती पुण्ये व्यतीपाते च संक्रमे। यो घ नदीनानं खुलकोटि समुद्धरेत् ॥७३|| व्यमपि दुर्वाणो भुञ्जानोऽपि यतस्ततः । चिनारकं दुःखं प्रात स्नायी न पश्यति इक्षा आपो अस्मानीतिऋचामुक्त्वा मजनमाचरेत् ।।४।। यान पिना नानेन गो मुणगमनासीन मंशाः । अग्नानागी म मुरग पग पूर्णगोजिनम अनुनागी कृमि गुदन अदागा विमग्नुते । मंसम्पपटनं मानं पापमम देवगिनणं गैप ग्नानं भालमियने । हिरण्ययनामिन्युफ्रया जलं गमयगायन " मुमित्रा इत्युदात्य म्यात्मानमभिपये। दुर्मिग्रा इन्युदाहटर गृम्यान जसमु गृजेत 11 योऽम्मान प्रीत्युदाइन्य मया त जलं क्षिपन् । यं प पयं द्विप्म इति पुनम्ना जलं क्षिपेत् ।।६।। एवं वित्तिकास्नाने जलमञ्जलिनोत्सृजेत् । नमोऽनयेति मन्त्रेण नमस्कुयांन् जलं ततः ।।८।। यदपामित्यमेध्यांशं निरस्येद्दक्षिण जलम् । अत्याशनादितिद्वाभ्यां त्रिरालोड्य तु पाणिना ॥१॥ चतुरनं तीर्यपीठं पाणिनोल्लिरन्य वारिपु। नन्दिनीत्यादिनामानि बद्धाञ्जलिपुटो भवेत् ॥ आवाहयामि त्वां देवि स्नानार्थमिह सुन्दरि । पहि गङ्गे नमस्तुभ्यं सर्वतीर्थसमन्विते ॥३॥ इमं मेगग इत्युक्त्वा पुण्यतीर्थानि च स्मरेत् । आपोहिष्टादिभिर्मन्त्रैरभिप्रोक्ष्य च वारिभिः। ततो नारायण स्मृत्वा प्रजपेयमर्पणम् ।।८।।

स्नानप्रकरणम् पणसूक्तस्य ऋपिरेवाघमर्पणः । नुष्टुप् तथा देवो भाववृत्तोऽधिदेवता ॥८६॥ मष्टवारं या निमग्न्यात्तजले जपेत् । स्य मन्त्रेण पुनः प्रोक्षणमाचरेत् ।।८।। ज्वलति मन्त्रेण प्राशयेन्मवितं जलम् । कार्यमन्त्रं तु पुनः मज्जन् जले जपेत् ।।८।। गोरिति मन्त्रेण मज्जेदप्सु पुनः पुनः । 7 वैष्णवी पा विप्णोः संस्मरणाय वे 11८६|| ह्याप्रतिग्राह्य भुक्त्वा चाभक्ष्यभक्षणम् । गोरित्यपा मध्ये सकृज्जप्त्वा यिशुध्यति ।।६011 च द्विराचम्य देवादीस्तर्पयेत्ततः । वहन्तीरिति च तृप्यतेतिस्थले क्षिपेत् ॥६॥ वस्त्रेणहस्तेन यो द्विजोऽङ्गं प्रमार्जति । भवति तन्नानं पुनः स्नानेन शुध्यति HERII नद्वनशेपेण नोत्तरीयेण या शिरः। निधुनुयाकेशान न तिष्ठन परिमार्जयेत् ।।४।। कृत्या वस्त्रं तु अर्ध्वमुदा(सारयेद्विजः । चस्मभस्ताच्चे पुनः स्नानेन शुध्यति ॥६॥ सन्ध्यामुपासीत वस्त्रसंशोधपूर्विकाम् । य मध्यमा सन्ध्या ववनिष्पीडनं परम् ॥६६॥ मूलाः क्रियाः सर्वाः सन्ध्योपासननेव च । सर्वप्रयत्नेन स्तानं कुर्यादतन्द्रितः ॥६७) २३३२ चाधूलस्मृतिः प्रातरुत्थाय यो विप्रः प्रातः स्नायी सदा भवेन् । सर्वपापविनिमुक्तः परं ब्रह्माधिगच्छति ||sal अन्तराच्छाद्य कोपीनं वाससी परिधाय च। उत्तरीयं समादद्यात् तद्विना नाचरेत्रियाः॥ यज्ञोपवीतवद्धार्यमुत्तरीयं सदा द्विजैः । वन्दने तर्पणे चैव कट्यामेव च धारयेत् ।।६।। मुखजानामूर्ध्वपुण्ई तिलकं याहुजन्मनाम् । पदाकारमूरुजानां त्रिपुण्डू पादजन्मनाम् ||१००ll धृतोर्ध्वपुण्डः परमीशितारं विष्णुं परं घ्यायति महात्मा । स्वरेण मन्त्रेण सदा हदिस्थितं परात्परं यन्महतो महान्तम् ।।१०।। महोपनिषदि प्रोक्तमूर्ध्वपुण्डू परं शुभम् । धृतोध्यपुण्ड. कृतचक्रवारी नारायणं सांख्ययोगाधिगम्यम् । मात्या विमुच्येत नरः समस्तैः मंमारपाशैरिह चैति विष्णुम् ॥१२॥ अथर्वशिरमि प्रोन मूर्ध्वपुण्डयिधि द्विजा । प्रवक्ष्यामि दिनाचं वो भयपापणाशनम् ॥१३॥ रः पादाकृति रायमात्मनश्रहिताय वै । मध्यदिन्दन्नूभ्वंपुष्ट यो धारयनि मर्वदा ।।१०।।

द्विजः पुण्डूमजु
अर्ध्वपुण्ड्रमहत्ववर्णनम्
स परस्य प्रियोनित्यं पुण्यभाक मुक्तिभाग्भवेत् ।
चतुरहुलमूनि द्वघडलं विस्तृतं मृदा ॥१०॥
सौम्य सान्तरालं तु धारयेत्।
अर्ध्वगत्यो तु यस्येच्छा तस्योध्वं पुण्ड्रमुच्यते ॥२०६॥
अर्श्वगत्यां तु देवत्वं स प्राप्नोति न संशयः ।
पर्वताने नदीतीरे विष्णु ने विशेषतः ॥१०७।।
सिन्धुतीरेऽय चल्मीके तुलसीमूलमाथिते ।
मृद एतास्तु संप्राधा वयश्चिान्याश्च मृत्तिकाः ॥१०८11
श्याम शान्तिकरं प्रोक्तं रक्त वश्यकरं भवेत् ।
श्रीकर पीतमित्याहुमोक्षदं श्वेतमुच्यते ॥१०॥
अप्ठः पुष्टिदः प्रोक्तो मध्यमा पुष्करी भयेन ।
अनामिकामदा नित्य तर्जनी मुचिमुक्तिदा ॥११०।।
अभिषिकतु यच्चूर्ण विष्णुविम्ये तु यो नरः ।
हारिद्रधारयेन्नित्यं सोश्यमेधपर लभेत् ।।११।।
अनागतां तु ये पूर्वी अनतीतां तु पश्चिमाम् ।
सन्ध्या नोपासते विप्राः कथं ते माक्षणा: स्मृताः ॥११॥
यावन्तोऽस्यां पृथिव्यां तु विकर्मरथा द्विजातयः ।
पाहि पापनार्थाय सन्ध्या स्टा स्वयंभुवा ॥११३||
गायत्री नाम पूर्या साविधी मध्यमे दिने।
सरस्वतीय साया सैय सन्ध्या विधा स्मृता ॥११ता
प्रतिपदादषयोपारपातकादुपपातकान् ।
गायत्री मोप्यते दामाम् गायन्नं वायते यतः ॥११॥

माmt:
गगनाना मानिकाला।
जगर प्रमवित्रीय गा मा ११
भागदगपा पुमान मुगाः।
प्रतिप्रायपुfrint परे पर 24
विमोची पेमभी गाग भपाय ।
गंपमा पार्न मानाने नियति ॥1
ग्जागो मोदतानान जाप्रम्पमानिनाम् ।
पाहमनःकायजान दोगामीतान नयमित ॥११॥
नयप्रणययुगन पापी दिप्टेल्यपन प।
मंयत्मगतं पापं मानान्त यिनश्यति ॥pil
ऋगन्ते माननं कुर्यान पादान्ते या ममाहितः ।
तृचम्यान्तेऽथया फुयांच्छिष्टानां मतमीहराम ॥१२॥
पश्चादुभाभ्या हस्नाभ्यां परिपिच्य यथाक्रमम् ।
सूर्यश्चेति जलं पीत्या दधिक्रायति मार्जयेत् ॥१२]
पश्चादुभाभ्यां हस्ताभ्यां धादायापः समाहितः ।
रवेरभिमुम्वस्तिप्टन तारव्याहृति पूर्वया ।।१२३॥
गायत्र्या चाभिमन्त्र्याय निक्षिपेद्विजसत्तमः।
तिप्टन पादौ समौकृत्वा जलेनाख़लिपूरणम् ॥१२॥
गोगमात्रमुत्सृज्य जलमध्ये जलं क्षिपेत् ।
सायं काले तु यो विप्रो जलेत्यव्यं विनिक्षिपेत् ।।१२।।
स मूढो नरकं याति यावदाभूतसंप्लवम् ।
यत्र सन्ध्या प्रकुर्वीत तत्रैष जपमाचरेत् ॥१२॥

तथा
सन्ध्याविधिवर्णनम्
अन्यत्र तु जपं कुर्वन् पुनः सन्ध्यां समाचरेत ।
वेदोदितानां नित्यानां कर्मणां समतिक्रमे ॥१२७||
स्नातकत्रतलोपे च दिनमेकमभोजनम् ।
अर्ध्यप्रदानतः पूर्वमुदयास्तमये सति ॥१२८॥
गायत्र्यटशन जायं प्रायश्चित्तं द्विजातिभिः ।
तन प्रातरतिकामेदुपवासोऽहरुच्यते ॥१२६||
सायमतिकामेदात्रि चोपवसेद्विजः ।
यदद्यकच्चं वृत्रहन प्रातरयमनुस्मृतः ॥३०॥
उच्छेदभीतिमध्याह्न प्रायश्चित्ताय उच्यते ।
न तस्येति च सायाह्न ततोऽस्त्रमुपसंहरेत् ।।१३।।
सूतके मृतके वापि सन्ध्याकर्म न संत्यजेत् ।
मनसोचारयेन्मन्नान प्राणायाममृते द्विजः ।।१३।।
प्रपावन तु संयुक्ता व्याहतीः सप्त नित्यशः ।
सावित्री शिरसा साधं मनसा नि:पठेद्विजः ।।१३३।।
देवार्चने जपे होमे स्वाध्याये श्राद्धकर्मणि ।
ग्नाने दाने तथा ध्याने प्राणायामास्त्रयनयः॥१३॥
आदावन्ते च गायत्र्या प्राणायामानयत्रयः ।
सन्ध्यायामयंदाने च प्राणायामाः सत्सकृत् ।।१३५११
अङ्गुष्ठानामिकाभ्यां तु तथैव च कनिष्टया ।
प्राणायामस्तु फर्तव्यः मध्यमा तर्जनी विना ॥१३६॥
तर्जनी मध्यमारपृष्ट्या अपन शूद्रसमो भवेन् ।
। पृत्वोत्तानी,करो प्रातः सायंचाधोमुखी करौ ॥१३७॥

न वाधूलरमृतिः मध्येस्कन्धभुजाभ्यां तु जप एवमुदाहृतः । अघोहम्तं तु पैशाचं मध्यहस्तं तु राक्षसम् ।।१३८।। यद्धहस्तं तु गान्धर्वमूर्ध्वहस्तं तु देवतम् । प्रदक्षिणे प्रणामे च पूजायां हवने जपे ॥१३॥ कण्ठावृत्तवस्त्रः स्यादर्शने गुरुदेवयोः । दर्भहीना च या सन्ध्या यञ्च दानं विनोदकम् ।।१४।। असंख्यातं च यजप्त तत्सर्व निष्फलं भवेत् । जपस्य गणना प्राहुः पद्माक्षः भक्तिवर्धनम् ॥१४॥ जपेत्तु तुलसीकाप्ठैः फलमक्षयमश्नुते । अच्छिन्नपादा गायत्री ब्रह्महत्यां प्रयच्छति ।।१४।। छिन्नपादा तु गायत्री ब्रह्महत्यां व्यपोहति । गृहस्थो ब्रह्मचारी च शतमष्टोत्तरं जपेत् ।।१४।। वानप्रस्यो यतिश्चैव जपेदष्टसहस्रकम् । प्रस्यधान्यं चतु.पप्टेराहुतेः परिकीर्तितम् ॥१४४॥ तिलाना तु तदधं स्यात्तदधं स्यावृतस्य (१) च । आत्मारदाप्मु मम्जेद्वा वदेद्वा पतितादिभिः ।।१४।। अथपा योपिनं गच्छेदनृतौ काममोदितः। यदन्त्येषु निमित्तेपु फेचिदपिविनाशनम् ॥१४६॥ आपस्तम्यस्य तन्नेष्टमात्मारूदः सदा गुचिः। यस्य भायां विदूरस्या पतिता या रजस्वला ॥१४॥ अनिष्टा प्रतिकूला या सस्या: प्रतिनिधी किया। अन्ये कुशमी पत्री त्या तु प्रतिरूपिकाम् ।।१४८॥

- गृहस्थधर्मवर्णनम् केचिच्छरमयी पनी नित्यकर्मणि कारयेत् । होमार्थ गोघृतं ग्राद्य तदलाभे तु माहियम् ॥१४६।। आज या उदलाभे तु साक्षात्तैलं प्रहिप्यते। यः शूद्रादधिगम्यार्थमग्निहोत्रं करोति चेत् ॥१५०५ दाता तत्फलमानोति कर्ता तु नरकं ब्रजेत् । ऋत्विजस्ते हि शूद्राः स्युः ब्रह्मवादिषु गर्हिताः ॥१५११॥ मेरुमन्दरतुल्यानि वाजपेयशतानि च । कन्याकोटिप्रदानं च समं सामयिकाहुतेः ॥१५२|| कृतदारो न वै तिप्ठेत् क्षणमप्यसिना विना । तिष्ठेत द्विजो ब्राह्म त्यक्त्वा तु पतितो भवेत् ॥१५३।। समिदात्मसमारूढो द्विकालमहुतस्तथा । धारणानिश्चतुरिं स पहिलौकिको भवेत् ॥१५४।। आरोपिताग्नेः समिधातु नाशे सीमादिलंधे च परामिवेश। अयाश्च मन्त्रेण चतुर्य होत्या तेनैव मन्त्रेण सकृन्नुहोति ।१५।। ब्रह्मयज्ञे जपेत्सूक्त पौरुषं चिन्तयन् हरिम् । स सर्वान् जपते वेदान् सांगोपांगविधानतः ॥१५६१ वेदाक्षराणि यावन्ति नियुज्यादर्थकारणात् । द्वावती ब्रह्महत्यां वै वेदविक्रव्यवाप्नुयात् ।।१५७॥ प्रख्यापनं प्राध्ययनं प्रभपूर्व प्रतिप्रहः । याजनाध्यापने वादः पविधो वेदविक्रयः ।।१५।।

पापरमिः
आग्यारे ग शौक ग मन्यात गुगादिः ।
नाहरगलगोत्रं मागाडापमानः ||
गंकानया पागोरो दास्या निशिगम्पयोः ।
मुलमी ये यिगिन्यन्ति गन्नि हरे: शिर:kat
नौ पापं न पुगीन न गुगाम प्रतिपादम् ।
दुसरं पानकं सो दुध प्रतिप्रहः ॥१६॥
ऋतामृताभ्यां जीवन मृतेन अमृतेन था।
सत्यानृताभ्यामपि या न श्यगृत्त्या कथंचन ॥१६॥
यो रानः प्रतिगृहाच शोचितव्ये प्राप्यति ।
न जानाति किलात्मानं विष्ठाकूपे निपातितम् ।।१३।।
नृणं वा यदि वा काष्ठं मूलं वा यदि या फलम् ।
अनापृष्ट्वैव गृहीयादस्तवेदनमहति ॥१६॥
वानस्पत्यं मूलफलं दावग्न्यथं तृणानि च।
तृणं च गोभ्यो प्रासार्यमस्तेयं मनुस्म्रवीत् ।।१६।।
भ्रूणहत्या प्रसिद्धि ( वाघुपि) च तुलायां समतोलयन
प्रतिष्ठद्म पहा कोट्यां वाधुपिः समकम्पत ॥१६६।।
अयाचिताहृतं ग्राह्यमपि दुष्कृतकर्मणः ।
अन्यत्र कुलदा (पा)(Ei) पण्डपतितेभ्यः(स)तया द्विपः
महापातकिनचोरादम्वष्ठादिपजस्तथा।
मृगयोः (टा)पिशुनाच्चैव नादद्यादाहृतं द्विजः ॥१६जा
कुलदा(पा) पण्डपतितवैरिभ्यः काकिणीमपि ।
उद्यतामपि गृहीयादापद्यपि, कदाचन, ॥१६॥

गृहस्थधर्मवर्णनम् परार्थ तिलहोतारं परार्थ मन्त्रजापिनम् । मातापित्रोरपोष्टारं दृष्ट्या चक्षुनिमीटयेत् ॥१६॥ कुक्कुटश्यानमा रान पोपयन्ति दिनत्रयम | ४६ अन्मनि शूद्रत्वं मृतः श्वा चाभिजायते ॥१४!! परहिसारताः करा: परदारपरायणाः। परदव्यापहारी घ चण्डाला यस्तु निर्दयः ॥७॥ नगरे पट्टणं पापि सावं तु यो घसेन । स जीयन्नेय शूद्रत्वमाशु गसति सान्वयः ॥१७॥ राजाश्रयेण यो मयों द्वादशारद बसेरादि । जीयमानो भवेच्या नात्र कार्या विचारणा ॥१५॥ अनुनात्स्यसमुत्कर्षों राजगाम प पैशुनम् । गुरोधालीकनिन्धः समानि प्रत्यया ॥१?|) यस्मिन् देशे यदा काले यन्मुहून प यहिने । हानिदियशो लाभः सत्तथा न तदन्यया ॥१॥ या धर्मशालागि प्रायधिस वदन्तिये। सपा राना भूखा सहपत्रमभिगम्यनि १४ पत्यारो का प्रयो दापि यदूम युर्वेदपारगः । म धर्म इति वियो नेनरम्नु मध्यराः ॥१५॥ ये पठन्ति दिशा ई थपरता थे। तपय मारयन्देते पम्पन्द्रियरता अपि teal पमा माष्टमयो दम्वी या पर्ममयो मगः । লমানখানায় नामधार हा च चतुर्दशी। वाधूलस्मृतिः संवत्मरेण पतति पतितेन सहाचरन् । याजनाध्यापनादीनां न तु शय्यासनाशनात् ॥१८॥ मर्व ब्रह्म वदिष्यन्ति संप्राने तु कलौ युगे। नानुतिष्टन्ति वेदोक्तं पापण्डोपहता जनाः ।।१८११॥ पाठ्यष्टमीहरिदिनं द्वादशी पर्वद्वयं च संक्रान्तिः श्राद्धाहो जन्मतारका ॥१८२॥ श्रयणव्रतकालाच विशेषदिवसास्तथा। एते काला निषिद्धाःस्युः भद्रे मैथुन कर्मणि ॥१८३॥ कृते संभाध्य पतति त्रेतायां दर्शनेन तु । द्वापरे त्वन्नमादाय कली पतति कर्मणा ॥१४॥ पतुदश्यष्टमी चैय घमावास्या तु पूर्णिमा । मण्येतानि विप्रेन्द्राः रविसंक्रान्तिरेव च ॥१८॥ अयार्थी यानि कर्माणि करोति कृपणो जनः। सान्येय यदि धर्मार्थ कुर्वन को दुःखभाग्भवेत् ।।१८६।। पैत्यभंचितायूप(धूम) चाचाण्डालं वेदविक्रयम् । मानामशते यम्नु सबैलो जलमाविशेत् ॥१८॥ वनप: फलं मूलं ताम्बूलं पयऔरयम् । विपियापि कांच्या मानदानादिका क्रिया ॥१८॥ अनिम्ती ममेवाज्ञा यानामुष्य वर्तते । सावंदी ममदोष्टी मगनोरिन ग्यः ||४|| विना नु पुरा गीतमेवं तम् मयेरितम् । धनामुन' नु विणा पनी हे विनिर्मिने ॥१६॥ .

ब्राह्मणशरीरोपयोगः
वैकया होनो द्वाभ्यामन्धः प्रकीर्तितः।
इनमक्षाणां गुनाघातमरोचकम् ॥१६१!!
तदेहाना धर्मशास्त्रमरोचकम।
ऋणाद्रीतः म(ग्मामानान्मरणादिय ॥१मा
घर श्रीभ्यः तं देषा प्राह्मण विदुः ।
तं जितक्रोधं जितात्मानं जितेन्द्रियम १९क्षा
मानण' मन्ये शेषाः शूद्राः प्रकीर्तिताः ।
च देवोऽयं नोपभोगाय पल्पते ॥१९॥
शाय मदते प्रेयानन्तमुराय च।
दिकं चाकपामा जलावादिः ॥१६RI
यदि तदा निराशा. पितरो गताः।
पटे प रोमस्थानेषु सुप्रचित ॥१९६१
कृमिनुल्या:म्युम्नत्तीयं रुधिरं भवेत् ।
मूठे मुलिलामिक्षिप्य सर्पयेत् ।
रितुल्यारम्युतित्तोयं गागरोपमम ARELI
रमन्यत्र निलंविमिङ
दरारिपाभ्यः प्रपतो मनुप्यः ।.
न समा मात्र
दायमेतस्पिनरी बदन्ति ॥mal
सपिष्ट नियंकतारेखमा!
मद्रामु चिना ॥९॥

प्रवं घरति संकल्पे सूतकं तु न दो IR०३॥ २६४२ पानमृतिः जपमार: माटर्म मायायाम्मेिष पा म्यर्थ भवति नन्सर्वगपंगुष्टुं बिना काम् ॥२ मार्ट पल्ला परदिने न द्विजान मोजयेदि । वादमामुरं लोके, प्रवदन्ति विपरितः Rok प्रादं कृत्वा परदिने प्रामगान् मोजयेदि । देवाश्च पितरन्तुष्टाः कर्तुः कुर्वन्ति संपदः ।२०। श्राद्ध पाकमुपकम्य नान्दोमार्ट विवाहके। बाद तु विकिरं दत्वा नाचामेन्मतिविभ्रमात् । पितरस्तस्य पण्मासं चण्डालोच्छिष्टमोजनाः IRall सहोदराणा पुत्राणां पितुरेकदिने तया। श्राद्ध निमन्त्रणं वयं क्षरकर्म तथैव च ।२०॥ विधुरं च यति चैव सगोत्रं ब्रह्मचारिणम् । देवार्थे वरयेद्विद्वान् न पित्रर्थे कदाचन ।२०६॥ वासासि वाससी वासो यो ददाति पितुर्दिने । वन्तु संख्याववर्षेण देवलोके महीयते ॥२०ी अभिश्रवणहीनं तु यः श्राद्धं कुरुते नरः। वदन्नं मांससदृशं तसं सुरया समम् ।।२० उदक्यायाः पति तावत्विकायाः पति तथा। माण्डस्पर्शनपर्यन्तं पैतृके वर्जयेत्सुघोः ॥२०॥ विमका भ्रातरः सर्वे स्वस्तार्जितधनाः शनैः। दशदिक तथा पित्रोः श्राद्धं कुर्यात्पृथक् पृथक् २al

श्राद्भदानेचवायाः
२६४३
संन्यासीबहुभक्षश्च वैद्यो वैसानसस्तया।
गर्भयान्येदहीनश्च दानं श्राद्धं च वर्जयेत् ॥२१||
स्नाने दाने जपे होमे स्वाध्याये पित्कर्मणि।
देवतासाधने चैव त्याज्यदोषो न विद्यते ।।२१।।
प्रत्यान्दिके शतं जप्यं मासिके स्यात् द्विषट्शतम् ।
सपिण्डे निसहमस्याच्या विशसमकम् ॥२१॥
मासिके पक्षमेकं स्यादाब्दिक १ तदर्धरम् ।
एकोदि पत्सरं स्यात् पाण्मासं तु सपिण्डने ॥२१॥
महालये त्रिरात्रं या भात्याकालिकं भवेत्।
मादान तिलहोम प रयाया प्रतिपदम् ॥२१५५
सिन्युस्नानं गयानादं पपनं शवधारणम् ।
पर्वतारोहण पेय गर्भका तु पनवेश २१६॥
गर्भकर्ता सु यो विप्लो पण्मासाभ्यन्तरे यदि।
भादानादीनि धुर्वाणो क्षिप्रमेव विनश्यति मा
मध्यदिने साहो पः स्नानं स्यात्यायेदारिम् ।
रषदेयं प यः पुर्यात् स गुल्मव्याधिपीडित: २at.
पितरम्मत्र मोदन्ते गोयन्ते(१) प पिनामदाः ।
मपितामह नत्यन्ते भोरिये गृष्मागते २१||
देशान्तरे दुरमानी प्रायभिताय म्मतम् ।
যমুনানান তিশার মান :
अमापार पिसार पक्विान्न पतेग्मया।
गूधानं विषपान ए समासमरा भर ॥२॥

बापूरामुनिः ।
गो मोहादा यात्म्यागावामीरापानम्।
गुरु ग गानि नरकं स्यानोनित जास्ते ।
अमृनं मशगन्य प दियामा ग मैयनम् ।
पुनाति पलम्यानं मागं सम्या यहि (पहित)
स्नानं मन्या जपं होम म्याध्यायं पितृतांगम् ।
देयताराधनं व यवदेवं . यथाविधि।
न पुर्याधदि मोहन म पण्डालो न संशयः ।।२२४॥
।। इति याधूल्यगृतिः समाता ॥

11 श्रीगणेशाय नमः ॥
* विश्वामित्रस्मृतिः *
अथ प्रथमोऽध्याय
नित्यनैमितिककमणवर्णनम
सहमदरपहजे मझलशीताश्मिप्रभे ।
पराभयकराम्युज विमलगन्धपुष्पायरम ।।
प्रसन्नवदनेक्षण मकसदेपतामपिणं ।
स्मरेझिरमिपायनं सदविधानपूर्व गुरुम ।।१।।
आधिकम
पतुःपञ्चघटीमान मुहूर्म मंतिम ।
पचपचपटी या उप.फाल तीच्यते ॥२॥
चतुषाणपटीमानमग्योदयमंजिनम् ।
र: पचपटीमानं प्रात:कास्ट इनि स्मृतः ॥३॥
एवं यो प्रभाते नु नियम ममापरेन।
नित्यनैमिति काये हे सारे तुमसनम ||
আর এ কথাব যা ম নাহিদ।
म्नानं दुर्गदुरपाले प्रामाभरपोदये ॥५॥
भा.काल अर्यान्नियनमिति वि।
रिममा समालोय TT समारे ॥१॥

तथा विसर्ग सहम वा विश रातमेव वा ॥१०॥ उक्तकाले व्यतीते तु उपाधिश्च प्रमाणकम् ॥१ta देहस्वस्थवता(स्त्यवता येन स्वस्थचित्तपताऽपि च ॥१२ स सर्वमार्गविभ्रएस्तिर्यक्त्वं समवाप्नुयात् ॥१३॥ असम्बद्धप्रलापेन दुःसङ्गेनापि निद्रया l नित्यकर्माखिलं यस्तु उक्तकाले समाचरेत् ॥१क्षा प्रत्यहं प्रातरुत्थाय स्नान सन्ध्यां समाप्य(विधाय)च 11 यामे चान्ये च सर्वा नाहीना पञ्चकं द्विजः ।। २६४६ शिवामित्रम्मृतिः "मभ्यायो मुध्यकाटातिकमे दोषः। कालासी न क तंत्र्यं कालमंयुतम् । सम्मात्मयंप्रयत्नेन काले कर्म समाचरेत् ॥ उक्तकाले तु यम प्रमादादातं यदि ॥ ८॥ निसहयजपं कुर्यात्प्रायमित्तं विधीयते । प्रोक्त प्राणायामद्रयनिम्म् ॥६॥ अथवा जपमायण कालातीतेन दोपमा । अनुलोमविलोमाभ्यांजप्यादपाप भयो भवेत् । अनुलोमविलोमाभ्यां सहस्रजपमाचरेत् । कालोऽतिक्रम्यते नित्यं तस्य पापो न गण्यते । वस्य दर्शनमात्रेण सचैलः स्नानमाचरेत् । अतिकामन्ति ये कालं ते नरा ब्रह्मघातिनः । जित्वा स सकलांल्लोकान् अन्ते विष्णुपुरं व्रजेत् । यथाशक्ति जपेद्विद्वान् स मुक्तो नात्र संशयः ।

घकालसम्पादितकर्मणोनिफरत्वम् २१४० प्रातःकाल इति ज्ञात्वा नित्यकर्म समाचरेत् । फर्मकालो दिनान्ते तु पाईन्यूनपटीत्रयम् ॥१॥ विम्यं दृष्ट्या त्यजेयं जपदावारकोदये । पण्यतेषु समाप्तेषु तत्तन्मन्त्रानुसारतः ॥१६|| नित्यकर्माणि यः कुर्याकर्मसिद्धि लभेन्नरः ( सः)। अनुक्तकाले कृतकर्म निप्पल अकालगृष्टिः पतिता यथा भुपि ।। उपानि पीजानि चिनिएफलानिया- करोत्यकालः कृतकनिष्फलः ॥२०॥ नियुचकर्माणि नियुस्फाले कृतानि सयामुरसिदिदानि । ययोप्तमीजानि यया फान काले दि गृष्टिवि जीयनानि ॥ सन्भ्याद्रितयलक्षणम उत्तमा वारकोपेता मध्यमा टुपनारका। अपमा सूर्यमदिवा मातम्मन्या विधा मनाPALI उसमा पूर्वमूर्या प मपमा मयसूर्या । अपमा पश्चिमादित्या माधम विधा मना IRI सलमा सूर्यमदिना मरमा मारा। अभमा शारफोपता मागल्या धिमा शुभिभिषानिमित्य मन सनसने। यापि निषादान शिशिप In

.
सम्य विशायिनाश स्याश्यमोमयति ध्रयम् Ipi
यथाशक्त्याचरेत्मन्ध्या काटेमाद्विषाफलमाप्नुयात्।
मोपाधिाणमायः म्यान्मुख्यास्यादनुपाधिका -३॥
শিনিস
गरपात्र गुणो हिसन्मा
विपशुढापमनं प्रकुर्गा ।
महामुनीयारि गमापन्न
सक्षिणापरिपमगो कदापि IRE
सत्याग्नानं परित्याय विवाभ्यागं करोति यः।।
गुरुपदेशयिधिना ग्नानं मध्यां समाचरन् ।
वेदादिसर्व विद्यार्थशानसंपत्तिसाधनम Rell
इत्येषाद्विजयाना विद्याभ्यामयिधि.कमान् ।
अन्यथा योग्यसेद्विधा तस्य यिद्यान सिध्यति el
यरसन्ध्या कालनः प्रामा अतिप्रमति दुर्मतिः ।
भ्रूणहत्यामवामीति काफयोनी प्रजायते ॥३०॥
काले तस्मात्प्रयत्नेन नित्यकर्म समाचरन् ||३"
आचारो द्विविधः प्रोक्तः मोपाधिरनुपाधिकः।
उपाधी समनुप्राप्ते गौणाचारं समाचरन् ।
अनुपाधी प दुर्घद्या गोणाचार करोति यः ॥३३॥
म दारिद्रमवाप्नोति महारोगः प्रजायते ।
अपयादो महान् दोषी मम्मन्नन्मजन्मनि ॥३क्षा
मुख्याधारं परित्यज्य गोणाचारं करोति यः।
सरय कर्मणि धर्माश्च निर्जिताः स्युर्न संशयः ॥३॥

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. दिवाचोदङ्मुखः कुर्याच्छौ, कर्म समाहितः ॥ell एतद्धमो गृहस्थस्य इतरेषां पृथक्पृथक् ॥५॥ पिशामित्रस्मृतिः प्रामारभिणदिग्मागे रातपन्यन्तराधि। देपाभ पयाय गणनायाश योगिनः । गठन्तु देयाः सर्या या शोचं करोम्यहम् । प्रथमं प शिरोवेट नियोतं प द्वितीयकम् ime दिग्दर्शनं तृतीयं स्यात् अन्तर्धानं धतुर्यम्। मोनन्तु पश्चर्फ शयं पुरीपं पटमेव च। सप्तमं मृत्तिकापानं उदकं पाष्टमं स्मृनम् ॥ मुष्टिमात्रणं दत्त्वा रात्री घाक्षिणामुखः। पामदक्षिणकर्णस्य उपवीतं च धारयेत् । फमान्मूत्र पुरीपे च कुर्याच्छौचं द्विजोत्तमः ।।१।। यथाविध्युक्तमार्गेण कुर्यादुद्धृतवारिणा। कूपकुल्या तदाकादिजलैः शौचं करोति यः ॥५॥ कल्पकोटिशतैर्वापि नरकान्न निवतते। एकालिङ्गे करे विस्रः पञ्चापाने तथैव च ॥३॥ पादद्वये चतुः संख्या एतच्छौचं विघीयते । स्मार्ताना द्विगुणं कुर्यात् वनस्थत्रिगुणं तया। चतुर्गणं यतीनां च त्रेयाणां भेद ईरतिः ।।५।। दुर्गन्धत्यागपर्यन्तं कृत्वा शौचं समाहितः ।।६।। ॥ दन्तधावनम् ॥ श्रीरकाप्टेन फुर्वांत पुर्वीत दन्तधावनमप्रजः। तृणपणैस्सदा पुर्यादमा (म) एकादशी विना 11 मानाचरणस्यफलम् २६११ उयोरपि च कुर्वीत जम्यूमशालपणकः । आयुर्वलं यशो पचः प्रजा:पशुवसूनि च ॥५८|| प्रज्ञा प्रज्ञा च मेधा प त्वं नो देहि वनस्पते । निष्ठीवनं १ गण्डूपं वायव्याभिमुखो नरः ॥६॥ ईशानाभिमुखो भूत्वा पापच्यान्ते समुत्स्नेत । अङ्गारवालुकाभिश्च भस्मांगुलिनरपि ॥६॥ इष्टकालोटपापाणेर्न कुर्यादन्तधावनम् । खदिग्ध फरशश्च कदम्बश्च वटस्तथा ॥६॥ येणुश्चतिन्तिडीप्लक्षा वाघ्रनिम्बे तथैव च । अपामार्गश्च विल्वर अर्कश्चौदुम्बरस्तथा ॥६॥ एते प्रशस्ताः कथिता दन्तधावनकर्मणि । यथाशक्त्यनुसारेण दन्तधावनमाचरेत् ॥६॥ ततो नदी समागम्य गङ्गाध्यानपुरस्सरम् । । आचमनम् ॥ स्वसूत्रोक्तविधानेन कुर्यादाचमनत्रयम् । वामहस्ते जलं नीत्वा ब्रिाहृत्याभिमन्त्रितम् ॥६४॥ आकृप्य दक्षिणे भागे रेचयेद्वाममार्गतः । खवामभागमालोक्य वज्रपापाणतस्त्यजेत् ॥६॥ पुनः शुद्धाम्बुनाचम्य ततः स्नानं समाचरेत् । नाभिमाने जलेस्थित्वा निवारं स्नानमाचरेत् ॥६६॥ ॥ स्नानभेदाः॥ प्राणायामवयं कुर्यात् दशप्रणवसंयुतम् । उल्लिखेन्मार्जन यन्त्रं स्नानयन्त्रं समुलिखेत् ॥६) २६२४ विश्वामित्रस्मृतिः मध्याह्न मृत्तिकास्नानं कुर्यान्नित्यमतन्द्रितः । प्रावस्सायाइसमये न कुर्यान्मृत्तिकाक्रियाम् Ilkar ॥ वनधारणम् ।। सूत्रेण प्रथितं सूच्या सण्डं चित्रं तथैव च । विचित्रपुचलीवस्त्रमन्यवस्त्रं न धारयेत् ॥६॥ एतत्समस्तमित्युक्त पट्टवस्त्रं न दोपभाक् । और्णवत्राणि सर्वाणि न दोपो धारयेद्बुधः ॥६०।। प्रातमध्याहयोः स्नान वानप्रस्थगृहस्थयोः। यतेत्रिपवणं स्नानमसकृत्तु ब्रह्मचारिणाम् ||१|| प्रोश्य बासोपसंयोज्य प्रणवादिषडक्षरैः । शुद्धपोतं परिमाह्य पट्कन्छविधिधर्मकम् ॥६२|| कन्सदयं यखमध्ये तच्छृङ्खपु(प) चतुष्टयम् । एवं कमेग थप्नीयाटाणं श्रुतिचोदितम् ॥६३|| भोजनोत्तरनिर्माल्यं प्रक्षाल्यदिजसत्तमः। मापंसा प्रकुर्यात अन्यथा अझपातकः ॥६॥ प्रातमभ्यद्धयोः नात्या पृथश्मल्यो समाचरेत् । पर धर्मो गृहायस्य योगिनां प्रातरेय दिशा "प्राणायामः ॥ सा प्रशम्न म्यागोगिना यायुधारणम् । गादार नानाला म्यित्वा प्रवादिनप्रयम् । सपलं ममानिोि वायुनिस्पा(तः) EIN प्रणवोपासनाकेसन्ध्याविधि २६५५ वापि कुम्भकं कृत्वा प्राणायाम समाचरेत् । स्योंदयं समारभ्य घटिकाद्वादशोपरि राणा ब्रह्मयज्ञाङ्गकरनानं अपराहे तु तर्पयेत् । सल्य प्रायशं च यथाशक्ति समाचरेत् MECH माध्याहिकं प्रकुर्वीत जपान्ते वर्षयेत्तया । यन्त्रहीनं जलानानं चीजहीनं तु यन्त्रकम् ||६|| विन्दुहीनं तु यद्वीजं वृथा स्नानं न संशयः। मन्त्रहीनो जले स्नात्वा सन्ध्यावन्दनमाचरेत् ॥१०॥ अशुचेस्तस्यमनसो मलिनं नैव गच्छति । मन्त्रयन्त्रविहीनो यः स्नानं सन्ध्या करोति चेत् ॥१०॥ विफलं मन्त्रतेजस्यात्सत्यं सत्यं न संशयः। पवनानं विना येन सार्य सन्ध्या कृता यदि ११०२।। तस्य पापं न गच्छेत यथा सूर्येऽस्तगे तमः। परिधाय शुभं वस्त्रं तिलकं धारयेत्ततः ॥१०३|| पुण्डधारणम्॥ गुरुपदेशमार्गेण अन्यथा धर्मघातकः । मृदारिचन्दनं भस्म बामहस्ते निधापयेत् ११०४६ त्रिकोणयन्वंसंलेख्य मध्ये मायां स विन्दुकाम् । कोणा प्रणवं लेख्यं दण्डेषु व्याहृतित्रयम् ||१०|| अभिमन्य तु गायत्रं मन्त्रराजं दशावधि । ललाटे तिलकं कुर्याद्गुरुपूजापुरस्सरम् ॥१०७।।

२६५६ विश्वामित्रस्मृतिः मन्त्रयन्त्रविहीनं यत्तिलक यदि घारयेत् !": तन्मुखं शयवदाति ब्रह्मतेजो न विद्यते: ॥१॥ तिलक यत्र , संयुक्त मन्त्रसंयुतमेव च । ललाटे यत्र दृश्येत तत्तेजो ब्रह्मनामकम् ॥१६॥ प्रणवं चोर्ध्वपुण्डं च त्रिपदा च विपुण्डम । ललाटे यस्य दृश्यन्ते(वर्तन्ते,तेजम्यि (स्त्री)ब्रह्मदो भवेत् ११० ओमापोज्योतिमन्त्रेण शिखाबन्धनमाचरेत् । स्वसूत्रोक्तविधानेन सन्ध्यावन्दनमाचरेत् । अन्यथा यस्तु कुरुते आमुरी तनुमाप्नुयात् ॥११॥ मयाकृते मूत्रपुरीपशौच- प्रक्षाल्यगण्डूपणमेहने वनस्यसंक्षालनके च दुतं क्षमरय गौं मम मुप्रसन्ना ॥११२।। त्रिकोणमध्ये द्वीकारं कोणारे प्रण लिखेत् । दण्डेषु व्याहृतिश्चैव उहिलेदुदके तथा ॥१३॥ प्रणवनयहिवेष्टय जल पीत्वाऽथ मार्जयेत् । तथैवविन्यसेरसन्ध्या अन्यथा शूद्रपद्येत् ।।११४॥ ति भीविश्वामित्रसंहिताया आन्हिकविधियोगोनाम प्रथमोऽध्यायः । '

अथ द्वितीयोऽध्याय
आचमनविधिवर्णनम
जलमध्ये वामकरे दक्षिणे कर्णवत्कृती।
आदी गुरु नमस्कृत्य पश्चादाचमनं चरेन ।॥ १॥
प्रागाचामेदभृतस्यात सोम्यायां सोमपामवेत् ।
पश्चान्मुखोरकपास्यात् मुरापा(पी दक्षिणामुख. ॥२॥
चतुर्विंशतिनामानि तत्तदंगानि संस्पृशन् ।
विन्यसेत्केशवादीनि पोरणाचमनं भवेत् ॥३॥
तकारादियकारान्तः चतुर्विशति वर्णकः ।
संस्हरोत्तत्तदंगानि स्मार्तमाचमनं चरेत् ॥४॥
देण्यापादेखिराचम्य अम्लिगनवभिः स्पृशेत् ।
सप्तव्याहृतिगायत्री शिरस्तुर्यस्तदागमम् (१) ॥५॥
विधाचाचमनं प्रोक्त पौराणं स्मार्तमागमं ।
श्रोतं च मानसं चेति पंचधा प्रोच्यते पुनः ।।६।।
संध्याप्रारम्भकालेषु कुर्यादाचमनवयं ।
संहृताङ्गुलिहस्तेन ब्रह्मतीर्थे पियेझलं ॥७॥
मुक्तागुष्ठकनिष्ठाभ्यों शेषेणाचमनं भवेत् ।
गोकर्णाकृतिहस्तेन मापमानं जलं पिवेत् ॥८॥
न्यूनातिरिक्तमात्रेण तजलं सुरयासमं ।
आदीवान्ते च मंत्रश्च क्रमादाचमनं चरेत् ।।६।।
श्रुतिस्मृतिपुराणानि पर्यायेणविलोमत्तः ।
अगुलित्रयसंयुक्त मुक्ताष्टकनिष्ठकं ॥१०॥

प्रद्युम्नं विन्यसेद्वामे अनिद्धं तु दक्षिणे ॥१६॥ (Tism: गोifiers Reीनि हमममाण गनिमी मंगजे ॥1 फपि गिगानं मुगांग fir: । irantifritarit मान लिगमात्॥ गोपिन्दमप्रमोन्माण गौतु frjमंग पर मदनमादित्री मुभाशा ग प्रियिमं ॥२३॥ अप्रतो यामनं य भी हम्नयोलया। पीपशं पद्मनाभ उभयोः पादयोन्मन् ॥१४॥ दामोदरं प्रधान नामसंकर्षणस्य च। न्यसेवा नासिकामध्ये पाम्यान्ते या विनिर्दिशेत् ॥११११ यिन्यसेहझनामा यामुदेवं तय प। पुरुषोत्तमं वामनेत्रे दक्षकणे'घ) अधोक्षजम् । नारसिहं यामकर्णे नाभायच्युतमेव वा ॥१॥ जनार्दनं हृदि न्यस्य ब्रह्मरंध्रत्युपेन्द्रकं । विन्न्यसेञ्च हरि कृष्णं मुजे दक्षे च वामके ॥al पौराणं स्मातमित्येतत् क्षत्रियाणां विधीयते ॥१६॥ परित्वागिर्वणोगिर इमा भवन्तु विश्वतो। वृद्धायुमनुवृद्धयो तुष्टाभवन्तु पुण्यस्त्रीणां तथा शेयं शूद्राणां नाममात्रकं । शुद्धाचमाना विविध प्रकार कुर्यान्त्रिसंध्यापि(सु) समस्तकर्मसु। जुश्यः IRON

विधिवदायमनस्यैवफलवर्णनम्
आरम्भणं केशवनाम युक्त
श्रुति स्मृतिभ्या द्विविधं तथोच्यते ॥२१॥
देवतीर्थन संगृह्य ब्रह्मतीर्थे जर पिवेत् ।
मुक्ताङ्गुष्ठकनिष्ठाभ्यां गोकर्णाकृति रुच्यते ॥२२॥
वर्तमादौ विधिपूर्वकममित्य त्रिकालं प्रयतैश्च नित्यं ।
श्रुतिस्मृतिप्रोक्त पुराणमागं तस्माद्विशुद्धाचमनं विशिष्ट २३
नानामादौ च वर्णानां पादादौ ॐ समुभरेत्।
नोज विन्यसेन्यंत्र कुर्याछुद्धो भवेत्रिधा ||२४||
चतुर्विशति पादानि चतुर्विशतिवर्णकं ।
चतुर्विशति नामानि प्रणवादिनमोन्तकं ॥२५॥
वैश्यानां तु नमोन्तस्य अन्येषां वर्णमाकं ।
पुण्यस्त्रीणां नमोऽन्तस्यात विशेषात्केशवादिपु ॥२६॥
शूद्राणो विधयानां च नाममा जलक्रिया ।
सुवासिन्यां नमोन्तं च द्विराचम्य विशुद्धयति ॥२७॥
नमोतं विविध क्षेयं प्रणवं त्रिविधं तथा।
एवमेव विराचम्य कर्मादौ वत्समाचरेत् ॥२॥
अन्यथा हि कृतं यत्तु आचमनं तु निष्फलं ।
कराप्रपंचांगुलि पूर्ण मुद्रा सकेशवाय नुवर्तनीया।
निष्ठीवने (तथा) प्रसुप्ते च परिधानेऽनुपातने ।
पञ्चश्रोत्रेपुचाचामेोत्रं वा दक्षिणं स्पृशेत् ||२६
भोजनादौ च भुक्त्यन्ते गोकर्णाकृतिपाणिना।
आपोऽशनं पिवेन्नित्यमन्यथा()चेलदर्भकम् ॥३०॥

मनसा स्मरेत्। दुपाई शिरः पादं गायत्री विपदा सह ॥ २६६० विश्वामित्रस्मृतिः नासापुटे (घ) अक्षकणं प्रजपद्व्याहृतित्रयम् । विस्पृशेच्छोत्रमानं च इत्येवं श्रुतिचोदितम् ॥३१॥ हस्वदीर्घप्लुतैर्युक्ता प्रणवं मानसाचमनं कुर्यान्मनोद्देशविधिक्रमात् ॥३॥ त्रिभिः पादेरपः पीत्वा आपोहिष्टापतोन्यसेन् । ॥मार्जनम् ।। ता न ऊर्ने च सौपुम्ने रदन्महेरणाय च । यो वः शिवतमस्सोमे तस्य भाजयतोऽप्रतः ॥३३॥ उशतीहस्तयोश्चैव वक्षे तरमाअरंन्यसेत् । यस्यक्षयाय वामे वा छापो जनयथा शिरः ॥३४॥ नासान्ते भूपदं न्यस्य भुवः पादं तु दक्षिणे। मुवः पादं याममागे महः पादं तु दक्षिणे ॥३५॥ जनः पादं वामनेत्रे तपः पादं तु दक्षिणे। मत्यं पादं यामकर नाभी देव्यादिपादकम् ॥३६॥ न्यसेद्वितीयं हृदये प्रहारन्ध्र तृतीयकम् । विन्यमेदक्षिणभुजे ग्यमापो ज्योतिरेय 1 131 तुर्यपादं न्यसेद्वामे मुजे अन्युक्ततः फ्रमात् । भुत्याचमनमेभियों हरेः कुयांद्विजोत्तमः ॥३८॥ मपापगुतःम्याटारष्टिन विद्यते । पाययं नषपदं ममलोकातय प पुनः पादत्रयं शय तुयं प्रौनमिनीरितम् । REn

।
पधाचमनविधिवर्णनम्
समव्याहतयश्चैव नवपाई त्रिपादकम् ।
चतुर्विशतिपादानि न तस्थानेषु विन्यसेत् ॥४१॥
चीपादो नव साधा त्रीणि च श्रुतीरितम् ।
गायत्री(मुञ्चरन् बद्ध्यापोहिष्टा नवभिः स्पृशेत् ॥४२॥
सप्तव्याहृतिभिश्चैय गायत्रीत्रिपदैः स्पृशेत् ।
शिरः पदा तु ध्यपदा चतुर्विशतिभिः स्पृशेत् ११४३१६
श्रुत्याचमनमेतद्धि विश्वामित्रादिभिः स्मृतम् ।
नाम वर्ण च पाई च भूर्भुवः (ख) रोमिति ||४||
पञ्चाचमनं चैतानि प्रोक्त स्वच्छन्दसां गणैः।
तिसभिश्च व्याहृतिभिः शिरश्चभूपि नासिके 11४५।।
श्रोत्रद्वयं च हृदये संस्पृशेच्चाथ पारिणा ।
॥ आचमनम्॥
निराचामेदिति त्रेधा परिमृद्वति च विधा ।
एकसदुपस्पृशेदित्येवं श्रुतियोदितम् ॥४६॥
प्रायज्ञे निधाचामेच्छ विस्मृतिपुराणकैः ।
द्विया परिमृज्यात्र ताल्वोहस्तेन मार्जयेत् ॥४७||
सजलं तु प्रणवेनांगुष्ठ नोपस्पृशेत् ।
अन्याः कुल्योपसंस्पृष्टाः निष्फलं कर्म तद्भवेत् ॥४८॥
चतुर्विशति पादानि चतुर्विशति वर्णकम् ।
चतुर्विशतिनामानि विधाचामेद्यथाविधि ॥४६॥
तथा द्विः परिमृज्येति चन्द्रसूर्यो स्वरी स्पृशेत् ।
उपरपशेरसुषुम्ना च ब्रह्मयज्ञे सकृजनैः ॥१०॥

গানিলি: मनपा निरागामेन्टो मा पुगणरम् । परिणाय प्रियातामोडमन परिमार्जन ॥१॥ उपागंन्यमानानं प्रणॉन मानन्। भोजने मयने दाने म्नाने दाने प्रतिप्रहं ॥३]] मन्ध्याये प निद्रायां तथा यम्राय घारगे । पूर्वः (म)पवभिगया नया रथ्योपमपंगे ॥१३॥ आदो श्रीनं सथाचामे तनः मातांवमानम्म । ततः पौराणमाचामे नित्यं श्राद्ध विधीयते ॥४॥ पुराणं श्राद्धकालं च श्राद्वान्तं स्मार्तमुच्यते । पार्वणि श्रोतमाचामे न्यासः श्राद्ध विलोमतः ॥२०॥ पुरश्चर्या च दीक्षायां मूलमन्त्रेण केवलम् । दुर्दानं दुष्पतिप्राहं दुरन्नं दुष्प्रभाषणम् ॥५॥ दुरालापादिकथनं दुष्टस्त्रीभिश्च सद्गमम् । चाण्डालजातिसंस्पर्श मलिनीकरणादिकम् ॥ सद्यो हरति सर्व च विधानाचान्तमात्रतः। इति विश्वामित्र स्मृतौ शुद्धाचमनयोगोनाम द्वितीयोऽध्यायः।

अथ तृतीयोऽध्यायः प्राणायामविधिवर्णनम् ॥ प्राणायामः॥ -हेना चैव सर्वेषां देहे ध्यानं समन्यसेन् । वापि द्विजवानां प्राणायामं समं न्यसेत् ।।१।। णायामत्रयं प्रातः सन्ध्याकाले समाचरेत् । णापानसमायुक्तं प्राणायाम इति स्मृतम् ॥२॥ नमं नवधा चैव पोढा मध्यममुच्यते । भिमन्त्रीयमित्याहुः प्राणायामस्य लक्षणम् ॥३॥ अव्याहृतिभिश्चापि प्रणवादिरनुक्रमात् । त्यच्या शिरसा व प्राणायामो विधीयते ॥४॥ अन्दुप्राणविसर्गक्यं गायत्रं विन्दुसंदितम् । रोव्याहृतिसंयुक्त प्राणायामे स्पृशेत्तथा(त्रिशस्त्रिधा) ॥५॥ दो कुम्भकमाश्रित्य रेचपूरकवर्जितम्। गहृत्यादिशिरोऽन्तं च प्राणायाम समाचरेत् ॥६॥ हत्ये नैमित्तिके काम्ये सर्वदा सर्वकर्मसु । दो कुम्भकमाश्रित्य रेचपूरे विसर्जयेत् ।।७।। न्ध्याकाले होमकाले ब्रह्मयज्ञे तथैव च। पदो कुम्भकविज्ञेय(माश्रित्य प्राणायाम समाचरेत् ।।८।। -णापानसभानबिन्दुसहितं वन्धत्रये संयुतं । बतव्याहृतिबिन्दु संपुटपरं देवादिपादत्रयम् ॥६॥ .

२६६२ विश्वामित्ररमृतिः ब्रह्मयज्ञ त्रिराचामेच्छोतं स्मातं पुराणकम् । परिमृज्य विधाताल्योहस्तेन परिमार्जने ॥११॥ उपस्पृशेत्प्रधानाङ्गं प्रणवेन सकृजपेन् । भोजने भवने दाने स्नाने दाने प्रतिप्रहे ॥२॥ सन्ध्यात्रये च निद्रायां तथा वनस्य धारणे । पूर्वः (म् ) पञ्चभिराचामेत् तथा रथ्योपसर्पणे ॥५३॥ आदौ प्रोतं तथाचामे ततः स्मार्ताचमानकम् । ततः पौराणमाचामे नित्यं श्राद्ध विधीयते ॥१४|| पुराणं श्राद्धकाले च श्राद्धान्ते स्मार्तमुच्यते । पार्वणि श्रोतमाचामे न्यासः श्राद्ध विलोमतः॥१६॥ पुरश्चयों च दीक्षायो मूलमन्त्रेण केवलम् । दुर्दानं दुष्पतिमाह. दुरन्नं दुष्पभाषणम् ॥५६॥ दुरालापादिकथनं दुष्पग्त्रीभिश्च मगमम् । पाण्डालनानिमस्पर्श मलिनीकरणादिकम् ॥ मधी रति म प विधानाचान्तमानतः । इति विश्वामित्र स्मृती गुदायमनयोगोनाम द्वितीयोऽध्यायः।

अथ तृतीयोऽध्यायः
प्राणायामविधिवर्णनम्
॥ प्राणायामः॥
हेनां चैव सर्वेषां देहे ध्यानं समन्यसेत् ।
पापि द्विजवर्णानां प्राणायामं समं न्यसेत् ।।१।।
णायामवयं प्रातः सन्ध्याकाले समाचरेत ।
णापानसमायुक्त प्राणायाम इति स्मृतम ॥२॥
नमं नवघ। चैव पोढा मध्यममुच्यते ।
भिमन्त्रीयमित्याहुः प्राणायामस्य लक्षणम् ॥३॥
हरव्यातिभिश्चापि प्रणवादिरनुक्रमान् ।
जयच्या शिरसा पैव प्राणायामो विधीयते॥४॥
उन्दुप्राणविसर्गक्यं गायत्रं बिन्दुसंहितम ।
रोव्याहृतिसंयुक्त प्राणायामे स्पृशेत्तथा(त्रिशस्निया) ॥५॥
पदो कुम्भरमाप्रित्य रेचपूरकवर्जितम्।
गहत्यादिशिरोऽन्तं व प्राणायाम समाचरेत् ॥ ६॥
त्ये नैमित्तिये काम्पे सर्वदा सर्वकर्ममु ।
दो कुम्भकमाश्रित्य रेचपूरे विसजयेन् ॥७॥
न्याकाले होमकाले प्रायज्ञ सथैव च।
दो कुम्भकयियं माश्रित्य)प्राणायाम समाचरेत् ।।
जापानसमानयिन्दुसहितं यन्धप्रये संयुनं ।
तिच्यातिविन्दु संपुटपरं यादिपाश्रयम् ॥६॥

विश्वामित्ररमृतिः
गायत्री शिरसा विनाडिसहितामूहाद्वयर्द्ध परं।
शुद्ध केवलाने चल) कुम्भकं प्रतिदिनं ध्यायामि वत्वं
परम् (पदम् ) ॥१॥
दश प्रणवगायत्र्या इडा पिगलवर्जितम् ।
कुम्भं सुपुम्नया कुर्यान्मन्त्रस्मरणपूर्वकम् ॥११॥
अधमे द्वादशी मात्रा मध्यमे द्विगुणा मता।
उत्तमे विगुणा प्रोक्ता प्राणायामविधिः स्मृतः ।।१२।।
आयासो रेचकः पूरो बनायासस्तु कुम्भकः ।
अनभ्यासे विपं शास्त्र अभ्यासे त्वमृतं भवेत् ॥१३॥
उत्तम विगुणं प्रोक्त मध्यम द्विगुणं तथा ।
अधमं न वदेत्यायः (१) प्राणायाम इतीरितः ॥१४॥
प्रणवादि नमोन्तं च मात्रा चेत्यभिधीयते ।
पञ्चद्वादशमंयुको मात्रा मात्रायिदो विदुः ॥१५॥
अंगुशानामिकाभ्यां तु प्राणायाम यतिवरेत्।
नामिकं वननं पंव यानग्यस्य तथैव हि ॥१६॥
पकार इति पञ्चैते यणाः पञ्च प नोदिता।
दं यिय्यात्मने गन्धान हमाकाशान्मने
यं वाय्यान्मने धूपं दीप गग्न्यात्मने नमः ।
निवेदयेष न यकारममृतान्मने
पषभूनामिना पत्र मानगिकी यजेन।
मिटमनमर्म नास्ति न बुम्मरवतात्परम् ॥१६॥
मुमम् ॥१॥
॥१॥

पञ्चपूजाविधिवर्णनन् २६६५
नन्द दृष्टि समानास्ति प्राणवायुनिरोधने ।
अन्तश्चक्षुर्वहिस्तेजो अधस्थाप्य सुखासनं ।
कृत्वा(शा)साम्यं शरीरस्य प्राणायामं समाचरेत् ॥२०॥
सर्वेषामेव जन्तूनां कर्तव्यं सुखमासनम् ।
तत्रापि मानसः श्रेष्ठ स्तत्रापि द्विज उच्यते ॥२२॥
सन्ध्या प्राचैव ध्येया च वनस्थस्य तथैव हि ।
सम्यक्पश्चागुलीभिश्च बद्ध्वा नासापुटं गृही।
शनैशनैश्च निश्शब्दं प्राणायाम समाचरेत् ॥२२॥
पञ्चांगुलीभिर्नासां च बद्ध्वा वायुं निरुध्य च ।
आकृप्यधारयेदग्निं प्राणायाम समभ्यसेत् ॥२३॥
प्राणायाम तथा ज्ञात्वा स्नापयेचिन्मयं शिवम् ।
तदादी मानसं कुर्यात्सम्यक्केवलवुम्भकम् ॥२४॥
पञ्चभूतात्मिकां चैव पूजांमानसिकी स्मरेत् ।
पूजामानससंयुक्तः प्राणायामफलं लभेत् ॥२५॥
पञ्चपूजां विना यस्तु प्राणायाम करोति चेत् ।
तस्य निष्फलितं कर्म विश्वामित्रेण भापितम् ॥२६॥
लकारश्वभकारश्च(हकारश्च)यकारो रेफ एव च।
वकार(चकार) इति पञ्चते वर्णाः पञ्चार्चनोदिताः ॥२७॥
लं पृथिव्यात्मने गन्धान हमाकाशात्मने सुमम् ।
य वाग्यात्मने धूपं दीपमान्यात्मने चरम् ॥२८॥
निवेदयेच नैवेद्य वकारममृतात्मने ।
पञ्चभूतात्मिकामेतां पूजां मानसिकी यजेत् ॥२३॥

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पिलोमगायत्रीमन्यपणनम मागापाम पिना यानु गम्पापन्दनमाचरेत् । मधर्मपरित्यागो ग महापानको भाग 1 निगमागममन्याला प्रामायामनु साधरम् । निगमागममन्येषु भूलमन्त्रंश फलम १४१॥ मनमा गगनापूर्व प्राणायामयिदी विदुः । स्थूलाबूलादिवर्ग प युक्तायुगादिवर्णकम् ॥४२॥ माणापानादिसंयुग प्राणायाम समभ्यमेन । प्राविधा महाविद्या साकोटरमना भुपि ॥४॥ चपेन्मूलमनुभिः प्राणायामो विधीयते । भूगदिव्याहतिरमा(प्रजल्लं सर्व)प्रजल्पासार्ववर्मना ॥४४॥ वथा विलोममार्गेण प्राणायामं ममाचरेत । च्याति.स्समगायत्री शिरसा शिखयायुताम् ॥४५ अनुलोमविलोमाभ्यां प्राणायाम अपेद्विजः । ओं मुय मुंव भू अमतं मृ सो र ती ज्यो पो मां ओं त्यादयोन नः यो यो धि। हिम धी स्य पदेगों भयं णी रेवंतु वि सत्व (१) । त्यस ओं प: त ओं नःज ओंम ओंम ओं वामु ओं वः मूः ओं भूः ओंम। मन्त्रराज . महातत्त्वमनुलोमविलोमतः । प्राणायाम प्रकुति महापातकनाशनम् ॥४६|| महापातकनाशाय महारोगहराय (श्रयाय) च दुःखदारिदपनाशाय प्राणायामफलं विदुः ॥४|| प्राणायाममथुर्वाणो अवकीणीं भवेत्तु सः ||२ २६६८ विश्वामित्रस्मृतिः दशप्रणवगायत्रीमनुलोमविलोमतः । स्मरन् शतद्वयं सम्यक्प्राणायाम समाचरेत् ||४-11 अविहितकृतदोपं राजसेवाविदोपं फरकृतमपिदोपं क्रूरकर्मादिदोषम् । हृदिकृतपरदोपं पापसंसर्गदोपं हरति सकलदोपं मन्त्रराज(जो)विलोम(म: ब्रह्महत्यादिपापानि अगम्यागमनादिकम् । अभोज्यभोजनादीनि अग्राह्यग्रहणादिकम् ॥ell तत्सर्व नाशमाप्नोति पूर्वोक्तर्वायुरोधनैः । किमत्र वहुनोक्तन मन्त्रराजोऽमितप्रदः ॥३॥ दशप्रणवगायत्र्या विनियोगरतो(हतो)द्विजः। सर्याण्यसंभावितानि विपरीतान्यनेकशः। नियमेन फनैः काले प्राणायामेव्यपोहति ॥३॥ मन्त्रराजं चतुष्पष्टिं द्वात्रिंशतदर्धकम् । नर्धमयमं यं प्राणायाम समाचरेत् ॥१४॥ मन्दरानं परायं च प्राणायाम करोति यः। निफलितं मन्त्रं पुनरमंकारमईति ! पष्टिवात्मकं मन्यं पराई यो निरोधयेत् । । जन्मनि शृदय सन्मन्यग्रेवियोनितः ॥६॥ अनुनाविधिनागन्यं प्राणायाम करोति यः। नायायुध्यविनाशाय अन्मनी पद्रिता ॥ सम्य

नानामन्त्राणांजपेततन्मन्त्रैवप्राणायामः २६६६
तत्तन्मूलं विनामन्त्रं प्राणायाम चरेद्यादि ।
सवल्पा निष्फलं यान्ति विघ्नं कुर्वन्ति देवताः ।।८।।
उपक्रमोपसंहारकारिफादो द्विधाकृतः ।
नित्यं नैमित्तिकं काम्यं त्रिविधं निष्फलं भवेत् ॥५॥
प्राणायाम स्मरेदन्यं उपमन्यवृथा क्रिया ।
यः करोति समूहात्मा द्विविघे निष्फलो मनुः ॥६०॥
पादा, पादमानं च द्विपादं च त्रिपादकम् ।
चतुः पाद(प्पदं)पञ्चपाद(पद)पट्पाद(पद) सप्तपादकम् ॥६१
अष्टपाद(अष्टा पद)नवपदमशीतिं च शतं तथा।
तत्तन्मूलं समाश्रित्य प्राणायामो विधीयते ॥६२||
निगमादिपु सर्वेप आगमादी तथैव च ।
तत्सन्मूलं प्रतिग्राह्य प्राणायाम प्रकल्पयेत् ॥६॥
एकाक्षरं द्वथक्षरं च व्यक्षरं चाधिकं च या।
सर्वथा मूलमन्त्रण
प्राणायाम समाचरेत् ॥६४||
चार्वाकशेवगाणेश (सौर ) वैष्णवशाक्तिकरः ।
तेषां जपे तन्मूलैश्च प्राणायामान समाचरेत् ।।६।।
श्रौतहोमे दशावृत्तिः सायं प्रातस्तथैव च।
पक्षहोमे पञ्चदश पशुबन्धे च विंशतिः ।।६।।
प्रायश्चित्ते चतुर्विंशविजश्चैकविंशतिः।
यत्र कुन प्रमादश्च प्राणायामास्त्रयोदशः ॥६॥
औपासनद्वये चैव प्राणायामाचतुर्दश ।
सायं प्रातश्च मध्याहे प्राणायामास्तु पोडश ॥६॥

१६७० विश्वामित्रमनिः येश्य प्राति दयन दरारान । যা যা সঃ নাৰ গ যান । प्राणायामं प्रापीन दरायांन दशारान् । गांधानं ममारभ्य आधानानं विषोयनं l विमीणीत परायं यो अपं ये देयतार्थनम् । परायं प्रनिधानं 7 युयांदुर्ग विदुः ॥२१॥ प्रमादेनाप्रयत्नेन कदानिकियते यदि । अनुलोमविलोमाभ्यां मन्त्रराजं शतायधि | दशमणवगायत्री द्विपट्यं प्राणरोधनम् । वर्णमाला जपेन्मन शान्तिपाठं समाचरेत् ॥३॥ अनृतवचनदोपं दुष्टसंसर्गदोपं अविहितकृतदोपं दुर्दुरानादिदोषम् । अहमिति दुरहं चासद्विज्ञानामयूर्य(ध) हरति सकलदोपं मन्त्रराजो विलोमः || स्नानं सन्ध्या मुक्तकाले द्विजो यः कुर्यान्नित्यं सर्वदोपं निहन्यात् । त्रयस्त्रिंशत्कोटिदेव प्रभावः तेनावश्यं प्राप्यते सद्विवेकः ॥शा शतं त्रिलोक त्रिशतं त्रिलोक पादं त्रिलोकं त्रिपदं बिलोकम् । .

मानविधियर्णनम्
सारं विलोकं त्रिशतं तुरीयं
सध्याएमव्यावदनाय रोधम ॥६॥
दवि विश्यामिवस्मृती प्राणायामविधानं (विधियोगे) नाम
मृतीयोऽध्यायः।
अथ चतुर्थोऽध्यायः
मार्जनम
पाई पाई क्षिपेन्मूना प्रीतिप्रणवसंयुताम् ।
निक्षिपेदष्टपादं तु अधो यस्य क्षयाय च ॥१॥
अष्टाक्षरं नवपदं पादादी ब्रह्मदा भवेत् ।
पादान्तं मार्जनं कुर्यादश्यमेधफलं लभेत् ॥२॥
यस्य श्याय पादं तु आपरशुन्धन्तु यत्पदम् ।
भूमौ पदो विनिक्षिप्य इतरं मूलिचाचरेत् ॥३॥
पादादी प्रणवं चोक्त्या पादान्ते मार्जनं भवेत् ।
ऋगादौ प्रणवं पोक्त्वा भृगन्त(न्ते) मार्जनं भवेत् ॥४॥
आपोहीति द्विनवकं दधिमात्रे द्विमार्जनम् ।
अगष्टेनोदकं स्पृष्ट्वा पादमात्रेण मार्जयेत् ।।५।।
अर्थमन्त्रं पूर्णमन्त्रं मार्जनं द्विविधं विदुः ।
रजस्सत्यतमोजातान् मनोवाधायजत्तिया ॥६॥

गिरणामित्रगति
जाप्रमागरमाय मौनानाभिदहन।
पभि हिमानं मन्नं हिमादिपटयम ॥७॥
कामकोपादिपष्टगा गाग गिनाशनम् ।
पानमन्त्रं गागंगन्यं पूर्णमन्यं विपन: 11८
मामेय यांनी नियि मामन यन् ।
पनुबिशनि गायत्री वर्णमंगानुमारतः ॥६॥
प्राशायन मार्गण गानानि ममाचरेत् ।
ऋग्यजुम्मामशाग्यानामे मानलक्षणम् ॥१०॥
आश्वलायनशासाना मार्जनक्रम उच्यते ।
आपो हिनादिनयकं शंनोदेवी द्विमार्जनम् ।।११।।
अप्मुमे त्रीणि चोक्तानि भृतं घेत्येवमेव हि ।
त्र्यचस्य च नवर्चस्य अन्लि द्विविधं भवेत् ।।१२।।
पादादी प्रणवं चोक्त्या पादान्ते मार्जयेद्विजः ।
ऋतं च मन्त्रस्यादौ च मानानि समाचरेत् ।।१३।।
शन्नो देवी समारभ्य गायत्री शिरसः प्रमात् ।
गादी प्रणकचोक्त्वा मार्जनम्परिकल्पयेत् ॥१४॥
अप्मे च समारभ्य भुवन्तं मार्जनत्रयम् ।
तत्रापि प्रणवं चोक्त्वा मार्जनानि समाचरेत् ।।१६।।
सुरान्तं मार्जयेद्भूमौ चतुर्विशतिमार्जनम् ।
पादशोऽयादशोक्तानि त्रिपदाभ्यां द्विमार्जने ॥१॥
पविध क्रमशस्त्रीणि ऋषत्रयेणेव मार्जनम् ।
यस्य क्षयाय च पदोअघोऽध्वं भुवि निक्षिपेत् ॥१८॥

मार्जनविधानवर्णनम्
२६७३
एकविंशति मूनित्यात् त्रि(पादो)भुवि मार्जयेत् ।
अङ्गुष्ठानलमादाय मन्वान्ते मार्जनं यजेत् ॥१८॥
पादो भूमी त्रिवार स्यान्मूनि स्यादेकविंशतिः ।
अष्टाक्षरं नवपद पादादी ब्रह्महा भवेत् ॥१६॥
पादान्ते मार्जनं कुर्यादश्वमेधफलं लभेत् ।
रजासत्त्वं तमोजातं मनोवाक्वायजं तथा ॥२०॥
जापत्स्वनसुषुप्त्यर्थ नवैतान्नवभिर्दहेत् ।
नवप्रणय युक्तन आपोहीतित्यूचेन च ॥२१॥
संवत्सरकृतं पापं पुनर्मार्जनतो दहेत् ।
शन्नोदेवी समारभ्य पभिश्वाथोसुवोऽन्तकः ॥२२॥
अरिपड्वर्गपापानि नाशयेन्मार्जनानि च।
अप्सुमे च समारभ्य ज्योक्चसूर्यान्तमार्जनम् ।।२३।।
इदमापस्समारभ्य ऋषभं मेहन्तमार्जनम् ।
पयस्यानम आरभ्य(भुवे) हुवेऽन्तं मार्जनं तथा ॥२४॥
ऋतं च सत्यमारभ्य अन्तरिक्षमयो मुवः ।
पर्यन्तं मार्जयेभूमो गृह्योक्तविधिना द्विजः १२।।
इत्येवं मार्जनं कृत्वा सन्ध्यावन्दनमाचरेत् ।
मन्त्रलिनं विना प्रोक्त (पूर्वीमार्जनं यः करोति हि ॥२६॥
तस्य पापमगण्यं स्यान्मार्जनं निष्फलं भवेत् ।
मन्त्रलिङ्ग यथाशास्त्रं मार्जनं परिकल्पयेत् ॥२७॥

दावरगायच्या मृटी पाय तु यो द्वितः 1 २६७४ विश्वामित्रस्मृतिः- सर्वपापविनिमुक्तः स्पृष्ट्या (स्पृष्टा) स्पृष्टिन विद्यते । इति विश्वामित्रस्मृती मानयोगोनाम चतुर्थोऽध्यायः । अथ पञ्चमोऽध्यायः सार्घ्यदानगायत्रीमाहात्म्यवर्णनम् ॥ अर्घ्यदानम् ॥ मन्न्यायन्दनयेलायो दद्यादयंत्रयं द्विजः। मायंप्रातः समानस्यान्मध्याह्न तु पृयविक्रया ॥१॥ पर मध्याकाले घ सायंप्रातस्त्रयस्त्रयः। एवं ज्ञात्या त्यजेदव्य लुमनक्षत्रपूर्वकम् एवं शम्पायनाशाय चिरं पाएननाशने । गुरामा पपाय दपाययं क्रमान् अमुगा बधाध्वं प्रायधित्ताय परम । पृथ्योपनिनं त्या मर्यपापैः प्रमुभ्यते I मन्यावन्दनालायर्या प्रायधिनाध्यमीरितम् । . ना ॥३॥ म ३ नगी नाम मकर्मदिनः । यो म नामानि म वियर पर दि"

गायत्रीमाहाल्यवर्णनम्
तस्य कर्मादिकं ज्ञानं तत्सवं निष्फलं भवेन् ।
बीजमन्त्र तु गायत्र्याः प्राण इयभिधीयते ॥
देहातु पिण्ड इत्युक्तो संज्ञाकवच एव हि ।
सर्वाङ्गानि पदो मन्त्रः सर्वमन्त्रप्वयं विधिः all
अस्त्रं पृष्टिरिति प्रोक्त गायत्रीन्याप्तिरुच्यते ।
एतत्पण्मन्त्रकं ज्ञात्वा दद्यादध्य विधानतः ॥६
प्रणवो बीजमन्त्रः स्याद् गायाय
ययारसर्वदा मतः।
पिण्डमन्त्रं तुरीयं स्याद्गायत्रोसंज्ञितं परम् ॥१०॥
नारायणं मूलमन्त्र संज्ञामन्त्रं भवेत्सदा ।
ओमापो ज्योतिरित्येतत्पदमन्त्रमितीरितम् ॥११॥
ओं तत्सवितुरित्येपा गायत्रीहन्महामुने।
एतदेव हि गायत्री विप्राणां मुक्तिदायिनी ॥१२॥
ब्रह्मास्त्रं चीजमित्याहुः शर्म स्याद्ब्रह्मदण्डकम् ।
कीलकं ब्रह्मशीर्ष स्यादृष्यादिन्यासपूर्वकम् ।।१३।।
भान्तं वह्निसमायुक्तं व्योमानलसमन्वितम् ।
मेषद्वयं दन्तयुक्त
हालाहलमतः परम् ॥१४||
सनाद्य वायुपूर्व स्याहत्तयुग्ममधापरम् ।
सरसामक्षपर्यायहान्तं भूभु (वस्त मतः परम् ॥१५॥
अम्बरं . वायुसंयुक्त अरिं मर्दय मर्दय ।
प्रज्वलेति द्विरमार्य परमेतत्परं ततः ॥१६॥
तत्रिपादं प्रयोक्न्यं गायत्रीमध्यमन्त्रतः ।,
पवयं . प्रयोक्तठयमेतद्ब्रह्मस्मृतीरितम् ॥१७॥

२६७६ यिष्यामिग्मृतिः असुराणा यमाय आर्यकाले दिजन्मनाम् । प्रोक्त प्रहाम्रमेतद्व सन्ध्यायन्दनकर्ममु ॥१. फर्माध काममोक्षादि प्रमाणेय लभ्यते । प्रझदण्डं तथा यध्ये मर्वशम्रास्त्रनाशनम् ॥१६ गायत्री सम्यगुणार्य परोरजसि संयुतम् । एतद्व ब्रह्मदण्डं स्यात्सर्वशम्नास्त्रमक्षणम् ॥२० सर्ववाहननाशायं वच्यन्त्रं ब्रह्मशीर्षकम् । गायत्री पूर्णमुचार्य मूलमन्त्रं ततो यदेत् ॥२१॥ ब्रहाशीर्षकमेतद्धि सर्ववाहननाशनम् । आधारादि समुद्धृत्य सुपुम्नामार्गनिर्गमे ।। सम्यगाचम्य तां देवं ब्रह्मब्रह्माण्डभेदिनीम् । ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च ईश्वरश्च सदाशिवः ॥२॥ परमात्मेति गायत्रीमनुलोमक्रमान्न्यसेत् । अघोरास्वाय शायि नाराचाय सुदर्शन ॥२४॥ प्रतिलोमक्रमान्यसेत् । । प्रायश्चित्ताय॑म्॥ एकं मध्याह्नकाले च प्रायश्चित्तार्यमुच्यते । अर्घ्यद्वयं तु मध्याह्न तथ्यमेतन्महामुने, ॥२५॥ अयययप्रयोगाथ प्रायश्चित्तं चतुष्टयम्। सायंप्रातद्विजातीनामेवमेप विधिः क्रमात् ॥२६॥ ब्रह्मास्त्रं ब्रह्मदण्डं च ब्रह्मशीपं तथैव च। अयंत्रयप्रयोगार्थमेवमेतदुदाहृतम् ॥२७॥ . 1

२६७७
शीपनि मनुप्रयम्।
ग ममुपायं पिवदलिना जलम् ।
मेिन प गायत्री योजयुमा मतुर्यफाम ॥२८॥
मा शिरसा युज. पतुष्पिं विनिभिपेन ।
दग्दशिरोयुक्त इंसमन्यं समुभरेत् ॥
नाहनाधोनं एकालिजलं क्षिपेत् ।
अत्तदिनीयायममुरागा यधाय प ॥३०॥
नणं परेशाग्थ्याः सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
नेति मर्नु विप्रो प्रयदत्तं समाचरेत् ॥३१||
दण्डास्त्र(सायुक्त निभिपद्रयिममुगे।
पदन पूर्वमन्त्रदण्डशिरस्तथा ॥३॥
न्यं सम्यगुणार्य अयमेकं विनिक्षिपेत् ।
त्रं समुगार्य शिरोन्तं श्रेयसंयुनम् ॥३३॥
कं तु मध्याद सत्यमुक्त महामुने ।
गुष्ठसंयोगो राक्षसी मुद्रिका भवेत् ॥३४॥
मुद्रिकादत्तं तत्तोयं रुधिरं भवेत् ।
चदि मूहात्मा गैरवं नरकं प्रजेत् ॥३३॥
उन्यायया तोयं देवतामुद्रिका भवेत् ।
करणेन लोकस्य) सर्वपापक्षयो भवेत् ।
साय यो दयादृष्यं सम्यकसुधीरितम् ॥३६॥
श्रमयो स्वाहा आपश्शुन्धन्तु मैनसः ।
मन्त्रेण यो भागे मार्जयित्वाचमेत् ॥३७॥

२६७८ विश्वामित्रस्मृतिः वायव्यास्त्रेण नववारं प्राणायाम कुर्यात् । उत्तमं नववारं स्यान्मध्यम ऋतुसंख्यकम् ॥ अधमं त्रयमित्याहुः प्राणायामस्य रक्षणम् । प्राणायामबलोपेतमुपसंहारमाचरेत् ॥३६॥ ततस्सर्वप्रयत्नेन प्राणायाम समाचरेत् । अस्य श्रीवायव्यास्त्रमन्त्रस्य, ब्रह्मा ऋषिः, गायत्री छन्दः महाभूतवायुदेवता। यं वीज, स्वाहा शक्तिः जगत्सृष्टिरिति कीलकम् । ब्रह्मास्त्रप्रयोगार्थ वाय- व्यास्त्रप्रयोगे विनियोगः। यामङ्गुष्ठाभ्यां नमः यी तर्मनीभ्यां स्वाहा। यू मध्यमाभ्यां यपद । ये अनामिकाभ्यो हुम्। यः (यों) ओं कनिष्ठि- काभ्यां पोपट् । यः करतलकरपृष्ठाभ्यां फट् । एवं दयादिन्यासः। लोकत्रयेण दिग्यन्धः ।। ध्यानम् पशकरं कृष्णमृगाधिरूढ़ पायुधी पापगदे दधानम् । गुमश्चतुभिगदादिकारणं चैतन्यापं प्रणमामि यायुम् ॥४॥ आयायध्यया वायत्र्यायां वायया या हा नई पर माहानि विधा जग। पुनमन्यवादिनय या प्राणानायम्य पचोरणारेभ्यस्य श्रीगूर्यनारा. या अन्यानं करिष्ये निमरय अयं.

1 नानामन्यविनियोगध्यानवर्णनम् २६४ प्रदानमन्त्रस्य सवित भगवानृपि: अनुष्टुपछन्दः, श्रीसूर्यनारायणो देवता ब्रह्मास्त्रं वीज, प्रादण्डं शक्तिः । ब्रह्मशीप कोलफं, श्रीसूर्यनारायणप्रीत्यर्थे अध्यंप्रदाने विनियोगः । तत्सवितुः ब्रह्मात्मनेऽ. गुष्ठाभ्यां नमः। वरेण्यं विष्ण्वात्मने तर्जनी- भ्यां स्वाहा मोदेवस्यरुद्रात्मनेमध्यमाभ्यां वपट् । धीमहि ईश्वरात्मने अनामिकाभ्या हुम् । घियो योनरसदाशिवात्मने कनिष्ठिकाभ्या वौषट् । प्रचो- दयात् परमात्मने करतलकरपृष्ठाभ्यां फट् । लोक- त्रयेणेति दिग्बन्धः। ध्यानम्- सर्वतोरणमध्यस्थं मण्डलान्तयवस्थितम् । ब्रह्मायुतसहस्रस्य सत्सन्तानकारणम् ॥४शा चिन्तयेत्परमात्मानमिव(वो)ऊवं न च निक्षिपेत् । उत्तिष्ठ देखि गन्तव्यं पुनरागमनाय च ॥४॥ अञ्जलिना जटमादाय गायत्री मालादारभ्य नासा- पुटे वा उत्तीर्याञ्जली निक्षिप्यार्थ्यप्रयोगं कुर्यात् । धानो धाम्नो राजनितो-च हरोऽसि पाप्मानं मे विद्धि आश्चलायनं यदध कच्च वृत्रहन्नुदगा अभि- सूर्य सर्वन्तदिन्द्र ते वशेइति प्रातः । आपस्तम्बस्य हिरण्यगर्भस्सन्म इति प्रातः। गर्भोऽसि पाप्मानं मे विद्धि । आश्वलायनस्य प्रातः देवीमदिति जोह- योमि मध्यंदिन "उदिता सूर्यस्य राये विश्वारुणा २६८० विश्वामित्रागतिः सवंशाते शं गोकाग सनयाय शंयोः। आपन- म्यस्य गःप्राणतो-मेति मध्यादे। उती सदम- ध्रुन् । गपं गृपमं न मुर्गापनं अस्तारमेपि सूर्य । आपम्नम्यम्य ग थान्मदामेति। साया। पुन नंयया प्राणानायम्य पशोपचारभ्यच्यं अमुरब- धप्रायश्रितार्थ चतुर्थान्यप्रदानं करिष्ये इति सङ्कल्प्य वाग्मयकामराजशक्तियीजमहितं विलोमगायत्री- सहितं शिरःशिखासहितं सतुरीयं चतुर्याध्यं दद्यान्। पुनर्नववारंप्राणानायम्य पञ्चोपचारमभ्यर्य अस्य श्री अस्त्रोपसंहारमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋपिः गायत्रीचन्दः विलोमगायत्री देवता ब्रह्म पीजं ही शक्तिः । कीलकम् अस्त्रोपसंहरणार्थे विनियोगः । अघो- रास्त्राय शाीय नाराचाय सुदर्शनाय हो धियो यो नः अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। अघोरादि चतुष्टय परियुक्त तर्जनीभ्यां शिरसे स्वाहा। अघोरादि- चतुष्टयसहित हूं, मध्यमाभ्यो वषट् । अघोरादि- चतुष्टयसहितं हें भर्गो देवस्य ओं अनामिकाभ्यां हुँम् । अघोरादिचतुष्टय सहितं वरेण्यं ह्रीं कनि- ठिकाभ्यां चौपट । अघोरादिचतुष्टयसहितं तत्स- वितुरों करतलकरपृष्ठाभ्यां है, फटः । एवं हृदया- दिन्यासः। ओं भूर्भुवःसुवरोमिति दिग्बन्धः । ध्यानम् साद्न्यासजपविधानवर्णनम् २६८१ सोजमर्कमहं ज्योतिरकज्योतिरहं शियः । आत्मज्योतिरहं शुक्रः सर्वज्योतिरसो महिम् (ऽमृतम) ४३।। आगत्य देवि तिष्ठत्वं प्रविश्य हययंमम । अदुशं मुद्रया नासा पुटं हृदयेनाभिस्पृशेत् । विलोमगायत्री त्रिवारं जपेत् । असावादित्यो महा पञ्चोपचारैरभ्यर्च्य पुनर्वायव्यास्त्रं न्यसेत् । इति त्रिकाले समानमन्त्रं अघोराखाय शाोय नाराचाय सुदर्शनम् । मायापड्दीधंगायत्री प्रतिलोम न्यसेतू क्रमात् । हकारं च यकारं रेफसंज्ञक 11४४|| यकारमिति विख्यातं पञ्चभूतात्मकं यजेत् । इति पञ्चमोऽध्यायः। कारंच अथ पछोऽध्यायः द्विविधजपलक्षणम् ओमित्येकाक्षरं ब्रह्मन्यासध्यानपुरस्सरम् । यथाशक्ति अपं कुर्यात्सन्ध्याङ्गो जपईरितः ।। १ ।। नदीतीरे सरिकोष्ठे पर्वताने विशेषतः। शिव विष्णुसमं देवा गायत्रीजपमाचरेत् ॥२॥ नैमित्तिकं च काम्यं च द्विविध जपलक्षणम् ।

विगामित्रम्पतिः
॥ गतिः॥
भृगुटगाधारद्धि प पिरिसदगुरमागतः ।
शुद्धी भूगो लिगमन्यं प्रणयादिगडमः ॥३॥
आधागप्रयंग मंगोरु प्राययेथियामिमाम ।
अपसपन्तु ये भूना ये भूता दियि संस्थिताः॥४
ये भृता यिनकनारम्ने नश्यन्तु शियामया।
पृथिवि(श्यित्यया धृता लोका देवि त्वं विष्णुनावृता
त्वं च धारय मा देवि पवित्रं कुरु घासनम् ।
प्रणवाद्यश्च पड्यणदेशवाराभिमन्त्रिनम् ॥ ६.
शुद्धभूमी जलं प्रोदय विलिम्बन्धमुत्तमम् ।
त्रिकोणा यहियीज मध्ये मायां सविन्दुकम् ।। ७॥
युतं तन्त्रं जपस्थाने लिखेत्क्रमात् ।
चतुरनं हरतमानं सुदृढं मृदु निर्मलम् ।
तस्योपरि समासीनो गायत्रीजपमाचरेत् ॥८॥
कृत्वा मूलेन भूगुद्धिं भूतशुद्धि समाचरेत् ।
शोपदाहप्लवं कुर्यात् प्रणवादिषडक्षरैः ॥६॥
पार्थिवं शतमेकं च वकारं द्विशतं तथा।
त्रिशतं वह्निबीजं च वायुबीजं चतुश्शतम् ।।१०।।
आकाशं पञ्चशतकं भूतशुद्धिरिति क्रमात् ।
प्रणवादि नमोऽन्तं च वृदिरेकोत्तरं शतम् ।।११।।
प्राणायामं च पञ्चाङ्गः कुर्याद्भभूतशोधनम् ।
मूलाधारं समारभ्य गायत्री तुर्यया सह ॥१२॥

गायत्रीन्यासवर्णनम्
२६८३
ऊर्ध्वनास्या(सा)समायोज्य गायनी तत्र विन्यसेत् ।
अस्त्रमन्त्रण कुर्वीत रक्षादिबन्धनं दिशाम् ॥१३॥
उपपातकरो(गाणां महापातकनाशनम् ।
कामक्रोधादिपड्यगं पापं कुक्षी विचिन्तयेत् ॥१४॥
खड्गचर्मधरं कृष्णं पिङ्गलश्मश्रलोचनम् ।
उकारान्तःस्थितद्वीपं ज्वालाकार हुताशनम ॥१५।।
प्रतिष्ठाप्य तत्त: कामं शक्तिमा वायुना (सह)।
शक्तिवीजात्मक ज्वाला त्रितयेन विनिर्दहेत् ।।१६।।
कर्पूरमिव सुज्वालाशेपं कुर्यात्समाहितः ।
ओं यं नमः शोपणं कुर्यात् । ओं इं नमः इत्यमि-
वीजेन दहनं कृत्वा। ओं वं नमः इत्यमृतबीजेन
प्लावनं कृत्वालं नमः इति पण्णवत्यालप्रमाणेनाव-
यवादिकं त्यक्त्वा । ओं हं नमः इत्याकाशबीजेन
सर्वसंज्ञाभासप्रतिष्ठापनं कुर्यात् ।
पादादिजानुपर्यन्तं पृथ्वीमण्डलसंक्षिा करतीम् ।
जान्वादिकटिपर्यन्तं जलमण्डलसंज्ञिज्ञ करत म् ॥१७॥
पदा()दिकटिपर्यन्तं वहिमण्डल संसि(झ) (a) कम् ।
हृदादिवर्णपर्यन्तं वायुमण्डलसंशि(ज्ञात)कम ॥१८॥
कर्णादिब्रह्मरन्ध्रान्तं नभोमण्डलसंति(स) (स) कम् ।
पाञ्चभौतिकमित्येताछोधनं समुदाहतम् ॥१६॥
गुदादिद्वपालाय(मेवादा)दिद्वयलादतः ।
मुषुम्नामूलमन्त्रेण वा (१) दि चतुरक्षरः ॥२०॥

२६८५ गिगामित्रमतिः यिलसिलामाप्रमं पा गाया सप्र विनायो मुलगडलिनी गुएनापदिपप्रभेदनमेश प्रमर नीत्या रात्र गुलमयमणिकामभ्यग्यितमम्पूर्ण गायत्री ओद्वारम्पपरमात्मनि शि लीना कुर्यात् । पाशमायाट्दुशेयीजप्रणयादिनमोन्तकः। प्राणायाम प्रकुति एयमष्टोत्तरं शतम् ॥२६॥ पञ्चपूजा प्रकुर्यात सात्मनो हंसरूपिणः । सोऽहं भावेन युनीयादाकाशाद्रयिमंडले ॥२॥ आकृप्य धारयेद्दवी(प्राणस्थापन) प्राणस्नापनमाचरेत् । हृदिस्थजीवं चैतन्यं हंस इत्यक्षरद्वयम् ।।२३।। सोऽहं भावेन संपूज्य पञ्चपूजानुसारतः । उक्तसंख्याप्रकारेण प्राणायाम समाचरेत् ॥२४|| प्राणप्रतिष्ठामन्त्रस्य ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः । भूपयः कथितास्तस्य छन्दांसि निगमत्रयम् ॥२५॥ देवता प्राणशक्तिःस्याद्वीजं शक्तिश्च कीलकम् । पाशादित्रितयं प्राणस्थापने विनियुज्यते ॥२६॥ वीजराजं पाशबीजं चैतन्यं चाकुशं तथा । हंसद्वयं पश्चात्पञ्चाशद्वर्णमन्त्रतः ॥२७॥ नादेस्संपुटितैः क्रमात् । वगैश्च यादिक्षान्तार्णैः(स)नत्याभ्यां संपुटीकृतैः। पञ्चविंशतितत्वैश्व करागन्यासमाचरेत् २८il ततः करागन्यासवर्णनम् २६८२ प्रणवं प्राणशक्ति घ पाशमायाद्शानि च । तृतीयस्परसंयुक्त यादिहान्तं समुचरन् ॥६॥ मम प्राणा इरात्यादि पहिलायान्तमुशरेत् । पाशादित्रितयं प्राणशक्ति, सारं समुभरन् ॥३०॥ इमं मन्त्र समजल्या प्राणस्थापनमाचरेत् । ।। अद्वन्यासः ।। करेण हृदयं स्पृष्ट्वा गुरोराज्ञानुसारतः । जपेन्मन्त्रमिदं सम्यग्दशवारं यथाविधि ॥३॥ स्वस्य शासोदितं प्राणसूक्त कारत्रयं उपेत् । प्राणसूत निरावृत्या आद्यन्तं प्रणवं युतम् ॥३॥ प्राणायामं प्रकुर्वीत पिण्डब्रह्माण्डसंयमे । मूलादिब्रह्मरन्ध्रान्तं प्रवालपनरागमयदण्डानुकारि- णीम् अखण्डमुज्वलन्ती सविस्मया अखिलदुरित- तिमिरनिरस्तपटीयसी ज्योतिर्मयी त्रिपदा सतुरीय- मन्त्रराजानुवर्तितेजः पुञ्जपअरीकृतज्योतिर्मयस्व- रूपिणी यावच्छवासस्पृशशरीरशासनं कुर्यात् । हकारं प्रणवो शेयः सकारं प्रकृतिस्तथा ॥३३॥ प्राणायाम प्रकुर्वीत मातृकावर्णकः क्रमात् । करशुद्धिश्च कर्तव्या पड्दीपस्परसंयुक्तः ॥३४॥ ऋष्यादिपटक विन्यस्य करगन्यासमाचरेत् । ऋषि भूप्रिं न्यसेत्पूर्व मुखे छन्द उदीरितम् ॥३।।

नामिनि क्यानं पाग्या समाधान २६८६ विश्वामित्रस्मृतिः देवता हृदि विन्यस्य नाभौ वीजमिति स्मृतम् । आधारे विन्यसेच्छक्ति कीलक पादयोन्यसेत् ॥३६॥ ऋपिला समाख्यातो गायत्री 'छन्द उच्यते । देवो बहिर्मातृका स्याद्धलो वीजानि च स्वरा ॥३७ शक्तयश्च समाख्याता नमः कीलकमुच्यते । द्वाभ्यां द्वाभ्यां हकारादिवर्णाभ्यां संपुटीकृतः ॥३८॥ कादिवर्णस्तत्त्वयुक्तः कराङ्गन्यासमाचरेन् । त्रिलोकईन्धनं ध्यानं योनिमुद्रा प्रदर्शयेत् ॥३६॥ पञ्चादशाक्षरविनिर्मितदेहयष्टिं फालेक्षणां इतहिमांशुकलाभिरामाम् । मुद्राक्षसूत्रमणिपुस्तकयोनि(ग)हस्ता वर्णेश्वरी नमत फुण्डहिमांशुगौरीम् ॥४॥ फैशान्ते मुसमण्डले नयनयोः श्रोत्रद्वये नासयोः । दन्तोष्ठद्वयदन्तपक्तियुगले गूधासने तु स्परान् ।।४।। दोः परमन्धितदपपादयुगले पृष्ठे घनाभ्यन्तरे । यायांनपि सनधातु तथा प्राणेषु जातानि तु ।।२।। सनोन्तमातृकान्यामं कुर्याद्विध्युक्तमार्गतः । तापत्रयेग दुर्यान प्राणायाम समाहितः ॥३३॥ ऋषिपदन्दो देवता पपी शतिश कीलकम् । नमा र लिपिगायत्री मनोन्नतिका मता irect वाम शकिपी श्रीवीच गया।

मुद्राविधिवर्णनम् २६८७ करन्यासं हृदिन्यासं कुर्यात्तात्रयेण च । अनुलोमविलोमाभ्यां त्रिलोकैर्वन्धनं दिशाम् ॥४६|| ॥ मुद्राः॥ कृत्या ध्यात्वा महायोनिमुद्रा सन्दर्शयेत्ततः । पञ्चाशनिदेहजाक्षर भवनानाविधैः कर्मभिः ।।४।। वहथैः पदवाक्य(दा)नजनकरड्रैश्च संभावितैः । साभिप्रायचिदर्थकर्मफलदानन्तरसतेरिदं ॥४॥ विश्वन्याप्यचिदात्मनाहमहमित्युग्जम्भसे मात्रके । एवमुक्तविधानेन विन्यसेन्मातृकाद्वयम ॥४६॥ आवाहनादिभेदेश्च दश आवाहनासने यो जुहुयाद्धविप्यं धृतसंयुतम ॥५०॥ अथवा तण्डुलेनापि नित्यकर्म समाचरेत् । अनाज्ञात्तत्रयं कृत्वा गायत्रीदशकं जपेत् || प्रणवाद्यन्तमध्यस्थ होमान्ते च विधीयते । चतुर्विशतिवर्णानि जपेत् पारायणे मनुः(म् ) ॥५२॥ जपे पारायणे चैव युक्तं च विरलं क्रमान् । चतुरक्षरसंयुक्त कराङ्गन्यासमाचरेत् ॥३|| तुर्यपाई विनान्यासमाधन्तं प्रणवैस्सह । ध्याहृतित्रयमुभार्यगायत्रीचतुरक्षरम् १५४॥ पुनन्यांहतिमुचार्य फराङ्गन्यासमाचरेत् । • ! पादं पाई विभागं च प्रनिप्रणयसंपुटम् ॥२॥ मुद्राः प्रदर्शयेत् ।

૪૮૮
लोकत्रयेण दिग्यन्धं ततो मन्त्रा(न प्रदर्शयेत् ।।
विश्वामित्रपतिः
फगगन्गामसंगोगे पदपदा विपदा मोन्।
अश्गुणादिचतुर्यगंमनुलोमझमेण ।
प |
हृदयादिचतुर्वणं अमेगेय विलोमता।
चतुर्वणं यिना यानु विपर्यास न्यसेगदि ।।)
म विपत्ति समाप्नोति सत्यं सत्यं न संशयः।
अप्राय फहिति न्यासमापादतलमस्तरम ॥
पष्णवत्यात्मफे देई प्रकाशार्थ प्रचोदयात् ।
हंससिंहासनं यदिविश्वयोनिस्तथैव च ।
खेचरी कुण्डलीवुण्डं सप्तव्याहृतिमुद्रिका ॥६॥
सुमुखं संपुटं चैव विततं विस्तृतं तथा ।
द्विमुखं त्रिमुखं चैव चतुःपञ्चमुखं तथा ॥६॥
पण्मुखाधोमुखं चैव व्यापकाञ्जलिकं तथा ।
शकटं यमपाशं च प्रथित(चोन्मुसम्मुखोन्मुखम् ।।६।।
प्रलम्बं मुष्टिकं चैव मत्स्यकूर्मवराहको ।
सिंहाक्रान्तां महाक्रान्तं मुद्गरं पल्लवं तथा ॥६३
एते मुद्राश्चतुर्विशा गायत्री सुप्रतिष्ठिता ।
इति मुद्रां न जानाति गायत्री निष्फला भवेत् ॥६४
ध्यानं मुक्ताविद्रुम हेमनीलधवलच्छायैर्मुखैः-भजे ।
तारं तुर्यपादं चोक्त्वा वीजशक्ति च कीलकम् ॥६॥
त्रीणि त्रीणि निघाप्रोक्त क्रमादृष्यादिकंन्यसेत् ।
पूर्णगायत्रिया देव्याः प्रसादे विनियुज्यते ॥६६॥

ततः। - भिन्नभिन्नकालानांजपप्रकरणवर्णनम् ૨૬૮૯ वीजशपयादिकीलानां अनुलोमविलोमतः । आदी प्रणवसंयुक्त कराङ्गन्यासमाचरेत् ॥६॥ प्रणवान्तत्रिलोकेश्च कुर्यादिग्बन्धनं ध्यानं- यह वास्सुरपूजितारुणनिभं हेमार्कतारागणैः पुन्नागाधुजनागपुष्पचकुलै. (वासा) दिभिः पूजितम् । नित्यं घातृसमस्तदीप्तिकरणं कालामिरुद्रोपमा तसंहारकरं नमामि सततं पातालपष्ठ मुखम् । शिखायोनिमहायोगी सुरश्चाप्युपमस्वनि (के)। लिङ्गमुद्रामहामुद्राअलिरित्यष्टमुद्रिका ॥६॥ प्रातमध्याहकाले तु तुर्यपादं दशांशकम् । सायंकाले चतुष्पादसहितं जपमाचरेत् ॥६॥ सुरभिानवैराग्ये योनिः शोऽथपङ्कजम् । लिङ्गं निर्वाणमुद्राऽप्टौ जपान्ते परिकल्पयेत् ॥७॥ चक्र-अत्र ग्रन्थपातः कमान् । भूकशासोक्तन विधिना योगे तु विलोमतः । विना प्रयोगजाप्ये तु अनुलोम न विद्यते ॥शा इति ......... नामपष्ठोऽध्याग मध्याहे च पृथक्सन्ध्या योदित्यं जातवेदसम् ॥२॥ अथ सप्तमोऽध्यायः उपस्थानविधियर्शनम् ॥ उपस्थानम् ॥ अथातसंप्रपश्यामि उपायानयिघि फ्रमात् । ऋफशासोतन विधिना जातवेदस इत्यूचम् ॥१॥ प्रातःकाले घ साया जपच्चत्युक्तमार्गतः। सहस्रपरमा देवी मध्याहे च जले द्विशः। सूर्यावलोकनं कुर्वन् दुगोंपरथानमाचरेत् ॥३॥ सायाह सूर्यमालोक्य दद्यादय॑चतुष्टयम् । भृक्षप्रकाशपर्यन्तं जपेदेवं चतुष्पदाम् ॥४॥ जातवेदस इत्येषां प्रातस्सायमृचं जपेत् । जलान्ते विधिवत्कुर्यात् उपस्थानं समाहितः॥३॥ हंसमन्त्रं समुच्चार्य गायत्री त्रिपदो वदन् । अर्घ्यमेकं तु मध्याह्न ऋग्यजुस्सामवेदिनाम् ॥६॥ प्रायश्चित्तं द्वितीयाध्य असुराणा वधाय च। अर्घ्यद्वयं तु मध्याह्र सर्वेपामेवमेव हि ॥७॥ अर्घ्यप्रदानात्परतो गायत्री पूर्ववज्ञपेत् । आवर्तनं गते सूर्ये उपरथानं समाचरेत् ॥ ८॥ उदित्यमिति मन्त्रेण ऋकशाखोक्तविधिक्रमात् । मध्यंदिने रविभ्याने प्रातस्सायावद्भवेत् ॥६!

सूर्योपासनाविधिवर्णनम् २६६१ कृत्वा माध्याहिकी सन्ध्यां त्रयोदशघटीपरम् । आवर्तनान्तं प्रजपेदुपस्थानं ततः परम् ॥१०॥ नित्यं जाप्यं विना यस्तु उपस्थानं करोति चेत् । सौरमन्त्रैश्च सकलैः गायत्रीजपपूर्वकम् ॥१२॥ प्रत्यगासूर्यमालोक्य उपस्थानं समाचरेत् । उदयेऽस्तमये जप्त्वा दुर्गोपस्थानमाचरेत् ॥१२॥ मध्यन्दिने जपान्ते च सूर्योपस्थानमाचरेत् । आश्वलायनगृह्योक्तमृग्यजुस्सामशाखिनाम् ॥१३॥ जपोपस्थानयोरन्ते सोरं पश्चार्वनं यजेत् । प्रभान्तमुद्यत्प्रतिभास्यमानो विम्यं समालोक्य कृतोदितो यदेत् । मन्त्रस्य चादिऋचं च याजुपैः शाखान्तरोक्तास्तु(समु) उपासनीयाः ॥१४॥ त्रिपदाजपसाद्गुण्यं तुर्याजाप्यं दशांशकम् । तुर्यपादं विना जाप्यं कुरुते निष्फलं भवेत् ॥१५॥ मित्रस्य चर्षणीमन्वं याजुपोपासनक्रमात् । प्रातर्भपान्ते गायच्याः सूर्योपस्थानमाचरेत् ॥१६॥ आसत्येनेति मन्त्रेण पड़चोक्तविधानतः । मध्यन्दिने रवि घ्यायेनपान्ते विधिवत्नमान् ॥१४ा सायं भानोरस्तमयाद्विपटी कर्मसंयमे । प्रापप्रकारापर्यन्तं उपन् देवी मनोहराम man यो हि यत्तधुनेदमी गायत्रीमंत्रपूर्वकम् ॥६॥ विश्वामित्रागतिः लुन गर्ग सगाठोपा दिगुरुग्धानमागरेन् । पूर्ण याम्गमस्ते ग समादि पठन्मनुम् ॥ प्रियाग समुपायं देवी ध्यायेपतु पदाम् । पयोपगारैरभ्य गायत्री तुर्यया सह Iroh इति विश्यामिग्रस्मृती उपस्थाननाम सप्तमोऽध्यायः। अथ अष्टमोऽध्यायः देवयज्ञादिविधानवर्णनम् ॥ वैश्वदेवम् ।। देवयज्ञादिकं वक्ष्ये गृह्योक्तविधिना ततः। कोद्रवान्मासुरान्मापान मसूरांश्चकुलुत्थजान् ।' लवणं च कटुद्रव्यं वैश्वदेवे विवर्जयेत् । नीवारान्वंशजं धान्यं गोधूमान् तण्डुलांस्तदा ॥२ कन्दमूलफलादीनि दधिक्षीरघृतादिकम् । प्रत्यहं वैश्वदेवार्थ कुर्यान्नित्यमतन्द्रितः ॥३ गृहस्थो वैश्वदेवस्य कर्म प्रारभते यदा। गृहे सिद्धान्नमादाय दधिक्षीरपृतान्वितम् ॥ ४। जपासने स्वकार्याथं सर्वेभ्यः पचने द्विजः।

बलिप्रकरवर्णनम्
२६६३
दिवा सूर्याय रात्री चेदमये च हुयेद्धविः ।
प्रजापतय इत्येकामुभयोराहुति हुनेत्(?) ॥६॥
प्रणवव्याहृतिभिश्च हुत्वामन्त्रैः स्वशाखिभिः ।
भूतेभ्यश्चबलिंदद्यात्
आयुष्कामो दियारात्रौ शूपाकारं बलिं हरेत्
मृत्युरोगविनाशार्थ नराकारं बलि हरेत् ॥ ८॥
काम्ये कर्मणि वाये च बलि पल्मीकवद्धरेत् ।
आयुरारोग्यमैश्वयं पुत्रान्पौत्रान्पशूश्च यः ॥ ६ ॥
काङ्क्षते स च मोक्षार्थी चक्राकारं बलि हरेत् ।
धर्मार्थकाममोक्षार्थ व्यजने च बलिं हरेत् ॥१०॥
पञ्चवैतेषु विप्राणां मुख्यमेतञ्चतुर्थकम् ।
प्रथम चोपवीतं स्याद्वितीयं च निवीतिकम् ॥११॥
तृतीयं पितृमेधार्थ वैश्वदेवे विधीयते ।
तण्डुलोदकसंयुक्त पाकं कुर्याद्विशेषतः ॥१२॥
तमोदकस्य मध्ये तु तण्डुलं नैव पाचयेत् ।
ततोदकस्य मध्ये तु तण्डुल पाचयेद्यदि ॥१३।।
तण्डुल गरलं ज्ञेयं तुल्यं गोमांसभक्षणम् ।
अन्नं पर्युषित भोज्यं स्नेहाक्त चिरसंस्थितम् ॥१४॥
अस्नेहा अपि गोधूमा यवा गोरसमिश्रिताः ।
पाक मध्ये घृतं दत्वा पाकादुत्तीर्य यत्नतः ॥१४॥
तस्योपरि घृतं क्षिप्त्या भागान् कुर्याद्विशेषतः ।
यज्ञार्थे देवपूजार्थे विप्रार्थे वलिकर्मणि ॥१६॥

सायंकाले तथा कुर्याद्धविष्यं तण्डलं द्विधा रसा विवामिम्मतिः प्रयापाई न मुगीन ग निः। हविगानं मुरीः कार्ग पथमागान्दितोत्तम ॥१॥ अभिगार्य पमान मागान पू परमादानेन । प्राणायामान्प्रीत पमपूजापुगमरम् ॥al देशकालो प संकोत्यं तमः कर्म समाचरेत् । पडभिरारी प्रनिमन्त्र उम्तेन जुहुयातनः ॥१२ मनःस्था(गानि)म्भिरा गृत्वा मयं जानामिनापयेत्। स्वयमनिरतो यातु म्पयंपाकी म उच्यते ॥२ अमन्द्रं या समन्यं या वैश्यदेवं न सन्त्यजेन् । वैश्वदेवस्य फरणादग्नदोपैनं लिप्यते ॥२१॥ प्रातर्मध्याहकाले च होमं कुर्याद्ययाविधि ! ' विधाय प्रत्यहं पाकं हुत्या देवार्पणं हविः। हुत्या दत्वा च यो भुक्त स्वयंपाकी स उच्यते ।।२३॥ पञ्चसूनापनुत्त्यथं प्रायश्चित्ते हुनेद्धविः। पवित्रमन्यं (न्न) तज्जातं नास्ति चेदपवित्रता ॥२ एकपाद्वेद्विधा होमो न कुर्याद्वश्वदैविकम् । कदाचित्कुरुते यस्तु उपोष्य व्रतमाचरेत् ॥ परेऽहनि समुत्थाय लानं कृत्वा यथाविधि) पाकं कुर्याद्विधानेन होमं कुर्यात्पडक्षरैः ॥२६ भूभुवस्सुवरित्येतैः हुनेत्प्रणवपूर्वकम् । अष्टोत्तरशतं चैव स्वसूत्रोक्तविधानतः ॥

वैश्वदेवकालनिर्णयवर्णनम्
वैश्वदेवं ततः कुर्यात्कमेणैव यथाविधि ।
बलिदानं ततः कुर्यात्रायश्चित्तं विधीयते ।।२८||
सूतकद्वयसंप्राप्तो नित्यहोमं परित्यजेत् ।
पारायणं प्रकुर्वीत वाचकोपाशुवर्जितम् IRell
एकादशेऽह्नि संप्राप्ते पृथक्पाकं प्रकल्पयेत् ।
वैश्वदेवं प्रकुर्वीत बलिकर्म यथाविधि ॥३०॥
प्रेतश्राद्ध पृथक्पाकं वैश्यदेवं समाचरेत् ।
क्षये दर्शे च पक्षे च एकपाको विधीयते ॥३१॥
मेतश्राद्ध विना येन पृथपाकः कृतो यदि ।
राक्षसाः प्रतिगृहन्ति पाककर्ता पतत्यधः ॥३२)
पैश्वदेवप्र(करणस्य) कालस्यान विनिर्णयम।
सूर्योदयं समारभ्य घटिका.म्युश्चतुर्दश ॥३३।।
पटिका पञ्चदश च पोडश स्युः ततः परम ।
सतरसप्तदश प्रोक्ताः ततश्चाष्टादश स्मृताः ॥३४||
सगमान्ते प्रायनं कुर्यास्नानपुरम्मरम् ।
मध्यसत्या सर्प प वैश्यदेवमिति प्रमात ॥३॥
मध्यकाले तु मध्याहे दक्षिणायनगे रषौ ।
पश्यदेवं प्रफुति मध्यकालाग पूर्वतः ॥३६॥
मध्यावान्ते वैश्यदेवं पटिकानश्कात्परम् ।
उत्तरायणगे सूर्ग पैश्वदेवं
समाचरेत् ॥३॥
पतुदरापटीभ्यम्नु मानण्डस्योदयावधि ।
परसस्तपणे वा घश्यदेखें समाचरेत् ॥३८॥

BER विश्वामित्रांग: गुमाग्यविभिना दक्षिणोगरमागयी। गूगोदर्ग ममारण पटिका पहात्परम् ॥ER गणान्तय विभिना वैश्य देयं ममानन् । योगिना येत्यादयाय कालनिर्णय उच्यत all याममध्ये न होगव्यं यामयुग्मं न सहयेत् । योगिनां पैश्य देयाय फाल ा उदाइत: ॥४१॥ अन्यथा यस्तु पुरते योगी भ्रष्टोऽभिज्ञायते । योगिनी यश्य देवस्य मुरन्यो यिधिहद हतः ।। यलिक्रिया समुत्सृश्य फुयांग्नित्यं पडाहुतिम् । नान्तलिकियां कुर्याद्वाह्य एको यलि स्मृतः ॥४३॥ पभिराध हुनेदन्नं इति कोपातकिस्मृतः । तरमाधुनेद्विधानेन वैश्वदेवं श्रुतीरितम् ॥४४॥ वैश्वदेवस्याकरणाद्दोपं भिक्षयंपोहति । भिक्षोर्नदानं दोषं तु वैश्वदेवं व्यपोहति ।।४।। अकृत्वा वश्वदेवं तु भिक्षी भिक्षार्थमागते । उद्धृत्य वैश्वदेवार्थ भिक्षा दत्वा विसर्जयेत् ।।४६॥ काष्ठभारगतेनापि घृतकुम्भशतेन अतिथियस्य भग्नाशरतस्य होमो निरर्थकः ||४|| दूरादतिथयो यस्य गृहं प्राप्य सुतोपिताः । सद्गृहस्थ इति प्रोक्तश्शेषाः स्नु हरक्षकाः ||४८il वैश्वदेवं बिना पाको यस्तु सप्रत्यनामकः । तं पाकं ब्राह्मणो भुइक्त स सद्यः पतितो भवेत् ।।४।।

पञ्चसूनापनुत्त्यर्थवैश्वदेवविधिवर्णनम् २६६७
वैश्वदेवाकृताद्दोपाच्छक्तो भिक्षुळपोहितुम् ।
पादुकायोगपट्ट च पवित्रं चित्रकम्बलम् ॥१०॥
स्वाहा स्वधां वैश्वदेवे तर्जन्यां रजतं तथा ।
वर्जयेज्जीवपितृकः कुर्यान्नित्यं पड़ाहुतीः ।।१।।
यदि पित्रा समाज्ञतो वैश्वदेवं समाचरेत् ।
असंस्कृतान्ननैवेद्य' स्थावरेषु गृहेषु च ॥२॥
स्याहाकारं विना यस्तु कुरुते ब्रह्मराक्षसः।
चराचरादिदेवानां हविष्यान्नं निवेदयेत् ॥५३॥
पञ्चसूनापनुत्त्यर्थ वैश्वदेवं विधाय च ।
पञ्चसूनापनुत्त्यर्थं प्रायश्चित्तं हुनेविः ॥५४॥
तत्परं देवताभ्यस्तु नैवेद्यं परिकल्पयेत् ।
वैश्वदेवार्पण येन द्विजदेवार्पणं हविः ॥५॥
कुर्वन्ति ते महापापात्तद्धविः क्रिमिसङ्कलम् ।
रण्डाबन्ध्याकृतः पाको बधिरामूकयोस्तथा ॥५६।।
निष्फलायाश्च गुविण्या न भोक्तव्यं कदाचन ।
रण्डापञ्चविधं ज्ञात्वा प्रयत्नेन परित्यजेत् ॥७॥
श्मशाने चितिसंयुक्त प्रज्वाल्याभीष्टकाधवत् ।
कन्या वैधव्यमापन्ना वीरेत्याचक्षते बुधैः ॥१८॥
रोहिणी विधवा भर्ता सा रण्डेत्यभिधीयते ।
दुर्भगा दशवर्षा या सा कन्या समुदीरिता ॥६॥
रजसः परतरसा तु यातुको विधवा भवेत् ।
असन्ततिश्च या नारी सा रण्डेत्यभिधीयते ॥६॥

वैश्वदेवं पिना यस्तु श्राद्धकर्म समाचरेत् ॥ निम्यनमिनिक धाद पन्या धान्नं प्रयत्नतः 1011 २६१८ विश्वामित्रस्मृतिः नानाभावः प्रयत्नेन रण्डापाकं परित्यजेत् । वीररण्डा कुण्डरण्डा बालपुत्राह्यपुत्रिणी ॥१॥ तासां पाको न भोक्तव्यो भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् । अस्नाता विधवा चण्डी पकाशी माससूतकी ॥६॥ पञ्चपकान्त्यजेद्विप्रः तत्प्रेष्यं च परित्यजेत् । पाकं कृत्वा प्रयत्नेन ह्यभुफ्त्वा भोजने विषम् ॥६॥ रण्डापार्क महापापं वैश्वदेवे परित्यजेत् । नाहुतं पाकमनीयादनैवेद्य स मन्यते ॥४॥ रण्डापाकं विषं क्रूर अहुत्वान्नं तथा विषम् । द्विविधं यन्त्रसंयुक्त तदन्नं कालकूटकम् नाना भावः प्रयत्नेन रण्डापा परित्यजेत् । प्रमादात्प्राप्यते चान्नं प्राणायामश्चितुर्दश ॥६६॥ कुर्यात्कुम्भकमार्गेण न्यासध्यानपुरस्सरम् । मन्त्रराजविर्भागं प्रथमं वैश्यदेविकम् ॥६॥ फूत्या श्राद्ध प्रकृति नित्यनैमित्तिकं घरेत्। मादामो करणात्पूर्व वेश्यदेवं विधाय च ॥१८॥ ततोऽनो करण कुर्यादन्यथा माद्धघातकः । पृथा श्राद्ध मांसप रोरयं नरकं प्रजेन्। मतो दोमं प्रकुर्यात प्रामणान् मोजयेत्ततः। परनो करणं या देवपुग्गरम.

वैश्वदेवमाहात्म्यवर्णनम् २६६६ ब्रह्मार्पणं हविस्तरस्यात्पितॄणां दत्तमक्षयम् । देवेभ्यश्च पितृभ्यश्च ऋपिभ्यश्च तथा हविः ।।७२।। आदी वह्निमुखे दत्तं तृप्त्यै भवति नान्यथा । यस्त्वमी न हुतं चान्नं देवे पित्र्ये प्रयच्छति ॥७३।। गोत्रपान्नं भवत्येव वृथा श्राद्धं न संशयः । नित्यश्राद्ध गयानाद्ध तीर्थश्राद्ध तथैव च ७४।। वैश्वदेवं हुनेदादो ततः श्राद्ध समाचरेत् । स्वाहाकारेण हुत्वादी म्वधाकारेण वै ततः ॥७॥ एवं होमत्रयं कृत्वा ततः श्राद्धं समाचरेत् । वैश्वदेवविपये हविष्यमन्नं घृतसङ्कलं च वही समांश जुहुयान्त्रियामम् । द्वयोत्तरं बिजति(१) युग्मसंज्ञ ओट्वारमादी प्रतिमन्त्रयुक्तम् ।।७६।। रसयुक्त हविष्यं स्याघृतयुक्त तथो(थो)दनम् । ब्राह्मणो वैश्वदेवार्थ कुर्यान्नित्यमतन्द्रितः ॥७॥ अन्यस्य चेद्रसं त्यक्त्वा वैश्वदेवं करोति यः । देवेभ्यश्शापमाप्नोति दरिद्रो भवति ध्रुवम् ।।sal सुपक रससंयुक्त राजान्नं घृतसंयुतम् । सद्धविप्यमिति ज्ञातं सुप्रीतानिदशादशः sell पर्वद्वये समायोगे श्राद्धान्ते वैश्वदेवार्थ पाकं कृत्वाप्रयत्नतः 1८11 - विश्वामित्रस्मृतिः हुत्वा दत्वा च भुक्त्वा च द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् । देवानां प ऋषीणां च पितृणां च विशेषतः ॥८२३॥ पर्यायेग प्रदातत्र्यं श्राद्धकाले हविर्द्विजैः । देवपिपितुष्टायमेकपाको विधीयते ॥२॥ प्रथमाको न पर्तभ्यः कृतश्चेत्पतितो भवेत् । अत्यान्नं तु नवे यः कुर्याक्रिमिसङ्कलम् ॥३॥ होमं त्या प्रयत्नेन वैश्य देवप्रकल्पयेत् । पनि विश्वामित्रामृती पश्यदेव प्रकरणंनाम सामोध्यायः ममात्र ।

लोहितस्मृतिः यदुभायस्योपासनादी विरोमः॥ तिरसा यस्यारसमुदपयत । सैव लोक कथिता सत्समा च सा नीरा सवधमसमाश्रया। मुद्भूतो यहिनिखिलकर्मणाम् ॥१०॥ चंदजन्यः सर्वयागैकसाधकः। दि प्रधानामिः ब्राझणस्यमहात्मनः ॥११॥ शिष्टाः दुर्वलास्तत्समान तु। दिकत्यस्य तूप्णीका एव केवलम् ॥१२॥ तिहोत्रे स्मातं कर्माखिलं चरेत् । न्यमिषु चत्तूष्णीकं कृत्स्नकर्म तत् ॥१३॥ प्रयः में यत्नेन सायं प्रावस्समाहितः ॥१४|| नरखिलेः कुर्यादौपासनं बुधः। बलामीनां नित्यमोपासनं तु तत् ॥१५॥ तु कर्तव्यं ब्रीहिभिर्न तु तण्डुलैः । बासनं तु ब्राह्मणेन विपश्चिता ॥१६॥ नित्यं कर्तव्यमिति काश्यपः। ब्राह्मणस्य स्वजातो धर्मतो मताः ॥१७॥ पयोश्वापि स्वजातादेव वै. तथा। नतन्त्राणि न भवेयुः कदाचन ।

प्रथमेष्वेव पञ्चसु शेपकृत्यवणनम २७०३ वैदिकानि प्रचालयेत्। पञ्चसु ॥१६॥ विशेपोऽयमथोच्यते । मन्त्रवत्तद्विधानतः ll नेदिति मनोर्मतम। प्रथमानो मुतेन वै ॥ : तन्मन्बेरखिलेरपि। णीकं ता: स वाहुतीः ।। तत्रस्युस्सर्वथैव हि। कयास्तन्त्राणि सूरिभिः ।।३।। न्यत्वेन चोदिताः। न्येऽस्यतेऽभवन् | न कमातूष्णी तु निर्वपेन। पजीवं विधानतः ॥२५॥ चौपासनमुसान्यपि। दोपासनमात्रकम् ॥ भालीपाकं तथैव च। द्वा नमित्तिकं भवेत् ॥ समन्यकम। देवं यथारुचि ॥l तथाविधः। पापासनं सदा रहा मो लोहिवस्मृतिः प्रमेणेतरकमांणि न्यत्यासेन तयरेत्। पृथनित्यं तथाकkमरामचंद्विचक्षणः ॥३०॥ ॥ अनेकामिसंसर्गः॥ सर्वपामपि यह्रोना संमगं विधिनाचरेत् । संसर्गे तु कृते होमे को पहिस्ततो भवेत् ।।३।। ततो होमे कृते तावन्मात्रेणेव समन्त्रकम् । सर्वत्रापि वृतं सम्यग्भवत्येव न संशयः ।।३।। धर्मपत्नीवीतिहोत्रे प्रधानेऽस्मिन्यथाविधि । क्रमेणेव स्थापयित्या हुत्यामन्त्रस्तुतैरति(पि) ॥३३॥ योजयेत्तेन विधिना नान्यावही कदाचन । योजयेत्समिताद्यस्तु चरुधर्मेण धर्मवित्। कदाचिन्मोहतो यो वा द्वितीयाद्यनले चेत् ।।३।। संसर्ग कुरुते मूढः प्रधानमितरास्तु वा। सर्वे नष्टाह्यमयरते लौकिकत्वं भजन्ति हि ॥३६॥ तद्दोपशमनायाथ पुनरनिं यथाविधि । प्रतिष्ठाप्याखिलैर्दारैरुपविश्य यथाक्रमम् ॥ प्रधानहोमं कुर्वीत लाजहोमं च पूर्ववत् । पत्नीसंख्याविधानेन पश्चात्तत्सिद्धिरीरिता ॥३८॥ अन्यथा दोपमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा । प्राधान्येन प्रधानानि कृत्वा तस्मिन् परान चीन ॥३ ॥ श्रौताप्नो विद्यमाने स्वायदने तु तदान्वहम् ॥३६ ॥

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चेष्ठत्वादिविचारवर्णनम्
२७०५
धर्मपल्यास्सदैव हि।
सद्योऽमिलौकिको भवेत् ॥४॥
नद्विस्तथा तस्मात्प्रयत्नतः।
नः तत्कालोचनं यथा ॥४॥
वात्तथा यत्नेन बोधयेत् ।
मोहादवशादुःखपीडनैः ॥४॥
यात्पुनस्सन्धानमाचरेत् ।
चेदभिभूतावशा भवेत् ॥४३॥
को चेदग्निस्तु लौकिकः।
जांच ज्येष्ठ्यकानिष्ठ्यविचारः।।
द्वितीया वयसाधिका ॥४४||
ज्यप्ठ्यमईति कर्मसु ।
सदा कानिप्ठ्यभागिनी ॥४॥
नाहुस्ते ब्रह्मवादिनः।
वयसा कर्मशीलतः ॥४६॥
जातपुत्रो बहुश्रुतः।
सीविरहितादपि ॥४ा
सोऽयमेवौरसः परः।
द्वितीयादिसुतास्तुते ॥४॥
श्रुतिस्मृत्यर्थदर्शिभिः।
तृतीया तुर्यकादयः ॥४॥

-
२००६
लोहितस्मृतिः
ज्येप्टयकानिष्ठाधर्मेणु न्यूनाधिक्येष्वपि शुटम् ।
धर्मपत्रीमुतेनेय स दत्तो भिनगोग्रजः ||५||
तुर्यभागीति कथितः न द्वितीयादिसूनना ।
विशेषोऽप्रापि भूयाच पालको याकिश्चनः ॥११॥
महापारिनयन्धुत्वशुश्रूपाद्यनुपर्तनः।
श्रीमग्रामतितुष्टाभ्या पितृभ्यो प्रीतिपूर्वकम् ॥२॥
॥ दत्तपुत्रविषयः॥
कृपया दत्तपुत्रः श्रीभूमिक्षेत्रादि भाग्यवान् ।
बहुलो जातपुत्रश्च शनैः कालेन वै तदा ॥३॥
वृद्धि तां परमा प्राप्तस्तत्सून्योश्च ततः परम् ।
तुल्यो भागः प्रकथितो न विवादः कदात्र वै ॥५४||
तत्रापि जैष्ठ्यकानिष्ठ्ये मात्रीचात्मजहेतुतः ।
विवदन् चात्र यः पापी राष्ट्रात्सद्यस्स एव हि ॥५॥
निर्वास्यस्ताडनीयश्च राज्ञा वै धर्म भीरुणा।
एतेन सर्वदत्तानां पुत्राणामयमेव वै ॥६॥
न्यायः प्रकथितस्सद्भिः एवं सत्यत्र केवलम् ।
एवं हि निश्चयो ज्ञेयः यो वा लोके त्वकिञ्चनः ॥१७॥
परश्रियं समुद्वीक्ष्य महिमानं च पूज्यताम् ।
वत्साम्यप्राप्तयेऽतीव कालमुद्वीक्ष्य केवलम् ॥८
परापुत्रत्वदुःखज्ञो भूत्वा पश्चात्स्वयं शनैः।
युवाभ्यां तनयं स्वीयं प्रदास्यामीति तो तराम् ॥१६॥

- । कपुत्रविधानवर्णनम् २७०७ समाश्रित्य च बन्धुभिः । तदीयैातिसज्जनः ॥६॥ अपुत्राभ्यां तदिच्छया। योक्तस्तुर्यभाग्यौरसेन वै ॥६॥ हेयापुत्रस्तुतात्यशः । व नचंद्दत्तः पुनर्यदि ॥६॥ मो वाभ्यधिकोऽथ वा। हितः पुष्कलात्मवान् ॥६३।। धर्मंकवर्मना। प्राहयामास केवलम् ॥६४|| न्ध्वादिजल्पितः। रिक्थद्रव्यक्षमादिषु ? ॥६॥ दौरसान्न तु तत्कृतौ। प्ठोऽयं वयसा तराम् ।।६६।। समोऽभ्यधिक एव वा। तु ज्यैष्ठ्य कथंचन ॥६॥ भागादिपु तादृशः। नाशो यदि वा पुनः ॥६॥ नताधनशेवधेः। नदानादिपु केवलम् ॥६॥ नत्कर्तृत्वं तदीशताम् । ते किल केवलम् !ill २७०८ दत्तः लोहितस्मतिः किं तु सजन्मजना क्रियाभिः पूर्वसंविदः। प्राहकस्यावश्यकत्वनावश्यत्वमुखैः परः । मृत्यश्चरित्रः सुस्पष्ट प्रभवेत्स्वयमेव वे। विद्वदत्तसुतोपायसंपादितमहाधने ||२|| किमोरसस्य समता सुर्यता घेति वै जगुः । तत्रात्रु वन्धर्मपरा महान्तो ब्रह्मवादिनः ॥७३|| स्वप्रार्थनापूर्वप्रातपुत्रत्वयान्यदि। भिन्नगोत्रः पुनश्चापि तुर्यभाक् तु स एव हि llsed औरसेन समोनायं स्वयमेवागतो यतः। पालकप्रार्थनाधिक्य या च सा शपथादिभिः ॥७॥ प्रदानशपथप्रोक्तिमर्यादावाक्यसूक्तिभिः । स्वगोत्रसगृहीतो यः प्रत्यासन्नोऽति सुन्दरः ॥७॥ कापेयरहितरसूनुः तत्समत्वेन कल्पितः ! विद्वद्दत्तसुतोपायसंपादितमहाधने |७|| विभागेच्छा पालकौरसस्यजाता तदाकिल। संपादकेच्छनियतां साम्यशश्च विधीरितः isd अनौरसः प्रकथितः धर्मपत्नीसमुद्भवः द्वितीयादिसुतास्सर्वे सूनुपुत्रादिशब्दिताः ॥ भवन्त्येयात्र सततमौरसत्वं न तेषु तु । एतादृशीयं मर्यादा धर्मपत्नीस्थितौ तदा ||li द्वितीयादिसमुद्भूतपुत्राणामिति निर्णयः । धर्मपल्यां तु नष्टायां पश्चात्स्याद्या विवाहिता ॥८ ॥

धर्मपत्नीत्वविचारवर्णनम्
२७०६
सा चापि धर्मपत्नीत्वं प्राप्नोत्येवाचिरात्खलु।
तस्यामपि च नष्टायां पुनर्यास्याद्विवाहिता ॥२॥
कुले समाने सा चापि धर्मपत्नीत्वमर्हति ।
ज्येष्ठायां विद्यमानायां या द्वितीया विवाहिता ११८३।।
पुत्रार्थ सापि काले न पुत्रिणी चेत्तथा भवेत् ।
वथा न चेद्धोगिनी स्यादाप्नोति पुरुपप्रसूः ॥८॥
यत्नेन धर्मपत्नीत्वमनवाप्यंसुनिर्मलम् ।
बहुकालसुता भावद्धर्मपन्नी द्वितीययोः ||
पुत्रसमणे जाते द्वितीया पुत्रिणी यदि ।
सदापि तनयस्सोऽयं औरसो न भवेदपि ८६||
आत्मजत्वं दत्तपुत्र अङ्गादनेति मन्त्रतः ।
यतो निक्षिप्तवान् तात: परसंजातविग्रहे ॥८॥
ततो द्वितीयासंभूतः तनयस्तादृशो न
कि त्वयं कामजः कोऽपि मुतपुत्रादिधाच्यता 16ll
तस्मिन् तिष्ठति बाढ़ सा नौरसत्वं प्रतिष्ठति ।
आत्मजत्वं च मुख्येन गौणत्वेनाखिलं तु तत् 11८९ll
प्रतिष्ठत्येव किं तेन नौरसेन समो भवेत् ।
ज्येष्ठाद्वितीययोरारापित्रापुत्रकृताः परः Eall
उपनीतस्ततोज्येष्ठा मृता तस्याः क्रियां च सः ।
अकरोदत्तपुत्रस्तु ततः कालेन सा परा ||
पुत्रं मासूत सोऽयंचेहत्तोऽन्यकुलजोऽपि सन् ।
तत्समांशी भवेदेव नाकार्या विचारणा ॥२॥

लोहितस्मृतिः ज्येष्ठाद्वितीययोरारातातेन च स्वीकृतः मुतः। सगोत्रो या सगोत्रो या तमीळ्यादिसलियः ।।232 मृता द्वितीया तस्यान्तु चकार प्रेतात्यम्। दत्तोऽयं स्पेन धर्मेण मृताया मातुरेख हि ॥६४|| पश्चाकालेन सा ज्येष्ठा प्रासूत यदि पुत्रकम् । सोऽपिपुत्रोऽपि ते नैव तुल्य इत्येव सूरिभिः ॥१३॥ कथितो हि महाभागैः तस्मात्कर्म तथाविधम् । तादृफर्मकरो मुख्यो भवत्येव तु तादृशं ॥६६॥ कर्म सद्भिः प्रकथितं तत्कर्तादुर्वलोऽप्ययम् । एव स्यादौरसेन समोऽप्यतः I एवं सत्यत्र भूयश्च निश्चयं वच्मिचैककम् । दत्तपुत्रादत्तपुत्रसन्निधाने पिवृक्रिया l अदत्तपुत्रेणैव स्यात्कर्तव्याऽन्येन नैव हि । प्रवलः सद्य ॥ धर्मपल्याः प्रावल्यम् ॥ मुख्योवैदिककृत्याना नान्या तत्सदृशी भवेत् । धर्मपत्नीसमुद्भूत औरसश्चात्मजश्च सः ॥१०॥ वंशोद्धरणकर्तृत्वस त्वसर्वधर्मसमाश्रयः। न तत्समः परस्तात्तु तदन्ये कामजाः स्मृताः ।।१०१।। सर्वे धर्मा धर्मपत्न्याः सकाशात्संभवन्ति हि । पाकयज्ञाः सप्त तेऽपि हविर्यज्ञास्तथैव च ॥१०॥ ज्येष्ठपल्येव सा पत्नी धर्मपल्ल्यपि सा परा MER

गृह्यानिकृत्येस्त्रियोमुखत्वम्
सोमसंस्थासप्तसंस्थाः नित्यनैमित्तिकास्सवाः ।
सहससंख्याः काम्याश्च यज्ञष्टिपशुकादयः ॥१०॥
अहीनाः तवश्चापि सत्रास्ते विविधाः पुनः।
धर्मपत्न्यनलानातास्तेषामोपासनस्य
तु ॥१०४॥
प्रथमः कथितरसद्भिः मुखं प्रवर उत्तमः।
तत्समो विद्यते भूमी मूलभूतश्चकारणम् ॥१०॥
तादृशस्यात्य करणं धर्मपत्येव मुख्यभूः।
तधोना बहयः स्युस्तस्मात्सा सन्ध्ययोद्वयोः ॥१०६।।
सीमासन्धिप्रदेशेषु न गच्छेदेव सर्वथा ।
नदीपाथः परंपारं न गच्छदेव सर्वथा ॥१०॥
यदि मोहेन सा गच्छंद्रहयस्सद्य एव वै।
लौकिकत्वं प्राप्नुवन्ति तस्मात्तु सरितं नदीम ॥१०॥
महानदीमल्पनदी यनान्नातिकमेत वै।
ना तरणमात्रेण धर्मपल्या विशेषतः ॥२०॥
पत्नीमात्रस्य सामान्यात्सजातेरपि केवलम् ।
पक्षवन्तो वहयस्ते प्रद्रवन्त्याशु तत्क्षणात् ।।१०।।
तस्मादत्यल्पसलिलकुल्यागोप्पदमात्रकाः ।
सरित्स्नानाय गन्तव्या न भवेत्तु तया किल ।।११।।
यदि मोहेन सा पत्नी अत्यल्पसलिलामपि ।
फुल्यारूपामतिस्वल्पविशाला पादमावतः ॥११२
सुसन्तरेयो हेला लइयेन्तु सर्वदा ।
सवन्या अपि तादृश्याः पर पारेऽतियाल्यतः ॥११॥

२७१२ लोहिवस्मृतिः अप्येकपादं पूर्व वा निक्षिपेत्तावतैव हि । पुनस्सन्धानमित्युक्त वह रेस्येति तत्रगुः ॥११४॥ धर्मपल्यतिरिक्तानां तादृशो नियमो न हि । संसर्गहोमात्परतः पत्नीनामिति निश्चयः ॥११॥ तावत्तु तासां स्वाग्नीनां अवनायायमेव वै॥११॥ नियमः कथितस्सद्भिः संसर्गात्परतः पुनः। एतादृशस्तु नियमः त्वत्यन्तावश्यको न तु ॥११ तस्माद्वितीयादि भार्या विशेषाणां च सानिशम् । शरणं विश्रमस्थानं सर्ववैदिककर्मणः ॥११० यदि सा स्यात्समीचीना धर्मपत्नी सती शिवा। तया समुत्तारिताः स्युः सर्वाभार्याः परास्तुयाः ।।११६ यदि सा स्यादप्रगल्भा कर्माज्ञा कर्मनाशनी। धर्मस्यसिदिनांस्यस्यादित्येवं धर्ममानसम् ॥१२०) अथापि तस्य यो यहिः सदा रक्ष्याच सूक्ष्मतः । नम्मिन्यौपामनेज्ययमयशानयमनाः। स्थामेरा पितृश्राद्धं आधान मोम पर वा। तुं न शनीय तं यया भवेत् ।।१२।। थमाया पमाल्या दूरगायां कदाचन । पाले भारत माम्माधानरम नत् ॥१४॥ संसर्गहोमो यावत्तु न कृतः स्यात्तदा पुनः । महिप्रधानो धर्मस्य मुख्याचौपासनः शिवः ॥१२ ॥ मंगोम्यानदमाये तु द्वितीयाधनलेल्प सा पुनः। गृह्माभिरक्षणविधिवर्णनम् २७१३ कृत्वा वस्मित्वीतिहोत्रे तानि कर्माणि चाचरेत् । द्वितीयाद्यनलेप्वेवं विद्यमानेप घेत्पुनः ॥१२।। अमन्वकेण होतन्यं अन्यथा कम नश्यति । कंचित्कालं धर्मपली स्वधर्मणस्थिता ततः ॥१२६॥ चित्तव्यामोहरुक्क्रोधोऽपस्मारादिकुबुद्धिभिः । भरिमपि संलक्ष्य भ्रष्टा तुच्छातिचारिणी ॥१२॥ जाता यदि तदा तस्यास्तमनि धार्य धर्मतः । विद्यमान समिनिष्ठमथवात्मनि संस्थितम् ॥१२८ तत्तत्कालेप संप्रामादेषु च तथा पित्रोच मातामहयोदशादिषु च कृत्रमशः ।।१२६।। नित्यनैमित्तिकेप्येवं स्थालीपाकेपु मन्त्रतः । हुत्याज्यं व्याहतीभिः सर्वचित्तप्रपूर्वकम् ॥१३॥ तस्मिन्नेव प्रधानानौ तानि कर्माणि चाचरेत् । अतिदुप्टेति या वरसा त्यज्यते मन्त्रसंस्कृता ॥१३।। ते नैव वहिना दाहं प्राप्यते घटतादनात् । तावत्तस्मिन् पावके तु तद्भर्ता पितुराब्दिकम् ।।१३२।। स्थालीपार्क तथा धानं यच्चान्यदपि वैदिकम् । संप्राप्तमखिलं कुर्याद्विवादो यदि वा पुनः ।।१३३।। घटाहरणाभावे कर्तव्यत्वेन निश्चितः। तस्मिन्वही विद्यमाने समिध्यात्मनि वा सदा ॥१३४॥ विद्यमानं मन्त्रमुखात् पुनस्सन्धाय वा ततः। तस्मिन्वह्रो विवाहोऽयं द्वितीयो मन्त्रपूर्वकः ।।१३।।

पुनः।
मोदितम्मतिः
काम्यनन गिरिता नभानन्तरं
सम्मिन्नंग ग मंमगाम गांगयाविधि ॥१३॥
हिममेयमिति पत्मा दापितः।
यविशियों न मंन्त्यायः आत्मगाव व यनः ॥१३॥
मोऽयमेव प्रधानाऽमिः यजमानस्य केवलम् ।
गाईस्थ्यदायफः श्रीमान् प्रापयनिवारकः ॥१३॥
प्रयलम्तेन कथिनम्तम्मिन सति ततः शिवे।
मुख्यानावात्मनि परे तमनाहत्य केवलम् ॥१३॥
यहिं गाईस्य्यदं दिव्यं पनीम पती जडः।
चदा पनी गता भ्रष्टा तदा सोऽपिविभावमुः ॥१४॥
नष्ट एवेतिनिश्चित्य दुर्बुद्धा शास्रवर्त्म तन्।
अज्ञात्वेय जडो जाड्य प्राप्य दुधिया वृथा ॥१४१
द्वितीयानिमुखाद्यद्यत्कर्म भ्रान्त्या करोवियत्।
व्यर्थमेव भवेन्नूनं फरदं न भवेदपि ॥१४॥
श्राद्धादित्यागदोपाय पात्रमेव भवेद्ध यम् ।
सति तस्मिन्प्रधानानौ वात्मन्यत्राशुशुक्षणौ ॥१४३||
द्वितीयाद्यनले लौकिकत्वेनैव समे स्थिते ।
अमन्त्रेणैव होतव्ये समन्त्रेण वृतं तु चेत् ॥१४४॥
व्यत्यासेन कृतं तच तूष्णीकं प्रभविष्यति ।
पित्रोः श्राद्ध तथा व्यर्थे जाते तत्परमेव वै ॥१४॥
सद्यश्चण्डालता सा स्यादनिवार्या सुरैरपि ।
पुनर्मोहेन तस्मिन्वै द्वितीयाद्यनलेऽल्पके ॥१४॥

भ्रष्टचरित्रायाःगृह्याग्निम्त्यनिषेधवर्णनम् प्राधान्येनेव निश्चित्य तानि कमांणि मोहतः। फवानि चेदिकानि का वा तस्य गतिभवेत् ॥१४॥ आदावेका गति कृत्या पूर्वाग्नेश्शास्त्रपर्मना । खीकारं वा नचेत्त्यागं पश्चात्कुर्यात्सवादिकम् ।।१४८।। इत्येचं केचन प्राहुराचार्या ब्रह्मवादिनः । वस्तुतस्त्वत्र निष्कर्ष प्रवदामि सुखाय वै ।।१४६।। आत्मस्थं वैदिकानि त भ्रष्टायै न कदाचन । दातुं शक्यते तूष्णी दत्तश्चदाशुशुक्षणिः ॥१५॥ ताशायै शपत्येनं घटध्वंसात्परं क्रुधा। सप्राणां पविता भार्या समुद्दिश्यैव पावकम् ॥११॥ शुद्धमात्मैकशरणं बुद्धिपूर्व कथं शुचिम्। दातुमिच्छत्ययं मूढः मामित्येवं सुदुःखितः ॥१५२॥ भक्त्ययं वायुसखा तस्मात्तां घटताडने। लौकिकेन दहेद्वैश्वानरेणैव न चान्यतः ५१५३११ पश्चात्पूर्वोत्थिते वही स्वात्मन्येयस्थितेशिवे द्वितीयासंभवं वहि संसृज्य विधिवत्ततः ॥१४॥ तस्मिन्नेवानले सर्व कर्मजातं तु वैदिकम् । कुर्यादेव विधानेन न बेहोपो महान् भवेत् ॥१५॥ दुश्चरित्रात्पूर्वमेव समुद्भूतरसुतः शुभः । निदोष एव स्वीकार्यः सेव त्याज्या मनीषिभिः ॥१५६।। उध्वं चेत्समुद्भवः तस्या गर्भात्तु शावकः । सा माह्यस्तु न भवेदिति, वेदान्तशासनम् ।।१५७॥ ।

२७१६ लोहितस्मृतिः तत्प्रकृत्या च तां ततः। । घटप्रहारात्परतः दग्ध्वाश्राद्धं च निवर्त्य सकृदेव स्वयं ततः ॥१५८ शुद्धो भवेन्नचेत्तूप्णी स्थितेऽस्मिन्वै तथा किल । श्रौतस्मादिकृत्यानां नाधिकारी भवेदयम् ॥१६॥ भ्रष्टायां पतितायां या स्वैरिण्यां यदि देवतः। जातायामपि तत्पत्न्यां त्यागं कुर्यादतन्द्रितः ॥१६॥ शास्त्रमार्गेण विधिना तमग्निं परिगृह्य वै। त्यक्त्वा तां विधिना पश्चाद्भूयो धर्मायमेव वै॥१६॥ आहरेद्विधिवदारान् अग्नीश्चवाविलम्बयन् । पञ्चायो ब्राह्मणस्य पक्षदाराश्चशास्त्रतः ॥१६२।। स्वाजातो विहितास्सद्भिः तेषु दारेषुधर्मतः । अनुगाम्येय तु भवेत्तादृशेन हि कर्मणा ॥१६३।। अयं भवेद्ग्रह्मचारी सदा नित्यविशेषणः । प्रजा मैथुन कुर्वन् ताभिरसंप्रार्थयन्नति ॥१६४।। पुनः सवस्तया नापि च्ययते ब्रह्मचर्यतः । प्रवपर्यसमिद्धिः पनीपञ्चकसंस्थिती सिध्यते प्रामणस्यैव ऋतुकालाभिगामितः। कामपतिकरणाग्रह्मचर्य कदापन ॥१६॥ मो(धमानोनि नगनि ने प्राय प्रवादिनः । पीना फरणं प्रो पचानां स्यारत युगे ॥१६॥ चातुर्व wिr मासेन प्रादसत्किया। आकारानो गवारमः भार्यान्तरपरिप्रहः ॥१८il d.

द्वादशविधपुत्रवर्णनम् २७१७ देवरादिसुतोत्पत्तिः विधवागर्भधारणम् । एवमादीनि चान्यानि कर्माणि न कलौ क्षितौ ।।१६।। ।। द्वादशविधपुत्राः ।। प्रशस्तानीति नोचुर्हि तथा द्वादशपुत्रकान् । तबादौ क्षेत्रजो दुष्टः स्वपत्न्यामन्यसंभवः ॥१७०) सगोत्रेणेतरेणापि तावुभौ शास्त्रनिन्दितौ । स्वस्मिन्न्याध्यादिना ग्रस्ते सति सान्येन सङ्गता ॥१७॥ येन केनचिदज्ञाता गर्भ धृत्वा रहस्यति । प्रसूते यं सुतं सोऽयं सुतो गूढजनामकः ।।१७२।। पितृमात्रेण संज्ञातजननो व्यभिचारजः । पितृणां सर्वनरकप्रदः पापालयः खलः ॥१७३|| वन्ध्ववन्धुप्रभेदेन द्विविधोऽयं च कथ्यते । या विवाहात्पूर्वमेव जारसगतितः किल ।।१७४।। 'गर्भधृतेऽथ तरिहात्वा सत्वरमेव वै। विवाहितापितृभ्यां हि दत्वा वै यस्य कस्यचित् ।।१७।। अकोत्यकभयात्सद्यः सा प्रसूते तु यं सुतम् । कानीन इति विख्यात: पुनश्चायं तथा परः ।।१७६।। प्रकारान्तरतः प्रोक्तः सूते कन्येव यं सुतम् । सोऽयं तथाविधश्चापि प्रथित्तस्तेन दुर्जनिः ॥१७॥ तन्माता पतिता पश्चाद्यस्य कस्य विवाहिता। कुटनी सच्चरित्रेय गुह्मपापातिनिन्दिता ॥१७८ खोहितस्मृतिः तुरन येनापि भाग साता! समायापतिभावं च पश्यता धारयन्त्यति ||१६i तं पापि सनयं स्यीयप सतः पुनः। पालगन्न्यपि निदुपुत्रवाधियीतले ॥१८॥ माभ्योपु च सतीया काचिदिति वादिनी। स्वमुताना सत्तुलेषु यदुकाले गते शनः ।।१८।। दूरदेशस्थितैयन् जाते. अभ्यमायया । विद्यमानातिचपला सेन पुत्रेण सत्कुलान् ॥१८चा महात्मनो नाशयन्ती तत्पुत्रस्तादृशो झयम् । कानीनस्त्वपरः पापी निन्दितो ब्राह्मणोत्तमैः ॥१८३॥ अक्षतायो क्षतायो च जातो भंगी मती। तो चापि निन्दितो पापी पुत्रवाही प्रकीर्तितौ ।।१८४ा अकीर्तिकारको बन्युजनानां दूपितो खली। अतिनच्यं गतो हेयौ धर्मशास्त्रप्रदूपिती ॥१८॥ पितृदोपैकजननी न योग्यो यस्य कस्यचित् । ॥ दत्तस्यौरससमभागः ॥ दत्तः पितृभ्यां दत्ताख्यः सापेक्षाभ्यां च सद्विधः । तथैव निरपेक्षाभ्यां तत्राद्यस्तु तुरीयभाक् । तत्तो यो निरपेक्षाभ्यां सकाशापालकस्य वै ॥१८६॥ सोऽयं वै समभागी स्यात्पश्चाज्जाती रसेन वै। दम्पत्योरेव तद्दानेऽधिकारस्तत्प्रतिग्रहे ॥१८७।।

विधवाया:दत्तकपुत्रस्वीकारेऽनधिकारित्ववर्णनम् २ दम्पत्योरेव नान्यस्य यते; ब्रह्मचारिणः । अकलत्रस्थतत्सामीप्याकलत्रस्य वा तथा ॥१८८॥ विधवाया नाधिकारः प्रदानग्रहणेऽपि वा । वानप्रस्थस्याशुचेर्वानुपनीतेः कदाचन ॥१८६॥ तद्वत्सूतकिनश्चापि वतिनोनाधिकारता । विक्रीतः कथितश्चैवं पितृभ्यां तादशैरपि ॥१६॥ निर्वाहकेण ज्येष्ठेन पितृव्येण तथैव च। पितामहेन तत्पल्या तथा मातामहेन च ॥१६॥ स्वयं क्रीतरच कथितः पुत्रः कृत्रिमसंज्ञिकः । स्वयंदत्तस्तु दत्तात्मा स्वपोपणपरः खलः ॥१६२।। सहोढजस्तथाप्यन्यः पुत्रः शास्त्रकनिन्दितः । गर्भे विनोन्यद्गहेतुः पितॄणां नरकप्रदः ॥१६३॥ स कानीनः पुनरपि स्वगोत्रेण समुद्भवः । अतिपापीस चण्डालादधिकोऽश्चाव्य एव सः॥१६४।। स्मरणीयो न वाच्योऽयं वंशमज्जनकारकः । अपुत्रेण परक्षेत्रे नियोगोत्पादितस्सुतः ॥१६॥ उभयोरप्यसौ रिक्थी पिण्डदाता च धर्मतः। हैन्यन्यङ्गकनिलयः पुत्रोऽयं कश्चनस्मृतः ॥१६६।। महादोपसमुद्भवः। प्राहकेण स्वीकृतो यः सोपविद्ध इतीरितः ॥१६॥ त एते निखिलाः पुत्राः सूत्रकारैर्महात्मभिः । दुखादनङ्गीकता.त्युः महान्यायकसंभवाः ॥१६॥ पितृभ्यां यस्समुत्सृष्टः . इतीरितः। २७२० लोहितस्मृतिः चरमस्त्वपविद्धस्तु कृताकृत तस्माद्वावेच तो प्रोक्तो तनयो शास्त्रविश्रुतौ ॥१६॥ नरकोत्तारको सद्यो जन्मनैव न कर्मणा। आत्मजश्चापिदौहित्रः समानी पैतृकेऽनिशम् ॥२०॥ कदाचिदधिकश्चापि दौहित्रस्तनयादति । दौहित्रात्तनयस्तद्वदधिकः केप कर्मसु ॥२०१॥ औरसो धर्मपत्नीजस्तत्समः पुत्रिकासुतः। पुत्रभावोयस्य वा स्यात्कदाचित्केन कारणात् ।।२९ पुत्रसमहणं सद्यः कर्तुमाशु न शक्यते । चिरकालप्रतीक्षादौ तत्पित्रोः कामपूरणम् ॥२०३६ तत्प्रार्थितप्रदानस्य शपथोक्यादिकं ततः । जनानां पुरतो होमः पश्चाच्छपथवाचनम् ॥२४॥ तस्यैतस्य तु कृतस्नस्य तत्तत्काले शनैः शनैः । अत्यन्तदुःसं मुकरमनुभूय स भार्यकः ॥२०॥ तं सगृह विधानेन जातकर्मादिकं च तत् । त्योत्सव न भूय तस्य मौज्यादिपुस्खयम् ।।२०६॥ पश्चाजाते धर्मपल्या तनये वा तदेय थे। द्विनीया मृतीयायां स्वकीयोत्पत्तिमात्रतः ॥२०॥ पूर्वकालगृहीतं तं कुमार शुचेतसम् । मगृपचोभयत्रापि भ्रष्ट कृत्वा स्वयं ततः। अत्यन्नपातायाममिथ्यावाक्यविशेषमान ॥२६॥ अपि नूप्मी ष्टि रिल तस्मादन्यमुतं दात् ॥२८ पुत्रसंग्रहावश्यकतावर्णनम २७२१ तमुद्दिश्यदिवारानं प्रलपन दुर्मनाः परम् । राजाज्ञापान्भूतश्च सज्जनरतिदूपितः १॥२१॥ संलंध्यन् मित्रवाक्यानि बन्धुवाफ्यानि भूरिशः। तृणीकुर्वन् दुष्टवाक्यसहस्रणायमल्पकः ॥२१॥ तुच्छो दृष्यः प्रभवति तन्मध्ये च पुनः पुनः । ताडितो धिकृतो राजकीयैः पुंभिः प्रदूषितः ।।२१२।। हेयभूतश्च भवति तस्मात्पुत्रस्य सङ्ग्रहम् । प्रकुर्वन्त्येव विद्वांसः पुत्राभावे तु मुख्यत्तः ॥२१३॥ दौहित्रे सति सोऽयं स्यात्पुत्रतुल्यस्ततोऽधिकः । न तस्य होमः कर्तव्यो ग्रहण न च मन्त्रतः ॥२१४॥ क्रियाः काश्चिन्न सन्त्यत्र जातकर्मादिकाः पराः । सनयोत्पत्तिसमयेस्वर्णदानादिकं परम ॥२१॥ यद्यत्तदेतदखिलं यनसाभ्यं विद्यते। स या नूनं कृते फिश्चिन् पुनरप्यनिवार्धके १२१६॥ अस्येव पुरतो दैवात्पुत्रे जातेऽथवा तदा । जातं तमेनं दौहित्रो मातुलो मम संप्रति ॥२१७॥ संजातइति सन्तोषपूर्वकं तोपयिष्यति । तयोश्चित्तं स्ववन्धूना पश्चाम्जातोऽप्ययं शिशुः ॥२१॥ संजातमात्रः परमः सर्वप्राणेन सन्ततम् । प्रपालयति स्वप्राणाधिकतो मानयन्नति ॥२१॥ मानितः पालितः सम्यक्तनैवं सति सोऽप्यति। प्रीत्येव सततं तारितः। नादिनम् भरमम्मानिट तान मम्मादार तो पासो गनगो शामचिनी । नरकोसारको मगी जन्मनयन नया। आरमनमापियोहियः ममानी पलनिरन् । फदामिदधिम्मापि वोहियानगाइति । दौहियातनयमावनिमः केर कम औरमो धर्मपनीजस्तत्समः पुत्रिकामुतः । पुप्रभावोयस्य या स्यात्कदाचितन कारणान् ।।२८ पुत्रसग्रहणं सशः कर्तुमागु न शक्यते । तत्प्रार्थितप्रदानस्य शपयोसयादिकं ततः । तस्यैतस्य तु कृत्रनस्य तत्तत्काले शनैः शनैः। सं सगृह्य विधानेन जातकर्मादिकं च तत् । कृत्वोत्सव नु भूय तस्य मौज्यादिषुस्वयम् ।।२०६१ पश्चाजाते धर्मपत्न्यां तनये वा तदेव वै। सगृह्यचोभयत्रापि भ्रष्ट कृत्वा स्वयं ततः । चिरफालप्रतीक्षादी तपियोः कामपूरणम् ॥ जनानां पुरतो होमः पश्चाच्छपथवाचनम् Real जत्यन्तदुःखं मुकरमनुभूय स भार्यक : Real द्वितीयायां तृतीयायां स्वकीयोत्पत्तिमात्रवः ॥२० ॥ पूर्वकालगृहीतं तं कुमारं शुद्धतसम् । अपि तूष्णी द्वेष्टि किल तस्मादन्यसुतं हठात् ॥२० ॥ अत्यन्नपातकावासमिथ्यावाक्यविशेषकान् IREL पुत्रसंग्रहावश्यकतावर्णनम २७२१ तमुहिश्यदिवारानं प्रलपन दुमनाः परम् । राजाज्ञापान्भूतश्च सज्जनरतिपितः 1॥२१॥ संलंध्यन् मित्रवाक्यानि बन्धुधाक्यानि भूरिशः । तूणीकुर्वन् दुष्प्याक्यसहस्रणायमल्पकः ॥२२॥ तुच्छो दूप्यः प्रभवति तन्मध्ये च पुनः पुनः । ताडितो धिश्कृतो राजकीयैः पुंभिः प्रदूपितः ।।२१२।। हेयभूतश्च भवति तस्मात्पुत्रस्य सङ्ग्रहम् । प्रकुर्वन्त्येव विद्वांसः पुत्राभावे तु मुख्यतः ॥२१३॥ दौहित्रे सति सोऽयं स्यात्पुत्रतुल्यस्ततोऽधिकः । न तस्य होमः कर्तव्यो ग्रहणं न च मन्त्रतः ।।१४।। क्रियाः काश्चिन्न सन्त्यय जातकर्मादिकाः पराः । वनयोत्पत्तिसमयेस्वर्णदानादिकं परम ॥२१॥ यात्तदेतदखिलं यनसाध्यं न विद्यते। स या नूनं कृते किश्चिन पुनरष्यतिवाक १२१६।। अस्यैव पुरतो देवात्पुत्र जातेऽथया तदा । जातं तमेनं दोहियो मानुलो मम संप्रति ॥२१॥ संजातइति सन्तोपपूर्वकं तापयिष्यति । तयोपित्त स्वमन्ना पश्चातानोप्य शिः २२at संजावमात्रः परमः सर्वप्राणन सन्तुसम । प्रपालयति स्वमाणाधिकनो मानयन्नति || मानितः पारिता सम्मान सति माश्यति। पोस्यैष सलन पासप्रनिहस्पषमा | एक २७२२ लोहितस्मृतिः तस्माद्दौहित्रतुलितो नास्ति पुत्रो जगत्त्रये । ॥ दौहित्रेसति पुत्रप्रतिग्रहाभावः।। दौहित्रोत्पत्तिमात्रेण तत्कुलद्वयसंभवाः ॥२२॥ उत्तारितास्सद्य एव भवेयुर्नात्र संशयः । तामभ्यनुज्ञा भार्यायाः पुत्रसमहहेतवे ॥२२२॥ न दद्यात्सति दौहित्रे म्रियमाणः स्वयंपतिः । आपन्निवारकरसोऽयं आपत्सापुत्रशून्यता ॥२२३॥ एव भवेन्नूनं दुहितातनयोऽखिलैः। दौहित्रे सति पुत्रस्य ग्रहणं न समाचरेत् ॥२२४।। अजातपुत्रस्तेनैव पुज्ययं धर्मतो मतः। अविभक्तो सातिभिर्यस्त्वपुत्रो देवयोगतः ॥२२॥ मृतश्चेत्तस्य ते सर्वे तन्मुखनैव तक्रियाः। मन्त्रैः कारयितव्याः स्युरन्यथा पापभागिनः ॥२२६॥ झातयः प्रभवन्त्येव वक्रियामात्रतोऽस्य वै। तद्रव्यभाषत्वं न भवेत् अविभक्ता यतस्तु ते ॥२२॥ विभास्ते खलु तदा भवेयुर्यदि तेन थे। पूर्व मृते न पत्तपा मातीनां तु न किश्चन ॥२२८|| रेशमा दिकिमपि धर्मतो न भवेद्ध यम् । दम्यं मृतस्य यद्वा तत्सर्व पुत्रीमुनस्य वै ॥२॥ यमेव भवेन्नूनं तम्माजातऽसिला भुष। दौदिने भप्रमनसः नष्टकामा गतधिः ||pell

परधनापहारकाणांदण्डविधानवर्णनम् २७२३
भवन्ति किल भूयोऽपि केचिदुष्टजनास्तराम् ।
परद्रव्यापहारः नित्यचौथक वृत्तयः
नित्यचौकवृत्तयः ॥२३॥
मयं ज्ञातेविभक्तस्य धनं तूप्णी दुराशयाः ।
कदा केन वरिष्याम इतिचिन्ता समन्विताः ॥२३२।।
अनुवानि च वाक्यानि प्रलपन्तस्ततस्ततः ।
सता प्रदपिणोऽतीय वर्तन्ते पापिनो जहाः ॥२३३॥
नान्नित्यं धार्मिको राजा विचार्य शटयुद्धिकान् ।
गर्मण चारमुखतः तया व्याभापणादिना ॥२३४||
पो परेपो विदुषां धर्मज्ञान मिधोक्तितः ।
वेचार सूक्ष्मयावुद्धया समालोच्य ततः परम ॥२३॥
वीकृत्य दण्डयित्वा च छीकृत्य प तदा तदा ।
दाष्ट्रात्प्रवासयेदुटान सन्तस्सम्यक्प्रपूजयेत् ॥२३६।।
दानमानादिना नित्यं तेनास्य सुमहात्मनः ।
भूतियशो भगवायुर्वन्तेन्यहमअसा ॥२३॥
अपुरधनमात्रे युतियो नित्यमेय थे।
रोदियाजनने यमातुं यता भवन्ति वे १९३८
दोधिप्रजनने सपो नष्टकामास्तथा
नेशानियदुःरान फरमलं प्राप्नुवन्ति प ॥२३॥
पभूरवारयोः पिनोः पत्यभाये ततः पुनः।
अभ्यनुशामदानेश्या अपविण्या विपपि ॥२४॥
सहारते कदापि
पुपमहणमंमः।
अधिकारी मनुमोफः आपत्साशून्यता ॥२४॥

२००५ लोहितामृतिः आपनियारकरसोऽयं दादिग्रस्तस्य गोदितः। विधवा या पितृभ्रानुक्ता पुत्रप्रहे तु या ॥२४॥ अभ्यनुज्ञा झातिमता चंद्वन्धूनां च प्रामिणाम् । जनानामपि शिष्याणां श्रीसृणामपि यत्नतः ॥२४॥ युक्तत्वेनेकण्यात्तथास्त्यिति मनोर्मतम् । तदा तु प्रहणं झातेनान्यस्य तु कथंचन ॥२४॥ कदाचिदपि पुत्रस्य प्रहणे समुपस्थिते । अपुत्रिणोस्तदाभ्रातृमध्येज्येष्ठान्त्ययोः किल ॥२४॥ एकस्य ग्रहणं कार्य धर्मतो यस्य कस्य वा। प्रहणं त्वेकपुत्रस्य सर्वेपामप्यसम्मतम् ॥२४॥ न ज्येष्ठस्य कनिष्ठस्य पङ्गोमू कस्यरोगिणः । अन्धस्य बधिरस्यापि कीघस्य श्चित्रिणोऽपि वा ।।२४॥ ग्रहणं नैव कुर्वीत कुर्याद्यदि वृधैव सः। औरसैरपि तैः पुत्रैः पङ्गुमूकादिभिर्जडैः ॥२४॥ निरंशैर्वेदमन्त्रैकन (?) धिकारनिदानकः । निष्पयोजनकः तुच्छ: नाममात्रैकभाजनैः ॥२४॥ भरणीयैरन्नपानप्रदानमुखतस्तराम् । प्रयोजनं किमप्यस्ति तदुत्पन्नः कथंचन ॥२५॥ वर्गप्रयात्परं तेषां मूकाद्यौरससन्तती। भवेद्ब्राह्मण्यपीप्कल्यं तत्पूर्व दस्य सर्वता ॥२५॥ मन्त्राघु दारणाभावात्तक्रियाणां च लोपतः। वथा वावरप्रकथितं धर्मस्तैर्महात्मभिः ।।२।।

विमस्या कृता
पुत्रत्वस्याधिकारितावर्णनम्
बन्धुसामन्तजनसम्मता।
1 चंद्र कृतानुज्ञा पुत्रग्रहण हेतवे ॥२३॥
बलत्येवेति धर्मक्षा न चेत्तु न तु सिध्यति ।
तिमत्या कृतं यत्तु पुत्रसमणादिकम् ॥२५४१
सदानकया। वं वैश्वस्तं तत्तु सिध्यति ।
सर्वज्ञातिमतं यत्तदानं विश्वस्तया कृतम् ॥२५॥
ारं धाराकृतं चेत्तु सिध्यत्यत्र न चेन्न तु ।
निकालनिषिद्धं यद्दानं धार रहः कृतम् ।।२५६।।
शान्तरकृतं चापि न सिध्यत्येव सर्वथा।
ण्डान्यदेशरचितभूमिदानं महात्मभिः २५७॥
च्छौर्यकृत्यमित्येव निश्चित शास्त्रवर्मना
नपुत्रपुत्रग्रहण दौहिबाजनने भवेत् ॥२८॥
Eौहित्रजननादूत्रं तदप्रामाणिक
तदप्रामाणिकं भवेत्।
बावन्नृणां विभक्तानां दौहित्रोत्पत्तियोग्यता ॥२६॥
बावत्तु तस्य स्वीकारे योग्यतापि न जायते
बातेन्द्रियाणां दोबल्ये दौहित्रे सति सङ्कटे ॥२६०)
अयशादसुसन्देहे पुत्रप्रहणमिप्यते ।
एकस्य पञ्चपेवस्य ग्रहणं ज्येसर्वयोः ॥२६॥
वहितो यस्य कस्यापि मध्य एकस्य सङ्ग्रहः ।
नव ज्येष्ठ्यकानिष्ठ्यनियमो मनुना स्मृतः ॥२६॥
महणं निपु मध्यस्य त्रयाणां पञ्चसु स्मृतम् ।
बयाणां पदसु खो वा ज्येष्ठो वा नियमो न हि ॥२६॥

२७२६ लोहितस्मृतिः त्रिषु पञ्चमु पपयं भ्रातृप्याद्यान्त्ययोश्च न । मध्य एकः प्रयश्चत्वारः स्युरप्रेति वै जगुः ।।१६४ समाह्य वाद्य एकः स्यानाझो ज्येष्ठो द्वितीयकः । तृतीयो वा विधानेन न दो सांत्मना स्मृती ॥२६॥ आद्यान्त्यावेव संत्याज्यों बहुभ्रातृ वत्सुतौ । मध्ये ज्येष्ठद्वितीयादि नियमो नेति चोचिरे ॥२६॥ यदि मोहारज्येष्ठपुत्रो दत्तरस्यात्ततः स्वयम् । कृतमौञ्जीवियाहोऽपि जनकस्य सुतो भवेत् ॥२६॥1 न पालकक्रियायोग्यो न गृह्णीयादतस्त्विमम् । यः कृतो दत्तहोमरस तूष्णीकं स्यान्न संशयः॥२६८।। दत्तोऽयं चालिशो भ्रष्टो ग्राहकस्य सुतो न तु । जनकस्य सुतस्सोऽयं इत्युक्त तं प्रवम्यपि ।।२६६॥ न कर्मयोग्यस्तस्यापि किं तु तूष्णीं ततः परम् । क्रयक्रीतद्रव्यसमः तृणकाष्टमृदादिभिः ॥२७०il तुलितो न क्रियायोग्यो यतस्त्यक्तश्च तेन वै। अनेकजायासातपुत्रानेकस्य चेदपि ॥२७॥ जायानामगजस्त्याज्यः कनिष्ठोऽपि तथैव हि । प्राह्यास्तत्र विशेषेण ज्यप्ठ्यकानिष्ठ्यसंभवः। ज्येष्टान्त्ययोस्तु ये मध्याः संजातास्तनयास्तु ते ॥२७ ॥ नियमोनेवि तत्र स्यादिति सर्वमतं तराम् ॥२ ॥

एकपुत्रत्वेदत्तकायोग्यतावर्णनम् । एकपुत्रस्य स्वीकरणनिषेधः ।। यद्य कपुत्रो दत्तश्चेदात्मानं ग्राहकं ततम् । मातृदयं तरक्षणेन नरके पातयिष्यति ॥२७४।। उभयोस्तातयोश्चापि जनन्योरपि कर्मणि । नाधिकारी भवेत्तस्मादुभयभ्रष्ट ईरितः ॥२७॥ प्रदानसमये स्वस्य सन्तु भ्रात्पु तत्परम् । नष्टेषु तेषु चेदवशिष्टो यदि भयेदयम् ॥२७६।। उभयोः कर्मकर्ता स्यात्तदा तद्रिक्थभाग्यपि । एकपुत्रोऽहमित्येवं वदन दत्तञ्च साम्प्रतम् ॥२७७।। सभायो व्यवहारेषु यहिष्कार्यो विचक्षणः । विधवासगृहीतोऽहमिति जल्पन सभासु चेत् ।।२७८।। (च)पेटिकाप्रदानेन छी(धिक) कार्यस्सद्य एव वै । विधुरेण प्रदत्तोऽस्मि दूरभार्येण वै तदा ॥२६॥ तथेच सगृहीतोऽहं वदन्नेवं तु निर्भयम् । स दूरीकरणीयः स्याचोरवतु विशेषत: ॥२८॥ पणिना यतिनापत्सु दत्तोऽहं मातृमात्रतः । पितमात्रेण दत्तोऽस्मि सङ्गृहीतोऽहमित्यपि ॥२८॥ सद्भिरसभासु विवदन दुश्चरित्रः परस्वहन् । निर्लज्जया न्यगहीनः सज्जनाकृतिमावहन् ॥२८॥ पूर्वोत्तरविरुद्धं तद्विवदन्प्रलपत्नति। तस्य तत्प्रतिवाक्येषु यो वै त निग्रहं शनैः ॥२८॥ ।

२७०८ लोहितामृतिः विराधान्यविधान सम्यक् संगृनय ततः पुनः । प्रदूषयेत्तिस्य देशानुमाटवेदपि ॥२८४|| दुनिप्रहमात्रेण तदेशस्य महोपतेः । तत्यानां च सर्वेषां सर्वश्रयो महद्भवेत् ।।२८६।। ज्येष्ठोऽहमेकतनयः पितृभ्यो पुनरेव । दत्तोऽन्याभ्यामिति च वै विवदन्पररिक्यकै ॥२८॥ पुत्रत्वहेतुना सोऽयं प्रसिद्धस्तस्करो मतः । न दाना) ज्येष्ठपुत्रः कदाचिदपि वा भवेत् । तत्रापि चैकरसुतरां तक्रियानधिकार्यपि ॥२८८] एवमेव परे चापि तनयाः परिरिक्थके। ।। विधवास्वीकृतपुत्र ( दण्डं)॥ तनयासु विभक्तानां प्रत्तासु विधवासु च । दत्तपुत्रोऽहमस्मीति सपिण्डोऽहं सगोश्यति ॥२०॥ सम्बन्धो भवतां को वा भिन्नगोविधनेऽति वै। प्रलपन्तः केन दत्त इत्युक्त निर्भयान्विताः ॥२६॥ अभ्यनुज्ञातस्वीकारा वै तद्भर्तृवाफ्यतः ॥RENI वयं तद्गोत्रसंभूता अस्माकं तदनं महत् । कुतस्तधेति सन्देहे तघसम्यनिरूप्यते ॥२८१ विवादमतिकुर्वन्तो दौहित्रादिपु तासु च ॥२६ ॥ निर्लन्ना मातृदत्ताः स्मः विश्वस्ताः स्वीकृताः खराः । न्यायेन निखिलं स्याद्धि मुतादौहित्रयोः कथम् IRENA दोनिप्रशंसावर्णनम् स्थितयोः परगोनत्वे नद्धनं तु भविष्यति । इति शास्त्रविरुद्धानि वाक्यान्यन्यानि वा पुनः॥१४॥ सभासु वै प्रलपतो सद्योदेशात्प्रवासयेन् । पुत्रभिन्नादन्धगोदत्तसाहनकात्तराम ॥२६॥ अधिको दुहितासूनुः सर्वशास्त्रस्तधोदितः। कुतस्तथेति चोक्त तु प्रवदामि च तत्स्पुरत्फुटम् ।।२६६।। ॥ दौहिनप्रशंसा ।। दुहिता(त)तनयो लोके सर्वेषां सर्वकर्मसु । नित्यं मातामहादीनां तत्मनीनां च पुत्रवत् ॥२६७|| करोति हि स्वपितृभिरसमत्वेन समन्यतः । दर्शादीन्यपि नित्यानि तथा नैमित्तिकान्यपि heen सर्वश्राद्धानि काम्यानि भासिश्राद्धादिकान्यपि । श्राद्धप्रतिनिधित्वेन क्रियमाणेसु कर्मसु ॥२६॥ तर्पणेष्वपि सर्वेषु नित्यस्नानादिकर्मसु । पितृवर्गसमत्वेन वर्ग मातामहस्य मातामहस्य वै ॥३०॥ मातृवर्गेण तुलितं तत्पत्नीनां त्रिकं तथा। को वा सपिण्डो यजते को वा भ्राता च तत्समः॥३०॥ वत्सुतः तस्य पौत्रो वा कदाचित्तस्य कर्मणि। कृते कार्यवशात्पश्चात्प्रतिसंवत्सरं ततः ॥३०॥ लौकिकामो श्राद्धमात्र तहिने स्वागते तदा। श्राद्धमा तु तत्पल्या: अपि तूणी करोति हि ॥३०३।।

लोदिसस्मृतिः अफ्ते या तस्य दोपः शान्त्रतो नारित कयम्। सता चिचसमाधानकार्याय किल तत्तथा। अकीर्तिभीत्या न प्रीत्या तथाध्य करणं परम् ॥३७१- दौहित्रमात्रस्य तु चल्होके सर्वत्र केवलम् । तत्कर्मण्यकृतेऽनेन मुख्यकां कृतेऽपि च ॥३०॥ सर्वशास्त्रोक्तमार्गेण यथा पुत्रस्य सन्ततम् । सर्वश्रा ककरणमौपासनगुचो हितः ॥३७॥ स्वल्पेकस्मिन्नभावेऽपि किञ्चिद्वा विहितेन वै ॥३adl तदीयसर्वश्राद्धानि गयातीर्थाष्टकादियु । तान्यजन्नेव विधिना तत्पन्नीरपि तत्समम् । तमजानन्नपि तदा शास्त्रमर्यादया यशात् । कर्मकर्ता प्रकथितो तेनान्यो महीतले । नास्ति सूनोश्शतगुणो दौहित्रो गयनामकः। गोधूमा: कण्टकिफलं मापामुद्गायवा जलम्। मृताद्विशेषलाभरपंदस्य तेन तु पश्यताम् | तथास्यापि स्मृतं तूष्णी तदीयद्रविणादिके । नान्दीदधिघृतारण्यकक्षेष्विभतृणादिपु ॥३० ॥ वर्तते राजते तस्मादपिकिश्चिद्धनं विना ॥३१० तरिक वेत्यविचार्येव तादृशानेन कः समः ॥३३ ॥ तुलितस्तनयस्सद्भिविचार्य च पुनः पुनः ॥३१ ॥ सङ्गपात्रं तिलादर्भास्तथा नेपालकम्बल : ॥ril गव्यं तद्रजतं गानं शिवनिर्माल्यमच्युतम् ॥

दौहित्रवैशिष्ट्यवर्णनम्
२७३
कुवपः श्रोत्रियो वीरोध्र णोप्रा सनातनम् ।
उपमारहितास्सर्वे त एते पितृवल्लभाः ॥३१॥
पुत्रदत्ताच्उत्तगुणा विनापाञ्जलयो नृणाम् ।
बदौहित्रणसंत्यक्ता अक्षय्या: प्रीतिकारकाः ॥३१६||
मृताना कथितारसद्भिनित्यनैमित्तिकादिषु ।
ततः प्रत्यन्दभिन्नेषु सर्वश्राद्ध पु सन्ततम् ॥३१७।।
स्वपितुर्वर्गसाम्पेन जननी पितृवर्गके।
स्वामातृवर्गसाम्येन तन्मातृवयकस्य च ॥३१॥
समर्चनं प्रकुरुते दोहिनोऽयं सुताधिकः ।
कश्चिद्गीतः प्रसिद्धोऽत्र ताल्भ्यपल्ल्या पुरास्फुटः ॥३१॥
सपनीतनययं दृष्ट्वा विवादे तनयं प्रति ।
अयं तवानुजो माद्वयञ्जलीदो हि तर्पणे ॥३२०॥
ब्रह्मयज्ञेन दर्शादिश्राप तु न
किञ्चन ।
भागिनेयस्तु ते धत्स पत्सोऽयं सर्वकर्मसु ॥३२॥
पतृकेषु प्रसक्तपु स्वमातृकुलसाम्यतः।
मद्वर्गस्य समप्रस्य व्यञ्जलीदो हि कोऽत्रमे ॥३२॥
आवयोः प्रवरः प्रोक्तः को वा त्वं वद मे स्फुटम् ।
इति मातुर्वचः श्रुत्वा वत्सस्तु सुमहानृषिः ॥३२॥
सपत्नीतनयात्तस्था दोहिमधिकं तराम् ।
। दौहित्रत्रैविध्यम् ।।
शाखविन्मन्यते नून समालोच्य स्वचेतसा ॥३२४॥

२०३२ लोहितामतिः रान्मातामहगोध्यकः दौहित्रांन्यस्तत: पर। निर्वास्त्रिविधीज्ञयः तमेनं प्रवदामि च ॥३५॥ कन्याप्रदानसमये तेन मातामहन वै। प्रोक्त एवं यदि तदा सोऽयमाद्योऽयमीरितः ॥३२६॥ अपुत्रोऽहं प्रदास्यामि तुभ्यं कन्यामलकताम् । एवं द्वितीयो विनयः कालेऽस्मिन्नेव केवलम् । भङ्ग्यन्तरेणचेत्प्रोक्तः दौहित्रः कोऽपिकथ्यते ॥३२॥ अपुत्रोऽहं प्रदास्यामि तुभ्यं कन्या भवानपि । पुत्रार्थी चेदिहोत्पन्नः स नौ पुत्रो भविष्यति ॥३५ अस्य गोत्रद्वयं ज्ञेयं तद्वंशस्य ततः परम् । गोत्रद्वयं च समाह्य विवाहादिषु कर्मसु ॥३३' एतादृगभिसन्ध्येकरहितेन कन्यकायाः प्रदत्तायाः तनयो दुहितुः पुनः ॥३३१ तातगोव्येव विज्ञेय एवं स त्रिविधो मतः। यदि त्वंसो। वर्गद्वयोद्धारकश्च सर्ववर्णकसम्मतः। तमेवं वीक्ष्य दोहित्रं विभक्तज्ञातिसञ्जयः ॥३३३।। वर्द्धमानं श्रिया दीप्त्या वर्चसा भ्राजसौजसा। यशसा कान्तिदाक्षिण्यसौजन्यादिगुणादिभिः ॥३३४।। निष्कारणं पृथा मोहात्मकुप्यति हि केवलम् । प्रतिप्रदो वा होमो वा दौहित्रस्य विधीयते ॥३३५।। अस्वा यो जायते पुत्रः स मे पुत्री भविष्यति ॥३२ ॥ त्रिविधोऽपि समो ज्ञेयो दौहित्रोऽयमकल्मपः ॥३३ ॥

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दाहियोनिययोज्यहत्तापर्णनम
जननादेव दाहिनः (स) तत्कुलहयतारकः ।
रोरवस्सर्वकृत्यानां पितृणामतिवृषिकन ॥२३६१
निवारको दुर्गतेन ताकस्ततयास च।
द्रव्याभाये कियाभावे मन्त्राभाव तथैव च ॥३३७॥
विप्राभाव धनाभावे शत्तयभावेऽधवा पुनः ।
सर्वाभावेऽपि यत्तेन दौदियस्य सुमेधसः ॥३३८।।
प्रोत्रियस्यास्य तन्त्रग्विमात्रणेव च तत्क्षणात् ।
पितृणां नित्यतृप्तिस्यादक्षय्या नात्र संशयः ॥३३॥
नन्द्राद्धदेवताना वा श्राद्धकर्तुरथापि वा।
दौहित्र इति विशेयः कर्नु णामस्य वा पुनः ॥३४०।।
अमादिकानो श्राद्धानां प्रकृतित्वेन फेवलम् ।
प्रोक्तानो पुनरन्येषां मनुभाटस्य तत्परम ॥३४१॥
युगाद्यानी तथा पश्चान्महालयपकस्य
अष्टकान्वष्टकानां च द्वादशानां तथैव च ॥३४॥
गजच्छायातीर्थदधिवृतानामेकमेव वै।
उपायः कथितस्सद्भिदौहित्रस्याय भोजनम ॥३४३॥
रब्धद्रव्येण लघुना येन केन यथा तथा ।
सर्वाभावे तस्यभुक्तिमात्रेणैव परं कृतम् ॥३४४||
सम्यग्भवति
नास्त्यत्र संशयस्त्वणुमात्रकः ।
प्रत्यब्दमानमेकं तद्विध्युक्तन परं स्मृतम् ॥३४॥
कर्वव्यत्वेन विद्वद्भिः निश्चितं ब्रह्मवादिभिः ।
अन्नेनैव दक्षिणया होमेन ब्राह्मणैरसह ॥३४६॥

लादिनम्मतिः
अमा फरणतो पापि पिण्डदानेन धर्मतः ।
तइगतपणेने पित्रोः प्रत्यादमेकम् ॥३४॥
अत्यन्तायश्ययन कर्तव्यत्वेन गोदितम् ।
अत्यन्तापदि च त्याज्यं न भरेय सर्वदा ॥३४॥
॥ प्रत्यादिकाफरणप्रत्यवायः॥
यदि त्यक्तं तदभयते तत्क्षणादेव केयलम् ।
पतितः स्यान्न सन्देहः तस्मात्तत्तु विधानतः ॥३४६)
सर्वप्राणेन कुर्याद्व ब्राह्मण्यस्यास्य सिद्धये ।
यदलभ्यं वस्तु तस्य प्राप्तये मासपक्षयोः ॥३०॥
पूर्वमेव यतन्
बाद येन केन प्रकारतः।
तत्संपाद्य प्रयत्नेन गोपवेत्तस्य कमणः
जलानि तण्डुलामाषा मुद्गारशाकद्वयं कृतम् ।
पत्राणि दक्षिणां शफ्त्या पात्राण्येतानि वाडवाः ।।३५२!!
मन्त्रज्ञाः श्राद्धकार्याय दशमोक्ता मनीपिभिः ।
एतेपामेकलोपेऽपि न श्राद्धं सुकृतं भवेत् ॥३५३॥
जलाभावे किमपि तन् न सिभ्यत्येव सर्वदा ।
तानि यत्र समृद्धानि तत्र श्राद्धं हि सिध्यति ॥३५४॥
तथैव तण्डुलाभावे न प्रत्यब्दकथा भवेत् ।
तण्डुलाश्चहिरण्यं च प्रधानद्रव्यमुच्यते ॥३५॥
कार्यमावस्य फरनस्य किमुत श्राद्धकर्मणः ।
॥३९॥

7 प्रास्यापकल्पेसम्पादनवर्णनम तस्कर्वव्यं यत्र कुत्र मृतेऽइन्येव नान्यतः। तभावं लोपएव भवेदेव तु तत्पुनः ॥३५॥ मुद्गाभा मापमात्रैः कतुं सूपाय शक्यते । मापाभाये स्वद्गलोपो भवेदेव न संशयः ॥३८॥ महापदि कदाचित तेन लोपेन तत्युनः । शम्यते हि वथा कतुं न त्याज्यं तत्तु तेन वै ।।३५६।। एपा हि चोदनाप्रोक्ता सुमहाचौर्यवर्मना । शाकारशाकी तथा शाफः पृथक्त्वेन मनीपिभिः ॥३६०।। कोकटादिषु तच्छृत्ये न त्याज्यं श्राद्धकर्म तन् । पयोदधिघृतक्षीरसूपभक्ष्यादिसंभव ॥३६॥ शाकाभावे विशेपेण बाधकं न भवेदिति । लौकिकानां वैदिकानां च महदुक्तिमहत्तरा ॥३६२॥ रोकिकोक्तिर्वदिकोक्तिः स्वीकार्ये वैदिकेऽपि च । भविष्यति कदाचित्तु चापत्कल्पं तदुच्यते ॥३६३।। ॥ श्राद्धद्रव्याभावे अनुकल्पः ॥ पृतस्य दुर्लभे जाते कदाचित्सङ्कटे खरे । देशनाशे राष्ट्रनाशे महावादिदुर्घटे ॥३६४॥ तैलं प्रतिनिधिस्तस्य दुर्लभे तस्य चागते। तस्य प्रतिनिधिस्त्वाज्यं दुर्लभे तु द्वयोरति(पि) ॥३६५।। पयः प्रतिनिधिः प्रोक्त तस्य प्रतिनिधिदधि। सर्वेषामपि चतेपां दल माहिनापतिः पर निन्न गर मां: प्रजापतिः । मयमाग धोयाग सर्वलोहिनाय ॥ पि जलेन मंगा लांडगिया विगंरतः। सेन पिष्टलेने हामझामांति पर ॥३८॥ लगन मधुना वापि मकायांणि माधयेत् । फलपत्रादिसुद्रव्यरन्नेन न तदा किल ॥३६॥ भाद्वादीन्यपिकायांणि न त्याज्यानि मनीषिभिः । मासप्रयत्नदुर्लभ्ये तदा कुर्याधया तया ॥३०॥ भष्टानो मुक्तिपत्राणां दुर्लभसति तत्परम् । तु लभ्यते वत् ॥३२॥ संलन्धं कथितं श्रीमन् तेन तत्साधयेचराम् । आपत्सुपत्रालाभे तु यत्तु तेन साधयेदिति सर्वेपी संमतिः परमा स्मृता। विप्राभावे तु सर्वत्र दर्भमुष्टिषु तत्पितॄन् ॥३७३॥ सुरानपि विधानेन मन्त्रैरावाह्य भूतले। कृत्वा तां निखिलामा अग्नौ करणमेव च ॥३४॥ अन्नत्यागं च तत्कृत्वा सर्व तत्परिपेचनम् । आपोशनादिका कृत्वा मन्त्रमात्रेण चाहुतीः ॥३७॥ पञ्चापि जप्त्वा विधिना चाभिश्रवणमेव च । उत्तरापोशन(ग) कृत्वा मन्त्रैः पूर्ववदेव वै ॥३७६॥ पिण्डप्रदानं निर्वयं तत्सव सलिले क्षिपेत् । श्राद्धकार्याय मृत्पात्रं कथितं यत्तु तत्सदा ॥३ ॥

सविधिप्राद्धकर्मफलवर्णनम्
कुदिव विधानेन दक्षिणा त ततः परम् ।
या कस्मेचिद्विप्राय दद्यादिति हि सा श्रुतिः ॥३७८।।
अस्वाधीनानि पात्राणि परेपा पूर्वमेव वै।
पिदिनादेव स्वाधीना म त्या तः ततः परम् ॥३७६।।
नैः श्राद्धं तु ततः कुर्यात्सद्यो लभ्याऽथवाऽऽपदि ।
यधारचित्कुयांच तेन चापि विधानतः ॥३८॥
शवमेव भवेन्नूनं नात्र कार्या विचारणा ।
मृत्पात्राणि तु चत्तानि पात्राभावेऽथवा पुनः ॥३८१॥
कपलं कवलं हस्ते घाववात्रिंशदाहुतीः ।
प्राणायेत्यादिभिस्सर्वैः परावृत्या ततः पुनः ।।३८।।
तुरीयपश्चमाभ्यां च सप्तमावृत्ति कर्मणि ।
पूरयित्वावृत्तिभेदं तो वृत्ति तत्रकर्मणि ॥३८३॥
श्राद्धाख्ये कारयेद्विद्वान् ब्राह्मणानामनापदि ।
एवं कृत्वा स एव सर्वभ्रष्टा भवेदपि ॥३८४॥
दहन्ता शास्त्रहन्ता मर्यादामारकश्च सः ।
पिनो विप्रहन्ता च भवेदेव न संशयः ॥३८॥
आपत्कल्पोक्तमर्यादाः शास्त्राणि विविधान्यति ।
अनापत्सु न गृहीयात् गृहन् तानि पतेधः ५३८६।।
येन केन प्रकारेण पित्रोः श्राद्ध विधानतः।
अन्नेनैव प्रकुर्वीत नान्येन तु कदाचन ॥३८७)
तदन्नमत्तिशुद्धं यद्योगं तच्छ्राद्धकर्मणि ।
अतिशुद्धत्वमन्नस्य सद्व्येणव केवलम् ॥३८८॥

२७३८ लोहितस्मृतिः संपादितस्य भवति नासद् द्रव्येण तद्भवेत् । न्यायार्जितस्य द्रव्यस्य सत्त्वं प्रकथितं बुधैः ।।३८६॥ तदन्यायार्जितं द्रव्यं असदित्येव सूरिभिः । कथितं सत्कर्मजालायोग्य(१) निरयभीतिदम् ॥३६० तत्सद्व्यं ब्राह्मणस्य याजनाध्यापनादिभिः । सम्प्राप्त यद्विशेषेण स्वीयोवींसंभवं च यत् ॥३६॥ धान्यादिकं शाकमूलशलाटुफलमूलकम् । न्यायार्जितमितिप्रोक्त योग्यं सत्कर्मणां सदा ॥३६॥ महादानादिसंप्राप्त गजदानादिनागवम् । शौद्रं सोतं रायकारं ताक्षं त्वाष्ट्र तथैणयम् । मालाकारीयमाम्यष्ठतोन्नवाय(तान्तुवाय)च सौचिकम् ।। कोलकं सौचिकं नाटं शैलूपं भारतं तथा। पामरं जाल्मर्फ गाधं चाण्डालं यावनं तया ॥३६॥ म्लन्छ होणं कोहणं या भृतकाध्यापनादिभिः । आद्यपादादिसंप्राप्त स्वामिद्रोहादिनागतम् ॥३६॥ चौर्यानृतममुद्भूनं दुष्टयाजनसङ्गतम् । अहीनकनुसंलब्ध कन्यका विक्रयोस्थितम् ॥३६॥ निक्षेपवा/प्यगतं यदन्यच्छाम्रनिन्दितम् । तदखिलं दून्यमसमीचीनमुध्यते ॥३६॥ समाधीनं तदेय स्यान् मच्ट्रोत्रियमुमागतम् । पविशदिमंसपारदक्षिणया तथा कुमा ( ला ) ध्यस्थ्यादिनाप्राप्त ग्रामसामान्यजादिकम् ॥३३ ॥

-- - असद्रव्यकृतधारयनरकप्रदत्ववर्णनम् प्रोविदत्तं पादकासमहसंभावनादितः । संप्रात' याचया प्रान शमशनफेरपि ॥४॥ सलमन्यसुतोत्पत्तिपुराणस्मृतिपाठकः । पठन्तरपि तत्पीत्या संप्रातमवशात्तदा ॥४०॥ दक्षिणादानरूपेण सदस्यादिमुखेन च। सोमप्रकाकादिभुसादुरसयादिमुम्बैन । 11४०२॥ संग्रातमवसाद वात्सप्रश्न न्यायवत्मना। मधुपर्कादिरूपेण समागतमनीश्वरात् ॥४०३।। यभान्यदखिलं भूयम्सद्व्यमिति तद्विदुः । असव्यकृतं श्राद्ध पितृणां निरयप्रदम ॥४ा ततोऽल्पनापि सद्व्यसमानीनैकवस्तुभिः । स्वपनीहस्तरचितपारत्यन्तपावनैः ॥४०॥ भावगुद्धने मनसा तादृशेनान्धसा च तत् । निर्वयमेकं प्रत्यन्दं मन्त्रपूतं च तातयोः ॥४०६१ ॥ श्राद्ध पाककर्तारः ।। तबादो पाककयेका धर्मपन्नी तथापराः । कुलपल्योऽनन्यजाति संभवाः स्युः प्रजावती ॥४० मावरो ज्ञातिपल्यश्च पितृष्वस्रादिकाः पराः। भार्याः स्वसारश्वश्र्वश्च मातुलान्यस्तथैव च throu अत्याराद्वन्धुपल्यश्व गुरुपत्यस्तथाविधाः। आनुकूल्येन निर्दिष्टास्सर्वाभावे स्वयं वरः ॥४०६] २०४० लोहिनम्पतिः पाककर्मणि मोरप्रसारमु बारेषु पुरः। न सामजि निदिनी गजमानोति च परनं कुरुते मोहात्तद्राष्ट्र तत्क्षणात्परम् । श्रियादिरहिनं सर्वदेवबंदमुरद्विजः ॥१३॥ तीर्थः पुण्यैः पवित्रैध सप्ततन्तुमुखादिभिः। नष्ट भ्रष्ट प्रभग्नं च भ्रान्तनष्टमृगद्विजम् । पाकभिन्नानि कार्याणि सर्वाण्येवाविशेषतः। विना पाकं तमेकं तु कार्याण्यन्यानि यानि वा। वर्णिना यतिना पाके कृता भूमिस्तथा तराम् । बन्धुपल्योमित्रपल्यः गुरुपल्यादिकाः स्मृताः। गति को प्रमगारो ना पाई प्रयन्ननः । नगदिश विधिना तस्य पांफ कदाचन । अधिकारीअस्ति मंग बनन्यस यतेरपि । ब्रह्मचारी यतियांपियम्मिन्देश यदा तदा भीता दग्धा प्रणष्टा च कम्पितास्यान्न संशयः ॥१८ ॥ तस्मात्तु यदि वीस्याच्छाद्धकर्ता तदा किल । प्रयजित विशेषण भवेदी तथा १४ ॥ निर्मानुष्यं शुष्कजलं आशताब्दाद्भविष्यति ॥४१५ गुरोनित्यं ब्रह्मचारी फतु शमोति सन्ततम् ।४१६३ तदुक्तानि प्रकुर्वीत यतिश्चापि तथैव हि hth तन्माता तस्य भगिनी यावकाश्चन वास्तु ॥१६ पाककानराः स्वीयाः कीर्तिता न स्वयं कदा ॥४ प्राप्पासानागहिवत्ववर्णनम् २७४१ सर्वश्राद्ध' सर्वत्र रण्डापाको विशेषतः । गर्हितः स्यात्तथा वन्ध्यापाकोऽपि परिकीर्तितः ॥४२१।। स्वसा माता तथा श्वभूमौतुलानीसुता पिता। पितृन्यपनी वा भार्या भगिनी या नथाविधा ||४२२॥ कत्रीणां तु पुरोक्तानामभावे विधवा अपि । एता प्रायाः पाझकार्ये श्राद्धकर्मणि सङ्कटे ॥४२३॥ शातिभार्याश्च निविला: प्रत्यासन्नास्तथाविधाः । सपिण्डभास्सिाळ्यश्चेद्माह्या एवेति शण्डिलः ॥४२४|| श्राद्धपाकक्रियायास्ताः प्राह श्रीमानसी महान् । पुत्रिणीनां न रण्डात्वं निखिलनिश्चितं पुरा ॥४२॥ वन्ध्यात्वं जातपुत्राणां न कदाचन विद्यते । कन्यकानुपनीतानां न कमहित्वमूचिरे ॥४२६।। ॥ मृत कार्यकर्तुरनुकल्पनिषेधः ।। सति कत्रन्तरेभूयो न चेत्तेपा तु कर्तृता। अस्त्येवेति तदा प्राह मृतकार्ये विशेषतः ॥४२७॥ स्वधानिनयनादेव मन्त्रकार्यासिलामता। अथवा तद्वत:कक्षान्तरनिष्ठस्तु कश्चन ४२८॥ तत्कार्यमखिलं कुर्यात्तेन तत्सुकृतं भवेत् । विनैव वरणं तूप्णी कर्तु:स्वस्य स्वयं यदि ॥४२॥ तत्कर्तव्यत्वेन कुर्याकर्म तस्यान्निरर्थकम् । यस्य कस्यापि पागाA TET EAfri मनाया 11 MATATAREE until sil भनिन। भारमा नाम mil fini waliना अन्यमा सन. नरम भागmfuन माना। सय मेगपत पाय पनि ४११० शायरोनाहार पाकिम । समुस्थित मटेस्मिन् मिययोः पायता पुरः ।।४।। कि फायमिति : प्रोतामेनामावश्य। सत्परं दीयते पति प्रतिसाप्य ततः परम् ॥१५॥ यन्डारणय विहितं तायन्मानं तदा तदा। अस्माभिदीयते पति नान्य किमापे क्षुलकम ॥४॥ धर्मतोऽस्यास्तु रण्डाया गयाऽन्यहमेय वै। यसनंत्रिपणयक्रीतं विमासानां तथैव च। एतावदेव साध्यीनो घोदितं विधवाशनम् ॥४६॥ प्रदेयं शास्त्रमार्गेण पंतस्मादधिकं न हि। येवमुफ्त्वा वचनं तावन्माने ततः पुनः ॥४६॥ (घ) नालमेतन्मे चेति रोदनपूर्वकम् । सार्वत्रिकरसंपूणांम्तण्डुला लवर्ण समित् ॥४८ ॥ द्वारे निरुद्ध झातेस्तु तत्र सन्तस्तु केचन ॥४६ ॥

.. विधयाया.स्वभ गेहनिवासवर्णनम् २७४५ किमेतदिति तूप्मीकं सन्तनं पश्यतां पुरः। उभयः कियते चंति इन्तसम्प्रतिमास्त्विति ॥४६॥ तत्कोप्टपूरणे यावत्तावहेयमिति क वा। गच्छेदियमिति प्रोक्त्वा चेतावद्वत्सरस्य रा:(१)|१४६३।। देया भवद्भिरित्येवं भूमिरूपेण वा पुनः। निवन्धद्रव्यरूपेण धान्यरूपेण वाथया ॥४६४॥ भवेत्कालन निष्कपः एवं सत्यत्र केवलम् । तस्थानिकृष्टता घोरा प्रसिद्धा जगतीतले ॥४६५।। सिद्धापि नात्र विशयः तस्मिन् भ कुटेऽन्यहम् । संप्राप्तजीवनांशायाः एवं यत्नेन कालतः ॥४६६॥ पश्चानिवासो भवने परेपो चेद्भवेद्यदि । अयशो महदेवस्याद्मावादीनां गृहेप्यपि ॥४६॥ तत्कलवादिजनतामद्वषः पुनरेककः । परगेहनिवासोत्थप्रत्यवायो महानपि ॥४६॥ जायते हि विशेषेण विश्वस्ताया तं तु सः। सन्त्यक्तभत गेहाया निवासी भरी मन्दिरे ॥४६॥ अन्वहं कृच्छ्रफलदं ज्ञातिचित्तानुवर्तनात् । स्वमत शयनयानपालनान्येपणादितः ॥४vall ब्रह्मचर्य महत्त्वं च सौजन्यमति वर्धते । तत्पुण्यत्तीनिखिलसकृच्छन्नतान्यपि ॥४७११॥ प्राधान्येव भवन्त्यस्यास्तस्मात्तव भक्तितः। येन केना ---

11४६७
-३४८
लोहितस्मृतिः
नामान्येतानि तुच्छानि चैतासा कर्ममात्रके।"
सन्नामके नाधिकारस्तथाप्यासां विधेर्वशात् ||४६४
सवृत्तिर्वसुधारूपा निवन्धादिस्वरूपका ।
संप्राप्तापिपितुर्भतुर्वन्धूनामथवा पुनः
॥४६॥
सकाशात्तु तया पश्चात् श्रियं सुमहतीं पराम् ।
संप्राप्ता अपि यद्यताः सततं परतन्त्रकाः ॥४६॥
स्वपात्रस्थोर्णकवलप्राशनेऽपि स्वतन्त्रतः ।
अत्यन्तशक्तिविकलाः सर्वशास्त्रलवर्मतः
तथा हि तासां सर्वासां वनितानां महत्कुले ।
संजातानां विवाहस्य पश्चात्संवसरात्परम् ||४६al
कार्तिकगौरीपूजायाः तद्दोपाराधनात्परम् |
त्रियुद्धिमृत्स्तम्भमहानिकटे तबते तदा ॥४६॥
महासुमङ्गलीवृन्दगीतवाक्यविशेषतः।
प्राप्ताया अप्यनुज्ञायाः तत्पूर्तिकरणाय वै ॥५००ll
नित्यं मुक्तिक्रियाकाले यां काञ्चिद्य च कं च वा।
दृष्ट्या पृष्ट्वा भोजनस्याभ्यनुो तदनन्तरम् ॥५०११॥
तया या तेन वोक्त वाऽभ्यनुज्ञानविशेषके।
सा भुक्तिः क्रियते तस्मात् वनितामात्रया भुवि ॥५०२।।
अभ्यनुज्ञानदेवास्ते प्रथम स्याद्गणाधिपः ।
ततः पश्चाद्गुहस्ताक्ष्योऽथ वा स्मृतौ ।।५०३॥
विकल्पयननिर्दिष्टौ पूर्ववत्कालनिर्णयः ।
पुष्पवन्तौ च निर्दिष्टो पश्चानोपजगद्गुरू ॥१०॥

विवाहात्परत.स्स्रोगामस्वातान्यवर्णनम् २७४६ उमामहेश्वरी पश्चालमीनारायणी ततः। उभयोरेतयोः कालो देवयोः परिकीर्तितः ॥५०॥ ववोऽपिद्विगुणस्तस्मात वनितामावतः स्मृताः । अष्टादशस्युर्वपास्ताः भोजने नियत्तास्सदा ॥५०६) अभ्यनुज्ञाप्रतस्यास्य चेतावदिति लेखनम् । जातं ममेति काश्यप्यां कृत्वा भच्या ततः परम् ॥५०७) वो देवतां नमस्कृत्य पश्चाद्भोजनमुच्यते । अपि पात्रगते चान्ने हस्तेनादातुमप्यलम् ॥१०॥ विनाभ्यनुज्ञा तूष्णीकं न युक्तमिति हि श्रुतिः । सुमद्गलीनां धर्मोऽयं मृते भर्तरि तग़ते १५०६11 तदेयतेयं विधवा सदधीनेव भवेत्तेनेवास्वतन्त्र्या(न्त्रा) परमाप्यवशा भवेत् ।।५१०॥ यतकाले तादृशे तु व्यतीतेऽस्यामहत्त्वकम् । स्वातन्त्र्यभत वाक्येन शनस्तामुखतो भवेत् ॥५११।। एवं सत्यत्र जगति वनितानां विशेषतः । विवाहपरतोऽत्यन्तमस्वातन्त्र्यं श्रुति-पुटम १५१२|| स्वपात्रगतभिस्सैकमहणाणुस्वतन्त्रकम् (१)। अत्यन्तकपराधीनं अतो नारीजनस्य वै ॥१३॥ वादशस्य कथंदानेऽधिकारः स्वस्य वा पुनः । यसुनः स्थावरादेर्वाऽभ्यनुज्ञा तां विनैव हि ॥५१४|| ज्ञातीनामभ्यनुज्ञा चेत् ज्ञातिप्राप्तक्षितेस्तथा। पितृप्राप्तक्षितेस्तस्य हत्यन्वावश्यकीति न ॥१३॥ सर्वदा।

॥रण्डामा मानवम्॥ एका नौम नियमेशाप्यनुगम्य सान। मग मग भंग गानोगतो तु या ॥४२३ अंगमा कधिना मतिः सामाग्रोनोद रामनान् । समणं या गुर स्या सत्रानं जगुः । भूपणान्छादनादानि पानधान्यधनान्यपि । अधिकारोऽस्ति सततं यच्छ शास्त्रवर्मना। तत्तत्कुलप्रसूतानां विनानुज्ञा तु तो हठात् । स्वीयानामेव वस्तूना दानं शास्त्रकसम्मतम् । न सामान्यं धनं देयं परभोज्यं विवादतः । नियमोऽयं सर्वधर्मः पितृभ्रातृमा सताम् । कतु न शक्यतेऽतीव भूमिदाने तु किं पुनः। स्वतन्त्रस्यापि शक्तस्य पुंसरसंपादकस्य च ॥४८॥ तामनुगनिनांम मसंगस्तिव ( ध ) नाम् issil दांशायास्तुण्डाया : यानि यनिसन्ति dismil येभ्यः कन्या परभ्यया स्वथ्या या दातुमुत्तमः पितृभ्रातृपतिप्राप्तधरणी यदि संस्थिता ish न दद्यादेवविधिनान्यस्मै स्वच्छन्दतो ननु well सामान्यानां धनादीनां दानं शास्वैकनिन्दितम् || ४७६ स्पष्ट तरं भावदुष्ट निपिद्ध स्वैः परैरपि ॥४८el पुत्रिणामपि दानेषु तदनुज्ञां विना कचित् ॥१८ ॥

नानाविधरण्डानभिदवर्णनम् २७४७
सगोत्रज्ञातिदायादसामन्तानुमतिः परा।
अपेक्षिताधरादाने हिरण्यमुदकं तथा ॥४८॥
एवं सति पुनर्नार्या अधिकारस्तथाविधे ।
कथं भवेद्भत पुत्रपौत्रवत्याः प्रदानके ॥४८४||
विश्वस्तायात्सनाथायाः तस्मिन्दानेऽतिसङ्कटे ।
वत्रापि सुतरां दूरं अनाथायास्तु का कथा ॥४८॥
दाने तु तादृशेधारे ह्यशफ्ये येन केनचित् ।
कतु प्रयत्नशतकादधिकारो भविष्यति ॥४८६।।
कथं वेत्यत्र देवेशो जानात्यन्येन चैव हि ।
अष्टवर्पा तु विधवा विवाहात्परतो यदि १४८७११
चित्यग्निसटशी प्रोक्ता प्रथमेयं स्मृताखला ।
रोहिणीविधवाचेत्तु
चितिधूमसमानिशम् ॥४८॥
अवीरेत्युच्यते नाना महापापेकसंभव।।
गौरीदशायां वैधव्यमापन्ना तापिता स्मृता ||४८६॥
चित्युल्मूकैव सा ज्ञेया रजसोऽांगितीव च ।
पुरोदिताभी रण्डाभिस्साकं भूयः पराहता: १४६011
सन्ति ताश्च प्रवक्ष्यामि स्पष्टाथं वै प्रसङ्गतः।
दुर्भगाकुटिलाकाष्ठा चरमा चटुला वशा ॥४६॥
वीररण्डा कुण्डरण्डा बाधारण्डा तथा परा।
दशानामपि चैत्तासा दशमान्दारपरं तथा १४६२||
ऐकादशाब्दप्रभृतिवैधव्यं क्रमतो यदि।
रजसः परतो भूयो भवेयुस्तानि शून्यतः ॥४३॥

11४६७
३४८
लोहितस्मृतिः
नामान्येतानि तुच्छानि चैतासां कर्ममात्रके 1 ..
सन्नामके नाधिकारस्तथाप्यासां विधेशात् ||४|४||
सवृत्तिर्वसुधारूपा निवन्धादिस्वरूपका।
संप्राप्तापिपितुर्भतुर्घन्धूनामथवा पुनः
॥४६॥
सकाशात्तु तया पश्चात् श्रियं सुमहतीं पराम् ।
संप्राप्ता अपि यद्यताः सततं परतन्त्रकाः ॥४६॥
स्वपात्रस्थोर्णकवलप्राशनेऽपि स्वतन्त्रतः।
अत्यन्तशक्तिविकलाः सर्वशास्त्रैकवर्त्मतः
तथा हितासां सर्वासां वनिताना महत्कुले ।
संजाताना विवाहस्य पश्चात्संवसरात्परम् ॥४६॥
कातिकगौरीपूजायाः तद्दीपाराधनात्परम् ।
वियुद्धिमृत्स्तम्भमहानिकटे तहते तदा ॥४६॥
महामुमङ्गलीवृन्दगीतवाफ्यविशेषतः।
प्राप्ताया अप्यनुज्ञायाः तत्पूर्तिकरणाय वै ॥५००ll
नित्यं मुक्तिक्रियाकाले यो काश्चिद्य व कं च या।
दृप्या पृष्ट्या भोजनस्याभ्यनुज्ञा तदनन्तरम् ।।१०।।
नया वा तेन योक्त वाऽभ्यनुज्ञानविशेषके।
सा भुक्तिः क्रियते तस्मान् यनितामात्रया भुपि ।।०२।।
अभ्यनुज्ञानदेवास्ते प्रथम स्याद्गणाधिपः ।
वर्षत्रयं ततः पश्चाद्गुहम्ताश्याव्य या स्मृतौ ।।१०।।
विरूपतेननिर्दिष्टों पूर्वयकालनिर्णयः।
पुष्पयन्नो य निर्दिष्टी पश्चानोपनगद्गुरू ॥५०॥

विवाहात्परत,स्त्रीणामस्वातन्त्र्यवर्णनम् ge उमामहेश्वरौ पश्चाहक्ष्मीनारायणी ततः । उभयोरेतयोः कालो देवयोः परिकीर्तितः ||५०।। ततोऽपिद्विगुणस्तस्मात् वनितामात्रतः स्मृताः । अष्टादशस्युर्वास्ता: भोजने नियतास्सदा ॥०६।। अभ्यनुज्ञावतस्यास्य चैतावदिति लेखनम् । जातं ममेति काश्यप्यां कृत्वा भक्या ततः परम् ॥५०७॥ तां देवतां नमस्कृत्य पश्चाद्भोजनमुच्यते । अपि पात्रगते चान्ने हस्तेनादातुमप्यलम् ॥५०८।। विनाभ्यनुज्ञां तूष्णीकं न युक्तमिति हि श्रुतिः । सुमङ्गलीनां धर्मोऽयं मृते भर्तरि तज्ञते ॥५०६।। तहवतेयं विधवा तदधीनैव सर्वदा । भवेत्तेनैवास्वतन्त्र्या(न्त्रा) परमाप्यवशा भवेत् ॥५१॥ व्रतकाले तादृशे तु व्यतीतेऽस्यामहत्त्वकम् । स्वातन्त्र्यभरी वाक्येन शनैरतन्मुखतो भवेत् ।।१।। एवं सत्यत्र जगति वनिताना विशेषतः । विवाहत्परतोऽत्यन्तमस्वातन्त्र्यं श्रुति-पुटम् ।।१२।। स्वपानगतभिस्संकमणाणुस्वतन्वकम् (१)। अत्यन्तकपराधीनं अतो नारीजनस्य वै ५५१३॥ ताशस्य कथंदानेऽधिकार: स्वस्य वा पुनः। वसुनः स्थावरादेर्वाऽभ्यनुज्ञा तां विनैव हि ॥५१४|| झातोनामभ्यनुज्ञा चेत् शातिप्रातक्षितस्तथा। पिप्रातक्षितेस्तस्य अत्यन्तावश्यकीवि नु ।।१।।

लोहिनम्मतिः गुरुत्वेनेर गृहन्ति र सन्तम्सुमेधसः | छतेऽपिनादरी पाने कवामिन्मायोपिया ? | समागगो गोमूलः स्थावरी यनितास। यथा या तद्गनं भूगः तथाकुमांन्नद्गृथा ॥१॥ स्वगोकतं भूमिहास्यादुत्तमोत्तमम् । भिन्नगोत्रमतं मा सफल विदुः ॥१८॥ सत्सु साधुपु तिष्ठरम स्वकीयेए उनेषु चत् । आहितामिषु विद्वत्सु तदरण्यधिकारिप ॥१६॥ विधयानाहिताप्नीन जनाना ताहशी धराम् । न सिध्यत्येव तेषां सा पुरोडाशः गुनामिव । भूरस्माकमिदं मन्त्रं आहिताग्नेः प्रतीष्टिके ॥२१॥ अध्वयों सति जपति स्वीया सा भूमिरुत्तमा । तदीयपूर्वकोपात्ता कयमन्यत्र गच्छति ॥५२॥ गता विना न्यायवर्मद्वारा तस्य तु सा ततः। वृद्धितान भवत्येव वृद्धिदात्र्यपि केवलम् ॥१२३।। सद्यस्ततस्सर्ववंशमूलोन्मथनकारिणी । भवेदेव न सन्देहः हरिपत्ल्यखिलाश्रया ॥२४॥ कालेन महता तस्मान कुर्याकर्म तादृशम् । नारीनरो वा मेघावी समालोच्य चिरंस्थिताम् ।।१२।। स्ववंशेऽस्याधिकारं च तदागमनकारणम् । देशं कालंयुक्तपात्रं युक्त चायुक्तमेव च न दद्यादेव सहसा दत्ताप्येषा कयश्चन ॥२० ॥

:
शानदष्ट्याधर्मपालनमहत्त्ववर्णनन्
ध्या समालोच्य पश्चाद्धर्म समाचरेत् ।
नित्याधिकारः स्यात्तद्वारा तनयस्य वा ।।५२७||
:: श्वसुरयोभर्तुरनुज्ञानास्त्रियस्य तु ।
शतगुणन्यूना वनिता सा सभर्तृका ।।५२८॥
इस्रगुणन्यूना विश्वस्ता
नष्टपुत्रका।
-इस्रगुणन्यूना रण्डा सर्व विवर्जिता ॥२६॥
चमिधूमकाष्ठोल्मूकसमानाऽतिगर्हिता।
दशीचेति वाक्यप्रलापनपरा खला ॥५३०॥
ण्डा तत्र भूदानं प्रहदानं च नेप्कुटम् ।
डादानं कूपदानं वापीदानं च गाहनम् ॥५३शा
एनं वृत्तिदान सेतुदानं च पाक्षिकम् ।
मान्य माण्टपं सौधं प्रासाद गैहदं तदा ॥३॥
करोत्तथैवाई करिष्यामीति मामकम् ।
स्येवं निर्भयेन निर्लज्ज जनतापुरः ॥५३३।।
दिनुमति श्वश्र्वोः ज्ञातीनां चत्तु सामगम् ।
वेति पुनस्त्वज्ञमजनानां विशेषतः ॥५३४||
काक्षानुमतिश्चाथाधिकोमम तु सांप्रतम ।
हातीननुसृत्य स्वान् तत्सम्मत्या चकार हि १५३।।
के चेन्मामकानां जनानो परया वतः।
न्येव करिष्यामि पश्यतां तद्विरोधिनाम् ॥५३६॥
रोधे कथं त्वं वै करिष्यसि नयो न तु ।
युक्तमेवं करणमित्युक्त तत्र सजनः ॥३७॥

हिनति परागसित गो माम मितिमा। प्रभाषन: 0 मग्निरोमाग सम्बनमा को यात्विमेव । पूोगधन्दानि यानानि दुरयुददुमनाम ज्ञातस्पेनि (उत्पतीम) वादिनम् । हुएत्य दूपयित्यय भसंयित्वा विशेषतः ॥४॥ सत्सहायानधर्ममान् पामरान्धर्मविद्विपः । भ्रंशयित्वा यदिफ्त्य निरोधनमुखेन च। अपराधानुगुण्येन द्वादशान्यूनकान्पणान् । स्थावरं न्यायमार्गेण दापयेत्पृथिवीपतिः । जीवनांशैकसंलब्धभूमिका यातिदुर्मतिः । अहो देवरपुत्रेण पुत्रिणीति ततो मया ॥४॥ प्रदीयतेऽस्मै मत्तातसंरब्धा धरणीति वै । न भूदानेऽधिकारोऽस्तीत्युक्त्वा वाक्यं ततश्च ताम् । पुत्रिणी सैव संप्राप्ता या प्रसूयेत जीविनः ॥४८॥ आईने प्रवरा की बातम्यवहारतः Rg दानप्रतिपदव्याजान् मयांदामाप्रदूषकान् ॥४ ॥ धिकृत्य वेदविदुपस्ताइयित्वाप्यभीक्ष्णशः ॥१४ ॥ तेभ्यः स्वीकृत्य तां गेहवत्मापणरसादिकम् ॥१४ ॥ । यथापूर्व तेन स्वर्गो जितो भवेत् l संवलब्धमनाथानां विधवानां कदाचन ॥४६ ॥ दूरतः प्रेपयेदुष्टो तदत्तामपि त धराम् ॥४ ॥ तत्स्वामिने दापयेच तेन ऋतुफलं भवेत् ।

पुत्राभावेदत्तकविधानवर्णनम् २७५३ पुत्रो वा पुत्रिका वापि यस्यारसाऽस्ति ह्यपुत्रिणी। पुत्रसंग्रहणेनापि भर्ना साकं च पुत्रिणी ॥५४३|| वन्ध्याऽपि प्रभवेदेव शास्त्रेण रचितेन चेत् । अनेकवारं पुत्रस्य ग्रहणं शास्त्रनिन्दितम् ॥५०॥ नष्टेऽपि दत्ततनये न पुनस्तचरेदपि । सगृहीयादेकमेव न द्वौत्रीन् चतुरोऽपि वा ॥५५१।। असकूद्वा सकद्वापि पुमान् स्त्री वा पृथङ्न तु । मिलित्वैवाऽतियत्नेन कुर्यात्तग्रहणं मुदा ॥५५२।। सहस्रदः सहस्राढ्यो ब्रह्मनिष्ठोऽन्नदस्त्वति । बहुशिप्यधनज्ञातिप्रामभूमिविशेपवान् ॥५५३।। अथितस्त्वग्निचिन्नष्टपुत्रो दौहित्रयानपि । नष्टमार्यो मित्रशिष्यज्ञातिप्रार्थनया तदा ॥५४॥ वीयसन्ततिविच्छित्तो सर्वमत्या विधानतः । नगृहीयाज्ज्ञातिपुत्रं दौहित्रस्य मतेन चेत् ॥५५॥ अपि पनी तादृशस्य विधवा नष्टपुत्रका । लशिष्यज्ञातिधनवन्धुमामहिताय च ॥५५६।। पा वाक्येन दौहित्रमत्या पुच्याश्च तादृशे । -टे महति प्राप्त प्रकुर्यात्सुत्रसङ्ग्रहम् ॥५५७।। देवरसुतो भवितव्यो न हीतरः। चपदश्च सर्वेपाममात्यानां च मध्यमे ॥५५८ll वरा एव विख्याता. ज्ञातिभ्यो न्यायवर्मना। नरेप्वपि भूयश्च सर्वेपामन्त्य पव चेत् ॥५६॥ पुत्रो बोदितस्पतिः रामः कपिरासदिमध्यमस्य तु मध्यमः। ग्यस्य तु मुनासा माममाः परिकीर्तिताः IM नर्भिमा गानिधारामाधमसंमकाः । एतेन घलु मयं दौदिय सति सम्टे ॥१॥ पुत्रस्यमहर्ण सुष्टं शाम्रजालररोष। इतियत्तस्य दोदिनामतं यदि वदा दराम् (१) ॥१३ न कार्यमेव तन्नो चन्मतेनास्य मुदादिना। सम्यक्तुं शक्यते हि तस्मिश्चद्यदि दुःखिते ॥३३॥ सङ्ग्रहीतस्स तु शिगुः पुत्रत्वेन न वर्धते । तत्समतिश्च परमा नास्त्यस्वीति ततः परम् ॥६४॥ कालेन महता पश्चात्कल्प्या फलबलेन हि । तादृशस्य च तादृश्याः विघुरस्य विपश्चितः ॥१६॥ तत्पल्या विधवाया वा स एपः पुत्रसमहः। उभयोरेतयोरेव पृथक्त्वेन तथाविधम् ॥१६६।। संगच्छते कर्म कतु नेताभ्यां भिन्नयोर्ननु । अन्याया विधवाया वै सोऽयं पुत्रपरिमहः । उपमारहितश्रीकः मिथिलोत्पत्तिसन्निभः ॥५६८|| एतादृक्पुत्रकरणे गुणा झावश्यकाः स्मृताः । तेऽत्यन्तदुर्लभा दिव्या ते सन्ति यदि वै तदा ।।६।। . सर्वथा शक्यते कतु नान्यस्य तु कथंचन ॥१६ ॥

समीचीनरण्डावर्णनम् कर्म कतु तादृशं चालं युक्त शास्त्रसंमतम् । ते गुणाश्चापि सुव्यक्त निरूप्यन्तेऽधुना क्रमात् ||५७०il वंशद्वयविशुद्धत्वं अत्यन्तावश्यक स्मृतम्। सहस्रदक्षिणादत्वं सहस्रधनवत्त्वकम् ॥५७|| पण्डितत्वं शताधिक्यशिष्यवत्त्वं महोन्नतम् । महाप्रामाधिकारित्वं ब्रह्मनिष्ठत्वमप्यति ॥५७२।। अन्नदत्वं ब्रह्मवित्त्वं शान्तिदान्त्यादिपात्रता | अग्निचित्त्वं पराधीशपूज्यता सर्वसम्मता ॥५७३।। यायते निखिलादिव्याः सन्ति तस्यैवतादृशे । समये कर्म तत्कतुं तत्कलवस्य शक्यते ॥५७४।। विधवायास्तादशस्य विधुरस्येति विश्चमृट् । पुत्रसंग्रहणे शास्त्र कल्पयामास सूक्ष्मतः ॥५७।। अतिगुहामिदं शास्त्रं सर्वसाधारणं न तु | ताशानां तु या काचिजन्मान्तरतपःफलात् ॥५७६।। ॥समीचीनरण्डा॥ मृते भर्तरि तूष्णीकं सर्व निश्चित्य केवलम् । नश्वरं दुःखजनकं अज्ञानास्पदमभ्र वम् ॥५॥ सद्वाक्येन विनिश्चित्य किमे न तो। क्षान्विशान्तिशमादीनां आलया सद्गुणाश्रया ||५७८|| वेदान्तवाक्यप्रवणं कुर्वन्ती महतां सताम् । वसन्ती निकटे नित्यं जगदेवचराचरम् || २७५६ .लोहितस्मृतिः... कं खं भूम्तिथा वायुः पुष्पवन्तौ सुरासुरान् । वृकं खरं खगं छागं पश्यन्ती ब्रह्म शाश्वतम् ॥५८० सत्यं ज्ञानमनन्तं च सचिदानन्दलक्षणम् । सर्वोपनिपी सारं सर्वोपनिपदीरितम् ॥५८१७ भेदं सर्व परित्यज्य सोऽहं भावनयैव हि । सुखं दुःखं भवं भावं भावाभावो तथैव च। शत्रु मित्रं तथानुष्णमुष्णं तेजस्तमस्तथा । समहरथा प्रपश्यन्ती परत्वमपरत्वकम्। लाभालाभौ च सततं स्वात्मन्येव व्ययस्थितम् । एम्मेवेति मन्याना द्वितीयं नेति सूक्ष्मतः ॥८६॥ मन्यमाना महाभागा महती ब्रह्मवादिनी। अहं भावं स्वसीयत्वं त्याया विस्मृत्य सत्वरम् । स्मियकारक्षमाणैव सर्वयातुप केवलम् ॥५८८ काममिच्छामि नाट्यलाया येन निधिन् । लन प्रागपि त कुर्वनो घ मुगंधिता l विन्यनुश न.मा पूर्णमा र मन्ततम् । मा पूर्णमिदं पूर्ण पूर्गा यदिता . iiii विभावयन्ती सततं स्वात्मत्वेन समत्वतः ॥१८ ॥ विपतिमविपत्तिं च द्वन्द्वाद्वन्द्व लयालयो ॥६ ॥ सिद्धान्तपूर्वपक्षी च भेदरहित्यतोऽनिशम् ॥८४ काम क्रोधादिकं चापि रागद्वपादिक परम् ॥५ आतिमानं घगरच जन्मणाश्रमादिकम् ॥१८ ॥

समीचीनायरण्डायावर्णनम् २७५७
अन्तः पूर्णमधः पूर्णमूवं पूर्ण च तेन हि।
परेण ब्रह्मणा तेन स्वयं तद्ब्रह्म कि कखौ ॥१६॥
नेतःपरमहं त्यस्मिवेति बुद्धिः परा दृढा ।
रण्डापि सा सर्ववन्द्या सदा शास्त्रार्थतत्व वित् ।।६।।
यस्याः स्यात्काक्षितं वस्तु परमिष्ट ममेति न ।
सेवं साक्षात्परं ब्रह्म सर्व(च) ह्यप्रयोजकम् ॥५६॥
तबज्ञाननिष्ठाद्याः सर्ववन्द्याः सदा जनैः।
स्वीकार्याः स्युर्विशेपेण तस्यां बुद्धि तु मानुपीम् ।।५६४॥
न कुर्यादेव धर्मण सा ब्रह्म व न संशयः।
न यस्याः स्वं परं चेति परभावोऽप्यहड्कृतिः ॥५६शा
देहे दुःखसुखे न स्तः सेयमप्राकृता स्मृता ।
सर्वप्राणिसमा दुःखमुखतुल्या निराकुल्ला ॥६६॥
निराशा निर्ममा साध्वी रण्डाऽपीयं विशिष्यते ।
दुर्व्यापारमकृत्वैव परेषा स्वहिताय वै
त्तिक्षेत्रगृहक्षोणी विपये निस्पृहा च या।
सापि रण्डा समीचीना प्राकृताभिः समा न तु ॥२६॥
दं कृत्यमिदं कार्यमिदं शास्त्रमिदं परम् ।
दं युक्तमिदं न्याय्यं इदं धम्यं सनातनम् 1128811
प्रदेयं देयमिदं अवाच्यं वाच्यमेव च।
अनुष्टयं च तद्भिन्न यम यमेव घ 11€ocll
श्रिाव्यं प्राव्यमित्येतज्ज्ञानं तस्य निरीक्षणम् ।
(नुष्ठान विशेषेण यस्याः स्युः साप्यकारतः ॥६०१॥

२७५८ लोहितस्मृतिः श्यं रण्डाप्यरण्डय झात्री धर्मपरा सती। मवंशाध्यपि या नूनं दुर्युदया सततं कलिम् ॥६६ म्यजनेः मातिभिस्सद्भिः पितृभ्यां बान्धवः परः। दुर्व्यापारादिना तेषां मृत्युस्सा सार्वकालिकी । तादृशी धार्मिको राजा स्वदेशादन्यतो नयेत् ।।६८४१ तस्कृता दुष्कियास्सा माजयित्वाऽय सत्रियाः। कारयेदेव विधिना सद्धर्मम्थापनाय वै ॥६०६॥ असक्रियककारं असद्वाक्यैकवादिनम् । सद्रूपकं दुष्टकर्मयोधकं राष्ट्रतो नयेत् ॥६०६१ निष्ठीवन्तं सभामध्यात्सभायां निर्भयेन वै। ताम्बूलचर्वणपरं वाक्येनोद्वासयेत्ततः ॥६॥ कल्याणराजसदसि रागेण यदि या क्षुतन् । अपानयन्या दुर्बुद्धि तूष्णीकं हि ततस्तु तम् ॥६०८ सद्यउत्थापयित्वैव तत्रद#भुवं दहेन् । ।। सभायां एकस्मिन् अन्यस्यपतने ॥ सभानृपतने जाते निद्रया यस्य कस्य वा ॥६६॥ तद्वस्त्रं सहसाच्छित्या वेष्टयित्वा शिरोऽस्य वै। प्रहृत्य पृष्ठे हस्तेन नो भूमिं च ततः परम् । कुर्वती मततं पीडा तद्व्यहरणेन्च्या ॥ विसर्जयित्वा रेऽथ तं दूरीकृत्य तत्परम् ॥ll प्रोक्ष्योद्धृत्याथवान्पांसून बहिर्गेहाद्विसजयेत् ॥११ ॥

उत्तमदण्डव्यवस्थावर्णनम्
मृदन्तरेण भुयश्च पूरयेत्तां भुवं यथा।
त्रियम्बकेन मन्त्रेण हुनेदष्टोत्तरं शतम् ॥६१२।।
ब्राह्मणान् भोजयेत्पश्चाच्छत्तयाचित्रानपड़सैः ।
आगामिसूतकं ज्ञात्वा गत्वा देशान्तरं त्वरन् ।।६१३।।
लोकिकं वैदिकं तत्र नित्यं नैमित्तिकं तु वा।
परस्य स्वस्य वा कर्म संप्राप्त कुरुते यदि ॥६१४||
कारयेद्वा विशेषेण यद्यदेवाखिलं परम् ।
तत्सूतककृतं नूनं भवेदेव न चान्यथा ॥६१।।
कृतस्य सूतके यत्तु प्रायश्चित्तमुदीरितम् ।
तथैवेहास्य कथितं कर्मणो ब्रह्मवादिभिः ॥६१६।।
तादशं तमिमं राजा बलादाहत्य सत्वरम् ।
उत्तमेनय दण्डेन दण्डयेद्धमसिद्धये ॥६१७॥
परप्रयोजनदशायो प्राप्तायां (तु) मृपाच्छलात् ।
चिराद्देशान्तरगतसूतक नेति वै वदन् ॥६१८।।
दाप्यरशतपणान्सद्यः तत्सत्यं चेत्त तत्पुनः ।
त्ववेदं दुष्कृतं दुष्टं किं कृतं तद्धठाद्यथा ॥६१६।।
न युक्तमेवं करणं तदिदानी सहिष्णुना।
तदाय तावत्पर्यन्तकालहाते विगहितम्
विगहितम् ॥२०॥
एवं जनानां पुरतो लजयेत्तं विगर्हयेत् ।
सूतकी सन्परे देशे श्राद्धभुक् शुभकर्मणः ॥६२।।
आत्विज्यं वैदिकस्यापि दुर्वन्यो वर्तते वराम् ।
तमेनं वालिशं भूख सद्यो राजा विशेषतः ॥६२२॥

७. लोहितस्मृतिः, प्राहयित्या रोधयित्वा मासं या पक्षमेव वा। तमेवं पूर्ववत्कृत्या लवयित्वा ततः पुनः ॥२३॥ तस्य स्वाधंधनं सम्यग्मृत्वा राष्ट्रात्प्रवासयेत् । पल्या रजस्वलायां यः श्राद्धभुक्तऽतिकामतः ॥६२ स्वायोग्यता लोपयित्या जनानां सोऽयमल्पकः। चतुर्विशतिपणान्यापि दाप्यस्सोऽथ वा भवेन् । वसतां कर्म सम्यग्वः कारयिष्यामि सन्ततम् । व्यामोहयन्वाक्यजाल नित्यानुसरणादिना। सेवया संचरन्नित्यं शास्त्रमार्ग विनाशयन् ॥६२८॥ मन्त्रक्रियापरिज्ञानविकलो नटवत्तराम् । दुष्टोऽयमसता मुख्यः सदूपणपरः पुनः अज्ञातशब्दार्थभयरहितः पामरो जडः ॥६३० ज्ञातो विप्रमुखाद्राजा सद्यस्तं भटवर्मना । विधानं ब्रूहि पुरतो कर्मणां विप्रसन्निधौ । सवं यः कारयिष्यामीत्युक्तिमात्रेण तान् जडान् । निष्कासितो धिकृतश्च मोचनीयः स्वकाद्गृहान् ।। अमन्वनिपुणो मन्त्रः कुमामेपु द्विजन्मनाम् ॥ संमन्येवं प्रतिज्ञाप्य तथा कुर्वन्न शास्त्रतः ॥२४ ॥ तक्रियाभिनयान् कुर्वन् वैदिकोऽहमितिव्र वन ॥२६ ॥ आनाययित्वा सन्ताड्य किं कृतंच त्वयानिशम् || तूष्णीक लोकविप्रत्वं नाशयिष्यसि केवलम् ॥३ ॥ 1 ज्यामोहयित्वापापात्मन् एवमुक्त्या पुनश्व तम् ॥६ ॥

सुवासिनीनाशिरःस्नाननिषेधः कपोलयोस्ताडयित्वा तत्तग्रामनिवासिनाम् । कार्याय फर्मजालस्य दक्षमेकं नियुज्य च ||६३४|| पश्चात्तस्यापि सर्वस्वं हृत्वा राष्ट्रात्प्रवासयेत् । विश्वस्तामशिरत्नातां शिर नाता सुवासिनीम् ॥६३३॥ कदाचिदवशादृष्ट्वा कुर्यात्सूर्यावलोकनम् । शिरमानं पतेः पित्रोः कृतनश्राद्धदिनेषु तत् ॥६३६॥ पाकस्य हेतवे हि स्यात् न चेन्नास्त्येव किंच तत् । प्रत्यब्दमात्रे भवति तदभावेऽपि केवलम् ॥६३७।। शिर.स्नानं ग्रहणयोः पूर्व चाप्यपरं परम् । द्विवारमपि यत्नेन तथा वन्धुमृतावृतौ ॥६३८।। चतुर्थेऽहनि तद्वमनियमेन समासतः। तथैवापूर्वतीर्थप चण्डालस्पर्शनादिषु ॥६३६।। अभ्यङ्गकालनेयत्यं आर्थिक प्रभवेद्धि । अध्वराधन्तयोरेवं नान्यत्रासां तु मास्तकम् ॥४॥ ॥ सुवासिनीनां शिरःनाननिषेधः।। मुमगलीनां तत्स्नानं हरिद्रावर्जनेन चेत् । जलं श्मशानगर्तस्थं सत्यं स्याद्धरणीगतम् ॥६४।। यद्य धृतं भाण्डगतं चण्डालचषकस्थितम् । तत्क्षणादेव भवति तदा तस्मात्त्यैव हि ॥६४२॥ । हरिद्रास्तानविधिः॥ नानं प्रकर्तव्यं अजनं तदरिद्रया। अजस्र विहितं स्नान रात्री चत्तम्जलं पुनः ॥६४।।

लोहितरमृतिः देवाकोत्यकचषकगतमेव न संशयः। नासामाकण्ठमेव स्यादास्यस्य क्षालनं च तन् ॥६४४ भतः स्नानात्परं प्रातः होमकार्याय नव हि ॥६४५॥ होमाभावं यर्थन्छ स्यात्सङ्ग्वे पाहतवे । पाकाभावेऽपि कालोऽयं सङ्गयो वाथ तत्परः ॥६४६॥ मध्याहो नापरातः स्यात्सदा कुर्यादरिद्रया। हरिद्रालेपने नित्यं तर्जन्या विदिशा दिशाम् ॥६४।। सर्वासां देवपत्नीनां तस्यादानं च धर्मतः । कर्तव्यत्येन विहितं हरिद्राया निरन्तरम् ॥६४८१ विदिशां देवपत्नीनां चतसृणां दिशामपि । हरिद्राकल्कलेशांस्तान् अक्षिप्त्वेवातिगर्वतः ॥६४६॥ अज्ञानाज्ज्ञानतो वापि नमस्कारप्रपूर्वकम् । या स्नाति विधवा नूनं सत्यमेव भविष्यति ॥६॥ या करोति शिरःस्नानं जीवभत्री सुमङ्गली । पतिनी सा प्रकथिता तथोक्त ब्रह्मवादिभिः ॥६५१।। विनाभ्यनुज्ञां भर्तुर्या चौपवस्तं करोति । || पतिव्रताधर्माः॥ भ शुश्रूपणं नायर्याः परमो धर्म उच्यते । नेतस्मादधिको धर्मो नैवस्मादधिको जपः ॥६५३।। भवां स्नानं नित्यमेव न मभ्यंऽलि ( मम्यान्हे ) विधीयते । भतु रायुष्यमभाति सैपा पापालया स्मृता ॥१२ ॥

पल्या:पतिशुश्रूषणंपरमधर्मवर्णनम्
नैतस्मादधिकं दानं नैतस्मादधिकं तपः।
नैतस्मादधिकं तीर्थ नैतस्मादधिकं दमः ॥६५४॥
नेतस्मादधिकाः कृच्छाः नेतस्मादधिकारसवाः ।
मुक्त्वा तत्पतिशुश्रूषां तस्मादन्यन्न किंचन ॥६५।।
धर्म चरेत्प्रयलेन साध्वी नारी पतिव्रता ।
नैनमुच्चैः प्रभाषेत प्रियमेवास्य यञ्चरेत् ॥६५६।।
आयेनं कुपितं रोपात्
प्रतिकुप्येत्कथंचन।
कठोरं निर्दयं कर निरनुक्रोशमक्षमम १६५७
ताडयन्तमहोरानं शपन्तमपि दुई दम् ।
न दूपयेन्न चाक्रोशेन्न अध्येत्प्रशपेदपि ॥६५८।।
छायानुवर्तिनी नित्यं दुःखिते दुःखिता भवेत् ।
सुखिते सुसिता तस्मिन् हट हृष्टा स्थिते स्थिता ॥६५६
शयिते शयिता सुप्ते पश्चात्सुप्ता स्वयं भवेत् ।
जाहूताऽतित्वरा गच्छेदपि कार्य विहाय च ॥६६॥
शतं सहस्र गोप्यं वा गुह्यमावश्यकं तु वा ।
ताम्बूलचर्वणं नित्यं अक्ष्णोरञ्जनमेव च ॥६६||
कुश्मं चापि सिन्दूर कन्जलं कन्चु कचः ।
कबरी च प्रशस्तं स्यात्सुगन्धं सक्सुमादिकम् ॥६६२॥
नित्यमावश्यक खीणां सतीनां विधिचोदनान् ।
भर्तरि प्रोपिते स्रोणां नालङ्कारो विधीयते ॥६६३||
पवित्रतानां धोऽयं तत्पुरोऽलकृतिः परा।
अन्वहं निशयास्नानं धिन्दूरं कुडमं सुमम् ॥६६४॥

लोहितस्मृतिः घोषयित्वा विशेषेण यद्यत्तत्तस्य सथितम् । शनैः शनैरुपायेन समादायाविकौशलात् ॥८॥ त्वां वयं मोचयिष्याम इत्युक्त्वा तत्कृताः पुरा। यत्र तत्र क्रियास्तारता ज्ञात्वा वन्मुखतः पुनः ॥६८८।। चो(चौ)रान्तरादिदुष्टोघान् विज्ञाय तदनन्तरम् । ताडयित्वा स्थापयित्वा बन्धयित्वातिनिष्ठुरम् । अखिलं तावक कृत्यं सम्यग्वदसि घेतदा ॥६६॥ निश्चयान्मोचयिष्यामो न चेन्मुतिस्तु तेन हि । विवारमेवं संशोध्य पश्चालन्धानि तन्मुसात् ॥६६॥ द्रव्याणि धर्मम्त्येषु योजयित्वा ततथ तम् । करमेकं पादमेऊ खण्डयित्वा विमोचयेत् ॥६६॥ गबोरं महाघोरे पल्वले गजसमहे । पुराते नारोऽस्मिन् कृतेऽयापि पने तथा ॥६॥ पानयित्या मनित्वनं प्रच्छायस्तम्भमूलके । काहनिशानः प्रयुलेः हन्यादेवाविपारयन् ॥६६४॥ एघोटने दक्ष सत्काले तमगि स्थिते। नेयमारनपर प्रहणायागतान् जनान् ॥it बदार खड्गेन गृहीतमयशाननः । पोरं मातापित्या गयित्या प्रवागत् ॥६॥ रहनः कोरिनम्मिन्या विशेषतः। सा: : परेगीयांसारित्याप्रमागत प्रवास निगलेन पुनस्सम्यक् ग्रन्थयित्वा तदा तदा ॥६६ ॥

नानादण्ड्यकर्मसुदण्डविधानवर्णनम् २७६७ यदि चंद् ब्राह्मणो दुष्टश्चौरस्तत्रापि हिंसकः । तस्मिन्काले विशेषेण खण्डदण्डादिभिर्जनान् ॥६६८) गृहीतोऽयं इतान्कृत्या तमेनं निगलेन वै। बन्धयित्वा पीडयित्वा शोधयित्वा तदा तदा ॥६६॥ संवत्सरात्परं यत्नात्कृत्वैवाक्षतमत्रणम् । सर्वाङ्गवपनं कृत्वा घोषयित्वा पुरे स्वके ॥७००। गर्दभारोहणेनाथ राष्ट्रादस्माद्विसर्जयेत् । सर्वेष्वपि च कार्येषु चातिकरेषु केवलम् ॥७०१|| कृतेष्वपि तथा तेन त्वक्षतो ब्राह्मणो ब्रजेत् । स्त्रीणां न हिंसाविहिता चात्तिक रेषु कर्मसु ८२|| बालनीनां तु रागेण परेपां स्वस्थ वा पुनः । क्षुद्रशूलशिलावद्विविप्रहकप्रदाइतिः ॥७०३।। प्रपातनं प्रकथितं ब्राह्मणीनां तु केवलम् । केशाना लुब्छनं कृत्वा च्छिन्नं कृत्वा यथातथम् ॥७०४क्षा स्वदण्डभ्वजशूलापस्मारचक्रादिभिः सदा । गदभारोहणादेव देशादुश्चाटनं स्मृतम् ॥७०१॥ अजितोऽस्मीति वक्तारं जितं न्याये न शाखतः । सभायां वं पराजित्य दूपयित्वा प्रवासयेत् ११७०६॥ दुष्टं सतो दूषयन्तं स्वकार्यायान्यहं खलम् । त्यतकापटपकौटिल्यान्मोड्यन्तमभीक्ष्णशः Isll भेदयन्तं भीषयन्तं हेतुवाक्यादिभीपणेः । वरसम्जनाकारमानं सज्जनपिणं तराम् ॥ell २५६८ लोहितस्मृतिः..... I सस्क्रियाचरणव्याजदुष्टकार्यककारिणम् । कोपेयं कर्कशंकर सामान्यद्रव्यहारिणम् ॥६॥ ग्रामद्रोहजनद्रोहसर्वद्रोहकलोलुपम्।। यत्नेन राजा निश्चित्य कालेन महता, शनैः। जनवाक्येन महतां चर्यया भाषणे न च ॥१९॥ पूर्वोक्तान् शिक्षयेत्सम्यक् सत्पथे विनिवेशयेन् । तस्योपायांश्च वक्ष्यामि स्पष्टाय विशदाय च ।।१।। स्वामिना स्यामिनं कार्यकाले तस्मिन्समागते । विवदन्तं समत्वेन सद्यस्सम्यक्प्रताडयेत् ॥१३॥ अझं सभायां विदुपा समत्वेनैव निर्भयम् । अश्रोत्रियं श्रोत्रियेण विवदन्तं सभास्वति । प्रामे राष्ट्र च सर्वत्र पाधान्यन चिरात्सितान् । महात्मनो महाभागान् दुष्टान् केचन सदशः ॥१६॥ मिलित्वा तरिम्याः पौवांपर्यमर्यादया कृताः। गवादन्यथयन्ती व नास्माकं सम्मतिः परा 1343 इयमित्येव ये दुष्पा तान्सपोनियं नृपः। एकदा भीपर्यन्यन दण्डसमहणात्परम् ... it विद्याविहीन पिशुनं पामरं पापचेतसम् l विवदन्तं घराधीशः सन्ताड्योद्वासयेदहिः ॥१४ ॥ तूणी विनय मर्यादा दमं कुर्यात्तु हुकृतेः | नयमामराज्येसर्वेषांसुखित्ववर्णनम २७६६ अनया निखिलाश्चापि सद्यश्शान्ता भवन्ति हि । अनयानामभावे तु लोकोऽयं सुखमश्नुते ११७१६।। लोको यदा सुखी राजा तदा सर्वान्मनोरथान् । अवशादेव लभते नात्र कार्या विचारणा ॥२॥ इतीदं कथितं शास्त्रं लोहितेन महात्मना । हिताय सर्वलोकानां सारमुद्धृत्य शाखतः ॥७२।। श्रीला हितस्मृतिः समाप्ता।

|Hiji नमः॥ * नारायणस्मृतिः प्रथमोऽध्यायः नारायणांममो सम्बादः एकदा नैमिषारण्ये प्रमपिंगणसयिते । नारायणो महायोगी र्यामसमपन्त ॥१॥ भगवन् मुनिशार्दूल सर्वधर्मभृतावर । सर्वपापप्रशमनी प्रायश्चित्तविधिः कथम । पापा: कतिविधाः प्रोक्ता विस्तरेण पदस्व मे ॥३॥ दुर्वासा उवाच । नारायण महायोगिन् शृणु विस्तरतो मम । कृते युगे चतुष्पादो धमों वर्द्धति वर्द्धतिते)॥४॥ त्रेतायुगे तु सम्प्राप्ते पादहीनो भवेवृषः । द्वापरे समनुप्राप्ते द्विपादाभ्यां वृपस्थितः ॥५॥ ततः कलियुगे प्राप्ते पादेनकेन तिष्ठति । ततः कृतो युगःश्रेष्ठो मध्यमस्तदनन्तरम् काले कलियुगे पुण्यध लुप्ते भुवस्स्थले ॥३ ॥

महापातकोपपातकवर्णनम् २७७१ अधमो द्वापरयुगः कलिस्स्यादधमाधमः। कृते कृते युगे पापे तद्देशं संपरित्यजेत् ॥ ७॥ त्रेतायां ग्राममात्रं तु द्वापरे कुलमुसृजेत् । फलो युगे विशेषेण कर्तारं तु परित्यजेत् ॥८॥ कृतप्रेताद्वापरे (पु) तु मरणान्तादिनिप्कृतिः । कलौ युगे तु सम्प्राप्ते मरणान्ता न निष्कृतिः ॥६॥ पापा नवविधाः प्रोक्ताः सावधानतया शृणु। ब्रह्महत्या सुरापानं रतेयं गुर्वङ्गनागमः ॥१० य एते (सह) संयोगी महापातकिनस्त्विमे। अतिदेशादमीषा यदातिदेशिकमुच्यते ॥११॥ एतत्प्रकाशपापानां गोवधादिकमेनोयदुपातकमुच्यते ॥१॥ यचा विलधान्यादि विक्रयात्तापमात्मनः । सङ्करीकरणं प्राहुः कन्यापहरणादिकम् ॥१३॥ मलिनीकरणं चैव चण्डालीगमनादिकम् । अपात्रीकरणं प्राहुः दुरनादेस्तु भोजनम् ॥१४॥ जातिभ्रंशकरं प्राहुस्तथा प्राहुस्तथा दुर्मरणादिकम् । प्रकीर्णकमिति प्रोक्तं पापानि नवधा क्रमात् ॥१२॥ महता पातकानान्तु प्रायश्चित्तं कलौ युगे। द्वययुतरेव गोदानमत्या विप्रबधे कृते अमत्यायुतगोदाननिष्कृतिः परिकीर्तिता । सुरापानं द्विजः कृत्वा प्रइत्यानतं घरेत् ॥१५॥ रहस्याना वधव २७७२ नारायणस्मृतिः- स्वर्णस्तेयेऽपि तद्वत्स्यान्मातृगन्तुस्तथैव अभ्यासे द्विगुणादीनि कल्पनीयानि सत्तम ॥१= गोवधे च कृते विप्रेरमत्या तु पराककम् । मत्या चान्द्रायणं कायं नान्यथा मुच्यते त्वघान् ॥१६ तिलविक्रयणे चान्द्र तप्त वण्डुलविक्रये । निक्षेपहरणे विप्रश्चान्द्रायणमथाचरेत् ॥२०॥ चण्डालीगमने विप्रस्त्वज्ञानान्मासमात्रतः। सेतुस्नानं ततः कृत्वा शुद्धिमाप्नोत्यसंशयः ॥२२॥ मत्या द्विमासमभ्यासे वत्सरं सेतुमज्जनम् । व्यतिपातादिदुष्टान्नभोजने न कृते यदि ।।२२।। प्राजापत्यद्वयं कृत्वा गुद्धिमाप्नोत्यसंशयः। विद्यु दग्न्यादिभिर्विप्रो मत्या प्राणेवियुज्यते ॥२३॥ तत्पापस्य विशुद्धयर्थ सत्पुत्रादियथाविधि । मत्या त्वशीतिकच्छ्राणि कृत्वा संस्कारमाचरेत ॥४॥ अमत्या दशकच्छाणीत्येवमाहुमहर्षयः । तुलाप्रतिमहे लक्षगायत्रीजपमाचरेत् ॥२॥ हिरण्यगर्भग्रहणे त्यष्टलक्षं जपेद्बुधः । प्रतिप्रहे कल्पतरोरष्टलक्षजपं परेत् ॥२६॥ गया चंय सहा तु प्रतिगृह्य द्विजाधमः । नयरक्षं जपं देव्याः प्रातस्नात्वा समाचरेत् ॥२. हिरण्यकामधेनुं तु प्रतिगृश द्विजाधमः। अष्टकं अपहेयी मसापच्यापनुत्तये ॥६ ॥

प्रतिग्रहपापप्रायश्चित्तवर्णनम्
हिरण्याश्वस्य च तधा ग्रहणे भूसुराधमः ।
अष्टलक्षजपं कृत्वा शुद्धिमाप्नोति पूर्वजः ॥२६॥
हिरण्याश्वरथं गृह्य वसुलक्षजपं चरेत् ।
हेमस्तम्वरम गृह्य वसुलक्षजपाच्छुचिः ॥३०॥
हेमहस्तिरथस्यैव ग्रहणे मुनिनन्दन ।
कूष्माण्डलक्षहोमेन शुद्धोभवति पूर्ववत् ॥३शा
पश्चलागलदानस्य ग्रहणे विप्रनन्दनः।
दशलक्षजपान्याः सम्यगेव समाचरेत् ।।३।।
प्रतिगृह्य धरादानं दशलक्षजपं चरेत् ।
विश्वचक्राय ग्रहणे तत्पापप्रशमाय च
प्रयुतेनाभिषेकेण शम्भोरगुद्धिमवाप्नुयात् ।
लतायाः कल्पसंज्ञायाः प्रहणे विप्रनन्दन ॥३४॥
लक्षद्वादशवारं तु गायत्रीजपमाचरेत् ।
सप्तसागरसंज्ञस्य दानस्यैव प्रतिग्रहे ॥३३॥
देव्या द्वादशलक्षं तु जपं विप्रसमाचरेत् ।
प्रतिरहे चर्मधेनोस्तत्पापस्य विशुद्धये ॥३६॥
देवीद्वादशलक्षं तु
जपं विप्ररसमाचरेत्।
महाभूतघटस्यैष प्रहले विप्रनन्दन ॥३॥
लक्षमा उपेहवी तस्मात्पापात्प्रमुच्यते ।
एषमादिमहापापान्यनेकानि च सन्ति हि ॥३८॥
यो विप्रो धनलोभेन प्रतिगृहाति कामतः ।
नरके नियतं वासः कल्पान्ठं परिकीवितः ॥३॥

मानना जाता रामायोजनामा मागहमानः पापी नस मभिः। निमिमानिमिता मानिनन ॥४१ पश्मिरो परम गुमन्यन्त्रोतुमिन्स। इति भीनारायणमूतो पापवियरन नान प्रथमोऽध्यायः॥ अथ द्वितीयोऽध्यायः बुद्धिमताभ्यासतपापानाप्रायश्चित्तवर्णनन नारायणग्याच। भगवन्मुनिनाथ वं मयि वात्सल्यगौरवान् । पुनवदस्य गुह्यं मे शरणं प्रणतोऽम्यहम् ॥१॥ मत्यामत्या तथा पापात् अत्यन्ताभ्यासतस्तथा। तत्तत्कालानुगुण्येन प्रायश्चित्तं पदस्व मे॥ दुर्वासा उवाच। नारायण महायोगिन् प्रायश्चित्तं यदीरितम् । अभ्यासे त्रिगुणं चैवमत्यन्ताभ्यासतस्तथा । बहुकालाभ्यासतश्च यत्पापं मनुजैः कृतम् ॥३ ॥ तदबुद्धिकृते पापे द्विगुणं बुद्धिपूर्वतः ॥३ ॥ चतुर्गुणं वहोः कालात् पद्गुणं परिकीर्तितम् ॥४ ॥

' वर्षाध्वंपापापनुतयेप्रायश्चित्ताकरणे न निष्कृतिः २०७५
एतद्वात्पुराज्ञेयं वर्षादून न निष्कृतिः ॥५॥
तस्मात्पापं न कर्तव्यं नरैनरकभीरुभिः ।
वर्षात्परं तु सामान्यपापाभ्यासात्पतत्यसौ ॥६॥
वस्मात् त्रिवर्षपर्यन्तं
द्विगुणत्रिगुणादिकम् ।
कल्पनीयं प्रयत्नेन प्रायश्चित्तं मनीषिभिः ॥७॥
परन्तु तद्भावमधिगच्छत्यसंशयः।
इति श्रीनारायणस्मृतौ प्रायश्चित्तवर्णनं नाम
द्वितीयोऽध्यायः।
ततः
अथ तृतीयोऽध्यायः
नानाविधदुस्कृतिनिस्तारोपायवर्णनम्
नारायण उवाच।
दुर्मासभक्षणेनैव दुस्संसर्गविशेषतः ।
दुष्कृत्यशतसाहस्रात् दुराचारसमतः ॥१॥
अत्यन्तमलिने काये बहुकालं गतेऽपि च।
नानावन्धुविनिन्दाभिस्त्यागादात्मजनैरपि ॥२॥
परैरपि च संत्यागात् धनहान्या विशेषतः ।
अतिनिर्वेदमापन्नः काले बहुदिने गते ॥३॥
प्रपन्नाशरणं कश्चित् कथं निपातिरीरिता ।
दुर्वासा उवाच ।
वास्तवाद्वाऽवास्तवाद्वा यः पुमान् शरणं प्रजेत् ॥४॥

२७७६ नारायणस्मृतिः तं त्यजेच्छक्तिमान्सोऽयमाब्रह्म नरके वसेन् । शरणागतसंत्राणमवश्यं कार्यमेव हि ॥६॥ यावतत्रिवर्ष पतितोऽप्यात्मभावं न मुञ्चति । अभ्यासस्यानुसारेण कल्प्यं निष्क्रयणं भवेत् ॥ ६ ॥ आत्मभावविहीनस्स्यादतः परमनातुरः । चतुर्थवर्षपर्यन्तं कथंचित्पूर्वनिष्कृतिः ॥७॥ ततः परं न कहिः कृतनिष्क्रयणोऽप्ययम् । तथाऽपि पापयाहुल्यात् नालं पूर्वोक्तनिष्कृतिः ॥८॥ द्वितीयादं समारभ्य सप्तमाब्दावधि द्विजः । प्राजापत्यद्वयं तस्य नित्यं स्यादिनसंख्यया ॥६॥ सौदर्शिनी तु संस्थाप्य कलशद्विशतेन तु । कूष्माण्डशतहोमेन गणहोमशनेन च ॥१०॥ पाहित्रयोदशानां च होमानी शतसंख्यया । तथैव विरजाहोमशतेन जुहुयाच्छुचिः ॥११॥ भूगोगभंविधानेन पटगर्भविधानतः । । प्राच्योदीच्यांगमहितं प्रायधित्तमिदं परेत् । नान्यथा शुद्धिमानोति यथा भुयि मुराघटः ॥१३॥ एपमेय नयादा प्रायश्चित्तविनिर्णयः । दरामानं ममारभ्य यादिशानियकम् ॥१४॥ अपमरंगमाहय रस्टिशतमाजनैः। प्रणवेन प सहसदरास्नान: गाम- स्वयं पितावाधान्यो या जातकर्मादि भावयेत् ॥१२ ॥

नानाप्रायश्चित्तवर्णनम्
२७७७
ततः पूर्वोक्तहोमेश्च प्राच्योदीच्याङ्गसंयुतां ।
पूर्ववन्निष्कृति कृत्वा पञ्चगव्य विशेषतः ॥१६॥
दशदानं भूरिदानं सहस्रब्रह्मभोजनम् ।
ततो गङ्गाजले स्नानं सेतुदर्शनमेव चा
एवं कृते विशुद्धोऽभूत् पूर्ववद्विजनन्दनः ।
रवकर्मपरकर्माहों भवेदेव न संशयः ॥१८॥
विशतेर्पतः पश्चात् आतॊ वाऽना” एव या।
नात्यन्तमलिनस्याहुः प्राजापत्यं महर्षयः ॥१६}}
इति श्रीनारायणस्मृतौ नानाप्रायश्चित्तवर्णननाम
तृतीयोऽध्यायः।
अथ चतुर्थोऽध्यायः
नारायण उवाच।
योगिनांवर मस्वामिन् सर्वज्ञ करुणानिधे ।
पदस्व तपता श्रेष्ठ मयि वात्सल्यगौरवात् ॥१॥
वंशतिवर्पतः पश्चात् अतीवार्तस्समागतः।
नेप्कृतिन कथं तस्य स्यादित्येवं प्रवीपि मे ॥२॥
दुर्वासा उवाच ।
पसंरक्तनयनः कुटिल, लतायुतः।
पुरदोष्ठद्वयोऽतीव विष्फुलिगितलोचनः ॥३॥

२०७४ नागमणस्पतिः नारायणमिई प्राहः कामानिक रया भृराम् । किमरे मूळ दुपारमन अपरिपडसि ॥४ परिहासो भवेरिया न सह कोषमुल्सनम् । पुनरेवं न प्रत्र्यं यदि शसि दुर्मठे ॥५॥ मरकोपजातकालाग्नी मृदां ते व्यपविध्यति । इति प्रयन् कोपेन दुर्वाससमनन्यधीः ॥१॥ उत्प्रयेपितसर्यानो भयविरललोचनः। ततः करुणया दृष्टया दुवांसास्तु महामुनिः । ततो धेयं समालम्ब्य नारायणमुनी स्थिते । प्रीत्योवाच स तुष्टात्मा नारायणमहामुनिम् ॥६॥ तात वत्स न भेतव्यं प्रसन्नोऽस्मि तवानघ । स्वदुक्ति संपरिज्ञाय मम चित्तं सुनिर्मलम् । सञ्जातमिनिशंकं पृच्छ मां यद्यदिच्छसि ॥१ इति श्रीनारायणस्मृती प्रायश्चित्तवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः। पपात पादयोस्तस्य शस्त्रन्टिन्न च दुमः ॥७ ॥ पाणिभ्यां सं समुद्घृत्य ममाज मुखमासा ॥८ ॥ कुटिलं पृच्छमानं त्वां मत्वा कोपो महानभूत् ॥१० ॥

अथ पञ्चमोऽध्यायः
दुष्प्रतिग्रहादिप्रायश्चित्तवर्णनम्
नारायण: उवाच ।
भगवन्मुनिशार्दूल नमस्ते रुद्रमूर्तये ।
कालामिसदृशप्रख्य कोपनाय नमोनमः ॥१॥
प्रसीद मे महर्षे त्वं पाहि मां शरणागतं ।
न कौटिल्यादहं पृच्छे नाहङ्कारान्महामुने ॥२॥
हिताय सर्वलोकानां पृष्टवानस्मि साम्प्रतम् ।
प्रसन्नो यदि वात्सल्यात् प्रष्टव्यं किंचिदरित मे ॥३॥
कोपो न स्याद्यदि पुनः भामनुज्ञापय प्रभो।
दुर्वासा उवाच ।
तात मा पितरं विद्धि गुरुमाचार्यमेव वा ॥४॥
मम कोपः प्रशमितः तव वास्तवदर्शनात् ।
अतस्त्वं भयमुत्सृज्य पृच्छ मा यद्यदिच्छसि ॥५॥
नारायण उवाच।
पृच्छन्तं मामतीवात उत्तरं दातुमर्हसि ।
सर्वपापप्रशमनं सर्वसिद्धिकरं नृणाम् ॥६॥
चिराभ्यस्तमहापापपिताना दुरात्मनाम् ।
दुर्देशगमनेनैव दुष्प्रतिप्रहकोटिभिः ॥ ७॥
म्लेच्छान्त्यश्वपत्रीभिः संसर्गाचिरकालवः ।
'अपेयमद्यपानार्दुष्टमांसादिभक्षणैः ॥ ८॥

२७८० नारायणस्मृतिः आत्र्तानां का गति झन् चदस्य करुणानिधे । दुर्वासाः उवाच । शृणुष्व सारः पृष्टोऽद्य लोकानां हितकाम्यया ॥६॥ संग्रहेण प्रवक्ष्येऽद्य प्रवक्ष्येऽद्य सावधानतया शृणु। युगेष्वपि च सर्वेषु सत्त्यराजसतामसाः ॥१०॥ नित्यं गुणाः प्रवर्द्धन्ते तत्प्रभावं वदामि ते । सत्त्वप्रवर्तका भूयः प्रवर्द्धन्ति(न्ते)कृते युगे ॥११॥ साविकानान्तु वक्ष्यामि गुणानां कृत्यमद्भुतम् । खीपुंसंयोगमात्रेण स्त्रियां गर्भः प्रजायते ॥१२॥ तस्मिन्निविशते जीवः कर्मपाशवशंगतः। तस्य प्रवेशकालस्तु सात्त्विको यदि ये भवेत् ॥१३॥ जातमात्रस्य तस्यैव सात्त्विकत्वं भवेद्भवम् । ततः कतिपये काले बुद्धिस्सत्त्वे प्रवर्तते ॥१४॥ सत्यप्रयत्नात्सोऽयं सत्कृत्यमनुतिष्ठति । स्नानं सन्ध्या जपोहोमः स्वाध्यायः पितृतर्पणम् ॥११॥ नेय पापसमापार प्रवृत्तिस्यात्कदाचन ॥१६॥ कालधर्म गते नमिन मुक्त श्ययं भवेद्ध यम् । नस्य घोरामालम्नु राजसो यदि भान् ॥१t रजोगुगारीतात्मा ब्रायते भुषि मानयः । 'गुपुवायन्नामः कामभोगमुमानि च ॥al अनिश्याराधनादीनि प्रवृध्यन्ति ( प्रवर्धन्त ) हि नित्यशः ।

पापसमाचारस्थगतिवर्णनम् २७८१
वान्ते दिवमासाद्य वर्गादिसुखमेष्यति ।
यंकालो मिश्रसत्वराजसो यदि वै भवेत् ॥१॥
राजससम्मिश्री जायते भुवि मानवः ।
सक्तः कचित्काले कचित्साविककृत्यवान् ॥२०॥
ने स्वर्गसुखं भुक्त्वा ब्रह्मणा सह मुच्यते ।
प्रवेशकालन्तु तामसो यदि वै भवेत् ॥२१॥
सा मूदचित्तस्तु जायते भुवि मानवः ।
यं कलहकारी च नित्यं द्रौटेकतत्परः ॥२॥
द्वारपरद्रव्यपरिग्रहपरायणः ।।
यं पापसमाचारः परह न शर्मकृत ॥२३॥
न्ते नरकं भुक्त्वा जायते भुवि कुत्सितः।
लातु तामसाधारः प्रायेणात्र तु तामसाः ॥२४॥
नेप्यन्ति विशेषेण सत्त्वोद्रिक्ताः कचित्कचित् ।
शक्तिक्षयकरः कलिर्दोषनिधिस्ततः ॥२५॥
बाबतोपवासाद्य कलो नैव समाचरेत् ।
बाम्नायादिरूपेण प्राजापत्यादिकं चरेत् ॥२६॥
जीयवर्षमारभ्य यावद्विशतिवत्सरम् ।
पापोपपापादि युक्तरत्वात्तों भवेद्यदि ॥रणा
त्तिहोमसंयुक्तमयमर्पणमेव च।
इसकसशस्नानमबिलगरातमजनम् ॥२८॥
चगव्यप्राशनं च सवं कृत्वा विशुपति ।
यः कुरुते सम्या सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥२६॥

नारायणस्मृतिः । नारायण याचा सहस्रकलशान तु स्थापन कयमुच्यते । कथं मण्डलसंस्थानं विस्तरेण यदव ने ॥३०३ दुर्वासा उयाच। शृणु मे विस्तरेणेह नारायण महामुने। सहस्रकलशाना तु स्थापनस्य विधिक्रमम् ॥३१॥ यच्छ त्वासर्वतापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः। नद्यास्तीरे तटाकस्य तीरे वा सुमनोहरे ॥३॥ शालो विशालां विधिवत् पत्रिंशत्पदसंमिता । पोडशस्तम्भसंयुक्तां प्रपा. तत्र प्रकल्पयेत् ॥३३॥ कदलीस्तम्भपूगालिमिश्रितां सुमनोहराम् । कृत्वा ततो वितानाद्य स्तोरणाद्यश्चभूपयेत् ॥३४॥ चतुरश्रां मध्यदेशे दशपायुतां भुवम् । वेदिका कल्पयेत्सम्यक चतुरङ्गुलमुन्नताम् ॥३५॥ ईशान्यादि चतुर्दिक्षु तथैव परिकल्पयेत् । गोमयेन समालिप्य निम्नोन्नतविवर्जिताम् ॥३६॥ पञ्चम्यगणैरलंकृत्य व्रीहिभारैस्ततस्तरेत् । सुधूपितान् सूत्रवनवेष्टितान् सुमनोहरान् ॥३॥ कलशान् द्विशतं सम्यक् कलशाक्षवशोभितान् । - सुश्च गु देशे स्थापयित्वाऽथ देशिकः। पुण्याहवाचनं कृत्वा संप्रोक्ष्य कलशानथ ॥ पञ्चत्वपल्लवमिश्रान् नालिकेराम्लपाल्वैः ॥३at

सहस्रकलशस्थापनेपापादिदूरीकरणार्थवर्णनम्
एक कलशमादाय स्थापयेबीहिमध्यतः ।
परितश्चाष्टकलशान् विरलान् परिकल्पयेत् ॥४०॥
ततो विशतिसङ्घयाकान् द्वात्रिंशत्सवयकारततः ।
चत्वारिंशच कलशान् चक्राकारान्यथाक्रमम् ॥४१॥
ततः शिर.प्रदेशे तु प्राच्यादिचतुरोन्यसेत् ।
मध्ये स्वेकं तु संस्थाप्य पार्श्वयोरुभयोरपि ॥४२॥
कलशत्रितयं दक्षे वामे च कलशत्रयम् ।
चक्रस्य दक्षिणे पार्वे कलशाना तु पञ्चकम् ॥४३॥
विन्यस्य मध्यमे त्वेक तर्थक शिरसि न्यसेत् ।
ततस्त्वधः प्रदेशे तु रेखाद्वयसमाकृतीन ॥४४॥
कलशान्दश विन्यस्य तथैवोत्तरतश्चरेत् ।
चक्रत्याधः प्रदेशे तु स्थाप्यकं कलशं ततः ॥४॥
परितः परिकल्प्याथ करशान्यव्यथाक्रमम् ।
पार्श्वयोरुभयोरतद्वन प्रत्येक कलशद्वयम् ॥४६॥
अधस्तात्कलशानां तु पटकस्य त्रितयं तथा।
अधस्तात्कलशद्वन्द्व स्थापयेद्विप्रसत्तमः ॥४४ा
एवं कृते भवेत्स्पष्ट साक्षाचक्राकृतिः क्रमात् ।
ईशान्यादिचतुर्दिक्षु कल्पयेदेवमेव हि ॥४॥
पञ्चचक्राफतिरिय महापापप्रणाशिनी।
'उपपातकदोपत्री अतिपातकवारिणी ॥४॥
दुर्देशगमने पेव दुःखीसद्गमे(मके)पु ।
"समुद्रलहने व नौयानमवलम्य प ॥५०॥

२७८४ नारायणस्मृतिः द्वीपान्तरगतो चैव चण्डालत्रीनिपेवणे । सन्ध्यादिकर्मणां चैव श्राद्धादीनां च लोपने ॥१E ब्रह्मनादिसहावासे तुलुष्कादिसमागमे । सर्वेपामपि पापानामियमेका हि निष्कृतिः ॥ भक्त्या परमया युक्त इमां निष्कृतिमाचरेत् । पराकमप्यकुर्वाणः पञ्चविंशतिसङ्ख्यया ॥ तप्तत्रिशतपूर्व तु भूगर्भ प्रथम चरेत्। गोगभं वटगभं च सर्व साङ्ग समाचरेत् ॥४॥ ग्रामः पूर्ववच्छुद्धो जायते स्फटिकोपमः। अथ पष्ठोऽध्यायः E नारायण उवाच। सहयव्यास्नानं कथं कार्य महामुने। दुर्यासा याचा समूत्रायान् मरिहदान मालशरागुभूषितान् । सहयगरपान करशान् नालादिरिये स्यकर्म परकांहों जायते तदनन्तरम् ॥ इति भीनारायणस्मृती विशेपविधाननाम पश्चमोऽध्यायः । सर्णराजनापारथ मृण्मयान्या विशेषतः || 3 कलौवय॑कर्मणां निषेधवणनम २७८५ दिश्यशान्या तधाऽऽमय्यां नित्या मरुतो दिशि । मध्ये च स्थापयेद्विप्रः कलशान् द्विशतं क्रमात् ।। ३॥ शुद्धोदकैरसमापूर्य नालिकेराम्रपल्लवैः । समलड्कृत्य विधिवत् वरुणं च प्रचेतसम् ॥४॥ आयाधापा पति चैव सुरूपिणमथाहयेन । नैवेद्यान्तस्तमभ्यर्च्य ऋत्विम्भिरसहदेशिकः ॥५॥ शन्नोदेवीस्त्वापो वा द्रुपदादिव इत्यपि । आपोहिष्ठाहिरण्याद्य मन्त्रैरसम्मन्थ्य मन्त्रवित् ॥ ६ ॥ गायच्या प्रणवेनैव त्यवरोहणमार्गतः । सकूचःश्च (१) स्थानं प्रोक्षणमेव वा। कारयेत् सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥ ७ ॥ इति श्रीनारायणस्मृतो सहस्रकलशाभिपेको नाम पष्ठोऽध्यायः । अथ सप्तमोऽध्यायः नारायण उवाच । कलो तु कानि कर्माणि वानि परिचक्ष्य मे। दुर्वासा उवाच । एगु नारायण ब्रह्मन् सावधानतयाऽद्य मे ॥१॥ कलौ तु पापवाहुल्यात् वर्जनीयानि मानवे. । विधवापुनरुद्वाही नौयात्रा तु समुद्रतः २७८६ नारायणस्मृतिः आतिश्य ( १ प्राशनस) करणार्थ तु मधुपर्कपशोर्वधः। शूद्रान्नभोज्यता विप्रः तीर्थसेवी च दूरतः ॥३॥ सर्ववर्णेषु भिषणा भक्षाचयं विधानतः। ब्राह्मणादिषु गेहेषु शूद्रस्य पचनक्रिया ॥४॥ भृग्वनिपतनं चाष्टौ कर्माण्येतानि वर्जयेत्। अवर्जयित्वात्वेतानि शास्रोक्तमिति बुद्धितः ॥५॥ कलौ युगे विशेषेण पतितस्त्यान्न संशयः। कृतादौ तु महीपालो वेनो नाम नृपोत्तमः ॥६॥ शशास पृथिवीं सीं सकुलाद्रिमहार्णवाम् । दुरात्मा स तु कृत्येन ब्राह्मणानन्वशासत ॥७॥ यूयमद्यप्रभृति वै समुद्र यानमार्गतः । द्वीपाद्वीपान्तरं गत्या कुरुध्वं सर्वविक्रयम् ॥८॥ विधयापुनम्द्वाहं यधेच्छ न विचारणा। पशुभक्षमातिथ्यव्याजेनाचरथ द्विजाः ॥६॥ गृहे पचन्तु युप्माकं शूद्रा.प्रादेऽपि नित्यशः । नीर्थसेवाव्याजमावात् त्यजध्वं श्रौतम घut यवयासवर्णेषु भिक्षा कुर्वन्तु সামোযাত্ব ও গ অধ্যা ॥ कालासहिप्पयो पृद्धाः भृगुपात परन्तु भोः । यो महामनमत्युभमन्यथाम्नुमिच्छति ॥ अमिना तोतंगधारण वध्य पय न संशयः। इति वेन पपरभूत्वा पर्यनस्यन्त पीडिताः ॥१३॥ कामवः।

वेनसमीपे सानुरोधं ऋषीणां समावेदनवर्णनम् २७८७
सो यदि भवेदेष राज्यं भूयादनायकम् ।
शप्तश्चेद्भवेत्पीडा कथं कार्यमितः परम् ॥१४॥
हे चिन्त्य (१) महात्मानः सङ्घीभूय सभान्तरे।
। महीपति व युः विप्राः प्राणपरीप्सवः ॥१शा
भो वेन महीपाल किमर्थ नः प्रवाधसे ।
शास्त्रीयानिमान् कृत्वाऽमहर्पिकथितान् प्रभो ।।१६।।
पातयसि नो घोरे निरये किं फलं तय ।
पिभापितमेवाद्य करिष्यामी महीपते ॥१॥
न्यत् किश्चित् करिष्यामः प्राणः कण्ठगतैरपि।
इन्छ त्वाऽथ भूपालो वैनः क्रोधपरिप्लुतः ॥१८॥
प्वादशसहस्र' तु ऋपीनानाय्य सत्वरम् ।
म्भेषु पडूक्तिसो यद्ध्वा केशरभिहनत्स्वयं ॥१॥
न संपीड्यमानास्ते घोपांचक्रिरे नृपम् ।
। भो राजन् महीपाल किमर्थ नः प्रबाधसे ॥२०॥
॥ वेनउवाच॥
-मनोरक्षकान्यद्य शास्त्राणि (रचितानि ) हि ।
अकान्येव सर्वेषु पदध्वं तत्प्रियं मम ॥२२॥
नादेशेषु विप्राद्याः नौयानात्प्रचरन्तु भोः ।
धिवापुनरुद्वाई चरन्तु पृथिवीवले ॥२॥
चरन्तु पशोहि सा मधुपर्के द्विजातयः।
गेहेषु भुंजन्तु द्विजगेहे पचन्तु वे ॥२३॥

२७८८ नारायणस्मृतिः भिक्षयस्सर्वधर्णषु भैक्षाचयं भेक्षाययं परन्तु च। कामममीन् परित्यज्य तीर्थसेवा चरन्तु च । स्त्याकण्यं च तद्वाक्यं वेपमाना महर्षयः ॥२५॥ नौयात्रा त्यष्टकर्मानुजानन्ति दुःखिताः । शशास पूर्ववत् पृथ्वी परिपूर्णमनोरथः। ततः प्रभृति विप्राद्याः नौयात्राद्यष्टकमणि ॥R प्रवृत्ता ऋषिवाक्येन धर्मबुद्धया च मोहिताः। युगनयेपु यातेपु ततः प्राप्ते कलौ युगे ॥२८॥ बदरीवनमासाद्य सङ्घीभूय महर्षयः । विचिन्त्य विधियोगेन कृत्यान्येतान्यवारयन् ।।२६. तस्मात् कलो विमान् धर्मान् वानाहुमहर्षयः। कलौयुगे तु संप्राप्त नौयात्रादि करोवि यः ॥३०॥ पतित्वा निरये घोरे दुःखमेति महत्तरम् । इमान् कृत्या कलियुगे निष्कृतिन विधीयते । तथाऽपि न परिग्राह्यः पापबाहुल्यकं यतः। इति श्रीनारायणस्मृतौ नौयात्राद्यष्टकर्मणानिधोनाम सप्तमोऽध्यायः दीर्घकालासहा गृद्धाश्चरन्तु भृगुपातनन ना ततो विसृज्य भूपालो महपीनमितौजसः ॥२६ ॥ तस्मादिमान् कलौधर्मान् वानाहुमहर्पयः ॥३१ ॥ यदि निष्कृतिमापन्नः सेतुस्नानादिना कचित् ॥३२ ॥ किमन्यच्छोतु कामोऽसि यदव द्विजनन्दन ॥३३

अथाष्टमोऽध्यायः
अष्टनिपिद्धकर्मणां प्रायश्चित्तवर्णनम्
नारायण उवाच।
भो भो ब्रह्मन् वदस्वाद्य विस्तरेण ममाथुना ।
अबुद्धया बुद्धिपूर्व वा कलिवानिमान्दिनः ॥१॥
कृत्वा ततः परंभूयः पश्चात्पापपरायणः ।
शरणं यदि संप्राप्तः कथं निष्कृतिरुच्यते ॥२॥
केनैव विधिना सत्यम् बन्धुमध्ये प्रवेशनम् ।
कि कृत्वा मुच्यते पापात् कथं कर्माहता भवेत् ॥३॥
एतदाचक्ष्य भगवन् संशयो जायते महान् ।
दुर्वासा उवाच ।
शृणु नारायण श्रीमन् गदतो मम विस्तरातू ॥४॥
गङ्गास्नानं वर्षमानं मासं सेतुनिमज्जनम् ।
सामंच विधिवत्कृत्वा व्यवहार्यो भवेदिह ॥१॥
भवेत्स्वकर्ममात्रस्य भविता त्वहता द्विज।
परकर्मणि नवाईः भवेदेव न संशयः
वस्मादिमान् कलियुगे पनिष्ठी पन्ति हि ।
असाध्यत्वात्कलो काले द्रव्यत्ययविशेषतः ॥७॥
यदि सर्वस्वदानेन चित्तं चरितुमिच्छति ।
वदाऽसौ सर्वकर्माहों भवेदेव न संशयः ॥८॥

२७६० नारायणस्मृतिः तदा तय यश्यामि रहस्यमिदमुत्तमम् । यदा प्रवृत्तरत्येतस्मिन् तदिनं परिगण्य च ॥६॥ चान्द्रायणद्वयं नित्यं कर्तव्यमविशङ्कया। पूर्वोत्तरागसंयुक्त 'अन्लिगशतमन्वितम् सहस्रकलशानानं पञ्चवारुणहोमकम् । कूश्मा(मण्डगणहोमानां शतं पाहि त्रयोदशः ॥१६॥ शतं तु विरजादोमं गायत्रीशतहोमकम् । Hal मजनं गोमयदे गोदानं द्वादशाचरेन् । एवमादि यथाशास्त्रं धनव्ययमचिन्त्य तु। सन्तुष्टचित्तः कृत्वा (सतत)शुद्धिमाप्नोत्यसंशयः ।।११ स्वकर्मपरकार्माहों भवेदेव न संशयः। अष्टमोऽध्यायः। तिलहोमसहसंश्च गर्भ च यदभूगवाम् || दशदानं भूरिदानं सहस्रब्रह्मभोजनम् ॥१३ ॥ इति श्रीनारायणस्मृतौ कलावष्टविधवय॑कर्म प्रायश्चित्तवर्णनं

अथ नवमोऽध्यायः
धनहीनाय प्रायश्चित्तवर्णनम्
नारायण उवाच।
भगवन सर्वधर्मज्ञ शरणागतवत्सला
अकिश्वनानामानां कलिवयंकृतां नृणाम् ॥ १॥
कथं निष्कृतिरादिष्टा वद मे शिष्यवत्सल।
दुर्वासा उवाच।
तात ते कथयाम्यद्य शृगु वात्सल्यगौरवात् ॥२॥
अत्यन्तात्तों यदि ब्रह्मन अधनः कलिवर्ण्यकृत् ।
शरणं यदि संप्राप्तः प्रायश्चित्तमिदं वदेत् ॥३।।
सशिखं वपनं कृत्वा नित्यकर्मपरायणः ।
पुण्यतीर्थे हदे वाऽपि पुष्करिण्यामथाऽपिया ॥४॥
आकण्ठजलसम्मनः प्राङ्मुखस्त्वषमपणम् ।
शिरस्यञ्जलिमाधाय जप्त्वा स्नानं समाचरेत् ॥५॥
पुनर्भप्त्वा पुनस्नात्वा पुनजपमथाचरेत् ।
एवं मध्याह्नपर्यन्तं प्राडमुस्वास्नानमाचरेत् ॥ ६ ॥
माध्याहिकं ततः कृत्वा समाराध्येष्टदेवताम् ।
ततः प्रत्यछमुखो भूत्वा पूर्ववत्स्नानमाचरेत् ।। ७॥
साया समनुप्राप्ते तदमुत्तीर्य वाग्यतः ।
न संमृजेच्छरीराणि वाससा वाऽपिपाणिना ॥८॥

२७६०
नारायणा
तदद्य तव वक्ष्यामि
यदा प्रवृत्तस्त्वेतस्मिन् तदिः
चान्द्रायणद्वयं नित्यं क
पूर्वोत्तरागसंयुक्त अब्लिगर
सहस्रकलशस्नानं पश्चवार
कूश्मा(मण्डगणहोमान शत।
शतं तु विरजाहोमं गा
तिलहोमसहस्रश्च गर्भ च
मननं गोमयदे गोदानं
दशदानं भूरिदानं सहम
एवमादि यथाशास्त्रं धनव्य
सन्तुष्टचित्तः कृत्वा (सततं)शुद्धि
स्वकर्मपरकामांहीं भवेदय न
इति श्रीनाराय गस्मृती कलायविधयय
अष्टमोऽध्यायः।

॥ श्रीगणेशाय नमः॥
* शाण्डिल्यस्मृति *
अथ प्रथमोऽध्यायः
श्रीमत्तोदगिरेमुनि श्रीमत्यायतने हरेः ।
शाण्डिल्यऋपिमासीनं प्रणम्य मुनयोऽब्रुवन् ॥ १॥
श्रीमदेकायनं शास्त्रं श्रुतं गुह्य सनातनम् ।
ज्ञातं च सर्व वेदानो अन्तस्सारमिदंत्विति ॥२॥
निवृत्तं चैदिकं कर्म यत्प्रोक्तं भवभेषजम् ।
पक्षकालात्मकं ज्ञानं तच प्रस कदैवतम् ॥३॥
कुटुम्बाश्रमनिष्ठानां पञ्चकालनिषेविणाम् ।
आचारं त्वन्मुखाम्भोजाच्छ्रोतुमिच्छामहे वयम् ॥ ४॥
शाण्डिल्योऽपि नमस्कृत्य मङ्गलायतनं हरिम् ।
अब्रवीत्समुनिश्रेष्ठान श्रेष्ठका महामुनिः ॥५॥
बहुशः पूर्वमेवायं समाचारो मयेरितः ।
पदार्थानाधिकृत्यैव शास्त्रे सप्त संस्थितान् ॥६॥
महाविस्तररूपोऽयमाचारः पञ्चकालिनाम् ।
संक्षेपात्प्रवीम्यद्य यथाशास्त्रं यथामति ॥७॥

२०६२ नारायणस्मृतिः फलाएकप्रमाणन राण्डुलेनहतिः पर्य। गोमूत्र विनियोच हरये परमात्मने एवं पण्मासद्विप्रः पूर्वयनच्छद्धिमाप्नुयात् ॥१८॥ ततो गलाजले स्नात्वा सेतुदर्शनमेव वा। कृत्या ततः पुनः कर्म कृत्या शुद्धिमयाप्नुयात् ॥११॥ स्वकर्मपरकर्माहों भवेदेव न संशयः। मेरुपृष्ठमुपागम्य तपश्चतु ययो मुनिः ॥१३॥ इति श्रीनारायणस्मृती कलौवयकर्मप्रायश्चित्तवर्ण नयमोऽध्यायः। तदेव भुत्या साया स्वपे दक्षिणाशिरः । एवं सम्यक् समादिष्टं श्रुत्वा नारायणो मुनिः ।।१ विच्छिन्नसंशयो भूत्वा परमानन्दनिर्भरः ।

।। श्रीगणेशाय नमः ।।
* शाण्डिल्यस्मृति *
अथ प्रथमोऽध्यायः
श्रीमत्तोदगिरेर्मुनि श्रीमत्यायतने हरेः ।
शाण्डिल्यऋपिमासीनं प्रणभ्य मुनयोऽन् वन् ॥ १॥
श्रीमदेकायन शास्त्रं श्रुतं गुह्य सनातनम् ।
ज्ञातं च सर्व वेदाना अन्तस्सारमिदंत्यिति ॥२॥
निवृत्तं वैदिकं कर्म यप्रोत भयभेपजम् ।
पक्षकालात्मकं ज्ञानं ता ब्रह्म कदेवतम् ॥३॥
कुटुम्बाश्रमनिष्ठानों पञ्चकालनिपेविणाम् ।
आचारं त्यन्मुखाम्भोजाच्छ्रोतुमिच्छामहे वयम् ॥ ४ ॥
शाण्डिल्योऽपि नमस्कृत्य मङ्गलायतनं हरिम् ।
अप्रवीत्समुनिश्रेष्ठान श्रेष्ठका महामुनिः ॥६॥
बहुशः पूर्वमेवायं समाचारो मयेरितः ।
पदार्थानधिकृत्येव शास्त्रे सप्त संस्थितान् ॥६॥
महाविस्तररूपोऽयमाचारः पञ्चकालिनाम् ।
संक्षेपात्प्रवीभ्यद्य यथाशास्त्रं यथामति ॥७॥

२७६४ शाण्डिल्यस्मृतिः रहस्यमेतद्विज्ञानं भक्तानां हितमेव च। अतः प्रमाणं भक्तानां सारं सर्वागमेषु च ॥४ कुटुम्वाश्रममाश्रित्य तथा कालक्रमेण च। यक्ष्याम्येव समाचारान् मुख्यास्ते हि कुटुम्बिनः ॥१ आचारं मंगलोपेतं संक्षेपात्प्रत्रवीमि वः। अनन्यमनसस्सर्वे शृणुध्वं मुनिपुङ्गवाः ॥१०॥ पञ्चेन्द्रियस्य देहस्य बुद्धश्च मनसस्तथा । द्रव्यदेशक्रियाणां च शुद्धिराचार इष्यते ॥१॥ वक्ष्यमाणस्य सूत्रं हि स्तोके श्लोकोऽयमीरितः । प्रतिपिद्धप्यसक्त हि यासक्त शुद्ध साधुपु । भगयद्विपयेध्येव शुद्ध तच्छ्रोत्रमुच्यते ॥१३॥ पश्यमशन्त्येयास्पृश्यं स्पृश्यमेव च। पापण्डपतिाय न पतन्ति कदाचन। असभा मंपतंनी रक्शुदा भागवतादिषु ॥' भोम्यानय रसावस्याश्रात्यन्द प पलारस । अमेभ्य गन्दादाभिता मेभ्यगन्धेष योनिता। विविधा रहादिश्च कर्मेन्द्रियवशात्तथा। संक्षेपविस्तराभ्यां च व्याख्यानमिदमुच्यते ॥१३ ॥ स्थाप्यलोलुपा सहि स्त्यमुद्धति निगयते ॥१ ॥ काले मित्र तु मा जिला परियतिमात्यो । युयलीलपानामा सेट् गुति कोयते || मांना प तमाम विविध्याशानुमन्यो ।

द्विविधादेहशुद्धिवर्णनम्
परापवादं पारुष्यं विवादमनृतं तथा ।
अतिबन्धप्रलापं च निजपूजानुवर्णनम् ॥१६||
असह्य मर्मवचनं आक्षेपवचनं तथा।
असच्छाखानुपठनमसद्भिस्सह भाषणम् ॥२०॥
इत्यादि दुर्वचो हित्वा स्वाध्यायजपतत्पराः ।
मोक्षधर्मार्थपठने निरता प्रियवादिता ||२||
सत्यैः परहितैस्सात्जप्तैर्लक्षणसङ्गतैः ।
युक्ताक्षरैस्सुपूता वाड्मोनरत्नेन मुद्रिता ॥२२॥
केशकेटरनुसरणा नसरोमावकृन्तनम् ।
तृणमृच्छेदनं वृक्षगुल्मानो छेदनं तथा ॥२३||
स्त्रीवालवृद्धातुराणामन्येपा ताडनं
कधा।
परदारपरद्रव्यपरामर्श त्वकामतः ॥२४॥
अडल्यास्फोटनं लीला पाणितालादि हेलनम् ।
तर्जनं चैवमादीनि बहिष्कार्या शुभानि वै ॥२॥
अभ्यञ्जनादिव्यापारे युक्तः पित्रोणुरोस्वथा ।
धारकः पुण्यशीलानां प्रधाना रोगिणामपि ॥२६॥
अत्थिनामिष्टदानेन सर्वदादीकृताङ्गुलिः ।
मल्लिकाजावितुलसोवर्द्धनादवकुण्ठितः ॥२५॥
भगवन्मन्दिरे नित्यं मार्जनादिक्रियापरः।
अलकारादिकरणे कुशलच जगद्गुरोः Rell
भगवत्पादपूजायो घरन् चालवने तथा।
'प्रसपरशुभशास्त्राण संस्कारादिप्रियापरः ॥२६॥

शामियानः जपमहानुगमनागापारेण परितः। युक्नथा शुभरन्यस्मुद्रः पाणितलो मतः ॥३ भगवन्मदिरं यदान प्यानन्या महालान् । सयोंपकरणानां च सर्वेषा प्राणिना तया। स्पर्शनं यानं चापि सधान्या अपि दुष्क्रियाः ॥३२॥ विमृश्य भगवत्कर्म सिद्धार्थ गमने रतम् । तथा भागवतस्याथां सिद्धपयं च विशेषतः ॥३३॥ प्रदक्षिणक्रियासरतः तीर्थयात्रापरं तथा । दर्शनार्थ तथा नित्यं कर्मवानुभवाय च दिव्यायतनयाघायामभियुक्त मृदुक्रमम् । महाभागवतानां च करसंस्पर्शवर्जितम् ॥३॥ सद्भक्तानामनन्यानां पूजाधं दर्शनाय ॥३४॥ उचारं ब्रेसनं कुर्वन् कालएव च नान्यथा! गुप्तच सर्वदा शुद्ध पायुस्थानं विदुयुधाः ॥३७॥ काले निजस्त्रीसंसर्गरसयोगानुवृत्तिमान् । अन्यदानुद्वणं गुप्रमुपस्थं शुद्धमूत्रितम् ॥३८॥ शिरकण्ठाक्षिनासादिमलनिहरणेऽनया। धर्महानिर्न कर्तव्या कर्तव्यो धर्म समहः ।. धर्माधर्मों हि सर्वेपी सुखदःखोपपातको mail प्रतिप्रसारणं मोहान भूमिधा पठायनम् ॥३ ॥ सत्वरं चैवमादीनि कुर्वन् पादद्वयं शुभम् ॥३ ॥ शुद्धिदेहस्य सा सद्भिस्सर्वाङ्गीणेति कीत्यते ॥३ ॥

ज्ञानकर्मभ्यां हरिरेचोपात्यइतिवर्णनम् २७६७ इदमेव तु सच्छास्त्रमयं धर्मःसनातनः । अन्यानि सर्वशास्त्राणि मोहनानि क्रियास्तथा ॥४॥ भ्रमन्ति सर्वभूतानि न च गच्छन्ति सत्पथम् । तामसं राजसं चान्यमेतत्सात्त्विकमुच्यते ॥४२|| इदं हेयमिदं हेयमुपादेयमिदं परम् । एवमुक्त पुराणेषु वेदेपूपनिपत्स्वपि ॥४३॥ एवं साधुभिराचीर्णमेवमन्याप्यकारिभिः । साक्षावा परं धाम सर्वकारणमव्ययम् ॥४॥ देवकीपुत्र एवान्ये सर्वे तत्कार्यकारिणः । देवा मनुष्याः पशवः मृगपक्षिसरीसृपाः ॥४॥ सर्वमेतज्जगद्धातुर्वासुदेवस्य विस्तृतिः । प्रवृत्तश्च निवृत्तश्च स्वर्गदेर्मोक्षदैरपि ॥४६ आराध्यो भगवानेव वेदधमै स्सनातनैः । स एव सर्वथोपास्यो नान्ये संसारतारणाः ॥१७॥ उभाभ्यां ज्ञानकर्मभ्यां आराध्यो भगवान् प्रभुः। वज्ञानमेव विज्ञानं तत्कर्म परमं शुभम् ॥४८॥ उभावपि विभको तो न तु संप्राप्तिकारको । युकाभ्यां भगवत्प्राप्तिः संसारफलमन्यथा ill वच्छास्त्रमेव सच्छात्रं तदीया एव पण्डिताः। शोच्या हि भगवत्पादपरिचर्याविधि विना l कृवकृत्यधियो मूढाः अहो इतमिदं जगत् । इत्यादिसात्त्विकज्ञाननिश्चयेन दृढीकृन्ताः ॥५||

॥१२॥
૨૯૮
शाण्डित्यस्मृतिः
अभेगा परमा बुद्धिाशुदेवि परिकीरते ।
परवारपरद्रव्यपरहिसानुचिन्तनम
वैरानुयन्यन पेपमठभ्यस्थानुचिन्तनम् ।
सुदूरं यदुधायातं भोक्तव्यमितिचिन्तनम् ॥१३॥
असत्कथानुसरणमसत्कार्यनिरूपणम् ।
इत्यादिदोपरूपाणि हित्वा कर्मणि निश्चलम् ॥१४॥
भगवत्कर्मसिद्धार्थ व्यापृतं भगवत्परम् ।
अविपण्णमनायस्तमहङ्कारविवर्जितम् ॥५॥
असद्विपयसक्तानामिन्द्रियाणामहनिशम् ।
दमकं सर्वयत्नेन बाह्यारंभं विनिस्पृहम् ॥६॥
सर्वदा भगवद्ध्यानं संसर्गविगतज्वरम् ।
भगवद्भक्तसद्वाक्यगङ्गाजलपवित्रितम् ॥७॥
सदर्थग्राहक सूक्ष्मज्ञानरूपविचारकम् ।
समर्थमप्रधृष्यं च धृष्ट तुष्टमसति च ॥८॥
एवमादिगुणोपेतं निर्मलं मन इष्यते ।
इन्द्रियाणां सदेहानां बुद्धश्चमनसस्तथा ॥६॥
आख्याता शुद्धिरेपाऽत्र द्रव्याणामधुनोच्यते ।
इच्छया देवदेवस्य प्रकृतिस्त्रिगुणात्मिका ६०॥
जगत्करणभूतान्ता विद्यत्याहुर्मनीपिणः।
वद्विकारं जगत्सर्व सदेवासुरमानुपम् ॥६९॥.
वस्याः स्वरूपं सत्त्वं तत् तद्दोपावितरौ गुणो।
अतएव विकारोऽयमभवत् त्रिगुणात्मकः ॥६॥

सालिकराजसतामसगुणानां वर्णनम् २७६६
मायाः पञ्चभूतानि जायन्ते प्रकृतेः किल ।
भूतान्यधिष्ठाय वर्ज(न)येच्छास्त्रवर्मना ॥३॥
सं तामसं चैव तज्ज्ञेयं पण्डितैर्वरः।
रजस्तमोध्वस्तं वैष्णवैः कर्मवमनि ॥४॥
जयति यो मोहात् तस्य साऽपि फलक्रियाः ।
में तदश्नीयात् निपिद्धो मुग्धचेतनः ॥६॥
जानन हृदयान्तःस्थं भोक्तारं न स सात्त्विकः ।
शं द्रव्यमभाति तामसं सात्त्विकं तु वा ॥६६॥
शं रूपमामोति ततः क्षमेति (भवे) तथा ।
उद्धं भोज्यमुद्दिष्ट अचोप्यैव कर्म सः ॥६७||
भाति स्वयं मोहात् साक्षात्स्तेनः स पापकृत् ।
पेद्धवस्तुतद्रौद्र रक्षाप्रेतादिसम्मतम् ॥६॥
शाद्रव्यविशुद्ध यत् सात्त्विकं सद्गुणोज्ज्वलम् ।
पेद्धवलादेव चईते सात्विकं परम ॥६॥
स्विकस्य विशुद्धय व वानं भवति निर्मलम् ।
वष्टिं समीक्ष्यैव शुद्धानां द्रव्यसम्पदम् all
स्तु सहमहे सद्भिः द्रव्यशुद्धिरपीप्यते ।
यामि देशशुद्धिं च संक्षेपेण यधागमम् ॥७॥
सत्रा(ता)मुपकाराय भवेत्सद्गतिकाक्षिणाम् ।
छपापण्डरहिवभार्मिकेश्वरपाठितम् ॥७२||
मिस्सेवितं शश्वद् व्यामसिंहादि पार्जितम् ।
इन्तदस्युरहितं सारंगशिखिसेवितम् ॥३॥

૨૮ शाण्डिल्यस्मृतिः अभेषा परमा बुद्धिमुदति परिकोयते । परवारपरद्रव्यपरहिसानुचिन्तनम वैरानुबन्धन पर्षमलभ्यत्यानुचिन्तनम् । सुदूरं बहुधायातं भोक्तव्यमिविचिन्तनम् ॥३॥ असत्कथानुसरणमसत्कार्यनिरूपणम् । इत्यादिदोपपाणि हित्वा कर्मणि निश्चलम् ॥१४॥ भगवत्कर्मसिद्धयर्थ व्यापृतं भगवत्परम् । अविषण्णमनायस्तमहङ्कारविवर्जितम् ॥१५॥ असद्विपयसतानामिन्द्रियाणामहनिशम् । मन इष्यते। सर्वदा भगवद्ध्यानं संसर्गविगतज्वरम् । भगवद्भक्तसद्वाक्यगङ्गाजलपवित्रितम् ॥७॥ सदर्थप्राङ्क सूक्ष्मज्ञानरूपविचारकम् । समर्थमप्रधृष्यं च धृष्ट तुष्टमसङ्गि च ॥५॥ एवमादिगुणोपेतं निर्मलं मन इन्द्रियाणां सदेहानां बुद्धश्चमनसस्तथा ॥१६॥ आख्याता शुद्धिरेपाऽत्र द्रव्याणामधुनोच्यते । इच्छया देवदेवस्य प्रकृतिस्त्रिगुणात्मिका ६० जगत्करणभूवान्ता विद्यत्याहुर्मनीषिणः । तद्विकारं जगत्सर्व सदेवासुरमानुपम ॥६॥ तस्याः स्वरूपं सत्त्वं तत् तदोपाविवरौ गुणो। अवएव' विकारोऽयमभवन् त्रिगुणात्मकः ॥६|| दुमकं सर्वयत्नेन वाह्यारंभ विनिस्पृहम् ॥६ ॥

सात्विकराजसताममगुणानां वर्णनम २५ विधायाः पञ्चभूतानि जायन्ते प्रकृतेः किल। पञ्चभूतान्यधिष्ठाय वजन येन्छास्त्रवर्मना ॥६॥ राजसं तामसं चैव तज्ज्ञेयं पण्डितैर्वरः। द्रव्यं रजस्तमोध्यन्नं वैष्णवै कर्मवर्मनि ॥६॥ संयोजयति यो मोहान तम्य माऽपि फन्टक्रियाः। स्वयं तदश्नीयान निषिद्धा मुग्धचेतनः ॥६॥ अजानन् हृदयान्तःस्थं भोक्तारं न स सात्त्विकः। यादृशं द्रव्यमभाति तामसं साविकं तु वा ॥६६॥ दार्श रूपमानोति ततः क्षमेति (भवे) तथा। भोज्यमुद्दिष्ट अचोप्येव कर्म सः ॥६॥ यानाति स्वयं मोहान साक्षात्स्तेनः स पापन् । निपिद्धवस्तुतद्रौद्र रक्षाप्रेतादिसम्मतम १६८१ साक्षाद्व्यविशुद्ध यन सात्त्विकं सद्गुणोग्यलम् । निपिद्धपर्जनादेव बर्द्ध ते सात्त्विकं परम ॥u सात्विकस्य विशुद्धय व ज्ञानं भवति निम्। शास्त्रदृष्टि समीक्ष्यैव शुद्धानां विशुद्ध २०६८ शाण्डिल्यस्मृतिः अभेगा परमा युदिरशुद्धति परिकीत्यते । परदारपरद्रव्यपरहिंसानुचिन्तनम वैरानुबन्धन पेमलभ्यत्यानुचिन्तनम् । सुदूरं बहुधायातं भोक्तव्यमितिचिन्तनम् ॥३॥ असत्कथानुसरणमसत्कार्यनिरूपणम् । इत्यादिदोपरूपाणि हित्वा कर्मणि निश्चलम् ||१४|| भगवत्कर्मसिद्धपथं व्यापृतं भगवत्परम् । अविषण्णमनायस्तमद्दवारविवर्जितम् ॥१६॥ असद्विपयसतानामिन्द्रियाणामहनिशम् । सर्वदा भगवद्ध्यानं संसर्गविगतज्वरम् । भगवद्भक्तसद्वाक्यगङ्गाजलपवित्रितम् ॥७॥ सदर्थप्राहक सूक्ष्मज्ञानरूपविचारकम् । समर्थमप्रधृष्यं च धृष्ट तुष्टमसङ्गि च ॥८॥ एवमादिगुणोपेतं निर्मलं मन इष्यते । इन्द्रियाणां सदेहाना बुद्धश्चमनसस्तथा ॥६॥ आख्याता शुद्धिरेपाऽत्र द्रव्याणामधुनोच्यते । इच्छया देवदेवस्य प्रकृतिस्त्रिगुणात्मिका ll अगत्करणभूतान्ता विद्य त्याहुमनीपिणः । तद्विकारं जगत्सवं सदेवासुरमानुपम् ॥६१ तस्याः स्यरूपं सत्त्वं तत् तद्दोपावितरी गुणो । अवएव विकारोऽयमभवत् त्रिगुणात्मकः ॥६२ दमकं सर्वयत्नेन वाह्यारंभ विनिस्पृहम् l भगवत्पूजन विधिवर्णनम् २८०१ पूर्वमन्त्राक्षरं मन्यन्तु लयरूपसमाप्ति च । रसाधु त्स्टविषये भोगमोक्षमहासुखम् ॥८॥ एवमादिगुणोपेतं भतिज्ञानोज्वलं कृतम् । इष्टमन्त्रेण द्रव्यं च परमं कर्म मङ्गलम् ।।८।। देहेन्द्रियान्तःकरणबुद्धिभूम्यर्थसिद्धिकृत् । अबोतलक्षणोपेतकर्मभारामतः परम् ।।८।। सप्तसंगुद्धिसंयुक्ता परिपूर्णा भवेकिया। सप्ते विमला भावा श्रद्धावान् प्रारभरिक्रयाम् ॥८॥ आधानादतिशुधा मा संस्कारैः पञ्चकालिनाम् । कुर्याद् ब्राह्मण एवैतत् विद्यो वा विशुद्धधीः ।।८।। प्रद्धावान् भगवद्धर्म रागादिरहितेन्द्रियः। ब्राह्मणः पूजयेन्नित्यं पञ्चकालपरायणान् ॥६all वरगोभूमिदानेन धनधान्यादिभिस्तथा । तोपयेत्परया भक्त्त्या नित्यं भागवतान्नरान् ।।६१|| सिद्धिर्भवति वा नेति संशयोऽच्युतसेविनाम् । न संशयोऽत्र तद्भक्तपरिचर्यारतात्मनाम् ॥२॥ केवलं भगवत्पादसेवया विमलं मनः । नरायते यथा नित्यं सद्भकचरणार्चनात् ॥६शा विशिष्टकुलसंजातसंस्कारस्संस्कृतो निजः। त्वदितो यदि सिद्धिर्म चरेत्कृच्छ्राणि दान्तधीः ॥४॥ तपश्चर्तुमशक्तश्चेद् धनवान्दानमाचरेत् । उभयोरप्यशक्तरसन् नामसंकीर्तनं चरेत् १६AI २८०० शाण्डिल्यस्मृतिः मोअभूमिरितिरूयातमा साधुसम्मन्न । दिव्यागा देवपातयाप्यादिविमलोदकम् ॥१३311 प्रभूनकदलीपूतनालिरादिमण्डितम् । सुसमृद्धसमिलाप्ठसम्पनामुमोदकम् ॥६॥ आसन्नधोजलं लपलाशतुलसीकुशम् । गोसहनसमाकीणं सपुष्मं सोत्पलाम्युजम् ॥२६॥ विविक्तदेशभूभागे दृष्टदोपविवर्तिते ॥ प्रासादं पर्णशाला या कृत्वा निजयलान्वितम् । अविस्मृतमनिर्वाधं परितोऽपि मनोहरम् all तत्राप्युच्छिष्टमूत्रामृक् केशकीटादिवर्जिवम् । करीपमृजलालिप्ते काष्ठताम्रण चेतसः ||Ell संप्रीतिजनके स्थित्वा भूतले भगवत्क्रिया । कर्तव्यमिति यत्नेन या शुद्धिर्भू विगोचरा ॥८० देहाशुद्धिरितिख्याता सेयं सच्छात्रवर्मनि । अनार्यजनसंरोधवीक्षणादितिवर्जितम् ॥८॥ श्रद्धातिरेकसंयुक्त दम्भलोभविवर्जितम् । आत्माथं त्यक्तसंसिद्धि रूपालोकन तत्परम् ।।८२|| अचञ्चला विपण्णान्तः करणायत्प्रीति संयुतम् । संकल्पपूर्वकं ध्येयं पदाजन्यास योगि च ॥८३।। द्रव्यमन्त्रे च मन्त्रेषु समाहितमहामति । गुमसंसाररहितं शुद्धमौनमवितधम् | पवमादिगुणोपेतं भूतलं यदि लभ्यते ।

पराविद्याप्राप्त्यर्थमधिकारिगुरुशिष्यवर्णनम् २८०३
एवमादिगुणोपेतमाचार्य वरयेद्विजः ।
आचार्यचित्तानुगुणं सिद्धान्तानुगुणा प्रिया ॥१०॥
अन्यत्र शृणुयाज्ज्ञ यमनुज्ञाप्येव जीवति ।।
यस्मिन् परमविद्यायानघं सिद्धिरवोधतः ।।१०।।
गुरोर्वाऽप्यन्यतो ग्राह्या परा विद्या गुणान्वितान् ।
परिशुद्ध कुलोद्भूतं विशुद्धाचारतत्परम् ।।१०।।
विरतं च महापापात् पितृदारादिपालकम् ।
द्वान्नं शान्तं मृदु सौम्यं प्रणतं भगवत्परम् ॥२१०)
सन्तप्तहृदयं भक्त्या शक्त्या सर्वार्थसाधकम् ।
विप्रवाक्यं महाबुद्धिं सत्यं कुशलपाणिकम् ११शा
एवमादिगुणोपेतं शिष्यभावेन संगतम् ।
मंवत्सरं तदद्ध वा मासत्रयमथापिया ॥११२।।
परीक्ष्य विविधोपायः कृपया निःस्पृहो भवेत् ।
प्रक्षाविद्याप्रदानस्य देवेरपि न शक्यते ॥११३।।
तिप्रदानमपि वा दद्यात् शक्तित आदरात् ।
प्रमाद्यद् गुरोशिप्यो वाङ्मनःकायकर्मभिः ॥११४।।
पपि भक्ष्यात्मनाचार्य वतास्मिन्यथोच्यते।
कोशकं दुष्टभावं पिगुनं सत्त्वरक्रियम् ॥११॥
सधैकसाधकं लुब्धमलसं सर्वकर्मसु ।
चारपरिवादाय बहुभाषितमुद्धतम् ।।११६॥
रावमानिनं सर्वश्रेष्ठ वा परिवर्जयेत्।
* पापरनैः शरैः सदागमपराइ मुसैः॥११॥

२८०२
शाण्डिल्यस्मृतिः
यथाशक्ति तपः कृत्वा दत्त्वा चव यथावलम् ।
वथाऽहमास्थि(तो)ध्यात्वा जपेत्सर्यापशान्तये ।।६।-
उपवासात्तथादानात् सद्भक्तानां च सेवनान् ।
सङ्कीर्तनानपात्तापाच्छ्रद्धया शुद्धिमृच्छति ll
उपासीत निरस्तोऽपि पञ्चकालपरायणान् ।
यदीच्छेद्भगवद्धर्म सेवया भवशान्तये ncil
पूर्वोक्ताचारसम्पन्नं युवानं गृहमेधिनम् ।
उत्तमैद्धसख्यं च भवसेवाविवर्जितम् II
प्रख्यातशुद्धचरितं सद्ब्रह्म कपरायणम् ।
भगवद्धर्मसंयुक्तमर्थसेन्देहनोदकम् ॥१००ll
प्रतिपादनसामर्थ्य युक्तवत्पुत्रपातिकम् ।
आरं भक्तिविवशं वशीकृतजगम्बनम् ॥१०॥
हावाक्यं कृतज्ञप दयाद्रीकृतमानसम् ।
अशूशिष्याशूद्राणां सानदानेप्यनाहतम् ॥१०२।।
अकोपनमनुरिसत्तमतिषणं विपस्वपि ।
भगवद्भक्तियुक्त मारोग मुप्रियम् ॥१०॥
मानामुपकाराय व्यातं क्लेशयजितम् ।
जाभन्यून्तिनानन्तरता विषयमान्द्रियम् ।
मोम्यरंगप्रशान्य पापरोगविजिनम् ।
अदुवामास्येयं रहनातिमानिनम् ॥१०॥
शिध्याना मापहारक प्रतिधापनगि।
सान्ति पोटिक भानं गुस्मुथपणे रतम ॥१६॥

प्रात.कृत्यवर्णनम्
२८८
मुनिरुवाच ।
सहाभिगमनेनैव प्रातःकालानुयायिना ।
वक्ष्यामि योगादूर्ध्व यत् कर्तव्यं स्नानपूर्वकम् ।। २ ।।
उच्चस्स्वरेण योगान्ते स्तुत्वा स्तोत्रैरनन्यधीः ।
वासुदेवादिदिव्याना नाम्नां संकीर्शनं चरेत् ॥३॥
प्रादुर्भावगुणं चापि संस्मरेतत्सर्वसिद्धये ।
कीर्तयेत्तद्गुणान्भया परमागुतवेष्टितान् ॥४॥
अतन्द्रितस्य स्वाध्याये योगे युक्तात्मनस्सदा ।
सद्भस्या खिन्नदेहस्स्यावश्यं नाम(नुकीर्तनम् ।।५।।
आदाय वस्त्रदण्डादि गृहीत्वा च कमण्डलुम् ।
प्रवृत्तच्छन्नमूर्दा च कर्मारंभपरो व्रजेत् ॥६॥
प्रामाद्बहिर्विनिर्गत्य विसृजेत्सहचारिणः ।
अपरिप्रदेशेषु कुर्यान्मलविसर्जनम् ॥ ७॥
मेहने मैथुने स्नाने भोजने दन्तधावने ।
इज्यया सह होमे च जपेन्मौनं समाचरेत् ।।८।।
स्वदक्षिणध्रुतिन्यस्य ब्रह्मसूत्रस्समाहितः ।
न श्मशाने न कृष्टेषु न मार्गे न च भस्मनि ॥ ६॥
नोपरे न च सस्येषु न गुल्मेष न च सैकने ।
न वृक्षमूले नामेध्ये न कीटेषु न चत्वरे ॥१०॥
नोदकान्तेन गोवासे न हृद्य न गृहागणे ।
न देवालयपाप न नद्या नाप्यसन्निधौ ॥१॥

२८०४ शाण्डिल्यस्मृतिः संबन्ध नाचरेद्रक्ति नश्यते तैस्तु सङ्गमे । भगवत्कथानिररस्तावपूजाजपादिभिः॥११॥ अग्रतपाइकस्त्यक्तविवादालाभवजितः । सुशीलेस्नानशीलच बाह्यान्तस्तुल्यवेष्टितः ।।११६।। हृद्यविशुद्धान्त र्भगवद्गुणमेलनः । सत्यवाग्भिर्दयासारै रसदा संग वसेवुधः ।।१२०॥ ब्रह्मचारी गृहस्सश्च वानप्रस्थो यतिस्तथा । कृपया श्रमिणस्सर्वे धर्म ब युस्स्वराङ्गने ।।१२।। गृहस्थो वाऽपि सर्वेभ्यो धर्म ब्यान्महामतिः। परिबाडपि वा व्रयात् सर्वश्रेष्ठो गृहाश्रमी ॥१२॥ । प्रथमोऽध्यायः॥१॥ अथ द्वितीयोऽध्यायः अथ प्रातःकृत्यवर्णनम् भृपय ऊचुः। स्नानं प्रधानं भक्तानां सम्यक् शुद्ध्युपपादकम् । श्रोतुकामा विधि तस्य सदाभिगमनेन च ॥१॥ इति श्री शाण्डिल्य धर्मशास्त्रे भगवत्पूजाविधिवर्णनं नाव

प्रात.त्यवर्णनम
२८८
मुनिमवाच ।
सहाभिगमनेनैव प्रातःकालानुयायिना ।
वक्ष्यामि योगादूर्व यन् यतव्यं स्नानपूर्वकम् ।। २॥
अचस्वरेण योगान्ते स्तुत्या स्तोत्रैरनन्यधीः ।
वासुदेवादिदिव्यानां नाम्नां संकीर्तनं चरेन ॥३॥
प्रादुर्भावगुणं चापि संस्मरेतत्सर्वसिद्धये ।
कीर्तयेतद्गुणान्मत्तमा परमातवेष्टितान् ॥ ४॥
अवन्द्रिवत्य स्वाध्याये योगे युक्तात्मनस्सदा ।
सदात्या खिन्नदेहस्त्यावश्यं नाम(न)कीर्तनम् ॥३॥
आदाय वरदण्डादि गृहीत्वा च कमण्डलुम् ।
प्रवृत्चच्छन्नमूा च कमारंभपरो प्रजेत् ।। ६॥
प्रामाद्वहिविनिर्गत्य विसृजेत्सहचारिणः ।
अपरिग्रहदेशेषु कुर्यान्मलविसर्जनम् ॥ ७॥
मेहने मैथुने स्नाने भोजने दन्तधावने ।
इन्यया सह होमे च जपेन्मानं समाचरेत् ॥ ८॥
स्वदक्षिणध्रुतिन्याय ब्रह्मसूत्रस्समाहितः ।
न श्मशाने न कृष्टेषु न मार्गे न च भस्मनि ॥ ६ ॥
नोपरे न च सस्येषु न गुल्मेषु न च सैकने ।
न वृक्षमूले नामध्ये न कीटेषु न चत्वरे ॥१०||
नोदकान्ते न गोवासे न हृद्य न गृहाङ्गणे ।
न देवालयपार्श्वेषु न नद्या नाप्यसन्निधौ ॥११॥

२८०६
शाण्डिल्यस्मृतिः
न वल्मीके न रन्ध्र पुन करीपे न चोपलें।
न देवतारिशिष्यामिगुरुद्धाङ्गनामुखः ।।१२।।
नगो गगनदिक्तारागृहामध्यावलोककः ।
न जल्पन्नस्पृशन्मौनी नचानावृतमस्तकः॥१३॥
चिरन्नोपविशन्नाति पीडयन्ना वैशसम् ।
एकाको मुक्तपवृक्षो यतसर्वेन्द्रियक्रियः ॥१४॥
मेहनादि क्रियां कुर्यान्नवाच्छादितनासिकः ।
उदङ्मुखो दिवानक्त' दक्षिणामुखसंस्थितः ॥१५॥
दिवेव सन्ध्ययोः कुर्यान्मेहनाद्य विचक्षणः ।
वल्मीककृष्णभूतोयकोटाशुद्धादियोगिनम् ॥१६॥
वर्जयित्वा मृदाशीचं कुर्यादुद्धृतवारिणा ।
पञ्चधा लिङ्गशौचं स्यात् गुदशीचं त्रिवेष्टितम् ॥१७॥
मनःप्रसादनं कुर्यात् शक्तं मूत्रविलोपनम् ।
पादयोलिङ्गवच्छौचं हस्तयोस्तु चतुर्गुणम् ॥१८॥
दन्तान्तुशोधयेत्प्रातः पलाशवटपिप्पलान् ।
विहाय स्वशुभैराम्रपूर्व विधिवदत्वरः ॥१६॥
उत्पादयन्नरक्तं च न पश्यन्सर्वतो दिशम् ।
समुद्रगापगादेवखातवापोहदाश्रये IRoll
स्नायाजलेन देवानां संसर्गपरिवर्जिते ।
सरसे सेविते सदिष्टिदोपविवर्जिते ॥२१॥
विशुद्धतीरभूभागे स्नायालघुनि वारिणि ।
अम्बु न क्षोभयेदङ्गः पार्दनोत्सादयेन्न च ॥२३॥

प्रातःकृत्यवर्णनम २८०० नावरेदयनकोडा न गादूपं जले क्षिपेत् । अन्योन्यं नोक्षिपेतोयं न देहमलमुत्सृजेत् ॥२३॥ न कुत्सवेदम्युतीर्थमन्यत्तत्र न कीर्तयेत् । शोधयित्वा धृताम्भोभिदेहं तीरे पुनर्जलैः ।।२।। प्रक्षाल्य भूमि कर्मार्थमवतारं च शोधयेत् । न स्नायात्सहसूदेण न स्रोभिर्नच नास्तिकः ।।२।। न पापण्टेनवालेश्च न रोगाशौचिभिर्नरैः। चण्डालं शास्त्रपति शास्त्रनिन्दापरायणम् ।।२६।। परित्रस्तं च नष्टं च दूरतः परिवर्जयेत् । शरीरं निर्मलीकृत्य कर्मारम्भपुरस्सरम् ॥२॥ शुद्धावगाहनं कृत्वा समाचामेद्यथाविधि । जान्योरन्तः करौ कृत्वा प्राङ्मुखो वाऽप्युदङ्मुखः ।।२८।। पाणि च संस्पृशन्नद्भिः प्रकृतिस्थाभिरेव च । आदाय विमलं तोयं ब्रह्मतीर्थन वाग्यतः ॥२६॥ हृद्गतं तु चतुःप्राश्य न शब्दमवतारयन् । वकालमार्जनं कृत्वा पाणिपादायवेक्ष्य च ॥३०॥ अङ्गुष्ठानामिकाभ्यां तु चक्षुषो संस्पृशेततः । वजन्यङ्गुष्ठयोगेन श्रौत्रे चैव समालभेत् ॥३१|| सांभिरड्गुलीभिश्च बाहुमूले उपस्पृशेत् । हृदयं च मूर्तीि जलं स्पृष्ट्वान्तरान्तरा ||३२|| न सिष्टन्नैकहस्तेन न शूद्रावर्जितेन च । मुद्धां मृदं समादाय जप्वा मन्त्रचतुष्टयम् ।।३३।।

२८०८ शाण्डित्यस्मृतिः चतुर्धा विभजेत्ता तु वामपाणितलोदरे। चतुर्मन्त्रः परामृश्य मुखबाहुकलेवरान् ॥३४॥ पदौ यथाक्रम लिंपत् चतुर्मन्त्रेण मन्त्रविन् । तत्रस्थं भावयेवं समय गराशिभिः ॥३॥ आसनाद्य यथाशक्ति समभ्यर्च्य जगद्गुरुम् । ध्यात्वा गङ्गा हरेः पादापतमानां स्वमूनि ॥३६॥ पवित्राद्यन्तकाभिज्ञाः मन्त्ररिसञ्चत्कराकरान् । ध्यायन्देवं परं ब्रह्म यथाशक्ति निमज्य च ॥३॥ चतुर्निमज्य विधिवद् आचम्यादाय वाससा। खण्डद्वयं शिरश्चाङ्ग प्रत्येक परिमईयेत् ॥३८॥ अन्तरान्छाद्य कौपीनं वाससी परिधाय च | ध्यानमौनपरो मन्त्री सम्यगाचमनं चरेत् ।।३।। भोजनाद्यतयोमूत्रशौचान्तेयज्ञकर्मणि । द्विह्निराचमनं कार्य वाससा परिवर्तते ॥४il पुण्यक्षेत्रे समुद्भूता मृदमादाय वैष्णवीम् । प्रणवाद्य व (श्च) मूलेन कारम्भं पुनर्जपेत् ॥४६॥ आहृत्याम्बु पवित्रेण कृत्वा सव्यकरोदरे। कारम्भेण मन्त्रोण मृदमालोडयेद्वशी ॥४॥ ब्रह्मणा तत्समीकृत्य ध्यायेद्दवं सनातनम् । प्रदेशिन्या समादाय किञ्चिच्छिरसि धारयेत् ॥४३॥ ललाटबाहुहृदयेप्याजवेन प्रदोपवत् । योद्ध्वपुण्ड नाम्नां च चतुर्नान्या समाचरेत् ।।

P
प्रातःकृत्यवर्णनम्
२८०६
पाठयेद्वादशनाम्ना तसस्थानेषु यो द्विजः ।
भवेत्स्नानफलं तस्य मृदा तत्र दिने दिने ॥४॥
तत आचम्य विधिवदभिज्ञाभिश्च तर्पयेत् ।
नमोऽन्तः प्रणवाद्यश्च पितृणां केवलं स्वकैः ॥४६॥
चतुर्मण संप्रोक्ष्य पीत्वा तेनाभिमन्त्रितम् ।
जलमाचम्य मूलेन दद्यादयं परात्मने ॥४॥
मर्त्य सान्तपि वा स्नायादापा दूधृत्य तन्मृदम् ।
ध्यात्वा क्षीरी नवं तच नित्य शिष्टनिविते ॥४८॥
कूप तोयैरपि स्नायात् सर्वाला समुद्धृतैः ।
स्नानन्तु न पटैः कार्य नासाच्छिद्रविवर्जितैः ॥४६॥
आरनालं न सेवेत कदाचिद्भगवत्पर. ।
सुराकल्पं हि तज्ज्ञयं तस्माद्यत्नेन वर्जयेत् ॥१८॥
सप्तमीदशमी(चैव)त्रयोदश्यष्टमीषु च ।
द्वितीयायो नवभ्यां च स्नायान्नामलकोदकः ।।५।।
पाहादिसेविते रुक्षे नीचावाससमीपगे।
श्मशानपावके ज्ञाते न स्नायान्नोपरोधतः ॥५२॥
न भुक्त्या नातुरो जीर्णो नान्यकामीन कामतः
न निशाया तथैकाकी न चिरं खोयमध्यतः ॥५३॥
अज्ञानाचरिते पापे दृष्ट्वा च शवसूत्रके।
वमने च व्यवाये च दुःस्वप्ने स्नानमाचरेत् ॥५४॥
मुक्ता श्रूशोकाकू त्या च न्यस्ता पाञ्चकालिकम् ।
स्पृष्ट्वा विकारं धर्मस्थं स्नायाद्रोगिणमेव च ॥५॥

२८१० शाण्डित्यस्मनिः उराममंगवाक्यं वाराने गुरौ। विवादं प जपरनाननमस्कारैः पुनारशुचिः ॥१६॥ शिरो वियम्यं न स्नायान्निमम्जेतामुना सह । नम्नानशाटी पाणिभ्याम्मध्येदपि या शिरः ॥११ न कुर्यादाई वस्त्रंण कर्म भागवतं बुधः। न दक्षिणामुसो शुद्धः पैशाचं तदुदाहृतम् ।।८।। प्रक्षाल्याजानुचरणो मृज्जले परावधि । हस्तौ विमृज्य यदनं विद्वानाचमनं चरेत् ।।६।। पादोदरं च भक्ष्यांश्च संभक्ष्याचमनं चरेत् ।।६०। स्नात्वा संप्रोक्ष्य पतितांश्चण्डालाद्यांश्च गहितान् । पापण्डिनश्च स्वाचान्तः पवित्रं ध्यानवान् जपेत् ॥६ पूजायां स्नानकाले च भोजने जपकर्मणि । अवैष्णवाना जन्तूनां दर्शनाद्य विवर्जयेत् ।।६।। नित्यं तीर्थोदकस्नायी तर्पयंस्तत्र तजलैः। श्रद्धया भगवन्मन्त्रैः सिद्धस्स्यादचिराद्विजः।।३।। कारम्भेण मन्त्रेण सर्व कर्म समारभेत् । पवित्रीकरणञ्चापि पवित्रेणैव सर्वतः ॥६४॥ अभिगच्छेच्च देवेशं सुस्नातस्सोर्ध्वपुण्डकः । सुप्रक्षालितपादश्च स्वाचान्तस्संयतेन्द्रियः ।।६।। सन्ध्ययोरुभयोनिय' यावदर्शदर्शनम् । ध्यायेद् ब्रह्म जपेन्मोनी तन्त्राभिगमनक्रियाः ॥६६॥ सुप्या क्षिप्त्वा च निष्ठीव्य स्पृष्ट्वा नासापुटादिकम् ।

प्रातःकृत्यवर्णनम् नकवस्त्रो न खिन्नश्च न क्रुद्धो मलिनोऽपि वा। नाक्षालिताधिर्नाभ्यको नातुरो न वदन्बहु ।।६।। न रक्तकृष्णमलिनं वासोऽपि परिधाय च | न च शून्यकच्छश्शास्त्री न यायाद्भगवद्गृहम् ॥६॥ प्रणम्य दण्डवद्भूमौ उत्थायोत्थाय तन्मनाः । स्वाध्यायवदनः कुर्याद् अष्टाङ्गने नमस्क्रियाम् ।।६।। नमस्कुर्वन् प्रतिदिशं वाग्यतो ध्यानतत्परः । असमक्तकरैः कैश्चिन्मन्दं कुर्यात्प्रदक्षिणम् ॥७॥ द्विचतुप्पड़ दशाष्टाद्यः कुर्यादेव प्रदक्षिणम् । देवस्य निकटे कार्य सम्यग्जानुप्रदक्षिणम् ॥७१।। चक्रवर्द्रमयेन्ना पृष्ठभागं न दर्शयेत् । सन्निधौ देवदेवस्य नचोच्चैः प्रलपेत्तथा ॥७२॥ निधाय दण्डव हे प्रसार्य चरणी करौ। यद्ध्वा मुकुलवत्पाणिं प्रणामो दण्डसंहितः ॥७३॥ पादौ शिरस्तथा हस्तौ निकुडच्य मुकुलाकृतिः । मनोबुद्धधभिमानश्च प्रणामोऽशाइसंज्ञितः ।।४।। मस्तकं संपुटं वैव प्रदादं च त्रयं बुधैः । कृतयोरन्ययोः कार्यमन्यथा विकलो भवेत् ||३|| सर्वत्र दृष्ट्वा देवेश जितं त इति मन्त्रकम् । द्वादशाणं जपेन्मन्वं भोतवत्पूर्वमानतः ॥ मत्कृतानि च कर्माणि मदीयमहमप्युत । तथैव नममेवीष्टं नमो भगवतेरिह !Holi २८१२ शाण्डिल्यस्मृतिः प्रदक्षिणानमस्कारं जपध्यानार्जनास्तुतिम् । मत्कर्मतद्गुणोद्घोपैविना नाचान्यदाचरेत् ।।७८t पादप्रक्षालनं व्याविष्टरं चावकुण्ठनम् । न कुर्याद् भगवद् गेहे भासं कण्ठध्वनि उथा En भोजनं स्वापमुद्बोपं ताम्बूलं केशशोधनम् । छत्राद्य च तथान्यांश्च न कुर्यान्नुल्बणक्रियाः १०॥ प्रदक्षिणे प्रणामे च पूजायां हसने तथा । न कण्ठगतवस्त्रस्यात् दर्शने गुरुदेवयोः ॥१॥ भगवन्मन्दिरे वृद्धान् पूज्यानपि विशेषतः । विना भागवतश्रेष्ठ प्रणामाचार्चयेत् ॥२॥ गुरोग हे देवगृहे पु(प्पण्यवाट्या गवो कुले । कृपणं पोल्यणं कर्म वर्जयेदपि संसदि ।।८।। जप्वाभिगमनं मला वर्जयित्वा यथाविधि। आसनाध्यादिभिभोगर्भया परमपावनैः ||cal अभिगम्य जगन्नाथं ध्यायन्नेव सनातनम् । जपेयथायलं प्रातः सहनशनसरपया ||२|| यनिष्ठादि ममारभ्य दर्शपर्यभरात्परः। पाक्षसफाटियांऽपि उपदुक्तादिभिस्तदा ।।६।। आचार्य देवनाथ भगवन्मन्दिरं जलम। अप्रिम प मामं च मय जपन्न प 10 सटामोटिपन्न पायन: पुस्पोममम् । अपन : पातायागु नश्यन्ति गमला : रिया : Mal

प्रातःकृत्यवर्णनम्
भिमुख्यं अपादीनां प्रशस्तं सर्वकमणि ।
मुखः प्राङ्मुखो वा कुर्याद्भागवतः क्रियाम् १८६||
श्रीश्च जुहुयात्यातः मेयेरेव समिद्गणैः ।
पिकं च जुहुयान्नित्यं वा पापशान्तये ॥६i
मुहूर्तात्त वै ब्राह्मादमृतं प्रहरात्सुधीः ।
मानार्चन जपस्तोत्रपाठः कालं विनोदयात् ॥AI
ति श्री शाण्डिल्यधर्मशास्त्रो प्रात.कूत्यवर्णने नाम
द्वितीयोऽध्यायः ।
अथ तृतीयोऽध्यायः
उपादानविधिवर्णनम्
ऋषय ऊचुः।
पादानविधि सम्यक श्रोतुमिच्छामहे वयम् ।
ग्यायोग्यविभागेन भगवत्कर्मसिद्धये ॥१॥
मुनिरुवाच।
पादानविधि वक्ष्ये योग्यायोग्यविभागराः ।
देवीयकालकर्तव्यं कर्म यन्मुनिपुङ्गवाः ॥२॥

२८१४ शाविल्यामतिः पश्यामि यस्समासेन कथम शानो शुदिमुन्छति। कमण्यमेयोपादाय वयित्या तयंवरत ॥३॥ क्रियमाणानि फागि सफलानि भवन्ति हि। स्वकीयारामजातानि यन्यान्यन्यानियादरान्॥४॥ पुष्पपत्रोदकादीनि प्रातरय समाहरेत् । मन्येण वा हरेत्सर्वमपक्वं योगसाधनम् ॥ ५॥ फलपुष्पाम्युकाष्ठाय विकोणीयं न किञ्चन । विक्रीणान्ब्राह्मणो द्रव्यं कोणान्यामृद्धिकाक्षया ॥ ६॥ खिन्नत्तिर्विकर्मस्थस्सत्पथाश्यपते (श्च्यवते) पुनः। वाधु प्यमुपजीवन्ति ये द्विजा लोभमोहिताः॥७॥ पुष्पपत्रफलादीनि शाकानि विविधानि च ॥८॥ स्वेप स्वेषु च कालेषु श्रद्धया वर्धयेद् गृही। मण्टाण्ड)पानि सरम्याणि पद्मोत्सलवनानि च ।।६। क्रीडाथं देवकीसूनो श्रद्धा भक्त्या प्रकल्पयेत् । तुलसीवाटिका यत्र यत्र वा कमलालया ||१०il पञ्चकालपरा यत्र तत्रासो भगवान्दरिः। सर्वैरक्षतेनित्यं अश्य(१)य॑कुसुमदुमान् ॥११॥ तुलसी चाहरेत्पत्रपुष्पाद्य वाग्यतश्शुचिः। स्वयं संवर्ध्य तुलसी द्वादशाक्षरचिन्तया ॥१२॥ अर्घयन्ति जगन्नार्थ श्वेतद्वीपं प्रयान्ति ये। दण्डप्रणाममपि वा कारयेत्पुष्पवादिकाम् ।।१३।। अभोज्यान्नानपात याः क्रियास्तेषां च निष्फलाः ।

भगवदुद्देश्यककर्मवर्णनम्
अथवा तुलसी पुन्नो कृतकृत्यस्सनातनः ।
अङ्कयेच्छवचक्राभ्यां चूताद्यांश्चम्पकादिकान् ॥१४॥
तुलमोवाटिकाः कुर्यात् शङ्खचक्राम्बुजाकृतिः ।
वृक्षगुल्मलतादीनां अच्युतारामजन्मनाम् ||१||
कुर्यान्नामानि देवस्य देव्यालयास्तथा हरेः ।
हमानश्चरेन्नित्यं कदाचिन्नालसो भवेत् ॥१६॥
अयाचितं शिलोज्छस्तु शिष्यदत्तः क्रमागतः ।
कुर्यातकर्मविशुद्धेभ्यः पुत्रमाह्यापिवाधनम् ॥१७॥
कुलटापण्डपतितवैरिभ्यः काकिणीमपि ।
उद्यतत्वे विगृहीयादापद्यपि कदाचन ॥१८॥
महापातकिनाचोरादम्बटरहितस्तथा ।
मृगयोः पिशुनाच्चैव नादद्यादुद्यतं त्वपि ॥१६॥
याचनेनाऽपि वर्शत दैन्यं हित्वागमस्ततः।
दानेन वा नित्यं प्रतिगेहावामतन्द्रितः ॥२०॥
आपद्यपि न याचेत झाविसभ्यन्यरीनपि ।
भिक्षार्थ न प्रजेत्तेषां गेहं कुर्याग्नचाप्रियम् ॥२१॥
राज्ञान प्रतिगृह्णीयात् उपपातकिनस्तथा ।
पुरोधा गणिकाध्यक्षकदर्येभ्योऽपि नाहरेत् ॥२२॥
रिवत्रिणोतुकेभ्यश्च विकमस्तेभ्य एवच।
स्त्रोजिताच्च तथान्लेयात् स्वस्तिवहिन्भ्य एवच ||२||
शास्त्रावमानिनश्चैव परद्रव्यापहारिणः ।
सायात्रिकाद्विपद्भ्यश्च गणकम्यस्वधैव च ॥२४॥

" २८१६ शाण्डिल्यस्मृतिः। दधिक्षीरघृतादीनां लवणस्य मधोस्तथा । विक्रयिभ्योऽपि नादद्यादश्वविक्रयिणस्तथा ॥२६॥ नाचरन्ति यथोक्त ये तेभ्योऽपि भृतकार्यात् । योजनहारिणश्चैव वलीवर्दस्य साक्षिणः ॥२६॥ अयथार्थस्य नादद्यादश्यानां दमकात्तथा । अभक्ताच्च त्रयी विद्यादुदक्यागमकात्तथा ॥२॥ कौसीदकास्तधाभोक्तः श्राद्धस्य सततं तथा । वणिग्भिश्च तथा शूद्रादुत्सृष्टाग्नेस्तथा शठान् । अगारदाहकेभ्यश्च परिवित्तभ्य एव च ॥२६॥ विन्यप्रस्थापकाचव तथा शिल्पोपजीविनः । परिहस्ताच नष्टाच्च शूद्रशिघ्यात्तथैव च ॥३॥ श्यपाफेभ्यः श्यवृत्तिभ्यः प्रायिवाकात्तथैव च। भगवन्तं तथा विप्रान् पश्चकालपरायणान् ॥३१॥ भगयन्मदिरं श्रेय पुण्यतीधानि सर्वदा । द्विपश्यैव नादगान्निक्षिप्तस्यापहारिणः ॥३॥ प्रतिलोम्याच जातेभ्यस्तथा चानतजीविनः । आतं त्यपि नादगादन्यदेवावलम्बिनः ॥३३॥ क्रमामयनयोपिम्पशंगारामसंभवैः । भगाक्तिभ्यो विभ्यो याचितम्नु आवासोमानियां-पि फमंकुरितन्दिनः । बन्यवां परपुमायणांना समययत् ।। या liye न प्रामयाजकेभ्यश्च नागम्यागमनात्तथा ॥२ ॥

भक्तिलाभोऽपवर्गरसज्ञस्यैवेतिवर्णनम् २८१७
अलाभे सर्वभोगानां जलं प्रतिनिधिः स्मृतम् ।
अलब्धयान्यो विप्रेषु कपत्रयं वापि योऽचयेत् ॥३६॥
विना मूर्दावसिक्तन्तु वैश्यं चाऽपि महापदि ।
अलब्धो याचनादेव तेपा वा वृत्तिमाश्रयेत् ॥३७॥
तिलं मांसं तथाऽन्नं च लवणं च तथाऽजिनम् ।
रक्तकरणादिकं वस्त्रं दधिक्षीरघृतादिकम् ॥३८॥
साधनं चैव हिंसाया विपोल्वणकराणि च ।
सुवर्ण चैव गां चैव विक्रीणन्नश्वमेव च ॥३॥
श्रोत्रियाध्यापको भूत्वा वृत्ति वा लभते द्विजः ।
स्त्रीबालवृद्धसंयुक्तः सर्वेभ्यो वा समाहरेत् ॥४॥
भगवद्भक्तियुक्तभ्यो दद्यात्स्वस्तिकोभवेत् ।
उपादित्सुर्यथालाभं कारम्भं प्रयोजयेत् ॥४॥
प्रतिग्रहाद्भवेदे(दो)पः चिरादेव (वि) नश्यति ।
भिक्षयित्वाऽपि वर्त्तत स्वाश्रमानुगुणं तथा ॥४॥
अपक्वं वाऽपि पर्क वा सर्वश्रेष्ठा हिसा स्मृता।
भिक्षित्वा(१)वर्तमानानां योगिनां सिद्धिकाइ क्षिणाम् ।।४३।।
मदमात्सर्यमानाचा दोषा गच्छन्ति संक्षयम् ।
यथा यथा हि खिन्नं स्यात् सांसारिफमुखोदये ॥४४
तथा तथा दृदं योगी निर्वाणपदमुन्छति।
अपवर्गरसको हि सन्मना दुःखवर्जिक ॥४॥
मोक्षधर्ममना नित्यं सुखं प्रति मुक्तवत् ।
योगिनामवमानं च शरीरफ्लेश एव च ॥४६॥

०८८ शामिति: अगंहानिकम विदंगमनात्यन् । गाय गामा माग गांगिनी नेह संभात् ॥ ४ ॥ अनायासनल म्यान परमं पदम्। अधिशासमना नित्यं नाभिहतोऽपि सन् 121 अपरेशन पण मा विमुददम्पतत्परः। न संमिढो भवेत्तस्मात् शुद्धद्रव्यपरोभवन् । तेपो विनिमयेनैव शुद्धिरत्यागेन या भवेत् । अलाभे सर्वभोगानामुदकेनापि पूनितम् ॥११॥ प्रयच्छत्यमलं लोकं भक्तिपूतान्तरात्मनाम् । जातया शुद्धवंशेपु भार्यया स्वानुकूलया ॥२॥ सद्भक्तिपूतया नित्यं कारयेद् द्रव्यसाधनम् । शाकाम्युमियां न्यायात्तर्भक्त्या संपूजयेद्धरिम् ॥१३॥ मन्त्री मन्त्रेश्वरश्शास्त्रं मन्त्रसिद्धिस्तथैव च । सिद्धान्तमक्षसूत्रं च गोप्यं धान्यं धनायुपी ॥१४॥ अवमानमसामथ्यं हृद्रोगं रोगमान्तरम् । अनर्थवृणमायासमकृत्यं न प्रकाशयेत् ॥५॥ धान्यवन्धुविनाशेन नैर्धन्योपद्रवेण च । शक्तश्चेदन्यथा रोगात् शाट्या सम्मार्जनं घरेत् ॥ अमाण धनलोभात सम्माय मुम्बमावसन En अकर्मण्यानि सिद्धानि यदिव्यागि कामत : all मूढैः कृतावमानेन खिन्नस्यान्न कदाचन ॥५६ प्रातस्नातोऽपि विधिवत् स्नानं माध्यन्दिनं चरेत् ।

बाह्याभ्यन्तरशुद्धिवर्णनम् २८१६
शुधिं कुर्यात्सदा विद्वान् मलानामङ्गजन्मनाम् ।
करकेशनखश्मथ स्त्रीपक्षेषु हपी (को १) भवेत् १५८।।
दिने दिने स्नानकाले कुर्यादभ्यञ्जनं गृही।
अथवा शस्तकालेषु शक्तः कुर्याद्दिवैव तु ।।६।।
विशुद्धदन्तवदनो निर्मलीकृतविग्रहः ।
शुद्धोदरः प्रसन्नात्मा यथालधैरसमर्चयेत् ॥६॥
सतीनां योपितो देहो यागोपकरणं भवेत् ।
भर्त णां भगवद्भक्तदेहस्तद्वजगद्गुरोः ॥६॥
कर्मान्तरेवसंसक्तिफलकाइक्षाविवर्जनम् ।
भक्तिद्रवीकृतं चित्तं विरक्तिस्सर्ववस्तुपु १६२||
अभ्यासस्सततं सर्वप्रकारेस्सक्रियाविधी।
आलायवर्जनं प्रद्धापरमं दम्भवर्जनम् ॥६३।।
अकार्पण्यमलोभश्च क्रोधमोहजयोभयम् ।
न्देहस्य सेन्द्रियस्यापि विशुद्रधिद्रव्यदेशयोः ॥६४||
अकाले वर्जनं निद्रामैथुनाशनकर्मणि ।
सर्वदा शास्त्रशिक्षा च शास्त्ररष्टेषु कर्मसु ।।६।।
पारवश्यप्रमागं च नित्यं शास्त्रो रदंपरे।
निपिद्धवर्जने यनस्संसिद्धान्तनिपेवणम् ॥६६॥
मार्दवहोर्दयाक्षान्तिरद्रोहस्सर्वजन्तुप ।
एवमादिगुणाः पुंसां यदायुस्सत्त्वसंभवाः ॥६जा
जातोर्यद्योगमात्मानं तदा भागवताविधी।
उत्सम्य भगवत्कर्म वासरूमपरायणः ॥६॥

शाहिनामनिः कुमको मूहमा राजसो नह सम्मनः। जमा समसा यामिनी या फोनः ॥६॥ अमेपासमाहामगि वैन। पांमद्गु गमगन्ना महाभागातप्रिया Isail मुदम्यिन्गगि काम म गुयांदतन्द्रिता। उत्थाय पूर्व गृहोस मुम्नाता यतमानसा ३ स्नुपाहितपुवामान्यथा सुनिता नयेन् । उधपुण्द्धराम्गाचा वसाभरणभूपिता: स्वाचान्तः प्रयतोदेवमभिगच्छेयुराहताः । पुत्रः प्रेयस्तथा शिष्य इत्येवं विनिवेदयेत् । गृहीत प्रमुखास्सर्वा यजन्त्यः पुरुषोत्तमम् ।।5617 बालक्रीडादिचरितः कर्म फुयुरतन्द्रिताः । पशुपुत्रादिकं सर्व गृहोपकरणानि च | अकयेच्छड्सचक्राभ्यां नाम कुर्याच्च वैष्णवम् । कारयित्वा सुवर्णेन पञ्चायुधगणं हरेः ॥७॥ पनीयात्कण्ठदेशे नु वालानां सूतिकागृहे । न पुत्र ये दास्यन्ति शयनानि महीतले १७ स्थापयेत्क्षेत्रमध्येपु शिलां चक्रादिमुद्रिताम् । मुक्तामणिसुवर्णाद्यः कृत्या चक्रादिभूषणम् ॥८il यथाई बिभृयुस्सर्वे पुमांसं स्त्रीजनोऽपि वा। वृद्धवालाङ्गनादीनो पूर्वाह भोजनं भवेत् ।। त्रिसन्या कारयेद्वालान् प्रणामं देवपादयोः ॥३ ॥

भोजनस्थानिदेवस्यसमर्पणवर्णनम् २८२१ यथाबलं समभ्यय॑ सानिं देवं ततोऽशनम् । घृतस्थाली विना सर्व जलक्षीरानसंश्रयम ८०॥ कर्तव्य दिवसं भाण्डमारुतातपतापितम् । कर्मण्यनघयुक्त प पूर्व स्मिन्दियसेऽनिशम् ११८१५६ परस्मिन्दियसे कुर्यात् पानेपु पचनादिकम् । गृहोपकरणं सर्व मुसलोलूपलादिकम ८२६ प्रक्षा(लये)जगन्नाथं यागोपकरणानि च | यागार्थ देवदेवस्य पाका चाम्पावनम् ।।८३॥ स्थापयेत्पादहन्तादि शुद्धयर्थ च पृथक्पृथक् । वस्त्रेण बहुशशोध्य त्रिविधं चाम्पावनम् ॥१४॥ इज्याङ्गमेवमेवाद्यसंस्कृतं क्षालयेत्पुनः । कर्मण्यं त्रिविधं वारि शुद्धभाजनसंभृनम ||८|| कुन्छाद्य स्थापयेच्छीते निधि परिवजिते । अग्न्यगारं च संशोध्य थागोपकरणानि च ॥८६॥ उद्धृत्य भम्म सम्माय॑ वह्नि काष्ठसमिन्धयेत् । करोपकालं क्षिप्तो कुसुमाद्यसमर्चयेत् ॥८॥ श्रद्धयाच्छाध गृहिणी पुत्रवत्परिरक्षयेत्। शोपये छुद्धभूभागे बोहिमुद्गतिलादिकान् ।।८।। पाकपस्वादिभूतानामप्राप्ये संवृताम्बरे । उपलिपो गुचौ देशे मुझे शूदिसाधने ॥८६॥ मोहिमुद्गादिकं सर्वमपहन्युः कुलाननाः । अपरान्यो निज हमजल्पन्न्यस्तथा बियः tell २८२२ शाण्डिल्यस्मृतिः अवन्त्युग्रमापूर्युजीर्णवस्त्रनिमृज्य च । निर्मलीकृतकर्ताभं विशुद्धीकृत्य तण्डुलम् ॥१॥ विकीर्य फलकापृष्ठ शर्कराद्यान् समाहरेत् । न पचेयु:हियवान् नावहन्युरतापिवान् ॥२॥ पचेयुर्वाऽपिताननं एति)पा न हृदयंगमः। शस्त्रेण फलमूलानि निकृत्यालोक्य यत्नतः ॥३॥ कृमिकण्टकदोपाणि निहरेद्वाग्यतो सति । विधायाहत्य यहुशः पुनः पुनरुदीक्षयेत् । चतुः प्रक्ष्याल्य शुदाभिरद्भिश्च क्षालयेत्तथा। तण्डुलाभःकरणं तद्वद् अन्नस्रावणमेव च । संविभागात्पुरासर्वमुपयोग नचाईति ॥६॥ अपऍपिततप्तेषु तापितेवातपामिभिः । मृण्मयेयु च ताम्र पचयुः क्षालितेषु च ||६८ मृण्मयेन नरध्येय शतश्चेत्याचयेद्धयः । पक्षाध्वं न कर्नया मृण्मये पचनक्रिया || भिन्नानि पिम्लाङ्गानि विकटानि तथैव च। पभाधन मंमा मुद्गमारं पुतं विलम् । नाम्यूर्व नगलं पय मासाधन संपयेत् ।।१०।। यलेन सर्वशाकानां कृमिकीटादिवीक्षणम् l सतण्डुलानि मुद्गानि शाकानि च फलानि च हव्यं मुद्गं च शाल्यन्नं शस्तं शाके तुलस्यपि । शरास्थिसमेतानि भाण्डानि परिवजयेत् ॥१ ॥

पाके निपिवृक्षाणामिन्धनदानेनिषेधः २८२३
अमावोदनपचने पाचयेदोदनादिकम् ।
वस्त्रं केशं हपीकं वा सृष्ट्वा प्रक्षालयेकरी ॥१०२।।
नासोदकं नेत्रवारि स्वेदाम्यूनि तथैव च ।
न स्पृशेत् न च वलोण मायेच्छोधयेद् बहिः ।।१०३।।
नोपशाम्योपशाम्याग्नि न मन्दं नापि सत्त्वरम् ।
नावतार्यावतार्याधो नान्यबुद्धिः पचेदपि ॥१४॥
तालमश्वत्थकाष्ठं च पलाशं बिल्वमेव च ।
मरीचकं मदनकं तेलमुन्मत्तकं तथा ॥१०॥
याधकं च कराञ्च करी व्याधिपातकम् ।
निम्बं तथा कपित्थं च पारिजातकमेव च ॥१०६।।
एरण्डमरुवं चैव कोविदारंविभीतकम् ।
हरीतकंच शाल्मलि च श्लेप्मातकमथापि च ।।१०७।।
वर्जयेदिन्धनार्थ तु यच्चान्यत्कीटसंयुतम् ।
विपद्रुमाणि सर्वाणि कण्टकानि तथैव च ।। १०८।।
दुर्गन्धधूमयोनीति (नि) यत्नेन परिवर्जयेत् ।
व्यञ्जनानि च तानि शाकादीन्यपि पाचयेत् ॥१०॥
कदलीजातयस्सर्वा (१) चूतं च पनसद्वयम् ।
उर्वारुकं च वृहती कारवल्लीत्रयं तथा ॥११॥
फर्कन्धुक्षुबृहती कुष्माण्डं तिन्त्रिणी उथा।
नालिफेरंप सिंही घ काकोंटं यत्सरं तथा ॥११॥
अलक क्षुदकन्दं च महाकन्दं तथैव च ।
कन्दं पिन्ध्युतो चैव सूरणं तूलमेव च ॥११२॥

। २८२४ शाण्डिल्यामतिः मरीशीर गैर निमा राजमापा। महामा मचगमा सघ च ॥१३॥ मापमुद्ग महामुद्गं मुरसी शाकिनी क्या। शशिगुरु र जीवन्त्यागस्त्य पम्यवाह ॥११॥ गियरं कुलत्वं च व्या सिंह वथैव च । शस्तान्यन्यागि दुटानि सुभृतं कारयेचुवः ॥११॥ कोशातकमलायुं च दूरतः परिवर्जयेत् । जोरकाद्यविमित्राणि नालिफेरयुतानि च ॥११६॥ समरीचानि कार्याणि व्यचनानि रसैस्सह । आसुरं स्याद्विदग्यं यदपक्वं रौद्रमेव च । केशकीटादिभिदु विदग्धमशृतं तु वा । शाकोदनादिकं सर्व सर्वथा परिवर्जयेत् ॥११६।। मुद्गान्नं च गुडान्नं च पायसान्न विशेषतः । शक्तश्चेदानयेन्नित्यमपूपान्भक्ष्यमेव पर्वणि अपयेदलं पायसं द्वादशीषु च। च ||१२all अशुद्धस्तु दशाहानि प्रसूनायाश्च गोपयः । पलाण्डुलशुनामेव्यं खादयन्त्या पयस्तथा ॥१३॥ अनुशारहितायाश्च निक्षिप्तायाव गोः पयः । पयोमियाणि शाकानि हिम्वमिवाणि साधयेत् ।। देवं शृणु तमेवातः कर्म च तहविः ।।११८ सर्वेषां पयसा शुद्धं गव्यं चेति निगद्यते ॥१२ ॥ तथैवाधिकृतायाश्च लाभ प्राप्त पयस्तथा ॥१२ ॥

12 निपिद्धपयोविवरणम् देशकालातिवृत्त्या च यस्या ऊथसि संस्थितम् । क्षीरं तस्यास्त्वकर्मण्यं विना वत्सं च दुह्यते ॥१८४१६ विद्धौजामध्यकर्मण्यं प्रसलंते (१) निवृत्तितः । वृपस्यन्त्यास्तथा क्षीरं वाहार्थे या च कल्पिता ॥१५॥ तं कर्मण्यमासा च यत्सो यस्यावमन्यते । रुद्रादिव्यपदेशिन्यो याश्च गावातहतिताः ॥१२६|| पयत्तासामकर्मण्यं लीलं यत्सविपरपि । कर्मण्यं पय आइत्य पायसं कारयेद्धविः ॥१२॥ अपूपं च गुला(डा)न्नं च नन्दायां सगुणं हविः । वैशेषिकेषु कुर्वन्ति दिवसेषु विशेपवन ।।१२८॥ पाकं पायसपूर्वाणां सन्त्येषां च यथावलम् । सङ्क्रान्तिर्जन्मनक्षत्रं श्रवणं द्वादशीव्रतम् ।।१२६।। पर्वद्वयं समुद्दिष्ट सविशेपक्रियाविधी । चन्द्रसूर्योपरागे च प्रादुर्भावदिनेषु च ॥१३०।। मासःप महाह विशेषाराधनं हरेः । विदुर्दुनिमित्ते च दुःस्वप्ने संजातेऽपि महाभये ।।१३।। आगतेषु च भक्तपकुर्याद्व शेषिकी क्रियाम् । इव्यहीना यदि भवेत् कर्म वैशेषिकं वृथा ॥१३॥ निर्धनोऽपि यथाशक्ति कुर्याद्भुक्तप विहितम । केवलेनोदनेनापि शाकानवतेन च ॥१३३।। नत्यं फर्म विधेयं वै भक्तानां गुदचेतसाम् । सुपक्षेषु च सर्वेषु परिमृज्याम्युनासिलम् ।।१३४|| शाण्डिल यस्मृतिः ऊर्ध्वपुण्डरलाय नयेधागालयं हविः। पास्थानं गृह सब विमायान्युश्य वारिणा ॥१५॥ आग्छा पत्रमन्यग समानामेतदम्धिनी । प्रविश्य भगवद्रोहं दीप प्रज्याल्य गेहिनी ॥१३॥ काक्षन्ति भर्तुरायानं तिप्टेसपरिचारिका । जघन्यशायिनी नित्यं पूर्वोत्थानपरा तथा ॥१३॥ अन्तर्वहिश्च संशुद्धिः गृहकर्मसु सोधमा । मङ्गलाचारशीलाध भृत्यवन्धुजनप्रिया ॥१३॥ हृद्यवेषा सदाभर्तुरानुकूल्यप्रयोजना । यथालव्येन संप्रीता कुशला पाककर्मणि ॥१३॥ र(म्य)वस्तुपु निस्स्नेहा काले मेध्यान्नभोजने । भगवद्भक्तियुक्ता च तथा भागवतप्रिया ॥१४॥ मितरभापिणी हासरोदनोद्धोपवर्जिता। गृहान्तरद्वारदेशस्थानासनविवर्जिता ॥१४१।। निद्रालस्यविवादासद्भापणासत्यवर्जिता । व्यये घ मुक्तहस्ता च दोपश्रवणभीपिता। नचयपत्र (१) च लाभा च वेश्यालावण्यनिस्पृहा । गुपयेपरहस्या कर्मभोज्यान्नभोजना ॥१४॥ निस्पृहा परकार्यपु स्थिखुद्धिढवता ॥१४२ ।। अलम्यानुद्व ( ल्य ) णा स्निग्धा सलज्जा मधुरस्वना । कुशला लोकयात्रासु दुष्टादुरक्रियापरा ॥१४ ॥ नास्तिवाक्येऽतिसंत्रस्ता संचारे छन्नविपदा ॥१४४ ॥

भोजनपरिवेपणेभ्रष्टनारीलक्षणम् २८२७ एवमादिगुणोपेत (1) नारीणामुत्तमा सती । भ कर्म स्वनुरूपास्याः (१) कृतकृत्यरसचेतमः ॥१४६५ श्लाघयन्तो स्वसामध्यं भर्तृ निन्दापरायणा । असमक्षं समक्षं वा दुष्ा ता वर्जयेद्बुधः ६१४७।। भर्तुर्धनं च लोभाखो विश्यमानेऽपि भर्तरि । पोपयन्त्यर्थशीलां तां कुर्यात्कर्म बहिष्कृताम् ।।१४८।। निजोदरं पूरयन्ती भृत्यका तथाऽतिथिम् । न्यूनस्वस्त्राति घी वा तथा पार्क विवर्जयेत् ।।१४६|| स्वश्या विद्यमानायां स्नुपाया स्वेन का सुतैः । पारयेत्तां प्रयत्नेन विनाता कर्म कारयेत् ।।१५।। धर्महानिर्यथा न स्याद्यथा सज्जनगर्हणा। सर्व तथा समीक्षं (क्ष्य) द्रागाचरेद् बुद्धिमान्नरः ॥१५॥ स्वाधीनां कारयेन्नारी सर्वकर्मसु नात्मवान् । सर्वकर्मानुसन्द-यात स्निग्धः किल तयावसन् ॥१५२।। स्त्रोकतेपुन विश्वासः कर्तव्यः सत्क्रियापरैः। मायाचारेण निपुणा मोहयन्त्यविचक्षणान् ॥१५३|| अपराधो यदि भवेत् प्रमादान्निजयोषिताम् । मुखभस्मृतस्तासा दण्डस्सन्तप्तचेतसाम् ॥१४॥ न वाडयेन्नातिमात्रं पुण्येन फसतां नयेत् । नियं भर्ता नचान्येपा दोपं तस्याः प्रकाशयेत् ।।१५।। भोजनाच्छादनः पुष्पभूपणाधनिजत्रियम् । आलापरसरसैनित्य चोपयेचा सयेन्न च ||१९६।।

शामितिः प्रमंडल नामि। पास्मानं गई गHिIYE वारिमा ११३५५ आगलाग सम्ममम समामामेर टुम्पिनी। प्रविण भगवगेई दोपं प्रग्यालय गहिनी ॥१३॥ कान्ति भरागानं शिष्टंसपरिचारिकता। । हृद्यवेपा सदाभतुरानुएल्यप्रयोजना । र(भ्य)वस्तु निरस्नेहा काले मेध्यान्नभोजने । भगवद्भक्तियुक्ता च तथा भागवतप्रिया ॥१४॥ मितरभापिणी हासरोदनोद्घोपवर्जिता । गृहान्तरद्वारदेशस्थानासनवियर्जिता ॥१४१।। निद्रालस्यविवादासद्भापणासत्यवर्जिता । निस्पृहा परकार्यपु स्थिरबुद्धिदृढव्रता ।।१४२|| कुशला लोकयात्रासु दुष्टादुक्रियापरा ॥१४३।। व्यये च मुक्तहस्ता च दोपत्रवणभीपिता। जपन्यशायिनो नित्यं पूर्वोत्थानपरा तथा ॥३ ॥ अन्तहिश संगुदिः गृहरुममु सोचमा । नास्तिवाक्येऽतिसंवस्ता संचारे छन्नविमहा ।।१४४il नववक्त्र ( ? ) च लाभा च वेश्यालावण्यनिस्पृहा । मङ्गलाचारशीलाध भृत्ययाधुजनप्रिया ॥३ ॥ यथालयेन संप्रीता पुशला पाककमणि ॥१३ ॥ अलम्यानुद्व ( ल्व ) णा स्निग्धा सलाजा मधुरस्वना । गुणवेपरहस्यार्थ कर्मभोज्यान्नभोजना ॥१४ क्षा

भोजनपरिवेषणेश्रेष्टनारीलक्षणम् २८२७
एवमादिगुणोपेत (1) नारीणामुत्तमा सती ।
भ कर्म स्वनुरूपास्याः (१) कृतकृत्यासचेतनः ।।१४६।।
श्लाघयन्तो स्वसामयं भर्तृ निन्दापरायणा ।
असमक्षं समक्षं वा दुष्टा ता वर्जयेद्बुधः ।।१४७।।
भर्तुधनं च लोभाली हिश्यमानेऽपि भर्तरि ।
गोपयन्त्यर्थशीला ता कुर्याकर्म बहिष्कृताम् ॥१४८।।
निजोदरं पूरयन्ती भृत्यवर्ग तथाऽतिथिम् ।
न्यूनस्यत्राति स्त्री वा तथा पाकं विवर्जयेत् ।।१४६||
स्वचा विवदमानायां स्नुपाया स्वेन वा सुतः।
वारयेत्ता प्रयलेन विना तो कर्म कारयेत् ॥१५॥
धर्महानिर्यथा न स्याद्यथा सज्जनगर्हणा ।
सर्व तथा समीक्षं (क्ष्य) द्रागाचरेद् बुद्धिमान्नरः ॥१५११॥
स्वाधीना कारयेन्नारी सर्वकर्मसु नात्मवान् ।
सर्वकर्मानुसन्ध्यात् स्निग्धः किल तयावसन् ॥१५)
खोकृतेपु न विश्वासः कर्तव्यः सरिक्रयापरैः।
मायाचारेण निपुणा मोहयन्त्यविचक्षणान ।।१५३।।
अपराधो यदि भवेत् प्रमादान्निजयोपिताम् ।
मुखभद्गरस्मृतस्तासां दण्डस्सन्तप्तचंतसाम् ।।१५४||
न ताडयेन्नातिमा पुण्येन करातो नयेत् ।
त्रियं भर्ता नचान्येपा दोषं तस्याः प्रकाशयेत् ।।१५।।
भोजनाच्छादनः पुष्पभूपणाद्य निजस्त्रियम् ।
आलापरसरसैनित्यं तोपयेचा सयेन्न ॥१६॥

२८२८
शाण्डिल्यस्मृतिः
विलोभयन्सदापृष्टप्रार्थवचनैःस्त्रिया ।
भगवत्कर्मसिद्धयर्थ नयेदात्मानुकूलताम् ॥१५॥
पुत्रान् भृत्यान् कलत्रं च भक्तमाथितमेव च।
नित्यं कुर्यादुपायेन भगवद्भक्तिभावितान् ॥१५८।।
अपुत्रा वा सपुत्रा वा भक्ता दक्षा च कर्मसु ।
या स्त्रो तां वर्जयेद्भर्ता न कदाचिदपि प्रियाम् ॥१६॥
पुत्रार्थ नोद्वहेदन्यां कर्म पुत्रा हि योगिनः ।
अपुत्रोऽपि परं याति कामी नान्योऽपि सत्सुतः ॥१०॥
न खोजितो भवेद्भर्ता नचाशक्येषु (दाप)येत् ।
भुक्ता न कथयेत्स्त्रीणां असक्तरसक्तवद्वसेत् ॥१६॥
निर्भयास्सुहृदोलोको यथास्युस्सर्वजन्तवा ।
सिधाभीत ( "?) स्वकुलंतत्तथाचरेत् ॥१६॥
यथाशास्त्रमुपादानमाचमेद्भोगनिस्पृहः ।
भगवद्धर्मलाभेन तृप्तो यस सुखी भवेत् ॥१३॥
इति शाण्डिल्यधर्मशास्त्रे उपादानाचरणं नाम
तृतीयोऽध्यायः ॥३॥

अथ चतुर्थोऽध्यायः
इक्याचारवर्णनम्
उपादानप्रकारो यः सम्यगुक्तः समासतः ।
इज्याचारं च वक्ष्यामि यथायदनुपूर्वशः ॥१॥
भोगानुपाज्यपागाधर्म विधिवत्स्नानमाचरेत् ।
प्रक्षाल्य पादौ स्वाचामेत् (नित्यंयः) स्वोर्ध्वपुड़कः ॥ २ ॥
सप(वि)वकरचैव प्रसन्नो यागमारभेत् ।
व्यक्त वेद्यामायतने व्योम्त्यन्तर्ह दयाम्बुजे ॥३॥
एकस्मिन्नेव देवेशं यथायोग समर्चयेत् ।
युक्तमायतनं याऽपि प्रथमं यत्समाश्रितम् ॥४॥
आदेहपातातद्वित्या नान्यविम्यं समाश्रयेत् ।
उपचारेषु भक्तस्सन् स एप इति निश्चितम् ॥५॥
व्यक्तायतनयोः पूजां कुर्याद्भक्तिविद्धये ।
वैद्यन्तरिक्षवन्मोढ्यावृत्तिस्थाने प्रपश्यति ॥६॥
व्यक्तायतनसंस्थानं नास्तिवार्चनाविधौ ।
कर्मिणासर्वथा नित्यमस्वाधीनप्रवृत्तयः ॥७॥
इति उप्रहयोगेन वैदिर्वेदप्रचोदिता।
ल्यं गुरोः प्रसादेन क्रमागवमथाऽपि वा ॥८॥
आ याचितं वास्यात् निम्नं गोगमवोऽन्यथा !
भवानी सर्व विषयच्यावृत्तचेतसाम् ॥६॥

२८३० शामिल्यस्मतिः संपामादिति मजलं वंदवादिनाम् । कुटुम्पी यजयेद् रिमं दावं शैवं च मृण्मयं ॥१४॥ गृहे मिनिसंस्थं च योगनिद्रारसोरमुकम् । कुदम्पात्रमनिवृश्य नित्यं साधीनमर्मणः ॥११॥ अन्छिदकारिगशान्तं व्यक्त मृदयस्य पूजनम् । चरतः कर्मणो यत्र वैदिः कर्नु न शक्यते ॥१२॥ अम्बुपायास्तथा भोगा स्तष्ट व्योम्नि पूजनम् । विकसिद्धा ये सन्तः पश्ययोगा गुणाविगाः ॥१३॥ केवलज्ञानसन्तृतास्ते यजेयुः परं हृदि । अन्येऽपि सर्वभोगानामभावे यत्र जायते ॥१४॥ यजेयुहू दयाम्भोजे भोगेर्मानसकल्पितः । सिद्धये तु महात्मानो विवेकज्ञानयोगिनः ॥१५॥ वर्जयित्वा कृतानन्ये यजेयुर्द्रव्यसंपदा | सर्वभूतेषु देवेषु नरः प्रकृतो (...) तथा ॥१६॥ मनुष्याकृतिदेवेषु न कार्य पूजनं बुधैः । मनुष्याकृतयो देवा नोपास्यास्ते कदाचन । प्रादुर्भावादिभिर्देवैः मत्स्यः कूर्मादिभिविना ॥१८॥ अशुद्ध वर्चयन्मूढो नाप्नोति परमं पदम् । यथास्थितासएवासो दीपाहोप इवोदितः। व्यक्तायतनयो नित्यमर्चयेत्पुरुषोत्तमम् ||२०|| ( केचिद् ) धनामुखाः केचित् दमनप्रतिशक्तयः तिर्यक्वंमानुपत्वं वा मत्स्याय स्वेच्छया हरिः ॥६ ॥

भगवद्भक्तिविषयकनियमवर्णनम्
सावधानो भवैद्भस्त्या मृत्यो नृपमिवान्तिके ।
अन्यत्राप्ययन्मन्त्री पूजाकाले जनार्दनम् ॥२१
त्रस्थं भावयेवं सर्वश्वर्यसमन्वितम् ।
परीक्ष्य भोगानादाय तीर्वाऽप्यभृतरूपताम् ॥२२॥
प्रहाङ्गो भोतवद्भोगैस्तन्मयैस्तन्मयोचितः।
नाभिगमने पूर्व दिव्यमन्त्रार्थदर्शनात् ।।२३।।
साक्षादभिमुखं देवं भावयित्वाऽर्चयेद्वशी।
भगवद्वदनाम्भोजस्यन्दमानामृनोदधिः १२४)
पियन्निवमहालादमध्यस्थः पूजयेत्प्रभुम् ।
भक्तसन्दर्शनप्रीत्या नानाभूतैरिवावृतः ॥२॥
नेत्रपात गवता स्वात्मानं शुचितां नयेत ।
नातिपूतं नातिमन्दं नोच्चैमन्त्रानुदीरयेत् ।।२६।।
अत्यरः सुमनाः क्रोधकामं हित्वा यजेत च ।
न शब्दयस्वात्मसङ्घमम्मुनाना यन्महीम् ॥२४॥
नन्तुं कु (१) अजल्पंश्च शुद्धमौनो भवेदशी।
सम्पूज्या रुपाङ्गश्च बद्धोष्ठं नासिकाक्षरैः ॥२८॥
अध्यक्त रण्यगुद्धं तन्मौनवर्जनं शुभम् ।
यथा युवान राजानं यदाचं मदहस्तिनम् ॥२६)
यधाप्रियातिथि योग्यं भगवन्तं स्थायेन् ।
सम्यकप्ताधितमेवापि यत्स्यान्न हृदयंगमम् ॥३॥
यजयेद् दृष्टदुर' च हस्तात्स्यस्विमेवर।
पुराभिगमनं मन्त्रः प्रगवायथाविधि ॥३॥

२८३२ शाण्डिल्यस्मृतिः अभिगम्येय देवेशं मानसा समर्पयेत् । अश्या विहिनमन्त्रधातुराश पदस्थितः ॥३६|| भगवत्प्रापरशुद्धीरिज्यामतौरसमचंयत् । स्नानभोगैरसमभ्ययं दिव्यालारादिमण्डितम् ॥३३॥ अलवारासनं दत्त्या दिव्यस्त्रचन्दनादिभिः । भोगैस्सुसंस्कृतदेवमचितं भावयेत्परम् ||३४|| सतीवप्रियभारं जननीय स्तनन्धयम् । आचार्य शिष्यवन्मित्रं मित्रवल्लालयेद्धरिम् ॥३३॥ स्वामित्त्वेन सुहृत्त्वैन गुरुत्वेन च सर्वदा । पितृत्वेन समाभाव्यो मातृभावेन माधवः ॥३६॥ सुस्नातं स्वनुलिप्त च स्रग्विणं च स्वलकृतम् । संस्तुतं विविधैस्स्तो ज्यासनगतं प्रभुम् ॥३७] अवश्यं मधुपर्कण मध्वाज्यदधियोगिना । अर्चयेदुदकेनाऽपि त्वातिथ्येन फलादिभिः ॥३८॥ मध्याज्यं दधि संयोज्य यजते यो जनार्दनम् । अयं संसृज्यते तेन श्रीमता मधुपर्कवत् ॥३६॥ मधुराणां तु सम्पर्को मधुपर्कः प्रकीर्तितः । सम्पर्क सरसस्तेन मधुपर्केण जायते ॥४॥ संपूज्य मधुपर्केण गो निवेद्य च दक्षिणाम् । गवार्थ द्रव्यमेवापि ततोऽग्नी च समर्पयेत् ॥४॥ शाककन्दफलोपेते गुंडदध्याज्यसंयुतः । अन्नः प्रभूतैर्देवैशं विविधः पृथगर्चयेत् ॥४२॥ २. + भागवतानां पूजा २८३३ पकस्तथान्नाद्यं यद्भुक्तं परमेष्ठिनम् । बद्रक्षणीयं तद्विनियोगावसानिकम् ।।४।। नान भावगतस्तित्र गुरुपूर्व यथाविधि । वयेत्परया भक्त्या द्रव्यैरयादिभिश्शुभैः ॥४४|| नोभिभू पणेभक्ष्य र्धनधान्यादिभिस्तथा । पा (भूति)तिमभ्यय॑ दद्यातो देवमन्निधौ ॥४|| रामध्ये तथा होमे योगे च जपकर्मणि । गतं पञ्चकालज्ञ संपूज्यवाचरेत्परम ।।४६।। णं गां गुणवती भूमि वृत्तिकरीमपि दागवताभ्यो मोगमोक्षाधये सुधीः ॥४४॥ कुम्भः पवित्रान्तैः फलमूलादिभिस्तिलः । वाद्यरुपयोगार्हस्तोपयेत्सात्त्यतोत्तमान् ।।४।। संवदात्मनो नित्यं यत्ख्यातं सद्गुणोज्ज्वलम् । नवेद्य जगद्धात्रे दद्यात्सत्कर्म योगिने ॥४६॥ मन कुम्भे प्रियं यत्स्यादम्बुवस्रोदनादिकम् । मन्काले प्रदातव्यं तेनेष्ट्वा पुरुपोत्तमम् ॥५ull शष्ट वस्तु संपाच हृय पुप्पोदनादिकम् । नेप्ट्वा तददत्त्वा च समश्मन्नरसूकरः ।।१।। नं सुसंस्कृतं हय भगवबामणाग्निभिः । यवर्गस्तथा भुक्त भोज्यं विषमतोऽन्यथा ॥२॥ घिमपि वा स्तोयं प्रभूवं स्वल्पमेय वा। वत्प्रीतये नित्यं दवाच्छुद्धाय योगिने ||३|| २८३४ शाण्डिल्यस्मतिः ये तोपयन्ति निरतं पधमालपरायणान् । सकामातरमलं यान्ति निष्कामाः परमं पदम् ॥ गृहे भागयते प्राप्त तदिटमुपलक्ष्य थ । अअसा सप्रियं कायं यथाई भ्रमनुत्तये ॥२ आसनराद्यान्यजनरुचितोक्तिभिः । पादसंगाहनाभ्यहरतियिः पूजयत्प्रियम् ।।१६।। प्रहश्वदनं दत्वा याक्यं प्रियमथासनम् । प्रदेयमनसा नित्यं संप्राप्ते भगवत्परे ॥१७॥ पूज्या नित्यं भगवतस्सन्निधाने विशेषतः । अनन्याः पञ्चकालज्ञा न कदाचिदथेतरे ।।५।। अन्नमम्बूनिवस्त्राणि पात्राणि सफलादिकम् । इष्टमिष्टावशिष्टं वा दद्यान्ना पश्चकालिने ॥६॥ सर्वपापप्रशमनं सर्वदु खनिवारणम् । भगवद्भुक्तमन्नाद्यमयोग्येभ्यो न योजयेत् ॥६०॥ अयोग्ययोजनादेव योग्ये चाप्यनियोजयेत् । भगवद्भुक्त भा(ण्डा)नां प्रायश्चित्ती भोन्नरः ॥६॥ भगवद्भुतमन्नाद्यमज्ञानाद्योऽवमन्यते । इह निकता प्राप्य जायते स पुरीपभुक् ॥६॥ पवित्रं भगवद्भुक्त' सेवयाभ्युपयुञ्जते । भवन्त्यरोगास्सुखिनः पापदोपविवर्जितम् ।।३।। आराध्यैव जगन्नाथं तच्छेपं नापरा अपि । त्यकभक्ताचंना व्यर्धा अरसा ऊपराम्बुवत् ॥४ ॥

२८३५ विष्णुभक्तानां गृहमेधिनां धर्मः अभावे कारिणं कारि मनसाचार्यमर्चयेत् । तत्तन्मन्त्रस्तथाद्रव्यैस्तृणं कृत्वा महीतले ॥६॥ आचार्यस्य पितुश्चव स्वामिनो द्रव्यमर्हति । शिष्यः पुत्रस्तथा दास इति तद्भोक्त्तुमर्हति ॥६६।। ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्यं शूदं स्त्रियमथेतरम् । पूजयेत्तान् यथायोगं भगवद्योगभावितान् ।।६।। दिव्यशास्त्रानभिज्ञोऽपि भक्तिमान्पुरुषोत्तमे। अभ्यसूयाविरहितश्शास्त्र पूज्यस्स सात्वतैः ॥६॥ अकृत्रिमा भगवति प्रीतियस्मिन् प्रदृश्यते । भक्तपु वाच्य एवायं वाह्यलिङ्गधरोऽपि वा ॥६६॥ वैष्णवोऽहं प्रदो(द)होति याचिते येन केनचित् । नावमन्येत तं विद्वान् तपेयेदन्यथाऽपि च ॥७०) अविज्ञाता अनः सामान्या ये गृहमेधिनः । देवानिवेदितव्यस्तयेत्तदसन्निधौ १७१|| मुक्त भगवता यद्यद् गुरुशेषमथापि वा। हुतशेपं ततोन्टिष्ट भक्तिहीने न योजयेत् ।।७।। अवस्य भोजनीयानामभागवतवेदिनाम् । लौकिकानिपु पक्वेन कार्यमन्येन तर्पणम् ।।७३|| प्रापणं साधितुं नित्यमशक्तस्सदामिना । योग्यगेहारतेनापि साधयेज्जुहुरादिह ।।७।। प्रापर्ण भगद्भुक्तं स्या भागवन तत् । पुनरिष्टय भोगव्यं दानं तस्य न चेष्यते ।१७।।

२८३६ शाण्डित्यस्मृतिः अनपितं भगवते वाराध्याय स्वतन्त्रतः । गप्पा गुरुने कम तदव्यं यस्य तस्य तन् ॥७६ कमणा मनसा याऽपि यथाकालं यथावलम्। स्वाराध्याय निवेग व सवं भुञ्जीत बुद्धिमान् ।।354 शुद्ध न्यायेन संप्रान साधितं साधुयत्नतः । अभोज्यमेव जानीयान्निजमन्त्रानिवेदितम् 1151 मूर्त्यन्तरेण संभुक्त अयत्नेन समागतम् । स्वमन्त्रमूर्ति सञ्चिन्त्य मनसा तत्समर्पयेत् ॥६॥ स्वत आत्मनि देवेश शेपभूतोऽप्यहं गतः । तयास्तीति यदन्छुद्धस्तथा वन समन्धितः ||८|| मुमूर्पवस्तथा बाला भगवत्पादयोः परैः। समय॑न्ते तथाशक्त भॊज्यमन्नं निवेदितम् ।।८।। तथा स्वाराधनेनैव न प्रीतो भगवान् हरिः। यथा भागवतश्रेष्ठपादाम्बुरुहपूजनात् ।।८।। यथा कु(को)दुम्मिश्रीमान् कुमारैरनुमोदिते । अनादृतसुनं गेही पुरुपं नाभिनन्दति । तथाऽनर्चितसद्भक्त भगवन्नाभिनन्दति ॥४॥ यस्य यस्याधिकं दृष्ट्वा भक्तिज्ञान क्रियामपि । तं तं समर्चयेत्पूर्व यथा क्रमयोगतः ॥८॥ निर्धनांश्चरतो लोके वृत्त्यर्थमिव स(सात्वतान् । नावमन्यत तेर्लोक मपात्री कुरुते हरिः ।।८।। मोदिते भगवान् तेस्तैस्तथा नियतमानसः ।।८३ ॥

विष्णुभक्तानां गृहमेधिनां धर्मः
ये पाचयन्ति धरणी चरन्तो पाञ्चकालिकः ।
दर्शनाद्भापणात्तेषां कृतार्थाः सर्वजन्तवः ||८||
अभ्यर्च्य श्रद्धया प्राप्तान सर्वानभ्यागतातिथीन ।
पापण्डवय॑मन्नाद्यरग्निकार्य समारभेन् ।।८।।
लवणं चोदकं हित्वा कर्मण्यं यद्यदाहृतम ।
सत्सवं जुहुयादग्नी तिलपुप्पीदनादिकम ।।८।।
यदन्न साधित
साधु प्रापणार्थ प्रयत्नतः ।
भगवद्भुक्तशेषेण तेनैव भगवक्रिया ||ll
यथा व्योम्नि यथा वेद्या योगे ध्याने यथोदितम् ।
कुटुम्बाश्रमनिष्ठानां तद्वदमि पूजनम MEn
पापक्षयक्रियापूर्तिस्सर्वोपद्रवनिग्रहः ।
शुद्धिश्चित्तप्रसादश्च तस्माद्धोमं न लोपयेन ॥६॥
निपिद्धद्रव्ययोगेन पञ्चकाले निपेवणाम ।
श्रद्धया जुद्धता नित्यं नाराध्यमिह किंचन ।।३।।
आवाह्यानो जगन्नाथं मनसाभ्यच्य शक्तिवः ।
जुहुयात्काप्टपुष्पान्नं घृतक्षीरविलादिकम ।।४।।
श्रद्धया परया हुस्वा यथाविधि विधानविन ।
संविभागं च भूतानां कुर्याद्भगवदप्रतः ।।६।।
भृत्याच द्विविधा झया प्रेता जीवास्तथैव च।
प्रेता मृतास्ववंशेष जीवा जीवन्ति वै गृह ||
पितृपुत्रकलबाद्या दासोदाससमाश्रिताः ।
रक्षणीया गृहे ये स्यु भृत्या जीवा इमे स्मृताः ॥१७॥

२८८ शाण्डिल्यामूतिः गया य ययाराफि मुविमग्यान्नमम्बुच । दशास्पितन् समुदिश्य भगवम्मानयोगिने ||६|| चत्वारो यहयों द्वौ वा सम्यम्नान्येक एव वा। पूज्या नित्यं प्रयलेन पित्रथं भाग्यसंपदा । स्वल्पेरप्यन्नपानायः पादोदकविमिश्रितः। भुक्तभंगवता सन्तं सोपयेपितृतृप्तये ॥१००। पितरं मातरं पुत्रान् कलत्रं मित्रमेव च । विभर्ति वा यथागेही प्रेतभूतांस्तथैव सः ॥१०२।। कृशान् भागवतान् प्राप्तान् दरिद्रानध्यकर्शितान् । तैलान्नयस्रपानाद्यः पुरस्तान् वासयेद् गृही ॥१८३।। निन्दन्ति ये भागवतानज्ञानात्पापचेतसः । : गृहे भागवतं प्राप्तमज्ञानाद्योऽवमन्यते । भोजयेद्भोजनीयांस्तान् गुरुपूर्व कुटुम्बिकः । पितृमातृक्रमेणेव दासान्तं प्रीतमानसः ।।१६।। कास्यं कुम्भोदलं पापालाशवटपल्लवम् । नातिदोपावहं कांस्यं भोजनेश्वत्थ एव च | भिक्षा वा भिक्षवे दद्यात् पित्र शक्तिवजितः । प्रत्याचक्षीत नाल्पान्नं पानीयं लवर्ण सति ॥१० ॥ न दद्यात्सर्वथा तेभ्यो वाचं वार्यापि वाङ्मुखम् arls नष्टश्रीको भवेत्सद्यः क्षीणायुः पुण्यसञ्चयः ॥१ ॥ अश्वत्थपल्यं चैव पात्रं कुर्यान्न भोजने ॥१०७ll कुदम्बिनामकामानामितीच्छन्ति हि केचन ॥१ ता

गृहमेधिनाधर्मवर्णनम्
२८३६
पानंदाच शैलं च मृण्मयं पाणिमेव च ।
आयसं वर्जयेद्योगी भूपृष्ठ वखमेव च ॥१०६।।
हैम रौप्यं च तानं च कदलीनालिकेरकम् ।
कारयेद्भोजने पात्रमन्यत्कर्मण्यवृक्षकम् ।।११०||
कर्मण्येष्वपि भिन्नेषु नाश्नीयात्तैजसेषु च ।
निक्षिपेन्नच ताम्रपु दधिक्षीरघृतादिकम् ।।१११||
चतुरश्रेषु शुद्ध पु सद्यः प्रक्षारितेपु च ।
भूमि संस्पृष्टपार्श्व' विष्टरेपु क्रमाविशेन् ।।११२।।
पालाशवटतालानामश्वत्थस्य च काष्ठजम् ।
चक्रादिलाञ्छितं भिन्नं वर्जयेदुनमासनम् ॥११३॥
वेत्रचर्मकृतं चैव तालपत्रकृतं कुशम् ।
आसनं वर्जयेद्भुक्तौ यागयोगोपयोगि च ॥११४।।
स्पृष्ट्वा भुवं पदापण पात्रं सव्येन पाणिना।
अश्नीयान्मन्दमावृत्त्य पादौ चनान्तरेण च ॥११॥
अकनारोहयेत्पादं पाणिना नाप्रमेद् भुवि ।
अङ्गवा न स्रोपट्या पादं पादान्तरेण पा ।।११६।।
उपलिप्य शुचौ देशे निश्चिद्रं चतुरश्रकन् ।
सविताने सदीपेच भोक्तव्यं भगवन्मयः ।।११७॥
वेवासनस्थे पात्रे घनाश्नीयान्नासने स्थिते ।
नाकं स्ये दारुसंस्थ प नाकेशेनाकारिते ॥११॥
नाश्नीयाग्छयनारूढो न दीपे निहते पुनः ।
नएष्ट्वा केशझीटाघ मविष्णवदर्शने ॥११॥

२८१ शाविल्यस्मृतिः पानीयं न पियेगांगी शमानकादिमुद्रितः । शन यायसेनारि पनायादिभिस्तथा ॥१०॥ कुर्वन् सुभोजनं कम्मं सर्वेषु गृहमन्यपि । प्रसादस्ताननुशाप्य सहाश्नीयात्प्रहयोः ॥१२॥ बालवृद्धातुरान्दासानात्रितान् मातरं गुरुम् । प्रक्षाल्य पादायाचम्य द्विराद मुस्खवत्करः। इज्या प्रदेशाभिमुखं समस्नीयात्प्रसन्नधीः ॥१२३॥ जपभोजनहोमांस्तु देवस्याभिमुखं चरेत् । विशुद्धकोष्ठद्धाग्निः पादाम्यु कुसुमादिभृत् । करिंभपवित्रं च प्रणवं च पडक्षरम । संविभागावशिष्टेन कारिदत्तावशेषितैः। हुतशेपेण संयुक्त यदन्नममृतं तु तत् ॥१२७॥ नावश्यं भोजने मौनं कुटुम्बाश्रमवासिनाम् । वाचोपचारः कर्त्तव्यो भोजने भुञ्जता सह ।।१२।। भगवत्पादतोयेन मोक्षयित्याऽमृतोदनः । अयण परिपिच्यान्न कारम्भेण मन्त्रवित् । पितरं चागत ज्ञात्या गृही भोजनमारमेत ॥१ ॥ भगवत्पादयोर्योज्य ( :) शिरस्शयनमाचरेत् ॥१४ ॥ पवित्रवेपरशुद्धात्मा भुञ्जीतान्नपवित्रितम् ॥१२ ॥ जप्त्वा ध्यानपरोश्नीयात् तन्मयोज्नमनाकुलः ॥FH ध्यायन्नन्नगतं देवं जपन्मूलं चतुर्गणः ॥१२६ || इदमन्नं जपेन्मन्ला स्पृष्ट्वा भोज्यामनाकुलः ॥१३ ॥

गृहमेधिनां धर्मवर्णनम्
२८४१
धातारं हृदयान्तस्थं ध्यात्वा पादाम्बुजपूर्वकं ।
तदास्ये जुहुयादन्नं तत्तन्मन्वैस्समोहितैः ।।१३।।
ध्यायन्नेवं परब्रह्म भोक्तारं हृदये स्थितम् ।
अश्नीयादत्त्वरो मन्त्री भोज्यं सर्वमकुत्सयन् ।।१३२।।
विशिष्टभोज्यमायातमनिवेदितमन्तरा ।
अर्यापयेदनेनान्तस्सुतांशष्यादिभिः परम् ।।१३३।।
क्षुद्रं वस्तु समायातं मनसा तन्निवेद्य च ।
अग्नीयान्मिश्रितं कृत्वा साक्षात्पूर्वनिवेदितः ।।१३४।।
निष्कल्मपो भवेन्मर्त्य एवं शुद्धान्नभोजनात |
प्रसीदन्ती इन्द्रियाण्याशु सत्त्वं च परिवर्द्ध ते ॥१३।।
अन्नशुधव सत्त्वस्य विवृद्धिस्सर्वदेहिनाम् ।
सत्त्ववृद्ध्यैव सत्कर्म निरते वर्जयेत्यसन् ।।१३६।।
आरोग्यं रूपवक्ता च कीर्तिःश्रीज्ञानमेव च ।
शान्तिस्सत्कर्मणि श्रद्धा शुद्धान्नेन भवन्ति हि ।।१३७॥
काम क्रोधस्तथालोभः परहिंसारुचिस्तथा ।
निद्रालस्यादयो दोपा अमेध्यान्ननिपेवणात् ।।१३८।।
अशुद्धानाशनात् पुंसा रोगावाहास्तथान्तरा।
शत्रुवृद्धिमहद्रोहस्तामसीगतिरेव च ।।१३।।
परदारपरद्रव्यसव्य( :)संसक्ति र्दुष्टभोजनान् ।
कार्ययुद्ध्येव कालेन क्रियन्ते ते व्हेतिभिः ॥१४॥
शनैशनैः क्रिया साध्वी विगलय्य यथादि वा।
अस्यन्तामेव भोज्यानि भोक्तुं मृगयते नरः ॥१४॥

२८५० शाण्डित्यस्मृतिः गले मरकर्मणा रूपादमेभ्यस्य निपेवणात् । विषयेप्यभिषाहानामायुः प्रभोयतेऽन्तरा ॥१४॥ पथ्यं मितं प शुद्ध च स्यं हृदयनन्दनम् । स्निग्धं दृष्टिप्रियं चोष्ण मन्नं भोज्यं मनीषिभिः । भगवद्यागयोग्यं यत्तदेवाशनकमणि । भोजनाईमिदं देव यागाङ्ग इति नेप्यते ।।१४४॥ अन्येभ्यो दापयज्ञस्या नग्नीयात्सहबान्धवैः ॥१४॥ शक्तिहीनो यथाशक्ति दापयन्नन्नमम्बु च । पिवेद्भोमनपात्रेण पाणिना पानभोजने । पीत्वावशिष्टं चपके पुनरवान्न पिवेजलम् । आद्यादाद्यन्तयोरार्द्रा मध्ये स्विन्नमिवोदनम् । अन्नोपदंशपानीय स्त्रिभागमुदरं भवेत् ॥१४॥ ये भुञ्जते समीपस्था ये भोक्ष्यन्ति ततः परम् । सर्व तन्मनसा बुद्ध्या तदहमशनं चरेत् ॥१५८ भगवद्गुक्तशेपं यद् भुक्त भागवता तथा । तदेव भोज्यमुद्दिष्ट भगवद्योगसेविभिः ।।११।। वासोभूषणपुष्पाणि गन्धं तैलं तदोषधम् । सवं भगवते नित्यमुपयुज्यान्निवेदितम् ॥१५॥ न भत्सयन् यालपुत्रान् नावदन् न च भार्यया । भृत्यवर्ग समाश्नीयात् तेभ्यो दत्वा कदाचन ॥१४ ॥ प्रभूतं न पिवेत्तोयं नापिवन वाशनं चरेत् ॥१४ ॥ शाकाद्यनोत्सृजेतथाल्यः पाणिना वापि भुञ्जनाम Itra

भगवत्पूजाप्रकारः
२८४ः
स्नानाचमनपानार्थमहणाद्य बदम्बुवत् ।
उपयुक्त भगवता पानीयं तत्प्रकल्पयेत् ।।१५६।।
भोजनाद्य तथादिव्यं पादाम्बेकं समन्त्रकम् ।
पीत्वे(पिवे)दवश्यं सद्भको मिश्रितं वाहणादिभिः ।।१४।।
भोजनं भगवत्कर्म यद्यपि स्यान्मनीपिभिः ।
न कार्य भगवद्गेहे विशेषाद्देवसन्निधौ ॥१५॥
तनयोऽहमिति ज्ञात्वा पात्रं शय्यासनादिकम् ।
उपयुञ्जन् भगवतः पातिन्या यत्प्रकल्प्यते ॥१६॥
तन्मयत्वेऽपि पुत्रस्य पितुः पुत्रो यदाभवेत् ।
नित्यं भिन्नश्च स यथा तथा भागचत्तो हरेः ।।१५७१॥
भुक्तोत्सृष्टं भगवता स्वात्यं तस्मै निवेदितम् ।
उपयोज्यं भवेत्सर्व नासा कार्य समाचरेत् ॥१५८।।
फलवयमपूपं च गुडान्नं पायसं तथा।
सर्व भगवते दत्तं भोज्यं तन्मन्त्रमूर्तये ।।१६।।
चन्दनं गन्धपुप्पं च खण्डं कर्पूरमेव च ।
नोपयुञ्जीत राजाईमन्यञ्च न समर्पितम् ॥१६॥
स्वसूकरहतं यस्यादुन्छिष्ट यच मानुपम् ।
नावद्यपि तदश्नीयात् दद्याद्वातापि कर्मिणे ।।१६।।
मापादिचूर्णम दिवा प्रक्षाल्यं करयोदयोः ।
प्रक्षाल्य जानुपादौ च दन्ताकाप्टविंशोधयेन ॥१६२।।
विशुद्धपदनो मन्त्री स्वाचान्तो द्विरनाकुलः ।
प्रविश्य भगवद्गेई नत्वा पुष्पाञ्जलि परेत् ॥१३॥

२८४४ शाण्डिल्यस्मृतिः आदाय तुलसी त्यक्ती भगवत्पादमण्डिताम् । भक्षयेच्छोधये हैं भगवत्पादवारिणा ॥१६॥ भक्षितं भगवत्पादसंस्पृष्ट तुलसीदलम् । ' . आरोग्यं भक्तिद्धिं च पापहानि करोत्यपि ॥१६॥ अष्टाङ्गयोगप्रीति च कृत्वा ध्यानपरो वशी। स्वाध्यायमपि सङ्कल्प्य यथाशक्ति जपेन्मनुम् ।।१६६१ स्तोत्रपाठेश्य सन्तोप्य शक्तश्चेद् गानविद्यया। स्वरयोगेन देवेशं तोपयेद्भक्तिद्धये ॥१६७।। पञ्चकाटकमपरा गानविद्या विशारदाः। शुद्रापारा महात्मानः पूज्या भागवतास्वयम् ।।१६।। मुस्निग्धकण्ठारतालमारस्वराचारादिवेदिनः । मागधाभिनया: पूज्या अनिन्द्याभगयानिह ।।१६।। भषया पुलफितस्यान आनन्द परिप्लुतः । गद्गदस्वरयोगध यथा हिस्यात्तथा घरेत् ।।१७।। अतिरेला यदि भो भक्तिसंकोचनादिभिः । नहा नोपरमेसरमात्र याक्रियते मुदा ॥१७॥ नताम नामप्यनलाजोगतक्लमः। अनुय हरिमाया शनारमन्यया ॥१७॥ मानवशासमधामन गानेन पुरुषोनमम् । वोपन यथारा मनायगन्निधौ हरे॥१॥ अरमायनस्यान्न बाध्यायानोतिया। नभ्यायोगान्त गानारायमिurall सच्छास्त्रश्रवणनपठन महत्त्ववर्णनम् उपरम्येच्छनै विद्वान स्तुतिगीति जपादिकान् । तोपयेदव्युतं भक्त्या भक्ष्यापूपफलादिभिः ।।१७।। समालिप्य जगन्नाथं कर्पूरागुरुचन्दनैः । कर्पटयञ्जनर्वाऽपि यथाकालं समर्चयेत् ॥१७६।। भावयन्तो जगन्नाथं बोधयन्तं परस्परम् । सुसंभूय कथाः कुर्यात् सच्छास्त्राणि विलोकयेत् ।।१७७६! सत्कर्मसततं कुर्यादऽसत्सवं च वर्जयेत । एकमेकायनं शास्त्रं साक्षाद् ब्रह्मप्रकाशकम् ।।१७८।। अन्यानि सर्वशास्त्राणि वदन्त्याच्छादा तत्परम् । सच्छास्त्रपठनैरसद्भिशास्त्रार्थस्यापि शिक्षया ।।१७।। शाखार्थज्ञापनर्वाऽपि शिक्षयेच्छास्त्रमादरात् । व्याख्यायालेखने नापि प्रन्थनिर्माणकर्मणा ||१८०। शिप्याण शिक्षया वाऽपि स्वाध्यायार्थेन मुच्यते । न स्मर्तव्यो विनीतेन वेदमन्योऽप्यवैष्णवम ||१८|| काव्यालापोऽपि अयोऽसौ यत्र संकीयतेऽच्युतः । गन्तव्यं यदि तीर्थार्थमुपादानार्थमेव वा ॥१८२।। स्वाध्यायकाले गमनं प्रारम्भोऽथ यथासम् । अवश्यमिप्ट्वा हुत्वा च दत्वा चैव यथाबलम् ॥१८॥ गन्तव्यमिष्टसिद्धच भगवद्योगसेविभिः । शुभेऽनुकूले नक्षत्रे मुर्तेऽपि र मङ्गले ॥१८४|| दोपाध्वानं प्रजेद्विद्वान् ससहायोऽप्रमत्तयोः । योनि देवं यजेन्नित्यं पाहुभ्यो न नदो तरेन् ।।१८।।

२८४६ शाण्डिल्यस्मृतिः सन्दिग्धान्नाश्रमे नावन्निवेद्यारोहयेद् बुधः । प्रयाणारम्भसमये मध्ये विश्रम्य चोत्थिते ॥१८६॥ आचम्य पुनरुत्थाने कर्मारम्भं जपेद् बुधः । वल्मोकं गोमयं चैव छायामश्यत्यतालयोः ।।१८७१ न लक्ष्यन्त्रद्विप्रो गवां नित्यमनापदि। छायायां विश्रमेन्नाऽपि कलिस्तस्यां हि तिष्ठति ।।१८८ शास्त्राभ्यासपरस्यापि शास्त्रे भक्तिः सुदुर्लभा। शास्त्रे भक्तिमतामेव ह्यलभं शाश्वतं पदम् ॥१८६१ श्रवणं श्रावणंचिन्ता तदर्थे तस्य सङ्ग्रहः । चोदितानामनुष्ठानं शास्त्रे भक्तस्य लक्षणम् ॥१६०il शास्त्राभ्यासपराणां च कर्मचाप्यनुतिष्ठताम् । हृदये भक्तिहीनानां न शाहां तु प्रकाशते ॥१६॥ अभक्तानामनाणां सन्छास्त्रं श्रूयतेऽपि वा। प्रकाशयितुमात्मानं भक्कानो हितकाम्यया । अवतीणों जगन्नाथः शास्ररूपेण वै प्रभुः ॥१६॥ वस्मान्छाखेता कार्या भक्तिमोक्षपरायणैः। अभयस्य परे शास्त्रे भगवान्न प्रकाशते ॥१६|| वामसाना विमूहानी पतितानां भवागरे। विपरीतं च सरलं धर्मज्ञानं प्रकाश ॥१६शा समाणिक्यो विरलापरवेष्टितः। घयत विवरैरव भन्मान्तः संस्थिता लि अन्यथा प्रतिभात्येव विपाताना यथा पयः || १६ ||

योगविधिवर्णनम्
२८४७
निष्प्रदोपस्यगेहस्य द्वाररिव दुरात्मनाम् ।
दृश्यते करणेरन्तरन्धकारसमं निशि ॥१६॥
हृदयस्थे जगन्नाथे कार्यकारी प्रियं भवेत् ।
कालयोग्यं च कृत्वैव योगं भोजनमाचरेत् ॥१६॥
राज्यामजस्रयोगासन यथाकामं समाचरेत् ।
भगवत्सन्निधाने वा चिचिक्तोऽन्यत्र वा स्थले ॥१६॥
योगं कुर्यात्समाधाय यथास्थानासनो वशी।
उपलिप्ते शुचौ देशे कुशानास्तीय भूतले ॥२०॥
शुद्धयासनं समाधाय वस्त्रेणाम्तृणुयाच तत् ।
चोरगुप्लकृतं चर्म मागं वेत्रकृतं तथा ॥२०॥
अजिनमेकवस्त्रं च योगेस्यादासनं दृढम् ।
ईदृशः परमात्मा यः प्रत्यगात्मा तथदृशः ॥२०२।।
सद्धमांनुसन्धानमिति योगः प्रकीतितः ।
योगानामिन्द्रियैश्य बुद्ध ब्रह्मणि संस्थितः ।।२०३॥
वदन्ति न तथा शेयं वयमेकं विदुर्बुधाः ।
भक्तियन्न वियोगेन यथाचित्रं न लभ्यते ॥२०॥
कर्मज्ञान तथा योग विना योगो न लभ्यते ।
अज्ञस्त्वेकायनाचारं कर्मयोग वदन्ति हि ॥२०॥
सम्यग्ज्ञानमिदं प्राधा वदन्यच्युतयोगिनः ।
योगो धर्म इति (प्रोक्त) साक्षाद्भगवतो विधिः ॥२०६।।
सर्वेन्द्रियैरपि सदा योगो युज्यत इत्यतः ।
अनुसन्धान विज्ञानयोगेन ब्रह्मशाश्यतम् ॥२०७॥

८१८ शागिरपतिः अगामिदिमागमा ....... • PC Infante गह भगवानरः। गया गया हरि मग जानानि पुगंतनम् नमा गया ममुनगाय पानि मते मुभन्। महापारम्य यमगंगा यात १८ill पिम्ला भगिरति पोदयं तममायनान् । रजस्तमः सयादेव शुद्ध सत्तं ततोऽमलम् ।।२११॥ फर्मणा मानमिण सिरप्रमोभवेत्पुमान् ॥२१॥ सत्प्रकाशे तु न तमो रजोया पत्तते कचित् । शुद्धाचारपरत्वं हि युद्धसत्यस्य लक्षणम् ॥२३॥ निपिद्धकाम्ययोगध सत्त्वतरगुणोद्भवः । अक्लेशेन सुमुक्तियं भवाब्धि याति तत्परम् । वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञ शश्वत्स्वाध्याय तत्परः ॥२१॥ योगधर्मकनिरतो ब्रह्मभूयाय कल्पते । भक्तानां पातकान्याशु नाशयत्यवशादिय ।। यजतो जुबां चैव जीवन्मुक्तिर्व्यवस्थिता । उपवासंविनवायं महापातकनाशनम् ।।२१८॥ मानं भवति विज्ञानात् भक्ति : पंसा प्रजावट । सच्छात्रनिरतायैव शुद्धसत्वा हि योगिनः ॥२१४ ॥ सकृदेवातितोऽयेप : स्वाध्यायोद्वादशाक्षरम् ॥२१ ॥ नित्यं स्वाध्यायशीलानां स्वाधीनेन्द्रियवृत्तिनाम् ।।२१४ ॥

. उपवासप्रशंसावर्णनम् २८ निपिद्धकर्मणि संप्राप्त सोपवासं जपेन्मनुम् । परिहत्य तु पापानि जपन् कुर्वन् सदा क्रियाम ।।२१६ उपवासपरो भूयः स कृच्छ्राणि समाचरेत् । उपवासपराणा तु कदाचिन्नेन्द्रियभ्रमः ।।२२०॥ इन्द्रियभ्रमहीनानामचिराद्ब्रह्म सिद्ध्यति । अक्षतर्पणयुक्तानां यततामपि योगिनाम् ।।२२।। नित्यं पार्श्वगतो मृत्युः सर्वसंजीविनामिव । अवश्यं भवसन्तारमिच्छन्नविजितेन्द्रियः ॥२२॥ शरीरं शोपयेन्नित्यं कच्छचान्द्रायणादिभिः । उपवासपराणां तु केवलं नाक्षनिग्रहः ।।२२३॥ क्रियमाणं कृतं यद्वा सर्व पापं विनश्यति । एकरात्रं द्विरात्रं वा विरात्रमपि पक्षयोः ॥२२४॥ यथाशक्युपवासी स्थायतवाकायमानस. । एकादशीमुपवसेदिनपट्कं तु शक्तिमान् ॥२२॥ अवर्णकादशीसवं कृष्णाष्टम्यास्यमादरात् । उपोप्यैकादशी वाऽपि भगवत्प्रीतये बुधः ॥२२६।। स्वाध्यायतत्पररशश्वत् द्वादश्यां पारणं चरेत् । उपोप्य विधिववमभ्यर्च्य च पदेऽहनि ॥२२॥ भक्त रसहारनता पुष्टिर्न श्वेतद्वीपवासिनाम् । उपवासदिने विद्वानात्मयागं विनैव तु ॥२२॥ अन्यत्समाचरेत्सवं यथापूर्व तु विज्वरः । अथवा जपनिष्ठाना दातां मितभोजिनारा २८५० शाण्डिल्यस्मृतिः अच्छिद्रकारिणां नित्यं पाञ्चकाल्यमलं भवेत् । स्वाध्यायमभ्यसेन्नित्यं मनसा मौनमावहन् । अविरोधेन भूतानां मुच्चद्वाचमनाकुलः । यदुद्वगकरं वाक्यं अन्याथर्थावबोधनम् ||२३E असत्यं निहताधं च नोश्चरेदपि गहिताम् । अर्थयुक्त (च) सत्यं च श्राव्य प्रियकर मृदुः॥२३२ शुद्ध मितं च सिद्धच कालयोग्यं वदेद्वचः। वेदविद्यावतस्नातै ह्यान्तसमचेष्टितः ॥२३॥ असूयारहितैरस्मिन्छास्त्रे भक्त समाचरेत् । मूर्खाश्व पण्डितंमन्या अधा ह्यास्तिका इव ||२३४- धर्मयुक्तान् प्रवाधन्ते साधूना लिगमास्थितः । एकतस्त्वपवर्गार्थमनुष्ठानादिकौशलम् ।।२३।। लोकानुसारस्त्यैकत्र गुरुः पश्चादुदीरितः । पासितोऽपि यथा मूबरचलो यासबुद्धिमान् । पापिष्ठा वावर्पण मोहयन्त्यविचक्षणान् । गोपयन्नाचरेद्धमान् नापृष्टः किश्चिदुसरेत् ॥३८॥ पृष्टोऽपि न वदेदध गुश सिद्धान्तमेव च। आधिनायाविभक्ताय शाम्रपदापराय च ॥ न्यायेन पुस्ते सवं याम्यं शौचयोगिने। धमा मायममिमिनधी भवन्ति बहवो भूसाः कचिदेकोऽपि मुद्भधीः न विश्वासः क्वचित्कार्यों विशेषात फलौ युगे ।

रात्री योगकालेकृत्यवर्णनम् २८५१
अयोग्येषु वदच्छास्त्रं सन्मार्गात् प्रच्युतो भवेत् ।
ऊपरे निपतेद् योजं पण्ढे कन्या प्रयोजयेत् ।।२४।।
सृजेद्वाचा नरेमाला नापात्र शास्त्रमुत्सृजत ।
अच्छिद्रकर्मनिरतः शास्त्राभ्यासपरस्सदा ।
स्वाध्यायाभ्यासयोगेन नयेत्कालमतन्द्रितः ||४||
इति शाण्डिल्यधर्मशास्त्रं व्रतादिविधाननिरूपणं नाम
चतुर्थोऽध्यायः ।
अथ पञ्चगोऽध्यायः
रात्रावन्यायमे योगमृत्यवर्णनम
न्यामिन्या योगकाले तु यत्कार्य योगिभिर्नरैः।
वक्ष्यामि वस्समासेन गुध्वं मुनिपुङ्गयाः ।। १ ।।
व्यथ वृक्षप्रमाणेन दृश्यमाने दिवाकरे।
वेधाय देहशुद्धि च वासोऽपि परिधाय च ॥२॥
क्षणाचमने कृत्वा दद्यादध्यं च पूर्ववत् ।
न्यायन्नेवापरं ब्रह्म यावनक्षत्रदर्शनम् ॥३॥
पेद् मझ पवित्रं वा मानसं मौनमास्थितः ।
भिगम्य यथापूर्वमर्चयित्वा यथाविधि ॥ ४॥

--- २८५२ शाण्डिल्यस्मृतिः हुत्या जप्त्वा तथा स्तुत्वा योगं कुर्यादतन्द्रितः। पुप्पानुलेपनै-पैरर्यपूर्वेर्यथाविधि ॥५॥ सन्ध्ययोरुभयोः कार्या पूजा परमपावनैः । त्रिकालं द्रव्ययागेन तथा नैमित्तिकार्चनात् ॥ ६॥ भक्तिज्ञानक्रियावृद्धिरविघ्नेनैव सिध्यति । नक्त कुटुम्विकोश्नीयात् हितं पथ्यं सुतृप्तिमान् ॥ ७॥ सर्व' च तिलसंबन्धं दधिशाकं च वर्जयेत् । मुद्गसम्बन्धसवं च शुक्त कालान्तरे भवेत् ॥ ८॥ अपूपवर्ज तच्चापि वर्ण्यमेव दिनान्तरे। शुष्कपर्क तथा वस्तु मघृतं शाकमेव च ॥६॥ बुरी(गुरु)भूतं च गर नीरं न पर्युपितदोपभाक् । दभ्यन्नपायसान्नं च गुडान्नं च घृतोदनम् ।।१८।। अपूपानि च पज्यांनि न पर्युपितदोपतः । द्र पेण पुनःपकारसगन्यान्तरान्वितम् ॥११॥ अन्योपयुक्तरोपं प वर्य स्याद् गव्यवर्जितम् । भक्ष्यापूपफलादीनां शय्यानामपि पू (य)शः ॥१० तरसंवन्धानुसन्धान मिनि योगः प्रकीर्तितः । योगान्नामेन्द्रियैवेश्ये शुद्धशाणिसंस्थितः ॥१३॥ प्रयुक्त रपयुवा भगवरसमविस्तरः। आमास मानिनोमानं योगकर्मयानन (थप)।

योगधर्मवर्णनम् २८५३ कर्मज्ञान तथा योग विना योगान्न लभ्यते । यज्ञास्त्वेकायनाचारं कर्मयोग वदन्ति हि ।।१६।। सन्थ्यज्ञानमिति प्राज्ञा वदन्त्य (१) योगिनः । योगधर्म इति ख्यातः साक्षाद्भागवतो विधिः ।।१७।। सर्वेन्द्रियरपि सदा योगो युज्यत इत्यतः। अनुसन्धानुविज्ञान योगेन ब्रह्म शाश्वतम ॥१८॥ यथाऽहमिन्द्रियैरात्मा सेव्यते सत्रियापरैः । बुद्धि संस्थं परं ज्ञानं थुद्वियुद्ध्यति तत्परम ।।१।। विशुद्धरिन्द्रियरेव वो तच्छक्यते न इन्द्रियाणां विशुद्धित्वं भगवत्कर्म योगिता ॥२०॥ सर्वकर्म निवृत्तिर्वा दुर्लभा सा शरीरिणाम् । असद्विपयसंसृष्टे (रि) इन्द्रिय (वि?) हतामतिः ॥२१॥ न शक्नोति परं इन्तु अविधेयाश्वमेधवित् । भगवत्कर्मसंसक्तरिन्द्रिय विमला मतिः ॥२०॥ प्रयाति तत्परं दीपः पदार्थादिव रङ्निशि। यधान्छिद्रपटस्यान्तः प्रदीपे स्थापिते निशि ॥२३।। ज्योतिर्मयानि छिद्राणि तथा द्वाराणि योगिनः । अमानतमसा पूर्वे हृदयं मूहचेतसाम् ॥२४॥ द्वाराग्यपि ततः पूर्णान्यकृत्वान्येव कुर्वते। सर्वदा योग एवायमेवमेक शाण्डिल्यस्मृतिः निबद्ध-यते तन्निर्मूलं पारतद्रवबिन्दुयत् । अस्थिरे मनसि मोतो विपयाने(व) य(ध)व मनस्तदाहदं मुग्वं रमते सत्प्रवृत्तिभिः । रमते तत्परेणैव स्वाधीना ( ? ) गुण(सद्) सम्यक् सद्विपयेप्वेव निवृत्तैरिन्द्रियैर्मनः IRE सत्त्वं ब्रह्मणि कालेन निष्ठितैरेव तिष्ठति । यदा तु भगवत्पादसरसीरुयोर्मनः ॥३०॥ निश्चलं रमते चित्तं कामकृत्यस्तथा बुधः । नियोज्य सस्क्रियास्वेव खानि वद्ध परे मनः अनिर्जितेन्द्रियो सिद्धो भगवद्योगएव सः जहाति भगवत्कर्म पतितो याति रौरवम् । योगोऽयमेव यागश्च याह्या ये व्याधयोऽभवन् । सर्व शरीरक्लेशाय येषु कृष्णो न चिन्त्यते । उत्सृज्य भगवत्कर्म सन्न्यासे हतसंशयः ॥३३ ॥ निप्पयोजनदेहाना ते न सुलभो हरिः । इन्द्रियाणि प्रवृत्तानि कर्मस्विति न हीयते ॥३४ ॥ हीयते सातियातानि निपिद प्वनृतो यथा । कदाचिन्न चहीयन्ते कार्य ( काम्य ) कमरता अपि । भगवन्तं समुरिश्य तदेकशरणा नरा : Ral भगवद्भक्तिशीलस्याचारवर्णनम् २८५५ तथा तथा स तन्निष्ठो रमते तत्र तत्र च । अभागवत भागस्था क्षीयते वासना यथा ॥३८॥ तथा यतेत पुरुपो मनोवाकायकर्मभिः । सर्वत्र मैत्री कुर्वीत विवादं नाचरेत्कचित् ॥३६।। न नासाचपल: कर्मी न जिह्वाचपलो भवेत् । अन्येपामिन्द्रियाणां च चापल्यं वर्जयेद् बुधः ॥४०।। नान्यैरवमतोदह्यान्नान्यभक्तान्समाश्रयेत् । अधीनं नोत्सृजेच्छास्त्रं न व्र यादनृते क्वचिन ॥४१।। शपथं नाचरेत्पादं संस्पृश्य गुरुदेवयो. । वाचि कर्मणि चित्ते च सर्वदा यश्शुचिर्भवेत् ।।४।। अतन्द्रितश्च शास्त्रार्थ योगसिद्धि स गच्छति । अनुदणच्छत्र वासा नियतामनभोजनः ॥४३॥ अनुद्धतजनयुको योगसिद्धिं स गच्छति । नक्त न संचरेद्योगी संचरेद्यदि दधृक् ।।४४॥ ससहायस्सावकाशः संचरेत्कायगौरवान। रूपं च वृक्षमूलं च सभावासं रिपो हम ॥४५॥ शून्यायतनमेवापि न पश्येन्नक्तमञ्जसा । नक्तमुक्त वक्तव्यं विवादं न स्मरेयुधः ॥४६॥ निप्पदोपे न भुशीत विशेषान्निते पुनः । मापात्रो (१) मास्थाय भुक्ता र मितमत्वरः ॥४॥ प्रोक्षित सपरिवादिरायिशंम्पयनीसमम् । यावन्निद्रा समभ्येति वापदि मनसा उपेन् ॥al -- 7 शाण्डिल्यस्मृतिः निद्रान्तरे प्रबुद्धस्सन् कीर्तयेद्भगवद्गुणान् । सुवरवेषधरया स्नातया दुर्विचित्तया ||४|| अरोगया दयितया स्वयमेवं विनिवेशयेत् (सदावसेन्) या तु क्षयो रोग वृद्धिरश्रीसत्कर्मविप्लवः ॥५॥ सौभाग्यायुर्यशो नाशः पुंसा स्त्रीष्वपि सगिंगा । गायतां भगवद्गाथां कुर्वतां स्तोत्र मुच्चकैः ॥५१॥ शृण्वन् श्रोत्रसुखं नादं निद्रामनुभवेद्बुधः । स्वप्नेषु चैव दृप्टेषु प्रियां भार्य गुरुं तथा ।।२।। विना न कथयेत्खनं अन्येपा (?) नमेव वा । दुःस्वप्नदर्शने सद्यः उत्थायाम्युकृतक्रियः ।।३।। प्रणम्य पादयोर्देवं जप्त्वा स्तोत्राणि कीर्तयेत् । दुःस्वप्नानुगुणं प्रातः स्नानदानार्चनादिभिः ।।४।। फुर्याद्विशेषवकर्म यथा वित्तं प्रसीदति । सुखनिद्रारतः काले भवत्युत्थाय सत्वरः ॥५२॥ प्रक्षाल्य पादावाचम्य युञ्जीतापि यथाविधि । आद्यन्तवर्ज निद्राया योग्यं यामद्वयं निशि ॥५६।। चतुर्थ याममुत्थाय योगी योगं समाचरेत् । साक्षात्परमयोगस्तद्द्वादशाक्षरविद्यया ॥७॥ भगवद्वासुदेवस्य पादाम्बुरुहचिन्तनम् ।

भगवर्पणवुद्ध वजन्मन.साफल्यवर्णनम तदीयं तक्रियाई च तवैवेति निगाते । अव्यक्तार्यतया तस्य प्रणवस्य विशेषत. ॥६०|| वर्थद्योतनादेतमुदितं भगवत्पदम | वासुदेव (१) इतिदन्तस्य चोपरि । नमः परपदं योगादुपरिस्थपदद्वयम ॥६॥ चतुर्थ्यन्तमभून्नित्यं योगिना योगसिद्धये । ओङ्कारपदमेवैकं योगिना योगसिद्धये ॥६३।। द्वादशाक्षररूपेण परिणाममुपागतम । मन्त्रान्तरेप्वपि बुधा देवतान्तरभागिषु ।।६४॥ प्रयुञ्जते तदोवारं मन्त्राणां प्राणसिद्धये । मन्त्रान्तरे प्रयुक्तत्वाद्देवतान्तरगोचरे ॥६५॥ अवार्थस्तथोङ्कारः केवलेनैव धारकं । पकयोगशरीराणामेवं ज्ञानवतामपि ॥६६॥ समासन्नेऽपि तज्ज्ञाने तन्मात्रं नव साधनं । अपयोगज्ञानानामपि वेदविदा नृणाम ॥६॥ द्वादशाक्षरयोगेन दूरस्थं तदिहान्तिके । चिचदर्पणसइकान्तः ससुसं लक्ष्यते हरिः । अतश्च द्वादशान्तेन स्वाध्यायेन जनार्दनम ॥६६॥ अन्यत्रापि च तद्दमित्यनन्यपरं वचः ॥६ ॥ स्मृतमाशे महामन्त्रो सुसूक्ष्मे द्वादशाक्षरे ।।८ ॥ आसन्नता प्रयात्यामु प्राण्यर्पितरुमणा । म्वाध्यायाधोगमासीत योगास्वाध्यायमामने ॥८ ॥

शाण्डिल्यस्मृतिः
निद्रान्तरे प्रबुद्धस्सन् कीर्तयेद्भगवद्गुणान् ।
सुवस्त्रवेपधरया स्नातया दुर्विचिचया ४६ll
अरोगया दयितया स्वयमेवं विनिवेशयेत् (सदावसेत)
या तु क्षयो रोग वृद्धिरधीसत्कर्मविप्लवः ॥५॥
सौभाग्यायुर्यशो नाशः पुंसा स्रोष्यपि सनिगा ।
गायतां भगवद्गार्थी कुर्वता स्तोत्र मुच्चकैः ।।१।।
शृण्वन् श्रोत्रसुखं नादं निद्रामनुभवेयुधः ।
स्वप्नेषु चैव दृप्टेपु प्रियो भार्य गुरु तथा ।।२।।
विना न कथयस्वन्नं अन्येपा (१) नमेव था।
दुःस्वप्नदर्शने सद्यः उत्थायाम्युकृतक्रियः ।।३।।
प्रणम्य पादयोर्दवं जप्त्वा स्तोत्राणि कीर्तयेत् ।
दुःस्वप्नानुगुणं प्रातः स्नानदानानादिभिः ॥४॥
कुर्याद्विशेषवत्कर्म यथा वित्तं प्रसीदति ।
सुखनिद्रारतः काले भवत्युत्थाय सत्वरः ॥५॥
प्रक्षाल्य पादावाचम्य युअीतापि यथाविधि।
आदान्तवर्ज निद्राया योग्यं यामद्वयं निशि ॥६॥
चतुर्थ याममुत्थाय योगी योगं समाचरेत् ।
साक्षात्परमयोगस्तद्द्वादशाक्षरविद्यया ।।७।।
भगवद्वासुदेवस्य पादाम्बुरुहचिन्तनम् ।
ओमित्येकाक्षरं साक्षान् यामुदेवस्य वाचकः ॥८॥
ओमित्युभारणेनैव वाच्यमानीयते परम् ।
ओमित्यानीय तह्मा नमस्कार प्रदेन तु ॥५॥

भगवदर्पणवुद्ध वजन्मन.साफल्यवर्णनम तदीयं तक्रियाई च तवैवेति निगद्यते । अव्यक्तार्यतया तस्य प्रणवस्य विशेषतः ॥६॥ तदर्थद्योतनादेतमुदितं भगवत्पदम् । वासुदेव ( ? ) इतिदन्तस्य चोपरि । नमः परपदं योगादुपरिस्थपदद्वयम ॥६॥ चतुर्थ्यन्तमभून्नित्यं योगिनां योगसिद्धये । ओङ्कारपदमेवैकं योगिना योगसिद्धये ॥६३।। द्वादशाक्षररूपेण परिणाममुपागतम । मन्त्रान्तरेप्वपि बुधा देवतान्तरभागिषु ॥६४ । प्रयुञ्जते तदोवारं मन्त्राणा प्राणसिद्धये । अवक्त्रस्तथोडारः केवलेनैव धारकं । पकयोगशरीराणामेवं ज्ञानवतामपि ॥६६।। समासन्नेऽपि तज्ज्ञाने तन्मात्रं नैव साधनं । अपयोगज्ञानानामपि वेदविदा नृणाम ॥६७। द्वादशाक्षरयोगेन दूरस्थं तदिहान्तिके । स्वाभ्यायाधोगमासीत योगास्वाध्यायमामनेत् ॥all अन्यत्रापि च तदुष्टमित्यनन्यपरं वचः ॥६ ॥ मन्त्रान्तरे प्रयुक्तत्वाद्दवतान्तरगोचरे ॥६ ॥ स्मृवमा महामन्त्रो सुसूक्ष्मेद्वादशाक्षरे | ८ || चित्तदर्पणसङ्क्रान्तः ससुसंलक्ष्यते हरिः । अतश्च द्वादशान्तेन स्वाध्यायेन जनार्दनम् ॥६ ॥ आसन्नता प्रयात्याशु ब्रह्मण्यपितकर्मणो ।

॥श्री:
* कण्वस्मृतिः*
धर्मसारवर्णनम्
कम्यं नत्वा महाभागं मुनयो ब्रह्मविचमाः।
युगभेदप्रभेदेन सर्वधर्मान्सनातनान् ॥१॥
पप्रच्छुरखिलसप्त्ये लोकानां हितकाम्यया।
कण्य वेदविदा श्रेष्ठ सर्वलोकहिताय वै ॥२॥
सर्ववैदिककृत्यानां
मुख्यामुख्यगुणागुणम् ।
प्रविभज्य समासेन सुस्पष्ट कथयस्व नः ॥३॥
मुख्यं कल्पममुख्यं च गौणं काम्यमियत्तमः ।
एवमेतत्तथा नोचेत्साध्या साध्येचतत्परम् ॥४॥
चित्तंसद्यस्तत्रतत्र संप्रहेणानुविस्तरम् ।
सुस्पष्ट सुलभं तुल्ययोगयोग्यं तथा वद ॥५॥
इतिपृष्टो ब्रह्मनिष्ठ इदं प्रोवा च तान्प्रति ।
पृष्टं भवद्भिः परमं रहस्यं स्वर्गसाधनम् ॥६॥
चित्तशुद्धिकरं ब्रह्म ज्ञानकारणमद्य वै ।
न शक्यतेऽन्यरेतद्धिवक्तुं श्रोतुं च कैश्चिदुः ॥७॥
अथापि यः प्रवक्ष्यामि धर्मसारं श्रुतीरितम् ।
मुख्यामुख्ये विभज्यैव चित्तपूर्व द्विजोत्तमाः ॥८॥

धर्मकर्तव्यवर्णनम
२८६१
केया कर्ता कारयिता कारणं तत्फलं हरिः ।
सर्वमीश्वरमेवेति बुद्धिर्यस्य सदास्थिरा ॥६॥
1 एव कृतकृत्यो हि सतु ज्ञानस्य भाजनम् ।
उत्कृतस्य च कार्यस्य वैगुण्यं नैव जायते ॥१०॥
कदाचिदपि केनापि नात्र कार्या विचारणा ।
पत्किंचिद्वा कृतं तेन पारमेश्वरतुष्टये ॥१६॥
दिक्षयममोघं स्यादब्रह्मज्ञानैकसाधकम ।
थाशास्त्रमतं च स्यादशास्त्रकृतमप्यलम् ॥१२॥
रमेश्यरतुष्टयर्थकृतं तस्मात्तथा चरेत् ।
स्मादम् (} सर्वत्र परमेश्वरतुष्टये ॥१३॥
हरिप्ये कर्मचेत्युक्त्वा सर्वकर्माण्युपक्रमेत् ।
परमेश्वरशब्दयेत्यकत्वान्यंशब्दमुत्तमम ॥१४॥
कर्मादिप प्रकुर्वन्ति तानि वैगुण्यमाप्नुयुः ।
सधएव ने संदेहस्तस्मात्तं तादृशरिशवः ॥१२॥
परमेश्वरशद्धं ये कर्मादिपुसमाहितः ।
प्रवदेवादिकः सिद्धिः ब्रह्मशब्दोऽथवा सदा ॥१६॥
श्रीशब्दपूर्वको नित्यं तावन्मात्रेण साक्रिया ।
सम्यक्कृता दोषशून्या सर्वलक्षणभूषिता ॥१॥
सर्वाङ्गोपाद्नसहिता सर्वमन्त्रकृता भवेत्।
देश.कालच वक्तव्यः कर्मादी प्रहं द्विजैः ॥al
वत्र देशाखिलानt प मेरुदक्षिणभागगः ।
पटपधारात्मभेदेन कधिवस्त तथा वदेन् ॥१६॥

माप माया नमायारतय गोवाय शरणायाः कायांश्चातः परम् ॥ ताम्रपण्यांश्च सेतोश्चमध्यभागं पटेदि सः। तारशे ॥२४॥ तत्यानं संवत्सरं मासमृतु पलं तिथि ततः । कमावरेणसंयुए. समुगार्य प मलम्पन्न प तिथी फरिप्यामीति कर्मणः । नामोपाय यदेवयमेसरसल्पमुच्यते ॥२३॥ संयत्सरप्रातुर्मासीयुगः पथस्तिथिस्तथा । गएरी कालभेदाःम्युश्चन्द्रगत्यासगुस्याः ॥२६॥ गायकलाश्गन्द्रस्य प्रथमायायतीरिवा! दिशयोयायशुप्रथमेत्युच्यतेयुधः ॥२७ एसपि नियां होयाः पञ्चदशापि थे। मुरपीनायपन्दम्य फलादिक्षयो पटिकाटिमाभ्या प्रियायापि गपरं। अनिदिशयममगनिमग्नानदागदा Ill पामाबामपटियातितिक्षा TARREARनियाnt निशाd: . livil स्मृती ॥२८॥ फालं पराध प्रथमं कल्पं मन्यन्तर युगम् ॥२ ॥

तेनु विनश्यति । तस्मान्मानस्तु चान्द्रोऽयं सर्वदिककमसु । परिपाह्यो भवेन्नूनं तेन मानेन बदिक 18 तस्मात्सर्वाणि कर्माणिनियनमित्तिकान्यपि । पैतृकाण्यपि देवानि यानिकान्यग्विलान्यपि ॥३४|| कान्तप्रयुक्तानि विना चान्द गैव ममाचरेत् । क्रियमाणेऽन्यथा तस्मिन्यस्मिम्मिश्चणि ॥३॥ पक्षमासर्तु भेदः स्यात्तस्मात्संकल्प ण्व म. । अन्यथैव भवेन्नूनं तस्मात्तन्कम फेयलम ॥३६॥ अन्यथैवं कृतं स्याद्धि तेन कालभेदकृतं कर्म तस्मात्तन्न तथाचरेन । ३७|| युगाब्दमासर्तुपक्षतिथयस्तवमुख्यत. । चान्द्रमाने संभवन्त्विकृपाश्चनियता पुनः । यएते कथिताः सद्भिरन्ये ह्यनियताः किल । कान्तयो निखिलालोनिश्चयागमवर्जिताः ॥३॥ तेपो मासत्यनामेदं मुख्यतातु न संभवेन । .मासादिमध्यान्तलक्ष्मराहित्येन तथोदिनम तदाहि तत्सम्यगेव प्रकृतेऽनिम्प्यते । इन्द्रानी हूयते यत्र मासादि संप्रीतित

नानयुदाहरिष्यामि स्पष्टाय मा सांप्रथम l
दन्तिः पूर्णिमामध्यः भूत्वयः प्रतिपन्मुखः ।
त्रिंशत्तिथिः पक्षयुगं कृत्स्नादायपृद्धिकः ॥४॥
मासवाचकशब्दाः स्युस्त इमे तनोतराम् ।
सौरमाने प्रवर्तन्ते मासेप किल सर्वदा ॥४६॥
सर्वे मेपादिशब्दास्ते राशीनामेय वाचकाः!
समासाना मुख्यतो वे गुणतश्चेत्कदाचन ॥४॥
तद्वाचकत्यकार्याय भवन्ति फिल तावता।
कथं ते मुख्यमासा.स्युस्तद्वयंऋतुरीरितः ।।४।।
तत्पट्कं वत्सरः प्रोक्तस्तस्मादब्दमृतु वतः ।
मासं पक्षं तिथिं चापि मार्गेणानेन सन्ततम् ॥४६||
सम्यगालोच्य संकल्प्येव्यत्यासे न भवेद्यथा ।
तथासमुबरेत्सर्वान न्यूनानतिरिक्ततः ॥५॥
तिथ्यादीन्यदि संकल्पे व्यत्यासेनोमरेतदा ।
पुनः कुर्यात्तु तत्कर्म नष्टं तत्तेन तावता ॥५१॥
स्नानद्वये नित्यमेव संकल्पं सम्यगाचरेत् ।
कालादीन्प्रवदेचापि त्वरन् यदि तदा पुनः ॥२॥

17.0
सः शब्दाऽय परमेश्वरः ।
श्रीशब्दस्तत्र तत्र स्यादन्यथा शुभभाड्न तु ।।५।।
शम्भुः पुण्यशिवश्रीभिरास्वश्विन्तः कालकीर्तनात् ।
भवन्ति श्रीशुभावासारतस्मादेतास्तदा वदेत् ॥५६॥
(भवन्त्यस्या: शुभाः सर्वे स्तोतारएतास्ततस्त्यजेत् )
आशीची प्रोक्तशंभ्वादि शब्दानां श्रुतिमावतः ।
आशौच मध्ये यदितान् श्रीशम्भु शुभपुण्यकान् ।
आशौची प्रवदेन्मोहात्तस्याशौचस्य सर्वदा १५७।।
वृद्धिरेव भवेन्नूनं तस्मातानति यन्नतः।
प्रसमीक्ष्य त्यजेन्नूनभन्यथानर्थ एव च ॥५॥
भवेदेव न सन्देहः अवस्तानत्र संत्यजेत ।
नैमित्तिकेषु सर्वत्र सर्वप्वपिशुचिर्यतन ॥६॥
देशं कालविशेपास्तान्संकल्पे प्रवदेद् भृशम् ।
उक्तिरेव हि संकल्पः कर्मादिषु न मानसः ॥६॥
सभाभ्यनुज्ञा च परावश्यकी दक्षिणा च सा।
विथिभेदान्मासभेदात्पक्षभेदाहतोस्तु वा ॥६॥
अब्दभेदात्कमनष्ट प्रवदेन्नात्र संशयः।
भेदो नामावसंकल्पे तथोक्तिरिति तत्स्मृतम् ॥६॥
अयनस्यप्रभेदोचिनंदोपाय भवेकिल।
यवोऽयनस्य सततं त्ततिर्नास्ति ततस्तथा ॥६॥

२८६६ कृण्वस्मृतिः मेषादीनामनेनैव नक्षत्रम्य च सर्वदा। प्रभेदोक्तो न दोपोऽस्ति तेन तेपां कदाचन ॥४॥ उक्तिरावश्यकी नेति संकल्पे श्रुतिराह हि। तस्मादव्दमृतुमासं पक्षं तस्य तिथि शिवाम् ॥६५॥ संकल्पे ह्यत्यजन्सर्वान्प्रवदेत्सर्वकर्मसु । एतेपामन्यथोक्तो चेत्संकल्पे तच्च कर्म वै ॥६॥ नष्टमेव प्रभवति तेन तम पुनश्चरेत् । अन्यथा दोपमाप्नोति नात्रकार्या विचारणा ॥६॥ श्रुतिस्मृत्युदितं कर्म विहितं वैदिकस्य यत् । तदुक्त नैव मार्गेण कर्तव्यं नान्यथा चरेत् ॥६॥ यदि प्रमादेन कृतमन्यथा शास्रवर्त्मनः। तस्यतदोपशान्त्यर्थ सद्यश्चित्तं श्रुतीरितम् ॥६॥ स्मृत्युक्त वाथ सूत्रोक्त पुराणोक्तमथापि वा। समाचरेद्विधानेन भक्तिश्रद्धापुरस्सरम् ॥७०॥ कृतमात्रे तु तस्मिन्वै प्रायश्चित्ते तक्षणात्ततः। तहोपो विलयं याति तेनायं स्यात्कृती शुचिः ॥७॥ भवेदेव न संदेहो न पेड़ोपोऽभियतते । तस्मादोपं समुत्पन्न सघरव प्रशामयेत् । बाढवा मानरुत्थाय स्मरेदीश्वरमव्ययम् ॥३॥ पादौ प्रक्षावय गण्ड्यं कृत्वाइसम्य, विधानतः । कालेन महता भूयो पत्सु यदबीजयत् ॥

प्रातःस्मरणेकीर्त्यानांवर्णनम गन्धमादनसंज्ञं च लोकालोकं गिरीश्वरम । हिमवन्तं च कैलासं पुनरन्याञ्छुभाकरान् ॥७५।। पतिव्रताः पार्वतीम्बा अहल्या द्रौपदी शिवाम् । तारां मन्दोदरी पुण्यां नित्यकल्याणसुन्दरीम् ॥७६।। सीतामरुन्धती लक्ष्मी भारती परमेश्वरीम् । इन्द्राणीपुनरन्याश्च नित्यकल्याणमूतिकाः ||७|| ब्रह्मनिष्ठान्महाभागान्ब्राह्मणान्संशितव्रतान् । लोकपालान्लोकनाथान्ब्रह्मविष्णुमहेश्वरान् ॥७८। स्मृत्वा ब्रह्म क्यसंधानं कृत्वा ब्रह्माहमित्यपि । सर्वेभ्यश्च नमस्कुर्यान्नमो महद्भ्यइति वै वदेत् ।।७।। वत्र ध्यानादि(?)स्मरणयोः कालादिनियमो नहि । यदायकाशो लभते तदानित्यं तु शक्यते ॥८०ll कतु किलाथ च पुनः प्रातश्चत्तद्विशिष्यते। पादप्रक्षालनं नित्यं पश्चिमाभिमुखश्चरेत् ॥८।। यद्यन्यथाकृतं तत्तु तदाम्भस्तरक्षणे परम् । मूत्रमेव भवेन्नूनं दक्षिणाभिमुखात्कृते ॥८॥ उदगाभिमुखे चेत्तु तजलं रक्तमेव हि । प्राकतु पेत्तजलं मद्य तत्स्पृष्टोऽयं हि जायते ।।८।। पादप्रक्षालनं पश्चात्पश्चिमाभिमुखेन हि । कर्तव्यं सततं यत्नानान्यया हरिता कचित् ॥८॥ सार्वकालिमधर्मोऽयं सार्ववर्णिक एव च। वैदिको निखिलो भूयो नूनं निश्चिनुताऽधुना ||८|| कसम्मतिः भादं गिनाई गई मौकामा सरसया। घिमिर्ग नियना प्रोगह भागते मनि ॥६॥ दक्षिणापित नम्मिन्दाभि मोहनः । अर्ग मन्त्री जपायंगापयमानः सुमनः | प्रागादिशातयामन्यस्तदुसरनि भुतिः । आरम्यो दिशि प्रोगतस्या अयुसरी महान १८il पाटकाले स्वयं पंच तथा वित्रस्य या वसान। नम्यास्यचा(प)नुवारग्य दरावारजपो भयेन् l मौज्या मोहेन भूयस्तथा कर्मण्य(न्या(जि)दिशु वै । अग्ने तेजस्विननुवाकं द्वादशवारकम् Heall अग्नेस्तु पुरतस्तिष्ठन् प्रजपेत्पाणिपीढने । श्रीसूक्त पूर्वानुवा; तथापि द्विगुणं अपेन् ।६१॥ यज्ञे तुः संभारयजूपि पत्न्यनुवाककम् । प्रजपेदेव तस्मात्तु पादप्रक्षालनं तदा । पश्चिमाभिमुखेनैव कर्तव्यं नान्यथा मतम् ॥३॥ मुखशब्दमकुर्वन्चे नित्यं गडूपमाचरेत् । । उदङ्मुखो यथेच्छं वा सशुद्धकरतस्तदा। तथा शुद्धाभिरभिर्वा विपद्यपि न चाचरेत् ॥६५।। यदि गण्डपकाले तु मुखाच्छन्दः प्रजायते । पुरुषसूक्त वैष्णवं च भृचं द्वादशवारकम् ॥ERI सर्वतोमुखहरताभ्यां शुद्धाभ्यां प्रामुखोऽथवा II पाने भक्षणेच शब्देकृतेप्रायश्चित्तवर्णनम सद्दोपपरिहाराय गायत्री गायत्री त्रिशनं जपेन । एवमाचमने प्रोक्त जलपाने च भोजने ॥६॥ भक्षणे चापि भक्ष्याणां खाद्यानामपि स्यादने । भोज्यानां भोजने चापि तथा व लाचाप्यनो. ॥१८॥ अशब्दं सर्वतः कुर्वन् तत्तत्कर्म समाचरेन । यदि शब्द तथा कुर्वन् सद्यो निरयमृच्छति ||६|| तदोपपरिहाराय पूर्वचित्तं समाचरेत । विशेषतस्तक्रदधिपयोदधिघृतादिषु ॥१००।। यदि शब्दः समुत्पन्नः पाने वा भक्षणे यदि । महाननों भवेत्सद्यः तद्रव्यं मद्यमेव हि ॥१०॥ भवेदेव न सन्देहस्तस्य चित्तं ततम्त्विदम् । पक्षं तु यावकाहारो निराहारो दिनत्रयम ॥१२॥ अष्टानां वा चतुगी वा ब्राह्मणाना च भोजनम् । कुर्यादेव न संदेहोऽथवा गायत्रमाचरेत ॥१८३|| विसहस्रजपं मासं संहितात्रयमेव बा। चित्तं तत्कथितं तस्मान्न तत्कुर्यात्तथा द्विजः ॥१०४|| नित्यं मूत्रपुरीपादिकर्मस्वेषु प्रचोदितम् । यत्र यत्र धाचमनं द्वयं (तत्र) तत्र परो विधिः ।।१०।। प्रधमाचमने बलु। मन्त्रो मानसिकः कार्यः कदाचिन्न तु वाच(चि)कः ।।१०६॥ द्वितीयाचमने सम्यङ्मन्त्रोधारस्तु वाचिकः । न मानसः कदा कार्यः प्रथमे तु तथा घरेन ॥१०७॥ अयमेव समाख्यातः २८७० कण्यस्मृतिः एककालस्य चित्तं स्यादेवं तत्कालसंख्यया । सम्यक्समीक्ष्य तत्कुर्यादन्यथा भ्रष्ट एव हि ॥१३॥ भवेदेव न संदेहस्तदूध्वं चेत्तथाविधैः। पुनस्संस्कारताशुद्रो भविष्यति न चान्यथा ।।१३१ यदि प्रक्षालनं त्यक्त्वा मेहनस्य गुदस्य वा। चरेद्विनो व्रात्यएव न संभाष्योऽखिलैरपि ॥१३२/ मोहना (त् ) क्षालनान्मासं मात्राद्यदिविपर्ययात् । भ्रष्टो भवेत्ततो भूयः पुनस्संस्कारतश्शुचिः ॥१३॥ यथार्थकथनान्नित्यं चित्ते कर्ता भवेन्न तु। युद्धिपूर्वगुदप्रक्षालनशून्योऽभक्षणे ॥१३४।। जाते तु सद्यः पतितस्तद्यथार्थोक्तितः परम् । पतितो नात्र सन्देहश्चित्तं तस्य च चोदितम् । शुद्धिः प्रकथिता सद्भिरतप्तस्यैव न चान्यथा। छत्या तु तादृशं कर्म न कृतं चेति वक्ष्यति ॥१३॥ आपण्मासाच्चित्तकर्मकतुं शक्यं ततः परम् ॥१३ ॥ पुनगर्भविधानेन पुनः संस्कारतस्तराम् ॥१३ ॥ संत्याज्य एव सततं न योग्यो यस्य कस्यचित् । परणोचकरी सम्यकप्रक्षाल्य च ततः परम् 112 नाचामेद्यदि तूष्णीकं भवेन्नानसंशयः । पुनः प्रक्षाल्याचामेच तो पापस्य विमुद्रये AT प्रणबन्यामयानोति तत्सापविनिवृत्तये ॥ed अनाचायेय या मोहाद्वे दवणं समुन् ।

पाहि
नित्यकर्मणांव्यतिक्रमे फलाभाववर्णनम् २८७३३
त्रयोदशाख्यमनुवाकं शतं
जपेत् ।
लौकिकोक्त रिदं विष्णु प्रजपेद्दशवारकम् ॥१४१।।
कदाचिन्मोहतो विप्रः अकृत्वा दन्तधावनम् ।
स्नायात्कृत्वा दन्तशुद्धि पुनः स्नायाद्यथाविधि ॥१४।।
तृणपणैरसदाकुर्यादमामेकादशी विना ।
तयोरपि च कुर्वीत जग्घूलक्षाम्लपर्णकः ॥१४३।।
अप्टकासु मृताहेपु अमामनुयुगादिपु ।
महालयेषु पुण्येषु संक्रान्तिप्वयनद्वये ॥१४४॥
व्यतीपाते
गजच्छाया ग्रहणादिपु सूतके ।
पुनरन्यासु तिथिपु स्वजन्मत्रितये तथा ॥१४॥
दन्तधावनतः पापं महदानोति केवलम् ।
तहोपपरिहाराय अग्नेर्मन्यानुवाककम् ॥१४६।।
स्नात्या संकलय विधिना प्रजपेत्पश्चवारकम् ।
पवित्रपाणिराचान्त उपविश्यैव नान्यथा ॥१४॥
तिष्ठन्धावन्प्रजल्पन्या
जपेद्यदि निरर्थकम् ।
भवेदेव ने सन्देहस्तस्मात्तन्न समाचरेत् ॥१४८॥
यदि संध्या प्रकुर्वीत चाकृत्वा दन्तधायनं ।
व्यर्था भवेत्तु सा संध्या तस्मात्तद्भूय एवं वे ॥१४६॥
दन्तधावनतः पश्चातुवीय यथाविधि ।
अपर्णा द्वादशगदूमुखशुद्धिर्भविष्यति ॥१५॥
तथैव पटके कुर्यात्तद्भिन्नेषु तथा न तु !
नित्यं स्नानं द्विजः कुर्यात्प्रातरुत्याय धर्मतः ॥१५॥

देवगिपिया अगया तसिलाः परम् । शपन्य जीवनासागरातः कोपिता हि ते ॥१५॥ नातुं प्रशान्तं विभाः पितरो मुनयांधिलाः । रप्या पयोधिनः सन्त अनुपावन्ति पृथतः ॥११॥ यदि साजलं हि दवय किल मौहगतः । मवस्यानसमुत्राष्टमन्यत्र किल गग्छति ॥१५४|| तूष्णी शिष्ठन्ति या मूहा भयंत्तन्यापभाजनम् । तस्मात्स्नात्या प्रयत्नेन देवादीनां विधानतः॥१५६।। देयमेव भयेन्नूनं सर्वस्वागविनिर्गतम् । स्नानागतर्पणं चापि नित्यं कार्य विधानतः ॥१५६।। अकृते सपणे तस्मिन्यथैव प्रभवेत्तु वत् । कुति तर्पणं सर्व स्नानेपु किल मार्जनम् ॥१५॥ संकल्पं तवयंचापि नचेत्स्नानं तु उद्भवेत् । यद्यशक्तो भवेत्स्नातु सलिलेषु विधानतः ॥१५८।। नदीसटाककूपेषु स्नानमुष्णेन वा चरेत् । कण्ठस्नानं कटिस्नानं पादस्नानं तु वा चरेत् ॥१६॥ तत्रापि यद्यशक्तश्चेत्सर्वमुष्णेन वाऽऽचरेत् । अथवा कापिलस्नानं प्रोक्षणस्नानमेव वा ॥१६०ll स्नातरनानं वा कुर्वीत शुद्धवस्त्राणि वा धरेन् (धारयेत) । • • मभ्या तु यथोतिस्त्रं शनैरसवं समाचरेत् ॥१६२) कायानुगुणतस्सव कार्यमेव न चान्यथा ॥१६ || प्रातस्तक्षेपतः स्नानं होमार्थ तु विधीयते ।।

वायव्यास्नानस्यश्रेष्ठयत्ववर्णनम् जलस्नानं सर्वथा चेदशक्तः कर्तुमेव वै । कायानुगुणतो यद्वा स्नानमेकं समाचरेत् ॥१६॥ बहुप्रोक्त पु सर्वेषु दिव्यस्नानं विशेषतः । दुर्लभं सर्वमेतद्धि गङ्गास्नानसमं हि तत् ॥१६॥ न संकल्पादि तत्र स्यात्तपणं प्राणसंयमः । तथैवाचमनं वापि वायव्येऽपि वथैव च ॥१६।। तत्तु प्रयत्नसाध्यं स्यात्सायं प्रातस्तथान्तरे । न वायव्यसमं स्तानं त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥१६६।। तद्गङ्गास्नानतुलितं पञ्चपातकनाशनम् । उपपातकसंदोहनिर्मूलकरणक्षमम ।।१६७।। ततरसन्ध्यां प्रकुर्वीत शक्तः स्नानप्रपूर्विकाम् । नक्षत्रसहितां पूर्व पश्चिमा सूर्यसंयुतरम् ॥१६८॥ असापादित्यमन्त्रेण ध्यान तक्रियतेसदा । ब्राह्मणस्यैव संध्या स्यात्संधायहक्षपामुखात् ।।१६।। सात्ययपूर्वकर्ता स्याद्गायत्र्याय॑ त्रयं चरेत् । सम्यगुच्चार्य तां वर्णस्वरतः कमतस्तथा ॥१७०। ब्राह्मण्यमूलं नैव स्यान्नान्यदस्ति जगत्वये। तन्मूलं तु वतासाहि संध्यानां त्रितयेऽनिशम् ॥१७॥ जयात्यन्त कनियमशतैयन्त्रशताधिकात् । एतन्मन्त्रजपनय ब्राह्मणानां महात्मनाम् ॥१७२।। सर्वलोककवन्धत्वं सर्वाचार्यत्वमेवच । वश्याकर्षणविद्वपस्तम्भनोसादनादिकम् ॥१३॥ .

कन्यामनि. निमहानुमही महिमामाता! एनन्मूलानि सांगि तस्मादनं मनुं परम् ॥१.87 गयाशाबमधोग स्यम्यणम्मान्वितम् । सम्यगेय अपेशितान त्रिसंध्यासु योचितः ॥१७॥ अयानु प्रभावियायाः परयणादिशून्यतः । मंख्यायीकरणतो प्राक्षम्य दूपितराम ||१७।। दोपयुफप भयति योंच्चारणतः परम् । सर्वस्यरादिशून्ये न व्यत्यासः स्वरतस्तथा ॥१७॥ तबादण्यं ताहगेव भवेदेव न संशयः। एतन्मत्रं समीचीनं प्रोक्त कर्मणि वैकते ॥१७८।। अर्थाः सर्वेऽपि गुध्यन्ति तद्ब्राह्मण्यं च पुष्कलम् । अतिशुद्ध महच्छीमत् प्रभवेद्वीर्यवत्तरम् ॥१६॥ चतुर्विशतिवर्णाना मुक्तिमात्रेण केवलम् । आभासमात्रब्राह्मण्यं तत्र तिष्ठति केवलम् ॥१८०। तस्मात्सम्यकस्वरयुतं तन्मन्वं वेदचोदितम् । विप्रत्वसिद्धयेऽधीत्य संध्याकर्मणि सिद्धये ॥१८॥ ब्रह्मध्यानाय॑मात्रो यः पुरापद्मभुवाखिलाः । श्रुतयो विशदत्वेन ब्राह्मणानां प्रदर्शिताः ॥१८२।। तस्माद् वेदान्विधानेन सम्यग्गुरुमुखात्परम् । अधीत्यानं तदन्तस्था गायत्री शिरसा सह ।।१८३।। नित्यमावर्तयेद्भत्या त्रिसंध्यासु महाशुचिः। भूत्वा स्नात्वा स्वरतत्तद्वर्णकरतिशोभनः ॥१८||

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०८७८ सम्मानित माता निभावाभायो शिवाशिवी। मुनामंजन्ममृती जगत्कार्यप्रयतते ॥१६॥ जगम जगरना चम्म विप्रम यया । पेनो नगिवन्यन गुसमेतन्मयोदितम् ॥१६॥ सर्वेषामपि लोकाना मग नागिनामपि । प्रविष्णमहेशानी मसाना यहुना रिमु ।।१६।। सर्यकत्यं संध्ययेय मम्यगेव सुसाधितम् । ब्राह्मणाना प्रसादेन नकिमपि नास्ति वे ||१६|| संध्याभाये सर्वलोकविनाशः सद्य एव वै। भवेदेव न सन्देही ब्राह्मणास्वारशा हि वै ॥२०० सर्वप्रापि च यतन्ते कलौ चैतत्तु केवलम् । तिष्ठेतिरोहितत्वेन देवाज्ञाताशा परो ॥२०१|| ब्राह्मणाः सर्वजगतां निदानं परमं परम् । तद्विना चेन्नकिमपि तेनैवैतत्प्रवर्तते ।।२०।। तत्कारणं हि गायत्री वेदमाता जगन्मयी। तयैवत्सृज्यते सर्व तयतत्पाल्यते परम् ।।२०३।। संहोयते (?) तयैवेति सैपा किल जगत्प्रसूः। बीलिङ्गने श्रुतौ नित्यं लीलया व्यवही(१)यते ।।२०४।। लिङ्गानां वचनानां च हृदयं तत्र ब्रह्मणि । लिङ्गः सर्वशब्दवचनैरखिलैरपि ॥२०॥ परं ब्रह्म नान्यतिकमपि , विद्यते । व्यवहारोऽयं यथा भवति तत्तथा ॥२०६।। .

गायत्रीमन्त्री शिष्यवर्णनम
देवता स्वयं प्रोक्त पुलिङ्गी देवग्नि
नपुंसक माविमा तदेनदागिरंम्मतम ।
गायध्यास्नु पन्दो वे गायत्र्येव न पनम्न।
पिण्यामित्रमूषिः प्रोको देवना मरिना मना II. In
सुगमतिः समास्याशिसा प्रशीनिता
नारायणस्नु रन्यं शिग्वाद ममोरिन II ||
महामन्याय तम्यान्यवणपाहणमाम ।
मानण्यं मुरूपतः प्रोक्न प्रथमं गुना पुन ।
मरवणसमीपोनममुष्पारणकारमा
पोरल्यं गाय मोफ गरिमामुम्बया
मार्मास्यासयामुमो
समभ्यं प्राधियोvil
परिसराय पान कारन माता रानः ।
यामर गार गुमरन RA
भोपीनामा मालमत्रा।
intuinaamananent पो

२८८०
कण्वस्मृतिः
तस्मादध्ययनं नित्यं गायत्र्याः किल केवलम् ।
समीचीनोचारणकहेतवे तस्य नान्यथा ॥२१॥
तस्मादेवं विधिःख्यातो गायत्रीग्रहणात्परम् ।
वेदैकाध्ययनं नित्यं तत्संस्कारैकहेतवे ॥२१॥
एवं सति तु यो मूढो गायत्रीग्रहणात्परम् ।
अनधीत्यैव तं वेदमसंशोध्येव तामपि ॥२२॥
गायत्री वर्णसंयुक्तामुचरेद्व देवर्जनात् ।
श्रममन्यवकुरुते शास्त्रजाले वृथाश्रमी ॥२२१।।
वेदारतस्तुयोलोके सोऽस्वाधीनकवाग्भवेत् ।
देवी स्वाधीनवाकमोक्तस्तेन मन्त्रादिकं सदा ॥२२२॥
सम्यगुभारणाच्चैव प्रभवेकिलसन्ततम् ।
सर्वदक्षस्तु वेदीस्यात्सर्वसिद्धिच तेन सः ॥२२३।।
प्रभवेदपि ते नैव इदं नित्यं समभ्यसेत् ।
वेदान्वेदी नवदं शाखामात्रं तु केवलम् ॥२२४।।
अध्येतयं प्रयत्नेन नचंदयाह्मणः स्मृतः।
दुर्भामणो या नो पत्तु प्राह्मणम् न संशयः ॥२२६।।
अथया प्रायन्धु.स्यात्तएते प्रायोनिजाः ।
स्वप्न्यनम्नुचत्वारस्तेषां टक्षणमुच्यते ॥२२६।।
प्रायोर्यसमुत्पन्नः सम्यमन्यैनं संस्कृतः ।
अनाप्रियकना तेन फर्माभासैकसरातः ॥२२॥
अमासमानियोलो मन्त्रामासनपादिकः ।
गभापानादिसंस्कारचोटोपनयनयुकः ॥२८॥

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1 अनामतिः ममुरिम प्रानन पादसलिलं ना। शिम शिरमा पो पो यमानिः ! नमाविमानेन नापियन्होमाम! कानं नयेति सम्म वादास्यास्स भग्नं ३॥ ममीनीनमहासंध्यारहिनस्य दुरात्मनः। नामानि तारकाणि ः प्रजातानि जगत्पतेः ॥२३४॥ वाक्षरेयशून्यस्य पुराणान्तर्गताः पराः। ग्लोकाः कंचन संप्रोमा स्नानसंध्यादिकर्ममु तारा न वैदिकः पुराणोफ मन्यः कुर्यालयंचन । किंचित्कापि तस्मात्त दिकरच वाचरेत ॥२६॥ सहस्रपरमा देवी शतमध्या दशापराम् । संध्या नोपासते ये तु कथं ते ब्राह्मणाः स्मृताः ।।२६/ कलौ तु केवलं तिष्ठद्गायत्रीवर्णमावतः । तदेकदेशतश्चापि क्रियानुफरणादपि ॥२६॥ ब्राह्मण्यं तच्च पूज्यं स्यान्न विचार्य प्रयत्नतः । न निषेध्यं विशेषेण गोपनीयतमं भवेत् ॥२६॥ संध्ययोः स्नानतो मौज्याः बाह्य कक्रियया परम् । मोदनीयं हि विप्रत्वं न विचार्यतमं भवेत् ॥२०॥ मूकस्यापि च विप्रत्वमरतीत्येवेति केचन । प्रोचुमहर्पयो मोज्यां गायत्रीजलपानतः ॥२७॥ जले संलिख्य गायच्या मन्त्रैः कृत्वाखिलाः क्रियाः । प्राशयेतं विधानेन मूकविप्रत्व सिद्धये ॥२७२ / 1

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९८८६ 4 कण्वस्मृतिः, सर्वेषु श्रुतिरुत्कृष्टा रुद्र कादशिनी ध्रुवौ । पञ्चाङ्गरुद्रन्यासेन सर्वकल्मपनाशनी ॥२८॥ विप्रसंध्याविघातस्य कर्ता सद्यः स्वयं वदा। तस्य संध्यां यतःकुर्यादन्यथा किल्बिपी भवेत् ।।२८३॥ न संध्याविघ्नकरणादन्यत्पापं तु विद्यते । ब्राह्मणस्य क्षत्रियादेरपि शूद्रस्य वा पुनः ।।२८६॥ संध्यापरं तु होमः स्यात्सा च संध्याजपोऽपि वा। मित्रस्यचर्पणीमन्त्रादुपस्थानादिकं परम् ॥२८॥ आहिताग्नेः पूर्वमेव चोदयादंशुमालिनः । निखिलं तद्विजानीयादग्नेरुद्धरणं तथा ॥२८॥ आहिताग्नेरनिहोत्रं सर्वध्रुतिसमीरितम् । निखिलेभ्यश्च कर्मभ्यः सततं यतिरिच्यते ॥२६॥ तत्कर्मणः सर्वकर्मजालं यत्तदशेपरम् । परं तद्योग्यतामा संपात(द)कमिति स्मृतम् ||२६cti वस्मात्तदुदयात्पूर्व स्मातं निर्वयं चाखिलम् । ततः संकल्पनियतस्त्वमिहोवस्य फर्मणः ॥२६॥ होप्यामीत्येव संकल्प्य सायम्प्रातः समाचरेत् । संकल्पानन्तरं तस्य तदुद्धरणगुच्यते ॥२२॥ अश्त्वैव (तु) संम्पं न तदुद्धरणं परेत् । पते तस्मिाचसंकल्ले तामध्ये मानकम ॥RE न मिचिदपि कुर्यात महावैदिकरमणि । कर्मपाज्यम्य संम्पेयकमान्तरमुच्यते ॥२६४।। 1

-
वेदिकात्यायमच प्राधान्यवनम
प्रयन्नं वैदिकं फर्म संबंपर 7 रमन
नत्यपुरापनाविनीः कुनयरियाम IIPEti
शां निपतित गह पितामपि पुन किमु
नावाद वाससा मार्ग अमित या पुरा in
नि नयाँ मा कति रा धनि
नविकम्य पृन्यम्य मंगल मन्नार यदि
यम्य फम्यरिदकम्य नदन्न पानिनामरि।
मो पा प्राविजाननमागीय मन all
नाम्यवनि सन, प्रा सम्मादार
नात्या फमांणि गुग्न फरामगुन ।
सानिमम्पलं लयमा
विनि मारना
पावाम तो भूगी हानि , पुन ial
पर परविजामन्यदगोरिमामय बन्य।
समान विधायक नमन
वा फर्म नम्मापमा पार
बापमार हिर महामन ।
महाः पर मुनिका
गांधारयःमरे नानार 4NNE
रिसायरि पी. martan
या ARifal
निर्म' मंत्र
Artiniमा (ति an)
ANRecial

२८८८ कण्यस्मृविः कन्याकुम्भलीप पन्नीगर्भ मुसन्ततम् । अत्यन्दमासपझपु चानुमनुयुगादिप ॥३०६।। प्रोच्यते यंदवाक्येन सम्मानु भुरकर्म छन् । आहिनाः पर्वणि हि कथितं तु विशिष्यते ॥३०॥ इयभावेऽपि रकम मात्रादपि च केवलम् । यत्किचित्कर्मणादिष्टिकर्मकदेशतः ॥३०८।। कर्मणादिष्टिसिद्धिश भवत्येवेति तत्कृतम् ॥३६॥ यावतः कर्मणः कर्तुमशक्तावपि तस्य वै । अङ्गमावास्यात्तु कती समीचीनं भवकिल ||३१०|| सोऽयं तस्मादाहिताग्नेन कालादिनिरीक्षणम् । क्षुरस्य कायं नैव स्यात्सकालः क्षुरकर्मणः ॥३११।। नित्यतः समुपक्रान्तस्तस्याइष्टरुपक्रमे। त्यक्तनष्टाग्निहोत्रस्याहिताग्नेरेयमप्यति ॥३१२॥ चोदितं तद्धि चैवं स्यादाहिताग्नीतरस्य च । वर्णिनो ग्रहणश्चापि वैदिकस्यैव केवलम् ॥३१।। उपाकर्मणि चोत्सर्गे व्रतानां सन्ततं तराम् । यदा तदा क्षुरं स्याद्धि न कालादिनिरीक्षणम् ।।३१४॥ कूष्माण्डे गणहोमे च प्रायश्चित्ते झुपस्थिते । सूतकान्ते प्रसूत्यन्ते व्रते(त)चान्द्रायणादिपु ॥३१॥ नैमित्तिकब्रह्मकर्षे न कालादिनिरीक्षणम् । देवासुरसुराणां त(त्)त्रिविधं परिकीर्तितम् ॥३१६।।

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२
कण्यस्मृतिः
नहीलानियमा दिया दात्यालापनादिकाः ।
महदाशीमत्सयाच भूषगोत्सव पर च ॥३॥
दीपोत्सयो दीपशान्तिः मुलाचारादयोऽसिलाः ।
चौर्योत्सवो हेलनाख्यो यन्मुभफिमहोत्सवः ॥५१॥
गीतोत्सयो वाद्यरंध्रभाषणात्सयसंक्षकाः।
रोपदोमो नाकबलि महेन्द्राणी(?) समर्थनम् ॥३१२।।
प्रयस्त्रिंशत्कोटिसंख्या तवाना समर्थनम् ।
महादिशामुत्सयश्च ताम्बूलोत्सव एव च ॥३३॥
तहम्पती महापूजा तन्नामोक्त्युत्सवः परः।
गृहाग्रामविनिर्याणांमहाजलमहोत्सवः ॥३४॥
हारिद्रजलतच्चूर्णगम्धकुसमवस्तुभिः ।
दोलोत्सवोदेवतोद्वासनसंज्ञोत्सवः परः
कङ्कणोद्वासनोबन्धोद्वासनादिकमित्यतः ।
यद्भव्यजातं तत्सर्वमन्वहं तत्ततोऽधिकम् ॥३५६॥
भवत्येव ततो यत्नादुख्यमग्निं सदा धरेत् ।
यदि भूमौ निक्षिपेत्तु तपभूमिशुचिः सदा ॥३५वा
सशान्ति कुरुते तस्मात्परं तण्डुलहोमतः ।
* गार्हपत्याख्यकश्चित्तु पुरोडाशादिना न तु ॥३५॥
हविपापाशुकेनैव नित्यशान्तो भवेदहो ।
f:: नचेद्गार्हपत्याख्यो यजमानस्य सन्ततम् ॥३६॥
तस्मिन्नतीते वर्पी पललं हि तदिच्छति ।।
वहयो वैदिकात्तस्माद्गार्हपत्यादिकास्त्रयः ॥३६॥

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मुधिः। यामतिः नियमोऽयं गानुपम्य प्रादणि पाया वैदिकः कधिनः मन्दिया चानो तव हि ॥३॥ मुख्यः कल्पः पावके माननी करणकमणः। विकल्पात्याणिहोमा:पि नादिस्तदनन्तरम् ||३|| प्रयनो वैश्वदेवान्तं ब्राह्मणाननिधीनपि। भोजयोत र बालादोन्मानुषोऽयं महामकः ॥३४॥ अजम वैश्वदेवादाववमानऽथया औदुम्बर्यश्चसमिधो जुहुयाइश या शतम् ॥३७॥ तावसंख्यान्नाहुतीश्च श्रीकामः कालयोद्वयोः । देवयज्ञोऽयमुदितः केचित्तु शकलाहुतिः ॥३७६।। इमं यज्ञं तमेयोचर्यपितृभ्यः स्ववेति वै । तर्पणं क्रियते यत्तु पितृयज्ञं प्रचक्षते ॥३७॥ येयं पूर्व बलिः प्रोक्ता वायसानां शुनामपि । एपा(प) वै भूत यज्ञः स्यादतिथीनां तु भोजनम् ॥३७८|| नृयज्ञः कथितः सद्धि ब्रह्मयज्ञत्रयीमयः । एवं पञ्चमहायज्ञाः श्रुतिप्रोक्ताः सनातनाः ॥३७६|| नेपामगानिभावोऽस्ति स्वतन्त्रास्ते परस्परम् । तपर्ण ब्रह्मयज्ञस्य देवादीनां यदोरितम् ॥३८॥ तदद्गमेवतस्याः स्यात्तच्चनित्यमितोरितम् । देवानां प्रथमं तत्र तर्पणं समुदीरितम् ॥३८॥ ऋषीणामथ तत्प्रोक्त पितृणां तु ततः परम् । ..... ये देवा वेदोक्ता अष्टमे मताः ॥३८२।। -

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. २८६६ कम्यम्मृतिः मम चे पतुडोनारः तेभ्यो यज्ञोऽधिनिर्मितः । स हि नारायणी प्रशा पुरुषरूपेण तत्र व ॥३ता यतते चानुवाकन चोत्तरेण जगन्मयः । सृष्टिस्थितिविनाशाना कताकारणकारणम् ॥३६॥ करणस्यापि करणं जगजन्मादिकारणम् । सत्यज्ञानानन्दमयं सदसचिन्मयात्मकम् ॥३६क्षा सद्र पेणावतीणं तत्तस्याध्येता तदात्मकः। ब्रह्मवाच्यते सद्भिः स यन निपिभ्यते ॥३६ull स सर्ववेदयज्ञोधसत्कर्मवतकृन्मतः। स उवै वैदिकश्रेष्ठःकर्मिष्ठः कर्मठोशाठः ॥३al सर्वाचार्यः संप्रदायप्रवर्तकः। सर्वाचारस्थापकश्च सर्वलोकविलक्षणः ॥३६॥ सूक्ष्मधर्मार्थतत्वज्ञः सोऽयं किल विशेषवित् । वेदमार्गानुसारी च परं वेदोक्तमेव हि ॥४००। करोति कर्मनान्यत्तु गौणमुख्ये तथा बलम् । देशकालमहापात्रद्रव्ययोगादिकेक्षणे 11४०१॥ मुख्यं तत्समनुष्ठानं कुरुते किल सन्ततम् । सत्कर्मभिः सदा पूजां करोति कुलसंभवः ।।४।। सपत्रपुष्पादि कृता देवस्य परमात्मनः । भवेन्नतु सदापूजा किन्तु साकर्मभिः कृतः ॥४३॥ यथाशाखादिविहितैरलभ्यमहतीति सा| सवबन्धः प्रोच्यते तद्विशेपः स हि सर्वोत्तमोत्तमः ॥४०४ ||

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२८६८ फण्यस्मृतिः कथितातु समासेन हवियज्ञास्तथैव च। अमिहोत्रं १ दशदि तयाप्रयणं महत् ।।४१६॥ चातुर्मास्यनिस्ट च सौत्रामगिरतः परम । पियशाध फधिता एकविंशतिसंज्ञिकाः ॥४॥ कर्म यद्यपि तत्प्रोक्त विक्षणस्थायि केयलम् । वानीमानि तु कर्माणि नित्यान्याहुर्मनीषिणः ॥४१॥ कथं तदिति हि मोके वीसावाक्येन केवलम् । तेन तत्कर्म कथितं कचिव महर्पयः ॥४६॥ चत्वारिंशत्संस्काराः प्रोचुरेवं च तद्यथा। गर्भाधानं पुंसवनं सीमन्तोनाम(जात)कर्म च । नामान्नप्राशनं चौलं मौंजीवतचतुष्टयम् ॥४२॥ स्नानं गोदानिकं चेति विवाहः पैतृमेधिकम् । वदंगभूतया दिव्यं सर्वाणयुक्तानि च क्रमात् । यस्य वेदश्ववेदी च विच्छिद्यते विपौरुषम् ॥४२३॥ स वै दुर्ब्राह्मणो नाम सर्वकर्मयहिष्कृतः । नित्यमेव यतस्तस्माद्यज्ञाने तान्सदा यजेत् । पितृणां प्रजया पश्चादेतेषु त्रिपु सर्वदा ॥४२॥ वसा भीतियुक्त ने तदापाकरणहेतवे। स्वाध्यायोऽयं धी(मधे)तव्यो(?)महातन्नियमैयुतः ॥४२६॥ पद्यापद्यापि वक्ष्यामि क्रमेणैव पुनश्च तेः ।।४२०ll परं निष्क्रमणं त्वेवं परो विष्णुवलिः परः ॥४२२ ।। दो झण्यविनाशाय द्विजो भक्त्या धिया युतः ॥४२४ ॥

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४ भवम्मतिः महापिगमाच पियानधेय. चा पेयकाणि हि कर्माणि चत्वापांशुमनीषिणः ॥४३० प्राधान्येनेव चौमानि जातकममुखानि तु । मानुपाणि नु मर्वत्र प्रमिद्धानि जगन्यये पराणि देविकान्याहुः सांण्येतानि वै द्विजः। प्रतिसंवत्सरं कुर्यादेव पित्र्याणि शक्तितः ॥४४०l- शक्तिसाध्यानि कायांणि कथं कुर्यादकिंचनः। प्रभूतधनधान्यानि पग्निहोत्रमुखानि वै ॥४४॥ इत्याहुः केचनाचार्या वैखानसमहर्षयः। अपरे यालखिल्यास्तु वैदिकामवयोव वन् १४४२|| यस्य त्रिवार्षिकं वित्तं लक्षं रक्षायमेव वा। स कथं मत्तमातङ्गमिहोत्रमुपासते ॥४३॥. पितामहेन देवेन तत्कार्याय मखः परः। रंभासंभोगकामा ये तैरेवादिसहितुः ॥४४५॥ समनुष्ठ य एवेति नान्यकार्याय स स्मृतः। मुक्तिनाव विरोधो हि तस्मात्कुर्याद्धरेः सदा । पत्रैः पुष्पैः फलरची पोडशैरुपचारकैः । नित्यपूजा विशेषेण तथा नैमित्तिकान्यपि ॥४४८॥ पुनरन्ये ह्यश्मकुट्टाः स्वमतं प्राहुरुत्तमम् । रंभासंभोगकार्याय स्वगोऽयं विहितः पुरा था नैमिशा ( पादि महाक्षेत्रे विद्यमानेश्वरार्चनान ॥४४६ ॥ प्रतिमासु • पुराणेपु मृद्दारुप्रस्तरात्मसु ॥४४ वा

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२६०२ कम्मरमृतिः वैखानसकनेशापि पकद पणमेव वै। ते तुममेण सद्भक्त्या वैखानसमहर्षयः ।।४६- यालसिल्यास्तु संभूत्या पश्चाजन्मान्तरे पुनः। संप्रक्षाला भवन्त्येव पश्चाजन्मान्तरे किल ॥४६९ मरीपिपा: संभवन्ति तस्मिन्मनि केवलम् । वेदमार्गानुगा बुद्धि संप्राप्य महती ततः ॥४६५ पितृभिरिशक्षिताः सम्यग्वेदाभ्यासपरास्तरी। वासं गुरुकुले कृत्या ऋचरसामानि तानि च ।४६३८ यजूपि लब्ध्या पुण्येन भवेयुः किल कर्मणा । सन्तः सत्पथगा धीराचांचल्यकविवर्जिताः ॥४६४८ सतां यजुस्सामऋचः श्रीदिव्या महती परा। तद्वन्तश्चतदर्थशास्तदनुष्ठानतत्पराः ॥४६॥ क्रमेणैव लभन्ते तं पन्थानं ब्रह्मवादिनाम् । सम्प्राप्य दिव्यज्ञानं तन्निदिध्यासनतत्परः ॥४६॥ सायुज्यनाम(मि)का मुक्तिं लभन्ते सद्गुरोस्तराम् । प्रसादेनेव कृपया पितृणामर्चया तथा ॥४६॥ अयमेव महामार्गो वेदोकात्यन्तसौलभः । अन्यः पन्था नायनाय श्रुतिरेवमुवाच सा ॥४६८/- ब्राह्मणस्यैव तद्विद्याशिक्षितस्य विशेषतः । विना वेदान्तवाक्यानां दिव्योपनिपदामपि ॥४seil וה द्वावेव श्रवणादीनां वेदवाक्यविचारतः ॥४६ ॥ सूत्राणा ( शि ) क्षया चापि मुक्तिः स्याताशी परा ।

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"0" २६०४ कण्यस्मृति विशेपेण ब्रह्मविद्या विपये वै वृथा कलिम् । न कुर्यादेव सहसा शक्त्या नित्यःसवो भवेत् ।।४८३॥ नानाहिताग्निस्तिप्ठेत्तु न च दुर्ब्राह्मणोऽपि वा। येन केनाप्युपायेन दौह्मिण्यं समागतम् ॥४८३] अपि स्वीकृत्य चण्डालान्नाशयेत धनं द्विजः। दोाह्मण्येन नष्टस्याश्रोत्रियत्वेन वा तथा ॥४८४।। असोमयाजित्येनैवं को लोकः स्यादहन्तराम् । नैव जाने नैव जाने नैव जाने पुनः पुनः ॥४८॥ वेदविद्भयस्ततो यत्नाद्विच्छित्तिनभवेद्यथा। मनुष्ययवः कर्तव्यस्तद्यनादपि केवलम् ॥४८॥ अदृष्टलाभो भवति विशेषेण न संशयः । नाहीनातुभिस्तिष्ये()यभेतैय न चान्यथा ॥४८) कलापहीनकतयो दुरसाध्या: म्युहि देहिनाम् । समबन्ना प्रथममाधानातु परंतराम् ॥४८॥ अमिष्टोमन्त्यनुप्ठेयः अतिरामोऽथया सा। अतिरा प्रथमतो यदि चत्समनुष्ठिते ॥४६॥ अधिकारम्भूतरेषु तेषु तुप नैव वै। पलामपि मपामगुष्ठानाय योग्यता । उमरेपा मोर नायकार्या विचारमा titil अप्टिीम प्रथमतः तेनु मिल यच्यहम् l

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२६०६ कण्यस्मृतिः नित्यं कर्तुं भवेद्भूयस्त्यतीतेगु दशस्वपि । अहन्येकादशदिने नामकरणास्यकर्मणा ॥१०॥ कतु तम कृते भूयस्तम नामात्यकं परम् । तत्परस्मिन्नपि दिने का ये शक्यते दिने ||५०४ा दिनेऽतीते द्वादशे तु भक्तप्राशनकर्मणा । सदैव विहितं शास्त्रान्न पृथग्भिन्नकालतः ।।५०५।। मासि पप्ठे तय कर्म काटेऽतीते तु तस्य च। वर्षे तृतीये चोलेन नान्तरा तम वे स्मृतम् ॥१०६।। तस्य कालेऽप्यतीते तु मौंज्या सह विधीयते । कर्तव्यत्वेन सततं जातकादीनि यानि वै ॥८॥ तास्युस्ता निखिलान्यत्र मौज्या सह विधानतः । कर्म कर्मान्तरेणैव कर्तव्यं स्यात्प्रयत्नतः । अपनीतेव्रतस्यापि पुनः करणमईति । पृथग्भिन्न भिन्नकाल: समुहूर्तादयः स्मृताः ॥५१॥ प्राजापत्येन मुख्येन तद्वितीयादिना मुखम् । प्राजापत्याख्य काण्डानि व्रतानि नव वै तथा । वैश्वदेवाख्यकाण्डानि पोडश स्युहि संख्यया । प्राजापत्ये नत्र काण्डं पौरोडाशे विधीयते ॥१३॥ तदानीमेव कार्याणि न तु भिन्नेन नेहसा kall यद्यतीतं कृतं कर्म भिन्ने काले प्रमादतः 100 कर्तव्यं स्यादुपाकर्म तथा चोत्सर्जनं पुनः ॥११ ॥ सौम्यान्यपि च दिव्यानि सप्ताग्नेयानि संविधिः ॥१३ ॥

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कण्वस्मतिः तदा सिद्वयं कुर्यान्लान्यकिमपि विद्यते । अयं हि गुमि(म)होमे स्यान्नित्यं कालद्वये चरेत् ।।१४ तदमिरक्षणायैव तदाय विधीयते । प्रधानाहुत्यथविवाहानिसिद्धिर्भवकिल ||४|| स्थालीपाकादयपुनस्तदुपक्रम उच्यते । औपासनस्य त्यस्य कर्मणः श्रुति चोधनात् ।।४।। तायन्मासस्तु पक्षो वा ऋतुर्वाप्ययनं शरत् । अहनधोदिनं वापि मार्गमध्ये विधानतः ॥५५॥ सायं प्रातस्तस्य कालो न गृहे सोऽयमुच्यते । शफटारोहणात्पश्चाद् वध्वा कृशानुना सह ॥१५॥ होमकाले मार्ग मध्ये गुप्तिहोमोऽय मुच्यते । गृहप्रवेशहोमस्य चार्वागेव ततः परम् ॥१५॥ यावजोवाख्य संकल्पपल्या कार्याद्विजन्मनाम् । अनुज्ञायं दक्षिणतः तेषां स्वप्रार्थनादितः ।।५५३॥ औपासनारंभतुर्ययामिन्यपरपक्षके । शेपहोमं प्रकुर्वीत मद्गलस्नानपूर्वकम् ॥५४॥ विवाहात्पूर्व दिवसे नान्दीश्राद्धमुदाहृतम् । ततः परं विधानेन लाजहोमात्परं तराम् ॥५५५।। तद्दीक्षायामनुप्ठेया दीक्षाधर्माः सनातनाः। नातपे संचरेद्वापि न ज्योत्स्नायां हिमेऽपि वा ।।५५६।। नैव स्नानं प्रकुर्वीत वटाके वा सरित्यपि । हदेवा देव खाते वा कूपे वा पल्वलेऽपि वा ॥५६७il

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२६०
कृष्यामृतिः
दाई एवं वैग न विस्करणिकामपि ।
विचित्रामूवगा कृत्या चतुभिः पभिरुत्तमः । १६६॥
अभियां द्विजधार बंदघोपपुरस्सरम् ।
गीतयादिग्रसंघच मर्यमङ्गलसंवृतः ||१०||
वहिगच्छेत्तदागच्छेत्सायं प्रातश्च वर्षति ।
न चरेन्नैव निर्गच्छेन्न तुपारेऽविधर्मके ॥७॥
न तप्रायां धरायां वा सोपानकोऽपि मगले।
नार्दीयो कर्दमेवाऽपि गच्छेदपि च सटे ॥५७२।।
अवशादागतं देवात्सूतकं मृतकं त्यजेत् ।
इन्द्राण्युद्वासनात्तद्वदाकङ्कणविमोक्षणात् ॥१३॥
लक्ष्मीनारायणध्यानपरत्वेन सदा भवेत् ।
इन्द्राणीमपि गौरीणां सायं प्रातः समर्चयेत् ॥१४॥
यदि मोहेन तेनार्चे नित्या मद्गलभाम्भवेत् ।
नित्यमोपासनं कृत्वा बृहत्सामेति मन्नतः॥३७६||
तद्भस्मना प्रकुर्वीत स्वरक्षां तद्विधानतः।
प्रयतानामिकाडल्या चेमांत्वमितिमन्त्रतः ॥१६॥
वध्वारक्षां प्रकुर्वीत शुभिके शिरमन्त्रतः।।
यामाहरेति मन्त्रेण मालिकामपि च स्रजम् ॥७॥
विभृयादपि(च)य(ने)न · नीराजनरतश्च वै।
तदा तदा च तन्मध्ये विमाशीरपि सन्ततम् ।।५७८।।
अत्यन्तावश्यकी शेया मङ्गलेषु पदे पदे ।
आगतानां विशेषेण बन्धूनां च द्विजन्मनाम् ॥१७॥

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झम्पतिः गाभिधारण मा परियपणमादितः । पतिमनोगामा भोजनेन्वहम् II व.पुन र मोमfaat महात्मनाम् । परिक पिरम्येषु भूरिए ॥E- पएफकी उभे वैश्वदेवकवर्जनात् । मामीनाराययो हितो IHREE भ शन्यासोमनगिर्वणाम् । चोरपरको भोजने तराम् ॥६॥ र साभ्यां चोजने 'छते । पर पायसं कसरं विना IRAN- २Reir भक्ष्याभाव वयं विधिः । सामन्ये विभयो नैव भोजयेत् || *मरे तेषु सर्वदिनेष्वपि । सिरे समीपु प्रामणेषु वा 111 सरा पानेयोपवेशयेत् । verest पाभिमायन्सी निषेधयेत् ||६|| हो पा यलेनैव विवर्जयेत् । 1. साभिरण्यातं जलम् ॥६coll व तथा प्रमौदने शिये। सामिनामिन चानयेत् ॥६०१।। RO रिम्भु परमान्नेषु भूरिपु ॥१६ ॥ RRENTINE नियमो मनुरब्रवीत् ।

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२६१६ कण्यस्मृतिः नोपरेत तदान्यानि पुराणादीनि यस्लशः! पिक्रियाप्रधानानि यामगाथादिकानि च ॥६१ सप्रयत्नेनोपरेण पितृयज्ञादिकं तथा । साकमेधं गुनासीरीयकं तद्वश्वदेविकम् ॥६१४ वारुणं तत्प्रघासं घ कल्याणेषु विवजयेत् । कुम्भाण्डश्चापिकूरमाण्डमसूरः कन्दसंज्ञकः ॥६१५ मूलानिशाकुटादीनि कर्णप्रावरण नियो नैव्यो महासौम्यः सोमकेतुश्शिवारुणः ॥६१६ कर्णमूलं कर्णदाम......"पाप्मनः । पुण्यो वार्ताकजातीयः पटोलः पनसशिवः ॥६१७- उर्वारुस्सरणरसारः सारणोपसरित्तटः। एते शाकाश्शोभनदाः कल्याणेपु महर्षिभिः ॥६१८॥ मुख्यत्वेनैव कुर्वीत सर्वसाधारणेन वै। पुनः। जपेत्पृथिव्यै स्वाहेति चानुवाकं पराश्शिवाः । पवते सदवाक्यानि तानि सर्वाणि वे जपेत् । अवशाज्जलसिक्तश्चेभ्यः स्वाहेति वा जपेत् ॥६२९।। शुना स्पृष्टिरस्पृश्यादिभिरेव वा। उष्णोदकेन तु स्नानं पावमानीभिरेव च। देहे निपतिताः स्युश्चेत्प्रमादाद्वर्णविन्दवः ॥१६ ॥ यदि वाकेन देवेन वाडितस्त्वानपेन वा ॥२० ॥ हरिद्रातलचूर्णानि द्रव्यलितो यदान्वहम् ॥२२ ॥ उत्तमानं विनासायादिदं विष्णु च तं जपेत् ॥२२ ॥

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२६१८ कण्यस्मृतिः दोनोलण्यं मुलं तेषां नास्त्येवादशपूर्वकम् । सवं यागप्रतिनिधिः कल्पोऽयं कश्चन स्मृतम् ॥६३५- प्राह्मणानां पुरा सृष्ट ब्रह्मणेव महात्मना | वेदक्रियासुचालस्यायेऽपि यातीवदुई दः ॥६३६।। तेषामपि हितार्थाय महाशीरियमुत्तमाम् । सृष्टा किलातिचपलं सर्ववेदस्वसारतः ॥६३७ समुद्धृत्य समुद्धृत्य चकीकृत्य च तां चिरात् । प्रकाशिता जगत्यत्र तदेतत्तादृशं शिवम् ॥३८॥ महत्तु वैदिकं कर्म ब्राह्मणानां सुमेधसाम् । यद्यत्र शोभने तस्य वस्त्रं कौतुकमुत्तमम् ॥६६॥ वध्वाहतस्य माङ्गल्यं वहिस्पृष्ट भवेद्यदि । उपदीकाहता: केशाः मूषकैपि दंशिताः। द्वपाच्छन्तुभिरुत्कृन्ता येां तेषां च कर्मणाम् ॥६४१।। आयुष्यसूक्तपठनं लक्ष्मीसूक्तस्य वै तदा। पुनर्वस्त्रान्तरादीनां तत्तन्मन्त्रैः परिग्रहः ॥६४२।। निष्कृतिविहिता सद्भिर्वेदविद्भिर्द्विजोत्तमैः । यदि चण्डालसंस्पर्श वरयोः संभवेत्तदा ॥६४३॥ तदास्यान्मङ्गलस्नानं हरिद्रोष्णजलेन तु। मानात्परं रुद्रजपत्रिवारं निष्कृतिर्मता ॥४॥ दुग्धमान्तं तथाधं वा यत्किंचिदपि वा पुनः ॥६४० ॥ यदि श्वकाकसंसृष्टिस्तदुष्णेनैव वारिणा ॥१४ ॥ हरिदामिश्रिते नैव धृतेन च विधीयते ।

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२६२०
कण्वागतिः
जलाश्ताभ्यां संहत्य पूजयित्वासतानपि ।
ऐरावतं च संपूज्य दक्षिणे पोचरे तथा ॥६॥
सुप्रतीकं धराधारं त्रिःपरिक्रम्य तत्परम् ।
प्रति प्रति प्रयादाभ्यां विनियम्य परस्परम् ॥६५
(न तत्सीमगल्यवद्यथा)
कृष्णान्मणीश्च तत्कण्ठे तद्देवानां च सन्निधौ।
वनीयाद्गीतवादिन पुरंध्रीगानपूर्वकम् ॥६५॥
ततः पुनश्च संकल्य फलदानानि चाचरेत् ।
तथा तांबूलदानानि दक्षिणादीनि शक्तितः ॥६६॥
ब्राह्मणेभ्यः प्रकुर्वीत तथालंकारपूर्वकम् ।
सभापूजां च कुर्वीत तदाशीः प्राप्य वत्परम् ॥६६१॥
दम्पती चोपवेश्योभी दम्पती पूजनक्रिया ।
प्रकुर्यातां विधानेन तदीयामाशिषां शिवाम् ॥६६२॥
स्वीकुर्वता तत्परं च दद्यात्ताभ्यां च दक्षिणाम् ।
तांबूलं च क्रमेणैव सर्वेषां च द्विजन्मनाम् ॥६६३॥
तत्रत्यानां च सर्वेषां तांबूलं चापि दक्षिणाम् ।
शफ्त्या लोभन दद्याच मञ्चारोहणमेव च ॥६६४||
डो(दो)लोत्सवोऽपि कर्तव्यो महाचर्णोत्सवस्तदा ।
वीथीप्रदक्षिणं चापि पुनर्वेश्मप्रवेशनम् ॥६६शा
जलक्रीडाविधानं च तायूलस्य च भक्षणम् ।
मध्याहे मङ्गलस्नानं पुनश्च स्वस्तिवाचनम् ॥६६॥

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२६२२ कण्यस्मृतिः कल्याणं पुत्रयोः त्या द्वौषण्मासं ततः परम् 1. पियोविना मृताहं तु अन्यइशांदिकं तु यत् ॥६- दुर्वाभताभ्यां तत्मय गुदिवाविचारयन् । यदि दूर्वाक्षरित्यक्त्या कारण्याना पिक्रियाम् ।। पितृव्यमातुलादीनामपि दशांदिकं च यन् । तदादिकं दर्मतिले.पण्मासं शुभात्परम् ॥६८०१ पुत्रयोः स्वस्य वा मूढः सदादुःसी भवेदयम् । तस्मात्पैतृककृत्येषु स्वस्य वा पुत्रयोः शुभान् ॥६८१।। पण्मासमध्यप्राप्त पु दर्शनैमित्तिकादिए । दूर्वाक्षताः प्रशस्ताः स्युन दा न तिला अपि ॥६८२।। पुत्रीवियाहः परमो विवाहात्तनयस्य वै। तस्मात्पुत्रविवाहस्य पण्मासात्तु परं तराम् । शुभकर्मसमाचारः स्वनुष्ठ यो विपश्चिता ॥६८४॥ पुत्रोपनयनं तस्माद्विवाहात्तस्य कर्मणः। शुभाचरणनाम्ना ३ सततं ह्यतिरिच्यते ॥६८।। यतो विवाहं पुत्रस्य स्वीकृतो हि गृहान्तरे। अथापि सम्यक्कुर्वीत विवाहात्तु तयोः परम् । शुभाचरणकर्माख्यपण्मासं च शनैश्शनैः ॥६८७॥ तत्क्रमाचापि वक्ष्यामि मन्दवारे च सौम्यकै । वरयोरुत्सवं कुर्यान्मङ्गलस्नानपूर्वकम् ॥६॥ यतन ( तनयः ) स्वगृहेसम्यविक्रयतेऽन्यत्र तस्य चेत् ॥६८३ ॥ तस्मादविवाहात्तु दुर्बलं नित्यमेव हि ॥६८६ ॥

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कण्यामतिः एवं तु तनये दत्ते भिन्नगोत्राय चापदि। तजाताना पुनः स्वस्य जनकस्य कुळं प्रति ||soall समाननकार्या. "त(अ)ज्ञात प्रार्थनादिका। सहस्राख्य परं भूयो दायादानां च तपितुः ||१|| तद्दायादिः प्रकर्तव्यो हरिद्राजटलक्षणम् । पश्चाच तत्वीकारोऽपि तदेतदखिलं कृतम् ।।७०२।। किमासीदिति चालोच्य चेतसा पश्यताधुना। गोत्रप्रवेशादयन तत्संसृष्टी जातायामपि तस्या:स्यात्तद्गोत्रस्य च तादृशः। तद्रिक्थसंबन्धकथा तत्समत्वकथापि वा ।।७०४|| क जाता तत्परं चास्य वंशो दुर्वल एव हि । बभूव किल हा तावत्मकृति याति केवलम् ॥७०६॥ तावदेव हि विप्रत्वं न्यूनत्वं समुपागतम् । तत्रापि सम्यगधुना स्पष्टाय हि निरूप्यते ॥७०६॥ अन्यगोत्रप्रदत्तो यः स तु स्वपितरं क्रमात् । वथा तराम् ||७०३।। । सपिण्डीकरणे सम्यग्योजयेत्तत्र बाधकम् । न भवेत्किंचिदपि वा दत्तजस्तु पुरा किल ||७०dil स्वपुत्रं न्यस्य तातैकगोत्रसिद्धयर्थमादरात् । स्वतातगोत्रमित्युक्तस्वपितामहगोत्रकम् ॥७०६l स्वताततातगोत्रस्य सिध्यथमिति तन्मनः। मुस्पष्टाय प्रकथितं तदर्थो गुरुगोदितः ॥७१०ll पालयिता तस्य पित्रा च तत्पित्रा दत्तकेन वा || ७०७ ) भारो ॥ १. want grm Ratani 11 Sen it Hongs hittin Ter foat Farm Hai fegufveriant To A Unel मार fest in twittaifree Twitreet Himneta utu FRanamik in a पनुमा til .4 मोड । समाfari imti Mmsutfaria पोजना पनि । yamaan-naagefansपि ध्या नशा मारा। माना समय हा गरपागोवा मे गुनम । पंगाना मुमदगो सामोरे ॥२८॥ सपानि ५ को पगोत्र। द्विान घायं पुराना २६२६ कण्यस्मृतिः सम्यक् त्रिपूर्वपर्यन्त असौ यद्यपि नैच्यभार। वंशजानामस्य पितुरत्याग एकस्य चोदितः ॥२५॥ पितामहस्य तापवाद्वितीयस्य ततः पुनः। तृतीयस्य परित्यागत्रयाणां तु ततः परम् ३७२३|| तद्वंशजाना सुस्पष्ट न्यानं नंच्यं च तयुले । मुस्पष्टमेव पित्रादित्यागस्तत्र सुवर्मना ।।७२४॥ युष्मत्साम्यं तत्परं वै वंशजाना भविष्यति । तावदेतांस्यक्तपितॄन् पश्यन्तः कृपया वत ॥७२५।। युप्माभिर्न समाह्य ते पुत्रपौवादयस्रयः । गोत्रप्रवररिक्यादिव्यवहारेषु वम्यपि ॥७२६।। कृपया विप्रमात्रत्वस्वीकारेण मुदायुताः। अङ्गीकृत्य च मामेवमेतदशं च धर्मतः ॥७२॥ समुद्धरत पाताद्य शरणं वोगतोप्रम्यहम् ।। इत्युक्तास्तेऽपि सर्वे वै तथा कुपुस्तहम्भसा ॥२८॥ ओमित्येवेति तत्रानो व्याहृतीश्चहुनेच्छतम् । न तैस्समो भवेत्तावद्गोत्रा रिफ्यक्रियादिषु । यावत्तु क्रमसापिण्ड्यसिद्धिः स्यात्तावदेव हि ॥७३०ll स्वगोवागतपुत्रस्य ताशस्य पितुम॒तौ । दर्शादिदेवताश्चापि पितामहमुखात्रयः। . नोचार्यश्च पिता वेषु श्राद्धमा त्रिपूर्वकम् ।।७३२।। ततो मौसी प्रकुर्वीत तत्पुत्रस्तदनन्तरम् 1/७२६ ॥ आशौचं त्रिदिनं प्रोक्तमेवं मातुश्च तत्समम् ।।७३१ ||

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फण्यस्मतिः सर्वस्वहरणं गया तयोः पूर्व निबन्धनाम् । पाश्यत्यरहिता त्या देशात्तस्मात्प्रयासयेत् 11७४ परस्मै पुत्रदाने तु महते तादृशं पुनः। बाधकं शास्रतो शेयं पुत्रीदाने तु साधकम् ॥१३॥ दौहिनः कता(?) तनयश्चापि सर्वशास्त्रसमौ मतो। विभक्तप तु वद्भातमुखेप किल तत्परम् ॥४६॥ स्वर्यातस्य पुत्रस्य का दौहित्र उच्यते । दौहित्रस्य तु कर्तृत्वं स(पुन) (स) पुत्रयोः ॥४॥ अभावे कथितं सद्भिः स्युश्चत्ते तु एव हि । . अविभक्तपु तैः सर्वैस्तन्मुखेनैव केवलम् । सर्व कारयितव्यं स्यात्प्रेतकृत्यमशेपकम् ॥४६|| नायं तद्धनभागी स्याज्ज्ञातयो धनभागिनः । न चेकिमपि नास्त्येव विभक्तषु तु तेषु वै। तद्धनं निखिलं चास्य धर्मतः प्रभवेद्धवम् ॥२१॥ यत एवमिति प्रोक्त पुत्राभावे तु चोदितः । प्रीत्यासन्नरसपिण्डत्वं दौहित्रस्येद मुख्यतः(मुच्यते) । अङ्गादङ्गात्संभवति पुत्रवद् दुहिता यतः । तेषामभावे दौहियो भ्रातपुत्रेषु सत्सु चेत् ॥al यत्किचित्तः प्रीतिदत्तमस्य तद्भवति ध्रवम् Istall प्रीत्यासन्नरसपिण्डो यः कर्वा स इति निश्चयः || इति तेषां सपिण्डानाममुख्यं तेन केवलम् isan वत्संभूवस्तु दौहित्रो भ्रातपुत्रादयस्वथा Item Reasonakchixtu Tirant मारल afterariatrict us FE witiy HAIRya mir me htha atauni tal मामr Ranauntey | ५ पचय umal Harrint Her की। Anti ENTERTwth निFिEREN+ग। Frie in R. पोग latest Airtant reif पाना निमि पा नि gria गा ARRANTI मनमा विधि निमाया मुमकिपा मायगे समीकर 1.tul गूरगायिया भवानीपाधियुगम। अभियानमारमा परिपिततिपा total भारमानं हिममा मन्त्री पानापानादिभिरपरम् । नापका योजनाकार्यमरि ग य stat कावस्मृतिः योजयेत्तु भयेदेव नात्र कार्या विचारणा । हविः स्यीकरणान्तो वै यागरसवांगसंयुतः | एकं हयिनान्यकार्यहेतवे प्रभवेत्किल । स्थालीपाकादिषु कृतं हविस्तब्रह्मभोजने १७६७॥ प्रभूतसर्पिपान्यस्य कार्यस्य न भवेदहो। मधुपकांदिषु कसं यद्धविरतत्तथैव हि ६८|| अन्यकार्याय न भवेच्छाद्धकर्मणि चंद्धविः । औपासनानो तत्पूर्व कर्तव्यं मुख्यतो न चेत् Iskell लौकिकानी सर्वजनसोलभ्यायच केवलम् । औपासनकृतं चान्नमुद्भियादाज्ञया कृतम् ॥oll तन्मे()क्षणेनोद्धृतं च होतव्यमधिकोष्णवः । यावत्तु प्राशनं तेषां तावदुष्णं भवेत्तराम् ॥७१।। ततः परं च पिण्डेपु गतोप्णेषु नमो मनुः । नमस्काराय कथितस्तस्मात्पैतृककर्म यत् ॥७७२।। अत्यन्तोष्णेन निर्वत्यं तस्य प्राशनकमणि । कर्तृणां गौणतः प्रोक्त कुमारस्य तु भोजने । गुरोरेव हि कर्तृत्वं भुक्त सूनोर्मतं तराम् ।।ssell सेचनं प्रोक्षणे नस्तो ब्राझोदनिककर्मणि ! हविर्भक्षणमात्रेषु सर्वत्र विधीयते ||शा एवमाप्रयणस्मार्वतण्डुलानां तथा पुनः। इविपश्वापि तत्प्रोक्त नतैः कान्तरं चरेत् ||wall प्रोक्षणं सेचनं चापि यजमानस्य मुख्यतः ॥७३ ॥

a germitsurat theuri in here - miniumini rainism. uire ta frantham int El umrajan reakinm pari hit Agamitituम ir Trtismell fry ravin forum se 1,4 tai tº 10 Turn पापा । मायु: बातुन l हामा : पाया THE fagal RT ने । Pi न त रक्षा tir म पाया कापन। ni नाममंग will पा गारगोगमा। मानिमितगंवादितं या आमन्नं ईशा नवन्धि पाम्पते। नमन्नियोपरि मागन्निधौ ||१४॥ 11clil २६३२ कण्वस्मृतिः श्राद्धं कुर्यात्प्रयत्नेन श्राद्धं कृत्वा विधानतः । देवपूर्जा प्रकुर्वीत वैश्वदेवं ततः परम् ॥ वैदिकोऽयं विधि.प्रोक्तः कर्मान्से ब्रह्मयज्ञकम् । प्रश्नब्रह्मपरो यस्तु शाखामात्रेऽतिपावने is८६ शाखाध्यायी महाभागः पङ्क्तिपावनपावनः । शाखामात्रैकदेशस्याध्ययनाच्छोत्रियत्वकम् । न प्रामोत्येव विधिना शाखाध्यायी ततो भवेन् । नित्यस्नानस्सदाचारः सदावहिः सदाशुचिः ॥६ सदातुष्टस्सदाशान्तः सदासूयाविवर्जितः । अमिहोत्राद्यभावेऽपि वेदवेदिविवर्जितः ॥६२१ प्रझमेधक्रियाशुद्धः पूर्वतुल्यो भयत्यपि । इत्येतदुक्त कण्येन मुनिना धर्मगुरामम् । शाम्राणी प्रयरं शास्त्रं हिताय जगत राम् it३ ॥ इति श्रीकण्यस्मृतिः समाता ॥ शुभमस्तु

* दाल्भ्यम्मृतिः *
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गाना पवार या५५ ॥५॥
fat anal terrinापितम ।
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नमो न EVAR
र म मा Rifaili ॥५॥
PAR व भूमिगुर पुग।
निमिंग ॥1
भूरिनरोन कॉगिाः
मान टीन माप पारपानारोदणे ॥ ७॥
पावागानि मायनानि ।
पटिशारा म पूपरगानु ॥८॥

२६३४ वान्यामृतिः अमिहोत्रं तपः सत्यं देयाना प्रतिपालनम् । आतिथ्यं वैश्य देय। मष्टमित्यभिधीयते HE स्टापूती द्विजातीनी सामान्यौ धर्मसाधकी। अधिकारी भवेच्छद्रः पूर्ने धर्म न वैदिछ । यायदस्तीनि गंगायो विठन्ति पुरुषस्य च। तावर्षसहस्राणि स्वालोके महीयते ॥ देवानां च पितृणां च जले दद्याजलावलीन् । असंस्कवप्रमीतानां स्थले दद्यान्नलाञ्जलीन् फेशकीटकशंबूकमस्थिकटकमेव च। स्थलेषु च न दातव्यं कदाचिदशुचिर्भवेत् वामहस्ते तिलान् स्थाप्य यस्तु तर्पयते पितॄन् । पितरस्तपितास्तेन रुधिरण जलेन का एकादेव(मेव) ऋषीणां तु द्वौ द्वौ तु सनकादयः । अर्हन्ति पिवरवीन्त्रीनत्रियश्चैकैकमजलिम् ।। नाभिमाने जले स्थित्वा सतिलं दक्षिणामुखः' त्रीस्त्रीनपोऽअलीन् दद्यादुच्चैरुचतरं द्विजः जले चैव जलं देयं पितृणां जलकाक्षिणाम् । ततःस्थलेषु दातव्यं पितृणां नोपतिष्ठति नोदकेषु च पात्रेषु नाशुद्धो नेकपाणिना ! नोपतिष्ठति तत्तोयं यद्भूम्यां न प्रदीयते एकादशाहे प्रेतस्य यस्य चोत्सृज्यते वृपः । मुच्यते प्रेतलोकाच स्वर्गलोकं स गच्छति

पासधारयन्स
या ६. पग पप गरी ने।
बजेता मापन पर गोग ll
धोनी का मन म प पाएर ।
रंग: मुरिपानामा परी ॥२॥
पनि ५ मे मममे गा।
न मा सारा
नरमा विपक्ष ५ मामधारिए।
पति पिसना को नुन पापदि धि ॥२॥
नामिनि शातारा मासिक।
नमामि नाईमा ग्यान पोरस ॥२४॥
मनि सुन प्रतिमा नु परसरम् ।
प्रतिसंवत्सरं यमाचर्मकारो इनि ॥२४॥
पायनानि न पान कास्टिानि पोहरा।
पिशापय स्थिर सदस: भादशौरपि ॥२६॥
मपिण्डीकरणादूध पत्र प्रदीपते।
मात्र यं दिकतानु श्येहनि ॥२५॥
एकोदिष्ट परित्याय पाणं गुरुवं तु यः।
अ सरिजानीयात्ममातृपिपावकः ॥२८॥
नियमिति कार्य नित्यं तु परिलंपयेत् ।
यादी नैमिति गुयांपश्चाग्नित्यं समाचरेत् ॥२६॥
थमायौ तु भयो यस्य पंतपक्षेऽधवा यदि ।
सपिण्डीकरणावं तस्याकः पाणो विधिः ॥३०॥

दाल्भ्यस्मृतिः त्रिदण्डग्रहणादेव प्रेतत्वं नैव जायते । एकादशदिने पूर्ण पार्वणं तु विधीयते ॥३१॥ यस्य संवत्सरादर्वाक सपिण्डीकरणं कृतम् । प्रतिमासं तथा तस्य प्रतिसंवत्सरं तथा ॥३ तस्याप्यन्नं सोदकुंभं दद्यात्संवत्सरं द्विजः। नित्यत्वात् कुलधर्माणां पुंसां चैवायुपः क्षयात् ॥३ अस्थिरत्वाच्छरीरस्य द्वादशाहः प्रशस्यते । मातुः सपिण्डीकरणे कथं कार्य भवेत्सुतैः ॥३ पितामह्या सहैतस्याः सपिण्डीकरण स्मृतम् । पतिनकेन कर्तव्यं सपिण्डीकरण खियः ॥३ सा मृतापि हि पत्यैक्यं मांसमजास्थिभिः सहः। मातुः प्रथमतः पिण्ड निर्वपेत् पुत्रिकासुतः ॥३ द्वितीयं तु पितुस्तस्यास्तृतीयं तु पितुः पितुः। अथ चेन्मन्त्रविद्युक्त. शारीरैः पङ्क्तिदूपः ।। अदुष्यं(?) तं यमः प्राह पतितपावन एय सः। मी फरणशेपं तु पितृपात्रेप दापयेत् ॥ पिपात्रं पितृणां च न दद्याद्वैश्वदेविके । मृन्मये (म) घ पात्रेषु श्रादे भोजयते पितॄन् ।। दातुध नोपतिष्टेत भोका च नरकं प्रजेत् । इनरमं नु यत् स्नेहलवणव्यंजनादिकम् ॥ वातुभ नोपतिष्टेत भाला मुंजीत फिक्विपम् । गारमात् पूर्व हने प्रक्षालयेदितः ॥ .

infiram भिमान | A: पिपनि मनो मानन ॥४॥ पशि Unia rati अति गरम मम भूमि in पनि पिय: म २ . भूमिदपनाः । ari yार - शनि iral संपyि असानं पापपान। पपिशानिधनुयार निदिमिना ॥४ मक्षिांनाउने कि भ्रमय म यिदति । पिता पिपवे मय जीन प पितामहः ॥४॥ में पिशासनामानारम्मिन प्रपितामह। पेनमा श्रीनि पूजा पिता प यमतं यदि ॥४॥ अनि पोपपासा पुनः भाई परेहनि । जानुपातं यदि पानि सारं तनं यस्मि ॥४८॥ दरवापसीदनं गुांबापावी प्रजायते । गनीय पिवतः पाये मुपती गलितं यदि ॥४॥ इम बदवे पंप निराशाः पिनरी गताः । परीमुभ व पवमीकरधीरकम जादी दर्शनमात्रेण निराशाः पितरो गताः । उरमी रावपाणि शृंगराजस्तथैव च भारतं मोगर पंप पिणा दधमक्षयम् । कुलियारामकातयो मसूरा याव नाटका: । likell दाभ्याभूतिः घिदण्डाहणारेय नत्वं न जायते । एकादशदिन पूर्ण पावं तु विधीयते ३१ यस्य मंगत्मरायांक मपिण्डीकरणं उनम् । प्रतिमासं तया सम्य प्रतिसंवत्सरं तया ॥३॥ तस्याप्यन्नं सौरभ गात्संवत्सरं द्विजः । मातुः सपिण्डीकरण कथं कार्य भवेत्सुतैः ॥३४॥ पितामझा सहतस्याः सपिण्डीकरण स्मृतम् । पतिनफेन कर्तव्यं सपिण्डीकरण खियः ॥३५॥ सा मृतापि हि पत्येक्यं मांसमजास्थिभिः सहः । मातुः प्रथमतः पिण्ड निर्वपेत् पुत्रिकासुतः ॥३६१ द्वितीयं तु पितुस्तस्यास्तृतीयं तु पितुः पितुः । अथ चेन्मन्त्रविद्युक्त शारीरैः पङ्क्तिदूपकैः ॥३० अदुष्यं(दू?) तं यमः प्राह पङ्क्तिपावन एव सः। अग्नौ करणशेपं तु पितृपात्रेषु दापयेत् ॥३॥ पितृपात्रं पितॄणां च न दद्याद्वैश्वदेविके । मन्मयेषु (एम) च पात्रेषु श्राद्ध भोजयते पितॄन् ॥३६॥ दातुश्च नोपतिष्ठेत भोक्ता च नरकं ब्रजेत् । दातुश्च नोपतिष्ठेत भोक्ता मुंजीत किल्विपम् । गण्डुपकरणात् पूर्व हस्तं प्रक्षालयेद्विजः ॥४१॥ नित्यत्वान गुलधाणा पंसा वायुषः क्षयात् || अस्थिरत्याग्छरीरस्य द्वादशाहः प्रशस्यते । हस्तदत्तं तु यत् स्नेहलवणव्यंजनादिकम् all

भारनिhिaulinal
पपिआमान पापपान।
"रो मनर: ना
पnिामान पापा
ति म पनि भूमि trail
मिल गई पामियानाः ।
पूर्ण मार्ट यानि iral
। पnिामा पापणाम।
វេព្យុះឆ្មារ។ निक्षिपदभूमिमा ॥४॥
गरने विमो प.महन्यो - विति।
प्रिय पार दिन प पितामहः ॥४॥
गडावनामानासमिन अपितामई।
प्रानि पूर्वाणा पिताप यमतं यदि ४ी
पोपयामा पुनः पाद परेशानि ।
पहिः पाणि कारं मनं परिम् ॥al
टोटनं कुर्यादाटपाती पजायते ।
पियतः पाये नपतो गरि यदि ॥४॥
पदते पंप निराशाः पिनगं गताः ।
मुमं पंप कनकीकरवीरफम् ॥l
दरानमाण निराशाः पितरो गताः।
: शतपत्राणि भृगराजस्वधैय च ॥५॥
मांगरं पेय पितृणां दधमक्षयम् ।
पाराणकाढक्यों मसूरा याच नाटकाः ॥५२॥

२६३८ दाल्भ्यस्मृतिः निः पावा राजमापाश्च नन्ति श्राद्ध पतत्ययः । श्राद्ध वै मृन्मयं(मृण्मयोपात्रं मृत्तिकायाश्च लेपनम् ॥३६५ साज्यं धूपं घृतं चैव निराशाः पितरो गताः। क्षारस्य तु यल्लवणमुच्छिष्टस्य तु यद्धृतम् ॥१४॥ मुखेन श्रमितं भुंक्त द्वितश्चान्द्रायणं चरेत् । अंगुल्या दन्तधावेन प्रत्यक्षलवणेन च ॥१५॥ मृत्तिकाभक्षणं चैव तुल्यं गोमांसभक्षणम् । श्राद्धं कृत्वा परश्राद्ध यस्तु भुञ्जीत लोलुपः ॥५६ पतन्ति पितरस्तस्य लुप्तपिण्डोदकक्रियाः । श्राद्धं कृत्वा तु यो विप्रो नैव भुक्त कदापन ॥३० हव्यं देवा न गृहन्ति कव्यानि पितरस्तथा । पुनर्भोजनमध्वानं भाराध्ययनमैथुनम् ॥८॥ पानं प्रतिमहो होमः श्राद्धभुगष्ट पर्जयेत् । पाद नियुक्तो भुक्त्या घ भोजयित्वाभिगम्य च ॥५६ व्ययायी रेतसो गर्ने मजयत्यात्मनः पितम् । देयपूर्वभवेच्छादमदेवं चापि यायेत् ॥६॥ प्रह्मचारी भवेद्भुक्त्या भुक्त्या प्राद्धय नेत्तियम् । मृतकातरित भादं प्रमादाद्गलितं तथा। दिनासारशा या कुर्यात् तन्मासपगि ॥३॥ पितृपावं समुत्सप्ट्या ( ज्य ) पि atta प्रदापयेत् ॥३१ ॥ अगुवा ये मृताः केचित धियो या पुरुषास्तथा । ant धातु कनन्यमेकोधि ( १ ) पावणम् ॥६ ॥

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दछु मालयस्मतिः समनमागतम्यागि Frm: राम्रहनस्य पा एकोरिए सुनः कार्य गदंगा महालये || महालये गयामा मातापियोः भवेद्धनि । कोलाहोऽपि गुांत पिंथानं ययायिपि ॥६॥ एकोदिष्टं यहीनमेकाम्यकपवित्रम्म् । आवाहनानो फरणरहितं त्यपसव्ययत् || संफल्म तु यदा फुयांन कुयांपापूरणम् । नायाइनानो करण पिण्वाश्चय न दापयेत् ||sil विवाहातपंधोवं वर्षमन्दार्धमेव वा। पिण्डान्सपिण्डान् नो नं कुर्वरितलतर्पणम् ॥ नित्यश्राद्धमदेवं स्यादर्घ्यपिण्डविवर्जितं । आमश्राद्धं तु नैव स्याच्द्रः कुर्यात्सदेव हि ॥८८|| अपनीकः प्रवासी च यस्य भार्या रजस्वला । आमश्राद्धो द्विजः कुर्याच्छूद्रः कुर्यात्सदैव हि ॥८१॥ या संख्या पकपाकस्य शुष्कं वद्विगुणं भवेत् । चतुर्गुण हिरण्यं तु श्राद्धकर्मणि संस्थितम् ॥८२।। मातुः श्राद्धं तु पूर्व स्यात् पितृणां तदनन्तरम् । ततो मातामहानां च वृद्धौ श्राद्धत्रयं स्मृतम् ॥३॥ दशकृत्वः पिवेदापो गायत्र्या श्राद्धभुक् द्विजः। ततः सन्ध्यामुपासीत दोमं चैव यथाविधि ८४|| चान्द्रायणं नवश्राद्ध पाराको(१) मासिके मतः। पक्षत्रयेऽति कृच्छू स्यात् पण्मासे कच्छू एव तु || १

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२६४२ दाल्भ्यस्मृतिः चण्डालोदकसंस्पर्श स्नात्त्वा विप्रो विशुध्यति । तेनेवोच्छिष्टसंस्पर्श विराणेय शुध्यति Isll अज्ञानतः स्नानमात्रमन्येभ्योऽपि विशेषतः । अत ऊध्वं न दोप: स्यान्मदिरास्पर्शने तथा cal अस्थिभेदं गवां कृत्वा लांगूलशफछेदनम् । पातनं चैव शृङ्गाणां मासाधं यावकं पिवेत् ||६|| यवसस्तावदूढव्यो यावद्रोहति तद्वणः । तद्वर्णी दक्षिणां दद्यात्ततः पापात्प्रमुच्यते ॥१०॥ हले वा शकटे चैव दुर्बलं यो नियोजयेत् । प्रत्यवाये समुत्पन्ने ततः प्राप्नोति गोवधम् ॥१०॥ प्रयत्नाद्वापि कूपेषु वृक्षच्छेद निपातने। गवाशनं कुन्तयित्त्वा ततः प्राप्नोति गोवधम् ॥१०२।। अतिवाहातिदोहाभ्यां नासिकाभेदनेन तु । नदीपर्वतसंरोधे पादोनं प्रतमाचरेत् ॥१०३।। एका चेद्बहुभिः कैश्चिद याद्वयापादिता यदि । पाई पादं च हत्यायाश्चरेयुग्ते पृथक् पृथक् ॥१४॥ एकादं परेद्रोधे दो पादौ यन्धने घरेत् । योजने ५ यः पादाः परत्सव निपातने ॥१०॥ रोम्पा तु प्रथमे पाद द्वितीये मशृयापनम् । गादहीने शिग्गव मशिनं नु निपातने ॥१६॥ यमदयं दद्याद् द्विपाद कास्यभाजनम् । प गा शान्मिधनं च निपातने ||१||

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मध्यमानः
चतुर्थ रारा स्थान पयिशाः सि पश्चने ।
पठे गनुगई प्रो सप्रमे तु दिनप्रयम् ॥११६)
एकाहान्छुगते विप्रो योऽपिदसमन्वितः !
ध्याहार यलोदारतद्वोनी दशभिदिनः ॥१२॥
मन्यकर्मपरिभ्रटाः संध्योपासनषिताः।
नामधारकयिप्राणी भरमात सूनकं भवेत् ॥१२१
संपकांबायते दोपो नान्यो दोपोऽस्ति ग्रामणे ।
तस्मान् सर्वप्रयत्नेन संपर्क नैव कारयेत् ॥१२॥
आदावारभ्य आशीचं संयोगो यस्य नामिषु ।
आदावन्ते च विझयं यस्य वैतानि को विधिः ॥१२३।।
शवसूतकमुत्पन्नं पश्चाज्जातं न सूचकम् ।
शावेन शुध्यते सूतिः सूत्या शावं न शुष्यति ॥१२४।।
जातं जातेन शुद्ध स्यान्मृतकं मृतकेन तु ।
न जाते मृतशुद्धिः स्यान मृते जावक तथा ॥१२॥
मातुरमे प्रमीतिः स्यादशुद्धौ म्रियते पिता ।
पितुः शेपेण शुद्धिः स्यान्मातुः कुर्यात्तु पक्षिणीम् ।।१२६।।
स्रावे मातुस्त्रिरावं स्यात्सपिण्डाः शौचवर्जिताः।
पाते मातुर्दशाहः स्यात्सपिण्डाना दिनत्रयम् ॥१२॥
आचतुर्थाद्भवेत्सावः पातः
पञ्चमपष्ठयोः।
अत ऊवं प्रसूतिः स्यात् सूतकं तु यथोदितम् ॥१२८।।
शिशोरभ्युक्षणं प्रोक्त बालस्याचमनं तथा।
रजस्खलायाः संस्पर्शे स्नानमेव कुमारके ॥१२॥

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वानसम्मतिः
मगोत्री धान्यांची माहिती यदि वा पुनान् ।
प्रभमेअनि यो वणात स दशाई ममापन ॥१४
निरो गुरुपाते न करे यांची हिम्।
अचं निराधमाशीम दशामातक्रियः ॥१४-
आरिमामा विरामं स्यात् परमासे पक्षिणी स्मृता ।
अहः संवत्सरावांक ततः स्नान समाचरेत् ।।१४
रामायेय समुत्पन्ने मृते रजसि सूतके ।
पूर्वमेय दिनं प्रानं यायनोदयते रविः ॥१४४
उदिते तु यदा सूर्ये नारीणां दृश्यते रजः।
जननं या विपत्तियां यस्याहन्तस्य शर्वरी ॥१४५
उपसः प्रामजः खीणां विनेयं दिनपूर्वकम् ।
अर्धरात्रायधिः कालः सूतकादो विधीयते ॥१४६)
रात्रिं कृत्वा विभागा तु द्वौ भागौ पूर्व एव तु ।
उत्तरं तु परं क्षेयं युज्यते रुधिरःस्मृतः ॥१४॥
रजस्वला यदि स्नाता पुनरेव रजस्वला।
एकादशदिनादयंगशुचित्वं न विद्यते ॥१४८||
रजस्वलायां प्रेतायां संस्कारादीनि नाचरेत् ।
ऊचं त्रिरावतः स्नातां शवधर्मेण दाहयेत् ॥१४॥
या मृता सूतकी नारी या मृता च रजस्वला ।
पूर्ववस्त्रं परित्यज्य शवधर्मेण दाहयेत् ॥१०॥
अन्तरिक्षे मृता ये वाऽप्यनो चाप्सु प्रमादतः।
उदश्यां सूतिकी नारी चरेचान्द्रायणत्रयम् ॥११॥

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२६४८ दाल्भ्यस्मृतिः संग्रामे अट्टमार्गे च यात्रादेवगृहेषु महोत्साहे महोत्पाते स्पृष्टास्पृष्टिन दुःष्यति ॥ दिवा(?)कपिच्छ(त्थ)छायाया रात्रौ दधिशमीपुर धात्रोफलेषु सप्तम्यामलक्ष्मीर्वसते सदा ॥ शूर्पवातो नखाद्विन्दुः केशवनघटोदकम् । मार्जनीरेणुसहितं हन्ति पुण्यं पुराकृतम् ॥ यत्र यत्र च संकीणं पश्येदात्मनमात्मना। तत्र तत्र तिलहोमो गायच्या वर्तनं यथा ॥१ इदं दाल्भ्यकृतं शास्त्रं श्रावयिष्यति यो द्विजान् । सवपापविशुद्धात्मा पुण्यलोकमवाप्नुयात् ॥ ।। इति श्रीदाल्भ्यप्रोक्त धर्मशास्त्रं समातम्॥ "शुभम्भूयात्॥

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आनिरसम्मतिः मन्याभावेव्यानयः मन्यामा तु सर्वत्र स्मृता व्याहृतयः किल ||७ अन्यये लिङ्गतोऽयांदा विरोधाभावतः परे। तत्तन्मन्याः संभवन्ति तेषु तेषु तु कर्मसु ॥८॥ प्रायश्रित्तं दृश्यते न यत्र कुत्रापि तत्र वै। पुण्या व्याहवयश्चेवि सा ऋग्या वैष्णवी शिवा । सर्वपापप्रशमनी चिन्तितार्थेदायिनी ॥१०ll प्रायश्चित्तक्रियाहेतोनिीता विष्णना पुरा। न व्याहृतिसमो मन्त्रो न व्याहृतिसमो जपः ॥११॥ न व्याहृतिसमस्तीथों न व्याहृतिसमं तपः। न व्याहृतिसमो यज्ञो न व्याहृतिसमाः क्रियाः ॥१२॥ तस्मात्सर्वत्र ता दृष्टाः प्रायश्चित्ताय केवलम् । तस्मादिककृत्यानां लौकिकानामशेपतः ॥१३॥ प्रमादाकरणे कृस्ने तत्त्यागे बुद्धिपूर्वके । । उत्तारका व्याहृतयो ऋचा युक्तास्तया पुनः । जातकर्माद्यतिक्रमे दिनैकसाध्याः कथितास्तथा नामाख्यकर्मणः। तस्यैतत्कथितं दिव्यं प्रायश्चित्तं महत्तरम् ॥६ ॥ अज्ञानिनां ज्ञानिनां च पावकास्तारकाः परा : ॥१४ कर्मणोऽकरणे जातनाम्नोव्याहृतयः स्मृताः ॥११ ॥ तथान्नप्राशनस्यापि चौलस्याकरणे ततः ॥१६ ॥

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२६५२ आङ्गिरसस्मृतिः पाकारम्भात्पूर्व तद्वीथ्या मृविसंभवे पाकारम्भस्य पूर्व तत्प्रभवेच्छ्राद्धवारकम् ॥ शवं वीथ्या निपतित पाकारम्भात्परं तुन । उपक्रान्तस्य तस्यास्य सूतकं यदि मध्यतः ॥२ अप्यागतं तेन तद्धि वारितं न भविष्यति । तस्माच्छाद्धमुपक्रान्तं सूतकेऽपि तथाऽऽचरेत् ॥ आतर्पणं विधानेन पाकस्यारम्भतोऽखिलम् । दर्शपूर्णमासेष्टिपशुबन्धानन्तरं भाद्रम् सर्वेषी व्रतकृछाणां वारकं श्राद्धमेककम् ॥२६ तस्यापि वारको यागः पौर्णमासश्च दाशिकः। पौर्णमासं च दशं च पशुबन्धं च तहिने ३० समागतं समाप्याऽऽदौ पश्चान्छाद समाचरेत् । पितृक्रिया दिनप्राप्तयागानुष्ठानतोऽखिलाः ॥३१॥ यसपश्चापि रुद्राश्चाप्यादित्याश्चैव कृत्स्नशः। तपाः पितरः सर्वे सर्व पापि पितामहाः ॥३२॥ नित्यता भवेयुर्वे निसिलाः प्रपितामहाः । दोक्षाप्राप्या तु भूयिष्ठा मिस्तेषा भविष्यति ॥३३॥ महादोक्षामभ्यगतश्राद्धम् प्रत्यन्दमामस्तन्मासदीक्षा या न भविष्यति। प्रत्यनमपि पिग्रोस्तन्न पितृमाविकं मतम् ॥३४॥ महादक्षिामभ्यगतं गतमेर भविष्यति । महापौवागतस्यास्य तदन्ते करण गनु l

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२६५४ आङ्गिरसस्मृतिः सूत्याशौचस्यास्पृश्यत्वम् सूत्याशौचे मृताशीचे वैदिकं कर्म नाचरेत् । अस्पृश्यत्वं न सूत्यो स्यादाशीचे तु भवेद्धि चत् ॥४॥ उभयोर्भोजनं कुर्यान्महागुरुनिपातने । अहोरात्रं भुक्तिदैन्यं सर्वेषामपि तन्मतम् ॥४६॥ अकालभुक्तिराशीचे सूत्याशौचे न तन्मतम् । संध्यामात्रं प्रकुर्वीत तयोर्मानसमन्त्रतः ॥४ एकद्वित्रिचतुर्नारीनष्टाशौचस्य चेत्पुनः । आशौचे वर्तमानस्य संघाताशौचिनस्ततः ॥४॥ साक्षादन्नस्य भुक्तिन संध्या सा स्याजले क्रिया। संतताशीचसंभये शतजातिगतप्रामवासिनः संततापिनः ॥४६॥ मूनकान्ते पुनःप्राप्तसूनकस्य निरन्तरम् । अन्नं दृष्ट्वा ततो यत्रात्यक्त्वा तं प्राममादरात् kalil सपो देशान्तरे पित्रोः पाद' कार्यमिति स्थितिः। यदा परंपराधोऽस्य (पस्य) जायते भाद्रयारकः ॥११॥ ना संवरमरं दृष्ट्या सद्यो देशान्तरं प्रजेन् । यदि यिनी न जायेन श्रावस्या तथा तदा ॥५ तय कुर्यान भृतयज्ञोपवीतवान् । .१व ममाकान्त: मूतम्यता यदि गोपन या पश्चागतम्यं तु विभूयात् । विहीनः स्थापन. मम्मंगु l

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२६ आङ्गिरसस्मृतिः एवं वर्षाष्टकेऽचीते वातीयीकाश्रमं व्रजेत् । शिखासूत्रं च तद्युग्मं ब्राह्मणत्वस्य मूलके ॥४॥ यया कया च विधया शिखां सूत्रं च विभृयात् । शिखाच्छेदो पञ्चवारं यदि जायेत शत्रुभिः ॥६॥ ब्राह्मण्यं तस्य नष्ट' स्यात् पुनःसंस्कारतोऽपि तत् । श्राद्धविन स्त्रीसंगे श्राद्धविघ्ने समुत्पन्ने सन्ततं सूतकादिना ॥६॥ अकृत्वैव तदा श्राद्धं नोपेयाश त्रियं वराम्। तदा यद्याहितो गर्भो ब्रह्महत्यावतं चरेत् ॥६७] तदा सकृत्सन्निपाते प्राजापत्यत्रयं चरेत् । असकृद्गमनाच्चापाप्रयानं च समाचरेत् ॥६॥ तस्योपनयनं भूयश्चोदितं ब्रह्मवादिभिः । प्रविष्टपरकायो यः स्वभार्या तेन वर्मणा | नोपेयात्तत्प्रविष्टः सन्नोपेयात्तस्य तामपि । तादृशं कर्म कुर्याच्चत्तत्कुलं स्वकुलं च ते ॥७॥ आत्मानं पातयेद्वारे नरके शेरवाभिधे । नष्टे विमायके श्राद्ध पूर्वस्मिन् हविपि कचित् ।।७११॥ तदा पुनस्तत्संपाद्य हुत्वा प्राणादिभिश्चगम् । द्वात्रिंशदाहुतेः पश्चात्तच्छेपेण समापनम् In यत्तविनायकं श्राद्धं तस्यागश्च समापनम् । अपराहे प मभ्या सद्यः पक भोद्धि वै ॥३||

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ताभ्यामाच्छाद्य 118 E५८ आङ्गिरसस्मृतिः अपावृत्ते तृतीये च दिवसेऽथ चतुर्थके। अहि द्वितीययामे वै शवकुम्भैरमन्त्रितः ॥४॥ अभिपेकं कारयित्वा शेपं कर्म समाचरेत् । औपासने त्वनारच्थे द्वितीयेऽति चेत् औपासने त्वनारब्धे द्वितीयदिवसे यदि ॥५॥ रजस्वला तदा तस्यै हविष्मन्मन्त्रसेचनात् । परं वस्त्रद्वयं दत्वा तूष्णीकं मन्त्रवर्जनात् ॥८६|| तत्पश्चात्सहस्र रुदकुम्भकैः। चतुर्थदिवसे कुर्यादभिषेकं समन्त्रः पञ्चगव्यस्तिलैः श्वेतैः सर्पपः सर्वधान्यकैः। व्याहृत्या चैय गायत्र्या हुनेदष्टोत्तरं शतम् १८८11 अष्टोत्तरसहस्र चेत्सर्वदोपहरं परम् । आयुष्यसूक्त हुत्वाथ चरुणा लाजतोऽपि वा ॥८६॥ होमशेष समाप्याथ कर्मशेष समापयेत् । पश्याच्छुदिमवाप्नोति कर्मणस्तस्य केवलम् ॥६॥ तत्पश्चमेऽथ दिवसे त्यौपासनपरिमदः । तयाथ संगमो मासाद्गर्भाधानविधानतः ॥६॥ सद्गृहक्षेत्रमनसा परस्परविरोधवः । निरुदतत्याना सूतकं तत्समापनान् निकटतम्या ये नवव्याहरणेच्छया। पेशा वरसूतकं भवेत् ॥६ Mail

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२६. आनिरसस्मतिः अनानि साकालंगु कुर्मात्तत्र न सूनी। भादेव पासपी गते सस्मिन् गुनस्तया ॥१०॥ जीवधिकरितापित्यमादिभाटम् अपि जीवसिता पिपिहयज्ञ समाचरेत् । मासि भाद सपा दमाइष्टको पिगमवः ॥१०४] पिनुवियोगापरतः पिण्डदान समाचरन् । तेनायं मादकतां स्यान्न मानुः पिण्डदानतः ॥१०॥ जीये पितरि पंडादे प्राप्त नैमित्तिक यदि । येभ्य एव पिता दद्यात्त यो दद्यात्तु तत्मुतः ॥१६॥ एवं पितामह जीवे येभ्यो दद्यात् स हि स्वयम् । वेभ्यो दद्यात्तु तत्पौत्रस्तथा स्याप्रपितामहे (हान्) ।।१०.ta पितरि संन्यस्ते पातित्यादिदूपिते तत्पित्रादिश्राद्धम् संन्यस्ते पतिते ताते भ्रान्तचित्ते चलात्मनि । तत्कत काणि श्राद्धानि स्वयं पुत्रः समाचरेत् ॥१०८ तत्तत्कालेषु विधिवच्छ्राद्धकर्ता न तेन सः। श्राद्धाधिकारी पिण्डस्य दानमात्रेण जायते । ऋत्विक्त्वेन वृते तस्मिन् न तु कर्ता भवेदयम् ।।११।। पितुः पिण्डप्रदानेन श्राद्धकर्ता भवेदयम् । श्राद्धाधिकारसिध्यर्थ कुर्यादेकादशेऽहनि ॥११॥ पार्वणं तद्विधानेन पितुः सिद्धरेनन्तरम् । कर्मन्दी प्राभूतस्य तदा तस्मिन्नियोजयेत् ॥११२।। तेपामकरणात्सोऽयं सद्यश्चण्डालवा व्रजेत् ॥१६ ॥

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२६६२ आङ्गिरसस्मृतिः अतस्मिन् तत्त्वमारोप्य संस्कुर्याद्यदि कामतः । निष्फलं याति तत्कर्म सोऽपि पातित्यमाप्नुयात् ॥१२॥ पितृत्वं जनितवैव मुख्यतोऽन्यत्र गौणतः। तत्पुरस्कृत्य चेत्कर्म कृतमन्यैः पुनः क्रिया ॥१२४|| विहितेनैव पुत्रत्वं स्वीकारेण न चान्यतः । भ्रातृजः कृवदारः कृतक्रियोऽपि । भ्रातृजो वाक्यतः पित्रोज्येष्ठपकानिष्ठयवर्जितः । पुत्रत्वं समवाप्नोति कृतदारः कृतक्रियः ॥२६॥ सोऽप्येकश्चेदवाप्नोति नोभयोस्तु तथा विधिः । जनितुर्मुख्यसूनुः स्यादन्यस्य गुणतः सुतः ॥१२॥ मातुलत्वपितृव्यत्वसुतत्वाद्यनुबन्धकम् । मुख्यतो यस्य यद्वा स्यात्तदुद्दिश्यैव तक्रिया ॥१२८1 मुख्यानुयन्धनं त्यक्त्वा यः कम कुर्यात्प्रमावतः । गोत्रनामानुबन्धव्यत्यासे गोगनामानुषन्धाना व्यत्यासेनाप्यनेहसः । यदि कुर्याक्रिया तो वे पुनः कुर्याद्ययाविधि ॥१३॥ उपनीवन्तु घेदुपनेतृत्वेनैव तक्रिया । विद्यादत्वेन तहानुभक्तदत्येन तत्पदे ॥१३॥ भयपलेन भयपे पितृव्यत्वेन तार। तत्चदुधारणं वा वचतम समाचरेत् ॥१३॥ समवाप्नोति बन्धनां राजविद्वदनुज्ञया ॥१२ ॥ पितृव्यादिकमुच्चार्य पुनः कुर्यात्तु ता क्रियाम् || १REn

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भाविरमपतिः
प्रेसमंसाराभाई
भाया प्रेगकार गो गुरुहे कामकारतः।
सगनापी अनासमत सिलम् ॥१४॥
गरोगरामनायाग पापा स्नानमाचरेत् ।
मासमा प्रयत्नेन न पश्य समाचरेत् ॥१३॥
विप्रानुसया यतिकरयम्
यिमाभ्यनुक्षया कुर्यात् फर्ममा विशेषतः ।
पितृहत्यं प्रेतात्यं तयोनों अद्यतरपि ॥१४॥
विप्रानुमा यतिरपि सम्भ्या स्नात्वा वसवः ।
प्रेतात्यं प्रकुर्वीत न चेत् कृत्यं तु तन तु ॥१४॥
अपि शाखा फर्म बहुविप्रामतं तु यत् ।
वदभ्यनुज्ञया तत्तु कर्मतः पुनराचरेत् ॥१४॥
बहुविप्रतिरस्कारप्रपाग:प्रदूपिवम् ।
वदभ्यनुनारहितं यत्चत्कर्म पुनश्चरेत् ॥१४॥
करि सन्निहितेऽक कृतं पुनः
यद्यक कृतं कर्म समीपे कर्तरि सिते।
धनवृत्तिगृहक्षेत्रहेतवे तत्पुनश्चरेत् ॥१४॥
भसगोत्रसंस्कृतावाशौचम्
असगोत्रमपि प्रेतं दाययेद्यः कथंचन ।
' , 'स चापि गोत्रिभिस्तुल्यो दशाह सूतको भवेत् ॥१४॥

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२६६६
आङ्गिरसस्मृतिः
अमेयैः संवृतो वेदः साक्षान्नारायणात्मकः ।
तादृशस्यास्य वेदस्य पठनात् सर्वकिल्विपैः ॥१६॥
सद्य एव विमुक्तः स्यात् पातकी नात्र संशयः।
ब्राह्मणस्य वेदाधिकारः
तादृशस्यास्य वेदस्य पठने ब्राह्मणस्य वै ॥१६॥
अधिकारो न चान्यस्य संस्कृतस्यैव कर्मभिः ।
तत्रापि परिशुद्धस्य कृतनित्यक्रियस्य वै ॥१६॥
तत्रापि परिशुद्धस्य विशेषेषु दिनेष्वपि ।
शुद्धाच्छुद्धः स्वतो वेदस्तदुच्चारणतः क्षणात् ॥१६२।।
देवनामान्यनन्तानि निखिलान्यपहानि ।
असकृत्पठितानि स्युनात्र कार्या विचारणा ॥१६॥
स्नानं कृत्वा प्रारभेच वेदं तं तादृशं शिवम् ।
अस्नात्वारम्भ
यद्यानात्वैव मोहेन प्रारभेत् पातकी भवेत् ॥१४॥
स्नानतः सर्वकर्माणि सिध्यन्त्येव न संशयः।
सर्व स्नानमूलम्
स्नानमूलमिदं प्राझ स्नानमूलमिदं तपः ॥१९॥
स्नानमूलाखिला यज्ञाः स्नानमूलमिदं जगत् ।
सर्वकृत्येषु सर्वत्र स्नानमेव परं मतम् ॥१६॥
यस्लेप्याचिषु स्नानं तारकं परिकीर्तितम् ।
अस्पृश्यस्पर्शनादिकमांमानानम्
अमश्यपशंन चैयमभक्ष्याणां प भक्षणे ॥१६॥

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माविरसम्मतिः
रात्रौ धमने
रात्री गु समने जाते रोगा। रप्पागतः।
भासने पायसि स्नानमुन्यते ॥
पर प्रातरेय स्यादिवि शामलभाषितम् ।
सगोयत्यागेज्यगोत्रपरिप्रहगे
सोपगोवारित्यागादन्यगोत्रपरिमहात् ॥१८॥
प्रभवेत्यतितः समः मुद्रः संस्कारतः पुनः।
सयगोत्रपरित्यागो भिन्नगोत्रपरिषदः ॥
पसमेतत्प्रकथितं त्रिय एय हि नुन तु।
अधोदयः
अर्थमुतिभ्यतीपातयुक्ताऽमा पुष्यमाघयोः ॥१
असाव|दयो योगः कोटवर्कमहसंनिमः।
अस्मिन् स्नातो चापकोटो कुर्यातनानशतं यदि ।।
विशदपं त्यक्तपितृकर्मा शुद्धो भवेत्ततः ।
महोदये तु तस्नानसहस्र यदि भत्तितः ॥१८
कुर्यादा कारवेद्वापि शुद्धः पूर्वाधतो भवेत् ।
अन्यथा निप्कृतिनास्ति ताशस्यास्य पापिनः ॥१८.
तंयोग सुसमीक्ष्येत तस्मात्ताहक्तु किल्बिपी ।
पत्यन्येन चितारोहितायाः पुत्रस्य कृत्यम्
चरिसायो प्रमादेन पत्यन्येन चिति व्रजेत् ॥१८४१
Pri...सत्कर्मकरणं पश्चात्तजातजन्मनाम् ।
देवा बभूवुः किल वै चिरम् ॥१८॥

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२६७० आङ्गिरसस्मृतिः दाता चाङ्गारशयननामकं प्रविपद्यते । तस्य निष्कृतिः तदोपशमनायाथ प्रायश्चित्तमिदं परम् ॥१६॥ दाता सेतुगतः सद्यो धनुष्कोट्यां समाहितः । नित्यं त्रिपवणस्नायी यावकाहार एवं वै ॥१६॥ संवत्सरं प्रयत्नेन वसेदेयान्वहं तराम् । स्वकृतं यच्च तत्पापं वदन्नित्यमटन् यतन् ॥१६॥ सर्वेष्वपि च तोर्थेषु तप्तकृच्छशतं चरेत् । ततः शुद्धो भवेदेवं वोदा पापि तदा पुनः ॥१६८11 तदोपशमनायैव पुण्यं चान्द्रायणत्रयम् । यत्वाकुर्वन् वसेत्तत्र ऋतुप्रयमतन्द्रितः ॥१६ER प्रतिनित्यं पचगव्यं पियंस्तद्विधिना रुदन् । निर्लज्जया लोकपुरः कूष्माण्डादोन पठंस्तथा ॥२०॥ दुपदा नाम गायत्री गायत्री वेदमातरम् । संध्यात्रये सहस्राणि जपस्तताख्यम् शिवम् ॥२०१॥ कन्छु विधानतः कृत्वा पुन:संस्कारतः पुनः । पुढगर्भविधानेन गुदो भयति सा चेत् ॥२०॥ न सारा कुर्यात् पुनरुपनया (यना परम् । सा चंद्रदयं त्यक्त्या मेनुम्नानसहस्रकम ॥२०॥ या प यावसाहारा वर्षमाण शुभ्यनि । यया युनिणी घन पदेवासुसर २०४||

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२६७२ आनिरसस्मृतिः तत्त्वं वस्यास्तु विज्ञाय प्रायश्चित्तं ततश्चरेत् । , यत्र यत्र च सा गत्वा यं यं वा स्वजनैः सह ॥२१४॥ मायया मोहयामास वञ्चयित्वाऽविचर्यया । तं तं ज्ञात्वा च संभाष्य तत्तद्वाङ्मूलमप्यलम् ॥२१॥ श्रुत्वा पश्चाच्छोत्रियेभ्यः श्रावयित्वाऽखिलं ततः। राहे वन्धुनि चावेद्य प्रायश्चित्तं ततश्चरेत् ॥२१॥ एतादृशेषु कृत्येषु सा क्षेत्रं प्रभवेद्र वम् । . प्रथमोद्वाहकस्यैव परं त्वेषा परा न तु ॥२१॥ कदाचिद्धर्मकृत्यानां न तस्यापि परस्य वा। तदपेक्षया वेश्या विशिष्यते सा भोगमात्रयोग्यापि वेश्या तस्या विशिष्यते ॥२१८॥ वया चत्तेषु कृत्येषु सपङ्क्ती भोजनं तथा । सह वा भोजनं दुष्ट यदि पावित्यकारकम् ॥२१॥ मन्टुभ्ययं रसायां तु श्यने संघाद्य धर्मतः । सनित्या याममा वा घटिकाद्वयमेव वा ॥२२० तस्माद्धृत्य पश्चानु जातकादि समाचरेत् । ततळच्छसहयाणि धर्मतश्च समाचरेत् ॥२२।। नियतात्मा यायकाशी पापाम तदाधिः । पच नानसहप्राणि स्वयं विप्रमुखन या रा स्यम्य शुद्धो भवति येवलम् । परपामयं योग्य पयमा पुरा भूगः ॥२ ॥

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आङ्गिरसस्मृतिः
निम्ममन्योरेशेन न देवाय निवेदयेत् ।
निवेदितेनानियेदितयोजने
निवेदितेन नच्यधं योजयेनानिवेदितम् ॥२३॥
तथा निवेदितं भूयो लवणं च नियोजयेत् ।
निवेदनादध पुनस्तदादाग घृतेन. या ॥३४॥
वेलेन लयणेनापि यत्नेन न नियोजयेत् ।
तदुन्छिष्ट न कुर्वीत तत्करेण न पीडयेन ॥२३।।
न खण्डयेन्मियोऽज्ञानान्न तत्प्रोक्षणमाचरेत् ।
परिपिञ्चेन्नैवमेव तूष्णीमास्ये विनिक्षिपेत् ।।२३६।।
गृहीयात्तु तदन्तर्वं न दन्तैरपि पीडयेत् ।
तदेतत्परमं शुद्ध निर्माल्यमतिदुर्लभम् ॥२३७]
देवानामपि तद्भोज्यं प्रयत्नेनातिभक्तिवः।
तदोपदंशं स्वीकुर्यान्निवेदितमहाक्षणे ॥२३८।।
भगवत्प्रसादग्रहणे भक्षणविषये
निवेदितस्य हविपो भक्षणे समुपस्थिते ।
आपोशनं न कुर्वीत प्रोक्षणं परिपेचनम् ॥२३॥
यदि कुर्वीत मोहेन रौरवं नरकं प्रजेत् ।
अन्नं पकात् समुद्धृत्य पृथपात्रे नियुज्य च ||२४०ll
कृत्वा सुखोणं संस्कृत्य पश्चान्छाखादिभिर्यजेत् ।
अत्युष्णादिनिवेदने
असह्योष्ण महोष्णं वा पकपात्रगमेव वा ॥२४॥

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२६७५ आनिरसस्मतिः अभ्यन्नम् अभ्याध तथा स्नायाच्छरीरारोग्यहेतवे । तस्नानं कथित सद्भिनं नित्यं तेन नाचरेत् ॥२५१।। कर्म नैमित्तिकं तस्माहवानामपि नार्चनम् । यावन्नित्यादिकर्मा निर्वत्यैव विधानतः ॥२२॥ पश्चादभ्यञ्जनस्नानं न चेत्काले तु मध्यमे । मध्याहे संगवे वापि स्नानं कृत्वा तु तादृशम् ।।२५३।। माध्याहिकस्नानम् माध्यंदिनस्य कृत्यस्य पुनः स्नानं यथाविधि । कृत्वा तत्प्रारभेत्कर्म तेनैतत्कर्म नाचरेत् ॥२४॥ मलापकर्पणार्थाय वद्धि स्नानं प्रकीर्तितम् । क्षुरस्नानम् एवमेव पुरस्नानं कर्मायोग्यं प्रचक्षते ॥२५॥ क्षुरस्नानात्परं यस्तु पुनः स्नानान्तरं विना । करोति वैदिकं कर्म न तत्फलमवाप्नुयात् ॥२६॥ भवेदपि प्रत्यवायी तथातो नाचरेद्बुधः । प्रातःसायंपर्वादिष्वभ्यञ्जनस्नानम् नाभ्यञ्जनं प्रकुर्वीत प्रातःसायं न पर्वसु ॥२५॥ प्रहणे श्राद्धकालेषु व्रतेषु निखिलेष्वपि। पुण्यवैदिकदीक्षासु न नक्त क्षेत्रतीर्थयोः ॥२५८] सुप्त्वा भुक्त्वा रुदित्वा वा दूरं गत्वा पिपासितः । अतिक्षुधातुरो रोगी न कुर्वीत कथंचन ॥२६]

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२६७८ आशिरसस्मृतिः न मंगा यिना कम नित्यकाम्यादिकं चरेत् । स मानसः स्यात्संकल्पः कर्तव्यो वाचिकः परः Rel यक्ष्य इत्येतद्वाक्येन तथा प्राह श्रुतिः शिवा । देशः कालश्च संकल्पे वक्तव्यो ना घेत्पुनः ||२all तिथिः काल इति प्रोक्तो व्यत्यासे तस्य कर्म तत् । नष्टमेव भवेत्सास्तस्मात्तत्तु पुनश्चरेत् ॥२७॥ पितृश्राद्धव्यत्यासे पुनश्चरेत् एकस्मिन्नेव दिवसे पित्रोः श्राद्धमुपस्थितम् । तत्क्रमेणैव कर्तव्यं व्यत्यासे तु पुनश्चरेत् ॥२७२।। मोहादतदिनकृतश्राद्धं चापि पुनश्चरेत् । शून्यतिथिकृतं पुनश्चरेत् तथा शून्यतिथौ यन्नात्कृतं चापि पुनश्चरेत् ॥२३॥ सूतकान्ते शून्यतिथिदोषोऽयं श्राद्धकर्मणः । कदाचिन्न भवत्येव तस्मात्तत्रैव तच्चरेत् ॥२७४।। पितृश्राद्धात्परं कारुण्यश्राद्धम् पितुः श्राद्धात्परं श्राद्ध कारुण्यानां समाचरेत् । तदन्यथाकृतं तचेत् परेा स्तत्युनश्चरेत् ॥२७॥ निमित्तग्रहणश्राद्धं धुत्वान्नेनापि तदिनए । भूयः सम्यक् प्रकुर्वीत भिस्सयैव न चान्यथा |रिन्। मातृपितृश्राद्धमेकदिनेऽन्नेन पित्रोर्स ताई सततमपि कृच्छ्रगतो नरः। अन्नेनव प्रकुर्वीत नामाद्यन कदाचन ॥२७जा

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૨૬૮૦ आहिरसस्मृतिः अधिकारप्रभेदेन भोजनस्य निरूपणम् । यदेतत्तस्य सर्वस्य प्रवदामि यिनिर्णयम् ॥२८) तत्कालाजीगराहित्ये हृदयं तन्निबोधन। एवं स्थिते पुनर्वच्मि यामतः साधयामतः ॥२८६|| जीर्णशक्तिमतो नुश्चेत्तत्काले शुद्भवेद्यदि । न दोपः कथितः सद्भिः कदाचिद्द वयोगतः ॥२६॥ अजीर्णः स्यात्तदा दोपः सुमहान् प्रभवेदपि । तस्माद्यामद्वयं सर्वभुक्तिस्त्याच्या विचक्षणः ॥२६॥ अत्यन्तातुरादीनाम् विशेपः कोऽपि भूयश्च प्रोच्यते सुमहान् परः। रोगिणोऽप्यतिमात्रस्य चौपधाति दग्नतः ॥२२॥ करपहातिवातस्य पिशाचावेशिनस्तथा । वश्याकर्षणविद्वपस्तम्भनोचाटनादिभिः ॥२६॥ पीडितस्य विशेपेण मूद्वितस्यातिताडनैः। अत्युत्क्रान्तिप्रवृत्तस्य चिरत्यक्तान्धसस्तथा। अप्राशनोत्पन्नमृतिसंशयस्य विशेषतः ॥२६॥ तत्कालभक्षणावृत्तिन दोपाय भवेदयम् । सर्वेपामपि वर्णानां सर्वाश्रमनिवासिनाम् ॥२६॥ मुख्यो साधारणो धर्मस्तत्कालाजीर्णशून्यता । यामत्रयादिका: कालास्वत्र तत्र प्रचोदिताः ॥२६जा - तत्कालभक्षणमपि न दुप्यति कदाचन REET

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२६८२ आविरसस्मृतिः मौज्यन्तेनातिहर्पण सर्वमत्या समन्त्रवः। पुत्रो मातिमती दत्तः सर्वपितृशियः ॥३०॥ यदि स्वयं नदा सी तवृत्ति लभते पराम् । सवस्य प्रतिमन्त्रस्य पितृहतुप्रपाटनात् ॥३०८ दत्तस्य तद्भूलाभः स्यात्तत्पूर्व सा न सिध्यति । हिरण्यकश्यामन्त्राणां पटनात्तत्रयं पुनः ॥३०॥ प्रदूरी कृत्य तज्ज्ञातीनवशादेति चाखिलम् । तद्धनं तु न तदा तु तद्धनं सर्व ज्ञातिसाधारणं भवेत् । स्वयमेव पितुर्दत्तः कर्म कुर्यात्प्रयत्नतः ॥३११।। चेत्सद्यस्तज्ज्ञातिगतमेव वै। दत्तोऽयमसगोत्रश्चेत्सदा दुर्वल एव वै ॥३१२|| भवेदेव न संदेहः शास्त्रेऽमुत्र परत्र च। यदि जामी तत्र भवेत्तन्मुखं नावलोकयेत् ॥३१३।। अवश्यं पुत्रसंग्रहः कर्तव्यः यथाकथंचित्पुत्रस्य संग्रहः कार्य एव वै। दौर्बल्ये स्वस्य संजाते धर्मज्ञेन महात्मना ॥३१४१ जलवुवुदसंकाशं वप्मतत्कथितं घुधैः । न हि प्रमाणं जन्तूनामुत्तरक्षणजीवने ॥३१॥ तस्मादात्महितं नित्यं चिन्तयन्नेय तचरेत् । अपुत्रस्य लोको नास्ति नापुत्रस्य तु लोकोऽस्ति पुत्रिणस्तु निविष्टपम् ॥३६॥ दत्तसूनुः पित्रान्येन संस्कृती यदि तवृतः ॥३१ ॥

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२६८२ आङ्गिरसस्मृतिः मौज्यन्तेनातिहर्षेण सर्वमत्या समन्त्रतः । पुत्रो ज्ञातिमतो दत्तः कृतसर्वपितृक्रियः ॥३- यदि स्वयं तदा सवीं तवृत्तिं लभते पराम् । सर्वस्य प्रतिमन्त्रस्य पितृहेतुप्रपाठनात् ॥ दचस्य तद्भूलाभः स्यात्तत्पूर्व सा न सिध्यति । हिरण्यकश्यामन्त्राणां पठनात्तत्त्रयं पुनः ॥६ प्रदूरीकृत्य तज्ज्ञातीनवशादेति चाखिलम् । दत्तसूनुः पित्रान्येन संस्कृतो यदि तवृतः ॥३१० तदा तु तदनं सर्व ज्ञातिसाधारणं भवेत् । स्वयमेव पितुर्दत्तः कर्म कुर्यात्प्रयव्रतः ॥३१॥ तदनं तु न चेत्सदास्तज्ज्ञातिगतमेय है। दत्तोऽयमसगोत्रश्चेत्सदा दुर्बल एष वै ॥३१ भोदेव न संदेहः शास्त्रंऽमुत्र परत्र या यदि जामी तय भवेतन्मुखं नावलोक्येत् ॥१३॥ अवश्यं पुत्रसंप्रहः फतव्यः यथास्यचित्पुत्रस्य मंपदः कार्य एव । पोल्ये माय संजाते धर्मोन महात्मना ॥१९॥ खुइसंकाशं यमनकथितं पुरैः। हि प्रमाण नन्नामुरारपतीयने ॥३१९. नम्मारामतं नित्यं विनयीय परे। अपुत्रस्य लोको नानि नायक तुलोमस्ति पुषिणातु विक्टिम Mali

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२६८४ आङ्गिरसस्मृतिः पुत्रसंपादनं धीमान् दुबलश्चेद्विशेषतः । वृत्तिदत्तादयः वृत्तिदत्तं कल्पयेता मौञ्जीदत्तमथापि वा ॥३२६।। विवाहदत्तमथवा यज्ञदत्तं न चेत्परम् । वृत्तिदत्तः कुलान्यष्टो मौञ्जीदत्तस्तु पोडश ॥३२॥ विवाहदत्तो द्वात्रिंशद्यज्ञदत्तस्तरिष्यति । चतुः पष्टिकुलान्यस्य लीलया सद्य एव वै ॥३२८।। अपुत्रदत्तवृत्या यः प्राणवृत्ति प्राणवृत्ति परत्यलम् । वृत्तिदत्त इति ख्यातस्तनयः पुण्यलोककृत् ॥३२६।। धनतो यस्य यो लोके झु पनीतो भवेदहो। स मौशिदत्त इत्याख्यरतनयस्तु ततोऽधिकः ॥३३० एवमेव भवेदन्यस्तनयः परलोकदः । विवाहदत्तसंज्ञः स्यात्ततोऽपि द्विगुणः परः ॥३३१।। ततोऽधिको यज्ञदत्तस्तनयः पितृयल्लभः । त एते तनया: सर्वे तत्तत्कर्मकपूर्तये ॥३३२|| कृतेन धनदानेन भवन्ति किल नान्यथा । वस्मात्सन्वः किलतेषां कर्मणामेकतो धनम् ॥३३॥ न गृहन्ति महात्मानो परलोकविरक्षपः। कणराः कणशः सपः प्रतिगृह्य ततस्ततः ॥३३४॥ शनैः शनैध कालेन महता तानि पाचरेत् । एवं कोष तेप्यंषु महागु फिल कर्मा ॥३३!

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१८
आरिसम्पतिः
भभिमानना गोमवम्
निम्माभिमाने मगारन्दने काम्यन्दने ।
गया महगो परम्मिपि गांव ॥४॥
गोमा सन गोजयित्वा ततः परम् ।
मेष यददगीप्रतिमा तया ॥३४॥
पभगताप महादशहायकम् ।
गोत्रमे भदेवं प्रयोदशम्माम् ॥३४॥
एवं पापं प
गांचं तत्प्रभवंदपि।
एवं जानानि गोयाणि दत्तागृत्युभवानि वै ॥३४॥
वतन्ते भूतले तम्माद्गोधिणस्तान्विचार्य च।
पृष्ट्वा तत्संशयात्याज्य सतावन्त्येव भूतले ॥३४६
गोत्राणि शास्त्रसिद्धानि कायाणि कानिचित् ।
द्वचयाणि व्यायाणि पञ्चायाणि सन्ति हि ॥३५॥
एतावन्त्येव सर्वत्र शास्त्रसिद्धानि नेतरत् ।
आद्यदत्तकतदत्तपारम्पर्येण फेवलम् ॥३१॥
दृश्यन्ते ब्राह्मणाः सप्तदशार्पयावधीतरे।
दत्तजादीना पूर्वगोत्रम्
तस्मादत्तजपुत्रास्तान् पूर्वगोत्रे प्रवेशयेत् ॥३५॥
विना प्रवेशं यदि ते परं प्राप्तकगोत्रिणः।
यदि स्युर्मोहतः पश्चात्पूर्व तजनकस्य च ॥३३॥
गोत्रं वज्यं विवाहादावेवं सत्यत्र कालतः ।
अज्ञात्वा पूर्ववृत्तान्तं गोत्रे तज्जनकस्य च ॥३४॥

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२६८८ आङ्गिरसस्मृतिः न चेहोपो महानेव भविष्यति न संशयः। स्वीकृत्यनन्तरमौरसोत्पत्ती स्वीकृत्य परपुत्रं यः संजाते त्वौरसे पुनः ॥३६४।। पुरोक्तान्यन्यथाकृत्वा मोहात्तदहितं चरन् । प्रलपस्तदुरुक्तानि मम मास्त्वयमद्य वै ॥३६॥ वदेत्पापी महाक रस्तेन भूर्भारवत्यलम् । तं देशाद्धामिको राजा ताडयित्वा प्रवासयेत् ॥३६६।। सर्वस्वं तस्य गृह्णीयात्तस्मिन् जनपदे न चेत् । न वर्षेत्किल पर्जन्यः राष्ट्रक्षोभोऽपि जायते ॥३६॥ पुत्रप्रदानसमये यदुक्त तत्कर्तव्यम् पुत्रप्रदानसमये तत्पित्रोहिकेण या। वागुता तो ततः काले तिरस्कतुं न शक्यते ॥३६८।। तद्वन्युभिस्तेन राक्षा तेर्जनैतिदापकैः । सद्भार्याभिस्तत्तनयन केनापि वा पुनः ॥३६६॥ पुषप्रदानसमये प्रोक्तवाक्यं तु प्रोक्तवाक्यं तु तत्परम् । अल्पं महदशक्यं या शक्यं या तन रस्येत् ॥३०॥ स्ककार्याय पुरा प्रोक्त्या जनानां पुरतो रहम् । इच्छंस्तदन्यथायितुं यतते यस्तु या जबा ॥३७१।। ऊवं लोकं न यादो वै भ्रूणहत्यामयाप्नुतः । मर्नुः पितुया वाक्याविरमे स्वपुप्रहितमिच्छन्यो भतुं वाक्यं पुरोदितम् ॥३७२

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दूरभ का। आरिमतिः प्रमादन प्रपनयन स्वाती तो पनिती भवम् । न तपाईन्द्रभायोऽम्ति काचिरा परस्परम् ॥३८२॥ मृतभापयत्यादिशुत्रमाणम् मृतभायां यनिया विश्वस्ता पुत्रं न प्रतिगृतीयाद्दूरभायोऽपि सूनको ॥३८॥ अधिकारी मिलिरायोर्दम्पत्योगभयोरपि । कदाचिन्न पृथक्वेन तदाने तत्प्रतिमहे ॥३॥ सूतिप्रजननस्थानापन्नयुग्मदयस्य चेत् । वस्तुनो मेलनं पुत्रदानं तद्महणं भवेत् ॥३८५।। सूतिप्रजननस्थानयुग्मद्वन्द्वमनःसुखम् । अचञ्चलं पिरं तुष्टं चेन्मनस्तघरेन्ननु ॥३८६।। दम्पती दम्पतीचित्तं तुष्ट कृत्वाम्बरादिभिः । कृत्वा च शपथ गाढं भविष्यत्कार्यहेतवे ॥३८७] साक्षिणा पुरवो नूनं देवब्राह्मणसन्निधौ । राशे वन्धुनि चावेद्य गृहीयातां सुतं ततः ॥३८८।। तत्काले प्रतिज्ञाय वदकरणे शपथानन्तरं कालान्मर्यादा था कृता पुरा। नरस्वानुराइयत राजा राष्ट्रात्यवासयेत् ॥३८॥ नवौष मुतस्वीकारकाले यासन्निहिता सा माता, भन्या सपनीमाता सुतस्वीकरणे याऽऽरातिथवा साम्बास्य वै भवेत् । सापनी जननी मूरस्थिता भवति नान्यथा ॥३६ot - - - औपासनानौ श्राद्धेप्रमादवर्णनम् अन्ये मातृमातामहादयः द्वे तिस्रो वा स्थिताश्चेत्तु तदारादेव केवलम् । पुत्रग्रहणतुष्टयव भ; साकं हृदा तया ॥३६॥ निखिला मातरो ज्ञेया बहुमातृक एव सः। तदानी स्वीकृतसुतो नात्र कार्या विचारणा ॥३६॥ तासां च पितरः सर्वेऽप्यस्य मातामहाः स्मृताः। सर्वश्राद्ध प्यनेनाथ सर्वान् मातामहान् क्रमात् ॥३६३॥ एकस्मिन्नेव तत्पिण्डे योजयेद्वा पृथक्तु वा । पिण्डान्वा निक्षिपेत्तेषां स्मर्तृणामत्र केवलम् ॥३६४।। वचनानां समत्वेन विकल्पस्तुल्य एव हि । यथारूचि प्रकुर्वीत यथा वा पुरतः कृतम् ॥३६॥ तथैव पश्चात्कुर्वीत सर्वत्र हि निर्णयः। सपनोपिता न मातामहः सपनीजननीवावो न तु मातामहो भवेत् ॥३६६॥ सपनीमातृतर्पणम् सपनीजननी नित्यतर्पणे द्वयञ्जली लभेत् । स्वमावत्यूञ्जलि सा कदाचिदपि नो लभेत् ॥३६७|| पुनर्निवाहितेनैवं तद्भार्या द्वयञ्जलिं लभेत् । अपुत्रा वा सपुश वा तत्समा सा प्रकीर्तिता ||sal तस्या औपासनानौ भादम् वरपा औपासने प्रादमी पुर्याग्न लौकिके। यदि मात्रमादेन कुलं स्य विनश्यति ॥३६॥ ।

२६६२ आङ्गिरसस्मृतिः पल्या अग्निः यतः पत्नीमृतदिनं पितृनाशदिनेन वै। तुल्यत्वेनैव कथितं तस्याः को वा विमूढधीः ॥४००ll लौकिकानी प्रकुर्वीत स्वसमाया विचक्षणः । सा विद्यमाना भायैव मृता चेन्मातृवर्गगा ॥४०॥ भ्रातृपुत्रग्रहणविधिः कृतत्रयविवाहस्य पन्नों दृष्ट्वा चिरं पृथक् । द्वादशाब्दमलभ्येतं तद्रजोदर्शनात्परम् ॥४०२॥ पुत्रप्रहः प्रकथितो मुख्योऽयं तद्महे विधिः। तत्र साक्षात्कनिष्ठस्य मुतश्चेन्जातमात्रकः ॥४०३।। प्रवरः कथितः सद्भिस्तस्य व्यवहितश्व चेत् । तस्मान्न्यूनो भवेत्पुत्र एवं द्वित्रिविभेदतः ॥४४॥ धातुः पुत्रो भवेन्यूनः सधः स्तन्यरसमहात् । परं तद्ग्रहणात्पुत्रस्तस्मान्यूनः प्रजायते ॥४०॥ एवमन्येषु नवसु जातहोमात्परं पृथक् । तती ज्येष्ठस्य घेत्पुप्रस्तन्यूनो नात्र संशयः । न पाप्येद्वित्रिभेदाद् भ्राता व्यय हितो यदि ।।। तस्य सूनुम्नया न्यून एवमेव पुनस्त्वया । तनयाः शास्त्रमार्गेण न्यूना पत्र भवन्ति ते । दिनभेदेन तन्न्यूनी दत्तो भवति पुत्रका ॥४६ ॥ सापनीमानृतनया उन्नया ज्येष्ठतः परम् ॥ll एवं पिवृष्यवनयननयाध स्थग्विधाः | --- कामजपुत्राणाम्वर्णनम् २६६ तन्न्यूना एव कथिताः सगोत्रा एवमेव वै । विज्ञेयाः किल कि भिन्नगोत्राश्चत्तु ततः पुनः ।।४१०|| किं वाच्यमस्ति तज्ज्ञात्वा बुद्धिमान् कालदेशको। समालोच्य विधानेन कुर्यात्पुत्रस्य संग्रहम् ॥४१॥ विभागे भ्रातरस्तुल्याः विभागे भ्रातरस्तुल्यास्तत्पुत्रास्तत्समा हि यत् । ते गृहीत्वा न तुर्याशं तल्लभन्ते सुतोद्भवे ॥४१२।। सममेव लभन्तेऽशमौरसेन समा हि ते। धर्मपल्या समुद्भूत औरसः कथितो बुधैः ॥४१३।। द्वितीयादिसमुद्भूतो न तत्साम्यमवाप्नुयात् । कामनपुत्राः धर्मपत्नीसुतं प्राहुरोरसं ब्रह्मवादिनः ॥४१४॥ द्वितीयादिसुतान् सर्वान् कामजानिति चोचिरे। धर्मपत्नीसुतो ज्येष्ठच दत्ताद्गौरवमाप्नुयात् ॥४१।। पश्चाज्जातः कनिष्ठोऽपि द्वितीयादिसुतास्तु घेत् । पिश्यादिक्रियया कालाधर्मपत्रीसुतः समाः ॥४१६।। भवन्त्यपि न संदेहस्तथापि पुनरेफकम् । स्वदामि समुद्भूतस्तस्मात्चत्कार्यकद्भवेत् ॥४१॥ योऽधिको दत्तसुतो न तत्कार्य प्रभुभवेत् । चिसूनुर्धर्मपल्याः सति तातेऽथवा न चेत् ॥४१८॥ देभायो क्रियाकच्चरदायर्याया (अथापि या)। दत्तसुनुस्वयोरन्यतरस्य यदि फर्मक ४१६॥ ૧૮૮

।।४२४॥
२९६४
आशिरसस्मृतिः
मृत्योरसे तत्समोऽयं प्रभवेदिति वै मनुः ।
दौहित्रो यदि दत्तः स्याद्भातृजो वा तथाविधः ॥४२०/-
औरसेनैव तुलितो सततं धर्मतत्परौ।
दत्तस्य पितरी प्रोको प्राहकावेव संततम् ॥४२१॥
पितृत्वमपि दत्तेन विष्ठज्जनकयोर्न तु ।
दानहोमात्परं तस्मात्पितरावस्य तो मतौ ।।४२२||
पितृत्वमपि मातृत्वमेकर हि तिष्ठति ।
न तिष्ठति तदन्यत्र क्रियाशवसहस्रकात् ॥४२३॥
पितृत्वं मातरि गतमेकशेषजमल्पकम् ।
यथा न तत्कार्यकरं मातृत्वमपि तत्तथा
पितृव्यपत्ल्यादीनां स्यात्ताडपत्नीत्वमेव हि।
तासो भवति तस्मात्तु न तन्मातृत्वमुञ्चरेत् ॥४२॥
प्रजापतिभ्यो ह्यभिमानसूनुः
पितृव्यसूनुस्त्वथवा सगोत्रः।
ज्येष्ठः कनीयान्न भवेत्तथैको
च भिन्नगोत्रो न सगोत्रविद्विट् ॥४२६।।
सगोव्यसंमतः सूर्यः कश्चन समागतः ।
पुत्रत्वेनोदरपरो नाभिमानसुतो भवेत् ॥४२
धर्मपत्नीसुवो वर्णी द्वितीयादिसुनो गृही।
जातपुत्रोऽप्याहितामिन समस्तेन वर्णिना ॥४२॥
धर्मपत्नीमुतो पालो द्वितीयादिसुतो युवा ।'
आहितामिदशसुतो न समस्तेन चोदितः ॥४२६॥

1-1-3 दत्तकरयकर्मकरणेऽधिकारित्वषर्णनम् २६६८ स एव पितृस्येषु मुख्यकर्ता न संशयः । अनुपेतोऽप्यसौ यद्यप्यथ तत्कप्तोऽखिलम् ॥४३०।। कारयेज्ज्ये मुखतस्तथा चेत्कर्म तत्परम् । जातमात्रे धर्मपत्नीसुते गौणसुता: परे ॥४३१।। द्वितीयादिपुरोद्भूता भवेयुस्तत्क्षणाननु । धर्मपत्नीसुतोत्पत्या दत्ततत्कार्यतोऽपि च ॥४३२॥ द्वितीयादिसुताना स्यात्सद्यो हैन्यं श्रुतीरितम् । तत्पनीकर्मकर्ता वेद्वितीयातनयस्व सः ।।४३३॥ दत्तादौ विशेपः दत्तोऽधिकरचद्भनति पितुर्यदि पुनस्तराम् । असविधौ सन्निधौ वा ताते जीवति दत्तकः ।।४३४॥ तद्भायर्याकर्मकर्ता चेत्ततात्तापतिरिप्यते | द्वितीयातनयश्चेत्तु कर्मकद्दचफस्तदा ॥४३॥ सद्यो हैन्यमवाप्नोति न ज्येष्ठासनयो यदि। तातस्वधर्मपत्नी च समौ दत्तस्य संततम् ॥४३६।। पराणि वत्कलपाणि संस्कार्याणि मुतो न घेत् । मुने सति स एव स्यात्तकमणि न चेतरः ॥४३॥ सर्वदेवं समाख्यातो न तेनायं हि दुर्बलः। दत्तन वत्कलयस्य प्रथमस्य कृता क्रिया ॥४॥ सत्पन्यातनये वावन्माणायमधाधिकः । नुशिोऽपि समांशः स्यात्तादृशं कर्म तत्सतम् ।।४३६॥

વાદ आगिरसस्मृतिः सति तत्तत्सुते तस्मात् पितृपल्या विचक्षणः । ज्येष्ठायास्तरकनिष्ठातः स्वयं कर्म समाचरेत् ॥१४॥ ज्येष्ठेन दत्तपुत्रेण तत्क्षेत्रस्य पितुस्तु वा। कृते फर्मणि तस्य स्यादाधिक्यं तत्सुतात्परम् ॥४४॥ ताते सति कलत्रस्य वत्पुरो ज्यायसोऽस्य चेत् । कृतं कर्म हि दर्तन सद्यः पुत्राधिको भवेत् ॥४४२।। पुत्रेषु सत्सु दत्तेन पितुः कर्म कृतं तु चेत् । न तदा तस्य वाधिक्यं स्वाम्यं किमपि लभ्यते ॥४४३॥ यदि तज्ज्येष्ठभार्याया अपुत्राया कृतं तु वत् । कर्म तत्पुरतो नूनं दत्तः स्यादधिकः सुतात् ।।४४४|| पितुः कर्म कृतं तेन दत्तेन यदि तत्परम् । अप्ययं मुख्यकर्ता न मुख्यः स्यात्सुत एव वै ॥४४॥ निखिलेभ्यो सुतेभ्योऽसावौरसो ह्यतिरिच्यते । पत्नीविशेपाः, तत्र धर्मपत्नी औरसो धर्मपत्नीजो धर्मपत्नी च केवलम् ।।४४६।। याऽनेन पूर्व वाला वा दुर्गुणा वा विवाहिता । सैवास्य धर्मपत्नी स्याद्धर्मविद्भिरुदाहृता ॥४४॥ द्वितीयपत्नी तत्पश्चाद्या कुलीना वा सुरूपा वा वयोऽधिका। सति चेत्तनये तल्पे पुनः कामाद्विवाहिता । द्वितीया भोगिनी नारी धर्मपत्नी न सोच्यते ॥४४॥ न सास्य धर्मपत्नी स्थाद्वितीया भोगिनी स्मृता trerell -- - - नानाविधानां पत्नीनांवर्णनम् २६६७ पुत्राणां ज्येष्ठयकानिध्यम् धर्मपत्नीसमुद्भूतो ज्येष्ठ पुत्र इति स्मृतः। पत्नी वनयराहित्यकृतवैवाहिकस्य सा ॥४५०|| येयमूढा धर्महेतोर्धर्मपल्यभिचोदिता । भोगिनी कलने सति पुत्रे वा पौत्रे नप्तरि सन्ततौ ॥४५१।। स्थिताया येयमूढा स्याद्भोगिनी काञ्चनाह्वया । भर्मणावावातादिपनयः भर्मणो(ऽमूनि)यानि नामानि तानि सर्वाणि कृत्स्नाशः ॥४५२।। टभतेऽतस्तु सा प्रोक्ता द्वितीया काञ्चनाहया | न धर्मपत्नी भवति भोगिन्येव परा स्मृता ॥४५३।। सर्वस्वर्णपदेर्याच्या वावातेति च फण्यते ॥४५४|| परा दुर्वर्णनामानि यानि ख्यातानि भूतले । तानि सर्वाण्यवाप्नोति तृतीयेति च तां विदुः ॥४५।। परिवृत्तीति तामेके विशेयो विमलामति । इदिा हरिणी कल्यां जगदुर्ब्रह्मवादिनः ॥४५६।। तनयाः सर्वेऽप्युत्तरोत्तरदुर्यलाः । धर्मपत्नीसुवान्न्यूना ययसाप्यधिकास्तराम् ॥४५वा एवासी सत्कणीति च कल्याणी धर्मः कथिता हि सा Impal भर्मणेयं यतः साध्या वनिता तेन सा स्मृता । प्रयमा धर्मपत्नी च सुभगा महिपोति च ।

२६६८
आगरसरसूतिः
धर्मपत्नीसुतो पालो मौञ्जीविरहितोऽपि वा।
तिष्टसु चान्यापुरेप कर्मभिः सत्कृतेप्यपि ॥४६॥
उत्तमः पितृछत्येषु तस्मादमिप्रदः स तु।
तेन प्राधानिक कर्म यद्यत्तत्तत्तु तन्मुसात् ॥४६०
सम्यकारयितुं न्याय्यं मन्यान् सर्वान्परे सुताः।
पठेयुर्वं विधानेन चैवं धर्मोऽखिलो महान् ॥४६१॥
विहितस्तु समासेन तेन यावत्कृतं न तु ।
तावत्स तु मृतो तातः परलोकन विन्दति ॥४६२||
प्रेतत्वाच्च म निर्मुक्तः श्रुत्तृष्णापीडितस्तराम् ।
शरणं यत्र कुत्रापि ह्यटन धावन् स्खलन् भ्रमन् ॥४६३॥
नित्यं च सलिलाकाङ्क्षी प्रेतलोके ह्यधोमुखः।
रुग्णो मुण्डश्च विकलो जडो भ्रान्तश्च दुर्मनाः ।।४६४।।
निवसेदेव सततं तस्मादौरस एव सः।
धर्मपत्नीजस्य स्पर्शमात्रक त्वम्
धर्मपत्नीसमुद्भूतो ह्यपरिज्ञातवर्णकः ॥४६॥
प्रेतकार्यस्पर्शमा स्नात्वा कुर्यादमन्त्रकम् ।
तावन्मात्रेण तत्तातः कृतकृत्यः सुखीतराम् ॥४६६।।
सम्यक् पितृत्वमाप्नोति नित्यानन्दः प्रजायते ।
तत्तन्मातुस्तत्तनया मुख्यकार ईरिताः ॥४६॥
सत्त्वौरसेपु मुख्यत्वात्त एवं कथिताः पराः।
वत्तकर्मसु कर्तारो नान्यमातृसमुद्भवाः ॥४६॥

- - - ---- -1- श्राद्धादावत्यन्ततृप्तिकराणाम्वर्णनम् २६६६ धर्मपत्नीसुते वाले केवलं रहिताक्षरे । अस्पष्टस्पष्टवणे या विद्यमाने मृते तु वा ॥४६६।। कक्ष्यानन्तरनिष्ठेने येन केन मुतेन वा। तत्समेनाऽथवा भ्राता शिष्येणान्येन पन्धुना ||४७०।। सर्व कारयितव्यं स्यात्समन्त्रेणाऽत्र तत्र चेत् । यद्यत्प्राधानिक कर्म तत्र तत्रास्य वै शिशोः ॥४७॥ सान्निध्यं स्पर्शमात्रकर्तृत्वम् स्पर्शमात्रः प्रकर्तव्यस्तत्सान्निध्यं च केवलम् । अपेक्षितं मृतस्यात्र महातृप्त्यैकहेतवे ॥४७२।। सत्सान्निध्यस्पर्शमात्रात् स मृतः सुखभागलम् । भवेदेव न संदेहस्तथा तस्मात्नु तचरेत ॥४७३॥ मृतस्यैतानि प्रोक्तानि तारकाणि महात्मभिः । कारकाणि महातृप्तेस्तानीमानि स्मृतानि हि ॥४७४।। श्राद्धादावत्यन्तवृमिकराणि जकारपञ्चकं त्वेकं धर्मपत्नीजसन्निधिः । तत्कार्यकरणं तद्वग्रहणश्राद्धमेव ॥४७॥ तथैव वरणं गौर्या वृपोत्सर्जनमेव च ॥४७॥ महालयश्च पनसस्त एते निसिलाः पराः। अत्यन्तवृप्तिमुक्त्यैकनिदानानीति तान् गुः ॥४७॥ जन्मभूम्यादिकं तत्र तत्रकारस्य पञ्चकम् । मृतस्य वारकं पूर्व तत्परं त्वौरसस्य वै ॥४॥ गयाधाद्धं च फल्गुन्याः शाकश्राद्धमचापि च ।

आविरमस्मृतिः मान्नि गतिकाले हिमोगादिसुनस्ल का। परलोगनुस्ता गा गुम्ग प्रभारया ॥६] गनिया मन्त्रा मृतम्ग प्रभवेराया। एवं स्मापदणमा गयाभादमयापरम् ॥१८ell यमि फाल्गुनीमादमष्टोगररातरुत। शाके भाट यत्किंगत राईफमय तारकम् ॥४८३।। गौरीदानं पिनतिरम् गौरोदानं पृत्सर्गः पाक्षिकोऽयं महालयः। स्थापनं पनसान्यस्य तानीमानि स्मृतानि दि ॥४८॥ पितृणामपि सर्वपा वलुभानीति ये जगुः । जकारपश्वा यत्सः परलोकगतस्य तत् ॥४८॥ तृप्त्यै संतरणायापि प्रोवाचैवं न चेतरत् । जकारपश्वकम् जलाधं जाह्ववीतीरं जनार्दनमहास्मृतिः ॥४४॥ ज्वलनो जननोत्पन्नसुतसान्निध्यमेव च। जकारपञ्चक प्रोक्तं कथित जन्ममोचकम् ।।४८५।। महणश्राद्धलक्षणम् प्रहस्पर्शादथ यतन् सद्यः पल्यादिभितः। तदान्नेनैव यच्छ्राद्धं करोति पितृप्तये ॥४८॥ स्नात्वा तेनैव विधिना तद्ग्रहश्राद्धमुच्यते। तदेतत्किल देवेशो भगवान् भूतभावनः ॥४८७ ) पनसस्थापनमाहात्म्यम् ३००१ पोडशश्राद्धतुलितं महादानशताधिकम् । प्रोवाच किल सर्वेशो गयस्य सुमहात्मनः ॥४८८|| गयाफल्गुनिकाशाकश्राद्धान्येतत्समानि वै । गौरीदानं तथैवेति वृपोत्सर्जनमेव च ॥४८६।। महान्ति निष्क्रियाणीति मनुः कात्यायनोऽङ्गिराः। कुत्सवत्साग्निभरतविश्वामित्रशुकादयः ।।४६०ll नेतेषां तुल्यमपरं पैतृकं कर्म विद्यते । लोकत्रयेऽपि परमं तस्मादेतेषु चैककम् ॥४६२|| अपि कर्ता कृतार्थः स्यात् सुकृती पितृतारकः । इत्येवमेनं जहषः पनसस्थापकं तु तम् ॥४६२॥ वयं न विद्मः को वा स दू दुर्वासाजनकोऽथवा । कुम्भोद्भवो दधीचिर्वा शिविर्वा नहुपो नलः ॥४६३।। मान्धाता वाऽप्यलों वा हरिश्चन्द्रोऽथवा महान् । गयो रामोऽथवा श्रीमानेषु चैकोऽथवा न चेत् ।।४६४॥ एवत्समष्टिलोंकानां हितायाऽत्र भुवः स्सले । अवतीर्णा न सन्देह इति ब्रह्मा शिवो हरिः ॥४६।। पनसे स्थापिते महान् विशेषः पनसस्थापकं प्रोचुः शलाटोस्तस्य पृष्ठतः । सर्वे कण्टकरूपेण समाभित्यैव सन्ततम् ॥४६॥ अष्टोत्तरशतश्राद्धदिव्यशाकविशेषकाः । ४६खा प्रवर्तन्ते यतस्तस्मात्तदा शाकसहसम्म् ३००२ आङ्गिरसस्मृतिः तस्वास्य दिव्यरूपस्य पितृप्राणैकरूपिणः । सर्वदेवस्वरूपस्य सर्वमन्त्रमयस्य च ||sat सर्वयज्ञमहातीर्थसरिदमिसुवर्मणः 1 निखिलागमशास्त्रोधव्रतकृच्छामृतान्धसाम् ॥४६॥ निधानस्य पवित्रस्य पित्र्याकर्पणवर्मणः। स्थापनं क्रियते येन तच्छायापत्रमूलकैः ॥५०० फलैः शलाटुभिर्वापि काष्ठेश्छायाभिरेव च । क्रियते पितृतृप्तिः स्याद्बुद्धिपूर्वमबुद्धितः ॥१०१।। तस्य पुण्यफलं वक्तुं गुरुणा ब्रह्मणापि वा। शक्यं वर्पसहस्रण फणिराजेन वा न तु ॥१०२|| पुरा किल पितृतृप्तिहेतवोऽखिलशाककाः । तपस्तप्त्या वरेणाऽथ ब्रह्मणः पनसं श्रिताः ॥१३॥ अलर्कश्राद्धम् अलकालर्फकारूपाच्युतचूताजरामराः । सप्तरोतेष्वच्युतश्चेदलर्फश्चाजरानयः ॥५४|| प्रतिमासजभेदेन स्मृता द्वादशजातयः । अतः पत्रिंशत्कसंख्या तस्मादेतत्त्रयस्य च ॥१०॥ एतेषां मासजाना स्यादेकजातिशलाटुवः । तद्भिन्नैकादशानां च शलाटफलभेदतः ॥१०॥ दैविध्यं फिल संप्राप्त शलाटोरपि वै मुः। आद्र शुष्म्यभेदेन द्वविध्यं समुपागतम् l 1 श्राद्धार्हदिव्यशाकवर्णनम् ३००३ तद्वत्फलानां च पुनद्वैविध्यं समुपागतम् । तच्चैत्रामलको ग्राह्य आशरस्सपवित्रकः 1५०८।। दिव्यशाकाः श्राद्धार्हाः वारकः कर्मजः शारिः श्रीपणं श्रीकरः शमी। युगदो युग्मदो रम्यं वनपर्णी करीपकी ॥५०६।। कारपल्ली यी कारुः कामकृत् कामवारकः । कामवाही कामदूरः शाकुटद्वयमग्रिमा ॥५१० काम कामदं कम्रः कलिङ्गः कलिवारुकः । अजश्रीरजचाख्यो दारको धर्मदो दमः ॥११॥ कुलंकारी मनुर्मानी राजश्रीः शेसरी नलः । नालकः कारक: खाद्यो गायत्रो हरिलोचनः ।।१२।। हरिदश्वो ह्यग्रीवः कारुण्यः कनकप्रियः। कार्मुकः कर्मकृत्कार्यों धैर्यदो मानकृन् कुणिः ॥५१३।। शरच्छोको मङ्गलको कुण्डोऽकुण्डो गुडप्रियः । दानदः कटुः क्षमी ॥१४॥ मान्मयो मधुरस्रावा वनो यनपञ्जरः । वल्मीको बालराजो चालपुत्रो वृहद्रथः ।।१२।। कर्णकारोऽक्षिरोगनः प्रतीहारी वलोमुखः । शर्मन्नेत्ररोगनो धान्यद्वपो दरिद्रहत् ॥१६॥ कुरालः कर्मसुखकृत् कण्ठहुन् कनकप्रभः। विश्वाकरः पिप्पलमः क्षुन्मूलो क्षुनिवारणः ॥१५॥ फलश्रीर्मधुरपोयो आसिम्मानः Amit frustriaxfrres मम मममम Trial मांगमहानोमरियममममः । निगमागमशानामनाममाम Rell निशाना farmयागः। Hir येन गाया | फलेः शमादभियांषि काष्ठयायाभिरेर य । किया गिगानिः गादिपूर्वमबुद्धितः ॥१०॥ तम्या 'पुग्पालं या गुरुगा प्रमाणापि वा। पुरा मिल पितृनिहतयोऽसिलशाकाः । तपस्तप्त्या चरणाऽय प्रक्षनः पनसं भिताः ३|| अलमंत्राद्धम् अलकालकारूपाच्युतचूताजरामराः। सप्तस्यैतेवच्युतश्चंदलश्चाजरायः ॥५०४।। प्रतिमासजभेदेन स्मृता द्वादशजातयः । अतः पत्रिंशत्कसंख्या तस्मादेतत्त्रयस्य च ॥१०॥ एतेषां मासजाना स्यादेकजातिशलादुवः । तद्भिन्नैकादशानां च शलाटफलभेदतः ॥१०६।। द्वविध्यं फिल संप्राप्त शलाटोरपि वै मुहुः । शम्य पमहगंज पगिराजन या न तु ॥२ ॥ आशुष्कप्रभेदेन द्वविध्यं समुपागतम् tell

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श्राद्धार्हदिव्यशाकवर्णनम्
३००३
तद्वत्फलानां च पुनद्वैविध्यं समुपागतम ।
तच्चैत्रामलको ग्राह्य आशरसपवित्रकः
||५०८।
दिव्यशाकाः श्राद्धार्हाः
वारुकः कर्मजः शारिः श्रीपर्ण श्रीकरः शमी ।
युगदो युग्मदो रम्यं वत्रपणी करीपकी ॥५०६।।
हारपल्ली यी कारुः कामकृत् कामवारकः ।
कामवाही
कामदूरः शाकुटद्वयमग्रिमा
काम कामदं कम्रः कलिङ्गः कलिवारुकः ।
अजश्रीरजचर्माख्यो दारुको धर्मदो दमः ।।११।।
कुलंकारी मनुर्मानी राजश्रीः शेखरी नलः ।
नालकः कारकः खाद्यो गायत्रो हरिलोचनः ॥५१२।।
हरिदश्वो हयग्रीवः कारुण्यः कनकप्रियः ।
कार्मुकः कर्मकृत्कार्यों धैर्यदो मानकृत् कुणिः ॥५१३।।
शरच्छोको मङ्गलको कुण्डोऽकुण्डो गुडप्रियः।
फलश्रोर्मधुरमीवो दानदः कटुकः क्षमी ॥१४॥
मान्मयो मधुरस्रावा वननो वउपञ्जरः ।
वल्मीको बालराजो वाटपुत्रो वृहद्रथः ॥५१॥
कर्णकारोऽक्षिरोगनः प्रतीहारी वलीमुखः ।
शर्मन्नेत्ररोगनो धान्यद्वपी दरिद्रहृत् ॥१६॥
आलः कर्मसुखकत् कण्ठहृत् कनकप्रभः ।
विश्वाकरः पिप्पलनः क्षुन्मूलो अनिवारणः ॥५१॥

आङ्गिरसस्मृतिः अग्निधामा धरानाथो धरावासो धराश्रयः। अद्रिराजो धर्मदेशी धर्माश्रयकरः प्रराट् ॥१८॥ अनिकेतो निमिग्रीवो नीलनेत्रो मरुत्पतिः । मणिमालो बृहन्नालो नारदो लिकुचो नटः ॥१६॥ कुम्भाडः कुण्डली चक्रः शैत्यकर्मा शताकरः। कल्याणाधार ईशान ईशानो दक्षिणास्पदः ॥२०॥ शतवल्ली महावल्ली चक्रवल्ली निपानछत् । द्रोणप्रियो द्रोणराजो गुल्महृत् कटुमूलकः ॥२१॥ नित्यश्रीको नित्यपुप्पो निर्मलो बहुपुष्पकः । प्लक्षराजन्यसंभूतो हेतिमूलो निशाप्रियः ॥२२॥ महादाहकरोप्रवत्थः सुन्दरः कर्दमाढ्यः कर्दमाधः सूपस्थानः सुरास्पदः ॥२३॥ पूर्णपानं शर्मपात्रं शातकुम्भः स्थिराकरः । काव्यश्रीः श्रीकरः श्रीगः परागश्रुतिदीपनः ॥२४॥ महामाली जीवमाली पाशाढ्यः पाशदु सहः। प्रथितो प्राणतरणो देवराजप्रियः पणः ॥२५॥ सद्योमूलः पण्यमतिः गरदूषो गणत्रिगः । गुहावासो गुहामूल्यं भरण्यं मुनिवन्दितः ॥२६॥ मुनिप्रियो दन्तरिपुः शर्मकच्छममत्सरी। पर्वताश्रयः। एतेषामम्लयोगेन तदयोगेन प द्विधा। भवेयुः किल ते भूय एतेषां पुनरेव वै ॥२८॥ त एते दिव्यशाकाः स्युः श्रादकर्मणि पोदिताः ॥२७ ॥

पनसमहिमावर्णनम् ३००५ मध्ये शाकुटकादीनि मूलतः स्तम्भतस्तथा । पत्रतत्रिविधो ज्ञेयः कानिचिच्छुप्कभेदतः ॥२६॥ पक्कन जलतैलाभ्यां पृथक्त्वेन समष्टितः । चूर्णकल्कप्रभेदेन यत्नतः स्यात्सहयकम् ॥५३०|| पनसमहिमा एतत्सर्व चैकपाने निधाय किल पद्मजः । अन्यपात्रे च पनसं तुलयामास पाणिना ॥३१॥ वदा तु पनसः किंचिद्वभूवाधिक एव वै। बृहती त्रिशतसमा तदा जाता हि पश्यताम् ॥५३२।। आर्द्र के पछतसमं तिलाः शतसमं तराम् । तुलायां त्रितयं संबभूव तदादि वे ॥५३३।। भूतले ब्राह्मणा: सन्तः पवित्रे श्राद्धकर्मणि । तुल्यं शाकसहस्रस्य तिला कबृहत्ककम् ॥५३४।। संपादयन्ति यत्नेन पितृणामतितृप्तये । कासा दशविधा दर्भा मुख्यामुख्याश्च ये मताः । सड्गं दशविधं मांसं प्रेतपर्पटभूतपाः ॥५३६।। वामदेवादयो विप्राः पितृसूतविशेषकाः । गयादिपुण्यक्षेत्राणि चटभूरुह एव प ॥५३॥ बिन्दुमाधवविश्वेशचतुर्दशपदानि शानादिमुखान्येवं गधाधरमहेश्वरी ॥३८॥ तिटमापनीदियवा मुद्गगोधूमशाककाः ॥५३ शा आधिरसत्पतिः भागीली फल्गुनी व यमुना र मरनौ। पितृणानि मर्माणि देण्यवानि विशेषतः ॥३६॥ रोमानि पवित्राणि पुनरन्ये तयाविधाः । श्राद्धद्रव्याविशेषाः स्युः पितृणामतिवल्लभाः ।।३१३४ ते सर्व पनसस्तकः मुमहाअयकारकः । एतस्मिन पनसे रखें सर्वश्राद्धनिदानके ॥१४१|| मृताहदिवसे पुण्ये नित्यतृताः सुतौपिताः पितरमान्दिलाः सद्यो भवन्त्येयेति सा श्रुतिः ॥१४२|| एवं सत्यत्र यो मर्त्यः पनसस्थापको हृदा। ज्ञानेनाऽज्ञानतो वाऽपि भूतले यत्र कुवचित् । स एव कथितः सद्भिर्गयाश्राद्धसहस्रकृत् ॥४४॥ पनसं सहकारैश्च कदल्यादिद्रुमैः सह । स्थापयित्वा विधानेन पत्नात्संबधितः शिवः ॥४॥ चम्पकैः पाटलौभिश्च मधूकैः सुमनोरमैः। चन्दनैः सन्दनैनीपस्तच्छायाभिश्च तत्फलैः ॥४६॥ पत्रः पुष्पश्च तत्काप्ठेनानाशाकविशेपकैः। कुर्वन् स्ववृत्या प्रयतर कुलकोटिसहस्रकः ॥४॥ ब्रह्मलोकमवाप्येह तत्सायुज्यमवाप्नुयात् । पनसं यत्र कुत्रापि दृष्ट्वा सद्यो महामनाः ॥४८॥ तत्काष्ठपत्रकुसुमशलाटुफलमुख्यकैः । येन केनापि वा तृप्ति पित्तॄणां तो समाचरेत् ॥१५॥ मत्याऽमत्याथवाऽतीव भक्त्याऽभक्त्याथवा पुनः ॥५४३

श्राद्ध पनसस्यावश्यकवावर्णनम्
सद्य एव ब्राह्मणेभ्यो लब्धमात्रे च तत्फले।
दृष्टमानेऽथवा भक्त्या दद्याद पितृतृप्तये ॥५५०||
शलाटुं पानसं पत्रं फलं दृष्ट्वा तु यो नरः ।
पितृप्तिमकृत्वैव तूप्णी तिप्ठेन्महाजडः ॥५१।।
तं तस्य पितरः सर्वे शपन्ति किल कोपतः।
दृष्टमात्रे तु तस्मात्नु पानसरव्यमुत्तमम् ॥५२॥
येन केनाप्युपायेन पत्रेण च फलेन वा।
रालाटुना छायया वा पितृतृप्तिनिमित्तकम् ॥५५३।।
यत्किंचिदपि वा पु ब्राह्मणेभ्यः प्रदापयेत् ।
वावन्मात्रेण पितरो नित्यतमा भवन्ति वै ॥५५४॥
एवं सत्यत्र यः कश्चिद्भाग्यवान् पनसी नरः।
तद्व्यैरनिशं भक्त्या तृप्त्यकृत् पातकी भवेत् ।।५।।
गालवस्तु पुरा विशो दृष्ट्वा बीजानि भक्तितः ।
क्रयेण पक्षपान् गृह्य पितृप्रीत्यै बुभुक्षितः ॥१५६।।
स्त्रयं पल्या भक्षयित्वा पितृप्ति चकार ह ।
तावन्मात्रेण ते चापि परंतप्ताः शताब्दकात् ॥१५
आनन्दसागरे मामा वभूवुरिति नः श्रुतम ।
पुरा कुशवने पुण्ये माण्डव्यो वेदवित्तमः ॥१५॥
महाविन्याटवीमार्गे पनसं कार्तिकेऽयशात् ।
दृष्ट्याकंच नतस्तूष्णी समालोच्य क्षणात्परम् ।।१६।।
तत्पाणि पवित्राणि पवितानि भुवः स्थळे ।
दृष्ट्या समादायैतानि निपुणः सबमर्ममु ॥१६॥

३००८ आङ्गिरसस्मृतिः तानि स्वकरतः शीघ्र कृत्वा पत्रपुटं त्वरन् । करमैचिद्विप्रपुत्राय पात्राय जलकाक्षिणे ॥१६॥ समुधु क्ताय पातुं तजलं भूमिगसं कथम् । पास्यामि सलिलं वेति समालोकयतेतराम् ॥६॥ पिबत्यनेकतरसा पितृप्रीत्यै पितॄन् महान् । स्मृत्वा ददौ तदा तेऽऽपि समागत्यातिसत्वरम् ।।५६३॥ तावन्मात्रेण संतुष्टा गयाश्राद्धशताधिकात् । अतिहपं गताः सद्यस्तमेनं भूरितेजसम् ॥१४॥ आशीभिश्च प्रशस्ताभिः प्रत्यक्षेणेनमीक्ष्य ते । परं तृप्ताः स्मेति चोक्त्वा त्वं कृतार्थो महानसि ॥५६क्षा शास्त्रार्थधर्मतत्त्वज्ञस्त्वमस्मत्परितृप्तिकृत् । इत्युक्त्वाऽऽभाप्य ते तेन तत्पदं चक्रपाणिनः ॥५६॥ पश्यतस्तस्य पुरतो जग्मुः फिल सुरोत्तमैः । प्रार्थनीयं विशेषेण सोऽयमेतादृशो महान् ॥५६॥ पितृगा पनसः श्रीमान् पल्लभः परमो महान् । कारश्च कारवल्लीकः कारकः कालिको करुत् ।।८।। पञ्चते प्रह्मपुरतो देवाना मण्यता वा। इसम्पयंची दुःसादस्माकमपि सन्ति ६ि ॥६॥ फष्टकानि सतो भूयः सराणि गुमहान्यपि । स्वमस्माकं तु तत्साम्यं किम नाफराविमो will इत्येवमतिदैन्वन पौन.पन्येन फेवलम् । करा लि दु.सातांस्तानेन्तिादशान्यिनुः Ikom कारस्यश्लाध्यत्ववर्णनम् ३००६ नाकिनां पुरतो भूयः प्रहसन् वाक्यमब्रवीत् । रोदनम यन्माहात्म्यसुमहतो जन्मसिद्धातिसुश्रियः ॥५७२।। दृष्ट्वा विभूति परमामसहन्नेव केवलम् । तत्साम्यमिच्छुरारान्मे रोदनं कृतघानसि ॥५७३।। तस्मादेतत्प्रभृति ते भुवने ये दरिद्रतः । श्राद्ध ककरणाशक्ता अष्टोत्तरशतेष्वपि ॥५७४॥ श्राद्धषु केपुचित्कालविशेपेषु कथंचन । रोदनाच्छ्राद्धकरणफलं ते प्राप्नुयुः परम ॥५७५।। कारस्य श्लाध्यत्वम यस्मादत्यम्लवचनं मत्पुरः प्रोक्तवानसि । देवानां शृण्वतां चापि तस्मात्त्वं श्राद्धकर्मसु ॥५७६।। नित्याम्लयुक्तो वर्तस्व कार रे रे कृती भव । कारवल्ल्यादयो यूयं स्वेषो कण्टकसाम्यतः ॥५७७) वत्साम्यवेत्तसो यस्मादङ्गीकुर्मश्च सांप्रतम् । युप्मान् श्राद्ध पु सर्वेषु तद्योग्या भवर्तव वै ॥१७॥ वत्साम्यं तत्त्रयस्यैव मिलित्वैव पृथा न तु । नित्यं शाकसहस्रस्य धृहत्यादेस्तु वो न तु ॥६॥ युप्माकं श्राद्धयोग्यत्वमानं मयसा मवम् । मनसा पूर्वमेव वै ॥८॥ साम्यं कण्टकतस्तस्य पनसस्य स्वकामयन् । युप्मदीयमिमं वृचं मात्वा तूष्णी व्यवस्थिताः ॥१८॥ सकण्टकबृहत्यस्ता ३०१० आनिरसम्मतिः अतिचातुर्यतोऽतीय निपुणाय विचक्षणाः। मान्या समृदयं सर्वमयलपं तथाविधम् ॥५८ सर्व सात्वा विधास्यामि लोकेष्वा च भूयताम् । मन्यादिए मदीयेषु युगादिषु चतुर्वपि ॥२८३ अष्टकामु च पुण्यासु संक्रान्तिषु च वृद्धिके । नैमित्तिक च तामा स्यादयोग्यत्वं तथाविधम् ॥१८४८ तत्र चैतासु याः फराः प्रेतकर्मणि ता. पराः । संभवन्तु न चान्येप मर्यादेवं मया कृता ॥५८ उर्वारुमहिमा एतस्मिन्नन्वरे तत्र देवसृष्टोऽतिसुन्दरः । पत्रपुष्पमहायल्लोशलाटुफलसंवृतः ॥५८६।। समागत्यातिचपलात् कैलासाद्धरणीधरात् । नत्वा बद्धाञ्जलिपुटश्चोर्वारुमम का गतिः ॥१८॥ इति चोवाच लोकेशं भगवन्तं पितामहम् । तादृशं तं समुद्वीक्ष्य गौरीवाक्येन केवलम् ॥५८८ शम्भुना लोकनाथेन सृष्टं शुद्ध कविमहम् । शुद्धसत्वं दूरगवं ज्ञात्वा तं सर्वसुन्दरम्। अतिप्रशस्यं चोवाच देवानां पुरतो विभुः ॥eol त्वमुर्वारो स्थाणुसृष्टो भवानीवचसा यतः । समागतं महाप्रत महागुरुपु वत्सलम् ॥१८ ॥ स्वयं प्रकृत्या च महान शान्तो दान्तो महामनाः IMERIE दविकेषु पनसस्तुतिवर्णनम् गुरुप्रियो विनीतश्च सततं गुरुवत्सलः । अवलेपैकरहितश्चाद्यप्रभृति भूतले ॥६|| च पित्र्येषु कल्याणेपु नवेषु च । नैमित्तिकेषु नित्येषु काम्येषु सकलेप्वपि ॥५६३॥ करतक्रियाविशेषेषु वालवृद्धातुरादिपु । नित्ययुक्तः सदा योग्यः शलाटूनां दशासु च ॥५६४|| दशास्वेवं फलानां च शाश्वतो भव शाश्चतः । पितृणां सर्वदात्यन्तं वल्लभः परमो भव ॥१६॥ वसन्तमाधवस्य त्वं ग्रीष्ममृत्युंजयस्य च । महावर्पाः सप्ततन्तुः शरत्काल्यस्तथा पुनः ॥५६६।। हेमन्तवनराजन्यः शिशिरः शीतलः शियः । सुखाकरः शुभकरो नित्यक्ल्याणकारकः ॥५६७|| प्रथितो भव सर्वेषां पानसैराम्रकैः शिवः। रम्भाभिस्तुलितो भूयः कदाचिदधिकस्तथा ॥१६८।। विद्वरस्तुत्यो राजमान्यो त्वजातीयकपोडशः। संमायो भव सर्वत्र सर्वनेत्रप्रियोऽनिशम् ॥१६॥ सर्वदा सर्वसंवृद्धो भवोर्वारोऽतिवर्धितः । मरुत्वी तु त्वद्वीजविक्षेपणमुखादितः ॥६॥ परयोजसमुत्पत्तिपर्यन्तं किल सर्वदा । तदिष्टिवयतः मुद्रो महान्मन्त्रपरिष्कृतः ॥६०।। यखिराकोटिसंख्यदेवाना वल्लभो भव । इति स्तुतः पूजितरच शासितो विहितोऽनघः ॥६॥ .

आङ्गिरसस्मृतिः
अत्यन्तपित्तप्रकारकः किल कारितः ।
आरम्ताश: प्रीrrसंप्रायः प्रादकममु ॥६
मांत्यागे दोषः
नारसं गमिमं यो मौज्वालाप संत्यजेत् ।
मग य पितुद्रोही भाव न संशयः ॥६४
देवद्रोही अतिदोहो
सर्वद्रोही स एव हि।
विधिनः श्रादहन्तास्यात्तानीमानि प्रयच्यतः ॥६०६॥
पण्णयतिप्रादानि
अमामनुयुगक्रान्तिध्यातिपातमहालया।
तिम्रोडका गजच्छाया पण्णवयः प्रकीर्तिताः ॥६०६॥
मासिश्राद्धानि तान्येवं मासि मासि कृतानि वै।
अष्टोत्तरशतानि स्युस्तानीमानि ततः पुनः ॥६॥
पित्रोताहः कथितोऽलननीयः कथंचन ।
रविं च प्रथमे पादे कवि चैव द्वितीयक ॥६०८।।
त्रयोदश तृतीये स्यादमाव्याख्यानमुच्यते ।
पुनर्निरूप्यते स्पष्टममावाक्यस्य सांप्रतम् ॥६०६||
अमावास्या द्वादश स्युर्मनवस्तु चतुर्दश ।
युगादयश्च चत्वारः क्रान्तयो द्वादश स्मृताः ॥६१०॥
धृतयश्चापि
पाताश्च त्रयोदश त्रयोदश।
महालयाः पञ्चदश अष्टका द्वादश स्मृताः ॥६११।।
गजच्छाया तथा चैका पण्णवत्स इतीरिताः।
प्रतिमासं प्रकर्तव्यत्वेन तानि च सांप्रतम् ॥६१२॥

। -- 1 -- ब्राह्मणस्य दर्शश्राद्ववर्णनम् ३०१३ कीर्तितानि द्वादश हि मिलित्वैतेऽखिलान्यपि । अष्टोत्तरशतानि स्युः प्राद्धानि विहितानि वै ॥६१३।। प्रतिवर्ष प्रयत्नेन महात्मनः। अमावास्यास्तत्र क्लुमा मासान्ता नित्यमेव वै ॥६१४|| अत्रैव पितृयज्ञश्च कर्तव्यत्वेन चोदितः । श्रुत्युक्तोऽयं पितृणां स्यादतितृप्त्यैककारकः ॥६१५।। श्राद्धानां प्रकृतित्वेन चोदितः स्मृतिकर्तृभिः । नैतस्मात्तु परं श्राद्धं विद्यते यत्र कुत्रचित् ॥६१६।। श्रुत्युक्तमेतदेव स्यादेतन्मात्रे कृते तु चेत् । सर्वाण्यपि कृतानि स्युरथवैवदिने तु यः ॥६१७।। श्राद्धं वे क्रियते तद्वा प्रकृतिश्चेति वै जगुः । इतरैः सर्वपित्र्याणां श्रुतितो ब्रह्मवादिनः ॥६१८।। यद्नुष्ठानतः सर्वानुष्ठानं जायतेतराम् । तदेव प्रकृतिः प्रोक्ता हि कैश्चिद्ब्रह्मवादिभिः ॥६१६।। दशधाद्रम दर्शानुष्ठानतः सर्वश्राद्धानि स्युः कृतानि वै। इति सर्वे प्रयो लोकारतूष्णी तिन्ति केवम ॥६२८|| न केनापि च तस्मात्त दर्शः संयम्यते परः। दर्शमात्रेऽनुष्ठितेऽस्मिन् येन केन प्रकारतः ॥६२१॥ मण्यनुष्ठिवानि स्युरिति वै लोकसंस्थितिः । ने तत्र साक्षाच्छादप कियते येन फेन या || आङ्गिरसस्मृतिः क्रियते कृतिना तत्तु भूतले येन केनचित् । तेनाप्युदकमात्रेण श्राद्धनापि कृतेन वै ॥६२ सर्वाण्यपि कृतान्येवेत्येवं सर्वैकनिधयः। स दर्शस्तादृशस्यानुष्ठाता यो ब्राह्मणोत्तमः ॥६२४ अमिहोत्री स एव स्यादर्शयाज्यक्षयाज्यपि । सोमयाजी सर्वयाजी तत्त्यागी ब्रह्मधावकः ॥६२५॥ एच कर्मचण्डालस्तमेनं प्राधातकम् । इप्ट्वा समागतं पापं वाङ्मात्रेणापि नायेत् ॥६॥ प्रकृतिश्राद्धमात्रश्च दर्श एव दर्श एव न चापरः। पितृयज्ञमुखादेव प्रकृतित्वं तदीरितम् ॥६२ तत्रैव विहितोऽयं हि पितृयज्ञः ध्रुतीरितः । दर्शाब्दिको तुल्यो दशों मृताहश्च समो न कदाचिन शक्यते ॥६२८) येन केनापि या त्यक्तुं तत्यागी पत्पसत्यधः । पित्रोम नाहस्त्वन्नेन कार्यः स्यात्तु न पान्यतः ॥२६॥ न हेनान्नेन होमेन पिण्डदानेन मन्त्रतः । अक्षेण रापमन्त्रयों न दुःन तदाचरेत् ॥३०॥ कि वनौकरणाद्ब्रह्मभोजनास्पिण्डदानतः । एतं भवति तत्सम न घेण्डालना प्रजेत् ॥३१॥ दशादियो न स्यायो मृताहोज्यनीय: सारांश्चापि तथाविधः । येन रेन प्रकारेग शभ्यत लि दुल: til संक्रान्तिपुण्यकालवर्णनम् अकिंचनैर्दुषलवा व्याधिौवा विशेषतः । वाधिवर्धावमानाऽज्ञातवासिभिरेव वे ॥६३३।। नष्टनियनष्टधनमतप्रायरथापि वा। त्यक्तं न शक्यते प्राद्धं मृताहाख्यं कथंचन ॥६३४॥ मनाइतादृशः फ्लुनः प्रतिवयं च चान्द्रतः । मानेनैव भवेन्नूनमक्लूमोऽन्येन चेद्भवेन ॥६३।। अत्यन्नावश्यको न स्यादफ्लुमश्चनु यो भयेन । ब्लूमस्यावृत्तिरित्येव मर्यादा शाखसमता ॥६३६।। निथ्यमी न तिथिस्तिथ्याशे कृष्णेभोऽनलो प्रदाः । नियों न शिवोवोऽमातिथी मन्यादयः स्मृताः ।।६३ा नामान क्लूमा इत्युकास्ततश्च फ्रान्तयः सूनाः । सूर्यराशिकमणतश्याफ्लूमा इत्युदीरिताः ॥६३८।। संक्रान्तिस्वरूपम अयने २ प विषुवो पतयः पाशीनयः । पनयो विष्णपपरय संक्रमा द्वारा स्मृताः ॥३६॥ स्विरभवसंक्रान्तिया विष्णुपदाहया । पाशीनिमुन शेय दि.मभानु राशिपु ॥४॥ सौम्ययाम्यायने नूनं भयनो मुगारंटी। तुलामेपोभयं यं रिपुरं मूकने | संझान्तिपुयार. म पुग्यमः सम् Elim रोमन भानोबा मम्मगुमरम्म) ton आनिरमस्मृतिः मोगाम्नायनान विशेष इति वे जगुः । अनारयानाग नाकालं पुण्य काल उपाइनः ॥६४३ मंकान्तिपिलायां सकाला गुस्यदः स्मृतः। गाया: सनिहिता: नाइनाना: पुण्यतमाः स्मृताः॥ई अगने में वि पतयः पइशीतयः । पतयो विष्णुपयाय मंत्रमा द्वादश रमूनाः ॥६४५॥ निशाटक नादयो मरे विशतिः स्मृताः। वर्तमाने तुलामेपे नायभूभयनो दश ॥६४६॥ पडशीत्या व्यतीतायां यष्टिरकाः प्रणाडिकाः । पुण्यायो विष्णुपद्या च प्राक् पश्चादपि पोडश ॥६४४ अर्धरावात दूधं या संक्रान्ती दक्षिणायने । पूर्वमेव दिने कुर्यादुत्तरायण एव वै ॥६४८1 अन्नश्राद्ध कुतपः यद्यत्तु पैतृकं कर्म श्राद्धमन्नेन चेयुनः। कुतपे तद्धि कुर्वीत तद्भिन्नस्य तु चेदयम् ॥६४६॥ विधिः ख्यातो न सन्देहो धर्मविद्भिः सनातनः । ओदनश्राद्धमात्रस्य संक्रान्तीनां च कृतशः ॥६५०।। द्वादशानां तथान्येषां कुतपो मुख्य उच्यते । तद्भिन्नस्नानदानादितर्पणादिषु ते स्मृताः ॥६५।। तदा तदा तु विहिता एते कालविशेषकाः। श्राद्धवर्तुस्तु सर्वत्र कृतिनः काल एकक ।

श्राद्धदेववावर्णनम् कुतपो वेदवचसा मुख्यः प्रोक्तो न चेतरः । सोऽपि यस्मिन् दिने सम्यग्दक्षिणायनकालकः ।।६५३|| तमुत्तरायणे कुर्यादुत्तरायणमेव हि । फुतपस्य तु यत्र स्याल्लोभपूर्व तथाचरेन ॥६४।। दर्शसंक्रान्त्यादिभ्राद्धानि दरकान्तियुग्मश्राद्धादित्यं सर्व यथा लभेत् । औत्तरे हयने सम्यक कुतपेऽस्मिन नचाउचरेन ॥६५५।। संक्रान्तिमात्राः कथिता अफ्लुमा इति मूरिभिः । एवं धृतिश्च पातश्च पड्विंशति कसंख्यया Ivan कथिताः किल सर्वाग्यप्यस्लमान्येव केयलम । महालयः महालया बहुविधा: पूर्व पञ्चदशेति वे ॥६ दशेति च तथापरे। पति अयं ऐति एफनेवेति फेचन tal पोदा ताधिताः मरिष्टका द्वारा स्मृताः। यदन्तुः दिसृदेवत्ये हंसश्चैव करे पितः || चाम्या विधिर्भवेत्सा नु गउम्छाया प्रकीर्तिता। प्राटदेवताः समामि शानि ख्यातानियिमानि पंचमी पदैवत्यानि कानि सुनवईयायकानि प। नगदी तु निदेव माह यd ॥१॥ पोडशवेति फेचिनु ३०१८ आङ्गिरसस्मृतिः पड्दैवत्यस्तु दर्शः स्यादृष्टका नवदेवताः । अष्टकासु च वृद्धौ च गयायर्या च मृतेऽहनि ॥६६२|| मातुः श्राद्ध पृथक् कुर्यादन्यत्र पविना सह । पतिना मह कर्तव्यं पृथक्त्वेन कृते यदि ॥६६३।। तत्पैतृकमहासद्गसौख्यविनकरं भवेत् । पितृवर्गस्तु पूर्व स्यान्मारवर्गस्ततः परम् ॥६६४।। ततो मातामहानां च वर्गोऽयं तत्कलनतः । पित्र्ये प्रदक्षिणम्, शून्यललाटता च पितृवर्गों यत्र पूर्व तत्र स्यादप्रदिक्षणम् ॥६६५।। अपसव्यं तथा शून्यललाटं प्रभवेदपि । यत्र यत्राऽऽपसव्यं स्यात्तत्र तत्राऽप्रदक्षिणम् ॥६६६।। तथा शून्यललाटं च प्रधानाने च तस्मृतम् । तत्र गृहालंकारो न कर्तव्यः योतत्त्रितयं तत्र गृहालंकरणं न तु ॥६६७॥ मातृवर्ग प्रदक्षिणादि मात्यों या पूर्व तत्र स्यात्तु प्रदक्षिणम् । सम्यं पुण्डललाट प मङ्गलस्नानमेव च गृहालंकरण चापि मालानि तथा पुनः। पितृगां ए ममो मुख्यो भवत्यपि प सन्नतम् ॥१६॥ प्रपितामहपूर्व स्यात्तत्पितामहमभ्यम् । पिन्त एवं कथितं तदुधारणलक्षणम् ॥all 11 आशौचकालनिर्णयवर्णनम् ३०१६ श्राद्धभेदेन विश्वेदेवाः तेपां च विश्वेदेवास्ते सत्यसंज्ञिकनामकाः । सर्वत्र वृद्धशब्दश्च प्रयोक्तव्यश्चतुर्वपि ॥६७१।। तथैव मातृवर्गऽपि ताीयीके च वर्गके। जननक्रमतश्चेदं तेपामुञ्चारणं भवेत् ॥६७२।। एतद्विरुद्ध तत्सवं तद्विरुद्धमिदं परम् । निःशेपमिति योद्धव्यं ते सर्वे देवताः किल ॥६५३।। वसवः पितरोऽत्र स्यू रुद्राश्चापि पितामहाः । प्रपितामहाश्च कथिता आदित्या इति तद्गणाः ॥६७४।। सापिण्ड्यनिरूपणम् एतत्वयात्पूर्वकस्य चतुर्थस्य सकृत्किल | श्राद्धस्य करणं प्रोक्त पाथेयाख्यस्य सूरिभिः ॥६७क्षा तदेवं सप्तपूाख्यं सापिण्ड्यस्य निरूपणम् । आशौचं च दशत्रिदिनभेकदिनम् वायत्त सूतकं सर्व तम्जानां संप्रकीर्तितम् ॥६७६॥ समानोदकसंज्ञाश्च ततो भूयः सगोत्रिणः । तदूर्ध्वमिति विज्ञयं तेपा तत्सूतकं ततः ॥६॥७॥ त्रिदिनं चैकदिवस पश्चात्स्नानं च बोधितम् । अमेणैव परं यावत्तावत्पर्यन्तमेव वै ॥६७८।। कथितं प्रसंगादिदमौरितम् । जीवच्छ्राद्धं तु तत्प्रोक्तं सर्वश्राद्धविलक्षणम् ॥६७६।। स्नानमात्रं च ३.०० भारिमामनिः पवाशियाकमया धर्मकाया। पुनः ममेतं नोपानम्ता विविध स्मृतम् ical मामानि कानिमिभूमी देवतासहिनान्यपि । अभिकानि प पुनस्तानमानि भग्यवे ॥६८९|| गदिमादध गयाना तमाशं तथैव च। भिमा नृणाममादौन्यसिलान्यपि ॥६८ना सरविकानि यातानि प्रेतबाधानि फरनशः। अधिकानि प्रतिनि सोदयम्भानि स्नशः ॥१३॥ अमादिश्राद्धे कर्तव्यानि प्रेतश्राद्धेषु सर्वत्र मंकल्पो मुत्यतः स्मृतः। अभ्यनुज्ञापि परमा सा चायाऽऽवाहनं मतम् ॥६८४॥ सपाद्याध्यगन्धयूपदीपपुष्पाणि केवलाः । तिलाः सर्वत्र तूष्णीकाः कृत्स्नं वेदमनुं विना ॥६॥ तत्र पूजा प्रफर्तव्या पिण्डदानं च दक्षिणा। आवश्यक्यत्र परमा दध्याज्ये वस्त्रमेव च ॥६८६|| पूर्वाह एव कुर्वीत कुतपं नावलोकयेत् । पिण्डानि वायसेभ्यो वा गृभ्यो वा निवेदयेत् ॥६८) न चेन्जलचरेभ्यो वा नान्यत्र तु विनिक्षिपेत् । एकोद्दिष्टाधिकारिणः भ्रात्रे भगिन्य पुत्राय स्वामिने मित्राय गुरवे श्राद्धं पितुर्मातुः स्वसुस्तथा । मोति ॥६८६॥ मातुलाय च ॥६८il महालयविधवर्णनम् ३०२१ अपिण्डकानि सपिण्डकानि च श्राद्धानि युगक्रान्तिमनुश्राद्ध प्रेतश्राद्धादिकं तथा । अपिण्डकानि ख्यातानि सपिण्डानीतराणि च ॥६६०|| महालयपोडशत्वे गजच्छायाऽत्र नो भवेत् । पण्णवस्यत्वसंख्याये सा हि पञ्चदशत्वतः ॥६६१।। यया कया संख्यया वा तया पड्विधया भवेत् । महालयत्वस्य सिद्धिविशेषे तु फलं तथा ॥६६२।। सर्वत्र समाख्याता प्रयासाधिस्यतः फलम् । प्रभयत्येव सुमहन्नात्र कार्या विचारणा ।।६६३॥ महालयः महालयः पाक्षिकोऽयं द्विविधः परिकीर्तितः । एकविप्रानेकविप्रभेदेन किल तत्र वै ॥६६॥ एकविप्राख्यपक्षस्य स्वरूपं वच्मि पूर्वतः । महालयानां सर्वेपामापक्षान्तस्य केवलम् ॥६६५।। वृताः प्रथमदिवसे वान्येषां च केवलम् । व एव नान्ये कर्तव्याः पक्षान्ते श्राद्धदक्षिणा ॥६६६।। एकदैव हि देया स्थान देया स्यात्तदा तदा । अनेकविप्रपक्षे तु प्रतिनित्यं च बाडवाः ॥६६७ भिन्नभिन्नाः प्रकर्तव्याः प्रतिनित्यं पृथक् पृथक् । दक्षिणा च प्रदातव्या प्रतिपूपं पृथक् पृथक् ॥६६॥ प्रतिवर्ग न चेद्विप्रा चरणीया विधानतः । पड्दैवत्यं तु सर्वत्र नवदेवत्यमेव वा ॥६ ये ३०२२ आङ्गिरसस्मृतिः ख्यातो महालयः सद्भिः पड्विधोऽपि महालयः । एवमेव प्रकर्तव्यो नान्यथा तं समाचरेत् ||७००l) सकृन्महालयः चरेद्यदि विशेषेण नानादेवतकेन । सन्महालयः सोऽयं स भवेकि तु स स्मृतः ॥७०११॥ गयाश्राद्धसमः कोऽपि कथितः परमो महान् । अनिर्वाच्योऽखिले: शास्त्रैर्महाश्राद्धविशेषकः ।।७।। तादृशश्राद्धकर्तापि पड्दैवत्येन संयुतम् । नवदेवतकेनापि विष्णुना वा समन्वितम् ।।०३।। धुरिलोचनसंयुक्तं कुर्याच्छाद्धं महालयम् । सत्पक्षेण वा पूर्वप्रोक्तपक्षेषु येन वा १७०४॥ पक्षण केनचित्कुर्यात् स महालयद्भवेत् । न चेदयं गयाश्राद्धतुलितं यं च कंचन पुण्यं श्राद्धविशेष वै कुर्यादेवेति सा श्रुतिः । महालयस्य भरण्यादीनां श्लाध्यत्वम् दिने दिने गयातुल्यं भरण्यो गयपश्चकम् ||६|| दशतुल्यं व्यतीपाते पक्षमध्ये तु विंशतिः । द्वादश्यां शतमित्याहुरमायां तु सहस्रकम् ॥ol महालयकालः आपाढीमवधि कृत्वा यस्याः पक्षानु पञ्चमः। महालय इति प्रोक्तः पिता श्राद्धसंपदे १७६८||

सुमद्गटीनाते प्राद्धव्यवस्थावर्णनम्
३०२३
यतीना महालयः
तत्र पक्षे यतीनां तु द्वादश्यां श्राद्धमाचरेत् ।
दुप॑तानाम्
चतुर्दश्यां विशेषेण दुर्मूतानां चरेक्रियाम् ॥७०६||
सुमङ्गल्याः
मुमगलीनां कथितं नवम्या प्राद्धमेककम् ।
अश्रोत्रियकलयाणां यावत्तद्भत वर्तनम् ॥७१८।।
प्राणिलोके ततस्तत्तु कुर्याद्वा न तु वा द्वयम् ।
एवंदस्ति हनुष्ठानं सन्महालये तु चेत् ॥११॥
यावत्पैतृकधर्माः स्युस्तुलितस्तेन स स्मृतः ।
अतीतो यदि पक्षः स तद्भिन्नेऽपरपक्षके ॥७१२।।
वदन्यस्मिन् वादशे वै तदन्यस्मित् तथाविधे ।
यावत्तु वृश्चिकस्तिष्ठत् तावत्तत्तु समाचरेत् ॥७१३।।
अदर्शने वृश्चिकस्य जाते तत्पितरः परम् ।
धनुर्मासे तु संप्राप्ते श्राद्धाकरणमीक्ष्य वै ॥७१४||
सद्यः शापप्रदानायोद्यु क्ता एव भवन्ति वै ।
तावदेव ततो भक्त्या श्राद्धं महालयाख्यकम् ।।७१५।।
विधिनैव प्रकुर्वीत न चेहोपो महान् भवेत् ।
येन केन प्रकारेण ततश्च श्राद्धमेककम् ॥७१६।।
कुर्यादेव पितुः श्राद्धतुल्यं प्रत्यब्दमेव वै।
महालये परेऽहनि तर्पणम्
प्रत्यब्दधर्मा निखिलाः सकृन्महालयस्य ते ॥१७॥

३०२४ आङ्गिरसस्मृतिः भवेयुरेव तस्मात्तु परेऽहन्येव तर्पणम् । श्राद्धे यावन्त उहिष्टास्तत्परेऽहनि तान् यजेत् ॥४१८] रव्युदयात्पूर्व तपणम् तच्छेपतिलदर्भस्तु पूर्व सूर्योदयस्य थे। प्रनष्टपितृकश्चत्तु तर्पणस्याधिकाययम् ||१६|| स प्रनष्टप्रसूनित्यं तर्पणेऽधिकृतो भवेत् । जीवपितृकश्राद्धम् मासिश्राद्धे पितृयज्ञे नान्दीश्राद्धे च सन्ततम् ॥७२०|| जीवत्तातोऽपि कर्ता स्यादाहोमात्करणं स्मृतम् । पूर्वद्वये तु सततं नान्दीश्राद्धं तु सर्वदा १७२१।। येपामेव पिता दद्यात्तभ्यो दद्यात्तु तत्सुतः। ताते भ्रष्ट पसंन्यस्ते रुग्णे रोगकपीडिते २२।। यत्कर्तव्यं तेन कम पैतृकं तत्सुतश्चरेत् । श्राद्धे वैदिकाम्न्यधिकारिणः पित्रोः श्राद्धं स्वपल्ल्याश्च सपनीमातुरेव च ॥२३॥ मातामहस्य तत्पल्याः श्राद्धमोपासने भवेत् । वद्भिन्नाना तु सर्वेषां श्राद्धं स्याल्लौकिकानले १७२४|| अपुत्राणां पितृन्याना भ्रातृणामप्रजन्मनाम् । तत्पन्नीनां च सर्वासा लौकिकामो यथाविधि |७२३॥ अवश्यत्वन कर्तव्यं न साज्यं धर्मतोऽखिलः। प्रत्यब्दं श्राद्धमात्रं स्यात् पितृश्राद्धसमानतः ॥७२६।।

निमन्त्रणाहविप्राणाम्बर्णनम् ३०२५ अष्टकामासिश्राद्धम् घष्णाष्टमी यस्यां रात्रो कुर्यात्समन्त्रकम् । रोमं दध्यञ्जलिस्तस्यापूपस्य स्थानके ततः बम्या तु वतो भक्त्या श्राद्धं कुर्याद्विधानतः । सिश्राद्धविधानेन तावन्मात्रेण फेवलम् ॥७२८।। नि शिष्टानि सर्वाणि ह्यकादश किलाऽटकाः । वा एव भवेन्नूनं लघुपायोऽयमुच्यते ॥७२६।। यथा दर्शश्राद्धतोऽखिलपतृकाः । प्राया इति तथा लघूपायः प्रकीर्तितः ॥७३०॥ पाणि पृथगेय स्युः कार्याणि नियमेन वै । अष्टोत्तराणि ख्यातानि कदाचित्तु विशेपतः ||३१|| टकासु समर्थस्तु यथाकल्यं प्रतिसंवत्सरं द्विजः ॥३२।। सर्वाणि कुर्याच्छदानि न चेद्दोपश्च कीर्तितः । श्राद्धप्रयोगः श्राद्धप्रयोगश्च मया कृत्स्न एवोच्यतेऽधुना ७३३।। निमन्त्रणम् प्रकर्तव्यं विधानतः। निमन्त्रणाहः विप्राणां वेदिनां नित्यं कार्य नाऽवेदिनां तराम् ।।७३४|| कुक्षौ तिष्ठति यस्यान्नं वेदाभ्यासेन जीर्यते । कुलं तारयते तेपो दश पूर्वान् दशाऽपरान् ।।३।। निमन्त्रणं च पूर्वेद्यः असमर्थस्य तु प्रोक्तो लघूपायस्तु कश्चन ।

मितिः सामोगी मन प्रति मिनः । मगर मानिहोलमोमिनः 1:14 सोननिमन्त्री म. गुजाराममन्त्राग यति । गान्न सम्म पनि मावन मंशयः ।।७३७ शपायेनं प्रधानार म्यग में ताहरां फिल। गजनं ५ प्रमतारं सदनं तददि स्थितम् ॥१३८1- गायतः पिण्यान मलु स प्राभाति हविगतः। वायतः शूलान् प्रसति प्राप्य वैवस्वत यमम् ॥३६॥ दातृदसंघ विन्दन्ति जिल्हापमितरस्य च। पश्यतधापी चंय शृण्वतः श्रीययुग्मम्म् १७१८॥ दुर्लभाया स्वशासायो भोक्तृनन्याग्निचेदयेत् । स्वशास्त्रीयः श्लाध्यः पियोः प्राविशेपेण स्वशासीयान्निवेदयेत् ।।३४१॥ कन्यमानं पितृश्राद्धं शुद्धकच्छेभ्य एव च । अभोज्याः रोगयुक्त दुष्युदि दुष्टचारित्रतत्परम् । सदोपर्फ च सद्वपं कुनखं श्यावदन्तकम् ॥४३॥ नित्याऽप्रयतवाणं दुर्वणं च कुरूपिणम् । नक्षत्रजीवनं दासकृत्यं शूद्रकजीविनम् ॥४४॥ प्रदेयं स्यात्प्रयत्नेन नासत्कच्छेभ्य एवं वं ॥४२ ॥

अमोज्यानाम्यानम् सूद कयाजर्फ शूद्रपुष्टं शूद्रनिकेतनम । शूद्रप्रतिमहपरं नित्ययाचकमेव च तथा पलविकं फरमात्मसंभाविनं शपम । अतिमानिनममाा निम्पियं वेदनिन्दकम ॥४६।। वेदविक्रविणं नित्यं प्रामवाजकमेव च । ब्रह्मविद्व पिणं चैव ब्रह्मस्वहरणोन्मुसम ७४७|| परदारपरं दुष्ट परदारकचिन्तकम् । सक्तभायं दत्तपुत्रं पुत्रविक्रयिणं तथा 1७४८॥ मातापित्रोरुपोटारं गुरुद्रोहिणमेव च । धनसंग्रहणोद्य क्तमानसं धनिनं कटुम् ॥७४६|| निर्दयं दानविमुखं नास्तिकं परदूषकम् । मणिकारस्वर्णकाररजकादिपुरोहितम् ॥५०॥ च दुर्वाद दाम्भिकं जडम् ।। वेदकर्मत्यागपूर्वशास्त्रमात्रकृतश्रमम् ॥७५१।। नास्तिकं किंभयिष्यन्तमृणिनं त्यक्तवेदकम् । त्यानानं त्यक्तसंध्यं निवृत्तचरकर्मकम् ॥२॥ कृतार्थक्षुरकर्माणं तुच्छ विकसितमेहनम् । फल कुन तथा चान्धं वधिरं भ्रान्तमुल्यणम् ।१७५३।। उन्मत्तं दुर्वलं सन्नं कोपिनं कुनखं रतम् । कुण्डकं गोलकं व्रात्यमशुचि परसूतकम् ॥७५४|| परान्निनं पराधीनं कर्पकं वाधुपि कृपम् । नृपवृत्तिं वैश्यवृत्ति शूद्रवृत्ति दुराशयम् ।।५।। अधिकाशमनृप्त च ३०२६ आङ्गिरसस्मृतिः वेदाध्यायी तु यो विप्रः सततं ब्रह्मणि स्थितः । साचारः साग्निहोत्री च सोऽमि कन्यवाहनः ।।७३ वेदहीननिमन्त्रणे मन्त्रपूतं तु यच्छ्राद्धममन्त्राय प्रयच्छति । तदन्नं तस्य कुक्षिस्थं रुदत्येव न संशयः ।।७३- शपत्येनं प्रदातारं स्वस्य तं ताशं किल । यजनं च प्रदातारं तदन्नं तद्धृदि स्थितम् ॥७३८ यावतः पिण्डान् खलु स प्राश्नावि हविपोऽल्पकः । तावतः शूलान् प्रसति प्राप्य वैवस्वतं यमम् ॥३६॥ दातृहस्तं च छिन्दन्ति जिह्वाममितरस्य च । पश्यतश्चक्षुपी चैव शृण्वतः श्रोत्रयुग्मकम् ॥४०l- दुर्लभायां स्वशाखायां भोक्तृनन्यान्निवेदयेत् । स्वशाखीयः श्लाघ्यः पित्रो. श्राद्ध विशेपेण स्वशासीयानिवेदयेत् ।।४।। फन्ट' गानं पितृश्राद्ध शुद्धकच्छेभ्य एव च। प्रदेयं स्यात्प्रयत्नेन नासत्कच्छेभ्य एव वै l अभोज्या: रोगयुक्त दुश्वुद्धि दुष्टचारित्रवत्परम् । । नित्या प्रयत्यमाणं दुर्वर्ण प कुरूपिणम् । नक्षत्रजीवनं दासत्यं शूद्र कत्रीविनम् ॥४॥ मदीप प म कुन श्यावदन्तरम् all तथा अभोज्यानाम्वर्णनम् ३०२७ शूद्र कयाज शूद्रपुष्ट शूद्रनिकेतनम् । शूद्रप्रतिग्रहपरं नित्ययाचकमेव च ७४शा पल्लविकं फरमात्मसंभाविनं शपम । अतिमानिनमग्राह्य निस्कियं वेदनिन्दकम ॥४६।। वेदविऋयिणं नित्यं ग्रामयाजकमेव च । ब्रह्मवि पिणं चैव ब्रह्मस्वहरणोन्मुसम् ७४७|| परदारपरं दुष्ट परदारकचिन्तकम् । यक्तभाय दत्तपुत्रं पुत्रविक्रविणं तथा ॥४८॥ मातापित्रोरुपोटारं गुरुद्रोहिणमेव च । धनसंग्रहणोद्य क्तमानसं धनिनं कटुम् ।।७४६।। निर्दयं दानविमुखं नास्तिकं परदूपकम् । मणिकारस्वर्णकाररजकादिपुरोहितम् ॥५०॥ अधिकाशमतृप्त च दुर्वाद दाम्भिकं जडम । वेदकर्मत्यागपूर्वशास्त्रमात्रकृतश्रमम् ।।१।। नास्तिकं किंभविप्यन्तमृणिनं त्यक्तवेदकम् । त्यास्नानं त्यक्तसंध्यं निवृत्तपुरकर्मकम् ॥७२॥ कृतार्धक्षुरकर्माणं तुच्छं विकसितमेहनम् । फल्गु कुञ्ज तथा चान्धं यविरं भ्रान्तमुल्यणम् ॥७५३।। उन्मत्तं दुर्बलं सन्नं कोपिनं कुनखं रतम् । कुण्डकं गोलकं व्रात्यमशुचिं परसूतकम् ||४|| परान्निनं पराधीनं कर्षकं वाधुपि चूपम् । नृपवृत्तिं वैश्यवृत्ति शूद्रवृत्ति दुराशयम् ७५३)

आरिमस्पतिः
जापनपा पानामापतित पा
तय गमिनीमायमभोगानं दुरागमम् 112
मोत्रिय कामगृतवर प
गाय मागनं अद्रभागिं तुलभाम् Ideal
दायका नटं नाट्यविय चुहायकम्।
शुदगी कामंत्री नित्यांगननापिनम् taal
न भोजपत्रमयनेन निमन्त्रणदिनारसरम् ।
दिनत्रयं पगिया (त्या) गुयादविचयंया El
अनुमासिकभोपारं पक्षमा परित्यजेत् ।
ऊनमासिकभीरधार मासमानं परित्यजेत् ॥
नमयाद्ध वर्षमा नवश्रादे तर्धकम् ।
पोडशे सावपं तु सपिण्डे च द्विवत्सरम् ॥७६१॥
वर्जयित्वा द्विजं पश्चाग्राहयेन्द्राद्धकर्मणि।
शूद्रामश्राद्धगं सम्यक् त्यजेद्वर्पवयं तथा ७६।।
नृपवैश्यश्राद्धभिरसाभक्षकं सन्वतं राम् ।
वर्जयेदव्दमानं तु प्रामचण्डालकर्मसु ।।६।।
आमश्राद्धगृहीतारं तहिने नावलोकयेत् ।
दिवारानमसंभाप्यो दिवाकीर्त्यपुरोहितः ॥७६४।।
पुण्यकाले त्वसंभाष्यः कुलालानां पुरोहितः ।
भानुवारे भौमवारे शुक्रवारे च सन्ततम् ॥६॥
असंभाष्यः प्रयत्नेन परसौनपुरोहितः ।
पर्वणोर्योगकालेषु द्विजवेश्यापुरोहितः ॥६६॥

प्रसादायदर्भदानम ३०२६ नावेश्या एव चते वै यदि धास्तदा तदा । अग्नेर्मन्येऽनुवाकस्य पठनात्कृतकृत्यता ६७ तीर्घप्रविग्रही दृष्टो यदि श्राद्धदिने सराम् । तीर्थजीवी वदावासी तत्पुरोहित एव च ७६॥ यदा घ्यस्तदा सूर्य पश्येमेति विलोकयेत् । वरणम् विपूर्यचर्यावृत्तान्तः स्पष्टो यस्य भवेत्तराम् ।।७६६।। वादशं प्रयतं दान्तमलोलुपमदाम्भिकम् । यदृच्छालाभसन्तुष्टं श्रोत्रियं वेदिनं शुचिम् ॥७७०॥ नित्यानि पूर्ववयसं सुधियं सत्कुलोद्भवम् । तस्मात्प्रत्युपकारकरहितं सुमुखं द्विजम् ॥७७११॥ समीक्ष्य वरयेत्सम्यग्ब्राह्मणं श्राद्धकर्मणि । आदी संकलय प्रयतः सपवित्रकरस्तथा ॥७७२।। दर्भपाणिः कृतप्राणायामोऽवरतरस्तराम् । अक्रोधनश्च सुमुखो वाचा संकल्पमाचरेत् ॥७७३।। देशं कालं च संकीर्य तथा च प्रकृते ततः । पितृन् देवान् प्राकृतान्वै समुद्दिश्य च प्राकृतम् ॥७७४|| करिष्ये कर्म वेति संकल्प प्रथम चरेत् । प्रसादाय दर्भदानम् क्षणं कृत्वा प्रसादोऽद्य करणीय उदीयते । इत्येवं दक्षिणे हस्ते दद्याद्दर्भान् द्विजस्य वै ॥६॥ विश्वेपामत्र देवानां स्थानमाहवनीयके || ७७५ ॥

३०३२ आङ्गिरसस्मृतिः तत्र निक्षिप्य तज्ञाम्भस्वद्धस्तेऽध्य प्रदापयेत् । आवाहनं च तत्पूर्व परं वा तत्कृताकृतम् ॥७६१ यदि कर्तव्यधीः स्याच्चेत्तदा व्याहृतिभिश्चरेत् । या दिव्या इति वा नो चेदेवा वोऽयमिति वन् II दद्यात्तमभ्यं देवेभ्यः पितृभ्यश्च क्रमेण वै। आवाहने विश्वेदेवा उशन्तस्त्विति युग्मकम् ॥७६ उभयत्र प्रकथितं केचनात्रापरामृचम्। विश्वेदेवास इत्येको विश्वेदेवेति वै पराम् Ivell आगच्छन्त्विति तां चापि देवार्थे प्रजपन्ति वै । पितृस्थान उशन्तस्त्वा आयन्तु न इतीव वै IsEEll प्रजपेयुः केचनात्र तदेतत् कथितं परम् । कृताकृतं प्रकथितमनुक्ताबाधकं न तु ||८००। वेदमात्रानुक्तितस्तु गन्धाक्षवयवादिकम् । धूपदीपदुकूलादि कृत्स्नं यज्ञोपवीतकम् ॥१॥ सर्व व्याहृतिभिर्दद्यात्तूष्णी वा तद्यथापि । अग्नीकरणम् । अनुक्तमन्त्रैः काश्चित्तु कृताः स्युस्ताः क्रियास्ततः । नत्यूर्यम्तसंकल्पकर्ममध्याधिकत्वतः ॥८०३।। पुनःसंकल्पप्रकरणम् वकिचिद्विगुणीभूयात् तव गुभ्यत एव । ततो sो करणं कुर्याद्यदि पूर्व स्वसूत्रतः 110 ) पन : संरपयित्वय तसवकक्रिया चरत 2011 परिवेपणेपौवांपर्यवर्णनम् सर्वत्रैवं विजानीयात् तत्तत्संकल्पकर्मम् । न चेदेकस्य संकल्प एकथंय भौद्धि वै ।।८०|| आसमाप्तेविधानेन प्रकृते पतृके रिल ! अनुभमन्त्रपठनात् पुनः संकल्पमाचरेत् ।।६।। ययुक्तमत्रमाण यत्कम चलति स्पले। तकर्ममध्ये न पुनः संकल्पः प्रभवेदि वै ॥८८७। वस्मात्संकल्पयित्वाऽथ पानीकरणमारभत । परिवेषणप्रकारपोयांपर्यम संपरिस्तीर्य विधिना दर्भस्तदक्षिणाप्रमः ॥al अममादाय पपात्तु घोपम्तीय सवः पुनः । मेक्षपेनाप्रमादाय मन्यमेतं ध्रुवीरितम् ।। प्रतिस्पैकपठितं सोमायेवि हुनेविः । सऐपेण यमायेति अप्रयेति सत्परम ॥८१८ा सत्यागमानं प प्राधीना विनंथ । समुपार्य पुनश्चय परिपिच्याप्रदक्षिणम ॥१॥ अमात्र विधानेन तदन्नं शिधासम्म । हिपहिमपाये दवा हस्ताद म: १८|| वाभिपाय विधानतः। अन्नप पायसं भय पनानि पलानिए १३|| पयो मधु i पन्नु परिन्। अमनमाने पदि दस पुन परिपितम् ॥१til पूर आङ्गिरसस्मृतिः तद्राक्षसं भवेत्राद्धं तथा तस्मान्न चाचरेत् । रक्षोममन्त्रम् अन्नमाज्येनाभिघाय गायच्या प्रोक्ष्य तत्परम् ।।८।। दधिनान्नं (दर्भणान्न) च प्रन्याय चाहमस्मीति सूरहसन प्रपठेदन विधिना राक्षोनश्रुतिमभ्यगम् ॥१६॥ येन केनायुधारणमसमर्थस्य सयं यासमर्थचन्मन्योपारणकर्मणि । येन रन प चित्रण यापनीय प्रयजतः til मैने मन्या याजमाना मोक्ताः फिल कर्मणि । राधमाना पिनाशाय वेदपोषः प्रशस्यते ॥१॥ स धोषी प्राण. स्तुं शक्यते प्रति लि। गंदातडपम् म पनि यानोद पापण सोयम् ॥१६॥ मलयानि नोतियपाय एथे। समस्यामा iiil माता पिताना *** & f446*1c47]* *7*4 tisku

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३०३६ आङ्गिरसस्मृतिः तथा घोपः प्रकर्तव्यः स्वयं परमुखात्तथा। यत्नात्कारयितव्यश्च न चेद्दोषो महान् भवेत् ॥८३४॥ वेदोच्चारणसामर्थ्य विकलो यदि तत्करः। नमो वः पितरो मन्त्रमात्रं भक्त्या जपेत्तु वै ।।८३३॥ इदं विष्णुाहतीर्वा गायत्री वा विधानतः। विष्णोरराटमन्वं वा गायत्री वैष्णवीमपि ॥८३६।। न चेत्तु पौरुपं सूक्तमथवा तं त्रियम्बकम् । आ वो राजानमन्त्रं वा मधुत्रयमथापि वा ॥८॥ नमो ब्रह्मण्यमन्त्रं वा दश शान्तिपु कामपि । स्वाधीना तामृचं नो चेद्गायत्री सर्वशून्यदाम् ।।८३८।। प्रतद्विष्णुमन्त्रमिरावती धेनुमतीति च । यजमानः स्वयं प्रीत्ये पितृभ्यो प्रवदेत्तराम् ॥८३६॥ भोजनान्ते च संपन्नं प्रददेत्पुरतः स्थितः । तृप्ताः स्थेति द्विवारं तदुक्त्या दद्यात्तदन्नकम् ॥८४०॥ तत्रैव विकिरेत्पात्रसमीपे तत्तुरः स्थितः । इन्ष्टिपिण्डं च दद्यादुत्तरापोशनं ततः सांख्येतानि शिष्टानामाचारेण न घोक्तिः। सूत्रकारस्य वेदस्य यतेऽभ्युदयमुच्यते ॥८४२।। थकने प्रत्यवायो न पुनरन्यानि केवलम् । तत्ता क्रियाविशेषु तूष्णीकं वेदमन्वयः ॥८४३|| अभानु मामालविलम्बी घाधकाय । भयदेव ने सन्देशः प्रादमन्यो यरितkal 11८४१॥

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३०३८ आङ्गिरसस्मृतिः अत्र पितरोऽमुत्र च अमी मदमतः परम् । ये समानास्ततो भूयो येन जातास्ततः परम् 11८५५- वीरं धत्तंति तत्माश्याघ्राय वा तत्परं पुनः। मार्जयन्वेति मन्त्रेण पूर्ववच्च तिलोदकम् ॥८५६॥ दत्वाञ्जनाभ्यञ्जने च वासश्छित्वा विधानतः। नमो व इति मन्त्रेण नमस्कारान् समाचरेत् १८५४ गृहान्न इति मन्त्रं च ऊजं वहन्तीमर्नु ततः। पुनर्न इति भूयश्च यदन्तरिक्षमिति वै। मन्त्रान् जप्त्वा क्रमेण पिण्डांस्तान्पूजयेत्ततः ।।८५६॥ पितृपिण्डार्चनं यैस्तु क्रियते दर्भपत्रकः । तण्डुलरक्षतैः पुष्पैस्तिलैरपि यवैस्तथा ॥८६॥ प्रीणिताः पितरस्तेन यावचन्द्रार्कमेदिनी । पुत्रकलवादिभिः पितृप्रदक्षिणनमस्कारः वासोभिः पूजयेत्पिण्डान् यथाशक्त्या विचक्षणः ॥८६१।। दक्षिणाभिश्च ताम्बूलेधूपदीपादिभिस्तथा । फलः परिवारैश्च न घेत्तस्य कुलं तराम् । व एव पिण्डाः पितरस्तद्र पेण स्थिवाः परम् । भवेयुः पूजनार्धाय नात्र कायां विचारणा ||८४i उत्तिष्ठत पितरो मनो न्वाहुयेति मन्त्रकम् || ६५८il प्रदक्षिणनमस्कारैः पुत्रपौत्रादिभिः सह मा न वर्धते क्षीयते च काले काले शनैः शनैः ॥८ ॥

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३०३८ आङ्गिरसस्मृतिः अत्र पितरोऽमुत्र च अमी मदमतः परम् । ये समानास्ततो भूयो येन जातास्ततः परम् । वीरं धत्तेति तत्प्राश्यानाय वा तत्परं पुनः। मार्जयन्वेति मन्त्रेण पूर्ववच्च तिलोदकम् If= दत्वाञ्जनाभ्यञ्जने च वासश्छित्वा विधानतः। नमो व इति मन्त्रेण नमस्कारान् समाचरेत् | गृहान्न इति मन्त्रं च ऊन वहन्तीमनुं ततः। उत्तिष्ठत पितरो मनो न्याहुवेति मन्त्रकम् IEE पुनर्न इति भूयश्च यदन्तरिक्षमिति वै। मन्त्रान जप्त्वा क्रमेणैवं पिण्डांस्तान्पूजयेत्ततः ।। पितृपिण्डाचनं यैस्तु क्रियते तण्डुलैरक्षतः पुप्पैस्तिलैरपि यवैस्तथा ॥८६० प्रीणिता: पितरस्तेन पुत्रकलवादिभिः पितृप्रदक्षिणनमस्कारः यासोभिः पूजयेत्पिण्डान् यथाशक्त्या विचक्षणः ॥८८ दक्षिणाभिश्च ताम्बूलधूपदीपादिभिस्तथा । प्रदक्षिणनमस्कारैः पुत्रपौत्रादिभिः सह फटः परिवारैश्च न चेत्तस्य युलं तराम् । न वर्धते क्षीयते प काले काले शनैः शनैः ॥८॥३॥ त एव पिण्डाः पितरस्तद्र पेण स्थिवाः परम् । भवेयुः पूजनार्थाय नाच कायर्या विचारणा ||१८६४४॥ दर्भपत्रकः। यावचन्द्रार्कमेदिनी।

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आङ्गिरसस्मृतिः
प्रारोपं न शूभ्यो न दद्यात्तु खलप्वति ।
पितृभोजनपात्रस्य खननम्
पितुझन्छिष्टपात्राणि श्राद्ध गोयानि कारयेत् ।
सनित्वैव विनिक्षिप्य यथा श्राद्धन गोचरम् ।
सोदकुम्भम्
कृतेऽछते या सापिण्ड्य मातापित्रोः परस्य वा I
तस्याप्यन्नं सोदकुम्भं दद्यात्संवत्सरं द्विजः।
अदेवं पार्वणश्राद्धं सोदकुम्भमधर्मकम् ॥८७
कुर्यादाब्दिकपर्यन्तं संकल्पविधिनान्यहम् ।
कुर्यादहरहः श्राद्धममावास्यां विना सदा ॥
यसोदकलशश्राद्धं न कुर्यादनुमासिके ।
प्रथमाब्दे न तिलतर्पणम्
प्रथमाब्दे न कर्तव्यं तिलतर्पणमित्यपि
सपिण्डीकरणात्परं श्राद्धाङ्गतर्पणम्
यदेतत्तत्तु कथितं वत्सराब्दे सपिण्डने ।
एकादशे द्वादशे वा सपिण्डीकरणं यदि ॥८७६-
कृतं चेत्तत्पुरं सम्यक् सद्यः श्राद्धागवर्पणम् ।
कुर्वीतेव तथा दर्श प्रतिमासं पृथक् पृथक् ।।८८०
अकृते तर्पणे भूयः पितरस्तस्य केवलम् ।
भवेयुर्दु:खिता घोरं पुनः प्रेतत्वशवया ॥८८१॥

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३०४२ आङ्गिरसस्मृतिः पितॄणां रजतं, देवानां स्वर्णम् ततः श्राद्ध कसाद्गुण्यहेतवे दक्षिणा मुदा । यथाशक्त्या प्रदद्याच पितणां रजतं परम् ॥८६॥ हिरण्यं चापि देवाना वाजेवाजेति वै वदेत् । उत्तिष्ठतेति पितरः अनुगच्छन्तु देवताः ॥८६४ill इत्युद्वास्य तु तान् पश्चादनशेपोऽखिलः पुनः । क्रियतां किमिति प्रोक्त चेष्टः स उपभुज्यताम् ।।८६५॥ इत्युक्तस्तु ततो भूयः स्वादुपं सद इत्यतः । उपस्थानं पितृणां तु कुर्यात्प्राञ्जलिना द्विजः ॥६६॥ तेपा तामाशिपं गृह्य प्रणिपत्य विधानतः । अनुप्रज्य विधानेन स्वगृहस्यान्तिमे त्यजेत् ॥८६॥ न घेत्सर्वत्र ताः प्रोक्ताः परा व्याहतयः शियाः । प्रयदेशन मनुना ययगुण्यमागतम् । कहूं भोक्नुमहादोपव्यकालादिसंभवाः । लोभमोहासानपिचकायात्यविशेषता: Iril महापराय: मुराः परीहारजिनाः। हे सर्व स्मरणामस्य महामन्यस्य वैभवान् ॥६॥ सपो विलयमायान्ति मसागुम्यमानी न पेत्तु यामदेयाय मन्थं परममुत्तमम् mean कममपस्मिन् सानासानत प EEn प्रमसर पर दामाम मनुमुममम् २ )

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३०४४ आङ्गिरसस्मृतिः तच्चापि वैष्णवं धाम तत्क्षणात्प्रापितं भवेन् । त्रिरात्रफलदा नद्यः पुण्ये तयनद्वये ॥६१३|| अधोदये महोदये चक्रिके ग्रहणे तथा । पद्मकापिलपष्ठयां या पुनरन्येपु ताः पुनः ॥६१४॥ विधिप्रयत्नरचिताऽयगाहनजपादिकैः । फलप्रदा हि सरितो न तथा जाहवी शिया १६१|| दर्शनस्पर्शनध्यानैर्जन्तूनां जन्ममोचनी । तदुत्तरक्षणाद्गगा तद्भातिनुसंभवा ॥१६॥ सिंहकर्कटयोर्मध्ये सर्वा नद्यो रजस्वलाः । दिनत्रयमसंस्पृश्यास्तत्रादौ याः सरिद्वराः ॥६१) महानद्यः गोदावरी भीमरथी तुगभद्रा च वैणिका । तापी पयोप्णी दिव्या स्युर्दक्षिणे तु सरिद्वराः ।।६१८॥ पायनी नर्मदा पैव यमुना च महानदी। सरस्वती विशोका च वितस्ता च तथा पुनः ||६१६॥ दक्षिणायनकाले तु संप्राप्ते पायगाइनान् । परं विदिनपर्यन्नं भवेयुस्ता रजस्वलाः नेतु सा शम्नुमंगधाग्नित्यशुदा प्रकीविता। जायी सरिता मुख्या सबलोपावनी 12} दादनी पावनी कामा कामनीया मरावती। Tरा म्युम्नो या नागाश्तास्तुरीयात् IIEIl HERI

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३०४६ आङ्गिरसम्मतिः अपाविशत्प्रभृति वै या: काधन जनः फिल! नदीति नित्यं कम्यन्त चन्वन्ते च तदा तदा 11६३४॥ नदीगा. मिन्गा वापि पर्वतादिसमुद्भवाः । या कुत्रापि या जाता: क्षुद्रा दोघां जलेयताः ।।६३३॥ वर्षाजलाशयननजला लवणशम्पराः। सांस्ता: कधिताः मदिमासान्ते स्यू रजस्वला: ।।६३६।। विशेषणाधुना प्रोक्ताः सर्वासा सरितामपि । प्रसंगात्तत्स्वरूपस्य माहात्म्यं च तथाविधम् ||६३sil उक्तप्राय विजानीयाद्या या नित्यजलाः पुनः। उत्तमा इति ताः प्रोक्ता नदीनां सिन्धुसंगतः ||६३८|| आधिक्यं तत्प्रकथितं पुण्यक्षेत्रादिना वथा। क्षेत्रं चापि तथा ज्ञेयं नदीयुग्मैकमेलनात् ॥३६॥ खननोत्पन्नसलिला तन्न्यूना कथिता तथा । खननाच्चाधिकजला तच्छ्रष्टा वै स्मृताखिलैः ।।६४०॥ पञ्चयोजनपर्यन्तप्रवहत्सलिलोत्तमा । उत्पत्तिप्रभृतिस्थैर्यवहत्सलिलसंयुता ॥६४१।। परमा चोत्तमा चेति सा गङ्गेति च फण्यते । नदीनां प्रवरा गङ्गा तजलं श्राद्धकर्मणि ॥६४२।। पावनं परमं प्रोक्तं वमनं मधु चोच्यते। खड्गपात्रं हि कुतपो दौहित्रो वा पुनः स्मृतः । शिवनिर्माल्यतः श्राद्धवैगुण्यं तत्पशाम्यति ॥१४॥ वत्वपर्पटं साक्षापितृणां दुःखवारकम् ॥६४३

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૨૦૪૮ आनिरमस्मृतिः उन्सिोम्लिएसमर्श असिष्टेन तु मंटो भुवानः श्राद्धकर्मणि । रोपमन्नं तु नाभीयानः पादस्य का गतिः ।।४।। सस्थाननामगोत्रेण हासनादि व्याचयेन् । अन्नत्यागं ततः कृत्या पायके जुहुयामरुम् IMEIN पुरुपसूफेन जुहुयाद्यावद्द्वात्रिंशदाहुतिः । होमशेपं समाप्याथ श्रादशेपं समापयेत् ॥६६॥ अफत्वा तु समीपे तु ब्राह्मणे वमनं यदि । पुनः पाकं प्रकुर्वीत पिण्डदानं यथाविधि H५] उच्छिष्टस्पर्शनं ज्ञात्वा तत्पात्रं च विहाय च । तत्पात्रं परिहत्याय भूमि समनुलिप्य च ॥६५८il तस्य शी विधायैव सर्वमन्नं प्रवेष्टयेत् । परिपिच्य ततः पश्चाद्भोजयेञ्च न दोपकृत् ॥६॥ अन्योन्यस्पर्श श्राद्धपक्तौ तु भुञ्जानावन्योन्यं स्पृशतो यदि । द्वौ विप्रो विस्जेदन्नं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ।।६६०१ उच्छिष्टोच्छिष्टसंस्पर्श सुना शूद्रण वा तथा। उपोष्य रजनीमेकां पञ्चगव्येन शुध्यति ॥६६॥ इन्द्राय सोमसूक्त ने श्राद्धविघ्नो यदा भवेत्। अग्न्यादिभिभोजनेन श्राद्धं संपूर्णमेव हि ॥६६२|| इन्द्राय सोमसूक्तन भोजनेनेति च त्रयम् । विधानं कथितं सम्यग्व्यवस्था हात्र चोच्यते ॥६६३।।

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आनिरसस्मृतिः उपवासार्थ: उपावृत्तिस्तु पाकन्यो यस्नु यासी गुणैः सह Merril उपयासः स वितयः सर्वभोगविवर्जितः। अपुत्रासापिण्डयम् पन्याः कुर्यादपुत्रायाः पत्युमात्रादिभिः सह ||६|| सापिण्डनमनुयाने तु जनकन सहात्मजः । अनुगमने मृतं यानुगता नाथं सा तेन सह पिण्डनम् IIEl अईति स्वर्गवासेऽपि यायदाभूतसंप्लवम् । स्त्रीपिण्डं भरी पिण्डेन संयुज्य विधिवत्पुनः ||६|| वेधा विभज्य तत्पिण्डं क्षिपेन्मात्रादिपु त्रिषु । भर्तुः पित्रादिभिः कुर्याद्वा पत्न्यास्तथैव च ॥६७ell सपल्या वाऽसपत्न्या वा न भेद इति गोभिलः । एकादशेऽइनि पोडशम् केचित्र पृथक्प्रोचस्तं पक्षं प्रवदाम्यहम् ॥६ull एकचित्यां समारूढी दम्पती निधनं गतौ । एकोद्दिष्ट पोडशं च पृथगेकादशेऽहनि ॥६८० द्वादशेऽहनि संप्राप्ते पिण्डमेकं द्वयोः क्षिपेत् । पितामहादिपिण्डेषु तं पितुर्विनियोजयेत् ॥६८१।। केचित्तमेव पिण्डं तु द्वधा कृत्वा ततः परम् । उदग्भागगत पिण्ड पितृवर्गे नियोजयेत् ॥६८२||

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२०५२ आदिरमस्मतिः दयमानं तु भतारं दृष्ट्वा नारी पवित्रता। अनुगच्छरायोः भादं यगेकादरोहनि IEER शिलाप्रतिष्ठापनादित्यं सर्व पृया पृषक । एकप्रैव प्रयुयात पितुमातुः समन्वकम् ॥६६४!! पोढशान्तं पृथपात्या सापिण्डय द्वादरोगनि। प्रेतत्वात्तु विमुक्त न सह मातुः सपिण्डकम् ॥EERAL तत्पिण्डसंयोजनम् स्त्रीपिण्डं भई पिण्डेन संयुज्य विधिवत्युनः । श्रेधा विभज्य तं पिण्डं क्षिपेन्मात्रादिप त्रिपु ॥६६६|| मातुः सापिण्ड्याभावस्थलम् अत्र विष्णुर्मतं स्वस्य सुलभायावदत्किल। कृते पितुः सपिण्डत्वे मातुस्तु न सपिण्डनम् ॥६६al पितुरेव सपिण्डत्वे वस्या अपि कृतं भवेत् । स्त्रीणां पृथङ् न कर्तव्या सपिण्डीकरणक्रिया पECl दत्तेन पालकपितुः सापिण्डयम अन्यगोत्रप्रदत्तश्चेत्तनयः स्वपितुस्ततः। पालकस्य प्रकुर्वीत तत्पित्रादिसपिण्डनम् ॥EEll दत्तपुरकृत्यम् विवादो नात्र कोऽप्यस्ति ताहग्दत्तसुतः पितुः । स्वयं तद्भिन्नगोत्रोऽपि तद्गोत्रे योजयेच तम् ॥१०००ll

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आरिमम्मानित re प्रसार भमंगः सम्ममु। inमामा प्रभृति यम् MAR परमासापूर्वमेव तदा तदा १० मान्य कया: काशन सन्तनम् । नसननलिष्टदिष्टान काश्चिद्विशेषकान् ॥१ मदिरयान् गुइमुद्गादिकान मधु। "रमलारिका काश्चिद्वनकापांसकादिकान् ।।१० संत सापदेशनारिण्यचन्दनखण्डकम् । विमोतीरं गुग्गुल प निक्षिपेशावनीवले ॥१०१ सुस्कान सलादकान् कांश्चिद्गोपयैच्छाहतवे । पशेष काश्चियलेन भूम्यन्तर्भूतले तथा ॥१०१५ मलेप दुफलेषु पुनः कुम्भघटेप च। सापयेनिक्षिपेदेवं निसनेकांश्चिदप्युत ॥१०१६॥ समीचीनानि वस्तूनि दृष्टमात्राणि चेत्तदा। भाद्रार्थमिति निश्चित्य प्रोक्त्वा स्वीयैश्च केवलम् ॥१० गोपयित्वैव यत्नेन स्थापयेत्सालयेदपि । रायुक्तितत्कथातृप्ताः पितरो नित्यमेव वै ॥१०१८॥ भाशीभिरेनं सततं चयन्त्यपि तारिताः। कथावप्तिः भवन्ति कथया स्वर्गे पितृलोके च तेनिशम् ।।१०१६॥ तृप्तिरेतेषां स्मृत्योक्त्या वचनादपि । •॥१०२० न

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३०५६
आङ्गिरसस्मृतिः
पश्चाद्दशं प्रकुर्वीत पित्रोरेवायमुच्यते ।
मृताहे मातामहादिश्राद्धसंभवे
मातामहस्य तत्पल्याः सापनीमातुरेव च ॥१०२६।।
पितुः श्राद्धसमत्वेन प्रोचुः किल महर्षयः ।
दर्श समागत मन्वादिकं वाद्धं समाचरेत् ॥१०३०।।
दर्शसिद्धिस्तावता स्यादैवतैक्येन केवलम् ।
सपिण्डकमपिण्डं वा देवतैक्ये पृथङ् न तु ॥१०३१।।
कायं भवति तच्छाद्धं भिन्नदेवतके पुनः।
नित्यनैमित्तिके प्राप्ते
पूर्व नैमित्तिकं काय प्रत्यन्दे यदि तत्तदा ॥१०३२॥
प्रत्यब्दमागतं प्रत्यासत्तियोगवशाचरेत् ।
पितुः श्राद्धं प्रथमतो मातुःश्राद्धं ततः परम् ॥१०३३॥
पश्चान्मातामहस्यापि तत्पल्याश्च ततः परम् ।
पश्चात्सपनीमातुः स्यात्पश्चात्पल्या प्रकीर्तितम् ॥१०३४
सुवभ्रातृपितृव्याणां मातुलादिकमात्स्मृतम् ।
दर्श बहुप्रासंभव
पित्रादिभिन्नाद्वाना कापण्याना यदा पुनः ।।१०३।।
दांदिप्वागताना चेन्मृताहाना तदा परम् ।
दांदि समाप्यैव कारण्यभादमाघरेन् ॥१०३६॥
कचित्पल्याः पितृव्यस्य नपल्याप समागमम् ।
दादिए मनाई वे पूर्ण कृत्वा नतः परम् ॥१३॥

WA + आशिरसस्मृतिः अल्पकालमृताया तु तत्तामस्थितरपि । तदा सदा पालितो यो यात्रीयन्प्रवर्धितः ॥१८४ एमात्रैर्याय एवं विप्रथुध्येय तेस्तराम् । संस्कृतश्चाध्यापितश्च मातामातकगोत्रकः ॥१०४ अज्ञातमामतातादिज्ञातजाति जनोक्तिः। ततो विद्वान् महात्मा यो यतस्तात इति स्मृतिः ॥१- एवमेव तथान्योऽपि तथावस्थाप्रभेदतः । यतोत्पत्तिस्तु कथिता अज्ञातग्रामसंभवः ॥१०६१ स्वजीवनप्रकारं यो बाल्ये द्वादशवापिकात् । न वेत्ति नष्टजनको यतोत्पत्तिस्तु कथ्यते ॥१०१२- मातरं यो न जानाति स्वकीयजनशून्यतः । तथा पित्रादिकान् सर्वान् प्रोच्यतेऽसौ यतः प्रसूः ॥१ त एते किल सर्वेऽपि विपत्कालसमुद्भवाः। नष्टपित्रादिकजना देवात्संप्राप्तजीवनाः ॥१०४।। यैश्च कैश्चिदृष्टमात्रैविप्रबुध्यैकपालितः । अवस्थाभेदतः सर्वे तत्तन्नामाङ्किताः स्मृताः ॥१०६१।। चत्वारः कथिताः सद्भिरतिदुःखैकजीवितम् ।' अतिवाल्ये ततो भूयो यौवने प्राप्तसंपदः ॥१०५६।। देवयोगेन विद्वांसः कर्मठाश्चापि वा भवन् ।' पितुमचतिथि यो या झात्या बाल्येन केवलम् ।।१० स्वयमेव श्राद्धहेतोर्मार्गशीर्षे ह्यमादिकम् । शाबद्दष्टया समालोच्य सद्भिक्तोऽथया गृणन् ॥१०५८ ..

ty ३०६० आङ्गिरसस्मृतिः तेपा श्राद्ध ककरणमेतेषां स्वस्य केवलम् । प्रत्यवायैकशून्याय न चेद्दोपो महान् भवेत् ॥१०६३ वत्संभूतमहादोपपरिहाराय वा न चेत् । । प्राप्तये कर्मठत्वस्य न चेदस्य तु केवलम् ॥१०७० श्राद्धत्यागात् प्रत्यवायो भवेत्तस्मात्तथाऽऽचरेत् । नित्यं तेषां मृताहेप दानधर्मादिकं चरेत् ॥१८७६।। विप्राणां भोजनात्पूर्व नियमोऽयमुदाहृतः । दुरात्मनो विशेपेण पूर्ववहोपशान्तये ॥१०७२।। श्राद्धभुक्तः परं तेपी न कुर्याद्भरिभोजनम् । श्राद्धानतर्पणं परेऽहनि परेप या प्रयत्नेन श्राद्धाङ्गतिलतर्पणम् ॥१०७३।। सय एप प्रकर्तव्यं पूर्व पश्चात्तु या तथा। अभिनवणमेवं स्यादेकेनेय दि कारितम् ॥१०॥४॥ नान्नसून त्यागकाठे प्राचीनायीतिक नतु। अमौकरणहोमेऽपि तावश्यकमुच्यते ॥१०॥ उशत्यागकाले सम्यम् उरित्यागकाले ५ सध्यमेव भवेदि थे। मध्यातायन्ते न मवावादिकं मुक्तन्ते व यापि ॥१.il चिरिंनर्यात विरं नैव मुनि निस्यसमामि यानि या। वानि सांगि सर्वत्र वृत्या मुई विधानतः IIRAI - ३०६२ आङ्गिरसस्मृतिः स्वच्छन्दतः प्रदेयानि । तावन्माण ते परम् । अतितुष्टा महातुष्टाः परितुप्राः प्रहर्षिताः ||१०८८ पूजिताश्च भविष्यन्ति तस्माद्वालमनोरथम् । पूरयेपितृतृप्त्यर्थं तदिनेषु विशेषतः ॥१०८६।। तृप्ताः स्थेति तथा प्रोक्त त्रिवारं पितृसूनुना। भावयन्ति तदा ते वै चतसा तु वयं तथा ॥१०६०ll तृप्ता जातास्तथा त्वं च तृप्तो यदि तदा वयम् । तृप्ता भूम न चेन्नोऽद्य का तृप्तिरिति वै तराम् ।।१०६१।। "दूयमानेन मनसा तिष्ठन्ति किल तेन वै। सम्यग्भुञ्जीत वै पूर्व यथा कुर्वन् भुजिक्रियाम् ॥१०६२।। ' अतृप्ता एव नो ते स्युरिणः पुत्रैश्च बन्धुभिः । विप्रालंकरणे जाते गृहालंकरणं भवेत् ॥१०॥ पन्यादीनामलंकारः शिष्टमाह्मणभोजनम् । अन्येय भोजन तेपो तदिने क्रियते तु यत् ॥१०६४।। तत्सवं प्रीतये तेषां भवदेय न पान्यथा । यद्वा तवा प्रफर्तव्यं तत्ततसर्व प्रयत्नतः ॥१०॥ अनन्तरं विप्रभुको पित्रुद्वामनतः परम् । तत्पूवं लयमा वा यस्तु किश्चिदपि स्वयम् ॥१०६५।। विलद्रोणत्रयः तिल्दोणवयं कुयांतदिने समुपस्थिते ॥१०६मा भश्यातिटमयाः कायांतिलक विशेषतः । विटणं नटपि निटभनमयुन १६al

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३०६४ आङ्गिरसस्मृतिः सतिलविद्यते श्राद्धं विना सर्वत्र केवलम् । मुख्यद्रव्यस्तिलरद्भिः पैतृकं निखिलं भवेत् ॥११० सर्वेषां कर्मणामाद्या आप एव विशेषतः । परमाः कारणानीह तस्माद्ब्राह्मपुंगवाः ॥१११ अप एच समाश्रित्य वर्षन्ते तोयदा महत् । जलं तत्रैव वर्तन्ते तदेव परमं सलम् ॥११११८ प्रभूतधोदफग्रामः सर्वदेशोत्तमोत्तमः।। नदीतीरं विशेपेण तच्छताधिकमुच्यते ॥१११२ तत्रैव सकला धर्मा अनुष्ठ या हि सन्ततम् । नदो प सजला ज्ञेया न तच्छ्न्या कदाचन ॥१११३- इति पूर्वाङ्गिरसम् इत्याङ्गिरसस्मृतौ पूर्वान्निरसं समारम् ।

॥ श्रीगणेशाय नम ॥ * आङ्गिरसस्मृतिः *(२) उत्तराङ्गिरसम् प्रथमोऽध्यायः धर्मपर्पतप्रायश्चित्तानावर्णनम विश्वरूपं नमस्कृत्य देवं त्रिभुवनेश्वरम । धर्मस्य दर्शनार्थाय अगिग इदमब्रवीन ॥५॥ अथ त्रयाणां वक्ष्यामि प्रमाण विधिमादिन । धर्मस्य पर्पदश्चैव प्रायश्चित्तकमस्य च || प्रायश्चित्तं चतुष्पाद विहितं धर्मकन भि । परिपदशधा प्रोक्ता त्रिविधा या ममामतः ॥ ३ ॥ अप्रमेयप्रमाणस्य दुखेनाधिगमो भवेन उपस्थानववादेशचर्याशुद्धिप्रकाशनम ॥ ॥ स धर्मस्नु कृतो शेय स्वाधिष्ठानक व वै। धनुर्भिः साधनेश्व धर्मः प्रोक्त. सनातन. ॥ ६ ॥ प्रमाणाभिहितं यत्तु सर्वमगिग्सा तदा । तस्मादगिरसा पुर्य धर्मशास्त्रमिदं कृतम् ।

4 AAY आङ्गिरसस्मृतिः त्या पूर्वमुदाहार्य यथोक्त धर्मकर्तृभिः । पश्चात्कार्यानुमारेण शक्त्या कुयुरनुग्रहम् ॥७॥ यत्पूर्वमृपिभिः प्रोक्त धर्मशास्त्रमनुत्तमम् । तत्प्रमाणं तु सर्वेषां लोकधर्मानुवर्णनम् ॥८॥ न हि तेपामतिक्रम्य वचनानि महात्मनाम् । प्रज्ञानेरपि विद्वद्भिः शक्यमन्यत्प्रभापितुम् ॥६॥ स्वाभिप्रायकृतं कर्म विधिविज्ञानवर्जितम् । क्रीडाकर्मव यालानां तत्सवं स्यान्निरर्थकम् ॥१०|| इत्याङ्गिरसधर्मशास्त्रे उपोद्धातो नाम प्रथमोऽध्यायः। . द्वितीयोऽध्यायः परिपद उपस्थानलक्षणम् अत ऊवं प्रवक्ष्यामि चोपस्थानस्य लक्षणम् । उपस्थितो हि न्यायेन व्रतादेशनमर्हति ॥१॥ सद्यो निःसंशयः पापो न भुञ्जीतानुपस्थितः । भुञ्जानो वर्धयेत् पापं परिपद्यत्र वर्तते ॥२॥ संशये न तु भोक्तव्यं यावत्कार्यविनिधयः । प्रमाणेनैव कर्तव्यं यावदाशासनं वथा ॥३॥ कृत्वा पापं न गृहेत गृहमानं तु वर्धते । स्वल्पं वाऽथ प्रभूतं वा धर्मविद्भयो निवेदयेत् ॥४॥ .

प्रायश्चित्तविधानवर्णनम्
३०६७
ते हि पापकृता वैद्या वोद्वारश्चैव पाप्मनाम् ।
दुःखस्यैव यथा वैद्या सिद्धिमन्तो रुजायताम् ॥ ५॥
प्रायश्चित्ते समुत्पन्ने श्रीमान् सत्यपरायणः ।
मृदुराजयसंपन्नः शुद्धिं यायाद्विजः सदा ॥६॥
सचेलं वाग्यतः सात्वा किन्नवासाः समाहितः ।
क्षत्रियो वाथ वैश्यो वा ततः परिषदं व्रजेत् ॥७॥
उपस्थानं ततः शीघमतिमान् धरणी व्रजन् ।
गात्रैश्च शिरसा चैव न च किंचिदुदाहरेत् ॥८॥
ततस्ते प्रणिपातेन दृष्ट्वा तं समुपस्थितम् ।
विप्राः पृच्छन्ति यत्कार्यमुपवेश्यासने शुभे ॥६॥
कि ते कार्य किमर्थ वा किया मृगयसे द्विज ।
पर्पदि हि तत्सवं यत्कार्य हितमात्मनः ॥१०॥
इत्याङ्गिरसधर्मशास्त्रे परिपदुपस्थानं नाम
द्वितीयोऽध्यायः।
।
"
तृतीयोऽध्यायः
प्रायश्चिचविधानयर्णनम्
सत्येन पोतते राजा सत्येन पोतते रविः।
सत्येन पोतते यहिः सत्ये सर्व प्रतिष्ठितम् ॥१॥
भूर्भुवःस्वत्रयोलोकास्तेऽपि सत्ये प्रतिष्ठिवाः ।
अस्माकं व सर्वेषां सत्यमेव परा गतिः ॥२॥

आदरसलानः यदि मरते सत्वं निप्नं प्राप्य मुखम् । यद्गृहीतो सनन नमुन्येव कहिचित् ॥३॥ सत्येनेय विशुपन्ति मुटिकानारच मानवाः । वम्मात्प्रत्र हि यत्सत्यमादिनन्यावसानम् ॥४॥ एवं सेः समनुज्ञातः सत्वं नयादरोपतः । तस्मिन्निवैदिवे कार्येऽपसायर्यो यस्तु कार्यवान् ॥५॥ तस्मिन्नुत्सारिते पापे चयावद्धर्मपाठकाः । ते तथा तत्र कल्पेयुर्विमशन्तः परस्परम् ॥६॥ आतधर्मपु यत्प्रोक्तं यच्च सानुग्रहं भवेत् । परिपत् संपदश्चव कार्याणां च बलाबलम् ॥७॥ प्राप्य देशं च कालं च वच्च कार्यान्तरं भवेत् । परिपश्चिन्त्य तत्सर्व प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ॥८॥ सर्वेपी निश्चितं यत्स्यायच्च प्राणान्न पातयेत् । आहूय श्रावयेदेको यः परिपन्नियोजितः ॥६॥ शृणुष्व भो इदं विप्र यत्त आदिश्यते व्रतम् । तत्तद्यलेन कर्तव्यमन्यथा ते वृथा भवेत् ॥१०॥ यदा च ते भवेश्चीणं तदा शुद्धिप्रकाशनम् । कार्य सर्वप्रयत्लेन न शक्त्या विप्रपूजितम् ॥११॥ इत्याङ्गिरसधर्मशास्त्रे प्रायश्चित्तविधानं नाम तृतीयोऽध्यायः

परिपल्लक्षणवर्णनम्
३०६६
चतुर्थोऽध्यायः
परिपल्लक्षणवर्णनम्
प्रायो नाम तपः प्रोक्तं चित्तं निश्चय उच्यते ।
तपोनिश्चयसंयोगात्प्रायश्चित्तमिति स्मृतम् ॥१॥
प्रायश्चित्तसमं चित्तं चारयित्वा प्रदीयते ।
. पपैदा क्रियते यत्तत्प्रायश्चित्तमिति स्मृतम् ॥२॥
चत्वारो वा त्रयो वापि वेदवेदाग्निहोत्रिणः ।
ये तु सम्यस्थिता विप्राः कार्याकार्यविनिश्चिताः ॥३॥
प्रायश्चित्तप्रणेतारः सप्तैते परिकीर्तिताः ।
एकविंशतिभिश्चान्यैः पार्पदत्वं समागतैः ॥ ४ ॥
सावित्रीमात्रसारस्तु चीर्णवेदवतद्विजैः ।
यतीनामात्मविद्यानां ध्यायिनामात्मवेदिनाम् ।
शिरोवतैश्च स्नातानामेकोऽपि परिषद्भवेत् ॥५॥
एवं पूर्व मयाप्युक्त तेषां ये ये परे परे ।
स्ववृत्या परितुष्टानां परिपत्त्वमुदाहृतम
एका लघुपु कार्येपू
मध्यमेषु च मध्यमा।
महापातकचिन्तासु शतशो भूय एव वा
अत अव ये विप्राः केवलं नामधारकाः।
परिपत्त्वं न तेवति सहस्रगुणितेप्यपि ॥८॥
जन्मशारीरविद्याभिराचारेण भ्रुतेन प।
धर्मेण च यथोकन प्रामणत्वं विधीयते ॥६॥

३०७० आनिरसम्मृतिः चित्रकर्म यथाने रसन्मील्यते शनैः। मारण्यमपि तस्यारसम्झारमन्त्रपूर्वकः ॥१०॥ इत्यादिरसधर्मशास्त्र परिपल्लमण नाम चतुर्थोऽध्यायः पञ्चमोऽध्यायः प्रायश्चित्तनियन्तृकथनम् चातुर्वेद्यो विकल्पी च अङ्गविद्धर्मपाठकः । प्रयश्चाश्रमिणो मुख्या पर्पदेपा दशावरा ॥१॥ चतुर्णामपि वेदानां पारगा ये द्विजोत्तमाः। स्वैः स्वैरङ्गैविनाप्येते चातुर्वेद्या इति स्मृताः ॥२॥ धर्मस्य पर्पदश्चैव प्रायश्चित्तक्रमस्य च। त्रयाणां यः प्रमाणज्ञः स विकल्पी भवेद्विजः ॥३॥ शब्दे छन्दसि कल्पे च शिक्षायां चैव निश्चयः । ज्योतिपामयने चैव सनिरुक्तऽङ्गविद्भवेत् ॥४॥ वेदविद्यावतस्नातः कुलशीलसमन्वितः । अनेकधर्मशास्त्रज्ञः पठ्यते धर्मपाठकः ॥५॥ ब्रह्मचर्याश्रमादूर्ध्वमाश्रमावृद्ध उच्यते । एषामेव तु वृद्धानां य एते संप्रकीर्तिताः ॥ ६॥ परिपब्राह्मणानां च राज्ञां सा द्विगुणा स्मृता। । वैश्यानां त्रिगुणा चैव पर्पदच अतं स्मृतम् ॥७॥ .

प्रायश्चित्तनियन्तृकथनम् ३०५ ब्राह्मणो ब्राह्मणानां तु क्षत्रियाणा तु पाठकः । वैश्यानां चैव यो प्रष्टा त एव व्रतदाः स्मृताः ॥८॥ अगुरुः क्षत्रियाणां तु वैश्यानां चाप्ययाजकः । । प्रायश्चित्तं समादिश्य तप्तकच्छ समाचरेत् ॥६॥ एवमुद्दिश्य वर्णेषु क्षत्रियादिपु दर्शनम् । प्रवृत्तानां तु वक्ष्यामि प्रायश्चित्तमनुत्तमम् ॥१०॥ शूद्रः कालेन शुध्येत गोब्राह्मणहिते रतः। दानैर्वाप्युपवासैर्वा द्विजशुश्रूपणे रतः अपि वा मार्गमालम्ब्य क्षत्रधर्मेप तिष्ठतः। अन्तरा ब्राह्मणं कृत्वा ततोऽस्य व्रतमादिशेत् ॥१२॥ । यस्माच्छू, समासाद्य तथा धर्मपथे स्थितः । प्रायश्चित्तं प्रदातव्यं धर्मवेदविवर्जितम् ॥१३|| आपन्नो येन वा धमों प्रतं वा येन तुष्यति । प्राह्मणानां प्रसादेन संतार्यः सर्व एव हि ॥१४॥ इत्याद्गिरसधर्मशास्त्रे प्रायश्चित्तनियन्तृकधनं नाम पञ्चमोऽध्यायः। -

३०७२
आशिरसस्मृतिः
पष्ठोऽध्यायः
प्रायश्चित्ताचारकथनम्
पणे तु पर्पत्कल्पस्य कल्पस्य परिपबलम् ।
कारिणश्चाप्युपस्थानं बलं सम्यनिवेदितम् ॥१॥
अकल्पा परिपद्यत्र कल्पो वा परिपद्विना ।
कार्य वाप्यन्यथोक्त वा शुद्धिस्तत्रास्य दुर्लभा ॥२॥
परिपत्कल्पतो कार्या यथा सर्वे बलीयसः ।
भवन्ति न तथा पापं सस्मिन् योगेऽवतीर्यते ॥३॥
एवमेतत्समासाद्य तद्योग च प्रणश्यति ।
महत्या चाम्भसि क्षिप्तं यथाल्पलवर्ण तथा ॥४॥
एवयोगप्रधानाय कार्याणि परिशोधने ।
तद्व्यं फर्मसंयोगाद्वक्त्राणामिव शोधने ॥२॥
यत्पापं शाम्यमानस्य कर्मेण शामतः।'
तद्वद्गन्छति कार]न भागशः प्रनयीमि ते ॥६॥
गुरुरात्मयता शास्ता शास्ता राजा दुरात्मनाम्।
अन्तः प्रच्छन्नपापान शास्ता वैवस्यतो यमः ॥७॥
गुरु राजा यमो वाऽपि शास्ता धर्मण युज्यते।
शास्ता संमुच्यते पापाहाहना भयतः शुभम् ॥८॥
प्रायश्चित्तं यदा पोर्ण प्रामणे दम्पशिविरे ।
धर्म मि मस्तेन तला कनु नियति ॥६॥
नव गनि कारं नैव गावि पापदम्।
मारवाशुगंयोगानलवत्संशयिी ॥१॥

प्रायश्चित्तवर्णनम् ३०७३ वेषां प्रेतामिना दग्यं पावकस्य तु धीमतः । नश्यते नात्र संदेहः सूर्यदृष्टिहिम यथा ॥११॥ प्रश्न यात्पक्षतो या वाह्य यच्चापि पर्पदः । गच्छतस्तावुभौ मूढो नरकं तेन कर्मणा ॥१२॥ अजानन् यस्तु विव याजानन्याप्यन्यथा वदेत् । उभयोहि त्योदोपः पक्षयोरुभयोरपि । १३॥ अजानानां च दातॄणामदातॄणां च जानताम् । एवं भवेन्महादोपस्तस्माज्ज्ञात्वा वदेत्सदा ॥१४॥ यत्तु दत्तमजानद्भिः प्रायश्चित्तं समागतैः । तत्पापं शतधा भूत्वा दातृनेवोपतिष्ठति ॥१५॥ 'ये तु सम्यस्थिता विप्रा धर्मवेदाङ्गपारगाः । शक्तास्ते तारणे तेपामात्मनोऽनुग्रहस्य च इत्याङ्गिरसधर्मशास्त्रे प्रायश्चित्ताचारकथनं नाम पष्ठोऽध्यायः। सप्तमोऽध्यायः पापपरिगणनम् आर्वाना मार्गमाणानो प्रायश्चितानि ये द्विजाः । जानन्तो न प्रयच्छन्ति ते च यान्ति समं तु ः॥१॥ जानद्रिः पर्पदः पन्था न हातव्यः पराङ्मुखैः ॥ २॥ वस्मादावं समासाद्य ब्राह्मणं तु विशेपतः ।

२०७४ आहिरसम्मृतिः प्रायश्चित्तं वयम तस्य कार्यों प्रतादेशः प्रमाणार्थ दिदातृभिः। . अशानानुपदेष्व्यः कमशः सर्व एव वा ॥३॥ भयावभ्युत्तरेकश्चिद्यातं सामर्ण कचिन् । एवं पापात्समुन्य तेन तुल्यफलो भवेत् ॥४॥ अनथिनेरनाहूनरपृष्टश्च यथाविधि । प्रायश्चित्तं न दातव्यं ज्ञानद्भिरपि च द्विजैः ॥६॥ तस्माजनेः प्रदातव्यमनुज्ञाप्य च पर्पदम् । न घान्येषु प्रजल्पत्सु चैवं धर्मो न हीयते ॥६॥ पातकेषु शतं पर्पत् सहन महदादिषु । उपपापेषु पञ्चाशत् स्वल्पं स्वल्पेषु निश्चयः ॥ ७॥ पञ्चमहापातकिनः ब्रह्महा स्वर्णहारी च सुरापो गुरुतल्पगः ! एतैः संयुज्यते योऽन्यः पतितैः सह पञ्चमः ॥८॥ पविताः नारीपुरुपहन्ता च कन्यादूपी गवां च हा । चत्वारः पतिता प्रोक्ता यथा वै ब्रह्महादयः ।। उपपातकास्त्वसंख्यातास्ते च गोनादयस्तथा ॥ ६॥ इत्याङ्गिरसधर्मशास्त्रे पापपरिगणनं नाम सप्तमोऽध्यायः। . T अष्टमोऽध्यायः शूद्वान्नस्यगर्हितत्ववर्णनम् प्रतिप्रहे आहितामिस्तु यो विप्रः प्रतिगृह्णाति शूद्रतः । भोक्तृणां समता याति तिर्यग्योनि च गच्छति ॥ १॥ शूद्रानभोजने यस्तु वेदमधीयानो भुङ्क्त शूद्रानमेव च। सूद वैदफलं याति शूद्रत्वं च स गच्छति ॥ २॥ शूद प्रशस्य स्वस्तिवचने प्रशस्य स्वस्ति चेत्युक्त्वा भोक्ता एव न संशयः ॥ ३ ॥ आम वा यदि वा पक्क शूद्रान्नमुपसेवते । प्रतिगृह्यान्येभ्यो दातव्यम् प्रतिगृह्य प्रदातव्यं न भुशीत स्वयं ततः शूद्रान्नरसपुष्टाधीयानस्य शूद्वान्नरसपुष्टस्य चाधीयानस्य नित्यशः । घात्वा पीत्वा निरीक्ष्याथ स्पृष्ट्वा च प्रतिगृह्य च । एवे दोपा भवन्तीह शूद्रान्नस्य परिग्रहे । " अनुप्रई तु वक्ष्यामि मनुना चोदितं पुरा ॥४ ॥ ' किल्विपं भञ्जते भोक्ता यश्च विप्रः पुरोहितः ॥५ ॥ गुरुववधतिथीनां तु भृत्यानां तु विशेषतः । जपतो जुह्वतो वापि गतिरूवं न विद्यते । आङ्गिरसस्मृतिः ससने दानधर्म प पकमन्नं तु गहितम् ।...' पश्चरात्र चरेद्वम पहहं मध्यमाचरेत् . In तथा धान्येप्यभोज्ये? यहमेवं समाचरेत्।। अनापरसु परेझैश्यं सिद्ध यस्तु गृहे वसन् IIAL दशरात्रेचरेद्वन्त्रमापत्सु च व्यहं चरेत् । पतिवानी च सर्वपा भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥ प्रतिमासदिनं हृष्टमन्यथा पतिवो भवेत् । प्रतिसंवत्सरं वापि श्रोत्रियस्य भवेदिदम् ॥८॥ ब्रह्मचारी यतिश्चापि विद्यार्थी गुरुपोपकः। अध्वगः क्षीणवृत्तिश्च पडते भिक्षुकाः स्मृताः ॥ ६॥ व्याधितस्य दरिद्रस्य कुटुम्बात्प्रच्युतस्य च। अध्वानां का प्रयातस्य भक्ष्यचर्या विधीयते ॥१॥ ब्रह्मचारी शुना दष्टरत्र्यहमेवं समाचरेत् । गृहस्थस्तु द्विरानं वाप्येकाई वामिहोत्रवान् ॥११॥ नाभेरुध्वं तु दष्टस्य तदेव द्विगुणं भवेत् । " तदेव द्विगुणं वपत्रे मूप्रिं चैव चतुर्गुणम् ॥१२॥ अत अवं तु यत्स्नातः स्नानेनैव विशुध्यति ।। '' सर्वेष्वेवावकाशेषु तदा प्रत्रजितः स्वयम् ॥१३॥ .. in दृष्ट्वाग्निं हूयमानं तु सद्य एव शुचिर्भवेत् ॥१४॥ प्राह्मणी तु शुना दृष्टा सोमे दृष्टिं निपातयेत् ।। !! यदा न दृश्यते सोमः प्रायश्चित्तं कथं भवेत्॥१६॥ अघ्रती सन्नती वापि सुना दष्टस्तथा द्विजः ।।

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३०८०
आशिरसामृतिः
कुशकाशेस्तु बनीयादूध दक्षिणतोमुखम् ।
पाशलग्ने तथा दाई प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥
यदि तत्र भवेच्छोकः प्रायश्चित्तं कथं भवेत् ।
जपित्वा पायमानीयं मुच्यते सर्वकिल्बिषात् ॥७॥
अस्थिभङ्ग गा कृत्वा ललगूलच्छेदनं तथा।
पातनं चैव शृङ्गस्य मासा, यावकं पिवेत् ॥८॥
प्रणम च कर्तव्यः स्नेहाभ्यङ्गश्च पाणिना!
यवसश्चोपहर्तव्यो यावद्र ढवणो भवेत् ॥६॥
अस्थिभने तथा शृङ्गकटिभङ्गे तथैव च।
यावजीवति पण्मासान् प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥१०ll
शृङ्गभङ्गेऽस्थिभङ्गे च चर्मनिर्मोचने तथा।
दशरात्रं पिवेद्वत्रं यावत्स्वस्ति भवेत्तदा ॥१९॥
अन्यत्राङ्कनलक्ष्मभ्यां वाहनिर्मोचने तथा ।
सायं संगोपनार्थ तु न दुप्येद्रोधवन्धयोः ॥१२॥
यन्त्रण गोचिकित्सा, मूढगर्भविमोचने।
यत्ने कृते विपद्यते न दोपस्तत्र विद्यते ॥१॥
औषधं स्नेहमाहारं दद्याद्गोब्राह्मणे हितम् ।'
प्राणिनां प्राणवृत्त्यर्थ प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥१४॥
गजे वाजिनि वा व्याघ्र खड्गे श्याममृगे के ।
सिंहे शुनि वराहे च मयूरे पक्षिणामपि ॥१शा
काके हंसे च गृधे च टिट्टिभे सञ्जरीटके ।
यथा गवि तथा विन्द्याद्धगवान्मनुरवीत् ॥१६॥

गोवधप्रायश्चित्तकथनम् ३०८ मोहाद्विरूढमाचार्यप्रत्यावृत्तौ तु यो द्विज. । प्रायश्चिचं न मृग्येत शृणु तस्यापि यो विधिः ॥१॥ विहितं यदकामाना कामात्तद्विगुणं भवेत् । पश्चात्तु दह्यात्तापेन कृत्वा पापानि मानवः ॥१८॥ धनत्यागं गृहे त्या सर्वत्यागेन गुभ्यति । दन्यै विपुलविप्रान् तोपवेद्यः मुनिश्चिनम ॥१६॥ बालवृद्धादनानां प्रायश्चित्तम उन्नार्यः फामतः प्रात: पापम समादिशेन। अर्याक्तु द्वादशाददात् पुरुण धर्मभाग्भयेन ॥२८॥ प्रशीवियस्य पापूर्णा वधं सफलो विधिः । पायधिवस्य ये होयवाटगद्धामनादयः ।। वेषु सर्वेषु संचिन्त्य पादमेकं समाचरेन ॥२६॥ इत्याशिरसधर्मशास्त्रे हिसाप्रायश्चित्तकथनं नाम दरामोऽध्यायः। एकादशोऽध्यायः गोवधायरिएपम्यनम् गोमो मुशीन सारमा अधारलय पाकर मांजनम् ॥१॥ हावापो बने गांठे पर्मया तन महतः। में मासो मानम गोमांस Hd ॥॥ पावसंयुको ३०८२ आनिरसस्मृतिः पादशौच क्रिया कार्या अद्भिः कुर्वीत केवलम् । प्रतिवद्धारयेद्दण्डं समन्यो मेखली तथा ॥३॥ गाश्चैवानुनजेन्नित्यं रजस्तासा सदा पिवेत् । तिष्ठन्तीप्यनुतिष्ठेभ प्रजन्तीप्यप्यनुप्रजेत् ॥४॥ शुश्रूपित्या नमस्कृत्या रात्री वीरासनं वसेत् । गोमती च जपेद्विद्वानोंकारं वेदमेव च ॥५॥ आतुरामभिशस्ता वा चोरव्याघ्रादिभिर्भयैः। पतितां पङ्कलमा वा सर्वप्राणैविमोक्षयेत् ॥ ६॥ उधणे वर्पति शीते वा मारुते वाति वा भृशम् । न कुर्वीतात्मनस्राणं गोरकृत्वा स्वशक्तितः ॥७॥ आत्मनो यदि वान्येषां गृहे क्षेत्रेऽथवा खले । भक्षयन्ती न कथयेत् पिबन्तं चैव वत्सकम् ॥ ८॥ अनेन विधिना गोप्रो यस्तु गा अनुगच्छति । स गोहत्यात्मकात् पापान्मुच्यते नात्र संशयः॥६॥ अपभैकादशा गाश्च दद्यात्सुचरितत्रतः। अविद्यमाने सर्वस्वं वेद विद्भयो निवेदयेत् ॥१०॥ एतेषां विहितं पुण्यं कृच्छ्रमङ्गिरसा स्वयम् । धर्मविद्भिरनूचानेरुपपातकनाशनम् ।।१।। इत्यागिरसधर्मशास्त्रे गोवधप्रायश्चित्तं नामैकादशोऽध्यायः। .

द्वादशोऽध्यायः कृच्छादिस्वरूपकथनम् अव उध्वं प्रवक्ष्यामि प्रायश्चित्तविधि शुभम् । यमधारय विगुवन्ति श्रुत्वा स्मृन्या प वै द्विजः ।।१।। सदा विपरणं स्नायात् सारनात्वा पयः पिन् । प्रातः स्नात्वा समारम्भं कुयांजप्यं नु नित्यशः ॥२॥ सावित्री व्याहती वापि जपेदष्टसहमम्म । बोकारमादितः त्या रूपे स्पं तथान्तग्म ॥३॥ पानं पीरासनं सक्तः कुर्यादासनमेय था। आसनं शल्यषिद्ध म्यादमधःशायी भवेत्मा ॥४॥ गम्यस्थ पयसोऽलाभ गम्यमेव भवधि। यभावे भवेत्तक तकाभावं तु पारम्म ॥५॥ रगमन्यतम यशाप्युपपपने मरिन । गोमग तु संयुफ पाय सपिवेटिमः ॥६॥ गत पिहितं पुष महिएमा पम् । भयवा समारम्मो नाम्ना मिनिम्तम् ॥1॥ एम्पायक मुन्ना मानि रिपीते। पापामा बर: गुनिifilm अयोपारिपET मामि। सोसाय काय ३०८४ थाङ्गिरसस्मृतिः ब्राह्मणा एव च क्षेत्रं ब्राह्मणा एव देवतम् । माझाणानां प्रसादेन सूर्यो दिवि विराजते ॥१०॥ न ब्राह्मणसम क्षेत्रं न ब्राह्मणसमोऽनलः । विधिन ब्राह्मणाधं न दैवं ब्राह्मणात्परम् ॥११॥ जपता जुलता चैव यच्छता च सतामपि । क्षेत्रोऽग्नेस्तु सुसंभूतो ब्राह्मणोऽद्य विशिष्यते ॥१२॥ न स्कन्दते न व्यथते न विनश्यति कहिचित् । वरिष्ठमग्निहोत्रेभ्यो ब्राह्मणस्य मुखे हुतम् ॥१३॥ देवतापितृभूतानां काचिद्भवति कस्यचित् । ब्राह्मणे देवताः सर्वाः स च सर्वस्य देवता ॥१४॥ यो हि यां देवतामिच्छेदाराधयितुमव्ययम् । सर्वोपायप्रयत्नेन तोपयेबाह्मणान् सदा ॥१५॥ समस्तसंपत्समवाप्तिहेतवः समुत्थितापत्कुलधूमकेतवः। अपारसंसारसमुद्रसेतवः पुनन्तु मां ब्राह्मणपादपासवः ॥१६॥ इत्यागिरसधर्मशास्त्रे कृच्छ्रादिस्वरूपकथनं नाम द्वादशोऽध्यायः । इत्युत्तराङ्गिरसम् इत्याङ्गिरसस्मृतिः।

॥ श्रीगणेशाय नमः ।। * भारद्वाजस्मृतिः प्रथगोऽध्यायः भारद्वाजम्पति मुग्यादिमुनीनां सन्भ्यादिप्रमुग्रफर्मविपये प्रभः हेमाद्विशिरसरे रम्ये मुरगमीनं महाउनम । भरतानं मुनिभ्रेष्ठ सर्वविद्यातपोनिधिम ।।१।। पुण्य पुण्यशीलं प्रमनिष्ठं जितेन्दिरम। वनामार मुनिधेष्ठः भृग्यादा मुनिपुगः ॥२॥ सुगरपिशिष्ठत्र शामिल्यो गहिर बा । हरितो गौतमो गर्गः कालरापोऽसि ॥३॥ माडे माण्डलः फरिलो नारद । जमदमिर्यालयलयो विधामा पर I४॥ एते पायपि मुनलो पा मारा। सोरपारीः सम्मार पपनमामा पन ॥ ॥ भयरन्मयश मराना मामाकरण Minutel विगिnिisterita मम्मारिका गरी निषाद । ३०८६ भारद्वाजस्मृतिः इति वृष्टो (पृष्टो) भरद्वाजस्तैर्महामुनिभिर्मुनिः । तान्प्रत्युवाच धर्मात्मा सन्तुष्टहृदयो भृशम् ॥ ८ पृष्टा युप्माभिरघुना याः क्रियास्ता महर्षिभिः । यथा क्रमेण कथ्यन्ते सन्ध्याप्रणतिपूर्विकाः ॥६॥ नित्यानुष्ठानरहितं द्विजैरधिकृतागमाः। यज्ञाः प्रतुश्च विधिपन्न भवन्ति फलप्रदाः ॥१०॥ तस्मात्सर्वप्रयलेन शुचि (भू) भूत्वा द्विजोत्तमः । अनुष्ठानम्प्रकुर्वीत प्रत्यहं शास्त्रचोदितम् ॥११|| धर्मशास्त्रेषु सर्वेप समरतेष्वागमेषु च। सारमुद्धृत्य वक्ष्यामि ऋणुञ्चमृपयोऽनघाः ।।१२।। शास्त्रायणमिदं श्रेष्ठमध्येयं श्रद्धया सह । शे पूर्धिमिः(१)द्विजैः काममनुष्ठानादि साधनम् ॥१३॥ शास्त्रावतारो दिग्भेदः मलमूत्रपरिच्युतिः । शौचमाचमनं दन्तधावनं सापनं ततः ॥१०॥ सन्ध्या प्रणामश्च जपः ब्रह्मयज्ञश्चतर्पणम् । औपासनं वैश्वदेवं महायज्ञचतुष्टयम् ।।१।। भोजनं शयनं ध्यानं महाध्यानञ्च पूजनम् । पूजा द्रव्यं जपसूक्ष(१) कलशं च क्रिया अपि ॥१६॥ यज्ञोपवीतश्च कुशाः प्रणवो व्याहृतिस्ततः। साधनं प्रायश्चित्तश्च क्रमोऽयं शाखसंग्रहः ॥१७॥ दिग(क)निर्णयं समारभ्यो प्रायश्चित्तावधि क्रमात् ।

३०८७ दिग्भेदज्ञानवर्णनम् पञ्चविंशति कर्माणि प्रोक्तान्यध्यायरूपतः। स पञ्चविंशत्यध्याये कर्मक्लनिर्यथाक्रमम् । धर्मशात्रं समाख्यातं भारद्वाजमहर्षिगा ॥२०॥ इति भारद्वाजस्मृतौ सन्ध्यादिप्रमुखकर्मविपयक प्रश्न वर्णननाम प्रथमोऽध्यायः । अथ द्वितीयोऽध्यायः दिग्भेदज्ञानवर्णनम् अथ विजानीयात्पूर्वादि दिग्भेदज्ञानपद्धतिम् । कथयिष्याम्यहं सम्यक् सर्वकर्मफलाहये ॥१॥ पूर्वादि दक्षिणा वारुण्युदीची घ यथाक्रमम् । दित(?श.श्चतस्रः परितः भवन्ति स्मृतिचोदिताः ॥२॥ यत्रोदेति सहस्रांशुः स्यात् (सा) पूर्वादिगुदाहृता । यत्रास्तमेति सा प्रत्य गीतकि(१)दक्षिणोत्तरे ॥३॥ दिक्संधयः म्युद्धिदशः चतस्रः परिकीर्तिताः । अभ्यन्तरं दिशोमन्तः तदूर्ध्वमुपरि स्मृतम् ॥ ४॥ वधस्तादधोदिक्स्यात् एकादश दिशः रा.(स्त्विमाः)। एवमेवाः परिझया दिशः सामान्यरूपतः ॥५॥ मामध्यम विजानीयात् मेपस्थानोदयम्युधः । उत्कमेमेतरदिशः मध्यदेश यथाममम् ॥ ६॥ एककस्मिन्किस्क ( १ ) माध्याये प्रोक्त का परिसंख्यया ॥१ ॥

1०८६ भारद्वाजस्मृतिः इति पृष्टो (पृष्टो) भरद्वाजस्लमहामुनिभिमुनिः। तान्प्रत्युवाच धर्मात्मा सन्तुष्टदियो भृशम् ॥८॥ पृष्टा युप्माभिरघुना याः कियास्ता महर्षिभिः। यथा ममेग कश्यन्ते सन्याप्रणतिपूर्विकाः॥६॥ नित्यानुष्ठानरहितद्विजैरधिकृतागमाः । यशाः प्रतुश्च विधियन्न भवन्ति फलप्रदाः ॥१०|| तस्मात्सर्वप्रयत्नेन शुचि (५) भूत्वा द्विजोत्तमः। अनुष्ठानम्प्रकुर्वीत प्रत्यहं शानचोदितम् ॥११॥ धर्मशास्त्रेषु सर्वेष समरतेप्वागमेषु च । सारमुद्धृत्य वक्ष्यामि ऋणुध्वमृश्योऽनघाः ॥१२॥ शास्त्रायणमिदं श्रेष्ठमध्येयं श्रद्धया सह । ज्ञे पूर्धिमिः(?)द्विजैः काममनुष्ठानादि साधनम् ।।१३।। शास्त्रावतारो दिग्भेदः मलमूत्रपरिच्युतिः । शौचमाचमनं दन्तधावनं स्नापनं ततः ॥१४॥ सन्ध्या प्रणामश्च जपः ब्रह्मयज्ञश्चतर्पणम् । औपासनं वैश्वदेवं महायज्ञचतुष्टयम् ॥१५॥ भोजनं शयनं ध्यानं महाध्यानञ्च पूजनम्। पूजा द्रव्यं जपलक्ष(१) कलशं च क्रिया अपि ॥१६॥ दिग(क)निर्णय समारभ्यो प्रायश्चित्तावधि क्रमात् । यज्ञोपवीतञ्च कुशाः प्रणवो व्याहृतिस्ततः । साधनं प्रायश्चित्तश्च मोऽयं शाखसंग्रहः ॥१७ ॥ स पञ्चविंशत्याध्यायं धर्मशास्त्र प्रवीमि वः ॥el दिगभेदज्ञानवर्णनम समाश्यासितिर्यायु यि(ई,शानश्चेत्यमोश्वराः। अंतरांध्यांधरदिशा भूतदेयादयोधिपाः ॥१८॥ एवं दिग्विपयाः प्रोकाः सर्वपा ममणि । परिमयः प्रयलेन बुधै कर्मफलेच्छुधिः ॥१६॥ मेपकम्नुिनश्चत्वारो राशयस्त्वमी। पूर्वादिपुचतुधिदि,क्ष मध्येज्योन्यत्र रारायाः ॥२८॥ प्राचीमध्यं विनान्यत्र संस्थिताये पराशयः । वयस्थिता हि मरिपच्छाया यफ्ना मदा भयेन ॥२६॥ ममभूमिस्तले दण्ड प्रमाण पतुरभके। शंखकोश्य दिगुणेनेय शुल्पे(१) कृति मण्डले In मधमस्थापयेचा (१) मेषस्थानोदये सुधः । मंस्तालानगनायम्यच्यापारमायुरादारिता अपराई सधा सघ शनम्नु हरिन ॥४॥ नयोषियं मध प्रशीत विसभमः । नतः प्रामारपेन्सूर्य तालिप गाममhkil कापीतीप्यो मतिम पिपरिया। पियानरभानरारानपुर : ग्यं पगलाय दक्षिणानरमा। मानानि पनि मामि गुमर पामा माnिetware १६४ परमाणदयालाभे नुलास्थाकादयोधया 100 •८८ भारद्वाजस्मतिः मेष सूर्योदये यत्रच्छायाशंको समसले। निगंगा सा प्रतीची स्यात् अस्ति प्राचीत्युदाहृता । दिग्नामानिस्तूपावास प्रामादिस्थापने युधाः । शकच्छाया पशाद्धया प्रात्यमध्यनिश्चयः ॥८॥ यानि देवोक्त कर्माणि प्रागादिमुखसंस्थितः । वेदी क्षेत्राणि सर्वाणि कुर्यात्तदभिवक्त्रतः ॥६॥ अथात्तरोर्वकाष्ठासु कर्मान्युयुक्तानि यानि वै। तानि कुर्यात्तदभ्यस्य तत्कर्मफलसिद्धये ॥१०॥ केचिद्देवालयद्वारं प्राचीमध्यं प्रचक्षते । माम राजमार हद्वारं तथाऽन्योऽस्यदिगन्तरम् ॥११॥ प्राक्पूर्वदिति नामानि प्राच्याः प्राहुः पुरातनाः। याम्यवाची दक्षिणाया नामनी नामानि,कथ्यते वुधैः ।१२ पश्चा(त) प्रत्यग्वारुणीति प्रतिच्यानानुवाचकाः । कौवेर्यादिच्युत्तरेति नामानिस्युरु......" शः ॥१३॥ अभ्यन्तरान्तरालातरव कोशान्तरातयः। अवान्तरदिशः सम्झौः(सब्ज्ञाः) विद्वद्धि परिकीर्तिता ।१४१ उपरिष्टादुपरिचेत्येतेवेसीमनी युधाः। आहुरुर्ध्व दिशस्त्वेवमभ्यासर्व दिशः स्मृताः ॥१२ हरिद्राशाककु काष्ठा चेतिनामानि वै दिशाम् । सर्यासामेवे हि दिशा सामान्यं विवुधा विदुः ॥१६॥ पूर्वादिवतुराशेगः क्रमादिद्रियबुराट् 1. किनरेश्वर इत्येते भवंति: विदिशामथ ॥१७॥ Aishtand- दिगभेदज्ञानवर्णनम साश्वासि तिवायु यि(ई,शानश्चेत्यमीश्वराः। अंतरावाधरदिशां भूतदेवादयोधिपाः ॥१८॥ एवं दिग्विपयाः प्रोकाः सर्वपां सर्ववमणि । परिशेयः प्रयत्लेन बुधै कर्मफलेच्छुचिः ॥१६॥ मेपकिंतुनश्चत्वारो राशयस्त्वमी। पूर्वादिपुचतुधिादि, मध्येऽन्योन्यत्र राशयाः ॥२८॥ प्राचीमध्यं विनान्यत्र संस्थिताये च राशयः । वस्थिता हि मरिचच्याया वपत्रा सदा भवेत् ॥२१॥ ममभूमिस्तले दण्ड प्रमाण धतुरमके । रायोकोरच द्विगुणेनैव शुल्पे(१) कृति मण्डले ॥२२॥ मधमस्थापयेभ (१) मेपस्थाोदये युधः । मेपस्मार्णदयालाभे तुलाभाशंदयोधया ॥३॥ मंदता(लात तायम्यछायायाधुरामारी(रिता अपराहे तथा नय शतमनु हरिगोन ॥४॥ वयोपियं मध्य प्रकुर्वाव विचक्षणः । वतः प्रासारयेत्सूर्य तापि यत्ममः ॥२६॥ मापीनीच्यो मध्ये प्रति विपरिता। विध्यात्तरभातफरानतपुरर ntil सूर्य सत्तन्मयं दधिमोत्तरः कराया पगारावानि पर्यनानि विनिम्किा भूपाणि । तत: Ent: injreगनि। पामा मदिरांना

भारद्वाजस्मृतिः
विहुकरफदिरश्चेति शंसुरक्षाः समीरिताः ।
यस्खोलादिविस्तकायप्कुरल पंचकं ।।२।।
पतुरंम्गुलविस्तारः मूर्धासौ शंकुत्तमः ।
यस्योछायादिनायो द्वौ भवतोष्टादशांगुलौ ॥३०॥
न शर्मध्यगोमत्यनाभिः सप्रदग्गुलम् ।
यस्याश्चनाभो भवतः द्वादशकादशांगुली ॥३॥
कनिष्ठोसी समाख्यातः शंखुच्छायावलोकने ।
सर्वेनिवृत्ताः सस्मिग्याः च्छत्रानारसिरोंकिताः ।।३।।
निर्यणाः शंकगोयेते निर्मितास्युः शुभप्रदाः।
त्वग्भिपकयावानां नारिकेलफलमय च ॥३३॥
ईजुर्यानिमितासंस्यात् प्रशस्ता मानकर्मणि ।
न्यग्रोधकेतकी तालवल्केवतेपनिर्मितम् ॥३४॥
कार्पासवटतत्वोत्रिग्रंथिविवर्जितम् ।
स्वकनिष्धांग्गुलि थूरंस्मिन्धककुदसम्मितम ।।३।।
सूत्रमेवंविधं शस्तं मापने सर्वभूमिपु।
शुल्वेरज्जुविदासूत्रं गुण एकार्थमुच्यते ॥३॥
देवब्रह्मपितृगां च जात्यायुक्त यात्रियून् ।
वृपकन्यकयोच्छाया नवक्त्रास्यास्थितौ ॥३७॥
वृरस्तभानोरुदये कन्यास्तार्कोदयेपि वा।
मण्डले स्थापयेन्छज यथापूर्व तथा ऋतौ ॥३८॥
पश्चाद्विगात्मकच्छाया यत्र तत्र तथा ततः।
वनाचीदिगितिमाहुः तितिरेदक्षिणोचरे ॥३॥

दिनिश्चयवर्णनम् बजेतुलायां मिथुने मृगेद्वघडलं नयेत् । कर्कट पृश्चिके मीने शोधयेश्चतुरंम्गुलम् ॥४॥ पडंग्गुलंघटचापे मकरेयांशुलं तथा। छायायांदक्षिणेमेनित्या सूत्रं प्रमारयेत् ।।४।। केचिदेवंत्यार्याः प्रारप्रत्यधिग्विनिश्चये। सदिक्षीरिणीसालामधूखदिरास्तथा ॥४२॥ ख्याताशंधुतमा प्रोक्ताः अथ सालभूरुहाः । एकादशांग्गुलादेः विशग्गुलदीधं छः ॥४३॥ पूर्णमुष्टिस्तुतन्नाभी मूलं सूचिनिभो भवेत् । प्रमाणसूत्रभियुक्त प्रमार्गनिश्चिमोहितः ॥४४॥ तदहिः परितोभागेपर्यतं सूत्रमियते। गर्भसूत्रादिरीत्यादुसूत्रमेवप्रचोदितम ॥४५॥ यदिपृत्याससून हि त्यानं सूमियते । अणुरेणु शिरोजामूलाक्षायुकाः ययाममान् ॥४॥ पाट गुनियाः म्यायाप्टक गुलर। द्वादशांगुरनाला अखतामृतम् ॥४॥ इतरतुभिरंस्थान सूखा स्मृाम् । स्वहसार सूगगि पतु विfetival पितसिालयित्युः भंगुन स्वरूशिम्म। अष्टभिः सममिति परिचमहम् Inul इधर्म मभ्यमंनी उत्तमे बदामम् । मंगु विविध प्रोण समानामा "भारद्वाजामृतिः अस्यधांगुलमेतरतु फध्यतैस्मिन् यतो भवेत् । माध्यपद्वियर्वाधासाध्यै साभिरेव वा । ५।। माध्यैः मप्तभिगल्यातं एवं विविधर्मग्गुलम् । शायिभिश्च त्रिभिः मा. चतुभिश्च यथायवः ।।। शाल्याद्भवं समाख्यातं अंगुलं त्रिविध) बुधैः । एवंमानग्गुिलं 'प्रोक्तमात्राम्गुलमयोच्यते ।।३।। मध्यमांगुलमध्यस्त पर्वदीर्घमितत्तु यत् । तच्छ धर्मग्गुलं प्रोक्त पादहीनं तु मध्यमम् ॥४|| अर्धही (न) कनिष्टं स्यादेवं मात्रांग्गुलत्रयम् । अंगुष्ट तर्जनीदीघं यत्तत्रदिशसंज्ञतं ॥५५॥ अंगुष्ठमध्यमायामं यत्ता साराभिदानकम् । अंग्गुष्ठानामिकायामं यत्तद्गोकर्णसंज्ञिकम् ॥६॥ अंग्गुष्ठाभ्यंगुला प्राहुः वितस्तेरिति कथ्यते । यत्रयचोदितं तत्र प्रयंजातेपु तत्प्रयः ॥२७॥ अंडादिसूत्रपयंत्तं प्रमाणं समुदाहृतम् । किवादि पंचशाकानां अधुनाभेद उच्यते ॥८॥ किप्कुर्नाममवेद्धस्त 'चतुर्भिष्टब्धिरंग्गुलैः। प्राजापत्योभवेद्धस्तः पंचविंशन्धिरंग्गुलैः ॥१६॥ पर्शियग्गुलहस्तः स्यानुमुष्टि संक्षिकः। हस्तपादयोहसप्तविंशब्धिरंगुलैः ६०॥ एवं चतुधिोहस्तः विज्ञेयः कर्मवित्तमः । कोरनिरसिकनिष्ठिका ॥६॥ . 'बद्ध a दिनिश्चयवर्णनम इत्येतो कथितो हस्तो मनुष्याणां मनीषिभिः ।। पूर्वोदित चतुईस्तो यवनाभिहिनादिमी ॥६॥ इसौ तत्र प्रयोक्तव्यो सामान्योनोदिनकवे(?) । बाहुहन्ताद्वयोरनिरनिः किकुरियपि ॥३॥ कथितो हस्तपर्यायः हस्तछेदाग्गुलंगपि । मयानुरवासनादीनि किप्युहम्तेन कारयेन :६४।। प्राजापत्यकरणव प्रासादादिशिहस्रयान् । विमान मौलिशांशाला सभास्थानं न कारचन ।।६।। धनुमहोण प्रामादीन् धनुर्मया(टया) महादिकान् । राजान्पदं?) राजधानी तदानयनसंशिवम ॥६॥ धनुष्टिकरणेच प्रकुर्यात विरक्षणः । अलाने किप्नुहम्तो या मर्वमेव केरलम || अपांगुलमानेन नामंगुलमाननः । प्रामं पनगरं पेटं पनटे'न) मटं ।। विट शिविरं वम निगमाराजधानिम्म । गेनामुरमिनिप्राहुः सादर्शनानि मूरयः ।। अन्येषु शिल्पशापु परदेशन्नुभयप । नदी उलायन नगर तु मापग ! *। टेन पावन्य प्रामपोरंन्तरं तथा । यस्यातिविधीमध्य धाम | बमापीमध्यमं प्रो भरिया मूर्तिमः। विप्नोतरापमुसा रोहिनीना मन्द्र

भारताजस्मृतिः
गो नेतिमर्थ इत्येतेयतेतराः।
राप्रती प्रतिभ्याम्नु मन्गघरात ॥७३॥
एवं मध्ययं सात्वा तनोमिक अिपेत् ।
ततो शिविरमध्ये तु समं सूत्रं प्रसारयेत् ||४||
एवं प्रानिप्रतिच्यास्तु जानीट्यान्मध्यमं घुधः ।
ध्यस्थानमुदिन्याम्नु मध्यपूर्वक्रमेण तु ॥७॥
सूत्रं प्रसाशयामाया मध्यं यं विपश्चिता।
प्यनिः प्राच्याथवा सौम्यानिश्चिता पूर्व वस्तुतः ।।६।।
प्राचीतरं तु यत्स्थानं सर्व दोपकरं भवेत् ।
एवं प्राची'नहोच्युते परिज्ञायानम्मेकर्माण्य धारयेत् ।
अज्ञात्वाऽरब्धऽकर्माणि निष्फलानि भवंति हि ॥७॥
। इति भारद्वाजधर्मशास्त्रे दिनिश्चय नाम द्वितीयोध्याय "
अथ तृतीयोऽध्यायः
विण्मूत्रोत्सर्जनविधिवर्णनम्
विष्मा(मू)बोत्सर्जनविधिद्विजानां प्रथमेरधरस्फुट।
शौचक्रमश्चाधतथा (१) समीचीनमिहोच्यते ॥२॥
ब्राह्म मुहूर्ते चोत्थाय धर्मतत्वार्थमीश्वरम् ।
न चिन्त्याथमहाद्गत्वा देशे दक्षिणपश्चिमे ॥३॥

विण्मूत्रोत्सर्जनविधिवर्णनम् ३०६ आहृताया मृदापश्चातस्ताश्शुद्धभूतले(?)। पात्रयोदमावश्च क्षिपेश्चाछार्धमाहात्मन(?) ॥ ४ ॥ वल्मीकेथाऽग्नि वृक्षादी मार्गे मूपिकसद्मनि । शौचदेशे जलांतस्ति कर्दमे देवतालये ॥५॥ पुरोपभूमालिरिणे निवासे च गवामपि । मृत्तिका न परिमाह्य शोचार्थ जातु विद्युदैः ॥ ६॥ वानसामोलिसाच्छाद्यामौनिमूर्धानमस्पृशन् ॥ ७॥ समे रहसि भूभागे दर्भेतरत्तणारमृते । विसृजेन्मलमूत्रे तु रात्रीचेदक्षिणामुखः ॥ ८ ॥ देवालयमखस्थानश्मशानाचलदारिपु । तदीकान्धितटीतीरच्छायामूलभस्मसु ।। ६ ।। लोप्टसस्य च यश्चभ्रपराग बहुलीकृते । स त्यजेन्मलमात्रे तु स्थानेष्वेतेषु बुद्धिमान् ॥१०॥ आदित्यानलविप्रामिनाभित्नस्यजेन्मूत्रपुरीपेतु विचक्षणः(१) प्रमादात्स्वमलं दृष्ट्याभूमिस्थं ब्राह्मणोयदि ॥११॥ सवितारं द्विजंद्रगामग्नि या निरीक्षियेत् । दभैरपितृणैशुष्क गुदमुत्सृज्य सत्वरम् ॥११॥ अयज्ञदारुकाष्ठन तत्पत्रैर्वाप्यलोभतः । उत्थाय सव्यहस्ते गृहीत्वाञस्वमेहनम ॥१२॥ शौचदेशमदागन्य कुर्याछौच मृदायुना। पूर्व जलेन प्रक्षाल्या मृदापश्चात्तवोंबुना ॥१३॥ संध्यास्वाह ! कर्णस्था ब्रह्मसूत्र उद्ङ्मुखः ।

. भारद्वाजामृतिः। एवं द्वादशकृत्यस्तु गुदशौचं समाचरेत् । प्रस्पति अमिताद्यामृत द्वितीया तु तदर्भका ॥१३॥ उत्तरोत्तरतः सर्वात्रितय्यायतुता चुधैः । दशकृत्वोवामहस्तं साकृत्यः कराटभो ॥१४॥ संयोज्य चैवं प्रक्षाल्य सकलोचं पुनश्चरेत् । " पंचकृत्वः कमाक्षाल्य मृदामलकमात्रया ॥१३॥ विकृत्वोलिंगशौचं तु हस्तक्षाल्यपदेद्वयं । संयोज्यत्रिमृदाक्षाल्य क्षालयेच्छौचभूतलं ॥१६॥ कुर्वीतेवदिवा शौचं रात्रायस्यार्धमुच्यते । उ(अ)शक्तस्य यथा शक्ति शौचमुक्त तथाध्वनि ॥१४॥ योपितामुक्त शोचार्य शूद्राणामप्युदीरितम् । नदीनरस्तटायेपु पापीकुण्डरदेषु च ॥१॥ निझरे देवखारब्धी द्विजः शौच न कारयेत् । एवं शौचविधि प्रोक्ता द्विजाना शुद्धि हो (ह) तवे ।।१८।। विधि विमृन्य यच्छौचं वृथा कृतमविरमृतम् । कृतं संध्यादिकं कम नित्यं नैमित्तिक तथा। सर्व निष्प(फ,लायानि शौचहीनं द्विज(न्म)नाम् ॥१६॥ । भारद्वाजस्मृती विषमूत्रविसर्गनं नाम तृतीयोऽधायः॥

. . अथ चतुर्थोऽध्यायः आचमनविधिवर्णनम समस्त कर्मणामादि सादनं सर्वशानां । उपस्पृष्ट विधिः सम्यगद्विजानामधुनोच्यते ।।१।। आचम्य विधिवत्कर्मकृतं यत्तत्प्रसिध्यति । विनवाचमनं कर्म कृतमव्यफलं लभेत् ॥ २ ॥ वस्मात्सर्वप्रयत्नेन आचम्य विधिवत्ततः । श्रोतं कर्माथवास्मात्तं कुर्याकर्म फलाप्तये ।। ३ ।। परातंकरौसम्यक्क्षालयेत्प्रथमं बुधः ॥ ४ ॥ कुर्यादाचमनादीनि कर्माणारेदपाणिना ॥ ५ ॥ जलस्थमुधृतंवापिचारिशुद्धं प्रपश्यते । वहिरंतस्थ आचामेदुभयत्र शुचिर्भवेत् ॥७॥ जानोरधस्तास्तविले उपस्पृष्टउपपृशे।। जलाशयादिष्वाचामेदू भः सूईसंस्थितः ॥ ८ । वदनःशकरः द्वितः शुचिरुपस्पृशेत् ॥६॥ जंघान्त जानुपर्यन्तं अपिवाचरणद्वयं । नाभेरथ ( ध ) स्तातत्सकलं क्षालयेत्मव्यपाणिना । स्थरस्थंभोधृतंभापि यथशुद्धतदुजेन ॥६ ॥ जले.जलस्थ आचामेत्यहिष्ठस्तु जलाद्वहिः । उपविश्य शुचौदेशे प्राङ्मुखो ब्रह्मसूबधृत ।

०६८
भाग्माजम्मतिः
निममन् मान जल्गन् मनलजमाएगा|
धरमपरान्दिरापरणनम्मारिनुपरोन (1) ॥१॥
कापरविद्रोडशाप्रहरजस्वलाः ।
प्रात्यस्थिजाति पतितापिरोतिः ॥११||
देयलाजभिषः गूदान गंहालानुरुपातकान् ।
पश्यनोपदरोटीमान् अन्याः संकरजानपि ॥१२॥
शयानः पादुरस्सरचरदिजांनुः शरासनः ।
उप्णीपीयुशीनम न कदाचिदप.स्पृशेत् ॥१३॥
प्रमप्रजापतिपितृत्वगोंकोजातवेदसाम् ।
संतिपंचापितीर्थानि पाणी विप्राय दक्षिणे ॥१४॥
भग्गुष्ठस्य कनिष्ठायाः तर्जन्यमूलमप्रकम् ।
फंकरस्यमध्यमंचाहुस्तीयस्थानानिसाधवः ॥१५॥
सर्पणं देवतादिभ्यः स्वती नव वर्पयेत् ।
पिवेदाचमनेदादिवीक्षितं ब्रह्मतीर्थतः ॥१६॥
पानमार्जनसानादिस्पर्शानामधिदेवताः ।
क्रमेण सम्यकथ्यते तदा संस्मरणाय वै ॥१७॥
कार्यः सर्वागिरो वेदः पुराणोनितिहासकः(१) ।
प्राणेंदुभानुदिग्भूमि ब्रह्मरुद्रामराधिपाः ॥१८॥
एतेपानशरीरांग्गदेवता इति कीर्तिताः ।
वत्तक्रियायां स्मर्तव्या पदोपस्पर्शने द्विजैः ॥१६॥
उपस्पर्शनकालेन स्मरन्यानाम्गदेवताः ।
पिबेत्सृद्विजन्मायः तस्योपस्पर्शनं पृथा ॥२०॥

आचमनविधिवर्णनम्
३०६६
प्रक्षाल्य चरणी हस्ती प्रामुखोवाप्युदङ्मुखः ।
उपविश्यासनेशुद्धे कुर्याद्रगोकर्णवत्करां ॥२।।
सपवित्रंकरे तस्मिन् मापमानमितं जले।
आनीय्यत्रिःप्पिवेद्धीमान्वेदत्रितियतुध्ये ॥२२॥
पकं सफेनकलुपं सदुर्ग,स् बुवुदम् ।
उष्णसंमृत्तिकंक्षारं त्यजेदाचमने जलम् ॥२३॥
अंतरीक्षं नखस्पृष्टं भिन्नरंद्रविनिर्गतम् ।
एक हस्तापितंवारि त्यजेदाचमने द्विजः ॥२४॥
चितापर्युपितत्सूर अंत्यजः क्रममि (१) संयुतं ।
देवाभिषिक्त हेयं च त्यजेदाचमने चयः ।।२५।।
अथवाग्गिरसन्तुष्टै ततोधिः परिमार्जयेत् ।
तिर्यदंगुष्टमूलेन मुखरन्ध्र विचक्षणः ॥२६॥
इतिहासपुराणानां तुपुप्पैनिर्जियेत्पुनः ।
अथावरोह क्रमतः तथा हस्ततलेन च ॥२॥
पादयोः सत्यपाणौ च का(प्र)क्षिपेद्वि गुतुष्टये ।
नासामूलं स्पृशेत्तुष्ट्य मध्यचंगुलिभिः शितः ॥२८॥
ततः पा(प्राणस्य संत्तुष्ट्य नासिका विवरद्वयं ।
अंगुष्ठ तर्जनीभ्यांतु संस्पृशेतु द्विजोत्तमः ॥२६॥
सूर्याचन्द्रमसोः प्रीत्यैदीयों प्रीत्यै च संस्पृशेत् ।
मंगुष्ठानामिकाभ्यांतु चक्षुपी प्रवणद्वयं ॥३०॥
दोम्गुष्ठ कनिष्ठाभ्यां नाभि संप्रीतये पृशेत् ।
ब्राह्मणो हृदयंप्रीत्यै अलभेववलेन वै ॥३॥

22 • भारद्वाजस्मृतिः सवाम्गुलीभिरीशस्य मूर्धानं प्रीतये म्पृशेत् । . : अंगुष्ठाङ्गुलीभिस्तुष्ट्यं जिष्णो स्मशेदजी (?) |३२|| कर्भावसाने कर्मादो देवमाचमनं द्विजः। कुर्यात्स्वकर्मसिध्यथं सर्वदा सर्वकर्मसु ॥३३॥ ताम्रचर्माश्ववालावु नारिकेलाश्मपत्रकी। उपस्पृशेस्वहस्तस्मै रेतैरपि विचक्षणः ।।३४॥ ब्रह्मयज्ञ विशेगोस्ति किचिदाचमनक्रमे। प्रवक्ष्यते तदेतद्धि तत्कर्मफलसिद्धये ॥३शा पानत्रयं यथा पूर्व तथा द्विः परिमार्जनं ।' उपस्पृश्य शिरश्चक्षु नासिकाद्वितयं तथा ॥३६॥ श्रोत्रद्वयं च हृदयं पूर्वोक्तविधिना लभेत् । । एवमाचमनं प्रोक्त ब्रह्मयज्ञे महर्षिभिः ॥३७॥ नानपानक्षुतस्पाप होमभोजनकर्म । अध्योपमर्पणे मूत्रविदुसृष्टी द्विराचमेत् ॥३॥ जपेश्मशानाक्रमेण परिधान्येन यासिनः। चत्वाराक्रमण चेय द्विजातिदिरूप ॥३॥ विनारिभ्युममागंग यो द्वितो नित्यमाचरेत् । अनाचातः स एवस्यादगुदयितिभारितः ॥१०॥ एवमाचमनस्योक्त विधान प्रतियोदितं । पनदयं द्विजः अनुष्ठानादिमापरः ॥४१॥ । इति भारद्वाजस्मूनावाचमनविधिनाम चतुर्थाध्यायः ।।

" ''अथ पञ्चमोऽध्यायः दन्तधावनविधिवर्णनम् दन्तानां धावनविधिर्द्विजानामधुनास्य स्फुट । कद्यते (कथ्यते) मुखशुध्यथं योग्याथ सर्वकर्मणां ।। १ ।। प्रक्षाल्य चरणी हस्ती मुखंचाथ यथाविधि । आचम्य प्राङ्मुखःस्थित्वा दन्तधापनमाचरेत् ॥ २॥ एकादश्यष्टमीपष्ठि नवमी च चतुर्दशी। प्रतिपत्पौर्णमासी च काप्ठमेवामुवर्जयेत् ॥३॥ जन्मत्रयापराबार्फदिवसव्यतिपातकाः । संक्रमाविवर्जान्युबत्तथापनकर्मणीम् ॥४॥ शल्मल्येरंद्धकार्पासा पालाशाश्वद्धतिहुकाः । स्लेप्मातकशमीनिम्बधवधात्रिलिभीकाः ॥५॥ काशांग्गुलिवुशाश्चय विवर्जा दन्वायने ।। ६ ॥ अशोकमधुकप्लक्षविल्यांसोलप्रियंगयः । जंचुम्दवस्यामाफ बदरीगचंपकाः ॥७॥ शिरीपदाडिमाकानाकरयोरातिमुक्तमाः । बजी श्रीफल भांडीरभद्रदायिकताः ॥ ८ ॥ कारमरोहनीमाल पिरिविल्या पाका: । अपामार्गाधमा भानग्रहः II En' निवारशीतक क्षिरिका कोविदारिकाः ।

१००२
भारद्वाजस्मृतिः
एवे वृक्षा प्रशावास्यु क्षीरलन्यमहीरुहाम् ।
यादायनं (१) कुत्तिानो सतवं द्विजा ॥१०॥
बका विवालाः शुकामाः सरंध्राः युग्मपककाः।
विकू_होयगंधा च सकीटज्ञातपूर्यिका ॥११॥
सप्रवामा समुच्चेदा न शायोक्तामनोहरा।
त्यत्तयेग्विधाशासा द्विजैः शुद्ध विचक्षणः॥१२॥
म्मिग्धासांद्रासुबिदलाढावामातिराजिता ।
स्वकनिष्ठांग्गुलिथूगावितस्त्यायातिकाशुभाः।।१३।।
नित्य देवालये गोप्ठे श्मशाने जलमध्यगे। .
यागस्थाने शुचौदेशेनाचरेत्तधायनं ॥१४॥
शार्दूल कृष्णगोकृत्तो यज्ञवृक्षे तृगेषु च ।
उपविश्य न कुर्वीत यक्वाशुद्धिमनासनः ।।१४।।
दक्षिणामुखस्तिष्ठं शयानश्वविदिङ्मुखः।
गच्छ वाजत्यज्ञरयोभूत्वा नाचरेत्तधावनम् ॥१५॥
पतितात्यय पापंड देवजीवरजस्वलाः ।
भिपक्यातकिछंडाल न प्रक्ष्यादंतधावने ।।१।।
शुनकं विड्वराहं च गभंतप्रचूडक ।
अन्यान्नैवेद्यशापये द्विजः शुद्धविचक्षणः ॥१७॥
यावंत्तो नियमाः प्रोक्ता द्विजश्रेष्ठस्य सुजितः।।
प्रेक्ष्याप्रेक्ष्येषु कर्तव्याः समौनेन विपश्चिता ॥१८॥
कदापार्जुन कौशीरशिरीप खदिरहषु।
द्विजः शुदि यतिः कुर्यात नदाष्टांगुलिशाखया ॥१६॥

४००३ दन्तधावनविधिवर्णनम् आयुरित्यादिमंत्रोयं उक्तः शाखाभिमात्रिणे। विनाभिमंत्रिणं तूष्णी वृथास्यादन्तधावनं ॥२०॥ अस्य प्रजापति ऋषिः छंद्दोनुष्टुग्वनस्पतिः । अभिमाहृतांशाखां मंत्रेणानेन वै द्विजः । परवावं क्रमणेपदावयेन्छाकयैकया ॥२२॥ शाखांविदार्य स्थूरमध्याल्पभेदतः ॥२३॥ तस्यास्तु भागेनैकेन मार्जयेत् । वैवः संकल्पयेत्यानं ब्रामा विनियोग RAI यापोहिठाधिभिः पद्भिः तिमुभिः प्रणवस्य प। हिरण्यवर्ण इत्यादि पतुभिार ठकः परं ॥२॥ पवमानानुवान पादायुक्त विधानतः । स्थत्मानं सौरम्भिः माजरेसरितोयुः ॥३०॥ देवतेतिहृदिस्मृत्वा मंत्रारभेपदेद्युधः ।।२ ।। श्रेष्ठामभ्याः कनिष्ठास्युकल्यायग्रासकल्पने । पिप्पलाद समुत्पन्ने कृत्यये लोकभयकरि ॥२४ ॥ पापाणंत्तेमयादत्तमाहाराधं प्रकल्पितम् । विलाक्षतेः सहाशीला मा म , प्रेणानेनवारि परशा दत्तेवाधाजलिंबचा ततस्रायाधधाविधि । विद्धपर्वतान ) सायाचतुर्दश्यां महोदधौ ॥२६ ॥ साचेगोमयुता सायात्तामतिकम्म पर्वणि । प्रक्षाल्य चरणो हस्तौ प्राइमुसो वायुरम्मुरवः ॥२७ ॥ स्थित्वा यथावदाचम्म प्राणायाम समाचरेत् ।

४००४ . भारद्वाजस्मृतिः" ब्राह्मस्थानमिदं प्रोक्तं पापक्षयकर परं। " पादयोनि हृदये मूनि वक्षसि पादयोः ॥३१॥ वक्षश्यंध्योश्चमूनीति ब्राह्मो संमार्जनं क्रमः ! प्राङ्मुखः प्रयतः पादौ प्रक्षाल्यचम्य पूर्ववत् ॥३॥ प्राणानायम्य संकल्प्य भस्मस्थानं समाचरेत् ।। आदायभसितं स्वेतं अमिहोत्र समुद्भवं ।।३।। ईशानेन तु मंत्रेण शिरस्येव विनिक्षिपेत् । तत आदायतदस्म मुखेतत्पुरुषेण तु ॥२४ा.' अघोराख्येन हृदये ततस्तद्भसितं क्षिपेत् । सद्योजाताभिधानेन भस्मपातद्वये क्षिपेत् ॥२५॥ मग्गिं प्रणवेनैव मंत्रणोद्धूलयेत्ततः । एषमाग्नेयज स्नान उदितं परमर्षिभिः ॥२। प्राङ्मुसरंचरणी हस्तो प्रक्षाल्याचम्य पूर्ववत् । प्राणानायम्य संम्लय तिप्ठेद पंचसा ॥२६॥ स्वरारी भवेदाय यावत्तावत्सितिप्रमा। दिव्यं स्थानमिदं प्रोम मुनिभिः मत्वविता) पूर्वयन्सल या मंम्यान्तं द्विजोत्तमः । पामादहिः शुनौ देशे गयागमसपद्धनी Pat मरनारायणं निष्टंगाबदल्यातं पुनः । वायव्यंझामिन्यु नहानाययादिभिः nelt देवाय नहीनीर मंदपुण्यायप्रमेयने । पहावाज्याप्रमाने गुदवान गमापरत Hil .

स्नानविधिवर्णनम् ४००५ येषु देशेषु यच्छश्यं तत्कृत्या स्नानमादितः । प्रक्षाल्य चरणो हतो उपस्पृश(श्य) यथाविधि ॥३१॥ उपविश्यचु'शु) चौ देशेशिश्चला ककृशास्मृते । अपुन विधिना ललाट हृदये गले ॥३२।। सात्वाग्निहोत्रजेनेव भस्मना च प्रसन्नधीः । पंचभिर्ब्रह्मभिर्वापि कृतेन भसितेन च ॥३३॥ वामभागेस्मरेद्विष्णु कमलारूढ़पक्षसं । नानारत्नप्रभाजालस्पु(स्कु) रन्मकरकुण्डलं । सर्वाभरणसंयुक्त होमयज्ञोपवीतिनम् ॥३॥ पवित्रहस्तोध्यायितः किंचित्प्रहसिताननं । मुकनंपांचजन्यंच विभ्राणं हस्तदक्षयोः ।।३६।। विभक्त्या स्मरस्ध्यायेदीश्वरं मुरनायकं । मर्वपापविनिर्मुक्तः स याति परमागतिम् ॥३८।। र हि मानसंस्कारं भुक्मुिफिकलाई । देवमहरिभिः सेन्यं भक्यापि परपा सदा ॥४॥ एवं सप्तविध सान प्रक्षण पुरोदितम् । सात्या द्विजोत्तमः सम्यम्पयायोम्यं ममापत ४॥ पोताम्बरधरश्याम चतुर्थाई कीरीटनं ॥३४ ॥ कौमोदकी रथागं च विभ्राणं वामहस्तयोः । तिष्ठंउवासुखासीनं तदाध्यायेद्यधारचि ॥३५ ॥ इस्तानंत सर्वपा सानानामाचरेगया । द्विजःशतस्त्वशतश्चेदिममेव समाचरेत् ॥६ ॥

१००६
भारमाजस्मतिः
अग्रोक्तं सर्वमंग्राणां प्रजापतिरिपि स्मृतः ।
छंदचंदसि विज्ञयं लिंग्गोका देवता रमता ॥ना
प्रयोगकाले मंत्राणां प्रमिचंदोधिदेवताः।
विनियोगक्रमादुका तत्तम समाचरेत् ॥४३॥
अयदित्वा ऋषिच्छंदी देवतं विनियोग ।
प्रयुनफिमसून्यूमो पापिय्यान्भवतिधर्व ॥४४॥
द्विजीमिहनजनय भस्मना घ सवारिणा।
धारयेदू पुंडू च सर्वपापविशुद्धये ।
ललाटचोर्ध्वपुंडस्यात्सर्वपुण्यफलं भवेत् ॥४क्षा
॥ इति भारद्वाजस्मृतौ नानविधिवर्णनंनाम पञ्चमोध्यायः।
अथ पष्टोऽध्यायः
त्रिकालसंध्याविधानकथनम
अथ संध्यात्रयोपास्ति विधानं कथर
द्विजन्मनां परिस्पष्टं समस्ताभिष्टसिद्ध
ब्रह्मव्याकारभेदेन याभिन्ना कर्मसाक्षिणी ।
भास्वतीश्वरशक्तिः सास्संध्येत्यभिहिता बुधैः ॥२॥
तं मयूस्वकायायां निविष्टं स्वस्वविप्रह।
संचिंत्यतस्याः कुर्याद्यत् कर्मोपायस्तदुच्यते ॥३॥

४००७ त्रिकालसंध्याविधानकथनम् उत्पत्तिस्थितिसंहार स्वस्वभाव प्रभेदतः । प्रासंध्यामध्यसंध्या च सायं संध्येत्यनुक्रमात् । तेनः संध्या भवत्येवं जन्मस्थितिलयात्मिकाः ॥ ५॥ उत्पूर्वसंध्या ब्राह्मीस्यान्मध्यसंध्या तु वैष्णवी । अग्युअस्सामवेदानां रूपत्रयमिदं मतं । पारभूवारकाज्योतिराभानुदय दर्शनात् । प्रातः संध्यत्यभिहित स्वाध्यायश्चमहर्षिभिः ॥ ८ ॥ सूर्यस्यास्थमयापूर्वमारभ्यातारकोदयात् । सायंसंध्येति सामध्यमुभयोमध्यमातथा ।।६।। वतश्चात्सश्चिमा संध्या नियमेन ततोद्विजः ॥१०॥ उद्धाय पूर्व संध्यायाः कृत्वा चावस्यकादिकं । सात्तिं विधिवत्सर्व संध्याफर्म समाचरेन ॥१॥ महाधनीधुनीश्रोतः सरोमातस्तटाफरः । पालः पुष्करिणीत्यष्टौ एते च मविलाशयः ॥१॥ ... उसमयसमाचम्य प्राणायाम समाचरेत् ॥६॥ संध्या सर्वगतासाध्या एकव विविधा भवेत् ॥४ ॥ रोदित पश्चिमासंध्या चैवं संध्या त्रयं स्मृतं ।। ६ ।। तस्माद्विजस्सदा संध्या त्रितयं सर्वदा चरेत् ॥ ७ ॥ सेवेत पूर्व प्रासंध्यांमध्यसंध्यां ततस्तथा । पतेप्वकत घदेशुद्धसानेपु व हि । वास्तित्वादिजः संमामुपासीन विधानतः ॥१६ ॥ सात्वानुपहतः पादौ प्रक्षाल्य प्रामुपस्थिनः ।

४००८
भारमाजस्मृतिः
प्रणवं व्यारति: मतगायत्रि सिरमासहा ।
निः पठेदागतः पाणः प्राणायामः स उच्यते ॥११
समन्याइनि पूर्वी तो आय प्रणवाडदा ।
उपेद्वादश गायनि एकोयं प्राणसंयमः ॥१६!
अशक्तास्यात्ममुदितः प्राणायामो द्विजन्मना ।
वालस्यतरेगा तु प्रशस्तः प्रथमोदितः ॥१७॥
दक्षिणाघ्राणरंधण रेचयेत्सकर्मसु ।
प्राणायामेन वामेन सरंध्रेण च पूरयेत् ॥१८॥
प्रायशोखिलमंत्राणां ऋषिश्चंदोधिदेवताः ।
विनियोगं च संग्मृत्वा ततो मंत्राः समुचरेत् ॥१६॥
इत्येवमुक्तो विधिवम्जपः कर्मणि सूरिभिः ।
व्यक्तोपांश्शुश्च कंठोप्टैमनस्सापित्र्यंनुक्रमात् ॥२०॥
पावस्थितजनश्रोतुं य उभारः परिस्घटः ।
स्पस्यश्रोतुं परीसृष्टं उच्चारो जपकर्मणि ॥२१॥
यो सा उपांसुरित्युक्त जपयज्ञपरायणः ।
य उच्चारः सविद्वद्भिः कंठोएक इतिस्मृतः ।।२।।
मंत्राक्षराणि मनसाचिंत्तयन्नप्यथक्रमात् ।
पृथक्पृथक्तदुचारो मानसाख्य इति स्मृतः ॥२३॥
व्यक्त एकगुणसस्मादन्योदशगुणाधिका ।
कंठोप्टकरशतगुणः तत्सहस्रगुणोदिकः ।।२४।।
पुरस्थात्प्रणवोभारः मंत्राणां सर्वदा स्मृताः।
सर्वकर्मसु सर्वत्रापरेपां परमपिभिः ॥२५॥

४००६ त्रिकालसंध्याविधानकथनम् वस्य मृपित्रह्म देवता च शृतित्रयं । दन्तु देविगायत्रि विनियोगोसुसंयमे ॥२६॥ मुंबस्वमहाजनस्तपः सत्यमितीरिताः । नते दिनामविभूगुकुत्सवशिष्ठगौतमकाश्यपोग्गिराः । मुनयरसप्तव्याहृतिनां क्रमास्मृताः ॥२८॥ भूदासिगायत्र्युष्णिश्च अनुष्टु(प) हति तथा । भूरादिव्याहृतीनांन्तु मुनयो मुनिसप्तकं । पावकस्य सन्त्सूर्यवागीशोयादसांपतिः । देवता परमात्मास्याद्विनियोगोनुसंयमे । प्रगवस्यवधावर्ण शुद्धस्फटिकसंनिभः ॥३॥ वयगमुक्तमंधाणां सर्वतत्रमिति स्म। इत्येवमुकानदाप सर्म समापरे ।।३।। पक्रमेण सप्तता : महाव्याहृतय स्मृताः ॥२७ ॥ पंक्तिखिप च जगते चैव मुक्तान्यनुक्रमात् ।।२ ।। संम्मतव्यमिति प्राहुः केचित्स्वाध्यायवादिनः ॥३० ॥ विश्वामित्रो जमदनिर्भरद्वाजोथ गौतमः । देवरात्विश्य देवाश्च देवता इत्युदीरिताः ॥३ ॥ बतखामश्व सारागः पीतवर्णाश्च लोहिता । सुवर्णवर्ण इत्येते तासां वर्णाः नमानस्मताः ॥३ ॥ विवामित्र भूपिश्चंरो गायत्रि देवता मान । अत्रिभृगुः कश्यपश्च इति सहमहर्पयः ॥३ ॥ गायोशिरसो ब्रह्म मुनिश्चरस्तव ॥३४ ४०१० भारद्वाजस्मृतिः आदौ यः सर्ववेदानां उन्चार्यः प्रणवो हि सः। भूरादयोत्र कथिताः संत्तिचंदसि सप्त च ॥३७) यस्यतत्सवितुपूर्व तदंतं च प्रचोदयात् । तस्मादयं प्रकथितः मंत्रः सर्वागमेष्वपि ॥३८॥ पवित्रवत्तइत्यस्मिन् सूक्त दयुजुरागमे । नतामियंनित्यस्मिंच मंत्रस्यश्चंद्दसिस्पुटं ॥३६॥ ॐ मापो ज्योतिरित्यादि भूर्भुवः मुवरोनिति ! सर्वशतिशिरोगृह्यमेतद्गायनिया स्मृता ॥४॥ एतद्रहस्यं गायत्र्याः शिरः सप्तदशाक्षरं। परब्रह्मत्यभिहितं वेदेवाजसनिय्यके ॥४१॥ ततः संकल्पयेत्प्रातः संध्योपास्तिकरोनि यः। इति स्वचेतस्मरणं यः संकल्पस्तदुच्यते ॥४२।। आपोहिष्ठादिभिर्मः त्रिभिः संमार्जयेततः । सिंद्धद्वीपमृपिश्चंदो गायिध्यापोहि देवताः ॥१३॥ मार्जने विनियोगस्तु सूर्यश्चेति जलं पियेत् । अस्यानुवारस्य भूपिः छडो गायधमंशुमान् ॥४॥ देवता विनियोगोपापाने समुपयेशयेत् । आत्मानं प्रोशयेत्पश्चात् दधिकायुमशुभा ॥४॥ आपोहिष्ठादिनिभिः ग्भिश्य मी भंटेः । दवित्राममंत्रस्य वामदेवभूषिर्मनाः ॥४॥ घरोनुदग्विधयाः देयतापश्ययाम्मुता। ततापमम्यं ध्याइया या ममनाया Isl ।

त्रिकालसंध्याविधानकथनम् ४०१६ पश्चादुवाभ्यां हस्ताभ्यां आदायांच्युसमाहितः । """भिमुखस्तिष्प्राणव्याहृति पूर्वया ॥४८॥ गायत्रियाभिमंत्रोवं विक्षिपेद्विजसत्तमः । तत प्रदक्षिणिकृत्य प्रोक्षतेद्धिशुचिस्थले ॥४६॥ दर्भपुराग्यतत्तिष्ठन् प्रामुम्बोदर्भपाणिकः । त्रिः प्राणसंयमं कुर्यात मृप्यादीनधनंन्तरान् । गायध्यास्तु समरधाया पिच्छंदोधिदेवताः। स्मृत्वाप्रत्यक्षरं पश्चारष्ट्यादिन्रमशस्मरेल ।।५।। पशिष्टभरद्वाज गौतमभृगुशाद्विल्य रोहितग शाण्डिल्य । सातातपसनत्कुमारसत्यरायपराशरपौण्डरीर मतुदक्षकाश्यपजमदग्न्यापेंद्गिरः कार्तिकरमृगकु- भयोनिसाध्या इति । चतुर्विशति वर्गानांतदादिना रथाममं । शुपयोगीसमारुमताः स्मनंन्याः प्रथमे मनो: ॥३॥ गायशुष्मिगनुपरतिप्रियुजगनिजानितात. मार साविष्टदपरति अधर पंगिमात्यान ज्योतिष्मति प्रियुगी मरी गाविस देसी गापतित्वतानि पंतमि al पशितिरेवानि महसमाधम मोनिगायारादीनि नहाना ॥

भारद्वाजस्मृतिः अमिप्रजापतिस्सोमः यीशानस्त्यदितिहरपतिमित्रोभग अर्यमान(स)वितात्यष्टा घूपंद्रामिरामदेवोमित्राव- मणाचभ्रातरौ विश्वदेवाविष्णुर्वमांजीवः ।। कुबेर अश्विनी ग्राम ति तेषां यथाक्रमेणतेचतुर्विशति संख्यया॥ अक्षराणां तदादीनां समाख्याता हि देवताः। पृथिव्यप्तेजोवाय्याकाशागंद्धरसरूपस्पर्शवास्वस्ति- पादपाया(यू)पस्तोत्रमनश्चक्षुर्जिव्हाप्राणहकारबुद्धि गुणत्रयमित्येतानि सर्वाणितल्दानिति ॥५६॥ चतुर्विंशतिवर्णानां तदादीनां यथाक्रमं । तत्वानितानि प्रतिवर्ण पृथक् पृथक् ॥५४ा ब्राझीसभामहानित्या विपापा च सरस्वती। प्रभावतिललाकांतिः कात्तदुर्गापरानला ।।८।। विश्वरूपा विशावेशा व्यापिनी कमलापति । मोहावसूक्ष्मा हिरण्मया शांतापद्मा सचापरा शोभानागदारूपिणिति ॥ चतुर्विशतिरेतेपां अक्षराणां पृथक् पृथक् । यथाक्रम समाख्याताः शक्तयः सर्वकामदा ॥५|| सुमुखं संपुटं विस्तीणं विस्तं द्विमुखं त्रिमुखं चतुसं पंचमुर्खपणमुखादामुखव्यापकांजलिशकटयम- पाशप्रथित सुमुखोस्मुख प्रलंयमुष्टिक मीनकूर्मवराह- सिंहाक्रांत्तमहाक्रांत्तमुद्ररपल्लयमिति ॥

न्यासविधिवर्णनम् चतुर्विशत्यक्षराणो येतामुद्रा पृथक् पृथक् । था क्रमेण कधिताः शीघ्रसिद्धिप्रदायकाः ॥६॥ दो सांग्गं च कर्मात सप्तम्यंत्तमनंतरं । बनियोग इतिवदेद्विनियोगस्तदुच्यते ।।१।। पका पुप्पयस्मितं इन्द्रनीलसमप्रभ । पीटयोनि दीप्ताभं जलद्वति समप्रभं॥६२।। गन्दुशंखधयलं पांढरं शुक्रकोपहं । रक्तमदृशं भानोः उदयपुतिसन्निभं ॥६॥ रोचनप्रभावीतं नीलोत्पलदलप्रभं। दधयल वर्णातीवंतदभुदं ॥४॥ इविंशतिवर्णानां वर्णाः प्रोफा यधाम । एवंमृष्टयादिकानेतः मर्यास्मृया प्रगम्य | मम्यगुत्यकारेणन्यासत्रयमधापरेन । प्रथम तु फरन्यासं देहन्यासंततः परं ।।६।। भग्गन्यासं ततः प्रोपमेन्याम प्रर्यक्रमात । कोटा यहि.पायोः तलयोललायोः जा मलयोर्मध्यमेविप्रः प्रणव पं.वलंयसेन। प्रकोपहम्लपिन्याम समानादिनामिय: Intel मलमध्यमविन्यास परांमध्यान्मापरः । भयो गुटोस्म्य तन्ना समेत अनामिका,मंगुलीनानु पगिरि रंग। पविभानिमन्नाननिमारनामा M १ भारद्वाजस्मृतिः अंग्गुलीभिश्चतभिः सोई दयशीर्षयोः । मुष्टेरंग्गुमशिरसापश्चमेतस्ययामतः ||६|| यहिः कलाभ्यां रफालं मध्यमर्धामगुलेखिभिः । अंग्गुष्ठनर्जन्यमाभ्यां सशदंदिादिशुपाखयोः ॥1 पडंग्गन्यासमित्युक्त इदंम्मेनप्रकारतः । न्यस्यापायातु वरदत्यनुवाकेन मंडभानोरावाहये- देवीसंध्यांगायर्त्यतया। चामुदेवऋषिश्चंदीनुष्टुस्सा- वित्रि देवता ।।६॥ आवाहने विनियोगः देव्या अस्यायथाक्रमं । अविचाबाहयेदेवी हृदयांभोरुहे द्विजः ॥६६।। ध्यात्वाध्येयं यथाप्रोक्त मूर्तिध्यानं तथैव हि । द्यात्वोपचाराः सकलास्कृत्याधजपसमाचरेत् ।।६जा अष्टोत्तरसहस्रवाहटोत्तरशतं तु वा। जप्तप्ट्य्वा विंशतिं वापि वीजशक्तिक्रमा(जपेत् ।।६८) पूर्वाण्डं च चतुर्थाण्डं वीजमस्या इति स्मृतं। चतुर्विंशाद्यक्षरांतं सदीध शक्तिरुच्यते IMELI जपेदष्टोत्तरशतं अष्टाविंशतिरेफला । एतयोः पूर्वमुनिभिः आख्यातः शक्तिबीजयोः ॥१००ll अंगुलिभिस्तुरेखाभिः अधवा जपमालया। जपस्यसंख्या विज्ञया जपकृद्धिद्विजोत्तमैः ।।१०।। वृथाभवेत्कृतो विप्रैः संख्याज्ञानं विनाजपः। ..पनि अवश्य जपकर्मणि ।।१०२॥

उपविधानधनम अपम्पकस्यैकमणि नवेदनमृति प्रमान । प्रामगुप्टेनमकलानिनशुलः महा ll अपवियरोनमः मुक्नरशः मम । गोरवादी भूमिः प्रलपनाउपादित १.it नेप्टेयभा शोधनिद्वारमनना मद । तिनधान्यजाटोमाटगने अपण ॥ पंनिविप्रः मूगांदीनदोस्त। पायायवशेष प्राणा मंगपा उपेन l वोपधारा मध्यम गुदयः प्रोकना मुनिमिrfantil सम्पमियानन म मादिननगममा सुग्मं REPानामा . 'मागुम्मा ignism भिमोर मनमा । mafefuita com aplanidismu. सोनाममा ब.nfirit.in Sitamarati Taggul. unintent मरांग enterinemattre . 4 १८ भारद्वाजस्मृतिः इत्युक्त्वानेनगायत्रि अनुवाकेन वै द्विजः। उदास्याधनमस्कुचितुः संध्यादि देवताः ॥११४|| संध्यापुरस्ताद्गायत्रि सावित्रि च सरस्वती। एतत्संध्यादयः प्रोक्ताः चतसोदेवताः क्रमात् ॥११॥ स्वस्वनाम चतुभ्यंत्तं प्रणवादि नमोत्तक। मंत्रमासामिह प्रोक्तं प्रणमेत्स्वस्वमंत्रतः ॥११६।। केचित्तु मुनयः प्राहुः प्रतिमंत्रं प्रदक्षिणं । कुर्वन्प्रणामं कुर्वीत ताभ्याः भक्तितो द्विजा ॥११७॥ मित्रस्येत्यादिभिग्भिः विस्पष्टोदित मंडलं । आदित्यंतिसृभिर्देव उपतिष्ठेदधद्विजः ॥११८॥ असामृपिविश्वामित्रः देवता वै दिवाकरः। भूमिगायत्र्यमाचस्पत्रिष्टुभाविदपश्चिमी ॥११६।। इत्येवमुकोपस्थाय ततस्थमभिवादयेत् । अभिवादनमंत्रेण सद्भपया लोम्साक्षिणं ॥१२०॥ सगोत्रनामशमाहं भी पादेरभिवादयेत् । इत्येवं भापमाणेयं मंत्रम भिवादने ॥१२१॥ सोध्यो देवताभ्यश्चन्येनत्प्रणव संयुतं । उत्तानमोनमयिनि प्रणमेत्सर्व देवताः ।।१२।। कामो कापिन्मनपुरका पिदत्येतटावमंत्रान् । उका प्रदक्षिणे नेर नमर्यायित ।।१२।। प्राची प दक्षिगाचाच प्रतीचीचोत्तरो। अपराचामरिधर पता: मतादिनादिराः ||

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४०२०
भारद्वाजस्मृतिः
अन्यत्सवं यथापूर्व कर्मकुर्याद्विजोत्तमः ।
एवं मध्याहसंध्यायां विशेषविधीरितिः ।।१३।।
अथ पश्चिम संध्यायां विशेषोत्र विधीयते ।
सितेरवाउपत्रम्य पश्चिमं तु समाप्नुयात् ॥१३६।।
अनिश्चेत्यनुवाकश्च मुनिः सूर्योहुताशनः ।
देवता गायत्रं छंदः पानेपांविनियोगकः ।।१३७।।
एतत्प्रत्यङ्मुखस्थित्या स्मृत्यात्त्वानेनपिवेत् ।
उपासने विशेषोयं उपस्थानेथ यक्ष्यते ।।१३८।।
याचिद्धित्यादिपंचर्चाल देवराज इति स्मृतः।
गायत्रित्रिष्टुन्जगति गायत्रित्रिष्टुभित्यपि
यथाक्रमेनाच्छंदांसि वरुणाश्चाधिदेवता ॥१३॥
उपस्भाने विनियोगयित्युक्तातं च पंचभिः।
वरुणं समुपस्थाय कुर्यादन्यदापुरं ॥१४०॥
प्रयोगकाले मंत्राणि ऋपिच्छंदांसि दैवतं ।
विनियोगं शक्तिवीजे स्मरेनोवृथाफलं ॥१४१।।
इदं समस्तं मृतिभिः गायविद्युदाहृता ।
विधिनैवाभ्यसेवायत्तुरिय्यं परमं पदं ॥१४२।।
ॐ भूदित्यादित्रिमत्रैः प्रागायर्त्यनंतरं ।
तस्यां प्रथमपानेन भूर्भुवः सर्जगद्र्यं ।।१४३।।
प्याप्यं द्वितिय्यपादेन वेदानां त्रितया तथा।
त्रितिय्येन तु पादेन प्राणंच्यानं समानकं ॥१४४॥

गायत्रिनिर्वचनम् ४०२१ व्याप्त चतुर्थपादेन परमं रविमण्डलं । क्रमाणानेन संक्रांतं ययाव्यातमिदं जगत् ॥१४४॥ गायनि सर्व देवानां माताः साक्षाद्विजाश्रयाः । तामेव प्रजपेद्भत्याध्यायेच सततं द्विजः ॥१४५।। दुष्पतिग्रह भुक्त्याहं उपाभ्यो निशं द्विजः । गायतं त्रायते यस्मात् गायत्रीति स्मृता बुधैः ।।१४६।। पाणागाधाइति प्रोक्ताः त्रायतेतानधापि वा। गायत्रीतिभवेन्नाम केवलं त्रायतीति वा ॥१४॥ आरोपप्राणि जिलासु सदावापूपवर्मनात् । परस्वतीतिनानोयं समाख्याता महर्षिभिः ।।१४८॥ सवित प्रकाशकरणात्सावित्रीतिसृता दुवैः । जगतः प्रसवतीति हेतुनानेन वा भवेत् ||१४६॥ तस्मादियं सदीपाश्या निशादिवसयोर्द्विजैः । गायत्रिसनन्निवेलायनैव संध्येति कीर्तिताः ॥१०॥ यो जपेद्वजसंज्ञात्वा नश्यत्यहसि तरक्षणात् । भूपिच्छंहो देवताश्च जपेत्तास्ता यथाक्रमात् ॥११॥ 'शात्यायोपास्तिमाचरेत्' शाखा पदानि जित्वा धमदिव्यं पादमन्ययम्। बाह्मणो याति तत्साम्यं पदं ज्ञात्वा नुरिप्यकम् ॥१५॥ यासायत्रिचरणा सात्रिमूर्तिस्वरूपिणि । उपास्यानारतप्रैः त्रिसंध्यासु त्रिमूर्तिपु ।।१५।।

४०२० भारद्वाजस्मृतिः अन्यत्सवं यथापूर्व कमकुर्याद्विजोत्तमः । एवं मध्याह्न संध्यायां विशेषविधीरितिः॥१३॥ अथ पश्चिम संध्यायां विशेगोत्र विधीयते । सितेरवाउपक्रम्य पश्चिमं तु समाप्नुयात् ॥१३६॥ अग्निश्चेत्यनुवाकश्च मुनिः सूर्योहुताशनः । देवता गायत्रं छंदः पानेपाविनियोगकः ॥१३७॥ एतत्प्रत्यङ्मुखस्थित्या स्मृत्वात्त्यानेनपिवेत् । उपासने विशेपोयं उपस्थानेथ पश्यते ॥१३८॥ याभिद्धित्यादिपंचाल देवराज इति स्मृतः । गायत्रिविष्टुम्लगति गायनित्रिभित्यपि यथारमेनाचंहासि वरुणाश्चाधिदेवता ॥१३६॥ उपसाने विनियोगायत्युकानं प पंचभिः । यानं समुपस्थाय कुर्यादन्यदापुरं ॥१४०।। प्रयोगकाले मंत्राणि भूपिच्छदासि देव । विनियोगं शश्नियीजे स्मरेमाचंथाफल ।।१४१॥ हं ममान गतिभिः गायपिंगुवाहना। विपिनयाध्यसेवायतनुरियं परमं पर ।।१४।। * भूदिल्यादिधिमत्रः प्रागायत्यनंतर । नम्या प्रथमपान भूयः मभंगपूय ॥१४॥ যে বিধান বানা ঝিনথা শখা चिनियन तु पाईन पाण्यानं ममान ॥१४॥ ..

४०२१ गायत्रिनिर्वचनम् ज्याप्त चतुर्थपादेन परमं रविमण्डलं । प्रमाणानेन संक्रांतं ययाव्यातमिदं जगत् ॥१४४।। वामेव प्रजपेद्भपयाध्यायेच सततं द्विजः ॥१४॥ पाणागाधाइति प्रोक्ताः वायतेतानधापि वा। गायत्रीतिभवेन्नाम केवलं त्रायतीति वा ॥१४॥ आशेपप्राणि जिज्ञासु सदावायूपवर्त्मनात् । वगतः प्रसवतीति हेतुनानेन वा भवेत् ।।१४६।। पत्रिसनन्निवेलायनैव संध्येति कीर्तिताः ॥१५८।। जपेद्वजसंज्ञात्वा नश्यत्यहंसि तत्क्षणात् । वायोपास्तिमाचरेत्' या पदानि जित्वा धमदिव्यं पादमव्ययम् । नणो याति तत्साम्यं पदं ज्ञात्वा तुरिय्यकम् ॥१५॥ गयत्रिचरणा सात्रिमूर्तिस्वरूपिणि । यानारतंप्रैः त्रिसंध्यासु त्रिमूर्तिः ॥१३॥ गायत्रि सर्व देवानां माताः साक्षाद्विजाश्रयाः । दुष्पतिमह भुक्त्याहं उपाभ्यो निशं द्विजः । गायतं त्रायते यस्मात् गायत्रीति स्मृता बुधैः ।।१४६ ।। परस्वतीतिनानोयं समाख्याता महर्षिभिः ॥१४८ ॥ भावित प्रकाशकरणात्सावित्रीतिसूता बुधैः । स्मादियं सदोपाश्या निशादिवसयोर्द्विजैः । पिच्छंदो देवताश्च जपेत्तास्ता यथाक्रमान् ॥२५ ॥

भारद्वाजस्मृतिः तुरिय्यपादमेतस्या ज्ञात्या यो पास्तिमाचरेत् । सरत्नपूर्ण पृथिवी गृहान्नो दोपमाप्नुयात् ॥१५४|| ब्रह्मकेशवरुद्रादि देवताभिरुपाशिताम् । संयत्तिाकोन सेवेत विप्रः सदभिलापकः ।।१५।। प्रातः सतारका संध्यां सायं संध्या सभास्कराम्। स्नानकर्मणितन्मध्यां उपासीत यथाविधि ॥१५६।। प्रारेयमुपासित्वा प्रात्कुर्याद्भवनं जपं। स्नानस्यानंतरं कुर्यात्तर्पणंच्च महाक्रमान् ॥१७॥ सायं संध्या तथोपास्य होमं कुर्वीत वासनं । संध्योपासनहीनो यः न योग्यः सर्मकर्म सु॥१८॥ तस्मादुपास्यविधिना संध्यामन्यक्रिया चरेत् । नोपासयो द्विजस्संध्याविनाशूद्रत्वमाप्नुयात् ॥१५६।। कर्माण्यान्यानि संत्यत्य संभ्या वा केवल द्विजाः । उपास्ये सर्वपुण्यानि न्याः सभवेदलं ॥१६॥ संध्योपास्ति विना विप्रः पुण्यन्यम्यासिपापरेन् । यस्तस्यतानि पापानि भवत्येव न संशयः।।११।। नाशये अनितंपाप दशजन्मातमात्मनः। पुरानं शतजपात् गायत्र्याख्यं विजन्मनः ॥१५शा मृतयुगेपिकस्मिन् सहयण जपन तु । वपन्या अपतस्तस्मादायत्रिं मर्वदा उपन् ॥१६॥ ममतमानतंतुभ्यः उपयधः परस्मृतः । हिंसयान्यव प्रयत्नवे उपयोग हिंसा Rm सनम THE LEARN सनानिमिय। गंना नियमानामिनादन। wal frTRA भरमुनिष शानि ॥१६॥ HTTशिपमः । माRificer वो मीनितः ॥१६॥ दामाजियोनिपाति ममापन् । ममता विमानन ॥१६॥ नई समान पायाभूतमला। वापनियोनिरामोदय न संशयः ।।१६।। गंधा मिनाममा यो प्राभ्यापर्व विजः । अगरी पदापय भोता काप्रमानसः ॥१७ म सर्वपापग्निा: मपिया विशारदः । नधान्यधनीपतः अपापशन मुनि ॥१७॥ परिधान मम्लं यां वदासिलदायित् । म योमयदयदाना पारगोपिन यंदायित् ।।१७२।। आप पूर्वउनने मायिन्यास संततिः ॥१३॥ यो धादिममध्यायं मद्भक्त्या सगोचमः । मनानु निर्मलं तस्य भयंदस्य न संशयः ॥१७४) सविद्वानं योधित्य भाषद्ब्रह्मणोचमान् । ; निएवंप्रयत्लेन माह्मणो नियमेन च ॥१७॥ मरच्या पदसमक्षा संविधिदारयिनु यो मूल प्रमसंततिः ।

४०२४
भारद्वाजस्मृतिः
अज्ञानेन प्रमादेन शृतचिन्नान्य संततिः।
(दुयत्समुदित)तस्य तत्सकलं नाशं ब्रजेत्तवन संशयः ।
या संध्योपास्तिविच्छंत्ति यस्यस्थानविहीनता।
पर्वणि श्रवणादन्यत्र तत्सर्व पूर्णतां भवेत् ।।१७७।।
कामवान्मोहयाल्लाभात्संध्यांनातिक्रमेद्विजः।
संध्यातिक्रमणद्विजः ब्राह्मण्यात्वततेयतः ॥१८॥
अनागतांतु ये पूर्वी अनिधीतो तु पश्चिमा ।
संध्यांनोपासते ये तु कथंते ब्राह्मणा स्मृताः ॥१७६।।
सायं प्रातः सदासंध्यां विनादिप्राउपासते।
काम तो स्वधिरोराजा शूद्रकर्मसु योजयेत् ॥१८०।।
विधानमेतन्नोदेयं रहस्यं यस्यकस्यचित ।
वेदाध्यायाभिजाताय प्रदेयं स द्विजन्मने ।।१८१॥
।। इति श्रीभारद्वाजस्मृती जपविधानवर्णननाम पद्योध्यायः ।।
अथ सप्तमोऽध्यायः
जपमालाया:विधानमथनम
महनापरमा नित्या शतमा दशायरा।
ना माधिधि जटिद्वान् प्रामुम्मः प्रयतम्धिनः ॥१॥
जापनिप्टेनादित्यं उदयन ममाहितः ।
मंत्रन्तु विविधामोरे झुम्पनुः मामसंभो ॥२॥

उपसागपा.विधानसनम मार महापार। निभूमी नगनिनेपा ॥ ३ ॥ पराम निपानामा मारि ॥ ४ ॥ संभापानगर जिपंत जपमालया। समारामनिसागानि तनाविधिः ॥ ७॥ समासापिरोपप फयत पवथामर्म। अपत्यजीवागायारमणिमौधिकाः॥८॥ मगंजपोजगाग्गेय पुशरद्राक्षसंमिका । सते उपमालायां मणिकयुदीरिताः ॥ ६॥ एसम्माधिमकपलेनाभिहिता अमी। अंगुलीभिः एनजपः शियातायानिति स्मृनः ।।१०|| रेकाभिरकोटात: किम्नुपिनदश ? । सिरकगुर्ण तपटकाक्षिश्चविभ्रमैः ॥११॥ के मद्दयमणिभिः पकोदशसहस्रकः। भयुक्तापरेका कोटिरेकोजयीजः ॥१२|| मेरेफादराकोटि शतकोटिस्तथा कुशः। वनंतमेकोरुद्राक्षेः एषमुक्कं फलं क्रमान ॥१३॥ समपनि प्रमापि । निरमाया : प्रपामामिपाकर्म ।। सो विपर : यो अपमालया । दम्माम प्रचन्नपभाटा यथाविधि ।।।

. भारद्वाजम्मतिः मनिभिमानमाला समाविशति संय। निरामय गुमणिभिः जपमालामनंदितः ॥१४॥ पंपाशम्सनसंख्या:माला यगुगनरपंचारामणिभित पमालिका। विषमादिगु क्षुद्रम्मम्मभिहिना युगः ॥१३॥ अष्टोत्तरशतं मालामणिभियां विनिर्मिता। मर्याभिप्टेक फलदा सदाजपनामलं ॥१६॥ एवं संस्न्यापलं प्रोक्त मणिनातु यथाक्रम। अधोच्यनंगुल फलं अंगुष्टादि यथाक्रमं ॥१७॥ अपोमोक्ष प्रदग्गुिष्ठः मध्यायुः प्रद्भिदाः । समस्ताभी फलदा नामिकामरणादिपु ॥१८॥ क्षुद्रकर्मसुसर्वेषु तर्जनि तत्फलप्रदा । अंग्गुलिनां फलं सम्यक्रमेणोक्त पृथक् पृथक् ॥१६॥ अथोच्यते मणीनां तु लक्षणं साध्वसाधु च । न ग्यास्मिग्धाः दृढ़ाः पक्काः गुरुवो ऋजुरंध्रकाः ||२०॥ न्यायागताये मणयः ते शुभाजप कर्मणि । पाकनापिप्पुरुपा खंडाः स्फटिकाश्च सकीटकाः ॥२१॥ अतिसूक्ष्मा अतिस्थूलाः अपकावरंध्रकाः। अन्यायेनागताः पूर्व पूर्वोक्ता जपकर्मणि ॥२२॥ हताश्चयेतें मणयः न प्रायजपकर्मणि ।। रुद्राक्षी पुत्रजीवाख्याः पद्मवीजेध्वमीगुणाः ॥२३॥ .

जमारारिभानपनम मुशायमा ARRE: गुभाः । PIRECmic गनुपाहिला मिpिenनिभा II समजाविमुग्गामा माटिका : २६ विगानिमा गाउमानाः । पिता मशरिपरीभनाः ।।२बा निटादारलिा: एनमन्मनगम्मताः । रिझायगंभुपंगाम गापन फीलकाः ॥२८|| म धिता दोग: मसाविशारदः । अंग्ग्लयामारः भानपुरमंनिभः सामणिपदाकारी पालयमस्ययनयन् । संपनुविधा विरग्री संतनि यिनाशन ॥३०॥ शंगममाम्मकारामरिणुप्रमोपमः । आयनोंदिपसारायं मदायिभ्रमझारफः ॥३१॥ गोधूमपूर्ण महशः व्याप्यरल समनतः । आम्लतनुपर्मशाय सर्वदांग्गाशप्रयः ||३२|| प्रामास्यः स्फटिकप्रख्यः शुरुत्यभ्यनमयसमः। प्रामस्नु विप्रकारोयं प्रास संजननः मदा ।।३३।। रविरश्मि समाफारा मूत्रपात्त पराकृति। पनपातपदाकारा त्रिधारेसादिकधा ॥३क्षा मनिवारनामा : अनिता सरल मुरमांकृयातिपमान ।

४०२८ भारद्वाजस्मृतिः कौशिका कृष्णलोहभाकृष्णंभ्रक समाकृतिः । शिखिपिञ्चवदाकारा त्रिधैतदसुनाशकृत् ।।३।। कीलकंकीलवकीलवतिष्टेत् सत्वधाहृदयत्तिकृत् । एवं रत्नेषु दोपाणां लक्षणं समुदाहृतम् ॥३६॥ भल्लेक्षणानिरत्नानि ग्राह्यण्यानि वर्जयेत् । गोमेधकः पुष्परागवैडूर्यः शतरुज्मणिः ॥३७|| एतेचस्फटिकाप्रख्याः स्फाले स्फटिकजातयः । जपमालाकृताचैव मणीनालोक्य शोभनाम् ।।३८।। जपांग्गुलिसमग्थूलमरथूलान् संगृपिय्याद्विजोत्तमः । यज्ञोपवीतविधिना शुल्वं कृत्वा विधानतः ॥३६॥ मणिनेकमुखाः सर्वास्फुटयेद्गात्र पंक्तिवत् । रुद्राक्षस्योन्नतस्थानरंधस्यात्समुदाहृतं । पृष्टनिम्नस्थलंरंधं संयुनं च शलाकया ॥४०॥ पद्मवीजस्यवदनंविंद्वय समन्वितं । नेकविंदुस्थलं पृष्ट विशालतस्य च स्मृतं ॥४॥ पृष्टास्ये पुत्रजीयस्य रुद्राक्षस्य यथापुरा। ज्ञात्वैतं प्रोत्सनच्छुलपस्वष्ट संख्यामणिन्छुपान् ।।४२।। प्रन्धियश्पृधकर्यामणीनामंतरे युधः । म्यो प्रोत्यसीमा प्रथिदद्यायथाशुभं ॥४३॥ रुद्राक्षादिविवीजाना एवंमालाकतिक्रमः। मणिनामिनरपा नु मुखभेदोन विगते ॥४ ।

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भारद्वाजस्मृतिः
परिम्तीथितन्मध्ये ततः कूचं विनिक्षिपेत् ।
ततः प्रक्षाल्यचरणायाचम्य च यथाविधि ॥५६॥
उदरमुरः प्रसन्नः सन् उपविश्य कुशासने ।
प्राणानां संयम कृत्या प्रतिष्ठा जपत्रः ॥
ततः पुराणाह संकल्पं द्विजन्मानुन्नया चरेत् ।
ततोवियुक्त मार्गेण कुर्यात्सुम्येहवाचनं ॥८॥
प्रक्षालयेततोमाला पुण्याहं कलशोदकः।
ततोभिपेचयेत्पंगत्र्यैदिक्षुरसेन च ॥५६||
मधुना कुशतोयेन स्नाप्य संस्कृत्य बुद्धिमान् ।
गोमूत्रं गोमयंक्षीरं दधिसर्पिप्यमानि च ॥६॥
पंचगव्यानिमुनयः प्रवदंति मनीपिणः ।
प्रिहिद्रोणेन कृत्वाधमंडलं चतुरश्रकं ॥६॥
तन्मध्ये पद्यमालिख्य साष्टपत्रं सकणिक ।
पूर्ववन्मंडलंदर्भः परिस्तिर्याथमध्यमे ॥६२॥
कुशकुर्च क्षिपेधीमान् प्रागपंचोदगप्रकं ।
लोहितः सदृढ़स्मिग्यः प्रस्थतोय प्रमाणकः ॥६३।।
कलशः पंचगब्यादि द्रयाणां समुदाहृताः।
असिता लोहितापीता धवला कपिला क्रमात् ।।६४॥
गोमूत्रगोमयक्षीर दध्याज्यानामिह स्मृताः।
ख स्ववर्णयुतालाभे लब्धगव्यानि वा हरेत् ॥६५॥
तत्रापि दोपदुप्पोनि परित्यक्त्वा शुभानि चेत् ।
आहारपशजीर्णाया रोगार्गक्षिणवत्सका ॥६६॥

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'०३२ भारद्वाजस्मृतिः एतद्रव्यैस्तुविधिवत नापयेदक्षमालिका। द्रव्याभिमंत्रिणे मंत्रं प्रणवस्यमुदाहृतः ।।७।। अष्टोत्तरशतरूपं मंत्रावृत्तिरुदीरिता। कलशानां समस्तानामभिमंत्रविदोबुधैः ।।६।। आपोहिष्टादिभिभत्रैः स्त्रीभिः प्राङमाजयेवुधः । हिरण्यवर्णइत्याद्वैः चतुर्भिस्तदनंतरं ।।८०॥ पावमानानुपाकेन ततः सकुशवादिभिः । प्राणवाष्टशतेनाभिमंत्रितेनाभसा ततः ॥८॥ स कूर्चाक्षतवलयमभिपिंचेद्विजोत्तमः । गायाप्टशतेनाभिमंत्रे तेनभिसा ततः ।।८।। अभिपिचेत्तु सद्गंध फूर्चेन च जपस । होमपाथवादो मृण्मयेतदनंतरं ॥८॥ आलिप्यं चंदनेनाथ पद्मपुप्पाणि लिखेन । प्रणवं पंकजेध्यायेतत्पादं कणिकांतरे ॥४॥ मदिनुः शदिवे वरेण्यं पन्हिविग्दले। भर्गोयमककुत्पये देवस्यनेतेदले ।।८।। प्रत्यग्दले धीमही च धिनः पावनादिग्दले । धियस्सोमदिग्दले कुद्रदिग्दलेन प्रचोदयात् ॥८६॥ मयंत्रवंहदाध्यायन् पनपीठ प्रकल्प्य प। ततस्तत्पमापीठस्य मध्यतत्कणिकोपरे ।जी बुरावं यथा पूर्व प्रक्षिपत्रिसत्तमः। तन्मधेनववस्त्रग शुक्टेन अपमारिका kal

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भारद्वाजस्मृतिः
भ्रामयित्वा पुनर्वश्नमारभ्य च जपेत्पुनः।
अयमेवसमारूपातः जपमाला विधिक्रमः ॥१०॥
एकादिपंचपयंत्तं कनिष्टादयगुलिकमात् ।
संफोदयेत्ततोविद्वान्यधापूर्व प्रसारयेत् ॥१०॥
अनेन जपसंख्यास्यात्रमेणव उपस्य तु ।
एकः स संख्या वामहस्ते दक्षिणेन तथाक्रमात ॥२८२।।
तत्रापि दशसंख्याया शतसंख्येति च स्मृतः ।
जपाग्गुलिकमेणोक्तो लेखाक्रममघोच्यते ॥१०३॥
मध्यांग्गुले ध्यरेखां समारभ्य प्रदक्षिणं ।
अनामिकांतरेखांतं अंग्गुष्ठेन यथाक्रमं ।।१०।।
स्पृष्ट्वा द्वादशसंख्यानानवारेण तत्पुनः ।
एवं रेखाक्रमजपः प्रस्पष्टः "प्रकाशितः॥१०॥
एतत्समस्तं विज्ञाय यो जपेद्विजसत्तमः ।
सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥१०६॥
इहलोके सुखी भूत्वा प्राप्नुयात्परमं पदम् ।
प्रणवव्याहृतिः सप्तगायत्रि वैदिकान्मनून ॥१७॥
विनानन्यान्जपेन्मात्राननयाजपमालया।
गुर्वलामे स्वयंवापि प्रतिष्टाप्यजपस्रजं ॥१०८॥
अनेनविधिना विप्रा जपेदक्षस्रजातया।
वामनेनस्पृशेन्मालां करेण ब्राझण कचित् ॥१०॥
2 करेकंठेथवास्कन्धे धारयेन्नकदाचन ।
जपसजावयानित्य जपकाने जपः शुचिः ॥११॥

जपमालाया प्रतिष्ठाविधिवर्णनम्
कलीत्वैवायशुचिनाने द्विजन्मात्र विनिक्षिपेत् ।
अम्याक्षमालयैतानि मंत्राणि च जपेद्बुधः॥१११।।
नान्येषामन्यमंत्राणां जपकर्माथमर्पयेत् ।
श्लेप्मरक्तसुरामांस पिण्मूत्रोचिष्टकिकसैः ।।११।।
कपालनसकेशैश्च पतितैरत्यरपि ।
उदक्याकाकपिटकोढ़सरपादायुथश्वभिः ॥११३।।
शाखारंडकदोपज्ञ देवाजवमहाहिभिः।
जपमाला यदिस्पृष्टा ता तथैव परित्यजेत् ॥११४||
अज्ञातपूर्वगणिका पंचवीसूतिकारुचिः।
याताभिरपि संस्पतिष्ठां त्यजेदक्षस्यजं धुधः ।।११।।
तयैवाक्षनजानित्या जपेत्सर्वार्थसिद्धये ।
दोपदुष्टाक्षमालात्तं महानद्यां हृदेथवा ।।११६॥
पुण्यतीथवा विप्रो मंत्रणव प्रचिक्षिपेत् ।
समुद्रं गच्छवाहेति मंत्रमेतदुदीरयत् ॥११॥
गंधपुष्पाचितैः साधं मालामंत्रेण निक्षिपेत् ।
रुद्राक्ष पुत्रजीवाज बीजर्भ जपस्रज ॥११८॥
दुःसृष्टि दोपविझेयो न तु राजपसजे।
पुनरेवं विधानेन संवाघाक्षसजस्ततः ॥११६॥
यदिच्छेदोप संस्पृष्टि भवेद्रनजपखज।
पुनरेवं प्रतिष्ठाप्य जपेदक्षप्रजातया ॥१२al
प्रतिष्टा कीर्चन्नाध्यायः ममारन्यानो अपसवः।
न यस्य
केन्मने ॥१२॥

०३४
भारद्वाजस्मृतिः
भ्रामयित्या पुनर्वषत्रमारभ्य च जपेत्पुनः।
अयमेवसमारुपातः जपमाला विधिक्रमः ॥१०॥
एकादिपंचपयंत्तं कनिष्ठाव घगुलिकमात् ।
संफोदयेत्ततोविद्वान्यथापूर्व प्रसारयेत् ॥१०॥
अनेन जपसंख्यास्यान मेणेय जपत्य तु ।
एकः स संख्या वामहस्ते दक्षिणेन तथाक्रमात ॥१८२॥
तत्रापि दशसंख्याया शतसंख्येति च स्मृतः ।
जपांग्गुलिकमेणोक्तो लेखाक्रममधोच्यते ॥१०३॥
मध्यांग्गुलेमध्यरेखां समारभ्य प्रदक्षिणं ।
अनामिकांतरेखांत्तं अंग्गुप्ठेन यथाक्रमं ॥१०४॥
स्पृष्ट्वा द्वादशसंख्याना:नवारेण तत्पुनः ।
एवं रेखाक्रमजपः प्रसष्टः"प्रकाशितः ॥१०॥
एतत्समस्तं विज्ञाय यो जपेद्विजसत्तमः।
सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥१०६॥
इहलोके सुखी भूत्वा प्राप्नुयात्परमं पदम् ।
प्रणवव्याहृतिः सप्तगायत्रि वैदिकान्मनून् ॥१७॥
विनानन्यान्जपेन्मात्राननयाजपमालया।
गुर्वलाभे स्वयंवापि प्रतिष्टाप्यजपस्रजं ॥१०॥
अनेनविधिना विप्रा जपेदक्षस्रजातया।.
वामनेनस्पृशेन्मालां करेण ब्राह्मण कचित् ॥१०६॥
करेकंठेथवास्कन्धे धारयेन्नकदाचन ।
जपनजातयानित्य उपकाले जपः शुचिः ॥११॥

जपमालाया प्रतिष्ठाविधिवर्णनम् कटीत्वैवायशुचिनाने द्विजन्मात्र विनिक्षिपेत् । अम्याक्षमाल्यैतानि मंत्राणि च जपेद्बुधः।।११।। नान्येपामन्यमंत्राणां जपकर्माधमर्पयेत् । श्लेष्मरचमुरामांस विण्मूबोचिष्टकिकसैः।।११।। कपालनखकेशैश्च पतितरंत्यजैरपि । उदक्याकाकविटकोढ़खरपादायुधश्वभिः ।।११३।। शाखारंडकदोपज्ञ देवाजवमहाहिभिः । जपमाला यदिस्पृष्टा तां तथैव परित्यजेत् ॥११४॥ अज्ञातपूर्वगणिका पंचवीसूतिकारुचिः । याताभिरपि संस्पतिष्ठां त्यजेदक्षत्यजं बुधः।।११।। तयैवाक्षनृजानित्या जपेत्सर्वार्थसिद्धये । दोपदुष्टाक्षमालांत्तं महानद्या हृदेवया ।।११६।। पुण्यतीर्थथवा विप्रो मंत्रणेय प्रचिक्षिपेत् । समुद्रं गच्छवाहेति मंत्रमेतदुदीरयत् ॥११७॥ गंधपुष्पार्चितैः साधं मालामंत्रेण निक्षिपेत् । रुद्राक्ष पुत्रजीवाज्ज वीजदर्भ जपखज ॥११८॥ दुःसृष्टि दोपविज्ञेयो न तु राजपस्रजे। पुनरेवं विधानेन संवाद्याक्षसजस्ततः ॥११६ : यदिञ्चेद्दोप संस्पृष्टि भवेद्रजपनज। पुनरेवं प्रतिष्ठाप्य : प्रतिष्ठा कीर्चन्नाभ्यायः न यस्य ०३४ भारद्वाजस्मृतिः भ्रामयित्वा पुनर्वस्त्रमारभ्य च जपेत्पुनः। अयमेवसमाख्यातः जपमाला विधिक्रमः ॥१०॥ एकादिपंचपयंत्तं कनिष्टाद्वयगुलिकमात् । संकोदयेत्ततोविद्वान्यथापूर्व प्रसारयेत् ॥१०॥ अनेन जपसंख्यास्यात्न मेणैव जपस्य तु । एक: स संख्या वामहस्ते दक्षिणेन तथाक्रमात् ॥१२॥ तत्रापि दशसंख्याया शतसंख्येति च स्मृतः । जांगुलिकमेणोक्तो लेखाकममधोच्यते ॥१०॥ मध्याम्गुलमध्यरेखां समारभ्य प्रदक्षिणं । अनामिकतिरेसत्तिं अंग्गुष्देन यथाप्रमं ॥१०॥ स्पृष्टा द्वादशसंख्यानानवारेण तत्पुनः । एवं रेखामजपः प्रस्पष्टः “प्रकाशितः॥१०॥ एतत्समस्तं विज्ञाय यो जपेद्विजसत्तमः। सर्वपापरिनिर्मुक्तः सन्किामानयाप्नुयात ॥१०॥ पहलोक मुखी भूत्या प्राप्नुयात्परमं पदम् । प्रणवत्र्याइतिः मानगायत्रि वैदिकान्मनून ॥१७॥ विनानन्यान्बपेन्मात्राननयाजपमालया। गुलाम म्पयंयापि प्रनिष्टाप्यजपथ ॥१८॥ थनेविधिना विमा संरक्षसजावया । वामनेनरोन्माला कोण प्रापगचित् ॥१८ करेक्टेयवारम्वधारयनमापन। चायनानयानित्य पhिati जपविधानवर्णनम् ४०३७ अन्वेपणमंगुल्या मुखवास प्रपूरणं । शिरः कंठे प्रावरणं वाससादोः प्रसारणं ॥६॥ शिरः प्रच्छादनं शिल्पकरणं चोपचर्वणं । सूक्ष्मजंतु पहननं मालाधानं तथैव च ॥ ७ ॥ क्रोधनं दुफियाध्यानं कर्माण्यस्यदपिदृशं । भर्वति कर्माध्येतानि जप नाशकराणि च ॥ ८॥ पापम्पापोरूपाप जनाभूतिसुरार्चका । एपानिशामनंचैक भापणं जपनाशकृत् ॥६॥ भवंत्ति कर्माण्येतानि यदिचेतु प्रमादतः । प्रक्षाल्य चरणाहस्तौ आचम्य च यथाविधिः ॥१०॥ प्राणायाम अयं कृत्वा सवितारं विलोक्य च । नमस्कृत्य ततोधीमान्जपशेपन समाचरेत् ॥११॥ एवं सर्वविधि ज्ञात्वा जपं कुर्याद्विजोत्तमः । तत्तदुक्तफलं सम्यक् प्राप्नुयास्नेहमानवः ॥१२॥ ॥ इति श्रीभारद्वाजस्मृती जपविधानवर्णन नामाएमोऽध्यायः ।।

४०३६
भारद्वाजस्मृतिः
यदाक्षराभिधानाना वलयोनियमोत्र नः ।
स्मृतिप्यथं प्रगृहिय्यादर्धमेव प्रयोजनं ॥१२२॥
आगमेपु पुराणेपु स्मृतिष्विकदासु च ।
अर्थमेव तु गुहिय्यान्न च शब्दविचारयेत् ॥१२३॥
॥ इति श्रीभारद्वाजस्मृतौजपमालाया:विधानकथननाम
मतमोऽध्यायः॥.
अथ अष्टमोऽध्यायः
उपनिषिद्धयामवर्णनम्
उपनिषिद्ध कर्माणि यानि वक्ष्यामितान्यहं ।
निपिदम्ममरणाग्निपिध्यति जपोरतः ॥१॥
तामात्सर्वप्रकारेण उपकर्माणि युद्धिमान् ।
निपिदानिह कर्माणि कदाचिदपि नाचरेत् ॥ २॥
पादप्रमारणं यानांमालोकन विभणि ।
हडाप्रमारांश्वापः नसक्दन तादनं ॥३॥
मुगागाकारनं रण्डारण गर्दशन ।
शुदिदियनं गायचलन बंधन ॥४॥
अवासरांनं दम देहयन।
धारभेटनं महामीन शयनं परिवोपूर्ण ॥६॥

गायच्यासाधनक्रमवर्णनम्
४०३६
एवं संख्याक्रम ज्ञात्वा मंत्रिमंत्रासदा जपेत् ।
संख्याज्ञाननं पात्रीजैः सूश्मशुद्धात्मवितु या ॥१०॥
संख्यारेकाभिरथवा भूमौ वा रज्जुबन्धनैः ।
विप्र पापक्षयार्थिचेत् प्रातः प्रथमवासरे ॥११॥
नत्याध नित्यकर्माणि निवर्त्य च यथाविधि।
ब्रह्मकूचांपिवेदमि द्वितीये प्रथमोक्तवत् ॥१२॥
सर्व कृत्वाधभूजीत पिशुद्धं यावकाशनं ।
पूर्ववत्सकलं कृत्वा द्वितीये दिवसे पुनः ॥१३॥
द्विजोत्तमानमुक्वाथ सावित्रि जपमाचरेत् ।
गायन्यत्वभिमयांभः शतवारंजलस्थितः ॥१४॥
स्नात्यापीत्या शतंजता मर्वपापै प्रमुच्यते ।
ब्रह्महा मधुपस्वर्णरतेयि च गुरुतल्पगः ॥१५॥
गोमातृहापितृनो वा गुणात्वि स सागरा।
सदाचार्य मुखात्सागो अधितात्त विधानतः ॥१६॥
गायत्रिमयुतं जप्त्या पापरेतैद्विमुच्यते ।
आदीवयक्रममिदं कृत्वा स्वस्याभिवृद्धये ॥१७॥
गायत्र्यांधत लाभाय होम सम्यक्समाचरन् ।
जपहोमौ च सततं कुर्याद्विपस्वतेजसा ॥१८॥
सर्वकामसमृद्ध्यर्थ परब्रह्मोदमुच्यते ।
नित्यनैमित्तिकेनाम्ने त्रितयेस्मिन्यतिष्ठिता ॥१६॥
गायत्रितत्परं नान्यत् इहैव च परचयः ।
मध्यंदिनेल्पभुज्यौनि त्रिकालज्ञानत्तत्परः ॥२०॥

अथ नवमोऽध्यायः गायच्यासाधनक्रमवर्णनम् अर्थतस्याः प्रवक्ष्यामि गायत्र्या साधनक्रम । न साधितं य आमंत्र प्रयोगो न फलप्रदः॥१॥ तस्मादिद्युक्तमार्गेण साधयित्वा द्विजोत्तमः । ततः प्रयोजयेत्मंत्रः अभिष्टफलदं भवेत् ॥ २ ॥ ऋपीछदासि देवानश्च वर्णनास्तत्वानिशक्तितः?। मुद्राश्च विनियोगं च चीजशक्त्यासनानि च ॥३॥ स्नानकालं च तद्ध्यान यथावद् गुरुवक्त्रतः। अधिकृत्या ततो विप्रा मंत्रमेतत्पुरश्चरेत् ॥४॥ शिरोना शिसारुद्रेः विष्णुई दयसंयुतः। उपायने विनियोगो गोत्रसाख्यानाप तु॥५॥ ज्ञात्वैतानि शुचिभ्यानि शुद्धविक्षासनः सन्। यत्रकालाप्लयोमृत्युः जपे द्वादशलक्ष ॥ ६ ॥ नादिश कालिपर्यन्वं माननियंत्रयं । युगं प्रत्येवमारोप्य पुरश्चरणमाचरेत् ॥ ७ ॥ पुरश्चरणमेतद्धि गायनां परिकीर्तितं । एक द्वित्रिचतुः पंचषमताष्ठानयोपरि ॥ ८ ॥ दशाननमय शतंदशवतरम । नथा महमामयुतं रक्षचति यथारौ ॥६॥ ॥

गायत्र्यासाधमक्रमवर्णनम् झं तु जुहुयाद्राज्य लाभेनिष्कंटके ध्रुवं । देतसत्राणि धृतयुक्तानि पावके ॥३१॥ शंभूमो भवेहि ष्टिमहत्यत्र न संशयः। हर जुहुयाद्भस्म जलेवपं विमुंचति ॥३२॥ क्षेण भरमहोमेन कृत्वा चोत्तिष्टते जलं । देव जुहुयादपमुलक्षं गुर्वि श्रीयंलभेत् ॥३॥ लास्ताक्तान्हया लक्षं स्वाहधिनायके। (मुक्तस्सकलाहोमिः परमैश्वर्यमाप्नुयात् ।।३४॥ तंडुलतिलान्टक्षं जुहुयात्सपिपासह । हप्रियेस्यगेहेभिः वृद्धिरत्युत्तमा भवेत् ॥३५॥ त्यई जुहुयादनमप्टोत्तरशतं द्विजः। शक्तोष्टाविंशति वा तद्गृहोन्नध्रुवं भवेत् ॥३६॥ घृतं जुहुयालक्षं समस्तास्युमनोरथाः । चिर्भूत्वा द्विजश्रेष्ठाः सुनमिद्धेहुताशन ॥३७॥ घृतं मधुसंम्मिधं इष्टत्री वस्यकर्मणि । युतं जुहुयादमी सास्त्रिप्राणप्रिया भवेन १३८॥ दृत्यबलवानविश्वयं गोवृतं लभंजुहुयात्सलभेस्थिरं । हुयाद्रक्तसिद्धार्थ: लक्षं साहा प्रिये यदि ॥३६॥ स्यर्थिनोध युध्यंत्तः ते बजेयुर्यमालयं । माश्वमारसमिधः जुहुयार हुताशने ॥४॥ वेद्विदेशगमनं संपन्नस्य न संशयः । यत्र प्रतिलोमोफा यवश्चाच्छन्विनाशयेत् ।।४।।

४०४०
भारताजस्मृतिः
लाप्रयोगगुरसरणमिदये।
सपकारिक कमंग विभिगेरितः ॥२॥
गायर कर्मममानिम्नु प्रात.नानं न मत्यजेत् ।
अभयदादिमातति प्रमादजननं विधि ॥२॥
गायत्रया संप्रयच्यामि धर्मम्मांधमोक्षदं।
पूर्व मूगोंदयाम्नान्या महयं प्रत्यनो जपेत् ॥२३॥
आयुप्यममारोग्यं लभत्कीर्ति च यांधयो ।
उपयाम अयं कृत्या महाय जुयाद्भुतं ॥२४)
महस्रपोपं लभते प्रवृद्धाचिपे पायो।
पयमाभ्यश्यममिधः पालाशस्यसहस्रकं रक्षा
महणजुहुयादिद्दोः सहस्ररजितं लभेत् ।
घृतेनाभ्यज्यसमिधः सदिरम्यहुताशने ॥२६॥
जुहुयाद् ग्रहणेभानोः सहस्रणेपमाप्नुयात् ।
(सहस्रपोपमाप्नुयात् ।
अलक्ष्मिप्रचुरव्याधिदुःस्वप्नाच समाश्रीताः ॥२७॥
सहस्रजन्ता कुंभांभ सेवनान्नादमाप्नुयात् ।
यां दिशं ब्राह्मणोगंतुधिश्चन्लोष्टानि सप्त च ॥२६॥
सप्तकृत्याभिमच्याथ विजेत्तत्रनोभयं ।
धिराशीजुहुयालक्षं क्षेरं मृत्युं व्यपोहति ॥२॥
घृताशी प्राप्नुयान्मेधा जप्वालक्षं न संशयः।
नाभिमात्रेभनिस्तात्वा सूर्यस्याभिमुखोजलं ॥३०॥

गायत्र्यासाधनक्रमवर्णनम् लक्षं तु जुहुयाद्राज्यं लाभेनिष्कंटक ध्रुवं ।। हुने(तसत्राणि धृतयुक्तानि पावके ॥३१॥ लक्षभूमी भवेदिष्ट्रिमहत्यत्र न संशयः । सहस्र जुहुयाद्भस्म जलेवर्ष चिमुचति ॥३२॥ लक्षण भस्महोमेन वृत्या चोत्तिष्टते जलं । तदेव जुहुयादपमुलक्षं गुर्वि श्रीयंलभेत् ॥३३॥ तिलास्ताकान्जुहुया लक्षं स्वाहधिनायके । विमुक्तस्सकलाहोमिः परमैश्वर्यमाप्नुयात् ॥३४॥ सत्तंडुलतिलान्लक्षं जुहुयात्सर्पिपासह । स्वादप्रियेस्यगेहेभिः वृद्धिरत्युत्तमा भवेत् ।।३।। प्रत्यहं जुहुयादन्नमष्टोत्तरशतं द्विजः । अशक्तोष्टाविंशति वा तद्गृहोन्नध्रुवं भवेत् ॥३६॥ गोघृतं जुहुयालक्षं समस्तास्युमनोरथाः । शुचिर्भूत्वा द्विजश्रेष्ठाः सुनमि हुताशन ॥३७॥ गोघृतं मधुसंम्मि इष्टवी वस्यकर्मणि । अयुतं जुहुयादग्नी माखिप्राणप्रिया भदेन ॥३८॥ सदृत्यबलवानं विश्वयं गोघृतं लक्षंजुहुयाप्रलभेस्थिरं । जुहुयाद्रक्तसिद्धार्थैः लक्षं साहा प्रिये यदि ।।३।। प्रत्यथिनोध युध्यत्तः ते बजेयुर्यमालयं । ताम्राश्वमारसमिधः जुहुयाललं हुताशने ॥४॥ भवेद्विदेशगमनं संपन्नस्य न संशयः । सा यत्र प्रतिलोमोक्ता ववश्चाच्छयून्विनाशयेत् ।।४।।

४०४२ भारद्वाजस्मृतिः अक्षरप्रतिलोमूर्य यस्मिन्नुद्धतकर्मणि । तमोखंविजानिय्यादेतद्धि ब्रह्मणोवलं ॥४२॥ विभीतकेथ समिधः ह्याक्षरप्रतिलोमया। हुनेत्सर्पप तैलेन विभीतककृतसूचा ॥४॥ ययिञ्चेत्पीटकंशत्रोः अपियोत्सादनं पुनः । पञ्च संपुले शत्रून् वर्णाशश्च प्रयोजयेत् ।।४४|| कर्मणां मरकादीनां तत्रोक्तानामनंतरं । होमकर्म प्रवक्ष्यामि समस्तानां प्रशांतये ॥४शा गोसर्पिदधिपिय्यासमेकीशृत्वज्यलक्षुका । यावत्तकोपशमनं तावत्तज्जुहुयाच्छुचौ ॥४६॥ लध्यासनोब्रह्मचारी विसहस्र जपेच्छुचिः । संवत्सराद्धनैश्वयं न लभेन्नात्र संशयः ॥४७॥ निराहारो जपेसक्षं सदाद्यादीप्सितंवरं। प्रत्यंचयोजदेताः अन्दत्रयमतंद्रितः ॥४८|| द्विजन्मा सपरब्रह्म ययादव न संशयः। पुरश्चरणपूर्वाणि कर्माणि सकलानि तु ॥६॥ अभ्यास्मिन्मयोक्तानि ज्ञातव्यानि द्विजोत्तमैः । अनेनविधिनाभीष्टं मफलं साधयेद्विजः ॥ ॥ इनि श्रीभारद्वाजस्मृती गायच्यामाधनमवणं नाम नवमाध्यायः॥

अथ दशमोऽध्यायः गायच्यामन्वार्थकथानम् थायमर्थ गायच्या प्रवक्ष्यामि यथातथं । वेजोत्तमानां सद्भच्या जपादीनि प्रकुर्वतां ॥१॥ पीत्वा सभक्तिजननं मंत्रार्थ ज्ञानमुत्तमं । स्मादर्थ विजानिय्याचलेन लपकृद्विजः ।।२।। वेश्वानभक्तिभाजांत्तु जपादीनां महत्ततं । कलं लभेज्जपकृतामिति वेदेषु भापितं ।। ३ ।। दानजनमंत्रस्य तदादीनि यथाक्रमं । नदं प्रत्यर्थनिष्पत्तिः विस्पष्टं क्रियतेत्र तु ॥ ४॥ नदिति द्वितियेकवचनं अनेन जगदुत्पत्तिस्थिति लयकारणभूतमोपनिषधिकंधानिरुपंतेजः सूर्यमंड- ठामेधेयं परब्रह्ममिधिय्यते । सवितिरितिपप्ठेक- पचनंपून प्राणिप्रसवइत्यस्पधातो: एत द्रूपंसर्वस्य-- धातोर्वाभरित्यर्थः।। वरेण्यं वरणिय्यं प्रार्थनियं नियमादिभिरवगतकल्मषः। सध्यधर्म: भंजी- आमर्दने भुज्जिमदभजन इत्येतयोर्धात्वी: भजतां नापभंजनहेतुभूतमित्यर्थः॥ भ्रा' 'लुदीतापितस्य- धातोर्वाभाः। तेज इति यावत् देवस्यवृष्टिदाना- दिगुणयुक्तस्य निरतिशयेत्यर्थः । तः प्रकाशात धीम- " -

४०४४
भारद्वाजस्मृतिः
हिनिवायां नियमनिमुराविद्यारूपेण चक्षुषायो-
माधादित्योहिरण्मयः पुरुषः सोहमिति चित्तयामि-
धिय इते तु द्वितिय्या यहुवचनं य इलियाडमत्वा-
लिंग्गव्यत्ययः। यस्यतेजः सवितुर्देवस्यवरेण्यंश्रेष्ठं
अस्मारभिभ्यातं भगादेवभजतां पाप भंजन हो
भूतं अस्माकं नः धियः। बुद्धिश्रेयस्करपुऊर्ममुप्रचो-
दयात् प्रेरयेदित्यर्थः।
एपाव्याख्या तु गायच्या सर्वपाप प्रणाशिनी।
विज्ञातत्या प्रयत्लेन द्विजैः सर्व शुभेप्मुभिः ।।५।।
जपस्थानांतरेव्याख्या कर्तव्याहरहर्द्विजैः ।
स्मरणात्सर्वपापानि प्रणस्यति न संशयः॥ ६ ।।
॥ इति श्रीभारद्वाजस्मृतौ गायत्र्यार्थप्रतिपादननाम
दशमोऽध्यायः॥
अथ एकादशोऽध्यायः
गायत्र्यापूजाविधानकथनम्
उत्तप्रमाण सुस्मिग्धं दृदशुल्पंचरंत्रिवृत् ।
संस्कारेणोपसंयुक्त यत्तयं द्विजोत्तमैः ॥ १॥
छिन्नं प्रभिन्न स्फुटतं विशीणं मानतोधिकं ।
मानहीनमसंस्कारं ब्रह्मसूत्रं न धारयेत् ॥२॥

गायत्र्यापूजाविधानकथनम् ४०४१ शशित्रत त्रयः कला: गायत्र्या अयुत प्रर्य। अल्पवनं महानद्या सममेतञ्चतुष्टयं ॥३॥ अथ पूजां प्रवक्ष्यामि देव्यासिद्धार्थ सिद्धिदान् । सर्वपापप्रशमनी सर्वाभयविनाशिनी ॥४॥ खात्या शुक्खांवरधरःस्सपविचकरद्वयः। पादोशमे च प्रक्षाल्य सपस्पृश्यवाम्यतः ॥५॥ उध्वंपुडतु विधिवत्भस्मना चंदनेन वा । धृत्वा ललाट पीया भुजयुगेन च द्विजः॥६॥ उपहरे शुचौदेशे विरिप्ते गोमयांच्चुना। दीपमारोप्यगंधादि पूजाद्रव्याणि निक्षिपेत् ॥ ७॥ मुगंधाधन पुष्पाणि धूपदीपादिकानि च । मावूलोपहारंप द्रव्याणाराधनस्य तु॥८॥ मौवर्ण रजितं तानं गुस्वास्यच्छदारवं । मृण्मयं पति पात्राणि समायादिता"|| हाटकं कलयीतं पलोहीले पदारवं। आराधनविधौ पीट पंचदा समुहातं l पूजापीठं खानपीठं इति पीटं निधारमृतं। पंस स्वस्तिक पनि पा समनंदिया १११ मात्यष्टचीनदेवांग कापामाधादनानि । नवानिवृतान्यन्यै मुभावोदितानि वामनाय नतोदभांनानी प्रारमंगानमः। तेपापविश्योररमुखः मापननियन्महात ४८४६ भारद्धाजस्मृतिः तत्पद्मस्यवहिदेव्या स्नानंस्थानं हरेर्दिशि। तत्रैवस्थापयेत्पीठं नानाथं द्विजसत्तमः ॥१४॥ पीठं तन्मध्यमेस्थाप्य वस्रमाछाद्य तत्र च । ततस्तस्यसमीभागे कुशकूचासनोपरि ॥१३॥ स्वाचायं पूज्य तद्भक्त्या चंद्दनप्रसवाक्षतैः। नमस्कृत्य ततः कुर्यात्प्राणायाम अयं बुधः॥१६॥ ऋपिश्छंदो देवताश्च वर्ण तत्वान्यनुक्रमात् । विनियोगं च संस्कृत्वा न्यासं कुर्यादनंतरं ॥१७॥ करन्यासं पुराकृत्या गेहन्यासमथाचरेत् । अंग्गन्यासं ततः कुर्यादेवन्यास विधीक्रमः ।।१८।। ततो भाडजलेकुचं चंदनादित्रयं पुनः । दत्वामृताक्षरान्यश्च संपृशा द्विजसत्तमः ॥१६॥ गायत्र्यासप्रणव व्यातितितयान्यया । अष्टम्त्यो येनतो विप्रमुद्रयाच्यादनाख्या ॥२०॥ पूर्वादिषु महादिशु विदिशु परिचममात् । आत्रणरक्षणं कुर्यात विच्छेदनमुद्रया ।।२।। ततन्तवलमादाय पात्रंणास्यस्यपूर्वतः । मनाप्यजसमंस्कारं यथापूर्व ममाचरेत रिना ननन्तद्वारियून समनात्मकलेबरं । मूघांदिपादपयंत्तं प्रोक्षयन्मूलगुद्रया ||३|| सानदन्याणि च नया ततः संप्रासयदिनः। दम्यागि चंदनादीनि पिण्यधिः मांगनी यदि

गायत्र्यापूजाविधानकथनम्
तथाभिमंत्रण दिक्षु रक्षणंधाध कारयेत् ।
तानिद्विधा विभज्याथ समीचीनांशभेतयोः ॥२२॥
देव्यर्थ परिचाराध इतरांशमिति स्मरेत् ।
परिवारांशकदन्यैः यजेतात्मानमर्चकः ॥२६॥
गंधपुष्पाक्षतेधूप दीपाभ्यां चोद्यविद्यया ।
तत्पाने तोयमुत्सृज्य पुनस्पत्रेण तेन च ॥२७।।
आदाय मांडसलिलं चतुप्पात्राणि पूरयेत् ।
अाचमन पात्राणं पात्राणि त्रीणिचेतरत् ।।२८॥
सामान्यामृतमित्येवं उक्त पात्र चतुष्टयं ।
ततः सलिलसंस्कारं यथापूर्व समाचरेत् ।।२।।
प्रक्षालनार्थ सलिल पात्रेप्रागेव पूरयेत् ।
अरप्रक्षालनार्थत्वादन्यसंस्कारणं न हि ॥३०॥
सामान्याचमानााणं पाराक्षालनयोस्तथा।
पात्राणिस्थापयेत्प्रत्यगदिमागवसात्तिकं ॥३१॥
तती गंधाक्तपुष्पेन पीठमध्ये सरोरुहं।
संविरूपकूर्वे तन्मध्ये न्यसेटुर्मानुदच्छिसं ॥३॥
ततः पीठस्य नैऋत्या पद्मं संलिख्य पूर्ववन् ।
गंधादिभित्रिभिदेव अर्चयेद्गणनायकं ॥३३॥
यी(ईशानदिशिपीठस्य लिसिताभीरहोपरि।
ततो गंधादिभिर्मयां क्षेत्राधिपतिमचयेन ॥३४।।
पश्चादधस्तापीठस्य चंदनप्रमुखंखिभिः।
अाधारशक्ति संपूस्य वदूधै कूर्ममचयेत् ॥३३॥

।
४०४८
भारद्वाजस्मृतिः
पश्यादनंतरं पृथ्वि ततो गंधाधिदिभित्रिभिः ।
उपर्युपरिसंपूज्य धर्मादीनध पूजयेत् ॥३६॥
धर्मशानंच वैराझं ऐश्वर्यचत्यनुक्रमात् ।
आज्ञेयदिक्षुकोणेषु चतृप्यापि यथाक्रमं ॥३॥
अधर्माज्ञानवैराग्यनैश्वाणि ततः क्रमात् ।
पूर्वादिषु महादिक्षु यजेत्पीठोपरिद्विजेः ॥३८॥
ततस्तन्मध्यमस्थाने चंद्दनप्रमुसखिभिः ।
महासिंहासनध्यात्वा दिव्यं समभिपूजयेत् ॥३६।।
तदूर्ध्वग्न्यर्कसो(मर)ना मंडलानि ततः कमात् ।
उपर्यपरिगंधादि त्रितयेन समर्चयेत् ॥४०॥
ततस्तदूर्ध्वतस्योरजः सत्वंददूर्ध्वतः ।
चंदनानि येणैव गुणत्रयमधार्चयेत् ॥४१॥
पीठस्यांतः पूर्वदले पूजयेदणिमाह्वयं ।
लघिमाह्वयमाग्नेय्यां महिमाख्यंत्तुदक्षिणे ॥४२॥
प्राप्ति निऋतिदिग्भागे प्राकाम्यं पश्चिमे दले ।
ईशित्वंवायुदिक्पत्रे वसित्वं यक्षदिग्दले ।।४३।।
यी(ईशानदिग्दले पश्चात् सर्वज्ञत्वं विचक्षणः ।
चंदनत्रितयेनैव ऐश्वर्यादिमर्चयेत् ॥४४॥
तद्वहिः पूर्वदिक्पत्रे प्रज्ञामनलदिग्दले ।
धृतियमककुत्पत्रे क्षेमा नितिदिग्दले ॥४शा
शांतिवरुणदिक्पन्ने स्मृति वायुककुदले ।
कात्तिः मुत्तरदिपत्रे शृतिमीशानदिग्दले ॥४६॥

गायत्र्यापूजाविधानकथनम् स्वस्ति गंद्रादिभिभक्या सहत्रिभिरथार्चयेत् । एवमेताः समभ्यर्च ततो वेदारसमर्चयेत् ॥४७॥ ऋग्वेदंतद्वहि प्राच्यां यजुर्वेदं तु दक्षिणे । सामवेदं तु वारुण्यांअथर्वाख्यं तथोत्तरे ॥८॥ पुराणाद्यकथातर्क धर्मशास्त्राण्यनुक्रमात् । अमिरक्षोनिवेशाम कोणेषु च समर्चयेत् ||४६|| निरुक्त ज्योति शिक्षा कल्पव्याकरणं तथा। छंदः सूत्राणि शास्त्राणि पूर्वादिपु समर्चयेत् ।।१०।। ततः पूर्वादि दिक्षादौ विधीक्षु च यथाक्रम । भत्त्यार्चयेद्वसूनष्टौ चंदनप्रमुखैत्रिभिः ।।१।। धरः सोमानिलश्चैव प्रभासीदवसंज्ञकः । आपः प्रत्यूपसंग्जिश्च व(पत्कारयिति स्मृतः ॥५२॥ ततस्तुदद्वहिर्देशे रुद्रानेकादश कमात् । सद्भावभक्तिसहितः यजेस्त्रीतद्विजसत्तमः ।।५।। महादेवः शिवोन्द्रः शंकरो नीललोहितः । यी(ई)शानो विजयो भीमो देवदेवोभवोहरः।।४।। कपालिसंखिइत्येते रुद्र एकादश स्मृताः। पूर्वादिपु विकाष्टामु रुद्रास्त्रीस्त्रीननुममान् ॥५॥ रुद्रौद्योउत्तराशायमर्चयेचंदनादिभिः । ततः प्रागादिकाष्टासु यजेद्वादश भास्करान् ।।६।। श्रीस्त्रीन्यथाक्रमेणव तद्वाय चंदनादिभिः । वैकर्तनोविवस्वाश्च मार्तण्ड भास्करो रविः॥णा

भारद्वाजस्मृतिः
लोकप्रकाशकरचय लोकसाक्षी त्रिविक्रमः ।
आदित्यश्च तथा सूर्यः अंगुमाली दिवाकरः ।।८।।
त एतेद्वादशादित्याः सर्वलोकविभानका ।
एतानेवनमभ्यर्च्य तद्वासोतन्मुनीन्यजेत् ॥६॥
पूर्वादिषु चतुर्दिक्षु वशिष्ठादीनप्रदक्षिणं ।
पत्पद्यथाक्रमेणेव मुनीनांग्गाधिभित्रिभिः ।।६।।
ततोवहिस्पले धीमान् इन्द्रादिनष्टलोकपान् ।
पूर्वादिष्यष्टकाष्टापु पूजयेदर्चनादिभिः ॥६॥
इन्द्राग्निसमयति च निऋतिर्वरुणोनिलः ।
भीमकुवेर इत्यष्टौ लोकपाल अमीस्मृताः ॥६२।।
स्वस्वनाम चतुयंतं प्रणवादिनमोत्तक ।
सर्वेपा परिवाराणां मंत्रमाराधने स्मृतं ॥३॥
स्वस्वमंत्रेण सकलान् उपचारान्द्विजोत्तमः ।
आचार्य प्रमुखस्तत्तत् ध्यानेन सहपूजयेत् ॥४॥
एवमेताः समभ्यर्च सुगंधकुसुमोक्षतैः ।
ततो देवी यजेदीमान् गायत्रि वेदमातरं ।।६।।
ध्यानध्यायो यथाप्रोक्तं रूपंदेव्याश्चलक्षणं ।
स्वर्गादिभिस्तथा कुर्यात् प्रतिमा नयनप्रियां ॥६६।।
सुवर्णरोप्यस्फटिक पापाण प्रतिमाकृता।
चत्वारयेतेशस्तास्युरलाभे स्थंडिलं स्मृतं ॥६७)
कृतांप्रतिष्ठां तां कृत्वा विधिना च द्विजोत्तमः ।
ततोद्विजन्महरहः तस्या देवी समर्चयेत् ॥६॥

गायत्र्यापूजाविधानकथनम् पूर्वसंध्यार्चितां पुष्प प्रतिमाया विसृज्य च । प्रक्षाल्य खापयेत्पीठे प्रतिमां प्राह मुखीं द्विजः।।६।। पश्चात्युप्पाक्षतस्तेषु प्रतिमायाः पदेप च । ततः सलिलमादाय सानपात्रेण पूर्वतः ।।७।। संस्थाप्य जलसंस्कारं यथापूर्व समाचरेत् । ततः कुन तत्तोयं आदाय च शनैः शनैः ।।७।। संप्रोक्षयेत्तत्प्रतिमा सद्भावनाविद्यया । ततः पुष्पांजलि कृत्वा प्रणवेनाकमंडलात् ॥जना देवीमायराहयेडोमान्प्रतिमायो यतेन्द्रियः । सतोजलिस्थितं पुष्पं विक्षिप्य प्रतिमापरि ||७|| अधोमुरोनजिलिना स्थापयेन्मूलविया । तचोमुष्टियांचरथं पृत्यांगुष्द्रयं युधः सा प्रदर्शयेन्मुस देव्याः भवेत्तत्संनिरोधनं । पश्यान्मुभियानस्यं कृत्याग्गुष्ठम्यायुधः ॥क्षा वर्ष प्रदर्शवदेव्या: मनिधीपरहिनन । एतत्प्रयोगदिनये मूलयिांव भापिता ॥ ततः माहातपुष्पागि दसानाविपया। पाचानुपाचारमनमानुस्मंग Pital दत्वाविद्यया परराव शोपवीत। इत्यापाभ्याम्पसमनं वरन्गरपिा sal पानाश्तपुरागि तथा दयायचा. धूपदीपो नचा दाहिरिन्मूलमजत ४०५२ भारद्वाजस्मृतिः ततः समस्तनिर्माल्यं आदाय प्रविमृन्य च । पुष्पाणि शीध्यारोप्य दद्यदाचमनं ततः ॥८॥ ततोनुपह्तगव्यैः व्यंचभिप्परमेश्वरी । ततः मृतगंधतोयः प्रत्यप्रेरभिषेचयत् ॥८॥ गोमूत्रं गोमयंक्षीरं दध्याधराभिधानकं । एतानि पंचगव्यानित्याख्यातानि महर्षिभिः ।।८।। पेय्यापदद्यापाराख्यमयीचरसपंचकं । एतत्पंचामृतनाम स्नपने प्रवरं स्मृतं ।।८।। द्रव्याण्यमूनिपात्रंप पूरइत्याथ पंचसु । गंदपुप्पामतान्धूपदीन्दत्या पृथक् पृथक् ? ।।४।। स्याटात्या रसाविध्या पायंप्रत्यभिमध्य च । अन्यरतन्ततो देवी लापयेद्विधिपूर्वकं ॥४॥ गंधद्वाराकरिषस्य गायत्रि गोजलस्य च। आप्यायस्यति पयसा शुझमस्यामपिपः ।।८।। दनोदधिकापुग्न इति देवस्यत्वा कुशोदकं । मवानामधीधाराधिगचरमस्य च ॥श्रा मंत्राण्यमूनिद्रव्याणिमाख्यानानि पृथक पृथक् । गोमूर नानादि मंगभिः ममाचोम् ॥८॥ एवंदराषियमान ग्यापासंग यारिणा। गोपिष्टमुद्रामापियामि नवंद ।।६।। नमोहन्दियानिध्य मुदशीनाजलेलया। अभिषिच ननशान निर्यमापन

४०५
गायत्रीपूजनविधानम्
आपोहिष्टादिभिमत्रै विभिःप्राक् नापनं स्मृतम् ।
हिरण्यवर्ण इत्याद्यैश्चतुर्भिःस्नापनं स्मृतम् ॥६१||
पवमानानुवाकेन न(स्न) पनं च तृतीयकम् ।
एवं त्रिः स्नाय्यमनुभिः एतैरप्याद्यविद्यया ||
समस्तयाऽयव्याहृत्या परिपिंचेत्प्रदक्षिणम् ।
दद्यादाचमनं देव्याः स्नानं प्रत्यात्मविद्यया ।।३।।
तथैवसाक्षतं पुष्पं उांस्वाधिपु च द्विजः ।
ततः पूर्वाचिते पीठे स्थापयेत्स्थानपीठतः ||४||
ततः पुष्पांजलिं दत्वा नमस्कृत्यात्मविद्यया ।
ततः पूर्वस्वलाद्यादि त्रितयं क्रमशोऽर्चयेत् ।।६शा
दद्यात्पाद्यं पदान्तेपुमुखेप्वाचमनिय्य(नीय)कम् ।
अर्घ पंचसु शीपु मूलमंत्रण मंत्रयित् ॥६६॥
ततो वस्त्रं ब्रह्मसूत्र दत्वाऽऽचमनमर्पयेत् ।
गंधपुष्पाक्षतैरेवमर्पयेदात्मविद्यया जा
ततो नानाविधैः पुष्पैः सुगंधैः कुसुमादिभिः।
यथेष्टं पूजयेद्देवी यथानयनवल्लभम् ||६||
ततो धूपं ततो दीपं दद्यात्पुप्पांजलिं ततः ।
सौवर्णे राजवे शोल्वेकांचने भाजने शुभे ।
नापूपघृतनिष्पन्नं परमान्नं सशर्करम्
दत्वाऽऽत्मविद्यया प्रोक्ष्य पुष्पं तदुपरि क्षिपेत् ।
ततोमंत्रासनस्योर्चे तत्लाप्यामृतमुद्रिकाम् ॥१०॥

अथ द्वादशोऽध्यायः
गायत्रीभ्यानवर्णनम्
अथ वक्ष्यामि गायत्र्याः ध्यानसर्वापनाशनम् ।
सर्वाभीष्टप्रदं साक्षादिहलोके परत्र च ॥१॥
ध्यानं संध्यान(सायन्तने) यत्र ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम्
अन्यथा तु निजध्यानं प्रधानं च यथाक्रमम् ॥२॥
ध्यानं विना जपं सर्व यलेनाऽपि कृतं वृथा।
तस्माद्विजस्तु ध्यानेन जपं सह समाचरेत् ॥३॥
हंससां कांस्यका रक्तां चतुर्वक्त्रां चतुर्भुजाम् ।
पद्मासन जटाचूडामष्टनेत्रां स्मिताननाम् ॥४॥
पीताम्बरप्रकटितां रत्नकुण्डलमण्डिताम् ।
दिव्यचंदनलिप्तांगां दिव्यपुष्पैरलंकृताम् ॥५॥
सर्वाभरणसंयुक्तां होमयज्ञोपवीतिनीम् ।
दक्षिणेऽक्षनजं कूचं वामभागे त्वं वरम् ॥ ६॥
चतुहस्तेन विभ्राणांदरण्येदिक्प्रदक्षिणम् ।
प्रासंध्यायाःस्मरेद्देवी गायत्र्याख्यां द्विजोत्तमः ॥७॥
दक्षिणेऽक्षस्रजं कूचं नवं वामे कमंडलुम् ।
एवं वापि स्मरेदेवीं द्विजः पूर्वोक्तलक्षणाम् ॥ ८॥
दधतीं श्वेतरूपां तो शितयनां चतुर्भुजाम् ।
द्विनेत्राहिमकोटि..." त्रिवेष्टनाम् ॥६॥

गायत्रीध्यानवर्णनम् ४०५४ सीतक्षामांबरधरां प्रसन्नेदुनिभाननाम् । सुगन्धा लिससीङ्गी सुपुष्पस्रग्विभूपिताम् ।।१०।। समस्तामरणोपेतां स्वणेयनोपवीतिनीम् । दक्षिणे पंकज शर्ख वामे चक्र महागदाम् ॥११॥ चतुर्हस्तेन विभ्राणां धरादित्यो प्रदक्षिणाम् । एवं मध्याह्नसंध्यायां सावित्री द्विजसत्तमः ॥१२॥ कृष्णां प्रौडा(दां पारुढ़ां एकयां त्रिलोचनाम् । चतुर्भुजां जटानागकुंडलेनसुमंडिताम् ।।१३।। व्याघ्रचर्मांवरधरां नानाभरणभूषिताम् । अक्षत्रजमहाशूलंडमरुचकपालकम् ॥१४॥ चतुष्करेषु विभ्राणां अधरादि प्रदक्षिणम् । एवं सरस्वतीसंज्ञां सायंकाले स्मरेद् द्वितः॥१२॥ सपवित्रां चतुर्हस्तां तिस्रो द्देव्य इमा ध्रुवाः । त्रिमूर्तिरूपधारिण्यः सृष्टिस्थितिलयांशकरः ॥१६॥ एवं निपु च संध्यासु उपकालेऽमंडले। गायत्री संस्मरेद्विमः सर्वान्कामानवानुयाति)॥१५ पञ्चास्यानि यः पादाः पड्वागादिशबाहवः । नेत्राणि पंचदश व तहकान्तिमत्तनुः॥१८॥ प्रदक्षिणा ततः प्रत्याश्यानि(१) यधाक्रमम् । रक्तकृष्णसुवर्णाभः श्वेतज्योति निभानि च ||१|| हुताशनवदास्त्रानि सुस्थिरत्वंत्तुतद्वयः । उत्संगे पृष्टभागे तु कुश्यापप्रकीर्तिताः all ४०५८ भारद्वाजस्मृतिः। कूर्चाक्षसूत्रं शृग्दधा(गदा?)भयादक्षिणपाणिपुर पुस्तकानि सवं पात्रं वराश्चेतसाणिपु ॥२१॥ अथवाल्पकशस्त्राणि भवेयुर्दशपाणिषु । चतुर्भुजा वा तां ध्यायेदन्यत्सर्व पुरोक्तवत् ॥२२॥ अफाक्षिमालाममयं दंडं दक्षिणहस्तयोः । कमंडलुं च वरदं बिभ्राणां यामहस्तयोः ॥२३॥ मुरुन्दं कुंडलं हारं कर्पूरं कुक्षियन्धिनीम् । छन्नं पीनं कराकल्पं कराशाखाविभूषणम् ।।२४।। कलापपादकटयोपुरालिभूपणम् । एतविभूषण मे नानारन पमन्वितः ॥२१॥ दियविभूपिता देवी कामयज्ञोपवीतिनीम् । पवित्रहसदलको किंचित्रसिताधराम् ||२|| दिग्यगंधानुलिमांगो दिव्यमाल्यरगताम । मीतक्षामपरी गाना सर्वाययवसुंदराम ॥२७॥ मर्यलक्षणमंपनमवली मनायवीम् । ममत मंत्रतंत्राणां नायक प्रतिक्षिाम् !२al गुलम्बनमोरनीः अनेकशीभिता। थानानात्यंन्तमादयंम्याने पंचायविना नयायिये भाठे विमय माधम पद रहगश चतुस्लिामिः२॥ शिवाशिमुनिभिः गायगाव देवः। धन्यानिशमुख्यानिशान्निभिः मांगारिभिः ॥३१४६

गायत्रीध्यातवर्णम्
प्रविशद्धि अमरैः सेंद्रः संसेविता भृशम् ।
सदाशिवस्वरूपेयमीश्वरस्याङ्गनाकृतिः ॥३||
सततं ब्रह्मविष्णुभ्यां समुद्रश्चनमस्कृता ।
तस्मादियं द्विजष्टा ध्येया जप्या च सर्वदा ॥३३॥
गायत्रीभक्तितस्तेषां भुक्तिमुक्तिफलप्रदा।
एवं सर्वश्वरी देवी गायत्री वेदमातरम् ॥३४॥
घ्यायचपन् सर्वसुखाप्नोतीह परत्र च ।
अहाहा वा सुरापी या स्तेयी वा गुरुतल्पयः ॥३५॥
तयोगी वान्यपापी या योवा को वा द्विजोत्तमः।
देवीध्यानरतः साधं जपेन सहभक्तितः ॥३६॥
तवैते पातकाः सर्वे विनश्यन्ति न संशयः।
व्यापादयो मृगाः क्रूराः वृश्चिकाद्याश्च जन्तवः ॥३४ा
ब्रह्मराक्षसपूर्वाश्च पिशाचा व्याधयश्च ये।
प्रेतामहापच निर्धाता: अप्यन्ये अद्धवैरिणः ॥३॥
देवीध्यानरतं वित्रं न रपृशंन्ति प्रमत्तितः ।
देवाश्च मुनयश्चान्ये सिद्धाः साध्यौ(घ्याश्च)च गुह्यकाः ३६
गंधर्वाप्सरसो यक्षा: किन्नरगरुडोगगाः ।
विद्याधरास्तथैवाऽन्ये भूताख्या भुविचारणाः ४all
मर्वे तु वशमायान्ति देवीध्यानरतस्य च ।
महानदीपु गिरिपु महाबाते महानले ॥४१॥
महाविपिनेविने) भयंनास्ति देवीन्यानरतस्य च।
द्विजस्य सप्यं ध्येयं च न गायन्याः परंपरम् ॥४॥

भारद्वाजस्मृतिः
सर्वप्रकाराल्लोकेषु त्रिषु सत्यं न संशयः ।
उत्पत्तिस्थितिसंहाराः यस्यास्युर्वशगा भृशम् ॥१३॥
तां गायत्री परित्यज्य विप्रः किं प्राप्यति(१) ध्रुवम् ।
स्वाध्यायाः संस्तरामंत्राः दानान्युप्रतपांसि च ॥४४॥
तीर्थानि वेदाः सकलं गायत्र्यैव द्विजन्मनः ।
सत्यं श्रेयोमहानंदोयकस्तेजोवलं(?) सुखम् ॥४॥
भागधेयं च सकलं गायत्र्यैव द्विजन्मनः ।
आयुर्धान्यं धनं रूपं सुशीलं सुमतिः कुलम् ॥४६॥
ज्ञानं विद्याश्च सकलं गायत्र्यैव हि सोमपाम् ।
देवीमेतां परित्यज्य देवतामितरां द्विजः ॥४७॥
आश्रयेलोऽत्र निर्भाग्यस्तस्माकियदि(कोऽप्यस्ति)पापभा
गायत्री जननी शस्ता गायत्री भ्रातरःस्मृताः ॥४८।।
गायत्री बन्धुवर्गश्चगायत्री चाधिदेवता ।
यतिनिश्चित्य यो विप्रस्ता समाश्रित्य तिष्ठति ॥४६॥
तस्येह दुर्लभं किचिदिह नास्ति परत्र च ।
गायत्री यो न जानाति जातो विप्रकुले यदि ॥५॥
प्रामणत्वं कुतस्तस्य स शूद्रण ममः स्मृतः।
नात्या विधिवदारम्य मपवित्रं करद्वयः ॥११॥
उध्वं पविधिवदमिहोत्रोत्यभामना ।
धृत्वा ललाटमुनयोईदि कठे यथाक्रमम् ॥१२॥
मदारनंग कमांमि फरमा भायन विजः।
उपविश्यंद्रियदिम्यक्त्रः भूत्वोदकमुश एवं या ॥३॥

गायत्रीभ्याजवर्णनम् ४०६ आसनं स्वस्तिकरवहा कृत्वा प्रीन्प्राणसंयमान् । ततो गुरु गणेशानं भल्यादेवप्रणम्य च १५४|| ऋपिश्छन्दो देवताश्च शक्तितत्यान्यनुक्रमात् । वीज शक्ति नियोगं च स्मृत्वोक्ता प्रणिपत्य च ॥५॥ कृत्या न्यासत्रयं पश्चाद्ध्यायेद्देवीमिहोस्थितः संध्यासंहिमग्धिचे स्ववेत्तस्थथचा बुधः ॥५६॥ एकाप्रमानसो भूत्वा जपेदष्टसहस्रकम् । नित्यमष्टशतं वापि यथाशक्त्याऽथ वा पुनः ॥७॥ संभवेत् त्रिषु लोकेषु निग्रहानुग्रहाक्षमः । यथेष्टमखिलान्भोगान्मुक्काभूतिंच शाश्वतीम् ॥१८॥ ततास्वर्गफलान्भुक्ता प्राप्नोत्यंते परं पदम् । ध्यानाध्यायमिदं पुण्यं न देयं यस्य कस्यचित् सद्ब्राह्मणाय दातव्यं सञ्चरित्रगुणाय च । दुश्चरित्राय दुष्टाय दुर्विप्राय दुरात्मने ॥६॥ न देयमेतदध्यायं स्नेहाकिमपि कोक्षया। यदि दुष्टस्तलेदत्तमध्यायं येनकेनचित् । स पापात्मा महाघोरे नरकाब्दी थि(चिरंवसेत् ॥६॥ १॥ इति श्रीभारद्वाजस्मृती गायत्रीभ्याननामको द्वादशोऽध्यायः॥

अथ त्रयोदशोऽध्यायः
गायत्रीमूलध्यानवर्णनम्
अथातः संप्रवक्ष्यामि मूलध्यानं तदात्मकम् ।
धैत.दिव)प्रसादजननसर्यायोध)सर्वथाघविनाशनम् ॥
सर्वथाऽनुष्टितं सिद्धं मुनिभिस्तत्त्वकांक्षिभिः ।
महानुभावरमरै रवि सद्भक्ति तत्परम् ॥ २ ॥
अन्येपामपि सर्वेषां निखिलाभीष्टसिद्धिदम् ।
तस्मादिदं महाध्यानं ध्यातव्यं द्विजसत्तमैः ॥ ३ ॥
स्नात्वा शुद्धः शुचौ देशे प्रक्षालितपदद्वयः।
स पवित्रकरद्वंद्वः कृते चास्पर्शने द्विजः ॥ ४॥
अमिहोत्रजयाभूत्या शुद्धयाजलसिक्तया ।
धृत्वालिकादि स्नानेपूर्वपुंडूच पञ्चसु ॥ ५॥
कुशासने प्राग्यदनः उदयत्रोयथामति ।
उपविश्य गुरुं वाचं गणेशं प्रणमेदथ ।।६।।
त्रिप्राणसंयमो भूत्वा भूर्भुवादित्रयेण तु ।
रेचकश्चायतृतीयः कुंभक (च) ततः (परम्) ॥ ७ ॥
ऋपिश्छंदो देवताश्च विनियोगं च वर्णकान् ।
तत्वादिशक्तिवीजं च शक्तिश्चाथ क्रमास्मरेत ।। ८॥
अथहस्ताङ्गदेहेषु कुर्यान्न्यासंत्रयं क्रमात् ।
दिग्यन्धनं च तत्पश्चाद् ध्यायेद्देवी प्रसन्नधीः ॥ ६॥

गायत्रीमूलध्यानवर्णनम् स्वित्यनुवाकेन हृदय वाऽमंहले ।। पीमायाह्य गायत्री ततो ध्यायेद्विजोत्तमः ॥१०॥ पवनो दशभुजा पड्गभी चरणप्रयाम् । उपचपष्टि गायत्री परमेश्वरी ॥१॥ दादिविद्याभूताशहुतरफ दयो जगत। प्रविष्णुशिवाचास्याः प्रधनावयया अमो ॥१२॥ ग्वेदः पूर्व चरणः यजुर्वेदो द्वितीयकः । सामवेदस्वतीयम्नु परणः प्रथितः परम) ॥१३॥ हादिमस्याउ पासी रमापरा.स्मृताः । चारिफमयमा युधिभिणादिग्न्तिीयकाः ॥१४॥ थिमादिक्तृतीयास्याः पुर्वराशायनुमंका । दिपरिमायादिगन्युका यधामा ॥१६॥ तिहामपुराणानि नाभिर्दिनानि जगन । भान्तरमहरभरवामियमतम्मनी १६५ বন্ত মালি খান নাৰি। रोपवागिरपति शीजि प ध प १॥ शशिरमा शिविरमा शरः कल्पालीयानु तनु निकम्म पभोलिपसार परमं परिलतिर। मतेकरगतिरंग्य यानादरम मौर र निधास: Rो बानुगरिन । मात्रिनमा दोर्माळा निविदा

४०६४
भारद्वाजस्मृतिः
पुप्पावतंसाम्योतीपि हरी नक्षत्रमालिका
रखाकल्पावनीरुहः मीमांमालक्षणानि च ॥२१॥
विद्याविधौशिरः पश्चा(द) अथर्याख्यो विचेष्टितः ।
वेदान्तशास्त्रं विमलं मानसं परिकीर्तितम् ॥२२॥
ब्रह्मा मुखं शिखा रुद्रः विष्णुरात्मा हदि स्थितः ।
एतल्लक्षणसंपन्ना गायत्रीति प्रकीर्तिता ॥२३॥
सांख्यायनस्य गोपा जगद्रूपाखिलेश्वरी।
एवं ज्ञात्वा स्वहृत्पद्म दिव्याकाशेद्भुत(?)स्थले ॥२४॥
हैमे सिंहासने देवी स्थितांध्यात्या द्विजोत्तमः ।
भद्रपीठेदयाघूढ़े नानारत्नसमन्विते ||२शा
पद्मासनेऽथवा सौम्ये तदायाते स्ववेतसः ।
पाद्यमाचमनं चाध्य वस्त्रं यज्ञोपवीतकम् ॥२६॥
चंदनं चाक्षतं पुष्पंधूपदीपं निवेद्यकम् ।
करानुलेपं तांबूलं दत्वाधिजपमाचरेत् ॥२७॥
प्रदक्षिणप्रणामांश्च यथाशक्त्या च कारयेत् ।
स्तुत्वाऽथ विविधस्तोत्रैर्देवीमुद्वासयेत्ततः ।।२८।।
एतान्यमूनि द्रव्याणि प्रोक्तानीहार्थनाधुना :
मानसोक्तानि सिद्धानि शुभानि द्रव्यजानि च ॥२६॥
एवं द्विजोत्तमः सम्यनियमेनैव सर्वथा।
यो ध्यानेनार्चयेद्देवी सर्वाभीष्टं लभेत्ततः ॥३०॥ •
ध्यानं कृत्वा ततः सम्यग्ब्राझणस्य महात्मनः ।
महापातकपूर्वाणि न स्पृशंन्ति तमास्यपि ॥३१॥

गायत्रीमहाध्यानम् ४०६५ नियोग्यानिवस्तूनि ध्यानं कुर्वन्स्पृशेद्विजः । यन्ति तानि सर्वाणि पवित्राणि न संशयः ||३२|| ततं ब्राह्मणो भक्त्या सहैव ध्यानतत्परः। तस्य दुष्कृतं किंचिदिहोपरिमहात्मनः ।।३।। माविष्णुहराश्चैव मुनयः पितरस्तथा। नेताः प्रीत्या प्रयच्छति धान्यानि च मनोरथम् ॥३४॥ दाविद्भिरिति भ्यानं ध्येयं तद्ब्रह्मसिद्धये। ब्रह्मणोऽनिशं शुद्धविवश्यरपिरमूतम ॥३१॥ गेन ध्यानमार्गेण जपेक्ष सततं द्विजः। हित्याश्रित्य वेदाभ्या सनाक्षदीश्वरसंस्मृताः ॥३६॥ यः किंजल्पनैवधैः भूयोभूयोविमोहनः । पत्र्यास्तु परं नास्ति दैवतं सद्विजन्मनाम् ॥३७) दाविका परित्यज्य गायत्री ये द्विजातयः । ठन्ति वेदानस्तेपात्ते भवेयुगईभस्वनाः ॥३८॥ यित्रीध्याननिरतो यो द्विजो जप्यवेदविन्। विदविदिति प्रोक्तो विशुद्धश्च द्विजातिपु॥३६॥ तयानं ततः कुर्यात् सद्भस्त्या नियमेन यः। ( सातः सर्वतीर्येषु कृतास्तेनाखिलाधराः ॥४०॥ तानि सर्वदानानि भूदानामुरानि च । चान्द्रायणादीनि कृतान्युप्रवपांसि च ॥४!! (न्यानि यानि पुण्यानि यानि धर्माणि तानि च । मोदितक्रमेणव समस्तानि तानि वै॥४|| -

44
भारद्वाजस्मृतिः,
महाध्यानमिति प्रोकं एतद्ध्येयं द्विजातिमिः।
सद्विजायपरट्रव्य(प्रदातव्य) अन्यस्मै न कदाचन ॥४३॥
द्विजः सदा महाध्यानाध्यायमेत परः शुचिः।
सर्वपापविनिर्मुक्तरस याति परमं पदम् ।।४४||
॥ इति श्रीभारद्वाजस्मृती महाध्याननामक-
स्त्रयोदशोऽध्यायः॥
अथ चतुर्दशोऽध्यायः
पूजाफलसिद्धये द्रव्यगन्धलक्षणवर्णनम्
अथार्चनोक्तद्रव्याणां गंधानां च पृथक पृथक् ।
लक्षणं संप्रवक्ष्यामि सपर्याफलसिद्धये ॥१॥
चंदनागरुकर्पूरकाश्मीरजचतुष्टयम् ।
गंधाख्योऽयं विलेप्यास्या भक्त्यावापि पृथक पृथक् ॥२॥
चंदनागरुकर्पूर कुंकुमस्निग्धकर्दमः ।
गंधोत्तमइति प्रोक्तः श्रेष्ठः सर्वानुलेपने ॥३॥
पूतिमृगमदादीनि पुण्यांगानि विशेषतः
द्रव्याण्यतिसुगंधीनि प्रमृज्यान्यनुलेपने ।
चंदनागरुलोहारुय काश्मीरजचतुष्टयम् ॥ ४॥
एकैकमष्टद्वितयशतसंख्यागुणाधिकम ।
अभिन्नाशंखयश्चेताः सुलिग्धा प्रीहितण्डुलाः ॥५॥

४० नानाद्रव्यगन्धलक्षणम् अक्षताश्चेत्यभिहितास्ते प्रशस्ताः समर्चने । कृष्णाः कङ्गा(१,बहुविधाः पुरुपाश्चमलीमसाः ।। ६ ।। श्रीशक्षता अपि क्षुद्राः न हि योग्याः समर्थने । मालनीमल्लिकाशोकाः जीवन्ती नवमल्लिकाः ।।७।। पुन्नागयकुलांभोजाः पाटलोत्पलचंपकाः । कदंवर्णिकारख्यपलाशकरवीरकाः ।।८।। मंदारनागविजयश्वेतमंदारकेसराः । कोजुकामतमातद्विसंध्यायर्तयुमुंभकाः॥६॥ घकागस्यासनद्रोण आरम्पधककाचनाः। घिसंध्य पृथुशलाजपाःम्युः पुप्पसंकटः ।।१।। एषां पुष्पाणि सततं प्रशतानि समर्थने। एषु लक्षणयुम्तानि योग्यानि कुसुमेप्वपि ॥१॥ अलक्षणानि पुपानि न योग्यानि फदापन । सदलानि न नालानि मुस्कानि नपानि पा स लक्षणानि तान्याहुः पुप्पाण्यक्षिप्रियामि । पुष्पेषु चतुर्गा भवन्तिधयलादयः ।।१३॥ तानि सांगि पुष्पागि प्रयोगनि ममपंने । प्रयोम्यायनादिभिः हाणि पुण्यगन्धानुटेपना अतिपकान्यपकानि तत्रानि विदतानि प। निनालानि प्राफनानि रामंटानि पE विशीयानि मगधाणि टोपलानि । एतात्यलभपादीनि पुनामिकामा तानिनु।

६८ भारद्वाजस्मृतिः वीतपुष्पफलाशानि विभज्य न तु पूजयेत् । अन्तरेण सरोजातेंदिवर प्रसवद्वयम् ॥१७॥ अत्राख्यातानि पुष्पाणि न योग्यानि कदाचन । तस्मादुक्तानि पुष्पाणि योग्यान्यभ्यर्चने सदा ॥१८॥ बिल्वापामार्गमरुवतुलसीदमनाम्र कः । भृङ्गराड्जंबुस्खदिरमहमदिदकाहयाः ।।१६।। शशिप्रझमहीजात हरिताल कुशाहयाः । एषा कोमलपग्राणि योग्यान्य(प्य मर्चने सदा ॥२०॥ पूर्वोक्तामुमालाभे परेशनियोजयेत् । एपामला पयाणा अक्षतर्यातिल यजेत् ।।२१।। स्वारामोद्भूनकुसुमे (र) अधिप्ठेत्युदीरिता । मध्यमा यनः पुष्पः कोतपुष्पैः कनीयसी ॥२२॥ कपित्थया कुघीसर्ग शिरीषमदयन्तिकाः । राल्मपरंडमधुकृषिभीतकविषद्रुमाः ॥२३॥ अन्ये येना कधिताः विरोधोलतिकाद्रुमाः। जोगिणमूनानि यजने न भयन्ति हि ॥२४॥ नस्तामाम्नयनेयी(भरम्याशीमामिलाए। म्यनादत्य गुणागि पाहा यन पवित् ।।२।। यो याताया पूजा मोदय नमः । गंगानि वादयाजियन प्रमनन वा!ि! धारययन मा पूजा या मौत। मि...मिन्दा) की की anixs नया ii at

पूनादन्यापरणवर्णनम्
४०६४
मूनि पंचद्रव्यापि पाधान्याहुमहर्षयः ।
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मून्नाचमनीप्यस्यानि द्रव्याप्युकानिसबुधैः ।
चामे विलसिद्धार्थ यवाक्षतषयांसि च ||२||
यायमूनिपदाहुः (?) अध्यस्य मुनिपुंगवाः ।
मेसजश्रीवासकुसुमं श्रीफलं मधु ॥३०॥
नक्षाकृष्णागरः सर्पिः श्वसनः सरद्रुमः ।
गर्महिपामश्च श्रीगंधी गुग्गुलस्तथा ॥३१॥
जासश्च्यवनश्चेति धूपद्रव्याणि पोडश ।
न्येप्वेषु यथालन्ध तथा तद्रूपमर्चयेत् ॥३२॥
लाभे प्रसवेनैव धूर्फ संकल्प्य वाचयेत् ।
पूरलोहश्रीखंडेलामन्जुकचतुष्टयम् ॥३३॥
पवेदांग तुरगसख्यं सध(घ)तसाधनम् ।
न्मधुधृतं पात्रे चिततज्यालपावके ॥३४॥
क्षिप्य दद्यात्तद्धपं महासम्मोहना यात्मकम्)।
रसीतलोहोभूफालेयंकुदुरुष्करम् ।।३।।
र्यासश्चंदनंचति द्रव्याण्येतानि सप्त वै।
मेणव तु समतिं संख्ययाच्युतभापितम् ॥३६।।
युपद्यमून (द्रव्यात्मक) देव्याः तश्रियं धूपसाधनम् ।
नेपामपि विज्ञेयाः भागाः पूर्व यथोदिताः ॥३७॥
तरंगोधून केलं महादिय (क)साधनम् ।
सूपंच कापसिं तद्वर्तिकरण स्मृतं ॥३८॥

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भारद्वाजस्मृतिः ताम्बूलं भावयेच्छ्राद्धं यत्तन्नयनवल्लभम् । श्रेष्ठानि पत्रवस्त्राणि महायाणि च सर्वदा ॥६०) एपामलाभे कार्याः स्युर्वासांसि प्रयतानि वा । नेत्रप्रियाणि सूक्ष्माणि नूतनानि धनानि च ॥६।। यान्याहृतानि वस्राणि प्रशस्तानि भवंति हि । आहुर्दग्धानि जीर्णानि अन्यैरपि धृतानि च ।।६।। कृमिदुष्टानि जीर्णानि स्थूलान्युपहतानि च । दुष्करं सुप्रयुक्तानि देवताभिभूतानि च ।।६३॥ नूतान्यस्यानिलब्धानि सस्युशस्थानिजा"चित्(?) । एवं सर्व समाख्यातं द्रव्याणां लक्षणं स्फुटम् । एतज्ज्ञात्वा द्विजोदेवी सद्भिद्रव्यैः समर्चयेत् ॥६४।। ।। इति श्रीभारद्वाजस्मृतौ पूजाद्रव्योपकरणवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ अथ पञ्चदशोऽध्यायः यज्ञोपवीतविधिवर्णनम् अथ यज्ञोपवीतस्य विधि मम्यगद्विजन्मना । श्रौतस्मातक्रियासिय प्रवक्ष्ये सिलशाखिनाम् ॥ १॥ यज्ञोपवीतं धृत्वय मर्वम्माणि मथा। श्रौतस्मातानि पान्यानि कुर्यारण्यानि पतिः ॥२ ॥

यज्ञोपवीतविधिवर्णणम् अज्ञात्वाऽस्यविधि विप्रः कृत्वा कृत्यान्करोति यः। यानि कर्माणि सर्वाणि तानिस्युनिष्फलानि वै ॥३॥ तस्माद्यत्नेन कर्तव्यमुपवीतं विधानतः । विधानेन यिना जातं भवेद्गोकंठरज्जुबत् ॥४॥ अतः सम्यविधि ज्ञात्वा कुर्वीत विधिपूर्वकम् । यज्ञोपवीतं पट्कर्म तत्सत्कर्माधिसाधनम् ॥ ५॥ सह वै देहनाश्चेत्यायेसिन्जुश्रुती ()। यज्ञोपवीतं विधिवत्कृत्वा धृत्वा द्विजोत्तमः ॥ ६ ॥ ततो वेदमधीयीत श्रौतस्मातक्रिया चरेत् । इत्येवं सुदृढ़ प्रोक्त अतोदभ्यादिनान्ततः॥७॥ देवं पटकमापं च कर्म कुर्यात्सदा द्विजः। कुर्याद्यज्ञोपवीत्येव नान्यथा तत्फलप्रदम् ॥८॥ निवीतं मनुष्याणां प्राचीनावीतं देवानामितिभ्रतिदर्शनान । चतुर्णां ब्राह्मणानां च वर्णाना क्षेत्रसंभवम् ॥६॥ कासिमुपवीताधं गृहीयान (तु १) भूमिजम् । कापांसः प्रथमः सृष्टः जगस.टी स्वयंभुवा ॥१०॥ ब्राह्मण्यस्य स्थापनार्थ वेदाना स्थापनाय च। साधीनं क्षेत्र स्वस्य कापसमधमं स्मृतम् ॥१३॥ तस्माच्छ स्वयं वीजं उपत्या तत्र समुद्भवम् । स्वस्ववर्णस्वदाहि) समुत्पादितवीरधिः॥१ कापसिं यत्तदुत्कृष्टं उपवीवरता भृशम् । स्वक्षेत्रे स्वगृहाभ्यासे गुचौ देशेऽपि वा दिवा

४०७४
भारद्वाजस्मृतिः
न्चेष्टयावत्स्थलं तावदवट जानुमात्रकम् ।
गोमयेन प्रलिप्तेन स्योकवर्णान्मुदा सह ॥१४॥
अंनि निर्वबीजं सकार्पासद्वयं शिवम् ।
प्रणवेनाभिमन्येव ततस्तोयं प्रसेचयेत् ।।१।।
आपोवाइतमित्यादि सूक्त नैवाभिमंत्रितम् ।
ततः शुद्धाम्बुनैकेन तत्सस्यमनुवर्धयेत् ।।१६।।
तथा जातेषु जातं यत् कार्पासमतिशोभनम् ।
श्वेतलोहितपीताःस्युः विप्रक्षत्रविशा क्रमात् ॥१७॥
वर्णशूद्रस्य कृष्णःस्याद्वर्णोऽन्यः संकरः स्मृतः ।
स्वक्षेत्रात्स्वहृतं श्रेष्ठं कापसिं धवलं द्विजैः ॥१८॥
पितरैरपि या शुद्धं उपवीतकृतौ शुभम् ।
फलवत्नुपकेशालि तृणवल्कानि यत्रतः ।।१६।।
पात्रे पवित्रं संस्थाप्य प्रयतः शोधयेद्विजः।
तस्मिन्कराभ्यो मुच्येत कार्पासबीजसंचयम् ||२०
कामिरराजुशापेन कुर्वीत मृदु कर्म तत् ।
तेनेय द्विजम्माऽथ कार्तिकं सूक्तमुत्तमे ।।२१।।
शुदाभिर्विधनाभियास्यस्यगोत्राभिरधापि(रप्यथा) या।
पुश्पलीभीमदक्याभिःकन्यकाभिधा) पुरधिभिः ॥२२॥
तंतुम न कर्तव्यं काममूदुकर्म च ।
प्रामु न्यूनाधिकागाश्च कुस्मितावयया अपि ॥२३॥
अमौम्यापनम्नस्यु योषित(?) (योपितलाकस्सने।
गुल्यथवा कन्यापराता(स्या?) कर्मणि ॥२॥

यज्ञोपवीतविधिवर्णनम्
स्थान प्रशस्तेति केचिदाहुमहर्षयः ।
वतं स्वस्य हस्तेन सूत्रमित्युत्तमं स्मृतम् ||२||
कर्मादिभिःपश्चादशतरचेदयं यदि।
स्तंतुदोषमः कलधौतस्तुमध्यमः ।।२६।।
वस्थानकश्चेति तंतुकर्मण्युदीरितम्।
डगुलमात्रायासंगुल्यां तस्य तु प्रमा २५
कालक्षणं त्वैवं प्रोक्त तंतुकृतः खलु।
सोनतंगुले वृत्तं समातन्तुरती मता ॥२६॥
द्विधमाख्यातं यन्त्र तन्तु कियाईयम् ।
मणिशलाकान्तं संप्रोक्ष्याद्वयकायतम् IRell
नर्गतं स्थितं यत्तत्तन्तु समुदीरितम् ।
योतलोहाना लम्जेनकेन निर्मिठम् ॥३०॥
भवेदलाभ पा ययदमनिर्मित।
लोलयं तस्य न्यासमंगुलपंपकम् ।।३।।
गप्रोवान्वितं यत्तसन्नापाप्रमुच्चले।
द्वयांगुलं पात्रं तदानि. कंधरांगुलम् ॥३२॥
रोधस्तस्यविस्तारं कर्णस्य दुव्यंगुलं भवेन् ।
तन्तुमणं स्थानं पात्रं रूपात विरंगुरम् ॥३३॥
तथैव पाहतातं म्यात कर्णरंध स्थापित
सोहककुटकान्येषु यथारनेन वा कृतः ॥३४॥
काकादीनां तन्तुना घलाने वन्नुानचेत् ।
कुपन्दनरपतदिरः पवमधिमनि ॥३॥

। भारद्वाजस्मृतिः तजातिनालं तस्य स्यात् कुशनालमथापि वा। स्वर्णतन्तुकृतादीनामलाभे धनसोमपाम् ॥३६॥ शुद्धमृण्मणिसंप्रोता कुशनाली प्रशस्यते । समक्षमृन्मणिस्तक्षः तत्तुकृतंत्तुकर्तने ॥३७॥ यज्ञोपवीतस्य भवेज्जातु चिह्न द्विजन्मनः । अस्य शुद्धिर्जनस्पृष्टिोपो ह्यस्माजकारणात ॥३८॥ आस्तृश्यलोत्पादेपः (?) तन्तुयंत्रो न शस्यते । अतिसूक्ष्ममतिस्थूलं शीपं निनोन्नतं च यत् ॥३६|| यलेन कीर्तितमपि द्विजः सूत्रं तदुत्सृजेत् । म्लानं यंत्रक्रियायुक्त उपयुक्तसुरैधृतं ॥४०॥ दग्धं तष्टं मुष्टिकाद्यैः यत्तत्सूत्रं परित्यजेत् । पूयशोणितविण्मूत्रश्लेष्मोच्छिष्टैश्च यद्यपि ॥४१॥ संस्पृष्टं तद्भवेत्सूत्रं उपवीतकृतीन हि । उपक्रम्य प्रतिपदं यावत्स्यात्पूर्णिमावधि ॥४२|| शुपक्षःस्मृतस्तावत्या मध्यावतः पुरा। स्वाध्यायोक्ततिथौ पुण्ये नक्षत्रे शुभवासरे ॥४३॥ मार शुचिः शुचौ देशे मसूर्य प्रकल्पयेत् । स्वाध्यायपठने योग्यातिथयो या प्रकीर्तिताः ||४|| तार स्वाध्यायतिथयो पक्षान्ते पुष्पहानि । चित्राश्विनीशनभिपरस्यानिपुष्या:पुनर्वसू ।।४५. इसचिपिष्टानुराधा(विशायानगरखनीरोहिणीप्रभम् । उत्तरविनयं मूलविशासा इरितारमा lisait.

यज्ञोपवीतविधानम्
एतान्यष्टादशोणि पुण्याण्यक्षयाजनुः ।
हस्ताभिजिद्नुराधश्वयुक्प्रौष्ठ पदासयाः ॥४४॥
तिप्यः पुनर्वसूचेतिताराः पुंसनका इमाः।
आसूपवीतं कुर्वीत द्राकर्मफलवाचकः ॥४८॥
भृक्षेषु जन्मश्रेष्ठःस्याभतुथं पहमष्टकम् ।
द्वितीयं नवमं चान्यस्यस्वतारा: शुभेवरा: ४६
तृतीये सममे पप्ले दशस्वप्त्य(स्व?) जन्मनि ।
एकादशे स्थितश्चंद्रः शुभप्रद इति स्मृतः।
ताराचंद्रबलोपेते दिवसे स्वस्य कल्पयेत् ।।६।।
ब्रह्मसूत्रं तयोहीनबलेनेव प्रकल्पयेत् ।
भूगर्वयजुः साम्नो कमादेतेऽधिपाः स्मृताः ॥२१॥
देवेड्ययेमरुम्पुत्र देतेयाराभ्यभूमिजाः ।
म्वम्ववेदे शखेरीवस्यवारेतदुदयेऽपिवा ॥२२॥
विधिनोपयीतानि तदलाभे शुभेडानि ।
वृहस्पति: मुराचार्यः रोहिणेयो हिमांशुकः ॥४३॥
एते शुभमहात्वा यासराः शुभवासराः।
देवस्थान नदीतीरभानमं गोनितिनम ॥४॥
भठरचतेषु लन्येप कुर्यायसोपचीनम्म ।
प्रविष्णुशियम्सूर्य: दुगांगगपतिह: १४५६
एतेपान्तु मुनिस्थानं देवस्थानमिति स्मृतम् ।
गंगादिसरिता पूळ नदीतीरमिनिस्पृहम ॥१६॥

०७८ भारयाजस्मतिः तपोवनमपीणां यत्तत्तदामममिति स्मृतम् । वासस्थानं गयो यत्तदुदितं गोनिकतनम् ॥२७॥ स्थान तपस्विना यम भवेत्तस्यमदाद्वयम् । स्नात्वा शुचिदिजः |ष्ठरचरणी च कमावतः ॥८॥ प्रक्षाल्याचम्य विधिवत्याक्मुखो वाऽप्युदङ्मुखः। कृष्णाजिनासनालाभेकुरायलमासनोऽपिया ॥१६॥ स्थित्वा समाहितमनाः प्राणायाम समाचरेत् । ततो गणेश्वरं वाचं स्वाचायं त्रिदशानृपीन् ॥६०॥ पितृन्ब्राह्मणमज्जाक्षरुद्रभक्याभिवादयेत् । ततः प्रणवमुचार्य व्याहृतित्रितयं ततः ॥६॥ नवतीसङ्ग्रहोयात्तत्सूत्रं चतुरंगुलैः । तदेवाचिररूपेण कुर्वीत त्रिगुणां ततः ॥६२॥ तत्संप्रक्षालयेच्छुद्धैरम्बुभिः प्रणवेन च । व्याहृतित्रितयेनाधस्तत्पूर्वोपरि निक्षिपेत् ॥६३।। आपोहिष्टादिभिर्मन्त्रैः कुशस्तन्मा येत्रिभिः । हिरण्यवर्णा इत्याद्यैश्चतुर्भिर्जियेत्ततः ॥६४॥ पवमानानुवाकेन ततो मार्जनमाचरेत् । उपवीतकृतौ विप्रः शुद्धौ द्वौ देवभाषितौ ॥६५॥ एकोनं वा ततो विप्रश्चान्यो मध्यमधारकः । प्राप्रत्यग्वदनो विप्रः दक्षिणाभिमुखोऽपि वा ॥६६॥ .

यज्ञोपवीतविधानम् ४०७६ स्थित्वापठन्स्मरन तुल्यं तत्सूत्रमनुपत्रयेत् । उञ्चरन्त्रणवं पूर्व व्याहृतित्रितयं तथा । शनामस्वहस्ताभ्यां अदाव्यमोजुपर्तयेत् ॥६॥ तत्सूत्रं त्रिगुणीकृत्य तैरप्राभ्यां विभिःसका। प्राणानामंद्धि(?)दसीत्युक्वाथ परिवेष्टयेत् ॥६॥ उञ्चरन्त्रणवं पूर्व व्याहृतित्रितयं तथा । शनर्धामं स्वहस्ताभ्यां तथाव्यमोनुवर्तयेत् ॥६॥ नरा मृगाः पतंगाश्च संधानेचानुपेष्ठयेत् । सूत्रस्याधो न गन्तव्याः गताश्चेद्युदत्तस्त्यजेत् १७०11 विभूत्रांगारकेशास्त्रिचर्मकिमियोपरि । अनुवर्तनसंधाने सूत्रस्य न समाचरेत् ।।७११॥ कपालोन्टिष्टनिर्माल्यतुपधूमेरिणोपरि । न चानुवर्तयेत्सूत्रं संदानं चास्य नाचरेत् ।।२।। यज्ञोपवीतशिल्पस्य नयकस्य प्रमाण । सिद्धार्थस्यापि प फलस्थूलम्योक्तं महपिभिः १३।। स्थूलफलस्य तूरस्य मध्यमस्य वृतां न । तत्र श्रेष्ठ मध्यम स्यात् कनिष्ट समयः स्मृतम् ।।७४॥ आयुहरंतूलाल्पं वपोहरं ( कनिष्प)। उत्तमप्रमाणं शल्पं यदुपवीतं करोति शम् ॥ एवं ज्ञात्वानुवाऽयः कुशौरमा कुशान्ते । देशे प्रसार्यदर्भो नौ दत्वा कुकरचनिन् । A

०८२
भारद्वाजस्मृतिः
सूचनात्स्वधरस्यैव सूत्रमित्यभिधीयते ।
यज्ञोपयज्ञयागांगोगोपवीतं (?) लक्षणाद्वयम् ॥ll
यज्ञोपवीतमित्युक्त तस्य संरक्षणतः सदा।
अग्निटोमादयो यज्ञाः एतत्सम्यद्विजन्मनाम् ॥१००ll
सततं सूचनादेतद्यज्ञसूत्रमिति स्मृतम् ।
रुद्रश्चतुर्मुखो विष्णुरप्यन्येऽमृतभोजनाः ।।१०।।
शश्वद्धधत्यतोदस्तद्देवरक्षेति चोच्यते ।
भूरितेजोवायुश्चप्राणाआत्मत्रयं तथा ॥१०२।।
क्रमाद्भवंति तंतूना सदानामधिदेवता ।
प्रथित्रयस्याधिपाःस्युः पितामहहरीश्वराः ॥१०३||
यज्ञोपयीतकारस्य परं ब्रह्मादिदेवतम् ।
तन्तुमाहो प्रन्थिकृती सूत्रसन्धारणेऽपि च ॥१०॥
देवानेतान्हृदि स्मृत्या नमस्कुर्वीत भषितः ।
एकैकमुपयीतं स्यादात्यंताथमिणोद्वयोः ।।१०।।
दरााष्टो वा गृहस्सस्य पत्यारि वनचारिणः ।
एकमेव यतः मूत्र तथैव ब्रह्मचारिणः ॥१०६।।
मोचरीयं गृहस्थस्य तथव वनचारिणः ।
कृष्णमारंगवतानां बजनं क्रमशःस्मृतम् ॥१०॥
मरोन्ननम्निम्बमकृष्णधवलं शुभम् ।
थर नोपयुन यत् प्रशस्नमजन स्मृतम् ।।१०८।।
स्तन रलैगचिरं यथ्यापाक्षिपियं यथा।
धायं धषियापुत्रम नरोदिनगनुना ॥१०॥

alvetfeeta imirmireti wriminuternatmtal Ment worlms Tretstetriimitate tutations Direcratel Bre andमि। aniran Ritam) मा Amanatantrivो। Referefusmssyvमामा rafaltimesमाता - पाwिome मनुगमम ॥११॥ पाम: कापा yिa परियापन। बाप पीमिन्युईन पारिणः ॥११॥ सम्मानित पा पानापम्पयापिकात। सामगंग पराप नूतनम ॥११॥ गुनासपा पागुरम। गाय पामिनि गम् ॥१११. पां हाय विमायाअमदीपः । शनिमामियाय पोष दि॥१६॥ परयाणि पोदितानि महीनठे । रवाय पोतानाणीत्यानुः पिन्महर्षयः ।।१२८|| भारताउस्मृतिः मुभिविषम्य पालाराः नृपस्यौदयरो विशः । घेल्या विशः ममान्यातः क्रमेण ब्रह्मचारिणः॥१२।। विप्रम्य दंदः पालाश: नय्यामाधी महीपतेः। वैश्यस्यौदंबरः प्रोक्तः अलाभे त्यप्रजन्मनः ॥१२२]] पालाशयिल्यो विप्रस्य पंपलं अग्रियम्य तु । वैश्यस्य पलयो दण्डः समानि ब्रह्मचारिणः ॥१२॥ स्वस्य शासोदंडानामलाभे मसोमपाम् । सर्वेष्यपु यथारब्धी दडःस्यात्संकटस्थले ।।१२४|| नृपस्य स्वस्य वैश्यस्य भवेयुः सर्वभूम्हाः । स्ववृक्षा पय वैश्यस्य दण्डसंग्रहणे स्मृताः ।।१२।। गृहस्थस्यवसस्तस्य यतेरासु त्रिजातिए । वेणुदंडः प्रशस्तःस्यात् निर्दोप"प्रणकः(१) ॥१२६।। गुह्यारण्यस्थयोर्दण्डो युपर्यो यतिनोऽन्यथा। शिरःप्रमाणं विप्रस्य क्षत्रियस्यालकोन्नतम् ॥१२॥ प्राणप्रमाणं वैश्यस्य दंडमेवं क्रमास्मृतम् । क्रिमिदुष्टः स्वयं शुष्कः सरंध्रः कुटिलो लघुः ।।१२।। श्रितो निर्वल्कलो दंड यो न योग्यः स कथ्यते । सत्रणः फलकाकारः परमो नवकन्दकः॥१२६।। जीर्णोवयुक्तो यो दंडोन योग्यःस्यात्सदारणे । समच्छेदागुलव्यस्तो पकाऽऽयामः सुवर्तुलः ॥१३॥ चक्षुस्याभिनवो दंडो योऽसौ सकलसिद्धिदः । एतैश्चदोपरहितैर्वध्यानयनवल्लभम् ||१३|| र.

यज्ञोपवीतविधानम् ..,३१६५
दभ्याइंडं नृपस्तद्वतत्पुरोगस्य च तत्सुतः।
विप्रस्य धवलच्छ तानं छत्र महीपतेः॥१३२।।
पीतच्छचं विशः कृष्णच्छ छत्रं शूद्रादिजन्मनाम् ।
द्विजन्मनः चतुस्तालं दशतालं नरेशितुः ।।१३३।।
पंचतालं विशञ्छनं विस्तारः क्रमशःस्मृतः ।
स्वस्वोक्त वर्णसूत्रेणवध्वाछत्रं यथादृढम् ॥१३४||
स्वस्वोक्त वाससाऽऽच्छाद्य संगृहीयु द्विजादयः ।
सर्वेषां वेणुदंडःस्यादलाभेवार्भ एव वा ।।१३।।
श्लेष्मावककरंजाक्ष वृक्षाःसन्यासिनां शुभाः ।
चतुष्पष्टयं गुलायामः ब्राह्मणस्य महीपतेः ॥१३६।।
एकोनवत्यंगुलै छौं द्विसप्तत्यंगुलायतः ।
वैश्यस्यैवंकमाइंदः छत्रस्तु समुदाहृतः ॥१३॥
तेषां नाई यथा योग्ये दंडानामित्युदाहृतम् ।
स्वखोकवस्त्रणकृतं प्रथमात्यानमस्पयोः॥१३॥
द्विजछत्रमितिप्रोक्तमितरैनधृतं पुरा।
घनछत्रस्यशूद्रादि स्पृष्टिदोयोऽस्ति सर्वदा ॥१३॥
वृक्षपूतानि पाप्राणिददत्यस्य न ज्ञातुचित ।
पलाशकेतकीतालनारिकेलादिभूरुहाम् ॥१४॥
पात्रराराराधितंछवं अन्यं स्यादप्रजन्मनाम् ।
पट्टे देवांगचीनादि चित्रांशुकविनिर्मितम् ॥१४॥
चित्रंयन्मोतिकच्छवं होमछत्रं महीपतेः ।
बातिपत्रं सर्वेपी अमीषामितिभापितम् ॥१४॥

.
२१८६
भारद्वाजस्मृतिः
फ(प)लाशकृष्ण छत्रे द्वे शूद्रादीना नृणां स्मृते ।
सुवर्गरजिताशाल्पात्रिविधाकुंण्डिका स्मृता ॥१४३।।
उत्तमामध्यमानी च पूर्वोक्ता च यथाक्रमात् ।
अपामूढ़कवाङ्भानश्रेष्ठानि प्रस्थवामिता ॥१४४||
मध्याद्विप्रस्थवाङ्भौना कुंडिकास्यात्कनीयसी।
कांस्यपित्तललोहैर्वा कुर्यात्स्वर्णाद्यलाभतः ॥१४॥
स्वर्णाद्याख्यातविधिना कुंडिकामुखवद्विजः ।
आसामलाभे गोचर्मनिर्मितःस्याकमंडलुः ।।१४६॥
अन्यानिपिद्धत्वग्जातो भवेत्सापि कमंडलुः ।
वैरूप्यताम्रकुर्वीतकाराधारजलानयम् ॥१५॥ .
अलाभेयज्ञवृक्षण कुतिजलपद्धतिम् ।
मृत्तिकाभस्मलोघृत्वकपायाम्युफलप्रयम् ॥१४८।।
एककम्दिनन्या पूरणाचर्मगुभ्यति ।
पश्चात्तु पंचदश्यातुप्रक्षाल्याऽथ शुभैलः ॥१४६||
प्रक्षाल्यापूयं तत्तोयं उपयुंजीन सर्वदा।
त्वफ्मारनारिफेलाप्रक्षालायुफले पु च ॥१५॥
एतेप्यपि यथारब्धो भयेद्वाऽपि कमंडलुः ।
भन्यैरनुपयुमायाः मुखिकामा शुभप्रदाः ।।१५।।
उपयुन्धानसमासः अपवित्रो द्विजोत्तमैः ।
घजामेसरलोत स्वरायः सदा द्विजः१५)।
एपामुच्चिरतानाधिनसावध कपालमा
ययः पात्रमयोग्य स्थानानापमनमणि ॥१५॥

यज्ञोपवीतधारणविधिः सबस्थितं धनरसं नोपयोज्यं द्विजन्मभिः । यज्ञोपवीतं वैवक्ष्य मेखलादंडमबरम् । छत्रदंडकडल्वाः (डलूनी) विधिरुतः सलक्षणः॥१४॥ ॥ इति श्रीभारद्वाजस्मृती यज्ञोपवीवविधाननाम पञ्चदशोऽध्यायः॥ अथ पोडशोऽध्यायः यज्ञोपवीतधारणविधिवर्णनम् अथ यज्ञोपवीतस्य धारणे कथ्यते विधिः। स्नात्वा शुचिः शुचौ देशे प्रक्षाल्य चरणो करी ॥१॥ पवित्रपाणिराचम्य प्राङ्मुखोवाप्युदङ्मुखः । उपविश्याऽथदर्भेषु प्राणानायम्यवाम्यतः ॥ २॥ आचार्य गणनाथं च याचन्देवानृपीनपितॄन् । ब्रह्माणमच्युतं रखें नमस्कुर्वीत भचितः ॥३॥ अथोपवीतं विधिना संज्ञावं तद्विजोत्तमः। जपेत्रियम्बकं मन्त्रं स्पृशन्दक्षिणपाणिना॥४॥ दक्षिण पाणिमुदत्य शिरसैवसहद्विजः। मंत्रं सदरमुभायं ब्रह्मसूत्र गले क्षिपेत् ॥५॥ यज्ञोपची समित्यादि मंत्रमन्यतदीरितं! यस्ययज्ञोपवीतेयन्भनमुक्कमयापि वा।।६।। .

११८८
भारद्वाजस्मृतिः
अथ द्विराचमेदेवं सदैव ब्रह्मचारिणः ।
विना यज्ञोपवीतेन द्विजातीनां न चेतरत् ।। ७॥
गृहस्थस्य वनस्थस्य सूर्य प्रति पुनः पुनः ।
मंत्रोचारणमाताम्रा(माम्नातं) द्वितयं क्रमशःस्मृतम् ॥ ८॥
अनेनोक्तप्रकारेण धारयेयुर्द्विजाः सदा ।
अनेन वेदाः कर्माणि यज्ञाश्च बहुदक्षिणाः ॥६॥
विना यज्ञोपवीतेन द्विजातीनो न चेतरत् ।
जपहोमार्चनम्नानस्वाध्यायाहारकर्मसु ॥१०॥
चुदा(द्धा) तिथिगुस्माप्ती उपवीतो भवेद्विजः ।
ब्रह्मादि देवता:स्थिसौ( सर्वे) देवताश्चेतरा अपि ॥११॥
उपवीतधरास्तस्माद्धार्यमेतद्विजातिभिः ।
आज्ञावन्तो वशिष्ठाद्याः ऋषयश्चतपोऽधिकाः ।।१२।।
धृत्वा चैतत्प्रसादेन जीवंतस्ते चलान्विताः।
नियमेन सदा धार्य उपवीतं द्विजोत्तमैः ॥१३॥
कदाचिदपि नो धायं शूद्रेरितरजातिभिः ।
आमेखलामर्जनं वस्त्रं दंडं छत्रं कमंडलुम् ॥१४॥
स्वस्वगृह्योदितमंत्रैः द्विजोदध्याद्विचक्षणः ।
अज्ञाता यदि चेन्मंत्राः स्वस्वगृह्य पु चोदिताः ॥१२॥
उपवीतमुखाना वै ते संधारणे द्विजः।
केवलं प्रणयो वाऽपि व्याहृतित्रितयं तु चा ॥२६॥
स्याता विप्रादिवर्णषु द्वावेतौसर्वशाखिनाम् ।
प्रणवः सर्वमन्त्राणां पितेत्याहुमहर्षयः ॥१७॥

यज्ञोपवीवधारणविधिः
३१८६
ॐ मिचिब्रह्मचेत्याचतिवाक्यनिदर्शनात् ।
सर्वेपामेव अंतूनां व्याहृतित्रितयन्तु वा ।।१८।।
भूर्भुवः सुपरित्येतद्व्याहृतित्रितयं स्मृतम् ।
भूर्भुवः स्परित्येच एतास्तिस्रो व्याहृतयः ॥१६॥
भूक्सामयजुरंगानीत्यागमोक्तिनिदर्शनात् ।
एतास्तिस्रो द्विजो वेत्ति सरहत्यं सकल्पकम् ॥२०॥
स हि देवः परं ब्रह्म तदंते यात्यसंशयम् ।
चतुरंगुलविस्तारं शिवामूलं द्विजन्मनः ॥२१॥
राज्ञः पंचांगुलंन्यासं वैश्यानां वै तथैव च ।
स्थापयेयुः शिरो मध्ये शिखा सर्वे द्विजातयः ॥२२॥
स्वमप्युक्तस्थले वाऽपि खर्श(ल्याटस्य न चोदितः ।
यज्ञोपवीतममलेश्रुतं वा वीत(क्रीत)मापणे ॥२३॥
धार्य न जातुचि?ममन्तरेणोपवीतकम्।
हैमंसतारवैकक्ष्यं उपवीतं सलक्षणम् ॥२४॥
धार्य सहोपवीतेन देव पतिभिः सदा ।
एकेन हैमसूत्रेण कुत्रीत लवनत्रयम् ॥२५॥
नयतंतुं स्मरेथैव प्रतिष्ठासमये धुरः ।
शुल्पत्थूरोऽथ वा सूक्ष्मो न हि वनियमोऽत्र तु ॥२६॥
नेत्रशोमी यथाजाति कुर्याद्धमोपवीवकम् ।
हेमयज्ञोपवीतस्य न संख्यानियम.कृतः ॥२॥
एकसंख्यादिपयंतंयलयं तत्प्रमाणकम् ।
तारखैमक्ष्यविस्तारं एकांगुलमुदाहृतम् ॥२८॥

३११२
भारद्वाजस्मतिः
प्रोतः स्मातक्रियाः कुर्यान्नवतरूलभाग्भवेत् ।
द्विजो नष्टोपबीतश्चेदुपवीतं परं द्विजः ।।५।।
आचम्य सन्नियम्याऽय मंत्रेणेव च धारयेत् ।
धारणात्यानिमज्याः मु तूष्णीतत्पुरतः स्थितः ।।२।।
नवतंतुरतं सूत्र प्रणवेनैव धारयेत् ।
उपवीतो स भूत्वा च यन्नादाचम्य यथाविधि ॥३॥
यज्ञोपवीतं विधिवत्कृत्वा दध्याद्विचक्षणः ।
यथावदेवोक्तपक्षतिथ्याहःकालभूमिषु ।।४।।
कृत्वा यज्ञोपवीतानि धारणाधं विनिक्षिपेत् ।
यथाद्विजन्मनःप्राप्त उपवीवस्य धारणम् ।।५।।
समं सर्वाश्रमस्थस्य तथैव तानि धारयेत् ।
यज्ञोपवीतं ये दध्युर्मोहान्द्रादयोनराः ॥५६॥
ते पापिनः पतिष्यन्ति महानरकयारियो।
तंतुना वाऽथवान्येन कृत्वा यज्ञोपवीतवत् ॥५ull
विभर्ति शूद्रो यदि यः सोऽपि यास्यति दुर्गतिम् ।
पादजात्यायज्ञसूत्रं मनुजा दधते हृदि ।।८।।
तांश्च धृत्वाऽथ वधर्मद्रव्यं नृातिहरेत् ।
इवोपवीतं दृष्ट्वाश्रुत्वाथ वा नृपः ॥५६॥
यदि तूष्णी समासीउ नरकान्दो चिरं वसेत् ।
अतः सर्वप्रकारेण कुर्यात्तदनुशासनम् ॥६॥
इहोपरि सुखं प्राप्य धर्मशास्त्रार्थमार्गतः ।
विना यज्ञोपवीतं यो यद्यासीतविचक्षणः ॥६॥

यज्ञोपवीतधारणविधिः उपवीती ततः शुद्धः स गायत्रीशतं जपेत् । द्विजन्मना प्रशस्त्येतरछे भेदे तथैव च १६२|| पितामहाख्या:श्वर्देवा: भूमिदेवा द्विजोत्तमाः । उपवीतमतो धार्य नित्यं तेनैव नेतः। अनामिकादेववाहु मूल देकं प्रमाणकम् ।।६३३१ ॥ इति श्रीभारद्वाजस्मृतीः यज्ञोपवीतधारणविधिनाम पोडशोऽध्यायः।। अथ सप्तदशोऽध्यायः यज्ञोपवीवमन्यस्यपिच्छन्दआदिनाचर्णनम् इति यज्ञोपवीवस्येत्याहुः फेचिन्मयः । अयानाख्यातो मंत्राणो भूपिच्छंदोऽधिदेवताः ।।१॥ विनियोग क्रमेणैव प्रवक्ष्यामि पृथक् पृथक् । प्रणवस्य भूपिन झा परमात्मा च देवता ॥२॥ छदस्तु देवी गायत्री विनियोगः क्रियावशान् । देववाजपकाले तु तेऽपिहोमे हुताशनः ।। ३ ।। भ्यानकाले परं मा विश्वेदेवान्तु देवताः । भूरादीनां सप्तानो ब्याइलोना ययामम् ॥ ४ ॥ भूपिरन्छन्दो देवताश्च प्रवक्ष्यानि प्रपन अविभूगुधवत्सश्च वशिष्ठो गौतमतया ॥५॥ " भारद्वाजस्मृतिः श्रोतः स्मार्तक्रियाः कुर्यान्नैवतस्फलभार- द्विजो नष्टोपवीतश्चेदुपवीतं परं द्विज आचम्य सनियम्याऽथ मंत्रणेव च धा धारणात्प्राङ्निमज्याः सु तूष्णीतत्पुरत नवतंतुरतं सूत्र प्रणवेनैव धारयेत् । उपवीती स भूत्वा च यत्नादाचम्य यक यज्ञोपवीतं विधिवत्कृत्या दध्याद्विच यथावदेवोक्तपक्षतिथ्याहःकालभूमिपु कृत्वा यज्ञोपवीतानि धारणार्थ विनि यथाद्विजन्मनः प्राप्त उपवीतस्य धार समं सर्वाश्रमस्वस्य तथैव तानि धारद यज्ञोपवीतं ये दध्युर्मोहाच्छूद्रादयोन ते पापिनः पतिष्यन्ति महानरकवा तंतुना वाऽथवान्येन कृत्वा यज्ञोपर्व विभत्ति शूद्रो यदि यः सोऽपि यास्य पादजात्यायज्ञसूत्र मनुजा दधते हा तांश्च धृत्वाऽथ तच्चर्मद्रव्यं नातिहरे, हतोपवीतं दृष्ट्वाश्रुत्वाथ या नृपः॥ यदि तूष्णी समासीउ नरकान्दो अवः सर्वप्रकारेण कुर्यात्तदनुशास. इहोपरि सुखं प्राप्य धर्मशाला विना यज्ञोपवीतं यो यद्यासीतथि

यज्ञोपवीतछन्दशादिवर्णनम्
हिरण्यवर्णाइतिचतुर्णा मंत्राणां परमेष्ठीमृपिश्चंदा ::
विष्टुम्देवता स्यात् अपांसंप्रोक्षणे विधिः ॥१६॥
परमांशस्य मुनयो विश्वेदेवाः प्रकीर्तिताः ।
प्रथमस्य द्वितीयस्य गायत्रं छंद उच्यते ॥१७॥
अनुष्टुपव तृतीयश्व गायत्री चोपरि द्वथा।
पष्टसप्तमयोस्रिष्टुगायत्री चाष्टमस्य तु ॥१८॥
नवमप्रभृत्यष्टानां अनुष्टुपविष्टुबत्यकम् ।
लिंगोक्तादेवताः प्रोक्ताः विनियोगातु मार्जने ॥१६॥
भूरमिचादि सूक्तस्य प्रजापति ऋपिः स्मृतः ।
स एव देवता छन्दो यजुरित्यभिधीयते ॥२०॥
आसत्यादीनां चतुणी हिरण्य स्तूपको अपिः ।
विष्टुब्यनुएगायत्री त्रिष्टुप्छंदांसि वै क्रमात् ।।२१।।
पां समत्तमंत्राणां देवता तिग्मदीधितिः ।
विनियोगश्चकथितः सूर्यसंदर्शकर्मणि ॥२२॥
वसिष्ठात्य॑वकमनोः मुनिर्देवस्त्रियंबकः ।
छंदोऽनुष्टुविनियोग उपचीताभिमंत्रणे ॥२३॥
उपवीतमनोर्ब्रह्म मुनिदाश्च देवताः ।
छंदखिदुविनियोगः उपचीताभिमंत्रणे ॥२४॥
प्राणानास्थिरसीत्यस्यब्रह्ममुनिर्यजुश्चंदः ।
प्राणोब्रह्मयजुरछंदइति स्मृतम् ।।२।।
सवितापाश्विनीपूर्ण भवेयुरधिदेवताः।
उदुत्वंजातवेदस्य पूर्वमेवसमीरिताः ॥२६॥

AR
भारद्वाजस्मृतिः
ऋषिश्वंदो देवताश्च विनियोगमथात्र तु ।
आवहंतीत्यस्य ब्रह्मा ऋपिश्छंदोऽधि देवताः ॥२७॥
अनुष्टुप्छामहावंती (१) च नियोगःशखधारणे।
प्रयोगकाले मंत्राणां ऋपिश्छंदोऽधिदेवताः ॥२८॥
विनियोगं च संस्मृत्वा नवा मंत्रानथोच्चरेत् ।
अज्ञात्वैतान्प्रयुक्ते यः मंत्रास्तत्रक्रियासु च |
तस्यतत्तत्फलप्राप्तिढिजस्य न भविष्यति ।
शास्त्रमेतच्चतुर्वर्गफलसाधनसाधकम् ।।३०।।
यावन्ति तस्य विप्रत्य नासाध्यमियोपरि ।
अध्यायोयोद्विजश्रेष्ठः वाच्यःश्राव्यश्च सर्वदा ।
ब्राह्मण्यस्थापनार्थच स्वाध्यायस्थापनाय च ॥३१॥
।। इति श्रीभारद्वाजस्मृतो यज्ञोपवीतादिविधानंनाम
सप्तदशोऽध्यायः ।।
अथ अष्टादशोऽध्यायः
सप्रयोजनकुशलक्षणवर्णनम्
कुशस्य च पवित्रस्य लक्षणं तत्प्रयोजनं ।
सकलं कथ्यते स्पष्टं फर्मानुष्ठानहेतवे ॥१॥
श्रुतिस्मृतिपु याः प्रोक्ताः नित्यनैमिचिकाः क्रियाः।
कुशैविना कृताः सर्वा निष्फलाःस्युद्धिजन्मनाम ॥२॥

३
सप्रयोजनकुशस्यमाहाग्राह्यत्ववर्णनम
तस्मात्समस्तकार्येषु मंत्रवस्तु द्विजोत्तमः ।
प्रयतश्च प्रसन्नात्मा कुशहस्तः समाचरेत् ।। ३ ।।
पापाहयः कुशब्दास्याच्छ.शब्दःशमनातयः।
तूणेन पापशमनं येनैतत्कुश उच्यते ॥४॥
कुशहस्तश्चरेत्स्नानं कुशहस्तः सदा जपेत् ।
जुहुयात्कुशहस्तश्च फलवाप्त्यभिलापुकः॥५॥
कुशस्य मूले मध्ये प्रे ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।
सदावसन्त्यत: श्रेष्ठः कुशः. सकलकर्मसु ॥६॥
नदीतीरेऽब्धितीरे तीर्थक्षेत्रे च कानने।
जातः कुशः समस्तासु क्रियासु श्रेष्ठ उच्यते ॥७॥
तत्रापि च द्विजन्मादि द्विजात्यवनिसंभवः ।
तत्तजाति क्रियायोग्यः अलाभे वास्यमूभिजः ।। ८॥
पाटलारुणपीताःम्युः विप्रराड्वैश्यभूमयः।
कृष्णापलभूरन्याभूर्मुहुः संकरा:स्मृताः ।।।
द्विजोवैश्योनृपश्शूदो इत्यये स्थाश्चतुर्विधः
गौरपीतामणश्यामः सुमन्योकिर्यथा समान् ॥१०॥
पुमांबीलीय इत्येवं तत्रापि विविधाः स्मृताः ।
तत्तजातिकियाम्वेय प्रयोजन्यः पलार्थिभिः ॥१३॥
होनाभि प्रयोकल्यः सोधुकर्ममु जानुचिन् ।
स्त्रीपुंसामेच सर्वत्र प्रयोक्तव्या पतामतः ॥१०॥
समन्ताधूसरोगायः पुरुषाचन्दनः कशः ।
समतर्मसु श्रेष्ठः पुमान्योइनो फलपदः ॥१३॥

६ ६६ भारद्वाजस्मृतिः ऋषिश्लंदो देवताश्च विनियोगमथात्र तु। आवहंतीत्यस्य प्रझा ऋपिश्छंदोऽधि देवताः । अनुष्टुप्छामहावंती (१) च नियोगःशस्त्रधारणे । प्रयोगकाले मंत्राणां ऋपिश्छंदोऽधिदेवताः ॥२८॥ विनियोगं च संस्मृत्वा नत्या मंत्रानधोचरेत् । अज्ञात्वैतानप्रयुक्ते यः मंत्रास्तत्रक्रियासु च ।।२६।। तस्यतत्तत्फलप्राप्तिद्विजस्य न भविष्यति । शास्त्रमेतचतुर्वर्गफलसाधनसाधकम् ॥३०॥ यावन्ति तस्य विप्रस्य नासाध्यमिहचोपरि । अध्यायोयोद्विजश्रेष्ठः वाच्यःश्राव्यश्व सर्वदा। ब्राह्मण्यस्थापनार्थच स्वाध्यायस्थापनाय च ॥३॥ ।। इति श्रीभारद्वाजस्मृतौ यज्ञोपवीतादिविधा नाम सप्तदशोऽध्यायः ।।

कुशंस्यमायामाहत्ववर्णनम् भाचम्य सुमना: सम्यक् प्राणायामधारयेत् (थाचरेत् । तो निलविनं वायु यमं वरुणमश्विनौ। औपधाशं शचीनाथं विश्वेदेवान् सरस्वतीम् ॥२५॥ देवानपीन्पितन संदं गुरून् गणपति दतः । बसूनरुद्रस्तिथाऽदित्यान्द्रहाविष्णुमहेश्वरान् ॥२६॥ देवाश्च हृदये ध्यायन्नमस्र्यापृथक् पृथा। ततीदाण पूर्वाश्यः उदयास्योऽय वा शाम् ॥२५॥ मुष्टिमायोपरिष्ट्रातु दिशात्मणवमुपरन् । तकिया शिष्य आभिचारार्थ तथा ॥२८॥ दक्षिणाभिमुसोपियामाधीनापीतिको द्विजः। भिप्राधपूर्वकांस्यका कुशान्यद विजसत्तमः ॥२॥ अन्यान् सलमणकुशान् संगहोयालयमः। त्रियुगुल्वं कुशः कृत्वा मागर्म योदगमम्म ॥३०॥ चितन्य प कुशानेनानिमपत्तमिन्यथा पुरा। पश्चाशुल्केन तेनैव इदं पध्यान यथासम्म ३॥ प्रागमनुदग या गु देशे पिंदरहे। पिएल्वं विपरीत श्वित्य प॥३॥ ततोऽनुपहतं गते गमा: पानि पुरिमान । राधान्शाताना मानानN HERE रोवरमानि समाज कति पटमार। शुनागुनसराईलमा hai

भाग्याजस्मति:
गरंग टेक मटा कमरिणः कराः।
कपिनाइलागेन पनिरीनागनासिना ||३||
भिपजा गिना गराः यमस्वरोमनः ।
देवलेन मंटन मायेन मानहानिना ॥३६॥
पायः पानपिना गटः शोनुष्टंयकम्।
रक्तश्लप्मादिभिः सः क्रियायुम्नः पुरामतः ॥३॥
उदिष्टजनसंपृष्टः कुराः कर्मविनारामः।
सूतिकात्रयकार्यश्य शातपूर्वाभिसारिका ॥३८॥
अन्याः सदापायाताभिः कुशःस्पृष्टः क्रियारिपुः ।
दोपरेवंविधैरन्यैरविस्पृष्टः प्रमादतः ॥३॥
कुशः कर्मस्वयोग्यःस्यादाघ्रातः पशुभिः स्मृतः ।
पिंढर्मणि ये युक्ताः कुशा ये पितृतर्पणे ॥४०॥
उच्छिष्टेऽपि च ये युक्ताः ते योग्या न हि कर्मसु ।
दोपानष्टान्कुशो त्यवान् कुशक्त्वीक्तैर्गुणयुधः ॥४१।।
शृतिस्मृत्युक्त कर्माणि वारयेत्कर्मसिद्धये ।
कुशालाभेश्ववालोवा विश्वामित्रोऽभिवारितः॥४२॥
दूर्वा चैतेषु यो लब्धः तेन कर्म समाचरेत् ।
अत्रोक्त कुशमुख्यानां तृणानां स्युः पृथक् पृथक् ॥४३॥
नामान्यमूनि सर्वेषां देहोवर्हिः कुशस्मृतः।
अतःश्रेष्ठतम कर्म अन्यश्रेष्ठोऽपि वा कुशः॥४४॥
विश्वामित्राश्च वाली द्वौ तथावितरी स्मृतौ।
शवत् ॥४॥

कुशविधानम् ३२० जलाशयेपुजननं यस्या सावश्ववालकः । श्रुतिस्मृतीनांमित्रत्वाद्विप्राणां विश्वकर्मणाम् ॥४६॥ विश्वांइसाममित्रत्वात् विश्वामित्रमिति स्मृतः। यो नित्यमोघदीप्वेकोनृभिर्योज्योऽनुवासरम् ॥४॥ जनेप्वयं प्रसिद्धत्वानोक्त संयुक्तलक्षणम् । पलाशमल्पदीर्घ च संधिकं कुरुसंभवम् ।।४८॥ कुशनालुलतारूपं यत्तदूविभापितम् । दु स्वप्नचाची दुःशब्दः या शब्दो नामसंज्ञकः ॥४६।। 'दुःस्वप्ननाशकत्वेन यत्तहर्वेति कीर्तिता। विधिना स्वीकृतान्दर्भान द्विजमान्यान्विजन्मनः ॥५०॥ अनुष्ठानाय शौर्येण नाहरेज्जातुचिद्विजः । तदनुज्ञा विना विप्र कुशानाइत्य यदि ॥५१॥ कुर्यात्स्वकर्मानुष्ठानं सत्सर्वमफलं भवेत् । प्रकुर्यात्तुत्रिभिर्धर्मः पवित्रं पाय पंचभिः ।।२।। द्वाभ्या वा शान्निकार्येषु सर्वकर्मसु शस्यते । शान्तिकं पौष्टिकं यावच्छुभं किमपि कर्म च ॥३॥ शातिकादीनि कर्माणि त्रोण्यमूनि विदुधाः । चतुर्भिराभिचार च पितृकर्ममु चंककः ।।४।। तत्तत्कर्मानुरूपेण समस्ताश्च मियाश्चरन् । अत्रोक्तसख्या युखोयादेकीकृत्य समं यथा ॥१॥ मूलानि दक्षिणे हस्ते धृन्वामण्यन्यपाणिना। दक्षहस्तेनदद्वाभ मनुसृत्य यधारदम् ॥६६॥ २०१

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३२० कुशविधानम् यदेतद्वर्तते हस्ते तत्पवित्रं मलं स्मृतम् । तस्मात्पवित्रो मंत्राभ्यां धारयेदभिमंत्र्य च ॥६॥ पवित्रवन्त इत्यादि मंत्रद्वितयमस्य तु । ऋपिव॑मानयोश्छन्दो जगती ब्रह्मणःस्पतिः ।।६।। देवताब्रह्मविष्ण्वीशाः अधिदेवा इति स्मृताः । प्रणवस्तस्य मंत्रस्य सप्तव्याहृतयस्तु वा ||७|| दध्यात्पवित्रमनयोः एकेन श्रुतिवर्जिताः । पवित्रोक्तप्रकारेण होम्ना कुर्यात्पवित्रकम् ॥७॥ तद्धार्यममरैर्भूपेरशुचये मंगलाय च। अस्मद्विधा यथापूर्व आग्नेयं ब्राह्ममित्यध ॥२॥ पुनः पित्र्ये तथैवैतत्पवित्रद्वितयं स्मृतम् । मानसंध्योपरिष्टारच जपे होमे सुरार्चने ॥७३॥ स्वाध्याये भोजने विप्रः पवित्रं करयोयंसेत । श्रौतस्मार्तानि कर्माणि यावन्तीहोदितानि वै ॥७४ तानि सर्वाणि कुर्वीत सपवित्रकरो द्विजः । पवित्रं द्वितयं दर्भान्कारयेदम्तयोयोः ॥७॥ धृत्वा सर्वाणि कृत्यानि मुचिमौनी समाचरेत् । कृतमेनोनुदिवसं वपुपा चेतसा गिरा ॥६॥ हन्यात्पवित्रं हस्तस्य सवं यत्तद्विजन्मनः । नित्यनैमित्तिके वाऽपि काम्योपक्रमणे कृतं। पवित्रं चापिकर्मान्ते प्रन्धि मुकाऽय उत्यजेत् १७७ २०४ भारताजस्मृतिः पुराहमाः पियशोयं वराहतः सदाऽचमेत् । सप्रन्मिनाइम्तेन न कदाचिनुपम्रो fat मुक्का प्रन्थि विमुन्याश्य तेन पोला जलं सदा। सत्पवित्रं त्यजेभूमी अथ मंग जानुचित् ।।६।। विस्मृत्य यदि पात्रं तु पवित्रं विसजेगादि । प्राजापात्यं परंतुटचं प्रत) तकिल्लिपविशुद्धये ।।८।। शमरपसर्व सृष्टी चाढालांत्यजभाषणे । पवित्रं करशासरथं दक्षिणश्रयणे न्यसेत् ॥८॥ गोपुच्छरोमभिः कृत्या पूर्वाभिहितलक्षणम् । पवित्र धारयेद्विप्रः कर्णोपक्रमणेन वा ।।८।। आप्रयं ब्राह्मभेदोऽस्ति पवित्रस्याऽस्ति पूर्ववत् । वस्मात्फलविशेपोऽस्ति तथैवाशेषकर्मसु ॥३॥ रोमणां पवित्रकरणे नियमो न कुशाम्विना । कुशरजोर्यथामूलप्रमाणं करयोस्तथा ।।४।। क्रमशश्चतुर्भिरंगुल्योः पवित्रे धारयेदिमे। भुक्तिकर्मणिनान्येपु द्विजन्माऽखिलकर्मसु ८५॥ कमांते पुनरादाय पवित्र द्वितयं द्विजः। शुचौ देशे विनिक्षिप्यारध्यादेतत्पुनः पुनः॥८६॥ याच्छिटाद्युपहतं पवित्रं च्छेदितुं यदि । तदेवप्रन्थिमुत्सृज्य त्यजेदितरथा न हि ॥७॥ रोमाणि, मध्यमं वध्या सुदृद्धं च कुशः सदा। होमांगुलीयकेनापि मार्जनं सर्वपापहम् IIll

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पायhimsen दिन
ArvingREE NIRHUI
Karitrary पाराम।
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अनामार गोपालसमित
नामिना शोभना MEI
মামাবণী: রুমির।
Hinालमामri in
मारा विनियामानी (माननिष्टप्य पूर्वया।
अविभिनीत मंन प्रश
सामानगलने मुशानामामागुते ।
माराम गो: statोम्यहं त्वं ममीदमे ॥४॥
अंगानेन दया गां पुष्पमाणिवानः ।
यानि भवनिमः मंत्रीमणपयित्रयोः ।
गांगुरोममि परिपोकरणमः ।
आता यमि पूषाय फरणं प्रम: man
नगर पंचम प्रमशः नः ।
एष वामध्यमान कनीयम नि स्मृतः राजा
दधि शुरोगन गनुग्गुलम् ।
पोरगुलमायामं अपनात्तप्रकीर्तितम ६८
पनि प्राम्यया प्रोगा प्रन्थिानम्मेण तु।
मन्धि भ्याद्धिजः पूर्व निस्यात्प्रवर्तवत् ॥६॥

२०५
भारद्वाजस्मतिः
गान्यस्योः पूर्व कमांमारावित्रम् ।
प्रधिकायाविशेषान कथितनत्यविश्यत् ॥१०॥
मक्षत्रियवैश्यानामे एवं उदाहनः ।
अलाभे स्वस्यस्य यथालन्योऽपि या भवेत् ॥१०॥
दाम्या हुशाभ्यामथवा सपूर्वोदितलक्षणम् ।
पत्या कूधमला तु मर्वकर्ममु योजयेत् ।।१०२॥
फूचांदिपंधनापाणामिमातिम्रोऽर्थदेवताः ।
भवन्ति वसुधा ब्राझी सवंतीयांनि च क्रमात ॥१०३।।
आसने देवतादीनो अपि च मानवारिए।
पंचगव्यप्रयोगे तु द्विजकूचं प्रपोजयेत् ॥१४॥
अमृतेषु च गव्येषु पंचमु नानकमणि ।
पुण्याहकमतोयेषु द्विजः कूचं प्रयोजयेत् ॥१०।।
ऊप्रिं स्थापयेत्कूचं गलत्यां कलशेषु च ।
ततः संप्रोक्षणं कुर्यात्तदरेण द्विजोत्तमः ॥१०६॥
प्रागप्रमुदगप्रया स्थापयेत्फूर्चमासनम् ।
ऋष्यर्थ देवतार्थ च पिञ्यर्थ दक्षिणायकम् ॥१०७॥
कमांते प्रन्थिमुत्सृज्य द्विजः कृषं परित्यजेत् ।
ग्रंथ्या सह न तु त्याज्यं उपवीतं कदाचन ॥१०८॥
पवित्रकूर्चेयस्यामं संप्रध्यास्तु प्रमादतः ।
उपवासश्चरेदेकं उपवासक्रम तथा ॥१०॥
कूचप्रयोगो यत्प्रोक्तः क्वैतत्कूचममजः।
अनारवं प्रयुंजीत स्वेष्टकर्मफलाप्तये ॥१०॥

, कुशविधानम् ३२० विधानमेतत्तथाख्यातं कूर्चस्य सकलं कमात् । अनंतरं प्रवक्ष्यामि दर्भमालाकृतिक्रमम् ॥१११॥ त्रिभिश्चतुर्भिश्च कुशैः दीर्घर्लक्षणसंयुतः । कुर्वीत मालिकां विप्रो यथानयनवल्लभाम् ॥११२॥ उपर्यप्रमधोमूलं कृत्वादर्भास्तदयकैः । रज्जुकनिष्टिका" प्रकुर्वात यथारदम् ॥११३॥ सुशानामंतरं तेषां व्यस्तामास्थानमांगलम् । उत्तम व्यंगुलं मध्यं अधर्म त्र्यंगुलं मात ॥१४॥ शुल्वस्याथ कुशायामा पंचशाखा प्रमाणकम् । एवं सम्यककृतायासा कुशमालंदमाःस्मृनाः ॥११॥ यज्ञशालावृता वैषा प्रोतातद्वारदक्षिणे । जपहोमार्चनरधानभ्यानसंवरणेऽपि च १९१६५ तृतीयागुलमुष्टीना द्वयं वैकमयापि का। आसनं प्रामणस्य स्याद्ममय प्रकुर्वतः ॥११॥ अष्टोत्तरशतं दर्भाः निदोपानिप्सरायताः। सदशं सर्वहामेषु संग्रामं सर्ववेदिनाम् ॥११८॥ आत्मब्रह्मासनार्य र संकल्पोरेश्यकायकम् । মাথগি বুগিয়া অধ্য?? पात्रं सम्माजनार्यप सम्परितरणार्थकम् । संस्कारार्धममी दर्माः प्रयोगन्या यथावमम् ॥१३ देव्याः सुशाययुगपत्परमात्मनि निताः । यत्रोक्तं वैदिक कर्म कुमाता प्रकीर्तिताः IER ३२०८ भारद्वाजस्मृतिः असोजयन्मुनयो लोकान्होन मम्लानपुरान् । सामध्यं चाभवतया अतोनेन गुशः स्मृतः॥१२॥ राजानेनामस्मनः। यचन्द्रस्यारानिहस्ते यथाशूलं कादिनः। यथानुदर्शनं विष्णोः विप्रहन्तारान्तथा ॥१२३॥ वरुणस्य करे पाशः यथा दंडो यमस्य तु । तथा ग्रामणहन्तस्थः सकलं साधयेतुशः ॥१२४।। विधिनाऽथानोदर्भः सर्वकर्मफलप्रदः। विधिनाऽय गृहीत्याऽय (साधयेत्सकलां?) विधिम् ।।१२५ विनागृहीतोयः प्रयुस्ततृगवद्भवेत् (हगवत्तद्भत्सदा)। तस्माच्छास्त्रं परिज्ञाय शास्त्रोक्तविधिना द्विजः ॥२६॥ कुशान्संगृह्य कर्माणि ममस्तानि समाचरेत् । देवव्राह्मणकार्येषु भक्षयेद्देपलः खलु ॥१२७।। सुवर्णांगुलिकं हृत्वा तत्तत्कर्म समाचरेत् । दध्यात्पवित्रं वृपलः कर्मानुष्ठानवर्जितः ।।१२८।। यच्छिद्रं नरके घोरे पतत्यत्र न संशयः। कस्मिन्नहनि वा शूद्रो पवित्रं धारयेद्यदि ॥१६॥ न वच्यते(वन्च्यिातो,महाघोरैः सुचिरं नरकामिभिः । शूद्रः पवित्रमज्ञाना(दुद्धपा) विधारयेत् ॥१३॥ स पापारमा महाघोरे चिरं तिष्ठति दुर्गती।

३२०६ कुशविधानम् तस्मात्सवित्रं सततं द्विजैर्वेदपरायणैः। कर्मानुष्ठाननिरतः धायनेतरजातिभिः ।।१३।। ॥ इति श्रीभारद्वाजस्मृतौ कुशविधानं नाम अष्टादशोऽध्यायः ।। अथ उनविंशोऽध्यायः व्याहृतिकल्पवर्णनम् अथ कल्पं प्रवश्यामि व्याहनीना स्थातधम् । द्विजानो सर्वशासाना कल्पाना मटशःस्मृतः ॥ १॥ भूरितिव्याइतिः पूर्वा द्विीयेति भुव स्मृता : सुवस्तृतीयःतियाचमहः पतु : पंचमीजनः ॥२॥ तत्पष्ठी सममी च सम्यगे सीरिताः। एता महान्याहुनयः सर्वदेह धिता दिवाः॥३॥ अमुसहमपूर्वा.म्यु. तिसो ब्याइतय.कमान् । एवं महाराहनयो द्विधा व्यारतयतया ।।४।। अह(एवं)? कमेग यानि मुनिचन्दोधिदेवताः । वास्थानस्वरूपाणि विनियोग निशासनम् ।।५।।

२१०
भारद्वाजस्मृतिः
पंचशाखं शरीराणां विन्यासत्रितयं तथा।
जपे होमे क्रमं चैव पुरश्चरणसत्तमम् ॥ ६ ॥
काम्यहोमफलावाप्तिमन्यद्भव्यफलं च यत् ।
तदशेपं यथास्पष्टं भवत्यत्यन्तमुतमम् ॥७॥
पिरासां समस्तानां व्याहृतीनां प्रजापतिः ।
कथ्यते मुनयस्तासां व्याहृतीनां पृथक् पृथक् ॥ ८॥
अत्रिभृगःकुत्ससशज्ञा(कश्यपश्च?) वाशिष्ठो गौतमस्तथा ।
काश्यपश्चांगिराश्चते मुनयः क्रमशःस्मृताः॥६॥
सप्तर्पयोऽथवतासां सप्तानो स्युर्यथाममात् ।
क्रमेणते प्रवक्ष्यते परिस्पष्टं यथााधः ।।१०।।
विश्वामित्रो जमदमिभरद्वाजोऽथगौतमः ।
अविर्वशिष्ठकश्यप इति सप्तसप्त(प)यः स्मृताः ।।१।।
दिव्यचंदन लिसांगा: दिव्यैःपुप्पैरलंकृताः ।
गायत्र्युष्णिनुष्टुपच वृहती पंक्तिरेय घ ॥१२॥
त्रिष्टुप्चजगती घेवस्युश्छन्दांसि यथाक्रमम् ।
अप्रियायुः महस्रांशुर्वागीशो वरुणो यूपा ॥१३।।
भासा यथाक्रमेणैव विश्वेदेवाश्च देवताः।
दिव्यचंदनलितांगा: दिव्यपुष्पैरलं गताः ॥१४॥
नीतोपयोतहृदयः सपवित्रे चतुष्पलाः।
अनिद्र(प्रीशा) यदनांभोगाः प्रभामंडल संस्थिताः ||१||
अभयाक्षनादधानाः परहन्तमरोहाः।
एवं होमेन प्रारंभे ध्येयानुयायो हिनः ॥१६॥

व्याहृतिविधानम्
तत्तत्फलप्रसिद्धयर्थ अन्यथा तत्पलंन हि।
तत्तत्कर्माभिधानार्थे विनियोगः उदाहृतः ॥११॥
आसनं स्वस्तिकं प्रोक्तं जपहोमो प्रकुर्वतः ।
कुशेशयासन वापि वीरासनमथापिवा ॥१८॥
अंगुष्ठाऽधिकनिष्ठान्तं उभयोईस्तयोः क्रमात ।
भूरादिपंचवि(क)? न्यस्यन्यसेदन्यद्विकं दले ॥१६॥
करन्यासक्रमोऽयस्यादेहन्यासोऽथ कथ्यते।
पादजानूर्वधोनाभिवक्षः करात्यमूर्धसु ॥२०॥
भूरादिसप्तकं न्यस्य प्रणवं चाऽथ विन्यसेत् ।
देहन्यासोऽयमाख्यातः त्वयमेवान्यथोच्यते ॥२१॥
भूरिति न्यस्य शिरसि भुवो बाहुद्वये न्यसेत् ।
सुवश्चरणयोय॑स्यमहर्वामकरे न्यसेत् ॥२२॥
वामस्कंघे जन त्यस्य तपो हस्तेऽध दक्षिणे ।
सत्यं च दक्षिणको न्यसेत्पश्चाद्विचक्षणः ॥२३॥
देहन्यासकरं प्रोक्त त्वंगन्यासोऽथ कथ्यते।
हृदये भूर्भुवो मौलो शिखायां सुपरित्यध ॥२४||
तपोमयहिश्चाक्षोः जनस्तपश्चपार्वयोः ।
सत्यं दशककुफ्वेवं पदस्थानेषु कमान्न्यसेत् ॥२१॥
आद्यन्तयोाहतीना सतानां प्रणवेन सह ।
गायत्री शिरसा योग्य जपेत्संध्या जप क्रमात् ॥२६॥
एवं समाहितमनाः प्राणान् संयभ्य वै वथा ।
त्रिवेदस्यनामास्यात्प्राणायामो अपस्य तु ॥२॥

२१२ मारद्वाजस्मृतिः सप्तताव्याइतीरेता केवला या द्विजो जपेत् । जपक्रमोऽयमेवं स्यात्सर्वपापप्रणाशनः ॥२८॥ पूर्ववत्प्राणसंरोपं कृत्वैताश्च द्विजो जपेत्। तस्य चाप्यभिधानं स्यात्प्राणायामो उपस्य तु ॥२६॥ अष्टोत्तरसहस्र वा अष्टोत्तरशतं तु या। जपतः सर्वपापानि प्रणश्यन्ति न संशयः ॥३०॥ देवादिस्थापना_मु भवने वाऽघमर्पणे । तिस्रो व्याहृतयो मुख्याः इति प्रोक्ता महर्षिभिः ॥३१॥ व्यस्तं पूर्व प्रयोक्तव्यं समस्तं वदनंतरम् । एवमासा प्रयोगोऽयं चतुर्धा समुदीरितः॥३२|| व्याहृतित्रितयं श्रेष्ठमंत्रेण सकलेष्वपि । भूभुवः सुवरिति वा तिस्रो व्याहृतय :स्मृताः ॥३३॥ चतुथं महइत्येतद्ब्रह्म सर्व उदाहृतः । भूम्यान्तरिक्षस्वर्काख्याश्चतस्त्र.स्युः क्रमा इमाः ॥३४॥ प्राणापानव्यानानि अर्कवाय्वनिवारिजाः। ऋषसामयजुर्व मणि इत्येवं श्रुतिचोदनात् ॥३५॥ एताश्चतस्रो यो वेत्ति सकल्पं सरहस्यकम् । स हि वेत्ति परब्रह्म तदन्ते यात्यसंशयम् ॥३६॥ जपदोमार्चनारंभे स्मृत्वा वा मुनिपूर्वकान् । मृत्वा(मूलं) न्यासत्रयं कृत्वा तत्तत्कर्माणि कारवेत् ॥३॥ अज्ञात्वैतानि होमानि कुर्युरुक्तक्रिया द्विजः । होमेन केवलमंत्रःनिएफलत्वं प्रयान्ति ताः ॥३८,

३२१३
व्याहृतिविधानम्
व्याहत्तीनामथैतस्मिन्पुरश्चर्याविधि पुरः।
शत्त्यर्थमन्यथाशक्तिन पुरश्चरणं विना ३६।।
तस्मात्सुरश्चरेद्धीमान् अथ कर्म समाचरेत् ।
कर्माणीष्टानि सिध्यत्ति सत्यं तस्याप्रजन्मनः ॥४०॥
विमानं ब्रह्मचयं च वसुधाशयनं चरेत् ।
जपेद्द्वादशसाहस्र उपवासत्रयं द्विजः ॥४१॥
अशक्तोयस्त्वहोरात्रं वोपोप्याभिहितं जपेत् ।
अपुरश्चरणं तदिष्टानान्यथाऽऽचरेत् ।।४२१५
ब्रह्मवर्चसकामश्चेत्सहस्र ब्रह्मभूरहरम् ।
सरधाक्तौरदध्यक्ताः समिधो जुहुयाल्लभेत् ॥४३॥
तेजस्कामस्तथाऽऽज्येन धान्यकामस्तु शालिभिः ।
क्षीरेण पशुकामस्तु पुत्रकामो वदेन्धनः ॥४४॥
शांतिकामःशमीकाष्टः अर्थकामोर्कतपणः।
रक्षोविनाशनार्थी वल्लाजैरपिति वैरपि ॥४॥
दुःस्वपरापनाशार्थी पापी सद्यो विनश्यति ।
प्रक्षिप्याभिभ्रातृकामः पुत्रार्थी पिप्पलेन्धनैः ॥४६॥
अपामार्गरेश्वर्यकामः श्रीकामी यः पलाशकः।
मुधर्मा प्रियकामस्तु सर्वद्रव्याण्यनुक्रमात ॥४॥
सहस्रसंख्यया होम: ततइष्टं प्रयच्छति।
तस्माद्विमपुरश्चीसम्यग् कृत्वायंहावयेन ॥४८॥

भारद्वाजस्मृतिः किमप्यसाध्यमेताभिः न्याहतीभिर्न जातुचित् । तस्मादेताः समाश्रित्य साधयेत्सकलं द्विजः॥४|| ॥ इति श्रीभारद्वाजस्मृतो व्याइतिविधानं नाम ऊनविंशोऽध्यायः॥ तत्सद् ब्रह्मार्पणमस्तु * "शुभम्भवतु।।

a श्रीगणेशाय नमः ॥ ईशा वास्यमिदवं सर्व यत्किञ्च जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः मा गृधः कस्यविद्धनम् ।। ईश्वर का आदेश है कि सृष्टि के सारे प्राणी मेरी दो भात्मा हैं। शान के द्वारा प्राणीमात्र की पूर्णरूपेण रक्षा का ध्यान रखते हुए अपना भोग- जो कि प्रकृति द्वारा निर्दिष्ट किया हुआ है--भौगो। ( किसी की भी हिंसा मत करो। सभी प्रापी मुष्टि की परिचर्या में पूर्णरूपेण सहायक हैं)। किसी भी प्राणी की शकि ( दूध) हरण करने की मन में मावना भी न आने दो।यही कल्याण का मार्ग है। वेदग्वाभ्यसेनित्यं शुचौ देशे समाहितः । धर्मशास्त्र तथा पाठ्यं ब्राह्मणः शुद्धमानसः॥ स्मृतिहीनाय विप्राय श्रुतिहीने तथैव च। दाने भोजनमन्यच दत्तं पुलविनाशनम् ।। तस्मात् सर्वप्रयलेन धर्मशास्त्रं पठेद् द्विजः । श्रुतिस्मृती प विप्राणां चक्षुपी देवनिर्मिते ।। (रपुहारीत स्मृ.) घभारित मन से शुद्ध देश में वेद प्रमभ्यासरे। उस मामों के मंघालों का पठन-पाठन करे। स्मृति एवं श्रुविहीन जो मनुष्य है रस मेजन नित्यम्म म्यवहार अपने तथा कुतलिये हानिकारक है। गर्व धर्मदाय को पो। मासिरों द्वारा रसि वेद, समृति पुराणादि पर्मशास्त्र मानव मात्र नेत्र (प्रकर)हैं। माना मात्र से मेरी रबर प्रार्थना है कि साल का पौ। पर पोत भुति स्मृति आदि उस मादध रखते हुए प्रपोज करा से नर र सम्मान प्राप्ति मे। इसी मामा न्याय है। "कामये दुःसताना प्रापिनामाविनाशनम्' कर रह- मनमुरराय मोर

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Smirti Sandarbh(part-5)

Author
Mor Mansukhrai
Title
Smirti Sandarbh(part-5)
File name
Smirti Sandarbh(part-5)
Text
OCR done
Citation
1955
Published
2011/08
Publisher
Calcutta, Clive Row
Language
Sanskrit
Pages
787
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
DLI number
310955
Barcode
99999990314392.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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