Sanmati Library, Jaipur
Jain Sahitya Samsodhak Vol - Ii
Front matter
ग्राहक वर्गने निवेदन पहेला खंडनो छल्लो अंक बहार पड्यां पछी आजे लगभग दोड वर करतार वधारे समय पछी आ अंक प्राहकोना हाथमां सुकता असारे ग्राहक वर्गने चुं निवेदन करबुं ते काई मुझनुं नधी. आ अंक छपात्रवानी शरुआत संवत् १९७८ ना आना त्रजिना दिवस थई हती पण तनी नानि सं० १९७५ ना जैठना धाय है. आटला वधा विलंबनां कारणो आपी देवाची पण अत्रने के प्राहकवर्गन सन्ताय बाय तेज लागतुं नयी नयी अने ए संबन्धनां 'जौनं सत्रार्थसाधक नी नीतिन अनुसरी मृतकालने भूली जवानी भलााण करिए छीर; अने भविष्य नाटे आशा आपीर जीए के, हवे पछी जल बनशे तेज वेळा- तर ज ग्राहकांना हाथमां अंक पहुंची जाय तेवी इरेक कोशीश करवानां आवश. -~-मुनि जिनविजय. mp-Audwome - LOdiaLI LALLADINDORRORDER रामजाक जैन साहित्य संशोधकना द्वितीय खण्डमां केवा केवा विषयो आवशे ते जाणवू होय तो आ नाचनी नोंघ ध्यानपूर्वक वांची बीजा खण्डमां, जैन बना प्राचीन गौरव उपर अपूर्व प्रकाश पाडनारा अनेक प्राचीन शिलालेखो अने तान्त्रपत्री प्रकट यशे. वीजा खण्डलांजैन संघना संरक्षक मुद्दा जुदा गन्ठानी पट्टावीलया प्रसिद्ध थशे. बीला खण्डमां: जैन साहित्यना आभूपणनूत ग्रन्थोना परिच्यो अने तेनी प्रशस्तिओ प्रसिद्ध थशे. बीजा खण्डनां, जैन अने बौद्ध साहित्यना नुलना करनारा प्रौढ अने गमीर लखो आवशे. वीजा खण्डनां, भगवान महावीर देवना निवांण सुजय संबंधी जुदा जुदा विद्वानोए लखेला लेखोना मापान्तरो तथा स्वतंत्र लेख्न आवशे. बोजा खण्डमां, प्रो वैवानी लखला जन आगानी विस्तृत समालोचना आपवामां आवशे. बीजा खण्डनां, जैन माहित्वना उझिलिन प्राचीन स्वळोनां वर्णनो आवशे. वीजा खण्डमां, बौद्ध साहित्यजा जैनधर्मविषये शाशा विचारी लस्राएला छे तेना विचित्र अने अज्ञातपूर्व उल्लेखा अ.क्शे. वीजा खण्डमां, जैन संपला आजपर्यंत यई गएला प्रसिद्ध पुरुषोना परिचयो आपवास आवशे. आ सिवाय बोजा पण अनेक नाना लोटा अपूर्व अपूर्व लखो प्रकट करवानां आवशे अने सायं तवां जमुन्दर. मनहर, दर्शनीय अने संग्रहाय अनेक चित्रों पण यथायोग्य आपवानां आवशे. वळी, आ मण्डगं कटेलीक ऐतिहासिक-प्राचीन प्रबन्यो; अने पट्टाबालिओ पण मूळ रूप आपवानां आवनार छ. उदाहरण तरीके सेगनुगाचार्य विरचित विचारणिः उपक्रशगच्छ, तपागच्छ, खरतर- गच्छ, बृहत्पोशालिक गच्छ मादिनी पट्टावली; जुना रासा; चैत्य परिपाटि तीर्थ माळा. अने विज्ञामि इत्यादि. इत्यादि.
No text on this page.
來來來來來统软软软软软软來來來來發
次次次次次次次家杂家杂家杂
.
杂杂家家來來來來家
长长长长长长长长长长
品。
*
येनूर (दक्षिण कर्णाटक ) स्थान स्थित मनुष्याकार दिगम्बर जैन प्रतिमा
次次次
单作用
1
-
जैन साहित्य संशोधक
器淨淨淨淨淨淨淨
來來來來來來來來來來來家采杂家杂
除家來來來來來來來來來來來來來來來
॥ ॐ अहम् ॥ ॥ नमोऽस्तु श्रमणाय भगवते महावीराय ।। जैन सा हि त्य सं शोध का 'पुरिसा! सच्चमेव समभिजाणाहि । सच्चस्साणाए उवहिए मेहावी मारं तरइ ।' 'जे एगं जाणइ से सव्वं जाणइ, मे सव्वं जाणइ से एग जाणइ ।' दिठं, सुयं, मयं, विण्णायं जं एत्य परिकहिज्जइ ।' -निर्गन्थप्रवचन-आचारांगसूत्र । खंड २ ] हिंदी लेख विभाग. [ अंक १ योग दर्शन OMG+ (लेखकः-पं. सुखलालजी न्यायाचार्य) । प्रत्येक मनुष्य व्याक्त अपरिमित शक्तियोंके तेजका पुञ्ज है, जैसा कि सूर्य । अत एव राष्ट्र तो माना अनेक सूर्योका मण्डल है । फिर भी जब कोई व्यक्ति या राष्ट्र असफलता या नैराश्यके भँवरमें पड़ता है तब यह प्रश्न होना सहज है कि इसका कारण क्या है ? । बहुत विचार कर देखनेसे मालूम पडता है कि असफलता व नैराश्यका कारण योगका ( स्थिरताका) अभाव है, क्यों कि योग न होनेसे चाई संदेहशील बनी रहती है, और इससे प्रयत्नकी गति अनिश्चित हो जानेके कारण शाक्तियां इधर उधर टकरा कर आदमीको बरबाद कर देती है । इस कारण सब शक्तियोंको एक केन्द्रगामी बनाने तथा साध्यतक पहुंचानेके लिये अनिवार्यरूपसे सभीको योगकी जरूरत है । यही कारण है कि प्रस्तुत व्याख्यानमालामै योगका विषय रक्खा गया है। भूजरात पुरातत्त्व मंदिरकी ओरसे होनेवाली आर्यविद्याव्याख्यानमालामें यह व्याख्यान पढा गया था।
२ ] जैन साहित्य संशोधक [ खंड २ MANAWWA.OM Mmmmm , इस विषयकी शास्त्रीय मीमांसा करनेका उद्देश यह है कि हमें अपने पूर्वजोंकी तथा अपनी सभ्यताकी प्रकृति ठीक मालूम हो, और तद्वारा आर्यसंस्कृतिके एक अंशका थोडा, पर निश्चित रहस्य विदित हो। योगदर्शन यह सामासिक शब्द है । इसमें योग और दर्शन ये दो शब्द मौलिक हैं। योग शब्दका अर्थ--योग शब्द युज् धातु और घञ् प्रत्ययसे सिद्ध हुवा है | युज् धातु दो हैं । एकका अर्थ है जोडना1 और दूसरेका अर्थ है समाधि2-मनःस्थिरता । सामान्य रीतिसे योगका अर्थ संबन्ध करना तथा मानसिक स्थिरता करना इतना ही है, परंतु प्रसंग व प्रकरणके अनुसार उसके अनेक अर्थ हो जानेसे वह बहुरूपी बन जाता है । इसी बहुरूपिताके कारण लोकमान्यको अपने गीतारहस्यमें गीताका तालर्य दिखानेके लिये योगशब्दार्थनिर्णयकी विस्तृत भूमिका रचनी पडी है । परंतु योगदर्शनमें योग शब्दका अर्थ क्या है यह बतलानेके लिये उतनी गहराईमें उतरनेकी कोई आवश्यकता नहीं है; क्यों कि योगदर्शनविषयक सभी ग्रन्थोंमें जहां कहीं योग शब्द आया है वहां उसका एक ही अर्थ है, और उस अर्थका स्पष्टीकरण उस उस ग्रन्थमें ग्रन्थकारने स्वयं ही कर दिया है । भगवान् पंजलिने अपने योगसूत्रमें4 चित्तवृति निरोधको ही योग कहा है, और उस ग्रन्थमें सर्वत्र योग शब्दका वही एक मात्र अर्थ विवक्षित है । श्रीमान् हरिभद्र सूरिने अपने योग विषयक सभी ग्रन्थों में मोक्ष प्राप्त कराने वाले धर्मव्यापारको ही योग कहा है; और उनके उक्त सभी ग्रन्थों में योग शब्दका वही एक मात्र अर्थ विवक्षित है । चित्तवृत्ति- निरोध और मोक्षप्रापक धर्मव्यापार इन दो वाक्योंके अर्थमें स्थूल दृष्टिसे देखने पर बडी मिन्नता मालूम हो ती हैं, पर सूक्ष्म दृष्टिसे देखने पर उनके अर्थकी अभिन्नता स्पष्ट मालूम हो जाती है । क्यों कि 'चित्तवृत्तिनिरोध' इस शब्दसे वही क्रिया या व्यापार विवक्षित है जो मोक्षके लिये अनु- कूल हो और जिससे चित्तकी संसाराभिमुख वृत्तियां रुक जाती हो । 'मोक्षप्रापक धर्मव्यापार ' इस शब्दसे भी वही क्रिया विवक्षित है । अत एव प्रस्तुत विषयमें योग शब्दका अर्थ स्वाभाविक समस्त आत्मशक्तियोंका पूर्ण विकास करानेवाली क्रिया अर्थात् आत्मोन्मुख चेष्टा इतना ही समजना चाहिये । योगविषयक वैदिक, जैन और बौद्ध ग्रन्थोंमें योग, ध्यान, समाधि ये शब्द बहुधा समानार्थक देखे जाते हैं । दर्श न श ब्द का अर्थ-नेत्रजन्यज्ञान, निर्विकल्प (निराकार) बोध,8 श्रद्धा, मा10 आदि अनेक अर्थ दर्शन शब्दके देखे जाते हैं। पर प्रस्तुत विषयमें दर्शन शब्दका अर्थ मत यही एक विवक्षित है । योगके आविष्कारका श्रेय-जितने देश और जितनी जातियोंके आध्यात्मिक महान् पुरुषोंकी जीवनकथा तथा उनका साहित्य उपलब्ध है उसको देखनेवाला कोई भी यह नहीं कह सकता है कि आध्यात्मिक विकास अमुक देश और अमुक जातिकी ही बपौती है, क्यों कि सभी देश और सभी जातियों में न्यूनाधिक रूपसे आध्यात्मिक विकासवाले महात्माओंके पाये जानेके प्रमाण मिलते हैं11 योगका संबन्ध आध्यात्मिक विकाससे है । अत एव यह स्पष्ट है कि - or युजूंपी योगे,-७ गण हेमचंद्र धातुपाठ. २ युजिच् समाधौ,-४ गण हेमचंद्र धातुपाठ, ३ देखो पृष्ठ ५५ से ६० । ४ पा. १ सू. २-योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः । ५ योगबिन्दु श्लोक ३१- अध्यात्म भावनाऽऽध्यानं समता वृत्तिसंक्षयः । मोक्षेण योजनाद्योग एष श्रेष्ठो यथोत्तरम् ।। योगार्वशिका गाथा ॥१॥ ६ लोर्ड एवेबरीने जो शिक्षाकी पूर्ण व्याख्या की है वह इसी प्रकारकी है:- Pducation is the harmonious developement of all our faculties." ७ दृY प्रेक्षणे-१ गण हेमचन्द्र धातुपाठ. ८ तत्त्वार्थ पचाल श्री सत्यलोक वार्तिक. ९ तत्त्वार्थ अध्याय १ सूत्र २. १० षड्दर्शन समुच्चय-श्लोक २-नीति षडेवात्र" इत्यादि. ३१ उदाहरणार्थ जरथोस्त, इसु, महम्मद आदि.
अंक.१1 योगदर्शन [३ योगका अस्तित्व सभी और सभी जातियों में रहा है । तथापि कोइ. भी विचारशील मनुष्य इस वातका इनकार नहीं कर सकता है कि योगके आविष्कारका या योगको पराकाष्ठा तक पहुंचानेका श्रेय भारतवर्ष और आर्यजातिको ही है । इसके सबूतमें मुख्यतया तीन बातें पेश की जा सकती हैं । १ योगी, ज्ञानी, तपस्वी आदि आध्यात्मिक महापुरुषोंकी बहुलता; २ साहित्यके आदर्शकी एकरूपता; और ३ लोकरुचि । १. योगी, ज्ञानी, तपस्वी आदि आध्यात्मिक महापुरुपोंकी संख्या भारतवर्ष पहिलेसे आज तक इतनी बडी रही है कि उसके सामने अन्य सब देश और जातियोंके आध्यात्मिक व्यक्तियोंकी कुल संख्या इतनी अल्म जान पड़ती है जितनी कि गंगाके सामने एक छोटीसी नदी । २. साहित्यके आदर्शकी एकरूपता-तत्त्वज्ञान, आचार, इतिहास, काव्य, नाटक आदि साहित्यका कोई भी भाग लीजिये उसका अन्तिम आदर्श बहुधा मोक्ष ही होगा । प्राकृतिक दृश्य और कर्मकाण्डके वर्ण- नने वेदका बहुत बडा भाग रोका है सही, पर इसमें संदेह नहीं कि वह वर्णन वेदका शरीर मात्र है; उसकी आत्मा कुछ ओर ही है और वह है परमात्मचिंतन या आध्यात्मिक भावोंका आविष्करण । उपनिषदोंका प्रासाद तो ब्रह्म- चिन्तनकी बुनियाद पर ही खडा है । प्रमाणविषयक, प्रमेयविषयक कोई भी तत्त्वज्ञान संबन्धी सूत्रग्रन्थ हो उसमें भी तत्वज्ञानके साध्यरूपसे मोक्षका ही वर्णन मिलेगा। आचारविषयक सूत्र स्मृति आदि सभी ग्रन्थोंमें आचार- पालनका मुख्य उद्देश मोक्ष ही माना गया2 है । रामायण, महाभारत आदिके मुख्य पात्रोंकी महिमा सिर्फ इस लिये नहीं कि वे एक बडे राज्यके स्वामी थे, पर वह इस लिये है कि अंतम वे संन्यास या तपस्याके द्वारा मोक्ष- के अनुष्ठानमें ही लग जाते हैं । रामचन्द्रजी प्रथम ही अवस्थामें वशिष्ठसे योग और मोक्षकी शिक्षा पा लेते हैं। युधिष्ठिर भी युद्ध रस लेकर बाण शय्यापर सोये हुए भीष्मपितामहसे शान्तिका ही पाठ पढते हैं । गीता तो रणांगणमें भी मोक्षके एकतम साधन योगका ही उपदेश देती है। कालिदास जैसे शृंगारप्रिय कहलानेवाले कवि भी अपने मुख्य पात्रोंकी महत्ता मोक्षकी और झुकनेमें ही देखते है । जैन आगम और बौद्ध पिटंक तो निवृत्तिप्रधान होनेसे मुख्यतया मोक्षके सिवाय अन्य विपयाँका वर्णन करनेमें बहुत ही संकुचाते हैं। शब्दशास्त्र -1 वैशेषिकदर्शन, अ० १ सू० ४ धर्मविशेषप्रसूताद् द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानां पदार्थानां 'साधर्म्यवैधाभ्यां तत्त्वज्ञानानिःश्रेयसम्। -न्यायदर्शन अ० १ सू० १ प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धा- न्तावयवतकीनर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानानिःश्रेयसम् ॥ सांख्यदईन, अ. १ अथ त्रिविधदुःखात्यन्तनिवृत्तिरत्यन्तपुरुषार्थः ॥- वेदान्तदर्शन अ०४, पा० ४, सू० २२ अनावृत्तिः शब्दादनावृत्तिः शब्दात् ॥ जैनदर्शन तत्वार्थ अ० १ सू० १ सम्यग्दर्शनशानचारित्राणि मोक्षमार्गः !! 2 याज्ञवल्क्यस्मृति अ. ३ यातधर्मानरूपणम् ; मनुस्मृति अ. १२ श्लोक ८३. 3 देखो योगवाशिष्ठ. 4 देखो महाभारत-शान्तिपर्व. 5 कुमारसंभव-सर्ग ३ तथा ५ तपस्या वर्णनम् . शाकुन्तल नाटक अंक ४ कण्वोक्ति. भूत्वा चिराय चतुरन्तमहोसपत्नी, दीप्यन्तिमप्रतिरथं तनयं निवेश्य । भवां तदपितकुटुम्बभरेण सार्थ, शान्ते करण्यास पदं पुनराश्रमेऽस्मिर ।। शैशवेऽभ्यस्तविद्यानाम् यौवने विषयषिणाम् । वाद्धके मुनिवृत्तीनाम् योगेनान्ते तनुत्यजाम् ||८|| सर्ग: अथ स विषयव्यावृत्तात्मा यथाविधि सूनवे, नृपतिककुदं दत्त्वा यूने सितातपवारणम् । मुनिवनतरच्छायां देव्या तया सह शिनिये, गलिसवयसामिक्ष्वाकणामिदं हि कुलपतम् ॥ ७० ॥ रघुवंदा: ३..
४ ] जैन साहित्य संशोधक [खंड२ भी शन्दशुद्धिको तत्त्वज्ञानका हार मान कर उसका अन्तिम ध्येय परम श्रेय ही माना है। विशेष क्या ? कामशास्त्र तकका भी आखिरी उद्देश मोक्ष है । इस प्रकार भारतवर्षीय साहित्यका कोई भी स्रोत देखिये उसकी गाते समुद्र जैसे अपरिमेय एक चतुर्थ पुरुषार्थकी ओर ही होगी। ३ लोकमाच--आध्यात्मिक विषयकी चर्चावाला और खासकर योगविषयक कोई भी ग्रन्थ किसीने भी लिखा कि लोगोंने उसे अपनाया । कंगाल और दीन हीन अवस्थामें भी भारतवर्षीय लोगोंकी उक्त आमचे यह सूचित करती है कि योगका सम्बन्ध उनके देश व उनकी जातिमें पहलेसे ही चला आता है। इसी कारणसे भारतवर्षकी सभ्यता अरण्यमें उत्पन्न हुई कही जाती है 1। इस पैत्रिक स्वभावके कारण जब कभी भारतीय लोग तीर्थयात्रा या सफरके लिये पहाडी, जंगलों और अन्य तीर्थस्थानामें जाते हैं तब वे डेरा तंबू डालनेसे पहले ही योगियोंको, उनके मठोंको और उनके चिन्ह तकको भी ढूंढा करते हैं । योगकी श्रद्धाका उद्रेक यहां तक देखा जाता है कि किसी नंगे बावेको गांजेकी चिलम फूंकते या जटा बढाते देखा कि उसके मुंहके धुंएमें या उसकी जटा व भस्मलेपमें योगका गन्ध आने लगता है । भारतवर्षक पहाड, जंगल और तीर्थस्थान भी बिलकुल योगिशून्य मिलना दुःसंभव है । ऐसी स्थिति अन्य देश और अन्य जातिमै दुर्लभ है। इससे यह अनुमान करना सहज है कि योगको आविष्य.त करनेका तथा पराकाष्ठा तक पहुंचानेका श्रेय बहुधा भारतवर्षको और आर्यजातिको ही है । इस बातकी पुष्टि मेक्षमूलर जैसे विदेशीय और भिन्न संस्कारी विद्वान्के कथनसे भी अच्छी तरह होती है।2 आर्यसंस्कृतिकी जड और आर्यजातिका लक्षण-~-ऊपरके कथनसे आर्यसंस्कृ.तिका मूल आधार क्या है, यह स्पष्ट मालूम हो जाता है । शाश्वत जीवनकी उपादेयता ही आर्यसंस्कृतिकी भित्ति है । इसी पर आर्यसंस्कृ- तिके चित्रांका चित्रण किया गया है । वर्णविभाग जैसा सामाजिक संगठन और आश्रमव्यवस्था जैसा वैय- क्तिक जीवनविभाग उस चित्रणका अनुपम उदाहरण है । विद्या, रक्षण, विनिमय और सेवा ये चार जो वर्ण- विभागके उद्देश्य हैं, उनके प्रवाह गार्हस्थ्य जीवनरूप मैदानमें अलग अलग बह कर भी वानप्रस्थके मुहानेमें मिलकर अंतमें संन्यासाश्रमके अपरिमेय समुद्र में एकरूप हो जाते हैं । सारांश यह है कि सामाजिक, राजने- लिक, धार्मिक आदि सभी संस्कृतियांका निर्माण, स्थूलजीवनकी परिणामविरसता और आध्यात्मिक-जीवनकी परिणामसुन्दरता ऊपर ही किया गया है । अत एव जो विदेशीय विद्वान् आर्यजातिका लक्षण स्थूलशरीर, उसके डीलडोल, व्यापार-व्यवसाय, भाषा, आदिमें देखते हैं वे एकदेशीय मात्र है । खेतीबारी, जहाजखेना, पशुओंको चराना आदि जो जो अर्थ आर्यशब्दसे निकाले गये हैं वे आर्यजातिके असाधारण लक्षण नहीं है । आर्यजातिका असाधारण लक्षण तो परलोकमात्रकी कल्पना भी नहीं है, क्यों कि उसकी दृष्टिमं वह लोक भी त्याज्य है । उसका सच्चा और अन्तरंग लक्षण स्थूल जगत्के उसपार वर्तमान परमात्मतत्त्वकी एकाग्रबुद्धिसे उपासना करना यही है । इस सर्वव्यापक उद्देश्यके कारण आर्यजाति अपनेको अन्य सब जातियांसे श्रेष्ट सम- झती आई है। १ द्वे ब्राणी वेदितव्ये शन्दब्रह्म परं च यत् । शब्दब्रहाण निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ।। व्याकरणास्पदसिद्धिः पदसिद्धरर्थनिर्णयो भवति । अर्थात्तत्त्वज्ञान तत्त्वशानात्मरं श्रेयः ॥ श्रीहेमशब्दानुशासनम् अ. १ पा. १ सू. २ लघुन्यास. स्थाविरे धर्म मोक्षं च " कामसूत्र ब. २ पृ. ११ Bombay Edition. 1 देखो कविवर टागोर कृत पृष्ठ ४. Thns in India it as in the forests that our civilization had its birth......etc 2 This concentrtion of thought (एकाग्रता) or one-pointedness as the Hindus called it, is something to us almost unknown. इत्यादि देखो. पृ. २३-बोल्युम १-सक्रेड बुक्स ओफ थि ईस्ट, मेक्षमूलर-प्रस्तावना. L २ साधना अंक १] योदगर्शन [५ . - •nwar-virW. -.- ANANMA शान और योगका संबन्ध तथा योगका दरजा--व्यवहार हो या परमार्थ, किसी भी विषयका शान तभी परिपक समझा जा सकता है जब कि ज्ञानानुसार आचरण किया जाय । असलमें यह आचरण ही योग है । अत एव ज्ञान योगका कारणं है । परन्तु योगके पूर्ववर्ति जो शान होता है वह अस्पष्ट होता है। और योगके बाद होनेवाला अनुभवात्मक ज्ञान स्पष्ट तथा परिपक्क होता है । इसीसे यह समझ लेना चाहिये कि स्पष्ट तथा परिपक ज्ञानकी एक मात्र कुंजी योग ही है । आधिभौतिक या आध्यात्मिक कोई भी योग हो, पर वह जिस देश या जिस जातिमें जितने प्रमाणमें पुष्ट पाया जाता है उस देश या उस जातिका विकास उतना ही अधिक प्रमाणमें होता है। सच्चा शानी वही है जो योगी है2 | जिसमें योग या एकाग्रता नहीं होती वह योगवाशिष्ठकी परिभाषा ज्ञानबन्धु है3 | योगके सिवाय किसी भी मनुष्यकी उत्क्रान्ति हो ही नहीं सकती, क्यों कि मानसिक चंचलताके कारण उसकी सब शाक्तियां एक ओर न बह कर भिन्न भिन्न विषयों में टकराती हैं, और क्षीण हो कर यों ही नष्ट हो जाती हैं । इसलिये क्या किसान, क्या कारीगर, क्या लेखक, क्या शोधक, क्या त्यागी सभीको अपनी नाना शक्तियोंको केन्द्रस्थ करेनेके लिये योग ही परम साधन है। व्यावहारिक और पारमार्थिक योग--योगका कलेवर एकाग्रता है, उसकी आत्मा अहत्व ममत्वका त्याग है । जिसमें सिर्फ एकाग्रताका ही संबन्ध हो वह व्यावहारिक योग, और जिसमें एकाग्रताके साथ साथ अहत्व ममत्वके त्यागका भी संबन्ध हो वह पारमार्थिक योग है । यदि योगका उक्त आत्मा किसी भी प्रवृ- त्तिमें-चाहे वह दुनियाकी दृष्टिमें बाह्य ही क्यों न समझी जाती हो-वर्तमान हो तो पारमार्थिक योग ही सम- झना चाहिये । इसके विपरीत स्थूलदृष्टिवाले जिस प्रवृत्तिको आध्यात्मिक समझते हों, उसमें भी यदि योगका उक्त आत्मा न हो तो उसे व्यवहारिक योग ही कहना चाहिये । यही बात गीताके साम्यगर्भित कर्मयोगमें कही गई है। यो ग की दो धा रा ये-व्यवहारमै किसी भी वस्तुको परिपूर्ण स्वरूपमें तैयार करनेके लिये पहले दो बातोंकी आवश्यकता होती है । जिनमें एक ज्ञान और दूसरी क्रिया है । चितेरेको चित्र तैयार करनेसे पहले उसके स्वरूपका, उसके साधनोंका और साधनोंके उपयोगका ज्ञान होता है, और फिर वह ज्ञान के अनुसार क्रिया भी करता है। तभी वह चित्र तैयार कर पाता है। वैसे ही आध्यात्मिक क्षेत्रमें भी मोक्षके जिज्ञासुके लिये बन्धमोक्ष, आत्मा और बन्धमोक्षके कारणोंका, तथा उनके परिहार, उपादानका ज्ञान होना जरूरी है। ' एवं ज्ञानानुसार प्रवृत्ति भी आवश्यक है । इसी से संक्षेपमें यह कहा गया है कि " ज्ञानक्रियाभ्यां मोक्षः योग क्रियामार्गका नाम है । इस मार्ग में प्रवृत्त होनेसे पहले अधिकारी, आत्मा आदि आध्यात्मिक विषयोंका आरंभिक ज्ञान शास्त्रसे, सत्संगसे, या स्वयं प्रतिभा द्वारा कर लेता है । यह तत्त्वविषयक प्राथमिक ज्ञान प्रवर्तक ज्ञान कहलाता है। प्रर्वतक ज्ञान प्राथमिक दशाका ज्ञान होनेसे सबको एकाकार और एकसा नहीं हो सकता । इसीसे योगमार्गमें तथा उसके परिणामस्वरूप मोक्षस्वरूपमें तात्विक भिन्नता न होने पर भी योगमा- 1 इसी अभिप्रायसे गीता योगिको ज्ञानीसे अधिक कहती है । गीता अ. ६ श्लोक ४६- तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः । कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद् योगी भवार्जुन ! ॥ 2 गीता अ. ५ श्लोक ५- यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते । एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥ 3 योगवाशिष्ठ निर्वाण प्रकरण, उत्तरार्ध, सर्ग २१- व्याचष्टे यः पठति च शास्त्रं भोगाय शिलिवत् । यतते न त्वनुष्ठाने शानबन्धुः स उच्यते ॥ आत्मज्ञानमनासाद्य ज्ञानान्तरलवेन ये । सन्तुष्टाः कष्टं चेष्टते ते स्मृता शानबन्धवः ॥ इत्यादि । 4 अ. २ लोक ४- योगस्थः कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनञ्जय!। सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ।।
. --- 2] जैन साहित्य संशोधक [खंड .... हैं, जिनमें योगशास्त्रकी तरह सांगोपांग योगप्रक्रियाका वर्णन है। अथवा यह कहना चाहिये कि ऋग्वेदमें जो परमात्मचिन्तन अंकुरायमाण था वही उपनिषदोंमें पल्लवित पुष्पित हो कर नाना .. शाखा-प्रशाखाओंके साथ फल अवस्थाको प्राप्त हुवा । इससे उपनिषदकालमें योगमार्गका पुष्टरूपमें पाया जाना स्वाभाविक ही है । उपनिषदोंमें जगत, जीव और परमात्मसम्बन्धी जो तात्विक विचार है, उसको भिन्न भिन्न ऋषियोंने अपनी हटिसे सूत्रोंमें अथित किया, और इस तरह उस विचारको दर्शनका रूप मिला। सभी दर्शनकारोंका आखिरी उद्देश मोक्ष* ही रहा है, इससे उन्होंने अपनी अपनी दृष्टिसे तत्त्वविचार करनेके बाद भी संसारसे छुट कर मोक्ष.पानेके साधनोंका निर्देश किया है। तत्वविचारणामें मतभेद हो सकता है, पर आचरण यानी चारित्र एक ऐसी वस्तु है जिसमें सभी विचारशील एकमत हो जाते हैं । विना चरित्रका तत्त्वज्ञान कोरी बातें हैं। चारित्र यह योगका किंवा योगां- गोंका संक्षिप्त नाम है। अत एव सभी दर्शनकारोंने अपने अपने सूत्रग्रंथोंमें साधन रूपसे योगकी उपयोगिता अवश्य बतलाई है । यहां तक कि न्यायदर्शन, जिसमें प्रमाण पद्धतिका ही विचार मुख्य है,उसमें भी महर्षि गौतमने योगको स्थान दिया है1। महर्षि कणादने तो अपने वैशेषिक दर्शनमें यम, नियम, शौच आदि योगांगोंका भी महत्त्व गाया हैं2। सांख्यसूत्रमें योगप्रक्रियाके वर्णनवाले कई सूत्र हैं । ब्रह्मसूत्र में महर्षि बादरायणने तो तीसरे अध्यायका नाम ही साधन अध्याय रवखा है, और उसमें आसन भ्यान आदि योगांगोंका वर्णन किया है 4 योगदर्शन तो मुख्यत- या योगविचारका ही ग्रन्थ ठहरा, अत एव उसमें सांगोपांग योगप्रक्रियाकी,मीमांसाका पाया जाना सहज ही है। । योगके स्वरूपके सम्बन्धमें मतभेद न होनेके कारण और उसके प्रतिपादनका उत्तरदायित्व खासकर योगदर्शनके उपर होनेके कारण अन्य दर्शनकारों ने अपने अपने सूत्र ग्रन्थोंमें थोडासा योगविचार करके विशेष जानकारी के लिये जिज्ञासुओंको योगदर्शन देखनेकी सूचना दे दी है। 1पूर्वमीमांसामें महर्षि जैमिनिने योगका निर्देश तक नहीं किया है सो ठीक ही है, क्यों कि उसमें सकाम कर्मकाण्ड अर्थात् धूम-मार्गकी ही मीमांसा है । कर्मकाण्डकी पहुंच 8 ब्रह्मविद्योपनिपद् , क्षुरिकोपनिषद्, चूलिकोपनिषद्, नादबिन्दु, ब्रहाबिन्दु, अमृतबिन्दु, ध्यानबिन्दु, तेजोविन्दु, योगशिखा, योगतत्त्व, हंस इत्यादि । देखो झुसेनकृत-Philosphy of the Upanishads *-प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्था- नानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसाधिगमः । गौ० सू० १, १, १॥-धर्मविशेषप्रसूताद् द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानां पदार्थानां साधर्म्यवैधाभ्यां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसम् ॥ वै० सू० १, १, ४॥ अथ त्रिविधदुःखात्यन्तनिवृत्तिरत्यन्त- पुरुषार्थः। सां० द० १, १ ॥-पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति । यो सू० ४, ३३ ॥-अनावृत्तिः शब्दादनावृत्तिः शब्दात् । ब्र, सू. ४, ४, २२ ।-सम्यग्दर्शनशानचारित्राणि मोक्षमार्गः । तत्त्वार्थ सू० १-१ जैन. ९० ।-बौद्ध दर्शनका तीसरा निरोध नामक आर्यसत्य ही मोक्ष है। 1 समाधिविशेषाभ्यासात् ४-२-३८ । अरण्यगुहापुलिनादिषु योगाभ्यासोपदेशः ४-२-४२ । तदर्थ यमनियमाभ्यासात्मसंस्कारो योगाचाध्यात्मविध्युपायैः ४--२-४६ ॥ 2 अभिपेचनोपवासब्रह्मचर्यगुरुकुलवासवानप्रस्थयशदानप्रोक्षणदिङ्नक्षत्रमन्त्रकालनियमाश्यादृष्टाय । ६-२ -२ । अयतस्य शुचिभोजनादभ्युदयो न विद्यते, नियमाभावाद्, विद्यते वाऽर्थान्तरत्वाद् यमस्य । '६-२-८ । 3 रागोपहतिर्ध्यानम् ३-३० । वृत्तिनिरोधात् तसिद्धिः ३-३१ । धारणासनवकर्मणा तत्सिद्भिः ३-३२ । निरोधश्छदिविधारणाभ्याम् ३-३३ । स्थिरसुखमासनम् ३-३४ । 4 आसीनः संभवात् ४-१-७ । ध्यानाञ्च ४-१-८ । अचलत्वं चापेक्ष्य ४-१-९ । स्मरन्ति च ४-१-१० । यत्रैकाग्रता तत्राविशेषात् ४-१-११। 5 योगशास्त्राच्चाध्यात्मविधिः प्रतिपत्तव्यः । न्यायदर्शन ४-२-४६ भाष्य । 14 अंक १, योगदर्शन [९ Mon. ww MAMMre - MaWANM वर्गतक ही है, मोक्ष उसका साध्य नहीं। और योगका उपयोग तो मोक्षके लिये ही होता है । जो योग उपनिषदोंमें सूचित और सूत्रोंमें सूत्रित है, उसीकी महिमा गीतामें अनेक रूपसे गाई गई है । उसमें योगकी तान कभी कर्मके साथ, कभी भक्तिके साथ और कभी ज्ञानके साथ सुनाई देती है1। उसके छठे और तेरहवें अध्यायमें तो योगके मौलिक सब सिद्धान्त और योगकी सारी प्रक्रिया आ जाती है2 | कृष्णके द्वारा अर्जुनको गीताके रूपमें योगशिक्षा दिला कर ही महाभारत सन्तुष्ट नहीं हुआ । उसके अथक स्वरको देखते हुए कहना पडता है कि ऐसा होना संभव भी न था । अत एव शान्तिपर्व और अनुशासनपर्वमें योगविषयक अनेक सर्ग वर्तमान हैं, जिनमें योगकी अथेति प्रक्रियाका वर्णन पुनरुक्तिकी परवा न करके किया गया है। उसमें बाण- शय्यापर लेटे हुए भीष्मसे बार बार पूछनेमें न तो युधिष्ठिरको ही कंटाला आता है, और न उस सुपात्र धार्मिक राजाको शिक्षा देनेमें भीष्मको ही थकावट मालूम होती है । योगवाशिष्ठका विस्तृत महल तो योगकी ही भूमिकापर खडा किया गया है । उसके छह4 प्रकरण मानों उसके सुदीर्घ कमरे हैं, जिनमें योगसे सम्बन्ध रखनेवाले सभी विषय रोचकतापूर्वक वर्णन किये गये हैं । योगकी जों जो बातें योगदर्शनमें संक्षेपमें कही गई हैं, उन्हींका विविधरूपमें विस्तार करके ग्रन्थकारने योगवाशिष्ठका कलेवर बहुत बढा दिया है, जिससे यही कहना पडता है कि योगवाशिष्ठ योगका ग्रन्थराज है । पुराणमें सिर्फ पुराणशिरोमीण भागवतको ही देखिये, उसमें योगका सुमधुर पद्योंमे पूरा वर्णन है। । योगविषयक विविध साहित्यसे लोगोंकी रुचि इतनी परिमार्जित हो गई थी कि तान्त्रिक संप्रदायवालोंने भी तन्त्रग्रन्थोंमें योगको जगह दी, यहां तक कि योग तन्त्रका एक खासा अंग बन गया । अनेक तान्त्रिक ग्रन्थों में योगी चर्चा है, पर उन सबमें महानिर्वाणतन्त्र, पट्रचक्रनिरूपण आदि मुख्य हैं । 1 गीताके अठारह अध्यायोंमें पहले छह अध्याय कर्मयोग प्रधान, वीचके छह अध्याय भक्तियोग प्रधान और अंतिम छह अध्याय ज्ञानयोग प्रधान हैं। 2 योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः । एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥ १० ॥ शुची देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥ ११ ॥ तत्रैकामं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः । उपविश्यासने युज्याद् योगमात्मविशुद्धये ॥ १२ ॥ समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं खं दिशश्चानवलोकयन् ॥ १३ ॥ प्रशान्तात्मा विगतभीब्रह्मचारिवते स्थितः । मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥१४॥ अ०६ 3 शान्तिपर्व १९३, २१७, २४६, २५४, इत्यादि । अनुशासनपर्व ३६, २४६ इत्यादि । 4 वैराग्य, मुमुक्षुव्यवहार, उत्पत्ति, स्थिति, उपशम और निर्वाण । 5 स्कन्ध ३ अध्याय २८; स्कन्ध ११- अ० १५, १९, २० आदि। 6 देखो महानिर्वाणतन्त्र ३ अध्याय । देखो षट्चक्रनिरूपण- ऐक्यं जीवात्मनोराहुर्योगं पोगविशारदाः। शिवात्मनोरभेदेन प्रतिपतिं परे विदुः ॥ पृष्ट ८२ Tantrik Texts में छपा हुआ । समत्वभावनां नित्यं जीवात्मपरमात्मनोः । समाधिमाहुर्मुनयः प्रोक्तमष्टाङ्गलक्षणम् || पृ० ९१ यदत्र नात्र निर्भासः स्तिमितोदधिवत् स्मृतम् । स्वरूपशून्यं यदू ध्यानं तत्समाधिर्विधीयते ॥ पृ० ९०,, त्रिकोणं तस्यान्तः स्फूरति च सततं विद्युदाकाररूपं । तदन्तः शून्यं तत् सकलसुरगणैः सेवितं चातिगुप्तम् ।। पृ. ६० " आहारनिर्हारविहारयोगाः सुसंवृता धर्मविदा तु कार्याः । पृ०६१ ध्यै चिन्तायाम् स्मृतो धातुश्चिन्ता तत्त्वेन निश्चला। एतद् ध्यानमिह प्रोक्तं सगुणं निर्गुणं द्विधा । सगुणं वर्णभेदेन निर्गुणं केवलं तथा ॥ पृ० १३४ " १०] जैन साहित्य संशोधक [संद wwwimwers ~-- .. ---- PARA जब नदीमें बाढ आती है तब वह चारों ओरसे बहने लगती है। योगका यही हाल हुवा, और वह आसन, मुद्रा, प्राणायाम आदि बाल अंगों में प्रवाहित होने लगा । बाह्य अंगोंका भेद प्रभेद पूर्वक इतना अधिक वर्णन किया गया और उसपर इतना अधिक जोर दिया गया कि जिससे यह योगकी एक शाखाही अलग बन गई, जो हठयोगके नामसे प्रसिद्ध है। हठयोगके अनेक ग्रंथों में हठयोगप्रदीपिका, शिवसंहिता, धेरंडसंहिता, गोरक्षपद्धति, गोरक्षशतक आदि अन्य प्रसिद्ध हैं, जिनमें आसन, बन्ध, मुद्रा, षट्कर्म, कुंभक, रेचक, पूरक आदि बाह्य योगांगोंका पेट भर भरके वर्णन किया है; और घेरण्डने तो चौरासी आसनकों चौरासी लाख तक पहुंचा दिया है। उक्त हठयोगप्रधान अन्यों हठयोगप्रदीपिका ही मुख्य है, क्यों कि उसीका विषय अन्य अन्याम विस्तार रूपसे वर्णन किया गया है। योगविषयक साहित्यके जिज्ञासुओंको योगतारावली, बिन्दुयोग, योगवीज और योगकल्प- दुमका नाम भी भूलना न चाहिये । विक्रमकी सत्रहवी शताब्दीमें मैथिल पण्डित भवदेवद्वारा रचित योगनिबन्ध नामक हस्तलिखित ग्रन्थ भी देखने में आया है, जिसमें विष्णुपुराण आदि अनेक ग्रन्यों के हवाले देकर योगसम्बन्धी प्रत्येक विषय पर विस्तृत चर्चा की गई है। संस्कृत भाषामें योगका वर्णन होनेते सर्व साधारणकी जिज्ञासाको शान्त न देखकर लोकभापाके योगियान भी अपनी जवानमें योगका आलाप करना शुरु कर दिया। महाराष्ट्रीय भाषामें गीताकी ज्ञानदेवकृत ज्ञानेश्वरी टीका प्रसिद्ध है, जिसके छठे अध्यायका भाग वडा री उदयहारी है। निःसन्देह ज्ञानेश्वरी द्वारा ज्ञानदेवने अपने अनुभव और वाणीको अवन्थ्य कर दिया है। सुहाँगेवा अंबिये रचित नायसम्प्रदायानुसारी सिद्धान्तसंहिता भी योगके जिशागुओंके लिये देखनेकी वस्तु है। कबीरका वीजक अन्य योगसम्बन्धी भाषासाहित्यका एक सुन्दर मणका है । अन्य योगी सन्तोंने भी भाषामें अपने अपने योगानुभवकी प्रसादी लोगोंको चखाई है, जिससे जनताका बहुत बडा माग योगके नाम मात्र मुग्ध बन जाता है। अत एव हिन्दी, गुजराती, मराठी, वंगला आदि प्रसिद्ध प्रत्येक प्रान्तीय भाषाम पातञ्जल योगशास्त्रका अनुवाद तथा विवेचन आदि अनेक छोटे बडे अन्य बन गये है। अंग्रेजी आदि विदेशीय भाषामें भी योगशास्त्रका अनुवाद आदि बहुत कुछ बन गया है, जिसमें वूडका भाष्यटीका सहित मूल पातञ्जल योगशास्त्रका अनुवाद विशेष उल्लेख योग्य है। जैन सम्प्रदाय निवृत्ति-प्रधान है । उसके प्रवर्तक भगवान महावीरने बारह सालसे आधिक समय तक मौन धारण करके सिर्फ आत्मचिन्तनद्वारा योगाभ्यासमें ही मुख्यतया जीवन बिताया। उनके हजारों शिष्य2 तो ऐसे में जिन्होंने घरबार छोड कर योगाभ्यासद्वारा साधुनीवन विताना ही पसंद किया था। जैन सम्प्रदायके मौलिक अन्य आगम कहलाते हैं। उनमें साधुचर्याका जो वर्णन है, उसको देखनेसे यह स्पष्ट जान पड़ता है कि पांच यम; तप, स्वाध्याय आदि नियम; इन्द्रिय-जय-रूल प्रत्याहार इत्यादि जो योगके खात अङ्ग हैं, उन्हींको, साधुजीयनका एक.मान प्राण माना है। , 1 प्रो. राजेन्द्रलाल मित्र, स्वामी विवेकानंद, श्रीयुत रामप्रसाद आदि कृत। 2 " चउद्दसहिं समणसाहस्सीहिं छत्तीसाहिं अजिआसाहस्साहि" उववाइसन्न । 3 देखो आचाराङ्ग, सूत्रकृताग, उत्तराध्ययन, दशवैकालिक, मूलाचार, आदि ।
अंक१] बोगदर्शन [११ जैनशास्त्रमें योगपर यहां तक भार दिया गया है कि पहले तो वह मुमुक्षुओंको आत्मचिंतनके सिवाय दूबरे कार्यो प्रवृत्ति करनेको संमति ही नहीं देता; और अनिवार्य रूपसे प्रवृत्ति करनी आवश्यक हो तो. वह निवृत्तिमय प्रवृत्ति. करनेको कहता है । इसी निवृत्तिमय प्रवृत्तिका नाम उसमें अष्टप्रवचनमाता1. है । साधुजीवनकी दैनिक और रात्रिक चर्या में तीसरे प्रहरके सिवाय अन्य तीनों प्रहरोंमें मुख्यतया स्वाध्याय और ध्यान.करनेको ही कहा गया है21. यह बात भूलनी. न चाहिये कि जैन आगमोंमें योगअर्थमें प्रधानतया ध्यानशब्द प्रयुक्त है। ध्यानके लक्षण, भेद प्रभेद, आलम्बन आदिका विस्तृत वर्णन अनेक जैन आगमोंमें है | आगमके बाद नियुक्तिकानंबर है। उसमें भी आगमगत ध्यानका ही स्पष्टीकरण है । वाचक उमास्वाति कृत तत्त्वार्थसूत्रमें भी ध्यानका वर्णन है, पर उसमें आगम और नियुक्तिकी अपेक्षा कोई अधिक बात नहीं है । जिनभद्रगणी क्षमाश्रमणका ध्यानशतक6 आगमादि उक्त अन्योंमें वर्णित ध्यानका स्पष्टीकरण मात्र है। यहां तकके योगविषयक जैन विचारोंमें आगमोक्त वर्णनकी शैली ही प्रधान रही हैं । पर इस शैलीको श्रीमान हरिभद्रसूरिने एकदम बदलकर तत्कालिन परिस्थिति व लोकरुचीके अनुसार नवीन परिभाषा दे कर और वर्णनशैली अपूर्वसी बनाकर जैन योग-साहित्यमें नया युग उपस्थित किया। इसके सबूतमें उनके बनाये हुए योगबिन्दु,योगदृष्टीसमुच्चय, योगविशिंका, योगशतका, षोडशक ये अन्य प्रसिद्ध हैं। इन अन्योंमें उन्होंने सिर्फ जैन-मार्गानुसार योगका वर्णन करके ही संतोष नहीं माना है, किन्तु पातंजल योगसूत्रमें वर्णित योगप्रक्रिया और उसकी खास परिभाषाओंके साथ जैन संकेतोंका मिलान भी किया है8 । योगदृष्टिसमुच्चयमें योगकी आठ दृष्टियोंका जो वर्णन है, वह सारे योगसाहित्यमें एक नवीन दिशा है । श्रीमान् हरिभद्रसूरिके योगविषयक ग्रन्थ उनकी योगाभिरुचि और योगविषयक व्यापक बुद्धिके खासे नमुने हैं। इसके बाद श्रीमान हेमचन्द्रसूरिकृत योगशास्त्रका नंबर आता है । उसमें पातञ्जल-योगशास्त्र निर्दिष्ट आठ योगांगोंके क्रमसे साधु और गृहस्थ जीवनकी आचार-प्रक्रियाका जैन शैलीके अनुसार वर्णन है, जिसमें आसन तथा 1 देखो उत्तराध्ययन अ० २४ । 2 दिवसस्स चउरो भाए, कुना भिक्खु विअक्खणो । तओ उत्तरगुणे कुना, दिणभागेसु. चउसुः वि ॥११॥ पढम पोरिसि सज्झायं, बिइअं झाणं झिआयइ । तइआए गोअरकालं, पुणो चउत्थिए सज्झायं ।। १२ ।। रति पि चउरो भाए, भिक्खु कुजा विअक्खणो । तओ उत्तरगुणे कुजा, राईभागेसु चउसु वि ॥१७॥ पढम पोरिसि सज्झायं, बिइअं झाणं झिआयइ । तइआए निद्दमोक्खं तु, चउत्थिए भुजो वि सज्झायं ॥ १८ ॥-उत्तराध्ययन अ० २६ । 3 देखो स्थानाङ्ग अ० ४ उद्देश १ । समवायाम स० ४ । भगवती शतक २५-उद्देश ७ । उत्त- राभ्ययन अ. ३०, गा० ३५1 4 देखो आवश्यकनियुक्ति कायोत्सर्ग, अध्ययन गा. १४६२-१४८६ । 5 देखो अ. ९ सू० २७ से आगे। 6 देखो हारिभद्रीय आवश्यक वृत्ति प्रतिक्रमणाध्ययन पृ० ५८१ 7 यह अन्य जैन ग्रन्थावलिंमें उल्लिखित है ,पृ० ११३ । 8 समाधिरेष एवान्यैः संप्रशातोऽभिधीयते । सम्यक्प्रकर्शरूपेण वृत्यर्थशानतस्तथा ॥ ४.१८ ॥ असंप्रशात एषोऽपि समाधिर्गीयते परैः । निरुद्धाशेषवृत्यादितत्स्वरूपानुवेधतः ।। ४२० ।। इत्यादि, योगबिन्दु । 9 मित्रा तारा बला दिप्रा स्थिरा'कान्ता प्रभा परा । नामानि योगदृष्टींनां लक्षणं च निबोधत ॥ १३ ॥ इन आठ दृष्टियोंका स्वरूप, दृष्टान्त आदि विषय, योगजिज्ञासुओंके लिये देखने योग्य है। इसी विष- यपर यशोविजयजीने २१, २२, २३, २४ ये चार' द्वात्रिशिंकायें लिखी हैं। साथ ही उन्होंने संस्कृत'न जान- नेवालोंके हितार्थ आठ दृष्टियोंकी सज्झाय भी गुजराती भाषामें बनाई है ।
१२] जैन साहित्य संशोधक [खंड २ A www.MA प्राणायामसे संबन्ध रखनेवाली अनेक बातोंका विस्तृत स्वरूप है; जिसको देखनेसे यह जान पडता है कि तत्का- लीन लोगोंमें हठयोग-प्रक्रियाका कितना अधिक प्रचार था । हेमचन्द्राचार्यने अपने योगशास्त्रमें हरिमद्रसूरिके योगविषयक अन्योंकी नवीन परिभाषा और रोचक शैलीका कहीं भी उल्लेख नहीं किया है, पर शुभचन्द्रचार्यके शानार्णवगत पदस्थ, पिण्डस्थ, रूपस्थ, और रूपातीत ध्यानका विस्तृत व स्पष्ट वर्णन किया है11 अन्तमें उन्होंने स्वानुभवसे विक्षिप्त, यातायात, श्लिष्ट और सुलीन ऐसे मनके चार भेदोंका वर्णन करके नवीनता लानेका खास कौशल दिखाया है21 निस्सन्देह उनका योगशास्त्र जैन तत्त्वज्ञान और जैन आचारका एक पाठ्य ग्रन्थ है। इसके बाद उपाध्याय-श्रीयशोविजयकृत योगग्रन्थोंपर नजर ठहरती है । उपाध्यायजीका शास्त्रज्ञान, तर्क- कौशल और योगानुभव बहुत गम्भीर था। इससे उन्होंने अध्यात्मसार, अध्यात्मोपनिपद तथा सटीक बत्तीस बत्तीसीयाँ योग संबन्धी विषयोंपर लिखी हैं, जिनमें जैन मन्तव्योंकी सूक्ष्म और रोचक मीमांसा करनेके उपरांत अन्य दर्शन और जैनदर्शनका मिलान भी किया है । इसके सिवा उन्होंने हरिभद्रसूरिकृत योगविशिका तथा घोडशकपर टीका लिख कर प्राचीन गूढ तत्त्वोंका स्पष्ट उद्घाटन भी किया है। इतना ही करके वे सन्तुष्ट नहीं हुए, उन्होंने महर्षि पतञ्जलिकृत योगसूत्रोंके उपर एक छोटीसी वृत्ति भी लिखी है । यह वृत्ति जैन प्रक्रि- याके अनुसार लिखी हुई है, इसलिये उसमें यथासंभव योगदर्शनकी भित्ति-स्वरूप सांख्य-प्रक्रियाका जैन- प्रक्रियाके साथ मिलान भी किया है, और अनेक स्थलोंमें उसका सयुक्तिक प्रतिवाद भी किया है । उपाध्या- यजीने अपनी विवेचनामें जो मध्यस्थता, गुणग्राहकता, सूक्ष्म समन्वयशक्ति और स्पष्टभापिता दिखाई है। ऐसी दूसरे आचार्योंमें बहुत कम नजर आती है। एक योगसार नामक ग्रन्थ भी श्वेताम्बर साहित्यमें है । फर्ताका उल्लेख उसमें नहीं है, पर उसके दृष्टान्त आदि वर्णनसे जान पड़ता है कि हेमचन्द्राचार्यके योगशास्त्रके किसी श्वेताम्बर आचार्यके द्वारा वह रचा गया है । दिगम्बर साहित्यमें ज्ञानार्णव तो प्रसिद्ध ही पर ध्यानसार और योगप्रदीप ये दो हस्तलिखित ग्रन्थ भी हमारे देखनेमें आये हैं, जो पद्यबन्ध और प्रमाणमें छोटे हैं । इसके सिवाय श्वेताम्बर दिगम्बर संप्रदायके योगविषयक ग्रन्यांका कुछ विशेष परिचय जैन ग्रन्थावाल पृ. १०६ से भी मिल सकता है । बस यहां तकहीमें जैन योगसाहित्य समाप्त हो जाता है । बौद्ध सम्प्रदाय भी जैन सम्प्रदायकी तरह निवृत्तिप्रधान है । भगवान् गौतम बुद्धने बुद्धत्व प्राप्त होनेसे पहले छह वर्पतक मुख्यतया ध्यानद्वारा योगाभ्यास ही किया। उनके हजारों शिष्य भी उसी मार्ग पर चले । मौलिक बौद्धग्रन्थोंमें जैन आगमोंके समान योग अर्थमें बहुधा ध्यान शब्द ही मिलता है, और उनमें ध्यानके 1 देखो प्रकाश ७-१० तक । 2 १२ वाँ प्रकाश श्लोक २-३-४ । 3 अध्यात्मसारके योगाधिकार और ध्यानाधिकारमें प्रधानतया भगवद्गीता तथा पातञ्जलसूत्रका उपयोग करके अनेक जैनप्रक्रियाप्रसिद्ध ध्यान- विषयोंका उक्त दोनों ग्रन्गोंके साथ समन्वय किया है, जो बहुत ध्यानपूर्वक देखने योग्य है । अध्यात्मोप- निषद्के शास्त्र, ज्ञान, क्रिया और साम्य इन चारों योगोंमें प्रधानतया योगवाशिष्ठ तथा तैत्तिरीय उपनिषदके वाक्योंका अवतरण दे कर तात्त्विक ऐक्य बतलाया है। योगावतार बत्तीसीमें खास कर पातञ्जल योगके पदार्थोंका जैन प्रक्रियाके अनुसार स्पष्टीकरण किया है। 4 इसके लिये उनका ज्ञानसार ग्रन्थ जो उन्होंने अंतिम जीवनमें लिखा मालुम होता है वह ध्यानपूर्वक देखना चाहिए । शास्त्रवार्तासमुच्चयकी उनकी टीका (पृ. १०) भी देखनी आवश्यक है। 5 इसके लिए उनके शास्त्रवार्तासमुच्चयादि ग्रन्थ ध्यानपूर्वक देखने चाहिए, और खास कर उनकी पातअल सूत्रवृत्ति मननपूर्वक देखनेसे हमारा कथन अक्षरशः विश्वसनीय मालूम पडेगा। आधारपर अंक १.! योगदर्शन [१३ चार भेद नजर आते हैं । उक्त चार भेदके नाम तथा भाव प्रायः वही हैं, जो जैनदर्शन तथा योगदर्शनकी प्रक्रियामें हैं1 | बौद्ध सप्रदायमें समाधि राज नामक ग्रन्थ भी है । वैदिक, जैन और बौद्ध संप्रदाय योगविषयक साहित्यका हमने बहुत' संक्षपमें अत्यावश्यक परिचय कराया है, पर इसके विशेष परिचयके लिये-कॅट्लोगस् कॅटलॉगॉरम् 2, वो० १ पृ. ४७७ से ४८१ पर जो योगविषयक ग्रन्योंकी नामावलि है वह देखने योग्य है। यहां एक बात खास ध्यान देनेके योग्य है, वह यह कि यद्यपि वैदिक साहित्यमें अनेक जगह हठयोगकी प्रथाको अग्राह्य कहा है, तथापि उसमें हठयोगकी प्रधानतावाले अनेक ग्रन्थोंका और मार्गोंका निर्माण हुआ है । इसके विपरीत जैन और बौद्ध साहित्यमें हठयोगने स्थान नहीं पाया है, इतना ही नहीं, बल्कि उसमें हठयोगका स्पष्ट निषेध भा किया है । -- 1. सो खो अहं ब्राह्मण विविच्चेव कामेहि विविंच अकुसलहि' धम्मेहि सवितकं सविचारं विवेकजं पतिसु खं पढमझानं उपसंपज्ज विहार्सि; वितक्कविचारानं वूपसमा अज्झत्तं संपसादनं चेतसो एकोदिभावं अवितकं अविचारं समाधिज पीतिसुखं दुतियज्झानं उपसंपज्ज विहार्सि; पीतिया च विरागा उपेक्खको च विहासिं, सतो. च संपजानो सुखं च कायेन पार्टिसंवेदसि, यं तं अरिया आचिक्खन्ति-उपेक्खको सतिमा सुखविंहारीऽति तति- यज्झानं उपसंपज विहासि; सुखस्स च पहाना दुक्खस्स च पहाना पुवऽव सोमनस्त दोमनस्सान अत्यंगमा अदुक्खमसुखं उपेक्खासति पारिसुद्धिं चतुत्थज्झानं उपसंपज मज्झिमनिकाये भयभेखसुत्तं विहासिं । इन्हीं चार ध्यानाका वर्णन दीघनिकाय सामञकफलसुतमें है। देखो प्रो. सि. वि. राजवाडे कृत मराठी अनुवाद पृ. ७२ । यही विचार प्रो. धर्मानंद कौशाम्बी लिखित बुद्धलीलासारसंग्रहमें है । देखो पृ १२८ । जैनसूत्रमें शुक्लध्यानके भेदोंका विचार है, उसमें उक्त सवितर्क आदि चार ध्यान जैसा ही वर्णन हैं। देखो तत्त्वार्य अ. ९ सू० ४१-४४ । योगशास्त्रमें संप्रशात समाधि तथा समापत्तिओंका वर्णन है। उसमें भी उक्त सविसर्क निर्वितर्क आदि ध्यान जैसा ही विचार है । पा. सू. पा. १-१७, ४२, ४३, ४४ । 2 थिआडोर आउफ्रेटकृत, लिप्झिगमें प्रकाशित १८९१ की आवृत्ति । 3 उदाहरणार्थ:- सतीषु युक्तिष्वेतासु हठान्नियमयन्ति ये । चेतस्ते दीपमुत्सृज्य विनिम्नन्ति तमोऽअनैः ॥ ३७ ॥ विमूढाः कर्तुमुद्युक्ता ये हठाच्चेतसो जयम् । ते निवघ्नन्ति नागेन्द्रमुन्मत्तं विसतन्ततुभिः ॥ ३८ ॥ चित्तं चित्तस्य वाऽदूरं सस्थितं स्वशरीरकम् । साधयान्त समुत्सृज्य युक्ति ये तान्हतान् विदुः ॥ ३९ ॥ योगवाशिष्ठ-उपशम'प्र. सर्ग ९२. 4 इसके उदाहरणमें बौद्ध धर्ममें बुद्ध भगवान्ने तो शुरुमें कष्टप्रधान तपस्याका आरंभ करके अंतमें मध्यमप्रतिपदा मार्गका स्वीकार किया है-देखो बुद्धलीलासारसंग्रह, जैनशास्त्रमें श्रीभद्रबाहुस्वामिने आवश्यकनियुक्तिमें " ऊसासं ण णिरंभइ" १५२० इत्यादि. उक्तिले हठयोगका ही निराकरण किया है। श्रीहेमचन्द्राचार्यने भी अपने योगशास्त्रमें " तन्नाप्नोति मनःस्वास्थ्यं प्राणायामैः कदार्थतं । प्राणस्यायमने पीडा तस्यां स्यात् चित्तविप्लवः ॥ इत्यादि उक्तिसे उसी बातको दोहराया है। श्रीयशोविजयजीने भी पातञ्जलयोगसूत्रकी अपनी वृत्तिमें (१-३४) प्राणायामको योगका आनिश्चित साधन कह कर हठयोगका ही निरसन किया है। ।
१४] जैन साहित्य संशोधक [खंड २ WA- - KHAN -- M -~- A ----- , - जो अथ, योगशास्त्र-ऊपरके वर्णनसे मालूम हो जाता है कि योगप्राक्रयाका वर्णन करनेवाले छोटे वडे अनेक ग्रन्थ हैं | इन सब उपलब्ध ग्रन्थोंमें महर्षि पतञ्जलिकृत योगशास्त्रका आसन ऊंचा है। इसके तीन कारण है -१ ग्रन्थकी संक्षिप्तता तथा सरलता, २ विषयकी स्पष्टता तथा पूर्णता, ३ और मध्यस्थभाव तथा अनुभवसिद्धता यही कारण है कि योगदर्शन यह नाम सुनते ही सहसा पातञ्जल योगसूत्रका स्मरण हो आता है। श्रीदांकरा- चार्यने अपने ब्रह्मसूत्रभाष्यमें योगदर्शनका प्रतिवाद करते हुए अथ सम्यग्दर्शनाम्पुपायो योगः " ऐसा उल्लेख किया है, उससे इस बातमें कोई संदेह नहीं रहता कि उनके सामने पातञ्जल योगशास्त्रसे भिन्न दूसरा कोई योगशास्त्र रहा है। क्यों कि पातञ्जल योगशास्त्रका आरम्भ अथ योगानुशासनम् इस सूत्रसे होता है, और उक्त भाष्योल्लिखित वाक्यमं भी ग्रन्थारम्भसूचक अथ शद्ध है, यद्यपि उक्त भाष्यमें अन्यत्र और भी योगसम्बन्धी दो उल्लेख हैं2 जिनमें एक तो पातजल योगशास्त्रका संपूर्ण सूत्र ही है। और दूसरा उसका अविकल सूत्र नहीं, किन्तु उसके सूत्रते मिलता जुलता है4 | तथापि " सम्यग्दर्श नाभ्युपायो योगः " इस उल्लेखनी शब्दरचना और स्वतन्त्रताकी और ध्यान देनेसे यही कहना पडता है कि पिछले दो उल्लेख भी उसी भिन्न योगशास्त्रके होने चाहिये, जिसका अंश " अथ सम्यग्दर्शनाभ्युपायो योगः " यह वाक्य माना जाय । अस्तु, जो कुछ हो, आज हमारे सामने तो पतञ्जलिका ही योगशास्त्र उपस्थित है, और वह सर्वप्रिय है; इसलिये बहुत संक्षेपमें भी उसका ‘बाह्य तथा आन्तरिक परिचय कराना अनु- पयुक्त न होगा। इस योगशास्त्रके चार पद और कुल १९५ सूत्र हैं। पहले पादका नाम समाधि, दूसरेका साधन, तीसरेका विभूति, और चोथेका कैवल्यपाद है । प्रथमपादमें मुख्यतया योगका स्वरूप, उसके उपाय और चित्त स्थिरताके उपायोंका वर्णन है । दूसरे पादमें क्रियायोग, आठ योगाङ्ग, उनके फल तथा चतुर्दूहका मुख्य वर्णन है। तीसरे पादमें योगजन्य विभूतियोंके वर्णनकी प्रधानता है। और चौथे पादमें परिणामवादके स्थापन, विज्ञानवादके निराकरण तथा कैवल्य तथा कैवल्य अवस्थाके स्वरूपका वर्णन मुख्य है । महर्षि पतञ्जालने अपने योगशास्त्रकी नीव सांख्यसिद्धान्तपर डाली है। इसलिये उसके प्रत्येक पादके अन्तमें " योगशास्त्रे सांख्यप्रवचने " इत्यादि उल्लेख मिलता है। " सांख्यप्रवचने" इस विशेषणसे यह स्पष्ट ध्वनित होता है कि सांख्यके सिवाय अन्यदर्शनके सिद्धांतोंके आधारपर भी रचे हुए योगशास्त्र उस समय , 1 ब्रह्मसूत्र २-१-३ भाष्यगत । 2 " खाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगः " ब्रह्मसूत्र १-३-३३ भाष्यगत । योगशास्त्रप्रसिद्धाः मनसः पश्च वृत्तयः परिगृह्यन्ते, " प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रासमृतयः नाम २-४-१२ भाष्यगत । पं. वासुदेव शास्त्री अभ्यंकरने अपने ब्रह्मसूत्रके मराठी अनुवादके परिशिष्टमें उक्त दो उल्लेखोंका योगसूत्र- रूपसे निर्देश किया है, पर अथ सम्यग्दर्शनाभ्युपायो योगः " इस उल्लेखके संबंधमें कहीं भी ऊहापोह नहीं किया है। 3 मिलाओ पा. २ सू. ४४ | 4 मिलाओ पा. १ सू. ६ । 5 हेय, हेयहेतु, हान, हानोपाय ये चतुर्वृह कहलाते हैं । इनका वणर्न सूत्र १६-२६ तकमें है ।
---- ----- V-4---------- -~-- अंक १] योगदर्शन [ १५ ........ मोजुद थे या रचे जाते थे। इस योगशास्त्रके ऊपर अनेक लोटे बडे टीका ग्रन्य1 हैं, पर व्यासकृत भाष्य और वाचस्पतिकृत टीकासे उसकी उपादेयता बहुत बढ़ गई है। सब दर्शनाके अन्तिम साथ्यके सम्बन्ध विचार किया जाय तो उसके दो पक्ष दृष्टिगोचर होते हैं। प्रथम पक्षका अन्तिम साध्य शाश्वत सुख नहीं है । उसका मानना है कि मुक्तिमें शाश्वत सुख नामक कोई स्वतन्त्र वस्तु नहीं है, उसमें जो कुछ है वह दुःखकी आत्यन्तिक निवृत्ति ही । दूसरा पक्ष शाश्वतिक सुखलाभको ही मोक्ष कहता है । ऐसा मोक्ष हो जानेपर दुःखकी आत्यन्तिक निवृत्ति आप ही आप हो जाती है। वैशेषिक नेयायिक-2, सांख्य, योग4, और बौद्धदर्शन प्रथम पक्षके अनुगामी हैं । वेदान्त और जैनदर्शनी, दूसरे पक्षके अनुगामी हैं। योगशास्त्रका विषय-विभाग उसके अन्तिमसाध्यानुसार ही है। उसमें गौण मुख्य रूपसे अनेक सिद्धान्त प्रतिपादित हैं, पर उन सबका संक्षेपमें वर्गीकरण किया जाय तो उसके चार विभाग हो जाते हैं । १ हेय, २ हेय-हेतु, ३ हान, ४ हानोपाय । यह वर्गीकरण स्वयं सूत्रकारने किया है; और इसीसे भाष्यकारने योगशास्त्र- को चतुयूहात्मक कहा है8 | सांख्यसूत्र में भी यही वर्गीकरण है । बुद्ध भगवान्ने इसी चतुर्दूहको आर्य-सत्य नामसे प्रसिद्ध किया है; और योगशास्त्रके आठ योगाङ्गोंकी तरह उन्होंने चौथे आर्य-सत्यके साधनरूपसे आर्य अष्टाङ्गमार्गका उपदेश किया है। दुःख हेय है10, अविद्या हेयका कारण है11, दुःखका आत्यन्तिक नाश हान है12, और विवेक ख्याति हानका उपाय है131 उक्त वर्गीकरणकी अपेक्षा दूसरी तिमे भी योगशास्त्रका विषय-विभाग किया जा सकता है । जिसस कि उसके मन्तव्यांका भान विशेष लष्ट हो। यह विभाग इस प्रकार है-१ हाता, २ ईश्वर, ३ जगत् , ४ संसार- मोनका स्वरूप, और उसके कारण | १. दाता दुःग्वसे छुटकारा पानेवाले द्रष्टा अर्थात् चेतनका नाम है । योग-शास्त्रमें सांख्य14 । 1 व्यास कृत भाष्य, वाचस्पतिकृत तत्त्ववैशारदी टीका, भोजदेवकृत राजमार्तड, नागोजीभट्ट कृत वृत्ति, विज्ञानाभिक्षु कृत वार्तिक, योगचन्द्रिका, मणिप्रभा, भावागणेशीय वृत्ति, बालरामोदासीन कृत टिप्पण आदि । " तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्गः " न्यायदर्शन १-१-२२ । 3 ईश्वरकृष्णकारिका १ 1 4 उसमें हानतत्व मान कर दुःखके आत्यन्तिक नाशको ही हान कहा है। 5 बुद्ध भगवानके तीसरे निरोध नामक आर्यसत्यका मतलब दुःख नाशसे है। 6 वेदान्त दर्शनमें ब्रह्मको सच्चिदानंदस्वरूप माना है, इसीलिये उसमें नित्यसुखकी अभिव्यक्तिका नाम हि मोक्ष है। 7 जैन दर्शनमें भी आत्माको सुखस्वरूप माना है, इसलिये मोक्षमें स्वाभविक सुखकी अभिव्यक्ति ही उस दर्शनको मान्य है। 8 यथा चिकित्साशास्त्रं चतुव्यूहम्-रोगो रोगहेतुरारोग्यं भैषज्यमिति, एवमिदमपि शास्र चतुर्दूहमेव । तद्यथा-संसारः संसारहेतुर्मोक्षो मोक्षोपाय इति । तत्र दुःखबहुलः संसारो हेयः । प्रधानपुरुषयोः संयोगो हेयहेतुः । संयोगस्यात्यन्तिकी निवृत्तिहानम् । हानोपायः सम्यग्दर्शनम् । पा० २ सू० १५ भाष्य । 9 सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि । बुद्धलालासार संग्रह. पृ. १६० । 10 " दुःखं हेयमानागतम् यो. सू। 11 " द्रष्टुदृदययोः संयोगो हेयहेतुः २-१७ | " तत्य हेतुरविद्या" २-२४ यो. सु. । 12" तदभावात् संयोगाभावो हानं तद् दृशेः कैवल्यम् " २०-२६ यो. सू । 13 " विवेकख्यातिरवि- प्लवा हानोपायः २-२६. यो. पुरुषबहुत्वं सिद्धं" ईश्वरकृष्णकारिका- १८ ॥ "२-१६ सू। 14" १६ ] जैन साहित्य संशोधक [खंड २ M.WA wwwwww - AW wwwA- . वैशेषिक1-नैयायिक, बौद्ध, जैन2 और पूर्णप्रज्ञ (मन) दर्शनके समान द्वैतवाद अर्थात् अनेक चेतन माने गये हैं41 योगशास्त्र चेतनको जैन दर्शनकी तरह देहप्रमाण अर्थात् मध्यमपरिमाणवाला नहीं मानता, और मध्वसम्प्रदायकी तरह अणुप्रमाण भी नहीं मानता किन्तु सांख्या वैशेषिक, नैयायिक और शांकरवे- दान्तकी9 तरह वह उसको व्यापक मानता है101 इसी प्रकार वह चेतनको जैनदर्शनकी तरहl1 परिणामि-नित्य नहीं मानता, और न बौद्ध दर्शनकी तरह उसको क्षणिक-अनित्य ही मानता है, किन्तु सांख्य आदि उक्त शेष दर्शनोंकी तरह12 वह उसे कूटस्थ-नित्य मानता13 है। २. ईश्वरके सम्बन्धमें योगशास्त्रका मत सांख्य दर्शनसे भिन्न है । सांख्य दर्शन नाना चेतनांके अति- रिक्त ईश्वरको नहीं मानता14, पर योगशास्त्र-सम्मत ईश्वरका स्वरूप नैयायिक-वैशेषिक आदि दर्शनोंमें माने गये ईश्वरस्वरूपसे कुछ भिन्न है। योगशास्त्रने ईश्वरको एक अलग व्यक्ति तथा शास्त्रोपदेशक माना है सही, पर उसने नैयायिक आदिकी तरह ईश्वरमें नित्यज्ञान, नित्यईच्छा और नित्यकृतिका सम्बन्धन मान कर इसके स्थानमं 1 "व्यवस्थातो नाना" ३-२-२०, वैशेषिकदर्शन । 2 "पुद्गलजीवास्त्वनेकद्रव्याणि" ५-५. तत्त्वार्थसूत्र-भाष्य। 3 जीवेश्वरभिदा चैव जडेश्वरभिदा तथा । जीवभेदो मिथश्चैव जडजविभिदा तथा ।। मिथश्च जडभेदो यः प्रपञ्चो भेदपञ्चकः । सोऽयं सत्योऽप्यनादिश्च सादिश्चेन्नाशमाप्नुयात् ।। -सर्वदर्शनसंग्रह पूर्णप्रज्ञदर्शनः । 4 " कृतार्थ प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात् " २-२२ यो, सू.। 5 असंख्येयभागादिषु जीवा- नाम् “ । १५ । " प्रदेशसंहारविसर्गाभ्यां प्रदीपवत् " १६-तत्त्वार्थसूत्र अ० ५ । 6 देखो " उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम् " । ब्रह्मसूत्र २-३-१८ पूर्णप्रज्ञ भाष्य । तथा मिलान करो अभ्यं- करशास्त्री कृत मराठी शांकरमाष्य अनुवाद भा, ४ पृ. १५३ टिप्पण ४.६ । 7" निष्क्रियस्य तदसम्भवात् " सां. सू. १-४९, निष्क्रियस्य-विभोः पुरुपस्य गत्यसम्भवात्--भाष्य विज्ञानभिक्षु । 8 विभवान्महानाकाशस्तथा चात्मा । ७-१-२२-वै. द.। 9 देखो व. सू. २-३-२९. भाष्य 10 इसलिये कि योगशास्त्र, आत्मस्वरूपके विषयमें सांख्यसिद्धान्तानुसारी है ।। 11 "नित्यावस्थितान्यरूपाणि" ३ । " उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत्" । २९ । “ तन्द्रावाव्ययं नित्यम् ३० । तत्वार्यसूत्र अ० ५ भाप्य सहित. 12 देखो ई० इ० कारिका ६३ सांख्यतत्त्वकौमुदी । देखो न्यायदर्शन ४-१-१० । देखो ब्रह्मसूत्र २-१-१४ । २-१-२७; शांकरभाष्य सहित । 13 देखो योगसूत्र. " सदाशाताश्चित्तवृत्तयस्तत्प्रभोः पुरुषस्य अपरिणामित्वात्." ४-१८ । प्रतिसंक्रमायास्तदाऽकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनम् " ४-२२ । तथा " द्वयी चेयं नित्यता, कूटस्थनित्यता, परिणा. मिनित्यता च । तत्र कूटस्थनित्यता पुरुपस्य, परिणामिनित्यता गुणानाम् ” इत्यादि ४-३३ भाष्य । 14 देखो सांख्यसूत्र १-९२ आदि । " " चितेर- . अकं १ ] योगदर्शन [ १७ -- ...... ॥ , सत्त्वगुणका परमप्रकर्ष मान कर तदारा जगतउद्धारादिकी सब व्यवस्था घटा दी है। ३ योगशास्त्र दृश्य जगत्को न तो जैन, वैशेषिक, नैयायिक दर्शनोंकी तरह परमाणुका परिणाम मानता है, न शांकरवेदान्त दर्शनकी तरह ब्रह्मका विवर्त या ब्रहाका परिणाम ही मानता है, और न बौद्धदर्शनकी तरह शून्य या विशान्यत्मक ही मानता है: किन्तु सांख्य दर्शनकी तरह वह उसको प्रकृतिका परिणाम तथा अनादि -अनन्त-प्रवाइस्वरूप मानता है । ४ योगशास्त्र में वासना क्लेश और कर्मका नाम ही संसार है, तथा वासनादिका अभाव अर्थात् चेतनके स्वरूपावस्थानका नाम मोक्षर है। उसमें संसारका मूल कारण अविद्या और मोक्षका मुख्य हेतु सम्यग्दर्शन अर्थात योगजन्य विवेकख्याति माना गया है । महर्षि पतञ्जलिकी दृष्टिविशालता-यह पहले कहा जा चुका है कि सांख्य सिद्धान्त और उसकी प्रक्रि- याको ले कर पतञ्जलिने अपना योगशास्त्र रचा है, तथापि उनमें एक ऐसी विशेषता अर्थात् दृष्टिविशालता नजर आती है जो अन्य दार्शनिक विद्वानांमें बहुत कम पाई जाती है । इसी विशेषताके कारण उनका योगशास्त्र मानों सर्वदर्शनसमन्वय बन गया है । उदाहरणार्थ सांख्यका निरीश्वरवाद जब वैशेषिक, नैयायिक आदि दर्श- नोंके द्वारा अच्छी तरह निरस्त हो गया और साधारण लोक-स्वभावका झुकाव भी ईश्वरोपासनाकी ओर विशेष मालूम पडा, तब अधिकारिभेद तथा रूचिविचित्रताका विचार करके पतञ्जलिने अपने योगमार्गमें ईश्व- रोपासनाको भी स्थान दिया, और ईश्वरके स्वरूपका उन्होंने निष्पक्ष भावसे ऐसा निरूपण किया है जो सबको मान्य हो सके। पतञ्जलिने सोचा कि उपासना करनेवाले सभी लोगोंका साध्य एक ही है, फिर भी वे उपासनाकी भिन्नता और उपासनामें उपयोगी होनेवाली प्रतीकोंकी भिन्नताके व्यामोहमें अज्ञानवश आपस आपसमें लड मरते हैं, और इस धार्मिक कलहमें अपने साध्यको लोक भूल जाते हैं । लोगोंको इस अशानसे हटा कर सतू. पथपर लानेके लिये उन्होंने कह दिया कि तुम्हारा मन जिसमें लगे उसीका ध्यान करो। जैसी प्रतीक तुम्हें पसंद आवे वैसी प्रतीककी ही उपासना करो, पर किसी भी तरह अपना मन एकाग्र व स्थिर करो, और तद्वारा परमात्म-चिन्तनके सच्चे पात्र बनीं। इस उदारताकी मृर्तिस्वरूप मतभेदसहिष्णु आदेशके द्वारा पतञ्ज- लिने सभी उपासकांको योग-मार्गमें स्थान दिया, और ऐसा करके धर्मके नामसे होनेवाले कलहको कम कर- 1 यद्यपि यह व्यवस्था मूल योगसूत्रमें नहीं है, परन्तु भाष्यकार तथा टीकाकारने इसका उपपादन किया है । देखो पातअल यो. पा. १ स्. २४ भाष्य तथा टकिा । 2 तदा द्राः स्वरुपावस्थानम् । १-३ योगसूत्र । 3 " ईश्वरप्रणिधानाद्वा" १-३३ । 4 " क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरागृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः " तत्र निरशितयं सर्वशबीजम् । पूर्वे- पामपि गुरुः कालेनाऽनवच्छेदात् " । (१-२४, २५, २६) 5 " यथाऽभिमतध्यानाद्वा ॥ १-३९ इसी भावकी सूचक महाभारतमें- ध्यानमुत्पादयत्यत्र, संहितावलसंश्रयात् । यथाभिमतमन्त्रेण, प्रणवाद्यं जपेत्कृती ॥ ( शान्तिपर्व प्र. १९४ श्लो. २०) यह उक्ति है। और योगवाशिष्ठमें- यथाभिवाञ्छितध्यानाच्चिरमेकतयोदितात् । एकतत्त्वघुनाभ्यासात्प्राणस्सन्दो निरुध्यते ।। (उपशम प्रकरण सर्ग ७८ श्लो. १६ ।) यह उक्ति है। - १८ ] जैन साहित्य संशोधक [संडर --.. नेका उन्होंने सच्चा मार्ग लोगोंको बतलाया । उनकी इस दृष्टिविशालताका असर अन्य गुण-ग्राही आचार्यों- पर भी पडा1, और वे उस मतभेदसहिष्णुताके तत्त्वका मर्म समझ गये । वैशेषिक, नैयायिक आदिकी ईश्वरविषयक मान्यताका तथा साधारण लोगोंकी ईश्वरविषयक श्रद्धाका योगमागमें उपयोग करके ही पतजलि चुप न रहे, पर उन्होंने वैदिकेतर दर्शनोंके सिद्धान्त तथा प्रक्रिया जो योगमार्गके लिये सर्वथा उपयोगी जान पड़ी उसका भी अपने योगशास्त्र में बडी उदारतासे संग्रह किया। यद्यपि बौद्ध विद्वान् नागार्जुनके विज्ञानवाद तथा आत्मपरिणामित्ववादको युक्तिहीन समझ कर या योगमार्गमें अनुपयोगी समझ कर उसका निरसन चोथें पादमें किया2 है, तथापि उन्होंने बुद्धभगवान्के परमप्रिय चार आर्यसत्योंका हेय, हेयहेतु, हान और हानोपाय रूपसे स्वीकार निःसंकोच भावसे अपने योगशाबमें किया है। 1 पुष्पैश्च बलिना चैव वलेः स्तोत्रैश्च शोमनैः । देवानां पूजनं ज्ञेयं शौचश्रद्धासमन्वितम् ।। अविशेषेण सर्वेषामधिमुक्तिवशेन वा । गृहिणां माननीया यत्सर्वे देवा महात्मनाम् ॥ सर्वान्देवान्नमस्यन्ति नैक देवं समाश्रिताः । जितेन्द्रिया जितक्रोधा दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ चारिसंजीवनीचारन्याय एष सतां मतः । नान्यथाष्टसिद्धिः स्याद्विशेषेणादिकर्मणाम् ॥ गुणाधिक्यपरिज्ञानाद्विशेषेऽप्येतदिप्यते । अद्वेषेण तदन्येषां वृत्ताधिक्ये तथान्मनः ॥ योगबिन्दु श्लो. १६-२० जो विशेषदर्शी होने हैं, वे नो कीसी प्रतीक विशेष या उपासना विशेषको स्वीकार करते हुए भी अन्य प्रकारको प्रतीक माननेवालों या अन्य प्रकारकी उपासना करनेवालस द्वेष नहीं रखते, पर जो धर्माभिमानी प्रथमाधिकारी होते हैं वे प्रतीकभेद या उपासनाभेदके व्यामोहसे ही आपसमें लड मरते है। इस अनिष्ट तत्त्वको दूर करनेके लिये ही श्रीमान् हरिभद्रसरिने उक्त पद्योंमें प्रथनाधिकारीके लिये सब देवोंकी उपासनाको लाभदायक बतलानेका उदार प्रयत्न किया है । इस प्रयत्नका अनुकरण श्रीयशोविजयजीने भी अपनी " पूर्व सेवाद्वात्रिंशिका: "आठदृष्टियोंकी सज्झाय" आदि अन्योंमें किया है । एकदेशीय सन्यदायाभिनिवेशी लोगोंको समजानेके लिये चारिसंजीवनीचार न्यायका उपयोग उक्त दोनों आचार्योंने किया है । यह न्याय पडा मनोरञ्जक और शिक्षाप्रद है। इस समभावसूचक दृष्टान्तका उपनय श्रीशनविमलने आउदृष्टिकी सज्झाय पर किये हुए अपने पूज- राती टवेमें बहुत अच्छी तरह घटाया है, जो देखने योग्य है । इसका भाव संक्षेपमें इस प्रकार है । कीती बीने अपनी सखीसे कहा कि मेरा पति मेरे अधीन न होनेसे मुझे वडा ऋष्ट है । यह सुन कर उस आगन्तुक सखीने कोई जडी खिला कर उत्त पुरुषको बैल बना दिया, और वह अपने स्थानको चली गई । पतिके बैल बन जानेसे उसकी पत्नी दु:खित हुई, पर फिर वह पुरुषरूप बनानेका उपाय न जाननेके कारण उस वैलरूप पतिको चराया करती थी, और उसकी सेवा किया करती थी। कोसी समय अचानक एक विद्याधरके मुखसे ऐसा सुना कि अगर बैलरूप पुरुषको संजीवनी नामक जडी चराई जाय तो वह फिर असली रूप धारण कर सकता है। विद्याधरसे यह भी सुना कि वह जड़ी अमुक वृक्षके नीचे हैं। पर उस वृक्षके नीचे अनेक प्रकारकी वन- स्पति होनेके कारण वह स्त्री संजीवनीको पहचानने में असमर्थ थी। इससे उत्त दुःखित श्रीने अपने बैलरूर. धारि पतिको सत्र वनस्पतियाँ चरा दी । जिनमें संजीवनीको भी वह बैल चर गया । जैसे विशेष परीक्षा न होने के कारण उस स्त्रीने सब वनस्पतियों के साथ संजीवनी खिला कर अपने पतिका कृत्रिम बैलरूप हुडाया, और असली मनुष्यत्वको प्राप्त कराया, वैसे ही विशेष परीक्षाधिकल प्रथमाधिकारी भी सब देवोंकी समभावले उपासना करते करते योगमार्गमें विकात करके इष्ट लाभ कर सकता है। 2 देखो सू० १५, १८॥ दुःख, समुदय, निरोध और मार्ग।
जेन दर्शनके साथ योगशास्त्रका साश्य तो अन्य सब दर्शनोंकी अपेक्षा अधिक ही देखने में आता यह यात स्पष्ट होनेपर भी बहुतोंको विदित ही नहीं है । इसका सबब यह है कि जैनदर्शनके खास अन्यासी ऐसे बहुत कम है जो उदारता पूर्वक योगशाम्मका अवलोकन करनेवाले हों, और योगशास्त्रके खास अभ्यासी भी ऐसे बहुत कम हैं जिन्होंने जैनदर्शनका बारीकीसे ठीक ठीक अवलोकन किया हो । इसलिये इस वित्र- यका विशेष खुलासा करना यहाँ अप्रासङ्गिक न होगा। योगशाम्न और जैनदर्शनका सादृश्य मुख्यतया तीन प्रकारका है। १ शब्दका, २ विषयका और ३ प्रक्रियाका । १ मूल योगसूत्रमें ही नहीं किन्तु उमके भाष्यतकमें ऐसे अनेक शब्द हैं जो जैनेतर दर्शनोमें प्रसिद्ध नहीं है, या बहुत कम प्रसिद्ध है, किन्तु जैन शास्त्रमें खास प्रसिद्ध हैं । जैसे-भवप्रत्यय,1 सवितर्क-सविचार- निर्विचार2, महायत, कृत-कारित अनुमोदित4, प्रकाशावरण, सोपक्रम निरूपक्रम6, वजसंहनना, केवली8, कुशल), शानावरणीयकर्मी0, सम्यग्शान,11 सम्यग्दर्शन,12 सर्वश,13 क्षीणक्लेश,15 चरमदेह16 आदि । 1 " भवप्रत्ययो विदेप्रकृतिलयानाम् " योगसू. १-१९ । " भवप्रत्ययो नारकदेवानाम् " तत्त्वार्थ अ.१-२२ । 2 ध्यानविदोषरूप अर्थमें ही जैनशान्त्रमें ये शब्द इस प्रकार है “ एकाश्रये सवितर्के पूर्वे (तत्वार्थ अ. १-४३) तत्र सविचारं प्रथमम् " भाष्य अविचारं द्वितीयम् " तत्त्वा० अ० ९-४४ । योगसूत्रमें ये गन्द इस प्रकार आये है-" तत्र शब्दार्थशानविकल्पः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः " स्मृतिपरिशुद्धा स्वरू- पान्येवार्थमात्रनिभीसा निर्विता: " एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता १-४२, ४३, ४४। 3 जनशास्त्रमें मुनिसम्बन्धी पाँच यमांके लिये यह शब्द बहुत ही प्रसिद्ध है । " सर्वतो विरतिम- हाव्रतमिति तन्वार्थ " अ०७-२ भाष्य । यही दान्द उसी अर्थमें योगसूत्र २-३१ में है। 4 ये शब्द जिस भावके लिये योगसूत्र २-३१ में प्रयुक्त हैं, उसी भावमें जैनशास्त्रमें भी आते हैं, अन्नर सिर्फ इतना है कि जैनग्रन्याम अनुमोदितके स्थानमें बहुधा अनुमतशब्द प्रयुक्त होता है । देखो- तन्वार्थ, अ. ६--९। 5 यह गन्द योगसूत्र २-५२ तथा ३-४३ में है। इसके स्थानम जैनशास्त्र में प्रसिद्ध है । देग्यो तत्त्वार्थ, ६-११ आदि। 6 ये शब्द योगसूत्र ३-२२ में हैं । जैन कर्मविषयक साहित्यमें ये शब्द बहुत प्रसिद्ध हैं । तत्त्वार्थमें भी इनका प्रयोग हुआ है, देखो-अ. २-५२ भाष्य । । यह शन्द योगसूत्र ३-४६ में प्रयुक्त है। इसके स्थानमें जैन ग्रन्याम 'वजऋषभनाराचसंहनन' ऐसा शन्द मिलता है। देग्यो तत्त्वार्थ अ० ८-१२ भाष्य । 8 योगसूत्र २-२७ भाष्य, तत्त्वार्थ अ. ६-१४ । 9 देखो योगसूत्र २-२७ भाप्य, तथा दशवकालिकनियुक्ति गाथा १८६ । 10 देखो योगसूत्र २-१६ भाष्य, तथा आवश्यकनियुक्ति गाथा ८९३ । 1] योगसूत्र २-२८ भाष्य, तत्त्वार्य अ० १-१ । 12 योगसूत्र ४-१५ भाष्य, तत्त्वार्थ अ० १-२ । 13 योगमूत्र ३-४९ भाष्य, तत्त्वार्थ ३-४९ । 14 योगसूत्र १-४ भाष्य । जैन शास्त्रमें बहुधा ' क्षीणमोह ' 'क्षीणकषाय ' शन्द मिलते हैं। देखो तत्वार्थ अ० ९-३८ । 15 योगसूत्र २-४ भाभ्य, तत्त्वार्थ अ० २-५२ ज्ञानावरण .
२०] जैन साहित्य संशोधक [खंड - wwwwwwwwwww ... -~~~ -- -- -- --- २ प्रसुम, तनु आदिल्लेशावस्या1, पाँच यम, योगजन्य विभूति, सोपक्रम निरुपमझम कर्मका रूम्प, तथा उसके दृष्टान्त, अनेक कार्योंका निर्माण आदि । 1 .. । - प्रसुन, तनु, विछिन्न और उदार इन चार अवस्थाओंका योगसूत्र २-४ में वर्णन है। जैन- शन्नमें वही भाव मोहनीयकमकी सत्ता, उपशमक्षयोपशम, विरोधिप्रकृतिके उदयादिकृत व्यवधान और उदया- दत्याके वर्णनरूपते वर्तमान है । देखो योगसूत्र २-४ की यशोविजयकृत वृत्ति ! 2 पाँच यनोंका वर्णन महाभारत आदि अन्योंमें है सही, पर उसकी परिपूर्णता "जातिदेशकाल- सम्याऽनवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम् " योगसूत्र २-३१ में तथा दशकालिक अध्ययन ४ आदि जैनमात्रपतिपादित महाव्रतोंमें देखनेमें आती है। 3 योगसूत्रके तीसरे पादमें विभूतियोंका वर्णन है, वे विभूतियाँ दो प्रकारकी हैं। ५ वैज्ञानिक र शारी- कि । अतीताऽनागतज्ञान, सर्वभूतरुतज्ञान, पूर्वजातिज्ञान, परीचत्तज्ञान, भुवनशान, ताराव्यूहज्ञान, आदि ज्ञान- विभूतियाँ हैं । अन्तर्धान, हस्तिवल, परकायप्रवेश, अणिमादि ऐश्वर्य तथा रूपलावण्यादि कायसंपन्. इत्यादि दागरिक विभूतियाँ हैं । जैनशास्त्र में भी अवधिज्ञान, मनःपर्यायज्ञान, जातिस्मरणशान, पूर्वज्ञान आदि ज्ञानल- ब्धियाँ हैं, और आौषधि, विमुडौषधि, श्लेमौषधि, सर्वोषधि, जंघाचारण-विद्याचारण, वैक्रिय, आहारक आदि शारीरिक लब्धियाँ हैं । देखो गा० ६९, ७० आवश्यकनियुक्ति लब्धि यह विभूतिका नामान्तर है। 4 योगभाष्य और जैनग्रन्थोंमें सोपक्रम निरपक्रम आयुष्कर्मका स्वल्प बिल्कुल एकसा है, इतना ही नहीं दल्कि उस स्वरूपको दिखाते हुए भाष्यकाग्ने यो. सू. ३-२२ के माध्यमें आई वस्त्र और तृणराशिके ने दो दृष्टान्त लिखे हैं, वे आवश्यकनियुक्ति (गाथा-९५६) तथा विशेषावश्यक भाष्य (गाथा-३, ६१) आदि जैनशास्त्रमें सर्वत्र प्रसिद्ध है, पर तत्त्वार्य ( अ० -२५२) के भाष्यमै उक्त दो दृष्टान्तोंके उपरान्त एक मग गणितविषयक दृष्टान्त भी लिखा है । इस विषयमें उक्त व्यासभाग्य और तत्त्वार्थभाष्यका शाब्दिक सादृश्य भी बहुत अधिक और अर्थसूचक है। यथाऽऽद्रवन्न वितानितं लघीयसा कालेन शुध्येत् तथा सोपक्रमम् । यथा च तदेव सपिण्डितं चिरण मयेद् एवं निरुपक्रमम् । यया चानिः शुष्क कक्षे मुक्तो वातेन वा समन्ततो युक्तः पीयसा कालेन दहेतू तथा सोपक्रमम् । यथा वा स एवाऽमित्तृणराशौ क्रमशोऽवयवेषु न्यस्तश्चिरेण दहेत् तया निरपक्रमम् योग ३-२२ भाष्य । यथाहि संहतस्य शुष्कत्यापि तृणराशेरवयवशः क्रमेण दह्यमानस्य चिरेण टाहो भवति, तस्यैव शिपिलप्रकीर्णोपचितत्य सर्वतो युगपदादीपितत्य पवनोपक्रमाभिहतस्याशु दाहो भवति, तद्वत् । यया वा संख्या- नाचार्यः करणलाघवार्थ गुणकारभागहाराम्यां गर्शि छेदादेवापवर्तयति न च संख्येयस्यार्थस्याभावो भवति, तद्वदु- पक्रमाभिहतो मरणसमुद्घातदुःखार्तः कर्मप्रत्ययमनाभोगयोगपूर्वकं करणविशेषमुत्लाद्य फलोपभोगलाघवार्थ कर्मा- पवयति न चात्य फलाभाव इति । किं चान्यत् । यथा वा धौतपटो जलाई एव संइतश्विरेण शोषमुपयाति । सख च वितानितः सूर्यरश्मिवावभिहतः क्षिप्रं शोषमुपयाति । " तत्त्वा० अ० २-५२ भाष्य । 5 योगबलसे योगी जो अनेक शरीरोंका निर्माण करता है, उसका वर्णन योगसूत्र ४-४ में है, यही विषय वैक्रिय-आहारक-लब्धिरूपसे जैनग्रन्योंमें वर्णित है। " अकं १] योगदर्शन [ २१ ~~nwwAM mM ३ परिणामि-नित्यता अर्थात् उत्पाद, व्यय, प्रौव्यरूपसे निरूप वस्तु मान कर तदनुसार धर्मधर्मीका विवेचना इत्यादि। इसी विचारसमताके कारण श्रीमान् हरिभद्र जैसे जैनाचायोंने महर्षि पतञ्जलिके प्रति अपना हार्दिक आदर प्रकट करके अपने योगविषयक ग्रन्थों में गुणग्राहकताका निकि परिचय पूरे तोरसे दिया है2, और जगह जगह पतञ्जलिके योगशास्त्रगत खास साङ्केतिक शब्दोंका जैन सङ्केतोंके साथ मिलान करके सङ्कीर्ण- दृष्टिवालोंके लिये एकताका मार्ग खोल दिया है । जैन विद्वार यशोविजयवाचकने हरिभद्रसूरिसूचित एक- ताके मार्गको विशेप विशाल बनाकर पतञ्जलिके योगसूत्रको जैन प्रक्रियाके अनुसार समाझनेका थोडा किन्तु मार्मिक प्रयास किया है। इतना ही नहीं बल्कि अपनी बत्तीसियों में उन्होंने पतञ्जलिके योगसूत्रगत कुछ विप- योंपर खास बत्तीसियाँ भी रची है। । इन सब बातोंको संक्षेपमें बतलानेका उद्देश्य यही है कि महर्षि पतञ्ज- लिकी दृष्टिविशालता इतनी अधिक थी कि सभी दार्शनिक व साम्प्रदायिक विद्वान् योगशास्त्रके पास आते ही अपना साम्प्रदायिक अभिनिवेश भूल गये और एकरूपताका अनुभव करने लगे। इसमें कोई संदेह नहीं कि महर्षि पतञ्जलिकी दृष्टि-विशालता उनके विशिष्ट योगानुभवका ही फल है, क्योंकि-जब कोई भी मनुष्य शब्द शानकी प्राथमिक भूमिकासे आगे बढ़ता है तब वह शब्दकी पूंछ न खींचकर चिन्ताज्ञान तथा भावनाज्ञानके6 उत्तरोत्तर अधिकाधिक एकतावाले प्रदेश में अभेद आनंदका अनुभव करता है। आचार्य हरिभद्रकी योगमार्गमें नवीन दिशा-श्रीहरिभद्र प्रसिद्ध जैनाचार्योंमें एक हुए । उनकी बहुश्रुतता, सर्वतोमुखी प्रतिभा, मध्यस्थता और समन्वयशक्तिका पूरा परिचय करानका यहाँ प्रसंग नहीं है। इसके लिए 1 जैनशास्त्रमें वस्तुको द्रव्यपर्यायस्वरूप माना है । इसीलिये उसका लक्षण तत्त्वार्थ ( अ० ५-२९) में । उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत् " ऐसा किया है । योगसूत्र (३-१३, १४ ) में जो धर्मधर्मीका विचार है वह उक्त द्रव्यपर्यायउभयरूपता किंवा उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य इस त्रिरूपताका ही चित्रण है । भिन्नता सिर्फ दोनामें इतनी ही है कि-योगसूत्र सांख्यसिद्धान्तानुसारी होनेसे " ऋते चितिशक्तेः परिणामिनो भावाः यह सिद्धान्त मानकर परिणामवादका अर्थात् धर्मलक्षणावस्था परिणामका उपयोग सिर्फ जडभागमें अर्थात् प्रकृतिमें करता है, चेतनमें नहीं । और जैनदर्शन तो " सर्वे भावाः परिणामिनः" ऐसा सिद्धान्त मानकर परिणामवाद अर्थात् उत्पादव्ययरूप पर्यायका उपयोग जड चेतन दोनोंमें करता है। इतनी भिन्नता होनेपर भी परिणामवादकी प्रक्रिया दोनों में एक सी है। 2 उक्तं च योगमार्ग स्तपोनिधूतकल्मषैः । भावियोगहितायोचर्मोहदीपसमं वचः ॥ ( योगवि. श्लो. ६६) टीका 'उक्तं च निरूपितं पुनः योगमार्गशेरध्यात्मविद्भिः पतञ्जलिप्रभृतिभिः ॥ एतत्प्रधानः सभ्ट्राद्धः शीलवार योगतत्परः । जानात्यतीन्द्रियानांस्तथा चाह महामतिः" ॥ (योगदृष्टिसमुच्चय श्लो. १००) टीका ' तथा चाह महामतिः पतञ्जलिः '। ऐसा ही भाव गुणग्राही श्रीयशोविजयजीने अपनी योगावतारद्वात्रिंशिकामें प्रकाशित किया है । देखो-लो. २० टीका । 3 देखो योगविन्दु, श्लोक ४१८, ४२० । 4 देखो उनकी बनाई हुई पातञ्जलसूत्रवृत्ति । 5 देखो पातञ्जलयोगलक्षणविचार, ईशानुग्रहविचार, योगावतार, क्लेशहानोपाय और योगमाहात्म्य द्वात्रिशिका। शब्द, चिन्ता तथा भावनाशानका स्वरूप श्रीयशोविजयजीने अध्यात्मोपनिषदें लिखा है, जो आध्या- त्मिक लोगोंको देखने योग्य है। अध्यात्मोपनिषद् श्लो. ६५, ७४ । 6 २२] जैन साहित्य संशोधक [ संडर Pr-AAMANAPrew- ....." ... N-..... -~~-... 04 जिशानु महाशय उनकी कृतियोंको देख लेवें । हरिभद्रसूरिकी शतमुखी प्रतिमाके बोत उनके बनाये हुए चार अनुयोगविषयक1 ग्राथाम ही नहीं बल्कि जैन न्याय तथा भातवीय तत्कालीन समग्र दार्शनिक सिद्धांतांकी चर्चावाले2 ग्रन्थॉमें भी बहे हुए हैं। इतना करके ही उनकी प्रतिभा मौन न हुई; उसने योगमार्गमें एक ऐसी दिशा दिखाई जो केवल जैन योगसाहित्यमें ही नहीं बल्कि आर्यजाताय संपूर्ण योगविषयक साहित्यमें एक नई वस्तु है। जैनशास्त्रमें आध्यात्मिक विकासके क्रमका प्राचीन वर्णन चौदह गुणस्थानरूपसे, चार ध्यान रूपसे और बहिरात्म आदि तीन अवस्थाओंके रूपसे मिलता है । हरिभद्रसूरिने उसी आध्यात्मिक विकासके क्रमका योगल्पसे वर्णन किया है। पर उसमें उन्होंने जो शैली रक्खी है वह अभीतक उपलब्ध योगविषयक साहित्य- मसे किसी भी ग्रंथम कमसे कम हमारे दखने में तो नहीं आई है। हरिभद्रसरि अपने ग्रन्थों में अनेक योगि. याँका नामनिर्देश करते हैं3, एवं योगविषयक ग्रन्यांका उल्लेख करते हैं जो अभी प्राप्त भीनहीं हैं। संभव है उन अप्राप्य अन्योंमें उनके वर्णनकीसी शैली रही हो, पर हमारे लिये तो यह वर्णनशैली और योग विषयक वस्तु बिल्कुल अपूर्व है। इस समय हरिभद्रसूरिके योगविषयक चार ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं जो हमारे देखनेमें आये हैं। उनमेसे पोडशक और योगविंशिकाके योगवर्णनकी शैली और योगवस्तु एक ही है । योगविंदुकी विचारसरणी और वस्तु योगविशिकासे जुदा है। योगदृष्टिसमुच्चयकी विचारधारा और वस्तु योगविंदुसे भी जुदा है। इस प्रकार देखनेसे यह कहना पडता है कि हरिभद्रसूरिने एक ही आध्यात्मिक विकासके क्रमका चित्र भिन्न भिन्न अन्यों में भिन्न भिन्न वस्तुका उपयोग करके तीन प्रकारसे खींचा है कालकी अपरिमित लंबी नदीमें वासनारूप संसारका गहरा प्रवाह बहता है, जिसका पहला छोर [ मूल] तो अनादि है, पर दूसरा [ उत्तर ] छोर सान्त है । इसलिये मुमुक्षुओंके वास्ते सबसे पहले यह प्रश्न वडे महत्त्वका है कि उक्त अनादि प्रवाहमें आध्यात्मिक विकासका आरंभ कबसे होता है ? और उस आरंभके समय आत्माके लक्षण कैसे हो जाते हैं ? जिनसे कि आरंभिक आध्यात्मिक विकास जाना जा सके। इस प्रश्नका उत्तर आचार्यने योगविंदुम दिया है । वे कहते हैं कि-" जब आत्माके ऊपर मोहका प्रभाव घटनेका आरंभ होता है तभीसे आध्यात्मिक विकासका सूत्रपात हो जाता है। इस सूत्रपातका पूर्ववर्ती समय जो आध्यात्मिकविकासरहित होता है, वह जैनशास्त्रमें अचरमपुद्गलपरावर्तके नामसे प्रसिद्ध है। और उत्तरवर्ती समय जो आध्यात्मिक विका- सके क्रमवाला होता है, वह चरमपुद्गलपरावर्तके नामसे प्रसिद्ध है। अचरमपुद्गलपरावर्तन और चरमपुद्गलपरा- वर्तनकालके परिमाणके बीच सिंधु और विंदुका सा अंतर होता है । जिस आत्माका संसारप्रवाह चरमपुद्गल- परावर्तपरिमाण शेष रहता है, उसको जैन परिभाषामै ' अपुनबंधक और सांख्यपरिभाषामें निवृत्ताधिकार प्रकृति ' कहते हैं । अघुनर्वन्धक या निवृत्ताधिकारप्रकृति आत्माका आंतरिक परिचय इतना ही है कि उसके ऊपर मोहका दबाव कम होकर उलटे मोहके ऊपर उस आत्माका दवाव शुरू होता है । यही आध्यात्मिक विका- . - . - 1 द्रव्यानुयोगविषयक-धर्मसंग्रहणी आदि १, गणितानुयोगविषयक क्षेत्रसमास टीका आदि २, चरण- करणानुयोगविषयक-पञ्चवस्तु, धर्मबिंदु आदि ३, धर्मकथानुयोगविषयक-समराइचकहा आदि ४ ग्रन्थ मुख्य हैं। 2 अनेकान्तजयपताका, पड्दर्शनसमुच्चय, शास्त्रवार्तासमुच्चय आदि । 3 गोपेन्द्र ( योगविन्दु श्लोक २००) कालातीत (योगविन्दु श्लोक ३००)। पतञ्जलि, भदन्तभा. स्करबन्धु, भगवदन्त (त्त) वादी (योगदृष्टि श्लोक १६ टीका )। 4 योग-निर्णय आदि (योगदृष्टि० श्लोक १ टीका) 5 देखो मुक्त्यद्वेपद्वात्रिंशिका २८ । 6 देखो योगविंदु १७८, २०१।
अंक १] यागदर्शन [ २३ MM --.-... Mamma -AAPAN.. ~M १ । सका बीजारोपण है। यहींते योगमार्गका आरंभ हो मानेके कारण उस आत्माकी प्रत्येक प्रवृत्तिमै सरलता, नम्रता, उदारता, परोपकारपरायणता आदि सदाचार वास्तविक रूपमें दिखाई देते हैं; जो उस विकासोन्मुख आत्माका बाह्य परिचय है"। इतना उत्तर देकर आचार्यने योगके आरंभसे लेकर योगकी पराकाष्ठा तकके आध्यात्मिक विकासको क्रमिक वृद्धिको स्पष्ट समझानके लिये उसको पाँच भूमिकाओंमें विभक्त करके हर एक भूमिकाके लक्षण बहुत सष्ट दिखाये हैं1, और जगह जगह जैन परिभाषाके साथ बौद्ध तथा योगदर्शनकी परिभाषाका मिलान करके2 परिभाषाभेदकी दिवारको तोडकर उसकी ओटमें छिपी हुई योगवस्तुकी भिन्नभिन्नद- र्शनसम्मत एकरूपताका स्फुट प्रदर्शन कराया है। अध्यात्म, भावना, ध्यान, समता और वृत्तिसंक्षय ये योग- मार्गकी पाँच भूमिकायें हैं। इनमेंसे पहली चारको पतंजलि संप्रज्ञात, और अन्तिम भूमिकाको असंप्रशात कहते है । यही संक्षेपमें योगबिन्दुकी वस्तु है। योगदृष्टिसयुच्चयमें आध्यात्मिक विकासके क्रमका वर्णन योगन्बिदुकी अपेक्षा दूसरे ढंगसे है । उसमें आध्यात्मिक विकासके प्रारंभके पहलेकी स्थितिको अर्थात् अचरमपुद्गलपरावर्त्तपरिमाण संसारकालीन आत्माकी स्थितिको ओघदृष्टि कहकर उसके तरतम भावको अनेक दृष्टांत द्वारा समझाया है, और पीछे आध्यात्मिक विकासके आरंभसे लेकर उसके अंततकमें पाई जानेवाली योगावस्थाको योगदृष्टि कहा है। इस योगावस्थाकी ऋमिक वृद्धिको समझानेके लिये संक्षेपमें उसे आठ भूमिकाओंमें बाँट दिया है। वे आठ भूमिकायें उस अन्यम आठ योगदृष्टिके नामसे प्रसिद्ध है। इन आठ दृष्टियोंका विभाग पातंजलयोगदर्शन-प्रसिद्ध यम, नियम, आसन, प्राणायाम आदि आठ योगांगोंके आधार पर किया गया है, अर्थात् एक एक दृष्टिमें एक एक योगां- गका सम्बन्ध मुख्यतया बतलाया है। पहली चार दृष्टियां योगकी प्रारम्भिक अवस्थारूप होनेसे उनमें अविद्या- का अल्म अंश रहता है । जिसको प्रस्तुत ग्रंथमें अवेद्यसंवेद्यपद कहा है 6 1 अगली चार दृष्टियोंमें अविद्याका अंश बिल्कुल नहीं रहता । इस भावको आचार्यने वेद्यसंवेद्यपद शब्दसे जनाया है। इसके सिवाय प्रस्तुत ग्रंथमें पिछली चार दृष्टियोंके समय पाये जानेवाले विशिष्ट आध्यात्मिक विकासको इच्छायोग, शास्त्रयोग और सामर्थ्ययोग ऐसी तीन योग भूमिकाओंमें विभाजित करके उक्त तीनों योगभूमिकाओंका बहुत रोचक वर्णन किया है। आचार्यने अन्तमें चार प्रकारके योगियोंका वर्णन करके योगशास्त्रके अधिकारी कौन हो सकते है, यह भी बतला दिया है । यही योगदृष्टिसमुच्चयकी बहुत संक्षिप्त वस्तु है । योगविंशिकामें आध्यात्मिक विकासकी प्रारंभिक अवस्थाका वर्णन नहीं है, किन्तु उसकी पुष्ट अवस्था- ओंका ही वर्णन है। इसीसे उसमें मुख्यतया योगके अधिकारी त्यागी ही माने गये हैं ! प्रस्तुत ग्रन्थमें त्यागी गृहस्थ और साधुकी आवश्यक-क्रियाको ही योगरूप बतलाकर उसके द्वारा आध्यात्मिक विकासकी क्रमिक वृद्धिका वर्णन किया है। और उस आवश्यक क्रियाके द्वारा योगको पाँच भूमिकाओंमें वि- भाजित किया है । ये पांच भूमिकायें उसमें स्थान, शब्द, अर्थ, सालंबन और निरालंबन नामसे प्रसिद्ध हैं। इन पाँच भूमिकाओंमें कर्मयोग और ज्ञानयोगकी घटना करते हुए आचार्यने पहली दो भूमिकाओंको कर्मयोग और पिछली तीन भूमिकाओंको ज्ञानयोग कहा है । इसके सिवाय प्रत्येक भूमिकामें इच्छा, प्रवृत्ति, स्थैर्य और सिद्धिरूपसे आध्यात्मिक विकासके तरतम भावका प्रदर्शन कराया है; और उस प्रत्येक भूमिका तथा 1 योगविंदु, ३१, ३५७, ३५६, ३६१, ३६३, ३९६ । 2 "यत्सम्यग्दर्शनं बोधिस्तत्प्रधानो महोदयः। सत्त्वोऽस्तु बोधिसत्त्वस्तद्धन्तैषोऽन्वर्थतोऽपि हि ॥ २७३।। परयोधिसमेतो वा तीर्थकृयो भविष्यति । तथाभव्यत्वतोऽसौ वा बोधिसत्त्वः सतां मतः" ॥२७४ ।। योगबिन्दु । 3 देखो योगबिंदु ४१८, ४२० । * देखो, योगदृष्टिसमुच्चय १४ । 6 ७५ । 7 ७३ । 8२-१२।
२४ ] जैन साहित्य संशोधक [खंड २ www wathwwwvvv इच्छा, प्रवृत्ति आदि अवान्तर स्थितिका लक्षण बहुत स्पष्टतया वर्णन किया है1। इस प्रकार उक्त पान भूमिकाओंकी अन्तर्गत निन्न भिन्न स्थितियोंका वर्णन करके योगके अस्सी भेद किये हैं, और उन सबके लक्षण बत- लाये हैं,जिनको ध्यानपूर्वक देखनेवाला यह जान सकता है कि मैं विकासकी किस सीढीपर खडा हूँ। यही योगविंशिकाकी संक्षिप्त वस्तु है। उपसंहार-विषयकी गहराई और अपनी अपूर्णताका खयाल होते हुए भी यह प्रयास इस लिये किया गया है कि अबतकका अवलोकन और स्मरण संक्षेपमें भी लिपिवद्ध हो जाय, जिससे भविष्यत्में विशेप प्रगति करना हो तो इस विपयका प्रथम सोपान तैयार रहे। इस प्रवृत्तिमें कई मित्र मेरे सहायक हुए जिनके नामोल्लेख मात्रसे मैं कृतज्ञता प्रकाशित करना नहीं चाहता। उनकी आदरणीय स्मृति मेरे हृदयमें अखंड रहेगी। पाठकोंके प्रति एक मेरी सूचना है। वह यह कि इस निबंध अनेक शास्त्रीय पारिभाषिक शब्द आये हैं। खासकर अन्तिम भागमें जैन-पारिभाषिक शब्द अधिक हैं, जो बहुतोंको कम विदित होंगे; उनका मैंने विशेष खुलासा नहीं किया है, पर खुलासावाले उस उस ग्रन्थके उपयोगी स्थलोंका निर्देश कर दिया है जिससे विशेष जिज्ञासु मूलग्रन्थद्वारा ही ऐसे कठिन शब्दोंका खुलासा कर सकेंगे। अगर यह संक्षिप्त निबंध न हो कर खास पुस्तक होती तो इसमें विशेप खुलासोंका भी अवकाश रहता । इस प्रवृत्तिके लिये मुझको उत्साहित करनेवाले गुजरात पुरातत्त्व संशोधन मंदिरके मंत्री परीख रसिक- लाल छोटालाल हैं जिनके विद्याप्रेमको मैं नहीं भूल सकता । संवत् १९७८ पौष वदि ५ लेखक- भावनगर. सुखलाल संघजी. 1 योगविंशिका गा०५, ६।
कुंरपाल सोणपाल प्रशस्ति से ( लेखक-बनारसी दास जैन, एम० ए०, ओरियंटल कालेज, लाहोर.) १. सन १९२० में एस० एस० जैन कानफ्रेन्स की तरफ से इन्दौर वासी सेठ केसरी चन्द भण्डारी ने मुझे लिखा कि उक्त कान्फ्रेन्स का जो प्राकृत कोश बन रहा है आप उसे देख- कर उस के विषय में अपनी तथा अन्य प्राकृत विद्वानों की सम्मति लेकर लिखें । इस सम्बन्ध में मुझे उस साल कई नगरों में जाना पड़ा । जब मैं आगरे में था तो मेरा समागम पं० सुखलालजी से हुआ, उन्हों ने मुझे बतलाया कि यहां के मन्दिर में एक नया शिला लेख निकला है 1 जिसको अभी किसी ने नहीं देखा। मैं मुनि प्रतापविजयजी को साथ लेकर उसे देखने गया । परन्तु उस समय छाप उतारने की सामग्री विद्यमान न थी इस लिये उस समय मैं वहां अधिक ठहरा भी नहीं क्योंकि लेख को देखने के दो तीन घंटे पीछे मैं वहां से चल पड़ा था। २. फिर अप्रैल सन १९२१ में मैं पंजाब यूनिवर्सिटी के एम. ए. तथा बी. ए. क्लासों के संस्कृत विद्यार्थियों को लेकर कलकत्ता, पटना, लखनऊ आदि बड़े बड़े नगरों के अनायव घर ( Museums) देखने जा रहा था, तब आगरे में भी ठहरा और उपरोक्त शिलालेख की छाप तय्यार की, परन्तु अब वहां न तो पं. सुखलालजी थे न ही मुनि प्रतापविजयजी थे । वाबू दयालचन्दजी भी कारण वश बाहिर गए हुए थे। इन के अतिरिक्त और कोई श्रावक मुझ परिचित न थे इसलिये उस वक्त वह छाप मुझ को न मिल सकी । अब कलकत्ता निवासी श्रीयुत वावू पूरणचन्द नाहर द्वारा मैं ने वह छाप प्राप्त की है और उसी के आधारपर पाठकों को इस शिलालेख का परिचय दे रहा हूं। ३. यह लेख लाल पत्थर की शिला पर खुदा हुआ है जो लग भग दो फुट लम्बी और दो फुट चौड़ी है। लेख खोदने से पहिले शिला के चारों और दो दो इंच का हाशिया ( margin) छोड कर रेखा डाल दी गई है। रेखा के वाहिर ऊपर की तरफ " पातसाहि श्री जहांगीर " उभरे हुए अक्षरों में खुदा हुआहै । बाकी का सारा लेख गहिरे अक्षरों में खुदा हुआ है। रेखाओं के अन्दर लेख की ३३ पंक्तियां हैं मगर उन में लेख समाप्त न हो सका इस लिये रेखाओं के वाहिर नीचे दो पंक्तयां (नं ३४ और ३८) दाई ओर क पंक्ति ( नं. ३५ ) और वाई ओर दो पंक्तियां [ नं० ३६-३७ ] और खोदी गई हैं। शिला के दाई ओर नीचे का कुछ भाग टूट गया है जिस से लेख की पंक्ति २८-३४ और ३८ के अन्त के आठ नौ अक्षर और पंक्ति ३५ के आदि के १४, १५ अक्षर टूट गए हैं । इस से कुँवरपाल सोनपाल के समय वर्तमान परिवार के प्रायः सब नाम नष्ट हो गए हैं । पंक्ति ३६-३७ के भी कुछ अक्षर ढ़े नहीं गए। 1 मन्दिर की एक कोठडी में बहुत से पत्थर पडे थे। जब अप्रैल मई सन् १९९० मैं उन पत्थरों। निकालने लगे तो उन में से यह लेख .भी निकला । अब यह शिला लेख मन्दिर में ही पड़ा है। , उस .
२ २६] जैन साहित्य संशोधक [खंड २ - ४. लेख के अक्षर शुद्ध जैन लिपि के हैं जो कि हस्त लिखित पुस्तकों ( Mss. ) में पाए जाते हैं । पुस्तकों की भांति लेख की आदि में ई०' यह चिन्ह है जो शायद । ओम् ' शब्द का द्योतक है, क्योंकि प्राचीन शिलालेख तथा ताम्रशासनों में · ओम् ' के लिये कुछ ऐसा ही चिन्ह हुआ करता था। ' च ' और 'व' की आकृति वहुत कुछ मिलती जुलती है । पंक्ति ६ और र में मार्ग और वर्ग शब्दों में 'ग' के लिये ग्र' 1 चिन्ह आया है जो जैन लिपि का खास चिन्ह है। ५. वर्णविन्यास ( Spelling ) में विशेषता यह है कि " परसवर्ण" कहीं नहीं किया गया अर्थात् स्पीय अक्षरों के पूर्व नासिक्य के स्थान में सर्वदा अनुस्वार लिखा गया हैं जैसे पंक्ति २ में पङ्कन, विम्ब, चन्द्र के स्थान में पंकज, विंव, चंद्र लिखे हैं। इसी प्रकार श्लोकार्ध वा श्लोक के अन्त में म् के स्थान में अनुस्वार ही लिखा है जैसे पंक्ति १६ में अठारहवें अर्धश्लोक के अन्त में ' श्रुत्वा कल्याणदेशनां । ' पंक्ति २० अर्धश्लोक २१ 'वित्तवीजमनुतरं । ' पंक्ति २२ श्लोकान्त २३ चित्तरंजकं । ' पंक्ति २६ श्लोकान्त २८ ‘कारितं ।' इत्यादि । पंक्ति ५ में षट्त्रिंशत के स्थान में षड्त्रिंशत् लिखा है। विराम का चिन्ह ।' श्लोकपादों के अन्त में भी लगाया है, कहीं कहीं पंक्ति के अन्त में अक्षर के लिये पूरा स्थान न होने से विराम लिख दिया है जैसे पंक्ति ७, ९, १२, १५ आदि में । ६. पट्टावलि को छोड़ कर वाकी तमाम लेख श्लोकवद्ध है । इसकी भाषा शुद्ध संस्कृत है परन्तु पंक्ति १५ में पति शब्द का सप्तमी एक वचन : पतौ' लिखा है जो व्याकरण की रीति से ' पत्यौ ' होना चाहिये था । यद्यपि पंक्ति १६ में 'कारिता' और पंक्ति २६ में · कारितं' शब्द आए हैं तथापि पंक्ति ३२ में कारिता के लिये कारापिता ' लिखा है। यह शब्द जैन लेखकों के संस्कृत ग्रन्थों में बहुधा पाया जाता है और प्राकृत से संस्कृत प्रयोग बना है। पंक्ति १७ में प्राकृत शैली से आनन्द श्रावक का नाम ' आणंद' लिखा है और पंक्ति ११ में 'उत्सुकौ' के स्थान में • उच्छुकौ ' शब्द प्रतीत होता है । ७. यह प्रशस्ति जहांगीर वादशाह के समय की है। विक्रम सं० १६७१ में आगरा निवासी कुंरपाल सोनपाल नाम के दो भाइयों ने वहां श्री श्रेयांस नाथ जी का मन्दिर बनवाया था जिस की प्रतिष्ठा अंचल गच्छ के आचार्य श्री कल्याणसागर जी ने कराई थी। उस समय यह प्रशस्ति लिखी गई। मन्दिर की प्रतिष्ठा के साथ ४५० अन्य प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा भी हुई थी जिन में से ६, ७ प्रतिमाओं के लेख वाबू पूर्णचन्द नाहर ने अपने . " जैन लेख संग्रह " में दिये हैं। (देखिये उक्त पुस्तक, लेख नं० ३०७-३१२, ४३३)। इन लेखों से कुंरपाल सोनपाल के पूर्वजों का कुछ हाल मालूम नहीं होता लेकिन प्रशस्ति में उन की वंशावलि इस प्रकार दी है। 1 डाक्टर वेवर ( Weber. ) इसको अ (गर) पढते हैं जैसा कि बर्लिन नगर के जैन पुस्तकों की सूचि के पृष्ट ५७६ पर आए pograla. शब्द से स्पष्ट प्रतीत होता हैं, वास्तव में यह शब्द पोग्गल ( Poggla. ) हैं । इसी प्रकार पृष्ठ ५२५ पर मियुग्गाम को miyagrama. ( मियग्राम ) लिखा Weber's datalogue of Crakrit Msg in the Royal Lidrary at Berlin. .
अंक १] कुंरपाल लोणपाल प्रशस्ति [ २७ श्रीश्रंग वेसराज जेठू श्रीरंग राजपाल जीणासीह मल्लसीह ऋपभदास (अपर नाम रेषा, भार्या रेपश्री) प्रेमन (वा पेमा) - कुंरपाल सोनपाल षेतसी नेतसी - (पुत्री) जादो कुंरपाल सोनपाल ओसवाल जाति के लोढा गोत्रीय थे । इन को जहांगीर बादशाह का अमात्य ( मंत्री ) करके लिखा है। जहांगीर के राज्य सम्बन्धी एक दो फारसी कितावें देखीं परन्तु उन में इन का नाम उपलब्ध नहीं हुआ। मूर्तियों के लेखों से मालूम होता है कि कुंरपाल सोनपाल के वंश को गाणी वंश कहते थे और इन लेखों से उन के परिवार के कुछ नामों का भी पता चलता है जो प्रशस्ति में पढ़े नहीं जाते जैसे कि: ऋपभदास के कुंरपाल सोनपाल के सिवाय रूपचंद, चतुर्भुज, धनपाल, दुनीचंद आदि और भी पुत्र थे । प्रेमन की भार्या का नाम शक्ता देवी था । पेतसी की भार्या का नाम भक्ता देवी था उन का पुत्र० सांग था। ९. इस के अतिरिक्त . जनसाहित्य संशोधक" खण्ड १ अंक ४ में जो सं.१६६७ का “ आगरा संघनो सचित्र साल्वसरिक पत्र " प्रकाशित हुआ है, उस में कुछ नाम प्रशस्ति के नामों से मिलते हैं परन्तु यहनत निश्चयपूर्वक नहीं कही जा सक्ती कि दोनों लेखों में एक ही व्यक्ति का उल्लेख है या भिन्न २ काः- 1 येह लेख पैरेग्राफ १३ मे उध्दृत किये गए हैं ।
२८] जैन साहित्य संशोधक [खंड २ ३० ३५ . सांवत्सरिक पत्र पंक्ति साः पेमन, सं: नेतसी ३३ साः पेतसी साः नेतसी, सं: रीपभदास रीपभदास सोनी १०, प्रशस्ति के समय के संबंध में यह वात बडी ध्यान देने योग्य है कि प्रशस्ति में तो साफ़ तौर पर वैशाख शुदि ३, विक्रम सं० १६७१ गुरुवासर ( बृहस्पतिवार ) लिखा है परंतु मूर्तियों के लेखों में वैशाख शुदि ३ विक्रम सं. १६७१ शनि ( सनीचर वार ) लिखा है 1 | यह ऐसा विरोध है कि इस के लिये कोई हेतु नहीं दिया जा सकता, क्योंकि एक ही स्थान पर एक ही तिथि में वारभेद कैसे हो सकता है । यदि तृतीया वृद्धि तिथि होती तो भी कह सक्ते कि वृहस्पति वार की रात्रि के पिछले पहर में और शनि को दिन के पहिले पहर में तृतीया थी। मगर तृतीया वृद्धि तिथि न थी जैसा कि इंडियन् कैलेंडर में दी हुई सारिणी ( Tables ) के अनुसार गणित करने पर गत संवत् ( Expired ) १६७१ वैशाख सुदि ३ शनिवार २ अप्रैल सन् १६१४ (Old Style ) को आती है और उस दिन वह तिथि १७ घडी के अनुमान बाकी थी। रोहिणी नक्षत्र सूर्योदय से १३ घडी पीछे लगा । वैशाख वदि १३ ( अमान्त मासों से चैत्र वदि १३ ) वृद्धि तिथि आती है। ११. प्रशस्ति में दी हुई अंचल गच्छ की पट्टावलि से ज्ञात होता है कि उस गच्छ के प्रवर्तक आचार्य, श्री आर्यरक्षित सूरि, भगवान महावीर स्वामी से ४८ वें पट्ट पर बैठे थे और श्री कल्याण सागर सूार गच्छ के १८ वें आचार्य थे। अंचल गच्छ की पट्टावलि डा. भांडारकर ने भी छापी है । इन में डा. भांडारकर तो पांचवें आचार्य श्री सिंहप्रभ सूरि का नाम छोड़ गए हैं 3 और डा. ब्यूलर छठे आचार्य श्री अजितसिंहसूरि अपरनाम श्री निनसिंह सूरि का नाम छोड़ गए हैं 4 । हालां कि जिन आधारों परसे उन्हों ने यह पट्टावलि छापी है उन में साफ़ तौर पर उक्त दोनों आचार्यों के नाम यथास्थान दिये हुए हैं। 5 और डा. व्यूलर 1 जैन लेख संग्रह, लेख नं. ३०८-११ " श्री मत्संवत १६७१ वर्षे वैशाष सुदि ३ शनौ " 2 The Indian Calendar dy Sewel and Balkrisłına Dikshit, 1896. 3 Report on the Search for Sanskrit manuscripts for the year 1883-84 Bomday 1887 p. 130 4 Epigraphia Indica p.39 5 भांडारकर-उक्त पुस्तक पृष्ठ ३२१ ४८ श्रीआर्यरक्षितसूरिः चंद्रगच्छे श्रीअंचलगच्छस्थापना शुद्धविधिप्रकाशनात् सं. ११५९ ४९ श्रीविजयसिंह सूरिः ५० श्रीधर्मघोष सूरिः ५१ श्रीमहेंद्रसिंह सूरिः ५२ श्रीसिंहप्रभ सूरिः ५३ श्रीअजितसिंहसूरिः पारके चित्रावालगच्छतो निर्गता सं. १२८५ तपगच्छमतं वस्तुपालतः गच्छस्थापना अक १] कुंरपाल लोणपाल प्रशस्ति १२. अंत में मैं यह निवेदन करना चाहता हूं कि इस प्रशस्ति के संबंध में दो बातों की अधिक खोज आवश्यक है एक तो यह कि मुगल बादशाहों के इतिहास में कुं[ व ]रपाल और सोनपाल या उन के पिता का नाम दूंडना चाहिये, और दूसरी यह कि वैसाख सुदि ३ को वहस्पति और शनि क्योंकर हो सक्ते हैं; इस का समाधान करना चाहिये । [-१३. मूर्तियों के लेख: जैन लेख संग्रहः पृष्ठ ७८, ७९, १०५ नं० ३०७. सम्बत १६७१ आगरावास्तव्य ओसवाल ज्ञातीय लोढा गोत्रे गाणी वसे सं० ऋपभदास भार्या सुः रेप श्री तत्पुत्र संघराज सं० रूपचन्द चतुर्भुन सं० धनपालादि युते श्री मदंचल- गच्छे पूज्य श्री ५ धर्ममूर्ति सूरि तत् पट्टे पूज्य श्री कल्याणसागर सूरीणामुपदेशेन विद्यमान श्री विसाल जिनर्विव प्रति.... नं० ३०८. संवत १६७१ वर्षे ओसवाल ज्ञातीय लोढा गोत्रे गाणी वंसे साह Qरपाली सं० सोनपाल प्रति० अंचलगच्छे श्री कल्याणसागर सूरीणामुपदेशेन वासुपूज्यविवं प्रतिष्ठापितं ॥ नं० ३०९. ॥ श्रीमत्संवत १६७१ वर्षे वैशाष सुदि ३ शनी आगरा वास्तव्योसवाल ज्ञातीय लोढा गोत्रे गावंसे संघपति ऋषभदास भा० रेपश्री पुत्र सं० कुंरपाल सं० सोनपाल प्रवरौ स्वपितृ ऋषभदास पुन्यार्थं श्रीमदंचलगच्छे पूज्य श्री ५ कल्याणसागरसूरीणामुपदेशेन श्री पदम- प्रभु जिनविवं प्रतिष्ठापितं सं० चागाकृतं ॥ नं० ३१०. श्रीमत्संवत १६७१ वर्षे वैशाष सुदि ३ शनौ श्री आगरावास्तन्य उपकेस ज्ञातीय लोढा गोत्र सा० प्रेमन भार्या शक्तादे पुत्र सा० षेतसी लघुभ्राता सा० नेतसी सुतेन श्री- मदंचलगच्छे पूज्य श्री ५ कल्याणसागरसूरीणामुपदेशेन श्री वासपूज्यविवं प्रतिष्ठापितं सं० कुर- पाल सं० सोनपाल प्रतिष्ठितं । लर-उक्त ( Epig. Ind.) Jaina inscriptions from Satranjaya, Nos. XXI, XXVII, और CV. XXI यह लेख स० १६७५ का है- श्रीसिंहप्रभसूरीशाः सूरयोऽजितसिंहकाः । श्रीमद्देवेन्द्रसूरीशाः श्रीधर्मप्रभसूरयः ॥ ८ ॥ श्रीसिंहतिलकाव्हाश्च श्रीमहेन्द्रप्रभाभिधाः । श्रीमन्तो मेरुतुङ्गाख्या बभूवुः सूरयस्ततः ॥ ९॥ XXVII यह लेख सं० १६८३ का है- तेभ्यः क्रमण गुरवो जिनसिंहगोत्राः बभूवुरथ पूज्यतमा गणेशाः ॥ देवेन्द्रसिंहगुरवोऽखिललोकमान्याः धर्मप्रभा मुनिवरा विधिपक्षनाथाः ॥ ९ ॥ पूज्याश्च सिंहतिलकास्तदनु प्रभूत-भाग्या महेन्द्रविभवा गुरवो बभूवुः ।। चक्रेश्वरी भगवती विहितप्रसादाः श्रीमरुतुङ्गसूरो नरदेववन्द्याः ॥ १०॥ CV यह लेख सं १९२१ का है। इस में आचार्य कल्याणसागर तक लेख नं XXVII के ही श्लोक उध्दृत किये हैं। इन लेखों की भाषा जैन संस्कृत है। 1 सिवाय लेख ४३३ के और सब जगह कुंर को कुंर या क्रुर पढा है। 2 प्रशस्ति में तथा मूर्ति के अन्य लेखों मे नेतसी ।
३० जैन साहित्य संशोधक नं० ३११. श्रीमत्संवत् १६७१ वैशाष सुदि ३ शनी श्री आगरानगरे ओ लोढा गोते-गावसे सा० पेमन भार्या श्री शक्तादे पुत्र सा० पेतमी मा० भत्तादे पुत श्रा अंबलाच्छे पूज्य श्री ५ कल्याणसागरसूरीणामुपदेशेन श्री विमलनाथ वि: सा० क्रुरपाल....। नं० ३१२. [सं० १६७१ ॥ संत्रपति श्री कुंरपाल सं० सोनपालः स्वमातृ. अचलगच्छे पूज्य श्री ५ श्री धर्ममूर्तिसूरि पट्टाम्बुजहंस श्री ५ श्री कल्याणसागरसरी श्रीपार्श्वनाविव प्रतिष्ठापितं पूज्यमानं चिरं नंदतु ॥ नं० ४३३. श्रीमन्संवत १६७१ वर्षे वैशाप सुदि ३ शनी श्री आगरावान्त-योसवाल ज्ञातीय लोना गोत्रे गावं-जा स० ऋषभदाम भार्या रेषश्री तत्पुत्र श्री कुंरपाल मोनपाल संवाधिप स्वानुजवर दुनीचंदस्य पुण्याथै उपकाराय श्री अचलगच्छे पूज्य श्री. ५ कल्याणसागरसूरीणामुपदेशेन श्री आदिनाथविवं प्रतिष्ठापितं ॥ प्रशस्ति की नकल (नोट:- [ ] इन चिन्हों में दिये अक्षर टूट गए हैं या साफ नहीं पढे जाते ) ॥ पातसाहि श्री जहांगी[२] ॥ १. ॥ ॐ || श्री सिद्धेभ्यो नमः ॥ स्वस्ति श्री विष्णुपुत्रो निखिल्लगुणयुनः पारगो वीत- रागः । पायान् वः क्षीणका सुरशिखरिममः क लिी- २. तीर्थप्रदाने ।। श्री श्रेयान् धर्ममृतिविकनगमन: पंकने विन्वाभानुः । कल्याणाम्भोधिचन्द्रः सुरनरनिकरः सेन्य [ मा]- ३. नः कृपालुः ॥ १ ॥ ऋषभप्रमुखाः सार्वा ! गौतमाया मुनीश्वराः । पापकर्मविनिर्मुक्ताः क्षेमं कुर्वन्तु सर्वदा ।। २ ॥ कुंर- ४. पालस्वर्णपालौ । धर्मकृत्यपरायणौ । न्ववंशकुजमाण्डौ । प्रशस्तिलिन्यते तयोः ॥ ३॥ श्रीमति हायने रम्ये चन्द्रपिरस- ५. भूमिते १६७११ पत्रिंशत्तिथिशाके १९३६ विक्रमादित्यभूपतेः ॥ ४ ॥ गधमासे वस- न्तौ शुल्लायां तृतीयातियों । युक्त तु ६. रोहिणीमेन निषे गुरुवासरे ॥ ५ ॥ श्री मदञ्चल गच्छाख्ये । सर्वगच्छावतंसके । सिद्धान्ताग्ल्यातमाग्गेण । राजिते विश्वविस्तृते । ६ उग्रसे- 1 लेख में विव 2 वितर्ग खोदकर काटी गई है जित से विराम सा प्रतीत होता है। 3 पटा चाहिये। 4 "ल" खोदने से रह गया था। पीछे व न के नीचे खोदा गया है। 5ग के लिये प्रचिन्ह लिखा गया है।
अंक] कुंरपाल सोणपाल प्रशस्ति - 1 - ७. नपुरे रम्ये निरातङ्करसाश्रये । प्रासादमन्दिराकाणे । सद्ज्ञातौ झुपकेशवे । ७ । लोढा गोत्रे विवस्वास्त्रिजगति सुयशा ब्रह्मच- ८. र्यादियुक्तः । श्रीश्रङ्गख्यातनामा गुरुवचनयुतः कामदेवादितुल्यः । जीवाजीवादितत्वे पर- रुचिरमतिर्लोकवर्गेषु याव- जीया- ९. श्चन्द्रार्कविम्वं परिकरभृतकैः सेवितस्त्वं मुदा हि । ८ । लोढा सन्तानविज्ञातो | धनराजो गुणान्वितः । द्वादशवतधारी च । शुभ- १०. कर्मणि तत्परः । ९ । तत्पुत्रो वेसराजश्च । दयावान् सुननप्रियः । तूर्यव्रतधरः श्रीमान् चातुर्यादिगुणैर्युतः । १० । तत्पुत्रौ द्वा- ११. वभूतां च । सुरागावर्धिती सदा । जेठू श्रीरङ्गगोत्रौ च । जिनाज्ञापालानोच्छुकौ । ११ । तो जीणासीहमलाख्यौ जेठ्वात्मजौ वभूवतु- १२. : । धर्मविदौ च दक्षौ च । महापूज्यौ यशोधनौ।. १२ । आसीच्छ्रीरङ्गनो नूनं जिन- पादार्चने रतः । मनीषी सुमना भन्यो रानपा- १३. ल उदारधीः । १३ । आर्या । धनदौ चर्षभदास । पेमाख्यौ विविधसाख्यधनयुक्तौ । आस्तां प्राज्ञौ दो च तत्त्वज्ञौ तौ तु तत्पु- १४. श्री। १४ । रेपाभिधस्तयोर्येष्ठः । कल्पद्रुरिव सर्वदः । राजमान्यः कुलाधारो । दयालुर्धर्मकर्मठः । १५ । रेपश्रीस्तत्प्रिया १५. भव्या । शीलालङ्कारधारिणी । पतिव्रता पतो. रक्ता । सुलशारेवतीनिमा। १६ । श्री पद्मप्रभविम्बस्य नवीनस्य जिनाल- १६. ये। प्रतिष्ठा कारिता येन सत्श्राद्धगुणशालिना4 | १७ । ललौ तूर्यव्रतं यस्तु । श्रुत्वा कल्याणदेशनां । राजश्रीनन्दनः १७. श्रेष्ठ । आनन्द श्रावकोपमः । १८ । तत्सूनुः कुंरपालः । किल विमलमतिः स्वर्णपालो द्वितीय- श्चातुर्यौदार्यधैर्यप्रमु- १८. खगुणनिधिर्भाग्यसौभाग्यशाली । तौ द्वौ रूपाभिरामौ । विविधनिनवृषध्यानकृत्यैकनिष्ठौ । त्यागः कर्णावतारी निज- १९. कुलतिलको वस्तुपालोपमाहौँ । १९ । श्री जहांगीरभूपालामात्यौ धर्मधुरन्धरौ । धनिनौ पुण्यकर्तारौ । विख्यातौ भ्रा- २०. तरौ भुवि । २० । याभ्यामुतं नवक्षेत्रे । वित्तवीजमनुत्तरम् । तौ धन्यौ कामदौ लोके। लोढागोत्रावतंसकौ । २१ । अवा- 1 छ के लिये जैन लिपि का चिन्ह । 2 लेख में आसीधीरंग० लिखा है । 3 पत्यौ होना चाहिये था। 4 सच्श्राद्ध० या सच्छ्राद्ध० होना चाहिये था। 5 लेख में आणंद लिखा है।
३२] जैन साहित्य संशोधक [खंड २ २१. प्य शासनं चारु । जहांगीरपतेर्ननु । कारयामासतुर्धर्म । क्रियासर्व सहोदरौ । २२ । शाला पोषधपूर्वा वै यकाभ्यां सा1 २२. विनिर्मिता । अधित्यकात्रिकं यत्र राजते चित्तरमकम् । २३ । समेतशिखरे भन्ये शत्रुञ्जयेवंदाचले । अन्येष्वपि च तीर्थेषु गि- २३. रिनारिगिरौ2 तथा । २४ । सङ्घाधिपत्यमासाद्य । ताभ्यां यात्रा कृता मुदा । महद- सर्वसामग्र्या । शुद्धसम्यक्त्वहेतवे । २५ । तुरङ्गा- २४. णां शतं कान्तं । पञ्चविंशतिपूर्वकम् । दत्तं तु तीर्थयात्रायै । गजानां पञ्चविंशतिः । २६ । अन्यदपि धनं वित्तं । प्रत्तं संख्यातिगं खलु २५. अर्जयामासतुः कीर्ति। मित्थं तौ वसुधातले । २७ । उत्तुङ्ग गगनालम्बि । सच्चित्रं सध्वजं परम् । नेत्रासेचनकं ताभ्यां । युग्मं चैत्य- २६. स्य: कारितम् । २८ । अथ गद्यम् । श्री अञ्चलगच्छे । श्री वीरादष्टचत्वारिंशत्तमे पट्टे । श्रीपावकगिरौ श्रीसीमन्धरजिनवचसा श्रीचक्रे [श्वरीद ]- २७. त्तवराः । सिद्धान्तोक्तमार्गप्ररूपकाः। श्रीविधिपक्षगच्छसंस्थापकाः । श्रीआर्यरक्षित सूरय-१ । स्तत्पदे श्रीजयसिंहसूरि [ २ श्री धर्म घो]- २८. पसूरि ३ श्रीमहेन्द्रसूरि ४ श्रीसिंहप्रभसार ५ श्री जिनसिंहसूरि ६ श्रीदेवेन्द्रसिंहमूरि ७ श्रीधर्मप्रभसूरि ८ श्री[ सिंहतिलकसू ] २९. रि ९ श्रीमहेन्द्रप्रभसूरि १० श्रीमेरुतुङ्गसूरि ११ श्रीजयकीर्तिसूरि १२ । श्रीजय- केशरिसूरि १३ श्रीसिद्धान्तसागर [ सूरि १४ श्री भावसा ] ३०. गरसूरि १५ श्रीगुणनिधानसूरि १६ श्रीधर्ममूर्तिसूरय १७ स्तत्पट्टे सम्प्रति, विराज- मानाः । श्रीभट्टारक पुरवराः [- 14 ३१. णयः श्रीयुगप्रधानाः । पूज्य भट्टारक श्री ५ श्री कल्याणसागर सूरय १८ स्तेषामुप- देशेन श्रीश्रेयांसजिनविम्बा [ दीना 15 ३२. कुंरपालसोनपालाभ्यां प्रतिष्ठा कारापिता । पुनः श्लोकाः। श्रीश्रेयांसजिनेशस्य विम्बं स्थापितमुत्तमं प्रति [f -] ३३. णामुपदेशतः । २९ । चत्वारि शतमानानि । सार्धान्युपरि तत्क्षणे । प्रतिष्ठितानि विम्वानि : जिनानां सौख्यकारि [णाम् । ३० । --] - 1 सा शब्द का I चिन्ह २२ वीं पंक्ति में है। 2 गिरिनार० चाहिये था क्यों कि यह शब्द गिरिनगर का अपभ्रंश है। 3 चैत्ययोः चाहिये था । 4 यहां से सात आठ अक्षर टूट गए हैं। 5 यहां से पांच अक्षर टूट गए 6 साा० लिखा है।
- - - - ]] - अक१] कुंरपाल सोनपाल प्रशस्ति [३३ ३४. तु लेभाते । प्राज्यपुण्यप्रभावतः देवगुव्वोः सदा भक्तौ । शश्वत्तो नन्दतां चिरम् । ३१ । मथ तयोः परिवारः । सङ्घराज [----1--1 ३५. । ३२ । सूनवः स्वर्णपाल -। [चतुर्भुज ] - [पुत्री ] युगलमुत्तमम् [४३ । प्रेमनस्य त्रयः [माः ३६. तसी तथा । नेतसी विधमानस्तु सच्छोलेन सुदर्शनः । ३४ । धीमतः सङ्घराजस्य । तेजस्विनो यशस्विनः । चत्वारस्सनुजन्मान मताः ॥३५कुंरसालस्म स- ३७. झार्या । -1 पतिप्रिया । ३६ । तदङ्गजास्ति गम्भीरा जादो नाम्नी [स] - - - । ज्येष्ठमळो गुणाश्रयः । ३७ । ३८. सधश्रीसुलसश्रीर्दा । दुर्गश्रीप्रमुखैनिजैः । वधूजनैयुतौ भाता । रेषश्री नन्दनी सदा । ३८ । भूपण्डलसमारङ्ग । सिन्ध्वर्कयुक्त [- - - । - । ३८ ] - - " लेख का सारांश (लेख की भाषा सरल होने के कारण पूरा अनुवाद नहीं दिया) पंकि १-३ मंगलाचरण । ४-५ प्रशस्ति की रचना काल । विक्रम संवत् चन्द्र ऋषि रस भू अर्थात् १६७१,शफ संवत् १५३६, राध (वैशाख) मास, वसंत ऋतु, शुष्ठ पक्ष, सृतीया तिथी, गुरुवार रोहिणी नक्षत्र । ६ अंचल गच्छ की प्रशंसा । ७ उपसेनपुर ( आगरा नगर ) की शोभा का वर्णन | ८-९ उपकेश (ओसवाल) शातीय, लोढा गोत्रीय, श्रीअंग की स्तुति । १. उस के पुत्र वेसराज के गुणों का वर्णन | ११ वेसराज के पुत्र जेठू और श्रीरंग का वर्णन । ११-१२ जेकू फे पुत्र जीणासहि और मसीह ] का वर्णन | १२ श्रीरंग का पुत्र राजपाल, तिस का वर्णन । १३ राजपाल की गज दरबार में घडी प्रतिष्ठा था, और उस के पभदास और पेमन दो पुत्र थे। १४ उन में ऋषभदास (अपरनाम रेषा) पहा था। इस की भार्या रेषश्री। १५-१६ ऋपभदास ने मंदिर में श्रीपष्मप्रभ के नये विंव की प्रतिष्ठा कराई थी। और , यह निष्धय पूर्वक नहीं कहा जा सका कि पक्कि ३४ के अंत और पंफि ३५ के आदि में कितने अक्षर " १ सास होता है कि प्रवास्ति या प्रयास हो गई।
६४1 जैन साहित्य संशोधक [खण्ड vw " किसी आचार्य की कल्याणकारी देशनों को सुनकर राजनी के पुत्रने प्रम- पर्य नत धारण किया। १७-१८ ऋषभदास के पुत्र फुरपाल स्वर्णपाल (सोनपाल ) । तिन के गुणों का वर्णन | दान देने में उन की कर्ण से उपमा । १९--२० ये जहांगीर बादशहा के अमात्य (मंती) थे; बडे धनवान थे, सदा शुभकाम फरते और पुण्य क्षेत्रों में धन लगाते थे । २१ जहांगीर की आज्ञा से दोनों भाई धर्म का काम करते थे। २२.०२३ उन्हों ने तीन भवन वाली एक पौषधशाला धनवाई । संधाधिपति बनकर समेत- शिखर, शत्रुजय, आयू, गिरनार तथा अन्य तीर्थों की यात्रा की। २४ १२५ घोडे,२५ हाथी यात्रा के लिये जुदा कर छोडे थे। २५ उन्हों ने दो चैत्य बनवाए जो बहुत ही ऊंचे, चित्रों और झंडों से सजे हुये थे। २६ संचल गच्छ को सस्पत्ति । भगवान महावीर से ४८ वे पट्ट पर श्री आर्य रक्षित सूरि हुए। उन्हों ने श्री सीसंधर स्वामी की आज्ञा पूर्वक चक्रेश्वरी देवी से वर प्राप्त फरफे विधिपक्ष अर्थात् अंचलगच्छ चलाय। २७-३० पट्टावलि । ३१-३२ कुंरपाल सोनपालने श्री कल्याणसागरले उपदेश से श्रेयांस नायजी का मंदिर बनवाया। ३३-३४ और उसी समय ४५० अन्य प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा हुई । इस से उन की बड़ी कीर्ती हुई। ३५ संघराज...बेटे सोनपाल...चतुर्भुज...दो बेटियां । प्रेमन के तीन पुत्र... ३६ पेतसी और नेतसी जो शीलपालने से मानो सुदर्शन ही विद्यमान था । धुद्धि- मान, तेजस्वी और यशस्त्री संघराज के चार बेटे थे। ३७ फुलपाल की भार्या.. .एस की पुत्री का नाम नादो था । जेष्ठमल्ल गुणों " का धाम ३८ रेपनी के दोनो पुत्र (ऊरपाल सोनपाल) अपनी पुत्रवधुओं संघश्री, सुलसभी दुर्गश्री आदि के गुणों से शोभा पाते रहें। आशीर्वाद (जिस के बहुत से अक्षर टूट गए हैं। १ कल्याणदेशना से शायद श्रीकल्याणसागर जी के उपदेश का भाशय हो। २ शायद पमदास की माता का नाम राजश्री था। ३ महाविदेह क्षेत्र में वर्तमान तार्यकर । ४ इन प्रतिमामों का पता लगाना चाहिये। : पहारेख का मापीक नहीं पडता !
MAAVARANP. अय] कुरपाल सोनपाल प्रशस्ति । १५ [टिप्पणी-कुंवरपाल सेनपाळकी प्रशंसा किसीएफ फयि हिन्दी भाषामें एक कविता लिखी है वो पाठणारे किसीएफ भंडारमें हमारे देखनेमें भाई घी और जिसकी नकल हमने अपनी नोटबुफमें फर की थी। उसका संबंध इस लेखके साथ होनेसे हम यहां उसे प्रकट किगे देते हैं।-संपादक । कोरपाल सोनपाल लोढा गुणप्रशंसा कवित्त सगर भरय जगि, जगडु जावड भये । पामराय सारंग, सुजश नाम धरणी ।। १ सेन्जे संघ चलायो, सुधन सुखेत बायो । संघपतिपद पायो, कवि कोटि किति बरणी ।। २ लांहनि कडाहि ठांम, ठांम दुग भांन कहि | आनंद मंगल घरि घरि गावे घरणी ।।३ वस्तपाल तेजपाल, हुये रेखचंद नंद । कोरपाल सोनपाल, कीनी भली करणी ।। ४ कहि लखमण लोढा, दूनीकुं दिखाइ देख । लछिको प्रमान जोपे, एसो लाह लीजिये ।। ५ आन संघपति कोउ, संघ जोपे कीयो चाहे । कोरपाल सोनपाल,-को सो संघ कीजिये ।। ६ सवल राय बिभार, निबल थापना चार | बाधा राइ बंदि छोर, अरि पर साजको ।। ७ अडेराय अवठंभ, खितीपती रायखंभ । मंत्रीराय आरंभ, प्रगट सुम साजको ।। ८ कबि कहि रूप भूप, राइन मुकटमनि | त्यागी राई तिलक, बिरद गज बाजको ।। ९ हय गय हेमदान, मांन नंदकी समान | हिंदु सुरताण, सोनपाल रेखराजको ॥ १० सैन पर आसनके, पैजपर पासनके । निजदल रंजन, भंजन पर दलको ॥ ११ मदमतवारे, विकरारे,अति भारे भारे । कारे कारे बादरसे, पासव सुजलके ।। १२ कवि कहि रूप, नृप भुपतिनिके सिंगार | अति वडवार ऐरापति समवलके ।। १३ रेखराजनंदकोर पाल सोनपालचंद । हेतवनि देत ऐसे हाथिनके हलके ।। १४ सोमदेवतरित नीतिवाक्यामृत । (अन्य परिचय) [ लेखक-श्रीयुत पं० नाथूरामजी प्रेमी.] [श्रीयुत पं० माधूरापजी प्रेपीकी देखरेखमें बम्बईसे जो माणिकचन्द्र--दिगम्बर जैनग्रन्थ- माला प्रकट होती है, उसमें अभी हाल ही सोपदेवसूरिकृत नीतिवाक्यामृत नापका एक अमूल्य ग्रन्थ प्रकाशित हुआ है । इस प्रन्थके कर्ता और विपय आदिका विस्तृत परिचय करानेके लिए प्रेमीजीने प्रन्थके प्रारंभों एक पाण्डित्यपूर्ण और अनेक ज्ञातव्य बातोंसे भरपूर सुन्दर प्रस्तावना लिखी है जो प्रत्येक साहित्य और इतिहास प्रेतीके लिए अवश्य पठनीय और मननीय है । इस लिए हम लेखक सहाशयकी अनुमति लेकर, जनसाहित्यसंशोधकके पाठकोंके ज्ञानार्थ, उस प्रस्तावनाको अविकलचया यहाँ पर प्रकट करते हैं-संपादक 1] श्रीमत्सोमदेवसूरिका यह ' नीतिवाक्यामृत' संस्कृत साहित्य-सागरका एक अमूल्य और अनुपम रत्न है। इसका प्रधान विषय राजनीति है। राजा और उसके राज्यशासनसे सम्बन्ध रखनेवाली प्रायः सभी मावश्यक वातोंका इसमें विवेचन किया गया है । यह सारा अन्य गद्यमें है और सूत्रपद्धतिसे लिखा गया है । इसकी प्रति- पादनशैली बहुत ही सुन्दर, प्रभावशालिनी और गंभीरतापूर्ण है । बहुत बड़ी बातको एक छोटेसे वाक्यमें कह देनेकी फलामें इसके कत्ती सिद्धहस्त हैं । जैसा कि प्रन्यके नामसे ही प्रकट होता है, इसमें विशाल नीतिसमुद्रका मन्थन करके सारभूत अमृत संग्रह किया गया है और इसका प्रत्येक वाक्य इस नातकी साक्षी देता है। नीतिशास्त्रके विधार्थी इस अमृतका पान करके अवश्य ही सन्तुस होंगे। यह प्रन्य ३२ समुदेशों में x विभक्त है और प्रत्येक समुद्देशमें उसके नामके अनुसार विषय प्रतिपादित है। प्राचीन राजनीतिक साहित्य । राजनीति, चार पुरुषामिसे दूसरे मर्थपुरुषार्यके अन्तर्गत है। जो लोग यह समझते हैं कि प्राचीन भारत- पासियोने 'धर्म' और 'मोक्ष' को छोड़कर अन्य पुरुषाधोंकी और विशेष ध्यान नहीं दिया, वे इस देशके प्राचीन साहित्यसे अपरिचित हैं। यह सच है कि पिछले समयमें इन विषयोंकी ओरसे लोग उदासीन होते गये, इनका पठन पाठन पन्द होता गया और इस कारण इनके सम्बन्धका जो साहित्य था वह धीरे धीरे नसाय होता गया। फिर भी इस बातके प्रमाण मिलते हैं कि राजनीति आदि विद्याओंकी भी यहाँ खुव उन्नति हुई थी और इनपर अनेकानेक अन्य लिखे गये थे। वात्स्यायनके कामसूत्रमें लिखा है कि प्रजापतिने प्रजाके स्थितिप्रबन्धके लिए त्रिवर्गशासन-(धर्म-अर्थ-काम विषयक महाशास्त्र ) बनाया जिसमें एक लाख अध्याय थे। उसके एक एक भागको लेकर मनुने धर्माधिकार, बृह- स्पतिने अर्थाधिकार, और नन्दीने कामसूत्र, इस प्रकार तीन अधिकार बनाये * । इसके बाद इन तीनों विषयोंपर उत्तरोत्तर x “समुद्देशश्च संक्षेपाभिधानम् "-कामसूत्रटीका, अ० ३ । " प्रजापतिहि प्रजाः सृष्टा तासां स्थितिनिबन्धन निर्वगस्य साधनमध्यायानां शतसहस्रणाने प्रोवाच । तस्यैक- देशिकं मनुः स्वायंभुवो धर्माधिकारकं पृथक् चकार । बृहस्पीतराधिकारम् । नन्दी सहस्तेणाध्यायानां पृथक्कामसूत्र अकार ।"-कामसूत्र अ.। - - अक] सोमदेवहारिकत नीतिवाक्यामृत ~~~ M गया था संक्षिप्त प्रन्योंका निर्माण हुआ । पुराणोंमें भी लिखा है कि प्रजापतिके उक्त एक लाख अध्यायनाले त्रिवर्ग-शासनके नारद, इन्द्र, बृहस्पति, शुक्र, भारद्वाज, विशालाक्ष, भीष्म, पराशर, मनु, अन्यान्य महर्पि और विष्णुगुप्त (चाणक्य) ने संक्षिप्त करके पृथक् पृथक् अन्योंकी रचना की + । परन्तु इस समय उक्त सब साहित्य प्रायः नष्ट हो गया है । कामपुरुषार्थ पर वात्स्यायनका कामसूत्र, अर्थपुरुषार्थ पर विष्णुगुप्त या चाणक्यका अर्थशास्त्र और धर्मपुरुषार्थ पर मनुके धर्म-शास्त्रका संक्षिप्तसार 'भान धर्मशासा'--जो कि भृगु नामक आचार्यका संग्रह किया हुआ है और मनुस्मृतिके नामसे प्रसिद्ध है--उपलब्ध है। उक्त ग्रन्थों से राजनीतिका महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ 'कौटिलीय अर्थशास्त्र अभी १३-१४ वर्ष पहले ही उपलब्ध हुआ है और उसे मैसूरकी यूनीवर्सिटीने प्रकाशित किया है। यह अबसे लगभग २२०० वर्ष पहले लिखा । सुप्रसिद्ध मौर्यवंशीय सम्राट् चन्द्रगुप्त के लिए -जो कि हमारे कथाप्रन्भोंके अनुसार जैनधर्मके उपासक थे और जिन्होंने अन्तमें जिनदीक्षा धारण की थी-आर्य चाणक्यने इस अन्यको निर्माण किया था । नन्दवंशका समूल उच्छेद करके उसके सिंहासन पर चन्द्रगुप्तको आसीन करानेवाले चाणक्य कितने बड़े राजनीतिश होंगे, यह कहनेकी भावश्यकता नहीं है। उनकी राजनीतिज्ञताका सबसे अधिक उज्ज्वल प्रमाण यह अर्थशास्त्र है । यह बड़ा ही अद्भुत ग्रन्थ है और उस समयकी शासनव्यवस्था पर ऐसा प्रकाश डालता है जिसकी पहले किसीने कल्पना भी न की थी । इरो पढ़नेसे मालूम होता है कि उस प्राचीन कालमें भी इस देशने राजनीतिमें आश्चर्यजनक उन्नति कर ली थी। इस ग्रन्थमें मनु, भारद्वाज, उशना (शुक्र), बृहस्पति, विशालाक्ष, पिशुन, पराशर, वातव्याधि, कौणपदन्त और बाहुदन्तीपुत्र नामक प्राचीन आचार्योंके राजनीतिसम्बन्धी मतोंका जगह जगह उल्लेख मिलता है । आर्य चाणक्य प्रारंभमें ही कहते हैं कि पृथिवीके लाभ और पालनके लिए पूर्वाचार्योंने जितने अर्थशास्त्र प्रस्थापित किये हैं, प्रायः उन सबका संग्रह करके यह अर्थशास्त्र लिखा जाता है । इससे मालूम होता है कि चाणक्यसे भी पहले इस विपयके अनेकानेक अन्य मौजूद थे और चाणक्यने उन सवका अध्ययन किया था। परन्तु इस समय उन ग्रन्थोंका कोई पता नहीं है। चाणक्यके बादका एक और प्राचीन ग्रन्थ उपलब्ध है जिसका नाम 'नीतिसार' है और जिने संभवतः चाणक्यके ही शिष्य कामन्दक नामक विद्वानने अर्थशास्त्रको संक्षिप्त करके लिखा है। अर्थशास्त्र प्रायः गद्यमें है। परन्तु नीतिसार श्लोकवद्ध है। यह भी अपने ढंगका अपूर्व और प्रामाणिक ग्रन्थ है और अर्थशास्त्रको समझनेमें इससे बहुत सहायता मिलती है । इसमें भी विशालाक्ष, पुलोमा, यम आदि प्राचीन नीतिप्रन्यकर्ताओंके मतोंका उल्लेख है। + ब्रह्माध्यायसहस्राणां शतं चके स्ववुद्धिजम् । तन्नारदेन शक्रेण सुरुणा भार्गवेण च । भारद्धाजविशालाक्षभीष्मपाराशरैस्तथा । संक्षिप्तं मनुना चैव तथा चान्यैर्महर्षिभिः ॥ प्रजानामायुपो ह्रासं विशाय च महात्मना । संक्षिप्तं मनुना चैव तथा चान्यैर्महर्षिभिः ।। प्रजानामायुषो ह्रासं विज्ञाय च महात्मना । संक्षिप्तं विष्णुगुप्तेन नृपाणामर्थसिद्धये । ये श्लोक हमने गुजरातीटीकासाहत कामन्दकीय नीतिसारकी भूमिका परसे उद्धृत किये हैं। परन्तु उससे यह नहीं मालूम हो सका कि ये किसं पुराणके हैं। * सुप्रसिद्ध इतिहासज्ञ मि० विन्सेण्ट स्मिथ आदि विद्वान् भी इस बातको संभव समझते हैं कि चन्द्रगुप्त मौर्य जैनधर्मके उपासक थे। त्रैलोक्यप्रज्ञप्ति' नामक प्राकृत ग्रन्थमें जो विक्रमकी पाँचवीं शताब्दिके लगभगका है-लिखा है कि मुकुटधारी राजाओंमें सबसे अन्तिम राजा चन्द्रगुप्त था जिसने जिनदीक्षा ली। -देखो जैनहितैषी वर्ष १३, अंक १२ । ४ सर्वशास्त्रानुपक्रस्य प्रयोगानुपलभ्य च । कौटिल्येनं नरेन्द्रार्थे शासनस्य विधिः कृतः॥ येन शास्त्रं च शस्त्रं च नन्दराजगता च भूः। असणोद्धृतान्याशुतेन शास्त्रमिदं कृतम् ॥ + पृथिव्या लाभे पालने च यावन्त्यर्थशास्त्राणि पूर्वीचार्यैः प्रस्थापितानि प्रायशस्तानि सहयैकमिदमर्यशानं कृतम् । देखो गुजराती प्रेस वम्बईके 'कामन्दकीय नीतिसार' की भूमिका ।
Anwar.MAN MARArANA......... Annar.... MA है, ३८] जैन साहित्य संशोधक [खंड फामन्दक नीतिसारफे बाद जहाँ तक हम जानते हैं, गहनोतिषाक्यामृत प्रन्य ही ऐसा बना है, जो उस दोनों प्रभोंकी श्रेणी में रखा जा सकता है और जिसमें शुद्ध राजनीतिकी चर्चा की गई है। इसका अध्ययन भी फौटिलीय अर्थशास्त्र के समक्षनमें वही भारी सहायता देता है। नोतिषाक्यामृतक कर्ताने भी अपने द्वितीय ग्रन्थ ( यशस्तिक) में गुरु शक,विशालाक्ष, भारद्वाजके नीतिशास्त्रोका उल्लेख किया है। मनुके भो बोसो श्लोकोंको उद्धत किया है की नीतियाक्यामृतमें विष्णुगुप्त या चाणक्यका और उनके अपशालका उलेख है। वृहस्पति, शुक्र, भारद्वाज, भादिके अभिप्रायोको भी उन्होंने नीतिवाक्यामृतमे संग्रह किया है जिसका सष्टीकरण नातीवाफ्यामृतको इस संस्कृत टीकास होता है। स्मृतिकारोसे भी वे अच्छी तरह परिचित मालूम होते है। इससे हम कह सकते है कि नीतीवाक्यामृतके कर्ता पूर्वोक्त राजनीतिक साहित्यस यथेष्ट परिचित थे। बहुत संभव है कि उनके समयमें उक सबका सब साहित्य नहीं तो उसका अधिकांश उपलब्ध होगा। कमसे कम पूर्वा भाचायोंके प्रन्योंके सार या संग्रह भादि अवश्य मिलते होगे। इन सब बातोंसे और नातिवाक्यामृतको अच्छी तरह पढ़नेसे हम इस परिणाम पर पहुंचते हैं कि नातिवाक्या- मृत प्राचीन नीतिसाहित्यका सारभूत अमृत है । दूसरे शब्दों में यह उन सबके आधारसे और कविको विलक्षण प्रतिभास प्रसूत हुआ संग्रह अन्य है । जिस तरह कामन्दकने चाणक्यके अर्थशास्त्र के आधारसे संक्षेपमें अपने नातिसारका निर्माण किया है, उसी प्रकार सोमदेवनारेने उनके समयमें जितना नीतिसाहित्य प्राप्त था उसके आधारसे यह नीतिवाक्यामृत निर्माण किया है। दोनोंमें अन्तर यह है कि नातिसार लोकबद्ध है और केवल अर्थशास्त्र के आधारसे लिखा गया परन्तु नातिवाक्ष्यामृत गद्यमें है और अनेकानेक अन्योके आधारसे निर्माण हुआ है, यद्यपि अर्थशास्त्रको भी इसमें स्पेष्ट सहायता ली गई है। फौटिलीय अर्थशास्त्रकी भूमिकामें श्रीयुत शामशास्त्रीने लिखा है कि, " यच यशोधरमहाराजसमकालेन सोमदेव- सूरिणा नीतिवाक्यामृतं नाम नीतिशास्त्रं विरचितं तदपि कामन्दकोयामिव कौटिलीयार्थशास्त्रादेव सक्षिप्य संगृहीतामात सदप्रन्मपदयाक्यशैलीपरीक्षायां निस्संशय ज्ञायते ।" अर्थात् यशोधर महाराजके समकालिक सोमदेवलारने जो' नीति- पाक्यामृत' नामका अन्य लिखा है उसके पद और वाक्योंकी शैलीको परीक्षासे यह निस्सन्देह कहा जा सकता है कि वह भी फामन्दकके नीतिसारके समान कौटिलीय अर्थशास्त्रसे ही संक्षिप्त करके लिखा गया है । परन्तु हमारी समझमें न्यायादवसरमलभमानस्य विरसेवकसमाजस्य विज्ञप्तय इव नर्मसचिवोक्तयः प्रतिपत्रिकामचारव्यवहारेपु स्वैरविहारेषु मम गुरुशुक्रविशालाक्षपरीक्षितपराशरभीमभीष्मभारद्वाजादिप्रणीतनीतिशास्त्रश्रवणसनाथं श्रुतपथमभजन्त ।"-- यशस्तिलकचम्पू , आश्वास २, पृ० २३६ । "दूषितोऽपि चरेद्धर्म यत्र तत्राश्रमे रतः । समं संवेंपु भूतेषु न लिग धर्मकारणम् ॥ इति कयमिदमाह वैवस्वतो मनुः । " यशस्तिलक आ० ४, पृष्ठ १०० । यह श्लोक मनुस्मृति अ० ६ का ६६ चौ श्लोक है। इसके सिवाय यशस्तिलक आश्वास ४, पृ. ९०-९१-११६ (प्रोक्षितं भक्षयेत् ), ११७ (क्रीत्वा स्वयं ), १२७ (सभी श्लोक ), १४९ (सभी श्लोक ), २८७ (अधीत्य ) के श्लोक भी मनुस्मृति में ज्योंके त्यों मिलते हैं । यद्यपि वहाँ यह नहीं लिखा है कि ये मनुके हैं। 'उक्तं च ' रूपमें ही दिये हैं। ४ नीतिवाक्यामृत पृष्ठ० ३६ सूत्र ९, पृ० १०७ सूत्र ४, पृ० १७१ सूत्र १४ आदि । "विप्रकीताबूढापि पुनर्विवाहदोक्षामईतीतिस्मृतिकारा:"~नी वा पृ०३७७,सू०२७; "श्रुतेःस्मृतेर्बाह्यवायतरे;' यशस्तिलक आ० ४, पृ० १०५" श्रुतिस्मृतीभ्यामतीव बाये"-यशस्तिलक आ०४, पृ० १११; "तथा च स्मृतिः" पृ. ११६; और " इति स्मृतिकारकीर्तितमप्रमाणीकृत्य" पृ० २८७ । यशस्तिलक आ० ४ पृ० १०० में नीतिकार भारद्वाजके पाइगुण्य प्रस्तावके दो श्लोक और विशालाक्षके कुछ वाक्य दिये हैं । ये विशालाक्ष संभवतः वे ही नीतिकार हैं जिनका उल्लेख अर्थशास्त्र और नीतिसारमें किया गया है। शास्त्रीजीका यह बड़ा भारी भ्रम है, जो सोमदेवसूरिको वे यशोधर महाराजके समकालिक समझते हैं। यशोधर जैनोंके एक पुराणपुरुष हैं। इनका चरित्र सोमदेवसे भी पहले पुष्पदन्त, बच्छराय आदि कवियोंने लिखा है। पुष्पदन्तका समय शकसंवर ६०६ के लगभग है । और बच्छराय पुष्पदन्तसे भी पहले हुए हैं। + - अंक १] सोमदेवसरिकृत नीतिवाक्यामृत। [३९ Mr - शास्त्रीजीने उक्त परीक्षा बारीकीसे या अच्छी तरह विचार करके नहीं की है । यह हम मानते हैं कि नीतिवाक्यामृतकी रचनामें अर्थशास्त्रकी सहायता अवश्य ली गई है, जैसा कि मागे दिये हुए दोनोंके अवतरणोंसे मालूम होगा । पाठक देखेंगे कि दोनोंमें विलक्षण समता है, कहीं कहीं तो दोनोंके पाठ विल्कुल एकसे मिल गये हैं। परन्तु इससे यह सिद्ध नहीं होता कि नीतिवाक्यामृत अर्थशास्त्रका ही संक्षित सार है । अर्थशास्त्रका अनुधावन करनेवाला होकर भी वह अनेक अंशोंमें बहुत कुछ स्वतंत्र है । अर्थशास्त्रके अतिरिक्त अन्यान्य नीतिशास्त्रोंके अभिप्राय भी उसमें अपने ढंगसे समावेशित किये गये हैं। इसके सिवाय अन्यकर्ताने अपने देश-काल पर दृष्टि रखते हुए बहुत सी पुरानी बातोंको-जिनकी उस समय जरूरत नहीं रही थी या जो उनकी समझमें अनुचित थीं-छोड़ दिया है या परिवर्तित कर दिया है। साथ ही बहुतसी समयोपयोगी बातें शामिल भी कर दी हैं। यहाँ हम अर्थशास्त्र और नीतिवाक्यामृतके ऐसे अवतरण देते हैं जिनसे दोनोंकी समानता प्रकट होती है:- १-दुप्पणीतः कामक्रोधाभ्यामज्ञानाद्वानप्रस्थपरिव्राजकानपि कोपयति, किमङ्ग पुनर्गृहस्थान् । अप्रणीतो हि मात्स्यन्यायमुद्भावयति । वलीयानवलं नसते दण्डधराभावे। -अर्थशास्त्र पृ०९ । दुष्प्रणीतो हि दण्डः कामक्रोधाभ्यामज्ञानाद्वा सर्वजनविद्वेष फरोति । अप्रणीतो हि दण्डो मात्स्यन्यायमुद्रावयति । बलीयानबलं असते ( इति मात्स्यन्यायः)। -नीतिवा० पृ० १०४-५। २-ब्रह्मचर्य चापोडशाद्वात् । अतो गोदानं दारकर्म च । -अर्थ० पृ०१०। ब्रह्मचर्यमापोडशाद्वात्ततो गोदानपूर्वक दारकर्म चास्य । -जी० १६७। ३-गुरोहितमुदितोदितकुलशीलं पडो वेदे दैवे निमित्ते दण्डनीत्यां च अभिविनीतमा- पदां दैवमानुपीणां अथर्वभिरुपायैश्च प्रतिकारं कुर्वीत । -अर्थ० पृ०१५-१६॥ पुरोहितमुदितकुलशीलं पडंगवेदे देवे निमित्त दण्डनीत्यामभिविनीतमापदां दैवीनां मानुषीणां च प्रतिकारं कुर्वीत । नीति० पृ. १५९। ४ परमर्मज्ञः प्रगल्भः छानः कापटिकः।-अर्थ पृ० १८। परमर्मज्ञः प्रगल्भः छातः कापटिकः । -. नी० पृ० १७३। ५-श्रूयते हि शुकसारिकाभिः मन्तो भिन्नः इमिरन्यैश्च तिर्यग्योनिभिः । तस्मान्मन्नोईशे- मनायुक्तो नोपगच्छेत् -अर्य० पृ. २६ । अनायुक्तो न मन्त्रकाले तिष्ठेत् । श्रूयते हि शुकशारिकाभ्यामन्यैश्च तिग्भिमन्त्रभेदः कृतः। -नीति० पृ० ११५॥ ६-द्वादशवर्षा स्त्री प्राप्तन्यवहारा भवति । पोडशः पुमान् । द्वादशवर्षा स्त्री पोडशवर्षः पुमान् प्राप्तव्यवहारौ भवतः । -नीति० ३७३। इस तरहके और भी अनेक अवतरण दिये जा सकते हैं। यहाँपर पाठकोंको यह भी ध्यानमें रखना चाहिए कि चाणक्यने भी तो अपने पूर्ववर्ती विशालाक्ष, भारद्वाज, वृहस्पति आदिके अन्योका संग्रह करके अपना अन्य लिखा है। ऐसी दशामें यदि सोमदेवकी रचना अर्यशालसे मिलती जुलती हो, तो क्या आश्चर्य है। क्योंकि उन्होंने भी उन्हीं प्रन्योका मन्यन करके अपना नीतिवाक्यामृत विद्या है। यह दूसरी बात है कि नीतिवाक्यामृतकी रचनाके समय प्रन्यकर्ताके सामने अर्थशास्त्र भी उपस्थित था। परन्तु पाजससे नीतिवाक्यामृतके महत्त्वको फम न समझ लें । ऐसे विषयोंके प्रन्योंका अधिकांश भाग संग्रहरूप ही होता है । क्योंकि उसमे उन सब तत्वोंका समावेश तो नितान्त आवश्यक ही होता है जो प्रत्यकर्ताके पूर्वलेखकों द्वारा उस शास्त्रके सम्बन्धमें निश्चित हो चुकने हैं । उनके सिवाय जो नये अनुभव और नये तस्य उपलब्ध होते हैं उन्हें ही वह विशेपल्पसे अपने ग्रन्थमें लिपिवद्ध करता है । और हमारी समसमें नीतिवाक्यामृत ऐसी यातोसे खाली नहीं है । प्रन्यकर्ताकी स्वतंत्र प्रतिभा और मौलिकता उसमें जगह जगह प्रस्फुटित हो रही है । अर्थ० १५४ ॥ देखो पृष्ट ५ की टिप्पणी 'पृथिव्या सामे' आदि ।
५०] जैन साहित्य संशोधक [खंड ग्रन्थकर्ताका परिचय। गुरुपरस्परा। जैसा कि पहले कहा जा चुका है नीतिवाक्यामृतके कर्ता श्रीसोमदेवसूरि हैं । वे देवसंघके आचार्य थे। दिगम्बर- सम्प्रदायके सुप्रसिद्ध चार संघों से यह एक है । मंगराज कविके कथनानुसार यह संघ सुप्रसिद्ध तार्किक भष्टाकलंक देवके बाद स्थापित हुआ था । अकलंकदेवका समय विक्रमकी ९ वीं शताब्दिका प्रथम पाद है। सोमदेवके गुरुका नाम नेमिदेव और दादागुरुका नाम यशोदेव था । यथाः- श्रीमानस्ति स देवसंघतिलको देवो यशःपूर्वकः, शिष्यस्तस्य बभूव सद्गुणानिधिः श्रीनेमिदेवालयः तस्याश्चर्यतपः स्थितस्त्रिनवते तुमहानादिनां शिष्योऽभूदिह सोमदेव इति यस्तस्यैप कान्यक्रमः॥ --यशस्तिलकचम्पू । नीतिवाक्यामृतकी गद्यप्रशस्तिसे भी यह मालूम होता है कि वे नेमिदेवके शिष्य थे । साथ ही उसमें यह भी लिखा है कि वे महेन्द्रदेव भटारकके अनुज थे । इन तीनों महात्माओं यशोदेव, नेमिदेव और महेन्द्रदेवके सम्बन्धमें हमें और कोई भी बात मालम नहीं है । न तो इनकी कोई रचना ही उप- लब्ध है और न अन्य किसी अन्यादिमें इनका कोई उल्लेख ही मिला है। इनके पूर्वके आचार्योंके विषयमें भी कुछ ज्ञात नहीं है । सोमदेवसूरिकी शिष्यपरम्परा भी अज्ञात है । यशस्तिलकके टीकाकार श्रीश्रुतसागरसूरिने एक जगह लिखा है कि वादिराज और वादीमसिंह, दोनों ही सोमदेवके शिष्य थे, परन्तु इसके लिए उन्होंने जो प्रमाण दिया है वह किस अन्यका है, इसके जाननेका कोई साधन नहीं है । यशस्तिलककी रचना शकसंवत् ८८१ ( विक्रम १०१६ ) में समाप्त हुई है और वादिराजने अपना पाश्र्वनाथचरित शकसंवर. ९४७ (वि० १०८२) में पूर्ण किया है। अर्थात् दोनोंके वीचमें ६६ वर्षका अन्तर है । ऐसी दशा में उनका गुरु शिष्यका नाता होना दुर्घट है । इसके सिवाय वादिराजके गुरुका नाम मतिसागर था और वे द्रविड संघके आचार्य थे । अब रहे वादीमसिंह, सो उनके गुरुका नाम पुष्पषेण था और पुष्पषेण अकलंकदेवके गुरुभाई थे, इसलिए उनका समय सोमदेवसे बहुत पहले जा पड़ता है। एसी अवस्था में वादिराज और वादीमसिंहको सोमदेवका शिष्य नहीं माना जा सकता। प्रत्यकर्ताफे गुरु बड़े भारी तार्किक थे। उन्होंने ९३ वादियोंको पराजित करके विजयकीर्ति प्राप्त की थी। इसी तरह महेन्द्रदेव भटारक भी दिग्विजयी विद्वान थे । उनका षादीन्द्रकालानत ' उपपद ही इस नातकी घोषणा करता है। तार्किक सोमदेव । श्रीसोमदेवसूरि भी अपने गुरु और अनुजके सदृश बड़े भारी तार्किक विद्वान् थे। इस प्रन्यकी प्रशस्तिमें कहते हैं:- अल्पेऽनुग्रहधीः समे सुजनता मान्ये महानादरः, सिद्धान्तोऽयसुदात्तचित्रचरिते श्रीसोमदेवे माथि या स्पर्धेत तथापि वपढताप्रद्धिप्रगाढाग्रह-स्तस्याखर्वितगर्वपर्वतपविर्मद्वापकतान्तायते ॥ सारांश यह कि मैं छोटोके साथ अनुग्रह, बराबरीवालोके साथ सुजनता और बड़ों के साथ महान् आदरका मर्ताव करता हूँ। इस विषयमें मेरा चरित्र बहुत ही उदार है। परन्तु जो मुझे ऐंठ दिखाता है, उसके लिए, गर्वरूपी पर्वतको विध्वंस करनेवाले मेरे वज-वचन कालस्वरूप हो जाते हैं। देखो जनहितैषी भाग ११, अंक ७-८। "उर्फच वादिराजेन महाकविना--...... ..........स वादिराजोऽपि श्रीसोमदेवाचार्यस्य शिष्य:- बादीभासिहोऽपि भवीयशिष्यः श्रीवादिराजोऽपि मदीयशिष्यः' इत्युकत्वाच्च ।" न्यशस्तिलकटीका आ० २, पृ० १६५। + गपास्तिलकके ऊपर उदृत हुए श्लोकमें उन महापादियोकी संरूमा-जिनको भनिमिदेपने पराजित किया था- तिरान मतगई है। परन्तु नीतिवाक्यामृतकी गयप्रशस्तिमें पचपन है। मालूम नहीं, इसका क्या कारण है। - ...... ~~~~~~~ ~~~~~~~~~ wwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwww. । अंक १] सोमदेधसूरिकृत नीतिवान्यामृत । [४१ दर्पान्धबोधवुधलिन्धुरसिंहनादे, वादिद्विपोद्दलनदुर्धरवाग्विवादे । श्रीसोमदेवमुनिपे वचनारसाले, वागीश्वरोऽपि पुरतोऽस्ति न वादकाले ॥ भाव यह कि अभिमानी पण्डित गजोंके लिए सिंहके समान ललकारनेवाले और वादिगजोंको दलित करनेवाला दुर्धर विवाद करनेवाले श्रीसोमदेव मुनिके सामने, वादके समय वागीश्वर या देवगुरु वृहस्पति भी नहीं ठहर सकते हैं । इसी तरहके और भी कई पद्य है जिनसे उनका प्रखर और प्रचण्ड तर्कपाण्डित्य प्रकट होता है। यशस्तिलक चम्पूकी उत्थानिकामें कहा है:- आजन्मकृवभ्यासाच्छुप्कात्तात्तृणादिव समास्याः । मतिसुरभेरभवादिदं सूक्तपयः सुकृतिनां पुण्यैः ॥ १७ अर्थात् मेरी जिस वुद्धिरूपी गोने जीवन भर तर्करूपी सूखा घास खाया, उसीसे अव यह काव्यरूपी दुग्ध उत्पन्न हो रहा है । इस उक्तिसे अच्छी तरह प्रकट होता है कि श्रीसोमदेवसूरिने अपने जीवनका बहुत बड़ा भाग तर्कशास्त्रके अभ्यासमें ही व्यतीत किया था। उनके स्याद्वादाचलसिंह, वादीमपंचानन और तार्किकचक्रवर्ती पद भी इसी बातके घोतक है। परन्तु वे केवल तार्किक ही नहीं थे-काव्य, व्याकरण, धर्मशास्त्र और राजनीति आदिके भी धुरंधर विद्वान थे। महाकवि सोमदेव । उनका यशस्तिलकचन्पू महाकाव्य-जो निर्णगसागर की काव्यमालामें प्रकाशित हो चुका है-इस बातका प्रत्यक्ष प्रमाण है कि वे महाकवि थे और काव्यकला पर भी उनका असाधारण अधिकार था । समूचे संस्कृत साहित्यमें यशस्तिलक एक अद्भुत काव्य है और कवित्वके साथ उसमें ज्ञानका विशाल खजाना संगृहीत है । उसका गद्य भी क दम्बरी तिलकमक्षरी आदिकी टक्करका है। सुभापितोंका तो उसे आकर ही कहना चाहिए । उसकी प्रशंसाने स्वयं प्रन्थकाने यत्रतत्र जो सुन्दर पद्य कहे हैं, वे सुनने योग्य हैं:- असहायमनादर्श रत्न रत्नाकरादिव । मत्तः काव्यामिदं जातं सतां हृदयमण्डनम् ॥ १४-प्रथम आश्वास । समुद्रसे निकले हुए असहाय, अनादर्श और सज्जनोंके हृदयकी शोभा बढ़ानवाले रत्नकी तरह मुझसे भी यह असहाय (मौलिक ), अनादर्श ( बेजोड़ । और हृदयमण्डन काव्यरत्न उत्सन्न हुआ। काजलिपुटैः पातुं चेतः सूक्तामृते यदि । श्रूयतां सोमदेवस्य नव्याः काव्योक्तियुक्तयः ॥ २४६ ॥ -द्वितीय आ०। यदि आपका चित्त फानोंकी अँजुलीसे सूक्तामृतका पान करना चाहता है, तो सोमदेवकी नई नई कान्योक्तियाँ सुनिए। लोकवित्त्वे कवित्वे वा यदि चातुर्यचञ्चकः । सोमदेवकवः सूक्ति समभ्यस्यन्तु साधवः ॥ ५१३ ॥ --तृतीय भा० । यदि सज्जनोंकी यह इच्छा हो कि वे लोकव्यवहार और कवित्वमें चातुर्य प्राप्त करें तो उन्हें सोमदेव कविकी सूक्तियोंका अभ्यास करना चाहिए। मया धागर्थसंभारे भुक्त सारस्वते रसे। फवयोऽन्ये भविष्यन्ति नूनमुच्छिष्टभाजनाः॥ --चतुर्थ आ०, पृ० १६५ । मैं शब्द और अर्थपूर्ण सारे सारस्वत रस ( साहित्य रस ) का स्वाद ले चुका हूँ, अतएव अब जितने दूसरे कवि होंगे, वे निश्चयसे उच्छिष्टभोजी या जूठा खानेवाले होंगे वे कोई नई बात न कह सकेंगे। अरालकालव्यालेन ये लोढा साम्प्रतं तु ते । शब्दाः श्रीसोमदेवेन प्रोत्थाप्यन्ते किमद्भुतम् ॥ -पंचम आ०, पृ. २६६ । समयरूपी विकट सर्पने जिन शब्दोंको निगल लिया था, अतएव जो मृत हो गये थे, यदि उन्हें श्रीसोमदेवने उठा दिया, जिला दिया-तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। ( इसमें सोमदेव ' शब्द विष्ट है । सोम चन्द्रवाची है और चन्द्रकी अमृत-किरणोंसे विषमूहित जीव सचेत हो जाते हैं।
-~~~~ :vvvvvvvvvvvvvvvvv vvvvvvvv .uvvvv vivivNovewrover-our" ४२] जैन साहित्य संशोधक [ खंड २ उद्धृत्य शास्त्रजलधनितले निमग्नः पर्यागतैरिव चिरादभिधानरत्नैः । या सोमदेवविदुषा विहिता विभूपा वाग्देवता वहतु सम्प्रति तामनर्धाम् ॥-पं० आ०, पृ० २६६ । चिरकालसे शास्त्रसमुद्र के विल्कुल नीचे डूबे हुए शब्द-रत्नोंका उद्धार करके सोमदेव पण्डितने जो यह बहुमूल्य आभूषण ( काव्य ) बनाया है, उसे श्रीसरस्वती देवी धारण करें। इन उक्तियोंसे इस बातका आभास मिलता है कि आचार्य सोमदेव किस श्रेणीके कवि थे और उनका उक्त महा- काव्य कितना महत्त्वपूर्ण है। पूर्वोक्त उक्तियों में अभिमानकी मात्रा विशेष रहने पर भी वे अनेक अंशोंमें सत्य जान पड़ती हैं। सचमुच ही यशस्तिलक शब्दरत्नोंका बड़ा भारी खजाना है और यदि माघकान्यके समान कहा जाय कि इस काव्यको पढ़ लेने पर फिर कोई नया शब्द नहीं रह जाता, तो कुछ अत्युक्ति न होगी। इसी तरह इसके द्वारा सभी विपयोंकी व्युत्पत्ति हो सकती है। व्यवहारदक्षता बढ़ानेकी तो इसमें ढेर सामग्री है। महाकवि सोमदेवके वाक्कल्लोलपयोनिधि, कविराजकुंजर और गप्यपद्याविद्याधरचक्रवर्ती विशेषण, उनके श्रेष्ठकवि. वके ही परिचायक हैं। धर्माचार्य सोमदेव । यद्यपि अभीतक सोमदेवसूरिका कोई स्वतंत्र धार्मिक ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है। परन्तु यशस्तिलकके अन्तिम दो आश्वास-जिनमें उपासकाध्ययन या श्रावकोंके आचारका निरूपण किया गया है इस बातके साक्षी हैं कि वे धर्मके कैसे मर्मज्ञ विद्वान थे। स्वामी समन्तभद्रके रत्नकरण्ठके बाद श्रावकोंका आचारशास्त्र ऐसी उत्तमता, स्वाधीनता और मार्मिकताके साथ इतने विस्तृतरूपमें आजतक किसी भी विद्वानकी कलमसे नहीं लिखा गया है । जो लोग यह समझते हैं , कि धर्मग्रन्थ तो परम्परासे चले आये हुए प्रन्थोंके अनुवादमात्र होते हैं--उनमें ग्रन्थकर्ता विशेप क्या कहेगा, उन्हें यह उपासकाध्ययन अवश्य पढ़ना चाहिए और देखना चाहिए कि धर्मशास्त्रों में भी मौलिकता और प्रतिभाके लिए कितना विस्तृत क्षेत्र है । खेद है कि जनसमाजमें इस महत्त्वपूर्ण ग्रन्थके पठन पाठनका प्रचार बहुत ही कम है और अब तक इसका कोई हिन्दी अनुवाद भी नहीं हुआ है। नीतिवाक्यामृतकी प्रशस्तिमें लिखा है: सकलसमयतर्के नाकलंकोऽसि वादिन् न भवसि समयोक्तौ हससिद्धान्तदेवः । न च वचनविलासे पूज्यपादोऽसि तत्वं वदसि कथमिदानी सोमदेवेन सार्धम् ।। अर्थात हे वादी, न तो तू समस्तदर्शन शास्त्रों पर तर्क करनेके लिए अकलंकदेवके तुल्य है, न जैनसिद्धान्तको कहने के लिए हंससिद्धान्तदेव है और न व्याकरणमें पूज्यपाद है, फिर इस समय सोमदेवके साथ किस बिरते पर बात करने चला है ? इस उक्तिसे स्पष्ट है कि सोमदेवसूरि तर्क और सिद्धान्तके समान व्याकरणशास्त्रके भी पण्डित थे । राजनीतिज्ञ सोमदेव। सोमदेवके राजनीतिज्ञ होनेका प्रमाण यह नीतिवाक्यामृत तो है ही, इसके सिवाय उनके यशस्तिलकमें भी यशोधर महाराजका चरित्रचित्रण करते समय राजनीतिकी बहुत ही विशद और विस्तृत चर्चा की गई है । पाठकोंको- चाहिए कि वे इसके लिए यशस्तिलकका तृतीय आश्वास अवश्य पढ़ें। यह आश्वास राजनीतिके तत्त्वोंसे भरा हुआ है । इस विषयमें वह अद्वितीय हैं । वर्णन करनेकी शैली बड़ी ही सुन्दर है । कवित्वकी कमनीयता और सरसतासे राजनीतिकी नीरसता मालूम नहीं कहाँ चली गई है। नीतिवाक्यामृतके अकलंकदेव--अष्टशती, राजवार्तिक आदि ग्रन्थोंके रचियता । हंससिद्धान्तदेव-ये कोई सैद्धान्तिक आचार्य जान पड़ते हैं । इनका अब तक और कहीं कोई उल्लेख देखनेमें नहीं आया । पूज्यपाद-देवनान्द, जनेन्द्र व्याकरणके फर्ता। । - ।
शंक १] सोमदेवसूरिकृत मीशिवाक्यास्त । [४३ -ramAAAnanANAPANm.w ....ARMAWAL AAAAAAAAAAAAAAAMARANA अनेक अंशोंका अभिप्राय उसमें किसी न किसी रूप में अन्तर्निहित जान पड़ता है + । जहाँ तक हम जानते हैं जैनविद्वानों और आचामि-दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनोंमें-एक सोमदेवने ही 'राजनीतिशास्त्र' पर कलम उठाई है। अतएव जनसाहित्यमें उनका नीतिवाक्यामृत अद्वितीय है । कमसे कम अब तक तो इस विपयका कोई दूसरा जैनग्रन्थ उपलब्ध नहीं हुआ है। प्रन्थ-रचना। - ? इस समय सोमदेवसूरिके केवल दो ही अन्य उपलब्ध हैं -नीतिवाक्यामृत और यशस्तिलकचम्पू । इनके सिवाय जैसा कि नीतिवाक्यामृतकी प्रशस्तिसे मालूम होता है- तीन ग्रन्थ और भी हैं-१ युक्तिचिन्तामणि, २ भिवर्गमहेन्द्रमातलिसंजल्प और ३ पण्णवतिप्रकरण । परन्तु अभीतक ये कहीं प्राप्त नहीं हुए हैं । उक्त अन्धों से युक्तिचिन्तामणि तो अपने नामसे ही तर्कग्रन्थ मालम होता है और दूसरा शायद नीतिावपयक होगा। महन्द्र और उसके सारथी मातलिके संवादरूपमें उसमें त्रिवर्ग अर्थात् धर्म, अर्थ और कामकी चर्चा की गई होगी। तीसरेके नागसे सिवाय इसके कि उसमें ९६ प्रकरण या अध्याय हैं, विषयका कुछ भी अनुमान नहीं हो सकता है। इन सब ग्रन्थोंगें नीतिवाक्यामृत ही सबसे पिछला ग्रन्थ है। यशोधरमहाराजचरित या यशस्तिलक इसके पहलेका है। क्योंकि नीतिवाक्यामृतमें उसका उल्लेख है । वहुत संभव है कि नीतिवाक्यामृतके बाद भी उन्होंने ग्रन्थरचना की हो और उक्त तीन ग्रन्योंके समान वे भी किसी जगह दीमक या चूहोंके खाद्य बन रहे हों, या सर्वथा नष्ट ही हो चुके हों। विशाल अध्ययन । यशस्तिलक और नीतिवाक्यामृतके पढ़नेसे मालूम होता है कि सोमदेवसूरिका अध्ययन बहुत ही विशाल था । ऐसा जान पड़ता है कि उनके समयमें जितना साहित्य-न्याय, व्याकरण,काव्य, नीति,दर्शन आदि सम्बन्धी उपलब्ध था, उस सबसे उनका परिचय था। केवल जैन ही नहीं, जनेतर साहित्यसे भी वे अच्छी तरह परिचित थे । यश- स्तिलकके चौथे आश्वासमें (पृ० ११३ में) उन्होंने लिखा है कि इन महाकवियोंके काव्योंमें नन्न क्षपणक या दिगम्बर साधुओंका उल्लेख क्यों आता है ? उनकी इतनी अधिक प्रसिद्धि क्यों है ?- उर्व, भारवि, भवभूति, भर्तृहरि, भर्तमेण्ट, कण्ट, गुणात्य, व्यास, भास, चोस, कालिदासर, बाण+, मयूर, नारायण, कुमार, माघ और राजशेखर । इससे मालूम होता है कि वे पूर्वोक्त कवियोंके काव्योंसे अवश्य परिचित होंगे। प्रथम आश्वासके ९० वे पृष्ठमें उन्होंने इन्द्र, चन्द्र, जैनेन्द्र, आपिशल आर पाणिनिके व्याकरणोंका जिकर किया है। पूज्यपाद + नीतिवाक्यामृत और यशस्तिलकके कुछ समानार्थक वचनोंका मिलान कीजिए:- १-बुभुक्षाकालो भोजनकाल:-नी० वा०, पृ० २५३ । चारायणो निशि तिमिः पुनरस्तकाले, मध्ये दिनस्य धिपणश्चरकः प्रभाते । भुक्ति जगाद नृपते मम चैप सगस्तस्याः स एव समयः क्षुधितो यदैव ॥३२८॥-यशस्तिलक,आ० ३॥ (पूर्वोक्त पद्यमें चारायण, तिमि, धिपण और चरक इन चार आचार्योंके मतोंका उल्लेख किया गया है ।) २--कोफवहिवाकामः निशि भुञ्जीत । चकोरवनकंकामः दिवापक्वम् ।- नी० वा. पृ० २५७ । अन्ये त्विदमाहुः- यः कोकवहिवाकामः स नक्तं भोक्तुमर्हति । स भोक्ता वासरे यश्च रात्रौ रन्ता चकोरवत् ॥ ३३० ॥ ---यशस्तिलक, आ०२ भास महाकविका 'पेया सुरा प्रियतमामुखसाक्षर्णायं' आदि पद्य भी पाँचवें आश्वसमें (पृ. २५० ) उद्धृत है । ४ रघुवंशका भी एक जगह ( आश्वास ४, पृ० १९४ ) उल्लेख है । + वाण महाकविका एक जगह औ भी ( आ० ४, पृ० १०१) उल्लेख है और लिखा है कि उन्होंने शिकारकी निन्दा की है।
wom.inwww.univoov...... ४४ ] जैन साहित्य संशोधन (जैनेन्द्र के कर्ता) और पाणिनिका उल्लेख और भी एक दो जगह हुआ है । गुरु, शुक्र, विशालाक्ष, परी- क्षित, पराशर, भीम, भीम, भारद्वाज आदि नीतिशास्त्रप्रणेताओंका भी वे कई जगह स्मरण करते हैं। कौटिलीय अर्थशास्त्रसे तो वे अच्छी तरह परिचित हैं ही। हमारे एक पण्डित मित्रके कथनानुसार नीतिवाक्यामृतमें सौ सवा सौ के लगभग ऐसे शब्द है जिनका अर्थ वर्तमान कोशोंमें नहीं मिलता। अर्थशास्त्रका अध्येता ही उन्हें साक्ष सकता है । अश्वविद्या, गजैविद्या, रत्नपरीक्षा, कामशास्त्र, वैर्धक आदि विद्याओके आचार्योंका भी उन्होंने कई प्रसंगोंने जिकर किया है । प्रजापतिप्रोक्त चित्रकर्म, वराहमिहिरकृत प्रतिष्टाकाण्ड, आदित्यमंत, निमित्ता- ध्याय, महाभारत, रत्नपरीक्षा, पतंजलिफा योगशास्त्र और वररुचि, व्यास, हरवोध, कुमारिलकी उफियोंके उद्धरण दिये हैं। सैद्धान्तवैशेपिक, तार्किक वैशेषिक, पाशुपत, कुलाचार्य, सांख्य, दशवलशासन, जैमिनीय, वाईसत्य, वेदान्तवादि, काणाद, ताथागत, कापिल, ब्रह्माद्वैतवादि, अवधूत आदि दर्शनोंके सिद्धान्तोंपर विचार किया है । इनके सिवाय मतनग, भृगु, भर्ग, भरत, गौतम, गर्ग, पिंगल, पुलह, पुलोम, पुलस्ति, पग- शर, मरीचि, विरोचन, भूमध्वज, नीलपट, अहिल, आदि अनेक प्रसिद्ध और अप्रसिद्ध आचार्योंका नामो- ल्लेख किया है । बहुतसे ऐतिहासिक दृष्टान्तोंका भी उल्लेख किया गया है । जैसे यवनदेश (यूनान? ) में मणिकुण्डला रानीने अपने पुत्रके राज्यके लिए विषदूषित शरावके कुरलेसे अजराजाको, सूरसेन (मथुरा) में वसन्तमतिने विषमय आलसे रंगे हुए अधरोंसे सुरतविलास नामक राजाको, दशार्ण ( मिलसा) में वृकोदरीने विपलिप्त करधनासे मदनाव राजाको, मगध देशमे मदिराक्षीने तीखे दर्पणसे मन्मथविनेदको, पास्य देशमे चण्डरसा रानीने करीने छुपी हुई छुरीसे मुण्डीर नामक राजाको मार डाला * । इत्यादि । पौराणिक आख्यान भी बहु-से आये हैं। जैसे प्रजापति ब्रह्माका चित्त अपनी लड़की पर चलायमान हो गया, वररुचि या कात्यायनने एक दासीपर रीझकर उसके कहनेसे मघका घड़ा उठाया, भादि । इन सब बातोसे पाठक जान सकेंगे कि आचार्य सोमदेवका ज्ञान कितना विस्तृत और व्यापक था। उदार विचारशीलता। यशस्तिलकके प्रारंभके २० वें श्ले करें सोमदेवसूरि कहते हैं: लोको युक्तिः कलाश्छन्दोऽलंकाराः समयागमाः । सर्वसाधारणाः सद्धिस्तीर्थमार्ग इव स्मृताः ।। अर्थात् सजनोंका कथन है कि व्याकरण, प्रमाणशास्त्र (न्याय ), कलायें, छन्दःशास्त, अलंकारशास्त्र और (आहेत, जैमिनि, कपिल, चार्वाक, कणाद, बौद्धादिके ) दर्शनशास्त्र तीर्थमार्गके समान सर्वसाधारण है। अर्थात् जिस तरह गंगादिके मार्ग पर ब्राह्मण भी चल सकते हैं और चाण्डाल भी, उसी तरह इनपर भी सवका अधिकार है। + पूज्यपाद इव शब्दतियेषु...पणिपुत्र इव पदप्रयोगेषु" यश. आ० २, पृ० २३६ । -२, ३, ४, ५, ६-" रोमपाद इव गजविद्यासु रैवत इव हयनयेषु शुकनाश इव रत्नारीक्षासु, दत्तक इव कन्तुसिद्धान्तेषु "-मा० ४, पृ. २३६-२३७ । 'दत्तक' कामशास्त्र के प्राचीन आचार्य है। वात्स्यायनने इनका उहख किया है। 'चारायण' भी कामशास्त्र के आचार्य हैं। इनका मत यशस्तिलकके तीसरे आश्वासके ५०९ पृष्ठमें चरकके साथ प्रकट किया गया है। १, २, ३, ४, ५–उक्त पाँचां अन्योंके उद्धरण यश० के चौथे आश्वासके पृ० ११२-१३ और ११९ में उद्धृत हैं । महाभारतका नाम नहीं है, परन्तु-पुराणं मानवो धर्मः साड्गो वेदश्चिकित्सितम्' आदि श्लोक महाभारतसे ही उद्धृत किया गया है। ६-तदुक्तं रत्नपरीक्षायाम्-'न केवलं' आदि; आश्वास ५, पृ. २५६ । ७-यशस्तिलक आ० ६, पृ० २७६-७७1८-९-आ० ४, पृ. ९९।१०,११-आ० ५, पृ०२५१-५४ । १२-इन सब दर्शनोंका विचार पाँचवें आश्वासके पृ० २६९ से २७७ तक किया गया है। १३-देखो आश्वास ५, पृ० २५२-५५ और २९९ । * यशस्तिलक आ० ४, पृ० १५३ । इन्हीं आख्यानोंका उल्लेख नीतिवाक्यामृत ( पृ० २३२) में भी किया गया है । आश्वास ३. पृ० ४३१ और ५५० में भी ऐसे ही कई ऐतिहासिक दृष्टान्त दिये गये हैं। ४ यश. आ० ४. पृ० १३८-३९ । + " लोको व्याकरणशास्त्रम् , युक्तिः प्रमाणशास्त्रम् , .....समयागमाः जिनजैमिनिकपिलकणचरचार्वाकशाक्यानां सिद्वान्ताः । सर्वसाधारणाः द्भिः कथिताः प्रतिपादिताः । क इव तीर्थ मार्ग इव । यथा तीर्थमार्गे माझगाश्चलन्ति, चाण्डाला अपि गच्छन्ति, नास्ति तत्र दोषः । "--श्रुतसागरी टीका ।
भक भ MAN...... www. W.www सोमदेवसारधारा गीतियाफ्याम्हस [१५ इस उकिसे पाठक जान सकते हैं कि उनके विचार ज्ञानके सम्बन्धमें कितने उदार थे। उसे पे सर्वसाधारणको चीज समझते थे और यही कारण है जो उन्होंने धर्माचार्य होकर भी अपने धर्मसे इतर धर्मके माननेवालोंके साहित्यका भी अच्छी तरहसे अध्ययन किया था, यही कारण है जो वे पूज्यपाद और भट्ट अकलंकदेवके साथ पाणिनि आदिका भी आदरके साथ उल्लेख करते हैं और यही कारण है जो उन्होंने अपना यह राजनीतिशाजनेतर आचार्योंके विचारोंका सार खींचकर बनाया है। यह सच है कि उनका जैन सिद्धान्तों पर अचल विश्वास है और इसीलिए यशस्तिलकमें उन्होंने अन्य सिद्धान्तोका खण्डन करके जैनसिद्धान्तकी उपादेयता प्रतिपादन की है। परन्तु इसके साथ ही वे इस सिद्धान्तके पक्के अनुयायी हैं कि 'युक्तिमद्वचनं यस्य तस्य कार्यः परिग्रहः ।' उनकी यह नीति नहीं थी कि ज्ञानका मार्ग भी संकीर्ण कर दिया जाय और संसारके विशाल ज्ञान-भाण्डारका उपयोग करना छोड़ दिया जाय। समय और स्थान। नीतियाक्यामृतके अन्तकी प्रशस्तिमें इस बातका कोई जिकर नहीं है कि वह कब और किस स्थानमें रचा गया था, परन्तु यशस्तिलक चम्पूके अन्तमें इन दोनों बातोंका उल्लेख है:- " शकनृपकालातीतसंवन्सरशतेप्वष्टस्वेकाशीत्यधिकेपु गतेपु अङ्क ८८१ ) सिद्धार्थ- संवत्सरान्तर्गतचैत्रमासमदनत्रयोदश्यां पाण्ड्य-सिंहल-चोल-चेरमप्रभृतीन्महीपतीन्प्रसाध्य मेल- पाटीप्रवर्धमानराज्यप्रभावे श्रीकृष्णराजदेवे सति तत्पादपनोपजीविनः समधिगतपञ्चमहाशब्दमहा- सामन्ताधिपतेश्चालुक्यकुलजन्मनः सामन्तचूडामणेः श्रीमदरिकेसरिणः प्रथमपुत्रस्य श्रीमद्वद्यगरा- जस्य लक्ष्मीप्रवर्धमानवसुधारायां गङ्गाधारायां विनिमोपितमितं काव्यामिति ।" अर्थात चैत्र सुदी १३, शकसंवन् ८८१ (विक्रम संवत् १०३६ ) को जिस समय श्रीकृष्णगजदेव पाण्स्य सिंहल, चोल, चेर आदि राजाओं पर विजय प्राप्त करके मेलपाटी नामक राजधानीमें राज्य करते थे और उनके चरणकमलोपजीवी सामन्त वहिंग-जो चालुक्यवंशीय अरिकेसरीके प्रथम पुत्र थे-गंगाधाराका शासन करते थे, यह काव्य समाप्त हुआ। दक्षिणके इतिहाससे पता चलता है कि ये कृष्णराजदेव राष्ट्रकूट या राठौर वंशके महाराजा थे और इनका दूसरा नाम अकालवर्ष था। यह वही वंश है जिसमें भगवजिनसेनके परमभक्त महाराज अमोघवर्ष (प्रथम) उत्पन्न हुए थे । अमोघवपके पुत्र अकालवप (द्वितीय कृष्ण ) और अकालवपके जगतुंग हुए * । इन जगत्तुंगके दो पुत्रों- इन्द्र या नित्यवर्प और वहिग या अमाघवप ( तृतीय ) मेसे--अमोघवर्ष तृतीयके पुत्र कृष्णराजदेव या तृतीय कृष्ण थे। इनके समयके शक संवत् ८६७, ८७३, ८७६, और ८८१ के चार शिलालेख मिले हैं, इससे इनका राज्यकाल कमसे कम ८६७ से ८८१ तक मुनिश्चित है । ये दक्षिणके सार्वभौमराजा थे और बड़े प्रतापी थे। इनके अधीन अनेक माण्डलिक या करद राज्य थे । कृष्णराजने-जैसा कि सोमदेवसूरिने लिखा है-सिंहल, चोल, पाण्ड्य और चेर राजा- ओंको युद्धमें पराजित किया था। इनके समयमें कनड़ी भाषाका सुप्रसिद्ध कवि पोन हुआ है जो जैन था और जिसने १ पाण्ड्य-वर्तमानमें मद्रासका 'तिनेवली' सिंहल-सिलोन या लंका। चोल-मदरासका कारोमण्डल । चेरस्केरल, वर्तमान त्रावणकोर । २ मुद्रित प्रन्यमें 'मेल्याटी' पाठ है। ३ मुद्रित पुस्तक 'श्रीमद्वागराजप्रवर्ध- मान-- पाठ है। जगतुंग गद्दीपर नहीं बैठे । अकालवपके वाद जगत्तुंगके पुत्र तृतीय इन्द्रको गद्दी मिली। इन्द्रके दो पुत्र थे-अमोघवर्ष (द्वितीय ) और गोविन्द ( चतुर्थ )। इनमेंसे द्वितीय अमोघवर्ष पहले सिंहासनारूढ हुए; परन्तु कुछ; ही समयके याद गोविन्द चतुर्थने उन्हें गद्दीसे उतार दिया और आप राजा बन बैठे। गोविन्दके बाद उनके काफा अर्थात् जगत्तुंगके दूसरे पुत्र अमोघवर्ष (तृतीय) गद्दीपर बैठे। अमोघवर्षके बाद ही कृष्णराजदेव सिंहासनासीन हुए । इन सबके विषयमें विस्तारसे जाननेके लिए डा० भाण्डरकरकृत 'हिस्ट्री आफ दी डेकन' या उसका मराठी अनु- बाद पड़िए। - - ४६] जग साहित्य संशोधमा [बीच MANARAM.NPNPARANARAMAYANAPAAAAAARNARRAMA WRIMINAAAAMRIKANNAAMANARArr.rn . शान्तिपुराण नामक श्रेष्ठ प्रन्थकी रचना की है। महाराज कृष्णराज देवके दरवारसे इसे 'उगयभापाकविचमवर्ती की उपाधि मिली थी। निजामके राज्यमें मलखेड़ नामका एक ग्राम है जिसका प्राचीन नाम 'मान्यखेट ' है । यह मान्यखेट ही अमोघ- वर्ष आदि राष्ट्रकूट,मंग ऐनकी राजधानी थी x और उस समय बहुत ही समृद्ध थी। संभव है कि सोमदेवने इसीको मेलपाटी यां मिल्याटी लिखा हो। हिस्टरी आफ कनारी लिटरेचर' के लेखकने लिखा है कि पान कविको उभयभापाकविचक्रवर्तीकी उपाधि देनेवाले राष्ट्रकूट राजा कृष्णराजने मान्यखेटमें सन् ९३९ से १६८ तक राज्य किया है। इससे भी मालूम होता है कि मान्यखेटका ही नाम मेलपाटी होगा; परंतु यदि यह मेलपाटी कोई दूसरा स्थान है तो समझना होगा कि कृष्णराज देवके सगयमें मान्यखेटसे राजधानी उठकर उक्त दूसरे स्थानमें चली गई थी। इस बातका पता नहीं लगता कि मान्यखेटमें राष्ट्रकूटोंकी राजधानी कब तक रही। राष्ट्रकूटोंके समयमें दक्षिणका चालक्यवंश ( सोलकी ) हतप्रभ हो गया था। क्योंकि इस वंशका सार्वभौमत्व राष्ट्रकूटोंने ही छीन लिया था । अतएव जब तक राष्ट्रकूट सार्वभौम रहे तब तक चालुक्य उनके आज्ञाकारी सामन्त या माण्डलिक राजा बनकर ही रहे। , जान पड़ता है कि अरिकेसरिका पुत्र वर्किंग ऐसा ही एक सामन्तराजा था जिसकी गंगाधारा नाजधानी में यशस्तिलककी रचना समाप्त हुई है। चालुक्योंकी एक शाखा जोल' नामक प्रान्तपर राज्य करती थी जिसका एक भाग इस सगयके धारवाड़ जिलेमें आता है और श्रीयुक्त आर. नरसिंहाचार्यके मतसे चाळक्य अरिकेसरीकी राजधानी 'पुलगेरी में थी जो कि इस समय ' लक्ष्मश्वर' के नामसे प्रसिद्ध है। इस अरिकेसरीके ही समयमें कनड़ी भाषाका सर्वश्रेष्ठ कवि पम्प हो गया है, जिसकी रचना पर मुग्ध होकर अरिकेसरीने धर्मपुर नामका एक ग्राम पारितोपिकमें दिया था। पम्प जैन था। उसके बनाये हुए दो ग्रन्थ ही इस समय उपलब्ध है-एक आदिपुराण चम्पू और दूसरा भारत या विक्रमार्जुनविजय। पिछले ग्रन्थमें उसने अरिकेसरीकी वंशावली इस प्रकार दी है-युद्धमल्ल -आरकेसरी नारसिंह-युद्धमल्ल - पहिग- युद्धमल्ल- नारसिंह और अरिकेसरी । उक्त अन्य शक संवत ८६३ (वि० ९९८ में ) समाप्त हुआ है, अर्थात् यह यश- स्तिलकसे कोई १८ वर्ष पहले बन चुका था। इसकी रचनाके समय अरिकेसरी राज्य करता था, तब उसके १८ वर्ष- बाद-यशस्तिलककी रचनाके समय-उसका पुत्र राज्य करता होगा, यह सर्वथा ठीक जंचता है। काव्यमाला द्वारा प्रकाशित यशस्तिलकमें अरिकेसरीके पुत्रका नाम 'श्रीमद्वागराज' मुद्रित हुआ है; परन्तु हमारी समझमें वह अशुद्ध है । उसकी जगह 'श्रीमद्धद्दिगराज' पाठ होना चाहिए । दानवीर सेठ माणिकचंदजीके सरस्वतीभंडारकी वि० सं० १४६४ की लिखी हुई प्रतिमें ' श्रीमद्वद्यगराजस्य ' पाठ है और इससे हमें अपने बाल्पना किये हुए पाठकी शुद्धतामें और भी अधिक विश्वास होता है। ऊपर जो हमने पम्पकवि-लिखित आरिकेसरीकी वंशावली दी है, उस पर पाठकोंको जरा बारीकीसे विचार करना चाहिए। उसमें युद्धमल्ल नामके तीन, अरिकेसरी नामके दो और नारसिंह नामके दो राजा है । अनेक राजवंशोंमें प्रायः यही परिपाटी देखी जाती है कि पितामह और पौत्र या प्रपितामह और प्रपौत्रके नाम एकसे रक्खे जाते थे, जैसा कि उक्त वंशावलीसे प्रकट होता है " अतएव हमारा अनुमान है कि इस वंशावलीके अन्तिम राजा आरियोसरी (पम्पके आश्रयदाता) के पुत्रका नाम बद्दिग ४ ही होगा जो कि लेखकोंके प्रमादसे 'वद्यग' या 'वाग' बन गया है। ४ महाराजा अमोघवर्ष (प्रथम ) के पहले शायद राष्ट्रकूटोंकी राजधानी मयूरखण्डी थी जो इस समय नासिक जिलेमें मोरखण्ड किलेके नामसे प्रसिद्ध है। * दक्षिणके राष्ट्रकूटोंकी वंशावलीमें भी देखिए कि अमोघवर्ष नामके चार, कृष्ण या अकालवर्प नामके तीन, गोविन्द नामके चार, इन्द्र नामके तीन और कर्क नामके तीन राजा लगभग २५० वर्षके बीचमें ही हुए हैं। ४ श्रद्धेय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझाने अपने ‘मोलंकियोंके इतिहास' (प्रथम भाग) में लिखा है कि सोमदेवसूरीने अरिकेसरीके प्रथम पुत्रका नाम नहीं दिया है। परन्तु ऐसा उन्होंने यशस्तिलककी प्रशास्तिके अशुद्ध पाठके कारण समझ लिया है। वास्तवमे नाम दिया है और वह ' वदिग' ही है।
अंक १] सोमदेवसरिकृत नीतिवाक्यामृत । [४७ .. A. MARAre MrwAAmrAnnar. Ariana... . 'गंगाधारा' स्थान के विपयमें हम कुछ पता न लगा सके जो कि बदिगकी राजधानी थी और जहाँ यश- स्तिलककी रचना समाप्त हुई है । संभवतः यह स्थान धारवाड़के ही आसपास कहीं होगा। श्रीसोमदेवसूरिने नीतिवाक्यामृतकी रचना कब और कहाँ पर की थी, इस वातका विचार करते हुए हमारी दृष्टि उसकी संस्कृत टीकाके निम्नलिखित वाक्यों पर जाती है। अत्र तावदखिलभूपालमौलिलालितचरणयुगलेन रघुवंशावस्थायिपराक्रमपालितकस्य ( कृत्स्न ) कर्णकुन्जेन महाराजश्रीमहेन्द्रदेवेन पूर्वाचार्यकृतार्थशास्त्रदुरवबोधग्रन्थगौरवखिन्नमानसेन सुबोधललितलघुनीतिवाक्यामृतरचनासु प्रव- र्तितः सकलपारिपदत्वा तिग्रन्थस्थ नानादर्शनप्रतिबद्धश्रोतृणां तत्तदीष्टश्रीकण्ठाच्युतविरंच्यहतां वाचनिकमनस्कृतिसू- चनं तथा स्वगुरोः सोमदेवस्य च प्रणामपूर्वकं शास्त्रस्य तत्कर्तृत्वं ख्यापयितुं सकलसत्त्वकृताभयप्रदानं मुनिचन्द्राभिधानः क्षपणकव्रतधती नीतिवाक्यामृतकर्ता निर्विनसिद्धिकरं...श्लोकमेकं जगाद-" पृष्ठ २. इसका अभिप्राय यह है कि कान्यकुब्जनरेश्वर महाराजा महेन्द्रदेवने पूर्वाचार्यकृत अर्थशास्त्र ( कौटिलीय अर्थ- शास्त्र ? ) की दुर्बोधता और गुरुतासे खिन्न होकर ग्रन्थकर्तीको इस सुबोध, सुन्दर और लघु नीतिवाक्यामृतकी रचना करनेमें प्रवृत्त किया । कन्नौजके राजा महेन्द्रपालदेवका समय वि० संवत् ९६० से ९६४ तक निश्चित हुआ है। कर्पूरमंजरी और.काव्यमीमांसा आदिके कर्ती सुप्रसिद्ध कवि राजशेखर इन्हीं महेन्द्रपालदेवके उपाध्याय थे' । परन्तु हम. देखते हैं कि यशस्तिलक वि० संवत् १०१६ में समाप्त हुआ है और नीतिवाक्यामृत उससे भी पीछे बना है क्योंकि नीतिवाक्यामृतकी प्रशस्तिमें ग्रन्थकाने अपनेको यशोधरमहाराजचरित या यशस्तिलक महाकाव्यका कर्ता प्रकट किया है और इससे प्रकट होता है कि उक्त प्रशस्ति लिखते समय वे यशस्तिलकको समाप्त कर चुके थे। ऐसी अवस्था में महेन्द्रपालदेवसे कमसे कम ५०-५१ वर्ष बाद नीतिवाक्यामृतका रचनाकाल ठहरता है । तब समझमें नहीं आता कि टीकाकारने सोमदेवको महेन्द्रपालदेवका सामायक कैसे ठहराया है। आश्चर्य नहीं जो उन्होंने किसी सुनी सुनाई किंवदन्तीके आधारसे पूर्वोक्त बात लिख दी हो। नीतिवाक्यामृतके टीकाकारका समय अज्ञात है; परंतु यह निश्चित है कि वे मूल ग्रन्थकासे बहुत पीछे हुए हैं, क्योंकि और तो क्या वे उनके नामसे भी अच्छी तरह परिचित नहीं है । यदि ऐसा न होता तो मंगला. चरणके श्लोककी टीकामे जो ऊपर उद्धृत हो चुकी है, वे ग्रंथकर्ताका नाम 'मुनिचन्द्र ' और उनके गुरुका नाम 'सोमदेव' न लिखते । इससे भी मालूम होता है कि उन्होंने ग्रन्थकर्ता और महेन्द्रदेवका समकालिकत्व किंव- दन्तकि आधारसेही लिखा है। सोमदेवसूरिने यशस्तिलको एक जगह जो प्राचीन महाकवीयोंकी नामावली दी है, उसमें सबसे अन्तिम नाम राजशेखरका है । इससे मालूम होता है कि राजशेखरका नाम सोमदेवके समयमें प्रसिद्ध हो चुका था, अत एव राजशेखर उनसे अधिक नहीं तो ५० वर्ष पहले अवश्य हुए होंगे और महेन्द्रदेवके वे उपाध्याय थे । इससे भी नीतिवाक्यामृतका उनके समयमें या उनके कहनेसे बनना कम संभव जान पड़ता है। और यदि कान्यकुजनरेशके कहनेसे सचमुच ही नीतिवाक्यामृत बनाया गया होता, तो इस बातका उल्लेख ग्रन्थकर्ता अवश्य करते बल्कि महाराजा महेन्द्रपालदेव इसका उल्लेख करनेके लिए स्वयं उनसे आग्रह करते। पहले बतलाया जा चुका है कि सोमदेवसूरि देवसंघके आचार्य थे और जहाँ तक हम जानते हैं यह संघ दक्षि- णमें ही रहा है । अब भी उत्तरमें जो भद्वारकोंकी गहियों हैं, उनमेसे कोई भी देवसंघकी नहीं है । यशस्तिलक भी दक्षिणमें ही बना है और उसकी रचनासे भी अनुमान होता है कि उसके कर्ता दाक्षिणात्य हैं । ऐसी अवस्थामें उनका देखो नागरीप्रचारिणी पत्रिका (नवीन संस्करण), भाग २, अंक १ में स्वर्गीय पं० चन्द्रधर शर्मा गुलेरीका 'अवन्तिमुन्दरी' शीर्पक नोट । x" तथा--उर्व-भारवि-भवभूति-भर्तृहरि-भर्तृमेण्ठ-गुणाढ्य-व्यास-भास-वोस-कालिदास-बाण-मयूर-नारायण-कुमार- माघ-राजशेखरादिमहाकविकाव्येषु तत तनावसरे भरतप्रणीने काव्याध्याये सर्वजनप्रसिद्धेषु तेषु तेप्पाख्यानेषु च कथ तद्विपया महती प्रसिद्धिः। - यशस्तिलक आ० ४, पृ०११३॥ - * - . ४८] जैन साहित्य संशोधक [संड २ निर्घन्य होकर भी कान्यकुब्जके राजाकी सभा रहना और उसके कहनेसे नीतिवाक्यामृतकी रचना करना असंभव नहीं तो विलक्षण अवश्य जान पड़ता मूलअन्य और उसके कर्ताके विषयमें जितनी बातें मालूम हो सकी उन्हें लिखकर अब हम टीका और टीका- कारका परिचय देनेकी ओर प्रवृत्त होते हैं। टीकाकार। जिस एक प्रतिके आधारसे यह टीका मुद्रित हुई है, उससे कहीं भी टीकाकारका नाम नहीं दिया है। संभव है कि टीकाकारकी भी कोई प्रशस्ति रही हो और वह लेखकोंके प्रमादसे छूट गई हो। परन्तु टीकाकारने अन्यके आरंभमें जो मंगलाचरणका श्लोक लिखा है, उससे अनुमान होता है कि उनका नाम बहुत फरके 'हरिवल' होगा। हरि हरिवलं नत्वा हरिवर्ण हरिप्रभम् । हरीज्यं च वेटीका नीतिवाक्यामृतोपरि ॥ यह लोक मूल नातिवाक्यामृतके निम्नलिखित मंगलाचरणका बिल्कुल अनुकरण है। सोमं सोमसमाकारं सोमाभं सोमसंभवम् । सोमदेवं मुनि नत्वा नीतिवाक्यामृतं ब्रुवे ।। जब टीकाकारका मंगलाचरण मूलका अनुकरण है और मूलकारने अपने मंगलाचरणमें अपना नाम भी पर्याया- न्तरसे व्यक्त किया है, तब बहुत संभव है कि टीकाकारने भी अपने मंगलाचरणमें अपना नाम व्यक्त करनेका प्रयत्न किया हो और ऐसा नाम उसमें हारिवल ही हो सकता है जिसके आगे मूलके सोमदेवके समान नत्वा' पद पड़ा हुआ है । यह भी संभव है कि हरिबल टीकाकारके पुरुका नाम हो और यह इसलिए कि सोमदेवको उन्होंने मूलमन्ध कर्ताके गुरुका नाम समझा है । यद्यपि यह केवल अनुमान ही है, परन्तु यदि उनका या उनके गुरुका नाम हरिवल छो, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। टीकाकारने मंगलाचरणमें हरि या वासुदेवको नमस्कार किया है। इससे मालम होता है कि वे वैष्णव धर्मफे उपासक होंगे। वे कहाँके रहनेवाले थे और किस समयमें उन्होंने यह टीका लिखी है, इसके जाननेका कोई साधन नहीं है। परन्तु यह बात निःसंशय होकर कही जा सकती है कि वे बहुश्रुत विद्वान थे और एक राजनीतिके अन्यपर टीका लिखनेकी उनमें यथेष्ट योग्यता थी। इस विपयके उपलब्ध साहित्यका उनके पास काफी संग्रह था और टीकामे उसका पूरा पूरा उपयोग किया गया है । नीतिवाक्यामृतके अधिकांश वाक्योंकी टीकामे उस वाक्यसे मिलते जुलते अभिप्रायवाले उद्धरण देकर उन्होंने मूल अभिप्रायको स्पष्ट करनेका भरसक प्रयत्न किया है। विद्वान् पाठक समझ सकते हैं कि यह काम कितना कठिन है और इनके लिए उन्हें कितने प्रन्योंका अध्ययन करना पड़ा होगा; स्मरणयाक्ति भी उनकी कितनी प्रखर होगी। यह टीका पचासों प्रन्थकारोंके उद्धरणोंसे भरी हुई है। इसमें किन किन कवियों, आचार्यों या ऋपियोंके लोक उद्धृत किये गये हैं, यह जानने के लिए अन्यके अन्तमें उनके नामोंकी और उनके पद्योंकी एक सूची वर्णानुक्रमसे लगा दी गई है, इसलिए यहाँ पर उन नामोंका पृथक् उल्लेख करनेकी आवश्यकता नहीं है। पाठक देखेंगे कि उसमें अनेक नाम बिल्कुल अपरिचित हैं और अनेक ऐसे हैं जिनके नाम तो प्रसिद्ध हैं; परन्तु रचनायें इस समय अनुपलब्ध हैं । इस दृष्टिसे यह टीका और भी बड़े महत्त्वकी है कि इससे राजनीति या सामान्यनीतिसम्बन्धी प्राचीन ग्रन्थकारोंकी रचनाके सम्बन्धमें अनेक नई नई बातें मालूम होगी। संशोधकके आक्षेप। इस ग्रन्थकी प्रेसकापी और प्रुफ संशोधनका काम श्रीयुत पं० पन्नालालजी सोनीने किया है। आपने केवल अपने उत्तरदायित्व पर, मेरी अनुपस्थितिम, कई टिप्पणियाँ ऐसी लगा दी हैं जिनसे टीकाकारके और उसकी टीकाके विष- यमें एक बड़ा भारी भ्रम फैल सकता है अतएव यहाँ पर यह आवश्यक प्रतीत होता है कि उन टिप्पणियों पर भी एक नजर डाल ली जाय । सोनीजीकी टिप्पणियोंके आक्षेप दो प्रकारके हैं:
क१] सोमदेवसारिकृत नीतिवाक्यामृत ४ि९ १-टीकाकारने जो मनु, शुक और याज्ञवल्क्यके श्लोक उधृत किये हैं, वे मनुस्मृति, शुक्रनीति और याज्ञ- 'ल्क्यस्मृतिमें, नहीं है। यथा पृष्ठ १६५ की टिप्पणी श्लोकोऽयं मनुस्मृतौ तु नास्ति। टीकाकर्ना स्व- सौटयेन ग्रन्थकर्तपराभवाभिप्रायेण बहवः श्लोकाः स्वयं विरचय्य तत्र तत्र स्थलेषु विनिवेशिताः।' मर्थात् यह श्लोक मनुस्मृतिमे तो नहीं है, टीकाकारने अपनी दुष्टतावश मूलकर्ताको नीचा दिखानेके अभिप्रायसे वयं ही बहुतसे श्लोक बनाकर जगह जगह घुसेड़ दिये हैं। २-इस टीकाकारने-जो कि निश्चयपूर्वक अजैन है-बहुतसे सूत्र अपने मतके अनुसार स्वयं बनाकर जोड़ दिये । यथा पृष्ठ ४९ की टिप्पणी-"अस्य ग्रन्थस्य का कश्चिदजैनविद्वानस्तीति निश्चितं । अतस्तेन स्वम- जानुसारेण बहूनि सूत्राणि विरचय्य संयोजितानि । तानि च तत्र तत्र निवेदयिष्यामः ।" पहले आक्षेपके सम्बन्धमें हमारा निवेदन है कि सोनीजी वैदिक धर्मके साहित्य और उसके इतिहाससे सर्वथा अनभिज्ञ हैं। फिर भी उनके साहसकी प्रशंसा करनी चाहिए कि उन्होंने मनु या शुक्रके नामके किसी अन्थके किसी एक संस्करणको देखकर ही अपनी अद्भुत राय दे डाली है। खेद है कि उन्हें एक प्राचीन विद्वानके विषयम-केवल इतने कारणसे कि वह जैन नहीं है इतनी बड़ी एकतरफा डिक्री जारी कर देनेमें जरा भी झिझक नहीं हुई। सोनाजीने सारी टीकामे मनुके नामके पाँच श्लोकॉपर, याज्ञवल्क्यके एक श्लोकपर, और शुक्रके दो श्लोकोंपर अपने नोट दिये हैं कि ये श्लोक उक्त आचार्योंके ग्रन्योंमें नहीं हैं। सचमुच ही उपलब्ध मनुस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति और शुक्रनीतिम उद्धृत श्लोकोंका पता नहीं चलता। परन्तु जैसा कि सोनीजी समझते हैं, इसका कारण टीकाकारकी दुष्टता या मूलकर्ताको नीचा दिखानेकी प्रवृत्ति नहीं है। सोनीजीको जानना चाहिए कि हिन्दुओंके धर्मशास्त्रोंमें समय समय पर बहुत कुछ परिवर्तन होते रहे हैं। अपने निर्माणसमयमें वे जिस रूपमें थे, इस समय उस रूपमें नहीं मिलते हैं । उनके संक्षिप्त संस्करण भी हुए हैं और प्राचीन प्रन्योंके नष्ट हो जानेसे उनके नामसे दूसरोंने भी उसी नामके ग्रन्थ बना दिये हैं। इसके सिवाय एक स्थानकी प्रतिके पाठोसे दूसरे स्थानोकी प्रतियोंके पाठ नहीं मिलते । इस विषयमें प्राचीन साहित्यके खोजियोंने बहुत कुछ छानबीन की है और इस विषय पर बहुत कुछ प्रकाश डाला है। कौटिलीय अर्थशास्त्रकी भूमिकामे उसके सुप्रसिद्ध सम्पादक . भार. शामशास्त्री लिखते हैं:- अतश्च चाणक्यकालिक धर्मशास्त्रमधुनातनाद्याज्ञवल्क्यधर्मशास्त्रादन्यदेवासीदिति प्रतिभाति । एवमेव ये पुनर्मा- 'नव-चाईस्पत्यौशनसा भिन्नाभिप्रायास्तत्र तत्र कौटिल्येन परामृष्टाः न तेऽअधुनोपलभ्यमानेषु ततद्धर्मशास्त्रेषु दृश्यन्त इति कौटिल्यपरामृष्टानि तानि शास्त्राण्यन्यान्येवेति बाढं सुवचम् । अर्थात् इससे मालूम होता है कि चाणक्यके समयका याज्ञवल्क्य धर्मशास्त्र वर्तमान याज्ञवल्क्य शास्त्र (स्मृति) कोई जुदा ही था। इसी तरह कौटिल्यने अपने अर्थशास्त्रमें जगह जगह वाईसत्य, भौशनस आदिसे जो अपने भिन्न अभिप्राय प्रकट किये हैं वे अभिप्राय इस समय मिलनेवाले उन धर्मशास्त्रोंमें नहीं दिखाई देते । अतएव यह अच्छी तरह सिद्ध होता है कि कौटिल्यने जिन शास्त्रोंका उल्लेख किया है, वे इनके सिवाय दूसरे ही थे । स्वर्गीय बाबू रमेशचन्द्र दत्तने अपने 'प्राचीन सभ्यताके इतिहास ' में लिखा है कि प्राचीन धर्मसूत्रोंको सुधार कर उत्तरकालमें स्मृतियाँ बनाई गई हैं जैसे कि मनु और याज्ञवल्क्यकी स्मृतियाँ । जो धर्मसूत्र खोये गये हैं उनमें एक मनुका सूत्र भी है जिससे कि पीछेके समयमें मनुस्मृति बनाई गई है। याज्ञवल्क्य स्मृतिके सुप्रसिद्ध टीकाकार विज्ञानेश्वर लिखते हैं:-" याज्ञवल्क्यशिष्यः कश्चन प्रश्नोत्तर- रूपं याशवल्ल्यप्रणीतं धर्मशास्त्रे संक्षिप्य कथयामास, यथा मनुप्रोकं भृगुः ।' अर्थात् याज्ञवल्क्यक किसी शिष्यने याज्ञवल्क्यप्रणीत धर्मशास्त्रको संक्षिप्त करके कहा-जिस तरह कि भृगुने मनुप्रणीत धर्मशास्त्रको संक्षिप्त करके मनुस्मृति लिखी है। इससे मालूम होता है कि उक्त दोनों स्मृतियाँ, मनु और याज्ञवल्क्यक प्राचीन शास्त्रोंके उनके ऽ रमेशबाबूने अपने इतिहासके चौथे भागमें इस समय मिलनेवाली पृथक् पृथक् वीसों स्मृतियों पर अपने विचार प्रकट किये हैं और उसमें बतलाया है कि अधिकांश स्मृतियाँ बहुत पीछेकी बनी हुई हैं और बहुतोंमें-जो प्राचीन भी है-बहुत पीछे तक नई नई बातें शामिल की जाती रही हैं। •in- ७ ५.] जैन साहित्य संशोधक [खंड शिष्यों या परम्पराशिष्यों द्वारा निर्मित किये हुए सार हैं और इस बातको तो सभी जानते हैं कि उपलब्ध मनुस्मृति भूगुप्रणीत हैं-स्वयं मनुप्रणीत नहीं। बम्बईके गुजराती प्रेसके मालिकोने कुल्लूकभट्टकी टीकाके सहित मनुस्मृतिका एक सुन्दर संस्करण प्रकाशित किया है। उसके परिशिष्टमे ३५५ श्लोक ऐसे दिये हैं जो वर्तमान मनुस्मृतिमें तो नहीं मिलते हैं। परन्तु हेमाद्रि, मिताक्षरा, पराशरमाधवीय, स्मृतिरत्नाकर, निर्णयसिन्धु आदि अन्योम मनु, वृद्धमनु और बृहन्मनुके नामसे 'उक्तंच' रूपमें उद्धृत किये हैं । इसके सिवाय सैकड़ों लोक क्षेपकरूपमें भी दिये हैं, जिनकी कुल्लक महने भी टीका नहीं की है। हमारे जैनग्रन्थोमें भी मनुके नामसे अनेक श्लोक उद्धृत किये गये हैं जो इस मनुस्मृतिमें नहीं है । उदाहरणार्थ स्वनामधन्य पं० टोडरमल्लजीने अपने मोक्षमार्गप्रकाशक पाँच अविकारमें मनुस्मृतिके तीन लोक दिये हैं, जो वर्तमान मनुस्मृतिम नहीं हैं। इसी तरह द्विजवदनचपेट' नामक दिगम्बर जैनग्रन्थमे भी मनुके नामसे ७ श्लोक उद्धृत हैं जिनसे वर्तमान मनुस्मृतिमें केवल २ मिलते हैं, शेप ५ नहीं हैं।' शुक्रनीति जो इस समय मिलती है उसके विषयमें तो विद्वानोंकी यह राय है कि वह बहुत पीछेकीबनी हुई है- पाँच छ: सौ वर्षसे पहलेकी तो वह किसी तरह हो ही नहीं सकती । शुक्रका प्राचीन प्रन्य इससे कोई पृथक् ही था । कौटिलीय अर्थशास्त्र लिखा है कि शुक्रके मतसे दण्डनीति एक ही राजविद्या है, इसमें सब विद्यायें गर्मित हैं; परन्तु वर्तमान शुक्रनीतिका को चारों विद्याओंको राजविद्या मानता है--विद्याश्चतस्त्र एवेताः' आदि (म० १ ग्लो०५१) । अतएव इस शुक्रनीतिको शुक्रकी मानना भ्रम है। इन सब बातों पर विचार करनेसे हम टीकाकार पर यह दोष नहीं लगा सकते कि उसने स्वयं ही श्लोक गढ़कर मनु आदिके नाम पर मढ़ दिये हैं। हम यह नहीं कहते कि वर्तमान मनुस्मृति उक्त टीकाकारके बादकी है, इस लिए उस समय यह न उपलब्ध होगी। क्योंकि टीकाकारसे भी पहले मूलका श्रीसोमदेवसूरिने भी मनुके बीसा श्लोक उद्धत किये हैं और वे वर्तमान मनुस्मृतिमे मिलते हैं, अतएव टीकाकारके समयमें भी यह मनुस्मृति अवश्य होगी; परन्तु इसकी जो प्रति उन्हें उपलब्ध होगी, उसमें टीकोद्धत श्लोकोंका रहना असंभव नहीं माना जा सकता । यह भी संभव है कि किसी दूसरे ग्रन्थकाने इन श्लोकोंको मनुके नामसे उद्धृत. किया हो और उस ग्रन्थके माधारसे टीकाकारने भी उद्धृत कर लिया हो । जैसे कि अभी मोक्षमार्गप्रकाशके या द्विजवदनचपेटके आधारसे उनमें उद्धृत किये हुए मनुस्मृतिके ग्लोकोको, कोई नया लेखक अपने ग्रन्थमें भी लिख दे। याज्ञवल्क्यस्मृतिके श्लोकके विषयमें भी यही बात कही जा सकती है। अब रही शुक्रनीति, सो उसकी प्राचीन- तामे तो बहुत ही संदेह है । वह तो इस टीकाकारसे भी पीछेकी रचना जान पड़ती है। इसके सिवाय शुक्रके नामसे तो टीकाकारने दो चार नहीं १७० के लगभग श्लोक उद्धृत किये हैं। तो क्या टीकाकारने वे सबके सव ही मूलकर्ताको नीचा दिखानेकी गरजसे गढ़ लिये होगे ? और मूलक" तो इसमें अपनी कोई तौहीन ही नहीं समझते हैं। उन्होंने तो अपने यशस्तिलको न जाने कितने विद्वानोंके वाक्य और पद्य जगह जगह उधृत करके अपने विषयका प्रतिपादन किया है। सोनीजीका दूसरा आक्षेप यह है कि टीकाकारने स्वयं ही बहुतसे सूत्र (वाक्य) गढकर मूलमें शामिल कर दिये हैं। विद्यावृद्धसमुद्देशके, नीचे लाख २१ , २३ वे और २५६ सूत्रोको आप टीकाकर्ताका बतलाते हैं:- १-"वैवाहिकः शालीनो जायावरोऽघोरो गृहस्थाः ॥"२१ २-यालाखिल्य औदुम्बरी वैश्वानराः सद्याप्रक्षल्यकश्चेति वानप्रस्थाः ॥२३ x देखो मोक्षमार्गप्रकाशका बम्बईका संस्करण, पृष्ठ. २०१। द्विजवदनचपेट ' संस्कृत अन्य है, कोल्हापुरके श्रीयुत पं० कलाप्पा भरमाया निटवेने जैनबोधक' में और स्वतंत्र पुस्तकाकार भी, अबसे कोई १२-१४ वर्ष पहले, मराठी टीकासहित प्रकाशित किया था। ४ देखो गुजराती प्रेसकी शुक्रनीतिकी भूमिका । - - - AARAKn- MAAnarnnnnnnnnnnnnAARAANANAnnnnnnnnnnnnnnnns अंक१] सोमदेवसूरिकत नीतिवाक्यामृत । ३-"कुटीरकवणेदक -हंस-परमहंसा यतयः ॥ २५ इसका कारण आपने यह बतलाया है कि मुद्रित पुस्तकमें और हस्तालाखेत एलपुस्तकमें ये सूत्र नहीं है । परन्तु इस कारणमे कोई तथ्य नहीं दिखलाई देता। क्योंकि- १-जब तक दश पांच इस्तलिखित प्रतियों प्रमाणमें पेश न की जासके, तब तक यह नहीं माना जा सकता कि मुद्रित और मलपुस्तकमें जो पाठ नहीं है वे मूलकत्तांके नहीं हैं-ऊपरसे जोड़ दिये गये है। इस तरहके होन अधिक पाठ जुदी जुदी प्रतियोंमें अकसर मिलते हैं। २-लकत्ताने पहले वाँक भेद बतलाकर फिर आश्रमोके भेद बतलाये हैं-ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और यति । फिर ब्राह्मचारियोंके उपकुवाण, नैष्ठिक, और ऋतुपद ये तान भेद बतलाकर उनके लक्षण दिय हैं । इसके आगे गृहस्थ, वानप्रस्य और यातयोके लक्षण क्रमसे दिये हैं; तब यह स्वाभाविक और क्रमप्राप्त है कि ब्रह्मचारियोंके समान गृहस्थों, वानप्रस्थों और यतियोंके भो भेद बतलाय जाय और वे ही उक्त तीन सूत्रोंमें बतलाये गये हैं । तब यह निश्चय. पूर्वक कहा जा सकता है कि प्रकरणके अनुसार उक्त तानों सूत्र अवश्य रहने चाहिए और मूलकीने ही उन्हें रचा होगा। जिन प्रतियोंमे उक्त सूत्र नहीं हैं। उनमें उन्हे भूलसे ही छुटे हुए समझना चाहिए । -यदि इस कारणसं यं मूलकत्ताक नहीं कि इनमें बतलाये हुए भंद जैनमतसम्मत नहीं हैं, तो हमारा प्रदन है कि उपकुवाण, फुतुप्रद आदि ब्रह्मचारियोंक भेद भी किसी जैनग्रन्थमें नहीं लिख हैं, तब उनके सम्ब- न्धक जितन सूत्र हैं, उन्हें भी मूलकत्तांके नहीं मानने चाहिए । यदि सूत्रोंके मुलकर्ताकृत होनेकी यही कसौटी सोनीजी ठहरा देव, तब ता इस प्रन्थका आधस भी आंधक भाग टीकाकार कृत ठहर जायगा । क्योकि इसमे सकड़ों ही सूत्र एस है जिनका जनधर्मक साथ कुछ भी सम्बन्ध नहीं है और फाई भी विद्वान उन्हें जनसम्मत सिद्ध नहीं कर सकता। ४-जिसतरह टीकापुस्तकमें अनेक सूत्र अधिक है और जिन्हें सोनाजा टीकाकर्ताको गढन्त समझते हैं, उसी प्रकार मुद्रित और मूलपुस्तकमें भी कुछ सूत्र अधिक हैं ( जो टीकापुस्तकमें नहीं है ), तब उन्हें किसी गढन्त समझ- नी चाहिए ? विद्यापद्धसमुद्देशके ५९ ३ सूत्रकं आगे निम्नलिखित पाठ छूटा हुआ है जो मुद्रित और मूलपुस्तकमें मौजुद है:- - "सांख्यं योगी लोकायतं चान्वीक्षिकी । वौद्धाहताः श्रुतेः प्रतिपक्षत्वात् (नान्वीक्षिकीत्व), प्रकृतिपुरुषशो हि राजा सत्त्वमवलम्बते । रजः फलं चाफलं च परिहरति, तमोमिनाभिभूयते । भला इन सूत्रोको टीकाकारने क्यों छोड़ दिया ? इसमें कही हुई बातें तो उसके प्रतिकूल नहीं थी ? और मुद्रित तथा मूलपुस्तक दोनों ही यदि जैनोंके लिए विशेष प्रामाणिक मानी जावें तो उनमें यह अधिक पाठ नहीं होना चाहिए था। क्योंकि इसमें वेदविरोधी होने के कारण जैन और बौद्धदर्शनको आन्वीक्षिकीस बाहर कर दिया है । और मुद्रित पुस्तकमें तो मूलकतांक मंगलाचरण तकका अभाव है । वास्तविक बात यह है कि न इसमें टीकाकारका दोष है और न मुद्रित करानेवालका । जिसे जैसी प्रति मिली है उसने उसीके अनुसार टीका लिखी है और पाठ छपाया है । एक प्रतिसे दूसरी और दूसरीसे तीसरी इस तरह प्रतियां होते होते लेखकोंके प्रमादसे अकसर पाठ छूट जाते हैं और टिप्पण आदि मूलमें शामिल हो जाते हैं। हम समझते हैं कि इन बातोसे पाठकोंका यह भ्रम दूर हो जायगा कि टीकाकारने कुछ सूत्र स्वयं रचकर मूलमें जोड़ दिये हैं। यह केवल सोनीजीके मस्तककी उपज है और निस्सार है । खेद है कि हमें उनकी भ्रमपूर्ण टिप्पणियोंके कारण भूमिकाका इतना अधिक स्थान रोकना पड़ा। एक विचारणीय प्रश्न । इस आशासे अधिक बढ़ी हुई भूमिकाको समाप्त करनेके पहले हम अपने पाठकोंका ध्यान इस और विशेषरूपसे आकर्पित करना चाहते हैं कि वे इस प्रन्यका जरा गहराईके साथ अध्ययन करें और देखें कि इसका जैनधर्मके साथ क्या सम्बन्ध है। हमारी समझमें तो इसका जैनधर्मसे बहुत ही कम मेल खाता है । राजनीति यदि धर्मनिरपेक्ष है, अर्थात् वह किसी विशेष धर्मका पक्ष नहीं करती, तो फिर इसका जिस प्रकार जैनधर्मले कोई विशेष सम्बन्ध नहीं - ५२] जैन साहित्य संशोधक [खेड२ उसी प्रकार और धर्मोंसे भी नहीं रहना चाहिए था। परंतु हम देखते है कि इसका वर्णाचार और आश्रमाचारकी व्यवस्या के लिए वैदिक साहित्यकी ओर बहुत अधिक झुकाव है । इस ग्रन्यके विद्यावृद्ध, आन्वीक्षिकी और व्या समुद्दे- शोंको अच्छी तरह पड़नसे पाठक हमारे अभिप्रायको अच्छी तरह समझ जावेगे। जैनधर्मके मर्मज्ञ विद्वानोको चाहिए कि वे इस प्रश्नका विचारपूर्वक समाधान करें कि एक जैनाचार्यको कृतिमे आन्वीक्षिकी और त्रयीको इतनी अधिक प्रधानता क्यों दी गई है। यशस्तिलकके नीचे लिखे पद्योने भी इस प्रश्नका उत्तर सोचते समय सामने रत लेना चाहिए:- द्वौ हि धर्मा गृहस्थानां लौकिकः पारलौकिकः। लोकाश्रयो भवेदाद्यः परस्यादागमाश्रयः॥ जातयोऽनादयः सर्वास्तक्रियापि तथाविधा। श्रुतिः शास्त्रान्तरं वास्तु प्रमाणं कात्र न क्षतिः॥ स्वजात्यैव विशुद्धानां वर्णानामिह रत्नवत् । तक्रियाविनियोगाय जैनागमाविधिः परम् ॥ यद्भवभ्रान्तिनिर्मुक्तिहेतुधीस्तत्र दुलंमा। संसारव्यवहारे तु स्वतःसिद्ध वृथागमः ।। तथा च- सर्व एव हि नानां प्रमाण लौकिका विधिः । यत्र सम्यक्त्वहानिन यत्र न व्रतदूपणम् ॥ कहीं श्रीसोमदेवसूरि वर्णाश्रमव्यवस्था और तत्सम्बन्धी वैदिक साहित्यको लौकिक धर्म तो नहीं समझते हैं ? और इसी लिए तो यह नहीं कहते हैं कि यदि इस विषय में श्रुति (वेद) और शास्त्रान्तर (स्मृतियाँ) प्रमाण माने जाय तो हमारी क्या हानि है ? राजनीति भी तो लौकिक शास्त्र ही है। हमको भाशा है कि विद्वान इस प्रश्नको ऐसा हो न पड़ा रहने देंगे। मुद्रण-परिचय । अवसे कोई २५ वर्ष पहले बम्बईकी मेसर्स गोपाल नारायण कम्पनी ने इस अन्यको एक सोक्षप्त व्याख्याक साथ प्रकाशित किया था और लगभग उसी समय विद्याविलासी वड़ोदानरेशन इसके मराठी और गुजराती अनुवाद प्रकाशित कराये थे । उत्त तीनों संस्करणोंको देखकर-जिन दिनों में स्वगाय स्याद्वादवारिधि पं० गोपालदासजीको अघांनताम जनमित्रका सम्पादन करता था-मेरी इच्छा इसका हिन्दी अनुवाद करनेकी हुई और तदनुसार मैन इसके कई समुद्दे- शोका अनुवाद जैनमित्रमें प्रकाशित भी किया; परन्तु इसके आन्वीक्षिकी और त्रयों आदि समुशोका जैनधर्मके साथ कोई सामखस्य न कर सकनेके कारण मैं अनुवादकार्यको अधुरा ही छोड़ कर इसको संस्कृत टीकाको खोज करने लगा। तबसे, इतने दिनांके बाद, यह टीका प्राप्त हुई और अब यह माणिकचन्द्रग्रन्थमालाके द्वारा प्रकाशित की जा रही है। खेद है कि इसके मध्यके २५-२६ पत्र गायब हैं और वे खोज करनपर भी नहीं निल। इसके सिवाय इसकी कोई दूसरी प्रति भी न मिल सकी और इस कारण इसका संशोधन जैसा चाहिए वैसा न कराया जा सका। दृष्टिदोष और अनवधानतासे भी बहुतसी अशुद्धियों रह गई है। फिर भी हमें आशा है कि मूलप्रन्यके समझनेमे इस टीकाले काफी सहायता मिलेगी और इस दृष्टिसे इस अपूर्ण और अशुद्धरूपने भी इसका प्रकाशित करना सार्थक होगा। हस्तलिखित प्रतिका इतिहास । पहले जनसमाजमें शानदान करनेकी प्रथा विशेषतासे प्रचलित थी। अनेक धनी मानी गृहस्य अन्य लिखा लिखाकर जैनसाधुओं और विद्वानोंको दान किया करते थे और इस पुण्यकृत्यसे अपने ज्ञानावरणीय कर्मका निवारण करते थे। बहुतोंने तो इस कार्यके लिए लेन्बनशालायें ही खोल रक्खी यो जिनमें निरन्तर शचीन अवाचीन ग्रन्योंकी प्रतियाँ होती रहती थीं। यही कारण है जो उस समय मुद्रणकला न रहने पर भी ग्रन्योंका ययेट प्रचार रहता या और ज्ञानका प्रकाश मन्द नहीं होने पाता था। त्रियोंका इस ओर और भी अधिक लक्ष्य था। हमने ऐसे पचासों इस्तलिखित ग्रन्य देखे है जो धर्मप्राणा त्रियोंक द्वारा ही दान किये गये है।
अंक १] सोमदेवमूरिकृत नीतिवाक्यामृत । धीसे भीवा औवच्छूक । इस शास्त्रदान प्रथाको उत्तेजित करनेके लिए उस समयके विद्वान् प्रायः प्रत्येक दान किये हुए प्रन्यके अन्तमें दाताको प्रशस्ति लिख दिया करते थे जिसमें उसका और उसके कुटुम्बका गुणकर्तिन रहा करता था । हमारे प्राचीन पुस्तक-भंडारोंके प्रन्योमेसे इस तरहको हजारों प्रशस्तियों संग्रह की जा सकती है जिनसे इतिहास-सम्पादनक कार्यम बहुत कुछ सहायता मिल सकती है। नातिवाक्यामृतटीकाकी वह प्रति भी जिसके आधारसे यह अन्य मुद्रित हुआ है इसी प्रकार एक धनी गृहस्थकी धर्मप्राणा स्त्रोके द्वारा दान की गई थी। अन्यके अन्तमे जो प्रशस्ति दी हुई है, उससे मालूम होता है कि कार्तिक सुदी ५ विक्रमसंवत् १५४१ को, हिसार नगरके चन्द्रप्रभचैत्यालयमें, सुलतान बहलोल (लोदी) के राज्यकालमें, यह प्रति दान की गई थी। नागपुर या नागौरके रहनेवाले खण्डेलवालवंशीय क्षेत्रपालगोत्रीय संघपति कामाको भार्या साची कमलश्रीने हिसार निवासी पं० मेहा या माहाको इस भक्तिभावपूर्वक भेट किया था। कल्ह नामक मंघपतिको भायांका नाम राणी था। उसके चार पुत्र थे-हंवा, धारा, कामा और सुर- पति । इनमेसे तासरे पुत्र संघपति कामाको भायां उक्त साध्वी कमली थी जिसने अन्य दान किया था। कमल- नामके दो पुत्र थे। इनमेसे भीवाकी भायां भिउंसिरिके गुरुदास नामक पुत्र या जिसकी गुणधी भायांके गर्भसे रणमल्ल और जट्ट नामके दो पुत्र थे । दुसरे वच्छुकको भायां वासिरिफ रावणदास पुत्र था जिसकी स्त्रीका नाम सरस्वती था। पाठक देखें कि यह परिवार कितना बड़ा और कितना दीर्घजीवी था। कमलधोके सामने उसके प्रपौत्र तक मौजूद थे। पण्डित मेहा या माहाका दूसरा नाम पं० मेधावी था। ये वही मेधावी हैं जिन्होनें धर्मसंग्रहश्रावकाचार नामका प्रन्य बनाया है और जो मुद्रित हो चुका है। पं० माहा अपनी गुरुपरम्पराके विषयमें कहते हैं कि नन्दिसंघ, बलात्कारगण और सरस्वतीगच्छके भट्टारक पननन्दिके शिष्य भ० शुभचन्द्र और उनके शिष्य भ० जिनचन्द्र मेरे गुरु थे। जिनचन्द्रके दो शिष्य और थे-एक रत्ननन्दि और दूसरे विमलकीर्ति । यह पुस्तकदाताकी प्रशस्ति पं० मेधावीकी ही लिखी हुई मालूम होता है । उन्होंने प्रलोक्यप्राप्ति, मूलाचारकी वसुनन्दिवृत्ति आदि अन्योंमें और भी कई बड़ी बड़ी प्रशस्तियों लिखी हैं । वसुनन्दि वृत्तिकी प्रशस्ति वि० सं० १५१६ की और त्रैलोक्यप्रज्ञप्ति की १५१९ की लिखी हुई है * । धर्मसंग्रहश्रावकाचार उन्होंने कार्तिक वदी १३ सं० १५४१ को समाप्त किया है। नीतिवाक्यामृतटीकाकी यह प्रशस्ति धर्मसंग्रहक समाप्त होनेके कोई आठ दिन बाद ही लिखी गई है। धर्मसंग्रहमें पं० मेधावाने अपने पिताका नाम उद्धरण, माताका भीषुही और पुत्रका जिनदास लिखा है। वे अग्रवाल जातिके थे और अपने समयके एक प्रसिद्ध विद्वान् थे। उन्होंने दक्षिणके पुस्तकगच्छके आचार्य श्रुतमुनिसे अन्य कई विद्वानोंके साथ अष्टसहस्री ( विद्यानन्दस्वामीकृत ) पढी थी । जान पड़ता है कि उस समय हिसारमे जैन विद्वानोंका अच्छा समूह था। भधरकोंकी गद्दी भी शायद वहाँ पर थी। यह टीकापुस्तक हिसारसे आमेरके पुस्तक मंडारमें कब और कैसे पहुंची, इसका कोई पता नहीं है । आमेरके भंडारमेसे सं० १९६४ में भधारक महेन्द्रकीर्ति द्वारा यह बाहर निकाली गई और उसके बाद जयपुर निवासी पं० इन्द्र- लालजी शास्त्रीके प्रयत्नसे हमको इसकी प्राप्ति हुई । इसके लिए हम भधारकजी और शास्त्रीजी दोनोंके कृतज्ञ हैं। इस प्रतिमें १३३ पत्र हैं और प्रत्येक पृष्ठम प्रायः २० पंक्तियाँ है । प्रत्येक पत्रकी लम्बाई ११॥ इंच और चौड़ाई ५॥ इंचसे कुछ कम है । ५१ से ७५ तकके पृष्ठ मौजुद नहीं हैं। वम्बई। निवेदक- पौपशुक्ला तृतीया १९७९ वि०॥ देखो जैनहितैषी भाग १५, अंक ३-४ । } नाथूराम प्रेमी।
५४] जैन साहित्य संशोधक खर ~~~~ [नोट:- भारतीय वाख्यय' का जर्मन भाषामें विस्तृत और परिपूर्ण इतिहास लिखनेवाले प्रसिद्ध जर्मन विद्वान् डॉ. विण्टरनित्स्, जो वर्तमानमें बड्गीय साहित्य सम्राट् कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ ठाकुर संस्थापित शांतिनिकेतनकी विश्व- भारती संस्थाको अपने ज्ञानका दान कर रहे हैं, उनके पास 'नीतिवाक्यामृत' की १ प्रति अभिप्रायार्थ भेट की गई थी। इस भेटके स्वीकाररूपमें डॉ. महाशयने ग्रन्थमालाके मंत्री और इस प्रस्तावनाके लेखक श्रीयुत प्रेमीजीके पास एक पत्र भेजा है वह यहाँपर मुद्रित किया जाता है । इससे, सोमदेवसूरिके नीतिवाक्यामृतके बारेमें डॉ. महाशयका कैसा अभिप्राय है वह थोडमे ज्ञात हो जाता है। इस प्रन्थके बारेमें, जैसा कि डॉ० महाशयने अपने इस पत्रमें सूचित किया है, विशेष उल्लेख, उन्होंने अपने भारतीय वाङ्मयके इतिहासके तीसरे भाग, (जो हालहीमें प्रकाशित हुआ है) पृ० ५०२७-५३० में किया है। -संपादक। (Santiniketana, Birbbum, Bengnl ) Srinagar ( Kashmir ) 26-4-23. To Nathurama Premi, Mantri, Manikachanda-Jaina Granthamala, Bombay. Dear Sir, I beg to acknowledge the receipt of one copy of Nitivakyamritam Satikam, published in the Jaina Granthamala. As I have pointed out in the third volume of my 'History of Indian Literatura,' the work is of the greatest importance both on account of its contents and especially as the date of its author is well known. Though quoting largely from the Kautilya Arthasastra, Somadeva is yet quite on original writer and treats his subject from a different point of view. The late Jaipacharya Vijaya Dharma Suri bad lent me a copy of the old edition of the book which is very rare. I often urged upon him the necessity of a new edition of this important work. I am very glad that the work is now accessible in such a handy and excelent edition, and I am very much obliged to you for sending me a copy. It is a pity that the introduction is not in English or in Sanskrit, as few Europeans read the Vernacular. Yours truly, M. WINTERNITZ. (शान्तिनिकेतन, बीरभूम बंगाल) श्रीनगर (काश्मीर ) ता. २५-४-२१ नाथूराम प्रेमी, मंत्री माणिकचन्द्र जैन ग्रंथमाला मुंबई. प्रिय महाशय, आपकी जैन ग्रंथमाळामें प्रकाशितक सटीक नीतिवाक्यामृतकी पुस्तक मुझे मिली। जैसा कि मैंने अपने 'भार तीय वास्पयका इतिहास' नामक ग्रन्थके तीसरे भागमें लिखा है, यह ग्रन्थ, अन्दरके विषय और इसके कर्ताके समयकी दृष्टि से बहुत महत्वका है । यद्यपि कौटिल्यके ग्रन्थका, इसमें अनुसरण किया गया है तथापि सोमदेवसूरि स्वतंत्र लेखक हो कर विषय प्रतिपादनकी शैली उनकी निराली ही है । जैनाचार्य विजयधर्मसूरिने इस ग्रन्थकी अत्यंत दुर्लभ्य ऐसी एक प्रति मुझे दी थी और इस महत्त्वके ग्रन्थकी दूसरी आवृत्ति प्रकट करनी चाहिए ऐसा मैंने आग्रह भी उनसे किया था । अब इस प्रन्यकी सुन्दर आकारमें उत्तम रीतीसे प्रकट की हुई इस आवृत्तिको देख कर मुझे आनंद होता है और मापने जो इसकी एक प्रति मुझे भेजी इस लिए मैं आपका बहुत ही उपकृत हूं। इसकी प्रस्तावना इंग्रेजी या संस्कृतमें नहीं लिखी गई इस लिए मुझे खेद होता है, क्यों कि देशभाषा जानने वाला युरपियन क्रचित् ही होता है। आपका, एम. विंटरनित्स् .
अंक १] कीरनामनो जन शिलालेख 1५५ कीर ग्रामनो जैन शिलालेख. [पंजाब प्रांतना कांगडा जिल्लामा कीरग्राम करीने एक स्थान छे अने त्यां शिव-वैद्यनाथनुं प्राचीन अने प्रख्यात धाम छे. ए वैद्यनाथना मंदिरमां कोई जैन प्रतिमान पाषाणतुं सिंहासन क्याएथी आवी गएलु छे जेना उपर नीचे आपेलो लेख कोतरेलो छे. ए लेख एपिग्राफिआ इंडिकाना, १ ला भागना, ११८ पान उपर डॉ. जी. बुल्हरे संक्षिप्त विवेचन साथे प्रकट करलो छे. ए विवेचन अने लेख आ प्रमाणे छे.-- संपादक ] नीचे आपेलो लेख कांगडानों कीरग्राममा आवेला शिव-वैद्यनाथना देवालयांयी मळी आवेलो छे. ए लेख जैन नागरी अक्षरोमां वे लीटिओप्नां लखेलो छ. आ लीटिओ महावारनी प्रतिमानी बेठकनी त्रण बाजुए चार मोटा अने बे नाना भांगमां हेंचाएली छे. लेख लगभग सारी स्थितिमा छे. ए दोल्हण अने आल्हण नामना बे व्यापारिओए आ प्रतिमा बनान्या विपे तथा देवभद्रसूरिए एनी प्रतिष्ठा को विषे उल्लेख करेलो के. कळी कारणानमा आ बने भाईओए महावीरनुं एक मंदिर बंधाव्यानी नोंध पण एमां करेली छे. वर्तमानमा, कारग्राममां कोई पण जना जैन मंदिरनी हयाती जणाती नथी तेथी एम लागे छे के ए मंदिर नष्ट थई गयु छ अने आ बेसणी कोईए त्यांथी उपाडी लावी शिवना देवालयमा मूकी दीधी छे. ए देवालयना अधिकारि- ओनी अजाणताने लांधे आ लेख सही सलामत रहेवा पाम्यो होय एम लागे के. मूर्ति अने मंदिर बनावनारा गुजराती होवा जोईए ; पंजाबी नहीं. प्रतिष्ठा करनार त्रि पण गुजरातना हता. कारण के दोल्हण अने आल्हण ब्रह्मक्षत्र गोत्र अगर ज्ञातिना हता के जे ज्ञात गुजरातमां वधारे छे. १८८१ ना सेन्सस रीपोर्ट प्रमाणे पंजाबमां ते ज्ञाति जणाती नथी. सूरी देवभद्रनो गुजरात साथे संबंध तेमना गुरु अभयदेवना लीधे छे. आ अभयदेवने । पल्लीय ' कहेवामां आवे छे ; अने ते जिनवल्लभ सूरिनी शिष्यसंततिमांना हता. आ जिनवल्लभ ते खरतर गच्छनी पट्टावलीमा करेला जे ४३ मां पट्टधर अने युगप्रधान पदधारी के तेज छे. तेओ एक नवो संप्रदाय जेने अहीं ' संतान' ना विशेषणथी उल्लेखेलो छे ते चलाव्या पछी वि.सं. ११६७ मां स्वर्गस्थ थया हता. तेमना पछी थएला आचार्य जिनदत्तना वखतमा खरतर गच्छनी रुद्रपल्लीय शाखानी स्थापना जिनशेखराचार्य वि. सं. १२०४ मां करी हती. तेथी आ लेखमां जणावेला देवभद्रसूरि श्वेतांबर मतना खरतर गच्छनी एक शाखाना हता. जुनी परंपरा प्रमाणे खरतर गच्छनी स्थापना गुजरातना अणहिलवाड पाटणमां थई हती. लेखनी मिति संवत एटले वि. सं. १२९६ फाल्गुण वदि ५, रविवार ' ते डॉक्टर स्क्रम (Dr. Sobram) नी गणना प्रमाणे ई. स. १२४० नी १५ जान्यूआरी बराबर थाय छे. जनरल सर कनिंगहाम जेणे आ लेख प्रथम शोधी कान्यो हतो तेमणे पोताना आर्किओलॉजिकल रीपोर्टस् (पु. ५ पान १८३) मां प लेखनी जे नकल आपीछे, ते अधूरी छे. कारण के तेमां 'क्षेत्रगोत्रो' थी 'पुत्राभ्यां अने 'प्रति- १अहीं आपेली लेखनी नकल पंजाब आर्किआलॉजिकल व्हसें तरफथी मळेली एक सारी छाप उपरथी पाडेली छ, २ जुओ-क्लॅट (klata) ई. एं, पु. 1, .पा. २४८ अने २५४.
। ५६] जैन साहित्य संशोधक (खंड ष्ठितं ' थी 'संतानीय' सूधीनी चे लीटिओ मूकी दीधेली छे. आने लीधे तेम ज केटलाक खोटा- पाठोने लीधे तेमनी नकल उपरथी भापांतर कर केवळ अशक्य छे. मूळ लेख १. ओ० संवत् १२९६ वर्षे फाल्गुण वदि ५ रवी कारणाने ब्रह्मक्षत्र गोत्रोत्पन्न व्यव० मानू पुत्राभ्यां व्य० दोल्हण आल्हणाभ्यां स्वकारित श्रीमन्महावीर देव चत्य ।। २. श्रीमहावीर जिन मूल बिंब आत्मश्रेयो []] कारितं । प्रतिष्ठितं च श्रीजिनवल्लभ सूरि- संतानीय रुद्रपल्लीय श्रीसदभयदेवसूरि शिष्यैः श्रीदेवभद्र सूरिभिः ॥ भाषांतर ॐ. (लौकिक) वर्ष १२९६ ना फाल्गुण वदि पंचमीने [दिवसे] करिग्राममा ब्रह्मक्षत्र ज्ञातिना व्यापारी मानूना बे पुत्रौ व्यापारी दोल्हण अने आल्हणे पोते बंधावेला श्रीमन्महावीर देवना मन्दिरमा श्री महावीर जिननी मुख्य प्रतिमा, पोताना कल्याणमाटे करावी. तेनी प्रतिष्ठा श्रीजिनवल्लभ सूरिना 'संतानीय' रुद्रपल्लीय श्रीमत्सूरि अभयदेवना शिष्य श्रीसूरि देवभद्रे करी: . . ३. जनरल कनिंगहाम कहेले के शिववैद्यनाथना देवालयना इतिहास साथे आ लेखनो कोई संबंध नथी. 1. पक्ति १ ली-ओं वाचवू; करिनामे ना र तथा प्रजोडेला छे ते भूल छे; ब्रह्म वाचवू झ नी उपर एक भूलथी करेल मात्र काढी नाखेल छेकदाच 'मातृपूत्राभ्या' खरो पाठ होय. कारण के त तथा न ओळखाय तेवा नथी. [पण ते बराबर नी; 'मान' शब्द ज बराबर छे. कारण के तेनी पहेलो व्य व्यवहारी शब्द पडेलो छे जे मातृाना. पाठ केता निरर्थक अने असंबद्ध थई जाय छे-संपादक.] . ..पंक्ति २ जी-श्रेयोथै नो थ जतो रयो छे; संतानीय नो ता स्पष्ट नथी. ६. वर्षेनु भाषांतर लौकिक वर्षे करूं छु, कारण के विक्रम संवत् पछी वर्षेने बदले घणीवार लौकिक वर्षे वापर वामां आवे छे. पश्चिम तथा उत्तर पश्चिम हिंदुस्थानमा विक्रम संवत्नां वर्षोंने लौकिक वर्षों कहे छ. अने शक संवत्ने शास्त्रीय वर्षों कहे छे. कारण के ते ज्योतिष विगेरे विषयोमा आवे छे. .. लेखमा जे फागुण लख्युं छे ते अर्ध प्राकृत भने अर्ध संस्कृत रूप छे. 1. मूल बिंब शब्दने भाष'तर कर्या शिवाय ज हुं रहेवा दऊं छु, तेनो खान मर्थ शो छे तेनी खबर नयी. हुं धार छ के बीजी नानी मोटी प्रतिमाओथी तेने खास भोळखावा माटे तेनु नाम आ पाडयु हशे. एनो अर्थ कदाव । मुख्य प्रतिमा' थई शके. [एज अर्थ थाय छे. सं०] ९. प्रतिष्ठितं च ए संस्कृतना नियम प्रमाणे शुद्ध नथी. पण जैन पुस्तकोमा ए घर्णा ठेकाणे जोवामां आवे छे. खरी राते प्रतिष्ठापितं च भगर प्रतिष्ठा कता. च एवो पाद जोहए, .
महाकवि पुष्पदन्त और उनका महापुराण। METHER [अपभ्रंश भाषा का एक महाकवि और महान ग्रन्थ।] (लेखक-श्रीयुत पं. नाथूरामजी प्रेमी।) भारत में अनेक शताब्दियों तक जो श्रार्य भापायें प्रचलित रही है, वे सब प्राकृत कहलाती है। प्राकृत शब्द का अर्थ है स्वाभाविक कृत्रिमता के दोष से रहित और संस्कृत का अर्थ है संस्कार की हुई मार्जित मापा । वैदिक सूक्त जिस सरल और प्रचलित भाषा में लिखे गये थे, उस भाषा को प्राकृत ही कहना चाहिए। इस श्रादि प्राकृत भाषा से जिन सव आर्य भाषाओं का विकास हुआ है, उनकी गणना दूसरी श्रेणी की प्राकृत में होती है। यह द्वितीय श्रेणी की प्राकृत अशोक के शिलालेखों में मिलती है । वौद्धशास्त्रों की प्रधान भापा पाली भी इसी दूसरी श्रेणी की प्राकृतों में से है। इस समय प्राकृत कहने से पाली की अपेक्षा उन्नत भाषा का बोध होता है। अशोफ के समय की आर्य भाषा की दो प्रधान शाखायें थीं, एक पश्चिमी प्राकृत और दूसरी पूर्वीय प्राकृत । पश्चिमी प्राकृत को सौरसेनी या सूरसेन (मथुरा) की भाषा कहते थे और पूर्वीय को मागधी या मगध की भापा। इन दोनों पूर्वीय और पश्चिमी भाषाओं के बीचों बीच एक और भाषा बोली जाती थी जो अर्ध मागधी के नाम से प्रसिद्ध थी। कहा जाता है कि भगवान् महावीर ने इसी भाषा के द्वारा अपने सिद्धांतों का प्रचार किया था। प्राचीन जैन ग्रन्थ इसी भाषा में लिखे गये थे। प्राचीन मराठी के साथ इस भाषा का बहुत ही निकट सम्बन्ध है। प्राचीन प्राकृत काव्य इसी प्राचीन मराठी में लिखे गये हैं। उक्त दूसरी श्रेणी की प्राकृत भाषाओं के बाद की भाषा अपभ्रंश कहलाती है। जो दूसरी श्रेणी की प्राकृत का पिछला और विशेष विकसित रूप है । यो अपभ्रंश का साधारण अर्थ दुषित या विकृत होता है, परन्तु मापा के सम्बन्ध में प्रयुक्त होने पर इस का अर्थ उन्नत या विकसित होता है। वर्तमान प्रचलित आर्य भाषायें जिन भाषाओं से निकली हैं, उनकी गणना अपभ्रंश में होती है । इन अपभ्रंश भापायों में भी एक समय अनेकानेक ग्रन्थ लिखे गये थे जिनमें से बहुत से इस समय भी मिलते हैं। जान पड़ता है, इन भाषाओं का साहित्य बहुत प्रौढ़ हो गया था और सर्वसाधारण में बहुत ही आदर की दृष्टि से देखा जाता था । इस साहित्य में हम उस समय की बोलचाल की भापात्रों को अस्पष्ट छाया पा सकते हैं। विक्रम की सातवीं शताब्दि तक अपभ्रंश साहित्य का पता लगा है। इसके बाद जान पड़ता है कि इस भाषा का प्रचार नहीं रहा। अपभ्रंश के पहले की प्राकृत भापाओं का प्रचार दसवीं शताब्दि के वाद नहीं रहा । उक्त अपभ्रंश भाषाओं की गणना दूसरी श्रेणी की ही प्राकृत में की जाती है । उनके बाद आधुनिक भाषाओं का काल पाता है जिन्हें हम तीसरी श्रेणी की प्राकृत में गिनते हैं । इन इमापात्रों का निदर्शन हम तेरहवीं शताब्दि के लगभग पाते हैं। अतएव मौटे हिसाब से कहा जा सकता है कि दशवीं शताब्दि से अाधुनिक आर्य भाषाओं का प्रचलन प्रारम्भ हुआ है और अपभ्रंश से ही इन सब का विकास हुआ है। संक्षेप में प्राकृत भाषाओं का यही इतिहास है।
AlwronhumAnnuMAANI... जैन साहित्य संशोधक [खण्ड २ इस लेख में हम जिस महाकवि का परिचय देना चाहते है, उसकी रचना इन्हीं अपभ्रंश भाषाओं में की एक भाषा में हुई है जिसे हम दक्षिण महाराष्ट्र की अपभ्रंश कह सकते हैं। दक्षिण की होने पर भी पाठक देखेंगे कि इसकी प्रकृति हमारी हिन्दी, गुजराती और राजस्थानी भाषाओं से कितनी मिलती जुलती हुई है। हमें पुष्पदन्त से भी पहले के अपभ्रंश साहित्य के कुछ अन्य मिले हैं जिन का परिचय हम आगे के किसी अंक में देना चाहते हैं। महाकवि पुष्पदन्त कहां के रहनेवाले थे, इसका पता नहीं लगता। उनके अन्यों में जो कुछ लिखा है उसके अनुसार हम उन्हें सब से पहले मेलाडि नगर में जो संभवतः मान्यखेट का ही दुसरा नाम है, पाते हैं। वहां वे पृथ्वी पर भ्रमण करते हुए आ पहुंचते हैं और वहीं से उनके कवि-जीवन का प्रारम्भ होता है। वे काश्यपगोत्रीय ब्राह्मण थे। उनके पिता का नाम केशव और माता का मुग्धादेवी था । एक जगह उन्होंने अपने पिता का नाम कन्हढ़ लिखा है* जो केशव के ही पर्यायवाची शब्द कृष्ण का अपभ्रंश रूप है। 'खण्ड' यह शायद उनका प्रचलित नाम था जो उनके अन्यों में जगह २ व्यवहृत हुआ है । अभिमानमेरु, काव्यरत्नाकर, कन्वीपसल्ल (काव्यपिशाच) या काव्यराक्षस, कविकुलतिलक, सरखतीनिलय आदि उनके उपनाम थे । वे शरीर से कश थे, कृष्णवर्ण थे, कुरूप थे परन्तु सदा प्रसन्नमुख रहते थे। उन्होंने आपको स्त्रीपुत्र हीन लिखा है; परन्तु संभव है यह उस समय की ही अवस्था का द्योतक हो जब वे मान्यखेटपुर में थे और अपने (उपलब्ध) ग्रन्थों की रचना कर रहे थे। इसके पहले जहां के वे रहनेवाले थे वहां शायद वे गृहस्थ रहे हों और विवाह श्रादि भी हुआ हो । यद्यपि अपने ग्रन्थों में उन्होंने अपना बहुत कुछ परिचय दिया है। परन्तु उससे यह नहीं मालूम होता है कि मान्य- ग खेट में आने के पहले उनकी क्या अवस्था थी और न यही स्पष्ट होता है कि वास्तव में उन्होंने अपनी जन्मभूमि क्यों छोड़ी थी। केवल यही मालूम होता है कि दुष्टों ने उनको अपमानित किया था और उन्हीं से संत्रस्त होकर वे भटकते भटकते बड़े ही दुर्गम और लम्बे रास्ते को तय करके मान्यखेट तक पाये थे। उनके हृदय पर कोई बड़ी ही गहरी ठेस लगी थी और इस से उन्हें सारी पृथ्वी दुर्जनों से ही भरी हुई दिखलाई देती थी। लोगों की इस दुर्जनता का और संसार की नीरसता का उन्होंने अपने ग्रन्थों की उत्थानिकानों में बार बार और बहुत अधिक वर्णन किया है। अपने समय को भी उन्होंने खूब ही कोसा है, उसे कलिमलमलिन, निर्दय, निर्गुण, दुर्नीतिपूर्ण और विपरीत विशेषण दिये हैं और कहा है कि "जो जो 'दीसई सो सो दुजणु, णिप्फलु नीरसु णं सुकड वणु ।' अर्थात् जो जो दिखते हैं वे सब दुर्जन है, सूखे हुए बन के समान निष्फल और नीरस है ऐसा जान पड़ता है कि वे किसी राजा के द्वारा सताये हुए थे और उसी के कारण उन्हें अपनी जन्मभूमि छोड़नी पड़ी थी। इसी कारण उन्होंने कई जगह राजाओं पर गहरे कटाक्ष किये हैं। उनके भ्रकुटित नेत्रों और प्रभुवचनों को देखने सुनने की अपेक्षा मर जाना अच्छा बतलाया है। वे भरत मंत्री से कहते हैं कि-"वह लक्ष्मी किस काम की जिसने टुरते हुए चँवरों की हवा से सारे गुणों को उड़ा दिया है, अभिषेक के जल से सुजनता को धो डाला है, और जो विद्वानों से विरक्त रहती है। x x इस समय लोग नीरस और निर्विशेष हो गये है, वे गुणीजनों से, द्वेप करते हैं, इसी लिए मुझे इस वन की शरण लेनी पड़ी है। * गंधव्वेकण्हडणं दणेण आयई भवाइं किय थिर मणेणा-यशोधरचरित्र ।
अक] Ahw arvww anANINNO. . - महाकवि पुष्पदन्त और उनका महापुराण जिस राजासे संत्रस्त होकर पुष्पदन्तकवि. मान्यखेट में आये वह शायद वीरराव था । आदिपुराण के प्रभाचन्द्रकृत टिप्पण में इस शब्द पर 'शूद्रक' और 'का पति ' टिप्पण दिया है और हमारी समझ में 'कांची' की जगह कावी लिपिकर्ता के दोष से लिख गया है । इस से मालूम होता है कि वीरराव कांची (काओवरम् ) का राजा होगा और शूद्रक उसका नामान्तर होगा। यह संभवतः पल्लववंशका था। श्रादिपुराणकी उत्थानिका के 'गिय सिरि विसेस' और 'पइमरणइ ' आदि दो पद्यों का अभिप्राय अच्छी तरह स्पष्ट नहीं होता है, फिर भी ऐसा भास होता है कि पुष्पदन्त का उक्त वीरराव से पहले सम्बन्ध था और उस के सम्बन्ध में उस ने कुछ काव्य रचना भी की थी। शायद इसी कारण भरतमंत्री ने पुष्पदन्त से कहा है कि वीरराव का वर्णन करने से जो मिथ्यात्व भाव उत्पन्न हुआ है, उस के प्रायश्चित्तस्वरूप यदि तुम आदिनाथ के चरित की रचना करो तो तुम्हारा परलोक सुधर जाय*। जान पड़ता है कि वारराव कोई दुष्ट और जैनधर्म का द्वेषी राजा था। पुष्पदन्त भ्रमण करते करते मान्यखेट के बाहर किसी उद्यान में पड़े हुए थे। वहां अम्मइया और इन्द्रराज नामक दो पुरुषों ने आकर उनसे कहा कि आप इस निर्जन स्थान में क्यों पड़े हुए हैं, पास ही यह बड़ा नगर है वहां चलिए । वहां शुभतुंगराजा के महामात्य भरत बड़े विद्याप्रेमी और कवियों के लिए कामधेनु हैं । भरत की लाकोत्तर प्रशंसा सुन कर पुष्पदन्त नगर में गये। वहां भरतमंत्री ने उनका बहुत ही सत्कार किया और उन्हें अपने पास रक्खा । कुछ दिनों के बाद भरत ने उन से काव्यरचना करने के लिए कहा। इस पर कवि ने कहा कि यह समय बहुत बुरा है। संसार दुर्जनों से भरा हुआ है । जहां तहां छिद्रान्वेषी ही दिखलाई देते हैं। र प्रवरसेन के सेतुबन्ध जैसे उत्कृष्ट काव्य को भी जब लोग निन्दा करते हैं, तब मुझे इस कार्य में कीर्ति कैसे मिलेगी ? इस पर भरत ने कहा कि दुर्जनों का तो यह खभाव ही है, उल्लू को सूर्य भी अच्छा नहीं लगता। उनकी श्राप को परवा न करनी चाहिए। इस के उत्तर में कवि अपनी लघुता प्रकट की और कहा कि मैं दर्शन, व्याकरण, काव्य, छन्दशास्त्र आदि के ज्ञान से कोरा हूं, ऐसी दशा में मुझ से महापुराण की रचना कैसे होगी, यह तो समुद्र को एक कुंडे में भरने जैसा अशक्य कार्य है, फिर भी श्राप के आग्रह से और जिन भक्ति वश में इस की रचना में प्रवृत्त होता हूं, मधुकर जैसा क्षुद्र प्राणी भी विशाल आकाश में भ्रमण कर सकता है। उक्त सब बातें आदिपुराण की उत्थानिका से ली गई हैं। इस के बाद उत्तरपुराण का प्रारंभ होता है। उस समय कविराज का चित्त उद्विग्न हो उठा। रचना से उन का जी उचट गया। तव एक दिन सरस्वती देवी ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिया और कहा कि अरिहंत भगवान् को नमस्कार करो। यह सुनते ही कविराज जाग उठे। उन्हों ने चारों और देखा; परन्तु कहीं कोई भी दिखलाई न दिया । बड़ा आश्चर्य हुआ। इस के बाद भरतमंत्री उन से मिले। उन्हों ने कहा कि, क्या आप सचमुच हो पागल हो गये हैं ? आप का मुख उतरा हुआ है, चित्त ठिकाने नहीं है। ग्रन्थरचना क्यों नहीं करते ? क्या मुझसे आप का कोई अपराध बन पड़ा? क्या बात है। मैं हाथ जोड़ कर प्रार्थना करता हूँ। मैं आपका चाहा हुआ सब कुछ देने के लिए तैयार हूँ। यह जीवन अस्थिर और असार है। जब आप को सरस्वती कामधेनु सिद्ध है, तब आप उसका नवरसरूप दूध क्यों नहीं दोहते? इस पर कविराज ने फिर वहीं समय x पुरानी लिपि में 'व' और 'च' लगभग एक से लिखे जाते हैं और इस कारण पीछे के लेखकों ने इन दोनों के भेद को अच्छी तरह न समझने के कारण अकसर 'च' को 'व' लिखा है। *पई मण्णिउं वण्णिउं वीर राउ, उप्पण्णउं जो मिच्छत्त भाउ । पच्छितु तासु जइ करहि अज्ज, ता घई तुज्झ परलोयकज्ज ॥
vAmiew ~yAshN... ६० जैन साहित्य संशोधक [खण्ड २ की और दुर्जनों की शिकायत की और कहा कि इस कारण मुझ से एक पद भी नहीं लिखा जाता है। अन्त में उन्हों ने कहा कि फिर भी मैं तुम्हारी प्रार्थना को नहीं टाल सकता। तुम मेरे मित्र हो और शालिवाहन तथा श्रीहर्ष से भी बढ़कर विद्वानों का श्रादर करनेवाले हो। तुमने मुझे सदा प्रसन्न रक्खा है। परन्तु जो यह कहा कि मैं सब कुछ देने के लिए तैयार हूँ, सो मैं तुम से अकात्रेम धर्मानुराग के सिवाय और कुछ भी नहीं चाहता हूँ। धन को मैं तिनके के समान गिनता हूँ। मेरा कवित्व केवल जिनचरणों की भक्ति से ही प्रस्फुटित होता है- जीविका की मुझे जरा भी परवा नहीं है । ये सब वातें कविने उत्तरपुराणकी उत्थानिका में प्रकट की हैं। पुष्पदन्त दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के अनुयायी थे; परन्तु वे अपने किसी गुरु का कहीं कोई उल्लेख नहीं करते हैं। इसका कारण यही हो सकता है कि वे गृहत्यागी साधु नहीं थे। यह भी संभव है कि पहले वे वेदानुयायो रहे हों और पीछे किसी कारण से जैनधर्म पर उनकी श्रद्धा हो गई हो, अथवा भरतमंत्री के संसर्गसे ही व जैनधर्म के उपासक बन गये हों, किसी जैन साधु या मुनिसे उनका परिचय न हुआ हो। उन्होंने अपने को जगह जगह जिनपद्मक्त, धर्मासक्त, व्रतसंयुक्त (व्रतोश्रावक ) और विगलितशंक (शंका रहित सम्यग्दृष्टी) आदि विशेषण दिये हैं, इस लिए उनके दृढ़ जैन होने में कोई सन्देह नहीं हो सकता। अपने अन्यों में जैनधर्म के तत्वों का भी उन्होंने बड़ी योग्यतासे प्रतिपादन किया है। पुष्पदन्त का खभाव एक विचित्र ही प्रकार का मालूम होता है। उनका अभिमानमेरु' नाम उनके स्वभाव को और भी विशेषता से स्पष्ट करता है। मान के सिवाय वे और किसी चीज के भूखे नहीं जान पड़ते। एक बड़े भारी राजा के वैभवशाली मन्त्री का प्राश्रय पाकर भी वे धन वैभव से अलिप्त हो रहे जान पड़ते हैं। महापुराण के अन्त में उन्होंने अपने लिये जो विशेषण दिये हैं, वे ध्यान देने योग्य है-शून्यभवन और देवकुलिकाओं में रहनेवाले, बिना घर-द्वार के, स्त्री-पुत्र रहित, नदी वापी और तालावों में स्नान करनेवाले, फटे कपड़े और वल्कल पहिननेवाले, धूलिधूसरित, जमीन पर सोनवाले तथा अपने हाथों को ही प्रोढ़ना बनानवाले, और समाधि मरण की श्राकांक्षा रखनेवाले । ये विशेपण इस अकिञ्चन महाकवि के चित्र को आँखों के सामने खड़ा कर देते हैं। सचमुच ही पुष्पदन्त अद्भुत कवि थे। वे अपने हृदय के आवेगों को रोक नहीं सकते हैं। वे जिले हृदय से चाहते हैं उसकी प्रशंसा के पुल बांध देते हैं और जिससे घृणा करते हैं उस की निन्दा करने में भी कुछ उठा नहीं रखते। अपनी प्रशंसा करने में भी उनकी कविता क. प्रवाह स्वछन्द गति से प्रवाहित हुआ है। इस प्रशंसा के औचित्य अनौचित्य का विचार भी उनका स्वेच्छाचारी कविहदय नहीं कर सका है। जो खोलकर उन्होंने अपनी प्रशंसा की है। संभव है, इस समय की दृष्टि से वह ठीक मालूम न हो; परन्तु उन को सरस और सुन्दर रचना को देखते हुए तो उस में कोई अत्युक्ति नहीं जान पड़ती। पुष्पदन्तने अपना आदिपुराण सिद्धार्थसंवत्लर में लिखना शुरू किया था जिस समय तुहिगु नाम के राजा राज्य करते थे और उन्होंने किसी चोल राजा का मस्तक काटा था। इस 'तुडिगु शब्द पर इस ग्रन्य को प्रायः सभी प्रतियों में 'कृष्णराजः' टिप्पणी दी हुई है। इसी अन्य उक्त राजा का एक जगह 'शुभतुंगदेव' और दूसरी जगह 'भैरवनरेन्द्र नाम से उल्लेख किया- गया है और दोनों जगह उक्त नामों पर टिप्पणी दे कर कृष्णराजः' लिखा है। इसी तरह यशोधर चरित्र में 'वल्लभनरेन्द्र ' नाम से उल्लेख किया है और वहां भी टिप्पणी में 'कृष्णराजः लिखा है। अर्थात् तुडिगु, शुभतुंगदेव, भैरवनरेन्द्र, वल्लमनरेन्द्र और कृष्णराज ये पाँचों एक ही mwww.ww AmrwwsnAmr.. ....now MANN. ~~ ~~ अंक १] महाकवि पुष्पदन्त और उनका महापुराण राजा के नाम हैं और इन्हीं के समय में पुष्पदन्तने अपने ग्रन्थों की रचना की है। एक जगह तुडिग को 'भुवनैकराम' विशेषण दिया है, जो कि उसकी एक विरुद थी। इसके सिवाय उसे 'राजाधिराज' लिखा है। श्रादिपुराण के २७ वे परिच्छेद के प्रारंभ में भरतमन्त्री की प्रशंसा करते हुए उसे 'भारत' (महाभारत ) की उपमा दी है:-"गुरु धर्मोद्भवपावनममिनन्दित- कृष्णार्जुनगुणोपेतं । भीमपराकमसारं भारतमिव भरत तव चरितम् ॥” इसका अभिनन्दित कृष्णार्जुनगुणोपेतम् ' विशेषण निश्चय से कृष्णराज को लक्ष्य करके ही लिखा गया है। उत्तरपुराण के अन्त में ग्रन्थ के समाप्त होने का समय संवत् ६०६, आसाढ़ सुदी १०, क्रोधनसंवत्सर लिखा है। क्रोधनसंवत्सर से ६ वर्ष पहले सिद्धार्थसंवत्सर आता है, अतः श्रादिपुराण की रचना का समय संवत् ६०० होना चाहिए । दक्षिण में शक संवत् का ही प्रचार अधिक रहा है, अतएव उक्त ६०० और ६०६ को शक संवत् हो मानना चाहिए। उत्तरपुराण की प्रशस्ति से मालूम होता है कि उक्त अन्य मान्यखेट नगर में बनाया गया था, जो इस समय मालखेड नाम से प्रसिद्ध है और निजाम के राज्य में है। उत्तरपुराण के ५० वें परिच्छेद के प्रारंभ में लिखा है:- दीनानाथधनं सदाबहुजनं प्रोत्फुल्लवल्लीवनम्, मान्याखेटपुरं पुरंदरपुरीलीलाहरं सुन्दरम् । धारानाथनरेन्द्रकोपशिखिना दग्धं विदग्धप्रियम्, क्वेदानी वसतिं करिष्यति पुनः श्री पुष्पदन्तः कविः ।। इससे मालूम होता है, शक संवत् ६०० और ६०६ के बीच में किसी समय धारानगरी के किसी राजा ने इस बड़े भारी वैमवशाली नगर को बरबाद किया था। पुष्पदन्तने अपना महापुराण पूर्वोक्त शुभतुंग या कृष्णराज के महामात्य भरत के आग्रह से और यशोधर चरित भरतमंत्री के पुत्र णरण या गएणराज के लिए कर्णाभरणस्वरूप बनाया है । गरण भी अपने पिता के सदृश वल्लभनरेन्द्र या कृष्णराज का महामात्य हो गया था । भरत और रणरण की पुष्पदन्तने बहुत ही प्रशंसा की है और उन के लोकोत्तर गुणों का वर्णन किया है। महापुराण के सब मिलाकर १०२ परिच्छेद हैं, जिन में से कोई ४० परिच्छेदों के प्रारंभ में पुष्पदन्त ने भरतमंत्री की प्रशंसा के सूचक सुन्दर संस्कृत पद्य दिये हैं जिन्हें हमने इस लेख के अन्त में उकृत कर दिया है। उन्हें पढ़ने से पाठकों को भरत की महिमा का बहुत कुछ परिचय हो जायगा। इसी तरह यशोधर चरित के चार परिच्छेदों में गएणराज की प्रशंसा के जो पद्य हैं, वे भी उध्दृत कर दिये गये हैं। उक्त प्रशस्ति-पद्यों के सिवाय पुष्पदन्तने श्रादि और उत्तरपुराण की उत्थानिकाओं में भरत- मंत्री को निःशेष कलाविज्ञानकुशल, प्राकृतकविकाव्यरसावलुब्ध, अमत्सर, सत्यप्रतिज्ञ, योद्धा परस्त्रीपराङ्मुख, त्यागभोगभावोद्गमशक्तियुक्त, कविकल्पवृक्ष आदि अनेक विशेषण दिये हैं। यशोधरचारत में भरत के पुत्र नन्न का गोत्र कौण्डिण्य बतलाया है । अतः संभवतः ये ग्राह्मण ही होंगे; परन्तु जैनधर्म के प्रगाढ़ भक्त थे । भरत के पिता का नाम ऐयण या अण्णय्या और माता का श्रीदेवी था। उन के सात पुत्र थे-१ देवल्ल, २ भोगल्ल, ३ णण्ण, ४ सोहण, ५ गुणवर्म, ६ दंगइया, और ७ संतइया । इन में तीसरा पुत्र णण्ण था, और भरत के बाद, इसी ने महामात्य या प्रधान- मंत्री के पद को सुशोभित किया था। श्रादिपुराण के ३४ वें परिच्छेद के प्रारंभ में नीच लिखा हुआ एक संस्कृत पद्य दिया है:- .
vnam Mini-rai-Amruvar.winnNAMAnnivAAN । जैन साहित्य संशोधक [खण्ड २ तीवापदिवसेषु बन्धुरहितेनैकेन तेजस्विना सन्तानक्रमतो गतापि हि रमाऽऽकृष्ठा प्रभोः सेवया। यस्याचारपदं वदन्ति कवयः सौजन्यसत्यास्पदं सोऽयं श्रीभरतो जयत्यनुपमः काले कलौ साम्प्रतम् ॥ अर्थात् बड़ी ही विपत्ति के दिनों में जिस अकेले और बन्धुरहित तेजस्वी ने सन्तानक्रम से चली गई हुई भी लक्ष्मी को अपने प्रभु की सेवा से फिर आकृष्ट कर ली और कविगण जिस के चरित्र को सौजन्य और सत्य का स्थान बतलाते हैं, वह भरत इस कलिकाल में अपनी जोड़ नहीं रखता। इससे जान पड़ता है कि भरत के पूर्वजों के हाथ से उक्त मंत्रीपद चला गया था और उसे भरत ने ही अपनी योग्यता से फिर से प्राप्त किया था। अपनी पूर्वावस्था में उन्होंने बड़ी विपत्ति भोगी थी और उस समय उन का कोई वन्धु या सहायक नहीं था । यशोधरचरित की रचना महापुराण के कितने समय बाद हुई, इस के जानने का कोई साधन नहीं है। यशोधरचरित में समय सम्बन्धी कोई उल्लेख नहीं है, परन्तु यह निश्चय है कि उस समय राजसिंहासन को वल्लभनरन्द्र या कृष्णराज हो सुशोभित करते थे । हाँ, मंत्री का पद भरत के पुत्र णगण को मिल गया था। गएण के उस समय कई पुत्र भी मौजूद थे जिन को यशोधरचरित्र के दूसरे परिच्छेद के प्रारंभ में आशीर्वाद दिया गया है। मालूम नहीं उस समय भरत जीते थे या नहीं। महापुराण जिस समय बनाया गया है उस समय पुष्पदन्त-भरत के ही घर रहते थे-" देवीसुत्र सुदणिहि तेण हउं णिलए तुहारए अच्छमि ।" ६७ वें परिच्छेद के प्रारंभ में कहा है- इह पठितमुदारं वाचकैर्गीयमानं इह लिखितमजलं लेखकैश्चारुकाव्यम् । गतवति कविमित्रे मित्रतां पुष्पदन्ते भरत तव गृहेऽस्मिन्माति विद्याविनोदः॥ इस से भी आभास मिलता है कि कविराज भरत के ही गृह में रहते थे और उन का कान्य वहीं पढ़ा, गाया और लिखा जाता था। इस के बाद यशोधरचरित जव लिखा गया है, तब वे एण्ण के ही घर रहते थे- णण्णहु मंदिरणिवसंतु संतु, अहिमाणमेरु कविपुप्फयंतु । " परन्तु इसी अन्य के अन्त में लिखा है कि गन्धर्व (नगर? ) में कन्हड़ (केशव) के पुत्र ने पूर्वभवों का वर्णन स्थिर मन होकर किया-"गंध कण्हडणंदणेण" इत्यादि । तव क्या यह गन्धर्व नगर कोई दूसरा स्थान है ? संभव है, यह मान्यखेटका हो दूसरा नाम हो अथवा कोई दूसरा स्थान हो जहाँ कुछ समय टिककर कविने ग्रन्थ का उक्त अंश लिखा हो । यह भी संभव है कि णगण के महल का ही नाम गन्धर्व या गन्धर्वभवन हो। यशोधरचरित जिस समय समाप्त हुआ है उस समय कोई बड़ा भारी दुर्भिक्ष पड़ा था जिस का वर्णन कविने इन शब्दों में किया है-* जगह जगह मनुष्यों की खोपाडेयां और ठठरियां पड़ी थीं, रंक ही रंक दिखलाई पड़ते थे। वड़ा भारी दुष्काल था। ऐसे समय में भी गएणने मुझे रहने को अच्छा स्थान, खाने को सरस आहार, पहिनने को स्वच्छ वस्त्र देकर उपकृत किया।" जान पड़ता है यह घटना उस समय की होगी। जब धारानरेशने मान्यखेट को लूट कर बरबाद कर दिया था। ऐसी सैनिक लूटों के बाद अक्सर दुर्मिक्ष पड़ा करते हैं। महापुराण में कविने नीचे लिखे ग्रन्थकारों और ग्रन्थों का उल्लेख किया है। कवि के समय निरूपण में इन नामों से बहुत सहायता मिल सकती है- अंक १] Arr.mnww महाकवि पुष्पदन्त और उनका महापुराण १ अकलंक,२ कपिल, ३ फणार या कणाद, ४ द्विज (ब्राह्मण), ५ सुगत (बौद्ध), ६ पुरन्दर (चार्वाक), ७ दन्तिल, ८ विशाख, ६ लुद्धाचार्य, १० भरत ( नाट्य शास्त्र कर्ता ), ११ पतंजलि ( व्याकरण भाष्यकार ), १२ इतिहासपुराण, १३ व्यास, १४ कालिदास, १५ चतुर्मुख खयंभू, १६ श्रीहर्ष, १७ द्रोण, १८ कवि ईशान बाण, १६ धवल जय धवल सिद्धान्त, २० रुद्रट, २१ न्यासकार, और २२ जसचिन्ह (प्राकृत लक्षण कर्ता), २३ जिनसेन, २४ वीरसेन। यशोधर चरित के अन्त में केवल एक ही ग्रन्थकार कवि 'वच्छराय' (वत्सराज) का उल्लेख किया गया है जिस के कथासूत्र के आधार पर उक्त चरित की रचना की गई है- महु दोसु ण दिजइ पुवे कइइ कइवच्छराय तं सुत्तु लइइ ।" यह तो कहने की आवश्यकता नहीं कि ये बच्छराय कोई जैनकवि ही थे । क्योंकि यशोधर की कथा जैनसाहित्य की ही चीज है। उत्तरपुराण के अन्त में महावीर भगवान के निर्वाण के बाद की गुरुपरम्परा दी गई है। उसमें लोहाचार्य तक की परम्परा त्रिलोकप्रज्ञप्ति, जंबूद्वीपप्रज्ञप्ति, गुणभद्रकृत उत्तरपुराण, इन्द्र- नन्दिकृत श्रुतावतार के ही समान है । जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति में जहां जसवाहु नाम है, वहां इसमें भद्रबाहु है । एक बड़ा भारी अन्तर यह है कि इसमें गोवर्धन के बाद भद्रबाहु का नाम ही नहीं है, साथ उसके बदले कोई दूसरा नाम भी नहीं दिया है । इतिहासज्ञों के लिए यह बात खास ध्यान देने योग्य है। सब के बाद इसमें जिनसेन और वीरसेन का नाम दिया हुआ है, जो आचारंग के एकदेश के ज्ञाता थे। जान पड़ता है ये जिनसेन संस्कृत आदिपुराण के कर्ता से भिन्न हैं। आदिपुराण (पुष्पदन्तकृत) के पांचवे परिच्छेद में नीचे लिखे देशों के नाम दिये हैं जिन्हें भगवान ऋषभदेव ने बसाया था- पल्लव, सैन्धव (सिन्ध), कोकण, कौशल, टक्क, आमीर, कीर, खस, केरल, अंग, कलिंग, बंग, जालंधर, वत्स, यवन, कुरु, गुर्जर, बर्बर, द्रविड, गौड, कर्णाट, वराडिव (वैराट?), पारस, पारियात्र, पुनाट, सूर, सोरठ, विदेह, लाड, कोंग, वैगि, मालव, पांचाल, मगध, भट्ट, भोट (भूटान), नेपाल, ओण्ट, पौण्डू, हरि, कुरु, भंगाल। पुष्पदन्त के बनाये हुए दो ग्रन्थ हमें प्राप्त हुए हैं, एक तिसहिमहापुरिसगुणालंकार जिस का दूसरा नाम महापुराण है और जिसके आदिपुराण और उत्तरपुराण ये दो भाग हैं । इसकी श्लोकसंख्या १३ हजार के लगभग है और इसमें सब मिलाकर १०२ परिच्छेद हैं । श्रादिपुराण में प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ का और उत्तरपुराण में शेष २३ तीर्थंकरों का और अन्य शलाका- पुरुषों का चरित्र है । उत्तरपुराण में पद्मपुराण और हरिवंशपुराण भी शामिल हैं और ये पृथक् रूप में भी अनेक पुस्तकभण्डारों में मिलते हैं। पुष्पदन्त का दुसरा ग्रन्थ यशोधर चरित है जिस के चार परिच्छेद हैं और छोटा है। इसमें यशोधर नामक राजा का चरित्र वर्णित है जो कोई पुराण पूरुष था। उक्त दो ग्रन्थों के सिवाय नागकुमार चरित नाम का एक ग्रन्थ है जो कारंजा (वरार) के पुस्तकभण्डार में है और जिस के प्राप्त करने के लिए हम प्रयत्न कर रहे हैं। १ यह एक जैन कवि है । इस के बनाये हुए दो ग्रन्थ हमें प्राप्त हुए हैं-'पउमचरिय ' या रामायण जिसके पिछले कुछ सर्ग उस के पुन त्रिभुवन स्वयंभुदेवन पूर्ण किए हैं और दूसरा हरिवंशपुराण जिस का उद्धार विक्रम की १६ वी शताब्दि के एक दूसरे विद्वान्ने किया है । शायद इसका आधिकांश नष्टं हो गया था। ये दोनों ग्रन्थ अपभ्रंश भाषा में ही हैं। इनका विस्तृत परिचय शीघ्र ही दिया जायगा ।
जैन साहित्य संशोधक खण्ड ३ NONannrn. हमें सब से पहले बंबई के सुप्रसिद्ध सठे सुखानन्दजी की कृपा से पुष्पदन्त का आदिपुराण देखने को मिला और उसी को देखकर हमें इस कवि का परिचय लिखने का उत्साह हुआ। सेठजी इस ग्रन्थ को फतेहपुर (जयपुर) के सरखतीभण्डार से लाये थे । उक्त सरस्वतीभण्डार का यह ८६ ३ नम्बर का ग्रन्थ है और बहुत ही शुद्ध है। उसमें कहीं कहीं टिप्पणी, भी दी है, वि० संवत्१५२८ का लिखा हुआ है उसमें प्रति करानेवाले की एक विस्तृत प्रशस्ति दी हुई . है' जो उपयोगी समझ कर इस लेख के परिशिष्ट में दे दी गई है। इस ग्रन्थ की दो प्रतियां हमें पूने के भाण्डारकर श्रोरियण्टल रिसर्च इन्स्टिटयूट में मिली जिनमें से एक वि० सं० १९२५ की लिखी हुई है और दूसरी वि० सं० १८८३ की लिखी हुई है। इस ग्रन्थ का एक टिप्पण भी हमें उक्त संस्था में मिला जो प्रभाचन्द्र कृत है और जिसकी लोकसंख्या १६५० है । इसमें प्रति लिखने का और टिप्पणकार का समय आदि नहीं दिया है। इसके बाद उक्त इन्स्टि० में इमें उत्तरपुराण की भी एक शुद्धप्रति मिल गई जो बहुत ही शुद्ध है और सं० १६३० की लिखी हुई है। इस पर यत्र तत्र टिप्पणियां भी दी हुई हैं । यशोधर चरित की एक प्रति हमे बंबई के तेरहपन्थी मन्दिर के पुस्तकभण्डार से प्राप्त हुई जो बहुत ही पुरानी है अर्थात् १३६० की लिखी हुई है और प्रायः शुद्ध है, और दुसरी भाण्डारकर इन्स्टि० से, जो वि० संवत् १६१५ की लिखी हुई है।। इस इन्स्टिटयूट में हरिवंशपुराण की भी एक बहुत हो. शुद्ध, टिप्पणयुक्त, और प्राचीन प्रति है, मिलान करने से मालूम हुआ कि यह उत्तरपुराण का ही एक अंश है। पुष्पदन्त के अन्य पूर्वकाल में बहुत प्रसिद्ध रहे हैं और इस कारण उनकी प्रतियां अनेक भण्डारों में मिलती हैं। उन पर टिप्पणपंजिकायें और टिप्पणअन्य भी लिखे गये हैं और तलाश करने से अव भी प्राप्त हो सकते हैं। जयपुर के पाटोदी के मन्दिर में उत्तरपुराण का एक टिप्पण ग्रन्थ है जिसके कर्त्ता श्रीचन्द्र (१) मुनि मालूम होते हैं और जो विक्रम संवत् १०८०में भोजदेव के राज्य में बनाया गया है। जयपुर के बाबा दुलीचन्दजी के. भण्डार में पुष्पदन्त के प्रायः सभी अन्यों की पंजिकायें हैं, प्रागरे के मोतोकटरे के मन्दिर में उत्तरपुराण की पंजिका है । प्रयत्न. करने पर भी हम इन्हें प्राप्त नहीं कर सके। इस समय हम पुष्पदन्त के नागकुमार चरित और उनके अन्यों को पंजिकानों को प्राप्त करने का प्रयत्न कर रहे हैं। उनके मिल जाने पर आगामी अंक में पुष्पदन्त का समय निर्णय किया जायगा और उनके ग्रन्थों में जिन जिन व्यक्तियों का उल्लेख हुआ है उन सब के समय पर विचार करके निश्चित किया जायगा कि वास्तव पुष्पदन्त के ग्रन्थ कब बने है। आगामी अंक में पुष्पदन्त की भाषा और उनके कवित्व को भी आलोचना करने का विचार है। परिशिष्ट में पुष्पदन्त के अन्यों के वे सब अंश दे दिये गये हैं जो महत्वपूर्ण हैं और जिनके आधार से यह लेख लिखा गया है। अधिक प्रयोजनीय अंशों का अनुवाद भी टिप्पणी में दे दिया है। इस लेख के तैयार करने में श्रीमान् मुनिमहोदय जिनावजयजी से बहुत अधिक सहायता मिली है। इसको बहुत कुछ सामग्री भी उन्हीं की कृपा से प्राप्त हुई है, अतएव में उनका बहुत ही कृतज्ञ हूं। में * नं. ११३९ आफ १८९१-९५४ नं. १०५० आफ १८८७-९१ । * नं. ५६३ आफ १८७५-७६ । ४ नं ११०६ आफ १८८४-८७ ।। नं. ११६३ आफ १८९१-९५। ११३५ आफ १८८४.८७॥ • देखा जैनमित्र, गुरुवार, आश्विन सुदी ५ वीर सं. २४४७ में श्रीयुत "पं. पन्ना- लालजी वाकलीवाल का "सं. वि. १०८० के प्रभाचन्द्र " शीर्षक लेख ।
अक १] महाकवि पुष्पदन्त और उनका महापुराण NowNovvv.xywww.www.wm परिशिष्ट नं. १ x X x (श्रादिपुराण के प्रारंभ का कुछ अंश ।) औं नमो वीतरागाय । सिद्धिवर्मणरंजणु परमनिरंजणु भुषणकमलसरणेसरु । पणवेवि विग्यविणासणु निरुवमसासणु रिसहणाहपरमेसरु॥ ध्रुवकम् ॥ तं कदमि पुराणु पसिद्धणामु, सिद्धत्यवारिसे भुवणाहिरामु । उवद्धज्जूड भूभंगभीसु, तोडेप्पिणु चोडहो तणउं सीसु॥१ भुवणेकरा, रायाहिराउ, जहिं अच्छा तुडि महाणुभाउ । तं (वं?) दीण दिण्ण घणकणयपयरु, महिपरिभमंत मेवाडिणयरु ॥२॥ अवहेरिय खलयणु गुणमहंतु, दियहेहिं पराइउ पुप्फयंतु । दुग्गर्मदाहरपंथेगरी, णव इंदु जेम देहेण खाणु ॥ ३ ॥ तरुकुसुमरेणुरंजियसमीर, मायंदगुंछ गुंदलियकीर । णंदणवणे किर वासमइ जाम, तहिं विणि पुरिस संपत्त ताम ॥ ४॥ पणवेप्पिणु तेहिं पवुत्त एव, भो खण्डै गलिय पावावलव । परिभमिरभमररवगुमुगुमंत, किं किर णिवसहि णिज्जणवणंत ॥ ५ ॥ करिसरवहिरिय दिञ्चकेवाले, पइसरहि ण किं पुरवरविसाले । तं सुणेवि भण्इं अहिमाणमेरु, परि खजउ गिरकंदरकलेग ॥ ६ ॥ एउ दुजणभउंहा वंकियाई, दसिंतु कलुसमाकियाई ॥ घत्ता। वरु णरवरु धवलच्छिह, होउ मकुच्छिह, मरउ सोणिमुहणिग्गमे। खलकुच्छियपहुवयणई, भिडियणयणई, म णिहालउ सूरुग्गमे ॥७॥ चमराणिलउडावियगुणाएं, अहिसेयधोयसुयणतणाएं । भावार्थ-इस प्रसिद्ध पुराणको मैं सिद्धार्थ संवत्सर में कहता हूं जब राजाधिराज भुवनैकराम तुढिगुने चोड राजा का सुन्दर जटायुक्त और भ्रकुटि भंगिसे भीषण मस्तक काटा ॥ १ ॥ उन्हों ने दीन दुखियों को प्रचुर धन दिया । इसी समय पृथ्वी पर भ्रमण करते हुए और खलजनों द्वारा अपमानित हुए पुष्पदन्त कवि मेवाडि या मेलाटी नगरी में आये । दुर्गम और लम्बा रास्ता तय करते करते उनका शरीर नवीन चन्द्रमा के समान क्षीण हो गया था। २-३ ॥ वे नन्दन वन नामक उद्यान में विश्राम ले रहे थे जहाँ का वायु पुष्पों के पराग से महक रहा था और आम्रवृक्षों पर शुकों के झुण्ड क्रीडा कर रहे थे। इतने में ही वहां दो पुरुष पहुंचे ॥ ४ ॥ उन्होंने प्रणाम करके कहा कि हे निष्पाप खंडकवि, आप इस निर्जन वन में जो भ्रमरों के गुंजार से गूंज रहा है क्यों ठहरे हैं ? हाथियों के शब्दों से दिशाओं को बधिर करनवाले इस विशाल नगर में क्यों नहीं चलते ? यह सुन कर आभिमानमेरु पुष्पदन्तने कहा कि गिरिकन्दराओं के जंगली फल खा लेना अच्छा, परन्तु दुर्जनों की कलपित टेढी भोंहें देखना अच्छा नहीं ॥ ५-६ ॥ उज्ज्वल नेत्रोंवाली माता की कुंख से जन्म लेते ही मर जाना अच्छा परन्तु प्रभु के दुष्ट वचन और भ्रकुटित नयन सवेरे सवेरे देखना अच्छा नहीं ॥ ७ ॥ वह लक्ष्मी किस मतलब की जिसने दुरते हुए चवरों की हवा से सारे गुणों को उड़ा दिया हो, भाभिषेक के जल १ सिद्धार्थ संवत्सरे । २ विरुदः। ३ कृष्णराजः । ४ दुर्गमदीर्घतराकाशमार्गेणागतः । ५ मन्दतेजः । ६ मिलित ७ पुष्पदन्तः। ८ हस्तिशब्दात् । ९ दिक्चवक्रवलये। .
६६ जैन साहित्य संशोधक [खण्ड २ अविवेयएं दप्पुत्तालियाएं, मोहंधयाएं मारणसीलयाएं ॥८॥ सत्तंगरजभरभारियाएं, पिउपुत्तरमणरसयारियाए। विससहजम्मएं जडरत्तियाएं, कि लच्छिए विउसविरत्तियाएं ॥१॥ संपइ जणु णीरसु णिव्विसेसु, गुणवंत जहिं सुरगुरुवि देसु । तहिं अम्हई लइ काणणु जे सरणु, अहिमाणे सहुं वरि होउ मरणु ॥ १०॥ अम्मइय इंदराएहि तेहिं, आयरिणय तं पहसिय मुहहिं । गुरुविणयपणयपणवियसिरहिं, पडिवयणु दिण्णु णायरणरोह ॥ ११ ॥ घत्ता। जणमणतिमिरोसारण, मयतरुवारण, णियकुलगयणदिवायर। भो भो केसवतगुरुह, गवसररुमुह, कन्वरयणरयणायर ॥ १२ ॥ वंभंडमंडवारूढकित्ति, श्रणवरय रइय जिणणाहभत्ति । सुहतुंगदवकमकमलभसलु, णीसेसकलाविएणाणकुसलु ॥ १३ ॥ पाययकइकन्च रसावलुदु, संपीय सरासइसुराहिदु । कमलच्छु अमच्छरु सञ्चसंधु, रणभरधुरधरणुग्घिटखंधु ॥ १४॥ सविलासविलासिणिहियय येणु, सुपसिद्ध महाकइकामधेणु । काणीणदीणपरिपूरियासु, जसपसरपसाहियदसदिसासु ॥१५॥ पररमणिपरम्मुह सुद्धसीलु, उण्णयमइ सुयोद्धरणलीलु । गुरुयणपयपणवियउत्तमंगु, सिरिदेविवगम्भुन्भवंगु ॥ १६ ॥ अण्णइयतण तणुरुहु पसत्यु, हत्यिवदाणोल्लियदीहहत्यु । महमत्तवं सधयवडु गहीरु, लक्खणलक्खकिय वरसरीरु ॥ १७ ॥ से सुजनता को धो डाला हो, अविवेक से दर्प को बढ़ाया हो, जो मोहसे अन्धी हो, मारणशील हो, सप्तांग राज्य के भार से लदी हुई हो, पिता और पुत्र दोनों में रमण करनेवाली (घृणितव्याभिचारिणी) हो, विषके साथ जिसका जन्म हुआ हो, जो जड़ ( या जल ) में रक्त हो, और जो विद्वानों से विरत रहती हो ॥ ८-९॥ इस समय लोग नीरस और विशेषतारहित हो गये हैं। अव तो गुणवन्त वृहस्मृति का भी द्वेष किया जाता है । इसी लिए मैंने इस वन का शरण लिया है। मैंने सोचा है कि इस तरह अभिमान के साथ मर जाना भी अच्छा है ॥१० 011 कवि के ये वचन सुनकर उन दो आगत नागरिकोंने-अम्मइय ( ? ) और इन्द्रराजने-प्रसन्न मुख से और बड़े विनय से मस्तक झुकाकर कहा-" हे मनुष्यों के हृदयान्धकार को दूर करनेवाले, नवीन कमलसदृश मुखवाले, मद- रहित, अपने कुलरूपी आकाश के चन्द्रमा, काव्यरत्नरत्नाकर, और केशव के पुत्र पुष्पदन्तजी, क्या आपने भरत ( मंत्री) का नाम नहीं सुना ? जिस की कीर्ति ब्रम्हाण्डरूपमण्डपपर आरूढ हो रही है, जो निरन्तर जिन भगवान की भक्ति में अनुरक्त रहता है, शुभतुंगदेव ( राजा और इस नाम का मन्दिर ) के चरणकमलों का भ्रमर है, सारी कला और विद्याओं में कुशल है, प्राकृत कवियों के काव्यरसपर लुब्ध रहता है और जिसने सरखतीरूप सुरभि का व दूध पिया है, लक्ष्मी जिसे चाहती है, जो मत्सर रहित है, सत्यप्रतिज्ञ है, युद्धों के बोझ को ढोते ढोते जिस के कन्धे घिस गये हैं, जो विला- सवती सुन्दरियों के हृदय का चुरानेवाला है, बड़े वंड़ प्रसिद्ध महाकवियों के लिए कामधेनु है, दीन दुखियाओं की आशाओं को पूरा करनेवाला है, जिस के यश ने दशों दिशाओं को जीत लिया है, जो परात्रियों की ओर कभी नजर नहीं उठाता, शुद्ध शीलयुक्त है, जिस की मति उन्नत है, लीला मात्र से जो सुजनों का उद्धार कर देता है, गुरुजनों के चरणोंपर जिस का मस्तक सदैव झुका रहता है, जो श्रीदेवी माता और अण्णय पिता का पुत्र है, जिस के हाथ हाथी के समान दान (या मदजल) से आई रहते हैं, जो महामात्यवंशका ध्वजपट है, गंभीर है, जिस का शरीर शुभ लक्षणों से युक्त है और जो दुर्व्यसनरूपी सिंहों के लिए जो अष्टापद के समान है ॥ ११-१७ ॥ माइए, उसके नेत्रों - अंक १] महाकवि पुष्पदन्त और उनका महापुराण ६७ दुश्वसण सीहसंघायसरहु, णवियाणहि किं णामेण भरहु । घत्ता। आउ जाहुंतहो मंदिरु णयणाणंदिरु सुकइकइत्तणु जाणई। सो गुणगणतत्तिल्लउ तिहुप्राणिभल्लउ णिच्छउ पई सम्माणइं॥ १८ ॥ जो विहिणा णिम्मिउं कन्वपिंडु, तं णिसुणेवि सो संचलिउ खंडु । श्रावंतु दिड्ड भरहेण केम, वाईसरिसरिकल्लोलु जेम ॥ १६ ॥ पुणु तासु तेण विरइउ पहाण, धरु प्रायहो अब्भागयविहाणु । संभासणु पियवयणेहिं रम्मु, हिम्मुक्कडंभु णं परमधम्मु ॥२०॥ तुहूं आयउ णं गुणमणि णिहाणु, तुहुं श्रायउ णं पंकयहो भाणु । पुणु एम भणेप्पिणु मणहराई, पहखीणरीणतणु सुहयराइं ॥ २१ ॥ वर राहाणविलेवणभूसणाई, दिरणई देवंगइणिवसणाई। अञ्चंत रसालई भोयणाई, गलियाई जाम कवय दिणाई ॥ २२॥ देवीसुएण कइ भाणउं ताम, भो पुप्फयंत ससिलिहियणाम । णियसिरिविसेसणिजियसुरिंदु, गिरिधार वीरु भइरव गरिंदु ॥ २३ ॥ पइ मरिणउं वरिणउं चीरराउ, उप्पण्णउं जो मिच्छत्तभाउ । पच्छिन्तु तासु जइ करहि अन्ज, ता घडइ तुज्म परलोयकज्जु ॥२४॥ तुई देउ कोवि भव्वयणबंधु, पुरुएवचरियभारस्ल खंधु । अभत्थिोसि देदेहि तेम, णिविग्धे लहु णिवा जेम ॥ २५ ॥ पत्ता। अइललियएं गंभीरएं सालंकारएं वायएं ता किं किजइ। जइ कुसुमसरवियारउ अरुहु भडारउ सन्माण थुणिजइ ॥ २६ ॥ को आनन्द देनेवाले मन्दिर में चालिए । वह सुकवियों के कवित्वका मर्मज्ञ है, गुणगणों से तृप्त है और तीनों भुवनों के लिए भला है, वह निश्चय से आप का सम्मान करेगां ॥ १८ ॥ यह सुन कर वह खण्ड कवि-जिस के शरीर को मानों विधाताने काव्य का मूर्तिमान पिण्ड ही बनाया है- उस ओर को चल दिया। उस समय भरत मंत्रीने उस को इस तरह आते देखा जिस तरह सरस्वतीरूपी सरिता तरंग ही आ रही है ॥ १९ ॥ तब उस ने अभ्यागत विधान के अनुसार उस का सव प्रकार से अतिथिसत्कार किया और बहुत ही प्रिय, दंभरहित धर्मवचनों से संभाषण किया ॥२०॥ कहा-हे गुणमणिनिधान, आप भले पधारे, कमल के लिए जैसे सूर्य प्रसन्नताका कारण है, उसी तरह आप मेरे लिए हैं । ऐसा कहकर उस के मार्ग श्रम से क्षीण सुख देनेवाले मनोहर लान, विलेपन और आभूषणों से उस का सत्कार किया और देवों के निवास करने योग्य स्थान में ठहराया। इसके बाद अत्यन्त रसाल भोजन से उसे तृप्त किया । इस तरह कुछ दिन बीत गये ॥ २१-२२ ॥ देवी सुत (भरत.) ने कहा-हे श्लाघनीय नामधारी पुष्पदन्त, भैरव नरेन्द्र ( कृष्णराज ) अपने वैभव से सुरेन्द्र को भी जीतनेवाले और पर्वत के समान धीर वीर हैं ॥ २३ ॥ तुमने कांची नरेश वीरराज शूद्रक (१) का वर्णन किया है, और उसे माना है अतः इस से जो मिथ्यात्वभाव उत्पन्न हुआ है उस का यदि तुम आज प्रायश्चित्त कर डालो तो इस से तुम्हारा परलोक का कार्य बन जाय ॥ २४ ॥ भव्यजनों के लिए बन्धुतुल्य तुम्हें पुरुदेव ( आदिनाथ ) चरित्र की रचना करनी चाहिए। मैं तुम्हारी अभ्यर्थना करता हूँ । इस काव्यरचना से तुम निर्विघ्नता पूर्वक निकृति प्राप्त करोगे ॥ २५॥ वह अतिशय ललित, गंभीर और अलंकारयुक्त रचना भी किस काम की जिस में कामबाणों को व्यर्थ करनेवाले अहेतु भटारक की सद्भावपूर्वक स्तुति न की गई हो ? ॥ २६ ॥ की एक हुए शरीर १ भइरव-कृष्णराजः । - जैन साहित्य संशोधक [खण्ड २ सियदंतपंतिधवलीकयासु, ता जंपइ घरवायाविलासु। मो देवीणंदण जयसिरह, किं किजइ कन्चु सुपुरिससीह ॥ २७ ॥ गोधजिपहिं णं घणदिहि, सुरवरचावहिं वणिग्गुणोह । मालियचित्तहिं णं जरघरेकिं, छिदण्णसिहि णं घिसहरोहिं ॥ २८ ॥ जडवाइपहिं णं गयरसेहिं, दोसायरोहिणं रक्खसोहि । आचक्खिय परपुष्ठीपलेहिं, वर कइ णिदिज्जइ हयखलेहिं ॥ २६ ॥ जो बाल बुडू संतोसहेउ,रामाहिरामु लक्खणसमेउ । जो सुम्मई कईवा विहियेसेउ, तासु वि दुजणु किं परे म होउ ॥ ३० ॥ घत्ता। णउ महु बुद्धिपरिग्गड, उ सुयसंगहु, गउ कासुवि केरउ बलु । भणु किह करमि कइत्तणु, ण लहमि कित्तणु, जगु जे पिसुणसयसंकुलु ॥ ३१ ॥ तं णिसुणेवि भरहे वुन ताव, भो कइकुलतिलय विमुक्ताव । सिमिसिमिसिमंतकिमि भरियरंधु, मेलवि कलेवरु कुणिमगंधु ॥ ३२॥ ववगयविवेउ मसिकसणकाउ, सुंदरपएसे कि रमई काउ । णिकारणु दारुणु बद्धरोसु, दुज्जणु ससहावें लेइ दोसु ॥ ३३ ॥ हयतिमिरणियरु वरकराणिहाणु, ण सुहाइ उलयहो उइउ भाणु । जइ ता किं सो मंडियसराई, उ रुचाइ वियसियसिरिहराहं ।। ३४ ॥ को गणई पिसुणु अविसहियतेउ, भुक्कउ छणयंदहो सारमे। जिण चलणकमल भत्तिल्लएण, ता पिउ कन्वपिसल्लपण ॥ ३५ ॥ घत्ता। एउ हउँ होमि घियक्खणु, रण मुणमि लक्खणु, छंदु देसि वि यामि। सब उस वाणी विलास कवि ने अपनी श्वेत दन्तावली से दिशाओं को उज्ज्वल करते कहा-हे देवीनन्दन (भरत) हे सुपुरुषसिंह, मैं काव्य क्या करूं ? श्रेष्ठ कवियों की खलजन निन्दा करते हैं । वे मेघों से घिरे हुए दिन के समान गोव- जिंत ( प्रकाशरहित और वाणीरहित ), इन्द्रधनुष के समान निर्गुण, जीर्ण गृह के समान मलिनचित्त (चित्र ), सर्प के समान छिद्रान्वेषी, गत रस के समान जडवादी, राक्षसों के समान दोषायर ( दोषाचर और दोषाकर) और पीठ पीछे निन्दा करनेवाले होते हैं । कविपति प्रवरसेन के सेतुबन्ध ( काव्य) की भी जव इन दुर्जनों ने निन्दा की तब फिर ओरों की तो वातही क्या है ? ॥ २९-३० ॥ फिर न तो मुझ में युद्धि है, न शास्त्रज्ञान है और न और किसी का बल है, तब बतलाइए कि मैं कैसे काव्य- रचना करूं ? मुझे इस कार्य में यश कैसे मिलेगा ? यह संसार दुर्जनों से भरा हुआ है ॥ ३१ ॥ यह सुनकर भरत ने कहा-हे कविकुलतिलक और हे विमुक्तताप, जिस में कीड़े बिलबिला रहे हैं और बहुत ही धूणित दुर्गन्ध निकल रही है, ऐसी लाशको छोड़ कर विवेकरहित काले कौए क्या और किसी सुन्दर स्थान में क्रीडा कर सकते हैं। अकारण ही अतिशय रुष्ट रहनेवाले दुर्जन स्वभाव से ही दोषों को ग्रहण करते हैं ॥ ३२-३३ ॥ उल्लु- ओं को यदि अन्धकार का नाश करनेवाला और तेजस्वी किरणोंवाला ऊगा हुआ सूर्य नहीं सुहाता तो क्या सरोवरों की शोभा बढानेवाले विकसित कमलों को भी न सुहायेगा ? ॥ ३४ ॥ इन खलजनों की परवा कौन करता है ? हाथी के पीछे कुत्ते भौंकते ही रहते हैं। यह सुनकर जिन भगवान के चरणकमलों की भक्ति में लीन रहनेवाले काव्यराक्षस (पुष्पदन्त ) ने कहा ॥ ३५॥ आप का यह कथन ठीक है, परन्तु न तो मैं विचक्षण हूं और न व्याकरण, छन्द आदि जानता १परपृष्ठिमांसः परोक्षवादश्च । २ वाला अंगदादयः; वृद्धा जांबवदादयः अन्यत्र श्रुतहीनाः श्रुतान्याश्च । ३ हनुमान । ४ कृतसमुद्रवंघः अन्यत्र तसेतुबंध नाम् कान्यं । ५ पानां । ६ काव्यराक्षसेन । ७ कुक्कुरः ।
अंक १] महाकवि पुष्पदन्त और उनका महापुराण जा विरइय जयवंदाहं आसिमुर्णिदहिं सा कह केम समाणमि ॥ ३६ ॥ अकलंक कविल कर्णयर मयाई, दिय सुगय पुरंदर णय सयाई । दन्तिलविलाहि लुद्धारियाई, गउ णायई भरह वियारियाई॥ ३७ ॥ णउ पीयइ पायजेलिजलाई, अइहोस पुराणई हिम्मलाई। भावाहिउ भारह-भासि वासु, कोहलु कोमलगिरु कालिदासु ॥ ३८ ॥ चउमुहुँ सयंभु सिरिहरिसु दोणु, णालोइउ का ईसाणु वाणु । एउ धाउ ण लिंगु ण गुणसमासु, णउ कम्मु करणु किरिया विसेसु ॥ ३६ ॥ एउ संधि ण कारउ पयसमत्ति, गउ जाणिय मई एकवि वित्ति। एउ वुज्झिाउ पायम सहधामु, सिद्धंतु धवल जयधवल णामु॥४०॥ पडुरुहडु जड गिरणासयारु, परियच्छिउ णालंकारसारु । पिंगल पत्थारु समुहे पडिउ, ण कयाइ महारइ चित्ते चडिउ ॥ ४१ ॥ जैसईधुसिंधु कल्लोलसितु, ण कलाकोसले हियवउ णिहित्तु । हउं वप्प निरक्खरु कुक्खिमुक्खु, परवेसे हिंडमि चम्मरुक्खु ॥ ४२ ॥ अह दुग्गमु होइ महापुराणु, कुंडएण मवई को जलविहाणु। अमरासुरगुरुयणमणहरोहि, जं आसि कयउ मुणिगणहरोहिं ॥ ४३ ॥ तं हां कहमि भत्तीभरण, किं गहे ण भमिज्जइ महुअरेण । पहु विणउ पयासिउ सज्जणाह, मुहे मसि कुच्चउ कउ दुज्जणाहं ॥ ४४ ॥ हूं, ऐसी दशा में जिस चरित को बड़े बड़े जगद्वन्द्य मुनियों ने रचा है उसे मैं कैसे बना सकूँगा ? ॥ ३६ ॥ मैं अकलंक जैन दार्शनिक ), कपिल ( सांख्यकार ), कणचर ( कणाद ) के मतों का ज्ञाता नहीं हूं, दिय (ब्राह्मण ), सुगत (बौद्ध), पुरन्दर ( चार्वाक ), आदि सैंकडों नयों को, दन्तिल, विशाख,लब्ध (प्राकृलरक्षणकर्ता ) आदि को नहीं जानता । भरत के नाट्यशास्त्र से मैं परिचित नहीं ॥ ३७ ॥ पतंजलि ( भाष्यकार ) के और इतिहास पुराणों के निर्मल जल को मैंने पिया नहीं, भावों के अधिकारी भारतभाषी व्यास, कोमलवाणीवाले कालिदास, चतुर्मुख वयंभु कवि, श्रीहर्ष, द्रोण, कवीश्वर वाण का अवलोकन नहीं किया । धातु, लिंग, गुण, समास, कर्म, करण, क्रिया- विशेषण, सन्धि, पदसमास, विभक्ति इन सब में से मैं कुछ भी नहीं जानता। आगम शब्दों के स्थानभूत धवल और जयधवल सिद्धान्त भी मैंने नहीं पढ़े ॥ ३८-४० ॥ चतुर रुद्रट का अलंकार शास्त्र भी मुझे परिज्ञात नहीं, पिंगल प्रस्तार आदि भी कभी मेरे चित्तपर नहीं चढ़े ॥ ४१ ॥ यशः चिन्हकवि के काव्यसिन्धु की कल्लोलों से मैं कभी सिक्त नहीं हुआ। कलाकौशल से भी मैं कोरा हूं । इस तरह मैं बेचारा निरक्षर मूर्ख हूं, मनुष्य के वेष में पशु के तुल्य घूमता फिरता हूं ॥ ४२ ॥ महापुराण बहुत ही दुर्गम है । समुद्र कहीं एक कूडे में भरा जा सकता है ? फिर भी जिसे सुर असुरों के मनको हरनेवाले मुनि गणधरों ने कहा था, उसे अब मैं भक्ति भाववश करता हूं। भौरा छोटा होनेपर भी क्या विशाल आकाश में भ्रमण नहीं करता है ? अब मैं सज्जनों से यही विनती करता हूं कि आप दुर्जनों के मुँह पर स्याही की ग्रूची फेर दें ।। ४४ ॥ ८ सांख्यमते मूलकारः।९ वैशेषिकमते मूलकारः । १० चार्वाकमते प्रन्थकारः। ११ पाणिनिव्याकरणभाष्यं ( पतंजलि)। १२ एकपुरुषाश्रित कथा । १३ भारतभाषी व्यास । १४ श्रीहर्ष । १५ कवि ईशानः वाणः । १६ परिज्ञातः । १७ प्राकृत - लक्षण कर्ता।
जैन साहित्य संशोधक [खण्ट २ परिशिष्ट नं. २ ( उत्तर पुराण के मंगलाचरण के बाद का अंश।) मणे जाएण कि पि श्रमणोज्जे, कस्वयह दिअहें केण विकज्जे। णिविण्णउ छिउ जाम महाकर, ता सिवणंतरि पत्त सरासह ॥१॥ भणई भडारी सहयरुश्रोई, पणवह अरुहं सहयरुमेहं । इय णिसुणेवि विउद्धउ कइवरु, सयलकलायसँग छण ससहरु ॥ २॥ दिसउ णिहालइ कि पि ण पेच्छा, जा विभियमहणियघरे अच्छइ । ताम पराइएण ण्यवंत, मउलिय, करयलेण पणवंते ॥ ३ ॥ दस दिस पसरिय जलतरुकंद, वरमहमत्तवंसणहचंदें। छणससिमंडल सपिणह वयणे, णव कुवलयदलदीहरणयणें ॥४॥ पत्ता। खल संकुले काले कुसीलमइ विणउ करेप्पिणु संवरिय । वच्चंति विसुण्णससुराणवहे जेणसरासइ उद्धरिय ॥ ५॥ इयणु देवियन्वतणुजाएं, जयदुंदुहिसरगहिरणिणाएं । जिणवरसमयणिइलेणखंभे, दुत्थियमित्त ववगयडंभे ॥६॥ परउवयोरहारणित्वहणे, विउसविहुर सयभय गिम्महणें । ते श्रोहामिय पवरक्खरहे, तेण विगैट्वें भवें भरहें ॥७॥ वोल्लाविउ कइ कन्वपिसलउ, किं तुहुँ सञ्चउ वप्पगदिल्लड । किं दीसहि विच्छायउ दुम्मणु, गंधकरणे किंण करहि णियमणु ॥ ८॥ किं किउ काई वि मई अवगैहउ, अवरु कोवि किं विरसुम्माहट। कुछ दिनों के बाद मन में कुछ युरा मालूम हुआ । जब महाकवि निर्विण्ण हो उठा तब सरखती देवी ने स्वप्न में दर्शन दिया ॥ १ ॥ भरिका सरस्वती बोली कि पुण्यवृक्ष के लिए मेघतुल्य और जन्ममरणरूप रोगों के नाशक अरहंत भगवान को प्रणाम करो। यह सुनकर तत्काल ही सब.लकलाओं के आकर कविवर जाग उठे और चारों ओर देखने लगे परन्तु कुछ भी दिखलाई नहीं दिया। उन्हें बडा विस्मय हुआ। वे अपने घर ही थे कि इतने में नयवन्त भरत मंत्री प्रणाम करते हुए वहां आये, जिन का यश दशों दिशाओं में फैल रहा है, जो श्रेष्ठ महामात्यवंशरूप आकाश के चन्द्रमा है, जिन का मुख चन्द्रमण्डल के समान और नेत्र नवीन कमलदलों के समान हैं, ॥२-४ ॥ जिन्हों ने इस खलजन संकुल काल में विनय करके शून्यपथ में जाती हुई सरस्वती को रोक रक्खा और उस का उद्धार किया ॥ ५॥ जो ऐयण पिता और देवी माता के पुत्र हैं, जो जिनशासनरूप महल के खंभ हैं, दुस्थितों के मित्र हैं, दंभरहित हैं, परोपकार के भार को उठानेवाले हैं, विद्वानों को कष्ट पहुँचानेवाले सैकडों भयों को दूर करनेवाले हैं, तेज के धाम हैं, गर्वरहित हैं और भव्य हैं ॥ ६-७॥ उन्हों ने काव्यराक्षस पुष्पदन्त से कहा कि भैया, क्या तुम सचमुच ही पागल हो गये हो ? तुम उन्मना और छायाहनिसे क्यों दिखते हो ? प्रन्थस्चना करने में तुम्हारा मन क्यों नहीं लगता? ॥ ८॥ क्या मुझ से तुम्हारा १ सरस्वती । ३ सुष्टु हतो रुजां रोगाणामोघः संघातो येन स तं । ३ पुण्यतरुमेघ । ४ गतनिद्रो जागरितः। ५आकार । ६ पश्यति । ७ भरतमंत्रिणेति सम्बन्धः श्रीपुष्पदन्तः आलापितः। ८ कन्दो मेघः । ९ महामात्र-महत्तर । १० चन्द्रेण ११ संवृता रक्षिता: सरस्वती । १२ एयण पिता देवी माता तयोः पुत्रेण भरतेन । १३ प्रासाद ! १४ मयि पुष्पदन्ते उपकार- भावनिर्वाहकेन । १५ निर्मथकेन । १६ रथेन विमानेन । १७ गर्व रहितेन । १८ कोमलालापे। १९ अपराधः । ३१ अन्यकाव्यकरणवांछ: किं त्वं अंक १ महाकवि पुष्पदन्त और उनका महापुराण ७१ भणु भणु भणियउं सयलु पडिच्छमि, हउ कयपंजलियरु श्रोहच्छमि ॥ १६ ॥ घता। अथिरेण असारे जीविएण, किं अप्पड सम्माहाह। तुहु सिद्धहे वाणीघेणुअहे, एवरसखीरु ण दोहहि ॥१०॥ तं णिसुरोप्पिणु दर विहसते मित्तमुहारविंदु जोयते । कसणसरीरें सुद्धकुरुवें, मुद्धाएविगभि संभवे ॥ ११ ॥ कासव गोत्ते केसव पुत्ते, का कुलतिलपं सरसयाँणलएं। उत्तमसत्ते, जिणापयभत्ते ॥१२॥ (१) पुप्फयंत कइणा पडिउत्तउ, भो भो भरह णिसुणि णित्तक्खुत्त । कलिमलमलिणु कालु विवरेरउँ, णिग्घिणु णिग्गुणु दुरणयगारउ ॥ १३ ॥ जो जो दीसइ सो सो दुज्जणु, णिप्फलु पीरसु णं सकउ वणु । रोउ राउणं संझ केरउ, अंत्ये पयइ मणु ण महार उ। उन्वेड जे वित्थरद पिरारिउ, एकु वि पैउ विरएवउ भारित ॥१४॥ घत्ता । दोसणे होउ त एउ भणमि चोज्ज अवरुमणे थक्कउ। जगुएउ चडाविउ चौउजिह तिह गुणेण सहवंकउ ॥ जयवि तो वि जिणगुणगणु धरणमि, कि हं पई अन्भस्थिउ अवगण्णमि। कोई अपराध बन पड़ा है अथवा और किसी रस का उमाह हुआ है अर्थात् कोई दूसरा काव्य बनाने की इच्छा हुई है ? बोलो, योलो, मैं हाथ जोड़ कर तुम्हारे सामने खडा हूँ, तुम जो कुछ कहोगे में सब कुछ देने के लिए तैयार हूं ॥९॥ इस अस्थिर और असार जीवन से तुम क्यों आप को सम्मोहित कर रहे हो ? तुम्हें वाणीरूप कामधेनु सिद्ध हो गई है, उससे तुम नवरसरूप दूध क्यों नहीं दोहते ? ॥ १० ॥ यह सुनकर मुसकराते हुए और अपने मित्र के मुखकमल की, ओर निहारते हुए कशशरीर, अतिशय कुरूप, मुग्धादेवी और केशव ब्राह्मण के पुत्र, काश्यपगोत्रीय, कविकुलतिलक, सरस्वतीनिलय, दृढवत और जिनपदभक पुष्पदन्त कवि ने प्रत्युत्तर दिया कि, हे भरत, यह निश्चय है कि इस कलिमलमलिन, निर्दय, निर्गुण और दुनौतिपूर्ण विपरीत काल में जो जो दिखते हैं सो सव दुर्जन है,सव सूखे हुए वन के समान निष्फल और नीरस हैं। राजा लोग सन्ध्याकाल की लालिमा के सदृश हैं । इस लिए मेरा मन अर्थ में अर्थात् काव्य रचना में प्रवृत्त नहीं होता है। इस समय मुझे जो उद्वेग हो गया है, उस से एक पद बनाना भी मेरे लिए भारी हो गया है ॥ ११-१४ ॥ यह जगत यदि दोष से वक्र होता तो मेरे मन में आश्चर्य नहीं होता किन्तु यह तो चढ़ाये हुए चाप (धनुष) सदृश गुण से भी वक्र होता है (धनुष की डोरी 'गुण' कहलाती है । धनुष गुण या डोरी चढ़ा ने से टेडा होता ॥१५॥ यद्यपि जगत की यह दशा है तो भी मैं जिन गुणवर्णन करूंगा। तुम मेरी अभ्यर्थना करते हो, तब मैं तुम्हारी अवगणना कैसे कर सकता हूं ? तुम त्याग भोग और भावोद्गम शक्ति से और निरन्तर की जानेवाली कविमैत्री से २१ सर्व प्रतीच्छामि । २२ एष तिष्ठामि । २३ तव सिद्धायाः । १ भरतस्य । २ सुष्ठ कुरूपेण । ३ मुग्धादेवी । ४ वाणीनिलयेन मन्दिरण । ५ सत्वेन दृढव्रतेन । ६ निश्चित । ७ विपरीतः । ८ शुष्कबनमिव जनः । ९ राजा सन्ध्यारागसदृशः। १० शब्दार्थे न प्रवर्तते । ११ एकमपि पदं रचितुं भारो महान् । १२ दोषेण सह जगत् चेत् वक्रं भवति तदाश्चर्य न, किन्तु गुणेनापि सह वकं तदाश्चर्यमाञ्चित्त । १३ चापः ।
जैन साहित्य संशोधक [खण्ड २ nanAmAnnnnnnn.muvi AN चाय भोय भाउग्गमसात्तिए, पई प्रणवरय रइय कइमित्तिए ॥ १६ ॥ राउ सालिवाहणु वि विसेसिड, पई णियजसु भुवणयले पयासिउ । कालिदासु जे खैध णीयउ, तहो सिरिहरिसहो तुहुँ जगि बायर्ड ॥ १७ ॥ तुहुं कइकामधेणु कइवच्चलु, तुई करकप्परक्खु ढोइयफल । तुहु कइ सुरवरकीलागिरिवरु, तुहूं कइ रायहंसमाणससरु ॥ १८ ॥ मद् मयालसु मयणुम्मत्तउ, लोउ असेसुवि तिठ्ठए भुत्तउ । केण वि कव्वपिसलउ मरिणी, केण वि थट्टु भणेवि अवगरिणउ ।। णिच्चमेव सम्भाव पउंजिउं, पई पुणु विणउ करे वि इउं रंजिउं ॥ १६ ॥ घत्ता। धणु तणुसमु म ण तं गहणु णेहु णिकॉरिमु इच्छमि। देवीसुश्र सुदणिहि तेण हउँ णिलए तुहारए अच्छमि ॥२०॥ महु समयागमे जोयहे ललियहे, वोल्लइ कोइल अंवयकलियाँ । काणणे चंचरीउ रुणुरुंटइ, कोरु किरण हरिसेण विसइ ॥ २१ ॥ मझ कात्तणु जिणपयमत्तिहे, पसरइ एउ णियजीवियवित्तिहे। विमलगुणाहरणंकियदेहड, एह भरह णिसुणइ पइंजेहडं ।। २२ ।। कमलगंधु धिप्पैइ सारंगें, रणउ सालूरे णीसॉरंगें। गमणलील जा कयसारंग सा किं णासिजइ सारंगे ॥ २३: ।। वढियसजण दुसणवसणे, सुका कित्ति किं हम्मैइ पिसुणे । काँमि कन्यु वमहसंहारणु, अजियपुराणु भवण्णवतारणु ॥ २४ ॥ शालिवाहन राजा से भी बढ़ गये हो और अपने यश को तुमने पृथ्वीतलपर प्रकाशित कर दिया है। इस समय जगत में तुम दूसरे श्रीहर्ष हो जिसने कविकालिदास को अपने कन्धे पर चढ़ा लिया था। ६-७ ॥ तुम कविकामधेनु, कविवत्सल, कविकल्पवृक्ष, कविनन्दनवन और कविराजहंस समान सरोवर हो ॥१८॥ ये सारे लोग मूर्ख, मदालस, और मदोन्मत्त बनें रहें, (इन से मुझे कुछ प्रयोजन नहीं ) । किसी ने मुझे काव्यराक्षस कह कर माना और किसी ने ढूँठ कह कर मेरी अवमानना की । परन्तु तुमने सदा ही सद्भावों का प्रयोग करके और विनय करके मुझे प्रसन्न रखखा है ॥ १९ ॥ मैं धन को तिन के के समान गिनता हूं और उसे नहीं चाहता हूं । हे देवीसुत श्रुतनिधि भरत, मैं अकारण प्रेम का भूखा हूं और इसी से तुम्हारे महल में रहता हूं ॥२०॥ वसन्त का आगमन होनेपर जब आमों में सुन्दर मौर आते हैं तब कोयल बोलती है और बगीचों में भौरें गुंजारव करते हैं, ऐसे समय में क्या तोते भी हर्ष से नहीं बोलने लगते हैं ? ॥ २१ ॥ जिन भगवान के चरणों की भक्ति से ही मेरी कविता स्फुरायमान होती है अपने जीवित की वृत्ति से या जीविकानिर्वाह के खयाल से नहीं। हे विमलगुणाभरणा- कित हे भरत, अब मेरी यह रचना सुन ॥ २२ ॥ कमलों की सुगन्ध भ्रमरगण ग्रहण करते हैं, निःसार शरीर मेंढक नहीं। हाथी या हंस जिस चाल से चलते हैं, उस से क्या हरिण चल सकते हैं। इसी तरह से जिन्हें सज्जनों को दोष लगाने की आदत पड गई है, ऐसे दुर्जन क्या सुकवियों की कीर्ति को मिटा सकते हैं ? अब मैं मन्मथसंहारक और भवसमुद्रतारक अजितपुराण नामक काव्य को कहता हूं। १४ त्यागः । १५ स्कन्धे धृतो येन श्रीहर्षेण । १६ तेन सदृशो महान् त्वं । १७ मूखों लोकः । १८ सद्भाव । १९ अकृत्रिम धर्मानुराग । १ वसन्तसमागमे । २ जातायाः सहकारकलिकायाः। ३ आम्र कलिकानिमित्त । ४ गृह्यते । ५ भ्रमरेण । ६ भेकेन । ७ निःसारांगण निकृष्ट शरीरेण । ८ हस्तिना हंसेन वा । ९ मृगेण । १० हन्यते । ११ कथयामि । १२ मन्मथ ।
अफ१] महाकवि पुष्पदन्त और उनका महापुराण ७३ N x x x परिशिष्ट नं. ३ ( उत्तरपुराण के अन्त का कुछ अंश ।) पिवुए वीरे गलियमयरायउ इंदभूह गणि केवलि जायउ। सो विउलइरिहे गउ णिवाणहो कम्मविमुक्को सासयठाणहो ॥१॥ ताहि वासरे उप्पएणउ केवल मुणि हे सुधम्महो पक्खालियमलु । तं णिव्वाणए जंवू णामहो पंचमु दिवणाणु हयकामहो ॥२॥ गंदि सुणदिमितु अवरुवि मुणि, गोवद्धणु चउत्थु जलहरमणि । ए पच्छए समत्य सुयपारय गिरसियमिच्छामयभवणीरय ॥ ३ ॥ पुण वि विसहु जइ पोटिल खत्तिउ जयणाउ वि सिद्धत्युह यत्तिउ । दिहिसणंकउ विजउ बुद्धिलउ, गंगु धम्मसेणु विणीसल्लउ ॥४॥ पुणु णखत्तउ पुणु जसवाल, पंडु णामु धुवसेणु गुणालउ । घत्ता । अणु कंसउ अप्पर जिणे वि थिउ पुणु सुहदु जणसुहयरु । जसभद्दु श्रखुद्दु अमंदमदणाणे णावइ गणहरु ॥५॥ भद्दबाहु लोहंकु भडारउ श्रायारांगधारि जससारउ । एयहिं सव्वु सत्यु मणे माणिउ, सेसहि एक्कु देसु परियाणि ॥६॥ निणसेणेण वारसेणेण वि जिणसासणु सेविउ मयगिरिपवि । पुषयाले णिसुणिउं सई भरहे, राएं रिखु-वहुदावियविरहे ॥ ७ ॥ एवं रायपरिवाडिए णिसुणिउं, धम्मु महामुणिणाहहिं पिसुणिउ । सेणियराउ धम्म सोयारई, पच्छिलउ वजियभयभारहं ॥ ८॥ ताहमि पच्छए बहुरसडिए, भरहे काराविड पद्धडियए। पदेवि सुणेवि आयरणेवि हयकले, पयडिउ मल्माएं इय माहियले ॥ ४ ॥ कम्मक्खयकारणु गणे दिउं, एम महापुराणु मई सिउं । पत्यु जिणिंद भग्गे श्रोणाहिउ, बुद्धिविहीणे जं मई साहिउ ॥ १०॥ तं महो खमहो तिलोयही सारी, अरुहुग्गय सुप्रएवि भडारी । चउवीस वि महुं कलुस स्वयंकर, दंतु समाहि बोहि तित्थंकर ॥ ११ ॥ घत्ता। दुई छिंदउ णंदउ भुयणयले णिरुवम करणरसायणु । आयएणउ मरणउ ताम जणु जाम चंदु तारायणु ॥१२॥ परिसउ मेहजालु वसुहारहि, माहि पिचउ वहु धरणपयारहिं। णंदउ सासणु वीर जिणेसहो, सेणिउ णिग्गउ गरयणिवासहो ॥ १३ ॥ लग्गउ ण्हवणारंभहो सुरवा, णंदउ पय सुहुं णंदउ परवइ । णंदउ देस सुहिक्खु वियंभउ, जणु मिच्छत्तु दुचित्तु णिसुंभउ ॥ १४ ॥ दुखों का नाश हो और यह कर्णरसायन काव्य पृथ्वीतल पर विस्तार लाम करे । जब तक चन्द्रमा और तारे है, तब तक लोग इसे सुनें और इसका आदर करें ॥ १२॥ पृथ्वी पर मेघ खूब बरसें और तरह तरह के धान्य पकें, वीरभगवान का शासन बढ़े, राजा श्रेणिक नरक निवास से बाहर निकले और ( तीर्थकर होने पर ) इन्द्र उस का जन्माभिषेक करें । प्रजा का सुख बढे और राजा आनन्दित हो । देश में मुाभक्ष (सुकाल) हो और लोगों का मिथ्यात्व भाव नष्ट हो ॥ १३-१४ ॥ अंगीकृत जैन साहित्य संशोधक [खण्ड २ xnn.samne. पडिवरणए पडिपालण सूरहो, होउ संति भरइहो गिरिधीरहो। होउ संति बहु गुणगुणवंतह, संतहं दयवंतहं भयवंतहं ॥ १५ ॥ होउ संति बहु गुणहि महलहो, तासु जे पुत्तहो सिरि देवलहो । एउं महापुराणु रयणुजले, जे पयडेवउ सयले धरायले ।। १६ ।। चविह दाणुजय कयचित्तहो, भरह परमसभाव सुमित्तहो । भोगलहो जयजसविच्छरियहो, होउ संति णिरु णिरुवमचरियहो ॥ १७॥ होउ संति णण्णहो गुणवंतहो, कुलवच्छल सामत्य महंतहो । णिञ्चमेव पालियजिणधम्महं, होउ संति सोहण गुणवम्महं ॥ १० ॥ होड संति सुश्रणहो दंगइयहो, होउ संति संतहो संतइयहो। जिणपयपणमण वियलियगत्वई, होउ संति पीसेसहं भव्यहं ॥ १६ ॥ घत्ता। इय दिवहो कन्वहो तणउं फलु लहुं जिणणाहु-पयच्छ । सिरि भरहहो अरुहहो जहिं गमणु पुप्फयंतु तहिं गच्छउ ।। २० ॥ सिद्धिविलासिणि मणहरदूएं, सुद्धाएवी तणुसंभूएं। णिद्धणसघणलोयसमचित्ते, सध्वजीवणिक्कारणमित्त ॥ २१ ॥ सहसलिल परिवढियसोते, केसवपुत्ते कासवगुत्ते । विमल सरासइ जणियविलासे, सुरणभवण-देवउलणिवालें ॥ २२ ॥ कलिमल पवल पडल परिचत्ते, णिग्घरेण निप्पुत्तकलत्ते। गइवावीतलाय सरण्हाणे, जर चीवरवक्कल परिहाणे ।। २३ ॥ धीरे धूलीधूसरियंगें, दूरयरुज्मिय दुजणसंगें। महि सयणयले करपंगुरणे, मग्गिय पंडियपंडियमरणे ॥ २४ ॥ मरणखेडपुरवर णिवसंते, मणे अरहंतु देउ झायंते। भरहमरणणिजे णयणिलएं, कन्वपवंधजणियजणपुलए ॥ २५ ॥ पुष्फयंतकयणा धुयपंके, जइ अहिमाणमरुणामके। पालन में शूर और पर्वत के समान धीर भरत (मंत्री) को शान्ति प्राप्त हो। गुणवन्त, दयावन्त, ज्ञानवन्त सज्ज- नों को शान्ति प्राप्त हो ॥ १५ ॥ उस के (भरत के ? ) पुत्र अतिशय गुणवन्त श्री देवल्ल को शान्ति मिले जिस ने कि इस महापुराण को रत्नोज्ज्वल धरातल पर फैलाया और जिस का चित्त चारों प्रकार के दान करने में उद्यत रहता है तथा जो भरत के लिए परम सद्भावयुक्त मित्र के तुल्य है । जिस का यश संसार में फैल रहा है और जिस का चरित्र उपमा- रहित है, उस भोगल्ल को शान्ति प्राप्त हो ।। १६-१७ ॥ कुलवत्सल, समर्थ, गुणवन्त और महन्त रणरण को शान्ति प्राप्त हो । निरन्तर जैन धर्म का पालन करनेवाले सोहण और गुणवर्म को शान्ति मिले ॥ १८॥ सुजन दंगइय और सन्त संतइय को शान्ति प्राप्त हो । जिनभगवान के चरणों में मस्तक झुकानेवाले और गर्वरहित अन्य सब भव्यजनों को भी शान्ति मिले ॥ १९ ॥ इस दिव्य काव्य की रचना का फल जिननाथ की छपा से मैं यह वाहता हूं कि श्री भरत और अहंत का गमन जहां हो पुष्पदन्त भी वहीं जावे ॥२०॥ सिद्धिरूपी विलासिनी के मनोहर दूत, मुग्धादेवी के पुत्र, निर्धनों और सपनों को बराबर समझनेवाले, सर्वजीवों के निष्कारण मित्र, शब्द सलिल से बंदा है काव्य स्रोत जिन का, केशवक पुत्र, काश्यप गोत्रीय, विमल सरस्वती से उत्पन्न विलासोंवाले, शून्य भवन और देव कुलों में रहनेवाले, कलिकाल के मत के पटलों से रहित, विना घरद्वार के, पुत्रकलत्रहीन, नदी, वापिका और सरोवर में स्नान करनेवाले, फटे कपड़े और वल्कल पहननेवाले, धूलिधूसरित अंग, दुर्जनों के संग से दूर रहनेवाले, जमीन पर सोनेवाले, अपने हाथों को ही ओढनेवाले, पण्डितपण्डितमरण की प्रतीक्षा करनेवाले, मान्यखेट पुर में निवास करनेवाले, मन में अरहन्त देवका ध्यान करनेवाले, भरतमंत्रीद्वारा सम्मानित, नीति के निलय, अपने काव्यरचनासे लोगों को पुलकित करनेवाले, पापरूप कीचड़ जिन क x अंक १ 1 महाकवि पुष्पदन्तं और उनका महापुराण कयउं कन्वु भत्तिए परमत्थे, छसय छडोत्तर कयसामत्थे ॥ २६ ॥ कोहण संवच्छरे श्रासाढए, दहमए दियहे चंदरुहरूढए । घत्ता। सिरि अरुहदो भरहहो बहुगुणहो कइकुलतिलए भासिउ । सुपहाणु पुराणु तिसहिहिमि पुरिसहं चरिउ समासिउ ॥ २७ ॥ इय महापुराणे तिसहिमहापुरिसगुणालंकारे महाभट्वभरहाणुमापिणए महाकइपुप्फयंत विरइए महाकव्वे दुइत्तरसइमो परिच्छेत्रो समत्तो ॥ १०२ ।। (प्राचीन पत्र ) संवत् १६३० वर्षे भाद्रपदमासे शुक्लपक्षे पूर्णिमातिथौ कविवासरे उत्तरा भाद्रपद नक्षत्रे नेमिनाथचैत्यालये श्रीमूलसंघे बलात्कारगणे सरस्वतीगच्छे श्रीकुंदकुंदाचार्यान्वये भ० श्रीपद्मनंदिदेवास्तत्पट्टे भ० श्रीशु [भचन्द्रदेवास्त] पट्टे भ० श्रीजिनचन्द्रदेवास्तत्प? भ० (श्रीप्रभाचन्द्रदेवास्तत्सिष्य मं० श्रीध....... स्तत्लिष्य मं० श्री ललितकीर्ति देवास्तत्शिष्य मं० श्री चंद्रकीर्ति देवास्तद............( खंडेल) वालान्वये सावडा गोत्रे सा० धेल्हा तद्भार्या घिल्हसरिस्तत्पुत्रौ द्वौ प्र० सा...............छायलदे तत्पुत्रः सा० वीरम तद्भार्या वीरमदे तत्पुत्रः सा० नाथू तद्भार्या.......... .....तीय जिनपूजापुरंदर सा० श्री धणराज तद्भाय द्वे प्र० सती सीताक...... परिशिष्ट नं०४ ( महापुराण के परिच्छेदों के प्रारंभिक पद्य ) १ आदित्योदयपर्वताद्गुरुतराचन्द्रार्कचूडामणे- राहेमाचलतः कुशेशनिलयादासेतुबन्धादृढात् । पातालतलादहीन्द्रभवनादावर्गमार्ग गता कीर्तिर्यस्य न वेत्ति भद्र भरतस्याभाति खण्डस्य च ॥ ३ बलिजीमूतदधीचिषु सर्वेषु स्वर्गतामुपगतेषु । संप्रत्यनन्यगतिकस्त्यागगुणो भरतमावसति ॥ ४ श्राश्रयवसेन भवति प्रायः सर्वस्य वस्तुनोऽतिशयः । भरताश्रयेण संप्रति पश्य गुणा मुख्यतां प्राप्ताः ॥ ५ भूलीलां त्यज मुंच संगतकुचद्वंद्वादिगर्वाक्षमा, मा त्वं दर्शय चारुमध्यलतिकां तन्वंगि कामाहता। मुग्धे श्रीमदनिंद्यखंडसुकवेधुर्गुणैरुन्नतः खप्नप्येष परांगनां न भरतः शौचांवुधेवाछति ॥ ६ श्रीर्वाग्देव्यै कुप्यति वाग्देवी द्वेष्टि संततं लक्ष्यै । भरतमनुगम्य सांप्रतमनयोरात्यांतकं प्रेम ॥ ७ हंहो भद्र प्रचंडावनिपतिभवने त्यागसंख्यातकर्ता कोयं श्यामप्रधानं प्रवरकरिकराकारवाहुः प्रसन्नः। धन्यः प्रालेयापिण्डोपमधवलयशो धौतधात्रीतलांत:- ख्यातो बन्धुः कवीनां भरत इति कथं पांथ जानासि नो त्वं ।। धो गया है और अभिमानमेरु जिन का चिन्ह या उपनाम है, उन 'पुष्पदन्त कवि ने यह काव्य भक्ति के वश हो कर ६.६ के क्रोधंन नामक संवत्सर में आसाढ़ के दशवें दिन सोमवार को बनाया ॥ २५-०६ ॥ कविकुलातलक में पुराणप्र- सिद्ध त्रेसष्ट पुरुषों का चरित संक्षेप से वर्णन किया ॥ २७ ॥ .
------- जैन साहित्य संशोधक [२ - माततुंघरि कुइलिनो ममैतदापृच्छतः कथय सत्यमपास्य सान्यं । त्यागी गुणी प्रियतमः सुभगोऽभिमानी किंवास्ति नास्ति सदृशो भरतार्यतुल्यः ।। एको दिल्यकथाविचारचतुरः श्रोता दुघोऽन्यः प्रिय एकः कान्यपदार्यसंगतमतिश्चान्यः परार्योयतः। एकः सत्कविल्य एक महतामाधारभूतो वुधा द्वावेतो सालि पुष्पदन्त-भरतौ मद्रे भुवा भूषणौ ॥ १. जंगं चम्मरम्म दीवो चंदावं घरती पनंको दो वि इत्या सुवर्ण । पिया णिहा णिच कम्बकीलावियोश्रो अदीपत्तं वित्तं इसरो पुष्फत्यंतो।। ११ सूर्याज गमीरिमा जलनिधेः स्यैर्य सराटेवियोः सौम्यत्वं जुलमायुधातु सुभगं त्यागं वलेः संत्रमात् । एकीकृत्य विनिर्मितोऽतिचतुरो धात्रा सखे सांप्रतं भरतार्यो गुणवान् तुलन्चयशसः खण्डः कवेलमः ॥ १४ केतातुम्मासिकंदा धवलदिसिगयोगपणदंतांकुरक्षा, लेलाही बद्धमूला जलहिजलसमुन्भूयडिंडीरवत्ता। मंडे वित्यरंती अमयरसमयं चंदवि फलंती, फुलंती तारोहं जयह गवलया तुम भरसकिन्ती ।। २५ त्यागो यस्य करोति याचकमनस्तृष्णंकुरोच्छेदनं, कीर्तिर्यस्य मनीषिणं विवनुते रोमांचव वपुः । सौजन्यं सुजनेषु यस्य ऋरते प्रेमांतर निवृति, लाध्योऽसौ मरतः प्रमुर्वत मवेऽत्कामिगिरं सूक्तिमिः ।। १६ प्रविगृहमति ययेष्टं वदिजनैः स्वैरसंगमावसति। भरतस्य वल्लभाऽसौ कीर्तिस्तदपीह चित्रतरं ।। २७ वैलिमंगकंपिततनु मरतयशः सकलपाण्डुरितकेशम् । अत्यन्वृद्धिगतमपि भुवनं यंत्रमति तश्चित्रम् ॥ १८ शशधरविम्बात्कान्तिस्तेजस्तपनागभीरतानुद्धेः । इति गुपसमुच्चयेन प्रायो मरतः कृतो विधिना । १९ श्यामत्रिनयनलमर्ग लावण्यमायमंगमादाय । मरतच्छतेन संप्रति कामः कामाकृतिमुपेतः॥ २१ यस्य जनप्रतिद्धमत्सरभरमनवमपास्य चारुणि, प्रतिइतपक्षपातदानत्रीरुसि सदा विराजते। वसति सरस्वती च सानन्दमनाविलवदनपंकजे, स जयति जयतु जगति भरइश्वर सुखमयममलमंगलः । २२ मदकरदलितकुम्नमुक्ताफलकरमरमानुरानना, मृगपनिनादरेण यस्योऽमृतमनधमनर्घमासनम् । निर्मलतरपवित्रभूषणभूपितवपुरद्वारुणा, भारतमन्न सास्तु देवी तब बडुविधमंत्रिका मुद्दे ॥ २३ अंगुलिदलकतापमसमति नखनिकुरंबकर्णिक १वही पय ५० ३ परिच्छेद के प्रारंभ में भी दिया है। २र पर ५३ परिच्छेद के प्रारंभ में भी है। इस २ परिहंद में भी है। ४ वट्ट ३९ दें परिट में भी है अंक 1 महाकवि पुष्पदन्त और उनका महापुराणं ७७ -~~~mirror A. .MAAN सुरपतिमुकुटकोटिमाणिक्यमधुव्रतचक्रचुंवितम् । विलसदणुप्रतापनिर्मलजलजन्मविलासकोमलं घटयतु मंगलानि भरतेश्वर तव जिनपादपंकजम् ॥ २४ हिमगिरिशिखरनिकरपरिपंडुरधवलियगगनमण्डलं पुलकमिवातनोति केतकतरुवरतरुकुसमसंकटे। विकसितपणिफणास सुरसरितामणिरुचिगतमधः- क्षितरिदमतिचित्रकारि भरतश्वर जगतस्तावकं यशः॥ २५ उन्नतातिमनुमात्रपात्रता भाति भद्र भरतस्य भूतले । काव्यकोतिबंटारवो गृहे यस्य पुष्पदंतो दिशागजः॥ २६ घनधवलताश्रयाणामचलस्थितिकराणां मुहुर्तीमताम् । गणनैव नास्ति लोके भरतगुणानामरीणां च ॥ २७ गुरुधर्मोद्भवपावनमभिनंदितकृष्णार्जुनगुणोपेतम् । भीमपरामक्रसारं भारतमिव भरत तव चरितं ॥ २८ मुखमलिनोदरसद्मनि गुणहृतहृदये सदैव यदसति । चित्रमिदमन भरते शुक्लापि सरस्वती रक्ता। २९ तंत्रीवाद्यैरनिर्वरकविरचितैर्गद्यपद्यैरनेकैः, कांतं कुंदावदातं दिशि दिशि च यशो यस्य गीतं सुरौधैः । काले तृष्णाकराल कलिमलकलितेप्यद्य विद्याविनोदो सोयं संसारसारः प्रियसखि भरतो भाति भूमण्डलेऽस्मिन् ॥ ३ वंभंडाहंडलखोणिमंडलुच्छालयकित्तिपसरस्स। खंडस्स समं समसीसियाए कइणो ण लजति ।। ३३ विनयांकुरसातवाहनादौ नृपचके दिवमीयुषि क्रमेण । भरत तव योन्यसजनानामुपकारो भवति प्रसक्त एवे ॥ ३४ तीवापदिवसेपु वन्धुरहितेनैकेन तेजस्विना सन्तानक्रमतो गतापि हि रमाकृष्टा प्रभोः सेवया । यस्याचारपदं वदंति कवयः सौजन्यसत्यास्पदं सोऽयं श्रीभरतो जयत्यनुपमः काले कलौ सांप्रतमें ॥ २५ इति भरतस्य जिनेश्वरसामायिकशिरोमणेर्गुणान्वक्तुम् । मातुं च वाड़ितोयं चुलुकैः कस्यास्ति सामर्थ्यम् । ५६ अत्र प्राकृतलक्षणानि सकला नीतिः स्थितिश्छन्दसा- मर्यालंकृतयो रसाश्च विविधास्तत्त्वार्थनिर्णतयः। किंचान्यद्यदिहास्ति जैनचरिते नान्यत्र तद्विद्यते देवे तो भरतेश-पुष्पदसनौ सिद्धं ययोरीडशम् ॥ ६३ बन्धुः सौजन्यवाद्धः कविखलधिपणाध्वांतविध्वंसमानु: प्रौढालंकारसारामलतनुविभवा भारती यस्य नित्यम् । वक्त्रांमोजानुरागक्रमनिहितपदा राजहंसीव भाति 'प्रोद्यद्वंभीरमावा स जयति भरते धार्मिके पुष्पदन्तः ॥ ६४ श्राखंडोइमरारुचंडमरुकं चंडीशमाश्रित्य यः कुर्वन्काममकांडतांडवविधिं डिंडीरपिंडच्छविः । हंसाडंबरमुंडमंडललसद्भागीरथीनायक १ यही पद्य २७ वें परिच्छेद में भी दिया है । २ यही पद्य ८८ वें परिच्छेद में भी है। ३ यही पद्य ४० वें परि- 'छद में भी है। ४ पूने की प्रति में यह पद्य तेरहवें परिच्छेद में भी लिखा है।
७८ जैन साहित्य संशोधक [खण्ड २ वांछन्नित्यमहं कुतूहलवती खंडस्य कीर्तिः कृतेः। ६५ आजन्म कवितारसैकधिषणा सौभाग्यभाजो गिरा दृश्यन्ते कवयो विशालसकलग्रन्थानुगा बोधतः । किंतु प्रौढानिसदगूढमतिना श्रीपुष्पदंतेन मोः साम्यं विभ्रति नैव जातु कविना शीघ्रं त्वतः प्राकृतेः॥ ६६ यस्येह कुंदामलचन्द्ररोचिः समानकीर्तिः ककुभां मुखानि । प्रसाधयंती ननु बंभ्रमीति जयत्वसौ श्रीभरतो नितान्तम् ॥ पीयूषसूतिकिरणा हरहासुहारकुंदप्रसूनसुरतीरिणिशफनागाः। क्षीरोदशेषवलसत्तमहंस चैव कि खंडकाव्यधवला भरतस्तु यूयम् ॥ ६७ इह पठितमुदारं वाचकैर्गीयमानं इह लिखितमजस्रं लेखकैश्चारुकाव्यम् । गतवति कविमित्रे मित्रतां पुष्पदन्ते भरत तव गृहेस्मिन्माति विद्याविनोदः ॥ ६८ चंचञ्चंद्रमरीचिचंचुरचुरीचातुर्यचक्रोचिंता चंचंती विचटचमत्कृतिकविः प्रोदामकाव्याक्रियाम् । श्रचंती निजगत्सुकोमलतया बांधुर्यधुर्या रसैः खण्डस्यैव महाकवेः सभरतान्नित्यं कृतिः शोभते ।। ८० लोके दुर्जनसंकुले इतकुले तृष्णावसे नीरसे सालंकारवचौविवारचतुरे लालित्यलीलाधरे । भद्र देवि सरस्वति प्रियतमे काले कलौ सांप्रतं कं यास्यस्यभिमानरत्ननिलयं श्रीपुष्पदंतं विना ।। परिशिष्ट नं० ५ ( यशोधरचरित के कुछ अंश ।) तिहुयणसिरिकतहो अइसयवंतहो अरहंतो वम्महहो । पणविवि परमेटिहिं पविमलदिहिं चरणजुयलु णयसयमहहो ॥ धुवकम् । कुंडिल्लगुत्तणहदिणयरासु, वल्लहनरिंदघरमहयरासु । गुण्णहु मंदिरणिवसंतु संतु, अहिमाणमेरु कइ पुप्फयंतु ॥ चितइ हो वण नारीकहाए, पजत्तउ कय दुक्खयपहाए । कय धम्मणिवद्धी कावि कहविं, कहियाई जाइ सिव सोक्खलामि ॥ अग्गइ कइराउ पुप्फयंत सरसइणिलो। देवियहं सरूनो वण्णइ कइयणकुलतिलो इय जसहरमहारायचरिए महामहल णण्णकण्णाहरणे महाकइ पुप्फयंतविरइए महाकव्वे जसहररायपबंधो नाम पढमो परिच्छेओ सम्मत्तो ॥१॥ नित्यं यो हि पदारविन्दयुग़लं भक्त्या नमत्यर्हता- मर्थ चिंतयति त्रिवर्गकुशलो जैनश्रुतानां भृशम् । साधुभ्यश्च चतुर्विधं चतुरधीन ददाति त्रिधा स श्रीमानिह भूतले सह सुतैनन्नाभिधो नंदतात् ॥ x x x x x x. - x x x १ शोभमान । २ चपल । ३ चौर्य । ४ समूह। ५ शोभमाना । ६ विद्युतत् चमत्कृत्या कवयो यया । " अच्छंती मनोहरता। ९ यह पद्य बम्बई की प्रति में नहीं है।
अंक १] महाकषि पुष्पदन्त और उनका महापुराण Aniwomanna x x x x x 3 x x नक्षत्राधीशरोचिप्रचयशुचिबरोदामकीर्त्या निकेतो, निर्णाताशेषशास्त्रास्त्रिदशपतिनुताशेषवित्पादभक्तः। भ्राता भन्यप्रजानां सततमिह भवाम्भोधिसंसारभीर- नीतिशो निर्जिताक्षः प्रणयविनयतानंदतान्नन्ननामा ।' श्राधान्तदानपरितोषितवन्धवृन्दो दारिद्ररौद्रकरिकुंभाविभेददक्षः। श्रीपुष्पदन्तकविकाव्यरसाभितृप्तः श्रीमान्सदा जगति नंदतु नन्ननामा ॥ गंधर्व कण्हडणंदणेण पायई भवाई किय थिरमणेण । महु दोसु ण दिजइ पुव्वे कइड कइवच्छराय तं सुत्त लहई ॥ पावनिसुंभणि मुद्दाबंभाणि, उअरुप्पणिण सामलवर्णिण । कासवगुत्ति केसवपुर्ति, जिणपयभत्तिं धम्मासत्तिं ॥ वयसंजुत्तं उत्तमसत्तं, वियलियसंकं अहिमाणेक पहसियतुंडं कयणा खंडं, रंजियवुइसह कयजसहरकह ।। जो प्रायण्णइ चंगउ मण्णइ, लिइइ लिहावह पढइ पढावइ । जो मणसावइ सो नर पावइ, विहुणियघणरय सासयसंपय ॥ जणवयनीरसि दुरियमलीमसि, कयनिंदायरि दूसहि दुहयरि । पडियकवालए नरकंकालए, बहुरंकालए अइटुक्कालए ॥ पवरागारि सरसाहारिं, सन्हइ चेला वरतंबोलइ । महु उवयारिउ पुण्णिप्पेरिउ, गुणभत्तिल्ला गुण्णमहल्लउ ॥ होउ चिराउसु वरिसउ पाउसु, तिप्पउ मेइणि धणकणदाइणि । विलसउ गोविणि णभाउ कामिणि, घुम्मउ मद्दल पसरउ मंगलु ॥ सत्ति यियंभउ दुक्ख निसंभउ, धम्मुच्छाहिं सहुनरनाहिं। सुह नंदउ पय जय परमप्पय, जय जय जिणवर जय भवभयहर। विमलु सुकेवलणाणसमुजलु, मह उप्पजउ इच्छिउ दिजा। मइ अमुणंतइ कन्वु कुर्णतइ, जं हीणाहिउ काइवि साहिउ॥ पत्ता-तं माइ महासह देवि सरासइ निहयसयलसंदेह दुह । महु खमहु भडारी तिहुयणसारी पुष्फयंत जिणवयणरुह ॥ २३ ॥ इयजसहरमहारायचरिए. चउत्यो परिच्छेश्रो सम्मत्तो ॥ छ । मंगलमस्तु । संवत् १३६० वर्षे आपाढ सुदि १३ शनौ अद्येह श्रीमहाराजाधिराज श्रीसुरत्राण महमदराज्ये दुर्गमंडप पडिगनायागे वगडी नामनि प्राग्वाटवंशीय सा० भावडसंताने सा० मल्हौ पुत्र रामा मात देल्हाकेन द्वाभ्यां जसोधरपुस्तिका लेखिता। सा चिरं नंदतु ॥ छ । शुभमस्तु ।। परिशिष्ट नं०६ आदिपुराण की प्रति लिखानेवाले की प्रशस्ति ।) पणविवि रिसहेसरु विणिहयपणसरु लोयालोय पयासणु । घरमुत्तिरमणवरु जम्ममरणहरु कम्ममहारि विणासणु ॥ भेयनयणवाणससहरमिपसु संवच्छ्रेसु पच्छइ गपसु । विक्कमरायहो सुइसेयपक्ख एवमी बुहवारे सचित्तरिक्ख ॥ गोवगिरीणयरि णिउ डुंगरिई, हुउ पयपाडियसामंतविंदु। 1 यह पद्य तीसरे परिच्छंद के प्रारंभ में है । २ यह पद्य चौथे परिच्छेद के प्रारंभ का है, परन्तु बम्बई और पूने की दोनों प्रतियों में नहीं है। छपी हुई भाषावली प्रति में है । ३ यह पद्य बम्बई की प्रति में नहीं है। ४ मद-नयन-वाण-शशधर मितेसु, अर्थात् वि० संवत् १५२१ । ५ ग्वालियर-गोपाचल। ६ डूंगर सिंहराजा।
८० जैन साहित्य संशोधक [ खण्ड २ .ronm. तहो सुउ सकित्तिधवलियदियंतु सिकित्ति सिंह णिवलच्छिकंतु ॥ सिरिकसंगमंडणु मुणिंटु, गुणाकत्ति जैईसरु जए अणिंदु । जसकित्ति कित्ति मंडिय तिलोउ तहो सीसु मलयकित्ति जिअसोउ। गुणभदु भदु तहो पट्टि सूरि में जिणवयणामिउ रसिउ भूरि। सिरि जइसवाल-कुलणह ससंकु, सिरि उल्हासाहु सया असंकु ॥ तहो जाया गयसिरि णामधेय, तहि सुत्र हंसराजु दया अमेय । उल्हा चउधरियहु णारि श्रगण, भावसिरिणाम णियगुणपसरण ॥ तहे पुत्त चयारि हयारिमल्ल, सिरि पउमसिंहु जिउ अतुल्ल । लच्छीहरुमाणिकु मणिसमाणु, धेना रायालयदीवमाणु ॥ पत्ता-सिरि हंसराय चउधरिय घरे विजसिरि भजा मदिया । तहे सुय गुणसायर सुहपउरेसर परिमियमयगणरहिया ॥ तहिं लल्ला रयणु सुबुद्धिधामु, मयणुजि वीरू मंडेहिहाणु । सिरि परमसिंह भन्ना सुपुज्ज, वीराणामे वरगुणसमुन्ज । तहे सुड सोनिग णामेण धीर, सूआ घरिणि एसहु जणि अभीरु । वीई वल्लहलहंगवग्ग, वीधो हिहाण सयदलकरग्ग । अरणजि धरिणी मीया अहिक्ख, सिरि परमसिंह घरे लीलसिक्ख । तहें चारिपुत्त हियपियरचित्त सिरि चित्त वाल टालू विचित्त ॥ तीयउ कुलदीवउ सो पयच्छु, तह मयणवालु चउथउ पसत्यु । माणिक माणिणिणं काममल्लि, लखणसिरि णाम रणारी मतल्लि ।। धेगा घरिणिउ णं कामअत्यु, संगहिउ जाहिं जिणधम्मवत्यु । मयणाभज्जो यति माह भीय गामेण सया सीलण सीय ।। लल्ला पिय मणसिरि पढम अरण, पट्टो मंगाभिक्खो सुवण्ण। सुन रामचंद्र कुलकमलनंदु, नंदउ चिरु इह णं वीयचंदु । नंदा पूना वे भज्जजुत्, चिरु जीवउ वोरू कमलवन्तु ।। एयाहं मभि सिरि पोमासिंह, जिण सासगणंदणवणसुसिंहु । विजुलचंचलु लच्छी सहाउ, आलोइवि हुउ जिणधम्मभाउ॥ जिण गंधु लिहाविउ लक्खु एक्कु, सावयलक्खाहारातिरिक्कु । मुणि भोयण भुंजाविय सहासु, चउवीस जिणालउ किउ सुभासु ।। घना चउधारय निमित्तु व्वु, तेणज्जिड लाइविजें अउव्व । पुरुएवजिणायदणु जि विचितु, ससिहरु सुपाडिहेर जुत् ॥ हिम्मविउ भवंबुहि जाणवत्तु, रयणत्तयजुयजुयपासजुत्त । कारिय पजिणसमइ दिट्ठ, अवलोइवि सयल सचित्तिहि । घता-णंदउ सिरिहंसराउ सुहउ, णंदउ परमसिंहु ससुर । णंदउ परिवारु लच्छिकलिउ, एंदउ लोउ गुणोह जुउ ॥ प्रायासस्स जिणस्स य जिह अंतं कोवि लहइ न गुणस्स। सिरि पोमसिंह तिह ते को पारइ गुणणिहाणस्स ॥१ सिरि पउमसिंह पउमं इह लोए जइण होतु ता पउमा । कीला कत्थ करती सुदाणपूया विणोएहि ॥२॥ ४ कीतिसिंह, डूंगरसिंह का पुत्र। ५गुणकीर्ति यतीश्वर । ६ यशः कीर्ति । ७ मलयकोर्ति यशः कीर्ति के शिष्य । ८ जिनवचनामृतरसिक । ९ गयसिरि जायाजश्री नामकी भार्या । १० ज्येष्ठ-जेठा।
प्रो. ल्युमन अने आवश्यक सूत्र هی بع जर्मनीना प्रसिद्ध प्रोफेसर ल्युमन जैन आगमोना घणा ऊंडा अभ्यासी छे. लगभग अर्धा सैका जेटला लांया समयथी तेओ जैन साहित्यनुं अवगाहन करता आल्या छे अने अनेक जैन सूत्रो- प्रन्थोना सूळ, नियुक्ति, भाष्य, टीका टिप्पणी आदिने अर्वाचीन शास्त्रीय पद्धतिए संशोधित-अनुवा- दित करीतेमणे प्रकाशमा आण्या छ.ए वधामां आवश्यकसूत्र अने तेने लगता साहित्य उपर जे तेमणे अथाग परिश्रम उठान्यो छ अने ते विपयमा जे निबन्धो आदि लख्या छे ते तो खरेखर तेमनी जैन साहित्य विपयक सूक्ष्म-प्रवीणतानी आश्चर्य-कारक साक्षी आपे छे. जर्मनीना लीप्झीक शहरमाथी प्रकट थती ओरिएन्टल सोसायटीनी ग्रन्थमाळा (Abhand. lungen fur die Kunde des Morgenlandes) मां आवश्यक-कथा (Die Avashyaka Erzahlungen) नामे एक अन्य छपाववानी तेमणे सुरुआत करी हती,जेमा आवश्यक सूत्रनी चूर्णि अने टीकामां आवती वधी कथाओ मूळ रूपे आपी, जुदी जुदी प्रतोमा मळी आवतां तेमनां पाठा- न्तरो तथा वीजा वीजा प्रन्योमा मळी आवतां रूपान्तरोनी घणी विस्तृत रूपरेखा आलेखवानी तेमनी इच्छा हती. परंतु, ते माटे जोइतां वधां साधनो-भाष्य, चूर्णि, दीका आदिनी जुदी जुदी प्रतो विगेरे-न मळी शकवाथी, पचासेक पानां छापी तेमने ए कार्य बन्ध करवु पडयुं हतुं. ते दरम्यान सने १८९४ मां जिनेवा (Geneve) मां भराएली इन्टर नेशनल ओरिएन्टल कोंग्रेसमां वांचवा माटे आवश्यकसूत्र साहित्य उपर जर्मन भापामां एक विस्तृत निबंध तेमणे तैयार कर्यों हतो जेमा आवश्यक सूत्रने लगतुं जेटलुं साहित्य मळी आवे छे तेनुं अतिसूक्ष्मरीते विवेचन कयुं हतुं.ए निवन्ध (Uebersioht uber die Avashyaka-Litteratur) ना नामे तेमणे स्वतंत्ररीते प्रकट कर्यो छे; जेना डेमी साइझना आखा कागळ जेवडा ५० उपर पानां छे. एमां प्रथम श्वेतांबर अने दिगंबर बने जैन संप्रदायोमा आवश्यकने स्थान छे ते वताव्यु छ; अने पछी . आवश्यक सूत्रनी भद्रबाहुकृत नियुक्तिमा आवता वधा विषयोनो बहु खूबी भरेलो सार आप्यो छे. ए सारमा साथे साथे नियुक्तिमा आवता विपयोने वीजां वीजां सूत्रो अने भाष्यो विगेरेमा आवता तेज विषयो साथे, कोष्टको करी करी गाथाओवार सरखान्या छे. आवश्यकचूर्णिं अने हरिभद्रकृत टीकामां परस्पर जे जे विशेष छे ते सघळा मूळ पाठो साथे समजाव्या छे. पछी जिनभद्र क्षमाश्रमणकृत विशेपावश्यक भाष्यनुं लवाणथी विवेचन कयु छे. एमां पण पहेलां, विशेपावश्यक ए शुं छे, तेनी टीका विगेरे कोणे करेली छे, ए वताव्युं छे; अने त्यार वाद नियुक्तिनी गाथाओने भाष्यना विवरण साथे विषयवार समजावी छे. अने ए उपरांत पछी आखा भाष्यनो सार आप्यो छे. एटलुं करीने पण ए जर्मनदेशीय. गीतार्थने संतोप न थयो तेथी ए निवन्धनी एक जूदी पूर्ति करी छे, जेमां विशेषावश्यक भाष्यनी शीलांका- चार्यकृत प्राचीन अने दुर्लभ्य टीकामां जे जे विशेष विशेष उल्लेखो छे ते बधा सूळरूपे गाथावार छपावी दीधा छ अने छेवटे ए टीकानी सौथी जूनी ताडपननी प्रति जे हालमा पूनाना भांडारकर ११ आप्या छे.' ८२] जैन साहित्य संशोधक [खंड २ ओरिएन्टल रीसर्च इन्स्टीट्युटमा सुरक्षित छ, तेना अतिजीर्ण शीर्णथएलां केटलाए पानाना फोटोग्राफर प्रो० ल्युमनना अथाग परिश्रम भरेला ए आखा निवन्धनो अविकल गुजराती अनुवाद कराववानो अमारो विचार चाली रह्यो छे पण कमनसीवे हजी असने ए निवन्धनी पूरी नकल मळी नथी. पूनाना भांडारकर ओ० री० इन्स्टीट्यूटमांना सर भांडारकरना पुस्तकसंग्रहमांधी फक्त एना कटेलाक प्रुफसीटस् ज अमने जोवा मळ्या छे, जे प्रोब्ल्यूमने डॉ०भांडारकरने, ए निबन्ध छपाती वस्रते, पूनानी प्रतो साये सरखावी जोवा माटे मोकल्या होय एम देखाय छे. ए संवन्धमा खुद्द प्रो० ल्युमनसाये ज असारो पत्रव्यवहार चाले छे जेनो सविस्तर खुलासो मळतां भाषांतरनी व्यवस्था करवामां आवशे. ते दरम्यान, जैन साहित्य संशोधकना वाचकोने ए असूल्य निवन्धनो काइक परिचय थाय तेटला माटे मजकुर प्रोफेसरे एनिवन्धमा आवश्यक नियुक्ति अने विशेपावश्यक भाप्यमां आवता गणधरवाद नामे विषयना उपर जे एक प्रकरण लल्यू के तेनो अनुवाद आपएि छीए, ए अनुवाद कार्यमां , मि. आर. डी. वाडेकर, वी. ए. नामना सज्जने जर्मन भाषा समजाववा माटे जे सहायता अपी छे तेनी आभार साथे अमारे अहीं खास नोंच लेवी जोईए. भारत जैन विद्यालय, पूना सुनि जिन विजय वैशाख, संवत् १९७९ -केशवलाल, प्रे. मोदी. विशेषावश्यकभाष्य अने तेनी टीकामां मळी आवतां वैदिक अने दार्शनिक अवतरणो. आवश्यक नियुक्तिना हा भागनी १ थी ६४ मी सुधीनी गाथाओमा गणधरवाद नामे विषय आवलो छ, एमां केवी रीते महावीरे ११ ब्राह्मणोना तत्वज्ञान विषयक संशयो दूर करी, शिष्यो साथे तेमने पोताना शिष्यो वनाच्या एतुं कुं अने एक ज प्रकारतुं वर्णन आपेलुं छे. ए अग्यारे ब्राह्मणो महावीरना मुख्य शिष्य होई गणधरो कहेवाय छे. शरुआतनां २ थी ७ सुधी गाधामां संक्षेपमां गणधरोनो टूक परिचय अने संशयात्मक विपयनी नोंध आपी के अने पछी ८ थी ६४ सुधी गाथामा तेनो ज विस्तार आपेलो के. गाथावार हकीकत आ प्रमाणेः- २. उन्नत अने विशालकृलमा उत्पन्न थएला अग्यारे ब्राह्मण पावानामक स्थानमां सोमिल ब्राह्मणे आरंभेला यज्ञपाटकमा आवेला हता. ३-४. तेमनां नाम- ६ मण्डिय ८ अकंपिय २ अग्गिभूइ ७ मोरियपुत्त ९ अयलमाय बाभूइ १० मेयज ४ वियत्त ११ पहास ५ सुहम्म ५. आ अग्यारेसांयी फक्त एक सुधर्म (५मा गणधर) नीज शिष्य परंपरा आगळ चाली. वाकीना कोईनो शिष्य समुदाय रहो नहीं. १ ए साता पुस्तकमा ममे पण फोटोग्राफत् पदाच्या छे. खरेतर ए प्रति एक दर्शनीय प्रति के भने एना ए फोटोग्राफरनी नकल दरेक पुस्तक भंडारमा मुकवामां आवे एवी भामारी खास भलामग छे. - १ इन्दभूइ अंक १] प्रो. ल्युमन अने आवश्यकसूत्र 8186 १ " mmm 0 ६ ठी गाथामा क्रमथी ए अग्यारेना मनमा जे जे बाबतनो संशय हतो तनी नोंध छे.अने ते आ प्रमाणे छ- जीवे' कम्मे तज्जीव भूय तारिसय बन्ध मोक्खे य । देवा नेरइया वा पुण्णे परलोग निव्वाणे'१॥ ६ (५९६) ७. पहेला पांचे गणधरोने ५००-५०० शिष्यो हता; ६-७ ने ३५०-३५० अने छेल्ला ४ ने ३००-३०० शिष्यो हता. महावीर दरेकने नाश गोत्र पूर्वक बोलावे छे अने पछी तेना मनना संशयनुं नाम लई, 'तूं वेदना पदोनो अर्थ जाणतो नथी, तेनो अर्थ आ प्रमाणे छ' एम एक ज प्रकारनो जवाब आपे छे. गाथावार गणधरोनो उल्लेख आ प्रमाणे- १७. पहेलो गणधर, जीव विषयक संशय. २५. बीजो कर्म विषयक ३१. त्रीजो तज्जीव तच्छरीर वि. ३५. चोथो पञ्च भूत वि० ३९. पांचमो सहशोत्पत्ति वि० ४३. छठ्ठो बन्ध मोक्ष वि० सातमो देवमृष्टि वि० ५१. आठमो नरकसृष्टि वि० नवमो ५९. दशमो परलोक वि० ६३. अग्यारमो निर्वाण वि० आ अग्यारे गणधरोना मनना संशयनो महावीरे जे खुलासो कयों हतो तेनो उल्लेख मूळ नियुक्तिमा करवामां आव्यो नथी. निन्हवोनी हकीकतनी पेठे ज ए हकीकत पण निर्णय वगर ज आपवामां आवेली छे. चूर्णिमां फक्त पहेला गणधरना संशयनो खुलासो करवानो थोडोक प्रयत्न करवामां आव्यो छे. पण जिनभद्र आ बाबतनो घणो उत्तम विस्तार करे छ. ए विषय माटे तेमणे ४०० उपरांत गाथाओ लखी छे अने तेना विवरणमा घणी विशेष वातो आपी छे. हरिभद्रसूरि आ विवरणमाथी घणांक अवतरणो पोतानी टीकामां ले छे अने एज अवतरणो विशेषावश्यक भाष्यमांना गणधरवादनी टीकाओना आधारभूत बने छे. वळी हरिभद्रनी टीका उपरथी किश्चिद्गणधरवाद नामनो पण एक ग्रन्थ लखायो छे, जेमा केटलोक वधारे विस्तार करवामां आवेलो होई वेदनां घणां खरां अवतरणो उपरांत छठ्ठी अने ते पछी आवती गाथामांनी हकीकतनुं पण निरूपण करेलुं छे. आनी श्लोक संख्या लगभग २५० जेटली छे अने पूनाना पुस्तकभंडारमां नं० १६, २९१'वाळी प्रतना २० थी २३ मा सुधीना पानाओमां ए लखेलो छे. दशवकालिकनी लधुवृत्तिमां पण संक्षेपथी आ विषय चर्चेलो छे. आ विषयने लगता जे केटलांक वैदिक अने दार्शनिक अवतरणो जिनभद्र आपे छ अने तेमनो जे अर्थ जैन मतांनुसार करे छे ते जाणवां जेवां छे. आमांनां घणां खरा अवतरणो तो तेमणे फक्त पुण्य विषयक " fq3 4 ८४] जैन साहित्य संशोधक पोतानी टीकामां ज आपला छे; पण ते स्वोपज्ञ टीका उपलब्ध नथी। तेथी हरिभद्र, शीलांक अने हेमचन्द्र-के जेमणे ए स्वोपज्ञ टीकानो पोतानी टीकाओमां उपयोग कयों छ-तेमणे ए अवतरणो लीधेला होवाथी आपणे ए टीकाओमाथी ज ते लेवानां छ. भाष्यना मूळमां ज जे अवतरणो आपेला छे ते खास काळा अक्षरोमां आपवामां आव्यां छे. बाकीनां कया टीकाकारे कयां अवतरणो लोधां छे ते जुदी जुदी रीते बताववामां आव्यां छे. ए अवतरणो कया प्रन्थोमांथी लेवामां आवेलां छे तेनो काई उल्लेख टीकाकारो करता नथी. तेथी कवना उपनिपद्वाक्यकोप अने वीजा तेवां वेदसंबंधी पुस्तको उपरथी घणांकनां स्थळो खोळी काढवानो प्रयत्न कर्यो छे. ए तो चोकस छे के जे अवतरणो जिनभद्रे लीयां छे ते घणां प्रमाणभूत छे अने तेमना वखतना ब्राह्मणो वादविवादमा ए वाक्यानी खूब चर्चा करता होवा जाइए. ब्राह्मणोनां दर्शनशास्त्रोमा परस्पर विरुद्ध विचार दर्शाव- नारा ए वाक्यो उपरथी दरेक गणधरनो संशय उभो करवामां आत्यो छे. प्रसिद्ध उपनिपदोना मूळ पाठो साथे सरखावतां ए वाक्योमा जे केटलीक भूलो नजरे पडे छे तेनुं कारण विनकाळजीपूर्वक एओनो उपयोग करवामां आवेलो होवु जोईए. ४२, ५ (१५५३ ). *( यदाहुनास्तिका) एतावानेव पुरुपो ऽयं यावानिन्द्रियगोचरः । भद्रे, वृकपद पश्य यद् वदन्ति बहुश्रुताः ॥ I पिब खाद च साधु शोभने यदतीतं वरगात्रि ताते। न हि भीरु गतं निवर्तते, समुदयमात्रमिदं कडेपरम् ॥ (भट्टोऽध्याह) ४ आ अंक ते प्रो. ल्युमने पोताना मूळ निवन्धमा विशेषावश्यकभाष्यना जे ५ विभागो पाडया छे तेना सूचक छे. एमां पहलो अंक प्रकरणने अनें वीजो गाथानंबरने सूचवे छे. आ पछी जे कौंसमा आकडा आपल छे ते काशीनी यशोविजय जैनप्रन्थमाळामा प्रकट थएल सटीक विशेषावश्यकभाष्यमांनी चालू गाथासंख्या सूचवे छे. मुद्रित ग्रंथमा १५४८ मी गाथा ज्यां पूरी धाय छे त्यां उक्त प्रो० ना वर्गीकरण प्रमाणे प्रथम विभाग पूरो थाय छ अने १५४९ मी गाथाथी बीजो विभाग शरू थाय छ ते २०२४ मी गाथाए पूरो थाय छे . ए विभागमा गणधरवाद नामनो विषय आवे छे अने तेनी कुल ४७६ गाथा छे. 8-( ) आवा गोळ कौंसमा आपेला पाठो आवश्यकसूत्रनी हारिभद्री टीकामा आपवामां आवेला नथी; तेम ज[ ] आवा चौखुणा कौंसमां आपेला पाठो विशेपावश्यक भाष्यनी शीलांकाचार्यकृत टीकामा आपेला नथी; एम समजवू. + आ अंको आवश्यकनी हारिभद्री टीकामां दरेक गणधरना माटे जे शंका-समाधानात्मक अवतरणो आपवामा आवेलां छे तेनो क्रमनिर्देश सूयवे छे. एमांनो मोटो अक्षर ए गणधरनी संख्या बतावे छे अने तेनी आगळ जे नानो अक्षर के ते अवतरणनी संख्या जणावे छे. I आ चिन्हवाळां अवतरणो फक्त आवश्यक चूर्णिमा ज मळी आवे छे. * आ बन्ने श्लोको हरिभद्रकृत पड्दर्शनसमुच्चयना छेवटना लोकायत प्रकरणमां, श्लोक ८१-८२, छे ( मुद्रित पृ० ३०१, ३०४, कलकत्ता ) त्या बीजा लोकनो प्रथम पाद ' पिव खाद च चारुलोचने' आ प्रमाणे छे. २. शीलांकाचार्यनी टीकामा 'यथाहुः'. पाठ छे. ३. शी. टी. 'एके.' ४. चर्णिमा 'एके आहुः' एटलो ज पाठ छे. ५. विशेपावश्यकनी हेमचंद्रकृत टीकानी केटलकि प्रतोमां आना ठेकाणे 'लोकोऽयं पाठ छ.६.५० शी० ह. हे. नी फेटलीक प्रतोमा ' वदन्त्यबहुश्रुताः' पण पाठ छे.
अंक १] ११३१० मो. त्युमन अने अवश्यकसूत्र [८५ विज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्याय तान्येवानुविनश्यति, न प्रेत्य सम्झास्ति। बृहदारण्यकोपनिषद् २, ४, १२.-आगळ गाया ३९अने १३७, नी टीकामा, (मुद्रित पृष्ठ ६८० तथा ७२० मां) पण आ अवतरण आवे छे. त्या भाष्यना मूळा, गाया ४०२,४१५, ४२१ (मु० पृ० ६८१) मा आ अवतरण मनुवादित है, (सुगतत्त्वाह) न रूपं मिक्षवः पुद्गल इति [ आदि ] १४ अन्ये त्वाः ६२ I वासांसि बोर्णानि यया विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा शरीराण्यपरापराणि जहाति गृहाति च पायं जीवः ॥ [ (तथा च वेदः)] न ह वै सशरीरस्य प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति, अशरीरं वाव सन्त प्रियाप्रिये न स्पृशतः। छान्दोग्योपनिषद् ८,१२,१. आगळ (गाया) ४३.१०३. २५६. ३१३ नी टीकामा (मुद्रित पृष्ठ ६८२. ७०६. ७५९. ७७७.मां) पण आ अवतरण उघडत है. त्या भाष्य-मूळ गाया-३१३१%D४६७१ (मु.प्र. ७७७. ८३१) मी मा भबतरण अनुवादित छे. ([तथा अग्निहोत्रं क्षुहुयात् स्वर्गकामः) मैयुपनिषद् ६,३६.-आगळ गाया ४३.९५, २५२. ३३४. (मु. पृ. ६८२. ७०२.७५८.७८४) नी टीकामा पुनः उत. मूळ गाया ९२% १३६२- ३९९२ =४२११, (नु.पृ. ७००. ७२०. ८०७. ८१४) मां अनुवादित. गाया ३३४. (नु. ५.७८४ ) मा सूचित । सरखावो-हरिमदनी आवश्यश्वृत्तिमा चैत्यवन्दनवृत्ति आव०५.१%, त्या शालवार्तासमुच्चय ६०५, वळी ए च्या ग्रन्यना १५७ मा लोकमा आना जेवू न एक अवतरण छे जे तैत्तिरीयसहिताना २ नानी आदिमा है. ([कपिलागमे तु प्रतिपाद्यते ] अस्ति पुरुषः) अका निर्गुणो माता (चिपः ) ७. आना ठेकाणे ह० मा 'त्या' पाठ छे. ८. भगवद्गीता २, २२ (महाभारत ६,९००) मां उत्तरार्द्ध मा प्रमाणे है:- तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही। - चूर्णिमां एक वीतुं वधारे नीचे प्रमाणेन अवतरण :- काया अन्नो मुत्तो निच्चो कत्ता तहेव भोत्ता य। तणुमेचो गुणवन्तो उड्ढ-ई वणियो जीवो ॥ सरखावो-दशवकालिक नियुक्ति गाया २२७ अने ते पछीनी. (नु. पृ० १२१) ९ सूत्रकृतांग १, १,१-१४ नी टीकामां शीलांवाचार्य 'तया चौक' करीने आ अवतरण नाचे प्रमाणे आपे है:- ८६1 जैन साहित्य संशोधक [खंड २ १७ २,३३(१५८०). [ नीलविज्ञान में उत्पन्नमात् ] सरसावो-सर्वदर्शनसंग्रह पृ. १९,७.१० (एक एव हि भूतात्मा भूते भूते प्रतिष्ठितः । एकधा वहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् ।। -ब्रह्मबिन्दु-उपनिषत् १२. यशस्तिलक चम्यू, श्वास ६, कल्प 1. (पृ.२७३ निर्णयसागर) यथाविशुद्धमाकाशं तिमिरोपप्लुतो जनः । सङ्कीर्णमिव मात्रामिभिन्नाभिरभिमन्यते ।। तयेदममलं ब्रह्म निर्विकल्पमविद्यया । कलुपत्वासवापन्नं भेदरूपं प्रकाशते ॥ "ऊर्ध्वसूलमधःशास्त्रमश्वत्थं प्राहुरव्ययस् । छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वदवित् ।।" -भगवद्गीता१५-१; (महाभारत ६-१३८३.) पुरुष एवेदं निं । सर्व यद् भूतं यच्च भाव्यं ।११ उतामृतत्वस्येशानो यदन्ननातिरोहति ।। -वाजसनेयी संहिता ३१,२:देतायतरोपनिषद् १-१५. २९१ " आ प्रमाणे अकर्ता निर्गुणो भोक्ता आत्मा सांख्यनिदर्शन । स्याद्वादमडरी, लोक १५ मां मल्लियेण भावो भोक मा प्रमाणे आप है:- असूर्तश्चेतनो भोगी नित्यः सर्वगतोऽक्रियः। अकता निर्गुणः सूक्ष्म.आत्मा कापिलदर्शने ॥ (बनारस, यशोविजय जैन अन्यमाला, पृ. ११३ पड्दर्शनसमुच्चयनो टीकामां गुणरत्ल पण आलोक उदत करे हे. (जुओ कलकत्ता आवृत्ति, पृ. १०५) वळी सरखावो-पदर्शनसमुच्चय, मूळ श्लोक ४१. १० ब्रह्मविन्दूपनिषद् (आनन्दानन मुद्रित, पृ. ३३८) मां बांजो पाद 'भूते भूते व्यवस्थितः है, अने यशस्तिलक चन्यू (निर्णयसागर-मुद्रित, पृ. २७३-उत्तर भाग ) मां बांजा सने श्रीजा पादनो पाठ-'देहे देहे व्यवस्थितः । एकवाक्या चापि-' मा प्रमाणे है. वळी, शीलांकाचायनी आचारांगसूत्र टीका (आगमोदय समिति मुद्रित, पृ. 10) अने सूत्रकृतांग सूत्र टीका (आ. स. नु. पृ. १९) मा पण आ लाक उद्धृत है. ११. उपनिषदमा ‘भव्यं' पाठ उपलब्ध थाय के. * प्रो. ल्यूमन आ शब्द उपर एक नांचे प्रमाणेनी खास नोध करे : “केटलाक प्रसिद्ध उपनिषदोनांथी जैन विद्वानोए लीवेलां ा अवतरणो संकाओ सुवी बहु ध्यान खेत्राया वगर ज लखातां आवतां हतां अने ते- यो जनोए करेली तेमनी नोंघनां स्वभाविकराते न केटलीक भूलो थएली है. उदाहरण तरीके- २' मार्नु निं त्या ७२र्नु अवतरम." आमांना प्रथम नि शब्द परनी नोटमां ते लखे है के-"वर्तमानना वैदिक वाङ्मयना हस्तलिखित ग्रन्योमां अनुस्वार भाटे जे चिन्ह वपराय छे, ते ८ मा सैका अगर तेनी पहेलो निं अक्षर जे देखतुंहशे अने यी वैदिक चिन्हयी अजाण एवान अन्यकारोए तेने एक खास शब्द नानी लीवलो लागे हे. अने यी तमगे पुल एवंदं सर्व ' ए मसल वाक्यमा निशब्द वधारी 'इदना 'द' उपर वांजो अनुस्वार बढावी दीवो होय एन जणाय .” -प्रो. ल्युमननी आ नोव अमने जरा विचारणीय लागे के. लिपिमेदना ज्ञानना अमावे एवी भूलो थवी जो के घणी भक्ति मात्र ज नयी पण सुज्ञात है. दाखला तरीके जैन लिपिमा 'ग' अक्षरने अंक १] प्रो. ल्युमन अने आवश्यकसूत्र fo २२ २,५० (१५९८). १६ यदेजति यनैजति यदूरे यद्वान्तके। यदन्तरस्य सर्वस्य यदु सवस्यास्य वाह्यतः॥१२ -वाजसनेयी संहिता ४०,५. [ तथा ] श्रुतौ [ अपि ] उक्त- अस्तमिते आदित्ये याज्ञवल्क्य चन्द्रमस्यस्तमिते शान्तेऽग्नौ शान्तायां वाचि किंज्योतिरेवायं पुरुषः ? 'आत्मज्योतिः सम्राडिति होवाच । -यू. आ. उप. ४, ३, ६, आमांना केटलांक वाक्यो ए ज उपनिषद्ना ४, ३, २ मां पण आवे छे. भाष्यनी मूळ गाथा २, ५० मा पण आ अवतरण - अनुवादित छे. १४ १५ २,९५ (१६४३). (स सर्वविद् यस्यैषा महिमा भुवि दिन्ये । ब्रह्मपुरे झेप व्योमन्यात्मा सुप्रतिष्ठितः ॥' -मुण्डकोपनिषद्, २, २,७. पूर्वाध. तमक्षरं वेदयतेऽथ यस्तु स सर्वज्ञः सर्ववित् सर्वमेवाविवेश ।। -प्रश्नोपनिषद्, ४, ११. उत्तरार्ध. एकया पूर्णाहुत्या सर्वान् कामानवाप्नोति । -सरखावो, तै० प्रा० ३, ८, १०,५. बदले घणा भागे जूना लहिआओ 'प्र' आवा रूपमा लखता. ए रूपने बराबर न समजवायी प्रो. वेवरे बर्लिन लाई- बेरीना म्येनुस्क्रिप्टस् केटलॉगमा 'समुग्गय ' जेवी शब्दोनी रोमन जोडणी: ' Samugrya' आवी खोटी करी घणो घोटाळो उभो कयों छे. एवी जरीते वीजा विद्वानोना हाथे पण भ्रम थई शके ते स्पष्ट छे. पण अमने अहिं वीजी रीते ए नोध विचारणीय लागे छ अने ते ए छे के आवश्यकटीका कर्ता हरिभद्रसूरिने वैदिक साहित्य के तेना संकेतथी अपरिचित मानी शकाय तेम नथी. कारण के ते पोते जैन दीक्षा लीघा पहेलां जातिए ब्राह्मण अने विद्याए सर्वशास्त्र निष्णात हता, ए सुविभुत छे. अने जो ते वात वाजुए मूकिए तो पण तेमणे जुदा जुद दर्शनो भने मतोना विषयमा जे अनेकानेक अपूर्व अने गहन अन्योलख्या छे; तेम ज सांख्य,वेदांत, न्याय, मीमांसा भादि वैदिक संप्रदायोनी जे खूब सूक्ष्म रीते आलोचना-प्रत्यालोचना करी छे ते जोतां स्पष्ट जणाय छे के तेओ वेद, ब्राह्मण, सूत्र, स्मृति अने उपनिषदोना धणा झंडा अभ्यासी भने ज्ञाता हता. तेथी तेमना जेवा विद्वान् आवा आवाल-प्रसिद्ध अनु स्वारना चिन्हने न समजी शके अने तेने कांई बीलु ज कल्पी ले, ए मानवु बिल्कुल अशक्य छे. हरिभद्रसूरि आ शब्दने 'मि' कहे छे अने एने वाक्यालंकार रूपे उक्त वाक्यमां वपराएलो लखे छे.- मिमिति वाक्या लंकारे - आवश्यकसूत्र, आ. स. पू. २४४ ) वर्तमान उपनिषदोमां पण पाठ-भेद अने पाठ-फेर क्या ओछ पएला छे जेथी आपणे जैन विद्वानोना आवा पाठान्तरोने एकदम भ्रमोत्पन्न कही शकिए. १२. ईशावास्योपनिषद्मा पण आ श्रुति आवेली छे अने त्यां यद्' ना ठेकाणे सर्वत्र 'तद् पाठ मळे छे.. १३. उपलब्ध उपनिषदमा वर्तमान पाठ आ प्रमाणे छ:- यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्यैप महिमा भुवि । दिव्ये ब्रह्मपुरे ह्येप व्योम्न्यात्मा प्रतिष्ठितः ।। १४. वर्तमान पाठ आ प्रमाणे- तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति । --हरिभद्रसूरिए शास्त्रवार्तासमुच्चय, ६२४, मां पण आ अवतरणो सूचवेल छे ( मुद्रित पृ० ३८५ ). १५. हरिभद्रसूरिए पोतानी ललितविस्तरा नामे चैत्यवन्दनवृत्ति ५-११ (मुद्रित पृ० ११) मां पण आ अवतरण उद्धरेल छ, -तैत्तिरीय ब्राह्मण ३, ८, १०, ५, मां आने मळंती हकीकतनो आ प्रमाणे उल्लेख आवेलो छ।- .
८८] जैन साहित्य संशोधक [संड एप वः प्रथमो यज्ञो योऽग्निष्टोमः, योऽनेनानिष्ट्वाऽन्येन यजते, स गर्तमभ्यपतत् । -तन्मयनहानाझग १६,1, २. द्वादश मासाः संवत्सरो-१ ० सं० ५, २, ५.५. अग्निरुष्यो- अग्निहिमस्य भेषजं-१७ -वा० स० सं० २३, १०० सं०७४,१८,२. २.१.१ (१६४९). ३२ सत्येन लभ्यत्तपसा झेप ब्रह्मचर्येण नित्यस् । ज्योतिर्मयो हि शुद्धो यं पश्यन्ति धीरा यतयः संयतात्मानः ॥१८ -गुड० उ० ३, १, ५, हेमचन्द्र बळी २, १३७ मी गायानी टीकामां पर आ सवतरण टांके . २, १२६ (१६७४). (एक विज्ञानसन्वतयः सत्त्वाः । [ यत् सत् तत् सर्व क्षणिकम् ])१९ ([क्षणिकाः सर्वसंस्काराः])-मा वाश्य अभयदेवरिए भग- वती सूत्रनी टीका ३०, १ मां तया मलयगिरिए नन्द्रिसूत्रनी टीकामां पण टाकलं छे. वळी शुओ षड्दर्शनसमुनयनी गुणरत्नकृत टीका १. स्वप्नोपमं वै सकलमित्येष ब्रह्मविधिरखसा विज्ञेयः । २,१४१ (१९८९).४१ धावा पृथिवी। पृथिवी देवता [आपो देवता]-शीलांकाचार्य आ अवतरण मा पछीनी गायामा मापे . २,२१४ (१७७२).५६ पुरुषो वै पुरुषत्वमहते, पशवः पशुत्वम् । -हेमचंद्र आ अवतरण यो दीक्षानतिरेचयति । सप्ताह प्रचरन्ति । सत वैशीर्षम्याः प्राणाः । प्राणा दीक्षा । प्रागैरेव प्राणां दीक्षामवदन्थे। पूर्णाहुतिमुत्तमा जुहोति । सर्व वै पूर्णाहुतिः । सर्वनेवामोति । अयो इयं वै पूर्णाहुतिः । अस्यामेव प्रतितिष्ठति । १६. माटुं वाच्य ा प्रमाणे :- द्वादश नाताः संवत्सरः संवत्सरेणैवात्या अन्नं पति यदमिचित् । १७. पूरं अवतरण आ प्रमाणे-'सूर्य एकानी चरति चन्द्रमा जायते पुनः । अमिर्हिनत्य भेषजं भूमिरावपनं महत्॥ १७. उपनिषदनां उपलब्ध पाउमाप्रमाणे - सलेन लन्यस्तपसा होष आत्मा सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यन् । अन्तः शरीरे ज्योतिर्मयो हि शुत्रो यं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः ।। १९. व्य-चन्द्रप्रमसारिकृत प्रमेयरलकोष ८,, पृ. ३० ।-महापण्डित रत्नकीर्तिकृत क्षगमगसिद्धिप्रकरण (बिलिमोथिका इन्डिका) पृ० ५४, मां आ पाच्य 'यत् सत् तत् क्षणिकम् ' या प्रमाणे छे. वळी, तुओ रत्मकृत रत्नाकरायतारिका परिच्छेद ५.(यशोविजय जैनप्रन्यमाला मुद्रित, पृ. ७६) २०. ऐ माखो लोकमा प्रमाणे हे- क्षणिकाः सर्व संस्कारा सस्थितानां कुतः दिया। भूतिया निया सव कारक सत्र चोचते। : - अंक १] प्रो. ल्युमन अने आवश्यक सूत्र. ૧૨ २, २५२-बालू गाथा १८००-मां पण आपे छे. शृगालो वै एष जायते यः सपुरीपो दह्यते । मा अवतरण वळी आगळ २, २५२-चालू गाथा १८००-- नी टीकामां आवे छे तथा मूळ भाप्य २, २५२ मां पण सूचित छे. २,२५२ ( १८००). [(अमिष्टोमेन यमराज्यमभिजयति ।)] --मैन्युपनि० ६, ३६. २, २५६ ( १८०४).६" स एप विगुणो विभुर्न बद्धयते संसरति वा, न मुच्यते मोचयति वा। -सरखावो सांख्यकारिका ६२. न वा एप बाह्यमभ्यन्तरं वा वेद । -सरखावो, बृहदारण्यकोपनिपद् ४, ३, २१. २,३१८ (१८६६ )..' स एप यज्ञायुधी यजमानोऽञ्जसा स्वर्गलोकं गच्छति । - शतपथ ब्राह्मण १२, ५, २, ८. वळी शीलांकाचार्य आगळ २,४०३- चालु गाथा१९५१-नी टीकामां पण आ अवतरण ले छे. अपाम सोमास् ,.अमृता अभूम, अगसन् ज्योतिः, आविदाम देवान् । किं नूनसस्मान् तृणवदरातिः, किमु धार्तरमृत सर्त्यस्य ॥ ऋग्वेद संहिता ८, ४८, ३, तथा अथर्वशिरा उपनि० ३. [को जानाति मायोपमान, गीर्वाणान् इन्द्र-यम-वरुण-कुबेरा- दीन् ?]-वळी २, ३३४-चार गाथा १८८२-नी टीकामां पण आ अवतरण छे. २, ३३५ (१८८३) (उक्थ-पोडारी-प्रभृति-ऋतुभिः यथाश्चति यम-सोम-सूर्य-सुर- गुरुस्वाराज्यानि जयति। -सरस्खावो, मैन्युपनिषद्, ६, ३६. अहीं मूळ भाष्यमा न आ अवतरण २१ अनुवादित छे. २२ । [(इन्द्र आगच्छ मेधातिथे मेपवृषण)] तैत्तिरीय आरण्यक १, १२,३; शतपथ ब्राह्मण ३,३, ४, १८. (माटुं वाक्य आ प्रमाणे-'इन्द्रागन्छ हरिव आगच्छ मेधातिथेः । मेष वृषणस्य मेने।') २, ३३९ (१८८७). " [नारको वै एप जायते यः शूद्रान्नमश्नाति । २१. उपनिषदमा वर्तमान पाठ नीचे प्रमाणे - अपाम सोमममृता अभूमागन्म ज्योतिरविदाम देवान् किमस्मान्कृणवदरातिः किमु धूर्तिरमृतं माय च ॥ --आनन्दाश्रममुद्रित, पृ० १०) २२. उपनिषा मा बावतनो नीचे प्रमाणे उल्लेख मळे छे--'अमिहोत्रं जुहुयात्स्वर्गकामो यमराज्यममिटोमेनामि यजति सोमराज्यमुक्येन, सूर्यराज्यं षोडशिना, स्वाराज्यमतिरात्रण, प्राजापत्यमासहस्रसंवत्सरान्तकतुनेति ।' आनन्दाश्रम मुद्रित,पृ. ४५७.
१४ २० ११२ ९०] जैन साहित्य संशोधक [खंड२ न ह वै प्रेत्य नरके नारकाः सन्ति ॥] (केनाञ्जितानि नयनानि मृगामानानां २, ३६० ( १९०८). को वा करोति विविधाङ्गरहान् मयूरान् कश्चोत्पलेषु दलसन्निधयं करोति को वा दधाति विनयं कुलजेपु पुस्सु ॥)" सरसावो, अश्वघोषकृत बुद्ध चरित, कॉवेलसंपादित पृ. ७७. पुण्यः पुण्येन [(कर्मणा) पापः पापेन कर्मणा] -~-बृह • आ०उप०४, ४, ५.हेमचंद्रसूरि आ अवतरण २,९५-बाल गाथा १६४३-नी टीकामा ले छे. २,४०३ (१९५१). १२१०२ सवै अयमात्मा ज्ञानमयः ।-वृ० आ० उ० ४, ४, ५. २, ४२६ (१९७४) १११ जरामयं वा एतत्सर्वं यदग्निहोत्रम् । तै० आ० १०,६४.महा. ना. उप० २५. वळी हेमचन्द्र गाथा २,४७५-चालू गा. २०२३-नी टीकामां पण आ अवतरण ले छे. द्वे ब्रह्मणी [ वेदितव्ये ] परमपरं च तत्र परं सत्यम ज्ञानपनन्तरं ब्रह्म] -सरखावो, मैत्र्युपनिषद् ६, २२; ब्रह्मबिन्दूपनिषद् १७. (सैपा गुहा दुरवगाहा) २, ४२७ (१९७५). ( यथाहुः[सौगतविशेपाः केचित् तद् यथा] दीपो यथा निर्वृतिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम् । २३. हेमचन्द्रसूरि गाथा१६४३नी टीकामां, आ पद्यगत भावने जणावनारा नीचे प्रमाणेना त्रण श्लोको आपे है- सर्वहेतुनिराशंसं भावानां जन्म वर्ण्यते । स्वभावादिभिस्ते हि नाहुः स्वमपि कारणम् ।। राजीवकण्टकादीनां वैचित्र्य कः करोति हि । मयूरचन्द्रिकादिर्वा विचित्रः केन निर्मितः ॥ कादाचित्कं यदनास्ति निःशेषं तदहेतुकम् । यथा कण्टकतैपण्यादि तथा चैते सुखादयः ॥ --सूत्रकृताङ्गसूत्रनी टीकामां शीलांकाचार्य (मुद्रित पृ० २१ आ. स.) आवी ज मतलबवाको एक अन्य ग्लोक आपे छ- कण्टकस्य च तीक्ष्णत्वं, मयूरस्य विचित्रता । वर्णाश्च ताम्रचूडाना, स्वभावेन भवन्ति हि ॥ २४. आचारागसूत्रनी टीकामां शीलांकाचार्य (आ. स. मु. पृ. १७) आ उपरना पद्यनी साये अश्वघोषवाळु पद्य तथा एक त्रीजु पण अन्य पद्य आपे छे. यथा- कः कण्टकानां प्रकरोति तैष्ण्यं विचित्रभाव मृगपक्षिणां च । स्वभावतः सर्वमिदं प्रवृत्तं, न कामचारोऽस्ति कुतः प्रयत्नः ॥'-(बुद्धचरित. ९-५२) स्वभावतः प्रवृत्तानां निवृत्तानां स्वभावतः । नाहं कतैति भूतानां, यः पश्यति स पश्यति ॥ -शान्त्याचार्य उत्तराध्ययन सूत्र अध्ययन२५ मानी टीकामां आ अने बीजां केटलांक अवतरणो ( उदाहरणार्थ भगव- द्गीता १८,४२) उदृत करेला छे तेम ज आवी ज जातनां बीजां पण केटलोक अवतरणो (उदाहरणार्थ-महानारायणो- पनिषद् १०, ५, कैवल्य उ० २, अने वाजसनेयी संहिता ३१, १८-श्वेताश्वतरोपनिषद् ३, ८) तेमणे अध्ययन १२, गाथा ११-१५ नी टीकामां आपेला छे. .
अंक १] प्रो.ल्युमन अने आवश्यकत. दिशं न काञ्चिद् विदिशंन काश्चित् स्नेहमयात् केवलप्रेति शांतिम् । जीवस्तथा निवृतिमभ्युपतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्ष । दिशं न काञ्चिद् विदिशं न काञ्चित् क्लेशझयात् केवलमेति शांतिस् । यशस्तिलक चम्पू ६, १ मां पण आ श्लोको आपेला छे. पण त्यां चरणव्यतिक्रम यएलो नजरे पहे छे. एक अवतरण वळी आवेलु छ जे ऊपरना १' वाळा अवतरण साथे संवन्ध धरावतुं होय तैम जणाय छे, अने हेमचन्द्रना लखवा उपरथी ते कोई उपनिपनी टीकामांनुं (उदा० बृहदार- 'ण्यक उपनिपद् ) होय तेम मालुस पडे छे. जिनभद्र गूळ ते आ प्रमाणे नोधे छे. ४०. गोयम, वेय-पयाणं इमाणमत्थं च तं न याणासि । जं विनाणघणो च्चिय भूएहितो समुन्याय ॥ ४१. मन्नास मज्जंगेसु व मयभावो भूय-समुदय-भूयो । विनाणमत्तं आया भूएऽणु विणस्सइ स भूयो । ४२. अत्यि न य पेचसन्ना जं पुव्वभवेऽमिहाणं 'असुगों ति। जंभणियं न मवाओ भवन्तरं जाइ जीवोत्ति। छेवटनी गाथामांना वाक्य उपर हेमचन्द्र आ प्रत्राणे टीका करे है-'किमिह वाक्ये तात्पर्य- वृत्त्या प्रोक्तं भवति-इत्याह-सर्वयात्मनः समुत्पद्य विनष्टत्वात् न भवान्तरं कोऽपि यातीत्युकं भवति ।' ज्यारे शीलांक पातानी हमेशनी विरल-व्याख्यापद्धति प्रमाणे एटलं ज लखे छ के-' एवं न भवाद् भवा- तरमस्तीत्युक्तं भवति । विशेषावश्यक २, २२६ सां वनस्पति अने प्राणी विद्या संबंधी अन्धविश्वास सूचवनारां एक चे अवतरणो आवे छे, ते पण हुं आनी पूरवणी रूपे अही नोंची लेवा इच्छं छु. ए अवतरणोनो' विषय, सहशमांथी सहशनी ज उत्पत्ति थई शके, एवो कोई नियप्त नथी; ए छे एना उपर टीका- कारे खूब विवेचना करी छे. ए अवतरण वाळी गाथाओ आ प्रमाणे छ: २२६. जाइसरो संगाओ भूतणओ सासवाणुलिचामो । संजायइ गोलोमाविलोम-संजोगओ दुब्बा ॥ २२७. इति रुक्साउवेदे, जोणिविहाणे य विसरिसेहितो। दीसइ जम्हा जम्मं, सुधम्म, तं नायमेगन्तो। सरखावो, पंचतन्त्र श्लोक १, १०७. ए ठेकाणे कविसंप्रदायनी पद्धति वाद करतां ऊपरना अन्धविश्वासवाळा अवतरणसांनी त्रीजी हकीकतनो उल्लेख करेलो छे-जेमके 'दुर्वा पि गोलोमतः'। आ अवतरणमांनी पहेली हकीकत के 'शृंगनांथी शर उत्पन्न थाय छे' तेनो उल्लेव वार्ताना रूपमा एक प्रत्येकबुद्धनी कथामां आवे छे. त्यां जणाव्या प्रमाणे एक शवनी खोपरी, आंख अने मोढामाथी वांसना त्रण फणगा नीकळ्या हवा. आ गाथामा जे योनिविधान शब्द आवेलो छ तेनो अर्थ टीका- कारे लख्या प्रमाणे ' योनिप्रामृत'छे अने ए नाप एक अन्यनु के जे पूनाना केटलॉगमां नं० १६० २६६, तया २१, १२४२ मा नोंघलो छे.
जैन साहित्य संशोधक. [खंड २. स्वाध्याय-समालोचन आगरे के श्रीआत्मानन्द पुस्तक प्रचारक मंडलने एक महत्त्वके प्रन्थका प्रकाशन किया है। इसका नाम है पातञ्जल योगदर्शन | यों तो पातञ्जल योगदर्शन के अनेक संस्करण, अनेक स्थानोंसे, अनेक रीतिसे और अनेक भापाओंमें प्रकट हो चुके हैं लेकिन हम जो इस संस्करणको महत्त्वका कहते हैं उसका खास कारण यह है कि इस संस्करणमें जो व्याख्या प्रकट हुई है वह संस्कृतसाहि- त्यके ज्ञाताओके लिये एक विशेष वस्तु है । पातञ्जल योगदर्शन एक वैदिक संप्रदाय है । ब्राह्मण संप्रदायके जो छ दर्शन गिने जाते हैं उनमें इसका विशिष्ट स्थान है। सांख्य और योग ये दोनों दर्शन युगलरूपसे व्यवहृत होते हैं और सब दर्शनों में प्राचीन हैं । असलमें सांख्य दर्शनका ही एक विशेप-- रूप योग दर्शन है । सांख्य दर्शनमें ईश्वरस्वरूप किसी व्यक्ति या तत्त्वका अस्तित्व नहीं माना जाता. और योगदर्शनमें उसको आश्रय दिया गया है-इतना ही इनमें मुख्य भेद है । जैन और बौद्ध दर्शनमें ऐसे अनेक तत्त्व और सिद्धान्त हैं जो सांख्य और योग दर्शनके तत्त्व और सिद्धान्तोंके. साथ समता रखते हैं। इस लिये बहुत प्राचीन कालसे जैन और बौद्ध विद्वानोंको सांख्य और योग दर्शनके अध्ययन और मननका परिचय रहा है । इसी परिचयका उदाहरण स्वरूप यह प्रस्तुत ग्रन्थ है । इस ग्रन्थसें पातञ्जल योगदर्शनके सूत्रों पर जैन धर्मके एक अति प्रसिद्ध और महा- विद्वान् पुरुषने व्याख्या लिखी है वह प्रकट की गई है। व्याख्याकार है न्यायाचार्य महोपाध्याय श्रीयशोविजय गणी । इस व्याख्यामें महोपाध्यायीने पातञ्जल योगसूत्रोंका जैन प्रक्रियाके अनुसार अर्थ किया है | व्यासकृत सूळ भाप्यके विचारोंके साथ जहां जहां अपना मतभेद मालूम दिया वहां उपाध्यायजीने बडी गंभीर भाषामें अपने विचारका समर्थन और भाष्यकारके विचारोंका निरसन किया है और यही इस व्याख्याकी खास विशिष्टता है। इस ग्रन्थका संपादन विद्वद्वर्य पं सुखलालंजीने किया है । जहां तक हम जानते हैं, जैन साहित्यमें अभी तक कोई तात्त्विक ग्रंथ ऐसी उत्तम रीतिसे संपादित हो कर प्रकट नहीं हुआ। ग्रन्थके महत्त्व और रहस्यको समझानेके लिये पंडित ने परिचय, प्रस्तावना और सार इस प्रका- रके तीन निबन्ध हिन्दी भाषामें लिखकर इसके साथ लगाये हैं जिनके पढनेसे, एक अन्यके पूर्ण अभ्यासके लिये जितने अंतरंग और बाह्य प्रश्नोत्तरोंकी आवश्यकता होती है, उन सबका ज्ञान पूरी: तरहसे हो जाता है । परिचय नामक निबन्धमें, पंडितजीने योगसूत्र, योगवृत्ति, योगविंशिका आदिका परिचय कराया है और प्रस्तावनामें जैन और योगदशनकी तुलना. तथा तद्विषयक साहित्यका विवेचन किया है । यह प्रस्तावना कैसी महत्त्वकी और कितने पांडित्यसे भरी हुई है इसका खयाल तो पाठकोंको इसके पढने ही से आ सकता है और इसी लिये हमने इस सारी प्रस्तावनाको इसी अंककी आदिमें उदृत की है। इस पुस्तकमें योगदर्शनके सिवा एक योगविंशिका नामका ग्रन्थ भी सम्मिलित है जो मूल. हरिभद्रसूरिका बनाया हुआ है और उस पर टीका सइन्हीं यशोविजयजीने की है । जैन दर्शनमें 'योग' को क्या स्थान है और उसकी क्या प्रक्रिया है यह जानने के लिये यह योगविंशिका बहुत ही उपयोगी है। पुस्तके अंतमें योगसूत्रवृत्ति और योग विशिकावृत्ति का हिन्दी सार दिया है जिससे संस्कृतः न जानने वाले भी इन ग्रन्थगत पदार्थोंको सरलतासे समझ सकते हैं । इस पुस्तकका ऐसा उपयुक्त संस्करण निकालनेके लिये संपादक महाशय पं. सुखलालजी तथा मंडलके उत्साही संचालक श्रीयुतः बाबू दयालचंदजी-दोनों सजन विद्वानोंक विशेष धन्यवादके पात्र हैं।
जैन साहित्य संशोधक ग्रंथमाळा
अध्यापक कॉवेल लिखित
प्राकृत व्याकरण-संक्षिप्त परिचय
संपादक
मुनि जिनविजयजी
एम. आर. ए. एम्.
( आचार्य-गुजरात पुरातत्त्व मन्दिर-अमदाबाद )
(जैन साहित्य संशोधक-खण्ड २, अंक १-परिशिष्ट )
प्रकाशक
जैन साहित्य संशोधक कार्यालय
भारत जैन विद्यालय-पूना शहर.
नि वे द न આ પ્રાકૃત વ્યાકરણ સંક્ષિપ્ત પરિચય, કેબ્રીજ યુનિવર્સિટીના એક વખતના સંસ્કૃતના અધ્યાપક અને એડીનબર્ગ યુનિવર્સિટીના નિરરી એલએલ. ડી. શ્રી ઈ બી. કોવેલ લખેલા A SHORT INTRODUCTION TO THE ORDINARY PRAKARIT OF THE SANSKRIT DRAMAS નામના નિબંધને અવિકલ ગુજરાતી અનુવાદ છે. જેમને સંસ્કૃત ભાષાને સાધારણ અભ્યાસ હોય અને જેઓ પ્રાકૃત ભાષાને ટુંક પરિચય કરવા માંગતા હોય તેમને આ નિબંધ ઘણું મદત કર્તા થઈ પડે એવું જણાયાથી, આ રૂપમાં પ્રકટ કરવામાં આવે છે. આ નિબંધ મૂળ સન ૧૮૫૪માં મજકુર પ્રોફેસરે વરત્તિ પ્રતિ પ્રણા ની જ્યારે પ્રથમ આવૃત્તિ બહાર પાડી હતી તેની પ્રસ્તાવના રૂપે લખ્યું હતે. અને પછી ૧૮૫ માં કેટલાક સુધારા-વધારા સાથે, લંડનની TRUBNER and Co. એ એક પુસ્તિકાના રૂપમાં એને જુદા છપાવ્યું હતું. એ પુસ્તિકા આજે દુલભ્ય હઈ બુકસેલરે તેની ૩-૪ રૂપિઆ જેટલી કિંમત લે છે. તેથી ગુજરાતી ભાષાભિજ્ઞ વિદ્યાર્થીઓને આ નિબંધ સુલભ થઈ પડે તેવા હેતુથી આ પત્રના પરિશિષ્ટ રૂપે પ્રકટ કરવામાં આવે છે. આશા છે કે સંશોધકના વાંચનારાઓને તેમજ અન્ય તેવા અભ્યાસિઓને આ પ્રયાસ ઉપગી થઈ પડશે. ચેષ પૂર્ણિમા, ૧૯૭૯ –સંપાદક अध्यापक कॉवेल लिखित प्राकृत व्याकरण-संक्षिप्त परिचय ઈ.સ. પૂર્વેના સૈકાઓમાં, ભારતવર્ષમાં સંસ્કૃત ભાષામાંથી અપભ્રષ્ટ થઈને કેટલીક ભાષાઓ (બેલીઓ) ઉત્પન્ન થઈ જેને સાધારણ રીતે પ્રાકૃત કહેવામાં આવે છે. આ ભાષાઓની શોધ ખેળને વિષય ભાષાશાસ્ત્રીને તેમજ ઈતિહાસ લખકને ઘ રસ આપી શકે તેમ છે. હાલની પ્રચલિત ભાષાઓ અને મહા સંસ્કૃત વચ્ચે સંબંધ જોડી શૃંખલાનું કામ બનાવનાર આ પ્રાકૃત ભાષાઓનું (અને ખાસકરીને પ્રાકૃત' નામક ભાષાનું) જ્ઞાન હાલમાં વપરાતાં કેટલાંક રૂપ સમજ- વાને ઉપયોગી છે એટલું જ નહિ, પરંતુ તેઓ ભાષાસંઘની એક ઇંડે-યુરોપીઅન શાખાના ઈતિ- હાસમાં પ્રકાશ પાડે છે, તથા લૅટીનમાંથી ઉત્પન્ન થએલી આધુનિક ઈટાલીઅન અને ચ ભાષાઓ સરખાવતાં જે સ્વરમાધુર્યનું આપણને ભાન થાય છે તે માધુર્યના નિયમોના અનુપમ દ્રષ્ટાંત પૂરાં પાડે છે. તદુપરાંત બીજા ઘણા રસોત્પાદક ઐતિહાસિક પ્રશ્નને સાથે પ્રાકૃત ભાષાને નિકટને સંબંધ છે. સાલેનના દ્ધાનાં તથા ભારતવર્ષના જૈનેનાં ધર્મપુસ્તકની ભાષાએ પ્રાકૃતનાં ભિન્ન ભિન્ન રૂપે છે અને ખરેખર બ્રાહ્મણની સંસ્કૃતને વિરોધ દર્શાવીને જનસમાજના હૃદય ઉપર સટ અસર કરવા માટે બદ્ધ ગ્રંથમાં પાલિ ભાષાને ઉપગ કરવામાં આવે છે. જ્યારે અલેકઝાન્ડરના આધિપત્ય તળે ગ્રીક લોકે ભારતવર્ષના સંબંધમાં આવ્યા ત્યારે પ્રાકૃત ભાષા જન- સમાજમાં પ્રચલિત હશે. જેમાં ઈસ. પૂર્વે લગભગ ૨૫૦ વર્ષના એન્ટીકસ અને બીજા ગ્રીક રાજાઓનાં નામ આવે છે એવા અશક રાજાના શિલાલેખેની ભાષા પણ એક જાતની પ્રાકૃતજ છે, તે જ પ્રમાણે બેકયાના ગ્રીક રાજાના દ્વિભાષિક સિક્કાઓ ઉપર પણ પ્રાકૃત ભાષા લખેલી જોવામાં આવે છે. જુના હિંદુ નાટકામાં પણ આ ભાષાઓને હિસે છે નથી, કારણ કે તેમાં મુખ્ય નાયકે સંસ્કૃતિને ઉપયોગ કરે છે, પણ સ્ત્રીઓ અને સેવકે જુદી જુદી જાતની પ્રાકૃત ભાષા વાપરે છે, જેમાંના પરસ્પર ફેરફારે બોલનારની કક્ષા પ્રમાણે, સ્વરમાધુના નિયમનું અનુસરણ કરે છે. વૈયાકરણે “પ્રાકૃત” શબ્દને પ્રતે મ ાત એમ જણાવી પ્રતિ એટલે સંસ્કૃત સાથે સંબંધ જોડે છે. આ વિષયમાં હેમચંદ્ર નીચે પ્રમાણે જણાવ્યું છે. પ્રતિ રાતે તત્ર સર્વ તત આતં શા ત પણ મૂળ તેના અર્થ “સાધારણ” અગર અસંસ્કારો એ હશે, કારણ કે મહાભારતમાં એક સ્થળે બ્રાહણેને ધિક્કાર કર નહિ એમ જણાવી લખ્યું છે કે – दुर्वेदा वा सुवेदा वा प्राकृताः संस्कृतास्तथा ॥ લભગભ આધુનિક વૈચ્યાકરણ “પ્રાકૃત' નામ તળે ઘણી ભાષાઓને સમાવેશ કરે છે, પરંતુ તેમાંની ઘણી ખરી પાછળથી થયેલાં ક્ષુલ્લક રૂપાંતર માત્ર છે. જેમ જુને વૈયાકરણ તેમ તેના ગ્રંથમાં થોડી પ્રાકૃત ભાષાઓ. તેજ પ્રમાણે ઘણુ પુરાણ વૈચ્યાકરણ વરરૂચિએ ફક્ત ચાર જ પ્રાકૃત ભાષાઓનું વિવેચન કર્યું છે, જેવી કે મહારાષ્ટ્ર, પૈશાચી, માગધી, અને શેરસેની. આમાંથી પહેલા એટલે મહારાણી ભાષાને તેણે વિશેષ મહત્તવની ગણી છે તથા કૈસન સાહેબે પણ પિતાના ૧. પિશાચી ભાષા ખાસ ઉપગી છે કારણકે વૃદતા તે ભાષામાં લખાયેલી છે, - ---- ૨] અધ્યાપક કવેલ લિખિત ( ખડ ૨ ઈન્ટીટયુશન્સ' નામના લેખમાં તેને જ સુખ્ય ગણે છે. વરરૂચિના પ્રાકૃત પ્રકાશમાં પ્રથમ નવ પ્રકરણમાં તેનું વ્યાકરણ આપવામાં આવ્યું છે, અને બાકીનાં ત્રણ પ્રકરણમાં બાકીની ત્રણ ભાષા- એની વિશિષ્ટતા જણાવી છે. મૃચ્છકટિક નાટકમાં પ્રાકૃત ભાષાઓનું એક વિચિત્ર મંડળ ભેગું કરવામાં આવેલું છે જેથી કરીને તે નાટક ઉપગી પ્રાકૃત રૂપની ખાણ બન્યું છે. વળી, વિકમેવશીના ચોથા અંકમાં પુરુરવ રાજાના આત્મપ્રલાપની ભાષા તદ્દન ભિન્ન જ છે, અને એક જાતની કાવ્યમાં વપરાતી અપ- ભ્રંશ ભાષા છે, જેને આધુનિક વૈયાકરણે મૂળ પ્રાકૃતથી, ઘણુંજ જુદી ગણે છે. આ અપવાદે સિવાય સંસ્કૃત નાટકમાં–ગદ્યમાં શૈરસેની, અને પદ્યમાં મહારાષ્ટ્રી–સાધારણ પ્રાકૃત જ વપ- રાય છે. આ બન્ને માટેના નિયમો સરખાજ છે, પરંતુ ગદ્યમાં વપરાતી ભાષા કેવળ વ્યંજને ઉડાડી દેવામાં થોડી છૂટ લે છે, તથા ધાતુ અને પ્રાતિપાદિકનાં કેટલાંક રૂપે તેનાં પિતાનાં ખાસ હોય છે, જે નીચે જણાવવામાં આવશે. તે પણ નાટકની ભાષા, ખાસ કરીને ગદ્યમાં, વરરૂચિના નિયમથી ઘણુ વાર વિરૂદ્ધ જાય છે. આ લઘુ વ્યાકરણ નાટકમાં વપરાતી સાધારણ પ્રાકૃત માટે ખાસ કરીને બનાવવામાં આવ્યું છે. ખરેખર, અત્યાર સુધી પદ્યાત્મક પ્રાકૃતનાં ઘણાં ઉદાહરણો જાણવામાં ન હતાં; ફક્ત નાટમાં તથા અલંકારના ગ્રંથમાં આવેલાં પ્રાકૃત પનાં ચેડાંક નમુનાએ જણાવ્યા હતા પણ છે. વેબરે હાલકવિના સસશતકનો કેટલોક ભાગ છપાવ્યું છે જેને લીધે મહારાષ્ટ્ર ભાષાનું મેટું ક્ષેત્ર ખુલ્લું થયું છે. તે કાવ્યમાં પ્રાકૃતના અભ્યાસને માટે ઘણી ઉપગી એવી આય એ છે પરંતુ મારાં પ્રસ્તુત કાર્ય માટે તે બહુ ઉપયેગી નહિ હોવાથી મેં આ લેખમાં તેમને ઉપગ બહુજ છેડે કર્યો છે. તે પણ પરિશિષ્ટમાં હાલકવિની દશેક આયાઓ મેં આપી છે. વિભાગ ૧ લભભ સર્વથા સંસ્કૃત શબ્દોમાં કેટલાક ફેરફાર કરીને અને કેટલાક અક્ષરે ઉડાડીને પ્રાકૃત રૂપ સિદ્ધ થયાં છે. સંસ્કૃતના અણીશુદ્ધ ઉચ્ચારેને બદલે પ્રાકૃતમાં અસ્પષ્ટ અને અધ- ઉરચાર કરવામાં આવે છે, તથા સંસ્કૃત ભાષાના સ્વભાવની વિરૂદ્ધ જઈને વારંવાર સ્વરસહને બાધ કરવામાં આવે છે. નીચેના પ્રકરણમાં, પ્રથમ તે શબ્દના અક્ષરોમાં થતા ફેરફાર વિષે અને, પછીથી, પ્રાતિપાદિક અને ધાતુઓનાં રૂપોમાં થતા ફેરફાર વિષે વિવેચન કરીશું. સ્વર પ્રકરણ પ્રાકૃતમાં ઢ છે, જો સિવાયના બધા વરે સંસ્કૃત પ્રમાણે છે કેઈ શબ્દમાં પ્રથમ અક્ષર = હેય તે તેને જ થાય છે, જેમ કે રાજા ને બદલે રિજ કેટલીક વાર આની પહેલાં વ્યંજન હોય તે તે જનને લેપ કરવામાં આવે છે, જેમ કે વાસ્તલિ. જે ૪ ની પહેલાં વ્યંજન આ હોય તે જ ને . અથવા શું થાય છે, અને જે તે વ્યંજન ઓછ- સ્થાનીય હેય તે ન થાય છે જેમ કે –ત, શd-શાસ, દિ– રિદ્ધિ –ા, gશથી–મુવી, પ્રસિ–પત્તિ. પરંતુ આવા ફેરફાર શબ્દના પ્રથમાક્ષર માં ભાગ્યે જ થાય છે તે પણ લિ (વિ), રાજુજ (પુ), દું(g), ૧. પુત્તર ના ચેથા અંકમાં ધીવર માગધી ભાષાનો ઉપયોગ કરે છે, તેમજ મુદ્દામાલ માં કેટલાંક પાત્રે નિકૃષ્ટ ભાષા વાપરે છે. ૨.ડે. પશ્ચિલે શાસેનીવિષે કુહુના બીજ ૫૦૮માં વિવેચન કર્યું છે. પરંતુ તેમના કેટલાક નિચે અનિશ્ચિત છે, છે [ ૩ 'ક ૧ ) પ્રાકૃત વ્યાકરણ -સંક્ષિપ્ત પરિચય. પ્રાકૃત શબ્દમાં આવી શકતું નથી, તેથી અન્તવાળા સંસ્કૃત શબ્દનું ષષ્ઠી બહુવચનનું રૂપ કારાન્ત અથવા હકારાન્ત શબ્દ પ્રમાણે થાય છે. રાત નું ચિત્ત થાય છે. છેનું અગર (કવચિત્ જુ અથવા ) થાય છે, જેમ કે તે (ૌઢ), (ચૈત્ર). ૌ નું અગર = (કવચિત ૪) થાય છે, જેમ કે મુ (મુવી), પર(), લેર (). બાકી રહેલા સ્વરમાંથી અને જે સધ્યક્ષર હોતા નથી, અને યથાનિયમાનુસાર હસવ ચા દીઘ હોઈ શકે. પ્રાકૃતને એક મુખ્ય નિયમ નીચે પ્રમાણે છે – મૂળ શબ્દમાં જોડાક્ષરની પહેલાં દીધ સ્વર આવ્યે હોય તે પ્રાકૃતમાં તે સ્વર હવે થાય છે, જેમ કે ચા, , નું અનુક્રમે ૪, ૫, ૩ થાય છે, (T અને એમ જ રહી શકે છે, જેમ કે મા–, , પૂર્વ–પુરવ. તેમાં બે પેટા નિયમ નીચે પ્રમાણે છે (a) જે પ્રાકૃતમાં પણ દીર્ઘ સ્વર રાખવામાં આવે તે જોડાક્ષરમાંથી એક વ્યંજનને લેપ થાય છે, જેમ કે થ્યિ – ઉત્તર અથવા સ્તર, વિશ્વાસ–વાલા અથવા વિરલા (૨) જોડાક્ષરની પહેલાં આવેલ સ્વ સ્વર દીઘ થાય છે અને એક વ્યંજનનો લેપ થાય છે, જેમ કે વિલીહા, કેઈકવાર જોડાક્ષરની પહેલાંના હુ ને સને બદલે અને શ થાય છે, જેમ કે પિve-, gue-ve. ઘણી વાર ૧ ની પહેલાંના જ ને બદલે ૬ થાય છે, જેમ કે ઉત્ત–વત, વડ, આશ્ચર્યા છે કેટલાક શખમાં પહેલા અક્ષરમાં નું જ થાય છે, જેમ मुकुट-मउड, पुरुष भने मात्र અનિયમિત રૂપ પુરિત અને નેત્ત થાય છે. આ નિયમિત ફેરફાર ઉપરાંત વ્યાકરણમાં અને પ્રાકૃત લેખમાં, તથા ખાસ કરીને સમ- શતકમાં કેટલાક સ્વના ફેરફાર અનિયમિત રીતે થાય છે જેમ કે વાદ-મિતિ અથવા તામિ, કલોતિ–૩રવ અથવા ઉલ્લામ, પરદ–પ૯૬, વિરે. સામાસિક શબદે કે જેમાં વારંવાર સ્વરે હવે દીર્ઘ થયા કરે છે તથા કેટલીક વાર આખા અક્ષરે લુપ્ત કરવામાં આવે છે તેમાં આવી અનિયમિતતા વારંવાર જોવામાં આવે છે, જેમ કે यमुनातट-जउणअड मने जउणा- અs ગુમા–સુમાર અને સમા, નામ અને કહ્યું, વિરે (સરખા-૨ ૨૦ ૪, ૨; વેબર, રતવા પાત્ર ૩૨, ૩૩.) ૨. કેવળ વ્યંજન પ્રકરણ (). સામાન્ય પ્રાકૃતમાં શું અને જૂ નથી, અને તેમને બદલે ૨ વપરાય છે. જૂ ની પછી દંત્યાક્ષર ન આવ્યો હોય તે સાધારણ રીતે તેને જૂ થાય છે. શબ્દના આરંભમાં આવેલા ૫ને શું થાય છે. સામાન્ય રીતે આટલા નિયમો અપવાદ રૂપે આવે છે [તે પણ, નાટકમાં કેટલીકવાર ૩ (પુનઃ), ૪ (૪) થાય છે, પરંતુ આવા ફેરફારે વરરૂચિએ સ્વીકાર્ય નથી. વળી, વહ૦ ૨, ૩ર-૪૧ માં આવેલા શબ્દ, જે આ પુસ્તકને અંતે આપવામાં આવ્યા છે તે જુઓ ]. g, એવાં શબ્દો જ્યારે કેટલાક શબ્દના આરંભમાં લગાડવામાં આવે છે ત્યારે તેવા શબ્દોને પહેલે વ્યંજન લુપ્ત થાય છે, જેમ કે પુલમહત્ત, મા–જુરમાર, (વ) છેવટના અને જે અનુસ્વારના રૂપમાં પરિણુત થાય છે, તે સિવાયના ખેડા વ્યંજન નેને લેપ થાય છે. ઘણી વાર છેવટના અનુસ્વારને લેપ થાય છે. કેટલાંક નામના અંત્ય વ્યંજનેને એ અગર આ લગાડવામાં આવે છે, જેમ કે પ્રી–પાડર, સર–વિના, w , UNNINષા ૪ 1 અધ્યાપક કવલ લિખિત ખડ ૨ () વચમાં આવેલા ખેડા અક્ષરે – , , , ૬, ૨, ટૂ, , , ને વિકપે લેપ થાય છે પરંતુ અને ને જ્યારે લેપ ન થાય ત્યારે તેમને બદલે ઘણી વાર હૂ અને ' અગર રૂ થાય છે. આવી રીતે તે લેપ ગદ્ય કરતાં પદ્યમાં વિશેષ જોવામાં આવે છે. ગતિ ઉપસર્ગને બદલે પ્રાકૃતમાં પદે લખવામાં આવે છે. ને ઘણી વાર લેપ થાય છે, જેમ કે વાયુ-વાડ, ચા–મમાં ને થાય છે, અને જો થાય છે, અને કેટલીક વાર ને જૂથાય , , , , " એમ જ રહે છે, અગર તે તેમને £ થાય છે (જ્યારે ને ન થાય ત્યારે અને ખાસ કરીને ગદ્યમાં, પણ થાય છે.) ૪, જૂ, અને સ્ માં ફેરફાર થતું નથી. ને હમેશા સૂથાય છેપણ સાધારણ રીતે અવિકૃત રહે છે, અને કદાચ તેને મ્ પણ થાય. (૪૦ ૨, ૨૬, સરખાવે લેસન સાહેબનું વ્યાકરણ, પાન ૨૦૮.) ને બદલે ઘણી વાર થાય છે અને આ પ્રમાણે માગધી અને બીજી કેટલીક હળકી ભાષા- એમાં નિયમિતપણે થાય છે. , , , , અવિકૃત રહે છે. શું અને જૂને બદલે ર થાય છે, પરંતુ રસ અને તેના ઉપરથી થતા શબ્દોમાં તથા વિવલ માં, ને થાય છે, જેમ કે ઇ- લા–રમાર, વિવ-વિ, તેમજ, હૃદ–દ, શબ્દની મધ્યમાંના ખેડા વ્યજનોને કેટલીકવાર બેવડાવવામાં આવે છે, જેમ કે પછી અથવા પુલ, મા-પિતા અથવા વિવ (૦ ૩, ૫૨,૫૮). ૩. જોડાક્ષર પ્રકરણ, પ્રાકૃત ભાષાના ખાસ ફેરફાર જોડાક્ષરોમાં થાય છે. જ્યારે વધારે સંસ્કૃત જોડાક્ષરે મળી જઈને એકાદ પ્રાકૃત રૂપ સિદ્ધ થાય છે ત્યારે તે રૂપ એકાએક ઓળખી શકાતું નથી. પ્રાકૃતમાં જુદા જુદા વગરના બે વ્યંજનેનું જોડાણ રહી શકતું નથી, તેથી તે વ્યંજનેમાંથી એકને લેપ કરી, અને બીજાને બેવડાવી એક વગનો કરવા પડે છે. સામાન્ય નિયમ તરીકે, જોડાક્ષરેમાંના પહેલા વ્યંજનને લય થાય છે, પરંતુ સૂ, ૫, ૬ પહેલા ન હોય તે પણ તેમને લેપ થાય છે, અને , જૂ, અને તે સર્વત્ર લેપ થાય છે. આ ઉપરાંત કેટલાક અપવાદો પણ છે. એક નિયમ ખાસ યાદ રાખવું જોઈએ ક–જ્યારે કોઈ જોડાક્ષરમાં જન્માક્ષર આવ્યો હોય, ત્યારે તેને લેપ કરી તેને બદલે તેની સાથે જોડાયેલા જન પછી મહાપ્રાણ વ્યંજન મૂકવામાં આવે છે. જેમ કે , " અથવા ને બદલે વશ થાય અગર તે, ઊકમાભરની સાથે જોડાયેલા વ્યંજનની પછી મહાપ્રાણ વ્યંજન ન હોય તે ઊષ્માક્ષરને બદલે દમકવામાં આવે છે, જેમ કે અથવા ને બદલે બg. પરંતુ જ્યારે આવી પરિસ્થિતિ સામાસિક શબ્દના પદોમાં આવી હોય ત્યારે ઉપર્યુક્ત નિયમ જળવાતું નથી, જેમ કે તિરસ્કા–તિર..(તિ એમ ન થાય.) શું અને કદી પણ બેવડાતા નથી. જોડાક્ષરમાં શું આવ્યું હોય તે છેવટે લખાય છે, જેમ કે ગ્રાહ્મણ–વ જોડાક્ષરમાં આવ્યું હોય તેનું અનુસ્વાર થાય છે, આ નિયમ ન્ અને ઊષ્મા- ક્ષરમાં પણ કેઈક વખતે લાગુ પડે છે, જેમ કે –, વ–ચં, અશ્વ–સંત - સંg ( જુઓ વર૦૪, ૧૫). કેટલીક વાર જોડાક્ષરની વચમાં એક ના સ્વર મૂકવામાં આવે છે; ૧. પ્રાકૃત અક્ષર હશે કે નહિ તે શંકાસ્પદ છે, કારણ કે પ્રતમાં હંમેશાં 7 લખેલે હોય છે, ૨. હૂ અને વારંવાર એક બીજાને બદલે વપરાય છે, જેમકે પા. ૧૯, ૧-૨, માં - રિસ્સા (રિરિચાર ), તથા શાલ, પા. ૧૬, ૧-૧૨, ( બેંથલીંગ ), મમતભૂમિ મમત)] • ४१ " ग्घ- પ્રાકૃત વ્યાકરણ-શક્ષિપ્ત પરિચય. [4 महर्ष-हरिस (नुमा वर० 3, ५६-86), el पार ये भी मारा य न इथाय छ, भचौर्य-चोरिअ. પ્રાકૃત જોડાક્ષરની તાલિકા નીચેની તાલિકામાં સંસ્કૃત જોડાક્ષરનાં પ્રાકૃત રૂપ આપ્યાં છે, જેમાંના ફેરફાર શબ્દના મધ્યમાં થાય છે એમ સમજવું; પણ તે પ્રાકૃત જેડામાંના પહેલા અક્ષરને લેપ કરવાથી તે રૂપે शहना मारमा पशुपयोगमा भाव; रेभ यक्ष-जक्ख: ५ क्षत-खदा ते प्रमाणे શબ્દની વચમાં હોય તે જ ને જ થાય છે, અને આરંભમાં હોય તે ક ને જ થાય છે. क-क, क्त (?), क्य, क, के, ल्क, क्ल, कम उत्कण्ठा, मुक्त, चाणक्य, शक्र, अर्क, विक्लव, उल्का, पक्क, ने मह अनुमे उक्कण्ठा, मुक्क, चाणक, सक, अक्क, उक्का, विक्कव, पिक्क થાય છે फ्वत्ख, ख्य,क्ष, क्ष, (क्ष्य), प्क, स्क, (ख), स्ख, ख, रेभ उत्खण्डित, आख्या, यक्ष, उक्षिप्त, मुष्क, स्कन्ध, स्खलित, दुःख ने मह उक्खण्डित, अक्खा, जक्ख, उक्खित्त, मुपख, खन्द, खलिस, दुक्ख थाय छे. ग्ग-ज, दन, ग्म, ग्य, ग्र, गे, लग रेम हे खड्ग, मुद्ग, नग्न, युग्म, योग्य, समग्र, वर्ग, वल्गित ने महले खग्ग, मुग्ग, णग्ग, जुग्ग, जोग्ग, समग्ग, वग्ग, वग्गिद थाय छे. =(१), छ, घन, घ, घरेभ उद्घाटित, विघ्न, शीघ्र, निघृण ने महले उग्घाडिद, विग्ध, सिग्घ, णिग्घिण थाय छे. ख-शाम सोभ-सलोह (अथवा सक्खोह ? ). व:च्य, त्य, चं; अच्युत, नित्य, चर्चरिका ने पहले अच्चुद, णिच, चच्चरिआ थाय छे. च्छ-थ्य, छ, छ, क्ष, स, म, त्स, त्स्य, प्स, श्चरेम है मिथ्या, सूच्छी. कृच्छ्राणक, अक्षि, उत्क्षिप्त, लक्ष्मी, वत्स, मत्स्य, लिप्सा, आश्चर्य ने महले मिच्छा, मुच्छा, कुच्छाणथ, अच्छि, उच्छित्त, लच्छी, वच्छ, मच्छ, लिच्छा, अच्छेर थाय छे. ज्ज-ज, ज्ञ (Ass qHd ) ज, ज, ज्व, द्या ये, य्य. (माये ); रेम है कुब्ज, सर्वज्ञ, वज्र, गर्जित, प्रज्वलित, विद्या, कार्य, शय्या ने महसे खुज्ज, सव्वज्ज, वज्ज, गन्जिद, पजलिद, विज्जा, कज्ज, सेज्जा थाय छे. ज्झम्ध्य, ह्या प्रेममध्य, वाह्यक, ને બદલે मझ, वज्झम थाय छे. हत रेभ नर्तकी नु णट्टई थाय छे. 8-ट, ठाभ दृष्टि, गोष्टी दिहि, गोडी थाय छे. इत, ई (लाये ); भगत, गर्दभ नुगड, गडह थाय छे. १. क-क्त घgi नाटमा नेपामां आवेछ, नुमा मृच्छ०, पा. २८ १-२० ९५२ टेन्सनी नोट. २. मासशन सभासभा क=ष्क, स्क क्राय छे, म निकम्प-निष्कम्प माडी अन्य स्थणे क्स थाय छे. ते प्रमाणे चश्च मने प्प-स्स, मगर ध्य. 3. वयित् श्च न मालेच नेवाभां भाव छ, पशु मास ४शन नियम (निश्चय) २वा शोभार જેમાં નિ ઉપસર્ગજ થી શરૂ થતા શબ્દ સાથે જોડાએલે છે. ४. अहि (अस्थि-डा), तथा ठिम (स्थित ) भां दृ स्य ने भाटे ५राय छे.
१] અધ્યાપક કવેલ લિખિત [७२ AAAAAAAAAAAAAAMAL ANNARMANANAA WAAAAAMKARAAMNAMAIRANANARAMMARKAA -व्य; જેમ કે आख्य अड्ड थाय छे. ण्णा (१), श, स्न, न, ण्य, न्य, णे, ण्व, स्व, भरुग्ण, यक्ष, प्रद्युम्न, प्रसन्न, पुण्य, अन्योन्य, वर्ण, कण्व. अन्वेषणा, ने पहले रुण्ण जण्ण, पज्जुण्ण, पसण्ण, पुण्ण, अण्णोण्ण, वपण, कण्ण, अण्णेसणाथाय छे. ग्रहण न. प्ण, स्न, ण, हम तीक्ष्ण, प्रश्न, विष्णु, प्रस्नुत, पूर्वाण, यहि ने पहले तिण्ह, पण्ह, विण्ड, पण्हुद, पुव्वण्ह, वहि थाय छे. तरक्त, त, न, त्म, त्र, त्व, ते; ६ भक्त, सुप्त, पत्नी, आत्मा, शड, सत्त्व, मुहूर्त ने पहले भत्त, सुत्त, पत्ती, अत्ता, सन्तु, सत्त, मुहुत्त थाय छे. स्थक्थ, त्र,' थे, स्त, स्थ; म सिक्थक, तत्र, पार्थ, हस्त, अवस्था ने पहले सित्थअ, तत्थ, पत्थ, हत्थ, अवस्था थाय छे. ६-ब्द, (?), द्र, दे, दरभ शब्द, भद्र, शार्दूल, अद्वैत ने पहले सह, मद, सदूल, अ६इअ थायछ. द्ध-ग्ध, व्ध, धे, ध्व भस्निग्ध, लब्ध, अध, अध्वन्, २ मा सिणिद्ध, लद्ध, अद्ध, अद्धा थाय छे. न्दन्त (शौरसेनीमा हाथ थाय छे.) म किन्तु, प्रभावान् ने पहले किन्दु, पहाव- धन्दी थाय छ.२ प्प-स्प, प्य, प्र, पल्प, प्ल, क्म; ३ म उत्पल, विशप्य, अप्रिय, सपणीय, अल्प, विष्ठव, रुक्म न महले उप्पल, विष्णप्प, अप्पिअ, सप्पणीय, अप्प, विप्पव, रुप्प थाय छे. प्फत्फ, प्फ, (:फ), स्फ, प्प, स्प; रेभ उत्फुल्ल, निष्फल, स्फुट, पुष्प, शरीरस्पर्श ने બદલે उप्फुल्ल, णिप्फल्ल, फुड, पुप्फ, सरीरप्फंस थाय छे. ब्ब-द्व, ब, वाम उद्वन्ध्य, अब्राह्मण्य २.महले उब्बन्धिय, अब्बम्हणम्. ब्भ-ग्भ, द्र, भ्य, भ्र, भ भ प्राग्भार, सद्भाव, अभ्यर्थना, अभ्र, गर्भ ने पहले पम्भार, सम्भाव, अब्भत्थणा, अब्भ, गब्भ थाय छे. म्म-डम, पम, न्म, म्य, में, स्मा५ भ है दिङ्मुख. षण्मुख, जन्म, सौम्य, धर्मन् , गुल्म न महले दिम्मुह, छम्मुह, जम्म, सोम्म, धम्म, गुम्म थाय छे. म्ह-प्म, क्षम, स्म, सामग्रीष्म, पक्ष्मन् , विस्मय, ब्राह्मण न महसे गिम्ह, पम्ह, विम्हा, बम्हण थाय छे. य, ज, ( भागधी ) भकार्य, दुर्जनः ने पहले कय्ये, दुय्यणे थाय छे. रि-६, (य) रेभ ताश, चौर्य नेमले तारिस, चोरिअ थाय छे. १. नगरसे स्थ मला भव्ययाभर १५शय छ, नभएत्थ (अत्र ), तत्थ (तत्र). २. नुमा मालिनु शाकुं०, पा. १५५ नाट 3. मात्मा न प्रात अप्पा तथा अत्ता मे छे. प्प-स्प, स्फ, भूत सभासभा, भ चउ- प्पहोचतुष्पथः ४. म-ह, भविमल-विह्वल. ५. मिलबल, सभ मिलाण म्लान गुमा वेसन, ५.२५८. १जी, वद्ध, रभ वारह-द्वादश.
જેમ કે વા. ન અક૧] પ્રાકૃત વ્યાકરણે સંક્ષિપ્ત પરિચય. ૭ = ૨, ૪, (ર), (ભાગ્યેજ), જેમ કે , નિર્જન, પ્રા ને બદલે , વુિં, પણ થાય છે. ल्ह રનું વાર થાય છે. = 'ચ, (2), વે, જેમ કે ઘાવ્ય, પૂર્વ ને બદલે શવ, પુત્ર થાય છે. સક, , શ્વ, સવ જેમ કે વન, ચ, અશ્વ, મહિના ને બદલે વૈરા, , સંતો, અપતિ થાય છે. રૂ=ઈ, મ, ય, , શ્વ, સ, શ, ષ, , , ; જેમ કે કું, રિમ, રબરસ્ટ, વિશ્રા, અશ્વ, ગુણ, પુષ્ય, ગામ, તસ્ય, રસ, તપશિવ ને બદલે ઉતા, રિત, ર૪િમ, વિરવત, અ, સોસ, પુરવ, રિયામિ, તરસ, વસ્ત્ર, તારી થાય છે. તા.ક–જે સંસ્કૃત શબ્દમાં ત્રણ વ્યંજને જોડાયેલા હોય તે તેમાંના અધરવરને પ્રાકૃત કરતી વખતે, લેપ કરવામાં આવે છે, અને ત્યાર પછી બાકી રહેલા વ્યંજને માટે ઉપયુકત નિયમ લાગુ પાડવામાં આવે છે, જેમ કે મચ=મ છે; પરંતુ આવા (અધરવર વાળા) જેડા- ક્ષરની પહેલાં અનુનાસિક વ્યંજન આવ્યા હોય તે બાકી રહેલા જોડાક્ષરની બાબતમાં સામાન્ય નિયમ લાગી શકે છે માત્ર અનુનાસિક પછી તેઓ બેવડાતા નથી, (વર૦ ૩, ૫૬) જેમ કે વિવ=વિજ્ઞ. [૨ ને ૪ (વર૦ ૩, ૨૮) પ્રમાણે થાય છે.] ઉપયુકત નિયમો ઉપરાંત, હાલ કવિના સપ્તશતકની જેમ બીજા પદ્યમાં ઘણું અનિયમિતતા જેવામાં આવે છે, જેમ કે કૈ નું પ્રાકૃત રૂ૫ વરરૂચિએ તેમ તથા તેને આપ્યું છે. તેજ પ્રમાણે રમત નું પ્રાકૃત રૂ૫ (ત્તરામ, પા. ૧૫, તથા સર૦ ૭૪), તથા રથ૪ (માહિતી, પા ૯૦), વિગેરે જેવામાં આવે છે. વિભાગ ૨ પ્રાકૃત નામે પાંચ જાતનાં હોઈ શકે ૧ સકારાંત તથા સાકારાંત ૨ ફુકારાંત તથા રંકારાંત ૩ સકારાંત તથા કારાંત ૪ મૂળરૂપે ગાકારાંત ૫ વ્યંજનાત. છેલ્લા બે વિભાગમાં પડે એવાં નામે ઘણાં ડાં છે. ગાકારાંત પુલિંગ શબ્દને સર અથવા આ અંતવાળા બનાવવામાં આવે છે જેમ કે પિતા-પિગ, પિન-, મમરા, મર્તા- મારા પ્રથમા તથા દ્વિતીયા બહુવચનમા, તૃતીયા અને પછી એકવચનમાં, તેમજ સમી બહુવચનમાં, છેવટના ને બદલે ૩ મૂકવામાં આવે છે, અને પછી કારાંત શબ્દોની માફક તેનાં રૂપે ચાલે છે જેમ કે મm-માળા, મમતુળો આવું રૂપ વપરાયલું પણ જોવામાં આવે છે, જેમ કે મલ્ટન્મત્ત સંબન્ધદશક નાનું પ્રથમ એકવચન આ અંતવા પણ હોય છે, જેમ કે પિતા-પિવા માતૃ-ભાભા, અને ત્યાર પછી સકારાંત સ્ત્રીલિંગ નામની માફક તનાં રૂપે ચાલે છે. તેમનું સાધનરૂપ મુદ્દા થાય છે અને તેનું સ્ત્રીલિંગરૂપ મહિલી અથવા મળી થાય છે, અંજનાં નામેની દ્વિવિધ ગતિ થાય છે. (૧) તેમને અંત્ય વ્યંજન ઉડી જાય છે અને ત્યાર બાદ ઉપર બતાવેલી પહેલી ત્રણ રીતે તેમનાં રૂપે ચાલે છે (નપુંસકલિંગ નામ પુલિંગ બની જાય છે), જેમ કે સર (૨) નું પ્રથમાનું રૂપ છે, રામ (વાન) નું વો થાય છે અથવા (૨) મુળ શબ્દને કે આ લગાડવામાં આવે છે, જેમ शरद् नु सरदो, आशिस्नु આલિતા. જે વિભક્તિએના પ્રત્યે વ્યંજનથી શરૂ થતા હોય તેમને માટે સાધારણ રીતે આ નિયમ લાગે છે. આ ઉપરથી જણાશે કે આ યુકિતઓ વાપરવાનું કારણ જનથી શરૂ થતા ૧. શ્વ, જેમકે લતે (વર૦ ૮૪૧), જેમાં જૂની પછી જ આવે છે . ८] અધ્યાપક કેવેલ લિખિત ખંડ રે પ્રત્યયે વ્યંજનાત શબ્દ સાથે જોડાતાં જે નવા જોડાક્ષરે ઉત્પન્ન થાય તથા જે નવા ફેરફાર કરવા પડે તે દૂર કરવાનું હોવું જોઈએ. પરંતુ સ્વરથી શરૂ થતા વિભક્તિના પ્રત્યે આગળ ઘણું ખરું સંસ્કૃત રૂપજ રાખવામાં આવે છે. અલબત, તેમાં પ્રાકૃત નિયમ પ્રમાણે ફેરફાર થાય છે, જેમ કે भवदा (भवत् तृतीयानु ३५), आउसा ( आयुषा, आयुस् तृतीयानु ३५). પ્રાકૃતમાં દ્વિવચન નથી તેમજ ચતુથી વિભક્તિ નથી (ચતુથીને બદલે પછી વપરાય છે); ५'यमी मक्यनना में प्रत्ययो छ हिंतो 'भांथा' नाममा प्रेमा पराय छ, भने सुतो माथी' ના અર્થમાં સાધારણ રીતે વપરાય છે. ખાસ ઉપગી એવાં પહેલા ત્રણ પ્રકારનાં રૂપે નીચે- પ્રમાણે છે. હકારાંત શબના રૂપ દુકારાંત પ્રમાણે ચાલતાં હોવાથી ખાસ અહીં આપવામાં આવ્યાં નથી. નામનાં રૂપાખ્યાન वच्छ वृक्ष (नपुंस० वण-घन) એક વચને. अपयन. वच्छो (नपुं० वणं) वच्छा (नपुं. वणाई,-इ, वणा; वणानि गधमा १५२य छ ). द्वि० वच्छं वच्छे वच्छा (नपुं० प्रथमा०) वच्छेण,-ण वच्छेहि-हि पं० वच्छादो,-दु-१ वच्छाहि, वच्छा विच्छासुंतो, वच्छेसुंतो वच्छाणं-ण वच्छे, वच्छम्मि वच्छेसु-सुं सं० वच्छ, वच्छा (नपुं० वण) वच्छा (नपुं० वणाई-इ). प्र० 8 १० वच्छस्स स० अग्गि-अग्नि (पुल्लिंग) दहि-दधि (नपुंस०). सवयन. બહુવચન प्र०. अग्गी (नपुं० दहिं ) अग्गीओ, अग्गिणो (नपुं. दहीहं,-) द्वि० अरिंग अग्गिणो अग्गी (8)-- त० अग्गिणा अग्गीहिं,-हि पं० अग्गीदो-दु-हि अग्गीहितो-संतो. go अग्गिणो, अग्गिस्स अग्गीणं,-ण. अग्गिम्मि अग्गीस,-सं सं० अग्गि (नपुं. दहि) अग्गीओ, अग्गिणो (नपुं. दहीई, इ) माला (स्त्रीलिंग) वयन. माला मालाओ,-3 माला द्वि० मालं पं. मालदो-दु-हि. मालाहितो,-संतो. ૧ ગદ્યમાં સામાન્ય રીતે રો વાળું જ રૂપ.વપરાય છે. २. माला भाटे गुमा वर० ५, २०., तथा शाकुं०भी पा १५६५२, दअमाणा श६५२ मायसी માથલીગની ટકા, એક વચન २ - અંક ૧ 1 પ્રાકૃત વ્યાકરણ-સંક્ષિપ્ત પરિચય. [૯ so એક વચન, नई मालाहिं,-हि भालाप, मालाणं,-ण मालासु, सुं सं० भाले मालामओ,-उ પ્રાકૃતમાં સ્ત્રીલીંગી કારાંત અને ઈંકારાંત તથા કારાંત અને સકારાંત નામનાં રૂપમાં ફેર- ફાર હેત નથી. गईनदी (स्त्रीलिंग) મહુવચન. प्र० જા-૩(દ્વિતીયા ? જુઓ द्वि० गई લેસન, પા. ૩૦૭, નેટ ૨) ઉ૦ ઇ-ટુ- णईहितो, सुंतो णईहिं,-हि णईणं,-ण णईस, सुं सं० इ s તથા સ્વ છેડાવાળાં ભાવવાચક નામે પ્રાકૃતમાં ર અને ૩ છેડાવાળાં બની જાય છે, જેમ કે ળા, ઉત્ત. મજૂ અને ઇન્દ્ર પ્રત્યનાં પ્રાકૃતમાં જુદાં જુદાં રૂપે થાય છે, જેમ કે છું, ચાહ, વંત, હૃત (ગદ્યમાં ચંદ્ર, દં), જેમ કે વિચાર્જી (વિવાદ). તાછીલ્યાથે ૬૪ પ્રત્યય વપરાર્ય છે, જેમ કે સિ. સ્વાથે જ (1) પ્રચય જોડવામાં આવે છે. જેમ કે સ્ત્રમ-- મહિલ, રાણી–મિ. (સૂકા) પ્રત્યયને બદલે રૂ થાય છે, જેમ કે – મા- ઉત્ત, યાયાચિલી-સાબાસત્તા (સ્ત્રીલિંગ). go स० મ-માં गई। વિભાગ રુ. સર્વનામ પ્રકરણે. પ્રાકૃતમાં સર્વનામનાં રૂપે નામ પ્રમાણે ચાલે છે. અને તે ઉપરાંત કેટલાંક નવાં રૂપ પણ ઉમેરાય છે. નીચે આપેલાં =નાં રૂપ ઉપરથી બીજા ખાસ ઉપયોગી રૂપ સમજાઈ જશે. પ્રાકૃતમાં વ્યંજનાત શબ્દ રાખવામાં આવતું નથી, તેથી સંસ્કૃતનાં કેટલાંક સર્વનામને પ્રાકૃતમાં વિભક્તિના પ્રત્યે લગાડતાં કેટલાક ફેરફાર કરવા પડે છે, જેમ કે ચિત્, તિ ને બદલે જ, , ત્ત થાય છે. પતિનું પ, અને કોઈકવાર શ થાય છે(તેથી પ્રજાતિમત્ત) ૬નું મન થાય છે; ચ નું શું થાય છે. લિમ્, ચ, તદ્દનું બીજું રૂપ વિશે, વિ, તિ પણ થાય છે કે આ પાછળના રૂપે સ્ત્રીલિંગમાં વપરાય છે તે પણ પુલિંગની અને નપુંસકલિંગની તૃતીયા અને ષટીમાં તેમનાં કેટલાંક રૂપે આવે છે. જૂનું પણ તૃતીયાનું મિના રૂપ થાય છે. ખરી રીતે પ્રાકૃતમાં સર્વનામનાં રૂપમાં બહુ નિયમિતતા જોવામાં આવતી નથી, તેથી મતિ ખરી રીતે પુલિંગ સમીનું રૂપ હેવા છતાં ઘણું વાર સ્ત્રીલિંગમાં વપરાયું છે જેમ કે રાફત્તેહ (મોનીયર વીલીયમ), પાના ૩૬, ૨૬ ૧૧૫, ૩. વરચિએ ખાસ આપેલાં કેટલાંક રૂપ હું નીચે આપું છું. તમા અને પતમાને બદલે તો અને ઘરો (૬, ૧૦,૨૦) તી અને તવાને બદલે (૬,૧૧); તે અને તાલ ને વ્યા° ૨ mamman वयन. ष० १०] અધ્યાપક કવેલ લિખિત [ અંક ૨ wa सिं. अदस् प्रथमा न्यनत्रणे निगम अह. नेथिया नया त ५g एनम् भने पनाम् ने महले नाम परायेदुलवामा मावे छ. कियद, तावत् विश्न महले केहह, केत्तिय, तेदह, तेत्तिा विरेमापेक्षा छ (४, २५); परंतु भरी:रीत केहह विरे कीहश वि.नेमाटा नये. जन्य (युल्लि.. मायन प्र० जो (जं नपुं० किं-किम् ) जे (जाई, नपुं०) द्वि० जं जे जेण, जिणा जेहि, जेहि पं० जत्तो, तु, जदो, दु जाहितो, जासुंतो जस्ल, जास' जाणं,-ण, जेसि स० जस्सि-स्सि जेसु- जम्मि,-म्मि जाहिं, जहि, जत्थ श्रीवि मवयन }जाओ-उ, जीओ, उ द्वि० जे पं० जादो, दु, जीदो (१) जाहिती, संतो, जीहितो, संतो जाहि, जीहिं त० जस्सा जासे (?) जाए,-, जालि, जाणं,-, जीणं,-ण, जीसिं, जिस्सा, जीसे (जासां, जेसि) जीमा,-अ जासु, सुं, जीसु,-सुं વરરૂચિએ (૬, ૨૫-૫૩) માં પુરૂષ સર્વનામે આપ્યાં છે. જે રૂપે નાટકમાં કદી પણ આવતાં નથી તેમને એ પૅકેટમાં મૂકયા છે. બહુવચનનાં રૂપે તદ્દન જુદી જ રીતે થાય છે, જેમ કે तुज्झ, तुम्ह, तुम्मा, अम्ह, तथा मझ. अस्मद् '' બહુવચન अहं (ई, अह, अहम्मि) अम्हे (वयं भी वय, वर०.२०,२५) द्वि० म, ममं (अहम्मि) अम्हे, णो (णे) मे, मए (मह, ममाइ) अम्हेहिं,-हि पं० मत्ती (महत्तो, ममादो-दु ममाहि) अम्हाहिती-संतो मे, मम, मज्झ, मह णो, अम्ह, अम्हाणं, अम्हे (मज्झ). मह (मए, ममम्मि) अम्हेसु वयन. प्रक जा प० -जीए-२, स० मक्यन. प्र० २ ष० स० १.जी, नाटीमा नस6ि षष्ठीमा कीस 'शाभाट सेवा अ भा १५शय याय छे. ૨. આ રૂપે ઉપકાંત રક્ષા માં મર્મ અને અર્વ રૂપે વપરાયેલાં જણાય છે. 3. मा ३॥ त सप्तश मा अम्हं, अम्मं, म्ह, अम्हि, अम्हाण ३२॥ १५शय राय छे.
१ પ્રાકૃત વ્યાકરણુ-સંક્ષિપ્ત પરિચય. [११ युप्मद् 'तु' प्र० तुमं, तुं (ते) तुज्झे, तुम्हे द्वि० (तं, तुं) तुम तुज्झे, तुम्हे, वो तइ, तप, तुमए, तुमे, (तुमाइ) ते, दे तुज्झोहि, तुम्मेहि, तुम्हेहि पं० तत्तो (तइत्तो, तुमादो,-दु, तुमाहि) तुम्हाहितो, सुतो (तुमो) तुह, तुज्झ, तुम्ह, तुम्म, तुव, वो, (भे) तुज्झाणं, तुम्हाणं तुअ, ते, दे स० तइ, तुइ, तए, (तुमए, तुमे तुमम्मि तुज्झेसु, तुम्हेसु प्रथमना त्र सध्यावायॐ शण्टानां प्राकृत३५ एअ मगर एक, दो (प्रथ० भने द्विती०-दो, दुवे, दोणि षष्ठी दोण्हं), ति (प्रथ०-तिण्णि, षष्ठी-तिह) थाय छे. पण न पहने छ थाय छे. વિભાગ ૪, ક્રિયાપદ પ્રકરણ એક વચન. ખરી રીતે જતાં પ્રાકૃતમાં એક જ ગણ (=સંસ્કૃતને પહેલે અને છો) છે. સામાન્ય રીતે બધા ધાતુઓને આજ ગણુમાં લાવવા પ્રયત્ન કરવામાં આવે છે, તે પણ અચાન્ય ગણુનાં કેટલાંક રૂપે નાટકમાં જોવામાં આવે છે. નામ પ્રક્રિયામાં જણાવ્યા પ્રમાણે ક્રિયાપદમાં પણ દ્વિવચનરૂપ થતાં નથી. કર્તરિ પ્રગમાં ફક્ત વર્તમાનકાળ, સામાન્ય ભવિષ્યકાળ, તથા આજ્ઞાથે જોવામાં આવે છે. વર્તમાનકાળનાં રૂપો. महुवयन. प्र० पु० हसामि, हसमि. हसामो,-मु,-म, हसिमो-मु, म हसम्हि हसमो,-मु,-म, हसम्हो, रह हससि हसह (गधमा हसघ,-धं) हसित्या (हसत्थ ?) तु० पु० हसदि हसइ हसंन्ति मध्यम प्रयोगमा ऋणे इषना क्यनना ३० थाय छ, २३ १. मणे, २. सहसे, ३ सहदे, अथवा सहए. माज्ञाथ. मक्यन. १. हसमु (वर०७.१८) हसामो, म हसमो,-म, हसम्ह. हससु, हस, हसाहि, हसस्स हसह, हसघ,-ध ३. हसदु', हसउ हसन्तु. द्वि० पु० એક વચન २. ૧. આ ગદ્યમાં વપરાતું રૂપ છે. તે જ પ્રમાણે હું વાળાં સામાન્યરૂપ, તથા ૬ વાળા ભૂત કૃદત પણ ગદ્યમાં વપરાતાં રૂપે છે. २. अस् ''ना३पानीय प्रभार छे. मे क्यन. १. मम्हि, २. असि, ३. आत्थ, म५० अम्हो, अम्ह, ३ सन्ति. ते प्रमाणे मेन्टमllsभा मे १० १ म्हि, २ सि ३ त्यि, महु१०१ हो, म्ह, २ त्य, भनयतनसूतभा ३१० १. भासिं, आसि, २. ३. आसि, ૧૨] અધ્યાપક કાવેલ લિખિત કઈ પણ પુરૂષપ્રત્યયની પહેલાં અને બદલે વિકલ્પ કરી શકાય છે (વર૦૧,૩૪), જેમ કે દુનિ, વિગેરે દહિ, દદુ વિ. બીજા શબ્દોમાં કહીએ તે, અર નું દ્ર રૂપ ા હેવાથી એમ કહી શકાય કે પ્રાકૃતમાં ક્રિયાપદનાં રૂપો સંસ્કૃતના દસમા ગણના ક્રિયાપદ પ્રમાણે વિકલ્પ થાય છે. પુકારાંત અને સકારાંત પહેલા ગણના સંસ્કૃત ક્રિયાપદના ચા અને લવ ને બદલે અને જો મૂકવામાં આવે છે, જેમ કે તેદુ, અતિ–-હોવિ અથવા તે ને લેપ થાય છે, અને રૂને રાખવામાં આવે છે, જેમ કે વહુ, વસિ. રાકારાંત કિયાપદમાં અર મૂકવામાં આવે છે, જેમ કે હૃતિ, ત્રિ–મ. ચેથા ગણના ધાતુઓમાં અન્ય વ્યંજને બેવડાય છે, જેમ કે સિ–ગુણિ, અથવા 9 ને લેપ કરીને જુદું જ રૂપ કરવામાં આવે છે, જેમ કે પુર-વુત્તિ. સાતમાં ગણના ધાતુઓમાં અનુનાસિક ઉમેરવામાં આવે છે, અને પછી બીજા ગણની માફક તેમનાં રૂપે ચલાવવામાં આવે છે, જેમ કે ઈન્દિરિ, , જી. પાંચમા ગણના ધાતુઓમાં જ ઉમેરવામાં આવે છે. જેમ કે ઋમિ-સુમ, varg–રૂપતુ કેટલીક વાર સંસ્કૃત રૂપે પણ રાખવામાં આવે છે, જેમ કે ચિણિ હજુ તથા જુહિ. નવમા ગણમાં ળા અને બેઉ વપરાય છે, જેમ કે રાત્રિ અને રારિ (જાનાતિ). તે ઉપરાંત કાળાહિ અને નાદિ રૂપ પણ જોવામાં આવે છે. વિધ્યથન માત્ર કેટલાંક ત્રુટિત રૂપે જ જોવામાં આવે છે, જેમ કે ૧. એવે, જીવે, ૩. એવે ૨ (પણું જુએ-વેબરનું ર૦, પા. ૬૨.) પ્રાકૃતમાં ભવિષ્યકાળનાં ઘણાં રૂપ છે. (૪) ખાસ ઉપગમાં આવતાં રૂપના પ્રત્યે નીચે પ્રમાણે છે. એકવચન. ૧. ર, રામ. ૨. સ્વતિ. ૩. , ૪૬ બહુવચન. ૧. તા. ૨. ઘં, હિં, ૩. રક્ષત્તિ. આ પ્રત્યે લગાડતાં પહેલાં લગાડવામાં આવે છે, જેમ કે તિર વિગેરે. મૂળ સંસ્કૃત પ્રત્યય ચ નું આ ર૩ પ્રાકૃત રૂપ છે. (૪) બીજા પ્રત્યમાં રસ ને બદલે છ વપરાય છે, જેમ કે તોછે (નું પ્રથમ પુરૂષી એકવચન). (જુઓ વર૦ ૭, ૧૬, ૧૭.), (૬) ત્રીજી જાતનાં પ્રત્યમાં રસ ને બદલે દિ વપરાય છે, જેમ કે સિદ્ધિનિ વિગેરે. આ ઉપરાંત પહેલા પુરૂષ એકવચન અને બહુવચનનાં વિદ્યામિ અને ત્રિદા એવાં રૂપ થાય છે. [ વળી, ઘઉં ( નું રૂપ), રા (વા નું રૂપ) પણ થાય છે, વર૦ ૭. ૨૬, રહું રૂપ વેબરના વરાહ પારા ૧૯૦ માં વપરાએલું છે.] [ વળી, , અને તેના પ્રત્યે લગાડતાં કેટલાંક વિરલ રૂપ બને છે, (ર૭, ૨૦-૨૨), જેમ કે, ઇંજ્ઞા, હિ૬, દોષ, વિગેરે. કેટલાંક ફુલ અને અંતવાળા ભૂતાર્થ વચ- નનાં વિરલ રૂપો પણ દેખાય છે, (વર૦ ૭, ૨૩-૨૪) જેમ કે સુબ, ઘોર (); જુઓ લૅસન્સ ઈન્ટ, પાક ૩૫૩–૯. ૨૦ માં ક અને શા છેડાવાળાં કેટલાંક વિધ્યર્થ રૂપે વપરા- એલાં છે.] પ્રાકૃતમાં કમણિ પ્રગમાં કરિનાજ પ્રત્યે વપરાય છે, અને ૪ પ્રત્યયને બદલે જ અથવા પ્રત્યય લગાડે છે, જેમ કે પીચ, રે અથવા તિજ્ઞા (પ). કેટલીક વાર જ રાખવામાં આવતાં પૂર્વના વ્યંજન પ્રમાણે તેનું રૂપાંતર થાય છે, જેમ કે શા (); હિસ્ટ અગર (તે). પ્રેરક લેદના પણ બે રૂપે છેએકમાં સંસ્કૃતના અ ને કરવામાં આવે છે, જેમ કે જ ઉપરથી વારિ થાય છે (ધાતુમાંના પહેલા અસરના જ ને જ કરવામાં આવે છે, વર૦ ૭. ૨૫) તે [ ૧૩ h અંક ૧] પ્રાકૃત વ્યાકરણ–સંક્ષિપ્ત પરિચય. બીજામાં આવે (?) લગાડવામાં આવે છે, જેમ કે દ્ધિ અથવા વજલિ (અહી, પ્રથ- મના ૪ નો વિકલ્પ આ થ છે, વાળ ૭. ૨૭). જે ધાતુને અંત્યાક્ષર વ્યંજનહાય તે તુમુન રૂપ કરતી વખતે તુમ લગાડવામાં આવે છે, પણ અંત્યાક્ષરવર હોય તે દુન્ લગાડવામાં આવે છે, જેમ કે વ ઉપરથી ઘઉં ની ઉપરથી નેવું ઘણીવાર વ્યંજનાંત ધાતુને હું અથવા શુ લગાડીને ધાતુને સ્વરાંત બનાવવામાં આવે છે, અને ત્યાર પછી તેને સુ પ્રત્યય લગાડવામાં આવે છે જેમ કે મg (g), કાવ્યમાં ઘણી વાર નો લેપ કરવામાં આવે છે, જેમ કે દર ઉપરથી દઉં, લિવું. સંસ્કૃતના સ્વા અતવાળા કૃદન્ત બનાવવાને પ્રાકૃતમાં અગર કા પ્રત્યય લગાડવામાં આવે છે, જેમ કે ઘ= ઉપરથી વાજ, ઘેરા ઉપરથી ઘેરૃ- સંસ્કૃતના ૬ અંતવાળા કૃદંત બનાવવાને પ્રાકૃતમાં રૂમ લાગે છે, અને ગદ્યમાં ઘણાં ખરાં આના રૂપ વપરાય છે, જેમકે ર્ નું પિત્રુ કેટલીક વાર ગદ્યમાં વા ને સ્થાને સુય વપરાય છે, જેમ કે વરદુમ (વા), દુષ (વા), વિગેરે. (૧૦ ૧૨.૧૦). કર્તરિ વતમાન કૃદંતને અંતે સંત પ્રત્યય (અથવા, વO ૭. ૩૪ પ્રમાણે ઉત) લાગે છે, જેમ કે પહંત, ગુપત (વરરુચિ ૭. ૧૧) ના કહેવા પ્રમાણે સ્ત્રીલિંગનાં પત્ત તેમજ પતી એમ બે રૂપ થાય છેમધ્યમ પ્રયાગમાં વર્તમાન કૃદંતને પ્રત્યય માને છે (સ્ત્રીલિંગમાં માળી અથવા મા પ્રત્યય લાગે છે). કમણિ પ્રાગમાં ગત અને મા પ્રત્યે લાગે છે, અને તેની પહેલાં જ્ઞ પ્રત્યય લાગે છે, જેમ કે રાત્ત (મા), તેમજ, (રહ્યમા), વરલીમાળ (ચમr), ભૂત- કૃદંતના રૂપ સંસ્કૃત પ્રમાણે થઈ તેમાં પ્રાકૃતના નિયમ પ્રમાણે ફેરફાર થાય છે, જેમકે હુ અથવા સુખ-શુત, ઋષ; કેઈક વાર ટુ વચ્ચે ઉમેરવામાં આવે છે, જેમ કે દ્ધિ (ધૃત), કુરિ (કૃત). આ ઉપરાંત કેટલાંક અનિયમિત રૂપ થાય છે, જેમ કે રુપ (રવિત). વિધ્યર્થ કૃદંત- ના જ ને તેની પહેલાંના વ્યંજન પ્રમાણે ફેરફાર થાય છે, જેમ કે વિપક્વ (વિચ), (શા), નીર પ્રત્યયને બદલે સામ, અથવા = થાય છે, જેમ કે ફૂગળી (પૂનાની), = (રાય). પ્રાકૃતમાં પક્ષભૂત કાળ નથી. તેના કારણે અકર્મક ધાતુના અર્થમાં ભૂતકાલવાચક ધાતુ- સાધિત વિશેષણ (રવિ વત્ત)ને ઉપગ કરવામાં આવે છે. અને સકર્મક ધાતુના અર્થમાં તેવાજ રૂપની કર્તની તૃતીયા અને સકમની પ્રથમ વિભક્તિ વડે કામ લેવામાં આવે છે. અવ્યવિષે પ્રાકૃતમાં વિશેષ જાણવા જેવું કાંઈ નથી. ફક્ત એટલું જ જાણવું જોઈએ કે કૃતિને બદલેર મૂકવામાં આવે છે, જેની પહેલાં મા, હું અથવા ને હસવ બનાવવામાં આવે છે, અને અનુ- સ્વારની પછી આવે તે તિ થઈ જાય છે. હસ્વ સ્વર અગર , સૌ પછી વહુ આવે તેને લો થાય છે, તથા દીર્ઘ સ્વરની પછી (તથા અનુસ્વાર પછી પણ) શુ થાય છે. તે જ પ્રમાણે પ્રવને બદલે નવ અથવા જેવ, અને પંદવ તેમજ પગ થાય છે. ઉa ને બદલે વિજ તથા =થાય છે આપ જે સવાર પછી આવે તે તેનું વિ અથવા વિ થાય છે, અને અનુસ્વાર પછી આવે તે જ થાય છે, તથા વાકયના આરંભમાં થાય છે. આ સ્થળે માગધી ભાષાનું નામ જણાવવાની જરૂર ગણું છું. તેમાં રૂ અગર ને બદલે ૧. કાવ્યમાં સ્વરની પહેલાં આવેલું અનુસ્વાર પિતાની સાથેના અંત્યસ્વરને દીવ બનાવે છે. પણ જે અનુસ્વારને તરીકે લખવામાં આવે તે તે સ્વર હસ્વ જ રહે છે, અને ત્યાર બાદ એ બેઉ શબ્દની સંધિ થાય છે જુઓ વેબર, પા.૪૭, an ४] અધ્યાપક કરેલ લિખિત [ भांड पाय छ, तथा र नेम ल् थाय छ ज २. महायतमा ने महमें प्य न्याय है; अ आशंत नामना अथमा क्यानभा छेक्ट ए भार इ आवे छ, रेभ माशे (मा.). ઉપરના નિબંધમાં,ધરવા પ્રમાણે, સાધારણ વિદ્યાર્થીઓને કાળિદાસ અગર ભાવતિનાં નાટ- કેમનું પ્રાકૃત સમજવા માટે જોઈએ તેટલું જ્ઞાન આપવામાં આવ્યું છે. અલબત, મૃચ્છકટિક અગર વિક્રમોર્વશીયનું પ્રાકૃત સમજવાને કેટલાક વિશેષ જ્ઞાનની જરૂર છે. १.ने प्राकृतना:मस्या:पधारा:डाय तेभ नीयना अयानु' मन::- 1 Lassen's Institutiones Linguae Pracritical,1837.2. Weber's सतशतकof हाल with his excellent introduction, 3870. 3. वररुचि ना प्राकृतप्रकाश, १८५४. 4. प्राकृत बाल- भाषा-(मागधी)-व्याकरण of Hemchandra, Bombay, 1873; भी थनी . विवेयनाम: આવૃત્તિ ડૉ. પલે તૈયાર કરે છે. તે ગ્રંથ ખાસ કરીને જૈન પ્રાકૃત માટે ઉપગી છે. परिशिष्टः-मन सरिभेन्ट सोसायटीना HA' ना भायमा स्तमा प्रो. વેબરે પ્રકટ કરેલા હાલકવિના સહ શતકમાંથી આયાવૃત્તની દસ ગાથાઓ નીચે આપી છે. १. पानपडिअस्स पइणो पुडिं पुत्ते समारहंतम्मि । दढमण्णुदूमिमाए वि हासो परिणीए निकन्तो ।। (११.) २. अन भए तेण विणा मणइयसुहाइ संभरन्तीए । अहिणवमेहाण रवो णिसामियो वक्षपडहो व्व। (२८), ३. तुझ वसई चि हिमयं इमेहि दिठो तुमं ति अच्छीई । तुह विरहे किसिआइ ति तीए अंगाइ विपिभाई ॥ (४०) ४. कल्लं किर सरहिअयो पत्रसइपिओ ति.सुणीअइ जणम्मि । तह वड्व भमवह णिसे जह से कलं विमण होइ ।। (४५.) ५. असणेण पेम्मं अवेइ भइदसणेण वि अवेइ । पिमुणजणजम्पिएण वि अवेई, एमेज वि अवह । (८०.) दक्खिपणेण वि एन्तो सुहम सुहावेसि म्हं हिलाई। णिकालवण जाणं गओ सि, का णिचुदी ताण ॥ ( ८४.) ७. तइया कसाव महुमर ण रमसि अण्णासु पुष्फाई। वद्धफलभारगर मालइमेहि परियसि ॥ (1) ८. उप्पण्णल्ये कजे अइचिन्तन्तो गुणागुणे तम्मि । अहसुइरसण्डपेच्छि-तणेण पुरिसो हरद कनं ।। (२१८).. ९. कलहंतरे वि अविणि-गमाइ हिममम्मि जरमुवगमाई! सुअणकाइ रहस्सा- डहर आउनए अम्गी ।। (३२८), : १०. बोलीणोलच्छिा-अनोवणी पुत्ति किण्ण दूमेसि। दिदटप्पणपोरा-जणवा जम्मभूमि व्व ॥ (३४२.) .. ,
॥ ॐ अहम् ॥
॥ नमोऽस्तु श्रमणाय भगवते श्रीमहावीराय ॥
॥ उपकेशगच्छीया पट्टावलिः॥
-
ner-
॥ श्रीमत्पार्थ जिनेंद्राय नमः ॥ श्रीमत्केशीकुमारगणधरेभ्यो नमः ॥ श्रीमद्रत्नप्रभसूरि-
सद्गुरुभ्यो नमः ॥ ओकेशशद्वन्यार्थाः लिख्यत ।। इशिक् ऐश्वर्ये, ओकेषु गृहेषु इष्टे पूज्यमाना सती या
सा ओकेशा सत्यिका नाम्नी गोत्रदेवता । अल ओक शहो अकारांतः तस्यां भवस्तस्या अयमिति वा ओकेशः।
भवे इत्यण् प्रत्ययः, तस्येदमित्यनन वा अणप्रत्ययः । सत्यिका देवी हि नवरातादिषु पर्वसु अस्मिन् गणे
पूज्यते सा चान्य गणम्य अधिष्टात्री अतएवाम्य गच्छम्य ओकेश इति यथार्थ नाम प्रोद्यते सद्भिरिति
प्रथमोऽर्थः ॥ १ ॥
ईशनमीशः ऐश्वर्य ओकर्महर्द्धिकश्राद्धप्रमुखलोकानां गृहरीशो यस्यां मा ओकेशा ओसिका
नयरी । तत भव ओकेशः । ओसिकानगर्यो हि अन्य गणम्य ओकेश इति नाम श्रीरत्नप्रभसूरीश्वरतो
विख्यातं जातमिति द्वितीयोऽर्थः ॥ २
अः कृष्णः उः शंकरः को ब्रह्मा । एपां द्वंद्वसमासे ओकास्ते ईशते पूज्यमानाः संतो देवत्वेन
मन्यमानाः संतश्च येभ्यस्ते ओकेशाः। ओके कृष्णशंभुब्रह्मभिदेवेरीशते येते वा ओकेशाः । परशासन-
जनाः क्षत्रियराज्यपुत्रादयः प्रतिबोधविधानात्तेपामयं ओकेशः । तस्येदमित्यणप्रत्ययः । श्रीरत्नप्रभसूरि-
भिस्तेषां पारतीर्थिकधर्मनिष्ठातः सिद्धान्तोक्तविशुद्धजैनधर्मनिछायां प्रतिबोधदानेन प्रवर्तना कृता । तथा
च श्रूयते पूर्व हि श्रीरत्नप्रभसूरीणां गुरवः श्रीपार्थापत्यीयकेशीकुमारानगारसंतानयित्वेन विख्यातिमंतो
जगति जज्ञिरे । नतः प्राप्तमूरिनंताः समत्तंत्रा रमणीयाऽतिशयनिचयाः स्वकीयनिस्तुपशमुखीप्राग्भार-
संभारात् ज्ञातहिंदशसूरयः श्रीमच्छ्रीरत्नप्रभसूरयः कियति गते काले विहरंतः संतः श्रीओसिका
नगयौं समवसृताः । तत्यां च सर्व लोकाः पारतीथिकधर्मधारिणो संति । न कोपि जैनधम्मर्धारी। ततः सा-
ध्वाचारं प्रतिपाल्याद्भिः सिद्धान्तोक्ततीर्थकरधर्मशुभकर्मप्ररूपणां कुर्वद्भिः सद्भिः श्रीरत्नप्रभसूरिभिः पार-
तीर्थकानेकच्छेकविवकिलोकाः प्रतिबोधितास्ततः एते ओकेशा इति विरूदो विख्यातो जातः । इति तृतीयो
..
अर्थः ॥ ३ ॥
अः कृष्णः, आः ब्रह्मा. उः शंकरः, एपा द्वंद्वे आवन्ततः ओभिः कृष्णब्रह्मशंकरदेवः कायते
स्तूयते देवाधिदेवत्वादिति ओकः प्रस्तावात् श्रीवर्धमानस्वामी कचिदिति ड प्रत्ययः, ओकश्वासा ईशश्च
ओकेशस्नम्याय ओकेशः वर्तमाननीर्थाधिपतिश्रीवर्षमानजिनपतितीर्थाश्रयणादिति चतुर्थीऽर्थः ॥ ४ ॥
.. . २] उपकेशगच्छीया पट्टावली अः अर्हन्,अः म्यादहति सिद्धे, चेत्युक्तेः । प्रस्तावादिह अ इति शब्देन श्रीवर्धमानस्वामी प्रोच्यते । ततः अस्य ओको गृहं चैत्यमिति यावत् , ओक: श्रीवर्धमानम्बाचित्यमित्यर्थः नम्मादीशः ऐश्वर्य यम्य म ओकेशः यनोयं गणः श्रीमहावीरतीर्थकरसान्निध्यतः स्फातिमवापति पंचमोऽर्थः ॥ ५ ॥ एवमग्य पदम्यानेकेप्यर्थाः संबोभुवति परं किं बहुश्रमेणेति ॥ अथ उपकेशशब्दस्य कियंतोऽर्था लिख्यतेः । उप समीपे केशाः शिरारूहाः मत्यस्येति उप- केशः । श्रीपार्थापत्यीयकेशिकुमारानगारः । एतदुत्पत्तिवृत्तांनम्तुः श्रीस्थानांगवृत्यादी सप्रपंचः प्रतीत एवास्ति । नन एवावगंतव्यः । ततः उपकेशः श्रीकशिकुमागनगारः पूर्वजो गुरुविद्यते यस्मिन् गणे म उपकेाः । अभ्रादित्वाद प्रत्ययः । अस्मिन्गछे हि श्री केशिकुमागनगारः प्राचीनो गुरुरासीत् । नतो यथार्थमुपकेश इति नाम जातमिति प्रथमोऽर्थः ॥ १ ॥ उपवर्जिताम्त्यक्ताः केशा यत्र सः उपक्केशः आसिकानगरी नस्यां हि सत्यिका देव्याश्चैत्यमस्ति । तद्ग्रे च धनेन: प्रथमजानवालकानां मुदिने दिने मुंडनं कार्यते तत उपवेश इति यथार्थ नाम ओसिका- नगर्याः प्रख्यातं जातं । तल भवो यो गच्छः स उपकेशः प्रोद्यते सद्भिविद्वद्धिः । अत्र हि भवे इत्यनेन मृलेण अणि प्रत्यये संज्ञापूर्वकस्य विधेरनित्यत्वाद्वेरभावः । श्रीरत्नप्रभमूरितो अनेकश्रावक प्रतिबोध- विधानानंतर लोके गच्छन्य उपकेशति नाम प्रसिद्ध जातमिति द्वितीयोऽर्थः ॥ २ ॥ को ब्रह्मा, अः कृष्णः, अः शंकरः, ततो द्वंद्व काः । तरीप्टे ऐश्वर्यमनुभवति यः सः केशकानां ईश: ऐश्वर्य यम्माद्वा केशः पारतीर्थिकधर्मःमः उपजिनन्न्यतो यस्मात्स उपकेशस्तीर्थकृढुक्तविशुद्धधर्मः म विद्यते यम्मिन् गच्छे म उपकेशः । अत्रापि अभ्रादित्वात्प्रत्ययः । इनि तृतीयोऽर्थः ॥ ३ ॥ कं त्र मुखं ई व लक्ष्मीः कयाँ ते ईशे स्वायत्ते यत्र यन्माद्वा स केश:--अर्थात् जनो धर्मः । म उपममीपे अधिको वाऽस्माद्गच्छात्म उपकेशः इति चतुर्थोऽर्थः ॥ ४ ॥ कश्च अश्च ईशश्च केशा:-ब्रह्मविष्णुमहेशाः । नर्मनिराकरणात्ते उपहता येन सः उपकेश: । प्रकरणादन श्रीरत्नप्रभसारः गुरुः तम्यायं उपकेशः । अत्रापि तस्येदामित्यणि प्रत्यये पूर्ववद्वन्द्वेः अभावो न दोपपोषायेति पंचमोऽर्थः ॥ ५ ॥ इत्यमन्येऽप्यनेके अर्था ग्रन्थानुसारेण विधीयते: परमलं बहुश्रमेणेति । एवमुक्तव्यक्तयुक्तिव्याक्ति- शक्त्या ओकेशोपलक्षणे उभे अपि नाम्नी यथार्थे पत्रां प्राचनः ॥ इति ओकेशोपकेशपदद्वयदशार्थी समाप्ता ।। संवत् १६५६ वर्षे ॥ श्रीमद्विक्रमनगरे . मकलवादिवृंदकंदकुद्दालश्रीकक्कुदाचार्यसंतानीयश्रीमड्री- सिद्धसरीणां आग्रहतः श्रीमदृहत्खरतरगच्छीयवाचनाचार्यश्रीज्ञानविमलगणिशिप्यपंडितश्रीवल्लभगाणिविरचि- ता चेयम् । श्रीरस्तु ॥ ग्रीप्महेमंतिकान् मासान्. अष्टौं भिक्षुः प्रचक्रमे । रक्षार्थ सर्वजंतूनां वर्षाम्वैका मंदमेंन् ॥ ? || मनुप्याणां सर्वेषु पदार्थषु सारो धर्म एव । मनुष्यत्वं धर्मेणैव वर्ण्यते ॥ स धम्मो वर्षासु मुनिपार्धात श्रोतव्यः । यतयो वर्षावकत्र तिष्ठन्ति. किमर्थं सर्व जंतूनां रक्षार्थ । धर्मभ्य सारं सर्व - " जैन साहित्य संशोधक [३ जावेषु दा । वर्षा पृथ्वी जीवाकुला भवति संयमो विराध्यते । अतो जीवरक्षार्थ चतुर्मासकल्प तिष्ठ- ति । शिवशासने पि जीवदयास्वरूपमेवं व्यावर्णित पश्यन् परिहरन जंतून मान्या मृदुसूक्ष्मया । एकाहविचरेद्यन्तु चंद्रायणफलं भवेत् ॥ १ ॥ महाभारते कृष्णद्वीपायनेनाप्युक्तं- यो दद्यात्कांचनं मेरुः कृत्स्नां चापि वसुंधरां । एकस्य जीवितं दद्यात् न च तुल्य युधिष्ठिरः ॥२॥ परेप्यवं वदति जनवाक्यम्य किं वाच्यं । मुनयः क्षेत्रन्य त्रयोदश गुणान वीक्ष्य तिष्ठति चखिल १ पाण २ थंडिल ३ वसहि ४ गोरस ५ जणा ६ उले ७ विज्ने ८ । ओसह २ धन्ना १० हिवइ १० पासंज्ञा ११ भिस्बु १२ सिज्जाय ॥ १३ ॥ एते त्रयोदश गुणाः । तत्र स्थिता दशधा समाचार्ग पालयंति- इच्छा : मिच्छा २ तहकारो ३ आवम्सिया ४ निसीहिया ५ आपुच्छणा य ६ पडिपुच्छ, ७ छंदणा य ८ निमंत्रणा य ९ उपसंपयाकाले ॥ १० ॥ समात्रारी भवे दसहा ॥१॥ पुनः धर्मशास्त्रण्युपदिशति । श्राद्धा वासनावानितचित्ताः शृण्वंति । परं चातुर्मासकात्पंचाश- दिनं व्यतिक्रांते कल्पावसरं । वीसहि दिणेही कप्पो पंचगहाणीय कप्पठवणायं । नव (९) सय तेण (९३) एहिं वुच्छिन्ना संघआणाए ॥ १ ॥ अधुना कल्पावसरे अन्यग्रन्थादगे न यथा दिव्यकोन्तुभाभरणं प्राप्य अन्यरत्नाभरणेषु निरा- दरत्यं जायते यथा च कुंडपातालामृतं प्राप्यांबुजलास्वादो न रोचते । भारतीभूपणकविजनवचनरच- नामासाद्य मामान्यजनवचांमि न रोचते । चक्रवर्तिन अग्रे मामान्यराजानोऽपसरते देवानां नंदीश्रवणे- नान्यशन्दा हीनतां वनंति । गन्धहस्तिनो गंधे अन्यगजेंना मदजलविकला भवंति । केवलज्ञानागमने अन्य ज्ञाना अपसरंनि । कल्पवृक्षाग्रेऽन्ये तरवाः न राजते । सूर्योदये ग्वद्योतस्य का प्रभाः । मुक्तिसौरव्याग्रे कानि सौख्यानि । सिंहध्वनेः पुरो यथा अन्य शब्दा न गजते तथा कल्पावसरे अन्यानि शास्त्राणि आदरो न। स कल्पो अनेकविधः-श्रीशत्रुनयकल्पः गिरनारगिर कल्पः कदंव निरिकल्पः अर्बुदाचलकल्पः अष्टापदकल्पः समेतगिरकल्पः हस्तिनापुरकल्पः मथुरानगरीकल्पः सत्यपुरकल्पः शंखेसरकल्पः स्तंभनतथि कल्पः यतीनां विहारकल्पः वस्त्रम्य कल्पसंज्ञा अनेन प्रकारेण अनेके कल्पसंज्ञाः । एके कल्पाः एवं विधा वर्तते । यस्य प्रमाणेन श्री पादलिप्ताचायों यावदायाति साधवो विहृत्य तावत् पंच तीर्थ नमस्कार विधायागच्छति । एके कल्पास्ते उच्यते येषां प्रमाणेन अदृशीकरणं आकाशगमनं स्वर्णसिद्धिः लक्ष्मी प्राप्ति मित्र पुत बांधवस्वजन प्राप्ति प्रभृति लब्धयः संपद्यते । परमयं कल्पोऽमेय महिमा निधिः इह लोका- भीष्ट सौख्यकारणं । अयं कल्पो दशाश्रुतम्कंधम्याप्टममध्ययन । नवमपूर्वात् श्री भद्रवाहु स्वामिनोदनः अमेयमहिमानिधानः सर्व पापक्षयं कर: यथाश्रूयमानः द्रुमेषु कल्पद्रुः सर्वकामफलप्रदः यथौषधीषु पीयूषं सर्वरोग हरं परं रत्नेषु गुरुडोद्गार यथा । सर्दविपापहारः मंत्राधिराजो मंत्रेषु यथा सर्वार्थ साधकः । यथा पर्वसु दीपाली सर्वात्मा सुखावहा तथा कल्पः सद्धर्मे शास्त्रेषु सर्व पापहरस्तथा सर्व सिद्धान्त मध्ये ४ ] उपकेशगच्छीया पट्टावलिः श्रीकल्पो गुरुतरः यथा पर्वतानां मध्ये मेरुः ती माहि शत्रुनयः दानमध्ये अभयदान अक्षरमध्ये कार देवेविन्द्रः ज्योतिपीपु चंद्र गजेन्द्रप्वैरावण समुद्रेषु वयंभुरमणः तुरंगमेषु रेवत ऋतुपु वसंत मृतिकयां तूरी सुगंधीपु कस्तुरी धातुधु पीतं मोहनेषु गीतं काष्टेषु चंदनं इंद्रियेषु नेत्रं व्यवहार पर्वमु दीपालिका धर्मशास्त्रेपु कल्पः सर्व पापहरः सर्व दुखक्षयंकरः । यथा जनमेजय राना अष्टादश पर्व श्रवणात् १८ विप्र हत्यात्यागः यवनिका श्यामत्वं जातं । यथा एकम्मिन् दिवसे जनमेजय राजाग्रे. पुरोहितेन कथितं पूर्वे त्रेतायुगे पांडवैश्च कारवः कृता अष्टादशाक्षोहिणिमृताः महाभारतो जातः । राजा प्रोक्तं को नाभवत् यत्तेपां निवारयति पुरोहितेन कथितं त्वां न निवारयामि । यतः अद्य दिवसात पष्टे मासे त्वं आखेटके न गंतव्यं यदा गमिप्यति तदा सूकरमृगं तेषां केटके अश्वो न क्षेपणायं यदा अम्बो क्षेपयनि तदा सगर्भा मृगी तस्यां वाणं न मोचनीयं यदा मुंचति तदा तन्या उदरं मध्ये पुत्रिका भविष्यति सा न गृहतिव्या यदा ग्राहयति तदा तस्या पाणिग्रहणं न करणीयं यदा प्राणिग्रहणं करोति तदा तम्या पट्टराज्ञपिदं न दातव्यं तम्या कथितं न मान्यं । इत्यादि भविष्यति वचनानि मया तव कथिताः म्युः परं त्वं न तिष्ठसि । अथ पट मासाः द्वित्रिदिवसोना गता तदा मालाकारणागत्य राज्ञः कथितं भो राजन तव वनो सूकरैः भग्नः । राज्ञा अश्व सजीकृत्य तेषां पृष्ठे गतः । ते पूर्वोक्तानि वचनानि सर्वे कृता गढ़वालस्य चुत्रिका दत्ता एषा वं पालय तेन पालिता परं स्वरूपा । अन्यदा राज्ञा दृष्टा सा परिणीता पूर्ववचनानि सर्वे विस्मृताः राज्ञा पट्टराज्ञी कृता। अन्यदा राज्ञा यज्ञो मंडितः अष्टादशपुराणवेत्तारः अष्टादश ब्राह्मणा आकारिताः यज्ञं यजमानं कश्चिहतेन देशान्तरादागतेन नृपोः आहूतः राज्ञा विप्राणां कथितं अहं उत्तिष्ठामि ते कथितं नहि यज्ञस्य विधातो भवति परं तव शरीरसमाना पट्टराज्ञी अस्ति राजा उत्थित ततः कटके केचिच्छातस्य रहस्यो आगतः तं ब्राह्मणाः हसिताः राज्ञी ज्ञातं एते मम हसिता क्रुद्धा राज्ञः कथिनं एते विनष्टा मां हसति ततः यदि एते मारयिष्यति तदा तब मम संबंधः । राज्ञा ने मारिता अष्टादशधा कुटा जातं । ततः पूर्वपुरोहितेन कथितं वरं त्वया न कृतं राज्ञा कथितं अधुना कथय किं करोमि तेन कथितं अष्टादश पुराणानि निसंदेहानि शृणु । ते चामि - आदि पर्व१ सभा पर्व २ विराट पर्व ३ आरण्यक पर्व४ उद्यान पर्व५ भीष्म पर्व द्रोण पर्व७ कर्ण पर्व शल्य पर्व९ सौतिक पर्व १ गर्म- पाल पर्व ११ शान्ति पर्व १२ शासन पर्व१३ आसुमाग्य पर्व १४ मेपक पर्व१५ मुशल पर्व१६ यज्ञ पर्व १७ स्वर्गारोहण पर्व १८ ॥ एभिरष्टादशविप्रहत्याक्षयकृतायवनिकाश्यामत्वं जाताः । तथा अयमपि अधुना ये मुनयः उपवासत्रयेण वाचयति चतुर्विधसंघो अष्टमेन शृणोति तदा तस्मिन्नेव भवे मोक्षः । यदि द्रव्यक्षेत्रकालसद्भावा भवंति । न चेत्तदा तृतीयभवे पंचमे भवे सप्तमे भवे अवश्य मोक्षः । पूर्व मुनयः पाक्षिकसूत्रवर्ध्वस्थाः कथयति चतुर्विध संघ ऊद्भर्वसन्नेव श्रृणोति परं श्रीवीरनिर्वाणात९९३ वर्षे गते आनंदपुरे ध्रुवमेनराज्ञः सभायां पुत्रशोकापनोदाय देवाद्धिमुनिना सभासमक्षं वाचितः श्रावकाः तांबूलदाना- दिप्रभावना कृता । तादनादाभ्य सा रीतिः। परं त्वस्य कालम्य वाचनैवोच्यते न तु व्याख्या । पूर्वे ये पाद- लिसाचार्य-सिद्धमेनदिवाकरप्रभृतयो अभूवन तैरपि वाचनैवोक्ता अन्येषां का वार्ता । यतः सिद्धान्ते इत्युक्तमस्ति सव्वनईणं जइहु वालुआ इत्यादि । एवंविधम्य कल्पम्य यदहं वाचनामनोरथं करोसि स बाहुभ्यां ममुद्रतरणमभिलपामि । यथा कुब्ज उच्चफलं लातुमिच्छति तथाऽहं यदिच्छामि वाचनां; कर्तुं तत् संघस्य सांनिध्यं पुनः गुरूणां प्रासादः । यद्वर्षाकाले मयुगे नून्यं करोति तज्जलधरगर्जिनश्माणं । दृपद्रूगश्चंद्र- .
जैन साहित्य संशोधक [५ . कांतमणिर्यदमृतं खूते तच्चंद्रस्य प्रमाणं । सूर्यसारथी रवि:आरूणः पंगोपि यदाकाशमुल्लंघयति तत्सूर्यस्य प्रमाणं । पुत्तालिका नृत्यं करोति तद्दिजालिकस्य प्रमाणं । तथाऽहं मंदबुद्धिः मूर्खशिरोमणिः प्रमाणे सप्र- माणता नास्ति, लक्षणे सल्लक्षणता न, अलंकारस्याऽलंकरणं नहि, साहित्ये साहित्यं नास्ति, छंदास सुछंदता न; एवंविधो पि वाचनाय साहसं करोमि तत् सद्गुरूणां प्रसादः। पुरातनैयाख्या कृता। ममापि युक्तिः । कथं जं देवो सायरो लहरिगज्जतनीरपडिपुन्नो । ता किंगामतलाओ जलमरिओ लहरिगा देऊ ॥ १ ॥ जइ मरह भावछंदे नच्चइ नवरंग चंगमा तरूणी। ता किंगामगहिल्ली तालिछंदेन नच्चेइ ॥ २ ॥ जइ दुद्धधवलखीरी तडफडइ विविहभंगेहि । ता कुक्कसकणसहिया रव्वडिया मा तडव्वडह ॥३॥ अहं यद्वेद्मि तद्गुरूणां प्रसादः । टोलो रोलो रुलंतो अहियं विन्नाण नाण परिहीणो । दिव्वुव वंदणिज्जो विहिओ गुरुसुत्तहारण ॥४॥ गुरवः श्रीपार्श्वनाथसंतानीयाः । १ श्रीपार्श्वनाथशिष्यः प्रथमो गणधरः श्रीशुभदत्तः। २ तत्पट्टे श्रीहरिदत्तः । ३ तत्पट्टे श्रीआर्यसमुद्रः । ४ तत्पट्टे श्रीकेशीगणधरः तेन परदेशीनृपः प्रतिवोधितः । राजप्रश्नीयउपांगे प्रसिद्धः । ५ तत्पद्देश्रीस्वयंप्रभसूरिः । ( स्वयंप्रभसूरिशिष्य बुद्धकीर्तिसुं वौधमत नीकल्यो, आचारांग टीकासु जाणनो ) अन्यदा स्वयंप्रभसूरि देशनां दृढतां उपरि रत्नचूडविद्याधरो नंदीस्वरे गच्छन् तत्र विमानः स्तंमितः । तेन चिंतितः मदीयो विमानः केन स्तंभितः । यावत् पश्यति तावदधो गुरुदेशनाददंतं पश्यति । स चिंतयते मयाऽविनयः कृतः यतः जंगमतीर्थस्य उल्लंघनं कृतं । स आगतः गुरुं वंदति धर्म श्रुत्वा प्रतिवुद्धः । स गुरुं विज्ञपयति मम परंपरागता श्रीपार्श्वजिनस्य प्रतिमास्ति तस्या वंदने मम नियमोऽस्ति सा रावणलंकेश्वरस्य चैत्यालये अभवत् । यावत् रामेण लंका विध्वांसता तावद् मदीयपूर्वनेन चंद्रचूडनरनाथेन वैताव्य आनीता।सा प्रतिमा मम पाश्चस्ति । तया सह अहं चारित्रं ग्रहीष्यामि। गुरुणा लाभं ज्ञात्वा तस्मै दीक्षा दत्ता। क्रमेण द्वादशांगी चतुर्दश पूर्वी वभूव गुरुणा स्वपदे स्थापितः। श्रीमद्वीरजिनेश्वरात् द्विपंचाशतवर्षे (५२) आचार्य पदे स्थापितः । पंचाशतसाधुभिसह धरां विचरति । श्रीलक्ष्मीमहास्थानं तस्याभिधानं १ पूर्व नाम गुजरातिमध्ये कृतयुगे रयणमाला २ त्रेतायुगे रयणमाला ३ द्वापरे श्रीवीरनयरी ४ कलियुगे भीनमाल ६ तत्र श्रीराजाभीमसेन तत्पुतश्रीपुंज तत्पुत उत्पलकुमार अपरनाम श्रीकुमार तस्य बांधव श्रीसुरसुंदर युवराज राज्यमारधुरंधर । तयोरमात्य चांद्रवंशीय द्वौ भ्राता तत्र निवासी सा उहड १ उद्धरण २ लघु भ्राता गृहे सुवर्ण संख्या आप्टादश कोट्यः संति । वृध्दभ्रातुहे ९९ नवनवति लक्षा संति । ये कोटी- श्वरास्ते दुर्गमध्ये वसंति ये लक्षश्वरास्ते वाह्ये वसंति । तत उहडेन एकलक्ष भ्रातुः पार्थे उच्छीर्ण याचितं । ततो वांधवेन एवं कथितं भवते विना नगरं उध्वसमस्ति, भवतां समागमे वासो भविष्यति । एवं ज्ञात्वा राजकुमार उहडेन आलोचितवान् नूतनं नगरं वसेयं ततो मम वचनं अग्रे आयातः । ढीलीपुरे राजा श्री साधु तस्य ऊहडेन ५५ तुरंगमा भेटिकृता उवएसा संतुष्टो ददौ । ततो भीनमालात् अष्टादश १८ सहस्र कुटुंब अगात् । द्वादश योजना नगरी जाताः। तत्र श्रीमद्रत्नप्रभसूरीपंचसयासीप्य समेत लुणद्रही समायाति । मासकल्प अरण्ये स्थिता । गोचर्या मुनीश्वरा ब्रजति परं भिक्षा न लभते । लोका मिथ्यात्व वासिताः यादृशा गता तादृशा आगता मुनीश्वराः । पात्राणि प्रतिलेप्य मासं यावत् संतोषेण स्थिताः पश्चात् विहारः कृतः । पुनः कदाचित् तत्रायातः । शासनव्या कथितं भो आचार्य अत्र चतुर्मासकं कुरु । .
- ६] उपकेशगच्छीया पट्टावलिः तव महालामो भविष्यति । गुरुः पंच त्रिंशत् मुनिभिः सह स्थितः । मासी द्विमासी तृमासी चतुर्मासी उ- प्पोसित कारिका । अथ मंत्रीश्वर उहड सुतं भुजगेन दप्टः। अनेक मंत्रवादिनः आहूताः परं न कोपि समर्यन्तैः कथितं अयं मृतः दाघो दयितां । तस्य स्त्री काप्टभक्षणे स्मशाने आयाता । श्रेष्टस्य महान् दुःखो जातः । वादिनान आकर्ण्य लघुशिप्यः तत्रागतः {झंपाणो दृष्ट्वा एवं कथापयति भो ! जीवितं कर्म ज्वालयततैः श्रेष्टिने कथित एषः मुनीश्वरः एवं कथयति श्रेष्टिना झपाणो वालितःशुल्लकः प्रनष्टः गुरुः पृष्ठे स्थितः। मृतकामानीय गुरु अग्रे मुंत्रति श्रेष्टि गुरु चरणे शिरं निवेश्य एवं कथयति भो दयालु मम देवो रुष्टः मम ग्रहो शून्यो भवति । तेन कारणेन मम पुत्रभिक्षां देहि । गुरुणा प्रासु जलमानीय चरणी प्रता- त्य तस्य छंटितं। सहसात्कारेण सज्जो वभूव हर्ष वादित्राणि वव । लोकः कयितं श्रेष्टि सुतः नतन नमो आगतः । श्रेष्टिना गुरूणां अग्रे अनेकमणि मुक्ताफल सुवर्ण वनादि आनीय भगवान् गृह्यतां । गुल्गा कथितं मम न कार्य परं भवद्भिः जिन धम्मों गृह्यतां ! सपाद लक्ष श्रावकानां प्रति बोधि कारक । पूर्व श्रेष्ठिना नारायण प्रासादं कारयितुमारव्यं । स दिवसे करोति रात्री पतति सर्वे दर्शनिनः पृष्टा न कोपि उपायो कथितं तेन रत्नप्रमाचार्यों प्रष्ट:-~-भगवान् मम प्रासादो रात्रौं पतति । गुरुणा प्रोक्तं कस्य नामेन कारयतः । नारायण नामेन । एवं नहि महावीर नामेन कुरु मंगलं भविष्यति । प्रासाद- स्य विघ्नं न भविष्यति श्रेष्टिना तयैव प्रतिपन्नं । अथ शामनदेन्या गुरूणां कथितं हे मगवन् अस्य प्रासाद योन्यं मया देव गृहात् उत्तरस्यां दिशी लूणद्रहाभिधानं इंगरिकायां श्री महावीर विवं कारयितुमारब्धं । तत्र तेन श्रेष्टिना गोपाल वचनात् गोदुग्ध सावकारणं ज्ञात्वा सर्वेपि दनिनः पृष्टाः तः पृथक् पृथक् भापया अन्यदन्यदुक्तं । ततः श्रेष्टिना स आचार्योऽभिवंद्य पृष्टः नतः शासन व्या वाक्यात् आचार्यों ज्ञात्वा एवं कथयति तत्र त्वत्प्रासाद योग्य वित्रो भविष्यति परं षट् मासैः सार्द्ध सप्त दिनः निष्कासनीयं । श्रेष्टि उच्छुक संजातः । किंचिनर्दिनः निष्कासितः निंबु फल प्रमाण हृदयस्य ग्रन्थीद्वय सहित। आत्रायः प्रोक्तं अद्यापि किंचित् असंपूर्ण विवं विलंबन्य श्रेष्टिना प्रोक्तं गुरुणां कर प्रासादात् संपूर्ण भविष्यति। तेनावसरे कोरंटकम्य श्राद्धानां आव्हानं आगतं । भगवन् प्रतिष्ठार्थमा- गच्छ । गुरुणा कयितं मुहूर्त वेलायां आगच्छामि । सप्ठत्या ७० वत्सराणां चरम-जिनपतेर्मुक्तनातस्य वर्षे पंचम्यां शुक्लपक्षे सुरगुरुदिवसे ब्रह्मणः सन्मूहुत्ते । रत्नाचार्यैः सकलगुणयुतैः सर्वसंधानुज्ञातैः श्रीमद्वारस्य विवे मवशतमयने निर्मितयं प्रतिष्ठा :॥ १ ॥ उपकेशे व कोरटे तुल्यं श्री वीरविषयोः प्रतिष्ठा निर्मिता शक्त्या श्रीरत्नप्रभसूरिभिः ॥ २ ॥ निजलपेण उपकेसे प्रतिष्टा कृता वैक्रिय रूपेण कोरंटके प्रतिष्टा कृता श्राद्ध द्रव्यन्ययः कृतः। ततस्तेन श्रेष्ठिना श्रीओपकेश पुरस्य श्रीमहावीर चिंत्र पूजा आरात्रिका स्नात्रकरण देव वंदनादिविधिः श्रीरत्नप्र- माचार्यात् शिक्षिता । तदनंतरं मिथ्यात्वाभावात् श्रावकत्वं केषांत्रित् श्रेटिसंबंधिनां संजात। ततः आचा- र्येण ते सम्यक्त्वधारी कृता । एकदा प्रोक्तं भो यूयं श्राब्दा तेषां देवीनां निर्दयत्रित्ताया महिष बोत्कटादि ।
जैन साहित्य संशोधक [७ जीववधास्थि भंगशब्द श्रवण कुतुहलप्रियया अविरतायाः रक्तांकितभूमितले आर्द्रचर्मबद्धवंदनमाले निठुरजनसेवितं धर्मध्यानविद्यापके महावीभत्सरोद्रे श्री सच्चिकादेवि गृहे गंतु न बुध्यते । इति आचार्यवचः श्रुत्वा ते प्रोचुः प्रमो युक्तमेतत् परं रौद्रा देवी यदि छलिस्याम तदा सा कुटुंवान् मारयति। पुनराचार्यः प्रोक्तं अहं रक्षां करिस्यामि । इत्याचार्यवाक्यं श्रुत्वा ते देवी गृहेगमनात् स्थिताः। आचार्याणां प्रत्यक्षीभ्य देव्या सकोपमित्युक्तं आचार्य मम सेवकान् मम देवगृहे आगच्छमानान् निवारणाय त्वं न भविष्यति । इत्युक्त्वा गता देवी परं सातिशय कालभावात् महाप्रभावात् अनेकंसुरकृतप्रातिहार्ये आचार्य देवी न प्रभव- ति । एकदा छलं लब्ध्वा देन्या आचार्यस्य कालवेलायां किंचित् स्वाध्यायादि रहितस्य वामनेत्र- भ्ररधिष्टिता । वेदाना जाता । आचार्यैः यावत् सावधानीमूय पीडायाः कारणं चिंतितं तावत् देवी प्रत्यक्षीभूय इत्ति प्रोक्तं मया पडिा कृता । अहं स्वशक्त्या त्वां स्फेटयिष्यामि इति सावष्टंमं आचार्योक्तं श्रुत्वा समयाकूतं सा विनयं प्रोक्तं भवादृशानां ऋषीणां विग्रहं विवादो न युक्तः । यदि त्वं कडमडडं ददासि तदाहं वेदनां अपहरामि । आचंद्राकै त्वकिंकरी भवामि इति श्रुत्वा आचार्यः प्रोक्तं कडडमडडं दापयिष्यामि । इत्युक्ता गता देवी। प्रभाते श्रावकानामाकार्य तैः पक्वान्न खज्जकादि सुंडकद्वयं कर्पूरकुंकुमादिभोगश्च आनीय श्रीसच्चिकादेवी देवगृहे श्रीरत्नप्रभाचार्यः श्रावकैः सार्धं गतः। ततः श्रावकैः पार्थात् पूजां कराप्य वामदाक्षिणहस्ताम्यां पक्वान्नसुंडकादि चूर्णयद्भिः आचार्यैः प्रोक्तं देवी कडडमडडं दत्तमस्ति । अतः परं ममोपासिका त्वं इति वचनानंतरं एव समीपस्थ कुमारिका शरीरे आवेशः कृतः । ततः प्रोक्तं प्रभो मया अन्य कडडमडडं याचितं अन्यं दत्तं । आचार्यैः प्रोक्तं त्वया वधोयाचितः स तुलातुं दातुं न बुध्यते इत्यादिसिद्धान्तवाक्यं कुमारी शरीरस्था श्रीसच्चिकादेवी सर्वलोक प्रत्यक्ष श्रीरत्नप्रभाचार्यैः प्रतिबोधिता । श्रीउपकेशपुरस्था श्रीमहावीरभक्ता कृता सम्यक्त्वधारिणी संजाता । आस्तां मांसं कुसुममपि रक्तं नेच्छति । कुमारिका शरीरे अवतीर्णा सती इति वक्ति भो मम सेवका यत्र उपकेशपुरस्थं स्वंयभू महावीरविवं पूजयति श्रीरत्नप्रभाचार्य उपसेवति भगवन् शिष्यं प्रशिष्यं वा सेवति तस्याहं तोपं गच्छामि। तस्य दुरितं दलयामि यस्य पूजा चित्ते धारयामि। एतानि शरीरे अवतीर्णा सा कुमारी कथ्यतां । श्रीसञ्चिकादेव्या वचनात् क्रमेण श्रुत्वा प्रचुरा जनाः श्रावकत्वं प्रतिपन्नाः। क्रमेण श्रीरत्नप्रभाचार्य ८४ वर्षे स्वर्ग गतः। ८ तत्पट्टे यक्षदेवाचार्यः माणभद्र यक्ष प्रतिबोध कर्ता संघस्य विष्नो निवारितः । ९ तत्पट्टे कक्कसूरि । १० तत्पटे देवगुपसार । ११ तत्पट्टे सिद्ध सूरि । १२ तत्पट्टे रत्नप्रम सूरि । १३ तत्पट्टे यक्षदेव सूरि। १४ तत्पट्टे कक्क सूरि। स्वयंभू श्रीमहावीर स्नात्र विधि काले, कोसौ विधिः कदा किमर्थ संजातः इत्युच्यते-तस्मिन्नेव देव गृहे अष्टान्हिकादिकमहोत्सवं कुर्वतास्तेषां मध्ये अपरिणतवयसा केषांचित् चित्ते इयं दुर्बुद्धिः संनाताः। यदुत भगवत् महावीरस्य हृदये ग्रन्थी द्वयं पूजां कुर्वतां कुशोमा करोति अतः मशकरोगवत् छेदयितां को दोषः। वृद्धैः कथितं अयं अघटितः टंकिना घातो न अर्हः। विशेषतो अस्मिन् स्वयंभू श्री महावीर विवे । वृद्धवाक्यमवगण्य प्रच्छन्नं सूत्रधारस्य द्रव्यं दत्वा ग्रन्थिद्वयं छेदितं तत्- क्षणादेव सूत्रधारो मृतः। ग्रन्थिच्छेदप्रदेशे तु रक्त धारा छुटिता । तत उपद्रवो जातः । तदा उपकेश- गच्छाधिपति श्रीकक्क सूरिभिः पायम्दिः चतुर्विधसंघेनाहूता वृत्तांतं कथितं । आचार्यैः चतुर्विधसंघ स- ..
.. ८] रेपकशगच्छीया पट्टापलिः हितेन उपवास त्रयं कृतं । तृतीय उपवास प्रान्ते रात्रिसमये शासनदेवी प्रत्यक्षी भूय आचार्याय प्रोक्त-हे प्रभो न युक्तं कृतं वालश्रावकैः मद् घटितं बिंबं आशातितं । कलानीशकृतं अतोनंतरं उपकेशनगरं शनैः २ उपभ्रंसं भविष्यति । गच्छे विरोधो भविष्यति । श्रावकाणां कलहो भविष्यति ।गोष्ठिका नगरात् दिशोदिशं यास्यति । आचार्यैः प्रोक्तं परमेश्वरि भवितव्यं भवत्येव परं त्वं श्रवतुरुधिर निवारय । देल्याप्रोक्तं घृत घटेन दधि घटेन इक्षुरस घटेन दुग्ध घटेन जल घटेन कृतोपवासत्रय यदा भविष्यति तदा अष्टादशा गोत्र मेलं कुरु; तेमी १ तातहड गोत्रं । २ बापणा गोत्रं। ३ कर्णाट गोत्रं । ४ वल गोत्रं । ५ मोराक्ष गोत्रं । कुल हट गोत्रं । ७ विरिहट गोत्रं । ८ श्रीश्रीमाल गोत्रं । ९ श्रेष्टिगोत्रं। एते दक्षिण बाहु। १ सुचंती गोत्रं । २ आइचणा गोत्रं । ३ चारवेडीया गोत्रं । ४ भाद्र गोत्रं । ५ चींचट गोत्रं (देशलहरासाखा)। ६ कुंभट गोत्रं । ७ कनउजया गोत्रं । ८ डिंडभ गोत्रं । ९ लघु श्रेष्टि गोत्रं । एते वाम बाहु स्नानं कर्तव्यं नान्यथाऽशिवो शान्तिर्भविष्यति । मूल प्रतिष्ठानंतरं वीर प्रतिष्ठा दिवसातीते शतत्रये ३०३ अनेहसि अंथियुगस्य वीरोरस्थस्य भेदोऽजनि देव योगात् इत्युक्तं श्रीमदुपकेशगच्छचरित्र सूत्रे श्लोक-१७२ १५ तत्पट्टे श्रीदेवगुप्तसूरि। १६ तत्पट्टे सिद्ध सूरि। १७ तत्पट्टे रत्नप्रभ सूरि। १८ एवं अनुक्रमेण श्रीवीरात् वर्षे ५८५ श्रीयक्षदेवसारर्वभूव महाप्रभावकर्ता द्वादशवर्षे दुर्भिक्षमध्ये वज्र स्वामी शिष्य वज्रसेनस्य गुरोः परलोकप्राप्ते यक्षदेवसूरिणा चत्वारि शाखाः स्थापिताः- १९ तत्पट्टे कक्कसूरि । २० तत्पट्टे देवगुप्तसूरि । २१ तत्पट्टे सिद्ध सूरि । २२ तत्पट्टे रत्नप्रभसूरि । २३ तत्पट्टे यक्षदेव सूरि । २४ तत्पट्टे कक्क सूरि । २५ तत्पट्टे देवगुप्तसूरि । २६ तत्पट्टे सिद्ध सूरि । २७ तत्पट्टे रत्नप्रभसूरि । २८ तत्पट्टे यक्षदेव सूरि । २९ तत्पट्टे कक्कसूरि । ३० तत्पट्टे देवगुप्त सूरि । ३१ तत्प सिद्धसूरि। ३२ तत्पट्टे रत्नप्रभ सूरि । ३३ तत्पट्टे यक्षदेव सूरि । ३४ तत्पट्टे ककुदाचार्य । तत्पट्टे देवगुप्ताचार्य। तत्पट्टे सिद्धाचार्य। एतानि पंच उपकेशगच्छाधिपा- चार्याणां मूलनामानि। तत्पट्टे कक्कसूरिद्वादश वर्षयावत् षष्ट तप आचाम्लसहितं कृतवान् । तस्य स्मरणस्तोत्रेण मरोटकोटे सोमकश्रेष्टिस्य श्रृंखला त्रुटिता । तेन चिंतितं यस्य गुरोः नामस्मरणेन बंधनरहितो जातः एकवार तस्य पादौ वंदामि । स भरुकच्छे आगतः। अटणवेलायां सर्वे मुनीश्वरा अटनार्थं गतास्ति । सच्चका गुरो अग्रे स्थितास्ति। द्वारो दत्तोस्ति तेन विकल्पं कृतं । शच्यका शिक्षा दत्ता मुखे रुधिरो वमति । मुनीश्वरा आगता ।वृद्धगणेशेन ज्ञातं भगवन् द्वारे सोमकश्रेप्टी पतितोस्ति। आचार्यैः ज्ञातं अयं सच्चिकाकृतं । सच्चि- का आहूता कथितं त्वया किं कृतं । भगवन् मया योग्यं कृतं । रे पापिष्ट यस्य गुरुनामग्रहणे बंधनानि शृंखलानि त्रुटितानि संति स अणाचारे रतो न भविष्यति । परं एतेन आत्मकृतं लब्धं । गुरुणा प्रोक्तं कोपं त्यज शांतिं कुरु ।तया कथितं यदि असौ शान्तिर्भविष्यति तदा अस्माकं आगमनं न भविष्यति प्रत्यक्ष । गुरुणा चिंतितं भवितव्यं भवत्येव स सज्जकृितः। सच्चिकावचनात् द्वयोर्नाम भंडारे कृताः श्रीर- त्नप्रभसूरि अपरश्री यक्षदेवसूरि एते सप्रमावा एतदनेहसि अस्य उपेकशगणस्य द्वाविंशति शाखा नामानि दत्तानि जैन साहित्य संशोधक [९ १ नागेन्द्र. २ चन्द्र ३ निवृत्ति ४ विद्याधराणां स्थाने १ सुंदर २ प्रम ३ कनक ४ मेरु ५ सार ६ चंद्र ७ सागर ( हंस ९ तिलक १० कलस ११ रत्न १२ समुद्र १३ कल्लोल १४ रंग १५ शेखर १६ विशाल १७ राज १८ कुमार १९ देव २० आनंद २१ आदित्य २२ कुंभ इति । ततः तेनैव कक्कसूरिणा अर्बुदाचलमेखलायां तृषार्तस्य संघस्य डंड स्थापनेन जलं प्रगटि कृतं । तेनैव साधर्मिक वात्सल्ये जेसलपुरात् भरुकच्छे घृतो आनीतः । ३५ तत्पट्टे श्रीदेवगुप्तसूरि । तत्पदमहोत्सवे पाठकाः पंच स्थापिता जयतिलकादि। तेन जयति- लकेन श्रीशान्तिनाथचरित्रं निर्मितं । ३६ तत्पट्टे सिद्ध सूरि । ३७ तत्पट्टे कक्क सूरि । ३८ तत्पट्टे देवगुप्तसूरि । ३९ तत्पट्टे सिद्धसूरि। ४० तत्पट्टे कक्क सूरि । ४१ तत्पट्टे देवगुप्तसूरि।सं० ९९५ वर्षे बभूव । ४२ क्षत्रीयवंशोत्पन्नत्वात् वीणावादने तत्परं क्रियाविषयं सिथिलः । ततः चतुर्विधसंघेन तत्पट्टे वीस विस्वोपकारकः स्थापितः श्रीसिद्धसूरिः । ४३ तत्पट्टे कक्कसूरिः पंचप्रमाणग्रन्थकर्ता । ४४ तत्पट्टे संवत् १०७२ वर्षे श्रीदेवगुप्तसूरि । ४५ तत्पट्टे नवपद प्रकरण-स्वोपज्ञटीकाकर्ता सिद्धसूरि । ४६ तत्पट्टे कक्क सूरि । ४७ तत्पट्टे देवगुप्तसूरि । ४८ तत्पट्टे सिद्ध सूरि । ४९ तत्पट्टे कक्कसूरि । ५० तत्पट्टे संवत् ११०८ वर्षे देवगुप्त सूरिर्बुभूव । भीनमाल नगरे साह भईसाक्षेन पद महो- त्सवे सप्तलक्ष धन व्ययो कृतः। ततोः गुरुणा पादप्रक्षाल्येन जले विषापहार लब्धी येन भइसाक्ष श्रेष्ठिना श्री देवगुप्त सूरेः पद महोत्सवः कृतः। स पूर्व डिंडवाण पूरे भइसा भार्या छगणाणि स्थाप्यते ततो गुरूपदे- शेन ज्वालितानि छगणानिरुप्यमयानि भवति ततो तेन रुप्येन गदहिया मुद्रा पातिता । भइसाक्ष माता श्री शत्रुजय यात्रागता खरच तुट्यते पत्तन मध्ये ईश्वरश्रेष्ठिनः पार्चे खरचो याचिता । तेन पृष्टं भवती कस्य माता तेन कथितं अहं भइसाक्ष माता । तेन हसितं अस्माकं गृहे पानीयमानयंति तेषां माता इति वित तिं। ततोऽनंतरं पश्चात् धनं गृहीत्वा यात्रां कृत्वा संघभक्ति कृत्वा गृहे जगाम । पुत्रेण प्रष्ट मातः मम कियभूमी नामं वर्तते । माता कथितं भवतां प्रतोली द्वारं यावन्नाममस्ति । तेन वचनेन असंतोषो जातः । श्रेष्टि हास्यवचनं कथितं । तद्वचनं वालयिस्यामि तदा द्वितीय वेला भोजयिप्यामि । एवं प्रतिज्ञां कृत्वा पत्तने सामान्यवेपे द्वार हट्टे गतः । भो श्रेष्टि रूप्यं अहिप्यसि । तेन कथितं रोषभरेण यत्किचिदानयिष्यसि तत्सर्वे गृह्णामि । संचकारो याचितः तेन युष्माभिर्दीयते सवालक्ष मुद्रिका दत्ता । ततो गर्दभयानि भारयत्वा पत्तने जगाम । पृष्टं एतत्कि रुप्यं वर्तते एवं श्रुत्वा श्रेष्टिनः चमत्कृताः स श्रीष्टि समग्र पत्तनश्रेष्टि मेल. यित्वा चरणे पपात । भइसाक्षस्तदेव कथितं गुर्जरधरीत्रीमध्ये महिषेण पानीयमानयेतुं तदा मोचयामि । तद्धनं देशे सप्तक्षेत्रे व्ययो कृतः । ततो गादिया इति शाखा जाता । ५१तत्पट्टे श्री सिद्धसूरि । ५२ तत्पट्टे श्री कक्कसूरि संवत् ११५४ वर्षे वभूव । येन हेमसूरि कुमारपाल वचसा कृपाहीना मुनिवरा निष्कासिता । ५३ तत्पट्टे देवगुप्तसूरि येन लक्ष द्रव्यं त्यजितं । ५४ तत्पट्टे श्री सिद्धसूरि । ५५ तत्पट्टे संवत् १२५२ श्री ककसूरिर्वभूव येन मरोट कोटः प्रगटी कृतं । - १०] उपकेशगच्छीया पट्टावलि: ५६ तत्पट्टे श्री देवगुप्तसूरि । ५७ तत्पट्टे श्री सिद्धसूरि । ५८ तत्पट्टे श्री कक्कसूरि । ६० तत्पट्टे श्री सिद्धसूरि । ६१ तत्पट्टे श्री ककसूरि । ५९ तत्पट्टे श्री देवगुप्तसूरि । ६२ तत्पट्टे श्री देवगुप्तसूरि । ६३तत्पट्टे श्री सिद्धसूरि । ६४ तत्पट्टे श्री कक्कसूरि। ६५तत्पद्दे श्रीदेवगुप्तसार । ६६ तत्पट्टे संवत् १३३० वर्षे चीचट गोत्रेऽतएव उवरराय स्थापितः श्री अर्बुदाचल तल- हटीकालंकारो वरणीनगरतः शा० देशलेन श्री शत्रुजयादि सप्त तीर्थेषु चउदश १४ कोटि द्रव्य व्ययेन चउदश यात्रा कृता चतुर्दश वारान् । प्रथमं देवगुप्तसूरि तत्पट्टे सिद्धसूरि प्रमुख समग्र सुवि- हित सूरि हस्तेन संघपति तिलकः कारितं । उक्तं च श्री देशलः सुकृत पेसल वित्त कोटी । चंचचतुर्दश जगज्जनितावदातः । शत्रुजय प्रमुख विश्रुत सप्त तीर्थः । यात्रा चतुर्दश चकार महामहेन ॥ १ ॥ तत्पुत्र समरसहनाभ्यां विमलवसत्युद्धारः कारितः संवत् १३७१ वर्षे । तथा एवमपरेरपि तिर्थयात्रा कृत्वा संघपतेः पदं स्वाकीरितं इत्युक्तमुपदेशरसाले । साह देसलेन पाल्हणपुरे श्री सिद्धसूरि पद महोत्सवो कृतः । तेन सिद्धसूरिणा समराग्रहेण शत्रुजये षष्ठोद्धारे श्री आदिनाथस्य प्रतिष्ठा कृता । ६७ तत्पट्टे संवत् १३७१ वर्षे साह सहजागरेण श्री कक्कसूरि पढ़ महोत्सवो कृतः । येन गच्छप्रबंधः कृतः । तत्र देसल पुत्राः समर-सहजानां चरित्रमस्ति । एवं उपकेश गच्छे अनेक प्रमा- वका ग्रन्थकर्तारो निरीहा सूरयो अभूवन् तेषां कियद् गण्यते एवं- ६८ तत्पट्टे श्री देवगुप्तसूरि वभूवः । कवि सार्वभौम विद्वच्चक्रचूडामणि सिद्धन्तपारगामी सर्वशास्त्रपारंगत । श्री सारंगधरेण संवत् १४०९ वर्षे दिल्यां मध्ये पद महोत्सवो विहितः सुवर्ण- सहस्र पंचक व्ययेन । ६९ तत्पट्टे श्री सिद्धसूरिः संवत् १४७५ वर्षे गुणभूरय अणहिलपाटक पत्तने चोरवेडीया गोत्रे साह झावा नीवागरेण पद महोत्सवः कृतः गुरूणां । ७० तत्पट्टे संवत् १४९८ वर्षे श्री ककसूरयः चित्रकुटे चोरवेडीया गोने साह सारंग सोनागर राजाम्यां पढ़ महोत्सवो कृतः येन चतुर्दश शत चतुः चत्वारिंसत् अधिक १४४४ कच्छ मध्ये अमारी प्रवर्ताविता । याम श्री वीरभद्रः प्रतिबोधितः। संस्कृतप्राकृतपरमामृतप्रवाहा विरचित निखिलशास्त्रावगाहाः वाणीविलासवाचस्पतितुल्याः सकलकलारंजितकोविदाः धर्मवुद्धिधुरंधरा सकलपुरंदराः । ७१ तत्पट्टे सं० १५२८ वर्षे जोधपुरे श्रेष्टि गोत्रे मंत्रीश्वर जयतागरेण श्री देवगुप्तसूरेः महोत्सवे नव महोत्सवो कृतः । श्री पार्श्वनाथस्य प्रासादः कारितः पौषधशालायां च । श्री शत्रुनय याता कृता । पंच पाठकाः स्थापिताः । तेषां नामानि श्री धनसार १ उ० देवकल्लोल २ उ० पद्म- तिलक ३ उ० हंसराज ४ उ.० मतिसागर ५। ७२ तत्पट्टे श्री सिद्धसूरयो. गुणभूरयः । श्री श्रेष्टि गोत्रे मंत्रीश्वर दशरथात्मजेन मनीश्वर लोलागरण संवत १५६५ वर्षे मेदिनीपरे पट महोत्सवः कृतः । :
जैन साहित्य संशोधक [११ ७३ तत्पट्टे श्री कक्कसूरयः श्री जोधपुरे मंवत् १९९९ वर्षे गच्छाधिपो जातः श्रेष्टि गोत्रे मंत्रि जगात्मजेन मंत्रीश्वर धरमसिंहेन पद महोत्सवो कृतः । ७४ तत्पट्टे श्री देवगुप्त सूरयः श्री श्रेष्टी गोत्रे मंत्रि सहसवीर पुत्रेण संवत् १६३१ मंत्री देवागरेण पद महोत्सवः कृतः । ७६ तत्पट्टे विद्यमान संवत् १६५५ वर्ष चैत्रसुदि १३ सिद्धसरिर्वभूव श्री श्रेष्टी गोने मंत्रि मुगुट मंत्रि शेखर सर्व विश्व विख्यात राज्यभार धुरंधर मंत्रीश्वर महामंत्रि श्री ठाकुरसिंह विक्रमपुरे महा महोत्सवेन पद महोच्छवो कृतः । ७६ संवत् १६८९ वर्षे फाल्गुण शुद्धि ३ श्री ककसूरिर्वभूव । श्री श्रेष्टि गोत्रे मंत्रि मुगुट मंत्रि टाकुरसिंह तत्पुत्र मं० सावलकेन तत्पत्नी साहिवदेन पद महोत्सवो कृतः । संवत् १७२७ वर्षे मृगशिर सुद्र ३ दिने श्री देवगुप्तमूरिर्वभूव श्रेष्टि गोत्रे मंत्रि ईश्वरदासेन पढ़ महोत्सवो कृतः। ७८ तत्पट्टे श्री सिद्धसूरि संजातः । श्रेष्टि गोत्रे मंत्रि सगतसिंहेन पट्टाभिषेकः कृतः संक्द १७६७ वर्षे मृगशिर सुदि १० दिने जातः । ७९ तत्पट्टे श्री ककसूरिर्वभूव । मंत्रि दोलतरामेन सं० १७८३ वर्षे आसाढ वदि १३ दिने पद महोत्सवो कृतः । ८० तत्पट्टे देवगुप्तसूरि सं० १८०७ वर्षे वभूव । मुहता दोलतरामजीना पढ़ महोत्सवो कृतः । ८१ तत्पट्टे श्री सिद्धमूरिर्वभूव । संवत् १८४७ वर्षे महासुदि १० दिने पट्टाभिषेकः संजातः । मुं० श्री खुशालचंद्रेण पदमहोत्सवो कृतः । तेषां प्रासादात् अहं कल्पवाचनं करोमि । पुनः दीक्षा गुरुप्रसादात् ८२ तत्पट्टे श्रीकक्कसूरिर्वभूव । संवत् १८९१ रा वर्षे चैत्र सुद ( अष्टमीदिने पट्टाभिषेक: संजातः। यमुं० टाकुर सुत मुं० सिरदारसिंह गृहे समस्त श्रीसंवेन बीकानेर मध्ये पढ़महोत्सवः कृतः। (३ तत्पट्टे श्रीदेवगुप्तसूरिर्वभूव । संवत् १९०५ वर्षे भाद्रवा सुदि १३ चंद्रवासरे पट्टाभिषेक: संजातः । श्रेष्टि गोत्रे वैद्य मुहता शाखायां प्रेमराजो तस्य परिवारे हठीसिंघजी ऋषभदासजी मेवरानजी- कानां उन्संगे गृहीत्वा श्रीफलोधीनगरमध्ये समस्त वैद्य मुहता पट्टाभिषेको कृतः । तेषां प्रासादात अहं कल्पवाचनां करोमि । ८४ तत्पट्टे श्रीसिद्धसूरिर्वभूव । संवत् १९३५ वर्षे माघ कृष्ण ११ दिने पट्टाभिषेक संजातः अष्टि गोत्रे वैद्यमुहता शाखायां ठाकुर सुत महारावजी श्रीहरि सिंघनी पढ़ महोत्सवः कृतः वृद्ध गृहे मध्ये धांसीवाला सुरजमलनी हन्तात् समस्त श्रीसंघसहितेन विक्रम पुर मध्ये देवदुप्य रंजित छटिका राज्य द्वारात समागता । तेषां प्रासादात् अहं कल्पवाचनां करोमि इति ।।
उपकेशगच्छीया पट्टावलिः . ॥ श्रीरत्नप्रभसूरिस्तोत्रम् ॥ ॥ श्रीमद्रत्नप्रभमून्सिद्गुरुम्यो नमः ।। वामेयपट्टे शुभदत्तनामा तच्छिप्यजातो हग्दत्तमुन्न्यः ।। आचाबुधिः केशी स्वयंप्रमोपि सूरीशरत्नप्रभलब्धिपात्रः ॥ १ ॥ मन्यावन्द्रीकमलकाननराजशृंगं श्रियःप्रवृत्तिमुनिमानमगनहमं ।। श्रीपाश्वनाथपदपंकजंगकं रत्नप्रमं गणव सनत स्तवीमि ॥२ विद्यावन्द्रपदाकलिनोपि काम श्रीमत्म्वयंप्रभुगिरः परिपाय योत्र । दीक्षावामुढ़वहन्मुद्रमाद्वानो गन्नप्रभम्म दिशतावमलाविलामं ॥ ३ ॥ मंत्रावरोहडसुनो मुजगेन दृष्टः संजीवितः सकललोकमभाममक्षं । यन्यांत्रिवारिन्युप्कमित्रनेन रत्नप्रभम्म दिशतात्कमलाविठामं ।। ४ ।। मिथ्यात्वमोहतिमिगाणि विवूय येन भव्यात्मनां मननि तिन्मवेत्र विश्वे । मंदशितं मलदशनतत्त्वत्पं रत्नप्रभस दिशतात्कमलाविलमं ॥ ५ ॥ येनापकेशनगरे गुरुदिन्यशक्त्या काटके व विदवे महती प्रतिष्ठा । श्रीवर्गियुगलम्य वरम्य येन रत्नप्रभन्म दिशतान्कमलाविलामं ॥ ६ ॥ श्रीपत्यिकाभगवती समभून्प्रसन्ना सर्वतशासनसमुन्नतिवृद्धिकी । यशनारमन्हस्यमवाष्य मन्या पत्नत्रभम्स दिशतात्कमाविलासं ।। ७ ॥ गृहंति यन्य सुगुरोर्गुरुनाममंत्रं मन्यन्वतत्त्वगुणगौरवगर्मितं ये । तेषां गृहं प्रतिदिन विलमंनि पत्रा रत्नप्रभस दिशतात्कमलाविलासं ॥ ८ ॥ कल्पद्रुमः करतल मुग्नमधेनु-श्चितामणिः स्फुरति गम्यग्नामिगमा । 186 योल्डमत्क्रमयुगांबुजपूजनेन रत्नप्रभन्स दिशतात्कमलाविन्लाम ॥९॥ इत्यं भक्तिभरण देवतिलकश्चातुबालागुरोः श्रीगन्नप्रभसूरिनजयुगुगे: स्तोत्रं करोति स्म यः । प्रातः काम्यमिदं पठत्यविरतं तत्याल्य सर्वदा । सानंद प्रमदेव दन्यतितरां साम्राज्यलक्ष्मीः स्वयं ॥ १० ॥ इनि ओएसनगरे सपाललावाः प्रतिवोविता ओएमवालज्ञातिः स्यापिता तस्य स्तोत्रमिदं मावान्न्यान पद्धती प्रत्यहं पठनीयं ॥ संपूर्ण ! ग्रंयाग्रंथ ॥ ३१५ ॥ श्रीरन्तु ।। , विमान Teri जैन साहित्य संशोधक समिति । . पेट्रन. श्रीयुत हीरालाल अमृतलाल शाह. बी. ए. मुंबई. वाईस पेटून. श्रीयुत केशवलाल प्रेमचंद सोदी. वी. ए. एल्एल्. बी. वकील अमदाबाद. श्रीयुत अपरचंद घेलामाई गांधी, मुंबई. सहायक. शेठ परमानंददास रतनजी, मुंबई. श्रीयुत मनसुखलाल रवजीभाई मेहता, मुंबई. शेठ कांतिलाल गगलभाई हाथीभाई, पूना. शेठ केशवलाल मणीलाल शाह, पूना. शेठ बाबूलाल नानचंद भगवानदास झवेरी, पूना. सभासद. श्रीयुत वायू राजकुमार सिंहजी बद्रीदासजी, कलकत्ता. श्रीयुत बाबू पूरणचंदजी नाहार. एम्. ए. एलएल. वी. कलकत्ता. शेठ लालभाई कल्याणमाई झवेरी, वडोदरा (मुंबई.) शेठ नरोत्तनदाम भाणजी, मुंबई. शेठ दामोदरदास, त्रिभुवनदास भाणजी, मुंबई. शेठ त्रिभुवनदास माणजी जैन कन्याशाला, भावनगर. शेठ केगवजीभाई माणेकचंद, मुंबई. शठ देवकरणभाई मूळजीभाई, मुंबई. शेठ गुलाबचंद देवचंद, मुंबई. श्रीयुत मोतीचंद गिरधरलाल कापडिया, बी. ए. एलएल वी. सोलीसीटर, मुंबई. श्रीयुत केशरी चंदजी भंडारी, इंदौर. शाह अमृतलाल एण्ड भगवानदास कुं० मुंबई. शाह चंदुलाल वीरचंद कृष्णाजी, पूना. शेठ लाधाजी सोतीलाल, पूना. शाह धनजीभाई वखतचंद साणंदवाळा, (असदाबाद) शाह वानुमाई शासचंद, तळेगाम ( ढमढेरे ). शाह चुनिलाल झवेरचद, मुंबई. शाह भोगीलाल चुनिलाल, सोलापुरवझार, पूना केंप.
पाली, प्राकृतं, संस्कृत, गुजराती, हिन्दी भाषानां
केटलांक उत्तम पुस्तका
.
१ प्राकृत कथासंग्रह. सं० मुनि जिनविजय (पुरातत्त्वमन्दिर ग्रंथावली)
२.. पाली पाठावली.
३. कुमारपाल प्रतिबोध (प्राकृत ऐतिहासिक ग्रंथ; गायकवाड सीरीझ)
४. हरिभद्राचार्यस्य समयनिर्णय' (जै. सा. स. ग्रंथमाळा...)
५. प्राकृत व्याकरण संक्षिप्त परिचय
d
६. सुपासनाह चरियं (प्राकृत भापानो महान् चरित्रग्रंथ :)
७. मुरसुन्दरी चरियं (प्राकृत भापामां एक सुंदर कथा:)
८. उपकेश गच्छीय पट्टावली (संस्कृत)
९. गुणस्थानक्रमारोह (हिन्दी भाषान्तर-विस्तृत विवेचन
१०. परिशिष्ट पर्व (हिन्दी भापासां उत्तम भापांतर)..
११. छेदसूत्राणि ( आमा कल्प व्यवहार-निशीथ नामना.त्रण छेदसूत्रो बहु शुद्ध अने
उत्तम पद्धतीए छपावेला छे,जे अत्यंत दुलम छे. वणी. थोडी नकली.छपविली .)२
१२. साधुशिक्षा ( सुन्दर हिन्दी भाषांतर.)
१३. जैन धर्मर्नु अहिंसातत्त्व (वारिक विवेचन)
१४. सुखी जीवन (वांचवालायक शातिप्रद सुंदर गुर्जराती पुस्तक)
१५. नयकर्णिका (उत्तम गुजराती विवचन)
ए सिवाय, आत्म तिलक प्रन्य माळामा छपाएलां नानां मोटी पुस्तकों में प्रभावना करक
होई नामनी किंमते ज वेधवामां आवे छे ते पण नीचेनों ठेकाणे मळे छे.
गुजरात पुरातत्त्वमंदिर,
एलीस अखि,
अहमदाबाद (गुजरात)
भारत जैन विद्यालय,
पूना सिटी (दक्षिण
मुद्रक--पृष्ठ १-३३ जैन साहित्य मुद्रणालय, पृ०५७-८० चित्रशाला प्रेस; और बाद
सब-हनुमान प्रेस, सदाशिव पेठ, पूना सीटी.-प्रकाशक चिमनलाल
एल्. शाहा, भारत जैन विद्यालय, पूना शहर:
No text on this page.