Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Panch Pratikraman Sutram
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प्रस्तावना
प्रथम यह पुस्तक बप कर प्रसिद्ध करनेका हेतु
कहे है, की सकलगुणगरिष्ठ, विछजानवरिष्ठ, चारित्र
पात्र चूमामणि, पट्काय रक्षक इत्यादि अनेक सञ्ज
पोकरकें विराजमान न्यायांजोनिधि श्रीश्रीश्री श्री
१००० महामुनिश्री 'शिवजी रामजी' महाराज, मा
मानुग्राम विहार करते करते, नव्यजीवोंकों प्रतिवोध
देते देते 'सवाश्जयपुर में पधारे,तव समस्त श्रीसंघ
मिलकें बडे महोत्सवसे सघ जिनचैत्योंका दर्शन क
रवाये पी. श्रीगुरुजी महाराज धर्मशालामें था कर
विराजमान हवा, तव श्रीगुरुजी महाराजने सघ श्री
संघकों धर्मोपदेश देना सरु कीया, जिसमें ज्ञानका
माहात्म्य
वर्णन करते करते गुरुजीने ऐसा कहा कि
इस कालमें ज्ञानान्यास करनेवालोंकी संख्या चहो
त करके खल्प हो गई है, जिसे जगें जगें वडे घडे
सहेरोमें पाठशाला बन जावे, तो फ्रमसें पढनेवाले
जी बहोत होजावे, क्योंकि कारणसें कार्य होता है
ऐसा श्रीगुरु महाराजका उपदेश श्रवण करके
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(३)
अव ये ठपी हुइ पुस्तककी प्रथमावृत्तिकी न
कल सव खप जानेसें फिर इनकी द्वितीयावृत्तिकी
नकल (२०७०) दो हजार, हालमें यथामति सं
शोधन करके मेने श्रावक जीमसिहमाणककी मार
फत उपवाई हे ये पुस्तककी दो हजार नकलमेंसें
( १५००) पनरेसे नकलका खर्च मेहेंता माणेकच
द मिलापचदने दिया है तथा (५०० ) पांचसे न
कलका खर्च नवानगरवाले लोढा जालमचदने दी
या हे उर ये पुस्तककी द्वितीयावृत्तिमें प्रथमावृत्ति
से अधिक एक सूतक विचार, दूसरो असद्याइवि
चार, और तीसरो साधु, श्रावककों कोनसी वस्तु
कितने प्रहर तथा दिन पीछे खाने लायक न रहे ?
ये सब दाखल किये हे
विज्ञप्ति
वर्तमान समयमें श्रीजिनधर्मके के तरेकी पुस्तकों
ठपी है, परतु तिनमें श्रावकको अवश्य करणे योग्य
जो सामायिकसे ले कर पचप्रतिक्रमण अरु पोपधा
दिक क्रिया है तिसको जहां जैसा सूत्रपात चहिये
लिखक जिस जगें जो जो वि
वैसाही सूत्रपात
अरु
(२)
सघ श्रावकों वापसमें विचार करके उसीबखत श्री
गुरु महाराजजीकों कहने लगे कि महाज ! आपकी
थाहासें 'सवाश्जयपुरमें जैनपाठशाला स्थापन कर
नेका दमने निश्चय करा पी विक्रमार्क संवत् १ए४५
के आषाढ शुक्क उजके दिन पाठशाला स्थापन कर
के तिस्में विद्यान्यासीयोंकों विद्याभ्यासार्थ संस्कृत
भाषा जाननेवाला दो पमितोंको वर्षासन देके रस्के
पी विधाज्यासी जनोंको जैनमार्गमें सामायि
कादिक पद आवश्यक अवश्य कर्त्तव्य है, सो पहि
खेही पढना चहियें, इस वास्ते तिस प्रथको बपवा
नेका श्रीसंघने मुकरर कीया तिसमें एक हजार पुस्त
कका खरच तो शेठ माणकचदजी मिसापचदजी मेहें
तानें दीया,और जास्ती पुस्तक उपानेका खरच पचा
ती तरफसें दीया जायगा एसा निश्चय करके सब प
चातियों मिलके श्रीमुवमें (मेरे पर) शेवगन
लालजी मगन लालजीके पुत्र नूरामक्ष वेराठीके पर
उक्त पुस्तकको मुषश्में ठपानेका हुक्लम लिखा तो
तिस मुजय मेनें गोपाखचदजी यतिके पास यथा
योग्य सशोधन करायकें श्रावक भीमसिंदमाणककी
मारफत उपवाया
॥ अस्य ग्रथस्यानुक्रमणिका प्रारंन ॥
प्रथांग अथोके नाम पृष्ठां ग्रथा ग्रंथोके नाम पृष्ठां
१नवकार मत्र २ १२वेसणो सदिस्सान ए
२ स्थापनाचार्यजीकी । १३ राप्रतिक्रमण ११
तेरह पडिलेदणा २ १५ सकलतीर्थन ११
३ खमासमण
२) २५ जाकिंचि
४ सुगुरुने शाता १६ नमुनुण
सुख पृष्ठा
श, १७ जावंति चेश्याश्१३
५ मुहपत्ती पहिरोहण १७ जावंत के विसाहु १३
के पच्चीश वोल ३ १ए परमेष्ठिनम १४
६ श्रगकी पच्चीश २० उपसर्गहरस्त० १४
पडिसेदण
४) १ जयवीयराय
सामायिकका २२ पडिकमण गय
पञ्चरकाण
चेका अवसर
छ शरियावहिय ७ २३ सहस्सवि
ए तस्स उत्तरी
२४ श्लामि गमि १७
१० अन्नससिएण ७ २५ वदणवचियाए १७
न २६ पुरकरवरदी
६
२१ लोगस्स
(४)
धि लिखना चहिये,लहा उही विधि लिखके बराबर
क्रमपूर्वक ठपी होवे, एसी को पुस्तक नहीं है
इस वास्ते मेंने यह पुस्तक बपानेके प्रारमसेंउक्त
विचार पूर्वक सामायिकसें से कर पौषधादि क्रियापर्यं
त सर्व सूत्रोंको विधि संयुक्त विस्तार, प्रयास पूर्व
क अनुक्रमसें उपकें पी सव श्रावक नाश्योंको निर
तर पठन पाठन करने योग्य ऐसे बहुत स्तवन, स
जाय, स्तुतियो, चैत्यवंदनो, राग रागणीमें गाने
प्रजातिपद तथा दादाजीके स्तवन वगेरे उपे हे
यह पुस्तककों मेरी मति अनुसार शोधन करने
में दृष्टि दोषसें, अरु स्थूलबुद्धिके होनेसें जो कुष्ठ
मेरी तरफसे हुख, दीर्घ, काना मात्रादिकका फर
क रहा गया होवे, और कोश् अकर अधिक न्यून
हुवा होवे, थागें पी दृया होवे, तो सब पढने प
ढानेवाले सुझजनोने मुझकों वासककी माफक
अथ शोधनेका अन्यासी जान कर मेरे पर बच्चेकी
माफक प्रेम दर्शाय कर शोध यांचनां मेरी तरफ
सें जो झूल रही होवे तिसका मिठामि उकड सर्व
श्रीसघ समक्ष देता दु लाजुरामल्ल राठी
यह पुस्तक सवाई जयपुर जैन पाठशालामें मिलेगी
-
॥ अस्य ग्रंथस्यानुक्रमणिका प्रारंन ॥
प्रथा अथोके नाम पृष्ठां ग्रथां यथोके नाम पृष्ठा
१ नवकार मंत्र १ १२वेसणो संदिस्साल ए
५ स्थापनाचार्यजीकी। १३ राप्रतिक्रमणय ११
तेरह पडिहणा २ १४ सकलतीर्थन ११
३ खमासमण
२ १५ जाकिंचि
४ सुगुरुने शाता १६ नमुलुणं
सुख पृष्ठा
२ १७ जावंति चेश्या१३
५ मुहपत्ती पडिलेदण २७ जावंत के विसाहु १३
के पञ्चीश घोल ३ १ए परमेष्ठिनम १४
६ अगकी पञ्चीश २० उपसर्गहरस्त १४
पहिलेहण
४ १ जयवीयराय
૨૫
सामायिकका
२५ पडिक्कमण गय
पश्चरकाण
वेका अवसर
७ शरियाव दिय ७ २३ सबस्सवि
१६
ए तस्स उत्तरी
७ २५ श्वामि गमि २७
१० अन्नससिपण ॥ २५ यंदणवचियाए २७
११ सोगस्स
ज २६ पुरकरवरदी
O
(२) प्रथा प्रथोके नाम पृष्ठा ग्रथांप्रथोके नाम पृष्ठा २७ सिकाण बुझाएं २०४२ काउस्सग्गमें स्तु २७ वेयावच्चगराण १ तिका पृथक्पा ४० २ए संमासाप्रमा० २१ ४३ श्रद्वाश्म ४१ ३० सुगुरुवांदणां २५] ४४ जय जय त्रिजुव ३१ देवसिय पालोन२३ न चैत्यवदन ४३ ३श्रात्रि संबधिथति ४५श्रीसीमंधरस्तवन ४४ चार आलोयण २३, ४६ महीममणपुष्प ३३वढारे पापस्थान २४ सोवसदेह ४५ ३४श्रावकवदितासूत्रश्६ ४ सिकाचलजीका ३५ वदिता सूत्र- चैत्यवंदन ४५ पीका विधि ३३ ४ सिकाचलस्तवन ४६ ३६ अपछि ३३, ४ए सिझाचल स्तुति ३७थायरियनवसाए३५/ ५० पडिलेदण ४७ ३ण्यावश्यककी मु०३५, ५१ सामायिक पारणे ३ए सकलतीर्थनम०३५ का विधि पए ४० परसमयतिमिर ५२ नयवादसमजोर तरपिका पाठ ३० ५३ संध्याकाल सा ४रससारदावास्तुति मायिक विधि ५१ मण विधि का विधि प्रथां ग्रथोके नाम पृष्ठा ग्रथा अथोके नाम पृष्ठां ५४ देवसिपडिक ६६ थजपयध्यि पास ५४ सामिणो SH ५५ जय तिहुश्रण ५४ ६७दादाजी श्रीजिनदत्त ५६ जय महायस ६१ सूरिजी श्राराधन १५ ५७ महावीरस्तुति ६७ दादाजी श्रीजिनक विधि सहित ६२ शल सूरिजीयाराधन ए ५७ स्तुति कझा पी ६ए चजवसाय १६ ६४ १० लघुशांतिस्तव 99 एएश्रुतदेवताकी स्तुण्६७ ७१ कमलदलस्तुति 10 ६०क्षेत्रदेवताकीस्तु०.६० १५ पार्श्वजिनस्तुति र ७३ जिनस्तुति ६१ वरकनक ६० ६५ नमोऽस्तुवर्षमा पश्यादिजिनस्तुति र १५शातिजिन स्तुति. ६३ चिंतामणिपाव ७६ नेमनाथ स्तुति २ पार्श्वनाथ स्तुति २ ६ध तीस पी काउवस्स महावीरस्तुति ७३ गग करवेका विधि ७३ पए पाक्षिकादि पडि ६५ बजणापार्श्वना कमणका विधि ३ थका चैत्यवदन su) 10 वृदद तिचार जिन स्तवन पुर
(४)
प्रथा ग्रथोके नाम पृष्टा ग्रयां अथोके नाम पृष्ठां
७१ अतिचारके पी
एर जवसग्गहर नामक
बैंका विधि २०६
सप्तम स्मरणम् १४४
प्रश्नुवनदेवतास्तु० ११० एश्नक्तामरस्तोत्र १४५
३ दस पञ्चरकाण ए३ वृकशांतिस्तव १५३
विचार १११, ए४ श्रीजिनपजर १६१
जय पञ्चस्काणके श्रा ५ श्रीश्रावक कर
गारोकी संख्या ११५
णीकी सद्याय १६५
७५ बृहद जितशांति ए६ अपुहरी पो
प्रथमस्मरणम् १९ए
१६७
लघु थजितशांतिस्तव एपोसहका पञ्च १६ए
द्वितीय स्मरणम् १२० ए चोवीस थमिमां
७७ नमिऊण नामक पडिलेहणका पाठ १७३
तृतीय स्मरणम्, १३२ एए थमिला कहां
D गणधरदेव स्तुति कहां करणां ? १५४
चतुर्थ स्मरणम् १३५/१०० पांच शस्तवें
पए गुरुपारतत्र्यनामक
देववंदन विधि १७६
पंचम स्मरणम् १३ए २०१ पञ्चरकाण पार
एक सिग्धमवदविग्ध ऐका विधि १७०
नामक पाटस्मरणम् १५२१०२ रासंधाराविधि र
सह विधि
का विधि (५) अथांग अथोके नाम पृष्ठा प्रथा प्रयोके नाम पृष्ठां १०३ पोसह पारणे २१७ श्रीसीमधरजीनु २०६ वीजु स्तवन, २०७ १०४ दिन उग्या पी ११० पचमीका वृक्ष पोसहसेनेकाविधि र स्तवन १११ १०५ रात्रि चपुरि ११ए लघुपचमीस्त १५ पोसहका विधि १५१ १२ पार्श्वजितस्त० ५१६ १०६ गणेकमणेच रए। १२१ विमल जिनस्त०१० १७७ वीजकी स्तुति १५ १२२ एकादशीवृरू०२१० १०७ पचमीकीस्तुतिरए६ १२३ तु मेरे मनमें तु १०ए श्रष्टमीस्तुति रए मेरे दिलमें स्तवन २२० ११० मौनैकादशी रए १२४ मार्गदेशक मो १११ पार्वजिनस्तु रपए कनो निर्वापास्तव २२१ २२५ तीर्थमालास्त०१२५ २१५ श्रांविलकी स्तुण्५०० १२६वाज याचा०२४ ११३ पजोसणस्तुति २०१ २७ उपदेशमाखा पो २१४ नेमनाथस्तुति २२, सहसमाय श्श्य २१५ दीपमालास्तु २०३ १२७ राइसंथारा पो ११६ सुगुण सनेही साज सहसलाय २३० न सीमधरण स्तुति २०४१२५ निदावारकस० २३३
(६)
प्रथां ग्रथोके नाम पृष्ठा प्रथांग अथोके नाम पृष्टां
१३० सीतासतीस० २३४
सातपद नाटक
१३१ अनाथीनीस २३६ ना रागमा २४ए
१३२ प्रतिक्रमणस २३७ २४सुमति जिनस्त०२५४
१३३ मांगविक सर०२३० २४ए वीरजिनस्त २५४
१३४ पार्श्वजिनस्त०२४० १५०श्रीदादाजीस्त०२५५
१३५ पार्श्वजिनस्त० २४१ १५१ दादाजी गुरुदेव
१३६ नेमजिनपद २४ जीका स्तवन पां
१३७ नेमजिन पद २४२ च, तथा काव्य, स
१३. नेरवी रागपद २४२ वश्या उप्पा २५न
१३ए नेरवीराग पद २४३ २५५ श्रीगौतमस्वामी
२४० नेरवीराग पद २४३ का बडा रास २६३
२४१ सिफाचलस्त- २४३ १५३ खकुलप्रकाशक
१४२ सीमधरस्तवन २४४ गुर्वावली २७३
१४३ श्रष्टापदस्तव० २४५ २५४ सूतक विचार, श्रस
२४४ पार्श्वजिनस्त० २४६ धाइविचार, तथा साधु
२४५ शंखेश्वरस्त २४७| श्रावकके कोनसी वस्तु
२४६ पार्श्वजिनस्त २४० कितना वखत पी न
१४७ गोपाखचदजी कृत खानी? इनकाविचार २७७
॥ ॐ परमेष्ठिने नम ॥
॥अथ।
॥श्रीश्रावकस्य विधिसंयुक्त देवसिरा॥
॥प्रतिक्रमणादि सूत्रम्॥
॥ तत्र प्रथम॥
॥प्रानातिक सामायिक विधिप्रारन ॥
॥थथ नवकारमंत्र ॥
॥ णमो अरिहंताणं ॥१॥ एमो सिहाणं
॥३॥ एमो आयरियाण ॥३॥णमो उवद्या
याणं ॥ ४॥ णमो लोए सवसाढूणं ॥५॥ ए
सो पंच मुक्कारो॥६॥ सबपावप्पणासपो ॥
॥७॥ मंगलाणं च सबेसिं॥७॥ पढम हवश्
मगल ॥ए॥इति ॥१॥ यद नवकार तीन
बेर गुण के थापनाजीकी थापना करे, तब
तेरे बोल चिंतवे, सो कहते है।
(६)
प्रथा ग्रथोके नाम पृष्ठां अथांग अथोके नाम पृष्ठां
१३० सीतासतीस० २३४ सातपद नाटक
१३१ श्रनाथीनीस २३६ ना रागमा ए
१३२ प्रतिक्रमणस० २३७ वसुमति जिनस्त०२५४
२३३ मागविक सर० २३० २४ए वीरजिनस्त० २५४
१३४ पार्श्वजिनस्त०२४० १५०श्रीदादाजीस्त०२५५
२३५ पार्श्वजिनस्त० २४१२५१ दादाजी गुरुदेव
१३६ नेमजिनपद २४१ जीका स्तवन पां
१३७ नेमजिन पद २४५ च, तथा काव्य, स
१३ नेरवी रागपद १४२ वश्या बप्पा श्थन
१३ए नेरवीराग पद २४३ २५५ श्रीगौतमस्वामी
२४ नेरवीराग पद २४३ का बडा रास २६३
२४१ सिहाचलस्त २४३ १५३ स्वकुलप्रकाशक
२४२ सीमधरस्तवन २४४ गुर्वावसी
२७३
१५३ थष्टापदस्तष० २४५ २५४ सूतक विचार, अस
२४४ पार्श्वजिनस्त० २४६ द्याइविचार, तथा साधु
१४५ शंखेश्वरस्त० २४ श्राषफके कोनसी वस्तु
२४६ पार्श्वजिनस्त २४० कितना वखत पीन
१४ गोपालचदजी कृत खानी? इनकाविचार २७
॥ ॐ परमेष्ठिने नम ॥
॥थथ।
॥श्रीश्रावकस्य विधिसंयुक्त देवसिरा॥
॥प्रतिक्रमणादि सूत्रम्॥
॥ तत्र प्रथम ॥
॥प्रानातिक सामायिक विधिप्रारन ।
॥श्रथ नवकारमंत्र ॥
॥ एमो अरिदंताणं ॥१॥णमो सिहाणं
॥३॥णमो आयरियाणं ॥३॥ णमो अवधा
याणं ॥४॥णमो लोए सबसाढूणं ॥५॥ ए
सो पंच पमुक्कारो॥६॥ सवपावप्पणासणो ॥
॥७॥ मगलाणं च सवेसिं॥७॥ पढम दव
मगल ॥ए॥ति॥१॥ यद नवकार तीन
बेर गुण के थापनाजीकी थापना करे, तब
तेरे वोल चिंतवे, सो कहते है।
(२) ॥अथ थापनाचार्यजीकी तेरे पडिलेहणा ॥ ॥शु स्वरूप धारुं ॥२॥ज्ञान॥१॥दर्श न॥२॥ चारित्र ॥३॥ सहित सहदणा शुद्धि ॥१॥प्ररूपणा शुदि॥ २ ॥दर्शन शुझि॥ ॥३॥ सदित पाच आचार पालु ॥२॥ पलायूँ ॥२॥ अनुमोष्ठ॥३॥ मनोराप्ति ॥१॥ वचन सुप्ति॥शकायराप्ति॥आदरुं॥३॥ एव तेरे बोल श्रीधर्मरत्नप्रकरणसूत्रवृत्तिमें कदे है ॥इति॥॥ ॥पी गुरुजीके सामने अथवा थापनाचा र्यजीके सामने खडा दो के तीन खमासमण देवे, सो लिखते हैं। ॥अथ खमासमण ॥ ॥श्चामि खमासमणो वदिन जावणिडाए निसीदिआए मधएण वंदामि ॥ इति ॥३॥ ॥अय सुगुरुने शाता सुखएचा॥ ॥श्चकारनगवन् सुदा,सुदेवसी, सुख तप ठारीर निराबाध सुखसंयम यात्रा निर्वहो
(३)
गेजी ? स्वामी शाता जी ? इति ॥ ४॥ ए
म गुरुने कही नमस्कार करे, तेवारे गुरु कहे
देवगुरु प्रसाद ॥
॥पा नीचे बैठ के जिमणा हाथ नीचा कर
के अनुनिमि कदे पायें खमासमण दे के श्चा
कारेण संदिस्सद नगवन् सामायिक लेवा मु
दपत्ती पडिलेढुं' गुरु कदे, पडिलेद पी
कदी दूजी खमासमण देई मुदपत्ती पडिलेदे॥
॥ अथ मुदपत्ती पडिलेहणके पच्चीश बोल
लिखते है॥
॥सूत्र, अर्थ साचो सईहूं ॥१॥सम्यक्त्व
मोदनी ॥२॥ मिथ्यात्व मोदनी ॥ ३ ॥ मिश्र
मोदनी ॥४॥ परिदरं यद चार बोल मुदपत्ती
खोलती विरीया कदणा ॥
॥ कामराग ॥१॥ स्नेदराग ॥२॥ दृष्टिराग
॥३॥ परिदरु ॥ यह सात बोलप्रथम कहीजें।
॥ सुगुरु॥१॥सुदेव ॥२॥सुधर्म ॥३॥
(४) आदरु ॥ कुगुरु ॥२॥ कुदेव ॥॥ कुधर्म ॥३॥ परिदरु ॥ ज्ञान ॥१॥ दर्शन ॥शा चारित्र ॥३॥ आदरु ॥ यद नव पडिलेदणमावेदाये करीये। ॥झानविराधना ॥१॥दर्शनविराधना ॥२॥ चारित्रविराधना ॥३॥ परिदरु ॥ मनोराप्ति ॥ ॥१॥ वचनराप्ति ॥२॥ कायराप्ति ॥३॥ आ दरु॥ मनोदंम॥१॥ वचनदंम॥३॥ कायदं म॥ ३ ॥ परिदरं ॥ यद नव पडिलेहण जिम णे हाथसें करणी ॥ यद पच्चीश बोल मुह पत्तीके जानने ॥ अब अगकी पच्चीश पडिलेदण लिखते है ॥ ॥ कृष्णलेश्या ॥२॥ नीललेश्या ॥शाकापो तलेश्या ॥३॥ ए तीन निलाडे मस्तकें परिद ॥शझिगारव॥२॥रसगारव ॥॥ शाता गारव ॥ ३ ॥ ए तीनुं मुखें परिहरु । ॥ मायाशल्य ॥२॥नियाणाशाल्य ॥॥ मि हादसणशल्य ॥३॥ए तीन हीये परिहरु (५) ॥ क्रोध ॥१॥ मान ॥२॥ए दोय जिमणे खन्ने परिदरुं॥ ॥माया ॥१॥ लोन ॥२॥ए दोय मावे खंने परिदरे॥ ॥ दास्य ॥१॥रति॥२॥ अरति ॥३॥ ए तीन मावे दाथे परिदरं ॥ ॥नय॥१॥ शोक ॥॥गंडा ॥३॥ ए तीन जिमणे दाये परिदरं ॥ ॥ एथ्वीकाय ॥१॥ अप्पकाय ॥॥ तेकका य ॥३॥ए तीन मावे पगे परिदरूं॥ ॥वानकाय ॥२॥ वनस्पतिकाय॥२॥त्रस काय ॥३॥ए तीन जिमणे पगे परिद॥ति मुदपति पडिलेदणा सपूर्णा ॥५॥ ॥ पा खडा दोय के श्वामि खमासमणका पाठ कदे के इचाकारेण संदिस्सद नगवन् । सामायिक सदिस्सा ' गुरु कहे सदिस्सावेद ॥पी कदे के फेर खमासमण दे केश्चा (६) ॥ज०॥ सामायिक ठगन ? गुरु कदे ठाएह ॥ ॥पीवेश्वं कदीखमासमण दे थोडो जुकी तीन नवकार गणी चाकारेण सदिस्सद नग वन् पसाज करीसामायिक दमक जच्चरावोजी॥ गुरु कदे जच्चरावेमो॥पी करेमिनते सामा य इत्यादि सामायिक सूत्र तीन वार उच्चरे ॥ ॥अथ सामायिकनु पच्चरकाण ॥ ॥करेमि नंते सामाश्य, सावकं जोगं पञ्च कामि ॥ जावनियम पखुवासामि ॥ विहं ति विदेण मणेण वायाएकाएण, न करेमि, न कार वेमि, तस्स नंते पडिकमामि निंदामि गरिदा मि अप्पाण वोसिरामि ॥ इति ॥६॥ ॥पी खमासमण दे के श्चाकारेण सदिस्सह भगवन् शरियावदिय पडिकमामि ॥ गुरु कहे पडिकमद पीठ इवं कदी॥श्चामि पडिकमि शरियावढियाएइत्यादिपाठ कहे,मोतिसतेगा
॥ अथ इरियावदियं ॥
॥श्चाकारेण संदिस्सद नगवन् ॥इरियाव
दियं पडिकमामि॥श्व श्यामि पडिक्कमिजं ॥
॥१॥रियावदियाए विराहणाए॥२॥ गम
णागमणे ॥३॥ पाणकमणे बीयकमणे दरियक
मणे॥सा उत्तिंग पग दग मट्टी मक्कड सं
ताणा संकमणे ॥ ४॥ जे मे जीवा विराहिया
. ॥५॥ एगिदिया बेदिया ते दिया चारिदिया
पचिंदिया ॥ ६ ॥ अनिदया वत्तिया लेसिया
संघाश्या सघट्टिया परियाविया ॥ किलामिया
उदविया गणानहाएं संकामिया जीवियानवव
रोविया॥ तस्स मिठामि उक्कड॥9॥ इति॥
॥अथ तस्स उत्तरी॥
॥तस्सनत्तरीकरणेणं॥पायचित्त करणेण ॥
विसोदीकरणेणं ॥ विसल्लीकरणेणं॥पावाणं क
म्माण॥णिग्घायपाए॥मिकाउस्सग्गं
(६) ॥न ॥ सामायिक गन' गुरु कहे गएद ॥ ॥पी श्वं कदीखमासमण दे थोडो जुकी तीन नवकार गणीश्चाकारेण सदिस्सद जग वन् पसान करीसामायिक दमक जच्चरावोजी॥ गुरु कदे बच्चरावेमो॥पी करेमिनते सामाश य इत्यादि सामायिक सूत्र तीन वार उच्चरे ॥ ॥ अथ सामायिकनु पच्चस्काण ॥ ॥ करेमि नंते सामाश्य, सावक जोर्ग पञ्च कामि ॥ जावनियम पॉवासामि ॥ विद ति विदेण मणेण वायाएकाएण, न करेमि, न कार वेमि, तस्स नंते पडिकमामि निंदामि गरिहा मि अप्पाण वोसिरामि ॥ इति ॥६॥ ॥पीठे खमासमण दे के चाकारेण सदिस्सह भगवन् शरियावहिय पडिकमामि ॥ गुरु कहे पडिकमद पविश्व कही॥श्चामि पडिक्कामिन शरियावदियाएइत्यादिपाठ कहे,मो लिखना ॥१॥ उसन मजिअ च वदे॥संनव मनिणं दणं च सुमश् च ॥पनमप्पदं सुपासं ॥ जिणं च चंदप्पदं वदे ॥२॥ सुविहिं च पुप्फदतं ॥ सी अल सिकंस वासुपुडं च ॥ विमल मणंत च जिण ॥ धम्म संतिं च वदामि ॥३॥ कुथु अ रंच मल्लि॥वंदे मुणिसुव्वयं नमि जिण च ॥वं दामि रिम्नेमि ॥ पासं तद वक्ष्माण च ॥४॥ एवमए अनिथुआ । विदुय रय मला पहीण जरमरणा ॥ चनचीसपि जिवरा ॥ तिजयरा मे पसीयतु ॥५॥कित्तिय वंदिय मदिया। जे ए लोगस्स नत्तमा सिधा ॥ आरुग्ग वोदिला न ॥ समादिवर मुत्तमं दितु ॥६॥चदेसु नि म्मलयरा ॥ प्राऽच्चेस् अदिय पयासयरा ॥ ॥अथ तस्स उत्तरार-in- ॥तस्स उत्तरीकरणापायश्चित्त करणेण ॥ हिनीकरणे ॥विसल्ली करो ॥ पाचालक ग्यायपहाए मिकाउस्सग्गज
(0)
॥ अय अन्नच नससिएण ॥
॥ अन्नच उससिएण नीससिएण खासिए
ग गीएक जनाइएण उएण वायनिसग्गेण न
मलिए पित्तमुचाए॥ १॥सुहुमेहिं अगसचा
लति ।। सुद्रुमेदि खेलसचालेदि।। सुदुमेहिं दि
हिमचालेदि ॥३॥ एवमाश्एदि आगारेहिं ॥
अन्नग्गो अविरादिन ॥ दुऊ मे कानस्सग्गो
।। ३ ।। जाव अरिदताण नगवताणं नमुक्कारेणं
न पारेमि ॥४॥तावकाय गणेणं मोणेणं की
णेण अप्पाण वोसिरामि ॥५॥ इति ॥५॥ इहां
चार नवकार अथवा एक लोगस्सको कानस्स
ग्ग करे पीछे णमो अरिहंताण कहे के काउस्स
ग्ग पारकें मुखसे प्रगट लोगस्स कहे, सो
भगवन्ने
यसरी
.
॥ अथ लोगस्स ॥
॥लोगस्स उलोअगरे॥धम्म तियरे जि
णे॥अरिदते कित्तश्स्स ॥..
केवानी
॥अथ राई प्रतिक्रमणविधि प्रारंन ॥ ॥ प्रथम एक खमासमणदेके श्वान॥ त्यवदन करूं गुरु कहे करेद ॥पविचक । जयन सामि जयन सामि इत्यादि कहे,सोदी नखते हैं। ॥अथ सकलतीर्थकरनमस्कारो लिख्यते॥ ।जयन सामिय जयन सामिय, रिसद सेत्तुंजि नजति ॥ पहु नेमिजिण, जयन वीर सच्चनरिमं मण ॥१॥नरुअन्जेद मुणिसुवय, मदुरिपास उह उरिय खंगण॥अवरविदेदिज तिबयर,चि द्वंदिसि विदिसि ज केवितीआणागय सपयं, वंत जिण सवेवि ॥३॥ ॥कम्मनूमिहिं कम्मनूमिर्दि पढम सघयणि ॥ नक्कोसन सत्तरिसन, जिणवराण विहरत ल नई ॥ नवकोडीदिं केवलिण, कोडि सदस्स न व साढु संप३॥ संपर जिरावर वीस मुणि, विदु कोडीदि वरनाण॥समण कोडी सदस्स उई,
(१०)
च कहे के वली खमासमण दे कर ॥श्वा०॥
जगवन् वेसणो गर्ल' गुरु कदे गएह ॥ फेर ३
व कहे के खमासमण दे कर श्चान॥ सि
काय सदिस्सावु ? गुरु कदे संदिस्सावेद॥पविं
इच कदे के वली खमासमण दे कर श्वा० ॥न
ग०॥ सिधाय करूं? गुरु कदे करेद॥फेर खमा
समण दे के खडे हो कर आठ नवकार कद क
र सद्याय करे तथा जो शीतकालादि दोवेतो
खमासमण दे के चा॥न०॥ पागरणो सं
दिस्सावु ? गुरु कदे संदिस्सावेद ॥ पी. शर्छ
कद कर खमासमण दे कर श्चा०॥०॥पां
गरणो पडिग्घालं? गुरु कदे पडिग्याएह ॥पीई
श्व कदी वस्त्र ग्रदण करे तथा सामायिकवंत
अथवा पोसासदित श्रावक वादे तो"वदामो"
ऐमो कदे और जो कोई दूसरो वाटे तो, सिथा
यकरेद एमेकदे॥इति प्रानातिकमामायिक ।।
(१३) 1५॥धम्मदयाणं, धम्मदेसियाणं ॥ धम्मना पगाणं, धम्मसारदीणं, धम्मवरचाजरतचक्कर हीणं ॥ ६॥ अपडिदय वरनाण दंसण धराणं, विअट्टनमाणं॥७॥जिणाणं जावयाणं, ति नाणं तारयाणं, बुहाण बोहयाणं, मुत्ताणं मो अगाण ॥७॥ सवन्नूणं सवदरिसिण, सिव म यल मरुअ मणंत मकय मवावाद मपुणरावि त्ति॥सिधि गइ नामधेयं ॥ वाण संपत्ताणं, न मो जिणाएं, जिअ नयाणं ॥ एजेअ अई आ सिक्षा ॥ जे भविस्संति पागए काले ॥ संपश्अवहमाणा॥सवेतिविदेण वदामि॥१३॥ ॥ अथ जावंति चेश्आइं॥ ॥ जावंति चेश्आई॥ जट्टेअ अदेय तिरि अलोएअ॥ सवाई ताई वंदे ॥दसतो तव सता॥१॥इति ॥१४॥ ॥अथ जावत केवि सादू॥ ॥जगवन् जावंत केवि सादू॥नरदेवय म (२) थुणिजशनिच विदाण॥२॥सत्ताव सहस्सा, लरका बप्पन्न अह कोडी ॥ चनसय गयासी या, तिबुक्के चेश्ए वदे॥२॥ वंदे नव कोडिस य, पणवीसं कोडि लक तेवन्ना ॥ अहावीस सदस्सा,चसय अहासिया पडिमा ॥३॥१२॥ ॥ अथ जंकिंचि ॥ ॥ ज किंचि नाम तिब॥ सग्गे पायालेमा पुसे लोए॥जाई जिणबिंबाई ॥ ताई सबार वदामि॥१॥ इति ॥२३॥ ॥ अथ नमुडण वा शक्रस्तव।। ॥ नमुढणं अरिदताणं, नगवताणं ॥१॥ आगराण, तिगराण, सय सबुझाण ॥३॥ पुरिसुत्तमाण, पुरिससीहाण, पुरिसवरपुमरी आप, पुरिसवरगपदवीण ॥३॥ लोयत्तमाण, लोगनाहाणं, लोगदिवाण, लोगपश्वाण, लो गपडोगराण ॥४॥ अनयटयाणं, चरकुद याण ॥मग्गटयाण, सरणदयाण, चोदिदयाण (१५) ॥अथ जयवीअराय॥ ॥ जय वीराय जगगुरु ॥ होउ मम तुद नावने नयव ॥ नवनिवेन मग्गा, पुसारि आ इछ फलसिदी॥१॥लोगविरुचाउ ॥ गुरुजणपूआ परबकरण च ॥सुदगुरुजोगोत वय, ण सेवणा आनव मखमा ॥२॥१७॥ ॥इत्यादि जयवीयराय पर्यत चैत्यवंदन करे ॥ पीले खमासमण दे के श्वा० ॥ न॥ कुसुमिण सुमिण राई पायवित्त विसोदण काउस्सग्ग करु' गुरु कहे करेद प िश्वं कद कर कुसुमि ण असुमिण राई पायचित विसोइएवं करेमि कानस्सग्गअन्नब उससिएणं॥इत्यादि पाठक दे के सोले नवकार अथवा चार लोगस्सका चदेसु निम्मलयरा पर्यंत चिंतन कर के कान स्सग्ग कोप िणमो अरिदताण कद कर का जस्सग्ग पारीक मुखसे एक लोगस्सका पाठ प्र गट कहे जो रात्रिमे गुण सबधि मोटको दूषण १
(१४)
दाविदेदे अ॥ सवेसि तेसि पणन ॥ तिविहेण
तिदम विरयाण ॥१॥इति ॥ २५॥
॥अथ परमेष्ठिनमस्कार ॥
॥नमोऽसिहाचार्योपाध्याय सर्वसाधुन्य ॥
॥ अथ नपसर्गदरस्तवन ॥
॥ उवसग्गहर पास ॥पासं वदामि कम्म
घणमुक ॥ विसदर विसनिन्नास ॥ मगलकल्ला
गावास ॥१॥ विसहरफुलिंगमंतं ॥ कंवें
धारे जो सया मणु ॥ तस्स गहोगमारी ॥
छ जरा जति जवसाम ॥२॥चिघ्न दूरे में
तो॥तुद्य पणामो वि बढुफलो हो ॥ नरतिरि
एसुवि जीवा ॥ पावंति न शक दोदग्ग ॥३॥
तुद सम्मत्ते ल३॥ चिंतामणि कप्पपायवाहि
ए॥पावति अविग्घेणं ॥ जीवा अयरामर वा
ण ॥४॥श्अ सथुन महायस ॥ नत्तिप्ररनि
परेण दिएण ॥ता देव दिक बोर्हि ॥ नवे
नवे पासजिएचट ॥५॥इति ॥१६॥
। (२५) ॥अथ जयवीअराय॥ ॥ जय वीराय जगगुरु ॥ दोन ममं तुद नावन नयवं ॥ नवनिवेने मग्गा, पुसारि आ श्ठ फलसिद्धी॥१॥ लोगविरुच्चा ॥ गुरुजणपूआ परबकरण च ॥ सुदगुरुजोगोत घय, ए सेवणा आनव मखमा ॥२॥१७॥ ॥इत्यादि जयवीयराय पर्यंत चैत्यवंदन करे ॥ पछि खमासमण दे के श्या० ॥०॥ कुसुमिण सुमिण राई पायबित्त विसोदणदं काउस्सग्ग करु १ गुरु कहे करेद. पी3 श्लं कद कर कुसुमि ण सुमिण राई पायचित विसोदणवं करेमि कामस्सग्गअन्नब उससिएणं॥श्त्यादि पाठक दे के सोले नवकार अथवा चार लोगस्सका चदेसु निम्मलयरा पर्यंत चिंतन कर के काम स्सग्ग करोपी पमो अरिदताण कद कर का उस्सग्ग पारीक मुखसें एक लोगस्सका पाठ प्र गट कहे जो रात्रिमें गुण संबंधि मोटको दूषण
(१६)
लागो दोवे तो कानस्सग्गमांदे ॥ सागरवरगं
नीरा ॥ पर्यंत चिंतवे ॥ इति संप्रदाय ।।
॥अब पडिक्कमणां नायवेका अवसर दुवा।।
जब खमासमण देश श्रीआचार्यजी मिश्र क
दि के वादीयें ॥२॥ खमासमण देई श्रीनपाध्या
यजी मिश्र कदि के वादीयें ॥२॥ खमासमण
देश जंगम युगप्रधान वर्तमान नहारक श्रीपू
ज्यजीका नाम ले के वादीये ॥३॥खमासमण
देई के सर्व साधुजीक वादीयें ॥४॥ इस तरे
चार खमासमणसें पडिक्कमणा वावी गोमालीये
वैठ के मस्तक नमाय कर दोनु दाये मुहपत्तीमु
दडे दे कर॥सबस्सविराश्य॥इत्यादि पाठ कहे
परतुश्चाकारेणसदिस्सद एवं इस माफकनकहे
॥अथ सबस्सवि॥
॥सवस्सविदेवसिधा ऽधितिष प्रासिय ७
शिथि श्ाकाण
(१७)
स मिना मि उकाडं ॥इति ॥१७॥सबेरका
बसिके ठिकाने राश्यं ऐसा पान कदे ॥
। पीव नमुखुण कद के खडा होय केंकरेमि
नंते सामाश्यं सावधं जोगं पच्चरकामि॥श्त्या
दिक पाठ कदे॥पबि लामि गमि कानस्सग्गं
जो मे राश्ना ॥ यह पाठ कदे,सो लिखते है।
॥अथ श्वामि ठामि ॥
॥श्वामि तामि कानस्सग्गं ॥जोमे देवसिन
अश्आरोकन॥ काश्न वाश्व माणसि ॥ज
स्मुत्तोजम्मग्गो अकप्पो॥ अकरणिको॥ज्या
विचिंतिअणायारो॥अपिचिप्रबो॥
सावगपानग्गो॥ नाणे तद दंसणे चरित्ताचरित्ते
॥ सुए सामाश्ए ॥ तिन्दं गुत्तीर्ण ॥चजन्दं कसा
याण ॥ पंचन्दमणुबयाणं ॥ तिन्दं गुणवयाएं ।
चलन्द सिरकावयाणं ॥ वारसवियस्स सावगध
म्मस्स ॥ज खमिअं जं विरादिअं॥ तस्स मि
(१६)
नागो दोवे तो कानस्सग्गमांदे ॥ सागरवरगं
नीरा ॥ पर्यंत चिंतवे ॥ इति संप्रदाय ॥
॥ अव पडिक्कमणां ठायवेका अवसर हुवा।।
जब खमासमण दे श्रीआचार्यजी मिश्र क
दि के वादीये ॥२॥खमासमण देई श्रीनपाध्या
यजी मिश्र कदि के वादीये ॥२॥ खमासमण
देश जंगम युगप्रधान वर्तमान नद्यारक श्रीपू
ज्यजीका नाम ले के वादीयें।। ३।। खमासमण
देई के सर्व साधुजीकुं वादीयें ॥४॥ इस तरे
चार खमासमणसें पडिक्कमणा गवी गोमालीयें
बैठ के मस्तक नमाय कर दोनु दाये मुदपत्तीमु
हडे दे कराासवस्सविराश्य॥इत्यादि पाठ कहे
परंतुश्चाकारेणसदिस्सहाइसमाफकनकहे
॥अथ सबस्सवि॥
॥सबस्सविटेवसिषऽचिंतिथ प्रासिय हु
चिहिअश्वाकारेण संदिस्सह नगवन
(१७)
स्स मिना मि इक्कडं ॥इति ॥२७॥ सबेरका
वसिके ठिकाने राश्यं ऐसा पाठ कदे ॥
॥ प िनमुबुण कद के खडा होय केंकरेमि
नंते सामाश्यं सावधं जोगं पञ्चस्कामि॥श्त्या
दिक पाठ करे।पबिश्वामिठामि काजस्सग्गं
जो मे राश्च ॥यह पाठ कहे,सोलिखते है।
॥अथ श्वामि ठामि ॥
॥श्वामि वामि कानस्सग्गं॥जोमे देवसिन
अश्वारो कनकाश्न वा माणसिन । उ
स्सुत्तोजम्मग्गो अकप्पो ॥ अकरणिजो॥ज्या
विचिंतितअणायारो॥अणिबिअबो॥
सावगपानग्गो॥ नाणे तद दंसणे चरित्ताचरिते
॥सुए सामाश्ए । तिन्दं गुत्तीणं॥चजन्दं कसा
याणं ॥ पंचन्दमणुधयाणं ॥ तिन्दं गुणवयाणं ॥
चउन्द सिस्कावया ॥ वारसवियस्स सावगध
म्मस्स ॥ज खमिरं जं विरादिअं॥ तस्स मि
२
(१६)
लागो दोवे तो कानस्सग्गमाहे ॥ सागरवरर्ग
नीरा ॥ पर्यंत चिंतवे ॥ इति संप्रदाय ॥
॥अब पडिक्कमणां गयवेका अवसर हुवा।
जब खमासमण देश श्रीआचार्यजी मिश्र क
दि के वादीये ॥१॥खमासमण देई श्रीनपाध्या
यजी मिश्र कदि के वादीये ॥२॥ खमासमण
दे जगम युगप्रधान वर्तमान नहारक श्रीपू
ज्यजीका नाम ले के वादीयें ॥३॥खमासमण
देई के सर्व साधुजीकु वादीयें ॥४॥ इस तरे
चार खमासमणसें पडिक्कमणा गवी गोमालीये
वैठ के मस्तक नमाय कर दोनु दाये मुहपतीमु
दडे दे कर सबस्सविराश्य॥इत्यादि पाठ कहे.
परतुश्चाकारेणसदिस्सह श्वं इसमाफकनकरे
॥अथ सबस्सवि॥
॥सबस्सविदेवसिथ चिंतित्र प्रासिय हे
चिहिनश्याकारेण सटिम्मट नगवन् २०
(रए)
शुधि निमित्त पुरस्करवरदीमा सुयस्स नगवनक
रेमिकाउस्सग्गाश्त्यादि पाठ कहे,सोलिखते हैं
॥ अथ पुस्करवरदी॥
॥ पुरस्करवरदीवद्वे, धायसमे अ जबुदी
अ॥नरदे रवय विदेदे, धम्माश्गरे नमंसा
मि॥१॥ तमतिमिरपमलविक्ष, सणस्स सु
रगणनरिंदमहिअस्स ॥ सीमाधरस्स वंदे, प
प्फोडिअ मोदजालस्स ॥२॥जाई जरामरण
सोगपणासणस्स, कल्लाण पुस्कलविसालसुहा
वदस्स॥को देवदाणव नरिंदगणच्चिअस्स, ध
म्मस्स सार मुवलप्त करे पमाय ॥३॥ सिमे
नो पय णमो जिणमए, नदी सया सजमे ॥
देव नाग सुवन किन्नर गण, स्साअ नावच्चि
ए॥ लोगो जबपहिने जगमिण, तेलुकमच्चा
सुरं॥धम्मो वहन सास विजयने, धम्मुत्तरं
वदन ॥४॥ इति ॥३॥ सुअस्स भगवन करेमि
कामस्सगं बंदणवत्तिए॥एपाव पूर्ण कद
(१०) घा मि इक्कड ॥इति ॥ इहां देवसियंके बिकानें राश्यं कहेनां ॥ इति ॥२॥ ॥पवितस्सुत्तरीअन्नवससिएण कह 4 र चारित्रशुदि निमित्त चार नवकार अथवा प क लोगस्सका कानस्सग्ग करी पारि के दर्शन शुक्षि निमित्तें प्रगट लोगस्स कही सबलोप अरिदत चेश्याण॥ करेमिकाउस्सग्गंवंदणः त्तिाए॥इत्यादि कदनां, सो लिखते हैं। ॥ अथ वदणवत्तियाए॥ ॥वंदणवत्तियआए, पूअण वत्तिमाए॥सका र वत्तिाए, सम्माण वतियाए ॥ बोहिलान वत्तिाए ॥निरुवसग्ग वत्तिाए ॥२॥स झाए मेदाए धीईए । धारणाए अणुप्पेहाए । वद्वमाणीए गमिकाउस्सग्ग॥॥ इति ॥२॥ ॥वि अन्नकदीचार नवकार अथवा एक लोगस्सका कानस्सग्ग करके पार केंझानाचार (१) ॥ अथ वेयावच्चगराए । ॥ चेयावञ्चगराणं संतिगराणं ॥ सम्मतिकि समादिगराणं ॥ इति ॥ करेमि काउस्सग्ग । अन्नब० ॥ इति ॥१३॥ ॥पलि संमासा प्रमार्जन पूर्वक बैठ के तीसरे आवस्सगसूत्र वादा निमित्ते मुदपत्तीपडिले दु गुरु कदे पडिलेएद ।। मुहपत्ती पहिलेदे. पौठे वादणा दे. तिनका विधि कहते है। ॥अवग्रहके बाहिर उना दूआ आधा नीचा नम कर श्वामिखमासमणो वंदिलं जावणिका ए निसीदिआए अणुजाणद मे मिनग्गरं. इत ना पाठ कद कर भूमि प्रमार्जन करता ह्या नि सीदि कद के कबुक अवग्रदमें प्रवेश कर के सं मासाप्रमार्जन कर के जक्कडवे के माबे हाथमें मुदपत्ति ले के मावे कानसें ले के जिमणा कान पर्यंत निल्लाड पूजी, मुदपत्ती आगें रख के ति सके मध्य भागमे गुरुचरणकी कल्पना क
(२०)
कर अन्नससिएणं कद के आठ नवकार अ
थवा दो लोगस्सका कानस्सग्ग करे. काम्स
रंगके मादे आजुणा चार प्रदर चितवे सो आगे
लिखेंगे पीछे सिक्षाणं वृक्षार्णका पाठ कहे, सो
लिखते ॥
॥ अथ सिधणं बुझाण ॥
॥सिधाण बुहाणं,पारगयाणं परंपरगयाएं
॥लोअग्ग सुवगयाणं, नमो सया सबसिर्ण
॥१॥जो देवाणवि देवो, जे देवा पंजली नर्म
संति ॥त देव देव महिरं, सिरसा वंदे महावी
रं॥२॥कोवि नमुक्कारो, जिपवरवसहस्स
वक्ष्माणस्स॥संसारसागराने, तारेशनरं वना
रिं वा ॥ ३ ॥ जर्कित सेल सिहरे, दिका नाएं
निसीदिया जस्स ॥ तं धम्मचकवाहि, अरिक
नेमि नमसामि ॥४॥ चत्तारि अह दस टो, य
वदिया जिवरा चवधीस ॥ परमह निहिया,
सिमा सिमिम दिमंतु॥७॥ इति ॥२२॥
(११) ॥ अथ वेयावच्चगराण ॥ ॥ वेयावञ्चगराणं संतिगराणं ॥सम्मति समाहिगराणं ॥ इति ॥ करेमि काउस्सग्ग । अन्नन ॥ इति ॥ १३ ॥ ॥पी संमासा प्रमाऊन पूर्वक बैठ के तीसरे आवस्सगसूत्र वादणा निमित्तै मुदपत्ती पडिले दु? गुरु कहे पडिलेएद ॥ मुदपत्ती पहिलेदे. पील वादणां दे तिनका विधि कहते है। ॥अवग्रहके बादिर उना ठूआआधा नीचा नम कर श्वामिखमासमणो वदिन जावणिका ए निसीदिआए अपुजाणद मे मिजग्गदं श्त ना पाठ कद कर नूमि प्रमार्जन करता दूआ नि सीदि कद के कबुक अवग्रहमें प्रवेश कर के सं मासाप्रमार्जन कर के लक्कडबेठ के मावे दायमें मुदपत्ति ले के मावे कानसेले के जिमणा कान पर्यंत निल्लाड पूंजी, मुदपत्ती आगे रख के ति सके मध्य नागमे गुरुचरणकी कल्पना क
(२०)
कर अन्नससिएण कद के आठ नवकार छ
थवा दो लोगस्सका कानस्सग्ग करे कामस
ग्गके मादे आजुणा चार प्रदर चिंतवे सो आगे
लिरखेंगे पछि सिक्षण बुझायंका पाठ कहे, सो
लिखते ॥
॥अथ सिधाण वुधाणं॥
। सिहाण वुशाणं,पारगयाण परंपरगयाण
॥लोअग्ग मुवगयाण, नमो सया सबसिहाणं
॥१॥जो देवाणवि देवो, ज देवा पंजली नम
संति ॥त देव देव महिलं, सिरसा वंदे महावी
रं॥२॥ कोवि नमुकारो, जिणवरवसहस्स
वक्ष्माणस्स।संसारसागरान, तारे नरं व ना
रिवा॥३॥जर्जित सेल सिहरे, दिका नाणे
निसीदिआ जस्स ॥ तं धम्मचकवडिं, अरिह
नेमि नमसामि ॥४॥चत्तारि अझ दस दो, य
वदिया जिणवरा चनधीसं॥परम निहिअहा,
सिमा सिमिम दिसंतु॥५॥इति ॥२॥
(१) ॥ अथ वेयावच्चगराण ॥ ॥ यावच्चगराण संतिगराणं ॥सम्मदिति समाहिगराण ॥ इति ॥ करेमि काउस्सग्ग । अन्नच॥ इति ॥२३॥ ॥प िसंमासा प्रमार्जन पूर्वक वैत के तीसरे आवस्सगसूत्र वादणा निमित्ते मुहपत्ती पडिले हुँ १ गुरु कहे पडिलेएद ॥ मुदपत्ती पहिलेदे. पी वांदणा दे तिनका विधि कहते है। ॥अवग्रदके बादिर उना दूआआधा नीचा नम कर श्वामिखमासमणो वंदिलं जावणिजा ए निसीहिआए अणुजाणद मे मिजग्गई.श्त ना पाठकद कर भूमि प्रमार्जन करता दूआ नि सीदि कद के कबुक अवग्रदमें प्रवेश कर के सं मासाप्रमार्जन कर के जक्कडबेट के मावे दायमें मुद्पत्ति ले के मावे कानसें ले के जिमणा कान पर्यत निल्लाड पूजी, मुदपत्ती आगे रख के ति सके मध्य नागमे गुरुचरणकी कल्पना क
र के॥अहो काय इत्यादि श्रावत कर के काम
नीचा नम कर मस्तकें अजलि कर के गुरु सन्म
ख दृष्टि स्थापन कर के ॥ खमणिको ने किला
मो॥ इत्यादि पाठ कदे पीठ फेर ॥ जत्ता ने।
इत्यादिआवर्तन करके रखडा दोके पति पगर्से
नूमि पूंजता दूआ अवग्रहसें वाहिर निकल
स्वस्थान पर आवे उहां ॥ आवस्सियाए ।
इत्यादि पाठ सर्व कदे, सो लिखते हैं।
॥अथ सुगुरुवादणा ॥
॥श्वामि खमासमणो वदिलं, जावणिकाए
निसीदिशाए॥ अणुजाणद मे मिनग्गरं निसी
दि॥ अहो कार्य काय संफास, खमणिको ने
किलामो॥अप्पकिरखताण बदु सुनेण ने, दि
वसो वश्कंतो जत्ता ने जवणिज च ने, खामे
मि खमासमणो॥ देवसिथ वश्कम वसि
आए, पडिकमामि खमासमणाणं॥देवसिथा
ए, आसायणाए॥तित्तीसन्नयराए जं किंचि मि
छाए, मणकडाए वयउक्कडाए, कायउक्कडाए कोंढाए, माणाए, मायाए, लोनाए, सबकालि आए, सब मिलोवयाराए, सवधम्माश्कमणा ए॥आसायणाए जो मे अश्ारों कन, तस्स खमासमणो पडिकमामि ॥ निंदामि गरिहामि अप्पाण वोसिरामि ॥२॥ दूजी वारके वांदणे आवसिआए ए पद न कहेना, अने राश्ये राश्वशक्तो,तथा चनमासी चजमासी व कतो, परकीय परको वश्कतो, संवचरीये संवत्र रीनवश्कतो॥एसीतरपाठकहेनां ॥इति॥४॥ ॥ अथ देवसियं आलो ॥ ॥श्चाकारेण संदिस्सद जगवन् देवसिय आलोनश्च॥आलोएमि,जो मे॥इतिश्य देवसियके विकाने राश्य कदेनां ॥ ॥ पाबैं रात्रि संबंधि अतिचार छरु समद आलोवे, सो कदेते है॥
(१२)
र के॥अहो कायं इत्यादि आवर्त कर के कडक
नीचा नम कर मस्तकें अजलि करके गुरु सन्म
ख दृष्टि स्थापन कर के ॥खमणिको ने किला
मो॥ इत्यादि पाठ कहे पीके फेर ॥ जत्ताने॥
इत्यादिआवर्तन करके खडा होके पनि पगसे
नूमि पूजता ढूआ अवग्रहसें वाहिर निकसके
स्वस्थान पर आवे उदा ॥ आवस्सियाए ॥
इत्यादि पाठ सर्व कदे, सो लिखते है।
।। अथ सुगुरुवादणां ॥
॥श्चामि खमासमणो वदिलं, जावणिकाए
निसीदियाए॥ अणुजाणद मे मिनग्गरं निसी
हि ॥ अहो कार्य काय संफासं, खमणिको ने
किलामो॥ अप्पकिलंताण बहु सुनेण ने, दि
वसो वश्कंतो जत्ता ने जवणिऊ च ने, खामे
मि खमासमणो॥ देवसिचं वश्कम्मं श्रावसि
आए, पडिकमामि खमासमणार्णदेवसिथा
ए, आसायणाए॥तित्तीसन्नयराए जं किंचि मि
(१५) क्रोध॥६॥मान ॥७॥ माया ॥७॥लोन ॥ए॥राग ॥२॥ क्षेष ॥१२॥ कलद ॥१३॥ अन्याख्यान ॥ १३ ॥ पैशुन्य ॥ १४ ॥रति॥ अरति ॥ १५॥ परपरिवाद ॥१६॥ मायाम पावाद ।। १७ ॥ मिथ्यावशल्य ॥१७॥ए अ ढारे पापस्थानक सेव्या होय, सेवराव्यां होय, सेवता प्रत्ये नला जाण्या होय, ते सत्वे हु म में, वचनें, कायायें करी तस्स मिना मि उक्कडं। ॥ शान, दर्शन, चारित्र, पाटी, पोथी, व पी, कवली, नवकरवाली, देव गुरु धर्मकी आ शातना करी होय॥ पन्नरे कर्मादानोकी आसे वना करी दोय॥राजकथा,देशकया, स्त्रीकथा, भक्तकया करी दोय और जो कोई पाप पर निंदा कीधु दोय, कराव्यु दोय, करता अनुमो धु दोय सो सर्व मन, वचन, कायाये कर के, दि वस अतिचार शालोया कर के पटिकमगमें आलो। तस्स मिठा मि जकड॥इति आलो (२४) ॥ अय आलोयण लिख्यते॥ । आजणा चार प्रदर दिवसमें जे में जीन विराध्या दोय। सात लाख एथिवीकाय ॥सा त लाख अप्पकाय॥सात लाख तेनकाय॥ सात लाख वाजकाय ॥ दश लाख प्रत्येक वन स्पतिकाय ॥ चनदे लाख साधारण वनस्पति काय ॥ दोय लाख वेड़िय ॥दोय लाख तेंडि य॥दोय लाख चौरियि ॥ चार लाख देवता ॥ चार लाख नारकी। चार लाख तिर्यंच पचें यि ॥ चनदे लाख मनुष्य ॥ एव चार गतिके चौरजीव दस्यो होय, दणाव्यो होय, दणता सापापानम, माहारे जीव जे प्रत्ये नलो जाण्यो दोय, ते सवे मन वचन कायायें करी मिना मि उकर्ड ॥ इति ॥२६॥ ।। अथ अढारे पापस्थानक पालोन। प्राणातिपात ॥२॥मृपावाद ॥३॥ दत्तादान ॥३॥ मैथुन ॥४॥परिग्रह।
(२५) क्रोध ॥६॥मान ॥॥ माया ॥॥लोन ॥ ए॥राग ॥१॥ देष ॥१२॥ कसद ॥१३॥ अभ्याख्यान ॥ १३ ॥ पैशुन्य ॥ १४ ॥ रति ॥ अरति ॥१५॥परपरिवाद ॥१६॥ मायाम् पावाद ॥१७॥ मिथ्यात्वशत्य ॥२७॥ए अ ढारे पापस्थानक सेव्यां होय, सेवराव्यां दोय, सेवता प्रत्ये मला जाण्यां होय, ते सत्वे हुँ म ने, वचनें, कायायें करी तस्स मिना मिकह। ॥ झान, दर्शन, चारित्र, पाटी, पोथी, ग्व खी, कवली, नवकरवाली, देव गुरु धर्मकी आ शातना करी होय॥पन्नरे कर्मादानोकी आसे वना करी होय॥राजकथा,देशकथा, स्त्रीकथा, नक्तकथा करी दोय और जो कोइ पाप पर निंदा कीg दोय, कराव्युं दोय, करतां अनुमो धुं दोय सो सर्व मन, वचन,कायाये कर के, दि वस अतिचार आलोयणे कर के पडिक्कमणामें आलोनं ॥ तस्स मिना मि कह ॥इति आलो (२६) यण ॥ श्दा प्रनातके पडिकमणेमे दिवसके ठिकाने रात्रिका पाठ कदेना ।। इति ॥७॥ ॥पी सबस्सवि राश्य॥श्त्यादि पार कहे. तिदा श्चाका न॥एपद कदनेसे आलो या दुआ अतिचारका प्रायश्चित्त मागे॥ गुरु कहे पडिक्कमह ॥ पीले श्वं तस्स मिठामि उक डंकद के समासा प्रमार्जन कर के आसन पर बैठ के जिमणा गोडाचा रख के मावा गोडा नाचं कर के ऐसे कदे कि नगवन्! सूत्रनपुं' तब गुरु कदेनणेद॥पश्चि कदि के तीन नवकार अरु तीन वारकरेमि नंतान केंश्चामि पडिक मिन जो मेरा इत्यादि कद करतं निंदे तं च गरिदामि पर्यंत वंदित्तु मत्रकहे सो लिखते है॥पी खडाहो केश, यारादणाए इत्यादि सपूर्ण कहे,
(१७)
॥श्वामि पडिकमिळं, सावगधम्माश्ार
स॥१॥जो मे वयाश्यारो, नाणे तद दंस
चरिते अ॥सुदुमो अ वायरो वा,तं निदेतं
गरिदामि ॥ ॥ विदे परिग्गमि, साव
जे बदुविहे अ आरने । कारावणे अ करणे,
पडिक्कमे देवसिय सर्व ॥३॥जं वधमिदिएदि,
चनहिं कसाएदि अप्पसजेहिं ।। रागेण व दोसे
व, त निदे तं च गरिदामि ॥४॥ आगम
णे निग्गमणे, ठाणे चकमणे अणानोगे ॥ अ
निगे अनिलंगे, पडिक्कमे॥५॥संका कख
विर्गिना, पसंस तद सथवो कुलिंगीसु ॥ सम्म
तस्स श्आरे, पडिक्कमे॥६॥ बकाय समारंने,
पयणे अ पयावणे अ जे दोसा "अत्तहाय पर
हा, जनयहा चेव त निंदे ॥७॥ पचएहमणु
बयाणे, गुणवयाण च तिपद मश्यारे॥सिका
एच चडएई, पडिक्कमे ॥७॥ पढमे
अपुछ
यमि. थलग पाणाश्चाय विरईच॥ आयरित्र
(२६) यण ॥ इदा प्रनातके पढिकमणेमे दिवसके ठिकाने रात्रिका पाठ कहेना ॥ इति ॥ ॥ ॥पी सबस्सवि राश्य॥श्त्यादि पाठ कहे. तिदा श्चाका ॥ न० ॥एपद कदनेसे आलो या हुआ अतिचारका प्रायश्चित्त मागे॥ गुरु कदे पडिक्कमह ॥ पीछे च तस्स मिठामि उक डं कद के संमासा प्रमार्जन कर के आसन पर बैठ के जिमणा गोढा उंचा रख के मावा गोडा नीचे कर के ऐसें कदे कि नगवन् सूत्रनपुं? तब गुरु कदेनणेह॥पबिश्च कदि के तीन नवकार अरु तीन वारकरेमि नंतान के श्बामि पडिक मिन जो मे राश्न इत्यादि कह कर॥त निदे तं च गरिदामि पर्यंत वंदित्तु सूत्रकदे सो लिखते दै॥पी खडा हो के अनुविम आराहणाए इत्यादि सपूर्ण कहे, सो लिखते हैं। ॥ अथ श्रावक वदितासूत्र ॥वदित्तुसब सिक्षे,धम्मायरिए थ
(ए)
, ॥ १७ ॥धण धन्न खित्त वनू, रुप्प सुबन्ने
। कुवित्र परिमाणे ॥ऽपए चप्पयंमि, पडि
ते ॥ १७ ॥गमणस्स य परिमाणे, दिसासु
अहेअतिरिअ च ॥ बुझिसश्अंतर-धा, पढ
मि गुणवए निंदे॥१५॥ महमि अ मंसंमि
अ, पुप्फे अफले अगधमल्ले आजवनोगप
रिनोगे, बीयमि गुणवए निंदे ॥ ३० ॥ सञ्चित्ते
पडिबछे, अपोल उप्पोलिशं च आदारे ॥तु
बोसदि नकराया, पडिक्कमे ॥२१॥इंगाली
वणसाडी, नाडी फोडी सुवढाए कम्मं ॥ वाणि
ही चेव दं, त लस्क रस केस विसविसयं ।
।।२।। एवं खु जतपिल्लण, कम्मं निलंबणं च
दवदाणं । सरदद तलाव सोस, असई पोसंच
वकिला ॥२३॥ सवग्गि मुसल जंतग, तण
कले मत मूल नेसले॥ दिन्ने दवाविएवा, पडि
कमेण ॥ २४ ॥ न्हाणू वट्टण वनग, विलेवणे
सहरूव रस गधे॥ वासण आनरणे, पडिक
(२०) मप्पस, श्च पमायप्पसगेण ॥एवह बंध उ विए, अश् नारे नत्त पाण वुढेए ॥ पढमं व यस्स आरे, पडिकमे ॥१०॥ बीए अणुवयं मि,परिथूलगअलिअ वयण विरई॥आयरि अमप्पस, श्च पमायप्पसंगेण ॥११॥ सह सा रदस्स दारे, मोसुवएसे अ कूडलेदे अ॥ बीयं वयस्स आरे, पडिक्कमे ॥१२॥ तश्ए अपुषयमि, धूलग परदबदरण विरई॥ आ यरिअ मप्पसले, श्च पमायप्पसंगणं ॥१३॥ तेनादडप्पनंगे, तप्पडिरूवे विरुधगमणे अ॥ कूडतुल कूडमाणे, पडिक्कमे ॥१४॥ चउठे अणुषयमि, निश्च परदारगमण विरश्॥श्रा यरिध मप्पसले, श्च पमायप्पसगेणं ॥२५॥ अपरिग्गदिया इत्तर,अणंग वीवाद तिव अ पुरागे॥ चनच वयस्स इयारे, परिकमे॥ ॥१६॥ इत्तो अणुबए प, धर्ममि आयरिश्रम प्पसवमि ॥ परिमाण परिशेए, पमायप्पसं
(३१)
॥ पंचविदो अश्आरो,मा मय दुक मरणते
॥ ३३ ॥काएण काश्अस्स, पडिक्कमे वाश्अस्स
वायाए ॥ मणसा माणसिअस्स, सबस्स वया
'आरस्स ॥३४॥ चंदणवय सिरकागा, रखेसु
सन्ना कसाय दमेसु ॥ गुत्तीसु अ समिईसु अ,
जो अश्आरो अतं निंदे ॥ ३५॥ सम्मदिही
जीवो, जश विद्रुपाव समायरे किंचि॥अप्पोसि
दोश बंधो, जेण न निधस कुण ॥३६॥ तं
पिट्ठसपडिक्कमणं, सप्परिआव सउत्तरगुणं च ॥
खिपं जवसामेश, वादिछ सुसिस्किन विल्लो ॥
॥३७॥ जदा विसं कुछगय, मत मूल विसार
या। विजा दणति मंतेर्दि, तो तं दवा निविसं
॥३॥ एवं अविदं कम्म, राग दोस सम
लिय॥आलोयंतो अनिंदंतो, खिप्प दण
सुसावन ॥३५॥ कय पावोवि मणुस्सो, आ
लोअ निंदिय गुरुसगासे । दोश् अरेग ल
दुन, दरिअ नरुव भारवहो ॥ आवस्स
(३०) मे ॥ ५॥ कटणे कुकुरए, मोहरि अहिंगर ए नोग अरिते॥दममि अाए, तश्यमि गुणवए निदे॥२६॥तिविदे उपणिहाणे, अ एवळाणे तदा सय विदणे ॥ सामाश्त्र वितह कए, पढमे सिंकावए निटे ॥३७॥ प्राणवणे पेसवणे, सहे रूवे अ पुग्गलरकेचे ॥ देसावगा सियमि, वीए सिकावए निंदे ॥ ॥ सथा रुञ्चारविदी, पमाय तद चेव नोयणानोए ॥पो सद विदि विवरीए, तए सिस्कावए निंदे ॥ ॥ए॥सञ्चित्ते निस्किवणे, पिदिणे ववएस म बरे चेव ॥ कालाश्कम दाणे, चनने सिकावए निंदे ॥ ३० ॥ सुदिए सुथ दिए सुश्र, जामे असजएम अणुकपा ॥रागेशव दोसेणव, तं निंदे त च गरिहामि ॥ ३१॥ सासु सविना गो, न कन तव चरण करण जुत्तेसु ॥संते फासु अदाणे, त निंदे तं च गरिहामि ॥ ३२॥ लोए परलोए, जीविध मरणे अ आसंस पचे
(३३)
मे सबनूएसु, वेरं मऊं न केण ॥४॥ एव म
हं आलोअ, निंदिअ गरदिय गविध स
म्मं ॥तिविदेण पडिकंतो, वंदामि जिणे चनधी
स ॥५॥इति॥श्णा हा प्रनातके पडिक्कमण
में देवसिके ठीकाने राश्य कदना ॥
पीब दो वादणा देकर अवग्रदमादियकोज
कदे॥श्चाकाणासमानाअनुनिमिअप्रिंत
र ॥राश्य खामेमि ' गुरु कदे खामेद ॥ संमा
सा प्रमार्जन पूर्वक गोमाली बैठ के, वे बाद प
डिलेदि ।। मुदपत्ती वामहाथसू मुखे देई, ददि
ण दाथ गुरु सामो करी॥ नीचो नम्योथको
किंचि अप्पत्तिय ॥ इत्यादि संपूर्ण कदे ॥
॥ अथ अनुहि॥
॥श्चाकारेण सदिस्सह नगवन् अनुहिनमि
अप्रिंतर देवसिन खामेनश्चिं खामेमिदेवसिय
जंकिंचि अप्पतियापरप्पत्तिय भत्ते पाणे विगए
वेआवञ्चे आलावेसंलावे बच्चासणे॥समासणे
एण एएण, साव जवि बहुरन हो । जसा व मत किरिथ, कादी अचिरेण कालेश। ॥४१॥ आलोअणा पद्धविहा, नयसभरिका पडिकमणकाले ॥ मूल गुण उत्तरगुणे, त निद त च गरिदामि ॥४२॥ तस्सधम्मस्स केवति पन्नत्तस्स ॥ अनुहिनमि आरा, दणाए विरल मि विराहणाए । तिविदेण पडिकतो, वंदामि जिणे घनधीसं ॥ ४३ ॥जावति चेआई० ॥ ॥४४॥जावंत केवि साढू ॥ ४५ ॥ चिरसं चिय पाव पणासणी, नवसयसहस्स महणीए ॥ चनवीस जिण विणिग्गय कहाई, वोलंतु मे दिअहा ॥ ४६॥ मम मंगल मरिहता, सिक्षा सादु सुझं च धम्मो य॥सम्महिही देवा,दि तु समाहिं च वोहिं च ॥ ४ ॥ पडिसिधाणं करणे, किंधाण मकरणे पडिकमणे॥ असहर णे अतहा, विवरीय परूवणाए अ॥४॥ खामेमि सब जीवे,सछे जीवा खर्मतु मे॥मित्ती
(३३)
मे सबनूएस, वेरे मन केपा ॥४॥ एव म
हं आलोअ, निदिध गरहिअधुगंविअंस
म्म ॥ तिविदेण पडिक्कतो, वदामि जिणे चनची
सें ॥५॥इति॥णा हा प्रनातके पडिकमण
में देवसिके ठीकाने राश्य कहना ॥
पनि दो वादणा देकर अवग्रहमादियकोज
कदे॥श्वाकासानाअनुहिनमिअप्रिंत
र॥राश्य खामेमि गुरु कदे खामेद ॥समा
“सा प्रमार्जन पूर्वक गोमाली बैठ के, वे बाद प
डिलेदि ॥ मुदपत्ती वामदाधरां मुखे देई, दक्षि
ण दाथ गुरु सामो करी॥नीचोनम्योथको
किंचि अप्पत्तिय ॥ इत्यादि संपूर्ण कहे ॥
॥ अथ अप्नुहिन॥
॥श्वाकारेण सदिस्सह भगवन् अनुनिमि
अग्निंतर देवसिन खामेश्वं खामेमिदेवसिय
जंकिंचि थप्पत्तिय॥परप्पत्तिय नत्ते पाणे विपए
वेधावच्चे आलावेसलावे उच्चासणे॥समासणे
(३४) अतरनासाए उचरिनासाए॥जं किंचि ॥ मक विषय परिदीणसुदुमवा वायर वातुने जाणह अदन जाणामि॥ तस्स मिशामिकडं ॥इति। ॥ इहा गुरु पण मिनामि उकडं कहे पीले थे वादणा देई नूमि प्रमार्जन करता हुआ पगसे अवग्रह वादिर आय के आयरिय जवाए त्यादि तीन गाथा कदे, सो लिखते हैं। ॥अथ आयरिय नवजाए ॥ ॥ आयरिश्र नवद्याए, सीसे साहमीए कुल गणे अ ॥ जे मे कया कसाया, सधे तिविदेण खामेमि॥१॥ सबस्स समण संघस्स, नगवन अजलिं करिअसीसेसई खमावश्त्ता,खमामि सबस्स अड्यपि ॥२॥सधस्स जीवरासिस्स, नाव धम्मो निदिन निथ चित्ते ॥ सब खमा, वश्त्ता, खमामि सबस्स अट्यपि ॥३॥ पा करेमिनं ते श्छामि गमि कानस्सा तस्सुत्तरी० ॥ श्रीमहावीर
(२५)
चितवणा निमित्त करेमि काउस्सग्गं अन्नबू॥
कदि के कामस्सग करे, कानस्सग्गमें श्रीवी
रकृत बम्मासी तप चितवन करे॥ चोवीश नव
कार अथवा लोगस्सका काजस्सग्ग करे,
काजस्सग्ग पारिकें प्रगट लोगस्स कदे ।।
॥ आवश्यककीमुदपत्तीपडिलेढुं गुरु
कदे पडिलेद। मुदपत्ती पडिलेहीबे वादणादेई
सकल तीर्थनाम लश्नमस्कार करे,सोलिखे.
॥अथ सकल तीर्थ नमस्कार।
॥ स्त्रग्धरा उत्तम् ॥
॥ समक्तया देवलोके रविशशिनवने, व्यंत
राणा निकाये, नदत्राणा निवासे गदगणपटले
तारकाणा विमाने॥पाताले पन्नगेरे स्फुटमणि
किरणे ध्वस्तसाजाधकारे, श्रीमतीर्थकराणा प्र
तिदिवसमद तत्र चैत्यानि वदे॥१॥ वैतान्ये
मेरुशृंगे रुचकगिरिवरे कुमले दस्तिदंते, वरकारे
कूटनंदीश्वरकनकगिरौ नैपधे नीलवते ॥ चैत्रे
(३४) अंतरनासाए जवरिनासाए ॥ज किचि ॥ मक विषय परिदीण सुहमवा वायर वातुने जाणह अदन जाणामि॥ तस्स मिचामिकडं तिम ॥ इदा गुरुपण मिठामि उक्कडं कहे पीने के वादणा देई भूमि प्रमार्जन करता दुआ पगसे अवग्रह वादिर आय के आयरिय जवळाए । त्यादि तीन गाथा कदे, सो लिखते है। ॥ अथ आयरिय नवजाए। ॥ आयरिश नवधाए, सीसे सादमीए कृप्त गणे अ॥ जे मे कया कसाया, सचे तिविदेण खामेमि ॥२॥ सवस्स समण संघस्स, नगवन अजति करिअसीसे॥सर्व खमावश्त्ता,खमामि सबस्स अदयपि ॥॥ सबस्स जीवरासिस्स, नाव धम्मो निदिध निध चित्ते ॥ सर्व समा. वश्त्ता, खमामि सबस्स अत्यपि ॥३॥ पति करेमि न ते श्छामि गमि काउस्सग्ग तस्मुत्तरी ॥ श्रीमहावीर स्वामी उमासि तप (३७) चोङयिन्या, कौशाव्यां कोशलाया कनकपुरव रे देवगिर्या च काश्या । रासक्ये राजगेहे ट शपुरनगरे जहिले ताम्रलिप्त्यां ॥ श्री०॥७॥ स्वर्गे मत्ऽतरिक्ष गिरिशिखरददे स्वर्णदीनीर तीरे, शैलाये नागलोके जलनिधिपुलिने नूरु हाणा निकुजे॥ग्रामेऽरण्ये वने वा स्थलजल विषमे पुर्गमध्ये त्रिसध्य॥श्रीम॥॥ "श्री मन्मेरौ कुलाजी रुचकनगवरे शाल्मली जंबुर के, चौकन्ये चैत्यनदे रतिकररुचके कौंमले मा नुपाके ॥ श्लूकारे जिना च दधिमुखगिरौ व्यंतरे स्वर्गलोके,ज्योतिौके नवति त्रिनुवन वलये यानि चैत्यालयानि"एवं श्रीजे नचैत्यस्तवनमनुदिनं ये पति प्रवीणा , प्रो अकल्याणदेतु कलिमलहरणं भक्तिभाजस्त्रि सध्यम् ॥ तेपा श्रीतीर्थयात्राफलमतुलमलं जा यते मानवाना, कार्याणा सिधिरुबै प्रमुदित t
॥६॥ चदाया चमुख्या गजपुरमथरापत्तने
(३६)
शेले विचित्रे यमकगिरिवरे चकवाले हिमाशे
॥श्रीम० ॥ ॥ श्रीशेले विंध्यश्रगे विमलामि
रिवरे ह्यqटे पावके वा, सम्मेते तारके वा कुख
गिरिशिखरेऽष्टापदे स्वर्णशैले । सह्याशे बैन
यते विमलगिरिवरे गुर्जरे रोदणाशे ॥ श्रीम
॥ ३ ॥ आघाटे मेदपाटे वितितटमुकुटे चित्रा
टेत्रिकुटे,लाटेनाटेच धाटेविटपिघनतटे हेमटे
विराटे॥कर्णाटे देमकूटे विकटतरकटे चक्रकूटे
च नोटे॥ श्री०॥४॥श्रीमाले मालवे वा म
लयिनि निषधे मेखले पिचले वा, नेपाले नाह
ले वा कुवलय तिलके सिंदले केरले वा ॥मा
दाले कोशले वा विगलितसलिले जगले वा
ढमाले ॥श्रीम० ॥ ५॥ अंगे वंगे कलिंगे सु
गतजनपदे सत्प्रयागे तिलंगे, गोडे चौडे मुरमे
वरतरविडे नडियाणे च पौने ।। आई माझे
पुलिविडकवलये कान्यकुब्जेसुराष्ट्रे॥श्री
(३७) चोङयिन्यां, कौशाव्या कोशलाया कनकपुरव रे देवगिर्या च काश्यां ॥रासक्ये राजगेदे द शपुरनगरे नदिले ताम्रलिप्त्यां ।। श्री०॥७॥ स्वर्गे मयेऽतरिक्ष गिरिशिखरददे स्वर्णदीनीर तीरे, शैलाये नागलोके जलनिधिपुलिने नूरु हाणा निकुजे ॥ ग्रामेऽरण्ये वने वा स्थलजल विषमे अर्गमध्ये त्रिसध्य॥श्रीम०॥॥ “श्री मन्मेरौ कुलाजी रुचकनगवरे शाल्मली जंबुर दे, चौकन्ये चैत्यनंदे रतिकररुचके कोमले मा नुषाके ॥ इहूकारे जिना च दधिमुखगिरी व्यंतरे स्वर्गलोके,ज्योतिर्लोके नवति त्रिनुवन वलये यानि चैत्यालयानि" | ए॥श्वं श्रीजें नचैत्यस्तवनमनुदिनं ये पति प्रवीणा , प्रो यत्कल्याणहेतु कलिमलहरण भक्तिनाजस्त्रि सध्यम् । तेषा श्रीतीर्थयात्राफलमतुलमल जा यते मानवाना, कार्याणा सिधिरुच्चै प्रमुदित रागमं परमसिद्धिकरं नमामि ॥३॥ परिमल (३०) मनसा चित्तमानकारि ॥ १० ॥इति चैत्य वटन सपूर्णम् ॥ इति ॥ ३ ॥ पी गुरुमुखें पच्चरकाण करिके॥श्वामोनि सद्विय कदि के गुरु एक गाथाकी स्तुति कहे ॥पीव णमोखमासमणाण णमोऽईसिहाय॥ कद कर परसमय तिमिरतरणि ए तीन गाथा कदीजें सो लिखते हैं। ॥अथ परसमय तिमिरतरणि ।। ॥ परसमय तिमिरतरणिं, नवसागर वारि तरण वरतरणिं ॥ रागपराग समीर, वदे देवम हावीरम् ॥ १॥ निरु६ संसार विहारकारि, रन्तनावारिगणा निकाम ॥ निरन्तर केवलिस तमा वो, नवावद मोदनर दूरंतु ॥ ॥सदेह कारिकुनयागमरूढगूढ, संमोदपकदरणामल वारिपुरम् ॥ ससारसागरसमुत्तरणोरुनावं, वी भरलोनालीढलोलालिमाता, वरकमलनिया
(ए)
से दारनीदारदासे ॥ अविरलनविकारागार
विचित्तिकार,कुरु कमलकर मेमङ्गल देविसारम्
॥शाशति ॥३३॥ अथवा ससारदावानी तीन
गाथा कदेवे, सो लिखते हैं।
॥अथ संसारदावा स्तुति ।।
॥ संसारदावानलदादनीर, समोदधूली
दरणे समीरम् ॥ माया रसादारणसारसीरं, न
मामि वीर गिरिसारधीरम् ॥२॥नावावनाम सु
रदानवमानवेन, चूलाविलोलकमलावलिमा
लितानि ॥ संपूरितानिनतलोकसमीदितानि,
कामं नमामि जिनराजपदानि तानि ॥२॥बो
धागाधं सुपद पदवी नीरपुराभिरामं, जीवादि
साविरललदरीसंगमागाददेदम् ॥ चूलावेल
गुरु गममणी संकुल दूरपारं, सारं वीरागमज
लनिधि सादर साधु सेवे ॥ ३॥ आमूला लो
लधूली बहुल परिमला लीढलोलालिमाला,
ऊंकारा रावसारा मलदलकमलागारनूमीनि
रागम परमसिद्धिकरं नमामि ॥ ३ ॥ परिमल (३०) मनसा चित्तमानदकारि ॥ १० ॥ इति चैत्य वदन सपूर्णम् ॥ इति ॥ ३ ॥ पी गुरुमुखें पच्चरकाण करि के॥चामोनि सद्विय कदि के गुरु एक गाथाकी स्तुति कहे ॥पी- णमोखमासमणाण णमोऽसिहा॥ कद कर परसमय तिमिरतरणि ए तीन गाथा कहीजें सो लिखते हैं। ॥अथ परसमय तिमिरतरपिं॥ ॥ परसमय तिमिरतरणि, नवसागर वारि तरण वरतरणिं ॥रागपराग समीरं, वदे देवम हावीरम् ॥१॥ निरुक्ष संसार विहारकारि, रन्तनावारिगणा निकाम ॥ निरन्तर केवलिस तमा वो, नवावई मोदनरं दूरंतु ॥२॥संदेह कारिकुनयागमरूढगूढ, संमोहपंकहरणामल वारिपूरम् ॥ ससारसागरसमुत्तरणोरुनावं, जरलोनालीढलोलालिमाखा, वरकमलनिवा
(३ए)
से हारनीदारदासे ॥ अविरलनविकारागार
विछित्तिकार,कुरु कमलकर मेमङ्गलं देविसारम
॥४॥ इति ॥३३॥ अथवा संसारदावानी तीन
गाथा कदेवे, सो लिखते है।
॥ अथ ससारदावा स्तुति ॥
॥ संसारदावानलदादनीर, संमोहघुली
हरणे समीरम् ॥ माया रसादारणसारसीरं, न
मामि वीरं गिरिसारधीरम् ॥२॥नावावनाम सु
रदानवमानवेन, चूलाविलोलकमलावलिमा
लितानि ॥ सपूरितानिनतलोकसमीहितानि,
काम नमामि जिनराजपदानि तानि ॥३॥बो
धागाध सुपद पदवी नीरपूराभिराम, जीवाहिं
साविरललहरीसंगमागाददेदम् ॥ चूलावेखं
गुरु गममणी संकुल दूरपारं, सारं वीरागमन
लनिधि सादर साधु सेवे ॥ ३॥आमूला लो
सधूली बढुल परिमला लीढलोलालिमाला,
अंकारा रावसारा मलदलकमलागारनूमीनि
(४०) वासे ॥ गयासनारसारे वरकमलकरे तारड़ा रानिरामे, वाणीसदोहढेहे नवविरहवरं देहि मे देवि सारम् ॥४॥इति ॥३४॥ ॥इत्यादितीनगाथा भणी, शकस्तव कहे पीछे खडा हो कर अरिदत चेश्याण करेमि का नस्सग्ग ॥ वदणवत्तिाए। अन्नतू ॥ इत्या दि पाठ कदि कॅ॥ ॥ कामस्सग्गमादे एक नवकार चिंतवी ॥ एक श्रावक प्रथम कानस्सग्ग पारी नमोऽर्हसि हाण कही।एक गाथास्तुतिकहे, सो लिखते हैं ॥अश्वसेन नरेसर, वामादेवीनंद ॥ नव के र तनु निरुपम,नील वरण सुखकद ॥ अहिख बण सेवित, पनमावर धरणिंद ॥प्रह की प्र णमू, नित प्रति पास जिणंद ॥१॥ए गाथा एक जण कहे ।। दूसरे सब कालस्सग्गादे रह्या हुआ सुणे॥पी णमो अरिदताण के दिके कानस्सग्ग पारे॥स तरे , पण (४१) गणा ॥ पी3 लोगस्स कहे । सबलोए अरिदं त चेप्राण वदणवत्तिः ॥ अन्नबूण ॥ इत्यादि कदि के।एक नवकारका काजस्सग्ग करी पा रिके दूजी स्तुति कहे, सो लिखते हैं। ॥ कुल गिरिवेयहर, कणयाचत अभिराम ॥ मानुषोत्तर नंदी, रुचक कुंमल सुखनगम ॥ नुवणेसुर व्यंतर, जोस विमाणी नाम ॥ वर्ते ते जिणवर, पूरो मुझ मन काम ॥२॥ ॥पी पुस्करवरदीवढे कदि के सुयस्सनगव ३० वदण अन्नबूणाकदी॥एक नवकारकाका उस्सग्ग पारि के॥त्रीजीस्तुति कहे,सो लिखते, ॥ जिदा अग इग्यारे, बार जपगब बेद ॥ दस पयन्ना दाख्या, मूल सूत्र चउन्नेद ॥ जिन आगम षड्व्य, सप्त पदारथ जुत्त॥सानलि सईदता, बेटे करम तुरत्त ॥३॥ ॥पी सिधाणं वुशाणाकद के वेयावच्च गराणं ॥ अन्नबूकदी। एक नवकारका का (४०) वासे ॥ गयासनारसारे वरकमलकरे तारहा रानिरामे, वाणीसदोदेदे नवविरहवरं देहि मे देवि सारम् ॥४॥इति ॥ ३४॥ ॥ इत्यादितीनगाथा नणी, शक्रस्तव कहे पीछे खडाहो कर अरिदत चेश्याण करेमि का जस्सग्ग ॥ वदणवत्तिाए। अन्नतू ॥श्त्या दि पाठ कदि के॥ ॥ कास्सग्गमादे एक नवकार चिंतवी ॥ एक श्रावक प्रथम कानस्सग्ग पारी नमोऽर्हसि हा कही॥एक गाथास्तुतिकदे, सो लिखते हैं ॥ अश्वसेन नरेसर, वामादेवी नद॥ नव क र तनु निरुपम,नील वरण सुखकद ॥ अहि ख बण सेवित, पनमावश् धरणिंद ॥प्रह की प्र एमू, नित प्रति पास जिणंद ॥२॥ए गाथा एक जण कदे ॥ दूसरे सब कानस्सग्गादे रह्या दुआ सुणे॥ िणमो अरिहंताणं के दि के कानस्सग्ग पारे॥इस तरे आगे पण जा (४१) पण पीने लोगस्स कदे ॥ सबलोए अरिहं त चेआणं वंदणवत्ति ॥ अन्नबूण ॥ इत्यादि कदि के॥एक नवकारका काजस्सग्ग करी पा रिके दूजी स्तुति कदे, सो लिखते हैं। ॥कुल गिरिवेयवश, कण्याचल अभिराम ॥ मानुषोत्तर नदी, रुचक कुंमल सुखाम ॥ नुवणेसुर व्यंतर, जोइस विमाणी नाम ॥ वर्ते ते जिएवर, पूरो मुफ मन काम ॥३॥ ॥पी पुस्करवरदीवढे कदि के सुयस्स नगव J० वदण अन्नबूणाकदी॥एक नवकारका का नस्सग्ग पारिके॥त्रीजीस्तुति कदे,सो लिखते, ॥ जिहा अंग ग्यारे, बार जपंग उ बेद ॥ दस पयन्ना दाख्या, मूल सूत्र चउन्नेद ॥ जिन आगम षड्व्य, सप्त पदारथ जुत्त॥ सानलि सईदता, त्रूटे करम तुरत्त ॥३॥ ॥पी सिक्षाणं वुशाण॥ कह के वेयापच्च गराणं॥ अन्ननू कदी। एक नवकारका का (४२) नस्सग्ग करी पारि के णमोऽर्हत्सिा कह के चोथी स्तुति कहे, सो लिखते है । ॥पनमावई देवी,पार्श्व यद परत ॥ सहु सघना सकट, दूर करेवा दद ॥ समरो जि ननक्ति, सूरि कदे श्क चित्त ॥ सुख सुजस स मापो, पुत्र कलत्र बद्ध वित्त ॥४॥ इति ॥३५॥ ॥पायें नीचा बैठ के णमोनूणं कदि के ॥ तीन खमासमणे पूर्वोक्त रीतें ॥ आचार्य,जपा ध्याय, सर्वसाधु वादे ॥ ॥अथवा कई ठिकाने जिमणो हाथ नीचो करि, मुखें मुदपत्ती देई अह्वाइलेसु कदे हैं,सो लखते हैं ॥ इति सप्रदाय ॥ ॥ अथ अवाश्तोसु॥ ॥ अढाइ सु॥दीव समुद्देसु ॥पन्नरससु क म्मनूमीसु॥जावंत केवि साहू ॥ रयदरण र उपडिग्गहधारा पंचमहययधारा ॥ अढारसह स्स सीलंगधारा॥ रत्ता स
(४३)
वे॥सिरसा मणसा मबएण वंदामि ॥ इति॥
॥ इतना विधि किया पी स्थिरता दुवे तो
खमासमण तीन बखत देई । चाकारेण सं
दिस्सद जगवन् ॥ चैत्यवदन करूं जी यद पाठ
कह कर चैत्यवंदन करे सो लिखते है ।
॥अथ चैत्यवंदन ॥
॥जय जय त्रिनुवन आदिनाथ, पंचमग
तिगामी॥ जय जय करुणा शात दांत, नवि
जनदितकामी॥ जय जय श्द नरिद ठंद, सेवि
त सिरनामी॥जय जय अतिशयानंतवत,अं
तर्गतजामी॥१॥ पूरव विदेह विराजता ए,
श्री सीमंधर स्वाम ॥ त्रिकरणशु त्रिहुँ काल
मे, नितप्रति करूं प्रणाम ॥३॥॥जकिचिना
म तिवं ।। नमोबूण जावति चेश्ण जावं
त केवि सादू० ॥ र णमोऽर्दत्सि-शचार्योपा
ध्याय सर्वसाधुन्य ॥ तक कदि के सीमंधर
जीका स्तवन कदे, सो लिखते हैं ॥३७॥
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(७) आम नोमवारा ॥प्रनुके चरण परतापसिंद में, हमारतन प्रनु प्यारा रे ॥धणा॥ इति ॥ ॥पविजयवीयराया वंदणवत्तियाए॥ अ न। कदि के एक नवकारका कानस्सग्ग करी॥पारि के नमोऽर्दत्सिाकदि के ॥ ॥शेत्रुजगिरि नमियें, झपनदेव पुमरीक ॥ शुन तपनो महिमा, सुणि गुरु मुख निरबीक ॥शुक्ष्मन उपवासे, विधिशु चैत्यवदनीक ॥क रियें जिन आगल, टाली वचन अलीक ॥१॥ इति ॥४१॥पी. फुरसद होवे तो पडिलेदण करे, सो लिखते है॥ ॥अथ पडिलेदण ॥ ॥खमासमण देई श्वाकारेण सदिस्सह नगवन् ॥ पडिलेदण सदिस्साजं ? गुरु कहे. सदिस्साएद ।। बीजे खमासमणे ॥ श्वाका0 सन पडिलेदण करु ? गुरु कहे,करेद॥ पीठे व कदी ॥ मुदपत्ती पडिलेदे ॥ इमदीज (४६) केवि साढूजाणमोऽसिकाचार्योपाध्याय सर्व साधुन्य ॥ तक कदि के श्री सिाचलजीका स्तवन कहे, सो लिखते है ॥३॥ ॥अथ श्रीसिहाचलस्तवनम्॥ ॥सिफाचल गिरि नेट्या रे॥धन्य नाग्य हमारा॥विमलाचलगिरिणाएद गिरिवरनोम दिमा महोटी, कदेता न आवे पारा ॥रायण रूख समोसस्या स्वामी, पूर्व नवाणूं वारा रे ॥ध ॥१॥ मूलनायक श्रीश्रादिजिनेश्वर, चोमुख प्रतिमा चार॥ अष्ट व्यसें पूजो नावें, समकित मूल आधारारे ॥१०॥॥ दूर देशथी हूं श्हा आयो, श्रवण सुनी गुण तोरा । पतित नछारण बिरुद तुमारा, एट तीरथ जग सारा २॥ध ॥३॥नाव भक्तिसें प्रनु गुण गावे, अपना जन्म सुधारा॥जात्रा करि जवि जन शुन नावें, नरक तिर्यंच गति वारा रे॥धा ॥४॥ सवत अढारे व्यासी मासापावे,वधि
(४७)
प्रारम नोमवारा ॥प्रनुके चरण परतापसिंद
ने, कमारतन प्रनु प्यारा रे ॥॥॥ इति ॥
॥ पबिजयवीयराय॥वंदणवत्तियाए॥ अ
रखूप॥ कदि के एक नवकारका कानस्सग्ग
करी॥पारि के नमोऽर्दसिहाकदि के ।।
! ॥शेत्रुजगिरि नमिये, झपनदेव पुमरीक ॥
शुन तपनो मदिमा, सुणि गुरु मुख निरबीक
॥ शुमन उपवासे, विधिशु चैत्यवंदनीक ॥क
रिये जिन आगल, टाली वचन अलीक ।।२।।
इति ॥४१॥पीने फुरसद होवे तो पडिलेदण
करे, सो लिखते हैं।
॥अथ पडिलेदण॥
॥ खमासमण देई इलाकारेण संदिस्सद
नगवन् ॥ पडिलेदण सदिस्सा ' गुरु कहे.
सदिस्साएद ॥ बीजे खमासमणे ॥ श्चाका
स॥ना पडिलेदण करु ' गुरु कदे,करेद॥
पीई कही। मुदपत्ती पडिलेदे ॥ श्मदीज
दोश् खमासमणे अग पडिलेहण संदि
अगपडिलेदण करु कदीके धोतियु
डिलेदि के ॥खमासमणदेईनाकार जगवन्
साज करी पडिलेदण पडिलेदावोजी एमकहीं।
थापनाचार्य पडिलेद रके, अने जो गुरवादिक
थापनाचार्य पडिलेदे, तो पण खमासमण देई
आग्यामागे,पीलेखमासमण देई॥हा॥सं०॥
न० ॥ मुदपत्ती पडिलेढुं गुरु कहे पडिलेदेह॥
पीलें ठं कही। मुदपत्ती पडिलेहि॥ दोय ख
मासमणे॥श्चाकासानादिपडिलेडण
सदिस्सा ॥ही पडिलेदण करु ॥ एम कही
कंबल वस्त्रादि पडिलेदे। पी- पोपधशाला
प्रमार्जी काजो, विधिशुंपरचीखमासमण देई
शरियावदी पडिकमे ॥ ए मुलविधि जाणवो॥
इतनी स्थिरता न होवे, तोनी दृष्टिपडिलेहण
तो अवश्य करणी ॥ अवनी प्राये एदीक
रते दिखते हैं।
--
(४५)
॥ अव सामायिक पारणेका विधि कदे दे।
॥ पीने सामायिक पारे ॥ एक खमासमण
देई ॥ मुदपत्ति पडिलेदे ॥ फिर खमासम
ण देई ।। चाणासाना सामायिक पारुं ॥
गुरु कदे पुणोवि कायबो, पॐि यथाशक्ति क
ही वली खमासमण देई कहे श्चाका स॥
जा सामायिक पारेमि ॥ गुरु कदे आयारो
न मोत्तबो॥पी तहत्ति कही, अ६ नमिक
नो थको, तीन नवकार गुणी नीचो गोमालीये
बेसी मस्तक नमावी ॥नयवं दसम्मनदो ॥
इत्यादिगाथा कहे, सो लिखते हैं ।
॥अथ नयवं दसमनहो॥
नियवंदसाम्नहो,सुदंसणोथूलिनद्द वयरोय
सफलीकयगिदचाया, साएद विदा दुती ॥र
सादूण वंदणेण,नास पावं असकिया नावा॥
फासु अदाणे निकर, अनिरगहो नाण माईणं
॥३॥बनमतो मूढमणो, कित्तिय मित्तपि संन
(५०)
र जीवो॥जचन संनरामि अहं, मिधामि
कड तस्स ॥३॥ जं जमणेण चिंतिय,मसुई
याइ नासिय किंचि ॥ असुदं काएण कयं, मि
हामि उक्कड तस्स ॥४॥ सामाश्य पोसहर्स,
झियस्स जीवस्स जाइ जो कालो ॥ सो सा
लोबोधवो,सेसो ससार फलदेक ॥५॥सामावि
क विधं लीधु विधे कीधु, विधि करता अविधि
अाशातना लगी होय, दश मनका, दश वच
नका, बारद कायाका, बत्तीस दूषणमाहि जो
को दूषण लगा दोय, सो सदु मन कर, व
चन कर, कायायें करीमिछामि कार्ड ॥ इति
सामायिक पोसह पारवानी गाथा ॥
॥अथवा पदिखा सामायिक पारी में, पीने
पहिलेदण करे यहां यथायोग्य अवसरे गुरुक्त
सुहराइ पू॥
दूसरा खमासमण देवे,
श्रीजिनपति
सूरि
(५१)
जीकी सामाचारीमें एसे कह्यो दे॥ ति सामा
यिक पाराविधि।
॥ अथ संध्याकाल सामायिक विधिलिख्यते ॥
॥ पिबले पदोरे धर्मशाला प्रमार्जी वस्त्रादिक
पडिलेदे. जो अवरो आयो दुवे, तो दृष्टिपडिले
दण करे॥पछि गुरु आगे अथवा थापनाचार्य
जीआगे आवीनूमि प्रमार्जी आसण वाम पा
स मूकी खमासमण देई कदे ॥श्चाका ॥स
॥ना सामायिक मुहपत्ती पडिलेटु १ गुरु कहे
पडिलेदेह छ कढी। फिरखमासमण देई मुद
पत्तीपहिलेदे॥पबि खमासमण देश्लाका
सं०॥10॥ सामायिक संदिस्साज गुरु कहे
संदिस्सावेद ॥ फिर खमासमण देई श्छाका
समानणा सामायिक गजगुरु कहे, गएद ॥
श्व कदी फिर खमासमण देई ॥ अविनत
थई तीन नवकार गुणी कदे श्चकार नवगन्।
पसा करी सामायिक दमक नबरावो जी॥
१
र जीवो॥ज चनसनरामि अहं, मिछामि
कड तस्स ॥३॥ जंज मणेण चिंतिय,मसुई
याश् नासिय किंचि ॥ असुदं काएण कय, मि
चामि उक्कड तस्स॥४॥ सामाश्य पोसहस,
यिस्स जीवस्स जाइ जो कालो ॥ सो सफ
लोबोधवो,सेसो संसार फलदेऊ ॥५॥सामाथि
क विधे लीधुं विधे कीधु, विधि करता अविधि
आशातना लगी होय, दश मनका, दश वर्ष
नका, बारद कायाका, बत्तीस दूषणमाहि जो
कोई दूषण लगा होय, सो सहु मन कर, व
चन कर, कायायें करीमिछामि कार्ड।ति
सामायिक पोसद पारवानी गाथा ॥
॥ अथवा पहिला सामायिक पारी के, पति
पडिलेहण करे इहां यथायोग्य अवसरे सुरुवँ
सुहरा पू॥
दूसरा खमासमण देवे, श्रीजिनपत्ति सूरि
एद॥पी इच कही जो शीत कालादि दुवे तो
(५३)
बबिहार उपवास ढुवे, तो पच्चरकाण कर ले
नदी॥ ते माटें मुदपत्ती नहिं पडिलेदे ॥ए वि
स्तार विधि दै॥पी एक खमासमण देई
श्याका ॥ सजा सिबाय संदिस्सा ?
गुरु कदे, संदिस्सावेद पीछे कदी वली
खमासमण देई॥बाण ॥ सपना सिला
य करूं १ गुरु कदे करेद ॥ पश्चि कही ।
खमासमण देई । उनो थको मधुर स्वरें आ
नवकारनी सिलाय करे॥प खमासमण
दे॥श्चास ॥ ॥ बेसणु सदिस्सान ?
गुरु संदिस्सावेद ॥ फिर खमासमण देई
बा॥ सं॥न ॥ बेसणुं गजे? गुरु कदे, ग
खमासमण देई॥श्चा०॥सं०॥न ॥ पाग
रणु संदिस्सालं ? गुरु कहे, सदिस्सावेद ॥ फि
र खमासमणु देई ॥श्चात संपन पागर
[ पडिग्घान? गुरु कहे पडिग्याएद॥पनिक
गुरु कदे उच्चरावेमो॥पी करेमिनते
य॥ इत्यादि सामायिक सूत्र गुरु
अनुनापण करतो थको तीन वार हब
री खमासमण देई॥श्चाका॥ स॥न।
इरियावदिय पडिकमामि गुरु कहे पत्रिका
द॥पीठे श्च कदी॥श्चामि पडिक्कमिजं ॥ !
रियावदियाए इत्यादि पानसें रियावदिय पनि
कमी ॥ एक लोगस्सका काजस्सग्ग करी
णमो अरिदताण कदी, कानस्सग्ग पारी म
खें प्रगट लोगस्स कही, नीचे बैठ के मुदप
त्ती पडिलेदि वादणा देई कहे इलाकार जग
वन्! पसा करीपच्चस्काण करावोजी पबिगुरु,
दिवस चरिम पञ्चकाण करावे ॥ गुरु अनावें
थापनाचार्य समदे अथवा स्वमुखें, अथवा.
वमेरा साधर्मी मुखे पञ्चके ॥ अने जो तिवि
दार उपवास कीधो हुवे, तो मुद्दपत्ती पडिलेहि
पच्चरकाण करे॥वादणा न देवे, अने
च
(५३)
नविदार उपवास हुवे, तो पञ्चरकाण करवू जे
नदी॥ते मात्रै मुदपत्ती नदिं पडिलेदे॥ए वि
स्तार विधि है ॥ पी एक खमासमण देई
श्वाका० ॥ स ॥नासिवाय संदिस्साल ?
गुरु कहे, संदिस्सावेद पीले श्वं कदी वली
खमासमण देई॥श्वासना सिजा
य करुं ' गुरु कदे करेद ॥ पविश्वं कदी ॥
खमासमण देई । उनो थको मधुर स्वरें आ
उ नवकारनी सिजाय करे॥पछि खमासमण
देई॥श्चा ॥स ॥न ॥ बेसणु संदिस्सान'
गुरु० संदिस्सावेद ॥ फिर खमासमण देई ।
घाण॥ सपन० ॥ बेसणुं गचं? गुरु कदे, ठग
एह ॥ श्च कदी जो शीत कालादि दुवे तो
खमासमण देई॥श्चा० ॥ सं०॥न ॥ पाग
रणु संदिस्साल ? गुरु कहे, सदिस्सावेद ॥ फि
रखमासमा देई पचास जना पागर
jपडिग्यानी गुरु कदे पडिग्घाएदापी श्चक
(५२)
गुरु कदे उच्चरावेमो॥पी करेमि ते
य ॥ इत्यादि सामायिक सुत्र गुरु वन
अनुनापण करतो थको तीन वार जब
रीखमासमण देई॥श्चाका॥स ॥
इरियावदियं पडिक्कमामि ? गुरु कहे परिकमे
ह॥पनि श्च कदी॥श्चामि पडिकमि ॥
रियावदियाए इत्यादि पानसे शरियावहिय पडि
कमी ॥ एक लोगस्सका कानस्सग्ग करी,
णमो अरिहताण कही, काजस्सग्ग पारी मु
खें प्रगट लोगस्स कही, नीचे बैठ के मुहप
ती पडिलेहि वादणा देई कदे श्वाकार जग
वन्! पसान करीपञ्चरकाण करावोजी प3 गुरु,
दिवस चरिम पञ्चकारण करावे ॥ गुरु अनावें
थापनाचार्य समर्दै अथवा स्वमुखें, अथवा.
वमेरा साधर्मी मुखे पञ्चके ।। अने जो तिवि
हार उपवास कीधो हुवे, तो मुदपत्ती पडिलेहि
पञ्चकाण करे ॥ वादणा न देवे, अने जो
,
(५३)
नधिदार उपवास हुवे, तो पच्चरकाण कर ले
नदी । ते मात्रै मुदपत्ती नदिं पडिलेदे ॥ए वि
स्तार विधि दै ॥पी एक खमासमण देई
इचाका॥ साना सिद्याय सदिस्सा ?
गुरु कदे, संदिस्सावेद पीये श्च कदी वली
खमासमण देई॥श्वासना सिजा
य करूं १ गुरु कदे करेह ॥ पनि छ कदी ॥
खमासमण देई॥ जनो को
मधुर
स्वरें आ
नवकारनी सिकाय करे ॥पनि खमासमण
देई॥चा ॥स ॥ ॥ वेसणु सदिस्सा ?
गुरु० संदिस्सावेद ॥फिर खमासमण देई ।
चा॥ सं॥न ॥ बेसणु गगन? गुरु कदे, ग
एद ॥वि श्च कही जो शीत कालादि दुवे तो
खमासमण देई ॥श्चा०॥ सं० ॥ न॥ पाग
रणु संदिस्सालं ? गुरु कदे, सदिस्सावेद ॥ फि
र खमासमए देई॥श्वासनापागर
jपडिग्घाज? गुरु कदे पडिग्याएद॥विश्वक
(५४)
दीशुनध्यान करे॥तिसध्यासामायिक विधिक
॥अथ देवसि पडिक्कमण विधि लिख्यते।
॥प्रथम त्रण खमासमण देई॥श्वाासंणा
नाचैत्यवंदन करु गुरु कदे करेह पनि श्चक
दी॥जय तिट्ठयण कदे॥जिसमे परकी तथा चन
मासी तथासंवबरीके रोजतीस गाथाकहेनी॥
और दिनोभेतोपाचगायापदेखेकी,और दोप
गाथापिगडीकी,एवंसातगाथा कनेकीप्रवृत्ति
देखणेमें श्रावेद अब जयतिढुअलिखते हैं।
॥ अथ जयतिढुअण लिख्यते॥
॥जय तिदुअण वरकप्परक जय जिण धन्न
तरि, जय तिढुअण कल्लाणकोसरिप्रकार के
सरि।।तिदुषण जण अवितधियाण नुवणत
य सामिअ, कुणसुसुदाइ जिणेसपास थनणय
पुरहिअ ॥१॥ तई समरत लहति जत्तिवर पु
त्त कलत्तदिं, धम सुवन्न हिरण पुरम जणYजहि
रजहि॥पिस्कहि मुस्क असखसुक तुद पासप
(५५)
साक्ष्ण, श्यतिदुअण वरकणरुक सुरकदि कुण
मदजिए ॥२॥ जरजऊर परिजएम काममा
छ सुकहिण, चकुरकीणखएणखुम्म निरसल्लिअ
सुलिणातुद जिण सरणरसायणेण लहु ढुंतिपु
एमव,जय धमतरि पास मदवि तुटुं रोगहरो
नव ॥३॥ विजाजोइस मतततसिनि अपय
त्तिण, नुवणानुअ अहविद सिद्धि सिकाइ तुद
नामिण ॥ तुद नामिण अपवित्तनवि जण दो
यवित्तज, त तिअण कल्लाणकोस तुद पास
निरुत्तन ॥४॥ खुद पवत्त मंत तंत जताईवि
सुत्तर, चरथिरगरलगदुग्गखग्गरिनवग्गवि
गज॥ उबियसब अपन घन निवारक दय
करि, उरिअई दरन सुपासदेव चरित्रकरिके
सरि ॥५॥ तुद आणायने नीमदप्पुटर सुरव
र, रस्कस जरक फणिंद विदचोरानलजलदर।।
जलयालचारिरनहरखुद्ध पसुजोइणि जोश्य,श्य
तिढुअणअविलघिआण जय पास सुसामित्र
(५४)
दीशुनध्यान करे॥इतिसध्यासामायिक विधि
॥ अथ देवसि पडिक्कमण विधि लिख्यते ।
॥प्रथम त्रण खमासमण देई॥श्वाासं
नाचैत्यवदन करु?गुरु कदे करेद पीब छक
दी॥जय तिट्ठयण कहे। जिसमें पकी तथाचन
मासी तथासंवबरीके रोजतीसगाथा कहेनी ।
और दिनोमेतोपाचगाथापदेलेकी,और दोप
गाथा पिगडीकी,एवंसातगाथा कडेनेकीप्रवृत्ति
देखणेमे आवेदै अब जयतिढुअणलिखते है।।
॥ अथ जयतिढुअण लिख्यते॥
॥जय तिदुषण वरकप्परुक जय जिए धन्न
तरि, जयतिहुअण कल्लाणकोसहरियकर के
सरि॥तिदुषण जण अविलंघियाण नुवणत
य सामिअ, कुणसुसुदाई जिणेसपास थनण्य
पुरमिअ॥२॥ तई समरत लहति कत्तिवर पु
त्त कलत्तदि, धस सुवन्न हिरम पुरस् जणचेंजहि
रहदिपिकदि मुरू असंखसुक तुद पासप
-
(५७)
पवूढरूढ उददादसुपुलश्य ॥ ममदिमप्प्सनम
पुस्मअप्पाणंसुरनर,श्य तिढुअण आणदचद ज
य पास जिणेसर ॥१॥ तुद कल्लापमहेसुघट
टंकारवपिल्लिअ, बलरमल्लमहल्लनत्तिसुरवर
गेजुलिय॥हल्लुप्फलिअ पवत्तयति नवणेहि
महसव,श्य तिढुअण आणदचंद जय पाससुद्ध
अव ॥ १२॥ निम्मल केवल किरणनियर विदु
रिअ तमपदयर,दसिअ सयलपयबसबविवार
अपदानर ॥कलिकलुसिथ जण घूअलोयलो
यणहअगोयर, तिमिरइ निरुदर पासनाह नुव
पत्तय दिणयर ॥१३॥ तुद समरणजलवरिससि
त्त माणव मइ मेणि, अवरावरसुदुमतबोह के
दलदलरेशणि॥जायफलनरनरिय दरिय ७
ददाद अपोवम, इयमइमेणि वारिवाद दिसि
पास म मम ॥१४॥ कय अविकल कल्लाणव
खिउल्लूरियञ्चदवणुं,दाविषसग्गपवरगमग 5
ग्गगम वारणु॥जय जंतुदजणएणतुल्लजंजणि
(५६) ॥६॥ पहिअ अ अपचदिवनतितर निजर, रोमच चिअचारुकाय किम्मरनरसुरवर ॥ जसु सेवहिं कमकमलजुअल पकालिअखिमलु, सो नुवणत्तयसामि पास मदमहन रिनबना। जय जोश्अमणकमलनसलनय पजरकुंजर, तिद्भणजण आणंदचद नुवणत्तयदिणयराज य मश्मेशणि वारिवाद जयजतु पिामह, र्थन यहिअ पासनाइ नादत्तणकुणमद ॥७॥ बहु विहवामुअवसु मुसु वणिज उपमहि, मुकधम्मु कामबकाम नर नियनियसबदि ॥ जे आयक्ष बहु दरिसण वदु नाम पसिन, सो जोशी मण कमलनसतमुह पास पवन ॥॥जय विनत रणमणिरदसण थरहरिष सरीरय, तर लिअनयणविसम्मसुमुगग्गिरगिरकरुण्यात सहसत्तिसरंति हुँति नरनासिब गुरुदर, महवि काविसकस पास जय पजरकुजर ॥१०॥ पासविविअसंतनित्तपत्ततपविनिय (एए) सामिद तुदुमाय वप्प तुटुंमित्तपियकरु,तुहु गइ तुडुं मरतुदिज ताण तुडुं गुरु खेमकरु॥दद नरनारिअबराज राजलनिनग्गन,लीपन तुद कमकमल सरणजिणपालदि चगज ॥२०॥प किविकयनीरोयलोयकिविपावियसुदसय, कि विममंतमहतकेवि किविसादियसिवपय ॥ कि वि गंजिअरिउवग्गकेविजसधवलिअ नूअल, मई अवदीरदिकेणपास सरणागयवबल॥३॥ पञ्चुवयारनिरीदनादनिष्पम् पयोअण,तुद्वं जिण पासपरोवयार करुणिकपरायणासत्तुमित्त सम चित्तवित्तिनयनिंदअसममण,मा अवहीरिअछ गगनविम पासनिरजण॥श्शा दजें बहुविद हतत्तगत्ततुदु उढनासापरु,दन सुयणदकरुणि कगण तुटुं निरुकरुणाकरु ॥ दन जिण पास सामिसाजुतुहूं तिदुअणसामिअज अवदीरदि मऊखतक्ष्य पासन सोदि॥३३॥जुग्गाजुग्ग विनागनादनदुजोअणतुड्सम, नवणुवयारसु
4
(५०)
यदियावहु, रम्म धम्म सो जयन पास जय
तु पिआमद ॥१॥ नुवणारमनिवास दरिक्ष
परदरिसणदेवय, जोणिपूअणखित्तवाल खुदा
सुर पसुवय॥ तुद उत्तम सुनह सुह अविसंतुल
चिदि,श्य तिढुअण वणसिंह पास पावाप
णासहिं॥१६॥ फणिफणफारफरतरयण कर र
जिअ नदयल, फलिणी कदलदलतमाल निश्च
प्पलसामल ॥कमासुर जवसग्गवग्ग संसग्ग
अगजिअ,जयपञ्चस्कजिणेस पास थनणय पुर
हिअ॥१७॥ महमणतरलपमाणनेय वायावि
विसग्लु, नियतपुरवि अविणयसदाव आल
सविहिलघनु ॥ तुदमादपपमाणदेव कारुम
पवत्तज, श्यमश्माधवहीरपासपालहिविलवं
तज ॥२७॥ किंकिकप्पिनणेयकलुणुकिंकिंवनज
पिन, किं वनचिन्जिकिदेवदीयमविलंबिन
॥ कासुनकियनिप्पललल्लुअोहिंउहत्तई,तहवि
न पत्तनताण किपि पऽ पट्ट परिचत्तरलातुई
(एए) सामिद तुहु माय वप्प तुहु मित्तपियंकरु,तुटुंग तुटुं मरतुदिज ताण तुडुं गुरु खेमकरु॥दर्ज उद नरनारिअवराज रानलनिनग्गन,लीपन तुद कमकमल सरणजिणपालदि चगन ॥२०॥ इकिविकयनीरोयलोयकिविपावियसुदसय, कि विमश्मंतमदंतकेवि किविसादियसिवपय ॥ कि वि गंजिरिजवग्गकेविजसघवलिअ नूअल, म अवदीरदिकेणपास सरणागयवचल॥३१॥ पञ्चुवयारनिरीदनानिप्पम् पयोअण,तुटुं जिण पासपरोवयार करुणिकपरायणासत्तुमित्त सम चित्तवित्तिनयनिंदअसममण,मा अवदीरिअञ्जु गगनविमइ पासनिरजण ॥२२॥ दन बहुविदष्ट तत्तगत्ततुदुंढनासणपरु,दन सुयणदकरुणि काण तुटुं निरुकरुणाकरु ॥ दन जिण पास सामिसान्तुदंतिदुअसामिअज अवहीरदि मऊखतश्य पासन सोदिय॥३॥जुग्गाजुग्ग विनागनादनहुजोअणतुड्सम, नवणुवयारसु
॥अप्सु ण जिजगतुटसमोविदम्किरमदयास
(६०)
हावन्नाव करुणारससत्तम।समविसमह किंधा
नए नुविदाइसमतन, श्य उदवघव पासनाद
मइ पाल थुणतन॥३॥नयदीपदीणयमुर
वि अमविकिविजुग्गय,ज जोश्यनवयारुकरश्न
वयारसमुङयादीगढ दीणनिहीणजेणतुहनाहि
पचत्तन, तो जुग्गअहमेव पासपालहिमई
गज ॥श्य॥ अहअमविजुग्गयविसेसकिविमल
दि दीपद, जं पासविनवयारुकरश्तुहनाह सम
ग्गद॥ सुच्चिअकिल कक्षाणुजेण जिण तुम्ह प
सीयद, किं अस्मुण तचेव देव मामअवहीरह
॥३६॥ तुद पत्रण नहु हो विठ्ठल जिजाण
किं पुण,
दरिकन निरुसत्तचत्तडकङ जस्सु
यमण॥त मामन निमिसेण एण एनविजा ल
प्राइ, सच्च जं नुस्कियवसेण कि वरु पञ्च ॥
॥७॥ तिनुश्रणसामिश्र पासनाह मर अप्पप
यासिन,किऊन जे नियरुवसरिसुनमुएंवटुजपि
(६१)
३, जश्अवगिमसि तुंदिजअददकिंदोसदया
स॥श्ता जर तुहरूविणकिणविपेअ पाणवे
लविन,तलजापुंजिणपासतुम्द दअगीकरिअ
ज॥श्यमदमिज न हो सातुददावण,
रकंतह नियकित्तिणे यजुङश्वदीरणारणा
एवमदारिदजत्तदेवश्यन्दवणमदूसन, ज अण
लिय गुणगदण तुम्द मुणिजणअणिसिन ।
श्य मा पसियसुपासनादर्थनणयपुरहिअ,श्य
मुणिवरसिरि अनयदेव विरमवश् आणिदिन।
॥ ३० ॥ इति श्रीस्तननकतीर्थराजश्रीपार्श्व
नाथस्तवनम् ॥
पनि जय मदायस कहे, सो लिखते हैं।
॥ अथ जय मदायस प्रारंन ॥
॥ जय मदायस जय मदायस जय मदाना
ग जय चिंतिय सुद फलय ॥जय समन्च परम
जाणय, जय जय गुरु गिरिम गुरु॥जय
इत्त सत्ताण ताणय, थनणयहिय पासजिण ॥
(६०)
हावनाव करुणारससत्तम।समविसमह किंधक
नए नुविदाहसमतन, श्य उदवधव पासनार
मझ पाल गुणतन॥३४॥नयदीणहदीणयपुर
वि अमविकिविजुग्गय,जं जोश्यनवयारुकरज्ञ
वयारसमुङय॥दीपद दीणनिहीणजेणतुहनाहि
णचत्तज, तो जुग्गअहमेव पासपालहिमई
गन ॥३॥ अहअमविजुग्गयविसेसकिविमल
दि दीद, ज पासविनवयारुकर तुदनाह सम
ग्गद ॥ सुचिअकिल कल्लाणुजेण जिण तुम्ह प
किं
अमुण तचेव देव मामअवहीरह
॥३६॥ तुद पत्रण नदु दो विढल जिजाण
न किं पुण,इनरिकन निरुसत्तचत्तज्कहु उस्म
यमण॥तं ममन निमिसेण एण एनविज ल
प्राइ, सच्च ज नुस्कियवसेण कि उवरु पञ्च ॥
॥३॥तिद्रुअणसामिश्र पासनाह मई अप्पप
यासिन,किन जनियरूवसरिसुनमुऐवटजपि
॥अमु ण जिजगतुटसमोविकिपदयास
सीयद,
(६३)
॥पी लोगस्स कद कर सवलोए अरिहंत
चेश्याण वंदणवत्तिः॥अन्ननू॥ कहि के एक
नवकारका कानस्सग्ग करे पारि के नक्त स्तुति
की दूसरी गाया कदे, सो लिखते हैं।
॥सुर नर किन्नर, वदित पद अरविद का
मित नर पूरण, अभिनव सुरतरु कंद ॥ नवि
याने तारे, प्रवदण सम निशिदीस ॥ चोवीशे
जिनवर, प्रणमुं विशवा वीस ॥ यद दूसरी गा
था कदि के कानस्सग्ग पारे पीवे पुरस्करवरदी०
वंदणवत्तिाए। अन्नवू कदि के एक नवकार
का कानस्सग्ग कर के, पारि के उक्त स्तुतिकी
तीसरी गाथा कदे, सो लिखते है।
॥अरथे करि आगम, नाख्या श्रीनगवत
॥गणधरने गूंथ्या, गुणनिधि झान अनंत ॥ सु
रगुरु पण महिमा, कहि न शके एकंत ॥ सम
रुं सुखसायर, मन शुधसूत्र सिघात ॥३॥ यद
गाथा कदि के सिक्षणं बुझाण ॥ वेयावच्च
तरेंआगे पण स्तुतिकीचारोंगाथामेजानलेना (६) नवियह जीम नवच, नव अवर्ण ताण तं गुणा तुमत्ति संज नमोवु ॥१॥ इति ॥ ॥पीने शक्रस्तव कद के खडा हो कर वरि दत चेश्याण ॥ करेमि कानस्सग्गं वदणवधि आए॥ अन्नबू॥ इत्यादि पाठ कह के काड स्सग्गमादे एक नवकार चितवी एक श्रावक कानस्सग्ग पारी नमोऽर्दसिधा ॥ कहीएक गाथा स्तुति कहे, सो लिखते है। ॥ अथ महावीरजिनस्तुति प्रारंजः॥ ॥ मूरति मन मोदन, कंचन कोमल काय ॥ सिहारथ नंदन, त्रिशलादेवी समायराम गनायक लंबन, सात हाथ तनु मान ॥ दिनदि न सुख दायक, स्वामी श्रीव-ईमान॥१॥ ॥ए स्तुति एक श्रावक कहे अरु दूसरे श्रावक सव काजस्सग्गमें रहे थके सुने पी। णमो अरिहताणं कद के काउस्सग पारे इसी .
(६३)
॥पीठे लोगस्स कदकर सबलोए अरिदंत
चेश्याण वदणवत्तिः॥अन्नतू०॥ कदि के एक
नवकारका कानस्सग्ग करे पारि के उक्त स्तुति
की दूसरी गाथा कदे, सो लिखते है।
। सुर नर किन्नर, वंदित पद अरविंद का
मित नर पूरण, अनिनव सुरतरु कंद ॥ नवि
यणने तारे, प्रवदण सम निशिदीस ॥ चोवीशे
जिनवर, प्रणमुं विशवा वीस ॥ यद दूसरी गा
था कहि के कानस्सग्ग पारे पीछे पुरकरवरदीप
वदणवत्तिाए। अन्नवू कदि के एक नवकार
का काजस्सग्ग कर के, पारि के उक्त स्तुतिकी
तीसरी गाया कढे, सो लिखते है।
॥अरये करि आगम, नाख्या श्रीनगवंत
॥ गणधरने गूथ्या, गुणनिधि झान अनंत ॥सु
रगुरु पण महिमा, कहि न शके एकंत ॥ सम
रु सुखसायर, मन शुभसूत्र सिधात ॥३॥ यद
गाथा कदि के सिधणं बुधाण ॥ वेयावच्च
काठस्सग्ग पारे श्सी तरेंआर्गे पण स्तुतिकीचारों गाथामेजानसेना (६२) नवियद भीम नवदु, नव अवर्णताण तंगुणा तुमत्ति संज नमोतु ॥ १॥ इति । ॥ पीठे शक्रस्तव कद के खडा हो कर भरि इत चेश्याण ॥ करेमि काजस्सग्ग बंदणवति आए ॥ अन्नवू ॥इत्यादि पाठ कह के कार स्सग्गमादे एक नवकार चिंतवी एक श्राका काउस्सग्ग पारी नमोऽतसिझा ॥ कहीएक गाथा स्तुति कदे, सो लिखते हैं। ॥ अथ महावीरजिनस्तुति प्रारंजः॥ ॥ मूरति मन मोइन, कंचन कोमल काप । सिहारथ नदन, त्रिशलादेवी समाय॥ गनायक लगन, सात दाय तनु मान । दिनदि न सुख दायक, स्वामी श्रीवईमान ॥१॥ ॥ ए स्तुति एक श्रावक कहे अरु दूसरे श्रावक सब काजस्सग्गमें रहे थके सुने पावें
(६५)
तस्सुत्तरिणाअन्नबूणाश्त्यादि कदि के, आव न
वकारका कानस्सग्ग करे. काजस्सग्गर्मादे
आजूना चन प्रदरमे ॥ इत्यादि पाठ मनमें चिं
तवी, एमो अरिहंताणं कदी काउस्सग्ग पारि
के प्रगट लोगस्स कहे॥
॥पीव समासा प्रमार्जन पूर्वक बैठ के तीस
रे आवश्यक सूत्र वादणा मुदपत्ती पडिलेढुं ।
गुरु कदे, पडिलेदेद पी मुदपत्ती पडिलेदि के
वादणा देवे पवि अवग्रहमादिज जनो थको
चाणा सं॥न० ॥ देवसियं आलोलं, एसा
कहे तब गुरु कदे आलोएद पश्चि आलो
एमि० ॥ यह पाठ कद के अतिचार आलोवे,
पनि सवस्सवि देवसियं इत्यादियी मामीने ३
डाकारेण सदिस्सद पर्यंत कदे, तब शुरु पडि
कमद यह पाठ करे॥
॥ पावलं तरस मिन्नामि उकड कदि के
समासा प्रमार्कि प्रमार्जित नूमिये आसन पर
(६४)
गराण अन्नतू ॥ कही कामस्सग्ग पारी मक
स्तुतिकी चोथी गाथा कदे, सो लिखते हैं।
॥सिहायिकादेवी, वारे विधन विशेष सर
संकट चूरे, पूरे आश अशेष॥ अहोनिश कर
जोडी, सेवे सुर नर इद ॥ जपे गुण गण इम,
श्रीजिनलान सुरिंद ॥४॥इति महावीरजिन
स्तुति ॥ यद् चोथी स्तुति कहिकें बैठ के नमो
बूणं कहे. पीछे एक खमासमण देई के श्रीश्राचा
र्य मिश्र दूसराखमासमण दीये पीले श्रीनपाध्या
यजी मिश्र तीसरा खमासमणदे कर श्रीवर्तमान
आचार्यजीकानामले के मिश्रचोथे खमासमण
में सर्व साधुजीमिश्र इसी तरें कह कर गोम
लीय बैठकेमस्तकनमावीसवस्सवि देवसियन
इत्यादि कदकर तस्समिछामि अकाउ कहे, परं
'इचाकारेण सदिस्सद श्च' ए पद न कहे।
॥प िखडे दो कर करेमि नतेसामाश्य।
चामि ठामि कानस्सग्गं जो मे देवसिन०॥
(६५)
तस्सुत्तरि॥अन्नबूणाइत्यादि कहि के, आव न
वकारका काउस्सग्ग करे काउस्सग्गमांदे
आजूना चन प्रदरमे॥ इत्यादि पाठ मनमें चिं
तवी, मो अरिदताएं कही काउस्सग्ग पारि
के प्रगट लोगस्स कदे ॥
॥पा संमासा प्रमाऊन पूर्वक वैठ के तीस
रे आवश्यक सूत्र वादणा मुहपत्ती पडिलेडु ?
गुरु कदे, पहिलेदेद पीछे मुदपत्ती पडिलेदि के
वांदणां देवे पीछे अवग्रहमादिज ननो यको
श्वा॥स०॥न ॥ देवसिय आलोज, एसा
कहे तब गुरु कदे आलोएद. पश्चि आलो
एमि० ॥ यह पाठ कद के अतिचार आलोवे
पबि सवस्सवि देवसियं इत्यादिथी मामीने
हाकारेण सदिस्सह पर्यंत कदे, तव गुरु पडि
कमद यह पाठ कदे॥
॥पी श्वं तस्स मिठामि इकड कदि के
समासा प्रमार्कि प्रमार्जित भूमिये आसन पर
बैठ के नगवन्। सूत्र नपुं एसा कहे तब गुरुमे
नणेद पीले श्च कही तीन नवकार गणी, तीन
करेमिन्नतेनणीने चामि पडिक्कमिनं जो मे देव
सिन इत्यादि कदी एक श्रावक वदित्तु कहे दू
सरा सव सुने पीसें खडा दो कर अप्नुहिम
आरादणाए इत्यादि सपूर्ण पाठ कही, दो बाद
णा देवे, अरु अवग्रहमादिज खडा ढुवा श्या
।। सं०॥ न ॥ अनुहिनमि अप्रिंतर देवसिमं
खामेवं गुरु कदे, खामेद ॥
॥पी श्वं खामेमि देवसिय कहि के गोमाली
ये बैत के वाम हाये मुदपत्ती मुखें धर के दक्षि
। हाथ गुरु सन्मुख कर केसर्व पाठ कदे पायें
विधिसेती दो वादणां दे कर आयरिय नवद्याय
इत्यादि त्रण गाथा कहिके करेमि न ते सामा
य इवामिगमि कानस्सग्ग इत्यादि कदी चारि
अन्नवून ॥
कहि के आठ नव
त्रशुद्धि निमित्ते
दो लोगस्सका
(६७)
कानस्सग्ग करी पारि के पनि दर्शनशुधि नि
मित्ते प्रगट लोगस्स कदी सवलोए अरिदत
चेश्याणणा वंदणवत्तिः ॥ अन्ननू । कहि के
एक लोगस्सका काउस्सग करी पारि के ज्ञान
शुधि निमिते पुस्करवरदीवड्ढे कदि के सुयस्स
नगवन ॥ वंदणवत्ति॥ अन्नः ॥ कदि के
एक लोगस्सका कानस्सग्ग करे पीछे पारि
के सिक्षण बुझाणा कहि के वेयावच्चगराण न
कदे पी सुयदेवयाए करेमि काउस्सग्ग अन्न
बू॥ कदी एक नवकारनो काजस्सग्ग करे
पीछे गुरुका योग न होवे तो एक श्रावक काल
स्सग्ग पारिके णमो अर्हत्सिाए कदि के श्रुत
देवताकीस्तुति कदे गुरु दुवे तो,गुरुकहे. और
दूजा सर्व स्तुति सुण के काजस्सग्ग पारे अब
श्रुतदेवताकी स्तुति कहे, सो लिखते है ।
॥ अथ श्रुतदेवताकी स्तुति ॥
॥ सुवर्णशालिनी दयाद, द्वादशागी जिनो
कहिके आठ नवकार अथवा दो लोगस्सका
(६६)
वैठ के नगवन् । सूत्र नणु एसा कहे तब गुरुने
भणेद पीवेश्च कदी तीन नवकार गणी, तीन
करेमिन्नतेनणीने श्यामि पडिकमि जो मे देव
सिन इत्यादि कही एक श्रावक वदित्तु कहे दू
सरा सब सुने. पी खडा हो कर अनुहिनमि
आरादणाए इत्यादि सपूर्ण पाठ कही, दो वांद
पा देवे, अरु अवग्रहमादिज खडा ढुवा इमार
॥ सं० ।। न० ॥ अनुनिमि अप्रिंतर देवसिर्य
खामेन गुरु कहे, खामेद ॥
॥पी श्वं खामेमि देवसियं कहि के गोमाली
ये बैठ के वाम हाथे मुदपत्ती मुखें घर के दहि
ण हाय गुरु सन्मुख कर केसर्व पाठ कदे पीछे
विधिसेती दो वादणा दे कर आयरिय उवद्याय
इत्यादि त्रण गाथा कहिके फरेमि न ते सामा
य श्वामि गमि काउस्सग्गं इत्यादि कदी चारि
शुक्षि निमित्ते करेमि काउस्सगं अन० ॥
(६७)
काजस्सग्ग करी पारि के पनि दर्शनशुचि नि
मित्ते प्रगट लोगस्स कही सवलोए अरिदंत
चेश्याएं॥ वदणवत्ति ॥ अन्नबू० ॥ कहि के
एक लोगस्सका काउस्सग्ग करी पारि के ज्ञान
शुक्षि निमित्तें पुरकरवरदीवड्ढे कहि के सुयस्स
जगवन ॥ वंदपवत्तिा अन्ननू ॥ कदि के
एक लोगस्सका कानस्सग्ग करे पीले पारि
के सिक्षण बुझाण कदि के वेयावञ्चगराणं न
कदे पीछे सुयदेवयाए करेमि कानस्सग्ग अन्न
बूणा कही एक नवकारनो कालस्सग्ग करे.
पा, गुरुका योग न होवे तो एक श्रावक काल
स्सग्ग पारिके णमो अल्सि-शा कदि के श्रुत
देवताकीस्तुति कदे गुरु दुवे तो,गुरुकदे.और
दूजा सर्व स्तुति सुण के कानस्सग्ग पारे अव
श्रुतदेवताकी स्तुति कहे, सो लिखते है।
।। अथ श्रुतदेवताकी स्तुति ॥
॥ सुवर्णशालिनी दयाद, द्वादशागी जिनो
कदि के थानवकार अथवा टो सोगम्सका
त्रशुक्षिनिमित्त करेमि कानस्सर्ग अन०॥
(६६)
वैठ के नगवन्। सूत्र नपुं एसा कहे तब गुरुम
नणेद पी श्च कही तीन नवकार गणी, तीन
करेमिनतेनणीने श्यामि पडिकमिज जो मे देव
सिन इत्यादि कही एक श्रावक वैदित्तु कहे. दू
सरा सब सुने पी खडा हो कर अनुहिनमि
आरादणाए इत्यादि संपूर्ण पाठ कही, दो वांद
णा देवे, अरु अवग्रदमादिज खडा दुवा छा०
॥सं० ॥ न ॥ अनुनिमि अग्निंतर देवसिय
खामेन' गुरु कदे, खामेह ।।
॥पी श्वं खामेमि देवसिय कहिके गोमाली
ये बैठ के वाम हाये मुहपत्ती मुखें धर के ददि
ए हाथ गुरु सन्मुख कर केसर्व पाठ कदे पाई
विधिसेती दो वादणां दे कर आयरिय नवधाय
इत्यादि त्रण गाया कदिके करेमि नं ते सामार
य श्चामि गमि कानस्सग्ग इत्यादि कही चारि
(६७)
काजस्सग्ग करी पारि के पवि दर्शनशुक्षि नि
मित्ते प्रगट लोगस्स कदी सबलोए अरिदंत
चेश्याणणा वदणवत्ति०॥ अन्नबू०॥ कहि के
एक लोगस्सका काउस्सग्ग करी पारि के
ज्ञान
शुक्षि निमित्तें पुरस्करवरदीवड्ढे कहि के सुयस्स
जगवन ॥ वंदणवत्ति॥ अन्नतू ॥ कदि के
एक लोगस्सका काउस्सग्ग करे पछि पारि
के सिक्षाण बुझाण कहि के वेयावच्चगराणं न
कदे पीछे सुयदेवयाए करेमि कानस्सग्ग अन्न
बा कदी एक नवकारनो कानस्सग्ग करे,
पी गुरुका योग न होवे तो एक श्रावक कान
स्सग्ग पारिके णमो अईत्सि-घा कदि के श्रुत
देवताकी स्तुति कदे गुरु दुवे तो,गुरुकहे. और
दूजा सर्व स्तुति सुण के काउस्सग्ग पारे अब
श्रुतदेवताकी स्तुति कहे, सो लिखते हैं।
॥ अथ श्रुतदेवताकी स्तुति ॥
॥ सुवर्णशालिनी दयाद्, वादशागी जिनो
(६६)
बैठ के भगवन् । सूत्र नणुं एसा कहे तब गुरुको
नणेद पीठे च कही तीन नवकार गणी, तीन
करेमिन तेनणीने श्यामि पडिकमिळ जो मे देव
सिन इत्यादि कही एक श्रावक वदित्तु कहे दू
सरा सब सुने पीठे खडा हो कर अनुहिनमि
आरादणाए इत्यादि संपूर्ण पाठ कही, दो वांद
णा देवे, अरु अवग्रहमादिज खडा दुवा श्या
॥ सं० ॥ न० ॥ अनुनिमि अप्निंतर देवसिर्य
खामेड? गुरु कहे, खामेद ॥
॥पीले श्वं खामेमि देवसिय कदि के गोमाली
ये बैठ के वाम दाये मुहपत्ती मुखें धर के दक्षि
ण हाथ गुरु सन्मुख कर केसर्व पाठ कदे पनि
विधिसेतीदो वादणा दे कर आयरिय उवद्याय
इत्यादि त्रण गाथा कदि करेमि नं ते सामाइ
य श्वामि वामि कानस्सग्गं इत्याटि कटी पारि
त्रशुद्धि निमित्ते करेमि काउस्सग्गं अग्रव
कदि के आठ नवकार अथवा दो लोगो
(६७)
काउस्सग्ग करी पारि के पीछे दर्शनशुछि नि
मित्त प्रगट लोगस्स कदी सबलोए अरिहंत
चेयाणा वंदणवत्ति० ॥ अन्न ॥ कहि के
एक लोगस्सका कामस्सग्ग करी पारि के झान
शुधि निमित्तें पुस्करवरदीवड्ढे कहि के सुयस्स
नगवन ॥ वंदणवत्ति॥ अन्नतू ॥ कदि के
एक लोगस्सका कानस्सग्ग करे पीछे पारि
के सिक्षाण बुझाण कदि के वेयावच्चगराण न
कदे पीब सुयदेवयाए करेमि काजस्सग्ग अन्न
बूणा कदी एक नवकारनो कानस्सग्ग करे
पॐि गुरुका योग न होवे तो एक श्रावक काल
स्सग्ग पारिके णमो अदत्सिा कदि के श्रुत
देवताकीस्तुति कदे गुरु दुवे तो,गुरुकदे. और
दूजा सर्व स्तुति सुण के काउस्सग्ग पारे अब
श्रुतदेवताकी स्तुति कहे, सो लिखते है।
॥ अथ श्रुतदेवताकी स्तुति ।।
॥ सुवर्णशालिनी दयाद्, हादशागी जिनो
(६६)
वैठ के नगवन् । सूत्र नपुं एसाकहे तब गुरुकडे
नणेद पवि श्च कदी तीन नवकार गणी, तीन
करेमिनं तेनणीने चामि पडिक्कमिजं जो मे देव
सिन इत्यादि कही एक श्रावक वंदित्तु कहे दू
सरा सब सुने पी खडा हो कर अनुनिमि
आरादणाए इत्यादि संपूर्ण पाठ कही, दो वाद
पा देवे, अरु अवग्रहमादिज खडा हुवा इछाए
॥ सं० ॥ न ॥ अनुनिमि अप्रिंतर देवसिय
खामेन ? गुरु कदे, खामेद ॥
॥पी श्वं खामेमि देवसिय कदि के गोमाली
ये वैठ के वाम दाये मुदपत्ती मुखें धर के दक्षि
पा हाथ गुरु सन्मुख कर केंसर्व पाठ कई पी
विधिसेती दो वादणा दे कर आयरिय उवद्याय
इत्यादि त्रण गाया कढिके करेमि न ते सामा
य स्वामिवामि कानस्सग्ग इत्यादि कदी चारि
शुदिनिमित्ते करेमि कानम्सग्ग अन्नबू० ॥
कदि के भाव नवकार अग्रवा टो
(६७)
काउस्सग्ग करी पारि के पवि दर्शनशुद्धि नि
मित्ते प्रगट लोगस्स कदी सबलोए अरिहंत
चेश्याण॥ वदणवत्तिः ॥ अन्नवू० ॥ कहि के
एक लोगस्सका काउस्सग करी पारि के ज्ञान
शुधि निमित्तें पुस्करवरदीवड्ढे कहि के सुयस्स
जगवन०॥ वदणवत्ति०॥ अन्ननू ॥ कदि के
एक लोगस्सका कानस्सग्ग करे पीछे पारि
के सिहाण बुझाण कहि के वेयावच्चगराणं न
कहे पवि सुयदेवयाए करेमि कालस्सग्ग अन्न
बूणा कही एक नवकारनो कामस्सग्ग करे.
गुरुका योग न होवे तो एक श्रावक काल
स्सग्ग पारिके णमो अईसिक्षण कदि के श्रुत
देवताकीस्तुति कदे गुरु दुवे तो,गुरुकदे और
दूजा सर्व स्तुति सुण कानस्सग्ग पारे अव
श्रुतदेवताकी स्तुति कदे, सो लिखते है।
॥ अथ श्रुतदेवताकी स्तुति ।।
॥ सुवर्णशालिनी दयाद्, वादशागी जिनो
(६६)
बैठ के नगवन्। सूत्र नपुं एसा कहे तब गुरुकडे
नणेद पीछे च कही तीन नवकार गणी, तीन
करेमिनतेनणीने श्वामि पडिक्कमि जो मे देव
सिन इत्यादि कही एक श्रावक वंदित्तु कहे दू
सरा सब सुने पीछे खडा हो कर अनुहिनमि
आरादणाए इत्यादि संपूर्ण पाठ कदी, दो वांद
पा देवे, अरु अवग्रहमादिज खडा ढुवा श्या
॥सं० ॥ न ॥ अनुहिनमि अप्निंतर देवसिय
खामेन गुरु कदे, खामेद ॥
॥पी चं खामेमि देवसिय कदि के गोमाली
ये वैठ के वाम दाये सुत्पत्ती मुखें धर के दक्षि
ए दाथ गुरु सन्मुख कर केसर्व पाठ कदे पाई
विधिसेती दो वादगा दे कर आयरिय उवधाय
इत्यादि त्रण गाया कढिक करेमि नं ते सामाइ
य श्वामि गमि कानस्सर्ग इत्यादि कदी चारि
त्रशुद्धि निमित्ते करेमि काउस्सगं अनबू० ॥
कदि के थान नवकार अथवा दो
.
(६७)
ण मतर, जोक्सवासविमाण वासीय ॥ जे केवि
बुदेवा, ते सधे उवसमंतु मे स्वाहा ॥१॥ प
वस्काण नदि लिया दोय तो करे। सामायिक
चोसो पडिक्कमणा, वादणा, काउस्सग,पच्च
रकाण, आवश्यक सांधता कानो,मात्रा,नगे
अधिको अदर उचो नीचो कह्यो दोय,ते सर्वे
मन, वचन, कायाये करी मिवामि उकडं ॥श्वा
मो अणुसहिंणा कही वैठे पीछे गुरु एक स्तुति
कह्या पी श्रावक समस्त, मस्तके अंजलि क
रिकें णमो खमासमणाण॥ णमोऽर्दत्सिहायक
दी। णमोऽस्तु वर्षमानाय इत्यादि तीन स्तुति
कहे श्राविका एमो खमासमणाणं कदी ससार
दावाकी स्तुति कदे
॥अथ नमोऽस्तु वईमानाय॥
॥ नमोऽस्तु वर्षमानाय, स्पईमानाय कर्म
॥ तळयावाप्तमोक्षाय, परोदाय कृती
म ॥१॥येपाविकचारविंदराज्या,ज्याय
(६७)
मवा ॥ श्रुतदेवी सदा मह्य, मशेषश्रुतसंपदम्
॥१॥प खित्तदेवयाए, करेमि काउस्सग्गं०
॥ अन्नबू ॥ कदि के, एक नवकार चितवीपूर्व
ली परें देवदेवताकी स्तुति कहे, सो लिखते हैं.
॥ अथ क्षेत्रदेवताकी स्तुति ॥
॥ यासा देवगता सति, साधव श्रावका
दय ॥ जिनाझा साधयतस्ता, रदंतु क्षेत्र
देवता ॥ ३ ॥ इति ॥
॥ पा खडा दुवा एक नवकार कही, सं
मासा प्रमार्जि
उकडू वैठ के के आवश्यककी
मुहपत्ती पडिलेड गुरु कहे पडिलेदेह
पनि मुदपत्ती पडिलेही विधिशु दो वादणा
देश में वरकनक कदे, सो लिखते हे
॥अथ वरकनक प्रारन ।
॥वरकणय सख विद्यम, मरगय घणसं
निद विगय मोद ॥ सित्तरि सयं जिणाणं, मा
मर पृश्य वदे॥स्वादा ॥१॥ नववा
१
(६५)
| भतर, जोइसबासविमाण वासीय॥जे केवि
उहदेवा, ते सधे जवसमंतु मे स्वादा ॥१॥ प
वस्काण नदि लिया होय तो करे ॥ सामायिक
चोइसनो पडिक्कमणां, वांदणां, काजस्सग्ग,पञ्च
स्काण, ब आवश्यक सांधता कानो,मात्रा, नगे
अधिको अक्षर उचो नीचो कह्यो होय, ते सर्वे
मन, वचन, कायाये करी मिलामि कार्ड ॥श्चा
मो अणुसहिंा कही बैठे पीछे गुरु एक स्तुति
कह्या पी. श्रावक समस्त, मस्तके अजलि क
रिकें णमो खमासमणाणं। मोऽर्दसिहाणाक
ही णमोऽस्तु वईमानाय इत्यादि तीन स्तुति
कदे श्राविका प्रमो खमासमणाण कही ससार
दाचाकी स्तुति कदे
॥अथ नमोऽस्तु वईमानाय॥
॥ नमोऽस्तु वईमानाय, स्पईमानाय कर्म
॥ तळयावाप्तमोक्षाय, परोक्षाय कुती
गम् ॥१॥येपाविकचारविंदराज्या,ज्यायः
(७०) क्रमकमलावलिं दधत्या ॥ सहशैरिति संगत प्रशस्य, कथित सतु शिवाय ते जिनेन् । ॥२॥ कषायतापाईितजंतुनिति, करोति यो जैनमुखाबुदोजत ॥ स शुक्रमासोनवष्टि सन्निनो, ददातु तुष्टिं मयि विस्तरोगिराम् ॥३॥ श्वसितसुरनिगंधा लोढनृङ्गीकरङ्ग, मुखश शिनमजा बिम्रती या विनति । विकच कम लमुच्चे साऽस्त्वचिंत्यप्रनावा, सकलसुखवि धात्री प्राणनाजा श्रुताङ्गी ॥४॥ इति ॥ ॥ यह तीन गाथा कदि के पी पामोचूणा कदि के एक श्रावक खमासमण दई कहे.-श्या का० ॥ स०॥ न०॥ स्तवन नगुं' दूसरा खमा समण देई कहे ।। श्चा० ॥ सं०॥०॥ स्तवन नणु स्तवन साननु गुरुकडे,लणेहसानलेड़ पा आसन पर बैठ के नमोऽनमिक्षाणाकाई के पडो म्नयन करे, मो 10
(७१)
॥अथ श्री चिंतामणि पार्श्वजिनस्तवनम् ॥
॥जविका श्रीजिनविंब जुहारो, आतम प
रम आधारो रे॥नाश्री०॥ जिनप्रतिमा जि
न सारखीजाणो, न करो शंका काई॥ आगम
वाणीने अनुसार, राखो प्रीति सवाई रे ॥न
श्री० ॥१॥जे जिनबिंब स्वरूप न जाणे, ते
कदिये किम जाणे ॥ नूला तेद अझाने नरि
या, नहिंतिदा तत्त्व पिगणे रे॥न ॥श्री०॥
॥२॥अंबड श्रावक श्रेणिक राजा, रावण
मुख अनेक ॥ विविधपरे जिन नगति करता,
पाम्या धर्म विवेक रे॥न ॥ श्री॥३॥ जिन
प्रतिमा बहु नगतें जोता, होय निश्चय जपगा
२॥ परमारथ गुण प्रगटे पूरण, जो जो आई
कुमार रे॥०॥श्री ॥४॥ जिनप्रतिमा आ
कारे जलचर, बे बहु जलधि मकार ॥ ते देखी
बगुला मत्स्यदिक,पाम्या विरतिप्रकार रे॥
॥श्री०॥५॥ पाचमा अंगे जिन प्रतिमानो, प्र
(१) गटपणे अधिकार ॥ सूरियान सुर जिनवर ! ज्या, रायपसेणी मकार रे॥न श्री॥ दशमे अर्गे अहिंसा दाखी, जिन पूज्या जिन राज ।। एदवा आगम अरथ मरोडी, करिये केम अकाज रे॥न॥श्री॥॥समकितधारीस तीय शैपदी, जिन पूज्या मन रंगें ॥जो जो ए दनो अरथ विचारी, उठे झाता अगें रे॥ श्री० ॥ ७ ॥ विजयसुरें जिम जिनवर पूजा, कीधी चित्त थिर राखी ॥ व्य नाव बिहुँ नेर्दे कीनी, जीवानिगम ते साखीरे॥नाश्री॥ ॥ए॥ इत्यादिक वढु आगम साखें, कोश का मति करजो ॥ जिनप्रतिमा देखी नित नवली, प्रेम घणो चित्त धरजो रे ॥०॥श्री० ॥१०॥चिंतामणि प्रनु पास पसाये, सरधा होजो सवाई ॥ श्रीजिनसान सुगुरु उपदेशों, श्रीजिनचर सवाई रे ॥नम् ॥ श्री० ॥२१॥ इति श्रीचिंतामणि पार्श्वजिन स्तवनम् ।।
०
(७३)
॥पी तीन खमासमणे आचार्य, उपाध्याय,
सर्व साधु वांदी, अद्वासु कदनां, फेर खमास
मणे ॥श्वाका॥सान॥देवसि पाय
हित विशुधि निमित्तं कालस्सग्ग करुं गुरु
कहे, करेद पीई कदि के देवसि पायचित्त
विशुदि निमित्तं करेमि काजस्सग्गं अन्नबू० ॥
कदि शोले नवकार अथवा चार लोगस्सका
काउस्सग्ग करे, पारी के लोगस्स कदे
॥पबिखमासमण देकर चाका॥ सं०॥
न०॥ खुद्दोवदव नमावण करेमि कानस्स
ग्ग ॥ बन्नः ॥ इत्यादि कही शोल नवकार
अथवा चार लोगस्सका कानस्सग्ग करे, पा
रि के प्रगट लोगस्स कदे पीर खमासमण
दे॥ सजाय सदिस्सा फेर खमासमण देई
सहाय करु तीन नवकार गुणीजे पी न
भासमण देई के॥श्वा० ॥ स॥ नगवन चै
त्यवंदन करूं जी॥ ऐसा कद कर थनणा पा
(७४)
र्श्वनाथजीका चैत्यवंदन करे, सो लिखते हे ॥
॥ अथ श्रीयंनणा पार्श्वनाथजीका चैत्यवंदन॥
॥ श्रसेढीतटिनीतटे पुरवरे श्रीस्तंनने
स्वर्गिरौं, श्रीपूज्यालयदेवरिविबुधाधीशे
समारोपित ॥ ससिक्त स्तुतिनिर्जले शिव
फल स्फूर्जत्फणापल्लवः, पार्श्व कल्पतरु स
मे प्रथयता नित्यं मनोवान्तिम् ॥१॥ आधि
व्याधिदरो देवो, जीरावल्लीशिरोमणि ॥ पार्श्व
नायो जगन्नाथो, नित्यनाथो नृणां श्रियाशिता
॥पनिमोक्षुर्णसें लेके जयवीयराय सुधी
कहे ॥पी खमासमणपूर्वक मस्तक नमावी
‘सिरियनणयहिय पास सामिणो' इत्यादि
दोय गाथा कदे, सो लिखते है.
॥ अथ श्रीयनणयहियपाससामिणे।।
॥श्रीथनणयहियपासमामिणो सेम तिव
सामीण ॥ ति समुन्द्रय कारण, मुगमुराणं
च सोसिएम मई सरण, मानम्मग्ग
(७५)
करेमि सत्तीए॥नत्तीए गुण सुध्यिस्स,सघस्स
समुन्नय निमित्तं ॥२॥इति ॥
॥श्रीयनणा पार्श्वनाथजी आराधवा नि
मित्तं करेमिकास्सग्गं॥पी खडे दो के वंदण
व०॥अन्न०॥कदी चार लोगस्सका काजस्स
ग्ग करिके पी पारी प्रगट लोगस्स कही के
॥श्रीखरतरगह सिणगारदारजंगम युगप्रधा
न नद्यारक दादाजी श्रीजिनदत्त सूरिजी चारि
त्र चूडामणीजी आराधवा निमित्त करेमि कान
स्सग्गं ॥ अन्नबू कदि के,एक लोगस्सका का
उस्सग्ग करे, पील प्रगट लोगस्स कद के
॥श्रीखरतरगड सिणगारदार जंगमयुग
प्रधान नद्यारक दादाजी श्रीजिन कुशल सू
रिजी चारित्र चूडामणिजी आराधवा निमित
करेमि कालस्सग्ग ॥ अन्नबध कदि के एक लो
गस्सका काउस्सग्ग करे पीछे प्रगट लोगस्स
कदि वैठ के मावो गोमो उचो करि के खमास
(७४)
वनाथजीका चैत्यवंदन करे, सो लिखते है ।
॥ अथ श्रीयनणा पार्श्वनाथजीका चैत्यवंदन।
॥ असेढीतटिनीतटे पुरवरे श्रीस्तंजने
स्वगिरी, श्रीपूज्यालयदेवसूरिविबुधाधीश
समारोपित ॥ ससिक्त स्तुतिनिर्जल शिव
फल स्फूर्जत्फणापल्लवः, पार्श्व कल्पतरु स
मे प्रथयता नित्यं मनोवाबितम् ॥१॥ आधि
व्याधिदरो देवो, जीरावली शिरोमणि ॥ पार्भ
नायो जगन्नायो,नित्यनायो नृणाश्रियति।
॥पछि नमोहुर्णसे लेके जयवीयराय सुधी
कदे ॥पी खमासमणपूर्वक मस्तक नमावी
सिरिथनणयहिय पास सामियो' इत्यादि
दोय गाया कदे, सो लिखते हे
॥अथ श्रीयंनणयझियपाससामिणो॥
॥श्रीयंनयहियपाससामिणो सेस तिच
सामीण ॥ ति समुनय कारणं, मुरासुराणं
च सबेसि॥१॥एस मई सरणर्थ, काउस्सर्ग
(७७) तो बडी शाति सुणे, परतु और दिनोमे गेटी शाति सुणे, सो लिखते है ॥अथ लघुशातिस्तव ॥ ॥शातिं शातिनिशांत, शांतं शांताशिव नमस्कृत्य ॥ स्तोतु शातिनिमित्तं, मत्रपदै शांतये स्तौमि॥१॥मिति निश्चितवचसे, नमो नमोनगवतेऽर्हते पूजाम् ॥ शांतिजिनाय जयवते, यशस्विने स्वामिने दमिनाम् ॥२॥ सकलातिशेषकमदा, संपत्तिसमन्विताय श स्याय ॥ त्रैलोक्यपूजिताय च, नमोनमः शातिदेवाय ॥ ३॥ सर्वामरसुसमूह, स्वा मिकसपूजिताय निजिताय ॥ नुवनजनपा लनोद्यत, तमाय सततं नमस्तस्मै ॥ ४ ॥स वैधरितोषनाशन, कराय सर्वाशिवप्रशम नाय ॥ अष्ट ग्रद नूतपिशाच, शाकिनीना प्र मथनाय ॥५॥ यस्येति नाममंत्र, प्रधानवाक्यो पयोगकृततोपा ॥ विजया कुरुते जनहित, (७६) मण देई के, श्वास ॥०॥ चैत्यवंदन करुं जी ऐसें कदि के चैत्यवंदन करे ॥ अथ चनक्कसाय ।। ॥ चनक्कसाय पडिमल्लूलूरण, उलय मय ए बाण मुसुमुरण ॥ सरस पियगु वन्नु गय गामिन, जयन पास नुवणत्तय सामिय ॥१॥ जसु तणु कति कडप्पसिणिइन, सोहर फणम णि किरणालिन ॥ ननव जलहर तरिक्ष य लंग्यि, सो जिणु पासु पयन वंद्रिय॥२॥ ॥ अर्दन्तो नगवत इंग्मदिता सिझाव सिद्धिस्थिता, आचार्या जिनशासनोन्नतिकरा पूज्या उपाध्यायका ॥श्रीसिझातसुपाका मु निवरा रत्नत्रयाराधका , पचैते परमेष्ठिनः प्र तिदिन कर्वतु वोमंगलम् ॥१॥ ॥पीठ नमुपसें से के जयवीयगय पर्यंत कदि के, परकी, पनम्मासीथरु
(पए)
कुरु कुरु पुष्टिं, कुरु कुरु स्वस्ति च कुरु कुरु
वं मे ॥ १३॥ नगवति गुणवति शिवशां, ति
तुष्टि पुष्टिस्वस्तीद कुरु कुरु जनानाम् ॥नमिति
नमो नमो झाँ, कोई य द हा फट्
फट् स्वाहा ॥ २४ ॥ एव यन्नामादर, पुरस्स
र संस्तुता जया देवी। कुरुते शातिं नमतां,
नमो नम शातये तस्मै ॥ १५॥ इति पूर्वसूरि
दर्शित, मंत्रपदविदर्भित स्तवः शाते ॥ स
लिलादिनय विनाशी, शात्यादिकरश्च नक्ति
मताम् ॥ १६॥ यश्चैनं पति सदा, शृणोति
भावयति वा यथायोग्यम्॥ स दिशांतिपर्दया
यात्, सूरि श्रीमानदेवश्च ॥ १७॥ उपसर्गाः
क्यं याति, नियंते विघ्नवल्लय ॥ मन प्रसन्न
तामेति, पूज्यमाने जिनेश्वर ॥१॥सर्वमगल
मांगल्य,सर्व कल्याण कारणम्॥प्रधानं सर्व ध
र्माणा, जैनं जयति शासनम् ॥१७॥ इति ॥
पाव चीराकका अथवा बीजलीका चादणा
(G)
मिति च नुता नमत तं शांतिम् ॥ ६॥नवतुन
मस्ते भगवति, विजये सुजये परापरैरजिते ॥
अपराजिते जगत्मा, जयतीति जयावहे नव
ति ॥ ७॥ सर्वस्यापि च संघस्य, नर कल्या
ण मगलप्रददे ॥ साधूना च सदा शिव, सुतु
ठिपुष्टिप्रदे जीया ॥७॥ नव्याना कृतसि
,निति निर्वाणजननि सत्त्वानाम्॥ अनय
प्रदाननिरते, नमोस्तु स्वस्तिप्रदे तुन्यम् सा
भक्ताना जन्तूना, शुनावहे नित्यमुद्यतेदेवि।।
सम्यग्दृष्टीना धृति, रति मति बुद्धि प्रदाना
य ॥२०॥ जिनशासननिरताना, शातिन
ताना च जगति जनतानाम् ॥ श्रीसपत्कीर्तिय
शो, वहिनि जय देवि विजयस्व ॥२॥ सति
लानल विपविषधर, इष्ट ग्रह राज रोगर
जनयत ॥राक्षस रिपुगण मारी, चोरेतिश्वा
पदादिन्य ॥ २७ ॥ थथ रक्ष रक्ष मुशिवं,
कुरु कुरु शातिं च कुरु कुरु मटेति ॥ तर्टि
(ए)
कुरु कुरु पुष्टिं, कुरु कुरु स्वस्ति च कुरु कुरु
खं मे ॥ १३॥ नगवति गुणवति शिवशां, ति
तुष्टि पुष्टिस्वस्तीद कुरु कुरु जनानाम् ।।मिति
नमो नमो झा, छी . य द ही फट्
फट् स्वाहा ॥ २४ ॥ एवं यन्नामादार, पुरस्स
र संस्तुता जया देवी।। कुरुते शातिं नमतां,
नमो नम शातये तस्मै ॥ २५॥ इति पूर्वसूरि
दर्शित, मंत्रपदविदर्जित स्तवः शाते ॥स
लिलादिनय विनाशी, शात्यादिकरश्च नक्ति
मताम् ॥१६॥ यश्चैनं पति सदा, शृणोति
जावयति वा यथायोग्यम्॥ स दिशातिपदया
यात्, सूरि श्रीमानदेवश्च ॥ १७॥ उपसर्गाः
क्ष्य याति, बिद्यते विनवलय ॥ मन प्रसन्न
तामेति, पूज्यमाने जिनेश्वर॥१७॥सर्वमंगल
मागल्य,सर्व कल्याण कारणम् ॥प्रधानं सर्व ध
र्माणा, जैन जयति शासनम् ॥ २७ ॥ति ॥
॥पनि चीराकका अथवा बीजलीका चादणा
पडा दोय तो शरियावहि तस्सुत्तरी अन्न कदि के, एक लोगस्सका कामस्सग्ग करे, पी, प्रगट लोगस्स की पूर्वली परे सामायिक पारे पवि एक स्तवन दादाजीको कदे ॥इति देवसी पडिक्कमण विधि संपूर्ण ॥ ॥ अथ कमलदलस्तुति ॥ ॥ कमलदलविपुलनयना, कमलमुखी कम लगर्नसमगौरी ॥ कमले स्थिता जगवती, द दातु श्रुतदेवता सौख्यम् ॥१॥झानादिगुणयु ताना, स्वाध्यायध्यानसयमरतानाम् ॥ विदधा तु नुवनदेवी, शिव सदा सर्वसाधूनाम् ॥२॥ यस्या क्षेत्रं समाश्रित्य, साधुनि साध्यते कि या ॥ सा देवदेवता नित्य, नूयान सुखदायि नी॥३॥इति देवदेवता स्तुति ॥ ॥ कल्याणकमला गेठ, नीलदेदं महासद ॥नवखमानिधं पाच, सदा ध्यायामि मानसे।
॥ अथ बुटक चैत्यवंदनस्तुतिर्लिख्यते॥ ॥ तत्र प्रथम श्रीपार्श्वजिन स्तुतिः ॥ ॥ सकलकुशलवल्ली, पुष्करावर्तमेघो, रि ततिमिरनानु कल्परोपमान. ॥ नवजल निधिपोत सर्वसपत्तिहेतु , स नवतु सततं व श्रेयसे पार्श्वदेव ॥१॥ इति श्रीपार्श्वजिन ॥ ॥अथ जिनस्तुतिः॥ ॥दर्शनादुरितध्वसी,वदनादिचितप्रद ॥ पूजना पूरक श्रीणा, जिन साक्षात्सुरजुम ॥२॥ इति॥ ॥ अथ आदिजिन स्तुति ॥ ।। सुवर्णवर्ण गजराजगामिन, प्रलववा दु मुविशाललोचनम् ॥ नरामरे स्तुतपादप कज, नमामि नत्या झपनं जिनोत्तमम् ॥३॥ इति आदिजिनस्तुति ॥ ॥अथ शातिजिन स्तुति ॥ ।। सोलम जिनवर शातिनाय, सेवो शिर नामीकचन वरण शरीर काति, अतिशय
(२)
अभिरामी॥ अचिरा अंगज विश्वसेन, नरप
ति कुलचंद ॥ मृगलबन धर पद कमल, सेवे
सुरनरलंदाजुगमां अमृत जेहवी ए, जास अ
खंमित आण॥ एक मने आराधता, लदिये को
डि कल्याण ॥४॥ इति श्रीशातिनाथस्तुतिः ॥
॥ अथ नेमिनाथस्तुति ॥
॥प्रद सम प्रणमुं नेमिनाथ, जिनवर जयवं
त ॥ यादवकुल अवतंस दंस, उत्तम गुणवंत
॥समुविजय शिवा देवी जास, मति सहित
उदार ॥ सुंदर श्याम शरीर ज्योति, सोहे सु
खकार॥गढ गिरनारे जिण लघु ए, अमृत पद
अभिराम ।। तास दमा कल्याण मुनि, निशि
दिन नमत कल्याण ॥५॥ इति श्रीनेमिनाथन
॥ अथ श्रीपार्श्वनाथ स्तुति ॥
॥पुरसादाणी पास नाद, नमियें मन रग॥
नील वरण अश्वसेन नट, निरमल निशंक।
कामित पूरण कलप साख, वामामत सार।
(३)
श्रीगोडी पुर स्वामि नाम,जपियें निरधार ॥ त्रि
नुवन
पति ओवीशमो ए, अमृत सम जसु वा
ण ॥ध्यान धरता एदनु, प्रगटे परम कल्याण
॥६॥ इति पार्श्वनाथ स्तुतिः ॥
॥ अथ श्रीमहावीर स्तुतिः॥
॥ वंदू जगदाधार सार, शिव सपत्ति कार
ण जन्मजरा मरणादि रूप, नव ताप निवा
रण ॥ श्रीसिझारथ तात मात, त्रिशला
तनुजात ॥सोवन वरण शरीर वीर, त्रिभुवन
विख्यात ॥ अमृतरूपे राजतो ए, चोवीशमो
जिनराय ॥ क्षमाप्रमुख कल्याण मुणि, आ
पो करि सुपसाय ॥७॥ इति श्रीमहावीर ॥
॥ अथ पाक्षिकादि पडिक्कमणविधिलिख्यते ॥
॥तिदा प्रथम वदित्तु सूत्र पर्यंत देवसिक
पडिक्कमी॥॥खमासमण देई देवसीआलोश्यं
पडिकता॥ श्वा० स०॥ न० ॥ पक्षिय मुद
पत्ती पडिलेडु १ चनमासीएं चजम्मासिय मुदप
सेवे
(२)
अनिरामी॥अचिरा अंगज विश्वसेन, नरप
ति कुलचद ॥ मृगलंग्न धर पद कमल,
सुरनरद॥जुगमा अमृत जेवी ए, जास अ
खंमित आण॥एक मने आराधता, लहिये को
डि कल्याण ॥४॥ इति श्रीशातिनाथस्तुतिः ॥
॥ अथ नेमिनाथस्तुति ॥
॥प्रद सम प्रणमु नेमिनाथ, जिनवर जयवं
त ॥ यादवकुल अवतंस दस, उत्तम गुणवंत
॥ समुजविजय शिवा देवी जास, मति सहित
उदार ॥ सुदर श्याम शरीर ज्योति, सोहे सु
खकार॥गढ गिरनारे जिण लघु ए, अमृत पद
अभिराम ॥ तास क्षमा कल्याण मुनि, निशि
दिन नमत कल्याण ॥५॥इति श्रीनेमिनाथन
॥ अथ श्रीपार्श्वनाथ स्तुति ॥
॥पुरसादाणी पास नाद, नमियें मन रंग।
नील वरण अश्वसेन नंद, निरमल निशंका
कामित पूरण कलप साख, वामासुत सार ।
(५)
नरसह दिवसाण पनरसह राईण ज किंचि
अप्पत्तिय ॥ इत्यादि सर्व पाठ कदे चनमासे
चजह मासाण अहह परकाणं वीसोत्तरसोरा
इंदियाण ज किंचि अप्पत्तिय ॥ इत्यादि कदे
सवारी ज्वालसह मासाण चनवीसहू प
काणं तिनिसयसहिराईदियाण ॥ जं किंचि
अप्पत्तिय इत्यादि कदे ।।तेवारे गुरु पण मित्रा
मि उक्कड कदे॥तिदा दोय साधु नचरता दुवे
तो पाखिये तीन, चउमासीये पाच, सवचरीय
सात साधुने खमावे॥पछि उनी अवग्रहमादि
रह्यो कदे ।।श्चा० ॥ स॥॥ परिकय आ
लोवू गुरु कहे बालोएद ॥पविश्व आलोए
मि,जोमेपरिकन॥३॥अश्यारोकन, इत्यादि स्
बनणीसंदेश्रथवा विस्तारपाखी चनमा
सी सववरी, अतिचार आलोवे,सो लिखते है।
॥ अथ वृहदतिचारा लिस्यते॥
।। नाणमि दसणमिय, चरणमितवेय तद य
१
(४)
त्ती, संवचरीये सवतरीमुदपत्ती पडिलेहुँ १ एम
कदे पीछे गुरु कदे, पडिलेदेद ॥पनि श्च करे,
दूजी खमासमण देश, मुहपत्ती पडिलेडी, वा
दणा देई, तिहा परस्कीमें पस्को वश्कतो॥ चन
मासी पडि ॥ चउमासी वकतो सवहरी में
सवबरो वश्कतो एम यथायोगें कदे ॥पीय
रु कदे पुण्यवतो देवसीने स्थानकें पाकिक ॥
चनमासिक सावचरिक नाजो गक जयणा
करजो मधुर स्वरे पडिक्कमजो, खासे सो वि
वरा शुछ खासजो. मामलमें सावचेत रदेजो.
पी सघलाही तदत्ति कहे॥पा की ।
चाका० ॥ सं॥०॥ संवुझा खामणे ॥थ
सुनिमि अग्निंतर परिकय ॥ ३ ॥ खामेक'
गुरुकदे, खामेद॥पीठे मस्तके अजलि करतो
थको, ठं खामेमि पस्किय ॥ ३ ॥ कदी, गोमा
लीय बेसी मस्तक नमावी दक्षिण दाय शुरु
सादामो करी, मुढपत्ती मुखे देई । पम्किये।
(७)
वीसारखो, तपोधन तणे धर्मे काजो अण ऊधरे
दामी अणपडिलेदी, वसती अणसोधी, अ
सिद्याई अणोऊा कालवेलामांदि दशवकालि
क प्रमुख सिधांत नण्यो गुण्यो, योग वह्या पखें
भएयो ज्ञानोपगरण पाटी,पोथी,उवणी,कवली,
नवकरवाली,सांपडा सांपडी वदीदस्तरी नली
या कागल प्रमुखप्रते आशातना दुई, पग ला
गो थूक लागो उसीसे मूक्यो कनें बता आदा
र नीदार कीधो, झानजव्य नदण जपेतण की
धो, प्रज्ञापराधे विणाश्यो विणसतो वेख्यो,
उती शक्ते सार सनाल न कीधी, ज्ञानवत प्रतें
मतर वह्यो, अवज्ञा आशातना कीधी, कोई
तेंजणता गुणता प्रक्षेष मत्सर अतराय अप
घात कीघो मतिझान,श्रुतझान,अवधिशान, म
न पर्यवान,केवलझान ए पाच झानतणी अ
सहए कीधी, कोई तोतलो बोवन्डो दस्पो, घि
तयोआपणा जाणपणा तणोगर्व चिंतव्यो,अ
(द) विरियमि॥आयरण आयारो,एसो पचहा नविन ॥॥ज्ञानाचार १, दर्शनाचार २, चारि त्राचार३,तपाचारध,वीर्याचार ए एव पाच विधि आचारमादि जिको अतिचार पक्ष दिवसमाहि सूक्ष्म,बादर, जाणता अजाणता दुन होई,ते सटू मन,वचन, कायाकरी मिबा म फुकरें। ॥अथ ज्ञानाचारना आठ अतिचार ।। ॥काले विणए वढुमाणे, उवदाणे तहय नि न्हवणे॥ वजण अब तच्छनए, अविदो नाण मायारो॥१॥ज्ञान -कालवेलामादि पढिन गु पिन नदी, अकाले पढिन, विनय हीन बहुमा न हीन उपधान हीन श्री नपाध्यायकने नही पढिन, अथवा अनेराकने पढिन अनेरो गुरु कह्यो व्यजन अर्य तनय कूदो पढ्यो देव- यादणे पडिक्मणे सियाय करता,पढना,गुणतां, डो अक्षर काने मात्र अधिको नगे भागल पाग्ल नस्यो, सूत्र अर्थ कृडा गप्पा.
(७)
वीसास्यो, तपोधन तणे धर्म काजो अण ऊधरे
दामी अणपडिलेदी, वसती अणसोधी, अ
सिचाई अणोमा कालवेलामांदि दशवकालि
क प्रमुख सिधात नण्यो गुण्यो, योग वह्या पखें
भएयो झानोपगरण पाटी,पोथी,उवणी,कवली,
नवकरवाली,सापडा सापडी बदीदस्तरीली
या कागल प्रमुखप्रते आशातना दुई, पग ला
गो थूक लागो नसीसे मूक्यो कनें बता आहा
र नीदार कीधो, ज्ञानभव्य नक्षण जपेतण की
धो, प्रशापराधे विणाश्यो विणसतो नवेख्यो,
बती शर्ते सार सनालन कीधी, ज्ञानवत प्रतें
महर वह्यो, अवझा आशातना कीधी, कोई प्र
तें नणता गुणतां प्रवेष मत्सर अतराय अप
घात कीघो मतिझान,श्रुतज्ञान,अवधिज्ञान, म
न पर्यवशान,केवलझान ए पाच झानतणी अ
सहदणा कीधी, कोई तोतलो बोबडो दस्यो, वि
तर्पोआपणा जाणपणा तणोगर्व चिंतव्यो,अ
(60)
एविध ज्ञानाचार विपन जिको अतिचार पद
दिवसमाहे सूक्ष्म, वाटर, जाणता, अजाणता,
ढुवो होय, ते सद् मन वचन कायाकरीमि० ॥
॥ दर्शनाचारना आठ अतिचार ॥
॥ निस्सकिय निक्कखिम, निवितिगिचा अ
मूढदिछी अ॥उववद थिरीकरणे,वबल्ल पनाव
णे अ॥१॥ देव गुरु धर्म तणे विपे निशंक
पणो न कीधो,तथाएकात निश्चय धख्यो नहीं,
सघखाइ मत नलाने, एदवी श्र-छा कीधी, घ
मसवधिया फलतणे विपे नि संदेद बुद्धि धर
नही चारित्रिया साधु साधवी तणा मलमली
न गात्र देखी ज्गंग नपजावी, मिथ्यात्वीतणी
पूजा प्रनावना देखी, मूढदृष्टिपणो कीधो, सं
घमाहे गुणवततणी अनुपदणा अस्थिरी
करण अवात्सल्य अप्रीति अनक्ति चितवी
सघमादे थिरीकरण वात्सख्य शक्ति पते प्रना
वना न कीधी, देवव्य विनाशिज, विणसंतु
जवेखीज, ती शक्ते सार संभाल न कीधी,सा चर्मिकशुं कलद कर्म कीg, जिन नवन तणी चोराशी आशातना कीधी, गुरुप्रतें तेत्रीश आशातना कीधी, अधौतवस्त्रे देवपूजा कीधी, तिद् गम पाखे देवपूजा, वासकूपी कलश तं पो उबको लागो, मुखतणी वाफलागी, उवणा रिय दायथकी पडी, पडिलेवो वीसास्यो, नवकरवालीने पग लागो, दर्शनाचार विषईन जिको अतिचार ॥३॥ ॥चारित्राचारना आर अतिचार ॥ । पणिदाणजोगजुत्तो, पचदिंसमिदितिदिं गुत्तीहिं । एस चरित्तायारो,अविदो होश्नाय छो॥३॥रियासमिती१,नासासमिती, एप णासमिती ३, आयाणनंम्मत्तनिकेवणासमि ती ४, जब्बारपासवणखेलजल्लसंघाणपारिका वणीयासमिती ५ मनोएप्ति ,वचनराप्ति , कायराप्ति ३, एपंच समिती तीन गुप्ति, रूडीपरें (ए) पालीनहीं॥साधु तणे सटेवश्रावक तणेपोसह पडिक्कमणे लीये अष्टविध चारित्राचार विषईन जिको अतिचार ॥४॥ ॥ विशेपत श्रावकतणें धमै श्रीसम्यक्तमूल वारद व्रत श्रीसम्यक्त्वतणा पाच अतिचार" सका कख विगिना, पसस तह सथवोकुलिंगी सु ॥ संकाः-श्रीअरिदत तणी बल अतिशय झान लक्ष्मी गानीर्यादिक गुण, शाश्वती प्र. तिमा चारित्रियाना चारित्र जिनवचन तणो सदेद कीधो आकाक्षा -ब्रह्मा विष्णु महेश्वर क्षेत्रपाल गोगो गोत्रदेवता ग्रह पूज्या विणाग हनुमत इत्येवमादिक ग्राम गोत्र देश नगर जू जुआ देव देहराना अनाव देखी रोगें आतकें दलोक परलोकार्थे पूज्या मान्या, वो सां, ख्यादिक सन्यासी नरडा जगत लिंगिया यो गी दरवेश अनेराई दर्शनियानो कप्ट मत्र चमत्कार देखी, परमार्थ जाएपाण
(ए)
अनुमोद्या, कुशास्त्र शीख्या, सांनस्या, शराध
सवत्सरी होली वलेव मादीनिम अजापडि
वो प्रेतबीज गोरत्रीज विणायगचोथ नागपा
चम फूलणाग्छ शीलसातम ध्रो याम नजली
नवम अवदसम व्रत ग्यारस वत्सबारस ध
नतेरस अनतचौदश आदित्यवार उत्तरायण
नवोदक, जाग नोग उतारणा कीधा, पिंपल
पाणी घाख्या घलाव्या घर बाहिर कूई तलाव
नदीसमुख कुममें पुण्य देतु स्नान कीधा,दान दी
धा,पदण शनिश्चर मादमास नवरात्रि नादिया,
अजाणना थाप्या,अनेराई व्रत व्रतोला कीधां,
कराव्या विचिकिचा धर्मसबधिया फल तणो
सदेद कीधो, जिण अरिदत धर्मना आगर
विश्वोपकार सागर मोदमार्ग दातार देवाधि
देव बुझेशुधनावें न पूज्या,न मान्या,महात्मा
ना नात पाणी तणीजगवा कीधी, कुचारित्रिया
देखी चारित्रिया ऊपरें अनाव हुन मिथ्यात्वी
(ए)
तणी अनावना देखी प्रशसा कीधी, प्रीति मा
मी, दाक्षिणलगें
तेदनो धर्म मान्यो॥श्रीसम
कितविपे अनेरो जिको अतिचार पद दिवस
मादि सूक्ष्म,बादर, जाणता अजाणता दुन हो
य,तेसमन,वचन,कायाकरी मिगमिणा॥
॥पदिले प्राणातिपात विरमणव्रते पाच
अतिचार वद बध विचए, अश्नारे नत्त
पाण बुए ॥ विपद चनपद प्रते रीशवशे गा
ढो धान प्रदार घाल्यो, गाढे बधन बाध्या, घ
णे नारे पीव्या, निलीबन कर्म कीधा चारा
पाणी तणी वेला सार सनार न कीधी, लहिणे
देणे किणहीपते संघाव्यु, तेणे नूखे आपण
जिम्या, अणगत पाणी वावस्युं, रूडे गल्यु
नदी, गलायुं नही, अगल पाणी फील्या
लूगडा धोया, इधण अणसोध्यु जाल्यु सा
पकानखजूरा सुलहला माकड जूथा गोगिं
हा साहता मूथा, दुखव्या, रूडे यानक न मू
क्या, कीडी मकोडी उदेदी घीवेली कातरा चू डेलीपतगिया मेमका अलसियाईली कृति मांस मसा वगतरामाखी प्रमुख जे कोई जीव विणा चापिया दूदव्या माला दलावतां पंखी काग चि उकलाना इमां फूटां, अनेरा एकेंझ्यिादिक जि के जीव विणा चापा, दूदव्या, दालता चालतां अनेरु का काम काज करता विध्वंसपणुं की, जीव रक्षा रूडे न कीधी,संखारो सूकव्यो,मुख्या धान तावडे दीधा,दलाव्या,नरडाव्यां, खाटला तावडे फाटक्या, मूक्या, मूकाव्या, जीवाकुल नूमि लीपावी, वाशीगार राखी रखावी,दसणे खामणे लीपणे रूडी जयणा न कीधी आतम चदशना नियम नाग्या, धूणी करावी ॥ पहि ला प्राणातिपात व्रत विपश्न अनेरो॥१॥ ॥ वीर्छ स्थूल मृपावाद विरमणव्रते पाच अतिचार॥ ॥ सदसा रदस्सदारे, मोसुवएसे य कूड
(ए)
लेदे य ॥ सहसात्कार -किणदिक प्रतें अयुक्तो
आल दीधो, किणदिक प्रते एकातें वात करता
देखी तुम्हें तो राजविरुधचितवो गे इत्यादि
क का स्वदार मत्र नेद कीधो, अनेराई
किणदीनो मत्र आलोच मर्म प्रकाश्यो, किण
हीने कूडीबुद्धि दीधी, कूडो लेख लिख्यो, कूठी
साख नरी, थापण मोसो कीधो, कन्या ढोर
गाय भूमि सबधिया लेदणे देयणे व्यवसाय
वाद वढावढि करता मोटक फूठ बोल्युं, हाथ
पग नणी गाल दीधी, करडका मोड्या, अध
र्मवचन बोल्या॥बीजे मृषावाद व्रत विष३० ।।
॥त्रीजे अदत्तादानविरमण व्रतना पाच
अतिचार ॥ तेनादडप्पळगे, घर बाहिर क्षेत्र
खले पराई वस्तु अणमोकलावी लीधी, दीधी,
वावरी, चोरीनी वस्तुमोल सीधी, चोर
प्रतें संवल दीधुं, संकेत कर्दा विरुप राज्या
तिक्रम कीघो, नवा पुराणा सरस विरस सजी
(ए)
व निर्जीव वस्तु तणा नेल सनेल कीधा, खोटे
तोल मान माप वदोस्खां, दाणचोरी कीधी,
साटे लाच लीधी, माता पिता पुत्र कलत्र परि
वार वची जुदी गाठ कीधी, किपदीने लेखे प
लेखे नुलव्यु,पडीवस्त नलवी लीधी, त्रीज अ
दत्तादान व्रतविषश्न ॥
॥ चोये स्वदार संतोप मैथुनव्रते पाच अ
तिचार ॥ अपरिग्गदिया इत्तर, अणंगवीवाद
तिबअपुरागे ॥ अपरिगृहीतागमन, श्वर
परिगदितागमन विधवा वेश्या स्त्री कुलाङ्गना
स्वदार शोकतणे विषे दृष्टिविपर्यास कीधो,
सराग वचन वोल्या, आम्म चनदस अनेराई
पर्व तिथि तणा नियम नागा,घरघरणा कीधां,
कराव्या,अनुमोदीया, कुविकल्प चिंतव्या, अ
नङ्गक्रीडा कीधी, पराया विवाद जोड्या, काम
नोगतणेविपेतीघ्रानिलाष कीधोकस्वप्नलाधां,
नट विट पुरुषशु हासुकीधु,चोये मैयन व्रत वि०
पुत्र कलत्रा (ए) ॥ पाचमे परिग्रहपरिमाणवते पाच अति चार॥धण धन्न खित्त व ॥धन धान्य क्षेत्र व स्तु रूप सुवर्ण कुप्प विपद चतुष्पद नवविध परिग्रह तणा नियम उपरात वृद्धि देखी मूळ लगे सदेप न कीधो, माता पिता दि तणे लेखें कीधो, परिग्रद परिमाण लेई पठ्यो नहीं पढी वीसारित, नियम वीसारिन । पाचमे परिग्रह परिमाण व्रतविषा ॥ बछे दिगविरमणव्रतें पाच अतिचार ॥ गमणस्सय परिमाणे ॥ईदिसि अधोदिसि तिर्यगदिसि जायवा आयवा तणो नियम जे कोई अजाणे नागो, एक गमा सकोडी बीजी गमा वधारी,विस्मृति लगेंअधिक भूमिगया,पा उवणी आघी मोकली॥हे दिग्रव्रत वि०॥६॥ सातमे नोगोपनोग परिमाण व्रत॥ जेहना भोजन आश्री पाच अतिचार भने करमडूंती पन्नरे, एव वीश अतिचार ॥ सञ्चिते पबिहे,
(ए)
अपोल उप्पोलय च आदारे सञ्चित्त तणे निय
म लीधे अधिक सञ्चित्त सीधु, तथा सञ्चित्त
मली वस्तु अपक्कादार पक्कादार तुनौषधि
तणुं नतण की, दोला नवी पहुंक काकडी
भडया कीधा, सुख्यां धान प्रमुख नतप कीधां
॥सञ्चित्तदव विगई, पाणद तवोलवल कुसुमेसु॥
वादण सयण विलेवण, वन दिसि एहाण भत्ते
सु॥१॥ए चवदे नियम दिन प्रते सनास्या
संतप्या नदिं, लेई नियम नाग्या वावीस अ
नह, बत्तीस अनतकायमादि आउं मूला गा
जर पीमालू सुरण सेलरा काची आवली गो
ल्दा खाधा, चोमासा प्रमुखमादे वासीकगेल
नी रोटी खाधी त्रिढुं दिवसनु दही लीधु, म
धु मढुडां माखण माटी वेंगण पीलू पीचू पं
पोटा पीपी विष दीम करदा घोलवडा अण
जाण्या फल टीवरूं अथाएं आमणबोर का
चुं मी, तिल खसखसकाचां कोविंबडा खाधां,
(ए)
रानिनोजन कीधु,जगवगतीवेलायें व्यालूकीवु,
दिवस उग्या विण शिराव्यातया पन्नरे कर्मादा
न गालि कम्मे, वणकम्मे, साडीकम्मे, नारी
कम्मे, फोडीकम्मे, दतवाणिज्ये, लस्क वाणिज्ये,
रस वाणिज्ये,केशवाणिज्ये, विप वाणिज्ये, जंत
पीलणकम्मे,निलबण कम्मे, दवग्गिदावण्या,
सर दद तलाव सोसण्या, असई पोसणया,ए
पाच वाणिज्य पाच कर्म, पाच सामान्य,महा
रंन लीहाला कराव्या इंटवाद नीवाद पचा
व्या, धाणी चणा पक्वान्न करी वेच्या वासी
माखण तपाव्या, अगीठा कीधा कराव्या, तिला
दिक संचीया, फागुण मास उपरात राख्या,
कडा सूडा प्रमुख पोष्या, अनेरुं जे काई बडु
सावध कठोर कर्मादिक समाचस्युं ॥ सातमा.
नोगोपनोग व्रत विपश्व०॥
॥थानमा अनर्थ दंम विरमणव्रतना पाच
अतिचार ॥ कंदप्पे कुकुश्ए ॥ कंदर्प लगें विट
(एए)
नी परें दास्य कुतूदल मुखादि अंग कुचेष्टा
कीधी, मूरखपणा लगे कुणदीने असव वा
क्य वोल्या खांमा कटारी कुसि कुहाडा रथ
ऊखल भूसल अगन घरटी आदिक सजकरी
मेव्या, माग्या आप्या, कणक वस्तु ढोर लेवरा
व्या, अनेरो काश् पापोपदेश दीघो, अंघोल
नादण, दातण, पगधोअण पाणी तेल अधिक
आण्या, हीमोले दींच्या, राजकथा देशकथा
भक्तकया स्त्रीकथा पराइ वात कीधी, आर्त रौ
इ ध्यान ध्याया, कर्कश वचन बोल्या, करडका
मोड्या, सनेडा लाया, नेसा साढ कूकडा, मि
ढा श्वानादि जूजता कलद करता जोया, खाधी
लगें अदेखाई चितवी माटी मीतु कण कपासि
या काजविण चाप्या, तेद उपर बयता, आले
वनस्पति खुदी, गस पाणी विरस तेल गुल
आम्लवेतस वेरजादिक तणा जाजन नघाडां
मक्या ते मादि कोही कथुआ माखी जदर गि
(९००)
रोली प्रमुख जीव विणग, सूडा प्रमुख जीव
क्रीडा हेते बाधी राख्या, घणीना कीधी, रा
ग क्षेप लगे एकने शधि परिवार वागी एकनें
मृत्युदाणि विमासी आठमा अनर्थ दमव्रतवि०
॥ नवमा सामायिकवतें पांच अतिचार॥ति
विदे उप्पणिदाणे सामायिक लीधे मन आद
ट दोहट चिंतव्यु, वचन सावध बोल्यु, काय
अण पडिलेा दलाव्यु, तीवेला सामायिक
न लीधुं, सामायिक सई उघाडे मुख बोख्या,
कघ आवी कीधी, वीज दीवा तणी जाहीला
गी कण कपासीया माटी मीतुं नील फूल ह
रिकायना सघह हुआ, पुरुष तिर्यंचना संघ
दुथा, तथा स्त्रीतिर्यंची प्रानडी, मुहपत्तीयोसं
घट्टी,सामायिक अण पूरलं पारिन, पारन वीसा
रिलं, नवमे सामायिक व्रतविपश्यो।
॥दशमे देशावकाशिक व्रते पाच अतिया
र॥आणवणे पेसवणे ॥ श्रावणपळगे ये
(२०) सवणप्पनगे सहाणुवाइ रूवाणुवाइ बदिया पु ग्गल केवे ॥ नियमित नूमिकामादिवाहिर थ की काई अणाव्यु, आप कन्दाथी वादिर मोक व्या, साद करी रूप देखाडी काकरी नाखी आपणपशुब्तुंजणाव्यु ॥ दशमे देशावकासि ग व्रतविषयो॥१०॥ ॥ ग्यारमे पोषधोपवास व्रते पाच अतिचा र ॥ सथारुञ्चार विदी, पमाय तह चेव नोथ णा नोए॥पोसह लीधे सथारा तणी नूमि बाहिरला यमिला दिवसें शोध्या पडिलेह्यां नीं, मातरं अणपडिलेयु वावरित, अणपुजी नूमिकाई परविन, परम्वता चिन्तवणानकी धी, अणुजाणदजस्सुग्गहो न कह्यो परतव्या पूठे वार त्रण वोसिरामि वोसिरामि न का पोसदशालामादि पासता नीसरता निस्स दी आवस्सदीकवीवीसारी, एथ्वीकाय, अप्प काय तेककाय वाजकाय वनस्पतिकाय त्रस
(१०२)
काय तणा संघट्ट परिताप उपञ्व दुश्रा, संथा
रा पोरसि तपी विधि नणनवीसारित पोरसि
मादि घ्या, अविधि सथारु पाथस्यु, काल
वेलाये पडिक्कमणु न कीवन, पारणादिक तणी
चिंता निपजावी, कालवेला देव वादवा वीसा
रिया, पोसह असुरो लीयो, सवारो पारीयो,
पर्व तिथि आवी पोसद लीधो नदी ॥ इग्या
रमे पोषधोपवास व्रतविषश्यो॥
॥ बारमे अतिथि संविनागव्रतें पाच अति
चार ॥ सञ्चित्ते निस्कवणे ॥ सञ्चित्तवस्तु हेठे
ऊपरि थके महातमा प्रते असूझतु दान दीधु,
अदेवा तणी बुड़े सूझतुं फेडी असूझतु कीर्छ,
देवा तणी बुड़े असूफतुं फेडी सूझतु कीg, आ
पणु फेडी परायु कीधु, विदरवावेला टलि गया
असुर करी महातमा तेड्या, मछरखगें दान
दीधुं, गुणवत श्रावे नगति न साचवी, ती
शक्ति साधर्मिक वात्सल्य न की
(१०३)
धर्म क्षेत्र सीदाता बती शक्तें नया नही।
बारमे अतिथि सविनाग व्रतविपश्यो० ॥
॥सलेदणा तणा पांच अतिचार दलोए पर
लोएणादलोका संसप्पनंगे परलोगासंसप्पन
गेजीविआससप्पनंगे मरणासंसप्पळगे कामनो
गाससप्पनगे श्लोक मनुष्यनव मान महत्त्व
लोक तणीसेवा ठकुराई बलदेव वासुदेव चक्र
वर्ति पद वाच्या परलोक इस अमिर देवा
धिदेव पदवी वाडी, सुख आव्ये जीववातणी वा
ग कीधी,ऽख आव्येमरवातणीवाग कीधी,का
मनोग तणी श्ना कीधी॥ सलेदणाव्रतवि०॥
॥ तपाचार बारनेर्दे ॥ अन्यतर, उ वा
दिर, अणसणमूणोयरिया, अणसण कहीयें
उपवास, ते पर्वतिथि उती शक्तें कीधु नदी
ऊपोदरी ते पाच सात कवल कणा रह्या नही,
व्य सढेप विगय प्रमुख परमाण कीधु नहीं
आसनादिक काय किलेश न कीघो, संजीण
(१०४
ता अगोपाग सकोच्या नहीं, नवकारसी पोर
सी गसी मूसी साहपोरसि पुरिमट्ठ एका
सणो वेआसणो नीवी आविल प्रमुख पञ्चका
एप पारवा वीसास्या बेसता नवकार नण्यो न
दी, कता दिवसचरिमं न कीधु, नीवी प्राषि
ल उपवासादिक तप करी काचु पाणी पीधु,
वमन थयु ॥ बाह्य तपव्रत विषश्यो ।
॥ अभ्यतर तप ॥ पायचित विपन गुरु
कने मन सुझे आलोयणा सीधी नही, गुरुदत्त
प्रायश्चित तप लेखा शुः पुढचाड्यु नहीं, देव
गुरु सघ सादम्मी प्रते विनय साचव्यो नदी,
वाचना एबना परावर्त्तना अनुप्रेक्षा धर्मकथा
लक्षण पचविध सिजाय कीधी नहीं, धर्मध्या
न शुक्लध्यान ध्यायुं नही, कर्म क्ष्य निमित्त
लोगस्स दसवीसनो कानस्सग्गन कीधो॥श्र
न्यतर तप विपश्यो० ॥
वीर्याचारना तीन अतिचार ॥ अणदि
(१०५)
यवलविरीन,परिकमजोजढुंत गणेसु॥झुंज
अ जहा थाम, नायबो वीरियायारो॥१॥प
ढवे गुणवे विनय वेयावच देवपूजा सामायिक
दान शील तप नावना प्रमुख धर्म कृत्यतणे
विषे मन वचन कायतणु न्तु बल वीर्य गोप
व्यु,रूडा पचाङ्ग खमासमण न दीधा, बेग पडि
कमणुं की वीर्याचारव्रत विषयो॥
नाणा अ अ वय,समसलेहण पण
पनर कम्मेसु॥वारस तवविरिषतिग, चवीस
सय अश्यारा ॥१॥ पडिसिहाण करणे ॥
॥जिनप्रतिषिवावीसअनक्ष्य बत्तीसत्र
नंत काय बहुबीज नदण महाआरन मदाप
रिग्रदादिक कीधा,नित्यकृत्य देवपूजा सामायि
कादिक तथा तीर्थ यात्रादिकन कीधा,जीवाजी
वादि विचार सहदिया नहीं,आपणीकुमति ल
गे उत्सूत्र प्ररूपणा कीधी,प्राणातिपात १,मृपा
वाट २, अदत्तादान ३, मैथुन ४, परिग्रह ५,
"
(१६)
क्रोध ६, मान , माया , लोन ए, राग १०,
क्षेप १२, कलह १२, अन्याख्यान १३, पर
परिवाद १४, पैशून्य २५, अरतिरति १६,
मायामृपावाद १७, मिथ्यात्वशल्य १५ ए अ
ढारद पापस्थानकमादि जे का कीधो करा
व्यो अनुमोद्यो । एव प्रकारे श्रावक धर्मे श्री
सम्यक्तत्व मूल बारह व्रत चोवीसा सो अतिचा
रमादि जिको कोश् अतिचार पद दिवसमादि
सुम बादर जाणता अजाणता दुवो होय ते
सद मन वचन कायाये करी मिठामि उकर्ड ॥
इति श्रीश्रावकोंके बारद व्रतका अतिचार स०
॥पी सवस्सवि पस्किय॥इत्यादि इचाकारे
ण संदिस्सद पर्यंत कदे तेवारे गुरु कहे चनच्छे
ण पडिक्कमद चनमासे छेण पडिकमह संव
करीये अहमेण पडिकमद श्वं तस्स मियामि
जकड कही हादशावत वादणा देवे पी
वाकारेण सदिस्सद जगवन,देवसियं
-
(१७)
यं पडिक्कता ॥१॥ पत्तेयखामणेण, अनुहिनमि
अप्रिंतरपरिकय॥३॥खामेऊं गुरु कदे खा०॥
पवित्रं खामेमि परिकय ॥३॥श्त्यादि पाठ
सर्व पूर्वे कह्यो, तिम कही मिवामि उक्कडं देई
खमावे, पीब वे वादणा देई नगवन् । देवसियं
आलोश्य पडिक्कता पस्किय ॥३॥ पडिक्कमा
वद ? गुरु कदे सम्म पडिक्कमद पविश्वं कदी
करेमि नते सामाश्यं ॥श्चामि तामि कानस्स
ग्गं जो मे परिकन ॥३॥ इत्यादि कही, तस्सु
त्तरी0 अन्नतू ॥कही। कानस्सग्ग करे, गुरु,
पारखीसूत्र कहे, ते सानले अने गुरुथकी जू
दापडिकमता दुवे, तो एक श्रावक खमासमण
देई कदे जगवन्। सूत्र नणु गुरु कदे, नणेद
एसो वचन मनमे धारी॥च कही, जनो थ
को, दाथ जोडी मुदपत्ती मुखे देई तीन नवका
र कदी, मधुर स्वरेंसूत्रार्थ मनमे चिंतवतो वंटि
तु सूत्र गुणे बीजा श्रावक करेमि न ते चा
(१००) मि गमि कानस्सग्ग तस्सुत्तरी० अन्न कही कामस्सग्गमे रह्या सुणे. सूत्रप्राते णमो अरि दताण कदी कानस्सग्ग पारी, उना थका ती न नवकार गुणीवेसे पीछे ॥३॥ नवकार ॥३॥ करेमिन ते कदी, श्वामि पडिक्कमिडं जो मे प स्किन ॥३॥ इत्यादि कही, वदित्तु सूत्र गुणे, पडिक्कमे देवसिय सघ ॥ एदने ठिकाणे पडिक मे परिकय, चजम्मासिय, संवरियं सर्व कहे पवि की, अनुहिम श्रारादणाए इत्यादि पूर्ण नणी, खमासमण देई इला० ॥स। न० ॥ मूलगुण उत्तरगुण अतिचार विशुद्धि निमित्त,काजस्सग्गकरूं ? गुरु कदे करेह पनि श्वं कदी, करेमि नते सामा0 श्छामि गमि का उस्सग्गतस्सु० अन्नवू इत्यादि कही, पाखी ये वार लोगस्सचनमासिये वीस लोगस्स संव वरीयें चालीस लोगस्सनो कामस्सग्ग करे, एक नवकार ऊपर, कास्सग्ग करी. पारी खो (२०ए) गस्स कदे वेसी मुदपत्ती पडिलेदी, वे वादणा देई बा ॥स०॥ न ॥ समाप्ति खामणे ण ॥ अनुहिनमि अग्निंतर परिकय ॥ ३॥ खा मेऊ ? गुरु कदे खामेह पछि ब खामेमि प स्कियं॥इत्यादि पाठ पूर्व कह्यो तिम कहे, पाई श्वाका० ॥स०॥न ॥ पाखी ॥३॥ खाम णा खामू गुरु कदे, पुण्यवंतो चार वेर खमास मण देई. तीन तीन नवकार कदी, पाखी॥३॥ समाप्तखामणां खामेद पछि श्रावक एक खमा समण देई मस्तक नीचु नमावी, तीन नवका र गुणे, म चार वार करे, पछि गुरु कहे नि चारग पारगाहोद पीछे श्रावक कदे श्व चामि अणुसहिं कही, गुरु कहे, पुण्यवतो पा खीने लेखे, एक उपवास अथवा दोय आवि स अथवा तीन नीवी, अथवा चार एकासमां, अथवा बे दजार सकाय करी, एक उपवास नी पेठे पूरज्यो, पाखीने स्थानके दैवसिक न ( १९१०) जो. एम चनमासे ए सर्व गुणो कहणो, सवतरीयें त्रिगुणो कदणो. पाव जिणें तप की धो दुवे ते पहिय कदे, न कीघो हुवे ते त इत्ति कदे॥पविवे वादणा देई, अनुम्निम श्र नितर देवसिय खामेमि इत्यादि कदे पीछे बे वादणा देई आयरिय नवनाए तीन गाथा कदे, म आगे सर्व विधि देवसिक पडिकम णानी करे, पण इतरो विशेष दै श्रुतदेवतानो काउस्सग्ग करी स्तुति करे, पाय नवण देवया ए करेमिकाउस्सग्ग इत्यादि विधे नवनदेवता को काउस्सग्ग करी स्तुति कदे, सो लिखते हैं ॥ अथ नुवनदेवता स्तुति ॥ ॥ चतुर्वर्णाय संघाय, देवी नुवनवासिनी॥ निदत्य चरितान्येपा, करोतु सुखमयम् ॥१॥ ॥ क्षेत्रदेवतानो कामस्सग्ग करे, तथा तीने पर्व वडा स्तवन अजितशाति कहणी, लघु स्तवन नपसर्गदर स्तोत्र कदणो, तथा परिक
मणो पूरो दुवा पीछे एक श्रावक गुर्वाशायें,
नमोऽर्दसिहा कदी, वडी शातिका स्तोत्र
कदे, बीजा सर्व सुणे, जिणनें रात्रि पोसद न
दुवे, ते पोसद सामायिक पारी सानले ॥ ति
पाकिदादि तीन पडिक्कमणविधि ।
॥अथ दस पच्चस्काणविचार लिख्यते॥
॥तिदा प्रथम चनदे नियम सनारे,सो इस
तरे पञ्चस्काण करे ॥ जग्गए सूरे नमुक्कार सदि
यं मुठसदिय पच्चस्का चनविदपि आदारं अ
सणं पाण खाश्मं सामं अमबणानोगेणं स
हसागारेणं मदत्तरागारेणं सबसमादिवत्तिया
गारेण विगश्न पञ्चकाइ अस्पचणानोगेणं स
दसागारेणं लेवालेवेण गिदिवससिडेणं नरिक
त्तविवेगेणं पड्डुच्चमस्किएण पारिछावणियागारे
ण मदत्तरागारेण सच्चसमादिवत्तियागारेणं
सावगासिय भोगपरिनोगं पञ्चरकाश् अमच
णानोगेण सहसागारेण मदत्तरागारेण सबस
(१९२) मादिवत्तियागारेण वोसिर ॥ इति नवकार सी पच्चरकाण ॥३॥ ॥ तथा जो श्रावक नियम सनारे नहिं,सो विगश्का र देसावगासिकका आगार न पञ्च के निकेवल नवकारसी आदिक पञ्चकाण करे सो लिखते है॥ ॥ जग्गए सूरे नमुक्कार सदियं पञ्चका ॥ चनविदपि आदार असणं पाण खाश्मं साइ मं अन्न ॥ सहा वोसिरामि ॥ इति नवकार सी पच्चरकाण ॥ आगार ॥२॥ ॥ पोरसी मुत्सी पञ्चकामि, जग्गए सूरे चनविदपि श्रादारं असणं पाणं खाश्म सा मं अमन० ॥ सदसा ॥ पन्चमकालेण दिसा मोदेणं ॥ साढुवयणेणं सब विगश्न पञ्चका मि इत्यादि पूर्वकी परें कहणा ॥ इति पोरिसी पच्चरकाण ॥३॥धागार ॥६॥ ॥इस माफक साह पोरसीका पडताण जा
( १९३)
पना. इतना विशेष है, पोरसिं पञ्चकाइके वि
काने श्हां साहपोरसिं पञ्चरका कदणांति
साह पोरसिपच्चरकाण ॥आगार ॥६॥
॥ सूरे जग्गए पुरिमढं अवडं वा पञ्चरकाश,
चनविपि आदारं असणं पाण खाश्मं साइ
मं अस्मासद॥पक्ष ॥ दिसामो० ॥साह।
।। मद० ॥ सब० ॥ विगश्न पच्चरकार इत्यादि
पूर्ववत् ॥ इति पुरिमटूपच्चरकाण ॥३॥आ॥७॥
॥पोरसिं साह पोरसि वा पञ्बरकर, नग्ग
ए सूरे चनविदपि आदारं असण पाण खाश्म
साश्मं अमण सदए पत्र दिसा० सादु०
सब एकासण बिआसणं वा पञ्चरकाश.विई
तिविदपि आदारं असण खाश्म साइम अ
हम सदा सागारिआगारेणं आजहणपसा
रेणं गुरुअनुहाणेण पारिमह सब देसा
वगासियंग इत्यादि पूर्ववत् ॥४॥ इति एकासण
विपासण पच्चरकाण ॥आगार ॥७॥
॥ पोरसिं साट्ट पोरसिं वा पच्चस्काइ जग्ग ए सूरे चजबिदपि आदारं असणं पाणं खाम सामं अप्प सदा पछामका दिसा साहु सब एकासण एगहाण पञ्चकाइ. विद ति विद चनविदपि आदार असण खाश्म सार में अम्म सद सागारिआगारेण गुरुअप्नु हाणेण पारिहाय मद सब देसाव इत्या दि पूर्ववत् ॥५॥इति एकलहाणा पञ्चकाए। आगार ॥ ७॥ ॥ पोरसिं साद पोरसिं वा पञ्चका जग्गए सूरे चनविदंपि आदार असण पाणं खाश्म सा० अस्म सह पण दिसामो साहु० स व आयंबिलं पच्चकाइ अम० सह ले वालेवेण गिदससिडेण नस्कित्तविवेगेण पा रिहा मद सब एकास पचकाइ तिवि दपि आदारं असणं खाश्म साश्म श्रमण सह सागारिश्रागारेण आनणपसारेण ग (११५) रुअनुहाणेणं पारिका मद सब वोसिर ॥६॥ इति आविल पच्चरकाण ॥ आगार ॥॥ ॥ पोरसिं साटु पोरसिं वा पच्चरकाश् जग्ग ए सूरे चनविदपि आदार असणं पाणं खाश्म साश्म अमब सदन पत्र दिसा साहु स व०॥निविगश्यं पच्चस्कामि, अण सहा ले वालेवेण गिदवससिडेणं जस्कित्तविवेगेण प हुन्चमरिकएण पारि मद सब एकासणं प बस्काइ तिविदपि आदार असणं खाइमं सा शम अमसद सागा आजट्टा गुरु० पाण मदन सबदेसावगासियंनोगपरिनोगपच्चस्का मि. अम० सद० मद सब वोसिरामि ॥ इति नीवो पच्चरकाण ॥आगार ॥५॥ ॥ सूरे जग्गए अप्नत्त पञ्चकामि चनविदं पि आदार असण पाण खाश्म साश्म अस्मण सद मद सब देसावगासिय नोगपरिनो ग पञ्चकामि अम0 सदन म सब वोसिरा
(१९६)
मि ॥ इति चनविदार उपवास पञ्चकाण ॥॥
॥सूरे जग्गए अप्नत्त पञ्चस्कामि. तिविई
पि आदारं असणं खाश्म साश्मं असा स
द० पाणहार पोरसिं साढ़ पोरसिं पुरिम अ
वह वा पच्चस्का अमण सहा पचम दिसा
साहु सब देसावगासिय नोगपरिनोगं पञ्च
स्कामि अ० स म सब वोसिरामि ॥ इति
तिविदार नपवास पञ्चरकाण ॥
॥पोरसिं साडू पोरसिं पुरिमई अवई वा प
चस्कामि जग्गए सूरे चनविदंपि आहारं अस
णं पाण खाश्मं साश्मं अहम सदन पत्र
दिसा सादु सब एकासणं एगहाणं दत्ति
यं पश्चस्कामि तिविहं चनधिदंपियाहार अस
णं पाणं खाश्म सामं अम० सह सागा
गुरु मह सब विगश्च पक्षकामि इत्यादि
पूर्ववत् देसावगासियं इत्यादि पूर्ववत् ॥ इति
दत्तिपञ्चस्काण ॥ए॥
(१९७) ॥दिवसचरिम पञ्चरकाश् चनविदपि आहा र असण पाण खाश्मं साश्म अम सदा मद॥ सब वोसिर॥इति दिवसचरिम प वस्काण॥१०॥ ॥दिवसचरिमं पञ्चकामि विदपिआदारं असण खाश्म अम सह मा सब। वो सिरामि. देसावगासियं पूर्ववत् ॥ इति दिवसच रिम विदार पञ्चकाण ॥ ए॥ ॥पाणदार दिवसचरिम पच्चरकामि अन्न सहछ मद सब चोसिरामि ॥ इति पाणदार जपवासरो पञ्चरकाण ॥५॥ ॥नवचरिमं पच्चस्कार तिविदपि चनविद पि आहार असण पाण खाश्मं साश्म अन्न सहा मद सब वोसिर॥ श्रागार ॥४॥ नवचरिम, दो आगारकानी होय ॥ इति न वचरिम पच्चरकाण ॥ ॥ तथा इमदिज गठिसदि मुठिसहि अगुछ ,
( १९७)
सहि प्रमुख अनिग्रह पच्चरकाणकेजी ए चार
आगार अम सहमहसवण्वोसिर॥पा
चमो चोलपट्टागारेण सो साधुकों दोय " नि
अनिग्रद पच्चरकाण ।।
॥ अहम भंते तुम्हाणं समीवे देसावगासि
य पच्चरकामि दवन खित्तन कालानावन द
बनण देसावगासियं खित्तनण जब वा अमब
वा कालनणं मुदत्तधारणाप्रमाणे जावनियम
पञ्चकामिनावनणं जावगदेणं न गदिजामिब
लेणं न बलिजामि अमेणकेवि रायंकेण वा ए
सो परिणामो न पडिवडता अनिग्गद अम
वणानोगेणं सहस्सागारेण मदत्तरागारेणं स
बसमादिवत्तियागारेण वोसिर॥इति देसाव
गासी पच्चरकाण ॥
। तथा साधु पञ्चरकाण करे तव देसावगा
सी नदी पञ्चके अरु तिविहार उपवासमे था
विसमें नीदीमे एकापण
(१९ए)
व आगार पञ्चके सो दिखावे है. पाणस्स
लेवाडेण वा अलेवाडेण वा अणवा बटुलेण
वा ससिलेण वा असिन्चेण वा वोसिर ।
॥अथ पच्चरकाण आगार सख्या ।
॥दोचेव नमुक्कारो आगार बच्च दुति पो
रसिए । सत्तेवत्त पुरिमद्वे, एगासणमि अव
॥१॥ सत्ते गहाणस्सन, अवय आयविलं
मि आगारा ॥ पंच वयना, उपाणे चरिम
चत्तारि ॥२॥ पंच चनरो अभिगदे, निवीए
अनवय आगारा ॥ अप्पावरणे पचन, दवं
ति सेसेसु चत्तारि ॥३॥इति आगार सख्या॥
॥अथ सप्त स्मरणानि प्रारच्यते॥
॥ तत्र प्रथम॥
॥श्रीबहदजितशातिस्मरण लिख्यते॥
॥ अजिअ जिसवनयं, सतिं च पसतस
वगयपाव ॥ जय गुरु सति गुणकरे, दोवि जिण
वरे पणिवयामि ॥ ॥ गादा ॥ ववगय मगुल
(१९७)
सदि प्रमुख अनिग्रह पञ्चकाणकेनी ए चार
आगार अमसहमदासत्व वोसिर॥पा
चमो चोलपट्टागारेण सो साधुकों दोय " पनि
अनिग्रह पच्चरकाण ॥
॥ अदम नंते तुम्हाणं समीके देसावगासि
य पञ्चकामि दव खित्त कालनावद
बनण देसावगासियं खित्तनण नन वा अब
वा कालनणं मुहुत्तधारणाप्रमाणे जावनियम
पञ्चस्कामि नावनणं जावगदेणं न गदिलामिब
लेण न लिजामि अमेणकेवि रायंकेण वा ए
सो परिणामो न पडिवलाश्ता अनिग्गद अम
तणानोगेणं सदस्सागारेण महत्तरागारेण स
वसमादिवत्तियागारेण वोसिर॥इति देसाव
गासी पच्चरकाण ।।
॥ तथा साधु पञ्चकाण करे तव देसावगा
सी नदी पञ्चके अरु तिविदार उपवासमे आ
घिरनमें नीवीमे एकासणु
(११९)
व आगार पञ्चके सो दिखावे दै पाणस्स
लेवाडेण वा अलेवाडेण वा अपवा बहुलेण
वा ससिडेण वा असिडेण वा वोसिर॥
॥ अथ पच्चरकाण आगार संख्या ॥
।। दोचेव नमुक्कारो आगार उच्च हुति पो
रसिए॥ सत्तेवत्त पुरिमद्वे, एगासणमि अव
॥१॥ सत्ते गहाणस्सन, अवय आयविलं
मि आगारा ॥ पंच वयना, वप्पाणे चरिम
चत्तारि ॥२॥ पंच चलरो अनिगदे, निवीए
अनवय आगारा ॥ अप्पावरणे पंचन, दवं
ति सेसेसु चत्तारि ॥३॥ इति आगार सख्या॥
॥अथ सप्त स्मरणानि प्रारज्यते ॥
।। तत्र प्रथमं ॥
॥श्रीददजितशातिस्मरण लिख्यते॥
॥अजिअ जिसवनयं, सतिं च पसंतस
बगयपाव ॥ जय गुरु सति गुणकरे, दोवि जिण
वरे पणिवयामि ॥१॥गाहा ।। ववगय मंगुल
( १९७)
सदि प्रमुख अनिग्रह पञ्चकाकेनी ए चार
आगार अस्म सहमद सब वोसिर॥पा
चमो चोलपहागारेणं सो साधुकों दोय । नि
अनिग्रद पञ्चकाण ॥
॥ अहम
नते
तुम्हाण समीवे देसावगासि
यं पञ्चरकामि दवा खित्त कालनावद
वळण देसावगासिय खित्तना जन्म वा अलब
वा कालनणं मुहुत्तधारणाप्रमाणे जावनियम
पञ्चरकामि नावनणं जावगदेणं न गहिकामिन
लेण नलिकामि अमेणकेवि रायकेण वा ए
सो परिणामो न पडिवळ ता अभिग्गद अम
वणानोगेणं सदस्सागारेणं महत्तरागारेण स
वसमादिवत्तियागारेण वोसिर । ति देसाव
गासीपवरकाण ॥
॥ तथा साधु पञ्चरकाण करे तब देसावगा
सी नदी पञ्चके अरु तिविहार उपवासमे श्रा
चिलमें नीतीम एकामण . पाणस्यका
(११) अ मदमविअ सुनय नय निनणमनयकर, स रणमुवसरिअ नुवि दिविजमदिअ सयय मुव णमे॥७॥ संगययं ॥ तं च जिणुत्तम मुत्तम नि त्तम सत्तधरं, अजव मत्तव खंतिविमुत्ति समा दि निदि। संतिअरपणमामि दमुत्तम तिवयरं, संति मुणी मम सति समादिवरं दिसत ॥७॥ सोवाणयं ॥ सावञ्चिपुत्वपतिवं च वरदवि मत्य पसत्त विचिन्न संथि थिर सरित वन मयग ल लीलायमाण वर गंध दखि पलाण पत्रिय सथवारिहं दचिहत वादु धतकणग रुअग निरुवदय पिंजरं पवर लरकणो वचित्र सोम्म चारु रूव सुइ मुदमणानिराम परम रमणिक वरदेव उंदि निनाय महुरयर सुहागिरं ॥ ए॥ वेदन॥अजिअं जिआरिंगण, जिअ सबनयं नवो दरिन ॥ पणमामि अद पयन, पाव पस मेन मे नयव ॥ १०॥ रासालुन ॥ कुरु जण वय दक्षिणानर नरीसरो पढम त महाचक्कव (१२०) नावे, तेई विजल तवनिम्मल सहावे॥निरुव - म मदप्पनावे, थोसामि सुदिछ सनावे ॥२॥ गादा ॥ सबक पसंतीणं, सव्व पावप्पसतिणे। सया अजिय सतीण, नमो अजिय-संतिण ॥३॥सिलोगो॥ अजिय जिण सुहप्पवत्तण, तव पुरिसुतम नामकित्तण॥तदय धिमण वत्तण, तवय जिपुत्तम संतिकित्तण ॥४॥मा गहिआ। किरियाविदि सचिअ कम्म किले सविसुस्कयर, अजिअ निचित्र च गुणेहिं म हामुणि सिगिय ॥ अजिअस्स य संति महा मुणिणोवि अ सतिकर, सयय मम निबुश्कार यं च नमसणय ॥५॥ अस्लिंगणय ॥ पुरि सा जश्कवारण, जश्य विमग्गद सुरकका रण ॥ अजिअ सतिं च भावन, अनयकरे स रण पवळाहा ॥६॥ मागडिया ॥ अरारक तिमिर विरहिथ मुवरय जरमरणं, मुर असु र गमल भुयगवई पयय पणिवं ॥ अजि (११) अ मदमविअ सुनय नय निनमनयकर, स रणमुवसरित्र भुवि दिविजमदिअं सयय मुव णमे॥७॥ संगययं ॥ तं च जिणुत्तम मुत्तम नि त्तम सत्तधरं, अलाव मत्तव खंतिविमुत्ति समा दि निर्दि॥ संतिअरंपणमामि दमुत्तम तिठयर, संति मुणी मम सति समादिवरं दिसन ॥७॥ सोवाणय।। सावठिपुचपचिवं च वरदवि मव्य पसत्त विचिन्न संथि थिर सरिब वन मयग ल लीलायमाण वर गंध दवि पत्राण पश्चिय संथवारिद इचिदब बार्दु धतकणग रुअग निरुवदय पिंजर पवर लकणो वचित्र सोम्म चारु रूव सुश् मुदमपानिराम परम रमणिक वरदेव मुखदि निनाय मदुरयर सुहगिर ॥ ए॥ बेन । अजिअं जिआरिंगण, जिथ सबनयं नवो दरिन ॥ पणमामि अद पयन, पाव पस मेज मे जयवं ॥ २०॥रासानुक्षन । कुरु जण वय दचिणार नरीसरो पढम त महाचक्कर (१२०) नावे, तेदं विजल तवनिम्मल सहावे ॥ निरुव म मदपनावे, योसामि सुदिछ सप्नावे ॥२॥ गाहा ॥ सबस्कप्पसंतीणं, सब पावपसतिणं॥ सया अजिय सतीण, नमो अजिअ -सतिणं ॥ ३ ॥ सिलेोगो॥ अजिय जिण सुहमवत्तण, तव पुरिसुत्तम नामकित्तणं॥तह य धि मइप्प वत्तणं, तवय जिणुत्तम सतिकित्तण ॥ ४॥मा गदिमा ॥ किरिश्राविदि सचिअ कम्म किसे सविमुस्कयर, अजिअ निचिअ च गुणेहिं म दामुणि सिगिय ॥ अजिअस्स य सति महा मुणिणोवि अ सतिकर, सयय मम निबुइ कार पर्य च नमसणय ।।५॥ अलिंगणयं ॥ पुरि सा जश्कवारणं, जश्थ विमग्गह सुखका रण ॥ अजिअ सतिं च नावन, अजयकरे स. रण पवबहा ॥६॥ मागटि ॥थर र तिमिर विरदिय मुवरय जरमरण, सुर असु र गमल नुयगवई पयय पलिया ॥ अजि (१३) गुत्ति पवर, दित्त तेअवधेअ सबलोअ नावि अप्पनावणे अ पश्समे समादि ॥ १४ ॥ ना राय॥विमल ससिकलारेअसोम्म, विति मिरसुर कलाश्रेअ तेअ ॥ तियसवगणारे अ रूवं, धरणिधर प्पवरारे सार ॥२५॥ कुसुमलया॥ सत्ते अ सया अजिअं, सारीरे अबले अजिअ॥ तव सजमेअ अजिअं, एस अदं शुणामि जिण अजिअं ॥ २६॥नुअगप रिरिंगिअं॥ सोम्मगुणेहिं पाव न तं नवसर य ससी, तेअ गुणेदिं पावश् न त नवसरय रवी ॥रूवगुणेदि पावश्न त तिअस गणवर, सार गुणेहिं पावन त धरणिधरव ॥१॥ खिडि अयं ॥ तिववर पवत्तय तमरयरदिअ,धीरजण थुअच्चिअं चुन कलिकलुस ॥ सतिसुदप्पव तय तिगरण पयन, सतिमदं महा मुणि सरण मुवणमे ॥ १७॥ ललिअयं ॥ विपनाये सिरि र अंजलि, रिसिगण साधे थिमिअं॥ विद्यु
(१२)
हिनोए मदपनावो जो बादत्तरि पुरवर सहस्स
वर नगर जिंगम जावयवई बत्तीसारायवर स
दस्साणुयाय मग्गो चनदस वर रयण नव म
दानिदि चनसहि सहस्स पवर जुबईण सुंद
र व चुलसी दय गय रह सय सदस्स सामी
बमवर गाम कोडि सामी आसिजो भारइंमि
नयव ॥११॥ वेद ॥ तं संति संतियरं, संति
न सब नया ॥ संति शुणामि जिण, सतिं विहे
व मे॥ १२॥रासादिअयं ॥ इकार विदेह
नरीसर, नरवसदा मुणिवसदा ॥ नव सारय
ससि सकलागण, विगय तमा विदुअरया ॥
अजित्तम तेष गुणेदिं महामुणि, अमिय
वलाविकस कुता ॥ पणमामि ते नवनय भूर
ण, जग सरणा मम सरणं ॥ १३ ॥ चित्तलेहा.
॥ देव दाणविंद चढ़ सूरवंद इह तुछ जिस पर
म, लहरुव धत रुप्प पह सेथ मुझ निक
घवत ॥ दतपनि मंति मत्ति किति सुत्तिति
(१२५) मा॥२३॥रयामाला ॥वंदिगण थोऊपतो जिण, तिगणमेवय पुणोपयादिण ॥ पणमिक पय जिण सुरासुरा, पमुश्ा सनवणाश्तो ग या ॥२४॥ खित्तय ॥ तं महामुणिमपि पंज लि, राग दोस नय मोद वजिअ॥ देवदाणव नरिंद वंदिरं,सति मुत्तम मदातवं नमे ॥३॥ खित्तयं ॥ अंबरंतरविारणिआदि, ललिभ हंस वढुगामिणिआदिं॥पीण सोणियण सा लणिआदि, सकल कमल दललोअणिया दिं॥२६॥ दीवयं ॥ पीण निरतर थानरवि णमिय गायलयादि, मणिकचण पसिढिलमेद ल सोदिय सोणितडादिं। वरखिंखिणि नेनर सतिलय वलय विनूसणियादि, रश्कर चार मणोदर सुदर दंसणियादि ॥३॥ चित्तरक रा ॥ देवसुंदरीदिं पाय वैदिआदि वंदिाय जस्स ते सुविकमाकमा अप्पणो निमालएदि ममणोणपगारएदि केदि केहिं वीअवग ति , (१२४) दादिव धणव नरवश, थुअ महिअश्वियं ब दुसो॥ अश्रुग्गय सरय दिवायर, समहिथ सप्पन तवसा ॥गयणंगण वियरण समुश्थ, चारण वंदिअ सिरसा ॥१॥ किसलयमाला॥ असुर गरुल परिवदिशं, किन्नरोरग पमंसि अ॥ देव कोडिसयसाय, समणसघ परिवंदि अ॥२०॥सुमुद ॥ अनय अणद अरयं अ स्य॥ अजिअ अजिअ पयन पणमे ॥१॥ विजविलसिअ ॥ आगयावर विमाण, दिव कणग रद तुरय पदकर सएहिं दुलिय॥ ससं नमो अरण स्कुनिअ लुलिअचल कुमलं गय तिरीम सोदत महलिमाला ॥२२॥ वेड ॥ज सुरसंघा सासुर सघा वेर विनत्तान त्ति सुजुत्ता,आयर नृसिअ सनमपिमिश्र सुछ सुविह्मिथ सबवलोपा ॥ उत्तम कचण रयण परूविध नासुर नूसण नामुरिअगा, गाय स मोण्य नतिवमागय पंजक्षिपेमियमीस पम्या
(१७)
मेसदं नमामि संतिमुत्तमं जिणं ॥३१॥ नारा
यन ॥ उत्त चामर पडागजूध जव मंमिआ,
यवर मगर तुरय सिरिवह सुलंबणा ॥ दीव
समुह मंदरदिसागयसोदिआ, सविध वसद
सीदसिरिवनसुलंबणा ॥ ३२॥ ललिअयं ॥स
दावलका समप्पश्चा,अदोस उहागणेहिं जिहा
॥ पसायसिहा तवेण पुजा, सिरीदी श्छा रिसी
ही जुझा ॥३३॥ वाणवासिआ॥ ते तवेण धुआ
सन्चपावया, सबलोअदिअ मूल पावया ॥सं
थुआ अजिअसति पायया, हुतु मे सिव सुदा
पदायया ॥३४॥ अपरातिया ॥ एव तव बल
विजल, थुझं मए अजिअसति जिजुयलं॥
ववगय कम्म रयमल,गश्गय सासया विमला
॥ ३५॥गादा ॥ तं वदुगुणप्पसायं, मुक सु
देण परमेण अविसाय ॥ नासेज मे विसाय, कु
पज परिसाविअ पसाय ॥३६॥ गाहा ॥
त मोएन अनदि,पावेना नदिसेणमनिनदिं॥
असब सत्त सतिकारयं पर्मत सा पाव दोस
(१६)
लय पत्तलेद नामएदि चिल्लएहिं संगयं गया
हिं नत्ति सन्निविठ वदणागयाहिं दुंति ते वदि
आ पुणो पुणो ॥२॥ नारायतमहं जि
पचंद, अजिअ जिअमोहं ॥ धुअसवकिलेस
पयन पणमामि ॥शए ॥ नंदिअयं ॥ थुअवं
दिअस्सारिसिगण देवगणेदिं, तो देव वहूदिं
पयन पणमिअस्सा ॥ जस्स जगत्तमसासणय
स्सा, नत्तिवसागयर्पिमिश्रआहिं ॥ देव वर
चरसा बढुआदि, सुरवर रश्यण पंमिश्रा
हिं॥३॥ नासुरय ॥ वंस सह तति ताल मे
लिए तिउरकरानिराम सह मीसएकए अ,
सुश्समाणणे सुरु सङ गीअ पाय जालघं
टिअदिं॥ वलय मेदला कलावनेनरानिरा
मसद मीसए कए अ देवनहिथाहिं ॥ हाव
भाव विप्नमपगारएदि नचिकण अंग हारएहिं
वदिश्राय जस्स ते मुधिकमाकमा ॥ तय तिलो
(१२५)
जा गईए ॥ सदल नदय लंवा लघए
पएदि, अजिअ मदव संति सो समठो च
॥३॥ तद्विदु वद्माणु ल्लासनत्तिरे
गुणकणमिवकित्ती दामि चिंतामणि ॥ अ
दिव अचिंता पंतसामनसिं, फलहर
सब वबिधेणिविशं मे ॥ ३ ॥ सयलज
आणं नाममिनेण जाण, विड्डर लट्ठ
निदोघहथकं । नमिरमुर किरीडू गिळ
गरविंदे, समय मजिअ सती ते जिर्णिदे
दे॥४॥ पसरइ वरकित्ती बदए देवदित्ती,
तसा नुवि मित्ती जायए सुप्पविती ॥ फु
परमतित्ती दोश् ससारवित्ती, जिगजुत्र
नती ही चिंतोरुसत्ती ॥ ५॥ ललियप
गारं नूरिदिवंगदारं, फुडगणरसनावो
सिंगारसार || अपमिसरमणीज इसणवे
जोया, इव पुणमणि बंधा कास नहोवयारं
। थुणद अजिअसती ते कया सेस सती,
(१२७) परिसाइवि सुदनदि, मम य दिसन सजमे नदि ॥३॥ गादा ॥ परिका चालम्मासिय,स वचरिए अवस्स नणिप्रबो ॥ सोअबो सवेहिं, नवसग्ग निवारणों एसो॥३॥जो पढ जोम निसुपश, जनन कालपि अजिअ सतिथयं ॥ न दु इति तस्स रोगा, पुवुप्पन्ना विनासति । ॥३५॥ जश्श्छद परम पय, अहवा कित्ति सुविवडा नुवणे ॥ता तेलुकु धरणे, जिणवयणे आयर कुणद ॥ ४० ॥ गाहा ॥ इति श्रीबृदद जितशातिस्तवन प्रथमस्मरणम् ॥२॥ ॥अथ वित्तीय लघुअजितशातिस्मरणम् ॥ ॥ उल्लासिक मनक निग्गयपहा दमवले गिण, वदारूण दिसंत श्व पयड निवाणम ग्गावलिं ॥ कुटिंडल दतकति मिस नी- त नाणकुरु, केरे दोविड इक योसामि खेमकरे
(१२ए)
जणिजा गईए ॥ सदल नदय लवा लंघए
जो पएर्दि, अजिअ मदव संतिं सो समझो ब
नं ॥३॥ तदविदु बहुमाणु ल्लासनतितरे
ण, गुणकणमिवकित्ती दामि चिंतामणिव ॥ अ
लमदव अचिंता पंतसामवनसिं, फलदर
लदु सव वंबिअंणिबिध मे ॥ ३ ॥ सयलज
यदिआणं नाममित्तेण जाणं, विदड लट्ठ
उछा निघ्दोघयह ॥ नमिरसुर किरीडू ग्गिठ
पायारविंदे, समय मजिअ संती ते जिणिंदे
निवदे॥४॥ पसर वरकित्ती वहुए देवदित्ती,
विलस नुवि मित्ती जायए सुप्पवित्ती ॥ फु
रइ परमतित्ती होइ ससाररित्ती, जिजुअ
पयनत्ती दीअ चिंतोरुसत्ती ॥५॥ ललियप
यपयारं नूरिदिवगहार, फुडगणरसनावो
बारसिंगारसार ॥ अपमिसरमणीज इसपने
अजीया, श्व पुणमणि वधा कास नहोवयारं
॥॥धणन अजिअसती ते कया सेस संती,
- (१२०) परिसाइवि सुदनदि, मम य दिसन सजमे नर्दि॥३७॥ गादा ॥ परिकथ चालम्मासिय,सं वरिए अवस्स नणिअबो॥ सोअबो सवेहिं, जवसग्ग निवारणों एसो॥३जाजो पढ जोश्र निसुण, जनन कालंपि अजिअ सतिथयं ॥ न दु दुति तस्स रोगा, पुवुप्पन्ना विनासति ॥ ॥३॥ जश् श्चद परम पय, अहवा किर्ति सुविबडा नुवणे ।। ता तेलुकुरणे, जिपवयणे आयर कुणद ॥ ४० ॥ गाहा ॥ इति श्रीबृहद' जितशातिस्तवन प्रथमस्मरणम् ॥२॥ ॥अथ वितीय लघुअजितशातिस्मरणम् ॥ ॥उल्लासिक्क मनक निग्गयपहा दमछलेणं गिणं, वढारूण दिसंत श्व पयड निवाणम ग्गावलिं ॥कुर्दिसुजल दतकति मिस नीट त नागकुरु, केरे दोविठक सोलस जिणे योसामि खेमंकरे ॥१॥ परम जलदिनीर जोमिणि जसीदि, सय समय ममी जो (१३१) द लडिं गाढसंयंनिअब ॥ ११॥ अडविनिव डिआणं पनिवुत्तासिआण, जलदि लहरि दीर ताण गुत्ति हियाण ॥ जलिअ जलण जाला लिंगिआण च जाण, जयश् लदु संति संतिनादा जिआण ॥१॥ दरि करि परिकिम् पक्क पाश्कपुरम, सयलपुदवि रजं मित्र आण सहं॥तण मिव पडिलग्ग जेजि णामुत्तिमग्ग, चरण मणुपवमा दूंतु ते मे पस मा ॥ १३ ॥ उपससिवयणादिं फुल्लनित्तुप्पला हिं, थणनरनमिरीदिं मुहिगिडोदरीदिं ॥ ललिअ नुअलयादिं पीण सोणितणीहिं, सयसुर रमणीहिं वदिआ जेसि पाया ॥१४॥ अरिस किडि नकुछ गठि कासाश्सार, खय जर वण खूआ साससोसोदराणि ॥ नदमुद दसणी कुचिकमारोगे, मद जिणजुआ पाया सुप्पसाया दरतु ॥ १५॥श्य गुरुदता से परिकए चाउमासे, जिणवर उगयुत्तं व .
न4
(१३०)
कायरयपसगा बजए जाणिमुत्ती॥ ।
परिरंना रंननिबाणलबी, घणयणघुसि
कु प्पकपिंगीकयव ॥ ७ ॥ दु
वबपिच्चं अणिचं, सदसदनिलप्पा ।
अणेग॥ श्य कुनय विरुई सुप्पसि तु ।
वयण मवय गिज ते जिणे संनरामि ॥G
पसरइ तिअ लोए ताव मोदधयारं,
य मसम्म तावमिन्चत्तम ॥ फुर
तणाणं सुपुरो, पयड मजिअसती काण
रोन जाव॥॥अरि करि हरि तिण्डु
चोरा दिवादी, समर ममर मारी रुह
वसग्गा ॥ पलय मजिअसती कित्तणे ।
ती, निविडतरत मोदानकरातुखिय च ॥१
निचिअरिअदारु दित्तकाणग्गिजाला, पा
गय मिव गोर, चिंतिथं जाण रूव ॥क।
निदमरेदा कतिचोर करिब,
।
,
(१३३) प्रड कल्लोल नीसणारावे ॥ संनंत नय विसतु ल, निद्यामय मुक्कवावारे ॥ ४ ॥ अविदलिअ जाणवत्ता, खणेण पावति इचिअं कूल ॥ पा सजिण चलण जुअलं, निच्चचिअ जे नमंति नरा ॥५॥खर पवणुफु वणदव, जालाव लि मिलिय सयल जम गदणे ॥ मन्नत मुशमि व वदु, जीसरणरव नीसणमि वणे॥६॥ जग गुरुणो कमजुअल, निवाविध सयल तिढुथ णानोअ॥ जे संनरति मणुआ, न कुण ज लणो नयं तेसिं॥७॥ विलसत नोग नीस प, फरिआरुण नयण तरल जीदालं ॥ जग्ग नुअग नवजल य, सबद नीसणायारं ॥७॥ मन्नत कीड सरिस, दूर परिबुड्डू विसम विस वेगा॥तुद नामकर फुडसि ६, मंत गुरुया न रा लोए ॥ ए॥ अडवीसु निल्ल तक्कर, पुलिंद सदल सहनीमासु॥नयविदुर वुन्नकायर, उ स्वरिअ पहिअ सासु ॥ २० ॥ अविलुत्तविद -- (१३५) बरे वा पवित्त ॥ पढइ सुण सिवा एड चित्ते, कुणद मुणद विग्धं जेण धाएह ॥२६॥श्य विजयाजियसत्तुपुत अजिणेसर, तह अपराविससेण तण चक्कीसर ॥तिबंकर सोलसम संति, सथुआ, कुरु मंगल मम दर सुख पि धुणंतद ॥१७॥ इति श्रीलघु स्तवन द्वितीयं स्मरणम् ॥२॥ ॥ अथ नमिळणनामक तृतीय स्मरणम् । ॥नमिकण पणय सुरगण, चूडामणि परजिअ मुणिणो ॥चलणजुअल पणासण संयव वुठ॥१॥सडिय कर नद मुद, नियम नासा विवन्न लावन्ना। मदारोगानल, फलिंग निहद सपगा॥ २ ते तुद्द चलणा राहण, मलिलजलिसेय यताया ॥वण दवदवा गिरिपा यय। पुणो सहिं ॥३॥ याय वृपिय जानन (१३३) उड कल्लोल नीसणारावे ॥ संनत नय विसतु ल, निद्यामय मुक्कवावारे ॥४॥ अविदलिय जाणवत्ता, खणेण पावति इछिअं कूल ॥ पा स जिण चलण जुअलं, निच्चंचिअ जे नमंति नरा ॥५॥खर पवणुचुअ वणदव, जालाव लि मिलिय सयल इम गदणे ॥मलत मुघमि य वदु, नीसरणरव नीसणमि वणे ॥६॥ जग गुरुणो कमजुअल, निवाविप्र सयल तिहुश्र णानोअ॥ जे संनरति मणुआ, न कुण ज लपोनयं तेसिं ॥७॥ विलसत नोग नीस पा, फरिआरुण नयण तरल जीदालं ॥ जग्ग नुअग नवजल य, सबदं नीसणायारं ॥6॥ मन्नत कीड सरिसं, दूर परिबुड्डू विसम विस वेगा। तुद नामकर फुडसि ६,मत गुरुआन रा लोए॥ए॥ अडवीसु निल तकर, पुलिंद सहल सहनीमासु ॥नयविदुर वुन्नकायर, बुरिअ पहिब सवासु ॥२०॥ अविलुत्तविद .
(१३२) बरे वा पवित्त । पढ सुण सिद्या एर चित्ते, कुपद मुणद विग्ध जेण धाएद ॥१६॥श्य विजयाजियसत्तुपुत्त अजिणेसर, तद अाविससेण तण चक्कीसर ॥ तिचकर सोलसम सति। सधुभ, कुरु मंगल मम दर सुख पि धुणंतह ॥१७॥ इति श्रीलघुअजित स्तवनं चितीयं स्मरणम् ॥२॥ ॥अथ नमिक नामक तृतीय स्मरणम् ॥ ॥नमिळण पणय सुरगण, चूडामणि । परजिअं मुणिणो॥चलणजअसं पणासण सथव छ॥२॥सडिय कर नद मुद, निबुझ नासा विवन्न लावन्ना ॥ महारोगानल, फुलिग निद्दव सबंगा॥ २ ते तुद चलणा रादण, सलिलंजलिसेय य हाया ॥वण दवदवा गिरिपा यव । पुणो लाकिं ॥३॥ ज्वाय खुतिय जलनिहि,
(१३३)
प्रड कल्लोल नीसणारावे ॥संनत नय विसतु
ल, निधामय मुक्कवावारे॥४॥ अविदलिय
जाणवत्ता, खणेण पावंति विधे कूस्त ॥ पा
स जिण चलण जुअलं, निच्चचिअ जे नमंति
नरा ॥५॥खर पवणुचुअ वदव, जालाव
लि मिलिय सयल ज्म गदणे ॥ मन्नत मुशमि
५ वदु, नीसरणरव नीसणमि वणे ॥६॥ जग
गुरुणो कमजुअल, निवाविध सयल तिढुध
णानोअ॥ जे संनरति मणुआ, न कुणा ज
लणो नयं तेसिं॥७॥ विलसंत नोग नीस
ण, फुरिआरुण नयण तरल जीदाल ॥ जग्ग
नुअग नवजल य, सबद नीसणायारं॥G॥
मन्नत कीड सरिस, दूर परिचट्ट विसम विस
वेगा॥ तुद नामस्कर फुडसि ६, मत गुरुया न
रा लोए ॥ए॥ अडवीसु निल्ल तक्कर, पुलिंद
सहल सहनीमासु ॥ जयविदुर वुन्नकायर, उ
स्नुरिअ पहिअ समासु ॥ २० ॥ अविलुत्तविद
(१३४)
वसारा, तुद नाद पणाम मत्तवावारा॥
विग्घा सिग्घ, पत्ता दिय विय गण ॥ ११
पङलिआनलनयण, दूरवियारियमुई
काय ॥नह कुलिसघायविअलिअ, २५
उलानोअ॥१२॥ पणय ससनम पचिव,
दमणिमाणिक पडिअ पडिमस्स ॥ तुद
पदणधरा, सीद कुछपि न गणति ॥ १३
ससिधवल दतमुसलं, दीहकरुल्लाल वद्धि
चात् ॥ मट्ठपिंग नयणजुअलं, ससलिल
जलदाराव ॥१४॥नीम महागद,
सन्नपि ते नवि गिणंति॥ जे तुम्द चलण
स, मुणिव तुग समक्षीणा ॥ १५॥समरम्मि
तिक खग्गा, निग्धाय पविच नाय कबधे
कुंतविणिनिन्न करि कल, ह मुक्कसिकार
मि ॥१६॥ निजिय दप्पुधर रिज, नरिंद।
दा नडा जस धवल ॥ पार्वति पाव पसमिण
पासजिण तुह पनावेण
।
--
१७॥रोगज
(१३५) जलण विसहर, चोरारि मसूद गय रण नयाई ॥पास जिणनाम सकि, त्तणेण पसमति सवा ३॥ १७ ॥ एवं मदा नयदरं, पास जिणिंदस्स सयवमुमार ॥ नविय जणाणदयर, कल्लाण परपरनिदाण ॥ २ए। राय नय जक रकस, कुसुमिण उस्सनण रिक पीडासु ॥ समासु दो सुपंथे, जवसग्गे तदय रयणीम् ।।२०॥ जो पढ जो अनिसुण, ताण कश्णो य माणतुं गस्स ॥ पासा पाव पसमिज, सयल नुवणच्छि अचलणो॥२१॥इति श्रीपार्श्वजिन स्तवनं तृतीयस्मरणं संपूर्णम् ॥३॥ ॥अथगणधर देवस्तुति चतुर्थ स्मरण प्रारन ॥ ॥त जयन जय तिच, जमिन तिबादि वेष वरिण ॥ सम्मं पवत्तिअन, व सत्त संताणसुद जणय ॥१॥ नासिअ सयलकिलेसा, निदय कुलेसा पसल सुदलेसा ॥ सिरिव इमाण तिठ, स्स मगल दिंतु ते अरिदा ॥२॥निद्दद्वकम्म वधि (१३६) बीआ, बीआपरमिहिणो गुणसमिधा सिक तिजय पसिझा, दणंतु ऽचाणि तिवस्स ॥३॥ आयार मायरता, पचपयार सया पयासता। आयरिया तह तिक, निदय कुतिवं पयासंतु ॥ ४॥ सम्मसुअ वायगावा, यगाय सिक य वायगा वाए॥पवयण पडिणीय कए, तु सबस्स सघस्स ॥५॥निवाणसादुणिमिश्र, साढूण जणिय सब साहला ॥तिचप्पनावगा ते, दवतु परमिहिको जपणो ॥ ६॥ जेणाणुग यं नाण, निवाणफल च चरणमविदव । ति वस्स दसण त, मगलमुवणेज सिक्ष्यिर॥७॥ निधनमो सुअधम्मो, समग्ग नवगि वग्ग के य सम्मो ॥ गुणमुन्धिस्स सघस्स, मगल सम्ममिद दिसन ॥७॥रम्मो चरित्त सपावि नवसत्त सिवसम्मो ॥नीसेस लेसदरो, हवन सया सयल एा गुणगण गुरुणो गुरुण शवसुट सघस्स ॥
(१३७) कुणंतुतिबस्सासिरिवक्ष्माण पदुपय, डिअस्स कुसलं समग्गस्स ॥१॥ जियपडिवरकाजका, गोमुद मायग गयमुद पमुका ॥ सिरि वन सं ति सदिआ, कय मयरस्का सिवं दितु ॥१२॥ अवा पडिदयमिवा, सिधा सिधाश्आ पवयण स्स ॥ चक्केसरि वश्रुट्टा, सति सुरा दिसन सु काणि ॥ १२॥ सोलस विला देवी, नदिंतु संघस्स मगलं विजन ॥ अबुत्ता सदिआन, वेस्सुअ सुयदेवयान सम॥ १३ ॥ जिण सास ॥ कय रका, जरका चनवीस सासण सुरावि॥ सुदनावा सतावं, तिवस्स सया पणासतु ॥ ॥ २४॥ जिणपवयर्णमि निरया, विरदा कुप हाज सब दासचे ॥ वेयावच्च गरावित्र, तिबस्स दवतु सतिकरा ॥ २६॥ जिसमय सुक्ष्सम ग्ग, विदिअ नवाण जणि सादजो ॥ गीयरई गीयजसो, सपरिवारो सुद दिसन ॥१६॥ गिदगुत्त खित्त जलथल, वण पचय (१३) वासि देव देवी ॥ जिण सासण हिवा, लासरिक, त्तवालया नवग्गहा सनस्कत्ता। दाणि सवाणि निदणतु ॥ १७॥ ५. इणि रागुग्गहका,लपास कुलिअभ पहरेदि ॥२॥ सहकाल कटएदि, सविहिवतेहिं लवेलादि ॥ सवे सब सुद, दिसतु संघस्स ॥ १५॥नवणवश्वाणमतर, वेमाणिश्रा य जे देवा ॥धरणिंद सक दलतु रिआई तिबस्स ॥ २० ॥ चक्क जलंत, गव पुरनपणासिअ तमोई॥ त । स्स नगवन, नमो नमो वक्ष्माणस्स ॥ सो जयन जिपो वीरो, जस्स विसासणं ए जयश् ॥ सिक्षिपदसासणं कुप, द नासणं वनयमदण ॥२२॥सिरि जसनसेण दयनय निवहा दिसंतु तिवस्स ॥सव नि। गणिदा, रिणो पद वविध सर्व ॥ २३ ॥ वक्ष्माण तिया, हिवेण तिछंसमप्पियं जस्स ,
(१३ए)
सम्म सुहम्म सामी, दिसन सुई सयल सं
बस्स ॥५४॥पयइएनदिआ जे, नहाण दि
संतु सयल सघस्स ।। श्यरसुरा विदु सम्मं, जि
गणदर कदिय कारिस्स ॥ २५॥श्य जो
पढ तिसऊ, उस्सब तस्स नचिकिपि जए।
जिणदत्ताणाएग्नि,सुनिहिअठा मुहीहोई २६
इति श्रीगणधरदेवस्तुतिनामक चतुर्थ स्मरण।
॥अथ गुरुपारतव्यनामक पंचम स्मरणम्॥
॥ मयरहिअंगुणगण रयण, सायरं सायरं
पणमिळणं ॥ सुगुरुजण पारतंत,नवहिव शुणा
मि त चेव ॥१॥ निम्मदिय मोद जोहा, निद
य विरोदा पण सदेदा ॥ पणयगि बग्ग दा
वित्र, सुद सदोदा सुगुण गेदा ॥ ३॥ पत्तसु
जश्त्त सोदा, समत्त परतित जणिय सखोदा
॥पडिनग्ग मोद जोदा, दसिअ सुमदन सो
दा ॥३॥ परिदरिअ सतवादा, दय उद दा
हा सिवव तरुसाहा ॥ सपाविअ सुदलादा,
. (१३०) वासि देव देवी॥ जिण सासण दाणि सवाणि निदपतु ॥ १७॥ लास रिक, त्तवालया नवग्गहा सनकता। शणि राहुग्गदका,लपास कुलियन ॥१॥ सहकाल कटएदि, सविविवेदि लवेलादि ॥ सवे सब सुद, दिसतु सघस्स ॥१ए॥नवणवश वागमतर, वेमाणिआ य जे देवा ॥धरणिंद सक्क दलंतु चरिआई तिस्स ॥ २० ॥चक जलंत, गछ पुरनपणासिथ तमोदं । स्स नगवन, नमो नमो वक्ष्माणस्स ॥२१ सो जयज जिणो वीरो, जस्स अविसासर्प ए जय ॥ सिक्षिपद सासणं कुप, द नासणं वनय मदणं ॥ १२॥ सिरि उसनसेण यनय निवदा दिसतु तिचस्स ॥सब . । गणिदा, रिणो पद वग्थिं सर्व ॥ २३ ॥ सिा वक्ष्माण तिधा, हिवेण तिसमषिर्थ जस्स
(१४१)
सेण ॥ ११॥ सुक्कश्त्त पत्त कित्ती, पयडिअ
गुत्ती पसत सुदमुत्ती ॥ पदय परवाइ दित्ती,
जिणचद जईसरो मंती ॥१२॥पयडिअ नवं
ग सुत्तल, रयणुक्कोसो पणासिअ पळसो ॥
वनीअमविध जमण, कयसंतो सो विगय
दोसो॥१३॥ जुग पवरागम सार, प्परूवणा
करणबंधु रोषणिअ॥सिरि अनयदेव सूरी,
मुणिपवरो परम पसमधरो ॥ १४ ॥ कय सा
वय संतासो, दरि व सारग नग्ग संदेदो ॥ग
य समय दप्प दलणो, आसाथ पवर कवर
तो॥ १५॥ नीमनव काणणमिश्र, दसिअ
गुरुवयण रयण संदेदो ॥ नीसेस सत्त गुरुत,सू
री जिणवल्लदो जय ॥१६॥उवरहिअ सच्च
रणो, चनर नेग पहाण सच्चरणो ॥ असम
मयराय मदणो, जहमुदो सदर जस्स करो।
॥ १७॥ दसिअ निम्मल निच्चल, दतगणो
गणि मावन्त नन ॥ गुरुगिरि गरुन सरदि
नयगिरि गुरुचरणे व (१४०) खीरोददिषुध अग्गादा ॥ ॥ सुगुपजण अ पुका, सळो निरुवा गदिश पधबार ॥५॥ अङसुहम्म प्पमुद्दा, गुणगण निवर सुरिंद विदिय मदा ॥ ताण तिसऊं नाम, नाम न पणास जिवाण ॥ ६॥ पडिवजिअ देवो, देवायरिन उरत नवहारी । सिरि ने चद सूरी, जजोयण सूरिणो सुगुरु ॥७॥ रि वक्ष्माण सूरी, पयडीकय सूरि मत मारणे ॥ पडिदय कसाय पसरो, सरय ससक्छ । जण ॥७॥ सुहसील चोर चप्पर, ए निचलो जिपमयमि॥जुगपवर सिझसिह, काण पणय सुगुणजप ॥ए।पुर मदिव, लदस्स अणहिल वाडए पयर्ड। वि आरिफण, सीदव दवलिंगि गया १० टसमझेरय निसिवि, प्फुरंतु सछंद सूरिमय मिर ।। रेणव सूरिजिणे,सरे जिण सास (१५३) ॥३॥सिरि थंनणय हिअ पा, ससामि पय पनम पणय पाणीण ॥ निदलिअ रिअ विं दो, धरणिंदो दर उरिआइ ॥४॥ गोमुद पमुक जरका, पडिदय पडिवरक परक लका ते॥ कयसुगुण संघ रका, दवंतु संपत्त सिव सुरका ॥५॥ अप्पडिचक्का पमुदा, ण देवयान जिण पणिआ॥सिझाश्आ समे या, दवतु सघस्स विग्घदरा ॥६॥ सक्काए सासचउर, पुरहिन वक्ष्माण जिण नत्तो॥ सि रिबन सति जस्को, रकन संघं पयत्तेण ॥७॥ खित्तगिद गुत्त संता,ण देस देवादि देवया ता 3॥निबुइ पुर पहियाण, नवाण कुणतु सुका णि॥G॥ चक्केसरि चक्कधरा, विदिपदरि जति एम कंधरा धणियासिवसरण लग्ग संघस्स, सबदा दरज विग्घाणि ॥ ए॥ तितवश्वमा जो, जिणेसरो सग सुसघेण ॥ जिपचदो न ग्रदेवो रकन जिणवल्लदो पद्रुमं ॥ १० ॥ सो रागम पीक, सपाणि पीपाय मणाकया मा। जेण जिणवल्लदेण, गुरुणा तं सबदा वैदेरला विप्फुरिअ पवर पवयण, सिरोमणी बूढ भार खमोया॥ जो सेसाण सेसु, व सहश् सत्ताणतो एकरो ॥२०॥ सच्चरिआण महीण, सुगुरू- पारतत मुबह ॥ जय जिणदत्त सरी, सिरि निल पणय मुणितिल॥२॥ इति श्रीगु (१४२) घ, सरि जिणवल्लदो दोचा ॥ १० ॥ जग रुपारतत्र्यनामक पंचमस्मरणम् ॥५॥ ॥अथ श्रीषष्ठमस्मरणम् ॥ ॥ सिग्यमवहन विग्ध, जिणवीर गामि सघस्स सिरि पासजिणो धनण, पुर निहिनिहो ॥१॥गोयम सुहम्म पमुहा, गणवणो विभिनव सत्तसुदा ॥सिरि माण जिति, व सुवयते कुणतु सया ॥ सकाश्णो सुराजे,जिण वेयावत्र कारिणो .. अवदरिअ विग्ध संघा, रर्वत ते संघ
(१४५)
॥ अथ भक्तामरस्तोत्रं प्रारच्यते ॥
॥नक्तानरप्रणतमौलिमणिप्रनाणा, मुयो
के दलितपापतमोवितानम्॥ सम्यक् प्रणम्य
नेनपादयुगं युगादा, वालवनं नवजले पत
जनानाम् ॥१॥य संस्तुत सकलवाङ्म
तत्त्ववोधा, उमूतबुझिपटुनि सुरलोकनाथै ॥
तौत्रैर्जगत्रितयचित्तदरैरुदारै,स्तोष्ये किलाद
पितप्रथमजिनेन्जम्॥शायुग्मं॥ बुझ्या विना
पे विबुधार्चितपादपीठ, स्तोतुं समुद्यतमतिर्वि
गतत्रपोऽहम् ॥ वालं विदाय जलसस्थितर्मिर
विव, मन्य क श्चति जन सहसा ग्रहीतुम् ॥
॥३॥ वक्तुं गुणान् गुणसमुख शशांककातान्,
कस्ते दम सुरगुरुप्रतिमोऽपि बुध्या ॥ कल्पां
तकालपवनोइतनकचक्र, को वा तरीतुमलमवु
निधि नुजाभ्याम् ॥४॥ सोऽहं तथापि तव न
क्तिवशान्मुनीश, कर्तुं स्तव विगतशक्तिरपि प्र
पीत्यात्मवीर्य'चार्य मृगोमगेज, ना
(२४४) जयन वक्ष्माणो, जिणेसरो ऐस रुब हयतिमि रो॥ जिणचंदा नयदेवा, पदुणो जिपवलहा जेय ॥११॥ गुरु जिणवल्लद पाए, जयदेव पत्त दायगे वदे॥ जिणचद जिणेसरव, इमा ण तिबस्स चुहिकए ॥१२॥ जिणदत्ताणं स म्म, मन्नति कुणति जेय कारति ॥ मपसा व यसा वडसा, जयंतु साहम्मिा तेवि ॥१३॥ जिणदत्त गुणे नाणाणो, सया जे धरति धारि ति॥देसिअसिय वायपए, नमामि सादम्मि आ तेवि ॥१४॥इति षष्ठ स्मरणम् ॥६॥ ॥अथ उवसग्गदर नामकं सप्तमस्मरणम् ॥ ॥जवसग्गरं पास, पासं वंदामि कम्मघण मुक्क॥विसह्रविसनिस्मासं, मंगलकल्याण श्रा वासार॥इत्यादि ॥नवेनवेपासजिणपद संपूर्ण कदना ॥५॥ इति श्रीपार्वजिन. सप्तमस्मरणम्॥॥इतिसप्तस्मा -
(१४७)
२० ॥ दृष्ट्वा नवतमनिमेषविलोकनीय, ना
पत्र तोषमुपयाति जनस्य चतु ॥पीत्वा पय
शिकरद्युति जग्धसिंधोः, दारं जल जलनि
रशितु क श्चेत् ॥ ११॥ यै शातरागरुचि
ने परमाणुनिस्त्वं, निर्मापितस्त्रिनुवनैकल
तामनूत॥तावंत एव खलु तेप्यणव प्रथिव्यां,
पत्ते समानमपरं नदि रूपमस्ति ॥१२॥ वक्र
ते सुरनरोरगनेत्रदारि, निशेषनिर्जितजग
वेतयोपमानम् ॥ विवं कलकमलिनं व निशा
करस्य, यहासरे नवति पामुपलाशकल्पम् ॥
॥ २३ ॥ सपूर्णमंमलशशाककलाकलाप, शु
भ्रा गुणास्त्रिनुवन तव लघयति ॥ ये संश्रिता
स्त्रिजगदीश्वरनाथमेक, कस्तान्निवारयति सच
रतो यथेष्टम् ॥१४॥ चित्र किमत्र यदि ते त्रि
शागनानि, नींत मनागपि मनो न विकार
मार्गम् ॥ कल्पातकालमरुता चलिताचलेन,
के मदराशिशिखर चलित कदाचित् ॥ २५॥
N
(१४६)
ज्येति किं निजशिशो परिपालनार्थम् ॥
अल्पश्रुत श्रुतवता परिहासधाम,
रेव मुखरीकुरुते वलान्माम्॥यत्कोकिल
मधौ मधुरं विरोति, तच्चारुचाम्रका
कदेतु ॥ ६॥ त्वत्संस्तवेन
पाप क्षणाक्ष्यमुपैति शरीरनाजाम्॥ ।
लोकमलिनीलमशेपमाशु, सूर्यांशु
शार्वरमधकारम् ॥ ७॥ मत्वेति नाथ तव
स्तवन मयेद, मारयते तनुधियापि तव
वात्।चेतो दरिष्यति सता नलिनीदलेषु,
फलद्युतिमुपैति नन्दबिंद्ध ॥७॥आस्ता
स्तवनमस्तसमस्तदोष, त्वत्सकथापि
क्षरितानि दति ॥ दूरे-सहस्रकिरणः कुरुते
व, पद्माकरेपु जलजानि विकाशनाजि॥ए
नात्यभुत नुवननपणनूत नाथ,
नवंतमभिष्ट्रवत ॥तुय्या नवति नवतो ननु
न किंवा, नूत्याश्रित यह नात्मसमं करोति
(१४७)
१० ॥ दृष्ट्वा नवतमनिमेपविलोकनीयं, ना
त्र तोषमुपयाति जनस्य चक्षु ॥पीत्वा पयः
शिकरद्युतिधसिंधो, दारं जल जलनि
रशितु क श्छेत् ॥ ११॥ ये शातरागरुचि
। परमाणुनिस्त्व, निर्मापितस्त्रिनुवनैकल
मनूत ।। तावत एव खलु तेप्यणव एथिव्यां,
ते समानमपरं नदि रूपमस्ति ॥२२॥ वक्र
ते सुरनरोरगनेत्रदारि, नि शेषनिर्जितजग
प्रतयोपमानम् ॥ विव कलकमलिन व निशा
रस्य, यहासरे नवति पामुपलाशकल्पम् ॥
। २३॥ सपूर्णममलशशाककलाकलाप, शु
त्रा गुणास्त्रिनुवन तव लघयति ॥ ये संश्रिता
रेजगदीश्वरनाथमेक, कस्तान्निवारयति सच
तो यथेष्टम् ॥२४॥ चित्रं किमत्र यदि ते त्रि
शागनानि, नीत मनागपि मनो न विकार
सार्गम् ॥ कल्पातकालमरुता चलिताचलेन,
कि मदराजिशिखर चलित कदाचित् ॥ १५॥
(२०) निर्धूमवर्त्तिरपवर्जिततैलपूर , कृत्स्नं जगत्रयमि द प्रकटीकरोपि ॥गम्यो न जातु मरुतां चलि ताचलानां, दीपोऽपरस्त्वमसि नाथ जगप्रका श ॥२६॥ नास्त कदाचिञपयासि न राहुग म्य , स्पष्टीकरोषि सहसा युगपङगति ॥ ना जोधरोदरनिरुक्ष्मदाप्रनाव, सूर्यातिशायिम हिमासि मुनीं। लोके ॥१॥ नित्योदयं दलि तमोदमदाधकारं, गम्यं न राहुवदनस्य के वारिदानाम् ॥ विभ्राजते तव मुखाजमनल्पका ति, विद्योतयलगदपूर्वशशाकबिंबम् ॥१७॥ किं शर्वरीपु शशिनाहि विवस्वता वा, युष्मन्म खें दलितेपुतमस्सु नाथ ॥ निष्पन्नशालिवन शालिनि जीवलोके, कार्य कियङलधरैलना रन ॥१। ज्ञान यथा त्वयि विनाति है. तावकाश, नैव तथा हरिहरादिपु नायकेपु ॥ तेज स्फरन्मणिपु याति यथा महत्त्वं, नैवे तु काचशकले किरणाकलेऽपि ।। 30 जनो का (१४) दरिदरादय एव दृष्टा, दृष्टेषु येपु हृदय त्वयितो पमेति ॥ किं वीक्षितेन नवता नुवि येन नान्य, कश्चिन्मनो दरति नाथ नवातरेपि ॥१२॥ स्त्री णां शतानि शतशो जनयंति पुत्रान्, नान्या सुत त्वउपमं जननी प्रसूता ॥ सर्वा दिशो दध ति नानि सदस्ररश्मि, प्राच्येव दिग्जनयति स्फुरदंशुजालम् ॥२२॥ त्वामामनंति मुनय परम पुमास, मादित्यवर्णममल तमस. परस्ता त्वामेव सम्यगुपलन्य जयति मृत्यु, ना न्य शिव शिवपदस्य मुनीपथा ॥२३॥ त्वा मव्यय विनुमचिंत्यमसख्यमाय, ब्रह्माणमीश्व रमनतमनंगकेतुम् ॥ योगीश्वरं विदितयोगमने कमेक, झानस्वरूपममल प्रवदति सत ॥३॥ वुधस्त्वमेव विवुधार्चितबुध्विोधात्, त्व शकरो ऽसि नुवनत्रयशकरत्वात् ॥धातासिधीर शिव मार्गविधेर्विधानात्, व्यक्त त्वमेव नगवन् पुरु पोतमोऽसि ॥ ३५ ॥ तुन्य नमस्त्रिनुवनार्तिदरा त्॥
ननवोदधिशोपणाय ॥ १६ ॥ को विस्मयोग य नाथ, तुन्न्य नम दितितलामखनूषणाका तुभ्य नमस्त्रिजगत परमेश्वराय, तुभ्यं नमोनि यदि नाम गुणैरशेपै, स्व संश्रितो निरवकाश तया मुनीश ॥दोपैरुपात्तविविधाश्रयजातगर्ने, स्वप्नातरेऽपिन कदाचिदपीक्षितोऽसि ॥४॥ चैरशोकतरुसश्रितमुन्मयूख, मानाति रूपमम ल नवतो नितातम् ॥ स्पष्टोलसत्किरणमस्तत मोवितान, विंबरवेरिव पयोधरपार्श्ववति ॥३०॥ सिंहासने मणिमयूखशिखाविचित्रे, विधाजते तव वपु कनकावदातम् ॥ बिंव वियधिलसर्व शुलतावितानं, तुगोदयानिशिरसीव सहस्रर इमे ॥ ॥ कुदावदातचलचामरचारुशोत्र, विम्राजते तव वपु कलधौतकातम् ॥ जया शाकशुचिनिर्मरवारिधार, मुच्चैस्तट सुरगिरे। व शातकौनम् ॥ ३० ॥ उत्रनय तव विनाति शशाककात,मुचे स्थितं स्था (१५१) पम् ॥ मुक्ताफलप्रकरजालवितश्शोन,प्रख्या पयत्रिजगत परमेश्वरत्वम् ॥ ३१ ॥ जन्निषदे मनवपकजपुजकाती, पर्युल्लसन्नखमयुखशिखा निरामौ ॥ पादौ पदानि तव यत्र जिने धत्त, पानि तत्र विबुधा परिकल्पयंति ॥ ३॥ यथा तव विनूतिरनूक्जिानें, धर्मोपदेशनविधी न तथा परस्य ॥ यादृक् प्रना दिनकृतः प्रदतां धकारा, तादृक्कुतोगदगणस्य विकाशिनोऽपि ॥३३॥श्योतन्मदाविलविलोलकपोलमूल,म त्तधमधमरनादविकोपम् ॥ ऐरावतान मिनमुतमापतंत, दृष्ट्वा नयं नवति नोनवदा श्रितानाम् ॥३४॥ निन्नेनकुनगलज्ज्वलशो णिताक्त, मुक्ताफलप्रकरनूपितनूमिनाग ॥व क्रम क्रमगतं दरिणाधिपोऽपि, नाकामति क्रमयुगाचलसश्रितं ते ॥ ३५॥ कल्पांतकाल पवनोश्तवह्निकल्प,दावानल ज्वलितमुज्ज्वल मुत्स्फुलिंगम् ॥ विश्वं जिघत्सुमिवसंमुखमापतं मिनमुत्फणमापततम् ॥ आक्रामति क्रमयुगेन निदामुपैति ॥३७॥ कुताग्रनिन्नगजशोषित वारिवाद, वेगावतारतरणातुरयोधनीमे ॥ (२५२) त, त्वन्नामकीर्तनजल शमयत्यशेषम् ॥ ३६॥ रक्तेक्षण समदकोकिलकतनील, क्रोधोस्त । निरस्तशक, स्त्वन्नामनागदमनी हदि यस्य पुस ॥ ३० ॥ वल्गत्तुरगगजगतिनीमनादा माजी वलं बलवतामपि नूपतीनाम्॥पनि करमयूखशिखापविई, वकीर्तनात्तम श्वास हे जयं विजित यजेयपदा, स्त्वत्पादपंकज वनाश्रयिणो लनते॥३५॥ अनोनिधौ हुनि तनीषणनकचक्र, पाठीनपीनियदोल्बणा डवाग्नौ ॥रंगत्तरगशिखरस्थितयानपात्रा, सं विहाय नवत स्मरणाद्रजति॥ ४० ॥ भूतनीपणजलोदरनारनुमा , शोच्या दशा मुपगताच्युतजीविताशा ॥ त्वत्पादपकजरजों मृतदिग्धदेहा, मानवंति (१५३) पा ॥४१॥ आपादकठमुरुगृखलवेष्टितागा, गाढ बदन्निगडकोटिनिघृष्टजघा ॥ त्वन्नाममत्र मनिश मनुजा स्मरंतः, सद्य स्वयं विगत धनया नवति ॥ ४२ ॥ मत्तजिमृगराजदवा नलादि, संग्रामवारिधिमदोदरवंधनोतम्॥ त स्याशु नाशमुपयाति नयं नियेव, यस्तावकं स्तवमिम मतिमानधीते ॥४३॥स्तोत्रस्न त वजिने गुणैर्निबछा, भक्त्या मया रुचिरवर्ण विचित्रपुष्पामाधत्तेजनो य श्द कतगतामजस्त्रं, तं मानतुंगमवशा समुपैति लक्ष्मी ॥४४॥ ॥इति भक्तामरस्तोत्र संपूर्णम् ॥ ॥ अथ दृश्शातिर्लिख्यते ॥ nनो नो नव्या शृणुत वचनं प्रस्तुत सर्व मेतत्, ये यात्राया त्रिभुवनगुरोराईता भक्तिना ज ॥ तेपां शातिर्नवतु भवतामर्ददादिप्रना वा, दारोग्यश्रीधृतिमतिकरी क्लेशविध्वसदेतुः ॥१॥ नो नो नव्यलोका श्द दि नरतेरावत
प्रकपानन्तर अवधिना विज्ञाय सौधर्माधिप
नव्यजनै सह समागत्य, स्नानपीठे स्ना विधा
य, शान्तिमुद्दोपयामि ॥ तत्पूजायात्रास्त्रात्रादि
(१५४)
विदेहसनवाना, समस्ततार्यकृतां जन्मन्मासन
ति सुघोपाधएटाचालनानन्तर सकससुरा
सुरेई सह समागत्य सविनयमईमारक य
हीत्वा, गत्वा कनकाशिंगे, विहितजन्मानि
पेक , शान्तिमुद्घोषयति, ततोऽहकृतानुकारमि
ति कृत्वा, महाजनो येन गतस्स पंथा ॥ इति
महोत्सवानन्तरं ॥ इति कृत्वा कर्ण दत्वा निश
म्यता स्वाहा ॥ॐ पुण्याह , प्रीयतां २, न
गवन्तोऽर्हन्त , सर्वदा सर्वदर्शिन ॥ त्रैलोक्प
नाथा, त्रैलोक्यमदिता त्रैलोक्यपूज्या त्रैलो
क्येश्वरा,त्रैलोक्योद्योतकरा॥श्रीकेवलझा
नीर, निर्वाणी २, सागर ३, महायश ४,
मल ५, सर्वानुभूति ६, श्रीधर ७, दत्त, दामो
दर ए, सुतेजा १०,स्वामी१२, मनिस प्रत १२,
,
(१५५)
सुमति १३, शिवगति १४, अस्ताग १५,नमी
श्वर २६, अनिल २७, यशोधर १७, कृतार्थ
रए, जिनेश्वर २०, शुक्ष्मति २१, शिवकर
शश, स्यन्दन २३, सप्रति १४, एते अतीत.
॥ चतुर्विंशतितिर्थंकरा॥
॥ श्रीझपन र, अजित २, संनव ३,
अभिनंदन ४, सुमति ५, पद्मप्रन ६, सुपार्थ
, चंप्रन , सुविधि ए, शीतल १०, श्रेयां
स १२, वासुपूज्य १२, विमल १३, अनन्त
२४, धर्म १५, शान्ति २६, कुंथु १७, अर
२७, मल्लिए, मुनिसुव्रत २०, नमि २१,नेमि
२२,पार्श्व २३,वईमान २४, एते वर्तमानजिना
-॥ॐ श्रीपद्मनान १, सुरदेव श, सुपार्य
३, स्वयंप्रन ४, सर्वानुभूति ५, देवश्रुत ६,
उदय ७, पेढाल , पोहिल ए, शतकीर्त्ति २०,
सुव्रत १२, अमम १५, निष्कषाय १३, निप्पु
लाक १४, निर्मम १५, चित्रराप्ति १६, समाधि
(१५६)
२७, सवर २७, यशोधर २ए, विजय १० मल्लि
३१, देव शश, अनन्तवीर्य ३३, नजकर २४
॥ एते नावितीर्थकरा जिना ॥ शान्ता.
शान्तिकरा भवतु मुनयो मुनिप्रवरा, रिपु
विजयनिक्षकान्तारेपु जर्गमार्गेषु रदंतु
वो नित्य ॥ श्रीनानि १, जितशत्रु
२, जितारि ३, सवर ४, मेघ ५, धर ६, प्र
तिष्ठ ७, मदसेन नरेश्वर G, सुग्रीव ए, दृढरथ
२०, विष्णु १२, वासुपूज्य २२, कृतवर्म १३,
सिंहसेन १४, नानु १५, विश्वसेन २६, सूर
२७, सुदर्शन १७, कुन रए, सुमित्र २०, विज
य २२, समुपविजय १२, अश्वसेनश्३, सिधा
र्थ श्वाति वर्तमान चतुर्विंशतिजिनजनकाः॥
॥ॐ श्रीमरुदेवा , विजया २, सेना ३,
सिद्धार्था ४, सुमगला ५, सुसीमा ६, प्रथि
वीमाता ७, लक्ष्मणा ,रामा ए, नंदा १०,
विप्पु १२, जया १२, श्यामा
-
(१५७)
३, सुव्रता १५, अचिरा २६, श्री २७, देवी
उ, प्रनावती १ए, पद्मा २०, वप्रा २१, शि
श, वामाश्३, त्रिशला २४॥ इति वर्तमान
नजनन्य ॥
॥ॐ गोमुख , मदायद २, त्रिमुख ३,
दानायक ४, तुबुरु ५, कुसुम ६, मातग ,
जय , अजित ए, ब्रह्मा २०, यदराज
२,कुमार १२, षण्मुख १३, पाताल १४,कि
र १५, गरुड २६, गधर्व १७, यदराज
१७, कुबेर २ए, वरुण २०, नृकुटि २२, गोमे
व शश, पार्श्व २३, ब्रह्मशाति २४ ॥ इति वर्त्त
मानजिनयदा ॥
॥ॐ चक्रेश्वरी १, अजितवला , उरिता
३, काली ४, मदाकाली ५, श्यामा ६,
शाता , नृकुटि सुतारका ए, अशोका १७,
मानवी १२,चमा १२, विदिता १३, अकुशा
TH कटा १५,निर्वाणी२६, वला१७, धारिणी
(१५)
२७, धरणप्रिया २ए, नरदत्ता २०, गाधारी
,अविकाश्श,पद्मावती२३,सिशयिका २४.
एते वर्तमानचतुर्विंशति तीर्थकरशासनदेव्य ॥
॥श्री श्री धृति, कीर्ति, काति, बुद्धि, स
दमी, मेधा, विद्या, साधन, प्रवेश निवेशनेषु,
सुग्रदीतनामानो जयति ते जिनेश ॥ॐ रो
हिणी २, प्रज्ञप्ति २, वजशृखला ३, वजाकुशा
४, चक्रेश्वरी ५, पुरुषदत्ता ६, काली, महा
काली ज, गौरी ए, गाधारी १०, सर्वास्त्रमहा
ज्वाला १२, मानवी १२, वैरोट्या १३, अबुप्ता
२४,मानसी २५,महामानसी २६,एता पोडश
विद्यादेव्यो रदंतु मे स्वाहा ॥ आचार्योपा
ध्यायप्रनृतिचातुर्वर्ण्यस्य श्रीश्रमणसघस्यशाति
वतु, तुष्टिर्नवतु पुष्टिर्नवतु ॐ ग्रहाश्चास्
योगारकवुधलदस्पतिशुक्रशनैश्चरराढुकेतुसदि
ता सलोकपाला सोमयमवरुणकुबेरवासवादि
त्यस्कन्दविनायक ये
(१५ए)
दयस्ते सर्व प्रीयतां ॥२॥ अदीको
छागारा नरपतयश्च भवतु स्वाहा ॥ ॐ
। त्रिभातृकलत्रसुहृत्स्वजनसबंधिबंधुवर्गस
नित्य चामोदप्रमोदकारिणो नवतु ॥ अ
व नूमंमले आयतननिवासिना साधुसा
प्रावकश्राविकाणां, रोगोपसर्गव्याधि ख
नस्योपशमनाय शान्तिवतु ॥ तुष्टि
शविटहिमाङ्गस्योत्सवा नवतु ॥ सदा
भूतानि उरितानि पापानि शाम्यंतु श
पराङ्मुखा नवंतु स्वाहा ॥ श्रीमते शा
नाथाय, नम शान्तिविधायिने ॥त्रैलोक्य
मराधीश, मुकुटान्यर्चिताइये ॥१॥ शा
शान्तिकर श्रीमान्, शान्ति दिशतु मे
॥ शान्तिरेव सदा तेषा, येपा शातिर्यदे
॥ॐ जन्मृष्टरिष्टउष्ट, ग्रहगति स्वप्न
मेनादिश संपादितदितरफ्त, नामरहण ज
ते शांते ॥३॥श्रीसगौरजनपद, राजाधि
(१६०) पराजसंनिवेशानाम्॥गोष्ठीपुरमुख्याना, मार रणैर्व्यादरेहातिम्॥४॥ श्रीश्रमणसंघस्यशांति- वतु, श्रीपोरलोकस्य शातिर्नवतु ॥ श्रीजन पदानां शातिर्नवतु, श्रीराजाधिपाना शांतिन वतु, श्रीराजसनिवेशाना शांतिर्नवतु, श्रीगो ष्ठिकाना शातिर्नवतु, स्वाहा ॥३॥ क्षी श्री पार्श्वनाथाय स्वाहा ॥ एषाशाति प्र तिष्ठायात्रास्नात्रावसानेषु, शातिकलशं ए. दीत्वा कुकुमचदनकर्परागरुधूपवासकुसुमां जलिसमेत , स्नात्री श्रीसघसमेत , शुषि शुचिवपु पुष्पवस्त्रश्चंदनानरणालंकृत , चंदन तिलकं विधाय पुष्पमाला कठे कृत्वा, शातिमु घोपयित्वा शातिपानीयं मस्तके दातव्यमि ति॥ नृत्यति नृत्यं मणिपुष्पवर्षे, सृजति गाव तिच मगलानि ॥ स्तोत्राणि गोत्राणि पठे ति मत्रान्, कस्याएनाजोदि जिनानिपेके ॥५॥अई तिव्यरमाया शवा (१६१) नयरनिवासिनी॥ अम्द शिवं तुम्द शिवं, अ सुदोवसमं शिव नवतु स्वादा ॥ १ ॥ शिवम स्तु सर्वजगत , परदितनिरता भवंतु भूतग णा ॥ दोषा प्रयातु नाशं, सर्वत्र सुखी नवतु लोक ॥२॥ उपसर्गा क्षय याति, ग्यिते चि घ्नवल्लय ॥ मन प्रसन्नतामेति, पूज्यमाने जिने श्वरे॥३॥ इति श्री शाति समाप्ता ॥ ॥अथ जिनपजरस्तोत्र लिख्यते॥ ॥श्रीअ अर्दभ्यो नमोनम, श्री अर्द सिझेन्यो नमोनम ॥ॐझी श्री अर्द आचार्येभ्यो नमोनम ॥झी श्री अई न पाध्यायेभ्यो नमोनम ॥ श्रीअर्दै श्रीगौ तमस्वामिप्रमुखसर्वसाधुन्यो नमोनम ॥१॥ एप पच नमस्कार , सर्व पापदयंकर ॥ मग लाना च सर्वेपा, प्रथमं नवति मंगलं ॥शा, श्री श्री जयविजये, अंद परमात्मने नम ॥क मलप्रनसूरीशे, नापते जिनपजरम् ॥ ३॥ ए (१६०) पराजसंनिवेशानाम्॥गोष्ठीपुरमुख्यानां,धार रणैर्व्यादरेचातिम्॥४॥श्रीश्रमणसंघस्यशांति भवतु, श्रीपौरलोकस्य शातिर्नवतु ॥ श्रीजन पदाना शातिर्नवतु, श्रीराजाधिपाना शांविर्न वतु, श्रीराजसनिवेशाना शातिर्नवतु, श्रीगो ष्ठिकानां शातिर्नवतु, ॐ है स्वाहा ॥२॥ श्री पार्श्वनाथाय स्वाहा ॥ एषाशाति त्र तिष्ठायात्रास्नात्रावसानेषु, शातिकलशं ए दीत्वा कुकुमचदनकर्पूरागरुधूपवासकुसुमा जलिसमेत , स्नात्रपीठे श्रीसघसमेत , शुषि शुचिवपु पुष्पवस्त्रश्चंदनानरणालंकृत , चंदन तिलकं विधाय पुष्पमाला कंठे कृत्वा, द्घोपयित्वा शातिपानीय मस्तके दातव्यनि ति ॥ नृत्यति नृत्यं मणिपुष्पवर्ष, सृजति गाई तिच मगलानि ॥ स्तोत्राणि गोत्राणि पटे ति मत्रान्, कल्याणनाजोरि जिनानिषेक ॥१॥अद तिवयरमाया शिवा देवी, तुम्ह शांतिमु (२६३) व कर्णयुगल, नासिका चानिनदनः ॥२शा ठौश्रीसुमती रदेत्, दतान्पद्मप्रनो विनु ॥ जि व्हा सुपार्श्वदेवीयं, तालु चंप्रनो विनु ॥१३॥ कठं श्रीसुविधीरक्षेत्, हृदयं श्रीसुशीतल.॥श्रे यासो वाढुयुगलं, वासुपूज्य करध्य ॥ १४ ॥ अगुलीविमलो रद,दनंतोऽसौ स्तनावपि ॥सु धर्मोप्पुदरास्थीनि,श्रीशातिर्नानिममलं ॥१५॥ श्रीकुथुर्सह्यक रहे, दरोरोमकटीतटामलिरूरू पृष्ठिवंशं, जघे च मुनिसुव्रत ॥१६॥पादागुली नमी रक्षेत्, श्रीनेमिश्चरणक्ष्यं॥श्रीपार्श्वनाथ सर्वांग, वईमानश्चिदात्मक ॥ १७॥ पृथिवी जलतेजस्क, वाय्वाकाशमयं जगत् ॥ रददश पपापेन्यो, वीतरागो निरजनः ॥ १७ ॥राजधा रे श्मशाने वा, संग्रामे शत्रुसकटे॥व्याघ्रचौरा निसर्पादि, नूतप्रेतनयाश्रिते ॥ १५ ॥ अका लमरणे प्राप्ते,दारिश्यापत्समाश्रिते॥अपुत्रत्वे महादोपे, मूर्खत्वे रोगपीडिते ॥३०॥ माकिनी (१६२) कनक्तोपवासेन, त्रिकाल यः पनेदिदं ॥ मनोषि लषित सर्व, फल स लभते ध्रुवं ॥ ४॥ न य्या ब्रह्मचर्येण, क्रोघलोनविवर्जित ॥ देवता ग्रे पवित्रात्मा, षण्मासैखनते फल ॥५॥ ईत स्थापयेन्मूर्ध्नि, सि.ई चतुर्ललाटके॥ चार्य श्रोत्रयोर्मध्ये,उपाध्याय तु प्राणके ॥६॥ साधुरन्दं सुखस्याग्रे, मन शुई विधाय पास र्यचानिरोधेन, सुधी सर्वार्थसिक्ष्ये ॥ ७॥ विणे मदनक्षेपी, वामपार्थे स्थितोजिन ॥ गसधिषु सर्वज्ञ, परमेष्ठी शिवकर पूर्व शा श्रीजिनो रहे, दाग्नेयीं विजितेश्यि ॥दवि शाशा पर ब्रह्म, नैतिं च त्रिकालाक्ति ॥५॥ पश्चिमाशा जगन्नाथो, वायवीं परमेश्वर ॥ उस रा तीर्थकृत् सर्वा, मीशानी च निरजन ॥१॥ पाताल जगवानई, माकाश पुरुपोत्तम ॥ एणीप्रमुखा देव्यो, रदंतु सकल कुल ॥११॥ झपनो मस्तक रहे,दजितोपि विलोचन। सन (१६३) व कर्णयुगल, नासिका चानिनदन ॥१शान ठौश्रीसुमती रदेत, दंतान्पद्मप्रनो विनु नि व्हा सुपार्श्वदेवीयं, तालु चश्मनो विनु ॥२३॥ कवं श्रीसुविधीरदेत, हृदयं श्रीसुशीतल.॥श्रे यासो वाहुयुगलं, वासुपूज्य करध्य ॥ २४ ॥ अगुलीविमलो रो,दनंतोऽसौ स्तनावपि ॥सु धर्मोप्पुदरास्थीनि, श्रीशातिर्नानिममलं ॥१५॥ श्रीकुथुर्राह्यक रहे, दरोरोमकटीतटामल्लिरूरू एष्ठिवश, जघे च मुनिसुव्रत ॥२६॥ पादागुली नमी रदत, श्रीनेमिश्चरणक्ष्यं॥श्रीपार्श्वनाथ सर्वांगं, वईमानश्चिदात्मक ॥ १७॥ एथिवी जलतेजस्क, वाय्वाकाशमय जगत् ॥ रदेदश पपापेन्यो, वीतरागो निरजनः ॥२७॥राजधा रे श्मशाने वा, संग्रामे शत्रुसकटे॥व्याघ्रचौरा निसर्पादि, नूतप्रेतनयाश्रिते ॥ १५॥ अका लमरणे प्राप्ते,दारिश्चापत्समाश्रिते॥अपुत्रत्वे महादोपे, मूर्खत्वे रोगपीडिते ॥३०॥ माकिनी (१४) चेपम्ये, व्यसने चापदि स्मरेत् ॥३॥ प्रातले य नास्ति, लनते सुखसपद ॥२२॥जिना जें, श्रियस लनते नर ॥३॥प्रातःसमुभव शाकिनीग्रस्ते,महाग्रहगणाईिते॥नपुत्तान समुदाय, य स्मरेजिनपजर ॥ तस्य किंचित जरनामेदं, य स्मरंत्यनुवासर ॥ कमलप्रमा पठेत् कृतझो,य स्तोत्रमेतकिनपंजराख्य॥ सादयेत्स कमलप्रनाख्या, लक्ष्मी मनोवादित पूरणाय ॥२४॥ श्रीरुष्पलीयवरेण्यगछे, देव प्रनाचार्य्यपदाब्जइस ॥वादीचूमामणिरेष जैनो, जीयाद गुरु श्रीकमलप्रनास्य ॥२५॥ इति श्रीजिनपजरस्तोत्र सपूर्णम् ॥ ॥अथ श्री श्रावक करणीनी सम्झाय ॥ ॥चौपाई॥ श्रावक तु वे परनात, घडीले पाउली रात ॥ मनमा समरे श्रीनव कार, जेम पामे नव सायर पार ॥१॥कवण देव क्वण गुरुधर्म, कवण अमारु ठे कुलकर्म,
(१६५)
कवण अमारो ने व्यवसाय, एवु चिंतवजे मन
माय ॥२॥सामायिक लेजे मन शुरू, धर्मनी
देडे धरजे वुध ॥ पडिक्कमणु करे रयणी तj, पा
तक आलोई आपणुं ॥३॥ कायाशक्तं करे प
वस्काण, सुधि पाले जिननी आण ॥ नणजे
गणजे स्तवन समाय, जिदूंती निस्तारो
थाय ॥४॥चितारे नित्य चनदे नीम, पाले
दया जीवतां सीम ॥ देदरे जाश् जुदारे देव,
व्यनावधी करजे सेव ॥५॥पोषाले गुरु
वंदन जाय, सुणो वखाण सदा चित्त लाय॥
निर्दूषण सूजंतो आदार, साधुने देजे सुविचार
५६॥ साहम्मिवत्सल करजे घणां,सगपण महो
टा सादम्मीतणां ॥३खीया दीणा दीना देखि,
करजे तास दया सुविशेष ॥ ७॥ घर अनुसा
रें देजे दान, महोटाशु म करे अभिमान ॥
गुरुने मुखे लेजे आखडी, धर्म न मूकीश एके
घडी ॥ ॥ वारु शुद्ध करे व्यापार, नंग अ
कूडा जनशु कथन म नाख ॥ए॥अर्नका
॥ते नदप नविकीजे किमे, काचा कवला,
गुली, मधु धावडी मत वेचो वली॥११
सीम करावे रगण पास, दूषण घणा कमा।
तास ॥ पाणी गलजे बेबे वार, अगख
धिकानो परिदार ॥म नरिशकेनीली साल
य कहीये वत्रीश,अनय बाविशे विश्वानी
ल मत जिमे ॥२॥ रात्रिभोजनना
जाणीने करजे संतोष साजी साबू खोदने
बहु
ता दोष अपार ॥२॥जीवाणीनां करजे ।
न, पातक उमी करजे पुण्य ॥ गणा इंधन
चूले जोय, वावरजे जिम पाप न होय ॥१॥
घृतनी परें वावरजे नीर, अणगल नीर म
इश चीर ॥ ब्रह्मव्रत सूर्बु पासजे, अतिचार
सघला टालजे ॥१४॥ कह्या पन्नरे कर्माटान,
पापतणी परहरजे खाण ॥ किरॉम सेजे अन
रथ दम, मिग्या मेल म जरजे पिंम ॥१५॥
(१६७)
समकित शुभ दैडे राखजे, बोल विचारीने नां
खजे ।। पाच तिथि म करो आरंन, पालोशी
यल तजो मन दल ॥१६॥ तेल तक घृत दू
ध ने दर्दिकघाडा मत मेलो सदी॥ उत्तम वा
में खरचो वित्त, पर उपगार करो शुनचित्त ॥
॥१७॥ दिवस चरिम करजे चोविदार, चारे
आदार तणो परिदार । दिवस तणां आलोए
पाप, जिम नांजे सघला संताप ॥ १७॥स
ध्यायें आवश्यक साचवे, जिनवर चरण शरण
नव नवे ॥ चारे शरण करी दृढ दोय,सागारी
अणसण से सोय ॥रए॥करे मनोरथ मन
एहवा, तीरथ शत्रुजे जायवा ॥ समेतशिखर
आबू गिरनार, नेटीश हूं धन धन अवतार
॥२०॥ श्रावकनी करणी एद, एदयी थाये
नवनो बेद ॥आठे कर्म पडे पातला, पाप त
णा ब्टे आमला ॥ २२॥ वारु लदियें अमर
विमान, अनुक्रमे पामे शिवपुर धाम ॥ कदे
॥तेनदा नवि कीजे किमे, काचा कवला
तास ॥ पाणी गलजे बेबे वार, अगर
(९६६)
धिकानो परिदार ॥म भरिशकेनी कूली साल
कूडा जनशु कथन म नांख ॥ ॥ अनंता
य कीये वत्रीश,अनक्ष्य बाविशे विश्वातील
ल मत जिमेरा रात्रिलोजनना बहु दोष
जाणीने करजे सतोष साजी साबू लोदने
गुली, मधु धावडी मत वेचो वली ॥१५॥
ली म करावे रगण पास, दूषण घणा कार
ता दोष अपार ॥ १२॥ जीवाणीना करजे ।
न, पातक मी करजे पुण्य ॥ गणा इंधन
चले जोय, वावरजे जिम पाप न होय ॥१३॥
घृतनी परें वावरजे नीर, अगल नरम
श्श चीर ॥ ब्रह्मव्रत सुधू पालने, अतिधार
सघला टालजे ॥ २४॥ कह्या पन्नरे कर्मादान,
पापतणी परहरजे खाण ॥
किम सेजेसन
रय दम, मिथ्या मेत म नरजे पिंग ॥१५॥
(१६ए)
गुरु कदे गएद, पीछे श्च कदी खमासमण
देई उनो थई, आधो शरीर नमावी मुखें
मुदपत्ती देई, मधुरस्वरे तीन नवकार गुणी क
हे श्बकार नगवन् पसाज करी, पोसद दमक
उच्चरावो ? गुरु कदे उच्चरावेमो॥ पी करेमि
नते पोसद ॥श्हासे ले के अप्पाणं वोसिरामि॥
तक करे अव पोसदका पञ्चस्काण तीये, सो
लिखते हैं
॥अथ पोसदका पच्चरकाण प्रारंन ॥
करेमि नं ते पोसहं, आदार पोसदं, देसन
सबन वा, सरीरसकार पोसई, सवन बनचेर
पोसई, सब अवावार पोसई, सघन चनवि
दे पोसदे, सावडं जोगं पच्चरकामि, जावदिव
स अदोरत्तिं वा पछुवासामि, विदं तिविदे
एं मणणं वायाए कारणं, न करेमि न कार
वेमि, तस्सनं ते पडिकमामि निंदामि, गरि
हामि अप्पाण वोसिरामि
जिनदर्प घणे ससनेह, करणी दुसरणी )
एद॥२॥ इति श्रीश्रावकनी करणीनीसा
॥ अथ अपुरी पोसह विधि लिख्यते ।
॥रात्रिनी पाली पडिये निज दूर करी
री, पर्व दिवसथकी प्रथम दिवसें पडिलेही रा
ने, पंचपरमेष्ठि स्मरण करी, गृहचिंता परिक्ष
ख्या, जे पोसदना उपगरण, ते लेई, पोसहशा
खाये थापनाचार्य समीपे, अथवा गुरुनो में
योग दुवे तो गुरुनी पासें आवी, नूमि प्रमा
र्जी एक खमासमण देई, शरियावदि परिकमि
पीत खमासमण दे॥श्चाका०॥सं०॥ना
पोसह मुदपत्ती पहिलेद् गुरु कहे, परिसरे
१
द् श्छं कदी खमासमण देई, सुदपत्ती परित
है. पछि जनो थई, खमासमण देई ॥
का॥स ॥न ॥ पोसह संदिस्सा गुरु
कदे, सदिस्सावेद, पविठं कही, समासन
ए देई छाका०॥सं०॥न
(१७१)
ने, तेमाटें श्दां सामायिक दंगक कच्चयां पी,
रियावही नही पडिकमीनें ॥ पीठे चैत्यवद
न, जयवीयराय सूधी करी कुसुमिण उस्समि
ण कालस्सग्ग करे, पीउ पडिक्कमणवेलासीम
सिसाय ध्यान करे पीछे पूर्वोक्तरीतें पडिक्कमण
करे, पण इतरो विशेष के चारे थुईयें देव वांया
पनि खमासमण देई कहे॥श्चाका ॥ सं० ॥
• ना बहुवेलं सदिस्सा १ गुरु कदे, संदिस्सा
वेद पी श्च कदी, खमासमण देई कदे ३
छाका ॥सं॥ना बढुवेलं करुं गुरु कदे,
करेद॥ श्वं कदी, तीन खमासमणे श्री
आचार्यजी मिश्र, श्रीनपाध्यायजी मिश्र,
त्रीजे सर्वसाधु वादी, कम्मनूमिहिं कम्मनूमिर्दि
इत्यादि नमस्कार नणे,जो पडिलेदणवेला नहिं
हुवे, तो सीमधरस्वामीनू चैत्यवदनादि करी,
सिलाय करे दवे पडिलेदण वेला पडिलेदण
१
॥ए पाठ तीन बार गुरुवचन अनुजाता
करतो उच्चरे।पीच एक खमासमणेश्णना
गुरु कहे, पडिलेदेह. वीजी खमासमण दे
खमासमा देई अर्धावनतगात्र ऊनो थको
तीन नवकार,गुनी तीन करेमि नते जगरी दोष
सिम्लाय कलंकदीखमासमा देईको
घको, आठ नवकारनो सिबाय करे शीतादि
(१००)
सन॥ सामायिक मुहपत्ती, परिखेड़ !
मुड्पत्ती पडिलेहे. पी दोय खमासमणे सामा
यिक संदिस्सा ? सामायिक गठ १ कही,
खमासमणे बेसणो संदिस्सा वेसणो गई !
कही, पीछे दोय खमासमणे सिक्षाय सदिस्सा
परिसदे दोय खमासमणे, पागरणुं संदिस्त
a? पागरण पडिग्घाउं? कदे ए सर्व सामावि
कविधि पूर्व को वे तिमदीन करवो, पण
तनो विशेप वे पदिल
(१७१)
बे, तेमाटे हा सामायिक दमक ऊच्चयां पी
रियावदी नदी पडिक्कमीनें ॥ पीले चैत्यवंद
न, जयवीयराय सूधी करी कुसुमिण उस्समि
ण कामस्सग्ग करे, पी. पडिक्कमणवेलासीम
सिशाय ध्यान करे पी, पूर्वोक्तरीतें पडिक्कमण
करे, पण इतरो विशेष के चारे थुईये देव वांद्या
पनि खमासमण देई कदे॥श्बाका ॥ सं० ॥
नावढुवेलं संदिस्सा १ गुरु कदे, संदिस्सा
वेद पी श्च कदी, खमासमण देई कदे ।
बाका० ॥संाना बहुवेलं करूं गुरु कहे,
करेद॥पी श्वं कही, तीन खमासमणे श्री
आचार्यजी मिश्र , श्रीनपाध्यायजी मिश्र,
त्रीजे सर्वसाधु वादी, कम्मभूमिहिं कम्मनूमिर्दि
इत्यादि नमस्कार नणे,जो पडिलेदणवेला नदिं
हुवे, तो सीमधरस्वामीनुं चैत्यवंदनादि करी,
सिसाय करे दवे पडिलेदण वेला पडिलेदण
१
॥ए पाठ तीन बार गुरुवचन अनुना
फरतो उच्चरे॥ परि एक खमासमणेशमा
गुरु कहे, पडिलेदेद बीजी खमासमण दो
तीन नवकार, गुनीतीन करेमि नते जबरी दोष
कही, पी दोय खमासमणे सिसाय सदिस्सा
१ सिम्लाय करूं ? कदीखमासमण देई कनो
थको, आठ नवकारनो सिबाय करे शतादि
स० ॥ न० ॥ सामायिक मुदपत्ती परिखेड़!
मुदपत्ती पहिलेदे पी दोय खमासमणे सामा
यिक सदिस्सा ? सामायिक नगर्ने ? कही,
खमासमण देई अर्धावनतगात्र कुनो थको
खमासमणे बेसणो संदिस्सा बेसणो गाउँ !
परिसदें दोय खमासमणे, पागरणुं संदिस्त
इं? पागरणु पडिग्घालं ? कहे ए सर्व सामावि
कविधि पूर्व को ठे तिमीज करवो, पण
तनो विठोपते पनि
(१७१)
बे, तेमाटें श्हां सामायिक दंमक ऊच्चयां पी,
शरियावदी नदी पडिक्कमीनें ॥ पी- चैत्यवद
न, जयवीयराय सूधी करी कुसुमिण उस्समि
ण कालस्सग्ग करे, पी. पडिक्कमणवेलासीम
सिलाय ध्यान करे पछि पूर्वोक्त रीतें पडिक्कमण
करे, पण इतरो विशेष के चारे थुईये देव वांया
पनि खमासमण देई कहे॥श्चाका० ॥ सं० ॥
नाबदुवेलं सदिस्सान गुरु कदे, संदिस्सा
वेद पाश्व कही, खमासमण देई कदे ३
का० सं०॥ना बढुवेलं करूं १ गुरु कदे,
करेद॥पश्चिं कही, तीन खमासमणे श्री
आचार्यजी मिश्र, श्रीनपाध्यायजी मिश्र,
त्रीजे सर्वसाधु वादी, कम्मनूमिहिं कम्मभूमिहिं
इत्यादि नमस्कार नणे,जो पडिलेदणवेला नदिं
हुवे, तो सीमधरस्वामीनू चैत्यवदनादि करी,
सिलाय करे हवे पडिलेदण वेला पडिलेदण
P
॥ए पानतीन वार गुरुवचन अनुमान
करतो जचरे।पी एक खमासमणेश्मा
स० ॥न० ॥ सामायिक मुदपत्ती. परिखे।
गुरु कहे, पडिलेहेद बीजी खमासमण दे
तीन नवकार, सुनीतीन करेमि नते जचरी दोष
खमासमणे बेसो संदिस्सा बेसणो गर्ने।
थको, आठ नवकारनो सिबाय करे शीतादि
मुदपत्ती पडिलेहे पनि दोय खमासमणे साना
यिक सदिस्साज ? सामायिक गर्छ ? कही,
खमासमण देई अर्धावनतगात्र ऊनो धको
कही, पीले दोय खमासमणे सिलाय संदिस्सा
'सिम्लाय करूं १ कदीखमासमण
को
परिसहे दोय खमासमणे, पांगरपुं संविस्ता
& ? पागरणु पडिग्घाउ ? कदे ए सर्व सामान
कविधि पूर्व को ठे तिमहीज करवो, पण
तनो विठोपवे पसिना
(१७१)
मे, तेमाटें इदांसामायिक दंगक कच्चयां पीछे
शरियावदी नदी पडिक्कमीनें ॥ पीने चैत्यवंद
न, जयवीयराय सूधी करी कुसुमिण उस्समि
ण काउस्सग्ग करे, पी. पडिक्कमणवेलासीम
सिसाय ध्यान करे पी, पूर्वोक्तरीतें पडिक्कमण
करे, पण इतरो विशेष के चारे थुईयें देव वांया
पी. खमासमण देई कदे॥श्चाका० ॥ सं० ॥
नणाबहुवेलं सदिस्सान गुरु कहे, संदिस्सा
वेद पाश्च कदी, खमासमण देई कदे ३
बाका संाना वढुवेलं करुं १ गुरु कदे,
करेद॥प िश्वं कदी, तीन खमासमणे श्री
आचार्यजी मिश्र , श्रीनपाध्यायजी मिश्रश,
त्रीजे सर्वसाधु वादी, कम्मनूमिदि कम्मनूमिर्दि
इत्यादि नमस्कार नणे,जो पडिलेदणवेला नर्दि
हुवे, तो सीमधरस्वामीनुं चैत्यवदनादि करी,
सिसाय करे दवे पडिलेदण वेला पडिलेदण
करतो उच्चरे ।। पी एक खमासमणे॥श्मकार
स० ॥ ॥ सामायिक मुदपत्ती पडिलेड।
खमासमण देई अर्धावनतगात्र जनो थको
तीन नवकार, गुनीतीन करेमि नतेनबरी दोष
चं? सिक्षाय करुकहीखमासमण देई को
(१००)
॥ए पाठ तीन वार गुरुवचन अनुजा
गुरु कहे, पडिलेदेद वीजी खमासमण दे
सुदपत्ती पडिलेहे पीवे दोय खमासमणे सामा
यिक सदिस्साज? सामायिक ठाउं ? कही
खमासमणे बेसणो संदिस्सा बेसणो गई !
कही, पी दोय खमासमणे सिलाय संदिस्सा
P
यको, आठ नवकारनो सिधाय करे शीतावि
परिसहें दोय खमासमणे, पागरणुं संदिस्ता
१ पागरणु पडिग्घाउ ? कदे ए सर्व सामामि
कविधि पूर्वे कह्यो । तिमदीज करवो, पण
(१७१)
बे,तेमा. श्दा सामायिक दमक ऊच्चयां पी,
शरियावदी नदी पडिक्कमीनें ॥ पीने चैत्यवंद
न, जयवीयराय सूधी करी कुसुमिण उस्समि
ण कामस्सग्ग करे, पी. पडिकमणवेलासीम
सिक्षाय ध्यान करे पछि पूर्वोक्त रीतें पडिक्कमण
करे, पण इतरो विशेष के चारे घुईये देव वांद्या
पी खमासमण देई कदे॥श्चाका ॥ सं० ॥
• ना बढुवेलं सदिस्साज गुरु कदे, संदिस्सा
वेद पश्चिं कही, खमासमण देई कहे ३
बाका ॥सं॥ना बढुवेखं करूं ' गुरु कदे,
करेद॥पीले श्वं कही, तीन खमासमणे श्री
आचार्यजी मिश्र , श्रीनपाध्यायजी मिश्र,
त्रीजे सर्वसाधु वादी, कम्मनूमिहिं कम्मभूमिहिं
इत्यादि नमस्कार नणे,जो पडिलेदणवेला नर्दि
हुवे, तो सीमधरस्वामीनुं चैत्यवदनादि करी,
सिसाय करे दवे पडिलेदण वेला पडिलेदण
१
१
॥ए पाव तीन चार गुरुवचन अनुमान
करतो उच्चरे ।। पी एक खमासमणे॥श्मा
स० ॥न । सामायिक मुहपत्ती परिखे।
गुरु कहे, पडिलेदेद, वीजी स्वमासमण दो
मुदपत्ती पडिलेहे. प िदोय खमासमणे सामा
खमासमण देई अर्धावनतगात्र को पको
तीन नवकार,गुनीतीन करेमिनंतेजवरी दोष
खमासमणे वेसणो सैदिस्सा बेसणो गई।
सिवाय करु ? कहीखमासमा देईको
थको, आठ नवकारनो सिचाय करे शीताति
(१७०)
यिक संदिस्सा ? सामायिक गर्ने ? कड़ी
कही, पबि दोय खमासमणे सिसाय संदिस्सा
परिसहे दोय खमासमणे, पागरणु संदिस्ता
न ? पागरणु पदिग्धावं ? कहे ए सर्व ,
कविधि पूर्व कह्यो तिमहीज करवो, पण
तनो विशेप पहिलो
(१७३)
॥ अथ २४ थमिलापडिलेहणपान लिख्यते॥
॥आगाढे आसन्ने उच्चारे पासवणे अण
दियासे ॥१॥आगाढे मद्ये उच्चारे पासवणे
अणहियासे ॥२॥ आगाढे दूरे उच्चारे पासवणे
अणदियासे ॥ ३ ॥ आगाढे आसन्ने पासवणे
अगदियासे॥४॥आगाढे मद्ये पासवणे अ
दियासे ॥५॥ आगाढे दूरे पासवणे अणदि
यासे ॥६॥आगाढे आसन्ने उच्चारे पासवणे
अहियासे ॥७॥ आगाढे मद्ये उच्चारे पासवणे
अदियासे ॥७॥ आगाढे दूरे उच्चारे पासवणे
अदियासेमा आगाढे आसन्ने पासवणे श
दियासे ॥१०॥ आगाढे म पासवणे अदिया
से ॥११॥ आगाढे दूरे पासवणे अदियासे ॥
॥रशाअणागाढे आसन्ने बारे पासवणे अण
दियासे ॥ १३ ॥ अणागाढे मधे बच्चारे पासव
णे अगादियासे ॥ १४॥ अगागाढे दूरे जच्चारे
पासवणे अणदियासे ॥१५॥ अणागाढे आस
F
तो पण सद्दे फेर लखीये ये. दोयखमासमलें, त्तीपडिलेदे पीछे दोय खमासमणेअंग परिले दण सदिस्सानी अग पडिलेवण करु' कहे. पार्वे गुरुवचने श्चकदी धोतियोकणदोरो परि लेद। वस्त्र पदेरी, खमासमण देई इनकार नगवन्! पसाज करी, पडिलेहण करावो जी। एम कदी, स्थापनाचार्य पडिलेदी स्थापे, ने जो गुर्वादिक स्थापनाचार्य पडिलेहे, तो प एखमासमण देशउक्त रीतें आग्या मागे पी में खमासमण दे॥श्चाका० स०॥०॥ उपधि मुदपती पडिलेहूं गुरु कहे, पडिलेदेर पाशा कदी, मुदपत्ती पडिलेही दोय समा (१७२) करे,तेविधिपूर्वआग्रयना ४७ पृष्ठमा सिस्मोठे श्या काणासानणापडिलेदणकरु कहीमुहू १ समणे ॥श्चाका ॥ सं॥न नही हण संदिस्सान ? गुरु कहे, सदिस्सावेद पडिलेदण करु ? गुरु कदे, दोवे, ते दोनुं तरफ पडिलेदे ॥ इति २४ थमि ला पडिलेदणविधि सपूर्ण ॥ पीठे श्वं कदी, कबल वस्त्रादि पडिलेदी पोसद शाला प्रमार्जी काजो विधिशुं परवी, एक ख मासमण देई रियावदी पडिक्कमे. इदा आचा र दिनकरमें कह्यो दोयखमासमणेश्वाकाण॥ सं०॥ना वसती सदिस्सान वसती पडिले हुँ कही वसती मात्रो प्रमुख प्रमार्जे इत्यादि पण विधिप्रपा प्रमुखमें न कह्यो । ॥ हवे एक खमासमणे॥श्चाका॥संपन ॥ सिधाय संदिस्साल ? गुरु कहे, सदिस्सावेद. बीजे खमासमणे ॥ इचाका ॥ सं०॥०॥ सिसाय करु ? गुरु कहे करेद पी श्वं कदी नवकार एक कथन पूर्वक उपदेशमाला प्रमुख सिम्साय करी, नवकार एक कदी धर्मध्यान क रे, नणे, गुणे, वखाण सुणे श्म करता पूर्ण पहुर दिन चल्या. नग्घाडा पोरिसी अथ पागाढे दूरे पासवणे अहियासे ॥२॥ एवं (२७४) ने पासवणे अपहियासे ॥२६॥श्रणागाठे म ये पासवणे अपहियामे ॥ १७॥ अणागाढे दू रे पासवणे अपहियासे ॥रणा अणागाढे था सन्ने नच्चारे पासवणे अहियासे ॥२५॥श्रणा गाढे मद्ये जच्चारे पासवणे अहियासे ॥३०॥ श्रा पागाढे दुरे जच्चारे पासवणे अहियासे ॥२१॥ अणागाढे आसन्ने पासवणे अहियासे ॥२॥ आणागाढे मधे पासवणे अहियासे ॥३॥ मिलपडिलेहण पाठ कह्या ।। ॥ यद चोवीस मिला कहा कहा करना ? सो लिखते हैं ॥ ६ मिला शय्याके दो तरफ दहिणे पासे ३, वामपासे ३, पडिलेदे॥६ दरवकेके भीतर पार्से दहिणे ३, यामें ३ लेदेथिमिला दरवओके भाहर दोनु पासे लेदे।६ थेमिनो जिहां ।
(२७५)
होवे, ते दोनु तरफ पहिलेदे ॥ इति २४ थमि
ला पडिलेदणविधि. संपूर्ण ॥
पीच कदी, कबल वस्त्रादि पडिलेही पोसद
शाला प्रमार्जी काजो विधिशु परमवी, एक ख
मासमण देई शरियावही पडिक्कमे इदा आचा
रदिनकरमें कह्यो दोयखमासमणेश्नाका॥
सं॥नमा वसती संदिस्सा वसती पडिले
हुँ? कही वसती मात्रो प्रमुख प्रमार्जे इत्यादि
पण विधिप्रपा प्रमुखमें न कह्यो ।
॥ दवे एक खमासमणे॥श्चाका॥सपना
॥सिद्याय सदिस्साल गुरु कदे, संदिस्सावेद.
बीजे खमासमणे ॥ श्ाका ॥ सं०॥न० ॥
सिप्लाय करु ? गुरु कहे करेद पी श्वं कही
नवकार एक कथन पूर्वक उपदेशमाला प्रमुख
सिसाय करी, नवकार एक कदी धर्मध्यान क
रे, नणे, गुणे, वखाण सुणे श्म करता पूर्ण
मदुर दिन चळ्या जग्घाडा पोरिसी अथ
.
(१७३)
वा, बहुपडिपुन्ना पोरिसी कही, खमासमण
देई इरियावदी पडिकमी दोय खमासमणे ॥
चाका ॥ सन०॥पडिलेदण करु शु
रु वचने श्च कदी, मुदपत्ती पडिलेही पान
भोजन पात्र पडिलेदी राखे पीके सिवाय
ध्यान करे।
॥ दवे कालवेलाये आवस्सदी पूर्वक देहरे
जई पाचे शकस्त देववांदण विधि दो प्रका
रसें लिखते हैं।
॥तीन प्रदक्षिणा देई तीन वार नमस्कार
करी, नूमि प्रमार्जी, पुरुष दुवे तो प्रनुजीके
दक्षिण पासें बेसे, स्त्री हुवे ते वाम पासें बेसे
पवि॥श्चाकाासनाचैत्यवदनकरूं?
कदी, चैत्यवदनकदे पीवें नमोक्षुण कहे
मणदेशरियावहीपडिकमे एक लोगस्सनो
नस्सग्ग करे मुर्खे लोगस्स कहे
र्जी वेसे तीन तथा चार पांच
(२७७)
कार कदे "ज किंचि नाम तिबं" इत्यादि
पीजे नमोबुणं कहे. जनो थई अरिदत
पाणं करेमि कानस्सग्गं वंदणवत्ती० अन्न
कदी, एक नवकारनो काजस्सग्गकरे पारी
थुश्की गाया कदे ॥ पी. लोगस्स स
गए अरि० वदणव अन्नतू कही एक न
। पारी दूसरी थुईकी गाथा कदे. पी पुस्कर
एदी० मुअस्स नगवदण अन्नलू कदी
क नवकार पारी तीसरी थुईकी गाण्पी सि
हाण बुझाणण्वेयावच्च गराणण्अन्नवूइत्यादि
कयन पूर्वक चोयीशुश्की गाया कद करवैठकें
नमोवूण कदे फेर अरिदंतचेई० कदे इसीतरे
चार घुश्ये देव वादी वेसे ॥ नमोबूण कदे न
मोऽर्दसिक्षाचार्योपाध्याय इत्यादि कही पीढ़ें
स्तवन कहे पीठे जयवीयराय कही नमो
ण सत्वे तिविदेण वंदामि पर्यंत कदे ॥ एम पा
चे शक्रस्तवें देववदन विधि जाणवो॥
(१००)
॥ए विधि प्रवचनसारोकार
ह्यो तथा चैत्यवदन बदनाप्यमे एम
नमस्कार कथन पूर्वक शकस्तव कही,
ची प्रतिक्रमणादि करे; वली नमस्कार
नपूर्वक शक्रस्तव कही दोय वार चार
से देव वादे फेर शक्रस्तव कही "जावति
याई" गाथा नणी खमासमण पूर्वक ज
के बीजी गाथा कही, स्तवन कदे वाली
मोबूणं कदी, जयवीयराय कहे ॥इति
न विधि ॥
॥प निस्सदी पूर्वक पोसहशासा
श्रावी, शरियावदी पडिक्कमे पी सिवाय
न करे, जो तिविहार उपवास कियो हुवे,
पञ्चकाण वेला पूर्ण हुवा जल पीणेतूं
ण पारे ।
॥ इवे पञ्चरकाण पारणेका विधि लिखते हैं।
॥खमासमण देई रियावही
(ए)
क खमासमण ॥श्चा०स०॥॥ पच
काण पारवा मुत्पत्ती पडिलेढुं १ गुरु कदे, प
हलेदेद॥पबिश्च कही खमासमण देई, मुद
ती पडिलेदे फेर एक खमासमण देई,
का० ।। स० ॥न०॥ पाणदार अमुक पञ्च
काण पारुं ? गुरु कहे, पुणोवि कायवो पीय
शक्ति कदी, खमासमण देई ॥श्चाका ॥
10 ॥ न ॥ पाणहार पारु ? गुरु कदे, आया
न मोत्तबो प ितदत्ति कदी, अमुक पञ्च
काण चनविहार कस्यो, एम कदी एक नव
तर गुणी पञ्चस्काण फासिय, पालिय, सोहि
[, तीरिय, किट्टिय, आरादियं, जं च न आ
दिय, तस्स मिठा मिक्कड, कदी॥ चैत्यवद
{ करे दणमात्र सिधाय करी यथासंचवें
अतिथिसविनाग करी पाणीपीवे॥
॥तथा उपधानवाही दुवे, तो पोरिसी प्र
मुख पच्चरकाण पारी आहार करे पनि आ
त्तर, सूर्य, ग्रामादिकने पूछि अण देई, मतमूर्व
(१००)
सण वेठो थकोदीज दिवस चरिम पाले,
रियावदी पडिकमी चैत्यवंदन करे.
त्यवदन आहार संवरण निमित्ते ३ ॥
पच्चरकाण पारणेका विधि ॥
॥पीछे जो बहिमिजावणो हुवे, तो मार
स्सही कदी उपयोगी थको, निर्जीव
जई, अणुजाणद जस्सुग्गहो कही पूर्व,
परिग्वे, प्राशुकजले शुद्ध
थई तीन वार के
सिरामि, एदवं कदिवे करी मल मूत्र
सिरावी, पोसदशालायें निस्सही पूर्वक पेसी
शरियावदी पडिक्कमे खमासमण देई कहे।
इचाका॥ स॥नगमणागमण पाटो
यई 'गुरु कदे, आलोएद पी श्च कही
पागमण आलोवे ॥ ते श्म आवस्सही करी,
प्राशुक देशें जई, समासा पूंजी, थमिलो प
डिलेडी, उचार प्रश्रवण
नो
,
१
(११)
करी, पोसदशालायें आव्यो। आवंति जतेहिं
जं खमियं, ज विरादियं, तस्स मिना मि उक्कडं,
एम कदी वेसे पपिडिलेदण वेला सीम सि
बाय ध्यान करे।
॥ दवे पाग्ले पहुरे इरियावदी पडिक्कमी
खमासमण देई कदे श्वाका० ॥ सं॥॥
पडिलेदण करूं १ गुरु कदे करेह श्वं कदी
दूजे खमासमणे श्बाका ॥ स ॥ न० ।।
॥ पोसदशाला प्रमार्जु ' गुरु कदे, प्रमार्जद.
पनि इचं कदी, मुदपत्ती पडिलेदी दोय खमा
समणे अंग पडिलेदण सदिस्सा अंग पडि
लेदण करु ? कदे. पी. गुरु
मुहपत्ती पडिलेही दमासणो पूजणी प्रमुख
प्रमार्जी पोसदशाला प्रमार्जे. पी काजो
शुरू करी, उधरी, एकाते विखरतो परवी
रियावही पडिकमी, खमासमण पूर्वक कदे ।।
श्वकार नगवन् पसान करी पडिलेदणां पडि
वचनें श्वं कदी
एक खमासमण दे॥श्चाका॥संग
(२२)
लेदावोजी ॥ पीठे स्थापनाचार्य
स्थापे गुरुसमीपे अथवा थापनाचार्य
मुहपत्ती पडिलेहु ? गुरु कहे, पडिलेहेड्
श्व कही खमासमण देई, मुहपत्ती पा.
पीछे दोय खमासमणे॥श्चाकास०॥
सिद्याय सदिस्साज ? सिद्याय करूं ? उक्त ।
क्षणमात्र सिद्याय करीतिविदार उपवास
घो हुवे तो गुरु साखे पाणिहार पञ्चके ।।
पधानवादीप्रमुख आदार कीघो हुवे, तो वो
दणां दोय देई, पच्चस्काण करे पी. एक समा
समण देई ॥श्चाका सं॥न॥ उपाधि
यमिला पटिलेहण संदिस्सालं? बीजे खमास
मणे ॥श्चाका ॥ सं॥॥ उपधि धमि
ला पडिलेढुं गुरुवचनें श्च कदी,दोय खमास
मणे ॥श्याकाण ॥ स० ॥न ॥ वेसणो संवि
स्सान पेसपो गर्न कही
वर
.
( १७३)
पडिलेहे पुजपी दुवे, तो ते पण मुदपत्तीशु
पडिलेदे नपवासी तो तेमाटे सर्व पाने के
डिपट्टो धोतीयो कणदोरो पडिलेहे, उपधानवा
ही प्रमुख भोजन कीधो दुवे तो कडिपट्टादि
पडिलेह्या. पीले वस्त्र कबलादि पडिलेहे ए वि
शेष ॥पी कालवेला सीम सिबाय ध्यान
करे पी नच्चार प्रश्रवण २४ थमिला पडि
लेदे, जो चनदश दुवे, तो पाखी चउमासी प
डिक्कमणो करे, सवबरीये सवबरी पडिकमणो
करे तिदा देवसी पडिकमणो पूर्वे लिख्यो ,
तिमदज करे, पण इतरो विशेष ॥ श्वा० ॥
देवसिय आलोएमि इत्यादि देवसी आलोयां
पी"गणे कमणे चकमणे"इत्यादि पाठ कदे
खुदोवदव कानस्सग्ग किया पीले दोय खमा
समणे ॥श्चाका० ॥सान॥सिद्याय सं
दिस्सान सिद्याय करु 'कदीबैठो थको तीन
नवकार प्रमुख सिद्याय करै॥इति ॥
N
(१४)
॥पाक्षिकादि तीन पडिक्कमणविषि
एदी पुस्तकमे लिख गये है. वहासे
॥ वे पडिकमणो हुवा
पीने
वच्च करी पोरसी सीम सिद्याय ध्यान करे.
सधुनीति प्रमुख करवी दुवे, तो आसा
तो थको, नूमि प्रमार्जे थमिल स्थानके
देवशका निवारे, प्रश्रवण वोसिरावी,
के आवे भगवन् । बहु पडिपुन्ना पोरसी
कही खमासमण देई रियावही पडिकमे
में राईसथारा विधि करे॥
॥ दवे राई सथारा विधि कहे ॥
॥खमासमण देई॥छाका॥सणाला
राइ संथारा मुहपत्ती पडिलेढुं ? गुरु कहे, पर
लेदेद पीच कदी, खमासमण देई मुहपत्ती
पडिलेदे एक खमासमणे ॥श्चाका ॥ स॥
ज०॥रा संथारो सदिस्साचं? वीजे खमास
मणे ॥श्चाका॥स० ॥ न० ॥राईसयारी
?
(२५)
वा' प िगुरु वचने श्चं कही, चनक्कसाय प
डिमनुल्लूरण इत्यादि नमस्कार कथन पूर्वक
जयवीयराय सूधी चैत्यवंदन करे. नूमि प्रमा
र्जी, संथारो उत्तर पट्टो पाथरे पीछे शरीर प्र
मार्जी निस्सही निस्सदी एम कदी संथारे बे
सी,तीन नवकार तीन करेमिनं ते कचरीणमो
खमासमणाणं, गोयमाईणं महामुणीणं, 'अणु
जाणद जिहिजा अणुजाणद परम गुरु' इत्या
दि राइ सथारा गाथा नणी, वाम दाथ सिरा
ऐ देई सोवे निज्ञ नावे जा सीम मुनिवर चरि
घ चिंतवे, पसवाडो फेरे तो शरीर संथारो प्र
मार्जी फेरे, जो देद शकायें ऊ, तो पूर्वोक्त
विधे देदशंका निवारी, शरियावदी पडिक्कमे ॥
पी जघन्ये पण तीन गाथानी सिद्याय करी
सोवे ॥ इति राइ सधारा विधि कह्यो।
॥ दवे रात्रिने पाठिले पदोर कठी, नवका
रादि गुणी, इरियावदीपडिक्कमे खमासमण दे
।। दवे पडिकमणो ढुवा पीनें साधुको
(२४)
॥पाक्षिकादि तीन पडिकमणषि
एदी पुस्तकमे लिखगये है वहासे
.
वञ्च करी पोरसी सीम सिद्याय ध्यान करे.
लघुनीति प्रमुख करवी दुवे, तो
तो थको, नमि प्रमार्जे धमिल स्थानके
देशका निवारे,प्रश्रवण वोसिरावी,
के आवे नगवन् । वह पडिपुन्ना पोरसी
कुली खमासमण देई रियावही पहिकमे में
में राईसथारा विधि करे॥
॥ दवे राई संथारा विधि कहे ॥
॥खमासमण देई॥श्चाका॥सान।
राइ संथारा मुहपत्ती पडिलेहु ? गुरु कहे, पर
लेहेद पी इच कही, खमासमण देई मुहपती
पडिलेदे एक खमासमणे ॥श्वाका० ॥ सं०॥
न० ॥रा संथारो संदिस्साईनीजे समास
मणे ।। श्गका ॥सं० ॥ ॥ गई गंधारो
(१७)
का॥ सं०॥ना पोसह पायुं गुरु कदे,
आयारो न मोत्तबो पीछे तदत्ति कदे.खमासम
ण देई अर्धावनत गात्रे जनो थको तीन नव
कार गुणी, खमासमण देई, मुदपत्ती पडिलेहे,
पवें खमासमण देई कदे ॥श्वाकाण ॥ स० ॥
न०॥ सामायिक पारुं? गुरु कदे पुणोवि काय
यो पीने यथाशक्ति कदी, खमासमण देई॥
नाका० ॥ सं॥न ॥ सामायिक पाखु गुरु
कदे आयारो न मोत्तबो पी तदत्ति कदी ख
मासमण देई अर्घावनत गात्रे उन्नो थको दा
थ जोड्या- मुदपत्ती मुखें दिया थकां तीन न
वकार गुणी संमासा पडिलेदे गोमालीयें वेसी
मस्तक नमावी, “नयवं दसन्ननहो" इत्यादि
नावनारूप गाथा कदे पीठे पोसदना उपगरण
संवरी, देदरे जई देव जुहारे घरे आवी आ
दार निष्पन्न दुवो देखी साधुसमीपे आवे, अ
तिथि सविनागव्रत साचवण निमित्ते साधु न
शाला पूजी काजोकथरीशरियावदीपरिमन
(११)
ई कुसुमिण उस्सुमिण कालस्सग्ग करी
क्त विधे सामायिक लेवे, श्दा २
डिक्कमे पति दोय खमासमणे।
ची आव नवकार गुणी, पडिकमण देखा
सिद्याय करे पडिक्कम वेला दुवा
णो पूर्वली परे करे,पण इतरो विशेष,
आलोया प िसंथारा जवठणकी इत्यादि
व कदे एम संपूर्ण पडिक्कमणो करी
ण वेलायें पूर्वोक्त विधैं पडिहण करी,
दोय खमासमणे सिधाय सदिसावी, उपो
शमाला प्रमुख सिद्याय करे पीछे पोसह
॥ अथ पोसहपारणेका विधि लिखते हैं।
॥ खमासमण देई मुहपत्ती पडिलेहे फेरस
मासमण देई कहे॥श्चाकाण॥॥ ज०।
पोसद पारु' गुरु कहे,पुणोवि काययो पाँच
थाशक्ति कही, खमासमण देई करे॥
(१७)
का ॥ स ॥ना पोसह पायुं गुरु कदे,
आयारो नमोत्तवो पी. तदत्ति कदे खमासम
ण देई अर्धावनत गात्रे जनो थको तीन नव
कार गुणी, खमासमण देई,मुदपत्ती पडिलेदे,
पीने खमासमण देई कदे॥श्चाका ॥ सं०॥
न०॥ सामायिक पारु' गुरु कदे पुणोवि काय
यो पी. यथाशक्ति कदी, खमासमण देई॥
छाका ॥ स॥न० ॥ सामायिक पायुं ' गुरु
कदे आयारो न मोत्तबो पीनें तदत्ति कदी ख
मासमण देई अर्धावनत गात्रे ननो यको दा
य जोड्या- मुदपत्ती मुखें दिया थका तीन न
वकार गुणी समासा पडिलेदे गोमालीयें वेसी
मस्तक नमावी, “नयवं दसन्ननहो" इत्यादि
नावनारूप गाया कदे पीवें पोसदना उपगरण
संवरी, देदरे जई देव जुदारे घरे आवी आ
दार निष्पन्न दुवो देखी साधुसमी आवे, अ
तिथि सविनागवत साचवण निमित्ते साधु न
परि
लेहावो जी. एम कदे, पीछे एक खमासमण दे
(१)
मासमणे वढुवेल सदिस्सावे ॥ ए तीन प्रय
रका विकल्प जाणनां दवे पडिलेडण तो
र्वे करीने, तो पण आदेश मागवो ते एमस
मासमण देई॥श्चाका ॥ सान
लेदणसंदिस्सा वीजे खमासमणे परिखेर
पण करु? कही मुदपत्ती पडिलेदे पा इमडीज
दोय खमासमणे अग पडिलेदण संदिस्सादी
मुदपत्ती पडिलेदे पीने वली खमासमण
चकार नगवन् । पसान करी पडिलेहण परि
ई॥श्चाका० ॥ सं॥न ॥ उपधि मुहपति
पडिलेढुं ? कही कोई वस्त्र प्रणपडिलेहोस
ख्यो दुवे, तो पडिलेदे नहीं तो वली आस
पडिलेढे दोय खमागयों मिटाय निम्मानी
(११)
बिली रातें वली सामायिक न लेवे जिणे दि
स संबंधी चड पुदरी पोसद सीधो हुवे, ते
बले पुदर पच्चरकाण किया, पवि दोय खमा
समणे नदी पडिलेदण संदिस्सान नदी पडि
दण करुं ? कहे,पण थमिला पद न कहे. अ
ने मिला नहीं पडिलेदे यद नि केवल दिन
संबधी पोसह ग्रहण करणेमे विशेष विधि दी,
सो वताई॥ति दिनसबधी पोसद ग्रहणविधि
॥ अथ रात्रि संबंधि चपुरी पोसदनो
विधि कदे दें।
॥तिदां जिणे प्रथम चउ पुदी दिवस पो
सो कच्चयो दे पावें संध्यानी पडिलेदण कर
ता रात्रि पोसदनो नाव थयो, तो पच्चरकाण
किया पी दोय खमासमणे पोसद मुदपत्ती प
डिजेदी तीन नवकार गुणी तीन वार पोसद
दमक बच्चरे तिहां जावरतिं पडवासामि एम
पाउ उच्चरे, पवि सामायिक विधि पूर्वं लिख्यो
दोय खमासमणे अंग पडिलेदण संदिस्सावी
(१०)
मासमणे बदुवेल सदिस्सावे ॥ए तीन प्रका
रका विकल्प जाणनां हवे पडिहण तो प
र्वे करी ठे, तो पण आदेश मागवो ते एमस
मासमण देई॥श्चाका || स॥॥ परि
लेदणसंदिस्सा वीजे खमासमणे परिलेर
ण करुं? कही मुहपत्ती पडिलेदे पनि महीन
मुदपत्ती पडिलेदे पी वली खमासमण देई.
इञ्चकार नगवन् । पसाज करी पडिलेहण परि
लेदावो जी. एम कहे, पी. एक खमासमण के
ई॥श्चाका ॥ सं०॥नाउपधि मुहपति
पडिलेहूं? कही कोई वस्त्र अणपडिलेह्योरा
ख्यो दुवे, तो पडिलेदे नहीं तो वली पास
पहिलेदे दोय खमासमणे सिद्याय संदिस्सानी
उपदेशमाला प्रमुख सिचाय करे आगे
क्रिया पूर्व अव पुरी पोसहमें लिखी है, तिम
दीज जाणवी,पण जहां
(१९३)
रे तिदां दिवसेसंरतिं पडवासामि कदे. सं
या दुवे, तो रतिं पञ्जुवासामि कहे. पी. बि
हुँ खमासमणे सामायिक मुहपत्ती पडिलेदे.
होय खमासमण देई, सामायिक संदिस्सावे
केर खमासमण देई, तीन नवकार गुणी, तीन
करेमि नंते कच्चरे दोय खमासमण देई सिधा
पसंदिस्सावी, आठ नवकार कहे. फेर दो
खमासमण देई, बेसणो सदिस्सावी सीता
दिके बे खमासमण देई, पांगरपुं सदिस्सावे.
पा बे खमासमण देई, अंग पडिलेहण संदि
स्सावी, मुदपत्ती पहिलेदे. फेर बे खमासमण
देई, नदी थमिलां पडिलेदण संदिस्सावी जो
अणपहिलेह्यो उपगरण दुवे तो पडिलेदे. जो
सर्व उपगरण पडिलेह्यां दुवे, तो पण थानक
शून्यता टालवा नणी वली आसण पडिले
ही, पडिक्कमण वेला सीम सिद्याय ध्यान करे
है,तिम करे पण सामायिक उपयां
खमासमणे सिद्याय सदिस्सावीथान
कहीवेसणोसदिस्सावी, पागरण
पीके दोय खमासमणे ॥श्चाका ॥सं०
नही थमिला पडिलेदण संदिस्सा नदी
मिला पमिलेदण करु? गुरु कहे, करे.
ही उपधि पडिलेदे आगे सर्व क्रिया पूर्वे
खी तम जाणवी तथा जे श्रावक जपवासी
व्यग्रपणे दिवसे पोसद न करी शक्यो, ते
त्रि पोसदनो नाव यये, पाबले पहर
नके आवे जो वसती प्रमार्जी दुवे, तो सस्तो,
नही तो वसती प्रमार्जी, काजो परिठवी सर्व
उपगरण पडिलेदी रियावही पडिकमे पी
चनविहार पञ्चकाण करी दोय खमासम
पोसह मुहपत्ती पडिलेदी दोय खमासमण
ई पोसद सदिस्सावे फेर समासमण दे,
तीन नवकार गुणी, तीन वार पोसह दमा
(१ए५)
॥अथ देववांदणमें अथवा प्रातःकाल सं
ध्याकालके प्रतिक्रमणमें कदनेकी स्तुति ॥
॥ तत्र प्रथम बीजकी स्तुति ॥
॥ मदीममणं पुन्नसोवनदेद, जणाणदणं
केवलन्नाणगेहं॥महानद लची बद्दु बुधिराय,
सुसेवामि सीमंधरं तिबराय ॥१॥ पुरा ता
रगा जेद जीवाण जाया, नवस्सति ते सव्व न
वाण ताया ॥ तदा सपयं जे जिणा वट्टमाणा,
सुद दितु ते मे तिलोयपदाणा ॥२॥ उरुत्ता
र ससार कुबार पोय, कलका वली पंकपकाल
तोयं ।। मणोवग्यिवे सुमदारकप्पं, जिणदा
गम वंदिमो सुमदप ॥३॥ विकोसे जिणदा
गणनोजलीणा, कलारूव लावरम सोदग्ग पी
णा ॥ वद तस्स चित्तमि णिच पिकाण, सिरी
नारई देदि मे सुइनाण ॥४॥ इति श्रीसीम
वरजीनी स्तुति ॥१॥
(२४) पीठ उच्चार प्रश्रवणना २४ मिला ही पडिक्कमणो करे तथा पाली रातें सामायिक न लेवे इतनां निकेवल पोसद लेवाना विकल्प जाणवा ॥ इति पोसदविधि संपूर्ण ॥ ॥ अथ गणेकमणे चंकमणे लिख्यते।। ॥ गणेकमणे चंकमणे आजते अणावे हरिप्रकायसघढे बीयकायसंघठे थावरकर संघहे बप्पश्यासघहे सवस्सवि देवसिड, । चिंतिय नासिय चिहिश्र ॥ इलाकारे संदिस्सद, श्व तस्स मिठा मि उकडं ॥१॥ सथाराजवट्टणकी, आजहणकी, परिश्रमणकी, पसारणकी, ठप्पश्यासंघट्टणकी, अवकुक्ति यकायकी, सधस्सविराश्य, उचिंतिथ, जा सिअ, उचिघ्यि, इछाकारेण संदिस्सर कई तस्स मिठा मि उकई ॥१॥इति।
(१७)
लिका, पंचम्यादितपोवतां नवतु सा सिहायि
का नायिका ॥ ४॥ इति श्रीज्ञानपंचमीस्तुति ॥
॥ अथ अष्टमीस्तुतिः॥
चनवीसे जिनवर,प्रणमुहूं नितमेव ॥ आ
उम दिन करियें, चानुनी सेव ॥ मूरति मन
मोदे,जाणे पूनिम चंद॥दीनां उख जाये,पामे
परमानंद ॥१॥मिलि चोसह इं, पूजे प्रनु
'जीना पाय ॥ इंजणी अपक्चर, कर जोडी गुण
गाय ॥नंदीश्वर घी मिलि सुरवरनी कोड ॥
अहार मदोतव, करता दोडा दोड ॥२॥ शे
त्रुजा शिखरे, जाणी लान अपार ॥ चनमार्से
रदिया, गणधर मुनि परिवार ॥ नवियणने ता
रे, देईधरम नपदेशदूध साकरथी पण,वाणी
अधिक विशेष ॥३॥पोसो पडिक्कमj, करि
ये व्रत पञ्चरकाण॥आठम तप करतां,आपक
रमनी दाण ॥ आठ मगल थाये, दिन दिन
चानुत्तरसीमदिव्यपदवीवश्याय मन्त्रोत्तममा
नप्रोज्ज्वलपचमीवरतपो व्याहारि तत्कारिणां,
प्राप्ता गतिं पचमी,तेऽमी सतु सुपंचमीव्रतनृता
॥ अथ पंचमीस्तुति ॥
॥ पंचानंतकसुप्रपंचपरमानंदप्रदानक्षम,
श्रीपंचाननलाउन स तनुता श्रीवर्धमान मि
यम् ॥१॥ये पचाअवरोधसाधनपरा पंचत्र
मादीदरा,
पंचायुवतपचसुव्रतविधिप्रकाप
नासादराः ॥
कृत्वा पंचज्ञषीकनिर्जयमथो
तीर्थकरा शकरा ॥२॥ पंचाचारधुरीण
मगणाधेशेन संसूत्रितं, पंचज्ञानविधारसा
रकलितं पचेषुपंचत्वदम् ॥ दीपा गुरुपंवमा
रतिमिरेप्वेकादशी रोहिणी, पंचम्यादिफल
प्रकाशनपटुं ध्यायामि जैनागमम् ॥३॥ पंचा
नां परमेष्ठिना स्थिरतया श्रीपंचमेरुधियां,
जताना नविनां गृहेषु बटुशो या पंचदिव्य मा
धात प्रहो पंचजने मनोमतम्तो स्वारमपणा
, (१एए) ॥अथ पार्श्वजिनस्तुति ॥ हरिगीत बद ॥ ॥कि धपमप, धुधुमि धोंधों, ध्रसकिधर, धपधोरवं॥दोंदोंकि दो दों,दाग्डिदिदाग्डिदिकि, मकिणरण,शेणाममि कि शशकणार गरण,निजकि निजजन,रजनं॥सुरशैल शिखरे, भवतु सुखदं, पार्श्वजिनपतिमानं ॥१॥ क टरेगिनि योगिनि, किटति गिग्डदा,धुधुकि धुट नट,पाटवंगुणगुणण गुणगण,रणकि ऐणे,गुण णगुणगण,गौरवं ॥ कि कि कें,ऊणण रणार रण, निजकि निजजन, सङना॥कलयंति कम ला,कलितकलमल, मुकलमीश,मदेजिना ॥२॥ कि कि ,वकि नझिक,पिट्टा,ताड्यते॥ तललोंकिलोलो,नेपित्रेषिनि,मेपिमेपिनि,वाय ताकि ,युगि थुगिनि,धोगिधोंगिनि, कलरवे॥जिनमतमनतं,मदिम तनुता, नमति सु रनर,मुवे ॥ ३ ॥ पुदाकि पुंढा, पुपुदि पुदां पुपुदि दोदो,अवरे॥चाचपट चचपट,रणकि णे (१) कोडि कल्याण ॥ जिन सुखत्रि कहे, म त जनम प्रमाण ॥इति अष्टमी स्तुति ।। ॥ अथ मौनैकादशीस्तुति ॥ ॥ अरस्य प्रव्रज्या नमिजिनपतेनिमतुष्ट तथा मल्लेर्जन्म व्रतमपमल केवलमले। वसई कादश्या सदसि लसज्दाममइसि, हितौ । ल्याणानां क्षपति विपद पचकमद ॥१॥ वैश्रेण्यागमनगमनैमिवलय, त्येवाहमहमिकया यत्र सलयं ॥ जिनानामप्या पु दणमतिसुखं नारकसद , दिती ॥२॥ जिना एव यानि प्रणिजगारात्मीयसमपे, फलं यत्कर्तृणामिति च विदित शुइसमये । निष्टारिटाना दितिरनुनवेयुर्वदुमुद , हि ॥३॥ सुरा सेजा सर्वे सकलजिनयंप्रमुदिता, स्तयाच ज्योतिप्काखिलजवननाथा समुदिता ॥ तपो यत्कर्तृणा विधति मुख विस्मितमा क्षितौ ॥४॥इति सदा स्वर्ग
(२०१)
थी करिये, नव आविल नव दिवसें जी ॥ तेर
सहस वलि गुणिये गुणगुं, नवपद केरो सारो
जी॥ण परि निर्मल तप आदरिये, आग
म साख उदारो जी॥३॥ विमल कमलदल
लोयण सुदर, श्रीचक्केसरि देवी जी|नवपद से
वक नविजन केरां, विघ्न दरो सुर सेवी जी॥
श्रीखरतर गड नायक सदगुरु, श्रीजिननक्ति
मुणिदा जी॥तासु पसायें श्णपरि पनणे, श्री
जिन लान सूरिंदा जी॥४॥इति श्रीनवपद
॥अथ पङसणकी स्तुति ॥
॥ वलि वलि हुँ ध्या गाजं जिनवर वीर,
जिनपर्व पजसण, दाख्या धरमनी शीर ॥ आ
षाढ चौमासे इंती दिन पचास, पडिक्कमण
सवचरी करिये त्रण नपवास ॥२॥ चनवीशे
जिनवर पूजा सत्तर प्रकार, करियें जलें नावें
भरिये पुण्य नंमार ॥ वलि चैत्य प्रवाहें फिरता
लान अनंत, इम परव पजूसण सढुमे मदि
पमगरस,सस ससस सुर,सेवता।जिननावार
गे, कुशलमुनि शं, दिशतु शासन,देवता ॥
(२०)
णे, मणण मे,मवरे ॥ तिदा सरगमपधुनि,निय
इति श्रजिनकुशलरिजीकृत पार्श्वजिन ।
॥ अथ आबिलकी स्तुति ॥
॥ निरुपम सुखदायक जगनायक सायक
शिवगति गामी जी, करुणासागर निजगुण
आगर शुन समता रस धामी जी॥ श्रीसिक
चक्र शिरोमणि जिनवर ध्यावे जे मन रंगे जी,
ते मानव श्रीपाखतणी परें पामे सुख सुर
जी॥१॥ अरिदत सि आचारिज पाठक,सा
धु महा गुणवता जी॥ दरिसण नाण चरण तप
उत्तम, नवपद जग जयवता जी। एहनु ध्यान
धरता लदियें, अविचल पद अविनाशी जी,
ते सघला जिननायक नमियें, जिणे एनीति
काशीजी॥ ॥ श्रासूमास मनोहर तिम
लि,चैत्रक मास जगीशें जीउजवालीसातन
संगै
(२०३)
मुनिवरू, चनवीस जिणवर तेद वदू सयल स
घे
सुखकरू॥३॥ ग्यार अंग उपाग बारे
दश पयन्ना जाणिये, बछेद ग्रंथ प्रसन अद्या
चार मूल वखाणिये॥अनुयोग हार उदार न
दीसूत्र जिनमत गाश्ये, एद वृत्ति चूर्णी ना
प्य पैंतालीश आगम ध्याश्ये ॥३॥ उडु दि
सें बालकदोय जेदने सदा नवियण सुखकरू,
जुख दरें अबा लुंब सुदर उरिय दोदग अपद
रू॥गिरनार ममण नेमि जिनवर चरणपकज
सेविये, श्रीसघ सद्भुनें सदा मगल करो अवा
देवियें ॥४॥ इति गिरनारममण श्रीनेमिः ॥
॥ अथ दीपमालिकास्तुति ॥
॥ पापायां पुरि चारुषष्टतपसा पर्यकपर्या
क्ष्मापालप्रनुदस्तपालविपुलश्रीशुल
शालामनु ॥ गोसे कार्तिकदर्शनागकरणे तू
रिकाते शुने, स्वातौ य शिवमाप पापरदि
त सस्तौमि वीरप्रनुम् ॥१॥ यजर्नागमनोभव
सन,
चाय, श्रीकल्पसूत्र जिदां सुणता पाप पुटार मावत ।। ।। पुस्तक पूजावी नव वाचना। ॥प्रतिदिन परजावना धूप अगर नस्केवान जविया प्राणी परव पजूसण सेव ॥३॥वधि सादम्मीवाल करिये वारं वार, के भावना सण एम सेवत आणद, सुयदेवी सानिध कर जिनलान सूरिंद॥ ॥ इति श्रीपर्युषणप०॥ अदोनित, घनसघनश्याम शरीर सुंदर श ख लंपन शोभितं ॥शिवादेवि नदन त्रिजग (२०१) नावे के तपसी शिलधार ॥ अडदीह पूज ॥ अथ नेमनाथजीकी स्तुति ॥ सुर असुर वदिय पाय पंकज मयणमक्ष वदन नविक कमल दिनेश्वर, गिरनार गिरि वर शिखर वदू नेमिनाथ जिनेश्वरम् ॥१॥ टापदें श्रीआटिजिनवर वीर जिन पावापुरे, वासुपूज्य चंपापुरिय सीधा नेम रेवय गिरिव समेतशिखरे वीम जिनबर
(२०५)
॥ पुरव विदेहें विजय नली पुष्कलावई नाम,
जिहां विचरे जिनवरजी धन ते नयरी गाम ॥
॥॥धन ते लोक सुणे जे जोजनगामिनी वा
ण, धन ते मदियल चरण धरे जिदा जिनवर
नाण ॥धन ते नविजन जे रदे प्रनु तादरे प
रसंग,वदनकमल निरखी नित्य माणे उत्सव अं
गाशसुगुरु मुखें प्रनु सुजस तुम्दीणो सानल
कान, मिलवाने उलसे मन मादरुं धरूं एक
ध्यान ॥ नगति [गति करवानी ने मुझ सघ
ली जोड, पण प्रनु लग पहूंचीजें तेद नर्दि
पग दोड ॥३॥ आमा मूंगर अति घणा विच
वदे नदियां पूर, किम मुझथी अवराये प्रनुजी
एटसी दूर ॥आरखडली उलको करे जोयवा
मुख जिनराज, पाखडली पाई नदि ते विन
किम सरे काज ॥४॥ वाटहली वहतो कोई न
मिले सेंन साथ, कागलियो लिख आ हूँ
जिम तेदने दाथ ॥ जाणू शशदर साथे कर्दु
तिरदो चक्रे महस्तत् दणात् ॥श्रीमन्मानिन अर्थात्पर्वमिदं जगाद जिनप श्रीवईमानानि (२०४) व्रतवरझानादराप्तिक्षणे, संनूयाशु सुपर्वसंत वादिवीरचरमास्ते श्रीजिनाधीश्वरा, संपाय नघचेतसे विदधता श्रेयास्यनेनासि च ॥३॥ ध, स्तत्पश्चाजणनायका विरचयांचक्रुस्तरां ५ त्रत ॥ श्रीमत्तीर्थसमर्थनैकसमये सम्यगा शा नूस्टशा, नूयामावुककारकप्रवचनं चेत श्चमत्कारि यत् ॥३॥ श्रीतीर्थाधिप तीर्थनाय नपरा सिहायिका देवता, चंचच्चक्रधरा सुरा सुरनता पायादपायादौ ॥ अईन श्रीजिन चगीस्सुमतिनो भव्यात्मन प्राणिनो, या चक्रेऽवमकटहस्तिनिधने शार्दूलविक्रीरितम्॥ ॥४॥ इति दीपमालिकास्तुतिः ।। ॥ अथ पञ्चतिर्योका स्तवन ।। ॥ सुगुण सनेदी साजण श्रीसीमधरस्वाम, अरजमणो एकजगगरुमक (२७) जाणे दजूर ॥ए॥ शिव सुखदायक नायक लायक स्वामि सुरग, ध्यायक ध्येय स्वरूप लदे निज आत्म उमंग ॥ सहिजे एक पलक जो थाये प्रनु तुझ संग, लान नदयजिन चs लदे नित प्रेम अनंग ॥ १०॥ इति श्रीसीम धर स्वामी स्तवनं॥ ॥अथ वीजो स्तवन। ॥सफल संसार अवतार ए हु गj, सामि सीमधरा तुम्ह नगते नपुं ॥ नेटवा पायकम ल नाव दियडे घणो, करिय सुपसाय जे वीन तु ते सुणो ॥१॥ तुम्दशुं कूड अरिदंत शु रा खिये, जिस्यो अतिस्यो कर जोडि करि नाखि ये ॥ अति सवल मुफ दिये मोद माया घणी, एक मन नगति किम करू त्रिनुवन धणी ॥२॥ जीव प्रारति करे नव नवी परिगडे,रीश चट को चढे लोन वयरी नडे । नयण रस वया रस काम रस रसीयो, तेम अरिदंत तूं दीयडे
पावन याय ॥ सादिबनी तो सुनजर सपने
शु साची प्रीत, गुण गुणवतना आवे हियो
(२०६)
सदेशा जेद, पण अलगो थई ऊपरि वाडेनि
कले तेद ॥५॥जो कोई ति प्रनुजी तुमची
एथ अवाय, तो इण भरतना वासी विजय
सरिखी होय, पण पोतानी प्राप्ति सारू फार
प्रति जोय ॥६॥ अलगो पण माहरे हुन
P
खिण खिण चित्त ॥ हुँवं सेवक तुं ने माहरो
पातमराम, नदिय विसारूं जीवं ज्या प्लामि
दरु नाम ॥ ७॥साचे दिलथी मुकशुल
धरम सनेह, करुणाकर प्रनु करजो मोर
दिर अछेद ॥ दूसम काल तणो इस
P४ दीन दयाल, पालो विरुद संभालो निय
॥४॥ कृपाल ॥ ७॥ आशवितुझा मात्र
।ण करे अरदास, पण महोटानी मदिर
॥ सुन्वे याय निराश ॥ बसे अनुपात
अरज मुंठे दूर, राजमदिरनी र सामने
(२०५) मरगिरि वेगलु ॥७॥ भोलिडा नगति तूं चित्त हारे किस्ये, पुण्य संयोग प्रनु दृष्टिगोचर दु स्ये ॥ जेदने नामें मन वयण तन उल्लसे, दूर थी टूकडा जेम दियडे वसे ॥ ए॥नल नलो एणि संसार सदुए अ, सामि सीमंधरा ते सह तुम प ॥ ध्यान करता सुपनमादि श्रा वी मिले, देखिये नयण तो चित्त आरति टले ॥ १० ॥साम सोहामणा नाम मन गदगदे, तेदशु नेद जे वात तुम्द जी कहे ॥ तुम्द पय नेटवा अति घणो टलव, पख जो होय तो सदिय आवी मिलुं ॥११॥ मेरुगिरि लेखणी आन कागल करु, वीरसागर तणा दूध खडि या नरुं ॥ तुम्ह मिलवा तणा सामि संदेशडा, ३७ पण लखिय न शके अ एवडा ॥२॥ आपणे रंग भरि वात मुख जेटली, कपजे सामि न कदाय मुख तेटली ॥ सुपो सीमंधरा राजराजेसरा, लाम ने कोड प्रनु पूर सवि .
रो धरू, मूढ मन रीझवा वलिय माया करूं ।
तूंदि अरिहंत जाणे जिस्यो आचरू, तेम .
सुख ने ख जे ढु सहूं, मन तणी वात परिर
नवि वसीयो ॥३॥ दिवस ने राति रिपडे बने
र जेम ससार सागर तरूं॥४॥ कम्मवासि
त किएने कदू॥करि दया करि मया देव
रुपा परा,ऽख दार सुरू कर सामि सीमंध
रा॥५॥जाण संयोग आगम वयण पण म
अरिदंत तू देव बीजो नदि, एद आधार जम
जापाजो अम्द सही॥६॥धा काय माप
पिय पुत्त परियण सदू, इस्यो बोल्यो रम्पो
रग रातो बढू॥जयो जयो जगगुरु जीव जीप
न धरा, तुम्द समो वड नदिं अवर वाल्देसरा
॥७॥ अमिय सम वाणिजाए सटा सान,
नारवर परपदामादि आवी मिलु ॥ चित्त जा
एं सदा सामि पाय उलयं, किम कर वाम '
णु, धर्म न कराय प्रनु पाप पोतें घj ॥ एक
(ए) मरगिरि वेगलु ॥७॥नोलिडा नगति तूं चित्त हारे किस्ये, पुण्य सयोग प्रनु दृष्टिगोचर दु स्ये ॥ जेदने नामें मन वयण तन उल्लसे, दूर थी इकडा जेम दियडे वसे ॥ए॥नल नलो एणि ससार सदु ए अबे, सामि सीमंधरा ते सद तुम परें ॥ ध्यान करता सुपनमादि आ वी मिले, देखियें नयण तो चित्त आरति टले ॥१०॥ साम सोदामणा नाम मन गदगदे, तेदशु नेद जे वात तुम्द जी कदे ॥ तुम्द पय नेटवा अति घणो टलवर्नु, पख जो दोय तो सदिय आवी मिलु ॥११॥ मेरुगिरि लेखणी आन कागल करूं, क्षीरसागर तणा दूध खडि या नरु ॥ तुम्द मिलवा तणा सामि सदेशडा, इं पण लखिय न शके अठे एवडा ॥२२॥ आपणे रग नरि वात मुख जेटली, ऊपजे सामि न कदाय मुख तेटली॥ सुणो सीमंधरा राजराजेसरा, लाम ने कोड प्रनु पूर सवि
कम्मपसि
देवक
जेदने, समरिये एणि ससार निया कह।
ध्यान दियडे वस्यु, बापड्ड पाप हित शरिर
नय टालशु॥१६॥ तुम्द हुदास हूँ तुम्हसे
मादरा ॥१३॥ पुष नवि मोटापा
हने मोर जिम कमल नमरो मो, तेम:
त त चित्त मोरे गमे ॥१४॥खत
रशे किस्यु ॥ वाम जिम गरुडवर पो
वही, ततखिण सर्पनी जाति न शमीम
॥ १५॥ पाप मे कऊ सावक सदु परिहरी,स
मि सीमधरा तुम्ह पय अणुसरी ॥ शुद्ध पा
रित्र कहियें प्रनु पालशु, उख नमार संसार
वक सही, एद मे वात अरिहंत आगल कड़ी
॥ एवडी मादरी नगति जाणी करी, श्रापजो
वापजी सार केवल सही ॥१॥ कलश ॥एम
शदिदि, समृदि कारण, उरित वारण,सुख
करो॥उवमाय वर श्री,नक्ति खाने, थुएयो श्री,
सीमंधरो॥ जय जयो जगगुरु,जीव जीवनक
(a)
मरगिरि वेगखें ।पणी॥ कर जोडि वलि वलि,
हारे किस्ये, पुर आशा, मन तणी ॥२॥ इति
स्ये ॥ जेदने निी स्तुति सपूर्णा ॥
थी ठुकडा उंचमी ६ स्तवन प्रारन ॥
एणि ससायु श्रीगुरु पाय, निर्मल न्यान नपा
सह तुम ।मे तप नणु ए, जन्म सफल गिणुं ए
वी मिल्पनवीसमो जिनचद, केवल न्यान दि
पद ॥ त्रिगडे गद गह्यो ए, नवियणने कह्यो
ए॥॥न्यान वडू ससार, न्यान मुगति दा
तार ॥ न्यान दीवो कह्यो ए, साचो सर्दह्यो
ए॥३॥ नयन लोचन सुविलास, लोकालो
क प्रकाश ॥न्यान विना पशु ए, नर जाणे कि
श्यु ए॥४॥ अधिक आराधक जाण,नगवती
सूत्र प्रमाण ॥ न्यानी सर्वतु ए, किरिया देश
तु ए॥५॥न्यानी श्वासोचास, करम करे जे
नास ॥ नारकीने सही ए, कोड वरस कदी ए॥
॥६॥न्यान तणो अधिकार, बोल्या सूत्र मका
(२१२)
र॥ किरिया के सदी ए, पण पा करी ॥
॥ ७ ॥ किरिया सहित जो न्यान, दुवे तोल
ति परधान ।। सोनो ने सुरो ए, शंख दूधै ना
ए॥७॥ मदानिशीय ममार, पांचमि ।
दर सार ॥ नगवत नाखीयो ए, गणपर
साखियो ए॥ ए॥
। ढाल दूजी ॥ कालदरानी देशी॥
। पाचमि तप विधि सजिलो, जिम पामो
नवपारो रे ॥ श्रीअरिहंत श्म उपदिशे, जवि
यणने दितकारो रे॥पा॥१॥मिगसर मा
ह फागुण नला, जेठ आषाढ वैशाखो रे।
श्ण षटमासें सीजिये, शुभदिन सद्गुरु सासो
रे।। पा० ॥२॥ देव जुहारी देहरे, गीतारष
गुरु वंदीरे॥पोथी पूजो ग्याननी, सगति
वे तो नदी रे ॥ पां० ॥३॥ कर जोडीमा
पशु, गुरु मुख करो उपवासो रे॥पांचमि परि
कमणो करो, पढो पमित गम
(२१३)
॥४॥जिण दिन पांचमि तप करो, तिण दिन
आरंन टालो रे ॥ पाचमि स्तवन थुई कहो,
ब्रह्मचरिज पिण पालो रे।पां ॥५॥ पाच मास
सघुपंचमी, जावजीव उत्कृष्टी रे ॥पाच वरस
याच मासनी,पाचमि करो शुनदृष्टि रे॥पा॥
॥ ढाल त्रीजी॥जल्लालानी देशी॥
॥हिव नवियण रे पाचमी उजमणो सुणो,
घर सारू रे वारू धन खरचो घणो॥ए अव
सर रे आवंता बलि दोदिलो, पुण्यजोगें रे
धन पामंता सोहिलो॥जल्लालो॥ सोदिलो व
लिय धन पामता पण धर्मकाज किदा वली,
पाचमीदिन गुरु पास आवी कीजीयें कालस्सग्ग
रली॥त्रण ज्ञान दरिसण चरण टीकी देश पु
स्तक पूजिये, थापना पदिली पूज केसर सुगुरु
सेवा कीजियें ॥२॥ ढाल ॥सिधातनीरे पाच प्र
तिवीटागणा, पाच पूग रे मखमल सूत्र प्रमुख
तणा ॥ पाच मोरा रे लेखण पाच मजीसणा,
बारपारे कांबी वारू बतरणा माला।
बतरणा वारू बली द कमली पाच किलमिव
पच नवकरवालिया, इण परे श्रावक करे
(२२४)
अति नली, स्थापनाचारिज पाच वणी ४
हपत्नी पडपाटलीपटसूत्र पाटी पंच कोषल
चम ऊजमगुंजवालिया ॥ ढालावलि देर
रेरे स्नात्र महोत्सव कीजियें, घर सारू रे दान
वस्तीतिदा दीजिये॥प्रतिमानी रे आगल
वणु दोश्य, पूजाना रे जे जे उपगरण जोयें
। उल्लालो। जोश्ये उपगरण देवपूजा काजक
लश नृगार ए, आरति मङ्गलथाल दीवो धूप
घाणु सार ए ॥ घनसार केशर अगर सूखा
अगखूणुं दीस ए, पच पच सघली वस्तु
ढोवो सगतिशंपचवीश ए॥३॥ ढाल॥ पांचनि
नारे सहाम्मी सर्व जिमाडिये,रात्रिजोगेंरेगीत
रसात गवाठिय॥ण करणारे करता ज्ञान
पाराधिये, झान दरिसण रे
डो
(२१५)
धिये ॥ उल्लालो॥ साधियें मारग एद करणी
ज्ञान लदिये निरमलो, सुर लोक में नरलोक
मांदे झानवत ते आगलो॥ अनुक्रमे केवल
झान पामी सासता सुख जे लदे, जे करे पां
चमी तप अखमित वीर जिणवर इम कदे ।
॥४॥ कलश ॥ एम पंचमी तप, फल प्ररूप
क, वर्षमान, जिणेसरो॥में थूण्यो श्री,अरिहंत
नगवंत, अतुल बल,अलवेसरो॥ जयवंत श्री
जिन,चंद सूरिज,सकल चद,नमसियो॥वाचना
चारिज, समयसुंदर, नगति नाव, प्रशसियो॥
॥३५॥ इति श्रीपचमीट इस्तवन संपूर्णम् ॥
॥ अथ पार्श्वजिन अथवा लघुपंचमी स्तवन ॥
॥पाचमि तप तुमे करो रे प्राणी, निर्मल
पामो ज्ञान रे॥ पदितुं ज्ञान ने पवें किरिया,
नहिं को ज्ञान समान रे ॥ पा॥१॥ नंदि
सूत्र में ज्ञान वखाएयु, ज्ञानना पच प्रकार रे ॥
मति श्रुत अवधि अने मन पर्यव, केवल ज्ञा
रेपा० ।। ३ ।। च सूरज ग्रह नहात्र तारा,
(२१६)
न श्रीकार रे॥पा०॥॥मतिमाशाम
त चवटे वीग, अवधि असत्य प्रकार रे॥
दोय भेट मन पर्यव दास्यु, केवल एक प्रकार
तेशु तेज आकाश रे। केवल ज्ञान सर्मुन
हिं कोई, लोकालोक प्रकाश रे॥ पाण॥!
पार्श्वनाथ प्रसाद करीने, महारी पूरो उमेव
॥ समयसुदर कदे तु पण पामुं, झाननो पंच
मो नेद रे॥पा ॥५॥ति श्रीपार्श्वजि ।
॥ अथ पार्श्वजिनस्तवनम् ॥
॥अमल कमल जिमघवल बिराजे, गाजेगोरी
पास । सेवा सारे जेहनी, सुर नर मन परिष
उल्लास ॥२॥सोनागीसाहिब मेरा बे, अरिहा
सुग्यानी पास जिपदावे॥ए थाकणी मुंबर
सूरति मूरतिसोहे,मोमन अधिकसुहाया पक्ष
क पलकम पेरखता मार्नु, नव नविनविय देखा
य॥३॥ सोना । थ०॥नरखजनज
(२१७) नमनरंजन, खंजन नयनशुं रंग ॥ श्रवण सु पी गुण तादरा, मादी विकस्यां अगो अंग ॥३॥ सो ॥ अ० ॥ दूरथकी हुँ आयो वदिने, देव लह्यो दीदार ॥प्रारथिया पदिडे नदिं, सा दिबा एक उत्तम आचार ॥४॥ सो॥०॥ अनु मुखचद विलोकित हरषित, नाचत नयन चकोर ॥ कमल दसे रवि देखिने, जिम जलधर आगम मोर ॥५॥ सो॥ण किसके हरि हर किसके ब्रह्मा, किसके दिलमे राम ॥ मेरे मनमे तुं वसे,सादिब शिवसुखनोदी नाम सोग ॥अ॥६॥ माता वामा धन्य पिता जसु, श्रीम श्वसेन नरेश ॥ जनमपुरी वणारसी, धन धन काशीनो देश सोणाअ॥ सवत सतरेशें बावीशे,वदि वैशाख वखाण॥आम दिन नले नावशु, मारी जात्र चढी परिमाण ॥ सो० ॥ अ॥७॥ सान्निध्यकारी विघ्ननिवारी, परजप गारी पास ॥श्रीजिनचद जूदारता, मोरी सफ
सादिबनो लदी जी, कुण ल्ये राक मनाय।
वि०॥३॥ रत्न ते कृण काचने जी, अखये
पसारे दाय॥ कुण मुरतरुथी कठिन जी, बाव
(२१०)
ल फली सह श ।सो अति
॥ अथ विमलजिनस्तवनम् ॥
।। घर अगण सुरतरु फल्यो जी, कवक
नक फल खाय ॥ गयवर वाध्यो बारणे जी, स
र किम आवे दाय ॥२॥विमलजिन महारी तु
म्हशु प्रीति, सुर सकलकित\ मिस्यां जी,
दियड हीसे केम ॥ वि॥२॥ मन गमता
वा सदी जी, कृण खल खावा जाय ॥ श्रादर
मे
लघाले बाथ ॥विधा देव अवर जो हुं कर
जी, तो प्रनु तुमची आण॥श्रीजनराज जवो
नवे जी, तुदिज देव प्रमाण विवाति ।
।। अय एकादशी वृक्ष स्तवनं ।।
॥ समवसरण वेता नगवत, धरम प्रकाशे
नीअरिदत ॥ वारे परपटा चैतीजी
(१५)
र शुदि ग्यारश वडी ॥२॥ मल्लिनाथना तीन
कल्याण, जनम दीदा ने केवल ज्ञान ॥ अर
दीक्षा लीधी रूवडीमााशानमिने छपनु के
वल शान, पाच कल्याणक अति परधान ॥
ए तिथिनी मदिमा एवडी॥ मा० ॥ ३॥ पाच
नरत ऐरवत श्मदीज, पाच कल्याणिक दुवे
तिमदीज ॥ पचासनी सख्या परगडी॥ मा॥
॥४॥ अतीत अनागत गणता एम, दोढशें
कल्याणक थाये तेम॥ कुण तिय ने ए तिथिजे
वडी ॥मा ॥५॥ अनंत चोवीशीण परें
गिणो,लान अनत उपवासा तणो॥ ए तिथि
सदु तिथि शिर राखडी॥ मा॥ ६॥ मौनप
रह्या श्रीमल्लिनाथ, एक दिवस संयम व्रत
साथ ॥ मौन तणी परिव्रत श्म पडी। मा॥
॥७॥ अव पुदरी पोसो लीजिये, चोविदारवि
घिशु कीजियें ।। पण परमाद न कीजें घडी।
॥माणात ॥ वरस ग्यार कीजें उपवास, जाव
हिय हीसे केम ॥ वि०॥३॥मन गमता में
वा लदी जी, कुण खल खावा जाय।।श्रादर
वि०॥३॥रत्न ते कुण काचने जी, अलबे
(२२)
ख फली सदु आश। सो॥ अति
॥ अथ विमलजिनस्तवनम् ।
॥ घर अगण सुरतरु फल्यो जी, कवण
नक फल खाय ॥गयवर वाध्यो बारणे जी, स
र किम आवे दाय ॥१॥ विमलजिन महारी तु
म्हश प्रीति, सुर सकलकितशु मियां जी
साहिवनो लही जी, कुण ल्ये राक मनाय।
पसारे दाथ ॥ कुण सुरतरुथी कविन जी, बराब
लघाले बाथ विणा देव अवर जो हुंकर
जी, तो प्रनु तुमची आण॥श्रीजिनराज नवो
नवें जी, तुदिज देव प्रमाण ॥वि०॥५॥ इति ।
॥ अय एकादशी र स्तवनं ॥
॥ समवसरण वेगा भगवत, धरम प्रकाश
श्रीअरिहंत ।। वारे परपटा मैगजुरी.
(१ए)
र शुदि ग्यारश वडी ॥१॥ मल्लिनाथना तीन
कल्याण, जनम दीक्षा ने केवल झान ॥ अर
दीक्षा लीधी रूवडी॥माणाशा नमिने कपनु के
वल झान, पाच कल्याणक अति परधान ॥
ए तिथिनी महिमा एवही॥ मा ॥३॥पांच
भरत ऐरवत इमदीज, पाच कल्याणिक दुवे
तिमहीज ॥ पचासनी सख्या परगडी॥ मा॥
॥४॥ अतीत अनागत गणता एम, दोढरों
कल्याणक थाये तेम ॥ कुण तिथए तिथिजे
वडी ॥माण ॥५॥ अनत चोवीशीण परें
गिणो,लान अनंत उपवासा तणो॥ ए तिथि
सद् तिथि शिर राखडी ॥ मा॥६॥ मौनप
णे रह्या श्रीमल्लिनाथ, एक दिवस संयम व्रत
साथ ॥ मौन तपी परिव्रत श्म पडी। मा।
॥७॥ अव पुदरी पोसो लीजिये, चोविहारवि
घिशु कीजिये। पण परमाद न कीजें घडी।
॥ मागावरस इग्यार कीजें उपवास, जाव
वा लदी जी, कुण खल खावा जाय॥श्रादर
(२१०)
ल फली सटु श्राश ॥ सोगा अपमातिा
॥अथ विमलजिनस्तवनम् ॥
॥ घर अगण सुरतरु फल्यो जी, कवण
नक फल खाय ॥गयवर वांध्यो बारणे जी, स
र किम आवे दाय॥॥विमलजिन महारी
म्हशु प्रीति, सुर सकलंकितशुं मिस्या जी
दियड हींसे केम ॥ वि०॥॥ मन गमता
मे
अलवे
सादिबनो लही जी, कुण ल्ये राक मनाय,
वि०॥३॥ रत्न ते कुण काचने जी,
पसारे दाथ ॥ कुण सुरतरुथी कठिन जी, बाव
सघाले बाथ ॥विधा देव अवर जो हुंकर
जी, तो प्रनु तुमची आण ॥ श्रीजिनराज जयो
नवें जी, तुदिज देव प्रमाण विon इति ।
॥अथ एकादशी वृक्ष स्तवन ।
॥ समवसरण बेग नगवत, घरम प्रकाशे
श्रीअरिहंत ॥ वारे परपदा मैठी सुरी,
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मौन (२०) जीव पण अधिक उल्हास ॥ ए तिथि मोहत पी पावडी ।। मा० ॥ ए॥ऊजमणुं की श्री कार, ज्ञानना उपगरण ग्यार ग्यार ॥ करो काजसग्ग गुरु पाये पडी।मा॥ १०॥ देहरे स्नात्र करीजे वली, पोथी पूजीजे मन रखी। मुगतिपुरी कीजें हकडी । मा० ॥ ११ ॥ इग्यारस महोटु पर्व, आराध्या सुख लहिये सर्व ॥ व्रत पञ्चरकाण करो आखडी ॥मा। ॥१२॥ जेसल शोल इक्याशी समे, की स्त वन सहू मन गमे । समयसुंदर कहे करो पा दडी॥ मा० ॥ १३॥ इति श्रीएकादशी६० ॥ अथ श्रीपार्श्वजिनस्तवन । ॥ तु मेरे मनमे तु मेरे दिलमें, ध्यान भरूं पल पलमें ॥ पास जिणेसर अन्तरजामी, सेव करुं विनविनमें तु० ॥१॥ काढूको मन तरुणीशुं राच्यो, काढूको वित्त धनमें । मेरो मन प्रनु तुमहीशु राख्यो, ज्यु चातक पित्त
(२३)
वन तिलो रे ॥ विमल वस वस्तुपाल ॥ ती०
॥२॥ समेतशिखर सोदामणो, रलियामणो
रे॥सिहा तीर्थंकर वीश ॥ती॥ नयरी चपा
निरखीये, दैये दरखीये रे॥ सिधा श्रीवासुपू
ज्य ॥ ती० ॥३॥ पूर्वदिशें पावापुरी, शन
रीरे॥ मुक्ति गया मदावीर । ती॥ जेसल
मे जुदारी, ७ ख वारीय रे॥ अरिदंत विंब
अनेक । ती॥४॥विकानेरज वंदीये, चिर
नंदीये रे ॥अरिदंत देदरां आठ ॥ ती ॥ सो
रिसरो सखेसरो, पंचासरो रे ॥ फलोधी यन
ण पास ॥ती० ॥५॥ अंतरिक अजावरो, अ
मीझरो रे॥जीरावलो जगनाथ ॥ती॥ त्रै
लोक्य दीपक देवरो, जात्रा करो रे॥ राणपुरे
रिसदेस ॥ ती० ॥६॥ श्रीनामुलाई जादवो,
गोडी स्तवो रे॥ श्रीवरकाणो पास ॥ ती० ॥
नदीश्वरना देदरा, वावन जला रे॥ रुचक कुं
मल चाक चार ॥ ती० ॥७॥ शाश्वती अशा
(२५)
सम्वाद ॥ ते परमेसर विण मिख्या रे, किम
वाधे उत्सादो रे॥ वीर ॥६॥ वीर थका पण
श्रुत तणो रे, हुतो परम आधार ॥ रमणां
श्रुत आधार ते रे, ए जिन आगम सारो रे
॥वीर ॥७॥ण कालें सवि जीवने रे, श्रा
गमधी आनद ॥ ध्यावो सेवो नविजना रे, जि
नपडिमा सुखकदो रे ॥ वीर ॥G॥ गणधर
आचारिज मुनि रे, सढुनें इण परसिह ॥
व नव आगम सगथी रे, देवच पदलीधो रे
॥वीर ॥ ए॥इति निर्वाणकल्याणक स्तव०॥
॥अथ श्रीतीर्थमालास्तवनम्॥
॥ शत्रुजय झपन समोसया, नखा गुण
नया रे ॥ सि साधु अनत, तीरथ ते नसुं
रे॥तीन कल्याणक तिहा थया, मुगते गया
रे॥नेमीसर गिरनार ॥ती० ॥१॥ अद्यापन
एक देहरो, गिरिसेहरो रे॥जरतें जराव्या
विव॥ती॥ श्रावु चौमुख अति जलो
.
(१२५) नीरजनशुं नेद धरीने, आगे उलग करस्यां। अभुत आदि जिनेसर निरखी, प्रेम सुधारस पीस्या रे॥ आण ॥५॥ पुदप सुगंधा लेप चरंगा, हार सुगंधा गूथी॥ पदिरावी प्रनु करें लदिस्यां, शिव मारगनी सूथी रे ॥ आ ॥६॥ गदिर स्वरे जिनवर गुण गातां, जात्र नवा" करिये ॥मन गमती जमती विच नमता, नव सायर निसतारिये रे॥ आ॥ ७॥ पूरव न वाणूं वार प्रथम जिन, रायण रूखे आया ॥ ए तीरथ शुन नावे फरसी, करिये निरमल का या रे॥आ॥G॥लान नदे ए गिरिवर ल दियें, कदे इम केवल नाणी॥ श्रीजिनचद स दा दित वत्सल, प्रेम घणे चित्त आणी रे॥ आ॥ए॥ इति सिधाचल स्तवनम् ॥ ॥अथ उपदेशमाला पोसद सिद्यायलि॥ ॥जग चूडामणिनून, उसनो वीरो तिलो य सिरि तिलन ॥ एगो लोगाश्च्चो, एगो चस्कू लगिरिजईएं रे ॥ आसुण बहेनी ए गिरिनी (१४) श्वती, प्रतिमा पती रे ॥ स्वर्ग मृत्यु पाताल ॥ती० ॥ तीरथ जात्रा फल तिहा, होजो मुक श्दा रे ॥ समयसुदर कहे एम ॥ती० ॥७॥ ॥ अथ सिहाचल स्तवनम् ॥ ॥ आज आपे चालो सदीयो, सिहावल गि रिजायें॥सिहाचलगिरि जईएबहेनी,विमलाप मदिमा,आदिजिनदश्मनाखनरतादिक नरप तिनेागल, इंसादिकसहु साखीरे॥जणा ॥१॥ण गिरिवरिये काल अनंते, साधु था नन्ता सीधा ॥ जन्म मरणनाःख बोडीने, मत अखय गुण लीधा रे॥ प्रा०॥२॥ण गिरि सन्मुख पगला भरतां,आतम शुभ मुजा वें॥कोडि नवारा पातक कीधा, एक पतको जावे रे। आ॥३॥सासतो तीरथ ए शे जो,जोतां लागे मीठो । तीन नुवनमे इण गि रितोले, बीजो को न दीठो रे॥धाण ।
(७) प्पदाणागमो मट्ठरवको ॥ गंजीरो घिमंतो, उ वएसपरो य आयरिए अपरिस्सावी सो मो, सगसीलो अभिग्गदमई य॥ अविकल जो अचवलो, पसंतदियन गुरू होई ॥१०॥ कश्याविजिणवरिंदा, पत्ता अयरामर पद दा बं॥ आयरिएदि पवयणं,धारिश सपय सय लं ॥११॥अणुगम्मए भगवई, रायसुयजा सहस्स देटिं। तदवि न करे इमाणं, परिय हश्त तदा नूण ॥ २२॥ दिण दिस्कियस्स दम ग, स्स अनिमुदा असचदणा अजा ॥ नेता आसणगदणं, सो विणन सब अजाण ॥१३॥ वरससय दिस्कियाए, अजाए अजदिरिकन सा दू॥ अनिगमण बदण नम, सणेण विणएण सो पुक्को॥१४॥धम्मो पुग्सिप्पनको, पुरिसव रदेसिन पुरिसजिलोएविपदपुरिसो, किपु ण लोगत्तमे धम्मे॥१५॥ सवादणस्ससरस्मो, तश्या वाणारसीनियरीए ॥ कन्ना सदस्समदि (२५६) तिदअणस्स ॥ १॥ सवतरमुसन जिणो,' म्मासे वक्ष्माण जिणचदो॥श विहरिया नि रसणा, जए हुए उवमाणेण ॥२॥ जश्ता ति लोयनाहो, विसहर बढुयाइ असरिसजएस्स ॥श्य जीयतकराई, एस खमा सबसाहूण॥ ३ ॥ न चला चालेज, मद मदावइमाण जिस चदो॥उवसग्ग सहस्सेहिं वि,मेरु जहा वायणं जाहिं ॥४॥नहो विणीय विन, पदम गण हरो समत्त सुयनाणी॥जाएंतोवि तमई, विनि य दियन सुण सब ॥५॥ज आणवेराया, पय त सिरेण बति॥श्य गुरुजण मुह न णिय, कयजलिउडेहिं सोया ॥६॥जद सुरग पाण श्दो, गहगणतारागणाण जह चंदो॥ज हय पयाण नरिंदो, गणस्स वि गुरु तहाणंदो ॥७॥वानुत्ति महीपालो, न पया परिहवाए स शुरु उवमा ॥ जवा पुरउ काउं, विहरति है। एगी तहा सोवि॥6॥पटिरूवो (ए) वि सीजन्द वायविद्याडिन ॥ संवधरमणसीन, वाहुबली तद किलिस्संतो॥ ३४ ॥ नियगम विगप्पिय चिं,तिएण सबंदबुद्धिचरिएण॥ कत्तो पारत्तदिय, कीर गुरु अणुवएसेण ॥ ५ ॥ यशो निरोवयारी,अविणीनगविन निरवणामो ॥साहुजणस्स गरदिन, जणेवि वयणिकयं ल दश् ॥२६॥थोवेण विसप्पुरिसा, सर्पकुमारुच्छ के बुलति ॥ देहे खणपरिहाणी, जकिर देवेदि से कदियं ॥ २१॥ जश्ता लवसत्तम सुर, विमा ए वासीवि परिवडति सुरा।।चितिजातं सेसं,सं सारे सासय कयरं ॥ ॥ कदत ननश्सुक, मुचिरेण विजस्स कमल्लिदियए॥जं च मरणा वसाणे, नव ससाराणुबंधिं च ॥ ॥ जवएस सदस्सेहि, बोदिऊतो न बुधई कोई ॥ जद वनदत्तराया, उदानिव मारन चेव ॥३॥ग यकन्न चंचलाए, अपरिचत्ताइ रायलबीए । जीवासकम्म कलिमल, नरिय भरातो पडति
नचि॥२७॥कि परजण बढुजाणा,वणादिं व
नचंदो य दिखता ॥२॥वेसो विअप्पमाणो,
असजम परसु वहमाण्स्स ॥ किं परियत्तियवे
स, विसं न मारे खडतं ॥२०॥धम रका
वेसो,सकश्वेसण दिस्किमिअहं ।जम्मग्गेष
पडंत, रकराया जवळ य ॥२॥श्रण
॥
(२०)
य, आसी किररूववृतीणं ॥१६॥ तह विप सा
रायसिरी, उल्लहंती न ताश्या ताहिं ॥ज्यरहि
एण के, ण ताश्या अगवीरेण ॥२७॥ महि
लाणसु बढ्याण वि, मजाद समत्त घरसा
रो॥रायपुरिसेहिं निक,जणेवि पुरिसो जर्दि
रमप्प सरिफयं सुकयं ॥ इद नरदचक्कवडी, पस
जाण अप्पा, जहनि अप्पसस्किन धम्मो ।
अप्पा करे तं तद, जद अप्पसुहावरं होई।
॥१२॥ज ज समयं जीवो, आविस्स जेण
जेण नावेण ॥ सो तमि तमि समए, सुहासुई
चधए कम्मं ॥३॥धम्मो
हुँतो
(२३१)
वोरिरियं ॥४॥ आसव कसाय बंधण, कल
हा नरकाण परपरीवा॥अर रई पेसुन्न, मा
या मोस च मिन्चत्तं ॥५॥ वोसिरिसुश्माइंमु, रक
मग्ग ससग्ग विग्ध नूआई। सुग्गशनिबंध
पाइं,अधारस पावठाणाई॥६॥ एगो द नति
मे कोइ, नाहमन्नस्स कस्सवि ॥ एव अदीम
एसो, अप्पाण मासासए ॥७॥ एगो मे सास
अप्पा,नाणदसणसजुनासेसा मे बादिरा ना
वा, सबे सजोगलस्कणा ॥G॥ सजोग मूला
जीवण, पत्ता उरकपरपरा ॥ तम्हा संजोग सं
बंध, सच तिविदेण वोसिरे। ए॥ अरिदतो म
ह देवो, जावलीवं सुसाहुणो गुरुणो॥ जिणपन्न
तं तत्त,श्यसम्मत्तं मए गदियं ॥३॥चत्तारि म
गलं,अरिहंता मगल, सिहा मगलं,साडू मग
लं, केवलिपन्नत्तो धम्मो मगलं, चत्तारितोगत्त
मा, अरिदता लोगत्तमा, सिश लोछत्तमा,
साढू लोगुत्तमा, केवलि पन्नत्तो धम्मो लोयत्त
.
(२३०) अढे ॥ ३१ ॥ वोत्तूणवि जीवाण, सजकरा इति पावचरिया॥नयवजा सा सासा, पञ्चाएसो हु णमो ते ॥३॥ पडिवडिळण दोसे, नियए सम्म च पायवडियाए ॥ तो कर मिगावईए,उ प्पन्नं केवल नाण ॥ ३३ ॥ति पोसह सिधा। ॥ अथ राईसथारा पोसद सिधाय । ॥ निस्सिही निस्सिही नमो खमासमणाणं, गोयमाईण ॥ महामुणीणं । नवकार ३, करेमि नंते ३,कहिये अणुजाणद निहिला, अपुजा गह परमगुरु. गुणगणरयणेहिं मंमिसरीराम बहुपडिपुन्ना पोरिसि, राईसथारए गमि॥१॥ अणुजाणड संथार, बाहुवहाणेण वामपासेर्ण ॥ कुकुड पाय पसारण, अंतरं तु पमकर भूमि ॥२॥ संकोश्य संमास, नवहतेय काय पहिले हा ॥ दवाई जवळग, ऊसासनिसनणालोयं । ॥ ३ ॥ ज मे ठुल पमान, इमस्स देहस्सिमा रयणीए ॥ आहार मुवदि ति
(१३३)
सु॥ तिरिएसु हुति चनरो, चजदस लका य
मपुएसु॥॥ खामेमि सबजीवे. सधे जीवा
खमंतु मे ॥ मित्तीमे सबनूएस.वेरं मधं न केण
वि॥३॥ एवमदं आलोअ, निदिध गरदि
अगग्निं सम्मतिविदेण पडिकंतो, वदा
मि जिणे चजबीस ॥४ा खमिअखमाविअमर
खमिश्र,सबद जीवनिकाया।सिध्दसारख आलो
यणद,मबदवेर ननाया|यासवेजी कम्मवसु,
चनदह राज नमंतु॥तेम सब खमाधिया,मय
वितेदखमतु॥६॥इति राई सयारागाथा सा
॥अथ निंदावारक सद्याय।।
॥ निंदा म करजो कोश्नी पारकीरे, निदा
ना वोल्या महापाप रे॥वयर विरोध वाधे घ
णो रे, निंदा करता न गणे माय बाप रे ॥ नि
१॥ दूर बस्ततीका देखो तुस्हें रे, पगमा ब
सती देखो सट्ठ कोय रे ॥ परना मेलमा धोया
लूगडा रे, कहो केम ऊजला दोय रे ॥ निं
(२३५)
मो॥ चत्तारि सरण पवळामि,अरिहते सरणं प
वजामि, सिझे सरण पवळामि, साढूसरणं पव
जामि, केवलि पन्नत्त धम्म सरण पवामि ।।
अरिदता मगल मन्न,अरिदता मध देवयान
रिदता कित्तिअत्ताण, वोसिरामित्ति पावर्ग
॥२॥ सिहाय मगलं मश, सिाय मस देव
या ॥ सिधा य कित्तिअत्ताण,वोसिरामि त्ति पा
वग॥२॥आयरिया मगल मस, आयरिया
मन्न देवया ॥ आयरिया कित्तिअत्ताणं, वोसि
रामि त्ति पावगं ॥३॥ नवधाया मगलमष,
वद्याया मध देवयानवद्याया कित्तिभत्ताणं,
वोसिरामित्ति पावगं ॥४॥ साढणो मगलं मत्र,
साढूणो मद्य देवया ॥ साढूणो कित्तिधताणं,
वोसिरामि त्ति पावग ॥५॥ पुदवि दग अगणि
मारुय, किके सत्त जोणि लकान॥ वणपतेम
अणते, दस चलदस जोणि लस्का॥॥
विगसिदिएस दो दो, चनरो प नारय.
(२३३)
तु ॥ तिरिएसु द्रुति चउरो, चनदस लरका य
मणुएस ॥ २॥ खामेमि सब वे, सवे जीवा
समतु मे ॥ मित्ती मे सबभूएसुवेरं मद्यं न केण
वि॥३॥ एवमद आलोय, निदिअ गरदि
अगंग्धि सम्म ॥ तिविदेण पडिकंतो, वंदा
मि जिणे चनधीसं ॥४॥ खमिर खमाविषम
खमिश्र,सहद जीवनिकायासिध्दसाखआलो
यणद,मधद वेरननाया|यासवेजीवा कम्मवसु,
चनद राज नमंतु॥तेमश्सव खमाविया,मद्य
वितेदखमतु॥ाति राई सथारा गाथा सणा
॥अथ निंदावारक सधाय॥
॥निंदा म करजो कोश्नी पारकीरे, निंदा
ना बोल्या महापाप रे ॥वयर विरोध वाधे घ
णो रे, निंदा करतान गणे माय धाप रे ॥ निं०
॥२॥ दूर बसंतीका देखो तुस्टे रे, पगर्मा व
लती देखो सदु कोय रे॥परना मेसमां धोयां
लगडा रे, कदो केम कजला होय रे ॥ नि
(२३४) ॥७॥ आप सनालो सङको आपणो रे, निं दानी मूको परी टेव रे ॥ थोडे घणे अवगुणे सदु नखां रे, केदना नलीया चुए केहना नेव रे। निं० ॥३॥ निंदा करे ते थाये नारकी रे, तप जप कीधु सदु जाय रे॥ निंदा करो तो करजो आपणी रे, जेम बुटकबारो थाय रे॥ निं०॥ ४॥ गुण ग्रहजो सढुको तणो रे, जेह मा देखो एक विचार रे॥ कृष्णपरें सुख पाम शो रे, समयसुंदर सुखकार रेनिंगपाति।। ॥अथ सीता सिद्याय लिख्यते।। ॥जल जलती मिलती घणी रे, जाली का स अपार रे॥सुजाण सीता ॥ जाणे केस्क लिया रे लाल, राता खैर अङ्गार रे॥सु० ॥१॥ धीज करे सीतासती रे लाल ॥शील तणे परि माण रे ॥सु ॥ लक्ष्मण राम खुशी थया रे लाल, निरखे राणो राणरे ॥ सु० ॥२॥ सा न करी निरमत जलें रे पावक .
आप रे॥ सु०॥ ऊनी जाणे सुराङ्गना रे वाल, अनुपम रूप दिखाय रे । सु॥३॥ नर नारी मिलिया घणारे लाल, ऊना करे हाय हाय रे॥सु ॥ नस्म दुशीण आगमें रेखाल, राम करे अन्याय रे ॥ सु०॥४॥ दि कोय रे॥ सु०॥ तो मुऊ अगन प्रजा शीथया रे सात, सीला शील सुरंग रे ॥ (२३५) राघव विन वाग्यो दुवे रे लाल, सुपनही न खजो रे लाल, नदि तो पाणी दोय रे ॥ ९ ॥ ॥५॥श्म कदि पेटी आगमें रे लाल, तुरत अगन थयो नीर रे॥सु॥ जाणे इद जलशु नयो रे खाल, जीने धरम सुधीर रे ॥१०॥ ॥६॥देच कुसुम वरषा करे रे लाल, एद सती शिरदार रे॥ सु० ॥ सीता धीजें कतरी रे, जात साख नरे संसार रे ॥ सु॥ ॥७॥रलियायत सढुको थया रे साल, स घले थया उतरंग रे ॥ सुा सूक्ष्मण राम खु
पर रेवाके चमर ढोलाय॥चा० ॥२॥तारणत
(२४०)
ग॥ दि० ॥ ७॥निशिदिन याकुं ध्यावतां हो
॥ना जीव तपोजहार ॥ कमी नहिं कोई व
स्तुनी दो ॥ना यादि जगमे सार ॥हिणाना
मनचिंता मनोरथ फले दो ॥नणावरते कोड
कल्याण ॥ शुभ मने करी समरता हो ॥न ॥
निश्चे पद निर्वाण ॥ दि॥ए॥ ए सरणाने
ध्यावतां दो॥न०॥ नाम तणो आधार ॥ ए
सरणाकी कीरति कढ़ी दो॥न॥ध्यावो मन
द् मकार ॥ दि० ॥२०॥ संवत् अढारे बावने
दो ॥न ॥ पालि सदेर सुखकार॥ चोथमज
श्म वीनवे हो॥न ॥ सुनजो बाल गोपाल
॥दि॥११॥ति श्रीमागलिक सरणा॥
॥अथ पार्श्वजिन स्तवन ।।
॥राग केरबो॥ चालो देखोरी मधुवनको
राव ॥ चा॥वामानंदन पास जिनेसर, शिर
विचित
रण जिनेसर लख के
॥ चा॥॥ गगादरस जमादो लागो,कव
तुं वाके मन वच काय ॥ चा ॥३॥इति॥
॥अथ पार्श्वजिन स्तवनं ॥
॥राग घाटी॥मेरो मन वश कर लीनो,जि
पर प्रनु पास ॥ मे ॥ अखियां कमल पाख
या, मुख सुंदर जास॥मे॥१॥काने कुम
दोय फलके, शशि सूरज सम नास।मे।
नील वरण तन सोदे, त्रिनुवन परकाश ॥मे
॥२॥प्रनु तुम शरण रदीने, समरु सासोसा
स ॥ मेणा लालचंद अरज सुनीजें, पूरो वागि
त आस ॥ मे०॥३॥इति॥
॥अथ नेमजिन पद॥
॥तुम॥राग जगलो।सुणो सुजाण नेमजी,
दारे में खडी पुकारु नेम तुही तुंही तुहीं॥सुन
॥ अरज करत ढुं मे पईया परत दु, ईतनी अ
रज मेरी मानो॥सुजाण ॥१॥विन अवगुण
क्यु तजो मेरे सादेव, नेद नजर मोपें मारो॥
(२४०)
ग। दि० ॥ ॥ निशिदिन याकुं ध्यावतां हो
आना जीव तणो उधार ॥ कमी नहिं को व
स्तुनी हो ॥ना यादि जगमें सार EिOGH
मनचिंता मनोरथ फले दो ॥ना वरते कोड
कल्याण ॥ शुरू मने करी समरता होन० ॥
निश्चें पद निर्वाण दि० ॥ ए॥ ए सरणाने
ध्यावता दो॥न०॥ नाम तणो आधार ॥ ए
सरणाकी कीरति कही हो॥न ध्यावो मन
द् मकार ॥दि ॥ १०॥ संवत् अढारे बावने
हो ॥ ॥ पालि सहेर सुखकार॥ चोथमच
श्म वीनवे दो ॥न० ॥ सुनजो बाल गोपाल
॥दि० ॥११॥इति श्रीमागलिक सरणां।
॥अथ पार्श्वजिन स्तवनं ॥
॥राग केरवो ॥ चालो देखोरी मधुवनको
राव ॥ चा० ॥ वामानंदन पास जिनेसर, शिर
पर रे वाके चमर ढोलायचा तारणत
रण जिनेसर तख के,जेटे नविचित
(२४१)
। चा॥॥ गगादरस जमादो लागो,कव
वाके मन वच काय ॥चा ॥३॥इति॥
॥अथ पार्श्वजिन स्तवनं ।।
॥राग घाटी॥ मेरो मन वश कर लीनो,जि
र प्रनु पास ॥मे॥अखियां कमल पाख
या, मुख सुंदर जास॥मे ॥१॥काने कुम
दोय जलके, शशि सूरज सम नास।मे॥
ल वरण तन सोदे, त्रिनुवन परकाश॥मे
२॥प्रनु तुम शरण रदीने, समरूं सासोसा
॥ मेणा लालचंद अरज सुनीजें, पूरो वाठि
आस ॥मे॥३॥इति॥
॥अथ नेमजिन पदं ॥
॥तुमरी॥ राग जगलो।सुणो सुजाण नेमजी,
हरेि में खढी पुकारु नेम तुदी तुंदीतुहीं।सु०
। अरज करत ढुं मे पईया परत ढुं, इतनी अ
ज मेरी मानो। सुजाण ॥१॥विन अवगुण
त्यु तजो मेरे सादेव, नेद नजर मोपें मारो॥
१६
(२४२) सुजा० ॥॥ दरख चद नेमी राजेसर, नवकी चेरी। सुजाण ॥३॥ इति ॥ ॥ अथ नेमजिनपदं ॥ ॥रागनैरवी॥नेमा मोरी रेन दिवस नित लग रहीरे॥ने ॥१॥ पदेलीआय जन दोस्ती कीनी, 3 बिटकाय दई रे॥पसुअन पर प्रनु दया रीने, सिवरमणी ते वर ले नेणामो केई नविक रसना कर दोस्ती, रत्नविमल पाय लई रे॥ने मो० ॥३॥ ॥अथ पद ॥राग भैरवी॥ । आज प्रनु तोरे चरण लागि,। ५ में खोई रे ॥ आ॥१॥ दरसन कर नयो मेरे, धानद चित्त अब जोई रे॥ प्राण ॥७॥ तुम बिन र न कोई मेरे, देख्यो वन जोई रे।।प्रा. विनति, तुम प्रनु .
(२४३) ॥अथ पदं॥ ॥राग नैरवी ॥ रात गई अब प्रात दोन यो,क्या सोये जिया जागरे॥राणादोय घडी डको अबरदियो, धरममें लाग रे॥रा १॥जिनवाणी जरवीच धार ले, नर नरम ब त्याग रे॥रा०॥॥आनद सुगुरु वच 'दित मानो, ए सूघो शिवमाग रे ॥राण॥३॥ ॥अथ पद॥ ॥राग नैरवी ॥ तुम बिन दीनानाथ दया नधि, कोन खवर ले मेरी रे॥ तु॥१॥ ध त फियो ससार जगतमें, मेटो नवदी फेरी ॥ तु॥२॥ नव नवके प्रनु तुम जगनाय 5, राखो शरणें तेरी रे ॥ तु॥३॥ नदय आ परोपकच्योतेरो,सरणग्रही में तेरी रो।तु॥४॥ ॥अथ श्रीसिझाचल स्तवनम् ॥ ॥ कडखानी देशी॥नाव धरि धन्य दिन प्राज सफलो गपुं, आज में सजन आनद पा (२४२) सुजा॥२॥दरख चंद नेमीराजेसर, नवकी चेरी॥सुजा० ॥३॥ इति ॥ ॥अथ नेमजिनपदं ॥ ॥रागनैरव। नेमजि मोरी रेन दिवस नित लग रहीरे। ने ॥१॥ पदेली आय उन दोस्ती कीनी, से 3 बिटकाय दई रे॥ पसुअन पर प्रनुदया रीने, सिवरमणी ते वर ले रे॥नेणामो० केई नविक रसना कर दोस्ती, रनविमल पाय लई रे॥ने ॥मो ॥३॥ ॥अथ पद ॥राग भैरवी॥ ॥ आज प्रनु तोरे चरण लागि, में खोई रे ॥ आ॥१॥ दरसन कर जयो मेरे, आनद चित्त अब जोई रे॥श्रा० ॥७॥तुम बिन मे न कोई मेरे, देस्यो वन जोई रे॥ आ॥३॥ दास तुमारो विनति. तम प्रन जव जव होईरे।
(२४५)
एक कोड लाल रे॥ श्री० ॥३॥ चरणकमल पि
जर वस्यो, मुफ मनदस नित्यमेव लाल रे ॥
चरण सरण मोदि आसरो, नवनव देवाधिदे
व लाल रे॥श्री०॥४॥अधम नधारण गे
तुमे, दूर हो नवउ ख लाल रे॥ कदे जिनद
र्ष मया करो, देजो अविचल सुरक लाल रे ॥
श्री ॥५॥इति सीमंधरजिनस्तवनम् ॥
॥अथ अष्टापदगिरिस्तवनम्॥
॥ मनडो अष्टापद मोह्यो मादोजी, नाम
जपूं निशि दीस जी॥चत्तारीअहदसदोय वदी
या जी, चिट्ठ दिशि जिन चोवीश जीमणार॥
जोजन जोजन अंतरे जी, पावड शाला आठ
जी॥आठ जोजन चंचु देदरुं जी, उख दोद
गजाये नाठ जी॥म ॥॥ जरते नराया न
ला देदरा जी, सो नोयरां यून जी ॥ आपे
मूरत सेवा करे जी,जाण जोईने ऊन जीमणा
॥३॥ गौतमस्वामी तिहा चढ्या जी, वलीना
(२४४)
यो॥ दर्पधरि नजर नरिविमलगिरि
रि, रजतमणि कनक सुरतरु कहायो ।
॥१॥पग पग नमगधर पथ नित
न्य दोय चरण तिदां चलत आयो॥
न दीद जागी सुकृतकी दिशा, आज धन ५
गिरि सुजस गायो॥ना ॥२॥ दूर
टरी जात्र विधिशें करी, पुण्यनमार पोते
यो॥वंदत जिनराज मणिरंग सुरगिरिसर ।
झषनजिनचद सुरतरु कढ़ायो ॥ना ॥ ३
॥ अथ सीमघर जिन स्तवनं ।।
॥ श्रीसीमधर साहिबा, वीनतडी
लाल रे॥ परमातम परमेसरू, श्रातम
आधार लाल रे॥श्री॥१॥ केवलज्ञान ।
वाकरु, नागे सादि अनंत लाख रे॥नासक
लोकालोकको, दायिक ज्ञेय अनंत साल रे।
श्रीराशाई चर चक्रीसरू,सुर नर रहे कर
जोड लाल रे ॥ पदपंकज सेवे सदा, अणइते
(२७)
गरी, श्रीध्रमसी सुखकारीराज॥॥॥इति।।
॥अथ शखेश्वर स्तवनम् ॥
॥ अतरजामी सुण अलवेसर, मदिमा त्रि
जग तुमारो॥सानलीने आव्यो तुम तीरे,ज
नम मरण नय वारो॥१॥सेवक अरज करे
राज,अमने शिवसुख आलो॥एआकणी॥
सडकोना मनवाबित पूरो, चिंता सढुनी चूरो
॥ एद बिरुद ने राज तुमारूं, किम राखो गे दू
रो॥सेवक ॥२॥सेवकने वलवलतो देखी,
मनमा मदेर न धरशो ॥ करुणासागर केम क
देवाशो, जो उपगार न करशो॥सेवक ॥३॥
लटपटनु दवे काम नदी, परतद दरिसण
दीजें ॥धूवाडे धीज़ नहीं सादिव, पेट पड्या प
तीजें ॥सेवक ॥४॥श्रीसखेसर मंमग सा
दिव, वीनतडी अवधारो॥ कदे जिनदर्प मया
करी मुझने, नवसायरथी तारो ॥ सेवक ॥५॥
केम हजर
जी
-
(२५६)
गीरथ गंग जी॥गोत्र तीर्थकर बांधीचा
जाणे जोई जे जनजीम० ॥४॥ देव
धी मुझर्ने पाखडी जी, आवु
समयसुदर कदे वदना जी, प्रह उगमते
जी॥म ॥५॥इति॥
॥ अथ पार्श्वजिनस्तवनम् ॥
॥सुण अरदासा सुगुण निवासा,
पूरो प्रनु आशा राज ॥सु०॥ देखि
अपणा दासा,
दीजे
कबुक दिलासा राज
॥२॥ चाडी चटकी नवमादि जटकी, नाम्यो
विध नटकी राज॥सु०॥॥ दवे मन
आपशु अटकी, लायु प्रनुपय लटकी राज।
सु० ॥३॥तें
दम टाली मुगत संजाली,
अमें दिज पाली राज ॥ सु०॥४॥ एक हया
सीवाजे ताली,वात अचना वालीराज।मु०
॥५॥ परउपगारी पास तुमारी, सेवामें विष
सारी राज।सुदातत्व विभारी मन शुभ
प्रीत
(ए)
। अथ पद ॥राजा हुँ मे कोमका ॥ए देश।
॥प्रद उठी मेसदानमुं, दाथ जोडके साम
चोवीशे जिनराजकु दु, नित्य करूं परणाम ॥
॥१॥रिषन अजित सनव अनिनदन,और
सुमति जिनराज ॥ पद्म सुपार्श्व चंज्ञ प्रनुसे,
लगन लगी दे आज ॥२॥ सुबुद्धि शीतल
श्रेयास सवाई, दीजे मुक्ति नाथ ॥ वासुपूज्य
जिन बारमा, विमल अनंत नाय ॥३॥ धर्म
शाति अरुकुंथु जिनेश्वर, अरमली महाराज ॥
मुनि सुव्रत नमि नेमजी, पार्श्व वीर जिनराज
राधाकदपाठककल्यानकी, निधान पूरोआश।
कर जोडी गुणगावता, चदगोपाल दास ॥५॥
॥पद ॥ अरे लालदेव इस तरफ
जलदी या॥ए रागमा॥
॥ गश्थी गश्थी में मंदिर आज, वा वेठे थे
श्रीजिनराज ॥१॥ कहा कटू आगीकी अजब
बादार, मन प्रसन्न नया प्रनुकू निदार ॥२॥
(२४०) ॥अथ पार्श्वजिन स्तवनम् । ॥प्राण पीयारा जी दो पास जी किरताराजिनेसर। साइव वसीया जोहो पुरी, हु इण जरत महार॥जि ॥प्राण आमो अंतरजीहो अति घणो, सेट न साथ ॥ जि ॥ लिख सदेशा जीहो कागल यू किण हाथ ॥जि ॥प्राण ॥ रमता थे मे जीदो एकग, दिनमें दश दश २॥जि० ॥ केश्क दिन लग जीहो एकता, लता घणी मनुहार ॥ जि० ॥ प्राण ॥३ श्रावतो मिलणो जीहो अवसरे, मिलशे सुस्त संयोग ॥ जि॥पण क्षण क्षण जीहो समिरे, वाला तणो रे विजोग । जि०॥प्राण॥४॥ मिलस्या जिण दिन जीदो मन रसी,फलशेते दिन प्राश ॥जि० ॥ चंदमुनिंद कहे जीदोषि समे, वसजो प्रनु सुखवास॥जि०॥प्राom 1 (२५१) गन प्रनु अरज करे दें तुमकु, चदगोपाल क ३ दरस देखावो मुझकुं॥५॥इति ॥ ॥पद ॥ तुमरी॥ बल्ला हमारा याद रखना॥ए देशी॥ ॥प्रनु नामकू याद करना, याद करनां न ही विसरना॥प्रणाए टेक ॥ जिनवरजीसे ध्या न लगाय के, आतम मैलकों निरमल करना ॥3॥१॥तीन तत्त्वका ध्यान धरिके, चार चोकडीवू परिदरना॥3॥२॥तन धन यौ वनसव दै जूग, इनको दिलमे खूब समजनां ॥3॥३॥ शिव पदवीकी चादा दोवे तो, स मकित बीज हृदयमें रखना ॥प्र०॥४॥ चंद गोपालकी आश पूरीजे, अव में आयो आप के सरना॥प्र०॥५॥ ॥ पद ॥ तुमरी ॥ लगना पानी पूरव मति जश्यो रे।। ए रागमा। ॥प्रनुका ध्यान धरो तुम प्यारा रे ॥प्रणा
-
F
लका दे फलकार ॥३॥गले विचमास
(२५)
मस्तकमै शोदे मुकुट अति सार, कानाने
हे मोतिकी, वाजु कडा की सोदे नीकी
सोनेके सिहासन पर बेठे है राज, फका
गध नया अति आज ॥३॥ऐसे साहेब
व जिनराज, करूं में प्रणाम पूरो मन काज
॥६॥ कल्याण निधानकी पूरी आश,
पाल तुमारो दै दास॥७॥ति ॥
सिर पेघाखो पेगले बिगगनतुझाए
॥ चिंतामणि पार्श्व प्रनु अरजकरुंमे
अब मेरी अरज सुनी पार उतारो मुजकुं ॥
शत्रु मेरे अष्ट कर्मोने फंदमें फसाया सुमऊं,
म बिन और नदी फद गेडावे मुमकु ॥॥
न ध्यान तप जप नहीं, उदर्ये यावे मुझकुं॥
क तेरा नामका आधार प्रनु है मुझर्क ॥३॥न
र नारि सुरवर नित्य नमे है तुमकं, मेरा मनमें
तो प्रनु ध्यान धरूं में
॥४॥ध्यान न
.
(श्पर) धान प्रनु अरज करे दें तुजकुं, चदगोपाल क दे दरस देखावो मुझकुं॥५॥ इति ॥ ॥ पद॥ तुमरी॥उल्ला दमारा याद रखना ॥ए देशी॥ ॥प्रनु नामकू याद करना, याद करना न ही बिसरना॥प्रण॥ए टेक ॥ जिनवरजीसे ध्या न लगाय के, आतम मैलको निरमल करना ॥प्र० ॥१॥तीन तत्त्वका ध्यान धरिके, चार चोकडी परिदरना॥प्र०॥२॥तन धन यो वनसब दै जूग, श्नको दिलमे खूव समजना ॥ ॥३॥ शिव पदवीकी चादा दोवे तो, स मकित बीज हृदयमें रखना ॥1॥४॥ चद गोपालकी आश पूरीजे, अब मे आयो आप के सरना॥प्र॥५॥ ॥ पद ॥ तुम। ॥ लगना पानी पूरव मति जश्योरे॥ए रागमा॥ ॥प्रनुका ध्यान धरो तुम प्यारा रे ॥प्रणा कानोने व जिनराज, करुं में प्रणाम पूरो मन काज (२५) मस्तकमे शोदे मुकुट अति सार, लका दे जलकार ॥३॥गले विष दे मोतिकी, वाजु कडा की सोदे नीकी ।" सोनेके सिदासन पर बैठे है राज, फुलूका गध नया अति आज ॥५॥ऐसे साहेब । ॥६॥ कल्याण निधानकी पूरो आश, पाल तुमारो है दास ॥७॥इति ॥ सिर पेखो पेगले बिगन तुमकुंए ॥ चिंतामणि पार्श्व प्रनु अरजकरुंमे अब मेरी अरज सुनी पार उतारो मुमकुं॥ शत्रु मेरे अष्टकोने फंदमे फसाया मुझर्क, म विन और नही फद गोडावे मुझकु ॥२॥ न ध्यान तप जप नहीं,उदये आवे मुफकु॥ क तेरा नामका आधार प्रनु दै सुमकुं॥३॥न र नारि सुरवर नित्य नमेदै तुमकु, मेरा मनमें तो प्रनु ध्यान धरूं मे तुझकु ॥४॥ कट्यान नि (श्एर) धान प्रनु अरज करे दें तुमकुं, चदगापाल क हे दरस देखावो मुझकुं॥५॥इति ॥ ॥ पद ॥ तुमरी॥ बल्ला हमारा याद रखना ॥ ए देशी॥ ॥प्रनु नामकू याद करना, याद करनां न ही बिसरना॥प्राए टेक ॥ जिनवरजीसे ध्या न लगाय के, आतम मैलको निरमल करना ॥प्र० ॥१॥तीन तत्त्वका ध्यान धरिके, चार चोकडीत परिदरना॥4॥२॥तन धन यो वनसव है जूग, इनको दिलमे खूब समजना ॥1॥३॥ शिव पदवीकी चाहा दोवे तो, स मकित बीज हृदयमें रखना ॥प्र०॥४॥ चद गोपालकी आश पूरीजे, अब मे आयो आप के सरना ।प्र॥५॥ ॥ पद ॥ तुमरी ॥ लगना पानी पूरव मति जश्योरे॥ ए रागमा॥ ॥प्रनुका ध्यान धरो तुम प्यारा रे ॥॥
(२५०)
मस्तकमे शोदे मुकुट अति सार, कानाने
लका दे जलकार ॥३॥गले विष माता
दे मोतिकी, वाजु कडा की सोदे नीकी ।।
सोनेके सिहासन पर बेचे है राज, फतूंका
गध नया अति आज ॥५॥ ऐसें साहेब
व जिनराज, करूं में प्रणाम पुरो मन काज
॥६॥ कल्याण निधानकी पूरो प्राश,
पाल तुमारो है दास ॥७॥इति ॥
सिरपेआखो पेंगलेपे बिगनतुझकाए
॥ चिंतामणि पार्श्व प्रनु अरजकरुंमें
अब मेरी अरज सुनी पार उतारो मुमकुं ॥
शत्रु मेरे प्रष्ट कर्मोने फंदमें फसाया मुग, ।
म विन और नहीं फद गेडावे मुझकु ॥शा
न ध्यान तप जप नहीं,उदये थावे मुफकुं॥
क तेरा नामका आधार प्रनु है सुमकुं॥३॥न
र नारि सुरवर नित्य नमे है तुमके, मेरा मनमें
तो प्रनु ध्यान धरूं में तुम्कु पाकल्यान नि
(२५३)
॥4॥३॥ कृपा करो मुझकों, पूरो मेरी
प्रास ॥ उसमनोकों दूर करो, करु नित प्रणा
म॥॥४॥ श्रीसघकी आशा पूरो, गुन
पद्म दास ॥ जैनप्रकाश मालीको, मानो बदु
प्रणाम।प्र०॥५॥
॥पद॥कढु बु नसीबें खीयो कीधो गाए राग॥
॥ किसपर मान गुमान करीजे, एक प्रनुजी
को ध्यान धरीजे ॥ किस० ॥ए टेक ॥ जोबन
जोर मायाके नसेमे, भूल गये तुम गुरु एक प
लमे ॥ किस ॥१॥क्रोध कूपमे पडके गमा
रा, एक उपाय न शोधुं तुमारा ॥ कि० ॥२॥
लोन लुगाइसें मोद पायकें, बहोत जुखी हुन
नरक जाय ॥ कि ॥३॥ पाच मित्रके फदमें
पडके,वार वार तु लद नमीके ॥ कि० ॥४॥
इनकु बोड तुम ध्यान लगावो, अजर अमर
सुख सदजमें पावो ॥ कि ॥५॥ चदगोपाल
की आस पूरीजें, जैनप्रकाशक गुनगाईजे॥६॥
(१५)
ए टेक ॥ प्रनुजीके नामसे पाप कटत है,
न करम दूर जावे रे ॥ ॥१॥ या
में और कोई नहीं है, एके प्रनुजी कहाने
प्रण ॥२॥ माता पिता सब सुखके साथी,
खमे कोई न आवे रे॥प्र० ॥३॥ या
की जूठी दै माया, जूग जाल फेलावे रे ।
ल्याननिधानकी आस पूरीजे, चदगोपाल
न गावे रे ॥ प्र०॥४॥शति॥
॥ पद ॥ मरु दुवेरी हाथथी ॥ए रागमा
॥प्रणाम होजो प्रनुने, महाराजा
॥ महाराजकु प्रणाम दे जिनराजकुं प्रणाम
प्र०॥ए टेक ॥ प्रथम आदिनाथदूं मैं,
करूं सार ॥ खकी मे बात कई, करीन प्रत
म ॥ प्र० ॥२॥ मुझकों उ ख देवे बहु, कर्म।
त्रुराय ॥ श्नकों दूर कीजिये, करु में
। प्र० ॥७॥ आपको में ध्यान धरु, घोर
हिंध्यान॥पूजा करूं नत्य कर्म कर
प्रण
(२५३)
म॥०॥३॥ कृपा करो मुझकों, पूरो मेरी
श्रास ॥ उसमनोकों दूर करो, करुं नित प्रणा
म॥प्र॥४॥ श्रीसघकी आशा पूरो, गुन
पद्म दास ॥ जैनप्रकाश मालीको, मानो बढु
प्रणाम॥प्र०॥५॥
॥पद॥कहुं बुंनसीबेखीयो कीधो गाए राग॥
॥ किसपर मान गुमान करीजे, एक प्रनुजी
को ध्यान धरीजें ॥ किस ॥ए टेक ॥ जोबन
जोर मायाके नसेमे, भूल गये तुम गुरु एक प
लमें। किस० ॥१॥क्रोध कूपमे पडके गमा
रा, एक उपाय न गोधु तुमारा ॥ कि ॥२॥
लोन लुगासें मोद पायकें, बहोत सुखी हुन
नरक जायकें ॥ कि० ॥३॥ पाच मित्रके फदमे
पडके,वार वार तु लद नमीके ॥ कि० ॥४॥
श्नकु गेड तुम ध्यान लगावो, अजर अमर
सुख सहजमें पावो ॥ किन ॥५॥ चद्गोपाल
की आस पूरीजें, जैनप्रकाशक गुनगाईजें॥६॥
मे और कोई नहीं है, एके प्रनुजी कहावे
प्र० ॥३॥माता पिता सब सखके साथ,
(२५)
ए टेक ॥ अनुजीके नामसे पाप कटत रे,
न करम दूर जावे रे ॥२॥ या
खमे कोई न आवे रे ॥प्र० ॥३॥ या
की जूती है माया, जूग जाल फेलावे रे ।।
ल्याननिधानकी आस पूरीजे, चदगोपाल
न गावे रे ॥ प्र०॥४॥इति॥
॥ पद ॥ मरु बुं वेरी दायथी ॥ए रागर्मा
॥प्रणाम होजो प्रनुने, मदाराजकू
॥मदाराजकु प्रणाम दे जिनराजर्ने प्रणाम
प्र० ।। ए टेक ॥ प्रथम आदिनाथरूं मैं, अरब
करुं सार ॥ उखकी में वात कहूं, करीने प्रय
म ॥ प्र० ॥२॥ मुझकों चख देवे वहु, कर्म ।
त्रुराय॥ इनकों कीजिये, करु में प्रणाम
॥10॥७॥ श्रापको में ध्यान धरूं, और न
हिं प्यान॥पूजा करु नृत्य करू, कर्म
मा
(२५३) म॥०॥३॥ कृपा करो मुझकों, पूरो मेरी श्रास ॥ उसमनोकों दूर करो, करु नित प्रणा म॥प्र॥४॥ श्रीसंघकी आशा पूरो, गुन पद्म दास ॥ जैनप्रकाश ममलीको, मानो बढु प्रणाम॥प्र०॥५॥ ॥पदकढुं बुं नसीबेखीयो कीधो गएराग॥ ॥किसपर मान गुमान करीजे, एक प्रनुजी को ध्यान धरीनें ॥ किस० ॥ ए टेक ॥ जोबन जोर मायाके नसेमें, नूल गये तुम गुरु एक प समें ॥ किस ॥१॥क्रोध कूपमे पडके गमा रा, एक उपाय न गोधुं तुमारा ॥ कि ॥२॥ लोन लुगाइसें मोद पायकें, वदोत खी हुन नरक जायकें ॥ कि ॥३॥ पाच मित्रके फदमे पडके,वार वार तु लद नमीके ॥ कि० ॥४॥ इनकु गेड तुम ध्यान लगावो, अजर अमर सुख सदजमें पावो ॥ कि० ॥५॥ चंदगोपाल की आस पूरीजें, जैनप्रकाशक गुनगाईज॥॥
॥पद ॥ मरुं बुवेरी हायधी ॥ए रागमा
(२५)
॥ टेक ॥ प्रनुज के नामसे पाप कटत है,
ज करम दूर जावे रे ॥प्रया
में और कोई नहीं दे, एके प्रनुजी काने
प्र० ॥ ७॥ माता पिता सब सुखके
खमे कोई न आवे रे॥4॥३॥ या
की जूवी दै माया, जूग जाल फेलावे रे।
व्याननिधानकी आस पूरीजे, चदगोपाल
न गावे रे ।। प्र० ॥४॥इति ॥
॥प्रणाम होजो प्रनुने, महाराजकू
॥ महाराजकु प्रणाम दे जिनराजकू प्रणाम
प्र०॥ए टेक ॥ प्रथम आदिनाथकुँ मैं,
कलं सार ॥छ खकी में बात कहूं, करनि प्रणा
म ॥ प्र० ॥१॥ मुझकों चख देवे बहु, कर्म।
त्रुराय ॥ इनकों दूर कीजियें, करूं में प्र
॥ ॥२॥ आपको में ध्यान धरूं, और
हिं ध्यान।।पूजा करु नृत्य करं करूं
(२५३)
म॥५०॥३॥ कृपा करो मुझकों, पूरो मेरी
आस ॥समनोकों दूर करो, करु नित प्रणा
म॥प्र॥४॥ श्रीसघकी आशा पूरो, गुन
पद्म दास ॥ जैनप्रकाश मालीको, मानो बढु
प्रणाम ॥प्रय
॥पद॥कढुंबु नसीबे उखीयो कीधो गाए राग॥
॥किसपर मान गुमान करीजे, एक प्रनुजी
को ध्यान धरीजे ॥ किस० ॥ए टेक ॥ जोबन
जोर मायाके नसेमे, नूल गये तुम गुरु एक प
लमें॥ किस ॥१॥क्रोध कूपमे पडके गमा
रा, एक उपाय न गोधुं तुमारा ॥ कि ॥२॥
लोन लुगाइसें मोद पायकें, बहोत सुखी हुन
नरक जायके ॥ कि० ॥३॥पाच मित्रके फदमे
पडके,वार वार तु लक्ष नमीके ॥ कि० ॥४॥
इनकुं गेड तुम ध्यान लगावो, अजर अमर
सुख सदजमें पायो॥ कि ॥५॥ चंदगोपाल
की आस पूरीजें, जैनप्रकाशक गुनगाईज॥६॥
।
(२५४)
॥ अथ सुमतिजिन स्तवनम् ।
॥ महाराज वधाई वाजे ।।
ईवाजे ते ॥ नगर अयोध्यामाहे, मेष
आज वधाई वाजे गए टेक॥मात
जनमिया रे, सुमति नाथ सुखकार॥
ई सटु देशमे रे, प्रगट भयो जयकार ॥
॥१॥ शादिक सद् सुर मल्यारे, मेरु
र पर आय ।। मकन पूजन बहुविधे रे,
करि मन वच काय॥व०॥शा घर घर रंग,
धामणा रे, घर घर मंगल चार ॥ बालचंद
नु जनमिया रे, सकल संघ सुखकार व
॥अथ वीरजिन स्तवनं ।।
। आज महोचव रंग रली री॥ए टेक
जायो सुत त्रिशलादे रानी, कामित पूरन
कतीरी॥॥१॥सजि शणगार,
सुरवनिता, अपने अपने मेल चली।
वत सिधारथजीके
पूरा
।
(२५५)
चोक पूरी री॥ आ ॥२॥णी मिल मंग
ल गावत, नाटक नाचत सुरकुमरी री॥ वाजत
ताल मृदग सुरपधनी, बेना बीन मोचंग वली
री॥आ० ॥३॥ई ढुकुम कर धरणी पग
यो, सब वसुधा धन धान्य नरी री॥ कनक र
जत मनि पच वरनके, कुसुम विखेरत गलिय
गलीरी॥आ॥४॥ जयजयकार नयो जि
नशासन, व्याधि व्यथा सवि विपत दरीरी॥
हरख चद जनम्यो प्रनु मेरो, मनकी आशास
फलफलीरी। आ॥५॥इति ॥
॥श्रीदादाजीको स्तवन प्रारन ॥
॥ विलसे शधि समृद्धि मिली, शुनयोगें पु
एयदशा सफली॥ जिन कुशलरिगुरु अतुल
बली, मनवाग्ति आपे दादो रग रली॥२॥म
गल लील समे विपुला, नव नवय मदोचव रा
ज्यकला ॥ सुपसायेगुरु चढतीकला,सुकुलिए
पुत्रवती मदिला ॥२॥सवही दिन थाये सव
(२५५)
॥ अथ सुमतिजिन स्तवनम् ॥
।।मदाराज वधाई वाजे ।।
ईवाजे ते ॥ नगर अयोध्यामाहे, मेष
आज वधाई वाजे ॥ए टेक ॥मात
जनमिया रे, सुमति नाथ सुखकार॥
ई सट्ठ देशमें रे, प्रगट नयो जयकार ॥
॥१॥शादिक सढु सुर मल्यारे, मेरु
र पर आय ।। मकान पूजन बदुविधै रे,
करि मन वच काय॥व०॥शा घर घर रंग
धामणा रे, घर घर मगल चार ॥ बालचं
नु जनमिया रे, सकल सघ सुखकार वि०
॥अथ वीरजिन स्तवनं ॥
॥आज महोचव रग रलीरी॥ए टेक
जायो सुत त्रिशलादे रानी, कामित पूरन काम
कलीरी॥आ० ॥१॥सजि शणगार ।
सुरवनिता, अपने अपने मेत चलीरी॥
वत सिधारथजीके
पूरत
(५५५)
चोक पूरी री॥ आ० ॥२॥क्षणी मिल मंग
ल गावत, नाटक नाचत सुरकुमरीरी॥ बाजत
ताल मृदग सुरपधनी, बेना बीन मोचग वली
री॥आ ॥३॥ई हुकुम कर धरणी पग
यो, सब वसुधा धन धान्य नरी री॥ कनक र
जत मनि पच वरनके, कुसुम विखेरत गलिय
गलीरी॥आ॥४॥ जयजयकार जयो जि
नशासन, व्याधि व्यथा सवि विपत दरीरी॥
दरख चंद जनम्यो प्रनु मेरो, मनकी आशास
फलफलीरी॥आ॥५॥ति ॥
॥श्रीदादाजीको स्तवन प्रारंन ।
॥विलसे शधि समृद्धि मिली,शुनयोगें पु
एपदशा सफली॥ जिन कुशलसूरिगुरु अतुल
वली, मनवाबित आपे दादो रग रली॥॥म
गल लील समे विपुला, नव नवय महोचव रा
ज्यकला ॥ सुपसायेगुरु चढतीकला, सुकुलिणी
पुत्रवती मदिला ॥२॥सवही दिन थाये सव
(२५५)
॥अथ सुमतिजिन स्तवनम् ।
। महाराज वधाईवाजे ॥
ईवाजे ठे। नगर अयोध्यामाहे, मेष
आज वधाई वाजे गए टेक॥मात
जनमिया रे, सुमति नाथ सुखकार।
ई सदु देशमे रे, प्रगट भयो जयकार ॥
॥२॥शदिक सद् सुर मल्यारे, मेरु
र पर आय॥ मऊन पूजन बहुविधे रे,
करि मन वच काय॥वा घर घर रंग
धामणा रे, घर घर मगल चार॥ बाल
नु जनमिया रे, सकल सघ सुखकार ॥
॥अथ वीरजिन स्तवनं ॥
॥आज महोच्छव रग रतीरी॥ए
जायो सुत त्रिशलादे रानी, कामित पूरन
कलीरी॥आ०॥५॥सजि शणगार
सुरवनिता, अपने अपने मेल चलीरी॥
वत सिधारथजीके
(२५७)
आपद निश्चेसुं उवरोणाखड खडखडगप्रदार
वदे, सौदामिनी जिम सम सेल सहे ॥ कुशल
कुशल गुरु नाम कहे, ते खेम कुशल रिणमध
लदे ॥१७॥धुन सकल परचा पूरे,श्रीनागपु
रें सकट चूरे॥मंगलोर अधिके नरें, देरावर न
य टाले दूरे ॥ ११॥ वीरमपुर वाने सुधरे, खं
भाईतपुर विक्रम नयरें ॥ जिणचद सूरि पाटे
पवरे, जसु कीरति महिममल पसरे ॥२॥ पूर
व पश्चिम दक्षिण आगे, उत्तर गुरु दीपे सोना
गे॥दद दिशि जन सेवा मागे, श्रीखरतर ग
१ मदिमा जागे ॥ १३ ॥ पुर पट्टण जनपद
गमे, गाईजे कुशल नयर गामे ॥ पूजे जे नर
हितकामे,ते चक्रवर्ति पदवी पामे ॥ १४ ॥ श्री
जिनकुशलसूरि साखे, सेवकजनने सुखिया रा
खे। समस्या गुरु दरिसण दाखे, श्रीसाधु कीर
ति पाठक नाखे ॥ १५॥ति ॥
(१५६)
ला, सदवास कपूर तणा कुरला । हर
थ पायक वदुला, कलोल करे मदिर
॥३॥वीं चमर निसाण घुरे, नर के
खडा पहरे ॥ जय जय कर जोडी उबरे,
ध्य गुरु सव काज सरे॥४॥सरसा
पान सदा, रुख रोग काल न होय
अविचल ऊलट अग मुदा, गुरु परमति
सन्न सदा ॥५॥घम घम मादल नाद
रमे॥प्रगट्यो पुरुष
मे, सवला अरियण ते आय नमेातन
ख मन सुख चीर तने, पहिरे वेलाजल होयर
नै॥ध्यावो कुशल गुरु एक मनें, जूंनक सुरम
दिर नरे धने॥७॥ततखिण घण खच्यो या
वे, करि श्यामघटा मेद वरसावे॥तिसीयां तो
य तुरत पावे, जलदाता त्रिजग सुजस गाने।
॥जलदिया जल कल्लोल करे, प्रवहणज
वसायर मथि मरे ॥डता जे
बत्तीसे नाटक रङ्ग
(२५७)
आपद निश्चेसु नवराएगाखड खड खडगप्रहार
वहे, सौदामिनी जिम सम सेल सहे ॥ कुशल
कुशल गुरु नाम कहे, ते खेम कुशल रिणमद्य
लदे ॥१०॥ धुन सकल परचा पूरे, श्रीनागपु
रें सकट चूरे॥मंगलोर अधिक नरें, देरावर न
य टाले दूरे ॥ ११॥ वीरमपुर वाने सुधरे, ख
भाईतपुर विक्रम नयरें ॥ जिणचंद सूरि पाटे
विरे, जसु कीरति महिममल पसरे ॥२॥ पूर
पश्चिम दक्षिण आगें, नत्तर गुरु दीपे सोना
गे॥दद दिशि जन सेवा मागे, श्रीखरतर ग
व महिमा जागे॥ १३॥ पुर पट्ठण जनपद
वामें, गाईजें कुशल नयर गामे ॥ पूजे जे नर
दितकामे,ते चक्रवर्ति पदवी पामे ॥२४॥ श्री
जिनकुशलसूरि साखें, सेवकजननें मुखिया रा
खे। समस्या गुरु दरिसण दाखे, श्रीसाधु कीर
ति पाठक नाखे ।। १५॥इति ।।
(२५६)
ला, सदवास कपूर तणा कुरलास
थ पायक बदुला, कलोल करे मंदिर
॥३॥वीं चमर निसाण घुरे, नर ने
खडा पहरे॥ जय जय कर जोडी उबरे,
ध्य गुरु सव काज सरे॥४॥सरसा
पान सदा, रुख रोग काल न होय
अविचल ऊलट अग मुदा, गुरु
सन्न सदा ॥५॥धम घम मादल नाद
वत्तीसे नाटक रङ्ग रमे॥प्रगट्यो पुण्य
में, सबला अरियण ते आय नमेातन
ख मन सुख चीर तने, पहिरे वेलाउल होपर
नै ॥ध्यावो कुशल गुरु एक मनें, नॅनक सुरम
दिर नरे धने॥७॥ ततखिण घण खच्यो छम
वे, करि श्यामघटा मेह वरसावे॥तिसीयां सो
य तुरत पावे, जलदाता त्रिजग सुजस गावे।
॥जलदिखा जल कलोल करे, प्रवहणन
वसायर मचि मरे ।। बता
(श्यए)
परिवाद अनेरी, सरण ग्रही इन चरणकी वाण
चण॥श्रीजिनदर्ष तुम चरणको दासा, आ
शा पूरो सुख करणकी वाणाव ॥ इति ॥
॥ ताल तुमरी॥
॥सदा सहाई कुशलसूरिंद, गुरु द्यो दोलत
गुरु राय जी सदा॥ खाई न खूटे खरचीन
तूटे, दिन दिन वधे सवाय जी ॥ सा ॥१॥स
कजा सुत
उर
शुन
दाय जी ॥ स । मित्र समागम सुजस वधार
ध, नित प्रति हरष उत्साद जीस॥शारा
जा परजा पाय नमे सहू, गुरु समरण सुपसा
य जी।स। दोपी शमन नपनय पडियां,
सगुरु करय सहाय जी ॥ स० ॥३॥ विषमी
विरिया सकट पडिया, समस्यां आवे धाय जी
॥स ॥ नूख्या नोजन तिसिया पाणी, निरध
निया धन दाय जी॥स०॥४॥ सघ सकलनेयो
सुख शाता, जिम कीरत जग थाय जी। स०
सुदर नारी,
परिकर सुख
k
(५०)
॥ अन्य गुरुदेवजीका स्तवन ॥राम
॥ श्रीजिनदत्त सूरिंदा, परम गुरु
परम दयाल दया कर दीजे, दरिसन
नदा ॥ १० ॥श्री० ।। जगम सुरतरु
दायक, सेवक जन सुखकदा ॥सद्गुरु
नाम नित समरण, दूर हरण उस ददा
श्री ॥१॥ निजपद सेवक सांनिधकारी,
खीयें गुरु रोजिंदा॥ कर जोडी विनय
वे, श्रीजिन दरख सूरिंदापणाश्री
॥राग सारग।
॥ चरणकी वारीजा गुरुराय चरणकी।
आकणी॥श्रीजिनदत्त सूरीसर सदगुरु, सफर
घडीसेवा चरणकी॥वाणार॥प्रथम मंगल गरु
रायकी सेवा,अशुन करम सब हरणकी।वा०
चा॥दारिख नजन अरि सब गंजन, फ्ग
पग सानिध्य करणकीवाच॥३
N
(३५)
परिवाद अनेरी, सरण ग्रहीश्न चरणकी॥वा
॥॥श्रीजिनदर्ष तुम चरणको दासा, आ
शा पूरो सुख करणकी॥वाच ॥५॥ इति ॥
॥ताल तुमरी॥
॥ सदा सहाई कुशलसूरिंद,गुरुद्यो दोलत
गुरु राय जी ॥सदा॥ खाई न खूटे खरचीन
तूटे, दिन दिन वधे सवाय जी॥स० ॥१॥स
कजा सुत
चर सुदर
दाय जी॥स मित्र समागम सुजस वधार
ण, नित प्रति दरष उत्साह जीस ॥शारा
जा परजा पाय नमे सद, गुरु समरण सुपसा
य जी॥स ॥दोषी उशमन नृपनय पडिया,
सशुरु करय सहाय जी॥स ॥३॥ विषमी
विरिया सकट पडिया, समस्या आवे धाय जी
॥स० ॥ नूख्या नोजन तिसिया पाणी, निरध
नियां धन दाय जीस०॥४॥ संघ सकलनेयो
सुख शाता, जिम कीरत जग थाय जी॥ स०
नारी, शुन
परिकर सुख
.
(१०)
। थानक थिरता परिगल जोजन, पण
शल सदाय जी।स॥५॥अनय
खदाई सदगुरु, नवनिधि वन्ति थाय जी
॥सुमति सवाई नित घर सपद, दान।
सदाय जी॥ स० ॥६॥इति ॥
॥ पुन ॥
॥ कुशल गुरु अब मोदि दरिसण दी।
॥ ॥ ऐसी नाति करो मेरे सजुरु, ज्यु म
न मूढ पती॥ कु० ॥१॥जलदातार मिस्त
अमृतरस, श्रवण अजलि जर पीजें। सुरतरु
सम दरिसण विन देख्या, कहो नयण किम री
के ॥कु०॥॥ परम दयाल कृपाल रुपानिधि,
स्तनी अरज सुगीजें ॥ परम भगत जिनराज
तुम्हारो,अपनो कर जाणीजें ॥॥३॥ इति ॥
॥ पुन ॥
॥ कुशल गुरु कुशल करो भरपूर, सेवक
जन मन पग्ति पूरण, समस्या होय
म
(२६१) कु० ॥१॥ परम दयाल प्रेम रस पूरण, अशु नदरण नये दूर ॥ सघ उदय कर सदगुरु मे रा, विनवे श्रीजिनचंद सूर ॥ कु० ॥॥ इति ॥ ॥ परममंगल श्रीदादाजीकाव्यानि ॥ ॥ दासानुदासा श्व सर्वदेवा, यदीयपादा जतले सुति ॥ मरुस्थलीकल्पतरु सजीया, धुगप्रधानो जिनदत्तसूरि ॥१॥ ॥चिंतामणि कल्पतरुर्वराको, कुर्वन्ति न व्या किमु कामगव्या ॥प्रसीदत श्रीजिनदत्त सूरेः, सर्व पद दस्तिपदे प्रविष्ट ॥२॥ ॥नो योगीन च योगिनी न च नराधीशस्य नो शाकिनी, नो वेतालपिशाचराक्षसगणा नो रोगशोको नय ॥ नो मारी नच विग्रदान तय प्रीत्या प्रणत्युच्चकै , यस्ते श्रीजिनदत्तसू रिगुरवो नामाक्षर ध्यायति ॥३॥ ॥अथ सर्वश्या लिख्यते । ॥ बावन वीर किये अपणे वस, चौसठ जो ++
गण पाय लगा॥माण साण व्यतरसेल
नूत रु प्रेत पिशाच पुलाबीज तबम्स
नटक,अटक रहे जुखटक्क नकाई,कहेप्रमसिर
लघे कुप लीद,दिये जिनदत्तकिएकहाशा
गेर गेर ऐसो देव नही और
दादो दादो नामते जगत्र जस्स गायो है,था
पणेदीनाय आय पूजे लखलोक पाय, प्यास
नकु रान माऊ पानी आन पायो है॥ वाट पा
ट शत्रु थाट हाट पुरपाटणमें, देह गेह नेहसु
कुशल वरतायो है, धर्मसिंद ध्यान धरेसेवका
कुशल करे साचो श्रीजिनकुशल गुरु नाम यु
कदायो है॥॥
उप्पा कुशल अग उबरग,कुशलविणव्यापा
रें।कुशल देव देहरे, कुशलधन राजवारे
पुण्य पसायें कुशल, कुशल श्रीसघनणीजें।
वादण आवे कुशल, कुशल घर घर गाईजें।
श्रीजिनचसूरि पुरपधर, मंत्र
(१६३) टले ॥ श्रीजिनकुशल सूरि पाय पूजता, नव निधान लदमी मिले ॥१॥ ॥ कुशल वडो संसार, कुशल सऊन घर चादे ॥ कुशलें मयगल वार, लछि घर कुशलें आवे ॥ कुशलें धन वरसंत, कुशल धन धन्न रु वन्नो ॥ कुशलें घोडा थट्ट, कुशल पहरीयसु वन्नो॥ए रसो नाम सद्गुरु तणो, कुशलें ज ग रलीयामणो॥ नद्यारक श्रीजिनकुशल सूरि नाम ग्रहणे करी, घर घर होत वधामणो ॥शा ॥अथ गौतम स्वामीनो रास सिख्यते ॥ ॥ वीर जिणेसर चरण कमल कमलाकय वासो, पणमवि पनणिसु सामी साल गोयम गुरुरासो॥म णतणु वयणे एकत करवि निसुणटु नो नविया, जि म निवसे तुम देह गेह गुण गण गह गहिया ॥१॥ जंबूदीव सिरिजरह खित्त खोणी तख मगण, मगहदे स सेणियनरेस रिग्दल वलखमण ॥ धणवर गुवर गाम नाम जिहा गुणगणसता, विप्प वसे वसुन्नू तष्ठ तमु पुहधी नहा ॥२॥ ताणपुत्त सिरिश्द नू
।।३॥ नयणवयण कर चरण जणवि पंकसावपारि
य, तेजदि तारा चद सूरि थाकासनमाश्विर
जिणवर ण अचिय, रंना पउमा गरि गंगरतिहा
(२४)
प भूगसपपगिकी,
पपदद विझा विराम
रस अमो॥ विनय विवेक विचार सार गुब मन
मनोहर, सान दाय मुप्रमाणदेह स्वहि रंधावर ।
वदि मयण थनग करवि मेल्यो निराहिय,भीरममे
रु गनीर सिंधु चगम चयचाहिय ॥४॥ पेख विनिए
वम रूव जास जण जपे किंचिय, एकाकी किस पी
त्त श्च गुण मेल्या संचिय॥श्रया निश्चयपुर जन्म
विधि वचिय नय नए गुर कविण कोष
जस्थागत रहियो, पचसयां गुण पात्र मात्र ही
रवरियो ॥ करय निरंतर या करम मिथ्यामति मो
हिय, अणचन होसे परमाण सणह विसोहि
॥६॥ वस्तु ॥ जंबूवीष जंबदीव भरह वासनि,
खोणीतल मंगण, मगढ़ देस सेणिय नरेसर, पर
घरगाम तिहां, मिप्प पसे वसा वर तमु पुरवि
मुडा, सयपगणगणरूपनिहाण, ताबच विमान
खो, गोयम अतिहि सुजाण ॥ ॥ नास ॥ पर
.
म जिणेसर फेपलनाथी,
(५६५) ॥ पावा पुर सामी संपत्तो, चनविद देव निकायहि जुत्तो ॥७॥ देवहि समवसरण तिहा कीजें, जिण दी मिथ्यामत बीजे ॥ त्रिजुवनगुरु सिंहासन वेग, ततखिण मोह दिगत पश्शा॥ ए॥क्रोध मान माया मदपूरा, जाये नाग जिम दिनचोरा ॥ देव मुनि श्रागासें वाजी,धरम नरेसर श्राव्यो गाजी ॥१०॥ कुम्लुमवृष्टि थरचे तिहां देवा, चनसठ सज मागे सेवा ॥ चामर न सिरोवरि सोहे, रूवहि जिनवर जग सहु मोहे ॥ ११ ॥ उपसम रसन्नर वरवरसंता, जोजनवाणि वखाण करता ॥ जाणवि वर्डमान जि ण पाया, सुर नर किन्नर श्रावश राया ॥१॥ कत स मोदियजमहलकता,गयण विमाणहिरणरणकता॥पे खवि श्दसू मन चिंते, सुर थावे थम यह हुवते ॥ ॥ १३ ॥ तीरतरंमक जिम ते वहिता, समवसरण पुदता गद्गदिता ॥ तो थनिमानें गोयम जपे, श्ण अवसर को तणु कपे ॥ १४ ॥ मूढा कोक थजाण्यु वोले, सुर जाणंता श्म कां मोसे ॥मो थागल को जाण नणीजें, मेरु अवर किम उपम दीजें ॥ ॥ १५ ॥ वस्तु ॥ वीर जिपवर वीर जिणवर ना ण सपन्न पावापुरसुरमहिय, पत्तनाद ससारतारण ॥
(२६६) तिहिं देश निम्महिय, समवसरण यदु मुक कार प ॥ जिपवर जग उजोय करे, तेजहि कर शिनकार सिंहासण सामी वव्यो, दुई तो जयजयकार ॥११॥ भास ॥ तो चढियो घणमाण गजे, दलूय पूपये व तो॥हुकारो करमचरिय, कवणसु जिपवर देव तो ॥ जोजन भूमि समोसरण, पेखवि प्रथमारन तो॥ दह दिस देखे विवुधवधू, श्रावती सुररंन तो ॥१७॥ मणिमय तोरणदम ध्वज, कोसीसे नवघाट तो॥ घयरविवर्जितजतुगण, प्रातीहारिज श्राप तो॥सुर नर किन्नर असुरवर, इं शाणी राय तो॥ पित्त चमकिय चिंतष प,सेवंतीप्रनु पाय तो ॥ १० ॥स इस किरण सामीवीरजिण, पेविध रूप विसाख तो ॥ एह असंजय संजव ए, सायो ए ई जाख तो॥ तो धोखाव त्रिजग गुरु,अनू नामेण तो॥श्रीमु ख संसा सामि सवे, फेरे वेवपएण तो ॥ १४ ॥मा न मेल मद ठेस करे, जगतहिं नाम्योसीस तो॥पंच सासू मत लियो ए, गोयम पहिलो सीस तोप संजम सुपविकरे आवेय तो॥ नाम तो॥ २० ॥ तो॥
सन्धि वसेण, चरम सरीरीसोज मुनि ॥श्य देसणा निसुणेद, गोयम गणहर संचरिय ॥तापस पररसर, ण, जो मुनि दीगो श्रावतो ए ॥२५॥ तपसोमि । (१६७) तो उपदेसे नुवन गुरु, सयमशु व्रत पार तो ॥ बिहु उपवासें पारणो ए, थापण विरदंत तो ॥ गोयम संयम जग सयल, जय जयकार करत तो ॥१॥ वस्तु॥ अजूश्मनूश् चढियो बहुमान, हुकारोक र कपतो, समवसरण पहुतो तुरतो ॥ जे ससा तामि सये, चरमनाद फेडे फुरंततो॥ वोधवीज स सायमनें,गोयम जवदि विरतादिक खेई सिका स ही, गणपयसंपत्त ॥२२॥ नास ॥श्राज हु सुवि हाण, श्राज पचेसिमां पुण्य नरो॥ दीग गोयम सा मि, जो नियनयणे श्रमिय करो॥ समवसरण मका र, जे जे ससा ऊपजे ए॥ ते ते पर उपगार, कारण पूजे मुनि पवरो ॥२३॥ जीहा दीजें दीख, तीहाके वख उपजे ए॥श्राप कनें श्रणहत, गोयम दीजे दान श्म ॥ गुरु उपर गुरु नक्कि, सामी गोयम ऊपनिय॥ श्रणचल केवल नाण, रागज राखे रग रे ॥४॥ जो श्रष्टापद सेल, वैदे चढ चउवीस जिण ॥थातम यनिय अग,श्रम्हा सगति न ऊपजे ए॥ किम
२० तिर्यचना रुधिर पटवाची बाब
(२)
दे अहोरात्र असधाय
२ए मनुप्यना रुधिर पडवाची हाय रे
यहोरात्र असद्याय
३० मनुप्यनां अस्थि, दांत, दार परे हापर।
सो माहे सूत्र पढवु सूजे नहि
३१ स्त्रीने शतु थावे थके दिन ३ प्रमा
३२ श्राओ नक्षत्र थाव्या पी. स्वाति नक्षत्र
जो गाजे, वीजे, मेह वरसे, तो असधाप न होग,
३३ पुत्रने प्रसवे दिन' सात असचाय भने
दीकरीने प्रसवे दिन श्राप असवाय
३४ कालग्रहण विणकी नणवो गुणवो नहिं प्र
हर १२ वार असधाय,
३५ वैशाखपदि १, श्रावणयदि १, कार्तिकववि,
मागशिरवदिर ए चार दिवसें सदैव सचाय भने
सूत्रनी असचाय तो प्रहर १५ पार सूभी आपकी
साधु र श्रापककों कोनसी वस्तु कितने प्रदर
र विन पी. न खावणी सोखिखते हे
॥ चावल प्रहरण, राब प्रहर१२, घीस.
॥ श्रथ ॥
(२३)
बाबी प्रहर २४, ददि प्रहर १६, दूध प्रहर ४, कांजी
वडा प्रहर २४, घोमवडा प्रहर ४, तथ्यां वहां प्रहर
४,पूडी प्रहर , रोटी प्रहर ४, तथा ६ घाजरा के
प्ण प्रदर १२, जवार उष्ण प्रदर १२, बाजरीकी
खीचडी प्रदर , जवारकी खीचडी प्रहर ७, चा
वलकी खीचडी प्रदर ४, सीयासे थाटो दिन १७,
उन्हाले थाटो दिन ७, वरसाले बाटो दिन ५,
पक्कान सियाले दिन ३०, उन्हाले पकान्न दिन
१५, वरसासे पकान दिन , उन्हाले खूण फासू
दिन , वरसासे खूण फासू दिन ३, सीयाले फासू
खूण विन ५, सीयाले फासु घी दिन ७, उन्हाले
फासु घी दिन ५, वरसाले फासु घी दिन ३, तथा
हमेसका सियाले फासु पाणी प्रहर ५, वरसाले
फासु पाणी प्रहर ३, सर्व अनाजकी घूघरी पाणी
जीजोइ प्रहर , पाणीकी उसेश घूघरी प्रदर २७,
घीतेलकी तली धूघरी प्रहर २७, तथा २४ घडी प्र
हर , कठी प्रदर ४, सर्व दाल प्रहर ४, तथा ६
रायता प्रहर ए, घीकी तली प्रहर १६ एव सर्व व
स्तु ए कीये परिमाण उपरात चलितरस होवे, सो
साधु तथा श्रावकको खावे योग्य रहे नहि ।।
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