Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Ath Vedangprakash Bhag-i
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• भोरम . भूमिका मुझको इस पुस्तक का प्रकाश फरना आरश्यक निदित इसलिये दुआ है कि आज कल देवनागरी वणों के उभारण में यहुधा जो जो गडबड हुई है उम उस को छोड फर यथायोग्य वणों का उगारण मनुष्य करें। जैसे झा, इममे ज++श्रा, ये तीन अक्षर मिले हैं इनका उशारण भी जकार, मकार और आकार ही का होना वाहिये, किन्तु ऐमा न हो कि जैसे दाक्षिणात्य लोग अर्थान् द्रापिड़, मैला, फरणाटक और महाराष्ट्र "इनान", गुजराती लोग "ग्यान" और पञ्चगौड़ "ग्यान" ऐसा अशुद्ध उभारण धन्ध परम्परा से घेदादिशात्रों के पाठ में भी करते हैं। ऐसे ही पश्चगौड़ प्राय "" (के स्थान में "स" का और कोई कोई "स" का और "य" के स्थान में "" का उधारण करते हैं। वैसे ही यगाली लोग "" और "स" के स्थान में भी "श" का उगारण किया करते हैं। यह अन्ध परम्परा नष्ट होकर शुद्धोगारण की परम्परा होनी योग्य है। और 'जैसे पाणिनिकृत शिक्षा में तिरसठ अक्षर वर्णमाला में माने हैं उन- की गणना पूरी करने के लिये कई एक लोगो ने कुं, लु, गं, g" इन पार को यम मान के तिरसठ अत्तर पूरे किये हैं। भला यहाँ विधारना चाहिये कि जय वोक्त यम हे तो "चुं,, जु, मुंड, हुं" इत्यादि यमक्यों नहो, और जो कोई कहे कि (पलिकामी, घरसम्नतु, - २ जमि', जयघनु ) इत्यादि में "क्स् ग घ्" ये वर्ण यम कहा और प्रातिशाख्य में प्रसिद्ध हैं तो क्या इस बात को वे नहीं जाना कि वे वर्णान्तर कभी नहीं हो सकते, क्योंकि वे तो कवर्ग में पद तथा अपाणिनीय शिक्षा को पाणिनित मान के पाठ किया करतें और उसको वेदांग में गिनते हैं। क्या वे इतना भी नहीं जानते कि "अथ शिक्षा प्रवक्ष्यामि पागनीयं मतं यथा" अर्थ में जैसा पाणिनि मुनि की शिक्षा का मत है वैसी शिक्षा करूंगा। इस में स्पष्ट विदित होता है कि यह ग्रन्थ पाणिनि मुनि का बनाया नहीं, किन्तु किसी दूसरे ने बनाया है। ऐमे २ भ्रमो की निवृत्ति के लिए बड़े परिश्रम से पाणिनिमुनिम्त शिक्षा का पुस्तक प्राप्त कर उन सूत्रों गई सुगम भाषा में व्याख्या करके वर्णोधारण विद्या की शुद्ध प्रसिद् फरता हूँ कि मनुष्यों को थोड़े ही परिश्रम से वीचारणविधा वो प्राप्ति शीघ्र ही जावे। इस ग्रन्थ में जो २ घड़े अक्षरों में पाठ है यह २ पाणिनिमुनि- मृत और मध्यम अतरों में अष्टाध्यायी और महाभाष्य का पाठ और जो २ छोटे अक्षरों में छपा है यह मेरा बनाया है, ऐसा सत्र समझना चाहिए। इति भूमिका समाप्त ह० दयानन्द मरस्वती (काशी) - ।" इस लेस दो शब्द वर्णो धारण-शिक्षा, वेदांगप्रकाश और पठनपाठन व्यवस्था में प्रथम पुस्तक है । पाणिनि मुनिकृत शिक्षा सूत्री के स्थान में आधु- निक श्लोकयद्व शिक्षा का प्रचार हो जाने से ये शिक्षा सूत्र नष्ट हो गये थे। ऋषि दयानन्द ने भूमिका में खयं लिखा है-"बड़े परिश्रम मे पाणिनि मुनिकृत शिक्षा का पुस्तक प्राप्त कर से स्पष्ट है कि उन्हें इस शिक्षा का कोई हस्तलेख प्राप्त हुआ था। महाशोक की बात है कि वह हस्तलेख ऋषि के वर्तमान संग्रह में हमे उपलब्ध नहीं होता। ऋषि के संगृहीत बहुत से हस्तलिखित प्रन्थ नष्ट हो चुके हैं। आज तक इस शिक्षा का दूसरा हस्तलेख प्राप्त नहीं हुआ किन्तु बड़े हर्ष की बात है कि इस शिक्षा से प्राचीन महर्षि श्रापिशलि के शिक्षा सूत्र प्राप्त हो गये हैं और छप भी गये हैं। श्रापि- शलि के शिक्षा सूत्र इम पाणिनीय शिक्षा के सूत्रों से बहुत मिलते हैं। प्रारम्भ के छः प्रकरणों में बहुत ही स्वल्प भेद है। इन दोनो शिक्षा सूत्रों की तुलना से स्पष्ट होता है कि याणिनि शिक्षा का जो हस्तलेख ऋषि दयानन्द को प्राप्त हुआ था, वह अपूर्ण और अव्यवस्थित था। जिस प्रकार पाणिनीय और आपिशल शिक्षा सूत्र परस्पर मिलते हैं, इसी प्रकार पाणिनीय व्याकरण और आपिशल व्याकरण दोनों के सूत्र भी परस्पर बहुत मिलने हैं और पाणिनीय व्याकरण के सदृश प्रापिशल व्याकरण में भी पाठ अध्याय थे। मधुराप्रसाद शिवहरे, मैनेजिंग डाइरेक्टर * इस पुस्तक की दूसरी प्रति प्राप्त हो गई है । उसके साहाय्य से यह दुर्लम वा अन्य पूर्ण हो जाता है। इसका भाषानुवाद सहित प्रकाशन शीघ्र ही किया जाएगा।
श्रो३म् ब्रह्मात्मने नमः ॐ अथ वर्णोच्चारणशिक्षा प्रिन) वर्ण वा अक्षर किनको कहते हैं ? १-(उत्तर) अक्षरं नक्षरं विद्यादभोतेर्वा सरोऽक्षरम् । वर्ण वाहु. पूर्वसूने किमर्थमुपदिश्यते ॥ महामाष्य श्र.१ । पा. १ । था.२॥ मनुष्य (अक्षरं नक्षरम् ) जो सर्वत्र व्याप्त जिन का कभी विनाश नहीं होता (वर्ण वाहुः पूर्वसूत्रे) अथवा जिनको पूर्वसूच' में वर्ण और अक्षर कहते हैं। (.विद्यात् ) उनको प्रयत्न से जानें। र प्रभ) किसलिए इनका उपदेश किया जाता [है.] २-(उत्तर) वर्णज्ञानं वाग्विपयो यत्र च ब्रह्म वर्त्तते । तदर्थमिष्टबुद्धयर्थ लघ्वर्थ चोपदिश्यते ॥ सोऽयमक्षरसमानायो वाक्समानायः पुष्पितः .. माध्यायी के 'भ इ उ ' आदि सूत्रों के व्याख्यान में पह कारिका है, याकरण की अपेक्षा में शिक्षा पूर्वसूत्र और उस में मी समर खरं. इसको अपेक्षा में पूर्व आकाशवायु० इस सूत्र में वर्ण का पाण्यान । महाभाष्य में पूर्वसूत्र शन्द का व्यवहार ५, ६ स्थानों पर हुश्रा है। उन सब स्थानों का तुलनात्मक अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि पूर्वसूत्र मगर ते किन्ही प्राचीन व्याकरण सूत्रों की ओर संकेत हैं । यु० मी.
वर्णोच्चारणशिक्षा फलितश्चन्द्रतारकवत् प्रतिमण्डितो वेदितव्यो ब्रह्मराशि सर्ववेदपुण्यफलावाप्तिश्चास्य ज्ञाने भवति । महाभाष्य श्र०१। पा०१श्रा०२॥ मनुष्य ( यत्र ) जिसमें (ब्रह्म च ) शब्द ब्रह्म वेद और परब्रह्म को प्राप्त हों ( वाग्विपय ) और वे जो वाणी का विपय अर्थात् (वर्णज्ञानम् ) वणों का यथार्थ विज्ञान है उसको जान सकें (तदर्थम्) इस इष्ट चुद्धि अर्थात् वर्णो का यथार्थ अभीष्ट ज्ञान और स्वल्प प्रयत्न से महालाभ को प्राप्त होने के लिये अक्षरों का अभ्यास वारंण की रीति प्रसिद्ध की जाती है। सो यह अक्षरों का अच्छे प्रकार कथन वाक्समानाय है, अर्थात् अपने शब्दरूपी पुष्प फलों से युक्त चन्द्र और ताराओं के समान सुशोभित आकाश में स्थित (राशि ) शब्दो का समुदाय ब्रह्मराशि जानने योग्य है और इसके यथाथज्ञान में सम्पूर्ण वेदो का फल प्राप्त होते है। इससे वणों के ठीक • उच्चारण से सुनने की निवृत्ति होती है। इसलिए यह वर्णोचारण विद्या अवश्य जाननी चाहिये। (प्रश्न) वर्षों का रूप कैसे प्रन्ट होता है ? ३-(उत्तर) आकाशवायुप्रभव' शरीरात् समुच्चरन् वक्त्रमुपैति नादः । स्थानान्तरेषु प्रविश्यमानो वर्षदमागच्छति य स शब्द ॥१॥ प्रीति और भ्रम -- 17 वर्णोच्चारणशिक्षा ३ - आकाश और वायु के सयोग से उत्पन्न होनेवाला नाभि के नीचे से ऊपर उठता हुआ जो मुस को प्राप्त होता है उसको नाद कहते हैं वह कण्ठ आदि स्थानों में विभाग को प्राप्त हुआ वर्ण भाव को प्राप्त होता है, उसको शब्द कहते हैं। ४-(उत्तर) आत्मा बुद्ध्या समेत्यार्थान् मनो युक्त विवक्षया । मन कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मास्तम् ।। भारतस्तूरसि चरन्मन्द जनयति स्वरम् ॥ जीवात्मा बुद्धि से अर्थों की सगति करके कहने की इच्छा से मन को युक्त करता है], विद्युतरूप मन जाठरामि को ताडता [है, वह वायु को प्रेरणा करता [६] और वायु उर स्थल में विचरता हुआ मन्द स्वर को उत्पन्न करता है। (प्रश्न) शब्द का स्वरूप कैसा है ? किस फल को प्राप्त करता और किन पुष्पो से सेवित है ? ५-(उत्तर) तमक्षर ब्रह्म परं पविन गुहाशय सम्यगुशन्ति विप्रा । स श्रेयसा चाभ्युदयेन चैव सम्यक् प्रयुक्त. पुरुप युनक्ति ॥२॥ (विप्राः) विद्वान् लोग (वम् ) उस आकाशवायु प्रतिपादित (अहरम) नाशरहित (गुहाशयम्) विद्यासुशितासहित बुद्धि में स्थित (परम् ) अत्युत्तम (पवित्रम् ) शुद्ध (ब्रह्म) शब्दशशि की ' वर्णोच्चारणशिक्षा (सम्यक् ) अच्छे प्रकार ( उशन्ति ) प्राप्ति की कामना करते हैं और (स एव ) वही ( सम्यक् प्रयुक्त. ) श्रच्छे प्रकार प्रयोग किया हुभा शब्द (अभ्युदयेन ) शरीर, आत्मा, मन (च) और स्वसम्बन्धियों के लिये इस ससार के सब सुख तथा (श्रेयसा) विद्यादि शुभ गुणों के योग (च) और मुक्तिसुख से (पुरुपम् ) मनुष्यो को (युनक्ति), युक्त कर देता है। इसलिए इस वर्णोच्चारण की श्रेष्ठ शिक्षा से शब्द के विज्ञान में सब लोग प्रयत्न करें। शब्द का लक्षण ६-श्रोत्रोपलब्धिबुद्धिनिधि प्रयोगेणाभिज्वलित आका- शदेश शब्द ॥ महामा० १.१.पा. १।०२।पा.२॥ यह 'अ इ उण' सूत्र की व्याख्या में लिखा है कि (श्रोत्रोप- (लब्धि) जिसका कान इन्द्रिय से ज्ञान और (बुद्धिनिर्माद्य) बुद्धि से निरन्तर ग्रहण और (प्रयोगेणाभिज्वलित ) जो उच्चारण प्रका- शिव होता 'स्था (आकाशदेश ) जिसके निवास का स्थान आकाश है (शब्द) वह शब्द कहावा है। (प्रश्न) वर्णमाला में कितने वर्ण हैं ? ७-(उत्तर) त्रिपष्टि ॥३॥ तिरसठ है। और ये अकारादि वणों में विभक है जैसे- वर्णोन्चारणशिक्षा अकारादि स्वरों का स्वरूप हव दीर्घ प्लुत ६ chor E कवर्ग-क स ग घ ह । चवर्ग-च छ ज झ न । अ३ टवर्ग-ट ठ ड ढ ण । तवर्ग-तथ द धन । पवर्ग-पफ घ मम। उ३ अन्तस्थय र ल व 1 ऊष्म-शप सह। ३ श्रयोगवाहरूप रू. ३ . विसर्जनीय ४ जिह्वामूलीय १ ५ दीर्घ ए ४ उपध्मानीय २ अनुनासिक चिह अनुस्वार ळ और यह अक्षर ओ यो३ ल . . ३ . शक, य परे रहने पर इनको चार यम भी कहते हैं। औ औ३२[प, फ परे रहने पर . उक्त वणों में अवर्ग के वर्ण अकार आदि स्वर और कवा आदि षों के वर्ण व्यखन कहाते हैं। स्वर वर्ण शनी में शुद्ध 'स्वरूप से भी रहते और व्यसनों के साथ में मानारूप भी आते हैं, मात्रारूप स्वरों में जब व्यवन मिलाये जाते हैं तब प्रत्येक व्यञ्जन बारह प्रकार से कहा जाता है उसका स्वरूप और सयोगचक्र (जिससे किव्यधन का परस्परसम्बन्ध विदित होता है ) आगे लिखते हैं। -
६
योन्चारणशिक्षा
वारह अक्षरों का स्वरूप
प
पु
1
६
का
प
कोसी के
संयोगवक्रम्
पाक
मा
मएस
पाँच्चारणशिक्षा 1 स्वरों की संज्ञाएं ह-ऊकालोऽभूस्वदीर्घप्लुतः।। प्रा० ११पा०२११०२७॥ स्वरों की हव. दीर्घ और प्लुत भेद से तीन संज्ञा है। इनके उच्चारण समय का लक्षण यह कि जितने समय में अङ्गुष्ठ के मूल की नाही की गति एक बार होती है उतने समय में हस्य, उससे दूने काल में दीर्घ और उसके विगने काल में प्लुत का उच्चारण करना चाहिये। और स्वरों के उदात्तादि भी गुण हैं- १०-उच्चरुदात्तः । अ० १ । २ । २६ ।। ऊर्व ध्वनि से उदास और- ११-नीचेरनुदातः ॥ ० १ १ २ ३० ॥ नीचे स्वरसे अनुदात्त बोला जाता है। १२-समाहारः स्वरितः ॥ अ० १ । २ । ३१ ।। उदात्त और अनुदात्तस्वरों को मिलाकर बोलना स्वरित कहाताहै। १३-हस्वं लघु ।। १०१।४।१०।। हस्व स्वर की लघु संज्ञा और- १४-सयोगे गुरु ।। अ० १ ४ । ११ ॥ जो दो वा अधिक व्यवनों का संयोग परे हो तो पूर्व हस्व अच् की गुरु संज्ञा होती है। जैसे 'विप्रः' यहां वकार के इकार की गुरु संज्ञा है क्योंकि इसके परे पकार और रेफ का संयोग है। १५-दोघं च ॥ ०१।४।१२ ॥ और दीर्घ की भी गुरु संज्ञा है।
वर्णोच्चारणशिक्षा
१६-हलोऽनन्तरा सयोग ।।०१।१।१७॥
अनन्तर अर्थात् अचों का जो व्यवधान उससे रहित हलों की
संयोग संज्ञा है।
व्यञ्जन का लक्षण
१७-अन्वम्भवति व्यञ्जनमिति ।। म० भा० ।।
०१. पा०२।सू० २६ श्रा.."
जिनका उच्चारण विना स्वर के नहीं हो सकता देन्यजन
कहाते हैं।
उच्चारण
करने वालों के गुण
१८-माधुर्यमक्षरव्यक्ति पदच्छेदस्तु सुस्वर ।
धैर्य लयसमर्थ च पडेते पाठका गुणा ।।
(माधुर्यम् ) वर्षों के उच्चारण में मधुरता (अतरव्यक्ति )
भिन्न भिन्न अक्षर ( पदच्छेद ) पृथक् २ पद (तु) और (सुस्वर)
मुन्दर ध्वनि (धैर्यम्) धीरता (च) और (लयसमर्थम्) विराम यथा
सार्थकता और जैसा हस्व दीर्घ प्लुत उदात्त अनुदाल खरिव स्वर स्पर्श
आदि अभ्यन्तर और विवारादि याह्य प्रयत्न से अपने अपने स्थानों
में वर्गों का उच्चारण करना तथा सत्यभापणादि भी वणों के
उच्चारण करने वालों के गुण हैं।
स्वरों के उच्चारण में दोप
१६-प्रस्त निरस्तमविलम्बित निहितमम्बूकृत ध्मातमयो
विकम्पितम् । सन्दष्टमेणीकृतमदंक द्रुत विकीर्णमेता
स्वरदोपभावना ॥
महाभाष्य ०१.पा.सा. १॥
वर्णोच्चारणशिक्षा (प्रस्तम् ) जैसे किसी वस्तु को मुस से पकड़ कर बोलना, (निरस्तम् ) जैसे किसी वस्तु को मुस से ग्रहण कर के फेंक देना, (अविलम्बितम् ) जिस का उच्चारण पृथक् पृथक करना चाहिये उसको वर्णान्तर में मिला के बोलना, (निर्हतम् ) जैसे किसी को घका देना, (अम्यूकृतम्) जैसे मुस में जल भरके योलना, (मातम्) जैसे रई को धुनना वा लोहार की भठ्ठी के समान उचारण करना, (विकम्पितम् ) जैसे कम्प करके बोलना, (सन्दष्टम् ) जैसे किसी वस्तु को दावों से काटते हुए बोलना, (एणीकृतम् ) जैसे हरिण फूद के चलते हैं वैसे ऊपर नीचे ध्वनि से बोलना, (अर्धकम् ) जितने समय में जिस वर्ण का उच्चारण करना चाहिये उसके आधे समय में बोलना, (द्रुतम् ) त्वरा से बोलना, (विकीर्णम् ) जैसे कोई वस्तु विखर जाय जैसा उच्चारण फरना । ये सब दोष स्वरों के उच्चारण करनेहारों के हैं। - २०-प्रतोऽन्ये व्यञ्जनदोषा । शश पप इति मा भूत् । पलाशः पलाप इति मा भूत् । मञ्चको मञ्चक इति मा भूत् । महाभाष्य कापा.१ प्रा." व्यसनों के उच्चारण में भी दोपों को छोडकर बोलना चाहिये। जैसे (शश:) इन वालव्य शकारों के उच्चारण में (पप इति मा भूत्) मूर्धन्य पकारों का उचारण फरना, (पलाश पलाप) यहा भी पूर्व- वात् जानना (मञ्चकः) इस च के स्थान में (मनक)जका उच्चारण करना, इत्यादि व्यसनों के उच्चारण करनेहारों के दोष कहाते हैं। इसलिए जिस जिस तर का जो जो स्थान, प्रयन और पारण का प्रम है, वैसा ही उस उस का उच्चारण करना योग्य है। (प्रश्न) इस प्रन्य में कितने प्रकरण हैं ?
वर्णोच्चारणशिणा -- - २१-(उत्तर) स्थानमिद करणमिद प्रयत्न एपो द्विधाऽनिल. । स्थानम् पीडयति वृत्तिकार प्रक्रम एषोऽथ नाभितलात् ॥४॥ । १ स्थान,२ करण, ३, प्राभ्यन्तर प्रयत्न, ४ बाह्य प्रयत्न, ५ स्थान में वायु का ताडन, ६ घृत्तिकार, ७ प्रक्रम और ८ नाभि के अधोभाग से वायु का उत्यान, ये आठ प्रकरण क्रम से इस ग्रन्थ में हैं। अथ प्रथम प्रकरणम् २२-अकुहविसर्जनीया कण्ठ्या ॥५॥ अ, श्रा, श्र३, कु अर्थात् क, ख, ग, घ, छ, ह और विसज- नीय इन वर्षों का कण्ठ स्थान है। अर्थात् जो जिला का मूल कण्ठ. का अग्रभाग काकल्क के नीचे देश है उस कण्ठ स्थान से इनका शुद्ध उचारण होता है। २३-इविसर्जनीयाबुरस्यावेकेषाम् ॥६॥ कई एक आचार्यों का ऐसा मत है कि हकार और विसर्जनीय का उचारण उर म्यान अर्थात् कण्ठ के नीचे और स्तनों के ऊपर स्थान से करना चाहिए। २४-जिह्वामूलीयो जिह्वयः ॥ ७॥ और वे ऐसा भी मानते हैं कि जिसलिए जीम के मूल से इस जिह्वामूलीय का उच्चारण होता है इसलिए यह जिह्वामूलीय फहाता है। २५-कवर्ग ऋवर्णश्च जिह्वयः ॥८॥ तथा उनका यह भी मत है कि जिस कारण कवर्ग और वर्ण अर्थान् हस्य, दीर्घ और प्लुत का जिह्वामूल भी स्थान है, इससे इनको 'जिह्वा की जड़ में से भी बोलना अशुद्ध नहीं।
चन्चिारणशिक्षा
१
२६-सर्वमुखस्थानमवर्णमित्येके ॥३॥
जिसलिये अवर्ण का उच्चारण सन मुख में करना शुद्ध है इस-
लिये कोई आचार्य अवर्ण को सर्वमुसस्थान वाला कहते हैं ।
२७-कण्ट्यानास्यमात्रानित्येके ॥१०॥
तथा कई एक आचार्यों का मत ऐसा भी है कि जिन जिन
वों का कण्ठ स्थान है उन सब का उच्चारण मुखमान में होना भी
अशुद्ध नहीं।
२८-इचुयशास्तालव्याः ॥११॥
जो इ, ई, ३३, चु अर्थात् च, छ, ज, झ, ब, य और श हैं
उनका तालु स्थान अर्थात् दातों के ऊपर से उच्चारण करना चाहिये,
जैसे च के उशारण में जिस स्थान में जैसी जीभ की रिया करनी
पड़ती है वैसे शकार का उच्चारण करना योग्य है ।
२६-ऋटुरषा मूर्धन्याः ॥१२॥
ऋ, ऋ, ऋ३, ट, ठ, ड, ढ, ण, र और ५ का उच्चारण मूघो
स्थान अर्थात् तानु के ऊपर से करना चाहिए। जैसी क्रिया ट के
उचारण में की जाती है वैसी
प के उच्चारण में करनी उचित है।
३०-रेफो दन्तमूलीय एकेषाम् ॥ १३ ॥
कई एक आचार्यों का ऐसा मत है कि र का उच्चारण दांत के
भूल से भी करना योग्य है।
३१-दन्तमूलस्तु तवर्गः ॥ १४ ॥
वैसे ही कई एक आचार्यों के मत में तवर्ग अर्थात् त, थ, द,
ध, और न का उच्चारण दन्तमूल स्थान से भी करना अच्छा है।
३२-लतुलसा दन्त्याः ॥१५॥
वर्णोच्चारणशिक्षा छ, ३, तु अर्थात् त, थ, द, ध, न, ल और स इन वर्षों का दन्तस्थान अर्थात् दातों में जिह्वा लगा के उच्चारण करना है। ३३-वकारो दन्त्यौप्य ॥१६॥ व का उच्चारण दाँत और ओष्ठ से होना चाहिये। ३४-सक्किणीस्थानमेके ॥ १७ ॥ कई एक आचार्यों के मत में वकार को सूक्किणी स्थान से घोलना चाहिये, जो दाँत और पोष्ठ के बीच मे स्थान है उसे सक्किणी कहते हैं। ३५-उपूपध्मानीया श्रोष्ट्याः॥१८॥ द, , उ३, प, फ, ब, भ, म, और * इस उपध्मानीय का पोष्ट स्थान से उधारण करना शुद्ध है। ३६-अनुस्वारयमा नासिक्या ॥१६॥ ळ को छोड के " और अनुस्वार को नासिका से बोलना ३७-कराख्यनासिक्यनुस्खारमेके ॥ २०॥ कई आचार्य अनुस्वार का कण्ठ और नासिका स्थान कहते हैं। ३८-यमाश्च नासिक्यजिह्वामूलीया एकेपाम् ।। २१ ॥ कई एक प्राचार्यो के मन से यम वर्ण अर्थात्, ५, ये भी नासिका और जिह्वामूल स्थान वाले हैं। ३६-एदेतौ कण्ठ्यतालव्या ।। २२ ।। ए, ऐ कण्ठ और ताल से बोलने योग्य हैं। ४०-योदौतौ करख्योप्ट्यौ ॥ २३ ॥ मो, श्री को कण्ठ और पोष्ठ से बोलना शुद्ध है। ४१-डनणनमा स्वस्थाननासिकास्थाना ॥ २३ ॥ शुद्ध है। - वर्णोच्चारणशिक्षा - इकारादि पाँच वणों को स्व स्व स्थान और नासिका स्थान से घोलना चाहिये। ४२-द्वे द्वे वर्णे सन्ध्यक्षराणामारम्भके भवत इति ॥२॥ सन्ध्यतर अर्थात् जो ए, ऐ, ओ, श्री' हैं इन में दो दो वर्ण मिले होते हैं। जैसे श्र, श्रा से इ, ई मिल के ए; अ, श्रा से ए, ऐ मिल के ऐ, श्र, आ से उ, ऊ मिल के ओ; 'अ,आ से ओ, औ मिल के ओ हो जाते हैं। जैसे एकार के आदि में प्रकार का कण्ठ और अन्त में इकार का तालु स्थान है इसी प्रभार औकार में प्रथम कण्ठ और दूसरा ओष्ठ स्थान है। ४३-सरेफ ऋवर्णः ॥ २६ ॥ 'ऋवर्ण रेफ से युक्त है। अर्थात् इसके उच्चारण में रेफ श्रुति होती है। 'इति प्रथमं प्रकरणम् ॥ अथ द्वितीयं प्रकरणम् अय स्थानों के कहने के पश्चात् दूसरे प्रकरण का प्रारम्भ करते हैं, इस में जैसी जैसी क्रिया से जिस जिस वर्ण का उचारण करना होता है उस उसका वर्णन है। परंतु यहां इतना अवश्य समझना है कि सब वर्णो के उच्चारण में जिह्वा मुख्य साधन है, क्योंकि उसके बिना किसी वर्ण का उच्चारण कभी नहीं हो सकता। ४४-जिहयतालव्यमूर्धन्यदन्त्याना जिह्वा करणम् ॥१॥ जिनका जिह्वामूल, तालु, मूर्धा और दन्त स्थान है उनके उच्चारण में जिला मुख्य साधन है, क्योंकि जिस जिस वर्ण का जो जो स्थान १४ वर्णोचारणशिक्षा कहा है उस उस में जिह्वा लगाने ही से उनका ज्यों का त्यों उच्चारण होता है । यह सामान्य सूत्र है, इसका विशेष विधान आगे कहते हैं। ४५-जिह्वामूलेन जियाना तयेपामभ्यासम् ॥ २॥ जिन वणों का जिह्वामूल अभ्यास अर्थात् उच्चारण स्थान है उन जिह्वामूलीय वणों का जिह्वामूल से स्पर्शकरके उच्चारण करना चाहिये। ४६-जिहोपाग्रेण मूर्धन्यानाम् ॥ ३॥ जिन वर्णो का मूर्धा स्थान कहा है उनका उच्चारण जिला के कपरले अग्रभाग से मूर्धा को स्पर्श करके करना चाहिये। ४७-जिह्वाग्राधः करण वा ॥ ४ ॥ इनके उच्चारण में दूसरा पक्ष यह भी है कि जिह्वान के अधोभाग से मूर्धा को स्पर्श करके उच्चारण करना योग्य है। ४८-जिह्वाग्रेण दन्त्यानाम् ॥ ५ ॥ जिन वणों का दन्त स्थान कहा है उनका उधारण जिहा के अप्रभाग से दाँतों को स्पर्श करके ही करना चाहिये। ४६-इत्येतदन्त करणम् ॥ ६॥ इस प्रकार से मुस के भीतर स्थानों में वर्षों की उच्चारण किया जाननी चाहिये। इति द्वितीयं प्रकरणम् । * इस का अर्थ यह भी हो सकता है कि जिद्दामूलीय वणों का 'जिह्वामूल उच्चारण साधन उनके लिए है जिनको उस प्रकार बोलने का अभ्यास होवे । पु०मी.
वर्णोच्चारणशिक्षा . . अथ तृतीयं प्रकरणम् अव स्थान और करण के कहने पश्चात् तीसरे प्रकरण का श्रारम्भ किया जाता है। इसमे श्राध्यन्तर प्रयत्नो का वर्णन किया है। ५०-प्रयत्नोऽपि द्विविधः ॥१॥ प्रयन भी दो प्रकार के होते हैं। ५१-याभ्यन्तरो बाह्यश्च ॥ २॥ थाभ्यन्तर और बाघ । ५२-ग्राभ्यन्तरस्तावत् ॥ ३ ॥ इन दोनों में से प्रथम श्राभ्यन्तर प्रयत्रो को कहते हैं। ५३-स्पृष्टकरणाः स्पः॥४॥ ककार से लेके मकार पर्यन्त २५ पच्चीस वर्षों का स्पृष्ट प्रयत्न है अर्थात् जिह्वा से स्व स्व स्थानों में स्पर्श करके इन वणों का उचारण करना शुद्ध है। -ईपत्स्पृष्टकरणाः अन्तस्थाः ॥ ५ ॥ थोड़े स्पर्श करके अन्तस्य अर्थात् य, र, ल, व, के उच्चारण करना चाहिये। ५५-ईपद्विवृतकरणा ऊष्माणः ॥ ६॥ उम वणों का' ईपद्विवृत प्रयत्न है अर्थात् श, प, स, ह फा उच्चारण कण्ठ को थोडा फैलाकर करना चाहिए। ५६-विवृतकरणा वा ॥७॥ इसमें दूसरा पक्ष यह भी है कि उप्मवणे का विवृत प्रयत्न है. इसलिए इनका उच्चारण कण्ठ खोलकर करना चाहिए। ५७-विवृतकरणाः स्वराः ॥ ८॥ ५४- ܀ .. ।
वर्णोचारणशिक्षा स्वरों का विवृत प्रयत्न है इनका उधारण कण्ठ को फैलाकर करना चाहिए। ५८-संवृतस्त्वकारः ॥६॥ अकार का संवृत प्रयत्न है, क्योंकि इसका उच्चारण कण्ठ को संकोच करके होता है। ५६-इत्येषोऽन्तः प्रयत्नः ॥ १० ॥ यह आभ्यन्तर प्रयत्नों का प्रकरण पूरा हुआ। इवि तृतीय प्रकरणम् । अथ चतुर्थ प्रकरणम् ६०-अथ वाद्याः प्रयत्नाः ॥१॥ अब इसके आगे चौथे प्रकरण में वणों के बाह्य प्रयनों का वर्णन करते हैं। ६१-वर्गाणा प्रथमद्वितीयाः शपसविसर्जनीयजिह्वामूली- योपध्मानीया यमौ च प्रथमद्वितीयौ विवृतकण्ठाः श्वासाऽनुप्र- दानाचाऽघोपा ॥२॥ यहाँ वर्ग शब्द से (कु, चु, टु, तु, पु) इन पांवों का ग्रहण है इनके दो दो वर्ण अर्थात् कवर्ग में (क,ख), चवर्ग में (प,छ), स्वर्ग में (ठ) तवर्ग में (त, थ) पवर्ग में (प, फ) ऊम्मो मे (श, प,स) और (.) विसर्जनीय (x) जिह्वामूलीय (*) उपध्मानीय (छ) ये दो यम इन अठारह ( १८) वणों का (विवृत कंठ) अर्थात् कंठ को फैला (वासानुपादन ) उच्चारण के पश्चात् श्वास को युक्त पर और (अघोप) सूक्ष्म धनि मी योजनारूप क्रिया करके इनका उच्चारण करना चाहिये।
वर्णोधारणशिक्षा ६२-एके अल्पप्राणा इतरे महाप्राणाः ॥ ३ ॥ पाचों वर्गों के प्रथम, तृतीय और पञ्चम अर्थात् (क, ग, ह, च, ज, ब, द, ड, ण, त, द, न, प, ब, म, य, र, ल, व) यम प्रथम नृतीय अर्थात् (२५) इतने सब अल्पप्राण अर्थात् ये थोड़े और (ख, घ, छ, झ, ४, ढ, थ, ध, फ, भ, श, प, स, ह) (:) (४) ()(छ,ळ) और अकारादि स्वर ये सब महाप्राण अर्थात् अधिक यल से बोले जाते हैं। ६३-वर्गाणा तृतीयचतुर्था अन्तस्था हकारानुस्वारी यमी च तृतीयचतुर्थौ नासिक्याश्च सघृतकण्ठा नादानप्रदाना घोषवन्तश्च ॥४॥ पांचों वगों के तीसरे और चौथे वर्ण अर्थात् (ग, ध, ज, झ, ड, ढ, द, ध, प, म ) अन्तस्य अर्थात् (य, र, ल, 4 ) ह (.) अनुस्वार और तीसरे चौथे यम अर्थात् (*) तथा सानुनासिक अकारादि स्वर इनका संतकण्ठ प्रयत्न अर्थात कंठ का संकोच (नादानप्रदाना ) इन के उच्चारण में अव्यक्त ध्वनि और (घोषवन्त.) इनका उधारण गम्भीर शन्द से करना चाहिये। ६४-यथा तृतीयास्तथा पञ्चमाः ॥ ५॥ वर्गों के तृतीय वर्षों के समान पञ्चम वर्ण अर्थात् (डबाण न,म) के संघृतकठ, नादानप्रदान और घोप प्रयत्न समझने चाहिये । ६५-यानुनासिक्यमेपामधिको गुणः ॥६॥ पूर्वोक्त छ, न, ण, न, म को मुख से बोल पश्चात नासिका से बोलना ही इनका श्रानुनासिक गुण अधिक है। ६६-शादय ऊप्माणः ॥७॥ २ वर्णोधारणशिक्षा शादि अर्थात् (श,प,स,ह) की ऊम संज्ञा है और ये महामारण प्रयत्न से बोले जाते हैं। ६७-सस्थानेन द्वितीयाः ॥८॥ जो पांच वर्गों के दूसरे वर्ण अर्थात् ( ख, छ, ठ, य, फ) हैं वे सकार के समान महाप्राण प्रयत्न से बोलने चाहिए। ६८-हकारेण चतुर्थाः ॥४॥ वर्गों के चतुर्थ अर्थात् घ, झ, ढ, ध, भ, इन पाच वणों का हकार के समान महाप्राण प्रयत्न होता है। इति चतुर्थ प्रकरणम् । अथ पञ्चमं प्रकरणम् ६६-तन स्पर्शयमवर्णकरो वायुरयपिण्डवत् स्थानम- मिपीडयति ।। अन्तस्थवर्णकरो वायुरुपिण्डवद्, ऊष्मस्वर- वर्णकरो वायुरूर्णापिण्डवद् । उक्ता. स्थानकरणप्रयत्नाः ॥१॥ सब मनुष्यों को उचित है कि जो (स्पर्श) ककार से लेके म पर्यन्त पीस (२५) वर्ण और चार थम हे इन को प्रकट करने वाले वायु को लोहे के गोले के समान स्थान में लगा के अन्तस्थ वणों के बोलने मे वायु को काष्ठ के गोले के समान स्थान में लगा के और शादि तथा पाईस ( २२ ) स्वरों के उच्चारण में वायु को ऊनके गोले के समान स्थान में लगा के चोला करें। इस प्रकार जो स्थान फरण और प्रयत्न कह चुके हैं उनका ज्ञान अवश्य करें। इति पञ्चमं प्रकरणम् ।
वर्णाधारणशिक्षा
अथ पष्ठं प्रकरणम्
७०-अवर्णो हस्वदीर्घप्लुतत्वाच स्वोपनयेन चानुना-
सिक्य भेदाच्च संख्यातोऽष्टादशात्मकः, एवमिवर्णादयः ॥२॥
अव अकारादि वर्गों के भेद दिसाते हैं-अकार के उदात्त,
अनुदात्त और स्वरित भेद हैं । और जब इन एक एक के साथ
हस्व उदात्त, हस्व अनुदात्त, हस्व स्वरित और इसी प्रकार दी और
प्लुत के साथ लगते हैं तब प्रकार के नव भेद हो जाते हैं। और
जय ये सानुनासिक भेदयुक्त होते हैं तब इन नव नव के अठारह
अठारह भेद होते हैं। इसी प्रकार इकार आदि स्वरों में प्रत्येक फे
अठारह भेद समझने चाहिये, परन्तु-
७१-लवर्णस्य दीर्घा न सन्ति ॥ २ ॥
जिसलिए लुकार के दीर्घ भेद नहीं होते-
७२-तं द्वादशभेदमाचक्षते ॥३॥
इसलिए लुकार को पारह (१२) भेद से युक्त कहते हैं।
७३-यदृच्छाशब्दे अशक्तिजानुकरणे वा यदा दीर्घाः
स्युस्तदाऽष्टादश भेदं त्रु वते क्लुपक इति ॥४॥
जिन लोगों के मत में यदृच्छा शब्द होते हैं उनके मत में अथवा
जब अशक्तिज ऋकार के स्थान में घोले गये लकार का अनुकरण
में प्रयोग करते हैं, तब लुकार को दीर्घ मान के उस के भी अठारह
(१८) भेद होते हैं, जैसे 'कल्पक' के इस प्रयोग में होते हैं।
७४-सन्ध्यक्षाणां हस्वा न सन्ति, तान्यपि द्वादश-
प्रभेदानि ॥ ५॥
वर्णोचारणशिक्षा जिसलिए सन्ध्यतर अर्थात् (ए, ऐ, श्रो, औ) इनके हस्त्र नहीं होते इसलिए इनके भी चारह भेद होत हैं। ७५-अन्तस्था द्विप्रभेदा रेफवर्जिता. सानुनासिका निरनुनासिकाश्च ॥६॥ और 'र' को छोडकर अन्तस्थ अर्थात् ( य, ल, व) ये तीन सानुनासिक य, लँ, वे और निरनुनासिक य, ल, व भेद से दो प्रकार के होते हैं। ७६-रेफोष्मणा सवर्णा न सन्ति ॥७॥ जिसलिए 'र' और ऊप्म अर्थात् 'श, प, स, ह' का कोई सवर्णी नहीं होता, इसलिये इनके परे किसी वर्ण के स्थान में इनका सवर्णी आदेश नहीं होता। ७७-वग्यौं वर्येण सवर्ण ॥८॥ परन्तु कु, चु, टु, तु, पु इन पाच वर्ग और य, ल, व इन तीनों की परस्पर सवर्ण सज्ञा मानी जाती है, जैसे ककार का सवर्णी खकार समझा जाता है, वैसे सर्वत्र समझना चाहिये। इति पष्ट प्रकरणम्। अथ सप्तमं प्रकरणम् ॥ ७८-इत्येष कमो वर्णानाम् ॥ १॥ यह पूर्व अकारादि वणों का मम कह के- । ७ह-तते कौशिकीया श्लोका ॥२॥ पष्ट प्रकरण के विषय में फौशिक ऋपि के श्लोक हैं उन में से आगे कुछ विशेष रिपयक श्लोक लिखते हैं।
वर्णोचारपशिक्षा ८०-सर्वान्तेऽयोगवाहत्वाद्विसर्गादिरिहाऽएकः । श्रकार उचारणार्थो व्यञ्जनेष्वनुबध्यते ॥३॥ विना संयोग के प्राप्त होने से यहां सब वर्णमाला के अन्त में विसर्ग आदि अष्टक = विसर्जनीय, जिह्वामूलीय, उपध्मानीय, अनु- स्वार, चार यम गिना जाता है और अलग इसकी प्राप्ति होती है इससे विसर्गादि अष्टक प्रयोगाह कहाता और वर्णमाला के वणों से अलग गिना जाता है। वर्णमाला के व्यसनी में एक प्रकार अनुपन्ध किया है, वह उच्चारणमान के लिए है कि जिससे व्यखन का स्पष्ट उच्चारण हो। ८१-क पयोः कपकारौ च तद्वर्गीयाश्रयत्वतः । पलिक्नी चल्नतुर्जम्मिर्जप्नुरित्यत्र यद्वपुः । नासिक्येनोक्तं कादीना त इमेऽयमास्तेषामुकारः संस्थान- वर्गीयलक्षकः ॥ ४॥ - जिह्वामूलीय और ४ उपध्मानीय के साथ में जो ककार और पकार हैं वे वर्गीयाश्रयत्व से हैं अर्थात् उनका कवर्ग और पवर्ग के परे विधान है। इस से उन के साथ में ककार और पकार हैं। पलिक्नी आदि प्रयोगों में जो क ख ग ध्' इत्याफारक अंश नासि- कास्थानीय ननम् न्' वर्गों से अप्रकटित अर्थात् गृहीत नहीं होता है वह अयम अर्थात् यम नहीं और ककारादि वर्ण का जो उकार आता है वह सस्थानीय वर्ण अर्थात् उन वर्गो के सजातीय वों का लक्षक है । जैसे कु, चु, दु, तु, पु इनमें प्रत्येक वर्ण के उकार के संयोग से वर्गमान का योध होता है। इति सप्तमं प्रकरणम्।
२२ वणाचारणाशक्षा अथाष्टमं प्रकरणम् ८२-उक्ता. स्थानकरणप्रयत्नाः ॥१॥ अव सब वणों के स्थान, करण और प्रयलों को कह चुके, अगले प्रकरण में स्थान आदि के लक्षण कहते हैं। ८३-यवस्था वा उपलम्यन्ते तत्स्थानम् ॥ २॥ स्थान उसको कहते हैं कि जहा से प्रसिद्ध होके वर्ण सुनने में आते हैं। ८४-येन निर्वृत्यते तत्करणम् ॥ ३॥ स्थानों में जीभ और प्राण के जिस संयोग से वणों का उच्चारण करना होता है, उसको क्रण कहते हैं। ८५-प्रयतन प्रयत्न॥४॥ जो वर्गों के उच्चारण में पुरुषार्थ से यथावत् क्रिया करनी होती है, वह प्रयत्न कहाता है। ८६-नाभिप्रदेशात् प्रयलप्रेरितः प्राणो नाम वायुरुर्ध्व- माक्रामन्नुर आदीना स्थानानाममन्यतमस्मिन् स्थाने प्रयत्लेन विचार्यते ॥५॥ जो ऊपर को श्वास निकलता है उसको प्राण कहते हैं जो आत्मा के उच्चारण की इच्छा से विचारपूर्वक नाभि देश से प्रेरणा किया प्राणवायु ऊपर जो उठता हुअा कण्ठ आदि स्थानों में से किसी स्थान में उत्तम यतन के साथ विचार जाता है अर्थात् अकारादि वर्गों के पृथक् २ उचारण में वायु के संयोग से विचारपूर्व यथायोग क्रिया करनी चाहिये।
वर्णोचारणशिक्षा
सब मनुष्यों को उचित है कि जिस जिस प्रकरण में जिस वर्ण
के उचारण के लिए जो जोयात लिसी है, उसको ठीक ठीक जान
कर विद्यार्थियों को जना के शब्दादरों क प्रयोग ज्यों के त्यों कर
प्रशंसित हो सदा आनन्द से युक्त रह और सय विद्यार्थियों को भी
पर्णोधारण शुद्ध कराकर आनन्द में रक्तो।
इत्यष्टमं प्रकरणम् ।
ऋतुरामाङ्कचन्द्रेऽन्दे माघमासे सिते दले।
चतुर्थी शनिवारेऽयं प्रथः पूर्ति समागतः ।।
इति श्रीमत्स्वामिदयानन्दसरखतीप्रणीतव्याख्यासहिता
पाणिनीयशिक्षा सूत्रसंप्रहान्विता वर्णोच्चारणशिक्षा
समाप्त।
चारों वेद सरल हिन्दी अनुवाद सहित
[भाष्यकार-श्री प० जयदेव शर्मा, विद्यालङ्कार, मीमांसावी.)
संपूर्ण १४ सण्डों का मूल्य ११२) रु० नेट.
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प्रत्येक आयगृह, आर्यपुस्तकालय, वैदिक स्वाध्यायप्रेमी आर्य
नर-नारी के पास ईश्वरीय ज्ञान वेद भगवान् की
एक-एक प्रति अवश्य होनी चाहिये
सामवेद १खएड
८).० अथर्ववेद ४ खण्ड ३२) ३०
यजुर्वेद
२ खण्ड १६) २०) ऋग्वेद
७ खण्ड ५६).
प्रत्येक जिल्द लगभग ७०० पृष्ठों की, पूरे कपडे की बंधी हुई,सुनहरे अक्षरों सहित
मैनेजर,
आर्य साहित्य मण्डल लिमिटेड, अजमेर.
॥ ओ३म् ॥ आर्यसमाज के नियम १-सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं उन सब का आदि मूल परमेश्वर है। २-ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्याय- कारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पविन और सृष्टिकर्ता है, उसी की उपासना करनी योग्य है। ३–वेद सम सत्य विद्याथों का पुस्तक है । वेद का पढ़ना पढ़ाना और सुनना सुनाना सब आर्यों का परमधर्म है। ४-सत्य के प्रहण करने और असत्य के छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिये। ५-सब काम धर्मानुसार, अर्थात् सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहिये। ६-संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है, अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना। ७-सब से प्रीतिपूर्वक धर्मानुसार यथायोग्य वर्त्तना चाहिये । ८-अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये। ९–प्रत्येक को अपनी ही उन्नति से संतुष्ट न रहना चाहिये, किन्तु सब की उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिये। १०-सब मनुष्यों को सामाजिक, सर्वहितकारी नियम पालने में परतन्त्र रहना चाहिये और प्रत्येक हितकारी नियम में सत्र स्वतन्त्र रहें।
WHAT . ०५० महर्पिकृत ग्रंथों के सस्ते व सुलभ संस्करण सत्यार्थप्रयाग (अजिल्द) २.२५ / गोररणानिधि सत्यार्थप्रकाश (सजिल्द) २७५ सरकारविधि वदिया ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका हवनमत्रा अजि०२५०, सजि०३.०० / नित्यकर्मविधि व्यवहारभानु १२० आर्योद्देश्यरनमाला पचमहायज्ञ विधि ०२० । सस्कृतवाक्यप्रयोध ०५० अन्य उपयोगी पुस्तकें वाल सत्यार्थ प्रकाश १००१ दयानन्द वाणी वैदिक मनोविज्ञान ०३७ / दयानन्द वचनामृत वैदिक अध्यात्मसुधा ०.६२ | भयानक पड्यत्र ०२५ रामायणदर्पण १२५ सतरे का घण्टा , महाभारत शिक्षा सुधा कतव्य-दर्पण १०५ सत्सग यज्ञ-विधि ०३७ युद्धनीति और अहिंसा १२५ सामान्य ज्ञान ४ भागों में, स्वस्थ जीवन ०२५,०३७,०४४,०५० साहित्य-प्रवेश ४ भागों मे, जीवन की नींव ३ २०० ०४४,०४४,१००,१०० गरड पुराण की बालोचना०५० इतिहास की कहानियाँ ०५६/ आर्यपर्वपद्धति १५० खूनी इतिहास ०७५ | सत्यधर्म विचार ०२५ ३२५ । वेदविरद्ध-मव-सडन हैदराबाद सत्याग्रह का रारजित इतिहास कर्म भीमासा-ले० आचार्य वैद्यनाथ शास्त्री २२५ सन्मार्ग दर्शन-ले० स्वामी सर्वदानन्दजी सजिल्द ४०० पुस्तकें मिलने का पता- श्रार्य साहित्य मण्डल लिमिटेड, अजमेर । १५० खतरे का बिगुल १००हमारे आदर्श कृष्ण चरित ०३५
वेदांगप्रकाशे द्धितीयो भागः
सन्धिविषयः
(संशोधितष्टिप्पणभरलंकृतश्च )
व्याख्याता-
श्रीमत्स्वामि-दयानन्दसरस्वती
साथ
॥ भोम् ॥
अथ वेदानप्रकाश:
* तत्रत्यो द्वितीयो भाग: *
सन्धिविषयः
पाणिनीयाष्टाध्याय्यां प्रथमो भागः
श्रीमत्स्यामिदयानन्दसरस्वतीकृतव्याख्यासहितः
श्रीपपिडतयुधिष्ठिर-मीमांसकेन संशोध्य,
टिप्पणीमिरलंकृतः
पठनपाठनव्यवस्थायां चतुर्थ पुस्तकम्
प्रकाशक
.
प्राय साहित्य मण्डल लिमिट, अजमेर,
मादित
प्रथमावृत्ति
१०.०
संवत्
दयानम्दान्दा २१ मुत्य साम
पस
प्रकाशक- आर्य साहित्य मण्डल लि., अजमेर. मुद्रक- दि फाइन आर्ट प्रिटिंग अजमेर .... سه १ .... .... 1. .... 4.4. विषयसूची १-प्रकाशकीय वक्तव्य १२~भूमिका ३-उपोद्धात ४-संज्ञा-प्रकरण ५-परिमापा-प्रकरण ६-साधन-प्रकरण १, स्यरसन्धि २. इलस्वरसन्धि ३. मन्धि ४. अयोगवाहसन्धि ७ व्याख्यातसूत्र-पातिक सूची ८ संशोधनपत्र ९ २५ ६४ .... . .... ... ..." १०० १२८ १३५ ... ....
वेदाङ्गप्रकाश, के भागों की क्रमसंख्या ऋषि दयानन्द ने पढ़ने पढ़ाने के लिये प्रमश, १६ पुस्तक प्रकाशित की। उनमें दो संकृतवाक्य-प्रबोध और म्यवहारमानु तथा १४ भाग चेदाप्रकाश के हैं। घेदानप्रकाश में १२ भाग व्याकरण विषयक है और वर्णोचारणशिक्षा तथा निघण्टु स्वतन्त्र वेदाग है भतः घेदामप्रकाश के प्रत्येक भाग के मुख पृष्ठ पर प्रायः तीन प्रकार की सख्या छपती है । प्रथम येथा प्रकाश के मागो की, दूसरी पाणिनीय भष्टाध्यायी अर्थात् ज्याकरण के भागों की, सीसरी पठनपाठनम्यवस्था क्रम की। वै० यं. के छपे घेदामप्रकाशों पर ये संख्याए बहुत अव्यवस्थित हैं। हम यहां प्रत्येक भाग की शुद्ध क्रम संख्या नीचे लिखते है- ५० पा० व्य• सख्या ०प्र० सख्या अष्टा० सख्या . ४ ५ २ ३ ४ O ५ ८ ५ ९ ६ वर्णीचारण शिक्षा. सन्धिविपय २ नामिक ३ कारकीय सामासिक स्गतादित अम्ययाय माख्यातिक सौवर पारिभाषिक धातुपाठ गणपाठ १३ उणादिकोश निघण्टु ७ द ९ ९ . १५ .
ओ३म् प्रकाशकीय वक्तव्य सुपि दयानन्द विक्रम की २० वीं शताब्दी के प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने आर्य भाषा (हिन्दी ), और संस्कृत भाषा को देश की राष्ट्र भाषा बनाने के लिये महान् प्रयत्न किया । यह उनके द्वारा लिसे गये अनेकों पत्रों से व्यक्त है । देखो ऋषि दयानन्द के पत्र और विज्ञापन (रामलाल कपूर ट्रस्ट लाहौर संस्करण ) पृष्ट २५, १२२, १४७, १५२, २९४, २९५, २९७, २९८, ३२४, ३६६, ३६८, ३६९, ३८६,४१६, ४२९, ४९८ । उन के उस महान् प्रयन का परिणाम यह हुआ कि देश में संस्कृत भाषा पढ़ने की एक लहर उत्पन्न होगई। जो व्यक्ति पूरा समय लगाकर किसी शिक्षक से संस्कृत भाषा पढ़ने में असमर्थ थे, उनकी ओर से एक ऐसे ग्रन्थ की मांग होन लगी जिस के द्वारा वे घर बैठे विना किसी शिक्षक के संस्कृत भाषा पढ़ सके । ऋषि दयानन्द उस समय वेदभाष्य के महत्त्वपूर्ण कार्य में विशेष रूप से लगे हुए थे । श्रत उन्होंने उस मांग की पूर्ति के लिये उक्त ग्रन्थ का कार्यभार अपने पण्डितों के ऊपर छोड दिया । इस प्रकार ऋषि दयानन्द की प्रेरणा और निर्देश के अनुसार पण्डितों ने चौदह भागों में वेदाग-प्रकाश की रचना की । देसो ऋषि दयानन्द के पत्र और विज्ञापन ( रा० ला० क० सं०) पृष्ठ ३३८, ३७४, ३७६; तथा श्री. महात्मा मुंशीराम (स्वामी श्रद्धानन्द) जी द्वारा प्रकाशित, पृष्ठ ४०, ४१, ४०४,४०५, ४१७, ४१८ । ५० भीमसेनजी के आश्विन शु० ६ सं० १९३८ के पत्र से ज्ञात
"....
-
होता है कि सन्धि-विषय की रचना ६० भीमसेनजी ने की थी।
वे लिखते हैं-
यह हाल मेरे बनाए सन्धि-विषय, नामिक और
कारकीय में कहीं आपने देखा? ....."
श्री० म० मुंशीरामजी सं० पत्रव्यवहार पृष्ट ४० ।
ऋषि दयानन्द को वेदभाष्य आदि को रचना और प्रचार कार्य से
इतना अवकाश नहीं मिलता था कि वे वेदाङ्गकाश के सब भागों
को पूर्णतया देख सकते । अतः इन प्रन्थों में व्याकरण की अनेक
भूलें रह गई। सधिन्विपर के प्रथम संस्करण के अशुद्ध मुद्रण
विषय में ऋषि दयानन्द का लेख इस प्रकार है-
सन्धिविषय की तरह अशुद्ध न होने पाये । अब हमने
शुद्धि देखा तो विदित हुआ कि जो कम विद्यावाला
भी ध्यान देकर शोधे तो भी ऐसी अशुद्धि कभी न रह सके।
पत्रव्यवहार (रा० ० सं०) ५४२७० ।
इसी प्रकार नामिक श्रादि अन्य भागों के विषय में भी पिके
पत्रव्यवहार में यत्र तत्र लिखा है।
वेदाङ्गमकाश के जिन भागों (वर्णोधारणशिक्षा, सन्धिविषय,
नामिक) का द्वितीय संस्करण पं० भीमसेनजी और पं० ज्यालादत्तजी
के कार्यकाल में प्रकाशित हुया उन में पयोत मंशोधन कर दिया
गया । अतः उन में अपेक्षा कृत अन्य भागों के अशुद्धियां न्यून हैं ।
सन्धिविषय के द्वितीय संस्करण (सं० ११४५ श्रापाद) फे
अन्तिम पृष्ठ पर निशन सूचना छपी है-
विसापन
यह पुस्तक (मन्धिविषय ) जिस समय प्रथम छपा था
उस समय सोपता के विचार से कुछ सून न्यून रक्से थे, और शीघ्रता के कारण कहीं कहीं अशुद्धिया भी रह गई थीं। अब द्वितीयावृत्ति में अनेक महाशयों की सम्मति से सन्धि सवन्धि विपय शुद्ध कर पूरा छपवाया हे । अत एव प्रथम छपी हुई पुस्तक से अब की बार सूत्र अधिक छपे हैं। ह.भीमसेनशर्मण हमारी चिरकाल से इच्छा थी कि इन वेदाङ्ग प्रकाशों का शुद्ध और सुन्दर मुद्रण हो, जिससे इन प्रन्थों के द्वारा व्याकरण पढने वालों को भ्रान्ति न हो। गत नवम्बर मास में ५० युधिष्ठिरजी मीमासक ने बताया कि गवर्नमेण्ट सस्कृत कालेज बनारस की प्राचीन व्याकरण और वेद नरुक्तप्रक्रिया क पाठ्यक्रम में वेदाङ्ग प्रकाश क सन्धि विषय, नामिक, आख्यातिक और उणादि-कोश इन चार भागों का समावेश हो गया है । इस कारण इन का शुद्ध मुद्रण अत्यन्त आवश्यक हा गया है। हमने इन अन्यों के सशोधन का भार ५० युधिष्ठिरजी मीमासक पर डाला और उन्होंने इस कार्य का करना सहप स्वीकार किया। । इस सस्करण की विशेषता मण्डल द्वारा प्रकाशित इस सस्करण में निम्न विशेषताए हैं- १-व्याकरण सबन्धी समस्त भूलें ऋषि दयानन्द कृत अष्टा ध्यायाभाष्य और महर्षि पतञ्जलि विरचित महाभाष्य के अनुसार ठीक कर दी है। २-जिस विषय में वैयाकरणों में मतभेद है, उसे वैसे ही रहने दिया है और उसका स्पष्टाकरण नीचे टिप्पणी में कर दिया है।
४
}को
३-जहा कहीं पाठ छूटा हुआ प्रवीत
उसे
मे पूरा कर दिया है।
४---विद्यार्थिया का सुगमता क लिये कई विषय नीचे टिप्पणा
में स्पष्ट कर दिये हैं।
५-प्रन्थ क मध्य और नीचे टिप्पणी में उद्धृत अध्यायी क
सूत्र वेदाग प्रकाश में जहा जहा व्याख्यात हैं उनके पते दे दिय है
जिसस छानों को उन सूत्रों का विषय समान में सरलना हो।
६-यह सस्करण सन्धिविषय के द्वितीय सस्करण के अनु
सार है । १४६८,७१, ७३ पर [
Jकोट म छपा पाठ श्राव
श्यक होने से प्रथम सस्करण से लिया है, और पृष्ठ ११ पर एक
वार्तिक बढ़ाया है, जिसका कारण नाचे टिप्पणी में व्यक्त कर
७-अन्य
व्याख्यात सून और वार्तिकों की सूची वर्णानुक्रम
से अन्त म लगा दी है, जिससे उनको ददन में सुगमता हा।
८-इस सस्करण में अप्राध्यायी फ सूत्रों और महाभाष्य के
पने प्राय प्रथम और द्वितीय सस्करण के अनुसार दिय है। इस
विषय में पृष्ठ १ की टिप्पणा दर्शनीय है।
श्राशा है इस प्रयत्न से पढन वाले विद्यार्थिया को पयात सहा
यता मिलेगा।
प्रकाशक
*--इस म दिये हुए पते मण्डर द्वारा प्रशस्यमाण वेदाङ्ग प्रका
के अनुसार है । वैदिक पन्त्रालय से अन्यों में भाग पीठ हैं।
* ओ३म् * भूमिका यह सन्धिविषय व्याकरण का प्रथम भाग है और पठन पाठन व्यवस्था में चौथा पुस्तक है '। मैंने यह पुस्तक इसलिये बनाया है कि जिससे व्याकरण में जितना सन्धि का विषय है उसको पढनेहारे सुख से समझ लेवें । व्याकरण का यही प्रथम विषय है कि जिसमें अच् के स्थान में हल, हल के स्थान में अच और हल के स्थान में हल और अच् के स्थान में अच् भी हो जाते हैं। विना सन्धिज्ञान यह बात समझ में कभी नहीं आ सकती, इसके विना जो-जो शब्द का प्रथम और पश्चात् स्वरूप होता है वह वह समझ में कभी नहीं आ सकता, इसके विना पदार्थज्ञान और वाक्यार्थज्ञान क्यों कर हो सकता है ? जब तक यह सब नहीं हो तब तक मनुष्य का अभीष्ट प्रयोजन भी प्राप्त नहीं हो सकता। इस प्रन्थ में लोक और वेद का विषय सम्पूर्ण रक्खा है, परन्तु पूर्वापर के स्थान मे जो आदेश जिस-जिस नियम से होते हैं वह-वह इसी ग्रन्थ से समझ लेना चाहिये । और जो-जो परिभाषा महाभाष्यस्थ हैं उन सब की व्याख्या उदाहरण, प्रत्युदाहरणसहित पारिभाषिक अन्य में लिखी हैं, क्योंकि जो सन्धिविषयादि व्याकर- रणविषय के ग्रन्थ क्रम से लक्ष्य पर सब सून घटा कर बनाये हैं जिससे पढने पढ़ानेहारों को कुछ भी क्लेश न हो, इसलिये जो कोई इन मन्थों को पढे वा पढावें वे सब निम्नलिखित रीति से पठ , यह वास्य अन्य के प्रारम्भ में था, यहा अनुपयुक्त होने से हमने आख्यतिक और स्त्रैणताद्धित के अनुसार यहा रक्खा है।
भूमिका नपाठन करें और करायें । जहां-जहां एफ उदाहरण पा प्रत्युदाहरण लिखा है उसके सदश दूसरे भी उदाहरण प्रत्युदाहरण ऊपर से पढ़ते पढ़ाते जाय कि जिससे शीघ्र ही पूर्ण पोष हो जाय । इसमें वीन प्रकरण है-एक संज्ञा, दूसरा परिभाषा, सीसरा कार्य। इनमें से संज्ञा उसको कहते हैं कि जिसमे थोड़े परिश्रम करके महा- लाभ होवे । परिभाषा उसको कहते हैं कि जो संज्ञादि सूत्रों के विषयों की सहायक होकर उसके विपय को निदोष करके परिपूर्ण कर देवे । कार्य उसको कहते हैं कि जिससे यथायोग्य शब्दों का साधुत्व किया जाता है। इन तीनों विषयों को जो कोई ठीक ठीक समझ लेगा उसको अप्रस्थ नामिक आदि ग्रन्थों को शीघ्र उपस्थित करके वेद और लौकिक प्रन्यों का भी बोध अनायास से होगा। इस अन्य में जो सूत्रों के आगे' अङ्क है वे तो इसी प्रन्यस्थ सूत्रों की संख्या जनाने फ लिये हैं, और अ० इस संफेत के आगे जो तीन अङ्क लिखे हैं उनमें प्रथम अङ्क से अध्याय, दूसरे से पाद सीसरे से सूत्र की संख्या समझी जाती है। स्वामिदयानन्दसरस्वती. 1.वेदाशनकाश के कई भागों में क्रमाइ सूत्र पाठ के अनन्तर छपे हैं और कइयों में पूर्व । हमने सब नागों में समान शैली करने और 'के लिये क्रमानों को सूट से पूर्व र सुगमता ओ३म् सच्चिदानन्दात्मने नमः अथ सन्धिविषयः सन्धि उसको कहते हैं कि जिसमे पूर्वापर वर्गों को मिलाकर पद और वाक्यों का उवारण करना होता है। इस प्रन्थ में इसी विपय की व्याख्या होने स इसका नाम सन्धिविषय रक्खा है। (40) शब्द नित्य हैं वा अनित्य ? (२०) नित्य है। (प्र.) जर नित्य हैं तो शब्दो में लोप, आगम और वर्णविकार क्यों होत है ? (उ०) सिद्धन्तु नित्यशदत्वात् । सिद्धमे- तत् । कथम् ? नित्यशब्दत्वात् । नित्याः शब्दाः। नित्येषु सतामादैचां संज्ञा क्रियते न संज्ञया श्रादैचो भाव्यन्ते। महा० अ० १, पाद !, सू० १६,* आ० ३ । * इस अन्य में अष्टाध्यायी के सूत्रों और महामान्य के उद्धरणों के जो पते लिखे गये हैं उनमें कही वहीं सूत्र संख्या में भिन्नता है। भत. वर्तमान में मुद्रित मूर अष्टाध्यायी और महाभाष्य में उस सख्या पर न मिले तो दो चार सूत्र आगे पीउ देख लेना चाहिए । पयोंकि इस प्रन्थ में जो सूत्र सत्या दी गई है यह सूत्रपाठ के योग विभागों और उसमें प्रविष्ट घातिकों को निकाल कर गिनी गई है । प्रथमाध्याय के प्रथम पाद की सून संख्याभों में ११, १५ सख्या का अन्तर है क्योंकि प्रन्धकार ने सन्धिविपय ये दोप नहीं था सकत क्योंकि शब्द नित्य है। नित्य शब्दों वर्तमान श्रादैच की वृद्धि सज्ञा होती है, सज्ञा से आदेच् बनाये| नहीं जाते । अध युक्तं यन्नित्येपु शब्देष्वादेशाः स्युः। गढ युक्तम् । शब्दान्तरिह भवितव्यम् । तत्र शब्दान्तराच्छन्दान्तरस्य प्रतिपत्तियुक्ता। श्रादेशा- स्तहीमे भविष्यन्ति अनागमकानां सागमकाः। तत्कथम्? सर्वे सर्वपदादेशा दाक्षीपुत्रस्य पाणिनेः । एकदेशविकारे हि नित्यत्वं नोपपद्यते ॥ महा० अ०१,पा० १,सू० ३५, आ० ५ (प्र०) क्या नित्य शब्दों में आदेशादि का होना युक्त ( उ०) हा, क्योंकि शब्दान्तरों के स्थानों में शब्दान्तरों के प्रयोग मात्र करने को आदेशादि होते हैं। जैसे- 'आदि+सु-अन्त+ सु-औ' इत्यादि के स्थानों में "आद्यन्ती" इत्यादि और पुरुष+श्राम इत्यादि आगमरहित पदों के स्थानों में "पुरुषाणाम्" ऐसे नुडागम सहित के प्रयाग किये जाते हैं। इसी प्रकार दाता के पुत्र पाणिनि आचार्य के मत में सब शब्दसड्यातों के प्रयोगविषय म शब्दान्तरी के सहयातों का उच्चारण किया जाता है, क्योंकि एकदेशविकार अर्थात् इकार स्थान में यकार के और यकार के स्थान में इकार आदि कार्य होने से शब्दों का नित्यत्व सिद्ध नहीं हो सकता । जैसे आचाय के स्थान में शिष्य का उपयोग, पिता के स्थानापन्न पुत्र 'अय शम्दानुशासनम्' और प्रत्याहारसूत्रों को पाणिनीय माना है अर्थात भय शब्दा.' से भष्टाध्यायी का प्रारम्भ स्वीकार किया है।
उपोद्धातः ३ " देवदत्त के अधिकार में यज्ञदत्त आदि का प्रहण होता है, तथा घोडे के स्थान में बैल और बैल के स्थान घोडा जोड़ा जाता है। वहा किसी का नाश हो जाता है ? कार्यविपरिणामाद्वा सिद्धम् । अथवा कार्य- विपरिणामात् सिद्धमेतत् । किमिदं कार्यविपरि- पामादिति ? कार्या बुद्धिः सा विपरिणम्यते ।। महा० अ० १,पा० १,सू०७२, आ.८ । इन शब्दो के प्रयोग होने से भी वे अनित्य नहीं हो सकते, क्योकि बुद्धि और वाणी की क्रिया ही का विपरिणाम अर्थात् अवस्थान्तर होता है, शब्दों का नहीं, क्योंकि जो शब्द अनित्य हों तो उनकी पुनः पुनः प्रसिद्धि नहीं हा सकती। जैसे कोई मनुष्य गौः इसको बोल के मौन अथवा अन्य शब्दो का उचारण करके कालान्तर मे पुन. गो शब्द का उच्चारण करता है, जो गो शब्द अनित्य होता तो पुनः कहां साता और क्या उच्चारण के पश्चात् बुद्धि में गो शब्द नहीं रहता १ तथा क्या सवेज्ञ ईश्वर के ज्ञान में किसा शब्द 'अर्थ और सम्बन्ध को कभी अभाव भी होता है ? इसलिये वहां- ऐसा समझाना चाहिये कि गो शब्द के उच्चारण में जब तक वाणी की क्रिया गकारस्थ हाती तब तक औकार में नहीं, जब तक श्रोकार में रहती तब तक विसर्जनीय में नहीं, जब तक विसजनीय में होती तब तक अवसान में नहीं रहती है। इसी प्रकार सर्वत्र वाणी की क्रिया ही का विपरिणाम जानना चाहिये, शब्दों में अवम्यान्तर नहीं नित्याश्च शब्दाः । नित्येषु शब्देषु कृटस्थैरवि- वालिभिर्भवितव्यमनपायोपजनविकारिभिः। महा० अ० १,पा० १,०२, भा०२- ४ सन्धिविषय इसलिय शब्द नित्य हैं, क्योंकि जो-जी शब्दों में वर्ष है वे कूपध अर्थात् निश्चल हैं। जो उच्चारण क्रिया से ताड़ित वायु की चालना होने से आकाशवत् सत्र स्थित शब्द सुन जाते हैं सा पवत के समान कूटस्थ हैं, न इनका अपाय अर्थात् लोप, न आगम, नविकार और कभी वे चलते [ हैं J और आकाश का गुण होने से उस समान शब्द भी नित्य हैं । इसलिये जो जो शब्दों के विषय में लोप आगम,वर्णविकार आदि की साधन प्रक्रिया शास्त्रो में लिखी हैं सिर सोशद अर्थ और सबन्ध के जानन के लिए हैं । देखो यह वचन है- कथं पुनरिदं भगवतः पाणिनेराचार्यस्य लक्षण प्रवृत्तम् ? सिद्धे शब्दार्थसम्पन्धे । महाभाध्ये अ.., पा० १,मा.. व्याकरणादि शास्त्रो की प्रवृत्ति नित्य शब्द, नित्य अथ ओर नित्य सम्बन्धों के जानने हा क लिय है। इसलिये सब मनुष्यों उचित है कि इस सन्धि विपय का ज्ञान अवश्य करें और करावे क्योंकि जब अनेक पद श्रथया अक्षर मिल कर हाने से उनका स्वरू पहिचानने में नहीं आता, तब उन फ ज्ञान क विना पद और पदा का ज्ञान भी नहीं हा सकता, विना इसरु प्रीति और व्यवहार : सिद्धि के न हाने से सुखलाम कैस हो सकता है ? (प्र०) व्याकरणादि शास्त्र पदन के कितन प्रयोजन है ? (उ०) रक्षा, ऊह , अागम , लघु, असन्दह । तऽसुरा। दु शब्द , यधीतम्, यस्तु प्रयुक्त, अविद्वास , विभकि कुन्ति, या इमाम, चवारि, उत त्व, सक्तुमिव, सारस्वतीम् , दशम्या si स्य, सुदयो असि वरुण इति । य अठारह (१८ ) प्रयाजन इनके अर्थ-रक्षा-मनुष्य लोगों को वेदों की रक्षा के । व्यावरणादि शास्त्र अवश्य पढ्न चाहिये, क्योंकि इनक पढन है .
उपोद्धातः ५ , औप, आगम और वर्णविकार आदि का यथावत् बोध होकर वेदों से रक्षा कर सकते हैं। ऊहः वेदों में सब लिग और सर विभक्ति महित शब्दों के प्रयोग नहीं किये हैं, उनका बोध व्याकरणादि शास्त्र विज्ञानपूर्वक तर्क के बिना यथावत् कभी नहीं हो सकता । गगमः-सव मनुष्यों को अवश्य उचित है कि साङ्गोपाङ्ग वेदों को ढकर यथोक्त क्रिया करके सुसलाभ को प्राप्त हो सो व्याकरणादि पढ़े विना कभी नहीं हो सकता, क्योंकि सब विद्याओं को प्राप्त करने में व्याकरण ही प्रधान है प्रधान में किया हुआ पुरुपार्थ सर्वत्र रहालाभकारी होता है। लघु-मनुष्यो को अवश्य उचित है कि उदादि शास्त्रों के सम शब्द, अर्थ थोर सम्बन्धों का जानें। सो ध्यारणादि के पढ़े विना थोडे परिश्रम से पूर्वोक्त पदार्थों का सहज से यथावत् जानना नहीं हो सकता। असन्देह -मनुष्य व्याकर- रणादि को पढ़ के ही शब्दार्थ सम्बन्यों को निस्सन्देह जान सकता है। तेऽसुराः-जो मनुष्य व्याकरणादि शास्त्रों की शिक्षा से रहित होते हैं वे हल्लागुल्ला करके अप्रतिष्ठित होकर नीचता को प्राप्त हो जाते हैं, और जो व्याकरणादि की सुशिता से युक्त होते हैं वे श्रेष्ठता से सम्पन होते हैं। दुष्टः शन्दः-स्वर और वर्ण के विपरीत करने से शब्द दुष्ट और वन के समान होकर वक्ता के अभिप्राय को विप- रित कर देता है, और जो व्याकरणादि को पढ के यथावत् स्वर और वर्णोचारण करते हैं वे ही पण्डित कहाते हैं । यदधीतम्- मनुष्य अर्थज्ञान के विना पाठमान ही पढ़ते जाते हैं उनके हृदय विद्यारूप सूर्य का प्रकाश कभी नहीं होता, और जो व्याकरणादि वारों को अर्थसहित पढते हैं वे ही सूर्य के प्रकाश के समान विद्या- रूप प्रकाश को प्राप्त होकर अन्य मनुष्यों को इनकी प्राप्ति फराके पर्वदा आनन्दित रहते हैं । यस्तु प्रयुक्ते-जो मनुष्य विशेष ज्यवहारों में शब्दों के प्रयोग ज्यों के त्यो करते हैं वे ही अनन्त ६ सन्धिविषयः विजय को प्राप्त होते [ हैं , और जो ऐसा नहीं करते वे सर्वत्र पराजित होकर सर्वदा दुःखित रहते । अविद्वांसः-जो विद्याहीन मनुष्य होते हैं वे सभा तथा बड़े छोटे मनुष्य के सद्ग में भाषणादि व्यवहारों को यथावत् नहीं कर सकते, उनको विद्वानों की सभा में स्त्री के समान लज्जित होना पड़ता [ है , और जो विद्वान होते हैं वे पूर्वोक्त व्यवहारों को यथावत् करके सर्वत्र प्रशंसा को प्राप्त होत हैं। विभाक्तिं कुर्वन्ति-जो विद्वान् होते हैं वे ही यज्ञकर्म अथवा सभा के बीच में यथायोग्य विभक्तिसहित शब्दों के प्रयोग कर सकते हैं ], और जो व्याकरणादि शास्त्र को पढ़े नहीं होते वे इसमें समर्थ नहीं हो सकते । यो पा इमाम् - जो मनुष्य पद, स्वर और अक्षरों को शुद्धतापूर्वक उचारण करके अपनी वाणी को पवित्र करता है वही यज्ञ और सभा आदि व्यवहारों में मान्य को प्राप्त होता है। चत्वारि-जिसके प्रात्मा में शब्दविद्या प्राप्त होती है वही महाविद्वान् होकर अपने और अन्य सब मनुष्यों के कल्याण करने में समर्थ होता है। उत त्या- -जो मनुष्य व्याकर- णादि विद्या को नहीं पढ़ता वह विद्यायुक्त वाणी के दर्शन से रहित होकर देखता और सुनता हुश्रा भी अन्धे और बहिरे के समान होता है। और जो इस विद्या के सरूप को प्राप्त होता है, उसी को विद्या परमेधर से लेकर पृथिवीपर्यन्त पदार्थों का स्वरूप यथावत् जना देती है। समिय-जैसे चलनी से सक्तु को छान कर मैदा और भूसी अलग-अलग कर देते हैं वैसे जो मनुष्य विद्यायुक्त हाते हैं वे सत्याऽसत्य का विवेक करके सत्य का प्रहण और असत्य का त्याग ठीक-ठीक कर सकते है । सारस्वतीम्-जब मनुष्य अविद्वान होते हैं ता भ्रान्तियुक्त होकर सभा और यज्ञशालादि के व्यवहारों में अनृतभापण कर दूपित हो जाने [ हैं ] और जो व्याकरणादि 17को पढ़कर येदोक्त व्यवहारों को यथावत् करते हैं वे ही सुभू- उपोद्धातः पित होकर सर्वत्र प्रतिष्ठा को प्राप्त होते हैं । दशम्यां पुत्रस्य- मनुष्यों को आवश्यक है कि अपने सन्तानों का नाम जन्म से दश दिन शास्त्रोक्तरीति से रक्खें। परन्तु शास्त्रों के पढ़े बिना नाम में दो वा चार अक्षर और वे वर्ण किस प्रकार के हों इत्यादि नहीं जान सकते, और जो विद्वान् होते हैं वे तो शास्त्रोक्त प्रमाणों को जानकर उक्त व्यवहार को यथावत् कर सकते हैं । सुदेवो असि घरुण इति-जैसे विद्वान् लोग सब विद्याओं को पढ़कर सत्य देव कहाते हैं वैसे हम भी हों, इत्यादि प्रयोजनों के लिये शास्त्रों को पढना सब मनुष्यों को अवश्य चाहिये । यह१८ (अठारह) प्रयोजन यहां सक्षेप से लिखे हैं, किन्तु इनके प्रमाण और विस्तारपूर्वक अष्टाध्यायो की भूमिका मे लिखेंगे'। सन्धि और संहिता ये दोनो एकार्थ हैं। (प्र०) सहिता किसको कहते हैं ? (उ० ) परः सन्निकर्षः संहिता । शब्दाविरामः, दादाविरामः, पौर्वापर्यमकालव्यवेतं संहिता। महा० अ०१,पा०४, सू०,१०८ भा०४॥ जहां पूर्व वर्ण वा पदों का पर के साथ उघारण हो अर्थात् शब्द ध्वनि और काल का व्यवधान न हो उसको संहिता कहते हैं । वहां अक्षरों के साथ अक्षर, पदो के साथ पद और वाक्यो के साथ वाक्य मिलाकर उच्चारण किये वा लिसे जाते हैं । जैसे-'अ, अ ये दोनों मिल कर 'आ' और 'श्र, इ' मिल कर 'ए' इत्यादि अक्षरों, धमा- थेकाममोक्षा' इत्यादि पदों और 'अग्निमीळे पुराहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्' इत्यादि वाक्यों की सहिता कहाती है। ऋषि दयानन्द कृत अष्टाध्यायी मान्य के तीन अध्याय प्रकाशित हुए हैं। यह अन्य प्राप के जीवनकाल में प्रकाशित न हो सका, अत एव इस में प्राप दयानन्द लिपित भूमिका का भी अभाव है। , - ८ सन्धिविषयः (प्र०) अवसान किसको कहते हैं ? (उ०)विरामोऽवसानम|| भ० १, पा०४, सू०.०९". जहां क्रिया और वर्ण का अभाव तथा कालव्यवधान हो उसको अवसान कहते हैं क्योंकि "वाक्यं वक्तधीनं हि"वाक्य वक्ता के अधीन होता है, चाहे सहिता करे, चाहे अवसान करे। परन्तु इसमें यह नियम समझना अवश्य है कि एकपद, समाम और धातु तथा उप- सर्ग के योग में तो संहता ही करनी, और वाक्य में सहिता तथा अवसान दोनों पक्ष शुद्ध हैं। सो चार प्रकार का होता है-स्वर, हल, इलस्वर और अयांगाह सन्धि । स्वरसन्धि उसको कहते हैं कि जहां पो वा अधिक स्वर मिलकर एक हो जाते हैं । जैम-अ+= आ, अ+इ=ए इत्यादि । हलमन्धि उसको कहते हैं कि जहां हल से परे हल का मेल हो जाता है । जैसे-कास्न्यम् । यहां र स् स न य् मिले हैं। हलम्वर संधि उनको कहते हैं कि-जहांहल और अच का मेल होता है। जैसे-+- क इत्यादि । और अयोगयाइसन्धि उसको कहते हैं कि जिसमें अच् और हल के साथ जिनामूलीय, उप-मानाय, कार, अनुम्बार, और विसजेनीय का मेन होता है । जिल्हामूलीय- देवदत्तशिरोनि, फिटर :सननि इत्यादि । अपमानीय--पालक: पठति, पृतःफनिइत्यादि। हस्पछकार-सहितासिदाकार -तपारसहनयोजने' इत्यादि। अनुम्यार-प्रसंमन्ति इत्यादि । विमजेनीय-परमेश्वरः, इत्यादि । पदने और पढ़ानेशले ऐसी उत्तमराति मे इस की पहें पड़ा कि जिममे संयुफ शब्दों की ययायन् संप्र जानकर विद्या फे प्रहण करने और कराने में उपयुक्त दोकर पात्रों के पढ़ने में सामध्ये फी प्रान परफ मुम्बी हो जायें। मानपत्रय शिक्षा में इस और दीपकराया भारती 'प्रसाद पोदपः, दीपाद परोप्रम:, प्रधान र परोपो की और राधा मे पास होता है।
अथ संज्ञाप्रकरणम् १-यथ शन्दानुशासनम् ॥१।१॥१॥ शदायशासन शास्त्र का अधिकार किया जाता है। अर्थात् शब्दों को कैसे बनाना, पालना और परस्पर सम्बन्ध करना चाहिये, इस प्रकार की शिक्षा का प्रारम्भ किया जाता है। यह मतितासूत्र है। २ अ इ उ ए ॥ ३ प ल क्॥ ४ ए यो दू॥ ५श्री च ॥ ६ ह य प र ट् ॥ ७ ल ए ॥ ८ मङ पनम् ॥६झ भम् ।। १० घ द ध प् ॥ ११ ज य ग ड ६२॥ १२ ख फछठ थ चटत ॥ १३ क प य ॥ १४ श प स र ॥ १५ हल्॥ १।१।२-१५॥
१० सन्धिविषयः एए के साथ [ मिलकर प्रण! ] संज्ञा को प्राप्त होता है सो 'बह का प्राहक होता है । इसी प्रकार 'अच' के कहने से '११ लए आऐ औ' वर्गों का प्रहण होता है। और जो अप प्रत्याहार के बीच में ' क ' आदि आते हैं इनका ग्रहण नहीं होता, क्योंकि चौरह सूत्रों के चौदह अन्त्य के हलों को इत् संज्ञा होकर लोप होजाता है। यहां व्याकरण के चौदह सूत्रों में जितने प्रत्याहार यनते है उनको निम्नलिखित प्रकार से जानो। जैसे-प्रकार से सात (७) प्रत्याहार-अण, अक, अच, अद्, अम, यश, अत् । इकार से तीन (३) प्र०-इफ, इच, इण । उकार से एक (i) Fo-उफ् । एकार से दो (२) प्र-एह, एम् । ऐकार से एक (१) Fo-ऐ । हकार से दो (२) प्र०-हले दश । यफार में पांच (१) प्र०-पण, यम् । यम्, यय, यर । यकार सेदो (२):०-यश, पल । रेफ से एक (2) प्र-रले । कार से एक (१)०-सम्। मकार में एक (1) to-मय। सकार मे एक (१) Ro-~म् । गकार से पाप (५) प्र-गरा, मप, कय, गर, गल्भकार से एक (१) प्र०-भप। जकार से एक (१) ० जश। पफार में एक (१) 0-4 फार में एक (१) प्र०-५ । रापार से दो (२)४०-गया । पकार में दो (२) --भय, परशरारसं दो (२) Ro- साये सप मिलकर पयालीम (४२) प्रत्याहार मना है।
হাদ ११ । हस्व अकार एड अर्थात् ए, ओ इन तीन वर्षों की गुण संज्ञा है। जैसे-तरिता, चैता, स्तोता । -२०हलोऽनन्तराः संयोगः ॥११॥२२॥ जिनके बीच में कोई खरन हो इस प्रकार के दो वा अधिक हली को संयोग संज्ञा है। जैसे-इन्द्रः, अग्निः, आदिल्या, इत्यादि । २१-मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः ।।१११॥२॥ कुछ मुख और युछ नासिका से जिस वर्ण का इन्धान हो उसकी अनुनासिक सज्ञा हो। जैसे-'न, म, ह, ए, न इन पंच वों तथा य, ल, व और अकारादि स्वरों के सानुनापिक मेने अनुनासिक कहते हैं।
सन्धिविषयः :, भा०-यत्र प्राकृतात् प्रयत्नाद् विशेषेऽनुपा- दीयमाने सन्देहो भवति श्रोष्यतिन श्रोष्यतीति, तद् दूरमिहावगम्यते ! महा० ४ । २ । ८५ ॥ जहां स्वाभाविक प्रयल से बुलाने में सुनने न सुनने का सन्देह होता है कि जिसका बुलाते हैं वह सुनेगा वा नहीं उसको दूर कहते हैं । उदाहरण-आगच्छ भो माणवक देवदत्त ३ ४ । यहां दूर- ग्रहण इसलिये है कि [समीप से बुलाने में ] 'आगच्छ भो माणवक देवदत्त यहां प्लुत न हो। ३०-हैहेप्रयोगे हैहयोः ॥ ८।२।८५ ॥ 'है, हे' शब्दों का प्रयोग हो तो दूर से बुलाने में जो वाक्य उस में है, हे' शब्दों को प्लुतोदात्त हो । उ०-है ३ देवदत्त, देवदत्त ६३; हे३ देवदत्त, देवदत्त हे३ । इस में दुबारा है, हे' प्रहण इसलिये है कि वाक्य के आदि अन्त में सर्वत्र है, हे' को लुतोदात्त .हो जावे। ३१--गुरोरनृतोऽनन्त्यस्याप्यकैकस्य प्राचाम् ।। ८।२१८६॥ जो ऋकार को छोड के अनन्त्य गुरु वर्ण है उस एक एक को सम्बोधनवाक्य में विकल्प करके प्लुतोदात्त हो। दे३ वदत्त, यहां 'दे' गुरु है उसको प्लुतोदात्त होता है। देवदत्त, यहां दकार को • प्लुतोदात्त होता है। इसी प्रकार यज्ञदत, इत्यादि । यहां 'गुरु' ग्रहण इसलिये है कि वकार को प्लुत न हो । ऋकार का निषेध x यह प्लुतोदास वहीं होता है जहां पाक्य के अन्त में संयोधन होता है, इसरिये 'देवदत्त भागच्छ' यहां पाक्य की टि को हुन नहीं होता।
मंशाप्रकरणम् । , इसलिये है कि कृपणदरा३ यहां ऋकार को प्लुन नहुा । 'प्राची' ग्रहण इसलिये है कि [यह] प्लुत उदात्त विकल्प करके हो । आयु- मानधि देवदत्त३ । यहां एक पक्ष में [अनन्त्य गुरु पर्ण को प्लुत] नहीं होता। ['अपि ' प्रहण इसलिये है कि वाक्य की टि को भी प्लुत हो जावे । एकैक' महण इसलिये है कि एक वाक्य में एक साथ कई घरों को प्लुत न हो। ३२-श्रोमभ्यादाने ।।८।२१७॥ अभ्यादान अर्थात् आरम्भ अर्थ में जहां आम का प्रयोग किया जाता है वहां प्लुतोदात्त होता है । जैसे-ओ३म् इपे वोजें या, ओ३म् अग्निमीळे पुरोहितम् , इत्यादि । ३३-ये यज्ञकर्मणि ॥८॥२८॥ यक्षकर्म में 'ये इस पद को प्लुतोदात्त हो। य३ यजामहे । "यज्ञकर्म' इसलिये कहा है कि 'ये यजामहे । ऐसा पाठ करनेमात्र में प्लुत न हो, किन्तु विधियक्ष में जप मन्त्र का प्रयोग हो वहीं 'प्लुत हावे । यजामहे । के साथ ही 'ये' शब्द को प्लुत अमीष्ट है, किन्तु 'ये देवासः' इत्यादि में प्लुत अभीष्ट नहीं । ३४-प्रणवष्टेः ।।८।२१६॥ यज्ञकर्म में टि के स्थान में प्रणव आदेश हो और वह प्लुत हो। पाद वा आधी ऋचा के अन्त्य टि संज्ञक (सूत्र ६७) भाग के स्थान में प्लुत ओकार ही प्रणव कहाता है। उदा०-अपां रेतांसि जिन्वतोश्म इत्यादि । . मशकर्म में यह प्रणव आदेश उन्हीं मन्त्रों की टि माग को होता है जिनका यज्ञकर्म में पाठ मात्र होता है अर्थात् जिन मन्त्रों के अन्त में 'पोपट' या 'स्वाहा' आदि का निर्देश करके उन से आहुति नहीं दी जाती। यथा-सामधेनी मन्त्र । देखो शांख्यायनीत भ. .
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सन्धिविषय
३५- याज्यान्तः ॥८।२।१०।।
यज्ञकाएड' में पढ़े हुए मन्त्रों के अन्त का जो टिसंज्ञक भाग
है उसका प्लु हो। उ.-स्तोमैविधेमाग्नये३, जितामग्ने चपे
हव्यवाहा३म् । इस में 'अन्त' प्रहण इसलिये है कि कोई कोई ऋचा
वाक्यसमुदायरूप हैं उनमें प्रत्येक वाक्य क अन्त्य टिभाग को प्लुत.
न हो, किन्तु मन्त्रान्त में ही हो ।
३६-बूहिप्रेप्यौपड्वौपडावहानामादेः ।।२।६१॥
हि, प्रेष्य, श्रौपट , वोपट और वह इनके आदि अक्षर को
सदास प्लुत हो । उ०-अग्नयऽनुवहि, अग्नये गोमयान प्रेक्ष्य,
अस्तु औ३पट , सोमस्याग्ने वीहा३ वौषट्, अग्निमा३वह ।
३७--अग्नीत्प्रेपणे परस्य च ॥८।२।१२।।
अग्नीध् [सज्ञक ] ऋत्विग विशेष को प्रेरणा करने में आदि
और उससे पर को भी प्लुतोदात्त हो। उदाहरण-ओ३ श्राश्वय,
इत्यादि।
३८-विभापा पृष्टप्रतिवचने हेः ॥८।२।६।।
क. १ । इस प्राचीन यज्ञिक परिपाटी से अनभिज्ञ कई महानुभाव उक्त
पाणिनीय सूत्र के आधार पर स्वाहान्त मन्नों में भी टि को प्रणव आदेश
करते हैं, वह भशुद्ध है। क्योंकि ये सूत्र यज्ञ कर्म में स्वतन्त्र विधायक
नहीं है। याज्ञिक ग्रन्थों में कहे हुए नियम के अनुवादक मात्र हैं। अत
एवं पूर्व सून से 'ये देवास' में 'ये' पद को प्लत नहीं होता।
। यज्ञकर्म में 'बोषट् ' शब्द का प्रयोग करके जिन मन्त्रों से
भाहुति दी जाती है उन को यान्या कहते
मैग्रायणी आदि सहिताओं में जिस स्थान में पदे हैं यह याज्याकाण्ड
कहाता है।
याज्या मन्त्र
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-- संज्ञाप्रकरणम् पूछ हुए के उत्तर देने में हि को प्लुतोदात्त हो विकल्प करके । Ho-अकार्षीः कटं देवदत्त ? अकार्य हि ३, अकाप हि, इत्यादि । 'पृष्टपतिवचर' ग्रहण इसलिये है कि कटङ्करिष्यति हि' यहां न हो । ३६-निगृह्यानुयोगे च ॥ ८।२।६४ ॥ वादी को प्रमाणों से उस के पक्ष से हरा के लज्जित करने के लिये उस के मत को प्रकट करने मे जो वाक्य है उसके दिमाग को प्लुतोदारा विकल्प से हो। उदा०-अनित्यः शब्दः, किसी ने यह प्रतिज्ञा की, उसको युक्ति से हरा के उपहासपूर्वक कहे कि 'अनित्यः शब्द इत्यात्य३' आप ने यही कहा था इत्यादि । ४०-यानेडितं भर्सने ॥८।२।१५ ॥ धमकाने अर्थ में पानेडित वा उसके पूर्वभाग को प्लुतोदार हो। उदा०-चौर चौर ३, चौर ३ चौर घातयिष्यामि त्वा; दस्यो दस्यो ३, दस्यो ३ दस्यो बन्धयिष्यामि त्वा इत्यादि । ४१-अङ्गयुक्तं तिङाकाक्षम् ।। ८ । २ । ६६ ।। अङ्ग शब्द से युक्त सापेक्ष जो निहन्त है उसके टि को धमकाने अर्थ में प्लुतोदात्त हो । उदा०-अङ्ग कूज३, अङ्ग व्याहर३ इदानी ज्ञास्यसि जाल्म | इत्यादि । तिङ्' इसलिये कहा कि 'अङ्ग देवदत्त' यहा न हो। ४२-विचार्यमाणानाम् ॥१२॥१७॥ जो विचार्यमाण वाक्य हैं उनको टि को प्लुतोदारा हो । जैसे- १ द्वियंचन में द्वितीय रूप की आमेडित सज्ञा होती है (तस्य पर- मानहितम् ! ०८,३,२), परन्तु यहा पर आनेडित ग्रहण द्विवंचन का उपलक्षक मात्र है। अत: पर्याय से दोनों को प्लुत उदात्त होता है। इसी को ध्यान में रख कर उपयुक्त सूमार्थ किया है। २ १८ सन्धिविषय होतव्यं दीतिवस्य गृहा३३ इति । यहा दीक्षित के घर में हवन करना चाहिये [या नहीं करना चाहिये यह विचार करत हैं। ४३-पूर्व तु भापायाम् ॥ ८।२। ६८॥ लौकिक योग में विचार्यमाण वाक्यों के पूर्व प्रयोग में प्लुतो. दात्त हो । जैस-अहिर्नु३, रज्जुनु ? यह साप है वा रज्जु ? ४४--प्रतिश्रवणे च ॥८।२।१६ ॥ स्वीकार अर्थ मे जा वाक्य उसके टि को प्लुतोदात्त हो । गां देहि भो , अह ते ददामि । ४५-अनुदात्तं प्रश्नान्ताभिपूर्जितयोः ।। २।१२०॥ प्रश्न के अन्त में और अभिपूजित अर्थ में अनुदात्त प्लुत हो प्रभान्त-अगम३ पूर्वाश्न प्रामाइन् अग्निभूता३६ इति, पटा३ इति । यहा 'अगम३ पूर्वाश्न प्रामाश् [पदों में वक्ष्यमारण अनन्त्यस्यापि प्रभाख्यानयो' (५०) सून ] से प्लुत हुआ है। अभिपूजित-शोभन खल्वसि माणवक३ इत्यादि । ४६-चिदिति चोपमार्थे प्रयुज्यमाने ॥बा२। १०१॥ उपमार्थवाची चित् अव्यय के प्रयोग में जो वाक्य उसकी टि को प्लुतानुदाच हो। उदा०-अमिचिद्भाया३त् । राजचिद्भाया३. त् । अग्नि के तुल्य वा राजा के तुल्य तेजस्वी होवे । उपमार्थ इसलिये कहा कि 'कथंचिदाहु.' यहा प्लुत न हो। प्रयुज्यमान इसलिये है कि 'अनिर्माणवको भायात् ' यहा न हो। 1.यपि इस सूत्र में सम्दोमहण नहीं किया, तथापि उसर सूत्र में भाषा प्रहण से विदित होता है कि यह नियम वैदिक ग्रन्थों के लिये है। -
संज्ञाप्रकरणम्
४७-उपरिस्थिदासीदिति च ॥ २॥१०२।।
उपरिविदासीत इस वाक्य के टि को प्लुतानुदात हो।
उपरिविदासी३त् ।
४८--स्वरितमार्गेडितेऽमूगासंमतिकोपकु-
त्सनेषु ॥ ८।२।१०३ ॥
जो आनेडित (द्विचन का परभाग) परे हो तो असूया,
संमति, कोप और कुत्सन अर्थ में पूर्वभाग को स्वरित प्लुत हो ।
असूया-माणवक३ मारणयक अविनीतोऽसि । समति-प्रियंवद ३
प्रियंवद शोभनः खल्वसि । कोप-दुर्जन ३ दुजेन तूष्णींभव ।
कुत्सन-याष्टीक ३ याष्टीक रिक्ता ते यष्टिः, इत्यादि ।
१६--क्षियाशी प्रेषेपु तिडाकाक्षम् ॥८।
२।१०४॥
तिया - आचार बिगाडना, आशीर्वाद और आज्ञा देने अर्थ में
अन्य उत्तरपद को आकाक्षा रखनेवाला तिइन्त पद प्लुतस्वरित
हो। [किया- स्वयं रथेन याति३ उपाध्यायं पदातिं गमयति ।
[आशी:-] सुताश्च लप्सीप्ट३ धन च तात। [प्रेप-] कटं कुरु मार्म
च गच्छ । आकाक्षा ग्रहण इसलिये है कि 'दीर्घ ते आयुरस्तु
यहां प्लुत न होवे।
५०-अनन्त्यस्यापि प्रश्नाख्यानयोः॥८
२ । १०५ ॥
प्रश्न और आख्यान अर्थ में अन्त्य और अनन्त्य पद के भी
टिभाग को प्लुतस्वरित होवे। अगमः पूर्वाश्न प्रामाश्न
अप्रिभूता३६, पटा३ । पाख्यान में-अगमः पूर्वाश्न
प्रामा३न् भोः।
२० सन्धिविषय - ५१-प्लुतावैच इदुतौ ॥८॥२११०६॥ 'दूराद्धृते.' इत्यादि सूत्रो में जो प्लुत विधान किया है वहा ऐच् को प्लुत होवे तो उसके अवयव इकार उकार का प्लुत हो। ऐ-तिकायन , औ३पाव । यहा जब इवर्ण, उवणे [और ] अवण का समविभाग समझा जाता है तब इकार उकार द्विमान प्लुत होजाते हैं। ५२-एचोऽप्रगृह्यस्मादूराद्धूते पूर्वस्यास्या- ऽऽदुत्तरस्येदुतौ ॥ ८ । २ । १०७ ॥ दूर से बुलान अर्थ को छाडकर अन्य अर्थों में जो अप्रगृह्य एच उसक पूर्व अर्धभाग को आकारादेश हो और उत्तरभाग को इकार उकार आदेश हों। ५३-भा०-प्रश्नान्ताभिपूजितविचार्यमाणम- त्यभिवादयाज्यान्तेष्विाति वक्तव्यम् ॥ ८॥२॥ १०७ ॥ जो इस सूत्र में कार्यविधान है वह प्रश्नान्त, अभिपूजित, विचार्यमाण, प्रत्यभिवाद और याज्यान्तरिपय में समझना चाहिये । प्रशान्त-अगम३ पूर्वाश्न मामा-न अमिभूताइ, पटा३उ । अभिपूजित-सिद्धोऽसि माणवक३ अग्निभूता३३, पटाउ। विचायमाण-हातव्य दीक्षितस्य गृहा३६ । प्रत्यभिवाद- , अर्थात् यहां 'इकार उकार' की तीन माना नहीं होती, दो माया होती है, क्योंकि एक मात्र प्रकार की है। यह पृत्तिकार का मत है। भाष्यकार के मत में 'इ' की तीन माया होती है और एक माया भकार की अथात् ऐच को चतुर्मात्रिकप्लुत होता है। महाभाग्यकार इसी स्म पर कहा है-इयत एप चतुर्माय प्लत इति । ने संज्ञाप्रकरणम् वशात्राय आयुष्मानधि अमिभूता३६ । याज्यान्त-उक्षान्नाय सोमपृष्टाय वेधसे, रतामैविधेमामया३६, इत्यादि। पूर्वोक्त विषयों में परिगणन इसलिये किया है कि 'विष्णुभूते [विष्णुभूते३ । पातयिष्यमि स्वाम' यहां न हुआ । ५४-वा०-एचः प्लुतविकारे पदान्तग्रहणम् ॥ महा.41211.04 जहां एच् को पूर्व सूत्र से आदेश करते हों वहां पदान्त [ में ] समझना चाहिये । पदान्तपहरण से यहां नहीं होता--भद्रे करोपि गौः।। क्योंकि यहां अन्त में विसर्जनीय है। यहां अप्रगृह्य प्रहण इसलिये है कि 'शोभने खलु माले ३ [यहां न हो । -वा-आमन्त्रित छन्दस्युपसंख्यानम् । महा०८।२।१०७ ॥ आमन्त्रित जो एच उसको वेदविषय में पूर्वोक्त प्लुतविकार हो। जैसे-अग्ना३३ पत्नीवः। ५६-तयोविधि संहितायाम् ॥८।२।१०८॥ पूर्वोक्त इकार उकार को य व आदेश क्रम से होते हैं अच् परे रहत सहिता में 1 अमाशयन्द्रम् , पटा३खुदकम । (इति प्लुतप्रकरणम्) ५७-ईदृदेद द्विवचनं प्रगृधम् ॥११॥२६॥ ई, ऊ, ए, ये जिनके अन्त में हों ऐसे जो द्विवचनान्त शब्द वै प्रगृह्य-संज्ञक हो । जैसे-~अग्नी इमो, वायू इमो, माले इमे,इत्यादि । ५८-श्रदसो मात् ॥ ११॥ २७॥ अदस शब्द के मकार से परे ई, ऊ की प्रगृह्य संज्ञा हो। जैसे-- श्रमी एत, अमू इति ।
२२ सन्धिविषयः ५६-शे ॥ १।१।२८।। जो [ सुप् ] विभक्ति के स्थान में शे आदेश होता है उसकी प्रगृह्य संज्ञा हो । जैसे-अस्मे इन्द्रावृहस्पती । ६०-निपात एकाजनाड् ॥ १।१।२६ ॥ आड् को छोड़कर जो फेवल एक ही अच् निपात है वह प्रगृह्य- संज्ञक हो। जैसे-अ, इ, उ । अ अपकाम, इ इन्द्रं पश्य, उ उत्तिष्ठ। ६१-श्रोत् ।।१।१ । ३० ।। जो श्रीकारान्त निपात है वह प्रगृह्य संज्ञक हो । जैसे-अथो इति, अहो इमे, भो इह, इत्यादि । ६२-संबुद्धौ शाकल्यस्येतावना ।।१।१३।। जो अनार्ष अर्थात् लौकिक इति शब्द के परे संबुद्धिनिमित्तक मोकार है उसकी शाकल्य ऋषि के मत मे प्रगृह्य संज्ञा हो । जैसे- वायो इति । अन्य ऋपियों के मत में वार्यावति । यहां 'अनार्ष। प्रहण इसलिये है कि आप अर्थात् वैदिक इति शब्द के परे प्रगृह संज्ञा न हा । जैसे-[ब्रह्म] बन्धवित्यप्रवीत् इत्यादि। ६३-उञ ॐ॥ ११॥ ३२ ॥ शाकल्य प्राचार्य के मत में अनार्प इति शब्द परे हो तो उच् की प्रगृह्य सज्ञा और उञ् के स्थान में ऊँ ऐसा आदेश हो, उसकी भी प्रगृह्य ज्ञा हो। जैसे-उ इति, ॐ इति । [अन्य ऋपियों के मत में- विति । ६४-ईदूतौ च सप्तम्यर्थे ॥ १।१ । ३३ ॥ सप्तमी विभक्ति के अर्थ में र्तमान इकारान्त अकारान्त शब्द प्रगृह्य संज्ञक हों। उ०-मामको इति, तनू इति, सोमो गौरी अधि श्रितः।
संज्ञाप्रकरणम् २३ ६५-नवेति विभापा ॥ १।१ । ५८ ॥ निषेध और विकल्प के अर्थ को निभापा संज्ञा हो। ६६-श्रदर्शनं लोपः ॥ १।१।७४॥ विद्यमान के प्रदर्शन की लोप संज्ञा हो । ६७-अचोऽन्त्यादि टि ॥ १।१।७८॥ जो अची के बीच में अन्त्य अच है उससे लेके जो अन्त्यादि समुदाय सो टिसंज्ञक होता है । जैसे-अग्निचित् । यहां अन्त्य के इत् भाग की टि संज्ञा है। ६८-अलोऽन्त्यात् पूर्व उपधा॥१।११७६ ।। जो वर्ग समुदाय पद में अन्त्य वण से पूर्व वर्ण है उसकी उपधा सज्ञा होती है । जैसे–निर्, दुर् । यहां इ, उ की उफ्धा संज्ञा है। ६६-ऊकालोऽस्वदीर्घप्तुतः॥१॥२॥२७॥ एकमात्रिक, द्विमात्रिक और निमात्रिक दीर्घ और प्लुतसंज्ञक हो । अ, श्रा, प्रा३ । ०-सुप्तिङन्तं पदम् ॥ १। ४ । १४ ॥ सुबन्त और तिइन्त शब्दों की पदसंज्ञा हो। ७१-प्राग्रीश्वरान्निपाताः॥१।४ । ५६ ॥ यह अधिकार सूत्र है । इससे आगे जो कहेगे उनकी निपात संज्ञा होगी। ७२-चादयोऽसत्त्वे ॥१।४।५७ ।। जहां किसी द्रव्य के वाचक न हों वहां च आदि शब्द निपात- संज्ञक हों। ध, वा, ह, इत्यादि को निपात संज्ञा है। अच् क्रम से
२४
सन्धिविपयः
७३-प्रादय उपसर्गाः क्रियायोगे ॥१।४।
५८॥
प्र आदि शब्द असत्त्व अर्थ में निपातसंज्ञक और क्रियायोग में
उपसर्गसंज्ञक [भी हों।
७४-गतिश्च ॥ १।४।५६ ॥
प्रियायोग में प्रादि शब्द गतिसंज्ञक भी हों।
७५-परः संनिकर्षः संहिता ॥१।४।१०८।।
पर अविशयकर जो सन्निपं अर्थात् वर्षों की समीपता है
उसकी संहिता संज्ञा हो।
७६-विरामोऽवसानम् ॥ १।४।१०६ ।।
समाप्ति अर्थात् जिसके आगे कोई वणे न हो उस अन्तिम वर्ण
की अवसान संज्ञा होवे।
॥ इति सज्ञाप्रकरण समातम् ।।
यह परिभाषा सूत्र है। इसलिये जो कुछ व्याकरण का विषय हे उस सब में इस सूत्र की प्रवृत्ति अवश्य होती है, क्योंकि जैसे समर्थ नहीं होते, और कृत्संझक प्रत्यय भी धातु से परे नहीं हो अथ परिभापाप्रकरणम् ७७-समर्थः पदविधिः ॥२।१।१॥ जो कुछ इस व्याकरण शास्त्र में पद को कार्यविधान सुना जाता है यह समर्थ को जानना चाहिये । व्याकरण में प्रथम यही परि- भापा सवेन प्रवृत्त होती है, क्योंकि "अपदं न प्रयुजीत" अपद अर्थात् सुप तिष्ठ प्रत्यय से रहित शब्द का प्रयोग कभी न करना चाहिय । और सुप् तथा तिड भी समर्थ ही से होते हैं असमधं से नहीं, क्योंकि विना संज्ञा के सामध्ये नहीं होता, सामर्थ्य के विना उससे प्रयत्य की उत्पत्ति नहीं हो सकती और इसके विना प्रयोग भी नहीं बन सकता। क्योकि:-"न केवला प्रकृतिः प्रयोक्तम्या, न च केयला प्रत्ययः । प्रकृतिप्रत्ययी प्रत्ययायं सह प्रतः" । इस महाभाष्य के वचन फा अभिप्राय यही है कि [प्रकृतिप्रत्यय] दोनों के मिले विना कोई भी प्रयोग सिद्ध नहीं हो सकता । इस कारण सामर्थ्य से बिना किसी प्रत्यय कार्य वा कोई व्याकरण को यात पृथक् नहीं हो सकती । इसलिये इसी सूत्र के भाष्य में [ कहा है "परिभापायां च सत्यां यावान् व्याकरणे पदगन्धो नाम स सर्व संगृहीतो भवति" । विना धातुसंज्ञा के भ्वादि शब्द कृसंज्ञक प्रत्ययों की उत्पत्ति सकते, वैसे विना प्राविपदिक संज्ञा के 'टाए' आदि ली और सन्धिविषयः - आदि तद्धित प्रत्यय उत्पन्न ही नहीं हो सकते, क्योंकि विना प्रतिप- दिक संज्ञा के उनका सामर्थ्य ही नहीं है जो सुप आदि प्रत्ययों की उत्पत्ति करा सकें, और सुप् , स्त्री और तद्धितसंज्ञा के विना सुप् आदि प्रातिपदिकों के आगे होने में भी समर्थ नहीं हो सकते, ऐसे ही सर्वन समझ लेना । इस सूत्र [ के पदच्छेद । में दो पन हैं। प्रथम पक्ष में दो पद और दूसरे पक्ष में एक पद है। इससे प्राचार्य का यह अभिप्राय विदित होता है कि प्रथमपत से व्यपेक्षाभाव साम- ग्रं, जिसमें पृथक्-पृथक् पद अलग-अलग स्वर और भिन्न-भिन्न विभक्ति रहती हैं उसका प्रकाश और दूसरे पक्ष से एकार्थीभाव साम- अर्थात् जिसमें अनेक पदों का एकपद, अनेक खरों का एक स्वर, और अनेक विभत्तियों की एक विभक्ति हो जाती है। और जो च्यपेक्षा सामर्थ्य में समर्थ शब्द के आगे उत्तरपद विधि' शब्द का लोप भी किया है इससे यह सिद्ध होता है कि व्याकरण श्रादि सय शास्त्र और लोकव्यवहार में भी समर्थ के लिये सब विधान है, अस. मर्थ के लिये कुछ भी नहीं। जैसे आंख वाला देखने में समर्थ होता है इसलिये उसको देखने का उपदेश भी करते हैं कि इसको तू देस, अन्धे को कोई नहीं कह सस्ता, क्योंकि वह देखने में समर्थ नहीं है। वैसे ही कोई सामर्थ्य वाले के लिये जो कुछ विधान करता है वह शुद्ध और सफल, और जो कोई इसमे उलटा करता है यह अशुद्ध और निष्फल समझा जाता है। इसलिए यह सूत्र जितने व्या. करण आदि शास्त्रों के विषय में जन सर में लगता है। इससे यह भी समझना कि जो भट्टोजिदीक्षित ने कौमुदी में इस सूत्र की समा. सही में प्रवृत्त किया है सो अशुद्ध ही है। ७८-इको गुणवृद्धी ॥ १।१।१८।। जहां-जहां गुण और पृद्वि शब्द फरके गुण और पृद्धि का रिधान करें वहां-यहां इप ही के स्थान में गुण और वृद्धि होते हैं।
परिभाषाप्रकरणम ऐसा सर्वत्र व्याकरण-शास्त्र में समम लेना। यहां श्र, ए और ओ की गुण संज्ञा, आ, ऐ और श्री की वृद्धि संज्ञा है । जैसे--कर्ता । यहां ऋ के स्थान में अगुण' होकर रपर हो गया है। चता-यहां इकार के स्थान में एकार, और स्तोता-यहां उकार को ओकार गुण हुआ है । वृद्धि-आकार्षीत् । यहां ऋ के स्थान में भार वृद्धि, 'अनैपीत् अचैपीत्'-यहां ई और इ के स्थान में ऐ, और 'अलावीत, अस्तावीत् --यहां ऊ और उ. के स्थान मे श्री वृद्धि हुई है । इक अहण इसलिये है कि 'अन्तगः' यहां श्रोष्ठस्थानी गम धातु के मकार व्यञ्जन के स्थान में प्रोष्ठस्थानी ओकार गुण न होवे। और गुण वृद्धि ग्रहण इसलिये है कि जहां संज्ञा शब्दों से गुण पृद्धि कहें यहीं इक के स्थान में हों । द्यौः-यहां दिव शब्द को श्रीकारादेश कहा है, सो संज्ञापूर्वक विधि के न होने स वकार के स्थान में होता है, और 'स: यहां दकार के स्थान मे अकारादेश होता है । १. सार्वधातुकार्धधातुकयोः (आ० २१) सूत्र से। २. उरण रपरः (सन्धि० ८५) सूत्र से। ३. सार्वधातुकार्धधातुकयोः(भा. २१) सूत्र से। ५. घृद्धि के सर उदाहरणों में 'सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु' (आ. १५८) से वृद्धि होती है । सन्धिविषय के अन्य संस्करणों में वृद्धि के 'कारकः, नायकः, ऐतिझायनः, पायकः, औपगवः' उदाहरण दिये है वे ठीक नहीं है, क्योंकि इन उदाहरणों में 'अचोऽणिति' (आ६६१) और *तद्धितेष्वचामादेः' (स्त्रै० ९१४ ) सूत्र से वृद्धि होती है। यहां स्थानी का 'अव:' स्पष्ट निर्देश किया है। इस सून की प्रवृति वहां होती है जहां पानी का निर्देश म हो । जैसे-साधातुकाधंधातुकयोः (मा. २१)। क्योंकि यह परिभाषा सूत्र है, परिमापा सूत्रों की प्रवृत्ति वहीं होती हैं जहां अनियम की प्राप्ति हो-अनियमप्रसंगे नियमकारिणी परिभाषा। दिव औन् (ना० १५1) सूत्र से । ७६) सूत्र से। । ६.प्यदादीपामः (ना.
२८ सन्धिविपयः ७६-श्राधन्तवदेकस्मिन् ॥ १।१।३५ ॥ जैसे अादि और अन्त में कार्य होते हैं वैसे एक में भी हो अर्थात् अनेकाश्रित कार्य एक का भी हो जावे। जिससे पूर्व कोई नहो और परे हो उसको श्रादि और जिससे परे कोई न हो पूर्व हो उसको अन्त' कहते हैं। इस कारण आदिअन्त को कहे हुए कार्य एक में नहीं बन सकत, इसलिये यह परिभाषा है । जैसे-'आर्धधातुकस्येड् चलादे" अग से परे वलादि आर्धधातुक को इट् का श्रागम होता है सो 'करिष्यति हरिष्यति' यहा तो स्य प्रत्यय के वलादि होन से होजाता है और 'जापिपत्, मन्दिपत्' यहा केवल एकाक्षर (सिप- का स्) वल् प्रत्यय होन से नहीं प्राप्त होता था, इस परिभाषा सूत्र से यहो भी हो गया। अन्तवत्-जै -जैम-घटाभ्याम् , पटाभ्याम् । यहा अदन्त अङ्ग को दीर्घ होता है", आभ्याम-यहा केवल प्रकार के होने से दोघे नहीं प्राप्त था, अन्तवत् मान के हो जाता है । ८०-याद्यन्तौ दकितौ ॥ १।१।६०॥ जो टकार और ककार अनुबन्धवाले आगम हों वे आदि [और ] अन्त में यथासख्य करके हा जावें । अर्थात् टित् आगम जिसको कहा हो उसी के आदि में और कित् जिसको विधान किया हो उसको अन्त में हो जावे । जैसे टित्-पुरुषाणाम् । यहा नुट्र श्राम् के आदि में, अभवत्यहा अट का धागम धातु के आदि में, भविता-यहा इट् का आगम' प्रत्यय के प्रादि में हुआ है। १.यस्मात् परमस्ति पूर्व नास्ति स आदिरित्युच्यते। महाभाग्य 11॥३५॥ २. यस्मात् पूर्वमस्ति पर नास्ति सोऽन्त इत्युच्यते । महाभाष्य १३५॥ ४ सुपि च (ना. २६) सूत्र से। हवनयापो नुद् (ना० ३२) सूत्र से। ६ लुब्लवडुदात्त (आ० ७५) सूत्र ..माधधातुकस्ये घरादे (आ० ४७) स्त्र से । । ३ आ. ४७ । ७.
परिभाषाकरणम् २९ कित्-सोमसुत्, जटिलो भोपयतं । यहाँ तुफ और पुर आगम भी धातु के अन्त में हुए हैं इत्यादि । ८१-मिदचोऽन्त्यात्परः ॥ १।१।६१ ।। जो मित् प्रागम वा प्रत्यय है वह अन्त्य अच से परं होता है। जैसे-नुम्-निन्दति, नन्दति । श्नम्-रुणद्धि । मुम्-वाचं. यमः । नुम्-कुलानि, यासि' इत्यादि। ८२-एच इग्घ्रस्वादेशे ॥ १।१ । ६२ ।। जहां-जहां एच् के स्थान में हस्व आदेश विधान कर वहां-वहां इन्ही हस्व हो जावे । जैसे-गो-चित्रगुः, शबलगुः। यहां श्रोकार के स्थान में उकार, रै-अतिरि-यहां ऐकार के स्थान में इकार और नौ-अधिनु-यहां श्रोकार के स्थान में उकार आदेश होता है। इत्यादि। ८३-पष्ठी स्थाने योगा॥१।१।६३॥ जो-जो इस व्याकरणशास्त्र में अनियतयोगा पष्ठी (अर्थात् जिस- का नियम नहीं किया कि इस पष्ठी का योग इसमे हो) है वह यह स्थानयोगा समझनी चाहिये अर्थात् स्थान में उसका योग होये। जैसे - 'अलोऽन्त्यम्य' ८ यहां अलः, अन्त्यस्य' ये दोनों पष्ठी है, सो अनियतयोगा होने से स्थानयोगा समझी जानी है। जैसे- १. स्वस्य पिति कृति तुक (भा६।।।७.) सूत्र से। २. भियो हेतुभये पुम् (आ० ४९०) सूत्र से । ३. इंदितो नुम् धातोः (भा० १२७) सून से। ५. रुधादिभ्यः श्नम् (मा० ४३५) सूत्र से । ५. धाचंयमपुरन्दरी च (आ. १.६६) सूत्र से । ६. नपुंसकस्य सलचः ( ना० ४३ ) सून से। .. इस्त्रो नपुंसके प्रातिपदिकस्य (ना.४७) स्त्र से 1 ८. सन्धि० ८६ । - सन्धिविषय . । - । 'इको गुणवृद्धी' इक ' यह यष्टी है इक् के स्थान में गुण वृद्धि हो । स्थान शब्द का लाभ इसी परिभाषा से सर्वत्र होता है, और जहा जहा षष्ठी का नियम विदित होता है कि इस षष्ठी का याग यहा हो, वहा-वहा स्थान शन्द की उपस्थिति नहीं होता। जैसे- 'शास इदहलो यहा शास धातु की उपधा को इत आदश है [अर्थात् 'शास' यह अवयव पष्ठी है ] इत्यादि । ८४-स्थानेऽन्तरतमः ॥१।१।६४ ॥ जो जो आदश जिस जिस के स्थान में प्राप्त हा वह-वह अन्त- रतम अर्थात् सदृशतम हा । अन्तरतम उसको कहत हैं कि जो अत्यन्त सदृश हो। जो किसी क स्थान में होता है वही आदेश फहाता है, सो स्थान शब्द का लाभ तो पूर्व परिभाषा से हुआ, परन्तु जो स्थान में प्राप्त आदश है वह कैसा होना चाहिय सा नियम इस परिभाषा से करत हैं। सादृश्य चार प्रकार का हाता है, तद्यथा- स्थानहतम्, अर्थकृतम्, प्रमाणकृतम्, गुणकृतश्चेति । स्थानकृत अन्तरतम उसको कहते हैं कि जो जा कण्ठ आदि स्थान प्रादेशा का हो वही आदेश का भी होना अवश्य हैं। जैसे-दण्ड+अप्र- म् = दण्डामम् । यहा पूर्व पर कण्ठस्थानी दो प्रकारों के स्थान में दीर्घ एकादेश कहा है, सो स्थानकृत नान्तर्य मान के कण्ठस्थान- वाले दोनों प्रकारों के स्थान में कण्ठस्थानवाला ही दीर्घ श्राकार होता है, भिन्न स्थान होने से ईकार, ऊकार नहीं होत । अर्थकृत प्रान्तर्य उसको कहते हैं कि जहा जैसा एक, दो और यहुत अर्थो का बोधक स्थानी हो वहा वैसा ही श्रादेश भी होना चाहिय, स्थान सदृश हो वा नहीं हो । जैसे-'तस्थस्थमिपा तान्तन्ताम" भवताम् । यहा "तस" प्रत्यय दो अर्थों का बोधक स्थानी है उसके , सन्धि००८ २ भा. ३७॥ ३. सन्धि. 101 . आ...
परिभापाप्रकरणम स्थान में 'ताम्' आदेश भी दो अर्थों का बोधक ही होता है। इसी प्रकार थिस आदि के स्थान में भी समझना चाहिये । प्रमाणकृत सादृश्य वह कहाता है कि जो एकमात्रिक स्थानी हो तो उसके स्थान में एकमात्रिक का ही आदेश भा हावे और द्विमानिक के स्थान में द्विमात्रिक आदेश हाना अवश्य है इत्यादि। जैस-अमुष्मै, अमूभ्याम । यहा एकमानिक स्थानी है उसके स्थान में एकमानिक और द्विमात्रिक के स्थान में द्विमात्रिक ही आदेश होता है । गुण- कृत प्रान्तये उसको कहते हैं कि जो अल्पप्राण स्थानी हा तो उस के स्थान में अल्पप्राणवाला आदेश, और महाप्राण स्थानी हा तो महाप्राणवाला ही आदेश होवे । जैसे-वाग्यसति, त्रिष्टुवभसति । यहा इकार क स्थान में पूर्वसवणा आदेश की प्राप्ति' में जैसा हकार नादवान् और महाप्राण गुणवाला है उसके स्थान में आदेश भी वैसा ही होना चाहिये । सो ये दोनों गुण वर्गों के चतुर्थ वर्गों में है इस कारण गुणकृत आन्तर्यमान क घकार और भकार ही होते हैं इत्यादि। प्र०-भा०-स्थान इत्यनुवर्तमाने पुनः स्थान- ग्रहणं किमर्थम् ? ॥ १।१।६४।। पूर्व सून से स्थान की अनुवृत्ति आजाती फिर स्थानप्रहण का प्रयाजन क्या है ? उ.-यत्रानेकविधमान्तर्य तत्र स्थानत एवान्तर्य घलीयो यथा स्यात् ।। १ । १।६४॥ जहा अनक प्रकार के अर्थात् स्थानकृत आदि दो तीन वा चारों , 'भद+स्मै' में एक मात्रिक और 'अमा+भ्याम्' में द्विमात्रिक को 'अदसोऽमेदु दो म' (ना० १८८) सेक्रमश 'उ' और 'अ' होता है। २. यो होऽन्यतरस्याम् (सन्धि० २३९) सूत्र से । .
३२ सन्धिविषयः प्रान्तर्य मिलते हों वहां स्थानकृत जो श्रान्तर्य है अत्यन्त बलवान् होने से वहीं प्रवृत्त किया जाता है। जैसे-चैता, स्तोता। यहां एक- मानिक इकार उकार के स्थान में प्रमाणकृत श्रान्तर्य को मानकर अफार गुण पाता है सो न हो, स्थानकृत आन्तर्य से तालु और ओष्ठावानवाले एकार और श्रोकार हो जाते हैं, यह द्वितीय स्थान- ग्रहण का प्रयोजन है। और यहां तम' प्रहण इसलिये है कि "वाग्धसति यहां महाप्राण हकार के स्थान में महाप्राण प्रादेश किया चाहें तो द्वितीय खकार प्राप्त है, और जो नादवान किया चाहें तो तृतीय गकार प्राप्त होता है, तममहण के होने से वर्गों का घ' आदि चौथा वर्ण [ जो] महाप्राण और नादगुण घाला है वह होता है। ८५-उरण रपरः ॥१।१। ६५ ।। जहां ऋ के स्थान में अण का प्रसङ्ग अर्थात् प्रण करने लगे (तो तत्काल ही रपर हो, अर्थात् उस अण् से परे रेफ भी हो जाये। जैसे-कर्ता, हर्ता । यहां के स्थान में प्रकार गुण हुआ है ' इसी से प्रण से परे रेफ भी हो जाता है। किरिः, गिरिः। यहां जो 'क' और 'ग' धातु के स्थान में इकारादेश किया है। वह रपर हो गया है। और 'द्वैमातुरः' यहां उफार भी रपर हुआ है। यहां 1. तत्काल रपर करने का प्रयोजन यह है कि पहले भण को रपर कर के पश्चात् भन्तरतमत्व का निर्धारण हो । अन्यया क को गुण प्रसा में , ए, ओ' इन में से कोई भी भादेश नहीं होगा, पयोंकि किसी का सारश्य नहीं मिलता। 'स्थानेऽन्तरतमः' सूत्र की प्रवृत्ति से पहिले रपर कर देने से 'मर' में रेफ भीर प्रकार का स्थान मिल जाता है। २, सार्य- धातुमार्धधातुकयो: (भा. २१)स्म से। ३. कम इदातोः (भा०२६५) सूत्र से। ५. मारुत् संग्यासंभार पूर्यायाः (०९२) सूत्र से।
परिभाषाप्रारणम् ३३ . प्रहण इसलिये है कि 'प्रपदात मुग्यम्' यहां देप धातु एकार के भ्यान में श्राकार हुआ है' सो रपर न हो जाने । अण' प्रहण इसलिये है कि सोधातकि: यहां प्राकार के स्थान में अम आदेश होता है। सो रपर न हो। ८६-थलोऽन्त्यस्य ॥ १।१।६६ ।। जहां-जहां पष्ठीनिर्दिष्ट के म्यान में बादश पहें यहां-वहां रिस] के अन्त्य अल के स्थान मे होयें। जय 'त्यदादीनाम:'' [सूत्र से विभक्ति के परे स्यदादि शन्दों के स्थान मे अकारादेश होवे ऐमा कई, तप इसी परिमापा की प्रवृत्ति होवे कि जो अन्त्य यर्ण दकार है उसके स्थान में अकारादेश हा जाता है। जैसे-स्यः, स:, यः, इदम्,' इत्यादि। ७-डिच ॥ १।१।६७॥ जो एत् अर्थात् जिसका डकार इत् जाय ऐमा अनेकाल भी आदेश अन्य बल के स्थान में हो। यहां पूर्व सून की अनुत्ति आती है। जैसे-अनइ-होतापातारी, मानापितरो। यहां अनह आदेश५ अन्त्य अल कार के स्थान में होता है। यह सून (८९) सूत्र फा अपवाद है। (म०) तातष्ट्र प्रादेश [हित् होने से अन्त्य अल में प्राप्त है सो क्यों नहीं होता (उ०१ भा०-एवं तर्येतदेव ज्ञापयति, न तात- भाच उपदेशेऽशिनि ( मा. २५२ ) स्त्र से । २. मुधातुरकष्ट घ (प.१०३) सूरसे । ३. मा. ६) १.श्मो मः(मा० १७९) सूत्र से भन्स्य मार के स्थान में मकार होता है। ५. ऋदुशनस्पुर- सोऽनेहसां च (मा. ९९) सूथ से। के स्थान ..
३४
सन्धिविषयः
उन्त्यस्य स्थाने भवतीति-यदेतं डितं करोति ।
इतरथा हि लोट एरुप्रकरण एव बृयात् तियोस्ता-
दाशिष्यन्यतरस्यामिति ॥ महा०१।१।६७ ॥
यह इसी सूत्र पर महाभाष्यकार ने समाधान किया है कि जिस
कारण तातडू आदेश हित किया है इसी से प्राचार्य की शौली स्पष्ट
विदित होती है कि यह अन्त्य अल के स्थान में नहीं होता। जो
श्रन्स्य बल के स्थान में करना होता तो तृतीयाऽध्याय के चतुर्थपाद
में 'लोटो लड्यत्, एरु'' इन सूत्रों के आगे 'तात्' आदेश कहते ।
इस में लाघव भी यहुत आता था। जो लोट लकार का 'ति' और
'हि' का इकार उसको तात् आदेश विकल्प करके होवे, ऐसा कहने
से अन्त्य अल इकार के स्थान में हो ही जाता, फिर 'श्री' मात्र के
अधिक पढ़ने और सप्तमाध्याय के में
कहने से ठीक जाना जाता है कि तातङ् आदेश मे डिस्करण
[अन्यादेश के लिये नहीं है,] गुण वृद्धि प्रतिपेध आदि के लिये है,
इस कारण अन्त्य अल के स्थान में नहीं होता।
-श्रादेः परस्य ॥१।१।६८॥
जो पर अर्थात् उत्तर को कार्य कहें वह [ उस के ] आदि थल
के स्थान में समझना चाहिय । यह सूत्र 'तस्मादित्युत्तरस्य' इस
सूर का शेष है, यहां पढ़ने का प्रयोजन यह है कि अल् की अनुवृत्ति
इसमें आ जावे, अन्यत्र पढ़ने से फिर अल प्रहण करना होता ।
जैसे-आसीनोऽधीते । यहां पास धातुसे उत्तर श्रान को ईकारादेश
कहा है, सो उसके आदि अल अकार के स्थान में हा जाता है।
१. क्रमशः, मा० ६८, ६६ । २. सन्धि० १००।१, ईदासः ।
प्रथमपाद
तावह आदेश के
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आ. १२५..
परिभापाप्रकरणम् ३५ - द्वीपम् । यहाँ विन्द से परे अप शब्द को ईकारादेश फहा है' सो उसक आदि अल थकार के स्थान में हो जाता है। ८६-अनेकाशित् सर्वस्य ॥ १।१ । ६६ ।। जो अनेकाल और शित् आदेश हो वह सम्पूर्ण के स्थान में हो जावे। अनेकाल जिसमें अनेक घणे हों, शित् अर्थात् जिसका शकार इत् जाय । जैसे-अस्तेर्भूः'। यहां अस धातु के स्थान में भू आदेश अनेकाल होने से सब के स्थान में हो जाता है । भविष्यति, भारत- व्यम्, इत्यादि । शित्-इदम् इश् । विभक्ति फे परे इदम् शब्द के स्थान में इश आदेश होता है, सो शिन् होने मे सम फे स्थान में हो जाता है। इतः, इह इत्यादि । ६०-स्थानिवदादेशोऽनविधौ ।। १ । १ । ६६ ।। जो आदेश है यह स्थानो के तुल्य होवे अर्थात् जो काम स्थानी से सिद्ध होता है वही आदेश से भी होवे, परन्तु जो अलाप्रयविधि कर्तव्य हो तो आदेश स्थानिवत् न हो । स्थानी उसको कहते हैं कि जो प्रथम तो हो [और] पीछे न रहे, और आदेश उसको कहते हैं कि जो प्रथम न हो और पीछे हो जावे । जो एक के तुल्य दूसरे को मानकर कोई काम करना है उसको अतिदेश कहते हैं । स्थानी और आदेश के पृथक-पृथक होने से स्थानी का कार्य श्रादेश से नहीं निकल सकता, इसलिये आदेश को स्थानिवत् अतिदेश करते हैं। जैसे-राजा । यहां विभक्ति लोप होने पर भी पदसंज्ञा रहती है। इत्यादि । आवधिषीष्ट । यहां इन धातु के स्थान में वध आदेश हा 1. वासरुपसंगम्योस ईन् । सा० ३५२ । 1. ० ०३५ । ५. विमतिलोप-हल्ल्याभ्यो दीघांत(मा० ४८) सूत्र से। पदसंज्ञा-सुतिन्न्तं पदम् (ना.) सत्र से । । २. आ. ३५३.
परिभापाप्रकरणम् ६१ स्थान में इकार संसारण हुआ है,' सां जो स्थानिवत् माना जाय तो 'हरि च" इस सूत्र से उत्त्व प्राप्त है, सो नहीं होता। अल करके जो विधि वहां स्थानिवत् न हो-न्यूढोरस्कन, महोरस्केन । यहां विसर्जनीय के स्थान में सकारादेश हुआ है, उसको यदि स्थानिवत् माने तो विसर्जनीय जो अयोगवाहों में प्रसिद्ध है उसका अद प्रत्याहार में पाठ मानकर नकार को णकारादेश प्राप्त है। सो नहीं होता, इत्यादि इस सूत्र का महान् विषय है, विशेष महाभाष्य में देख लेना। -अचः परस्मिन् पूर्वविधौ ॥१११ १७१ ॥ जिस अच् के स्थान में आदेश होनेवाला हो उसके पर पूर्व को विधि करना हो तो अच् के स्थान में जो आदेश है वह स्थानिवत् होजावे । जिसालये पूर्व सूत्र में अविधि में स्थानिवद्भाव का निषेध किया और इसी विषय में इस सून में स्थानिवद्भाव का विधान है। इसलिये यह सूत्र उसका अपवाद है । जैसे-पटयति । यहां पटु शब्द से शिघ प्रत्यय के परे उसके उकार का लोप हुआ है, उस सकार को इस सूत्र से स्थानिवत् मानने से वृद्धि नहीं होती। यहां 'अच्! २. पचिस्वपियजादीनां मिति (भा. २८३) सूत्र से। २. सन्धिः २५४ । ३. विसर्जनीयस्य सः (सन्धि० २६०) स्त्र से । ५. अयोग- चाहानामट्स णत्वम् । महा० भ० १,पा०१, भा०२ । ५. अटव प्वाइनुम् ग्यवायेऽपि (ना० २५) सूत्र से । ६. 'पटुं करोति' इस अर्थ में 'तत्करो- तीन्युपसंख्यानं त्रयस्याअर्थम्' (मा. ६१२ ) से णिच्, 'प्रातिपदिकाद धारवये बहुलमिष्टवष्च' (भा. ६.) से इष्टवद्भाव होकर '2:'(स्त्रैः ८८९) से दिलोप 'पट्+इ' इस अवस्या में 'भत उपधामा:' (मा १२६) से उपधा अकार को वृद्धि प्राप्त होती है वह उकार लोप को स्थानिवत् मानने से नहीं होती, क्योंकि स्यानिवत् होने पर उपभा में भकार नहीं रहता।
२८ सन्धिविषयः प्रहण इसलिये है कि हल के स्थान में जो आदेश है वह स्थानिवत् न हो। जैसे- 1-प्रागत्य "जो यहां मकार का लोप हुआ है उसको स्थानिवत् मानें तो तुक्का पागम' नहीं पावे । 'परस्मिन्' प्रहण इसलिये है कि जहां परनिमित्तक अच् का आदेश न हो वहां स्थानिवद्भाव न हो । जैसे-श्रादीध्ये। यहां जो इट् प्रत्यय को एका रादेश होता है वह परनिमित्त नहीं है उसको यदि स्थानिवत् माने तो दोधी धातु के ईकार कालोप 'योवर्णयोदधिोवेव्यो." से होजावे, सो नहीं होता। पूर्वविधि' प्रहण इसलिये हैं कि जहां परविधि कर्तव्य हो वहां स्थानिवद्भाव न हो। जैसे-नैधेय । यहां जब दुधान् धातु के आकार का लोप कित् प्रत्यय के परे होता हैतब निधि शब्द बनता है, उस प्राकारको यदि स्थानिवत् माने तो द्वथच् प्रातिपदिकाश्रित जो ढक् प्रत्यया होता है वह नहीं हो सके। परविधि यही है कि प्रातिपदिक से परे प्रत्यय होत हैं। १२-न पदान्तद्विर्वचनवरेयलोपस्वरसवर्णानु- स्वारदीर्घजश्वविधिषु ॥ १ । १ । ७२ ।। पदान्त, द्विवचन, वर, यलोप, स्वर, सवर्ण, अनुस्वार, दीर्घ जश, चर इन विधियों के करने में जो पर को निमित्त मान के आदेश होता है वह स्थानिवत् न होवे । जो पूर्व सून से स्थानिवद्भाव का विधान किया है उसी का नियत स्थानों में यह सून निषेध करता है। जैसे-पदान्तविधि-को स्तः । यहां अस धातु के प्रकार का लोप पर को मानकर हुआ है. उसको स्थानिवत् मान के जो गम को (मा० 111५) सूत्र से। २. हस्वस्य पिति कृति तुक (सन्धि २०६) सूत्र से । ३. दित भात्मनेपदानां ढरे (भा. १८) सूत्र से। मा० ३७३१ ५.भासो होप इटि च (मा. २४४) सूत्र से ।। १.दयच. (स्टें० २०१) सूत्र से।" भसोरलोप (भा० ३५३) सूत्र से। ।
३९ परिभाषाप्रकरणम् । । आय आदेश प्राप्त है, सो नहीं होता। द्विवेचनविधि-दद्ध्यत्र । यहां इकार को यणादेश पर को मानकर हुआ है, उसके स्थानिवत् होने से धकार को द्विवचन नहीं पाता इसलिये द्विर्षचनविधि में स्थानिवद्भाव का निषेध किया है । वरे विधि-अर्थात् जो वरच प्रत्यय फे परे लोप होता है वहां स्थानिवद्भाव न होवे । जैसे-यायायरः । जो यहां प्रकार का लोप परनिमित्त हुआ है, उसके स्थानिवत् होने से आकार का लोप प्राप्त है, सो न हुश्रा । यलोपविधि-मााणक- एडतिः । यहाँ या प्रत्यय के प्रकार का लोप पर फो मानकर हुआ है. उसके स्थानिवत् होने से यकार का लोप नहीं पाता था। स्वरविधि-चिकीर्पकः । यहां एफुल प्रत्यय के परे चिकीर्ष धातु के अकार का लोप होता है, उसके स्थानिवत् मानने से लित् प्रत्यय १.एचोऽयवायाव ( सन्धि० १८०) सूत्र से। २. इको यणचि (सन्धि० १७९) सूप से । ३. अनधि च ( सन्धि० २२२ ) सूत्र से हल परे रहने पर द्विवचन होता है। ४. या+यह = यायाय, इस भव- स्था में 'यश्च यह ' (आ. १३१२) से घरच् प्रत्यय हुआ। उस के परे 'मतो रोप' (भा. १७२) से मकार रोप और 'होपो योलि (अष्टा० ।।६६) से यकारोप होकर 'याया+घर' इस अवस्था में यह के अकार को स्थानिवत् मान के 'मानो रोप इटि च' (आ. २४४ ) से आकार का लोप प्राप्त होता है । ५. कण्इ-कण्वादिम्यो यक् ( भा० ३१८ ) से थक्, 'क्तिको च सज्ञायाम्' ( भा० १५16) से स्ति-कार+य+ति । उस के परे 'भतो होप:' (मा० १०२) से अकार लोप होता है। ६ कण्डू+य+ति इस अवस्था में 'लोपो ग्योवलि' (मष्टा (६६) स्त्र से होने वाला यलोए । ७. तो टोपः (भा. १०२) सूत्र से।
सन्धिविषयः से पूर्व की' में उदात्त स्वर' इष्ट है वह नहीं हो सम्वा, सो हो गया । सवर्णविधि-उन्धः । यहां श्नम् प्रत्यय के प्रकार का लोप हुया है, उसक स्थानिवत् होने से प्रकार के परे अनुस्वार को परसवर्ण अर्थात् नकारादेश नहीं पाता था, सो हुआ। अनुस्वा- रविधि-शिंपन्ति । यहां श्नम् प्रत्यय के प्रकार का लोप हुआ है, उसके स्थानिवत् होने से नकार को अनुस्वार नहीं प्राप्त होता था, सो हो गया। दीर्घविधि--प्रतिदीवना । यहा प्रतिदिवन शब्द के प्रकार का लोप हुआ है, उसके स्थानिवत् होने से दीर्घ नहीं पाता था, सो हो गया । जशविधि-सन्धिः। यहां घस धातु के अकार का लोप हुआ है, उसके स्थानिवत् होने से क्तिन् प्रत्यय ..लिति (सौ० ४९) स्न माता २. 'चिक+' इस अवस्था में यदि अकारलोप स्थानिवत् माना जाय तो 'की' ण्वुर प्रत्यय से अव्यवहित पूर्व नहीं रहता, बीच में भकार का व्यवधान हो जाता है। ३. इनसोरलोप (मा० ३५२) सूत्र से । ४ अनुस्वारस्य ययि परसवर्ण (सन्धि १९७ ) सूत्र से। क्योंकि भकारलोप के स्थानिवत होने से यय परे नहीं रहता, अकार का व्यवधान हो जाता ५,श्नसोरकोप (मा० ३५२ ) सूत्र से। ६ नवायदान्तस्य शलि ( सन्धि० ११२) सूप से सल परे अनुस्वार होता है । समारोप के स्थानिवद् होने से शल परे नहीं रहता। १. अलीयोन (मा. ०३) सूत्र से। १. हलि च ( ना० ११०) सूत्र से हल परे रहने पर दीर्घ होता है, अकारलोप के स्थानिवत् होने से हल परे नहीं रहता। ९ समान+घस्+सिन् । घसिमसोहलि च (आ० ३९३) से अकार रोप, 'मलो झलि' ( आ. ११२) से सकार लोप होकर 'समान +४+ति।
परिभापाप्रकरणम् ४१ के तकार को धकार नहीं पाता था, सो होगया। चर्विधि- जक्षतुः । यहा भी घस् धातु के प्रकार का लोप हुआ है, उसके स्थानिवत् होने से घकार का ककारादेश नहीं पास होता था, सो होगया। ६३-चा०-प्रतिषेधे स्वरदीर्घयलोपविधिपु लोपा- जादेशो न स्थानिवत् ।। महा० १।१ । ७२ ॥ जो सुत्र से पदान्त श्रादि विधियों में निषेध किया है वह इस प्रकार से होना चाहिये कि स्वर, दीर्घ और यलोपविधि क करने में अच् के स्थान में जो लोपरूप आदेश है वही स्थानिवत् न हो, अन्य आदेश तो स्थानिवत् हो ही जावे । जैसे-घरविधि-पञ्चारल्य.। यहा इकार के स्थान में यणादेश हुआ है। उसके स्थानिवत् होने से [अर्थात् इगन्त मानकर ] गन्तकालकपाल'' इस सून से पूर्वपदप्रकृतिस्वर हो जाता है। दीघविधि-किर्यो । यहा किरि शब्द के इकार के स्थान में यणादेश होगया है५, उसके स्थानिवत् होन से १. पस्तयो|ऽध (भा० १४.) से झप् से उत्तर सकार को धकार होता है। अकार के स्यानिवत् होने से किन का तकार झप् से उसर नहीं रहता, बीच में अकार का व्यवधान हो जाता है । 'समा. नस्य छन्दस्यमूर्ध.' (सा. २२१) सूत्र से समान के स्थान में सकार भादेश होता है। २ 'घस्+ अतुस्' इस अवस्था में 'गमहनजन समयसा.'(आ० २१४) से अकारलोप, द्विवचन-'जस्+भनुस्' । 'सरि च' (सन्धि० २३५) से खर परे रहने पर घ को क होता है। यदि भकाररोप स्थानियत् हो जावे तो चर् आदेश नहीं हो सकता। ३. पशारणी+जस् = पञ्चारगी+अस्, इस अपस्या में 'इको यच' (सन्धि० १७९) से यणादेश होता है। १.भष्टा०६।२ ॥ २९ ॥ ५.इको यणचि (सन्धि १७९) सूत्र से । .
सन्धिविषयः दीर्घ नहीं होता। यलोपविधि-वाग्दोः । यहां कार के स्थान में धकार हुआ है, उसके स्थानिवत् होने से यकार का लोप नहीं होता। ६४-वा०-क्विलुगुपधात्वचइपरनिहसिकु- त्वेपूपसंख्यानम् । महा० १।१ । ७२ ॥ यह दूसरा वार्तिक के विपयों से अलग स्थानिवद्भाव का निषेध करता है। की लुप्ते न स्थानिवत्-जहां क्विप् प्रत्यय के परे किसी का लाप हुआ हा वहां स्थानिवद्भाव न हो। [जैसे-] लो । यहां क्विप् प्रत्यय के परे णिच प्रत्यय का लोप हुआ है, उसके स्थानिवत् नहीं होने से वकार को उ आदेश होता है । लुकि न स्थानियत्-लुक होने में स्थानिवद्भाव न हो । जैिसे--] पञ्चपटु । यहा तद्धित प्रत्यय का लुक् होने से डीप् प्रत्यय के ईकार का लुक् हुआ है। उसके स्थानिवत् नहीं होने से पटु शब्द को यणादेश नहीं होता । उपधात्ये न स्थानिवत् । उपधा का कार्य करन में स्था. .. हलि च ( ना० १४.) सूत्र से प्राप्त होने वाला दीर्घरव । २. इको यणचि (मन्धि०१७९) सूत्र से। ३ लोपो व्योवलि (अ०६। १६६)सून से प्राप्त होनेवाला यकार लोप । ४ लू+णि+ किम् = 'लाव् इक्विप्'-इस अवस्था में 'णेरनिर्टि' (आ. १७७ ) से णिलोप होता है। यदि यह स्यानिवत् हो जाये तो इकार के व्यवधान होने से 'च्छ्वो शूडनुनासिके च' ( आ. ४५४ ) से प्राप्त उठ्न हो । ५ पञ्चभि पटवामि क्रोस = 'पञ्चन भिस्+पटु डीप मिस्'इस अवस्था में तिदितार्योत्तरपदसमाहारे च' (सा० १३.) से समास होकर 'अभ्यर्धपूर्व- द्विगोलुंगसज्ञायाम् (भष्टा० ५।।। २८) से फ्रोत अर्थ से उत्पन तद्वित प्रत्यय का लुक् होता है, उस के पश्चात् 'लुक् तद्धितलुकि' (म० ।। २१४९)से डीप का लुक् हो जाता है। यदि सीप को स्थानिवत् हो तो पटु के उकार को 'इको यणचि (सन्धिः १०९) से यणादेश प्राप्त होता है।
परिमायाप्रकरणम् निवद्भाव न हो। (जैसे-1 पारिधीय' । यहाँ परिसा शब्द से चातुरर्थिक अण इत्यय के परे प्राकार क स्थानिवत् नहीं होने से पारिख शब्द से खोपध छ प्रत्यय हो जाता है । घट्पनिहासे न स्थानिवत्-जहां चह प्रत्यय फे पर हम्य का विधान हो स्थानिवत् न हो । जैसे-अवीवदत् । यहां गिाच कंपा गया लोप हुआ है, उसके स्थानिवत् नहीं होने में स्पधा को हम्य हो जाता है । कुत्वे न स्थानिवत्-कुत्यविधि करन में स्थानियद्धाय न हो। जैसे—अब.! यहा अर्च धातु मे पर प्रत्यय फे पर णिच प्रत्यय का लोप हुआ है, उसके स्थानिवत् नहीं होने से कार को, - --- सन्धिविषयः ककारादेश हो जाता है। १५-चा-पूर्वबाऽसिद्धे च ॥ महा० ११११७२॥ इस तीसरे वार्तिक से अष्टाध्यायी के अन्त्य के तीन पादों कार्य करने में स्थानिवद्भाव न हो। जैसे-याष्टिः । यहां यह प्रत्यय के प्रकार का लोप हुआ है, उसकं स्थानिवत् होने से यज धातु के जकार को पकारादेश नहीं प्राप्त होता था, इत्यादि । ६६--द्विवचनेचि ॥ १।११७३ ।। द्विवचननिमित्तक अजादि प्रत्यय परे हो तो द्विवेचन करने के लिये अच् के स्थान में जो आदेश है वह स्थानिरूप ही हो जावे । इस सूत्र में स्थानिवद्धाय का विधान है, अर्थात् निषेध की अनुमति नहीं आती । इसी से यह भी अतिदेश हुआ। अतिदेश दो प्रकार के होते हैं एक कार्यातिदेश और रूपातिदेश । कार्यानिदेश यह होता है कि जो आदेश को स्थानी के सदृश मानकर स्थानी का काम आदेश से ले लेना । और रूपातिदेश उसको कहते हैं' कि स्थानी अपने स्थान में स्वयं श्राजावे, क्योकि जहां स्थानी के समान श्रादेश को मानने से काम नहीं चलता, वहा रूपातिदेश माना जाता है । सो इस सूत्र में रूपातिदेश है। जैसे--पपतुः । ..अर्क+णि+ध-इस अवस्था में 'गैरनिटि' (भा. १७४) से णिलोप और 'चजोः कु पिण्ण्यतो.' (आ० ९४६) से चित् परे रहने पर कुत्व होता है। यदि णिलोप स्थानिवत् हो तो उसका व्यवधान होने से कुरव नहीं हो सकता। २ यज+य याय++तिन्- इस भवस्या में 'सतो होप' (भा. १७२) से अकार रोप और 'सोपो ग्योबलि' (अष्टा०111६६ ) से यकारलोप होता है। यदि भकार लोप स्थानिवत् हो सो 'प्रश्वभ्रस्ज .' (था० २३३ ) से सल्परे होने पाला पकारादेश न हो।
परिभाषाप्रकरणम् १ . यहां अतुस प्रत्यय फे परे धातु फे आकार का लोप हुआ है, उसके स्थानिवत् होने से ही द्विर्वचन हो सकता है। यहां द्विवचन ग्रहण इसलिये है कि गोदा: यहां आकार का लोप अजादि प्रत्यय के परे हुआ है, परन्तु द्विवेचननिमित्तक प्रत्यय नहीं [ है ] इससे स्थानिवद्भाव नहीं होता। और अच्' प्रहण इस लिये है कि देमीयते' यहां अनादि प्रत्यय परे नहीं [ है ] इससे स्थानिवत् नहीं होता। --प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् ॥ १।११७६|| जहां प्रत्यय का लोप हो जावे, वहां उस प्रत्यय को मानकर कोई कार्य प्राप्त होवे तो हो जाय । जैसे-अनिचित् । यहां लोप के पलवान होने से किप् प्रत्यय का लोप प्रथम ही हो जाता है, पीछे उसको मान फर तुक. का आगम ४ होता है । इस सूत्र में *प्रत्यय' प्रहण इसलिये है कि जहां सम्पूर्ण प्रत्यय का लोप हो वहीं प्रत्यय निमित्तक कार्य हो और जहां प्रत्यय के अवयव का लोप हो वहां न हो । जैसे-आप्नीत । यहां प्रत्यय के अवयव सकार का लोप हुया है सो जो प्रत्यय लक्षण होवे तो हुन् धातु की उपधा का लोप नहीं प्राप्त होवे। दूसरा 'प्रत्यय' प्रहण इसलिये है कि 1. भातो होप इटि च (भा० २४४ ) सूत्र से। २. लिटि धातोरनभ्यासस्य (आ. ३८) सूत्र में 'एकाच:' की अनुवृत्ति है, अतः एकाच होने पर ही द्विवचन हो सकता है। आकार शेप हो जाने पर एकाचव का भभाष हो जाता है । ३. सर्वविधिभ्यो सोपविधियलीयान् (पारि० ९९) इस नियम से। १. इस्वस्य पिति कृति मुक् ( सन्धि २.६) सूत्र से । ५. 'भा+हन्+सीयुट्+त' इस अवस्था में लिया सरोपोऽनन्त्यस्य' (भा०८. से सकार लोप होता है। 'गमहनजन' (भा० २१४ ) से अजादि कि हित् प्रत्यय परे उपधा का लोप होता ।
सन्धिविषयः प्रत्यय के लोप में [प्रत्यय को मानकर होने वाला कार्य ही हो] वर्णाश्रय : कार्य प्राप्त होता ही सो न हो। जैसे-रायः कुलम् - रेवुलम् । यहां प्रत्यय के लोप में एच् प्रत्याहार के आश्रय ऐकार को आय आदेश प्राप्त है । सो नहीं हुआ। १८--न लुमताइस्य ॥११११७७ ॥ जहां लुक्। श्लु और लुप् इन शब्दों से प्रत्यय का प्रदर्शन हुआ हो वहां उस प्रत्यय के परे जिसकी अङ्ग संज्ञा हो उसको • प्रत्ययलक्षण मानकर कार्य न हो । पूर्वसूत्र में जो प्रत्ययलक्षण कार्य सामान्य से कहा है उसका इस सूत्र से विशेष विषय में निषेध करते हैं । जैसे-गर्गाः। यहां यम् प्रत्यय को मानकर वृद्धि और आगुदात्त स्वर प्राप्त है सो नहीं होते । इस सूत्र में 'लुमता' प्रहण इसलिये है कि 'धार्यते' यहां णिच् प्रत्यय का लोप हुआ है। इससे प्रत्ययनिमित्तक कार्य जो वृद्धि है उसका निषेध नहीं होता। E6-तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य ॥१॥१०॥ जो शब्द सप्तमी विभक्ति से निर्दिष्ट = पढा हो उससे जो पूर्व शब्द वा वर्ण हो उसी को कार्य हो, अर्थात् उससे परे और व्यवधानवाले को न होवे । इस सूत्र में इति शब्द थर्थ का बोध है। यदि सीखुद को सलादि माना जाय तो उपधा लोप न हो। 1, एचोऽययावावः ( सन्धि० १८.) मूत्र से । २, गर्ग के अपाय इस अर्थ में 'गर्गादिभ्यो यम्' (दै० १८२) से यम् प्रत्यय, और 'यमोन' (भ० २।४ । ६४ ) से यम् का लुक् । या को प्रत्ययलक्षण मान कर 'सद्धितेश्वचामाद' (सै० ९.४) वृद्धि और 'निस्यादिनित्यम्' (सी० २९) से आधुदास स्वर की प्राप्ति होती है। ३. णेरनिटि (मा.९७७) से णि लोप होता है, उस को प्रत्यय लक्षा मानकर 'भचोऽश्मिति' (भा० ६.) से वृद्धि होती है।
परिभाषाप्रकरणम् ४७ . 1 । होने के लिये पढ़ा है, अन्यथा तस्मिन् यही शब्द जहां पढ़ते वहीं 'पूर्व का कार्य होता । जैस-दधि-अत्र । यहां अकार सप्तमीनिदिष्ट है। उससे पूर्व जो इकार है उसी को कार्य होता है। इसमें निर्दिष्ट ग्रहण इसलिये है कि व्यवधान में यणादेश न हो । जैसे- समिधः । यहां धकार [ फे] व्यवधान में यण नहीं हाता । १००-तस्मादित्युत्तरस्य ॥ १ ॥ १।८१ ॥ जो पञ्चमी विभक्ति से निर्देश किया कार्य है वह व्यवधान- रहित पर के स्थान में हो । पूर्वसून से यहां निदिष्टशब्द की अनुवृत्ति आती है। 'इति' शब्द यहा भी पूर्वोक्त प्रयोजन के लिय है। जैसे- द्वीपम् । यहां 'द्वि' शब्द से पर अप् शब्द को ईकारादेश होता है। इस सून में निदिष्टप्रहण का प्रयोजन यह है कि अत्यन्त समीपवाले को कार्य हो । अन्तर्दधाना आप -यहां अपशब्द को ईकारादेश न होवे । 'प्रादेः परस्य' यह सूत्र लिख चुके हैं सो इसी का शेष है। १०१-स्वं रूपं शब्दस्याशब्दसंज्ञा ॥२२॥ व्याकरण शास्त्र में शब्द का जो रूप है उसी का प्रहण होवे, शब्द शास्त्र में जो संज्ञा है उसको छोड़ के, अर्थात् उसके पर्यायवाची और विशेष वाची का ग्रहण न हो । लोक में यह परम्परा है कि शब्द के उच्चारण से अर्थ की प्रतीति होती है। जैसे किसी ने 1.इको यणधि (सन्धि १७९) सूत्र में 'भ' सप्तमी निर्दिष्ट है। २. दयन्तरुपसर्गेम्योप ईत् (सा. ३५२ ) से ईकारादेश होता है। । यहाँ 'अन्तर' और 'आप.' के मध्य 'दधाना.' का म्यवधान होने से 'यन्तरुप०' (सा० ३५२ ) से इंकारादेश नहीं होता। " सन्धि० ८७1 -- -४८ सन्धिविषयः - किसी से कहा कि गौ लाया, वो चार पगवाली व्यक्ति विशेष को ल पाता है, वैसे व्याकरण में शब्दों से कार्य कहे है, अर्थों से उनका होना तो कदापि सभव नहीं। जैसे अग्नि से कुछ कार्य कहा' -तो क्या अंगारों से वह काम हा सकता है ? इसलिये अमि के पर्यायवाची जितन शब्द हैं उन सब से वह कार्य प्राप्त होता था, इस दाप के निवारण के लिये इस सूत्र का प्रारम्भ किया है। जैसे-गो शब्द का कोई कार्यविधान किया है वह उसके पर्यायवाची धेनु श्रादि शब्दों से और विशेषवाची कृष्णा आदि शब्दों से न हो। इस सून में 'रूप' ग्रहण इसलिय है कि-शब्दों का सम्बन्धी जो अर्थ है उसका प्रहण न होवे । जा इस सूत्र पर चार वानिक हैं सो लिखते हैं- १०२-वा-सित्तद्विशेषाणां वृक्षाद्यर्थम् ॥ महा ०1८२ ।। सित् निर्देश करना चाहिये, अर्थात् जिन जिन शब्दों के विशेषवाचा शब्दों का ग्रहण इष्ट है वहा वहा एक सकार अधिक पढकर एक नवीन संकेत करना चाहिये, जिससे वृक्ष यादि शब्दों के विशेषवाची शब्दों का बोध होजावे । जैसे-'विमाया वृक्षमृग०" इत्यादि एक वचन प्रकरण में सामान्यवाची वृक्ष आदि शब्दों के ग्रहण में विशेषवाचा न्यग्रोध श्रादि का भी प्रहण हाता है। प्लक्षन्यग्रोधम् , प्लक्षन्यप्रोधा', इत्यादि । १०३-वा -पित्पर्यायवचनस्य च स्वाद्यर्थम् ॥ महा०111८२ ॥ 1. भोटक (भ० ४ । २ 1 ३६) से टक् प्रत्यय का विधान किया है। २. गोतो गित् (ना. ४) से सर्वनामस्थान को णिधत् कहा है। ३.सा...। - परिभापाप्रकरणम् ४९ जिन शब्दों के पर्यायवाची शब्दों और उनके विशेषवाची शब्दों का प्रहण और अपने रूप का महण इट है वहां-वहां पित्स्येत करना चाहिये । जैसे-स्ये पुपः '-स्वपोयं पुष्यति । यहां अपने स्वरूप का प्रहण है। रेषापं पुष्यति, धनपीपं पुष्यति। यहां स्वशद के पयायवाची है। आदि हैं। अनपोपम्, गोपीपम् । यहां अश्व आदि शब्द उसके विशेषयाची है। १०४-चा०-जित्पर्यायवचनस्यैव राजाद्यर्थम् ।। मदा०1111८२ ।। जिन राजादि शब्दों के पर्यायवाचियों का ही प्रहण इट है यहां-वहां जित्रांवेत फरना चाहिये । इस यातिक से 'समा राजामनुष्यपूर्वा इस सूत्र में राजन् शब्द के पर्यायवाचियों का ही महण होता है। इनसभम् , ईश्वरसभम् । ये राजन् शब्द के पर्यायवाची है। और राजन् शब्द का प्रहण नहीं होता-राज. मभा और राजन् शब्द फे विशेषवाचियों का भी प्रहण नहीं होता। जैसे-चन्द्रगुप्तसभा, पुष्पमित्रसभा इत्यादि । १०५--वा०-झित्तस्य च तविशेषाणां च मत्स्याद्यर्थम् ॥ । महा."।।८२॥ जिन मरस्यादि शब्दों के विशेपवाचियों और उनके स्वरूप का प्रहण इष्ट है वहां मित्संकेत करना चाहिये । इस वार्तिक में पतिः मत्स्यमृगान् हन्ति' इस सूत्र में मत्स्य शब्द से अपने स्वरूप और पसके विशेषवाची शब्दों का ग्रहण होना इष्ट है । जैसे-मत्स्यान् हन्ति मात्मिकः। यहां यरूप का पहरा । और उसके विशेष- आ०१५७९. २. भ. २।४।२३॥ ४७८ , ६. सन्धिविषयः -- याची-साफरिकः, शाकुलिकः, इत्यादि । पर्यायवाची अजिम आदिशब्दों का प्रहण नहीं होता, परन्तु एक पर्यायवाची का भी प्रहण इष्ट है। मीनान् हन्ति मैनिक । १०६-अणुदित् सवर्णस्य चाऽप्रत्ययः॥ १।१।८३ ॥ श्रण प्रत्याहार और उदिन ये दोनों अपने सवर्णो के ग्रहण करने वाले हों, अर्थात् इनको जो कार्यविधान किया हो वह इनके सवणियों को भी हो, परन्तु प्रत्यय सहक श्रण सवर्ण का प्राहक न हो। पूर्व सूत्र से 'सं रूप' इन दो शब्दों की अनुवृत्ति आती है। अण प्रत्याहार इस सूत्र में पर णकार से लिया जाता है। और उदित् करके कु, चु, हु, तु, पु, ये पांच अक्षर लिये जाते हैं। जैसे- 'अस्य चयौ" यहा अकार को कार्य कहा है सो आकार को भी होता है, तथा उदित् 'चट्ट यहा चवर्ग टवर्ग का 'अट्कुप्वा' यहा कु, पु शब्दो से कवर्ग पवर्ग का प्रहण होता है। इस सूत्र में प्रत्यय का निषेध इसलिये है कि-'श्र, उ इन प्रत्ययों में दार्घ वर्णों का प्रहरण न हो। १०७-तपरस्तत्कालस्य ॥ १।१।४।। जिससे तकार परे हो वा जो वर्ण तकार से परे आवे वह उतने ही काल वाले सवर्णसज्ञक वर्ष और अपने रूप का बोधक हो, अर्थात् तपर हस्व वर्ण को कार्यविधान किया हो तो दी और १ अ०७॥ १॥ ३२ ॥ २ जैसे 'शुक्ली भवति' में ईकारादेश होता है वैसे-मध्यमवति, माली भवति' में भी हो जाता है। ३ मा० १७, भा३२ । ४ ना. २५, आ० ८७, । ५ ११६।। ६ सनारासभिक्ष उ । भा. १३..। भ प्रत्ययात् | आ.
परिभाषाप्रकरणम् प्लुत को न हो । जैसे-'अत्" यहां दीर्घ श्राकार फा ग्रहण नहीं होता, क्योंकि उसके उच्चारण में द्विगुण काल लगता है। तथा जहां-जहां सत्रों में प्राकार तपर' पढ़ा है उसका प्रयोजन यह है कि-उदात्त अनुदात्त और स्वरित का भी ग्रहण हो, क्योंकि उदा- चादिकों में कालभेद नहीं होता । हस्व स्वरों में पूर्व सूत्र से सामान्य करके सवर्ण ग्रहण प्राप्त था सो इस सत्र से हस्व तपर सरो मे अधिक कालत्राले दीर्घ प्लुत का निषेध कर दिया है, तथा पूर्वसूत्र से दीघे स्वरों में सवर्ण प्रहण प्राप्त नहीं था सो इस सूत्र से तत्काल के प्रहण में उदात्तादि विशेष गुणों का भी ग्रहण हो जाता १०८-येन विधिस्तदन्तस्य ।। १।११८६ ॥ जिस विशेपण करके विधि हा वह जिसके अन्त में हो उसको कार्य हो। जैसे-'अचो यत्। यहां अच' यह पद धातु का विशेषरण होने से अन्त शब्द का लाभ करके जो अच् को कार्यविधान है सो अजन्त को होता है। भव्यम् , इत्यादि । १०९--वा- -समासप्रत्ययविधौ प्रतिषेधः ॥ महा...८६॥ समासविधान और प्रत्ययविधान में तदन्तनिधि न हो । समा सविधान में-जैसे-कप्टश्रितः । यहा तो समास होता है और पर- मकट भित' यहां तदन्त का समास नहीं होता। प्रत्ययविधि-नड- स्यापत्यं नाडायन.। यहां तो प्रत्ययविधान होता हैऔर 'सूत्रनड- , अदट् गुण (सन्धि० १९) सूत्र से भकार की गुण सज्ञा होती है, आकार का नहीं। २.द्धिरादैच् (सन्धि० १८) आदि सूली में। ३ आ० १२१ । १. द्वितीया श्रितातीनपतितगता० ( सा. ७५) सूत्र से। ५ नडादिभ्य फक् (स्त्रै० १७१) सूत्र में ।
५२ सन्धिविषयः स्थापत्यं सौत्रनाडि: यहां तदन्त से फक् प्रत्यय नहीं हुआ, इत्यादि । ११०-वा०-उगिद् वर्णग्रहणवर्जम् ॥ महा०11८६ ।। पूर्व वार्तिक से जो निषेध किया है सो प्रत्ययविधि में सर्वत्र नहीं लगता, अर्थान् उगित् ग्रहण और वर्ण प्रहण को छोड के [निषेध प्रवृत्त होता है ] । जैसे-भवती। यहां उदित् भवत् शब्द से डीप् प्रत्यय होता है" तो 'अतिभवती' यहां तदन्त से भी हो जाये। वर्णमहण- 'अत इञ्' [ अस्यापत्यमि । यहां अ शब्द से इन प्रत्यय होता है, इस वार्तिक से] 'दातिः' इत्यादि में अदन्त से भी प्रत्यय-विधान होता है। १११-अचश्च ।।१।२।२८ जहां-जहां व्याकरण शास्त्र में हस्व, दीर्घ और प्लुत [ का । विधान करें यहाँ वहां अच् ही के स्थान में हों। जैसे- हरयो नपुंसके प्रातिपदिकस्य यहां प्रातिपदिक हो हस्व कहा है, जैसे-रे-अतिरि। यहां ऐकार को इकार और 'अधिनु' यहां औकार को उफार होता है। यहां 'अच्' प्रहण इसलिये है कि 'सुवाग ब्राह्मणकुनम' इत्यादि प्रयोगों में हलन्त को हम्ब न हो। दीर्घ-अत्सार्वधातुकयोदीर्घः।" स्तु, श्रु-स्तूयने, श्रूयते । यहाँ उकार के स्थान मे ऊकार दीर्घ हुआ है। अच् का नियम इसलिये है कि 'अग्निची३न्' यहां तकार के स्थान में प्लुत ५ न हो जावे। परन्तु जहां संज्ञा शब्दों से हस्व, दीर्घ और प्लुत का विधान हो वहीं अच् के स्थान में हो । यह नियम १.उगितरच (स्. २३) सन से । २, ०११। ३. ना. ४७ । ५. भा० १६०। ५. दूराद्धृते घ ( सन्धि. २९)सून से।
परिभाषाप्रकरणम् 3 इसलिये है कि 'त्यददीनाम:' यहा प्रकारादेश कहा है, और कार की हस्य संक्षा है सो यहा अच की अपेक्षा न हो, इत्यादि । ११२-यथासंख्यमनुदेशः समानाम् ॥१॥३।१०।। जहां-जहां परायर संख्यावालों का कार्य में सम्बन्ध करना हो वहां-वहां यथासंख्य अथात् जैसा उनका म पढ़ा हो वैसा ही सम्ब. न्ध किया जावे। जैसे-'एचोऽयघायायः ' यहां एच् प्रत्याहार में [ए, ओ, ऐ, औ ] चार वर्ण हैं सो ही अय्, अव, पाय, आय ये चार आदेश है सो प्रथम फे स्थान में प्रथम, द्वितीय के स्थान में द्वितीय, तृतीय के स्थान में तृतीय और चतुर्थ फे स्थान में चतुर्थ होते हैं। इसी प्रकार सर्वत्र यह नियम जान लेना। यहां 'समानाम्' प्रहण इसलिये है कि-'लक्षणेत्थम्भूतारयानभाग- यीप्सासु प्रतिपर्यनय। यहा चार अर्थ और तीन उपसर्ग है, इससे यथासस्य मम नहीं लगता, इत्यादि । ११३---स्वरितेनाधिकारः।१।३ । ११ ॥ उस स्वरित के चिन्ह से अधिकार का बोध करना चाहिये जो अक्षर क ऊपर सड़ी रेखा लगाते हैं। वह स्वरित वर्ण का धर्म होता है। जैसे-प्रत्यय.', धातोः कर्मण्यण', इत्यादि। श्रन जिसके ऊपर स्वरित का चिन्ह किया हो वह अधिकार कहा तक जावेगा यह घात उस-उस के विशेष व्यारयान से जानना। ११४-विप्रतिपेधे परं कार्यम् ॥ १।४।२।। विप्रतिषेध मेंपर को कार्य होना चाहिये। इतरेतरप्रतिपेधो विमति- पेधः। जो परस्पर एक दूसरे का रोकना है वह विप्रतिपेष कहाता है। १. मा.१०।। २. सन्धि १८.। ...॥ ६.०९९८॥
सन्धिविषय AA ~- - हो प्रसगौ यदान्यार्थो भवत एकस्मॅिश्व युगपत् प्राप्नुत स वि- प्रतिषेध । जो पृथक्-पृथक प्रयाजन वाले दा कार्य एक विषय में एक काल में प्राप्त होते हैं उसको विप्रतिषेध कहत हैं। जैसे-वृक्षाभ्याम् । यहा सुपि च" इससे दार्घ होता है, और 'वृक्षेषु यहा 'बहुवचने झल्येत्' इससे एकारादश होता है । ये तो इनके पृथक् प्रथम प्रयो- जन हैं, परन्तु वृक्षेभ्य यहा जो दो सूनों की प्राप्ति एक काल में होकर वृक्ष शब्द को दीर्घ और एकारादेश दोनों ही प्राप्त होत हैं इसका न्याय इस परिभाषा सून से किया है कि पर का कार्य एकारादेश हो जावे और पूर्वसूत्र का कार्य दीर्घादेश न हो, इत्यादि असख्य प्रयोजन हैं। ११५-अन्तादिवच्च ॥६।१।८४ ॥ जा पूर्व पर के स्थान एकादेश विधान किया है सो पूर्व का अन्त अवयव और पर का आदि अवयव समझना चाहिय । पूर्व, पर और एक शब्द की अनुवृत्ति इसके पूर्व सून से आती है। इसके प्रयोजन-जैसे पूर्व का अन्तवत्-ब्रह्मग्रन्धू । यहा उकारान्त शब्द से ऊड प्रत्यय होता है । उकारान्त तो प्रातिपदिक [ है । और प्रत्यय का ऊकार अप्रातिपदिक है इन दोनों उकारों का एकादेश. प्रातिपदिक के ग्रहण करके गृहीत होन से स्वादि प्रत्ययों की उत्पत्ति होती है अन्यथा नहीं हो सकती, इत्यादि । पर का आदिवन्-अमी इति, वायू इति । यहा इकार, उकार और औकार का एदादेश ५ हुआ है सो द्विवचन औकार की प्रादिवत् होन से ही प्रगृह्य ससा हो सकती है, अन्यथा नहीं हा सश्ती थी, इत्यादि। ११६-पत्वतुकोरसिद्धः ॥ ६।१।८५ ॥ , ना. २६ । २ ना० ३०। ३ क पूर्वपरयो (सन्धि०:२९) से।। उष्टुन (ौ१२५) सून से। ५, प्रथमयो पूर्वसवर्ण (मा. १९) सूत्र से। ६ इद् द्विवचन प्रगृह्यम् (सन्धि.६४) सून से। सूत्र परिभाषाप्रकरणम् जो पत्र और विधि के फरने में पूर्व पर के स्थान में एका. देश है वह असिद्ध हो जाता है। जैसे-पलकोऽमिचात् । यहां अकार को पूर्वरूप एकादेश हुश्रा है, उसको पत्यविधि' करने में प्रसिद्ध मान के पत्य नहीं होता, इत्यादि । तुविधि-धीत्या परीत्य । यहां मवर्णदीर्घ एकादेश' को प्रसिद्ध मानकर हम्ब से परे तुफ का पागम होता है, इत्यादि । ११७-चा०-संमसारणडीट्सु सिद्धः॥ महा ०11८५॥ परन्तु जहाँ संप्रसारण, टि विभक्ति और इट् प्रत्यय के साथ एकादेश हुआ हो तो वहां पत्र और तुकनिधि करने में एकादेश सिद्ध ही माना जाये। क्योंकि पूिर्व] सूत्र से [सिद्धत्व फा] निषेध मास था, उसी प्रतिरोध का यह प्रतिपेय है। जैसे संप्रसारण-शहपु । यहां शकपूर्वक 'हे' धातु से किप फे परे संप्रसारण को पूर्वरूप एकादेश हुआ है, उसको असिद्ध मानने से सप्तमी विभक्ति के सकार को पत्र नहीं पाता था इससे होगया। डि-वृक्ष धनन्, १.एरः पदान्तादति (सन्धि १९०) सूत्र से। २ भादेशमन्यपयोः (मा० ३४,०५६) सूत्र से। ३. धि+इत्य, परि+हस्य 'भ: सबने दीर्घः (सन्धिः १३.)सूत्रसे । १. हम्बस्स पिनि कृति सुर (सन्धि००१) सूम से। ५. द्वेष-आदेष उपदेशेऽशिति (भा. ३४२) से स्वाहा पि- पचिस्वपियजादीनां फिति (भा० २८३) से संप्रसारण-इट । १. उआ-सम्प्रसारणाच (सन्धि० १५९) से एकादेश-दु', इलः (आ. ५१) से दीर्घ च ह । .. आदेशप्रत्यययोः (मा० ३१, मा. ५६) मत्र से प्राप्त । ८. एकादेश असिद होने पर '3+आ ऐसा वस्या होती, क्स में सुप् का सकार इण कवर्ग से उत्तर नहीं रहना, बीच में '' म्यवधान हो जाता है।
सन्धिविषयः पृच्छन्नम् । यहां मृत शब्द का हि विभक्ति के इकार के साथ एका- देश' दुआ है, जो उसको प्रसिद्ध मानें तो पूर्ववत् निरय तुफ' पाता है, 'पदान्ताद्वा' से विकल्प इष्ट है, सो हो गया इत्यादि । ११८-पूर्वत्राऽसिद्धम् ॥ ८॥२॥१॥ जो कार्य यहां से पूर्व सपादसताध्यायी अर्थात् एक पाद और सात अध्याय में जितना शब्दकार्य कहा है वहां सर्वत्र त्रिपादी का किया कार्य श्रसिद्ध माना जावे, और त्रिपादी में भी पूर्व-पूर्व के प्रति पर-पर सून का कार्य अमिद्ध माना जाय। जैसे-पादा उच्यते । यहां 'लोपःशाकल्यस्य" इस सूत्रसे अवर्णपूर्व वकार का लोपहुआ है, उसको असिद्ध मानकर गुण एकादेशरूप सन्धि नहीं होती। अग्न आयाहि । यहां भी अवर्णपूर्व यकार का लोप होने से उसको असिद्ध मानकर सवर्ण दीर्घ नहीं होता, इत्यादि । त्रिपादी में-गोधुडमान् । यहां दुह धातु के हकार को धकार,' कार को . 1. भाद् गुणः (सन्धि० १३३) सूत्र से । २. एकादेश को असिद्ध मानने पर पूर्ववत् अर्थात् जैसे 'अधीत्य' में नित्य तुक होता है वैसे 'वृक्ष+' इस अवस्थमें 'छे च' (सन्धि० २०८) से नित्य तुक् प्रास होता है। ३. सन्धि० २.५। ५. सन्धि० २५१ । ५. यहाँ 'अवर्ण है पूर्व में जिस के ऐसा बहुचीहि समास समझना चाहिये । ६.भाद् गुणः (सन्धि० १३३) से प्राप्त । ७. यहां भी पूर्ववत् बहुमोहि समास है। लोप. शाकल्यस्य (सन्धि० २५१) सूत्र से । ९. अफ सपणे दीर्घः (सन्धि. १३०) सूत्र से। १०. दादेर्धातो: (भा०३1) सूत्र से।
परिमापाप्रकरणम् , - गकार' और गकार को डकार' और दकार को धकार होता है। इस सब को असिद्ध मानकर मतुप के मकार को वकारादेश नहीं होता, इत्यादि। २१६-नलोप: सुप्स्वरसंज्ञाताविधिपु कृति ॥२२॥ परन्तु प्रातिपदिकान्त नकार का जो लोप होता है वह सुप, स्वर, संज्ञा और कृत्सम्बन्धी विधि इन्हीं विधियों के करने में असिद्ध माना जावे। सुपविधि में दो प्रकार का समास होता है-सुप् के स्थान में जो विधि और सुप के परे जो विधि । जैसे-सुप के स्थान मे जो निधि-राजभिः, तक्षभिः । यहां राजन् , तक्षन् शब्द के नकार फा लोप हुआ है उसको प्रसिद्ध न माने तो भिस् विभक्ति को ऐस् । आदेश हो ही जाये, सो इष्ट नहीं है। तथा सुप् के परे जो विधि-राजभ्याम् , तक्षभ्याम् । यहाँ नलोप को असिद्ध मानने से विभक्ति के परे दीर्घ नहीं होता। स्वरविधि-पञ्चामम् , सप्तामम् । यहां पञ्चन् और सप्तन् शब्द के नसार का लोप हुआ है उसको असिद्ध मानकर 'अम चाऽवण द्वयच् च्यच् इस स्वर विधायक सूत्र से जो] अवर्णन्त पूर्वपद को आशुदात्त स्वर प्राप्त है सो नहीं होता, क्योंकि नलोप के असिद्ध मानने से अवर्णान्त ही नहीं। संज्ञाविधि-पञ्चभिः, सप्तभिः । यहा पञ्चन और सप्तन् शब्द के १. सलाजशोऽन्ते (सन्धि० १९०) सूत्र से। २. यरोऽनुनासिके प्रत्ययभा- पाया नित्यवचनम् (सन्धि० २२०) वार्तिक से। ३. एकाचो यशो भप सपन्तस्य रध्वोः (आ० २०४) सूत्र से। ४. यहां 'झयः' (१० ६७४) से प्रास धकारादेश घत्व और जश्व के असिद्ध होने से नहीं होता। ५. नलोप. प्रातिपदिकान्तस्य ( ना० ६७) सूत्र से। ६. अतो भिस ऐस् (ना. २७) सूत्र से प्राप्त । ७.सुपि च (मा० २६) से प्राप्त । १.भ.६।२६९० ॥
सन्धिविषय नकार का लोप हुआ है उसको असिद्ध मानकर पटसज्ञा' होती और तदापय पसंज्ञा के कार्य भी होते हैं। तुविधि- ब्रझहभ्याम् ब्रह्मभिः। यहा नलोप को असिद्ध मानकर जो कृत् के श्राश्य से तुफ्' प्राप्त है तो नहीं होता । यहा 'कृ' प्रहण । इसलिये है कि ब्रह्माहच्छत्रम्' यहा जो छकाराश्रय तुगागम " है सो हो जावे, इत्यादि। (प्र०) "पूर्वत्राऽसिद्धम्" इस उक्त सून से ही निपादी के सब कार्य प्रसिद्ध हो जान, फिर यह सूर किस लिये किया ? (उ०) यह सूर नियमार्थ है कि इतने ही विधियों के करने में नकार का लोप असिद्ध माना जावे अन्यत्र नहीं। इससे 'राजीयति' यहाईकारादेश अवर्णान्त मानकर हो जाता है, इत्यादि। नकारान्त सल्यावाची शब्द की 'पणाला पटु' (ना० १३६) सूत्र से पट सज्ञा होती है। २, वेद में 'झल्युपोत्तमम्' (अ०६।।। १०६) सूत्र से नित्य और 'विभाषा भाणयाम्' (अ० ६।।। १०७ ) से भाषा में विकल्प करक उपोसम अर्थात् अन्त्य से पूर्व को उदास होता है । ३ इस्वस्य पिति कृति तुक् (सन्धि० २०६ ) सूत्र से । ४ ग्रहच्छतम्-यहा 'इस्वस्य पिति. (सन्धि० २०६) सूत्र से प्रास कृदाश्रय तुग्विधि में मरोप के असिद्ध होने से 'वृत्रह' शब्द हस्वान्त नहीं रहना, नकारान्त हो जाता है। परन्तु 'च' (सन्धि. मून से प्राप्त तुग्विधि म नलोप असिद्ध नहीं होता, अर्थात् सिद्ध रहता है। अत 'वृत्रह' शब्द को हवान्त मानकर 'छे च' सूत्र से तुक हो जाता है । ५ राजीयतिराजन्+क्यच्+तिप् । न क्ये (आ० ५६३ ) से पद सज्ञा होकर 'नलेप प्रातिपदिकान्तस्य' (मा. १७) से नकार का लोप होता है। नरोप सुपसर० ( सन्धिः १९) सूत्र के नियमार्थ होने से यहा असिद्ध नहीं होता, और राज शन्द को भवर्णान्त मानकर 'क्थचि च' (आ० ५६२) सूत्र से ईकारा- देश हो जाता है।
परिभाषामकरणम् १२०-नमुने ॥ ८॥२॥३॥ नाभाव करने में मुभाव प्रसिद्ध नहीं होता अर्थात् सिद्ध ही माना जाता है। जैसे-अमुना । यहा अदस शब्द के कार को मकार और अकार को उकारादेश त्रिपादी में' होता है उसको असिद्ध नहीं मानने [अर्थात् उकारान्त मानने] से पिसक्षक से परे टा विभक्ति को ना आदेश' हो जाता है, नाभाव कर लेने के पोच जो मुभाव को असिद्ध मानें तो अदन्त अग को दीर्घ 'प्राप्त होता है, इसलिये ऐसा अर्थ करना किनाभाव के करने में और करने के पश्चात् भी मुभाव सिद्ध ही माना जावे' इत्यादि । १२१-चा -संयोगान्तलोपो रोकत्वे ॥ महा०. ८।२।६॥ यहा को उकारादेश फरने में सयोगान्तलोप सिद्ध माना जाता है। जैसे हरिवो मेदिन त्वा । यहा जो 'हरिवन्त शब्द में सयोगान्त तकार का लोप असिद्ध माना जावे तो हश् के न होने से उत्व ५ प्राप्त नहीं होता, इत्यादि। १ असोऽपर्दादु दो म (ना. १८.) २ स्व इकारान्स उकारान्त शब्द की शपो ष्यसखि' (ना० ५७ ) से घि सज्ञा होती है । ३ भाडो नाऽखियाम् (ना० ५.) सूत्र से ४ मुपि च ( ना. २६) सूत्र से। ५ 'हरिपन्त् मेदिनम्' इस अवस्था में 'सयोगानस्य लोप' (ना.) से तलोप होकर 'मयसोर सयुद्धौ सदसि (अ० ८।३।1) से नकार को रु भादश होता है। उकार की इरसज्ञा और लोप होकर मकार परे रहने पर 'हशि च' (सन्धि० २५४ ) से उत्व होता है। यदि यहा तकार लोप को असिद्ध मानें तो 'र' से परे हश् = मकार नहीं मिरता, बीच में सकार का व्यवधान होता है। - ---
सन्धिविषय
-
१२२-वा-सिज्लोप एकादेशे सिद्धो वक्तव्यः।।
महा०८।२६॥
सवर्णदीर्घ एकादेश के करने में त्रिपादा में विहित सिच
प्रश्यय का लोप सिद्ध ही समझना चाहिये । जैसे-अलावीत् ।
भावान ! यहा इट् से परे सिथ् के सकार का लोप ईट् के पर
हुआ है, ' पश्चात् उस सकार के लोप को असिद्ध मानें वो
सवणेदाघ एकादेश' नहीं पावे, इत्यादि ।
१२३-चा०-संयोगादिलोपः संयोगान्तलोपे।
महा०८।२।६॥
जो त्रिपादी मे सयोगादि सकार ककार का लोप होता है वह
सयागान्त लोप करने में सिद्ध माना जावे । जैसे-काप्ठतट ।
यहा सयोगादि फकार का लोप सयागान्त लोप में सिद्ध मानन से
सयोगान्त टकार का लोप नहीं होता इत्यादि ।
१२४-वा०-निष्ठादेशः पत्वस्वरप्रत्ययेड्-
विधिपु सिद्धो वक्तव्यः ॥ महा०८।२।६ ॥
जो निष्ठासज्ञक प्रत्ययों के स्थान में आदेश होत हैं वे पत्व,
स्वर, प्रत्यय और इट्विधि के करन मे सिद्ध मानने चाहिये ।
जैसे-पत्यविधि-वृक्ण , वृणवान् । यहा ओदित् धातु से परे
निष्ठा के तकार को नकारादेश हुआ है उसको सिद्ध मानने से
, इट ईटि (आ. १३३) सूत्र से । २ अक सवर्ण दीर्घ
(सन्धि० १३०) से प्राउ | ३ को सयोगायोरन्ते च (मा० २१.)
सून से । ५ स्को सयोगाद्यो. (भा० २१.) सूत्र से । ५ भोदितत्र
(भा०:१५६) सूत्र से ।
परिमापाप्रकरणम्
'प्रश्चनजं."
-
इस सून से पत्व नहीं होता, इत्यादि ।
स्वरविधि-क्षीयः । यहाँ क्षीप धातु से निष्ठा के परे इत्मात्र का
लोप माना है । (हाय-इट-त) इस अवस्था में निपातन से
इट् फा इ और क्त का त् इस प्रकार इत् का लोप होकर क्त के
अ में घ मिल के तीबः बनता है, उसको सिद्ध मानके निष्टा च
द्वयजनात्' इससे आगुदात्त सर हो जाता है। प्रत्ययविधि--
क्षीयेन तरति क्षीयक । यहां भी उस लोप के सिद्ध मानने स ही
द्वयच् लक्षण ठन् प्रत्यय होता है। इटविधि-तीयः। इसमें
जय तकार के लोप का निपातन ५ मानते हैं तब उसको सिद्ध
मानकर इट नहीं होता।
१२५-चा०-प्लुतिस्तुग्विधौ छे च ॥महा.
८।२।६॥
जो निपादी में विधान किया हुआ प्लुत विकार है उसे
छकार के परे तुक विधि • करने में सिद्ध ही समझना चाहिये।
१.आ. २३३ ॥ २ अनुपसर्गात् पुलक्षीयकृशोलाघा (आ.
१९७२) सूत्र से । ३. भ. ६ । १ । २०५ ॥
द्वयचटन् ( स०
४५९) सूत्र से। ५. क्षीय शब्द के निपातन में दो पक्ष है
प्रथम-क्षीय धातु से परे र प्रत्यय को इट् का आगम करके
'इत्' शब्द का लोप । दूसरा- प्रत्यय के 'त्' का लोप । प्रथम पक्ष
में स्वरविधि का उदाहरण है। द्वितीय पक्ष में तकार होप को सिद्ध
मानकर 'भाधधातुक्स्येड् घरादेः (आ. ४६) सूत्र से इहागम
की प्राप्ति होती है। अत: इविधि मे तकार रोप के सिद्धत्व का
विधान किया है। ६ एकोऽप्रगृह्यस्यादूराद्धते. ( सन्धि० ५२)
सूत्र से विहित प्लतविषयक इ उ विकार । ५. छे च (सन्धिक
२०८)सूत्र से।
-
सन्धिविषय जैसे-अग्ना३इच्छत्रम् । पटा३उच्छरम्। यहा प्लुत को सिद्ध मानकर तुक का ओगम हो जाता है। १२६--वा०-रचुत्व घुविधौ ॥ महा० । २।६॥ जो शकार चवर्ग के योग में सकार तवर्ग को शकार चवर्ग' होते हैं उनको धुड्विधि में सिद्ध मानना चाहिये। जैसे-अट+ श्च्योतति । यहा शेकार को सिद्ध मानने से डि सि धुद इस सून से धुट का आगम नहीं होता। १२७-वा०-अभ्यासजस्वचवमत्वतुकोः।। महा०८।२६॥ जो अभ्यास में फलों को जरत्व और चर्व त्रिपादी में कहा है उसको एत्व और तुक् के करने में सिद्ध मानना चाहिये । जैसे- यमणतु, बभणु । यहा अभ्यास के भकार का धकारादेश' हुधा है, उसको सिद्ध मानने से आदेशादि धातु को एत्व नहीं होता। चव- उचिच्छिपति । यह 'उच्छी विवासे' धातु का प्रयोग है, उसके अभ्यास में चकारादेश होता है, उसको असिद्ध मानने , स्तोपचुना श्चुः (सन्धि. २३) सनसे । २ डासि धुट् ( सन्धि. २०) सूत्र से । ३ च्युतिर क्षरणे धातु वस्तुत सकारादि 'सच्युतिर' है, चकार के योग में सकार को शकार हुभा है । यदि इसे प्रसिद्ध मानकर सकार माने तो धुट् की प्राप्ति होती है । अत एव इस घातिक से उसे सिद्धयत् माना है। ४ सन्धिः २० । ५ अम्यासे चर्च ( मा० ४३ ) स्त्र से। ६ भम्यासे चर्च (भा० ४५) सूध से । • अत एकहरूमध्येऽनादशालिटि (मा० १२५) स्त्र से। ८ अभ्यासे चच (भा०४३) सूत्र से।
परिभापाप्रकरणम्
से तुक' पाता है सो सिद्ध मानकर न होवे ।
१२८-वा-द्विवंचने परसवर्णत्वम् ।।
महा०८।२।६॥
जहां-जहां अनाचे च' करके द्विर्वचन करते हैं वहां-वहां
परसवर्ण सिद्ध ही मानना चाहिये । जैसे संयन्ता, सवत्सरः
यस्तै लोकम् , तल लोकम् , इत्यादि में अनुस्वार को परसवर्ण
आदेश होता है उसको सिद्ध मानने से द्विवचन " होता है,
इत्यादि।।
॥ इति परिभाषाप्रकरया समाप्तम्
1. असिद्ध अर्थात् छकार मानने पर 'छै छ' (सन्धि० २०८)
मे शुक् पाता है। २.( सन्धिः २२२) ३. वा पदान्तस्य (मन्धि.
१९०) सूत्र से।
१.भनचि च (सन्धिः २२२ ) सूत्र से ।
अथ साधनप्रकरणम्
१२६-एकः पूर्वपरयोः ॥६।१।३।।
यह अधिकार सून है। यहां से आगे जो-जो कहेंगे वह सब,
पूर्व पर के स्थान में एकादेश समझना याग्य है।
-अकः सवर्णे दीर्घः॥६।१।६६ ।
अक प्रत्याहार से सवर्ण अच परे हा ता पूर्व पर के स्थान में
सवर्ण दोघे एकादेश हो । अय प्रत्याहार में पाच वर्षे लिये जाते हैं
अ, इ, उ, ऋ, ल। इनकी परस्पर सन्धि दिखलाते हैं। अवर्ण में
परस्पर चार प्रकार के सन्धि' होते हैं। श्र+श्र, श्र+श्रा, श्रा+अ
श्रा+या। इन दो-दो का मिलके सवर्ण दीर्घ श्राकार हो जाता है।
जैसे-परम+अर्थ = परमार्थ , वेद+श्रादि-वेदादिः, विद्या+
अर्थी, विद्यार्थी, विद्या+श्रानन्दः= विद्यानन्द । अन्य शब्दों में
भी अवर्ण सन्धि इसी प्रकार के आवेगे। इवर्ण में भी चार भेद
हैं। इ+,इ+ई, ई+इ, ई-ई। जैसे--प्रति-+इतिः प्रतीति,
भूमि+ईश =भूमीशः । मही-इन'-महीन , कुमारा-ईहते-
कुमारीहत । ऐस उवर्ण का भी चार प्रकार का विषय है। जैसे-
6+उ, उxऊ, ऊ+३, अ+ऊ । क्रम से उदाहरण-, विधु+
उदय =विधूदय , मधु + उणे- मधूर्ण, चमू+उद्गम. चमू-
द्गम' बधूx वि = वधूति' । ऋवर्ण के विषय में भी ऐसा
संस्कृतभाषा में 'सन्धि' शब्द 'क्यन्तो धु' (लिजानुशासन
१) नियम से पुलिा है। इस ग्रन्थ में भी उसी नियम से पुलिस
मानकर व्यवहार किया है। भाजकल हिन्दीभाषा में सन्धिशब्द स्वीरित
माना जाता है।
-
१.
साधनप्रकरणम् महा०८।।९९ ॥ ही समझना, परन्तु लिखते भी हैं । पितृ+ऋणम,-पितणम्, इत्यादि । परन्तु ऋाल दो वरणों में इतना विशेष है- १३१--वा० -ऋति वा वचनम् ।। महा० ८.९९ ।। हस्य प्रकार से सवर्ण ऋकार के परे पूर्व पर के स्थान में विक- ल्प करके हख ऋकार एकादेश होता है, और दूसरे पक्ष मे दीर्घ एकादेश होता है। सूत्र से सवणे दीर्घ एकादेश प्राप्त है, इसलिये यह वार्तिक पढ़ा है । जैसे-होत+कार होतकारः। द्वितीय पक्ष में होट+कार:=होतकारः। १३२-चा०-लुति ल चा वचनम् ।। ऋकार कार के स्थान प्रयत्न एक नहीं हैं, इसलिये सवर्णसंज्ञा विषय में वार्तिक लिख चुके हैं। और अक प्रत्याहार में भी शल दोनों पढ़े हैं। कार से हम्व लुकार फे पर पूर्व पर के स्थान में हस्व लकार एकादेश हो । जैसे-होत+लकारः = होल्लकारः। और जिस पक्ष में ऋकार लकार को मिलके एकार एकादेश नहीं होता वहां लकार के दीर्घ नहीं होन' से दीर्घ ऋकार एकादेश ही होजाता है। जैसे-होतकारः। इन दोनों की परस्पर सवर्ण संज्ञा का फल भी यही है कि दोनों को मिलके एकादेश हो जावे। १३३-श्राद् गुणः॥६।१।८६ ।। अवर्ण से अमवर्ण श्रच परे हो तो पूर्व पर के स्थान में गुण एकादेश होता है ! जैसे-अ+इ,श्र+ई,अ+उ, अ+3,4+स, मा+इ, आई, आ+स, आ+ऊ, पा+ऋ, यह दश प्रकार का गुण एकादेश होता है । क्रम से उदाहरण-प्र+इदम् = प्रेदम् , १. देखो पूर्व पृष्ठ ।। २.लवर्णस्य दीर्घा न सन्ति । धों० प्र०६। ५ सन्धिविषयः 'उरण रपर." सून परम+ईशः = परमेशः, सूर्य+ उदयः - सूर्योदयः, शब्द+उहा- शब्दोहा, ब्रह्म+ऋपिः मर्पिः। यहां अकार ऋकार के स्थान में से रपर अर्थात् श्रर आदेश हो गया है। कन्या+इयम् = कन्येयम् , महा+ईश्वरः = महेश्वरः, कृपा+उद्घा- टनम् = कृपोद्घाटनम, रक्ष+अहः- रोहः, महा+ऋषिः- महर्षिः। इसी प्रकार अन्य शब्दों में भी उदाहरण पावेगे। १३४-वृद्धिचि ॥६१1८७॥ अवर्ण से एच् प्रत्याहार परे हो तो पूर्व पर के स्थान में वृद्धि एकादेश हो जाय । यह सूत्र गुणादेश का अपवाद । एच प्रत्या- हार में चार वर्ण आते हैं-ए, ऐ, ओ, श्री। इन चार वणों के परे होती है। म+ए, श्र+ऐ, अ+ो, अ+ो, मा+ए, आ+ऐ, आ+ओ, पा+ो। इसी रीति से आठ प्रकार की वृद्धि होती है । जैसे-ब्रह्म+एकम् = ब्रोकम् , परम+ ऐश्वर्यम् = परमै- श्वर्यम् , ,गुड+ोदनः = गुडौदनः, परम+औपधम = परमोपधम, महा+ ओजस्वी - महोजस्वी, तमा+एका क्षमैका, विद्या+रहि- की-विद्यहिकी, खट्वा+ोपगवा = खट्यौपगवः । अब इन गुण वृद्धि के विशेष अपवादरूप सूत्र लिखते हैं- १३५-एत्येधत्यूद्सु ॥ ६॥ ११॥ अवर्ण से एति, एधति और उछ परे हों वो पूर्व पर फे स्थान में वृद्धि एकादेश हो। यहां एति और एधति इन दो धातुओं के परे 'एङि पररूपम्" से पररूप एकादेश पाता था, इसलिये वृद्धि का भारम्म किया है, और ऊळ आदेश में गुण पाता था उसका अप- वाद है। उप+ एति उपैति, उप+एमि = उपैमि, प्र+एधते - 1. सन्धि ८५। २. सन्धि १४५। ३. सन्धि १३३ सूत्र से। .
साधनप्रकरणम्
धत, उप+ एधते = उपधते, उल्-प्रठ+3 = प्रष्ठोदः, प्रष्ठ+
प्रष्ठोहे।
१३६-चा०-अक्षादूहिन्याम् ॥
महा०६111८८॥
अन शब्द फे श्रागे हिनी शब्द हो तो पूर्व पर के स्थान में
पृद्धि एकादेश होता है। जैस-अक्ष+हिनी - अक्षौहिणी । यहां
गण'एकादेश की बाधक वृद्धि है ।
१३७-या-प्रादूहोढोठ्यपैष्येपु ॥
महा०६.१.८८"
प्र उपसर्ग के आगे ऊह, उढ, अढि, एप और एष्य शब्द हों वो
पूर्व पर के स्थान मे पृद्धि एकादेश होता है। जैसे-प्र+हा+मोहः,
म+ऊद.-:, प्र+अदिः- प्रौढः, +एए:-प्रेयः, +
एध्यः = मध्यः । इन शब्दों में पूर्व पर के स्थान में गुरु को याध के
वृद्धि होती है।
१३८-या-स्वादिरेरिणोः ।
महा.६.८८॥
स्व शब्द के आगे इर और इरिन शब्द हो तो पूर्व पर के स्थान
में वृद्धि एकादश होता है। जैस-स्व+इरम - स्वैरम् , म्व+इरी-
स्वैरी । यहां गुण पाता था सोन हुआ।
१३६-वा-ते च तृतीयासमासे ॥
महा.६111444
1.सन्धि० १३३ सूत्र से प्राप्त । २. जम, और उढि में 'आद
गुणः' (सन्धि १३३) सूत्र से, और एष तथा एण्य में 'एछि पररूपम्'
(सन्धि.४५) स्त्र से । ३, सन्धि ११ सूत्र से।
1.६८ सन्धिविषय अवर्णन्त पूर्वपद के आगे तृतीयासमास में ऋत शब्द हो तो पूर्व पर के स्थान में वृद्धि एकादेश होता है। सुखेन+ऋत = सुखा. ते, दु सेन+ऋत = दु खाई । यहा 'ऋत' प्रहण इसलिये है कि 'सुख+इत = सुसेत ' ऐसे वाक्या म वृद्धि न हो। 'तृतीया' ग्रहण इसलिये है कि 'परम+ऋत = परमर्त। यहा पृद्धि एकादेश न हो । और 'समास' ग्रहण इसलिये है कि सुखेन+ऋत = सुखेनत यहा भी वृद्धि एकादेश न हुआ। यहा' गुण और प्रकृतिभाव भी " पाया था। १४०-वा-प्रवत्सतरकम्बलवसनानां च ऋण ॥ महा०६।१८८॥ प्र, वत्सतर, कम्बल, वसन इन शब्दों क आगे ऋण शब्द हो तो पूर्व पर क स्थान में वृद्धि एकादेश होता है ।जैम-म+ऋणम - प्रार्णम , वत्सतर+ऋणम् = वत्सतरार्णम, कम्बल+ऋणम् = कम्ब- लार्णम, वसन+ऋणम् = वसनार्णम् । यहा सर्वत्रगुण और प्रकृति- भाव' पाया था। १४१-वा -ऋणदशाभ्यां च ॥ महा.६.१1८८॥ ऋण और दश शब्द के श्रागे ऋण शब्द हो तो पूर्व पर के स्थान में वृद्धि एकादेश होता है। जैसे-+ऋणम = ऋणार्णम, दश+ऋणम्-दशार्णम् । यहा भी गुण और प्रकृतिभाव दोनों पाय थे। * [१४२-बाटश्च ।। ३ । १।८६॥ जो धातुओं के पूर्व आट का आगम होता है उससे परे अजादि , यहाँ अर्थात् सुखात , दुखातं शब्दों में । २-गुण-आद् गुणा (सन्धि १३३) सन से । प्रकृतिमाप-ऋत्यक (सन्धि० ११) सूत्र से। कोपावगत पाठ प्रथमावृत्ति में अधिक है।
साधनप्रकरणम् धातु हो तो पूर्व पर के स्थान में वृद्धि एकादेश होता है जैसे-श्रा+ ईक्षत ऐतत, आ+ ईशिष्ट ऐतिष्ठ, श्रा+इंहिष्ट-पेहिष्ट, आ+ सनत्-ौनत् । यहां 'भाद् गुणः'' इस सूत्र से गुण पाया था सो मदुमा। १४३- उपसर्गादति धातौ ॥ ६।१।६०॥' अवर्णन्त उपसर्ग से परे कारादि धातु हो तो पूर्व पर के स्थान में पृद्धि एकादेश होजाय । यह सूत्र भी गुण एकादेश का बाधक है। [जैसे-] प्र+च्छति प्राति, उप+ऋच्छति-उपार्छति, प्र+ शुघ्नोति प्राध्नाति ।यहां 'उपसर्ग प्रहण इसलिये है कि 'स्वटवा+ ऋच्छति =सटवच्छति' यहां पृद्धि न हुई। १४४-वा०-सुप्यापिशलेः ॥६।१।६१॥ अवर्णान्त उपसर्ग से परे ऋकारादि सुधन्त धातु हो ता पूर्व पर के स्थान में विकल्प करफे वृद्धि एकादेश होता है, पक्ष में गुण हो जाय, परन्तु यह यात आपिशलि प्राचार्य के मत में है अन्य के नहीं। यहां पूर्वसून की अन्यृत्ति आती है। [जैसे- सप+ऋणी. यति = उपाणीयति, उपर्णीयति । विकल्प के लिये वा शब्द तो पदा ही है फिर जो यहां श्रापिशलि फा प्रहण है सो सत्काराय है। १४५--एडि पररूपम् ॥ ६।१।६३ ॥ अवर्णान्त उपसर्ग से परे एहादि धातु हो तो पूर्व पर के स्थान में पररूप एकादेश होता है। यह सूत्र वृद्धि का अपवाद है। [ जैसे-] प्र+एलति-प्रेलति, उप+एलति-उपेलवि, प्र+ओपति प्रोपति, उप+योपति उपोपति । १४६-वा०-एवे चानियोगे || महा० ६ ॥ ११९३ ॥ 1. मन्धि १५३ सन्धिविषयः . अनियोग अर्थात् अनियत अर्थ में अवर्णन्त से परे एव शब्द हो सो पूर्व पर के स्थान में पररूप एकादेश हो जाय । [ जैसे-] इह एवइहेव, अग+एव = अद्येव। यहां 'अनियोग प्रहण इस. लिये है कि 'इहैव भव, मा स्म गा" यहां नियोग के होने के कारण पररूप न हुआ। १४७-वा०-शकन्ध्वादिषु च ।। महा०६।।९३॥ शकन्धु आदि शब्दों में पूर्व पर के स्थान में पररूप एकादेश होता है। जैसे-शक+अन्धुः = शकन्धु', कुल+अटा=कुलटा, इत्यादि। 'सीम-+ अन्त' शब्द भी शकन्ध्यादि शब्दों के सदृश है, परन्तु इस में भेद यह है कि- १४८-वा०-सीमन्तः केशेषु ॥ महा०६१।१३ ॥ केश अर्थ वाच्य हो तो सीम शब्द से अन्त शब्द क परे पूर्व पर के स्थान में पररूप एकादेश हो जाय । जैमे-सीम+अन्तः - सीम- न्तः । यहा 'केश ग्रहण इसलिये है कि अन्यत्र पररूप एकादेश न हो, अर्थात् जैसे-सीमान्तः । यहां पररूप एकादेश न हुश्रा, किन्तु सवर्णदीघे एकादेश हो गया। १४८-वा-श्रोत्वोष्ठयोः समासे वा ॥ महा०६।३।९३५ जो अवर्णन्त के आगे ओतु, पोष्ठ शन्दों का समास किया हो तो विकल्प करके पूर्व पर के स्थान में पररूप एकादेश होता है। पक्ष में वृद्धि हो जाती है क्योंकि इसं वाचिक से वृद्धि की प्राप्ति में पररूप एकादेश किया है। जैसे-स्थूल+श्रोतु - स्थूलोतुः, स्यू. 1 साधनप्रकरणम् . लौतुः; विम्ब+ोष्ठी विम्बोष्ठी, निम्बोष्ठी । यहां 'समास' प्रहण इसलिये है कि एहि पालौतुरायाति यहां समास के न होने से पर. रूप नहीं हुआ। १५०-पा०-एमन्नादिपुच्छन्दसि ।। महा०६।।१३।। घेदस्थ प्रयोगों में अवर्ण से परे एमन आदि शब्द हो सो पररूप एकादेश हो। जैमे-अपां त्वा+एमन् = अपां वेमन, अपां त्वा+ योद्मन् । (= अपां त्वाद्मन, इत्यादि । यहां वृद्धि पाई थी सो न हुई। १५१-श्रोमाडोश्च ॥ ६।१।१४ ॥ जो प्रवर्णान्त शब्द से परे श्रोम और श्राप शब्द हो तो पूर्व पर के स्थान में पररूप एकादेश होता है। जैसे-कन्या+श्रोमित्यु- पाच = कन्यामित्युवाच, श्रा+ उनत्ति = श्रोनत्ति,यद्य+ोनत्ति अद्योनत्ति, फदा+ओनति = कदोनत्ति । यहां आकार का उकार के साथ पररूप एकादेश हाता है उसका पर का श्रादिवत् मान के पुनः पररूप एकादेश होता है । यहां भी वृद्धि प्राप्त थी' सी न हुई। [१५२-उस्यपदान्तात् ।।६।१।६५ ॥ जो अपदान्त अवर्ण से परे उस प्रत्यय हो तो पूर्व पर के स्थान में पररूप एकादेश होता है । यह भी गुण का अपवाद है। हन्या+ घस - हन्युः, भिन्द्या+उस = भिन्युः, इत्यादि । यहां 'अपदान्त' प्रहण इसलिये है कि का+उसा- कोसा, तन+उपित्वा - तत्रो- पित्वा यहां पदान्त में पररूप एकादेश न हुआ। १.पविधि (सन्धि १२)सूम से । * कोष्ठान्तर्गत पाठ प्रथमावृति में अधिक है।
सन्धिविषयः ७२ + १५३-अतो गुणे ।। ६१।६६ ॥ जो अपदान्त प्रकार से परे गुणवाची अ, ए, ओ, हों तो पूर्व पर के स्थान में पररूप एकादेश होता है। जैसे-] पच + अन्ति = पचन्ति, पच+ए% पचे, इत्यादि। १५४-अव्यक्ताऽनुकरणस्यात इतौ ॥ ६ । १1६७॥ जो इति शब्द परे हो तो अव्यक्त शब्द का जो अनुकरण उसके अत् भाग को पररूप एकादेश हो जावे। जिसमें अकारादि वर्ण स्पष्ट न निकलें उसको अव्यक्त शब्द कहते हैं। अनुकरण वह कहाता है कि किसी मनुष्य ने जैसा शब्द किया हो उसका प्रतिशब्द नकल करनी। जैसे-पटत् + इति=पटिति,घटत् + इति घटिति,इत्यादि। यहां अव्यक्त का अनुकरण इसलिये कहा है कि 'जगत् + इति = जगदिति ऐसे वाक्यों में पररूप एकादेश न हुआ । १५५-वा०-इतावनेकाग्रहणं अदर्थम् ॥ महा०६.१।९७ ॥ जहां इति शब्द के परे अव्यक्त शब्द के अनुकरण को पररूप एकादेश किया है वहां अनेकाघ अव्यक्त शब्द को हो, अर्थात् 'श्रत्+ इति =अदिति यहां एकाच शब्द के अत् भाग को पररूप न हुआ। १५६-तस्य परमानेडितम् ।।८।१।२॥ जो द्विवचन का पर भाग है उसकी भाग्नेडित संज्ञा होती है। जैसे-ऋक्सक् । यहां जो परे ऋक् शब्द है उसको थानेडित कहते हैं। इसी प्रकार सर्वत्र सममना । १५७-नानेडितस्यान्त्यस्य तु चा॥६॥१३॥ जो श्रामेडित संज्ञक अव्यक्त शब्द के अनुकरण का अत् भाग हो उसको इति शब्द के परे पररूप एकादेश न हो, किन्तु जो माने साधनप्रकरणम् ७३ 'डितसंज्ञक के अन्त में तकार है उसको विकल्प करके पररूप एका- देश होवे । पटत् पटत् । यहां पर भाग पानेडित कहाता है। पटत् पटत् + इति =पटत्पटेति । और जिस पक्ष में पररूप [न] हुश्रा वहां-पटत्पटदिति । १५८-वा०-नित्यमामेडिते डाचि पररूपं वक्तव्यम् ।। महा०६।१।९८ ॥ इस वार्तिक का प्रयोजन यह है कि जो अनुकरण में डाच प्रत्ययान्त आनंडित परे हो तो पूर्व के अन्य के तकार को नित्य पररूप एकादेश हो जाय । जैसे-पटत्+पटा। यहां तकार को पर अर्थात् पकार का रूप हो जाता है। पटपटा करोति, पटपटायते, घटघटा करोति, घटघटायते, शरशरा करोति, शरशरायते ॥ काशिकावाले जयादित्य आदि लोगों ने इस वात्तिक का सूत्र- पाठ में व्याख्यान किया है, सो सत्य नहीं। महाभाष्य के देखने से स्पष्ट विदित होता है कि यह सूत्र नहीं है, किन्तु लेखकभ्रम से सूत्रों में लिखा गया है। ®[ १५६-संप्रसारणाच ॥६।१।१०६ ।। यण अर्थात् य व र ल इन चार वर्णों के स्थान में इक् अर्थात् इ, उ, ऋ, ल, ये चार आदेश होते हैं, इनको संप्रसारण कहते हैं । जो संप्रसारण से परे अच् हो तो पूर्व पर के स्थान में पूर्वरूप एका- देश हो जाता है। जैसे-यज्+त+सुइ7 अज्+क+सु- इष्टम्, यज्+क्ति+सुई+अज्+क्तिन् + सु-इष्टिः, वप्+क्त+ * यह कोष्ठान्तर्गत पाठ प्रथमावृत्ति में अधिक है। 1. देखो 'इग्पण: संप्रसारणम्' । मष्टा०111५९ ॥
सन्धिविषयः सु-+अप+त+सु-उतम ,ग्रह++सु-गृ+अह+त+ सु- गृहीतम्, + प्रह,तिन्+सुगृ+अह,xक्तिम +सु = गृहीतिः, इत्यादि। १६०-एङः पदान्तादति ।।६।१।१०७॥ जो पदान्त एक से परे हम्ब प्रकार हो तो पूर्व पर के स्थान में पूर्वरूप एकादेश होता है । जैस-अग्ने+अत्र - अग्नेऽत्र, वायो+ अन्न-वायोऽत्र, ब्राह्मणो+अब्रवीत् - ब्राह्मणोऽब्रवीत् , गुरवे+ अदात् = गुरवेऽदात् । यत्' ग्रहण इसलिये है कि 'वायो इति' यहां पूर्वरूप न हुआ। १६१-प्रकृत्यान्तः पादमव्यपरे'॥६।१।११३ ।। यहां से लेके सात सूत्रों का विषय वेदों ही में सममना । जहां वकार यकार परे न हो एमे प्रकार के परे पदान्त एह प्रकृति करके अर्थात् ज्यों का त्यों बना रहे, यदि वह [एइ ] पाद के बीच में हो। जैसे-धारे अस्मे चशृण्वते, त्रयो अस्य पादाः, उप प्रयन्तो अभ्याम् शुक दुदुहे अहयः, यजिष्ठो अध्वरेवीड्यः, इत्यादि । यहां पाद बीच में इसलिये कहा है कि-द्विपतो वोऽसि, रक्षमा भागोऽसि, -इत्यादि में एड प्रकृति करके न रहे। वकार यकार पर न हों यह इसलिये है कि 'तेऽवदन् , तेऽयुः' इत्यादि में भी प्रकृतिभाव न हो । १६२-थव्यादवद्यादवकमुरबतायमचन्त्ववस्युपु च।।६।१।११४।। १. महाभाष्य के भनुसार इस सूट का पाणिनीय पाठ 'भान्तः पा- एम' है । इस का अर्थ है-पाद के मध्य में जो एन उस से भयर्ण परे रहने पर सो कार्य कहा है यह न हो। इस सूग्र का पाठान्तर 'प्रकृयान्तः पादम्' है । 'भष्यपरे' भंश वार्तिक का है। २. पाद शब्द का प्यार पवन मन्त्रों में ही होता है। प्रायुदाहरण गमयों के है। पे साधनप्रकरणम ७५ । पदान्त एक से अत्र्यात् , अवद्यात् , अवक्रमुः, अग्रत, अयम्, अवन्तु, अवस्यु इन उत्तरपदों में पकार यकार पर भी अकार परे हो तो पदान्त ए प्रकृति करके रह जाये। जैसे-वसुभिर्नो अध्यात् , मित्रमहो अवद्यात् , मा शिवासो अवक्रमुः, ते नो अग्रता, शतधारो अयं मणिः, ते नो अवन्तु पितरः, शिवासो अवस्यवः, इत्यादि । १६३-यजुप्युरः ॥६।१।११५ ॥ यजुर्वेद में प्रकार के परे उपः शब्द का 'उरो' पदान्त एड होता है वह प्रकृति करके रहे । जैसे-उरो अन्तरिक्षम, इत्यादि । १६४-पापो जुषाणो वृषणो वर्दिष्ठे श्रम्ये अम्पाले अमियक पूर्वे ।।६।१।११६ ।। यजुर्वेद में पापो, जुपारणो, वृष्णो, वर्षिष्ठे, ये एडन्त शब्द अ- कार के पूर्व हो तो प्रकृति करके रहें, और अधिक शब्द से पूर्व अम्बे, अम्बाले हो तो ये दो शब्द इसी प्रकार रहें। जैमे-आपो अस्मान् मातर शुन्धयन्तु, जुपाणी अग्निवेतु स्वाहा, वृष्णोअंशुभ्यां गभस्तिभिः, वर्षिष्ठे अधिनाके, अम्ये अम्बाले अम्बिके । १६५-अङ्ग इत्यादौ च ॥६।१।११७ ॥ जो यजुर्वेद में अकार परे हो तो 'पद्ग' एडन्त शब्द पति फरफे रह जावे, और जो अङ्गे इसके परे आदि एड है सो भी पE- ति फरके रहता है। जैसे-ऐन्द्रः प्राणो अङ्गे अद्ने निदोध्यत् इत्यादि। १६६-अनुदात्ते च कुधपरे ॥६।१ । ११८ ॥ यजुर्वेद में जिस अनुदात्त प्रकार से परे कवर्ग और धकार हो उसके परे पदान्त एह प्रकृति करके रह जावे। जैसे-भयं सो अग्निः, अयं सो अध्वरः, इत्यादि।
सन्धिविषयः महा.६.१२५" हत, कुमारि औदव, कुमाहित; यधु आगमनम् , पवागमनम्। बधु इन्दति, बाध्वन्दात; पधु हठ, बवाहत; बधु ऋच्छति, पम्वच्छति; पधु एति, यध्वात; पधु आखति, यम्वास्थति; अधु ऐधिष्ट, पवैधिष्ट; बधु औदिष्ट, यवौर्दिष्टः पित अयनम् ; पित्रय- नम् ; पितृ श्रादरः, पित्रादरः; पित्त इक्षुः, पित्रिभुः पित हा, पित्रोदा होस उखा, होगुसा; पित अह , लिह., इत्यादि असं- ख्य प्रयोग पनत हैं। यहा असवणे ग्रहण इसलिय है कि 'कुमारी हते -कुमारीहते' इसके दो प्रयोग न हो, किन्तु नित्य ही दीर्थ एका- देश हो जावे, और शाफल्यग्रहण आदरार्थ है। ९७४-वा-सिन्नित्यसमासयोः शाकलमति- षेधः॥ सित् प्रत्यय के परे और नित्यसमास मे शाकल अर्थात् इस 'इकोऽसवणे' सूत्र का कार्य न हो । ऋतु+इया यहा 'इयः' सित् प्रत्यय है इसके परे प्रकृतिभाव नहीं हाता, ऋत्विय.' यह एक ही प्रयोग होता है। नित्यसमास- वि श्राकरणम् = व्याकरणम्, कुमारी अर्थः= कुमार्यर्थः । यहां प्रतिभाव और हस्व नहीं होता। १७५-वा-ईपा-अक्षादिए च छन्दसि प्रकृ- तिभावमात्रम्। महा०६।१।१२५ ॥ वैदिक विषय में पिाअक्षा' आदि शब्दों में प्रति भाव मान्न होता है। अर्थात् जिन में 'इकोऽसवर्णे' सूत्र से हस्वत्व की भी १.यण सन्धि के विधान सामर्थ्य से यण सन्धि होगी, और प्रकृति माय के विधान सामो से प्रकृति भाव । इस प्रकार दोनों रूप विधान सामर्ण से बन ही जावेगे। मत: शाकल्य ग्रहण यहां विकरूपाय नहीं है।
साधनप्रकरणम प्राप्ति होती है वह नहीं होती । जैसे-ईपा अक्षः । का ईमिरे पिशगिला, पथा अगमन् , इत्यादि । १७६-ऋत्यकः ॥६।१।१२६ ।। जो अक् प्रत्याहार से परे हस्व ऋकार हो तो उसे शाकल्य ऋषि के मत में प्रकृतिभाव और हस्व होता और अन्य प्राचार्यों फे मत में नहीं होता है। खटवा+ऋश्यः = खट्र ऋश्यः, माला+ऋश्यः माम ऋश्यः । यहां हम्ब और प्रासभाव हुश्रा, और 'खट्वयः, मालW.' यहां न हुा । इत्यादि प्रयोग बनते हैं। यहां 'अ' ग्रहण इसलिये है कि 'कुमारावृपा' यहां सन्धि हो जाय। १७७-अप्लुतबदुपस्थिते ॥६।११ १२७ ।। जो प्लुत से परे उपस्थित अर्थात् अनार्य इति शब्द हो तो प्लुत को अप्लुनवत् कार्य हो, अथात् प्लुत को प्रकृत्तिभाव न हो। जैसे- सुभद्रा३ इति सुभद्रेति, सुमङ्गला३ इति = सुमद्गलेति, सुश्लोका३ इति = सुश्लोकेति । जिन शब्दों की प्रगृह्यसक्षा होती है उनमें से किसी-किसी की प्लुत संज्ञा भी हाती है। जैसे-अमी३ इति, इत्यादि । यहां प्लुत को अप्लुतवत् होकर सन्धि नहीं होता, क्योंकि प्रगृह्य संज्ञा का मान के प्रकृतिभाव हो जाता है। १७-ई ३ चाक्रवर्मणस्य ॥६।१।१२८॥ जो प्लुत ईकार है वह चारवर्मण आचार्य के मत में अप्लुनवत् होता है, अर्थात् उसको प्लुत का कार्य नहीं होता। चिनुही३ इदम् = चिनुहीदम् , सुनुही३ इदम् = सुनुहीदम, इत्यादि । यहां भी पूर्व सूर से अप्लुवत् हो जाता, परन्तु यह सून उपस्थित से अन्यन हो अप्लुवत् करता है।
सन्धिविषय । २ १७६-इको यणचि ॥६।१।७६ ।। इक प्रत्याहार अर्थात् इ, उ, ऋ, ल, इन चार वणों से परे अच् हो तो इन के स्थान में यण अर्थात् य, व, र, ल ये चार वर्ण [क्रमेश.] हो जावें। जैसे-वापी-अश्व = वाप्यश्च , कुमारी- अपि कुमार्यपि । यहां वाहिरङ्गलक्षण यणादेश को असिद्ध मानकर सयोगान्तलोप नहीं होता। वधू+अर-वभ्वत्र, पित+अर्थम् = पिनर्थम, ल+अनुषन्ध - लनुबन्धः, इत्यादि असख्य उदाहरण बनते हैं। १८०-एचोऽयवायावः ॥६।१।७७ ॥ एच् अर्थात् ए, ओ, ऐ, औ इन चार वर्षों से परे अच हो तो इनके स्थान में कम से अय, अव् , आय , आव , ये आदेश होते हैं। जे+अ.-जय । माले+आ-मालया', माले+ओ १. पाप्यश्व , कुमार्यपि उदाहरणों में 'सयोगान्तस्य लोप.' (ना० १२)से यकार का लोप प्राप्त होता है । यकारलोप स्वपदाश्रय कार्य है, और यणादेश द्विपदान्तर्गत इक् और अच् को मानकर होता है। 'यपेक्ष बहिरगम्' अल्पापेक्षमन्तरगम्' इस नियम के अनुसार 'यकाररोप अन्तरग और यणादेश बहिरा कार्य है। भसिद्ध बहिरग- लक्षणमन्तरङ्गलक्षणे (पारि० ४४) अर्थात् बहिरङ्ग लक्षण कार्य अन्तरङ्गलक्षण कार्य की दृष्टि में प्रसिद्ध होता है इस नियम से अन्तरक्ष यकार रोप के प्रति हिरण यणादेश असिद्ध होता है। यणादेश के मसिद्ध होने से यरोप नहीं होता । २.जि धातु से परे 'एच' (भा० १३९९ ) से भच, सावधातु- कार्धधातुकयो (भा० २१) से गुण-+7 | ३. माला शब्द परे तृतीया का एकवचन, पष्ठी, सप्तमी का द्विवचन हो तो भाडि चाप' (ना०५०)सूत्र से एकारादेश होता है।
साधनप्रकरणम
N
.
मालयोः, इत्यादि। वायां+आयाहि - वायवायाहि, लो+:-
लयःइत्यादि]। ऐ+:-श्रायः', इत्यादि । लो+अकः -
लावकः, इत्यादि।
१८१.-वान्तो यि प्रत्यये ॥६।१।७८॥
घान्त अर्थात् जो पूर्वसून मे अव आव् आदेश कहे हैं वे
यकारादि प्रत्यय के परे भी हो जायें। जैसे-श्रव-याभ्रो+यः-
पाभन्या, आव-नौ-य:-नाव्यः,५ इत्यादि यहां 'वान्त
प्रहण इसलिये है कि 'यति। यहां न हो। यकारादि प्रहण
इसलिये है कि नौका" यहां न हो। 'प्रत्यय' प्रहण इसलिये है
कि गोयानम् । यहां अय आदेश न हो जावे ।
१८२-वा-गोयूती छन्दस्युपसंख्यानम् ।।
महा०६।१।७८॥
वैदिक प्रयोगो में गो शब्द से परे यूति हो तो गो शब्द के
[ोकार के ] स्थान में वान्त आदेश होजाय । आ नो मित्रावरुणा
धृतर्गव्यूतिमुक्षतम् । यहां गो'श्रागे यूतिः इसका गन्यूतिः' हुआ है ।
१.दोरम् (भा. १४०३ ) से अप, पूर्वयत् गुण-+ अ ।
२. भार+इण-एरच् ( आ० १३९९ ) से अच् पूर्ववत् गुण, मा+
ए-ऐ-द्धिरेचि ( सन्धि १३४) से पृद्धि, ऐ+ । ३. ण्वुल्तृचौ
(मा. ९७६) से ण्वुर, 'युयोरनाको' (भ० ।।) से भक आदेश,
'अचोऽगिति' (भा. ६.) से घृद्धि-लो+भकः । ४. मधुययो-
क्षणकौशिकयोः (दै०१४३) से यन्, 'तद्वितेभ्वचामादे' (.
९१४) से वृद्धि, ओर्गुण' (दै० ११६) से गुणादेश-वाम्रो+य |
५. नौययोर्धममूलमूल• (० ५११) से यत् । ६. सुप भात्मनः क्यन्
(आ. ५६१) से क्यच-रे+4+नि । .. हस्ता नौ,
(म० ५। ३।८६) से के प्रत्यय ।
नौका-हम्मे
सन्धिविपयः
१८३-वा०-अध्वपरिमाणे च ॥ महा०६।
मार्ग के परिमाण का अर्थ हो तो यूति शब्द के परे गो शब्द
के [ोकार के ] स्थान में वान्त आदेश हो । जैसे-गो+यूतिः-
गन्यूतिः, गन्यूतिमध्वानं गतः । दो कोश को गव्यूति कहते हैं ।
१८४-धातोस्तन्निमित्तस्यैव ।।६।१।७६ ।।
जहा यकारादि प्रत्यय को मान धातु
एच् हुआ हो तो
यकारादि प्रत्यय के परे वान्त श्रादेश होता है, अन्यत्र नहीं।
मो+यम्-भव्यम्', अवश्य+लौ+ यम्- अवश्यलाग्यम् । यहां
धातु' प्रहण इसलिये है कि प्रतिपादिक का नियम न हो जावे ।
'सन्निमित्त प्रहण इसलिये है कि 'पोयते, लीयमानिः । यहां
यकारादि प्रत्ययनिमित्त एच् नहीं है।
१८५-क्षय्यजग्यो शपयार्थे ॥६।१।८०॥
यन् प्रत्यय परे हो सो शक्यार्य में कि, जि. धातुओं के एकार को
साधनप्रकरणम - ---------- . अय आदेश निपातन किया है। क्षेतुं शक्यःक्षय्यः' जेतुं शक्यो जय्यः । शक्यार्थ' इसलिये कहा है कि 'क्षेयं पापम् इत्यादि में श्रय नहीं होवे । १८६-क्रय्यस्तदर्थे ॥ ६।१।८१॥ की धातु का अर्थ जो बेचने का है वह वाच्य हो और यत् प्रत्यय परे हो तो की धातु के एकार को अय आदेश निपातन किया है। ऋय्यो गौः, कय्यः कम्बलः । तदर्थ इसलिये कहा है कि 'क्रय धान्यम् यहां द्रव्यवाच्य विक्रयाह मे न होवे'। १८७-भय्यप्रवय्ये च छन्दसि ॥६।११८२॥ यत् प्रत्यय पर होतो वेद विषय मे 'भी' और प्रपूर्वक 'वो'धातु के एकार को अय श्रादेश निपातन किया है। भय्यम', प्रवय्या'। यहां भव्य शब्द मे अपादान में प्रत्यय है और प्रत्रय्या स्त्रीलिङ्ग मे नियत है। वेद मे इसलिये कहा है कि 'भेयम्, प्रवेयम" यहां न हो । १८८-वा-हृदय्या आप उपसंख्यानम् ॥ महा०६11८२।। जल अर्थ में हृद शब्द के एकार को यत् प्रत्यय के परे अय आदेश हो हदय्या आपः। ।। इति स्वरसन्धिः ।। १.क्षि, जि धातु से 'अचो यत्' (आ० ९२१) से यत्, 'सार्वधा- तुकाधंधातुकयोः' (आ० २१) से गुण-क्षे+य, जे+य। २.की धातु से पूर्व की तरह यत् और गुण-क्रे+य । ३. जो द्रव्य दुकान में बेचने के लिये रखा हुआ होता है यह 'क्रय्य' कहाता है । जिस च्य में बेचने की योग्यता तो हो, परन्तु येचने के लिये न हो वह 'क्रेय' कहाता है । ५. भी और वो धातु से पूर्ववत् यत् प्रत्यय और गुण । ५. 'हूदे भवाः' इस अर्थ में सप्तम्यन्स हद शब्द से भरे च्छन्दसि' (अ० १०) से यत्, छान्द- सत्यान् सप्तमी का अलुक्-हूदे+यत्, अयादेश,स्त्रीलिङ्ग में टाप-हदय्या । । - 1 अथ हलस्वरसन्धिः । । . १८६-चोः कुः ॥८॥२॥३०॥ पदान्त में वर्तमान चवर्ग के स्थान में कवर्ग आदेश हो जाता है, और मल परे हो तो भी । इससे वाच आदि चकारान्त शब्दों को ककारादेश हो जाता है। जैसे-वाच + सुवाक, वाग् , इत्यादि। १६०-झलां जशोऽन्ते ।।८।२ । ३६ ॥ पदान्त में मलों के स्थान में जश् आदेश हो । देसो जहां चका- रान्त शब्दों को ककार होता है उनसे उत्तरपद के आदि में स्वर हो तो ककार को गकार हो जाता है। जैसे-वाक+अनम्यागत्र । और चकार के 'अय+अन्तः-अजन्तः" इत्यादि, यहां जकार हो जाता है। प्रष्ठवाह, दित्यवाह, तुरासाह, इत्यादि हकारान्त शब्दों से परे स्वर हो तो इनको जस आदेश हो जाता है । जैसे-प्रष्ठाह, +इह-प्रष्टवाडिह । पट् + अन्तःपडन्तः विट+६=विडिक, सम्राट् + अन=सम्राटन, विराट+हते-विराहीहतं, इत्यादि टकारान्त शब्दों के स्थान में डकारान्त हो जाते हैं। जोधकारान्त शब्दों में परे स्वर हो तो दकार हो जाता है। जैसे-समिध+थाधा- १.यहां पर 'कोकु' और 'सरा जशोऽने' सूम से 'याग' समान 'भगन्त' प्रयोग होना चाहिये, परम्नु पृदिराग गुण '(भ ।। ,111) 'माझली' ( भ.।।। २५) इत्यादि यो में कुच का भभाव होने से तथा पाकरणों के 'भमन्ना भारि प्यवहार में प्रतीत होता है कि अनादि उसरपद पर रने पर एप स भादि पारान्तमायादारों को कुयादेश नहीं होना।
साधनप्रकरणम् ५ नमः-समिदाधानम् , इत्यादि। जो सकारान्त शब्दों से परे अजादि उत्तरपद हो तो तकार को दकार हो जाता है । जैसे-विद्युत् + आपसनम -विद्युदापतनम् , विद्युत् + इ =पिदिहा पकारान्त तथा भकारान्त शब्दों के अन्त में अजादि उत्तरपद पर हो तोचकार आदेश हो जाता है। जैसे-[पकारान्त-] अप्+अयनम= अवयनम्, तिप् + अन्त::तिमन्तः, सु+अन्तः सुषन्तः, इत्यादि । भका. रान्त-अनुष्टुभ् + एव:- अनुष्ट्येव, त्रिष्टुभ् + आदि-त्रिष्टुवादि । जो इनसे भिन्न अन्य वर्ण पदान्त में आवेंगे तो उनमे कुछ विशेप विकार न होगा । जैसे-मय+श्रादि-मयादि, सम्+अवैति = समति, प्रातर+अत्र= प्रातरत्र, पुनर +इ = पुनरिह, इत्यादि । - ॥ इति हलस्वरसन्धिः॥
अथ हल्सन्धिः भय इसके आगे पदान्त अथवा अपदान्त नकार मकार वा अन्य वर्ण को जिस जिस वर्ण के परे जो-जो कार्य होते हैं उस उस को लिखते हैं- १६१-- मोऽनुस्वारः ।।८।३ । २३ ।। जो हत् परे हो तो पदान्त मकार को अनुस्वार होता है। जैसे--प्रामम् +याति = ग्राम याति । यहा पदान्त की अनुवृत्ति इसलिय है कि गम्यते' यहा अनुवार न हुया । १६२-नरचापदान्तस्य झलि ॥८॥३॥२४॥ जो झल् प्रत्याहार परे हो तो अपदान्त अर्थात् एक पद में नकार और मकार को अनुस्वार होता है। जैसे-मीमान्+सते. मीमासते, पुम्+सु-पुसु, इत्यादि । इस विषय में यह समझना चाहिये कि श, प, स, ह, इतने वों के परे अपदान्त नकार मकार को अनुस्वार हो जाता है, परन्तु वैदिक प्रयोगों में श, प, स, र, ह इन वर्गों के पर अनुस्वार को आदेश होता है, क्योंकि- रेफोप्मणा सवर्णन सन्ति । महा० १ । १।२ । इस ज्ञापक से सवर्णादेश का निषेध होकर असवर्णदश होता है। इस में भी जो कुछ विशेष होगा वह भागे लिखेंगे । 'मल्' प्रत्याहार ग्रहण इसलिये है कि 'मन्यते' यहा न हुआ। और मल प्रत्याहार मे | श, ष, स, र, ह इनको छोडकर ] बाका जो वर्ण बचे हैं उनके परे अपदान्त नकार मकार को अनुस्वार होके जो कुछ विकार होता है वह आगे लिखेंगे। १९३-मो राजि समः कौ ॥८।३।२५ ॥
साधमप्रकरणम् किप् प्रत्ययान्त राज़ धातु परे हो तो सम् उपसर्ग के मकार को मकार ही आदेश हो। जैसे-सम्+राट = सम्राद, साम् + राज्यम-साम्राज्यम् । यहां 'सम्' महण इसलिये है कि स्वयराट इत्यादि में नहीं होता। किप् प्रत्ययान्त ग्रहण इसलिये है कि 'संराजितव्यम् , सराजितुम्' यहां न हुआ। १९४-हे मपरे वा ॥८।३।२६ ।। जिससे परे मकार हो ऐसे हकार के परे पदान्त मकार को मकार श्रादेश विकल्प करके होता है। द्वितीय पक्ष में मकार को अनुस्वार होता है। जैसे कि झलयति, किम्मलयति, कथं झलयति, क्थम्हालयति, इत्यादि । यहा मपर हकार का ग्रहण इसलिये है कि कि हससि' इत्यादि में न हो। १६५-वा०-गवलपरे यवला वा ॥ महा०८।३।२६॥ जिससे परे य, व, ल वर्ण हो ऐसा हकार परे हो तो पदान्त मकार को सानुनासिक य, व, ल विकल्प करके होते हैं। पक्ष में अनुस्वार हो जाता है । य-क्यि ह्योऽभवत् , कि ह्योऽभवत् । व- क्वि हवलयति, कि हलयति । ल-किल हादयति, कि हादयति, इत्यादि । प्रत्युदाहरण -जैसे-किं हृष्यसि, इत्यादि में न हुआ। १९६--नपरे नः॥८।३ । २७ ।। जो कार से परे नकार हो तो मकार को विकल्प करके नकार आदेश होता है । पक्ष में अनुस्वार होगा। जैसे-विन्हनुते, कि हुनुते, कथनहनुते, कथ हनुते इत्यादि । नपर हकार इसलिये कहा है कि हदय तेऽस्ति। यहां न हुआ। , मकार को मकारादश का विधान अनुस्वार की निवृति के लिये है।
८८ सन्धिविषयः - - अब पदान्त नकार मकार को अनुस्वार हो के जो-जो विशेष [ कार्य होता है सो लिखते हैं- १६७- अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः ।। ४। ५७ ॥ जो यय प्रत्याहार परे हो तो अपदान्त अनुस्वार को परसवर्ण आदेश होता है । इससे उत्तरसूत्र में पदान्तप्रहण के चापक से यह सूत्र अपदान्त के लिये है। जैसे-थं+फः- अङ्कः, अं+चनम् = अञ्चनम्, वं+टनम-वण्टनम् , अं+तिवः-प्रन्तितः, +3- चण्डः, क+पनम्-कम्पनम् , इत्यादि । परसवर्ण अर्थात् जिस वर्ग का अक्षर परे हो उसी वर्ग का अनुनासिक वर्ण अनुस्वार फे स्थान में हो जाता है। जैसे-कवर्ग के परे पूर्व अनुस्वार के स्थान में डकार ही होगा, इसी प्रकार सर्वत्र समझना चाहिये। १९८-या पदान्तस्य ।।८।४।५८ ।। यय प्रत्याहार के परे पदान्त अनुस्वार को पर का सवर्ण श्रादेश विकल्प करके होता है । जैसे-कटड़करोति, कटं करोति; घालञ्चेतयति, पालं चेतयति; ग्रामण्टीकते, प्रामं टीकत, नदीन्तरवि, नदी तरति; प्रजाम्पिपर्ति, प्रजा पिपतिः स यन्ता, संयन्ता; सवत्सरः; संवत्सरः, यलोकम् , यं लोकम् , इत्यादि । ॥ इत्यनुस्वारप्रकरणम्॥ १६६-तोलि ॥८।४। ५९ ॥ लकार परे हो तो सवर्ग के स्थान में परसवर्ण हो जावे। जैसे- अमिचित् + लुनाति = अमिचिल्लुनाति, विद्युत् +लेलायते--विद्युल्टे. लायते भवान् + लक्षति - भवालक्षयति, इत्यादि । २००-दणोः कुक टुक शरि ॥२८॥ . ।
साधनप्रकरणम् शर प्रत्याहार परे हो तो पदान्त स्कार णकार को विकल्प करक कुक टुक का आगम यथाक्रम से होता है । जैसे-उदकशेते, उदइ शेते, उदडकपष्टः, उदह पष्ठः, उदकसुनोति, सदड़ सुनोति; प्रवाण्टशेते, प्रवणे शेते; प्रवरणटप्वकते, प्रवण प्वकते; प्रवणट्सरति, प्रवण सरति, इत्यादि। २०१--डः सि धुट् ॥ ८।३।२६ ॥ जो पदान्त डकार से परे सकारादि उत्तरपद हो तो उसको विकल्प करके धुट का पागम होता है। जैसे-वलिटत्सीयते, श्वलिट् सीयत, मधुलिटत्सीयते, मधुलिट सीयते, इत्यादि। २०२-नश्च ॥८।३। ३० ॥ जो पदान्त नकार से परे सकारादि उत्तरपद हो तो उसको धु का आगम विकल्प करके होता है। भवान्त्सनोति, भवान् सनोति, इत्यादि। २०३--शि तुम् ॥८॥३॥ ३१ ॥ जो पदान्त नकार से परे शकारादि उत्तरपद हो तो उसको विकल्प करके तुक् का श्रागम होता है। जैसे-भवाञ्च्छते, भवान्छेते, इत्यादि। २०४---ङमो इस्यादचि उमुण् नित्यम् ॥८॥ ३। ३२ ।। हस्ख से परे जो पदान्त सम् प्रत्याहार उससे परे अजादि पत्तरपद को नित्य ही मुट् का श्रागम होता है अर्थात् उकार से इट, णकार से गुट्, नकार से परे नुट् का आगम होता है। जैसे-विष्ट +अतिक: तिहड तिडा, उदास्ते, प्रवणणास्ते, प्रवणणवोचत्, कुर्वन्नास्ते, तस्मिन् + इति = तस्मिन्निति, इत्यादि । - ९० सन्धिविषय - २०५-मय उओ वो वा ।।८।३।३।। जो मय प्रत्याहार से परे उन् अव्यय उसको अजादि उत्तपरद परे हो तो विकल्प करके वकार आदेश होता है। जैसे--शम्-उ- अस्तु, शम्वस्तु, तद्-उ-अस्य, तहस्य, किम-उ-आवपनम, किम्वावपनम , इत्यादि। अब इसके आगे तु का आगम लिखते हैं- २०६-हस्वस्य पिति कृति तुक् ।। ६ । १। ७०॥ पूर्व हस्व को तुक् का आगम होता है जो पित् कृत् परे हो तो । पुण्यत्, अमिचित् , इत्यादि । २०७--संहितायाम् ॥६।१।७१ ।। यह अधिकार सून है। उसके आगे जो-जो कहेंगे सो सो सहिता विषय में सममना । २०८-~छे च ॥६।१।७२ ॥ जो हस्त्र से परे छकार हो तो पदान्त और श्रपदान्त में भी उसको तुफ का आगम होता है । जैसे-इ+छति = इच्छति, गच्छति, स्वच्छन्द , देवदत्तच्छनम् , इत्यादि । २०६-प्राइमाडोश्च ॥६।१।७३ ॥ जो आड और माह से परे इकार हो तो उसको तुम् का श्रागम होता है । ईपदर्थ, क्रियायोग, मर्यादा, अभिविधि इन अर्थो में आकार हि आता है। पदर्थ-श्रा+छाया-श्राच्छाया । 1.इस अर्थ का स्पष्टीकरण इस प्रकार समझना चाहिये-पदान्त और अपदान्त में वर्तमान जो हम्ब उसको तुक् का भागम होता है छकार परे रहने पर। , साधनप्रकरगाम् ९१ क्रियायोग-श्रा+छादनम् = आच्छादनम् । मयोदा-आ+ छायायाः= आच्छायायाः । अभिविधि-श्रा+छायम् = आच्छा- यम् । मा+छत्सीत् = माच्छत्सीत् , माच्छिदत्, इत्यादि। २१०--दीर्घात् ॥ ६।१।७४ ॥ जो अपदान्त अर्थात् एकपद में दीर्घ से परे छकार हो तो उसको तुक् का आगम होता है। जैसे-ही+छति = ह्रीच्छति, म्लेच्छति इत्यादि। २११-~-पदान्ताद्वा ।। ६।१। ७५ ॥ जो पदान्त दीर्घ से परे छकारादि उत्तरपद हो तो उसको तुक का आगम विकल्प करके होता है। जैसे-गायत्री छन्दः, गायत्री च्छन्दः, इत्यादि। २१२-चा-विश्वजनादीनां छन्दस्युपसंख्या- नम् ॥ महा० ६ । १।७५॥ विश्वजन आदि शब्दों से परे छकार को विकल्प करके तुक का आगम होता है। पूर्व 'छे च' इस सूत्र से हस्व से परे नित्य तुक प्राप्त था, उसका विकल्प यह सममना चाहिये । जैसे- विश्वजनछत्रम्, विश्वजनच्छत्रम् । ॥ तुक प्रकरण पूरा हुआ। २१३-स्तोः श्चुना श्चुः ॥८।४।३१।। सकार और तवर्ग को शकार और चवर्ग के साथ कम से शकार और चवर्ग होते हैं । जैसे-विष्णुमित्रस्+शोभते । विष्णुमित्रश्शोभते । सकार का चवर्ग के साथ-जैसे-देवदचस्+ चलति देवदत्तश्चलति, इत्यादि । तवर्ग का शकार के साथ- १९२ सन्धिविषय MAM के साथ- जैसे-अमिचित् + शेते = अग्निचिच्छते, इत्यादि । तवर्ग का चवर्ग -जैसे-अनिचित्+छादयति = अमिचिच्छादयति, इत्यादि अनेक उदाहरण हैं। २१४--टुना टुः ।।८।। ४० ॥ सकार और तवर्गका कार और टवर्ग के साथ पकार और स्वर्ग होते हैं। जैसे--पुरुषस+पष्ट - पुरुषष्यष्ठ इत्यादि, पुरुषस्+ टीकते - पुरुपष्टीकते इत्यादि । टवर्ग का सकार के साथ-शूद्रस्+ टलनि-शूद्रालति, इत्यादि । तवग का टवर्ग के साथ-यापित् + टलतियोपिट्टलति, इत्यादि। २१५-न पदान्ताद्दोरनाम ।।८।४।४१ ।। अनाम् अर्थात् पष्ठी के बहुवचन को छोड के पदान्त स्वर्ग मे उत्तर सकार और तवर्ग को पकार और स्वर्ग आदेश न हो। मेस--पट् सन्ति, मधुलिट् तरति, इत्यादि । जो सूत्रकार ने बाम् अर्थात् षष्ठी के बहुवचन को छोड़ क तृत्व का निषेध किया है उसी मे वार्तिककार कहते हैं कि- २१६-या०-अनामनवतिनगरीणामिति वाच्यम् ॥ नाम् के निषेध के साथ नवति और नगरी शब्द का भी निषेध कहना चाहिये । जैसे- पद+नाम् : पणणाम् , पद+नपति षणणवति , पट+नार्य - पणणार्य , इत्यादि । सूत्रे में पदान्त' अहण इसलिये है कि ईड+ते = ईट्टे यहा टवर्ग आदेश का निषेध नहुा । टबर्ग से परे इसलिये है कि निप्+तप्तम् = निष्टप्तम्, सपिष्+तमम् = सर्पिष्टमम, यहा टुत्व हो हो गया। २१७--तोपि ॥४॥४२॥ महा०411५॥
साधनप्रकरणम
।
पकार के परे रहने पर तवर्ग को टवर्ग आदेश न हो। जैसे-
योपित्+पण्ढः- योपित्पण्डः, त्यादि ।
२१८-शात् ॥८।४।४३ ॥
शकार मे परे तवर्ग को चवर्ग आदेश न हो । जैसे—विश्नः,
प्रमः। यहां बकार न हुआ।
२१६-यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको चा ||४|४४॥
जो अनुनासिकादि उत्तरपद परे हो तो पदान्त यर् को
अनुनासिक आदेश विकल्प फरक होता है। जैसे -चा+
नमति = वाहनमति, वाममति । जिस पक्ष में अनुनासिक नहीं
हुआ यहा पदान्त में जश् आदेश होता है । त्रिष्टुभ नाम -
[त्रिष्टुम्नाम,] त्रिष्टुवुनाम। यहां पदान्तग्रहण इसलिये है कि
'दम्नोति, क्षुम्नाति, रुक्मम्' इत्यादि उदाहरणों में नहीं होता ।
२२०-वा-परोऽनुनासिके प्रत्यये भाषायां
नित्ये वचनम् ॥
महा०८।४।४५॥
अनुनासिकादि प्रत्यय परे हो तो यर् को अनुनासिक नित्य ही
होता है, भापा अर्थात् लौकिक प्रयोग विषय में । जैसे-प्राङ्मयम् ,
चिन्मयम, इत्यादि। यहां 'भाषा' प्रहण इसलिये है कि वेद में
पूर्ववत् दो ही प्रयोग हों। जैसे-वाइमयम्, वाग्मयम् , इत्यादि ।
२२१-चो रहाभ्यां द्वे ॥८।४।४५॥
अपदान्त में अच् से उत्तर जो रेफ हफार और उनसे उत्तर
जो यर हो तो उनको विकल्प करके द्वित्व होता है । जैसे-कार+
यम् = कार्यम् कार्यम् ; हर्षानुभवः, हर्यनुभयः; महम्म, ना,
-९४ सन्धिविषयः 1 अपहन्तुतिः, अपहनुनिः, इत्यादि । यहां अच से परे इसलिये कहा है कि-'रातिलति' यहां द्विवचन न हुआ। २२२-अनचि च ॥८॥४॥ ४६॥ जो अच से परे और [अनच् अर्थात् ] हल के पूर्व यर प्रत्याहार हो उसको विकल्प करके द्वित्व होता है। जैसे-दधि+ अत्र = दद्ध्यत्र, दध्यत्र इत्यादि । यहां द्वित्व होकर ( २३४) सूत्र से पूर्व धकार को दकार होगया । 'अच्' प्रहण इसलिये है कि 'स्मितम् स्तुतम्' इत्यादि मे न हो। २२३ -वा -द्विवचने यणो मयः॥ महा०८।४।४६ ॥ इस वार्तिक के दो अर्थ हैं , एक चो-यण से परे मय को [विकल्प करके ] द्वित्व होता है और दूसरा-मय से परे यण को [विकल्प करके ] द्वित्व हो । जहाँ यण से परे मय् को द्वित्व होता है वहां, 'उल्का' [उल्का;] वल्म्मीकमा [ वल्मीकम् ] इत्यादि उदा- हरण धनते हैं । और जहां मय से परे यण को द्वित्व होता है वहां, 'दध्य्यन्त्र, दिभ्यत्र म यत्र, [मध्वत्र ] इत्यादि उदाहरण बनते हैं। २२४-वा-शरः खयः ।। महा.41 ४॥ ४६ ॥ १. इस प्रत्युदाहरण में 'रेफ' अच् से उत्तर है, परन्तु उसमे उत्तर 'यर' नहीं है 'ह' से उत्तर 'य' पकार है परन्तु हकार भय से उसर नहीं। मन कार को द्विग्न नहीं हुआ। २. दो भय होने का कारण है कि कई भाचार्य 'यणः' में पञ्चमी भीर 'मयः' में पठी विमरिक मानते है। अन्य आचार्य 'मयः' में पशमी और 'यगः' में पष्ठी विमसि मानते हैं। -
माधनप्रकरणम्
इस वार्तिक में भी दो मत है', एक तो-शर से परे सय का
[विकल्प करके ] द्विवचन होता है और दूसरा-खय् से परेशान
को [विकल्प करके ] द्विवचन हो । [ प्रथम अर्थ में-जैसे-
स्त्थाली, [स्थाली;] स्त्थाता, [ स्याता, ] स्फोटः, [स्फोट::]
स्तोतः [स्तोतः; ] श्योतति, [श्च्योतति, इत्यादि । द्वितीय श्रर्थ
में जैसे-- संवत्स्सरः, [ संवत्सरः ]; पीरम् , [ीर]
अप्प्सराः, [अप्सराः] इत्यादि ।
सन्धिविषयः जो, पुत्र शब्द से परे हत और जग्ध शब्द हो तो उसको विकल्प करके द्विवचन होता है । जैसे-पुत्त्रहती, पुत्रहती, पुत्त्रजग्धी पुत्रजग्धी, इत्यादि । २२६-वा०-चयो द्वितीयाः शरि पौष्कर- सादेः ।। महा०८।४।४॥ V । जो शर् प्रत्याहार के परे चय प्रत्याहार हो तो उसके स्थान में वों के द्वितीयवर्ण आदेश हो जाते हैं, यह पौष्करसादि प्राचार्य का मत है। [जैसे-] क्शाता-खशाता, वत्सरः- ययसरः, थप्सरा:-अफसराः, इत्यादि। २३.-शरोऽचि ॥८॥४॥ ४८ ॥ जो अच् परे हो तो शर प्रत्याहार को द्विवचन न हो। जैसे-7 दर्शनम् , कर्पति, इत्यादि । यहां 'अच्' प्रहण इसलिये है कि 'ते' इत्यादि में निषेध न हो। २३१-त्रिमभृतिषु शाकटायनस्य ।।८।४।४६।। जहां तीन श्रादि वर्ण इकट्टे हों वहां शाकटायन आचार्य के गत से द्विपिन न हो। जैसे-इन्द्रः, चन्द्रः, उष्ट्र, राष्ट्रम्, इत्यादि। २३२-सर्वत्र शाफल्यस्य ॥ ८।४।५० ॥ जहां-जहां द्विवचन कह पाये है यहां-वहां शाफल्य प्राचार्य के मत से [ द्विर्षपन ] न होना चाहिये । जैसे-अर्कः, प्रमा, दध्यत्र, मध्यप्र, इत्यादि। २३३-दीर्घादाचार्याणाम् ॥८।४। ५१ ॥
साधनप्रकरणम - सम आचार्यों के मत से दीघे से परे यर को द्विर्वचन न होना चाहिये। जैसे-दात्रम् , पात्रम् , स्तोत्रम् इत्यादि । २३४--झलां जश् झशि ।।८।४। ५२ ।। जो मश प्रत्याहार परे हो तो मलों के स्थान में जश आदेश होता है। जैसे-लम+धा = लब्धा, दोघ+धा = दोग्धा, दस्यत्र, इत्यादि । यहां मिश्' प्रहण इसलिये है कि 'दत्तः, श्रात्य इत्यादिकों में न हो। २३५---खरि च ॥८॥४॥ ५४॥ जो खर प्रत्याहार परे हो तो मलों को चर् आदेश हो । जैसे- भेद् +ता = भेत्ता, लिभ+सा -लिप्सा, युयुध्+सते = युयुत्सते इत्यादि। २३६--उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य ॥ ८४६०॥ उद् से परे स्था और स्तम्भ धातु के सकार स्थान में पूर्व का सवर्णी आदेश होता है। जैसे-उद्+स्थानम् = उत्थानम् । यहां एक थकार को पूर्व सूत्र ( २३५) से तकार हो जाता है । उत्याता, उत्थातुम् , उत्थातव्यम् । उद्+स्तम्भनम-उत्तम्भनम् , उराम्भिता, उत्तम्भितुम् , उत्तम्भितव्यम् इत्यादि । स्थास्तम्भ' का प्रहण इसलिये है कि 'सद्+रक नीति-उत्स्कभ्नोति' इत्यादि मे न हुआ । २३७ ---वा-उदः पूर्वत्वे स्कन्देश्छन्दस्यपसं- ख्यानम् ॥ १. कई व्याख्याकार बहुवानान्त आचार्याणान्' पद से पाणिनि के प्राचार्य का ग्रहण मानते हैं । स्त्रैणताद्वित में 'भादाचार्याणाम्' (क्रमात २१) की टिप्पणी में लिखा है--'यहां भाचाय शब्द के बहुवचन निर्देश से पाणिनि के भाचार्य का मत समझना चाहिय' । महा०८।४।६० ।।
९८ सन्धिविषय. वैदिक प्रयोगों में उद् उपसर्ग से परे स्कन्द धातु को पूर्वसवर्ण आदेश हो । जैसे-अध्न्ये दूरमुत्कन्दः । यहां उद्+स्कन्द ' सकार को पूर्वसवर्ण तकार होकर 'उत्कन्दः ऐसा होता है। २३८--वा०-रोगे चेति वक्तव्यम् ॥ महा०८।४1६०॥ रोग अर्थ में भी [ उद् उपसर्ग से परे ] सन्द को पूर्व सवर्ण आदेश हो जावे । जैसे-उत्कन्दो रोगः। २३६-झयो होऽन्यतरस्याम् ॥ ८।४।६१ ॥ मय प्रत्याहार से परे हकार को पूर्वसवर्ण आदेश विकल्प करके होता है। जैसे-वर्ग से परे हो तो पकार-वाग् हसति, वाग्यसति । टवर्ग से परे हो तो ढकार-लघड हन्ता, लघदन्ता । तवर्ग से परे हो तो धकार-अमिचित् हसति, अनिषिद्धसति । पवर्ग से परे हो तो भकार होता है-निष्टुब् हसति, त्रिष्टुम्भसति इत्यादि । यहा 'माय' प्रहण इसलिये है कि 'भवान हसति' इत्यादि में न हो। २४०--शरछोऽटि ।।८।४। ६२॥ जो झय से परे और अट् प्रत्याहार के पूर्व शकार हो तो उसको छकार आदेश विकल्प करके होता है । जैसे~वाक् छते, वाक् शेते, मधुलिट् छेने, मधुलिद शेते, त्रिष्टुप् छते, त्रिष्टुप् शेने इत्यादि। २४१-चा०-छत्वममीति वसाव्यम् ।। . . महा०८11६२ " जो अम प्रत्याहार परें हो तो भी गाय से पर शकार को छफार आदेश होता है। जैसे-तत् श्लोफेन, सन्छलोपन, तत् श्मन तच्छमश्र इत्यादि।
साधनप्रकरणम् ९९ चार तकार होते...उद्+स्थानम् । सकार को थार और पार 'भननि ' २४२-हलो यमा यमि लोपः॥८१४१६३ ॥ हल से परे यम का लोप विकल्प करके होता है जो यम् परे हो तो जैसे- शय्य्या'। यहां तीन यकार हैं इन में से मध्यस्थ यकार का लोप होकर-शय्या । धप्यत्र 'यहां भी वैकल्पिक लोप होकर दभ्यन्न इत्यादि । 'हल' प्रहण इसलिये है कि वित्तम' यहां न हुआ। यम् का लोप इसलिये कहा है कि अमिः' यही लोप न दया। और यम् परे इसलिये है कि शाम्' यहां न हुआ । [ यहां यम् से यथासंख्य यम् परे रहने पर लोप होता है, इसलिये माहात्म्य' में मकार का लोप नहीं होता । । २४३--झरो झरि सवर्णे ॥८।४। ६४ ॥ जो सयौँ मर परे हो तो हल से परे मर का लोप विकल्प फरफ होता है। जैस-प्रत्त्तम्, अवन्ततम् । यहां चार तकार होते हैं । तीन प्रथम ही है और एक पीले द्विवेचन होने से हो जाता है, उन में से एक वा दो का लोप होकर-ताम्। प्रतम पत्त्तम, अवत्तम्। उत्थानम् यहां भी एक तकार को लोप विकल्प करफ हो जाता है-उत्थानम इत्यादि । ॥ इति हल्सन्धिः ॥ 1. यहां 'अनधि च' (सन्धि० २२२ ) से द्विपंधन होता है। २. यहां 'द्विपंचने यो मयः ( सन्धि २२३) से दिय होता है। ३. यहां प्र और भय पूर्वक दा धातु को त परे रहने पर 'भघ उपसगांव त:' (भा. १२२३ ) से सकारादेश होता है-+++त। रमार को 'सरि ' (सन्धिः २३५) से तार होकर-प्रन्दन । पुनः सन्धि. २२२) से द्वितीय सकार द्विवचन होकर को तगार होता है।
अथ अयोगवाहसन्धिः अय इसके आगे अयोगवाहसन्धि का प्रकरण लिखा जाता है- २४४-ससजुपो रुः ॥२॥६६॥ जो पदान्त सकार और सजुप शब्द का मूर्धन्य पकार है उसको रु आदेश होता है। पदान्त दो प्रकार का होता है, एक तो अवसान में अथात् जिससे आगे कोई पद वा अक्षर न हो और दूसरा उत्तरपद के परे भी पदान्त कहाता है। इसमें से [जो ] अवसान में सकार को रु होता है उसका विषय नामिक पुस्तक में आवेगा । यह प्रयोगवाह [ सन्धि का ] प्रकरण है, यहा शब्दों की मिलावट दिखलाई जाती है। यह रु आदेश सब दन्त्य सकारान्त शब्दों को होता है, इसलिये सजुप् शब्द के मूर्धन्य पकार को र विधान किया है। पदान्त सकार भी दो प्रकार का होता है, एक स्वरान्त शब्दों से विभक्ति का सकार और दूसरा जो प्रथम से ही सकारान्त होते हैं। विभक्ति से सकारान्त-जैसे- पुरुप-सु, इत्यादि । प्रथम से सकारान्त-जैसे-मनस्, पयस , धनुप्, हविप इत्यादि। अब इस पदान्त सकार को आदेश होकर पौछ क्या-क्या कार्य होता है सो क्रम से लिखते हैं- २४५---एतत्तदोसुलोपोऽकोरनसमासे हालि। ६।१।१३० ॥ जो एतद् और तद् शब्द ककाररहित और नञ्समास में वर्तमान नहीं है उन के सु का लोप होता है हल प्रत्याहार परे हो लो। जैसे-स पठति, एप गच्छति इत्यादि । यहां फकार का , .
साधनप्रकरणम्
।
निषेध इसलिये है कि 'एपको गच्छति, सको प्रवे' यहां न हुआ।
नन्समास में निषेध इसलिये है कि 'नेपो दधावि, असो याति'
इत्यादि में न हो। हल' महण इसलिये है कि 'एपस + अनन
एपोऽत्र, सस+पत्र - सोऽत्र' यहां 'सु' का लोप न हो
२४६--स्यश्छन्दसि पहुलम् ॥६।१।१३१॥
वैदिक प्रयोगों में हल प्रत्याहार परे हो तो त्यद् शब्द के सु
का लोप पहुल फरक हो। जैसे-स्य ते घुमा इन्द्र सोमः । बहुल
प्रहण से यहां नहीं भी होता यत्र स्यो निपतेन् । यहां 'छन्दसि'
इसलिये कहा है कि लोक में न हो-यो हसति, स्यो धावति
इत्यादि।
२४७-सोऽचि लोपे चेत् पादपूरणम् ॥
६।१।१३२॥
जो अजादि उत्तरपद पर हो तो तद् शब्द के सु का लोप
होता है, परन्तु लोप होने से छन्दों के पाद की पूर्ति होती हो तो ।
जैसे-सेमन्नो अध्वरं यज । यहां जय 'सस+इमम्' पद के परे लोप
नहीं पाया था सो लोप होर गुण एकादेश हो गया, तब 'समम्!
ऐसा हुआ, जो न होता तो नव अक्षरी के होने से पाद भी पूर्ण
नहीं होता । लोक में-सैप शूद्रो महायली । यहां भी 'सस+एपस्'
इस अवस्था में विभक्ति के सकार का लोप होकर वृद्धि एकादेश
हो जाता है। यहां पादपूरण इसलिये है कि-'स इव न्यानो भवेत्।
यहां न हो।
अब इन दो सूत्रों से जहां सकार का लोप नहीं होता वहां
स्वरादि उत्तरपदों के परे र को क्या-क्या होता है सो क्रम से
लिखत हैं-
२४८-अतोरोरप्लुतादप्लुते॥६।१।१११॥
-
१०२ सन्धिविषयः जो अप्लुत हस्ख प्रकार से अप्लुत [हस्व ] अकार परे हो तो रु के स्थान में उकार आदेश होता है। जैसे-पुरुष+अत्र - पुरुषोऽत्र, मनर+अर्पय = मनोऽय, इत्यादि । अप्लुत से परे इसलिये है कि 'सुश्रोता'३ अन त्वमसि' यहा उत्वादेश न हो। अप्लुत परे हो इसलिये है कि तिष्ठतु पय आमिदत्त' यहा न हो। अब जहा अवर्णन्त वा अन्य स्वरान्त शब्दों से परे हो और उत्तरपद में अश् प्रत्याहार तो क्या होना चाहिये इस विषय में लिखते हैं- २४६-भोभगोअघोअपूर्वस्य योऽशि ॥ जो भोस्, भगोस् , अघोस् और अवर्णपूर्वक रु से परे अश् प्रत्याहार हो तो . के स्थान में 'य' आदेश हो जाता है। जैसे- भोय+अ = भो अत्र, भगोय् + इह = भगो इह, अघोय+ उत्तिष्ठ = अधो उत्तिष्ठ । अकार से परे आकार के पूर्व-पुरुपय+ आगच्छति = पुरुप आगच्छति । आकार से परे प्रकार के पूर्व- माझाय+अविदु - ब्राह्मणा अविदुः । अब जो रु के स्थान में 'य' आदेश हुमा है इसका क्या होना चाहिय सो लिखते हैं- २५०-व्योलघुप्रयत्नतरः शाकटायनस्य ॥ ८।३ । १८ ॥ जो अवर्ण से परे यकार वकार है उसको लघुप्रयनतर आदेश हो, शाकटायन आचार्य के मत में। जिसके चारण में बहुत थोड़ा पल पड़े वह लघुप्रयनतर पहाता है। एचोऽयवाया इस , देखो प्रष्ट , २. सन्धि० १८.। टि.
साधनप्रकरणम् १०३ , उक्त सूत्र से पदान्त में जो अय आदि आदेश होते हैं वे तथा जो पूर्व सूत्र से रु के स्थान में यकारादेश होता है उन सब यफार चकारों का यहां प्रहण है। पुरुषयागच्छति, पुरुपयिह, ब्राह्मणाय- विदुः इत्यादि । अय [आदि] आदेश के आसते= कयाससे, वायो आयाहि-वायवायाहि श्रिय उद्यतः श्रियायुद्यतः, असौ आदि- स्या असावादित्यः । जो यह लघुप्रयत्नतर आदेश होता है सो उदाहरणों में बहुत कम आता है। अब जहां लघुप्रयन्नतर आदेश नहीं होता वहां क्या होता है, सो दिसलाते है- २५१--लोपः शाकल्यस्य ॥ ८।३। १६ ।। जो प्रवर्ण से परे और अश प्रत्याहार के पूर्व पदान्त यकार चकार हो तो उनका विकल्प करके लोप होता है, शाफल्य आचार्य के मत मे । जैसे-पुरुपय् आगच्छति-पुरुप आगच्छति, पुरुपया- गच्छति; ब्राह्मणाय अविदुःब्राह्मणा अविदुः, ब्राह्मणायविदुः, कय आसते= क श्राम्ते, कयासते; गृह्य आसते =गृह आसते, गृहयासते; वायय, श्रायाहि-वाय श्रायाहि, वायवायाहि; पादाव् उन्येते पादा उच्येते, पादावुच्येते; हरय एहि हर एहि, हरयेहि विष्णव् इह विष्ण इह, विष्णविह इत्यादि । २५२-श्रोतो गार्यस्य ॥८।३२० ॥ अझ प्रत्याहार परे हो तो श्रोकार से परे जो रु को य होता है उसका नित्य ही लोप होवे । गाय का ग्रहण पूजार्थ है । भोय+ अत्र-भो अत्र, भगोय+इह -भगो इह, अधोय+ इह= अघो इह । २५३-उनि च पदे ॥१३॥ २१ ॥ उञ् पद के परे अवर्ण के आगे जो पदान्त यकार वकार हों नो उनका नित्य लोप हो जावे । जैसे—सय न प्राणस्य प्राणः -- । ।
१०४
सन्धिविषय.
%D
उ प्राणस्य प्राण , कय उ स्विजायत पुन = क ह सिजायते पुन ,
कय सन्ति - क उ सन्ति, वायव् उ वाति = काय उवाति,
'श्रियाय उ यतते श्रिया उ यतते इत्यादि।
सजुप आदि शब्दों को रु विधान कर चुके हैं। इससे उत्तरपद
में जो स्वर होगा तो रेफ उस में मिल जावेगा। और जो हल वर्ण
आयेगा तो उसके ऊपर रेफ चढ जावेगा ! स्वर में-सजूरन, सजू-
रिह इत्यादि । यहा रेफान्त की उपधा को पदान्त में दीघे आदेश
हो जाता है। परन्तु ऋकार के परे रेफ ऊपर ही चढ जाता है
सजूझ पि , वायुच्चति इत्यादि। अनि+अत्र = अमिरन,
अमिर+थानीयते-अमिरानीयत इत्यादि ।
जो अश प्रत्याहार में स्वरों से भिन्न वर्ण रहें ता पहा क्या होना
पाहिये सा लिखते हैं-
२५४-हशि च ॥६।१।११२॥
हस्व प्रकार से परे र फे रेफ को पार आदेश होता है जो
इश प्रत्याहार परे हो तो। जैसे-पुरुप+3+हसतिर । उकार के
साथ गुण एकादेश होकर-पुरुपो हसति इत्यादि।
२५५-एलि सर्वपाम् । ८।३।२२ ॥
हल प्रत्याहार फ परे भा, भगो, अपो और भय जिसके पूर्व
, पहा 'समान' उपपद होने पर 'उप्' धातु से रिपप् पप
होता है। 'समानम्य सदस्य.' (सा. २२१)ग्यो समानको 'ग'
भादेश मा । पराया दीर्घ इका' (मा. १५) उपमा
को दीपं होता।२ पहा 'मोभगोमपोभपाय योऽnि' (राधि
२१९) 'य' मादा होता है, परन्तु इसमें मसिद मानम शि
से उत्यो गाना
ढकार के परे ढकार का लोप हो । जैसे-लिह+त+सु- साधनप्रकरणम् हो उस यकार का लोप सब प्राचार्यों के मत से हो । भोय+ हसति भो हसति, भगोय हसति = भगो हसति, अयोय + इसति :अघो हसति । श्राकारान्त से-पुरुपाय+हसन्ति-पुरुषा हसन्ति, बालाय+नन्दन्ति = वाला नन्दन्ति, चन्द्रमाय+वर्धते = चन्द्रमा वर्धते इत्यादि । हशमान में इस सूत्र को प्रवृत्ति होती है यहां हलग्रहण उत्तर सूत्रों के लिये है क्योंकि यहां हश प्रत्याहार से ही प्रयोजन है। जब इकार आदि स्वरों से परे रु हो और हश प्रत्याहार उत्तर- पद में आये सो कार्रफ उत्तर वर्ण के ऊपर चढ़ जाता है । जैसे- सजूदेवेन, सजूति, अग्निर्दहति, वायुति, गौर्धावति इत्यादि । हा प्रत्याहार में रेफ भी श्राता है उसके पर क्या होना चाहिये सो लिखते हैं- २५६-रो रि॥८।३ १४॥ जो रेफ के परे रेफ हो तो पूर्व रेफ का लोप होता है । जैसे- प्रातर+रतम् =प्रात रक्तमा निर+रक्तम् =नि रकम गुरुर+ राजत =गुरु राजते। श्रर लोप होकर क्या होना चाहिये सो लिखते हैं- २५७-लोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः ॥६॥३॥१११॥ जहा रेफ, ढकार का लोप हो वहा उस रेफ, ढकार से पूर्व श्रण को दाई आदेश हो जावे । दीघे होकर-प्रातारक्तम्, नोरक्तम् , गुरू राजते इत्यादि। २५८-ढो दे लोपः ॥ ३११३॥ - १०६ सन्धिविषयः - लिद+दम्'-लिढम्, गुह+क+सु - गुढ + ढमगुढम् यहां ढकार के लोप में भी पूर्व श्रण को दोघे होकर 'लोढम् । गूढम्' इत्यादि सदाहरण होते हैं। अब हलादि वर्णों में खर प्रत्याहार के परे रु को क्या होना चाहिये सो लिखते हैं- २५६--खरवसानयोर्विसर्जनीयः ॥२१॥ खर प्रत्याहार के परे और अवसान में रेफ के स्थान में विसर्जनीय आदेश होता है। जैसे--नदी + जस+सवन्ति = नद्यः सवन्ति, पुरुष+सु+शेते = पुरुष. शेते इत्यादि । स्वाभाविक रेफ-गीः स्रवति, धूः सरति । खर प्रत्याहारमात्र में विसर्जनीय होकर क्या-क्या होता है सो आगे लिखते हैं- २६०-विसर्जनीयस्य सः ।।८।३ । ३४ ॥ खर प्रत्याहार के परे विसर्जनीय को सकार आदेश होता है [ यह आदेश ] च, छ, ठ, थ, द, त इन छ, वों [के परे होता है ] खर प्रत्याहार में जो अन्य वर्ण रहे उनके परे दूसरा कार्य कहेगे। पुरुषस+चेतति -- पुरुपश्वेतति, सजूस+चैतति = सजूश्वेतति, सजूस+विनत्ति = सजूश्विनत्ति, वासस= छादयति वासश्छादयति । यहां विसर्जनीय को सकार होकर (२१३) सूत्र से श होता है। उक्तस्वकारः, पुरुषस्तरति, उक्तस+दकार 1. हो ढः (भा० २०३) से धातु के हकार को कार 'क्षपस्तयोोऽध:' (आ. १) से प्रत्यय के सकार को धकारादेश और 'धुना gः' (सन्धिः २४) से धकार को दकार होता है- लि+दद। .
खिचवे, माल: विद्यते, पुरुष पठति, पुरुषः पठति; थान फरावि, साधनप्रकरणम् १०७ उपप्रकारः, उक्तस+ठकारः = उत्तष्ठकारः। (२१४ ) सूत्र सेस को पहो गया है। २६१-शर्परे विसर्जनीयः॥८।३।३५॥ शर जिससे परे हो ऐसा वर प्रत्याहार परे हो तो पूर्व विसजेनीय को विसर्जनीय हो। जैसे-पुरुषः ज्ञाम्यति, पुरुप. सरुः इत्यादि। २१२-वा शरि ।।८।३। ३६ ॥ रार प्रत्याहार फे परे विसर्जनीय को विकल्प करके विसर्जनीय आदेश हो। जैसे-पुरुषः शेते, पुरुपश्शेते; कवयः पट, कवयप्पट धार्मिकाः सन्तु, धामिकास्सन्तु इत्यादि । २३३-चा०-या शर्मकरणे खपर लोपः ।। महा.८11३६॥ जिससे परे सर प्रत्याहार का वर्ण हो ऐसा जो शर् उसके पूर्व विसर्जनीय हो तो विकल्प करके लोप हो । जैसे-पुरपाठीवन्ति, पुनपा छीवन्ति वृक्षाः स्थातारः, वृक्षा स्थातारः इत्यादि । यहां सप- रफ शर प्रत्याहार में तीन-तीन प्रयोग यनेगे-पुरुपाः छीवन्ति, पुरुषा धावन्ति,पुरुपाषष्ठीवन्ति इत्यादि । अब सर प्रत्याहार में सय वर्णों के साथ विसर्जनीय की सन्धि तो दिसला दो, परन्तु सर प्रत्याहारम्य , स, प, फ इन चार वों के साथ विसर्जनीय को जो-जो होता है सो दिखना है- २६४---कुप्योः फ.पौ च ॥८।३ । ३७ ॥ कवर्ग पवर्ग अर्थात् क, ख, प, फइन चार वर्णों के परे विसर्जनीय को विकल्प फरर्फ मम से मिहामूलीय और उपध्मानीय आदेश हो । पुरुषःकरोति, पुरुषः करोति; पाल - १०८ सन्धिविषयः पालः फणति इत्यादि। जिस पक्ष में जिह्वामूलीय उपभमानीय आदेश नहीं होते उस पक्ष में विसर्जनीय ही रहते हैं। २६५-सोऽपदादौ ।।८।३॥ ३८॥ जो अपदादि अर्थात् एक पद में कवर्ग पवर्ग परे हों तो विसर्जनीय के स्थान में सकार आदेश हो जाता है । जैसे—यशः+ कल्पम यशस्कल्पम्, पयः+कल्पमः पयस्कल्पम्। अयः पाशम्-अयस्पाशम् , अन्धः+पाशम-अन्धस्पाशम् इत्यादि । यहा कल्पप, पाशप् प्रत्ययों के परे रु के विसर्जनीय को सकार हुआ है। यहां से आगे जो पूर्व सूत्र से जिह्वामूलीय, उपध्मानीय आदेश होते हैं उन्हीं के अपवाद सब सूत्र सममना । २६६-वा-सोऽपदादावनव्ययस्य ॥ ॥ महा०८।३।३८॥ जो अपदादि कवर्ग पवर्ग में विसर्जनीय को सकारादेश कहा है वह अव्यय के विसर्जनीय को न हो । जैसे-प्रातःकल्पम्, पुनःकल्पम् इत्यादि । २६७-रोः काम्ये नियमार्थम् ॥ ॥ महा.८.३।३८ ॥ जहां काम्यच् प्रत्यय फे परे विसर्जनीय को सकारादेश होता है वहां रुके रेफ का विसर्जनीय हो तो सकारादेश[ हो । जैसे- 1. कल्पप-ईपदसमाप्ती करपन्देश्यदेशीयर. (०.९०) सूत्र से और पाशप-याप्ये पाशप् (०.००) सूत्र से होता है। २. सोऽपदादी (सन्धिः २६५) सूर से।
साधनप्रकरणम पयस्काम्यति, यशस्काम्यति । यहाँ ] न हो। जैसे-गी'काम्यति', पूकाम्यति । २६८-इणा प॥८।३। ३६ ।। इण प्रत्याहार से उत्तर जो विसर्जनीय उसको मूर्धन्य पकार आदेश हो अपदादि कवर्ग पवर्ग परे हो तो। जैसे-हविष्काम्यति, सजूष्कल्पम्, दोष्कल्पम् हविष्पाशम् दोष्पाशम् । यहां अपदादि को अनुवृत्ति करने का यह प्रयोजन है कि 'गुरुपाठयति' यहां सकारादेश न हो । कवर्ग पवर्ग की अनुवृत्ति इसलिये आती है कि *सपिस्ते, धनुस्ते' यहा मूर्धन्य न हो। अय यहा से आगे अवर्ण से परे विसर्जनीय को सकार और इण प्रत्याहार से परे उसको मूर्धन्य आदेश सब सूनों में कहेंगे, ऐसा अधिकार सममना । २६६-नमस्पुरसोर्गत्योः॥ ८।३ । ४०॥ जो कवर्ग और पवर्ग परे हों तो गतिसज्ञक नमस् और पुरस् शदों के विसर्जनीय को सकार आदेश होता है। नमः + कर्ता - नमस्कतो, नम.+कृत्य = नमस्कृत्य, पुरस्कर्ता, पुरस्कृत्य इत्यादि । २७०- इदुदुपधस्य चाऽप्रत्ययस्य ॥२४॥ इकार वा उकार जिसकी उपधा में हैं उस प्रत्ययभिन्न शब्द विसर्जनीय को पकार होता है। जैसे-निर+कृतम्-निष्कृतम्, निर+पीतम-निप्पीतम, दु+कृतम्-दुष्कृतम्, दुर्+पीतम्= दुष्पीतम, आविस्+कृत्तम्-श्राविष्कृतम, प्रादुस+कृतम्: , आत्मनो गिरमिच्छति-~ी कम्यति 'काम्य' (आ.५० से काम्य प्रयय होता है।
सन्धिविषयः महा०८।३ ।। प्रादुकृतम्। इत्यादि । यहां 'अप्रत्यय' प्रहण इसलिये है कि 'वायुः पाति' यहां पकार आदेश न हो। २७१---वा०-पुम्मुहुसोः प्रतिषेधः ।। पुम् और मुहुस् इन शब्दों में भी अप्रत्यय के विसर्जनीय हैं, यहां इस उक्त सून से विसर्जनीय को पकाराऽऽदेश न हो। जैसे- पुंस्कामः, मुहुःकामः । यहां विसर्जनीय को पकार न हो। २७२-तिरसोऽन्यतरस्याम् ॥८॥३॥४२॥ गतिसंज्ञक तिरस शब्द के जो विसर्जनाय [ हैं ] उनको क्वर्ग पवर्ग के परे सकारादेश विकल्प करके होता है । पक्ष में विसनीय रह जावेंगे। जैसे-]तिरस्कृतम्, तिरस्कृतम; तिरस्कर्ता, निरःकर्ताः तिरस्कृत्य, तिर कृत्य तिरपिबति, तिर पियति । गतिमहरण इसलिये है कि 'तिरः कृत्वा' यहां सकारादेश न हो। २७३---द्विस्त्रिश्चतुरिति कृत्वाऽर्थे ॥३४॥ कृत्वसुच् प्रत्यय के अर्थ मे वर्तमान जोति, नि और चतुर, शब्द इनके विसर्जनीय को पकार आदेश विकल्प करके हो कवर्ग पवर्ग परे हो तो। [जैसे-] द्विष्करोति, द्विःकरोति त्रिष्करोति, : त्रि.करोति; चतुष्करोति, चतुःकरोति; द्विप्पठति, द्विःपठति विष्पठति, निःपठति चतुष्पठति, चतुःपठति इत्यादि। यहां कृत्वोऽय! प्रहण इसलिये है कि 'चतुष्कपालम, चतुष्कण्ठम्, चतुप्पथम्' इत्यादि में विकल्प न हो। २७४-इसुसो सामथ्र्ये ॥ ८।३।४४ ॥ यहां विकल्प की अनुवृत्ति आती है। जो सामर्थ्य विदित होता हो तो कवर्ग पवर्ग के परे इस्-उम प्रत्ययान्त शब्दों के विस- साधनप्रकरणम् । जनीय को पकारादेश विकल्प करके होता है। जैसे-इविष्करोति, इविः करोति, सपिंकरोति, सर्पिः करोति; ज्योतिष्पश्यति, ज्योतिः पश्यति; यजुष्पठति, यजुः पठति इत्यादि । यहाँ 'सामध्ये प्रहण इसलिये है कि तितु सर्पिः करोतु यलमन्नम्' इत्यादिको में सापेक्ष होने से पकारादेश न हुआ। २७५-नित्यं समासेऽनुत्तरपदस्थस्य ।।४।। जो कवर्ग पवर्ग के परे समास में अनुत्तरपदस्थ अर्थात् उत्तर- पद में इस् उस् न हो तो इस् उस् प्रत्ययान्त शब्दों के विसर्जनीय को नित्य पकार आदेश हो जावे । जैसे--सर्पिकुण्डिका, सर्पिष्पा- त्रम्, धनुष्करः इत्यादि । यहा 'अनुत्तरपदस्थ ग्रहण इसलिये है कि 'सुसपिःपानम्, सुसर्पि.कुण्डिका' इत्यादि में पकारादेश नहीं हुआ। २७६-प्रतः कृकमिकंसकुम्भपात्रकुशाकर्णी- प्वनव्ययस्य ॥८।३। ४६ ॥ [समास ] मे जो प्रकार से परे अध्यय को छोडकर अनुरा- रपदस्थ विसर्जनीय को क और कमि धातु तथा वंस, कुम्भ, पात्र, धुशा और कर्णी शब्द परे हों तो सकार आदेश हो। जैसे-अयस्कार, अयस्कामः प्रयासः, पयस्कुम्भः, पयस्कुम्भी ! यहां नीलिङ्ग' में भी होता है । पयस्पात्रम्, अयस्कुशा, अयस्कर्णी । यहां अकार से परे प्रहण इसलिये है कि पी.कारः, पूकारः' यहां सकार न हो। तपरकरण इसलिये पढ़ा है कि 'भाकाम:' यहां न हो। और 'अन्यया का निषेध इसलिये है कि-अन्तःकरणा, प्रात:कालः, 1. पानिपदिकमहणे लिविशिष्स्यापि प्रहण भवनि ( पारि०१२) इस नियम मे यहां भी सकारादेश होता है।
सन्धिविषयः ११२ पुनःकरोतु । समास इसलिये है कि 'यशः करोति' यहां न हो। अनुत्तरपदस्थ इसलिये है कि 'सुवचः कामः' यहां न हो। २७७-अधःशिरसी पदे ॥८।३।४७॥ जो समास में पद शब्द परे हो वो अधस् शिरस् के अनुत्तर- पदस्थ विसर्जनीय को सकार आदेश होता है। [ जैसे-अध- स्पदम्, शिरस्पदम्, अधस्पदी, शिरस्पदी । यहां समासग्रहण इसलिये है कि 'अधः पदम् यहां न हो । अनुत्तरपदस्थ ग्रहण इसलिये है कि "परमशिरःपदम् । यहां सकारादेश न हुआ। २७८--कस्कादिषु च ॥ ८।३।४८॥ जो-जो शब्द कस्क आदि गण में पढ़े हैं उनके विसर्जनीय को यथालिखित सकार वा पकार आदि जानना चाहिये। यहां भी एक पद से परे विसर्जनीय और उत्तरपद में कवर्ग पवर्ग पर लिये जाते है। जैसे-क+कः = कस्कः, कौतुस्कुतः, भ्रातुष्पुत्रः, शुनस्कर्णः, सद्यस्कालः, सद्यस्क्री, साद्यस्कः, कांस्कान्, सर्पिष्फुण्डिका, धनुष्क- 'पालम् , बहिप्पूलम्, यजुष्पात्रम्, अयस्काण्डः, मेदस्पिण्डः इति ॥ २७६-छन्दसि वाऽमामेडितयोः ॥८३।४।। जो प्र और श्रामेडित को छोड़कर कवर्ग पवर्ग पर हों तो वेद में विकल्प करके विसर्जनीय को सकारादेश होता है । जैसे-४ पात्रम्, अयस्पात्रम् । यहां प्र और आग्रेडित का निपेध इसलिये है कि इन्द्राय सोमाः प्रदिवो दिवानाः श्रानेडित-'पुरुपः पुरुषः परि' इत्यादि में सकारादेश न हुआ। २८०-काकरत्करतिकृधिकृतेष्वन दितेः॥ ८।३। ५० ॥ कः, करत, करवि, कृधि, कृत इन परे वेदों में अदिति शब्द -श्रय:- साधनप्रकरणम् ११३ फो छोड़ कर सब शब्दों के विसर्जनीय को सकारादेश होता है। [जैसे-] विश्रतस्कः, विश्वतस्करत् , यशस्करति, विश्रतस्कृधि, अधरतम्, सहरसृतम् इत्यादि । पूर्वसूत्र से सर्वत्र विकल्प करके प्राप्त था, इसलिये यह सून नियमार्थ किया है। यहां अदिति का निषेध इमलिये है कि 'यथा नो अदितिः करत' यहां सकारादेश नहुथा। २८१-पञ्चम्याः परावध्यर्थे ॥८।३।५१ ॥ वेदोंगे जो अधि के अर्थ का परि उपसर्ग परे हो तो पञ्चमी के विसर्जनीय फो सकारादेश होता है। जैसे-विश्वतस्परि, दिवस्परित इत्यादि । यहां पञ्चमी का प्रण इसलिये है कि 'या गोः पर्येति' इत्यादि में नहीं होता । 'परि' इमलिये है कि लोकेभ्यः प्रजापतिः समेरयत्' इत्यादि में न हो। 'अध्यर्थः इसलिये है कि दिव. पृधि. व्याः पर्योज उभृतम्' इत्यादि मे न हो। २८२-पातौ च यहुलम् ॥ ८।३ । ५२ ॥ वेदो में पाति धातु के प्रयोग पर हो तो कहीं-कहीं पञ्चमी के पिसजेनीय को सकारादेश होता है। जैस-दिवम्पातु, राज्ञस्पातु, युकेभ्यस्पातु, इत्यादि । कहीं कहीं नहीं भी होता-परिपदः पातु, इत्यादि। २८३-पष्टयाः पतिपुत्रपृष्ठपारपदपयस्पांपेषु ।। ८।३। ५३ ॥ वेदो में जो पति, पुत्र, ठ, पार, पद, पयम और पोप पर होतो पपी के विसर्जनीय यो सकार भावेश होता है । जैसे-याचस्पतिः, दिवस्पुत्राय सूर्याय, दियो, भित्र्यास्पृष्टे, तमसापारम् , इडस्पद समिन्यन, सूर्य धनुदियस्पया, रायरपोपेण समिपा मदन्नः। यहां पिटी महण इसलिये है कि मनुः पुग्नेभ्यो दार्य रमा जन्' यहा न हुआ,
११४
सन्धिविषयः
--
२८४--इडाया या ।।८।३। ५४ ।।
जो वेदों में पूर्वसूत्रोक्त पति आदि शब्द हों तो इडा शब्द
की पठी के विसर्जनीय को विकल्प करके सकारादेश होता है ।
जैसे-इहायास्पतिः, इडायाः पतिः इत्यादि ।
२८५--अम्नरूधरवरित्युभयथा च्छन्दसि ।।
८।२।७०॥
अम्नस, ऊस, अस इन शब्दों के सकार को प्रादेश
विफल्प करके होता है। जैसे- अम्नस+एव - [अन्न एव ],
अम्नरेव । ऊधस्+एव%D[ ऊध एव, 7 उधरेव । अवस+एव -
[ अव एव ], अवरेव इत्यादि । [ पक्ष में रेफ आदेश होता है ],
२८६-अहन् ।।८।२१६८॥
बहन शब्द को [ पदान्त में ] आदेश होता है। अहन् ।
भ्याम् = अहोभ्याम् । इस सून पर यह वासिंक है-
२८७-वा -रुत्वविधावहोरूपरात्रिरथन्तरे-
पूपसंख्यानम् ॥
रत्वविधि प्रकरण में रूप, रानि और रथन्तर शब्दों के परे
अहन् शब्द के मकार को रु आदेश होता है। जैसे-अहम् +
रूपम् = अहोरूपम, अहम् +रात्र:-अहोरात्रा, अहन्+रथन्तरम्
- अहोरथन्तरम्।
[कई प्राचार्यों का मत है कि वार्तिक में रूपादि प्रहण
रेफादि का उपलक्षणार्थ है। इससे 'अहोरम्यम्' इत्यादि में भी
रुत्व हो जाता है।
२८-रोऽसुपि ॥ ८।२।६६ ।।
जो सुप् से भिन्न कोई उत्तरपद परे हो तो अहन शब्द के नकार
को र आदेश होता है । इसमे यह विशेप है कि जहाँ र होता है
महा०८।३।६८॥
D
साधनप्रकरणम् यहाँ उत्व भी होता है, और जहाँ र होता है वहां उत्व नहीं होता । जैसे-अहन्+ददाति = अहर्ददाति, बहन+भुक्ते = अहर्मुक्ते इत्यादि। इस पर यह वात्तिक है-- २८६-वा-अहरादीनां पत्यादिषु ।। महा०८।२।७०॥ जो बहन आदि शब्दों में रेफ होता है उसके स्थान एक पक्ष में रेफ को रेफ ही हो जावे पति आदि शब्द परे हों तो। [ उसका ] प्रयोजन यह है कि एक पक्ष में रेफ को विसर्जनीय और एक पक्ष में रेफादेश होता है । जैसे-अहर्पतिः, अहःपतिः; गीपतिः, गी:पति; धूर्पतिः, धूःपतिः इत्यादि । २६०-वा०-छन्दसि भापायां च प्रचेतसो राजन्युपसंख्यानम् ॥ लौकिक और वैदिक प्रयोगों में प्रचेतस् शब्द के सकार को राजन्य शब्द के परे रु आदेश विकल्प करके होता है। पक्ष रेफ आदेश हो जावेगा। जैसे-प्रचेतस्+राजन् = प्रचेतोराजन् , । प्रचेता राजन् । २६१-वसुखंसुध्वस्वनडुहां दः ||२|७३॥ जो पदान्त और अवसान में वसुप्रत्ययान्त और ससु, ध्वंसु और अनडुह शब्द हो तो उनको दकागदेश होता है । वसुप्रत्ययान्त -विद्वस+श्रासनम् = विद्वदासनम् । सेदिवम्+आगमनम् = सेदिव- दागमनम् इत्यादि । उखास्रस्+अत्र = उखासदत्र, पर्णध्वस+ महा०८।२।७०॥ , हशि च ( सन्धि० २५४) भादि से।
सन्धिविषयः
पर्णध्वदन इत्यादि । अनडुह+इच्छा = अनडुदिच्छा: अनडुह +
उल्लङ्घनम् = अनडुदुल्लङ्घनम् इत्यादि ।
अब जहां रु के पूर्व अच् को अनुनासिक होता है उसका
प्रकरण लिखते हैं-
२६२--अन्नाऽनुनासिका पूर्वस्य तुवा ।।८।।२।।
यह सूत्र अधिकार के लिये है । जहां-जहां आगेर विधान
करेंगे वहां-वहां रु के पूर्व वर्ण को विकल्प करके अनुनासिक होगा ।
२६३--श्रातोऽटि नित्यम् ।। । ३ । ३॥
जो वेदों में श्रट प्रत्याहार के परे रु से पूर्व प्राकार हो तो
उसको अनुनासिक नित्य ही हो जावे । जैसे-सूर्यवड महाँ असि,
देवा श्रासादयादिह ।
२६४-- अनुनासिकात् परोऽनस्वारः ।।८।३।४||
जिस पक्ष मे रु से पूर्व [ वर्ण को ) अनुनासिक नहीं होता
वहां उससे पूर्व वर्ण से परे अनुस्वार [ का आगम ] हो जाता है।
जैस-विद्वान् +चिनोति = विद्वांधिनोति ।
२६५--वा०-विभाषा भवद्भगवदघवतामो-
चावस्य॥
वेदों में विक्रूप करके भवत् , भगवत् , अघवत् शब्दा य अन्त
को रु और श्रव भाग को ओकार आदेश होता है। जैसे-भवत् +
, यद्यपि इस सून में छन्द की अनुचि कही से नहीं आती तथापि
यह सूत्र 'दीर्घादटि समानपादे' (सन्धि० १३०) सून विहित 'र' के विषय
में नित्य भनुनासिक्रव का विधान करता है। 'दीर्घाटि.' सूत्र
'मनु' की अनुवृति है अतः यही वृति में 'वेदों में शब्द र है।
महा०८।३।।
में
-
साधनप्रकरणम्
११७
रदि = भो एहि, भवन्नेहि, भगवत् + एहि = भगो एहि, भगवन्नेहि
अधवत् +याहि = अधो याहि अघवन् याहि, इत्यादि ।
अप सुट प्रकरण को लिखते हैं जो कि इसी रु प्रकरण से
सम्बन्ध रखता है।
२६६-सुट् कात् पूर्वः ॥६।१।१३३ ।।
यह अधिकार सूत्र है। यहां से आगे जहां-जहां सुट का
विधान करेंगे वहां-वहां वह कार से पूर्व होगा।
२६७-अडभ्यासव्यवायेऽपि ॥'
जिसको सुट का आगम विधान करें उसको अट और अभ्यास
व्यवधान में भी फकार से पूर्व सुट् होवे ।
२६८-संपर्युपेभ्यः करौती भूपणे ।।६।१।१३४॥
भूपण अर्थ में सम् , परि, उप इन उपसगों से कृ धातु का
कोई प्रयोग परे हो तो उसके ककार से पूर्व सुट का आगम होता
है । जैसे-सम् + कराति = सम् + सुट +फरोति = संसरोति
उक्त ( २९७ ) सून से अट क व्यवधान में-सम+अ+करोत् =
समस्करोत् , सम् + कार्यात् = समस्कार्षीत् । अभ्यास फे व्यवधान
में सम् + चकरतु = सभ्वस्करतुः,
सम्+चकरु. सश्चस्करः,
इत्यादि । परि+सुद+करोति = परिष्करोति । जो यहा दन्त्य सकार
को मूर्धन्य हो जाता है इसका विषय आख्यातिक प्रन्य के
त्वप्रकरण में लिग है। परि+अ+सुट+करोत् = पर्यस्करोत् ,
.. यह काशिकानुसारी पाठ है। महाभाष्य (६।१५) में
"अदम्ययाय उपसंख्यानम्, अभ्यासम्यपाये छ' दो धात्तिक है।
२. परिनिविभ्यः सेयसिप्तसयसियुसहमुटस्तुस्वनाम् (भा• ८२०)
सूत्र से परय होता है।
.
।
११८ सन्धिविषयः . पर्यष्करोत् । ये दो प्रयोग पत्व के विकल्प से होते हैं । उप+सुद+ करोति = उपस्करोति, उपस्कारः, उपसर्ता, उपस्कृतम , इत्यादि। अब सम् के मकार को क्या होना चाहिये सो लिखते हैं- २९६-समः सुटि॥८॥३॥ ५ ॥ सुट् परे हो तो सम् के मकार को रु आदेश हो। इस सून से र आदेश होकर विसर्ग प्राप्त हुघा, ममका अपवाद यह बार्तिक है-- ३००-या०-संपुंकानां सत्यम् महा. ८ ॥३॥५ सम्, पुम्, कान इनफेर को सकार ही होता है।को जो सकार रिया है उससे पूर्व वर्ण को धनुनासिक और (परा से पर) अनुस्वार उफ सूत्र में मममना। अनुनासिक पक्ष में- संसूरपरोति, संसपरोति। यहां पक्ष में एक सकार का लोप' भी हो जाता है। सरकारः, संस्कार:। जहां दो सकारों में पर को द्विधन होता है यहां सीन मफार भी हो जाते है- समस्कारः। अनुनामिफ ने दुधा मो 'संसार, कार, संसार.' ये एः प्रयोग होते है।
साधनप्रकरणम् ११६ प्रतियत्न अर्थात् जो किसी व्यवहार में अनेक गुणों का आरोपण करना, वैकृत अर्थात् विकार को प्राप्त होना, वाक्याच्याहार अथात् जो जानने योग्य अर्थ है उसके जानने के लिये वाक्य घोलना । इन तीन अर्थों में जो उप उपसर्ग मे परेक धातु का प्रयोग हो तो ककार से पूर्व मुटु का आगम हो । प्रतियन- उपस्कुरते एधोदकस्य । वैकृत-उपस्कृत भुक्ते । वाक्याध्याहार-उ. पस्कृतं व्रते, इत्यादि। ३०३-किरती लवने ॥६।१।१३७ ।। लवन अर्थात् काटने अर्थ में जो कृ धातु का प्रयोग हो तो उप उपसर्ग से परे उसके क्कार से पूर्व सुर्ट आगम होता है । जैसे- उप+किरति । यहा ककार से पूर्व सुट होकर-कृषीवल: क्षेत्रमुपस्किरति । अट के व्यवधान मे-उपास्किरत् । अभ्यास व्यवधान में उपचस्करतु । ३०४-हिंसायां प्रतेश्च ॥ ६।१।१४८ ॥ हिंसा अर्थ में उप तथा प्रति उपसर्ग से परे क धातु का प्रयोग हो तो ककार से पूर्व सुट का आगम होता है। जैसे-उपस्किरति जीवान् , प्रतिष्किरति जीवान् , इत्यादि । ३०५-अपाच्चतुष्पाच्छकुनिष्वालेग्यने । ६११।१३६ ।। चतुष्पात् अथोत् चार पगवाले घोड़ा, हाथी, ऊट, बकरी, गो आदि और शकुनि अर्थात् मोर, तीतर, मुर्गा आदि, ये कर्ता हों तो अप उपसर्ग से परे क धातु के ककार से पूर्व सुट् का आगम होता. है, [श्रालेखन अर्थात् ] रोदना अर्थ सूचित होता हो तो। ३०६-वा -फिरतेहपजाविकाकूलायकरणे- प्विति वक्तव्यम् ॥ महा. ६।।१३९ ॥
१२० सन्धिपिपय हर्प = आनन्दित होना, जाविका - कुछ प्राप्ति की इच्छा करना, कुलायकरण - किसी का प्राश्रय लेना । इन तान अर्थों में उक्त सुटू का आगम होता है। हर्प-अपस्किरत वृषा दृष्ट । बैल अब श्रानन्दयुक्त हात हैं ता सींगों से भूमि को करादा करत जाविका-अपस्किरते कुकुना भक्ष्यार्थी । मुरगे क्षुधातुर होकर अपनी चाच से भूमि का करादा करत हैं । कुलायकरण-अप- स्किरत श्वाऽत्रयार्थी । कुत्ता आश्रय अथात् शरण चाहता हुआ भूमि का करादता है, इत्यादि। ३०७--कुस्तुम्गुरूणि जातिः। १६ । १ । १४०॥ यहा जाति अर्थ म कुस्तुम्बुरु शब्द क तकार स पूर्व का सुट् का आगम निपातन किया है। कुस्तुम्वुरु किसा आपधि का नाम है उसके फल-कुस्तुम्बुरूणि फलानि । यहा 'जाति' ग्रहण इसलिय है कि-'कुतुम्वरूणि फनानि, यहा सुट न हुआ। ३०८-अपरस्पराः क्रियासातत्ये॥६।१११४१॥ क्रिया क निरन्तर हान म अपरस्परा' यह शध्द निपातन किया है। अपरस्परा पठन्ति । निकृष और उत्तम विद्यार्थी लाग निरन्तर पढत हैं। यहा 'सातत्य' प्रहण इसलिय है कि 'अपरपरा गच्छन्ति अनियम से चलत हैं। यहा सुट न हुया । ३०६-चा-समो हितततयोर्चा लोप ॥ हित और तत शब्द क परे सम् के मकार का लाप विकल्प करक होता है । सहितम, सहितम्, सततम्, सतवम् । इसा सतत शब्द स सातत्य बनता है। जहा लाप नहीं हाता वहा मकार को अनुस्वार होकर विकल्प से परसवर्ण मी हा जाता है | [जैसे- सन्ततम्, सततम ] , या पदान्तस्य (सधि० १९८) सून से। महा.
३१३--यास्पदं प्रतिष्ठायाम् ॥६।१।१४३॥ प्रतिष्ठा अर्थ में 'आस्पदम्' यह निपातन किया है। आस्पद स्थिरमालब्धम् । यहा भी पद शब्द के पूर्व सुद हुआ है। यहा 'प्रतिष्ठा' प्रहण इसलिये है कि 'आपदमप्रतिष्ठा प्राप्तो देवदत्त, साधनप्रकरणम् १२१ ३१०--वा०-समतुमुनोः कामे लोपो वक्तव्यः ॥ महा०६।१।११॥ जो काम शब्द परे हो तो सम और तुमुन् प्रत्यय के मकार का लोप होता है । सम्+काम = सकाम । भोक्तुम् + कामः = भोक्तुकाम , इत्यादि। ३११-वा०-अवश्यमः कृत्ये लोपो वक्तव्यः ॥ महा०६।११४१ ॥ जा नृत्य प्रत्ययान्त शदी के परे पूर्व अवश्यम् शब्द हा तो उसने मकार का लोप हो जावे । अवश्यम्-भाव्यम् , थवश्यभाव्यम , अश्यलाव्यम्, इत्यादि । इन वार्तिकों का यहा प्रसग नहा था, परन्तु इसी (३०८ ) सून पर थे इसलिये लिस दिये है। ३१२-गोपटं सेवितासेवितप्रमाणेषु ॥६। १।१४२॥ सवित, असक्ति और प्रमाण थर्थ का वाचक गोष्पदम्' यह निपातन किया है । सेपित-गाप्पदो दश । ऐसा यहा विग्रह होना चाहिये कि-गाव पद्यन्त प्राप्यन्ते यत्र तत् गोप्पदम् । असेवित- गोष्पदमरण्यम् । प्रमाण-गोष्पदपूर पुणे मेघ । यहा श्रों का प्रदेण इसलिय है कि 'गो पदम् = गोपदम्। यहा सुदन हुआ। यहा न हुआ। - १२२ सन्धिविषय - ३१४--श्राश्चर्यमनित्ये ।।६।१।१४४ ॥ अनित्य अर्थात् जो कभी कभी हो सदा न हो। इस अनित्य अर्थ में आश्चर्यम्' यह निपातन किया है। 'आ+चर्यम् यहा चकार से पूर्व सुट हो जाता है- आश्चर्यमिद फर्म । अनित्य' प्रहण इसलिये है कि आचर्य सत्यम' यहा न हुआ, क्योंकि सत्य का आचरण नित्य करना चाहिये। ३१५-वर्चस्केऽवस्करः ॥ ६।१।१४५ ॥ वर्चस्क अर्थात् अन्न के मल अर्थ में, "अवस्कर ' यह निपातन किया है। यहा वर्चस्व' प्रहण इसलिये है कि 'अबकर' यहा न हुआ। ३१६-अपस्करो रथाङ्गम् ॥ ६।१।१४६ ॥ रथ के अङ्ग अर्थात् अवयव अथे मे 'अपस्कर यह शब्द सुट सहित निपातन किया है। यहा रथाङ्ग' ग्रहण इसलिये है कि विपकर यहान हुथा। ३१७-निष्किरः शकुनिर्वा ।। ६।१।१४७ ॥ शकुनि अथात् पक्षा अर्थ में विपूर्वक किर शब्द ककार से पूर्व सुट का आगम विकल्प करक निपातन किया है। विष्किर, विकिर । दोनों पक्षिविशेष के नाम हैं। ३१८-हस्वाचन्द्रोत्तरपदे मन्त्रे ॥६॥१४॥ वैदिक शब्दों में हस्व से परे चन्द्र शब्द हो तो उसके चकार मे पूर्व सुट् का आगम होता है। सुश्चन्द्रा युष्मान् । सुनचन्द्र सुश्चन्द्र । हख से परे इसलिये कहा है कि पराचन्द्र' इत्यादि में न हुआ । 'उत्तरपद' ग्रहण इसलिये है कि समास' में ही सुट का आगम हा । इससे 'शुक्रमसि चन्द्रमसि' यहा न हुआ । पपद उसरपद का व्यवहार समास में ही होता है मत: इत्तरपद प्रहण से यहां समास में मुहागम का विधान समझना चाहिये।
- - जहां पारस्कर श्रादि शब्द संज्ञा अथात् किसी के नियत नाम साधनप्रकरणम् १२३ ३१६-प्रतिष्कशश्च करोः॥६।१।१४६ ॥ यहां प्रतिपूर्वक कश धातु का प्रतिप्कशः' यह शब्द निपातन किया है। प्रति+कशः = प्रतिष्फशः । यहां ककार से पूर्व सुट् और सकार को मूर्धन्यादेश निपातन से हुधा है। ३२०-- प्रस्कण्वहरिश्चन्द्रावृपी ॥६।१।१५०।। पि अर्थ मे प्रस्कण्वः, हरिश्चन्द्रः' ये दोनों शब्द सुट आगम के साथ निपातन किये हैं। अर्थात् ये दोनों ऋषि के नाम हैं। जहां और किसी के नाम होंगे वहां सुट न होगा, [ प्रकण्व, हरिचन्द्र ] इत्यादि। ३२१-मस्करमस्करिणौ वेणुपरिव्राजकयोः।। ६।१।१५१ ॥ मस्करः (बांस की लकड़ी) और मस्करी ( उसको धारण करने वाला संन्यासी), ये दोनों शब्द वेणु और परिव्राजक अर्थ में निपातन किये हैं। जहां इनसे अन्य अर्थ हो वहां मकरः धूर्तता और मकरी = धूर्त मनुष्य का नाम जानना । ३२२-कास्तीराजस्तुन्दे नगरे॥६।१।१५२॥ कास्तीर और अजस्तुन्द, ये दो शब्द नगर अर्थ में निपातन किये हैं। अर्थात् किसी नगर के नाम हो यहां इन दो शब्दों के तकार से पूर्व सुट होता है। कास्तीर नाम नगरम्, अजस्तुन्दं नाम नगरम् । अन्य अर्थों में 'कातीरम्, अजतुन्दम्' ऐसा ही रहेगा। ३२३-पारस्करप्रभृतीनि च संज्ञायाम् ॥६॥ १। १५३ ॥ होते हैं वहीं इन में सुट् का आगम किया है । जैसे-पारस्करः।
१२६ साधनप्रकरणम् Aur यहा प्रशान् का निषेध इसलिय है ‘গহানিবি शाञ्चेतति' यहा रु पादश न हुआ । 'छन् । प्रहण इमलिये है कि 'भवान् वदतु यहा न हुथा। अम्पर ग्रहण इसलिये है कि भवान् सिरति यहा न हुआ। ३२६-उभयथर्वा ॥८॥३॥८॥ पूर्व सूत्र से नित्य प्राप्त रु आदेश का इस सूत्र से विकल्प किया है । अम्परक छन् प्रत्याहार के परे ऋग्वेद म नकारान्त पद क नकार का रु आदश हा विकल्प करके हो। जैसे-तस्मिंस्त्वा दधानि, तस्मिंस्त्वा दधाति । जिस पक्ष में नहीं होता वहा नकार बना रहता है-तस्मिन्वा, दधाति इत्यादि। ३३०--दीर्घादटि समानपादे ८॥३६॥ दीर्घ से परे पदान्त नकार को अट प्रत्याहार के परे समानपाद अर्थात् एकपाद में रु आदेश हो ऋग्वेद में विकल्प करके जैसे- जनों अचुच्यवीतन । यहा रु को यकार होके लोप' हो जाता है। गिगैरचुच्यत्रीतन । यहा लोप न होने से प्रकार में रेफ मिल गया। विकल्प ग्रहण इसलिये है कि आदित्यान् याचिषामहे । यहा के आदेश न हुआ । के पूर्व [का अनुनासिक नित्य होता है सो लिख चुके हैं, परन्तु वह दीर्घ प्राकार को ही नित्य होगा ईकार 'ऊकार को विकल्प करक होगा। परिधा रति,परिधीरति, वरिह, वसूरिह, वगने वसूरिह रुद्रा आदित्या उत इत्यादि । ३३१-नृन् पे॥८।३।१०॥ जो पकारादि उत्तरपद परे हो तो नन् शब्द के नकार का विकल्प करक रु आदेश हाता है। अन्य कार्य सय पूर्व के तुल्य जानना । जैसे-न पिपति न:पिपत्ति, न पिपत्ति, न: . सन्धि० २५९, २५॥ - सन्धिपिपयः १२७ पिपरि एक पक्ष में नन् पिपत्ति' इत्यादि । यहां पकारादि ग्रहण इसलिये है कि 'नन् भोजयति' यहां कुछ भी विकार नहीं होता । ३३२-स्वतवान् पायो॥८॥३॥ ११ ॥ पायु शब्द परे हो तो स्वतवान् शब्द के नकार को आदेश विकल्प करके होता है । जैसे-मुवस्तस्य स्वतवाः पायुरने, स्वतवान् पायुः, इत्यादि । यहां सय कार्य पूर्ववत् होते हैं। ३३३-कानाऽनेडिते ॥ ८।३ । १२ ॥ भानेष्टित अर्थान द्वितीय कान् शब्द परे हो तो फान् शब्द के नकार को रु आदेश होता है। जैसे-फान+कान् । यहां रु होकर "संपुकानां सत्वम् ' इस वार्तिक से जिह्वामूलीय और विसर्जनीय यो बाधकर सकार ही हो जाता है, कांस्कान् ! इतीरितस्तन्धिविधि महामुने- निशम्य सन्धेविपयस्सता मुदे । मुखेन ताखमश्चयेऽनया मयार्यया कल्पितयार्यमापया ॥१॥ इति श्रीमत्स्वामिदयानन्दसरखती- प्रणीतार्यभापावित्तिसहित- स्सन्धिविपयस्समाप्तः । 1.सन्धि. ३...
अकः सवणे दीर्घः । अङ्ग इत्यादौ च. अङ्गयुक्तं तिडाकांक्षम अचः परस्मिन् पूर्व विधी अचश्च सन्धिविषये व्याख्यातानां सूत्रषात्तिकानां वार्नुक्रम-सूची सूत्र क्रमाङ्क सूत्र क्रमाङ्क २२२ २ अनचि च अ इ उस १३० अनन्त्यस्यापि प्रश्नाख्यानयोः ५० अक्षादूहिन्याम् १३६ अनाम्नवदिनगरीणां २१६ अनीत् प्रेपणे परस्य च ३७ अनुदात्तं प्रश्नान्ताभिक ४५ १६५ अनुदात्ते च कुधपरे १६६ ४१ अनुनासिकात् परोऽनुस्वारः२९४ ९१ अनुस्वारस्य याय परसवणेः१९७ १११ अनेकाल्शित् सर्वस्य ८५ अचोऽन्त्यादि टि ६७ अन्तादिवच्च ११५ अचो रहाभ्यां द्वे २२१ अपरस्पराः क्रियासातत्ये ३०८ अडभ्यासव्यवाये ऽपि २९७ अपरकरो रथाङ्गम् ३१६ १०६ अपाच्चतुष्पाच्छकुनि अतः कृमिवंसकुम्भ० २७६ अप्लुतबदुपस्थिते १७७ अतो गुणे १५३ अभ्यासजश्त्यचर्व० ५२७ अतो रोरप्लुतादप्लुते २४८ अम्नरूधरतरित्युभयथा० २८५ अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वा २९२ अलोऽन्त्स्य अथ शब्दानुशासनम १ अलोऽन्त्यात् पूर्व उपधा ६८ श्रदर्शनं लोपः थवड स्फोटायनस्य अदसो मात् ५८ अवपयासि च प्रदेड गुणः १९ अवश्यमः कृत्ये लोपी० ३११ २७७ अवमान च २२५ अवपरिमाणेच १८३ अव्यक्तानुकरणस्यात इतौ १५४ T . अणुदित् सवर्णस्य० १६७ अधः शिरसि पदे १२९ सूत्र कमाङ्क सूत्र कमाई अव्यादवद्यादधामु० १६२ ईदेद्विवचनं प्रगृह्यम् अशूदस्यसूयकेवितिः ७२ इन्द्रे च नित्यम् १७० अन् २८६ इसुसोः सामध्ये २७४ अहरादीनां पत्यादिपु २८९ ईदूतौ च सप्तम्यर्थे ६४ आहोऽनुनासिकश्छन्दसि १७२ ईपा अक्षादिषु पच्छन्दसि०१७५ आइमाडोश्च २०९ ई३ चाक्रवमणस्य १७८ श्रादश्च १४२ उगिद् वर्णमहणवर्जम ११० आतोऽटि नित्यम् २९३ उन ऊँ आदिरन्त्येन सहेता उनि च पदे ०५३ आदे. परस्य ८८ उदः पूर्वत्वे स्कन्देश्छ. आद्गुण. १३३ उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य २३६ आघन्तवदेकस्मिन् ७९ उपरि स्विदासीदिति च आद्यन्तो किती ८० उपसगोरति धातो १४३ आपो जुपाणो वृष्णो० ૨૦૨ 'आमन्त्रिते छन्दस्युपसंख्यानम्५५ उभयथर्छ आनहितं भर्सने ८५ ४० उरण रपर आश्चर्यमनित्ये १५२ ३१४ उस्यपदान्तात् प्रास्पद प्रतिष्ठायाम ३ इको गुणयुद्धी ऋलू इको यणचि इकोऽसवर्ण शाकल्यस्य ० १७३ २८४ ऋति ऋवा वचनम इडायाचा इणप: १७६ इतावनेकाजमहणम् १३२ ૨૭૦ लुति ल वा वचनम् १६४ उपात् प्रतियत्नवैकृत० ३२९ ३१३ ऊकानोऽज्मस्वदीत १७९ कारलकारयो सवर्णविधि २३ ऋणदशाभ्याच १४१ १३१ २६८ ते च तृतीयासमासे १३९ श्यकः ३दुदुपधस्य पाप्रत्ययस्य १३२ क्रमा ३२५ ३२६ १७१ पाती च बहुलम् पुमः खय्यमपरे क्रमाङ्क निपात एकाजनाज ६० प्रात्तुम्पनी गविकतरि निष्ठादेशः षत्वस्वर० १२४ प्रादय उपसार्गाः क्रिया ३३१ प्रादूहोढोड्येष्येषु पञ्चम्याः परावभ्य) २८१ प्रायस्य चित्तिचित्तयोः० पदान्ताद्वा २११ पृतप्रगृह्मा अचि परः सन्निकर्षः संहिता ७५ प्ततावैच इदुतो २८२ प्रतिस्तुम्विधौ हे च पारस्करप्रभृतीनि च० ३२३ भूहिप्रेष्यश्रौपड्वोपड़ा पित्पयोयवचनस्य च खा० १०३ भय्यमवय्ये पच्छन्दसि पुंमुहसोः प्रतिषेधः २७१ भोभगोअघोअपूर्वस्य० ३२७ भोगजन्यविशां पा पूर्व तु भाषायाम् ४३ मय यो पोषा 'पूर्वत्रासिद्धम् १२८ मस्करमस्करिणी वेणुः पूर्वत्रासिद्धे च ९५ मिदचोऽन्त्यात्परः अत्यान्तः पादमव्यपरे १६१ मुसनासिकावपनो० प्रणवष्टेः ३४ मोऽनुस्वारः अविश्रयणे प ४४ मो राजि समः को प्रतिपधे स्वरदीप ९३ यजुप्युरः प्रतिष्कशश्च परोः ३१९ यथासख्यमनुदेशः० प्रत्यभिवादेऽशूद्रे २६ परोऽनुनासिफे ऽनुना० प्रत्ययनोपे प्रत्यय ९७ परोऽनुनासिके प्रत्ययः प्रवत्सतरकम्यलयसनानां० १४० पकापरे यया या प्रश्नान्ताभिपूमिसविधार्य५३ याध्यान्न अम्मरबहरिश्चन्द्रापी ३२० येन विधिमादनाम्य प्रागरीधराग्निपाताः ७१ पेयाकर्मणि १२५ ३६ १८७ २४९ २८ २०५ ३२१ ८१ २१ १९१ १९३ १६३ २१९ २२० १९५ १०८ १३३ रोगे चेति वक्तव्यम् ३१५ शपस सूत्र क्रमाङ्क क्रमाक रुत्वविधावलोप० २८७ वृद्धिरेचि १३४ रोः काम्ये नियमार्थम् २६७ व्योलघुप्रयत्नतरः शाक० २५० २३८ शकन्यादिषु च १४७ रोरि २५६ शरः खयः २२४ रोऽसुपि २८८ शरोऽचि २३० लग ७ शपरे विसर्जनीयः २६१ २५१ शर्पकरणे खपरे लोपः २६३ शश्छोऽटि २४० २२१ १४ २१८ १८१ शि तुक् २०३ १९८ शे ५९ वा शरि २६२ श्चुत्वं धुड विधी १२६ वा शप्रेकरणे खरे लोपः २६३ परवतुकोरसिद्धः ११६ वा सुप्यापिशले १४४ पष्ठी स्थानयोगा ८३ वा हतजग्धयोः २८८ पष्टयाः पतिपुचपृष्ठ विचार्यमाणानाम् २१४ ४२ ष्टुना ः ११४ संपर्युपेभ्यः करोती भूपणे २९८ विभाषा पृष्टप्रतिवचने हेः ३८ सघुकानां सत्वम् २०० ११७ विभाषा भवद्भगवदघवता० २९५ संप्रसारणडीट्स सिद्धः विरामोऽवसानम् १५९ ७६ संप्रसारणाच्च विश्वजनादीनां छन्दस्यु० २१२ संयुद्धौ शाकल्यस्येतावना ६२ विकिरः शकुनिर्वा ३१७ संयोगादिलोपः संयोगा० १२३ विसर्जनीयस्य सः २६० १२१ संयोगान्तलोपो रोरुत्व १८ संहितायाम २०७ घृद्धिरादैच लोपः शाकल्यस्य वर्चस्केऽवस्करः वसुलंसुध्वंस्खन हां दः वाक्यस्य टेलत उदात्तः वान्तो यि प्रत्यय वा पदान्तस्य विप्रतिषेधे परं कार्यम् १३४ २४६ १०१ सूत्र क्रमाङ्ग सूत्र क्रमाक सम. सुटि २९९ स्थानेऽन्तरतमः समर्थ. पदविधि. स्यश्छन्दसि बहुलम् समवाये च ३०१ खरूपं शब्दस्या० समासप्रत्ययविधी १०९ खतवान् पायो ३३२ समो हिततयोर्वा लोपः ३०९ स्वरितमानेडितेऽसूया. ४८ समतुमुनो. कामे लोपो० ३१० स्वरितेनाधिकारः ११३ सर्वत्र विभाषा गो. १६८ स्वादिरेरिणो १३८ सर्वन शाकल्यस्य २३२ ह य व र ६ ससजुपोरु २४४ १५ सिब्लोप एकादेशे सिद्धो० १२२ हलन्त्यम् सित्तद्विशेषाणा वृक्षाद्यर्थम् १०२ २५५ सिन्नित्यसमासयो.. १७४ हलोऽनन्तराः सयोग सीमन्तः केशेषु १४८ हलो यमा यमि लोप २९६ हशि च सुमिडन्त पदम् हिंसाया प्रतेश्च ३०४ साऽ चि लोपे चेत० २४७ हेमपर वा १९४ साऽपदादावनत्र्ययस्ये २६६ हैहेप्रयोगे हैहयो सोऽपदादो २६५ हृदय्या आप उपसख्यानम १८८ स्तो चुना श्चु २१३ हस्वस्य पिति कृति तुक स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ ९० हस्त्राचन्द्रोत्तरपदे मन्ने ३१८ हलि सर्वेषाम् २४२ २५४ सुद कात् पूर्व २०६ पृह N ८ २९ संशोधनपत्रम् पडित अशुद्ध शुद्ध और कभी और न कभी यज्ञकाण्ड याज्याकाण्ड प्रयत्य प्रत्यय यहां प्रोष्ठस्थानी गम यहां गम धातु धातु के के ओष्ठस्थानी (आ०६।१७०) (सन्धि २०६) चिकीर्ष चिकीर्द १५ कि स्थानी कि कार्य करने के लिये ] स्थानी पुष्पमित्र पुष्यमित्र चवो च्वो २१ सेएकादेश में पूर्वरूप एकादेश १९ प्रत्ययभा० प्रत्यय भा० वा-सुप्या वासुप्या स्तोश्चुना ६२ स्तोः चुना मधु+उ मधु+अर्ण २ २२,२५ गुणसंज्ञक कुमारि रक्ष गुणवाची कुमारी माम नित्ये वचनम् अप्सरा अफसरा 'अग्नि वेदों में गोप्पदमरण्यम् नित्यवचनम अपसरा: फसरा: ७ ९ ९६ ९९ ११६ wr ९ १८ १३४ ७७ स्यश्छन्दसि बहुलम् २४६ खतवान् पायो ६ सूत्र क्रमाङ्क सून समः सुटि २९९ स्थानेऽन्तरतमः समर्थः पविधिः समवाये च ३०१ स्वरू५ शब्दस्या १०१ -समासप्रत्ययविधी १०९ ३३२ समो हिततयोर्वा लोपः ३०९ स्वरिसमामेडितेऽसूया० ४८ समतुमुनोः कामे लोपो० ३१० स्वरितेनाधिकारः ११३ सर्वत्र विभाषा गोः १६८ स्वादिरेरिणो १३८ सर्वत्र शाकल्यस्य २३२ ह य वर ससजुषो रु २४४ १५ सिन्लोप एकादेशे सिद्धो० १२२ हलन्त्यम् सित्तद्विशेषाणां वृक्षाद्यर्थम् १०२ हलि सर्वेषाम् २५५ सिनित्यसमासयोः० १७४ हनोऽनन्तराः संयोग २० सीमन्तः केशेषु १४८ हलो यमां यमि लोप २४२ २९६ हशि च २५४ सुप्तिङन्तं पद्म हिंसायां प्रतेश्च ३०४ सोऽ चि लोपे चेत० २४७ हेमपरे वा १९४ -साऽपदादावनव्ययस्य २६६ हैहेप्रयोगे हैहयो सोऽपदादो २६५ हृदय्या आप उपसंख्यानम् १८८ स्तो श्चुना श्चुः २१३ हस्वस्य पिति कृति तुक २०६ स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ ९० हवाञ्चन्द्रोत्तरपदे मन्ने ३१८ सुट् कात् पूर्वः ७० -- संशोधनपत्रम् ५४ परिक्त १९ और कभी और न कभी यज्ञकाण्ड याज्याकाण्ड प्रयत्य प्रत्यय यहां श्रोष्ठस्थानी गम यहां गम धातु धातु के के प्रोष्ठम्यानी (मा०६।१७०) (सन्धि २०६) चिकीर्ष चिकीर्द कि स्थानी कि [ कार्य करने के लिये ] स्थानी पुष्पमित्र पुष्यमित्र पो च्चो से एकादेश से पूर्वरूप एकादेश प्रत्ययभा० १५ २१ ११ वा-सुप्या प्रत्यये भा० वा सुप्या स्तोःश्चुना स्तोश्चुना मधु+उर्ण मधु+ऊर्णा २ २२.२२ २२,२५ रत गुणवाची कुमारी माम नित्ये वचनम् ७ ९ गुगसंज्ञक कुमारि माल नित्यवचनम् अप्सरा: अफसराः 'अमिन वेदों में, अगोष्पदमरण्यम w or असरा 'अमिः वेदों में गोप्पदमरण्यम्
संस्कृत व्याकरण पढ़ने वालों के लिये
भपूर्व भवसर
वेदाङ्ग-प्रकाश का शुद्ध संस्करण
वेदानप्रकाश के शुद्ध और मुन्दर संस्करण
की भावश्यकता का अनुभव चिरकाल से किया जा
रहा था। वेदामकाश के कई भाग गरन मेन्ट
संस्कृत कॉलेज बनारस की परीक्षामों के पाठक्रम
में स्वीकृत हो गये हैं। अतः हमने मण्डल की मोर
से इन के शुद, मन्दर और बात्रोपयोगी टिप.
पियों से युक्त संस्करण छपवाने का व्यवस्था की है।
१-सन्धिविषय-रूप गया।
२-आख्यातिक-छप रहा है । शीघ्र
प्रकाशित होगा। शेष भाग भी यथासंभव
शीघ्र प्रकाशित होंगे।
प्रपन्धका-
प्राय साहित्य मण्डल लि., अजमेर,
मून्य 1)