Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Subodh Vyakaram Koumudi

Pt. Ramsundar Sharma · 2011/08

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Ipproved text book in Bengal, Bihar, C.F.. Punja
-
Rहामहोपाध्याय पण्डित यरचन्द्र विद्यासागर
संस्कृत
सुवोध-व्याकरण-कौमुदी
हारोमा ।
बिlanc
এবিয়ন মন্তব্য সম্মা কালীগ
धारा मम्पादित
पुपोष मधमाशा काप्यालय,
TuelatiCS1
niral

भूमिका। ध्याफरणा कौमुदी की रचना द्वारा महामहोपाध्याय पण्डित श्वरचन्द्र विद्यासागर में विद्यारियों का बड़ा ही उपकार किया है। इसके द्वारा सुगम रीति से संस्कृत सीखने में उन्हें बड़ी सहायता मिलती है। यह पुस्तक भारत के प्रत्येक प्रान्तों में प्रचलित है। यंगला में इसके अनेक प्रकार के संस्करण निकल चुके है जिससे हाई स्कूल तथा कालेज के विद्यार्थी महान् लाम उठा रहे हैं। हिन्दी में भी इसके दो तीन प्रकार के संस्करप अयश्य निकले हैं, पर उनसे युनिसिटी के परीक्षाथियों के सभी आवश्यकतायें पूरी नहीं होती तथा मूल्य भी अधिक रखा गया है। विद्यार्थियों को इन्दी अमुविधाओं की पूर्ति के विचार से मैंने सुबोध व्याकरण कौमुदी नामक यह नवीन संस्करण प्रकाशित किया है। शब्दरूप में सर्वत्र प्रेजी अर्थ सहित शब्दों की सूचियाँ दी गयी है। धातुरूप में भी इसी प्रकार अंग्रेजी-अर्थ सहित धातुओं की वृहत् सूचियां दे दी गयी धातुरूप में लुङ्ता लिट् लकार बड़े ही कठिन है भतपय लुङ् लकार ७ भागों में और लिट् दो भागों में विभक्त करके समझाया गया है जिससे विद्यार्थियों के लिये बड़ा ही सरल और सुयोध हो गया है। ऐसे ही विषय को सरल प सुयोध करने के लिये अनेक स्थानों के क्रम में परिवर्तन कर दिया गया है।यीच २ में क्रियाविशेषण Degree of comparison पादि अनेक विषय बढ़ा दिये गये है। प्रायः प्रत्येक स्थलों में पाणिनि के संस्कृत सूत्र भी दे दिये गये है जिससे विद्याथीं Ara कण्ठस्थ कर सकें । सर्वत्र यीच २ में श्रमास दिये गये २ इनके मनन य अभ्यास से विषय के पूर्णतया योध होने में

विधापियों को बड़ी ही सहायता मिलेगी। मन्त में
के सुमति के लिये अक्षर के प्रमानुमार अंग्रेजी ।
रूप सहित प्रत्येक धातुओं की एक सूची दे दी ग
इसके उपराल भनुवाद की सुविधा के लिये अंग्रेजी
धातुभो की सूवी मी Alphabets ( अक्षरों ) के
गयी है। विषय को सरल य सुशोध करने के लिये
साध्य पूर्ण प्रपत किया है, पर मैं इसमें कहाँ सका।
हैं, इसका निर्णय सहक पाठक ही कर सकते है
वर्ष उक्त पण्डित जी की संस्कृत व्याकरण की उ
का सुबोध संस्कृत व्याकरण नामक नवीन संस्कर
किया था इसे शिक्षकों तथा विद्यार्थियों में ऐस
समझा कि बिहार में तो इसका सर्वत्र प्रचार हुआ।
अतिरिक्त यंगाल, यू० पी० और सी० पी० की
कमिटियों ने भी इसे अपने यहाँ टेक्स्ट धुक रख !
उत्साहित किया है। इसके निमित्त मैं सयों का
हैं। सुबोध संस्कृत व्याकरण का इस प्रकार भाद
पूर्ण विश्वास है कि शिक्षक, विद्यार्थी तथा शिक्षा
कम्मेवारी इस सुबोध ब्याकरण कौमुदी को
अपनायंगे, क्योंकि मैंने इसे सुगध संस्कृत व्याकरण
अधिक उपयोगी बनाने का पूर्ण प्रपन्न किया है, य
इससे विद्याधियों का कुछ उपकार हुआ तो में म
सफल समगा।
विद्यार्थियों की सुविधा के लिये इसके चारों
अलग और एक साथ भी प्रकाशित किये जा रहे है
प्रकार की सुविधा हो उसी प्रकार लास उठाने की
आप का विनति-
रामसुन्दर शर्मा।

(सुबोध व्याकरण कौमुदी) | Panulit Ramsındar Sharma Kavgalırtha, H + Zila School, Ranchi. is book on Sanskrit grammar is not a mere Hi ation of Vidyasagar's Kaumudi but. Pandit Ra Sharma has made various improvements on Only the fourth part of Vidyasagar's Kaum ed Satras but, in the peresent publication the auth en Sanskrit Sutras in the 3 preceding parts as we en in the fourth part Panini's aphorisms have at plac niven side by side with Vidyasagar's Sutras. TI feature of the pablication renders it highly valuat vanced students. The expositions of the Sutras a concisa and accurate. A large number of exercis rection and for translations from English and Hin Enskrit and vice versa, makes the work immense le for students. This excellent publication us pri tly fit to be rulopted ng A text-book in Schools ar $. The equipment the student will get from i $ sure to be thorough and efficient. Sd. Kashi Prasad Shastri, KAVYATIKTUA, M. A., IL L., M. O. L. (Examiner of Sanskrit Title Examination etc.) whoath t'yalarn Kaumaale" has been vervably by l'atutit lamtumiar Surina, Kalyuttha of : The geral arrangement of the subject matter 18 try. Thz alithar hus tikrn grit D1224 in arefully 15.4 bank which 14 Ach lu lay sefer mense on the whole of the student work, to art at every slik, excellent KTOUD4 of merciee4 **** 13. f* fedut of the edition they aro Land artrim that they will be of great 14 Alletin mustring thn intx k1e4 of Sanskrit 7.

- The chapter dealing with समास, तद्धित and कृदन्त are so complete that any student who knows them thoroughly will scarcely require the study of any other grammar for his ordinary purposes. This attempt of the author is very commendable by issuing this work. He has removed the long-felt want of good Sanskrit grammar in Hindi. No doubt, the present book will not only serve the purposes of High School stu. dents but riay, with advantages, be consulted also by yunior students in colleges. In my oprason the author has eminently succeeded in bis object. Sd. Ram Pratap Shastri, VIDYANIDHI, VIDYABHUSHAX, Senior Professor of Sanskrit Gorl. Morris College, Nagpur (c. p.) प्रातःस्मरणीय प. ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने व्याकरण कौमुदी रच. कर छात्रों का बढ़ा दी उपकार किया, पर साथ ही साथ उन के इस उपकार से कुछेक विद्यार्थियों को कुछ भपकार भी हो जाया करता है। ऊपर की कक्षाओं में व्याकरण कौमुदी के सूत्रों का ज्ञान नितान्त निर. भक हो जाता है और परिणाम यह होता है कि बहुतेरे पात्र व्याकरण- कौमुदी के सूत्रों को भुला पाणिनि के सूत्री के उलझन में पद संस्कृत के ध्ययन से हताश हो जाते हैं । यदि भारम्भ काल ही में ये होनहार बालक पाणिनि के सूों से कुछ परिचित हो जाते तो शायद उनको दुबास परिधम उपर के प्रमों में नहीं करना पड़ता। बड़े हर्ष की बात है कि परामसुन्दर शम्मा जी ने छात्रों को इस असुविधा को बड़े ही सरल तरीके से हटा दिया है। बहुत से छात्र संस्कृत केवल मैट्रिक परीक्षा भालानी से पास कर लेने के विधार से ही पदवे है। उनके लिये तो पाकरण कौमुदी का माययन ही श्रेयस्कर है। परन्तु जो छात्र उपर भी संस्कृत पड़ना तया प्रौदता प्राप्त करना चाहते हैं उनके लिये प्रारम्भ

.
मा पनिगुतो लापन MRI मो
नेता at mma पंगा font
धार Tiffarm mmH Tr
सायनिताnt Tीरे में पानी
दिपेगे जिसे माम में भी
HTTET में भी गया होगी जो nिet
पा नि in माना है. उ पाक की गाने
पाम पांगी पानाडा में मी पाणिनि
कामेोपारमिगे।
विशेषतापपुर भागामाकी भामार , जो
मम्माम मरे परे । नापी या भामापी जाँ
जिये, वही मे से न पा पाभों समाबी लिस्ट
रानो मीत मिली मिलेगी। इसके विाय अन्याय
भी किसी प्रकार की कमी मही निगमे पात्रों को अपने
परधी शाम को प्रयोग में देखने या लाने का भावा मुषोग
-
'सायस संस्करण की एक और सूबी यह है कि सीमान्
इस के अन्त में पातु पाठ और शब्द-कोर भी जोड़ रखा है
र्थियों को अपने संस्कृत अध्ययन काल में अन्यान्य पुस्तकों
मीन खटकने पावे।
राशा ही नहीं, परन् पूर्ण विश्वास है कि संस्कृत प्रेमी यात्रा
-गण इस संस्करण को अपनाकर उ पण्डितजी के परिश्रम
साहित्याचार्य १० परमेश्वर प्रसाद शर्मा
एम. प., पी. एल.
Senior Sanskrit Professor.

सरल पृष्ठ .... ९१ प्रकरण ८० Geen " .... सूचीपत्र । प्रथम अध्याय रण पृष्ठप्रकरण निर्णय १ व्यञ्जनान्त शब्द:- if का उच्चारण स्थान ३ पुंल्लिा और स्त्रीजित भाषा.... क्लीवलित ६ | सर्वनाम... ८६ स्वरसन्धि ६ सय॑नाम से उत्पन्न व्यसन सन्धि १२ क्रियाविशेषण विसर्ग सन्धि संख्यावाचक विधान क्रियाविशेषण १.३ विधान २६ | Degree of comparison पण... थव्यय... ३२ १०८ उपसर्ग न्त-प्रकरण ३५ क्रियाविशेषण १२ परान्त पुंलित शब्द संयोजकादि १११ स्त्रीलिज शन्द १७ विस्मयादिबोधक क्लीवलिङ्ग शब्द द्वियीय अध्याय। त... १२१ स्वादि... त की मारुति १२२ प्रयादि लोट् , लङ् , विधिलिङ रुधादि, अदादि, हादि सन्धि १५६ TTTT ( Group I) रण नियम के विशेष नियम १२५ रधादि १६. १२६ भदादि दि १३१ द्वादि... दि ११२ दि अभ्यस्त के नियम भाग (Group II) र (इट् ) विधान तनादि. १५० । लुट्,लदलङ् " १७ अतिरिक्त भव्यय ... ११८ ... सनादि ... ... RRCH ... दि ... ... ... ....

1 शामिद - 1. १२२ १२५ Rorluplicatire eriphrasti: ... .. ... - ... ... ... १.. परम्म विधान मारमने निधान प्रार पवासामोर मामाभा५७ २. लकार निर्णय सूतीय मध्याय। एम.प्रकरण २४१ । नित्य विधि उणादिप्रत्ययान्त शम्न ३०१ सुद प्रत्याहार धातु मध्याय विमति निर्णय ३१३ । स्त्री.प्रत्यय अपमा २१.समास.. द्वितीया आयपीभाव पुरुष ११२ तृतीया . .चतुर्थी कर्मधारय ५२२ ४२५ पष्ठी बहुमीहि सप्तमी ३२५ अलुक... vt कारक ३२६ मध्यपदलोपी कर्ता ३२८ सयसमाससाधारणविधि४५१ करण... सम्प्रदान 0 सर्व समास शेष अपादान ३३४ | लिङ्गानुशासन अधिकरण ४७० तद्धित ३३६ ! English Sanskrit Verbs ... ... पक्षमी ... ... ... .. ... ... ३३० । पूय निपात ... ... ३३६ धातुकोप ... ... . ...

र्णय
Alphabets.
वर्ण
स्वर और ध्यान। जिन या के
की सहायता नहीं लेनी पड़ती; उन्हें
वर्ण दो प्रकार के
के उच्चारण करने में स्परषों की
स्चारण में अन्य पर्ण इन्हें व्यजनरर्ण कहते है ।।
पर कहते है। जिन परवर्ण-Vowels.
हायता लेनी पड़ती ल ए ऐ यो यो, ये १३ स्वरवर्ण
सारभो।ऐ भौ । हायपरट् । ल
सभा उजा। प६५५जनगर। सफ
उ । इल
RETAR | झम है। श (प्रत्याहार) की गणना के
को छोर देते। यथा, मग से 13
उयचता पम् ।
म जो ऐ औ (सर स्वर पो तथाल से
अप्रत्येक एप के हलत ,
है। मे हो भाइ, एल.
मन में
पार, पर, मल्यादि प्रत्याहार
यजनानो कापी गणना करनी चाहिये।
भा.र..गर्न
.

मैं और पमिलकर क्ष होता है इसलिये यह संयुक्त वर्ग में गिना जाता है।
२
मात्र मुगा
२३ प्र*.. RET USurt atta
(I.C)
... नमारमा
पर मामी मारामाला
HT-Consonant.
गगनझम,४१.पापम,
कमम, परम, शम -( ) :).ये
या है।
()योमारगाना:-क से महक २१,पों को सशंर्ग
पारी मोकिनिका के मप्र, मग भीर मूल इत्यादि पानी
कोपर्यापार में इनका उच्चारण होता । वर्ण पाच
भाग में विमन है; कार्ग-पगघ, मार्ग-2 म
प्र, वर्ग-2८८ ण, वर्ग-धम, पार्ग-पफब
(२) य र ल वा अन्तःस्था:-स्पर्श भार उध्मयों के बीच
में रहने से घरलपको अन्तःस्म करते हैं।
(३ ) प स हा माण:-शप स६, इनके उच्चारण में
अधिक उप्मा (यायु ) पार मिपालती है, इसलिये इन्हें ऊष्म
पूर्ण करते हैं।
BC) भनुम्बार गौर (:) विसर्ग को अयोगवाह कहते हैं,
योंकि और गान में अनुस्वार तयार और स् के स्थान
में विसर्ग होने के कारण पाणिनीय भ्याकरण में इसका उल्लेख
(योग) मा थापि प्रयोग में उसका कार्य (बहन) करता है।
के प्रथम, द्वितीय वर्ण तथा श प स को अपोषण

भार वर्ग के तृतीय, चतुर्ण, पामर तरह की पर करने है। पपम, सूतीय भार पशम पर्ण को rary नया दिनील गार गनुको को मार है। या का उपारण-स्थान । . भारतिमानापाना :--पाक गभीर र) विसर्ग का कारण फण्ट से दोताद इसलिये इन्द (Guntural) कहते है। २६वधानान्तनु- ज झ भय भीरका उच्चारणस्थान तालु है। इसलिये न्दै वालव्यवर्ग ( Palatal) ३दरपणो मू- घरट४१८ रमौर पका उच्चारणस्थान मूसा है, इसरिये इन्हें गून्य ( Cerebral) ४ हलमानां पता:-ल त प ६ ध न ल और सका उच्चारणस्थान दन्त है, इसलिये न्हें इन्स्यवर्ग ( Dentat) कहते है। ५ एपनीयानामोटो-उ अपफयम और मका उar- रणस्थान ओष्ठ है, इसलिये इन्हें भोष्श्वर्ण (Labial) कहते है। ६ एदेतो कप्ताल-ए और ऐ के उच्चारणस्थान फपर और तालु है, इसलिये इन्हें कतालव्य वर्ण ( Palato-guttural) कहने हैं। मोदीतीगलौटम् --थो मौर भी के उच्चारणस्थत कण्ट और ओष्ठ है; इसलिये इन्हें कएलोप्ट्याण ( Labioguttural ) ८.कारस्य दन्नौम्य के उच्चारणस्थान दन्त और पोष्ट wfret T. That were t} कने treatm4tarith- . HTTETratak in TIMeafraternm. frमा 31-ATER, ITIOfrre पा(nelione fre मेनपामार प्रदा भा-नापी घr-faminापार at Pratil rones) महारा, भगा हर, इन दिन ~~uাসন্ন: মাসিম-নি पस्तुया यमन के विशेषण फावापानीमा ( Nominal Dases) हैं। बागप-गन्द, सूर्य, लता, जल, वायु, गृहस्थापितु का विनोमवारक- स्थिर, प्रयल, नूतन, पुरातन, मन, सुन्दर पादित २ प्रत्यय-धातु मोर मातिपदिक पर जो मगाया जा हैं उसे प्रत्यय कहते हैं। प्रत्यय पोय प्रकार के होते है, पिर कृत, तक्षिप्त, स्त्री प्रत्यय मोर धात्यययय । विभक्ति-"विविश्य -धातु के परे ति सः मन्ति स्या भौर प्रातिपदिक फे परे भो, भः इत्यादि जो सय प्रत्यय हो

L
संत
उन्दै निधि ( Inflections) ही है।
r-धातु के परे सभ्य, य, त्या पारि सो सर पर
होते है उन्दर( Vartal fullixec ) कहते है।
सदिन-प्रातिपदिक थे पर ययादि जो सब प्रत्यय
दोन है उन्हें सस्ति (Nominal suffixes) पाहते हैं।
चीनस्यय-त्रालिट्र में भास्यापि जो सघ सयप होते
है उन्हें अपर ( Feminine suffixes) कहते हैं।
पात्या-पानु के परे णिच् मन् स्यादि तथा प्रातिपदिक
कपर.य, काम्य हरयादि ओमय प्रत्यय होते हैं उन्दै पावश्यक
( Parts of roots) पदते हैं।
३ पर-"तुमिन पदम"-भानु और प्रातिपरिक पि.
भक्तियुक्त होने से १३ ( Infiected worda ) कहलाते हैं।
भांश-प्रकृति और प्रत्यय रुपपरियतन को मादेश
पहने है। यथा, वृद्ध शहद के स्थान में ज्य, स्या धातु के म्यान
में तिष्ठ, सन् विमति के स्थान में उ: स्यादि।
५ गुण-"मदेव गुण:"-स्यर के गुण से पद समझा जाता
किरके धान में प, ऊ के स्थान में मो, के स्थान
में भर्ल के स्थान में अल् दोता है।
६ दि-"द्धिरादर"-स्था की वृद्धि कहने से पह समझा
जाता है कि के स्थान में प्राई के स्थान में ऐ, उ ऊ के
मशान में भी, और घर के स्थान में भार होता है।
७ लघु व गुरु-हस्वं लघुः संयोगे गुदा-हस्य स्थर
को मधु और दीर्घ स्वर को गुरु पाहते हैं। संयुक्त वर्ण के पूर्व
हस्य स्थर को भी गुरु कहते है।
उपसर्ग- उपसर्गाः क्रियायोगे-मिपा फे सायोगहोने
। मे प्र, अप, भय, उप, आ, परा, नि, पि, परि, प्रति, गति, मधि,
-
A

६
ध्याकरण कौमुदी
अपि, भगि, उ, अनु, उत् (उद्य), सम, निर पुर इन २०॥
को उपरागं ( Prepositional prefixes ) फाईने है।
९ रावर्ग-"तुल्याम्यप्रयत्नं मयर्णम्" -ममानपान
प्रयत्न द्वारा उधारण किये हुए वर्गों की सर्ग मंशा होती
यथा, भ, था, इ, ई, 3, ऊ, ऋ, स्यादित पर एक स्थान
उच्चारण किये जाने के कारण म्परयर्ण और व्यअनयर्ण
सवर्णता नहीं होती। स्वरवर्ण की स्वरवर्ण के साथ मोर ।
अनयर्ण फी ध्यानयर्ण के साथ मयर्णता होती है ।
१० टि-अयोऽन्त्यादि टि"-शरद के अन्त्य स्वर से ले
आगे के पणों की टि संशा होती है।
११ सपधा-शब्द के अन्त्य वर्ण के पूर्व पर्ण को उ
कहते हैं।
सन्धि-प्रकरण ।
दो वर्ण परस्पर निकट होने से मिल जाते हैं। इसी
को या मेल से जो विकार होता है उसे सन्धि कहते हैं।
३
(१) स्वरसन्धि-स्वरवर्ण के साथ स्वरवर्ण की जो सनि
होती है उसे स्वरसन्धि कहते हैं।
(२) व्यक्षसन्धि-व्यञ्जनवर्ण के साथ स्वरवर्ण या ध्या
वर्ण की जो सन्धि होती है उसे व्यञ्जनसन्धि कहते हैं।
(३) विसर्गसन्धि-विसर्ग के साथ स्वरवर्ण या व्यञ्जनय
की जो सन्धि होती है उसे विसर्गसन्धि कहते हैं।
स्वरसन्धि ।
(B) रावणे दोषः-दो सवर्ण (समान स्वर हस्थ
पी) इफट होने से दोनों मिलकर दीर्य हो जाते हैं। यथ

सन्धि:प्रकरण।
७
ट
(९) शश+ अङ्क:-शशाङ्क कुश+भासनम् = कुशासनम,
1 + अर्णयः दयाणेघः, विद्या + आलयः - विद्यालयः ।
गिरि + इन्दः - गिरीन्दः, क्षिति + ईश:
क्षितीशा,
महतीच्छा, पृथ्वी + ईश्वर = पृथ्वीश्वरः।
पिधु + उदय: विधूदयः, लघु + अर्मि: लघुर्मिः,
म्भू + उदयः - स्वयम्भूदया, + ऊर्द्धम् = भूईम्
पितृ + णम् = पितृणम् । भ्रातृ + ऋद्धिः भ्रातृद्धि ।
शकन्ध्यादिषु पररूपं धाच्यं । तच्च टेः-शकन्धु इल
रस्प भादेश होता है । पूर्व शद में टि का लोप होता है।
-अन्धुमशक, कक+अन्धुः कन्धः, मनस + ईषा-
ई-हलीपा, लाल + ईप % लागलीषा, कुल + अथः
+ भन्जलि: = पतञ्जलिः, सार + ag: = सारङ्गः, सं
3 सीमन्तः, मार्त + अण्डः- मार्सगडः।
'२) आद्गुण:--दि हाच या दीर्घ भ के परे ह्रस्व य
म आये तो ममिल कर ए, भउ मिल कर ओ:
लकर अर हो जाते हैं। यथा, (१) देव+ इन्द्रः =i
ईशः = गणेशः, महा + इन्द्रः महेन्द्रः, रमा+
1(२) नील + उत्पलम् = नीलोत्पलम्, एक जना
नविशतिः, गङ्गा + उदकम् - गगोदकम्, महा +
मिः । (३) देव + ऋषिः देवर्षिः, दिम + मृतुः
ऋषिः = मदर्षिः, देवता + ऋषभः = देवतर्षभः ।
1. B.१ स्वादोरेरिणो:~स्य के परे ईर और र
द्व होती है। यथा, स्व + ईर- रचरः। स्व+।
गी। स्वैर, स्वैरी।
अक्षाहिन्यामुपसंख्यानम् ~अक्ष के परे ऊहिनी

८ ध्याकरण कौमुदी। दोनों मिल पर मी (छि होता है। गया, गन + कहिनी भक्षोहिणी। ३ प्रादहोतोयय ये-के पर कद, अठ, अहि रहे तो दोनों मिलफर भी ( वृद्धि होता है और पपया प्य परे रहने से ऐ होता है। यथा, प्र + ऊहः = प्रौदः, प्र + ढः = प्रौटा,प्र. कटि = प्रोतिः, प्र + एपः = प्रयः, + १घ्यः प्रेष्यः । ४ वत्सस्कम्बलयसनाणेदशानाम-प्र, यार, फम्पल, यसन ऋण और दश के परेण शब्द हो तो अ और मिल कर पार होता है । यथा, प्र+ऋणम् = प्रार्णम्, यत्सर + ऋणम् वत्सरार्णम्, फम्यल + ऋणम् = कम्यलार्णम् इत्यादि । ५ ते च तृतीयासमासे-अकार या आकार के परे त शब्द के रहने से तृतीया तत्पुरुष समान होने पर दोनों मिल कर पार होता है । यथा, शीत मृतः = शीतातः। पर तृतीय समास भिन्न-परम + ऋतः = परमतः। ६ उपसर्गादृतिधातौ-यदि उपसर्ग के अ या मा के परे धातु फी ऋ हो तो दोनों मिल कर आर (वृद्धि ) होता है। यथा, अपच्छति = अपार्छति। (३) वृद्धिरेचि-हस्य या दीर्घ के परे ए, ऐ, ओ, मी आये तो अ.ए. या अ ऐ मिलकर ऐ तथा अओ या अमओ मिलकर औ हो जाते हैं। यथा, (१) एक+ एकम् = एकैकम्, मत+ मतेषयम्, सदा + एव = सदेव, महा + ऐरावतः मदरावतः । (२) जल + ओघः = जलौघः, चित्त + औदार्यम् चित्तौदार्यम् . महा + भौषधिः = महौषधिः, महा + औदा- व्यम् = महोदार्णम् । १ ओस्वोम्योः समासे वा-अकार या भो या भोष्ठ हो और समास हो तो अकार या आकार का ऐक्यम् आकार के परे सन्धि.प्रफरण। विकल्प से लोप होता है। यथा, स्थूल + भोतुः - स्थूलोतुः पलीतुः ( मोटी दिल्ली), पिम्य+मोष्ठः=यिम्योष्ठः, विम्योष्ठः । समास नहीं होने से नहीं होता। यथा, तब + मोठः = तपोष्टः। २१डि पररूपम्-उपसर्ग के अकार या भाकार के परे ( ए और इभिन ) धातु का ए या ओ रो तो या भा का लोप होता। अर्थात पररूप एकादेश होता है । यथा, + एण्यति -प्रेषयति, प + धोखति - उपोखति । पर उप + एधते - अपेधते, भव + एति = अतिः ( एत्ये. धन्युट्सु)। ३ पपे चानियोगे-अकार के परे एव हो और अनियोग अर्थ हो तो दोनों मिल कर ए होता है। यथा, अय+एवं = अषा नियोग अर्य में-अव गरछ। ४ ओमाङोश्च-अकार के परे ओम् या भार (उपसर्ग) रहे तो म का लोप होता है । पथा, शिव + एहि ( आ + इहि ) = शिवेति, शिवाय + ओम नमः शिवायोन्नमः। (४) इको यर्णाचहस्व या दीर्घ इ उ और ऋ के परे कोई भिन्न घर (के गरेई को छोड़ कर दूसरा कोई घर तथा उके पर उ ऊ को और के परे ऋ को छोड़ कर दूसरा कोई स्थर ) आये तो इ का यू, उ का घु और १ का र हो जाता है। यथा, (१) यदि + अपि = यद्यपि, अमि + उदयः = अभ्युदयः, नदी + अम्बु - नयम्यु, देवो + आगता = देव्यागता । (२) अनु + अय:: अन्वयः, सु+मागतम्:स्वागतम् , अनु + पणम् = अन्वेषणम् , सरयू + अम्यु- सरस्वम्वु, वधू + ऐश्वर्यम् - पञ्चेश्चर्यम्। (३) पितृ + अनुमतिः पित्रनुमतिः, पितृ इच्छा-पित्रिश। (५) एचोऽयवाया:-स्वर वर्ण परे रहने से ए ऐ ओ भी के स्थान में क्रम से भय , भाय् , भय, भाय् हो जाते हैं। यथा,

याकरण कौमुदी
= ताश्वरी, तार्य
(१) मनम् - शयनम् , ने+शनम् - नयनम् । (२
वि + अ - विनायकः, स + अकः = सायकः। (३
भो+अनम् = भवनम् , पो + अनः = पनः । (४) पौ+ मात्र
पायक, + उक: : मायुकः।
१ लोप:शाकल्यस्य-पदान्त ए भी ऐऔवेस्थान में होने या
भय, अय्, भाय् , भाय्, के य और एका विकल्प से लोप होत
है। यथा, सखे + मागच्छ - सख भागमछ, मस्त्रयागच्छ ने
एकदा = त एकदा, तयेकदा । प्रमो+आय% प्रभ आगच्छ
प्रभयागच्छ; प्रमो+ एहि = प्रम एहि, प्रमयेहि। श्रिये + अर
= श्रिया अर्थः श्रियायर्थः । ती + ईश्वरी
श्वरी; विधी + उदिते - विधा उदिते, विधायुदिते ।
२धान्तो यि प्रत्यये-ओ और भीके पर ऐसा प्रत्यय आ
जिस के आदि में यहो तो क्रम से आय
हो जाता है
यथा, गो + यम् = गव्यम् ( wilk ); नौ + यम् = नाध्यम् ।
मार्ग परिमाण योघ होने से गो + यूति: = गम्यूतिः (
फोश ) होता है, अन्यत्र गोयूतिः (घेलों का एक जोड़ा)।
गोरखा स्फोटायनस्य-घरघर्ण परे हो तो'गो' पद के भो
विकल्प से अव् होता है । यथा, गो+ ईशः गयेशः, गवीश:
पर इन्द्र और अक्ष शब्द परे होने से नित्य अव होता है। यह
पो+इन्द्रः = गयेन्द्रः, गो + अक्षा - गवाक्षः ( window)|
४ ए पदान्तादचि-पदान्त ए या ओ के परे माये तो
का लोप हो जाता है और के स्थान में एक ऐसा कि
रहता है । यथा, सखे + अर्पय = सखेऽर्पय, ममो + अनुगृहाण
प्रमोऽनुगृहाण।
(६) निप्त लिखित पदों में सम्धि नहीं होती-
(फ) निरात एकाना-मोकारान्त तथा एक स्थर था
अय् और

सन्धि-प्रकरण। अध्यय के साथ उसके परे रहने वाले स्वरों की सन्धि नहीं होती । यथा, महो + अच्युत = अहो अच्युत, आ + एवम् -आपधम्। पर सीमा, व्याप्ति या ईपर्थ बोध होने से या क्रिया के साथ योग होने से आ अव्यय की सन्धि होती है। यथा, सीमा. आ + अध्ययनात् = आध्ययनात्। व्याप्ति-मा+एकदेशात ऐकदेशात् । पिद-भा + आलोचितम् = आलोचितम् । किया. योगे-भा + इहि = पहि। (ख) प्लुतप्रया अचि नित्यम् । इंद्विवचनं प्रगृह्यम्-~प्लुत स्वर तथा द्विवचनान्त ईऊ और एके पर कोई स्वर थावे तो सन्धि नहीं होती। यथा, एहि कृष्ण ३, अत्र गोश्चरति, कवी + इमौ - कधी इमो, साधू + इमी = साधू इमी, विद्य+मे विद्य + (ग) अदसौमात्-प्रदत् शब्द के ईकारान्त भोर ऊकारान्त पदों फी सन्धि नहीं होती। यधा, भमी अश्या-ममी+अश्वाः, अमू अर्भको = अमू भको। अतिरिक्ता पर+भक्षः3 परोक्षः, अन्य + भन्यम् - अन्योन्यम् , किम + इतम् = किम्युक्तम् , विमु उक्तम् । सप्त + अपौशाम् सप्तपीगाम , सप्त ऋषीमाम् । चली + 42%3D चक्रिभत्र, चकपत्र; गो + अप्रम् - गो अपम्, गवाप्रम् । Exercise 1 1. Join the following words:- + प्राप्तीद, श्री+ई, भानु +उपय., साधु + अचुः, क + अजुः, उप + एम.हित उपदेशः, महा +पि, म+पति, सा+एव. + एजते, उप + एति, विम्ब+ भोध, मनाम् +पा, ति + आइ, सप्तऋषीणाम्, विष्णो+ए, गो+ गोऽप्रम् . .

then in the rotri Prem Tr, rmirtire
MARArr. anati RIPATir.
भाभार्गgi An irritt
भाभीयोसी।
B.Correnti-INEMAnam
माग मिrTHAI witTERI WITH Pra
मुभिमा inin iran Mantr wat
पुणमिमा
मपान मन्ति।
(9) लो पुकार-सफार यातना
फे योग होने से मारा और तार्ग का मार्ग हो जाता है
(मार्ग पर चार्ग या मार्ग पर गं गले से माया
नयर्ग के परगने मेतगंका गया हो जाता है, पर शकार
के पर तयर्ग का पर्ग नहीं होता।
१.त् और दु के स्थान में य् ए पर गहने मे ग् और
परे रहने से ज होता है। यथा, महत् + गम् = मायाम, तनु
+ छविः = ताधिः, उत् + जलः = उज्जलः तद् + महाप
मझङ्कारः।
२-ज या झ परे रहने से न के स्थान दोता है। यया,
महान् + जयः + महाञ्जयः, गच्छन् + झटिति = गच्छन्झटिति ।
३-पदान्त त् या दु के परे श् हो तो त्छ के स्थान में
और श् के स्थान में छ होता है। यथा, जगत् + शरण्यः-
जगच्छरण्या, तद् + शरीरम् तच्छरीरम् ।
%3D
६

सन्धि प्रकरण N. B. १. श् च युक हो तो ऐसा नहीं होता। यथा, उस्+ श्चीतति = उतश्चोतति। २ शरयोटि-पदान्त त् या दु के परेश हो तो याकरण लोग दोनों ही पद सिद्ध करते हैं। यथा, महत् + शकटम् - महच्छकटम् महशकटम् तदु+शरीरमन्तच्छरीरम,तच् शरीरम्। ३ भयो होन्यतरस्याम --पदान्त त् या दु के परे ह हो तो त् के स्थान में दु और ह के स्थान में ध् होता है। यथा, उत्+हता उद्धतः, विपद् + हेतुः विपद्धतुःपर ऐसे स्थान में चैयाकरण लोग दो पदमी सिद्ध करते हैं। यथा, उत् + हरणम् = उद्धर- णम्, उदहरणमा तद् + हेयम = तद्धे यम्, तद्व्हेयम् । सानुनासिक वर्ण को छोड़ कर वर्ग के किसी वर्ग से परे हो उस वर्ण के स्थान में निजवर्ग का तृतीय वर्ण और के स्थान में विकापसे उसी वर्ग का चतुर्थ वर्ग हो जाता है। यथा, वाक् + हरिः बाग्धरिः S यार हरिः । ४ पदान्त न से परेश हो तोन का और शु का विकल्प से होता है । यथा, महान् + शब्दः = महा छन्दः महाम् शब्दः । ५चवर्ग के पर न हो तो न के स्थान में - दोता है । यथा, या + मा याचना, यज्+:- पक्षः। (२) ष्टुना टुः--स् या तवर्ग के साथ प्या स्वर्ग का योग होने से स् के स्थान में प और तवर्ग के स्थान स्वर्ग होता है। १-त् और दु के स्थान में टट् पर रहने से ट् तथा इद परे रहने से होता है । यथा, तद् + टीका - तट्टीका, एनद् + टक्कुरः = पतनुषकुरः, उत् + डीनः = उहीनः, एतद् + ढका- एतदका। २-ड्या द् के परे रहने से न के स्थान में ण होता है।

४ ध्याकरण फीमुदी। . यथा, महान् + डामरः = महाण्डामः, मवान् + दुनि भयाण्दुण्डति । ३-५ के परे स् के स्थान में द और धु के स्थान में ह हो- । यथा, आकृ +: = माष्टः, पर+धः = षष्ठः । (३) तोलि~ल् परे रहने से त् दु (सबर्ग) के स्थान में और न के स्थान में अनुस्वार सहित ल् होता है । य वृहत् + ललाटम् = वृहल्ललाटम्, एतद् + लीलोद्यानम् = पतई लोद्यानम्, महान् + लामः = महांल्लामः । (४) मोहस्वादचि मु न्नित्यम्-यदि पदान्त न के पूर्व इस्य स्वर और परे कोई स्वर हो तो म् का द्वित्व हो जात है। यथा, धावन् + अश्वः = धावन्नश्या, हसन् + मागतः- हसन्लागतः । दीर्घ स्वर के परे नहीं होता । यथा, महान् आग्रहः%3D महानाग्रहः । (५) नग्छव्यप्रशान्– पदान्त न के स्थान में च् छ् परे रहते से अनुस्वार और श् , द्, पर रहने से अनुस्वार और तथा त् थ् परे रहने से मनुस्वार होते हैं पश्यन् + चकितः = पश्यंश्चफितः, चलन + टिट्टिमिः = चलं- पिट्टिमिः, पतन + तरः = पतंस्तरुः । (६) नश्चापदान्तस्य झलि-वर्गीय घर्ण परे रहने से पद मध्य में रहने वाले न और म् के स्थान में उसो वर्ग का पञ्चम पर्ण हो जाता है और ऊमवर्ण रहने से अनुस्वार होता है। या, आशन् + का = आशंका, गम् + ता = गन्ता, दन + गानम् = दंशनम् , रम् + स्यते = रस्यते । पर सम् + राट् : मम्राट होता है। (9) मोऽमुस्तास-हात:स्प या ऊप्पयर्ण पर रहने से पदान्त म्का भनुस्वार तथा स्पर्शपर्ण परे रहने से अनुस्वार या म् के और १ 1 यथा.

सन्धि.प्रकरण।
कोपा रहे उसी का पशम पर्ण होता है । यथा, सत्वरम्
पति - सत्यरं धापति, सत्यराधायति; सम् + शयः
शयः, धनम् + ददाति = धनं ददाति, धनन्ददाति।
क) यदि म् के परेय यल हो तो मका अनुस्वार सहित
ल्हो जाता है।
८) च-हस्य स्वर से परे छ् हो तो उसे च सहित ए
गता है और दीर्घ स्वर से परे हो तो विकल्प से होता है;
सया मा के पर अवश्य छ होता है । यथा, परि + छदा-
उदा, वृक्ष छाया-वृक्षच्छाया, मा+छादयतिआच्छादयति,
छिदत् = माच्छिदत्, लक्ष्मी + छाया = लक्ष्मीच्छाया,
छाया।
S) स्थासम्भोः पूर्वस्य-उत् उपसर्ग के पर था और
धातु के स् का लोप होता है। यथा, उत् + स्थानम् -
मि, उत् + स्तम्भनम् % उत्तम्भनम् ।
१.) लाजशोऽन्ते--स्वरवर्ण, वर्ग का तृतीय या चतुर्थ
प्रिल यह परे रहने से असानुनासिक वर्गीय वी
न निज वर्ग का तृतीय वर्ण हो जाता है। यथा, दिक्
- दिगन्तः, याक् + जालम् = वागजालम्, दिक् +
दिग्दस्ती (१-३ का N. B देखो), अच् + अन्तः-
, सम्राट् + मागतः = सम्राडापतः, जगत् + आदिः
देः, अप् + जम् - अजम् ।
1१) खरिच-वर्ग का प्रथम, द्वितीय वर्ण या श्प्स परे
असानुनासिक वर्गीय वर्गों के स्थान में निज वर्गका
र्ण हो जाता है । यथा, ककुम् + प्रान्तः - ककुपमान्तः,
, पतति दशत्पतति ।
११) यरोनुनासिकेऽनुनासिको वा न या म परे रहने से
-
4

केवल धरणे दोकाापा, पार + मातम्यामारन
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TAIT in inri nangi
Ram | mr.firm freनाय.
दिन: जग + माग - TAIME LATE: net
मतः महिमामा, मानिमा T +- HTTE
गमयम् , म+मान AIAR , मागम् ।
(5) नानातिना~िमाम (मका
मपति भी मार न होता है।
पपा, पद+मति पनि
(1) प्रत्यये मागमा निम्-माया माम् पर गहने से
यित् + मयम् = गिन्मयम् ।
(१३) अयोहाभ्याम् t-रया हो परे कामों को
भाप ध्यअन पर्चा का शिकामे यापा, कर्म,
फर्म; सध्यम् सर्वम् । पर दर्शनम्, ममः । बिश्य होने से प्रारम्न
पाले द्वितीय भीर चतुर्थयों का सम से प्रथम और हनीयपणे
हो जाता है । यथा, मूर्दा, मूर्धा ।
(१४) णोःकुक टुक शरि-शस् परे रहने से हुया.
के परे विकल्प से यथामाम क्या दफा भागम होता है। यथा,
प्राङ् + पठः = प्राड्पष्टः, प्रासष्ठः, सुगण + षष्ठः = सुगपछ
सुगण्ट्पष्टः।
(१५) समः मुटि-कृया धातु से बने हुए शब्द के परे
रहने से सम् के म् का अनुस्वार और स् होता है। यथा, सम.
कृतः = संस्कृतः, सम् + कर्ता संस्कर्ता।
(१६) प्रमः खय्यपरे–धर्ग के प्रथम और द्वितीय वर्ण के परे
रहने से पुम् के म् का अनुस्वार और श् या स् होता है । यथा,
पुम् + कोकिलः = पुंस्कोकिला, पुम् + चकोर:=पुधकोरः।

सन्धि-प्रकरण- (१७) मनस् और काम शब्द परे रहने से तुम् प्रत्यय के मू का लोप होता है । यथा, गन्तुम् + मना:-गन्तुमनाः, कर्तुम् + कामः-फर्स कामः। १८ ससजुपो रुः। खरवसानयोविसर्जनीयः- पद के अन्त में रहने से और कर प् फ् श् स् पर रहने से स् और र के स्थान में विसर्ग होता है । यथा, प्रातर-माता, पहिस् यहिः । Exercise-2 1. Join.-- हरिः + शेते, तत् + टीका, एतद् + मुरारिः, वाक + भयम, उत् + स्थानम् तद् + शिवः, गृहम् + गच्छति, उत् +स्थितिः, तदू+ मायम, जगत् + नाथा, विपत् + कालः, सम्यक् + वदति, लक्ष्मी + छाया, महान् +छेदः, हसन् + आगत, उत्कृष् + त। 2. DIsjonp.- विपञ्चयः, भवानीदतु, राझी, निन्दम, विपदः, महछकरम्. हसरतलति, स्मरसुवास, समीरम्, भवदुक्तम् । दिग्गज 3. Correct:-- बाग्मयम् , विपद्काले, धैर्यमवलम्यस्य । सनादागतः । मेवः सूर्यमाछादयति । इसंचलति युवायो । कोषालय । व्यापार महालाभो भवति। तस्य वाकाइम्बरोऽयम् । विसर्गसन्धि । (१) स्तोः धुना श्चुः । ष्टुना ष्टुः। विसज्जनीयस्य स:- विसर्ग के स्थान में व छ परे रहने से श्, र परे रहने से और त्य परे रहने से स होता है । यथा, पूर्णः+ चन्द्रः- पूर्णचना, सरो+छाया-सरोपवाया, भीत: + निमीतष्टलति, नद्याः + सीरम् = मधास्तीरम, क्षिप्तः + धुत्कार:-क्षिप्तस्युत्कारः। (९पारिश्स् परे रहने से विसर्ग के स्थान में विकल्प से प्रमानुसार शप्स होते है। यथा, सुप्ता। शिशुः । २ व्याकरण कौमुदी। यदि विसर्ग D हस्ता। सुप्तशिशुः, सुप्तः शिशुः; मत्तः + पट्पदः = मनापटाकर मत्तःपटपदा; प्रथमः + सर्गः =प्रथमस्मर्गः, प्रथमः सर्गः। (३) समजुपोरः। अतोरोरप्तादप्लुतः। इशि च- के पहले म भौर पर अ, पर्ग का तृतीय चतुर्थ या पञ्चम वर्ण अथवा य र ल व ह हो तो अ और विसर्ग के स्थान में भी हो जाता है। यथा, नरः + अयम् = नरोऽयम, वेदः + अधीत:: घेदोऽधीतः, शोभनः + गन्धः = शोमनो गन्धः, नूतनः+ घटा नूतनो घटः, शान्तः +रोपः = शान्तो रोपः, कृतः + लोमा कृतो लोमा, शीतः + घायुः = शीतो यायुः, रामः + हस्तः =रामो (१) भो भगो अपो अपूर्वस्य योऽशि-१ यदि विसर्ग के पहले से और परे म को छोड़ कोई स्वर हो तो विसर्ग का लोप होता है। यथा, पुतः + आगतः = कुत आगतः, न. इय = नर इय, देवः + ऋषिः = देव ऋषिः। विसर्ग के स्थान में पक्षान्तर में य भी होता है। यथा, कुतः + आयातः - कुतयायातः। विसर्ग र-जा० ( र से उत्पन्न ) होने से न तो उसका लोप होता है और न पूर्णस्थित भ के साथ मिल कर औ होता है । यथा, पुन + अपि - पुनरपि, प्रातः + एव = प्रातरेव, अन्तः + धानम् अन्तर्धानम् , E + गतः = सर्गतः, दुहितः + मादि •र्यादि । पुनः प्राता, मन्तः, स्या, प्रमृति पदों का या प्रकारान्त सान्दो : गम्बोधन एकावन का विसर्गर-जात विगर्ग है। २ विगर्ग के पहले भा और परे स्वरवर्ग, वर्ग का तृतीय चतुर्भ पधमार्ग थमा रह होवे तो विगर्ग कालोप होता है । स्था, भ+ अमी - भाया अमो, हताः + गाः = इंता गमा - दुहिता सन्धि-प्रकरण। . । r: + धान्ति - अश्वा धान्ति, उपता: + नगाः - उसता नरा: + लभन्ते = नरा लभन्ते, वाता: + थान्ति - शान्ति, · बालकाः + हसन्ति = पालका हसन्ति । स्वरवर्ण होने पर पनान्तर में विसर्ग के स्थान में य होता है । यथा, +इमे गजा इमे, गजायिमे । N. B. विसर्ग के लोप होने पर फिर सन्धि नहीं होती। ५.) समजुपो :--यदि विसर्ग के पहले व भा को छोड़ कर कोई स्वर हो और विसर्ग के परे स्वरवर्ण, वर्ग का तृतीय या पञ्चम वर्ण अथवा य रल्व्ह होये तो विसर्ग के में र होता है । यथा, कविः + अपम् - कविरयम्, रवि '- रयिरदेति, निः + धनः - निर्धनः, घायुः + वाति - ति, शिशुः + हसति = शिशुहसति । ६) ठूलोपे पूर्वस्य दोघोणार परे रहने से विसर्ग के स्थान र होता है उसका लोप होता है और पूर्व स्वर का दीर्घ । यथा, पितः + रक्ष % पिता रक्ष, नि: + रसः - : निः+रोगः - नीरोगः, विधुः + राजते = विधूराजते । क) एतत्तदोसलोपोऽकोरनन्समासे हलि-सः और एषः के पर छोड़ कर अन्य किसी वर्ण के रहने से विसर्ग का लोप और लोप होने पर फिर सन्धि नहीं होती ! या, स:+ =स पागतः, सः+गच्छति स गच्छति, पप:+आयाति आयाति । 'क' प्रत्यय तथा न युक्त होने से यह नियम पता । यथा, एपको रुडः, असः-असो पाति। | भो भगो अघो भपूर्वस्य पोऽशि स्वरवर्ण, वर्ग का चतुर्य पशम वर्ण या यरल ह परे रहने से भोः के का लोप होता है। लोप होने पर फिर सन्धि नहीं होती। ईशान - भो ईशान, मो: गदाधरमो गदाधर। है

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Perfr. Pr Imam TET
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Hindi, Taminी ,"
नमो :, : +in errit irmw
मग,in+ : - Mitram.ne+Keneral
(४) मो भगो भो म मो- aft fr
पदमीर को जारी rat fatar
मापदना। गा- RITEST भागमा
यमरय, देगः +शक्षित देश: frगान
पक्षासर में भी होता है। या, Tr: + wrपाल
पुलगायातः।
विगर्ग र-जात (र से सपा ) दोने तो उमा भोट
दौर म पूर्णस्थित म के साथ मिलकर मोहोगा। मथा, ल
+ अपि = पुनरपि, प्रातः + एव = प्रातरेय, भन्नः + पानन्
अन्तर्धानम् , n + गवः = सर्गतः, दुनिः + मा = दुहिता
-यहि ।
पुना, प्रातः, अन्तः, स्वः, प्रमृति पौधया शुधारन्त शादी
सम्बोधन एकवचन का विसर्ग र जात विमर्ग है।
२ विमर्ग के पहले भा और परे स्वरवर्ग, वर्ग का तृतीय चनुर्व
पञ्चमवर्ण अथवा स् रल्व्ह होवे तो विसर्ग का लोर होता है ।
*यथा, अवाः + अमी अश्या अमो, हताः + मजाहता गजा
.

सन्धि-प्रकरण।
अभ्याः + धावन्ति = अश्वा धान्ति, उन्नताः + नगाः = उन्मता
मगाः, नशः + लभन्ते - नरा लभन्ते, वाताः + वान्ति 3
वाता वान्ति, , बालकाः + हसन्ति = वालका हसन्ति । स्वरवर्ण
परे होने पर पक्षान्तर में विसर्ग के स्थान में य होता है । यथा,
गजाः + इमे = गजा इमे, गजायिमे ।
N. B. विसर्ग के लोप होने पर फिर सन्धि नहीं होती।
(५) ससपो -यदि विसर्ग के पहले सभा को छोड़ कर
दूसरा कोई स्थर हो और विसर्ग के परे स्वरवर्ण, वर्ग का तृतीय
चतुर्थ या पञ्चम वर्ण अथवा य् ल् व् ह होवे तो विसर्ग के
स्थान में होता है । यथा, कविः + अयम् = कविश्यम्, रविः।
-उदेति = रविरुदेति, निः + धनः = निर्धनः, वायुः + वाति =
वायुति, शिशुः + हसनि = शिशुहसति ।
(६) ठुलीपे पूर्वस्य दीर्घोऽण:-र परे रहने से विसर्ग के स्थान
में जोर होता है उसका लोप होता है और पूर्व स्वर का दीर्घ
होता है । यथा, पितः + रक्ष% पिता रक्ष, नि: + रसः -
नीरसः, निः + रोगः = नीरोगः, विधुः + राजते = विधू राजते ।
(७) एतत्तदोसुलोपोऽकोरनसमासे इलि-सः और एपः के परे
को छोड़ कर अन्य किसी वर्ण के रहने से विसर्ग का लोप
होता है और लोप होने पर फिर सन्धि नहीं होती । यथा, सः+
आगतः =स आगतः, सः+ गच्छति स गच्छति, एप:+आयाति
= एप आयाति । 'क' प्रत्यय तथा न युक्त होने से यह नियम
नहीं लगता । यथा, एपको रुद्रः, अस:-असो याति।
(८) भो भगो थयो अपूर्वस्य योऽशि--स्वरवर्ण, धर्ग का
हतीय चतुर्थ पशम वर्ण या यु ल एह परे रहने से भोः के
चलर्ग का लोप होता है। लोप होने पर फिर सन्धि नहीं होती।
चा, भोः+ ईशान = भो ईशान, मोः + गदाधर-भो गदाधर ।
।

२० ध्याकरण कौमुदी। स्वरयर्ण परे रहने से पक्षान्तर में विसर्ग फा र होता है। यथा, भोयीशान। (९) सोऽपदादी- एक परे रहने से निः, आदिः, यहि- दुः, प्रादुः और चतुः के विसर्ग का होता है । यथा, नि:t फामा=निष्कामः, निः + खेदः - नियम्वेदः, नि: + पापः-निपा. पः, निः + फलः = निष्फलः, आयिः + कृतम् = आविष्कृतम् , वहिः + कृतम् = यहिष्कृतम्, दुः + फरम् = दुष्करम्, प्रादुः + कृतम् = प्रादुष्कृतम्, चतुः + कोणम् = चतुष्कोणम् । (१०) इमुसोः सामर्थ्य- पु पर रहने से इयिः, सर्पिः, वहिः, अचिः, रोचिः, शोचिः, आयुः, धनुः, चक्षुः, पपुः और यजुः इत्यादि के विसर्ग का विकल्प से होता है । यथा, हविः+पत- ति = हविष्पतति, हविः पतति; सपिः + पियति = सपिस्पिति सपिः पियति । पर भ्रातुः + पुत्रः का भातुप्पुत्रः होता है। (११) इदुपपस्यचाप्रत्ययस्य-तकारादि तद्धित प्रत्यय पर रहने से हस्थ इ या उ के परस्थित विसर्ग का ए होता है । यथा, अच्चिः + त्यम् = अञ्चिष्ट्रम, चतुः + तयम् = चतुष्टयम् । . (१२) नमस्पुरसोर्गत्योः- धातु परे रहने से नमः, पुरः और तिरः के यिसर्ग का स् होता है । यथा, नमः + कार: नमस्कार, पुरस्कारः = पुरस्कारः, तिरः+कार:- तिरस्कारः। (१३) अतःकृमिर्कसकुम्भपात्रकृशाकर्णीष्वनव्ययस्य-फर, कार, कांत, काम, कुम्म और पात्र शम्द परे रहने से अकार के परस्थित विसर्ग का स् होता है। यथा, श्रेयः + फरः = श्रेयस्कर, पुरः+कार पुरस्कारः, अयः + कांत:- अयस्कतिः, मनः + कामः = मनस्यामः, भयः + कुम्भः = भयस्कुम्मः, पयर पात्रम्: पयपात्रम् । (१४) हमः + काण्डः, मेदः + पिण्डः, माः+करः, भह- पत्यायधान। TV RA + फरः, पायः + पतिः, दिधः + पतिः, मपः + कोल: स्पादि में विसर्ग काम होता है । यथा, तमस्काया, मेदस्कार, भाभर, भहस्फरः, याचस्पतिः इत्यादि। {१५) स्प पर रहने से विकल्प से विसर्ग कालोप होता है । यथा, मनः + स्थ- मनस्यः, मनास्यः, दु: + स्थ: 3 दुस्था, दुस्थः। (१६): पिसी परे-परशाद पर रहने से अधः और शिर के यिसर्ग का स् होता है । यथा, अस्पदम्, शिरस्परम् । अतिरिक-चिद्वस् + जनः - विदरजनः, पुम् + फोफिला - स्कोकिला, पुम् + चकोरः = पुश्चकोर:, भुवः + लोकः :- १ भुपर्लोकः, मदन + अहः = अहरहः । Exercise-3. I. Join the following words with rules --वायुः + चलति. उन्नतः+ तर, धनु+रकार, वामः + हस्तः, प्रथमः + सर्गः, एम. + रोदिति, पितः + रक्ष, निः+रोग, गतिः + इयम् , कः + एषः, नसः + एते, चादः + उदेते, स्त्रः + गतः, भोः + माधव, तिरः+कारः, पिर पानम् सम् + कारः 2 Disjoin the following:-नधास्तीरम. प्रामणोऽयम्, देव ऋषिः, नरा लभन्ते, मातदेहि, वायुवाति, शिरस्पदम, अनुष्टयम्, धनुष्करोति, भो जनमेजय, पण पालकानीरमः । 3.Correct:-- पूर्णो चन्द्रो उदेति । भ्रमरा पटादाः भवन्ति । राम भयं धावति। देवा स्वो गच्छति। दशरथोवाच । तस्या पुत्रा पठन्ति । निरोगोऽयं बालकः । पितो वक्ष माम् । एषो वदति । भो पुत्र कुन गछसि । स नगरात पहिस्कृतः । प्रानुस्पुत्र हि मम। यतिबंतं गच्छति । पणत्वविधान-Change of न into (१)पाभ्यां नो गः समानपद-एक ही शब्द में ऋ प्रहर या ५ के परे न भाये तो न का ण होता है । यथा, नृणाम्, । । Fear वा x गा। maritient या मोगी। (९) गोsrt-- Rak नि, fr... प्रातभीर मनिकाहोगाmmfat काम:=मिरकाम:, नि: + = निगमः, नि:+ :-fert. पः, निः + पालः = निगाल:, भाषि: + सम् - मागिपतन, पहिः + हना - हिम, :+am = पुकाम, प्रा. एतम् = प्रापुरतम्, गनुः+कोणम् = गतुकोणम् । (1.) इसी सामर्च- प पर रहने में गिः, मार पदिः, महिया, रोगिः, शोनिः, मायुः, धनुः, म. गपु: भार पत्र इत्यादि के विसर्ग फा पिकल्प से होता है। पि.पि. ति-दयिष्यति, दयिः पतप्ति; मषिः + विपति =मणिपति सपिः वियति । पर धातुः + पुष: का भातुपुत्रः होता है। (११) इदुपस्यचाप्रत्ययस्य-सकारादि तद्धित प्रत्यय पर रहने से हस्य दया उ के परस्थित विमर्ग का होता है। यया, अधिः + त्यम् = भविष्टम्, चतुः + तयम् = चतुष्टयम् । (१२) नमस्परसोर्गत्योः धातु पर रहने से नमः, पुर और तिरः के विसर्ग का स् होता है । यथा, नमः + फारा=नमस्कार, पुरः + कारः=पुरस्कारः, तिरः+ कारः - तिरस्कारः। (१३) अतःकृमिकसकुम्भपात्रकुशाकणीवनव्ययस्य-कर, कार,कांव, काम, कुम्म और पात्र शब्द परे रहने से प्रकार के परस्थित विसर्ग का स् होता है। यथा, धेयः + फरः = श्रेयस्कर, पुरः + कार= पुरस्कारः, अयः+ कांत:- अयस्कांत:, मनः+ कामः = मनस्कामः, अयः + कुम्भः = भयस्कुम्भः, पयर पात्रम् = पयपात्रम् । (१४) समः + काण्डः, मेदः + पिण्डः, भाः+ करा, मह- বথল। + करः, वाचः + पतिः, दिवः + पतिः, अयः + फीलः इत्यादि में विसर्ग का स् होता है । यथा, तमस्काण्डः, मेदरकाण्डः, भास्करः, अहस्करः, याचस्पतिः इत्यादि। (१५) स्थ परे रहने से विकल्प से विसर्ग का लोप होता है । यथा, मनः + स्थ % मनस्थः, मनःस्थः, दु: + स्थः = (१६ ) अधः शिरसी पदे-पद शब्द परे रहने से अधः और शिरः के विसर्ग का स् होता है । यथा, अधस्पदम्, शिरस्पक्षम्। अतिरिक्त-विद्वस् + जनः = विद्वज्जनः, पुम् + कोकिला- पुस्कोकिला, पुम् + चकोर - पुंश्वकोरः, भुवः + लोकः = भुवीकः, अहन + अहः - अहरहः । Exercise-3 I.Join the following words with rules -चायुः + चलति, उन्नतः + तरुः, धनुः + टङ्कारः, वाम + हस्तः, प्रथमः सर्गः, एषः + रोदिति, पितः + रक्ष, नि:+रोगः, गतिः + इयम् , क + एषः, नशः + एते, चन्द्रः + उदेतेि. स्वः + गतः, भोः + माधव, हिरः + कारः, हविः + पानम्,सम् + कारः। 2. Disyon the following:नधास्तीरम्, माह्मणोऽयम् देव ऋषिः, नरा लभन्ते, मातदेहि, वायुवानि, शिरस्पदम्, चतुष्टयम्, धनुष्करोति, भोजन मेजय, एप बालकः, नीरसः । 3.Correct:--पूर्णो चन्द्रो उदेति । भ्रमरा पट्पदाः भवन्ति । राम भयं धावति । देवा स्वो गच्छति। दशरथोवाच | तस्या पुत्रा पदन्ति । निरोगोऽयं बालकः। पितो रक्ष माम् । एषो वदति । भो पुत्र कुन गइति । स नगरात बहिस्कृतः। भ्रानुरपुत्र हि मम। यतिपर्वतं गच्छति । पणत्यविधान-Change of न into . । (१) पाम्यां नो गः समानपद-एक ही शब्द में ऋ र के परे न भाये तो न् का ण होता है । यथा, नणाम, . याच

२२.
ध्याकरण कौमुदी।
तिषणाम् भ्रातृणाम्, चतुर्णाम्, कृष्णः ।
(२) अटकुप्वाइ नुम्यवायेऽषि-यदि बार या व और
न के बीच में स्वरवर्ण, कार्ग, पवर्ग, य्व्ह और अनुस्वार
(इनमें से एक या अनेक ) हो तो भी न कोण हो जाता है ।
यथा, करणम , हरीणाम् , गुरुणा, मृगेण, वृक्षेण, हणम् ।
N. B. इनके अतिरिक्त अन्य कोई पर्ण धीच में बाये तो
ण नहीं होता। यथा, अर्चना, मूर्छना, अर्जनम् , किरीटेन,
मृडेन, डेन, आर्तेन, पिमर्दैन, अर्द्धन, विरलेन, स्पर्शन, रसेन ।
( ३ ) पदान्तस्य न- पदान्त न् का ण नहीं होता । यथा,
नरान्, हरीन्, गुरून्, मातन् ।
N. B. न्-मिन्न तवर्गयुक्त तथा ए और भू युक्त न् का गू
नहीं होता। यथा, कुन्तति, प्रन्थनम् , वृन्दः, रन्धनम, तृप्नोति,
क्षुम्नाति ।
२ यदि एक पद में ऋ पा र य प हो और दूसरे पद में
न हो तो ण नहीं होता । यथा, न्यानम् , गिरिगहनम् , शानि,
रघुनन्दनः, गिरिनन्दनी, त्रिनेत्रः, षवाहनः, सर्यनाम ।
३से विभाग कथावावशान्त उपदेशे-यदि अन्य पदस्थित
म् पिकि स्थान में हो या यिक्ति युक्त हो अथया
स्त्रीलिङ्क के रपय मे युस हो तो विकल्प से ण होता है।
पपा, भितिस्थान में प्रमायेण, प्रभायेन; परिमयेण, परिमयेनः
भग्नमपिण, भरतमयिक; विभक्तियुकयिपापिणा, विषपायिना।
प्रन्यययुन-गिरपायिणी, यिषपायिनी।
गम् के नामही होता । पपा, मृयुयानी, क्षत्रिययूना।
1

त्यगिधान। भगिनी, कामिनी, भामिनी, यामिनी, यूनी इत्यादि के न् का ण नहीं होता है। यण, पिनुमगिनी, हरिकामिनी, पोरयामिनी। ४ एकादुत्तरपदेणः, कुमति घ यदि पर पद एक स्थर पाला या काग युक्त हो तो न का नित्य ए होता है । यथा, प्रमुणा, घृषहणः । कवर्ग पु-धोफामेण, दुर्गमेण, परिपाकेण पर पक्य शब्द का नहीं होता । यथा, परिपक्येन, परिपक्यानि, परिपपयानाम् । ५ विभायोपधिवनस्पतिभ्यः-- भोपधिवाचक ( पका हुआ शस्य) और घृक्षाचक शब्दों के परे धन केन का विकला मे पण होता है । यथा, औषधिवाचक- घोहियणम्, प्रोहियनम् ; दुळवणम्, दूविनम्: नीवारयनम्, नीधारयणम्: आई कधणम्, आई कयनम् । वृक्षवाचक-लोध्रयणम् , लोभवनम् ; यदरीवणम् , घदरोयनम् शिरीपघणम, शिरीपयनम् जम्पीयणम्, जम्बीरपनम् । दो या तीन स्वर का शब्द नहीं होने से ऐसा नहीं होता। यथा, देवदारुवनम् , उदुम्बरवनम् , नागरङ्गायनम् , नारि. केलयनम् , योधिद्र मयनम् , कोविदारयनम्, राजवृक्षवनम्, सह- कारधनम्, कुश्यकचनम् , फर्णिफारवनम् , सिन्धुवारयनम् , नागकेशरयनम् । प्रनिरन्तः शरेक्षुप्लक्षाम्रकार्यसदिसीयूक्षाभ्यांसंज्ञायाम - प्लक्ष, थान, खदिर, इन कई शब्दों के परे बन केन का नित्य ण होता है । यथा, शरवणम्, प्लमरणम्, आध्रप्रणम्, शिवणम्, खदिरपणम् । प्र, निर्, अन्तर, अ इत्यादि कई शब्दों के परे धन केन का ण होता है । यथा प्रणम्, निर्वणम्, अन्तर्वणम्, अप्रेषणम् । ६ वा भावकरणयोः-दूसरे पद में रहने वाले के परे पान ।

२४ गम का REntriant Tur पानम , FIR, नि। fast - nirmith. त्रिभर गार Art Einmen बिदागी : गणपणी गीः । ८ नार-प्रज, भर It ril के परेम केन का पदोगा। या, RE . Tणांट, मा । भानव-रIr, Int, माद और मार शमों पर अपन का पोता है। गणा राणम्, पारायण उसरायणम्, चान्द्रायणम्, मारा। १० अपप्रामाभ्यानयते:-मप्र सौर प्राम गो पर भी के न फा .दोता है । गया भप्रगी, प्रामीः। १५. पूर्णपदात् संज्ञायामगः । वागत् बलम-संभा बार होने से पूर्ण के परे नप तथा प्र.अ.पर भोर याों के परे नम के न फा ण दोता है । गया, गया, प्रणसः, गुणम, याणमः। १२ गिरिनद्यादीना पा-गिरि नदी स्यादिक का विकला से ण होता है। यथा, गिरिणदो, गिरिनदी, गिरिणितम्बः, गिरिनितम्यः। ऐसे ही गिरिनन, गिरिनद, चक्र- नदी, चक्रनितम्ब, तूर्यमान, मापोन, मार्गपन में भी होता है। १३ पात् पदान्तात्-पूर्ण पद के अन्त में होने से उत्तर पद के न का ण नहीं होता । यया, हरिप्पानम्, आयुष्कामेन, सर्पिष्पायिना । १४ उपसगांदसमासेऽपि नोपदेशस्य-प्र, परा, परि, निर, इन बार उपसगों के परे यदि नद्, नम्, नश्, नह, नी, नु, नुइ, मन, .धातु हों तो न का ण होता है। यथा, प्रणदति, प्रणमति, स्वर्णदी, नदी पत्यविधान । प्रणामः; परिणमति, परिणामः, प्रणश्यति, प्रणाशः (नश् के शका पहो तो ण नहीं होता। यथा, प्रनयः, परिनएः, निर्नयः, अन्तः न), परिणाहः । मणपति, प्रणयः, परिणयः, निर्णयः। प्रणयः । प्रणोदः । प्राणिति, पाणः । प्रहपयते, हणनम् (हन के ह का घ् होने से ण नहीं होता। यथा, प्रश्नन्ति, परिमन्ति, प्राधानि, प्र-- घानि, शत्रुप्तः)। बमोवा-यदिइन् धातु का न म भोर " युक्त हो तो विकल्प से होता है । यथा, प्रहपिम, मदन्मि, महण्यः, महन्यः । १५ वानिसनिनिन्दाम्-निस, निक्ष, निन्दु इन तीन धातुओं केन का पर विकल्प से होता है। यथा, प्रणिसितव्यम् , प्रनि- सितव्यम् । मणिक्षणम्, प्रतिक्षणम् । प्रणिन्दति, प्रनिन्दति । १६ हिनुमोना-हिनु भोर मीना के न् का णू होता है । यथा, अहिणोति, प्रणुितः, प्रदिपवन्ति । प्रमीणाति, प्रमाणीतः, प्रमीणति । १७ आनि लोट-लोट् की भानि विमक्ति के न का ण होता है। यथा प्रभवाणि, परिभयाणि, प्रबहाणि । १८ नैर्गदनदपतपदधुमास्यति इन्ति याति वाति द्वाति साति वपत्ति पति शाम्यति चिनौति देग्धिषु-गदु पत् दा धा हन् नद् पद् दान दो दै सोधे मा या दावा यप शम् वह विदिह धातुओं की पूर्ववर्ती नि उपसर्ग के न का ण होता है । यथा, प्रणिगदति, प्रणिपतति, प्रणिपात:, प्रणिधानम्, मणिहन्ति इत्यादि। १६ कृत्यचः-धातु के पहले म परा परि निर् ये चार उपसर्ग या अन्तर् शब्द हो तो कृत् प्रत्यय के न् का ण होता है। यया, प्रयाणम्, प्रहाणम्, प्रयमाणः, प्रमाणम्, परिमाणम् । हलधे जुषधात्-जिन धातुओं के पहले व्यञ्जनवर्ण हो और अत्यवर्ण के पहले आभिन्न स्वर हो उन के परे कृन् प्रत्यय

च्याफरण फोमुवी।
-
प्रयापणी-
-
कोपका यिकला से ण होता है । यथा, प्रकोपणम्, प्रकोपनम् :
परिगोपण, परिगोपनम् ।
गोविभाषा-प्यन्त धातु के परे कृत् प्रत्यय के न का विकल्प
सेप होता है । यथा, यापि-प्रयापणम् , प्रयापनम्।
यम् , प्रयापनीयम् । पाहि-प्रवाहणम् , प्रवाहनम् ।
न भाभूपूमिगमिप्यायिवेपाम् –मा, भू , पू, कम् , गम्,
प्याय, घे , कम्प, इन धातुओं के प्रयन्त होने पर भी इनके
परे छत् प्रत्यय के न् का ण नहीं होता । यथा, परिभानीयम् ,
परिमापनीयम् , परिभवनीयम् , परिमावनीयम् ।
कृत् प्रत्यय का न् व्यञ्जनवर्ण से युक्त हो तो ण नहीं होता।
यथा, प्रमन्ना, प्रमः, परिमग्नः।
२० निम्नलिखित शब्दो का ण् स्यामाधिक है:-
पाणी-तूणीर-वेणी-फणिमणि लवणं कोण-फल्याण-वाणा
गोणी-घोणी फणाणुर्घण-विपणि-पणं स्थाणु-पुण्यं विषाणम् ।
माणिक्यं शोणशाणी गुण-गण गणिका-येणु सिंहाण-वीणा,
निर्णाणो निकणेणकण-मिण धणिजः फणं पाणितूणी
पिणाकमपि चाणक्यमित्याद्याः स्युः स्वमावतः।
पत्यविधान Change of स् into .
(१) इण: को:-- म मा मिन्न स्थर, क्यार के परे प्रत्यय
म् कान्दो जाता है। यण, मुनिपु, नदी, नरेषु, दिन,
य।
N. B. मात् प्रत्यय के स् का नहीं होता। यथा,
सान्यायुसार, ग्रातसात् ।
• २ नुम् पानीपराभवारोऽपि अनुस्वार पिसर्ग तया ॥
भति-

पत्थरिधान । . एस् का व्यवधान होने पर भी होता है। पथा, हापि, भाशीः। क्लीयलिंग की प्रथमा और द्वितीया के पहुयवन से भिन्न अनुस्वार का व्यवधान हो तो नहीं होता। यथा, पुम्सु, सु। त (२) सज, सद्, सह, साधू, सिच, सि, सु, सू, से, सो, स्तम्म्, स्तु, स्तुभ्, स्त्य, स्था, स्ना, स्तिह, स्नु, सिम, स्वस, । स्वदु, स्थपू, स्पिद, इत्यादि धातुओं के अभ्यस्त करने पर यदि | धातु का द्वितीय भाग स् ई, उ, ५, के परे हो तोप होता है। १ यधा, सि.सिपेध, सिपिधतुः, सिविधुः । सु-सुगय, सुपुपतुः, सुपुयुः । सू-सुषुबे, सुपुत्रात, सुपुथिरे । सेव-सिपेवे, सिपेयाते, । सिविरे । स्तु.तुष्टाव, तुष्टुवतुः, तुष्टुवुः । स्निहसिष्णेह, सिणि. हतुः, सिणिहुः । स्मि-सिष्मिये, सिध्मियाते, सिम्मियिरे । स्वप् -मुप्पाप, सुयुपतुः, सुपुपुः । स्तुभ-तुभे, तुप्रभाते, तुष्टभिरे। सो- सेषीयते । सेय-सेसेव्यते । सू.सीपूयते । स्तु-तोयते । N. B. ( १) थङ् प्रत्यय होने से सिंच के स् का प नहीं होता । यथा, सेसिच्यते । (२) धातु के परे सन् प्रत्यय का प् हो तो धातु के स् का नहीं होता । यथा, सिच्-सिसीक्षति, सू सुसूपति, से- सिसेविषते; हिम-सिस्मयिपते, स्तम्भ-तिस्तम्भिपति, स्तुम् । तुस्तोभियते, मनु-सुस्नूपति । केवल स्तु धातु का होता है । यथा, तुष्ट्रपति । सन् प्रत्यय काम रहे तो धातु के स् का होता है। यया, स्था-तिष्ठासति, स्वप्सुपुप्सति, सो सिषासति, स्ना. सिष्णासति। प्यन्त धातुओं में केवल स्विन्दु, स्थद् और सह, का नहीं होता । यथा, बिद्-सिस्वेदयिपति, स्वद् सिस्वादयिषति, सह- ....

रहने से नहीं होगा गया, लद-ममिगोग,ला-मामी.
प्या, स्यन्मभिसोप्यम् ) । (सदादिगणांय-णित.
farmful for mil nा है।
Am. :गुणnfrin. गि निfrifa fati
यतिनि.म.नि. मान.firsairat
(Orth Matters
गगामा - II (नि.. alr, गि, मति, मा
मपि ममि) मोर उकारात (सु. अनु. TIMI पर
गु, गो, सा, गुम्, गा, गनि पि.मिग, . जर
भार सम्म धागो कार होता है।गणा.
अनुपुनोति (मद् भार लइ गिकि न् प्रत्यय परे
भनुपुपति । सो.अधिनि । मिटोनि. मनुम-प्रतियोमो,
मनुप्रीमते मा.अधिष्ठास्यति, मनुशाम्यति, मनि-मिगत
सिघ्-प्रतिपेयति, अनुग्धति, ( गमनार्य मिए पातु कार मई
होता । यथा, गृहं प्रतिमेधति, परिमेधति, भमिसंधति)। सिव
मिपिञ्चति । सक्ष-निपजाति, अनुपजनि । स्व परियजने ।
सद्-विपीदति, अनुषीदति (प्रति पहले हो सो मदों होता । या,
प्रतिसीदति) । स्तम्भ-अभिष्टम्नोति, अनुष्टप्नोति (मालम्बन
सामीप्य अर्थ में भर पहले होने से भी होता है। या,
यष्टिमवष्टभ्य आस्ते यएिमालम्ब्य तिष्ठतीत्यर्थः । अप्रष्टरमा
गौः समीपे घच ते इत्यथः ।
अट का व्यवधान होने पर भी प होता है। यथा, अभ्यः
णोत्, अभ्यपेणयत्, न्यपिञ्चत्, अन्यषजन्, व्यपीदत् । परन्तु
और नि पूर्वक स्तु और स्यञ् धातुओं में विकल्प से होता
। यथा, पर्यटावीत्, पर्यस्तावीत; पर्यप्वजत्, पर्यस्वजन् ।
(3) परिनिविभ्यः सवसितसयसिसहमुट् रसुस्वनाम्-परि, नि,
मार
गौ,
परि

पत्यनिधान ।
२
विपूर्वक संघ, सिप, सह धातु के स्का प होता है । यथा,सेय
परिपेयते, निपेपत, विपेवते; :सिध्-परिपीव्यति, निपीव्यति
सह-परिपहने, निपहते, विपहते (साह का सोट होने पर पूना
होता । यथा, परिसोदा, निसोदुम, विसोढः)।
बटु के व्यवधान होने पर भी सेव का नित्य और सि
तथा सह का विकल्प से होता है। यथा, सेय-पर्यपेयते
सिव-पथ्र्य पीव्यत्, पर्यतीव्यत् । सहन्यपहत, न्यसहस ।
प्यात करने पर लुइ मै सिम् और सह के स् कान
होता । यथा, सिध्-पर्य्यसीसियत, सह-पर्यसीसहत ।
(५) स्थादिषभ्यासन घाभ्यासस्यः--इकारान्त और सकारा
उपसर्गो के.पर सेनि, सिध्, सिच, सञ्ज., स्वज और हे
धातुओ के अभ्यस्त होने पर दोनों स् का होता है। यह
सेनि-अमिचियिति । सिध-निविषेध, प्रतिपियिष
अभिपेविध्यते । सिच्-अभिविषेय, अभिपिपेयिपति (
होने से नहीं होता । यथा, मभिसेसिध्यते) । सञ्ज.अनुपपत्र
प्रतिपिपञ्जयिपति, स्या-परिविवाविपतिसद् निपिपादयिष
विषापद्यते (लिट में स्वस् और सद् के द्वितीय स् का पन
होता। यथा, स्व-परिपत्यजे, विषस्वजे । सह-निपसा
विषसाद ) । सेय्-परिपिपेये, अभिविध्यते ।
(6) स्तन् भेः- इकारान्त और उका उपसर्गाके
अभ्यस्त स्था और स्तम्भ धातुओं कात के व्यवधान होने
मी ५ होता है। यथा, स्था-अनुतष्ठी, अधितष्ठी, अभिता
स्तम्भ-अनुतष्टम्भ, अधिवएम्भ, मभितएम्भ ।
प्रतिस्तब्ध भौर निस्तब्ध में नहीं होता! पयस्त करने
लुङ् में स्तम्म् का नहीं होता । यथा, पर्यतस्तम्मत् ।
(७) परि पूर्वक स्ह धातु के स् का होता है ।

मत्स्यः । प्राणी कर्ता हो तो ऐसा नहीं होता । यथा, अनुस्यन्दने स्फुल् धातु केस का विकल्प से होता है। यथा, पुर। निप्फुरति, निस्फुरति; विष्फुरति, विस्फुरति.। एफुल्-निफुलति का होता है । यथा, विष्कम्नाति, निष्कम्भितम्, यिष्कम्भि. सुप्दा तो स्फा हो जाता है। यथा, सुषुप्ता, ३० ध्याकरण गौमुदी। परिकरोति, परिकार: 1 भट में गयान होने का शिका में प् होता है । यथा, पट्यारोन्, : कापीत, पर्यस्कात् । (८) अनुविपर्यभिनिभ्यः स्यन्दतेरप्राणिपु---मनु, पि, परि, पनि, नि पूर्वक स्यन्दु धातु के स् का विकला में होता है । यथा, अनुप्यन्दते, अनुस्यन्दन; निष्यन्दत, यिस्यन्दने, परिष्यन्दतं. परिस्यन्दते; भमिप्यन्दते, अभिस्यन्दते; निष्यन्दने, निस्यन्दते। (६) परेश-परि पूर्वक स्कन्दु धातु के स् का विकल्प से होता है । यधा, परिष्कन्दति, परिस्कन्दति; परिकपणा, परिस्कन्नः। तेर स्कन्देरनिष्ठायाम्-निष्ठा-भिन्न कृत् प्रत्यय परे रहने से घि पूर्वक स्कन्दु धातु के स् का विफल से पदोता है । यथा, विष्कन्ता, विस्कन्ता; विस्कन्तुम्, विस्कन्तुम् । निष्ठा प्रत्यय होने से नहीं होता । यथा, विस्पन्नः, विस्कलवान । (१०) स्फुरतिरफुलत्यौनिनिविभ्यः-निर, नि, पूर्वक कर और निस्फुलति; विएफुलति.विस्फुलति । (11) ः स्कनातेनित्यम्-पि पूर्घफ स्फम्भ धातु विष्फम्मा, विष्कम्भकः। . शविनियः मुपि मृति रामा:--सु, वि, निर, दुर P के के नि:पुप्ता, दुयुप्ता, दु:पुषुपतुः, दुःपुषुपुः ।

पत्यविधान। । - . . (१३) उपसर्गप्रादुभ्यामस्तिष्यन् परः-- इकारन्त और उका. रान्त उपसर्ग तथा प्रादुः शब्द के परे भस् धातु के स् का प् होता है । यथा, निपन्ति, प्रतिपन्ति, अधिपन्ति, परिष्यात्, अनु. पन्ति, प्रादुःपन्ति, प्राध्यात्। पर तय मया य के साथ मिले हुए स् का प नहीं होता। यथा,अधिस्तः,अनुस्तः,प्रादुःस्तः, प्रति. स्था, अभिस्था, मधिस्मा, अनुस्मः, प्रादुःस्मः, अनुस्वः, भादुःस्वः । (१४) शासिवमिघसौनाच-उस् प्रत्यय परे रहने से घस् धातु के स् का होता है। यथा, उपितः, उपितवान् . ऊपतुः, ऊचुः । (१५) घस् धातु के घ का का हुआ हो तो स् का होता है । यथा, जक्षतुः, जनः। (१६) सहे साडासः-सह धातु से बने साह शब्द का साट् और साइ हुआ हो तोस का प् होता है । पथा, तुरापाट् तुरापाड, तुरापाट्सु, दुरापाड्भ्यः । साद् रहने से नहीं होता। यथा, तुरासाहौः, तुरासाहः, तुरासाहम् । (१७) समामेऽगुलेः सङ्गः-समास होने पर अंगुलि शब्द के परे सन के स का ए होता है । अंगुलिपङ्गः । (१८) सु, वि, निर् , दुर् उपसर्ग के परे सम शब्द के स् का प् होता है । यथा, सुषमा, विषमः, दुःषमः । (१६) पतिज्ञायामगात्-नाम समझे जाने से अ मा भिन्न स्वर के परे सेना शब्द के स् का होता है । यथा, सुषेणः, हरिपेणः, मधुपेणः । नाम न समझा जाय तो नहीं होता, यथा, कुरुसेना, पदुसेना, कपिसेना। (२०) भूमि और दिवि शब्दों के परे स्थ हो तो स् का प् होता है । यथा, भूमिष्ठः, दिविष्ठः । (२१) गवियुधिभ्या स्थिरः-युधि के परे स्थिर के स्का , होता है। पा, गुगिन (२३) मpa P.AL TATT famoyi aatam प्रालीजामा |RT- मागणा विमा friefitोला घामामा, मानTITTEFreeTHI मही हा परमो mt, arj MIT Presents (२३) निम्न EिRIremierमागि?- भागढ़, , . , पीपirramin पुन, मास, मदिर, मेष, मनिस Tr, TE. It imपोर पुरप, विषय, पद, वर्ग, पागाण, प. Meणादि। प्रमवाति Exercitrt 1. When is changed to anal to my? 2.Correct or ushfy the following water- कृष्णेन, अनुष्टानम् . प्रष्टंग.न. अपंगा, घाममा, अभि सेक पाना, नराण, मर्मत, मागा, भदंग, मिटेगशुम्माति, त्रि प्रभावेन, पितृमगिणी, परिपान, देवदामपणम् , मनम, म घान्द्रायनम्, शूर्पनखा, इविपाणम , प्रगटः, माहिनीन् । प्रनिपतति, प्रपतनम् , चतुर्मु. अभियात्, धमि. . . मुमुष्प निसेवते, मसिसेघ, अधिनस्यो, विकास, उमिता गुरामार, विपमः । विशेपण। जिसके द्वारा किसी व्यक्ति, पस्तु, जाति, गुण या क्रिय का पोध हो उसे विशेष्य ( Noun) कहते हैं। यया, गणि वाचक-रामः, गङ्गा, हिमालयः । वस्नुबायक-घटा, घृतम् जलम् । जातिवाचक-पशुः, पक्षी, कीटः, मनुष्यः । गुणवाचा धेर्यम् । क्रियावाचक-पठनम् , थयणम् , हननम् ।

विशेषण । AN जिसके द्वारा विशेष्य का गुण, अवस्था या संख्या जानी जाय उसे विशेषण (Adjective) कहते हैं। विशेष्य में जो लिङ्ग, विभक्ति और पवन होते हैं यही लिङ्ग, विभकि और यवन विशेषण में भी होते हैं। यथा, सुन्दरः शिशुः, सुन्दरी फन्या, सुन्दरं गृहम्, यलयन्ती सिंही, घेगवत्यः नद्यः इत्यादि । कुछ आवश्यकीय विशेषण निम्नलिखित है:- अखिल-all, whole; अगाध very deep, भज्ञ ignorant, अटल immovable, अतीत past, मद्धत extra-ordinary, अधम base, अधीन dependent, अनुरक्त fond of, अन्ध blind, अर्वाचीन new, अलस idle, अल्प-small, अवहित careful, अवैध unlawful, मशरण helpless, भादय rich, भास्मीय intimate, आदिम first, prior; आधुनिक recent, आध्यात्मिक spriritual, wiz wet, damp; 31 fierce, a high, 37,7 high, उत्सुक fond of, उदार liberal, उदत baughty, उन्मत्त mad, उष्ण bot, उर्व upper, ऋजु straight, कटु bitter, कपिश brown, करुग lamentable, कu cruel, violent, कश्मल dirty, काण one-eyed, कान्त lovely, कुटिल crooked; कुत्सित awkward, कृवन ungrateful, कृतs grateful, कृपण miser, mean; * only, stchuel, afya momentary, सlame, गभीर deep, गई cebsurable, गुरु long, chief; गोल round, गौण secondary, ग्राम्य vulgar, धन thick, धोर horrible, चञ्चल fickle, चपळ fickle, un. steady; चाह beautifal, चिर long, जगम moveable, जटिल mixed with, तनु small, little; तर liquid, तीक्ष्ण severe, दारुण cruel, दिव्य divine, beautiful; दुर्गम inaccessible; दुर्धर्ष dreadfal, दुर्बल weak, दुष्कर difficult, धवल ३

perishable, fakat
white, 9119% pious, a dirty, y siy, y certain
timid, भोषण dreadful, भूरि much, मृश much, मधु
of handsome, 12 Angry, light, smalls **
यायाल talkative, वार्षिक annual, विकट horrible, विपक्षण
whelmed, शान्त gentle, शिथिल loose, शीतल cool, शुक्ल
व्याकरण फौमुदी।
नग्न naked, नव-नवीन new, नश्वर
whole, faaiza excessive, forca eternal, fapt clerer,
fanne indifferent, fafaz thick, fafara sharp, Farmit
cruel, qna new, ata cruel, wicked; hafiís nataral,
wqa less, 977 ripe, Fable, clever; ot? Buitable, 907
horsh, पर्याप्त sufficient, पवित्र pure, पाण्डु pale, पान
sinful, qran pure, a yellow, a thick, larges state
fat, पुण्य holy, पुराण-पुरातन old, पृथु large, broad;
पैतृक paternal, प्रखर very hot, प्रगलम bold, प्रफुल्ल gayi
973 terong, my plentiful, faz notable, fapt dear,
बधिर deal, बहु many, भंगुर brittle, भासुर bright, भीर
sweet, मम्मुल beautiful, मनोज-मनोरम beautiful, मन्या
slow, afera foul, 4 smooth, and great, nare deas,
#147 strong, as silent, dumb; za dead, soft
tanite charming, 7 beautiful, fets empty, 474 sick,
crooked, as affectionate, in liberal, 14 wild,
skilful, विचित्र curious, वितप false, विनीत modest,
शिल rast, विश्वस्त faithful, विस्तृत wide, विहल orer.
white, fa pure, a good, Ta white, ve dry,
vacant; ज्याम dark, वेन white, सकल entire, सीर्ण
nitrow, full ol, 44 fruitful, tau able, RAEG

उपा-मकरण a ne Equal, Re Kincer, natural, ncy TRIEnt, REEKRUTIersal.form white,TR accessible, ma thin, maar old, FUNT imtuavable, yulere firm, corrior bulky; ? fiable, finde gudent, cu ferocious, F pleised, m short. सुपन्न प्रकरण ( Declension) विमति की आकृति। पायथन শিদ बहुपपन भी भ: (जर) हिनीया मम् भी ( मोद) मा() गृतीया भा(रा) भ्याम् शिक(भिस्) पतु भ्यः (भ्यस्) पश्चमी म: (रसि) भ्याम् भयः (भ्यस्) वही भोः (धोस् । माम् सनी भोः (मोस्) सुसुप) इन उपर्युक साता रिक्तियों की तुप् . कहते है। माति- पदिक पर सुप लगाने से सुगन्त पर पनता है। , प्रत्येक यिक्ति में तीन २ पचन ( Nutnber) होते; पफयरन ( Singular), द्वियवन (Daal) भोर पहुपयन (Plural) शय में एफपचन की बिमक्ति रहने से एक यस्तु, द्विवचन की विमति रहने से दो वस्तु और पनुषचन की विनियो । पाला पक्षर मुभीर अन्त्य भक्षर है, अतएष न्हें सए कहते है।

riting m mitti at it int । ( 36 हो। काक ret.it मामान, TER, A Mermirmal Trjarituantitargat गायोग में FREE fraternik ART प्रिया के TIHAmma area Timirmirrtal नाम ifer far Bाने में पता है, या मानमणि Armire गौर पदमन में PATRIOn Eart.tr पफरम में बीमार हा मान एफपयन फा प लिगा जायगा। स्थरान्त-हिम शन्। अकारान्त-गज ( Elephant) বিধান परवन गजः गजी द्वितीया गजम् गजी गजान् सृतीया गजेन गजाभ्याम् गजे चतुथों गजाभ्याम् गजेभ्यः पञ्चमी गजात् गजाभ्याम् गजेभ्यः पष्ठी गजस्य गजयोः गजानाम सप्तमी गंजे गजयोः गजेषु सम्बोधन प्रथमा Mar: गजाय गज

मुयन्त-प्रकरण।
19
(U) wa farge serpent, 643 superinten.
dent, sunt obstacle, *** year, 3454 minister,
En charioteer of the sun, dawn; ept wealth, MT
mine, erari preceptor, the cowherd, ura income,
आयुध weapon, उपल stone, मोदन cooked rice, काछा थर्म
tortoise, & mat, sine heimsmın, fik spot, 578
strife, & Crow, I desire, a time, it a dog,
कुम्जर an elephant, कुम्भ jar, कोश corner, कोदण्ड bow,
treasure, 1 two miles, 1 moment, et razor,
Ea a bird, rex cluster, he planet, 4x execu.
sioner, 375 sparrow, eam shoe-maker, emot
Jard, qx mango tree, Et gost, a jackal, men
'uscal, in cloud, ise egg, hogy rice, a thicſ,
Toca dance of Shiva, te palm tree, or cotton,
77# adopted son, pride, 41977 kinsman, 147
ich man, ** lag, mongoose, R# crocodile, se
ouad, side, wingi 7 wages, price; 90% cloud,
मे bedstead, पारावत Pigeon, पाश net, पिक cuckoo,
beap, grænt reward, 7 citizen, fagras cat, 47
evotee, w soldier, i servant, # platform, 78
emple, epalosure, azk frog, fra cupid,
राल duck, मस्तिष्क brain, मशक gnat, मानव man, भाष
kind of pulse, an deer, # union, * servant
: Kuber, a sacrificer, 97 barley, mfp pilgrim,
#warrior, stage, cela mango tree, ag stick,
Atz forehead, 59* banter, du race, family,

bamboo; क्यस्य companion, था boon, पत्मीक anth- वारण elephant, घासर day, विनिमय exchange, Arb व्यतिकर occurence, प्याज pretense, शाक regetat कतिपय Bome, द्वय pair, प्रय three, द्वितय couple त्रितय third, चतुष्टय four इत्यादि के प्रथमा-बहुवचन (४) द्वितीया-यहुवचन तथा इससे आगे की विलियों होने मेसका लोप होता)दोता है । पशान्तर में इनकार ध्याकरण कौमुदी। शावक young of beasts, 54197 beast of prey, 903 bu सकर mixture of castes, सचिव minister, सहाय cos panion, सूद cook, सैनिक soldier, स्तम्भ pillar,r heap, स्तेन thief, स्यन्दन chariot, We sweat, हय hor इत्यादि सब अकारान्त पुलिश शब्दों के रूप 'गज' के समान होते । पर अजगर, अध्यक्ष इत्यादि में 'गल विधान' के अनुसार तृतीया एका और पष्टो-बहुवचन में न का ण हो जाता है। (२) अल्प little, प्रथम first, चरम last, अर्द्ध hs अल्पे अल्पाः इत्यादि दो २ रूप होते हैं। (३) द्वितीय और तृतीय के चतुर्थी पञ्चमी और सप्तमी एकवचन में द्वितीयाय-द्वितोयस्मै, द्वितीये-द्वितीयस्मिन् इत्यादि दो रूप होते हैं। पाद ( foot ) के स्थान में पद्, दन्त ( tooth) के स्थान में मास (month) के स्थान में में यूपन भी हो जाता है । पद् का रूप सुहृद् के समान, भूमृत के समान और मास् का येयस् के समान (भ पर कप 'गज' के समान होता है। यथा, पाद-३ था-पादेन पदा- पादाम्याम्-पगुम्याम्, पादः-पदि । दन्त-दता, दम्याम, वनिः । माम.मामा, माभ्याम् मामिः । यूप-यूष्णा, यूपभ्याम्, यूपभिः द्वियीयात्-द्वितीयस्मात मास् और यूप (broth) के स्थान का मुषन्त-प्रकरण। (५) अजर, निजर, निर्जर ( god) स्यादि के रूप स्वरा (जिसके मादि में स्थर हो) विभक्तियों में 'वेधस' के सम्म भी होते हैं। यथा, रमा-अजर भजरी-भजरसी, भजम भजरस: । २-अजरम्-अजासम्, अजरी-अजरसी । (b) सायाह, व्यह तथा संख्यावाचक भह (पह, - इत्यादि ) शब्दों के सप्तमी-एकवचन में सायाहि, सायादा सायाही व्यहि व्यहनि, व्यह; इत्यादि तीन २ रुप होते और अन्य विमक्तियों में 'गज' के समान रूप होते है। मध्याह, अपराह, पूच्याही, के पफ. ही रूप होते है। आकारान्त-विश्वपा (God, Sun, Moon एकवचन द्विवचन बहुवचन एकवचन द्विवचन बहुव १. विश्वपाः विसपी विश्व ५, विश्वपः विश्वाभ्याम् विश्वष- २. विश्वराम विश्वका विश्वरः ৰিৰী: ३. विश्व विश्वराभ्याम् विश्वपाभिः ५. विश्वपि विग्री विश्व- ४.विश्वपे विश्वपाभ्याम् विश्वपाभ्यः सं० विश्वपाः विवो वित (१) गोपा cowherd, सोमपा one who drinks Soma juice, 75 one who inhales smoke, strength giver, शंखध्मा couch-shell blower इत्यादि से बने हुए सब भाकारान्त शब्दों के रूप 'विश्वपा' के समान होते है (२) धातु से धने हुए सर आकारान्त शब्दों में सा नियमानुसार विभक्तियां जोड़ दी जाती है। यथा, हाहा- 1. हाहा हाही हाहाभ्याम् हादसभ्य २. हाहा हाही हाहाः हाहाम् ३.हाहा हाहाम्याम् हाहाभिः हाहाभ्यः संहाहा हाहा - ५.दादा " " "

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मुपन्त-प्रकरण (५) भजर, निजर, निर्जर (god) इत्यादि के रूप स्वरादि (जिसके भादि में स्थर हो) विभक्तियों में 'धस्' के समान भी होते हैं । यथा, रमा-अजर भजरी अजरसी, अजराः, भजरसः । २-अजरम्-अजरसम्, अजरी.अजरसी । (६) सायाह, व्यह तथा संख्यायाचफ अह (यह, यह इत्यादि ) शवों के सप्तमी-एकवचन में सायाहि, सायाहानि, सायाहव्यहि, घ्यहनि, ध्यहे; इत्यादि तीन २ रूप होते हैं और अन्य विभक्तियों में 'गज' के समान रूप होते हैं । पर मध्याहे, अपराहे, पूर्वाह , के एफ. ही रूप होते है । आकारान्त-विश्वपा (God, Sun, Moon) " विश्वपाम् एकवचन द्विवचन बहुवचन एकवचन द्विवचन बहुवचन १. विश्वपाः विश्वौ विश्वाः ५. विश्वपः विश्वपाभ्याम् विश्वपाभ्यः २. विश्वपाम् विश्वपी विश्वरः विश्वपोर ३. विश्वग विश्वपाभ्याम् विश्वपाभिः ७. विश्वपि विश्वपोर विश्वपाए ४. विश्वपे विश्वाभ्याम् विश्वपाभ्यः सं० विश्वपाः विश्वषो विश्वपाः (१) गोपा cowherd, सोमपा one who drinks the Soma juice, घूमरा one who inhales smoke, बलदा strength giver, शंखध्मा conch-shell blower इत्यादि धातु से बने हुए सब आकारान्त शब्दों के रूप 'विश्वषा' के समान होते हैं । (२) धातु से बने हुए सय आकारान्त शब्दों में सन्धि. नियमानुसार विभक्तियाँ जोड़ दी जाती हैं । यथा, हाहा- १. हाहा: हाही हाहाः हाहाभ्याम् दाहाम्या २. हाहाम् हाही हाही हाहाम् ३. हाहा हाहाभ्याम् हाहाभिः हाहा हाहाभ्यः सं० हाहाः हाही १.हाहा " 1. Translate into Hindi or English :-भज्ञपुरुष अपनो ४० याफरण कौमुदी। Exercise-5 सेवको। भाज्यामिकेन बनेन विपत्तो पालको पात ग्रामस्य मौका भागरहन्ति । वृक्षात् पालोऽपतत् । शिष्यानुपदिशति शिशः। मुर्गमा ग्यालका लोकाना पिया भवन्ति । चौरा अधोरयन्ति । विश्वामित्रम्प उपदेशेनागती रामलक्ष्मणौ । भूपः प्राणःशवहन्ति । मधेभ्यो लोकायोऽष ददाति । दशरथस्य पुरा ग्राम गरन्ति । 2. Translate into Sanskrit -(a) दो सहके । गाँध आदमी। दशरथ के पुत्रों को । गाँव में बहुत वृक्ष है ( सन्ति पनी लोगों को मुलाता है । मादयति ) राजा दरिद्रों को धन देता है (दवासि) । थालक एक पैर का लॅगया है। अस्ति। वह दोनों हाथों से शत्रओं को मारता है ( ताइयति ) । राजा के दोनों सैनिक युद्ध करते हैं । युध्येते )। मानसरोवर से यापुत्र नदी निकलती है (निर्गच्छति । (b) A food boy. Two sticks of Ram. Warriors of the King. There are (सन्ति) ducks in The boy takes (gifa) from the hand. The bull falls (wafa) from the top of the mountain. By the help of his wife Dasharatha conquires ( जिनवान् ) the enemies. 'The King gives (ददाति) wealth to the poor. There are many trees in the village. People bear (वहन्ति ) burden on their heads. Men eat appes rice with their right hand. Boys $te ( azafia) the moon in the sky. Gods dwell (fan) in heaven. 3.Correct--मश्वरः लोकाः जटिलो प्रश्नः । दक्षिा पुरुषा भाग एका गीरी कर पतति । ममाण गरम्ति सनिया | भाममेव भनेको भूगा परस्ति। स्थण म्वर्ग गनि किरेन वा गृमाति । सटाणा मो भवनि गनुन्या समूहः पतो। the pond.

सुपन्त-प्रकरण। ४१ इकारान्त-मुनि (Sage) प्रथमा मुनिः मुनी मुनयः द्वितीया मुनिम् मुनी मुनीन् तृतीया मुनिना मुनिभ्याम् मुनिभिः चतुर्थी मुनये मुनिभ्याम् मुनिभ्यः पञ्चमी मुनेः मुनिभ्याम् मुनिभ्यः पष्ठी मुनेः मुन्योः मुनीनाम् ससमी मुनी मुन्यो. मुनिपु सम्बोधन मुने पति और ससि शब्दों को छोड़ कर अतिथि guest, भरि enemy, effios bee, eifer sword, afe shake, pia sage, fa monkey, fa poet, for belly, A worm, fafe mountain, प्रन्थि joint, धर्जटि (शिव), ध्वनि sound, निधि store, पागि hand, वलि offering, यति ascetic, रवि BUD, मि ray, विधि (ब्रा) rule, व्याधि sickness, सारथि cha. rioteer इत्यादि सब इकारान्त पुंलि शब्दों के रूप 'मुनि' के समान होते है। ५. पति ( Lord, husband) २. पतिः पती पतयः पत्युः पतिभ्याम् पतिभ्यः २. पतिम् पती पतीन् २. पस्या पतिभ्याम् पतिभिः पत्यौ पति .. पत्ये पतिभ्यः सम्बो० पते पती अन्य शब्दों के साथ समास होने पर पद के अन्त में पति हो तो मुनि' के समान रूप होते हैं। यथा, नृपति, भूपति, पत्युः पत्योः पतीनाम् " पतयः 47 (१) अरही shameless, दुधी-मनपी-इतपी silly, in one who buys barley, शुद्धौ of pure intellect, मुत्री beautiful इत्यादि प्रायः सब कारान्त शब्दों के स्प(अलि और Tình ft : f= + V-in-.. thì ra: ulti ning ( friend) 1. rr गती t, uTor 1. fa.rator . ईकारान-सुपी (A wise mun) प्रथमा एपी सुधिनी हिनीया एपिप सुधिमा तुतीया सुशिया सुपीमा मणी मुधिये सुनस्याम पश्चमी मुधियः गुपीताम् पष्ठी सुधियः मुभिषी सप्तमी मुधियि मुधियोः सम्योधन सुधीः स्त्रीलिङ्ग दोनों में ऐसे ही होते हैं। (२) पर सेनानी general, अप्रणी leader, प्रामणी Superintendent इत्यादि का शब्दों के रूप सन्धि-नियमा. नुसार विभकियों को जोड़ देने ही से बन जाते हैं । सप्तमी के एकवचन में सेनान्याम् इत्यादि होते है। धि पि मुभिः गु सुपर राधियान मुधीर - सुबन्त-प्रकरण। (3) the sun, out horse sitt gag & s Intelope के रूप सेनानी की भांति होते हैं, पर द्विती फियवन में चातप्रमीम् और यहुवचन में बातमीन् । सप्तमी एकवचन में धातमी इत्यादि होते हैं। (४) प्रधी of good intellect का रूप भी सेनानी माति होता है। केवल सप्नमी के एकववन में प्रध्यि होता। उकारान्त-साधु (A sage, A saint) प्रथमा साधुः साधू साधध द्वितीया साधुम् साधू साधून तृतीया साधुना साधुभ्याम् साधुनि चतुर्थी साधये साधुभ्याम् साधुन पञ्चमी साधोः साधुभ्याम् साधुम्म षष्ठी साधोः साध्वीः साधून सप्तमी साधी साध्वोः सम्बोधन বাঘা (१) अणु atom, दक्ष sugarcane, I arrow, atraight, ऋतु season, गुरु preceptor, गोमायु Jai जन्तु animal, तन्तु thresd, तर tree, दस्यु robber, metal, परशु axe, पशु beast, पशु dust, प्रभु master friend, अ (मामा), विन्दु drop, भानु Sun, भिy bes मनु, मृत्यु death, बाहु arm, वायु wind, विभु lord, घेणु bamboo, bugle, शनु enemy, शिशु infant, सूनु सेतु bridge, हेतु cause इत्यादि प्रायः सूव उकारान्त पुंलिङ्ग के रूप 'साधु के समान होते हैं। (२) कोष्टु Jackal के रूप प्रथमा और द्वितीया के " ६ " अग्निभुवोः अग्निभुवान ४ अमिभुवे " पर, फरभू finger-nail, खलपू Bweeper, हम्भू thunder bolt, वर्षाभू frog, सुलू good cutter, हूहू agandharba ध्याकरण कौमुदी। घचा में नित्य तथा अन्य स्थरादि विक्तियों में विक्रम प्रोष्टु होफर 'वात' के समान होते हैं। यथा, -फोटा, प्रोधारा फोटार, ३-प्रोष्ट्रा-कोष्टुना, कोष्टुभ्याम् , मोष्टुमिः। उफारान्त शन्द-अग्निभू (कार्तिकेय) १ अग्निभूः अग्निभुवो अग्निभुवः ५ अग्निभुवः अग्निभूभ्याम् अग्निमूना २'अग्निभुवम् , ३ अग्निभुवा अग्निभूभ्याम् अग्निभूभिः ७ अग्निभुवि अमिभुवोः अग्निभा अमिभूभ्यः स. अग्निभूः भग्निभुवो अम्निमुः अधिभू lord, जितभू conqueror of the world, प्रतिभू guarantee, मनोमू (फामदेव ), स्यभू.स्ययम्भू ( ब्रह्मा ) इत्यादि के रूप “भग्निभू" के समान होते हैं। इत्यादि शब्दों में उच् न हो कर सन्धि-नियमानुसार विभक्तियाँ और दी जाती हैं । पर हूहू इत्यादि कई शब्दों की द्वितीया के एकवचन और बहु- यमन में प्रम से हुहुम् और हहुन् होते हैं । यथा, सन्नू,मुल्यौ, पुरुषः इत्यादि। कारान्त-दात (giver ) प्रथमा दाता दातारी द्वितीया दातार दातारम् दातारी सूर्माया दातन् दामा दातृभ्याम् যার্থী दा दातृभ्याम् पश्चमी दातृभ्यः दातुः पट्टी दातृभ्याम् दातृभ्यः दात्रो मनमी दातणाम् दात्री दातृषु . दामिः .

मुपन्त-प्रकरण। (1) fry taler, agent, wing boyer, it co reror, wm one who knows, looker, पान-विगत cator, नतृ grandson, धोत hearer, andience; सवित naz creator, इन्द्र killer इत्यादि स ह वन प्रयपान्त न्त ऋकारान्त पुलिस शब्दों के रूप 'दा' के समान होते हैं। (२) पर जामात Bon-in-Jay, देवृhusband-brother, man, पितृ father, सत्येष्ट charioteer त्यादि फा. न्त पुंलिश शब्दों के रूप 'मातृ' के समान होते हैं। भ्रात ( Bother) भ्राता भ्रातरी भ्रातः ५. घावर भ्रातृभ्याम् प्रानृभ्यः . भ्रातरम् भ्रातून ६. मातुः माओ भ्रातयाम् प्रारभ्याम् भ्रातृमिः ७. भातरि मानो भातर : प्राने मातृभ्यः स. मातः भातरौ भात कारान्त (Wealth) रायो राम्याम् सभ्यः रायम् रायो 1.राया राभ्याम् राभिः रायो राये सो ओकारान्त-गो (Cow, earth) गाची गायः ५ पोः गोभ्याम् गोभ्यः २ गाम् गावों गाः ६ गोः गयोः ३ गया। गोभ्याम् गोमिः पवियोः गोभ्याम् गोम्यः स. गौः गायों " " " " ५. राय " १गौः गयाम् गोषु पाय: ४ गये पशिल पारिशस्ति । सैनिक ४ सप भोकारान्त पुंलिङ्ग शब्दों के रूप ऐसे ही होते हैं। औकारान्त-ग्लो (Camphor, Moon) Tinate totn linth or Lnglish:--रयेरिमा 11 tatutilist. 14.10...net riaantiral ४६ व्याकरण कौमुदी। ग्लावा 1. ITE लोना ग्लोभम् लोभिः सम्बो. ग्लोहा या साकार के रूपलो के समान होते है। Csercine - 6 ५. म्लापः ग्लोभ्याम् ग्लायोः सा- " " PARTNE मेगातिमादिशति । नुप' पारा ror Irr ATMAITHशान गा -HTE गए। For | रामा गनि के EL Patnagi ima ** * mamta *-try Trantiaती . M- 1 - • • Imharam. ho सुबन्त प्रकरण । ४७ -- लते द्वितीया तृतीया चतुर्थी पञ्चमी पष्ठी सप्तमी सम्बोधन 3. Correct. --गुरुस्य भादेशः । हरिस्य सृष्टिः। मुनौ गिरिं गच्छतः । हस्तेन् गृहाति। कवीन् आह्वयति । ऋषेभ्योऽयं ददाति । नरपति सखे विश्वायो नास्ति । पितारं वदति। गावं मा तादय । भ्रातोः पुत्रौ पठतः । स्त्रीलिंग-शन्द । आकारान्त-लता (Creeper ) प्रथमा लar लताः लताम् लताः लतया लताभ्याम् लताभिः लतायै लताभ्याम् लताम्यः लतायाः लताभ्याम् लताभ्यः लगाया: लतयोः लतानाम् लतायाम् लतयोः लतासु लते (१) भर्थना worship, भात्मजा daughter, आशा order, आशा hope, इच्छा desire, कनिष्टा little finger, कन्या -daughter, करुणा compassion, कला art, कलिका bud. कविता poetry, कान्ता wile, कुलटा upchaste woman, कनशता gratitude, I mercy, an night, क्षमा forgive. ness, शुधा hunger, गङ्गा Ganges, गणिका hariot, गुदा cave, i neck, wfext small bell, you liate, farm Funeral pile, चिन्ता thought, घेरा attempt, घटा light, 2141 slade, at thigh, 1 crowd, 757 wife, fan ongue, ओविका livelihood, मोत्स्ना moonlight, तन्दा aziness, तमिमा night, वारा star, I state, दाक्षा rape, नासा nose, पा wisdom. पपिन letter, पादुचshoe, Nimika IlyaRrfanlion. jrsmine, रेम Imr. Rahments ney, rrrh मेगा oli maart carth, arntar desirr.amrpminstruction, fra; tame, fona. *** राम court. FTETTsanel. सुना ectr, मेना- Service, हया killing प्रमः राम (२) या Inother + मम्योधन.एफपवन (२) द्वितीया मीर तृतीया शादी के का धनु , (४)स्वरादि विमक्तियों के आने से जरा (old as विकल्पसे जरस हो जाता है। यथा, जरा, जरे-जरसी, मैं नासिका ( nose ), निशा ( night) और पृतना (are (५)द्वितीया-यहुवचन तथा आगे की स्वरादि विम से प्रमश: निड़ और पृइ तथा सप्तमी-बहुवचन में वि से निर्धार पृत् होता है । यथा, नासिकया नसा; निशा, निशाभ्याम्-निड्भ्याम्, निशामिः-निभिः, निश Mrm sinha . R-RIf fort's na रूप'ला'गमान होने। होता है। १ पष्ठो और सप्तमी के एक से द्वितीया द्वितीयाया:-द्विनीयस्याः, द्वितीयायाः-द्वितीयस्याः, द्वितीयस्याम् इत्यादि दो २ रूप होते हैं। जरसः। फा विकलेप से क्रमशः नस्, निश् और म-मादि चाली विभक्तियों में निशा और पृतना का प्रत् हो जाता सुषन्त प्रकरण दिसु इत्यादि। हर प्रत्यागतः। . - Exercise-7 1. Translate into Hindi or Enghsh:--गाया आरमजा । दाय माला । महिलासु लज्ञा वत्तते । भार्यायाः सेवया तुष्यति जनः। पुरा कन्यायै मालां ददाति । ललनाः शिलायामुपविशन्ति । भाषां शिक्षन्ते अब लिकाः । ललनाया हत्या कदापि न करणीया । रामस्य पादुकया भरतो 2. Translate into Sanskrit-(a) कन्या को । महिला के लिये। 'लना की चेष्टा गहा के लिये मालायें। रात में तारे उगते है ( उद्यन्ति । न्या की हत्या से लोग दुखी हैं । पर्वत की शोभा देखो ( पश्य )। स्त्री की रक्षा करो ( रक्ष)। कन्याओं की शिक्षा का प्रबन्ध करो (कुरु) । लड़- ग्याँ पुतलियों से खेलती हैं (क्रोदन्ति ) स्त्री पति के समाचार से प्रसन्न जाती है (भपति)। (b) For the daughter. Desire of women. Ram gives arland to Sita. The monkey falls from the mango-tree. the wife follows (अनुसरति) her husband. The woman Erorsbips (पूजयति) gods. Monkeys live (वसन्ति) on the pranches of trees, Mother gives dolls to her daughters. 3. Correcti-अन्नपूर्णा घराशाखात् पतति वाला । धरास्य रक्षा रु | मालान् धारयन्ति ललनाः। भार्याय अर्थ ददाति । मस्तकस्य पीडेन पीडितः । वृक्षशाखापु खगा निवसन्ति । नृपां प्रजानां रक्षकाः भवन्ति। इकारान्त-मति ( Intellect) थमा मतिः मती मतयः द्वितीया मतिम् मती मती: मत्या मतिभ्याम् मतिभिः मत्य-मतये मतिभ्याम् मतिभ्यः मरया:-मतेः मतिभ्याम् मतिभ्यः मत्या:-मतेः मत्योः मतीनाम् मस्याम्-मतौ मत्योः म्बोधन मते ४ तीया raut श्चमी ठी प्तमी मति' ki पत्ति wick of a lamp, विपत्ति adversity, वृत्ति professi शृष्टि rain, शक्ति power, शान्ति peace, स्मृति memon Vedas सृष्टि creation, हानि loss इत्यादि सब इकारान्त स्त्री- finger, अरवौ forest, sची earth, कठिनी chala Paatain, कामिनी woman, काकी-गोरी goddess ध्याकरण गौमुदी। भाग लि finger: मनधि funeral ceremony Accrease, उन्नति increment, अदि fortunes beauty, कीर्ति fame, कृति action, r husbandry. Amusement, fifa earth, aft mino, na morem. पकादि compound interest, पुलि fire-place beauty, जन्मभूमि mother land, जाति castc, race, fafa date, glz loss, e fa light, eifr earth, qfar dasts patience, नीति politics, पनि line, प्रति natures prosperity, भूमि land, मुनि freedom, मुक्ति images young lady, ufa night, afa manner, fa mi :शब्दों के रूप 'मति' के समान होते है। (१) ईकारान्त-नदी ( river प्रथमा नदी नयी द्वितीया मदीम् नद्यो नदी तृतीया नद्या नदीभ्याम् चतुर्थी नध नदीभ्याम् पञ्चमी नद्याः नदीभ्याम् पष्ठी नद्याः नयोः मदीनाम् नद्याम् नयोः नदीषु 'नदि नदीमिः नदीभ्यः नदीभ्यः .

सुयन्त प्रकरण। कुमारी Virgin, कौमुदी moon-light, गर्मिणी pregna woman, pfemt honge- wife, ait mother, afzaitof river, तर्जनी forefinger, तन्वी musical instrumes दासी maid servant, धरणी earth, धात्री nurse, न town, नन्दिनी daughter, भारी woman, पनी wife, town, geat manuscript, ut earth, firait sist मन्जरी blossom, मशहरी mosquito curtain, R crowned queen, मही earth, युक्ती young wom: रजनी night, राशी queen, लेखनी pen, eroit speech, well, चाहिनी army, विभावरी-शर्वरी night, श्रेणी Ii इत्यादि ईकारान्त स्त्रोलिङ्ग शब्दों के रूप 'नदी' के समान होते हैं। N, B. पर अवी (रजस्वला खो), सरी boat, तस्श्री 1 लक्ष्मी goddess of wealth और स्तरी Bmoke के प्रथमा- चन में विसर्ग भी होता है । यथा, अवी, तरीः इत्यादि शेष रूप के समान होते हैं। (२) श्री ( Beauty ) प्रथा सम्यो श्री थ्रिया द्वितीया थियम् श्रियो श्रियः तृतीया धिया श्रीभ्याम् श्रीभिः चतुर्थी थिय-धिये श्री.पा धीभ्यः पञ्चमी श्रिया:-थ्रिया धीभ्याम् श्रीभ्यः निया:-नियः भियोः श्रीणाम्-थि सप्तमी ‘भियाम्-धियि थियो श्रीपु धो intellect, भी fear, } हो shame के श्री समान होते हैं। श्रियः AIR finger,Inertildrro180 rrrrmant : in famn, 17 aclion, Amoeninant, toorth,#* mina, नकादि compouni intrest, if brauty, fe nothing innd, 10755 तिपिdate, दि.१२, गुलि light,frestha patience, मोति politics, din line, प्राल prosperity, भूमि land, मु िfreedom, मूर्ति young lady, tify night, Oir minner, afet wick of a lamp, fasta adversity, fine Vedas creation, हानि 10s इत्यादि सब क- अंगुलि finger, अटवी forest, चौ earth, कठिनी ch तो plantain, कामिनी woman, काको गौरी godd- (१) ईकारान्त-नदी ( river) hoauty, वृष्टि rain, शकि power, शान्ति शों के रूप 'मति' के समान होते हैं। peace, tofa ना प्रथमा द्वितीया तृतीया चतुर्थी पञ्चमी पष्ठी सप्तमी सम्बोधन नदी नदीम् नद्या नद्य नद्याः नधा: नधी नया नदीग्याम् नदीभ्याम् नदीभ्याम् मद्योः नयोः नई नदीम नदीम मदीन नदीषु नद्याम् 'नदि ..

सुयन्त प्रकरण - खुमारी Virgin, कौमुदी moon-lighth गर्भिणी pregnant woman, pfeuft house- wife, at mother, afzeit-fiat river, Eräät forelinger, asit musical instrument, दासी maid servant, धरणी earth, धात्री nurses नगरी town, मन्दिनी daughter, मारी woman, पक्षी wife, पुरी town, पुस्तो manuscript, पृथ्वी earth, भगिनी sister, मन्जरी blossom, मशहरी mosquito curtain, महिषी crowned quees, मही earth, युवती young women, at night, zret queen, लेखनी pen, amit speech, atat well, वाहिनी army, विभावरी-शर्वरी night, घेणी line, इत्यादि ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों के रूप 'नदी' के समान होते हैं। N. B. पर थची (रजस्वला स्त्री), at boat, तन्नो lute, लक्ष्मी goddess of wealth और स्तरों smoke के प्रथमा-एक- बचन में विसर्ग भी होता है । यथा, अकी, तरी इत्यादि शेष रूप नदी' के समान होते हैं। । (२) श्री ( Beauty ) प्रथमा सम्योधी: थियो श्रियः द्वितीया प्रियम् थियो श्रियः तृतीया धिया श्रीभ्याम् श्रीभिः चतुर्गी शिप-धिये. श्रीभ्याम् धीभ्यः श्रिया:-थ्रियः श्रीभ्याम् धीभ्यः पष्टी थ्रिपा:-धियः धियोः श्रीणाम थियाम् सप्तमी ‘धियाम्-भिपि धियोः धीपु धौ intellect, भौ fear, भोर हो shame के 'श्री' के समान होते हैं। पञ्चमी . .. A माद compount infrri in prosperity. भूमि land fertion minimes young ladly, tf1 night, A minnar, * * are wick of a lamp, frin adrerity. In profess: fe rain, s poser, re, e per Veda of creation, 1043 777 TTC - 7 + C Mitamarhte. amgirmant, fit orth, et on thrauty, wife mithor and in.. pिrdate refh lirhternetnews patience, it politics, ** lina, op!t nafne“, यमों के रूप मति के ममान होते। (१) ईफारान्त-नदी ( river ) नदी नदीम् नद्या नद्य नधी नया नमः प्रथमा द्वितीया तृतीया चतुर्ण पञ्चमी पष्ठी सप्तमी सम्बोधन अंगुलि file कदलो plant मदीयाम् नदीभ्याम् नदीयाम् मद्योः नद्याः नद्याः नदीमिः नदीभ्यः नदीभ्यः नदीनाम् . नद्याम् नयोः . नदीषु earth, fait chalk, goddess सुयन्त प्रकरण। कुमारी Virgin, कौमुदी moon-light, गमिणी pregnant woman, गृहिणी house wife, जननी mother, तटिनी-तरंगिनी river, at forefinger, azzi musical instrument, दासौ maid servant, घरणी earth, धानो nurse, नगरी town, affi davghter, at woman, wat wife, yo town, पुस्तो manuscript, पृथ्वो earth, भगिनी Bater, मजरी blossom, मशहरी mosquito curtain, महिषी crowned queen, मही erth, पुत्रत्तो young woman, रजनी night, राज्ञी queen, लेखनी pen, शाशी speech, धापी well, पाहिनी army, विभावरी-शधरी night, श्रेणी line, इत्यादि इकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों के रूप 'नदी' के समान होते हैं। N. B. पर वी (रजस्वला स्त्री), तरी boat, तस्त्री ute, लक्ष्मो goddess of wealth और स्तरी smoke के प्रथमा-एक- वचन में विसर्ग भी होता है । यथा, अवी, तरी इत्यादि शेष रूप नदी' के समान होते हैं। (२) श्री ( Beauty ) मथमा सम्बो. श्रीः थियो श्रियः द्वितीया श्रियम् . थियो श्रियः तृतीया धिया श्रीभ्याम् श्रीभिः चर्स धि-धिये श्रीभ्याम् धीभ्यः पश्मी धिया:-श्रियः श्रीभ्याम् श्रीभ्यः पष्ठी श्रिया:-धियः धियोः श्रीणाम्-थियाम् सप्तमी ‘धियाम्-धियि थियोः श्रीपु धौ intellect, मी fear, और हो shame के रूप 'श्री' के समान होते हैं। . .

Siunar mansion, पन्चु benk, तनु body, रज्य rogdust, लायु nerve ल्यादि स उकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों के ध्याकरण-कौमुदी। (१) स्त्रीलिङ्ग सुधी, हनी, शमी, शुद्धी इत्यादि । के रूप 'श्री' तथा पुल्लिङ्ग 'सुधी दोनों के समान होते हैं। (२) स्त्रीलिङ्ग प्रामणी, अग्रणी इत्यादि के रूप पुल्लिङ्ग समान होते हैं। Fat Woman ) प्रथमा स्त्री स्त्रिया स्त्रियः द्वितीया स्त्रियम्-स्त्रीम् स्त्रियों तृतीया स्त्रिया स्त्रीभ्याम् चतुर्थी स्त्रिय स्त्रीभ्याम् पञ्चमी स्त्रिया: स्त्रीभ्याम् पष्ठी स्त्रियाः स्त्रियोः सप्तमी स्त्रियाम् स्त्रियोः सम्योधन स्त्रि उकारान्त-धेनु (Cow) मधमा धेनवः द्वितीया धेनुम् तृतीया धेन्या धेनुमिः चतुर्थी धेन्य.धेनवे धेनुभ्यः पञ्चमी, धेन्या:-धेनोः पछी धेनुभ्यः धेण्या-धेनोः सप्तमी धेन्याम् धेनौ धेनूनाम सम्पोधन धेनी धेनु' स्त्रियः-स्त्री स्त्रीमिः स्त्रीय स्त्रीय स्त्रीणा स्त्री धेनू धेनू धेनुभ्याम् धेनुभ्याम् धेनुभ्याम् धेन्योः धेन्योः 'भ' के समान होते हैं।

सुषन्त-प्रकरण। घध्या ऊकारान्त-वधू (Wife, bride) थिमा वधूः पथ्यौ पध्यः द्वतीया वधूम् वध्यो वधूः तीया वधूभ्याम् घधूभिः तुर्थी वध्ये यधूभ्याम् घधूभ्यः ।श्चमी घध्या: वधूभ्याम् यधूभ्यः ष्ठी घध्याः यध्वोः घधूनाम् उप्तमी यध्याम् वश्वोः यधूप सम्बोधन वधु कर्कन्धू jujube tree, चमू army, चञ्चू beak, चम्पू (काव्य), नू body, पुनk re born, प्रसू mother, वौरसू mother of tero, ग्वधू mother-in-law इत्यादि सब ऊकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों रूप 'वधू' के समान होते हैं। पर भू earth, सुभू, woman having beautiful eye. prow शब्दों के रूप 'भ' के समान होते हैं, परन्तु सम्बोधन-एकवचन 'सुभू' का 'मुभू' होता है। (Eye-brow) थिमा-सम्यो. भ्रः भ्रषौ भ्रवः देतीया भ्र पम् भ्र वो ध्रुघः तीया भ्रघा भूभ्याम् तुर्थी মুহামু ची सुवा:-मूकः भ्रूभ्याम् ठी 5 भ्यः सुवा भ्रवः मयोः प्तिमी भ्रूणाम्भ्याम् ध्रुपाम्-सुपि म्वोः भ्र भ्यः

।
tuitml
File mantri
ter. ममा htstands arrr. om rotter.r
baridir brother's teir, er sister said it LETTE
के पाग, मा भीरमा
समान होने है। पर
दिन में ए.
मनान्तः मानः, यान होते है।
ओकारान्न-औकारात च ।
स्त्रीलिङ्ग भोकारान्त भोर भीकाराग्लशदों के पति
के समान ही होते हैं। या, otheatent m 'गो'
समान और नी.bot 2 R 'ली' के समान होते हैं।
Exercise-8
1. Translate into Hindi or English:ोनये
विपत्ती हतिः । स्मृतीन रचना । जननी जन्मभूमि । वृष्टरमान
भाषाया उन्नति भवति । कृपये भूमिः। को हानि भवति । कपनो मा
शक्तिः । भटम्यां नमामि तटिनी पवा निस्मा नारी पशु
प्राप्नोति । कुमारी कठिल्या पयं लिखति । दासी नगरी गतिमिर
दास्याः पुत्रं पृच्छति । आम्रवृशेषु मार्य. पन्ते।
2. Transtate into Sanskrnt:-चन्द्रमा की रोशनी ।
अंगुलियों । लड़की के लिये । स्त्री के लिये मशहरी । स्वर्ग से "
पर आता है (भागति)। नगर में स्त्रियों का दल जाता
(गति) । धूल से आकाश पूर्ण है । दरास्य को तीन स्त्रियाँ ।
चार पुत्र है। कार्तिकेय को ६ मातायें थी (आमन्) । प्रकृति
देखता हूँ (पश्यामि)। सीता सामु की सेवा करती है (सेवते
की रिश्रयों पति को देवता समझती ६ (मन्यन्ते)।

सुबन्त-प्रकरण। (b) To the earth. The beauty of women. T ment of the earth. Images of goddesses. Man fall (wala) into the Ganges. Stars shme (9 the night. Young womea go (neofia) to their There are many wells in the village. The que money to ber mard-servants. 3. Correct:--स्मृतिस्य रचना । देवतास्य भाज्ञा । शन जयति। लेखनिना लिखति कन्या । स्वभ्यो माला लक्ष्मी विष्णोः पनी । राज्ञीश्य भाशा माननीया । कुमारी ददाति । स्मृतिसु महतो उपदेशा सन्ति । स्वरान्त-क्वीवलिङ्ग शब्द । अकारान्त-फल (fruit), फलम् फला २ फलेन फलाभ्याम् ४ फलाय फलात् फलाभ्याम् ६ फलयो फलेषु स० फले फला अध sing a spot, mark; अझ hmb, भग yard, अज्ञान ignorance, अध्यात्म knowledge अन्तर interval, अन्तरीक्ष sky, अपत्य offsprit nectar, अरविन्द lotus, भर्श piles, अश्रु tear, अहिफे झालबाल basia for water round the root of मासन seat, इन्दिय an organ of sense, इन्धन fr upper garment, उत्पल lotus, उदर bell, उद्यान " " " " #9829; int yuqorint p:/***, ** tinh, tikrina, *tt bozera *****, ***** costeiri, ki prirm, pret bus, iptalita. 37 lotni, ** lumiiy. * writern. 1108, 4** puel lotus, **541 stortPosy, licht, e fooie, lines, strel, *cours yans, sely manner of trudin bile, TTT busytail fun lienti, foye chin, f47 muxtk. parte posibir, conciousnese, tra irabel, T? bully. 1 warr, 1 nrl, me reality, copper, SAT? tobarnr. star, bank, arrosts fra kl.15, 1:* 1stcary, Tos milk, fort, fai length, 147 bin... 7 tvor, 07 meditation *T star, 3771 town, Faster midnatt, 7 dancing, ** enerchandur, 477 rickfruit, á Ical, ar vessel, a wster, Tifft ressard, Free cage, fret cake, gertail, get inesit, 37 LOND, SOTT book, 7 datn, day break, T flower, faranga disc, a luck, 977 world), altue, A7 liquor, IT crowd, root, mpnes, y unchine, g* war, रजत silver, रण war, रन hole, रहस्य secreey, me kingdom, countryi 11 ssit, erre beauty, बचन speech, वमन romitung, वरन wearing, वर्णन describing, ana-apa cloth, 35796 window, fint science, वित्त wealth, विष poison, वृत्त circle, qन्त stalk, और enmity, fan, un adrersity, difficulty; 4719 सुबन्त-प्रकरण. ५७ grammar, व्रण tumour, u penance, शव dead body, young grass, शास्त्र weapon, शस्प corn, शौर्ष head, शील. nature, भाव funeral ceremony, सङ्गीत song, पच power, सन्तान issue, समीर proximity, साक्ष्य eviance, सादृश्य likeness, साहस boldness, साहित्य literature, द्वासन throne, a happiness, सुवर्ण gold, सोपान stairs, न्य beauty, स्वर्ण gold इत्यादि सब भकारान्त क्लोवलिङ्ग ग्दों के रूप 'फल' के समान होते है। पर णत्व-विधान के अनुसार ही २२ काण हो जाताई। पर वितीया यहुवचन Aथा मागे की विभक्तियों में हृदय हत् , उदक का उदन और आस्य का भासन भी होता है। क्षान्तर में इनके रूप 'फल' के समान होते हैं। यथा, ३या--- दा-दयेन, हृद्भ्याम्-हदयाभ्याम्, इद्धिः-हदयः इत्यादि। आकारान्त शब्द। साकारान्त शब्दी को अकारान्त करके उनका रूप पल' के समान बनाया जाता है। यथा, धोपा-धोपम् , धोपे, धीपाणि इत्यादि। इकारान्त-वारि (Water ) प्रथमा पारि पारिणी यारीणि हिनीया erfc चारिणी বাতি तृतीया धारिणा হিমাম पारिमिः धारिणे থামি धारिभ्यः पक्षमी पारिणः पारिभ्याम् पारिभ्यः पठो ঘাত; यारिणोः पारीणाम् सप्तमी पारिणि परिणोः पारिषु सम्योधन पारे, पारि maava-Biamon. ध्याकरण-कौमुदी। अक्षि cye, मस्थि bone, दधि curd, सक्रिय फो छोड़ फर इकारान्त क्लीवलिङ्ग शब्दों के रूप 'या समान होते है। दधीति दधीनि दधि (Curd) प्रथमा दधि दधिनी द्वितीया- दधि दधिनो तृतीया दधना दधिभ्याम् दधिमि चतुर्थी दने दधिभ्याम् दधिम्य पञ्चमो दहनः दधिभ्याम् दधिम्य पछी पध्मः नोः सप्तमी दनि-दधनि दश्नो दधिषु सम्बोधन धे-दधि अक्षि, मस्थि और सथि के रूप 'दधि' के समान हैं, परन्तु अक्षि में न् का ण होता है। उकारान्त-मधु ( Honey ) प्रथमा द्वितीया तृतीया चतुर्थी पसमो पष्ठी ससमी मधु मधु मधुना मधुने मधुन: मधुन: मधुनि मधुनी मधुनी मधुभ्याम् मधुभ्याम् मधुभ्याम् मधुनोः मधुनोः मधूनि मधून मधुमिः मधुभ्यः मधुभ्यः मथनाम् मधु -- सुधन्त-प्रकरण भF water, अश्रु tear, as thigh, अनु lac, जानु kuee, शाल pslate, दारु wood, मह desert, वसु wealth, परंतु thing, मधु beard, सानु tableland इत्यादि सब उकारान्त लौलिग शब्दों के रूप 'मधु' के समान होते हैं। द्वितीया-बहुवचन तथा आगे फी विभकियों में सानु (tableland ) का स्नु भी होता है। उकायन्त शब्दों का उकारान्त कर देते हैं और 'मधु' के समान रूप होते है । यथा, सुलू-सुलु, सुलुनी, सुलूनि इत्यादि। विशेषण । विशेषण इकाराल और उकारान्त क्लीलिङ्ग शब्दों के रूप भी विशेष्य इकारान्त, उकारान्त के समान ही होते हैं; पर चतुर्थी, पञ्चमी, ष्ठी, धीर सप्तमी के एकवचन तथा पष्ठी और सप्तमी के द्विवचन में पुलिङ्ग के समान भी रूप होते हैं। यथा, शुचि ( pure)-शुचिने-शुचये, शुचिस्याम् , शुचिभ्यः इत्यादि। सुमति-सुथुद्धि good intellect, अनादि eternal, स्वादु siveet इत्यादि के रूप 'शुचि' के समान होते हैं। N. B. पर सुधी, सुधी, शुद्धधी, मन्दधी, हतधी को इकारान्त कर देते है और कारि' के समान इनके रूप होते हैं परन्तु द्वितीया से आगे को स्वादि विभक्तियों में पुल्लिङ्ग 'सधी' के समान भी रूप होते है। यथा, (१ मा, २ या,) सुधि, सुधिनी, सुधीनि। (३ या ) सधिया-सुधिना, सुधिभ्याम् , सुधिभिः इत्यादि।

पाकरण कौमुदी सरामी FTFITT.77777 (Creator) पाग धागणी पानि forint पाणी धागि गर्माया घायणा-छात्रा पागम्याम् সামি मी धारण-यात्र मातृभ्याम् पक्षमी धारण:-धातु पातम्याम् धानुभ्यः गणी धावणा-धातु धातूणी:-धात्री पावणाम রাসূলির আণা:-গাষী: খাস सम्योग धातु-धातः 4.79docr, autliort F11 giver, air knatcr, 57 conqueror इत्यादि प्रकारात शब्दों के रूप मी पैसे ही होते है। ए-ऐ-ओ-आकारान्त शब्द । प.ऐकारान्त क्लीवलिङ्ग शब्दों को इकागन्त तथा मो.सी. कारान्त शब्दों को उकारान्त फरके मम से 'वारि तथा 'मधु' शब्दों के समान रूप यनाते है । यथा, परे (one who has great wealth )-(१.२) प्ररि, परिणी, प्रीणि; (३) प्ररिणा, प्रराम्याम्, प्रराभिः (see रै)। प्रद्यो तथा मुनी के रूप 'मधु' के समान यना लो। Exercise--9 I. Dectine-नर, हरि, यखि, पति, नरपति, सम्मु, सेनानी, हाहा, सुधी, सुलू, हूहू, कन, गन्त, गो. तारा, बुद्धि, जननी, सनु, स्वस्. मात्र, यो, नौ, कमल, दाह, शुचि, सुधी and कन। 2 Dectine पति, सुधी, स्त्री, धो, न, वारि and प्र in 2nd, 6th and 7th cases. . - सुपन्त-प्रकरण। ६ १ 3. Translate into Hindi or English:-मधुराणि फलानि । काष्टमये भासने फलग्राय भोजनम् । उद्यानात् पुष्पाणि आनय । दशरथस्य पच अपरयानि मासन् । कङ्कणाच्या स्वर्ण क्रीतवान् । करपण विदार्यमाणं कारद्वयमस्ति । उद्यानात् कतिपयानि भाम्राणि भानय | गङ्गाया. स्वादु पारि पियामिावारिणि सुन्दराणि कमलानि शोभन्ते । भ्रमराः पुष्पेभ्यो मधूनि गृहन्ति । चौरा ब्राह्मणस्य सर्वानि वस्तूनि चोरयन्ति । - +. Translate into Sanskrit-1a) लकड़ी के घर में। वन के मोठे फल । समुद्र का जल स्वास होता है । वृक्ष के सूखे पत्ते पृथिवी पर गिरते हैं ( पतन्ति ।मनुष्य पुराने घरों को स्याग देता है (यजति ) । माम के फल मोठे होते है ( भवन्ति)। बालक की असफलता का कारण क्या है रामचन्द्र १४ वर्ष वन में थे (आसीत् । घर में अन्न की राशि है। रथ पहियों से चलता है। चलति)। (b) To the widow. Ghee for the friend. The king gave (दसवान् ) hum pason. Beegars beg ( याचन्ते ) from door to door. Bees gather (Ausfin) honey from flowers Boys will learn (farm) literature from the teacber. All subject are satisfied with the rule of Ram. Shyama is blind of one eye. The heart of Hari is full of joy. Contentment is the source of banpiness, 5. Correcti--आम्रस्य फलान् खादन्ति लोकाः । प्रकृतेः सौन्दर्येन सन्तुया लोकाः । बहवो कमला शोभन्ते । पद्मो भाति सनोवरे । पालिकामा अक्षिणे पोशावति । मद्या धारी स्वाति बालक.मधौ मधुरतास्ति। व्यम्जनान्त शब्द। व्यञ्जनान्त शब्दों में प्रायः सधिनियमानुसार विभक्तियों के योग करने दी से रूपयन जाते हैं। पुल्लिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग ध्यञ्जनान्त शब्दों में पुल्लिा भार स्त्रीलिङ्ग के विचार से पिकियों के लगाने में कोई भेद नहीं है।

ध्याकरण कौमुदी। क् ख् ग्ध, ट्द,तू थ द धु, प्य म्-अन् चाले शब्दों में प्रायः प्रथमा की स् विमक्ति का लोप होक शब्द के अन्तिम वर्ण के स्थान में अपने वर्ग का प्रथम वर्ण है जाता है। स्वरादि विमकियों में कोई परिवर्तन नहीं होता पर व्यञ्जनादि विभक्तियों में सन्धि.नियमानुसार अपने वर्ग क प्रथम या तृतीय वर्ण हो जाता है । यथा, सर्वशक्.ग, सर्व शको । सर्यशगम्याम् सर्वशशु, चित्रलिग्-चित्रलिक चित्रलिखो चित्रलिग्भ्याम्, चित्रलिक्षु इत्यादि। चकारान्त-पुल्लिङ्ग-जलमुच् (Cloud ) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा सम्बोधन जलमुक जलमुची जलमुचः द्वितीया जलमुचम् जलमुची जलमुचः सृतीया जलमुचा जलमुग्भ्याम् चतुर्थी जलमुचे जलमुग्भ्याम् जलमुग्भ्यः पची जलमुचः जलमुग्भ्याम् जलमुग्भ्यः पष्ठी जलमुचः जलमुनोः जलमुचाम् सप्तमी जलमुचि जलमुयोः जलमुक्षु पयोमुच्-यारिमुच् ( cloud ) इत्यादि सय दिलङ्ग तथा स्य Skin, पाय Speech, शुच् Sorrow, इत्यादि सय स्त्री- लिङ्गशदों के कप जलमुच्' के समान होते है। पर उदय north, northern तियेच bird, प्रत्य Test, western रस्पादि मञ्च् ( togo) पातु से बने शान दिनीया फे. पदवयम तथा मागे की स्वरादि मिमकियों में प्रम से उदीय तिरघ, प्रतीच इत्यादि हो जाते हैं। फिर 'प्राच' के महम् इनके सर होते हैं। जलमुग्मिः सुयन्त प्रकरण। ६ ३ 91€-( East, eastern) " " " " प्राक्ष. प्राङ् प्राची प्राञ्चः प्राश्चम् प्राचः प्राचा प्राग्भ्याम् प्राग्भिः प्राचे प्राग्भ्यः प्राचः प्राग्भ्याम् प्राग्भ्यः प्राचोः प्राचाम् माथि मा प्राची प्राश्वः स्त्रीलिङ्ग में प्राच्, उदीच् इत्यादि के रूप प्राची इत्यादि न्त हो फर 'नदी' के समान होते हैं। जकारान्त पुल्लिङ्ग पणिज्-( Merchant ) , सम्योधन धणिक पणिजी पणिजः यणिजम् पणिजी चणिजः पणिजा पणिग्भ्याम् पणिमिः पणिजे पणिग्भ्याम् पणिभ्यः पणिजः वणिग्भ्याम् घणिग्भ्यः पणिजः पणिजोः पणिजाम् पणिजि पणिजोः पणिक्ष त्विज family priest; यलिभुज् fire, मिपञ् =ian, भूभुम् king. भृतिभुज् Servant, हुतभुज त्यादि सब पुल्लिङ्ग तथा रु disease, न garlsnd सप स्त्रीलिङ्ग शब्दों के रूप ऐसे ही होते हैं।

६ व्याकरण कौमुदी। (२) पर देवराज Indra, परिबाज mendia पिराज splendour, विश्वसृज creator of the unit इत्यादि 'सम्राज' के समान होते हैं; पर विश्यमृज् के 'यणिज्' के समान भी होते हैं। सम्राज ( Emperor) प्रथमा, सम्बो. सम्राट सम्राजी सम्राजः द्वितीया सम्राजम् सम्राजी सम्राजः तृतीया. सम्राजा सघ्राइभ्याम् सम्रानि चतुओं सम्राजे सम्राइभ्याम् सम्राइभ्य पञ्चमी ताजा सघ्राइभ्याम् सम्राझ्य पष्ठी सम्राजः सम्राजोः समाजाम सप्तमी सम्राजि सम्राजीः सम्राट्स तकारान्त पुंल्लिङ्ग-भूभृत् ( King, mountair प्रथमा सम्पो भूभृती भूभृतः द्वितीया भूमृतम् भूभृती भूमृतः পূর্শায়া भूभृद्भ्याम् भूभृमिः घनुर्थी भूभृतं भूभृद्भ्याम् भूमइभ्यः पञ्चमी মুমূস: भूम्याम् भूभृदय: पछी भूभृतः भूभृती: सप्तमी भूभृति भूमनोः भूमृत्यु भन् (शत, स्यन् (य), मत् (मनु), पत् (ARIF सगन् (चतु) प्रत्यगन्त और मरम् को छोपहर इन्द्रजितु conquerof Indra, táin workman, nem wiog, iar fi सुयन्त-प्रकरण पापयत् one who has committed sis, वृहत् lyrge, मल्लू air, महीक्षित् king, महीभृत् mountain, निपश्चिस् learned, विश्वजित conquering all, शशभूत् moop, हरित green, इत्यादि सब रिला या शुस् sneezing, सहित् lightning, प्रत् army, योपित् woman, विद्युत् hghting, परिस् river इत्यादि सब स्त्रीलिङ्ग तकारान्त शब्दों के रूप ऐसे ही होते हैं। (१) अत् व स्वत् प्रत्ययान्त । अत् प्रत्ययान्त-धायत्-running. . ५ घावतः " " " " - " धावत्स ঘৰৰ পানী খান: ४ धावत धावद्भ्याम् धावद्भ्यः सम्बो २ धावन्तम्। धावत: धावतोः धावताम् ३ धावता धावद्याम् धावद्भिः ७ धावति इउत् wiehing, कुम्वत् doings गच्छस् going, गायत् singing, 67 taking, taking, तिष्टस् standings द्विषत् hating, ध्यायत meditatiog, नृत्यत् dancings पश्यत् seeing, पिक्त drinkings ब्रुवत् speaking, भवत् being, इत्यादि शत् प्रत्ययान्त तथा करिष्यत् about to do, गमिष्यत् about to go, दास्यत् about to give, यास्य, about to go, स्थास्यत about to stand इत्यादि स्यत् प्रत्ययान्त शब्दों के रूप 'धावत्' के समान होते हैं। पर जापत् being awake, शासत् governing, ददर 'giving, दधत् holding, यिमत् possessing इत्यादि के रुप 'भूभृत्' के समान होते हैं। M स्त्रीलिङ्ग-में धत्, स्यत् , मत्, यत्, तवत् प्रत्ययान्त " " known, दृष्टवत् seen, शुतवत् beard, स्थितवत् stayed इत्यादि प्यार कीमुही (२) मन, या , সব प्रत्ययान्न। मत् प्रत्यपान्त-श्रीमत् Prosperous, श्रीमान् भीमन्तो धीमतः १ भीमा भीमद साम् श्रीमान् 1. भीमन् श्रीमतः २ श्रीमन्नम् धीमतः भीमतो ३ धीमता भीमद्भ्याम् श्रीमति: ७ भीमति अंशुमत् Run, मायुप्मत long.lived, योनिम RUDीप्तिमत rossessed of majestic lustre. पनुमत् Archer, धीमा wise. मानुमत् luminous, मतिमन्-युदिमत् wise, मतिमत Sharing form, सानुमत mountain, हनुमत् ( हनुमान् ) स्य मत् प्रत्ययान्त; इयत् this much, एतायत so mucb, फियत how much, ज्ञानवत् प्रजावत् wise, तावत् as much, ममत्वत air, भगवत् adorable, भवत् ( युष्मदर्थ ) thou, भास्वत् shining, यावत् as much, सजावत् bashful, पलवत् strong: विद्यावत् learned, विवस्वत् sun, इत्यादि यत् प्रत्ययान्त तथा बE Esid, सवत् done, गतवत् gone, जितवत् conquered, ज्ञान . 1 . तवत् प्रत्ययान्त शब्दों के रूप 'श्रीमत्' के समान होते हैं । महत्-Great. १. महान् महान्तौ महान्त: २. महान्तम् महान्तो महतः शेष रूप 'श्रीमत्' के समान । शब्दों के परे ई जोड़कर (स्त्रीलिङ्गप्रत्यय में देखो) 'नदी के समान रूप बनाये जाते है। सं० महन् " पन्त प्रकरण । MIC दकारान्त-पुंल्लिङ्ग-मुहद्-Friend. द-पहत् मुद्ददौ पवादः ४.९ो मुहदम्याम् मुहद्भ्यः १५ " " १७ " १ एडयो सुददाम् सुद्भ्याम् सद्रिः सदादि दिद् sprouting, गोत्रभिद् Indra, दिविप god, निरापद् perous, पy foot, मझविद् sage, समासद् member of ssembly rrufsfery 907 2017 denger, 197 stone, Besembly, विपद् anger, autumn, संग rbly, सम्पद prosperity इत्यादि प्रोलिय दकारान्त शन्नों 'सुहन्' के समान होते हैं। धकारान्त-स्त्रीलिङ्ग-धीरुध-Creeper. (औरत् पोल्यो बोधः मोरो पीररम्माम् परम्पः वोरपः म पैरो बीरधाम दौरभ्याम् वीदिः . वीरधि मधू knowing the law, सुपुम् fighting trell, पुहिक तथा सुY hunger, गुम् war, समिधु ivel, स्त्रीलिपकारात राहों प पीर' के समान " " " " " " 1 Exerciser-10. ranslate into Hndh or Inahshi• पयोमुक पारपाम् । माधुरन पर शानिएशिलान् हुमनाम पारा शिक्षको दिम मानला मितिमा सरिक रिमाwिityी मामा- ध्याकरण कौमुदी। गच्छति । विद्यावन्तो ज्ञानवत आदरं कुर्वन्ति । यालकः नृप्यन् गृहं प्रविश कार्य करिष्यन ग्रामं गमिष्यामि । परिषदि दिविषदः धसन्ते । शरदि आ निम्मलं भवति । विपदि ब्रह्मविदोऽपि दुःखिता भवन्ति । 2. Translate into Sanskrit:-(a) वचन से। राजा का। देवताओं का राजा है । राजा को माला देता है । वणिक् म्यापार करता मेव में विजा चमकती है (प्रकाशते ) नदियों में गला श्रेष्ठ है। मार्ग गाते हुए भाता है। ईश्वर का ध्यान करते हुए बोला (भवदत् )। सूर्य निकलता है (उदेति ) तय भन्धेरा दूर हो जाता है ( नश्यति ) 15 ने कहा था (कथयत् )। राजा ने शवों को जीता। राजा ने अनेक र को मारा ( हसवान् ) । लड़के ने एक बाघ देखा (अपश्यत् ) । सभा पण्डित लोग भाये हुए है ( भागताः)। (b) In the east. Vashishtha was the priest of Rag! family. Servants serve (hard) their king and the kiem protects (रक्षति) them. The girl made (प्रथितयती) - iand and gave ( दत्तवती)t to her younger brother. Gares bas farge wings. There are many green leaves on 15 tree. Women mudo (Alust:) garlands of flowers. An intelligent boy learns (font) his lesson. The sun gives heat and ligbt. News is heard (at) by every one in it assembly. One should have (मवलम्वनीय) patience in dance I. Correct:- भूभृतस्य भाशा मामनीया । समाजप्रजाना हवा गाराचे प्रम। समाजस्य परिषदे मे यायो मुदा सन्ति । वि हुम गर्न प्रक्षिपति। शान् मिया माग सेनापति क्षोमा भान जामवर अपि भगवर माज्ञानसंग सम्परविको पादपाः पनपत्रनिनिविदामा परिषद गौचभिवानि ।

सुयन्त-प्रकरण । ६ ६६ साबो. गुणिन् । २. गुणिनम , " " नकारान्त शच्द। (१) इन् भागान्त पुंल्लिङ्ग-~-गुणिन् (Qualified) १. गुणी गुणिनी गुणिनः ४. गुणिने गुणिभ्याम, गुणिभ्यः ५. गुणिनः गुणिनोः ঙ্গিনাম, ३. मुभिना गुणिभ्याम गुणिभिः ७. गुणिनि গুলি पपिन्, मपिन्, ऋभुक्षिन को छोड़कर भर्थिन् one who arks anything, आत्मघातिन् one who commits suicide, एकाकिन् alone, कछु किन् chambernin, करिन् elephant, कुटुम्बिन house holder, कुशलिन happy, केशरिन् hon, हिन् householder, चक्रवर्तिन् sovereign ruler, शानिन् wise, तपस्विन ascetic, तेजस्विन strong, दूरदर्शिन prophet, देहिन् one who has a tody, ट्रेषिन् enemy, धनिन् nch man, धन्विन् an archer, पक्षिन् bird, प्राणिन् animal, धलिन् strong, मनीषिनू wise man, मनोहारिन् pleasing, मन्त्रिम् minister, Aufat intelligent, ifta sickly, afinal eloquent speaker, aifaz horse, farefas sensualist, after enemy, शिखिन् peacock, साक्षिन् witness, स्वामिन् lord इत्यादि इन् मागान्त पादों के रूप 'गुगिन्' के समान होते हैं। afer (Path, way) पायानी पन्यानः, ४. पथे पनि पशियः १. पन्थाः " " " .. पन्धानम " पथः पवन पधिप्राम पथाम पयिषु (२) अन् भागान पुल्लिा-लपिमन(Lightness) मुनाणी, प्रामुशाणः, द्वितीया में प्रमुभाणम्, अमुशाया. होने पर भकाराप्त होगा। यथा सुपथः, सण्या, मुग्धाः। शदों के परे लगा कर'मी' के समान रूपपनाये जाने है। (क) अणिमन् subtility, अर्यमन् the sun, गरिमन् । वक्षन् carpenter, द्रढिमन् hardness प्रधिमन् greatness, प्रेमन् affection, मजन् marror मूद्धन् head, सुनामन् auspicious-named इत्यादि पुति तथा पामन scab, सीमन् boundary इत्यादि स्त्रीलिङ्ग शाही १ आत्मा यात्मानौ भात्मानः ४मात्मने आत्मभ्याम् आत्मभ्यः ध्याकरण की मुदती। मगिन् churning stick शण का मा 'पथिन' ई रमान होता है । प्रमुभिन् Indra के प्रथमा में अनुशा तथा शेषकर पपिन् ' के समान होते हैं। पविन शष समास पथ साथ अकारान्त भी होता है। स्त्रीलिङ्ग में इन् मागा प्रथमा लधिमा लधिमानी द्वितीया लघिमानम् लघिमानी तृतीया लघिम्ना लाघमभ्याम् चतुर्थी लधिम्ने लघिमभ्याम् पञ्चमी लघिम्नः लघिमभ्याम् पष्ठी लधिम्नः लधिम्नोः सप्तमी लघिम्नि, लघिमनि लधिम्तोः सम्बोधन लघिमन् लधिमानी heaviness, के रूप 'लधिमन्' के समान होते हैं। यात्मन् Soul लधिमानः लयिनः लधिमाभिः लघिमभ्यः लधिमभ्यः लपिम्नाम् लघिमसु लधिमानः . . " " स०आत्मन् २ भात्मानम् आत्मनः ३ आत्मना भारमभ्याम् भात्मभिः " ५आत्मनः ६ ७ आत्मनि धात्मनो माश्मन " आत्म " सुयन्त प्रकरण। ७१ (ख) पुलिङ्ग अर्धन् horse, अश्मन् stone, कृष्णवर्मन् fire, द्विजन्मन् twice-born, यज्वन् sacrificer, यक्ष्मन् consumption, ब्रह्मन् Brahma, सुशर्मन् इत्यादि जिन शब्दों के अन् का अकार म् या ध् संयुक्त वर्ण से मिला हो उनके रूप 'यात्म' के समान होते हैं। .. " " " राजन्-king युवन्:young १ राजा লানী राजानः युवा युवानी युवानः सर राजन युवन् २ राजानम् युवानम् थून: ল্যাম যতমিঃ তুলা युवभ्याम् थुभिः राजभ्यः यूने युवभ्यः यूनः है रामो राज्ञाम् ७ राजनि-राज्ञि, राजसु यूनि युवा " " " " "" " यूनो यूनाम " २ मघवानम् 1 मघवन् Indra श्यन dog मघवा मघवानी मघवान: वा वानो स्वानः स० मघवन् मघरानो मधदानः वन् श्वानी मघोनः श्वानम् ३ मोना मघवभ्याम् मध्वभिः गुना स्वभ्याम् ग्वभिः ४ मघोने मधदभ्यः शुने ५ मोना शुक्रः मधोनो मघोनाम् धनाम् मयोनि मषवम वसु 11 . " 1 " " ७२ ध्याकरण कौमुदी। (३) हन् भागान्त-पुल्लिङ्ग-वृत्रहन्--Indra १ वृत्रहा ग्रहणौ त्रहणः ४ वृत्रने वृत्रहभ्याम् वृत्रहम्यः " " ५वृअनः " पकारान्त शब्द बहुत कम है। अप् शब्द समासान्त होने ३ थापः स.नइन् २ पुत्रहणम् ॥ वृत्रघ्नः " पुत्रघ्नोः वृत्रनाम् " अपहर वृनना वृहभ्याम् वृत्रभिः ७ वृत्रग्नि-वृनहगि पूपन्, अर्यमन और शत्रु इन् आदि सय हुन् भागान्त शब्दों के रूप ऐसे ही होते हैं, केवल पूपन के सप्तमी-एकवचन में पूष्णि, पूणि, और पूपि तीन रूप होते हैं। पकारान्त स्त्रीलिंग-भ water नित्य बहुवचनान्त । अद्विः अभ्यः अभ्यः अपाम् अप्सु अपः पर अकारान्त होता है; यथा; यिमलापं सरः। भकारान्त स्त्रीलिंग-ककुभ् Direction कार गुमी ककुभः ४ सयुभे कारभ्याम, काम्य " कमभाम " " २ भम् ककुभो पुमा काम्याम् पभिः ७ ककुभि जीलिङ्ग मनुष्टुम्, त्रिष्टुम् forms of metre sत्यादि नया पुगि मकानों के काम के समान होते है। पर मकारागत सि श यान कम है। 93719. Tranquil. बाद विनियों में कामही जाता है। पा, मार, मामी, प्रशामः, प्रशानम्यार, प्रशाम्। - रकारान्त स्त्रीलिङ्ग-गिर Speech. गिरी गिरः ४ गिरे गौाम् गीर्यः " " " गिरी ७ " गिराम् " " ६ गीभ्याम् गोभिः ७ गिरि गीषु -स्त्रीलिङ्ग धुर the forepart of a carriage, पुर पादि के रूप ऐसे ही होते हैं, पर व्यञ्जनादि विभक्तियों ऊ होता है। यथा, , पुरी, पुरः, पुरम् , पूर्मिः पुलिङ्ग शब्द बहुत कम है। द्वार door में विभक्तियों के जोड़ देने से रूप धनते , द्वाः, धागे, द्वााम् , दाएं। यकारान्त स्त्रीलिङ्ग-दिष-Heaven. चुभ्याम् शुभ्यः " म्" " " विधाम शकारान्त पुंलिङ्ग-विश् Vaishya. विशी विध विभ्याम विड्भ्यः ५ रिश n " विशोर . " विड्म्याम विभिः ight, पिपाश् name पदों के रूप ऐसे ही विशाम विद खील दिग्भ्याम् दिनमः " " " " " ईदृश् sucb, एतादृश् such, कीदृश् what like, तादर such water, fit Virgin, orduro Rania sifa TATA प्याकरण फौमुदी। fazt-direction. १ दिक दिशी दिशः ४ दिशे स० २ दिशम ६ दिशोर ३ दिशा दिग्भ्याम् दिग्भिः ७ दिशि दिस दश् looker, स्पृश् who touches, तथा इन से बने हुए like, भयादश् like you, मर्मदृश् Sharp इत्यादि पुल्लिङ्क तथा सुदश् pretty woman, मृगदृश् deer-eyed woman इत्यादि स्त्रीलिङ्ग शब्दों के रूप दिश' के समान होते हैं। gitarat Sacrificial food १ पुरोडाः पुरोगामी पुरोडाशः ४ पुरोडाशे पुरोडोभ्याम पुरोडभेम्बर ५पुरोडाशः २ पुगेशशम , ३ पुरोडासा पुरोडोभ्याम, पुरोटोभिः ५ पुरोडाशि पकारान्त शब्द। अतिरम् Very angry, विप् enenty, wicked, fofas enemy, krefagari aur far lighf, splendour, p thirst, रुप् anger, विभुप drop . स० " " ur " पुरोटाशोः पुरोडाशाम पुरोड " of शो रूप विश' के समान होते हैं। पथा, विशी, विदम्पाम, छिद्गु इत्यादि। दिए विद सुबन्त-प्रकरण १. वेधाः ५ वेधसः " क " " "" ३ " सकारान्त-पुल्लिङ्ग-वेधस् Creator, वेधसौ देधसः ४ वेधसे वेधोभ्याम, वेधोभ्यः स० वेधः २ वेघसम् वेषसोः वेधसाम ३. वेधता वेधोभ्याम् वेधोभिः . वेसि वेधः पोस्, विद्वस्, लघीयस्, अग्मिधस्, आशिस्, पुमम इत्यादि कई शब्दों को छोड़कर चन्दमस् moon, दिवौकस god, दुर्भनस् illminded प्रचेतम् (वरुण), विमनस, ill-minded, विहायस् sky इत्यादि प्रायः सब पुलिा तथा बासरस_ nymph, सुमनस. flower इत्यादि प्रायः सन स्त्रीलिङ्ग शब्दों के रूप 'वेघस' के समान होते हैं । पर उशनस (शुकाचार्य) का प्रथमा व सम्बोधन के एकवचन में उशन, उशनन् , उशनः तीन रूप होते हैं। पुल्लिग-दोस Arm १मा सम्बो, दोः दोपी दोपः २या दोपम् दोषी दोपः, दोपण ३या दोषण, दोष्णा दोाम्, दोपभ्याम् दोभिः, दोषभिः ४थी दोपे, दोपणे दोम्यः, दोषभ्यः ५मी दोषः, दोषणः दोषो., दोणोः दोपाम् दोषणाम् मी दोषि, दोणि दोपुदीपर पुल्लिंग-विस- Learned man, विद्वान् विज्ञसो विसः ४ विदुषे विवदयाम विभ्यः २.विद्वन् ५सिपः २विद्वांसम विदुषः । विदुर ३ विदुषा विदम्याम् विधि: विन्स तालिग में "विदुषी होकर नदी के समान रूप होता है। " " " " " १ विधान, " .. + ४ आशिषे आशीभ्याम् भार्य: Mixtutimes 7.in lighter Pet , mantra **गम . IRTriramir. ME न कमीmunerr nfrm nine, Pet मी nitram der Time Foun... - polarne uno Irteer, sitan mop linu gani गार प्रापपात पनि पीया के समः दोनोमिक में सीकर नदी के समान पुंपिलग-जग्मिस् One who has gone १ अमितान् गरिमामी जन्मिाग: ४ जानजामाभ्याम् जम्मा स. अग्मिन् ५जामुन अस्मिाराम् जग्मुः ३ जग्मुगा जमिनभ्याम् जग्मिानित • जामुन सस्थियस् staying, निषेदियस् sitting. पेवियस् cook ing, इत्यादि यस् प्रत्ययान्त सय दुल्लिङ्ग शादों के रूप ऐसे दी होते हैं। स्त्रीलिङ्ग-आशिस, Blessing १ भाशीः आशिपो आशिष ५माशिष: २ भाशिषम् आशिषो ३ आशिषा आशीर्थ्याम् माशीभिः ७ आशीपि " " " " जग्मुर जामुन " . स० " " " " " आशियन धाशी- सुयन्त प्रकरण। ७७ पुमान् संपुमन् P " " " " " भास: भार २ भासम् ३ भासा -- " . ६ " पुल्लिङ्ग-पुमस्-Man, Male. पुमांसौ पुमांसः पुंसे पुभ्याम् घुभ्यः ५ पुगः २ पुंसम् पुंसो पुंसाम् ३ पुंमा घुभ्याम् पुभिः पुसि पुंसु स्त्रीलिङ्ग-भास् Light. •भासौ ३ भासः भाभ्याम् भाभ्यः भामो भासाम् भाभ्याम् भाभिः ७ भासि भासु ४ भासे भाभ्य. स.भाः भासौ भास: हकारान्त पुंलिङ्ग-मधुलिह- Honey-bee, ! मधुलिट, मधुलिहौ मधुलिहः मधुलिहे मधुलिम्याम् मधुलिया संक २मधुलिहा २ मधुलिहम् मधुलिको मधुलिहाम् ३ मधुलिहामधुलियाम्मधुलिभिः ७ मधुलिहि मधुलिदोः मधुविदा उपान, मनडुह, इत्यादि कई शब्दों को छोड़कर तुरासाद Indra इत्यादि सय पुलिङ्ग य स्त्रीलिङ्ग इकारान्त शब्दों के रूप 'मधुलिह' के समान होते हैं। " " " " . " उपानट स्त्रीलिंग Shoe उपानत् उपामही उपानहा ५ उपानहे उपानम्याम् उपानन्यः . २उपानहर पानहम् ६ उपानहोः उपानहाम् २ पाना उपागम्याम् उपादिः उपामहि उपानामु " " .

६ " ३अनहुदा विश्ववाह 2 Decline तेमसन् । मुगमन, पुपन्पथन, . ध्याकरण कौमुदी। पुल्लिंग अनदुह् Bull अनइवान् भनझाही अनड़वाहः भनदुहः अनहुभ्याम् अनन्य २ अनवाहम् भनबाहौ भनदुहः अनहुहोः अनहुद्भ्याम् अनहुदिः ७ अनदुह ४ अनहुहे अनडुयाम् अनन्यः सं० भनइवन् भनझाही अनावह विश्ववाद् विश्ववाही विश्ववादः ५ विश्वोह विधवाइभ्याम् विधवारम्य २ विश्ववाहम् विश्ववाही विश्वौहः ६ विश्वौहः विश्वौहोः विवौहाम् ३ विश्वौहा विधवाइम्याम् विश्ववाइभिः ७ विधोहि विश्वाहोः विश्ववादम ५ विश्वौहे विश्ववाइम्याम् विश्ववाइभ्यः सं विश्ववाट्-इ विश्ववाहो विश्ववाह धुग्भ्याम् दुहोः धुग्भ्याम् धुग्भिः दुद्दोः धुभ्याम् धुभ्यः सधुकग दुही Exercise 11 1. Decline जानिन् ,'स्वामिन् , मयेन् , राजन् , भारतन् । मगमन् , सन् , विश् . ईर, मास, घाम देर, चन्यम, साप कापरयमपुसिह, and भाशिम् । धुका घुपया ६ दुहः ७ दुहि ...

-u-प्रकरण। प्रशाम , गिर . धुर् . दि. पुरोद्धार, लघीयस अग्मिवस्, पुमस्, भास्, उपानह, and अनहुह.in 3rd to 7th cases & सम्बोधन । 3. Translate into Hindi or Englishi- गुणी गुणिनां गुणं वेत्ति। लोके धनाय निमां भादरी भवति । मनीषिणः सर्वग्र सामाद्रियन्ते। राजा मेधाविनो मन्त्रिणः सहायेन वैरिणं कृतवान् । पथि भारमनः पुत्र पश्यति । युवा पुरुषः वैरिणां विनाशाय मघोनः पूजां करोति । दिवि दिवौकसः पुरोटाश मुन्ति प्रचेतस आशिया पुंसां सृष्टि भवति । मधुलिहा पुष्पेभ्यो मधु आनयन्ति । उपामद्धिः शरीरिणां पादानां रक्षा भवति । भारतवर्षेऽनदुइ प्रतिष्ठा पूजा च क्रियते। 4. Translate the following into Sanskriti (a) #ias for से मी श्रेष्ठ है। स्वामी की आज्ञा से घोड़े पर चदता है। आरोहति)। कुएँ पर मोर नाचते है (मृत्यन्ति ) । शिव के मस्तक पर चन्द्रमा की कला शोभती (शोभते)। कुसे घर की रक्षा करते हैं (संरक्षन्ति ) नगर में राजा की आज्ञा का पालन होता है। अपने राजा की आज्ञा से सेवक सब दिशाओं में गये (भगन्छन् । शुक्राचार्य राक्षसों के गुरु हैं। छोटे भाई को फल देता है । ब्रह्मा की सृष्टि में ऐसा विद्वान नहीं है । वैश्य धन से देश की सहायता करते हैं ( साहाय्यं कुर्वन्ति)। चौर रात में अकेले भी चोरी करते है (चोरयन्ति। (b) The lion kills (efter elephants. In the town there is a good garden of margo trees. Two ascetics are going (tretja: ) to the moudtzo. Gods and demons churned (a) the sea with a churning sticks. Palaces are made (निमिधानि) with stoves. Boys heard (धृतवन्तः) such instruction from the wise man. Brahma has made ( STECHET) the creation. The elder brother loves (fiarafa) his youngers. Gods descended (अवातरम् ) from the heaven to the earth. 5.Correcte- मेधावीनां वचनम् । साक्षिनस्य गिरेण जास्य भूर्दै मुदं अस्ति। पथे युवनः सन्ति । श्रहणा हत) मघवानः अपं। दवाति । पनै रयते । दिवे दिवौकसाः सन्ति । देशाप विशस्य धनं। - जहाँ लि के साथ मी मेलमही यह समिकिने शेष विगकियों में 'जलमुच्' के समान रूप होते है। ना की माय पEtni HITI TA Tri सीगलिक । ना मिलों के काम के समान हो ६, पर प्रगमा मार दिन में माला पहना। मगर फेगल प्रामा और दिनीपाद में परिणापे जाते हैं। के रूप दिखाये जायेंगे। चकारान्नग्राम्-Eastern, prior. प्रथमा, सम्योधन प्राक प्राची द्वितीया प्राप प्राची प्रत्यच्, तिर्यच् मार उदय् को डोट कर सप चकाराम छीपलिङ्ग शब्दों के रूप 'प्रा के समान होते है। प्रत्यच्-Western. प्रथमा, सम्बोधन प्रत्यक् प्रतीची द्वितीया प्रत्यक् प्रतीची facia-An irrational animal. प्रथमा, सम्योधन तिर्यक तिरथी द्वितीया तिर्यक् तिरधी उदच-Northern. ', सम्योधन उदा उदीची उदक उदीची प्राञ्चि মাদি प्रत्यनि प्रत्यति तिशि तिय॑ति उचि का सुरन्त-प्रकरण ८१ थिमा, सम्बो जकारान्त-असृज-Blood. असक् घरजी ससूचि द्वतीया भरक् असृजी अमृधि शेष रूप पणिज्' के समान होते हैं। सब जकारान्त शब्दों के रूप ऐसे ही होते है। N. B. द्वितीया बहुवचन तथा आगे की विभक्तियों में अस्त्र का प्रसन्' भी हो जाता है । यथा, असानि । ३-श्रना, भसम्पाम्, मसभिः । अस्ने, असम्याम्, असभ्यः । अस्नः, असभ्याम्, असभ्यः 1-अनः, भरनीः, भरनाम् 10-अस्नि, असनि, अस्नो, अससु। FITFI-FT-World. मयमा सम्बोधन जगत् जगती जगन्ति द्वितीया जगत् जपती जगन्ति शेष रूप धावन्' के समान होते है । महत् और अत्- प्रत्ययान्त कुछ शब्दों को छोड़ कर सब हकारान्त शब्दों के रूप ऐसे ही होते हैं; पर स्यत्-प्रत्ययान्त शब्दों की प्रथमा व द्वितीया के द्विषवन में ती के स्थान में विकला से न्ती होता है । यथा, मयिष्यन्ती, भविष्यती। महत-Great. मधमा, सम्योधन महत् महती महान्ति द्वितीया महत् महती महान्ति अत् मत्ययान्त(१)-गच्छत् Going मयमा, सम्योधन गच्छत् गच्छन्ती गच्छन्ति द्वितीया गम्छत् गच्छन्ती गच्छन्नि मादि भोर दिवादि गतीय धातुओं से बने मत् (शत) प्रत्ययान्त शब्दों के रूप 'गच्छत्' के समान होते हैं। ६ उन दान्ति, दान तानि भीर ग्दिा मिल्न गारान ममागिर नकारान्त शब्द दो प्रकार के होते है, अन्-भागान्त,न NEET कीgin माण-Wishin. ant, mगोपन र इमानी पम्मी धिमा Tyो, मी भानुमो में पने ( के समान होते है । यदि बाप के समान होता है । ३.ददा-Giving प्रथमा, सम्योधन पात् द्वितीया पदी मम्यस्त (जिन का विश्य होता है। धातुओं से बने। प्रत्ययान्त शब्दों के रूप ददत्' के समान होते है। ४ इनके अतिरिक अन-प्रत्ययान्त सब शब्दों के । "जगत्' के समान होते हैं। N. B. द्वितीया-बहुवचन तया मागे की विमतियों में यह का 'यकन भी हो जाता है और 'मापन के समान रूप होते हैं। दकारान्त-हृद्:Heart सम्यो हदी द्वितीया हुत् हृदी शेष रूप 'सुहृद' के समान होते हैं। सय दकारान्त क्लो लिङ्ग शब्दों के रूप ऐसे ही होते हैं। नकारान्त। प्रथमा, ..

सुबन्त-प्रकरण. . (१) नामन्-Name प्रथमा नाम नाम्नो, नामनी नामानि द्वितीय नाम्ती, नामनी नामानि सम्बोधन नाम, नामन् नाम्लो, नामनी नामानि कर्मन इत्यादि और अहन शब्दों को छोड़कर फलोमन् the bla- (ader. दामन happiness, धामन् house, lustre; प्रेमन् affection, लोमन् hair, वमन् !oon, व्योमन् sky, सामन Samaveda हेमन् इत्यादि सब अन्-मासन्त बलोबलिङ्ग शब्दों के रूप ऐसे कर्मन्-Action. प्रथमा कर्म करमणी कम्माणि द्वितीया कर्म कम्र्मणी फार्माणि सम्बोधन फर्म, कर्मन् कर्मणी कर्माणि चर्मन skin, छन् disguise, जन्मत् birth, नर्मन् est, joke; पईन् festival, भस्मन् ashes, मम्मन् organ, लक्षन् mark, spot; acat road, manner: aria armour, RT house, शरमन plensure, सद्यन् house इत्यादि शब्दों के रूप, जिन के अन्त अकार म् पा संयुक्तवर्ण से मिले हैं, 'कम्मन' के समान होते हैं। अहन Day. प्रयमा सम्बोर अह. अह्री, महनी अहानि द्वितीया अहः अही, बहनी সানি (तनीया अड़ा महोभ्याम् अहोभिः चनुर्थी अझै भहोभ्याम् अहोभ्यः पक्षमी अहः अहोभ्याम् अहोभ्यः अहः सहो अहाम् 'सप्तमी महि, अहनि अहोः अहम ।

स्था सकारान्न शब्द तीन प्रकार के ह; अस्-मागाल, शेष विभक्तियों में पुंलिङ्ग 'वेधस्' के समान रूप होते हैं अम्मस् water, अयस् iron, आगस् sin,रस् brea भौधस् udder, एनस् sin, ओकस् house, भोजस light, mind, छन्दस् metre, desire; तपस् religious-austerit तमस् darkness, तेजस.inght, नमस-85y, मनस् mind, fame, यक्ष an evil spirit, रजस्, dust, रहस् Becrer रोयस bank, वक्षस breast, वयस age, वर्चस light, are pond, water इत्यादि अम.भागान्त क्लीवाला शब्दों के स्म पर ध्याकरण कोमुवी। भान् शE A और कर्मपा ममाग में भारत । मोर 'गज' के समान रूप होता है। (२) स्थायिन Permanent, प्रथमा म्यायि स्थायिनी द्वितीया स्थापि শাবিধ सम्योधन स्थायिन् स्थायिनी इन्-भागान्त सथ क्लीयलिङ्ग शादों के ऐसे ही होते हैं। सकारान्त। भागान्त, उस-भागन्ति । अस्-भागान्त-पयस्-Milk, water, प्रथमा सम्बोधन पयः पयसी द्वितीया पयः पयसी cloth, शिरस् head, श्रेयस bliss, सदस assembly., के समान होते हैं। . पयां पया सुबन्त-प्रकरण। 1. बहुवीहि समास में पयस्, मनस्, चेतस् भादि अस्. मागान्त शब्दों के रूप पुहिला और स्त्रीलिङ्ग में 'वेधस्' के समान होते हैं । यथा, उदा चेतो यस्य सः उदारचेताः । 2. तस्थिवस् का प्रमा, सम्बोधन और द्वितीया में तस्थि. यत् , तस्थुषी, तस्थिवांसि रूप होते हैं। (२) इस्-भागान्त-हविस-Ghee. प्रथमा, सम्बोधन हविः हविषी हवींषि द्वितीया हविः हाविधी हयोंधि तृतीया हविषा विाम् हविर्भिः चतुर्थी हविपे हरिभ्याम् इवियः पञ्चमी हविषः हवियाम् हविभ्यः (पष्ठी हविष: हरिपोः हविषाम् सप्तमी दविषि हविषोः हविःसु afeer ray of light, satfdą light, tifare light, यहिस् light, शोचिस् light, सर्पित ghee इत्यादि सब इस्-भागान्त क्लीवलिङ्ग शब्दों के रूप ऐसे ही होते हैं । (३) उस-भागान्त-धनुस्-Bow. प्रथमा धनुः धनुषी द्वितीया धनुः धनुपी शेष रूप विस् के समान होते हैं । अरुस् sore, आयुस age, चक्षुस् eye, यजुस् yajur veda, पपुस् body इत्यादि उस भागान्त जीवलिङ्ग शब्दों के रूप ऐसे ही होते हैं। Exercise - 12 1. Decline धावत्, नश्यत, सियत्, कथयत्, पात् , यात् , धामन्, ग्योमन् , भस्मन् सन् , उस्, यशस्, सरस ज्योतिए, आयु and धनू पि क है

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सर्च। " " . " -पुलिंग। सर्व-स्त्रीलिंग। सध्वी सध्या सन्च स सन्थे सम्वाम सम्वाभ्याम सर्व सर्वया सर्वाभ्याम् रार्धाभिः सर्वेभ्यः सम्बस्य साम्यः सर्वस्याः राययोर सर्वेषाम् सध्ययोः सर्वासाम, सर्वे सदस्याम सी-प्रलीवलिङ्ग सर्वाणि शेषरूप पुंलिङ्ग के समान । " " " " " " " B. सर्व और विश्व शब्द फेवल 'सकल वा समस्त' अर्थ में तेि हैं, भन्म अर्थ में 'गज' के समान रूप होते हैं। यथा, गवाय) क्षितिमूर्तये नमः। यहां सर्चस्मै नहीं होगा। विश्व में देखा जाता है। यथा, विश्वे देवाः। जगत् अर्थ में होता) यथा, विश्वात् भभिन्नो विश्वेश्वरः । (२) अन्पादि। ther, straat either, at other, mat which तिम which of many, और एकतम one of · भन्यादि शब्दों के रूप भी 'सादि' के समान लि पलीवलिंग की प्रथमा और द्वितीया के एफयन अन्यतरत्, इतरत्, फतरत् , कतमत्, एकतमत् मनिमम्मणिरा: मेनानिः मिग्रम्प मोमिनार अमि माम्म पाइभिन्न मन्तिा तमा माया गिरते हैं। माग एण्ड़ों के द्वारा ईश्वरीमुतिmthe (जायमाप्रशसघन मेरी।भारे माहारा मायण के सदके पदपलेशोगशिर से मारने कमल का फूल इतकीभाजा से मेर जन देना। (b) The house of the brother. Asbes are seen body of Shiva. The son of flm is going ( malto. Good men eater (प्रविशन्ति) the heart of mendra (CET) the enemies with a bow. There is putin in the the friend. There is great darkness in the asse broke (बमा) the great bow of Shiva at theager 4.Correcti-महान् धनु.! मधुरं पयासिायोमेबारमा काष्ठन समो निर्मीयते । वाससेन रक्षा भवति । नभपात शिर भार वहति । प्रामे बहवो सराः सन्ति । धनुवाणा रूप की सुविधा के लिये सर्वनाम पांच भागों है; सर्यादि, अन्यादि, पूर्बादि, इदमादि, यदादि । सधे all, विश्व all, उभय both, पकone, गार की। ? Translate into fliptic English माम् गृति पोमन मणि प्रकाराने। मरामि गरिन । मामिलामा प्रयोजनीया । 3. Translate into Sanskrit(a) दे में ईश्वर थमने मन्तिा एप को ताजा । a कम्पन्ते । सूर्यः उदीचे उदेति प्रतीचे निमजति च । सर्वनाम ( Pronoun) (१) सर्वादि। H - जर one of bro, इन सादि शब्दों के रूप 'सर्व' है। होते हैं।

सुबन्त प्रकरण। ८१ सर्व । " " . " ११ " " " " " " " सर्व-पुलिंग। सर्व-स्त्रीलिंग। नर्वः सब्दों सन्वें सन्धी सचे स सर्व सच विम् सर्वान् सखाम व्ण सर्वाभ्याम् सः सर्बया साभ्याम सन्वाभिः चामे सर्वेभ्यः सर्वस्ये साम्यः सर्वरमात् सर्वस्याः नवश्य सर्वयोः सव्वेषाम् सध्वयोः सर्वासाम सर्चस्मिन् सन्वेषु सर्वस्याम सामु सर्व-क्लीवलिङ्ग। सम_ सर्वे सर्वाणि शेषरूप पुंलिङ्ग के समान । N. B. सर्च और विश्व शब्द केवल 'सकल पा समस्त' अर्थ में नाम होते है, अन्य अर्थ में 'गज' के समान रूप होते हैं । यथा, यि (शिवाय) क्षितिमूर्तये नमः। यह ! सर्वस्मै नहीं होगा। कि प्रयोग थेर में देखा जाता है । यथा, विश्वे देवाः । जगत् अर्भ में नाम नहीं होता । यया, विश्वात् अभिन्नो विश्वेश्वरः । (२) अन्यादि। अन्य other, अन्यतर either, इतर other, कतर which twor, कत्तम which of many, और एकतम one of Phay, इन अन्यादि शब्दों के रूप भी 'सादि' के समान ३ है, पल पलीलिंग की प्रथमा और द्वितीया के एकवचन सन्यत्, अन्यतस्त्, इतरत् , तस्त् , कतमत् , एक्तमत् " " होते है। पूर्वे, पूर्व ধুলান पूः पूधे prior, ent, पर after, अपर otber, भार N. B. 1. पूर्व से उत्तर तक सात शब्द दिक, देश और काल- भस्म, युष्मद, इदम् और अदस् के रूप भिन्न होते है। प्याकरण कागुती। (3) मूल्यादि। posterior, west; अघर infernor, west; दक्षिण south rights उत्तर north, स्य own, इन के रूप 'पू' के समान पूर्व-पुंल्लिङ्ग। प्रथमा पूर्यः पयों द्वितीया पूर्णम् पूष्यों तृतीया पूष्यण पूर्व्याभ्याम् चतुर्थी पूर्वस्मै पूर्वाभ्याम् पश्चमी पूर्वस्मात्-पूर्ध्वात् पूर्ध्याभ्याम् पष्ठी पूर्वस्य पूर्वयोः सप्तमी पूर्वस्मिन्-पूर्वे क्लीवलिङ्ग । पूर्वम् पूर्ये द्वितीया पूर्वम् पूर्वे शेष रूप पुल्लिङ्ग के समान होते हैं। स्त्रीलिङ्ग में 'सव' के समान रूप होते हैं। वाचक अर्थ में ही सव्वनाम होते है, अन्य अर्थों में पुलिस में मर्ज, क्लीवलिंग में फल और स्त्रीलिंग में 'लता' के समान रूप होते हैं। 2. 'स्व' शब्द कुटुम्ब समान होता है और 'भपना' भर्य में सर्वनाम होता है। (४) इदमादि। पूर्वम्यः पूर्वेभ्यः पूर्येपाम् पूर्वेषु " प्रथमा पूर्वाणि पाणि सुयन्त-प्रकरण । महाम्-मे अस्मत् अस्मद्-पुबलीव-स्त्रीलिङ्ग । प्रथमा अहम् भावाम् घयम् द्वितीया माम्-मा भावाम्-नो अस्मान्-नः तृतीया मया आयाभ्याम् अस्मामिः चतुर्थी आयाभ्याम्-नौ अस्मभ्यम्-नः पञ्चमी मत् आवाभ्याम् पष्ठी मम्-मे भाययो:-मी अस्माकम्-नः सप्तमी मयि आययोः अस्मासु युष्मद्-पु-क्लीव-स्त्रीलिङ्ग। ग्थमा श्यम् युवाम् यूयम् देतीया स्याम् त्या युधाम्-चाम् युप्मान्यः पृतीया त्यया युवाभ्याम् युप्माभिः तुर्या तुभ्यम्-ते युवाभ्याम्-पाम् युप्मभ्यम्-य: श्यत् যথা युप्मत् तय-ते युश्योः-याम् युष्माकम्-पः स्यीय युप्मामु N. B. 1. स्मद् और युग्मन के छोटे स ( Short forms) , मे, नौ, नः तपा स्वा, ते, पाम्पा, वाक्य के या लोक के चरण रम्भ में पयवा च, एक, वा, हा Or, भ६ के पूर्व में प्रयोग नहीं किये है। पथा, मम मित्रम । पुस्तकं ममैत्र, सप फरम : ई तक: में या ते का प्रयोग नही होगा। यदि मा, मेरस्यादिको सवा इत्यादि उपम हो तो एक मात्र प्रयोग होता दैपया, रामो समगध मे पुत्रो। 2.ये छोटे रूप धनादेश में यम्य और अन्यत्र विराज्य में प्रयोग किये जाते हैं। एक बार कहा गया है, उगरि कहने को 'मन्वादेवा' पण, तेममा (जिसका वर्णन हो पुध) ma भोलि बासः वा मनोति। t 'प्तमी युषयोः १ अयम् २इमम् " H शेष रुप पुंल्लिा के समान होते। करन-की। 3 गो परेमा, मे मnिtrik होगा यथा. ३१ मम (Bहोगा) मिगत माग 4. मेटे मारा प्रयोग शालीमा झोन दारणमि । पर, भारत पर गई मपिता इदम् । इदम् this पुल्लिा इदम् this स्त्रीलिङ्ग। मो इमे इयम् इमान् ३ अनेन आभ्याम ofभः भनया मायाम ४ अस्मै पन्या थम्य ४ अरमात अस्याः ६अस्य अनयो एषाम अनयो ७ अस्मिन् " एयु अस्याम इदम्-क्लीयलिंग। इमे इमानि अन्यादेश अर्थ में इदम् और पतद् के स्थान में द्वितीया के तीनों पचन में (एन, एनौ, पनान् , तृतीया के एफयवन (एनेन) तथा पष्ठी और सप्तमी के द्विवचन में (एनयोः । एन. आदेश हो जाता है । यथा, अनेन व्याकरणमधीतम् , छन्दोध्यापय । अनयोः पवित्रं कु, एनयोःप्रभूतं यलम् । आनिः " माभ्यः " : मामाम भामु " २ " एन सुबन्त प्रकरण। A " अदस्। अदस्.this, that-पुल्लिंग। अदस्-स्त्रीलिंग १ सौ अमी असो अमू अमूह २ अमुम. अमून् अमूम ३ अमुना अमूभ्याम् अमोभिः अमुया अमूभ्याम् अमूभिः ४ भमुष्मै अमोम्यः अमुष्य अमूभ्य: ५ अमुष्मात् अमुष्याः अमुष्य अमुयोः अमोषाम ७ अमुस्मिन् अमीषु अमुष्याम अदस-कीवलिंग। अमूनि 'शेष रूप पुलिंग के समान । " " " " " " भमुयोः अमूपाम " १अः २ " " (५) यदादि । यद् who, which, what; तद् he, she, it, that; एतद् this, स्पद्, किम् who, whath ये यदादि में है। पEnho, which, what; पुल्लिग। पद्-स्त्रीलिंग। यौ ये यान् याम ये याम्याम. पया याभ्याम् पश्ये परमात् पेरम दे] पए " " 3 " " . " परिमन 2 .

पाक कोगुनी . यसीलिंग। सो लिग के मनः।। स-he, she, it, that.लिग। तो त है " तनु.स्त्रीलिंग २ सम. साम्याम टन ४ सरमै सम्य ५तरमा ६ तस्य ७ तस्मिन् " " १ तत् ते " " तयोः ताम तयो तापन हा तस्थाम तद्-कोयलिया तानि शेष रूप लिग के समान । २ एतद्-this-पुंलिङ्ग। पतद्-स्रोलिङ्ग। १ एपः एतौ एते एषा एते एतान् एताम ३ एतेन एताभ्याम एतः एतया ४ एतस्मै एतेभ्यः एतस्यै ५९सस्मात एतस्याः ६ एतस्य एतयोः एतेषाम् एतयोः ७ एसस्मिन् एतेषु एतस्याम् एसद्-फीवलिङ्ग। एतानि शेष रूप लिङ्ग के समान ! २ २ एतम. " " एताभ्याम् एताभि एताम्म " " " " " एतासा एतास १ एतत् " सुयन्त-प्रकरण किम्-who, what पुलिङ्ग। किम्-स्त्रीलिङ्ग। के काः २ वम् कान काम " " " काभ्याम काभ्याम, काभिः काम्या केभ्यः कस्यै " " " " कयो " काम " " " - कयो केपाम " कासाम केषु वस्थाम किम्-क्लीयलिङ्ग। १ किम के कानि शेष रूप पुल्लिङ्ग के समान । २ ऐसे ही त्यद् का 'त्य होकर 'यद् के समान रूप होगा। विशेप द्रष्टव्य । सर्व, विश्व, उम ( two ), उभय, डतर, इतम, कतर, फतम प्रत्ययान्त, अन्य, अन्यतर, इतर, त्वत् ( other), स्य (other ), नेम (ball), सम ( all ), सिम ( whole); पूर्व, पर, अवर, दक्षिण, उत्तर, अपर, अधर; स्य, अन्तर ( outer ), त्यद्, सद्, यद्, एतद्, इदम् , अदस्, एक, द्वि (two), युष्मद्, अमद्, भषत् (you ), किम् , ये ३५ सर्वनाम है, इनके अतिरिक्त और सर्वनाम नहीं हैं। (१) उभ और द्वि द्विवचनान्त होते हैं। पर उभय शब्द द्विवचनान्त नहीं होता; यह एकवचनान्त था पहुषचनान्त होता है । यथा, उभी (दो) यालको आगती । एतदुमयं विचार्य पश्य! (२) एक शब्द एकत्व भर्ध में एकवचनान्त और यहुत्त्व मर्थ में यहुयबनान्त होता है। यथा, एको जनो पदति। एके

मर्य
मयं लोका मरिष्यन्ति ( मनुष्य मांगे)। मर्य
(६) अन्तरं बहियों गोरसपानयोः-पहियोग (बाहर) और
उपसंध्यान (घन पहनने के अर्थ में अन्तर शद सर्वनाम
Bाकरण कीगुतो।
affia ( Some nas!
(३) मांदिश गिरोश मौर जियोनी ले
है। गया. सणावागती गुगः ( तिगि सर का गुरु है।
माश्रयः (तुम गय . माय हो। त्यस मोकान दिन
यान ( तुम ने मय लोको को जीता।
(४) अन्यता मनाम र अन्यतम सर्थनाम नां
है। या, अन्यतरम्मै । र भन्यतमाय ।
(:) समसाल' भर्य में सनाम है, पर 'समान'
में सयं नाम नहीं है। यथा, समाः ( equals )।
होता है। 'पुरि' का विशेषण हो तो सर्वनाम नहीं हो
यथा, मन्तरायां पुरि।
(७) पूर्वपराधरदक्षिणोत्तरापराधराणि व्यवस्थायामहायान,--
पर अवर दक्षिण उत्तर अपर अधर, ये अपनी २ व्यव
अर्थात् दिक् देश काल समझे जाने पर सर्वनाम होते
अन्यत्र नहीं होते, संज्ञा समझे जाने पर भी सर्वनाम
होते । यथा, उत्तराः कुरवः, दक्षिणाः गायकाः। पधिम, सः
नाम नहीं है । यथा, पश्चिमायां दिशि । तृतीया समास
उसके अर्थ में भी पूर्वादि सर्घनाम नहीं होते।
मासपूर्वाय, मासेन पूर्वाय ।
(८) स्वमज्ञातिधनाख्यायाम -स्व शब्द,आत्मा और भात
अर्थ में सर्वनाम होता है, पर ज्ञाति और धन अर्थ में स
नाम नहीं होता। यथा, बन्धनमोचनकर्ता तु स्वस्मादन्यो
(पन्धन से मुक्त करने वाला अपने से भिन्न होईन
य

सुवन्त-प्रकरण । तो ग - है); ते स्वेषां पुत्राणां मङ्गलमिच्छन्ति । तस्य शब्दं श्रुत्वा सर्वे स्वाः (शातयः) विरोतु मारब्धाः; सर्वे जनाः स्थाय (धनाय) यतिष्यन्ते। २-यदि निकटवती कोई व्यक्ति या वस्तु समझी जाय 'इदम्' शब्द, अधिक निकटवर्ती व्यक्ति या वस्तु समझी जाय तो 'एतद्' शब्द, दूरवती कोई व्यक्ति या वस्तु समझी जाय तो 'अदस्' शब्द तथा अनुपस्थित कोई व्यक्ति या घस्तु का घोध हो तो 'तद्' शब्द, का प्रयोग किया जाता है। इदमस्तु सन्निकृष्ट समीपतरयति चैतदो रूपम् । भदसस्तु विप्रकष्टं तदिति परोक्षे विजानीयात् ।। २. प्रश्नसूचक वाक्य में 'किम्' शब्द का प्रयोग वाक्य के आरम्म में होता है । यथा, किं त्वं श्रुतवानेतत् ? कति--how s much ) many; afa-bo (much ) many; agga- मान्त हैं । यथा, कति बालकाः, पर ये सर्वनाम नहीं है। ४. संशोग्सर्जनीभूतास्तु न सर्वादयः । तृतीया समासे । द्वन्द-यदि सपनाम समास का अप्रधान शब्द हो या तृतीया तत्पुरुष के अन्त में या तृतीया समास के अर्थ में हो अथवा द्वन्द्र या यहु- योहि समास के अन्त में हो तो उसका रूप सर्वनाम की भांति नहीं होता। यथा, अतिकान्तः सव्यं अतिसर्यः, तस्मै भति. 'सोय ( nok सर्वस्मै ) । मासपूर्वाय or मासेन याय ( not मासपूर्वस्मै ) । वर्णाश्रमेतराणाम, पूर्व्यदक्षिणोत्तरा. जाम्। पर द्वन्द्व समास में प्रथमा के थपवन में विकल्प से सपनाम होता है। यथा, पर्णाधमेतरे, वर्णाधमेतराः; पूर्व दक्षिणोत्तरे, पूर्वदक्षिणोत्तराः । जितं सम्बं ,येन स जितसर्च:. जितसाय, जितसर्वात, जितसर्थे ।

A. शाकरण-कीमुदी। सर्वनाम से उत्पन्न मियाविशेषण । पर इत्यादि सद, इदम्, एतदु, यद, किम्, सर्म्य, पूर्य, सध्यनाम पर पसी और समी के अर्थ में स्त्र, पर इत्यादि कालसूत्रक मर्थ में था, दानीम्, दि इत्यादि काउ स्थान और दिग्याचा अर्थ में तान्, दिकसूचक अर्थ में भा. भात, भादि इत्यादि तथा प्रकार अर्थ में था, य इत्यादि प्रत्यय जोड़े जाते हैं । यथा, तद्-तदा then, तदानीम् at that time, सहि tter therefore; तथा so, ta there, तत: tbence, thereuporn , therefore, etc. इदम –इदानीम् now, इत्यम् thus, अ here, भत therefore, a: from this, hence; agar nos, here. एतद् - पतहि now, इत्थम् thus, अतः hence, fore277 here. यद्- यहि when, यदा when, यथा as, यत्र । यतः whence, since, because. किम -कहि when, कदा when, कथम् how,कुत्रा षय where, कुत: where, whence, कुह whences th सर्व-सर्चदा always, सदा always, where, on all sides; सर्वत्र everywhere, in all p पर-परत: further on. bAvind Ate. सर्वतः . , UCIuw-

मायावसपणा
अवर--अयः, अयस्तात् or अघरस्तात, अवतरस, be
buv, downtferds.
अपर-पश्चात् from behinds, afterward,
rd etc.
दक्षिण-दक्षिणा, दक्षिणात्, दक्षिणाEि to or i
itb, on the right side.
उt-उत्तरा, उत्तरात,
उत्तराहि to or in the nor:
।
Exercise--13
1. Decline उभप, एक, पर, स्व, पर तदनra
all genders.
.. Translate the following into Hindi or Im
यह पिता स! दरारपरय पुनो मोऽति
इति । काप पत्रिका परिका: भस्मा सतवित
पु जीपुर्याइम्तिोऽयम् । य पारिया
यो परपोरखापशमन्दिा भो राशा माया को
। गमिप्यामिरला हस्य परे पर माता ।
भवन्ति । गुफा मेनन मामामु समसामने
सामेनीमा सप गमिप्यसि ।

करते(भारिपते) । मृष्य की किरणें सर जगह जाती है। आप लोगों के स्वागत के लिये भागाभागतोऽग्मि) पूर्य पर्व मयंत्र पाये जाते हैं प्राप्यते)। उनमें से एक पटना जायगा (मनि लोग भाये हुए सब लोग अपने देश को प्यार करते हैं । एकतर हूँ (भाद्रिये)। ईरवर हम लोगों की सदा रक्षा करता है पसे उनका विजय हुआ (अभवत्) । मेरा लड़का तुम्हारे सड़के के साथ (b) I will just now go ( offen) to your house He has given (दत्तवान् ) hum bundred rupees. Tbonil (पास्यति) itto you? He fell (अपतत्)o dihe earth from the top of the mountain. He gives a garland to his girl In.what country do you live (वससि)? Where are your sans going early in the morning ? This is the creation o मासरण कौगुहो। 3. Translate into Suoskiti-fix ) Horny उगता है और पभिम में पता है निमाजति) । भाम के भू भारत प्यति ) | आप की पातों में मधुरता है । तुम्हारे दर्शन के लिये या भारत संसार में भ्रष्ट था । मैं रामायण और महाभारत का भावर करा ग्याकरण पढ़ता है । राम या श्याम घर जायगा । । में get ( Arreala) it from me tomorrow. Who will git Brahma I.am Roine (Team.the mother direction संख्याधाचका संख्यावाचक (Numerals) एक द्वि त्रि पश्चन् पर सप्तत् नयन् दशन “एकादशन् २० विशतिः २१ एफपिशतिः २२ द्वाविंशतिः ३० प्रिंशत् । ४० चत्वारिंशत् ४२ वाचत्वारिंशत् द्विरस्पारिशत् ४३ वाशिन् त्रित्यारिंशत् ৪ পgয়াহিয়া भष्टचस्थारिश ५० पश्चात् ६. पष्टि ७. सप्ततिः ८. भशीतिः १० नतिः १००शतम् १०१ एकाधिक शनम् एकाधिकरानम् १२ इयधिक शतम् यधिकशतम् प्रयोदशन् चतुर्दशन पयशन् पोशन प्रदशन् एकोनविशतिः उनशित एमावविशतिः ४.० मा पनि २.स माम प्रगम, कोरि, माराम, माजन.याम महार, ग, जप, अम्पन, मान- जोड़ने में २१ यादि संभपापं पन जाती है। पर ५२.५ ५८६२,६३.६८७२,३,८,१२,११,४२४.. की मांतिदा२कप पाते २ भार०,६,८८ में मत (३) १००से अधिक की संपामों में एकाधिकाधिक इत्यादि जोड़ दिये जाते हैं। यथा, १२० शिल्यधिक शतम्। २६५२ %Dदापशाशदधिर्फ पदाताधिकसदनम् । ६५ द्वि(दहोकर) के रूप तीनों लिहरों में सर्वे के समान है। एक' शब्द एकवचनान्त और 'द्वि' शब्द द्विवचन होते हैं। पञ्चन से नवदशन् तक के शब्दों के रूप तीनों लिए में एक ही होते है। सप्तन् से नवदशन्तक के रूप पाव Emaigti *** furonse १.000 (गोकर:- पार्यमा (२) पिंगति, गित मा पूर्ण में पाया पहले विनि, मर जोड़ दिये जाने हैं। शिदुतर पटशतम् । ३२० प्रीणि शतानि शिविर २१७-सप्तदशं द्विशतम् , ऐसा भी होता है। एक से नयदशन् पर्यन्त विशेषण शब्द अपने रिश के लिङ्ग, वचन और कारक के अनुसार होते हैं। एक के समान होते है।

चतुर
पश्चन
अप्रन्
.
पु.
स्त्री. पु.ली स्त्री.पु क्ली. स्त्री . क्ली, श्री.
१मा यः
प्रियः
चत्वार
चतम्रः।
पश्च
अट-अष्टो
"
चतुरः
.
३पा त्रिमिः
"
संख्यावाचका
पड्मिः अपमिः यष्टाभिः
२या पीन
नियमिः चतुर्भिः चतगृमिः
पञ्चभिः
४.५ मी विम्यः तियन्या
चतुर्मः चतसम्यः
६ठी त्रयाणाम् तिगृणाम् चतुर्णाम् चतसृणाम् पश्चानाम्
मी पिण तिर चतु चतरपु
पड्भ्यः अष्टभ्य:-अप्पाभ्यः
पण्णाम्
अष्टानाम्
अष्टसु-अष्टासु

ri
पर nिtarti
(Naamirmiti
मायामागोमागे की
एकागतगीत,
(३) गिति न्टि, मजति मातिमातिमोर
शत, सहन इरपादिप 'फ.म' के समान मारमा
तीनों लिंगों में ऐसे ही रूप होंगे।तति So msty'
Viratram net
faiminatti
नि
मार दीAm ITRAFFES
का स्त्रीलिङ्क 'मतिमान होते हैं। नित पारि
रान्त शादी के बालों के समान है।
इत्यादि के पशिशों के समान होते हैं।
अनेक ( Many ) यवमनान्ना
तीनों लिङ्गों में 'सर्य के समान रूप होते हैं।
कति ( How many) यहुवचनान्त
कति कति कतिमिः फतियः मतिभ्यः कतीनाम् ,,
..
.
*
यति
as many
के रूप 'कति' के समान होंगे।
।

संख्याधारक क्रियाविशेषण। पूरणवाचक Ordinal M प्या Ordinal पुलिङ्ग जीपलिङ्ग स्त्रीलिङ्ग First प्रथमः प्रथमम् प्रथमा Second द्वितीयः द्वितीयम् द्वितीया Third तृतीयः तृतीयम् तृतीया ग्तुर Fourth चतुर्थः चतुर्थम् चतुर्थी धन् Fifth पञ्चमः पञ्चमम् पञ्चमी Sixth पष्टी एकादशन् Eleventh एकादशः एकादशम् एकादश विशति Twentieth fast: বিহা विशी विशतितमः विशतितमम्, विशरि पधि Sistieth afgan पष्टितमम् पष्टिता Maare Sixtifirst Sixtifirst एकपः एकपष्टम् एफपा एपपष्ठितमः पफपरितमा पका सप्तन, भएन्, नयन, पान के पूरणयाचक 'पञ्चन्' के द्वादशन् से नरदशन तक के 'एकादशन' के समान, और विशति मे उनपए तक के "विशति" के समान होते है। सप्तति, मशीति, नयति, शत, सदन के पूरणपाचक 'i समान होते है। परन्तु पष्टि स्यादि के पूर्य में अन्य पाचक शब्दवोतोपकपति' केसमामागे। - N. B. पूरणाचर दाम्मी के रूप पुति में 'ग', होम प' और प्रौलित में 'नो' के समान होते है। संरपायापक विपारिशेपण। मार once मा दो पारtwice नि, thrice fr, at four trues 70, ataer five .4 -- " - धा संख्याओं में 'कृत्य' जोड़ कर संख्यावाचक क्रियाविशेष (२) प्रकारार्थ-एक प्रकार से in one way पर- ऐकध्यम् ऐसे ही द्विधा, धा, द्वधम् ; निधा, घा, धनthree parts त्रयम्, त्रितयम्। ऐसे ही चतुष्टयम्, पञ्चतयम् इत्यादि तय जोड़ कर बनाते हैं। स्त्रीलिंग में जोड़ देते हैं। (४)पञ्चक: bought for five (Rs. etc.) विशः bought for thirty, anfas: bought for ftrenty (५)क और अत् जोड़ने से पट्क: a collection of 1.Translate into Hindi:-पत्र स्त्रियः। चत्वारिमित्राणि वितो नारअन पञ्चदश पुस्तकानि सन्तिायामोऽष्टादश पुराणानि कृतवान् । न्यारीपेशा पद शास्त्राणि प सन्तिा भनेके देवाः तत्र गतवन्तः । बाबका अग्मिन् वर्ग सति चतुः तव गृह मागता, परन्तु वा मापश्यम्। अभिनवचा क्रियते।वालका चतुष्टयमत्र वस। पञ्चाशाको मामयश मुत्रा पारयति । सहयं सैनिका अस्मिन् युद्धे निहना। खास समापिरितमं बाबई मममी पंचय । परीक्षार्थी पञ्चविंशतिast १०४ ध्याकरण कौमुदी। पञ्चत्यः, छःयार six times षट्नत्यः, ऐसे ही मागे । ( Numeral adverbs) बनाये जाते हैं। चतुर्धा, पञ्चधा, पोढा- पद्धा, सप्तधा, अष्टया इत्यादि जोड़ कर यनाये जाते हैं। (३) एक २ करके one by one एफशः, ऐसे ही द्विध त्रिशः, त्रिंशः, शतशः, सहस्रशः इत्यादि । erfafen - sitzt a pair zam-facra, consisting of अन्त में ति और शत् हो उनके परे क six, पञ्चत् a collection of live, दशत् इत्यादि । Exercise-14 जिनके पनते हैं। जोड़ने से Degree of Comparison, १०५ 2. Translate into Sanskritt-ta) दोनों लड़के। पहला भादमी। मीसरे मनुष्य को भेजी (प्रपय । हीना मित्रों ने कहा (अकथयन् ) । मुझे तीन फल मिले ( प्राप्तवान ) । वर्ष में ६ ऋतु और १२ महीने होते हैं (भवन्ति)। इस स्कूल में २ वर्ग है और प्रत्येक वर्ग में २.लरके हैं। स्कूल में कुल कितने लड़के हैं। मैं पांच लड़कों के साय वहाँ जाऊँगामिप्यामि। उस प्रभा में हजार आदमी थे । करोड़ों मनुष्य क्षुधा से पारित है। जरासन्ध युद्ध में ७ बार हार गया (परा. जितः । दोस्नियाँ माला बना रही है (मनीतः)। कृपा कर मुझे ८०) रपये दीजिये। इस बागीचे में ३६ भाम के भौर २७ जामुन के वृक्ष हैं। १) रपये में पुस्तक खरीदी १ (कोतवान्) । एक ओका कपका भेजिये। एक करके सथ बारके चले गये (गता)। (b) Three funds. Two creepers. Eleven boys. Seventeen harses. Ninety nine men are coming from Calcutta. Please send the first boy to me. Three thousind sokirers are lighting tert) in the batle field I will go to you on the 15th day. The king nent to the forest wish three huadret men. There are ( भवन्ति ] 30 days in a month and 52 weeks in yer. He has 19 elephants and 65 horses. 3. Correctingीण बाREL | पवारः स्थिपः । नी पुरषाण । महानि पुराणानि । एकापा: Eा। शिहो । २०) पुरुषाः । mat: REEकायः पुरपार मस्ति। विशोरया वनस्ते । मा खिका भागन्ति। Degree of Comparison. १.दो में से एक का उत्कर्ष जाना जाए तो शप पर परमार भोक में से एक उरकाशाप तो तम' स्पप लगा है।

. तमाम् हो, दो, जाता है। पही तर और तम के पूयं भी होता है। यथा, अयमेनयोरत- गुरुः गुरुतरः; अयमेतेपामतिशयेन गुरुः गुरुतमः। (ग) क्रिया और क्रियाविशेषण अव्यय के परे तर मार यथा, प्रयान्तुतराम्, प्रयान्तुतमाम: नितराम्, नितमान उच्च स्तराम्, उच्च स्तमाम्। पर विशेषण-उच्च स्तरः, उच्च स्तमः। २.गुणवाचक विशेषण के परं तर और तम के स्थान में फम से ईयस और इछ हो जाता है। यथा, पाप-पापीयस. पापिष्ठ; लघु-लघीयस्, लयिष्ठ; महत्-महीयस्, महिष्ठ । पर मनिष्ठ; मेधायिन्- मेधीयम् , मेधिष्ठ; धनिन्-धनीयस् , धनिष्ट (घ)यस् भारष्ठ प्रत्यय के आने पर ध्यान के पार्ष strong-दोयम् , हिष्ट पृथु (स्थूल-प्रयीयस् प्रपिट ध्याकरण कौमुदी। ( क ) मृतीया.भ्याम् के पूर्व्य शब्दों में जो कार्य होता ही लघु लघुतर, लघुतम; विद्वस शिद्वत्तर, विद्वत्तमः बलिए- घलितर, पलितम; महत्-महत्तर, महत्तम. उत्-उत्तर, : इत्यादि। (ख) तर और तम के माने से ई और ऊ का विकता से हस्व होता है। यथा, श्रीतरा-श्रितरा, श्रीतमा-श्रितमा । तम के स्थान में क्रम से तराम और पायकतर, पाचकतम। (क) ईयस् और इष्ठ प्रत्ययों के लगने से मत्, यिन् , और त प्रत्ययान्त विशेषणों का प्रत्ययों का हो दो जाता है। यथा, यलपन्-बलीयस् , स्तोतु म्नीयस् , म्लयिष्ठ। पत्तों का रहो आता है। यथा, कृश मशीयम् । nuch-मशीयस् , शिष्ट; मृतु-प्रदीपस्, प्रदिष्ठ । यलिष्ठ; मतिमत्-मतीयम P Degree of Comparison. .. भविष्ट - - (ग) नियम विरुद्ध:-- मन्तिक near नेदीयस मेदिष्ट भयम भएप httle भरपीयस् भरिपष्ट वाढ well साधीयस् साधिष्ट कनीयम् कनिष्ठ युवन् (युवा) यषीयस् यविष्ट उद ( विशाल) वरीयस् बरिष्ट कमीय कनिष्ठ क्षिण (शीघ) पीयस् क्षेपिष्ट विपुल (बहुत) ज्यायस् ज्येष्ठ क्षुद्र (नीय) सोदीयस् क्षोदिइ वर्षीय पिष्ट गरीयम् गरिष्ट হাহছু বঃ दीर्घ माघीयम् दापिष्ट स्थिर स्थेयम् रथेष्ट दूर दुषीय विष्ट स्यूल (बदा) स्थायर स्पविष्ट धेयर भेष्ठ रिफर (बहुत) स्फेयम् सेट PraseworthyS पापम् ज्येष्ट इसीयम् हसिष्ट मिय प्रेयस् प्रंट (घ) मर्थ की मधिपता प्रकट करने के लिये कहीं २ ईयर और के परे भीतर और तम लगाये जाते हैं। या, धेरतर, श्रेष्ठतमः पापीयस्ता पापीयस्तम । , Exercise 15 1. Translate tata Hai -योवतरः । मागु भेटमः । विदाम पुरुषमं 18 समं पुराधा प्रापयति पानो तमो ती सिंहो पनिट । जननी अम्मभूमिश्च स्थापिपिसी । मा यात्रं सम्पमा रामा तपोद गासनिपात्र फलं शनि । 2ranslate anto Sansint-1) दोनों में गरम में पना। मा भाइयों में ज्येष्ट राजा शाप केमा में राम सर मोटे । बाबा पसेराधिकारी मगर में राम सबसे पुरिमान है। दोनों में गोपाल भधिक पायामपये गा। पीm.futtrafari (friftarfrimurपरे। पपा माराम. याम: Frenef २.गुपशामक रेपर और ममम प्रारमानापा, PR पापिष्ठ, मघुमायण, माप, ममदापमा पिन् ,न् भारतापपारतविरणानन्य (क)यम भीर प्रयोग से मतिष्ठ; मेधायिन्- मेपीयम् . मेधित थनिन-मनीयम्. पत्ता घर का हो जाता है। यया, हरामीयत्।। (ख)पिस् औरष्ठप्रत्यय के माने पर ध्यान इe strong-हीयस् द्रदिष्ठ; पृथु (स्थूल-प्रवीयम्.. भृश much-Hशीयस् ,शिष्ठ मृदु-म्रदोयस, चि! HTimirman ki ant. HTTrmurtime IMURARITantrtarfare mHA AENT Amit Ram, SAHIRITENT- Tera पायकतर, पागकरम। दो जाता है । यथा, पापलीयम , बलिष्ठः मतिम स्तोतृ स्तरीयस्, स्तविला .

Degree of Comparison. पाद well । (ग) नियम विरुद्धः- अन्तिक near भेदीयस् मेदिष्ट भपस भविष्ट अरुप little भल्पीयस् भस्पिष्ट साधीयस् साधि कनीयम् कनिष्ठ युवन् । युवा) यधीयस् यविष्ट उह(विशाल) वरीयस् वरिष्ठ कनीयस् कनिष्ट क्षिम । शीघ्र) क्षेपीयम् क्षेपिष्ट विपुल (बहुव) ज्यायस् ज्येष्ठ TA (नीच) मोदीय क्षीदिष्ट वर्षीयस् पपिष्ट गरीयम् गरिष्ट ज्यायम् माधीयम् दाधिष्ट स्थिर स्थेयम् स्थष्ट दवीयम् विष्ट स्थल (सदा) स्परायम् स्थविष्ट प्रशस्य धेयस. श्रेष्ठ रिफर (बहुत) स्फेयम् कष्ट I'rauseworthy S597979 she इसीयम् सिष्ट मिथ प्रेयसू प्रह (प) अर्थ की भधिक्ता प्रकट करने के लिये कहीं २५पस् भारत के परे भीतर और तम लगाये जाते हैं या एतर, घेतमा पापीयस्तर, पापीयस्तम । Exercise 15 1. Translate into lait -योनवस । पुमामु धेटमः । वितम पुरुष प्रेषयतमं पुरस्कार प्रापयति । पनी हातमो इसी पदो पनिट । जननी जन्मभूमित स्वादपि गयी। राजा र राज्यभार समापोवनं गमिष्टपाचे फलं शामि। E Trandate ante Sanskrnt-1)दोनों में रहा। सबमें पना। मी भाइयों में राजा दयपanा में ये छोटे थे। राससे Tanाधिकारी सामगध में राम कामे पुरिमार है। दोनों में गोपाल शिकारमधर्म पुषसर अपने छोटे भाई पाला है।

strorict Attitution Pmnt TiTv
atharget runninthamst 1114 Matus
गजमिम मित्रानो TITI गाणी
पिणे
3. farret IITTARI
N. B.इनके अतिरिक्त अन्यत्, भोन, पाद conxing, नमन,
जो अव्यय क्रिया के पूर्य आते है उन्हें उपसर्ग कहते हैं।
उपसर्ग के लगाने पर क्रिया का अर्थ पदल जाता है। कमी
तो अर्थ में कुछ विशेषता हो जाती है, कमी भिन्न और कमी
TERT की
17 the rrial. We a tret of angrets {{seth
अग्गय ( Indeclinable)
सदरा प्रिय लिंग गुमगिमनिषु।
परनेच सपान भोति तस्ययम् ।
लिंग, पचन गार कार के कारण मध्यप को मन्ठर
नहीं होता। यह मा एक रूप रहता है। हाल अन्तस्थित
भौर स् का विसर्गदो जाता है।
अव्यय के प्रधानतः धार भेद है। उपसर्ग, क्रियाविशेषण.
संयोजकादि मौर विस्मयादियोधफ ।
भूर earth, भुवर sky, स्वर heaven, भी अव्यय है।
उपसर्ग।
उल्टा अर्थ हो जाता है। उपसर्ग २० है:-
-
1

अव्यय ।
प्र--- Forth, forward, well, exeedingly,
प्रयाति
goes forth, प्रकर्षः
greatness, प्रकार,
प्रकोपः, प्रमाणम् , प्रमादा, प्रयोगः, प्रलापः, प्रया,
प्रसाद, प्रस्तावः, प्रस्थानम्, प्रसारः, प्रहारः इत्यादि।
Away, back, opposed to etc.
power, qarà defeats, atra; defeat, diss
परामर्शः, पराजयः।
अप- Away, away from, opposite tor
taking away, sax: degradation, maits
मानः, अपयशः, अपराधः, अपपादः, अपव्ययः, अपा
मपेक्षा।
सम्-Together with, fall, excellent etc.
urion, संस्कार: rerfection, संस्कृतिः reline
संयमः, संयोगः, संशदःसंसर्गः, संसारः, संहारः, स.
सन्देशः, सन्देदः, सदायः, सम्भयः, सम्मोगः, सम्म्रमः ।
अनु- Alter, along, behind etc. अनुसर
गति goes after, tollows, अनुहति: imitstion,
method, भनुप्रद, मनुवर, मनुतापा, मनुनया से
मनुभानम,
भनुरागः, मनुरोधः,
भनुपादः, अनुष्ठानम्
सधानम्.मनुसरणम्।
मर-Down, offfrom, niray cte. मरता
down desrends, भवगाहनम् bathing, मययपः
ing, भपक माताणम् . भपसर, भाला।
FAR (RT I Oat ol. away from, withoc
faisanat: breathing out, ana u pisage,

orer, knows, gets, अधिकार, मधिधानन्।
दुष्कृतिः।
fafaastafa separates,
विकारः, विकृतिः, विकार,
दुम् (दुर)- Bad, hard to be.done, difficultere.
दुराचारः bad conduct, दुष्करः hard.io.be-done,
fa - Apart, separate from, certainly, refer
विक्रमः, विकयः, विग्रहः, विघ्नः, विजय, विज्ञानम, वितानम्,
आ- Up to. towards, all round, a little.eta
आकारः, आक्रोश: abuse, आक्षेपः, आख्यानम्"rsk
भागमः, आघातः, आचारः, आज्ञा, आवपः, आधार, भापह
नि-In, within, on, upon, opposed to doun
etc. निरीदति sits down, निकर:-heap:: निकप: shouch
stone, निग्रहः, निदानम् , निदेशः, निशतः निमन्त्रणा
धि-Over, above, upon, on ete-मधिमा
1- Beyond, over, too muchi,' Téry "izda,
व्याकरण कौमुदी।
निराकरणम्, निर्भरः, निर्णयः, निर्धनः, निर्याणम्।'
to etc.
विदेशः, विनयः, विनाशः, विप्लयः, विभवः, विनमः, वियोग
मिरागः, विरामः, विरोधः, विलासः, विवाहः, विवेकः, विधान
पिपादः, विस्तारः, विस्मयः।
मागच्छति comes,
आरोदति
माकम्प: shaking a little, आहुतिः ।
नियमः, नियोग: order, निसर्ग: nature.
grows to, ascends, आफरत
.
-
भधिवासः।

मध्यया
.
exceediogiy, azafat goes over, afaan:
Eentry, पतिपानम, भत्ययः ।
सु-Vell, thoroughly,पुरात done well, सुश
well gorerned, सुगमः, पुचरितम्, मुजना, सु-
मुमिः ।
उ-UP, Above, superior etc. दरपततिalls
उदराति rises, उधासः, अण्डा, स्कर्ष:, .
उयानम्, उत्पत्तिः, उत्पाना, उत्सा, उत्सपः, उत
उदयः, उदमः, उदयः, उपमः।
अभि-To, towards, upyon, near to etc. अमित
goes to, goes near th, भभिगम: going ton.
भमिमानम्, मिधानम् , मिनया, ममिमः do
ममिमानः, मसियोगः, मिषिः, मिलापः, अमिषा
ममिया, पमिकः।
ति-In return, back, towards in oppos
tarte. AfAmma ki n return. अनिका Terr
प्रतिक्रिया, विप्राः, प्रतिनि:, प्रतिनिधिः, तिवार
प्रतिरोधाप्रतिहिंसा
sfe- All rourul, abut cic afet to plae
rountd, पnिar direkh, परिणयः, पहि: परिणनि:,
marriage
परिणाम, पत्तिाप, परिधि, परि
Tire, परिवनम्, परिवार, परिशिष्टम् or
Rimti.
। 'car, lees, neattiecas argona
र पर, एमाल: disrax, पलप, rucravपा-
- मोmriyncat नएम. Rur
पश्लिप

H गापि. भा. 1. Ati (४] मापन आर्गम ATTRI कियाविशेषण में सीलिदिनीया एफपयन की शिर्ड दोती कमीमग विमतियों के पावन का प्रयोग होता है। सर्वनाम मौर संध्या से पने हुए रियादित है। मम., wear frrrr.! 1) mitr. rrorm.gmta पिरेमfirमजान यमा, भामगrerincesthaaheswREETI क्रियाविशेषण (Adverb) पण शब्द पहले दिये गये है। निलिखित भावों में भाग सभी मियाविशेषण की मोतिप्पयत होते हैं। अफस्मात् Suddenly भय then अप्रतस् belore भय किम yes भद्धा certainly अद्य today अचिरात् recently, अघस below अविरेण ata:following day अचिराय quickly अनिशम् incessantly. अजनम् ever भन्तर् असा rightly अन्तरा excepth. अन्तर in, into अन्तरेण witboot, अतीव exceedingly. अन्तरे .betweep । भने before अविरम् wou 18 near XR again Ta little besides 968ą loudly Z elsewhere उत्तरम् then Per otberwise उपरि above grip in private ta ir oreover Jag from both a Pan frequently 3900 FL on both ( quickly उभयेछु days उपा atdawn 17 in the next world A quickly } truthfully iture before ऋधक् enough set without me without 097 together 54 repeatedly एकदा once एकपदे suddenly ainan } improperly gafa now 670 instantly एप just रात् near एवम् thus Ifze openly ait so be it ***There aod there sfor} I trust, ega I hope again 403 with grea mia: the other day 37 ) effort कदाचित् once uponal म कदाचित् terer here ffaf at any time a so fac thus troly < } fraste; Irskiy, to ac-2* for a long time | ATT in various way 907: dayAfter tomormt fun 11h: f1764 fem m** färg ****! lira fent hors more fægt life lion folychry ft foram ffum how, whicther 143 alteurnells for anywherr गरम only #no agform somnr. plica Rafora nowhere ory certainly fata TEOTT Patio चिरेण Ara by name Fr. Dear जातु perhaps जोषम् silently ज्योफ soon HT not झटिति quickly 9 then, over az therefore narfe as for instance afra: around 2.7 certainly TA by night TIe but not so afin} not at all मनम् certainly - मम्पया afce out a: Again : # to: to-morrow pointa sufficiently 79. excordiogly siatia bolind भृशम् greatly DATE a little "11:5*: again and again At not mfc cxcept before, Hifima without ciciny FIR in front fagt: to cach other ferit *T in former linnas faol en llorc trongly pra: femterday in rain Apart from * in the morning Tuin vain 17 catensicly Minice *: for which canin Amering ma Jrxhaunted 09 herr falan purry this 91 rutas tech as Eran on the other hand AITAR in dun crent GUTRITT ;*i os tercard A briore 9 * The inter incurs 999 Marm -- I often na Irrills Qatip faith Frutiner From the thing

(२)तार-यदित् मोट.पिचार
७.
nant
amin
Freone Aream
गीपोमा !
nafa
सो remot
गगुरintent
गम्पwell
tionarrate
Inte
in yeriprusy
गंपोगकादि (Conjunction)
नियनिखित पत्रकारिमाया है।
(१)संपोरा-मय, भयो, काययानि
(२) किना-या, पा......पा, सपा, 5.
F
बिया त्यादि।
-

अध्ययन
(v) कारणवाचक-हि, तत, तेन इत्यादि।
(५) प्रश्नवाचक--- आहो, आहोस्वित्, उत, कि, 1
(त, ननु, नया, तु इत्यादि।
(६) कालवाचक-यायत् तावत् , यदादा त्यादि
(७) विधिव निषेधार्थक-भड अथ, किम्, माम्, पात्र
N, B. अय कार्यारम्भ का और इति कार्यान्त का सूचक है।
३. और वा का प्रयोग-दो मा भनेक पद एकहने से
पन्तिम पद के अन्त में रहते हैं या प्रत्येक पद के अन्त में रह
घद्वारा दो एकवचनान्त कर्तृपद संयुक्त हों तो किया द्विव
है और अन्यत्र बहुवचनान्त होती है। परन्तु वा, अथवा, न र
होने पर किया अन्तिम कर के अनुसार होती है। का
के हो तो उत्तम पुस क्रिया के निकट रहता है और किर
म पुरुष होती है। मध्यम पुरुष और प्रथम पुरुष के कर्ता
। मध्यम पुरुष होती है। यथा, रामो लामणध गच्छा,
रणध, गच्छतः। रामो एक्ष्मणोपा गाति । स, स्वं, हप
वंश आगरा
विस्मयादियोधक ( Interjection)
निम्नलिखित मध्यय मन के भायों को प्रकट करते है
(१) भा, इ, उ, पे, श्री, मह, महह, अहो, पात,
दास्यादि भार्य भी शोक इत्यादि प्रकट करते हैं
(२) फिम, धिक इत्यादि परशा पर करते हैं।
(३) हाहाहा, पात, पन्त इत्यादि शोक और भेद
(४) हन्त इत्यादि वर्ष प्रकाश परते है।

।
Particles पादपूरण या निश्चय अर्य में भाते हैं। इनमें
(६) स्म-भूतकाल के अर्थ में वर्तमान के लट् के साथ
माकरण-कीमुनो।
(५) प्रीपट . पौगर भोर गाट, देवता या मिर्ग हो
पलि देने के समय बोले जाते है। या देशलायी बन्द
स्यादि।
(६) स्थाहा भौर स्पधा प्रम में देवता या पितरण को
थलि देने के समय बोले जाते हैं। या, मानये स्वाहा
पितृभ्यः म्यघा।
(५) सम्बोधन में- (१) भङ्ग, अयि, भये, मही, पर,
२, , भो, प्याट्, मो, मोः, दंदी, हे, हो, इत्यादि भाइर
अर्थ में गाते हैं । (२) मा भरे, अये, , १२, मोरे, इत्यादि
अवमा भर्य में भाते हैं।
अतिरिक्त अव्यय Particles.,
से ये हैं; किल, खलु, च, तु, नु, थे, दि इत्यादि ।
कुछ अव्यय दूसरे शब्दों के साथ प्रयोग किये जाते हैं।
(१) अद्-- अद्भुतं a wonder.
(२) का-कापुरुषः a bad man,
कोष्णम् Juke warm.
(३) कु- कुकृत्यम् a bad deed.
(४) चन, चित्-किञ्चित् , कधित्, किञ्चन, कचन
(५) न-स्वरादि शब्द के पूर्व न का मन और ध्या
नादि शब्द के पूर्व भ हो जाता है। यथा, अनीश्वरः, अनश्या,
अमालणः, अज्ञानम् , अकाल:, अनीतिः, मसुरः
इत्यादि।
स्म भाता है । यया, भवति स्म = अभवत् । मा पहले रहने से
इत्यादि।

अव्यय । अधे की अधिकता का बोध होता है । यथा; मा स्म प्रजापीडने मनः कृथाः। (७) स्वित्-कि या दूसरे अध्ययों के साथ जोड़ा जाता है और प्रश्न या सन्देह काला अर्थ प्रकाश करता है । यथा, किस्थित् होस्वित् इत्यादि । (८) स्वी-स्वीकार अर्थ में कृ धातु या क धातु से निष्पन्न शब्दो के पूर्व में आता है। यथा, स्वीकारः, स्वीकृतम् इत्यादि। Exercise--16. 1. Translate into Hindi-भीमोऽर्जुनश्च । हरिश हर । देवा साक्षसाश्च । कृष्णो हरियो । बालक कुत्र गच्छति । क्व गतः स दृष्टारमा । रावणो बलात् सीता मपाहरत् । पूर्वेछु : तेऽवागताः । मिथ्या मा पद । प्रामादितिएति सः। अलसा दिवा निदा यान्ति स ाक तान् प्रवृद्धान् करिष्यति । उच्च ते विरोतुमारधाः । अपि कुशली स्वम्, १ धिक माँ कृप्या. भक्तम् । रामः खलु तीक्ष्णबुद्धिः। यतो धर्मस्ततो जयः । भोः कुत भागर इति भवान् ? महान् धर्मारमा हि स नृपतिः । राजा नाम साक्षाद्विष्णोरवतारः । मृत्युरेव प्राणिनां ध्रुवम् । 2. Translate into Sanskrske~-(a) भाई और बहन । पुत्र या पुत्री। अरे, गीत की मधुरता । इसमें इनका दोष नहीं है। यह माया है या मतिभ्रम है। हे तात! व विलम्ब क्या। तुम्हारा मित्र कही है। अरे, यह बड़ा पाप है। मैं परलो घर जाऊँगा ! आज मेरा जन्म सफल हुआ । हसका फल क्या है। प्रातः काल कामना रहा है। तब स्वरह की पारी भाषी सजनों का दर्शन बढ़ा दुर्लभ है। उसमें मेरी बड़ी प्रीति है। हितकर और मनोहर वचन दुर्लभ है। आलस्य मनुष्य के शरीर में रहने वाला मारीशन है। (6) Father and mother. The king and the pioister. Men or worer. Seal them here. Where do you live? Where are . - - " they going? Don't tell a lie. Moreover you are my enemy The youthful age and this handsome body, Bring the thier in the presence of the king. Who is then the second ? Ihre no fear from death. Ram weot ( 77 ) to the forest sth Sita and Lakshmuna. Ram, you and I will go horate 3.Correct:-सुयोधः सुशीलश्वागतः। रामो लक्ष्मणो वा वर्तते । स्वच पश्यसि। दिवायां निद्रा याति। मिथ्यां मा वदसि धस भागमिपति। कामुदा and you will come to my village. रवसागतः ते । स नक्ते दिवायां च स्वपिति । मुदया तय गताः ते ।

व्याकरण-कौमुदी द्वितीय भाग। + तिङन्त (Conjugation of Verbs ). भवादयो धातवः-भ, स्था, गम्, दृश्, रुद, हस् इत्यादि चिफ शब्दों (प्रकृति ) को 'धातु' कहते हैं । धातु के परे भक्तियां होती है उन्हें 'तिड्' और तिङ् युक्त पद को न पद' कहते हैं। तु के परे दश विभक्तियां होती है; लट-Present, mperative, लङ्-Imperfect, विधिलिङ्-Poten- उद-Peripbrastic Future, लट्-Future, लङ्- tional, माशीलिङ्-Banedictive, लिट्-Perfect, rist. B. रूप बनाने की सुविधा के लिये इन १. विभक्तियों को दो विभक्त करते हैं। प्रथम भाग (Special tenses and 9 में लट्, लोट्, लल् और विधिलिङ् हैं, द्वितीयभाग (General and moods) में शेष सभी विभकिया। बास्त्रीणिग्रोणि प्रथममध्यमोत्तमाः-विभक्तियों में तीन पुरुष प्रथमपुरुष, मध्यमपुरुप, उत्तमपुरुष । शुतमा- अस्मद और को छोड़कर सय शब्द

पुरुष
सय पिचियादो मागों में यिमन है; परम्मैन्द, मात्मने-
पदा प्रत्येक यिक्ति के अटारद कप होते, परामद
नय. मात्मनेपद में नय । अतपय परस्मैपद में नये और
आत्मनेपद में मग्ये रुप होते है। इनमें से प्रत्येक को भी
विमति ही कहते है। इस प्रकार कुल १८० विमकियाँ ।
४. धाविभाग-संस्मत के सय घातु १०थेणियों में विनड
है । प्रत्येक श्रेणी को गण कहते है। बादि (Fist
conjugation), अदादि ( 2nd conj),हादि ( 3rd coom
दिवादि ( 4th conj), स्यादि (5th conj), तुदादि (E
conj), रुधादि ( 7th conj), तनादि (8th conj), प्रयादि,
में विभक्त करते हैं। प्रथम माग (Group I) में भ्यादि, दिवादिगदारी
N. B. रूप बनाने को मुविधा के लिये इन १.गों को दो माग
लट्, लोट् , ल और विधिलिङ् (special tenses |
and moods) में प्रथमभाग (GroupI) और द्वितीय भाग
(Group II) को विमक्तियों की आकृति में कहीं २ पुछ मेह
पड़ता है। जहां दोनों में भेद पड़ता है वहाँ प्रथम माग ।
विभक्ति के सामने ही द्वितीय माग की विमतियां भी
३. शाकाचद्विसदनबटुननागेश
प्रोक
यवन है; पफरयन, द्वियगन, यनुययन ।
(9th conj), चुरादि (Ioth conj), ये १० गण है।
और चुरादि तथा शेष गण द्वितीय भाग ( Group II ) में हैं।
विभक्ति की आकृति ।
ऐसी () यन्धनी में दी जाती है ।

तिडन्त प्रकरण। -- . परस्मैपद आत्मनेपद १. ए.व. वि.व. व.व. दि.व. क.व. अन्ति इते (आते) अन्त (अते) म.पु.सि से इथे (आधे) ये मा इ (९) बहे लो। ताम् अतु ताम् इताम् (भाताम्) अन्ताम (भताम् अम. पु. ०हितम् । व इथाम् (माथाम्) ध्वम् (उ.पु. आनि श्राव थाम ऐ आवहै भामहै ले। 1. पु. अम् व (प्र. पु. तू ताम् इताम् (भाताम्) अन्त (अन) तम् त याः इथाम (भाषा) ध्वम् म ३ वहि महि विधिलिड़ा प्र. पु.ईत (यात्) तिम् (याताम्) ईथुः (युः) ईत ईयाताम् ईन् 'म. पू. ई. (याः) ईतम् (यातम्) ईत (यात) ईथाः ईयाथाम् ईश्वम् उ. ३. ईवम्याम् ) ईव (भाव) ईम (याम) ईय ईवधि ईमहि प्र.५ स्यति म.ए. स्थसि ब, पु च्यामि स्यतः स्यथः स्यावर स्यन्ति स्यय स्यामः स्यते स्यसे हयेते स्येथे स्थादहे स्थध्ये स्यामहे स्यताम् R.प. स्या १.पु. स्यम् स्थत स्थाम स्थत स्येताम् स्थयाः स्येथाम् स्याह स्पे स्यध्यम् स्थाहि प्र.पु. म.पु. at तमाय वा सासह समई सीयास्ताम् और सौक्षाः सीयारथाम् सन याते अनुरोध, भाशीर्वाद इत्यादि अर्थ में, लछ-लिट्-ल-भूतकाल में, विधिलिए भौचित्य (विधि) और माज्ञा इत्यादि अर्थ में, लुटू-लद्-भविष्यद में, आशीलिख-आशीर्वाद अर्य में, लुए-दो क्रियाओं के कार्य कारण का भार भ्याकरण कामुदा। तारी तार तासि सास्यः सास्थ ताम उ.पु. तास्मि वास्ता साहे आशीलिं। प्र.पु. यात् याताम् यामुः गौर म.पु. याः याम्तम् यास्त उ.पु. याराम् याख यारम सीय सीवहि लिद। प्र.पु. अ अतुः उ ए थ अथुः भ से आये महे व म ए पहे त् ताम् त भाताम् धन . तम् थाः आयाम RA व म इ N. B. (१) लट्-वर्तमान काल में, लोट्-आज्ञा, निमन्त्रण, प्रार्थना, बोध होने से क्रिया के फलतिका अयोध होने पर भाता है। (सकारार्थ निर्णय में सविस्तर देखो)। ति सस् भाताम् E थ मि मम म.पु. . अन्त अन् त - म.पु. सिर थास् भायाम्

विल्त प्रकरण
(२)मा का फल को निमित्त हो तो कर
आमदार पर किया नमी दूसरे
सेनी पारिकिशापाको पो मनमा
नियमन,तियो यी (नियमान होना)
पर भारत प्रयोग में कामहीं।
Special tenses and moods
(लद , लोद , लहा, विधिलिए)
प्रथम भाग ( Group I.)
माधार नियम।
१. सतोगुणी-विभक्ति के प्रकार पर रहने से पूर्वपर
मकार का लोप होता है। या, पत् + म + मन्ति = पतन्ति
२.भोवधी योग-यिक्ति के दौर म परे रहने।
पूर्ण्ययी अफार का साकार होता है । यथा, पन् + H + यः
परायः पन्++म: पनामः।
२. सदरमर पाडसान:~ल.लुभार लइ विमति
में धातु के मादि में 'श' होता है। यथा, ममयत् , म
अमविष्यत् । परन्तु मा और माम शब्दों के योग में अना
होता यषा, मा.मरत् , मास्म भूत् ।
४. पाइजादीनाम् । माटवल, लुङ् और लङ् विमसि
में, 'अ' के साथ धातु के थादिस्थित ईका थे, उ ऊ का में
श का भार हो जाता है । यथा, भ+ + + = पेक्ष
गए। इच्छु )-ऐच्छत् ; च्छमार्छत् : ऐक्षिष्ट, ऐक्षिष्य
इत्यादि।
५. वायमाने-पदान्त घर्गीय पूर्ण के स्थान में विकल्प
निज परी का प्रथम वर्ण होता है।
.
.

र विमतिमात्मनेपदी धातु के परमात्मनेमकी मिति किया में भी यही पुस मोर यही बनाते हमर्यात उत्तम पुपरदो तो क्रिया उत्तम पुगर को होगी, कर्तामा दोतो किया प्रथम पुरुर की दोगी. ती एकवचन होता किया एफययन फी, फर्ता दियचन हो तो क्रिया द्विवचन की अहं गच्छामि; स गच्छति; भायां गच्छायः; ययं गयन. १. तुदादिभ्यः शः लट्, लोट्लङ्भीर विधिलिड्. इन चार शककोगुणी 7.7777 ( Active voice.) का धागपाशी garma, पी, उमगादी स्मेकी गानु के परे An: उमयपदी धातु के पर दौमांगी मिक्रिया होती है। कगाय के कत्ता में जो पुरुष र जो पवन होते। पुरुष दो तो निशा मध्यन पुगर की होगी, का प्रथम पुर और फर्ता बावधन हो तो क्रिया यायचन इत्यादि। तुदादि (6th conjugation) की होगी। पयः विभक्तियों में तुदादिगणीय धातु के पर तथा विभक्ति के पूर्व • अ' जोड़ दिया जाता है । यथा, सन् + +ति = सृजति । स्पृश् (to touch) परस्मैपद । एकवचन स्पृशति प्रशसि प्रथमपुरुष मध्यमपुरुष उत्तमपुरुष द्विवचन स्पृशतः स्पृशयः स्थाः बहुवचन स्पृशन्ति स्पृशय स्पृशामा स्पृशामि 11 तिडन्त प्रकरण। लोट् । स्पृशतु प्रथमपुरुष मध्यमपुरुष उत्तमपुरुष स्पृश स्पृशानि स्पृशताम् स्पृशतम् स्पृशाव स्पृशन्तु स्पृशत स्पृशाम m प्रथमपुरुप अस्पृशत् अस्पृशताम् अस्पृशन् जो मध्यमपुरुष अस्पृशः अस्पृशतम् अस्पृशत at उत्तमपुरुष अस्पृशम् अस्पृशाव अस्पृशाम विधिलिङ् । प्रथमपुरुष स्पृशेत् स्पृशेताम् स्पृशेयुः , मध्यमपुरुष स्पृशः स्पृशेतम् स्पृशेत । उत्तमपुरुष स्पृशेयम् स्पृशेय स्पृशेम परस्मैपदी धातु । उझ to avoid, to abandon, उन्छ to glean, शुद् to cut, qt to touch, to shake, faset to write, fast to enter, with fa to sit down, with oft to place before, with सम् and नि to be near, with सम् and मा to introduce, सज् to create, with stor वि to leave, with सम् to unite, स्पृश् with उप to trend upon, स्फुर् to open, फुत् to throb, इन धातुओं के रूस्टर' के समान होंगे। farsit to fear, to tremble image! लट् । प्रथमपुरुष मध्यमपुरुष उत्तमपुरप विजते विजसे विजे विजेते विजेथे विजाय चिजन्ते पिजध्ये विजामहे विजलद বিজ্ঞান रिजाई अविजन मस्जिद मविजा विजेत to plough, क्षिप् to throw, dr togive paal दिश् to grant, with an to order, with उत् to proelam with at to advise, with far to speak to with वि& निर् to declare, with सम् to commeady cale, or to throw, to send, to put, to incite, wid प्र to direct, with अप to remove, vith fe, confess, with a to be happy, मित् ta join, girl रिलिपुएट स्पादियार विधियों लोट् । प्रथमपुरुप विजताम् विजेताम् मध्यमपुरुष विजस्व विजेथाम् उत्तमपुरुष विजे विजाय प्रथमपुरुष अविजत मविजेताम् मध्यमपुरुष अविजथाः अविजेयाम् उत्तमपुरुष थविजे अविजायहि विधिलिड् । प्रथमपुरुष विजेत विजेयाताम् मध्यमपुरुष विजेयाः विजेयाधाम उत्तमपुरुप विजेय विजेवादि विज् with उत् to shake उद्विजते । उभयपदी । "मि भोर बियोनों के समान होंगे। घाकारान्त घातु। पिजेसी धिनका रिय हो जाता है।

तिहस्त प्रकरण ।
मृ to die आत्मनेपदी।
लट्
प्रियने नियेते नियन्ते घियताम् नियेताम् नियन्ताम्
1. पुनियसे म्रियेथे नियध्वे नियस्व नियेथाम् मियध्वम्
1. पुहिये ब्रियावहे म्रियामहे
म्रियावद प्रियाम
विधिलिङ् में मी ऐसे ही पिकियां जोड़ दो।
मात्मनेपदी-- with मा to worship, to regard, ह.
with पि and to be busy; इनके रूप मृ' के समान होंगे।
प्राकारान्त धातु।
३ एत इसातो:-लट् इत्यादि चार विभक्तियों में पानु के
आन्तस्थित घर का दर हो जाता है । यथा, फto scatter.
to pour out-फिरति, किरता, फिरन्ति । गto devour,
to swallow-गिरति, गिरतः, गिरन्ति । ऐसे ही विशक्तियों
को जोदने से सप रूप बन जायेंगे।
इकारान्त, उकारान्त धातु।
४ लट्पादिचार विमक्खियों में धातु के अन्तस्थित
इस्य या दीर्घ के स्थान में पयाक्रम इय, उय हो जाते
है। यथा, Rto go to more-रियति, रियता, रियन्ति
रयादि । ५ 10 shake-धुपति, धुक्तः, धुपन्ति त्यादि
hिto dvell-क्षियति।
परिवर्तनीय धातु।
५. निलिखित धातुओं में कुछ परिपतन होता है। एट
पमा-एकपयन का दिया जाता है, लोद,
RE विधिनिमें सेती पिमहियों को छोड़ से सबस
६

पहले उपसर्ग छोड़ दिया जाता है। पया,म विश्प्रोमविशत्-माविश fra to suffer pain for fry to obtain formy Pto swallow गिति,गिलति, प्यम् to deceive रिवर्ति 1. Translate into Hindi IRTP Fzy? माते है। कल उसका पड़ा लड़का मर गया। अपने पिता के पास एक *किसी गण के धातु के एवं उपसर्ग होतो धातुका रूप बना कर उह पान जागे । im ml मी गमीय पातु मम itnाहीमा मागि। 17! "185 point 7 to bathe to cut Trai F.with or प्रति उप. फिरति Or प्रतिम्किरति with उत् to romit, with u to cut पश्यति सम् and उत् to throw up. सम्ज to go अद् to cut गुटयति, रति DED to ask qafa Exercise-17 मन्नति मुग to relran मुन्नति for lo anoint foarte ला o break लुम्पति-ते सरजति faq to sprinkle fanfa पिरा to form पिशति भ्रम् to fry घ्रजाति-ते मयादुद्धिजते तस्य हृदयम् । ते क्षेत्रेषु धान्यानि उम्पन्ति । सेन राया लेनिका नगरं प्राविशन् । ब्रह्मा सृष्टिमिमा असुजन् । तव । क्षेत्र कृपेत् । नपतेरादेशेन सैनिका वाणान् अक्षिपन् । तस्य पुत्र मामतुदताम् । पितरौ मामादिशतः । पाद प्रभो क्षेत्राणि असिना स्वामिन् ! भस्मात् भरकात् मुञ्च माम् । अस्मिन् सरोवरे थालका मन्जन य्यं गुरु बहूनि प्रश्नानि पृच्छय। 2. Translate into Sanskrit:-(a) रामा ने चोरों को छोड़ दि। उसके लड़के फल की इच्छा करते हैं। अपनी माता से पूछो। भाजप मुझे ठग दिया। ईश्वर की कृपा से वह घन पावे । मृत्युलोक के ...मकरण! लिखा। किमी को दुख मत दो। हवा से वृक्ष के पत्ते हिजते हैं । सब खोग स्वर्ग में जाते हैं। उसके दोनों लड़के पत्र मिल प्रझा सुष्टि को बनायें। मैं देशभक्तों का हृदय से भादर करता हूँ। तुम्हारे दोनों लड़कों ने सम रुपये लिवरा दिये। उसने छूरी से अपनी अंगुली कार दी है। उसने प्रेमान से पुत्र का शरीर सौंच डाला। (b) Yamaraj asked Yudhishthu many questions. You should enter the assembly. Soldiers got order of their general. The cloud sprinkled the earth yesterday. We two wish your Welfare. Let us plough our fields for corns. I am waiting a book of Sanskrit grammar. Ask this of your parests. Touch the sight hand of your friead. Warriors should throw arrons on their enemies. Kings too have regards for wise men. 3. Correcti-भादवि पूरामि । सर्वे खा भाद्वियन्ति । सो आदिशति । यूयं गुमरा नियन्ति । पुस्लई खामि । स्तेना तस्य सर्वस्वं भमुषन् ।सा फलमेक ऐषत् । ते धनं विन्दस्व । परनं मातरम। Faila ( Ist Conjugation ). करिशप-सट् इत्यादि घार विमधियों में स्वादिगणीय धातु के परे 'म' जोड़ा जाता है। यथा, पति-पति। 'धंद् to speak परस्मैपदी। हट। बहुवचन यन्ति प्रथमपुरुष यध्यमपुरुष पचमपुष्य. एकवचन परति परसि 'पदामि पदतः पदयः घदत घदाम T ल। अवदन् . अवदाम घदेत् with to worship, with off to Borve, with लोट । प्रथमपुरुष घदतु वदताम् . घदन्तु मध्यमपुरुप चद घदतम् उत्तमपुरुष पदानि घदाव प्रथमपुरुष अघदत् अवदताम् मध्यमपुरुष धवदा अवदतम् प्रयदत उत्तमपुरुष अषदम् अवदाय विधिलिङ्। प्रथमपुरुप घदेताम् मध्यमपुरुप घदेः पदेतम् उतमपुरुष घदेयम् यदेव परस्मैपदी धातु। भक to go, अ to pervade, मञ्च् to go, to bes worship, भद् to ramble, to wander, भत् to gor to worship, ez' to earn, serve, sr to protect, ईष्य to enry, कर to.burry to aound, st to wish, to desire, F 10 OC hum, कृष् to be blunded, अन्द् to cry, at top 75 to flow, to wash, a to cat, nt to say, to roar. में to sing, ग्लै to be weary, पर to... with arft & 81T to transgress, with for to bet! with a to attend, with ere to practise a da भई to worship, to wa to go astray, with a to rido upon, Kar to perform, पर to discus, पर्ण to ab

तिहन्त प्रकरण।
chew, to walk, to move, a to kiss, 7 to
mutter, 67 to rumour, o live, 7 to be hot
with fever, a to burn, to glow, 2 to be confu.
Bed, 27 to cut, to wound, at to shine, with wa
to repeat, with oft or R to beat or inflict paia,
तर्न to threaten, त्या to abandon, अस् to trouble, दल,
to burst open, to burn, to pain, to suck,
to think, 57 to sound, Reto dante, to act,
to sound, po to be pleased, with afa to wish for,
with erf to be happy, with gfa to be thankful, A
to salute, a to sound, fame to censure, to read,
art to praise, 7 to fall, with estat prefixed to
excel, with wf Or 877 to descend, with HT to come,
with a to ascend, with fat to get or fall down,
with fe to turn back, with R & Ti to fly, a to
result, Fte to open, to blow, 701 to speak to
Adora, w, to walk, to roam, #25 to decorate, na
to churn, was to closc, to tivtokle, to share,
to grind, to faint, to grow scary, to
I'rofect, ent to talk, with 13 to talk like, with mp3
to deny, with w to address, with s to talk in
roherently, with frto lament, with a to contense,
" to shipe, go to rob to plunder, with
to speak similarly, with 87 to reprore, with the
to speak ayniast, with a to repis, to rarit,
to dwell, with it to occupy, with a to fast,
-

संवन्ते से सेवामत 877 to go, with afat to believe, with or 4L fly, to sees with अप to expect, with अभि पारण कोगुतीं। with fato dsvoll, with a lo dwell abroad, ** wish, to desire, w to go, t to praise, withs praire, MFI 10 fall down, in lo sound, TT 10 Lit दन धानुभों के सर इत्यादि नारोमिनियों में 'इ' के समान है सेय to serve आत्मनेपदी। प्रथमपुर सेयते सेयेते मध्यमपुरुष सेय संयेथे उत्तमपुरुष सेये संयायदे लोट् । मथमपुरुष सेयताम् सेताम् सेवन्ताम् मध्यमपुरुष सेवस्य सेवेथाम् सेवध्वम् उत्तमपुरुष सेवायह लङ। प्रथमपुरुष असेयत असेवेताम् मध्यमपुरुष यसेवथाः उत्तमपुरुष असेचे असेवायहि विधिलिङ् । प्रथमपुरुष संयेत सेवेयाताम् सेवेरन् मध्यमपुरुष सेवेथाः सेयेयायाम् सेवेश्वम् उत्तमपुरुष सेय सेवेवहि सेवेमहि आत्मनेपदी धातु । ৪ঘাম असेचन्त असेवेषाम् असेबश्वम् मसेवामहि .

तिस्त प्रकरण।
1370 at, with #s to inspect, avith fat to see, with
* to examine, with a to expect, with to see,
with ar to cotapire, to select, with ex to look
at, with a to abandon, to beglect, to sim at.
to shake, to grow, to prosper, rto sbake,
to tremble; m to shipe, to best, to endure:
**** to bathe, a to be croched, to swallow,
to frapper, with the lo transgressi2 to
Merivo, lo try, or to saun, then go with my
in approrch, 17 with at or far to warm, a to be
anhnmcd, 10 protect, MT. 10 hurry, to gire,
Sy to hold, to pity, to protect, u to dedicare
onerell in, wth to perishi, to fall down; een
crow, to swell, 94 to become Inmoum, 174 to orprese
to termeni, pe to speak, with a 10 cxplain,
with conies, with 47 10 censurr, **.10
shinc, fax so bcx, vt (all clowa, #77 to shing,
*t to whins, **1 to shine, *1 10 attempt to
Exgin, with wi to begin, F. to play, with nor
R104011, with no 10 stor, ** 10 perpeite, ** 1.)
fel, tofu, to hang doon, with Rt 10 holt
mith ke to delay, to art, mith wt in wr, ya
her, 10 disus. T *th ft to dixote, en tu
alain tin tremble, i 10 Perto ', 101
#wry, , to skabe, to be afraid, th 90
begr, myn kam, ** to mas, to var, 10
>

स्मरात स्मरत स्मरन्ति स्मरसि स्मरथः स्मरथ स्मरामि स्मरायः स्मराम हस्व या दी। उभीर लूका गुण मम से एओभर भर भर होताहे Hair erut MEEnt, rets htrint.net Ifo... rtin the auth stur.kt inni to treat ARE Trimiri मैं * उभगारी पातु। httndi: wrtunt.tottom oak . blcro, 97, lo cevke in clisest; *7 pis borok **Arr: * to sienfier, la freship BS, to shinr, men with, to desirm, with #fits *? to sow, bn $c4!179. to curry, in tears to SM, in curt: * in all the way to play 'गे'मामाला गानुपाम:-मद या गार मिनियों। मादिगणीप पा gmar का गुण होता है। भू++नि मो++in म+में+लि = मति जि to conquer परस्मैपदी। रद मोर म.पु.जयति जयतः जयन्ति जयतु जयताम म. पु. जयसि जयथः अपतम् उ.पु. जयामि जयायः जयामः जयानि जयाप लह, विधिलिड् में भी ऐसे ही शिमकियां जोड़ दो। भू to be प.स्ट म. पु. भवसि भयपः भवथ उ.पु. भवामि मवायः भवामः लोट्, ला, विधिलिङ् में भी ऐसे ही विभक्तियाँ जोड दो। 4 जपत जपथ स्मृ to remember प. *

तिडन्त प्रकरण।
परस्मैपदी धातु
-
fu to waste akay, to cross, with to
descend, with ext to cross by a boat, with a to
cross over, with st to cross with difficulty, with
yfore to obtain salvation, with fy to give away,
with a to swim over, a to melt, to rush, at with
13 to entreat, with ery to take away, with a to
indicate by signs, with 241 to bring, with a to
Taiso up, with Free to ascertain, with off to marry,
with fo to be humble, with 9 to write, with fa
and BTT io remove, witb , and ep to assemble,
with 7 to invest with sacred thread, fx to swell,
y to increase; to move, with up to follow, with
Got to go back, with erfit to attend, with em to
approach, with fort to go forth, with a to proceed;
to Now, to go with erg to imitate, with any
to remove, with wp and a to reason, with a
and on to say, to illustrate, with a to bring
to, with ev and to withhold, with fat and
pilns to fast, with sft to learn, with sto strike,
with safe (zat) to keep watch, with fato sport,
phone with it and ef to say, with fa and et ta innsact
en business, with a to kill, truth and it to
Acollectल धामों के सदस्यादि चारो विमकियों में जिभू या
Hrg के समान होंगे।

- आरमनेपदी धातु-ही to fly, with a to fly, go, to jump; रिमtosmile. इनमें भी अन्त्य वर का गुना away. इन धातुयों में भी गुण का परस्मैपद और मलने म्स्य) वर्ण को उपधा से है।यथा, शुक्र +3+, इसमें ३ +तुदादिकदिवादिगणीय धातुओं के भन्स्य स्वर तपा) ध्याकरण कोमुवी। आत्मनेपद की विभक्ति लगाने में पारो विमतियों में रूप बन जायेंगे। उभयपदी धातु- to hold, to bear, मो to ler भू to nourish, to carry; yि to serve, to go;". take दोनों विभक्तियों के जोड़ने से रूप धन जायेंगे। भ्वादिगणीय धातु को उपधा के लघु स्वर का गुण हो ३ युगन्तस्य लघूपयस्य प-लुट् इत्यादि चार विलियों है । यथा, शुच् + अ + ति = शोच् + अ + ति = शोचति । सिध् to go प. लट प्र. पु.सेधति सेधतः सेधन्ति म. पु. सेधसि सेघयः सेधय शोचसि उ. पु. सेधामि सेधाव सेधामः शोवामि शोवावः शोवार वृत् to exist आ. लट् । लोट् लङ प्र. पु. धर्तते वर्तते वर्तन्ते म.पु. पतंसे वत्त वर्तध्ये जोड़ने से सिघ, शुच, उ.पु व पविहे यामहे मलोऽन्त्यात्पूर्व उपधा- शब्द के अन्त्य वर्ण के पूर्व ( सपा है। मा स्वर का गुण नहीं होता। शुच to mourn.लद शोचति शोचतः शो शोचथः शोषय विधिलिङ्ग मी ऐसे ही विभकियों प के रूप घन जायेंगे।

विडन्त प्रकरण । परस्मैपदी धातु। । उच् to burn, कृम् to plough, to draw, with अप to draw dowo, with 32 to draw out, with to attract, with a to raise, with to draw toge- -ther, with सम् & नि to bring near, श् to cry, to lament, with an to censure, with a' to reproach, with छत् to ery aloud, घुम् to proclaim, to soundy धृष् to rob, चित् to understand, स्युत् to drop dowa, पप to nourish, भूप् to bear, to sprinkle; इच् to rain, सप् to go, to creed. इनके रूप 'सिध् मा घुन्' के समान होंगे। आत्मनेपदी धातु । ज् to go, acquire, शुभ to disturb, चुत् to , shine, मृज to fry, to parcb; मृद् to be glad, to , rejoicey ९to be pleased, पृथ् to grow, A to shine, एन्ट to split open. इनके रूप 'पत्' के समान होंगे। उभयपदी धातु- to know के रूप शुन् और नृत् दोनों के समान होंगे। परिवर्तनीय धातु। ऋto go ऋच्छति धाश् to shine भ्राश्यते गुए to protect गोपायति भ्रम् to roan सम्पति, धूप :o heat पूपायति म्राम्यति पिछ 1080 घिसायत्ति प्रम् to walk कामति, पण 10 praise पणावि, to प्राम्यति transact business out to desire tofa.it गुहू to conceal गृहति-ते धिम् to please धिनोति frazy to spit goal to kill, hert Ercania अझ to pervade ममोति तक्ष to cut तक्ष्मोति जुगुप्सते fah to bear fafaga धीमत्सने भृत् to reproch ऋतीयते Et to be disgussed si: *T3 to embrace na fog to roll into a bill, दह to be firm दहति-पति मम् to be ready समति लुच्topluck लोचति,लुन व्याकरण कौमुदी। कम् to wish कामयते प्टीयति चम् with l to sip आचामति गम् to go गच्छति गुप् to censure यम् to restrain यच्छति af to drink fazla घा to smell जिति धमा to blow धमति स्था to stand तिष्ठति म्ना to think मनति दा to give यच्छति दश् to see पश्यति शद् to perish शीयते सद् to perish सीदति दश् to bite दशति सन to adhere सजति रज. todye रजति-ते पिण्डते मृज् to be clean मार्जति शुट to purify, to go जम् to yawn जम्मते एप् to be edequate फल्पते च-ग्लुच् to go लज् to blush लन्नते दान to make straighti दीदांसति-ते मान् to think मीमांसते शान to sharpen शीशांसति है कित् to desire केतति, to dwell केतयति दान् to cut दानयति ते भिदु to cut मिन्दति अह to go अहते नि मोचयनि किन् to treat ass pati. ent चिकित्सति- प्र.श्चति; ग्लोषयति, ग्लुभूति गुज् to hum गोजते, गुजरे ज् to roar गर्जति, जति 3.ne तु यासकाम् इम। . Exercise--18 1. Translate into Hindi-पिता पुत्रमवदत् । सवें नरा एवं दति स्म। मम सेवका भवन्तं सेवताम् । साह्मण ! श्रद्धया पितरं सेवस्व । तस्य पुत्र पठनाय विद्यालय मारहुन् । राजानः सैन्यबले शत्रन् जयन्ति वानराणां साहाय्येन रामो रावण मजयत् । प्राणमयेऽपि मिथ्या tमा यद । सदा सत्यं वदेत् । पुरा सुरासुस्योमहायुद्धमभवत् ।कोतिर न जीवति । तो मृगस्य वासभूमि मगच्छताम् ! पिता कन्याय पुतलिका परछत् । स पादाभ्या चलति । भावां बालक सह तत्र क्रोदावः । ययं मणाय काही गच्छत् । चौराः तेषां सर्वस्व भपाहरन् । नारदः स्वर्गात एथिवी मवतरति । बोरा नपते रादेशायान वर्तन्ते। 2. Translate into Sanskriti-(2) मै सामने भय देख रहा हूँ । घर जाओ और पुस्तक लाभो । वह सेना के साथ मन में मता है। इस समय दोनों कहाँ से आते हो? चारी मारण पढ़ने के लिये काशी गये । शिव हम लोगों की रक्षा करें। अाम की दाली पर कोयल बोलती है । राम प्रातकाल में शय्या से उठता है। वह अपना हाय पुस धोता है। लड़कों को मिठाई अच्छी लगती है। हम दोनों ने सभा में सामायण गान किया । इस वन में रातदिन सिंह व व्याघ्र गरजते रहते । लोमश ऋषि के पुत्र के श्राप से राजा परीक्षित मर गये। दुष्टों का Kare पोदो, भलों के साथ रहो। इस कुत्ते ने कई भादमियों को काटा है। राजा माहाणों को धन देता है। (b) Boys see tigers in the forest. Sages always think about God. Every man and woman satute him A respectfully. They two fell down from the top of the mountais. She adorns her body with ornaments. Gods and demons churned the sea with a mountain. The sage Ascended the high peak of the Himalayas. Ia ancient Ajames kings went to the forest in their old age.. 3.Correct-वर्षा भवति । य विपति। वयं पुत्रान् स्मरन्ति । सूर्यः दिवायां प्रकाशति । अहं भयात् कम्पते । ते मधुरं भापन्ति ।। बालकाय मोदकानि रोचते । सपने समस्या वमोदनं पचेत् । बाणा - - 2 expel, with 24 to abandon, with eff and 37 # गि मत। मृत्पनि प्रथम पुरुष मध्यम पुगर उत्तम पुरुष नृत्य मम्मानः गणी पाग जादा जाता है। यया, मर +4 अस्-to tbrow, with,नि to deposit, with रि विगादि (th Conjugation.) मनर-राम Infer ना to dance मादी। एफ.गगन नत्यतः যনি गया नश्यामि नृत्यायः लोटा मृत्यतु मृत्यताम् नृश्य नृस्पतम् नृत्यानि नत्याय अनृत्यत् भनृत्यताम् अन त्यः अनत्यतम् भनृत्यम् अनृत्याय विधिलिड्। नृत्येत् नृत्येताम् 'मध्यम पुरुष नृत्यः नत्येतम् उत्तम पुष्प नृत्येयम् नृत्येव .परस्मैपदी धातुं । प्रथम पुष्प मध्यम पुरुष उत्सम पुरुष সূল मृत्यत नृस्पाम प्रथम पुरुष मध्यम पुष्प उत्तम पुरुष मनत्यन् अनत्यत अनत्याम प्रथम पुरुष नत्येयुः नत्येत नत्येम .

तिडन्त प्रकरण। sít around, with a to reject, with a to divide, with सम् and नि to abandon the world. witb सम् to »llect, to go, with big to search after, to rospes, to please; कुए to be angry to be angry, श_to become thin, क्षिप् to throw, उधू to be angry, भ् to be agitated, तुषु to be pleased, a to become atisfied, qp to be thirsty, R to be afraid, 19 to ut, दुष् to impure, दृप to be proud, दुइ to bear aalice, नश् to be lost, to perish. पुष् to nourish, पुष्ट्र o open, to blow, मुड् to faint, गथ् to be favourable, to be angry, सभ् to covet, शुध् to be pure, शुप् to de dried, feet to embrace, face to succeed, to Accoraplish, fere to have affection for, fent to perspire, ह to be delighted इनके रूप चारो विभक्तियों में 'नृत्' के समान होंगे। far to be, to exist आत्मनेपदी । प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष 1 विद्यते विद्यते 'विद्यन्ते विद्यसे विथे विद्यध्ये विध विधायहे विधामहे लोट् ।। 'प्रथम पुरुष विद्यताम् । . . विद्यताम् । मध्यम पुरुष विद्यस्य . . विद्ययाम् :: विद्यध्यम् ::: उत्तम पुरुषः वि... विद्यापह। वि.विद्याय है। विद्यामहै। विद्यन्ताम् . .

प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष अविद्यताम् . भविद्यन्त अविद्यधम् अविद्यामह । मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष विधत विद्ययाधाम् ' : विद्य चम् • विद्यमति अन् to breathe, to live; क्लिश् to be afflicted, to suffer pain, to fly, mq to be poiverial, 1 trouble, with अg to repent, with परि or सम् tot Borrowful (see भ्वादि), दीप to shine, E to sufter pain 9 to go, to attain, with ef# to understand, writ भनु to follow, with भा to happen, with उत् born, with to gain, with 34 or sfa to'gain, fa to suffer misfortune, with fa and 3C to d3 criminate, to analyze, with to increase, execute, with सम् and मा to finishyपूर.tolille to look for, with A to wake, मन् to thinki know, with a to assent, with a fu so closire, mit! todisrespect, with राम् to concursमा to measur to kill to concentrate the mind, with a to take, to eat, with a to order,' to join, with 1 अविद्यत अविद्याः अविद्ययाम् अविद्य अविद्यायहि विधिलिङ प्रथम पुरुष विद्यत विद्ययाताम् विद्यथाः विद्यय पियदि आत्मनेपदी धातु | .... satisly, प्री to leel affection, युध् to know, Fit है with ठडन्तःप्रकरण। . to to be fit, with वि to separate, with सम् to unite, gu to fight, to lie on, to stick, to produce, सञ् to create. इनके रूप चारो विभक्तियों में 'वि' के समान होंगे। उभयपदी धातु। मह to bind, मम् to suffer, to pardon, es to wish, रा to be able, शपु 10 eurse, शुच् to be afflicted. इनके रूप नृत् भोर विद् दोनों के समान होंगे। कारान्त धातु। ऋत इद्धातोः । हलि च-लट् इत्यादि चारो विमतियों में परफारान्त धातु के म का ईर् हो जाता है। पधा, जु grow old-जीर + 2 + ति जीयेतिः, जीर्यत: जीर्यन्ति; ६ to tear दीयंति, दीर्य्यतः, दीर्यन्ति इत्यादि । ओकारान्त धातु। ३. कोत: स्यनि-लट इत्यादि चारों विभक्तियों में भोकारान्त धातु के मो का लोप होता है । यथा, सो to destroy स्यति, स्थतः, स्यन्ति इत्यादि । छो to cuts दो to cut, शो to Bharpen के रूप ऐसे ही होंगे। परिवर्तनीय धातु । कम् to go काम्यति मम् to walkzाम्यति तम् to endureक्षाम्यति भ्रश to fall नश्यति धम् to endure लाम्पति, नस् to allम्रत्यति स्लामति # to be mad hafa to be born आयते रम् to color रज्यवि-त todesire ताभ्यति व्य to hurt विध्यति to be tamed rufa शम् to be calm शाम्यति to play, to sbine श्रम् to be weariedभाम्यति. दीव्यति । सिए 10 ser सम्पति

-
Transliter Hinthiपुजामा गय Im
viपश सभmy. पाम सम्पन्न
पहाताने । परीक्षनेत प्रत मार
मनिममम पिता पुधाप मानाकाम
शिवाशिमेष ममरणाप हावा
2. Translate intn Sanskrit:-fa) मुनि मेराको
ये भरने कम्पमे प्रमत्तीग मापारा मेतारेममा
भाजा से सेना एकमगरसे परे नगर में जानी है। दोनों
माचेवामा फली से मनुष्ट नापसी माहारा में उसने मेरे समर
(b) Mothers have alfection for their children. Het
STOWI old and bis 500 18 now young. The AITO
fear of punishment be became calm, You should
agitated in vain. He closely embraced his son OF
सरस्य जलं थ्रोषसि । बालको नृत्यति । पिता कुप्यते । पुत्रो
तस्य हृदय क्षुभ्यन्तु । पुत्रं रिलप्यते।
लट् इत्यादि-चार विभक्तियों में चुरादिगणीय पातु
११. सत्यापयशरूपदीगातूरलोकसेनालोमत्वचत्रर्मवर्णचूर्णचुरादियो
(स्वार्य में णिच् होता, है अर्थात् ) 'अय' जोड़ा जाता
चुरादिगणीय धातु प्रायः उभयपदी होते है। यथा, म ।
भयुष्यम्न।
पुत्र सीव जनमने भौर मरते रहने से दुग उत्पन्न होता !
the enemy pierced him in the battlefield. Owing
the want of water lotuses dried up.
3. Correcti-स फलैः तोप्यति । कन्या मनत्यत् । तारा
चुरादि ( loth Conjugation) -
प्रय+ति: भक्षयतिते।
।
के

Pur तिडन्त प्रकरण। परस्मैपदी-लए आत्मनेपदी-लट . पु. भक्षयति मक्षयत: भश्यन्ति भक्षयते भक्षयेते भक्षयन् प.पु. भक्षयसि भक्षययः भक्षयथ भक्षयसे भक्षयेथे भक्ष्य 3. पु. भक्षयामि भक्षयावः मक्षयामः भक्षये भक्षयावहे भक्षया लोट्, लङ् विधिलिड् में भी ऐसे ही विभक्तियां जोड़ se to distribute, भघ to commit sin, अथ count, to mark; ere to worship, spt to wors अ to earn, मर्द to kill, आई 10 worship, अन् । blind, अवधौर to hate, आन्दोल to rock, कथ् to tell topierce, कल् to sound, to count, कुपट to cove to send, to direct, as to break, not to count, to sound, गर्द to Bound, गई, to blume, to cen- गुग to multiply, Bry to string together, वर्ष Btudy, far to paint, fent to thiak, to con पूर्ण to crush, to cover, छिद्र to bore, शा to: तुल to waigh, to examine, दण् to punish, to दुःख to give pain, ध्वन् to sound, पार to protec to give pain, पूज् to worsinp, पूर् to fill, to प्रय to publish, भूए. to adarn, मण्ड to adora, म honour, मान to respect, मार्ग to Beek for, todate, मित्र .to mix, मूल to plant, यन्त्र to restrai to adora, to write to drw, to find out, - seeto look at, or to paint, लोच to spesk, tos पए to divide, वर्ण to explain, शन्द to sound, to appease, to trace. out, s. - -

माम्मनपरी Mi to begam thakreti
ki hlamie, to bitr, An to threaten, # tot.
cheat. इनके साम्पा मारमनियों में मरम्मत
३'अय' के पहले धातु की उपधा के लघु स्वर(13E
का गुण होता है। यथा, चुर् (to steal) + अयति
99 to proclaim, faz to sharpen, a to weig
to examine, I to tear (परस्मैपदी)इनके रूप 'घर'
समान होंगे । पर स्पृह् to desire, मृग to seek, ।
pity, सुख to make happy, फुद् to become maniled
Rullt, sm to acpk, 1 th notier, to dofir,
राब बानपानुनो 'म' का सीना है।
२- 'प्र. के पाले गुरादिगणीय धातुओं के अन्य स्तर
वि
तण पपा * •' की वृद्धि होती है। यथा,
Father)+भय +from+ति याय + अय
यायपति । तद + मय + ति = साइ+मय + ति = सार
तारयतः, ताइयन्तिात्याविचारो मितियों में ऐसे ही हो
भकारोपधधातु-क्षल to wash, BP to eat, re
collect together, प्रस् to hold, to oprose, म
shine, to fall तथा परस्मैपदी घातु- गल् to pours
to filter, मद् to please, इनके रूप 'त' के समान होंगे।
मम्, कष् इत्यादि उपर्युक धातुओं को उपधा का दो नहीं होता।
+ अय + ति = चोरयति, चोरयतः, चोरयन्ति इत्यादि।
इत्यादि के उपधा-लघुविर का गुण नहीं होता । यथा, स्पृश्यति । .
की वृद्धि मा, इ ई की ऐ, उसकी श्री, मोर कर की भारत

. मात्र के समान पाला। साधु लोग कभी किसी को दुम्ब नहीं देते। वह तिङन्त प्रकरण। परिवर्तनीय धातु। छत् to celebrate कीर्तयति प्री to please प्रीणयति धू to shake धूनर्यात गण-गणापयति अर्थ to beg अर्धापयति चण्ट-घण्टापयति लज्ज् to be ashamed लजापयति Exercise-20 • 1. Translate into Hindi :गोपालस्य पुत्रौ धन मयत्तः । स सस्म कथामिमा मकथयत् । तस्य दुष्टस्य सन्द कृतान्तं राज्ञे कषय । सो पुरोः । पादौ जलेनाक्षालयताम् । कोशे कति मुद्रा वसन्त इति कोशाध्यक्षः मुद्रा गणयति । नृपस्या घोषयतु भवान् । धनार्थ पृथा चिन्तयेत् बालका। मिनुका राजान मर्थयते । रहसि भृपतिः मन्त्रिभि मन्त्रयेत् । 2. Translate into Sanskrit:-la) तुम दोनों 'मारते हो। शिक्षक ने कल लदों को दण्ड दिया। राम ने मजर को -- का an माता पिता को ईश्वर के समान पूजता है। उसने इस वर्ष कई पुस्तके प्रकाशित की । गहने से लड़के का शरीर आभूषित कीजिये । मीठी बात से लोगों को सान्त्वना देनी चाहिये । तर शृगाल जोर से शेलने लगे। (b) The mother protects her chudren. Tell the where your father is pow. An idle man always throks of sin. A learned map should think of success as well as of failure. Ope day the boy cheated his class-fellow's and his teacher. He stole every thing of his. 3.Correct:--धन मार्जयामि । शन् तादयन्ति । इदम् ब्रुश्यत् । सुखं मायन्ति जनाः धनमयति । भाव भूषणाभिः शरीरान् भूषयामः । राजास्याज्ञा पोपपति मन्त्री। द्वितीय भाग ( Group II) इस भाग ( group ) को १८० विमकियां दो भागों में मा माग रानमा गुम्न म. क्तियों में स्वादिौर तनादिगणीय धातुओं के परम से ३. यदि नया के पहले संयुस. पर्णमहोतो कि केयमारकेभाने से 'उ'का यिका रोलोपोता। पपा, मुगु, शुभ्यः; मुनुमः, सुम्मः तन्तनुराग ४. रिनपा के पहले संयुक्त पर्णहोतो कार अपन मिलियामाने मे' मा 'यो ALI व्याकरण कामुश विभक्त हैं; सयल ( strong terminations) और भी (weak terminations) सबल विमक्ति -- में लट्-ति, सि, मि; लइ-त, लोट-तु, आनि, माय, माम, ऐ, मायद, भाम?; ये १३ किया है। अबल विभकि-में शेष १६७ विमकिया है। स्वादि, तनादि (5th, 8th Conj.) १. स्वादिभ्यो नः । तनादि :-लट् इत्यादि धार और जोड़ दिये जाते हैं। २. सपल विभक्तियों में दोनों के दु'का 'मो' हो जाता परशकशनराशनुमः। यथा, नुमतिपति। ५.यान पर मनोहर inोता।ा, नु I पर शादि। स्वादिगु to athe उभयपदी लर नामद । गगन विगत एन मस्ती TMATER एमा KAN सुनुते सुनुपे सुन्ये आत्मनेपद । सुन्याते सुन्वते सुन्वाथे सुनुभ्ये सुनुवहे-सुन्यहे सुनुमहे-सुन्महे लोट-परस्मैपद। सुनोतु-सुनुतात् सुनुताम् सुन्यन्तु सुनु-सुनुतात् सुनुतम् सुनुत सुनवानि सुनवाय सुनवाम आत्मनेपद। सुनुताम् सुन्याताम् सुन्वताम् सुनुष्य सुन्याधाम् सुनुध्वम् सुनवे सुनवाय सुनवामहै लङ्-परस्मैपद। असुनोत् असुनुताम् असुन्यन् असुनोः असुनुतम् असुनुत असुनवम् असुनुव-असुन्य असुनुम-असुन्म आत्मनेपद । मसुनुत असुन्वाताम् असुन्वत असुनुया असुन्याथाम् असुनुध्वम् भसुन्धि असुनुवहि-असुन्यति असुनुमहि-असुन्महि विधिलिङ्-परस्मैपद। सुनुयात् सुनुयाताम् सुन्युः सुनुयाः सुनुपातम् सुनुयात सुनुयाम् सुनुयाय सुनुयाम म.पु. उ.पु. मुन्वारन् सुर्मायन मुग्धीमहि - परस्मैपदी धातु-hि to destrotogire pain! to be satisficd, it to send forth, to go a उभयपी धातु-वि to collect, धु to shake, धू shake, मि to throw, to scatter, g-tochoose,f to bind, to tie, स्तृ to spread, इनके रूप 'सु' के समा थश् to spread मात्मने । प्र.पु. भाप्नोतु आप्नुताम् माप्नुवन्नु अश्नुताम् अनुवाताम् अनुसार धरनुष्य भरनुवायाम् भरनुध्वम् उ.पु. भाप्नवानि आप्नवाव आप्नवाम अश्नव प्रश्नवावहै अरनवार्मा प्र. पु. भाप्नोत् भाप्नुताम् आप्नुवन् । भारनुत आरनुवाताम् मारनुक्त आरनुथाः भाश्नुवायाम् आरनु प्र.पु. भाप्नुयात् भाप्नुयाताम् भानुयुः अनुवीत भरनुवीयानाम भरनुपर म.पु. भानुपाः भाप्नुयातम भानुपात भरनुवीयाभरनुषीयापामभरनुप उ. पु. भाप्नुयाम् भाप्नुयाष भानुपाम भरनुवीय भरनुयहि भरनुमा व्याकरण कामुदा। आत्मनेपद। प्र. पु. मुन्यात मुन्यीयाताम् सुन्यीपा: सुन्यीयाथाम् सुधीय सुन्यीयहि होते हैं। भाप् to get परस्मैपद लट् । प्र.पु. भामोति आप्नुतः पाप्नुवन्ति म. पु. आप्नोपि आप्नुयः आप्नुथः उ.पु. आप्नोमि भाप्नुवः भानुमः लोट। म.पु. भाप्नुहि आप्नुतम् थाप्नुत म.पु. भाप्नोः भाप्नुसम 'भानुन उ.पु. आप्नवम् भामुव भानुम भारनुवि भानुवाद भारनुमी भरनुने अरनुवाते भरना भरनुपे भरनुबाये भरना अरनुवे 'भानुवः अरनुम - विधिलिङ् ।

तिङन्त प्रकरण परस्मैपदी धातु-आप with वि to pervade, with उप, सम् & yि to arrive at or enter, तक्ष् to cut to wound, शक् to be able, to endure, राधo kill, to accomplish, साथ् to finish. इनके रूप 'माप्' के समान होंगे। परिवर्तनीय धातु। 5 to hear शृणोति, with प्रति or सम् to promise, with for to be famous füą to please featfà i Exercise-21 1. Translate into Hindi:-ऋषिकुमारस्याशथा सपो' राजान. मतपणो । स मुजवलेन दिविपदामपि साहाय्यं नोति । स दरिद्रपुरषाणा सपनं प्रेग्णा गणोति । परिश्रमस्य फलं समाप्नुयात् । रामस्योचाने माप्रमानि चिनु । 2. Translate into Sanskrit-1) वह अपने दोनों पंखों को फैलाता है। इन पलों से सन्तुष्ट होभो । उसने बागीचे में बहुत फल पाये । उनका धार्मिक ग्याल्यान सुनना चाहिये । राजा के दणमय से चोर का सर्वाना है। (b) i father fruits an. Noners every day in the garden. He got much Kerlih here in the earth. I beard a great nok on the night. 3. Correcti- बालकाः तस्य वरनं मरणोनितो बहूनि फखाने गनुका । अयं पुपाणि सिवाना वाण धुननि। तनादिनन् to spread उभयपदी। परम्मैपदी कर भारमनेपदी सन्नी नुते जनते म.पु.गोनि तनुरे दापे तनुते उ.पु. लोमि तनुः मन्दः तनुम-तन्नः तन्वे नाहे मोद-उन्मो

म. पु. तनु
तन्वायाम तनुप्रन
तनवावी तनानई
अतन्वहि भन्म
प्र.पु. तनोतु सनुताम तन्वन्तु तनुताम् तन्वाताम तन्वतन
प्रपु. अतनोत् अतनुताम अतन्वन् अतनुत अतन्वाताम रतन
अतनुतम अतनुत अतनुयाः अतन्वाधान मत
प्र.पु. तनुपात् तनुयाताम् तनुयुः तन्वीत हबीयाताम सवाल
म.पु. सनुयाः तनुयातम. तनुपात तन्वोषाः तन्त्रीयायाम, सन्मान
सपल विममियों के भाने से 'ए' का 'कर' भार
पिडियम, पर रहने मेहफे परस्थित
लोट् ।
तनुतम् तनुत तनुष्य
उ.पु. तनवानि तनवाद
तनवाम तनव
लङ्
६. पृ. अतनवम् अतनुव अतनुम
असन्धि अतनुवहिरी भनुन
अतन्य
असम्म
विधिलिङ्।
३. सनुपाम तनुपात तनुयाम सन्कौय तन्वीयहि
कृ to do उभयपदी।
बाप आता है।
परम्मैपद
आत्मनेपद
नमा पनि
सन्नी
मितियों के माने से 'कुर' हो जाता है।
अम्मी

लोट् ।
उ. करोतु कुस्ताम् कुर्वन्तु कुस्ताम् कुर्वाताम, कुब्वंताम
कुस्तम् कुस्त
कुर्बाथाम कुरुवम्
-- करवाणि करवाव करवाम
करवावहै करवामहै
अकरोत् अकुरुताम् अकुर्वन् अकुरुत अकुर्वाताम अकुर्वत
अकरोः अकुस्तम् अकुरुत अकुख्याः अकु थाम् अकुरुध्वम
अकरवम अकुर्च मकुम अकुन्धि अकुर्वहि अकुर्महि
विधिलिङ् ।
कुति कुर्याताम, कुयुः कुवात कुठायाताम, कुचारन्
कुर्याः कुर्यातम् कुर्यात कुचीयाः कुवोगथाम कुर्तीचम
चुाम कुवि कुाम कुवीय कुवीवहि कुवीमहि
- with ma to exceed, with afa to overcome,
old right, with अनु to copy, with अप to wroog,
jure, with to call, with उप to be friend,
निर&wr to expel, with परा & मा to act well,
to begin, with sfa to counteract, with fa
ter, with वि & आ to explain, with सम to
7, with परि to polish.
Exercise--22
Translate into Hindi--अहमेतरकायं मकरवम् । स स्वबाहु-
चान् नृपान् अधिकरोति । महता माचरणं सम्वेऽनुकुर्वन्ति ।
स्वकीति तनोति । त्यज दुर्जनसंसर्ग कुरु साधुसमागमम् ।
नने यनं कुर्यात् ।
Translate into Sanskriti-(a) राम अपना काम करता
याम नहीं करता । उसने तेरी भलाई की। दूसरों की धुराई
नी चाहिये । कदि लोग बड़ों की कीर्ति फैलाते हैं। सदा

नाम् क्रीणाताम्गनाय Mr मणि मनोबा भी means. The goat imitates the action of the cars और ना का लोप होता है। यथा, मुष-मुपाण । भश्मशान, प्र.I. कारण रगीन जानाम् ॥nt म.I'रान धारणापाम् भजप मित्र की भलाई करो । युधिष्टिर ने राजसूय यज्ञ किया ! (b) Do your duty. You should do this work bg 27 Ram spread his fame in the whole world. 3. Correct:-ते एकार्य कति कुर्यात् त्वम् । पूजा करोमि । तो गानं कुर्वन्ति । आवां तस्य कीर्ति ठनुवाद । क यादि 9th Conj.) १ ऋथादिन्यः भा-लट् इत्यादि चार विभक्तियों में क्रयादि गणीय धातुओं के परे सबल विभक्ति में ना, स्वरादि पद विभक्ति में - और ध्यानादि अयल विभक्ति में नी जोड़ दिया जाता है। २ वजनान्त धातुओं में लोट् के 'हि' मा 'मान' होता । n पुर-पुराण इत्यादि । की to buy उभयपदी परस्मैपदी सद आत्मनेपदी प्र. पु. होणाति कोमोतीन्ति कोणीते कोणाते कोणते म.पु. भोगागि कोगायःणीय कीणोपे कोणाये उ.पु. शोगामि गीतः कोणीमः कोणाचे कोणीवहे कीगोमहे मार। प्र.पु.गात जीनाम् रणन्नु म. Tीनाम्न 1.1. मानिना कोणेच मायामार T

तन्तप्रकरण।
."
विधिलिद।
कोपीयात् क्रीणीयाताम् ऋणयुः क्रीपरित कीणीयासाम् कणीरन
कोणीयाः कोणीयातम् कणीयात कोणीयाः करणोयायाम् कशीध्वम्
कोणीयाम् कोणीयाव कोणीयाम क्रीणीय कोणीवहि कोणीमहि
परस्मैपी धातु-~अश् to eat, लिश् to torment, क्षुम्
to disturb, पुयू to nourish, मुप to steal, मृद्ध to
press, to kill, आत्मनेपदी धातु-५ to cherishy उभयपदो
धातु-प्री to take delight in, मी to kill इनके रूप
उपर्युक नियमानुसार होंगे, पर क्षुभ में ना के - का ण नहीं
होता । यथा, क्षुम्नाति ।
परिवर्तनीय धातु
३ लट् इत्यादि चार विभक्तियों में ग्रह का गृङ्, उपा to
become old का जि और शा का ज्ञा होता है । प्रह to take
गृह्णाति, गृङ्गीते, with अनु to favour, with नि to
punish, with परि to lay hold of, with प्रति to
accept, with वि to quarrel, with सम् to collect, ज्ञा
to know जानाति, जानीते, with अप to conceal, with
मनु to acknowledge, with अब to despise, with परि
to ascertain, with मति and अभि to recognise, vith.
समूto recollecte
४. लट् इत्यादि चार विमक्तियों में परस्मैपदी-री to gora
ली to melt, ब्ली to select, to go, A to go, to
kill, 7 to speak to wear out, to carry, to
fill, to fry, to supports to kill, to kill, aut
उभयपदी-घू to shake yto parily, लू:to cut off, ५
to choose, स्तु to spread, इन धातुओं के दीर्घ स्वर का

मध्नाति । पुत्र पुष्णोहि। भावां पुस्तक कोणावः।
RRE जाता है। पाfirmनतिजागिर पाई
chorenागर का निधन होगा।
मध्याति, पम् in Eमानि, परम् with भनु 102
फरया पुरतकमि क्षगं गृहाण 'सइदो रश्या तगाना माना।
1. Translate into Hindi:--अघमातरि परगान मनन।
देवामुरा मरदरेण समुनममनन् । मीमाक्षगेन पुरे भयुवानी बरका
2.'Translate into Sanskriti-ta)दा लड़के के लिये पुमा
खरीदता है। चोरों ने उनका सर्वस्व अपहरण कर लिया। राजा
आनन्दपूर्वक प्रजा का उपहार स्वीकार किया तुम उसकी कथा जानते
हो। उसने अपने आचरण से अपना पंरा पवित्र किया।दयोधन मे
(b)'He fills the jar with water. Let them tre the burden.
He bought 10.books in the market. He took Uttara, the
daughter of Virat, for his son. He purifies bis nation by bis
3.Correct-वयं पुस्तकं गृहामि । सोइ जानावि।स अलाशय
HTो in kill attn in th protest
गानि, free
५. मारि गामि में ITI कार का मोर
दोसा है। पा, Pe to tur प्रजाति, म to cart
nttached to, with सम् to connect, with in to do
unite, with मा to loosen.
मस्तकं भलुनात्।
की गति रोक दी।
good actions.
Exertise-23
1
1
7

तिडन्त-प्रकरण
रुधादि, अदादि, हादि।
१. सन्धि के विशेष नियम ।
(१) दादे(तीर्घः--यन्तःस्थ तथा ङ्णनम् को
अन्य व्यञ्जन वर्ण परे रहने से दकारादि धातु के हफा
धकार होता है।
(२) एकाचवशोभप झपन्तस्य श्यो:-पदान्त मैं या सू भी
के परे होने से दह, घुभात्यादि धातु के आदिस्थित तृती
के स्थान में चतुर्धवर्ण होता है । यथा, दुह् + सि - धो
पादु हमुहप्नुप्निहाम् हो ढः। दो दे सोपः । दूलोपे पूर्वस्य दीपों-
सध परे रहने से हकार सहित दोनों का ग्ध होता है।
हकार का लोप होता है और त थ ध करद हो जात
लुप्त हकार के पूर्वस्थित बस्य स्थर का दीर्य होता है
मुड्-मुग्धः, मूढः । गुह् + :- गृहः लिह + 1 = लीदा।
(३) होदा--अन्तःस्थ तथा झ्ण् न म को छोड़
ध्यान पर्ण परे रहने से धातु के अन्तस्थित 'ह' का
जाता है। यदि धातु के प्रारम्म में 'इ' हो तो इस भवर
दुका म्हो जाता है।
(४) किसी वर्ग के चतुर्थ वर्ण से परे विमति के
स्थित र भौर एका ध् हो जाता है । ( देखो)
(५) परे रहने से दया का हो जाता है।
(६) यदि पातु में एकाधिक स्पर हो तो स्परादि
विमति के भाने से धातु के भन्तस्थित हस्य या
(जिसके पहले कोई संयुक्त पर्ण महो) का य् हो जात
श्या, दीधी ईतदीपीत!..' ~
७)सत् भाने से. धातु के भन्लास्थित स् का
।

१.एगायाATभीरता
मग्य कायमपणेदातोपातु या to sacrita
१६.६परेरने से धातुके मन्तस्पिाश्मए,
१.स्थादिभ्यः प्रम-लद इत्यादिचार वित्तियों में सक्न
विमक्तिके माने से धातु के अन्त्य स्थर और मन्तिम व्यंजन
Fair,Ramaire
khush Rimmint
* + 1 को T #m
RAMRITrir
...Anil Amit
RATrma art TRIYAfterh
१५ पु माता में
मौरपा रोगा।
Man wintan
पर सोहिका पिता है।
१५. प्यमनात भात परे एक मोर का होर
दोता है।
हो जाता है।
रुधादि (.7th conj.)
.

प्रकरण। १ ६ घर्ण के बीच में न जोड़ दिया जाता है और अबल विमति के आने पर न जोड़ा जाता है। यथा, रुधु-रुणद्धि, रुन्धः। २. धातुस्थित सानुनासिक वर्ण का लोप होता है। यथा, म-अनमि। ३. तृणह इम,-व्यञ्जनादि सबल बिगक्ति के आने से तृह् धातु में उपर्युक्त न का ने हो जाता है। N. B. यहाँ सन्धि के विशेष नियम के ३, ४,९,१०,११, पर विशेष ध्यान रखना चाहिये। रुध् to obstruct उभयपदी। परस्मैपदी। ट। आत्मनेपदी। म. पु. रुणद्धि रुन्दः (रुन्धः) रन्धन्ति हल्धे राधाते रूयते म.पुरुणस्मि हन्ध हल्धाधे हलचे उ. पुरुणमि रुनः रूभ्वहे महे लोट। अ.पुणवरुधाम् स्यन्तु स्याम् रूवाताम् हचताम म. पु. सन्धि रूधम् हन्ध हनस्व स्वाथाम् व. पु. रणधानि, रुणधार स्पधाम रुगधै रणधावहे रुगधाम प.पु. मरण भल्धाम् अन्धन् मरवत भएधावाम् भरल्यन २. पु. भरणत् द् भरल्धम् अहन्ध भएघाः अरूधापाम् भररूपम् ..पु. भएणधम् भरगम भरूम अरन्धि भरनहि भरलम विधिलिए। • हयात् रूपाताम ल्युः हल्धीत धीयाताम् धीरन रूपाः हव्यातम् स्यात रूधीथा: पयायाम् रूपम - रूपाम् रूपाद रूपाम हन्धोष पीवी . -- shut up. तह tokil. तन्ति परस्मैपदी धातु। with aT in guard, with 31 to bloctada with ata or 17 to orpose, with and fats भुज to protect परस्मैपदी लर मुज to eatमात्मनेही 737. to disappoint affo f719 to distinguish fara शुद्ध to pound क्षणत्ति, क्षन्ते युज् to unite युनक्ति, युक fun to cut foafe, ferate to empty मि to separate मिनत्ति, यिच् 10 separate विनकि, प्र.पु मुनक्ति मुना मुजन्ति मुरते मुनाने म. मुनक्षि मुकथा मुकथ मुनों मुलाये उ.पु. मुनरिम मुभव मुन्ने मुश्वह दिस to kill प. प्र. पु. हिनस्ति हिस्तः हिरान्ति तृणीडि तृपः म. पु.हिनस्गि हिस्थः हिस्य सूर्णक्षि उ.पु. हिनस्मि हिरवः हिरमः নূগন্নি 873 to anoint atafa for to shake, to fear 3* to svet safet विनक्ति fara to grind, to hurt श्रृज to avoid, to shun पिनष्टि घृणक्ति far to know fara मिन्ते आत्मनेपदी धातु । इन्ध to kindle इन्धे faz to suffer pain faza उभयपदी धातु । रिलक्ति, तृ to split णसि, तृन्ते रिक पित

विडन्त प्रकरण
Exercise-24.
1. Translate into Hindi:--मेवाः सूर्यस्य किरणानि रधनि
. मन्नानि मुझमहे । शस्त्राण्यपि भारमान मछिन्दन्ति । भई
जानि अमुक्षि रिमन् संसारे लोका बहूनि दुःखानि मुस
द्वा जीवान्न हिंसन्ति।
2. Translate into Sanskrit:--1) साधु लोग राय को भी
ने । देवताओं ने स्वर्ग का द्वार बन्द कर दिया । छोटे जीवं
मारना नहीं चाहिये । घर का दरवाजा बन्द कर लो। यह
। शाखाभी को काट ले । हे हजारों दुख भोगते हैं।
(b) They two fear from the serpent. You should
all an amal. Let Ram till Rawas, the lag of demo
am broke the bow of Shiva with a great ease. Ma
cople dise here today.
3. Correct-- द्वारं । तो राय हिंमतः। पर मन
जामहे । इयं भजेत् । ते गात्राणि हिन्ति ।
भदादि ( 2nd Covj.)
१. अदादिगणीय धातुभो के परे विमकियों सीधे जे
जाती है।
अद् to eat परस्मैपदी।
लोट
कति : अन्ति
अपाम
तिसर: भस्थ
भम्
१. म सगम्-के परे सरदार के पार
कम से मन् मोर मारे जाता है।

म. मा मामाने भागने माकम् मायानाम् मापार भापीत भामीयानाम आनन् म.पु.भारथाः भामाथाम् माध्यम मापीया:भामीयाथाम् वासका ४. आकारान्त धातु के परे लड्अन् का विकल्प से उस मद आप भाग भवन भयम् आम् to sit आरमनावी ३ रे गले में भारम् का मोप होता है। लोद म. माश्मे मासाय मार्ग भागन मामाचाम् उ.. मामे भारी माग्म भाग বঃ विधिलिङ प्र..भास्त भासाताम्मासन उ. पु. भासि भास्वहि भारमहि मासीय भापीयहि घस् to dress with मा के रूप 'भास्' के समान होंगे होता है । उस् होने से आकार का लोप होता है। या to go परस्मैपदी लोट प्र. पु याति यातः यान्ति म. पु. यासि यायः याथ याह यात उ. यु. यामि यावः यामः यानि याम आमनी आकारान्त धातु यानु याताम. यातम् याद विडत्त प्रकरण । Aur -- - विधिलिङ म. पु. अयात् अयावाम् अयुःभयान् यायात् पायाताम् पायु: म.पु. भयाः अयातम् अयात यायाः यायातम् यायात उ.पु. अयाम् अयाव अयाम यायाम यायाव यायाम or with a to follow, with a to approach, witb $ to come, with je to yield, with fire to go out, with प्रति to go towards, with सम् and * to arrive. परस्मैपदी धातु-ख्या to tell, दा to cut, a to fly.पा to protect, मा to fill, मा to shine मा to measure, TT to give, el to give or take, at to blow, Get to | eat, धा to crok, स्वा to bathe इनके कर 'या' के समान होंगे। * पुगन्तस्य लघूपधस्य १-सरल विभक्ति आने से अदादि. गणीय धातुओं के अन्त्य स्थर तथा उपधा के लघुरूवर का - गुण होता है। द्विप, to hate, to envy परस्मैपदी । लोट । विष्टः द्विषन्ति द्वेटु द्विष्टाम् हिषन्तु म. पु.क्षि विष्टः विद्धि विम् द्विष्ट ३. पु.मि द्विस्वः द्विष्मः पाणि द्वैपाय ६. द्विप के परे लङ् के भन् का विकल्प से उस होता है। विधिलिड्। प.पु. भट्- मदिशा अविपुः द्विष्यात द्रिष्यताम् दिप्युः २ म.पु. प्रदेदः शिष्टम् पदिष्ट দুধ্যে उ. भदेषम् अप्ति अमि दिग्याम् दिप्याव हिण्याम द्वेषाम . - लोट, रोदितु रदिताम् स्तु रदिहि रुदितम् संच रोदानि रोदाव रोदन विभक्तियों के परे रहने से रुद, स्य, श्वास, अन्, N. B.रुद् इत्यादि धातुओं के लख केतु के स्थान में ईवा अदिताम अरुदन् स्यात् स्याताम अन् to breathe, स्यप् to sleep, श्वस् to breati ८ रित्यारयाद-लद इत्यादि चार विमतियों में घ..तिला शनि शक्षित विषिः अथ दि व्याकरण-कामुदा। ५. रुदादिभ्यः सार्यधातुपे-लट्, लोट् , लङ् के व्यवना धातुओं के परे 'इ' का आगम होता है। रुद् to cry परस्मैपदी। लट् । प्र.पु. रोदिति रुदितः रुदन्ति म. पु. रोदिषि रदियः रूदिय उ.पु. रोदिमि रुदिवः स्खदिमः अत् तथा (1) के स्थान में ई. और अः होता है। विधिलिङ् । प्र.पु. भरोशीत् । अरोदत् म. पु. बरोदी अरोतः उ.पु अरोदम भरदिव अरदिम रथाम् रुवार इनके रूप पेमे ही होंगे। जाए, दरिद्रा, प्रफास् , शास् , इन धातुओं के परे भन्लि, " और मन का प्र.म से भति, मनु और उस् हो जाता है। जक्ष to ent परस्मैपदी। मोद। अभिताम af HERE बात अशिनम्

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मर पायाम् मायाराम शास् to govern, to teach परस्मैपदी । - ".शामसलो। शाहो-प्रवल ध्यानादि विना शाम्नु शिष्टाम् सामन शिष्याः शिष्यातम् - शियात पतास् to shine परस्मैपदी। 11 नागि raham न शान्ति नागामिल विधिलिए भयान भाम प्रमाण नाम्पा मायनमा भारमनाना महान चामा नपानम् मनकामम् अपहार कम भाने से शास् का शिप और दि माने से शा हो जाता घकास् पातु पेनो। लोट प्र.पु. शास्ति शिष्टः शासति म.पु. शारिम शिष्टः शिष्ट शाधि शिष्टम् पु. शारिम शिष्य. शिमः ग्रासानि शासाव लड्न विधिलिङ् प्र.पु. अशात् अशिष्टाम् अशामुः शिष्यात् शिप्याताम् शिष्युः म.पु. अशात् अशाः अशिष्टम् मशिष्ट उ.पु. भशासम् अशिष्व अशिष्म शिष्याम् शिष्याव O/शी to sleep आत्मनेपदी। १२. शौडः सार्वधातुके गुणः । शीकोस्ट- लट् इत्यादि चारो विभक्तियों में शी का शे तथा अते, माताम् भोर मत में शेर हो जाता है। सामान शिष्यान and

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. इ to go परस्मैपदी। १४ इणौ यन्-अन्ति और अन्तु में इ का य हो जाता है। लोद एताम् इथ इमः एताम, with उत् to rise or ascend, with भभि । उत् to prosper, with अनु togo after, with मनि obtain, with 819 to go away: to perish, with And 39 to arrive, with 39 to receive, with to trust, with वि to expend, with समad (with अधि) to study आत्मनेपदी। भधीमाम भधीयानाम् aft भधीयाधाम पर अध्यषावई माय १५.सकी स्थरादि विमति में पेकार गया। ध्याकरण फामुदा। प्र.पु. पति इतः यन्ति म.पु. एपि इथ: उ.पु.एमि अयानि अबाव ल विधिलिङ् आयत् इयात् ऐतम् ऐत इयाः उपु.आयम् ऐव ऐम इयाम इया to obtain. लंद सोद जन अपीयाले मधीयते अपने अपार्थ धीय भधीय भये अपीयरे म मरे अध्यय प्र.पु. ऐत म.पु. ऐः इयोताम इयातन,

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१५.तोकिदि-यवनादि सपल विभक्तियों में विधिलिङ् हन्यानाम् न्यु हन्यातम् न्यान हन्याव हन् with अमि to sounds musical instruments with fat or gti to destroy entirely, with fand प्र. पु. घेत्त वित्ताम विदन्तु विदाकरोतु विदाइकुस्ताम विदाइपन विदाइकुरु विदाकुरुतम विदाइरल उ. पु. येदानि वेदाय वेदाम विदाकरवाणि विदाकरवाच विदार ध्याकरण कामुदा। प्र. पु. भइन् अहताम् मानन् म. पु. भहन् महतम् हन्याः उ. पु.अहनम् महन्व महन्म हत्याम् आ to obstruct. विद् to know परस्मैपदी। वेत्ति वित्त: विदन्ति विदतुः वरित वित्यः विस्थ देश्य विदयुः विदः विद्या विद लोट 4 म. पु. विद्धि विचम् वित्त विद्याताम. विध प्र.पुभवेन्दुभदित्ताम अविदुः । विद्यात् अविदन् । म. पु. भवेः भवित्तम् भवित विद्याः भवन उ. पु. भवेदम, भविद्ध अविन विधाम, विधातम् वि विद्याव उकारान्त धातु। धातु के प उ की वृद्धि होती है।

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मारमनेपदी भूपाने मुगये तर.गड़ rifalse fairn Manghy भीtaarana नीम प्र.गु. भगवीत् अबृताम् अनुवन् अत अगुदाताम अवदत भतम् भगृत भयाः भदायाम् अग्रुध्यम घुयातम् ग्रूयात भुवीथाः ध्रुवीयायाम् पीचर गी। पEinfकि जरदो। 5 to speak उमगदी। 1.k-नादि सममिकों के माने से पातु को काम होता है। परामेको मीनिमा मायुः परित प्रबोधिभारपप:-भा प्रय प्रीमि मुक मम प्र.पु. मोतु प्रताम् अवन्तु घृतम् मन उ.पु.प्रवाणि मवाद वाम अवम अश्रुदि अग्रवहि विधिलिङ् । -प्र.पु. यात् घूयाताम् अयुः पवीत सुवीयाताम् वीरन म.पु.प्रयाः 'उ.पु.मयाम् मयाव मधीमहि लोट् । म.पु. महि मताम् मुराताम् मुस्तान मुवायाम् भूवर मुवावहे हुनम म.पु. अग्रवी उ.पु. भवम् अव अमहि पाम भवीय अवीवहि

तिडन्त प्रकरण ।
पु. दोरिष
दुहाथै
दुह to milk उभयपदी।
परस्मैपदो लट् श्रात्मनेपदी
दुहन्ति दुग्धे दुहाते दुइते
धुते
धुरध्ये
दुहे दुहे
लोट् ।
दुरधाम् दुहन्तु दुग्धाम, दुाताम. दुइताम
.. दुन्धि दुग्धम
हाथाम थुध्यिम
.पु. दोहानि दोहाव दोहाम
दोहाबद दोहामहे
• ५. अधोक्-ग अदुग्धाम अदुहुन् अदुग्ध अदुहाताम बहत
- पु. भधोक्-र भदुग्धम् भदुग्ध अदुग्धाः अदुइायाम अधुरध्वम,
• पु. भदोहम अछ
अनुमाहि
विधिलिड्।
- पु. दुसात् दुखाताम, दुगः दुहीत दुहीयाताम दुदीन
.पु. दुपा दुधातम दुमति दुहीयाः दुहीयापाम, दहीवार
.पु.उगम, दुसाव
दुसम दुहीय होवहि
दिह् to anoints to polute के देग्धि, दिग्धे इत्यादि
ऐसे ही होंगे।
लिए to lick to taste उभयपदी ।
परस्मैपदी
भात्मनेपदी
लिन्ति

लोटाम् लिहावाम् दिन लिहाथाम् सोम लेहावहै अलीद अलिबादाम अमित अलोढाः अलिहायाम मोहन अलिहि अदिदि सलिम ईशीथाः शीवापामा ईशीय ईसी to prniseizाते, इने रयादिश केसर लोट् । प्र. पु. लेदु लोढाम् लिहन्तु म.पु. लौढि लोदग् लौट उ. पु. लेहानि लेहाव लेहाम प्र. पु. अलेट्-ड् अलीढाम अलौहन् म. पु. अलेट इ अलीढम् अलीढ उ. पु. अलेहम् अलोह अलीर विधिलिङ् प्र. पु. टिह्यात् लियाताम् लिघु : म.पु. लियाः लिह्यातम रिह्यात उ.पु. लिह्याम लिखाव लिह्याम ईश to command, to rule आत्मनेपदी। २०. ईशः से । इडजनोध्ये च-लट्, लोद, लङ् के स् ईशाते ईशते म... ईशिष ईशाधे ईशिवे उ.प्र. ईशे ईश्वहे ईरम ल ऐशाताम् ऐशत म.. ऐया ऐशापाम मेशिनम् उ.शि परवी महि लिहीत लिहीयाताम् लिहौर लिहीयाः लिहीयाथाम लिभर लिहीय लिहीवहि दिनी मोर लट् लोट ईटाम् ईशाताम ईशिष्य ईशाधान ईशावर या विधिलिए ईशीत इंशीयाताम् तिहन्त प्रकरण। १ वश् to wish परस्मैपदी। २१. अयल विभक्तियों में घश् के च का होता है । लोट उशान्ति वष्ट उथाम् उशन्तु उढि उम् उ.पु. पश्मि उरवर उश्म वशानि पशाव घशाम विधिलिङ् भ.प. भवर भौशम् भौशन् पात् उश्याताम् उरयु म.प्र. भवार औएम् भौष्ट उश्यात उ.प्र. भवराम औश्व औरम उश्याम् उश्याव उश्याम चक्ष् to speak आत्मनेपदी। २२. को संयोगायोरते च-त, थ, ध, स परे रहने से वक्ष घातु का थप होता। : लोद पक्षाते परते पटाम् चक्षातामू चशवामू समाये वाइवे घक्षायाम्पसम् ६.प. बझे घरब पदमाई पक्षावर पक्षामहे विधिलिङ् .. अपष्ट भवाताम् भवत्रत वशीत सीयाराम सीरन् म.. Mer: मायाम् भवएवम् पक्षीया पीयायाम प्यम् 11.3. पक्षि भषा भवरभाहि पक्षीय पीपति श्रीमद अतिरिक्त पी-100 घेति, पीता, धियन्तिभषे, भपीताम, अधिपन् । -togo लतरत; ऐनं. ऐराताम, ऐश्त। p-togo करें, कशाते, शत: मकर, मध्यावाम् । -- Deaven.xretplx.ta lndur निक्षीत। : नादि विभक्तियों में उ की विकल्प से घृद्धि होती है। पया मुज-tocleanse केका सयल विमतियों में समय और भबल स्वरादि विभक्तियों में विकल्प से वृद्धि होती है। वच-to speak का ट् के प्रथमपुरुष-यहुवचन में नहीं होता। यथा वक्ति, पक्षि, पच्मि यक्त, पन्धि, पवानि 1. Translate into Hindi :-अग्र बहवो लोका रात्री मानना चनं वयुः।इमे बालकाः क्षुधवा रन्ति चौरा निशाया जाति भादन् । भगवन् कृपयासनमिदमास्यताम् । भरतेन सह सवें रामा निद्रा मान्ति। आकाशे यहूनिवारकाणि चकासति राम प्रजापुला 2.Transite into Sanskritin)हम लोग रातकोश नहीं बोलना चाहिये । रोगों के द्वारा रिवर की सुति कोमिक (b) Irns tho book.letoki him the whole story bollways spark tha truth. Lotuses thing in therant I do not believs IR TOT words. Wiry do you envy व्याकरण कामुदा। निज-to purify निक्त, निजाते, निजते; अनिष्ट ऊ-to cover त् और : को छोड़ अन्य सबल ध्या ऊर्णीति, ऊोति । यथा, मार्टि, मृष्टः, मार्जन्ति-मृजन्ति, भमार्ट-मज्यात् । भयक-ग; उच्यात्। हु-to take away हुते, वाते, हयते, भहता. Exercise - 25 पामाहा मान वेद पाते। उप सभा में राम रावण को बाण से मारा । प्राण के मर में पाने पर stars शाम की गायों को दाना। भशान्। से पिन . -

तिडन्त प्रकरण
3. Correct -सोऽअसमदति । अत्र बालको भासताम् । पानि
पति सोको । पारमहात् । पुनमवत शिलका शरणार्या शयन्ते ।
इंवेदं वेत्ति पुत्रो सेदितः।
हादि ( 3rd Conj.)
१. जुहोत्यादिभ्यः ग्लुः । ग्लो लट् इत्यादि चार विमतियों में
डादिगणीय धातुओं का अभ्यस्त होता है।
भभ्यस्त (reduplication) के नियमः
(क) अपने पूर्ववर्ती व्यञ्जनवर्ण (यदि हो) सहित
भादि स्यर का अभ्यस्त ( द्वित्य ) होता है। यथा, पन्,-पपता
गुथ्-युयुधा
(ख) धातु के यादि में संयुक्त वर्ण हो तो प्रथम अक्षर
सहित आदि स्वर का अभ्यस्त होता है। यथा, प्र-पपच्छ ।
N. B. यदि संपोग का अपम अक्षर अमवर्ण (श, स् ) हो
और द्वितीय पर किसी धर्म का प्रथम वा द्वितीय पहो तो वर्गीय
वर्ण का भव्यस्त होता है। यथा, स्पर्ध पल । सन् सस्तन ।
(ग) धातु के मादि में वर्ग का द्वितीय या चतुर्थवर्णदो
तो मम्यस्त में उसफा कम से प्रथम पा तृतीय वर्णहो जाता
है। यथा, छिद्-विच्मि । मुज-युभुज ।
(1) मभ्यस्त में फर्गका वर्ग और का होता है।
यथा, कम-ककम्-चकम् । एन्-यसन् । दस्-जहस् ।
(4) सभ्यस्त में दी र फा हस्थ मार काम होता
है। था, पाया, मी-मिनी, कृ.यह
(B) अपस्त में उपधा प धा ऐ मोरमोपाभीका बम
र उहो जाता है। यथा, सेप.सिपेथ्-दीक मुदीक।
२.दिगणीप धातुभों के परे गन्ति भोर मन्तु नका
सोप होता है।

होता है। F ३. लङ्क अन् का उस् हो जाता है। उसके पहले ४.सयल विमति के आने से धातु के अन्त्य स्वर नाम् अपि निहीबार जियाना जिहीया मिलीपालमा निहायाम् निदीपाव forter १८० ध्याकरण कामुदा। के आ का लोप तथा हस्य या दीर्घ इ, उ और ऋका उपधा के लघु स्वर का गुण होता है। हु to sacrifice परस्मैपदी। ५. अन्ति और भन्तु में हु धातु के उ का पू होता है। लट लोट प्र. पु. जुहोति जुहुतः गुवति जोतु जुहुताम् जप म. पु. जुहोपि जुहुयः जुहुय उहुधि जुतम् बहुत उ.पु. जुहोमि बहुवः अहुमः जवानि जुहवाय जापान विधिलिङ्। भजुहोत् अनुहुताम् जलयात् जुहुयाताम् जाउ भनुहोः अनुहुतम् भनुहुंत जायाः जायातम् जाया भवम् भाव जहुयाम् राहुयाव जाम ही to be ashamed परस्मैपदी लट H. मिलि लिहीतः जिदिति जितु जिहीनाम म. जिपि चिदीया जिद्दीय जिदीहि जिवीता 1. मिमि मिय: भिडीमा मिहयानि जिदया यिपिलिज अभिहीम प्रहार तिङन्त प्रकरण विमिताम . भी to fear परस्मैपदी । ६. मियोऽन्यतरस्याम् -मयल व्यजनादि यिमक्तियों में मी धातु का विकल्प से हस्य होता है। लोट, प्र. पु. विमति भीत: बिभ्यति विभेतु विभीताम, विभ्यतु विभितः म पु. विभषि विभीयः विमीय विभौहि विभौतम विभीत विभियः बिभिय विभिहि विभितम विभित उ.पु. विभेमि विभीषः बिभीमः विभवानि विमयाव विभयाम विभिवः बिभिमः लङ् विधिलिङ् अविमंत् यविभीताम अविभयुः विभीयान् बिभीयाताम विभीयुः अधिभिताभ विमियात् विभियाताम् विभियुः बिभेः अविभीतम अग्भिौत विभौयाः विभीयासम्, विभौयास अदिभितम भविभित विभियाः विभियातम विभियात अविभयम अविमीव अविभीम विभीयाम विभीयाव विभीयाम अबिभिव विभिम घिमियाम विभियाव विभियाम भृ to maintain. .. भृषामित्-मा, हा to go. भृ, पृ or पू to fill और ऋ के स्वर का अभ्यस्त में होता है। यथा, मिमा, जिहा, विभृ।, परस्मैपदी लट् आत्मनेपदी विभूतः विभ्रति विभृते विभ्राते विभ्रते -पु. विभषि विभूयः विभय विभूषे विभूषे विभ्राथे विभृञ्चे पु. विभमि विभूवः' विभूमः विधे विभृवहे. विमृमहे ऐसे ही लोद, लङ् विधिलिङ् को विभक्तियां जोड़ दो। ... -पु.विमति PAR m- 73; frre - जालोम-हा to abandhan का अभ्यस्तमहना सरयजनादिभवम वित्तियों में दिया सहा स्परादिभार पिधिलिएकी विमतियों में जहदी arth मा to metrentne wal .ar irat at arrey atta मिमी. RATOTTARAKHin- सोर H.In tATE Fore.Intr. Intere lattres free, ARI हा to abandon परस्मैपदी। लोट् के दि में जहादि, जहिदि, जदीरितीन रूप होते हैं। चोद प्र. पु. जहाति जहीतः जति जहितः अदिताम म.पु.जहासि अहीयः जहीय जद्दौलम अहिया जहिय महिहि, जहीहि जहितम. ... जहामि बहीनः जहीमा जहानि जहाद बहिषः जहिमः जीतामा अाहि तित प्रकरण दा और पा धातु। १७. अयल विभक्तियों में दा और घा के अभ्यस्त छ दय होते हैं ।स, २, ३ और थ परे रहने से द का घर जाता है। लोट् के हि में कम से देवि और धेहि रूप होते Erriti m दा to give उभयपदी। - आत्मनेपदी। परस्मैपदी प्र.पु. दशति दत म.पु.शासि पत्थः १.पु.शामि ददति दसे दार्थ 4 दर लोट । दाम दाताम् ददता Prit ददाम दै কৰাৰ ग n थददात् पदधाम् अतः अत्तम अदछ अददाम मदद अददि अदहि विधिलिड्। दयात् याताम दधुः ददीत पीयाताम् दीर यातम. दद्यात ददीयाः ददोयाथाम् दी द्याम दवाव ददीय ददीवहि दधाम मा ददीमा पिप to spread येष्टि, येषिष्टः, पेवियति पविष्टे, विधाते। विग्यो पनमा । युधिष्टिरा.कदापि सत्यं भाजहात् । मानसई, दबाते दी दयाथै , पद्ने दध्वहे - - लोट-दधातु, पत्ता, धतु; पेहि दयानि पत्तामधत्स्वा । लङ्-अदधात्, अदधाः, अदघाम, अपच, अवस्था बना ११. निजा प्रयाण गुणः श्लो-लटत्यादि चारो लकारों ,विज् todistinguish घेयेक्ति, पेयिक्तः,पेविजति, पवित। 1. Translate into Hindit-- विद्या विनयं ददाति । रास मोका दिन्यति। लौका पदामि सवानि परिश्यति। स्वकार्मशामिल धा to hold उभयपदो। परस्मैपदी आत्मनेपदी प्र. पु. दधाति घत दति धत्ते म.ए. दधानि धत्थः धस्थ पत उ.पु. दयामि दध्मः दधे विधिलिङ्-ध्यात् , दध्याः, दयाम् , यीत, दीपार, दघीय ! निज् , विज् , विप् , धातु । निज, विज् , विए के अभ्यस्त के पूर्व भाग के इ का गुण होता है। पर स्वरादि सबल विभक्तियों के परमाग में गुण नहीं होता। निज् to wash उभयपदी। परस्मैपदी मैनेति नेनिकः नेनिक्त नेनिजाते नेनेक्षि नेनियः मेनिक्य नेनिने नेनेजिम नेनिया नेनिम्मः आत्मनेपदी नेनिजति मेनिन मेनिजे नेनिजा नेनिगो नैनिज्महे निमो Exercise-26

तिइन्त प्रकरण।
Translate inta Sanskriti-(a) मेघ जल से संसार का पालन
है। इस दोन को खाने को दो। मैं तुम से दरता हूँ। दशरय ने सत्य
हा। उसने दरिद्रों को वस्त्र दिये। उसने इस नगर को परित्याग
या । कृपया मुझे यह पुस्तक दीजिये।
b) The teacher gives knowledge to the student.
ook his dress and weat there. The Brahtan aflers
into the fire. A pous man does not give up bis religion.
. Correct :-ते धनं वदन्ति । स मी पुस्तकं देहि । सात् लोका
तवयं वस्त्राणि परिदधामि।
General tenses and moods,
इस भाग (लट् . लुट , लङ्, माशीर्लिङ, लिट् और
मैं गणभेद से रूप में कोई अन्तर नहीं होता। मतपय
क विभक्ति में सब गणों के रूप दिखाये जायेंगे।
इस भाग में कई धातुओं में कुछ विशेषता है उनमें प्रधान
दे दिये जाते हैं।
(१)स भाग में भस् भार का मम से भू
जाता है।
(२) गुप् , धूप, विच्छ, पण, पन् , कम् भोर शत् के
रूप से गोपाय, धूपाय इत्यादि (जो प्रथम भाग में घिम.
यो के पहले होते हैं। भी होते हैं। यथा, गोपिता, गोपा-
पिता, धूपायिता।
(३) जिन धातुओं के भत्त में ए ऐ मोर मोहोघे
इस भाग में (इन कारों में} आकारान्त समले जाते
मि SUtm throw, मो 90 to kill, Ato
rish. ली9,4A to adhere का विकल्प से माया.
हो जाता है।
और पय

शुक्ल पच् मुचि रिच घच् यिच् । सिच् प्रच्छित्यञ् निजिर्भज
रामागमकामा तण. सनम.
पातुमी मे मा उम्मेद्र, जिम पातों में
लगता उन्दै भनिन्, या जिनमें विकल्प से लगता है
सेट् पातु-(१) एक से अधिक स्थरयाले, चुरादिगार
तथा णिजल, सनन्त, मामधातु प्यादि दूसरे धातु या
धृवृष्भ्यां च विनकाचोऽजन्तेपु निहताः स्मृताः
ऊकारान्त भार प्रकारान्त धातु, यु,क, पशु, शी, स्तु..
अनिट् धातु-(१) उपयुक कारिकामिन्न एक स्वर पाजे
(२) एक स्वर पाले व्यजनान्त धातुओं में निम्नलिखि
(५) Frt in engit tra माग "
मगमा Rm frametests
{m मग मनकासात माह
भीर हा
मारा।
(द) विमान।
दानि प्रगाने में मिला
नारि गिकियों के पूयं का भागम होता है। दिन
पेट् कहते है।
से बने हुए धातु सेट होते है।
(२) उदृदन्तैयोति रुक्ष्यशीनुनुक्षश्चिडीद्धिमिः।
श्चि, डी, नि, वृ9A भौर 5 U धातु सेट है।
(३) एक स्वर घाले व्यसनात (१०२ अनिट् धातुओं
को छोड कर ) सभी धातु सेट है।
सभी स्वरान्त धातु अनिट् है।
-
१०२ धातु मनिट है:-

विन्त प्रकरण
१८७
।
मन भुज सम्म मृज् यज् युज इज । मज विजिर स्पति
सजराजः।
भनु शु खि छिद् दिनुः । पधभिनु पिचतिर्थिन ।
सदस्यिप्रति स्कन्दि । हदी का क्षुधि पुभ्यती ।।
धियुधिरपोराधिः शुधः साधिसिध्यती ।
मन्यहम्नायू लिपित । तिपतप्यतिप्यतो ।।
लिप लप्प गप सप पि यम् । रम् मम् गम् मम् यमो रमिः ।
भागिदशिदिशी हर मर। रिश क लिए विश स्राः एपिः ॥
ffথ হি বিপু। যি য হিথ মিঃ।
पसति दत् विहिदी मर मिद गद लिए यदिस्तथा ॥
अनुदाता हलन्तदुधातयो दयधिक शतम् ।
पद भानु--- निम्नलिगित पातु गेट है।
शरतिः परते ते पथमे मपमं च पुत्र ।
समलिभिारतापनधि नपिनः .
मादि माति जाग्लेपु हान्नो शिति म्यन्ते ।
सध्यतिः तिर्धान्ती पान्ताः पाच
पोपापतिप्यतिधपतिमा ।
मागतो शाम्यति समनु मनाहिनापति
शान्तालपोधाशतिम निष्णातभनि।
स्पतिशमाता गाह.
परस्पेनिश भकारोपापगई ।
Prfacefagी पनि गुन ५६
पहन
मिश्यले पेटमा दिपाल
WATANT पत्येष परमार सदा।
अतिरिक।
(9.५, प... मित्र र भानुमो

N. B.१ दृस्व ऋकारान्त धातु के परे थ रहने से नहीं बोट २ धातु के अन्त में स्वर तथा उपचा में होतोय के पहले विकल्प (३) लट् और लङ् में परस्मैपदी गम् , हन और भूला. (४) लुङ् के परस्मैपद में स् परे होने से सु, घु औरस्तु (५) लुङ् और आशीलिङ के यात्मनेपद में संयोगादि १-पुगन्सलघुपधस्य च-लुट, लट् और लइ विमति धातु के अन्त्य स्पर तथा उपधा के लघु स्वरं का गुण होता। व्याकरण का फे लिट् में होता है। पर ऋ, क, धातु में निस्य होता है। से इट् होता है। २) दृश् , मुज , स्वरान्त मौर अकारयुक्त अनिट् धातुनों के लिट् फेथ में विकल्प से इ होता है। N. B. ध्ये और भद् धातु के परे नित्य इ होता है। रान्त अनिट् धातुओं के परे होता है। धातुओं के परे होता है। हस्य ऋकारान्त धातुओं के परे विकल्प से होता है। लट्, लट्, लङ् । भू to be परस्मैपदी। म मयिता भाषितासि भवितास्मि भवितारी सवितारूप: মদ্বিনাথ भविताः সবিরথে मवितास्मः उ.पु. भविष्यति मपिण्यति मषिप्यामि E भविष्यतः मयिध्ययः मरियायः भविष्यन्ति भविष्य भविष्यामः इ.पु.

तिइन्त प्रकरण । অবিব ममयिप्यताम् মষিng अभविष्यः मरिष्यतम् মনি अमयिध्यम् भविष्याय ममयिष्याम शी to sleep आत्मनेपदी। --- ঘিনা शयितासे দ্বিধা शयितारा शयितासाथै शपिकास्पद शयितारः शयिताध्ये शपितास्पद प.पु. उ.पु. शयियो शपिप्यसे पिये शयिध्येने शपिच्यर्थ शविण्यावर शयिष्यन्त যিল যিযাই भशपिप्या भविष्येताम् माविष्यात म.पु. #বিখ্যা: বিশ্ব বিখ रापिध्ये पराविध्यादि माविम २.sahel:-मुर,पर भीरमरप. (र) दोहापा, महीपनि महीयन् । मोरा-सरासर भीर सर TIRTH पायुसरा विकार होता था, To crea पाम्मैशीranian, free-art. महरिप्य-प्प । vमरमर मरने Enter ratiपाधिमा मिसिन्।

अध्ययन होगा। गागना, दापनि, भद्रा । गरबा प्राचीन समय पर पाया..गुर पर के कागिय मेरदोनापा, मया,माया होतामारीकी ईका गुण मोहासााया, मध्यपी. लरमगधिक to rend का विकला में गो ७.सरमौर लर मे, ताप, मुहमारना धातुमो में विपका सेपर दाताहै। यथा, -कतिष्पर्क ता-प्रप्ता तस्यति-त्रप्स्यति मतप्स्यत्-अम्रप्स्यत् न्यतः फरस्यति, मतिप्यत्, मकरस्यंत । प्रथम पुरुष के एफययम में कुछ धातुमी के रूप। घातु चल् चलिता चलिष्यति अवलिप्यत् पच् पका पश्यति अपश्यत् मुच मोका मोक्ष्यति अप्रोक्ष्यत् सिच्. सेक्ता सेक्ष्यति असेक्ष्यत् भज भक्का সহরি अभश्यत् भुज् भोक्ता मोक्ष्यति अमोक्ष्यत् म्रक्ष्यति अम्रश्यत् भी मध्यति अभयत् अदु अत्ता मत्स्यति मात्स्यत् पत्ता पत्स्यते मपत्स्यत मन् मन्ता मंस्यते ममंस्यत सूप तर्पिता तर्विष्यति अतपिध्यत् गमिष्यति गम् अगमिष्यत् . म्रा . . गन्ता ------ u. . तिइन्त प्रकरण। वम् इनियति अहनिष्यत् एस् पस्ता परस्पनिक घश्यति मधल्या घोदा যধি अपश्यत् याता यास्यति भयास्यन् जेता जेष्यति मजयन् ए कता करिष्यति भारिपन् थ श्रोता धोध्यति भीप्यत् অবধি अवयन प्रस्पति भनय मम् छापा म्यते अपक्ष समिता समिध्यने মহানিশ क्षस्थत भक्षम्पत प् प्रपिता-प्रा पिते-जपयो भरिप्या-भ रप रधिना-पदा रधिनि-रस्थति मधिय-म सवितासोमा सपियन.मायने भसरिया- Hvertir Turkiate Inte Jiterary मर्षे नमः MENTrain wrम की या माNIRAM परशरामाल RELA athireferee an गुमोज In Kr Aman inta SanArit-1) मुंगा Kumariमो मागास मोनोरे - • Rimti पाप मा.

(bleileyn tomatron, F50 ripthors HIRathrrel Isre Tousaints your father. They will Parsammar withours J.Correrti-गु गु शामियामिापनअभियो। गाह मनायगामी मण्यताबास परियामा १आशीलिद में परस्मैपदी दा, पा, मा, गा (गे), सा N. B. पर स्था-भिन्न संयुक्तवर्णादि धातु के आ का विडय होता है। यथा, बा-लेयात् , मायात् प्रा- यात्, प्रायात् । स्था स्पेयत्। है। यथा, जि जीयात् जीयास्ताम् जीयासुः। श्रु:श्रूयात्। २. परस्मैपद में धातु के अन्तस्थित इउ का दीर्घ होता ३. परस्मैपद में घातु के अन्तस्थित ऋ का रिहोता है। N. B. संयोगादि ऋकारान्त और च धातु का भर होता है। कान TRE imam में gries हैंmमा हांगे। tracker. Ile will contain the party Al lrt. शेणानं प्रतिभ्यामि। आशीलिङ। परस्मैपदी पातु। भू to be परस्मैपी । भूयात् भूयास्ताम् म.पु. भूयाः भूयास्तम् भूयासम् भूयास्य (सो), हा धातुओं के आ का हो जाता है। यथा, देवान् । देयास्ताम् , देयासुः पेयात् , पेयास्ताम् , पेयासुः । यथा, कृ-क्रियात् । मृ to hold नियात। भूयासः भूयात भूयास्म । यया, स्मृ स्मात् । to go-अर्यात् ।

तिहन्त प्रकरण].
४. धातु के अन्तस्थित र काई होता है, पर पर्ग के
परे प्रह हो तो ऊर होता है। पथा, त-तोर्यात् । पृto blow
- पूर्ध्यात् ।
५. भाशीलिङ् में प्रस् का गृह , प्रच्छ्फा पृच्छ्, व्यथ्
- फा विधू और यज् का हज होता है । पपा, प्र-गृह्यात;
मच्छ पृच्च्यात् । ध्यध् to plerce विध्यात् ; यज्-इज्यात् ।
६. पच, पद, पप्. यस् , यह , स्वप् धातुओं के प का 3
होता है। यथा, पच् उच्यात् । यस उष्यात् इत्यादि ।
७.to call का होता है। यथा, हयात्, हयास्ताम् ,
यासुः।
८. धातु के उपधा-नकार का लोप होता है। यथा, मन्य
to chura मध्यात् , मध्यास्ताम्, मध्यासुः स्यादि।
६. शास् to govern का शिप होता है। पया, शिप्यात् ।
आत्मनेपदी घातु ।
सेच् to serve.
प्र.पु. सेविषीष्ट सेपिपीयास्ताम् सैयिपीरन्
म. पु. सेविपीठाः सेविषायास्याम् सेविपीदयम् सेविषाध्यम
उ.पु. सेपिषीय सेविपीरहि सविधीमहि
१. भागोलिक में पारमनेपदी धातु के भन्स्प स्थर सपा
उपपा के लघुस्यर का गुण होता है। यपा, शी to sleep
- शपिपीरः
पुत् to shire प्रोतिपोर इत्यादि।
'मा भिसरश परम्पारो भाबिर और हर
स्प पर नया रिपोर

उद्यात तुल्सौर वह सरिता ३. अनिट् धातु के अन्तस्थित ऋ का गुण नहीं होता 1.Translate into Ilindii-कुशलते भूयात् राजा चिडीया 2. Trandate into Sanskrit:-la) तुम्हारा पुत्र दोबा पाशाको एक पुत्रदोवेरसका होवे । तुम मममनोरष हो। तुम क्षोग सदा म Correct--रामं भूगा भवान् पिनीमा IN व्याकरण-कौमुदी। २. पात्मनेपदी में ग्रह, धातु के परे इ (इट्) होता है। यथा, प्रहीपीष्ट । यथा, क-कृषीष्ट । मृ-मृषीष्ट । ४. अनिट् धातु की उपधा के लघु स्वर का गुण होता । यथा; भुज् to eat भुशीष्ट । प्रथम पुरुष के एकवचन में कुछ धातुओं के रूप भिद् मिद्यात् तुद् गम् गम्यात् स्पृश् स्पृश्यात् मृत् मा मेयात् मुच् मुच्यात्-मुशीट गेयात् मुह. मुद्यात् सेयात् एज् सध्यात्-पक्षीय हेयात् दंश दक्ष्यात Exercise--23. मुविधादर्शनेन तर पतिः स्मर्यात् । भनया सेनया भवान् । पामिको दानशीरच भूपा। मारे गए होग गुजा मोर पनवान हो। (b) May you hars an ima your family owlere. Cal save the king. Lont Ourior परिता १ रान you hapor विडन्त प्रकरण। लिट् । छट् दो प्रकार के होते हैं, उन्हें Reduplicative स्त) और Periphrastic कहते है। १)एक स्वर पाले व्यञ्जनादि धातुओं (दय, फास् को कर) स्वगदि धातुओं में जिनके मादि में म, मा, हो, उन धातुएँ ( मय आस् को छोड़कर के रूप Uplicative ( अभ्यस्त से बनते हैं। २) शेष धातुओं (ऊणु और ऋच्छ को छोड़ फर) के Periphrastic की रीति से पनते हैं। N. B. छ, विद, काग, कार, जाग, भी, हो, म, हु और दरिया पदोनों रीति से बनते हैं। Reduplicative ( अभ्यस्त ) १ अभ्यस्त (reduplicative) के नियम द्वादिगण में - २ पास्मैपद में -(१) प्रथम पुरुष के एकवचन में अवश्य ए उत्तम पुरुष के पवयवन में विकल्प से धातु की उपधा और मन्त्य स्वर की वृद्धि होती है । उत्तम पुरुष के एक- न में धातु के अन्त्य स्वर की वृद्धि और गुण दोनों होते 11(२) प्रथम और उत्तम पुरुष के एकवयन में उपधा के स्वर का गुण होता है। (३) मध्यम पुरुष के एकचन धातु के अन्त्य स्थर तथा उपधा के लघु स्वर का गुण N. B. लिट् के रूप में टू का अतिरिक्त देखो।

निन्विरे मिन्मा र faz to knorre निन्यतुः नियुः निन्ने निय ३.पु. निनाय-निमय निग्यिा निन्यिन निन्ये नियम उ.9. शशाश-शशशशश्चशिव शशशिम विवेद विविति शशु के समान-खइन्चखाद, गद्-जगाद, कम्-वकार, चक्षाम, क्ष-चक्षार,स्व सस्वजे, म्पश-पस्पर्श, साध-सर श्वस्-शश्वास, शास्-शशास, शंस्-शशंसे-शंस, प्रज विद् के समान-खिद् विखेद, चित्, निज (उ मिल (उ), रिच, दिघ, दिश् (उ), लि, लिप्.. (उ), शिप, शिप-शिश्लेष, सिच्, सिध्, कुप-धुकोप, चुक्रोश, क्षुद्-चुशोद, क्षुध-चुलोध, क्षुम्-घुशोम, फ.. च्युत्-युच्योत, तु, तुद (3), दुह, भुज् (3), स्था। छत्, कर, कृप, तप, तह हप, धूप, मुश, वृता। व्याकरण कौमुदी। नि to lead, to carry उभयपदी । म.पु निनाय म.पु. निनेप-नियिय निन्ययुः निम्य शश to jump प. प्र.पु. शशाश शयः शशशुः हिवद विविध म.पु. शशिष शशशः शष विवेदिय विविदयुः इत्यादि । रुप ( उ ), मुच्, मु, शुच्, शुध् । नत्-ननन. fh - .. - नन्ततः स्पृश् इत्यादि।

तिङन्त प्रकरण । .पु. चय कृ to do उभयपदी । •पु. धकार चरम पर चक्रात मकिरे चम्यु कृष पकाये पदवे .पु.वार-चकर चकृत म चकृवढे चमहे ऐसे हो-भृ-यमार, वृ-श्रवार, मृ-मार, स-ससार, धृ- (धारह-जहार पर धू+4-धरण। to scatter to remember 1.पु. चकार चकरतुः चकरुः सरमार सम्मरतुः सरमरुः 1.प. बकरिय चचरयु: कर सस्मर्थ सस्मरथुः सस्मर .पु. चकार-चकर परिख सकरिम सस्मार-सस्मर समरिख समरिम समान-ग-जगार, ज-मजार इत्यादि। ३. आकारान्त धातु में परस्मैपद के प्रथम पुरुष और उत्तम पुरुष के पकवचन में याकारान्त धातुओं के भा के परे भी होता है । अन्यत्र धातु के भा का लोप होता है, पर इट् भिन्न प के पूर्व वा का लोप नहीं होता। या togo ऐसे ही पा-पपी, धा-यवी, ययतः ययुः म. पु. ययिष ययाध ययधुः यय धा-दधौ, स्था-तस्थी, हा- 3. पु. ययो ययित्र ययिम ) जही, भा-बमो, ध्रा-जनी, ज्ञा-जज्ञी, ख्या-चख्यो। - । - * परस्मैपद के प्रथम और उत्तम पुरुष के एकवचन भिन्न स्वरादि अन्य लिट विभक्ति के पूर्व प्रकारान्त धातु के श्च कार होता है। पर इकारान्त, संयोगादि ऋकारान्त भौर , अरब तथा जागृ धानु के का ला होता है। परन्तु यू. द. पके का विकल्प से अर होता है।

पैचे जाली,,मयी,मानी.दासीमा ४. जिन पातुर्मा के मार मार भग्न में अमंयुक काएदाजासाद(पर मादि का मार लामा ऐसा नही होता). परस्मैपा के प्रथम मोर उचनपुर N.B.ारादि धातु तथा राम और पद में पहनिएन हो परस्मैपदी-चम्,चर, जप, तन् (3),सप् (30 दम,नेह, पच्, फल, भज्, यम्, पद, पत्, मा। आत्मनेपदी-तप्, पद, रम्, सह, रम्, इत्यादि। ५. परस्मैपद के प्रथम और उत्तम पुरुष के एक ६-मूका अभ्यस्त में बभूव होता है। यधा, बभूव। यतुः, अभूवुः घभूविष, यभूषथुः, पभूधः यभूय, बभू मामी, दासी मानो, मा.मा.प्र-जयते पर्ण भोर मध्यम उRTHEA महीला, एफयमन तथा टु मिन मिति में ऐसा नहीं। शर-मोफिय-सशक्य । चल-प. प्र.पु. पचाल घेलतुः म.ए.चेलिथ घेल उ.पु. चाल-चरल चेलिव लिम पचे ऐसे ही होंगे। ऐसे ही तृ का तेर् और प्रप् का त्रेप होता है। तृ-ततार, तेरतुः, तेरुः। प्रप्-वेपे, नेपाते, पिर। मिन्न अन्य लिट् विकियों में म्रम् , राज् का विकल्प से ययाम ध्रम्, रज , ये होता है । यथा राम्राम, यम्मतुः-ने मतुः, घनमुः-म्र मुः इत्यादि। यभूविम । घेशः पच्-आ. पेबारे पेचिर पंचाय पचे पेचिई पनि , और धम् धातु ६.

सिडन्त प्रकरण। नधेष । . ७ अभ्यम्त के परभाग में जि को गि, हि को घि और वि ने विकल्प से कि होता है। यथा, जि-जिगाय, जिग्यतुः अग्युः; जिगयिध-जिगेय । हि-जियाय, जिभ्यतुः; जियिष. चि.विकाय, विक्यतुः-चिध्यतः चिपिय थ-विचयिष-चिचेय; विश्विय, वियिय । रिपये, विये। ८ परस्मैपद के एकायन-मिन्न लिट् धिमक्तियों में पातु के उपधा-नकार का वियप से लोप होता है। दश धातु। 1.पु दंश दशः ददशतुः दशुर-दवशुः म. पु. ६देश ददशिय ददंशाः ददशY: ददंश.दश दशिय-दशिय दशम दशम ऐसे ही सन-समय, समजतुः, ससमता, सगा-सराणः । एलजिय-ससंघ, रागात्रपुर-रामसगज.समा । ससा, समय- परिव, सरधिम-रासहिन । an..हस्य प्रकारादि भीर संपोगान्त फारादि भानुमों के पूर्व माग के स्थान में मान होता है। अश-आत्मनेपदी। पु.भान भानगिरे २.पु.मानशिपमान भानशा भानशिप 1.पु.भानो সহ-সন্ত বিধিমালা पात्-परस्मैपदी अर परस्मैपदी अ.. भान AT: भान जान भार २. 1. तिच भावना मानत पर भार .. भाता भार्गम भानणात

.
गरप
जन-सामनेत्री
fuali, fami nfrafit, frafiri, Hard:
घस्-अपाम, जमतुः, अघसिप, अक्षयः, अक्षिा
हन्-जघान, जमनु: जनिय-जघन्य अप्रयु, अनिता
.३ लिट्केप परेने सेश मीरमधातु के परमर
दृश-दर्श, ददशतुः, दहशुः, ददर्शिप ददष्ट परिव ।
ज्-ससर्ज, ससृजतुःसएजः, ससजिण,सष्ठ, समृजिता
पधा, विव्यये, विव्यपाते, विष्यधिरे, विचधिरे, विया
१४ लिट् में व्यथ धातु के पथ्ये भाग का चिहोता है।
Mir Triniti timr.
Frantii.imaerat
infri rimins है।
गम परमैत्री
अग
जगम-जगम मा
सन:उभयपदी।
के फा र होता है । इद होने से नहीं होता।
वि-Name
पच्या
परिप यालपुः
पनि बनाये पनि
A

तिङन्त प्रकरण २०१ 1 : १५. लिट् में ग्रह का गृ होता है; पर परस्मैपद के एफ पयन ऐसा नहीं होता। पधा-- ग्रह to take उभयपदी। अमाह जगृहे जगृहाते जगहिरे जप्रहिय जहयुः সহ अहिपे जगृहाथे अहि वेदवे जमार जगृहिय সন अगृहे जगहिया अगदिमहे १६. अभ्यस्तस्य चलिर में धातु काहु होता है । यपा, उदाव जुहुवे जहुवावे उद्धविरे शषिय-जुहोष जुहुरः विषे जुगाये जुविध्व-वे जुदाय जुहुविध विम जुहुने जुहुविवहे पिमहे १७. परम्मैपद पयरन मिस मन्य लिद विमक्तियों में यच्, यद्, पस्. यह. हयप, यज इत्यादि धातुभी के या उ - भोर पका होता है। पग-परस्मैपदी स्वप्-परस्मैपदी ऊ गुवाप मुरापा रिश पर उस शुपरिष पयारपुर मा सुपार-स्पर गुरश्मि पज-उभयपदी। रंगो f-rem.पुः । मा Refन . •uranारिमदिरों में का Patrunter, firefr. Home शिश्यिर शिश्यिो शिधियतुः शिवयुः शिश्रमिय शिश्वियतुः शिश्वियुः शिश्वयित्र सिमियाते सिमियर सिमिय सिपयिय मित घुच्युयाते युच्युबिरे युच्यविष कुछ धातुओं का लिट् । प्रथम पुग्य मध्यम पुरुष ध्याय ईयतुः इयर्यायय-इयेय क्षि विनाय विशियनुः विक्षियः विक्षयिय-चिक्षेश ऐसे ही फ्री.विक्राय, प्री-पिप्राय शिश्ये शिश्यात शिधाय शिव शिश्याय सि सिपाय सिष्यतः सिम्युः स्मि सिपिये दुदाय दुदुरतुः दुद्राव दुद्र वतुः दुद्रुघुः दुधाय दुधुक्तुः युयाव युयुक्तुः युयुयुः रुपवतः पुप्लुवे पुप्लुवाते पुप्लुबिर पुप्लुवित्र सुपुराते सुपुविर सुषुपिणे चुनाव चुक्षुयतुः चुक्षुयुः चुश्नाय चुदनुवतुः चुक्ष्नुः घुच्युये पू ददार ददरतुः स्तु तस्तार तस्तरतुः सस्तरुः फूज घुज घुजतुः चुकूः चक्रन्दतुः चमन्दुः मम् घाम चत्रमतुः चक्रमुः NERARAca ke sathapan दुविथ दुदोष दुद्रोथ . दुयिय दुदोष युयविध रुरविध सुपुवे क्षविध चुस्नुविध ददरिय तस्त चुनिय याग्दिष चामिय

fasन्त प्रकरण ।
२०३
और पिकोद विमान: निकी विधि
द बिल विलिः चिडि विनियमित
पर विश
निहिरातुः विविशुः विशि.पिछ
पदाम नक्षमतुः पक्षमुः गामिण-क्षय
मामे परमात यक्षमिरे सक्षमियम
पर
पहार पक्षर मन पक्षीय
समिचितिनिधिनु: विशिः विपित्र
नवार
गणार सादिक
वियेल यिमेटतः निलुः timize
जगति गहिर जगदि
गद गाल जगल जगनुः
जगदिश
जगहा माहित अगादिस जारी
पप गीग या: मग पीषिण-गीत
नगाथा
en.xite
बाद जगाई

जागरावर जागराममा जागराधक जागराम्पमूगपुः जागराम्बर N.B.छि भेर मदेसी हिकिनम्नि धातुओभरता ३ आम के पूर्व हु, मी, ही और भृका अभ्यस्त भी होता है। यथा, हुजुवाम्यभूय, मी-विभयाम्यमूच, हो-जिहवाम्बभूक कास • net ringtree RTE ITRA माग I HARIrrma, frry जाग to be awake परामादी। प्र.गरागमा सागरापरतुः जागरापमा जागराम्पात: जागरामाग जागरामायण म..जाराम आMASATE: কাষগুলি जागरामालिश जागरामास: 3.पु.जागराध्यकाागकर जागराधार जागराम्यमूग जागरामास AITCAIET7 दय-दयाम्यगूग, दयाञ्चक, दयामास । भास्-मासाम्यमय, आसाञ्चक, भासामास । ई-इहाम्यभूय, ईहाञ्चक्र, ईहामास । ईन्द.ईन्दाम्यभूय, ईन्दाञ्चकार, ईन्दामास । भू-विमराम्यभूय। दरिदा-दरिदाग्यभूव, दरिद्राञ्चकार, दरिद्रामास । काश-काशाम्बभूव, काशाच, काशामास! जागामास जागरावान जागराम्पणिय जागराम्यग्नि লালমােমিন से होगा। ,

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हिमशुपाशात् मृहपत्यम्रामा यस्थाताम्बर अस्थात पर अस्थाव अखाम . विभक्तियां केवल जोड़ दी जाती है। पर अन् विमतिक N. B.लुङ्मे इकागा होता है। यथा अगा, भगातामा २. भू में उस्का अन् और स्वरादि विभक्ति में भूकेका जाताद। यथा, अभूत्, अभूताम्, अमूवन्, भमू भभूतम. ३.घ्रा, धे, छा, शो और सोफे रूप प्रथम और चतुर्थ दोनों N.B.भारमनेपद-में स्था, दा, घा, के रूप पर प्रकार से, रूपमप्रकार से, और इwith अधि के रूप थष्ट प्रकार सेबनो।। ४इसमें विभक्ति के पूर्य धातुमों में 'भ' जोड़ा जाता है। N.B. शक तथा धातु के अन्तस्थित चोहोबरम ५ममें परस्मैपदी तर दुय् दिए आप् गम् घस्मश्र भृरतुर पिप विलुप तशदि) शकुप शिदुत्सा गुच टियदुश लुट् स्यिद् थ् सिथ् रूपय दम् गुरम कामुदा उस् हो जाता है। २. इस प्रकार , स्था, दा, घा (दा, घा के सदृश थाले धातु ), r to drink और भू धातु के रूप होते हैं। स्था प्र.पु. अदात् अदाताम् अदु: अस्थात् म.पु.अदाः अदातम् अदात अस्थाः उ.पु. अदाम् अदाव अाम अस्थाम् with भधि अध्यगात् , अध्यगाताम् , अध्यगुः। अभूवम् , अभूव, अभूम। प्रकार से यनते हैं। धे के ऊपतृतीय प्रकार से भी धनते हैं । यथा, अप्रात् , अघ्राताम् , अनुः। २ य मकार ( 2nd form) स्वरों का गुण या वृद्धि नहीं होती। . .

किडन्त प्रकरण । पुप् परस्मैपदी। रुच धन्स् तृप्तम् ब्रम् क्षम् मद रुप् कृश अस् ( दिवादि) ई गुप् लुम् क्षुम् शुभ ध्वन्स अन्य स्कन्ध अन्म भोर रु आदि धातु है। गम् परस्मैपदी। 5. अपुषत् बक्ताम् अपुषन् अगम अगमताम् भगमन ३. अपुपः पुषतम् अचम अगमा भगमतम् भगमत १. अपुषम् अपुलाव भपुषाम भगमम् गमाव अगमाम ६मस्, ख्या, पत्, घच् or J, शास् , शिव और हफा से अस्थ, ख्य, पप्त्, पाच , शिप, श्व और हो जाता है। चच पत् पु. भदोचत बोचताम् भवोचन भरसत् अपसताम् अपरन् पु. भवोचः सोधतम् भवोचत अपप्तः अपसतम् बरत पु. कोषम् अबोचाव अदोचाम अपप्तम् अपप्ताव अपमान N. B. Rश का विकल्प से नेश होता है | था, सनशन अनेशन नेशताम् अनेछन् । ७ भातु के उपधा-सानुनासिक धर्ण का लोप होता है। था, धन्श.अधशत् , अभ्रशताम् , अनशन इत्यादि। ८लिप् , सिच् भोर है के रूप परस्मैपद में अवश्य और आत्मनेपद में विकल्प से द्वितीय प्रकार के अनुसार होते हैं। गत्मनेपद में छ प्रकार से रूप बनता है। यथा, मसिचद, सिचताम् , असिवन् : मसिचत प्रसिचेताम्, असिवन्त । A with सम् तथा उपसर्ग सदित या पच् और मस् Othrow के रूप भात्मनेपदी होने पर भी इसी प्रकार से नते है । यथा, with सम् to go समारत, समारताम् , समारन्त समारथाः, समारेषाम्, समारध्यम् । समारे समारा. रहि, समारामहि । .

. . ६ मिद छिद् रिच विच् निज विज्च् ग्लुच शुक्र स्फुट चुत् व्युत् ज्युत क्षुद बुन्द रुदु बुध रुथ धुप उस दुह, वृहदश् दृपतृप सुद छ यि जगूच ग्लुच ग्लु श्च्युत् स्कन्द स्तम्म और श्लिप के रूप विकल्प से प्रकार के होते है। पक्षान्तर में ६ या७मप्रकार सेप १० रुच घुट रुट लुट् लुट् घुत् वृत् श्चिन् श्वि स्यन्दु स्विद् वृध श्ध् क्लप्क्षुभ तुभ नुम् शुभ रभ मए ध्यस् भ्रस् भौर संस्, इन २५ आत्मनेपदी धातुओं के रूप प्रकार में परस्मैपदी धातुओं के समान होते हैं। प्रात्मक में६४ या ७म प्रकार से रूप बनते है।यथा, रुख अपवा केम्प विकल्प से इस प्रकार से बनते ह(seelsts घुमार फम् स्यादि धातुओं के रुप यनते हैं। भारत पदान्त भो कालोप तथाउकाममसेयउयोगा। प्याकरण कीमुदा। N. B. M परे रहने पर ऋ, स तथा A का कम से का. तथा दर्श हो जाता है। यथा, समारत, अमरताम् , असरन् ।। अदर्शत् , भदर्शताम् , अदर्शन् । हैं। यथा, भिद्-अभिदत् , अमिदताम् , अमिदन ।। अरुधत् , अरुघताम् , अरुधन् । अश्यताम् , अरुचन् । ३ य प्रकार (3rd form) ११. इस प्रकार से चुरादिगणीय, गिजन्त तथा fornis) १२इसमें धातुमों को अभ्यस्त होता है और समय पादप जोड़ा जाता है। १३. चुरादि तथा णिजात पातु :- (क) णिजन्त तथा पुरादिगणाय धातुमा के भय का तिङन्त प्रकरण। - अमूमुचावहि नया ए ऐ का, और मो मो का उ हो जाता है। यथा, मोचय (मुच्) परस्मैपदो। प्रथमपुरुष अमूमुचत् अमूमुक्ताम् अमूमुचन् यमपुरुष अमूमुवः अमूमुचतम् अमूमुचत तमपुरुष प्रमूमुवम् अमूमुचाय अमूमुचाम आत्मनेपदी। उधमपुरुष अमूमुक्त अमूमुचेताम् अमूमुचन्त मध्यमपुरुष अमूमुचयाः अमूमुचेयाम् भम्मुवध्यम् उत्तमपुरुष अमूमुचे अमूमुचामदि N. B. अभ्यस्त में अभ्यास (जिसका दिल होता है। के भकाइ -सा है। संयुक्ताक्षर या दीर्घ स्वर परे न रहे वो इस इकाई हो जाता - यथा, माक्य (भू से)-भाष्-वभव-विभव-पोभन्मवीभवत्-त । तय चित् से ) मचीनिचत् ।स्सल-अचिस्मलत्-त । पन्द्-अपस्पन्दत्-त । २. धातु की उपधा में हस्त या दीर्घ रो तो विकल्प से ज्यो का रहता है। पर दीर्घ का इस्व हो जाता है, यथा, वय (वृत् से). अववर्तत-त, त्-भवीवृतत् । कीर्तय (त् से )-कीत्-अचिकीर्तत्-त, --मवीकृतत्-स। (णिजन्त में लुछ का विवरण देखो) १४ यहाँ अभ्यस्त के नियम भरपत्र से कुछ भिन्न भौर उन है। भतएव कुछ धातुओं के रूप प्रथमपुरुष के एकवचन दिये आते हैं। भर-भाटिटत् , भार-आपिपत् , नु-अनूनश्त-त, स्मात् , पू. वत्स, रिम् असिन्नवत्-अमुन्यात, भू-अशिधवत् अभवत्, अदि. अस्वत्, स्स-मासस्मरत्, प्र-भरप्रयम् , रूप मसपुपत्, पम्. Gk with भधि-समापिपत्-अध्यागपत, गण-बजगातू, १४ १५इस प्रकार से आकारान्त घातु (१म, समय नम् के रूप यनते है। यम् with उपor उदुम N. B. स् और स विभक्तियों के पूर्व सी और अन्य विमति' पूर्व सिप जोड़ दिये जाते हैं । यथा, यम् अयमीत् अयंसियम् बर्ष १६. मिन भनिदधातुमों के अन्त में श, प, स्मार। भारण्याम या लदो उनके पास प्रकार से Kामृयश् भोर कर विकासेसप्रकार 8. B.परामरामाश्मनेपदको विमनियापूर्व Panाम, मोरम प्रकार में भारमनेपा. ध्याकरण कौमुदी। अजोगणत्, धा अजिघ्रपस-अजिनिपत, स्या-अतिष्ठित्-त । ४ थे प्रकार ( 4th form) . घालों को छोड़ फर), यम् ,रम् (P with वि. भा, के रूप पष्ठ प्रकार से यनते हैं। इसमें केवल परस्मैपद को विभक्तियां लगती है। : झा-परस्मैपदी अशासीत् भज्ञासिटाम् मासिपुः मसीः अज्ञासिष्टम् भज्ञासिष्ट भजासिपम् अज्ञासिय भशासिम पिरम् व्यरंसोत्, RT-भमासीत्, छो-अच्छासीत. भशासीत् इत्यादि। ५ म प्रकार (5th. form). ।पराप६४ प्रकार से पनरो है। रपबियों के स्थान में सम मे माता और भाचाम् । नम-परस्मैपदी भनंसीद अनंसिराम जी अनमोः अनसिएम मेशि अनसिपम् अनंसिव तिहन्त प्रकरणा दिश-परस्मैपदी दिश्.मात्मनेपदी दिक्षत् अदिक्षताम् अदिक्षन् अदिक्षत अदिशाताम् भदिक्षन्त दक्षः मदिक्षतम् अदिक्षत मदिक्षयाः प्रदिक्षायाम् भदिशाणम् पेक्षम भदिक्षाय मदिक्षाम भदिक्षि अदिक्षापहि दिशामत दिह-अधिक्षत् , भधिक्षताम् , मधिक्षन् । अधिक्षत, धिक्षाताम् , अधिक्षन्त । लिह-मलिसास गुड्.* भघुक्षत्-स, रिशमरिक्षन् , -ए-हिसन् , अक्षत् , लिश भलिक्षा, यिश-भविक्षत, .अक्षत्, स्पृश-मस्पृक्षत् , मुश्मृक्षत्, कुप with --निरफुभन, पश-भरक्षा, यि भरियशत् , दिप मदिक्षत, भविक्षत् , शिलप-अश्लिक्ष , गृहमपक्षन् , मिड्-ममिक्षा, -मातृक्ष, स्तू-मस्तसन् , पृद्-मभूक्षत् , गृह-भवृक्षत्, अयक्षत् । ६८ प्रकार (6th form) 1. जिन मनिट् धातुओं के लए उपयुक ५ प्रकारों से -बनते उनके का प्रकार से बनते हैं। जिन मनिट मौके पयिकरूप से उपयुक ५ प्रकारों में से किसी से पनते है उनके तथा येट् धातुभों के कप पिकना से फारसे पनने १४ ...और भनि पूर्णसी और मम्र अनिल कपूर और राता। . भ प्रसार के मेमन्त'विकिरपान में ' भाता। और गुर.भीर विपन्म ENTE से बने। -सामरूपमामयेपर से बनने म .. उपमेयर में मा मेरो।मेर. मी मागचा मान) मामेको संभाम्पित हण्य या रहने से हो जाता है। यथा, चि-सचेट, नी-अनेर मनिट् धातु के का विकल्प सेर लोरहोता है। पाहाणामुना हमरा fer ।रए, IPTET-माय:। नाम्मे में पातु माय सर या II र (NI *समलीपर की वृद्धि होती है। arerile ,प.प्रपाक्षीन, मत्र-मासीत् । भारमनेपदम धातु गुग होना । मलस्थित र तथा उपपा के स्वरका नहीं होता। मन्तस्थित र का भयोप, पू.मघोष्ट, कृ-प्रगत, मिनु-अमित, स्त-प्रस्ती मयूर्ट। रुप.अफाक्षोत् , मकाक्षीत्। कृ-परस्मैपदी मशवीत् अार्शम् अका भाषाः मार्टम् अकाई अकार्षम् अकार्ष अकाल पर या अर ( पर्गम कृ-आत्मनेपदी बाप अकृत महसवाय अकृथाः अपाथाम् मकृषि अकृपहि नेपदी .

तिङन्त प्रकरण ।। , नह - अवाक्षीत् , भवोदाम, भवाभुः भयोड, भषक्षाताम् । अनियमित धातु। - १६. मात्मनेपद में दा, धा और स्था इत्यादि के मा का रहो जाता है और इसका गुण नहीं होता। यथा, आदित, अदिपाताम , भदिप्त; भदिया; अदिपि । २०. विभक्ति आने पर इन ( with मा A) के न का लोप होता है। पधा, माहत, आइसाताम , आहसत, भाइधाः । २१. गम् और यम् (with उप to marry ) के म का मात्मनेपद में विकल्प से लोप शेता है । यथा, यम् to give Jout फेम् का अवश्य लोप होता है। पर गम् with सम्. -समस्त.समगत । यम् with उप-उपायंस्त-उपायत । ७म प्रकार ( 7th. form) २२. सेट् धातुओं के रूप । जिनके प उपयुक प्रकारों से नहीं धनतेरस प्रकार से बनते हैं। N. B. तू भोर र विभकियों के पूर्व ई, ध्वम् के पूर्व और अन्य विनियों के पूर्व इषु जोड़ दिये जाते हैं । या, शम् अस्मीत् , मियम अऋमिषुः ममी ममिष्टम , ममिय; अमियम • NE. मिष, ममिम! २३. परस्मैपद में दान्त, मान्त, यान्त, क्षण , यस् , जाए, शि, मए, इस् स्यादि तथा एकार इत् भिन्न धानुभों के पधा-अकार का विकल्प से भाकार होता है। यथा, गद्- भिगाव अगादिष्टाम अगादिशुः अगदोत्दष्टाम् भगा भादो भगादिम अगादिए भग: दषम भगदिर' दिसम भयारिष अगामि अगदिश्म भरष अगदिम - चर-अचारीत् , अचारिष्टाम, मचारिणः मवारी। मज्-यबाजीत् , भवाजिष्टाम् , अमाजिपः भवाजी: वृ--अधारीत् , अयारिष्टाम् , भवारिपुः; मगर: २५ परस्मैपद में धातु के उपधा-लघु स्वर का गुन है। यथा, रुद्-अरोदीत् , अरोदिष्टाम् , मरोदिपुः, म भरोदिष्टम् , अरोदिष्ट, अरोदिषम् , अरोदिष्य, मरोदिया २६ आत्मनेपद में धातु के अन्य स्वर तथा पश भविष्ट भराषिपाताम् भशयिपन भयोतिष्ट भचोसियाम् ॥ महायिटामशयिपाथाम् भरविवम् मधोतियाभियोतिषापाम मराषिषि मशयिष्यहि मशयिमहिभधोतिषि भयोतिप्पीre मातरित-सु-मसायीत् , धूमधायी , गरि मनायी ,समस्तारिण, मस्तारी; (१)मति मापातमाधिष्टः शिव-अश्ययीत् , आगृ-मजागरीत मानीन् ,भण्-भमाणीत्, प्रह-मप्रदीत , भरहोएगा पापी, मगोपीत मान्म-मक्षामित्र, व्यर व्याकरण कामुदा। २४. परस्मैपद में घात के अन्त्य घर तथा पद, र या ल् अन्त याले धातुओं के उपधा अ की वृद्धि होती वद्-अयादीत् , अवादिष्टाम , भवादिषु मवादी । चल-अचालीत, अचालिप्टाम, अवालिपुः भवाली नु-अनायीत् , अनाविष्टाम् , अनाविपुः । स्लु-मनावीत् , मनाविष्टाम् , अनाविपुः । त-अतारीत्, अतारिष्टा , अतारिपुः; स्थर का गुण होता है। शी-आत्मनेपदी भना मना मसारी चुत-आत्मनेपदी . सरोजाना।

विडन्त प्रकरण । २१५ . धातु। भव्ययिष्ट; क्षर-अक्षारीत् । गाह अगाहिष्ट, गुह् धगृहीत , गृहिष्ट। अनियमित २७ प्रथमपुरुष के एकवचन में आत्मनेपदी दीप जन् पूर य और प्याय् धातुओं के परे इष्ट के स्थान में विकला से ता है । यथा, दीप-अदीपि, मदीपिष्ट; जन्.अजनि, अजनिष्ट, एमपूरि, अपूरिष्ट, वाय-मताय, अतायिनः प्याय् भप्यायि, प्यायष्ट। २८ णकारान्त या नकारान्त तनादि गणीय धातुओं के मात्मनेपदी इष्ट और इष्ठाः के स्थान में विकल्प से यथाक्रम और था: हो जाता है। यथा, ऋण.आणि भात, माणिgri. Kः। क्षिण-अक्षणिट-क्षित, अक्षेणिया: अक्षिधा। घृण- घिणि-अपूत, भनिष्ठा:-अधुपाः । तृण आणिष्ट अतृत. तमिष्ठाः अतृधाः । तन्-प्रतनिष्ट अतत, अनिताः अतथाः । -अमनिष्ट-अपत, धमनियाः, अमपा पम्-अनिष्ट-अपत, यनिष्ठाः भवथाः । सन् असनिध-असात् , अस निष्ठा असापा: Exercise-30. -1. Translate into Hindi:-प्रेतायुगे' रामरावणयो युंदमभूत् । सियो राम मवोचत् । कोशलाधिपति दशरय एवं मबवीत् । स तस्मै हूनि धनाम्पदात् । इयत्म भाइपा मेश भूमि मसिधन् । नृपतेरादेरोन रान् सोऽमुचत् । पम्दतात् शिला पृथिवी मनिस्सनत् । म गोपागा क्षन् । स चूषभद्येन क्षेत्रमकाझीत् । प्रभो राज्ञया एतस्कार्यमकाः। निराणां हाहाम्धेन रामो सवर्ण म्यष्ट । Translate anto Sanskrit-(a) राजा मे प्रजाओं से कर मा ममा ने सष्टि बनायी रात दिन घंटे का शन्न सुनवा था। वानरों में सेमा समुदाया। मैं स्कृन से अपने घर गया | भान रात में उसको 'श्रावि घातु कहलाता है। इसमें धातु के सभी कार्य होता य 1. Yetarian Itn Alte hits. 11-103 Saatramser mothy- Erammu.ladrank nkwithin brother. They dra J.Corrrrr-मोडमा १तरप्रयोगको पातुति य--अबको किसीको रिसी कार्य करने के लिये प्रेरण करता मो उस मप में घातक धातु उभयपदोदोता है। प्रत्येक पातु से णिजन्त बना सो २घुरादिगणीय धातुओं के समान णिच होने पर धातु के अन्त्य स्वर तण उपधा भकार की युति भार उपचार स्थर का गुण होता है। यथा, थु+%थावि,-प्लु+1% प्लावि, क कारि, ह.हारि, चल चालि, ६-दाहि, पच-पादि पह-पादि इत्यादि।(२) लिप्+% लेपि, सिन् सिरि N.B. धातु के परे णिच प्रत्यय लगाने से जो जिन्द धातु का वह स्वतंत्र घातु होता है। यथा, "श्रु+इ= भावि" यह पर Mira मेरमैं Immer rn A Tant ng ramebore tor.ltretfor the throninthahistoal. भीमाभूमपMATE सम्मै भन भाई मी नल मा मेगा मामी पनगान् मेर। णिजन्त-प्रकरण। परे गिच् प्रत्यय लगता है। णिच् का रहता है। शित मुच्.मोचि, दुह्दोहि, दश् दशि, मृप-मर्षि इत्यादि । 2 तिङन्त प्रकरण। - "पिच के रको निकाल कर धुरादि गणोय' धातुओं के सदश जिजन्त घातुओं के रूप पनाये जाते हैं। या, धावपति-ते। श्रावि to cause to hear लोट श्रावयति धावयवः श्रावयन्ति श्रावयसु भावयताम् श्रावयन्तु यावयसि भावयथः थावयय धावय श्रावयतम् भावयत' यावयामिश्रावयावःथावयामा श्रावयानि प्रावयाव थासयाम विधिलिङ् अयावयत् भावयताम् अधावपन् श्रावयेत् प्रावयेताम् भावयेयुः 'अभावः अधावयतम् अभावयत श्रावये भावयेतम् भावयेत अधावपम् अश्रावयाय सहावयाम श्रावयेयम् धावयेव धावयेम .. मिता हस्वः -णिय होने पर मन्त । श्रम + अन्त ) नया 'पटादि धातुओं के अश्य स्वर तथा उपधा-अकार की वृद्धि नहीं होती। यथा, ममन्त-गम् गमयति, दम-दमर्यात, नम्. मयति, रमरमयति, शम्-शमयति । घटादि-घर-घटयति, यय-व्यथयति, जन-जनयति, त्वर-त्वरयति, झप-अपयति, ज्वल्-वलयति। घटादि धातु-पद , य, प्रथ् , स्वर् , नद, स्वर, र५, ८, शा, शा, चल् , मद्, ध्यन् , मन्द, रम, जन और रम् । पर इल, स्थल, उप तथा उपसर्गहीन ज्दल , ग्ल, बन , बम और स्ना धातु विकल्प से घटादि । गिन् होने पर भौर जाट धातुमों के अन्य स्वर 'फा गुण होता है। था, ज जरयति, जाय जागरयति ।। नस्तोऽदियणलोः दोषो गो-णिच् होने पर ल का पास और दुकाइप होता है। यथा, हन-धातयति, दुप दूषयति । . - जम्म, रम्म, लम्भ और रन्ध होता है। यपा, जम्म ८ भूपयोग:-जिम्होने पर मी मोर विषारदोता है । या, प्री-प्रीणनि, प्रायपनि। गुण होता। यथा, -मर्पयति,ही पति, स्या-क्या आकारान्त होते है, और उनके परे एका आगम होगा। पर य और रक्षार्थ पा धातु के परेल होता है। यथा, पाना ११ णिच् होने पर छो, शो, सो, घे, व्ये और होता है, यथा, डाययति, शाययति, साययति, वाययति, १२ णिच् परे होने पर जम् , र, लम् और रघु मिmatmat miar Raftar है। गोषनिriinf| गरम : गिम्दीने का मोर गुर. गूर होना । मा, शनि an. I. PART-गम होने पर रोहका भौर मरमा हाता है । मार-रोगपनि रोहनि. करपनि, फारयति । খুসখনি, খায়নি। v. भनिहालोरी जन्माप्या पुरती तथा भाकारात पार और धानुभो ঘ.সাবধান, মায়াবলি। कोजीना गो-णिच् होने पर क्रो, मधि. और जिम यथा को प्रापयति, थपि. अध्यापति, जि-ज्ञापयति । १० पातेणों लम्वारयः-णिच् होने पर पानार्य पा धातु पाययति रक्षार्थ पालपति। घ्याययति, हाययति। कम्पनार्थ 'ये घाजयति। गि होने पर - धातु के परेज होता व्याधः। यति पक्षिणो व्याधः । भाभ्यात् धाम्यास्ताम् श्राध्यासुःअभावयिष्यत् अश्रापयिष्यताम् अधावयिष्यन् भाया भाज्यास्तम् श्राध्यास्त भावयिष्यः अनावयिष्यतम् अधावयिष्यत मायाम् ाम्पास्व धाम्यास्म भनाववियम् भश्रावयिष्याव अन्नादयिष्याम् भाम् लगा कर, और अस् के लिट् का रूप जोड़ दिया जाता है। यथा, धावयाम्बभूव, धावयाञ्चकार,थापयामास। यति, रम्मयति, लम्भयति, रन्धयति । १३ भियो हेतुभये थुक नित्यं स्मयते, मौरम्यो तुभये-यदि कर्ता स्वयं भय उत्पन्न करे तो णिच् होने से भी का भी और स्मि का स्माप तथा भात्मनेपद होता है। यथा, सर्पः शिशं भीप. पतेः पुरुषः सर्पण शिशं भाययति । ऐसे ही विस्मापयते, विस्माययति। १४ रनेणी मृगामणे नलोपो वक्तव्यः--णिच् होने पर मृगया मर्थ में रज के न् का लोप होता है। यथा, रजयति मृगान् पर मृगया ( पशुवध ) अर्थ छोड़ कर अन्य अर्थों में न का लोप नहीं होता। यथा, रजयति मृगान तृणदानेन रज- १५ गौ गमिरवबोधने-णिच् होने पर इ धातु का गम् हो जाता है, पथा, गमयति । पर ज्ञानार्थ में नहीं होता। यथा, थावि-लद् वयिता भावयितारो भावयितारा भावयिष्यति श्रावयिष्यतः भावयिष्यन्ति प्रावयितासि भावयितास्यः श्रावयितास्थ भादयिष्यसि भावयिष्ययः भावयिप्यय गवयितास्मि थावयितास प्राययितास्मयावयिष्यामिशादयिष्याव.भापयिष्याम आशीलिङ्। १० कास्यनेकाच आम् वक्तव्यः-लिट् में णिजन्त घातु के परे प्रतिर-प्रत्यायति। धावि-लुट लङ् लिट् ।

गुणदोता। यथा, -मपेयति, ही- पयति, स्था-स्थापय व्याययति, डायति। कपमा 'धातु १२ मिथ् पर होने पर सम्..मम् और चित्त फी अप्रसन्नता के अर्थ में दुप का यिना से द। यथा, मोधः चित्त दूषयति दोषयति था। ६ शदेरगतो त:-णिच् होने पर सदु का शत् और गुड़, गृह होता है। यथा, शातयति । गृहयति । '. ७ : पोऽन्यतरस्याम्, चिरफुरोणों-णिच् होने पर वि गद, के ह का प् और स्फुर के 3 काम होता है । सह-रोपयति, रोहयति; स्फुरस्कारयति, स्फोरयति । ८ धूप्रौशेर्नु ग्यक्तव्यः-णिच् होने पर प्री और पू के यिकम्प से न होता है । यथा, प्री-प्रीणयति, प्राययति धूनयति, धाययति। र भतिहोब्लौरी यन्यीक्ष्माय्याता पुष्णी - गिच् होने पर है तथा भाकारान्त धासुगौ के परे होताहै भीर धातु च्या.ध्यापयति, सा-शापयति । opीजीना गो-णिच् होने पर ग्री, अधि. भौर जि! भाकारान्त होते है, और उनके पर पका भागम होता यथा फ्री मापयति, अधिः-अध्यापयति, जि-ज्ञापयति । १० पाणी बताया-णि दोने पर पाना या धान परंप और रक्षार्थ पा धातु के परे ल होता है। पा, पा पायपतिरक्षा पासपनि। पनि होने परो, शो, सो, थे, ये भोरप होता है, पण छाययति, शापयति, साययति, पाषण वाम माम् , , Bा मोर ग होता है। पा, जर 1 के परजोता पा, पामता

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है। यथा, सिच् + इ-सेचि-असीपिचत् , असीपिचताम् अधीभिदन् । मुच् + 3 मोचि.अमूमुचत्, अमूमुमताम् पोता है। यथा, थल + भधीयलत्, पाति-अपीप H. B. पर 'इनारि' में ई नहीं होता; या, भारत पायुह भाभी में विकासे होता था, था+Tum २भागार्ग तुकारा) सरगुन होतोमहीनामा वि. पत्रकाजि, ift. यादि, मीकि बाwिhe १८. लुङ् में णिजन्त धातु के परे म होता है और महो से धातु का अभ्यस्त (द्वित्व ) होता है तथा अध्यम्त के सम कार्य इसमें होते हैं। भ परे होने से णिजन्त धातु के पर भाग के अन्तस्थि इकार का लोप तथा पर भाग की उपघा के दीर्घ स्वर हस्य होता है। णिजन्त धातु के पूर्व भाग के लघुस्थर का दीर्घ होत असीपियन् । भि + = भेदि-अयोमिदत् , भीभिदताम् अमूमुचन् । संयुक्ताक्षर परे हो तो पूर्ण भाग के लघु स्वर का वीर्घ भई होता। यथा, निन्दि भनिनिन्दत् , भनिनिन्दताम्, मनिनिनन् शिक्षि-मशिशिक्ष, भशिशिक्षताम् , मशिशिक्षन ।' २५ लर में णिजन्त धातु के पर्थमाग में मकार का कार गरमयीमान् , हासि-मजीदसत् । मोरागर, अपनापन् । mens और यानि पाikant mसला गधा, शासनको .

= शासि.अशाशासत् , भश् + इ = भक्षि-अवमक्षत् , रक्ष् + इ% दक्षत् , लख्घ + इ = लड्य- अललयत् । लुड में णिजन्त धातु के पूर्व भाग के अफार के पं वर्ण हो तो अ का होता है। यथा, व्यथ +: विव्यथत्, झप् + इ = ज्ञपि-अजिशपत् । मृदृत्वरप्रयप्रदस्तृस्पृशाम्-पर स्मृ, स्तु और त्वर् धातुओं होता । यथा, स्मृ + इ = स्मारि-असस्मात् , असस्म- असस्मरन् । स्तृ+तारि-अतस्तरत् , अतस्तरताम्, त्व + = त्वारि तत्वरत् , अतत्वरताम् , अत- आजभासभाषदीपजीवमीलपीडामन्यतरस्याम्-णिजन्त भ्राज्. स्, भाष, जीव, मील् , पीड् इत्यादि के परभाग -के दीर्घ स्वर का विकल्प से हस्व होता है। माजि. , अयिभ्राजन् । दीपि-अदीदिपत् , अदिदीपत् । 3rd from ) कारोपध धातु णिजन्त हो तो लुङ् में विकल्प से नों रहता है । यथा, वृत + = घर्ति अवीवृतत् अय- - 36 3rd form) पेयहि-लुड में णिजन्त स्वप् का स्वपि होता है। + इ = स्वपि असूपुपत् । टतेरित-लुङ् में णिजन्त स्था के आ फा होता है। +1= स्थापि-भतिष्ठिपत्। ना का विकल्प से होता है; यथा, मजिप्रिपत् , वितेरीचाभ्यासस्य-लुङ् में पायि धातु का मभ्यस्त यथा, भपीप्यत्।

१ पासोरकामी हसाव किया रामबहारेप-एक स्थर: अर्थ में यड्प्रत्ययदोता। यद्का य रहता मोर भारमनपरी होता है। यदमीस्पतन्त्र धातु कहलाता है ३. पोऽिकित:-यड्पर होने से धातु के पूर्व माग और लान्त धातु के पूध मागके स्वर पणे के परे भनुस्था ५नुगतोऽनुनासिकान्तस्य च-यपरे होने से नान्त, मा होता। यथा, जन्-जजन्यते, मन् मम्मन्यते, गम जंगम्यते, हुद-गिnिा. मिलिनि, सरमिय उदगिकोin , Hinfee-fini। १२ कि. मि. गु. गए और मान धातु म्याम् ( InM) में मन होगा नया पत्र और मान के पुर्णमाग के म भोर मा* CIR #हता है चिमिति नितिशत, नगुप्स, थीम. मीमांसने । यहन्म प्रकरण। धातु के प्रारम्भ में ध्यान वर्ण हो तो पानापुन्य और पति- लट्, लोट्, लद तथा विधिलिद में मादिगणीय धातु रूप होता है। २. सम्पकोt-यङ् होने से धातु अभ्यस्त होता है - अभ्यस्त (reduplication) के सय काय होते है । अफार फा दीर्घ होता है । यथा, लप-लालप्यते, सप्-धातम्या लप-लालप्यते, क्रन्दु-चामन्यते । गुगो यालुका:-यङ् प्रत्ययान्त धातु के पूर्व भाग गुण होता है। यथा, शुक्-शोशुच्यते, स्व-रोज्यते, दीप-वे प्यते, सिच्-सेसिच्यते, लुप्लोलुप्यते, भिद्-घेभियते । चकम्यते,'चल् चल्यते, गल्-जंगल्यते।'' . - A 64 7 तिडन्त प्रकरण। २२५ -- । M . रोगदाधस्य च मृफारोपध धातु के पूर्व भाग के परे री होता है । यथा, नृत्-नरीनृत्यते, सुप्-सरीसृप्यते, फय्-चरो- कृप्यते। ५.शेता-कारान्त धातु के ऋ कारी होता है । पया, क-चक्रीयते, स-सेनीयते । है भनिरिक्त-दा-देदीयते, शाजाज्ञायते, भू-शोभूयते, इ-पेनीयते, १ मा वामपतं, दोक् होडीक्यते, ध्यप-विच्यते, स्वप्-सोप्यते, प्रा-क्षेत्रीयत, मादेमीयते, क्या चलीक्लप्यते, सि-पक्षीयते, शुभ-चोधुभ्यते. अपू. अश्या, मर-मरीमश्यने, प्रा-परोपच्यते, प्रद्-अरोगपते । लिद, लुद, लट्, लुङ, लङ्, आशीलिङ । पाय हल-लु इत्यादि विमकियों में व्यञ्जन वर्ण के परे परका भौर परवर्ण के परेय के भका लोर होता है। पपा, लिट्-शोशुवाम्पभूग, शोशुचामास, शोधाशक । लुद- पोषिता, लद-शोशुयिष्यते, तुर-भशोशुधि लए मशोगु. रियत, मायोलिए-शोशुविषोए । दा-लि-देदीया, मुदः सविता, लट्-देवोयिणते, मुरमदेदीविए, ललमदेवी पिप्या, माशीलिंगदेदीपीए । यह लुगन्त। १.पोप-यात पातु दो प्रकार होते है। एक में रगाया जाता है (ऊपर देषो) मार हमरे में प नहीं रमाया माता, पर भौर सरकार्य होते हैं। दूसरे प्रकारको तहते है । यद धातु परस्मैपदरी होता है। सका योग प्रायः पेमे होता है। इसका सशदि गषीय - सरीसृपः, लेलिहत्व उनका रूप होता है और उन्हें नामधातु कहते हैं। इनका आरमसम्यधिनी (केवल अपनी भात्मा के लिये होतो विषय के सूचक शब्द के परेकाम्यच और क्रच प्रत्यय। दाकाम्यच् का फाम्य और पयच का योष रहता। पातु परस्मैपदी होते हैं। यथा, काम्य-भारमनः मिल पुत्रकाम्यति he wishes for a son; मात्मनो धनामिमा घरकाम्पति, प्रारमनी यश इमति यश:काम्यति। पुत्रकाम पुत्रकाम्य, मपुत्रकाम्यत्, पुत्रकाम्येत्, पुत्रकाम्यिता काम्पियनि, अपुषकामियष्यत्, पुत्रकाम्यात्, पुत्रकाम्या ऐसा होता है । लट् के तीनों पुरुष के एकवचन, लम और मध्यमपुरुष के एफवचन मोर लोट् के प्रथमपुत्र एफयवन में विकल्प से धातु के परे ई का आगम होता के आगम होने से उपधा के हस्व स्वर का गुण नहीं ६ यथा, भू-(योमयीति ) योमोति, योभूतः, योभुवति । कृदन्त में-चञ्चलः , जङ्गमः, का प्रयोग मिलता है। नामधातु। १ शब्दों के परे कई प्रत्ययों के लगाने से धातु के भ्वादिगणीय धातु के ऐसा होता है। १-२ काम्यच् , फ्यच् । २ काम्यध, गुप भात्मनः क्यच्-यदि किसी विषय की पुरकाम्यामास पुत्रकाम्याशकार, गपुत्रकाम्पीन् ।

जीनाम्यति। शिष्यम् । मृत्यं सखायमिर आचरति, सखीयति भृत्यम् । के पर क्या प्रत्यय होता है। क्यङ्काय रहता है और ३श्यचि छ, रोहतः~ (१)श्यचु प्रत्यय पर होने से * अन्तस्पित अकाई, उका दीर्घ, का रो, भो क- और भी का भाव होता है। यथा, पुत्रमिच्छति पुषी कवि-कधीयति, प्रभू-प्रभूपति । फतुं फर्जीपति : गोग N. B. मन्यसम्बन्धिती इरछा में काम्यच् और क्यच् प्रल्- होते । यथा, 'पुत्रस्य पुमिच्छति' में ये प्रत्यय नहीं लगेंगे। (२) भशनायोदयधनायामुक्षारिपसागद्धेषु-बुभुक्षा - अशन शब्द के परे और पिपासा अर्ध में उदक शब्द यच् होता है। थशन के अन्स्य अ का आ तथा उद उदन हो जाता है ।पधा, अशनायति he wishes to उदन्पतिः (३) नमो परिवचित्रका क्य-नमस् , तपस् और ८ शब्दों के उत्तर 'करना' अर्थ में क्यच् होता है। यथा करोति, नमस्यति; तपस्यति, परिवस्यति serves. (৪) অষ্যত্যাব-বল জ ম বন্ধ ও के परे क्पच होता है। यथा, शिष्यं पुत्रमित्र आवरति, पु- रिमिव भावरति, रिति मित्रम् he treats the l like an evemy. उपाध्यायं पितरमिय मावरति, पित्र ३ श्यङ् ४ क्य सलोपश्च-आवरण अर्थ में कर्तृवावक उपाध्यापम्। यात्मनेपदी होता है।

माना (२) यह परेनेमेश भाम्पिन हब म्वर दी होता है और पयम् कम्का विकामे लोराही सम्रायते; पय यमायरति पयायत, पयस्यने । मन्नम्ति चर, फलह, मध्र, कण्य, मेघ इत्यादिशग्दों के परे क्पद । है। यथा, शरद फरोति शब्दायत; पैरायते, फलहायने, . दुःख और कृच्छ शब्दों के परक्यङ्प्रत्यय होता है। (५) वाष्पोष्मभ्यामुद्रमने, पंताच्चेति वाच्यम् - उधमन अर्थ याप्प, फेन, धूम और उष्मन् शब्दों के परे वय प्रत्यय है। यथा, याप्पमुद्धमति याप्पायते, फेनायते, घुमार (१) कर्मणो गेमन्थतपोभ्या वर्सिचरो:-उद्गारपूर्वक ' अर्थ में रोमन्य शब्द के परे क्यङ्होता है। यथा, पण्डित, उत्सुक, सुमनस्, दुर्मनस्, उन्मनस् । परे अभूततदाय (जो नहीं है उसका होना) अर्थ में. (१)कार होने में ममित न और स्। मापोता है। यया, पुत्र प्य मायानि, पुत्रायने, शिष्य इव शिष्यायने, स इस भारति ईसायत; समाय शु का होता है। यथा, पिनेय भावरति पित्रीयते । (३) शब्दयरकलाकण्वमेभ्यः करणे-'करना' अर्थ में यते, फण्यायते, मेघायते। (v) सुस्वादिभ्यः कांधेदनायाम् . सुखमनुमयति सुखायते, दुःखायते, कृच्छायते । उष्मायते। अर्थ में। अनुभव - चर्घयति इत्यर्थे रोमन्यायते। (५) मृशादिभ्योभुव्यच्चेलो पश्च हल:-भृश, शीय, साल तिहन्त प्रकरण। २२१ - होता है । यथा, अभृशो भृशो भवति भृशायते । मशीघ्रः शाम्रो भवति शीमायते । ऐसे ही चपलायते, मन्दायने, पण्डितायते, उत्सुकायते, सुमनायते, दुर्मनायते, उन्मनायते ४. किम् । '.. भाचरण अर्थ में पर्तृवायफ उपमान के परे वियप् प्रत्यय होता है। वियप में कुछ नहीं रहता भोर यह परमेषद होता है। पथा, पुत्र य भाचरति पुति । शिष्य इय माय. नफारान्त शब्दों की उपधा के भकार का दीर्घ तथा शयों के मन्तस्थित म्पर फा गुण होता है। यथा, राजा ५ भाच. रति राजानति । ससि-ससा र मायरति मसति । कपि. कथयति, पन्धु-बन्धपति, गुरु-गुरयति, पितृ-पिताति, मात. रति शिष्यति। मातरता - ५. णिच् । 1. सति ताप-करना' भर्य में राष्ट्र के परेणियु प्रत्यय होता है। जिन्त के प्राय: सब यिपान इसमें होते। पा, परन करोति प्रश्नपनि देकरोमि रामपति। (१)णि होने से पृशु, मः att हद सदों को पौर भन्स्य पर का लोप होता है। था, परोनि भापनि, प्रदपति, नापति। (२) जिप होने से स्पलारपप्. दरका ६५, मन्तिक का भीरशुल का बर होता है। पपा, एल परोति पनि । रोति पनि मन्तिय कति पति। मातिदपति।

1. Cive one word for tra) पातु भवति । गन्नु भन्दा सवितु मिणानि । दाणु मिया भूश ताता रानी पारंवार सति । भामनो पामिपनि । निमित आमा किता माचरतिमई करोति । दुल मनुमतिमि मा (b) lle causes to do. He causes to ga. He Chess to see, le causes to grow. He causes to drint.* wishes to write. Ile wishes to dance. He tristes conceal. He gives repeatedly. He wishes for fame for 2 Translate into Hindi-समा व्याघ्रमेक मदर्शवत। पालको कृपस्य जल पाययतिरािजा धम्मण पृथिवीमपालपन समान कल्याणाय निजसदस्वं तस्मै भयति। बाकका पुस्तक विपठिपति 18 गाया जर्ज पिपासति पुत्रस्य चरिण पिता दुखापते । पर्शसुवा जलं फेनायते। सवपि निबिड़े बने तपस्यतिरािधी दीपा देदीप्यन्ते । 3 Translate into Sanskrit:-(a) पण्डित लोगों को सुनाते हैं। मुझे राजा का दर्शन कराभोशिम श्याम से भात पका है।दुत राजा को सब बातें जनाता है। माता पुत्र को जगाती है। करता है। रोगी की दवा करता है। वह बार बार घर जाता।वारा घर जाने की इच्छा करता है। वह रोग के कारण मरने की (b) Mother fed her children. He makes him deri water. Let him wish to kill the tiger. He frer's know. They behave lrke friend. They two wishe ध्याकरणकामुक Exercise. मपणा पती भवति । गुरुवि मावातितिरीति । himself. He treats like a friend. खेत सींचता है । यह धन की इच्छा करता है। his elder brother as father. He wishes to क cause take fruits. The good boy reads his and agaia, book 1820 विहन्त प्रकरण। + Correct:--स जलं पपासति । राजा पृथिवीं पाययति । सर्प स्त्रियं भाययति । बालकः सुस्वासति । स घनामाप्सति । वालका रुरु- इन्ते । बालकं श्यति । हृदयं दयति । शिष्यो गुरु पच्छिसति । राजा राजन् जिजीपति । परस्मैपद-विधान । १ ध्याण परिभ्योरमः-विभा, परिपूर्वक रम् धातु में परस्मै- ग्द प्रत्यय होता है stop, भारमति rests, firafa is pleased. । यथा, विरमति उगम-उप पूर्वक रम् धातु में विकल्प से परस्मैपद यय होता है । यथा, उपरमति, उपरमते desists. २ अनुपराम्या कृषा-अनु परा, पूर्वक क ( उभयपदी) धातु परस्मैपद प्रत्यय होता है । यथा, अनुकरोति imitates पराफरोति rejects. ३ अभिप्रत्यतिभ्यः क्षिपः-अभि, प्रति, भति पूर्वक क्षिप् (उभयपदी) धातु में परस्मैपद प्रत्यय होता है । यथा, अमि. क्षिपति throws on, प्रतिक्षिपति, अतिक्षिपति । • प्रादहा-प्रपूर्वक यह (उभयपदी) धातु में परमैपद प्रत्यय होता है । यथा, प्रबहति flors. ५ मियतेलु लिव-लिट्, लु, लट्, लङ् में मृ धातु नरस्मैपद प्रत्यय होता है। यथा, ममार, मा, मरिष्यति, में समरिष्यत् । बुधयुधनराजनेष्णुमुसुभ्योणे-णिजन्त युध, युध, मरा, न, अध्ययनार्थ , और भु, धातुओं में परस्मैपद - - प्रत्यय होगा।गगा, योधयति, योधत, माशी, जनपद 1.) निगरगममाया-णिजन्त भोजनार्य मोर वन नाणे पातु में परम्मेपर प्रत्यय होता है। पथा, मोज () अगावकर्माश्चितत्वात-अणिजल मरम्या यदि कोई प्राणी (प्राणधारी)कर्तादो तो अकर्मक भिजन्तु धातु में परस्मेपद प्रत्यय होता है। पथा, पुत्रः शेते; the sea sleeps-माता पुत्रं,शाययति the mother makesta son sleep; शिशुः जागर्ति-माता शिशु जागरयति, दत प्राणी का न हो तो ऐसा नहीं होता। यथा, जल पति- जल शोषयति शोषपते वा= the sun makes the rak २. परिव्यवेभ्यः क्रिया-परि, वि, मय पूर्वक की (उभयरी धातु में आत्मनेपद प्रत्यय होता है। यथा, परिक्रीणीते, प्रत्यय होता है। यथा, विजयते, पराजयते conquers ३. विपराभ्यो :-वि, परापूर्वक जि धातु में मात्मनेपा व्याकरण कौमुदी मध्यापयति, प्राधपति covers Ter द्वापति, प्रायति । माशयति, बालयति, कम्पयति । फ्रीडति-गोपो पतसं फ्रीडयति । आत्मनेपद विधान। १. नेविंश:-नि पूर्वक होता है । यथा, निविशते enters in. atuita buys, fartuta sells. defents. dry up. पिश् धातु में भात्मनेपद प्रत्या , तिइन्त प्रकरण। २३३ ४. आयो दोहनास्य विहरणे-आङ् पूर्धक दा (उभयपदी) तु में विहरण ( taking ) अर्थ में आत्मनेपद प्रत्यय होता स्था, विद्यामादत्त, भत्रमादत्त । विस्तार अर्थ में नहीं होता। यथा, नदी फूल ध्याददाति ends, वैद्यो विस्फोटकं (विषफोड़ा) म्याददाति। .. कीडोऽनुसम्परिभ्यश्च-आ, अनु, परि पूर्वक क्रीड् धातु त्मनेपद प्रत्यय होता है। यथा, आक्रीडते, अनुकीडते, कीडते plays. मोनुकूजने-सम् पूर्वक कीड् धातु में आत्मनेपद प्रत्यय है । यथा, संक्रीडते plays. पर फूजन (शब्द करना) 'नहीं होता। यथा, संक्रीडति चक्र = wheel creaks, fra fregar: = the birds are cooing. अपाच्चतुष्पाच्छकुनिष्वालेखने, सुद-पक्षी तथा चतुष्पद जन्तु से, तथा हर्षप्रकाश, माहारान्वेपण, यासग्रहणेच्छा अर्थ जाय तो अप पूर्वक कृ धातु में आत्मनेपद प्रत्यय और धातु के पहले सकार का आगम होता है। यथा, वृपमः%3D the or throws up the earth with pleasure अपस्किरते कुक्कुट:- the cock eeerches the earth in search of food. अपस्किरते सारमेयः = the dog searches the earth to make a place to lie down in. ५. आधिन प्रष्टयो:-श्रा पूर्ध्वक पृच्छ् धातु में आत्मनेपद प्रत्यय होता है । यथा, बन्धून आपृच्छते = asks his friends.

स्थापन मात्मने में स्था धातु मारमनेपदीदाताद। यथा, सन्तितने %D stays that fagn = waits, afago = sets forth, fafagt store (स) पार पूजासंगतिकरणमिरगामिति बारम्-दो मात्मनेपद प्रत्यय दोता है । यथा, देवपूजा-विष्णुमुपतिने ( worships ) कृपणः। मिलन-यमुना गङ्गामुपतिष्ठते ( makes स्था धातु विकल्प से आत्मनेपद प्रत्यय होता है। पधा, धनिनमुपतिष्ठते उपतिष्ठति ( धनलाभेच्छया धनिसमीपं गब भारमनेपद् प्रत्यय होता है । यथा, भोजनकाल उपतिष्ठते। परन्तु सकर्मक होने पर ऐसा नहीं होता । यथा, शिष्यो में आत्मनेपद प्रत्यय होता है। यथा, भाहते, आयच्छते। परन्तु सकर्मक में नहीं होता। यथा, मायच्छति कृपाइपमा २३४ गाकर की। ८. समातिमा-सा, गा, प्रति पूर्णक apart. (5) नोऽन्द्याणि - उत् पूर्णक स्था धातु दोता है। यथा, उत्तिष्ठते । पर उत्थान अर्थ में नही होता, यपा, भासनानुतिष्ठति = rises from his seat. पूजा, मिलन, मेत्रीकरण अर्थ में उप पूर्वक friendship with) साधुः। (ग) मा लिप्तायाम्-लाभेच्या अर्थयोघ हो तो उप (घ) अकर्मकाच्च-उप पूर्वक अकर्मक स्था धातु गुरुमुपतिष्ठति। ९. आहो यमहन:-आ पूर्ध्वक अकर्मक तीत्यर्थः) भिक्षुः । में तिडन्त प्रकरण। - हन्ति शत्रुम् । आत्म-अपयव कर्म हो तो मात्मनेपद होता । यथा, आयच्छते (strikes ) पाणिमात्मीयम् । माइते strikes at)स्वीयं शिरः। १०. समोगम्यच्छिभ्याम्-सम् पूर्व्यफ अकर्मक गम् , और धातु में प्रात्मनेपद होता है । यथा, सङ्गच्छते, संदणोति स्त्रम् , समान्छेत् मित्रम् । परन्तु सकर्मक में नहीं होता। , संगच्छति मित्रम् , समार्छत् मित्रम् । १. पर्यायामा-स्पर्धा ( challenging ) मर्य में भा धातु में मारमनेपद प्रत्यय होता है। यथा, मल्लमाह- (challenges) मल्लः । स्पर्धा रहित अर्थ में नहीं होता। पिता पुत्रमायति ( calls )। १२. विसर्गतायनेयुक्रमः-वृद्धि, उत्साह और मप्रतिषिद्ध मर्थ समझा जाय तो प्रम् ( उभयपदी ) धातु से परे मारमने- पर प्रत्यय होता है । यथा, सो धीः कामते, पर्वते एपर्यः । मध्यपनाय ममते शिष्यः, उत्सहते इत्यर्प.। शास्त्रेषु प्रमते दुनिःन प्रतिदन्यते त्यर्थः । पराभौर उप मित्र मन्य उपसर्ग में नहीं होता। (क) पदविहरण-पद-विक्षेप भई में यि पूर्णकम् धातु भारमनेपद प्रत्यय होता है। यथा, साधु विषमने (walking) (प) गनने-प्रद मात्रादि ज्योतिः पदाणे का नयंगमन समझा जाय तो मा पूष्पकम् पातु में रममेपर मत्यप होता है, पपा, मानमते ( rites) एप्पः। .

1 का धातु पूज्यक क्रम् धातु में यात्मनेपद प्रत्यय होता है । यथा, तो (घ) अनुपसर्गाद्वा-उपसर्गहीन प्रम् धातु में विकल्प से आत्मनेपद होता है। यथा, शतं संजानीते, प्रतिज्ञानी (promises) स्मरण अर्थ में नहीं होता। यथा, पुर्व संजानादि (स) अनुरसगांव-उपसर्गहीन झा धातु में शिकाय मारमनेपर होता है। यथा, सरिते ( Promises), मारमनपर होता। यथा, गुरुययनमुधरते (disoteyr) भकामंक में नहीं होताायथा, उधरति (rises ) धूमः। 1) समस्तीपायुधान-सूतीयान्त पर योग र ध्याकरण कीमुदो। अन्य पदार्थो के उदुर्ध्वगमन अर्थ में नहीं होता । यथा, मारा मानामति (rises) धूमजालम् । (ग) प्रोगा समर्याभ्याम्-आरम्म अर्थ में प्रमौर पर ( commences ) भोकुम, उपक्रमते भोक्तम् । ' आत्मनेपद होता है । यथा, कामति । १३ अपहश:- अपहय ( अस्वीकार ) अर्थ में शा धातु आत्मनेपद होता है । यथा, शतमपजानीते ( denies) (क) सम्प्रतिभ्यामनाध्याने- सम्, प्रति पूर्वक स्मरतीत्यर्थः। मात्मनेपद होता है। यथा, जानीते, जानाति । १४ रामः प्रतिश्शने-प्रतिमा अर्थ में सम् पूर्ण्यक गुमा १५ उमरः सार्मकात्-उत पूर्णक सकर्मक घर प्राप्त पूर्वर पर पातु में भारमनेर होता है साता ( । या, तिङन्त प्रकरण। २३७ १६ वपाथमः स्वकरणे-विवाह अर्थ हो तो उपपूर्वक यम् धातु में आत्मनेपद प्रत्यय होता है। यथा, सीतामुपयच्छते ( marries) १७ प्रोपाभ्या युजेरयात्रेषु--उपसर्ग पूर्वक युधातु मारमने- पद होता है। यथा, प्रयुङ्क्ते, नियुङ्क्ते, वियुक्त, अनुयुत, विनियुक्त । निर्, दुर्, सम् पूर्वक युज् में नहीं होता । यथा, नियुक्ति, दुर्युनक्ति। १८ भुजोऽनवने-रक्षाभिन्न अर्थ में भुज् धातु में आत्मनेपद होता है; यथा, भन्नं भुङ्क्ते । रक्षार्थ में-महीं भुनक्ति राजा । १९ स्वरितडितः कत्रंभिप्राये क्रियाफले--यदि कर्ता अपने लिये क्रया का अनुष्ठान करे तो उभयपदी धातुओं में आत्मनेपद होता है । यथा, यजते sacrifices for his own benefit. wafa sacrifices for the benefit of some other - person. २. शाश्रुस्मृदा सनः-सनन्त ज्ञा, श्रु, स्मृ और दृश् धातु में आत्मनेपद प्रत्यय होता है। यथा, धर्म जिज्ञासते, गुरु शुश्रूपते, नष्टं सुस्मूर्पते, चन्द्र दिदक्षते । (क) नानोर्सः-अनुपूर्वक सनन्त झा धातु में आत्मनेपद नहीं होता । यथा, अनुजिज्ञासति । (स) प्रत्याभ्यां ध्रुवः-प्रति, आ पूर्णक ध्रु धातु में आत्मनेपद नहीं होता। यथा, प्रतिशुश्रूपति, माशुथूपति । - २१ विभ्यां तपः। स्वाङ्ग कर्मकाच इति वक्तव्यम् -अकर्मक सुपर्ण मुत्तपति (beatrji भारमनेपद होता है। यथा, उमरते ( shines het) सूर्य, २३ भागनोपसम्माषशानयत्नदिमत्युग्मन्यवर-मामन (prohi ciency), उपसम्माष ( pacifying), मान, यन्न, (difference of opinion), उपमन्त्रण (flattering) अर्थ में पद् धातु में भात्मनेपद होता है। यया, मनुः स्मृती घदते ( shows brilliance), क्षेत्र यदते (toils), प्रातर आत्मनेपद होता है । यया, शिष्यः गुरु मनुषदते (imitates) प्र' रहने से व्यकसहोक्ति में मात्मनेपद होता है। यथा; गुरु अथवा स्याह कर्मक होने पर उन् भौर पि पूर्वक हप् धातु विसपने ( warms) पाणिम् । भन्यत्र विवदन्ते ( quarrels), उपयदते भिक्षुकः, युद्ध पदते । (क ) मनोरकर्मकात्-अनु पूर्वक अफर्मक पद धातु (स) विभाषा विप्रलापे-पादानुवाद अर्थ में वि और पूर्धक पद धातु में विकल से आत्मनेपद होता है। यय विप्रवदन्ते, विप्रवदन्ति चैधाः । (ग) धदु धातु के पहले 'उप' उपसर्ग रहने से प्रलो था उपसान्त्वन अर्थ में, 'वि' रहने से विवाद अर्थ में, सम् । शिष्य भुपश्दते, परस्परं विवदमानानामपि धर्मशास्त्राणाम्। पते ग्राह्मणा अत्र सम्प्रवदन्ते । २३. गाँधनायोपणसेवनसाइसिक्यप्रतियनप्रकवनोपयोगेषु का गन्धन injury, अयक्षेपण.censure, overcoming: सेन, माहसिफ्य, प्रतियरन, प्रकथन, उपयोग application, भ में धातु में भारमनेपद होता है। यथा. सन कुरते-does तिङन्त प्रकरण । injury to, श्येनोपतिका उदाकुरुते censures,हरि मुपकुरुते. serves, पान्यं प्रकुरुते outrages, इन्धन मन्नस्योपस्कुरुते prepares, गायाः प्रकुरते recites, शतं प्रकुरुते employs. (क) अप्रहसनेसमा और अभिभय अर्थ में अधि पूर्वक है धातु में यात्मनेपद होता है। यथा, शत्रु मधिकरोति. forgives or overpowers. (स) ः शन्दकर्मणः अकर्मकाच-शब्द उच्चारण अर्थ में वि पूचक ह धातु में प्रात्मनेपद होता है। यथा, स्वरान् विकुस्ते produces. अन्यत्र चित्तं विकरोति क्रोधः । अक. र्मक वि पूर्वक कृ धातु में मात्मनेपद होता है । यथा, छात्रा विकुते ( विकार लमन्ते )। २४ मावकर्मणो:-माववाच्य और कर्मवाच्य में धातुओं में आत्मनेपद होता है । यथा, यालफेन गम्यते, शिशुना चन्द्रो दृश्यते। २५ भाशराशंसायाम् -आशा अर्थ में आ पूर्वक शंस् धातु मैं आत्मनेपद होता है। यथा, विजयाय आशंसे। Exerciser-32 1. Form sentences to allustrate the distinction in meaning Vetween:--आदरे आददाति, संकीदते & संक्रीडति, आइयते & यति, विक्रमते & विकामति, अपज्ञानीते & प्रविजानीते, संजानाति & जमाते, संगछते & संगति, उपतिष्ठते & उपतिष्ठति, उत्तिष्टते & उत्ति- 2 Translate into Hindi:-पाध्ययना प्रमाणो विरामी गुरोवाष्पेन सस्तिष्टने । यमुना गामुपतितं । सा माहने स्वयंति नृपति पृथिवीमेय देवलं धुमुजे। हितान्न यः संशशुने सकिनमुः। पन्या: राजपथ मुपतिष्ठते । माकाशमाकामनिघूमजालम् निदो मा 3. Translate into Sanskriti-ta) उमने राम को पढ़ने में नियुक्त किया। वह अपने मित्रों के साथ खेलता है। यमुना गशसेमिनी" किया राजा प्रजाभों को पालता है। राम ने बहुत दिन तक पूपिकी मोम क्षद के वन में फस एकत्र करने हैं। उमने शत्र की राजधानी पर कर (b) He sets out for the forest. He comes at the timed dinner. The birds are cooing. He defeated bis eperties. Po men suffer hundreds of miseries. My heart is touch: with anxiety. The servant will come back within a week. 4.Correct:-पठनात् विरमतेपदान पराकुस्ते स:1हिमवतोवा प्रवहते। सर्वे लोका मरिष्यन्ते। माता पुषशाययते स गृह निविपति राजा शयन विजयति । ग्याघ्रो मुर्ख व्याददते। संदते चक्रमा मान ति, मुमकि मुन, मीपन & माययति and यज & पानी दाति प्रबनेन येगेन गन्ना प्रवइनि। कर लिया । वह चन्द्रमा को देखने की इच्छा करता है। दुत्तिष्ठते । साधुमुपतिष्ठति साधुः । अश्वेन सरति शब्द संगिरति । गुन शुभ्रपति। कर्मवाच्य और भाववाच्य। १. मावकर्मणो:-कर्मधाच्य और मायाज्य में पातु । तिडन्त प्रकरण। २४१ मात्मनेपदी होता है और उसमें केवल भात्मनेपद प्रत्यक- होता है। N. B. कर्मवाच्य के कर्मपद में जो पुरुष और जो वचन होते है किया में भी वो पुरुष और वही वचन होते हैं अर्थात् कर्मपद में लम पुरुष हो तो किया में भी उत्तम पुरुष होता है; ऐसे ही मध्यम पुरुष हो तो किया मैं भी मध्यम पुरुष तथा प्रथम पुरुष हो तो किया में भी प्रथम पुरुष होता है। इसी प्रकार कर्मपद में एकवचन होता क्रिया में भी एकाचन, विवचन हो तो क्रिया में भी द्विवचन तथा बहुवचन हो को किया में भी बहुवचन होता है। २ भाववाच्य की क्रिया में केवल प्रथम पुरुष एकवचन होता है। ३ इन वाच्यों के पक्ष में नृतीया और कर्मपद में प्रथमा विभक्ति होती है। . २ सार्थभातुके थक्--फर्मवाध्य और भाववाच्य में लट्, लोद, ल और विधिलिङ् में सय धातुओं के परै य लगाया जाता है। यथा, गमनाम्यते, मिद्-मियते, पद-पठ्यते, छिद्. विधते, त्यज्.त्यम्यते, शुच्-शुच्यते, स्पृश्-स्पृश्यते, भुन् मुज्यते, सम-लभ्यते, सन् सम्यते, नी नीयते, ना-नायते, हन हन्यते, सेम्-सेव्यते, शा-ज्ञायते, लुर-लुप्यते । (क) य के भाने से धातु के अन्तस्थित हस्प और का दीधे, ऋका रि, संयुक्त वर्ण युक्त तथा ऋ पानु का गुण मौर र कार्पा (पवर्ग से युक्त होने मे ) ऊहो हो जाता है। यथा, जि-जीयते, धु-धूयते, ति-चीयते: मनु-स्तूपते, मियोयते, क्षि-सीयते, कृ-क्रियते, म. मिपते, ह-हिपते, मृ. भ्रियते । स्मृमते, स्तु.स्तपते, भू-अर्पते, न-तीर्यते, क (ब) यमाने से दा, घा, भा, गा, हा, पा(पामा) भोर कीर्णते, प.पूर्वते ।

औरत (प) यमाने से प्रहका 2. प्रच्छ काप, मधम विध्यते, शिभ्यरो, यते, शय्यते, जायते, खन्यने या सायने। (च) धातु के उपधानकार का लोप होता है। पधा, बन्धः (छ) य भाने से णिजन्त धातु केका लोप होता है।पया. कारि-कार्यते, स्थापि-स्थाप्यते, दृषि-दूप्यते, पशि-पर्यते। ३लत्यादि कार लकारों को छोड़ कर अन्य लकारों य नहीं लगाया जाता। पर परस्मैपद प्रत्यय ( यदिहो) चदले आत्मनेपद प्रत्यय लगाते हैं। यथा, से-लिद-सिमें सिपेवाते, सिपेपिरे । लुट्-सेविता, सेवितारी, सेवितारः विष्येताम् , असे यिष्यन्त । आशीलिङ्-से विषीठ, संविषय (6) परे रहने से धातु के अन्त्य स्वर तथा उपधा भकार की होती है। यथा, भु.लिट्-शुश्रु वे, रुन्योता, आविता; बदा-या ध्याकरण कामुता मा मातु के मा काttart या दीपने, धीयते, , गीयत, दीपपीने, धीयते । (ग) 4 भाने से यय् , यदु, गण, यस्, बह पातु के या होउज्यते, उद्यते, उष्टते, उस्यते, उपमे, गुप्यते। थिए , शास् का शिकाशी को शर, जन् का! पौर पन् को सन् या यादो नाताया, गृह्यते, पक्षने, यध्यते, प्रन्य-प्रध्यते । लट् संविध्यते, सेवियेते, सेविष्यात असेविष्यत् , भई स्ताम् , सेयिषीरन् । भुज् --लिट्-बुभुजे । लुट्-भोक्ता । लट्-मोक्ष्यते । शुर अमोक्ष्यत । भाशालिङ्ग-मुशीष्ट । ४ लुद लद , लङ्, आशीर्सिङ, में स्थरान्त, म । और हन् धातु मों के परे विकल्प से होता है।

- श्राविष्यते; -अश्रोष्यात, अभाविष्यत; आशीलिङ्-भोपीय, भाषि प्रह-लिट्-जगहे, उद-प्रहीता, प्राहिता; लट्-ग्रहोप्यते, या लए अप्रदिप्यत, अपाहिष्यत; आधीलिङ प्रहीपोट, माहिषोष्ट । (ख) इ परे रहने से उपधा लघुस्वर का गुण होता है । यथा पहरे,मष्टा दशिता, श्यते-दशिष्यते, भद्रक्ष्यत-मदशिष्यत, दशीष्ट-ददि (ग) इ पो रहने से हन् धातु के ह के स्थान में घ होता है अध्ने, हन्ता.धानिता, हनिष्यते-पानिष्यते, अहनियत-अयानिष्यत, पौर-धानिपीट। (पोइ परे रहने से आकारान्त धातु के परे य होता है । मया पासा-दायिता, दास्यते-दायिष्यते, अदास्पत-भदायिष्यत, दासी-दादि ५ फर्मवाच्य भोर भाववाच्य में लुङ् के त के स्थान होता है। पर रहने से अन्स्य स्वर और उपधा का वृद्धि होती है तथा उपधा-लघुस्यर का गुण होता है । पद-मवादि, अयादिषाताम्, अपदिषत । सिप-असेयि, মিথ্যানু, সমষিখর মালি, মহাৰাম, মন मन ममानि, मर्मसाताम्, अमंसत ! ६ स्वरान्त प्रह, दूश् और इन धातु में लुकेत विभक्ति में लुट् इत्यादि के अनुसार कार्य होता है । -अधावि, मधोपाताम, अभाविपाताम्, अध्रोपत, अE पत । प्रह-भग्राहि, मनदीपाताम्, अनाहिपाताम्, अना मप्राषित । दश-अदशि, भदक्षाताम् अदशियाताम्, म মির | इन अवधि, अघानि, अधिषाताम्. अहंसा पानिपता, भयधिपत, महंसत, अशानिपता दा- अदिपाताम, अदायिषाताम, मदिषत, भदायिषत । Exercise- 33 I. Change the voice of:-भाको म्यानं परति - Truttart Liminarane.larthrwanHare mman. Mhune 41mgey (Present trus) fहिदोभीपा, मात्र २१२-मूकाम में पायु उरमर(ine perfcct), fa (l'eríect ) art ( fori) ३ायगा, पम् मगमगाम, भगमत् ।मू-भमात्, बा. ममत् । हर गपश्यन् . वरी, मत्-मद्रासीत् । स्या-अतिधा mATARPAN Timrom Tarjimes मका-निर । ! Man - Marg गति, परपति, आनि । . सस्थी, भस्यात् । ३ भविष्यति मनवाने सुद् म। -अशिष्यत् काल में पाठ सिडन्त प्रकरण । 1. । .. , के परे लुट् ( Periphrastic future ) भोर लुट (future ) होता है । यथा, गम्-गन्ता, गमिष्यति । भू-मविता भविष्यति । दर-दष्टा, द्रक्ष्यति । स्था-स्थाता, स्थास्यति । ४ लट् स्मे-स्म शब्द के योग में भूतकाल में लट् होता है। यथा, स मदुश्मागच्छतिस्म ( यह मेरे घर आया था ), ' व्याकरण मधीते स्म (उसने व्याकरण पढ़ा था)। ५माहिल-मा शब्द के योग में सपकाल में विकल्प से लुप होता है । यथा, मा मूत् दुःखम् , मा भवतु दुःखम् , मा मयिष्यति दुःखम् । ६ स्मोसरे ए च-मास्म शब्द के योग में सर्वकाल में और लुङ् होता है। यथा, मास्म भवत् शोकः , मास्म भूत् ७ यावत् पुरानिपातयोलेट्-यावत् और पुरा शब्द के योग में - मविष्यत्काल में लट् होता है। यथा, स यावत् आगच्छति तावत् अह गमिष्यामि (जय वह भायेगा तब मैं जाऊँगा)। ८ विभाषा कदावो:-फदा और कहि शब्दों के योग में भविष्यत् काल में विकल्प से लट् होता है । यथा, कदा ददामि ( दास्यामि ) न जाने (कप दूंगा नहीं जानता)। ६ विभाषा कथमि लिछ च-फर्थ शब्द के योग में सब काल में रिकल्प से लट् और विधिलिङ् होता है। यधा, कर्य गच्छसि, फयं गच्छे। १० पदाश्द्योर्लिहयदा और यदि शब्द के योग में भविष्यत् काल में विधिलिए होता है । यथा, वक्ष्यामि यदास मागच्छेत् , दास्यामि यदि स मागच्छेत् । · १९ आशिषि लिए लोटी-आशीर्वाद (blessing).अर्थ में धातु के उत्तर भाशीलिङ् ( Beredictive mood ) और लोट - .

पाहि। समधिरजीम्यात् ।मोद-सय मु मातु, सवनम अंतु भारहिम्गान में विकल्प संतान्होठा है। यथा,ता पुशल मपतात, तर कुशल भयनु। श पाता, २३ विधिनिमन्त्रणामन्त्रगाधीटप्रग्नप्रार्थनं लिप-विधिका विधि दो प्रकार की है, प्रयर्सना भौर निवर्सना | सकी धातु के उत्तर विधिलिङ् ( Potential mood) है। प्रवृत्ति करने को प्रवर्तना मोर भसरफर्म से अलग करने को नियतना कहते हैं। यथा, प्रवर्तना-सत्यं यदेत, प्रियं यत, गुरुमभ्यर्थ येत्, दीन दयां कुर्यात् , क्षुधिताप अन्नपचन्ता नियतमा-नानृतं यदेत् , गुरुंन निन्देत् , परस्य मापहरत, को यतन पर्जयेत् , अहङ्कार परिहरेत , आलस्यं परित्यजेत् । N. B. अनुशा (command), नियोग ( permission), निमन्त्रण (invitation), अनुरोध (entreaty, request great ( Prayer ) ait faaret ( asking, queation) andi विधिलिक और लोट् होता है। यथा, अनुज्ञानाच्नु भवान् । नियोगका भवान् । निमन्त्रण-इह भुजीत भवान् । अनुरोप-इह शौच मवाना मत्पुत्रमध्यापयेद्वान् । जिज्ञासा-कि भोम्याकरणमघौयीय व सालिन् । है। यथा, यदि बाल्ये अघीयत यावजीयनं मुखं लभेत। यहाँ याल्यकाल का अध्ययन यावज्जीवन सुखलाभ का कारण होता है। इसलिये दोनों क्रियाओं में विधिलिङ्हुआ। ( imperatire ) होता है। यथा, माशीडितय सुधमा १२ सालशियाकामागोद मर्य में बोरी १४ हेतुहेतुमतोर्लिङ्-दो क्रियाओं का हो तो दोनों क्रियानों के भविष्यत् काल में विधिलिङ्ग . कार्यकारणमा यो ऐसे ही, यदि प्रिय घदेत् सधैयां प्रियो भवेत् । 1 तृतीय भाग मृत-प्रकरण। साधारण-नियम। के परे तप्प, मिठा प्रभृति पय होते है "पपहले गाने पे नियम है- पर परेने मे पातुरेबाप सर या पार । दापोरवोदोगुन सरकार दोपगार wी रम पर Netant Tोनर maratram TRam MRIME Inment जर 11 (b) If my father wel here, you would * There may bot be any trouble to the people Im 3.Correct:- यानं मपश्यनरम । मवाना ट्रि me a book. Let the two books he bronght bere. p गः। मुम्बी भवतु स्वम् ।

विशेष भर्य में पपन् प्रत्यय परे हो तो यच.मु.युग सिरहोता। यधा, भमा सद पसतोऽस्पो चन्द्राभिमा. छत्-प्रकरण। २५१ नीय, पापि-यापनीय, स्थापि.स्थापनीय, रोपि-रोपनीय, पापिण्यापनीय, ज्ञापि-ज्ञापनीय, अध्यापि-अध्यापनीय, पालि- लनीया ण्यत् (य) १. शहलोj-फर्मयाच्य और भाववाच्य में प्रकारान्त ॥ध्यअनान्त धातु के परे ण्यत् प्रत्यय होता है। ण्यत् के का लोप होता है और य रह जाता है। यथा, मृका. त-क-कार्य, what is lit to be done. .धाये, ए. ये, स्मृ.स्मार्य, इ-हार्य । व्यसनान्त यच्चान्य, सिच् प, त्यज-त्याग्य, यज-याश्य, युज-योज्य, मज-माज्य, भुज- भाग्य, युध्.योध्य, शिवाय, मिद-भेद्य, विद्-घेच, मन्-मान्य, मन-मक्ष्य, श्श्स्-श्यास्य, इस्-हास्य, पाद-बाट । .. जो कु पिण्यती:-ण्यत् पर होतो पच् , यम् इत्यादि भात का कभीर ज् का ग होता है। यथा, पच-पापय. ग-रोग्य। पद संशयाम् ; भोज्य मध्य प्रयोज्यनियोग्यौ राया- इत्यादि धातुओं के काफ भौर का होता है। पपा, प शनार्य में पाक्ये, भुन-मोग भर्य में भोग्य, यु-भाई भई में पोषण। नि-पूर्णक युज कनयाय में (प्रभु मर्प में) नियोग। समारयादम्यतरस्याम-प्रमायभ्या राष्ट्र निपातन में Inteorol:brtoonzITr.mगारपर शी.पि.पो.गांगल.म.मरिसरमा म्ग:मरस, पप गाया-पापिगम्य, प्राए-यार जागिरमा स्पस, प-मगित समरिम ऐराय, नियरिणय, युपनोरम्य, पम्गलर, REE भार-माग, सम्माचप्पसम्पन्नध्य मन-मनाय, मा गसितम्य, जीप-जीनिगम्य, मैय्-मेणिय, राय, पेपथ्य-पूरा-पुण्य, मक्ष मशिनय, स्वसितम्य, द. इसितम्य, प्रह-पवीतम्य, गुहयोगपम्प, यहु-पाडण्य, भारिसर. पितब्य, योनि-योजपितम्य, पिप विकशितव्य. -- ५ कम्मेयाच्य भोर भाययाच्य में पाती होता है। यथा,पा-पानीय what mustor ought tok drunk. चिन्वयनीय, शी-शयनीय, शु-अवधीय, कारगर स्मृ-स्मरणीय, इ-हरणीय, छिद्.छेदनीय, विदु-दनीय, मननीय, शुभ-शोभनीय, रम्-रमणीय, सेष-सेवीय, नीय, रक्ष-रक्षणीय, तुप-तोपनीय, पूजि-पूजनीय, मति मीमांसितम्प। अनीप। का केलिम होता है। इसमें क् का लोप होता है और पलिम रहता छत्-प्रकरण । १५. वः सुपि क्यप् य-कर्मवाच्य और भाववाच्य में सुयन्त शब्द के परवत्ती चद् धातु के परे फ्यप् और गत् हो तथा क्यप् के पक्षान्तर में व काउ होता है। पथा, ब्रह्मोद्य, ब्रह्मवय Expounding the Veda. मृषा के परे हो तो केवल क्स होता है; यथा, मृषोद्य speaking falsely. १६ भुवो भावे -भाववाच्य में सुपन्त पद के परवती भू तु के परे क्या होता है। यथा, ब्रह्मभूयः identification 'ith Brahma, देवभूयः। १५. इनस्तु प-भाववाच्य में सुमन्त पद के परवत्तीं हन् (तु के परे क्या होता है तथा न के स्थान में त् और स्त्रीलिङ्ग ता है। पथा, स्त्रोहत्या, गोहत्या, पितृहत्या, ब्रह्महत्या । १८. राजसूयसूर्यमुपोधरुच्यकुप्यकृष्टपच्याव्यध्या:-राजसूप इत्यादि निपातन से सिद्ध होते है। यथा, राजा सूयते अत्र इति राजसूयः , सरति माकाशे इति सूर्यः , मृपोधम् (मृषायद् + पया), रुच्यः , कुप्यः , कष्टाच्यः , अव्यध्यः । केलिम। १९. केलिमर उपसंख्यानम् - कर्म-फर्तृधामय में धातु के परे २। यश, मिमिदेलिम what ought to be filled, बच्-पचेलिम, छितु-छिदेलिम । N. B. कृत्य प्रत्यय से बने हुए शमाथिया की भांति व्यवहत होतो सायोजित की प्रथमा के एकाबनान्त पर होते हैं और कर्म गप्प में कर्म के विशेषण होते हैं, अतएव कम्म में जो लिङ्ग, को विभकि नौर ओपनमोनमें मोहोरया, भाववाच्य-मया स्थातव्यम्, . - केपर या प्रत्यय होता है। पाकेका मोप होता परसादापया, चि.गेय what isfit or orphtook १. ईद मति-या परे होने से धातु के भन्तस्ति का पदोसा है। यषा, दा-देय, गा-गेय, पा-पेय, स्थास्य. में श, सद्भौर पयर्गान्त धातु के परे यत् होता है। शक्-शक्ष, सदसहा, शप-शप्य, रमरम्य, लम्-सभ्य, गम्-गक १३. गदमदवरयमत्रानुसगं-कर्मयाच्य और मारधारी उपसर्ग हीन गद्, मद्, यम्, चर् धातु के परे यत् होता। यथा, गद्-गध, मद्-मद्य, यम्-यम्य, चर-ब> । उप पूयंक होने से पयत् होता है। यथा, नि-गद् निगाध,म. १४. एतिखशाम्भृजुषा क्यप् , हस्वस्य मिति ऋतिए पाच्य और भाववाच्य में इ, दू, भूक, जप, शास्मात मौर एमा होता है और य रहता है। यथा, -त्य what is ought be approached, द-दत्य, भृन्भृत्य serrar, sy स्तु स्तुत्य । कृ-घात में विकल्प से यत् होता है; यथात ध्याकरण की गुणी १. मोया-कार्मपाध्यमार माशा शान्त collected, जि जेप, मी.मय, धु-प्रव्य, म-मध्य । मामेय. हा-हेय, पा-धेय। १२. पोरगुरपात् शनिदोग-फम्र्मयाच्य भोर मानव नम्-नम्य, रम्-रम्य । प्रमाद्य, नि-यम् मियाम्य, वि-चर विवायं । क्यप् । -pan धातु के पर क्यप् होता है। क्यप् कार्य; शिष्यः pupil, scholar.

छत-मकरण। वह यहत्, पधमान । अदादिगणीय-द्विष-विपत् , द्विषाण; दिइन् , दिहान ; दुह्-दुहत् , दुहान ; स्तु-स्तुषत् , ६ पूघत् अघाण । हादिरणीय-दा-ददत् , ददान; धा-द दधान; भृ-विधत्, विघ्राण ! स्थागिणीय सन्धू-बन्धात्, तनादिरणीन-तन् तन्यत् , तन्यान; क-कुर्वत, कुर्वाण । र गीय-की-कोणत् , कोणान; प्र-गृहत् , गृहान । २६ कम्म पाच्य में धातु के परे चर्चमान काल में । - . होता है। २७ कर्मवाच्य में शानच् के स्थान में मान होत गधा, क-नियमाण, पच्-उध्यमान, दा-दीपमान, पा-पी- प्रद-गृप्रमाण, सेव् सेव्यमान, यह-उामान , दुश-दृश्य छा-कृप्यमाण, सूज सश्यमान, शा-शायमान । N. B. परतु और शानच् प्रत्यय से बने हुए पाद विशेषण इसलिये इसमें विशेष्य के लिश, विभक्ति और वचन शप्त होते। परयन् पुरुष, पश्यन्त पुरुष, परस्ता पुरुषमा गच्छदी स्त्री गच्छन्ती गच्छन्त्या स्त्रिया; पतत् फलम्, पतला फलेन, पतत फलप हत्यादि क्यसु और कानय् । २८ लिटः कान का भु-भूतकाल में परस्मैपदी के परे क्य होता है। और वयसु फा पर रहता है ! २६ लिट के उत्तमपुरुष के द्विवचन में जो कार्य हो कार होने से एमिन ये सय कार्य धातु में होते है। यस् having heard, विद्-विधिद्धर, मृइ-अमृदस् , स्तु- बस्, भू-भूस्, कन्ययस् । १० बरसाशाद् घसाम्-फसु होने से घस, इन भी पर होता है । यथा, घस् अक्षियस् विवस्, स्था-सधि, सादिवस , पा-पपिषम् । । कारात धातु - ।

इन्-प्रत्, गणत - हादिगणीय-हु-जुहत् . मी-विभ्यत् , म णिजन्त-कारिटकारयत्, स्मारिस्मारयत, स्थापि स्थापरत N. B. विदेःशतुर्वसुः-अदादिगणीय विद् धातु के परे २२ कत्तु वाच्य में आत्मनेपदीय धातु के पर काल में शानच होता है और शानच् का मान रहता। २३ धातु के परेशान होने से लट् आते ( मन्ते नि २४. आने मुक-भ्वादि, दियादि और तुदादिगणीय केपरेशानच् के स्थान में मान हो जाता है। यथा, गणीय-सेव.संयमान, घृत-वर्तमान, युध् यद्धमान, up मान, सह-सहमान । दिव दिगणोय-जन-जायमान, मान, पद-पद्यमान, युथ्-युध्यमान, विदु-विद्यमान | गणीय-मृ-नियमाण, द-द्रियमाण, पृ.ध्रियमाण | wmart N. B.ईनास:--भदादिगगीय आत् पातु रे २५ कयाध्य में उभयपदी धासुमों के परमार कान दोनों प्रत्यय होते हैं। यथा, म धिधपधपमाणमी.मयत्, भयमानदाताम! राजन्, राजमानामज-मजत गजमाना यन-पन अदादि-गणीय अद्-अदत्, द-रदत् । यात् , अस्-सत् , स्वप्-स्वपत् , श्वस्-श्वसत् । पालि-पालयत्, जन-जनयत् । सननविकीर्ष-विक जिघृक्ष-जिघृक्षत् । से शतृ का वस् होता है । यथा, विद्वस् , विदत् । के सप कार्य होते हैं। शी-शथान, अधि.इ.अधीयान । मादिगणीय मा.मिमान । कपादिगणीय-की-फ्रीणाम । स्थान में न हो। यथा, भासीन। भीर पा तनादिगणीय मन-मा । 1 छत्-प्रकरणा स्यत् , पापास्यत्, दृश-द्रक्ष्यत् , हन-हनिष्यत् , मृ-मरिष्यत् , पत्-पतिप्यत् , कारि कारयिष्यत् , दशि-दर्शयिष्यत् , योजि. योजयिष्यत् । ३७ भविष्यत् काल में भात्मनेपदी धातु के परे कर्तवाच्य में स्यमान होता है । स्यमान परे रहने से भी लुट् के सभी कार्य होते हैं । यथा, सेल्-सेविष्यमाण, वृत्-वत्तिप्यमाण, व्यय-व्ययिष्यमाण, जन्-जनिष्यमाण, पदु-पत्स्यमान, सह- साहित्यमाण में ३८ भविष्यत् काल में उभयपदी धातु के पर पधाच्य स्थत और स्यमान दोनों प्रत्यय होते हैं। यथा, स्तु-स्तीप्यत्, स्तोष्यमाण, दादास्पत , दास्पमान; घा.धास्यत् , पास्पमान; प्रह-प्रदीप्यतु , प्रदीप्यमाणा -करिष्यत् , करियमाण । ३६ भविष्यत् काल में धातु के परे कर्मवाच्य में स्यमान होता है। पधा, शा-शायिष्यमाण, शास्यमान, ध्रु-धाविष्पमाण; भोप्यमाण; -कारिध्यमाण, करिष्यमाण; दश-पशिष्यमाण, श्यमाण; १-धक्ष्यमाण, घन्-धक्ष्यमाण। N. B. स्यतृ और म्यमान से बने हुए शन्द विशेषण होते हैं, भतएर विशेष्य के लिश, विभक्ति और पचन को प्राप्त होते हैं। था, गमिष्यन् S, गमिष्यन्तो यो, गमिप्यन्तः पुमा, गमिष्यन्त पुल, गमिप्यता wण, अनिमाणा कन्या, जनिष्यमाणा च्याम्, अनिष्यमाणया कन्या गा। पतिथ्यत् एत्रम्, पतियता पत्रेण, पतिष्यतः पाप । रिम्यमार्ग भ, रष्यमाणे गि, हरिष्यमाणानि कण, परिष्यमाणेन सर्मणा, रिप्यमाणात् कम्गा, चीप्यमाणे कम्मणि । वयमाण पचनम्, प्रयमाणेन पचनेन, पक्ष्यमाणात् बचनात् , यमाणस्थ वयनस्य, स. मागे नेषु ।।

परेकोने में उन माग परेर होना। गए.मा गरिम, मा.मागिर, पर-पेनिनस ३२ मिन् गाम् । से-मुहाने मेमन हन.पि.ए.मीर पिपासुकेरे किसे है। गा, गरिमार, जगरासहन जमिास, जल ३मूतकाल में मारमनेपदी पातु के पर कामना ३४ लिद के माने (मन्ने) विमति में जो कार्य कानय् दोने से मी यही कार्य दोते है। यथा, युध-सुरक स्य-रचमान, गन्दु-ययन्दान, शिक्ष-शिशिमान, व्यय विक N. B.ED और काना प्रत्यय से जोशम बने यथा, शुश्रुपान् पुसा, शुभुदास पुरुषन् । युम पुर्वमितिका होते। अतएव विशेष्य के लिा, विमकि भोर पवन को प्रात ३५ भविष्यत् काल में परस्मैपदी धातु के परमार में स्यत् प्रत्यय होता है और स्यत का स्यत रहता है। ३६ लट् विक्ति में गुण, द इत्यादि जो कार्य / घे सय कार्य स्यतृ में भी होते हैं। यथा, भू-मविपटक Amगम होने पर जोगाएF ETrian पण , पर अतिम्, इनि। पिरा-तिमिशिगम्, शिशिम: हाशिम, वि-विविदिय , मिनिम्। गौर कानर का मान रहता है। थान, सद्-मेहान, ह.चमाग, यच्-ऊवान । विविदुषों कन्याम् , विविदुष्या कन्यया, पतिका पत्रम् , स्पतृ और स्यमान। पेशा . .

कृत्-प्रकरण । २६१ - - दाम्, स्था-स्थातुम्, हा ज्ञातुम्, जि.जैतुम्, यज्-यष्टुम्, एज- सम् , पह-गोटुम् , शु श्रोतुम् , स्तु-स्तयितुम् , स्तोतुम : सह-सहितुम् , सोदुम् ; कम-शामितुम् , फल-फलितुम् , सम्. गन्तुए, हन-इन्तम् तृ तस्तिम. तरीतुम् । सेव.सेवितुम् , ., भ्रम् भ्रमितुम् ; विद् घेदितुम , रद्-रोदितुम् , शास्-शासितुम् , नत-नर्तितम् , कारि-कारयितुम् , याजि-याज. यितुम् , मोचि.मोचयितुम् । ४५ पर्याप्तवचनेष्वलमपु-समर्धार्थक शब्द के योग में धातु के पर तुमन् होता है । यथा; योधु समर्थः, मोक्तु पट: पत्तितु निपुणः, कारयितुं कुशलः ) ४३ कार समयवेलासु तुमन् कालवाचक शब्द के योग में धातु के परे तुमन् होता है। यथा, गन्तु समयोऽयम्, अभ्येतु कालोऽयम् , शयितु पेलेपम् । णमुल। ४४ भाभीक्ष्ण्ये णमुल च -पीनःपुन्य अर्थ समझा जाय तो पूर्णकालिक क्रियावाचक धातु के परे णमुल होता है और मुल् फा अम् रहता है। यथा, म्मृस्मारम् , श्रु-श्रायम् , स्तु- स्वायम् , नम्-नामम , प्रह प्राइम, भुज-भोजम् , भिद्-भेदम् . क्षिप् क्षेपम्, मश-मर्शम् , स्पृश-स्पर्शम् , हस्.हासम् , गाह- गाहम्, सेक्-सेयम् । ४५ णमुल् प्रत्यय परे रहने से हन् धातु का धात होता है। घातम्। ४६ णमुल् प्रत्यय से बने शब्द प्रयोगकाल में द्वित्व होते है। N, स्मारं स्मारम् having repeatedly remembered, माहम् , घात घातम्। .

२६२ ध्याकरण-कामुयो। N.B. भागणा, तम गम और हम शनी के पर गमन होता है। गया, भन्ययाधरम in a different manner, एसमपारम..याम । २कम्र्मणि इशियियोः साकल्य-सारसय मर्थ समझा जाय को काम पर के परे र भौर पिद पातु के उतर गमुर होता है। यथा, वरिपरी दशति सान् दरिद्वान् एवा दातीत्यर्थः, विदर्श विसति, सध्यान् विप्रान् पाहमियतीत्यर्थः, दरिद्रोदन , विपदम् । ३ यायति चिन्दजीयो:--यावत् शब्द के परबत्ती जोर धातु के रे णमुल होता है। यथा, यावशीवमधोते। ४चर्मोदरयोः पूरे:- कर्माचा दर दाद के परे परि धातु के उत्तर णमुल होता है । यथा, उदरपूर मुक्त, उदरं पुरयिस्वा मुक इत्यर्थः । ५ निर्मूल समूलयोः फरः । समूलाराजीयेषुइनामः-- क्रयाविशेषण वाचक समूल शब्द के परे का और हन् धातु के उत्तर णमुट होता है। यथा, समूटका कषति | इन् के ह का घ और न का त होता । यथा, समूलपात हन्ति killa totally. जीव शब्द के परे प्रहू धातु के उत्तर णमुल होता है। यथा, जीवप्राई गृहाति captures him alive. ६ हस्ते पत्तिग्रहो:-करणवोधक इस्तवाचक शब्द के परे प्रह बातु के उत्तर णमुल होता है । यथा, हस्तपाहं गृहाति, हस्तेन गृहातीत्यर्थः । गणिप्राहम, करप्राहम् । ७ स्वेपुपः-करणोधक स्ववाचक शब्द के.परवर्ती प्र धातु तर णमुल होता है । यथा, स्वपोषं पुष्णाति, स्वेन पुष्णातीत्यर्थः, धनपोषम्, मपोषम् , मातृपोषम् । स्वधनेन, स्वमात्रा पुण्यातीत्यर्थः । • ८ अर्चे शुपि पूरोः कर्तविशेषण उध्र्व पद के परे उ धातु के उत्तर णमुल होता है। सपा, अर्वशीर्ष शुष्यति तरू, रु एष तिष्ठन् शुष्यतीत्यर्थः ।

१ उपमाने कर्मणि च-उपमानवाचक का पद और कर्मपद भरखती धातु के उत्तर णमुल होता है । यया, वियु प्रणाशं प्रनष्टः, बुदिव क्षणेनैव विनष्ट इत्यः शलभनाशं नश्यति, शलभ इव भविमृश्य- टी पुरुषो नायतीत्यर्थः; पितृवेद वेत्ति गुरुम्, गुरु पितरमिव जानाती- दशं पश्यति शिष्यम् , शिष्य पुमिव सस्नेहं परयतीत्यर्थः । क्त्वा (क्त्वाच्)। ४७ समानकत्त कयोः पूर्वकाले-दो क्रियाओं का एक कर्ता को पूर्वकालिक क्रिया के उत्तर पत्वा होता है और क्रया या रहता है। सेट् धातुओं में स्त्या के पहले इद् लगता है। , शाहात्या Knowing, ध्य-ध्यात्या,स्ना-स्नात्वा, पा-पीत्वा, -स्थित्या, दा-दच्या, धा-हित्वा, चि.चित्वा, जि-जित्या, भि. बा, की-मोत्या, धुश्रुत्या, हु-हुत्या, भू-भूत्या, क-कृस्या, घृ. प, स्मृ-स्मृत्या, मुच्-मुक्त्या, सिच्-सिफ्त्या, त्यज् स्थक्त्वा, भुक्त्या, सज्-पट्या, छिद्-छित्त्वा, मिदु-मिस्या, पुध्- पा, क्षिप्-क्षिप्त्या, लम्-लका, दृश् दृष्टा, दह-दग्ध्या, याच. त्या, गज्ज गजिरवा, पठ्-पठित्वा, फीड कोडित्या, तित्या, व्यय-ध्यथित्या, सेय्-सेपित्या, भिन्न-मिलित्या, विधा, यज्-वा, प्रह- गृहोस्वा, प्रह-पृष्टया, यस्-उपि. स्वप्-सुप्तवा, गमगत्या, नम्-मस्या, मन्-मत्या, हन-इत्या, अध्या, स्तम्भू-स्वाचा । ८ प्रत्यय के पहले इद होतो धातु के भन्रय स्थर तथा के लघु स्थर का गुण होता है । यथा, शी-शयित्या, वयिस्था, कारि-फारपिरया, स्थापि-स्थापपित्या, पाय. उत्पा, पत्-वत्तित्या, मृत्-नत्तित्या । E.B. गृहमृद पुधकुप लिशवियसः बस्या-गा, पर 'रुद्, विद् मु, और लिश् धातुओ में गुण महों होता । यथा, मुडिया, मृदित्या, हदित्वा विदित्वा, मुषित्वा । २ तृषिमृपिकशेः काश्यपस्य-मिल, लिए, तिम्, कु, क्षुध, शुद्, धुत् , रुच्, स्फुट, कृप. तृप, और मृष् धातुओं में विकल्प से गुण होता है । यथा, मिल्-मिलित्वा, मेलिवा; लिख लिखित्वा, लेखित्वा स्तिम्-स्तिमित्वा, स्तमित्वा; कुप्-कुपिस्वा, कोपित्या; उध्-शुधित्वा, ओधित्वा; ग्रुट-टित्वा, प्रोटित्वा; घुन गुतित्वा, घोतित्वा; रुच्-रुचित्वा, रोचित्वाः फुट्-स्फुटित्वा, स्फोटित्या; कृश्-कृशिवा, कशिवा; तृप्-तृपित्ता, तपित्या; मृप्-मृषित्वा, मषित्वा । ४९ नोपधात् थफान्ताद्वा । जान्तना विभाषा-पत्या प्रत्यय होने से जान्त, पान्त, और फान्त धातु के उपधा नकार का विकला से लोप होता है। यथा, म भक्त्या, भङयत्या; रज रफ्त्या. गङ्मत्या, अन्य-प्रन्थित्या प्रथित्या, मन्थ-मथित्या, मन्धित्या, गुम्फ-गुम्फित्या, गुफित्या । पश्चिमुच्युतश-पन्च्, लन्च्, में भी विकल्प सेन का लोप होता है। पथा, पञ्च-पवित्या, पश्चित्या लग्य-लुमित्या, लुधिया । N. B. स्वा प्रत्यय होने से पूऔर हिम् धातु के परे विकणसे पदोता है । यथा, प्र-पक्रिया, पूचा हिश लिशिया, लिया। २उदिनीया । मधविश्य-गणपाठ के समय में जो धातु नारंगुष्ट हो इस परे क्ला प्रयय होने से विशाय सेव होता। पपा, कम मिया, अग्ला क्षम्-शामित्या, मानवाः, श्रम अमिस्या, भरत्या शम्-गमिता, शाया; निविचा, पा; fon fri, थानीय, पिनीय, संथुत्य, संस्तुत्य, उत्प्लुत्य, रिधूय, सम्भूय, छत्-प्रकरण। २६५ ५० जहातेश्च विश्व-त्या प्रत्यय होने से त्यागार्थ हा धातु का हि-होता है । यथा, हित्वा । ५१ भलंखल्वोः प्रतिषेधयोः प्राचा क्त्वा-निषेध अर्थ समझा जाय तो अलं और खलु शब्दों के योग में धातु के परे क्त्या होता है। यथा, अलं गत्या, अलं स्थित्या, अलं दृष्ट्या, अलं स्पृष्ट्या, अलं श्रुत्वा, खलु उक्त्या, खलु कृत्या, खलु भुक्त्या, खलु क्षिप्त्वा। ल्यप। ५१ समासेऽनम् पूर्वोचो त्या-नम् मिन्न अव्यय ( उपसर्ग ) के साथ समास होने पर धातु के परे पत्वा के बदले ल्यप् होता है और ल्यप् का य रहता है। यथा, था-मा-भानाय, मा.दा आदाय । ऐसे ही विधाय, अपिधाय, प्रस्थाय, विदाय, व्याख्याय, विज्ञाय, आलिहाय, सम्-मन्त्यज्य, विमभ्य, प्रणि- पत्य, नाप्य, प्रकम्प्य, भारभ्य, निशम्य, विधम्य, भासष्य, संरक्ष्य, उदस्य, अभ्यस्य, निश्वस्य, विहस्य, विगर्छ । ५३ ल्यप् प्रत्यय परे होने से धातु के अन्य स्वर तथा उपधा लघुस्या का गुण नहीं होता। यधा, वि.जि विजित्य, सम्.चि-सञ्चित्य, अधीत्य, प्रेत्य, धाधित्य, संघित्य, विस्मित्य, . ममय, भादत्य, विकृत्य, भावृत्य, प्रदत्य, संमृत्य, संम्मृत्प, मात्य, विधारल्य, नानारत्य, आलिख्य, उन्मुच्य, सम्मुभ्य, नियुश्य, विएज्य, माछियविभिय, निरभ्य, संक्षिप्य, प्रकुष्य, बिलुप्य, शिरप्य, प्रगुप्य, प्रविश्य, भारव्य, निधिप्य, विशिष्य, माय, सन्दिय, भारय, दि.सा. -विपहा. बिगाहा मगा। ५४ हरपस्प पितिति तुर-त्यप परे होने से दन, मन, तन् २६ प्रगोनाकीगुरी। गाkि gif काम होता है। गा, मा-इन-m, गामा, गि . ना RT-AT पर होने में गम्, R, गम्यादि शमीम का निकास होता है। या, सम्-यम- संपण, पम्प, fun, पिपरग; प्रणम्य, प्रणय, मागम, ५१ व्या पर होने से सतनादि धातुमो के उपधा. मकार कालोप होता है। या, भा.मत्रमासम्य, प्र-शंस. मराम्य, सम्-ए-सन्दरप, पि.घस- गिम्य, प्र-स्-अम्रस्य, म.मन्य प्रमच्या ५७ स्या पर होने से शी का शय, प्रच्छ का पृच्छ और प्रद का गृह धोता है। यथा, मधि-शी-मधिशय्य, मापल्य संगृह्य, यिगृहा, निगृत। ५८ क्षियः-लया परे रहने से है का भार शिफाक्षी होता है। यथा, माहय, प्रक्षीय। ५६ ल्यप् परे दोने से स्यप्, यस्, यप्, यच् यह और चद् धातु के घ का उ होता है; यथा, सम्स्यप् संसुप्य, प्र. यच्-प्रोच्य, सम्-पप्-समुप्य, भघि यस्.अध्युष्य, प्र-वह-प्रोहा, अनु-यद्-अनुद्या ६० ल्यप् परे होने से धातु के दीर्घ ऋ फाईर होता है। यथा, वि.फ-विकीर्य, उदीर्य, वितीर्य, विदीर्य, विशीर्य, विस्तीर्य । N. B. पप् परे होने से गिन् का लोग होता है। यया, नि-मीलि. निमौल्य, विधारि-विचार्य, सम्-प्र-धारि-सम्प्रचार्य, संस्थाप्य, प्रकाश्य, विनाश्य, भाग्यास्य, उत्सार्य, अध्याप्य, समय, विदार्य, आलोय, - सम्पीज्य नियोच, भाम्याय, आवाय, भाराध्य ।

छत प्रकरण। २ल्यपि लघुपूर्ध्यात्-णिच का पूर्ववर्ती स्वर यदि लघु हो तो स्या परे रहने से णिच् का भय होता है । यथा, दि.गगि-विगणय्य, वि- रचि-विरचय, प्र-नमि-प्रणम्य, वि-मि विरमध्य, सम् घटि संघदय्य, वि- रहि-विक्षप्य विमापापः-त्या परे होने से आप धातु के णिच् का अय् होता है और पक्षानगर में मित्र का लोप होता है। यथा, प्र आपि-प्रापश्य, प्राप्य; सम्-आपि-समापय्य, समाप्य । तुमुन् , णमुल्, त्या और ल्यप् प्रत्यय से बने हुए शाद अव्यय होते है। ये असमापिका क्रिया है। Exercise 37. 1. Translate into Hindi-धम्म धोनुमिहागच्छामि। वनं गन्तुमि- दामि । सीतास्वयम्बरं द्रष्टुं स गच्छन् । बरसान् स्मारं स्मारं गावः गृह प्रत्यागच्छति । गुरुं नस्वा पाठ मारभस्व । पुत्रस्य वचनं श्रवा प्रसन्नो बभूव । गजातटमागस्य स तस्यौ। सर्वपामपि वधं विधाय चर्म विदार्य प्रस्य प्रेक्ष्य धनं नेष्यामः । तमेव निहत्य वनमिदं निरुपदवं करिष्यामि । राजानं प्रणिपस्य तस्मै सचं निवेदयामासा 2. Translate into Sanskrit:-(a) क्या बाज जड़के को हर सकता है। इसे देख कर सब आनन्दित होते हैं। आप को देख कर मेरी सब इण्टा निवृत्त हो गयी। रामचन्द्र को वन से लौटाने के लिये भरत बन गये । राजा दरियों को धन देने की इच्छा करता है । सीता को लेकर रावण लका गया । वह भर पेट साता है। नीच उच्च पद पाकर स्वामी को मारने की इच्छा करवा (b) I am not able to do it. He wants to go there. Having done this I shall go there. He totally killed his enemies. He goes to the forest to collect some flowers. Please give this to the poor. I shall go there and bring him to you. Hla:iz? ser epily red bis parents he rent horre. 3 Cortect.-शानं प्रयितु मागनिम पगु मिानिसभित्र धन प्रहित भागोमागोपनं दवा लिम। गुरुं प्रणमध्य Fag पिंजय भागए। धन मन शानरं गमि यामि । निटा। . ६१ क-गपत् निश-भूतकाल में धातु के परक्त मौर तयनु प्रत्यय होते है और इनका यथानम और तयत् रहता है। इन दोनों प्रत्ययों को निष्टा कहते है। ६२ अनिट् धातुओं में इट नहीं लगता। यथा, ख्या-ख्यातः famous, ख्या.ख्यातवान् , हा-मातः known, ज्ञातवान् । ध्यातः, ध्यातवान् ; या-यातः, यातयान् ; स्ना-नातः, नातवान इ-इतः, इतवान् । चि-चितः, चितवान् ; जि-जितः, जितवान् । स्मि स्मितः, स्मितवान् ; फ्रोतः, क्रांतवान, नीतः, नीतवान् । प्रीतः, प्रीतवान् ; भीतः, भीतवान् ; दुतः, द्रुतवान् ; धूतः, धूतवान् श्रुतः, श्रुतवान् ; स्तु-स्तुतः, स्तुतवान् ; चुतः, त्रु तवान् । हुतः, हुतवान् ; कृतः, कृतवान् । हृतः, दतवान् ; धृतः, धृतवान् ; भृतः, भृतवान् । मृतः, मृतवान् । सृतः, सृतवान्। स्तृतः, स्तृतवान् । स्मृतः, स्मृतवान् ; हृतः, हतवान् । ६३ तिङन्त में जो कार्य होते हैं प्रायः ये सथ फार्य निष्ठा, क्त्वा और क्तिन् प्रत्यय में भी होते हैं । यथा, शक्-शक्तः, शक्तवान् । मुच्-मुक्तः , मुक्तवान् । रिच-रिक्तः, रितवान् । सिच्.सिक्तः , सिक्तवान् । त्यज्-त्यक्तः , त्यक्तान् । भज मन, भक्तवान् । भुज्-भुक्तः, भुक्तवान्; युज-युक्तः, युक्त्यान् । एजः . .

उभिनयान; घट-घटितः, घटितवान् : घट्ट घट्टितः, घट्टितवान् । चेष्ट-चेष्टितः, चेष्टितवान: घर त्रुटितः, त्रुटितवान् वेट-घेरितः, वेष्टितवान्। स्फुट-स्फुटितः, स्फुटितवान; कुण्ट-कुपिटतः छन.प्रकरण। . - सृष्टः, सश्यान्; क्रुध-दः,दवान; बुध-बुद्धः, बुद्धवान्; युध्. युद्धः, युद्धवान्; राध राधः, रायान; रु.गदा, रवान् शुध-शुद्धः, शुदवान् ; सि.सिद्धा, सिद्धवान्, आप-आप्त:, भातवान्, क्षिप-क्षिप्तः, क्षिप्तवान्, तप्-तप्तः, तप्तवान्; सुप्-तृप्तः, तृतवान्; लिप्.लितः लिप्तवान्; लुप् लुप्तः, लुमवान्; शप-शप्तः, शनधान्; रम-रब्धः, रुधवान्, लभ-लब्धः, लब्धयान्; दिश्- दिएः, दिष्टयान् ; दृश् दृष्टः, दृष्टवान्, विश-विष्टः, विष्टवान्; स्पृश. स्पृटः, स्पृष्टयान; कप-कृष्टः, कृष्टवान्; तुप्-तुएः, तुवान; दुप्- दुष्टः, दुश्यान् ; पिप-पिष्टः, पिष्टवान्: पुष्-पुष्टः, पुश्वान्, मृ. मृष्टः, मृश्यानशिप-शिष्टः, शिष्टवान् ; श्लिप-लिएः, लिष्टवान् ; दह-दग्धः, दग्धवान् ; दिह-दिग्धः, दिग्धधान, नह-नग्धः, नग्ध. धान्; रह-रूदः, रूढवान् ; लिह लीढः, लोढयान् । ६४ निष्ठा प्रत्यय पर हो तो सेट् धातुओं के परे इट् होता 1 यथा. लि.लिखितः, लिखितवान् ; लिंग-लिङ्गितः, लिशित- वान् लव लावतः, लहितवान् । श्लाघ-श्लाधितः, श्लाधितवान् अर्थ भर्थितः, चितवान्; यर्थ-वचितः, चचितवान्; याच्. याचितः, याचितवान्; यश-पश्चिनः, वश्चितवान् ; पान्छु- यन्छिनः, वाञ्छितवान, गर्ज-गर्जितः, गजितधान्; तर्ज. नद्धितः, तर्जितवान्; राज-राजितः, राजितवान् ; उभि उज्झितः, -- कुण्ठितवान, पट् पठितः, पठितवान्। लुण्ठ-लुण्ठितः, लुण्ठित- गन्; क्रीड्-क्रीडितः, मीडितयान्; पिण्ड्-पिण्डितः, पिण्डित- यानमुण्ड-मुण्डितः, मुण्डितवान् ; लोड्-लोडितः, लोडितयान्;

सुधियाकरण-कीमुदी। पूर्ण गिराः, भूमिमगान: पप्पणितः, गणितयाना पत्-पतिनः, নিমা, সি, সিনা। গলগিস, যিল पान : मन्त-मादितः, ममिया, मई महित, नदिनानः मिन्दु-निन्दितः, निन्दिरामान: नन्दु-नन्दिनः, मदितवान् : मुद्ध- मुदितः, मुदितयान: मयु-मदिनः, मदितवान् ; विविदितः, पिदिमान, या-वाधितः, वाधियान: पधिपधितः म्य. धितयान; कु कुपितः, कुपितयान, कम्प्-कम्पितः, पिता पान: जल्प जमियतः, जहिपतगन् : गुम्फ गुम्मितः, गुम्फित पान, घुम्य्-घुम्यितः चुम्यितयान; लम्बालम्यितः, लम्बितवान् शुभ-अमितः, श्रुमितयान; जम्म जन्मितः, जन्मितवान; स्तिम्-स्तिमिला, स्तिमितयान। थय्-अयितः, अयितयान सर्-शरितः, क्षरितया , घर-चरितः, चरितवान् ; स्वस्थ रितः, त्यरितयान्, स्फुरस्फुरितः, स्फुरितवान्ः ज्यल-स्त्र लितः, उपलितयान्। दल-दलितः, दलितवान्, मिल-मिलित, मिलितवान् ; मील-मीलितः, मौलितवान् : येल्ल्-वैल्लितः, घेलि- तवान्ः; शल्-शलितः, शलितवान्; शील्-शीलितः, शीलितवानः स्खल-स्पलितः, स्खलितवान्। बर्व खस्तिः, खन्वितयान गर्घ गयितः, गांध्यतया: जीव-जीविता, जीवितयान, धा. धायितः, धावितवान्, सेव-सेवितः, सेवितवान्, अश- अशितः, अशितयान्; फाश.काशितः, काशिनवान: ईश्-ईक्षि- तः, ईक्षितवान्। कां कांक्षितः, कांक्षितवान् । तृप्-तृषितः, तृपितयान, मिश् भिक्षितः, मिक्षितवान्; रक्ष रक्षितः, रक्षित तवान्। लप्लपितः, लपितयान: शिक्ष-शिक्षित:. शिक्षितवान, मर्क्स-मत्सितः, भत्सितरान्रस रसितः, रसितवान्; लस्. लसितः, लसितवान्, श्वस्-श्यसितः, श्यसितवान्। शंस्- शंसितः, शंसितवान्। हस्-हसितः, हसितवान्; हिस्-दिसितः, कृत्-प्रकरण । . हिसितवान् । इह-ईहितः, इंहितवान् : सह-अहितः, ऊहित- पान् । गह गहितः, गहितवान् ; रह-रहितः, रहितवान् । ६५ निष्ठा प्रत्यय के प्रयोग में स्ट् प्रत्यय आये तो णिच् का लोप होता है । यथा, कारि.कारित: caused to be made, कारितवान् ; क्षालि-क्षालितः, क्षालितान ; पालि- पालितः, पालितवान् ; थपि-अपितः, अर्पितवान् । स्थापि. ধাবিব, থাথিরান্ত; ঋদ্বি-খাবিব, খাযিথার; বি. "पितः, रोपितवान् । जनि-जनितः, जमितवान् । ६६ निधो स्विदिमिविक्षिशि:-निष्ठा प्रत्यय पर होने से शी का शय होता है । यथा, शयितः शयितया । ६७ निष्ठा प्रत्यय पर होने से घि, उकारान्त, अफारान्त, पृ धातु के उत्तर इट नहीं होता । पथा, धि-धिता, श्रितवान् ; युयुतः, युतयार ; स-रतः, रतया ; नु-नुतः, नया स्नु-स्नुतः, स्नुतवान् । धू-धूतः, धूतया ; पू.पूतः, प्रतवान् । भू-भूतः, भूतवान्। सू-स्तः, सूतयान : वृतः, भौर प्रतवान्। ६८ गणपाठ के समय में जो धातु फार-संगष्ट दो, निष्टा प्रत्यय पर रहने से उनके उत्तर र महीं होता। यथा, दी. दीमा, दोसशन : स्त्रस्तः, प्रस्तवान् । एच्.पृक्तः, पृक्तयान् । ६६ दूसरे प्रकरणों में जहां पातु के परे विकरूप से होता है यहां निष्ठा प्रत्यय पर रहने से हट नहीं होता। यथा, ए.ए., एमान : गुप्-गुप्तः, गुमयान् ; इप-मः, इयान् : उप-गुप्तः, लुतवान् ; भर-भस्तः, मम्तन् । प्रस्:प्रसा, प्रस्त. पान : पृष:यूटः, वृपया । कृप-पृटः, कृपया ; मा मुट एमान् गा-गर, गाम्यान ; गुना, गान् । स्नि निष्ठा प्रत्यय परे रहने से गम्, नम्, यम्, रम्, क्षण, तन, शुमायाकरणामु गिम्य:. निघयान : मु.मुग्णा, मह, मुग्धपान , मूगन् । सा-गोरा, सोयान् । ७. मिशा भोर किन प्रत्यय करने से दिए टिन और सिर धातुओं के य् का होता है। यथा, दियः सः, पत शानप्रिय.प्टय मः, यतयान, मिय-म्यूनः, स्यूनवान् । १ मिटा मार सिन् प्रत्यय पर होने से प्रम् इत्यादि धानुनी के भ फा माहोता है। या, मम् कान्तः, प्रान्तवान् । कम्-जान्नः, सान्तगान् क्षम्-शान्तः, क्षान्तधान्। चम् चान्ना, चारतवान् । तम्-तान्तः, तान्तयान्। दम्दान्तः, दान्तान् । रम्पान्तः, रान्तवान् ; शम्-शान्तः, शान्तयान , धम् श्रान्त, धान्तवान् । ७२ अनुदातोपदेशवनतितनोत्यादीनामनुनासिकलोपो मनिहिति-- मन् और हन् के अन्त्य वर्ण का लोप होता है। यथा, गम्-गता, गतवान् ; नतः, गतवान् ; यतः, यतवान् ; रतः, रतवान् ; क्षतः, क्षतवान् ; ततः, ततवान्मतः, मतवान् ; हतः, हतधान् । ७३ निष्ठा प्रत्यय परे हो तो खन् , जन् और संन् धातु का यथाक्रम खा, जा और सा होता है। यथा, खन्-खातः, खातवान् ; जन्-जातः, जातवान् ; सन् सातः, सातवान् । ७४ अनुदात्तोपदेशवनतितनोत्यादीनामनुनासिकलोपो झलिक्षिति- निष्ठा प्रत्यय पर रहने से दश् इत्यादि धातुओं के उपधा- नकार का लोप होता है । यथा, दन्शदपः, दष्टवान् ; रज्. रक्तः, रक्तवान् ; सञ्ज सक्तः, सक्तवान् ; घन्ध यदः, यध्यान म्तम्भ स्तब्धः, स्तब्धवान् ; दंश-भ्रष्टः, भ्रश्वान् ; ध्वंस्-ध्यस्तः, ध्वस्तवान् ; उस वस्तः, सस्तवान् । शंस्-शस्तः, शस्तवान् । अन्य-प्रथितः, प्रथितयान ; मन्य मथितः, मधिनवान् । " कृत् प्रकरण। २७७ N. B. पवा के स्थान में हद होने पर ७०, ७, ७, ४ का कार्य नहीं होता है। ७५ रदाभ्यां निष्टातो नः पूर्वस्य च दा-निष्ठा प्रत्यय परे होने से दकारान्त धातु के दु के टु और उसके परस्थित निष्ठा के a का न होता है । यथा, क्लिदु किन्नः, क्लिनवानक्षुद-भुन्नः, क्षुनधान खिदुःखिन्नः, खिन्नवान् ; छिद् छिन्नः, छिन्नवान् ; भिद्-भिन्ना, भिन्नवान् ; पद-पनः, पन्नधान् , सद्-सन्तः, सन्नवान् । मद् धातु में नहीं होता। यथा, मत्तः, मत्तवान् । भोदितच । श्यादिभ्यः-गणपाठ के समय में जो धातु भोकार-संपृष्ट हो उनके पर निष्ठा के त का न होता है। यथा, रज-याणा, राणयान ; विज्-विधा, विनयान । भुज भुन्नः, भुनवान् । भज भग्नः, भग्नवान् : मज् के स् का लोप होता है मनः, मग्नवान् : दूदूनः, दूनधान : सू सनः, सनयान ; लू. लूनः, र नयान ; दो-दीन, दीनपान : डी-डानः, डोनशान् ; क्षि धातु केरका दीर्घ होता है। क्षीणः, क्षीणवान् । ७. सदाभ्या निट तो नः पावरप च-रके परे निष्ठा के न का न होता है। यथा, गू गर्णः, पूर्णवान्, पूर-पूर्णः, पूर्णयान्। चूर-चूर्णः, चूर्णयान् । ७८ संयोगादेशमो पाताणत:-ला, म्ला,दा, स्न्या धातु के परे निष्ठा के काम होता है। पपा, ग्ला.ग्लानः, पटानयान् ! हाम्लानः, म्लानन्दा-दापः, द्रापान ; स्पास्यामः, स्पानशन् । १ निष्ठा प्रत्यय पर हो तो प्राकारान्त धातु के. " और होता है। पया, फकीर्णः, कोपरान् ; ग-गोर्ण गीर्ण पान ;

सुबोध.व्याकरण-कौमुदी। - यद्, यप्, घह और स्वप् धातुओं के प का उहोता है । यथा, उपितः, उपितवान् उक्तः, उक्तवान्; उदितः, उदितवान् । उप्तः, उप्तवान् ; ऊठः, ऊदयान् ; सुप्नः, सुप्तवान् । ६१ निष्ठा, क्ता तिन् प्रत्यय पर हो तो गा (गै), पा और हा धातुओं केा का ई होता है। यथा, गीतः, गीतवान् । पीतः, पीतवान् ; हीनः, हीनयान् । ९२ शुषः कः । पोवः । क्षायो मः-निष्ठा सहित (क्षे), पव और शुप् धातुओं का यथाक्रम क्षाम, पक और शुष्क होता है। यथा, क्षामः, क्षामयान् ; पकः, पकवान् शुष्कः, शुष्कयान् । V. B. कर्तृवाच्य में धानु के परे क्तवतु प्रत्यय होता है और कवा प्रत्यय से यना हुआ पद का का विशेषण होता है, इसलिये का के लिए विभमि और वचन को प्राप्त होता है। यथा, स पुस्तकं पठितान, तो पुस्तकं पटितवन्तौ, ते पुस्तकं पठितयन्तः, सा चन्द्र रस्वती, ते चन्द्र र परयो, ताश्चन्द्र रटवरयः । वृक्षात् फलां पतितयत्, वृक्षात् फले पतितानी, पृशात फलानि पतितवन्ति। २ कम्मवाय में सकर्मक धातुओं के परे त प्रत्यय होता है और मा मस्यय से पने हुए पद काम के विशेषग होते हैं तथा कर्म के लिश. विभक्ति और वचन को मापने यथा, कुम्भकारेण EXः कृतः, पटी कृती, घटाः कृताः । मिग्रेण पनी लिधिता, पोलिसो, काय मिला। मालिमा पुरुष मितम. पुष्पे चित, पुपाणि चितानि । (क) पत्यकर्मफलिपशीयासयसजनजीनिmy. Murls, क नया शो, स्था, भाम, प, शिप. और में उपसर्ग योग से होने पर गाय में भी न होना sit इसमे बने विशेषण हो । पया, म भाग मा at म , शिया पोमु गा, ग गीत, कृत्-प्रकरण। विद्यालय प्रातः। स गृहमधियितः स शय्यामधिष्ठितः, मुनिराश्रमम प्यासितः, स ग्राममायुषितः । पिता पुत्रमाग्लिश:, नरो वृक्षमारूढः । ३ यदि सवतु और त प्रत्यय से बने शब्द समापिका क्रिया की भांति प्रयुक्त न होकर विशेषणरूप में प्रयुक्त हों तो विशेष्य के लिङ्ग, विभक्ति और वचन को प्राप्त होते हैं। यथा; अधोतवान् छात्र., अधोतवन्त छात्रम्, अधीतवता अत्रेण, अधोवते छात्राय इत्यादि । भीतः शिशुः, भीत शिशुम्, भौतेन शिशुना इत्यादि। ४ सब धातुओं के उत्तर भाववाच्य मेक होता है। भाववाच्य में क प्रत्यय से बने शाद समापिका किया की भांति व्यवदत हो तो सदा भोलि की प्रथमा का एकवचन होता है । यथा, तेन कृतम्, ताभ्यां कृतम्, पृतम्, त्वया कृतम्, युगभ्यां कृतम, युष्माभिः कृतम्, मया कृतम, भावाभ्यां कृतम्, अस्माभिः कृतम्, शिशुना रदितम्, तेन भुकम्, मया शातन्, त्वया दृष्टम् , कन्यथा हसितम् । जब विशेष्य पद की भांति व्यवहत होते हैं तय अकारान्त लोवलिा के समान होते है । यथा, गतम्, गते, गतानि; रदितम्, रदिते, रुदितानि । ५मतिबुद्धिपूजार्थेभ्या-मति, बुद्धि और पूजा भर्थ वाले धातु के उत्तर वर्तमान काल में न होता है। यथा, राज्ञो मतः, इएः, पुनः पूजितः। Exercise-38 1. Translate into Hindi--एवं कथयित्वा स पुस्तकं गृहीतवान् । अर्जुन मुभा प्रसवोदवान् । मृगमादाय गच्छता तेनैक शूको हटः। एवं विवदमानी वायपि राजमुलं गतवन्तौ । चौरेण तस्य घनमपट्टतम् । हरयमभिहितं भवता । तो मुनिकुमारी सभायां गतवन्तौ । इपबधार्य तस्योपरि कुटार उक्षितवान् । वत् धन श्रोतु महागतोऽस्मि | रामरय दगेन दाणेन रावणो हतः। वानरेण हतो राजा विशानीरंग रशिताः । 2. Translate into Sanskrits-(a) पितसे ऐसा कह कर has created us and the earth. I have composed this book सुबोध याकरणका घर चला गया । भालू देखकर वह वृक्ष पर चढ़ गया । वे अबका लेकर घर चले गये । मैंने तुम्हारे लड़के को एक पत्र लिखा था । वीर दान पर याण छोड़ा । म्याघ ने खेत में जाल फैला दिया । (श में मैने या पुस्तक खरीदी । राजा की भाशा से घोर फासी पर लटका दिये गये पिता की आज्ञा शिर पर धारण कर रामचन्द्र बन गये। (b) The king heard the cry of a woman. He sent him a letter. I saw two tigers in the forest. You kare been many times tested by me. He asked him mang questions. Saying so he came back his home. Brahma in two years. I ordered him to go there. 3. Correct-वयमत्र भागतः। सर्वे तय गतः । अहं पुस्तकं न्तः । स धनं दत्तः । तौ ग्यानं दृष्टवान् । पालिका पत्र लिखितान् । वृक्षात् फलानि पतितवन्तः। क्तिन् (क्ति) १३. स्त्रियां क्तिन-माधयाय में धातु के परे क्तिन' होता है। क्तिन का ति रहता है और इससे यते शरद स्त्रीलिङ्ग होते है। यपा, ख्या-ख्यातिः, गै-गीतिः, मा.मितिः, स्थास्थिति, चि-थितिः, नी-नीतिः । ऐसे ही प्रीतिः, मोतिः, प्युतिः, तिः गुतिः, थुतिः, स्तुतिः, प्रतिः, कृति, धृतिः, भूतिः, मृतिः death, पतिः, मृतिः, हमतिः, शकिः, मुक्तिः, उक्ति, गति मुक्तिः, यज्-टिः, युतिः, 'मृतिः हतिः पतिः, पति, पत्ति: loot-soldier, मितिः, वित्तिः discussion, बुद्धिा, पृषिः, शुद्धिः, सिदिः, मतिः, तनमति: Iine, मति, कृत्-प्रकरण। 298 भाप्तिः, गुप्तिः, तृप्तिः, दीप्तिः, सुप्तिः, लब्धिः, फ्रम्-धान्तिः, फ्रान्तिः शान्तिः forbearance गतिः, नतिः, म्रान्तिः, गतिः, शान्तिः, श्रम्-धान्तिः, दृष्टिः, कृष्टिः, नुपिः, पुष्टिः, वृष्टिः, रतिः । N. B. म्टा, म्ला, हा, इत्यादि धातुओं के परे ति का नि होता है। स्था, म्लनिः, म्लानिः weariness, हानिः । पोति-योजकः। णक ( ण्युल्) १४ गतुल्-धातु के उत्तर फर्तृवाच्य में 'गफ' होता है और गफ का भक रहता है। यथा, नी-नायफः, धु-धायकः, पू.गायकः ए-कारकः, । ऐसे ही तारकः, स्मारक, नाशकः, पायका, पाटकः, ग्रेिवयः, सेवकः, मोचकः, क्षेपक, रोष. का शोषकः, पा.दापपः, गायफः, जनि-जनका, पालि पालफः, (क) निमिरा भर्य समझा जाय तो मरिष्यत् काल में पातु के उत्तर पगाध्य में पफ होता है। यथा, भुज-मोजको मजति ( भोजन करने के निमित्त जातादप पाथको मनि (पाक का निमिन जाता है)। (स) (शुन् ) शियिनि पुर। मतिनिधिम्य एए-शियां समझा जाय तो मत्, पन् भोर रमा धानुो उत्तापात पार में एक होता है मार पफ 1 अप. राता है। यथा, गर्मक, गनक, जक, को दाया- Enोता है। (ग) पदभार धक (finit) प-शिवी Rझा जाए मोमै पाउना पाप में मर और साभार मा मन भौर मा. पापा, सुशोध-गाय कोमुहा नन् । ९.शुसन:-धातु के उत्तर प्रयाग में तन होता है मार गुप कामगा है। गया वादानुदाना, पा-पाना, मा. मामा, जि.जेना, मो.नेता, ग्रीना, म.सा, ता, संता, मता, येत्ता पोन्द्रा, रोसा, गन्ता, दन्ता । शील, धर्म भार सम्परकरण मर्थ में मी तब होता है। (क)लुर यिगति के अनुमार सून् परे होने से भी धानु के. उत्तर इद होता है। याम-भविता, पद-यदिना, फलिता, चलिता, देविता, नोदिशा, नतिता, दीपिता, सैयिता, कारि. फारयिता, स्यापि-म्यापयिता, जनि.जनयिता, सुसविता, सोता, स्तु-स्तविता, म्तोताप.एपिता, पा; शुच्-शोधिता, शोका, रु.रोपिता, रोटा। अण ११- कर्मण्यण-कर्मशावक पद के परखती धातु के उत्तर फर्तृवाच्य में अण होता है और अप फा म रहता है। यथा, कुम्भं करोति इति कुम्मकारः, तन्तून् वयति तन्तुवायः wearer, तन्वं चयति तन्त्रयायः wearer, शाखकारः, सूत्रकारः, चाटुकार: flatterer, सूत्रधारः,'माला- कार:, भाषाकारः, फर्मशाल वारियाहः cloud. शास्त्राणि फरोति अट् । -दिवा इत्यादि कर्म. - दिवाविभानिशाप्रमाभास्कारान्तानन्तादिबहुनान्दीविलिपिलिविवालि- मक्तिकर्तृ चित्रक्षेत्रसंख्याजावाददर्षततधनुररघु- पाचक पद के परबत्ती क घात के उत्तर फर्तृवाच्य में अट होता है और अट् का अ रहता है । यथा, दिवाकरः, कृत-प्रकरण। २८१ विभाकरः, निशाकरः, प्रभाकरः, भास्करः, अन्तफरः, किङ्करः, लिपिकरः, पलिकरः, भक्तिकरः, अहस्कर: the sun, चित्रकरः, कम्मे करः ( कर्मणि भृती-भृत्य अर्थ समझा जाय तो अण् होता (क) कृतो हेतुताच्छोत्यानुलोम्येषु-हेतु और अनुकूल अर्थ समझा जाय तो फर्मवाचक पद के परबत्ती क धातु के उत्तर फर्तृवाच्य में अट होता है । यथा, हेतु अर्थ में-शोककरः पन्धु. नाशः (शोक का हेतु बन्धुनाश ), अर्थकरः यशस्करः विद्या. लामः ( अर्थ और यश का हेतु विद्यालाम ), क्लेशकरः, क्षोभ- करः, रोगकरः । अनुकूल अर्थ में वलपर पुटिकरं अन्नम् ( चल और पुष्टि के अनुकूल अन्न), हितकरः, प्रीतिफरः, मङ्गलफरः । (ख) पुगेऽप्रतोऽनेषु सत्त:-पुरस् , अग्र, अग्रे, अग्रतः, इन भाई शब्दों के परपती स धातु के उसर फर्तृवाच्य में अट् होता है । यथा, पुरःसर:, अप्रसरः, अग्रेसरः, अप्रतः सरः । (ग) रेट:--अधिकरणवाचक पद के परबत्ती चर धातु के उत्तर भर्तृवाच्य में भट् होता है। पथा, जले वरति जल. चरः, पारिणि चरति वारियरः, स्थले चरति स्थलचरः, भुवि चरति भूगरः, यने चरति यनवरः, निशायां चरति निशाचरः, पार्थे चरति पार्श्वचरः, खे चरति खेचरः (कभी कभी अधि. करणवाचक पद सविभक्तिक होता है), रात्रौ चरति रात्रिचरः रात्रिञ्चरः (रात्रि शब्द विकल्प से द्वितीया-एकपचनान्त होता है), पनेवर। (घ) कर्मवाचक पद के परवत्ती गै धातु के उत्तर कर्तृ. घाध्य में घट होता है। यथा, साम गायति सामगः। (घ) कर्मपाचक पद के परबत्ती हुन् धातु के उत्तर कापाच्य में भर होता है और हन् का म होता है। यथा, ૨૮૨ सुयोध-व्याकरण-कामुदा। रोगहरः, पलेशहरमा शत्रु इन्ति शत्रुमः, पापं हन्ति पापनः, पित्तं हन्ति पित्तम वातं हन्ति पातनः, मित्रं हन्ति मित्रनः, गां हन्ति गोप्रा, पशून हन्ति पशुध्नः, त्रिदोपं हन्ति त्रिदोपतः । अ (अच्) ९० नन्दिप्रहिपचादिभ्यो युगिन्यच-पच् इत्यादि धातु उत्तर फर्तृवाच्य में अ होता है। यथा, पचः cook, बलtrembling, सर्पः, दिव-देयः, वरः, धृ.घर: mountain. (क) हरतेरनुधमनेऽच-फर्मवाचक पद के परयतींद धातु के उसर फरर्तृवाच्य में से होता है। यथा, मंशं हरति शहर:- मागं हरति भागहरः, शोकहरः, दुःखहर, भारवहन अर्थ में नहीं होता, यथा, भारं हरति मारहारः (मण लगा है)। (ख) अहः-फम्र्मवाचफ पद के परपती भई, धातु के उत्तर कयाध्य में भ होता है। यथा, पूजां भईति पूजाई, सत् महति तदर्दः, सत्कारं मईति सत्काराहः, निन्दा मर्हति निन्दाः। (ग) अधिकरणे शेत-मधिकरण यायफ पद परयतों शी धातु के उत्तर कर्तृयाध्य में भ होता था, शिलापा शेते शिलाशयः, मूमौ शेते भूमिशया, शव्यायां शेते शय्याशयः । पार्श्व स्यादि पदों के परबत्तो शो भातु के सत्तर बाध्य में म होता है। यथा, पापेन शेते पाबंशया, पृष्ठम शेते शशा, वशेण शेत मारायः, उत्तानः शेने उत्तानशया, अपूर्वा शेत माग गया। क (अ) (4) मनोग-कर्मयाग परपत्ता काराल धातु के उत्तरमनपाय 4(दोता है और पा केमाका होता है। या, मान पाति AIR, भूमितः, विभवस्यन्त होता है); मनसि जायते मनोजः, प्रकार तथा मकार का लोप होता है । यथा, अन्तं गच्छति सयंगः, सर्वत्रमः, गृहं गच्छति गृहगः, प्रामगः, तरं गच्छति, हद-प्रकरण। २८३ सर्वज्ञः, नृन् फरदः, धनदा, जलदः, वारिदः, तर्नु प्रायते तनुत्रम् ( अपा. दान के उत्तर वा धातु के परे भी होता है। यथा, भात. पात् प्रायते आतपत्रम् ), धम्म जानाति धर्मशः, रसाः, पाति नृपः, भुवं पाति भूपः, भूमिपः, मधुपः। आतश्योपसर्ग--उपसर्ग के परवती आकारान्त धातु के उत्तर भो र होता है । यथा, विज्ञः, अभिज्ञः, प्रदः, प्रतिपः, व्याघ्रः, निमः । (च) सपि स्थः-सुघन्त पद या उपसर्ग के परवत्ती स्था धातु के उत्तर कर्तृवाच्य में अ होता है और धातु के मा का लोप होता है । यथा, गृहे तिष्ठति गृहस्थः, मध्यस्था, धनस्थः, प्रतिस्था, सुस्थः, संस्था, दुस्था, उत्थ: Standing, निष्ठः . skilled in. (७) सप्तम्यां अनेः । उपसर्ग व संज्ञायाम्-उपसर्ग या सुपन्त पद के परवत्ती जन् धातु के उत्तर कर्तृवाच्य में म होता है और धातु के प्रकार और नफार फा लोप होता है। यथा, सरसि जायते सरोजम् , सरसिजम् , (कभी कभी पूर्ण पद मनसिजः, याप्सु जायते अजम् , अङ्गात् जायते अगुजः, जले जायते जलजम्, पड्डात् जायते पहजम्, स्वेदजः, अण्डजः, जरायुजा, सह जायते सहजः, अनु जायते अनुजः, अग्रे जायते अप्रजा, दिजायते द्विजः, यात्मजः, प्रजायन्ते प्रजाः। (ज) अन्तात्यन्ताऽवदूरसारसर्वानन्तेषु :-सुमन्त पद के परपत्तों गम् धातु के उत्तर फर्तृघान्य में य होता है और धातु के . मन्तगा, मध्यानं गच्छति मध्यमः, दूरगः, पारगः, सर्व गच्छति उपमा, खे गच्छतिसगः।

Oilm.n माग - Tr.m.rrforman mitti mantrfastrar ForesthilmiRam Tim, TMTA KE मुग गुग, भुगमा, ATTERugm.giratगम: सपा गति imrine: HENRE TREATital (R)ोगो-nir समम हारे परत गाशंकर गायु के उगा गंगा में होता गौर घामार मार रहा। यया, या भारम्तिमशाद, शोकापदः तमापदः। अ६(क) Segmaari-जिन धानुमो की उपमा में ... प्रादी उसके उत्तर पन्याध्य में भर दोता है और मा का रहता है। यथा, गिरिका, युथ युधः, नुदु-नुदा, नृत् नृतः । ()ी, प मोर ग धातु के उत्तर दृयाव्य में अइ दोता । के स्थान में और के स्थान में र होता है। यथा, प्री प्रियः, प.किरः, ग.गिरः। (स) दुहः का पाए- सुयन्त पद के परबत्ती दुह् धातु उत्तर कर्तृयाध्य में मदोता है। दुह के हफा प होता है । यथा, कामं दोन्धि कामदुधा धेनुः । गिन् १०० नन्दिहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यथा-धातु के उत्तर कर्तृवाच्य में णिन् होता है और णिन् का इन् रहता है । यथा, मन्त्र मन्त्रिन मन्त्री, पद्-धादी, प्रतिवादी, परिवादी, यस्-धासी. प्रवासी, अधिवासी, राघ.अपराधी, चर्-व्यभिचारी, सञ्चारी; स्था-स्थायी, सृ.संसारी, द्विप्द्वपी, विद्वपी, गध-रोधी, के हैत-प्रकरणा विरोधी, प्रतिरोधी; दुह-द्रोही, विद्रोही; दिव-परिदेवी, क- अधिकारी, मय-प्रमाथी, लप-अमिलायो । (क) प्यजाती गिनिस्तान्छील्ये । प्रते। बहुलमाभीक्ष्ण्ये-उपसर्ग और सुबन्त पद के परयत्नों धातु के उत्तर प्रत, शील और पौनःपुन्य अर्थ में णिन् होता है । यथा, वत अर्थ में-स्थण्डिले होने स्थण्डिलशायी, थाइमोजी । शील अर्थ में-उष्ण भुङ्क्त उपभोजी, अनु याति अनुयायी, अनु जीवति अनुजीवी, सोम पिपति सोमपायी, अप्रे याति अग्रयायी, साधु करोति साधु कारी, प्रमादी, सत्यवादी, प्रियवादी, विकत्थी, मनोहारी, विकारी, हृदयग्राही, फणवाहो, पण्डितमानी, सुभगमानी, अनुगामी, सहगामी । पौनःपुन्य अर्थ में -पुनः पुनः मिथ्या वदति मिथ्यावादी, पापकारी, कलहकारी, मित्रद्रोही। (स) करणे यजा-रणवाचक पद के परवत्तीं यज् धातु के उत्तर कर्तृवाच्य के भूतकाल में णिन् होता है । यथा, सोमेन इष्टवान् सोमयाजी, अग्निष्टोमेन इष्टवान् अग्निष्टोमयाजी । (ग) कर्मणि हनः-फर्मवाचक पद के परवत्तीं हन् धातु के भूतकाल में कर्तृवाच्य में णिन् होता है और हन् धातु के ६ का घ और न का त होता है। यथा, पितरं जघान पितृ- धातो, पितृव्यं जघान पितृव्यघातो, पुत्रं जघान पुत्रघाती, मित्रं जधान मित्रघाती। (घ) भविष्यत् काल समझा जाय तो भू , या, स्था, गम् , युध् और रुध् धातुओं के उत्तर कर्तृवाच्य में णिन् होता है। स्था, भू-मावी what will be, यायी, स्थायी, प्रस्थायी, गामी, प्रतियोधी, युध्:प्रतियोधी, प्रतिरोधी। (घ) पिनुण -युज्, त्यज्, भज, रज, वि-पूर्वक विच, सम् पूर्वक पृच् और सृज् धातु के उत्तर शील अर्थ के कर्तृ.

भERTAImmamtat farmirmiti कुन fit filim afri, मा frmatire (nagarnim amit, frerit arti, it. LTTAITगा- पापा TETीमामा मन Rajatra initiमा माग fateg पारितो, तितो. after Tit. गुरि मपि। (मो म पनि मागुनी उपर in mmswasna.in | 4, शनसनी, धमा, परिधी, मो, शमी, मनो, प्रगप्रसा। hirmira-fry गॉर मरस् सन्द के परपती तर पायु केसा पर और समाट शद परपती तर धातु के उत्तर फयाज्य में पारदोता मार थर का मरहता है। या विध मुदति विधु'सुरः बिपिन्तस्य मुम्-मरस् के स् काम दोता ६ पया, भानुपति मरस्तुदः rounding the vital parts, परंतपति परन्तपः, ललाटं शपति सलारत्तपः । N. B. द्विग्नपरपोम्तापे तविहस्य:--पर शब्द के परपसी सापि धातु के उत्तर सर होता है और धातु के आ होता है । यथा, पर तापयति पान्तपः। (क) प्रसूर्यनलाटयो शितयोः । उपमयेरमदप गिधमाश- भसूर्य और उन शरद के परवती दश धातु के उत्तर कर्तु:

फत्-प्रकरण २८७ - पाच्य में खङ् होता है और दृश् का पश्य होता है। यथा, असूर्यम्पश्यः, उन पश्यः। (ख) प्रियवशे वरः खच् । बहाभ्रे लिहः-प्रिय और घश शब्द के परपती पदु धातु के और अभ्र शब्द के परबत्ती लिइ धातु के उत्तर कर्तृवाच्य में खङ् होता है । यथा, प्रियम्बदः, पश- म्बदः, अम्र लिहः। (ग) वाचंयमपुरन्दरौ च --व्रत अर्थ में पाच शब्द के परवर्ती पम् धातु के उत्तर फर्तृवाच्य में खट होता है । पथा, पायमः (मौनती। (५) सर्वकूलाकरीषेषु कपः- सर्व, फल, भभ और फरीप शब्द के परपत्तों का धातु के उत्तर फर्तृघाच्य में खङ् होता है। यथा, सडपः, फूलड्डपः, अनङ्कषः, फरीपङ्कपः । उदिाले जिवो:-कूल शद के परवत्ती उत् पूर्वक रज और यह धातु के उत्तर कतधाच्य में खर होता है । यथा, फूल- मुगुजः breaking down the bank फूलमुखदः । ख-(घ) संज्ञायो भूत्तजिधारिसहितपिदमा-संझा समझी जाय तो विभ्य शब्द के परवती भू, पति और स्वयम् शब्द के पर. पची , सर्व शब्द के परिपत्ती सह तथा पसु शब्द के पर. पत्ती धातु के उत्तर फर्तृवाच्य में घ होता है और खफा भ रहता है। यथा, विश्वम्मरी विष्णुः, विश्वम्भरा पृथियी, पतिवरा, स्वयंवरा कन्या, सव्वंसदा पृथिवी । पमु शब्द के परेन होता है; घसुन्धरा पृथियो । पद--(६) मेघतिभये पत्रः । क्षेमप्रियमय च-मय, प्रिय और क्षेम शब्द के परपती कृ धातु के उत्तर कर्तृवाच्य खद होता है और खट् का आ रहता है। यथा; भयङ्करः, प्रियः, क्षेमङ्करः।

सुयाय.व्याकरण.कामुदा। (ज) नासिकातनयोध्मपिटी: स्तन शब्द के परपत्ती घे धान के उत्तर कनुपाच्य में बट होता है। यथा, स्तनन्धयः शिशुः स्तनन्धवी कन्या। खि १.२ आत्मोदरकुशिषु इति चान्द्राः-कुक्षि और उदर शब्द परवर्ती भृ धातु के उत्तर खि प्रत्यय मोता है और खि काइ रहता है । यथा, कुक्षिम्मरिः, उदरम्मरिः। के ख्य १०३ मनआत्मनने स्या- आत्ममनन अर्थ में कर्मचायक पद के परबत्ती मन् धातु के उत्तर कर्तृवाच्य में ख्य होता भौर ख्य का य रहता है । यथा, भात्मानं पण्डितं मन्यते पण्डितम्मन्यः, कृतार्थम्मन्यः, धन्यम्मन्यः। इ १०४ स्तम्बशस्तौरिन्-शत् और स्तम्य शब्द के परवर्ती कृ धातु के उत्तर कर्तृवाच्य में होता है । यथा, शरत्कार, स्तम्बकरिः। (क) फलेपहिरात्मम्भरिश्व-इ प्रत्यय पर होने से फलेप्रति और आत्मम्भरि पद निपातन से सिद्ध होते हैं । यथा, फलानि गृह्णाति फलेग्रहिः, भात्मानं विभत्ति आत्मम्मगिः । खनट १०५ भादयमुभगस्थूलपलितनामान्धप्रियेपुच्चाप्यचौ कृतः करणे ख्युत् भूननद्वाय भर्थ समझा जाय तो प्रिय इत्यादि शब्द के परपीक घातु के उत्तर परणयाच्य में खनट होता है और ग्यनट का मन रहता है। स्था, अप्रियः प्रियः क्रियतेऽनेन कम्मरुन्, पापात्, मन्नत, पुण्यकृत। रन-करण । २८६ प्रियङ्करणम्, पलितङ्करणम्, नग्नङ्करणम्, अन्धकरणम्, स्थूल- करणम् सुभगङ्करणम्, माढयङ्करणम् । खिष्णु और खुकन् 1. फत्तरि भुवः खिष्णुच सुझमौ-अभूतदाय अर्थ में प्रिय इत्यादि शब्दों के परवती भू धातु के उत्तर कर्तृवाच्य में विष्णु और सुक होते हैं और दोनों का पपाकम इष्णु और उक रहता है। यथा, अप्रियः प्रियो भवति प्रियम्भविष्णुः, वादयामयिष्णुः, प्रियम्भावुकः, आढयम्भावुकः, सुभगम्भावुकः, । णि । १०७ भजोणि:-सुबन्त पद के परवत्ती भज् धातु के उत्तर कर्तृवाच्य में णि होता है और णि का लोप हो जाता है। यथा, अंशं भजते अंशमाफ, दुःखं भजते दुःखभाक् । किम् । १०८ सत्सूद्विपद् इद्दयुजविभिदाचिदजिनौराजागउपसर्गेऽपि विप -- सुयन्त पद के परबत्ती धातु के उत्तर कर्तृवाच्य में किप् होता है और इसका विल्कुल लोप होता है । यथा, सभासद्, संसद्, परिषद्, पुत्रसूः ( पुत्र उत्पन्न करने वाला), वीरसः, प्रसः, धर्म विद, मित्रद्विट्, शास्त्रविद्, धर्मविद्, प्राविद्, गोत्रभिद्, मर्ममिद, पक्षच्छिद्, मर्मच्छिद्, शत्रु जित्, इन्द्र- जिन्, सेनानी:, अग्रणीः, विराट, स्वराट्, सम्राट, जलस्पृफ् । N. B. उदक शब्द के उत्तर नहीं होता । उदकरटश. में अह होता है। ( क ) सुकर्मपापमन्त्रपुष्येषु कृम:--सु, कर्मन्, पाप, मन्त्र और पुण्य शब्द के परबत्ती धातु के उत्तर फर्तृवाच्य के भूतकाल में किए होता है । यथा, सु कृतवान् सुरुत्, फर्म कृतवान् समान का समारम्य का अन्यादा जाताRinni २६० सुयोध-व्याकरण कौमुदी। (ख) प्रद्म त्रेषु किप्-भ्रूण, ब्रह्मन् और वृत्र शब्द के पर पत्ती हुन् धातु के उत्तर कर्तृवाच्य के भूतकाल में किए होता । यथा, 5 जघान भ्रूणहा, ब्रह्महा, वृग्रहा। (ग) सोमे सुत्रः । अग्नौ :-अग्निशद के परवत्ती वि और सोम शब्द के परवर्ती सु धातु के उत्तर कर्तृवाच्य में किए होता है । यथा, अग्नि चितवान् अग्निचिन्, सोम सूतवान् सोमसुत्। किए और पड़ १.९ त्यादिषु दृशोऽनालोचने कञ्च-उपमान घायफ तद, यह, एतद्, मयत्, अस्मद, युष्मद्, भदस्, इदम्, अन्य और समान शब्द के परपती हर पातु के उत्तर फर्मवाच्य में फिप् मार पङ् होता है । विप् का सप लोप हो जाता है मौर पर का भ रहता है। (क) किप भार पर प्रत्ययात दर घातु परे रहने से इ. यद्, एतद, यस्म, और युष्मद् शन के दुका लोप भीर उसके पूर्वीयती फामा होता है। यथा, सइय श्यते साहरू, साइशः, पादप, याद्शः, पता, पताहराः; REमा. हक, सम्मादशा युष्मादक, युष्माइशः । और दुष्णा राग के स्थान में पाचन में मा भीर सद् होने से भी होता या, मामाSITE,तारा। (4) शिप भोर पा प्रत्ययान्त र धातु पर रहने से मदम् का समू, एम् का है. किम् का की, भप का भाषा: चायत भमूर, अमागः भगिम दृश्यत हिमा + पश्यते कहा, कोहरा:; भयानिय रयत मघा । N.D. भरमर शत्-प्रकरण। २११ भवादशः, समान व दृश्यते सदक् , सदृशः; अन्य इव दृश्यते अम्पादक, अन्यादृशः। कनि ११० दशेः इनिप्-फर्मवायक पद के परवती दृश् धातु के उत्तर फर्तृवाच्य के भूतकाल में कनिष् होता है और कनिम् का वन रहता है । यथा, पारं दृष्टवान् पारदृश्या । - १११ अलकृय , निराकृत्रप्रजनोत्पचीत्यतोन्मदरुध्यपत्रपतधुसहचर इष्णुन् । भुवय-शील, धर्म और सम्यकरण अर्थ में सह , रुच् , वृथ् , अलक, निराक, प्रजन् , उत्पन्, उत्पत् , उन्मद्, अपत्रप्, वृत् , वर् , और प्र-भू धातुओं के उत्तर फत्वाच्य में प्णु होता है। यथा, सह-सहिष्णुः, रोविष्णुः, पर्धिष्णुः, अलङ्करि- पुणुः, निराफरिष्णुः, प्रजनिष्णुः, उत्पविष्णुः, उत्पतिष्णुः, उन्म. दिष्णुः, अपपिष्णुः, पत्तिष्णः, चरिष्णः, प्रभविष्णुः । स्नुक ११२ ग्लाजिस्थश्चस्नु- शील इत्यादि मर्थ में जि, भू, स्था और ग्ला धातु के उत्तर कत पाच्य में स्नुक होता है और नुक् का स्नु रहता है । यथा, जिष्णु: Victorious, भूष्णुः, स्यास्नुः, ग्लास्तु: languid. क्नु ११३ प्रसिधिषिक्षिपेः :-शील इत्यादि अर्थ में प्रस्, गृथ्, धृष् और क्षिप् धातु के उत्तर कर्तवाच्य में है और धनु का नु रहता है । यथा, त्रस्नुः timid, गृध्नुः Breedy, धृष्णुः bold, क्षिप्नुः throwing. पन होता सुबोध-व्याकरण-कीमुदी। उकन ११४ लपपतपदस्थाभूपहनकमगमशृभ्य उम्म् --शील इत्यादि अर्थ में कम्, लप, पत्, पटु, स्था, भू, घृष्, हुन्, गम् मौर शृ धातु के उत्तर कर्स याच्य में उफ होता है और उकम् का उफ रहता है । यथा, कामुकः, लापुकः, पाटुकः who goes on foot, स्थायुकः. भावुकः, वर्ष कः, गामुकः, शारुकः, हन् का धात् होता है; घातुकः । आलु ११५ स्पृहिगृहिपतिदयिनिद्रातन्द्राश्रद्धाभ्य आलु-शील इत्यादि अर्थ में दय, नि और तन पूर्वक द्रा, धत् पूर्णक धा, शी, गृहि, स्पृह और पति धातु के उत्तर फर्त याच्य में भालु होता । यथा, दयालुः, निद्रालुः, तन्दालुः, श्रद्धालुः, शयालु: sleepyi Pइयालुः, स्पृहयालुः, पतयालु: talling. घुर १५६ भाभामिदो पुराच -शील इत्यादि अर्थ में भार मास् के उत्तर पत याच्य में पुर होता है । गौर पुर का उर रहता है । यथा, गर, भासुरः, मेदुरः smooth, coft. क्ष्याप ११७ नजिसिया क्याए-शील इत्यादि में , .जि, ए भोरे गम् धातु के उत्तर कर्तयाध्य भर होता भौर स्या का गर रहता है। यथा, नायर, स्य:, मयाः । गोप-गम् के काम होता है; गरयः । और मिद् धातु छत्-प्रकरण। र ११८ ममिकम्पिाम्य जसकमहिसदीयो स-शील इत्यादि - रम् , कम्, हिन्स् , स्मि, कम्प् , अजस्, और दीप धात उत्तर फर्तृवाच्य में रहोता है। यथा, नम् नम्रः, हिन्स्- मेरः, कम्प्रः, अजनः eteraal, दीपः shining. उ १२९ रानासभिक्ष 3.1 विन्दुरिच्छु:-शील इत्यादि अर्थ आपूर्वक शेस् , ए , भिक्ष और सनन्त धातुओं के उत्तर ए पाच्य में 3 होता है। यथा, आशंसुः desirous. १५ पर होता है; इच्छुः, भिव:, जिससुः, पिपासुः, युभुशुः, फी, पियक्षः, जिपृशुः, wishing to take, जिनांसः, तीपः, ईसुः, दित्सुः, लिपुः, जिगीपुः । घर १२.स्पेशभासपिनको परम् । परच य:-शील स्वादि में स्था, ईश, भास् , कस् भोर पडन्त पा धातु फे. उत्तर फबार में घर होता है। यथा, स्थावर परभार पदका लोप होता है-यापाय: borse. ११ शा। यजमार :--ल स्यादिमध में : धातु तथा यहन्त पक्ष, जप, २४ और दश धानु . उफ होता है और यह का लोप होता है। यथा, सागर ".019**: cac ubo performs sacificcs laguy. जणूका, यायमः, पाकः।

२१४ सुयाधयाकरण-कामुदा मदि, दूषि, गदि मौर १२२शील रयादियं में म्ननि, कति धातुमी के उत्तर न होता है। यया, स्तनयिटनु clord, मnि mnd man, दूपपिरनुः vitiating, गदयिटनुः talkative वर्षयिन्नुः। पमर १२३ यघरपः यमरण-शील इत्यादि अर्थ में घस् , मदु योर म धातु के उत्तर पर होता है और इसमें मर रहता है। यथा, धस्मः, अमरः, समरः going. । १२४ विदिभिनिधिदेः करम् --शील इत्यादि अर्थ में सिद्ध, मिड़, और यिद् धातु के उत्तर फुर होता है। यथा, छिदुरः cut. ting, मिदुरः, विदुरः who knows. , १२५ दाम्नीशमयुजस्तुतुदसितिमिहपतदशन करणे-फरण अर्थ में दा, नी, स्तु, शस्, यु, युज् , तुइ, सि, सिन् , मिह , पन्, दन्श् , न इत्यादि घातुओं के उत्तर कर्तृवाच्य में होता है। यथा, नयति भनेन नेत्रम् , दाति अनेन दात्रम्-sickle, शसति मनेन शत्रम् , स्तौति भनेन स्तोत्रम्, पतति भनेन पत्रम् , दशति अनया दंष्ट्रा-jaw. इन १२६ अतिधूमुखनसहचर इमः-करणाच्य में पू, यर , यह । पन्, छ, ऋ, धू, सू और सह धातु के उत्तर होता है।

कूद-प्रकरण। २६५ यथा, पूर्यते अनेन पवित्रम् , चरित्रम् , यहित्रम्, खनित्रम् इत्यादि। इ (कि) १२७ उपसर्गे घोः कि:-उपसर्ग और अन्तर् शब्द के परवतों घा धातु के उत्तर भाववाच्य में होता है और धातु के आ. कार का लोप होता है। यथा, विधिः, निधिः, सन्धिः, याधिः, अन्तद्धि: disappearance. (क) कर्मण्यधिकरणे च-कर्मवाचक पद के परबत्ती धा धातु के उत्तर अधिकरणयाच्य में होता है और धातु के आकार का लोप होता है । यथा, जलानि पीयन्तेऽस्मिन् जल- थिः, पारिधिः, पयोधिः, जलनिधिः, पारिनिधिः, पपोनिधिः । निमक १२८ हिसः कि:-पपाट काल में जो धातु डु-संसृष्ट हों उनके उत्तर सन्नित अर्थ में त्रिमय होता है और इसका त्रिम रहता है। यथा, -क्रियया निवृत्तम् फत्रिमम्, दा का दत् होता है.दानेन निवृत्तम् दात्रिमम् , पाकेन नितम् पक्तिमम् । अथु १२९ द्वितोऽथुच्-गणपाठ काल में जो धातु टु-संरएट हों उनके उत्तर भाववाच्य में अधु होता है। यथा, घेप-वेपथुः, रम्-मथुः, विश्वप: swelling. अनि १३० आक्रोशे नन्यनिः-न के परपत्तों धातु के उत्तर भाव. पाच्य के आगोश अर्थ में अनि होता है। अनि-प्रत्ययान्त शब्द खालिङ्ग होते हैं । यथा, जीय.मजीवनि: non-existence, जन्-भजननि: privation of birth.

सुयोध-व्याकरण-कौमुदी। - मंधि- चि-चयनम्, अन १३३ ल्युट् च-भाववाच्य में धातु के उत्तर अन होता है अन-प्रत्ययान्त शब्द फ्लीयलिङ्ग होते हैं । यथा, गम्-गमनम् भुज भोजनम्, शी-शयनम् , यमनम् , भा-रुद्द आरोहणम् , मक्ष णम् , चलनम् , पतनम् , क्षरणम् , स्खलनम् , रक्षणम्, मा- णम् , गर्जनम् , लनम् , स्यन्दनम् , तर्पणम् , मननम् , इ-अध्ययनम् , पञ्चनम् , खण्डनम् , पानम् , दानम्, गानम् । प्राणम् , ज्ञानम् , विधानम् , आ-धा-आधानम् taking. st- मानम् , मानम्, शि-श्रयणम् श्रषणम् , करणम्, भरणम् , मरणम्, धरणम् , स्मरणम् , हरणम् , दर्शनम् , स्प. शतम् , सेचनम्, रजनम् , नत्तनम् , मन्धनम् , रोदनम् । N. B. मन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः-मन्दि इत्यादि धातु के उत्तर कर्तृवाच्य में अन होता है । यथा, मन्दिनन्दनः, मदि.मदन; माध- साधनः, पदि-यईनः, शोभि-शोभनः, सह-सहनः, तप रापनः-The suny दम दमनः, रम रमयः, गदि मुदतः, मोवि भीषणः, नाशि-नागना ! यमण्डनायम्यध-मोपाय और माना पान र बारय में गील इत्यादि अर्थ में मन होता है । यथा, हुमोपना, और फोपना, भा-म भामर्षणः, मवाना, मलारण: ornmment. २ पड्यम्य दन्द्रय गृ गृधि ज्यल शुचलप पर-पा:- शीस इत्यादि भ में पल इत्यादि धानुभो के उपर कारप में मन सका है। था, असन: fire, शौचना, पईना, चलना, बना। अनन् । (4)मरण भीरमधिकरण में धातु होता है और मका भन रहता है। मनरपश्ययात पहीयाहिम दोने । यथा, भनीत AIRE, 2. A me होता है-रागः, मङ्-मङ्गः, सङ्ग्सङ्गः। ली-लया, नी-नया,हवः, रवः, स्व-प्रयः, स्तु-स्तयः, भूमियः, मी-मयम्, पृ-वम् , जपः, धि-ध्रयः, वि.चयः, प्रहः, मद, अस्मिन् स्थानम् । बोधः, खेदः, मर्शः, स्पर्शः, दंशः, भेद, हर्षः। कृत-प्रकरण। २१७ लोच्यते अनेन लोचनम् , चर्यते अनेन चरणम् , क्रियते अनेन करणम् , साध्यते अनेन साधनम् , भूप्यते अनेन भूषणम् , मण्डयते मनेन मण्डनम् , यायते अनेन यानम् , बाह्यते अनेन पाहनम् , अधिमाते अनया अधिरोहिणी। अधिकरण अर्थ में- शप्यते अस्मिन् शयनम् , भूयते अस्मिन् भवनम् , स्थीयते घन १३२ भावे । कर्तरि च कारके संज्ञायाम्- भाववाच्य में और हतु मिन्न फारकवाच्य में धातु के उत्तर घञ् होता है । घम् राम रहता है। यथा; पच-पाकः, त्यागः, नाशः, शोकः, भुज- रोगः, गेगः, वासः, पातः, पादः, शापः, तापः, दाहः, ध्रु. वि: dropping, लामः, लापः, पाठः, युज्-योगः हासः, हिः, स्यादः, मादः, हारः, लासः, यागः, भागः, स्पर्शः, इन्ध. एषः, चि-फायः, यि च भावमणोः- रज् के न् का लोप अ (अल) १३३ भाववाच्य में और कर्तृभिन्न कारकवाच्य में धातु के उत्तर म होता है। यथा, जि जया, क्षि-क्षयः, स्मि-स्मयः, मोदः, श्लेपः, रोपः, मोह, दोहा, क्रोधः, कोपः, सोमः, तोपः, खल् १३५ ईषःसुपाच्छापु सल्-- सु, दुर् और ईपत् शब्द :- .

भाववाच्य में अ होता है। यथा, मिझा, सेया, आकांक्षा- परीक्षा, दीक्षा, निन्दा, खेला play, रक्षा, शङ्का, अर्था, मुर्गा लजा,प्रोडा, क्रीडा, मेधा apprehension, बाधा, मनुकम्पा- ईया, हिनता, असूया, घाझी, प्रहर omission, माशंसा, के परगती धातु के उपर कम्गाय मार मारशस्य में होता है भारतका प्रहता है। या, ह.मुकर, तुम tarकर, गम्-तुगमः, दुर्गमः, विनमः, यह सुगर, दुई पद्रदः, मुख्यतः, श्यजः, ईपत्यजः, सुनमः, दुर्लमः, खल् और अन (युच) १३५-मातो युर। माया शामियुधिशिपिपियो युनाम- सु. दर् और पत् शद परपत्ती शास्, युए, दृश् , भौर मृ धातु के उत्तर फर्मवाच्य में बल और मन हो- है । यथा, शास्.सुशासः, सुशासनः, दुशासः दुशासन सुयोधः सुयोधनः, दुर्योधः दुर्योधनः सुदर्शः सुदर्शन दुर्दर्शः दुर्दर्शनः; मुघर्षः सुधर्षणः; दुर्घः दुर्घर्पणः; सुम सुमपणः, दुर्मर्पः दुर्मणः। अ १३६ अप्रत्ययात्- सन् प्रत्ययान्त धातु और नाम धातु उत्तर भावयाच्य में होता है। अ-प्रत्यय से बना हुआ शन स्त्रीलिङ्ग होता है। पथा, सनन्त-जिज्ञासा, पिपासा, विकीप- जिगोपा, लिप्सा, जिघांसा wishes to kill विपित्ता मीमांसा, जुगुप्सा । नामधातु-तपस्या, वरिवस्या service भशनाया hunger, पुत्रकाम्या, कण्डूया itching. (क) गुरोथ हल:-गुरु स्वरयुक्त व्यञ्जनान्त धातु के उत्तर प्रशंसा।

•याख्या designation, संख्या, अभिख्या, संस्था, अवस्था, . कृत्-प्रकरण। ..२६६ (ख) चिन्तिाजिकधि कुम्विचच--चिन्ति, पूजि, फथि, वधि, स्पृहि, दोलि, पीडिभौर शोभि धातु के उत्तर भाववाच्य में स होता है । यधा, चिन्ता, पूजा, कथा, चर्धा, स्पृहा, पीडा, शोभा। (ग) निद्रिादिभ्योऽस-जो धातु गणपाठकाल में यकार. संसृष्ट हो उनके उत्तर भाववाच्य में भ होता है । यथा, अपा, न्यथा, त्वरा, पचा । मृज् का गुण नहीं होता; मृजा purication. भिद् इत्यादि धातु के उत्तर भाषयाच्य में भ होता है। पा, मिदा separation, कृपा, तृषा, क्षमा, दया । (घ) इन्छा (शः)-- प्रत्यय होने से इप का इच्छ् और छका पृच्छ होता है । यथा, इच्छा, पृच्छा asking. (1) भातश्वीपसमें-उपसर्ग के परबत्ती भाकारन्त धातु के र भाववाच्य में भ होता है। यथा, आभा, प्रमा, विभा, मा, प्रभा perception, उपमा, अनुमा infirence, मा, विधा, व्यवधा, अविधा name, सन्ध्या, उपधा, न और अन्तर के परे भी धात में होता है; श्रद्वा, अन्तर्धा ) मशा, प्रज्ञा, धनुज्ञा संज्ञा, थधज्ञा, प्रतिज्ञा, उपशा, आशा, निष्ठा, प्रतिष्ठा, आस्था regard. अन १३७ व्यासभस्यो युच्-णिजन्त धातु के उत्तर भायाध्य में मन होता है । मन प्रत्यय से बना हुआ पद स्त्रीलिंग होता । यथा, अधि-अर्चना कल्पना, कारणा pain, गणना, धारणा, पारणा, वि-मानि-विमानना dishonour, यन्त्रणा, सुयोध.ध्याकरण-कौमुदी। यातना, वासना | कहीं २ क्लीयलिङ्ग होता है; प्रेरणम् प्रीणन- तर्पणम्, शोधनम्, साधनम्, गोपनम् । वन्द, विद्, आस्, इप, प्रन्यू और अन्य धातु के उस भाववाच्य में अन होता है। यथा, चन्दना, घेदना, आसन seat, ग्रन्थना, थन्थना stringing flower. न (नङ्) १३८ यजयाचयतविच्छयक्षो नहन्यज, यत्, स्वप, म याच् और तृप् धातु तृप् धातु के उत्तर भाषयाव्य में न होता है यथा, यज्ञः, यतः, स्वमः, प्रश्नः याना, तृष्णा । यक् । १३९ अजयजो वे क्या-यजु घर और पिदु धातु के उत्त भाववाच्य में यक् होता है और यष का य रहता है। यह प्रत्यय से बना हुआ शब्द स्त्रीलिङ्ग होता है। यामात्र wandering about, प्रयज्या, गरिमत्या, या, परि चा, विद्या (क) सज्ञायां समनिपानिपतमनविदयुन्शोध मृमिणः । इलाशप- ह, शी, यज् मृग धातुओं के उत्तर या होता है और निश लिखित पद निपातन से सिद्ध होते हैं गया, किया, सध्या शी-शय्या, यज-ज्या, मृग-गृगया। उणादि-प्रत्ययान्त शब्द । पुंलिङ्ग। गु-संश् + कु मल-मा- गलय RUTH + पति-गनि मजलि- मगलिय मतिपि.infy- भरमाच् मणु-मण +8 : मनात भानुभाभत म जहाभत से हलत सम्म पाई। मे, 'म'को मण समझना चाहिये । मध्यम छत्-प्रकरण । अरि- पर्चक अचिर मर्च +स् प्र.म+भन् मलि- मसि मनल-अन् कलच् ऋषम प्+अमच कुरङ्ग- अलच मनिल-मन् इलय् ऋषि-ऋष+इन् पुलाल-कुल+काटन् .अन्त-मम्म्तन् मोदन 1-उन्द्+युच् कुष्ठ-कुर+क्यन् माद-अय+दन थोष्ठ-उपक्थन् कूप-कुक्प पक्ष-कास कृशानु-ए+आनु मरण-+उनन् कडालक कालच् छपक-ए+पथुन फण्ठ-कण+४ केतु-चि+तुन् कपि -कम्प्+ केलि-केल+इन् फपोत-फय्+मोतच् कोकिल-कुष इलच् कपोल-कप्+मोलच् प्रतु-+मुन् भ-अश+पयन् फमठ-फम्+अठ प्रिमि-यम्सन, मस्+६ कम्पल-कम्पल शुरशुरन् माय)-मस्+3 फरम- मम पद्गासम्पन् मसुर भस्#उरन् पर्फट फर्फ +मटन खण्ड-खन्+: मन्त्र-मस्कएन् फर्ण-शानक खुरपुर रन भारमन् मत्+मनिन् कदम.फ मम् गण्डगम्+८ शुर+मु फलि.फलान् गर-गउपन् गर- उति तुर.उन्दु+उरच् काक..न् गत्त-गृस्तन काय-ए उप गरम-गरम कासार-फास्+भारन् गर्भ गृ+मन् फिशोर-कि- मोरन् गर्य-गम्य इन्-37+मनिन् दुमकुर कुरा उरम् गिरि- कुक्षि पवित गुप्त पुन्दरिन् गुल्म-गरमा पुस्मार-कुम+भारन् गध्र.एप्पन कवि भान उस उन्तु+स शाभूस गुपचियाकरण-काया। गो-गम हो पाणिपणन गोधूम गए मम् उरम् पितु पार गोमागु.गो-मा+उपम পিগবিশিষ্ট प्रन्गि-प्रन्य+गुनसायुग मण पाम प्रस्+मन् पियम्-पिण+ममन् मम पा+हुममुन् प्रा+प पार्म:मन् पुरुषः कुन् प्रीतम.प्रर+मा घातु-चा+न् पूग-पू+गन गलो.ग्लै+ धापा-या व्यग्य पांत- -+तन् पर्म-ध+मम् पूम-घू+मा लीहन्-प्ली कनि गडाल.घण्द+भालच् धत्तं धूम्र्य +तन फेन म्फायनिक चन्द्र-चन्नु र धूलि-ध+लिए यनि-यणनि डाग-छो+गन् नियन्+s पदर-प+मर जन्तु-जन्+तुन् नखानह+a यधिर-धन्ध किरय जरठ-ज़ अठच् नापित-न,भाप्+तन् पन्धु-यन्ध+3 जरायु-जरा-इ+मुण निशीथ-नि-शो+य यलि-बल्+इन् तक्षन-तस्+फनिन् निष्क-नि-सद+फन् याहु-यम्भुण तण्डुल-तण्ड् उलच् नृ-नी+ऋ विन्दु-बिन्दु तनय-तन्+कयन् पक्ष-पण+स तन्तु-तन्+तुन् पतन-पत्+अङ्गच तमस्+तम् असुन पधिन्-पत्+इथिन् भवत्-मा+डरतु तमाल-तम् कालन् पनस्-पन+असच् भानु-भानु तरङ्ग-त+अलच् परशु-पर-श+कु भिदु-भिद्कु सर-ताउ पर्जन्य-पृए+अन्य तालु-तत्रुण पर्यत पर्य+मतच् भृङ्ग-भृ+गन तुपार-तु+आरन् पशु-दृश्+कु भेक-भोकन दएड दम्+ड प्रांशु-पन्श+कु भेरि-भी+विग्रन् ब्रह्मन्-वृह मनिन् मल्लूक-मल्ल ऊक भिपञ्-भी+भजि .

माजिर-मू+आरन् यत्स-बदु+सलच् मुकुर-मक् + उरच् पर्ण-पृ+ नक् कृत-प्रकरण । ३०३ मणि-मण +8 मण्ड-मन् +3 न्यु-मन् + युच यूर-मि+ ऊरन् भ्रमर भ्रम् + फरन् मुक मुए + के यहिस्-वृहि + इसि मातृ वाज् + तृच् मूर्ख-मुह् +ख चलय-बल् + कयन् मघवन्-मह् + कनिन् मूषिक-मूष + किकन् वसन्त-स् + अच् मृगायु-मृग-या+कु घात वा + त मृदङ्ग-मृद्ध + अङ्गच् वापि-या + इन् मण्डूक-मण्ड् + ऊक यति-यत् + इन् वायस-वय्+अलच् पसर-मदु+सर याम-या + मन् वायु-या + उन् रस्य-मद् + स्यन् युवन्-यु + कनिन् घासर-यास् + अर यूथ-यु + थक विटप-विट् + कपन यूख मा + ऊख विडाल-विट+कालन् यूप-यु+प रज्जु-िसृज् + उ विधु-व्यध् + फु राल-मृ + थालच् रथ-रय् + क्थन् विप्र-वप् + रन् + इर्यि रभस-गम् + असच वीचि-वे + ईचि रवि-5 वीर-अज् + रक स्त-मृ+ उति राजन्-राज + कनिन घृक-वृ+ कफ कर-मर्फ, + अटन् राशि-अश् + इण वृक्ष-मश्च+ फस् रासभरास् + अभच वृश्चिक-यश्व+फिकन व्य-मल् + कयन् राहु-रह+उण वृषम वृप + अभ सा-मस् + इन् रिपु-रप् + कु वृषल.कृप+ फल मसूर-मस् + ऊरच रणु-री+नु घेणु-मज+नु महिप-महू + टिपच् चटु-यट् + उ घेतस-ये + असच घेत्र-वि+ मिहिर-मिहफिरच् घत्सर-घस् + सर पेधस्-वि-धा+असि घरुण-वृ+ उनन् शकुन-शक् + उन शकुनि-शक् + उनि ययर-धु + घरच् शकुन्त-शक् + उन्त रोचि-म -मृ+तन मीन-मी+नक् मुनि-मन +8 ३०४ सुयोध-व्याकरण.कौमुदी। स्तूप-स्तु+ हनु हन् +3 विस्-हु + इसि शक्तु-शक् + तुन् शोथ-शु + थन् सेतु-सि + तुन शङ्यु-शड्क् + उ श्येन-श्य + इनच् सोम-सु मन् . शत-शम् +ख श्वन्-शिव + फनिन् स्तम्ब-स्था + मय- शत्रु-शद् + यन् पण्ड-सन् + ड शपथ-शप् + अयच् सखि-स-ख्या + इन् स्तोम-स्तु + मन् शम्भु-शम् भू+डु सर्षप-स + थाप हंस-हन् + स शरणि-शृ + अनि साधु-साध + उण शलभ-शल अभच् सारथि-स + अथिन् हरि-ह + इन् शार्दूल-श+दूलव् सार्थ स + कथन हरिण-हरिन शिशिर-शश+किरच् सिन्धु-स्यन्द + उ हरित-ह+इति शिशु-शो + उ सुर-सु+ यत्रन् शुक-शु+ फक् सूनु-सू+नु दस्त-दस्+तन् सूप-सु +4 हेतु-हि + तुन शुजार-शु + मारन् सूरि-सू + पित्रन् होम- क्लीवलिङ्ग थम- मर अख-अस् + ट्रन शामिन अज+इनच् अस्थि अस् +कपिन् कमल-कम् + फलच पजिर भ+किर भायुस् + उसि फर्मन+मनिन् भनीय-मन्कन् दध्म-न्य + मर कलुष कल् + उप मम्बर-माय मरन् उरस्.प्र + मसुन् कयय-यु+भय् म्यु.अग्य+3 उधम्-यद + असि काष्ठ-काश+ फधन अगस्-आप्शन शक्य अग् + एक किटियपशिल+ष्ट्रिय अप+मगुन् मोकग उय्+भएन् कुण्डल-कुण्द कर Aण्य-+ भाप भोजर मोज+भएन सीदवार भरस् + उसि कमककान +1 कपाल.फप+काल धम्मेन-वर मनिन् धनुस्-धन्+उसि छन्.मकरण । दामन दो मनिन् क्षीर-घस्रन् तिमिर-तिम् किरच् पाताल-पत्+पालन क्षेम-शि+मन् तुहिन-तुहानन् पात्र-पा+प्रन् क्षेत्र क्षिन्ि तृण-तृदक पाप-पा+प गगन-गम्युच् तेजस्-तिज+असुन् पाप्मन् पा+मनिन् गहरगाह प्यरच तोय-तु+कोय पिशित-पिशाक गात्र गम्+प्रन् दात्र-दाखिन् पीयूष-पीय ऊपन् गोत्र-गु+पत्र पुण्डरीक-पुण्डक चा-चक रक् दाय- पुण पुण्य-पु+हुण्य धनुस्-चक्ष उसि दिन-दो+किनन् पुरीष-पाइपन् घटयर-चत्+प्याच् द्रविण-दु+इनन् पुलिन-पुल+नन् पुष्कर-पुर+फरन् घेतस्-चित् असुन धान्य-धा+यत् उत्रादु+न घामन्.धा+मनिन् पृट-पृ+य मानन्-ए+मनिन् नक्षत्र-न-क्षिात्रन् बाप्प-यापक एन्दस् छन्दुमिसुन् नभस्-नद मसुन् मद-मदार सिद- विनर मम्मन्-नृ+मनिन् मम्मन्-भस्+मनिन् जगत्-गम्मति नलिन-लहन भुवन-भूपियुन् अतु-जन्+3 नामन्-म्ना+मनिन् मङ्गल-मग मलय ज-जन्+6 नीर-नीष मधु-मन्+3 जन्म-जन्मनिन् पक्षमन् पक्षनिन् मनस्-मन् मान् जानु जन्+उण पटल-पद्+क्लयू मन्दिर-मन्द फिर पकतरफ मर्मन्-+मनिन् दमपदु+मन् ममर-मिरन् पपस्-पर+भमुन् मल-म फल पर्ण-प+म मम्-मस्तु म्यूल-गम् +उगए पप्पन प+पनि मौस-मन्स पृषत-प+भनि -सन्+न रिस-स+ममुन् सुयोध व्याकरण-कौमुदी। शालूक-शल+उक मिथुन मिय+उनन् घंश-यन्+श शरीर-शारद मुफुट-मकाउट घक्त -यक्+क. शर्मन्-श+मनिन् मुख-खन्+अच् यशम्-यह अमुन् शल्य-शल्य मुमल-मुस्+फल घचस्-य+असुन शष्य-यस्+प मेदस्-मिदु+अमुन् यपुसि-यप् उसि शस्त्र-शस्+प्रन् यक्ष्मन्-यक्ष+मनिन् यप्र-यप्रन् यजुस-यज्+उसि पयस्-धी+असुन् शिरस्.श्रि+असुन यन्त्र-यम्+त्रन् वर्थस्-यर्थ +असुन् शिल्प-शील्प यशस्-अस्+असुन् पर्मन-वृत्+मनिन् शिव-शी+यन् युग्मन्युज मक् वर्मन्-वृ+मनिन् शिविर-शी+किरन् रहस्-रह असुन् वसु-यस्+3 शीघ्र-शिधारक रक्षस्-रक्ष+असुन घस्तु-वस्तुन् शील-शी+लक रजस्-रक्ष+मसुन् यस्त्र-यस्+ट्रन् रल-रम्म्म् पारि-नाम् शूर्प-शप राष्ट्र-राज+प्रन् घासस्-यस्+असुन् शृङ्ग-श+गन् रुषम-रच्+मक शिपिन-वेप+इनन् शोचिस्-शुपसि रुधिर-रुध्+किरच् विश्व-विशधन् श्रोत्र-श्रु+प्रन् रूप-कप पुजिन-वृज+इनच् सदस्-सद+भपुन् रेतस-री+समुन् घेतन-धी+तनन् रोमन्-हामनिन् मन्ये+मनिन् सलिल-सल्लय् लबङ्गल मगच् वेश्मन्-विश+मनिन् सिन्दुर स्यन्दु+उरन् स्टाइल-लङ्ग उलच् व्योमन्-ध्ये+मनिन् स्रोतस्.स+मसुन् हाल-लङ्ग उलच् शफल-शक फल दिम-दन+मर गलोमन-मनिम् शत्-श+तिन् हृदय ह+जयन् शत शो+उतम् हेम-हिमम् शुपिर-शुप+किरच सरस्-स+असुन् लोहित-बहन पर कृ + ऊरच पाति-की+स्वच्-तन् +चिक् घट्या-खट् + फन् धरणि-+ अनि प्रदणि-ग्रह + धनि ना- नुडो एत-प्रकरण। ३०७ पुंलि और सीवलिङ्ग भारमा + भार फरक-श3 पल्यल-पल् + पल मामिप-यम् + रिपकिरीट-5.+फोटन् मुकुल-मुच् + उलच् कहत-कम् +स फोदण्ड.पु.पण+अण्डच् यम-यन + रन् कम्बुकम् +3 घाटु-चट + पूण मिन्दु-विदु +3 करीप+ पन् तीर्थ-त + एक शकट-शक् + मटन स्त्रीलिङ्ग अंगुली यह उलिच् छाया-छो+ य पृथ्वी-प्रथ + पियन् भाजि-अ +इन् जाया-जन् + यया पेपणि पिम् + अनि धालु प्र + उ जिहा जिद + फन् फरगु फल्द + गुक् हटका. + तकन् तडित्-इ + इति घधू-यह +3 तनु-न् +3 पन्ध्या-वधू +यक उपस्व + थनि तरणि-तृ + अनि भ्रमि-मम् + इन् फत्तरी कृत् + मरन् तृष्णा.तृर+न मक्षिका-मश+सिकन् दुहित दुह् + तु मदिरा म+फिरच मसूरी-मस् + उरच धेनु-धे + नु महिला-म -मह् + इल नाभि-नाट् + इम् मदी-मह +६ गाया- पथन् । नेमि-नी + मि मात-मा+हच् माया-मा+य पताका-पत् + थाकन माला-मा + चन् पृतना-पृ+तनन् मुद्रा-मुद् + रक् पृथिवी-प्रय + पिधन् यात-यत् + अन् ऊर्मि.+मि कृषि कपू + इन् धनि बन्न गड्डा-गम् + गन् चक्षु- याउ चमचम् + छवि-छो ३०८ सुयोध-व्याकरण.कामुदा सरणि-स् + अनि सरित्-स + इति +स स्नूपा-स्नु योपित्-युप् + इति यागुराया + उरच् शटाका-शल्+आफन् रजनी-रज+अनि घोणा-यो+न शिखा-सी +ख रशना-प्रश् + युच् पीथि-विथ + इन् श्रेणि-धि+नि रात्रि-रा+ त्रिप् घेणि-धी+नि लालसा-लल+असुन् वेदि-विद् + इन् पत्ति-वृत् + इन् शरद-शृ+ अदि सिकता सिक् प्रत पलि-चल, + शर्करा-श+ करन् वसति-घस + अति शयरी-श + प्वरच् स्वस-मु+अस्+ऋन् विशेपण अम्ल-अम+क्ल क्रूर-क+ रक् तिग्म-तिज् + मक भाद अद् + रक् क्षिप्र क्षिप + रक् उष्ण-उप + णक् क्षुद्र-क्षुत् + रक् घरज- +कु गभीर-गम् + ईन् गम्भीर-गम् + इरन् दारुण-द + उनन् फठिन-कट् + इनच् गोर-गु + रन् दोन-दी+नक कठोर-फट+भोरन् चश्चल-चञ्च+अलच फपिल-फम् इलच् चटुल-च उलच् फरण- + उनन् चण्ड-चन् +3 फश्मल-कश् +मल चतुर-चत्+उरच् फिम्यदन्ति-किम्-पद् चपल-चुप्+फल +भिन् चरम-यर् + अमच कुटिल-कुद्+फिलच् चाद-चर् + उण पीयर-पा+ प्याय कृत्स्नातकस्न विधाण-चित्+कण कृष्ण+मक् तरल + कल पृथ-प्रथे + कु कोमल कुमल क्षण- + उनम पेशल पिश + मलयू तीक्ष्ण-तिज् + पस्न तीव-तीव् + रक् । दक्षिण-दश् + इनन् धवल-धाप+ फल धूसर-धू + सर पंगु-पण +3 पटु-पट +3 पाण्डु-पण्ड +कु पिशुन-पिश् + उनन् पुष्कल-पुर + कलय कृत्-प्रकरण ३०६ भीम-भी+म भीर-मी+म. मन्धर-मन्थ+अरच मलिन-मलू+इनन् वृहत् वृह + अति प्रथम-प्रथ + अम रक्षारह किस शिथिलश्रय किरन् यह यह+कु रुचिर-रच्+किरच शुक्ल-शुच + रक् भयानक-भी+आनक लघु-लड + कु शुचि-शुच् + इन् वक-यरक शुभ्र-शुभ + रक् उदान्य-पद्न्यान्य श्याम-श्य + मक भूरि-भू + छिन् वरेण्य + एन्य सरल-सृ+ फल पतल-वृत्+मलच् सूक्ष्म-सूच् + मन् घाम- घाम स्थावर-स्था+किरच महत्-म + अति विदुर-विद्+कुरच् स्थिर-था + किरच् मुहस-मुह + उसि विशाल-विश+कालन् स्वादु-स्वद् + उण मृदु-मृद+कु Exercise---39 I. What is the difference between the use of ar & पर and n करतु? 2. Gve ome word for:-शास्त्राणि करोति इति । प्रभाकरोति इति । हितं करोति । पूजामहति । ललाट तपति । शव जबान । अयमित्रएश्यते । वक्तुमुचितम् । इन पाति । वसूनि घरति या । मीयते तेनेति । अप्रियः प्रियः भवति । प्रियं वदति यः सः 1 काम दौग्धि था। निशायो चरति इति । तमोऽपहन्ति यः। 3. Derive--हानिः, शान्तिः, जनक, पाचका, रज, इन्ता, सविता. चाटुकारः, विभाकर, शवप्न , अंशहरः, मधुपः, युधः, विद्रोही, स्थायी, विभी, परिश्रमी, परन्तपः, विश्वम्भरा, भयभरः पण्डितम्मन्या, भारमभरिः, दु:खभाक, परिषद्, सम्राट, तारयः, सहिष्णुः, धानुक, निमायुः, मासुरः, मरवरा, हिंसः, लिप्सुः, ईश्वरः, विदुरः, शस्त्रम् . परिधम्, पारिधिः, वेपथुः, अध्ययनम् . वाहनम् , स्वा, भयम् , क्रोध, एषांपाकरमाकामुरा त्यः)। ATri-गानु कार पाले सम् पारि गर्ग के एरोना है और सुरका स् गदता है। rar:I गया तो मोगमा ५-मूगा मीर समूह मर्य में राम्, परिमौर क क धातु के पहले सुर होना। पण संकरोति (मूगनीदयः) संपुर्यन्ति (सहोमगली. রথ মামাশায়মাৱাই বি, সিনাই पाफ्यायादार (माकाशित एकदेश पूरण) अर्थ में उप पूर्णक ए धातु के पहले मुर होता है। यया. उपस्रय कन्या ( अलं. हत्येत्यर्थः ), उपस्त्य माझगाः (समुदिता इत्यर्थः ।, एधोदक- स्योपस्कुरते, गुणाधान करोति; उपरत मुक्तः (विस्तमित्यर्थः) उपस्तं व्रते (पाक्याध्याहरेण ते इत्यर्थः)। ४ हिंसायां प्रवेध-हिंसा अर्थ में उस और प्रति पूर्वक क धातु के पहले सुद होता है। यथा, उपस्किरति, प्रतिस्किरति । ५ अपारतुप्पाच्छानिधालेसने-आलेखन अर्थ में अप धातु के पहले सुट् होता है । यथा, भपस्किरते वृपोहः । ६ गोसद सेविता सेवितप्रमाणेषु-सेपित, असेवित और प्रमाण अर्थ में पद शब्द परे हो तो गो शब्द के परे सुट् होता है । यथा, गोभिः सेवितः गोस्पदः । पास्पदं प्रतिष्ठायाम् । पूर्वक व्याकरण-कौमुदी चतुर्थ भाग पाण्यानगर एयरप इति एदाती विरासत कापानमा विभक्ति-निर्णय संख्यामारकोयित्रो विभक्तिः-जिसके द्वारा संख्या और परक का योध हो उसे विभक्ति कहते हैं। यथा, घर:. घटी, यही घर शब्द में प्रथमा विमति रहने से एक घट, दो र पार पहुत घट का बोध होता है । चन्द्र पश्यति, पदा न्द्र में द्वितीया विमति रहने से कर्मकारया का पाप होता है। मायः सप्त--प्रथमा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पशमी, टी मार सक्षमीये सात विमनिया है। मधमा अभिधेयमाप्रमा-क्रिया भित्र पस्नु मामा पाप तो उस (प्रातिपदिक) में प्रथमा विमति होती है। यया, TV सता. पु. गिरि, नदी, जलम, राम, सीता, मणः, एक, बी, शरः, योगः स्यादि । सरकार में प्रथमा विक्षिाती है। पा; पशुः कोइनिगायत, मेघों गति । ५मान-सम्योजन में प्रथमा पिहितीपथा गे.(वनपट-ति, सन भाभियोंयोग में प्रपमा मिति होगी या तिमाह,पुगः।

- ७ कम्मणि द्वितीया-कर्मकारक में द्वितीया विभक्ति होती ८ क्रियाविशेषणे च-क्रियाविशेषण में द्वितीया विभकि अध्यकालाभ्यामत्यन्तसंयोगे । कालाध्यनरत्यन्तसंयोगे)-अत्यन्त प्रति, भा, पिक्, निका, अन्तरा, भगतरेण भोर पान शों के योग में द्वितीया विमनिहोती।यथा, बीमप्रति पा, राममनुमातोश्मणः, शार्ण धिक, मार्म famat व्याकरण-कौमुदी। सङ्गः परित्यक्तुं साम्प्रतम्, विपवृक्षोऽपि संवर्द्धय स्वयं छेनु मसाम्प्रतम्। द्वितीया है। यथा, पुष्पं चिनोति, अन्नं भुपते, जलं पिरति । होती है; एकवचन-क्लीयलिङ्ग में इसका प्रयोग होता है। यथा, सत्वरं धापति, द्रुतं पलायते, मृदु हसति, साधु भाषते । संयोग अर्थात् व्याप्ति अर्थ में अभय (मार्ग) वाचक भौर काल पाचक शब्दों के उत्तर द्वितीया विभक्ति होती है। यथा, अध्याचक-क्रोश गिरिः स्थितः, योजनं भृत्येनानुगतः। वाचक-दिवसमुपयसति, मासमधीते । फ्रोश, योजनं, दिएस, मासं व्याप्य इत्यर्थः। .. अभिपरिसौभयत्तसन्तः ( उभसर्वतसोः कायाधिगुण- दिन मिए । दितीयामेंडितान्तेषु सतोऽन्यत्रापि ण्यते । मभितः परित समया निकातियोगेऽपि तस् प्रत्ययाभि, परि, मन, और उमय शादी के योग में द्वितीया मिति होती है।पा, प्रामममितः, गृहं परितः, उद्यानं सर्चतः, नवी मुमयतः। "प्रत्याधि निकषान्तराम्तरेग-यानि ( उम...... ! AT सन्तरेगा । कर्मप्रायमीपयुक्त वितीया मय 1 AM पालिका पीत ननु स्फुति इस स्थान में मध्ययन के फल की प्राति विभक्ति-निर्णय सत्यां मां च मन्तरा उपविष्टः, श्रममन्तरेण विद्या न भवति, यनं याथदनुसरति। तृतीया १२ तृतीया करणे ( कर्तृ करणयोस्तृतीया )--करण कारक और अनुक्क फर्ता में तृतीया विमक्ति होती है। यथा, इस्तेन गृहा- ति, चक्षुषा पश्यति, कर्णेन शृणोति । अनुक्त कर्ता और फरण कारक में तृतीया विभक्ति होती है। यथा, रामेण याणेन हतो १३ महायः ( सहयुकऽप्रधाने । साकं साद्धं सगं योगऽपि )-सदार्थ शब्द के योग में तृतीया विभक्ति होती है। यथा, रामः सीतया लक्ष्मणेन च सह धनं जगाम, फेनापि साद विरोधो न फत. ध्यः । सहार्य शब्दों के अध्योग में भी होता है, पपा, पिता पुत्रेण गच्छति (पुत्रेण सहेत्यर्थः ।। १४ अनवारण्ययोजनायेंश्च-ऊन (कम), धारण और प्रयो. - जन मर्थ पाले शब्दों के योग में तृतीया विभक्ति होती है। यया, उनार्थ-पकेन ऊनः, विद्यया हीनः, अहङ्कारेण न्यः । पारगार्थ-अलं विषादेन, फलान किम् । प्रयोजनार्थ-धनेन प्रयोज. नम्, फोऽर्थः फलहेन । ३५ अध्नकालाम्यामार्गे ( अपवर्ग तृतीया )-अपयर्ग अर्थात् कियासमाप्ति भोर फलमाप्ति भर्थ घोष होने से मध्यवाचक और कालवाचक शब्दों के योग में तृतीया रिभक्ति होती है। था, पन्नाक-मोशेनानुशाकोऽधीतः । पलवारक-शिमिर- मासेन ध्याकरणामधोनम् ।मास घ्याकरणम. गतम्, पिति हुई। पिकारसमड़ी का गिकार दीप पड़ता है, उस मावावा विभक्ति होती है। यथा, जटामिः तापसमपश्यम्, भूगामि- गाफा-कोरी। मही समझी गाती, मनियनीया गिनिहाकर द्वितीया ॥ नामानि EिR (देना)-तिम मा शन में गुतीया विमति होती है। यथा, मनुषण काणा, पा, पन पधिरः, पटेंन कुजः। १७ ममगार (पाणे)-जिस लक्षण या विह दारा कोई पनि मूचित हो उस सक्षणयोधक शाद में तृतीय शिशुमार्शम, पुस्तकेन पात्रमदाशम् । १८ प्रत्यादिमा ( प्रत्यादिन्याहयानम् )-स्थलविशेष में प्रति प्रभृति शब्दों के योग में सृीया विमति होती है। यथा, प्रस्या चार, स्यमावेन सरल, थाहत्या मुन्दन जात्या ग्रालणः, गोत्रेण शाण्डिल्यः, नाना सोमवातः, प्रायेय दुःखितः, येगेन गच्छति, त्यरया धापति, यत्नेन लिखति, मुखेन स्यपिति, दुःखेन याति, फ्लेशेन वदनि । चतुर्थी १९ चतुर्थी सम्प्रदाने-सम्प्रदान कारक में चतुर्थी विमति होती है । यथा, दद्धिाय धनं ददाति, मिक्षये भिक्षा ददाति । २० तादये ( तादम्य चतुर्थी वाच्या)-कोई वस्तु या क्रिया जिसके निमित्त समझी जाती है उसमें चतुर्थी विमक्ति होती है । यथा, यूपाय दारु, कुण्डलाय हिरण्यम् , अश्वाय घास, न्धनाय स्याली, शानाय अध्ययनम्, दीनाय धनोपार्जनम्, मानाय नदी याति, पाकाय मग्निमाहरति । २१ निवृत्तौ निवर्तनीयात्-निवृत्ति अर्थ में जिससे निवृत्ति विभक्ति-निर्णय। ३१७ ते है उसमें चतुर्थी विभक्ति होती है । यथा, मशफाय = मशफनिवृत्तये इत्यर्थः, आतपाय छत्रम् (भातपनिवृत्तये), साये जलम् (पिपासानिवृत्तये), तापाय स्नानम्, (ताप. तये), रोगाय मौषधम् (रोगनिवृत्तये), पापाय प्रायश्चित्तम् निवृत्तये)। २२ सम्पद्यमानात् क्लप्यादेः (कपि सम्पद्यमाने )-बपि दि धातु के प्रयोग में सम्पद्यमान के उत्तर चतुर्थी विभक्ति है । यथा, भक्तिर्शानाय कल्पते, ज्ञानं सुखाय सम्पद्यते, स्वर्गाय भवति, अधर्मो नरकाय भवति । ३ हितमुसनमोभिः (नमःस्वस्तिस्वाहास्वधावपट्योगाच । हितयोगे -हित, सुख और नमस् शब्द के योग में चतुर्थी विभक्ति है। यथा, हितं पुत्राय, सुखं शिप्याय, नमः गुग्ये । - स्वस्तिप्वाहास्वपावपभिः । नमःस्वस्ति...... )-स्वस्ति - स्वधा और चपट शब्दों के योग में चतुर्थी विभक्ति है । यथा, स्वस्ति प्रजाभ्यः; स्वाहा अग्नये; स्वघा इन्द्राय वषट् । समर्थार्थ कैरच-समर्थिक शब्द के योग में चतुर्थी होती है । यथा, समर्थो मल्लो मल्लाप, अलं मल्लो शको मल्लो मल्लाय, प्रभुमल्लो मल्लाय । समर्थार्थक - योग में भी चतुर्थी विभक्ति होती है; यया, प्रभवति चल्लाय, शनोति मल्लो मस्लाय । मन्यकर्मण्यनादरे विभाषा (मन्यकर्मययनादरे विभाषाऽप्राणिषु). समझे जाने से दिवादिगणीय मन् धातु के अवज्ञा- कर्म में विकल्प से चतुर्थी विभनि होती है । यथा, सुणाय मन्यते, नाहं त्यां कुषकुराय मन्ये । पक्षान्तर में विभक्ति होती है, पर शृगाल, काक, शुफ, नी और होमपपियोधक हम उत्तर पक्षी विधि प्याकरण कीमुदी। अन्न शब्द फर्म हो तो चतुर्थी नहीं होती, यथा त्यामह शृगालं मन्ये। २७ वा गत्यर्यकर्मणि चेष्टायाम् ( गत्यर्थकम्मगि द्वितीया-चतुर्यो चेष्टायामनध्वमि )-चेष्टा समझे जाने से गत्यर्थ धातु के कम्म में विकल्प से चतुर्थी विभक्ति होती है। यथा, प्रामाय गच्यति, बजाय यजति । पक्षान्तर में द्वितीया होती है, पर वेयान समझी जाने से नहीं होती; यथा, मनसा मथुरा गच्छति । भध्वयायफ कर्म हो तो नहीं होतो; यथा, मध्यानं गच्छति, पन्थानं गच्छति । २८ क्रियायो पपदस्य च कर्मणि स्थानिनः-अप्रयुज्यमान तुमन्त धातु के फर्म में चतुर्थी विभक्ति होती है। यया, फलेभ्यो याति, फलान्याहत्तुं याति इत्यर्थः । २९ तुमर्याच भाववचनात्-तुमर्थयुक्त भाषयाच्य में विहित प्रत्ययान्त शरद के उत्तर चतुर्थी विभक्ति होती है। यथा, यागाय याति, पष्टुयाति इत्यर्थः । पञ्चमी २. दाने पममी-अपादान फारक में पचमी गिति होती है। यथा, अश्यात् पतितः, गृवाचलितः, जलातुस्थितः । " स्यन्लोपे कर्मण्यधिकरणे ५-यप् प्रत्ययान्त पर गप्रयोग में कर्मचार मधिकरण कारक मे पक्षमी होती है। पथा, प्रासादात् प्रेक्षत, प्रासादमा त्य: सापको. कति, भासन उपविश्य श्ययः । -कालपरिमाण गौर भासवरिमाम । विभकि-निर्णय है। यथा, कालारिमाण-अग्रहायणात् पञ्चमासाः, माघात् ये मासि, विधाहात् सप्तमे दिने । भवपरिमाण-पाटलि- व शतकोशाः, प्रयागात् त्रिंशत्क्रोशाः, कुरुक्षेत्रात् दश- नानि । ३३ निकृयादेकोको (पञ्चमी विभक )-दो या अधिक वस्तुओं च में किसी एक वस्तु की उत्कर्षता (अधिकता) प्रकट ग्य तो निकृष्ट वस्तु में पञ्चमी होती है। यथा, धनात् गरीयसी, पेत्रो मैत्रात् बलीयान्, माधुराः पाटलिपुत्रकेभ्यः तरा:। • मस्यौदाभिविध्योरायोगे (पञ्चम्यपाइपरिभिः आह् मर्यादाभि. । आर मर्यादाक्यो)-मर्यादा और अभिविधि (ध्याप्ति) मझे जाने पर 'आ' अव्यय के योग में पञ्चमी होती है। नाशि-आ जन्मनः, आ शेशवात् , आ समुद्रात् , मा लात् । अभिविधि-आ यनात् वृष्टो देवः, धनस्य प्रान्तं व्यर्थः, भा सकलात् ब्रह्म, सकलं व्याप्य इत्यर्थः । भन्याथैः (अन्यारादितरत्त दिक्शदाञ्चूतरपदाजाहियुक्त )- शब्द के योग में पञ्चमी विभक्ति होती है । यथा, यः कः परित्रातु समर्थः, घटः पटादितरः, इदमस्मा- 1 अन्यार्थ क्रिया के योग में भी होती है; यथा, स्वर्ण । आते। दिग्देशकालवाचिभिः ( अन्यारादितरन', "......)-दिग्पाचक, कमोर फालवाचक शब्द के योग में पञ्चमी होती है। मादक-पूबों प्रामात् , उत्तरो गृहात् । देशवावक- वात् पूर्वदेशे । कालवाचक-- । कालवाचक-चैत्रात् पूर्वः फाल्गुनः, माक्, शयनात् पूर्णम् , उत्थानम् परतः, प्रस्थाना- - 1 - दक्षिमा में पञ्चमी और तृतीया होती है । यथा, स्तोकान्मुक्त:, स्तोत्र ध्याकरण-कामुदा । १७ परिसरात्रमूतिभिः यहिस् , मारा और प्रभृति मन्द के योग में पशमी विमनि होती होयया, गृहात् पहिः, प्राना यदिः (मामदीश्यर के मत से यह शद के योग में पानी और यष्ठी विभक्ति होती है ), माराम् धनात्, भारान् उद्यानात, जन्मनः प्रभृति, शैशवात् प्रभृति। ३८ आ-आहिया (भागतिर......)-मा और माहि प्रत्ययान्त शब्द के योग में पशमी विमति होती है । यथा, उद्यानात उत्तरा गृहम् , गृहादुत्तरादि सरः, हिमालयात् भारतवर्षम् , प्रयागात् दक्षिणाहि विन्ध्यः । ३६ तेयोगे द्वितीया च-मृते शब्द के योग में पञ्चमी और द्वितीया होती है । यथा, मानाइते, भानमृते । ४. पृथग्विनाभ्यां द्वितीयातृतीय च ( पृथग्विनानानाभिस्तृतीयाऽन्यवर स्याम् ) पृथक् और विना शब्द के योग में पञ्चमी, द्वितीया और तृतीया होती है । यथा, चैत्रात पृथक् , च पृथक चैत्रेण पृथक् ; श्रमात् विना, थमं पिना, थमेण विना । ४१ स्तोकच्याल्पतिश्येभ्यस्तृतीया च ( करणे च स्तोकापा कतिपयस्यासत्ववचनस्य )-स्तोक, कच्छ, अल्प और कतिपय शब्द मुकः, छछान्मुक्तः, पण मुक्तः, अल्पान्मुक्तः, अल्पेन मुक्का कतिपयान्मुक्तः, कतिपयन मुक्तः । विशेषण होने से नहीं होता। यथा, स्तो पचति। ४१ हेतो च-हेतु अर्थ योघ होने से हेतुशेधक बाद योग में तृतीया और पञ्चमी होती है। यथा, धनात कुलम धनेन कुलम् । मयात् कम्पः, भयेन फम्पः, हर्थात् मरति, नत्यति, दुःखात् रोदिति, दुःखेन रोदिति । . स्तोकः पाकः, के , विभक्ति-निर्णय। ३२२ पष्ठी। ४३ पटौ सम्बन्धे (पटी शेषे)-सम्बन्ध में पष्ठी होती है। यथा, मम पिता, तर पुत्रः, तस्य भ्राता, महिषस्य गम्, गो- दुग्धम् , नया जलम् . वृक्षस्य छाया, अग्ने शिखा, वायोगः, + जलस्य प्रवाहः। - ४४ कर्तृकर्मणोः कृति-कृत् प्रत्यय के प्रयोग में कर्ता और फर्म में पष्ठी होती है । यथा; कर्ता में-शिशोः शयनम् , अश्य. स्य गतिः, तब पिपासा, मम बुभुक्षा । कर्म में-अन्नस्य पाकः, ‘पयसः पानम्, सुखस्य भोगः, धनस्य दाता, वृक्षस्य छेदकः । ४५ उमयाप्ती फर्मणि-यदि कर्ता और कर्म दोनों को प्राप्ति हो तो केवल कर्म में पछी होती है। यथा, गवां दोहो गोपेन, पयसः पानं शिशुना, धनस्य दानं नृपेण, जलस्य शो- पणं सूर्येण, अर्थस्य हरणं चौरेण । (क) चिद्विभाषा करि-कहीं कहीं फर्ता में विकल्प से पष्ठी होती है। यथा, घटस्य कृतिः, कुम्भकारेण कुम्भकारस्य था, चन्दम्य दिहक्षा मया मम वा, शिष्यस्य प्रशंसा गुरुणा गुरोर्वा, शब्दानामनुशासनम् , भाचार्येण भावार्य्यस्य था। नसनादेः (म रोकाध्ययनिष्ठाखलर्थ तृणाम् )।-शत, शानच् कासु, फानच्, स्यतृ और स्यमान प्रत्यय के प्रयोग में पष्ठी नहीं होती। यथा, शतृ-गृहं गच्छन्, जलं पिवन ( द्विपो विभाषा-द्विर धातु में विकल्प से होती है; यथा, सुरं द्विषन्, "सुरस्य द्विषन् ) । शानम्-भग्नं भुजाना, व्याफरणमधीयानः । कासु-मोदन पेचियान्, प्रार्म जाग्मियान् । कानन्-गुरं धवन्दानः, शास्त्र शुधवाणः । स्यत-गृहं गमिष्यन्, घेदं पठिप्यन् । स्यमान- गुरु सेविष्यमाण, धनं दास्यमानः । ।

चन्द्रो दृष्टः। क्तवतु-स गृहं गतवान् , महं चन्द्र दृष्टयान, त्वं SIRt.niya .. मना: (*... - गुगन् , मकर और पाम प्रग प्रयोग में मिति महीं होती। या, मन- गागगरम् - पोरगा, फलं गृही- या -रम, गृहमागाय | मुत-गुन मेयं सेगम् ,शा मागम् । re मोशाय (ो...) उभाराल कृत् प्रत्यय के प्रपोगो महीदोगी। या, जल निगः, रिपून जिरा; शिलो शिशुः पिप निराकरिष्णुः, पलं गृहयालुः । ४. मोमोलममयिनिनाम् (मगका.... | -अनि भविष्यदा धमर्गयो ) उक, शीलार्य नन् भऔर भविष्यदर्थ णिन् प्रत्यय के प्रयोग में पछी नहीं होती। ययास-हंगामुकः, जलं वपुक, शत्रु घातुफ: ( फामुक शब्द प्रयोग में होती है। यया, धनस्य कामुकः) ।शलार्म मनु-पनं दाता, भन्नं दाता, निराफर्ता । भविष्य गिन-धनं दायी, पृतं मोजी, गृहं गामी। ५. न सलपानाम् (न लोग...)-सलर्य प्रत्यय के प्रयोग में पष्ठी नहीं होती। यथा, नेतन् सुकरं भवता, नेतद्दुष्करं तेन, सर्चमीपत्कार सुधिया, मया सुमर्षणः शत्रुत्वया दुःशा N. B. मु, दुर् और ईपत् शब्द के योग में पातु के उपर जो म और मन होता है उसे सलयं प्रत्यय कहते। ५१ म निष्टाया:-निष्ठा प्रत्यय के प्रयोग में पष्ठी नहीं होती। यथा, क-तेन व्याकरण मधीतम् , मया जलं पीतम् , स्ययाः विपक्ष सनो रिपुः। । घेदं अधीतवान् । पिहित ५२ सल्य वर्तमाने ( फस्य च वर्तमान )-वर्तमान काल में क्त प्रत्यय के प्रयोग में पष्ठी होती है। यथा, राश मतः, विकप से पष्ठी होती है। यथा, नाग्निस्तृप्यति काष्टा- माविभोर भतमु प्रत्यय के पोप में पट्टी होती है। विभक्ति-निर्णय। । राजभिर्मन्यते इत्यर्थः, सतो पूजितः; सद्धिः पूज्यते इयर्थः । १३ अधिकरणवाचिनाच- अधिकरण कारक में विहित क्त प्रत्यय के प्रयोग में पष्टी होती है। यथा, इदमेषां शयितम्; एतदेपामासितम्। ५४ विभाषा भावे-भाववाच्य विहित का प्रत्यय के प्रयोग में फर्ता में विकल्प से पष्ठी होती है। यथा, मम स्नातम्, मम स्थितम् , मम शयितम् , मम जागरितम् । पक्षान्तर में तृतीया होती है ५५ त्याना पंतरि वा-कृत्य प्रत्यय के प्रयोग में पता में विकल्प से ही होता है। यथा, पुस्तक तय पाठयम्, चन्द्रो मम पटव्यः, गुरुस्तस्यार्थनीयः । पक्षान्तर में सृतीया होती है। कर्मणि जाति-पिर-निप्रहण हिसायाम् ( जासि निप्रदणनाटका. गि हिमायाम् ) --दिसा अर्थ समझे जाने से जासि, पिए था नि पा प्र पूर्वक हन् धातु के कर्म में पष्ठी होती है। था, चौरस्य उजासयति, शस्त्रोऽपिनटि। नि य प्रध्यस्त, मस्त मौर विपर्यस्त भाव में होने से भी होता है पथा, हिन्ति, महन्ति, निहन्ति, प्रणिहन्ति या चौरस्य । ५७वा स्मृत्यर्थदयेशा कामगि (अधोगदये मणि)-स्मर. गये दर और ईश् धानु के फार्म में विकल्प से गठी होती "यथा, पुत्रो मातुः स्मरति, दाता दरिद्रस्य दपते, पिता • पुस्पष्ट पक्षान्तर में द्वितीया होती है। 6 हफ्यानाम् रिभाषा करणे-तृप्त्यर्थ धातु के फरक कारक माम, अपी हि तृप्ताप न पारिधारा स्या: मुगन्धिः पदने दुसरा पक्षान्तर में हितोया होती है। १९ मा स्थापना (पउतार्थ प्रयन)-मस्तान्, मति, - से विकल्प से होती है।) यथा, कृत्वमु-पञ्चकृत्यो दिवसस्या- कुशल देवदसाय भूयात्; निरामयं देवदत्तस्य भूयात्, निरा. मर्प देवदत्ताय भूयात्; सुग्वं देवदत्तस्य भूयात्, शुख क. व्याकरण-कीमुदी। पुरस्तादुद्यानस्य, उपरिष्ठात् मञ्चस्य । असि-पुरो नगरस्य, अधोवृक्षस्य । आति-उत्तरात् समुद्रस्य, दक्षिणात हिमालयस्य अससु-दक्षिणतो प्रामस्य, उतरतो गृहस्थ । PA कृत्वसमुयोःकालाधिकरणे ( कृस्वोऽधप्रयोगे झालेऽधिकरणे) कृत्यसु और सुच् प्रत्यय के प्रयोग में कालवाचक शब्द के अधिकरण में षष्ठी होती है (वोपदेव और क्रमदीश्वर के मत धोते, सप्तकृत्यो दिवसस्यागच्छति । सुच्-द्विदिवसस्य भुङ्क्ते, निर्दिघसस्य स्थपिति। ६१ एनपा द्वितीया च-एनप् प्रत्ययान्त शब्द के योग में पष्ठी और द्वितीया होती है । यथा, दक्षिणेन वाटिकायाः सः, दक्षिणेन पक्षवाटिकां सः। ६१ तुल्यार्थस्तृतीया च ( तुल्याधरनुलोपमाग्यो तृतीयान्यतररपाम् । तुल्यार्थ शब्द के योग में पष्ठी और तृतीया होती है । यथा, मम तुल्यः; मया तुल्यः; तय समः; स्यया समः तस्य सहक २३ भाशित कुशलादिभिश्चतुर्थी च (पोवाशिष्यायुधमभर- फुपालमुग्या हितः)-आशीर्वाद समझे जाने से कुशल, दित, सुन्न, अर्थ, भायुष्य और ऐसे अर्थ के शनी में पष्ठी भौर चतुर्थी होती है । यथा, कुशल देवदत्तस्प भूयात तेन सदृशः। निरामय, दत्ताय भूयात्। + विशया पी-कभी ममी कर्म भादि कारकों में पानी विमति होती है उसे 'विवक्षया पठीकहते है। पया, मतम, मातु: मरति, शम्मोधरणयोम, फलान तयार।

होती है। प्रशंसा समझो जाने से साधु और निपुण शब्द के योग में विभक्ति-निर्णय ६५ दुरान्तिका: पचमी च (दुरान्तिकाय पप्यन्तरस्याम्}-दूरार्थ और भन्तिकार्य शब्द के योग में पछी और पञ्चमी विभक्ति यया, दूरं प्रामान्, अन्तिकं नगरस्य, अन्तिक नगरात्। १६ निमिचाइनुप्रयोगे (पाठी हेजप्रयोगे )- हेतु शब्द के प्रयोग में निमित्तयोधक शब्द के उत्तर पष्ठी विभक्ति होती है। (बोपदेव और मट्टीजि दीक्षित इस स्थान में तृतीया आदि पांच विमक्तियों का विधान करते है ) । यथा, अन्नस्य देतोघसति, अल्पस्य हेतोर्यहुहातुमिच्छन् । ६७ सर्वनाम्नस्तृतोया च-हेतु शब्द के प्रयोग होने से निमित्त- पोधक सम्वनाम शब्द के उत्तर पष्ठी और तृतीया होती है पोपदेव, मदीश्वर और भट्टोजि दीक्षित प्रथमा इत्यादि सातो विभक्तियों का विधान करते हैं )। यथा , फस्य हेतोः आगतः; फेन हेतुना स पागतः । सप्तमी ६८ सप्तम्यधिकरणे-अधिकरण कारक में सप्तमी विभक्ति ती है। यथा, गृहे तिष्ठति, शय्यायां शेते, नद्यां म्नाति । र यस्य च भावेन भावलक्षणम्-यदि एक क्रिया के काल रा दूसरी क्रिया का काल निश्चित हो तो उस क्रिया और सके कर्ता में भावे सप्तमी होती है । यथा, रवावस्तं गते गतः, रस्तगमनसमकालं गत इत्यर्थः । विधायुदिते समागतः, धूदयसमकाल समागत इत्यर्थः। साधुनिपुणाभ्याम_याम् ( साधुनिपुणाभ्यामर्चायां सप्तम्यप्रेते)- सप्तमी विभक्ति होती है। यथा; ध्याकरणे साधुः, साहित्य निपुणः ( चोपदेव के मत से पष्टो और सप्तमी दोनों ५० - होती है) ३ २ व्याकरण-फीमुदी। इत्यर्थः । कस्य सहेनिनामगि (तस्येवित्रस्य कम्म्यापर्मल्यानम् )- इनि सहित त प्रत्यय के प्रयोग में कर्म में सप्तमी होती है। यथा, अधीतं व्ययाफरणमनेन अधीती ध्याकरणे, अवकीर्ण वत:मनेन अवकीणी प्रत । ७२ अध्वनो व्यवधौ प्रथमा च ( यतश्वाश्वकालनिम्मणि तत्र पञ्चमी । उद्युनोदध्वनः प्रथमा-सप्तम्यौ-ध्यवधान समझे जाने से अध्व. वाचक शब्द के उत्तर सप्तमी और प्रथमा विभक्ति होती है । यथा, ग्रामो पनात् पञ्चसु ग्रामो धनात् पञ्चसु कोशेषु पञ्चकोशा था, पञ्चकोश व्यवधाने विद्यते इत्यर्थः । प्रयाग: पारिपुत्रात दशसु योजनेषु दश योजनानि या, दशयोजनव्ययघाने विद्यते ७३ प्रसितोत्सुकाभ्यां तृतीया य-प्रसित और उत्सुक शब्द के योग में सप्तमी और तृतीया यिक्ति होती है । यथा, धनेषु प्रसितः, धनैः प्रसितः, विद्यायामुत्सुकः विद्ययोत्सुकः । wr कियामध्येऽवकालाभ्यो पञ्चमी च ( सप्तमो पचम्यौकारकमध्ये)- दो क्रियायों के मध्यवत्ती अध्यवाचक और कालवाचक शब्द के उत्तर सप्तमी और पञ्चमी विभक्ति होती है। यथा, अध्य-याचक- अयमिह स्थित्या मोशे मोशाता लक्ष्य विध्येत् । फालयाचफ-अयमय भुक्त्वा यह यहाद्वा भोक्ता ! .५ दूरान्तिकार्थेभ्यो द्वितीया तृतीयापञ्चम्यश्च ( इरान्तिकार्य यो द्वितीया य-दरार्थ और अन्तिकार्य शब्द के उत्तर सप्तमी, द्वितीया, तृतीया मोर पञ्चमी धिमक्ति होती है । यथा, प्रामस्य, दुरं ग्रामस्य, दूरेण प्रामस्य, दुरात् प्रामस्य । अन्तिम गृहस्य, पतिर्फ गृहस्य, भन्तिकेन गृहस्य, अन्तिकात् पृहस्य । विशेषण होने से नहीं होता है । यथा, दुरो प्रामः, दूर पगाः ६ पटी पानावरे-क्रिया द्वारा निरादर समझा जाय तो जिसका निगरो उसमें भीर मिया में सप्तमी भौर पष्ठी -- कारक। ३२७ होती है । यथा, दति शिशी जगाम, रुदतः शिशोर्जगाम; रदन्तं शिशुमनादत्येत्यर्थः। ७६ साक्षिप्रभृतिभिश्व (स्वामोश्वराधिपतिदायादसाक्षिप्रतिभूप्रसूतथ)- साक्षिन् , प्रतिभू , कुशल, स्वामिन् , ईश्वर, अधिपति, प्रसूत, आयुक्त और दायाद शब्द के योग में सप्तमी और पष्ठी होती । यथा, विवादे साक्षी, विवादस्य साक्षी; व्यवहार प्रतिभू , ध्ययहारस्य प्रतिभू, मीमांसायां कुशलः, मीमांसायाः कुशलः, स्त्रियां प्रसूतः, स्त्रियाः प्रसूनः । Arow यतश्च निर्धारणम्-जाति, गुण, क्रिया अथवा संज्ञा द्वारा समुदय-स्वजातीय से एक के पृथक्करण को निर्धारण कहते है। जिससे निरण ( पृथक्करण ) किया जाय उसमें सप्तमी और पष्ठी होती है । यथा, मनुष्येषु क्षत्रियः शूरः, मनुष्याणां क्षत्रियः शूरः, गोषु कृष्णा पहुक्षीरा, गयां कृष्णा पहुक्षीरा; मध्यगेषु धावन्तः शीप्रगामिनः, अध्यगानां धावन्तः शीघ्रगामिनः; साधु मैत्रः प्रवीणः, छात्राणां मैत्रः प्रवीणः । live निमित्तात् कर्मसमवाये (निमित्तात् कर्मयोगे)-- फर्म के साय सम्बन्ध होने से निमित्तयोधक शब्द के उत्तर सप्तमी होती है। पधा, चर्मणि द्वीपिनं हन्ति, दन्तयोईन्ति कुञ्जरम् , केशेषु चमरी हन्ति, सोम्नि पुष्फलको (कस्तूरीमृगः) । इतः । पक्षान्तर में चतुर्थी होती है, पथा, मुक्ताफलाय फरिणम्, हरिणं पलाय त्यादि। N. B. अधवा ' मुकाफलमाह' ऐसा करके क्रियायो पादस्य ५ कर्मणि स्थानिन' सूत्र से इसमें चतुयों सिद्ध करते हैं। कारक क्रियायि भरकम्-प्रिया के साथ ओ सम्बन्ध है उसे कारक कहते हैं।

णिजन्न गया में प्रयोज्य कसो हुमा भोर सृतीया शिकि करतासलिये पदयोग्य फत्तामा भार इसमें प्रथमा 'गन्यथना कम्मगंज्ञा प्रयोग्यस्य (गतिश्वित्यकसानाशा. फना में कर्म-संज्ञा होती है । यथा, देवरती गृति, ranपन (गत......)-शानार्थ सथान. व्याकरण.कोमुदो। २ पट कारकागि-- फर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, मपादान और अधिकरण, ये छः कारक है। का ३ क्रियासम्पादकः कर्ता (स्वतन्त्रः क)-क्रिया के करने याले फो फर्ता फारफ कहते हैं। यथा, शिशुः क्रीड़ति, गी: शम्दायते, मेधो गर्जति, गोपो दुग्धं दोन्धि, मालाफारः पुष्पं चिनोति, यानरो घृक्षमारोहति, राजा प्रजाः पालयति । ४ प्रयोजकाच (ततत्प्रयोजको हेतु)- जो दूसरे को क्रिया के करने के लिये प्रवृत्त करता है उसे भी फर्ता कारक कहते है । - ५ नृतीया प्रयोज्ये ( कत करणयोस्तृतीया-क्रिया की भणि जन्त अवस्था के कर्ता को णिजन्त होने पर प्रयोग करता कहते हैं। प्रयोज्य फर्ता में तृतीया विमति होती है । पपा, देवदत भोदनं पयति-यादतो देवदत्तन भोग्न पायति । यहाँ देवरस पच्' मिया का आणजन्त भवस्था में कर्ता का हुई। यशदत्त देवदत्त को पत्र किया के लिये प्रपत्रित सिमक्ति हुई है। पानामा मागणी)- गमनाई যায়। यादमी देवनगमपति। बाद, गम. मिन्न भशमा भानुप्रयोग में प्रयोय कता में १ पा, -शिष्यो या पुस्य, गुम के प्रयोग में प्रयोग .

कारक। घटकारयति। शिष्यं धर्म योधयति। अशनार्थ-पुत्रोऽन्नमश्नाति, माता पुत्रं पन्नाशयति। शब्दसम्मकाणामकर्मकाणाञ्च (तियुद्धि......)-पद, पाक्य, पन्य, उपदेश, तिरस्कार, प्रशंसा, प्रभृति शब्दकर्मक और है, कन्द, शब्दाय, जल्प, भाप, लप, थु, वि.झा, उप-लभ भिन्न अकर्मक धातु के प्रयोग में प्रयोज्य कर्ता में फर्म संशा होती है। यथा शब्दकर्मक-शिष्यो पेदमधीते, गुरुः शिष्यं घेदमध्या. पयति। अकर्मक-शिशुः शेते, माता शिशुं शाययति । ६ विभाषा मोः ( इकोरन्यतरस्याम् )-हम् और कम् धातु के प्रयोग में प्रयोज्य कर्त्ता में विकल्प से कर्मसंशा होती है। यथा, भृत्यो भार हरति, प्रभुत्यं भृत्येन या मार हारयति कुम्भकारो घटं करोति, यज्ञदत्तः कुम्भकारं कुम्भकारण या • भावयोस्तृतीया (कर्तृ करणयोस्तृतीया )- फर्मयाच्य भाववाच्य के प्रयोग में फर्ता में तृतीया विभक्ति होतो है। यथा; कर्मवाच्य-गोपेन दुग्ध दुहते, मालाकारेण पुष्प चीयने, राज्ञा धनं दीयते । भाववाच्य -शिशुना स्यने, यूना दस्यते, पृद्धन सुप्यते। ५ कर्मसंज्ञायां प्रयोज्यकर्मणोः प्रयमाद्वितीये कर्मणि (धुद्धिभक्षा- पंयोः शाष्टकर्मकाणा निजेदया। प्रयोज्यकर्मन्यन्येषां ध्यन्ताना लायो मताः)-जहाँ प्रयोज्य कर्ता की कर्म-संज्ञा हो यहाँ कर्म- पाच्य के प्रयोग में प्रयोज्य में प्रथमा भौर फर्म में द्वितीया रिमति होती है । यथा, शिष्येण घेदोऽधीयते, गुरुणा शिप्यो परमध्याप्यते । यहाँ प्रयोज्य तो शिष्य' में प्रथम और कर्म "पैद' में द्वितीया विमति हुई। इसके भतिरिक, देवदत्तेन भोदनं पच्यते, यदत्तन मोदन पाध्यते । २२ भार गावर-कीमुही। । मी १० नि प्रालि fe:-क्रिया-प्रथम स्थान में हो गाय काफ का विधान होता, मिनु शिया-प्रगति सश मिया नियति में मी मर्य मिशेर तत्तत् कारक का गिधान होगा है। यथा, भशाम् पतितः, अश्यान्न पतिक नयनामिग, मध्यपानग्न विरमति मिश मिशा हाति, मिनये मिला न ददाति; मद्यमिद म्यदने, महामिदं न बदने, हस्तेन गृहाति, हम्तन में गृहाति; यत्रंणाच्छादयति, पत्रम गाच्यादति, गृहे तिष्ठति, गृहे न तिष्ठति; शय्यार्श शेते, शप्यायो न शेने जलं श्यिति, जलं न पियति, चन्द्रं पश्यति, यन्दन पश्यति; मेधो पति, मेयो न यति; नदी घदति, नदी म यति। १३ विज्ञावशात् कारकाणिजहाँ जो कारक विदित है या विवक्षायशतः ( वक्ता के इच्छानुसार ) दूसरा कारक होता है । यथा; गृहं गच्छति, गृहे गच्छति; यह प्रविशति, गडे प्रविशति; पुप्पेभ्यः स्पृहयति, पुष्पाणि स्पृहयति; पुष्पेभ्यः स्पृहा, पुष्पेषु स्पृहा; भाये कुप्यति, अरी कुप्यति; गां दोग दोन्धि, गोर्दुघ दोग्धि; नपं धनं याचते, नृपादनं याचते; वृक्षं पुष्पं चिनोति, वृक्षात् पुष्पं चिनोति, पुत्रं गृहं नयति, पुत्रं गृहे नयति; जलधिममृतं ममन्युः, जलधेरमृतं ममन्युः; शिष्याय विद्यां वितरति, शिध्ये विद्यां वितरति; दिमयतो गड्डा प्रमति, हिमवति गङ्गा प्रमवति। कर्म १४ क्रिश्याकान्त कर्म (कतरीसिततम कम्म)-क्रिया द्वारा जो भाक्रान्त हो उसे कर्मकारक कहते हैं। यथा, गृहं प्रवि- शति, चन्द्र पश्यति, प्रामं गच्छति, भन्न मुक्ते, जलं पियति, मध्याले। गुर पाच, पच्, दण्ड्। स्थ् , प्राछ, चि, शास्, जि, कारक। ३३१ पुष चिनोति, वस्त्र ददाति, वेदमधोते, वृक्षमारोहति, शाखा छिनति, कामिनत्ति। AY अधिशौस्थासामधिकरणम् ( अधिशोथासां कर्म }--अधि पूर्वक शी, स्था और आस् धातुओं के अधिकरण को कम्म- संक्षा होती है। यथा, शय्यामधिशेते गृहमधितिष्ठति, प्राम- 2 सपान्वध्यावसा-उप, अनु. अधि और माइ पूर्चक घरी धातु के अधिकरण की कार्मसंज्ञा होती है। यथा, प्राम- मुपवसति । उपचास अर्थ में होता है। उपसति बने ), गृहमनुरसति, नगरमधिनसति, गुरोरालयमावसति । F१७ मिनिविशो विभाषा (अभिनिशिश्च )-अभि पूचक और ने पूर्थक विश् धातु के अधिकरण को विकल्प से कम्मसंज्ञा होती है । यथा, धर्मममिनिविशते, धर्मेऽभिनिविशने । घोषमयोः सम्प्रदानम् (धा होरपष्टयोर कर्म)-उप- सर्ग पूर्वक पध् भोर दुह धातु के सम्प्रदान कारक की कर्म- संज्ञा होती है। यथा, भृत्यममि पति, शत्रुमभिक पति । विभाषा दिवः करणम् (दिवः कर्म ६)-दिए धातु के फरणकारक की विकल्प कर्मसंना होती है। यथा; अक्षान् कर्मणि दुहादेः ( भकषितम् च। दुइयापच्यरधिरित शामुजिमन्यमुराम् । कर्मक् स्यादवयित तथा स्वासौहाय्यताम् }- मन्यू : मुर स्यादि (आदि) मोरनी, हकार, पड् , (पादि) पानुमों में दो सम्म होते है, प्रधान और प्रधान । प्रिया के साय प्रधान रूप से जिसका सामन्य ही उसे प्रधान कर्म कहते है। पथा, गोपोगा दुग्धं दोन्धि, दरिद्रो राजानं धनं दीव्यति, अर्शदीव्यति ।

पृच्छयते, वृक्ष पुष्पं चीयते, शिष्यो धर्ममनुशिष्यते, जलधिर. RANI.mpiti गामी. HTTET n grt fillin, firit Ta, free मन, देगनपि मम। RTH, न, Th, ma.T, या प्रमाल कर्म है मोर गो, गा, TV, गु. ग. जमान है। मन को माता fnlira errit गानी famil mar को प्राति की सामान मोर पानी निमारकों में प्रान मकर पकार में होगा . उसीमो मयत, এবিসি ধামস সনি এন ৪ गो वोग्धि, रामः पन यागी, सात पुष यिनीति, गुरोध गनि, पुरं गृ गति, जलयामृतं ममत, इस प्रकार पादानादि काफ भी हो सकी है। २१ सin ये प्रपना-मम्मंग्राम के प्रयोग में कर्म- कारण फी प्रथमा विममि होती है। यथा; प्रामो गम्यते चन्द्रो हरयते, पृक्ष भारत, शपुरमित हो । (२२ न्यादैः प्रमाने (गोगे कमी दुहादः प्रपनेनोहरथ्वइन् । पुसिभिशापोः शम्मकम्मंकणा निग्या प्रयोज्यकम्म समन्वैग मान्दाना लादयो मताः )-फर्मयाच्य फे. प्रयोग में नो,ह, कर और घड़ धातु के प्रधान फम्र्म में प्रथमा होती है । यथा; नीयते, हियते, रुष्यते, उहाते या। २३ दुहादेप्रधान (गोगे....)-फर्मयाच्य के प्रयोग में दुहादि धातुओं के प्रधान फार्म में प्रथमा होती है। यथा, गौदुग्ध दुह्यते, राजा धनं याच्यते, चौरः शतं दपज्यते, गुरुर्धर्म गौग्राम मृतं ममन्थे। तण्टुलादोदनं पचति । गर्गान् शतं दण्डयति । यजमवरणद्धि गाम् ।

पाडारा जिसको भमियत दिया जाय उसमें सम्नदान उसका मसर पहुचता हो) में सम्पदान होता है। पथा; मोदः शिशये रोचते,दं महत्वदने। मदान में होता दायथा तुम्यं शनं घारपति, स्वं महा सदय कारका माणदक धम्म ते शास्ति या । शतं जयति देवदत्तम् । देवदत्तं शतं मुग्णाति । करण २४ साधकतमं करणम्-क्रिया के फरने का जो सर्वप्रधान उपाय है उसे करणकारक कहते हैं। यथा; चक्षुपा पश्यति, कर्णेन पृणोति, इस्तेन गृह्णाति, दात्रेण लुनाति, यष्टया प्रहरति, शरेण विध्यति, अश्येन सञ्चरते, घस्त्रेण भाच्छादयति । सम्प्रदान २५ यस्मै दान सम्प्रदानम् (कर्मणा यमभिप्रेति स सम्प्रदानम् )- जिसको कुछ दिया जाता है उसे सम्प्रदान कारक कहते हैं। पया परिदाय धनं ददाति, मिक्षवे भिक्षा ददाति, सर्पस्य गुरपे -रच्यांना प्रीयमाणः-रच्यर्थक धातु के प्रयोग में प्रीय. माण (जिसकी प्रीति, तृप्ति या प्रसन्नता हो भयषा जिस पर "हेरीप्सितः-स्पृहि धान के प्रयोग में जिसके निमित्त पहा की जाय उसमें मम्प्रदान होता है । यथा; धनाय स्पृहपति, रतमर्ग:-धारि धातुओं के प्रयोग में मृण देनेवाला दयात्। पुष्पम्यः स्पृहपति। पापसा शिरमा पमभिa Ea पति सोऽसि )- धनं प्रतियणोति, भायणोति या, दणि धर्मदेहीति भेति, महिपात् प्रस्थति। प्राणार्थ-आतपात् त्रायते, मल्लुका- ध्याकरण-कागती। होता है। गया, शिये मोदकमानपनि, गुग्ये रशियामाहानि, पुत्राय गन्दरता tोपोहे fraat सागपा (इपा देयायधना में भी को:--मोधायक दोहाक, याक मार भगायक धातु के प्रयोग में जिस पर मोच याद हो पद सम्प्रदान होता ३१ प्रयाम्प शुमार (प्रत्याभ्यां धुवः पूर्वस्य बना प्रति पूर्णफ भोर भाइ पूज्यक व पान के प्रयोट में जिसको देने फी प्रतिमा की जाय यह समान में होता है। यथा; दरिद्राय प्रयतिः प्रतिजानीत त्यर्थः। अपादान ३१ यतो विश्लेयोऽगदानम् ( भुवमपायेऽगदानम् }-जिससे कोई घस्तु अलग हो, उसे अपादान कारक कहते हैं। यथा, अश्वान् पतितः, हस्ताद भ्रष्टः, जलादुत्थितः, गृहात् प्रस्थितः, विदेशात् ३३ मीनार्यानो भयहेतुः-मयार्य और प्राणार्थ धातु के प्रयोग में/मय के हेतु में अपादान होता है। यथा; मयार्य-व्यापादि- प्रत्यागतः। दक्षति। ३४ हेतुरत्पत्त: (जनि कत्तु : प्रकृतिः)-उत्पत्ति के कारण में अपादान होता है । यथा, वीजादकरो जायते, पितुः पुत्रो जायते, दुग्धात् घृतमुत्पद्यते, धर्मात् सुखं भवति, अधर्मात् दुःखमुद्र- "-३५ आविर्भवनभूर्भुवः (भुवः प्रभवः)-भू धातु के प्रयोग में घति। - । मसमर्थ इत्यर्थः।। जगप्सा (hating) अर्थ चाले धातुओं के प्रयोग में जिससे कारका जिस स्थान में (जहां से ) किसी घस्तु का प्रकाश या आविर्भाव हो उसमें अपादान होता है। यथा, हिमवतो गङ्गा प्रभवति, वाल्मीकानात् धनुःखण्डमाखण्डलस्य, आविर्भवतीत्यर्थः । २६ विरामानों यतो विरतिः ( जगुप्साविगमप्रमादार्थानामुपसं- प्यानम् )-विरामार्थक धातु के प्रयोग में जिससे विराम हो उसमें अपादान होता है । यथा, अध्ययनाद्विरमति, फलहानियतते ३७ पराजेरसह्यम् (पराजेरसोदः)-परा पूर्यफ जि धातु के प्रयोग में असह्य विषय में अपादान होता है । यथा, अध्यय- नात् पराजयते, पापात् पराजयते, अध्ययनं पापाञ्च सोटु- 2३८ यस्यादर्शनमिच्छति (मन्तद्धौ ऐनादर्शनमिच्छति )-जिससे कोई पस्तु छिपाना चाहते है उसमें अपादान होता है । यया, गुरोरन्तर्धत्तं पितुनिलीयते, दस्योर्मुकायते, गुरुः पिता न मां पश्येदिति, लजया भयेन घा तदर्शनपथादप- १९ यतोजुगुप्सा तदर्थानाम् (जुगुप्साविरामप्रमादानामुपसंख्यानम)- जुगुप्सा हो उसमें अपादान होता है। यथा, पापाज्जुगुप्सते, नरफान् पीमत्सते । • प्रार्यानो यतस्त्रपा-लज्जार्थक धातु के. प्रयोग में जिससे लजित हो उसमें भपादान होता है । यथा; गुरोर्लजते, पिनुस्त्रपते, मातुर्जिह ति। अधोत्पानामन्यागिता ( भाल्पातोपयोगे )-अध्ययनार्थ धातु के प्रयोग में अध्यापक में भपादान होता है। यथा, उपाध्यायादपीदे, गुरोः पठति । क दस्युर्मा सरतात्यर्थः। .

३३६ ३ ब. पथिक भार भभिष्यापक । यथा ऐकशिक-पने यसनि, पनकदेशे इत्पर्यः, नयां स्नाति, गृहे भ्यपिति, शल्यायो सध्यानपयमान प्याप्य इत्ययः तिलेपुलमस्ति, वहीदारिका- ध्याकरण फौमुदी। ४२ पारणार्थानामोप्सितः-पारण अर्थ के धातु के प्रयोग में जिससे निवारण करना हो उसमें अपादान होता है । यथा; अन्नेभ्यः कार्फ धारयति, ययेभ्यश्छार्ग निषेधति, व्यसनात् पुत्रं निवारयति । ४३ श्रुत्यर्थानां श्रावयिता (पाख्यातोपयोगे)-श्रवणार्थक धातु प्रयोग में जो सुनाने वाला है उसमें अपादान होता है। यथा, गुरोः शास्त्र शृणोति. नटात् गीतमाफर्णयति, कम्पात् श्रुतं भवता, मया श्रुतमिदं तातात् । ४४ ग्रहणप्राप्त्यर्थानां तत्स्थानम् (जुगुप्सा ... )-- प्रहणायक और प्राप्त्यर्थक धातु के प्रयोग में ग्रहण स्थान और प्राप्तिस्थान में अपादान होता है । यथा; प्रहणार्थक-आचार्यात् उपदेश गृहाति, प्रजाम्यः फरमादत्त । प्राप्त्यर्थक-उपाध्यायात् विर्घा प्राप्नोति, गुरोर्शानं लभते। '४५ प्रमादार्थानां यतः प्रमादः ( जुगुप्सा ...)-प्रमाद अर्य के धातु के प्रयोग में जिससे प्रमाद हो उसमें अपादान होता है। यथा धार्मात् प्रमाचति, मध्ययनादनपधानम् । अधिकरण । आधारोऽधिकरणम्-कर्ता और कर्म के भाधारको भधिकरण कहते हैं। आधार तीन प्रकार के होते हैं, ऐक देशिक, शिशु शाययति । यिक-जले TEST, जलयिषये इत्यर्थः पिधायामगुरागः । भभिय्यापा-दुग्धे माधुष्यमस्ति, दुपस्य सीतया पवनं जगाम । बालवा वानराश स्वभाधन चन्चला भवन्ति । नाम निकपा नदी पत्तते । भ्रातरि भागतेऽहं दाणी यास्यामि । वयां विना सुखं न भवति । महता फप्टेनोपामिन विलयापि पस्न परमे वषसि पुत्राय राग्यभार दाशसवनं जगाम। जननी कारक Exercise-40 I. What is the difference between कारक & विभक्ति ? 2. Use the following words in your own Sentences:-- सम्वत, प्रति, धिक, अन्तरेण, सह, स्वधा, अन्तरा, विना, अलम् । चहिः, अते, निपुणः, पृथा, नम., स्वस्ति, उत्तरा, वषट् , निकषा, परितः, भयम् , प्रमादात् , उपवने । 3. What caseverdhags are governed by अभ्यास्ते, उप- वसति, अधिवसति, अभिनिविशते, रोचते, धारयति, प्रतिशृणोति, भभि- पति and अधितिएति। 4. Rilustrate the following:-भस्यन्तसंयोगे द्वितीया, अपवर्ग तृतीया, हेतो तृतीया पञ्चमी च, स्यबलोपे पञ्चमी, भावे रूसमी, तादम्य चतुर्थी, निरिणे षष्टी सप्तमी च, विवक्षया पठी, लक्षणात् मृतीया and तृतीया प्रयोज्ये। 5. Translate into Hindi and account for the case eadings of black words.- अह मद्य यमुनातलं गमिष्यामि । राजानं प्रति एवं सा उपाच । धिक स्वां पापकारिणम् । रामो लक्ष्मणेन - अनामर्जने दुसज्जिताना रक्षणे । साधवः सर्वभूतेषु दया यन्ति । राजा चर्मणि मृगं हन्ति । गोषु कृष्णा बहुक्षीरा भवन्ति । म। माना शिशु शरयायो शाययति । यतः देवदत्तेन भोदनं यति । भलपस्य हेतो हातुमिच्छन् । जात्या माणः कर्मणा --1 useless. In ancient time, there lived in Mithila a virtuous 7. Correct-- ग्रामस्य निकषा। प्रामस्य परितः नदी वर्तते। बलात् किं यो न रिपून वाधते । ईश्वररेण भिग्नः को सहायकोऽस्ति। 114 HIRaign जगम मे rifilanmiमारेमा writai पोरगाrani गरी निर्णय प्रकोmami kantire । कुलेन Frt Totमा यो नः । परन ने AMA दोगः । भोलिदियो मान गया । तेन मुनिना सुपरnि airi पुन जान मोम मिमि। Juविष्यातमाम राजा बभूव । 6. Translate into Sanskrit:- () मैं भाई के सार घर जाता है। राजा दशमी को पन देना है। वानर पक्ष पर पह पुतलिय मोना मदता है। बिना परिश्रम के विधा नहीं होती । लाम से च भौर कोष से पता।पये यार दुरा कोई पाप नही । वृक्ष फल से और मनु विद्या मे नम्र होते हैं। दान से विद्या का दाम नहीं होता सूर्योदय होने पर मैं जाऊँगा । कू का अब ग्रीष्मकाल में होता है। (b) I have come to learn Dharmshastras from you vot be angry tvith me. I have no friend except you. A tres is haown by its fruits. Koowledge witbout modesty is king. Every one of the world Torships Goi for absolution. समा कुष्यति । पिता मलमभिकुष्यति । पशुम्यः हिंहो बलिप्तः स्य विना किमाये न सिध्यति । तव ने कोऽपि मम सहायको नास्ति । स्वया भागते अहं तत्र गमिष्यामि । ग्रामस्य उत्तराहि सरः। अहं तवमलेन सन्तुष्टः । सबै जना धनं स्पृहयन्ति । पितुराज्ञा शिरमादाय वनं रथे। Do तद्धिता अन्तरा मम तव च हरिः । आसनेऽधितियति। इदं मान रोचते। धनात् होने न किमपि आदियते । स मम शतं धारयति । पयः पानः शिशुना। लियस्य अन्तिकस्य। तद्धित तद्धित-संशा के परे जिन प्रत्ययों के लगाने से दूसरी संशायें पनती है उन्हें तद्धित प्रत्यय कहते है। शतिकादीनाच)-सुभगा. दुर्भा, अधिदेव, अधिभूत, परलोड, सर्व- शेष, अनुशल, परस्त्री इत्यादि प्रातिपदिक के सतर्गत दोनौपदों पिलाद्विवर्ष, विर्ग, पनु पयस्यादि प्रतिदको अन्तर्गत सिर ११ मादिको पद होती। नेप्रतिरको भन्दरिया गुणा। मान रामसराराम साधारण नियम पः स्थरयत्-इमर, मोकास १ णितिवृद्धिरायस्य ( तद्वितेप्वचामादेः)-जिम अस्पय के लोप होता है उसके आने से प्रातिपदिक के बाद सरको पहि रती है। २ सुभगादेग्मयोः (लुगसिन्ध्यन्ते पूर्यपदस्य च । अनु. परिमोदिहोती है। ३ मुसञ्चालादेद्वितीयस्य-मुग्धाल, थप चाल, मानवता, ४ मणिपाप्यं सत्र-जिग प्रन्ययामेर हद मो भने में प्रतिपदिक पारिसर सर्वत्र र महोती। ५ोपोडशवयोर्यस्यायोः तखित प्रत्यय और पर कर रह से प्रतिदिन और tant ६ गुण उपरम्प (मोगुण- नियमा •मोशेभ्यो धारगना है। यथा, शरस्य अपत्य शारित, दशरथस्यापत्य ध्याकरण कौमुदी। ८ टेलोपोडिति (ः)-उ-इन् वाले तदित प्रत्यय के परे रहने से प्रातिपदिक के टि। अन्त्य सर को पूर्ववत्ता व्यञ्जन वर्ग सहित हि कहते हैं ) का लोप होता है। । तेविंशतः (तिविंशडिति)-ड-इत् बाले तद्धित प्रत्यारे परे रहने से विशति के ति का लोप होता है। १० इयुवी यययोद्ययः पदान्ते णिनि-ण-इत् वाले सद्धित प्रत्यय के परे रहने से पद के अन्तस्थित आदि सर के स्थान में उसनम का इय् और व् का उछ होता है । २१ द्वारादीनाञ्च-द्वार, स्वर, स्वाध्याय, प्यश, स्वस्ति, स्वर, स्वादु, मृदु, श्वस्, श्वन और स्व इत्यादि प्रातिपदिक के स्थान में य और व् का क्रम से इय् और उच् नहीं होता। १२ न स्यागतादीनाम्-स्वागत, स्वध्वर, खड़, यश, पर, व्यवहार और स्वपति प्रातिपदिक के आध य और द का इय् और उम् पा श्यापदन्यको:- धापद, न्याकु इन दोनों प्रातिपरिकों का विकम्प से होते हैं। २३ भव्ययाश्चित:---इत् वामे तद्धित प्रत्ययों से बने हुए राम धभ्यय होते है। १४ अपत्ये (तन्यापत्यम् )- पक्ष्यमाण (कहे जाने वाले ) या अपस्य भर्य में विदित है। २ अन्तात् पिम् (अत् इ० )-अपत्य अर्ध में अकारान्त शप फे परे पिण प्रत्यय होता है। इसके , प का लोप होता है दाशरथिः, वोणम्यापरयं द्राणिः, युधिष्ठिरस्याप यौधितिष भानम्यापश्यं मा निः, विकर्णग्यापर्य कर्णिः, कृष्णा म्यापन्य कारि नहीं होता।

शिवस्यापत्य शैया, ककुत्स्थ-काकुत्स्थः, विश्रवण धवणः, तद्धित। दौमित्रिः। (स) डको व्यासमधानो:पिणि ( सुधातुरफट् च । व्यासवरडनिपाद- लाण्डालविम्बाना चेति वक्तव्यम् )-पिण प्रत्यय परे होने से व्यास और सुधातृ शब्दों के परे डक होता है और इसका अफ रहता है । यथाः व्यासस्यापत्यं चैयासकिः, सुधातुरपत्यं सोधातकिः । उपवाहविः, सुमित्राया अपत्यं सौमित्रिः, दुम्मित्राया अपत्यं रहता है। यथा; नडस्यापत्यं नाडायन:, चरस्यापत्ये चारा- पणा, दासस्यापत्यं दासायन:, शकटस्यापत्यं शाकटायनः, द्रोणस्यापत्यं द्रीणायनः, पळतस्यापत्यं पार्वतायन:, वदरस्या- पत्यं पादरायणः, दक्षस्यापत्यं दाक्षायणः । इत्यादि शब्दों के परे ध्यण होता है और इसका य रहता है। था, गर्गस्यापत्यं गायः, यत्तस्यापत्यं वात्स्या, अगस्ति- नागस्त्यः, पुलस्ति-पौलस्त्यः, मण्डु-माण्डव्या, मधु-माधव्या, पिडल-शाण्डिल्यः, चणक-चाणक्यः, जमदग्नि-जामदग्न्यः, बाशर.पराशर्यः, अग्निवेश-आग्निवेश्यः, दिति-दैत्यः, दिति. यादि शब्दों के परे पण होता है और इसका अ रहता है। (क) बादादिभ्याव-अपत्य अर्थ में याहु इत्यादि शब्दों के परे पिण होता है। यथा, पाहोरपत्यं वाहविः, उपवाहोरपत्य ५ निवादिभ्यः पम् ( शिवादिभ्योऽण् }-अपत्य अर्थ में शिव ३ महादिभ्यः पायन ( नादिभ्यः फक् )-अपत्य अर्थ में नड् इत्यादि शब्द के उत्तर पायनण होता है और इसका आयन ४ गादिभ्यः ध्यण (गर्गादिभ्यो यन् )-अपत्य अर्थ में गर्ग गीषु-जिगीपयः, कुण्डिनी कौण्डिन्यः, यशवक-याज्ञवल्प यः, अदित्यः, प्रजापति-प्राजापत्यः ।

के परे डुर्होता है और इसका उर् रहता है। यथा; द्वयोर्मातो. रहने से कन्या का कनीन होता है । यथा, कन्यायाः अपत्य ३५२ पाकरण कीगुड़ी। गम:, ऊर्णनाम:माणनामः, Tणाया मा पार्यः, इटा. itm:, पति-गापमाः । (NORME-भपाय में दादि शाह के परे पण दाता है । यथा, विदयापर्य-यदा, उय मार्यः, कश्या- फापपः, शिककौशिकः, मामाज-मारद्वाजः, विश्वानर- पैश्यानरः, शरद्वत: शादतः, शुनक-शीनमः, पुत्र-पौत्रः, दुहित. दोदितः। (1) मरादग्य-अपत्य में भृगु इत्यादि शब्द के परे प होता है। ययाभृगोरपाय भार्गवः,मरोचि-मारीया, यसिध. यासिष्टः, फुटस.फोत्सः, गौतम गौतमः, अङ्गिरस.आङ्गिरस, विश्वामित्र.पैश्यामित्रः, धृतराष्ट्र धार्तराष्ट्रः, पाण्डु-पाण्ड यसुदेव-यासुदेयः, यदु-यादयः, पुरु पोरया, रघु-राधयः, कुर- फोरयः, मनु-मानवः, द्रुपद-द्रौपदः, पर्वत-पाय॑तः। (ग) वामकोरण्य मनुष्यमानुपाः ( जनपदशदात् क्षत्रियादम् । पुरुनादिभ्यो गयः । मनोजांताव यती युक् च -ऐयाक इत्यादि निपा. तन से सिद्ध होते हैं । यथा; इश्याकोरपत्यम् ऐश्वाका, कुर कौरव्यः, मनु-मनुष्यः, मानुषः । (घ) मातुईरसंख्यायाः ( मातुरूत्संस्थासंभदपूर्वयोः - घण प्रत्यय परे होने से संख्यावाचक शब्द के परवती मातृ शब्द रपत्यं द्रमातुरः पण्णां मातृणामपत्यं पाणमातुरः । सम् भद्र शब्द के परे रहने पर भी होता है; यथा, साम्मातु, भाद्रमातुरः। (च) कन्यायाः कनीनः ( कन्यायाः कनीन च)-पण प्रत्यय पर मार कानीनः।

यः, दुभंगा-दो गिनेयः, बन्धकी-वाधकिनेयः, कनिष्ठा-कानि यथा, कुलटाया अपत्यं कोलटिनेयः, कौलदेयः । उत्तर पीया होता है और इसका ईय रहता है ।यसुरफ्त्य सद्धिता ६खोभ्या पेयम् (खोगे दक)-अपत्य अर्थ में स्त्री प्रत्यया शब्द के परे पेयण होता है और इसका एय रहता है। यथ गाया अपत्यं गाड्या, राधाया अपत्यं राधेयः, विनता-चैन तेयः, ताडका-वाडकेयः, सरमा-सारमेयः, भगिनी-भागिनेय कुन्नी-कौन्तेयः, गोधा-गीधेयः । गाँधेरगोधारी (गोधाया ढक् , आरगुदीचाम् )-गोधाम श्रात्यं, इस अर्थ में गौधर और गौधार निपातन से सिद्ध होते हैं। (क) शुधादिम्यश्व~अपत्य अर्थ में शुद्ध इत्यादि शब्द के प पेयण होता है । यया शुभ्रस्यापत्यं शौथः अत्रि-आत्रेयः विमातृ-वैमात्रे यः, शकुनि-शाकुनेयः, इतर-ऐतरेयः । (ख) लोपः पेयप्युवर्णस्य--पेयण प्रत्यय होने से प्रातिपदिक के अन्तस्थित उवर्ण का लोप होता है। यथा; मृकण्डोरपत्य मार्कण्डेयः, कमण्डलो: अपत्यं फामण्डलेयः । -पाण्ड और नहीं होता । यथा, पाण्डोरपत्यं पाण्डचेयः, कद-काद्रवेयः । (घ) समगादेरिन् पेयणि-पेयपा प्रत्यय होने से सुभगा इत्यादि शब्दों के उत्तर इन होता है । यथा; सुभगाया अपत्यं सौभागि माया वा-कुलटा शब्द के उत्तर विकल्प से होता है N. B. यहाँ कुलटा का अभिशोपजीवनी सती स्त्री है, व्यभिचारिण नहीं। यभिचारिणी भर्य में कोलरेयः, कोलटेर होता है। "स्वप्नादिन्यः पोयम् -- अपत्य अर्थ में स्वर इत्यादि शब्द के (ग) न पाण्डुम्दो:- पदु शब्द के उवर्ण का लो- . टिनेयः। स्वनोपः।

व्याकरग.कौमुदी लिका। पितृमातृध्यम्रोः पेयण या मृलोपध-पितृस्वम् और मानस शाद के उत्तर विवय में पेया होता है। यण होने से प्रकार का हो होता है । यया; पिताममुरपत्य पैतृपमेयः, तित्वोयः। मानुष्वर-गम रोया, मातृष्वपीया। - रेवत्यादिभ्यः किम् ( रेवस्पादिम्यक् )-भपत्य अर्थ में रेवती इत्यादि शब्द के उत्तर पिकण होता है और इसका इक रहता है । यथा, रेवत्या अपत्यं पतिकः, अश्वपाली.माश्या- लोपोगर्गादेर्यहुवचने-महुवचन में गर्ग इत्यादि के परे आप प्रत्यय का लोप होता है। यया; गर्गस्य अपत्यानि गर्ग, वत्सस्य अपत्यानि पत्साः, अगस्ति-अगस्तया, विश्वावमु-विश्वावसवः, बभ्रु भत्रका, मुहर मुद्रलाः, जमदनि-जमदमय । यस्कादेः-बहुवचन में यस्यादि के परे अपत्य प्रत्यय का लोप होता होता है । यथा, यस्कस्य अपत्यानि यस्काः, दुहास्य अपत्यानि सुधार तृणकर्ण-कृणर्णाः, जहास्य-जदारथाः । विदादेः-बहुवचन में विद इत्यादि के उत्तर अपत्य प्रत्यय का लोप होता है । पया, विदस्य अपत्यानि विदाः, उर्ब-उवाः, कश्यप-कश्यपान कुशिक कुशिकार, भरद्वाज-भरद्वाजार, विश्वानराः, शरद्वत् शरद्वतः, शुनक-शुनकाः । अध्यादेश्व ( अत्रिभृगुकुत्सबशिष्ठगोतमाङ्गिरोभ्यश्य) वचन में भत्रि इत्यादि के उत्तर अपत्य प्रत्यय का लोप होता है । यम, भयोग्पत्पानि भत्रया, म-मृगः, कुत्स-कुत्साः, वशिध-वशिष्टा, गोतम गौतमः, अङ्गिरस-अङ्गिरसः। राजसंज्ञाभ्यो विभाषा (तदाजन्ययहुषु तेनयास्त्रियामर बहुवचन में राजसशक शब्द के उत्तर भारत प्रत्यय का विम्प से हो होता है । यथा रघोरपत्यानि रवा, रापता, कुरु-कुरषः, औरणा': उपमन्यु-उपमन्यवः, विवानर- प्रन्यय होते है। यथा, तक पेसि अधीते पा ताकिकः, न्याय पेसि भाते पानैयायिकः, घेदान्तं येत्ति मधीते पा घेदान्तिकः, पुराण-पौराणिकः, घेद-पैदिकः, थलङ्कार मालडारिकः,ज्योतिस्. पातिपिका, ध्याकरण-घेयाकरणः, कम-प्रमकः, पद-पदकः। फ्युज प्रत्यय होते ६ पथा, पिणा प्रोतंभापम्, मनुना म् मानयं, मानवीयम्, विष्णुना प्रोक्तं चप्पब, पतलि. जालम्, फणाद-काणादम्, पाणिनि-पाणिनीपम् जैमिनि. मनीयम्, भत्रि-मात्रेयम्, उशनस्-मोशनसमा हिरसम्, पराशर-पाराशरीयम्, पृहस्पति-पाईस्पत्यम्, एनारदीयम्, पाल्मीकि-यामाफीयम्, यौघायन-पौधाय. तदित। ३४९ पतु यदनः, पादत्राः; इसाकु-इलाका, ऐश्वाकाः; वृष्णि-वृष्णयः, वार्णयाः। न स्त्रियाम् (तद्राजन्य......... स्त्रीलिङ्ग में अपत्य प्रत्यय का लोप यही होता । यथा, यस्कस्य अपत्यानि स्त्रियः यादयः, विदस्यापत्यानि स्त्रिया वैयः, अत्रेः अपत्यानि स्त्रियः आग्रेयः, रघोरपत्यानि स्त्रिया राघव्यः अर्थ विशेषे चापल्यानि-अपत्य अर्थ में जो प्रत्यय होते हैं थे अन्य विशेष भणे में भी होते है। ईय-फणणीन-पोकणच-अर्यविशेष में ईय, कण , पैरा प्रत्यय भी होते हैं । कण कार, जीन का ईन और पोकण का ईक जीन और । (क) तति तदधीत ( तदधौते तद्वेद)--तत् येत्ति, तत् अधोते इन दो वर्षों में प्रातिपदिक के उत्तर पधासम्भय उपयुक्त हस्सोऽन्त्यः शिक्षादे:-शिक्षा इत्यादि के मन्त्र स्वर बस । यथा, शिक्षा देति मधीते या शिक्षः, मीमांसा मोम'राकः । (क) तेन प्रोत्रम्-इस अर्थ में शव के उत्तर पथासम्भय (५) लम्-स भर्थ में प्रातिपदिक के उत्तर यथा- हारिम्, गजिया-मातिम्, साशा-नाशिम, रोचना-पान- देयता शेयः, विष्णुरस्य देवता :, शनि मस्य देवता (६) तस्य सम-समर्थ में शब्द के उत्तर यथासम्म उपयुक्त प्रत्यय होते हैं। यया, मिझानां समदमसम्, मला राणो समूदः माहारम्, मयूर-मापूरम, धेनु-धेनुकम्, कलाप- कालापकम्, राजन्य-राजन्यम्, राजपुत्र-राजपुत्रकम्, मनु- N. B. समहसण्ड-काएड-तल:-समूह अर्थ में शदर यथासम्भव खग्ड, क्या और तल प्रत्यय होते है। यथा, कमलान समूह कमलखण्डम, कुमुहाना समूहः कुमुदखण्डम, दुणि सादुकामद, कम्मको समूहः कम्म कायम तल प्रत्ययान्त शब्द स्त्रीलिज होते है। (ज)तत्र भव:-इस-अर्थ में (यहां-भव शब्द से जात, artiyri mAT गुहार लम्कारित गईन म मादिकम्, गोर-शा. नानावित, पुष्पीमीयम्, ममिकामाशिम, नीम् । (Rita (नेन स भ में उमर गासमा गएँग प्रगा होते हैं। या, रग, फागपा, रामन रात कौमुमन, माली मारन, इन्दिा निकम, पीर-गीगम् । (4) राम्य पा-सा मम्य देता, म अर्य में प्रार सार पचामामय उपर्युक होते है। पया, शिमोऽस्य शालः, गणपति-गाणपत्यः, प्रजापति-प्राजापत्यः, यायु-यायव्य, भग्नि-माग्नेयः, सोम-सौम्यः, पायायिध्यमः मनोपोम मनीपोमीयम, भग्नीपोम्यम् । प.प्राह्मण्यम्। जनानां समूह जनता, बन्धूनां समूहः पन्धुना। पायाधियी-चापाथिर्वायन, एय-मानुप्यकम्, अपूप-आपूपिकम्, गणिका-गाणिक्यम्, प्राय स्थित, संक्रान्त, याविर्भूत इत्यादि कई थर्थ समझे जाते हैं) पसन्त-वासन्तिकः, हेमन्त-हैमन्तिकः, समुद्र-सामुद्रिका, द्वीप- द्वैपायन,प्या; थकाल-आफालिका,शश्यत्-शाश्वतिकः, फुल- मान्तरिकम् , मनस्-मानसं, मानसिकम्: शरीर-शारीरिकम, परपयारण्यकः, फोश-कौशेयम्, इद भयं ऐहिकम्; लोक. सौकिकम् , भूमि-भीमः, दिव-दिव्यः, अन-अम यम् , आदि. याधम्, अन्त-अन्त्यम् , पेशे भवा वेश्या, लिकम् , कदाचित्-कादाचित्कम्, सम्प्रति-साम्प्रतिकम् , ऐवं भवं धाधिदैविकम् , मध्यन्दिने भवं माध्यन्दिनम्। टिलोपोऽस्माद्वदिपो:--अकस्मात् और बहिस् के टि का लोप होता है। यषा, स्माद्भवं आकस्मिकम् , यहिः भवं बाह्यम्, शाहिकम् । स्त्रीपुसायो नण्-भर इत्यादि अर्थ में स्त्री और उमस के परे " होता है और इसका न रहता है। यथा, स्त्र भवं स्त्रणम् पुमस्. नक निपातन से सिद्ध होते हैं। यथा, हेमन्ते भर हैमनम् , खोरमा हैमन-शॉयस्तिकपौनापुनिका:-हेमन, धौवस्तिक और पौर:- प्रतीच्योदीव्यतिरधीना:-प्रतीच्य, उदीच्य और तिराचीन नातन से सिद्ध होते हैं। यया, प्रतीधि भवं प्रच्यम्, उदोचि भर कुलीनः, दुष्कुल-दीकुलेयः, दुकुलीनः; प्राच्-प्राच्यम्, दिश- तद्धित। ३४७ शब्द के परे यथासम्भव उपर्युक्त प्रत्यय होते हैं। यथा, मथु- फलिङ्ग भयः कालिङ्गः, शरद्-शारदः, गयां मयः माथुरः, फलिङ्ग 1 - दिश्यम् , वर्ग-वर्ण्यम् , फण्ठ-कण्ठयम् , दन्त-दन्त्यम् , तालु- वालव्यम् , भोप्ठ-मोष्टयम् , जिहामूल-जिह्वामूलीयम् , अन्तर. अध्यात्म-याध्यात्मिकम् , अधिभूतं भवं साधिभौतिकम् , धधि- , -वस्तिकम्। पुन: पुनर्भवं पौनापुनिकम् । 1 - याम् , तिरधि म तिरोनम् ।

ध्याय-भोपाध्यायकम् , पितामद-पैतामहयाम् , मात-मातरम (क) तन साधुः-इस अर्थ में शब्द के उत्तर यथासम्भव दिफः, संग्रामे साधुः सांग्रामिफा, संयुगे साधुः सांयुगानः, अहोऽड:-बहन शब्द का अड़ होता है। यथा, भडा निसर ध्यातीच-व्याप्ति भर्य में भी होता। यथा, दिन मापनि घयसिच-अयम् अथ में भी होता है। यथा,वास पर विपणः, द्विवीयः, द्विमाविका, द्विवर्षः; पछ वर्षाण्यस्य वः पयार पञ्चीयः, पयवार्षिक:, पण पोडश वर्वादयस्प क्या कि, माथुर, नगरादागत: मागरिका, आपण भापनिक, मा. ध्याकरण-कौमुदी। उपर्युक्त प्रत्यय होते हैं । यथा, सभायां साधुः सभ्यः, समान साधुः सामाजिकः, अतिथी साधुः भातिथेयः, घेदे साधुः वितण्डा-वैतण्डिकः, संकथा-सांकथिका, संग्रह सांप्रदिकः । अर्थ (ट) देये कालादवश्यम्भावे (देयमृणे-अवश्यम्भाव समझा जाय तो देय अर्थ में फालयाचक शब्द के पर यथा- सम्भव उपयुक्त प्रत्यय होते हैं । यथा, मासे देयं मासिकम् , वर्षे देयं वापिफम् , संवत्सर-सांवत्सरिकम् , मप्रहायण-आग्र. हायणिकम् , श्रावण धावणिकम् । निवृत्ते च (तेन निवृत्तम् )–निर्वत्त अर्थ में भी होता है। यथा, दिनेन निर्वृत्तं दैनिकम , मासेन निवृत्त मासिकम् , वर्ष-वार्षिकम् । संवत्सर सांवत्सरिकम । भातिकम दैनिकम, मारा व्याप्य स्थितम मासिकम ; वर्षम वापिकम् , बतुरो मान् ग्याप्य स्थित चातुर्मास्यम् । पौरायपीयः, पोटशवापिका, पोडशवर्षः। (8)सत भागतःस अर्थ में प्रातिपदिक उत्तर यया. सम्मय उपयुका प्रत्यय होते हैं। यथा, मथुराया भारत - पेन, इस अर्थ में शब्द के परे यथासम्भव उपयुक प्रत्यय यम्, शिवस्येदं शैवम् , जनपद-जानपदम् , तस्य इदं तदीयम्, पतस्य इदं एतदीयम, देव-देवम् , असुर-भासुरम्, सम्राज्- शरीर-शारीरम् , पितृ-पिण्यम्। गो-गव्यम, महिप-माहिपम् , येणु-येणवम् , पलाश-पालाशम्, सदिर-खादिरम्, बिल्व-वैल्यम्, मुख-माअम् , स्त्री-स्त्रणम्। पुमस्-पस्निम्, गङ्गा-गागम्, हिमवत्-हैमवतम्, पशुपति-पाशुपतम् , शहर-शाङ्करम्, सुर- सौरम् , चन्द्र-चान्द्रम, घेद-वैदिकम् , उपनिषद्-औपनिषदम्, प्रथिवी-पायिवम्, जल-जलीयम् , तेजस्-तैजसम् , घायु-पाय- बीयम् , शत्रु-शात्रयम्, रुख-गौरयम्, न्यस्कु-नेयस्करम्, न्यास्क- नम्वापद-शीवापदम्, श्वापदम् भरत-मारनम्, भारत- भारतवर्षोयम् , युप्माकमिदं-युप्मदीयम् , अस्माकमिदम् , तद्वित। दक्षिणीयः,दक्षिण्यः। सवितृ-सावित्रम्, भ्रातृ-मातृकम् , पितृ-पैतृकम् , पिश्यम्; स्त्रिया मागतं स्त्रणम् , उस आगतं पास्नम् । (४) सदईति-तत् अर्हति, इस अर्थ में शब्द के उत्तर यथा. सम्भय उपयुक प्रत्यय होते हैं । यथा, शतमहति शतिका, सहनमदति साहनिमः, छेदम् अर्हति छेद्यः, भेदम् अर्हति भेद्यः, दण्ड-दण्डयः अर्घ-मर्यः, वध-वध्यः, यज्ञ-यज्ञीयः, दक्षिणा. (ढ) तस्मादनपेतम् ( धर्मपथ्यर्थन्यायाइनपेते )-तस्मात् मन- होते हैं । यथा, धर्मादनपेतं धर्म्यम् according to jusuce, or morality, न्यायात् अनपेतं न्याय्यम् , अर्थ-अयम्, पथ-पथ्यम्, विधि-वैधम् । (ग) तस्येदम् --तस्य इदम् , इस अर्थ में शब्द के उत्तर यथासम्भव उपयुक्त प्रत्यय होते हैं । यथा, विष्णोरिद पप्पा. साम्राज्यम् , इन्द्र-ऐन्द्रम् , महेन्द्र-माहेन्द्रम् , मनस्-मानसम्, से सिद्ध होते हैं। यथा, सूर्यस्येदं सौर दिनम सरम्बा सार (त) तस्य विकार:-इस अर्थ में शब्द के उत्तर ययासम्मर दारयः, देवदारुन्देवदारयः, पयस्-पायसः; मग्नि-माग्नेयः ध्यानीमुदी। भामयम् । सम्मदायकवन-फान में युमा का व मा साह । यथा, तपम, मम इद मोरन् । गुप्माकाम्माको जीनपणी: (गुप्मदम्मदोरन्यतरस्या स' गीन मोर पण प्रत्यय परे रहने से गुमर का युप्मा और सड़क बामा होता है। यमः; गुमायमर यौनाकीनम् , यौनान् । मि आमाकोनम् मारमाम् । तयफममकायेकया-वचन में सदा बोर मम होता है । पथा, सर इ ताबीनम्, सारसम्मम इद मामकोनम्, ममन्न् । परादेः फन् पीयणि-पोयण प्रत्यय परे रहने से पर, ६, राजन इत्यादि शब्द के उत्तर, कन् दोसा है और इसका क रहता है । यय परस्येदं परकोयम् । स्व शाद के परे विश्र से होता है; स्वस्येदं सकीयन स्वीयम् । सौरसारप-स्वायम्भुवः-सौर, सारव और स्वयम्भुव निफानन अलम् , स्वयम्भुव इदं स्वायम्भुवं धाम ! भवदीयान्यदीयो-भवदीय और अन्यदीय निरादन से सि. होते हैं । यथा, भवत इदं भवदोयम , अन्यस्य अन्यदोयम् । उपर्युक्त प्रत्यय होते हैं । यया, सुवर्णस्य विकार: सौवर्ण रजतस्य विकारः राजतः, सीसस्य विकारः संसः दारु मुद्ग-मौद्गः, क्षु-ऐक्षवः, गुड-गोडा, पिष्ट-पष्टः, तिल-तैलम् । (थ) सदस्य पश्यम-तत् अस्य पण्यम् इस अर्थ में प्रस्ट .फे उत्तर यथासम्भव उपर्युक्त प्रत्यय होते हैं । यथा, लय ज्य आपूपिका, तण्डुल-ताण्डुलिकः, मोदक-मोदकिकः, उशीर. man, प्रासु-प्रासिका, परश्वध-पारश्वधिकः, परशु-पारश- विकः, तरवारि-तारवारिकः, शक्ति-शाक्तीकः, यष्टि-याट्रीका, आयुस्-मआयुष्यम्, काम-काम्यम्, गृहप्रवेशन-गृहप्रवेशनीयम्, अनुप्रवचन-अनुप्रवचनीयम् , संवेशन-संवेशनीयम्। उत्तर यथासम्भव उपयुक्त प्रत्यय होते है। यथा, तपोऽस्य तापसा, छत्रमस्य शाल छात्रः, शिक्षा अस्य शीलं शेक्षा, रिका, दिशोऽस्य प्राप्तः दैष्टिकः, ऋतुरस्य प्राप्तः आर्तवः । (क) अविकृत्य कृतं प्रन्ये-प्रन्थ समझे जाने पर 'मधिहत्य इस अर्थ में शब्द के उत्तर यथासम्मय उपयुक होते हैं । यथा; राममधिरत्य कृतं रामायणम्, मग- (प) तस्य प्राप्त कालात्-तत् अस्य प्रातम्, इस अर्थ में मधिहस्य कृतं भागवतम्, मारतानधिसत्य कृतं भारतम् तद्धिता स्य पण्यं लायणिकः, तेलमस्य पण्यं तैलिकः, अपूपा भस्य भौशीरिक, ताम्बूल-ताम्बूलिकः । (३) तदस्य प्रहरणम्- तत् अस्य ग्रहरणम्, इस अर्थ में राब्द के उत्तर यथासम्भव उपर्युक्त प्रत्यय होते है । यथा; धनु- रस्य महरणं धानुष्कः, मसिः अस्य ग्रहरणं असिकः a swords- (शक्तिपट्योरोका )। (५) तदस्य प्रयोजनम्-तत् अस्य प्रयोजनम् , इस अर्थ में सन्द के उत्तर यथासम्भव उपर्युक्त प्रत्यय होते हैं । यथा, यशः प्रयोजनमस्य यशस्यम् , स्वर्गः प्रयोजनमस्य स्वर्ग्यम् , (न ) तदस्य शीलम्-तत् अस्य शीलम् , इस अर्थ में शब्द बोइ-मारोहः, चुरा-चौरः। लयाचफ शब्द के उत्तर यथासम्भव उपयुक्त प्रत्यय होते यथा समयोऽस्य प्राप्तः सामयिफः, फालोऽस्य प्राप्तः - (म)तमै हितम-इस अर्थ में शध्द के उत्तर यथासम्म हित मध्यरीणम् , ग्रह्मणे हितं ब्राह्मण्यम्, विश्वसनेम्यो दिन (म) का नक्षत्रातयोगे (माग गुरुः कालः)-फान और नक्षत्र योग समझा जाय तोमक्षत्रपाचकशदक उत्तर पधा. ग्या-येष्ठः, मायादा-भागका प्रयणा धावण, धाशिम) भाविना, भरपयुमाश्श्युजः, कृतिका-कार्तिकानि ३५२ व्याकरण-कौमुदी। चाक्यं पञ्चाधिकृत्य कृतं वाक्यपदीयम् , राघवान् पाण्डवा- ञ्चाधिकृत्य एतं राघवपाण्डीयम्, किरातमजुनवाधिरत्य कृतं किरातार्जुनीयम् , अनुशासनमधिकृत्य कृतं अनुशासनिकम, अश्वमेध-अश्वमेधिकम् , माधमयास-आश्रमवासिकम् , मुबल मोपलम् , महाप्रस्थान-महाप्रस्थानिकम् , स्वर्गारोहण-स्वर्गा रोहणिकम् । (4) तस्मै प्रभवति ( तस्मै प्रभवति सन्तापारियः)-तस्मै प्रभ पति, इस अर्थ में शब्द के उत्तर यथासम्भव उपर्युक प्रत्यर होते हैं । यथा; सन्तापाय प्रमयति सान्तापिका, सन्नाहाय प्रभयति सान्नाहिफा, संग्रामाय प्रमयति सांप्रामिका, महात- साङ्घातिका, उत्पात मोत्पातिकः । काम के धनुषि (कर्मण उकम् )-धनु अर्थ में का सद निपासन से सिद्ध होते। यथा; कर्मणे प्रभवति कामुक धनुः । उपर्युक्त प्रत्यय होते हैं। यथा; यज्ञाय हितं यशीयम् , मरण विश्यजनीनम् , सर्यजनेभ्यो हितं सायंजनोनम् (म. जनभोगत्तरपदात्ता सम्भव उपयुभ प्रत्यय होते | यथा; विशातया ना युतो मास: पैशासा, गधया नक्षत्रण युक्ती गामः . मदा-मा - मनपदा भावपर, प्रोपवा-प्रोत गरिएको भानहाणिक, गगी अग्रहायणी अप्रशायणः, भाप्रहायणः, अर्धार्थम् उदकं मार्यम्, पलये इदम् पालेयम्, यतिथये इदं मातिथ्यम् , भग्निदेवताय इदं अग्निदेवत्यम् , पितृदेयताये इदं तद्धित। मार्गः, मृगशीर्ष-मार्गशीर्षः, मृगशिरस्-मार्गशिरमः, मघा-माधः, फल्गुनी-फाल्गुनः, फाल्गुनिकः, चित्रा चैत्रः, चैत्रिकः । यलोपस्तिष्यपुष्ययो:-तिष्य और पुष्य शब्द के प का लोप होता है। यया; तिष्येण नक्षत्रेण युक्तो मासः तपः, पुष्येण नक्षत्रेण युनो मास: पोपः। (य) तद्वदति--तत् पहति, इस अर्थ में पथासम्भव उपयुक्त प्रत्यय होते हैं। यथा; धुरं वहति धुर्यः, धीरेयः, सर्वधुरं (१) तेन जीवति-इस अर्थ में शब्द के उत्तर यथासम्भव उपर्युक्त प्रत्यय होते हैं । यथा; वेतनेन जीवति वैतनिफा, वाहनेन जीवति पाइनिकः, जालेन जीवति जालिका, उपदेशेन (व) चादय-तादी समझे जाने पर शब्द के उत्तर यथा- सम्भव उपर्युक्त प्रत्यय होते हैं। यथा; पादार्थम् उदकं पायम् , पद्दति सर्वधुरीणः, चतुधुरा-चतुधुरीणः, हल-हालिकः, सीर- सेरिका, रथ-रध्या,युग-युग्यः, शकट-शाकटः। जोवति औपदेशिका, धनुषा जीवति धानुष्कः, मयविक्रयाभ्यां जीवति क्रयविक्रयिका, आयुध.आयुधिकः, आयुधीयः, पागुरा- यागुरिफः, नौ-नाविका, व्यवहार-व्यवहारिकः। द्वापस्मिन् वृद्धि दीयते द्विशतम् , त्रिकंशतम् , चतुष्पंशतम्, पञ्चशतम् वृद्धिः। आय, लाम इत्यादि के दान में होता है। (ल) तदस्मिन् दीयते-तत् अस्मिन् दीयते, इस अर्थ में प्राति- पदिक के उत्तर यथासम्भव उपयुक्त प्रत्यय होते हैं। या, पितृदेवतम् । (सपा-इस अर्थ में प्रातिपरिक के उत्तर यथासम्मय उपर्युक प्रत्यय होते हैं। प्रत्यय होने से शब्द के अर्थ में परि- भेज-मप- भागरूपनामम्यो धेया-वार्य में भाग, रूप, मामन् इनके परे सस्नी प्रशंसायाम-प्रशंसा समझी जाय तो स्वार्थ में मृा शद के उत्तर सऔर न प्रत्यय होते हैं। पया; प्रशस्तिा, मृत मृता, मृत्स्ना। म्याकरण कौमुदी। यत्तन नहीं होता, पहला ही भर्य रहता है। यथा; यन्धुरंग घान्धयः, चोर एय पौरः, चण्डाल पर चाण्डाला, मन र मानसम् देयता एप दंगमम् , प्रा एय प्राजः, कुतुक-कौनुकम् , कुतूहल-फोनहलम् , मगम्-मारतः, रक्षस-राक्षस:, ज्यम् , इतिहेव ऐतिहाम, निलोफी-प्रैलोक्यम् , फरुणा-कार- ण्यम्, द्विगुण-वैगुण्यम्, त्रिगुणगुण्यम्, पड्गुण-पागण्यन, चत्यारो पर्णा एव चातुर्वर्ण्यम्, सेना-सैन्यम्, सनिधि-सान्नि- ध्यम् , समीप-सामीप्यम् , उपमा-ऑपायम् . मुम्न-सौरयम् , सोदर-सोदयंः, एफ-ऐककः, मत्यय-मात्यायिकः, सर पर सूर्यः, मत्तं पय मर्त्यः, समान-सामान्यम् , याय-यायक: यालयालफः, नौ नौका, नया-नव्यम् , नवीनम् , बागेय वादिक सन्देशवचनम् । देवात्तल-स्वार्थ में देव शब्द के उत्तर तर होता है। यथा; देव एव देवता। धेय प्रत्यय होता है। यया; भाग एद भागधेयः, नान एव नामधेयम् । मृदस्तिकम्-स्वार्थ में मृद् शब्द के उत्तर तिकन् प्रत्यय होता है। यथा; मृदेव मृत्तिका। इतनी -नून और नूतन राख्द निपातन से सिद्ध होते है। यथा, मवमेव नत्नं, नूतनम औपयिकश्व-औपयिक शब्द निपातन से सिद्ध होते हैं। यथा, उपाय एव चौपयिका (५) सोऽस्य निवासोऽभिजनो वा ( सोऽस्य निवासः अभिजनव सः अस्य नियासः । (निवासोनाम यत्र सम्प्रत्युच्यते ), सः अस्य - नल शिलः, विदेह-घदेदः, पञ्चाल-पाञ्चालः, मगध-मागधः, थयोध्या- थायोश्यिकः, मद्र-मादः, अङ्ग-आङ्गः, वह-वाङ्गः । अभिजन अर्थ यथा, एपो निवासः बगा; वा एष निवासः पगाः, कलिङ्ग एषां निवसः कलिङ्गाः, विदेह एप निवासः विदेहान, उत्पल-उत्कला, कम्बोज. सोऽस्य राजेत्येवम.-सः अस्य राजा, अर्थ में भी घेही प्रत्यय और कार्य होते हैं जो 'सोस्यऽनिवासः, सोऽस्यामि. मगध-मागधा, निपध-नैपथः । यहुवचन में कश्मीरा:, फलिगा, विदेहाः, पञ्चालाः, मगधाः, निपधाः । में भी ऐसा ही होता है। यथा, गान्धोस्य अभिजनः कम्बोजाः, मगध-मगघात, पञ्चाल-पञ्चाटार, करमीर-कश्मीराः। नहीं होता । यथा, मगध भास निवासः मागध्य, पञ्चाल-पाचारयः, जनः' अर्थ में होते हैं। यथा, प.श्मीरस्य राजा काश्मीरः, कलि- तद्धित । अभिजमः (अभिजनो नाम यत्र पूर्वरुषितम् ) इस अर्थ में शब्द के उत्तर यथासम्भव उपर्युक्त प्रत्यय होते हैं । यथा, मधुरा अस्य निवासः माथुरः, मिशिला अस्य निवासः मैथिलः, कम्योज-काम्योजः, कश्मीर काश्मीरः, गन्धार-गान्धारः, कलिंग. कालिङ्गः, उत्कल औत्कलः, सिन्धु-सन्धयः, तक्षशिला-ताक्ष- गान्धारः इत्यादि। लोपो यहुपचने ( तद्राजस्म यहुपु तेनैवास्त्रियाम् )- बहुवचन में निवास और अभिजन अर्थ में विहित प्रतयय का लोप होता है । न स्त्रियाम् (तद्वाजस्य यहुषु तेनैवास्त्रियाम् )-स्त्रीलिङ्ग में विदेह-वेदेवाः, कलिङ्ग-कालिटम्यः । इस्य राजा कालिगः विदेहस्य राजा वैदेहः, पञ्चाल-पाञ्चाला, (स) तस्य भावः-इस अर्थ में शब्द के उत्तर में यथा. मय उपर्युक्त प्रत्यय होते हैं । यथा, पुमारस्य भायः - म्यविर म्याविरम, गुरु-गौरयम् , लघु-लाधयम , मुष्ठ-सौष्ट- यम्, ऋजु-भाजेयम् , मृदु-मादेयम् , पटु-पाटयम , मुरमि- भावः, तस्य फम्म, इन अर्थों में शय्द के उत्तर यथासम्मर आर-शौर्यम् , वीर-वीर्यम्, दूत-दूत्यं, दौत्यम् ; पुरोहित-पौरो. कृल्यम्, पुरुष पास्यम्, सुमातृ-सीमात्रम्, दुति-दौत्रिम् , ध्याकरण-कौमुदी। फीमागम् , शिशीर्मायः शैगम् , यरस्य मायः याद्वपयर सौरभम् , रमणीय-रामणीयम् , मनीय-सामनीयम् , स्थिर. म्यय॑म् , धीर-धैर्यम् , गम्भीर-गाम्भीर्य्यम , श-काम जड जाडयम् , शीत-शैत्यम् , उष्ण-औष्ण्यम, दाम् , मन्द-मान्द्यम् , सुभग-सौभाग्यम् , दुर्मग-दीर्माग्यम् , मधुर. माधुर्यम् , माधुरी; मूर्ख-मोयम , विषम-पग्यम् , स. साम्यम् , फातर-कातर्य्यम , फर्फश-फार्फश्यम् , बाल-बाल्यम् । शुख-शोषल्यम् , सुमनस् -सौमनस्पम् , दुर्मनस-दौमनम्यम् प्रीण-प्रावीण्यम् , उदासीन-औदासीन्यम् , कृपण-कार्पप्यम् , मध्यस्थ माध्यस्थम् , उदार-औदार्यम् , विगुण-वैगुण्यम् , सुजन-सौजन्यम् , स्थूल-स्यौल्यम् , अधिक-आधिक्यम् । (६) तस्य भावः कर्म च ( गुणवचनब्राह्मणादिन्यः कर्मशि च )-तस्य उपयुक्त प्रत्यय होते हैं। यथा, ब्राह्मणस्य भावः कर्म या ब्राह्म- ण्यम् , चोरस्य भावः कर्म पा चौर्यम् , अलस-आलस्यम् , सेनापति-सनापत्यम् , अधिपति-आधिपत्यम् , सखिसख्यम् । हित्यम् , सुहित सौहित्यम् , सारथि सारथ्यम् , मास्तिक-मा- स्तिक्यम् , नास्तिक-नास्तिक्यम् , ,पण्डित-पाण्डित्यम्, पणि वाणिज्यम् , शुचि-शौचम् , दाशुचि-मशीयम् , मुनि-मीनम् । अकुशल-अकौशलम् , अनुकूल-आनुकृल्यम् , अनुकूल-आनुवल्यम् , प्रतिकल-प्राति- मुद-सौहार्दम्, दुहेद-दोहोईम्, अनुशंस-मानुशंस्यम् । कुशल-फौशल्यं, कोसला, पल-बापन्यम् , यापलमा, निपुर. .

ईश्वर: सायमीमः, चक्षुपा गृह्यते चाक्षपं रूपम्, थवणेन गृह्यते श्रावणः शब्दः, रसनया गृह्यते रसनी रसः, त्वचा गृह्यते त्याचः तुल्यः पयस्यः, तुलया सम्मितं तुल्यम्, गृहपतिना संयुक्तः गाई पत्योऽग्निः, समाने तीर्थे घसति सतीर्थ्यः, समाने लोके विदितः लौकिक:, सर्वलोके विदितः सार्चलौकिका, नित्य क्रियते दीयते या नेत्यम्, नैत्यकम्, नैत्यिकम: निमित्त न स्पर्शः, बापा निप्पन चाक्षुपं प्रत्यक्षम्, श्रवणेन निष्पन्नं स्त्रिया जित: स्त्रैणः, द्वारे नियुक्तः दौवारिकः, भाण्डागारे विदूरात् प्रमयति पैदयों मणिः, रधेन सञ्चरते रधिकः, शकुन्तान् हन्ति शाकुन्तिकः सहसा धर्त्तते साहसिकश्चौरः, क्रियते दीयते था नैमित्तिकम्, प्रवेशेन दीयते प्रावेशनम्, पर-प्राप्नोति आप्रपदीनः पटः, अनुपदं वदा अनुपदीना उपा. कारका नेपुण्यम्, नैपुणम्। सहाय-साहाय्यम्, साहायकम्। चतुर्- चातुर्यम्, चातुरी। (4) इसरेवपि दृश्यन्ते-पिण् इत्यादि प्रत्यय जो अपत्य अर्ध में आते हैं ये तदिन अनेक अर्थों में आते हैं । यथा, धम्मं चरति धाम्मिकः, पशं गतः घश्यः, पृथिव्या ईश्वरः पार्थिवः, सर्वभूमेः धावणम्, रनसया निप्पन्नं रासनम्, त्वचा निष्पन्नं त्याचम्, पारंगतवान् पारीणः, पारावारं गतवान् पारावारीणः, अर्थेन कीतः आर्थः, विद्यया लब्धं घेद्यम्, विद्यायां कुशलः वैद्यः, नियुक्तः भाण्डागारिकः, हिमवतः प्रभवति हैमवती गङ्गा, भवेन सञ्चरते आश्विकः, शकुनीन् इन्ति शाकुनिकः, जलेन पर्तते जलीयो मत्स्यः, अनुकूलं वर्तते मानुकूलिकः, भतिकूलं धर्तते प्रातिकूलिका, नावा तार्या नाव्या नदो, पयसा उदर शयितः समानोदर्म्यः, अने दीयते अप्रियम्, अप्रीयम्; भाषेशनिकम; साङ्गाणि व्याप्नोति साङ्गीणस्तापः; आप्र- मत्, भयमित्र सभ्य भवाचीन. घीहीणां फलानि वीदयः, यवानां फलानि यथाः, मागणी ध्याकरण-कौमुदी गच्छसि अभ्यमित्रीयः, अन्यमित्रीग: a soldier who face the enemy valiantly, arafa: पदैरयाप्यते सातपदीनं सत्यम, द्रिस्य आत्मनो रिङ्ग इन्द्रियम्, कुशाप्रमिय गुशाग्रीया युदिः, काकतालनिर ( काकागमनमिय तालपतनमिय फाकतालम् ) काकतालीयन, मा सम्भूतः प्राचीनः eastern, अयाक् सम्भूतः southern, मुस्नातं पृच्छति सौस्नातिकः, सुसशेयनं पृच्छति सौवशायनिकः, परदारान् गच्छति पारदारिय:, पावितेत निवृत्तं याचितकम्, अर्थ गृहाति मायिक, भापणस्य धाम्य थापणिकम, नरस्य धा नारी, पातस्य शमनं कोपनं या पातिकम्, पित्तस्य शमनं कोपनं या पैत्तिकम्, सन्निपातस्य शमनं फोपनं या सान्निपातिकम्, अस्ति परलोक इति मति- यस्य भास्तिकः, नास्ति परलोक इति मतिर्यस्य नास्तिका, अस्ति दिष्टमिति मतिः यस्य दैष्टिका, भामलस्याः फलं भाम- लकम, बदाः फलं वादरम्, अश्वत्यस्य फलं आश्वत्यम्, न्यग्रोधस्य फलं नयनोधम् । लोपः क्वचित् प्रत्ययस्य-कहीं कहीं प्रत्यय का लोप होता है। फलानि मापाः, मल्लिकायाः पुष्पं मल्लिका, मालत्याः पुष मालती, फरवीरस्य पुष्पं फरवीरम्, पाटलस्य पुष्पं पाटल, जात्याः पुष्पं जाती, यूथ्याः पुष्पं यूथी। जम्न्या विभाषा-जम्मु शब्द के उत्तर विकल से होता है। यहां अम्ब्चा फल जम्बु जाम्बधम् । दैयङ्गयीनाथरवीनी-हैयङ्गयीन और अधीन निपातन से सिद्ध होते हैं । यथा, हो गोदोहा उदयति हैयङ्गयीनम्, बदस् का आमुष्मिक और आमुप्यायण निपातन से होता है। स्थितन का होप होता है। यथा; अग्निशमणोऽपत्यं आग्निशन्मिः, दुलो- म्नोऽरत्य भौगोमिः, राज्ञ समूहः राजकम, हरितना समूहः हास्तिकम् , शद केन् का लोप नहीं होता है। यथा, यूनो भावः यौवनम्, मनाइदै माधवनमशूनी समृदः शीवनम् , पर्वणि क्रियते दीयते वा पार्वणम् , मनि कुशलः सामना, सुस्पन इदं सोत्पनम, यवनोऽपत्ये दामना, पम्नेका परियता चर्मणा, पम्मरिय पोलं फार्मणः, मस्मनो विकार दालोपोता है। यथा, सामनि साधुः सामन्यः प्राग : अपया, अननि साधुः अध्यन्यः राजनि साधु राजन्यः मणि भवति पघि कुशल, पथिक, सर्वकर्मामु पुशलः सर्वकम्मीणा मामैव नामधेयम् । सम्रपा, मुनि भवः मुर्दन्यःर्भिसोर भर में ना कर तद्धित। - अथ यो वा घटते अद्ययीन मरणम्, अद्यश्वीनो वियोगः, अद्य श्यो वा प्रसूता अश्वीना स्त्री। पान्यसाशिवादुपिका:- पान्थ, साक्षिन् और वाद्ध पिक निपा- मन से सिद्ध होत हैं। यथा; पथि फुशलः पान्यः , साक्षात् दृष्टवान् साक्षी, वृद्धया जीवति घाई पिकः। श्रामुष्मिकामुष्यायणी-विकण और पायनण् प्रत्यय सहित यथा; आमुग्मिन् (परलोक) हितं आमुष्मिकम् , अमुष्य (मृतस्य) पुत्र थामुष्यायपाः। पौनः पुन्यम्-पीनःपुन्य निपातन से सिद्ध होता है । यथा; पुनः पुनरनुपानं सट्वटनं या पौनःपुन्यम् । N.B. नस्यलोपोऽन्त्यस्य-तद्धित प्रत्यय होने से शब्द के अन्त- . दयो बडो भवः दयहीनः, सामवेसि अधीते वा सामका, आत्मन् बारमीयम । २ नानन्तस्य पणि-पण प्रत्यय परे होने से अन्-भागान्त . मात्मनः । २ येच भावफर्मव-तद्धित के य परे रहने से भन् भागात ३ . 41 रहने से मन् भागान्त शब्द के न् कालोप होता है। यथा, सुनाम्नोऽ. व्याकरण.फौमुदी। होता है । यथा, राशो भावः धर्म का राज्यम् । ४ नाध्यात्मनोणीने–णीन् प्रत्यय होने से अध्यन् और भारमन् , फे न् का लोप होता है । यथा, अध्वनि साधु: अध्वनीना, शात्मने हित आत्मनीनम् । ५ मनन्तस्यापत्यपणि-अपत्य अर्थ में विहित पर प्रत्यय परे पत्यं सोनामः, दुनाम्नोऽपत्यं दौमिः, कृतनाम्नोऽपत्य का मामः। ६ या हितनाम्नः-हितनामन् के परे विकल्प से न का लोप होग है । यथा, हितनाम्नोऽपत्यं हैतनामः, देसनामनः । .७ हेमाश्मनोविकार-विकाग विहित पर प्रत्यय परे रहने से हेमन् और भस्मन् के न् का लोप होता है। यथा, म्नी Kare मः, अग्मनो विकारः भागमः । ८ चर्मणः फोपे-कोप अर्थ में धर्म के न का लोप है है। पथा, यमगो विकास चाम्मः कोपः। १ ग्रह्मणोऽजाता-जाति भिम अर्थ में प्रम के होता है। पथा. मा भय देवता मा मस्त्रम, हरि, प्रभी सोधिः, प्रल उपारने प्रमा, म इयं प्राचीन जति अर्थ दवावमा, प्रमोऽस्य प्रागः । १० मेनरताय पणि-पम् प्रत्यय होने से इन-भागात शारे काकोर नहीं होता है । यथा, वसिन इन मालिनम , हसिt नका, मपनि धाम, समाविम , भय भय । देता है; यण, मंगनोडलय मेधा, मानिसय मया । गायि NIगा, पा, गायन शायिनः मोrdifver! इल में में मिला तो नहीं होता , गोग खामि माग सम्बना, वक: 4 गिः ।

अमरत्वम्, अमरता; पशु-पशुत्वम्, पशुता, नास्तिकता; अलस-अलसत्यम्, यसलता; अन्ध-अन्त्यम्, राजत्वम, राजता युवन्-युवत्वम् युवताः न्यूनन्यूनत्यम्, प्रातिपदिक के उत्तर मनि होता है और इसका इमन् रहता और तल होते है। यथा, नीलस्य भावः नीलिमा, नीलत्वम्, नोलता, पीत-पीतिमा, पीतत्वम्, पीतता; रक्त रक्तिमा, रक्त. त्वम्, रक्तता; शुक्ल-शुलिमा शुरुत्वम, शुक्लता; उप्ण-उप्णिमा, एणत्यम्, उष्णता; जड-जडिमा, जडत्वम्, जडता; मधुर- मधुरिमा, मधुरत्वम्, मधुरता। (क)भोलोपोन्स्यस्प-इमन् प्रत्यय होने से शब्द के थन्त. स्थित उकालोप होता है(इठ श्रीर ईयसु प्रत्यय में भी यही नियम लगता है)। यथा, लयोर्भावः धिमा, लघुत्वम्, लघु. an; मणु-अणिमा, अणुत्यम्, अणुता, तनु-तनिमा, तनुत्यम्, नुवाः स्यादु-स्वादिमा, स्यादुत्वम्, स्वादुता, पटु-पटिमा, पुत्व, पटुता, ऋजु-ऋजिमा, ऋजुत्वम्, ऋजुता। (1) ऋतो : पृथ्वा (रतो हलादेदंपोः)-मनि, ५४, तद्वित। १. तस्य भावस्त्वतलौ-तस्य भावः, इस अर्थ में शब्द के उत्तर त्व और तल् प्रत्यय होते हैं। तल् का त रहता है। त्व प्रत्ययान्त शब्द क्लोवलिङ्ग और तल् प्रत्ययान्त शब्द स्त्री. लिङ्ग होते हैं । यथा, प्रमो यः प्रभुत्वम्, प्रभुता; भोरो वः मनुष्य-मनुष्यत्वम्, मनुष्यता, अमर शूरता; चपल-चपलत्वम् , चपलता; नास्तिक-नास्तिकत्वम् , मीरत्वम् , भीरता; अन्धता; मूर्ख-मूर्खत्वम्, मूर्खता; मूक-मूकत्वम, मूकता; राज- , न्यूनता। "वा नीलादेरिमनिः-तस्य भावः, इस अर्थ में नील इत्यदि हाइमन् प्रत्ययान्त शब्द पुलिङ्ग होते हैं। पक्षान्तर में त्य . , व उन्नतः पयतवदुन्नतः, ग्राह्मण यमधीते प्रामणयधी, ६ २ हत्यम्, हृढता; श-प्राशिमा, धरात्यम्,शता भृश म्रशिमा, होने से भूमन् निपातन से सिद्ध होता है। यथा, यहोर्माव: १२ औपम्ये पति ( तेन तुल्यं किया चेतिः)-सादृश्य समझा जाय तो शन्दके उत्तरपतिच होता है और इसका पद रहता है । यथा, चन्द्र इय मुखं चन्द्रषन्मुखम्, क्ष्मिमिय शीतल हिमयत् शीतलम्, समुद्र इव गम्भीरः समुद्रयद्गम्भीरः, पर्धत ध्याकरण-कौमुदी। भौर यस् प्रत्यय होने से पृथु, मृदु, मत, इश, भूरा और परियट के प्रकार होता है। पया, पृयोर्मायः प्रथिमा, पृथु- स्यम् , पृथुना मृदु-म्रदिमा, मृदुत्यम् , मृदुता; इन-दिमा, भृशत्यम् , भृशता, परिवृद्ध-परिणदिमा, परिवृढत्यम् , परि- यूढवा। (ग) प्रिय-महतोः प्रमही (प्रियस्थिररिफरोबहुगुक्दषदीर्घ वृन्दारकाणां प्रस्थरफायगिति एव दापिन्दर)-मन् , ए और ईयसु प्रत्यय होने से प्रिय का प्रमौर महत् का मह होता है। यथा, प्रियस्य भावः प्रेमा, प्रियत्वम्, प्रियता; महतो मात्रः महिमा, महत्त्वम् , महत्ता । (1) गुरु-हस्व-दीर्घाणा गर इस-दापाः (प्रियस्थिर... । स्थूलद्यु चलस्वक्षिप्रवद्राणां पणादिपरं पृथ्वस्य च गुण)-मनि, इष्ट और ईयसु प्रत्यय होने से गुरु का गर्, हस्त्र का हस् और दीर्घ का द्वारा होता है । यथा, गुरोर्मावः गरिमा, गुरुत्वम्, गुरुताः हस्व-हसिमा, हस्थत्यम् , हस्यता; दीर्घ-दाधिमा, दीर्घत्वम्, (च) भूमा यहोलापो भूप महोः )-यहु शब्द के परे मनि भूमा। दीर्घता। 1 क्षत्रिय इस युध्यते क्षत्रियययुध्यते, पितरमिय पूजयति पित शिष्यम्, गृहे इप घसति गृहयद्वसति धने, शय्यापामियशेते सच्यावत् शेते भूतले, देवदत्तस्य इच भवनं देवदत्यद्भवन पादचस्प, रामस्येय पितृभक्तिः रामवत् पितृभक्तिर्मरतस्य, अन वित्तः अर्थचुयुः, अर्थवण: famous for wealth, विद्या वित्तः विद्याचुचुः विद्याचणः, ज्ञानेन पित्तः शानचुचुः, जानवणः । माया-मायाचुञ्चः, मायावणः, अस्त्र-अस्त्रचुचः १४ सदस्यास्मिन् वा संजातं तारकादिभ्य इत: (तदस्य समास सारकादिन्य इत)-तत् अस्य संजातम्, तत् अस्मिन् संजातम्, नयों में शन्द के परे इत होता है। यथा, तारका अस्मिन् सजावा:तारफित नमः, पल्लयाः अस्य सजाताः पल्लचितः तम, फलानि अस्य संजातानि फलितो वृक्षः, पुष्प-पुष्पिता अधकारितं जगन्, फल-फलडितचन्द्रः, कई-कई मितः न्या. पुलकानि यस्मिन् सातानि पुलकितं शरीरम्, मार- महरित धान्यम्, व्याधि-व्याधितो मनुष्यः, मजरी-मजरितः, दमल-पुन्मलितः, स्तयक-स्तरफितः, फिसलय-किसलयितः, एल-मुलितः, कुयलय युवलयितः, कोरफ-कोरफितः, निदा- नदिनमुना-मुद्रितः, युमुक्षा-बुभुक्षितः, पिपासा-पिपासितः, सुखितः, दुस-पिता, मण-पितः, तिलक-तिलफितः, च-गचित, हर्षितः, क्षुप भुधा अपिता, सीमन्त. मन्तित, जयर-परितः, रोग.रोगिया, रोमाञ्च-रोमाधिवः, तद्धित। कुन् पूजयत्युपाध्यायम्, पुत्रमिव स्निह्यति पुत्रवत् स्निह्यति राजेच राजवत, आत्मे यात्मवत् । १२ तेन वितरचुचुचौ ( वेन वित्ताचुन्नुप्वणपो)-तेन पित्तः, इस अर्थ में शब्द के उत्तर चुचु और चण होते हैं । यथा, अवयणः, कर्मन्-कर्मचुचुः, कर्मवणः । सता, तरह-तरङ्गिता नदी, उत्कण्ठा-उत्कठितं मनः, अन्धकार- -TEE, मनोज (5) बा(भा सम्र्थनाम्नः)-यतुप होने से यद,मद, पता केका पादोता है। यथा, यत् परिमाणमस्थ यावान्, होते है । यथा, कि परिमाणमस्य फियान् , दंपरिमाणम १७किमः संस्थापरिमाणे दतिः (संख्यापरिमागे इति च)-संख्या- है और इसका भति रहता है। यथा, का संख्या परिमाम १८ अक्यदे तयद् संख्यापाः (संस्थाया भयवे तयर)-अवश गानागुन पन्ना पिता, पालिता, नमोनिया, मोहितः, कन्द-मानित:, पियविभिर, lafiशियिरिया, गूगल पोशा-दीक्षितः । प्रमाणे मात्र दः (गणनामा मान परिमान भर में करके सर मात्र, दाद, और इस प्रत्यय होने है मोर का पात्रम मात्र, दम और इसम रदगा ।यपा, दम्तः प्रमागमस्य इम्तमात्रम् , ता. रायम्; जानु प्रमाणमम्प जानुमार, जानुदमन, जानुप्रयासम् । ऊरमात्रम् , अन्दामम् , अरद्वपसम् , पिनलि. पिराम्तिमानम् , पिम्तिमम्, विस्तायसम्। साल-साल- मात्रम्, तालदम्नम्, सालव्यसम् गज-गजमात्रम्, गजमन्। गजदयसम् । १६ परदेतदेभ्यः परिमाणे गनुप-परिमाप मर्य में पर, तर भौर पतनु के परे पतुप होता है और इसका यत् रहता है। परिमाणस्य तापान , एतत् परिमापमस्य एतावान् । (स) किदियो रिमिदमा यो )-रिम् मोर इदम् शब्द उसर पतुप् होने से फियत् और इयत् इयान् । परिमाण समझा जाय फो किम् शब्द के उत्तर. - फति । कति शब्द यहुववनान्त है । निपातन से सिक उति होता उय रहता है। यथा, चत्वारो अवयवा अस्य चतुष्टयम्, पञ्च अवयया अस्य पश्यतयम् , शत-शततयम्, सहन-सहनतयम् । में द्वि और त्रि के परे विकल्प से डयट होता है और इसका अय रहता है। पक्षान्तर में तय होता है। यथा, द्वो भवययो उत्तर यहोता है। यथा, उभी अपयवा अस्य उमयम्। इस अर्थ में दशन् भागान्त शब्द के उत्तर ड होता है और इसका रहता है। यथा, एकादश अधिका अस्मिन् एकादर्श शतम् द्वादर्श शतम् , त्रयोदशं शनम्, चतुदश शतम् । (घ) शदन्त विशतेश्च-तत् अस्मिन् अधिकम् , इस अर्थ में विशत् अधिका अस्मिन् त्रिशं शतम् , चत्वारिंशं शतम्, पञ्चाशं बातम् , एकत्रिशं शतम् , चतुश्चत्वारिंशं शतम् , पञ्चपञ्चाशं १२ संख्यायाः पूरणे डट् ( तस्य पूरणे इ )-पूरण अर्थ में संख्यावाचक शब्द के उत्तर डट होता है और इसका हता है। यथा, एकादशानां पूरण: एकादशः, द्वादशः, प्रयो. रा, चतुदशः, पञ्चदशः, पोडशः, सप्तदशः, अष्टादशः। (क) नान्तादसंख्यादमट-पूरण यर्थ में नकारान्त संख्या- वक शब्द के उत्तर मट् होता है। मट् का म रहता ६. या पानां पूरणः पञ्चमः, समानां पूरणः सप्तमः, अष्टमः, तक्षित । RU धर्य में संख्यावाचक शब्द के उत्तर तय होता है और इसका , (क) दयट् वा रित्रिभ्याम् (विग्रिन्या तयस्यायन् वा)-अवयर अर्थ अस्य द्वयं, द्वितयम् ; त्रयोऽधयवा अस्य त्रयम् , त्रितयम् । (ख) उमाधः ( उमादुदात्तो नित्यम् )-अवयव अर्थ में उभ के (ग) तस्मिन्नधिकमिति दशान्तात-तत् अस्मिन् अधिकम् , । शत् मागान्त और विशति शब्द के उत्तर ड होता है। यथा, विशं शतम्, एकविर्श शतम्। - AM पष्टपादेधासंख्यादेः- प्रभृति संरपावापक शन्दर नित्य समोता। वा, एटापाणः परितमः, समतितमः, शनि मवतितमः भन्य संख्यावाचक दाम पहले राने से विद्या (दाबहु-गण-पूगग पेभ्यस्तिधु (गणमहापर)-पूण ३६६. ध्याकरण.कौमुदी। नवमः, दशमः। अन्य संख्यावाचक शब्द में नहीं होता; यथा, एकादशानां पूरणः एकादशः, द्वादशः, प्रयोदशः। (ख) थद् चतुर-पय-कतिभ्यः (पट कति कतिपयचतुर्णा युक)-पूरण अर्थ में चतुर्, पप् फति और कतिपय के उत्तर यट होता है और इसका थ रहता है । यया, चतुर्णा' पूरणः चतुर्थः, पर। पष्ठः, कति-फतियः, फतिपय-कतिपयथः । (ग) देस्तीयः-पूरण अर्थ में द्वि. के उत्तर तीय होता है। पथा, प्रयोः पूरणः द्वितीयः । (घ) नृतीय-तुर्य-सुरीया:-पूरण अर्थ में तृतीय, तुर्य और नुरीय निपातन से सिद्ध होते हैं । यथा, त्रयाणां पूरणः तृतीया, चतुर्णा पूरणः तुर्यः, तुरीयः। (च) विशत्यादेस्तमट् वा (विशत्यादिभ्यस्तमान्यतरस्याम् )-पूरण अर्थ में विशति इत्यादि संख्यावाचक शब्द के उत्तर विश्वप से तमद् होता है और इसका तम रहता है। पक्षान्तर में द होता है। यथा, विंशतः पूरणः विंशतितमः, विशः, एफरिश तितमः, एफविंशः, द्वाविंशतितमः, द्वाविंशः, प्रयोविंशतितमः, प्रयोविंशः; त्रिंशत्तमः, विशाः; चत्वारिंशत्तमः, चत्वारिंशः; पञ्चाशत्तमः, पश्चाशः। नित्यं शतादेः (नित्यं शतादिमासामामसंघरसराय-रात इत्यादि शन्द के उत्तर नित्य तमद होता है। यथा, शतस्य पुरः पतनः सहस सइयतमः, अयुत अयुततमः, मासतमः, मई मासतमः, संवसादमः । मया, एकोपरणा एकटमा, एकपटः विपरिदमः, : | तरित। ३ NAT क भर्ष में पहु, गण, पूग और संघ के उत्तर तिथुक् होता है और इसका तिथ रहता है। यथा, यहूनां पूरणः यहुतियः, गणानां पूरणः गणतियः, पूगतियः, संघतियः। (२) वस्वन्तादिथुक् ( बतोरिथुक् )- पूरण अर्थ में बतु प्रत्य. पान्त शब्द के उत्तर इधुक होता है और इथ रहता है । यथा, पूरणः यापतिथः, तायतियः, कियतिथ:, एतापतिथः । २२ तदस्यास्मिन्वास्ति मतुप ( तदस्यास्त्यस्मिन्निति म तुर)-तत् मस्य मस्ति, तत् अस्मिन् अस्ति इन अर्थो में शब्द के उत्तर यावता मनुप होता है और इसका मत् रहता है।यधा, मतिरस्यास्ति मतिमान, बुद्धिः अस्मिन् अस्ति युद्धिमान् , धी-धीमान् , धी- प्रोमान् , अंशु-अंशुमान् , पितृ-पितृमान्, धनुस्-धनुष्मान् , , पपुस्-धपुमान्, अग्नि-अग्निमान् , वायु-बायुमान्, नदी-नदीमान् भ्य.)-मयन्त शब्द के इतर विहित मनु के म का होता. पा, काने अत्य अस्ति शानवान्, धन-यनवान्, ल-बलवान, विशा- विवाश्या-दयावान एमा-क्षमावान् । परस मेंमाणम भिन्न वर्गमकेत दित परमका पहरोताहै। यथा तडित् स्मिनस्ति हिवान। ३ मरणोपचार (मादुपधायाध... )-शिन से नाएको उनले उत्तर विहित मामारो. भारमा भरपास्ति भारमवान्भासोऽप सन्ति मास्वान् । ४ मकारोएचाप(मानुपधायाध...)-जिनमोपचा २.अड अणन-स्पर्शान्ताद (झयः । संझायाम् ;-जन विद्युत् देशः, गायोऽस्या सन्ति गोमती शाला । N. B. भवर्णान्तान्मो घः (मादुपधायाधमतोपर्योऽयययादि . . करमनसि विशु स्वान ।

कक्ष्या अस्यास्ति कक्षोपान नाम ऋषिः, अन्यत्र कायावान वयमस्मिन्न- माकरण-कौमुदी। मेम हो उनो नगर विहिल मार के मका होता है। यथा, समर स्मास्ति समीपान , शमी-वामपन् । ५ म ययादेः (मानुपधायाध....)-या इत्यादि शमी के मरहित मार के मका व नहीं होता। यण', यामान जुमामान. वसामान , माशामान , गठमान, हरिहमान , कमान , ममन, भूमिमान , शमिमान । ६ उदन्यदादयः संज्ञायाम्-मनुर प्रन्यय होने से और संज्ञा अर्थ बोध होने से उपन्यत् इत्यादि निपातन से सिद्ध होते हैं । यथा, दन: रिममग्नस्ति तदन्वान समुर, अन्यत्र उदयान , धर्म अस्यामस्ति धापती माम नशे, अन्यत्र पर्मवती; अस्थि अस्मिन्नस्ति अशीवान, जानमन्धिा, अन्यम अस्थिमान ; घरमस्याम्ति चक्रीवान नाम राजा, अन्यत्र सावन नडायस्मिन् सन्ति महिपा अस्मिन् स्ति लवयवान नाम पर्वतः, अन्यत्र लवणवान् । (क) कुमुद नह-वेतस-महिपेभ्यो नुप्-कुमुद, नड, घेतस और महिप के उत्तर ड्यतुप होता है और इसका वन रहता है । यथा, कुमुदान्यस्मिन् सन्ति कुमुद्रान्, नड्यान् वेतसान्यस्मिन् सन्ति चेतस्वान्, सन्ति महिष्वान् । (स) अस्-माया-मेधा-सजो विनिर्वा-अस् भागान्त, माया, मेघा और स्रज् के उत्तर विकल्प से विनि होता है और उसफा विन् रहता है। पक्षान्तर में मतुप होता है । यथा, यशोऽस्यास्ति यशस्वी, यशस्थान् ; तेजोऽस्यास्ति तेजस्वी, तेजस्वान् ; पयोऽस्या अस्ति पयस्विनी, पयस्यती धेनुः माया मेधा यस्यास्ति मेधावी, मेघा. घान् । स्रक भस्यास्ति स्रग्वी, स्नग्यान् । अस्यास्ति मायावी, मायावान् ;

तद्धित। CY नित्यं तपसः-तपस् शब्द के उत्तर नित्य विनि होता है। पथा, तपोऽस्यास्ति तपस्वी। (ग) इन् वा नकस्तरादवर्गात्-एकाधिक स्वरविशिष्ट अवर्णान्त सन्द के उत्तर विकल्प से इन होता है। पक्षान्तर में यथासम्भव भनुप् और विनि होता है। यथा, ज्ञानं अस्यास्ति ज्ञानी, ज्ञान- वान् ; चल-बली, बलधान्: धन-धनी, धनवान् ; शिखा शिखी, शिखावान् ; चूडा-चूडी, चूडावान् । माया-मायी, मायावी; नित्यं सुखादेः-सुख इत्यादि के उत्तर नित्य न होता है। पथा, सुखमस्यास्ति सुखी, दुःख-दुःखी, प्रणय-प्रणयी, फच्छ. उत्तर नित्य इन् होता है। यथा, हस्तोऽस्यास्ति हस्ती (गजः), करोऽस्यास्ति करी (गजः)। अन्यत्र हस्तवान् पुरुषः । उत्तर नित्य इन् होता है। यथा, वर्णः अस्यास्ति पर्णी शब्द के उत्तर नित्य इन् होता है, यथा, पुष्कराण्यस्यां सन्ति पुष्पादिभ्यो देशे-स्थान समझे जाने से पुष्करिणी (दीधिका), पद्मान्यस्यां सन्ति पद्मिनी, उत्पलिनी, पजिनी, सरोजिनो, सरोहिणी, अरविन्दिनी, मम्मोजिनी, मस्जिनी, कमलिनी, कुमुदिनी, फेरविणी, विसिनी, मृणा- लिनी, समारिनी, नलिनी, तरङ्गिणी, पल्लोलिनी, तटिनी, विषेक-विवेकी, विवेकवान् ; हस्तकराभ्या जासो-जाति समझे जाने से हस्त और कर के साहस-साहसी, साहसवान् ; उत्साह-उत्साही, उत्साहवान् । कच्छी, सहन-सहस्री। वर्गाद् ब्रह्मचारिण-ब्रह्मचारी समझे जाने से वर्ण शब्द के (ब्रह्मचारी)। सन्यत्र वर्णवान् । बाहिनी। अांद याचक-याचक समझे जाने से मर्थ शब्द के उत्तर ध्याकरण.फौमुदी। नित्य इन होता है। यथा, अयोऽस्यास्ति अथीं ( याचकः)। अन्यत्र अर्थवान् । अर्थान्तेभ्यश-अर्थ अन्त वाले शब्दों के उत्तर नित्य न होता है। यथा, विद्यारूपोऽर्थः, प्रयोजनमस्यास्ति विद्यार्थी, घनायौं, धान्यार्थी, हिरण्यार्थी, गुरुदक्षिणार्थी। (घ) मासादेलों विभाषा-मांस इत्यादि शब्द के उत्तर विकल्प से ल होता है । यथा, मांसमस्यास्ति मांसलः, धो-धील: Pros. perous, पश्म-पक्ष्मल: having eye-lash, स्नेह-स्नेहल, शीत-शीतलः, पिङ्गलः, पित्तल: bilions, पृथुलः, मदुला मण्डलः, चटुलः, कपिलः, प्रन्थिलः, कुशलः, पांशुलः, श्लेष्मल: पेशल: dexterous, तुण्डलः, अंशलः, वत्सलः । पक्षान्तर में मतुप होता है। (घ) फेनादिलव-फेन के उत्तर विकल्प से लौर इल होता है। यथा, फेनोऽस्मिन्नस्ति फेनलः, पक्षान्तर में फैनायन् । )-विष्ठा मोरया (६) लोमादेशः (लोमादिशादिपिण्मादिभ्यः पनेला )- लोमन् इत्यादि शब्द के उत्तर श होता है। यथा, लोमाग्यस्य सन्ति लोमशः, रोमशः, गिरिशः, फर्यशः, कपिशः। (अ) पिराभ्यामिलः (लोमादि.... के सत्तर इल होता है। या, पिछा अस्यास्ति पिपिलः, (म) दादर ( दन्त उन्नत मय-दात के उत्तर होता है। यथा, उग्नता दन्ताः मारपत्य दातुः। (2)-मुनि कमायो (कापमधी)- एगि, मुफ भोर मधु के उत्तर होता है। Ar, at. पहिलः। एनिमः, मुकर, मयु के उत्तर श्रमिन् होताहै। यथा स्वं (ऐश्वर्य) अस्यास्ति स्वामी। उपण के उत्तर आलु होता है। यथा; शीतं न सहते शीतालुः, नया पातोऽस्यास्तिपातकी, अतीसार.अतीतारकी। ता है। यथा, पलयोऽस्मिन् सन्ति यलिभम् । तद्धित। मुखादेश्य-मुख इत्यादि के उत्तर र होता है। यथा, मुखं अस्यास्ति मुखरः, कुञ्जर, नगरम्, पाण्डुरः । (३) नह-शादाभ्यां वलप -नड और शाद के उत्तर ड्वल होता है और इसका वल रहता है । यथा मडा भस्मिन् सन्ति नड्वलः, a bounding in reeds, शादा अस्मिन् सन्ति दोर्याऽन्त्यस्य (वले)-यल प्रत्यय होने से अन्त्य स्वर का दीधे spectator, रजस्वला, ऊर्जस्वला powerful, दन्तावलो के उत्तर होता है। यथा; केशा सन्त्यस्य केशवः (विष्णुः), मणिरस्यास्ति मणियः (नागविशेषः), अजग-अजग (पिनाक:) (2)वासातीसाराभ्यां रोगे किन् (वातातीसारामा कुक्ष)-रोग समझे जाने से बात और अतीसार के उत्तर किन होता है। (द) केशादेवः सज्ञायाम्-संज्ञा समझे जाने से पेश इत्यादि शाल: muddy. (४) कृप्यादेवलः ( रजः कृप्यासुतिपरिपदो पल ) कृपि इत्यादि के उत्तर पल होता है। होता है। यथा, कपिरस्यास्ति कृषीवला, पारपद्धलः पर्षदलः दस्ती, शिखावलो (मयूरः)। गाण्डियम् , कार का दीर्घ भी होता है, गाण्डीयम् । (१) स्वादामिन्नश्वर्य (मिन्नश्वये)-ऐश्वर्य समझे जाने से स्थ (त) शीतोष्णाभ्यामालुसहने-असहन अर्थ में शीत और उष्णं न सहते उष्णालुः। () पत्यादर्भः (सुन्दिवलिवटे-घलि इत्यादि के उत्तर म के अर्थ में मात, पितृ के उत्तर डामह होता है मोर इसका रमाकामुक (१) म भारत (Mafotery-मम् स्यादि के उत्तर गत दोता है और इसका पता है। पा, महामि प्रय सन्ति मशंसा, उपसरसः, पलिश-लित: greytsired, जय जटः, सम्ल-मम्मा, मामयः,माणसणः। (म) मागमा गुः ( यजमगुंघ-भादम मौर उत्तर युदोसा है। पया; महंमस्याम्मि मईयुशुभयुः । (1) उमेर नादयः (गोरस्मतामय दिगो हिन्नुमोमिमा नमसोममायोत्स्ना इत्यादि निपातन में सिद्ध होते हैं। यथा ज्योतिरस्यास्ति ज्योत्स्ना, समस-वमित्रा, रशिया, मल-मलिनः, मलीमसः, अर्ण स्मर्णयः । () वाग्मिन् पानाम-यापाटाः (वाची मिनिः । आलजाटवी बहु मापिणि )-पाम्मिन् , याचाल, और याचाट निपातन से सिद्ध होते हैं। यथा, याचोऽस्य सन्ति याग्मी, यः कुरिसा या मापते स पाचालः, याचाटः। २४ मूले माहः कर्णादः-मूल अर्थ में फर्ण इत्यादि के उचर जाह होता है। यथा; फर्णस्य मूलं फर्णजाहम् , अक्षयोः मूलं अक्षिजाइम् , च जाहम् , नवजाहम् , केशजाहम् , पानाइम्, यङ्गजाहम् , दन्तजाहम् । (क) पक्षाति:-मूल मर्य में पक्ष के उत्तर ति होता है । यथा, पक्षस्य मूलं पक्षतिः। २५ मातृपितृभ्यां डुलब्यौ प्रांतीर (गि भ्रांतरि व्यत् । मातुईम्बू म्रात अर्थ में मातृ के उत्तर डुल और पितृ के उत्तर व्य होता है । डुल फा उल रहता है। यथा; मातुर्माता मातुला, पितुर्धाता, पितृभ्यः। २६ डामहः पित्रोः मातृपितृभ्यां रिसरि डामह)-पितृ और मातृ तद्वित। बामह रहता है । यथा; मातुः पिता मातामहः, पितामहः, मातामही, पितामही। २७ टा धर्मणः दुशले ( कर्मणि घटोऽठच् ) कुशल अर्थ में कर्मन् के उत्तर ट होता है। यया; फर्मणि कुशलः कर्मठः । २८ पूर्खादिनिस्तृतीयाय ( पूर्वादिनिः । सपूर्वाञ्च)-तृतीया के यर्थ में पूर्व के उत्तर इनि होता है और इसका इन् रहता है । यथा पूर्वमनेन कृतं भुक्त, पीतं, गतं वा) पूल्बी, कृतं पूर्व- मनेन कृतपूर्वी फटम् , मुक्तपूर्वमनेन भुक्तपूर्वी मोदनम् . पीतं पूर्वमनेन पीतपूर्वी पयः, गतं पूर्वमनेन गतपूवीं गृहम् । मासेवित-मासेवितो गुरो, निराकृत-निराकृती शत्री, उपकृत- जाना जाय तो तमोर इछन् प्रत्यय होते हैं और इनका यपाक्रम तम और इठ रहता है । यथा; अयमेपामतिशयेन लपिष्टः गुरु-गुरुतमः, गरिष्ठः, प्रियतमः, प्रष्ठः; दीर्घतमः, दाधिष्टः; दृढतमः, ढिष्ठ:: मृदुतमः भ्रदिष्टः; शतमः, से एक का उत्कपे समझा जाय तो शब्द के उत्तर तर ईयनुन होते हैं और इनका तर थोर ईयस रहता है । यथा; अयमनयोरतिशयेन पटुः पटुतरः, पटीयान् । लघु-लघुतर: घीयान् । गुरु-गुरुतरः, गरीयान् । प्रियतम, प्रेयान् ; दीर्घ- • द्वयोस्तस्बीयसुनौ (द्विवचनविभज्योपपदेतरवीयसुनौ )-दो में और (क) इष्टादिभ्यरच- तृतीया के अर्थ में इट इत्यादि के उत्तर इनि होता है । यथा; इष्ट मनेन इष्टी यज्ञ, अधीत-अधीती शास्त्रे, धुत-श्रुती वेदे, गृहीत-गृहीती उपदेशे, अन्नात-अन्नाती इतिहासे, उपरती मित्रे, अवकीर्ण-अवकोणी व्रते । २९ अतिशायने तमबिष्टनो-अनेक में से एक का उत्कर्ष पः पटुतमः, पटिष्टः; अयमेषां अतिशयेन लघुः लघुतमः, शिष्टः।

७ स्थूलदूरयोः स्थयदयो (स्थूलदूर ...)-स्थूल हा घ्याकरण-कौमुदी। तरः, द्वाघोयान् : दृहतरः, ढीयान् ; मृदुतरः, नदीयान् । कृशनर:मशीयान् । N. B. ज्यी प्रशस्यस्य (प्रशस्यस्य धः । ज्य)-इष्टन् और ईयसन् प्रत्यय होने से प्रशस्य शब्द का और ज्य होता है । यथा; भयमेपामतिशयेन प्रशस्यः श्रेष्ठ, ज्येष्ठः, अयमनयोरतिशयेन प्रशस्यः श्रेयान् । २ आ ज्यादेरीयसुनः ( ज्यादादीयसः)-ज्या आदेदा के परवती ईयनुन् केई का आ होता है। यथा, ज्यायान् । ३ धर्मज्यो वृद्धस्य ( वृद्धस्य च )- इछन् और ईयमुन. परे रहने से युद्ध का वर्ष और ज्य होता है । यया; अयमेपाममयो अविशयन पृद्धः वर्विष्टः, वर्षीयान् ; ज्येष्ठः ज्यायान् । ४ अन्तिकयाढयोर्नेद-साधी-अन्तिक का नेद और शाड की साथ होता है। यया नेदियः, नेदोषान् : सापिष्टः, साधीयान । ५ अल्पस्य फन् विमापा (युवाल्पयोः कनन्यतरस्याम् )- भाप का विकल्प से कन होता है। यया; कनिष्ठः, कनीयान : भरपोयान । ६.यूनः फयन्यो (स्थूलदूरयुषहस्यक्षिप्राणां यादि पर पूर्धस्य च गुणः)--युवन का विकल्प से कन और या होता है। पथा पनिटः, कनीयान् । यविष्ठा, यवीयान् । और नर का दर होता है । यथा, स्पविष्टः, क्यवीयान पर शोषण । ८. उत्श्योरक्षोदी । प्रियस्थिरस्फिरोग्यालगुपार. মুনাঘাফোলা মযষৰ সৰ এখিলা:)~~ इन बराबर भोर चोद होता है। । शियालयोः क्षेपपही (प्रियदर....)-fa काही भीर बात दावा होता है । यथाविष्टसंगीवान बयपत्र । भपिट यथा; मनयोः कतरः ष्णवः, धनपोयेतरो ब्राह्मणः, ततर ३२ बहूना तमः (षा बहूनां जातिपरिप्रश्ने तमच )-अनेक में उत्तरडतम होता है और इसका अतम रहता है। यथा; एपां N.B. एकान्याम्याच (एकाच प्राचाम् )-क और अन्य उत्तर इतर और डतम होता है। यथा; भवतोरेकसरः पठतु, मवतामे. तमाशगोति, तयोरन्यतरो यातः, तेषामन्यतमो मृतः। से एक का उत्फ समझा जाय तो किम्, एकारान्त और ३३ किमेव्ययेभ्योऽद्रव्ये चतरां चतमामेकोल्कर्ष-दो और अनेक अध्यय शब्द के उत्तरचतराम् और तमाम होता है और इन माराम और तमाम् रहता है। यथा; किन्तराम्, किन्तमाम् । तद्धिता १० स्थिरस्य स्थः ( प्रियस्थिर"}-स्थिर का स्थ होता है। गया, ज्येटः, स्येयान् । ११ मिन्मतुपोलुक्-इष्टन और ईयसुन् परे रहने से विन और मनुप् प्रत्यय का लोप होता है। यथा, अयमेपामतिण्येन मायावी, मायिः मायौयान् बलिया, बलीयान् । १२ भूयोभूयिष्ठी ( यहोर्लोपो भू च यहोः)-बहु शब्द का इयछन् परे रहने से भूयस् और इछन् परे रहने से भूयिष्ठ निपातन से सिद्ध होते हैं । पया; अयमनयोरतिशयेन बहुः भूयान् , अयमेघा मतिशयेन बहुः भूपियः । ३१ कियत्ता द्वयोरेकरम तरः (किंवत्ता निर्धारणे द्वयोरेकस्य इतरच )-दो में से एक का निर्धारण समझा जाय तो किम्, पद और तद् के उत्तर इतर होता है और इसफा अतर रहता आगच्छतु। से एक का निर्धारण समझा जाय तो किम् , यद् और तद् के कतमः शेवः, एषां यतमः क्षत्रियः ततमः प्रयातु। - .

. नया- स्थानः, पितृस्थानीयः, भ्रातृस्थानः, भ्रातृस्थानीयः, मातृस्थाना, होता है। यथा, ग्राह्मणजातीयः, क्षत्रियजातीयः, पुरुषजातीय, वृत्तिगणन (फैयार क्रिया अनुष्ठित हुई है, उसकी गणना) है और इसका त्यस् रहता है। यथा पश्चयारान् भुइळे, ध्याकरण-कौमुदी। मास, माइतमा उम्तम् , उच्च स्तमाम् । इन समहो जाने नहीं होता गया, उतरत! ३४ प्रगंगायो :-प्रशंसा समझे जाने से शन के उत्तर कपोता। या प्रशम्गो येथाफरणः पाकरणकर, विकार, मालदाकिरपा, मीमांसफरूप.. ३५ ने करवायाः (समा कायापदेशीरः)- पत् न्यून गर्य में शव के उत्तर फल्प, देश्य मार देशीय होता है। यया; ईपनो विधान विकल्पः, विनश्या विद्वदेशीयः। N. B. तिइन्ताग (तिडश)-अर के सोन पयों के प्रत्या तिमन्त परके परे होते हैं। यया परतितराम , पठतितनाम् , पतिरन्न पठतिकत्यम् , पठतिरम् , पटविदेशीयम् । (क) या मुगे बहुः पुरस्तात्-पत् (थोड़ा) ऊन मर्य में सुमन्त पद के पहले विकल्प से या प्रत्यय होता है। यथा: ईपटूनः पटुः यापटुः, पटुकल्पः, पटुदेश्यः, पटुदेशीयः। २६ तेम तुल्यः स्थान स्थानीयौ-तेन तुल्या, इस अर्थ में शब्द के उत्तर स्थान और स्थानीय होता है। पथा; पित. मातृस्थानीयाः, मातृप्यता। (5) जाती जातीयः-जाति अर्थ में शब्द के उत्तर जातीय स्त्रीजातीयः, पणिग्जातीयः, रजकजातीयः, ताकिजातीय, घेयाकरणजातीयः। ३. संख्यायाः कियाभ्यावृत्तिगणने कृत-मिया के अभ्या: समझी जाय तो संख्यावाचक शब्द के उत्तर मृत्यसुच् होता पित्रा तुल्या तद्वित। । पचलत्यो भुझ्यते, सप्तवारान् स्वपिति सप्तमृत्यः स्वपिति, शनहत्व. पठति । (क) द्वित्रिचतुभ्यः सुच्-क्रिया के अभ्यावृत्तिगणन समझे ज्ञाने से द्वि, त्रि भोर चतुर के उत्तर सुच होता है और इस पारान् मुमते त्रिभुदक्ते । N.B. लोपोऽन्त्यस्य चतुर:--मुच् होने से चतुर के अन्त्य २ एकस्य सकृय-सुन् होने पर एक का सकृत् पर बनता है। काम रहता है। पथा, दो चारी: कोका को होता है। यथा, चनुरो वारान भुत चतुर्भुरुक्त । स्था, एक चार मुक्त सकृद् भुषको एक बार अधोते समधीते । यहाँ अन्यातही है। केवल गणनामान समझी जाती है। निया के सभ्यावृत्तिगणन तथा क्रिया के अनुष्ठान के फाल कीपरस्पर निकटता समझी जाय तो घर के उत्तर विकल्प पाच होता है और इसका धा रहता है। पक्षान्तर में प्रत्य. मुच होता है। यथा, पहुधा दिवसस्य भुड्यते, मस्य मुइस्ते। निकटता नहीं समझी जाय तो नहीं होता पेथा, यात्यो मासस्य गच्छति । (0) दुपाचावा घशस.(बद्यार्थाच्छमारकादम्यतररशम्)- पामार भल्पार्थ शब्दों के उत्तर विकल्प से यशस् होता मार इसका शस् रहनादायथा, यहुपदाति, या सा- हिमरि ददाति,भूरिशो ददाति मल्पं ददाति, अल्पशी पति सापाम् )-दीप्सा रामी बार तो संख्यार.पर भार का केर विप से वशसहायथा, संरयावाचक- 9. B. संख्यफदेशायनाच्च पीसायाम् (संस्कययनाथ (१) विभाषा बहोरविप्रकृष्टकाले धान् (विभाषा वहोर्धाऽविप्रारकाले)- । क्योटो ददाति ।

३९ हे तैलन (स्नेहे तलन् )-स्नेह अर्थ में शब्द के उत्तर दोता।यथा, दारुण्यस्याश्ययाः दारमयम् मासनम्, दमा (ग) व्याप्ती (तम्यतारने मयत् । समूहबर बदुध)-पास्ति अर्थ में शब्द के उत्तर मय होता है। यथा, जलेन व्याप्तं जल- (घ) अपृथग्भावे च (स्मत"}-अपृथग्माव में शब्द के SITETTोमुता Anima.TATER गौ । देश पागल-nt at me शे fat -गिकार में शव के उत्सर भयर होगा भार हा मप रहना है । पया, स्वस्य विकार म्यमय घटः, यमपी प्रतिमा, ही विकारः मृन्मयो घर, गृमी प्रतिमा। (6) हिरममा-हिरण्मय निपातन में सिद्ध होता है। यया, हिरण्यम्य विकार: हिरण्मयः। (स) भारो-ययय मम जाने से शब्द के उत्तर मयद भम्यायपयाः दर्भमयों प्राह्मणः, काष्टान्यस्यायययाः काष्ठमयो दस्ती, ऊर्गामयं यासः, मन्नमयो मयं जगत् प्रलये, रोगमय शरीरम् । (घ) संसर्ग (सत्प्रत......)-संसर्ग समझे जाने से शब्द उत्तर मय होता है । यया, तिलेन संसृष्ट तिलमयं सर्पणम्, घृतमयं व्यजनम्, पापमयं शरीरम् । 'यज्ञाः, अपूपमयं श्राद्धम् । के .. उत्तर मयट होता है । यथा, विष्णोरपृथगभूतं विष्णुमयं जगत्। यागम्योऽपृथग्भूतं पाड्मय शास्त्रम् ; चितोऽपृथग्मृतः (छ) गोश्च पुरीषे–पुरीप (मैल) अर्थ में गो के उत्तर मयद होता है । यथा, गोः पुरीपं गोमयम् । चिन्मयः पुरुषः ।

तद्धित। या भुकते। कुष, एक राशि पवधा कुरु । यसम्पादन अर्थ में धाच होता है। यथा, पञ्चराशीन् एकधा से सिद्ध होते हैं । यथा, एका विधा ऐकध्यम् , द्वे विधेद्वघं घा धम्, प्रेधा; पोढा । पक्षान्तर में एकधा, विधा, रोताहै। यधा, कुत्सितो घयाफरपाः वैयाकरणपाशः, मीमांस. पाश: मिपकपाशः, दिकपाशः, लेखकपाशः। नाहौर सका घर रहता है। यथा, भादपो मतपूष्य: भादरा, इटो भूतपूयः दृश्यर, पितो भूतयः भरित. पूर्व देवदसाप्यम् ,देयदत्तचर या भग्नम् । स्तर मालिनि प्रत्यय होताभीर इसका भाफिन रहता। ३७६ नैरन होता है और इसका तैल रहता है। यथा, तिलस्य स्नेहः दिलनेलम, सर्पपतलम् , एरण्डतलम् । ५. धान् संख्याया विधायें-विधा (प्रकार ) अर्थ में संख्या. वाचक शब्द के उत्तर धाच् होता है और इसका धा रहता है। यया, एका विधा एकघा, द्वे विधे द्विधा, तिस्रो विधा: विधा (क) भावान्तरापादने च--भावान्तरापादन अर्थात् अन्यभा- (ख) ऐकध्यादयो वा-ऐकध्य इत्यादि (विकल्प से) निपातन पाशः कुत्सिते-पुत्सित अर्थ में शद के उत्तर पाश अभूतपूर्व चरट्-भूतपूर्व अर्थ में शब्द के उत्तर बाद भूतथ्य रुप्य प्रत्यय होते है। पथा, देवदतस्य भूत. एककिनिरसहाये-सदायलान्य मर्य में एक शाद चतुर्ग। चरः, अधीतो भूतपूर्वः अधीतवरः । (5 सब रुप्पध-सम्यन्ध समझा जाय तो और में परद रा, एक ५ पकाकी।

गाधिका। होता है। यथा,हस्यः वृक्षः वृक्षका, हस्वः पट: परकः, स्तम्भ (च) अनुकम्पायाम्-अनुकम्पा अर्थ में शब्द के उत्तर स्वार्थ में कन् होता है। यथा, अनुफांम्पतः पुत्रः पुत्रका, यसकः से अन्य स्थर हव होता है। पपा, मालयी-मालशिका, मागरी-सागरिका, लपङ्गो लयटिका, माधयी-माधविहा, ध्याकरण-फौमुदी। ४४ प्राक्टीक स्वाय-स्वार्थ समझे जाने से इन्द के टि RF शक होता है । यथा, कन्या पय कन्यका, तारा एव तारका। (क) बालादरिक ( प्रत्ययस्थात् कात् पर्वस्यात् इदाप्यस-स्वार्थ समझे जाने से घाला इत्यादि के टि का इक होता है। यथा. घाला पय घालिका, तरला एव तरलिका, निपुणा-निपुषिका, चतुरा-चतुरिका, चपला-चपलिका, लता-लतिका, गोधा- (ख) अशाते कन् –अज्ञात अर्थ में शब्द के उत्तर स्वार्य में फन् होता है और इसका फ रहता है। यथा, फस्यायमश्वः अश्वकः, उष्ट्रकः, गईभकः । कुत्सिते-कुत्सित अर्थ में शब्द के उत्तर फन होता है। यथा, कुत्सितोऽश्वः अश्यकः, फुत्सितो महिपः महिषकः । (ग) अल्पे- अल्प अर्थ में शब्द के उत्तर स्वार्थ में कन होता है । यथा, अल्पं तैलं तैलकम् , क्षीरकम् , सलिलकम् । (घ) हरवे-हस्व अर्थ में शब्द के उत्तर स्वार्थ में न स्तम्भकः, दण्ड-दण्डकः । दुर्यलफः। (5) संज्ञायाम्-संशा अर्थ में शरद के उत्तर स्वार्थ में कर होता है। यथा, फरमकः, रोहितकः, शयिलकः । (ज) स्त्रियामन्त्यो हस्वः-स्त्रीलिङ्ग शब्द के उत्तर फन होने - चण्डी चण्डिका, कुशण्डी कुशाण्डिका, शेफाली.कालिका, स्वे- हव अर्ध में अश्व, उक्षन् , वत्स और ऋषभ शन्द के उत्तर तरट् होता है और इस का तर रहता है। यथा, इखोऽश्वः अश्वतर, उक्षतर, सेसिल होता है और इसका तस् रहता है। यथा, गृहात् । गृहतः प्रामात्, प्राम; नगरात्, नगरतः; सर्वमान् , पर्वतः परस्मान् , परतः: दक्षिणस्मात् , दक्षिणतः, उत्तरस्मात्, उत्तरतः हस्तात्, हस्ततः; वृक्षात्, वृक्षतः, मेधात्, मेघतः; सप्तम्याश्र--सप्तमी के स्थान में विकल्प से सिल होता है। एया, पूर्वस्मिन् , पूर्यतः; दक्षिणस्मिन् , दक्षिणतः; उत्तर- । उत्तरतः। प्रथमे, प्रथमतः परस्मिन् , परतः अग्ने, माता, मादी, आदितः; मध्ये, मध्यतः; अन्त, अन्ततः, पृष्टे, रना, पाययोः, पार्श्वत:, सार्वस्मिन् , सर्चतः। करतर तसिल होता है। यथा, परितः, भभितः । नित्यं पर्यमिभ्याम् । पर्यमिभ्या )-परि और अभि उपसर्ग 5. B. नहाकरहोः (अपादाने चाहीयरहोः)-हा और रह के प्रयोग में तसिल नहीं होता। यथा, स्वगत् होपटे,पर्वतावरोहति । सर्वतः, विश्वस्मात् , विश्वतः; उभयस्मात् , उभयतः, भवतः, तद्वित। मृणाली-मृणालिका, यूपी-यूथिका, यदरी-बदरिका, दूती- इतिका, काली-कालिका, शारी-शारिका, सूची-सूचिका । N. B. हस्ये कुटीशमीशुण्डाम्यो रः (कुटीशमीशुण्डाभ्यो १.}-स्व अर्थ में कुटो, शमी और शुण्डा के उत्तर र होता है । यधा, दम्वा कुटो कुटीरः, शमोरः, शुण्डारः distiller. २ अश्वोक्षवत्सर्पभेभ्यस्तरट् ( वत्सोक्षाश्यर्षभेभ्यश्च तनु- बन्पतरः, ऋषभतरः। १ चम्यास्तसिल वा-पञ्चमी विमक्ति के स्थान में विकल्प . भवतः एकस्मात् , एकता; अन्यस्मात् , अन्यतः; पूर्वस्मान् , उलान् , जलतः। स्मिन् , भिन्न . मि.गामभीमगि मात्र प्रा। या. मामा, मान मननी. मागम म न मान111, गा. ME मा मनोमात्र, तन मग-im ३८२ प्याकरण-कौमुदी। ४६ सप्तम्पास्नल या सर्वनाम्नः-वि, भस्मद, युप्मा सर्यनाम को सप्तमी के स्थान में विफप से चल होता है और इसका प्र रहता है । यथा, सास्मिन् ', सर्प उभय. स्मिन् , उभयत्र; एफस्मिन् , एकत्र भन्यस्मिन् , मन्यत्र; इतर.' स्मिन् , इतरत्र; पूर्यस्मिन् , पूर्यत्रा परम्मिन् , पात्र; भपा. स्मिन् ,अपरत्र। N. B. भ-य-सा एतदु-या तवाम् (पदोऽए। . दीनामः ) -तसिन और मन होने से तस पर और सद का त होता है । यथा, एतस्मात् भाः, एतस्मिन् ; परमात् पता पम्मिन्यत्र तामात तना, सस्मिन् तत्र। २ फिमः कु:-मि का कु होता है। या ना FT स्मिन्त्रा शादी- और यह निगम मे Tatai | था, . ४रिमः- ता है (वन में भी आता है)। ww,मा. Amma (गी :- मामी के है। बया, fing. (भाग - मी मामी I am - 1.netirr- म mait सहित। है। यथा, एकस्मिन् काले एकदा। सो वा सर्वस्य ( सर्वस्य सोऽन्यतरस्या दि)-दा होने से सर्व चंदा। अन्यदा। सर्व सद्यनाम शब्दों के उत्तर. सप्तमी के स्थान में दा होता विकप से स होता है। यथा; सधस्मिन् काले सदा, उम्भार यदु की सप्तमी के स्थान में दा और हिल होता है और दिल काहि रहता है। यथा; सद्यस्मिन् काले अन्यहि, किपदोः फया-पा और हिल होने से किम् का क और यद् का यहोता है। यथा, कस्मिन् काले कहि, कदा: यस्मिन् काले यहि, यदा। तस्तदा-दा, हिल और दानीम् होने से सद्कात होता है। यथा, अधुनेतही-अधुना और एतहिं पद निपातन से सिद्ध होते हैं। पया अस्मिन् काले अधुना, अस्मिन् एतस्मिन् वा काले एतहि । उत्तर पास होता है। यथा; स्मिनहनि अन्येद्युः, अपरस्मिन्नहनि अपरा, इतरेयुः, अन्य. अन्यय भी होता है; या उभयस्मिन् अनि उभयधुः। N. B.घसद्योऽयश्वः परद्यवयः-दिन समझे जाने से विभक्ति त पद का रासमान का सद्यसम्श भय और पर काम्बस. ३८३ (क) अन्यकियदा हिल्ब ( अनद्यतनेहिलन्यतरस्याम् )-अन्य, ८ एस. पूर्वादेरहनि-दिन समझे जाने से पूर्घ इत्यादि के तरयः, अधरेयः उत्तरेयुः, उभयेयुः। उभय के उत्तर पुस् (स) तदो दानी च-तद् की सप्तमी के स्थान में दा, हिल और दानीम् होता है। दस्मिन् काले तदा, तहि, तदानीम् । है इदमो दानीम्-इदम् की सप्तमी के स्थान में दानीम् होता । यया; मस्मिन् काले इदानीम् ।

ध्याकरण.कौमुदी। तथा परेशान होता है। या मिनि म, ममानेऽहान सदा, अस्मिनहनिभापरस्मिन् अनि मः, परे। २ पेपमा-पात-पारयो वर्ष-वापर यमझे जाने से विमति सहित इदम् का ऐषमग , पूर्वी का परन् , और पूर्वतर का पररि होता है। यया, अस्मिन् वर्षे ऐपमा, पूर्वस्मिन् वर्षे परत , पूर्वतरे व पारि । ४९ थाल् प्रकारे नृतीयायाः-प्रकार अर्थ में तृतीया विमक्ति फे स्थान में थाल होता है और इसका था रहता है । यया; सयैः प्रकाः सर्वथा, अन्येन प्रकारेण अन्यथा, इतरेण प्रका- रेण इतरथा, उमयथा, अपरथा। N. B. य.तो यत्तदोः-याल होने से यद् का य और दद् का त होता है । यथा; येन प्रकारण यथा, तेन प्रकारेण तथा । २ कथमित्थमा-कथम् और इत्यम् निपातन से सिद्ध होते हैं। यथा; केन प्रकारेण कथम् , अनेन एतेन वा प्रकारेण इत्यम् । ५०-परादेरस्तात् सप्तमौ पञ्चमी-प्रथमानाम्-पर इत्यादि शब्द के उत्तर सप्तमी, पञ्चमी और प्रथमा के स्थान में अस्तात् होता है। यथा; परस्मिन् परस्मात् परो वा परस्तात् , पश्चिमे पश्चि मात् पश्चिमो वा पश्चिमस्तात् । पथात्-अस्तात् सहित भएर का पश्चात् निपातन से सिद्ध होता है । यथा; अपरम्मिन् भपरस्मात् अपरो वा पश्चात् । उपर्युपरिष्टात्-अस्तात् सहित उर्ध्व को उपार और उपरिष्यत् निपातन से सिद्ध होता है। यया; उद्ध्वं उदात् उद्ध्वों का उपरि उपरिष्टात् । (क) पूर्वाधरावराणामसिच-पूर्व, अधर और अवर सप्तमी, पञ्चमो और प्रथमा के स्थान में अस्तात् और असि प्रत्यय होते है; असि फा अस् रहता है। पुराधोपूर्वाधरयोः-अस्तात् और असि होने पर पूर्व कपुर स्तिात् , पुर, अधरस्मिन् अघरस्मात् अधरो वा भघस्तात् , अधः। स्थान में अतसु होता है और इसका अतस् रहता है। यथा; दक्षिणस्मिन् दक्षिणस्मात् दक्षिणो वा दक्षिणतः, उत्तरस्मिन् (ग) उत्तराधरदक्षिणानामाति:-उत्तर अधर और दक्षिण की सप्तमी, पञ्चमी और प्रथमा के स्थान में आति होता है और इसका भात् रहता है । यथा, उत्तरस्मिन् उत्तरस्मात् उत्तरो पा उत्तरात्, अघरात, दक्षिणात् । ५१ एनए चादुरेऽपञ्चम्या:--अदूर अर्थ में सप्तमी और प्रथमा स्थान में एन होता है और इसका पन रहता है। यथा, उत्तरस्मिन् उत्तरो वा उत्तरेण, अधरेण, दक्षिणेन । ५२ दक्षिणोत्तरयोरादाही घ-दक्षिण और उत्तर शब्द की बन्द के उत्तर तन होता है और इसका तन रहता है। न्तनम् , दोषातनम् , दिवातनम्, पुरातनम, चिन्तनम् । पा, मद्य भवं अद्यतनम् , मातभवं प्रातस्तनम्, सायं भयं दातनम् ,अधुनातनम् । इदानीन्तनम् तदानीन्तनम् । सामी और प्रथमा के स्थान में तद्धित। ३८५ और अधर का अर्थ होता है। यया, पूर्वस्मिन् पूर्वस्मात् पूर्वो वा अबो विभाषावरस्य-अस्तात् भौर क्षति होने से अवर का प से श्रव होता है । यथा, अवरस्मिन् अवरस्तात् अवरो वा अवस्तात, रस्तात्, अवा, असा (ख) दिग्देशयोदक्षिणोत्तायोरतमुः- -दिग्वावक और देशवाचक गण गार उत्तर शब्द की सप्तमी, पञ्चमी और प्रथमा के उत्तरस्मात् उत्तरो वा उत्तरतः। भौर आदि प्रत्यय होते है, आन् का.या रहता है या, दया, दक्षिणादि; उत्तरा, ५२ भवेशलाव्ययेभ्यस्तन--सव अर्थ में कालवाचक अव्यय उत्तराहि।

ध्याफरण-कौमुदी। । (E) प्रार-प्रगम्याय (गायविरमा प्ररोऽध्यायटशुटथुली तुट्च-- मा, प्रग, न सम्यन्त शी के उत्तर भी होता है । यथा, मातनम् । दोपहर के पहले का ), प्रगतनम् (प्रात.काल का)। (a) विमापा पूर्वाहापराणाम्या सप्तम्याम् -सप्तमी विभक्ति में पूर्या और अपराह शब्दों के उत्तर विकल्प से तना होता है। यथा, पूर्चा भयं पूर्वाद्ध तनम् , पााहिकम् : अपराई भवं अपराहतनम् , आपराह्निकम् । (ए) नित्यमृदिः-उर्ध्य इत्यादि के उत्तर नित्य तन होता है । यथा, ऊर्थे भवः अद्यतनः, उपरि भयः उपा तनः, अधः भवः अधस्तनः, प्राक्तनः, पूर्वे भवः पूर्वतनः । (घ) आदिमध्याभ्यां मन-सप्तमी विमक्ति में आदि श्री मध्य के उत्तर मन् होता है और इसका म रहता है । यथा भादो भयः आदिमः, मध्ये भयः मध्यमः । (च) अप्रान्तपश्चात्भ्यो डिनः-अग्र, अन्त और पश्चात् के उत्त डिम होता है और इसका इम रहता है। यथा, अग्रे भव अग्रिमः, अन्ते भवः अन्तिमः, पश्चात् भवः पश्चिमः । (छ) चिर-परुत् परारिभ्यस स :-चिर, पस्त और परारिय उत्तर न होता है । यथा; चिरतम् ancient, पठनम् परारितम् । (ज) दक्षिणापश्चात् पुरोभ्यस्त्यण-दक्षिणा, पश्चात् और पुरस के उत्तर त्यण होता है और इसका त्य रहता है। यथा, दाक्षि. णात्यः, पाश्चात्यः, पौरस्त्यः । (झ) अमेहकतमिल्नल्भ्यस्त्या-अमा, इह, क और तसिल तथा प्रल् प्रत्ययान्त शब्दों के उत्तर त्य होता है। यथा हत्यः, पत्यः । ससिल प्रत्ययान्त-सतस्रयः, भतात्यः । प्रल् प्रत्ययान्त-तत्रत्यः, अत्रत्यः, कुत्रत्यः । TH तद्धित। ५४ मिश्चिञ्चनौ विभक्त्यन्तात्-अनिश्चय अर्थ में विभक्त्यन्त किम् शब्द के उत्तर चिन भोर चन होता है। यथा, कश्चित् , फेनबित् , कस्मेचित् , कस्माशित् , कस्यचित् , फस्मिचिन् , कुनश्चित् , कचित् , कुत्रचित् , कश्चन, फिञ्चन , काचन, कुतश्चन, क्यचन, कुत्रचन । ५५ अवस्तियोगेऽभूततदावे कि:-, भु, और अस् भानु के पोग में अभूततदाय जो पस्तु नहीं है इसके होने के ) अर्थ शब्द के उत्तर यि होता है और इसका सम्पूर्ण लोप होता है। (5) दीर्घोऽन्त्यः-अभूततद्वाय अर्थ में प्रत्यय होने से द के अन्तस्थित हस्य का दीर्घ होता है। यथा, अलघु लघु रोति लघूकरोति, अलघुल पुः भवति लघूभवति, भलघुर्लयः पात् लघूस्यात् । (ब) रिवर्णस्य-अभूतप्तद्वाप भर्थ में प्रत्यय दोने से शहर कअन्तस्थित भ का होता है। यथा, भशुगर रोति सीकरोति, भगः सुमो भवति शुशीभवति, पशुः शुक्र হালুয়াঘাসু। (ग)श्वतोपे:-ममूततदार भर्थ में प्रत्यय होने से पर * मन्तम्धित प्रकारीता है। पधा, मधांतारं धातार करोति धीग्रोफरोति, धोत्रीभवति, धोनाम्यात् । (4) शेषोऽसादरयाय-अमृतनदाय अर्थ में रपटीमे भरम्, मनमा बास, घेतस्, रहर भोर रज भनय पणे कालोपtart। था, भारोति, सामाति, भाग, शिमीरोति, गिनीमति, मिनीपाट, रोति, उपक्षमपति. पायात, गुग्गोपनि ध्याकरण-कौमुदी। अस् धातु के योग में सुनतीभात, सुतीयान, विग्होफरीति, विहीभवति, विदास्यात् , विरजीकरोति, विजीमयति, विरजीस्यात् । (१) विभाषा सारिप कास्न्य-फारस्य (सम्पूर्ण) समझे जाने से 'भभूततदाय भर्थ में, भू भार विकल्प स मातिच् होता है और इसमा सात रहता है। यथा, एस्स्नं लवणं जलं फरोति जलसात् करोति, कृत्स्नं लपणं जलं मशति जलसादयति, कृत्स्नं लवणं जलं स्यात् जलसात् स्यात् । भस्मसात् करोति, मस्मसादति, मस्म. सात् स्यात् । पक्षान्तर में च्यि होता है; यथा, जलीकरोति, जलीभवति, जलीस्यात् , भस्मीकरोति, भस्मीभति, भस्मी. स्यात् । (६) मभिविधौ सम्पदा च-अभिरिधि (ध्याति) समझे जाने से भभूततदाय अर्थ में च, मू, भस् और सम् पूर्वक पद धातु के योग में विफल्प से सातिच् होता है। यथा, भनि- सादयति, भनिसात् स्यात् , अग्निसात् सम्पद्यते । पक्षान्तर में च्यि होता है; यथा, अग्नीकरोति, अग्नीभति, भग्नीस्यात्, अग्नीसम्पद्यते। अधीनतापाञ्च (तस्पोनवचने -अधीनता अर्थ में भी होता है। यथा, राशोऽधीनं करोति राजसात् करोति, राशोऽधीनं भवति राजसादयति, राज्ञोऽधीनं स्यात्-राजसात् स्यात् , रामोऽधोने सम्पद्यते-राजसात् सम्पद्यते । राजीकरोति, राजीभवति, राजीस्यात् , राजीसम्पद्यते । ५६ देये श्यय् च-देय अर्थ में ए, भू, अस् और सम् पूर्वक पद धातु के योग में सातिच भौरे पाच होता है और "५ कात्रा रहता है। यथा, ग्रामवाय देयं करोति ग्राह्मण करोति, ग्राल गया करोति; माह्मणवायति, प्राणा .

सपत्राकरोति मृग व्याधः, सपत्र शरं अस्य शरीरे प्रवेशयन् अर्थ में निप्कुल के उत्तर डाच होता है। यथा; निप्पुलाकरोति दाडिमम्, दाढिमस्य अन्तरस्ययान्न पहिनि सारगतीत्यर्थः। प्रिय के उत्तरडाच होता है। यथा सुधाकरोति, प्रियाराति मित्रम्, भनुकलाचरणेन भानन्दयतीत्यर्थः । - तद्वित। ३८६ भवति, ब्राह्मणसात् स्यात् , ब्राह्मणना स्यात् , ब्राह्मणसात् सम्पयते, ब्राझणया सम्पद्यते। ५० व्या द्वितीयादेः कृपौ डाच्-कृ धातु के योग में द्वितीय, वृतीय, शम्य और चीज के उत्तर कर्षण अर्थ में डाच होता है गैर इसका आ रहता है । यथा; द्वितीया करोति, तृतीया रोति, द्वितीयं तृतीयं कर्षणं करोतीत्यर्थः, शम्याकरोति अनु- माष्टं क्षेत्र प्रतिलोमं कर्यतीत्यर्थः बीजाकरोति, वीजेन- द करतीत्यर्थः। (क ) सहयायाश्च गुणान्तायाः-गुण शब्द अन्त में रहने से ध्यावाचक शब्द के उत्तर कृ धातु के योग में कर्षण अर्थ में च होता है । यथा; द्विगुणाफरोति, त्रिगुणाकरोति क्षेत्रम् , द्विगुणं त्रिगुणं फर्पतीत्यर्थः । (ख ) समयाच्च यापनायाम्- यापन समझे जाने से समय शब्द के उत्तर डाच् होता है । यथा, समयाफरोनि समयं (ग) सपत्र-निष्पत्राभ्यां व्यथने ( सपननिष्पप्रादतिथ्यथने )-यधन अर्थ में सपत्र और निप्प के उत्तर डाच् होता है । यथा, व्यथपतीत्यर्थः, निष्पत्राकरोति, शरीरात् शरं भपरपावें निष्का. मयन् व्यथयतीत्यर्थः । (प) निष्कुष्टन्निएकोषो-निष्कोपण (कोप से बाहर करना) यापयतीत्यर्थः। (च) मुखप्रिपाभ्यामानुलोम्ये-सानुलोम्य अर्थ में सुरा और ध्याकरण-को मुहा। । (C) दुगात्मानिलाम्य-प्रातिलोम्य अर्थ में दुःख के उत्तर अच होना है। यथा, प्राफगेति भृत्यः, स्वामिनं पीडय- मात्यर्थः। (ज) ग्लात्पा-पाक धर्य में शल के उत्तर डाच होता है । यथा; शलाकरोति मांसम् , शूलेन पयतीत्यर्थः । ( 2 ) सत्यादसाधे-शपथभिन्न अर्थ में सत्य के उत्तर डाव होता है । यथा; सत्याफरोति माण्ड वणिक, कतव्यमिति प्रतिजानीत इत्यर्थः। ( ट ) भद्रात् परिवापने-मुण्डम परिवापने-मुण्डम अर्थ में भद्र के उत्तर डाच् होता है। यथा; भद्राकरोति, साकल्यं मुण्डनं करोतीत्यर्थः । N. B. पुंवत्तसिलादिषु भासितस्फस्य- तसिल् , अल् । घरट., जातीय, देशीय और पास प्रत्यय परे रहने से स्त्रीलिङ्ग शब्द का पुंबद्भाव होता है । यथा, उत्तरस्याः दिशः उत्तरतः, उत्तरस्यां दिशि उत्तरता, सर्वस्यां दिशि सर्वत्र, अर्पिता भूतपूर्वा अर्पितचरी, जात्या ब्राह्मणी प्रायः जातीया, ईपना पण्डिता पण्डितदेशीया, कुस्मिता पाचिका पाचकपाशा । २ फल्पादिपु त्र-कल्प, रूप, तर और तम प्रत्यय परे रहने से स्त्रीलिङ्ग शब्द का पुंबद्भाव होता है । यथा; ईशदना पण्डिता पण्डितकरण, मयस्ता गायिका गायकरूपा, इयमनयोरतिशयेन निपुणा निपुणतरा, इयमा सामतिशयेन चपला चपलतमा। ३ ईवूपोर्विभाषा-करुप इत्यादि प्रत्यय परे रहने से ईवन्त और ऊवन्त स्त्रीलिङ्ग शब्द का विकल्प से पुंक्शाव होता है । यथा; ईपना विदुयो विदुषीकलपा, वितरकल्पाईपदूना मेधाविनी मेधाविनीरूपा, मेधाविसमा एप मनयोरतिशयेन मायाविनी, मायाविनीतरामायावित दयमासामतिशयेन मनोहारिणी मनोहारिणीतमा, मनोहारितमाः वामस्वरुपा, धामोरपा; वामोरूरूपा वामोररूपा; वामोरूतरा; यामोरतरा, वामोरूतमा, वामोरतमा । वैयाण लोग उयन्त के मुंबनाव को निषेध करके विकप से जर शक्षित। - बलिन् , मतिमत् , लघु, बहु, उरु, दीर्घ, गुरु ard द । उत्तरत, पावतायन:, सायन्तनम्। भादित्यः, आदितयः, पौत्रः, पाण्डवः यस्तात्, भन्यथा, मनुष्यः, भागिनेयः, वैद्दान्तिक, पाणिनीयम् कार्यम, सहि भन्ये, सर्वत्र, यत्र, कालिका, दण्डका, चपलिका विधा, आग्नेय., जनता, पायन:, आध्यारिमकम, म्यः, मासिकम रमेन मियः, स्वर्णस्य विकार, दर्भा भस्य भवरावि, बुम्पिन पाचोइस्य सन्ति, मानुर्माता, अयमेशमतिशयेनप्रिय, भयमरपोनि- ३ का इस्त्रविधान करते हैं; पुचद्भाव के अभाव में ऊर का कहीं विकरम और कहीं नित्य इस विधान करते हैं। यथा, विदुपोकल्पा, विदुपिक- विद्वत्कबा; माणिमा, ब्राह्मणम्पा । ४ शसियल्पार्थस्य-शस् प्रत्यय परे रहने से बहुर्थ अ मलार्थ बोलिङ्ग शब्द का पुवद्राव होता है । यथा; बहोम्यो देहि, यहु- हि, अल्पाभ्यो देहि, अपशो देहि । ५त्यतलोगुणवचनस्य:-त्व और तल् प्रत्यय परे रहने से सापक खोलिङ्ग शब्द का पुषद्भाव होता है। यथा, निपुणाया भावः निपुर- खम् , निपुणता, चपलाया भावः चपरत्वम् , उपलता; मेधाविन्या भा= मेधावित्वम् , मेधाविता, प्रियवादिन्या भावः प्रियवादित्वम् , प्रियवादिता Exercise-41 Give the comparative and superlative forms 2 Derive-दाशरथिः, भस्मसात्, अन्तिमः, मौमित्रिः अमात्य- ज्य, मानसम्, पार्थिवम् सांघातिक, धाममा माधुण्यंम.. मौदनम् 3, Substitute single words for.--'यूनाय भावः, पुत्रमिक पश्चया स्मिन संजाता, गज प्रमाणमस्प, पच पचा शाप, स्तानां पण, स्वारस्यास्ति, माया अस्य भरिन, उष्णं न करने . and प्रमुखम् । .

6. Correct:-कोशलराज्ञः कति पुत्राः सन्ति । दाशरपिस्य आज्ञा . (b) I will go there and see your brother. You have sent me three books. The army of the enemy was defeated. व्याकरण-कौमुदी। अश्व , म प्रहारएम्मिन्नहानि, प्रातर्मयम् शुगल शुभ मदत, अनम्य अपयम, मनोर परयम , वामस्य अश्यानि, बेई अर्धने, शरीरेण हतम् , विष्णुरस्य देवता, अर्थमई नि, मरतस्य इम, रजतम्य विकार, येतनेन जीवति, धम्म पति, अन्यन प्रकारेण and वाला एर। +. Translate into Hindi:-दाशरथिः तम्य वचनं शुवा यो यभूव । पाण्डवकोरवयोमहान् युद्धोऽभूत् । अग्मिन् वने महाउपा नाम तापम मासीत् । सम्य ज्येष्ट पुत्रो बुद्धिमानस्ति । धाणाष्टमवलोक्य सन्चे यत्र तत्र पजायिताः । अग्मिन् मठे यहवो वैष्णवाः सन्ति । अदितेर- परयानि आदितया दिते देण्याचा मन्ति । 5. Translate into Sanskrit-३) मातापिता सन्तान की रक्षा करते हैं। देशभक्त अपने देश को प्राण से भी अधिक प्यार करते हैं। आप समुद्रापर्यन्त पृथ्वी के राजा है। कौशिक ने रामचन्द्र से कहा। हिमालय भारतवर्ष के उत्तर में है। The royal officers went to the tree. He sarhsa!1 day and never wastes time. Please come to my house to morrow. - पालय । धनिना सेवा सर्वे कुर्वन्ति । मस्तिष्ठति जिह्वाग्ने हरे तस्य हलाहल. । बालकेन चन्द्रं पश्यते । मां धनस्य प्रयोजनं मास्ति। धनेन विद्या गरीयसी । पतिना नीयते वधू । लक्ष्मीमानाऽस्ति । . स्त्री-प्रत्यय १ स्त्रियम्-इस प्रकरण में पुलिङ्ग से स्त्रीलिङ्ग यनाने के नियम का उल्लेख किया जाता है।

स्त्री प्रत्यय । २ भदन्तादाप (अजाद्यता)-अकारान्त प्रातिपदिक के उत्तर आप होता है और इसका भा रहता है । यथा; कृश-कृशा, दीन- पीना, मलिन-मलिना, कृपण-कृपणा, र फरा, सरल-सरला, भवल-प्रयला, अचल-अचला, निपुण निपुणा, चतुर-चतुरा, ताल- तरला. चपल-चपला, दक्षिण-दक्षिणा, उत्तर-उत्तरा, पूर्व-पूर्वा, अनुकूल-अनुकला, प्रतिकूल-प्रतिकूला, मनोहर-मनोहरा । (क) मापि प्रत्ययकात् पूर्वस्यात इत् ( प्रत्ययस्थात् कात् पूर्खस्यात् पाचिका, नाटक-नाटिका, पालक-पालिका, कारक-कारिका, पश्चिम-पश्चिमा, प्रथम-प्रथमा, द्वितीय द्वितीया, तृतीय-तृतीया, छाप्यमुपः)-आप होने से प्रत्यय के ककार के पूपयती प्रकार का इकार होता है। यथा, नायक-नायिका, पायक- पोधक-योधिका, साधक-साधिका, पालक-यालिका। देखत्ये। क्षिपकादीनां चन)-यतका इत्यादि के फकार के पूज्ये. पत्ती अकार का इकार नहीं होता। यथा; अएका, एका, कन्यका, फरका, चटका, तारका, अधित्यका, उपत्यका। इंपिछोपोऽवर्गस्य (पस्येति च) होने से शब्द के अस्त- पत अ का लोप होता है। यथा, गौर-गौरी, कुमार-कुमारी, -शोर-किशोरी, सुन्दर-सुन्दरी, तरुण-तरुणी, पितामद-पिता. मातामह-मातामही, नद-नदी, सट-तटी, नट-नटी, पट-पटी, ल-कदली, स्थल-स्थली, काल-काली, माग-नागी, मण्डल. इली, सल्लक.सल्लकी, घेतस-घेवसी, आमटक-आमटकी, २६ (स) नाटकादेः (त्यकनश्च निषेधः । तारका ज्योतिपि । अटका पितृ । । गौरादिभ्यः-गौर इत्यादि मकारान्त शन्दों के उत्तर होता है और इसकाईरहता है।

३१४ ध्याकरण-कौमुदी सूण-तणी, कोण-द्रोणी, पारयदरी, कयर-कय s braid of hair. (0) आती नातेदन्तदीर ( जातरम्त्रीविष्याश्योपयात् )-जाति अर्थ में जातियाचक अकारान्त प्रदों के उत्तर ईप होता है। यया, सिंद-सिंही, व्याघ्र-व्याघ्री, मल्लूक-मन्दकी, मृग-मृगी, हरिण हरिणी, कुरङ्ग कुरङ्गी, गईभ गर्द भी, शूकर शूकरी, कुक्कुर- कुकुरी, जम्यूक-जम्यूकी, गाल-गाली, बिडाल- पिडाली, घोटक-घोटकी, महिष-महिषी, हंस-हंसी, सारस. सारसी, ययाफ-चक्रयाफी, मानुष-मानुर्ग, ब्राह्मण-ब्राह्मणी, गोप.गोपी, अण्डाल-चण्डाली, पिशाच-पिशाची, राक्षस. राक्षसी, निशाचर-निशाचरी। N. B. नाजादेः-जातिवाचक शब्दों में अब इत्यादि के परे । नहीं लगता । यथा; अन्न-अजा, कोकिल कोकिला, चटक-चटका, मंज-अश्या, मूपिक-मूषिका, पुनक-पुत्रिका, बाल-बाला, वत्स-यत्सा, ज्येष्ठ-ज्यच्या, कनिष्ठ- कनिष्ठा, शूद-शूदा, (महत् शब्द पहले रहने से इंम् होता है; यथा; महाशदी)। २ न योपधाद्ययादिवर्ऋत् ( जाते शब्दों को उपधा में य हो तो ई नहीं होता । यथा: वैग्य-वैश्या । गश्य a species of ox, हय, मुख्य, मत्स्य और मनुष्य के उत्तर होता है; यथा; गयी, हयी, मुकयो । ३ लोपो मत्स्यमनुष्ययोर्यस्य (सूर्यतिघ्यागस्त्यमत्स्यानो य उपधायाः)-ईप होने से मत्स्य और मनुष्य के य का लोप होता है। मत्स्य-मत्सी, मनुषी। (ख) ऋचन्तादीपः (अक्षम्यो.डी-कारान्त शब्दों के उत्तर ईए होता है । यथा; दातृ-दात्री, भातृ-धात्री, ककनी, जनयित-जनयित्री, प्रसवितृ-प्रसवित्री।, -आतिवारी या;

मधिकारिन्-अधिकारिणी, उपकारिन्-उपकारिणी, अनुरागिन्- मागान्त शब्दों की उपधा का लोप होता है। यथा; राजन्-राशी, परम् सीमा, पामा, सुदामा, अतिमहिमा । थन् भागान्स शब्दों के उत्तर महीं होता। यथा; पहनि सन्स्यस्य! विभाषा डा (डावुभाभ्यामन्यतरस्याम् )-बहुमीहि समास मने से अन् भागान्त शब्दों के उत्तर विकल्प से डापू होता याः, पक्षान्तर में पहुपा, यहुपर्याणी, यहुए णः। श्रीहि समास होने से विकल्प से डा भार होता है। स्त्री प्रत्यया अनुरागिनो, हारिणी। N. B. न स्वस्रादेः (न पट् स्वस्रादिभ्यः )-स्वस इत्यादि प्रकारान्त शब्दों में ईए नहीं होता। यथा; स्वसा, माता, दुहिता, याता, जनान्दा, तिमः, चतस्रः। (ग) नान्तादीपू (ऋन्नेभ्यो कोप)-नकारान्त शब्दों के परे होता है। यथा; कामिन-कामिनी, मानिन्-मानिनी, मायाविन्- मायाविनी, तपस्थिन-तपस्विनी, विलासिन्-विलासिनी, प्रियवादिन-प्रियवादिनी, मनोहारिन्-मनो. N. B. उपधाया लोपोऽनः ( भालोपोऽनः ) ई होने से अन् और संयुक्त उपधा का लोप नहीं होता। २ संख्यायाः-संख्यावाची नकारान्त शन्दों के परे ईपू नहीं होता है। यथा; पच, सप्त, भट, नव, दश । ३ ने मनन्तात्-मन् मागान्त शब्दों के परे ई नहीं होता । यथा, । ४ नानन्ताबहुधीही (मनो यहुयीदेः )-बहुनीहि समास होने से मणि बहुपर्खा वेणुषष्टिः। भौर इसका भा रहता है। यथा; पहुपा, पहुपये, पहु. चोपधालोपिनो श ( अन अचलपिनोऽन्यदरस्याम् )-जिन मागान्त शब्दों की उपधा, फा लोप होता है उनके परे परे विकल्स से नून् होता है। यथा तुदत्-सुदन्ती, सुदती; इच्छत्-इवन्ती, नाकरन-कौमुदी। गया, गायराम्या राजानः पता, दुगो, gnani, पदुमी, बगायो, करायः। पसागर में यदुराजा, पर गजानी, यदुराजानः। N. B. गुगत्यादयः (एनप्तिः। शयुगमयोनामनि)-- NEET रित है। या यात्रा युक्त, गूगन-गुनी मपान-मपोत , मशी। (2) दाभ्यामीर-भौर लोप होने वाले प्रत्ययों के योग से पनेशनों के उत्तर पदोता है। यथा, उबरेत भवत भयनी, इयत्-स्पती, किया-कियती, श्रीमत्-धीमती, पुद्धिमत्- युनिमती, पुप्रयत् पुत्रयती, स्वायत्-लजावती, यलवत-घल. पती, प्रमायत्-प्रमायती, प्रत्यत्-स्तयती, प्रेयस्-प्रेयसी,धेयस्- धेयसी, गरीयस्-गरीयप्ती, लघीयस्-लयीयसी, कनीयस्-कनी. पसी। ऋष्यरेत-सत्-सती, दत्-रदती, शृण्वत्-शृप्पी, द्वि. पत्-दिपती, पिनत् यिनती, पुर्यत्व्यती, गृहत्-गृहती, जानत्-जानती। N. B. शतु न भू-दिवादिम्याम्-ई होने से मार, दिदि और पुरादि गगीय पात के उत्तर शत प्रत्यय को नन का भागम होता है। नून का न रहता है और शतृ के त् के पूर्व लगता है। यया; म्यादि-धावत्- धावन्ती, गरछस् गच्छन्ती, पतत्-पतन्ती, तिसष्टन्ती, चलत्वलन्तः, चुरादि-पश्यत्-परयन्ती, अरयत्-बारयन्ती, स्मारयत्-स्यारयन्ता स्थापयर- स्थापयन्ती, पालयत्-पामयन्ती । दिशादि-दीव्यत्-श्रीमन्ती, नश्यत्-नस्पती, जीर्यत्-जीर्य्यन्ती, मुखत्-मुधन्ती । २ वा तुदादेः (माच्छीनद्योम ) तुदादिगणीय धातुओं के इच्छती, पृच्छत्-प्रचन्ती, पृच्छती, स्पृशत्-शन्ती, स्पृशती, सिन्धत सिचन्ती, सिञ्चती।

कागन्त धातु के परे विकल्प से नून होता है। यथा, यातन्यान्ती, पाती मात्-मान्ती, माती; भात-भान्ती, भाती; स्नात्-नान्ती, स्नाती । प्रत्यायान्त शब्दों का विकल्प से नून होता है। यथा; भविष्यत्-भविष्यन्ती, भवियती करिष्यत् करिष्यन्ती, करिष्यती, दास्यत्-दास्यन्ती, दास्यसी, दन मात्र तयर टक टकाकरपः)-र और प लोप होने वाले प्रत्ययों से बने हुए शब्दों के परे ईप होता है। यथा; रकारेत्- मायन-गायनी, कर्मकर-कर्मकरी, अर्थकर-अर्थकरी, यशस्कर- पशपरी, निशाचर-निशाचरी, भयङ्कर भयङ्करी, चतुर्थ-चतुर्थी, पञ्चन-पशमी, पष्ठ-पष्ठी, सप्तम-सप्तमी, अष्टम-अष्टमी, नवम- नवमी, दशम-दशमी, एकादश-पकादशी, द्वादश-द्वादशी, प्रयो. श-त्रयोदशी, चतुश-चतुर्दशी, घोडश पोडशी, दयायी, यो, मृन्मय-मृन्मयी, हिरण्मय-हिरण्मयी । पकारेत-नर्सक- पी, चतुष्टय-चतुएयी, दयामय-दयामयी, स्वर्णमय-स्वर्ग. की, रजक-रजको, मानय-मानवी, वैष्णव-वैष्णवी, द्रौपद- पदी पाञ्चाल-पाशाली, मागध-मागधी, मैथिल-मैथिली, चन-पार्वती, चातुरन्चातुरी, माधुरमाधुरी, मागिनेय-मागि- पौत्र-पौत्री, दौहित्र-दौहित्री, ईश-ईदशी, तादश-ताशी, रा-यादशी, कोदश-कीदृशी, सद्श-सदशी, पता-पताशी, 1.B. ईपि लोप: प्यणो हलः (दलस्तद्धितस्य)-र होने णे के परसी पर प्रस्पय का होप होता है। क्या गाग्य-गी. स्त्री प्रत्यय। ३ प्रदादेश्चादन्तात् ( आच्छीनचोर्नुम् )-अदादिगणीय आ- ४ विभाषा स्यतुः (आच्छोनद्योम्)-ई होने से स्थत वास्यत -वास्यन्ती, यास्थती। (घ ) टित-पिदभ्यामीप् ( पिद् गौरादिभ्यश्च । टिचाणन् यस - दश-अन्याशी।

४०० होता है। यथा, पशिष्ठस्य पती, पशिष्ठानुष्ठितयशफलमोपत्री- त्यर्थः। प्रामस्य पतिरियम् (यहां पति का अर्थ भधिकारिणी ण्याकरण-कौमुदी। के उत्तर होता है। यथा, अस्था दानी द्विदानी । cow tued with wo ropes, श्रीण्यस्या दामानि त्रिदानी; Fat gruâ fcripát A com two years old, fret- यणी, चतुर्हायणी गौः। हायन शब्द ययोपावक न हो तो ईपू और पत्य नहीं होता। यया, विहायना, निहायना, चतुर्हायना शाला। (ण) सन्ताद्विभाषा विकारादचितः-कारान्त शब्द के उत्तर विकल्प से ईप होता है। यथा, घेणी, श्रेणी: राजी, राजिः; आली, मालिः, फटी, कटि; रानी, रात्रिः; रजनी, रजनिः; शारी, शारिर; यष्टी, यष्टिः अही, महिः; कपी, कपिः; मुनी, मुनिः; शकटी, शफटिः। - N. B. नित्यं सख्युः ( सत्यशिश्वीति भाषायाम् )-- सति में नित्य होता है। यथा, सखी । २न के (कृदिफारादक्तिनः )-क्ति प्रत्यय से बने हुए इका- रान्त शब्दों के उत्तर ईप नहीं होता है। यया, गतिः, स्थितिः, वृति, मतिः, भक्तिः, मुक्तिः, धुद्धिः। ३ वा शक्ति-पद्धतिभ्याम् ( वहादिभ्यश्च )-शक्ति और पद्धति शब्द के उत्तर विकल्प से होता है । यया, शक्ती, शक्तिः ( अस्त्र अर्थ में, पद्धती, पद्धतिः। (त) पत्युनो यज्ञसंयोगे-यज्ञसंयोग अर्थात् यज्ञ के फलमा• गित्व अर्थ में पति के उत्तर ई और कार के स्थान में न है, फलमोती नहीं है; इसी से ईप और न नहीं होता)। N. B. सपनोभृतयः (नित्ये सपल्यादिषु)-सपी इत्यादि = निपातन से सिद्ध होते हैं । यथा, समानः पतिरस्याः सपत्नी, एका पतिरपा स्त्री प्रत्यय। । दिपदी, प्रयोऽस्या: पदः त्रिपदी, चतुष्पदी, यहुपदी, शतपदी । मर्ष में पाणिगृहीत शरद के उत्तर होता है । यथा, पाणि. गीतोऽस्याः पाणिगृहीती पत्नी अन्यत्र पाणिगृीता मारी। मसायी, साधुः: पदयी, पटु: गुप्यों, गुरु लम्पी, पु:: भाषी, मणुः स्याद्री, स्थायही, बहुः (माकपा) । पर उसमें कहो. उम उत्तर रसोता। और भनहरुप्र के उत्तर निरयांए होतादापा, मरिया, पप्पा दर:-माया मधे में भप.' पण मन्.मातुर, शत्रिय, पाप्यार करावा ४०१ एयरनो सानो वीरः पतिरस्या: वीरपस्नी, वृद्धः पतिरस्याः मास्नी, भवः पतिरस्याः भास्नी, पच पतयोऽस्याः पयानो परी, पतिरस्त्रयाः पति- पलो, बहन, मन्तरस्त्यस्याः अन्तर्वस्नी गर्भिगी। (५) पदो बहुवीहौ (पादोऽन्यतरस्याम् )-- यहुमोदि समास होने पर पद के उत्तर होता है। यथा, नापस्या पदी (६) दत्तर-यहुयीहि समास होने पर दम् के उत्तर प् होता है। पा, सुदती, चादनी, शुभ्रदती, उन्ददती। (५) पाणिगृहीतात् पस्न्याम् ( पागिरीती भाग्यापाम् )- पत्नी (1) गुणानकातुरन्तात् (योतो गुणचना ) गुणयायक उफारान्त शब्दों के उत्तर विकल्प से होता है । पपा, गरी, girl who chooses her husband शाद में नहीं होता संयुक्तोपपात् (सहसंयोगोपचा)-जिन सानो (नियमिदनमाम् ( गमग मरा)-गि स्या: शिगुरित्यर्थः भादी! भा-निपातन से सिरहता है। ' भाभी (परमा- पाय- (मगोपधान।

४०२ ध्याकरण-कौमुदी। के उत्तर मान् घप होता है। यथा, भयस्य जाया भगनी, शर्वस्य जाया शोणी, रद-रुद्राणी, मृड-मृडानी, इन्द्र- इन्द्राणी, वरुण-घरुणानी, इत्यादि । (क) न लोपो ब्रमणः-भान होने से ग्रह्मन् के नफार का लोप होता है । यथा, ब्रह्मणो जाया ब्रह्माणो। (स) मातुलादान विभाषा (मातुलोपाध्याययोगनुग्वा)-मानुल राम के उत्तर विकल्प से भान् होता है। यथा, मातुलस्य जाया मातुलानी, मातुली। (ग) वा क्षत्रियादेरानीपो (अपक्षप्रियाभ्यां वा स्वाय)-क्षत्रिय इत्यादि शब्द के उत्तर विकल्प से भान् भार होते है। यथा, क्षत्रिय क्षत्रियाणां क्षत्रिया A woman of the Kshatriya caste, sfazit the wife of a Kshatriya, Med. भर्माणी, भा, भक्ष्यों; उपाध्याय-उपाध्यायानी, उपाध्यापी The wile of a teacher, उपाध्यायी, उपाध्याया-aler male preceptor, पाचार्या, भायाप्र्यानी the wife of an Acharya or holy teacher (न मुर्दम्य मही होता) Haitat a spiritual preceptress. (0) अर्थशिवे हिमादः (हमारण्पयोमहत्व । यो । पति- प्याम् )-मर्थ विशेष में हिम, मरण्य, यश और पर उत्तर निस्य मान् भार होता है । महत हिम हिमानी, महत् भरण्यम् भरण्यानी, दुष्णी या यानी, पनाat farm. पानानी। ५ उतार-उकारात दार उप होना है माँ THEIRATRINT HIT arg प्रमाः।

3.Translate into Sansknt'नाजा परमे भरमी कन्या - स्त्री प्रत्यय। सरस्य जाया वधूः। गा, धनुः, आलु, हनु, कमण्डला, त्राः, वृतवाहु, अवययुः। रमाविवास्या ऊरु करभोसः, करिफराविवास्या ऊरू करि- परवती ऊरु के उत्तर में ऊप होता है। यथा, वामोरू:, हेतोः, सहोकः, संहितोकः, लक्षणोरूः, शफोरुः। .Give single words for:-भाचार्यस्य जाया. खरस्य ४०३ न रज्यादे.- इत्यादि के उत्तर अस नहीं होता । यथा, (क) विभाषा तन्वाद-तनु इत्यादि के उत्तर विकल्प से अप होता है। यथा, तनूः, तनुः, चञ्चूः, चञ्चः। यथः श्वशुरस्य-वशुर का निपातन से श्वभू होता है । यथा, (स) उरोरौपम्ये (ऊरुत्तरपदादौपम्ये )-उपमा अर्थ में ऊर के उत्तर अप होता है। यथा, रम्भे इवास्या ऊरू रम्भोरु, (ग) दामादिप्टारच (संहितशफलक्षणदामादेश्व)-घाम इत्यादि Exercise-42 1 Ghe the feminine forms of:-प्रथम, मनुष्य, तपस्विन्, नेद, राजन् , युवन् , श्रीमत् , पतत् , नर्तक, गाय, उपच, आचारयं, उपाध्याय, मृगनयन, पति, मृदु, कुरु, श्वशुर, भविष्यद, ६. मनोहारिन् , कामिन् , शूद, गायक and क्षत्रिय । मानुलस्य जाया, वीरः पतिरस्या, मृग इस भयनेऽस्या , मह्मगो गणकस्य जाया, समानः पतिरस्या, पञ्च पतयोऽस्या.. समाधि of Gop class, Thewife of lodra. womaa .

४०४ ध्याकरण.कौमुदी। में मरस्य की परमाई देख कर जो उसे वैधेगा, उसी के साथ दोपदी विवाह होगा । अनेक पोर राजाओं ने मत्स्य वेधने की चेष्टा की, पर कोई भी सफल न हुआ । अन्त में ब्राह्मण वेषधारी अर्जुन ने मरस्य को मार गिराया और द्रौपदी को लेकर भाइयों सहित अपने स्थान को भले । पर दुर्योधन इत्यादि सब राजाओं ने युद्ध करके द्रौपदी को छीन लेने का विचार किया। युद्ध में अर्जुन ने सबको परास्त किया। प्रोपदी सहित पांचो पाण्डव अपने घर पहुंचे और द्वार से ही माता को पुकार कर पड़ा कि हे माता, हम लोग एक फल लाये है। माता ने कहा कि भापम में योट लो | माता, के ऐसा कहने के कारण द्रौपदी पाँचो पाण्डवों की स्त्री हुई। समास १ एकपदीभावः समास:-दो या अधिक पद मापस में मिल जाते हैं तो उन्हें समास कहते है। समास में केयल भन्त के पद में विभक्ति होती है। N. B. लुफा विभक्त-समास के अन्तर्गत विमति का लोप होता है। २ नस्यलोपः पूर्यस्य (म लोपः प्रातिपदिकान्तस्य). समास होने पर पूर्वपद के अन्तस्थित न का लोप होता। ३ परम्य म्परे (मस्तद्धित)-सर वर्ग परे रहने से पराई भन्नस्थित न् का छोप होता है। पर प्रत्यय परे रहने से भी परपर के भन्तस्थित माछप होता है। ४ लोपोडणेपर्णयोः ( यस्येतिघ-स्वरवर्ण परेसने से र भरमार होता है। ५ मकारो नमो इलि (मोपी ममः)-जन क परे पने में नाकाम होता है। ६ मन् म् (सस्माग्नुचि)- प हो जाम भन्दा है।

सास होने पर समस्त माग पलीवरिषदाता। समास। कालोप होता है। हेने पर समस्त भाग प्रातिपदिक होता है अर्थात् उनले उत्तर फिर साव (ल्लिा के समान मार ) होता। वीययोः) विशेष्य पद परे हो तो महामाहोता। १४ महतो महा विशेष्ये ( भान्महतः समानाधिकरण ७ टेलोपो डिति (टेः)-र-इत वाले प्रत्यय के परे रहने से टि- ८ तेचिशतः (ति विशतेहिति -विशति के ति पा लोप रहस्योऽन्ते गोस्त्रियायन्यार्थे (गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य )- बदा अन्य पदार्थ का बोध हो वही अन्तस्थित गोरा और स्त्री प्रत्यय पास्त होता है। स्त्री नेयसुनः--ईयमुन के पावती स्त्रीप्रत्यय का हस्त्र नहीं देता । १० समासा:प्रातिपदिकानि ( तद्धितसमासाध)-सनाम विक्तियां लगती है। ११ विशेष्यलिङ्गमन्यार्थे- जहाँ अन्य पदार्थ का बोध हो ।' समस्त माग विषयक हिंग को प्राप्त होता है। २२ मपुसकैफयचने समाचार-समाहार समान होने पर एमाल मग नपुसकलिङ्ग और एकवचनान्त होता है। १३ पुंधरायः सयानः-समास में लिा सर्वनाम का उसे मध्ययोमाय पाहते हैं। अव्ययीभाव समास परमार्थप्रधानोऽपदभाव-जिस समास में पूर्पपा मान (1) म सकभरे ( अन्य भाषा -मम्पपी मार (स) मान्तभिनयम: (भारमोन :- PIRTH.कामुही। यसमो को मार गिमति के गाल में होता है । यया; राममधियाय प्रणा कया अधिकारी र गान् गतः। (Afrौपानयोः । गत जलम् । तृतीया मोरगामी प्रिमि में पिकामम् होता है। पथा, रामभ्य समापन कार्य इति उपगमम् , उपरामेग पा कार्यम्। रामभ्य मपि मिति उपगमम् . उपरामे या स्थितः। (4)पात ( मनभाए। आप मुअकारान्त मिन भीमाय के परवनी मिमिका लोप होता है। ३ मुरादापर्य गमती ( भाययं मिनिमनमविण्यामावा যমাশহাবমেৰিগৰৱালায়াশকিশৰৱৰ- ने-समोप, भमाय, मत्यय, असम्पति, पधात् , योग्यता पीसा, मनतिवृत्ति, मानुपूर्ण, विमनि, साहश्य, योगपट, साफल्य, समृदि, पर्योल इत्यादि मर्थ में सुबन्त पर के साथ मध्यप का समास होता है। यया; समीप-गृहस्य समीपं उप- गृहम् , गङ्गाया समीपं उपगङ्गम् अभाव-यिनस्य अमाय. निर्धिनम् , मक्षिकानां अमायः निम्मेक्षिकम् । अत्यय-हिमस्या- त्ययः भतिहिमम् , याधाया मत्ययः प्रतिवाघम् , अमन्त- निद्रा सम्प्रति न युज्यते अतिनिदम् । शोकः सम्मति न युज्यते अतिशोकम् ; पश्चात-रथस्य पश्चात् भनुरयम्, अनुगृहम् । योग्यता-रूपस्य योग्यं अनुरूपम् , मनुकुलम् ; योप्सा-दिनं दिन प्रतिदिनम् । प्रतिगृहम् , अतिवृत्ति-शकिमनतिक्रम्य यथाशकि, यथाज्ञानम् ; आनुपूर्दी-ज्येष्ठस्य मानुपूयेश मनुव्येष्ठम् , मनु. वर्णम् ; विभक्त्यर्थ-हरी अधिहरि, गृहे अधिगृहम् ।। में स्त्रोऽकाले ( अध्ययोमावे वाकापे)-अव्ययीभाव समास -सह शब्द के स्थान में स होता है । यथा; साहाय-हरेः सह -- सहः शन्त पद के साथ यहिस्, प्राच, अयाच्, प्रत्यय, मप, परि त्यादि शब्दों का विकल्प से समास होता है। यथा, यहि- मम्, प्रामादिः प्रागुपवनम् , उपवनात् प्राक् । बिना मर्यादा, तत्सहितोऽभिविधिः) अर्थ में सुयन्त पद के साथ माड् अव्यय का विकल्प से समास होता है।यथा, मापाटलिपुत्रम् ( थापाटलिपुत्रात् ) पृष्टो देवः; भाकुमार सशेणाभिप्रतो आभिमुख्य-माभिमुख्य ( सम्मुख)मर्थ में सत्यवाचक सुबन्त पद के साथ अमि और प्रति अध्ययों का विकल्प से समाप्त होता है। यथा, अम्यग्नि (अग्नि ममि) सलमाः पतन्ति, प्रत्यग्नि (मग्नि प्रति)। ८यस्य चायामस्तनानु:( यस्य चायामः)-जिसकी दीर्घता का रोघहो उसके साथ भनु व्यय का विकल्प से समास होता । पा; अनुगङ्गम् (गंगाया भनु) पाराणसी, गंगा दै. (मा कुमारेभ्यः) यशः कालिदासस्य; भामुक्ति ( मामुक्त) ALLA समासा ४०७ -- सहरिः; योगपद्य-चक्रण युगपत् सवक्रम; साकल्य-तृणमपि परित्यज्य सतृगम् ; समृद्धि-मदाणां समृद्धिः समदम् । पर्यन्त-अभिमन्यपव्यातमधीते साग्नि । फाल भर्य में स नहीं होता; यथा, सहपूर्बाहम् , सहापराकम् । । पाववधारणे--अवधारण अर्थ में सुयन्त के साथ यावत् का समास होता है । यथा, यावदमत्रं ब्राह्मणानामन्त्रयस्व, पावन्त्यमत्राणि सन्ति तावत् भामन्त्रयस्वेत्यर्थः; यावन्तः लोकास्तावन्तोऽच्युतप्रणामा यायच्छ लोकम् । ५ विभाषा पदिशदिः पञ्चम्या (अपपरिवहिरबरः पञ्चम्याः )-पञ्च- , . , . आमर्यादाभिविध्योः--मर्यादा और अभिविधि (तेन संसार ७ है। सशदोपलक्षिता इत्यर्थः ।

४०८ के यह,पया मोरजादों के उत्तर भन्सार और भन् प्यारग.फौमुदी। ९पारमध्यो पट्या (पार मध्ये पच्या बा)--पष्टयन्त पद साथ पार और मध्य शब्दों का विकल्प से अव्ययीभाव होता है। यथा; समुद्रस्य पारं पारसमुद्रम् , गङ्गायाः मध्य मध्ये. गङ्गम् (निपातन से ५ का आगम होता है)। पक्षान्तर में पष्ठी समास होता है। १० संख्या मदीभिः समाहारे ( नदीभिश्च । समाहारे चायमण्यते -- समाहार समझे जाने से नदीयाचक सुयन्त पद के साथ संख्यावाचक शब्द का अव्ययीभाव समास होता है। यथाः तिसृणां गंगानां समाहार: त्रिगङ्गम् , पञ्चनदम् , सप्तगोदावरम् । भन्यपदार्थे च संज्ञायाम्-संज्ञा मर्थ में और अन्य पदार्थ का योध होने से नदीवाचक सुयन्त पद का अव्ययीभाव समास होता है । यथा; उन्मत्ता गङ्गा यस्मिन् उन्मत्तगङ्गम, लोहित. गङ्गम् , तुप्णीगङ्गम्, शनर्गङ्गम् , इमानि देशविशेषनामानि । ११ सिद्गुप्रभृतीनि (च)-अव्ययीभाव समास में सिद्गु यद्गु. भायतीगयम् , खलेयवम् , खलेयुसम् , लूनययम्, लप. मानययम् ; पूतययम् , पूयमानयवम् , संहितययम्, संहियमाण. ययम् , संहृतयुसम्, संहियमाणघुसम् , समभूमि, समपदाति, सुषमस् , विषमस् , दुःपमम् , निःपमम् ,भपसमम् , भायतीस- मम्, प्रौढम, पापसमम्, पुण्यसमम् . माहम् ; प्ररथम् , प्रगम, प्रदक्षिणम् , अपरदक्षिणम् सम्पति और मसम्मति निपातन से सिद्ध होते है। या तिष्ठन्ति गायो यस्मिन् काले वोहाय तिघदगु, मायान्ति यस्मिन् काले गायोगोएम् मायतीगया। N. B. सरदारिन् (मध्ययीमाये शरतमभृतिभ्यः)- मध्यपोगाव समास में शागिर, अनम, मणम् , MATR, आमा निए, दिमात्र, रसद गि, शि, शुस - हुदर्क सामवाङ्मनसाक्षिम पदारगयोष्ठीवपदष्टीवनक्कन्दिवरा - पतन से सिद्ध होत । यथा रजोऽपि अपरित्यज्य सरजसम् नः ५ अनन्तात् (अनध)-अन् भागान्त शब्द के उत्तर अन् होता ययाः उपराजम् , अध्यात्मम् , प्रत्यध्वम् । नहायणीभ्यः । गिरेश्व सनकस्य)-निरि, नदी, पार्यमामी और महायणी के उत्तर विकल्प से अद होता है। यथा; उपगिरम् . उपनिरिक नदम् , उपनदि उपपौर्णमापम्, उपपौर्णमासि; उपाग्रहायणम्, उहायगि। शमी के सर विकल्प से अन् होता है। यथा, उपहशम्। उपरत स्पशान्तावापश्चमात् ( झयः )-पयमभिन्न सश-वर्गात समद उरण शब्द के उत्तर अन होता है। स्था; सि.प्रत्युरसम्।। ८प्रतेपरः सप्तमीस्थानात्-प्रति शम्द के परकता सप्तम्यर्थ में समास। ४० है। यथा; शारदः समीपम् उपशरदम् , प्रतिदिशम् , आहिमवतम् , अनुशम् । २ जराया जरस् ( जराया जरस् च)-अन् होने से जरा का बरस होता है । यथा, जरायाः समीप उपजरसम् । ३ सरजसोपशुने ( अचतुरविचतुरसुचतुरस्त्रीपुंसधेन्वन- जेन्दिवाढदिवसरजसनिःश्रेयसपुरुषायुषव्यायुषघ्यायुषय॑नुष - गतोक्षमोक्षवृद्धाशापशुनगोष्ठश्या: ) -- सरजम और उपशुन पं उपगुनम् । ४ प्रतिपरसमनुभ्योऽक्ष्णः-प्रति, पर, सम् और अनु के पर. अक्षि शब्द के उत्तर अन् होता है। यथा; प्रत्यक्षम् , परोक्षम् , म., अक्षम् । या नपुंमकात् ( नसकादम्यतरम्याम् )- नपुसक अन् शन्द के उत्तर विकल्प से अन् होता है। यया; उपकर्मम् उपचने । । गिरि-नदी-पौर्णमास्याग्रहायणीभ्यः ( नदीपौर्णमास्या- - अनुगमधम् , अनुसमिता - संयोग अर्थ में सुयन्त पद् के साथ द्वितीयान्त कारवाचक सुयन्त पद का समास होता है । यथा; मुहत्तं सुखं मुहते. ४.० ध्यागणीमुदी। भनुगममायाम-या अर्ष में भगवन् निपातन से सिंड बनाया गोपामार अनुगाम् । सत्युमय-समाम १२ सामानम्तम्पुर:-जिस समाम में उत्तरपद प्रधान दो उसे सरपुरुष समास पहने हैं। Y. B. परलिङ्गमापुरपे (परयलिङ्ग इन्द्रसत्पुरुपयो:)-- सगुल समारा होने पर समस्त भाग उत्तर पदगिको प्राता है। २राबाहाहा पुमांसः (रात्राहाहाः पुमि)-सन्युम ममाम होने में रामस्न माग के अन्सम्धिन राणा, और शाहिद होते हैं। ३ रात्रं नसर्फ संख्यापूर्व्यम्-संख्यावाचक शब्दाले हो तो राग्य शब्द नपुंसक होता है। ४ पुण्यादहः (पुण्यसुदिनाम्यामहो नपुंसकत्यंवक्तव्यम् )- पुण्य शब्द के परबत्ती भइ नपुंसक होता है। १३ द्वितीया श्रितादिभिः (द्वितीय भितातीवर वितगतात्यस्तपाताप धित इत्यादि सुबन्त पद के साथ द्वितीयान्त पद का समास होता है और उसे द्वितीया तत्पुरुष कहते हैं। यथा,षष्ठं श्रितःपश्रितः, दुःखमतीतः दुःखातीतः, कृपं पतितः कृपपतितः, गृहं गतः गृह- गतः, तुहिनमत्यस्तः तुहिनात्यस्तः सुखं प्राप्तः सुखप्रातः, सुखमा- पन्नः सुखापन्नः, ग्राम पामी प्रामगामी ( गम्यादीनामुपसंख्यानम् ), अन्नं युभुक्षुः अन्नयुभुचः, वेदं विद्वान् घेदविद्वान् । (क) सट्वा तन कुत्सायाम् ( सट्वा क्षेपे)--निन्दा अर्थ में एक प्रत्यय से यने सुधन्त पद के साथ द्वितीयान्त सटवा शब्द का समास होता है ! यथा; खटयां मारूढः खट्यारूढ़ः । (ख) काला अत्यन्तसंयोगे ( कालाः । अत्यन्तसंयोगे व )- मत्यन्त - चान्येन पर्यः धाग्याथैः, माना मदशी मातृसदशी, पित्रा तृतीयान्त पदफासमासदोता। यथा, एन ऊनः एकोन:, बयाधीनः विचादीनः, धमेण हितः धमरहितः, गव्येण निदाघः, जलेन सिक्तः जलसिकः, अञ्जलिना पेयं और संचतुधा तत्पुरुष कहते हैं यथा; भूताय घलि: भूत- समास। ४१६ मुमम् , मापं य: मासाम्य, मोम्यः दर्पभोग्यः; मुह माम प्यार। मदीया मिभिः (गमनमनिपुर मिनाल)- पूर्ण रणादि मुबन्त पद गाय यात पदफा समास होता और उसे सुनाया तत्पुरुष पारने ही यथा. मासेन पूर्व्यः मास- एर्णः, परं पर पाया पल: यामलद, गुडेन या गुरमियः, मायारेण इलक्षणः (विष्णः । भावारश्लक्षणः, RE: पितृममः। (6) ( पूर्व ..... }-ऊनार्ध मुयन्त पद के साथ म्यः गयंान्यः, मटन विफलः गङ्गविफलः । (ग) तारणयोः (करणे ना बहुलम् )- छत्-प्रत्यय सुषन्त पद फे. साथ कभीर करण में विहित तृतीयान्त या समास दोना है। यथा; त में-व्याघ्रण हतः व्याघ्र- : मदिना पटः भदिदः, ध्यासेन रचितः व्यासरचितः, गनिना मणीनं पाणिनिप्रणीतम्,नारदेन प्रोक्त नारदप्रोक्तम्, न मध्य विजभश्यम्, पुत्रेण देयं पुत्रदेयम् । करण में- मनः नवभिन्नः, सिना नि सिछिन्नम्, अग्निना लिपेयम् शिरसा धाग्यं शिरोधार्यम् । । चतुथी लिहित मुगः (चतुर्थीतदर्थार्थदलिहितमुखारक्षितः । यसमासी विदोग्यलिङ्गता चेति वरय्यम् )-सुबन्त यलि, हित सुन शब्द के साथ चतुर्थ्यन्त पद का समास होता है -- .

४१२ व्याकरण कौमुदी। पलिः, पुत्राय हितं पुत्रहितम, भ्रात्रे सुएं भ्रातृसुखम् । ( क ) अयन च ( चतुर्थी तदर्थार्थ ........)-अर्थ शब्द के साथ चतुर्यन्त पद का समास होता है। समस्त भाग विशेष्य के लिंग को प्राप्त होता है। यथा; द्विजाय अयं द्विजार्थः सूपः, द्विजार्था यवागूः, द्विजार्थ पयः । (ख) विकृतिः प्रकृत्या तादये ( चतुर्थीतदर्थार्थ ......)-ताऱ्या अर्थ में प्रशतिस्थलीय सुयन्त पद के साथ विकृतिस्थलोय चतुर्थ्यन्त पद का समास होता है । यथा, कुण्डलाय हिरण्यं कुण्डलहिरण्यम् , यूपाय दारु यूपदारु-rood for sacrificial post. १६ पचमी भयादिभिः ( पञ्चमी भयेन । भयभीतमोरिति पापम् । अपेतापोढ मुझपतितापत्रस्तरमश:)-भय इत्यादि सुबन्त पर के साथ पञ्चम्यन्त पदका समास होता है उसे पञ्चमो तत्पुरुष पाइने हैं। यथा, व्याघ्रात् भयं ध्यानभयम् , व्याघात् भीतः च्यान. मीतः, व्याघात् भी व्याप्रमी:, घ्याघ्रात् भीति: ज्यामीति, गृहात् निर्गतः गृहनिर्गतः, अधर्मात् जुगुप्सुः अधर्मगुगुप्सुः, सुपात् अपेतः सुखापेतः, यन्धनात् मुक्तः पन्धनमुक्तः, स्थान पतितः रथपतितः, aङ्गात् अपनरन्तः तरकापत्रस्तः, विदेशाम् थागतः विदेशागतः। १. पटो समयेन (पाठी)-समर्थनुपन्त पर के साथ पपरत पर फा समास होता है उसे पठी तत्पुरुष कहते हैं। यागंगायो जलं गंगाजलम, सर्ग: छाया सपच्छाया, भाने: शिणा शिशिना, पायोः पेगः घायुयेगा, जालम्य प्रगाः जलप्रपा माय भोगः मुबमोगः, पयास: पान पयागम.म्याया: दान पन्यापानम, गयो दोहः गांवोह, भाज्ञाया भडः मानामा पायामन्त दशाता, पूर्यग्य उदयः एम्योदया, पृष्टः पात: धि- करणेन)-पूरणार्य पद के साथ षष्यन्त पद वा समास नहीं होता। पाठ्यन्त पद का समास नहीं होता। यथा. पटस्य शौकम्, कोकनदस्य हित्यम् , आकाशस्य नीलिमा, दाक्षाया माधुर्यम् । कहीं कहीं होता है, ता। यथा, तृच-जगत: खटा, सुखस्य दाता, दुःखस्य हता;थक- पना पालका, वृक्षाणां छेदका, शत्रु घातकः। याजक इत्यादि का स होता है; यथा, शूदपाजका, देवपूजक, राजपरिचारः, वेदाध्या. :, सच्चोत्साहक, देवस्नातक, जलरिषेवक, भुवनमा, इविहाता, १६ सक्षमी शौण्डादिभिः (सामी शौरः)-शीण्ड, धूर्त, कितन, प्रवीण, संवीत, पटु, पण्डित, कुशल, चपल, निपुण, पथा, मस्य गौरवम् अर्थगौरवम् , बुद्ध मान्यम् बुद्धिमान्धम् , अस्थि प्रसमास नहीं होता। यया, अपां नृप्तः, फलाना सुहिता, अजस्त्र आशितः। सिद्ध,शुष्क, पक्य इत्यादिशब्द के साथ सप्तम्यन्त पद का समास। पातः, शिरसः छेदः शिरश्छेदः, गवां वधः गोवधः, पितुः गृह पितृगृहम् , राज्ञः भवनं राजभवनम् , मनी: वचनं मनुवचनम् , अर्थस्य नाशः अर्थनाशः, कृपस्य उदवं कृपोदकम् । N. B. न निर्धारणे-निरिण अर्थ में विहित पठी का समास नहीं होता । यथा, मनुष्याणां क्षत्रियः शूरः, गा कृष्णा बहुक्षीरा। २न पूरणार्थः ( पूरणगुणसुहितार्थसदव्ययतव्यसमानाधि. पथा, राज्ञा प्रथमः, पुप्रयोः द्वितीयः, भ्रातृणां तृतीयः, शिष्याणां चतुर्थः, पायाणा पञ्चमः। ३ न गुणवाचिभिः (पूरण )-- गुणवाचक पद के साथ आदर्यम् अर्थकार्यम् । . . ४ मतृप्त्यर्थः (पूरण ......)--तृप्त्यर्थक पद के साथ षष्ठ्यन्त पद । ५न तृजकाभ्यां याजकादिवर्जम् ( तृजकाभ्यां कर्तरि )- व और अक प्रत्यय से बने शब्दों के साथ पय्यन्त पद का समाम नहीं - होता, गुणग्राहकः।

४१५ माकामुर्गा main at I मनमो मकर मारलाना है । या, दाने शीषदः पामगरसाम्प्रे प्रमाण: NEFIT, यो गित पगि, प्रो शर: फ्रांडाशर, wriry निपुण धर्मनिपुणः, भान गुकः मातागुम्का, गोप:यालीपापः। (6):म-मण मग में पृष्य प्रत्यय से यने शन्द के सा माध्यत पर का समासादा पगा, मामे देयं मासदेयं प्राणम्.वरिश परिशोध्य प्रणम् । (1) रामामा-म. प्रत्यय में पने शब्द पं. साथ दिन भारत के भयया यांचा सतम्यन्त पद का समास होता है। यथा, पूयह एतं पूशांतहतम्, अपराहे कृतं प्रप. राहरतम् , ध्यरात्रे एतं पश्यरात्ररतम् , अपररात्रं कृतं अपररात्रनम्। (ग) पुत्साय! कायना (मणोपे -निन्दा भर्य में काम्याचक मुरन्त शरद के साथ सतम्यन्त पद का समास होता है। यथा, तीर्थ फाक र तीर्यकाकः, तीर्थयायसः, सीवादक्षः, यनस्पित इत्यर्थः । १. पूर्धादिरेकदेशिनकवचने (पूपिराधरोनामकाशिनकाधिकरणे)-- पकवचनान्त अषयी के साथ पूर्ण, अपर, अधर और उत्तर फा समाम होता है । यथा, पूर्वे कायस्य पूर्धकाया, कायः, अधरकायः, उत्तरकायः कश्चन नहीं होने से नहीं होता । यथा, पूध्वं क्षात्राणामामन्त्रयस्थ । १८ भद्धं नपुंसम्म्-एकवचनान्त अवयवी के साथ क्लोर. लिङ्ग अर्द्ध शब्द का समास होता है। यथा, अद्ध पिपल्या अर्द्धपिप्पली । अन्य लिङ्ग में नहीं होता; यथा, प्रामस्य भईः। एकवचन नहीं होने से नहीं होता। यथा, भई पिम्पलीनाम् । अपर- मध्य अहः मध्याहः, अपरं अहः अपराहा, सायं अहः सायाह्नः। एकदेशवाचक शब्द के परबत्ती रायि शब्द के उत्तर अन् होता है और दुयियन्यसरराम)-पष्टयन्त अवयवी के साथ द्वितीय, हतीय, चतुर्थ और तुर्य का विकल्प से समास होता है। पथा, द्वितीयं भिक्षायाः द्वितीयमिक्षा, तृतीयभिक्षा, चतुर्थ. भिक्षा, नयेभिक्षा। पक्षान्तर में पष्ठी तत्पुरुष होता है। यधा, हासमास होता है और चतुर्यन्त स्त्रीलिंग पद का पदाय पता है। यथा; अलं जीविकाय अलंञ्जीविकः। २३ अत्यादयः कान्तादो द्वितीयया-कान्त इत्यादि पर्थ में द्वितीयान्त पद के साथ अति इत्यादि का समास होता है मोरोलिड द्वितीयान्त पद का चदार होता है । यथा, मतिकान्तः खयां भतिखट्वः, उत्कान्तो बेला उद्यलः। मेक्षायाः द्वितीयं भिक्षाद्वितीयम् , भिक्षातृतीयम् , भिक्षा- समास। ४१५ १९ कालाः परिमाणिना-परिच्छेत्वाचक पद के साथ काल. पायक पद का समास होता है। यथा: मासो जातस्य मासजातः, वर्षो मृतस्य वर्षमृतः । २० एकदेशवाचिना च--एकदेशवाचक पद के साथ काल- वाचक पद का समास होता है। अदोऽड एकदेशात् ( अडोऽड एतेभ्यः)-एक देशवावक पद के परपत्तों अहन् का अह होता है। या पूर्व अह पाहः, N. B. राघरन् ( अहः सकदेशसंख्यातुपुण्याच गः )--- इसका भा रहता है। यथा; पूर्व रानी पूर्वरानः, मध्यं सत्र मध्यरात्रा, अपर रात्रः अपररात्र २१ विभाषा द्वितीय तृतीय-चतुर्थ-ागि ( द्वितीयतृतीयचतुर्थ- चनुर्थम् , भिक्षातुर्यम्। २२ अल चतुर्थ्या पुच्च-चतुर्थ्यन्त पद के साथ अलं भव्यय ग ४ । ३. भाजीपा (कुतिप्रायः)-ईच अर्थ में गुपत पाके व्याकरण-कौमुदी। २४ अवादयः कुष्टादौ तृतीया-फूट इत्यादि अर्थ में तृतीयान्त पद के साथ अब इत्यादि का समास होता है और स्त्रीलिङ्ग तृतीयान्त पद का पुबराव होता है । यथा, अवकष्टः कोकि- लया भयकोकिला २५ पादयो ग्लानगदी चतुर्या-ग्लान इत्यादि अर्थ में चतु य॑न्त पद के साथ परि इत्यादि का समास होता है और स्त्रीलिङ्ग चतुर्थ्यन्त पद का घद्वाय होता है । यथा, पग्लिानः अध्ययनाय पर्यध्ययनः, पग्लिानः सेवार्य परिसवः। २६ निरादयः कान्तादौ पञ्चम्या-फ्रान्त इत्यादि अर्थ में पर- म्यन्त पद के साथ निर् इत्यादि का समास होता है भीर स्त्रीलिङ्ग पञ्चम्यन्त पद का धदाय होता है । यथा; निष्कान्तः कौशाम्ब्याः निष्कौशाम्यिः, उत्थितो निदायाः उभिद्रः । २७ सामिस्वयमौ केन (स्वयतन)-क्त प्रत्यय से पने सुपन्त पद के साथ सामि और स्वयम् भव्ययों का समाप्त होता है। यथा; सामिकृतम् , सामिघटितम् , यस्तम्, स्ययन्दत्तम् । २८ नम् सुपा ( नम्)-सुयन्त पद के साथ मम् का समास होता है। इसे नम् समास या मत्पुस्प पहते हैं । यथा । ब्राह्मणः भवाह्मणः, न मोघ: अमोघः, न प्रियः भप्रियः, न विशतः अविश्तः, न सिरः भसिद्धः, न तुले असुम्पम्, न दर्शनम् अदर्शनम्, न उपलम्मः भनुपलम्मः । २९ पदाता - कृदन्तभिन्न सुमन्त पा के माप भय्यय का समास होता है । यथा, पहिला, पतिकथा, चन्मुकुलितः। माराम स्यय का समास होना है। यथा; भाग, A , मालोहितः।

- समासा ३१ सती पूजायाम ( कुगति पदयः )-प्रशंसा अर्थ में सुबन्त द के साथ सु और भति अव्यय का समास होता है । यथा; पुरुषः, सुब्राह्मणः, अतिमृदुः, अतिदयालुः । ३२ दुनिन्दायाम् (कुगति प्रादयः)-निन्दा अर्थ में सुबन्त पद साथ दुर् अव्यय का समास होता है । यथा, दुष्कुलम् , है दुनीतिः, दुश्चरितम् । ३३ कुः पापाय ( कुगठि प्रादयः )-कुत्सित अर्थ मे सुयन्त पद के साथ कु अव्यय का समास होता है। यथा कुब्राह्मण, (जिन सुवन्त पदों के परे धातु के उत्तर कृत् प्रत्यय हो उन्हें उपद कहने हैं) का समास होता है। इसको उपपद समास हइने है । यथा, कुम्भकारः, प्रभाकरः, निशाकरः, हितकरः, तिकरः, अग्रसरः, जलचरः, पार्श्वचरर, शिलाशयः, सर. रजम् पङ्कजम् । अण्डजा, जलजा, पतगः, भुजगः। ३५ उपसर्गाच (कुगतिप्रादयः)-धातु के साथ उपसर्ग का -विजयते, विजयः, विजित्य अभि-अभिपिश्चति, अभिषेकः, पिच्यः भा-आरभते, आरम्भः, आरभ्य। २. स्वधा, स्वादा, वपट, चौपट इत्यादि शब्दों और वि डाच प्रत्यय का समास होता है । यथा, ऊरी-ऊरी. रोति, ऊरीकरणम्, ऊरीकृत्य; आविस्-आविष्करोति, आरि- किया, भाविकन्या प्रादुस-प्रादुर्भवति, प्रादुर्भावः, प्रादुर्भूय । F-धीकरोति, स्वीकारः, स्योहत्य, भस्मीभवति, मस्मी- मात्र, मामीभूय डाव--समयाकरोति, समयाकरणम्, सम्या- r, दुःखाकरोति, दुःखाकिया, दुःखात्य। -धातु के साथ ऊरी, उररी, आबिस्, कुपुरुषः, कुसंस्कारः। ३४ पातुभिरुपपदानि ( उपपदमतिङ्-धातु के साथ उपपद स होता।यथा, सम् -- संस्करोति, संस्कार, संस्कृत्य; - अयादि वि डानाव - + ४१८ व्याकरण-कौमुदी। अनुकरणञ्चानिति परम-धातु के साथ अनुकरण शब्दों का समास होता है । यथा, खाट करोति, खाटकरणम्, खात्य । द्राकरोति,द्राङ्क्रिया, द्रात्य । इति शब्द पर होने से नहीं होता । यथा; खाडिति कृत्वा निष्ठोयति, द्वामिति कृत्या पतितः। आदरानादरयोः सदसती-यथाक्रम आदर और अनादर भर्थ में धातु के साथ सत् और असत् शब्द का समास होता है। यथा; सत्करोति, सत्कारः, सत्कृत्य; असत्करोति, असत्त्रिया, असत्कृत्य। अलं भूपणे (भूषणेऽलम् )-भूषण अर्थ में धातु के साथ अलं का समास होता है । यथा भलरोति, भलङ्करम् , अलकत्य। अन्तरपरिमहे-धातु के साथ अन्तर् शब्द का समास होता है । यथा; अन्तर्भवति, अन्तर्भावः, अन्तर्भूय। परिग्रह अर्थ में नहीं होता, यथा, अन्तहत्या गतः, इतं परिगृहा गत इत्यर्थः । पुरोऽध्ययम्-धातु के साथ पुरस् भव्यय का समास होता है। यथा, पुरम्फरोति, पुरस्कारः, पुरस्कृत्य । अस्तं च-धातु के साथ मस्त अव्यय का समास होता है। यथाः अस्तगच्छति, मस्तगतः, मम्तनत्य । भच्छ च बदगत्यय: (भटगत्ययं वदेणु)-यदु और गत्ययं धातु के साथ मच्छ अव्यय का समास होता है। यथा, मध्यपति, मच्छोय, मच्छगच्छति, मछगत्य, भमिमुमित्यर्थः । अन्तधा तिः (विरोइन्तदी-ययधाम भर्थ में धान के साथ तिरच भव्यय का समास होता है। यथा; तिरीमति, तिरो. भायः, तिरोभूय। विभाग कृषा ( विभाषा कृमि)-- पान के साथ मिan होता है। यया, तिरस्य, तिरकृत्या। साशात अभूतानि -ए.धातु के साथ साक्षात मिथ्या, मास होता है। यथा, उरसित्य, उरसि कृत्वा स्वीकृत्ये. र्थ: । मनसि कृत्य, मनसि कृत्या, निश्चित्येत्यर्थः। उपश्लेष में नहीं होता; यथा, उरसिशयित्वा । मध्येपदे निवचने च-कृ धातु के साथ मध्ये पदे और नियनने २६ तत्पुरुषः समानाधिकरणपदः कर्मधारयः (तत्पुरुष समानाधि. कपः कर्मधारयः।--जिस तत्पुरुष समास में समास होने २७विशेष विशेष्येण (विशेषणं विशेष्येण बहुलम्)-विशेष्य पद साध विशेषण पद का समास होता है। यथा, नालं उत्पलं नीलोत्पलम्, नयः पल्लयः नवपल्लघः, मधुर वचनं मधुरयव. म. नवं अन्नं नयासम्, सर्वे लोकाः सर्चलोकाः, विश्वे. भ्यन्त पदों का विकल्प से समास होता है। यथा, मध्ये- , हस्तकल्प, पाणीहत्य, दारफर्म कृत्येत्यर्थः । शले पद समानाधिकरण अर्थात् विशेष्य- विशेषण भार को समास। ४१६ नमस्, प्रादुस्, अर्थे, यशे, अमा, अद्धा, उष्णम्, शीतम, आदम्, विकसने, प्रहसने इत्यादि शब्दों का विकल्प से समास होता है। पथा, साक्षात्कृत्य, साक्षात् कृत्वा: नमस्कृत्य, अमः कृत्या, परोकत्य, वशे कृत्या; मिथ्याकृत्य, मिथ्या कृन्त्रा। अनुपनेप उरसिमनसी ( अनत्याध्यान उसि-मनसो)-कृ धातु साथ उरसि और मनसि सप्तम्यन्त पद का विकल्प से त्विा। मध्ये कृत्या, पदेकृत्य, पदे कृत्वा निवचनेकृत्य. निवचने । उपश्लेप अर्थ में नहीं होता है। यथा, मध्ये शपित्या, त्य हस्ते पाणावुपयमने-विवाह अर्थ में कृ धातु के साथ और पाणी सप्तम्यन्त पद के साथ नित्य समास होता कर्मधारय समास भान हो उसे कर्मधारय कहते हैं ।

गाamari देगः निराशा, कन्या :, Trn द समि- मामा, मर: जनप नगरः मन पुरामपुर महान : सहा. मदान नीर: महागीर: पामः पुष पाग... TR: मेगा TRITIE, जान नया. गि जग्गानिक भय माया, ममी पमाः पर- गम:,मनदा: मप्रदाः। गत पूर्ण मागि' कार्मजायेयह भाय जातपदेशीय)-मंगर ममाग होने में पूर्वाद को (१gran भोका होना) द्राकर है। भा, गुन्दरी मरिना मुशिमला, पाय या कपाशी, ifentोपामारको परामो या पपया मुली भाका मुकेश भायां प्राणी माया ममम । न्ययान का नहीं होता पपा, पामोर मार दामोस्मा। २० केन न पिशिष्ट नाना-न युक क-प्रत्ययान्न पद साय नमिन त प्रत्ययान्त पद का समास होता है। यथा, एनश तम् अत हतारतम्, मुक्तच तत् अमुकच मुकाः भुक्तम् पोतच तत् भगीनच पीतापीतम् क्लिष्टश्च तत् भक्ति पञ्च लियालिटम, पच तत् अपक्यंच पक्कापक्यम् । ममान प्रकृति वाले शादों ही में होता है। सिद्धच अमुक्तञ्च, म्थान में समास नहीं होता। ३९ वणों वर्णन-वर्णयाचक पद के साथ वर्णवाचक पद का समास होता है। यथा, नीलचस लोहिनश्च नीललोहितः लोहिनश्च स पयलश्च लोहितधयला; पीतश्च स धवलश्व पीतधरला ४. पूर्वोत्तरकालयोः समानाधिकरणेन)-पूर्वकाल और उत्तरफाल समझे जाने से के गत पद का समास होता है । यथा, पूर्व स्नातः पश्चा• (पूर्वकालकपबंजरतपुरामनद केजला दोनों में होता है उसे समान धर्म कहते हैं। मान्यप्रयोगे)-समान धर्म का प्रयोग न हो तो व्याघ, सिंह, क्ष, ऋषभ, वृक, वृष, वराह, कुञ्जर, चन्द्र, कमल, एषव्याघ्रः, पुरुषः सिंह य पुरुपसिहा, राजा चन्द्रर जिवन्दः, मुख कमलम् इव मुखकमलम, करः किसलयमित्र किसलयम,अधर: पल्लव इव अधरपटलयः, वदनं सुधाकरव बदनसुधाकरः। उपमान और उपमेय का समान धम्म होतो नहीं होतारायथा, पुरुपो व्यान व शूरः मुर्पकमलमिव सुन्दरमा ४३ घेण्यादयः कृतादिभिरभूततद्भावे ( घेण्यादयः कृतादिभिः)- बनूनद्वार अर्थ में कृत, मित, मत, भूत, उक्त, युनः, समा. पात, समानात, समाख्यात, सम्भावित, संसेवित, अवधारित. माकलिस्त, निराहत, उपकृत, उपास्त, दृष्ट, कलित, दलित, वाहत, विश्त और उदित शब्दों के साथ श्रेणि, पूग, मुकुन्द समासा ४२१ । दनुलिप्तः, स्नातानुलिप्तः, यातायानः, शयितोत्थितः, दसाप- इतम्, भुक्तोद्गीर्णम्। उपमानानि साधर्म्यवचनैः ( उपमानानि सामान्यवचनैः )--उप- मान और उपमेय के समानधर्मवाचक पद के साथ उपमान- वावक पद का उपमान समास होता है । यथा, मन इत्र श्यामः घनश्यामः, अव इव गभीरः अर्णवगभीरः, शैल इव उन्नतः शैलोन्नतः, अनल इव उज्ज्वलः अनलोज्ज्वलः, नयनीमिय कोमलं नवनीतकोमलम् । जिसके साथ उपमा दी जाती है उसे उपमान और जिसके लिये उपमा दी जाती है उसे उपमेय कहते हैं। जो धर्म उपमान और उपमेय ४२ उपमेयानि व्याघ्रादिभिः साधाप्रयोगे ( उपमित व्याघ्रादिभि. दुध, शाल, पल्लव इत्यादि उपमान वायक पदों के साथ मेय का उपमित समास होता है । यया, पुरुषो व्याघ्र प्रय ર ध्याकरण गौमुदी अजयः । राशि, निगम, विषय, निधन, पर, इन्द्र, देव, मुण्ड, मूत. भ्रमण, यक्षग, मध्यापक, पमिपक, प्राह्मण, क्षत्रिय विशिष्ट, पटु, परिन, पुराल, चाल, निपुण और कृपण शर्दी या ममासदता है।गा, श्रणय: शताः श्रेणिकृता- अपूगा: पूगाः फलाः पूगताः, माशय राशयः कृताः राशि- एताः, अभ्रेणयः श्रेयो भूताः श्रेणिभूनाः, अनिपुणाः निपुणाःभूता निपुणभूताः, अकुशलाः कुशलाः भूताः कुशाभूताः। अंपयादिपु व्यर्थयननं पर्तव्यम् -वि प्रत्यय होने से अपने विप का कार्यमगुत्य भी होता है। यथा, श्रेणीतः, पूगीकृतः, रगी. कृतः, अंगीभूतः, निपुगोभूतः, राशीभूतः, कुशोभन: स्थादि । जय पूर्वपद उत्तरपद का पक हो जाय तो उसे रूपक कर्म धारय समास कहते हैं। यथा, देह पर पितरं देवपिज. रम्मानसमे विहंगः मानसविहंगः । द्विगु समास ४४ संख्यापूर्वो द्विगु-जिस कर्मधारय के पूर्व में संस्था. चाचक शब्द हो उसे द्विगु कहते हैं। ४५ तद्धिनार्थोत्तरपदसमाहारेषु ( तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारै च)- सदितार्थ, उत्तरपद पर और समाहार अर्थ में द्विगु समास होता है । यथा, तद्धितार्थ-पञ्चभिगों भिः कोत: पञ्चगुः: उत्तर पद परे-पञ्च हस्तः प्रमाणमस्य पञ्चहस्तप्रमाणः । ४६ अदन्तादी समाहारे (आचरान्तीत्तपशे दिगुः मियामिष्टः)- समाहार द्विगु होने से अकारान्त शब्द के उत्तर ईप होता है। यथा, त्रयाणां लोकानां समाहारः त्रिलोकी, चतुर्णा पदानां समाहारः चतुष्पदी. पञ्चानां नलानां समाहारः पश्चनली, .: शतानां समाहारः सप्तशती। ४५ न भुवनादेः । पात्राचन्तस्य न ) भुश्न इत्यादि के उत्तर नहीं होता। यथा, प्रयाणां भुवनानांसमाहार, त्रिभुरानम् .

समास। - . चतुर्णा युगानां समाहार: चतुर्युगम् , पञ्चानां पात्राणां सम् हारः पञ्चपात्रम्। ४८ मयूरध्यमकादयः ( मयूरध्यमकादयश्च )-मयूग्व्यंसक, छा व्यंसक, यवनमुण्डः , उच्चावचम् , उच्चनीचम् , अकिञ्चन, अकुतोभयः , राजान्तरम् , प्राणान्तरम् , चिन्मात्रम् , अन सपियता, खादनमोदता, अहमहमिका, अहंपूटियका इत्या निपातन से सिद्ध होते हैं। इन्हें मयूरय्यसकादि समाप कहते हैं। यथा मयूगे व्यंसकः मयूरव्यंसफः a cunning rercock, उदक्क अवाक उभावचम् , नास्ति किञ्चन यस्य भकिम्यनः नास्ति कुतोऽपि भयं यस्य अकुतोभयः , भन्योऽधः अर्थान्तरम् , मन्यो देशः देशान्तरम् । इसे नित्यसमास भी कहते है। ४९ माख्यातमाख्यातेन किासातत्ये-निया का सतत अनुष्ठान समझे जाने से भाख्यात पद के साथ भाख्यात का समास होता है। ये पद निपातन से सिद्ध होते है। यधा, अश्नीत पियत इत्येवं सततमभिधीयते पम्यां सा प्रियायो अश्नीतपिरता, पचतमुचना, खादतमोदता, वादनाचामता। X. B. सर्घ पुन्य संख्यास्ययेम्पो रात्रेग्न् ( मदासम्मपदेश- संल्यातपुप्याच्च रात्रेः -मार्य, पुयय, संस्थावाचक और भायय दर परवती रात्रि राम के उत्तर अन् होताधा, सागतिः मात्र, पुण्या रात्रिः पुरयरात्र, दिगम् , विरात्रम् , पररात्रम् । दश. राथम् (संस्थापूर्य राय कीयम् ), निराः । २महोश (बहोहएतेभ्यः)-सर्व, पुप सकसभा और अपय पी मान् शम्द के उार अन् हेता है और भन्छ मा =ोता है। यया, सर्पमा सदः, म, भ्यनु मा - . भाः पादः।

४५ SATTA BREAL: ममा. ममाहारा है मे MITTEE ो अन मी. ५न पुर्णकाम्याम् ( उममेकाम्याम् न)-3 और 2 * ARRIMEही'. TRE गम्यायामामले (गुरुपागाइ याययादेः-- मम्मामा भीरप के उत्तर अन् होता है। ग्या. ममममग पालम, far सम् । राजार समिभ्ययः ( राजाहः सबिमा अन, मान् और मगि उरसाद और इसका रहता है। म. महान गाभाग, महान राजा महाराज, परममइः पामाइ, वन मा उत्ता, मगा राजममः, प्रियः सम् प्रियससः। ७ गोग्नदिता गोस्तद्धितलुमि.)-गो शब्द के उत्तर र होता है। यथा गो गौः गजगवा, पामोपामग, दश मा धन- मस्य देशवधना, पक्षना गय) मनाहारः पवम् । तद्धितार्थ में नहीं होता । यथा; परभिः गोभिः कोत: पशगुः। ८ मुख्यार्धादुरसः ( अग्राख्यायामुरसः - मुन्ध अर्यदायक उरम् शब्द उर होता है। यथा: अपवान! उरः इव रिमन, मुख्योऽध इत्यर्थः। ६ अनोऽश्माय सरसां जातिसंज्ञयो:--जानि और राय में अनस, भामन , अयस् और सरस् के उत्तर ट होता है । यथा; जाति-- उपानसम, अमृताम्मः, कालायसम , मण्डूकरारममा संज्ञा-महानमन पिण्डारमा, लोहितायसम , जलसरसम् । १० ग्रामफाँटाभ्यां तक्ष्णः (ग्रामकोटाभ्यां च तक्ष्णः)-- ग्राम भोर कौट शब्द के परवती तशन के उत्तर ट होता है । यथा, प्रम- सक्षः, साधारग इत्यर्थः कोटतक्षा, स्वतन्त्र इत्यर्थः । भन्यत्र राजतक्षा | समास। 20 ११ अतः शुन:-अति शब्द के परवत्तौ श्वन के उसरट होता यथा, अतिकान्तः ग्वानम् अतिम्वो वराहः, अतिश्वी सेवा । १२ उपमानादप्राणिपु-उपमानवाचक वन के उत्तर ट होता है यथा, भाकर्षः श्वेव आकर्षवः । प्राणो अर्थ में नहीं होता; यथा, बानरः श्वे यानरवा। १३ उत्तर-मृग-पूनापमानेभ्यः सक्थनः ( उत्तरमृगपूर सक्नः )-उत्सर, मृग, पूर्व और उपमानवाचक के परवती सथि शाद के उत्तर ट होता है । यथा, उत्तरसम् , मृगसक्थम् , पूर्वसधम् । उपमान-फलकमिव सन्धि फलक्सक्थन् । १४ नायो दिगोरतद्धिता (नायो द्विगो:-दिगुममासस्थित नौ के उत्तर ट होता है। यथा, दयोर्मायोः समाहारः द्विनावम् , पचनावो धम्मस्व पसनावधनः । तद्धितार्थ में नही होता यथा, पमभिः मौभिः कोतः पनौः । द्विगुभिन्न स्थान में राशो नौः राजनी, नवीना मौः मन- भधि-भई शन्द के परबती मोरे उत्तर ट होता है। पथा, भई" मावःगर्दनावम् । १५ खार्या विभाषा (सार्शः प्राचाम् )-गि समाग होने वा ईशब्द के पहले रहने से सारी बाद उसर विकप सेट होगा। यथा, दे सायौ प्रमाणमय द्विारम् , दिसारि भई" मीः भरतारम् , भदंसारि। १६ विप्रिभ्यामजले:-निगु समास होने पर परवती' दिन उत्सा किप से दहापासी प्रमाणमय दपजलम् , पञलि; यजलम् पनि । मन्त्रसर १७ जनपदा प्रायः ( प्राणो अनपदाल्यापाम् )- रक्षापिशावादि पूया च-रक्षम् ाि इत्यादि पहले सने से याकरण-कौमुदी। वार शाम परबर्गा मान के उपर होता है। यथा, सादार अमा गुममा मास्तिरयः, निममन्यत्र देशमनारक विमाकुमददुभ्याम् (कुमदुम्यामन्यतरस्याम् }-कु और मान शाक परसा होने से विकल में होता है: कुस्मत जमा 'ममः, गुमना; महायग्रा महामा। १८ भक्ष्णोऽयपि (मणोऽदर्शनाम् )-अधि शद के उत्तर र होता है। पाः गवामीत गाः। मंत्र समझे आने से नहीं होना; यथा पालकर भक्षि बालाक्षिा १९ वृद्ध-महाबातम्य उक्ष्णः (अचतुर विचतुर ----पर महत् और आत राम के परवती टक्षन् के उत्तर ट होता है। यथा; वृक्ष टक्षः वृद्धोक्षा, महान उक्षः महोक्षः, जातः उस जातोशः। २० निःश्रेयस-पुरुषायुपे (विमापा सेयासुराच्छायाशाला- निशानाम् )-निःश्रेयस और पुरुषायुध निपातन से सिद्ध होते हैं । यथा; निश्चितं श्रेयाः निःश्रेयसम् , पुण्यस्य भायुः पुरुषायुपम् । २१ विभाषा छायादि नपुंसकम् (विभाषासेना ...)- हाथा, शाला, सेना, सुरा, निशा इत्यादि विकल्प से नपुसक होते हैं । यथा; तर छायम् , तकराया; गोशालम् , गोशाला। २२ नित्यं छाया वाहुल्ये ( छाया बाहुल्ये )-पूर्व पदार्थ की बाहुल्यता में छाया शब्द नित्य नपुंसक होता है । यथा; इथूणां छाया इ3. 'छायम् , शराणा दाया शरच्अयम् । २३ समाप्रभुपाय पूळ (समाराजाऽमनुष्यपूळ )- प्रभु का पर्याय ( अर्थसूचक दूसरा) यद पहले रहने से समा शद निरय नपुंसक होता है । यथा; प्रभुसभम् , ईश्वरसभम् राजसमा इत्यादि में नहीं होता। -- - समास। समा शब्द नित्य नपुंसक होता है। यथा, रक्षासभम् । पिशावस अन्यत्र मनुष्यसभा, देवसभा। अशालाच--शालाभिन्न अर्थवाचक समा शब्द नित्य नपुसक है है। यथा. स्त्रीसभम्, स्रोणां समूह इत्यर्थः; शिशुसभम् , शिशूना समक इत्यर्थः । २४ पुचत् कुक्कुटीप्रभृतीनामण्डादी (कुक्कुटादीनामण्डा दिषु)-अगड इत्यादि शब्द परे रहने से कुक्कुटी इत्यादि का पुवदान होता है। यथा, कुशुध्या अण्ई कुपाटाण्डम् , ईस्या अगई हसाणम् पुरयाः शाषः कुश्शावा, हस्याः शावः हसावः, मृग्याः पर 'मृगपदम् , मृग्याः क्षीरं मृगक्षीरम् । पहुव्रीहि समास । भन्यपदार्थप्रधानो बहुव्रीहिः (शेषो अदुनीति)-जिसमें अन्य पदार्थ प्रधान हो अर्थात् जिन पदों का समास दो उनका अर्थ न समझा जाफर अन्य पदार्थ का अर्थयोध हो तो उसे यहु- प्रीदिसमास कहते है। यथा, भारूदो यानरोऽयम् मारदवानरो पृक्षः, एतं कर्म येन शतकम्र्मा पुरुषः, दतं धनं यस्मै दत्तधनो दरिद्रः, उहतं उदकं पस्मात् उह तोदकः कृषः, दीर्थी पार स्य दीर्घयाहुः पुरुषः, प्राग्लानि कमलानि यस्मिन् प्रपुल- मलं सर। ५. संख्याभिरव्यपासन्नराधिक संख्या (संश्ययाम्पयामग्नाधिक न्याः संख्येये )-संख्यायाचर शद के साथ भव्यय, भारत, तर, अधिक भौर मंख्यागवक का पदुमोदि समास ता। संभ्याया भाहो (बहुमो माये सपना)-संख्या पावक शरद के उत्सर होता है। यथा, दशाना सर्मापे ये है ४२८ युदप्रवृत कंशाकशि, दण्डेश्य दण्श्व प्रहरयारपुर व्याकरण-कौमुदी। उपदशाः, विंशतेरासना आसन्नविंशाः, त्रिशतोऽदूरे प्रदूर- त्रिंशाः, चत्वारिंशतोऽधिका अधिकचत्वारिंशाः, द्वी या प्रयो था द्वित्राः, पञ्च वा पड् वा पञ्चपाः। बहु शब्द के उत्तर नई होता । यथा, यहूनां समीपे उपययः । ५२ दिङ् नामान्यन्तराले-अन्तराल भर्य में दिवावक पूर्व इत्यादि शब्द का यहुप्रीहि समास होता है। यथा, दक्षिणस्याः पूर्वस्याश्च दिशोरन्तरालं दक्षिणपूर्वा,उत्तरस्याः पश्चिमायाश्व दिशोरन्तराल उत्तरपश्विमा। ५३ सहस्तृतोयया ( तेन सहेति तुल्ययोगे)-तृतीयान्त पद के साथ सह शब्द का यहुमीहि समास होता है। सहः सो विभाषा ( वोपसर्जनस्य )-पहुग्रीहि समास में सह का विकल्प से स होता है। यथा, पुत्रेण सह सपुत्रः, सहपुर अनुजेन सह सानुजः, सहानुजः, यान्धयेन सह सपाघर, सहयान्धयः भृरयेन सह सभृत्यः, सहमृत्यः । ५४ रणव्यतिहारे तृतीयासप्तम्या सरूपयोः (ततेने मिति सह)-- परस्पर युद्ध अर्य में समान रूप तृतीयान्त और सप्तम्यरत पर का यहुमोहि समास होता है। दोघोऽन्या पूर्वस्य (अन्येषामपि दृश्यन्ते )-व्यतिधार में समास दोने से पूर्य पद के मस्य स्थर का दीर्घ होता है। पच परात (कर्मम्यतिहारे )-रणव्यविहार में समान होने से पर पद के उत्तर इच् होता है और इसका रहता है। इयत्ययान्त शम्न भव्यय होता है। करे ने सेम उपर्ण का गुण होताई। यथा, केशे शेतु ग्रहीया । दा, गुणामुहि, माया योग के मत से पूर्व पर के मरयर के स्थान में पिता से होता timel, समास। मुष्टामुष्ट्रि, मुष्टीमुष्टिः पाहापाइपि, पाहाहवि: E रहने से नहीं होता; यथा, अस्यति । ५५ स्त्रियाः पदापितपुरकायाः स्त्रियाम् ( स्त्रिया पु नह समानाधिकरणे स्त्रियामपूरणीमियादिषु) पहुयीहि सम लिङ्ग शब्द पर हो तो उसका जवाब होता है। प बुद्धिरस्य स्थिरबुद्धिः, महती मतिरस्य महामतिः । स्य चित्रगतिः, द्वढा भक्तिरस्य दृढभकिः, प्रिय प्रियमार्यः, शीता गोरस्य शीतगुः । विशेष व्यनोवदन्तस्य ( स्त्रिया ......)- में अप-प्रत्ययान्त स्त्रीलिङ्ग शद का वदाव नहीं होता। মাখি মীমা:। म कोपयस्य (न कोपधायाः)-जिस स्त्रीलिश की या भक प्रत्यय का क रहे उसका बद्भाव नहीं होता है। या रसिका भायर्यास्य गसिकामायः, अक प्रत्यय--पाधि पाचिकामार्य: । अन्यत्र होता है। यथा, एका भार्यास्य एकभार- न संज्ञा-पूरण्योः (संशापूरपोश्च )-ज्ञावाचा चाचक का पुवनाव नहीं होता। यथा, संज्ञायायक- दत्ताभाऱ्या, गंगा मावि गंगाभाम्य, पूरणवाचक-द्वित द्वितीशभार्य, पश्चिमी भायास्य पञ्चमीभाय। न जाति स्वाइयोः (स्वाहाश्वेतः । जातेश्च भौर सांगवाचक स्त्रीलिङ्ग शद का पद्भाव नहीं होता। चाचक-माझणी भाशंस्य प्राझणीमार्यः, क्षत्रिय भार- मायः, स्वरालयाचक-मुकेशी भार्यास्य केशोभाट - -- ४३० ध्याकण-कौमुदी। म प्रियाविशरण्यो: (स्त्रिया......हि गम स में गि मनोशा, कल्यागो, गुमना, दुर्भगा, मयिका, सा, कान्ता, शन्दा, ममा, माला, वाममा ( भनि, सनया और दुहिता भी शिलाद गण में पब्दि होता है, परन्नु गतंत्र को सिन प्रयोग मा जाता है, अतएव इमाण में इसको नहीं रणा) इत्यादि और पूग्णायक शाद परे रहने से पूर्व- वी स्त्रीति शमवहार नहीं होता। यया, शोमना निशम्य शोमनाप्रियः, मुलीवना काय मुलीवनासन्तः । २ अ पूरणी प्रमागीभ्याम् ( अप् पूरणी-प्रमाययोः)-पूरणयायक और प्रमाणी शब्द के उत्तर अप होता है और इसका म रहता है। यथा, कल्याणी पशमी यासो रात्रीणां ताः कल्याणी पञ्चमा रात्रयः । मुख्य पूरणी के उत्तर अप होता है. गौण के उत्तर नहीं होता। कल्याणी पञ्चमी गप्रियस्मिन् पक्षे स कल्याण. पञ्चमीका पक्षः। यहां पूरण पाचक शब्द गौण है, इसलिये इसके उत्तर अए नहीं हुआ। असमस्त , दशा में जिस अर्थ का चायक है, समस्त दशा में मो उसी अर्थ का याचक होतो मुख्य, पर असमस्त दशा में जिस अर्थ का याचक है समस्त दशा में उसके भिन्न थर्य का याचक होने से गौण कहते हैं। कल्याणपञ्चमा गत्रयः, यहां पूणघाचक असमस्त और समस्त दोनों दशा में रात्रिवाचक है, इसलिये मुख्य है; पर कल्याण पञ्चमोकः पक्षः, इस स्थान में पूरणवाचक शब्द असमस्त दशा में रात्रियाचक किन्तु समस्त दशा में तवाचक न होकर सद्भिन्नार्थ पक्षवाचक होता है, अतपय यह गौण है।'' न-सु-विभ्युपेभ्यश्चतुरः ( बचतुर विघ्नुर सुचतुर ये, त्रि और उप के परवती चतुर के उत्तर अप होता है। यथा, भविद्यमानानि चत्वार्यस्य अचतुरः, सुचनुरः, विचतुर, त्रिचतुरः, उपचतुरा। ...)-नम्, स. ।

समास नेतुर्नक्षत्रात् (नेतुनक्षन्ने अव वक्तव्यः )-नक्षत्रशचक शब्द के रवती नेतृ के उत्तर अप होता है । यथा, मृगनेत्राः, पुप्पनेनाः त्रियः। माः संज्ञायामः-संज्ञा अर्थ में नाभि के उत्तर भप होता है। प्रधा; ऊर्णनाम:, पद्मनामः। अन्तर्वहि लोम्नः- अन्तर और हिल शब्द के परवर्ती ठोमन् शब्द के उत्तर अप होता है । यथा; भातोमानि यस्य पस्तलोमा, पहिलोमानि यस्य पहिलोमः। मम् दु-मुभ्यः सक्रानो वा (नम् सुभ्यो हलि सम्योरन्यतरस्याम् )- रम्.दुर और सु के परबत्ती सथि के उत्तर विकल्प से अप होता है । यथा, मसक्य: असधिः, दुःसक्यः, दुःस- धिः, सुसक्या, सुसधिः । ३ सध्यक्षिभ्यो : घार (बहुवीही सध्ययोः सामात् प )- स्वाह अर्थ में साथ और अक्षि शब्द के उत्तर प होता है और सका अ रहता है । यथा; दीर्घ सक्थिनी अस्य दीर्घ- सक्थ ( one taring long thighs ) पुरः, वृत्ते सचिनी अस्या पृससी नारी, दी यक्षिणी अस्मिन् दीक्षिपद- नम्, विशाले भक्षिणी अस्याः विशालाक्षी देशी । स्थान समझे जाने से नहीं होता, यथा, दीर्घसकपि शकटम् , स्थूलाक्षिः क्षुदण्डः। असेदाणि-- दा समझे जाने से भंगुली शब्द के उपर पहोता है। यथा पांगुलं दादा दारुमिल स्थान में पशा- गुलिस्तः। निया मृधः वित्रिया ः मूदमा)-दि और विशद के परयती मूर्तन के उत्तर प होता है। पथा दो मुर्भानी પર ध्याकरण कीमुदी। दिसून त्रयो मूर्नानाम्य त्रिमूर्द्धः भन्यत्र नहीं होता । यथा; पश्च मूर्भागोऽस्य पञ्चमू । भा सुभ्यः प्रजाया (निम्याम मेघयो:)-मञ् दुर भोर सुके परयी प्रजा के उत्तर मर होता है । यया; अप्रजाः, दुष्प्रजाः, सुप्रजाः। मन्दारूपाभ्यास मेधायाः (नित्यमसिन् प्रजामेषयोः)-नम् , सु, मन्द मीर अल्प के परबत्ती मंधा शब्द के उत्तर अस होता है। यथा; अमेघाः, दुर्मेघाः, मुमेघाः, मन्दमेधाः, अल्पमेघाः । धम्मदिन केवलात् (धदिनिच केवलात् ) -पर्म के उत्तर भन् होता है । यथा; सुधार्मा, शुभघमा, अजितया । धर्म शब्द के माप दूसरा शब्द मिला हो तो नहीं होता था; पर- मस्वयम्। ५ दक्षिगादीमालम्घयोगे ( दक्षिणेमल्लिब्धयोगे )-व्याध सम्बन्ध समझे जाने से दक्षिण के परबत्ती ईर्म के उत्तर. अन् होता है । यथा, दक्षिणे ईम्म प्रणं यस्य, दक्षिणा मृगः, व्याधेन दक्षिणे पाश्र्वे कृतव्रण इत्यर्थः । ६ प्रसम्भ्या जानुनोः शुः- और सम् मन्यय के परवर्ती जानु का शु होता है । यथा; प्रक्षः, संभुः । मध्वाद्विमापा-ऊध्व शब्द के परवत्तों जानु का विकल से झु. होता है । यथा; अध्यक्षुः, उध्वजानुः । ७ नसोनासिकायाः संज्ञायाम् ( अञ् नासिनयाः संज्ञायो नर्स गरम लात् )-संज्ञा अर्थ में नासिका कोनस होता है । यथा लि नासिका अस्य इणसः, पार्थीव नासिका मत्य यार्डोणस गौरिय नासिका अस्य गोनसः । स्थूल शब्द के उत्तर नहीं दोता; पथा; स्थूला नासिका अस्य स्थूलनासिकः । संज्ञा नही समास। समझे जाने से नहीं होता; यथा, तुङ्गा नासिकास्य तुड़नासिकः पुरुषः। उपसर्गाच-उपसर्ग के पायत्ती नासिका का नस् होता है। यथा प्रणसः, उन्नसः, अपनसः। खरखुराभ्यां नस् च (खुरखरायां वा नस् )-घर और खुर शरद के पावती नासिका का नस और नस् होता है । यथा, खर. पसा, खरणा: खुरणसः, खुरणाः। विप्रादयः (घेरों यक्तव्यः । व्यश्च )---वि उपसर्ग के परवती नामिका का विष, विष और विम् निपातन से सिद्ध होते हैं। • जानिर्मायाया ( जापाया नि) - जाया का जानि होता है। या, युवतिर्जायास्य युयजानिः, मिया जायास्य प्रियजानिः, गुन्दरी जायास्य सुन्दरजानिः । यात्मपतिगुरभिभ्यः (गन्धस्यदुत्पत्तिममुरभिभ्यः)- उत्, सु, पूति और सुरभि के परयी गन्ध शब्द के उत्तर होता है। यथा, उद्गन्धिः, सुगन्धिः, पूतिगन्धिः, सुरभिगन्धिः । दूसरे द्रव्य के गन्ध के सम्बन्ध में नहीं होता । यथा, सुगन्धः पघनः। असमभेग (भपाख्यायाम् )--अपसंयोग ममझे जाने से गन्ध शब्द के उत्तर होता है। पथा पृतगन्धि, दधिधि, सूपगन्धि भोजनम्। उपमानाप-उपमानधायक पर परपती गन्ध शब्द उत्सरहदोता है। यथा. पायेर गन्धोऽस्य पशुगन्धिः, करी. पगन्धिः (घोपदेव के मत से यमप से होता है)। १. पारस पादुपमाबादहमपाः (Re:)- उपमानवाचक पद के पायती पाद का पान होता . पपा, यामम्येय पादारभ्य स्याम्पान् । इम्सिन, पाल, माय, मत्र दधि, मधु, शालि, सपिस् , अनडुह , नौ, निर् और मम् पूर्वक भयारण-कौमुदी कपोत, जान, गण्ड, गण्डोल और हाल रयादि के पपनों होने में महापया, हम्मी पायम्ग हस्लिादः । गममाय (या संभ्यायायक और म पहले पहने से गाद का पान होता है। यया, दिगन्, प्रिपात्, पात्। स्त्रियां कुम्मादेः पा (कुम्मपी)-प्रोक्षिा में कुम्भ मि, मत, गूल, मास, मुग, गुग, गा, गोधा, मृग, farg, अर्ड, राय, शनि, रा प्रमादि के परसः पार का पद होता है। यथा, अम्मादी, एसीपिरो, गिदी, विणी, बाईपदो। "बस एसय -ययस् समझे जाने से मंख्यावाचक और छ पूर्यफ दन्त का दा होता है और इसका दत् रहता है। यथा; द्विदन , चतुर्दन , सुक्ष्न्, सुदती। पयस् नहीं समझे जाने से द्विदन्तः फरी, सुदन्तः मटः। भणन्तशुद्धाशुभ्रवराहेभ्या-मन, मत, शुद्ध, शुम्र, वृष और घराक्ष के पश्यत्ती दन्त का विकल्प से दत होता है। यथा; अग्रदम् , अप्रदन्तः । सुहृदुई दो मित्रामित्रयो:-मित्र और ममित्र अर्थ में सुहृद् और दुद् निपातन से सिद्ध होते हैं। यथा; शोभनं हृदयमस्य सहर मिग्रम् , दुष्ट हृदयमस्य दुई अमित्रः । १२ उरः प्रभृतिभ्यः कर-उरस् , उपान, पुमस् , पयस्। अर्थ के उत्तर का होता है और इसका क रहता है। यथा; ब्यूटमुरोऽस्य ध्यूढोरस्कः, उपानभ्यां सह सोपानक, भाषितः पुमाननेन भापित स्कः, न विद्यते अर्थोऽस्मिन् निरर्थकम् , अनर्थकम् ( अर्थानम)। इनन्तात् प्रियाम् ( इनः स्त्रियाम )-स्त्रीलिङ्ग में इन् मागान्त समासा शद * उत्तर फप होता है। यथा, यहयोऽस्यो पनिनः बहु- पनिका नगरी, यहयोऽस्यां वाग्मिनः यहुयाग्मिका समा। 'दम्तनदीभ्याश ( नत)-फारान्त मोर नदीसंबक शब्द के उत्तर का होता है। यथा; सन्त-पकपितृका, समानु, मृतमर्स फा; नगर-मृतपत्लोकः, पहुकुमारीकः । शेगादिभाषा-पूज्योंक्त भिन्न के उत्तर विकल्प से का होना । यथा; सम्पयशस्कः, सम्धयशाः, समानवयस्कः, ममान. पया मुशिशिरस्कः, मुडिशियः, भजितन, मजित. पनः । नेपतुनः (ईयसश्य)-यमुन् प्रत्ययान्त राम्रो उत्तानो होता । पथा पशुपान् । प्रेयसी । मप्रशंसायो मतपदिने मातुः)- अर्थ में मारे उत्तर रमीला बा गुभाता, समता, गाrar NEIR भूभ्रम, ANI म माहोतो यार नाहीतयो मांगे)-17 में मानी सोला। पानी Tara नमो बने मे बरगम्भः । १३ गुमाताश्य: । गुगतमुपदिशारिदमनुग्नी पासपोरपदाः)-" में Reful गा। . मुलभnिs.. MS: पुष । rern-मो. समाMR TRAFI पग. ETKARोता। पाशा पनुः पाप पाया। R-मर्ष में रिगं होगा ता. अपनापनु पुरया, पुष्पः।

६ ध्याकरण-कौमुदी। द्वन्द्व समास उभयप्रधानो द्वन्दः (चा द्वन्द:-जिस समास में पूज्यपद और उत्तरपद दोना-प्रधान हों उसे द्वन्द्व समाप्त कहते हैं। ५६ परलिङ्ग द्वन्द्व (परवति' द्वन्द्वतत्पुरुषयोः)-बन्द समास में समस्त भाग परपद के लिङ्ग को प्राप्त होता है। ६. इतरेतरयोगे-परस्पर योग समझे जाने से द्वन्द्वसमास होता है । यथा; हरिश्च हरश्च हरिहरी, रामश्व लक्ष्मणश्व राम. लक्ष्मणौ,भीमश्च मर्जुनश्यभीमार्जुनी, घयश्च खदिरश्च पला. पाश्च धवखदिरपलाशाः; फन्दश्च मूलच फल कन्दमूलफ- लानि, शरदश्च स्पर्शश्च रूपञ्च रसश्य गन्धश्च शब्दरूप. रसगन्धाः । हरिहरी, यहाँ हरि और हर का परस्पर योग समझा जाता है, धवलदिरपलाशाः, यहाँ घर, सदिर मौर पलाश का परस्पर योग समझा जाता है। (क ) ऋदन्तादृदन्ते डा विद्यागोत्रसम्बन्ध ( भान तो ब)- दिया और गोत्र या हो तथा प्रकारान्त शम्न के पर अकारान्त शब्द हो तो पूयसी शब्द के उत्तर डा होता है, और इसका आ रहता है। यथा; विद्यासम्बन्ध-होता य पीता च होतापोतारी, मेष्टा च उद्दाता य नेटोद्गातारी; गोत्रसम्बन्ध-- माता च पिता च मातापितरौ, याना घननाना च यातानना- पुर(सोऽन्यतरस्याम् )-पुत्र शम्द पर. रहने से भी प्रा का दा होता है। यथा; पिता पुत्रश्च पितापुत्री, माता व पुत्रश्य मातापुत्री। नामिना पूात् (देवनाद)-देवतायाधी पोका ममाम दो तो पायपद के परे डा होता है। पथा, दश्य १६० बदारी।

समासा पञ्च इन्द्रायणी, मिश्च परुणश्च मित्रावरुणी, सूर्यच चन्द्रमाश्च सूर्याचन्द्रमसौ। न बापजापत्यादेः-ब्रह्मप्रजापति इत्यादि के उत्तर दा नहीं होता । यथा, ब्रह्मा च प्रजापति ब्रह्मप्रजापती, अग्निश्च वायुश्च भग्निायू, वायुश्च अग्निधास्वनी। (स) ईदग्ने सोमवरणयोः-सीम और चरण शब्द परे रहने से अग्नि शब्द के उत्तर ईत् होता है और इसका रहता है। यया, अग्निश सोमश्च अग्नीपोमी, अग्निश्च वरुण अग्नी. चरणो। (ग) वो पावा- पूर्ववत्ती दिए को चाया होता है । यथा, पौध भूमिश्च पायाभूपी, धोध क्षमा च चायाक्षमे। खित व विशम् (दिवमय पृथिव्याम् ।-पृधियी शरद पर दो तो दिए का चाया भोर दिवस होता है । यथा, पौष पृथिवी aarयाषिध्यो, दियापियो। (4) मातापितरी (मातरपितराबुदोवाम् )-निपातन से सिद्ध होता था, माता पिता व मातापित। (च) दम्पती सम्पतीया (आयाशदस्य जम्मातादम्भावध पानिपात्यते)- जाया और पति राम्दी का समास होने से विकल्प से दम्पती और जम्पती होता है। यधा, जापा पतिध जापानी, दम्पती, जम्पती। ७ माहारेक-दो या अधिक पदार्थों का Rमादार समझा जाय तो दग्द समास होता है। (6) प्रगतरसेनामा लय प्रणितमेगाहानाम ) : समास में प्राण्यङ्ग, मुक और सेना वाचक समा समा. हार होता है। यथा, प्राण्या-पाणीच पाशेषतयो समाह पाणिपाम ऐसे ही करी चरणों व करपरणम्, दन्ता ८३८ व्याकरण-कौमुदी। - . । ओष्ठौ च दन्तोष्टम्, कर्णी च नासिका च कर्णनासिकम् घों च ललाटश्च भू ललाटम् , पृष्ठच उदरश पृष्ठोदरम् ; सूर्य:- पणयच मृदङ्गश पणयमृदगम्, शङ्खश्च दुन्दुभिश्च शयदुन्दुभि, भेरी च पटहश्य भेरीपटहम् अपभश्च गान्धारश्व ऋषमगान्धा- रम्; धैवतश्व पञ्चमश्च धैवतपयमम्, पजश्व मध्यमश्व पड्न. मध्यमम; सेनाङ्ग-रथिकाश्च अश्वारोहाश्च रथिकाश्यारोहम्, शाक्तिकाश्च याप्टीकाश्च शाक्तीकयाटीकम् , पाशवश्व फरयालाश्च परशुफरवालम्, धनूपि च शराश्च धनुःशरम् , शराश्च तूणीराश्च शरतूणीरम् । सेनालयाची पदों के केवल यहुपयन ही में समाहार होता है । यथा, शरश्च तूणीरश्च शरतूणीरो, शक्तिश्य परशुश्च करया. लश्य शक्तिपरशुकग्वालाः। (ख) नदीवाचिनलिङ्गभेदे (विशिलिगो नीदेशोऽध्यमाः )-लिङ्ग में भेद हो तो नदीयाचक पर्दो का समाहार होता है । यधा, गलाच शोणश्च तयोः समाहारः गाशोणम् , उम्पश्य रायती च उध्येरात, ग्रहापुत्रश्य चन्द्रमागा य ग्रहपुत्रः यन्त्रमागम् । लिङ्ग भेद न हो तो नहीं होता; यथा, गहाय यमुना चमहायमुने, सरस्पती घ दशद्धती य सम्यतीशदस्यो। (१) देशवाविनाम (तशि..... )-लिङ्गभेर हो तो देशपायी पदों का समाहार होता है । पथा,"कुरपश्य कुत्रा फुकुरक्षेत्रम्, पुरषर मार कुस्मालम् , मारा: पाटलिपुत्रश्न मलाटलिपुरम् । मिहत होती होता यापा, महास्य वयाश्य मा.विदवाश्य कानिहाय विहमति प्रामा पोका माहार नही होता या नावाश्व शाक्तिी याम्यशालकियो । (५) ग परामिबिना बहुरो (प्राना fire ४३६ . गणधान्यध्यजनपशुशकुन्यक्षवडवपूर्वापारोत्तरागाम् )-पशुचार निवाचक और क्षुद्रजन्तुवाचक पहुवचनान्त पदों । रूप से समाहार होता है। यथा पशुवाचक- गावश्च मर्मा तेषां समाहार: गोमहिपम् , गोमहिपाः; काश्च कुरङ्गाः रङ्गम्, वृकुरङ्गा; गोमायवश्व गईभाश्च गोमायुगईभम युगभाः शकुनिवाचक-हंसाश्व सारसाश्च हंससारसम रसाः; काश्व चक्रवाकाश्च धकचक्रवाकम्, चकचक = कोकिलाश्च मयूराश्च कोकिलमयूग्म्, फोफिलमयूर्गः; बाचक- दंशाश्च मशकाश्च दंशमशकम् , दंशमशकाः; न मक्षिकाश्च यूकमक्षिका, यूकमक्षिकाः; मत्कुणाश्व काश्च मत्कुणपिपीलिकम् , मत्कुणपिपीलिकाः । ) फरतृणतत्वाचकानाच (विभाषा वृक्षमृग ...)-फल, तृण व्याची बहुवचनान्त शब्दों का विकल्प से समाहार यथा फरवाचक-यदराणि च प्रामलकानि च पदरा- पदरामलकानि; खजूगणि व नारिफेलानि च खजू: म्, खजूरनारिकेलानि:मीहयश्च यवाश्च मीहिययम्, :: मुद्गाश्य मापाश्व मुद्गमापम्, मुद्गमायाः तृणवाचक- काशाश्व फुशकाशम्, कुशकाशाः; तरुवाचरु- च न्यग्रोधाश्च अश्वत्यन्यग्रोधम्, अश्वत्थन्यग्रोधाः। नित्यं नित्यविरोधिनाम् ( येषाच विरोधः शाशतिका)-जिन परस्पर नित्य विरोध हो उनके पाचक यहुवचन त्य समाहार होता है । यथा; महयश्व मकुळाश्व र महिनकुलम्, काकाश्व उल्काश्य फाकोटकम् , मूपिकाश्च मार्जारमूपिकम् । वाग्वप्रमतौनाञ्च ( गवावप्रमृतीनि २)-याश्य इत्यादि नाहार होता है । यथा; गावश्च प्रश्वाश्च तेषां ४४० व्याकरण-कौमुदी। समाहारः गयाश्यम् , अजाश्च अविकाश्च अजाविकम्, पुपाश्च पीत्राश्च पुत्रपौत्रम्, गायिकम्, गडकम्, अजैडकम्, कुजबा- मनम् , फुञ्जकिगतम्, श्यपचचण्डालम्, स्त्रीकुमारम्, दासी- माणवयम्. शाटीपटोरम्. शाटोप्रच्छदम् , शार्टीपट्टिकम् , उष्ट्रस्वरम्, उष्ट्रशशम्, मूत्रशत् , मूत्रपुरीयम् , यहम्मेदः, मांस. शोणितम्, दर्भशरम्, दर्भपूतीकम्, अन्जु नशिरोपम्, अर्जुन. पुरुषम् तृणोपलम् दासीदासम् कुटीकुटम्,भागवती मागवतम्। (झ) विभाषा पूर्वापरादीनाम् ( विभाषा वृक्षमृग ... )-पूर्घ और अपर इत्यादि का विकल्प से समाहार होता है । यथा; पूयंच अपरंच पूर्खापरम्, पूर्खापरे; अधरंच उत्तरंच अधरोत्त- रम्, अधरोसरे; दधि च घृतंच दधिधृतम् , दधिधृते । (८) विरुद्धानामविशेषणानाञ्च (विप्रतिषिद्ध मानाधिकरणवाचि)- परस्पर विरुद्ध पदार्थों में विकल्प से समाहर होता है । यथा; शीतंच उप्ण च शीतोष्णम्, शीतोष्णे सुखंच दुःखंच सुखदुःखम् , सुखदुःखे, आलोकश्च अन्धकारश्च मालोकान्ध. कारम्, भालोकान्धकारी। विशेषण होने से नहीं होता । यथा; शीतोष्ण पयसी। (3) दाणामनिरवसिताना नित्यम् (शूदानामनिरवसितानाम् )- मृदयाचक पदों का नित्य समाहार होता है। यथा, मापिताश्य ते समाहारः गोपनापितम्, कर्मकाराश्य कुम्भ काराश्च फर्मकारकुम्भकारम् , तालिकाश्य तन्नुयायाण ताम्यूलिफतरतुयायम् । निरयसित (से मुक्त पात्र सरकारेगा। गुयात ते निरवरिताः शूद्रों का मही होता; पया, यासाश्य मृताश्य धपालमृताः (न दधियः प्रकृतीनाम् (न दधिरप आदीनि)- पिपस् इत्यादि में समाहार नहीं होता यावधिपती, सनिमधुनी । गोपाल समासा ४४ .... शुक्लकृष्णो, दीक्षातपसी, उलूखलमूसले, मधुसर्पिपी, ब्रह्मप्रजा. पती, शिववैश्रवणों, स्कन्दविशाखौ, परियाटकौशिकी, प्रयग्यो. पसदी, महिपो, श्रद्धातपसी, मेधातपती, अध्ययनतपसी, भाययसाने, श्रद्धामेधे, ऋकसामे, पाड्मनसे। N. B. अश्यवर्गदपहान्तात् समाहारे (इन्दाचुदपदान्तात् समाहार)-समाहार दन्द्र में चार्गान्त, पंचगन्स, पकारान्त और इकारान्त शब्दों के परे अ होता । यया, पाक्त्यचम् , श्रीघरम् , शमी- स्परम् , सम्पद्विपदम् , वाक्त्वियम् , वाग्वित्रुषम् , एनोपानहम, धेनुगोदु- हम् । समाहार नहीं होने से नहीं होता । यया, श्रीनजी, प्राचारदी। २ नित्यं स्त्रीपुसादयः ( अचतुरविचनुर . समास में स्त्री सी इत्यादि निपातन से सिर होते हैं। यथा, स्त्री व पुमाश्च स्त्रीपुसी, पाच मनप्र वामनसे, मना दिवा च मातदिनम्, रायो वदिशा प रानिन्दिवम् , मदनि पदिश च महादिकम् , हय रात्रिय अहोरात्रः, धम्बनदुहौ, भ्रि वम् , दारगवम् , उर्वकोषम् , परप्ट वम्, ऋग्यजपम् , सरजगन् , नि: यमम् , पुवायुपम् , जानोशा, महेश, सोशः, उपशुनम् , गोष्ठता, अपुर, मुचनुर, वितुरः। ६२ सरूपणानेम्शेष एविभत्री-एकविमति में जितने एक से रूप होते है उनमें से एक ही (भयशिट) रह जाता है, इसको एकशेष इन्द्र पहने है। दो पदों का एक होने से भरशिष्ट पद द्विवचनान्त होता है भोर भनेक पदों का एकदोष होने से भयशिए पर पहुययनान्त होता है। यथा, तश्य सध स, तयश्च तमश्च तपश्च तरयः, फल फलेच पले, पलंग कलेच फलंच फलानि (0) पुमान् रिश्रया-श्री मार पुरप के साथ समास होने र पुरुषाची पर अपशिष्ट रह जाता है। यथा, प्रायन सपी ग्राह्मणों, कुपाटश्व कुषबुटी पदुमकुटी। परिमिय इत्यादिमें समाहार नहीं होता। ययावधिपती, सरिमधुनी -पूर्य " ("पिपयःप्रमृतीनाम् (नधि भादीनि)-रचित ध्याकरण-कौमुदी। समाहारः गयाश्यम् , अजाश्च अविकाश्व अजाविकम, पुत्राश्च पौत्राश्च पुत्रपौत्रम्, गवाविफम्, गवैडकम्, अजेंडकम्, कुञ्जना मनम, कुजकिरातम्, श्यपचचण्डालम्, स्त्रीकुमारम्, दासी- माणप्रकम्. शाटीपटीरम्. शाटीप्रच्छदम् , शारीपट्टिकम् , राष्ट्रस्वरम्, उष्ट्रशशम् मूत्रशत् , मुत्रपुरीपम् , यरन्मेवा, मांस- शोणितम्, दर्भशरम्, दर्भपूतीकम्, अनुनशिरोपम्, अर्जुन पुरुषम् तृणोपलम्,दासीदासम् ,कुटीकुटम्,भागवती भागवतम्। (# ) विभाषा वापरादीनाम् ( विभाषा वृक्षमग ... और अपर इत्यादि का विकल्प से समाहार होता है । यथा; पूष्यंच अपरंच पू परम्, पूर्वापर अधरंच उत्तरंच अधरोत्त- रम्, अघरोत्सरे; दधि च घृतंच दधिकृतम् , दधिघृते। (८) विरुद्धानामविशेषणानाञ्च (विप्रतिषिद्ध थानाधिकरणवाधि)- परस्पर विरुद्ध पदाथों में विकल्प से समाहार होता है। यथा शीतंच उणच शीतोष्णम्, शीतोरणे, सुखंच दुःलय सुखदुःखम् , सुखदुःस्त्रे, आलोकश्च अन्धकारश्य मालोफान्ध. फारम्, भालोकान्धकारी । विशेषण होने से नहीं होता। यथा; शीतोष्ण पयसी। (3) शाणामनिरसिताना नित्यम् (शूदाणामनिरवसितानाम् )-- शूदयाचक पदों का नित्य समाहार होता है। यथा, गोपाश्च नापिताश्य ते समाहार: गोपमापितम्, कर्मकारय कुम्भ फाराश्य फर्मकारकुम्भकारम् , ताम्यूलिकाय तन्तुपायाश्य तालिकतन्वायम् । निरयलित गुणक पाकरेगा। गति से निरवगिताः ) शवों का नहीं होता; यथा, अण्डामा मृगाश्च चण्डालमृतपाः।

समासा ४४९ शुक्लकृष्णी, दीक्षातपसी, उलूखलमूसले, मधुसर्पिषी, प्रहप्रजा. पती, शिववैश्रवणो, स्कन्दविशाखौ, परिवाट्फोशिकी, प्रयग्यो- यसदी, इमर्दिपो, श्रद्धातपसी, मेघातपत्ती, अध्ययनतपसी, माद्ययसाने, श्रद्धामेधे, ऋक्सामे, याड्मनसे। N. B. अश्यवर्गदपहान्तात् समाहारे (इन्द्वाच्युदपहान्तात् समाहार)-समाहार दन्द्र में चवन्त, घरान्त, पकारान्त और हवारान्त शब्दों के परे अ होता है । यथा, वाक्स्वचम् , धीरजम् , शमी- स्पदम् , सम्पद्विपदम् , वाल्वियम् , पाविषम् , एग्रोपानहम , धेनुगोदु. हम् । समाहार नहीं होने से नहीं होता । यथा, प्रौनजी, प्राचारदी। २ नित्यं स्त्रीसादयः ( अचतुरवियतुर . उमास में स्त्री सौदस्यादि निपातन से सिद्ध होते हैं। यथा, स्त्री पुनश्च स्त्रीपुसी, वाक् च मन वाल्मनसे, नगा दिशप नादिवम्, रायो च दिवा व रानिन्दियम् , मदनि वदिश च महदिसम्, हय रात्रिय भदोगमः, धन्वन हो, ध्रुिवम् , दारगवम् , कर्पष्टीयम् , पाठीवन, गयजुपम् , सरजगम् , निः पराम् , पागम् , प्रतीक्षा, महापा पुसोक्षः, उपशुनम् , मोटरवा, मधुर, मुचनुरः, विश्नुस । ६२ सस्पाणामेोप एकविभत्री-एक विभक्ति में जितने एक से रूप होते है उनमें से एक ही (अपशिष्ट) रह जाता है, इसको एकशेष इन्द्र पहते हैं। दो पदों का एकोहोने से माशिए पद द्विवचनान्त होता है भौर भनेक पदों का एकशेष होने से अवशिष्ट पद पहुषयनान्त होता है। पथा, तश्य लक्ष्य रु, तरुश्व तपश्च तयश्च तरयः, फल फलंच पले, पलंय कलंगफलंच फलानि। (.) पुमान स्त्रिया-त्री मार पुरप साप समास दोने र पुरपराधी पर भयशिष्ट रह जाता है। पथा, प्राममा सनीय ग्राहणी, कुपाटश्य कुपकुटी व पुषकुरी। पदिमित्र .

व्याकरण-कौमुदी। जातीय स्त्री और पुरुष का समाप्त हो तो ऐसा नहीं होता यथा, इंसश्य सारसीच तसारस्यो। (स) म यतिसंज्ञानाम् - -विशेष व्यक्ति-योधक पदों का एक शेष समास नहीं होता । यथा. इन्द्रश्य इन्द्राणी व इन्द्रन्द्राण्य भयश्च भयानी च भवमयान्यो। (ग) भ्रातृ-पुत्री स्वर-दुहितृभ्याम्-स्यम के साथ भ्रात औ दुहित के साथ पुत्र का समास होने पर यथाक्रम भ्रातृ भी पुत्र अवशिष्ट रहता है। यया, भ्राता च स्वसा व म्रात पुत्रश्व दुहिता व पुत्री। (घ ) विभाषा पिता माया-मातृ के साथ समास होने प= विकल्प से पितृ शब्द अवशिष्ट रहता है। यथा, माता च पित च पितरो, मातापितरौ। (च) श्वशुरः ग्वधू वा--श्वश्रू के साथ समास होने पर विकल्प से श्वशुर शब्द भांशष्ट रहता है। यथा, श्वश्रूश्च श्वशुरध श्वशुरो, श्यश्रूश्वशुरौ। (छ) नपुसकमनपुंसकनकवचनं वा ( नसकमन धनकवचनमन्य- तरस्याम् )-नपुंसक भिन्न शब्द के साथ नपुंसफ शम्द समास होने पर नपुसक शब्द अपशिष्ट रहता है मौर घि से एकयवन होता है । यथा, शुक्लश्च शुक्ला च शुरुच शुत्र शुकानि । नपुसक शब्द के साथ समांस होने से पफय नहीं होता । यथा, शुक्लच शुक्लच शुक् च शुलानि । . N. B. द्वन्द समास में किस पद को कहाँ रखना चाहिये ! निमित्त निम्नलिखित नियमों पर ध्यान देना चाहिये। (१) अल्पत्थर द्वन्द्व (अल्पाच तरम् )-द्वन्द समाप्त थे। पर में कम स्तर हो ट पहले रखना चाहिषास्या, मालामालगगर .

समासा ४४३ - गहन्दुभी, भ्रातृभगिन्यो, गोमहिषी, शमशकी, हससारसी, काक- किली, अम्लमधुरी, तिक्तपायो। (२) स्वरायदन्तं साम्ये (मजायदन्तम् )-पदि समान सर तो स्वरादि अकारान्त पद पाले रखा जाता है। यया, अश्वगजी, 'म्लनिकी, अननपवनी, भन्युतमहेशी, अचासमुद्री, इन्द्रदही, ईण्मी, खरी, ऊध्वनिम्ने । (२) दुदन्तञ्च-यदि समान हर हो तो इकारान्त और आकारान्त को पहले रखना चाहिये । पया, हरिहरी, गवियुधी, पशुको, मृदी। (४) अभ्यहितञ्च-अभ्यहित (पूजित) वाचो पद को पहले रमाना यि । यथा, मातापिती, सापसयाकी। (५) लघुवर्णश (लपक्षरं पूर्णम् ) सा वर्णयुक्त पद को पदप 1 चाहिये । यथा, इराकशम, नलनीकी, बलय यूरो। (६) भ्राता च ज्यायान् (मातुयायसः)-2 प्रादायी १६ पहले रखा जाता है।पा, दुधिररानो, भयाणा, बलराणी। (७) प्रातुनक्षत्राणामानुपूर्येण ( अनुनक्षत्राणां ममासराणा मानुपूर्येण )- और नक्षत्रवाणी पर पौरिप्यं नियम के अगर रखे जनपथ, हेमन्तशिशिरी, शिगिरवमरती, गिनीभरण्य । (८) पर्णानाञ्च (वर्णानामानुपयेण)- वार को भानुपरयं प्रम मे रगना सरिये । 1. मानवाया। (६) मनियमो परमादी ( धार्मादिनियमः)-धर्म : भोग में कोई नियम नहीं है। यय, धम्म धम्म काममा कम दामा, अर्थशादी दरकार सपनी, माम; पन, भन्ता गुणा, दिए। अन्टु समास। तरदे- समास होने पर हो रही यंती व्याकरण-कौमुदी। विभक्ति का लोप नहीं होता; उसे अलुक् समास कहते हैं ६४ पञ्चम्याः स्तोकान्तिकरार्थच्छे भ्यः (पंचम्या स्तोकादिभ्यः) म्तोकार्थ, अन्तिकार्थ, दूरार्थ और कृच्छ शब्द को परय पंची विभकि का लोप नहीं होता। यथा, स्तोकान्मुख अल्पान्मुक्तः, अन्तिकादागतः, अन्तिकादागतः, समीपादागतः, समीपादागतः, दूरादागत विप्रकृष्टादागतः, कच्छान्मुक्तः । ६५ भोजः सहोऽम्भस्तमसस्तृतीयायाः ( ओजःसहोऽम्भातमसस्ट यायाः अजम उपसंख्यानम् )- ओजस् , सहस् , मम्भस् , तम और अंजस की परवतः तृतीया विभक्ति का लोप नहीं होत यथा, मोजसाकृतम, सहसाकृतम्, गम्भसारतम्, तमसा- तम्, अंजसाकृतम्। (क) सोऽनुजे (सुसानुजो जनुपान्धो विकृताक्ष इति र)-मन शब्द परे हो तो पुमस् की परयी तृतीया विभक्ति का सो नहीं होता। यथा, पुंसानुजः। (स) जगुराऽन्ये (सानुमो...)-मन्ध शब्द पक्षी जनुस् की परपत्तों तृतीया विभक्ति का लोप नहीं होता यथा, जनुपान्धः। (ग) भारमनः पुणे (भामना पण इति वक्तव्यम्)-पूर पाया पर पर हो तो भारमन् की पावती तृतीता निर्मा- का लोप नहीं होता। यथा, भारमना पंचमः, मारममायामः । ६. वैयाकरणात्याया अभ्या:-व्याकरण की सा राम जाए तो भागमन की पत्नी मनुषों विमति का नई होता । यथा, मारमनेपदम्, मारमनभाया। (5) पच (नाम्य 4 --पर शपउन int राममाशा सन्नात् माय: मंडपम्-शाम मेहर ताया, परगद, पर समासा और अफारान्त शब्द की परवर्ती सप्तमी विभकि का लोप नहीं होता । यथा; युधिष्ठिरः, त्वचितारः, अरण्येतिलकाः, तनेकिंशुकाः, कूपेपिशाचकाः । (क) अन्तमध्याभ्यां गुरी (मध्यात् गुरौ । अन्ताच)-गुरु शब्द परे तो तो अन्त और मध्य की परवर्ती सप्तमी विभकि का लोप नही होता । यथा; अन्तगुरुः, मध्ये गुरुः । (स) अमू मस्तकात् स्वाहादकामे-स्वावाचक शब्द की पर- पत्ती सप्तमी विभकि का लोप नहीं होता । यथा; कण्ठेकाला, रसिलोमा, शिरसिशिख. । काम शब्द पर हो तो विभक्ति का लोप होता है; यथा; मुखकामः । मूर्दन और मस्तक शब्द के परे की विभक्ति का लोप होता है । यथा; मूर्ख शिखः, मस्तक- शिखः । (ग) विभाषा बन्धे (बन्धं च विभाषा)-यन्ध शब्द पर होने से विकल्प से लोप होता है । यथा; इस्तेयन्धा, हस्तबन्धः पदेवन्धः, पदयन्धः। (घ) सत्पुरुषे कृति बहुलम् --तत्पुरुष समास में कृत् प्रत्यय से बना हुमा पद परे हो तो सप्तमी विभक्ति के लोप का कोई नियम नहीं है अर्थात् कहीं लोप नहीं होता, कही होता है और कहीं विकल्प से होता है। यथा; अलुक्-अन्तेयासी, स्तन्ये. रमः, कर्णेजपः, पङ्करहः, मनसिशयः, प्राषिजः, शरदिजः प्राद्धरत्कालदिवा जे:) । लुक् कुरुवरः, स्थण्डिलशाया, फूटस्था:, हस्थः । विकल्प से-सरसिजम्, सरोजमः मनसिजः, मनोजः; मेयाप्तः, प्रामवासः; ग्रामवासी, ग्रामवासी। पात्रेसमितादयः कुत्सायाम् { पात्रेसमितादयश)-कुत्ता अर्थ में समित इत्यादि की सप्तमी विभक्ति का लोप नहीं होता। या, पाप्रेसमिता: (भोजनकाले पात्रे एव सङ्गता, नतु फार्य- ध्याकरण-कौमुदी। काले इत्ययः ) गेहेशरः (गेहे एक शरः, मतु अन्यत्र इत्यर्थः पायगुलाः, गेहेनहीं, गेहेश्वणी, गेहविजिती, गेहेदृप्तः, गे धृष्टः, गर्मेतृप्तः, गोध्यारः, गोष्टः गोष्ठेपण्डिनः,गोष्ठेगल इत्यादि। ६८ पशा आरोगे-भर्सना मर्य में पष्ठी विमति का लो नहीं होता। यथा; चौरस्या फुलम्, दासस्य तनयः। (क) पुत्र विमाषा (पुत्रेऽन्यतरस्यान्)-भर्सना समझे जाने भो पुत्र शब्द पर रहने से पष्ठी विमक्ति का विकल्प से लो नहीं होता । ययाः, दास्या:पुत्रः, दासीपुत्रः: वृषल्याः पुत्र वृपलीपुत्रः । (स) यादिपश्यया युक्तिदण्डहरेषु-युक्ति, दण्ड और ६ शब्द पर रहने से यथाक्रम वाच् , दिश् और पश्यत् शब्द के परबत्ती पठी विभक्ति का लोप नहीं होता। यथा; वाचोयुक्ति विशोदण्डः पश्यतोहरः। (ग) देवात् प्रिये (देवानां प्रिय इति च मू)-प्रिय शब्द परे होने से देय शब्द की परवती पठो विर्भात का लोप नहीं होता यथा, देवानाप्रियः । अन्यत्र देवप्रियः । (घ) शुनः शेप-गुच्छ लागलेषु संज्ञायाम् ( शेषपुच्छला'लेषु शुनः)-- संज्ञा समझे जाने और शेप, पुच्छ और लाइगूल शब्द पर रहने से श्वन की परवती पष्ठीविभक्ति का लोप नहीं होता। यथा; शुनः रोपः, शुनः पुच्छ, शुनो लागलः । (च) दिवश्व दासे-संज्ञा अर्थ में दास शब्द परे होने से दिए की पष्ठी विभक्ति का लोप नहीं होता । यथा; दिवोदासः ! (घ) ऋतो विद्यागोत्रसम्बन्धात (तो विधायोनिसम्बन्य)-विधा सायन्धवाचक भार गोत्र सम्बन्धयावर फारान्त राम ।

समास। की षष्ठी विभकि का लोप नहीं होता। यथा । होतुरन्तेयासी, पितुः पुत्रः, पितुरन्तेयासी। विमाषा स्वसरत्यो:--स्वस और पति शब्द परे हो। से लोप होता है। यधा; मातु:स्वता (भानुः पितुभ्यामः मातृस्यसा; पितुः स्वसा पितृस्वसा; दुहितः पतिः १ ननान्दुः पतिः ननाट्रपतिः। मध्यपदलोपी समास ६९ सापः इचिन्मध्यप (शाकापिकादीनां सिये स्योपसंख्यानम् )-समास होने पर कहीही मध्यप होता है उसी को मध्यपदलीपी समास कहते है। मिथं मोदन पृनोदनम् , पलामि भन्नं पलामम् . বার্ষি: ফার্থি, সব ধষ এ সংবা स्थितः फालोग्य कण्ठबाला, उति स्पिानि उरसिलोमा, शिरसि स्थिता शिखास्य शिरसिरिया, पर्णान्यस्मात् मार्णः, मपगतः शोकोऽस्य अशोष मलमस्मात् निर्मला, ममुक्तानि पापिनया अपर्णा, धम्मात् सः, मनुगतोऽर्थोऽस्मिन् सन्या, ययाभूतो यथार्थः, प्रतिगमक्षमस्मिन् मापसः, उमिन मुगमने भधत मुधमनेन अधोमुस. निन, धनमस्य निर्धनः मनोऽस्य यिमनाः, उसकष्ठितं मनोऽस्य उम्मना, मनास्य सुमनाः, सुवर्णपिकालारोऽस्य एर पपिपमानः पुरोऽन्य भपुत्रः, पश्चिमान: मोधोर एकाधिका विशति: पशितिः, एकाधिकाशि.. आतुरधिका दश अनुदेगा, एकाधिका दरा पवार, शितिः परिगति, पदाधिकाशि पत्रिशत् ।

घ्याकरण कीमुदी। (क) एकस्यका दशनि-दशन शद परे होने से एक का एक होता है । यथा; एकाधिका दश एकादश । (स) घटना संख्यायाम् ( द्वयन:संख्यायामबहुनीशोत्योः)- संग्ख्यामायक शब्द परे हो तो द्वि का द्वा और यटन का अष्टा होता है । यथा, द्वयधिका विशतिः द्वाविंशतिः, द्वयधिक त्रिंशत् द्वात्रिंशत् । अष्टाधिका दश अष्टादश, अष्टाधिका विशति- अष्टाविंशतिः, अष्टाधिका प्रिंशत् अष्टात्रिंशत् । स्त्रयः-त्रि का प्रयस होता है। यथा; श्यधिका दश त्रयोदश, अधिका विंशतिः त्रयोविंशतिः, यधिका प्रिंशन् त्रयस्त्रिंशत् । विभाषा चत्वारिंशत्प्रभृतौ सव्वेषाम्-चत्वारिंशत् , पञ्चाशत् , पष्टि, सप्तति और नयति पर हो तो द्वि का द्वा, त्रि का प्रया, और अष्टन् का अष्टा विकल्प से होता है। यथा, द्वधिका चत्वारिंशत् द्वाचत्वारिंशत् , द्विचत्वारिंशत् ; दयधिका पञ्चाशत् द्वापञ्चाशत् , द्विपञ्चाशत् ; त्रयश्चत्वारिंशत् , त्रिचत्वारिंशत् : भयःपञ्चाशत् , त्रिपञ्चाशत् ; भष्टाचत्वारिंशत् , मष्टचत्वारिंशत् ; अष्टापञ्चाशत् , अपञ्चाशत् । नाशीतिशतादौ यहुबोही (दपष्टनः ......)- अशीति और शन इत्यादि संख्यावाचक शब्द परे हो तो बहुप्रीदि समास में उपर्युक्त कार्य नहीं होता । यथा; यशीतिः व्यशीतिः, द्विशतम् , त्रिसहनम् । बहुमोहि समास में द्विधाः, प्रियतुराः । (ग) एकोनस्यका कानी विभाग ( एकादिश्चकाय पादुक- एकोन का विकल्प से एफोन और एकादुन होता है। यथा; एकोनविंशतिः, एकानविंशतिः, कानविंशतिः । - सर्वसमाम-साधारणयिधि • पोडाममा ( ऋषर घुः पयामानशे )-समास होने .

ससासा पर समस्त माग के अन्तस्थित पथिन के उत्तर होता है और इसका थ रहता है। यथा, पध: समीपं उपपथम्, जले पन्धा: जलाया, प्रयाणा पणं समाहार: प्रिपयम्, चतुणों पथा समाहार, चतुप्पथम, रम्यः पन्थाः अस्मिन् रम्य नगाम्, क्षेत्र पन्याश्च क्षेत्रपयो । मव्यय के परपत्तों होने से नपुंसक होता है । यथा, विन्दः पन्या: विपथम्, गर्दितः परथाः उत्पपम् , अपकृष्टः पाया मपषधम् । ४५ धनर:--समास होने पर सन्तस्थित आप के उत्तर सन् होता है धीरसका म रहता है । यथा, विमला मापोऽस्मिन् बिमलाई मरः, उस ता पापोमात् उस साप: कृपः, यूप. स्थाप: कपाता, निर्मला : निर्मला:। RTHEREगेम्योपनियन्तपसबोडर )-fa, In और सर्म के परयत्ता म के भकाईहोता तपथा. योर्दिशोः यापोऽस्य दीपम्, भन्तरीपम्, समीपम्, प्रतीपम्, मन्योप। अवमा ( aan)--भयणांनत उपसर्ग के परयसी होने से पिप से होता है । यथा, प्रेम, मायम्, परेम, घरापम्, अप समीप उपेपम्, पापम् । १ समानुग-समाप और अन्य निशान से सिन होवे हैं । यथा, समापो देवयजनम्, अनूपी । १ पुरोऽमर्श (एस......)-समास होने पर मन्तkिan पुर् के उत्तर मन होता है। यथा, राम: गजरा, महतो माधुरा, पृता धानेन धुरः। भक्षण का समय हो तो मही होता। यश, भास्य धमाका धम्मित हम्पू: मा (सपुर......)-मन्तस्थित शके सर पर ध्याकरण-कौमुदी। । सामा सामन् होता है । यथा, अई अवः अचः (पुल्लिङ्ग होता है। अधिगता अक् अनेन मधिगतः। ननो माणके-माणयक अर्थ में न के परबत्ती के उत्तर अन् होता है । यथा, अनुचो माणयकः। अन्यत्र धनुष यहोरयाणे (ऋकपूर......)-चरण अर्थ में बहु के परवर्ती च् के उत्तर अन् होता है। यथा, यह वश्चरणः । मन्यत्र यहक सूक्तम्। ७५ प्रत्यन्ववेभ्यो लोन्नः (अव् प्रत्यन्वापूर्वात् सामलाम्नः )-प्रति, भनु और अब के परबत्ती लोमन् के उत्तर अन् होता है। यथा, प्रतिलोमम्, अनुलोमम्, अवलोमम् । ६ साम्नश ( अच्......)-प्रति, अनु, मोर भय के परबत्ती के उत्तर अन् होता है। यथा, प्रतिसामम, अनुसामम्, अयसामम्। कृष्णोदक पाण्डसंख्याभ्यां भूमेः (हगोदणडुख्यापाया भूमेरजिष्यते )-कृष्ण, उदर, पाण्डु और संख्यावाचक शब्द के परवर्ती भूमि के उत्तर अन् होता है । यथा, कृष्णभुमः, उदग्भूमः, पाण्डुभूमः, द्विभूमः, चतुर्भूमः। २८ ब्रह्मास्तिरभ्यराज यो वर्षसः (महस्तियो पसोऽम्पय राजम्यां चेति वनप्यम् )-ब्रह्मन्, हस्तिन् , पल्य और राजन के परयत्ती यस् के उत्तर मन होता है। यथा, ब्रह्मार्चसम्, हस्तिवर्चसम, पल्ययर्थ सम्, राजयच॑सम् । अबरामन्धेभ्यस्तमसः-अय, सम् और मन्ध के पायतों तमम् के उत्तर मन होता है। यथा, भयतमसम्, सन्तमसम्, अन्धतमसम्। • मनतम यो रहसः ( अन्ना हस: )-मनु, मन 68 / और an के पचत्ती रहस् के उत्तर अन् होता है। यथा; अनु. रहसम्, अवरहसम् , सप्तरहसम्। ८१ उपसदिध्वन:---उपसर्ग के परयता अध्यन के उत्तर भन् होता है । यथा, प्रातः अध्यान प्राध्शे रथः, अध्वानोऽमाव: निरध्यम् , अध्यान प्रति प्रत्यध्वम् । अन्यत्र उत्तमोऽध्या उत्तमाया। ८२ स्वसो वमीय योम्याम् ~यस् के परखची वसीयस् और श्रेयस् के उत्तर अन होता है । यथा, श्वोवसीयसम्, श्वःश्रेयसम्। N.B. न प्रशंसायां स्वस्तिभ्याम् (न पूजनात् । स्वस्तिभ्या. मेव) प्रशसायाची और भति पहले रहने से समासान्त विधि नहीं होती। यथा; शोभन राजा सुरामा, शोभनो राजा अस्मिन् धराशा देशः, भतिशयन जामतिराजा सुरूखा, अतिसखा, सुगौः, अतिगौः, मुख्या, स्वध्वा । २ न किमः कुत्सापाम् ( किमाक्षेपे)-कुत्सावाची किम् शब्द पहले रहने से समासान्त विधि नहीं होती। यथा, कुत्सितो राजा किराजा, कुत्सितः ससा किसखा, कुत्सितः पन्धाः भस्मिन् विपन्थाः देशः । ३न नत्रस्तत्पुरुषे ( नत्रस्तत्पुरुषात तत्पुरुष समास में मा पहले रहने से समारान्त विधि नहीं होती । स्था, अराजा, MAR, गौः ४ पधो विभापा-पधिन के उत्तर शिक्षा से होता है । समासान्त पक्ष में मधुसक होता है । यथा; अपथ , अपमाः । ८३ स: समानस्य गोवादी (ज्योतिर्जनपदरात्रिनामिनामगोत्रस्परपान- वर्णवयोवदनवन्धुषु)-समास में गोत्र इत्यादि शब्द पर होतो समान का स होता है । यथा; समान गोत्रमस्य सगोत्रः, सरूपः, सवर्णः, सक्षः, सनाभिः, सपिएडा, सनामा, समयाः, सनीधः, साधुः, सबचानः, सरात्रिः, सज्योतिः, सजनपदः, सब्रह्मचारी। - - -------- यामागोमुता IT --पार्म, उदयं मार जातीय शन्द गोटोगोपिया, यामयम्मी, ममानयार्मा; मादयः, समानोदरः ist); सजातीयः, समानजातीयः । ८r gray ( भारस्य दुरी रामाय: freilsunics)-माशिम् इत्याविशद पर हो तो अन्य पद के उत्तर होता है और इसका दु रहता है। या; माया माशीः मन्यदाशी.. भन्यम्मिन माशा मन्यदाशा, अन्य- स्मिन् माहामन्यदास्था, मन्यस्मिन् माध्यितः भन्यदास्थितः, अन्यम्मिन् उत्सुफः मापदुरमुकः, भन्यस्मिन् रागः भन्यद्राणा, अन्यःकारका मन्यत्कारकः। (क) न तृनौयायो:-तृतीयान्त और पष्टयन्त अन्य शब्द के. उत्तर नहीं होता । यथा; मन्येन माशीः मन्याशीः, अन्य- स्याशी: अन्याशीः। (स) अर्थ विभाषा-अर्थ शब्द परे हो तो विकल्प से होता है । यथा; अन्यस्यार्थः अन्यदर्थः, अन्यार्यः। ८५ कोः कन् स्वरे सत्पुरुषे ( कोः फक्तपुरोऽचि)-तत्पुरुष समास में स्वरवर्ण परे होतो कुका कत् होता है । यया: फुत्सितोऽश्यः फदश्वः, कुत्सितः उनः कदुनः, कुत्सितमन्नं कदन्नम् , फुत्सित आचारः कदाचारः, कुत्सितमुदकं दुदकम् । (क) निरयवदेषु (त्रौ च । स्यदयोग्य)-त्रि, रथ और पद शब्द परे हो तो कु का फत् होता है । यथा; कुत्सितात्रयः कत्तूय:, कुत्सितो रथः पदयः, कुत्सितं वदति कदः। (ख) का पथ्यशो ( कापथ्यगोः )-पधिन् और मक्षि शब्द परे हो तोकु का 'का' होता है । यथा, कुत्सितः पन्थाः कापयः कुत्सितमक्ष अस्य काक्षः ।

समास। रंग) ईषद च-ईपन् अर्थ में कु का 'का' होता है । यथा. कामधुरम्, ईपन्मधुरमित्यर्थः; कालयणम्, चालायणमित्यर्थः । विभाग पुरुषे--पुरुष शब्द पर हो तो विकल्प से होता है। यथा, कापुष्या, कुपुरुषः । (५) का-कत्-कवान्युगे (कर्व चोटो)-उष्ण शब्द परे होतो बुर फा का, फत् और का होता है। पधा, कोणम्, 'दुष्णम् , कयोष्णम्। 4६ किमिश्रादयः (मित्र का विवस्य मुरायो । नरे सशायाम् )- विश्वामित्र मादि निपातन से सिद्ध होते है। यथा, विश्वस्य मित्र विश्वामित्रः, विश्वावसु, विश्वानरः, अायमा, अष्टा- पदम्, मम्, शुनो दन्तः स्यादन्तः, श्यारंगा, श्यामार्णः, श्यापुमा, शुनस्य पादायस्य शापदः (म: स्याम् । शुभ दन्त ष्ट्राकर्णकुन्दपुरणपदेषु वाग्यः) ८. समोऽन्दली.काम-मनसो-काम भीर मनस् पद पर हो तो सम् भव्यय के अन्त्य वर्ण का लोपदास, सकामः, समना:। 10) मुनाच (दमः काम-मनगो)-काम और मन शाद पर हो तो नुम् के भन्त्य वर्ण का लोप होता है। यया, गन्तुकाम:, पन्मनः (a) सश्यमः प्रत्य-सत्य प्रत्यय परे हो को पत्र में भनय वर्ष का लोप होता है। यथा, मायदेवम्,भार. कर्तव्यम्। पूर्व निपात 4 उपगया-समास में पसन्म पर का पूर्ण. निपातदोता है। ..

४.४ ध्याकरण कागदी। प्रमादित्य समय उपमर्म नम्-ममास में प्रथमा पिनि फे. महशंग में जिसका निर्देश दिला है उसे उपसन्नं न कहते है। मध्ययीमार में मध्यप इत्यादि गद, नापुरुष में द्वितीयादि पिमयायत पद, कम्मधारय में विशेषण त्यादि पद. द्विगु में मंग्यायाचक पर उपसर्जन है। यशा, अध्ययीभाष-फलस्य समीप उपकूलम्, मानमनिकम्य यथाशनम्, वर्णानामानुपूरऽर्येण भनुवर्णम् , तृणमयपरित्या समृणम्. प्रामादिः वहिा- मम्, पाटलिपुत्रात् भापाटलिपुत्रम्, समुद्रस्य पारे पारे. समुद्रम् । तत्रल-मुपं प्राप्तं सुषमाप्तम्, भानं युभुनः अन्न. युभुक्षुः वर्ष भोग्यः वर्षमोग्यः, पित्रा समः पितृसमा, अङ्गने यिफल: अङ्गयिकालः, पाणिनिना प्रणीतं पाणिनि- प्रणीतम्, भूताय पलिः भूतयलिः, पुत्राय हितम् पुत्रहितम्, व्याघ्रात् भयम् व्याघ्रभयम्, गृहात् निर्गतः गृहनिर्गतः, नरोः छाया तरुच्छाया, अग्नः शिखा अग्निशिखा, शास्त्र प्रवीणः शास्त्रप्रवीणः, पूवा कृतम् पूर्वाकृतम् । कर्मधारय- नीलं उत्पलं नीलोत्पलम्, नयः पल्लयः नवपल्लवः, सन् पुरुषः सत्पुरुषः । द्विगु-पञ्चनिः गोभिः क्रीत: पञ्चगुः, प्रयाणां लोकानां समाहारः त्रिलोकी, त्रयाणां भुवनानां समाहारः त्रिभुवनम् ८६ राजदन्तादिषु परम्-राजदन्त इत्यादि में उपसर्जन पर का परनिपात होता है । यथा, दन्तानां राजा राजदन्तः, वनस्य अप भवनम् । १० वा कडारादयः कर्मधारये ( रडाराः कर्मधारये )-फर्मधारय समास में कडार, खञ्ज, काण, कुण्ठ, गौर, वृद्ध, भिक्षुक, पिङ्ग, पिङ्गल, तनु, जठर, यघिर, घबर इत्यादि पदों का विकल्प से 'पूर्वनिपात होता है । यथा, फडारगजः, गजकडार, पशिशुः, 'शिशुखतः वृद्धपुरुषः, पुरुषवृद्धः।

। समासा ११ सप्तमीविषये यहुबोहो-यहुव्रीहि समास में सप्तम्यन्त और विशेषण पद का पूर्वनिपात होता है । यथा; सप्सम्यन्त-- कण्ठेकालः, उरसिलोमा, विशेषण-दीर्घबाहु, महायलः । ९३ विभाषा प्रियस्य-प्रिय शब्द का विकल्प से पूर्यनिपात होता है। यथा; गुडप्रियः, प्रियगुडः । १३ सप्तमी पर गड्यादेः-- गहु इत्यादि के योग में सप्तम्यन्त पद का पानिपात होता है। यथा; गदुः कमै यस्य गडक्या गड: शिरसि यस्य गडशियः । १४ प्रहरणार्यश्च (प्रहरणार्थेभ्यः परे निष्टासप्तम्या)- प्रहरणवाचक पद के योग में सप्तम्यन्त पद का परनिपात बताया। शास्त्र' पाणी यस्य शस्त्रपाणिः, दण्डः पाणौ यस्य दागिः, सहारे यस्य गाकरा, धनुर्हस्ते यस्य धनुस्तः । १५ निष्टा खा-निष्ठा से उत्पन्न पद का पूर्य निपात होता है । यथा; पतकर्मा, धोतव्याकरणः, मक्षितादनः धृतायुधः, उधृतवण्य मारयः, पक्याः । ६६ वाहितम्यादिषु-साहिताग्नि इत्यादि में निष्ठा से उत्पन्न पदों का विकल्प से पूर्व निपात होता है । यथा, भादिताग्नि, मान्यादितः जातमुखः, सुखजातः जातपुत्रः, पुषजातः: जातन्तः, दन्तजातः: तेलपांग, पीतम मपीस पास मयः, सुरापीतः, पीतपुर, भाग्योद, ऊमा मगम:, गायः माप्नकाल:, कालप्राप्तः: भम्युपतः, उपतासिः जातश्मधुर, मधुजात; पुनपीतः, पीततः। मर्य समास शेप। १७ समासाधतुधिः-पानिय मन में , Tr मोरगर SERY समास! | मार व्याकरण.कौमुदी। ये तत्पुरुष के अन्तर्गत है। कहीं कही कर्मधारय और द्विगु को स्वतन्त्र समास मान कर समास प्रचार का माना जाता है। १८ पूर्वपदार्थप्रधानोऽव्ययीभावः-अध्ययीभाव समान पूर्व पदार्थ प्रधान है । उपगृहम्, यथाशक्ति इत्यादि में टप, यक इत्यादि पूर्व पदार्थ प्रधान है । १६ उत्तरपदार्थप्रधानस्तत्पुरुषः-तत्पुश्त' समाग में उत्त- पदार्थ प्रधान है । तरुच्छाया, गाजलम् इत्यादि में छाया, जल इत्यानि परपदार्थ प्रधान हैं। १०० उभयपदार्थप्रधानो द्वन्द्वः-द्वन्द रामास में दोनों पदा प्रधान हैं। अश्वगजी, तालतमालौ इत्यादि में अश्व, गज, साल, तमाल, सभी प्रधान है। अन्यपदार्थप्रधानो यहुयी दिः--जिन पदों से पानीहि समास धनता है उनके अर्थ को छोड़ कर इसमें अन्य अर्थ की प्रधानता रहती है। यथा; बहुधना, दीर्घबाहुः इत्यादि में यधन दोपं और यह इत्यादि को प्रधानता न सममी बार बहुत धन और बहुत गहु पाले पनि स्प अन्य पदार्य की प्रधानता समझी गातीदे। पान्त सर्वत्र ये नियम नहीं लगते । कहीं कहीं इसका निधन देखा जाता है । सागोदावरम्, उन्मत्ताम् इत्यादि अभ्ययीभाव में 4. पार्थ प्रधान मोकर हाय पदार्थ प्रधान है । अनि, आराम विक, स्पादि सरस में उत्तरपदार्थ प्रधान न होका भायपदार्थ प्रधान । पसमा त्यादि मनुमोदि में भन्यादा प्रधान न म उभय पाय प्रधान है। हगराारसम्, शमशका इत्यादि दवा में उभ प्रभात कर तगमाहार पदार्थ प्रधान है । भताए जनिमम " कार प्रायः लगते हैं । इसलिये उपयुक भी पा an प्रापैग ओरिने । उमपपदार्थप्रधानो जनतः- यह सब सम्म ससे नहीं 71 समासा उभय पदों में जिस प्रकार इन्द्व समास होता है उसी प्रकार अनेक पदायाँ' में भी होता है। अतएव सत्र में उमय के स्थान में अनेक होना चाहये । अव्ययीभाव समास में दो पद और अनेक पद होते हैं, और बहुधीदि समाम में दो पद और अनेक पद होते हैं; पर तत्पुरुष समास में प्रायः सर्वत्र दो पद होते हैं। १०१ पहुमोहि द्विविधस्तद् गुणसंविधानोऽतद्गुणसंविधा- नश्च-बहुबीहि समास दो प्रकार के होते हैं, तद्गुणसविज्ञान, अतद्गुण- संविज्ञान । जहाँ समास शोधित अन्यपदार्थ के पश समाम होने वाले पदार्थ का क्रिया इत्यादि के साथ सम्बन्ध हो उसे सत्गुणसंविज्ञान कहते और जा समास होने वाले पदार्थ का क्रिया के साथ सम्बन्ध न हो उसे अतद्- गुणसंमिशान कहते हैं । हावर्णमानय इत्यादि में मामय किया का लम्ब व्यकिके साथ सम्बन्ध है और सम्वर्ण का भी परम्परा सम्बन्ध है, इमे तद्गुगत विशान कहते हैं। समुदमान इत्यादि में अनय क्रिया कारष्ट-समुद्र मक्ति के रणय सम्बन्ध है, पर समुशका सम्बन्ध नहीं है इसलिये इसे भगद्गुणस रिसान पते।। १.२ समानाधिकरणपटिको मधिकरणापरपटितन- अमोदि प्रकारान्तर में दो प्रकार का होता है, समानाधिकरणपटित भौर यधिकरणपश्यति । विशेष्य भौर विशेषण १६ पदुमीहि को समानाधिकरणपरत परत है। पा.मीला. परर, दोर्यशाः, कृष्णकायः स्पादि । जहाँ अन्य प्रकार के पक्ष में पहुमोदि होता है उसे प्यधिकरपटत पतं : पथा; दण्डपाणिः, यस्त. स्पादि। Esercise-43 1. Explain the distinction between-ar& rat धारय & frगु, कर्मचारय & ATTA मारkg, and पोतारम् पटनाः।

व्याकरण-कौमुदी। 2. Expound the Samssas of:-अतिशोकम्, यथ- शक्ति, पारेसमुदम्, पन्चनदम्, उपगहम्, कृपपतितः, पितृममा, भ्रातृ खम्, बन्धनमुक्तः, कार्यकुशलः, योदयम, ब्राह्मणभार्या किंग ब्राह्मणीमार्य:, चतुपदी, दादण्डि, निरर्थकम् , हरिहरी, देशमशकम मातापितरौ, दम्पती and भ्रातरी। 3. Give compound words for:-कण्ठे स्थितः कालो- स्य तृणमप्यपरित्यज्य, पञ्चाधिध विंशतिः, तममा कृतम्, कुत्सितं असम नकञ्च दिवा च, द्योथ, भूमिञ्च, काकारच उन्नाव, पमस्येव गन्धोऽस्य सुन्दरी जायास्य, पाचिका भास्यि, अशान राजा, नास्ति धुतोऽपि मन यस्य, पूर्व स्नातः पश्चानुलिप्तः, सुन्दरी महिला and सर्मान जयति । +. Translate into Hindi:-नदी मुभयती बहवो वृक्षा- सन्ति । रावणेन भीता दानरा दिशि दिशि पलायन्ते । ठोरगर्मामपि जानी विमुच्य गुरुजनस्तत्र गतः। न मे हस्तपादं प्रसरति । इये फरकुमुमपल्ला- यण मामुपतिएत । स सभार्यः सपुत्रः सपसि स्थितः। विष्णुशा माम ग्रामणः सकलनीतिशास्त्रपर आसीत् । ममायुःशेषेणापि जीवतु सपुत्र- रोऽय राजपुत्रः। . 5. Translate into Sanskrit:-(a) सोलाको यह कन्य घड़ी हो गुन्दर है । गुरु की मीठी बात सुनकर हस्य संतुर हो गया। यह मनुष्य नीतिशास्त्र में महा ही कुशल है। विद्यापन राम धो से उत्तम है। माता पिता की सेवा करो। विश्वासपाती को कोई प्रतिष्य मी करता! ईश्वर के विषय में जितना अधिक विचारता हूं उतना ही कम जानना । (b) Kindly send there the person posse aged of long arms. You liase a bul minister. I enw shero an assembly of women. I will order then togo to another villago. Ram accompanied by Sir and Lakshmana went to the forest. Isliell try for लिंगानुशासन। your good to the utmost of my power, 6.Correct:-एवं चिन्तयन् सा निशा अति घाम | रोगि: दिवायां निद्रा याति । नृपो प्रजान् पालयति । कथं त्वं दसि । मे पापा क्षम | विथ्यावादी धिक् । मह वेत्ति शुको वेति । अथ ज्वलते तो शमी- कोटरेऽदग्धशरीरः स्फुटितक्षणा करणात् परिदेवयन् सस्य पिता निर्चक्राम । लिङ्गानुशासन । पुंल्लिङ्ग Masculine. १ धनवन्तः-घम् और अप् ( अल ) प्रत्ययान्त शब्द पुंलिङ्ग होते हैं; यथा, पाकः, त्यागः, भावः; करः, गरः Sickness. २ पाजन्तरव-घ और अच् प्रत्ययान्त शब्द पुंलिङ्ग होते हैं। या पिस्तरः, गोचरः, चयः, जयः । पर भय, लिङ्ग, भग (fortune), और पद शब्द क्लीवलिङ्ग है। ३ नहन्तः--नङ् प्रत्ययान्त शब्द पुलिङ्ग है, यथा; यतः, यशः । पर याज्ञा स्त्रीलिङ्ग है। ४ वयन्तोधुः--कि प्रत्ययान्त दा और धा धातु से बने हुए शब्द पुलिङ्ग होते हैं, यथा,माधिः (anxiety), उदधिः, निधिः । पर इपुधि (quiver) पुल्लिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग दोनों है। ५ देव, भसुर, आत्मन् स्वर्ग, चन्द्र, सूर्य, अग्नि, वायु, नेघ, गिरि, समुद्र, नख, केश, दन्त, स्तन, भुज, कण्ठ, षड्ग, र, पङ्क, शत्रु. वर्ण, प्रह भोर वृक्ष वाचक शब्द लिङ्ग होते :यपा, देव-अमरः, निर्जरः, देयः, सुरः, वियुधः, दिवोकः, त्रिदशः । अमर-असुरः, दैत्या; दनुजः, दानवः, सुरद्विद । आत्मन्-- रमा, क्षेत्रः । स्वर्ग-स्वर्गः, नाकः, त्रिदिवः । चन्द-चन्द्रः, शाकरण-मीमुदी। हिमांशुः, गन्द्रमाः, दुः, पिपुः, पुर्यागुः, सोमः, मृगाः शाशधरा, भाकरः । गर्य-सूर्णः, मारित्या, दिशक मास्करः, महम्करः, यिमाकरः, मार्तण्डा, मिहिर, रिमावर सयिता, रविः, सपना, मित्रा, सहस्त्रांशुः, भानुः, अंशुमाली अग्नि-मग्निः, पैश्यानरः, यहि, पायकः, मनला, हुतमुक वायु-यायुः, मनिला, समीरः, मास्तः, मरत्, समीर पयनः, प्रगान, यातः । मेर- मेघः, पारियाहः, यलाहर जलधरः, यारिक, जलमुर, अम्युभृत् । गिरि- पर्यतः, मा गिरिः, अचला, शैलः । ममुद-समुदः, सागरः, मरित्र पारावारः, उदधिः, सिन्धुः, अर्णवः, जलनिधिः, रत्नाकर सरितातिः, नव-नवः, फरमदः । केश-केशः, विकु- कुन्तला, फचः, शिरोरुहः । दन्त-दन्तः, दशनः । स्तन--स्तन कुचः । भुज -भुजः, याहुः, दोः। गठ-कण्ठः, गलः । खड्ग खड्गः, असिः, कग्यालः। श-शरः, पाणः, विशिखः, मार्ग पर-पङ्कः, कदमः शत्रु-शत्रुः, रिपुः, अरि, देरी, सपल द्विपत्, द्विट् , अमित्रः, अरातिः । वर्ग-शुक्लल, श्वेतः, शुक्र पाण्डुरः । प्रा-रविः, सोमः, बुधः, केतुः इत्यादि । वृक्ष-वृक्ष तरुः, विटपी, शार्या, अनोक्हा, महीरुहः, द्रमः, पादपः। त्रिविष्टप शब्द क्लीलिंग, दिव् शब्द स्त्रीलिंग, पु तथा पाहुशन पुंलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग तथा अन शब्द क्लीयलिङ्ग है। ६ ऋतु (यश).पुरुष, कपोल और गुल्फ के पर्याय श पुलिङ्ग है, यथा, क्रतुः, अध्वरः, पुरुषः, नरः, कपोलः, गण्डः गुरुफः, प्रपः। रश्मिदिवमाभिधानानि-रश्मि भौर दिवस के पर्याय शब्द पुलिङ्ग है । यथा, रश्मिः, फर:, किरणः, अंशुः, गमस्तिः, मयूखः, दिवसः, घनः । पर दीधिति ( ray of light) लिंगानुशासन । स्त्रीलिङ्ग है और दिन तथा अन द वसीवलिङ्ग है। ८ मानाभिधानानि-मान के पर्याय शब्द पुंलिङ्ग है, यथा; कुंडरः, ग्रन्थः। पर द्रोण तथा पाढक लिङ्ग और क्लीपलिंग, खारी और मालिका स्त्रीलिंग हैं। ६ दारातलाजाम न। बहुलच-दार, अक्षत, लाज, असु (पाण) पुलिंग और यहुवचनान्त है । १. नाध्यापदानि पदानि-नाडी, अप और जन के परवर्ती यथाक्रम घण, बङ्ग और पद शब्द पुलिङ्ग है । यथा, नाढीवणार, अपाङ्ग, जनपदः । ११ उकारान्त तथा कद, ण,य,न ,म्, य, या स् , उपधा वाले शब्द पुलिङ्ग होते है; यथा, 3-प्रभुः क्षुः (ईप) पर धेनु, रग्नु, कु-ह, सरयु, तनु रेणु, प्रियङ्ग ( a plant) स्त्रीलिङ्ग है; श्मथ ( beard ), जा, स्वाद, अधु, जतु ( lac ), पु(tin), सालु ( palate ), घर पलीलिङ्ग है; मगु (A kind of bird), मधु, शीधु, { wine }, सानु ( table-land ) और कमण्डलु पुंलिङ्ग या बलीयलिङ्ग है। रत्वन्त:- और तुमत्ययान्त शब्द पुंलित हैं। यथा, मेरः (पर्वत), सेतुः। पर दाय, कसे {gns), पस्त. मात पनीर ) पुलिग मोर पलीवरित है। +-स्तरकः, कल्कः ( sediment) पर चियुक, शम्लुक, 'तिपदिक, अंशुफ, उन्मुक कलीलिंग पटक, अनीक, एक (rum ), मोदक, चपक (mine glass), मस्तक, स्तक, ताक, निष्क, शुष्क, यक ( brightness ). नाक, भाण्डक, इण्डक, पिरक (फोड़ा), वालक (talk), रफ { shield ), पुलक (रोमा) लिंग भार पलोशलिंग है पलीयलिंग है। ईम ( fuel), युग्म, गुल्म, अध्यात्म, कुकुम, क्लीयलिंग है। माकरण-मागुदी। ट-घट. परः। पर किरीट, मुकुट, ललाट, यट, बीट (ए गौघा ), यहाट (गौराहा), कराट, लोट पलीवलिंग है, कुछ फर, कपट, कपाट, कपट, कट, निकट, कीट पुलिंग माँ -गुणः, गगः, पापाणः परण, लयम, पर्ण, सोरण रण, उप पलीयलिङ्ग है; म्यर्ण, सुवर्ण, व्रण, वरण, विषाण ( सांग ), पूर्ण, नृण, पुलिंग और यलोयलिंग है। ५-रथा पर याप्ट, पृट, सिया (wax), उक्य (साम- येद ) क्लीयलिग है; तीर्थ, प्रोय (hip), यूय, गोय ( a resre- पुलिंग भौर कीलिंग है। म-नः (सूर्य), फैनः। पर जयन, अजिन (मृगचर्म )- तुदिन, कानन, यन, जिन (पाप), विपिन, घेतन, शासन सोपान, मिथुन, श्मशान, रत्न, निम्न, विह, क्लीयलिंग है; मान यान, अमिधान, नलिन, पुलिन ( तट), उद्यान, शयन, आसन, स्थान, चन्दन, आलान (A letter ), समान, भवन, सम्मावन, विमान, पुलिंग और क्लोवलिंग हैं। प-यूपः, दीपः, सर्पः। पर पाप रूप, उडुप (a raft ), तल्प ( bed ), शिल्प, पुष्प, शष्प समीप, अन्तरीप क्लोवलिंग है। शूर्प, दीप, विटप, पुलिंग और क्लोवलिंग हैं। भ-स्तम्भः, कुम्मः । पर जृम्म (yawaing), पुलिंग और क्लीवलिंग हैं। म-सोमः, भीमः । पर रुकम ( स्वर्ण), सिध्म (scab!, संग्राम, दाडिम, कुसुम, भाभ्रम, क्षेम, क्षीम (रेशमी वस्त्र ), होम, उद्दाम पुलिंग और क्लोवलिग है। य-समयः, हयः । पर किसलय, हृदय, इन्द्रिय, उत्तरीय, .

लिंगानुशासन। चित्र, सूत्र, . मय लोवलिंग हैं; कपाय, मलय, अन्यय, अव्यय पुलिंग और लोवलिंग है। र-क्षुरः (razor), अछुरा परद्वार, अग्न, स, थक, 1. क्षिप, छिद्र, नीर, तीर, दूर, कच्छ, रन्ध्र, अशु. श्यम् (0 le), गभीर, फर, विचित्र, केयूग, घेदार, उदर, अजर उदा), शरीर, कन्दर, मन्दर, पर, यल्वर, काश्मीर, नार, थिर, शिशिर, तन्त्र, यन्त्र, क्षत्र, क्षेत्र, मित्र, कलत्र, मुख), नेत्र, गोत्र, अङ्गुलिप, मस्त्र, शास्त्र, वस्त्र, पत्र, पात्र छत्र बलोवलिङ्ग हैं। चका, पत्र, अन्धकार, सा, पार, क्षीर, तोमर, ङ्गार, मुहार, तिमिर, लिङ्ग और पलीयलिङ्ग है। ५-धूपः वृक्षः । पर शिरीष, जोप lease), अन्तरीय { a frying pan), पीयूष, पुरीप (मल), किल्पिप, फरमर (पाप) पलोयलिंग है; यूष ( coup), करीए ( dried cowdung), मिप, विष, वर्ष पुसिंग और पलीयलिंग है। स-पासः, घायसः, महानसः (kitchen)| पर पनस, यस, साहस पलीयलिंग है; सरस, नियास, उपवास, कार्पास, यास, मास, कास (cough ). कांस (metal), मांस पुलिग और पलीयलिंग है। स्त्रीलिङ्ग-Feminine १२ कारान्त माहिस्तस्पोननान्दार:-प्रकारान्त मात. हित, स्थर, पोत (prit st), ननाद भार यात ( पति की मातृश्यू) शब्द स्त्रीलिंग होते है। १२ भन्यूपत्यान्तो धा:- भनि और 3 प्रत्ययान्म शद. बीलिंग है, यथा, भयतिः, चमः। पर अनि (पर), मरणि, रणि (काछ) लिग भरि त्रीलिंग है।

ध्याकरण कौमुदी। १४ मिन्यरत:-घातक पर मि भोर नि प्रत्यय के योग से उम्पन्न राष्ट्र म्बीटिंग है, यया, ममिः, ग्लानिः । पर यहि, वृष्णि, भग्नि पुलिंग : श्रेणि, योनि और अम्मि पुडिंग और म्त्रीलिंगई। १५ दिनम्तः-निन् प्रत्ययान्न शब्द त्रीलिंग यथाः पतिः, मतिः, भक्तिः। १६ ईकारातन- प्रत्ययान्त शब्द स्त्रीलिंग है, यथा; लक्ष्मीः। १७ उमान्तश्च-अङ, डो और भाप् प्रत्ययान्त शब्द स्त्रीलिंग है: यथा, कुरूः, विद्या, काली। १८ घन्तमेकाक्षरम् -एकाक्षर ईकारान्त और अकारान्त शब्द स्त्रीलिंग होते है; यथा, थोः, भूः (पृथियो । १९ विशत्यादिरानवतेः-विशति से नवति पर्यन्त संख्या- वाचक शब्द स्त्रीलिंग है, विशतिः, त्रिंशत्, चत्वारिंशत्, पञ्चा. शत्, पष्ठिः, सप्ततिः, अशीतिः, नवतिः । २० दुन्दुभिरक्षेपु-अक्ष मर्थ में दुन्दुमि स्त्रीलिंग है। २१ नानिरक्षत्रिये-अक्षत्रिय अर्थ में नामि स्त्रीलिंग है। २२ तलन्तश्व-तल् प्रत्ययान्त शब्द स्त्रीलिंग है, यथा, शुक्लना, ग्रामता (प्रामस समूहः), देवता, प्राह्मणता। २३ भूमिविद्युत्सरिहतावनिताभिधानानि-भूमि, विद्युत्, सरित्, लता और वनिता वाचक शब्द स्त्रीलिंग है, यथा भूः, सौदा. मिनी, निमग्ना, घल्ली, योपित् । पर यादस् ( aduatic animal ) क्लीलिंग हैं। २६ भास् (light) प्रक, नुम् (spoon), दिक, उष्णिा और उपानह स्त्रीलिंग है। २५ स्थूणा (post) और ऊर्जास्त्रीलिंग और क्लोलिंग है। (घेदांग) लिंगानुशासन। . २६ प्रावृष, विभुः (जलबिन्दु), रुप, विप् और अप २७ दबि ( spoon), येदि, खनि, कृषि, भोपधि, फरि और गुलि स्त्रीलिंग है ( पक्षान्तर में ईए होता है। यथा; वेदी, दयीं इत्यादि। २८ अ सुमनतामासिकतावाणी बहुल्लम्च-अप, सुमनस्, समा (yeer ), सिकता और वर्षा स्त्रीलिंग और बहुधवनात है। र देयतापाची सुमनस्, पुंलिंग और बहुवचनान्त है। Falafe-Neuter. २९ मा स्युडन्तः- मायधाष्य में न्युट (थमटू ) प्रत्ययान्त शाद कीवलिंग है;था, सनम्, शयनम् । ३.निए - निष्ठा प्रत्ययान्त शष्ट क्लीयलिंग है, पथा, हसितम्, पीतम्। ३१ त्यायधी तदिती-सदित के त्य और यह प्रत्ययान्त शब्द क्लीवलिंग है, यथा, शुकृत्यम्, शुक्ल्यम् । २२ माच धीर कर्म भर्ष में पल्, य, ६, पभर, मन, ङ, छ प्रत्ययान्त शब्द क्लीयलिश है। यथा, स्तेयम् (चौरी), सख्यम्, माधिपत्यम्, देवायनम् (दो वर्ष का), पितापुत्रम् । ३३ मध्ययोमार:-- अध्ययीभाव समास के शम्द हीलिग है; यथा, उपनगरम्, यथाशकि, घिरि २४ दक्तम-समाहार इन्द के शम्द हीलिंग है, यथा, पाणिपादम् । ३५ अनलाराया-पाहुरूप अर्थ में या पलीयरिंग; पथा, शरस्वायम्, सुखायम् (सूर्मा छाया)।

४ MIN MI ४२ मन् दण्यकोतर-परि-मिग्न पाध्य भन् गागात ध्याकरण फौमुदी ३६ राजा मनुष्यपृथ्यांसभा- राजन् तथा मनुष्यभिन्न अन्य शब्दों के परे समा शब्द क्लीलिंग है; यथा, राजसमम् , पिशाचसमम्। सुरा, सेना, छाया, शाखा और निशा समास में विर से स्त्रीलिंग होते हैं; यथा, ययपुरा, यवसुरम्, शत्रुसेना, शत्रुः सेनम् ; वृक्षलाया, वृक्षच्छायम् ; गोशाला, गोशालम् ; महा. निशा, महानिशम् । २७ रुस्यापूर्वा रात्रिः-संख्यायाचफ पद पूर्व में हो तो रात्रि शब्द क्लीयलिंग होता है; यथा, द्विरात्रम् । ३८ इसुमन्तः--इस् और उस् भागान्त इद पलीयलिंग होते हैं। यथा, हयिस्, धनुस् । पर अथिस् पलीयलिंग भौर २६ मुख, नयन, लोह, पन, मांस, रुधिर, धनुः, वियर, जल, दल, धन गौर भन्न वाचक शब्द क्लीयलिंग होते हैं। ४० लोपः-लू उपधा याले शम्द पलायलिंग होते वया, पुलम्, फुलम्, स्थलम् । पर तूल, उपल, हाल, हाल, कम्मत लिंग है । शील, मूल, मंगल, कमल, तल, मूसल भौर गुल लिंग और पलीयलिंग है। तसिंग्या-संख्यायाशक शत प्यादि पत्रीलिंग दें; या, शाम, सहस्रम् । पर अयुत, प्रयुत पुलिंग है । कोटि प्रीटिग है। स्त्रीलिंग है। शदपत्रायलिंग। यथा, गार्म, पर्मा पर मणिमा, EिRT. लिंग हैं। प्रशान् पुलिंग और क्लीयलिंग है। मगत देयम् :-समागत शान लीलिंगा. य, मनः : I पर थमा पर यममा पुटिंग भीर मरम থী। म्बीलिंग है। ४४ माता--भागान्त शब्द क्लीयलिंग है, पया, पर उनम् । पर यात्रा, मात्रा, मात्रा (bellous),दंष्ट्रा स्त्रीलिंग हैं: मूत्र, भामत्र, छात्र, पुत्र, मात्र, उप पुलिंग है: पत्र (leaf ), पात्र, पविध, सूत्र पुलिंग और क्लीयलिंग है। ४५ वल, कुसुम, पत्तन, रण बाचक शब्द क्लीवलिंग है। पर आक्ष्य ( रण ) और संग्राम लिंग और आजि (रण) ४६ मामलकम, आघ्रम् इत्यादि फलजाति तथा वियत, जगत्, नयनीत, अमृत, निमित्त, दिन, वित्त, प्रत, रजत, वृत्त थाद्ध, कुलिश, पीर, अङ्क, . भास्पद, भाकाश, धान्य, शस्त्र, काव्य, पण्य, सत्य, अपत्य, मूल्य, मद्य, हर्य, सैन्य, कुटुम्य, करच इत्यादि कीलिंग है। N.B. इनके अतिरिक्त मुवन्त प्रकरण में सर मानुमार लिश स्त्रोलिक और लीवलिङ्ग शब्दों की बालिका दी गयी है, टरमे भी लिएका ज्ञान हो सका। धातुकोप "1. 2. 3. इत्यादि Contugation के योषक है।...से मात्मनेपदी, P. से परस्मैपदी, ..से उभयपदी धातु समझना चाहिये।" भक !". to yu tortuouslt लद-मति, लोरमकनु. इ-भाव, विधिलिङ्-प्रफेन् । टुट्-मरिता एट्-मकिप्यति। लह-माफियत् । भाशीलिङ मसात् । लिदमाफ, माकिया सुश्माकीत, मालियाम् अगिता, तभ्यामसितम्या, स्पा. भकिस्था, नम्-अफितुम् । मि.मयति-ते । परिसर । - ध्याकरण-कीमुदी। . अन् । P. to go, to worship. अशनि । मचिता। অশ্লিাক। চাষি। মাস। গান, নথি। शाचीन्, भाचियाम् । अञ्चितः { worshipped), अतः (mored), यश्चितध्यः भश्चित्या, भयरया; अश्चितम् । अञ्चति । शकयते, अच्यते। गद 1 P. to go. अटति, अटिता, अटिप्यति, आटिप्यत्, अट्यात्, माट, माटीत्, मटितः । अदित्या, मटितुम्, माटयति-ते, घट्यते, अटाव्यते ( यङन्त ), मटिटिपति ( सनन्त )। अण् + A. to breathe, to lire. अण्यते, अणिता, अमिप्यते, आणिष्यत अणिपोष्ट, आणे, आणिष्ट, अणितः, आणयति, अण्यते, अणिणिपते । अत् 1 P to go अतति, मतिता, अतिध्यति, भातिप्यत्, अत्यात्, आत,मातीत, अतितः, आतयति-ते, अत्यते,अतितिपति। अद् 2 P. to eat, अत्ति, अत्ता, अत्यति, पारस्यत्, अद्यात्; जघास, जक्षतुः, जभुः, जयसिथ (आद, भादिय), अघसत्, अघसताम्, अघसन: जग्धः, मन्नम्, घासः, जग्ध्या, अत्तुम, पादयति-ते, अदाते, जिघरसति । अन् 2 P.to breathe, to live. आनति, अनितः, अनन्ति; भानीत्, भानत्, अनिता, अनिष्यति, भानिध्यत्, अन्यात्, मान, भानीन्, मानिटाम्अनितः, आनयति-ते, मन्यते, अनिनिपति । अय् I A. to go अयते, अयिता, भयिष्यते, भामिप्यत, थयिषीष्ट, भयाञ्चक, मायिष्ट, आयिपाताम्. भायिष्ठाः; अयितः, भाययति-ते, अय्यते, मयियिषते, with परा-पलायते । अर्च 1 P. 10 U. to worship मर्चति, भर्चयति-ते; धर्यिता, मर्चयिता, भविष्यति, भयिष्यतः अर्यात्. भानर्य, भर्चमाञ्चकार, माचीत्, अशितः, अर्चनीया,अर्चयति-ते, अर्थते, - धातुकोष। 'चिपति-ते। म to earn, अर्दु to ask, to kill, थ, to worship. eserve-अर्च के समान / 100. फालुङ्.माज्ञिदत्-स। पर्थ 10 A. to beg. अर्थयते, अर्थयिता, अर्थयिष्यते, प्यत अर्धयिपोष्ट, अर्थयाश्च यभूय-मास,मायत, मर्थितः, ते तिथयिपते। घ 1 P. to protect. अति, अविता, अविध्यत, ति, अध्यात्. मात्र, भावीत, अक्तिः, मात्रयति-ते,बापने, पति। 15A.to pervade, अश्नुते, अशिता, अथा, मशिष्यते, पत्त अक्ष्यते शिर अक्षीष्ट, भानशे, याशि(माशिशन्। अशित्वा, अटवा; शाशयति-ते, अश्यते, मशिक्षिपते। 9P.to eat. अश्नाति, अश्यात् , शाश, माशीत , P.to be. मस्ति, मविता, मरिष्यति, भपात, रभूत् , भूतः, मयितव्यः, भयनीयः, भूयने, धुभूपति, यिडन्त)" Sr.to throw. मायति, मसिता, भतिष्यति, अख्यात्. धरायत्, मास, मस्त; भस्यते, भसिसिति। 5 P. to obtain, to pervade मामाति, भामा, भास्यत्, भायात, आप, भापत, माप्तः, पापप. असत्या, माया, ति। :. A. to sit भात, मासिता, भासियते, मासिपीए, पासाच यमश-प्रास, मासिए, प्रासयति, भास्पते, भासिसिपते ।

ध्याफरण कौमुदी। 1. I'. 2. P. to go. अयति, पति पता, एण्यति, ऐध्यम्, ईयात्; ईयाय, ईयतुः, युः, मगा। इला; गमयति, अययति, ईयते, जिगमिषति । Twith अधि 21. to study. अधोते, अध्येता, अध्येप्यते; अध्यगीप्यत, मध्यप्यत; अध्येपीए, अधिजगे: अध्यगीष्ट, अध्येयः; अघीतः, अधीन्य, अध्येतुम , अध्यापति, अधीयते । रम् 1. P. to wish. इच्छति, पपिता, पटा; एपिष्यति, ऐशिष्यत्. इप्यात्, इयेपः ऐपीत्, इष्टः, एपिस्या, इष्ट्वा; एपितम् , पपयति-ते, इप्यते. एपिविषति । इप 4 P. to go. इध्यति, पपिता, इयेष, ऐपीन्, इपितः। ईक्ष 11. to see ईझते, ईक्षिता, क्षिप्यते, ऐक्षिष्यत्, ईक्षिपीष्ट, क्षाञ्चक: ऐतिष्ट, ऐक्षिपानाम, ऐक्षिष्टाः, इक्षितः, ईक्षयति-ते, ईचिक्षिपते। ई 2 A. to praise. ईट्ट, इंडिता, ईडिभ्यते, ऐडिष्यत, इंडिपोष्ट, ईडाचक्र, ऐडिट, इंडितः, ईडयति-ते, ईडयते, ईडिडिपते। ईर् ? A. to go to more. इत, इरिता, इरिष्यते ऐरिष्यत, ईरिपोष्ट, ईराञ्चक, ऐरिष्ट, ईरित:, रियति-से, ईयेते, इरिरिपति। ईय् 1. P. to enrg. इग्रंति, प्यता, यिष्यति, ईर्ष्याञ्चकार, ऐयोत्, इयित, यति-ते, यंते, इर्ण्यि. ईश् 2 A. to rule, ईटे, ईशिता, इशिष्यते, ऐशिया, शिपोप्ट, ईशाञ्चक, ऐशिष्ट, ईशिता, ईशयति-ते, ईश्यते । ई 1 A. to aim at. ईहते, हिता, हिप्यते. पेशिष्यत, ईदिपीष्ट, ईहाञ्चक, ऐहिष्ट, इहितः, हयति-ते, हाते, पिपति । ।

धातुकोप। ईजिहिपते। उज्छ 1,6 P. to glean. अति, इञ्छिप्यति, उछाच. कार: श्रीछोत् । उप 1, P.to bum, to punish. ओषति, ओपिता, भोपियति, भौविष्यत्, उध्यान्, भोपाचकार, उपोष, भोपीत्, ओपितः, उपितः, उपः, ओषति, उभ्यते, ओपिपिपति। अर्ण 20. to corer, to hhde. ऊर्णोति, ऊर्जाति, ऊर्णते; कर्णविता. ऊर्णविता, ऊर्णविष्यति-ते, अणुविष्यति-ते, मौविध्यत, ओर्णविध्यत्, औणुविष्यता ऊर्णविपीट ऊ विधीष्ट, अणुमाय, अनुश्रीविष्ट, औ थिए,यते 1 P. to go to get. 3 P. to go. मृच्छति, इयत्ति; अर्ता, आरिता, भरिप्यति, भारिष्यत अर्यात्, मार, थापीत्। ऋतः, ऋत्या; आर्ययति-ते, भर्यत, अरिरिपति। मध 4 P. ko prosper, to please. अध्याति, मधिता, अधिष्यति, मानध, भात् , ऋदः, या, अधित्या, अधितम्, अर्धति-से, अध्यते; अदिधिषति, ईसति । 29 P. to go. ऋणाति, भरिष्यति, भरीष्यति रात्, भराऽचकार, आरीत, ईर्णः । पध् । A. to grow, to prosper. पधने, एधिता, पधिष्यते, ऐधि यत्, पधिषीष्ट, पधाश्चक, ऐधिष्ट, एपित्तः, पधयति-त, एध्यते, दिधिषते । with उप-उधते कए 1 P. to ery in distress. कणति, कणिता. कमिष्यति, मकपिाध्यत्, कण्यात्, वाण, अफणीत, मकाणीत: कणित, कणयति-ते, कण्यते । पथ 10 U. to tell. बथयति, कथयिता, कथयिष्यति, प्रकथयिष्यत्, मध्यात्, कथयिषीष्टः कथमाञ्चकार, अचका. - - - ५७२ व्याकरण-कौमुदी। त्-त, कथितः, कथ्यते, चिकथयिषति । कम् ! A. to desire. कामयते, फामयिता, कमिता फामयिष्यते, कमिप्यते, अकायिष्यत, अकर्मायध्यत, कामयि- पोट, कमिपीट, कामयाश्चक, चकमे, भीकमत, अचमत्- फान्तः, कायित्या, कान्त्या, फामित्या, कामयितुम् , काम्यते, फम्यते; चिकामयिपते, विकमिपते; चम्यते । कम्प 1A. to shake, to tremble. फम्पते, कम्पिता, फम्पियते, अकम्पियत, कम्पिपीट, चकम्पे, अम्पिट, फरिपतः, कम्प्यते, विकम्पिषते। कर्ण 10 U. to picrce. फर्णयति-ते, कविता, कर्णयिष्यति-ते, भकर्णयिष्यत्-त, कर्णयाञ्चकार, भयकर्णन-त । कल 10 t. to go, to count कलयति से, शलयिता, फलयिष्यति ते, भालयिष्यत्-स, कलयाशकार. भवफलत, फलितः। फा 1 P. to desire, to wish. काशति, ativar काक्षिण्यति, अफाक्षिष्यत् , काया , यक्ष, शीत, काशिता, फशियति-ते; काश्यते, शिक्षिति। काय I+A. to shine. फाशते, कायने, काशिता, काशिने, काशित, काशियो, गा, भाई, मकाशिष्ट काशितः, काशपति-से, मिकाशित । काम् ।... to cough. फाम का कातिल, कि.tocurr. निमिति,AAPा, विकिnि. ति, भविकिमियत, मिलिमाTET, fafarin. fafarm. निसियन, निवि, falential र .in be angry. पुर, कोकिना, यिनि, (Bhenा)।

धातुकोष। ४७३ अकोपिष्यत, कुण्यात् , चुकोप, भकुपात्, कुपितः, कोपयति-ते कुप्यते, चुकोविपति, कुपिपति । कुस् 4 P. embrace. कुस्थति, फोसिता, कोसिष्यति, अकोपिष्यत् , कुस्मात् , चुकोस, अकुसत् कुलितः, फोसपति-ते कुस्यते, चुकोसिषति, चुकुसिषति । कुज् 1 P. to coo. कूजति, कृजिता, फजिष्यति, अकृजि. प्यत् , फुज्यात् , युफूज: अकुजीत् , कुजितः, फूजयति-ते , कृज्यते, चुकूजिपति । रु 8 Uto do. करोति, कुरुते; कर्ता, करिष्यति-ते, भकरिष्यत्-त; क्रियते, क्रियात् , कृषीष्टः, चकार, चक्र, अकार्षीत्, भकृत; कृतः, कर्तुम्, फारयति-ते, निफीपति ते, वेकीयते। कृत 6 P. to cut. कृन्तति, कतिता, फत्तिष्यति, फस्यति, भकतिष्यत् , अकस्य॑त् । कृत्यात् , चकत्त, अफत्तीत् , छत्तः, फत यति कृत्यते; चिकत्तिपति, विकृत्सति । पलप् 1 A. to be able. कल्पते, कल्पिता, परिपथ्यते, फलप्यते, अकल्पियत, अकरप्स्यत, कल्पिषीष्ट, पलप्सीप्ट, यालपे; अपलपत् . भकल्पिष्ट, अपलप्त, फपितुम् , फल्पनुम् । फरूपयति-ते, कल्प्यते; विकल्पिषते, चिक्लप्सते.ति। पृश् 4 A. to become thin. कृश्यति, फशिष्यति, चफर्श, अकृशत्। कृप् ! P. to draw, to plough. कर्षति; फी, प्रष्टा कदति, प्रक्ष्यति, अकक्ष्यत् , अश्यत् । कृप्यात् , यसप; काक्षीत, अफाक्षीत् , अकृक्षत् , कृष्टः, कर्पयति-ते, कृप्यते, वहति । कृषU. to plough. रुपति-ते, कयति-ते, प्रक्ष्यति-ते, कश 1 P. to cry, to call. फ्रोशति, प्रोटाकोश्यति, अफोक्ष्यत्, श्यात्, चुमोश, भक क्षत्, मार; मोशयलित, ४७४ ध्याकरण-कौमुदी। रुष्यात् , कृशीष्ट । फ6 P. to scatter. किरति, करिता, फरीता, करिष्यति, फरीष्यति, कोरात्, चकार, मकारीत् , कीर्णः, कारयति-ते, कीर्यते, चिकरिपति। फत् 10 U to sound. कीर्तयति-ते, कीर्तयाशकार-वन कोर्यात् , कीर्तयिपीट, मचीकृतत्-त, अचिकीर्तत् त, कीर्तितः, कीतिः, कीर्त्यते। फन्दु I P. to cry मन्दति, कन्दिता, क्रन्दिष्यति, मन्दि- प्यत् , मन्यात् , चक्रन्द, अक्रन्दीत् , ऋन्दितः, क्रन्दयति-तै, कन्यते, चिकान्दिपति, चामन्यते । क्रम् 1 U. and P. to walk. कामति, फ्राम्यति, क्रमते; फमिता, मन्ता; मिष्यति, स्यते, अशामिप्यत, अस्पत; क्रम्यात्, सीट, चक्राम, चक्रमे, अक्रमीत्. अस्त, क्रान्तः, कमयति-ते, विक्रमिपति, चिक्रसते। फ्री 9 U. to buy. फ्रोणाति, क्रीणीते, ऋता त्यति-ते, कीयात् , क पीष्ट, चिकाय, चिक्रिये; मकपीत् , अकए; क्रीतः, कापयति-ते, मीयते, चिकीति-ते। की 1 P. to play. फ्रीडति, कोडिता, मोडिष्यति, भक्रोहिण्यत् , क्रोड्यात् , चिक्रीड, कोडोत् , कोडितः, कीडयति.ते, क्रोड्यते, विक्रीडिपति । कुथ् 4 P. to be angry. क्रुध्यति, क्रोद्धा, क्रोत्स्यति, भकोत्स्यत् , अध्यात् , चुमोध, मधत् , सः, कोधयति-ते, फुध्यते, चुरसति। - । चुप क्षति।

धातुकोप। ४७५ जम् 1 & 4 P. to be tired. प्लामति,साम्यति, कामिता, मध्यति, भक्तमिप्यत् , लम्यान् , चाम, भलमन् , शान्ता, लम्यते, चिलामिपति। हिर 4 A. to be afflicted. किश्यते, क्लेशिता, फ्लेशि- प्यते, पशिष्यत, मलेशिपीए, विहिरो, भक्लेशिष्ट, शिरः, विश्यते, चिक्लिशिपते, चिक्लेशिते । लिए 91. to distress हिनाति; फ्लेशिता, प्रदेश, फ्लेशियति, घलेश्त्यप्ति, क्लिश्यात् , चिपलेश; आपलेशी, महि- क्षत, चिलिशिपति, विषलेशिपति, चिशिक्षति । सम् 1 A. to bear. क्षमते, क्षमिता, क्षमा, मिप्यते संस्थते. क्षमिपीट, क्षसीए, पक्षम, मक्षामिए, क्षम्ता समितः, समयति, सम्यसे; विशमिपते, विक्षसते। क्षम् + P. to endure. साम्पति, क्षम्यान, यक्षाम, भक्षमता सर। . to flow. रति, सरिता, पक्षारिश्या . शान् रक्षार, क्षारीत् , सरितः, क्षारपति, सते, यिक्षरिवति। क्षल 1", to wash, सलति, चशाल, भागलात् , (like क्ष) । सन् 10 I'. to nath. झालपति- शालयाञ्चकारगणे, भविक्षलतू-त । सि1.5.5.9.P.सपति, सिपति, नीति, सिमाति, रा, क्षेप्यति, पायात् , दिक्षाय, भारत सोपः, नि:, गपति, सीपते, विशीपति। हिप् 47.6, लिपति, सिरहिन होना, नि, स्पो. शियात् , सीर, मिझेर, भोप्सी. ra, अमः, सेपपति, सिमत, गिक्षिप्सति। घ70, to pound, to gand पुनधि, ने. शाला, ६ शाहरण-मोगुना मोति-से. अपार, द. मनात, मझौरमीत्, मलत, भुतः, झोति, मान, गति से। धम् 4 to be hungry, मुध्यति, मोखा, झोरम्यति, wirent , पार, मनपान, धितः । शुम् 1.1, 4.9 to disturb शोमते, शुभ्यनि, शम्नाति, सोगिता, शामियान, मोमिनार, नभ्यान धुभे, घशोम भलोमिष्ट, मानमत्, ममोमीर , क्षय, क्षमितः, शोभयनि से शुम्यते, गुभुमिगत्ति, गुभुमिपते.ति। पपद 10 U. सपति-ते, मण्डयामास, अवषण्डत, गण्डितः। गन् I U, to dig बनति-त, प्रनिता, अनियतिने, मस- निष्यन् त, सन्यात् , सायात् , सनिपोष्ट; यमान, यख्ने, भख. मी , भग्नानीन्, मवानिष्ट, सातः, शानयति-ते, सन्यने, चियनिपति-ते। खाद 1 P.to eat खादति, स्वादिता, सादिष्यति, अखा- दिप्यम् , खाद्यात् , खाद, मसादीत् , सादितः, खादयति-ते, खाचते, चित्रादिपति। fag 6P. to afflict, 4&7A, to soffer pain ferrafa, विदते, खिन्ते; खेत्ता, सेत्स्यति-ते; चिद, विधिदे, भखैटसोत, अखित्त, जिन्ना, चिखिस्सति.ते । खेल ! P. 0 play खेलति, खेलिता, खेलिष्यति, अखे. लिष्यत् , चिखेल, अखेलीत्, खेलितः, खेलपति, विखेलिपति । ख्या 2P. to tell ख्याति, ख्याता, ख्यास्यति, मख्यास्यत् ख्यायात् , स्येयात् ; घख्यौ, अख्यत्, ख्यातः, ख्यापयति, स्या. यते, विख्यासति। गण् 10 U. to count गणपति-ते, गणयिता, गाय- .

धानुकोप। . पति-ते, गण्यात, गणयिपीट, गणपाशकार-चक; भाउ ते, अजगणन-त, जिगयिषति-ते। गद 1 P. to speak गदति, गदिता, गदिया दिष्यत् , गद्यात् , जगादः अगदी-यगादीत , गदितः यनि-ते, गधते; जिगदिपति। गम् 1 P. to go गच्छति, गन्ता, गमिष्यति, भगा गम्यात् , जगाम , अगमत् , गतः, गमयति-ते, जिमिपति। गर्ज, 1 P & 10 . to ronx. गर्जति, गर्ड गाजिता, निष्पति, गार्यात् , जगर्ज, भगीत् . गजितः, जिपति जागयते। गई, 1 AM 10 U. to censure गईत (गईति), ते, गर्दयिता, गर्दिता, गई रिप्यति-ते, गर्दिष्यति; गर्दा चकगहिपीए, जगह-जगद, अहिए, मजग-1, जिगईपिपति-ते, निगदिपति प्राद!.., to batbe गादते, गादिता, गादा गा पास्यते; गाविषीर, घाशीष्ट; जगा; भगाहिए, मगाद:, जिगाहिपते, शिधारने । गुस् । P. to defend, conceal. पोपायति गोप गोपिता, गोप्ता, गोपाविष्यति, पोपियति, यो गोपाम्यात् , गुप्याम् , गोप, गोपापाशकार, भगोष भगोप्सीत् , गोपायित., गुप्तः, जुगोपपिपति, बा गोपिपति, जुगुप्सति। गुह 10. to corerto keep reent. गानित। गोरा, हिप्पति-से, पोश्यति.ते. गुणात, गुहिर ! अगर, उगुहे भगुडीद, माहिए. मगुस-स, माह - गुग में गुणो, मानिने। LI in watlny. ft गिनत गरिया, ता, rfornt, ram free. निगनियति, गलीयत. iterin . नगार. जगात. tim, मगानी ; गीर्ण.. ग. Enfगी, गिनिनि, निगरगति । ग.teek. गुणागि, गरिमति गरयति (ep!! Ithanगानि. गागा, गामति, मगायत् . गा, जगी, मगामी मौत, गीतिः, गापपति ते, गीगने, निगा। मग । Sto thenit to twine. अनयते. अन्यिता, प्रन्यि. यने, भगिया जमान्य, प्रनिगट, प्रनियत, ग्रन्थति, प्रने, निग्गिने। प्रय,to tre. प्रनाति, प्रधान, (लोर दि) मग्रन्थीन् । प्रस् I A. to swallow. प्रमने, प्रतिता, प्रसिध्यते, भासियत, प्रसिपीट, जनस, भग्रसिष्ट, प्रस्ता, प्रप्तित्या, प्रस्त्या. ग्रामपति-त, निमासिन। प्रह१ . to take. गृहाति, गृहीते; प्रदीता, प्रहीप्यति-ते, गृह्मात् , प्रदीपोएजग्राह, गृह, अग्रहीत, महीट, गृहीतः, गृहीतुम, गृह्यते, जिघृक्षति-ते। ग्ल IP.to be weary, ग्लायति, ग्लाता, ग्लास्यति. भग्लास्यत; ग्लेयात्, ग्लायात्; जग्ली, भग्लासोत. ग्लानः, ग्लानिः, ग्लापयति-ते, ग्लायते, जिग्लासति । LA, to happen, घटते, घटिता, घटिष्यते, अघटि- प्पत्, अधादिप्यत; घरिषीष्ट, जघटे, मघदिष्ट, घटितः,घटयति-ते, जिटिपति। घु I P, to declare, घोपति, घोपिता, घोषिष्यति, अघो।

धातुकोष। ४७६ पिप्यत्, घुष्यात, जुधोप, अधुपत्, अघोषीत् , घोषितः, घुषितः, घोषयति, घुष्यते, जुषुपिपति । घुए 10 U, to proclaim aloud, घोषयति-ते,घोपयिता, घोपयिष्यति-ते, धुष्पात्, योपयाञ्चकार-चक्र अजुघुपत् घुषितः, घु, घोपयति, धुष्यते, जुधुपियति । मा IP, to smell, जिप्रति, प्राता, प्रास्यति, अधास्यत्, घायात्, J यात्, जमो, अधात्, भन्नासीत्, प्रातः, घाण:, मापयति-ते, प्रायते, जिप्रासति। चकार 20, to shine, चकास्ति-ते, चकासिष्यति-ते, चकासिता,वकासाञ्चकार-मास-चक,चकासीत्, अचकासिष्ट्र, सकासितः, चकासयति-ते, चकासिपति। चक्षु (with आ) 2 A, to speak, चष्टे, ज्याला, कशाता, ख्यास्यते.ति, शास्यते-ति, ख्यायात्, ख्येयात, ख्यासीए, फ्शायात्, कशेपात्, कशाप्तीए चचक्ष, धख्यौ, यख्ये, चशी, चकी, अख्यतत्-अशासीत, अक्शास्त, रूपात:, व्यापयति ते, क्शापयति-ते, विख्यासते.ति, विक्शासते-ति । सम् 1 P, to eat, ( with at ) to drink, थारमति, आयमिता, भामिप्यति, आववाम, भाचमीत्, चान्तः, चान्स्था, चमित्या, चिचमिति। घर 1 P, to walk, चरति, चरिता, चरिष्यति, भवरिष्यत्, चात्, चार, अचारीत, चरितः, चारपति-ते, शर्यते, विचरिपति। चट् 1 P, to go, चलति, वलिता, बलिष्यति अचलिप्यत्, धयाल, अचालीत्, चलित; वलयति, चालति.ते; चिचरिपति। चिU, to collect, विनोति, चिनुने, चेता, चेष्यति-ते. चीयात, चेपोष्ट, चिकाय, विद्याय, विक्ये, विध्ये ध्याकरण कीमुसी। मोटा मिः यापयति, यापपति, शीयने, चिपति-तं, गिकीरतिरी चिन्त 10 U, to think चिन्तयति-से, चिन्तयिमा, चिन्तयिष्यति-ने, गिरयात्, चिन्तयिष्ठ चिन्तयाध्यकार-चत्र, भचिन्तत्-त, गिन्तितः, चिन्तयित्या, चिन्दयते, चिचिन्त- विपति, चिचिन्तिपति। गुर 10 V, to steal,योरयति-त, चारयिता, योरयिष्यति. ते घोात्, चोरयिरीष्ट; चोरयान्चकार चन, मयूचुरत्-त, चोरितः, घोयिस्या, चोर्यते, च्योरयिषति-ते। घेट 1 A, to strive, चेपुते, येगिता, चेटिष्यते, चेष्टिपोट्र, चिचे, मचेष्टिट, चेष्टितः, चेप्टयति, चेप्टयने । घ्युत् 1Pto flow, to drop down, व्योतति, च्यो. तिता, ज्योतिष्यति, व्युत्यात्, चुन्योत; मच्युतत्, अव्योतीत्, च्युतितः, ज्योतितः, च्योतयति-त, चुम्योतिषति, चुच्युतिपति । छन् । & 10 U, to cover, छदति.ते, छादयति-ते; छदिता, छादयिता, छदिष्यति-ते, छयात्, छाधात्, वच्छाद, बच्छदे, छादयाशकार-चक मच्छवीत् , अच्छादीत् . मच्छदिष्ट, अवि. चवदत् ; छन्ना, छादितः; चिच्छदिपति-ते, विच्छादयियति-ते। छिद् 7 U, to cut, छिनत्ति, छिन्ते, छेत्ता, छेत्स्यति-ते, विधात् , छेत्सीए; विच्छेद, विच्छिदे, अच्छिदत्, मच्छेत्सीत्, मच्छित्त; छिन्नः, छेदयति-ते, छिद्यते, विच्छित्सति-ते। ज 2 P, to eat, जक्षिति, जक्षिता, जक्षिप्यति, जश्यात्, जजक्ष, जजक्षुः, मजक्षीत् , जक्षितः, जक्षयति, जश्यते, जिज. क्षिपति। जन 4 A, to be born, जायते, जनिता, जनिष्यते, जनयिषीष्ट, जसे, अजनिष्ट, जात, जनयति, जायते, अन्यते, धातुकोष। ४८१ जिजनियते। जप 1 P, to mutter, अपति, पिता, जपियति, जप्यात् , जजाप, मजपीत, भजापीत् । जपिता, जापयति से, ज्ञप्यते, जिज्ञपिपति। जाय 2 P, to wake, जागत्ति, नागरिता, नागरिष्यति, जागात्, जजागार-गर, जागरायका मजागरी, जागरितः, मागयंत, जिजागरिपति। जि !", to conjver, जयति, जेता, ओप्पति, मजयन्, ओयाम् , निय, मजेत, जितः, जापति-त, जीयने, जिमीपति। जीयP to lire, जीपति, सीपिता, जीविध्यति, भजीवियत, मध्यात्, निजीय, मजापान, जापितः, मोषयति-ते, जोयते. जिजीरिपति। जAP.to grow old, जीये ति; शरिमा जसा, रिण- ति, जरोप्यति, जीत जमार, महारी, प्राण : मो. जयति-ते, गायत; जिजस्पिति, fraini, शिजीवन 19.10 knon, मानाति, मामी, मा, भास्पति-त, शायात्पा, मासो जनों, और ममासी , MA: मापयति-ने, अपपनि ते. साधते, मिति पर 1P. to be hot with imer or Taruen. मरति, सरिता, गरिष्यति, भान्, मार, AAItn. पूर्णः, गरितः, सरपनि, शिरिपनि। सर"to burn, स्पति ग्यमिता, रिपति, सल्यान, माल, मशाली, जारिता सात परिने, सल्याने, लिपति। 1134.1.tilm. २, दिना रवि ध्याकरण-कौमुदी। हायपीट, fel. अयिए; इयितः, डीनः, डाययति-ते, विडयिषते। टीका IA, to go to approach, ढोकते, दौकिता, दीकिष्यते, दौकिपीए, डुढोके, भदौकिष्ट, दीकितः, दोकयति. ने. दौययते, डुढाफिरत । सन् 1 & 5 P, to cut to round, तक्षति, तक्ष्णोति, तक्षिता; तक्षिष्यति, तश्यति, तश्यात् , ततक्ष, अतक्षीत् , कष्ट, तक्षित्या, तितक्षिपति। सन 8 U', to spread, तनीति, तनुते; तनिता, तनिष्यति- ते; तन्यात्, तनिपीए; तनान, तेने, अतनीत्, अनानीत्, अतनिष्ट, अतः, ततः, तनित्या, तानयति-ते; तन्यते; तायते, तितांसति-ते; तितंसति-ते, नितनिपति-ते। त 1 P, to shipe, to eat, तपति, तप्ता, तप्स्यति, तप्यात् ; तताप, तेपतुः; मताप्तीत् , तप्तः, तापयति-ते, तप्यते, तितप्सति। तम् 4A, to trouble, तप्यते, तप्सीए, तेपे; तेपाते; मता। त1 P, & 10 1, to threaten, तति, तजयते तर्जिष्यति, तर्ज यिष्यते; ततर्ज, तर्जयाक, अतीत्, मततर्जत, तर्जितः, तितजिपति । तड् 10 U, ताडयति, ताडयिता. ताडयिष्यति-ते, ताड्यात्, ताडयिपोष्ट; ताडयाचकार-चक्र, अतीतइत्-त; ताडितः; साइ. यित्या, ताझ्यते । तुद् 6, to give grin, तुदति, तुदते; तोता, तोरस्पति. ते तुयात् , सोत्सीष्ट तुतोद, तुतुबे, भतोत्सीत्, मतुत्त, नुन्ना, तोदयति-ते, तुतुत्सति-ते। तुल् 10 U, to weigh, तोलयति-ते, तोलयिता, तोलपि.

धातुकोए। ४८३ - प्यति ते; तोल्यात्, तोयिपीए; तोलयाञ्चकार यक, अतू तुलन- त, लोलिता, तुतोलायति । तुम् 1 P, to be pleased, तुष्यति, तोटा, तोक्ष्यति, मतो. क्ष्यत तुष्यात्,तुतोप,अतुपत, तुः, तोपयति-ते,तुप्यते,ततुक्षति। तुप । P, to become satusfted, तृप्यति, तर्पिता, तप्ता, घप्ता; aदिप्यति, तप्स्यति, अप्स्यति; तृप्यात् , ततर्प, अतृपत्, अतपत्, अत्राप्सोत , सतासीत्। तृप्तः, तपितुम्, तर्पयति-ते; तितविपति, तितृप्सति । 11 P, to eross, नाति; तरिता, तरीता, तरिष्यति, तरी. स्थति; तीर्यात्, ततार, भतारीत्, तीर्णः, तारयति-ते, तीर्यते; तितीति, तितरपति, तितरीपति। स्पज 1 P, to abandon, त्यजति, त्यक्ता, त्यक्ष्यति. त्यज्यात, सत्याज, अत्याक्षीत्, त्यक्तः, त्याजपति.ते, त्यज्यते, तित्यक्षति। प्र! Ato be ashrmed, अपते, पिता, प्रस्तापिप्यते, चप्स्यते पिपीट, प्राप्तीप्ट, पे; अत्रपिष्ट, मत्रप्त, अतः प्या पित्या, अपर्यात ते, तिपिषते । प्रस् 1 & 4 P. to lear, सति, प्रस्थतिः असिता, प्रसि- ध्यति, स्यात्, तत्रास अत्रासीत्, भत्रसीत, स्त:, सित्या, श्रासयति-ते, त्रस्यते, तिप्रसिपति। IA.to prateet, प्रायते, पाता, प्रास्यते; अप्रास्यत, चासोट,तरे,भवास्तशत:,त्राणापति-ते.त्रायते,तिशास। स्वर ! A. to hurry, स्वरते त्वरिता, त्वरिष्यते, त्वरिपीए, सत्वरे, अस्वरिष्ट, त्वरिता, तुर्णा,त्यरयति-ते,त्यर्यते,तित्वरियते। पण्ड् 10 U.topunish, दण्डपति-ते, दण्डपिता, दण्डयि- शति-ते, दण्डयिपी, दण्डयाकार-च, अददाइत्-त । ६ .

तुद् 6U, to give pain, तुदति, तुदते;तोत्ता,तोत्स्यति- ते; तुद्यात्, तोत्सीप्ट; तुतोद, तुतु मतोत्सीत्, मतुत्त, तुन्न, तुल् 10 U, to weigh, तोलयति-ते, तोलयिता, तोलवि. शाल.कोणती friig. fri. र ति, ता. डापति ने, दि। टीम I. to go to apprnch, टोकने, हौकिया, दौरिया टीका मयि दीकिमः, टोकपति. मेहीमाग, तोकिला स145.to cat wound, हानि, मरणोति, fatafireनिमयति मात्र ARN, मतली,, समिना निशिता तन81) great, गीति तनु निता, नियति. मे.म्यान, निनीट समान. तेने. मानीन्, अनानी, अनिष्ट मत, रा. तामिग, तानाति-ने, तन्यते, तापते, तितासति-ते; तिमति से, निजनियनि-। त IP, to shine, to eat, तपति, नप्ता, हास्यति, प्यात्मताप, तेपनुः: मताप्सीन , तप्तः, सापयति-ते, तप्यते, तितासति। त+A. to trouble. सध्यते, तप्सीट, तेपे, तेपाते; अतत। स, & 10 .., to threaten, सति, सर्जयते; तार्जिष्यति, तर्जयिष्यने; ततर्ज, तयाक, भतीत्, अततर्जत, तजितः, तितजिपति। तड् 10 U, ताडपति, साइपिता. ताइयिष्यति-ते, ताइयात, ताडयिषोष्ट; ताडयाचकार-चा., भीतडत्-त; ताडितः; साड- यिस्था, तायते । तोदयति-ते, तुतुत्सति-ते।

धातुकोष। ४८३ ते.ते; तोल्यात्, तोलयिपीठ; दोलयाञ्चकार-चक्र, भत्तुलत्- लितः, तुतोलपित्ति। तुम् ! P, to be pleased, तुप्यति, तोप्टा, सोश्यति, मतो. तुच्यात्,तुतोप, अतुपत्,तुष्टः, सोपति-ते,तुप्यते,तुतुक्षति। प् । P, to become sansised, तुप्यति, सविता, तप्ता, सविपति, तप्यति, अत्यति; तृप्यात्, ततर्प, मतपत्, त्, भप्राप्सोत् , मातीत, गृप्तः, प्तर्षितुम्, तर्पयति-ते; पति, शितृप्सति। 1P, to cross, भगति: सरिता, तरीना, रिपति, तरी. तीर्यात्, तार, मतारीत, ती, तारयनि-ते, वीर्यत, ति, तितरिपति, तितरीपति। ज11 to abandon, त्यजति, त्यना, स्यारयति, र, तस्याज, प्रत्याशीत्, स्पा, स्याजयति से, स्यश्यते, ति। to the ashomed, पले, अपिता, पता, पियते, प्रविधी सीट, पे, प्रत्रपिष्ट, भरत प्रप्त उपयनिते. सिविपत। 1441.toler, अति, स्पति, सिता, प्रसि- स्यात् , सास, मासीन्, मरसात, नसिला, ते, म्यते, लिसिसि ... torroteet, पाप, प्राता, मान, साम्पा प्रेमावापापयनि-नापन, निवासी 1.1. to hurry.त्याने सरिता,हारिष्यत्यािर. रिए,हरितार्णधारपतन, त्यतिपरिष OFto punsa, पति ने दापिता पापीयाकार परमार ते; तुधात्, तोत्सीप्ट: तुतोद, तुतुदे, भतौरसीत्, भतुत्त, तुन्न, तुल 10 U, to weigh, तोलयति-ते, तोलयिता, सोलपि. की। airig. furi. fre, tim, . fal दौर। igner Parth. दोने, feer गिरि गीति, पिस कपलि. दोप, किता 18Shens th wound, नागि, सणोनि, nfirmafirma, Amमननीत.तर. nfirart, fanfirmi सन 8 pread, नीति, नुननिता, नियति. मे. पानितीर मान. मेने, गनी, भतानी, मतनिष्ट मार, निग, मानयनि-जनते, तापने, नितांसतिन्नः गितमतिरी, निजनियमिग । त" to ahine, tort, ति, तप्ता, तप्स्यति. नया साप, रोपनुः: मताप्सीत् , तप्तः, पति-ते, तन्यते, शिप्सति। त+Ato trouble. सध्यने, तप्सार, ते, तेगते; मतता सम् ।.& 10.1 to threaten, सर्जति, सर्जयते; सर्जियति, सजयिष्यने नत, तर्जयाक, मतजीत्, मततर्जत, तजितः, तितजिरति। तद् 10 , ताडयति, ताहपिता, ताइविष्यति-ते, तायात, ताइयिषीट; ताडयाचार-चा, भतीतइत्-त; ताडितः; ताड. यित्या, तान्यते। तुद् 6U, to gire gain, तुदति, तुदते; तोत्ता, तोदयति-ते, तुतुत्सति.ते। तोत्स्यति- घातुकोष। ४८३ प्यति ते; तोल्यात्, तोलायपीठ; तोलयाञ्चकार-चम, भतू नुसत्तू- त, तोलितः, तुतोलयिषति । तुर 1 P, to be pleased. तुभ्यति, तोटा, सोक्ष्यति, सतो. श्यत्,तुष्यात्, तुतोष, अतुपत.तुष्टः,तोपपति-ते,तुप्यते,ततुक्षति। तुप् ! P, to become satusfied, तृप्यति, तर्पिता, तप्र्ता, car; पिप्यति, सयंति, प्रास्यति; तृप्यात्, सतर्प, अतृपत्, अतीत्, भवाप्सीत् , ताप्लीत्। तृप्तः, तर्पितुम्, सर्पपति-ते; तितविपति, तितासति। P, 10 cross, नाति; तरिता, तरीता, हरिष्यति, तरी. स्थति: तीर्यात्, सतार, मतारीत्, ती, तारयनि-ते, तीप्यते, हितीप्ति, तितरपति, तिरीपति। स्पज् 11, to ahindon, स्यजति, स्पना, त्याति, स्पस्यात् , तत्यान, अत्यासीत् , त्यक्तः, त्याजयति ते, स्वायत, तित्यक्षति। अप् । To be ashami. पते. अपिना, प्रमापियते, प्रफ्यते अपियोष्ट, ताट.भत्रपिष्ट, ममत्रता अपित्या, अपनते. तिप्रपिचत । प्रस् 1 4 . to lear सति सम्पति, प्रमिता सि. पति, स्यात्, तास, भवासी, भरमीत, पर, ram, पासपति-से, मयते, विनिता nnrotant. आय.RTNet twimm.

सर्जियति, तर्जयिष्यते; ततर्ज, तर्जयाशक, मतजीत, मततर्बत, तुद् 6.togire pain, तुदति, तुदते; तोत्ता,तोत्स्यति. ते; तुधात्,प्तोरसीष्ट; तुतोद, तुतुदे, भतौत्सीत्, मतुत्त, तुन्न, तुल 10 U, to weigh, तोलयति-ते, तोलयिता, सोलयि. शारण-गोमुही। गित M, मपिया मितः नः, पति-ने, विधिमा टीम। .I, to go to approach, दोकने, दौकिता, दौकिमी. दौति र मोतिहाफितः दोकपति. होगपणे, किरता सा I & Stocurround, साति, तत्पीति, farति, राधाति, ध्यान, ता. मतभीन्.सर सरिया, निगशिपति। तन 81. to spread, नीति, नुने, तनिता, नियति. से. पात, तनिष्ट तमान, तेने. मानीट, अनानी, अतनिष्ट. मना, ततः. तनिया, नानपति-ते; तन्यते, तापते, तितासति-ते; तितसतित, नितनिपति-ते। तप, to shine, torat, ति, तप्ता, तप्स्यति, सप्यात् । तताप, तेपनुः; मताप्सीन , तप्तः, तापयति-ते, तप्यते. तितप्सति। तप्4.1. to trouble, तप्यते, सप्सीष्ट, तेये, तेपाते; अतत। त।". & 10 .I, to threaten, सर्जति, पर्जयते तजितः, तितजिपति । तड् 10 U, ताडयति, साहपिता. ताडयिष्यति-ते, ताड्यात्, ताडयिषीय; ताइयाञ्चकार-चक्र, अतीतइत्-त; ताडितः; साड. यिस्या, ताड्यते। तोदयति-ते, तुतुत्सति-ते।

धातुफीष। ४८३ प्यति.ते; तोल्यात्, तोलयिपीए; तोलयाञ्चकार-चक्र, भतू तुलत्- त तोलितः, तुतोलयिति । तुर 1 P, to be pleased, तुष्यति, तोटा, सोक्ष्यति, अतो. श्यत्,तुष्यात्,तुतीप,अतुपत्, तुटः, तोषयति-ते,तुप्यते,तुतुक्षति। तृप् । P, to become satusfied, तृप्यति, तपिता, तार्ता, प्रप्ता तपिप्यति, तस्य॑ति, अप्स्यति; तृप्यात्, ततर्प, अतृपत्, अतीत्, अत्राप्सोत् , अवाप्सीत्। तृप्तः, तर्पितुम्, तर्पयति-ते; सितवित्ति, तितृप्सति। तृl P, to cross, नरति; तरिता, रीता, तरिष्यति, तरी. स्थति; तीर्यात्, सतार, अतारीत्, तीर्णः, तारयति-ते, तीयेते; सितीति, तित्तरिपति, तितरीपति। त्यज 1P, to abandon, त्यजति, त्यक्ता, स्वक्ष्यति, त्यज्यात्, तत्याज, अत्याक्षीत्, त्यक्तः, त्याजयति-ते, त्यज्यते, तित्यक्षति। अप् ! Ato teashamed, पते, अपिता, प्रप्ता, अपिण्यते, आपल्यते पिषीय, अप्सीट; पे, अत्रपिष्ट, अत्रप्त प्रप्तः, प्रप्त्या, अपित्या, अपयति ते, तित्रविपते । प्रस् 1 &4 P. to lear, असति, प्रस्थति; असिता, प्रसि- पति, स्यात्, तत्रास अत्रासीत्, अत्रसीत्, प्रस्तः, प्रसित्या, पासपति-ते, त्यते, तिमसिपति। A. to proteet, प्रायते, बाता, कास्यते; अवास्यत, घासीट, तो,अत्रास्त;त्रात: घाणः धापयति-ते.त्रायतेतिचासते। स्वर ] A. to hurry,त्वरते, त्यरिता, त्वरिष्यते, त्वरिषीष्ट, तत्वरे, अत्यरिए, त्यरिता, तुर्णः,त्तरपति-ते, त्वय्यंते, सित्वरिपते । दण्ड 10 U.to puntsh, दण्डयति-ते, दण्डयिता, दण्डयि- पति-ते, दण्डयिषीष्ट, दण्डयाञ्चकारवा, मददण्डत्-al तर्जिष्यति, तर्जयिप्यते; ततर्ज, तर्जया, मतीत्, भततर्जत, तुद् 6U, to give pain, तुदति, तुदते; तोता, तोरस्पति- ते; तुद्यात्, तोत्सीष्ट तुतोद, तुतुदे, भतौत्सीत्, भतुत्त, तुन्न, तुल् 10 U, to weigh, तोलयति-ते, तोलयिता, तोलपि. ध्याकरण-कौमुदी इपिए, fri. भइपिता पिता, डीनः, डाययति-ते, विधि दी 1.), to go, to approach, दौडते, दाकिता, दौकियते, दौकिरोए हुदोके, गदीकिट, दौक्तिः, ढोकपति. ने, दोषयने, दुढाकिरता सन् 185P, to cut to wound, तक्षति, तश्योति, तशिता, शिष्यति, तश्त्यति, सत्या , ततक्ष, मतभीन् , तर, तक्षित्या, तिनक्षिपति। तन् 8 (', to spread, तनीति, तनुते सनिता, तनिध्यवि. ते; तन्यात, सनिपीट: तनान, तेने, अनीन्, अतानीत्, अतनिष्ट मतत, ततः, तनित्ग, तानयति-ते, तन्यते; तायते, तिनांसति-ते तितंसति ते, तितनिपति-ते । तप् 1 , to shine, to eat, तपति, तप्ता, तप्स्यति, तप्यात् : तताप, तेपतुः; मताप्सीत् , तप्तः, तापयति-ते, तप्यते, तितप्सति। तप् 4A, to trouble, तप्यते, तप्सीट, तेपे, तेपाते; भतात। त 1, & 10 1, to threaten, ति, तयते; तर्जितः, तितजिपति। तड़ 10 U, ताडयति, ताडपिता. ताडयिष्यति-ते, ताड्यात ताडयिपीट; ताडयाञ्चकार-चक्र, अतीतइत्-त; यित्वा, ताध्यते । तोदयति-ते, तुतुत्सति-ते । ताडितः; ताइ.

४८३ प् ! to beashamid, पत्ते, प्रपिता, प्रप्ताअपियर अपिषीय, प्रपीट: पे अप्रषिय, भरत प्रस्तावना 144P.tolear, सति, अत्यतिसितार धातुकोथ। ति.ते; तोल्यात्, तोलयिपीए; तोलयाञ्चकार यामतूतुरत्- तोलितः, तुतोलयिति। नु । P, to be pleased. तुभ्यति, तोष्टा, तोक्ष्यति, मतो. न,तुष्यात, तुतोप,अतुपत्,तुमः, तोपपति-ते,तुप्यते,तनुमति। तृप् । P, to become sattsfied, तृष्यति, तर्पिता, तप्ता, ; तविष्यति, यति, अप्स्यति; तृप्यात्, ततर्प, अतृपत्, ति, अत्राप्सीत् . याप्सीत्। तृप्तः, तपितुम्, तर्पपति-ते विपति, तितृप्सति। 11 P, to cross, गति: तरिता, रीता, तरिष्यति, री. 5 तीर्थात्, ततार, अतारीत्, ती, तारयनि-तै, तीर्यते, पंति, तितरपति, तितरीपति। 'यज 14. to abandon, त्यजति, त्यता, त्यति, त्, तव्याज, अत्याशीत्, त्यक्तः, स्याजयति-ते, पश्यने, इति। अपर्यात ते, तिपिपत ।

ध्याकरण-कौमुदी। दंश् 1 P, to bite दशति, दया, दंश्यति, पश्यात्, देश, अदांक्षीत्, दपः, दष्टुम्, दष्ट्या, दंशयति-ते, दश्यते, दिर्दशति । दम् 4 P, to conquer, to be tamed, दाम्यति, दमिता, दमिष्यति, दम्यात्, ददाम, देमतुः, अदमत्, दमितः, दान्तः, दमयते, only, दिदमिपति। दय 4 A, to pity, to protect, to give, दयते, दयिता, दयिध्यते, दयिपीट, दयाचक्र, अदयिष्ट, दयितः, दिदयिपते । दरिद्रा 2P, to be poor, दरिद्राति, दरिद्विता,दरिद्रिष्यति, दरिद्रयात्, दरिद्राशकार, ददरिद्री, भदरिद्रीत्, गदरिदासीत्, दरिद्रितः, दरिद्रयते, दिदरिद्रासति, दिदरिद्विषति । दल 1 P, to burst open, दलति, दलिता,ददाल, भवाली। द६1P,to burn, पति, दग्धा, वक्ष्यति, मधयत्, दह्यात ददाद, देहतुः; अधाक्षीत्, भदाग्धाम, दग्धः, दाहयति-ते, दह्यते, दिघक्षति दाP,& 3 U, to give, यच्छति, शाति, दसे, दाता, दास्यप्ति, देवात्. दासीष्ट, ददी, दे, दात, मदितः, पत्तः, दातुम् , दापयति-ने, दीयते, दित्सति से। दिय 4 1,to shine, to play, दीव्यति, देयिता, देविष्यति, नीव्यात , विदेष, दिदियतुः, अदेयोत , ता, नः, देवयति ते, वीप्यते, दुयु पति, दिदेविति । दिए 6U, to allow, दिशति-ते, देशा, देशपति-ते. विश्वान, दिशोष्ट, दिदेश, दिदिशे; मदिक्षत् त, विष्टः, विष्दा, रा. देशपति-से, दिश्यते, विदिशति-से । दी 4A, to shine, to burn, दीप्यते, दीपिका, र प्यते, पोनिपीट, विदीपे, मदीपिष्ट, दीपि, वीप्तः, दीपयति है, दीप्यते, दिदीक्षित।

धातुकोष। - दुद् 2 U, to milk, दोधि, दुग्धे, दोग्धा, धोक्षयति-ते: हुवात् , दुक्षिष्ट्र, दुदोह, दुदुहे, अधुक्षत्-त, अदुग्ध, दुग्धः, दोग्धुम् , दोहयति-ते, दुहते, दुधुक्षति-ते । टू ( with मा ) 6 A, to regard, आद्रियते, भादत्ता; भादरिष्यते, मादपीट, भादद; भादूत, भादपाताम् । आइतः, भादरपति-ते, भाद्वियते, मादिदरियो । दृश् 1 P, to see, पश्यति, द्रष्टा, क्ष्यति, दृश्यात् , ददर्श; अदर्शत, भद्राक्षीत् , दूधः, दर्शयति-ते, दृश्यते; विद्वक्षते। धुत् 1 A, to shine, घोतते, घोतिता, घोसिष्यते, घोतिषीष्ट, दिद्यु ते अद्योतिष्ट, अद्य तत् । घुतितः, योतितः, योतयति-ते दिधु तिपते, दिघोतिपते। द्रु 1P, to melt, to run, यति, द्रोता, द्रोष्यति, दुयात् , दुद्राय; अदुदुयत् , दुनः, दापयति-ते, टूयते, दुद्पति । दुद्द 4 P, to bear malice, दुह्यत्ति; द्रोहिता, द्रोग्धा, दोढा, द्रोहियति, धोक्ष्यति, दुह्यात् , दुद्रोह (दोहिय, दुद्रोद, दुदोग्ध-लिट्-थ ), अद्र हत् , दग्धः, द्रोहितम् , दोधुम: द्रोदुम् , दुहित्या, द्रोहित्या, दुग्ध्या, या मोहाति-ते, दुखते. द्रोहिपति, दुदुहिति । द्विर 2 U, to hate, टि, द्विः द्वथर, स्यति-ते; द्विष्यात् , द्वितीय; दिद्वप, दिद्विष, मदिक्षत्-त, द्विधः, एम् , द्वेषयति-ते, द्विष्यते, दिद्विक्षति-ते। था 3U, to usintain, दधाति, धते; धाता, धास्यति ते; धेयात् , धासोप्ट, घी, दूधे अपात् , अपितः, हितः, पाप- यति-ते धीयते, धित्सति-ते। धात् । U to run, पायति-ते, धाविता, घाविष्यति-ते, धाव्यात् , धाधिपीर; दधाव, दघाये; भयाधीत्, मधाविष्टः १८६ व्याकरण-कौमुदी। - धावितः, धोतः, घाययति-ते, दिधांविपति-ते । धु 5 U, to shake, धुनोति, धुनुते; धोता, धोप्यति ते धूयात् , धोपीट, दुधाय, दुधुवे, मोषीत् , अधोष्ट धुतः, धार यति, धूयते, दुधुपति-ते। धू 6 P, 5&9 U. धुपति, धुनोति, धुनुते, धुनाति, धुनीते; धोता, धयिता; धोष्यति-ते धयिष्यति-ते: धूयात् , धविपीप, दुधाव, दुधुवे अधावीत् , अधविष्ट, मधुवीत् धूतः, धूनः; धूनयति, धूयते, दुधूपति-ते। धृ 1 U, to hold, धरति-ते, धर्ता, घरिष्यति-ते; धियात् , धृषी, दधार, ध्र, अधापीत् , अधृत; धृतः, धारपति-ते, ध्रियते, दिधीति-ते। ध्मा 1 P, to blow, धमति, ध्माता, ध्मास्यति; मायात् । ध्मेयात्, दध्मी, ममासात् , मातः, आमापति, ध्मायते, दिमासति । ध्ये 1 P, to think of, ध्यायति, याता, ध्यास्यति; ध्यायात , ध्येयात् ; दथ्यो, मायासीत् , यातः, यापपति-से, ध्यायते, दिध्यासति। ध्यस् 1 A, to perish, पंसते, तिता, सिष्यते, ध्यसिपीट, दध्यसे, मध्यसत्, मध्यंसिए, ध्वस्त:; सिया, ध्यस्रया, सयति-ते, ध्यत्यते, विध्यंसिपते । ध्यन IP, to sound, to echo. धनति, ध्यमिता, ध्यनिष्पति, ध्वन्यात् , PEETA, मध्यनीन् , मध्यानी अनिता, भ्यान्तः; ध्यानयति.ने, विध्यनिपति। REP.to sound मदतिमरितामनामनादीन भनी । माद 1 P. to be pleased नग्दतिमलिना, नमिति, मन्याननमन, मनादौत, मन्दिता, पति-ने, ना, धातुफोप। ४८७ निनन्दिपति। नम् 1 P, to salute, नमति, नन्ता, नस्पति, नस्यात् , नाम, अनंसीत् , नतः; नामयति, नमयति. नम्रते, नि सति । नई 1 P, to roar, नर्दति; नर्दिष्यति, ननर्द, मनदीत् । नश् 4 P. to be lost, नश्यति; नष्टा, नशिता; मशिष्यति, नश्यति; नश्यात् , ननाश, मनशत् , नएः; ना, मशित्या; नाश. यति-ते, नश्यते, निनशिपति । न 4 U, to bind, नाति-ते, नद्वा, नत्स्यति-ते, नहात् , मत्सीय मनाह, नेहे; अनारसीत् , मन, नदः, नाहयति-ते, नाते, निनत्सति-ते। मिन्दु 1 P, to censure, निन्दति, निन्दिता, निन्दियति, नियात् , निनिन्द, मनिन्दीम्, निन्दितः निन्दयति-ते, निन्यने, निनिन्दिपति । नी 10, to lead. मपति-से, नेता, नेष्यति.ते, नीयात् । नेवीए निनाय, निन्ये, भनेवीत् . अनेट, नीतः, नेतुम् , नापति, मीयते, मिनीपति-ते। नु2. to praise. नाति, भविता, मविप्यति, नुनाय, मनापी , नुतः नापति ते, नुनपति । नुत 4 P, to dance, नरपति, नर्तिता नलिष्यति, नृत्यान्, मनत, अनीत् , मृतः, मतितुम् . नर्सयते; only. सत्यने, निनतिपति, निनृत्सति । प। to cook, to digest, पचति ते, पना, त्यति नं. पच्यात् , पक्षीट; पाच, पेचे; पपाशीत , भपका पार पपत्या, पराप्यः, पाययति-तं. पध्यते, पिपति। पट् । P, to read, पति, पटिता, परिप्यानि, पटगान् . पाठ, पेठनु भपडीत : मपाटी : पटिना, पाठयति-ने, पाने, यति-ते, पूजयाञ्चकारचक्र, अपूपुजव. पूजितः, पुपूजयिषति-ते। पूज 10 U, to worship, पूजयति-ते, पूजयिता, पूजयि- याकरण-मोगुस। fmहिता IP,tolall, कागि पनिमा, पनियनपटयान् : पतपेगा. सागर, पतितः, पानसे, पश्यने, पिसान, पिनियन प EAtog, प, पना, पास्यते, परसीर, पे, भावि. पन:, पाया, पाति-म, पिने, पिसने। पाto drink, पिपति, गाता, पाम्यति,पेयात्, पपी, भपात . पीतः, पातुम् , पायति-त. पायत, पिपासति । पाP.to protect, पाति, मपासीत. पायात् , पाल- पति.से, पायते। पाल् 10 to protect, पालयति ते, पालयिष्यति-ते; पाल्या. पालयिपीट पालपाशकार-यक, मपीपल, पालितः। पि 7P, to grind, पिनष्टि, पेश, पेक्ष्यति, पिध्यात्, पिपेष, पिणन् , रिटः, पेष्टुम् , पेपयति-ते, पिण्यते, पिपिक्षति । पी 10 U, to gire pmin, पोडपति, पोडयिष्यति-ते, पीयात् , पोडयाशकार-चक्र, भपीपिदत्-त, पिीडत्-त, पिपीयिति-ते। पुष् 19, 4, P, to nourish, पोपति, पुष्णाति, पुष्यति; पोपिता, पोटा; पोपियति, योक्ष्यति; पुष्यात्, पुरोष; अपोषीत, मपुपत् । पुपितः, पुष्टः, पुपितुम् , पुपति-ने, पुष्यते; पुपुषिषति, पुपापिपति, पुपुक्षति। 9 U, to purity, पुनाति, पुर्वात, पविता, पविष्यति, पयिपीट: पुपाय, पुपुये; मपावीत् , अाविष्ट, पूतः, पुपूपति-ते। T पूयात्, धातुकोष । ४८६ पूर 4 A, to satisfy, पूर्यते, परिता, परिष्यते. पुपुरे; भपुरिष्ट, अपूरि, पूर्णः, पूर्तः, पूरयति-ते, पुषिते । 5 P, to be satisfred, पृणाति, पर्ता, परिष्यति, पपार, सपार्षीत् । 49& 3 P. to thi, पृणाति, पिपत्तिः परिता; परीता, परिष्यति, परीष्यति, पूर्यात्, पार, अपारीत्, पूर्णः परितः, पारयति-ते, पूर्णति, पिपरिपति, विपरीपति । प्याय् 1 A, to grow, व्यायते, प्यायिष्यते, पिप्प, अपाय पीना, पानः। प्रच्छ 6 p, to ask, पृच्छति, प्रया, प्रक्ष्यति, पृच्छयात्, पप्रच्छ अप्राक्षीत्, अमाटाम्लुङ-ताम्, पृष्टः, प्रष्टुम्, प्रच्छयति-ते, पृच्छयते, पिच्छिपति-ते। प्रथ 10 U, to publish, प्रथयति-ते, प्रथयिता, प्रथयिष्य. तिते, प्रथयाचकार-चक्र, अपरथत्न, प्रथितः, पिपथयिषति-ते श्री 4 A, to frel sffeetion, प्रीयते, प्रेता, प्यते. प्रेषीष्ट, पिप्रिये, अप्रेट, प्रीतः, प्रेतुम् प्राययति.ते, प्रीयते, पिनीयते। प्रो 90to please, प्रीणाति, प्रीणीते श्रीयात्, पिट अप्रैपीत्। प्री 10 U, प्रीणयति, शीणयिष्यति, भीणयाञ्चकार-कः प्लु ! A, to float, to go प्लयते, प्लोता, प्लोष प्लोषोष्ट, पुप्लुये, अप्लोए, प्लुतः, प्लाययति-ते, प्लूर प्लुपते। फल । P. to result, फलति, फलिता, फलिप्य फाल, अफालीत; फलितः, फुल्ला, फालयति, फल्यते, पि पति। पन्ध् 9 P, to bind, मध्नाति, बन्दा, मत्स्यति, सन्ध्यः ४६० व्याकरण-कौमुदी। यवन्ध, समासीत्, यद्धः, बन्धयति-ते, यध्यते, विभत्सति । याथ् 1 A, to oppress, याघते, याधिता, याधिष्यते, याधिपोट, यबाधे, भवाधिष्ट, याधितः, थाधयति-ते, याध्यते, बियाधिषते। बुध् ! U, to know, योधति-ते, योधिता, योधिप्यति-ते; चुध्यात्, योधिपोष्ट; घुबोध, युबुधे; अबुधत्, अयोधोत्, अयोधिप्टः; बुद्धा; बुधितः; योर्यात-ते, युध्यते, युयुधिषति-से; चुपोधिपति-ते। घुघ 4 A, to know वुध्यते, योद्धा, भोत्स्यते, भुत्सीष्ट; अबुद्ध, अयोधि; युद्धः, योद्धम. युभुत्सते। घ्र 2 U, to speak प्रवीति-ते, आहा यक्का, पक्ष्यति-ते; उच्यात्, यक्षीष्ट; उवाच, उचे भवोचत्-त, उक्तः, वक्तुम्, पाचयति-ते, उच्यते, विवक्षति-ते। भश् 10 U, to eat भक्षयति-ते, मक्षयिष्यति, भश्यात्, मक्षयाञ्चकार-चम, अयभक्षत, भक्षितः, भक्षयितुम्, भक्ष्यते, सिमक्षयिषति-ते। मज् I Uto serve भजति-ते, मंका,पति-ते, मध्यात. मक्षीप्ट; यमाज, भेजे; अमाझीत्, अमक्त, मक्तः, मामयति-से, भग्यते, यिमक्षति-ते। मज 7 P, to break भक्ति, मका, भक्ष्यति, भग्यात, पमा, समाशोन्, मनः, मनपति-त, मायते, भिक्षति। मा 2 P, to shine माति, माता, गास्यति, गापात्, पी,' अमाक्षीन्, मातः, मापयति-ते, मायरो, यिमासति । मा IA, to speak मापते, मापिता, मानियने, भाषि. रोट, बमारे, ममापोट, भाषिता, मापयति, भायत, मानिपीट।

धातुकोष। भास.IA, to shine, मासते, यमासे, अमासिष्ट, like भिक्ष IA, to be मिक्षत, मिक्षिष्यते, मिक्षिपोष्ट, विमिश्ने, अभिक्षिका मिद् 7U, to break dong, भिनति, भिन्त; भेत्ता, भेस्थति.ते; भिवात् , भित्सीट; विभेद, यिभिदे, अभिइन् , अभेसीत् , भभित्ता भित्ताः भिन्ला, भेयः, मित्या, भेत्तुम् , भेदयति ते, भिद्यते, यिमित्सति-ते। भी ५P, to fear. विभेति, भेत्ता, भेष्यति, भीयात् : विमाय, विभ्यतुः विमयिय, विभेष, विभयाशकार, अभेपोत् । भीत:: मायपति, भाषयते, भीषयते; मीयते, विमीपति। भुज7,toent, to protect मुनक्तिः, भुरके, मौका, मोपति-ते. मुग्यात, मुसीट; युभोज, युभुजे. ममीक्षीत् , अभुक्ता भुक्ता, मोजयति-ते, मुज्यते, युमुक्षति-ते। भू।। . to be, मयति-ते, मयिता, मयिष्यति में भपात , भविषी पभूग, धभूः अभूत् , भमगिटः भूना, मायपति, भूयते, युभूपति। भू 1 & to u. to ndern भवति, भूत्यति-से, মুমিনি, সুযিনি- আলু , মূৰহিথ, ধ, মূল্য अकारचा भभूवीत् , भभूषत् । भृU, to nourish, to s! भरलिजे, शिमति, विभृते; मा, मरिष्यति त निपात्, भूपौर: मार, बी. विमराञ्चफार. मसापीत मभृतामतः मारयति.ने, भ्रिष बरिपति, पुहि-ते। भ्रम् I&to rosm, प्रमति, ग्राम्यति, सम्पति, मिना, मिष्यति, मापात् । बाम भभ्रमात्, मनमत् ।

शाकरण-कीमुदी। म्रानः, ममति, प्रभ्यते, पितमिति। मंश् । .. & P to foll, नशने, नश्यति, शिता, मशियनित, शिमोट, नश्यात् : यम्रश, यनशे: अनं शत् भन्न शिष्ट, गधरान् : म्रएः, मशिस्या, नंशयति-त, भ्रश्यने, यिन शिति-ते। म्रज 6 U, to try, भृन्नति-ते; मया, मा; प्रक्ष्यनि-ने मयति; भृपान् . मशीट, मनीय, पन्न, यमर्ज, यम्रज्जे, बमर्जे; मनाक्षात् , भगीन् । अभ्रष्ट, अमर्ष; मृष्टः प्रद्युम् , मर्दुम् । प्रजयति-ते, मर्जयति-ने; भृजने, यिनशति-ते, विमर्शति-तै; विनाविपति-ते, पिम्रजिपति-तं। म्राज 1 A, to shine, म्राजते, भ्राजिता, भ्राजिप्यते, म्राजिपीट; यभ्राज, ब्रजे; अम्राजिष्ट, भ्राजितः, म्राजयति-ते, भ्राज्यते, विमाजिपते। मदु + P, to be glad, to be mad, माद्यति, मदिता, मदिष्यति, मद्यात् , ममाद; ममदीत् , मत्तः, मदित्या, मदयति- ते, मद्यते, मिमदिपति। मन् 4 A, to think, मन्यते, मन्ता, मंस्यते, मंसीट मेने, भमंस्त, मत्तः, मानयति-ते, मन्यते, मिमंसते । मन्त्र 10 A, to advise, मन्त्रयते, मन्त्रयिता, मन्त्रयिष्य- ते, मन्त्रयिपीट, मन्त्रयाञ्चक्र, अममन्त्रत, मन्त्रितः, मिमन्त्रयिषते । मन्थ् 9&1P, to churn, मध्नाति, मध्नति; मथिता, मन्धियति, मथ्यात् , ममन्थ, अमनीत् , मथितः, मन्धित्या, मन्थयति-ते, मध्यते, मिमन्धिपति । मस्ज्6 P, to sink, मजाति, मङ्क्ता, मझ्यति, मन्यात्, ममग्न, माङ्क्षीत् , मग्नः, मज्जयति, मज्जाते, मिमक्षति । मा 2 P, to measure, माति, माता, मास्यति, मेयात् , धातुको। ४६३ ममी, अमासीत् , मितः, मापयति-ते, मीयते, मित्सति । मान् 1 A, to search, मीमांसते, मिमांसता, मिमांसिष्यते, रोमांसितीष्ट, मीमांसाम्बभूव आस-चक्र, अमीमांसीष्ट, मिमां- पेतः, मीमांसिपत। मार्ग 10 U, to seek for, मार्गयति-ते, मार्गयिता, यिष्यति-ते, मार्यात् , मार्गयिषीट; अममार्गत्-त, मार्गितः, उमागिपति ते मार्ज 10 U,to purify, मार्जयति-ते, मायिता: माात्, मार्जयिपीए; मार्जयाञ्चकार-चक्र , अममार्जत्-त, माजितः, मिमार्जयिषति-ते। मि 5 U, to scatter, मिनोति-मिनुतेमाता, मास्यति-ते; मीयात् , मासीट; ममी, मिम्ये; अमासीत् , अमास्त; मितः, माययति-ते, मीयते, मित्सति-ते। मिल 6 U, to join मिलति-ते, मेलिता; मिल्यात् , मेलि- पीट मिमेल, मिमिले; अमेलीत् , अमेलिए; मिलितः, मेलयति-ते, मिमेलिपति-ते। मुच् 6 U, to leare, मुञ्चति-ते, मोक्ता, मोक्षपति-ते; मुच्यात् , मुक्षीय मुमोच, मुमुचे; अमुचत् , अमुक्त; मुक्तः , मुक्त्या, मोचयति-ते, मुमुक्षति-ते। मुद् ! A, to rejoice, मोदते, मोदिता, मोदिप्यते, मोदि- 'योट, मुमुदे, अमोदिए; मुदितः-मोदितः: मोदयति. मुद्यते, मुमु. दिपते । मु9 P, to steal, मुष्णाति; मोपिता, मोषिष्यति, मुष्यात् , मुमोष, अमोपीत् , मुषितः, मुध्यते, मुमुषिपति । मुह + P, to faint, मुह्यति; मोहिता, मोग्घा.मोदा, मोहि- "प्यति. मोक्ष्यति; मुह्यात्, मुमोह, अमुहत् : मूढः; मोहित्वा-मुग्ध्या: . .

४६४ व्याकरण कौमुदी। मूदद्या, मोहयति-ते, मुहते; मुमुहिपति, मुमोहिपति, मुमुक्षति । मृ6 A, to die, म्रियते, मर्ता, मरिष्यति, मृषीष्ट, ममार, अमृत, मृप्तः, मर्तुम्. मारयति-ते, म्रियते, मुमूर्षति । मृग 10 A, to hunt, मृगयते, मृगयिष्यते, मृगयाऽचा अममृगता मृश् 6 IP, to toucb, to consider, मृशति, मी, प्रधा; मति, म्रक्ष्यति, मृश्यात्, ममर्श: भमाक्षीत्, भम्राक्षोत्, भ. क्षत् , मृष्टः, मर्शयति.ते, मृश्यते; मिमृक्षति । मृप् । ', to sprinkle, to bear, मति, मर्पिता; मर्पियति, प्रक्ष्यति, मध्यति; मृष्यात् , मम ममीत् , गृधः मृपित्या, मर्पिश्या, मर्पयति-ते, मृष्यते, मिमर्विषति । मृ + Uto suffer, to allow, मृष्यति-ते, मालपोए. ममृगे, भमर्षिए। यज 1 0, to worship, यजति-से, यटा, यश्यति से, ग्यात् , शीट, इयाज, जे; मयाक्षीत, भपर; इटः, याजयति-ने, पियक्षति से। यत् ।.1, to attempt, यतते,यतिता, यतिष्यते, पतिरोध, येते, मयति. यता, यतिस्था, यातयति-से, ययते, पियतिपतं । पम् । P. to go,यानि, यता, ति,मध्यत, पम्यान, ययाम, भयंसील, या, यामपति ते.पमपति से गायने, पियति । गा".toga, याति, याता, पाम्पसियासत, यापात. पो, भयामीत् , याता, पापयति; यात्रे, यायासति । या।", to beg, पायनि., पागिता, यायिष्यति, पाण्यात, पापितोट, भयागी, मयागिष्ट, गावित यायनित पापन, पियापिनि। पुत्र 4 ... ATL, to unite, Tणने, युननि, गु., धातुकोप। + योका; योक्ष्यति-ते, युस्यात्, युक्षीट; युयोज, युयुजे; अयुजत् , अयोक्षीत्, अयुक्त युक्तः, योजयति-ते, युज्यते, युयुक्षति-ते। युथ 4 A, to fight, युध्यते, योद्धा, योत्स्यते, युत्सीय, युयुधे, अयुद्ध, युद्धः, योधर्यात-ते, युध्यते, युयुत्सते। रक्ष । P, to protect, रक्षति, रक्षिता, रक्षिष्यति, रक्ष्यात्, ररक्ष, भरक्षीत, रक्षितः, रक्षयति-ते, रक्ष्यते; रिक्षिपति । रच 10 U, to arrange, to make, रचयति-ते,रचयिता, रख्यात्, रचयिपीठ; रचषाञ्चकार-चक्र, अररचत्-त, रिरचयि- पति-ते। रस.1 & 4 U, to be pleased,रजति-ते,रज्यति-तरका; रंपति-ते; रज्यात् , रंक्षीए; रज, रमजे; अपेक्षीत , अरक्त रक्तः, रजयति.ते, रज्यते, रिक्षति-ते। रम् 1 A, to begin, रमते, रब्धा, रप्स्यते, रसीए, रेभे, अरव्य, रब्धः, रम्भयति-ते, रम्य रिप्सते। रम् 1 A, to play. रमते, रन्ता, रंस्थते, रसीट, रेमे, अरस्त, रतः, रमयनि-ते, रम्यते, रिरहते। राज् ! U, to shine, राजति-ते, राजिता, राजिप्पति ते, राज्यात , राजिपीट; राज, राजे, रेजे; पराजीत् , अराजिष्ट; राजितः, राजयति-ते, राज्यते, रियजिपति-से। राध् + P, to finish, राध्यति, राधा, रात्स्यति, राध्यात् . पराध, अरात्सीत् , राधा, राधयति-ते, राध्यते, रिरात्सति । 12 P, to sound, रीति, रीति, रपिता, रविष्यति, स्यात् , सराव. भरावीत् , स्तः, रायपति.ते, कयते, ररपति। रुच 1 A, to be pleased with, रोचते, रोचिप्यते. रोचिपीए, भरोबिष्ट, रुचितः, रोचयति-ते, रुच्यते, रोचित एद 22, to cry, रोदिति, रोदिता, रोदिष्यति, स्यात् , . -- 8 40 व्याकरण-कौमुदी। का सरोद, अरुदत, अरोदीत् ; सदितः, रोदयति-त, रुदिपति । रुथ् , 7 U, to Bhut up, रुणदि, रन्धे; रोद्धा, रोत्स्यति. ते; रुध्यात्, स्त्सोट, ररोघ, रुरुधे; अरुयत् , अरोत्सीत् , अद्ध, रुदः, रोदुधम् , रोधयति-ते, रुध्यते. रुरुत्सति-ते । रह ! P, to rise, रोहति, रोढा, रोश्यति, रद्यात्, रोह, अरुक्षत् , रदः, रोहयति, रुह्यते, रक्षति । लम् 1 A, to get, लमते, लब्धा, लप्स्यते, लप्सीप्ट, लेमे, अलब्ध, लब्धः, लम्भयति-ते, लभ्यते, लिप्सते । लम्य् I A, to hang down, लम्पते, लम्बिता, लम्बिध्यते, लम्यिपीए, ललम्बे, अलम्बिष्ट, लम्यितः, लम्बयति-से, लम्यते, लिलम्बिपत । लप् 1 & 4 U, to desire, लपति-ते, लष्यति-ते, लपिता, लविष्यति-ते, लप्यात् , लपिपीट, ललाप, लेथे; अलपीत् , अलापीत्, अलपिष्ट; लपितः,लापयति-ते, लप्यते, लिलपिपति-ते । लज् 1 &6 A, to be ashamed, रजते, लजिता, लजिच्यते, लजिपीट, ललज्जे, अलजिष्ट, लजितः, लजयति-से, लजयते, दिलजियते। लिए 6 P, to write, लिखति, लेपिता, लेखियति, लिख्यात् , लिलेख, भलेखीतः, लिखितः, लेखयति-ने, लिख्यते, लिलेखिपति लिप 6 U, to paint, लिम्पति-ते, लेप्ता, लेप्यति से लिप्यात्, लिप्सीट; सिलेप, लिलिपे; मलिपत्-त, पलिप्त; लिप्तः, सेपपति-ते, लिप्यते, लिलिप्सतिते । लिह 2U, to lick, लेदिलीदेलेखा, लेष्यति-त; सिगात, लिशीय, लिल लिरिहे; मलिशत् , भली मोदः, लेदयति से, लियत, सिलिक्षति-। - 14 A, to perish, लीयत; लेता, लेष्यते, लास्यते; , लासीट; लिये; अलेष्ट, अलास्त, लीनः, लायति-ते . ₹ 1 &4 !, to roll, लोटति-ते, लुट्यति; लोरिता; लुलुटे; अलुदत्, लोटिष्ट, अलोटीत्, लुटितः, लोटितः, ते-तै, लुलोटिपति-ते। 14 P, to covet, लुभ्यति; लोमिता, लोधा लोभि. लोपनि; लुम्यात्। लुलोभ, अलोभीत्, भलुभत् लुब्धः, ते-ते, लुभ्यतो लुलुभिपति, लुलोभिवति । }U, to cut, लुनाति, लुनीत: लपिता, लविष्यति-त; विषोए; लुलाब, लुलुये; अलीत्, अलविष्ट: टूनः, लाय- टूयते, लुटूपति-ते। THA, to see, लोकते, लोकिता, लोकिप्यते,लोकिपीष्ट, अलोकिष्ट, लोकिता,लोकयति-ते, लोक्पते,लुलोकिपते। 1 A, to see, लोचते, लोचिता, like लोक् । ?", to speak, पकि, वक्ता, पक्ष्यति, उध्यात्, घोवत् , उक्ता. पाचयति, उच्यते, विवक्षति। P, & 10 8, to speak, धचति, पाचयति-ने, अवीवचन-त। P.to sA.y, पदति, वदिता, पदिष्यति, उद्यात्, उपाद, इदितः, पादयति-ते, उद्यते, विवदिपति। A, to aslute, पन्दते, वन्दिता, यन्दिप्यते, वन्दि- भन्दिए, पन्दितः, बन्दपति-त, पन्धते, विशन्दियते । J, to sor, पति-ते, चप्ता, यस्पति-ती उपस्पात, प, उपेः भवाप्सीत् , मयप्त, उप्तः, पापयति-ने, सति-त।

व्याकरण-कौमुदी। . पम् ! P, to vomit, यमति, यमिता, मिष्यति, वम्यात्, ययाम, भयमीत् यमितः, वान्तः, वमयति-ते,यम्यते, विचमिपति। वर्ण 10 U, to explain, दण्यतिके, वर्णयियति-ते, वर्णयाञ्चकार-चक्र, अवयर्णत-त, यणितः, विवर्णयिषति-ते । पस् 1 P, to dwell, यसति, यस्ता, वत्स्यति, उध्यात्, उवास, भयात्सीत्, उपितः, वासयति, उभ्यते, विवत्सति । यह ] U. to carry, to flow, वहति-ते, चोदा; उद्यात्, पक्षीय उवाह, ऊहे; अवाक्षात्, अयोट ऊढः, बाहयति-ते, उहते, वियक्षति-ते। पा 2 P, to blow, वाति, वाता, यास्यति, वायात्, यो, अयासीत् , पातः, वापयति-ते, यायते, विकासति । याउछ 1 P, to desire, वाञ्छति, पाञ्छिता, पाछिपति, पाञ्छयात्, ययाञ्छ, अवाञ्छोत्, वाञ्छितः, याम्यति-ते, पाच्यते, विवाञ्छिपति। विद् 2 P, to desire, वेत्ति, वेद; येदिता, येदिष्यति, विद्यात्, विवेद, विदाञ्चकार, अवेदीत्, विदितः, घेदयति-ते. विवेद्यते, विविदिपति। विद् 4 A, to be, विद्यते, वेत्ता, येत्स्यत, यिविदे, अपित्त, यिद 6 U, to get, विन्दति-; येदिता, घेता, विधात्, पित्सीट, दिपोष्ट, अविदत्, भवित्त, भयेदिध विविसति-ने, यिथि (ये) दिपति-ने। विश 6 P, to enter, विशति, येटा, येति, विसयात्, पियेश, भरिक्षत्, विष्टः, पेशयति-त, विश्यते, विविशति । 41&U. A, to choose, परति-ते, पोति, शृणुनं, यरिता; यरीता; परिप्यति-त, परीष्यति-शरियान , यियित्सते । न धातुकोष। - . परिपोष्ट, वृधाए; क्यार, यो भवारीत् , अवरिष्ट, अवरी वृत वृत्तः, परितुम्, धारयति-ते, प्रियते; विवरिपति-ते, विचरीपति-ते, युवतिते। कृत् ! A, to exist, वर्तते, यत्तिता, यस्पति, पतिष्यते, यतिषीय; ववृते, अवृतत, वृत्तः, वर्त्तपति-ते, वृत्यते विकृत्सति, विवतियते। वृध 1 A, to grow, पद्धते, पद्धिता; दिप्यति, यस्य॑ते; यद्धिपीष्ट, ववृधे; अवृधत् , अद्धिष्ट, वृद्धः, पद्धयति-ते, वृध्यते; विदिपते, विवृत्सति। वृष् । P, to raiv, पर्पति, पिता, पिप्यति, वृष्यात ववर्ष, अवर्षीत् , पृष्टः, घर्षपति-ते, विपिपति । 90 to choose, qणाति, वृणोते; चरिता, धरीता; चूर्य्यात् , परिपीट, यूपीए, बयार, घरे; भवारीत् , अपरिष्ट, अवरीष्ट, अयूट । घे ! A, to shake, वेपते, वेपिता, पिप्यते, येविार, विवेपे, अपिट, पितः, पयति-ते, विवेवियते । ध्य 1 P, to hurt, विध्यति, व्या, स्यरस्यति, विध्यात्, विव्याघ्र , मध्यात्सीत् , विद्धः, व्याधयति-ते, दिव्यत्सति । ग्र 1 P, to go, प्रजति, प्रजिता, प्रजिष्यति, मापात् , पवाज, अधाजीत् , प्रजित:, माजपति, मम्पते, विजिपति । शंस 1 P.topraise, शंसति, शंसिताशसिम्पति, शंस्यात्, पाशंस, अशलीत्, शस्तः,शंसित्या, शंसयति, शिशंसिपति। शक 5P,to be able,शक्नोति, वसा, शशिता, आश्यति, शक्यात् , शशाक, पशफत् , शक्तः, शाकयति-ते, शक्यत, शिक्षति शंक 1A, to doubt, शडते, शहिता, शण्ड, मशाहिए।

५०२ व्याकरण-कौमुदी। सविष्यते; सोपीष्ट,सवियोष्ट; सुपुये असोष्ट,असविष्ट; सूतः,सूनः । स1 P, to go, सरति, सा, सरिष्यति, घियान् , ससार; असरत् , असापीत् ; सृतः, सारयति-ते, नियते, सिपीति। सन् 6 P, to create, स्रष्टा, स्रश्यति, सृज्यात्, ससर्ज, अनाक्षीत् , सृष्टः, सृष्टम् , सःि, सृज्यते, सिसृक्षति । रसृप । P, to go, सर्पति; सप्ता,सर्ता, सप्स्यति, सस्यति; मृप्यात् , ससर्प, अस्पत्, सृप्तः; सप्तुंम्, सर्पयति-ते, सिएप्सति । सेव् 1 A, to serve, सेवते, सेरिता,सेमिष्यते, सेविपीट, सिपेवे, असविष्ट, सेवितः सेययति-ते, सेव्यते, सिविपते । सो 4 P, to destroy, स्यति, साता, सास्यति, सेयात्, ससी; असात् , असासीत् , सितः, साययति-त, सीपते, मिपासति। स्तम्म् 14,5& 9p, to support, म्तम्मते, स्तम्नोति, स्तम्नाति, स्तम्मिता, स्तम्मिष्यति, स्तम्यात् , तस्तम्म, मस्त. मिर, स्तब्धः, स्तम्मित्या, स्तम्भयति-ते, तिस्तम्भिवति । स्तु 2 U, to praise, स्तौति, स्तुते, स्तुपीत स्तोता,स्सी. व्यति-ते, स्तूयात् , स्तोपोट तुष्टाय, तुष्टुये, अस्तायीत्, मोट म्नुतः, स्ताययति-ते, स्तूयते, तुष्ट पति-ते । म्त 5 U, to cover, स्तृणोति, स्णुते, म्शता, रि. प्पनि-से स्तीर्थ्यात् , म्तृपीट,म्तरिशिष्ट ततार, तस्त, मस्त. गंतु , अन्तरिय, अस्लरीए; मस्तीष्ट, स्तुतः तीर्यत, तिरि. 7 9 U, to cover, स्तुणानि, णीत; ललिा, करीता, likeeतु।

५०३ था 1 P, to stand, तिप्रति स्थाता, स्थास्यति, स्थे- यो, अस्थात् , स्थितः, स्थापयति, स्थीयते, तिष्ठासति। स्ना 2 P, to bathe. स्नाति, स्नाता, स्नास्यतिः गत् , स्नेयात् : सस्नो, अस्नासीत् , स्नातः; स्नापयति, गति; स्नायते, सिष्णासति । नह 4 Phto hase, allection for, स्निहाति; स्नेहिता, , स्नेढा; स्तिहिप्पति, स्निह्यात्, तिणेह, मस्निहत् , 1:-नीतः। निहित्या, स्नेहित्या, स्निग्ध्वा, स्नोया; क्षिति, सिस्तिहिपति, सिस्नेहिपति। पन्दू 1 A, to throb, to go, पन्दते, स्पन्दिता, स्पन्दि. रुपन्द, अस्पन्दिष्ट, स्पन्दितः, स्पन्दयति, स्पन्द्यते, विरूप. - र्ध 1 A, to challenge, to contend with, स्पद्धिता, पदिप्यते, स्पद्धिपीष्ट, पस्पर्धे, अस्पद्धिष्ट, :, पिस्पधिपते। to touch, स्पृति; मा म्पी, स्त्रक्ष्यति, स्प. पृश्यात् , पस्पर्श, भस्पाक्षीत् , अस्पृक्षत; पिस्पक्षति। 1100, to desire, स्पृहयति-ते, स्पृहयाअकार-चत्रा, 1 A, to smile, मेयते, स्मता, स्मेष्यते, सिरिमये, अतः, स्मापयति-ते,स्माययति-तेस्मीयते,सिस्मपिपते । P, to remember, स्मरति, सार्ता, स्मरिप्पति, समार, अमापीत् , स्मृतः, स्मारयति-ते, स्मरयति. . :1A, to embrace, स्थजते, स्यक्ता, स्वध्यते, ५०४ व्याकरण-कौमुदी। स्वंक्षीट; सस्वजे, अस्वंक्त, स्वक्तः, स्पति-ते,स्वम्यते सिस्य. क्षते। स्वप् 2 p, to sleep, स्पपिति, स्वप्ता, स्वास्थति, सुप्यात्, सुष्याप, अस्वाप्सीत्, सुप्तः, स्वप्यते, सुषुप्सति । इन् 2 p. to kill, हन्ति, हन्ता, हनिष्यति, यध्यात्, जधान: अयधीत् , महत, भयधिष्टः हतः, घातयति.ते, हन्यते, जिघांसति। हस् I phto laugh, हसति, इसिता, हसिष्यति, हस्यात्, जहास, अहसीत् , हसितः हासपति, हस्यते, जिहसिपति । हा 3p, toabandon, जहाति, हाता, हास्यति. देशात्, जहाँ, भहासीत् , दीनः, हित्या, हातुम्, हापयति-ते, हीयते, जिहासति । ( 3 p u, to sacrifice, जुहोति, दोता, दोप्यति हयात्, जुदाय, भदौपीत्, हुतः, होतुम्, दायर्यात ते । 10, to steal, हरति ते, दर्शा, हरिप्यति त हियात् . हपीट, जहार, जह, महापीत् , महत; हमाहारयति-ते, बियने जिहीपति-ते। है । A, to neigh, हेपते, हपिता, जिहये। हाद् 11, to be glad, हादते, हारिता, हादिप्यने, हादिपीए, जहादे, महादिय, हादितः हादयति ने, जिहादिपते । RU, to call, यति-त, हाता, हायति हता, यति. ताया, हासीय, जुदाय, शुदये। मात्-त, ता, या गम् , हापयति-त, हयते, जाहपति.। CH- धातुकोप। ENGLISH-SANSKRIT VERBS. Abandon स्यज, हा Adopt परि प्रह Antire af 12 Abide 97, 1977 Adore , Ascend 25.2% Abuse पुरस् , भर्स Adorn 17, #05 Asccrtain *** Accept प्रति ग्रह, भा-दा Adrise उप-दिशि Ask प्रगइ Accompany 83-4: Ifflict 3.eu Ittack e-** Accomplishme, Igitate 2 Itisin 9-777 मिधु .igree it Altcod 7. Account 17 Illow #39 tempt 47,57 Accuse Blu- Imend ofteafs Attract w-17 Achnowledge 4 - Antes 6-97 Awatt 7.13 Acquaint sifir insner fa-47 Sushes Acquire 37- .Ippear Avalen sn.dk Act az, 8.5 Irrease tipBalc pe Arpis **1,70-97 Bathet.*** Appoint la.92 Bewn. Whet, Address ta eft Approach 17-74 Be able PT Admirci Approret - afraid Chit Irrarge -arsty -Idapt for Sad गम्-अस् WY . - ध्याकरण-कौमुदी। 93 79 poor दरिदा Buy at 23 Correct संशोधि Be born 37 Breathe Commit careful 7-81 Bring a1-a11 Compare humble fa.at Bring forth Coinpose 9-17 hungry शुध् Build निर-मा Conceal 1 * pleased a Burn 5, 117 Confess to Cooquer fa proud प् Calculate not Consider मन-मयू Bear क्षम् , सह Call 3, 37.8 Consult सम्-मंत्र Beat तह, प्रह Carry at Control 7777 Become Catch 9.91 Cook 9 Beg मिश् , याच Cease fa-17 Begin 61-T Censure from Count 70% Behave आ.चर Challenge स्पर्ध Cover 5-w7-17 Behold ey, ईश् Change oft-TT Covet 3! Believe fq-145 Cheat 457 Create TL Bend HR Check fa#1-75 Creep at Bewail 34 Chev चर्ष Croes Bid 11-14 Choose 77 Crush , Bind बन्ध, प्रन्थ Churn Cry , Bite देश Close -t. fatto Cure for Blame निन्द् Collect fa, 47- Curse 1 Bless भाशिद Colour र Cut 1.1 Dance ? 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Fade te, Die Eat अद्, अश् , खाद् Fail विफली-भू Dig भक्ष , मुश्प्रम् Faint 95,5 Digest पच Echo fa.97 Fall war Disappear fat-Elapse erfet en Fall down as Disappointed Embrace feq, Fasten, भज Emlpoy 7-77 Favour अनु र Discuss चर्च Endure क्षम् , शत् Fear प्रस, मी, Disguise 877-B7 Engage fa-17 Feed भौषि, परि Feel 7 Dispense -- Enjoy 37-47 Disperse 017- Enquire *7-67 Fetch Dispute fa- Enter fat Fight युथ Fill , , Disregard37-4. Entretag ध्याकरण कौमुदी। Fly Find आरम Goycrn 97. Informa.गा,निविद Find out, Grant भनु-मन् Injore फंड, हिम् Fine द Grasp, Inquire अनु-१३ Finish सम्भार Grazes Introdince मम्। FFix युज Grind fr7, Ti. भागि Flatter w Grow TL,R , IT Invite 6 Flow 7, 14 Grow old Join मिल, युन Guess and Jump प्यु Follow अनु, गम् Hang आ-अप-लम्बि Keep R., पा। Forget fq.17 Happen घट् Kill इन्, Form रघुक IHarass तुद Kindle इन्य. 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Subodh Vyakaram Koumudi

Author
Pt. Ramsundar Sharma
Title
Subodh Vyakaram Koumudi
File name
Subodh Vyakaram Koumudi
Text
OCR done
Citation
1995
Published
2011/08
Publisher
Ranchi, Subodh Granthmala
Language
Sanskrit
Pages
532
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
DLI number
310965
Barcode
99999990314401.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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igHJz6UMAWZ
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