Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Chobey Ka Chitha

Pandhey,roop Narayan · 2011/01

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हिन्दीग्रन्थरत्नाकर-सीरीज, न०६।
चौबेका चिट्ठा।
स्वर्गीय बाबू बकिमचन्द्र चट्टोपाध्यायके
'कमलाकान्तेर दफ्तर' का
हिन्दी अनुवाद ।
अनुवादकर्ता
श्रीयुक्त पण्डित रूपनारायण पाण्डेय ।
प्रकाशक
हिन्दी-ग्रन्थ-रत्नाकर कार्यालय, बम्बई ।
वृतीयात्ति ]
कपढेकी जिल्दका )
[मूल्य ॥७)

प्रकाशक:
और
हेन्टीग्रस्थरताका
हमानम
वाकलीवाल
हीराबाग
वम्बई
-
मिन्टर मगेशराव कुळकर्णी
कर्नाटकस्टीम प्रेस
४३४ ठाकुरद्वार बम्बई

MENU 2018! HOTEL IITBATIJLS भूमिका । ग्रन्थकार। बगसाहित्यके सूर्य, प्रसर प्रतिभाशाली, स्वर्गीय वावू पङ्किमचन्द्र चट्टोपा- घ्याय, रायबहादुर, सी आई ई के नामको हमारे हिन्दी पड़ने-लिखनेवाले भाई भी बहुत अच्छी तरह जानते ह । बकिम वावूकी रत्नप्रसू लेसनीसे निकले हुए कई उपन्यासों और निबन्धोंके भाषान्तर इस समय हिन्दी पाठकोंके आगे उपस्थित है। यह पुस्तक भी यावूसाहबके 'कमलाकान्तेर दफ्तर' का रूपान्तर है। घावू वकिमचन्द्र उस समय हुए जिस समय हिन्दी-साहित्यके पोपक और उमको गति देनेवाले बाबू हरिश्चन्द्र भारतेन्दु अपनी सहदयता, चातुरी और अनुभवसे भरी हुई निर्मल प्रतिभामयी प्रभासे हिन्दीसाहित्यका मुस उज्ज्वल कर रहे थे। अभी बहुत समय नहीं हुआ जब वगला भी हिन्दीकी तरह हीन अवस्थामें थी । जैसे कुछ अँगरेजी पढे लिसे उच्च उपाधिकारी पुरुप हिन्दीसे घृणा रखते हैं, डरते ह कि यदि हम हिन्दीमें अपने विचार प्रकट करेंगे, इष्ट- मित्रों और मान्यवरों' को हिन्दीमें पत्र लिसेंगे, तो गॅवार समझे जायेंगे, क्योंकि हिन्दी गँवारोंकी भाषा है, वैसे ही उस समय बगालका हाल था।लेरिन वकिम यावूने उस समय प्रकट होकर वगभापाके साहित्यमें ऐसा अमृत मींचा कि अब वह अमर होकर, दिन दिन, केवल वगालियोंके ही नहीं बल्कि भार- तके कई प्रान्तोंके आदरकी सामग्री हो रहा है। वगभाषाके सपूतोमें उस समय कैसी हवा चल रही थी, इसको पतलानेके लिए हम यहाँपर केवल एक घटनाका उल्लेख करेंगे । वायू रमेशचन्द्रदत्तका नाम या योग्यता भारतमे ही नहीं विलायत तक प्रसिद्ध है। रमेश बाबू जो उछ लिमते ये सो सघ अँगरेजीम ही । अफिमगावूने एक बार रमेशनायूसे कहा- आप अगरेजीमें बहुत कुछ लिखा करते हैं, म आपसे मातृभाषामें भी कुछ । ।

- लिखते रहनेके लिए अनुरोध करता हूँ। " रमेशवाबूने उत्तर दिया-" मुझे खेद है कि मातृभाषाम लिखनेका मुझे अभ्यास नहीं । मैं जो कुछ सोचता विचारता या लिसता हूँ सब अँगरेजीमें।" बहिमबाबूने कहा-"आपका यह कहना सन्तोपजनक नहीं । आप जो लिखेंगे वही सुलिसित होगा । मातृभाषामै लिखने पढनेके लिए अभ्यासकी आवश्यकता नहीं, योग्यता चाहिए।" इसका फल यह हुआ कि रमेशवाबूने वगलामें माधवी-ककण, समाज, ससार, जीवन- प्रभात, जोवनसन्ध्या आदि कई ऐसे अन्य लिखे जो इस समय बडे ही आद- रकी दृष्टिसे देखे जाते हैं। वकिम बाबूने अपने निवासस्थान काँटालपाडामे 'बगदर्शन प्रेस' स्थापित करके उससे वगदर्शन नामका मासिकपत्र निकालना शुरू किया। पकिमवाबू चार भाई थे और चारों साहित्यानुरागी तथा प्रतिभाशाली थे । बक्रिमवावूकी मित्रम- ण्डलीमें बा० दीनबन्धु मित्र और बाबू हेमचन्द्र बनर्जी उनके प्रधान मित्र थे। ये दोनो बगभाषाके पडे भारी नाटककार और कवि हो गये हैं। वकिमवाबूके सम- सामयिक कई उत्कृष्ट लेराफ बगदर्शनमें लिखते थे। बगदर्शनके लेस इतने अच्छे, उपादेय और मनोहर होते थे कि उसकी कोई सख्या निकलनेमे दो एक दिनकी देरी भी पाठकोंको अधार कर देती थी। वक्रिमवावू छह वर्षतक उसके सम्पादक रहे। उसके बाद उन्होंने वगदर्शन अपने भाई के सपादकत्वमें छोड़ दिया। यद्यपि इस समय बगालमै अच्छे अच्छे मासिकपत्र सचित्र और उच्चश्रेणीके निकलते हैं तथापि चन वगदर्शनकी छटा फिसीमे भी देसनेको नहीं मिलती और इन सब पत्रोंका प्रचार अधिक होनेपर भी इनका बगदर्शनके समान आदर या गौरव नहीं है । उसी वगदर्शनमें "कमलाकान्त" यह करियत नाम देकर वकिमवावूने कई निवध लिखे थे। उन्हा नियन्धोंम समह 'कमलाकान्तेर दफ्तर' है। ग्रन्थ। जो लोग असाधारण वुद्धिशक्ति लेकर पृथ्वीपर आते है उनकी दृष्टि अवश ही अपने समाज पर पड़ती है। यदि समाजमे उनको कुछ बुराइयाँ, हानिकारक प्रवृत्तियोकी प्रबलता या अध पतनके कारण देस पडते है तो वे उन्हें दूर करनेके लिए अपनी असाधारण शक्तिका प्रयोग करते हैं। यह बात पृथ्वीमण्ड रके हरएक देश में समानरूपसे देखी जाती है। ऐसे लोग समय समय पर प्रकट ३ होकर, समाजचक्रकी चूलमे तेल डालकर, उसे उनतिके पथमे चलाते और अपना नाम इतिहासम अमर कर जाते हैं। समाजकी बुराइयो या बुरे झुकावको फेरनेके लिए दो ही उपाय काममे लाये जाते है-(१) वक्तृता देना और (२) लिसना । यद्यपि वस्तृता देकर समाज पर प्रभाव डालना भी अधिक कठिन है तथापि कई कारणोंसे लिसकर समाजको मुधारनेकी चेष्टामें सफलता प्राप्त करना अत्यत ही कठिन है। इसके लिए असाधारण प्रतिभा और प्रभाव डालनेवाली विलक्षण शक्ति चाहिए। इसीसे किसीने कहा है-"शत वद, मा लिस ।" इसके सिवा वक्तृताका असर अल्पकालस्थायी होता है, किन्तु लेखका असर चिरस्थायी होता है । इस कारण वक्तृताकी अपेक्षा लेस लिखना अधिक महत्त्वका काम है । हम यहाँ पर साधा. रणत रेसके विपयमें ही कुछ लिसनेकी चेष्टा करते हैं। लेस लिखकर मनुजी महाराजकी तरह प्रत्यक्ष रूपसे विधि-निषेधकी शिक्षा देना उतना कठिन काम नहीं है, और सच पूछो तो उसका असर भी बिगडे हुए समाज पर पूरा नहीं पडता । ऐसी शिक्षा देनेमे बहुजताकी अधिक आव- स्यकता रहने पर भी प्रतिभाकी वैसी आवश्यकता नहीं रहती। फल भी प्राय उलटा ही होता है। प्राय देखा गया है कि जिस कामके करनेमें वाधा दी जाती है या मना किया जाता है उसे करनेके लिए और भी आग्रह होता ह-आर भी उत्तेजना घटती है। यही कारण है कि जो असामान्य प्रतिभाशाली लेसक होते है वे अप्रत्यक्ष रूपसे शिक्षा देते हैं और उनकी शिक्षा साहित्यका एक अग बन जाती है । कभी कभी वे हास्य-रसका आभय लेकर सामाजिक, नैतिक और धामिक कुरीतियोंका सशोधन करनेको चेष्टा करते हैं। हास्यरस एक सजीव रस है । और यही एक ऐसा रस है जिसका उपयोग इस कार्यमे विशेषतासे होता है । हास्यरसका उप- योग भी कई तरहसे किया जाता है। एक तो हास्य तीव्र विद्रूपमय होता है । पर अच्छे रेखक उसे अच्छा नहीं समझते। उस तीन विद्रूपमय हसीसे प्राय पाठकों का मनोरजन ही होता है, असल उद्देश्यकी सिद्धि न होकर वेर-विरोध ही अधिक बढता है । जो अच्छे लेखक है, उनके हास्यरसपूर्ण शिक्षाप्रद लेस तीन विद्रूपमय न होकर मीठी चुटकी लेनेवाले होते हैं । वे कडवा काढा न देकर शफरमें लिपटी हुई क्वीनाइनकी गोली देते है । उस गोलीको रोगी मजेमे निगल जाता है और शीघ्र ही आरोग्य हो जाता है। उनके लेसोंके ऊपर विमल हास्य रसकी झलक अवश्य होती है, लेकिन स्थिर दृष्टिसे भीतर तह तक देसने पर उसमे बिगडे हुए समाजको अपनी बुराइयोंका प्रतिबिम्ब और लेखककी मर्मव- दना स्पष्ट देख पडती है। फल यह होता है कि समाजके वे लोग जिन पर लेख होता है, लज्जित-सचेत होकर अपनी बुराइयोंको आप ही छोड़ देते हैं। ऐसे लेख लिखना साधारण काम नहीं है। ऐसे लेरा लिसने के लिए चाहिए समाजकी भीतरी तह तक पहुँचनेवाली सूक्ष्मदृष्टि, विचारशक्ति और अलौकिक प्रतिभा । जिनमे ये बाते नहीं है वे बालसुलभ हंसी मजाकके चुटकिले भले ही लिस ले, पर उनसे सुधार करनेका काम कदापि नहीं हो सकता । यहाँ पर ऐसी शैलीके दो उदाहरण हम देगे । वगालमे एक बड़े भारी नैयायिक पण्डित थे। उनके किसी विद्यार्थीने अपने सहपाठीको कोई गाली दी । पण्डितजी दूर ये। पर उन्होंने उसे सुन लिया । पण्डितजीने उस समय तो कुछ नहीं कहा, पर एक दिन, जव कि वही गाली देनेवाला विद्यार्थी साय था, घरके भीतर जाते समय राहमे बैठे हुए कुत्तेसे कहा-"महाशय, तनिक हट जाइए।" विद्या- याँसे न रहा गया-उसने कहा, "पण्डितजी कुत्तेसे इस तरह कहने की क्या आ- वश्यकता थी?" पण्डितजीने कहा-"भैया, कुत्तेको भी गाली देना उचित नहीं है । कुत्तेको तो गाली या स्तुतिका ज्ञान नहीं है, मगर अपनी जान तो इसी तरह सराव हो जाती है।" उस दिन वह विद्यार्थी इतना लज्जित हुआ कि फिर उसने कभी किसीको गाली नहीं दी । इसी तरह हमारी महारानी विक्टो- रियाका एक नौकर था, जो पीछे उनकी नकल किया करता था। महारानीको किसी तरह यह मालूम हो गया। उन्होंने एक दिन उस नौकरसे कहा-"मुझे नही मालूम कि मैं किस तरह चलती हूँ-जरा तुम मेरी तरह चलो तो, मे दे।" महारानीके इस कथनका उस पर इतना असर पड़ा कि उसने उसी दिनसे अपनी वह बुरी आदत छोड दी। बाबू यकिमचद्रके ये निरन्ध भी इसी ढंगके है । इनमे कोई कोई निबन्ध तो अवश्य ऐसे है जो हास्यरसके लेख कहे जा सकते हैं-उनमें भीतर गूड व्य और शिक्षा रहने पर भी ऊपर हास्यरस लहरा रहा है, लेकिन कुछ निबन्ध ऐसे भी हैं, जिनमें हास्यरसका आभास भी नहीं है, उनमें केवल लेस- - - ककी उत्कट देशभक्ति, हादिक उच्चास और मर्मभेदी हृदयके भाव भरे हुए है। 'एक गीत,' 'दुर्गापूजा' आदि निवन्ध ऐसे ही हैं। पाश्चात्य भाषाओंमें डिक्रस, मोलियर आदि लेसोने इस ढंगके अनेक निवन्ध और नाटक लिखे हैं । पर उगलामे यकिमावू ही इस टगके लेखक हुए हैं, या यों कहना चाहिए कि वफिमवावूने ही अपने इस ढगमें सफलता पाई है । मराठी गुजराती भाषाओंम कोई इस ढगका लेखक हुआ है या नही,सो तो हम नहीं जानते, लेकिन हिन्दीमे अभी इस ढगका कोई सिद्धहस्त लेखक नहीं हुआ। हिन्दीमे इस टगके लेखक क्या, कोरे हास्यरसके लेखकोंका भी एक प्रकारसे अभाव ही है । यह तो ऊपर ही कहा जा चुका है कि वफिमवावूकी इस निवन्धावलीम हास्य रस प्रधान नहीं, गौणरूपसे कहीं कहीं झलकता है। इसी कारण हम इम निवन्ध- मालाको हास्यरसके लेस कहना ठीक नहीं समझते । हमारी ममझमें ये निवन्ध हास्यमिश्रित गद्य-काव्य कहे जा सकते है। इनमें काव्यके सब अग मौजूद हैं। इनमे अलौकिक प्रतिभा, कल्पना, चमत्कार, रस और शिक्षा है। ये पढते ही असर डालनेवाले हे-अधमसे उत्तम बनानेवाले है। इनमें कविके कौशल, कल्पना और लिखनेके टगको देखकर सहृदय पुरुपको वही मजा मिलता है जो एक अच्छे ऊँचे दर्जेके कविकी कविता पढनेमे मिल सकता है। अतएव यह गद्य काव्य है और इसके लेखक बाबू यक्रिमचन्द्र एक बहुत ऊँचे दर्जेके भावुक कवि ये- इसमे क्मसे हमको कुछ भी सन्देह नहीं है । हिन्दी अनुवाद । अब हम इस हिन्दी अनुवादके सम्बधर्म कुछ कहकर अपना वक्तव्य ममाप्त करेंगे। किसी भापासे दूसरी भापामे कोई ग्रन्थ लिखना वडा ही कठिन काम है। यासकर ऐसे ग्रन्थका अनुवाद करके मूलकी सरसता और चमत्कार बनाये रसना असम्भव ही है। हमने यथाशक्ति ऐसी चेष्टा की है कि पाठकों को अनु- वादमे मूलका ही मजा आवे-मूलग्रन्थकारके भाव बिगडने न पावें, भापाकी सरसता नष्ट न हो, शाब्दिक चमत्कार कम हो। किन्तु इसमे हम कहाँ तक सफलता पा सके है सो हमारे बगला जाननेवाले पाठक मूलसे अनुवादको मिला कर ही जान सकते है। यहॉपर हम यह भी कह देना उचित समझते हैं कि यह अनुवाद एकदम अनुवाद ही नहीं है। हमने इसे वर्तमान समयानुकूल (up to-datc) बना- । - ६ नेकी पूरी चेष्टा की है। इस चेष्टामें कहीं कहीं कुछ छोड भी देना पड़ा है। इसके सिवा बकिमवायूने वगाल और बगालियोंको लक्ष्य करके ही ये निवन्ध लिखे थे, परन्तु हमने इनका भाषान्तर समग्र भारत और भारतवासियोंको लक्ष्य करके किया है। ऐसा करनेमें भी बड़ी कठिनाईका सामना करना पड़ा है। बहुतसी बुराइयाँ, बातें और कहावतें इसमें ऐसी थीं जो केवल बगाल और बगालियोंसे ही सम्बन्ध रसती हैं, उनकी जगह पर वैसी ही बातें और कहावते, जो भारत भरसे भारतवासियों भरसे-सम्बन्ध रखती हैं, खोजकर रखनी पड़ी हैं। हिन्दी में इस ढगका कोई अन्य न देखकर हमने इस प्रन्थरलका हिन्दी भा. पान्तर करके हिन्दी साहित्यसेवियोंके मेवाम समुपस्थित किया है । हमको पूर्ण आशा है कि यह ग्रन्थ पढकर हिन्दीभाषाभाषी लाभ उठावेगे । केवल इतना ही न होगा बल्कि इसी शैलीके आदर्शपर हमारी मातृभाषाके सपूत सेवक सज्जन इसी ढगके मौलिक ग्रन्थ लिखकर हिन्दी साहित्यके एक विभागकी पूर्ति करते हुए हिन्दीका गौरव बढावेंगे। दारागज, प्रयाग, वैशास कृष्णा ११, मगलवार -रूपनारायण पाण्डेय । सवत् १९७१ वैक्रमीय ।

चौवेजीका परिचय। बहुतमे लोग चिदानन्दको पागल कहते थे। उसकी चित्तवृत्ति कुछ बिल क्षण प्रकारकी थी। उसकी बातचीत, कामकाज, रहन-सहन आदि सभी बातें अनोखी थीं। यह बात नहीं कि वह हछ लिसा पढा नहीं था । उसे कुछ अंगरेजी और कुछ सस्कृत आती थी। किन्तु जिस विद्यासे अर्थोपा- र्जन न हो, वह विद्या क्मि कामकी ? उसे मै विद्या ही नही कहता । चाहे कोई कैसा ही मूर्स क्यों न हो, भले ही उसे लिपने पढनेके नाम केवर अपने दस्तखत करना ही आता हो, किन्तु यदि उसकी साहय-सूयाओ तक पहुंच हो और उसे झूठी सच्ची रातें बनाकर अपना काम निकलना आता हो, तो मेरी समझमें वह पण्डित है ओर चिदानन्द जेमा विद्वान्, जिसने वीसी पुस्तक पढ डाली हो, पिलमुल मूर्य है। चिदानन्दको एक वार नौकरी मिल गई थी। एक साहत यहादुग्ने उसकी अंगरेजी सुनकर अपने आफिसमे कर्क रप लिया था। परन्तु चिदानन्दसे यह की न हुई । वह आफिसमें जाकर आफिसमा काम नहीं करता था । आफि- सके रजिष्टरोमें कविता लिखता था, आफिमकी चिट्ठियोमे ' शेक्सपियर ' नामक किमी रेग्यकके वचन लिख रखता था आर निल त्रुकोके पृष्ठोपर चित्र बनाया करता था। एक बार साहपने उससे माहवारी पेपिल बनानेके लिए कहा । चिदानन्दने निरउक पर एक चित्र बनाकर तैयार कर दिया । उसका भाव यह था कि बहुतसे भिक्षुक माहवसे भिक्षा मांग रहे है और साहब बहादुर उनके आगे दो-दो चार-चार पैसे फेंक रहे है। चित्रके नीचे लिखा था-" वास्तविक पे-पिल ।" साहबने इस अतिशय नूतन ' पे मिल को देखकर चौग्रेजीको उसी दिन अपने यहासे बिना कुछ कहे-सुने विदा कर दिया। बस, चिदानन्दकी चाकरीका अन्त हो गया। इसके बाद उसने और कोई नौकरी नहीं की। जरूरत भी नहीं थी। शादीके फन्देमें तो वह कभी फंसा ही नहीं। जहाँ वह रहता वहीं यदि भरपेट भोजन और लोटा भर भग मिरा गई तो फिर उसे और किसी चीजकी दरकार न थी। उसके रहनेका ठिकाना न था, जहाँ तहाँ 'पडा रहता था। कुछ दिन वह मेरे घर पर भी रहा था। पागल समझकर मैं उस पर दया करता था। किन्तु मैं भी उसे बहुत दिन नहीं रस सका। कहीं स्थायी होकर रहना उसके स्वभावमें ही ने था । एक दिन वह मोरे उठा और ब्रह्मचारीकेमे गेरुण कपडे पहनकर न जाने कहाँ चला गया । बहुत हँढा, परन्तु फिर उसका पता न चला । उसके पास कागजीका एक वस्ता था। कहीं कोई कोरा या अधलिसा कागज मिला कि वह उसपर कुछ-न-कुछ लिखनेके लिए बैठ जाता था । क्या लिग्वता था, सो वह जाने या परमात्मा जाने, मैं कुछ भी नहीं समझता था। जब कभी मौज आती थी, तो वह मुझे भी अपना लिया हुआ सुनाने लग- ता था। मैं कौतूहलवश उसे सुनना अवश्य चाहता था, परन्तु कुछ सुननेके पहले ही मुझे नींद आ जाती थी। उसके उक्त सब कागज एक पुराने और स्याहीसे चित्रित कपडेमें बंधे रहते थे । यही उसका वस्ता था। जिस समय वह गया, उस समय यह वस्ता मुझे देता गया और कह गया कि यह मैने तुम्हे इनाम दिया। इस अमूल्य रत्नको लेकर मैं क्या करूं ? पहले इच्छा हुई कि इसे अग्नि- देवको समर्पण कर दूं, परन्तु पीछे मेरे हृदय में लोकहितैपिता जाग्रत हो उठी । मैंने सोचा, जो पुरुष मसारका उपकार नहीं करता है उसका जन्म व्यर्थ है। इस बस्तेमें अनिद्रा रोगकी अत्युकृिष्ट औषध है-इसे जो पढेगा उस पर तत्काल ही निद्रा देवीकी कृपा होगी। इसलिए जो लोग अनिद्रा रोगले पीडित हैं, उनके उपकारके लिए मैं चिदानन्द चौबेके इस बस्तेको प्रकाशित करता हूँ। मुझे अनुप्राससे बहुत प्रेम है । अनुप्रासहीन रचना कैमी ही भावपूर्ण क्यो न हो, मुझे अच्छी नहीं लगती। प्रकाशित करते समय ' चौबेका वस्ता नाम मेरे कानोमैं बहुत खटका । तब मैंने बहुत कुछ सोच विचारकर इसका नया नामकरण किया-चौका चिहा' या चिदानन्द चौबेका चिहा।' -खुशनवीस। . ' - चौबेका चिट्ठा। कोई १ अकेला। वह कौन गाता है? ई गाता चला जा रहा है । बहुत दिनोसे भूले हुए सुखस्वमकी स्मृतिकी तरह उस मधुर गीतने मेरे कानों में प्रवेश किया ।गीत कुछ बहुत सुन्दर नहीं है। पथिक अपनी उमगसे राहमें गाता जा रहा है । चाँदनी रात देसकर उसके हृदयका आनन्द उमड आया है उसका कण्ठ स्वभावहीसे मधुर है। वह उसी अपने मधुर कण्ठमै मधु. मास (चैत) में सुखपूर्वक माधुरी बरसाता हुमा जा रहा है । तो फिर, सितारपर भेगुली फेरनेसे जैसे उसके सर तार झनझना उठते है, उसी तरह, इस गीतने अपने स्पर्शसे मेरी हदयतन्त्रीको क्यो वजा दिया ? क्यो, इसका समाधान कान करेगा ? चाँदनी रात है-नदीकी रेती में चांदनी हसते हसते लोट रही है । नीली साडीसे निसका आधा अंग द्वका हुआ हो उस सुन्दरीकी तरह शीर्ण शरीरवाली नील-जल-मयी नदी उस रैतीको धेरै हुए यहती चली जा रही है । सडकपर आनन्द ही आनन्द दिखाई देता है।लडकी, एडके, जवान, ओरत-मर्द, मोढा, और उद्दी सिया सय निर्मल उज्ज्वर चन्द्रमाकी किरणोंमें नहाकर आनन्द मना रहे हैं। मैं ही केवल आनन्दमे खाली हू, इसी कारण शायद इस सगीतमे मेरे हृदयी वीणा यों यज उठी है। मैं अकेलाई, इसी कारण यह गीत सुनकर मेरे शरीरमें रोमात्र हो आया । इस घहुत भादमियोंसे भरी-पुरी नगरीमें, इस आनन्दपूर्ण मनुष्य- , चौवका चिठ्ठा- २ प्रवाहमे मैं अकेला हू । तो फिर मैं भी क्यो न इम अनन्त मनुष्य-प्रवाहमें मिलकर इन विशाल आनन्द-तरग-ताडित जलके बुबुदोम और एक बुबुद क्यो न बन जाउँ चूद बूंद पानीसे ही तो समुद्र बना है । मैं भी एक बूंद हूँ, फिर इस समुद्रमे मिल क्यों न जाऊँ? इच्छा होनेपर भी इस समुद्रमे क्यो नहीं मिल जातामो मैं नहीं जानता, केवल यही जानता हूं कि मैं अकेला ह । मेरा तो यही उपदेश है कि भैया, इस ससारमें ' अकेले' होकर न रहना । अगर अन्य किसीने तुमसे प्यार' न पाया, तो तुम्हारा मनुष्य-जन्म ही वृथा हुआ। फूलमे सुगन्ध है । लेकिन अगर कोई उसे सूघनेगाला न होता तो फूल सुगन्धित नहीं कहला सकता था। क्योंकि सूंघनेवालेके सिवा सुगन्धके अस्तित्वका प्रमाण ही और क्या या ? देखो, फल अपने लिए नहीं फूलते। तुम भी अपने हृदयकी करीको दूसरोके लिए प्रफुलित करो। पर यह तो मैंने अभीतक बतलाया ही नहीं कि केवल एक बार सुनते ही यह गीत क्यो इतना मनोहर मधुर जान पडा । बहुत दिनोसे मैंने आनन्दको उमङ्गसे गाया गया गीत नहीं सुना था, बहुत दिनोसे मेरे मनने ऐसे आनन्दका अनुभव नहीं किया था। जवानीमें, जर सारी पृथ्वी सुन्दर थी, जर' हर फूलमें सुगन्ध मिलती थी, हर पत्तेकी सटकमें मधुर रागिनी सुन पडती थी, हर नक्षनमें 'चिना'-'रोहिणी' की शोभा देख पड़ती थी, हर आदमीके मुखपर सरलता और विश्वासका पाया जाता था, तब आनन्द था। पृथ्वी अब भी वही है, समार अर भी वही है, लोक-चरित अब भी वही है, किन्तु यह हृदय अब वह नही रहा। उस समय गीत सुनकर जो आनन्द होता था, वही आनन्द इस समय यह गीत सुनकर याद आ गया है । जिम अवस्था और जिस मुसमें मैं उस समय आनन्दका अनुभव करता था वही अवस्था, वही सुस, इस समय याद आ गया है । घडी भरके लिए जैसे मुझे फिर वही जवानी मिल गई । पह- लेकी तरह फिर जैसे, मन-ही-मन, जमी हुई मिमण्डलीमें जा बैठा, और पहरे की तरह वैमे ही अकारण ऊंचे स्वरसे हमने लगा। जिन बातोको अर में व्यर्थ समझकर इस समय नहीं कहता, उन बातोको उस समय चित्त चञ्चल होनेके कारण दिनमें दस बार कहा करता था, उन्हीं बातोको मानी आभास . । " ३ अफेला। फिर कहने लगा । मानो फिर पहले की तरह सरल मचे हृदयसे दूसरोके स्नेहको सच्चा समझकर स्वीकार करने लगा। मुझे क्षणभरके लिए भ्रम या मोह हो गया, इसीसे यह गीत इतना मधुर मालूम पड़ा। केवल यही कारण नही है। पहले गीत अच्छे लगते थे,-- -अब नहीं लगते । जिम चित्तको प्रफुलता या प्रसन्नताके कारण गाना अच्छा लगता था, वह प्रफुल्लता अब नहीं है, इसीसे गाना भी अच्छा नहीं लगता । मैं इस समय गीत सुनने के पहले अपने मनके अतीत इतिहासमें मन लगाकर जवानीके सुसका ध्यान कर रहा था। इसी समय यह पूर्वस्मृतिकी सूचना देनेवाला गीत सुन पहा ! भोर इसी कारण मुझे इतना मधुर जान पड़ा। वह प्रफुल्लता ओर यह सुस अब क्यो नहीं है ? क्या सुसकी सामग्री कम हो गई है ? या अन मैं ही नीरस हो गया हू? मग्रह ओर क्षय, दोनो ही ससारके नियम है। किन्तु उसके साथ ही यह भी नियम है कि क्षयकी अपेक्षा सग्रह अधिक होता है। तुम अपने जीवन-मार्गमे जितना आगे बडोगे, उतना ही अपने लिए सुस-सामग्री-सग्रह करोगे । अरछा, तो फिर अवस्था अधिक होनेपर इन्द्रियोमें शिथिलता क्यो आजाती है? पृथ्वी वैसी सुन्दर क्यो नहीं देख पडती ? आकाशके तारे से क्यो नहीं चमकते ? आकाशकी नीलिमाम वैमी उज्वलता (चमक या कान्ति) क्यो नहीं रहती ? जो स्थान उस समय तृण-पल्लन-पूर्ण, फूलोकी सुगन्धसे सने, स्वच्छ नदीसे जर. कण रेनेके कारण सुशीतल हुए वायुसे हृदयको हरा कर देनेवाले जान पडते थे, वे ही म्यान इस समय रेतीली मरभूमिके ममान उजाट क्यो जानसे पडते है ? समझा, भाशारूपी रगीन चश्मा न होने के कारण ही यह सर विपरीत दिखाई दे रहा है। जवानीम सचित सुप थोटा होता है, किन्तु सुखी आशा अपरिमित होती है । इस समय सचित सुख तो अधिक है, किन्तु यह ब्रह्माण्ड व्यापिनी आशा कहाँ है ? तब नहीं जानता था कि केमे क्या होता है, इमोसे अनेक माशा करता था। अन जान पटा है कि हम समारचक्रमे चट नेपालको फिर वहीं लौट जाना पड़ता है, जहामे वह घरता है । जिस समय यह मोचता है कि में आगे बढना है, उस समय ग्रह वेवर चकर ही राता अपसमझमें आया है कि समार-मागरम तरते समय हमें उमरी सरदार मारकर किनारे फेंक जाती ह । अय मारम हुआ कि इस जगलमें रार नहीं -- चोयका चिट्ठा- है, इस मैदानमे कोई जलाशय नहीं है, इस नदीका पार नहीं है, इस समु- हमे टापू नहीं है, इस अन्धकारमें नक्षत्रोका भी प्रकाश नहीं है । अब जान पढा कि फलमें कीड़े हैं, कोमल पत्तोमै काँटे हैं,आकाशमै मेव है, निर्मल नदीम भवर' हैं, फलमें विप है, बागमें सौप हैं, मनुष्यके हृदयमें केवल आत्मप्रेम है । अत्र विदित हुआ कि हरएक वृक्षम फल नहीं होते,हरएक फूलमे सुगन्ध नहीं होती, हर एक चादरा बरसता नहीं, हर एक बनमें चन्दन नहीं होता और हरएक हाथीके मस्तक, गजमुत्ता नहीं होती। अब समझा कि काँच भी हीरकी तरह उज्ज्वल होता है, पीतल भी सोनेकी तरह चमकता है, कीचड भी चन्दनकी तरह गीला होता है, और कोसा भी चादीकी तरह मधुर शब्द करना है। किन्तु क्या कहता था, भूल गया । हाँ, वही गीतकी ध्वनि । वह भली अवश्य जान पड़ी थी, मगर अब उसे फिर दुबारा सुनना नहीं चाहता । इस मनुष्यकण्टसे निकले हुए संगीतके समान ससारमें एक और भी संगीत है, ससाररसके रसिक लोग ही उसे मुन पाते हैं। इस समय । वही सगीत सुननेके लिए मेरा चित्त आफुल हो रहा । इस सगीतको क्या न मुन पाऊगा। सुनंगा, किन्तु अब इस अनेक बाजोकी ध्वनिमें मिले हुए और बहुत कण्टोसे उत्पन्न हुए ससार-संगीतको न सुनकर उसी सगीतको सुनेगा। अत्र न चे पहलेके गानेवाले हैं, न वह अवस्था है और न वह 'आशा' ही है। किन्तु, इससे मैं टुसी नहीं हू, अब उस ससार-संगीतके बदले जो सगीत सुन रहा ह, वह उससे बडकर प्रसन्नता देनेवाला है। उस समय जिस सगी. तसे मेरे कान तृप्त हो रहे है, उसमें अन्य किसी बाजेका शब्द नहीं है। 'प्रीति' इस समारमें सर्वव्यापिनी है, प्रीति ही ईश्वर है। प्रीतिका है संगीत इस समय मेरे कानोमें भरा हुआ है । मै चाहता हूँ कि अनन्त काल तक इस प्रीति या प्रेमके सगीतसे मिलकर मनुष्य समाजके हृदयकी वीण बजनी रहे । यदि मनुष्यजाति पर मेरा प्रेम बना रहे तो फिर मैं और सुर नही चाहता। । .

२ मनुष्य-फल। - . । जय भगकी मात्रा कुर अधिक हो जाती है-गहरी उन जाती है, तर मुझे समारके सर मनुष्य तरहतरहके फल जान पड़ते हैं। वे मायारूपी इटलंम लगे हुए मसारके महावृक्षम लटक रहे है, पकते ही गिर पड़ेंगे। उनमसे सभी नहीं पकने पाते, कुछ असमयमै आधीसे कच्चे ही झड जाते हैं, कुछमे कोडे लग जाते ह, कुछको पक्षी कुतर जाते हैं और कुछ यथासमय पक जाने पर तोड़ लिये जाते हैं। जो पकनेपर तोड लिये जाते है ओर गगाजलसे धुल कर देवो या ब्राह्मणोके काम आते है उन्हींका फल जन्म या मनुष्ययोनि सार्थक है । कुछ पकेहुए फल मे भी होते हैं जो खून पक- कर आप-ही-आप उची डालने पृथ्वीपर गिर पडते हैं और उनको मियारसाते हैं । उनका फल-जन्म या मनुष्ययोनि वृथा है । कुछ फल तीने कटु या कसेरे होते है, किन्तु उनसे अच्छी अच्छी दवाएं बननी हैं। कुछ बिल्कुल जहरीले होते है, जो खाता है वही मरता है । और कुछ कुंदरूकी जातिके होते है, जो केवल देसने भरके सुन्दर होते हैं। मुझे कभी नशेम उघते-ऊंघते देस पडता है कि भिन्न भिन्न जातिके लोग भिन्न भिन्न जातिके फल है। मुझे आजकरके 'पडे आदमी' मालूम पड़ते हैं । कुछ उनमे बडे बडे कोण्के होते है, कुछमें रेशा अधिन होता है, ओर कुछ ऐसे होते है कि उनके भीतर ढेरसी रकटी ही लकडी होती है, वे केवर' पशुओके काम आते हैं। कुछ तो दालमे पक्ते हैं ओर कुछ डार में ही लगे रहते हैं, कभी पकते नहीं। कुछ ऐसे होते है जो पंक तो पक सकते है, किन्तु पकने नहीं पाते, पृथ्वीका राक्षस उनको कच्चेपनहीमें तोडकर तकारी बनाकर साजाता है। अगर वे पके भी तो सियार वडा उपद्रव मचाते है । अगर पेड चारो ओरमै रॅधा हो, या कटहर उंची हाल में फला हो, तब तो खैरह, नहीं तो सियार उसे अवश्य नोच सायेंगे। सियारोमें कोई दीवान, कोई मुसाहव, कोई कारिदा, कोई मुनीम, गुमाश्ता और कोई केवर आशीर्वाद देनेवाले होते है। यदि इन सरके हाथोसे बधकर पका कटहल किसी तरह घर पहुंच गया, तो वहाँ मक्खियाँ भन भन करने लगती है। मक्खिया कटहल नहीं चाहती, वे चाहती हैं उसका रसाया मक्सी कन्याका ब्याह करना चाहती है, कुछ सुभीता नहीं है, जरा सा रस . .

६ चौबका चिट्ठा- . . दो। वह मक्सी अपने मा-यापकी 'गया' करना चाहती है, एक वूद रम दो। इस मक्सीने एक पुस्तक लिखी है, इसको कुछ रस दो। उस मक्सीने पेट पारनेके लिए एक समाचारपत्र निकाला है, उसको भी कुछ रस दो। यह मक्सी कटहलकी बुआके जेठके रडकेके मारेकी माली हे-गनेका सुभीता नहीं है, कुछ रस दो। उस मक्खीने एक पाठशाला खोली है, उसमे पौने चौढह लडके पढते हैं, कुछ रस दो। इधर कटहलको घरमे रस छोडना भी ठीक नहीं, सडकर उससे दुर्गन्ध फैलेगी। मेरी राय तो यही है कि कटहलको काट कर उसकी उत्तम निर्जल दूधमें सीर बनाकर चिदानन्द चौबे ऐसे श्रेष्ठ नाहाणको भोजन करा देना ही उचित है। इस देशकी सिविलसर्विसके साहबोको मैं आमका फल समझता है । कुछ रोगोंका कहना है कि आम इस देशमें नहीं होता था, समुद्रपारसे कोई महात्मा इस फलको इस देशमें लाये थे । आम देसनेमे रगीन और सुन्दर होते हैं । कच्चे तो बहुत ही खट्टे होते है, हा, पकने पर अवश्य मीठे हो जाते हैं, मगर तब भी भीतर, गुठलीपर, सटाई (तुर्शी) बनी ही रहती है-वह नहीं जाती। कोई कोई आम तो ऐसे वाहियात होते हैं कि पकने पर भी उनकी खटाई नहीं जाती, मगर देसनेमें ऐसे बड़े और रगीन होते हैं कि बैच- नेवाले ग्राहकको ठगकर पचीस रपये सैकडे तक बेच जाते है। कुछ आम ऐसे होते हैं कि कच्चे रहने पर मीठे और पक जाने पर फीके हो जाते है बहुतसे अधपके ही रहते है । उनको कूटकर नमक मिलाकर 'कचूमर' बना डालना ही अच्छा है। सब लोग आम साना नहीं जानते । तुरन्त डालसे तोडकर साना ठी नहीं, उनमें गर्मी भरी रहती है । उनको या तो पाल रखकर, और या, ज डारसे टूटे आये हो उनको, कुछ देर सलामके पानीमै ठडा करके, अगर है। सके तो उस पानीमें थोडीसी सुशामदकी वर्फ भी डाल कर, फिर छुरी चला कर मजेमें खाना चाहिये। ससारमें साधारणत स्त्रियोंकी उपमा केके फरसे दी जाती है। लेकिन यह ठीक नहीं । मुझे केलेके फरमें और भुवनमोहिनी स्त्रियोमें कुछ भी समता नहीं देख पडती। खियां क्या गौधको गौध एक साथ फलती हैं ? अगर किसीके भाग्यमें फरती हों तो फलती हो, परन्तु चिदानन्दके भाग्यमें तो - - .

मनुष्य-फल। । । - । कभी नहीं फलीं । केलेके साथ खियोका इतना ही मेल है कि दोनो ही वान- रोको प्रिय होती हैं-रचती हैं। केवल एक इसी बातमे मै कामिनियोकी सुलना केले से करना उचित नहीं समझता।इसके सिवा कुछ ऐसे भी कटुभाषी लोग है जो स्त्रियोकी तुलना कुदरूके साथ करते है। जो ऐसा कहते है वे 'जलमुहे हैं। मै तो सुन्दरियोंका दासानुदाम हु, मैं नहीं कह सकता। मैं कहता हूं कि स्त्रिया इस ससारमे नारियल के फल है। नारियल भी एक एक डाल में गुच्छेकेगुच्छे फरते है, परन्तु (व्यापारियोको छोडकर ) कोई भी उनके गुच्छेकेगुच्छे नहीं तोडता । कोई कभी एकादशी व्रतके भोर पारण करनेके लिए, अथवा वशासमें ब्राह्मण-सेवाके लिए एक आध तोड लेता है। एक माथ गौघकीगौध गिराकर सानेका अपराध करनेवाले भगर कोई हैं तो वे कुलीन ब्राह्मण है। चिदानन्दसे कभी ऐसा अपराध नहीं बन पडा। वृक्षके नारियलोकी तरह मसारके इन नारियलंकी भी अवस्थाभेदके अनु- सार कई हाल्तें होती है । दिलकुल कच्ची अवस्थामें दोनोका हृदय बहुत ही स्निग्ध+ होता है। नारियल्के जलसे कलेजा तर होता है, ओर किशोरी का- मिनीके सच्चे भोग और विलास-के लक्षणोसे शन्य स्नेहके रससे हदय स्निग्ध होता है । किन्तु दोनों जातिके मनुष्यजाति और फरजातिके-नारियल कच्चे ही अच्छे होते हैं। उस समय वे उज्ज्वल श्यामल फर कैसे सुन्दर जान पडते है-उनमें कैमी ज्योति (कान्ति और चमक) होती है? उनसे रका हुमा ताप (धाम ओर दु ख) भीतर नहीं आने पाता। जगतका ताप मानो उम नवीन श्याम शोमा उडा पड जाता है। मुझे झरोसेमें झुद्ध की धुइ स्त्रियों पेडमें गुच्छे के गुच्छे नारियरोसी जान पडती हैं ।दोनो ही चारो ओर अपनी छटा, अपना प्रकाश, फैलाते है। मगर देसो, इन्हें देखकर भूलना नहीं, चैतके घाममें पेडसे कच्चे नारियलको कभी न तोडना, इस समय उसमें गर्मी भरी रहती है। जिसने ससारकी शिक्षा नहीं प्राप्त की, ऐसी कच्ची वगालके कुलीन ब्रामण पहले एक साथ दम दस बीस बीस ब्याह कर लिया करते थे। व्याह ही उनकी जीविका थी। लेकिन अब यह वात शिक्षा- प्रचारके साथ साथ उठती जाती है। + स्नेहसे भरा भोर तर। - चौवेका चिट्ठा- . . दो। वह मक्सी अपने मा-बापकी 'गया' करना चाहती है, एक बूद रस दो । इस मक्सीने एक पुस्तक लिखी है, इसको कुछ रस दो। उस मक्सीने पेट पालनेके लिए एक समाचारपत्र निकाला है, उसको भी कुछ रस दो। यह मक्सी कटहलकी बुआके जेठ रडकेके सालेकी साली है-पानेका सुभीता नहीं है, कुछ रस दो । उस मक्खीने गुक पाठशाला सोली है, उसमें पोने चौदह लडके पढते हैं, कुछ रस दो। इधर कटहलको घरमें रस छोटना भी ठीक नहीं, मडकर उससे दुर्गन्ध फैलेगी। मेरी राय तो यही है कि कटहलको काट कर उसकी उत्तम निर्जल दृधमे सीर बनाकर चिदानन्द चौबे ऐसे श्रेष्ठ ब्राह्मणको भोजन करा देना ही उचित है। इस देशको सिविल्सविसके साहबोंको में आमका फल समझता है। कुछ लेगोका कहना है कि आम इस देशमें नहीं होता था, समुद्रपारमे कोई महात्मा इस फलको इस देशमें लाये थे । आम देसनमें रंगीन और सुन्दर होते हैं । कच्चे तो बहुत ही सहे होते है, हा, पकने पर अवश्य मीठे हो जाते है, मगर तब भी भीतर, गुठलीपर, पटाई (तुशी ) बनी ही रहती है-वह नहीं जाती। कोई कोई आम तो ऐसे वाहियात होते है कि पकने पर भी उनकी सटाई नहीं जाती, मगर देखनेमे ऐसे बड़े और रंगीन होते है कि बैच- नेवाले ग्राहकको उगकर पचीस स्पर्य सैकडे तक घेच जाते है। कुछ आम ऐसे होते है कि कच्चे रहने पर मीठे और पक जाने पर फीके हो जाते है बहुतसे अधपके ही रहते है । उनको यूटकर नमक मिलाकर ' कचमर' बना डालना ही अच्छा है। सर लोग आम ग्याना नहीं जानते । तुरन्त डालसे तोडकर खाना ठीक नहीं, उनमें गर्मी भरी रहती है । उनको या तो पाल रसकर, और या, जो डालसे टे आये हो उनको, कुछ देर सरगमके पानीमे उडा करके, अगर हो सके तो उस पानीमे थोडीसी सुशामटकी बर्फ भी डाल कर, फिर छुरी चला कर मजेमै साना चाहिये। ससारमें साधारणत लियोकी उपमा कलेके फलसे दी जाती है। लेकिन यह टोक नहीं । मुझे फेलेके फलमें और भुवनमोहिनी खियोमें कुछ भी ममता नहीं देख पडती। स्त्रिया क्या गोधकी गोध एक साथ फलती हैं ? अगर किसीके भाग्यमे फलती हो तो फलती हो, परन्तु चिदानन्दके भाग्यमें तो ७ मनुष्य-फल। - . - कभी नहीं फली । केलेके साथ स्त्रियोका इतना ही मेल है कि दोनों ही वान- रोको प्रिय होती है-रचती है। केवल एक इमी वातसे मैं कामिनियोकी तुलना केले से करना उचित नहीं समझता। इसके सिवा कुछ ऐसे भी कटुभाषी लोग है जो स्त्रियोकी तुलना कुदरुके साथ करते है। जो ऐसा कहते हैं वे 'जलमुहे' हैं।मैं तो सुन्दरियोका दासानुदास हू, मै नहीं कह सकता। मैं कहता हूँ कि स्त्रियाँ इम ससारमें नारियल के फर है। नारियल भी एक एक टालमें गुच्छेकेगुच्छे फलते है, परन्तु (व्यापारियोको छोडकर ) कोई भी उनके गुच्छेकेगुच्छे नहीं तोडता । कोई कभी एकादशी व्रतके भोर पारण करने के लिए, अथवा वेशासमें ब्राह्मण-सेवाके लिए एक आध तोड देता है। एक साथ गोधकीगौध गिराकर सानेका अपराध करनेवाले अगर कोई है तो वे कुलीन ब्राह्मण है। चिदानन्दसे कभी ऐसा अपराध नही न पडा। वृक्षके नारियलोकी तरह मसारके इन नारियलोंकी भी अवस्थाभेदके अनु- सार कई हारते होती है। बिलकुल कच्ची अवस्थामें दोनोंका हृदय बटुत ही स्निग्ध+ होता है। नारियर के जलसे कलेजा तर होता है, और किशोरी का- मिनीके सच्चे भोग और विराम के लक्षणोंसे शन्य स्नेहके रससे हदय स्निग्ध होता है। किन्तु दोनो जातिके-मनुष्यजाति और फलजातिके-नारियल कच्चे ही अच्छे होते हैं। उस समय वे उज्ज्वल श्यामर फल कैसे सुन्दर जान पढते हैं-उनमें केसी ज्योति (कान्ति और चमक) होती है? उनसे रका हुआ ताप (धाम ओर दुख) भीतर नहीं आने पाता। जगतका ताप मानो उम नवीन श्याम शोभामे ठडा पड़ जाता है। मुझे झरोखेमे मुह की झुड खिया पैडमें गुच्छे के गुच्छे नारियलोंसी जान पडती हैं । दोनो ही चारों ओर अपनी छटा, अपना प्रकाश, फैलाते हैं। मगर देसो, इन्हें देसकर भूलना नहीं, इस चैतके घामने पेडमे कच्चे नारियल को कभी न तोडना, इस समय उममें गर्मी भरी रहती है। जिसने समारकी शिक्षा नहीं प्राप्त की, प्रेमी कची चगालो कुलीन ब्राह्मण पहले एक माथ दस दस योस चीम ब्याह कर लिया करते थे। गाह ही उनकी जीविका थी। लेकिन अब यह बात शिक्षा- प्रचारके माथ गाथ उठती जाती है । +लहसे भरा और तर । - चौका चिट्ठा- ८ - . . बालिकाको हृदयमें स्थान मत देना, नहीं तो तुम्हारे हृदयमे ज्वाला पैदा हो जायगी। आमकी तरह कच्चे नारियलको भी खुशामद-रूपी बर्फके पानीम रखकर उडा कर लेना । बर्फ न हो सके तो तालाबकी कीचडमें ही कुछ देर गाडकर उड़ा कर लेना-अर्थात् मीठी बातोसे न हो सके तो चिदानन्द चतुर्व- दीकी आज्ञा है कि कडाईस ठडा कर लेना। नारियलमें चार चीजे होती हैं-पानी, गिरी, नरेटी (लकडीका गोल) और जटा । मेरी समझमे नारियलका पानी और स्त्रियोका स्नेह, दोनो बरा- घर हैं। दोनोके द्वारा हृदय शीतल होता है, और दोनो ही भीतर छिपे हुए रहते हैं। जब तुम ससारकी तपनमें तपकर हॉफते हॉफते धरकी छॉहमे विश्रा- मकी इच्छा करो, तव इस ठडे पानीको अवश्य पियो-उसी दम तुम्हारा हृदय शीतल हो जायगा । सोचो तो, तुम्हारे गरीबीके चैतमे या बन्धु-वियोगके वैशाखमे, तुम्हारी जवानीके देपहरामें अथवा रोग-ताप-पूर्ण तीसरे पहरमे तुम्हारा हृदय और काहेमे शीतल हो सकता है ? जीवनके सन्ताप-समयमे माताके आदर-यत्न, स्त्रीके प्रेम और कन्याकी भक्ति के सिवा आर काहेसे सुख मिल सकता है ? और ग्रीष्मकी गर्मीम, कच्चे नारियल के जलके मिवा और किस चीजसे ठडक पड सकती है? परन्तु नारियल पक जानेपर उसका पानी कुछ तीसा हो जाता है। मोह, नकी माकी उमर पकनेपर मोहनका बाप इसी तीसेपनके कारण घर छोडकर चला गया। यही कारण है कि नारियलो में कच्चे नारियलका ही आदर होता है। नारियलकी गिरी और स्त्रियोकी बुद्धि एक सी होती है। बिल्कुल कच्चे- पनमें तो नाममानको रहती है, परन्तु उसके बाद किशोर अवस्थाम बड़ी ही मीठी और अढी ही कोमल होती है। फिर पकजानेपर बहुत ही कडी हो जाती है, फिमकी ताकत है जो उसको दाँतोमे फोड सके' समय इमे गृहिणी-पना कहते हैं। गृहिणी-पनेमें रस और मिठास अवश्य होती है, मगर उममें किसीका दाँत नहीं गड सकता । एक तरफ कन्या बैठी है, यह चाहती है कि माताके गहनोके सन्दूक कुछ गहने प्राप्त करू- मगर पकी गिरी प्रेमी कठिन है कि उसमें कन्याका दात गड न मका-पी गिरी अर्थात् पुरचिनने आप ही दया करके उस मन्दुकमसे एक चाली निकाल दे टी। एक तरफ पुन बैठा हुआ पकी हुई माताको पूजीपर ढोत रगा

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चावका चिट्ठा- रस्सीसे बडे बडे मनोरथ सींचती है । जव रथ खींचना रोकनेके लिए कोई कानून बने तो उसमें इस मनोरथ खींचनेको रोकनेके लिए एक 'दफा' जरूर रहनी चाहिए। ऐसा होगा तो इससे होनेवाली अनेक हत्याएँ बद हो जायगी। यह तो मुझे मालूम नहीं कि नारियलकी रस्सीमे गला फसाकर कभी किसीने जान दी है या नहीं, मगर यहमें जरूर जानता है कि स्त्रियोके रूपकी रस्सीम गला फसा कर इतने लोगोने प्राण दिये है कि उनकी गणना नहीं हो सकती। वृक्षके नारियलो और ससारके नारियलोसे मेरी अनसनका कारण यही है कि मैं अभागा दोगसे एकको भी नहीं प्राप्त कर सका । और फल तो नीचे सड़े रहकर लग्गीसे खींचकर गिरा लिये जा सकते हैं, पर नारियल पेडपर चढे पिना हाथ नहीं लग सकता । अगर पेडपर चढनेकी चेष्टा करोगे तो या तो अपने पैरोमें रस्सी बांधनी पडेगी ओर या डोमकी खुशामद करनी पडेगी। मै डोमकी सुशामद करनेके लिए भी राजी हूँ। मगर किया क्या जाय, मेरे भाग्यमें नारियल यदा ही नहीं। मैं जैसा आदमी हु, वैसे ही पेडमे वैसे ही रूप-गुणकी लग्गीसे नारियलको पासकता हूँ । पासक्ता हूं, लेकिन खटका यह है कि नारियल कही मेरे सिर पर न आपडे । ऐसी बहुतसी धन्नो, मुन्नो, काली, गौरी हैं जो चिदानन्दको अपना स्वामी बनाकर ग्रहण कर सकती है। किन्तु पराई लडकीको सिर चढाकर ससारको यात्रा करने में यह गरीव ग्राह्मण सर्वथा असमर्थ है। यही कारण है कि अबकी बार चिदानन्दने भक्तिके साथै नारियलका फल विश्वनाथको अर्पण कर दिया। वह एक तो मसानमे रहते हैं, ओर उस पर विप भी पी लिया है। यह कच्चा नारियल उनका क्या बिगाढ सकता है? इस देशमे और एक तरहके आदमी आजकल दिसलाई दिये हैं, जिनको साधारणत देशहितपी कहते हैं । इनको मैं सेमरका फर समझता हूँ। जब सेमरमे फल फूलते है, तब देसनमे चे बडे सोहावने जान पड़ते हैं-डे घंटे लाल लाल फुलोसे पेढकी बढी शोभा होती है। पर मेरी दृष्टिसे तो मेमरके गले मैडमें इतनी ललाई अच्छी नहीं जान पडती। वह कुछ पत्तोसे ढकी रहती * जान पडता है चिदानन्द पुरोहितको 'डोम' कहता है ! क्योकि पुरोहित ही राह कराता है । उ ! कैसा बदमाश है। -~मदारीलाल। - - यूटिलिटी या पेट दर्श Yuva मगर जहाँ जरा ऑधी चली, बेलसे हट हट कर जमीनमें लोटने लगेगे। बहु- तसे तो रूपमें भी कददू हैं और गुणमें भी कद्द है। कुम्हडे या कद आज कल दो तरह के होते हैं, देशी आर विलायती । विरायती कहनेसे यह न समझ रेना कि ये कुम्हडे विलायतसे आये है, आजकल' जैसे देशी मोचीके बनाये जूते अगरेजी बृट कहलाते हैं चैसे ही ये विलायती कुम्हडे भी हैं। यह कहनेकी तो कोई जरूरत ही नहीं कि पिलायती कुम्हढोकी कदर ज्यादा होती है समारके बगीचेमें और भी अनेक फल फलते हैं, उनमें सबसे बढकर निकम्मा निकृष्ट और कडुमा फर है,-चिदानन्द चतुर्वेदी । . बेन्थम ३ यूटिलिटी * या पेट-दर्शन । न्थम साहब हितवाददर्शनकी सृष्टि करके यूरोपमे अक्षय कीति छोड गये है। मै उस हितवाददर्शनको नापसन्द नहीं करता, और न उसका विरोधी ही हू, बल्कि अनुमोदन करता हू, परन्तु आपको मालूम होना चाहिए कि मैं भी पक सुयोग्य दार्शनिक हू। मैने उसी हितवाददर्शनके आधारपर, उसे कुछ घटा- चढा कर, एक नवीन दर्शनशास्त्रकी रचना की है। वास्तवमें देसा जाय तो यह मेरी रचना भारतमें प्रचलित हितवाददर्शनकी एक नई व्यारयामान है। यूटिलिटी शब्दके क्या माने हे ? म सुद अंगरेजी नहीं जानता-चिदान- न्दने भी कुछ नहीं बतलाया-इसी लिए लाचार होकर मेने अपने पुनसे पूछा । मेरे पुत्रने डिइनरी सोलकर देराकर यह अर्थ बतलाया है-'यू' शन्दका अर्थ है तुम या तुम लोग ! 'टिल' शब्दका अर्थ है खेती करना । 'इट'ब्दका अर्थ है खाना । 'ई' शब्दका क्या अर्थ है, सो वह कुछ बतला नहीं सका । मेरी समझमें चिदानन्दका मतलब यह है कि तुम सब लोग खेती करके साओ कसा पाजी है 1 सयको क्सिान कह दिया । ऐसे दुष्ट दशानन ल्पोदर गजान- नकी रचना पढनेमे भी पाप होता है। मेरा पुत्र शायद अब बहुत अच्छी अंग- रेजीकी योग्यता प्राप्त कर चुका है, नहीं तो ऐसे कठिन शब्दकी ऐसी अच्छी मिता। -मदारीलाल। .

चाँचका चिट्टा- - . . नकी दार, भात, . समालोचनाकी आगमे जलता भी स्व है । सच कहनेमें डर काहेका, वात तो यह है कि इमलीके वरावर सराव चीज मुझे समारमे और नहीं देस पडती। जो बोडी सी भी खा लेता है उसे अजीर्ण हो जाता है और सही डकार आने लगती हैं। जो अधिक सा लेता है उसे तो सदा अम्लपित्तका रोग बना रहता है। जो लोग माहव बन गये हैं और रेपिल-कुर्सी लगा कर गैस या विजलीकी रोशनीमें करीमबख्श सानसामाके हाथका पका या हुआ साना छुरी- कोटेसे सानासीस गये हैं वे एक कठिनाईके हाथसे छुटकारा पागये हैं-इम- रीकी सटाईकी उन्हें कुछ पर्वाह नहीं रहती-उन्हें आदिसे अन्त तक इम- लीकी चटनीके साथ रोटी नहीं खानी पड़ती। किन्तु जिन्हें छप्परके नीचे बैठकर रामदेईक हाथकी रसोई सानी पडती है उनके कष्टका कुछ ठिकाना नहीं है । रामदेई कुलीनकी लटकी है, नित्य मोरे नहाती है, रामनामी उपहा ओढती ह, हाथमे तुलसीकी माला रिये रहती है, किन्तु मूग अरह- और चटनीके सिवा कुछ बनाना नहीं जानती। करीमबख्श, जातिका तो नीच है, मगर रसोई ऐसी बनाता है कि उसका स्वाद अमृतका ऐसा होता है। बस अब एक प्रकारके और मनुष्यफल की बात कह कर आज इस लेसको समाप्त कर देगा। अच्छा बतलाओ, ये देशी हाकिम किस जातिके फल हैं ? जिसको क्रोध करना हो करे, मै तो सच ही कहंगा । ये लोग संसारके कुम्हर (क) है, इन्हें अगर छप्पर पर चढा दो तो ये उंचे पर फलेंगे, नहीं तो नीचे मिट्टीपर ही पडे पढे लोटा करेंगे । जहाँ चाहो इन्हें डाल दो-उठा दो, * चिदानन्दका मतलब यह है कि यद्यपि अँगरेजीका साहित्य अंगरेजोकी रचना है-जिन्हें हम जातिको दृष्टिसे नीचा समझते हैं-मगर है वह अमृतके समान सरस, उपादेय और जीवनदान करनेवाला । और हमारे वर्तमान देशी माहित्यकी रचना यद्यपि उच्च जातिके लोगोंके हाथसे होती है, मगर वह इम- लोके समान दाँत सटे कर देनेवाला, हानिकारक और इधर उधरसे बुराया हुआ ही बहुधा होता है। ऐस लेसकोंके पास गाँठको पूँजी तो कुछ होनी नहीं, और दूसरोंमे जो लेते है उसे भी विकृत कर देते है। जो लोग अगरेजी नहीं जानते उन्हें उसीसे अपनी जिज्ञासा शान्त करनी पड़ती है, और जो अँगरेजी जानते है ये मजेसे अंगरेजी साहित्यका स्वाद लेते है। ।

यूटिलिटी या पेट दर्शन। अर यह सिद्ध हुआ कि पेट नामके बडे विवरमे लड्ड पूडी आदि भौतिक पढार्थीको भर लेना ही पुरपार्थ है। अब इस पुरुषार्थके साधन भी निश्चित करने चाहिए। सूत्र-पहलेके पण्डितोने पुरपार्थ पानेके छह साधन या उपाय बतलाये है, यथा -विद्या, बुद्धि, परिश्रम, उपासना, यल, और भाष्य-(१) विधा । विद्या क्या है, यह निश्चय करना बहुत ही कठिन है। कोई कहता है, लिस्रना-पढना सीख लेना ही विद्या है। कोई कहता है, विद्याके लिए विशेष लिखने पढनेकी कोई जरूरत नहीं, पुस्तकें लिख लेन और असगार लिस तैना आजाना ही विद्वत्ताका प्रमाणपन है । कोई इसमें आपत्ति करता है, कहता है, जो लिखना नहीं जानता वह असगारमे लेखही कैसे लिखेगा? मेरी समझमें ऐसा तर्क करना ठीक नहीं । मगरका बच्चा अण्डा फोडकर बाहर निकलते ही पानीमें तैरने लगता है, उसे सीपना नहीं पडता । उसी तरह भारतवासियो ( विशेपकर हिन्दी भाषाके सम्पादको, आधुनिक ग्रन्थकर्ताओं ओर कवियो) के लिए विद्या एक स्वभावसिद्ध महज गुण है। उन्हें विद्या प्राप्त करनेके लिए लिखने-पढनेकी जरूरत नहीं। (२) बुद्धि । जिस विचित्र शक्तिके जलसे आमको इमली कर सकते हैं और रईको रोहा और लोहेको रई बना सकते है, उसे बुद्धि कहते है सूमकी सम्पदाकी तरह इसे आदमी आप ही देख सकता है, पृथ्वी भरकी सब चीजोंकी अपेक्षा यह शक्ति ही जगतमें अधिक देख पड़ती है। मैने तो कमी पिसीको ऐसी शिकायत करते नहीं देखा कि मुझमें बुद्धि कम है। (३) परिश्रम । ठीक समयपर गर्म गर्म भोजन करना, उसके बाद कोमल छिौने पर सोना, हवा साने जाना, तमाखू जला जलाकर धूी धार करना और अपनी या पराई स्त्रीसे प्रेमालाप करना इत्यादि बडे बडे कामोको पूरा करना ही परिश्रम है। (४) उपासना । किसी व्यनिक सम्बन्धमे यदि कुवात की जाती है तो उसमें या तो उसके गुण गाये जाते हैं, ओर या उसके दोपोका वर्णन होता है। किसी क्षमताशारी प्रधान व्यक्ति के सम्बन्ध ऐमा पाताराप होनेम, अगर वह सचमुच दोपपूर्ण है तो उसके दोप-कीर्तनको निन्दा कहते है, और यदि उसमें कोई दोष नहीं तो उसके दोपकीर्तनको दूसरा नहीं .

चौबेका चिट्ठा। ~~~-~ v4 vvvi कयन' या रसिकता कहते है । और गुणोक सम्बन्धमे यह नियम है कि यदि उसमें कोई गुण न हो तो उसके गुणगानको 'न्यायनिष्टता' और यदि वह सचमुच गुणी हो तो उसके गुणकीर्तनको 'उपामना' कहते हैं। (५) बल । बडी बडी बाते मारना, लाल लाल आँखें निकालकर जोर जोरसे चिल्लाना-धमकाना, और मुहसे अशुद्ध उर्दू अगरेजी शब्दोके साथ थूक बरसाना, थप्पड लात घूसा मारनेका इशारा करके ओठ चबाना-दौत पीसना, इनके सिवा साढे तिर्पन तरह मटक कर ताल ठोकना, मगर पटैतके सामने आनेपर औरतके लहंगेम छिप रहना वगैरह बातें 'बल' कहलाती है। 'के छ उपभेद है । यथा ---मुसका, हाथोका, पैरोका, आखोका, सालका, और मनका गालीगलौज, कोसना और निन्दा करना मुखका बल है। धूसा थप्पड वगैरह दूरमे दिसलाना हाथोंका बल है । भागना वगैरह पैरोका बरा है। रोना वगैरह औसोका वल है। प्रमाण चाणक्य पण्डित हैं रोदन पल । मारपीट सहना वगैरह सालका बल है । द्वेप, डाह, हिंसाप्रभृति आदि मनका बल है। (६) छल । नीचे लिखे व्यक्तियोको मसारमें छली जानना । एक, दूकााटार । प्रमाण लीजिये, दुकानदार चीज घेचकर उसके दाम मां- गता है। दान देनेवाले जितने है मा यही समझते हैं कि हम सौदा खरीदने में गरिये गये। दुसरा, वैद्य । प्रमाण लीजिये, रोगीके आरोग्य होनेपर अगर चैद्य फीस मांगता है तो रोगी प्राय यह सिद्धान्त कर लेता है कि मैं आप ही आराम हो गया हू, ये हजरत यो ही ठगकर रपये वसूल किये लिये जाते हैं। तीसरा, धर्मोपदेशक और धार्मिक। ये सदासे ठग कह कर प्रसिद्ध है, ओर एक नाम है ' भड', क्योकि ये प्राय असरकी नकल करके लोगोको दगा करते हैं। इनके ठग होनेका एक विशेष प्रमाण यह भी है कि ये लोग धन आदिकी इच्छा नहीं रखते। सूत्र-~-इन छ प्रकारके साधनोसे पेट-पूति या पुरपार्थ असाध्य है ॥ ५ ॥ भाष्य-इस सूत्रसे प्राचीन पण्डितोके मतका मण्डन क्यिा नाता है। विद्या आदि पूर्वोक्त छह साधनोंसे पेट नहीं भरा जा सकता, नीचे क्रमश यही दिपाया जाता है। इनका .

यूटिलिटी या पट-दशन । (१) विद्यासे अगर पेट भरता तो हिन्दीके समाचारपत्र भूसो क्यो मरते? (२) बुद्धिसे अगर पेट भरता तो गधे बोझा क्यो ढोते ? (3) परिश्रमसे अगर पेट भरता तो हिन्दुस्तानी लोग कुली ही क्यो बने रहते? (४) उपासनासे अगर पेट भरता तो साहब लोग चिदानन्दपर अनुग्रह क्यो न करते ? मैंने तो अपने आफिसके साहयको 'पे-निल' कुछ बुरा नहीं बना दिया था। (५) बलसे अगर पेट भरता तो हम गिरकर मार क्यो खाते? (६) छलसे अगर पेट भरता तो कभी कभी शराबके कारमानोंका दीवाला क्यो निकलता? सूत्र--पेट भरना या पुस्पार्थ केवल औरोका हित करनेसे सिद्ध हो सकता है ॥ ६॥ भाष्य-उदाहरण लीजिए-ब्राह्मण पुरोहित महन्त महारमा वगैरह लोगोके कानो में 'मन' फंककर उनका हित करते हैं । आजकरके हिन्दीस- माचारपन आपसमें गाली गलौज करके पाठकोंका हित करते हैं। विचारक लोग न्यायालयमें स्वर्गीय सुखका अनुभव करते हुए अपने विचा- रसे प्रजाका हित कर रहे हैं। देशी सस्थाए-क आदि दिवाला निकालकर देशका और देशके व्यापारका हित कर रहे है । हिन्दीके बुकसेलर-पासकर काशीके-पेचदार मजेदार चकरदार उपन्यास रिसकर प्रकाशित कर हिन्दी साहित्यका हित कर रहे है। यूरोपकी जातियोने अनेक जगली जातियोंका हित किया है। और इग्लिशमैन आदि एग्लो इटियन पत्र भारतका हित कर रहे हैं। इन सबका पेट अच्छी तरह भरता है, अर्थात उन्हें पुरपाय-लाभ होता है। सूत्र-अतएव सन लोग देशका हित करो ॥ ७॥ भाष्य- इस अन्तिम सूत्र के द्वारा हितवाद-दर्शन ओर पेट-दशनकी एकता सिद्ध की गई । भर यम, चिदानन्दशर्माके सूत्रप्रन्यकी समाप्ति भी यहीं समझ लो । मुझे आशा है कि भारतवासी लोग इसे सप्तम दर्शन समझकर इसका आदर करेंगे। । चौ०-२ - चावेका चिट्ठा- AM ४ पतंग। सिकनाके बैठकसानेमे एक बैठकका ग्लोरदार बटा रेप जर रहा है- पास ही मै मुमाहवी ढंगसे बैठा हुआ है। रमिकवायू बैठे हुए हिन्दु- स्तानियोकी आपसकी फूटके बारेमें बातचीत कर रहे हैं। मैं भगका गोरा चढाए झूम रहा हूँ। हिन्दुस्तानियोकी फुटसे चिढ कर आज मैं भगकी उपल माना चढा गया हु। विधाताने मेरे कपालमे यही लिप रकमा था । इस समय ब्रह्माण्डकी अनादि क्रिया-परम्पराके नियमोमें विधाताने यह भी लिख दिया था कि बीसनी शताब्दीमें श्रीचिदानन्द चतुर्वेदी पृथ्वीपर अवतार लेकर आज रातको रमिकनारे बैठकरपानेमे बैठ कर आवश्यकता अधिन भग छान लेंगे । तर मेरी क्या मजार कि मै उसे अन्यथा कर म। मैंने नशेमे झमते झूमते देया, एक पतग आकर लेपके चारो ओर धूम फिर कर ' भनभन' करने लगा। नोके शोकमें मैने सोचा, क्या मैं पतगकी भाषा नहीं समझ सकता। कुछ देरतक कान लगा कर मुनता रहा, पर फुल न समझ सका। मैने मन-ही-मन पतगमे कहा-" त यह क्या भनभन भन- भन कर रहा है, मेरी समझमें कुछ नहीं आता। एकाएक भगभगानीकी कृपासे मुझे दिव्य कान मिल गये। मैंने सुना, पतग कहता है-" में इस प्रकाशके साथ बातचीत कर रहा है, तुम चुप रहो। " तर मै चुप होकर पतगकी बातचीत सुनने लगा। पतग कह रहा था--- " देसो प्रकाशमहाशय, पहले तुम अच्छे थे, पीतलकी दीनटपर मिट्टीके दीपक शोभा पाते थे, और हम बिना किसी रकावटके जल मरते थे। अम तुम भी अगरेजी फेशनके भक्त होकर शीशेके धेरैमें घुस कर बैठे हो. हम चारो तरफ घूमते फिरते है-भीतर तुम्हारे पासतक जानेकी राह नई पात-जर कर मरने नहीं पाते । देसो, इस तरह जर' मरनेका हमको अधिकार है, राइट है, हक है। हमारी पतग जाति सढासे प्रकारामें जलकर मरती आई है-कभी किसी प्रकाशने हमको नहीं रोका । तेरके प्रकाश, मोमबत्तीके प्रकाश, लकडीके प्रकाश---किसी भी प्रकाशने हमको नहीं रोका । प्रभो, फिर तुम क्यो का. चके कोटमे बैठकर हम जलमरने नहीं देते? हम गरीव पतग है, हम पर " पतग। " - यह सहमरण निपेयका आईन क्यो जारी करते हो? हम क्या हिन्दुओकी नियो है कि जलकर मर न सकेंगे? देखो, हिन्दुओकी गियोमे ओर हममे रडा अन्तर है । हिन्दुओकी स्त्रिया आशा-भरोसा रहते कभी जलकर मरना नहीं चाहती-पहले विधवा होती है, पीछे मती । हमारी ही जाति ऐसी हे जो सदा आत्मत्याग करने के लिए तैयार रहती है। हमारे माथ स्त्रीजातिकी तुरना कमी ? यह सच है कि हमारे ही ममान स्त्रियाँ भी रूपकी आग जलते देखकर उसमे कूद पडती है । फल भी एक ही होता है-इम भी जर मरते है, आर वे भी जर मरती है। पर देसो, उनको उम जलमरनम सुख है, मगर हमको क्या सुप है ? हम केवल जल्ने लिप करते है, मर- ने लिए मरते है। क्या प्रिया भी ऐमा कर सकती है ? फिर हमारे सार उनकी तुलना क्सी? सुगो, अगर ज्वालापरिपूर्ण रूपकी आगम इस शरीरकी आहुति न दी, तो फिर यह शरीर किम लिए है? अन्य जीव क्या सोचते हैं, सो तो हम कह नहीं सकते, किन्तु हम पतग जातिके जीव है, हमे बहुत कुछ सोचने पर भी नहीं जान पड़ता कि यह शरीर किस लिए है !-इसे लेकर हम क्या करेगे? हम नित्य फूरोका 'मधु' पीते है, नित्य जगत्को प्रफुलित करने- वाली किरणाम विचरते हैं, परन्तु इसमे क्या सुस हफोमे रही एक ही गन्ध है। मजुमे नही एक ही मधुरता है। सूयमे वही एक ही प्रकारका तेन है । ऐसे असार, पुरान, विचित्रता-शून्य जगत्मे रहना किसे अच्छा रगेगा? इस घेरेके बाहर आओ, जलती हुई रूपनी शिमा पर हम अपने शरीरको निछावर कर दे। 'देसो, म तुममे बहुत ही साधारण भिक्षा चाहता हू। अपने प्राण तुमको अर्पण कर जाउँगा, क्या न लोगे ? देनेके सिना तुमसे कुछ न टूगा । फिर इसम तुम्हारी क्या हानि है? तुमने अपने रूपमे जलाने के लिए जन्म लिया है, और में पतग जलने के लिए पैदा हुआ हू, आओ, निसका जो काम है उसे करते चले। तुम हसते रहो, मे जर। तुम समारभरको जला टारनेकी शनि रसते हो । जगन्म ऐमी कोड चीज नहीं है जो तुमको रोक मरे । फिर तुम काचके कोटमे क्यो छिपे हु - चौबेका चिट्ठा! २० wwwharm हो? सारे जगत्की गतिका कारण होकर भी तुम क्यो इस कैदमै पढे हुए हो? किस मूर्वने यह काँचका कोट बनाया है ? और किस पाजीने तुम्हें इसके भीतर बद कर रक्सा है ? प्रभो, तुम तो विश्वव्यापी हो, काँचका कोट तोढ- कर क्या मुझे दर्शन नहीं दे सकते तुम क्या हो-यह मैं नहीं जानता। यह न जानने पर भी केवल इतना जानता ह कि तुम मेरी वासनाकी वस्तु हो-जागतेमे ध्यानकी सामग्री, सोतेमे सुसका स्वस, जीवनकी आशा और मरनेका आश्रय हो। तुमको कभी सकूगा [-जानना चाहता भी नही । जिस दिन जान लंगा, उसी दिन मेरा सुस भी चला जायगा । जो चीज चाहकी होती है उसका स्वरूप जान लेने पर फिर वह सुसकी सामग्री या चाहकी चीज नहीं रहती। तुमको क्या न पा सकूँगा? कितने दिन तुम इस कॉचके कोटमे रहोगे? क्या मै इस काँचको तोड न सर्पगा ? अच्छा रहो, मै छोडनेवाला जीव नहीं-फिर आता हूँ।" भनभन करके पतग उड गया । जान न इतनेमें रसिकबाबूने पुकारा-" चौबेजी।" मैं चौक पड़ा । और खोल कर देखा, जान पडा--र --रसिकबाबू न पुकारते तो मैं तकिया लेका तसतके नीचे ही होता । रसिकबाबकी तरफ कई बार औसे फाड फाड कर देसा, मगर उनको पहचान न सका। ऐसा जान पड़ा कि एक बडा भारी पतग तकियेके सहारे बैठा हुआ हुक्का पी रहा है। वे मुझसे बातें करने लगे, मुझे जान पडा, पतग भनभन भनभन कर रहा है। तभीसे मुझे जान पडने लगा कि जितने मनुष्य है, सब पतग है। सभीके जल मरने के लिए एक-न-एक अमि है। सभी उस अग्निमें जल मरना चाहते है । सभी समझते हैं कि उस भागमें जल मरनेका उनको अधिकार है । उनमेंसे कोई जल मरता है, और कोई काचमै टकराकर फिर आता है। ज्ञानकी अग्नि, धनकी अमि, मानकी अग्नि, रूपकी अमि, धर्मकी अग्नि, इन्द्रियोकी अग्नि, कहातक गिनावे, ससार अग्निमय है। इस अग्निमय समारमें काँचका घेरा भी है। जिस प्रकाशको देस कर मोहित होते हैं-मोहित होकर जिसमें कूद पडना चाहते हैं-कही, २१ पतग। - तो नहीं पाते-लोट कर भनभन करते चले जाते हैं, और फिर फिर कर उसीके आसपास चक्कर लगाते है । अगर घेरा न होता तो ससार अबतक कनका जर कर भस्म हो गया होता। यदि सभी लोग धर्मके ज्ञाता होकर धर्मकी अग्निको अज्ञानके आवरणसे अलग कर पाते तो इस मसारका कारोबार कितने दिन चलता ? बहुतम मनुष्य जानाग्निपर चढ़े हुए कांचके आवरणसे टकराकर पच जाते है । पर तु 'माक्रेटिम' और 'गेलीलियो' उसमें जल मरे। रूपकी, धनकी और मानकी अग्निम तो हम नित्य ही हजारो पत- गोंको जलते मरते देसते है । इस अग्निदाहका निसमें वर्णन होता है उसको काव्य कहते हैं । महाभारतके लेसकने मानकी अग्नि उत्पन्न कर उसमें दुर्यो- धन-पतगको जला दिया,-जगतमे एक अद्वितीय काव्य-ग्रन्थकी रचना हुई। ज्ञानाग्निम जरनेके गीत "पेराडाइस रास्ट " नामके अन्यमें गाये गये हैं। धर्माग्मिका अद्वितीय कवि सेट पाल' गिना जाता है । भोगकी अग्निके पतग 'एण्टोनी ओर किओपेटा' थे । रूपामिक पतग 'रोमियो और जूलि- यट' थे। ईर्पाकी अग्नि' ओथेलो' में ओर इन्द्रिय-सुसकी अग्नि 'गीतगो- चिन्द ' और ' विद्यासुन्दर ' में जर रही है । स्नेहकी आगम सीता-पतगको जलानेके लिए रामायणकी रचना हुई है। आग क्या पदार्थ है-मो हम नहीं जानते । रूप, तेज, ताप, निया, गति आदि शब्दोंका कुछ अर्थ ही नहीं है। यहाँपर दर्शनशास्त्र हार मानते हैं, विज्ञान हार मानता है, धर्मपुस्तके हार मानती है, काव्यके प्रथ हार मानते है। ईश्वर क्या है, धर्म क्या है, ज्ञान क्या है, स्नेह क्या है। क्या है, सो हम कुछ भी नहीं जानते। तो भी उन्ही अलोकिक अनात पदार्थीको घेर धेर कर चक्कर मारा करते हैं। हम पतग नहीं हैं तो क्या है ? देसो माई पतग-दल, इस तरह चक्कर लगानेम, भटकनेम, कोई लाभ नहीं। हो सके, तो आगर्म कूद कर जल मरो। न हो सके, तो चलो, भनभन करके चल दे। कवि मिल्टनका एक अथ ।

चौवेका चिट्ठा। मेग ५ मेरा मन । मन कहा गया। उसे किसने लिया? कहा, जहाँ मेरा मन था वहा तो नही ह । जहाँ मैंने अपने मनको ग्य छोडा या वहाँ तो उसका कुछ पता नही है । किसने उसे चुराया ? उसकी रोजमें पृथ्वी-आकाश- पातार एक कर डाला, मगर मेरा मन या मेरे मनका चोर कहीं नहीं मिरा फिर पिसने मेरा मन चुरा रिया ? मेरे एक मि बोले-टेगो, रसोईघरमे जाकर देखो, संभव है कि वहा तुम्हारा मन पटा हो। यह मैं मानता कि रसोइधरमे मेरा मन पटा रहा करता था। जहाँ पुलाव जर्दे और कमान कोफ्तको मुगन्ध उडती थी-जहो डेकची-वाहिनी 'अन्न- पूर्णा' की धीमी धीमी फुदफुट-बुदबुर ध्वनि सुन पडती थी, वहीं मेरा मन पड़ा रहता था। जहाँ आलू-देव कटाहीकी गगामे स-तल तान करके मिट्टी- कोसे मात्र या चादीके सिहासनमें विराजमान होते है, वहीं मेरा मन प्रणत होकर पटा रहता है, भक्ति-रसमें शराबोर होकर उस तीर्थस्थानको जोड़ना नहीं चाहता। जही करीका बथा, दूसरे ' दधीचि' की तरह परोपकारके लिए अपनी हडियो अर्पण कर देता है, और उन मास-मिली हडियोमे कोर्मा-रूपी वन न कर भूगरूपी वृत्रासुरका वध करनेके लिए तैयार रहता है, वहीं मेरा मन इन्द्र-पद नेके लिए उपस्थित रहता है। जहाँ पाचकरूपी विष्णु-पूरी कचौरीरूपी सुदर्शन चक्र छोढता है, वहीं मेरा मन परम वैष्णव होकर बटा रहता है । अथवा जिस आकाशमें पूरी-म्पी चन्द्रमामा उदय होता है, वहाँ मेरा मन राहु बनकर ग्रहण' के ताकम लगा रहता है। और रोग चाहे जिसे (रपण आदिको) क्हे, मगर मैं तो पूरीको ही 'असण्ड-मण्डलाकार' कहता है । जहा रसगुरलास्पी गालग्राम विराजते है, वहीं मेरा मन उनका उपासक हो रहता है। रसिस्वागूके घरकी मिसरानी देख नेमे तो सूपनग्माकी सगी बहिन थी आरे उसकी अवस्था भी कमसे कम साठ वर्षकी होगी, मगर वह रसोई अच्छी बनाती थी और परोसती भी जी सो एकर थी, इमी कारण एक समय मेरा मन उसको चाहने लगा था। इस शुभ- कार्यमे बाधा केरल यही हुई कि मिसरानी पहले ही कूच कर गई-इसीसे ऐसा नहीं हो सका। . .

२३ मेरामना “ मित्रके कहनेमे मैने रसोई घरमे अपने मनकी सोज की, मगर वहॉ पता नहीं चला । पुराव कोफ्ते वगेरह अधिष्ठाता देवतोसे पूछनेपर मालूम हुआ कि उनमेंसे किसीने मेरा मन नहीं चुराया । मित्रने फिर कहा- अच्छा, अब जरा श्यामा पारिनके यहा जाकर तो पोज करो । शायद वर तुम्हारा मन ले गई हो।" श्यामाके साथ मेरा कुछ सम्बन्ध अवश्य है, लेकिन वह सम्बन्ध गाररसका नहीं, गो-रसका है। श्यामा, देसनेमें गदबढी, गोल गोल, अरस्था पचामके लगभग, दातोमे मिस्मीकी धडी, मॉगमे सेदुर भरा, मुसमें हसीभरी, नाकमें छोटी सी नथ, ओर सिरपर दृध-भरी मटकी लिये, रसमयी हसी वरमाती राही चली जाती थी, और मै पीछे पीछे उस हेसीका मजा बटोर बटोर कर अपनी झोली भरताजाता था। यह देखकर कुछ दुष्ट दुनियारे लोग मेरी निन्दा करने लगे । पुजारी महराजके मारे बागमे फूल नहीं सिरने पाता, और चयाइयोके मारे श्यामाके आगे मेरा मुग्पकमल' नहीं गुलने पाता । नहीं तो गोरस और काव्यरसमे परस्पर खून देन रेन चलता । इसमे मुझे अपने लिए चाहे दुप हो, या न हो, रेकिन श्यामाके लिग मुझे अवश्य पहाट म ह । क्योकि मेरी समझमे श्यामा सती, मामी, पतिव्रता है। यह बात भी में चार आदमियोके आगे करने नहीं पाता । एक गार मैने यह बात कही तो महल्लेके एक दुष्ट लटकेने इसका भी उल्टा ही अर्थ क्यिा । उसने कहा-श्यामा 'हे,' इसलिए वह 'सर' या सती' । वह साधू ग्वाले की स्त्री है, उससे उमे' माध्वी' का सकते है। और यह विधवा होनेपर भी पतिसे सारी नहीं, इसीसे घोर 'पनिव्रता' है। कहनेकी जरूरत नहीं कि मेन शिक्षा देनेके लिए एसा युरा अर्थ करने- वारे' र उकेके दो चार सप्पट झाड दिये थे, किन्तु इससे भी मेरा कलक दूर नही दुआ जन लिपो रेठा है तब माफ-ही-पाफ रिपूग । मेरे मनमें श्यामाका अनुराग कुछ न कुछ अवश्य ह । इसके कई कारण ह-एक तो यह कि वह जो दूध देती हे यह यस्ता होता है, और उममें पानीका एक डॅड भी नहीं मिला होता । दमरे यह कि यह कभी कभी ध, महा, मस्या वगैरह मुझे मुफ्त ही दे जाती है । तीसरे एक दिन उसने मुझसे कहा था कि " चायनी, तुम्हारे पास वह कागजोकी पोटली कमी है." मैने पूछा- श्या तुम चौवेका चिहा। ४ सुनोगी ?" इसके बाद मैंने उसे कई लेख पढकर सुनाये । उसने बैठकर मन लगाकर उन्हें सुना । भला, इस व्यवहारसे कौन लेखक वे-दामका गुलाम न बन जायगा ? श्यामाकी तारीफ कहातक करूं, उसने मेरे कहनेसे, अनुरोध करनेसे, भग पीना भी शुरू कर दिया है। यह बात मै स्वीकार करता हूँ कि इन्हीं सब कारणोंसे मेरा मन कभी कभी श्यामाके घरके चारो ओर चक्कर लगाया करता था । किन्तु, केवल उसके आसपास ही नहीं, उसके यहाँ जिस दालानमें मगला गऊ बँधती है वहीं भी मेरा मन बराबर ताक-झांक लगाये रहता है । मैं जैसे श्यामाको चाहता है, वैसे ही मगलाको भी । एक दृध, महा और मक्खन पैदा करती है, और दूसरी देती है । गगा विष्णुके चरणोसे पैदा हुई है, लेकिन उनको यहाँतक लाये हैं राजा भगीरथ । मगलाको में विष्णुपद और श्यामाको राजा भगीरथ समझता है । मैं दोनोको समानभावसे चाहता हूँ । श्यामा और उसकी गर, दोनो ही सुन्दरी, दोनो ही मोटी ताजी, रसमयी, दूध देनेवाली और धड़े घडे भरके थनोवाली है। उनमसे एक गोरसकी और दूसरी हास्यरसकी जननी है। और मैं, मैं तो दोनोहीके निकट बिना दामके बिक चुका हूँ । किन्तु आज कल सोज करनेसे जान पड़ा कि मेरा मन श्यामाके छपर खटमें या गोशालामें नहीं है। फिर मेरा मन कहाँ गया? रोते रोते घरके बाहर निकला । देखा, एक युवती जलकी कल्सी कमरपर रक्ष लिये जा रही है । उसके मुसमण्डलपर दृष्टि पटी तो उसकी गहरे काले रगकी और हवाके हिलोरोसे हिलती हुई अरक, काली काली कमान सी भौहें, और काली काली ऑसोकी पुतलियाँ देखकर जान पटा, जैसे कमलके चनमें चचल भौरे घूम घूम कर उड रहे हैं-~-बैठते नहीं, उडे उडे फिरते हैं। चलने में उसके अगोका हिलना देसकर जान पड़ता था, जैसे लावण्यकी नदीमें छोटी छोटी लहरे उठ रही है । पग पग पर, चलते समय, जान पडता था, जैसे वह हृदयकी हडिया तोडती चली जा रही है। उसे देखकर मुझे जान पढा कि निस्सन्देह इसीने मेरा मन जुराया है। मैं उसके साथ हो लिया उसने धूमकर कुछ शोधका भाव दिखाकर कहा। यह क्या जी ? तुम मेरे साथ क्यों आ रहे हो?" मैंने कहा-तुमने मेरा मन चुराया है ? . -

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चौवेका चिट्ठा- . - इन कई । - चित है, वे सभी तृप्त न कर सकनेवाली, और इसीसे टु सकी जड है । जहाँ देखोगे वहाँ यशके साथ निन्दा, इन्द्रियसुखके साथ रोग, धनके साथ हानि और चिन्ता देसोगे । सुन्दर शरीर बुढढा और रोगी हो जाता है, सुनामम भी मिथ्या कलक लगाया जाता है, अपने धनको कहीं कही स्त्रीका उपपति भोग करता है, मान और प्रतिष्ठा मेघमालाकी तरह भरदऋतु (बुढापे) मैं नही रहती । विद्यासे भी तृप्ति नहीं होती, वह केवल अन्धकारने घोर अन्धकारमें ले जाती है। उमसे इस ससारकी तत्व-जिज्ञासा कभी मिट नहीं सकती। हाँ, यह बात अवश्य है कि विद्यामा जो उद्देश्य (धन, मान, यश आदिकी प्राप्ति) है, वह अवश्य उसके द्वारा सिद्ध हो जाता है। किन्तु उससे सच्चे सुखकी प्राप्ति नहीं होती। क्या आपने कभी किसीको कहते सुना है कि "मै धनोपार्जन करके, अथवा यशस्वी होकर, सुखी हुआ हू लाइनोको जो कोड पढे, वही स्मरण करके देसे कि उसने कभी क्सिीके मुरवसे ऐसा सुना है । मे सौगद साकर कह सकता हूं कि किसीने कभी ऐसी बात नहीं सुनी होगी। इसमे बढकर धन और मानके निकम्मे होने- का प्रमाण और क्या हो सकता है ? आश्चर्यकी बात तो यही है कि ऐसे अझाटा प्रमाणके रहते हुए भी हर एक आदमी उसी धन और मानके लिए प्राणपणसे चेष्टा करता है । इसका कारण और कुछ नहीं, आजकलकी शिक्षा' है । माके धकी घूटीके माथ ही बचे हृदयमे यह विश्वास पैठ जाता है कि जो कुछ है वह धन और मान है। बालक देखता है कि रातदिन उसके मा-बाप, भाई-बहन, पास-परोसी, इष्ट-मित्र, नोकर-चाकर,मभी “हाय धन, हाय यश, हाय मान," करते फिरते है । बस, यह वालक और निझर- नके पहले ही उसी राम्तेपर चलना सीप जाता है । न जाने यह मनुष्यसमाज कर नित्य और सच्चे सुनके पानेका उपाय खोजेगा? जितने विद्वान् , बुद्धि- मान् , दार्शनिक और मसारका तत्व जाननेकी डींग होकनेवाले है, सर मिर कर देखें कि औरको सुपी बनानेने सिना अपने मुसी होनेका और कोई उपाय हे या नहीं। मैं कहता है कि नहीं है । मैं मरकर जलकर राख हो जाऊँगा, मेरा नाम तक इस संसारसे उठ जायगा, किन्तु मै मुक्तकण्ठ होकर कहता है कि एक दिन लोग मेरी इस बातको अवश्य जानेंगे कि मनुष्य के स्थायी सुनका मल कारण दसरेको सुसी करनेके सिवा लार कुछ नहीं है। आज जेसे रोग धन मान आदिके पीछे पागल हुए फिरेन है, बसे ही एक दिन सारी मनुष्यजाति . . । - .

२७ मेरा मन । 1 दृसरको सुग्गी बनानेके लिए पागल हुई फिरेगी । मै मरकर मिट्टीमे मिर जाऊँगा, मगर मेरी यह आशा एक दिन अवश्य सफल होगी। सफर होगी, रेपिन किती दिनोम ? हाय, कोर रतलामेंगा, कितने दिनोमे । यात पुरानी है। ढाई हजार वप पहले शास्यमिह इसी जातको कई तरह बतला गये है । उनके बाद और भी कई लोकशिक्षक महापुर पोने यही सिप- राया है। किन्तु किसी तरह ससारके रोग नही मीमते, रे सिमी तरह इस धन-जन-मान-लालसाके इन्द्रजाल को अपने आगेमे हटा नहीं सकते। इधर जसे अंगरेजी शासनका अधिकार हुआ है, तबसे इस मामलेमें और भी गड पडी पट गई है । अगरेजी शासन, अंगरेजी सभ्यता और अगरेजी शिलाके साब साथ 'मेटीरियल प्रास्पेरिटी' (भौतिक सम्पत्ति ) पर अनुराग भी दिना- दिन इस देशम यढता जाता है। अगरेज जाति इस भातिमसम्पत्तिको बेहद चाटती ह। अंगरजोकी सभ्यताका यह प्रधाा चिह्न है । अगरेज लोगोका जनमे यहा शुभागमन हुआ है तयमे वे इस देशकी भौतिक्मम्पत्ति वटानेमे ती जीजानी जुट हुए है । हम भी 'यथा राजा तथा प्रजा' तोक्र उम भौतिकसम्पत्तिक आगे ओर सब भूल गये या भूर रहे है । भारतवर्षको ओर देनमृतिया स्थान- भ्रष्ट हो गई है, सिन्धुमे रेकर ब्रह्मपुत्र नद ना रेवल भौतिक सम्पत्तिकी पूना हो रही है । देगो, निजकी क्सी श्रीवृद्धि या तरकी हो रही है-देसो गाटीका जाल कहाँतक फैला हुआ है-देसते हो, टेलीग्राफ कमी चीन है। देखता ह, फिन्तु चिदानन्दका प्रथ यह ह कि तुम्हारे टेलीयाफले आर गाडीने मेरे मनका सुग्म क्तिना बटेगा? मेरे सोये हुए मनको क्या ये वस्तुण सोज ला दे सस्ती है? क्या इनमे किसीके जीकी ज्वारा मिट सस्ती है ? इनमे कृपणकी तृष्णा मिट सकती है ? फिमी अपमानितक अपमानका बदला चुक सस्ता है? अगर नहीं, तो तुम अपनी इस रेल और टेलीयाफको उसाड कर समुद्रम फेंक दो, चिदानन्दकी तो यही राय है। क्या अगरेजी, और क्या हिन्दी, जो मामिपत्र, समाचारपत्र आर ध्यारयान हम देयते या सुनते हैं, उसीमे हमको भातिक्मम्पत्तिकी चर्चा या भालोचना मिलती है। पम् भोलानाथ । भोतियसम्पत्तिकी पूजा करो, रपयो- की देरीपर ढेरी चढाओ, जो कुछ है वह सोलह आनेस रपया है। रपया भात है, रपया मुक्ति है, रपया उन्नति है, रपया मदति है। रपया धर्म है, . . ।

चौवेका चिट्ठा- . । . रुपया कर्म है रुपया ही धर्मार्थकाममोक्षका मूल है। इस राहपर न जाना, देशका रुपया घटेगा,उस राह पर चलो, देशका रपया वढेगा। जय पशुपतिकी। रपया बढाओ-रपया बढाओ । रुपया रेल और टेलीग्राफसे बरसता है, उन्हींके मन्दिरोमे जाकर सिर झुकाओ। ऐसा करो जिसमें रुपया बढे, शून्य आकाशसे स्पये बरमा करें । रपयोकी झनझनाहटसे भारत भर उठे। और मन ? मन और क्या चीज है ? रपया ही मन है, मन तन्मय है । मन हमारा साल' में गढा और निगाटा जाता है । रपया ही भौतिकसम्पत्ति है । हर हर बम् म् । भौतिकसम्पत्तिकी पूजा करो। इस पूजाके पुरोहित शुद्धाचारी ॲग- रेज ऋपि हैं। आदमस्मिथ-पुराण और मिर-तन्त्रसे इस पूजाके मन्त्र पढे जाते हैं। इस पूजाके उत्सवमें अंगरेजी असवार नगाडा और ढोल बजाते हैं, और हिन्दी अपवार झॉझ पीटते है । शिक्षा और उत्साहका नैवेद्य लग जानेपर हृदयको भेट चढाई जाती है । इस पूजाका फल भी सुनोगे ! सुनो, इस पूजाका फल है, इस लोक और परलोकमे सदाके लिए नरकभोग। तो आओ फिर, सब लोग मिलकर भौतिकमम्पत्तिकी पूजा करें। आओ, यशोगगाके जलमें धोकर, वञ्चना-बिल्वपत्रम मीठी बातोंका चन्दन छिडककर इस महादेवकी पूजा करें । बोलो भाई हर हर बम् वम् । हम भौतिकसम्पत्तिकी पूजा करते है। बजाओ भाई ढोर तुरही और झांझ-ढम ढम ढम, झम झम झम । आइए पुरोहितजी । मन्त्र पढिए । हमारे इस बहुत पुराने घीको रेकर स्वधास्वाहा उच्चारण कर अग्निम आहुति दीजिए ! कहाँ हैं लाला मदारीलालके माहबजादे यूटिलिटेरियन बहादुर । बकरेकी गर्दन टेपर रक्सी है, एक बार बागा पञ्चा- नन्दका नाम रेकर हाथ मारो ! हर हर यम् पम् । चिढानन्द खड़ा हुआ है, बकरेकी 'मूडी' देना | तुम मजेमें पूजा करो । पूजा करो, कोई हानि नहीं, परन्तु मुझे कई बातें समझा दो।---तुम्हारी इस भौतिकसम्पत्तिसे कितने अभद्र भद्र हुए है। क्तिने भशिष्ट शिष्ट हुए है। कितने अधार्मिक धारमा हुण हैं ? कितने अपवित्र पवित्र हुए हैं ? एक भी पचानन नाम ठीक नहीं-~-पञ्चानन्द ही ठीक है। मदिरा, मास, गादी- जोड़ी, पोशाफ, और वेश्या-टन पाँच आनन्टोंसे पमानन्दका सगठन हुआ है। -मदारीलाल। h 1 मेरा मन । । । नहीं । अगर मेरा यह अनुमान सच है, तो मुझे तुम्हारी यह 'सम्पत्ति' रत्तीभर न चाहिए । मै आना देता हूँ कि इसे भारतसे उठा दो। तुम्हारी बातें मैं समझता है। तुम्हारा विश्वास है कि यह पेट नामका जो पडा. भारी गढा है इसे नित्य भरना चाहिए, नहीं तो काम नहीं चल सकता । तुम कहते हो कि सनका यह गढा जिसमें अच्छी तरह भरता रहे उसीकी चेष्टा हम करते हैं । " मैं कहता हू कि, यह तो बहुत ही अच्छी बात है, परन्तु इसके लिए इतनी धूमधाम या तन्मयताकी आवश्यकता नहीं । इस गढेके भरनेमें तुम ऐसे लग गये हो कि तुमको और तरफ आग्य उठाकर देग्वनेका भी अवकाश नहीं। मेरी समझमें गढेका एक कोना चाहे साली रहे, वह अच्छा, परन्तु और और तरफ भी मन लगाना चाहिए । गढेको भरना ओर मनकी तृप्ति (सुस ) दोनो भिन्न है । मानसिक सुस बढानेका क्या कोई उपाय नहीं हो सकता ? तुम इतनी कले बनाते हो, क्या मनुष्य मनुष्यमे परस्पर प्यार वढानेकी कोई कर नहीं बन सकती ? जरा अफला लटाकर देखो, नहीं तो मर विकल हो जायगा। मैं भी चिरकालसे केवल गढा भर रहा हूं-मैंने कभी पराये लिए कुछ नहीं सोचा । इसीसे सर सो बैठा हू–ससारमे मेरे लिए सुख नहीं है, इसीसे इस पृथ्वीपर मेरे रहनेका प्रयोजन भी कुछ नहीं। दूसरेका योश अपन सिरपर क्यो र, यही मोचकर मैंने ब्याह नहीं किया। उसका फल' यह हुआ कि मेरा मन कही नहीं है-लापता हे । मतलब यह कि मैं सुखी नहीं हु । सुसी कैसे हो सस्ता हूँ ? जर मैं किसीके काम न आया, क्सिीकी जिम्मेदारी मैने नहीं ली, तर सुग्रपर मेरा अधिकार ही क्या है? यह सच है कि सुखपर मेरा अधिकार नहीं है, रेकिन इससे यह न समझ हेना कि तुम लोगोने व्याह दिया है और उसमे तुम मुनी हु हो । यदि पारिवारिक स्नेहमें तुम्हारी आरमप्रियता (म्बुदपसन्दगी)रीन नहीं हुई, यदि विवाहसस्कारसे तुम्हारा हृदय उदार नहीं यना, यदि तुम अपने परिवारका प्यार करने के द्वारा मारी मनुष्यजातिको प्यार करना नहीं मीये, तो गुम ब्याह वृया हुआ, तुमो व्यर्थका यथेठा मोल लिया। इद्रियतृप्ति या Puti मुग्य देखना ही विवाहमा उद्देश्य नहीं है। यदि निगहबन्धनसे मारा चरिन उत्तम न बना, तो विवाहकी कोई जरूरत नहीं। इन्द्रियों wrire चौबेका चिट्ठा। ३० वश की जा सकती है । अभ्याससे ही इन्द्रिया एकदम शान्त बनाई जा सकती है । मेरी सम्मति है कि मनुष्यजाति अभ्यासके द्वारा इन्द्रियोंको वशमे रस- कर चाहे पृथ्वीपरसे उठ जाय, किन्तु जिम विवाहसे प्रीतिकी शिक्षा न मिले वैसे विवाहकी कोई आवश्यकता नहीं है। अब चिदानन्द शर्मा हाथ जोडकर सबसे यह प्रार्थना करता है, कि आप रोगोममे कोई मनन उसका एक ब्याह करा दे सकते हैं? ६ चॉदनीमे। स घामफलसे हरे भरे स्थानमे, इस उमगसे बहती हुई गगाके किनारे, इस चमकीली चाँदनीम, आज चिडेकी श्रीवृद्वि करूगा-उसका कलेवर बढाउँगा। ऐसी ही चोदनीम ट्रेम शर्मा ट्रायकी ऊंची दीवारपर चढकर रिलीडाकी यादमें गर्म सॉस लिया करते थे-ऐसी ही चादनीमें सुन्दरी थिलगी इसी तरह ओसरी चूढोसे भीगी हुई कोमर' घासको सुकुमार पैरोसे रोट कर पिरामसके मिलनस्थानको अभिमार करती थी, और हमारे कान्हाने भी ऐसी ही शरद ऋतुकी चादनीमे रास रचा था । मै भी आज पञ्चपतिका और द्रोपदीमे भी बढकर 'महाभारत' रचनेकी शक्ति रखनेवारी इस लेसनीके साथ रास रचने बेटा हू-टेसू कन्हैयाकी तरह पहाड मकता हू, या नहीं। चन्द्र, तुम हेसते हो ? मारे हसीके आकाशमें लोटे लोटे फिर रहे हो? अपनी सत्ताईस प्यारियों ( नक्षत्रो) के साथ आँख मटका कर मुझे हैस रहे हो ? राजा दक्षकी समझदारी पर वारी |--एकदम सत्ताईस लडकिया गरे मढ़ दी। इधर चिदानन्द शर्मा केवल एक व्याहके लिए ईश्वरसे निकाल प्रार्थना करते करते वृढा होगया। अच्छा, अब तुम अमल-धवल-किरण • 1 ओर नहीं तो कमसे कम 'इलेपा' आर मघा' को मुझे दे दो, मैं इन दोनोको बहुत प्यार करता है । मुझ जैसे निकम्मे लोग इनकी कृपामे कमसे कम दो दिन अपने घर रहनेका आराम पा सकते है।मै इन दोनो बहनोको अपने घरमे सदाके लिए रखकर सुपले समय विताउंगा। इनमे मोर भी ओक गुण हैं, अपनी अक्षमता ( नालायकी) के कारण राशि सुधाकर

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चौधेका चिट्ठा- ૨૨ लवस्तृता बडे यलसे कामस्काटका देशकी नदियोके नाम कण्ठस्थ किये हैं। इसी उच्च- शिक्षाके लिए उन्होने आधी आधी रातको तेल जलाकर लेम्पके आगे एकाग्रभा- बसे सहारा मरुभूमिके धूलिकणोका हिसार लगा डाला है। इसी उच्चशिक्षाके लिए सालिमेनके पहलेकी ५२ पीढी और पीछेकी ५३: पीढीके नाम रट डाले है। इसी उच्च शिक्षाके बलसे उन्होंने सीसा है कि प्रकाश्य सभाओं में अनर्ग- दे लेना ही परम पुरपार्थ है, किसी-न-किसी तरह अगरेजोकी निन्दा कर लेना ही राजनीतिकी जानकारी है, और वशदण्डिका (स्त्री) की स्थापना करके उम्मेदवारो (बालबच्चो) का दल बढाकर जगत्को जगल बना देना ही इस कलियुगी जीवनको सफलता है मगर मैं इस तरहकी वशदण्डिका नहीं चाहता । मै विल (वसीयत) कर जाऊँगा कि मेरी सात पीढीतक किसीका ब्याह न हो तो भी अच्छा, लेकिन ऐसी वशदण्डिकाके सहारे स्वर्ग पानेकी कामना करना किसी तरह उचित नहीं । यदि समारको चलानेके लिए व्याह किया जाता है, तो मैं मछली वगैरह जानवरों के साथ व्याह करूगा, अगर रपयेके लिए ब्याह किया जाता है, तो मै टकमालके बडे अफसरसे व्याह करूंगा । और यदि सौन्दर्यके लिए ब्याह किया जाता है, तो पूंघटसे घिरे हुए चन्द्र-वदनको दूरहीसे प्रणाम कर इस चन्द्रसे व्याह करूंगा। भागीरथी । अगर तुम शन्तनु राजाके विशाल वक्ष स्थलमें, या उससे ऊंचे हिमालयकै भवनमें, अथवा और भी चे महादेवके जटाजूटम रहती, तो आज कौन तुम्हारी उपासना करता ? तुम नीचगामिनी होकर, मनुष्यलोकमे उतर कर सहस्त्र धाराये सागरसे मिलने गई, इसीसे सगर राजाके साठ हजार पुत्रोका उद्धार कर सकी। वायुदेव । अगर तुम अञ्जनाके अञ्चलसे ही चिरकार तक क्रोटा करते रहते, या मलयाचल पर अपने प्रमोदमन्दिरके बीच चन्दनकी डाले युकाकर, अथवा इलायचीकी रताओको हिराकर छेद कर फिरते रहते, तो फिर कौन "त्वमेव जगजीवन पालन" कह कर तुम्हारी स्तुति करता? यदि इन वसन्त विलासी पक्षियोका कलरव नन्दनवनमें ही मुन पडता, तो चिदा- नन्दशर्मा आज यहा इतनी रातको इनके नाम पर वृथा स्याही कलमका नाश क्या करता ? चन्द्र । यदि तुम क्षीरसागरके तले-अमृतके भडारम-मूगेके सके उत्तर पूर्वका प्रायद्वीप । - .

चाँदनीमें। AAR जो पलान् है वे ही मर्द और जो निल हैं वे ही स्त्री हैं। इसी तरह सही। जिम विद्ववर कोम्टने अपनेको नीतिज्ञशिरोमणि मानकर यूरोपियन पण्डितमण्ड- लीसे 'कर' मांगा था, उसी अतुलप्रतापशालीको जिस मैडम क्लोटिलट डेमोने अपने प्रतापसे वशम कर लिया, उसे She कहंगे या He ? रोमरा ज्यके केसर प्रतापशाली पृथ्वीपति थे। ऐसे तीन कैमरोंको जिस मिसर देशकी रानी क्लिओपेट्राने अपने अधीन रसकर उनपर हुकूमत चलाई, उसको She कहेंगे या He ? असल बात तो यह है कि इस जगत्मे कान He हे, कौन She है, इसका निश्चय हो नहीं सकता। एक दिन नाटकका तमाशा हो रहा था, उसमें एक स्त्रीपानने पार्ट करते करते कहा-" सिंहिनी होय शिवापद सेहही ? " और भारतकै 'नवयुवक मन्त्रमुग्धकी तरह उसकी ओर ताकने रगे, उस समय मुझे सचमुच वह नारी सिंहिनी ओर वे युवक शिवा (सियारी) जान पडे थे। उस समय यदि कोई मुझसे पूछता कि इनमे कौन He है ओर कोन She, तो मैं अवश्य कहता कि यह स्त्री He है, और ये देखने-सुननेवाले She हैं। सच तो यह है कि भारतीय युवक कहीं He ओर सर्वन विकल्पसे इट It होते हैं। इसकी नित्यविधि भी है। जैसे, वे हसीदिलगीमे He, पलगपर She ओर काम- काजमें It होते है । वे वक्तृता देने के समय He, साहबोके सामने She और मद्यपान करनेपर It हो जाते है । फल यह कि वे चाहे He हों, चाहे She, अन्तको It होना अनिवार्य है । जो कुछ हो, मुझे अपने ही वारेमें निश्चय नहीं है कि मै He हूँ या She । उस दिन काली भाटने मेरा नाम रेकर श्यामासे कुछ दिल्लगी की, श्यामाने चटपट दूधसे भरा मिरपरका घडा उमके उपर पटक दिया और उसकी अतीके किनाडोकी मजबूती जांचनेके लिए उसपर एक विशेप प्रकारका अस्त्र चरानेकी इच्छा प्रकट की, वह श्यामा तो समारकी दृष्टि हुई She, ओर मैं, जिससे एक दिन रसिक बाबूने जो कहा कि "चौरेजी, माजउँघते उघते तुमने रेम्प गिराकर विछौना जला डाला, कलको घरभरमें भाग लगा दोगे" तो उसने डरके मारे भगकी मात्रा कम कर दी, वा में हुआ He। ऐसे ही विचारके कारण तो ससारसे मुझसे पटती ER It भी अगरेजीका मर्वनाम शब्द है-इसका प्रयोग नपुसकलिंगफै लिए होना है। - .

चावका चिट्ठा- M स्माके यशकी पताका हो । तुम आकाशकी उज्ज्वल मणि, जगत्की शोभा, और मरघटके जीव श्रीचिदानन्दके हृदय-सर्वम्व हो। तुम अच्छे के लिए अच्छे, और बुरेके लिए बुरे हो, रसमें रस हो, नीरस समयम विप हो। तुम मुझ चिदानन्दकी सहधर्मिणी (स्त्री) बनने योग्य हो । शशि, मैं तुमको बहुत प्यार करता हू, मैं तुम्हारे ही माय ब्याह करूंगा। सर पाठक मिलकर हरि हरि बोलो भाई। बम् भोलानाथ । चन्द्र तो पुरप है । अब डबल.मानाके बिना काम नहीं चल सकता। . हम लोगोके मतसे चन्द्र पुरुप है, मगर विलायती शर्मा लोगोके मतमे चन्द्र कोमलागी कामिनी है। हमारे मतमें चन्द्र हि ' He है, और अंगरेजोके मतसे चन्द्र शि' She है । अब क्या उपाय है ? चन्द्र वास्तवमे हि है या शि, इसका निश्चय कैसे हो? असल बात तो यह है कि इस बारे में समारके माथ आज तक मेरा मत नहीं मिला। इस बारेमे मुझे तरह तरहके सन्देह होते हैं। जो वाजिदअली शाह लखनऊ शहरसे चुपचाप मटियाबुर्जमे जा कर रहे, और वहाँ हस-हसी कबूतर-कबूतरी आदिके साथ सेलते, गुलाबजलकी नहरमें नहाते, और अपने ही समान सोनेके पिंजरेमें पड़ी हुई बुलबुलको घीका पुलाव म्विलाते थे, वह He थे या She ? और जिस रानीने देश-प्रेमके कारण ऐहिक सुस-सम्प- त्तिको लात मार दी, राजपुस्पोंकी शरणमें जानेके बदले भीर मांगना अच्छा समझकर नेपालके पहाडी प्रदेशमे जा कर आश्रय लिया, वह He है या She ? इससे तो जान पड़ा कि साहससे He या Sbe का निर्णय नहीं होता । तो क्या युद्धचतुरताके द्वारा He या She का निर्णय होना चाहिए । अच्छा, जिस जवानने वालियन् दुर्गपर आक्रमण करते समय सबसे आगे पैर चढाया, जिसने फ्रान्सका फिर उद्धार किया, उसे He कहेंगे या She ? और जिस बेडफोर्डने उसे जाल में फंसानेके लिए उसी जवानके कारागार (केदखाने) में मर्दके कपडे पहन रक्ग्वे थे उसे He कहेंगे या She? नहीं, युद्धकोशलसे भी निर्णय न होगा। अच्छा, साधारणत सुना जाता है कि He और She दोनों शब्द अगरेजी भापाक 'सर्वनाम' है। He पुल्लिंगके लिए और She स्त्रीलिंगके लिए काममें लाया जाता है । , ३५ चाँदनीमें। AA । . जो बलवान् है वे ही मर्द और जो निगल हैं वे ही स्त्री हैं। इसी तरह सही। जिस विद्वद्वर कोम्टने अपनेको नीतिज्ञशिरोमणि मानकर यूरोपियन पण्डितमण्ड- लीसे 'कर' मांगा था, उसी अतुरप्रतापशालीको जिस मैडम क्लोटिल्ट डेनोने अपने प्रतापसे वशमे कर लिया, उसे She कहेंगे या He ? रोमरा ज्यके कैसर प्रतापशाली पृथ्वीपति थे। ऐसे तीन कैसरोंको जिस मिसर देशकी रानी क्लिओपेट्राने अपने अधीन रखकर उनपर हुकमत चलाई, उसको She कहेगे या He ? असल बात तो यह है कि इस जगत्म कोन He है, कोन She है, इसका निश्चय हो नहीं सकता। एक दिन नाटकका तमाशा हो रहा था, उसमें एक स्त्रीपानने पार्ट करते करते कहा-" सिंहिनी होय शिवापद सेइहाँ " और भारतके 'नवयुवक मन्त्रमुग्धकी तरह उमकी ओर ताकने लगे, उस समय मुझे सचमुच वह नारी सिंहिनी भोर वे युवक शिया (सियारी) जान पडे थे। उस समय यदि कोई मुझसे पूछता कि इनमे कौन He है और कान She, तो मै अवश्य कहता कि यह स्त्री He है, और ये देखने-सुननेवाले She है । सच तो यह है कि भारतीय युवक कहीं He ओर मनन विकल्पसे इट It होते है । इसकी नित्यविधि भी है । जैसे, वे हसीदिल्लगीम He, पलगपर She और काम काजमें It होते हैं । वे वक्तृता देने के समय He, साहनौके सामने She और मद्यपान करनेपर It हो जाते है । फर' यह कि वे चाहे He हो, चाहे She, अन्तको It होना अनिवार्य है । जो कुछ हो, मुप्ते अपने ही गारेमें निश्चय नहीं है कि मे He हूँ या She । उस दिन भाटने मेरा नाम लेकर श्यामासे कुछ दिल्लगी की, श्यामाने चटपट दूधसे भरा मिरपरका घडा उसके उपर पटक दिया और उसकी छातीके किवाडोकी मजबूती जांचने लिए उसपर एक विशेष प्रकारका अन घरानेकी इच्छा प्रकट की, यह श्यामा तो समारकी दृष्टिम हुई She, और मै, जिसमे एक दिन रसिक याने जो कहा कि "चौग्रेजी, आनघते उंचते तुमने लेप गिराकर विछौना जला डाला, करकोघरभरमें आग लगा दोगे।" तो उसने इरके मारे भगको माना, कम कर दी, घर में हुआ He। ऐसे ही विचारकै कारण तो समारमे मुझसे पटती MIE भी अगरेजीका सर्वनाम शब्द है-इसका प्रयोग नपुपरलिगके लिए होता है। - चौबेका चिट्टा- ३६ अच्छा, . नहीं। मतलब यह कि जब मैं खुद अपने He या She होनेका निश्चय नहीं कर सकता, तव चढ़के He या She होनेका निश्चय कैसे होगा ? अगर चन्द्र He है तो मैं She हूं, क्योंकि मुझे चन्द्रसे प्रेम हो गया है, मैं चन्द्रसे व्याह अवश्य करूँगा । और शायद मैं सचमुच श्री- चिदानन्द चौने निकला, तो चन्द्र She है, चन्द्र विलायती मतसे She हैं। तो मैं चिलायती ढगसंही चन्द्र के साथ व्याह करूंगा। इस समय अनेक मत है, और उनके अनुसार अनेक काम होते है, मैं विलायती मतले व्याह करूगा । देगो न, इस समय विष्णुके दस अवतार भिन्न भिन्न काम देते है । मरम्य ( मछली), कूर्म (कछुआ) और वराह (सुअर) खानेके टेनिलकी शोभा बढाते हैं। नृसिंहरूपधारी कुत्ते सदा साथ रहते है । भारतके युवक लोग चामन होकर भी चन्द्रको छनेकी, पकडनेकी, चेष्टा करते हैं। वे पहले राम (परशुराम ) की तरह माताकी सेवा, दूसरे रामकी तरह स्त्रीकी सेवा करते है । उन्होने तीसरे राम ( बलराम ) से मद्य- पानकी शिक्षा प्राप्त की है। उन्होंने बौद्धमतमे ससारकी अनित्यता मानकर कल्कि अवतारकी तरह संहारमूर्ति धारण की है। इस समय शाक्तमतमे भोजन बनते हैं, और शैव-त्रिशूल (काँटे) में कोच कोच कर वे गलेके नीचे उतारे जाते हैं। पीछेमे या साथ ही सुरापान ( मद्यपान ) अवश्य सेवनीय समझा जाता है । इसके सिमा जेरूसलम 3 के प्रथम गौराग (ईसा) के उपदेशा- नुसार ' भजन' होता है । नवद्वीपवासी दूसरे गौरागकी तरह हरिकीर्तन किया जाता है और राधानगरके छोटे गौरागकी तरह संस्कृत श्लोक पढे जाते हैं। अतएव शशि, पूर्णशशि, मै तुमको अंगरेजी मतसे She मानकर होशह- वास और तन्दुरुस्तीकी हालतमे खुशीसे तुम्हारे साथ व्याह करता हूँ। मेरे बाद मेरे पुत्र पौत्र भी बिना किसीके साझे सुसपूर्वक तुमपर अधिकार बनाए से सकेंगे। इसमें तुम या तुम्हारी जगह पर और जो आगा वह, अगर कोई आपत्ति करेगा तो वह नामजूर होगी। तुम्हारी सत्ताईस प्यारियोंपर आज मेरा पूर्ण अधिकार होगया। . - ईसाइयोका पवित्र तीर्थस्थान-ईसाकी जन्मभूमि ।

३७ चाँदनीमें। अब इस तरह दबे पैरो रोहिणीके साथ गुपचुप बाते करनेमे क्या होगा? इसतरह मुंह मोड मोड कर हँसते, और हलके हलके वादलोका पूंघट काढ कर भागते हुए कहातक जाओगे । इति कोर्टशिप । अथ गान्धविवाह । मैने तुमको वरमाला पहनाइ, तुम मुझे वरमाला पहनाओ। कन्याने सुद दान किया, वर स्वय बराती बन आया । अपना मन ही बना पुरोहित, मडवा मरघटमें छाया ॥ देखो चन्द्र, अब निरारे में मैं तुमसे कुछ बातें करना चाहता है। अब तुम अपने रूप-गौरवका घमण्ड करके जही तहाँ रूपकी वर्षा न करना । जिस समय पुग्नशोकमे पीडित माता छाती पीटकर तुम्हारी तरफ देय देख कर रोती होगी, उस समय तुम उसे अपना रूप दिखाकर क्या करोगे ? तर कर किनी, तू अपने रूपकी राशिको घने बादलोके भीतर छिपा रग्पना । जय समारकी मालाओमे जले हुए लोग तुम्हारे दीरम आफर फर्याद करें, तब उनके आगे अपना रूप लेकर न बैठना, क्योकि जो मसारकी आगमे जल' रहा है उसके लिए वह तीन विपके समान होगा । उसको मरपर घृणा हो गई है, वह किसीकी प्रसन्नता या मुशीको देस नहीं सकता । और सुनो-जिसने इस लोकके मारे मुखोकी चरम सीमा पर पहुंचकर आत्मत्यागकी पूरी तैयारी कर ली है उसको भी वृथा भाशा बधाकर इस ममारमें फैमा रसनेकी चेष्टा न करना । तुम पर अब एकमात्र मेरा ही अधिकार है, अब तुम किस तरह दुम रेको आशा धाओगी? मुनो, चिदानन्दके लिए समय असमय कुछ नहीं है, सयोग नियोग भी कोई चीज नहीं है। चिदानन्दको मुखदुखकी भी कोई पर्दा नहीं है। सुम सदा मेरे पास आना, अपने सुपटु पकी यात मुझमे फहना और मेरी या सुनना । मेरी यातें सुनर भुला न देना, अपने हृदय में, अपनी भन्धि-ममाके माय उन बातोको मिला रसा। मगर देखो, उजियारी रातम मुझसे मिलने आना, यह मुन्दर परेर अधेरी रातमे न निकलना। प्रिये, मेरे लिए यह कैसे सुपका दिल, सो गरे मिया और कौन समझ सकता है ? देखो, भावमे मारीने महीहर महीसे - . , बावेका चिट्ठा- ૨૮ , , - अन्तमे, इसी गगातट पर, मै रात विताउगा। लेकिन याद रक्सो, प्रत्येक पूर्णि- माकी रातको न आना । पचाङ्ग बनानेवाले ज्योतिषियोमे मुहर्त पूछ रेना, नहीं तो किसी दिन दुष्ट राहू राहमें तुम्हारा मुंह कालरा करके तुमको कष्ट पहुँचावेगा । आज पहली ही रातको और अधिक उपदेश करना ठीक नहीं, फिर देखा जायगा। अव चन्द्र, एक बार इस मनुष्यलोकमे उतर कर गगातरगावलीके ऊपर । परीकी तरह नाचो-मैं देखू । एक बार काले बादल के भीतर घुसकर- दौडकर बाहर निकलकर झाको तो सही । एक बार गहरे बादलमे छेट करके मेरी तरफ मधुर कटाक्षपात करो तो सही । एक बार नक्षन नक्षत्र में परस्पर झगडा कराकर, जब वे भिडने लगे तब उन दोनोके दल हटाकर, वेगसे दोडो तो सही। एक बार दोडनेकी थकावटसे निक्ले हुए पसीनेकी मोती- सरीखी बृदोसे सुशोमित मस्तक पर धूघट काढकर गगन-गवाक्षमे बेटकर वायुसेवन करो तो सही । एक बार निरन्तर अमृतवर्षा करके चकोरोंको तृप्त करो तो सही । एक बार इस शुभ अवसर पर चिदानन्दके हृदयमें उदय होकर भीतरका अन्वकार दूर करो तो सही!-अब चिदानन्द सोता है। चन्द्र, यह क्या ? तुम क्षीरसागरकी लडकी त्रिभुवनविहारिणी होकर भी मान' करती हो ? चिदानन्दसे तुम्हारा क्या अपराध बन पडा। एक बार स्त्री पुरपभेदकी जटिलता मिटानके लिए उदाहरणके तौर पर मैंने श्यामा ग्वालिनका नाम ले लिया था, तो क्या उसीके रिए रूठ रहीहो ? ऐसी साधारण वातके लिए आज इस तरह रूठना तो अच्छा नही मारम पडता। देखो, तुम कर किनी हो, तो भी मैंने तुमको ग्रहण कर लिया। तुमसे पूर्वा- नुराग होनेके कारण आजतक मै Lunatic wनाम स्वीकार किये हुए है। ज्योतिषी लोग कहते है कि तुम पत्थर हो, तो भी मैने तुमसे व्याह कर लिया। वे कहते हैं कि तुममें मनुष्य चिह्न नहीं है, तो भी मैंने तुमको स्वीकार कर लिया। तो भी सफगी है ?-अच्छा तो यह समार-गरर-पण्डन गिरितरशिरोमण्डन रिण चरण मेरे निरपर रस लो। हो सके तो इस अनन्त नील वृन्दावन में एक बार यादरका घूघट काढकर मानिनी राधा बनकर बैठो, - चन्द्रप्रस्त, अर्थात् पागल ३२ चाँदनीमे मैं एक बार खियोंके पैर पकड कर अपने जीवनको सफल कर ले। आज मैं चाहे संकों अपराधोका अपराधी हूँ, तुम्हारे द्वारा मेरे सर पापोका प्रायश्चित्त होजायगा । तुम मेरे चान्द्रायणव्रतकें चन्द्रफलक हो । तुम मुझे वैतरणी पार पहुचानेवाले नए ढगके बडे हो। नहीं मानती ?-ऐसा करोगी तो मै सैकडो हजारों व्याह कर टूगा । अब चिदानन्दने व्याहकी नई रीतियां सीस ली है। उसने आप ही वर, समधी, पुरोहित ओर घट बनना सीस लिया है । चिदानन्द अर चाहे जहा व्याह कर सकता है । जर देखूगा कि नव पल्लमोसे लदी हुई डार अपना मुह बढा- कर पत्तोकी उगुली मटका कर बुला रही है, यस, उससे व्याह कर लूग । जर देखूगा कि पमिनी स्वच्छ सरोवरके दर्पणमे ग्रीवा बाकी करके अपना रूप निहारकर खिरी उठती है, उस, उसे व्याह टूगा। जर देखगा कि नदी इन्द्र धनुपका किनारा पकडे हुए उसीके माथ लहरा लहरा कर सेल रही है, उस, उसे उसी धनुपकी सौगन्द देकर अपनी चिरसगिनी बना लूगा । जन देखूगा कि अनन्त शय्या (पृथ्वी) पर रेटी हुई गगा श्वेत वस्त्र (चांदनी) और मणियोंके आभरणों ( तारागणकी परछाहीं) से भूपित होकर सोने एगी, बस, उसके साथ सो रहूगा । जर देखूगा कि कुजकी लता फूरोके गुच्छोसे सिगार करके काले काले केश-करापको सोलकर सूर्यकी सुनही कोमल कान्तिमे मुग्धाका भाव दिखा रही है, बस, उसी गोदमें सिर रखकर उसे उसके वरको पहचनवा दूगा । चिदानन्दने अब व्याह करना मीसा है और घटकका काम भी सीख लिया है। अब वह व्याहके लिए किसीका मुह नहीं निहारनेका। पाठकगण । अगर तुम मेरा कटना मानो, तो मेरी तरह मेरी रायसे व्याह करो । मै, कन्याके लिए वर और वरके लिए कन्या खोजना सूय जानता हूँ- तुम्हारे मनकी चीज दृढ दगा। १ चिदानन्दने एक यार श्यामा ग्वालिनके भी पैर पकडे थे, लेकिन दूपके लिए।-लाला मदारीलाल। २ यह व्रत प्रायश्चित्तके लिए किया जाता है। ३ यमलोस्की भयानक नदी । इसे सहजमें पार होनेरे लिए मृत्युममय गोदान दिया जाता है। ४ जो लोग कन्याके लिए वर और वरके लिए कन्या खोज देते हैं।

चौबेका चिट्ठा- ७ वसन्तका कोकिल ।' भाई वसन्तके कोकिल, अच्छे जीव हो । जब फूल खिलते हैं, दक्षिण " १ , आकर रसिकता शुरू करते हो। और जब दारुण शीतकालमें लोगोके दांत कटाकट बोलते है, तब कहाँ रहते हो भैया ? जब सावन-भादोकी बरसातसे मेरी टूटीफूटी कुटियामें नदी वह चलती है, जव बौछारोकी कडी चोटमे भीगे हुए कौए और चील्हे इधर उधर घर घर घुसती फिरती हैं, तब तुम्हारा यह स्निग्धकृष्णकान्त कमनीय कलेवर कहाँ रहता है ? तुम वसन्तके कोकिला हो, और जाडे-बरसातके कोई नहीं ? क्रोध न करना, तुम्हारे ऐसे हम लोगोम भी बहुत से है। जब रसिक बायके यही इलाके परमे आमदनी आती है, तर मनुष्यकोकिलोके कलकण्ठकजनमे उनका वह निकुक्षनिकेतन भी गूज उठता है। कितनी ही चोटी, तिरक, मॉग और चश्मोका बाजार लग जाता है, कितनी ही कविता, श्लोक, गीत, डोटी अगरेजी, मोटी अँगरेजी, हट्टी-फूटी फटी अगरेजी, चुराई अंगरेजीके आर्तनादसे रसिक बाबुका बैठकसाना वैसा ही जान पडता है, जैसे ढाबलीम कबूतर गुटु, रंगू' कर रहे हो । जब उनके घरमें नाच रंग, गाना बजाना, तिथि-तेहबार- उत्सव-निमन्त्रण होता है, तब मुडके झुड मनुष्यकोकिल आकर उनके घरहा- रको सराय बना टालते हैं कोई साता है, कोई गाता है, कोई हेपता है, कोई खॉसता है, कोई तमाखू जाता है, कोई हंसता दुआ टहलता है, कोई नशेकी मात्रा चढाता है और कोई टेगिलके नीचे लुढकना है । जब रसिक बार याग जाते है, तर मनुष्यकोकिल चींटियोकी कतार होकर उनका साथ देते है। और जिस रातको, खूब पानीकी झडी लगी, रसिक बाका जवान लड़का मर गया, उस दिन उनको एक भी आदमी नहीं मिला । किसीकी तबियत अच्छी नहीं थी, इसलिए वह नहीं आ सका, किमीको वडा भारीसुव था -पोता हुआ था, इससे यह नहीं आ सका, किसीको सारी रात नींद नहीं आई, इससे नहीं आ मका, कोई रातभर पडा सोया किया, इसमे नहीं आ सका । असल पात यह है कि वह दिन बरसातका है, वसन्तका नही । बसन्तका कोकिर उस दिन क्यो आने रगा? .

वसन्तका कोकिला स्वरम'कु. -7 मो भाई वसन्तके कोकिल, तुम्हारा टोप नहीं है, तुम मजेमे योगे। इस अशोक्की दाल पर बैठो, राल लाल फलाके ढेरमे अपने काले शरीरको, दहकते भगारोम छिपे हुए काले बैगनकी तरह, छिपाये रखकर एक बार अपने पञ्चम कहकर पुकारो। तुम्हारे इस 'कु- ' शन्दको मै बहुत पसन्द करता हु । तुम खुद काले, पराण अनसे पले हुए हो, तुम्हारी दृष्टिम सभी 'कु' है। तो फिर जितना हो सके इसी पञ्चम स्परम पुकार कर कहो-'कु-'। जब इस पृथ्वीपर ऐसी कोई सुन्दर चीज देयो, जिसमे तुम्हारे मनमें दाह, जलन या द्वेष पैदा हो, तभी उंची ढार पर बैठकर पुकार कर कहना'-ऊ । क्योंकि तुम सुन्दरतासे शन्य, पराये अन्नमै पले हुए हो। जब देसना, शामकी हवा पाकर पुष्पगुच्छोसे लदी हुई लता दोल उठी, सुगन्धकी लहर उटने रगी, वैसे ही पुकार कर कहना 'कु-3 'जन देखना असरय गुलाय एक माय ग्विलकर, अपनी सुशनसे आप ही मस्त होकर, एक दूसरेके उपर गिर रहे है, नय अपनी ढाल परसे पुकार उठना 'कु- '। जय देसना, मोल मिरीके बहुत ही धने स्निग्ध श्यामर' उज्ज्वल पत्तोकी शोभा वृक्षम नहीं समाती-जवानीमें भरी सुन्दरीकी तरह हेस हेस कर, इतरा इतरा कर, हिल डुलकर, दफ्ट कर, उठली पडती है, उसके सिले हुए अपग्य फूलरीके भुगन्धसे आकाश मस्त हो रहा है, तब, उसीके महारे उठकर, उन्हीं पत्तोके स्पर्शसे अपने अग शीतल करके, उसी गधसे देह पवित्र करके, उसी बकुर-कुझसे पुकारना 'कु- ' जर देखना, शुभमुसी शुद्ध शरीरवाली सुन्दरी चमेली सन् याके हिमणोंकी नमी और घोर घामकी कमी पाकर धीरे धीरे मुग्य सोल्नेका साहस कर रही है.-तहकी तह असग्य अक्रक पसटियोको विकसित करनेका उपक्रम कर रही है -जब देखना कि भौरा उस रूपको देखकर आदर-भरे स्वरमे उसके ऊपर, आसपास गुनगुनाता हुआ चक्कर लगा रहा है-तब, ए कलमुहै, फिर 'कु- कहकर अपने जीकी जलन बुझाना । और, जर किसी गृहस्थके ऑगनमें अनारकी डाल पर बैठकर देग्वना कि उस घरकी कुसुम कुमारी कन्याएँ लताका डोरना, गुलाका विलना, मोलमिरीका रूपरग व गन्ध और चमेलीको निर्मलता एकत्र लेकर क्रीडा कर रही है, तब उन्हींके मुँह पर, इसी पञ्चम स्वरमें, घरभरको प्रति- ध्वनित करते हुए सबसे पुकार कर काना-इतना रूप, इतना सुस, इतनी 'परिनता, मर'कु-ज । यही तुम्हारी जीत हे-यही पञ्चम म्वर । नही . . य चौयका चिट्ठा- ३२ . . . . . . तो इस तुम्हारे 'कु-3'' को कोई न सुनता । इस पृथ्वीपर 'ग्लाइस्टन,' 'टिजरेली' आदिकी तरह-तुम केवल गलेवाजीसे जीत गये, नहीं तो तुम्हारा यह काला रंग तुमको मर्वत्र पुरस्कारमें तिरस्कार दिलाता। तुम्हारी अपेक्षा कोयलेका रग भी अच्छा है । गलेबाजीमें इतना गुण न होता, तो निकम्मे नाविल लिसनेवालेको राजमन्त्रीका पद कैसे मिलता ? और ' जान स्टुअर्ट मिल' को पार्लियामेंट महासभामे स्थान क्यो न मिलता? अच्छा, तो तुम कोकिल, प्रकृति' की बृहत् पार्लियामेटमें खडे होकर, नील चेंदोयेसे मण्टित और पर्वत-नदी-नगर-निकुज आदि बैंचोसे सुसज्जित इस महासभाके भवनमे, अपने उसी मधुर पञ्चम स्वरसे कु-ऊ कहकर पुका- रो, सिंहासन परसे 'हेस्टिंग्स' तक हिल उठे कु-3 1 ' अच्छा, यही मही, इस कमनीय कण्ठसे 'कु' (बुरा) कहोगे तो 'कु' मान लेंगे, और 'सु' (अच्छा) कहोगे तो सु' मान रेंगे। के सिवा है क्या? सब 'कु' है। लतामै कोटे हैं, कुसुममें कीडे है, गधर्म विप है, पत्ते सूसजाते हैं, रूप फीका पड़ जाता है, स्त्रियो छल कपट जानती हैं। टीक 'कु- है, तुम गाओ। किन्तु जब तुम अपने इसी पचम म्वरम कहोगे तभी 'कु' मानेगे, यदि मुर्गे राम 'कुक्कू' करके सरेकी सुसकी नींदको 'कु' कहेंगे तो उसे मैं 'कु' नहीं माननेका । उसके गला नहीं है। गलेबाजीसे ससार पर शासन चलाया जा सकता है, केवर चिल्लाने चीखनेसे कुछ नहीं होता। अगर तुम्हारे ही पञ्चम स्वरको कोई पा सके, तभी वह शब्दमन्त्रसे जगत्को जीत सकता है। लय-पर्दा या कडी-मध्यमका कुछ काम नहीं । सर जेम्स मॉकिन्टस अपनी वक्तृतामें फिरासफी (दर्शन) की कही मध्यम मिलानेसे हार गये, और मेकाले रेटरिक (अर कार ) का पञ्चम लगाकर जीत गये। सूरदार 'श्रृगार' को पजममे गाकर जीत गये हैं, आधुनिक कवियों के अपभ (सडी बोली) को कौन सुनता है ? दसो, रोगोके बूढे माघापोकी बेसुरी बकरकसे क्या फर देस पढता है ? किन्तु जन बाबूजीकी वीयोजी बापूका मुर' बांध देनेके लिए सारगीकी खूटीकी तरह उनके कान उमेठकर पञ्चममे गला चढाती है, तब, तुम्ही बताओ, या पिटि पिडि,' करने लगते हैं कि नहीं ? झमें नहीं आता कि तुम्हारे स्वरको पञ्चम क्यो कहते है। क्या जो मीठा है वही पञ्चम है ? हो, दो पञ्चम जर मीठे रगते हैं--एक . । ' , मगर यह वसन्तका कोकिल। स्वरका पञ्चम, और दसरा महावर-लगे छोटे पेरोके घुघरूदार बिछुओका पञ्चम । किन्तु 'सुर' पञ्चममें उठनेसे अच्छा लगता है, और पैरोका पञ्चम नीचे रसनेहीमे मीठा लगता है। कोन स्वर पञ्चम है, कौन स्वर सप्तम है, कोन मध्यम है, और कौन गान्धार है, यह मुझे कौन समझायेगा? यह हाथीकी चिंघाड है, वह घोडेकी हिनहिनाट है, वह मोरका शोर है और वह यदरकी किचकिच है, यह कहनेसे तो मेरी समझमें कुछ भी नहीं आता। नशेबाज-सुरा सुनता हू, येसुरा सम- झता हूँ, बेसुरा लिखता हू-धैवत, गान्धार, निषाद पञ्चमकी पर्चा नहीं रसता । अगर पसारज,तानपूरा, चिकारा लेकर कोई मुझे सात स्वर समझाने आता है, तो उसका गरजना सुनकर मुझको मगला गायके तुत ध्याए बच्चेका शब्द याद भाजाता है--उसके पीनेसे बचे हुए निर्जर' दूधमे ध्यान बट जाता है-मुर समझ ही नहीं पड़ता । मै गानेवाले के निकट कृतज्ञता प्रक्ट करके मन-वाणी-कायासे आशीवाद करता हूँ कि वह दूसरे जन्ममे मगला गायका बछडा अवश्य हो। अब आरे कोकिर । मैं और तू, दोनो, एक बार पञ्चममें गावें । तू भीजो है, में भी वह हूँ । हम दोनो, एक ही दुमके दुसी और एक ही सुसके सुग्वी है । तू इसी फूलोके बागमे हरएक वृक्षपर भानन्दसे गाता हुआ धूमता है, मै भी इस ससार-काननमें घरघर आनन्दसे यह चिहा सुनाता हुआ विच- रता हू । आ भाई, हम दोनों हिलमिल कर पञ्चममें गा। तेरे भी कोई नहीं, आनन्द है, मरे भी कोई नहीं, आनन्द है। तेरी पूजी यह गग है मेरी पूजी यह भगका गोला है। तू भी ससारमें इस पञ्चम स्वरको पसट करता है और मै भी इसे प्यार करता हूँ । तू पञ्चम स्वरमे किसको पुका. रता है ? और मै ही क्सेि पुकारता हूँ? बतला तो सही कोक्लि, किसे पुकारता हूँ? जो सुन्दर है, उसीको पुकारता हू, जो भला ह, उसीको पुकारता है। जो मेरी पुकार सुनता है उसीको पुकारता हू । इसी-निम आश्चर्यमय ब्रह्माण्डको देखकर कुछ भी न समझनेके कारण विस्मित हो रहा हू-इसीको पुकारता हूँ। इस अनन्त मुन्दर जगत-शरीरका जो आरमा है उसीको पुका रता है। मैं भी पुकारता है-तू भी पुकार । जानकर पुकार या येजाने चौवेका चिट्ठा- ८४ पुकारू-एक ही बात है । तू भी कुछ नहीं जानता, और मैं भी। तेरी भी पुकार पहुचेगी, और मेरी भी। यदि मन पुकारोको सुननेवाला कोई कान है तो मेरी पुकार क्यो न यहा तक पहुचेगी? आ भाई, दोनो जने हिलमिर- कर एक बार पञ्चम स्वरम पुकारें। अच्छा तो फिर 'कुर कुछ कहनेमें सधे हुए गलेसे, तू कोकिल, एक बार पुकार तो सही। कण्ठ न होनेके कारण में कभी अपने मनकी बात कह नहीं सका। अगर तेरा यह भुवनमोहन स्वर पाता, तो कहता। तू मेरे मनकी वहीं बात खुलासा करके इस कुसुमकुजकाननमें एक बार कह, मैं सुनें । क्या कहना चाहता हूयह भी कहना नहीं जानता, उसी गातको तू कह दे--- मैं सुनू । चिदानन्दके मनकी बात इस जन्ममें नहीं कही गई-मनकी मनमें ही रही । अगर कोकिलका कण्ठ पाउँ-कोई अमानुपी भाषा पाऊ-आर नक्षत्र तारागण सुननेवाले हो-तो मनकी बात कह सकता है। इस नील नमोमण्डलमं घुसकर, इस नक्षत्रमण्डलीम उढकर क्या कभी मनमाने ढगमे कु-ऊ ' नहीं पुकार सकृगा ? मैं न पुकार म न सही, तू ही कोकिर, एक बार मेरी तरफसे पुकार-मै सुन । . . ८ स्त्रियोंका रूप। बहुतमी सुन्दरी रूपके गौरवसे पृथ्वीपर पैर ही नहीं रखती । मोचती है, जिधर वे लचककर रोचके साथ निकल जाती है, उधरके लोगोकी सुधबुध जवानीकी नदीमें उठनेवाली हार-भावकी लहरोमें यह जाती है- एक नवीन जगतकी सृष्टि हो जाती है। वे समझती हैं, उनके रूपकी आधी जिधर उठती है, उधरके लोगोका धैर्य फुसकी तरह उड जाता है- धर्मका कोट ढह पडता है। जब पुरपोंके मनरूपी सागरमे उनके रूपकी बहिया आती है, तब उसमें (पुरपोके) कर्म-जहाज, धर्म-नौका और घुद्धि- डोगी, सत्र डून जाते है । केवल सुन्दरताका अभिमान रसनेवाली रमणियो. को ही ऐसा विश्वास नहीं है। बहुतसे पुरुप भी जब स्त्रियोकी मोहिनी शक्तिके वशीभूत होकर उनके रूपकी महिमाका बसान करने लगते हैं, तब वे भी ऐसी बाते कहते हैं, जिन्हें सुनकर बडा ही विस्मय होता है। तब वे आकाश- के तारागण-चन्द्र, और पृथ्वी परके, पर्वत-पशुपक्षी कोडे-पतग-लता आदि- स्त्रियांका रूप। MmA । को रेकर उपमाके लिए सर पींचतान करते हैं। और फिर उनमसे बहुतोको अपमानित कर उल्टे पैसे लौटा देते हैं । वे रूपवती युवतीके मुखमण्डर से तुलना करनेके लिए पूर्ण चन्द्रमाको निमन्त्रण देकर फिर उसे कलकित करके गटा देते है। गरीब चन्द्रमा अपने परकको छातीसे गाये रात भरम अपना काम पूरा करके सिसक जाता है। वे सुन्दरीके मस्तकमें लगे हुए सिन्दूरनिन्दुको देयर पूर्वदिशाके मरतककी शोभा जो बालसूर्य है उनकी निन्दा करते हैं। सूर्यदेव राय होकर पृथ्वीको जराकर चले जाते है । वे रसमयी रमणीके मुसकी हँसीके आगे, खिले हुए कमलपुष्पपर सूर्यको किर- गोके, या सिली हुई कोकारेली पर चौदनीके, नृत्यको कुछ नहीं समझते। तभीसे कमल और कोकारेली पर कोडे और पतगीका अधिकार हो गया। वे कामिनीके कण्ठहारको टेसकर रातम जगमगाती हुई तारागणी माराका तिरस्कार करते है। मैं समझता हूँ, अब ये ज्योतिपका अनुशीलन छोडकर मुनारी मीसनेमे मन रुगावेगे। वे रसरगमयी ललनाओके अगसञ्चालनम ऐसी रावण्य-लीला निहारते ह कि चादनीरातम धीरे धीरे हिलते हुए वृक्षोके पत्तोंमे, अथना निरन्तर चलायमान नदीकी हिलोरोमे, चादनीकी क्रीडा उन्हें कुछ नहीं जंचती। इसीसे शायद वे रातको सो रहते हैं, और करमी पडे आदि भरकर नदीको मुखानेकी चेष्टा किया करते हैं । ओर, जब व खि- योके नयनोका वणन करने बैठते है, तर सरोवरमें मल्यपवनसे हिलते जुलते हुए नीलकमर की कौन कहे, ससारभरकी कोई चीज उन्हें अच्छी नहीं लगती। इन स्त्रियोकी स्तुति करनेवालोमे उपमाके अनुभवकी जो शक्ति है, उसकी बटाई क्येि विना नहीं रहा जाता । एक नेन, उनकी कल्पनाके प्रभावसे, कभी पक्षी (सजन, चकोर आदि), कभी जर जीव (मछली आदि), कभी वनस्पति (पद्म, पलाश, इन्दीवर आदि) और कभीजड पदार्थ (आकाशके तारे आदि) बन जाते हैं। एक चन्द्रमा उनकी कृपासे कभी स्त्रियोका मुखमण्डल आर कभी पैरोका नन बन जाता है। इतना उंचा कैलासका शिसर और मेरी समझम चन्द्रमाके साय नरामी उपमा बहुत ठीक होगी। क्योकि गेमा करनेसे कवितामे उत्तम पदविन्यास या आ सकती हैं। यथा- नसर-निकर-हिमकर करम्बित-कोपिल-कूजितकुलकुटीरे । यह खास मेरी वनाइ हुई कविता है। ~मदारीलाल । जमक ." " चौबेका चिठ्ठा । ४६ . - इतनी छोटी कमलकी कली, दोनोंकी उपमा एक ही अगके साथ देते हैं । इस पर भी पूरा नहीं पडता, तव अनार, कदम्बपुष्प, हाथीकै मस्तक, नगाडे आदिको उपमाकी जजीरमे जकडकर वाहवाही लूटनेकी कोशिश करते हुए अपनी कुशाग्रबुद्धिका परिचय देते हैं। यह तो सभी जानते है कि कहाँ जलचारी छोटा मा पक्षी हस, और कहाँ स्थलविहारी बडेभारी ढीलडोलबाला चार पैरका पशु हाथी, इनकी चाल एक सी न होना ही स्वाभाविक है। किन्तु कविनामधारी जीवोकी दृष्टिमे ये दोनो ही स्त्रियोसे अपनी अपनी चाल सीव है। उस पर तुर्रा यह कि ऐसे वैसे हाथीकी चालके साथ इन हसगा- मिनियोकी गतिकी तुलना नहीं करते, हाथियोके राजा गजराजकी ही चालको इस गतिके योग्य समझते हैं । सुना जाता है कि हाथी एक दिनमें बहुत दूर जाता है, घोटा वगैरह कोई भी पशु उसके बराबर नहीं जासकता । तो फिर जिनको दूरका सफर करनेकी जरूरत पडा करती है, वे इन्हीं गजेन्द्रगामिनी । 'कामिनियोंकी सवारी पर ही यात्रा क्यो नहीं करते । जिधर अभी रेल नहीं गई, उधर छॉट छोट कर गजेन्द्रगामिनियोकी डाक चिठला दी जाय तोक्सा हो? मैं भी किसी समय कामिनीभक्त कवियोमे गिना जाता था, और था भी। उस समय मुझे भी इस सारे ससारमें रमणियोके समान सुन्दर वन्तु ओर नहीं देख पडती थी। चपा, कमल, कुन्ठ, कदम, मौलमिरी, गुरान, बेला आदि फूल, उस समय कामिनियोकी कान्तिमें गुंथी हुई कुसुम-मालाओके आगे कुछ भी नहीं जंचते थे। मैं वसन्तमें फूली हुई पृथ्वीसे भी बढकर फूल सी सुन्दरीको प्यार करता था, बरसातमें बढीहुई तरगमयी नदीसे भी बढ- कर रसवती युवतीका पक्षपाती था। किन्तु अब मेरे ये विचार बदल गये हैं। मुझे दिव्य ज्ञान हो गया है। मैं मायामयी महिला-मण्डलीका मोहजाला काटकर उसमे बाहर भाग आया हूँ । मल्लाहके सढे जाल में फसा हुआ मच्छ जैसे उसे काटकर भाग जाता है, या मकड़ीके जार में पडकर गुबरीला कीडा उसे तोडकर निकल भागता है, अथवा दुष्ट बैल किसी तरह रस्मी तुढा पाने पर पूंछ उठा कर भागता है, वैसे ही मैं भी महिला मण्डलीके मोहजा. लसे निकल भागा हूँ। मगर इसमें मेरी कुछ करामात नहीं है, यह सम भंग भवानीका प्रताप है। हे भग भगवती, तुम्हारे जगल अक्षय हों। तुम रेशमी । बोरोम विराजमान होकर दिग्विजय करो, चीन, जापान, साइरिया, यूरोप, अमेरीका आदि सत्र देशोंमें तुम्हारी उपासना हो, केवल भारत मे ही नहीं, पृथ्वी भर पर तुम्हारी जयती मनाई जाय । मगर मेया, मुझ चिदानन्दको न भूल जाना । मैं तुम्हारा दासानुदास हूँ । मैं तुम्हारी कृपासे सर्वसाधारणके उपकारार्थ जी खोलकर अपने मनकी दो चार बात कहूँगा । इसमें कोई सन्देह नहीं कि मेरी बात सुनकर केवल स्त्रियाँ ही नहीं, बहुतसे पुरुप भी मुझे पागर' ठहरावेंगे ।-ठहरावें, उसमें मेरी कोई हानि नहीं। नई बात जो कहता है वही ससारमै पागर गिना जाता है । गेलीलि. भोने कहा पृथ्वी घूमती है, इटलीके धनी मानी विद्वान् बुद्धिमान् सुनकर हसने लगे। उन्होने समझ लिया कि गेलीलिओ पागल हो गया है। उसके याद बहुत सा समय बीत गया अर इटलीके धनी मानी विद्वान् बुद्धिमान् पृथ्वीका घूमना सुनकर नहीं हॅसते, और गेलीलिओको भी अब कोई पागल नहीं कहता ससारके सभी लोग सुन्दरताके बारेमें स्त्रियोंकी प्रधानता स्वीकार करते हैं। विद्या, बुद्धि और बलमें पुरपाको श्रेष्ट मानकर भी रूपका टीका स्त्रियोंके ही मत्ये मढा जाता है । हो, मेरी समझमें मत्थे ही मढा जाता है, नहीं तो पु. रपासे बढकर स्त्रियाँ रूपवती नहीं होती। है मानमयी मोहिनियो । भेरे इस अपराधके कारण तुम अपने कुटिर कटाक्षसे कालकूटकी वर्षा कर मुझे भम्म न कर देना, काली नागिनमे भी रटकर विपभरी वेणीसे मुझे जकड न लेना, अपनी भौंह-कमान पर प्राण सधान कर मुझे मार न डालना । मच तो यो है कि तुम्हारी निन्दा करते समय मेरा कलेजा धडकने लगता है। मैं तुम- को बहुत डरता हूँ। राह समझकर अगर तुम अपनी नथका फदा डाल रकम्यो तो यडे पडे हाथी उसमें फेसकर रटकनकी तरह उसीमें लटकते रह जाय- यह चिदानन्द क्या चीज है । तुम्हारी नयका एटकन अगर पिसक परे मो उससे कई सून हो जाना यहुत समय है । तुम्हारे चन्द्रहारका एवं भाई चन्द्रमा भी अगर किसी पर टूट पड़े तो उसके हाय पर टूट जाना है विचित्र नहीं । अतण्य तुम मुझपर कोप न करना । और हे रमणीप्रिय + कोपर्निकस् P D.

चौका चिट्ठा- ४८ । नाप्रिय उपमाप्रिय कविगण, मै तुम्हारा भी अपराधी है। किन्तु, मैं तुम्हारी उपास्यदेवता स्त्रीमूर्तिकी मुसमयी प्रतिमाको तोडनेके लिए प्रवृत्त हुआ ह- यह सोचकर मुझे मारने मत दौडना । मै इस बातको साबित कर दूंगा कि तुम लोग कुसस्कारदूपित्त पौत्तलिक (बुतपरस्त ) हो। तुम लोग उपास्य देवताकी प्रकृत (असली) मृतिको छोडकर विकृत (बिगड़ी हुई या नकली ) प्रतिमूर्तिकी पूजा कर रहे हो। मसारमे देखा जाता है कि जिसके सुन्दर बाल होते है, वह नकली वालोसे अपने गिरकी शोभा नहीं बढाता। जिसके निर्मल और दृढ़ दॉत होते हैं, उसे बनावटी दातोकी जरूरत नहीं पडती । जिसका सुन्दर गोरा रग होता है, वह पाउडर नही मलता। जिसके ऑखे हैं, वह कांचकी औसें नहीं लगाता । जिसके पैर हैं वह लकडीके पैरोका सहारा नही हूंढता । तात्पर्य यह कि जिसके जो चीज होती है, वह उसके लिए लायलाय नहीं करता। जो यह समझता है कि प्रकृत्तिने उमे अमुक चीज नहीं दी, वही उसके पानेके लिए यत्न करता है। यही देस-सुनकर मैने निश्चय किया है कि स्त्रियोमें रूप रत्ती भर नही है । वे सदा अपना रूप बढानेमे ही लगी रहती है। किस तरह सुन्दर जान पडेगी, इसी चिन्तामे चूर रहती है। अच्छे अच्छे गहने किस तरह मिलेंगे, यही हर घटी भावना रहती है। इसीके लिए हर घडी चेष्टा किया करती है । मैं तो यह कहनेमे भी अनुचित नही समझता कि गहने ही उनके लिए जप, तप, ध्यान, ज्ञान, सन कुछ हैं। अपने शरीरको सजानेके लिए वे इतना यत्न करती हैं, इसीसे मुझे जान पड़ता है कि उनमें सच्ची मुन्दरता अधिक नहीं है । जिसकी नासिका सुडौल सुन्दर नहीं है, वहीं नधकी रम्सीम लटकनरूपी जगन्नाथको मुलाती है। जिसके कान सुन्दर नहीं है, वही फल फूल-पशु-पक्षी वेल्यूटेदार करनफर या शुमके एटकाती है। जिसका हृदय अच्छा नहीं है, वही सात लडकी फासी (मतरटी) डालकर पुरपोको, विशेषकर दुधमुहे बच्चोको, डराती है। जो बिना, गहनोके भी अपनेको सुन्दर समझगी, वह कभी गहनोंका बोझा लादनेके लिए इतनी प्ययन होगी। मर्दलोग गहने न पाकर भी सन्तुष्ट रहते है, मगर औरत यिना आभूषणोके चार आदमियोमें मुंह नहीं दिखा सकती। अतएव सियोंके ही व्यवहारसे मिद्ध हुआ कि स्त्रियो सुन्दरतामें पुरुषोंमे कम हैं। . - .

४९ खियोका रूप। , प्रकृतिको सृष्टिपद्धतिको सूक्ष्म दृष्टिमे देखोसे यह यात और भी स्पष्ट हो जाती है कि पुरपाकी सुन्दरता खियोमे अधिक है । निम फैले हुए कलाप ( मोरकी पूछ) को देखकर मेघका मुकुट इन्द्रधनुप हार मानता है, यह कलाप मोरके ही रोता है, मयूरीके नहीं। जिस केसर (गदनके बालो) से सिंहकी इतनी शोभा है, वह सिहनीके नहीं होता । जो ककुद (पीठ परका उठा हुआ मास) थैलके सुन्दर मालूम पड़ता है, वह गऊक नहीं होता। जैसी सुन्दर रार कलगी मुर्गके सिर पर होती है, वसी मुर्गाके नही। इस तरह ध्यान देकर देपनेमे स्पष्ट जान पडता है कि उच्च श्रेणीके जीनोम भी स्त्रियोकी अपेक्षा पुरपोकी गठन हट ओर सुदौर होती है । तर केरल मनु- प्योरी सृष्टिमें विधाता इस नियमको क्यो तोटने लगे? हे ' विद्यासुन्दर नाटककी रचना करनेवाले महाशय । क्या तुमने मेरे इसी सिद्धान्तके अनुसार अपने नायकका नाम 'सुदर' रक्या था ? क्या तुम समझ गये थे कि स्त्रियाँ चाहे जमी 'विद्यावती हों, उन्हें पुरुषोंके स्वाभाविक सौन्दर्य और विशाल बुद्धिके आगे हार माननी पडती हे? सुन्दरताको बहार जवानीकी फसलमें होती है । स्न्तुि हे अपने रूपके नशेमें अन्धी हुई हरनाओ। तुम्हारी जवानी कितने दिन टिकती है ? समु. हकी तरह आते आते ही उतर जाती है। वीमसे पचीस तीसके बीच तुम बुढिया हो जाती हो । थोडे ही दिनोंमे तुम्हारे अग शिविर पड जाते हैं। उमर चढते-ही-चढते तुम्हारे गरेकी जयमालाको गिरा देती है। चारीस पैंतालीस वर्षको अवस्थामें पुरपके चेहरे पर जो श्री रहती है, वह तुम्हारे चेहरे पर बीस पचीस वपके भीतर ही नहीं रहती। तुम्हारा रूप निजीकी तरह है, इन्द्रधनुपकी तरह है, पानीके चूलेकी तरह है । घडी भरके लिए न सही, मगर यह रहुत ही थोडे दिन ठहरता है। रूम-भोगके लिए जो पागला हुए फिरते है उनका कष्ट मुझे उसी समय जान पडता ह जय मै भोजन करने के उता है । मुझे अपने जीवनमें बडा भारी दुप यही है कि दाल भात रोटी थालीम परोसते परोसते ही उडी हो जाती है । ऐसे ही स्त्रियोंकी जवानीका भात प्रेमकी थाली में परोसते परोसते ही ठडा हो जाता है-फिर उसे कोई भी रचिसे नहीं खाता । अन्तको सँवार-सिंगाररूपी चटनी मिलाकर आदरका नमक छोडकर किसी तरह उसे निगलना पड़ता है। चौ०-४ - .

चोवेका चिट्ठा- ५० । " है सौन्दर्यका धमउ रयनेपाली नारियो । सच कहना, क्या क्षणस्थायी होनेके कारण ही तुम्हारे स्पका इतना भादर है ? तुम्हारा रूप ऐसा है कि उसे अच्छी तरह भोगना कैमा, देपना भी असभव है, देखते ही देखते धूपकी तरह ढल जाता है। क्या इसीसे मर्दलोग तुम्हारे मुसचन्द्रकै चकोर बने रहते है-तुम्हारे रूप पर धन-धर्म-धैर्य सब चार देते है ? तुम्हारा रूप उसी धनके समान है जो अचानक मिल जाता है और फिर वैसे ही हाथसे निकल जाता है। क्या इमीसे तुम उसके ठीक ठीक दाम नहीं बतला सकती? मेरी समझमें तो केवल क्षणभर ठहरनेके कारण ही स्त्रियोंका सौन्दर्य इतना मनोहर नहीं होता। और भी एक कारण है। वह कारण यह है कि पृथ्वीमण्डल पर जितने ग्रन्थकारोका मत मान्य हुआ है वे सभी पुरप थे, और उन्होंने अ- पनी आसाम अनुरागका अजन लगाकर उस दृष्टिमे स्त्रियोंके रूपका वर्णन किया है । सुनते हैं कि मजनू जिसपर मरता था, वह लैला बिकुर' बदसूरत थी। लेकिन वह मजनके लिए परियोमे बढकर थी। मसल ही मशहूर है, " दिल लगा गधीसे तो परी क्या चीज है सैर जो कुछ हो, कहने- का मतलर यह है कि स्त्रिया प्रेमकी चीज है, उन्हें कौन रसिक या कवि साधारण दृष्टिसे टेरोगा ? यह आपने देखा ही होगा कि अच्छे आईनेमें बुरी सूरत भी अच्छी देख पटती है। हम यदि नारीके भुवनमोहन रूपको प्यारका अजन रगाकर देगे तो फिर वह पुरुपकी अपेक्षा अली क्यो न देख पडेगी? हे प्रेमदेव, यूरोपके कवियोंने तुमको अन्धा ठहराया है। बात झूठ नह है। तुम्हारे प्रभावमे कोई भी अपनी प्यारी चीजके दोप नहीं देख पाता तुम्हारा अजन जिसकी आगोमे अज गया वह हमेशा ही विश्व-निमोहन वस्तु ओसे घिरा रहता है । वह विकट मूर्तिको सुन्दर देखता है, वर कर्कश म्बरको अमृतमय मानता है, वह भुतनीके उछरफादको ललनाको लावण्यलीला भी बढ़कर सुखदायक समझता है। यही कारण है कि चनिदेशी चिपर्ट नाककी कदर है, विलायती बीवियोके समाजमें भूरे वालो और कजी आखा. का आदर है, हनियोके देशमें मोटे ओठोका सम्मान है, और हमारे भारतमें गुदना गुगये ना मिस्ती-मलिन मुर-चन्द्रकी शोभा है। इसीलिए मनुष्यसमा जमे नियोका आदर है । और अगर कही नियों भी ग की तरह पेटकी बात जबान पर मकती या हाती, तो है प्रेमदेव, उसके गुणसे न सही, त्रियोंका रूप। . । कमसे कम तुम्हारे गुणसे तो अवश्य हम सुन पाते कि पुरपोके रूपके आगे बियोका रूप कुछ भी नहीं है। परन्तु, यद्यपि खिया अपने भीतरके गुप्त भावको रचनोके द्वारा प्रकट कर नेमे सकुचती है, मगर उनके कार्योम उस आन्तरिक भावकी झलक दिसलाई पढ जाती है। आपने प्राय देखा होगा कि कोई स्त्री किसी को अपनेमे अधिक सुन्दर स्वीकार करना नहीं चाहती, परन्तु पुस्पको सहजहीमें आत्म- समर्पण कर देती है। इससे क्या यह सिह नहीं होता कि स्त्रिया मन ही-मन स्त्री-रूपकी अपेक्षा पुरप-रूपको अधिक मानती हैं। पुरपोके ' रूप रूप' चिलानेसे ही स्त्रियोका सर्वनाश हुआ है । सभी यह समझते हैं कि रूप ही स्त्रियोका महामृत्य रत्न है—सर्वस्व है। इसका फर यह हुआ कि कामिनियाँ जो कुछ चाहती है, उसे लोग रूपके ही बदलेमे देना चाहते हैं। इसीसे मनुप्यसमाजके लिए कलक्-रूपिणी वेश्याओकी सृष्टि हुई है। इसीसे परिवारमें स्त्रियाको दासी बनकर जीवन रिताना पडता है। में यह सुनना नहीं चाहता कि स्त्रियोकी न ठहरनेवाली सुन्दरता या रूप ही उनकी एक मात्र पृजी है-र -ससारसागर पार करनेवाला कर्णधार है। यह मैं बहुत दिनासे सुन रहा हूँ। सुनते सुनते कान पक गये । अर नहीं सुन सकता। मैं सुनना चाहता हूँ कि नारियोम रूपकी अपेक्षा सौगुने हजारगुने राखगुने करोडगुने महत्वके गुण है । मै सुनना चाहता हु कि स्त्रिया साक्षात सहिष्णुता, भनि और प्रेमकी मूर्ति है । जिन्होंने देखा है कि माता कितने कष्ट सह कर बचोका लालन पालन करती हैं, जिन्होंने देखा है कि स्त्रिया स्तिने स्नेह और यत्नसे अपने परिवारके रोगियोकी सेवा-शुश्रूषा करती है वे ही ना- रियोकी सहिष्णुताका कुछ पता पासकते है। जिन्होंने कभी किसी सुन्दरीको पति या पुनके लिए प्राण देते, धर्मके लिए सामारिक मुसोंको हात मारते, देव हे वे ही कुछ कुछ समझ सस्ते है कि उनके हृदयमें केसी भक्ति मार केमा प्रेम ह। जन मै सरम श्रेष्ट नारीका आदर्श सोजने लगता हूं त मेरे नागे पति साथ जर मरनेके लिए तेयार 'सती' की मूर्ति आ जाती है। मे देव ता हूँ कि चिता धकधक जर रही है, सती अपने पतिके परोंको आदर साथ अपनी छातीसे लगाये हुए अग्निके यीचमें बैठी हुई है 1 आग धीरधीरे - बात चौवेका चिट्ठा- amava बडकर फैट रही है, सतीके एक अगको जलाती हुई दृसरे अगमे लग रही है। सती अग्निम जल रही अपने स्वामीके चरणोका ध्यान कर रही है । मुसपर शारीरिक या मानसिक कष्टके कोई लक्षण नहीं है । मुख खिले हुए कमलके समान प्रसन्न है। धीरे धीरे आग ही आग देस पड़ने लगी। सतीके प्राण निकल गये, शरीर भस्म हो गया ।धन्य सहिष्णुताधिन्य प्रेम । धन्य भक्ति। जब मैं मोचता हूं कि कुछ दिन हुए, हमारे देशकी अपलाएँ कोमलागी होने पर भी इस तरह पति के लिए प्राण दे सकती थी, तब मेरे मनमें एक नई आशाका संचार होता है। तब मुझे विश्वास होता है कि ' महत्व' का बीज हम लोगोके हृदयमे अभी पड़ा हुआ है। क्या समय आने पर भी हम अप- ना महत्व न दिसा संकंगे? हे भारतकी नारियो । तुम भारतकी महामूल्य मणियों हो, तुमको झवी रूपकी बडाईसे क्या प्रयोजन? तुम अपने सहनशीलता, दया, भक्ति और प्रेम आदिगुणोको अपनाओ। ९ फूलका व्याह । वेशार शाखका महीना 'सहायक' का महीना है। मैंने वैशासकी पहली ति थिको रमिक वाके वागमे वैटकर एक ब्याह देखा है । उसीका हाल रिसे रखता है, शायद आगे होनेवाले वरवधुओको इससे कुछ शिक्षा मिल सके। - चमेलीका ब्याह है। दिनान्त-शैशव बीत चला, कली-कन्याध्याहने लायक हो आई । कन्याका बाप बडा आदम नहीं, छोटासा पेट है, और उस पर उसके अनेक लडकियों व्याहनेको हैं। व्याहकी बहुत सी बातचीत हुई, पर कोई पक्की नहीं हुई । वागका राजा गुलार, पात्र तो येदाग है, मगर धराना बदाउचा है। वह इतना उतरकर सम्बन्ध करने के लिए राजी नहीं होता । दुपहरियाके फुलको इस न्याहमें इनकार नहीं था, लेकिन यह बढा रागी (लाल और बोधी) है, क्न्याके पिताका जी नहीं भरा । केवढा पार तो अच्छा है, किन्तु दिमाग बरे हैं,पता ही नहीं रहता। इसी प्रकारको गडयदमें मधुकर महा- राज दूत बन कर चमेलीके पेटके पास आकर उपस्थित हुए। आते ही बोले- गुन । गुन । गुन । रडकी है।" चमेरीके वृक्षने पत्ते हिलाकर उत्तर दिया-"है!" .

फूलका ब्याह । . भ्रमरने पत्तोके आसन पर बैठकर कहा-"गुन-गुन-गुन । गुन-गुन-गुन । लडकी देगा।" वृक्षने डाल झुकाकर, सकोचसे ऑयें बद किये हुए और यूंघट निकाले हुए कन्याको दिसा दिया। भ्रमरने एक पार चक्कर लगाकर कहा-“ गुन गुन गुन ! , गुन । देखना चाहता हूँ--बूंघट सोलो।" लजीली कन्या किसी तरह घूघट नहीं खोलती। वृक्षने कहा- र इकिया बडी रजीली है। तुम जरा देर ठहर जाओ, मैं मुंह सोलकर दिग्वा- . " मेरी "दीदी, . भ्रमर 'भन' से उड गया और गुलारके बेठकसानेमें जाकर गपशपलडाने लगा। इधर चमेलीकी वडी बहन सन्ध्याढीदी जाकर उसे बहुत कुछ समझाने रगी-चोली-" बहन, जरा घूघट सोरो, नहीं तो वर नहीं आनेगा-मेरी प्यारी, मेरी दुरारी इत्यादि ।" कलीने कितनी ही बार कहा- तू जा । " किन्तु अन्तको सन्ध्याके स्निग्ध स्वभावसे मुग्ध होकर चमेलीने मुह सोर दिया । तर भ्रमर महाशय ' भन' से राजमहलसे उतरकर फिर उपस्थित हुए । कन्याको देसा, जैमा रूप है वैसी ही सुगन्ध है । भ्रमरराज योले- गुन-गुन गुन । गुन-गुन गुन ! कन्या गुणवती है। अच्छा घरमै मधु' कितना है?" कन्याके पिता वृक्षने कहा-जितनेका करार होगा उतना दे दूंगा, रत्ती भर कम न होगा। भ्रमरने कहा-गुन गुन-गुन । आपमें अनेक गुन हैं-मेरा मेहनताना ? वृक्षने ढाले हिलाकर कहा-वह भी दूंगा। भ्रमरने कहा- -मेहनतानेकी रकम कुछ पेरागी न दे डालो।' महा कल्याण !' यह वडा भारी गुन है,-गुन-गुन-गुन तय क्षुद्र वृक्षने पीअर पर डार हिलाकर कहा-पहले वरया हाल नो बताओ पर कहै? भौरा 1-घर बहुत ही सुपात है। उसमें अनेक गुन है-गुन गुन-गुन वृक्ष--उसका नाम क्या ? भौरा [हाला गुलायचट । उसमें बतुतमे गुन है-गुन-गुन-गुन ! नगददान । - चौवेका चिट्टा- ५४ " ऐसी बातचीतोको मनुष्य नहीं सुन पाते । मुझको भगभवानीकी कृपामे देखने-सुननेकी दिव्य शक्ति प्राप्त हो गई है, इसीसे में सुन सका। मैने सुना, कुलपज्य मधुकर महाराज पर झाडकर, छ पैर फैरा कर गुलारका गुणानुवाद गा रहे थे। कहते थे, " गुलारका धराना बहुत बडा है-यह बहुत ही उचा है -इसका रंग ही निराला है। फलते तो सभी फूल हैं, लेकिन गौरव गुलाबहीका अधिक है, कारण, ये साक्षात् वाला मारीकी सन्तान हैं-उसने इन्हें अपने हाथसे लगाया है। अगर कहो इस फलमें कोटे है, तो किम कुल या फूलमें नहीं है ?" जो कुछ हो, किसी तरह व्याहकी बातचीत पक्की करके भौरराम भन-से उटकर गुलाब बाबूके वगरे सरर देने गये। गुलार उस समय हवाके साथ नाच-नाच कर हंस-हंस कर कृद-कूद कर क्रीडा कर रहा था। गुलाग्ने व्याहकी खुशखबरीसे खिलकर रडकीकी उनके बारेमें पूछा। भौरेने कहा- आज ही कलमे सिर उठनेकी उन्न है। गोधुरिबेलाकी लग्न' आनेका समय हुआ है। गुलार स्वय विवाहया- वाके उद्योगमे लगा हुआ है। झींगुरोने नौवत बजाना शुरू किया। ममासीने शहनाईका बयाना लिया था, लेकिन रतोधी आनेके कारण वह साथ जा न सकी। जुगनुओने पशासै जराये । आकाशमे तारागणकी आतशबाजी छूटने रगी। कोयल आगे आगे नकीरका काम करती चली। बहुतसे बराती चले। रोजकुमार कमल शामकी आरहवा सराव होनेके कारण बरातमे शामिल नहीं हो सके । किन्तु ' दुपहरिया' के सभी धराने आये, सफेट दुपहरिया, राल दुपहरिया जर्ट दुपहरिया आदि सब आकर मौजूद हुए। 'कर्नर' के दोनो (मफेद भार लार) घराने प्राचीन समयके राजाओकी तरह बडी ऊची उंची डालो पर चढे हुए आकर उपस्थित हुए। 'वेरा' सहवाला बननेवाला था, इस रिण व सजधज कर आया। चपा पीताम्बर पहने आकर सटा हुआ। मगर बहुत सी वराडी पी आया था, मुंहसे उन गन्ध निक्ल रही थी। केव- डेके झुट भी सादगीके साथ अपनी बहार दिसाते हुए महक्से महफिटको मस्त कर रहे थे। अशोक नशेके मारे लाल हो रहा था। उसके साथ एक चींटोंका झुट मुसाहब होकर आया था। उनका गुणसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं, उल्टे दन्तदशनका भारी मय है । ऐसे बराती कहाँ नहीं जुटते, और किस ।

फूलका व्याहा व्यारमें गडबढ करके झगडा नहीं मचवा देते । कुद, कुरुक, कुटज आदि और भी अनेक थराती आये थे। भ्रमर महाराजसे, अगर आपकी इच्छा हो तो, उनका पूरा परिचय प्राप्त कर सकते है, क्योंकि उनका जाना-आना सर्वत्र होता है और उन्हें सभी जगह कुछ कुछ मधु भी मिलता है। मेरा भी निमन्त्रण था, मैं भी गया। देसा, वर पक्षके लोग बडी विपत्तिम पढे है । वायुने सर बरातियोको राद रेजानेका टेका लिया था। उस समय तो वह बहुत तूमतडॉगमे चला था, मगर कामके समय न जाने कहा जा छिपा, सोजने पर भी कहीं पता नहीं लगा। मैंने देखा, वर जोर वराती, सन चुपचाप सोचमे सटे है। चमेलीकी कुल रक्षाफे लिए मैंने ही फूलोका वाहन बनना स्वीकार कर लिया। वर और बराती मनको रेकर चमेलीपुरको चा। । वहीं जाकर देगा, क्न्यापक्षकी कामिनियो खुशीसे मिल रही है, घूघट सोरकर सुगध वरसाती हुई सुखकी हसी हस रही हैं। हर एक पत्ता एक दुसरेके गलेसे लगा हुआ है । खुशबूकी लूट मची हुई है। रूपका बाजार रगा हुआ है। जुही, मालती, कामिनी, रजनीगधा आदि सोहागिनाने स्त्री- आचार कराया । इतनेमें पुरोहित आकर मौजूद हो गये। देसा कि रसिक- बाकी नौ बरसकी लडकी कुसुमलता (सजीन पूर-सरीसी) सुइ ओर तागा लिये सटी है। कन्यारे पिता (वृक्ष) ने कन्यादान क्यिा । पुरोहि तजीने दोनोको एक डोरेम डार कर गोठ दे दी। फिर स्त्रिया वरको भीतर ले गई। न जाने कितनी मधुमयी रसमयी सुन्दरियोंने यहाँ वरको धेर रिया । सीधे स्वभाव और उज्ज्वल भावने दिलगी करते करते नेवादीका मुंह सूप उठा। गुलमेंहदीकै रगीन मुखकी हमी रोके नहीं रकती थी। यही क्न्याकी मनी है, वह कन्याके पास जाकर सो रही । रजनीगन्धाको ताइका राक्षसी कहकर वरने वढी भारी दिल्लगी की । मुलती एक तो उम्र कम, उसके उपर जितना गुण है उतना रूप नही, वह पक कोनेमे चुपचाप बैठी रही । रडे आदमियोकी घरवालीकी तरह मोटी गदागीनी नीली माडी हटाकर रोनके साथ बैठ गई। इतने में "अजी उठो, घर जाओ-रात हो गई है, क्या यहीं लुढक रहोगे काका?" कहती हुई कुमुमरताने मुझे हिलाया। चोककर देखा, कहीं कुछ भी न था।

. बह फलोंका रगीन दिन कहाँ गायब हो गया ? मैंने सोचा, ससार सचमुच अनित्य है-अभी या, अव नहीं है। वह रमणीय दिन कहीं चला गया। वे हेसमुस रसभरी पुष्पनारिया कहाँ गई ? जहा सर जायेगे, वहीं, स्मृति- दर्पणके तले, 'भूत'-सागरके गर्भ में । जहाँ राजा, प्रजा, पहाड, समुद्र, ग्रह- नक्षत्र आदि गये हैं, या जायेंगे, उसी जगह ध्वस-पुरमें। इस व्याहकी तरह सब कुछ शुन्यमे लीन हो जायगा, सब हवाम उड़ जायगा। केवल रहेगा, क्या? भोग ? नहीं भोगनेकी चीजके बिना भोग नहीं रह सकता, तव क्या रहेगा। स्मृति । कुसुमलताने कहा-उठो न, क्या कर रहे हो? मैंने कहा-दूर हो पगली, मैं व्याह करा रहा था। कुसुमलता हंसती हुई और पास आकर भादर करके पूछने लगी-किसका व्याह काका? मैंने कहा-फलका व्याह । कुसुलता-वाह वाह, फूलका व्याह ? मैं भी तो फलका व्याह करा रही थी। मैं कहाँ ? कुसुमलता-यह देसो मैंने फूलोकी माला गृथी है। मैंने देसा, उसी बारिकाकी बनाई मालाम मेरे घर और वधु दोनो हैं । . १० बड़ा बाजार। जनसे रसिकनावृके घर आया हू तरसे उसका दूध, दही, मक्सन, मलाई सा रहा हू । सानेके समय समझता था कि श्यामा केरल परलोकम मदति पानेकी कामनासे ही यह अनन्त पुण्य-सचय कर रही है जानता था कि जो लोग ससारके जगलमें पुण्यरूपी मृगको फैंमाके लिए फदा लिये धूमते हैं उनमें श्यामा बहुत ही चतुर है । मैं नित्य दूध दही मानेके बाद देवगणके निकट प्रार्थना करता था कि श्यामाको उस रोकम अक्षय स्वर्ग मिरे और इस लोक भगको माना बढे । किन्तु इस समय- ५७ वडा बाजार। हाय । मनुप्तका चरिन कैसी भयानाक स्वार्थपरतासे कर कित है। इस समय चह दाम मागती है। इसी कारण श्यामाके साथ मेरे चिरविच्छेडकी सभावना देस पडती है। पहले दिन जन उसने दाम मागे तो मैने दिलगीम वात उढा दी, दुसरे दिन विस्मित हुआ, ओर तीसरे दिन गारिया देने लगा । अब उसने दूध- दही देना बद कर दिया है। कैमा अन्धेर है । इतने दिन बाद मारम हुआ कि मनुष्यजाति निहायत सुदगर्ज है, इतने दिन बाद जान पड़ा कि आशामओ- को यत्नपूर्वक हृदयके खेतमें रोपकर विश्वासके जलसे उन्हें पुष्ट करना व्यर्थ है । अब मैने जाना कि भक्ति, प्रीति, स्नेह, प्रणय आदि मर झूठी बात है, आकाशकुसुमके समान निर्मूर हैं, दमवाजियां है । हाय, मनुष्यजातिका परिणाम क्या होगा । हाय, धनलोभी ग्वालोंकी जातिको कौन उयारेगा । हाय इयामा ग्वालिनकी गउ कय चोरी जायगी। श्यामाके दध दही है, वह देगी, मेरे पेट है, मै साउगा। उसके माथ यही सम्बन्ध है । इसमें वह दाम किम अधिकारमे मोगती हे? कुछ मेरी समझमें नहीं आता । श्यामा कहती है कि “मैं अधिकार-घधिकार कुछ नहीं जानती। मेरी गउ है, मेरा दूध है, मै दाम लूगी।" वह किसी तरह समझती ही नहीं कि गऊ किसीकी नहीं, गउ सुद अपनी है, अर्थात उम पर उसीका अधिकार है, और दूध, जो पीता हे, उमीका है। तथापि, में स्वीकार करता है कि ससारमै दाम रेनेकी एक रीति है। केवल खाने-पीनेकी ही सामग्री क्यों, सभी चीजे दाम देकर खरीदनी पड़ती हैं। दूध, दही, चावल, पढा-लत्ता आदि याजारम निकनेवारी चीजोंको जाने दीजिए, विद्या-बुद्धि भी दाम देकर परीदनी पटती है। कालेजम दाम देकर विद्या मोल लेनी पड़ती है। बहुत लोग अच्छी गतीको दाम देकर सरीदते है। हिन्दू रोग अश्मर दाम देकर धर्म खरीदते है । यश और मान तो बहुत ही थोडे दामम मिल जाता है । अच्छा, अच्छी चीन दाम देकर गरीदी होगी-यह नियम तो कुछ समझमे भी माना है, रेफिन यह क्या अन्वर है कि जो विप मानम मनुष्य मर जाता है वह भी तुमको नाम देकर याना- रमे गरीन्ना होगा ? मनुष्य ऐसा ही दामका गुलाम है, यह गम लिये धिना पुरी चीज भी किमीको देना नहीं चाहता। यह चौवेका चिट्ठा- इसीसे, मेरी समझमें, यह जगत् ही एक बड़ा बाजार है-इसमे सभी अपनी अपनी दुकान लगाये बैठे हैं । सभीका एक उद्देश्य है-दाम पाना सभी वरावर पुकार रहे है-" हमारी दूकानमे अच्छा माल है खरीदार चले आओ।" सभीका उद्देश्य है कि ग्राहककी ऑसोम धूल झोककर रद्दी माल उसके गले मढ दे । दुकानदारो और सरीदारोमें बराबर यह युद्ध चला रहा है कि कौन किसे कहाँ तक ठग सकता है। इस बाजारमे सस्ता खरीद- नेकी चेष्टाको लोग 'जीवन' कहते हैं। बहुत सोच-विचार कर मनके चिता-रुपी दुसको कम करनेके लिए मैंने शामकी भग दोपहरको ही छान ली। फिर क्या था, भग-भवानीके अगमें आते ही वह रंग जमा कि सर ढग ही बदल गया--दिव्य दृष्टि खुल गई । मैंने आँखें फाडकर देसा, सामने सुविस्तृत ससारका बाजार लगा है। देसा, अगणित दूकानदार दूकानें रगाये बैठे -असरय खरीदार सौदा चुका रहे हैं । देवा, वे दुकानदार और सरीटार परस्पर एक दूसरेको अगूठा दिखा रहे है । मै भी अॅगोळा कधे पर डालकर कुछ सरीदारी करनेके लिए बाजारकी तरफ चला। सबसे पहले रूपकी हाटमें गया । क्योकि ससारका नियम है कि जो चीज घरमे नहीं होती, उसीके लिए आदमी बाजार जाता है। रूपकी हाटमें जाकर देखा तो वह ससारका मछरहहा (मछली-बाजार ) निक्ला । पृचीपरकी परिया मछली होकर टोकनीसे ढकी हुई कूडामे पड़ी है। देखा, गोटी बडी रोह-गिरई झींगा-इलिश पूटी वगैरह हर तरहकी मछलियों सरीदारके लिए पूठ पटक पटक कर छटपटा रही हैं। जितना वाजारका वक्त बीतता जाता है उतना ही वे चिकनेके लिए तडपती है । मटलीवालिया पुकार रही है। " मठरी लोगे जी' कुर पोसरकी सस्ती मछली यो ही लुटा देगे।"कोई पुकारती है-" मछली रोगे जी-धन-सागरकी मीठी मछली, जो रारी-- दता है उसे फिर जन्म नहीं लेना पडता, एक ही जन्ममे मर गतियों हो जाती है। धर्म- अर्थ-काम-मोक्ष, सर बीबीके श्रीचरणोकी टोकरोसे घरभरमें मारा मारा फिरता है। जिसमें शक्ति हो वह सरीद ले। मोनेकी हासीम आ- सोंके जरमे उपारकर हृदयकी आगमं की आंच देकर पकाना पड़ता है । कौन सरीदार इतना माहस रखता है, आये। सावधान । हीराका कॉटा गरेमें फेंसनेसे सासरूपी विल्लीके परो पडना पडता है।-कॉटकी तकलीफ है तो । । - - बड़ा बाजार। wom - क्या, मछली बडे मजेकी है ।-आओ सरीदार-चरे आओ।" कोई पुका-- रती है-"आओ, हमारी चटपटी लाज सरोवरकी मछली सरीदो । घीमें, तेल्मे, पानीमें, जिसमे चाहे पका ले। रो-लो, आओ, रे जाओ, मजेमै जिन्दगी बिताओ।" कोई कहती है-" कीचड धोकर चोदसी मछली राई हूँ। देखते ही सरीदार पागल हो जाता है। लो, रे जाकर अपना घर उजि- याला करो।" यो देस सुनकर मछली खरीदने लगा। क्योकि मेरी रसोई अभी तक मास मछरीके मजैसे साली थी। देसा, मछलियोके दलार' भी है, उनका नाम है पुरोहित । दरालके सडे होने पर पूछा, दाम क्या है ? उत्तर मिरा- दाम है 'जीवन-सर्वस्व' । जो मछली चाहो खरीदो, दाम एक ही है । मैने कहा-अच्छा ये मरलियाँ कर तक चलेंगी? दलालने कहा-दो-चार दिन, उसके बाद सड जायगी, दुर्गन्ध आने लगेगी। तब यह सोचकर कि इतने महंगे भावमे प्रेमी कम टिकाउ चीज क्यो सरीदा, मैं मछरहसे भागा। यह देसकर मछलीवालिया हाथ मटका मटका कर मुझे गालिया देने लगी। रूपका बाजार छोडकर विद्याके पाजारमें गया। देसा, वहाँ फर' चिकते है। एक जगह टीका तिलक लगाये, चुटैया फटकारे, रामनामी वस्त्र ओढे कुछ ब्राह्मण पके नारियर रिए दुकानपर परीदारोको उला रहे हैं। कहते है." हम बेचते हैं घटत्व पटव और पत्व-णव । घरमें भरा होना ही स्व-हे । नहीं तो न-स्थ है। दव्यत्व, जातित्व, गुणत्व आदि पदार्थ है। बापके श्राद्धर्म दक्षिणा न देनेसे ही तुम 'अपदार्थ' हो। हमारे पास 'पदाथ तच' नामका पका नारियर है-पानेमें बहुत ही कठिन है । उसके पहरे छिलकेमें लिखा है कि ब्राह्मणी ही 'परम पदाय' है। अभाव नामक नारियल चार प्रका- रका हे" , * बकिम पावूका अभिप्राय यह है कि यायिक पण्डितोंकी विद्या नारिय यलके समान है । जैसे पके नारियलका गोला जटानोंगे छिपा रहता है, चैमे ही उनकी विद्या घटत्व आदि दुम्ह शब्दोंमें छिपा रहती है। जैसे नारियल ऊपर सूखा और भीतर सरस मीठा होता है, वैसे ही पुराने पण्डितोकी विद्या चौवेका चिट्ठा- ६० , , तुम्हारे घरमे धन है, हमारे घरमे नहीं है-इसे कहते है अन्योन्याभाव । जब तक धन नहीं पाते, तबतक प्रागभाव है। वह धन सच होजानेसे ध्वसा- भाव होजाता है । रहा अत्यन्ताभाव, सो हमारे घरमे हर घडी बना रहता है । अगर यह सशय हो कि अभाव नित्य है या अनित्य, तो हमारे भडारेमें प्रोककर देखो, देसोगे अभाव नित्य ही है। इस लिए हमारे पके नारियलको सरीटो। 'व्याप्य' 'व्यापक' और 'व्याप्ति', इस नारियलका साराश है। ब्राह्मणका हाथ ठहरा भ्याप्य, चादीका सिक्का हुआ व्यापक, और तुम्हारे दान करनेहीसे हुई व्याप्ति । यह पका नारियल सरीदो, अभी सत्र समझमें भाजायगा । देसो भैया, 'कार्य-कारण-सम्बन्ध' बडी भारी बात है । रुपया दो, अभी एक कार्य हो जायगा । कम देना ही अकार्य है और, कारण क्या समझावे, यह जो दोपहरकी कडी यूपमे घुटी सोपडी लिये नारियल बेचने आये है, इसका कारण ब्राह्मणी ही है। अगर कुछ न सरीदोगे तो हमारा नारियर लाद लाना अकारण ठहरा । इस लिए नारियल सरीदो--नहीं तो हम इन्हीं नारियलो पर सिर पटककर जान दे देंगे।" घोर घामकी तपनके कारण पसीनेमें तर हो रहे उन ब्राह्मणोंका शरीर और वाग्वितण्डापूर्ण प्रलाप देख मुनकर दया हो आई । मैंने पूछा--" महा- महोपाध्यायजी, नारियल लेनेके लिए हम तैयार हैं, मगर आपकी दूकानमें नारियल छीलकर गोला निकालनेके लिए कोई औजार भी है " उत्तर मिला-"नहीं भैया, हम कोई अस्त्र नहीं रखते।" मैंने कहा-" तो फिर नारियल छीलते कैसे हो?" उत्तर मिला-"हम छीरना नहीं जानते, दातासे नोच नोचकर साते हैं।" मैंने ब्राह्मण पण्डिताको नमस्कार कर पासहीकी दृसरी दुकानमें प्रवेश किया । ब्राह्मणों के सामने ही एक्सपीरिमेन्टल साइस (अनुभूतविज्ञान)की दूकाा है। कुछ अगरेज दूकानदार सूखे नारियर, बादाम, पिस्ता, सुपारी वगैरह फर बेच रहे है । दूकानके उपर बडे बडे पीतलके अक्षरोमें लिखा है- - . - है ! xxx नैयायिक लोग चार प्रकारका अभाव मानते हे-अन्योन्याभाव, प्रागभाव, ध्वसाभाव और अत्यन्ताभाव । अर्थात् अन्योन्यका अभाव, पहलेका भभाव, नाश हो जानेपर अभाव, और अत्यन्त ही अभाव।

६१ बटाबाजार। MESSRS BROIN JONES AND ROBINSON NUI-SUPPLIERS ESTABI.ISHED, 1757 ON THE CIELD OF PL ISSEY v MĘSSRS BROW'N JONES AND ROBINSON offer to the Indun public A large assortment of NUTS PHYSICAL, METAPHYSICAL, LOGICAL, ILLOGICAL, AND SUFFICIENT TO BREAK THE JAITS AND DISLOCATE TEETH OF ALL INDIAN YOUTHS Who stand in need of having their dent il superfluities curtuled अर्थात्- मेसर्स ब्राउन जोन्स और राचिन्सन् असरोट बेचनेवारे। स्थापित प्लासीके मैदानमें सन् १७५७ मेसर्स ब्राउन जोन्स और राविन्सन् भारतवासियोके लिए बहुतसे बचेहुए अखरोट देते हैं। स्थूर पदार्थसम्बन्धी, आत्मविद्यासम्बन्धी, तार्किक, अतार्किक विज्ञान, जो दॉतो और जबडोको तोड डालनेके लिए काफी हैं।

चौवका चिट्ठा- Anmol और - उन सर भारतीय नवयुवकोके लिए, जो दांतोकी बहुतायतको कम करनेकी आवश्यकता रखते हैं, दिये जाते हैं। दूकानदार पुकार रहा है-"आ रे काले बच्चे, Experimental Science ( अनुभूत विज्ञान ) खायगा, आ । देख औपर नगरका एक्सपी- रीमेंट ( अनुभव ) धूसा है, इससे दात उखडते है मत्था फटता है, हड्डियाँ टूटती है । हम पर इन एक्मपीरीमेटो ( अनुभवो) को बिना दाम लिये ही दिसा देते हैं-उस, पगया सिर या नम हड्डी मिलनी चाहिए। हम स्थूर पदार्योका मयोग और वियोग साधनेमें सिद्धहस्त है। रसायनके बलसे, बिजलीके बरसे, अथवा चुम्बक्के बलसे जड़ पदार्थोंको अलग अलग करनेमें ही विशेप चतुर हैं। किन्तु सरकी अपेक्षा धूसोंके जोरसे खोपडीके सण्ड खण्ड अलग कर देनेहीमे हमारा हाथ सफा है। हम माध्याकर्षण, यौगिकाकर्षण, चुम्बकाकर्पण आदि तरह तरहके आर्पणोकी पात जानते हैं सही, लेकिन सनकी अपेक्षा केशाकर्पणका ही विशेष अभ्यास रसते हैं । इस समारमे जड पदार्थोके तरह तरहके योग ( मेल ) देये जाते हैं, जैसे हवामे 'अम्लजन और ' यवक्षारजन' का सामान्य योग्य है, पानीमे 'जलजन' और 'अम्र. का रामायनिक योग है, और तुम्हारी पीठ और हमारे हाथमे मुष्टियोग है। देवेगा काले लडके ? इन विचित्र बातोको देखना हो, तो सिर बढा दे। देखेगा कि गैरिटेशन ( आकर्षण शक्ति) के बरसे ये सब नारियर' वगैरह तेरे सिर पर पटेंगे, ह पार्कशन नामके अद्भुत शब्द-रहस्यका परिचय पावेगा, और अपने मस्तककी नमोंके गुणसे पीटाका अनुभव करेगा । पेशगी दाम दे, तो चेरिटी (मेरात) मे एक्सपीरीमेंट पा सकेगा।" मै यह सब देख मुन रहा था। इसी समय सहसा देसा कि अगरेज दृका- नदार लोग राठियाँ लिये हुए झपट कर ब्राह्मणोके पके नारियलोके ढेर पर जो पडे । यह देखते ही उसी दम ब्राह्मण लोग नारियल छोडकर, रामनामी दुपट्टेको फैक्फर, अ-कच्छ हो कर जान लेकर भागे। तर माहव लोग उन नारियलोको अपनी दूकान पर उठा ले आये और विलायती अखाकी सहाय- तामे छील कर मजेये साने रगे। मैने पूछा-" यह क्या हुआ?" माहयो जन।

६३ वडा बाजार। A NAAwar. ने कहा- " " " इसको कहते है Asiatic Researches (भारतीय अनुस- न्धान)।" तर मै इस आशकासे कि कही मेरे शरीरमें भी Anatomical Researches ( चीरफाडसम्बधी मोज) न हो, वहाँसे भागा। वहाँसे साहित्यके बाजारमं गया । देखा, वात्मीकि बगैरह ऋपि लोग अमृत-फल बेच रहे हैं । फिर देसा, और कुछ लोग रीची, अमरूद, अनाना- स, अगूर, अनार आदि सादिष्ट फर बेच रहे है। मालूम हुआ, यह अंगरे- जोका साहित्य है । और भी एक दुकान देखी। उसमे असग्ग्य बालक और ओरते पंच-खरीट रहे थे । भीडके मारे भीतर नहीं घुस सका, बाहरहीमे पूछा-" यह काहेकी दुकान है?" बालकोने कहा- "हिन्दी साहित्यकी। मै "बचता कौन है ?" हम ही बेचते हैं। दो एक बडे व्यापारी भी है। उनके मिया कुछ क्थरी-कपि भी है । उनका परिचय प्राप्त करना हो तो समस्यापूर्ति मासिफपत्र देखो।" मैं "अच्छा, इस माल को मरीढता कौन है?" उत्तर "हमी लोग।" माल देखनेकी इच्छा हुई। देखा, अपमारके कागजमें लिपटे हुए कुछ कचे केले महासे तेरियोकी पट्टीमे गया। देसा, दुनियाभरके उम्मेदवार ओर मुमा- हव तेरी रूपम तेरका भाडा रिये कतार बाधे इस सिरसे उस मिरे तक बैठे है । तुम्हारे श्रीचरणों में कोई जगह साली सुन पाते ही, तुम्हारे पैर पकडकर, तेल्या भाडा निकालकर, तेल मलो ठ जाते हैं। कोई जगह साली 7 होनेपर भी, शायद हो-इस जासरे, पर पकडकर तेर मलने रगते है । तुम्हारे पास नौकरी नहीं ह, न मही-नकद स्पया तो है, गच्छा यही दो, तेर मरते है। किसीकी प्रार्थना है, जब तुम अपने निराले यागम बेटकर बराडीसी पोतल पाली करोगे, तर में तुम्हारे तलवो तेर मरगा-मेरी बेटीका व्यार हो जाना चाहिए । किमीकी अर्गम है, मैं तुम्हारे पानीम रावर मुशामदका पुशबूदार तेल छोड़गा-मेरे मकानकी ट्टी दीवार पकी करा दीजिए । रिमीकी कामना ६, तुम्हारी दयामि चौका चिट्ठा- । सुगरका कागज (समाचारपत्र ) चल निकले, मैं तुम्हारे लिए दिनको रात और रातको दिन लिख सकता है। सुननेमे आया कि इन तेलियोकी सीचतानमे कितनोके पद टूट गये। मुझे सटका हुआ, कहीं कोई तेली भगके लिए चिदानन्दके चरणाम भी तेल न भरने लगे । मैं वहाँसे भी भागा। उसके बाद यशके हलवाई-हमें गया । समाचारपनसम्पादक-नाम-धारी हलवाई गुड और बिरायती चीनी मिली हुई सडी बासी मिठाई नगद दाम लेकर बेच रहे थे। वे राह-चलतोंको जबर्दस्ती पकडकर वह माल उनके गरे मढ रहे थे और उसके बाद दाम मिलने पर कपडा तक उतार लेनेके लिए उतारू हो जाते थे। इधर उनकी उस यशकी मिठाईकी दुर्ग- न्धके मारे रास्ता चलनेवाले लोग नाक, कपडा दे देकर इधर उधर भागते थे। दुकानदार रोग बिना सोयेकी गुड-मिली चीनीकी विचित्र मिठाई बना- कर सस्ते भावमें वेच रहे थे। उनमें कोई रपये आठ आनेके लिए, कोई सिर्फ सातिरके लिए, ओर कोई केवल शामकी व्यालूके लालचसे, यश वेचते हैं। कुछ ऐसे सस्ता माल बेचनेवाले भी हैं जो सिर्फ वायमाहय या भैयासाहबकी गाडी पर हवा सा आनेके लिए ही यशके ढेर लुटा देते हैं। उसी बाजारमें एक तरफ राजकर्मचारी लोग हलवाईके रूपमें राय वहादुर, राजाबहादुर सितार-खिलत, निमन्त्रण, धन्यवाद वगैरह तरह तरहकी मनो- हर चमकीली मिठाइया लिये दुकान सोले बैठे है, और चढा, सलाम, डाली खुशामद, अस्पताल खुरवाना, रास्ता-घाट वनवाना इत्यादि मूल्य रेकर अपनी मिठाई बेच रहे हैं, लेकिन विक्रीका प्रवन्ध ठीक नही है । कोई सर्वस्व समर्पण करके भी कुछ नहीं पाता, और कोई सिर्फ सलाम करके मन भर चौधे लिये जाता है। इमी तरह अनेक दृकाने देसी, किन्तु सभी जगह सडा माल आधे दामों पर विकते पाया, कहीं खरा माल न देस पडा । केयर एक दूकान ऐसी देस पडी, परन्तु उस दूकानमें सरीददार एक न देख पडा । देस क्या पडता, दूकानके भीतर बहुत ही धना अन्धकार था-कुछ भी न सूझता था। पुकारने पर भी दूकानदारका पता न चला, बाहरसे केवल एक प्रकारका भय पैदा कर देनेवाला अनन्त गर्जन सुनाई पडा । अस्पष्ट प्रकाशमें बाहरके तरतेका लेख पढा । उसमें लिखा था- 1 मरादुगात्सव । Anwww M . - . यशकी दूकान चिकनेकी चीज-अनन्त यश । बेचनेवाला-काल । मूल्य-जीवन । जिन्दगीमें कोई इसके भीतर प्रवेश नहीं कर सकता। और कहीं सुयश नहीं मिकता। पढकर मैंने सोचा, मुझे ऐसा यश न चाहिए । चिदानन्द चौबेकी जान सलामत रहेगी तो बहुतेरा यश हो रहेगा। 'विचार' के बाजार में गया । देसा, वह कसाईखाना है । टोपी माथे पर लगाये, शमला माथे पर रक्से, छोटे बडे कसाई छुरी हाथमे लिये पशुओको काट रहे हैं । भैसे वगैरह बड़े बड़े जानवर सींग छुड़ाकर भागे जाते हैं, और यकरी-भेड बगैरह छोटे और भोले जानवर जान दे रहे हैं। मुझे देखते ही एक कसाई बोल उठा-यह भी वैर है, इसे भी काटना होगा । मैं सलाम करके भागा। अब अढा बाजार धूमनेकी इच्छा नहीं रही, तो भी श्यामा पर गुस्सा या, इस लिए एक बार दहीहट्टा देखे बिना न लौट सका । जाफर पहले ही देखा, वहा खुद चिदानन्द चौवे ग्वाला, चिहारूपी सडे मढेकी मटकी लिये बैठा है। आप वही मट्टा खाता है, और औरोको भी खिलाता है। वैसे ही चौंक पडा, भग उतर गई, ऑसे सोरकर देखा, देखा कि रसिक आरके घरमें ही हू । मगर मढेकी मटकी सचमुच पास रक्खी हुई है।श्यामा महा रेकर मुझे मनाने आई है, कहती है-" चौरजी, खफा न होना आज दृध या दही कुछ नहीं बचा। इतना मट्ठा लाई हूँ। इसके दाम न देने होंगे।" - , ११ मेरा दुर्गोत्सव । शहरेक दिन मुझसे क्सिने इतनी भग पी लेनेके लिए कहा था। मैंने क्यो भग पीरी । मै क्यो (देवीकी) प्रतिमा देसनेके लिए गया । जो फिर कभी देख नहीं सकता, वही मैंने क्यों देया । यह इन्द्रजार किसने दिसाया। चौ.-५ दशहरे चौबेका चिट्ठा- - मैया तैरती मैंने देखा, कालका प्रबल प्रवाह बडे वेगसे विश्वब्रह्माण्डमें वहा चला जा. रहा है, मैं भी उसीम एक छोटी सी ढोंगी पर बैठा हुआ हूँ। देखा, अनन्त अपार अन्धकार है । उस प्रवाहमे ऑधीसे बडी बढी लहरें उठ रही है । बीच बीचमे उज्ज्वल नक्षा कभी दिखलाई पडते हैं, कभी छिप जाते हैं, और कभी फिर निकल आते हैं। मैं अकेला ही हूँ, अकेले होनेसे डर मालूम पड़ने लगा। बिल्कुल ही अकेला हूँ, माता भी पास नहीं । "भैया। मैया।" कह कर पुकार रहा हूं। मैं इस काल-मागरम मैयाको सोजने आया ह कहाँ है ? कहाँ मेरी मैया है ? कहा हो चिदानन्दकी जननी भारतमाता ? इस घोर समयसमुद्रमें कहाँ हो तुम सहसा स्वर्गीय बाजोके शब्दसे कान भर गये । आकाशमें, प्रात कालके अरुणोदयका ऐसा ललाई लिये उज्वल प्रकाश छिटक गया। शीतल मद पवन चलने लगा । तरगपूर्ण जलराशिके उपर दूर पर-मैंने देखा, सुवर्णमढी सप्तमीकी प्रतिमा शरदकी शोभा शोभायमान है | जलम हंसती है, है, और विमल प्रकाश फैलाती है। यही क्या मैया है ? हॉ, यही मैया है। यही मेरी जननी जन्मभूमि है। यह मिट्टीकी, अनन्तरस्नधारिणी, इस समय कालकी कोखमें डूबने चली है। रत्नभूपित दस भुजाये दशो दिशायें हैं, जो कि दस तरफ फैली हुई हैं। उन भुजाओमें जो शस्त्र देस पडते हैं वे ही तरह तरहकी शक्तियाँ हैं। पैरोके नीचे शनु कुचरा पडा हुआ है, चरणाश्रित वीर सिह शनुको उठने नहीं देता |यह मूर्ति इस समय नहीं देलूँगा, आज भी नहीं देखूगा, कल भी नही देगा, काल सागरके पार पहुंचे बिना नहीं देखूगा। किन्तु एक दिन जरूर देखेंगा । मैंने फिर मग्न होकर उस कालके स्रोतमें दशभुजा, अनेकशस्त्रधारिणी, शनुमदिनी, वीरे- न्द्रवाहना, भगवती भारतमाताकी सुवर्णमयी मूर्ति देसी। देसा, प्रतिमाकी दाहनी ओर भाग्यरूपिणी लक्ष्मी और बाई तरफ विद्याविज्ञानमयी सरस्वती हैं। सगमें बलरूपी कातिकेय और कार्यसिद्धिरूपी गणेशजी विराजमान है। मालूम नहीं, कहासे फल मिल गये। मैंने उस प्रतिमाके चरणोमें पुष्पा- अरि चढाई, और कहा--जय सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे, हमारे सब प्रयो. जनोको साधनेवाली । असंरय सन्तानोंका पालन करनेवारी अन्नपूर्ण। धर्म- अथ-काम-मोक्ष और कर्मफलरूप सुख-दु स देनेवाली मैया । मैरी यह पुष्पा- - , । . .

६७ मेरा दुर्गोत्सव । - . अलि ग्रहण करो। भक्ति, प्रीति, प्रवृत्ति, शक्ति आदि पुष्पोंको हाथ में लेकर मैं यह श्रीचरणों में पुष्पाञ्जलि अर्पण करता हूँ। तुम इस अनन्त जलमण्डल्से निकर कर एक बार जगत्के-अपने पुत्रोंके-आगे यह विश्वविमोहिनी मूर्ति प्रक्ट करो। माओ मैया, नवीन रगसे रंगी हुई, नवीन बल धारण किये हुए, नवीन दर्पसे भरी हुई, नवीन स्वम देखती हुई मैया आओ, घरमे आओ, हम तुम्हारे ३२ करोड सन्तान एक स्थानमें एक साथ ६४ करोड हाथ जोड- कर तुम्हारे श्रीचरणोकी आराधना करेंगे। ३० करोड कण्ठमे आकाशमण्डलको कपाते हुए कहेंगे-“मैया जननि अम्बिके । धानि धरिति धन धान्य धारिणि ! 'नगाकशोभिनि । नगेन्द्रवालिके । शरत्सुन्दरि चारपूर्णचन्द्रभालिके । " पुकारेंगे,-"मिन्धुमेविते सिन्धुपूजिते सिन्धुमन्यनकारिणि शनुओको मारनेके लिए दस भुजाओमे दस शस्त्र धारण करनेवाली । अनन्त-श्रीसम्पमा अनन्त- कारस्थायिनी। हे अनन्तशक्ति, अपने सन्तानोको शक्ति दो। हम तुमको क्या कहकर पुकारें मैया? हम इन ३२ करोड सिरोंको इन चरणोके ऊपर गिरावंगे, सब मिलकर ३२ करोड कण्ठोंसे तुम्हारा नाम लेकर हुकार करेंगे, ३२ करोड शरीर तुमको अर्पण कर देगे। न हो सकेगा तो ६५ करोड आँखोसे तुम्हारे लिए रोएंगे । माओ मैया, घरमै आओ, जिसके ३२ करोट बचे हैं उसे चिन्ता काहेकी" देवते ही-देखते वह प्रतिमा उसी अनन्त कालसमुद्रमे इब गई, फिर न देस पडी । अन्धकारमय आकाश तक वह तरगपूर्ण जलराशि व्याप्त हो गई, उसीमें मारा विश्व-मसार डूब गया । तब मैं व्याकुरतासे ऑरंगोमें ऑसू भरके हाथ जोड कर पुकारने लगा-" उठो मैया सुवर्णमयी भारतमाता । उठो मैया, अब हम सपूत होकर सुराह पर चलेंगे, तुम्हारा सिर उचा करेंगे । उठो मैया, देवी, देवताओपर अनुग्रह करनवाली । अब हम नीच म्वार्थपरता छोडकर भ्रातृवत्सल बनेंगे, औरोका मगर साधेगें । अधर्म, आलस्य, इन्द्रि- योकी भक्ति छोड देंगे। उठो मैया, हम अकेले पड़े रो रहे है, रोते रोते ऑग्वं फूटी जाती है, मैया । उठो उठो मेया, भारतमाता। मैया नहीं उठीं। क्या नहीं उटगी? आओ भाइयो, चरो, हम इसी अन्धकारमय कार-सागरमें कूट आओ, हम सब ६४ करोड भुजाओमे माताकी मूर्ति उठाकर, ३२ करोड . - चौवेका चिट्ठा- ६८ . सिरों पर लादकर, अपने अपने घर ले आवे । आओ, अन्धकार है तो तर क्या है ? ये जो नक्षत्र बीच-बीचमे दिखलाई पड़ते हैं, वे ही राह दिसावेंगे। चलो, चलो, असख्य भुजाओसे इस काल-सागरको ताडित मथित और व्यस्त करके हम तैरेंगे, उस सुवर्णप्रतिमाको मस्तक पर लेआवेंगे। डर क्या है ? न होगा, इब जायेंगे । विना माताके यह जीवन किस कामका ? आओ, प्रति- माको उठा लावे । पूजाकी बडी धूमधाम होगी। हम लोग उसी मातृपूजाके अवसर पर विरोध-बकरको सत्कीर्तिके खगसे मैयाके आगे भंट चढावेगे (बलिदान करेगे), पूर्वममयके कितने ही ऐतिहासिक शस बजाकर माताका गुणगान करेगे, कितनी ही शहनाइया भैरवी और सोहनीमे माताकी महि- मा सुनावेंगी, और हम आनन्दविह्वल होकर नाचेंगे । पूजाकी बडी भारी धूम होगी, अनेकों ब्राह्मण विद्वान् जमा होगे और कहेंगे जय अम्बे-अम्बिके- अम्बालिके- शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे । सर्वस्यातिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ कितने ही देशी परदेशी सज्जन-उंच नीच सव-आकर मैयाके चरणोंम प्रणम करेगे, कितने ही दीन दुखी प्रसाद साकर पेट पालेंगे। कितनी ही अप्सरायें नाचेंगी गन्धर्वगण गायेगे, कितने ही करोड भक्त गद्गद होकर पुकारेंगे--मैया । मैया मैया ।- जय जयदात्री जय धात्री, जय दुर्गे दुर्गतिही । जय वरदायिनि जय सुखदे, जय भगवति मगलकत्री ।। खल-दल-दलिनी शान्तिमयी, स्वर्णभूमि, जय सिन्धुसुते। जन्मभूमि जय जय जननी, कोटि कोटि सन्तानयुते ॥ चिदानन्द-जननी देवी, जगदम्बे आनन्दमयी। पुत्रोंको ले लगा हृदयसे, जिससे हम हो जगजयी ॥ पाप, ताप, भय, शोक मिटे, भक्ति, शक्ति, उत्साह बढे । राग, द्वेष, आलस्य हटे, भ्रातृभावका रग चढे । - ,

एकगांत।
१२ एक गीत।
मैंने कहा-सुन यामा, तुझे एक गीत सुनाउँ । श्यामा बोली, मुझे
अभी गीत सुननेकी छुट्टी नहीं है, दुध दुहनेका समय हो पाया है।
मैं-" आवहु आपहु यन्यु-"
श्यामा-छी छी। मैं क्या बन्धु है?
मैं-हरि हरि । तुम ' साठा-पाठा, ' बन्धु क्यो होने लगी ? मेरे गीतम
है-" भावहु आवहु यन्तु यसिय आधे आंचर महे"
मै गाने लगा, श्यामा भी दोहनी रसकर बैठ गई। मैंने आदिसे अन्त तक
गीत गाया।-
आवहु आवहु वन्धु, बसिय आधे ऑचर मॅह ।
दृग भरि देख? आजु साधों प्यारे, तुम कहें ॥
बहुदिनमहं विधि दियो, बन्धु, तुमसम मनको धन ।
तुम मेरे सरवस्व, तुम्हे दीन्हीं में जीवन ॥
मनिमानिक हो नहीं, गरेको हार करहुँ जो ।
कुसुम नहीं हो, करि सिंगार में सीस धरहुँ जो ॥
हे गुणनिधि । विधि कियो मोहि नहिं नारी सुन्दर ।
तुम्हें साथ ले देश देशम फिरतिउ भूपर ॥
जापति है जब याद बन्धुवर, माहि तुम्हारी ।
वृन्दावनकी जोर लपहुँ, सव सुरति विसारी॥
विसरे चार न बॉथि, रसोईघरमह सोबहुँ ।
तुव गुन गावहुँ बन्धु, धुऑको मिस करि रोगहुँ ॥
हिन्दी भाषामे ऐसा ही और एक मोहनमन्त्र सुननेकी वढीही साधा।
जन पालेपहल यह गीत कान लगाकर जी भर कर मुना था, तर इच्छा हुई
थी कि इस नील गगनमण्डलके तरे एक साधारण पक्षी यनफर यही गीत
गार, जी चाहा था कि उम विचित्र करपनायुशल करिकी प्रकृति पशीमें
यही स्वर फर दे, मेघोंके उपर जो शदशून्य वायुचक्र है, जहाँसे पृष्पीका
कोई रश्य नहीं देख पढता, यही बेरकर उसी यशीम, अकेले यही गीत गाऊँ।
यह गीत मुझे क्षय तक नहीं भूला, इमे कभी भूर भी नहीं मगा।-
.

चौवेका चिट्ठा- ७० , . आवहु आवहु बन्धु-' लोगोके मनमे क्या है, सो तो कुछ कह नहीं सकता, किन्तु मैं चिदानन्द चौबे नहीं समझता कि इन्द्रियकी तृप्तिमे भी कुछ सुख है। जिस पढपशुको इन्द्रियतृप्तिके लिए बन्धुको बुलानेकी उत्कण्ठा हो वह कभी चिदानन्दका चिहा पढने न बैठे। मैं विलासी आदमीके मुंहसे 'आवहु आवहु बन्धु' सुनना नहीं चाहता । 'आवहु आवहु बन्यु' का अर्थ ससारमें मुझे यही जान पडता है कि मनुष्य मनुष्यके लिए है-एक हृदय अन्यके हृदयके लिए है। वही हृद- यसे हृदयका स्पर्श, हदयसे हृदयका मिलना, मनुष्यजीवनका सुख है। इस जन्ममें मनुष्यके हदयको परखो, देसोगे, उसमें केवल प्यास है, चाह है, अन्यहृदयकी कामना है। मनुष्यका हृदय निरन्तर दूसरे हृदयको पुकारता है, कहता है-' आवहु आवहु बन्धु।' मनुष्यकी बडी बडी वासनाय शरीररक्षाके लिए छोटी छोटी प्रवृत्तियोसे कहती हैं- आवहु आवहु बधु ।' तुम नौकरी करते हो अपने पेटके लिए, किन्तु यशकी चाह करते हो दुसरेका अनुराग भादर पाने के लिए, जनसमाजके हृदयको अपने हृदयसे मिलानेके लिए। तुम जो परोपकार करते हो उसका कारण पराये हदयके क्लेशका अपने हृदयमें अनुभव ही है। तुम जो क्रोध करते हो उसका कारण तुम्हारे मनके माफिक काम न होना ही है। हृदय हृदयसे नहीं मिलता, यही कारण है कि सर्वत्र 'आवहु आवहु बंधु' की पुकार सुन पडती है । सर कौंका मूलमन्त्र यही ' आवहु आवहु वधु' है। जड जगत्का नियम है आकर्षण, अपनी ओर सींचना । बड़े ग्रह छोटे ग्रहोको पुकारते हैं-' आवहु आवहु बंधु।' सौरपिण्ड (सूर्य- गोरक) बड़े ग्रहीको पुकारता है ' भावहु भावहु वधु । एक जगत् दूसरे जगत्को पुकारता है ' आवहु आवहु वधु । एक परमाणु दूसरे परमाणुको निरन्तर पुकारता है 'आवहु आवहु वधु ।' सारे जदपिण्ड, ग्रह, उपग्रह, धूमकेतु मभी इस मोहनमन्त्रसे बंधे पड़े घूमते हैं। प्रकृति पुरपको पुकार रही है 'आवहु आवहु यधु । ' जगत्की यह गभीर धनि बराबर सुनाई पड रही है 'आवहु आवदु धु।' चिदानन्दका बन्धु क्या कभी आवेगा? तरह सारे पद्यके सण्ड खण्ड करके उनकी व्यान्या की गई है, पाठ- कोंको मिलाकर देख लेना चाहिए ।

७१ एक गीत। - - . . कालापाढ 'बसिय माधे ऑचर महें।' इस घास-फूस और झाड-झसाडसे भरे कडे कण्टकोसे अगम्य ससारके जग- रमें, हे मगलमय । हे चिरवाञ्छित । तुमको और क्या आसन हूँ, मेरे इस हृदयके पर्दे पर बैठो । ककड और कण्टकोसे तुम्हे बचानेके लिए मैं अपने हृदयको उघारता हू-मेरे ऑचलमें बैठो। हे मिलित । जिससे मेरे मानकी- लजाकी-रक्षा है, मेरे शरीरकी शोभा है, वह आधा तुम भी ग्रहण करो; आधे आँचलमें बैठो। हे दूसरेके हृदय, हे सुन्दर, हे मनोरअन, हे सुखद । पाम आओ, मुझे स्पर्श करो, मैं तुमसे मिलूगा, दूर न बैठना, इसी मेरे शरी- रके आधे ऑचलमें बैठो। हे चिदानन्द । हे दुर्विनीत । हे आजन्मविवाहव- श्चित 'तू इस आधे आचरको ढाकेकी ' साडीका आँचर न समझना । तू जिस आधे आँचलमें बैठेगा उसे बुननेवाला जुलाहा अभीतक पैदा ही नहीं हुआ। मनका नगापन ज्ञानके वस्त्रसे ढका हुभा है, आधे वस्त्रसे अपने हृदयको ठकना, और आधे अपने वाञ्छित बन्धुको बिठलाना । तू मूर्ख है, तथापि यदि कोई तुझसे भी बढकर मुर्ख हो तो उससे कहना- आवहु आवहु बधु बसिय आधे औचर मह।' 'हगभरि देस? आजु साधों प्यारे, तुम कहें।' किसी कभी देखा है ? तुमने बहुत सा धन कमाया है-पर क्या कभी आय भरकर अपना धन देख पाया है ? तुमने यशस्वी होनेके लिए जान रडा दी है, मगर अपने यशको देसकर कर तुम्हारे नेत्र तृप्त हो गये है ? रूपकी प्यासमें तुमने सारा जीवन बिता दिया । जहाँ फूल खिलते हैं, फल हिलते है, पक्षी फिरत हैं, मेघ घिरते है, पहाडोंकी चोटिया है, यहती हुई नदिया है, झरनोकी झनकार है, यमन्तकी यहार है, वहीं तुम रूपकी गोजमें फिरे हो । जहाँ बालक अपने प्रसन्न मुमको हिला हिलाकर हसता है, जहाँ कोई युवती रजाके मारे विधिल शकित चालसे जाती है, जहाँ भरी जवानी. मे पूर्णरूपसे खुली सिरी हुई प्रोढा नारी, दुपहरिया पभिनीकी तरह, बिना किसी सकोचफे रूपकी छटा रिटकाती है, वहीं तुम रूपकी गोजमें फिरे हो; मगर यतलाभो, कभी भाव भरकर रूप देसा है? तुमने क्या नहीं देगा कि फूल देसते ही देखते सूख जाता है, फल देगते ही देखते पक जाता है, फिर गिरता और सड गल भी जाता है, पक्षी उढ जाते है, मेघ चले जाते है, । - चौवेका चिट्ठा- ७२ , । पास पहाड भूगर्भ में धस जाते है, नदियाँ सूख जाती है, चन्द्रमा अस्त हो जाता है, नक्षत्र छिप जाते है-बालककी हेसीको रोग हर लेता है, युवतीकी लज्जा सदा नहीं रहती, प्रौढाके रूपकी छटा दुपहरियाके साथ ही ढल जाती है। यह ससारका अभाग्य ही है कि कोई किसी चीजको आँस भरकर नहीं देख पाता। अथवा, यही ससारका सौभाग्य है कि कोई कुछ भी आँस भरकर नहीं देख पाता । गति ही समारका सुख है-चञ्चलता ही ससारकी सुन्दरता है । आँसें नहीं तृप्त होती । तृप्त होनेवाली ओसें हमको मिलती ही नहीं। मिलती तो ससार दु ससे भर जाता, तृप्तिरूपिणी राक्षसी हमारे सारे मुखको अस लेती। जिस कारीगरने इस परिवर्तनशील समार, और इन तृप्त न होनेवाली आखोको बनाया है, उसकी कारीगरीके ऊपर कारीगरी, यह वासना हे कि-' गभरि देस? आजु साधसो प्यारे तुमकहें । हे रूप । हे मोन्दर्य । हे हमारी अन्त प्रकृतिके साथ सम्बन्धयुक्त आओ, आँख भरकर तुमको देश् । दूर बैठोगे तो देस न सकूँगा। क्योंकि देवना केवल आसोसे नहीं होता, स्पर्श किये बिना या समीप भाये बिना मनकी बिजली नहीं दौडती, हम लोग सारे शरीरसे देखते रहते हैं। एक मनसे दूसरे मनमें बिजली दौडती है तभी आँख भरकर देखना होता है। हाय । केसे आसें तृप्त होगी? ओसोमें तो पलकें हैं। 'बहु दिनमहं विधि दियो, चन्यु, तुमसम मनको धन ।' मुझे कभी कभी जान पडता है कि केवल दु.सकी मापके लिए विधाताने 'दिन' की सृष्टि की है, नहीं तो कालकी कोई माप न थी, मनुष्यका दुख अपरिमित होता। हम लोग अब कह सकते हैं कि हम दो दिन, दो महीने, या दो वर्षसे दुख भोग रहे हैं। किन्तु यदि दिन-रातका हेर-फेर नलगा होता, समयपथ चिह्नशून्य होता, तो सरकी यही धारण होती कि हम बहुत सम- यसे दुखभोग कर रहे हैं। ऐसा होने पर आशा पास न फटकती, कोड यह सोच न सकता कि इतने दिनाके बाद दु स दूर होगा। जैसे, जिस मार्गम वृक्षोंकी छाया नहीं होती उसमें चरना कठिन हो जाता है, वैसे ही जीवन- पथ पार होना लोहेके चने हो जाता। जिन्दगी घोर कष्टका कारण बन जाती। मतएव इस विशाल विश्वके केन्द्र-म्वरूप सूर्यका मार्ग हमारे दु सका . - मान- ७३ एक गीत । । - दण्ड ' माना जासकता है । दिन गिननेमें सुख है। सुख होनेके कारण ही दुखिया रोग दिन गिता करते है । दुसमें दिन गिनना ही जी बहानेका एकमात्र उपाय है। मगर ऐसे भी दुसी लोग हैं जो दिन नहीं गिनते, दिन गिननेमें उनका जी नहीं यहलता। तब, भूलसे पृथ्वी पर पैदा हो जानेवाला मै चिदानन्द चौ किम रिए दिन गिनू ? मेरे न सुख है, न आशा है, न उद्देश्य है, न कोई कामना है। मैं इस समारमागरमें रहता हुमा एक तिनका, अथवा मसारकी आँधीमे उडता हुआ एक यूरका किनका हूं। मुझे ससार- चाटिकाका एक निष्फल वृक्ष, या समारगगनका जलहीन मेव-पढ समझो। मैं क्यों दिन गिनूगा गिनूंगा । मुझे एक दुस, एक मन्ताप, एक भरोसा है । जिस दिनमे इन्द्रप्रस्थ-राजधानीसे ' पृथ्वीराज ' का सडा उसड गया, चित्तौरका प्रताप' नहीं रहा, उस दिनसे दिन गिन रहा है । जिस दिन भारतमाताकी छाती पर यवोंके घोडाकी टाप जी, उसी दिनसे दिन गिन रहा हूँ। हाय । कहाँ तक गिनगा। दिन गिनते गिनते महीना होता है, महीने गिनते गिनते वर्ष होता है, वर्ष गिनते गिनते शतान्दी होती ह । शताब्दिया भी कई बीत गई-कही तक गिर्ने ? कहा, बहुत दिनो विधातासे मनका धन कही मिला ? जो चाहिए वह कहाँ मिरा ? मनुष्यत्न कहाँ मिला? एक्जातीयता कहाँ मिली? एका कहाँ मिला? विद्या कहाँ है ? गौरव कहाँ है ? कालिदास कहाँ है ? विक्रमादित्य कहा है ? चन्द्रगुप्त कहाँ है ? भगवान् बुद्धदेव कही है । भगवान् शकराचाय कहा है ? मनका धन क्या अब नहीं मिलेगा ? हाय । सरका मनोरथ पूरा होता है, चिदानन्दका ही मनोरथ पूरा नहोगा? 'मनिमानिक हो नहीं, गरेको हार करहुँ जो। कुसुम नहीं हो, करि सिगार मैं सीस धरहुँ जो ॥' विधाताने जगत्को जडपदार्थमय क्यों बनाया? रूप जड पदार्थ क्या है? सभी शरीररहित क्यो न हुए ? अगर होते तो हृदयसे हृदय कैसे मिलता? अगर रूपके लिए शरीरकी जरूरत थी, तो विधाताने तुम्हारा हमारा एक ही शरीर क्यो नहीं बनाया ऐसा होता तो फिर नियोगका खटका ही न था। अब क्या हमारा तुम्हारा शरीर एक नहीं हो सकता? मेरे शरीरमें इतनी जगह है, उसमें कहीं पर क्या मैं तुमको रख नहीं सकता ? तुमको गरेमे चौवेका चिट्ठा- T . लगाकर, हृदयमें लटकाकर, रख नहीं सकता ? हाय ! तुम 'मनिमानिक हो नहीं, गरेको हार करहु जो।' और भारतभूमि । तुम्हीं मणि या माणिक क्यो न हुई ? मैं तुम्हें हार बनाकर गलेमें क्यो न धारण कर सका ? तुम्हें अगर कण्ठमें धारण करता तो जबतक मुसल्मान मेरी छातीमें लात न मारते, तबतक उनके पैरोंकी धूल तुमको छू नहीं सकती थी। तुमको सोनेमें मढाकर हृदयमें रखकर देश देशमे दिखाता । यूरोप, अमेरिका, मिसर और चीन देखते कि तुम मेरी कैसी उज्ज्वल माण हो। 'हे गुणनिधि । विधि कियो मोहि नदि नारी सुन्दर । तुम्हें साथ ले देश देशमह फिरतिउँ भू पर ॥ पहरे बुलाना-'आवहु आवहु बधु,' फिर आदर या प्यार-' वसिय आधे आँचल मह,' फिर भोग-'ग भरि देखहुँ आजु साधसों प्यारे तुम कहे ।' तर सुखभोगके समय जो पूर्व-दु सका स्मरण होता है उसका उदय- बहुदिन महें विधि दियो बन्धु तुम सम मनको धन ।' सुख दो तरहका होता है, एक सम्पूर्ण, दुसरा असम्पूर्ण । असम्पूर्ण सुख जैसे-' मनिमानिक हो नहीं, गरेको हार करहुँ जो । कुसुम नहीं हो, करि सिंगार मैं सीम धरहुँ जो।' इसके बाद सम्पूर्ण सुख, जैसे-हे गुणनिधेि । विधि कियो मोहि नहिं नारी सुन्दर । तुम्हें साथ ले देश देशम फिरतिउ भू पर । असा सुसका सम्पूर्ण रक्षण है शरीरकी चञ्चलता और मनकी अस्थि- रता । यह सुस कहाँ रक्यूँ, लेकर क्या करू, मैं कहाँ जाऊँ, यह सुसका बोझा रेकर कहा उतारू? इस मुसका योझा रेकर में देश देशम फिरूंगा, यह सुख एक स्थानमे नहीं आसकता। जहाँ जहाँ पृथ्वीमें स्थान है वहाँ वहाँ सुसको रेकर जाऊँगा । इस जगन् समारको इस सुससे भर दूंगा । ससारको इस मुबके सागरमें तैराऊंगा, एक मेल्ले दूसरे मेर तक सुसकी तरंगे नचाउँगा, भाप गोते लगाकर उतराकर गिरकर पड़कर उटपर इसौमे दौडूंगा। परन्तु, इस मुममें चिदानन्दका अधिकार नहीं है, इस मुग्यमें हिन्दूमात्रका अधिकार नहीं 1 इस मुग्नमें क्या, सुखकी चर्चामायमें हिन्दुओंका अधिकार नहीं है। गोपियोंको दुव था कि विधाताने उन्हें स्त्री क्यो पनाया, दुम है कि ७५ एक गीत। . विधाताने हमे स्त्री क्यो न बनाया, अगर ऐसा होता तो यह मुग्व फिर किसीको दिखाना नहीं पड़ता। सुखकी चर्चा में हिन्दुओका अधिकार नहीं है, किन्तु दुसकी बातोमें है। कातरोक्ति कितनी ही गभीर, कितनी ही हृदयविदारक क्यों न हो, वह हिन्दुओकी मौक्ति है । और कातरोति कहा नहीं है? तुरतके पैढा हुए पक्षीके बच्चेसे लेकर महादेवके 'सिंगीनाद' तक सभी कातरोक्ति है। जिसको सब सुख प्राप्त है वह सुसी भी सुरपके समय पहलेके दुग्योकी याद करके कातरोक्ति करता है। अगर ऐसा न हो तो सुसकी सम्पूणता ही क्या हुई ? दु ग्बकी यादके पिना सुखमें भी सम्पूर्णता नहीं है । सुस भी दु समय है- 'आवति है जब याद बन्धुवर मोहि तुम्हारी। वृन्दावनकी ओर लपहु, सर सुरत बिसारी ॥ निसरे पार न बोधि, रसोईघर महँ सोबहु । तुव गुन गावडे बन्धु, धुओको मिस करि रोवहु ॥' यह उक्ति सुख और दु सके यीचकी सीमा-रेसा है। जिसके पिछले सुबकी याट होने पर उस सुखके चिह्न अब भी देस पडते हैं, वह इस समय भी सुखी है, उसका सुस एकदम जडमरसे नष्ट नहीं हुआ । उसके बन्धु, उसके प्यारे, उसके इष्टमित्र चले गये हैं, किन्तु उसका वृन्दावन बना है। वह चाहे तो अपने उस मुसकी भूमि वृन्दावनकी ओर देख सकता है। हाँ, जिसका मुग्न गया है, सुसका चिह्न भी नहीं रहा, यधु चले गये है, वृन्दावन भी नहीं रहा, आप उठाकर देखनेको जगह नहीं है, वही दुखिया है, अनन्त दुमसे दुग्विया है। वह बैसा ही दुरपी है, जेमे विधवा स्त्री अपने पतिकी पादुका गोजाने पर . दुग्गी होती है 1 मेरे इस भारतके सुपकी स्मृति है, मगर चिह्न कहा है। विक्रम भोज, कालिदास, भवभूति, चन्द्रगुप्त, अशोक, शकर, वुद्ध, दिली, कनौज, चित्तौर आदिकी स्मृति है, मगर चित कहाँ है ? सुनसरी याद आई, परन्तु देखू किम तरफ ? वह दिली कहाँ है? वह कलौज कहा है। यह चित्तौर कहीं है ? वा दिल्ली-यह कसोज-वह चितार-इस समय भग्नावशेषमात्र रह गये है। भार्यराजधानी इन्दभस्थका चिह कहाँ है ? आर्योंका इतिहास कहाँ ? जीवाचरित चौचका चिट्ठा- कहाँ है ? कीर्ति कहा है कीर्तिस्तम्भ कहाँ है ? समरभूमि कहा है ? सुन गया, सुखके चिल्ल भी गये, बधु गये, वृन्दावन भी गया, देख किस तरफ ? देखनेके लिए एक श्मशानभूमि है-इन्द्रप्रस्थ । वहीं पर अधिकार करके यवनोने भारतमाता पर अपना सिक्का चलाया था। भारतमाताकी याद आने पर मैं उसी श्मशानभूमिकी तरफ देमता हूँ। जब देखता हूँ कि उस राज- धानीको घेरकर आज भी यमुना करनाद करती हुई वह रही है, तब यमु. नाको पुकार कर पूछता हूँ-"तुम हो, मगर वह राजलक्ष्मी कहाँ है? तुम जिसके पैर धोती थीं, वह माता कहाँ है ? तुम जिसको घेर घेर कर नाचती थीं वह आनन्दमयी कहाँ है ? तुम जिसके लिए विदेशोसे धन लाद- कर लाती थीं वह रत्नगर्भा कहाँ है ? तुम जिमके रूपकी छायासे शोभा पाती थीं वह अनन्तसौन्दर्यशालिनी निभुवनसुन्दरी कहाँ है ? तुम जिसके प्रसादी फल पाकर इस स्वच्छ हृदयमें माला पहनती थीं वह पुप्पाभरणा कहाँ है ? उस रूपको, उस ऐश्वर्यको, तुम कहाँ वहाले गई ? विश्वासघातिनी, तुम क्यो फिर इस श्रवणमधुर कलनादसे मन बहलानेकी चेष्टा कर रही हो। मैं समझता ह वह राजलक्ष्मी यवनोके भयसे तुम्हारे ही गभीर गर्भमैं इब गई है, और शायद वह हम कुपुत्रोका मुख नहीं देखना चाहती, इसीले डबी हुई है। मन ही मन मैं उसी राजलक्ष्मीके डूबनेके दिनकी कल्पना करके रोता हूँ। मुझे स्पष्ट देख पटता है कि चमचमाते हुए बौँको उँचा किये यवनोकी सेना दिल्लीम आ रही है। समय आया देसकर दिल्लीसे भारतकी राजरक्ष्मी निकली जा रही है। सहसा आकाशमें अन्धकार छा गया, राजमहलका शिखर फट पड़ा । पथिकने भयभीत होकर रास्ता छोड दिया, सधवाओके अगसे अलकार गिर पडे, कुञ्जोमें पक्षी चुप हो रहे, धरमें पलाऊ मोरोका शब्द कण्टका कण्ठम ही रह गया । दिनको रान हो गई, बाजारके दीपक बुझ गये, मदिरम बजानेके समय शस नहीं बजा, पण्डितने अशुद्ध मन्त्र पढा, सिंहा- मन परसे शालग्रामकी शिला लुढक पडी। सहसा जवानोके शरीरसे शनि निकल गई, जवान स्त्री वैध यके भयसे रो उठी, बालक बिना किसी रोगके माकी गोदमे पडा पडा मर गया। बहुत ही गाढा घना धना अन्धकार हर तरफ छागर्यो । आकाश, अटारी, राजधानी, राजमहल, सडकें, देवमन्दिर, बाजार हाट, सब कुछ उसी अन्धकारमें ढक गया। कुजके किनारेकी भूमि, . - विलाव। नदीका वालुकामय किनारा, नदीकी लहरे, सब कुछ उसी अन्धकारमें अस्पष्ट होते होते लीन हो गया। मैं इस समय भी अपनी आंखोके आगे सन देख रहा हूँ । आकाशमें मेघ घिर आये है, यह राजलक्ष्मी सीढिया उतरकर जलमे उतर रही है। अन्धकारमें घुझते हुए प्रकाश-निन्दुकी तरह, जलमे क्रमश वह तेजकी राशि लीन हो रही है । अगर यमुनाके अथाह जर में नहीं डूबी, तो मेरे देशकी राजलक्ष्मी गई कहाँ ? १३ बिलाव। में अपने सोनेकी कोठरीमे चारपाई पर बैठा हुआ ऊँध रहा था। एक प्रेतकी तरह नाच रही थी। भोजन अभी तैयार नहीं हुआ था, इसीसे मैं आखें बद किये सोच रहा था कि अगर मैं नेपोलियन बोनापार्ट होता तो वाटके सम्राममें विजय प्राप्त कर सकता या नहीं? इसी समय एक छोटा मा शब्द हुआ-' म्याऊँ।' औसे सोलकर देसा-एकाएक कुछ समझमें नही आया। पहले जान पडा, बघूक आफ वेलिंगटन एकाएक बिलाव होकर मुझसे दूधिया भग मांगने आया है। मैंने पहले तो पत्थरकी तरह कठिन होकर यो कहनेका विचार किया कि डयूक महाशय, आपको पहले ही उचित पुरस्कार दिया जा चुका है, अब और पुरस्कार नही दिया जा सकता। इसके सिवा अधिक रोम करना अच्छा नहीं । इतनेमें डयूक बोला-' म्याऊँ ।' तर मैंने अच्छी तरह ओसें फाडकर देखा, चेलिंगटन नहीं, एक छोटा सा बिलान है। श्यामा ग्वालिन मेरे लिए जो दृध रस गई थी, उसे आप चुप- चाप चाट गये हैं । मै उस समय वाटर्राके मैदानम न्यूह-रचना (सेनाकी मो.नटी) करनेमें लगा हुआ था, कुछ देखा नहीं। अब इस समय दिला- वराम मलाईदार दूधको तरावटसे तृप्त होकर अपने मनका आनन्द इस जगतम प्रकट करनेके लिए अत्यन्त मधुर स्वरसे कह रहे है-'म्याउ। मैं शशाखके प्रमाणसे तो नहीं सिद्ध कर सकता, परन्तु मुझे जान पडा कि अँगरेज सेनापति, जिसने वाटलंके युद्ध में नेपोलियनको हराया था। क .

चौका चिट्ठा- ७८ " उसके इस 'म्याऊँ' शब्दमे व्यग अवश्य है। शायद पिलाय मन-ही-मन हंसता हुआ मेरी तरफ देखकर कहता था कि "कोई जोडे और कोई खाय। अथवा वह मेरा इरादा जाननेके लिए म्याजम्याऊँ कर रहा था । जान पडता है, वह यह कहता था कि " तुम्हारा दूध तो मैं पीगया-अब क्या कहते हो?" कहू क्या ? मैं तो कुछ निश्चय नहीं कर सका । दूध मेरे बापका नहीं था। दूध था मगला गऊका, और उसे दुहा था इयामा ग्वालिनने । बम, उस दृध पर जैसे मेरा अधिकार है वैसे ही बिलावका भी। इसी कारण मैं उसपर क्रोध नहीं कर सकता । तथापि बहुत दिनोसे एक प्रथा चली आती है कि रिल्ली दूध पी जाय तो लोग उसे मारने दौडते है। चिरकालसे चली आई इस चालको न मानकर में मनुष्यकुलम कलक भी नहीं बनना चाहता । क्या जाने, यह निलाव अपनी मण्डलीम जाकर चिदानन्द चतुर्वेदीको कायर कहने लगे, इस कारण मौके योग्य काम ही करना चाहिए। यह निश्चय कर, बहुत खोजने पर पाईहुई एक हट्टी लकडी ले, गर्वके साथ मैं उस बिलावको मारने झपटा । निलार चिदानन्दको पहचानता था, लकडी देखकर वह कुछ विशेष भय- भीत नहीं हुमा । केवल मेरी ओर देखकर एक जम्हाई लेकर जरा हट बैठा पिलावने फिर कहा- म्याऊँ ।' उस समय भगभगवतीकी कृपासे मुझे दिव्य कान मिल गये। तब पिलावका प्रश्न समझ कर एकडी रसकर मैं फिर पलंग पर जाकर लेट रहा । दिलाव कह रहा था कि " मारपीट क्यो करते हो? जरा स्थिर होकर हुक्का पीते-पीते विचार तो करो । ससारके सब रस, दूध, दही, मक्खन, मलाई, मोहनभोग, मास, मछली आदि पदार्थ क्या तुम्हारे ही लिए है ? क्या हमारा उनपर कुछ भी अधिकार नही है ? तुम मनुष्य हो, हम बिलाव है पर हममें तुममें अन्तर क्या है ? तुम्हारे भूख प्यास है, हमारे भी है। तुम साते हो, हम कोई आपत्ति नहीं करते । तो फिर हमारे कुछ सा पी लेने पर तुम किस शास्त्र के अनुमार लाठी लेकर मारने दौडते हो? तुमको हम लोगोसे कुछ उपदेश ग्रहण करना चाहिए। मेरी समसमें विज्ञ चौपायासे सीखे बिना तुम्हारा ज्ञान बढ़ नहीं सकता । तुम्हारे विद्यालयोको देखनेसे ७९ बिलाव। जान पडता है कि इतने दिनोंके बाद तुम मेरे इस सिद्धान्तको मानने लगे हो। "देसो पलंग पर रेटनेवाले आदमी, धर्म क्या है ? परोपकार करना ही परम धर्म है । यह दूध पीनेसे मेरा परम उपकार हुआ है। तुम्हारे दूधसे यह परोपकार हुआ--अतएव तुम इस परमधर्मके भागी हुए । मैंने चोरी की या जो चाहे किया, किन्तु तुमको स्मरण रहे कि मैं ही तुम्हारे इस धर्म- सचयका मूलकारण हूँ। इस लिए मुझे मारनेका इरादा छोडकर तुमको मेरी गडाई करनी चाहिए । मैं तुम्हारे धर्मका सहायक है। " देखो, मै चोर हू सही, किन्तु सोचो तो, में क्या शौकसे चोरी करता हूँ ? खानेको मिले तो कौर चोरी करेगा ? देसो, जो बड़े भारी साधु-सजन ईमानदार समझे जाते हैं, जो चोरके नामसे कोप उठते है, वे चोरोंसे भी बढकर अधार्मिक है । उन्हें चोरी करनेकी जरूरत नहीं, इसीसे वे चोरी नहीं करते । किन्तु उनके पास आवश्यकतासे अधिक धन होने पर भी ने चोरकी तरफ ऑस उठाकर नहीं देग्वते । इसीसे चोर चोरी करता है। अधर्म चोर नहीं करता, घोर जो चोरी करता है उस अधर्मका भागी धनी- सूम है। चोर दोषी है, चोरको दण्ड होता है, किन्तु चोरीको जड जो कृपण है उसे क्यो नहीं दण्ड दिया जाता "मैं एक दीवारसे दूसरी दीवार पर म्या-क्या करता फिरता हु, तो भी कोई एक टुकडा रोटी मुझे नहीं देता। रोग आगेका बचा हुआ अन्न कुत्तोको दे देते है, नालीम फेंक देते हैं, मगर हम लोगोंको बुलाकर नहीं देते । तुम्हारा तो पेट भरा है, तुम हमारी भूसका कष्ट कैसे जान सकते हो? हाय । गरीरमे सहानुभूति दिसानेमें क्या कुछ तुम्हारा गोरव घट जायगा? इसमे सन्देह नहीं कि मुझ सरीखे दरिद्रकी व्यथाम व्यथित होना लजाकी यात है। जो लोग कभी अधे अपाहिजको मुट्ठी भर अझ नहीं देते, उन्हें भी यदि किसी राजा या सेठ-साहकार पर कोई सम्ट आपडे तो रातभर नींद नहीं आती। इस प्रकार पराई व्यथामें व्यथित होनेके लिए सब राजी होगे। लेकिन मुझ सरीसे साधारण आदमीके दुग्में दुखी-छी ।-कौन होगा? देगो, यदि अमुक महामहोपाध्याय या तकंचूडामगि भयवा न्याया- लहार तुम्हारा दूध पी जाते तो क्या तुम पाठी रेकर उन्हें भी मारने दौडते ? १ । . .

चौबेका चिट्ठा- 1 MA Rahu " नहीं, उलटे हाथ जोडकर कहते कि " क्या और थोडा सा ले आऊँ ? फिर प्रभो, मेरे लिए यह लाठी क्यो? तुम कहोगे कि वे बड़े बड़े पडित है-मान्य हैं। अच्छा, पण्डित या मान्य होनेके कारण क्या उनको हमसे अधिक भूस लगती है ? यह बात तो नहीं है। जिसे जरूरत नहीं उसे देनेका मनुष्यजातिको रोग है। गरीब मुफलिसको कोई नहीं देता । जो सानेके लिए आग्रह करनेसे ' नहीं नहीं' करें उनके लिए तो जबर्दस्ती भोजनका प्रबन्ध करो, और जो भूखसे व्याकुल होकर बिना बुलाये ही तुम्हारा अन्न सा जाये उसे चोर कहकर दण्ड दो ।-छी-छी। देखो, हमारी दशा देखो, हम घर-घर डगर-डगर, दीवार-दीवार, और ऑगन-आंगन म्याऊँ म्याऊँ करते और दीन दृष्टिसे चारो तरफ देखते फिरते हैं, कोई हमको रोटीका टुकड़ा नहीं फेक देता। हाँ, अगर कोई बिलाव तुम्हारे यहाँ पलाउ हो जाता है, तो उसकी चैनसे गुजरने लगती है । वह वैसा ही हटपुष्ट हो जाता है जैसे किसी बुढेके घर रहनेवाला उसकी जवान स्वीका भाई, अथवा मूर्ख मोटेमल रईसके पास रहनेवाला शतरज ताश वगैरहका खिलाडी मुसाहब । उन बिलाओकी दुम फूल उठती है, शरीरमें रोएँ भरे रहते है। उनके रूपकी छटा देखकर बहुत से बिलाव कवि हो उठते है। " और हमारी दशा देसो, भोजन न मिल्नेके कारण पेट पीठमे लग गया है, हड्डियों देस पडती है, जीभ बाहर निकल रही है, पूछ गिरी पडती है। निरन्तर भूखके मारे पुकारा करते हैं ' म्याई ? ' (अर्थात् मै भाऊ?) मानेको नहीं मिला-- म्याऊँ ?' भैया, हमारा काला चमडा देवकर हमसे पृणा न करो। इस पृथ्वीके पदार्थों पर हमारा भी कुछ अधिकार है। स्वानेको टो, नहीं तो चोरी करेगे। हमारे काले चमदे, सूखे मुख, क्षीण और करणापूर्ण म्याउँ म्याऊँ शब्दको सुनकर क्या तुमको दुस नहीं होता? दया नहीं आती? चोरके लिए दण्ड है, तो क्या निर्दयी निठुरके लिए दण्ड नहीं है। दरिद्र पुरप यदि अपने लिए आहार जुटावे तो उसके लिए दण्ड है, फिर धनी आदमी कृपणता करे तो उसको दण्ड देनेकी व्यवस्था क्यों नहीं ? तुम चिदानन्द, दूरदर्शी और समझदार हो, क्यों कि भंगभवानी अनन्य उपासक हो । तुमको भी क्या यह यतलाना पड़ेगा कि रईसोंके 1 m . - . ।

बिलाव। । दोपसे ही गरीन चोरी करते हैं? पाँच सौ गरीबोंको वचित कर उनका भोजन अपने यहाँ बापके मालकी तरह रस लेनेका धनियोको क्या अधिकार है ? और रईस या धनी ऐसा करता है तो फिर वह भोजन दरिद्रोको बॉट क्यो नहीं देता? अगर वह नहीं देता तो दरिद्र लोग जरूर ही उसमेंसे चुराकर सायगे । क्यो कि भूखों मरनेके लिए इस पृथ्वीपर कोई नहीं आया।" बिलावके वाक्य मुझे असह्य हो उठे। मैने कहा " ठहरो ठहरो विलाव पण्डित । तुम्हारी बातें भारी बोलशेविज्मसे भरी हैं । इनसे समाजमें उलट- पल्ट हो जायगा । जिसकी जितनी क्षमता है वह उतना धनसञ्चय न कर सकेगा, या चोरोके उत्पातसे सुखपूर्वक उसका उपभोग न कर सकेगा, तो फिर कोई धनसञ्चयकी चेष्टा ही न करेगा । और इससे समाजकी आर्थिक उन्नतिमें या धनवृद्धि में बाधा पडेगी। बिलावने कहा- -" आर्थिक उसति या धनवृद्धि न होगी तो हमको क्या? समाजकी धनवृद्धिका अर्थ हुआ धनीके धनकी वृद्धि । अच्छा, धनीका धन नहीं बढा तो उससे दरिद्रकी क्या हानि हुई?" मैंने समझाकर कहा-" सामाजिक धनवृद्धिके सिवा समाजकी उमति नहीं हो सकती। बिलावने क्रोध करके कहा-" मुझे अगर खानेको न मिले तो फिर मैं तुम्हारी समाजकी उनति रेकर क्या करूगा ? गिलावको समझाना कठिन हो गया। जो विचारक या नैयायिक होता है उसको कभी, कोई भी, कुछ भी नहीं समझा सकता। यह विलाव विचारक तो है ही, तार्किक भी यहा प्रवल है। इसीसे उसे मेरी यात न समझनेका अधिकार है । तब मैने प्रोध न करके कहा-"हो सकता है कि समाजकी उन्नतिम गरीरका कुछ स्वार्थ न हो, ऐकिन धनियोका तो उसमें विशेष स्वार्थ है। अतण्व चोरको दण्ड देना कर्तव्य है।" तय फिर रिलायरामने कहा-" भाप चोरको फॉमी दीजिए, इसमें भी हमको आपत्ति नहीं, कितु उसके साथ ही एक और नियम बनाइए । भर्यात जो रिचारक चोरको मजा दे यह पहरे ती दिन तक भूमा रहे । इस पर भगर विचारक्को चोरी करके खानकी इच्छा न हो तो यह खुशीम घोरको फौमी पर चढचा दे। तुमने मुझे मारनेके लिए राठी तानी थी, म " . चौ०-६ चौका चिट्ठा- ८२ . तीन दिन तक लधन करो । इन तीन दिनोंमें अगर तुम रसिकवाकी रसो- ईमें न पकडे जाओ तो मुझे जी भरके मार लेना, मैं चू नहीं करूंगा।" चतुर लोगोकी राय यह है कि यदि विचारमें हार जाय तो गभीर मावसे उपदेश करने लग जाना चाहिए। मैं इसी प्रथाके अनुमार कहने लगा- "देखो पिलाय, तुम्हारी ये बातें बिल्कुल नीतिविरुद्ध हैं, इनकी चर्चा करनेमे भी पाप है। तुम इन सर ससारको चिन्ताओको छोड कर धर्म-कर्ममें मन लगाओ। तुम अगर चाहो तो मैं तुमको 'न्यूमेन' और 'पार्फर' के अन्य दे सकता हू । और चिदानन्द चतुर्वेदीका चिट्ठा पढनेसे भी तुम्हारा बहुत कुछ उपकार हो सकता है । और कुछ हो या न हो, भग-भवानीकी असीम महिमा अच्छी तरह तुम्हारी समझमें आजायगी। अब तुम अपने भवनको सिधारो । श्यामा ग्वालिनने कल कुछ खोया ' देनेके लिए कहा है । सबेरे जलपानके समय आना । हम तुम दोनोका साझा रहा। आज किसीकी हॉडी न चाटना । अगर बहुत भूख लगे तो फिर आजाना, थोडीसी भगकी गोली , " दे दूगा। " पिलावने कहा-"भगकी मुझे जरूरत नहीं । रही होडी पर हाथ सफा करनेकी बात, मो इसका विचार भूख लगने पर उसीके अनुसार किया जायगा। बिलाव बिदा हो गया। उस समय यह सोचकर मुझे बडा ही मानन्द हुआ कि आज मैं एक पतित आत्माको अन्धकारसे प्रकाशम ले आया। १४ ढेकी। में क्या सोचता हूँ? यही सोचता हूं कि अगर पृथ्वी पर देंकी न होती, तो मैं पाता क्या ? चिडियोंकी तरह खलिहानमें बैठकर धान खाता। या, कान और पूछ हिलाकर गजेन्द्रगामिनी गऊकी तरह मडाईमें मुंह डालता? निश्चय, यह तो मैं न कर सकता, नौजवान काला काला नगा धडगा किसान आकर मेरी पसलियोंमें डडा मारता और मैं दुम दबाकर सींग हिलाकर जान वचाकर चट पट वहॉसे भागता | किन्तु आर्य-सभ्यताकी अनन्त महिमाके कारण यह भय नहीं है। ढकी है, धान फुटकर चावल होते हैं। मैं इस परो- पकारनियत देंकीको आयमभ्यताका एक विशेष फल समझता है । इसके आगे - - - ८३ ढकी। . . आर्योक साहित्य और दर्शनको मै कुछ नहीं समझता । रामायण, कुमारस- । भव, पाणिनिका व्याकरण और पतञ्जलिका भाष्य, इनमेसे कोई भी धानको चारर नहीं कर सकता। ढकी ही आर्य-सभ्यताका मुख उज्ज्वल करनेवाला पुत्र, श्राद्धका अधिकारी हे, नित्य पिण्डदान करता है। क्या जहाँ धान कूटे जाते है, केवल वहीं ? समाजमें, साहित्यमें, धर्मसंस्कारमें, राजसभामें-कहाँ नहीं की आर्यसभ्यताका मुप उज्ज्वल करनेवाला पुन-श्राद्धका अधिकारी है ? कहाँ नहीं वह नित्य पिण्डदान करता ? दु स केवल इतना ही है कि इतनेपर भी आर्यसभ्यताकी मुक्ति नहीं हुई, आज भी वह 'भूत' रूपसे बनी हुई है । आशा है कोई देकी शीघ्र ही उसकी 'गया' करेगी। कीके इस अपरिमित माहात्स्यका कारण सोजने के लिए मुझे बडी उत्सु- कता हुई । यह वीसवीं शताब्दी है, वैज्ञानिक समय है, कारणका अनुसन्धान करना ही पड़ता है। ढेकीमे कहाँसे यह कार्यदक्षता आई ? उसमें यह परोप- कारबुद्धि कैसे आई ? इम Public Spirit ( सर्वसाधारणके लिए जोश) का कारण क्या है ? हमारे शास्त्र कहते है कि ' नावस्तुना वस्तुसिद्धि । अ वस्तुसे वस्तुकी सिद्धि नहीं होती। यह कार्यदक्षता-पहिरक स्पिरिट---- बिना कारणके नहीं है। कारणका पता लगानेके लिए मै वहाँ गया, जही ढकीमें धान कुटते थे। देवा, ढंकी गढे में गिरती है। बूटभर भी मदिरा नहीं पी, तथापि धारवार गढे में गिरती है, उटती है, फिर गिरती है, दम भरका विश्राम नहीं है। मैंने सोचा कि चार यार गढेमे गिरना ही क्या इसके इतने माहात्म्यका कारण है ? ढेकीके यह परोपकारसुद्धि क्या गढे में गिरनेहीसे है ? इसमें इतनी Public Spirit क्या चार बार गिरने-पडनेहीने पेदा हुई है। नहीं, यह कभी हो नहीं सस्ता। क्यो कि हमारे अमुक रईस भी तो दोबस्ता करवरियाकी नाली में पड़े रहते है, किन्तु कहाँ, उनमें तो कुछ Public Spirst नहीं है । कलवरियाके बाहर तो उनके हाथो कुछ भी परोपकार होता नहीं देख पढता। और भी-छिपानेशीषया जरूरत है ?-मै श्रीचिदा- नन्द शर्मा युद एक दिन गढेमें गिर पडा या । रेकिन अगूरी रसके मेवनमे मुझे उस लोककी प्राप्ति नहीं हुई, उसका कारण कुछ और ही था। गोपांग- लाउरकलंकिनी श्यामा ग्वालिनने एक दिन अपनी गड मगलाको चोल - - चौवेका चिट्ठा- । . जगह गया। दिया। खोलते ही वह पूछ उठाकर सींग झुकाकर दौडी। कह नहीं सकता, क्या सोचकर मगला दौडी, खोजाति और गोजातिके दिलका हाल कौन बता सकता है। किन्तु मुझको देख पडा कि मैं ही उसके दोनो सींगोका निशाना हूँ। तब मै कमरमे फेंट कस कर दर्पके साथ सिर पर पैर रखकर सरपट भागा, पीछे पीछे वह घडे घड़े भरके थनवाली भयानक राक्षसी थी। मैं भी जितना दौडता था, वह भी उतनी दौडती थी। फल यह हुआ कि एक औचट चपेट खाकर, लुढकते लुढ़कते एकदम विवर-लोकमे दाखिल हो " बिसरे केशकलाप सास हू कढै न मुखसौं । हाय । उस समय मेरे हृदयाकाशमें Public Spirit रूपी पूर्णचन्द्रका उदय क्यो नही हुआ? हुआ तो जरूर था। उस समय मैंने सिद्धान्त किया कि अगर पृथ्वी पर एक भी गऊ न रहे, और नारियल, ताड, खजूर आदि पेडोसे दूध निकला करे तो इस दुग्धपोप्य हिन्दजातिका विशेष उपकार हो। ये लोग सींगकी चपे- टसे बे-सटके होकर दूध पिया करें । उस दिन उस गढ़ेमे गिरनेके कारण मेरी परहितकामना इतनी प्रबल हो उठी कि मैने दूसरे समय श्यामा ग्वालिनसे कहा-"अयि दधिदुग्धक्षीरनवनीतपरिवेष्टिते गोपकन्ये । तुम अपनी गऊ भैंसोको बेच डालो, और खुद भूसी सली खाया करो । तुम खुद बहुतसे दुधमुहोको पाल सकोगी। मगर किसीको लतियाना नहीं।" इसके जवाबमें श्यामाने झाडू उठाई और लाचार मुझे भी उस दिन परहितव्रत त्याग करना । पड़ा। . . अब आप ही बताइए परहितकामना, देशभक्ति, ' साधारण आत्मा अर्थात् Public Spirit और ग्वासकर कार्यदक्षता, ये सब बात गढे में गिर- नेसे होती हैं या नहीं? अगर नहीं होती, तो देकीके यह कार्यनिपुणता, यह महायल कहासे आया ? मैं इसी कूटतर्ककी मीमासाके लिए मन्देहके साथ सोच विचार कर रहा था, इसी समय मधुर कठसे किसीने कहा-"क्यों जी । मुह पाये क्या सोच रहे हो? तुमने क्या कभी डेकी नहीं देगी?" आंख उठाकर देसा, कामिनी और दामिनी दो बहने देंकी पर धमाधम उचक रही है। अब तक उधर देसनेकी फुर्सत ही नहीं मिली थी। एक अधा आदमी हाथी देखने गया और वहां उसने केरर हाथीकी सूड ही देस पाई। में भी ढंकी देखने गया, मगर अब तक केवर देकीकी संढ देस रहा था।

ढंकी। -- । 'पीछेकी तरफ दो श्रीमतियोके श्रीचरण ढंकीकी पीठ पर धमाधम पड रहे थे- यह देखकर भी नहीं देगा था। देखते ही जैसे किसीने मेरी आँखोपरका टोप उतार लिया। मुझमे दिव्य ज्ञानका उदय हो आया, कार्य-कारण सम्बन्धकी परम्परा मेरी आखोके आगे दुपहरियाके प्रपर प्रकाशमे प्रकट हो आई। यही तो ठेकीका वल है। यही तो ढेकीके माहात्म्यका मूल कारण है। यही रमणीपादपन धमाधम पीठ पर पड़ रहा है, और ढंकी धान कूट कर चावल निकाल रही है। उठती है, पडती है, ढक ढक कच-कच करती है, मगर चरणकी चोटसे काम करना ही पड़ता है। न जाने कितना परोपकार कर डालती है। हाय डेकी। उन पैरों में क्या ऐसा गुण है कि उनको अपनी 'पीठ पर पाकर तू करोडो मनुप्योको अन्न देती है ? और देवताओको भोग अलगसे। आओ सुन्दरियोंके श्रीचरणो, तुम अच्छी तरह ढंकीकी पीठ पर ताण्डव नृत्य करो, मै कृतज्ञता-पाशमं बंधकर तुमको-हाय । क्या करू?- 'डायमण्ड कट'की झाझे पहना। और भाई कीन्ट । मै तुम्हारी विद्या बुद्धि सब समझ गया। जर पीठ पर रमणीपादपन उर्फ औरतोंकी लातें पडती है, तभी तुम धान कूटते हो, नहीं तो केवल काठ हो, जड हो, गढेमें सिर डालकर पूंछ उठा कर पढे रहते हो। तुम्हारी विद्या है केवल गढेम पढा रहना, तुमको आनन्द है केवल मुँहभर चावर पानेमें, और तुम्हारा पुरस्कार है केवल वे ही रंगीन और कोमल श्रीचरण । मोर सुन पडता है, तुम लोगोंमें एक विशेष गुण है। घरमें रह कर क्या तुम वीच बीचमें 'मगर' हो जाते हो? और भाई ठेकी, और एक बात पूछता हूँ। सुना है, बीच बीचमें तुम्हें म्वर्गमें भी जाना होता है, सचमुच क्या यहा जाकर भी धान यूटने पड़ते हैं ? देवता रोग अमृत पीते है, कल्पवृक्ष पर चढते है, अप्सराओके साय ग्रीडा करते हैं, मेघकी सवारी पर हवा याने निकलते है, रति और कामदेवके साय लुकी-लुकइया' खेरते हैं तुम क्या तय तक केरल घिचिर विचिर' करके धान ही यूटती रहती हो? धन्य है भाई तुम्हारा माहस । . * वगालियोंम की नारदका याहन प्रसिद्ध है।

चौबेका चिट्ठा- A marwawur Crime । . ढंकीने कुछ उत्तर न दिया, केवल धान कूटती रही। मैं सफा होकर वहाँसे चला गया। कहाँ ? अपने · आनन्द कुटीर' में। आप जानते हैं, आनन्द-कुटीर क्या है ? स्वर्गीय रसिक बार इस समय धान कूटने चले गये हैं। नन्दो नाइन एक सैंडहर हाता छोड कर स्वर्गको सिधार गई है। उसका कोई उत्तराधिकारी उसके वियोगकी व्यथा सहनेके लिए पृथ्वी पर मौजूद नहीं है । उस हातेकी ऐसी हालत है कि और किसीने उस पर नेक- नियतीकी नजर नहीं डाली, लाचार मैने ही उसमें अपना आनन्द-कुटीर बना डाला ! वह केवल श्रीचिदानन्दका कुटीर नहीं है, साक्षात् सच्चिदानन्दका मन्दिर है। मैं वहीं चारपाई पर लेट कर भगका गोला गलेके नीचे उतार गया-एकदम सटसे पेटके भीतर । तबियत तर हुई ।, थोडी देरके बाद समाधि लगने लगी-आसे बद होते ही ज्ञाननेत्र खुल गये । मैंने देखा, यह सारा संसार कीशाला है। बडी वडी इमारतें, बैटक्साने, राजमहल, सब देंकीशाला हैं-उनमे बडी बडी कियाँ गढेमे मुह डारे खढी या पली हुई हैं । कही जमीदाररूपी की मजाके हृदयपिण्डको गढेमे- कूटकर उससे नये निर्स-रूपी चावल निकाल सुखसे पका कर अन्नभोजन कर रहे हैं। कहीं आईन बनानेवाले ढंकीरूपसे मिनिट रिपोर्टकी रागिको गढेमें कूटकर उससे निकालते है नये नये आईन कानून । विचारकरूप ढेको उन्ही आईनोको गढेमें पीस कर निकालते है मोहताजी, जेलसाना, धनीके धनका अन्त और भले मानसका प्राणान्त । बाबूरूप की बोतलके गढेम पिताके धनको कूटकर निकारते है पिलही और तिल्ली । बाबुओकी देकियाँ एकादशी आदि बतोके गढेमें सारी आमदनी कूटकर निकारती है अनाहार । सबसे अधिक भयानक यह देखा कि लेसकरूपी ढकी साक्षात् माता सरस्वतीके सिरको छापेके गढ़ेमें कूटकर निकारते हैं स्कूल उक, उपन्यास और सडी बोरीकी हिन्दी कविताय । देखते देखते देसा कि मैं भी एक भारी की हूँ। आनन्द-युटीरमें लया लवा रेटा हुआ नशेके गढेमें मनोवेदनारूप धान कूट कर चिहाल्पी चावल निकार रहा हूं। मन ही-मन मुझे अहकार हुआ, ऐसे चावल तो और पिसीके नहीं निकलते । तर इच्छा हुई कि ये चावल तो मनुष्यरोकके लायक नहीं हैं, मैं स्वर्गमे जाकर धान कुटुंगा । उसी समय मनोरथके रथ पर चढ़ कर स्वर्ग पहुंचा । मैंने स्वर्गमें जाकर देवराज पुरन्दरको कहा-हे देवेन्द्र । हे पुरन्दर । मैं श्रीचिदानन्द देकी हूँ-स्वर्गमें धान कहँगा।। णाम करके ढकी। AnAmr मैंने कहा- इन्दने कहा-हर्ज क्या है ? क्या कुछ पुरस्कार भी चाहिए? -उर्वशी मेनका रभा। इन्द्र ने कहा-उर्वशी या मेनका नहीं मिलेगी। भौर तीसरा नाम जो शुमने लिया (रभा) वह तो मनुष्यलोकमें-कर कत्तेमे ही पैसेकी आठ आठके हिसारसे मिल सकती है। मैं बडा मुंहफट ह,-मैंने कहा-क्या देवताजी केला ? वह तो आजकला मनुप्योको मिरता ही नहीं-देवोके ही काम आता है। सन्तुष्ट होकर इन्द्रने मुझे एक सेर अमृत ओर एक घटेके लिए उवंशीका गाना बखशिस किया। इतनेमें सचेत होकर मैंने देसा, पास ही एक मट- कीमें सेर भर दृध रक्सा हुआ है, ओर श्यामा सडी हुई चिल्ला रही है- नशाखोर, बेहया, पेटू इत्यादि इत्यादि ।' मैंने उर्वशीसे कहा-वाईजी, एक घंटा हो गया, अब बन्द करो। - १५ चिदानन्दकी चिट्टियाँ। (१) क्या लिखू ? पूज्यपाद श्रीयुक्त वगदर्शन-सम्पादक महोदयके श्रीचरणकमलोंमें। मेग नाम है श्रीचिदानन्द चौधे, मैं पहले श्री-श्री-आनन्दकुटीरमें रहता था । मैं आपको प्रणाम करता हूँ। मुझसे और आपसे कभी साक्षात्, मेंट-मुलाकात नहीं हुई, तो भी देखता हूँ कि आपने अपने गुणसे मेरा विशेप परिचय प्राप्त कर लिया है। मैं पहले ही समझता था कि लाला मदारीलाल खुशनबीस एक बेईमान आदमी है। मैं अपना चिट्ठा उसके पास अमानत रखकर तीर्थयात्रा करने चला गया। उसने यह सुअवसर पाकर वह चिट्ठा आपके हाथ वेच डाला। बेचनेकी वात आपने नहीं स्वीकार की, किन्तु मैं जानता हूं कि लाला मदारीलाल बिना दामके शालिग्रामको तुलसी या महादेवको लोटा भर जल भी अर्पण नहीं करता, तब सभव नहीं कि श्री- चिदानन्दका चिहा उसने आपको मूल्य लिये गिना अर्पण कर दिया हो। इस जारसाजीका हाल पहले मुझे नहीं मालूम था। अकस्मात् एक दिन एक जोडा जूता खरीदनेसे संब हाल मालूम हुआ। जूतेका जोडा एक अखबारके टुकडे में बंधा था । देखकर मैंने सोचा, फिसका ऐसा सौभाग्य उदय हुआ कि उसकी रचना श्रीमान् चिदानन्द चौवेके चरणों के जूतोंको चूम कर धन्य हुई! मैंने कहा-उसका रेसनी धारण करना सार्थक है। उसका रातोका तेर जलाना भी सार्थक हुआ । किसी मूर्यके द्वारा पढी न जाकर साधुओंके घर- गोंके साथ सम्बन्धयुक्त हुई-यह उस रचनाके लिए, विशेषत लेखकके लिए, गौरवकी यात है। यों सोचकर कौतूहल्के साथ मैने पढकर देखा कि मखयार कौन है । उपर लिखा था-' वगदर्शन,' और भीतर लिखा था-' चौवेका चिट्ठा' तर समझा कि यह मेरे ही पूर्वजन्मके सचित पुण्यका फल है। ग - चिदानन्दकी चिट्ठियाँ। . और भी एक बात जाननेके लिए कौतूहल हुआ। मैंने सोचा बंगदशी क्या चीज है ? अपने एक दोस्तसे पूछा-" भाईसाहब, भाप बतला सकते है, वगदर्शन क्या चीज हे ?" उन्होंने बहुत देर सोचा । फिर सिर उठाकर बोले-" जान पडता है, बगालको देखना ही वगदर्शन है।" मैंने उनके पाण्डित्यकी बडी बडाई की, मगर लाचार एक ओर दोस्तसे भी पूछना पड़ा। उन्होंने कहा-"शकारके उपर जो रेफ है, वह छापेवारेकी गल्तीसे रह गई है। ठीक शब्द है वगदशन अर्थात् 'यगालके दाँत'।" उन्हें एक पाठशाला सोलनेकी सलाह देकर मैने और एक सुशिक्षित सजनसे पूछा, उन्होने कहा- इस शब्दका अर्थ है, 'पूर्व वगाल देग्वनेकी विधि ' जिसका अगरेजीम तर्जुमा होगा--A Guide to Eastern Bengal." इस तरह अनेक प्रकार अनुसन्धान करने पर अन्तको मालूम हुआ कि वगदर्शन एक मासिक- पत्र है, और उसमे चिदानन्द चौरका मासिक श्राद्ध हुआ करता है । अय सुन पढता है कि किसी धनुर्धरने मेरे चिढेको अपनी रचना कहकर प्रसिद्ध करना आरम्भ किया है। और भी न जाने क्या क्या होगा। अतण्व हे बगदशनसम्पादक महोदय । आपको मालूम होना चाहिए कि मैं श्रीचिदानन्द शर्मा इस जगत्में अभीतक स शरीर मौजूद हु और आप लोगोंको विशेष आपत्ति होने पर भी अभी और कुछ दिन रहनेकी इच्छा रखता हू। अब यह भी जान लीजिए कि इस समय में आपको क्यो पन लिसन बैठा हूँ। मेरे रसिक बापू तो ससारमे फूच कर गये। मुझे भरोसा है कि ये सबके आश्रय-स्वरूप श्रीपादपद्ममें पहुँचे होंगे। किन्तु असलमें उनकी कौन गति हुई, इसकी मुझे रत्तीभर भी सयर नहीं है। केयर इतना ही जानता हु कि वे इस लोकमे नहीं है । जब कारण नहीं तो कार्य भी नहीं, इसी सरल सिद्धा. न्तके अनुसार जय रसिक या नहीं तो मेरा भी आश्रय नहीं। आनरल भगके रगमें भी गडबड मची हुई है। क्या आप भगके लिए कुछ बन्दोबस्त कर दे सकते हैं ? मालूम नहीं, मापने मेरे चिठेके लिए खुशनयीम महाश. यको क्या दिया दिखाया-किन्तु मुझे एक मन भग हर महीने भेज दिया फीजिए ( मैं कुछ अधिक भग पीता), मैं एक ऐप हर महीने आपको दिया करूंगा। आपका कल्याण हो, अब इसमें कुछ नाहीं-नहीं न कीजिएगा।

चौबेका चिट्ठा- पूछ लेना किन्तु आपके साथ इस तरह पक्का प्रबन्ध करनेके पहले मैं वात चाहता है । इस चिदानन्दी कलमसे फर्माइशके माफिक सब तरहके लेख लिखे जाते हैं. आपको क्या चाहिए ? नाटक-नाविल चाहिए, या पालिटि- क्सकी जरूरत है ? कुछ ऐतिहासिक मोज-परतालका हाल भेजू, या सक्षिप्त समालोचना लिस? विज्ञानशास्त्रमे आपकी रचि है, या भूगोरतत्व आपको पसद है? तात्पर्य यह कि गुरु विपय भेजूं, या लघु? मेरी रचनाका पुरस्कार आप गजमे नाप कर देंगे या मनसे तौलकर देगे ? अगर आपको गुर विषय ही पसद हो तो बतलाइएगा, उसमे कैसा अलहार या चमत्कार रहे ? आप कोटेशनको अधिक पसट करते हैं या फुटनोटको ? अगर कोटेशनच्या फुट- नोटकी जरूरत हो तो उन्हें किस भापासे उद्धत करूगा ?-~-यह भी लिम्ब दीजिएगा । यूरोप ओर एशियाकी सब भाषाओसे मैने कोटेशनोका संग्रह कर रक्सा है । केवर आफ्रिका और अमेरिकाकी कुछ भाषाओका पता मैंने अभी- तक नहीं पाया। लेकिन आप चिन्ता न कर, मैं बहुत शीघ्र उन भापाओसे कोटेशन लेनेकी चेष्टा करना। अगर गुरविषयकी रचना आपको बहुत ही पसद हो तो यह भी बताइ- "गा कि किस किस तरहके गुर विपयको आप चाहते हैं ? इस बारेमे मैं खुद चाहे कुछ कर सकें या न कर सकू, मुझे एक सहायक बड़ा भारी मिर गया है। लाला मदारीरार सुशनबीम महाशयका लड़का, जिसने यूटिलिटी शब्दकी विचित्र व्यारया की थी, उसे शायद अभी आप भूले न होगे। वह इस समय पढ़ रिसकर लायक हुआ है। उसने एम० ए. पास करके विद्यासी फॉमी गले में डाल ली है। वह गुरु विषयमे पारदर्शी है। क्या स्कूली किता चाहिए। वह 'वर्णप्रकाशिका' से लेकर ' रोमदेशके इतिहास' तक सर लिस सक्ता है। नेचरल हिस्ट्रीका तो उसने अन्त ही कर डाला है, उसने 'पेनी मेगजीनसे' अनेक लेसोंका अनुवाद कर रक्सा है। और, गोल्डस्मिथके लिसे हुए 'एनी- मिटेड नेचर' का साराश सग्रह कर रस्सा है। ये चीजें चाहिए क्या ? सरसे घडकर गुरविषय जो पाटीगणित और ज्यामिति है, उसमें भी उसका कम साहस नहीं है । ज्यामिति और त्रिकोणमिति चूल्हेमे जाय, चतुष्कोणमितिमें भी उसका पूरा दरसल है। दैवविद्याके बरसे उसने अपने बापके बनवाये हुए * उद्धरण 1 x नीचेके स्फुट,नोट । । - । - चिदानन्दकी चिट्ठियों। । चतुष्कोण तलाबको भी माप दारा है। इस कार्यके लिए लोगोने उसकी प्रशसाके पुल बांध दिये, धन्य धन्य कहने लगे। उसकी ऐतिहासिक कीति कहा तक कहू ? उसने चित्तौरके राजा ' अरफ्रेड दि ग्रेट ' का एक जीवनच- रित १०-१५ सफेका लिस रक्सा है, और हिन्दीसाहित्यसमालोचनाका एक अनूठा ग्रन्थ महाभारतके आधार पर लिख डाला है। उसमे 'कोस्ट' और 'हर्बर्ट स्पेन्सर' के मतका खण्डन किया गया है और 'डारिन' साहयकी जो थ्योरी है कि पृथ्वी 'माध्याकर्पण' के बल पर ठहरी हुई है, इसका भी प्रतिवाद है। इस ग्रन्थमे मारतीमाधव नाटकसे भी ४-५ श्लोक उद्धृत क्येि गये हैं। इन्हीं कारणोसे यह एक बडे भारी गुरुविषयका ग्रन्थ हो गया है। कई हजार वर्षांसे ऐसा ग्रन्थ ससारकी किसी भी भाषाम नहीं रिसा गया, और न लिखे जानेकी भव आशा है। मुझको निश्चय है कि समालोचनाके समय आप अवश्य इस प्रथको हिन्दीमाताके मस्तक्का महोज्ज्वर' मणि कह- नेमें जरा भी न हिचकेंगे। मैं आशा करता हूँ कि गुरु विषय छोडकर रघु विषयकी ओर आपकी प्रवृत्ति न होगी। क्योकि लघु विषय तैयार करनेमें जरा कटिनाइ है । सुश. नवीस-नन्दनने एक नाटकका सामान तो जरूर तैयार कर रक्सा है। उसने नायिकाका नाम चन्द्रकला या शशिरभा ऐसा ही कुछ रसना निश्चय किया है। घाट इतना बना है कि नायिकाके पिता विजयपुरके राजा भीमसिंह ह और नायक और कोई एक 'सिंह' है । अन्तिम सीनमें शशिरभा नायककी छातीमें छुरी मार कर आप ' हाय मैं मरी' करके जल मरंगी । विन्तु नाट- कको आदि या मध्य कसा होगा, ओर नाटकोल्लिसित व्यक्तिगण' क्या क्या करेंगे, इसका कुछ अभी ठीक नहीं हुआ। शेपाक्के चक्कूमार मीनका कुछ अश लिखा जा चुका है । में कसम साकर कह सकता हूँ कि जो २० लाइनें लिखी गई है, उनमें आठ' हाय सपी।' ओर तेरह ' क्या हुआ?' चमचमा रहे है । अन्तमें एक गीत भी है-नायिका छुरी हायमे लिये गाती है। किन्तु दु सकी यात इतनी ही है कि नाटकके अन्यान्य अश बिल्कुल कोरे पढे है। अगर नाविल आप चाहते हो तो भी हम अर्थात युशनीसम्मतीके लोग मुह न मोडेंगे । हम लोग उत्तम उपन्यास लिस मकने हैं। मगर हमारी चौका चिट्ठा- ९२ यह इच्छा थी कि वाहियात नाविला न लिखकर 'डानविकसोट' या जिलना' का परिशिष्ट लिख डालते । दुर्भाग्यवश दोनोमेसे एक पुस्तक मी अबतक हम लोगोंने नहीं पढी। फिलहाल मेकाले साहबके 'ऐसे' का परिशिष्ट लिख टेनेसे क्या आपका काम चल सकता है ? वह भी नाविल है। अगर कविता चाहिए तो बजभापामें या पडी बोलीम ? और तुकदार या बेतुकी ? स्पष्ट करके लिखिएगा । ब्रजभापामें चाहे बेतुकी कविता ही करा लीजिए, मगर खडी बोलीमें, उहू । ही बेतुकी कविता मैं खूब कर सकता हूँ। इस समय खुशनबीस-नन्दनने ' रामसीतायण' नामके महाकाव्यका एक खण्ड बडे परिश्रमसे लिखा है । यह प्राय रामायणके ढंगका है, केवल चार नाम बदले हैं। चाहिए। और अगर लघु गुरु सब छोडकर, खुशनचीसी रचना छोड कर, साफ चिदानन्दी ढंग आपको पसद हो तो वह भी लिखिएगा । मेरा लिखा जो कुछ साक-पत्थर है, उसे भेज दूगा । मगर उसके बदलेमें मन भर भग जरूर लूंगा। रत्ती रत्ती तोलकर जांच लूगा :-तिल भर नहीं छोडूगा । क्या आप राजी हैं ? आप राजी हो या न हों, मगर मैं राजी है। (२)-पालिटिक्स ( राजनीति)। श्रीचरणोमें,-भग मिली। बहुतसी भग आपने भेज दी-श्रीचरण- कमलोंमें । आपके श्रीचरणकमलयुगलमें-और भी थोडीसी भग भेजिएगा। मगर मालूम नहीं कि श्रीचरणकमलयुगलसे मेरे लिए ऐसी कठिन आना धयो निकली ? मापने लिखा है कि इस समय लोग आईनके सौफसे पालि- टिक्स बहुत कम लिप्यते हैं, अगर तुम कुछ पारिटिक्स लिखो तो अच्छा होगा-परके ग्राहक बढ जायेंगे । क्यो महाशय ? मैंने ऐसा कौन अपराध किया है जो पालिटिक्सरूपी पत्थर मारकर अपना सिर फोड लू? चिदानन्द एक छोटासा ब्राह्मण है, उसके उपर पालिटिक्स लिखनेकी आज्ञा क्यों जारी की गई ? चिदानन्द स्वार्थपर आदमी नहीं है। भगके सिवा जगत्में मेरा और कोई स्वार्थ नहीं है, मेरे ऊपर पालिटिक्सका बोझा आप क्यों लादते है।

९३ चिदानन्दकी चिट्ठियाँ। मै राजा हूं, या खुशामदी मुसाहब हूँ, या जुआचोर हू, या फकीर हूं, या सम्पादक है, जो मुझसे आप पालिटिक्स लिखनेको कहते हैं । आपने मेरा चिहा पढा है । उसमें आपने कहीं मेरी स्थूल बुद्धिका ऐसा चिह्न पाया है, जो मुझसे पालिटिक्स लिसनेको कहते है ? भगके लिए मैंने जरूर आपकी खुशामद की है लेकिन इससे यह न समझ लीजिएगा कि मैं ऐसा खुशामदी या खुदगर्ज हो गया हूँ कि पालिटिक्स रिखू । धिक्कार है आपके सम्पादक- पदको। और धिक्कार है आपके भग देनेको। आप अभीतक नहीं समझ सके कि श्रीचिदानन्द शर्मा ऊंचे दर्जेके कवि है, चिदानन्द छोटी समझके पारिटिशियन (राजनीतिज्ञ) नहीं है। आपकी यह आज्ञा पाकर बहुत ही उदास मनसे, एक गिरे वृक्षके उपर बैठकर, मैं वगदर्शनसम्पादककी बुद्धि इसतरह विपरीत क्यो हो गई, यही सोच रहा था। क्या करूँ, किसीत किसी तरह पावभर भगका गोला गलेके नीचे उतार गया। सामने कल्लू तेलीका घर है, घरके आगनमें दो तीन वैर बंधे हुए है, मिट्टीमें गडी हुई नोदमें तेलिनके हाथकी मिलाई हुई ग्वली -चोकरकी सानीको गऊ बैर आंखें मूंदे सुग्नके साथ खाकर मजेमें पागुर (रोथ ) कर रहे हैं। मेरा चित्त कुछ ठिकाने हुआ, यहाँ तो पालिटिक्स नहीं है। इस नॉदके भीतर सय गउ-बैल पालिटिक्सविकार शून्य सचा सुरस पा रहे है, यह देखकर कुछ सन्तुष्ट हुआ। तर मै भगके प्रसादसे प्रसन्नचित्त होकर लोगोकी इस पालिटिक्सप्रियताके बारेमें विचारने लगा। मुझे किसी कविका एक छन्द याद पढा- "गूंगा चाहे चले जवान, लैंगढा चाहे चलना खून । तुम चाहो होउँ विद्वान, इच्छा तो है, क्या खूब ।" हम रोगोकी इच्छा है पारिटिक्स, हम हर हफ्तै हर रोज पालिटिकम चाहते हैं, लेकिन गूगकी बोल्नेकी कामना, रंगडेकी दोढनकी अभिलाशा, अन्धेकी चित्रदर्शनलालसा, हिन्दू विधवाकी स्वामिस्नेहकी आकाक्षा, अथरा मेरे मनमे दुरारी दुरहिनके आदरकी रातमाकी तरह वह पेपर हेमी करानेवाली है, सफल होनेरी नहीं। भाई पालिटिक्सपायरो। मैं चिदानन्द चौये तुम्हारे हितकी बात कहता हूं। सिपाहीके मुसरार सम्भव है, लेकिन जिम जातिने आपसकी करहम भूलकर गैरोको अपने देशमै युटाया और चौवेका चिट्ठा- ~- " सभव नहीं। . अपने हाथो देशका सत्यानाश किया, उसके पालिटिक्सका होना निकालमें भगवान् भला करें, भूखे हैं, भीन दो। बस यही उन लोगोका पालिटिक्स है। इसके सिवा और पालिटिक्स जिस पेटमें फलता है, उसका जीज इस देशकी मिट्टीमें अकुरित नहीं हो सकता। इसी तरह सोच रहा था, इतनेमे देसा, कल्लू तेलीका दस बरसका पोता एक थालीम भात लाकर बाहर छप्परके नीचे बैठकर खाने लगा। दरसे एक चितकबरे कुत्तेने यह देखा । देसकर, एक बार सडे होकर, फिर स्थिर दृष्टिसे ताककर, जीभ निकाल कर वह हॉफने लगा। उज्चल अन्नका ढेर कॉसकी चमचमाती हुई थालीमें फलकी मालाके समान शोभा पा रहा था । मैंने देसा, कुत्तेका पेट बिल्कुल पीठमें लगा हुआ है । कुत्तेने सडे-खडे देसभालकर एक बार देह तोडकर जम्हाई ली। इसके बाद कुछ सोच समझ कर धीरे धीरे उसने एक एक डग आगे रखना शुरू किया । वह तेलीतनयके भात भरे मुसकी तरफ तिरछी दृष्टिले देखता है और एक पैर फिर आगे बढाता है। एकाएक भगभवानीके अनुग्र- हसे मुझे दिव्य दृष्टि मिल गई। देसा, यही तो पारिटिक्स है-यही कुत्ता तो पालिटिशियन है । तब मन लगाकर देखने रगा। कुत्तेने पकी पोलिटिकल (राजनैतिक) चाल चलना शुरू किया। कुत्तेने देखा तेलीका बालक बडा भला आदमी है, कुछ नहीं कहता। यस क्या था, कुत्ता उसके पास जाकर पाल्यी मार कर बैठ गया। धीरे धीरे पुंछ हिलाता है और तेलीके बालककी ओर दीन दृष्टिसे देखता हुआ ह -ह ' करके हाफता है। उसकी दुबली देह, पतला पेट, कातर दृष्टि और हॉफना देसर लडकको दया आ गई। कुत्तेका पोलिटिकल एजिटेशन (राजनैतिक आन्दोलन) सफल हुआ। तेलीके ल्डकेने मसाला मिले मासमेसे एक हड्डी अच्छी तरह चिचोरकर कुत्ते के आगे फेंक दी। कुत्तेने आग्रहके साथ आनन्दपूर्वक उसे चारना चाटना रीलना और हजम करना शुरू किया । आनन्दसे उसकी आँखें बद हो आई। जन कुत्ता उस हड्डीका रस अच्छी तरह ले चुका, तर उस सुचतुर पालिटिनियनने सोचा-और एक हड्डी लेनी चाहिए। यों सोचकर वह पालिटिशियन फिर उस लडकेके मुंहकी तरफ उसी दीन भावसे देखने लगा। उसने देसा, वह बालक मनमाना भात इमली-गुडकी चटनीके चिदानन्दकी चिट्ठियाँ। " साथ मिराकर सपाटेके साथ पा रहा है, कुत्तेकी तरफ देसता ही नहीं। तब कुत्तेने एक Bold move (वीरताका गाना) ग्रहण किया। जाति ही पालिटिशियन टहरी, फिर ऐसा क्यो न होता? वह राजनीतिज्ञ साहस पर भरोसा करके और थोडा आगे बढ बैठा, और एक बार जम्हाई ली। इस पर भी तेलीके लडकेने आप उठाकर नहीं देखा । तर कुत्ता धीरे धीरे गुर्राने लगा। शायद वह कहता था कि हे राजाधिराज तेलीतनय, इस कगारका पेट अभी नहीं भरा । " गुर्राने पर तेलीके लडकेने आँख उठा- कर उसकी तरफ देखा । थालीम अब कोई हड्डी नहीं थी, उसने एक मुट्ठी भात कुत्तेके आगे फेंक दिया। देवराज पुरन्दर जिस सुससे नन्दनवनमे बैठकर अमृतपान करते हैं, कार्डिनेर ओल्जी या काडिनल जेरेजने जिस सुखसे कार्डि नेलझी टोपी पहनी थी, वह कुत्ता उतने ही सुससे वह मुट्ठीभर भात खाने . 'एगा। । भसर भसर इसी समय तेलीकी जोरू घरसे निकली । अपने बेटेके पास एक कुत्ता भात खा रहा है यह देखकर, तेलिनने लाल लाल ऑग्य निकालकर एक भारी इंट कुत्तेके सीच मारी । राजनीतिक कुत्ता चोट साकर दुम दनाकर तरह तरहकी राग-रागिनियों भलापता हुआ फुर्तीके साथ भागा। इसी बीचमे एक और घटना देसी । जब तक कगार कुत्ता इधर अपना पेट भरनेके लिए तरह तरहके कौशर कर रहा था, तर तक उधर बडाभारी साँड आकर तेलीके चलकी नॉदमें मुंह डालकर सली-मिली सानी स्वाट ले लेकर साने रगा। तेलीका बैल बेचारा कमजोर था, वह उसके भयानक पैने सींग और भारी शरीरको देसकर नॉटसे मुँह हटाकर चुपचाप सडे होकर कातरदृष्टि से उसके मानेकी चातुरी देखने लगा । कुत्तेको मारकर तेलिन रोटी। इधर यह लूट देसकर उसने एक लाठी उठाई, और वह बेलको मौत के मुंहम जानेकी सलाह देते हुए उसकी तरफ झपटी। किन्तु भौतके मुंह तक जाना तो दूर रहा-साड एक पग भी उस जगहसे नहीं हटा । तेलीकी जोरू जन पास पहुंची तन सांडने अपने बड़े बड़े सींग दिलाकर उन्हें उमके पेटमें भोकनेका इरादा जाहिर किया । तेलिन तय लडाईसे भागकर घरमें घुस गई । सोट भी नाँदको चाट-पोटकर मस्तचारसे चर दिया।

चौबेका चिट्ठा- ~~~~ सभव नहीं। " अपने हाथो देशका सत्यानाश किया, उसके पालिटिक्सका होना त्रिकालमे भगवान् भला करें, भूखे है, भीख दो। बस यही उन लोगोका पालिटिक्स है । इसके सिवा और पालिटिक्स जिस पेड़में फलता है, उसका बीज इस देशकी मिट्टीमें अकुरित नहीं हो सकता। इसी तरह मोच रहा था, इतनेमे देखा, कल्लू तेलीका दस बरसका पोता एक थालीम भात लाकर बाहर छप्परके नीचे बैठकर साने लगा। दूरसे एक चितकबरे कुत्तेने यह देवा । देवकर, एक बार खडे होकर, फिर स्थिर दृष्टिले ताककर, जीम निकाल कर वह हॉफने लगा। उसनल अन्नका ढेर कसिकी चमचमाती हुई थाली में फूलको मालाके समान शोभा पा रहा था । मैंने देवा, कुत्तका पेट नियुल पीठमें लगा हुआ है । कुत्तेने खटे-सडे देग्वभालकर एक बार देह तोडकर जम्हाई ली। इसके बाद कुछ सोच समझ कर धीरे धीरे उसने एक एक ढग आगे रसना शुरू किया। वह तेलीतनयके भात-भरे मुसकी तरफ तिरछी दृष्टिसे देसता है और एक पैर फिर आगे बढाता है। एकाएक भगभवानीके अनुम- हसे मुझे दिव्य दृष्टि मिल गई। देसा, यही तो पारिटिक्स है-यही कुत्ता तो पालिटिशिया है। तब मन लगाकर देखने लगा। कुत्तेने पक्की पोलिटिकला (राजनैतिक) चाल चलना शुरू किया। कुत्तेने देखा तेलीका बालक घडा भला आदमी है, कुछ नहीं कहता। बस क्या था, कुत्ता उसके पास जाकर पात्थी मार कर बैठ गया। धीरे धीरे पूछ हिलाता है और तेलीके बालककी ओर दीन दृष्टिसे देखता हुआ 'ह-ह ' करके हॉफता है। उसकी दुचली देह, पतला पेट, कातर दृष्टि और हाफना देसर लडकेको कुत्तेका पोलिटिकल एजिटेशन (राजनैतिक आन्दोलन) सफल हुआ। तेलीके ल्डकेने मसाला मिले मासममे एक हड्डी अच्छी तरह चिचोरकर कुत्तेके आगे फेंक दी। कुत्तेने आग्रहके साथ आनन्दपूर्वक उसे चारना चाटना लीलना और हजम करना शुरू किया। आनन्दसे उसकी ऑसें बढ हो आई। जर कुत्ता उस हड्डीका रस अच्छी तरह रे चुका, तब उस सुचतुर पालिटिशियनने सोचा-और एक हड्डी लेनी चाहिए। यो सोचकर वह पालिटिशियन फिर उस रडकेके मुंहकी तरफ उसी दीन भावसे देखने लगा। उसने देसा, वह बालक मनमाना भात इमली-गुडकी चटनीके - - दया आ गई - चिदानन्दकी चिट्ठियों। -~~ - असार उडकर आया, और मेरे कानोके पास भनभन करने गा । अब बतलाइए महाशय, आपको पन कैसे लिखू ? भ्रमर भैया अपनेको बहुत ही रसिक और अच्छा व्यारयानदातासमझते हैं। उन्होंने समझा कि उनकी भनभनाहटसे मुझे सुस मिलेगा, मेरा जी जुडा जायगा । मेरे ही फूलोकी पविडियो तोडकर मेरे ही कानोके पास भन भन । में क्रोधके मारे अग्निशर्मा हो गया, मेरे हाड जल उठे । मैं ताटका पखा हाथमें रे भौरेसे भिढ गया । तत्र में घूर्णन, सघूर्णन आदि विविध वक्रगति- योसे पसेका अस्त्र चलाने लगा, भौरा भी डीन, उड्डीन, प्रडीन, समाढीन आदि अनेक पैतरे बदलकर अपनी फुर्ती दिसाने लगा। मै श्रीचिदानन्द चौबे चिहारूपी मुक्तावलीका लेखक हूं, किन्तु हाय रे मनुष्यके पराक्रम तू अत्यन्त । तू सदा मनुष्यको धोखा देकर अन्तको अपनी असारता प्रमाणित कर देता है । तूने जामाकै मैदानमें हैनीतरको, पल्टोवाके मैदानमें चामको, वाटर के मैदानमें नेपोलियनको ओर आज इस भ्रमरसमरमें चिढानन्दको खून ही धोखा दिया। मैं जितना ही पसा घुमाकर, हवा पैदाकर भौंरेको उडाने रगा, उतना ही वह दुष्ट घूम फिर कर सिर पर चढकर भनभन करने लगा। वह कभी मेरे कपडोमें छिपकर, बादरकी आउसे मेघनादकी तरह, युद्ध करने लगा, और कभी कुभकर्णपे रडनेवाली रामकी सेनाकी तरह मेरी बगलसे निकल कर मुझे सिझाने रगा । वह कभी शेम्पसनकी तरह मेरे वालोमें ही मेरा सारा पराक्रम सचित समझकर मेरे शरद स्तुके बादर सरीखे घुघराले श्वेत-श्याम केशोमें घुसकर भेरी बजाने लगा । तर काटनेके डरसे घबराकर मुझे युद्ध छोट भागना पडा । उसने भी पीछा किया उसी समय चौग्वटमें ठोकर साकर चिदानन्द शर्मा " पपात धरणीतले ।।" ससारके सग्राममें महारथी चिदानन्द शर्मा, जो कभी दारिद्रय, चिरकौमार और भग आदिसे भी नहीं परास्त हुए, वे ही हाय । आज इस साधारण जीवसे हार गये। तव शरीरसे घूर झाडता हुआ मैं उठ खडा हुआ, और हाथ जोडकर भ्रमरराजसे इस प्रकार क्षमाप्रार्थना करने रगा। मैने हे द्विरेफसत्तम। इस गरीय ब्राह्मणने तुम्हारा क्या अपराध रिया है, जो तुम उसके लिसने. पढनेमें बाधा डालने आये हो । देखो, मै वगदर्शन-सम्पादकरो यह पतारिखने चौ.-७ कहा .

चौधेका चिट्ठा- मैंने सोचा कि यह भी पालिटिक्स है। दो तरहका पारिटिक्स देसा-एक कुत्तेकी जातिका और दूसरा बैलकी जातिका । 'विस्मार्क' और 'गकफ' इस बैलकी श्रेणीके पालिटिशियन थे, और 'ओल्जी' से लेकर हमारे परम- मित्र राजा ढोलकप्रसाद रायबहादुर तक सभी कुत्तेकी श्रेणीके पालिटिशि- यन है। समानक . ३) भारतवासियोंका मनुष्यत्व । म्पादक महाशय, आपको पत्र क्या लिखू-लिखने वाधा डालनेवाले अनेक इस समय जिस झोपडेमे रहता हूँ उसके पास ही दुर्भाग्यवश मैंने दो-तीन फूलोके पेड लगा दिये हैं। मैंने सोचा था, चिदा- नन्दके कोई नहीं है, ये ही फुल मेरे ससाससी होगे। इन्हे खुशामद करके प्रफुल्लित प्रसन्न करनेकी जरूरत नहीं, इनके लिए रुपया लुटानेकी आवश्य- कता नहीं, इन्हें गहने न देने पड़ेंगे। इनका मन रखनेके लिए चापलूसीकी बातें न करनी पड़ेंगी। ये अपने सुससे आप ही खिल उठेंगे । इनमें हंसी है, रोना नहीं है, प्रसन्नता है, रूठना नहीं है । मैने समझा था कि श्यामा ग्वालिनसे और मुझसे गिाड होगया है तो क्या, उसने मुझे तज दिया है तो क्या, इन फूलोसे मैं दोस्ती करूंगा। सो, फूल भी खिले-वे हेसने भी लगे। मैंने सोचा-सम्पादकजी । मैं सोचने ही कहाँ पाया, फूलोको सिलते देखकर झुंडके झुड भौरे ममाखी और भिडे इत्यादि रसकी सोज करनेवाले रसिक आकर मेरे द्वार पर डट गये और वे गुनगुन भनभन घेथें करके जी जलाने लगे । उनको बहुत कुछ समझाकर मैंने कहा-"सजनो-महाशयो । यह सभा नहीं, समाज नहीं, एसोसियेशन, लीग, सोसाइटी, क्लब आदि कुछ भी नहीं, यह चिदानन्दकी झोपड़ी है। आप लोगोको भनभन घे-में करना हो तो अन्यत्र जाइए । मैं अब और कोई रिजोल्यूशन (प्रस्ताव ) करनेके लिए तैयार नहीं हूँ-आप लोग दूसरी जगह पधारे । परन्तु गुनगुन मनमन करनेवाला दल किसी तरह नहीं माना। उलटे वे रोग फूलोके पेड छोडकर मेरी झोपडीके द्वार पर हला करने लगे। अभी मैने आपको पत्र लिखना शुरू किया था ( अब भगका नशा उतर । चला है)- इसी समय एक भौंरा, काजल सा काला असल भौरा, भनसे चिदानन्दकी चिट्टियों। wa असार है उडकर आया, और मेरे कानोके पास भनभन करने लगा । अब बतलाइए महाशय, आपको पत्र कैसे लिखू ? भ्रमर भैया अपनेको बहुत ही रसिक और अच्छा व्यारयानदातासमझते हैं। उन्होंने समझा कि उनकी भनभनाहटसे मुझे सुस मिलेगा, मेरा जी जुडा जायगा । मेरे ही फलोकी पैरडिया तोडकर मेरे ही कानोके पास भन भन । मैं प्रोधके मारे अग्निशर्मा हो गया, मेरे हाड जर उठे । मैं ताडका पखा हाथमे रे भौरेसे भिढ गया। तर मै घूर्णन, सघूर्णन आदि विविध वक्रगति. योसे पसेका अस्र चलाने लगा, भौरा भी डीन, उडीन, प्रदीन, समाडीन आदि अनेक पैतरे बदलकर अपनी फुर्ती दिसाने लगा। मैं श्रीचिदानन्द चौवे निहारूपी मुक्तावलीका लेखक हूँ, किन्तु हाय रे मनुष्यके पराक्रम ! तू अत्यन्त । तू सदा मनुष्यको धोखा देकर भन्तको अपनी असारता प्रमाणित कर देता है। तूने जामाके मैदानमें हैनीवलको, पल्टोबाके मैदानमें चार्ल्सको, वाटके मैदानम नेपोलियनको और आज इस भ्रमरसमरमें चिदानन्दको खूब ही धोसा दिया । मैं जितना ही पमा घुमाकर, हवा पैदाकर भौरेको उडाने लगा, उतना ही वह दुष्ट घूम फिर कर सिर पर चढकर भनभन करने रगा। वह कभी मेरे कपडोमें छिपकर, बादरकी आडसे मेघनादकी तरह, युद्ध करने लगा, और कभी कुभकर्णसे लडनेवाली रामकी सेनाकी तरह मेरी बगरसे निकल कर मुझे विझाने लगा । वह कभी शेम्पसनकी तरह मेरे बाल ही मेरा सारा पराक्रम सचित समझकर मेरे शरद स्तुके बादर सरीखे घुघरारे श्वेत-श्याम केशोंमें घुसकर मेरी बजाने लगा । तर काटनेके डरसे घबराकर मुझे युद्ध छोड भागना पडा । उसने भी पीछा किया । उसी समय चौसटमें ठोकर साकर चिदानन्द शर्मा पपात धरणीतरे।" ससारके सम्राममें महारथी चिदानन्द शर्मा, जो कभी दारिद्रय, चिरकौमार और भग आदिसे भी नहीं परास्त हुए, वे ही हाय । आज इस साधारण जीरसे हार गये। घूर झाडता हुआ मैं उठ सडा हुआ, और हाथ जोडकर भ्रमरराजसे इस प्रकार क्षमाप्रार्थना करने लगा। मने कहा हे द्विरेफसत्तम । इस गरीब ब्राह्मणने तुम्हारा क्या अपराध किया है, जो तुम उसके रिसने. पढनेमें बाधा डालने आये हो । देसो, मैं -सम्पादकरो यह न चौ.-७ तव शरीरसे * चौवेका चिट्ठा- बैठा हूँ-पत्र लिसनेसे भग आवेगी-तुम क्यों भनभन करके उसमें विन डाल रहे हो?" में आज सोरे एक हिन्दीका नाटक पढ रहा था, अकस्मात् उसी नाटककी धुनमें मैंने कहा-" हे भृग । हे अनगरगकी तरग बढानेवाले । हे बागविहारी | तुम क्यों भनभन कर रहे हो ? हे मृग । हे द्विरेफ । हे पट्- पद । हे अलि । हे भ्रमर ! हे भौरे । हे भनभन !" अपने सहस्रनाम-पाठसे प्रसन्न होकर भौंरा मेरे सामने आ बैठा। वह गुन- गुन करके गला साफ कर कहने लगा । आप जानते ही हैं कि मैं भंगभगव- तीकी कृपासे सब प्राणियोंकी बाते समझ सकता हूँ । मैं कान लगा कर सुनने लगा। मधुकर बोला-" विप्रदेव । मेरे ही ऊपर इतना क्रोध क्यों है ? क्या मैं ही अकेला भनभन करता हू? तुम्हारी इस भारतभूमिमें जन्म लेकर भनभन न करूं तो क्या करू? कौन हिन्दुस्तानीभनभन नहीं करता? भनभनके सिवा भार- तवासियोंका और रोजगार ही क्या है? तुम लोगोमें जो लोग राजा महाराजा या मानरेबुल आदि है, वे कौंसिलोंमे बैठकर भनभन करते हैं। जो लोग राजा या राय- बहादुर होनेके उम्मेदवार हैं, वे दिनरात राजदार या साहबोंके पास जाकर भनभन करते हैं। जो केवल एक नौकरीके उम्मेदवार हैं, उनकी भनभनाह. टका तो अन्त ही नहीं है । हिन्दुस्तानी, बाबूलोग जिन्होने थोडी बहुत अंगरेजी सीख ली है, हाथमें दरवास्त या सिफारिशी चिट्ठी लिये उम्मेदवार बनकर द्वार-द्वार भनभन करते फिरते हैं। वे मच्छडोकी तरह साते-पीते, सोते-बैठते, चलते-फिरते, दिनको, रातको, सबेरे-दोपहर, तीसरे पहर, शामको, हरघटी, भनभन करके सताया करते हैं । जो लोग उम्मेदवारी छोडकर स्वाधीन वकील वैरिस्टर हो गये हैं, वे सनद-याफ्ता भनभनानेवाले हैं। वे सच-झटके सागर-सगममें प्रात स्नान करके, जहाँ देखते हैं कि कठघरेके भीतर गजा सिर लिये मारी होआ-बडे जज, छोटे जज, सरजज, डिपुटी, मुन्सिफ आदि-बैठे हैं, वहीं जाकर भनभनाहटका फुहारा छोड़ने लगते हैं। कई लोग भनभनाहटके द्वारा देशका उद्धार करने के विचारसे समामें लडके- वाले और बुड्ढोको जमाकर भनभन करने लगते हैं। कुछ रोग ऐसे हैं जो क्सिी देशमें वर्षा न होनेका समाचार पाकर उसीके लिए दस बीस भादमियों- को जमाकर भनभनाने लगते हैं। कुछ ऐसे हैं, जो कहते हैं, हम लोगोंको . . - चिदानन्दकी चिट्टियाँ। " बडी बडी नौकरियों नहीं मिलती, आओ भाई, सब मिलकर भनभन करें, भमुक रईसकी मा मर गई है, आओ भाई, उसका स्मारक स्थापित करनेके लिये भनभन करे । कुछ लोग ऐसे हैं, जिनको इसमें भी सन्तोप नहीं होता। वे कागज-कलम रेकर हर सप्ताह, हर महीने, हर रोज भनभन भनभन करते रहते हैं। और तुम भैया, जो मेरी भनभनाहटसे इतना चिढ रहे हो, क्या करने बैठे हो ? तुम भी वगदर्शनसम्पादकमे भग पानेकी अभिलापा करके भनभन करने बैठे हो । तब फिर मेरी ही भनभनाहट क्यो इतनी बुरी लगती है। तुममे सच कहता हूँ चिदानन्द । तुम्हारी जातिकी भनभनाहट मुझे भी अच्छी नहीं लगती। मैं एक साधारण कीढा हूँ, मैं भी केवल भनमन नहीं करता। हम लोग मधु-सग्रह करते हैं, और जथा बाँधते हैं। तुम रोग न मधु-सग्रह करना जानते हो, और न जया बाँधना जानते हो, जानते हो केवर' भनभन करना । तुमको कोई काम करनेका सलीका नहीं, केवल रोनी औरतोकी तरह दिनरात भनभन कर सकते हो । जरा बकबक करना और लिसना पढना कम करके काममै मन लगाओ, तभी तुम्हारी श्रीवृद्धि हो सकती है। मधु-सग्रह करना सीखो, मधुकर (ममासी) की तरह एका करके जथा जोडना सीखो। तुम्हारी जीभ और करमसे तो हमारा ढक ही अच्छा है । तुम्हारे वाक्योसे या कर मसे कोई नहीं डरता, परन्तु देखो, हमारे डकसे सब लोग घराते हैं । स्वर्गम इन्द्रका वन है, पृथ्वी पर अंगरेजोकी तोप है और आकाशमार्गमें हमारा डक है । मस्तु, प्रयोजन इतना ही है कि मधुसग्रह करो और काममें मन लगाओ। अगर देसो कि जीभ और हायो- की सुजलोके मारे काममें मन लगता ही नहीं, तो जीभ काटकर काममें हाथ लगाओ, अवश्य काममें मन लगेगा।" यों कहकर भ्रमर भैया भनसे उड गये। मैंने सोचा, यह भौरा अवश्य ही बडा पडित है । सुना जाता है कि यदि किसी मनुष्यकी पदवृद्धि हो तो वह होशियार और विज्ञ समझा जाता है। इसी कारण दो-पदवाले मनुष्योंसे चार-पदवाले पशु,अथवा जिन मनुष्योंकी पदवृद्धि हुई है, उन्हें अधिक वित समझना चाहिए। इस भौरेके दो नहीं, चार नहीं, छ पद है। अवश्य ही यह बडा भारी पण्डित और चतुर है, नहीं तो इसकी ऐमी असामान्य चौबेका चिट्ठा- १०० कैसे होती? फिर ऐसे पण्डित जीवकी सम्मतिका अनादर कैसे करूं ? अत- एव कमसे कम आज मै अपनी भनभनाहट बद करता हूं, परन्तु मधुसग्रहकी आशा लगी हुई है। वगदर्शनरूपी पुष्पसे भगरूपी मधु (शहद) प्राप्त होगा-इसी आशासे प्राण धारण किये हुए है मैं- आपका आज्ञाकारी, श्रीचिदानन्द चतुर्वेदी। . (४)-धुढापैकी वाते। (म्पादक महाशय । भग नहीं पहुंची, इधर कई दिन बडे कष्टसे बीते । आजका यह लेख मैंने आंखे फाड फाड कर लिखा है, भग-भवानीकी कृपासे नही । आज एक अपने मनके दुसकी बात लिखता हूँ। मैं बुढ़ापेकी बातें लिखूगा। लिखें-लिवू कर रहा है, लेकिन लिस नहीं पाता । हो सकता है कि ये दारण या करुण बातें मुझे बहुत ही प्यारी लगती हो, क्योकि अपने सुखदु सकी बातें सबको अच्छी मालूम पड़ती हैं। किन्तु यदि मैं इन बातोको लिखूगा तो दूसरा कोई क्यों पढेगा ? जवान लोग ही प्राय लिखते पढ़ते हैं, बृढे लोग नहीं । जान पड़ता है, मेरी इन बुढापेकी बातोका पढनेवाला एक भी न निकलेगा। इसीसे मैं ठीक बुढापेकी बाते नहीं लिखूगा। अभी मैंने वैतरणी (यम- लोककी एक भयानक नदी) के किनारे लगे हुए अन्तिम जीवनसोपान पर पैर नहीं रक्सा । कमसे कम मुझे यह पूर्ण विश्वास है कि वह दिन अभी दूर है। किन्तु जवानी पर भी अब मेरा कुछ दावा नहीं है, मियाद पूरी होगई। यद्यपि मियाद पूरी हो गई है, लेकिन बकाया वसूल करना बाकी है। उसके लिए अभी कुछ झगडा बना हुआ है । अभी मैं जवानीसे पूरी तौर पर फार- सती नहीं ले सका। इसके सिवा महाजनका भी कुछ बाकी है, अकार के दिनों में बहुत कर्जा लेकर साया है। अब उस ऋणको चुका सकनेकी न आशा है और न शक्ति है। उस पर, पार पहुंचानेवालेको उतराई देनके लिए भी कुछ जमा करनेकी जरूरत है। मैं अगर अपने इस दु सचिन्तापूर्ण समयकी दो चार बातें कहूँ, तो क्या तुम जवानीका सुख छोडकर एक बार । - सुनोगे?

चिदानन्दकी चिट्ठियाँ। . . और या . पहले अमर बातका निर्णय हो जाना चाहिए। अच्छा, क्या मैं वृढा हूँ? मैने यह प्रश्न केवल अपने ही लिए नहीं उठाया। में, बूढा हूँ या जवान हू, दोनोमसे एक बात स्वीकार करनेके लिए तैयार हूँ । किन्तु जिसकी अवस्था ऐसी ही सींचतान की है, जिसकी जवानीका सूर्य ढल चुका है, ऐसे हर आदमीसे मैं यही कहता हूँ कि विचार कर देखिए, क्या आप बूढ़े हैं ? आप, या तो, नार भौंरके ऐसे कारे धुंधराले, दाँत मोतीकी रडीको भी रजानेवाले, और नींद तिवारा व्याहकर राई हुई जोरके जगाने पर भी न खुलनेवाली होने पर भी, बुढ़े हैं। या, बाल गगाजमुनी, दाँतोकी रडी बीच बीचके एक-दो दानोसे शून्य, ओर नींद आसोके लिए बिडम्बनामान होने पर भी, जपान हैं। आप कहेंगे, इसके क्या माने ? मैं कहता हूँ, इसके माने यही है कि बहुत रोग ऐसे हैं जो ३०-३५ वर्षकी अवस्थामे ही अपनेको वृढा मान लेते है, और बहुत ऐसे है जो ४०-४५ वर्षके होने पर भी अप- नेको जवान समझते हैं । जो तीस पैतीस वपकी अवस्थामें बूढा बनना चाह- ता है, वह या तो वृढा बनकर अपनी विज्ञता प्रकट करना चाहता है, चिररोगी है, अथवा किमी बढे दु पसे दबा हुआ है। ऐसे ही जो ४०-४५ वर्षकी अवस्थामें अपनेको जमान रतलाना चाहता है उसको या तो यमराज- का भारी भय हे और या उसने तिवारा किसी पोडशीसे व्याह किया है। फिन्तु, जीवनकी इस आधी मजिल पर पहुंचकर, चश्मा हाथमें रे, रूमा- लसे मत्थेका पसीना पोछते-पोछते ठीक ठीक बतलाना कठिन है कि “ मैं पढा हुआ या नहीं। " शायद हो गया, अथवा अभी नहीं हुआ। मन है कि आसाँसे भरी ही साफ न देख पडता हो, बाल भले ही एक आध पक गये हो, रेकिन अभी बढा नहीं हुआ। क्यो ? कुछ भी तो पुराना नहीं हुआ। यह पुराना-बहुत पुराना जगत् तो आज भी नवीन ही है। प्यारी कोयर का कुहकुहू शब्द पुराना नहीं हुमा, गगाकी ये सुन्दर चचल चमकीली लहरें पुरानी नहीं हुई, प्रभात कालकी शीतर मन्द सुगन्ध हवा-प्रकुल कामिनी चम्पा चमेली जूहीकी सुगध-वृक्षोंकी श्यामर शोमा- चन्द्रमाकी विमल चादनी-कुछ भी पुराना नहीं। सर वैसा ही उज्ज्वल, कोमल, सुन्दर है। केवला में ही पुराना हो गया? मैं इस बातको नहीं मान- ता। पृथ्वी पर तो इस समय भी वैसे ही हसीका फुहारा छूट रहा है। केवल कहता चौवेका चिट्ठा- १०२ मेरे ही हंसनेके दिन चले गये ? पृथ्वी पर उत्साह, क्रीडा-केलि, रग-तमाशा भाज भी वैसे ही भरा पटा है, केवल मेरे ही लिए नहीं है ? जगत् प्रकाश- पूर्ण है, केवल मेरे ही लिए अन्धकारमयी अमाकी निशा आगई ? सालोमन कम्पनीकी दूकान पर वज्रपात हो, मैं यह चश्मा तोड डालूगा । मैं चूढ़ा नहीं हुआ। मगर कठिनता तो यह है कि मै मानू या न माने, लेकिन बुढापा नहीं मानता । वह चला ही आता है । मैं लाख दूर भागू-पर वह पीछा नहीं छोडनेका । धीरे धीरे पल पल आयु क्षीण होती जाती है। जवानीवाला किनारा दूर होता जा रहा है। मैं लाख कहूँ कि बूढा नहीं हुआ, लेकिन 'मै बृढा हो चला '-इसका अनुभव मुझे हर घडी होता जाता है । लोग हँसते हैं, मैं केवल उनका मन रसनेके लिए हंसीकी नकल कर देता हूँ। लोग गाते-बजाते हैं, मैं केवल यह दिखानेके लिए कि मैं अभीतक वृढा नहीं हुआ, मुझमें जवानीका उल्लास वैसा ही है, उनकी मण्डली में शामिल होता हूं। लेकिन सच पूछो तो हंसने-चोलने या गाने-बजानेके लिए हृदय नहीं हुलसता । मेरे लेखे उत्साह है ही नहीं । आशा, मेरी समझमें अपने आत्मा- को धोखा देना है । कहाँ, मुझमे तो उत्साह या आशा-भरोसा कुछ भी नहीं है । जो है नही, उसे सोजनेकी भी कोई जरूरत नहीं। खोजनेसे क्या मिलेगा? जो फूलोकी मारा इस जीवन-वाटिकाको सुगधित भौर सुशोभित करती थी, उसके सब फूल एक एक करके झड गये । जो सदा प्रफुल्लित मुखकमल मुझे बहुत प्यारे लगते थे, उनमेसे बहुतसे अदृश्य हो चुके, और बहुतमे अब भी धाममें मुरझाये हुए तीसरे पहरके फूलकी तरह देय पडने हैं, उनमे वह रस नहीं है। इस टूटेफूटे भवनमे, इस निरानन्द बद नाट्यशालामें, इस उजडी हुई महफिर मे, वह उज्ज्वल दीपमाला कहा है। एक एक करके सब प्रकाश बुझ गये । केवर मुख ही नहीं, वह सरल स्नेह- पूर्ण, विश्वासमें दृढ, सौहार्दमें स्थिर, अपराध करने पर भी प्रसन्न, बधुहृदय कहाँ है? नहीं है। किसके दोपसे नहीं है। इसमें मेरा दोप नहीं, बन्धुओंका भी दोप नहीं। दोप है अवस्थाका अथवा यमराजका । तो इसमें हानि क्या है ? अवेग आया था, अकेला ही जाऊंगा। इसकी चिन्ता क्या है ? इस असरयजीवपरिपूर्ण संसारसे मेरी नहीं बनी, अच्छा .

चिदानन्दका चिट्ठिया। - विदा । पृथ्वी, तू अपने नियमित मार्ग (कक्षा) में घूमती रह, मैं भी अप- ने मनकी जगह जाता हू । तेरा मेरा नाता छूटा, तो इससे तेरी हानि क्या है ? और मेरी ही क्या हानि है ? तू अनन्त कार तक यों ही शून्य-पथमें घूमा करेगी। और मै, मैं भी कुछ ही दिनोका मेहमान हू-फिर, जिसके पास परम शान्ति मिलती है, सर ज्वालाये मिट जाती हैं, उसीके पास, तुझे चक्करमें छोड कर चल दूंगा। अच्छा, तो इससे यह निश्चय हुआ कि एक तरहसे मै बूढा हो चला ।अब मुझे क्या करना चाहिए? किसी ना-समझने लिस दिया है कि पचासके बाद वनमें चले जाना चाहिए-पञ्चाशोवं वन वक्रेत् ।' वन और कहाँ है? मेरे रिए तो बस्ती ही वन है। आप सच मानिएगा, इस अवस्थामे सब भोग- विलासोकी सामग्रियोंसे परिपूर्ण बडे बडे महलोंकी शोभा और आदमियोकी चहलपहल से नोजवानोको खुश करनेवाली नगरी ही जगल है। हे नवयुवक पाठकगण, तुम्हारे हृदय और मेरे हृदयसे रिलकुल मेल नहीं है । सास कर तुम्हारा ही हृदय मेरे हृदयसे नहीं मिलता। ईश्वर न करे कोई आपत्ति आ- पडे तो उस समय शायद तुमसे कोई पूछने भी आये कि ए वृढे तूने बहुत देया सुना है । बता, इस विपत्तिमे मै क्या करूँ ? " रेकिन अमन चैनके समय कोई नहीं कहेगा कि " ए बुढे, आज हमारे खुशीका दिन है, आ, तू भी आनन्द मना।" बल्कि ऐसे जल्मों और तमाशोंमे इस बातकी कोशिश की जायगी कि यूढे खूसटको सबर न होने पावे। तो बताओ, जगलमे की क्या है? हे प्रौढ पाठकगण, जहा तुम पहले स्नेहकी प्रत्याशा करते थे, वहीं तुम इस समय भय या भक्ति के पात्र हो। जो पुन, तुम्हारी जवानीके समय, अपने ल्डकपनमें, तुम्हारे पास पलंग पर पड़ा हुआ सोते सोते छोटे छोटे हाथ फेलाकर सुमको सोजने लग जाता था, वह इस समय तुमसे मिलता भी नहीं, और लोगोके द्वारा सर देता है कि पिताजी कैसे हैं ? जिस पराये रडकेकी सुन्दरता पर मुग्ध होकर तुमने उसको गोढमें लेकर आदर किया था, मुख चूमा था, वही आज जवान है। वह इस समय या तो महापापी है-अपने कुकर्मोंसे पृथ्वीका भार बढा रहा है-पापके सागरमें आकण्ठ निमग्न है, भयवा तुम्हारा ही शनु बन बैठा है । तुम क्या करते हो? केवल रोकर कर सकते .

चौबेका चिट्ठा- १०४ - . । हो कि इसे मैने अपनी गोद में खिलाया है। तुमने जिसे गोदम बिठाकर क-स' सिखलाया है, वही इस समय लब्धप्रतिष्ट लेसक और पण्डित है, और तुम्हींको मूर्स कहकर मन-ही-मन हसता है। जिसको किसी समय तुम कुछ न समझते थे, वही इस समय तुमको कुछ नहीं समझता । तो बताओ, अव जगलमे बाकी क्या है? भीतरी वान छोडकर बाहर देखिए, वहाँ भी ऐसा ही दीख पडेगा । जहाँ तुमने अपने हाथसे फूलबाग लगाया था, चुन चुन कर गुलाव, बेला, चमेली, जही आदिके पेड लगाये थे, घडा लेकर अपने हाथो पानी सीचा था, वहीं देसोगे कि चने-मटरको सेती हो रही है। कालू किसान बैलोको हॉकता हुआ मजेमें गा-गाकर हल चला रहा है, उस हलकी नोक मानो तुम्हारे हृद- यमें घुसी जाती है। जो मकान तुमने जवानीमें तरह तरहकी अभिलापाय करके बडे यत्नसे बैठकर बनवाया था, जिसमें पलग पिछा कर, उस पर अपनी धर्मपत्नीके साथ नयनसे नयन और अधरसे अधर मिलाकर, इस जीवनमें कमी न मिटनेवाले प्रेमकी बातें पहलेपहल की थीं, देसोगे, उसी घरकी इंटें किसी रईसके अस्तबल की सुर्सी तोडनेके लिए गधोपर लदी चली जा रही हैं। उस तुम्हारे यौवन-लीला-निकेतन पलगको 'पट्टी' और 'पाये' चूल्हेमें जलाये जा रहे हैं । तो यताभो, अव जगलमे क्या बाकी रहा? सरसे बढकर जलनकी बात यह है कि तुमने या मैंने उस जवानीके समय जिसे सुन्दर परमसुन्दर देखा था, वही अब बुरा (कुरूप ) है। मेरे प्यारे मिन बाबू आनन्दकन्द बढे ठाटके साथ जब जवानी में मस्त हो रूपके घमण्डम ऐठे फिरते थे तर ( उन्हींके कथनानुमार) न जाने कितनी रसिक रमणियां गगातट पर उन्हें देखकर शिव पर जल चढाते समय 'नम शिवाय ' की जगह 'आनन्दकन्दाय नम कह बैठती थीं। इस समय उन्हीं आनन्दक- न्दका हाल क्या है ? जानते हो' वह रूपका बाजार लुट गया है, वे बडी बडी आसें बैठ गई है, बाल पक गये है, मुंहमें दांत एक भी नहीं रहा, खाल स्टक भाई है, लटिया टेककर सिर हिलाते-मानो अपने किये पिछले कर्मों पर पछताते-चले आते है । आनन्दकन्दजी जवानीमें एक बोतल बराठी और तीन मुर्गियोंका 'जरपान' करते थे, लेकिन अब वे ही लगा तिलक लगाये रद्राक्षको माल पहने, उपदेश देते घूमते हैं। उनके खानेके । . । - १०५ चिदानन्दकी चिट्ठियाँ । समय अगर कोई मद्य-मासका नाम भी रे लेता है तो वे परोसी हुई थारी छोडकर उठ खडे होते हैं और गारियोकी 'पुरझडी' बन जाते हैं। तो बताओ, अव जगर में क्या बाकी है। यतसियाकी मा हीराको देखो। जब वह मेरे फूल मागमें छिपकर फूल चुराने आती थी, तर जान पडता था, मानो नन्दनवनसे चरती-फिरती फूली-फली करपलता राकर छोड दी गई है। उसकी अरकोंके माथ वायु ग्येला करता था और उसके आचलको पकडकर गुलानका पेड छेडछाड किया करता था। उसी हीराको भाज देसो, बक्झक करती हुई चावर' फटक रही है। कपडे मेले है, बीच बीचमें टूटे हुए दांतोने चेहरेको विकट बना रक्सा है, शरीर दुनला और काला पट गया है, हट्टियां निकल आई है और झुर्रियां पड़ गई है। यही वह रम रग-तरगवती युवती हीरा है। तुम्ही ताओ, अर जगलमें क्या बाकी है? तो यह बात निश्चित है कि मै धनको न जाऊंगा। क्योंकि मेरे लिए घर ही वन हो रहा है । अच्छा तो फिर क्या करूगा ? महाकवि कालिदासने सर्वगुणसम्पन्न रघुवशियोंके लिए बुटापेमें मुनिमृत्तिकी व्यवस्था दी है । वे लिखते हैं- शैशवेऽभ्यस्तविद्याना यौवने विषयैपिणाम् । वार्द्धक्ये मुनिवृत्तीना योगेनान्ते तनु यजेत् ॥ रघुवशी रोग बचपनमें विद्याभ्याम, जवानीम विषयभोग बुढापेमें मुनि- वृत्ति और चौथेपनमें योगसाधन द्वारा शरीर-त्याग करते थे। मैं निश्चित रूपसे कह सकता हूं कि कालिदासने ४० चर्पकी अवस्था होनेके पहले ही रघुवंश लिखा है। यह प्रमाणित करनेके लिए मैं उनके दो ग्रन्थोसे दो लोक उद्धत करूगा । रघुवरामे अजके विलापमें आप रिसते हैं- इदमुसितालक भुप तव विश्रान्तकथ दुनोति माम् । निशि सुप्तमिवैफपंकज विरताभ्यन्तरपट्पदस्वनम् ॥ अर्थात् है इन्दुमती, यह तुम्हारा मुख, जिसकी अरके हवासे हिल रही है-किन्तु जिसमेंसे कोई बात नहीं निकलती, मुझे यहुत ही व्यथित कर रहा है । यह वैसा ही जान पड़ता है, जैसे एक कमलका फूल रातको मुकु. -

चायेका चिट्ठा-
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चन्द्रमासे व्याह करता, कोयर के माय गाता और फूलोंको व्याहता था-मो
चला गया, भगका रंग क्यों है? शी फट गई, फिर मर-ग-म क्यों है।
जान चली गई भाई, अयास क्यों है? सुप चला गया भाई, फिर उसके
लिए रोना क्यों?
तब भी रोता है । पैदा होते ही रोया था, और रोते ही मरूँगा?
मनुगत म्बगत और विगत
श्रीचिदानन्द चौथे।

(१६)-चिदानन्दकी जबानबन्दी। खुशनबीस जूनियर लिसित । उस भगभक्त चिदानन्दकी यहुत दिनोसे पर नहीं मिली थी। बहुत कुछ ढूंढा-पता लगाया । एक दिन अकस्मात् मैंने उसको फौजदारी अदालतमे देसा । देखा, बेचारा ब्राह्मण एक पेडके नीचे बैठा, उसकी जडका सहारा रिये ऑख बन्द किये है। मैंने सोचा और कुछ नहीं, ब्राह्मणने लोभके फैरमें आकर कहींसे भग चुराई है। मुझे निश्चित रूपसे मालूम है कि चौने कभी और चीज नहीं चुरावेगा। उसके पास ही एक साकी वर्दी पहने मि- पाही भी देर पडा । मैं वहासे धीरे धीरे खिसक कर आडमे हो गया । क्या जानें, शायद चिदानन्द जमानत देनेके लिए कहे। दूर स्खडे होकर देखने लगा कि क्या होता है। कुछ देरके बाद चिदानन्दकी पुकार हुई। तब एक सिपाही उसे इजलासमें ले गया । मैं भी पीछे पीछे गया, सडे होकर दो एक बाते सुननेसे कुछ कुछ मामला मालूम हुआ। इजलासमै कायदेके माफिक ऊची जगह पर हाकिम विराजमान थे। हाकिम अगरेज नहीं, एक देशी धर्मावतार थे। पूछनेसे मालम हुआ, आप डिपुटी साहन है। चिदानन्द असामी नहीं, गवाह था। मुकहमा गऊ-चोरीका है। फर्यादी वही श्यामा ग्यालिन है। सिपाहीने चिदानन्दको गवाहके कटहरेमें भर दिया । तर चिदानन्द धीरे धीरे मुसकराने लगा। सिपाहीने धमकाया-"हँसता क्या है ?" चिदानन्दने हाथ जोडकर कहा-"बाबा, मैंने क्सिके सेतमें धान पाये है, जो मुझे इस कटहरमें राफर रद कर दिया है ?" सिपाही महाशय बात नहीं समझे, उन्होंने दाढी हिलाकर कहा-"यह दिल्लगीकी जगह नहीं है, हरफ पढो।" चिदा.-"पढाओ न भेया।" * पुराने सुशनधीम, अर्थात् लाला मदारीलाल ।

चौवेका चिट्ठा- क्या कहू ? तब एक मुहरिर हलफ पढाने लगा। बोला-" कहो, मैं परमेश्वरको प्रत्यक्ष जानकर- चि०-(विस्मयके साथ) मुह.-"सुनते नही हो ? कहो-परमेश्वरको प्रत्यक्ष जानकर- चिदा.--"परमेश्वरको प्रत्यक्ष जानकर । आप तो अनर्थ कर रहे हैं।" हाकिमने देसा, गवाह कुछ गडबड मचा रहा है। उन्होंने कहा- " "अनर्थ क्या ? " .- चिदा " 'परमेश्वरको प्रत्यक्ष जानकर' यह कहना होगा हाकिम-" हर्ज क्या है ? हलफके फारम पर लिसा ही है।" चिदा हुजूर बडे विज्ञ हाकिम मालूम पड़ते हैं। एक बात मुझे यह कहनी है कि गवाही देते देते दो एक छोटे मोटे झूठ तो बोरे भी जा सकते है, लेकिन शुरूसे ही इतना बडा झाट बोलना क्या आप अच्छा समझते हैं?" हाकिम-"इसमे झूठ क्या है ?" चिदानन्दने अपने मनमे कहा तुम्हारे इतनी बुद्धि न होती तो यह पद-वृद्धि कसे होती ?" प्रकटमें कहा-"धर्मावतार मुझे कुछ कुछ जान पडता है कि परमेश्वर प्रत्यक्षका विपय नहीं है। मेरी ही आँखोका दोप हो, या चाहे जो हो, मैंने आजतक परमेश्वरको प्रत्यक्ष नहीं देख पाया । जान पडता है, आप लोग आईनका चश्मा नाक पर चढाकर उसे प्रत्यक्ष देख सकते है, किन्तु में जर उमे इस अदालतके घरमें प्रत्यक्ष नहीं देख पाता, तब कैसे कहूं कि परमेश्वरको प्रत्यक्ष जानकर-- फर्यादीके वकीर विगड पडे-उनका समय बहुमूल्य ठहरा, वह मिनट मिनटमें चमकदार चाँदीके सिक्के बरसाता ह । यह दरिद्र गवाह उसी सम- यको नष्ट कर रहा था। वकीलने गर्म होकर कहा-" अजी जनार, इस अपने Theological Lecture (परमार्थ विद्याविपयक व्याख्यान) को थिया- सोफिकल सोसाइटीके लिए रहने दीजिए । यहा आपको आईनके माफिक काम करना होगा।" चिदानन्दने उसकी तरफ घूम कर देसा और मन्द हास्यके साथ कहा- जान पडता है, आप वकील हैं।" चकीलने हंसकर कहा-"कैसे पहचाना?" " , । । - " " । you like . चिदा.-. बहुत ही सहजमे । मोटी चैन और मैला शमला देस कर । पर महाशय, यह Theological Lecture आपके लिए नहीं है । मैं मानता हूँ कि जन मवकिल आता है तब आप लोग परमेश्वरको प्रत्यक्ष देखते हैं। वकीरने गुस्सेसे उठकर हाकिमसे कहा-" I ask the protection of the court agunst the insults of this witness (अर्थात् इस गवाहने जो मेरा अपमान या मुझमे गुस्तासी की है उसके विपयमें मैं अदालतसे मदत चाहता हूँ।) अदालतने कहा-" Oh Baboo, the witness is your own witness, and you are at liberty to send him away if (यह तुम्हारा ही एक गवाह है, और अगर तुम चाहो तो इसे अदालतसे बाहर करनेके लिए स्वतन्त्र हो।) चिदानन्दको विदा कर देनेसे वकील बावृका मुकहमा निगडता था। वकील साहब चुपचाप बैठ गये । चिदानन्दने सोचा, यह हाकिम जाति- भ्रष्ट है और इसकी विद्या बुद्धि भी वैसी ही है। हाकिमने रंग-ढग देखकर मुहर्रिरको हुक्म दिया-" गवाहको उसमें objection ( एतराज ) है-उससे simple affirmation ( साधा- रण हलफ) कराओ। तर मुहर्रिरने चिदानन्दसे कहा-" भच्छा, उस बातको छोड दो। कहो, मै प्रतिज्ञा करता हूँ-कहो।" चिढा०-" मेरी समझमं पहले ' क्या प्रतिज्ञा करता हूँ ' यह जानकर प्रतिज्ञा करना ठीक होगा।" मुहर्रिरने हाकिमकी तरफ देखकर कहा-" धर्मावतार, साक्षी बडा हरा- मजादा है।" वकील यानू भी गोल उठे-“Very obstructive," (अर्थात् बहुत ही निन्न डालनेवाला है।) चिढा०-(वकीलसे)" सादे या कोरे कागज पर दस्तखत करानेकी चार अदालतके बाहर जरूर है, पर क्या • दालतके भीतर भी वही चलाई जायगी?" ची. o-७ चौवेका चिट्ठा- । वकील-" सादे कागज पर दस्तसत करनको तुमसे कौन कहता है ? चिदा क्या प्रतिज्ञा करनी होगी, यह गिना जाने प्रतिज्ञा करना और कागजमे क्या रिसा जायगा, यह जाने बिना दस्तखत करना, एक ही बात है।" हाकिमने मुहर्रिरसे कहा " पहले इसको प्रतिक्षा सुना दो, गोलमाल' करनेकी कोई जरूरत नहीं है।" मुहर्रिरने कहा--" सुनो, तुमको कहना होगा ' में प्रतिज्ञा करता है कि मैं जो गवाही दूगा वह सच होगी। मैं कोई बात छिपाउँगा नहीं-सच सच कहूंगा।" चिटा.-"--वाह वाह वाह ।। मुहरिर इसके क्या माने ?" चिदा.-" पढ़ाओ, मैं पढता है । चिदानन्दने कुछ गोलमोल नहीं क्यिा-प्रतिज्ञा कर दी। तब वकील बाबू सवाल करनेके लिए सडे हुए और ऑयें लाल लाल करके चिढानन्दसे बोरे-" अब बदमाशी न करना-मैं जो पूछता है, उसका ठीक ठीक जवाब देना । व्यर्थकी बातें न करना । चिदा.. जो पूछेगे वही मुझे कहना होगा? और कुछ नहीं? वकीर-" नहीं। तर चिदानन्दने हाकिमकी तरफ फिर कर कहा-" मगर मुझसे प्रतिज्ञा कराई गई है कि मैं कोई बात नहीं छिपाउँगा। धर्मावतार, बेअदबी माफ हो । मोहल्ले में आज एक जगह 'रहस' होनेवाला था, इच्छा थी कि देखने जाऊँगा, लेकिन वह इच्छा यही पूरी हो गई। वकील बावृप्रधानजी है, और मै रहसधारियोका रडका है। जो ये कहावेगे वही कहूगा, जो न कहला- वगे यह नहीं कहूंगा । जो न कहलायेंगे घर आप ही छिपा रहेगा । तब, प्रतिज्ञा अवश्य ही शठ होगी, क्षमा कीजिएगा।" हाकिम " जिसे कहनेकी जरूरत जान पडे उसे निता पूछे भी कह सकते हो।" तर चिदानन्दने सराम करके कहा- बहुत खूब ।" वकील वाह फिर सचार करने लगे-" तुम्हारा नाम क्या है ?" चिदानन्दने सलाम करके कहा-" श्रीचिदानन्द चौवे ।" " आप " मेरी - “ ।

चिदानन्दकी जवानचन्दी। " " कहा- . “ " " वकील-" तुम्हारे बापका नाम क्या है ? चिदा.-"क्या आपने कहीं मेरा ब्याह ठीक किया है ? आप वापका नाम क्यो पूछते हैं? वकीलने अग्निशर्मा होकर हाकिमसे कहा- हुजूर । ये सब बातें Contempt of Court (अदालतका अपमान करनेवाली) हैं।" हुजूर वकील की दुर्दशा देखकर एकदम नाखुश भी नहीं थे-उन्होंने आपहीका तो गवाह है।" लाचार सील या फिर गवाहकी तरफ झुके, बोले-" बतलाओ। तुमको बतलाना पडेगा।" चिदानन्दने बापका नाम भी बतला दिया। तब फिर वकीलने पूछा- तुम कौन जाति हो?" चिदा. हिन्द। वकील-"अ । कौन वर्ण हो?" चिढा०-" एकदम कारा। वकीरने ग्पीझकर कहा-" दर हो । ऐसा भी गवाह कोई लाता है । मैं कहता हु कि तुम्हारे जाति है ? चिदा०----" जाति है नहीं तो ले कोन गया?" हाकिमने देखा, वकील के क्येि कुछ नहीं होता । हाकिमने सुद पूछा- हिन्दुनोमे ग्राह्मण, क्षत्रिय, वेश्य, मल्लाह, पासी वगेरह बहुत मी जातियाँ हैं, जानते हो न?---तुम इनमेंसे कौन जाति हो?" चिढा--" धर्मावतार, यह वकील' याचूकी ही बुद्धिका दोपह। देसते है कि मेरे गले में जनेज है, नामके साथ भी 'चौरे' लगा हुआ है। जाने कि वकील चार इम पर भी नहीं समझ सके कि में ब्राह्मण हूँ। हाकिमने रिस लिया जाति ब्राह्मण । फिर वकीरने पूछा-" तुम्हारी अवस्था कितनी है?" इजलासमे एक पडी घडी लगी हुई थी-उसकी तरफ देखकर और हिसार लगाकर चिदानन्दने कहा-" मेरी अवस्था ५१ साल, २ मही, १३ दिन, ५ घटा, " मिनट, ५० सेकिण्डकी है।" चकील-" अरे । तुम्हारे घटा मिनट कौन पूछता है ?" " है। मैं क्या चौबेका चिट्ठा- ११६ 0- - .- 0- चिदा "क्यो । अभी अभी आपने प्रतिज्ञा कराई है कि मैं कोई बात न छिपाउंगा। वकीर "जो तुम्हारी इच्छा हो, करो । मैं तुमसे पेश नहीं पा सकता। तुम्हारा निवास कहाँ है?" चिदा "मेरे निवास नहीं है।" वकील-"अजी मैं पूछता हू, तुम्हारा घर कहाँ है ?" चिदा घर कैसा । मेरे तो एक कोठरी भी नही है।" वकील-"तो फिर रहते कहाँ हो?" चिदा "कभी यहाँ, कभी वहाँ।" वकील-"कोई अड्डा तो है न ?" चिढा० 'था, जय रमिक वा थे। अब नहीं है।" वकील अब कहाँ हो?" चिदा० 'क्यो, इसी अदालतमे।" वकील- कल कहां थे?" चिदा०---"एक दूकानमें ।" हाकिमने कहा- -"ज्यादा बकवाद करनकी जरूरत नहीं है, मैं रिसे लेता हूँ कि रहनेका कही ठिकाना नहीं है । इसके बाद ?" चकीर "तुम्हारा पेशा क्या है ?" चिदा० "पेशा कैसा ? मैं वकील हूँ या वेश्या?" वकील-"मेरा मतलब यह है कि खाते-पीते कैसे हो?" चिदा "भातमें दाल डालकर, दाहने हाथसे कौर उठाकर मुहमें रख- कर, गलेके नीचे उतार जाता है।" वकील-"वह दाल-भात मिलता कहाँसे है?" चिदा. 'भगवान् देते हैं तो मिल जाता है, नही तो नहीं।" वकील-“ कुछ पैदा करते हो?" चिदा.-" एक पैसा भी नहीं।" वकील-" तो क्या चोरी करते हो?" चिदा "ऐसा होता तो इससे पहले ही मुझे आपकी शरणमे आना और आप भी उसमेंसे कुछ हिस्सा पाते।" - - .- पडता चिदानन्दकी जबानबन्दी। साता और वकीलने झेपकर अदालतसे कहा-" मैं इस गवाहको नहीं चाहता। मुझसे इसका इजहार नहीं लिया जा सकता। श्यामा फर्यादी थी, उसने वकीलसे कहा-"नहीं, इस गवाहकी गवाही जरूर लेनी होगी। यह ब्राह्मण सच ही कहेगा। मुझे खूब मालूम है कि यह झूठ नहीं बोलनेका । आप इससे पूछनेका ढग नहीं जानते, इसीसे इतनी गडबड हो रही है। उसका पेशा क्या होगा? वह ब्राह्मण ठहरा, इधर उधर घूमता रहता है। उससे पूछते हो, कुछ पैदा करते हो ? वह क्या कहेगा?" तर वकीलने हाकिमसे कहा -"लिख लीजिए, पेशा भीस मॉगना ।" अन तो चिदानन्दको क्रोध आगया। उसने गरज कर कहा-"क्या ? चौयेकी वृत्ति भिक्षा है ? मैं हलफके साथ मुक्तकण्ठ होकर कहता हूँ कि मैंने कभी किसीसे एक पैसा भी नहीं मागा।" अन श्यामासे रहा नहीं गया। उसने कहा-" यह क्या महाराज, तुमने कभी भग मांगकर नहीं पी?" चि.. 'दूर हो पगली औरत । भग क्या पैसा है ? मैंने एक पैसा भी कभी किसीसे नहीं मांगा। हाकिमने हसकर कहा क्या हिमें चिदानन्द ?" चिदानन्दने नर्म होकर कहा-" लिख लीजिए, पेशा ग्राह्मण भोजनका निमन्त्रण ग्रहण करना।" सर लोग हंस पडे । हाकिमने यही लिस लिया । तर वकील साहब मुकदमेके सम्बन्धमे गवाहसे प्रश्न करने लगे, पूछा- क्या तुम फर्यादीको पहचानते हो?" चि.--"नहीं।" श्यामा जोरसे बोल उठी यह क्या महाराज | इतने दिनोसे मेरा दूध दही खाया और आज कहते हो मैं नहीं पहचानता । चिदानन्दने कहा -"यह तो मैं नहीं कहता कि तुम्हारे दृध दहीको नहीं पहचानता । तुम्हारे दूध दहीको खूब पहचानता हूँ । जब देखता हूँ कि एक पाव दूधमे तीन पाव पानी है तभी समझ जाता है कि यह श्यामा 0- " " है चौवेका चिट्ठा- " ग्वालिनका दूध है, जब देखता हूँ कि दहीमें तोढ भरा हुआ है तभी समझ लेता हूँ कि यह श्यामाका दही है । दूध-दही क्यों नहीं पहचानता ? श्यामाने जरा टेढे होकर कहा -"मेरा दूध दही पहचानते हो, और मुझे नहीं पहचानते ?" चिदानन्दने कहा औरतोको कब कौन पहचान सका है बहन । विशेष कर ग्वालेकी औरतके सिर पर दूधकी मटकी होने पर किसकी ताकत है जो उसे पहचान सके ?" यकील साहब फिर सवाल करने लगे-“मालम हुआ, तुम फर्यादीको पहचानते हो-उसके साथ तुम्हारा कोई सम्बन्ध है?" चिदा.-" खून कहा-इतने गुण न होते तो वकील कैसे होते ?" वकील -"तुमने मुझमें क्या गुण देखा ?" चिदा.--"ब्राह्मणके लड़के और ग्वालेकी औरतमें भी आप सम्बन्ध ढूंढ रहे हैं, यह क्या कोई कम गुण है ?" वकील-"ऐमा सम्बन्ध क्या हो नहीं सकता ? कौन जाने, तुम उसके पोष्यपुन भी हो सकते हो।" चिदा उसका तो नहीं, मगर उसकी गऊका अवश्य हूँ।" चकीर "समझ लिया, तुम्हारे साथ फर्यादीका कुछ सम्बन्ध है । अगर साफ साफ कह देते तो क्या कुछ हर्ज था-इतना दिक क्यों करते हो ? अच्छा बतलाओ, इस मुकदमेके बारेमे तुम क्या जानते हो?" चिदा.--"यही जानता है कि इस मुकद्दमे में आप वकील हैं, श्यामा फर्यादी है, मैं साक्षी हूँ। और यह नीच जातिका आदमी असामी है।" वकील" यह नहीं, गऊचोरीका क्या जानते हो? चिदा.--"गजचोरी तो मेरे बाप-दादा भी नहीं जानते थे । क्या साप कृपा करके यह विद्या मुझे बता देंगे ? मुझे दूध-दहीकी बडी जरूरत रहती है।" वकील---"अ -कहता हूँ कि तुमने गऊ चुराते देखा है ?" चिदा.-"एक दिन देसा था।रसिकनाबृकी गऊको एक साला मोची-" वकील "ओ । मै यह पूछता ह कि श्यामा ग्वालिनकी गाय जब चुराई गई, तब तुमने उसे देसा था?" 0- - . - चिदानन्दकी जवानवन्दी। . । चिदा.-"नहीं, चोर ऐसा बुद्धिमान् नहीं था कि मुझे बुलाकर गवाह बनाकर गऊ चुराता । अगर ऐसा होता तो आपको ओर मुझे दोनोको ही सुभीता होता। श्यामाने देखा, वकीलको व्यर्थ ही रपये दिये गये । तब उसने चुपकेसे वकील के कानमे कह दिया-"वह ब्राह्मण यह कुछ नहीं जानता, केचर गर पहचानता है।" अव वकील महाशयकी समझमे आया । फिर गरज कर पूछा-"तुम गऊ पहचानते हो?" चिदानन्दने मीठी हंसीके साथ कहा-"वाह, पहचानता क्यो नहीं-न पहचानता तो आपसे इतनी मीठी बाते कैसे करता?" हाकिमने देवा, गवाह बहुत ज्यादती कर रहा है। हाकिमन कहा- "यह सर रहने दो।" श्यामाकी श्यामरा गउ अदालतके आगेके मैदानमें बंधी हुई थी-इज- लाससे दिखाई देती थी। दिपुटी बाबने उसकी तरफ इशारा करके पूछा- 'तुम इस गउको पहचानते हो?" चिदानन्दने हाथ जोडकर कहा "कोन गर धर्मावतार?" हाकिम-"कौन गा क्या? मामने एक ही तो गह।" चिदा.-"आप देखते है एक, मैं देखता हूँ बहुतमी ।" हाकिमने चिढकर कहा-" देयते नहीं हो यह श्यामला?" चिदानन्दने श्यामरा गउकी तरफ न देमकर पकीरके शमतेकी तरफ देग्या, और कहा यह शमला भी क्या चोरी का है?" चिदानन्दकी दुष्टता भय हाफिमके लिए अमदा हो उठी। हाकिमने सुम भदाएतके काममें विन दार रहे हो-Contempt of Court के लिए तुम पर पाच रपये गुर्मा। चिदानन्दने जमीतक झुककर सलाम पिया, और फिर हाप जोडकर यहा" यहुत खून हुजूर । जुर्माना यमूल कान करेगा?" हाकिम-" श्यो?" " कहा- " चौबेका चिट्ठा- १२० " " D- " चिदा० इस लोकमें तो मुझसे जुर्माना वसूल होनेकी कोई सभावना नहीं है, इस लिए जो जुर्माना वसूल करेगा उससे पूछंगा कि यह परलोक तक जुर्माना वसूल करने के लिए मेरे साथ चलनेको तैयार है या नहीं ?" हाकिम-"जुर्माना न दे सकोगे, तो जेल जाना पड़ेगा।" चिदा "कितने दिनोंके लिए धर्मावतार?" हाकिम -"जुर्माना न अदा होनेपर एक महीनेके लिए। चिदा क्या भाप कृपा करके दो महीनेके लिए नहीं भेज सकते " हाकिम 'तुम अधिक कैद क्यो चाहते हो?" चिदा आजकल समय बढा नाजुक आगया है। अब ब्राह्मण भोजनके निमन्त्रण बहुत कम मिलते हैं । अगर जेलखाने में दो महीने तक आप ब्राह्मण-भोजनकी व्यवस्था कर देगे तो यह गरीब ब्राह्मण आपको आशीर्वाद देगा।" ऐसे आदमीको कैद या जुर्माना करनेसे क्या होगा ? हाकिमने हैसकर कहा अच्छा अगर तुम गडरट न करके साफ साफ बयान दोगे तो तुम्हारा जुर्माना माफ कर दिया जा सकता है । बताओ, इस गऊको तुम पहचानते हो कि नहीं?" हाकिमने एक सिपाहीको आज्ञा दी कि वह पास जाकर श्यामाकी गऊ दिखला दे । सिपाहीने वही किया । क्षोभसे भरे हुए वकीलने पूछा-" इस गउको तुम पहचानते हो?" चिदा.. 'इस सींगवालीको, यह कहो । चतील- तुम क्या समझे थे?" चिदा " मैं समझा था शमलावाली। सैर, हो, मैं इस सींगवाली गउको पहचानता हूँ। इसके साथ मेरी अच्छी तरह बोलचाल है।" वकील-" यह गऊ किमकी है?" चिदा.-"मेरी।" वकीर" तुम्हारी ?" चिदा- हो, मेरी ।" हरे हरे । श्यामाका मुंह सूस गया । वकीलने देसा, मुकद्दमा निगडा जाता है। तय श्यामाने गरज कर कहा-"गड तेरी है हरामखोर ?" 0- । 0- १२१ चिदानन्दकी जवानगन्दी। .- 0 " चिदा " मेरी नहीं तो किमकी है ? में उसका दूध पीता हू, उसका दही साता हू, मक्सन साता हु, घी साता हूं, मेरी तो गऊ है ही । तू केवर पालती है, इसीमे क्या तेरी गउ हो जायगी ?" वकीलमें इन बातोके समझनेकी शक्ति कहाँ ? उसने अदालतसे कहा- धर्मावतार | witness hostile ! ( गवाह विरोधी है । ) Permission ( माज्ञा ) दीजिए, मै उसे cross फ्रास (जिरह ) करूंगा। चिदा क्या ? मुझे क्रास करोगे? " वकील हो, करूगा। चिदा o--" नावसे, या पुल बाधकर ?" वकीर-" इसके क्या माने " चिदा--" अजी वकीलसाहय, उपाधिका पुछला रगालेने पर भी तुम इतने बटे हनुमान नहीं हो गये हो कि चिदानन्दसागरको पार कर सको।" इतना कहकर चिनानन्द चौने क्रोधसे कापते हुए कटहरसे बाहर जाने लगे, सिपाहीने पकडकर उन्हें फिर कटहरेके भीतर कर दिया । तब चिदानन्द लाचार निश्चेष्ट होकर बोले-"यरो यात्रा क्रास करो। मैं अथार समुद्र पडा हुआ हू-जिसकी इच्छा हो, फाद जागो-' अपामिवाधारमनुत्तरगम् ४ बना रहूँगा। वकील साहय । यह प्रशान्त महासागर लहरें नहीं रेता, आप खुशीमे उछलिए-फोरिए।" तय वकील माहयने अदालतम का-" धर्मावतार, या भादमी पागर जान पडता। इमे प्राम करनेकी कोई जरूरत नहीं है। पागर के कारण इसका इजहार किसी कामका नहीं, इसे याहर जानेकी भाता हो।" हाकिम चिदानन्दसे छुटकारा पाते ही थे, उसे विदा करना चाहत ही थे, इतनेमे श्यामाने राय जोड कर महारतसे कहा-" अगर हुकुम दोनो सुर उसमे उछ यातें पूटए, फिर रिदा फरसा होमो कर दीजिएगा।" - कारा शब्दके दो अर्थ - नॉप जाना और दूसग जिगर काला! जसे तरंगहीन समुन।

चौका चिट्ठा- १२० चिदा--" इस लोकमें तो मुझसे जुर्माना वसूल होनेकी कोई सभावना नहीं है, इस लिए जो जुर्माना वसूर करेगा उससे पूछेगा कि वह परलोक तक जुर्माना वसूल करने के लिए मेरे साथ चलनेको तैयार है या नहीं?" हाकिम--"जुर्माना न दे सकोगे, तो जेल जाना पटेगा। चिदा०-"कितने दिनोंके लिए धर्मावतार ?" हाकिम -"जुर्माना न अदा होनेपर एक महीनेके लिए।" चिदा.---. क्या आप कृपा करके दो महीनेके लिए नहीं भेज सकते १" हाकिम-“तुम अधिक कैद क्यो चाहते हो?" चिदा आजकल समय बढा नाजुक आगया है । अत्र ब्राह्मण-भोजनके निमन्त्रण बहुत कम मिलते, हैं । अगर जेलखानेमे दो महीने तक भाप ब्राह्मण-भोजनकी व्यवस्था कर देंगे तो यह गरीब ब्राहाण आपको आशीर्वाद O- “ 0- देगा। ऐसे आदमीको कैद या जुर्माना करनेसे क्या होगा ? हाकिमने हंसकर कहा 'अच्छा अगर तुम गडरट न करके साफ साफ ययान दोगे तो तुम्हारा जुर्माना माफ कर दिया जा सकता है । बताओ, इम गउको तुम पहचानते हो कि नहीं?" हाकिमने एक सिपाहीको आना दी कि वह पास जाकर श्यामाकी गऊ दिपला दे । सिपाहीने वही किया । क्षोभसे भरे हुए वकीलने पूछा-" इस गजको तुम पहचानते हो?" चिदा०-"इस मींगवालीको, यह कहो। वतीर-" तुम क्या समझे थे ?" चिदा " मैं समझा था शमलावारी। खैर, हा, मै इस सींगवाली गऊको पहचानता है। इसके साथ मेरी अच्छी तरह बोलचार है वकील" यह गऊ किसकी है? चिदा- वकील-" तुम्हारी?" चिदा हो, मेरी।" हरे हरे । श्यामाका मुंह सूख गया । वकीलने देसा, मुकद्दमा विगढा । तब श्यामाने गरज कर कहा-“ग तेरी हरामखोर?" । 0 " मेरी।" 0- .- hir जाता ।"

१२३ चिदानन्दकी जबानबन्दी। " " " , पागलपन तब फर्यादीके वकीलने कहा-मेरा काम होगया-मै अय उससे कुछ पूछना नहीं चाहता।" यह कह कर वे बैठ गये। तव असामीके वकील साहर सडे हुए। उन्हें देखकर चिदानन्दने पूछा-" तुम भैया कौन हो?" वकील-" में अमामीकी तरफसे तुम्हें क्रास करूगा। चिदा एक साहय तो क्रास कर गये--अब तुम कुमारबहादुर आये हो क्या?" वकील कुमारबहादुर कान?" चिदा.-" राजकुमारको तुम नही पहचानते ? प्रेतायुगमे समुद्रको पहले कास किया महावीरजीने, उसके बाद फास किया कुमारबहादुर ( अगद) ने।" वकील- यह कुछ मैं नहीं जानता। तुमने कहा है कि में गउको पह- चानता हू-केसे पहचानते हो?" चिदा--"कभी सींगसे और कभी शमसे।" वकील ने गुस्सेसे गर्म होकर टेविर पर हाथ पटक कर कहा- रहने दो-बतलाओ, गउको किस लक्षणसे पहचानते हो?" चिदा.--." इसी रेभानसे । वीरसाहव हताश होकर बोले-" Hopcless |" (नाउम्मेद) और ट गये। उन्होंने जिरह करनेका विचार ही छोड दिया। चिदानन्दने विनीत भानसे कहा-“ रस्मी क्यो तुडाते हो बानू" हाकिमो देगा, वकीर जिरह नहीं करेगा, चिदानन्दको उट्टी दी। चिदानन्दने भागकर अटारतके वाहर दम लिया। मैं कुछ अपना काम करके बाहर भाया, देखा कि चिदानन्द घेटा है, चारो तरफ लोग उसे घेरे खटे हैं-श्यामा भी यहाँ आगई है। चिदानन्द तिरस्कार करता हुआ उसमे कह रहा हे-" तुझे अपगी मगला गउकी सौगद, तुझे दूधकी मटकीकी मांगद, तुझे दृधदहीकी मांगट, तुझे अपनी हम विस्कोवाली नयी सांगद, इस चोरको गउ दे डाल । मैंने पूरा-" चायजी । यह चोरको गउ क्यों दे टाल " पिदान्दो कहा-"परे ममयमें महारान इथेननितमे एक ब्राह्मणने कहा था कि वठडा, महीर और चोर, इनमसे जो गज्का दूध पीता है यही ।

चौवेका चिट्ठा- हाकिमने कौत्तहलके साथ स्वीकार कर लिया । तर श्यामाने चिदानन्दकी तरफ देसफर कहा महाराज | आपकी भग छननेका समय हुआ कि ॥ में नहीं?" " + . - " - चिटा०-भगके लिए समय असमय क्या है री-"अजरामरनमासो विद्या नशा च चिन्तयेत।" श्यामा--" इस समय अपना यह अ-ब रहने दो। बतलामो, भग पियोगे?" चिदा.-"साडे। दयामा अच्छा, पहले भेरी वातका जवाब दो तो ला दूंगी। चिदा.-"अच्छा तो जरसी जल्दी पूछ श्यामा -" मैं पूछती हूँ, गऊ किमकी है ? चिदा. गऊ तीन जनोकी, पहरी अवस्थामें गुर महाशयकी, दूस- री अवस्थामे खीजातिकी, अन्तिम अवस्थामें उत्तराधिकारीकी, और रस्मी तुडाकर भागनेके समय किसीकी भी नहीं। इयामा मैं कहती है कि यह श्यामरा गज किसकी है ? चिदा०-" जो उसका दूध पीता है उसकी । यह गऊ मेरी है कि नहीं?" चिदा तू कभी उसका दूध ऐक बूंद नहीं पीती, केवल बेच बैंच कर मरती है, गऊ तेरी कैसी हुई ? वह गा अगर तेरी है तो चगारबक्का सब रपया भी मेरा है । अरी, गऊ इस चोरको दे दे-गरीब आदमी दृध पीकर तुझे असीसेगा।" 'हाकिमने देसा, दोनो आदमी बहुत बढते जा रहे हैं, अदालत मछली- वालियोका बाजार हो रही है। हाकिमने दोनोको धमकाकर प्रश्न करना बन्द कर दिया । हाकिमने खुद पूछा-" श्यामा इस गऊका दूध बेचती है?" चिदा.--"जी हा । हाकिम-" उसके घरमे यह गऊ रहती है ?" चिदा यह गऊ भी रहती है, और कभी कभी मैं भी । । हाकिम-" यही उसे खिलाती पिलाती है?" चिदा to-" उसे और मुझे-दोनोंको। श्यामा- “ -- " “ + ।

-- १२३ चिदानन्दकी जबानयन्दी। " " r तब फर्यादीके वकील ने कहा मेरा काम होगया-मै अब उससे कुछ पूछना नहीं चाहता।" यह कह कर वे बैठ गये। तर असामीके वकील साहर बडे हुए। उन्हें देखकर चिदानन्दने पूछा-" तुम भैया कान हो।" चकीर-" में अमासीकी तरफसे तुम्हे क्रास करूगा। चिटा.-- एक साहन तो क्रास कर गये--अब तुम कुमारबहादुर आये हो क्या?" वकील-" कुमारवहादुर कौन ? " चिढाo-" राजकुमारको तुम नहीं पहचानते ? नेतायुगम समुद्रको पहले काम किया महावीरजीने, उसके बाद कास पिया कुमारबहादुर (अगद) ने।" धकील यह कुछ मैं नहीं जानता। तुमने कहा है कि में गऊको पह चानता हूँ-कैसे पहचानते हो? चिदा.-"कभी सींगसे और कभी शमलेसे।" वकील ने गुस्सेये गर्म होकर टेपिर' पर हाथ पटक कर कहा-" पागलपन रहने दो-तलाओ, गउको किस लक्षणसे पहचानते हो?" चिदा.-" इसी रेभानसे।" धकीलसाहब हताश होकर बोले-" Hopeless " ( नाउम्मेद) औ बैठ गये। उन्होंने जिरह करनेका विचार ही छोट दिया। चिदानन्दने विनीत भावसे कहा-" रस्मी क्या तुटाते हो ना हाकिमने देसा, वकील जिरह नहीं करेगा, चिदानन्दको छुट्टी दे दी चिटानन्दो भागकर अदारतके पाहर दम लिया। मैं कुछ अपना काम करके बाहर आया, देवा कि चिदानन्द धेटा है, तरफ लोग उसे घेरे सडे हैं-श्यामा भी वहाँ आगई है। चिदानन्द तिरस्कार करता हुआ उसमे कह रहा ह-" तुझे अपनी मगला गउकी सौगद, दृधी मटकीकी सौगंद, तुझे दूधदहीकी मांगद, तुझे अपनी इस थिरकनेवाल मी सौगद, इम चौरको गउ दे डाल । मो पूछा-" चायेजी। यह चोरको गउ क्यों दे डाले?" चिदानन्दने कहा--" पूर्व समयमें महाराज श्येनजितसे एक ब्राह्मण कहा था कि बछडा, अहीर और चोर, इनमेंसे जो गजका दश पीता है 1 - " चौवेका चिट्ठा- १२४ . उसका यथार्थ अधिकारी है। और किसीका उसपर ममता दिखलाना विड- म्बनामान है ( महाभारत, शान्तिपर्व, १७४ अध्याय )। यह वो हुआ भी- प्मपितामहका Hindu Law (हिन्दूनियम), यही इस समय यूरोप- खडका International Law ( अन्तर्जातीय नियम) है। यदि सभ्य और उन्नत होना चाहते हो तो छीनकर साओ।गो शब्दका अर्थ चाहे गऊ समझो और चाहे पृथ्वी, इसका भोग चोर ही करते हैं । सिकन्दरसे लेकर रणजीतसिंहतक सभी चोर इसके प्रमाण है। Right of Conquest (विजयका अधिकार ) यदि एक Right (अधिकार ) है, तो Right of Theft ( चोरीका अधिकार ) क्या एक Right नहीं है ? अतएव हे श्यामा गोपी । तुम आईनके माफिक काम करो । ऐतिहासिक राजनीतिको मानो। चोरको गऊ दे डालो।" इतना कहकर चिदानन्द वहाँसे चला गया । देखा, वह बिलकुल ही पागल हो गया है। समाप्त।

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Chobey Ka Chitha

Author
Pandhey,roop Narayan
Title
Chobey Ka Chitha
File name
Chobey Ka Chitha
Text
OCR done
Citation
1920
Published
2011/01
Publisher
Hindi Granth Ratnakar Karyalaya Bombay
Language
Sanskrit
Pages
136
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546589
Barcode
4990010025049.00
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C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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