Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Karikavali

Vishvanath Bbhattachary · 2012/08

PDF Proofread

Front matter

भा IMITE IBRARY श्रीगणेशायनमः । नूतनजलधररुचये गोपवधूटी दुकूल चौराय । तस्मै कृष्णायनमः संसारमहीरुहस्य बीजाय॥१॥ नाम नाम घनश्यामं भगज्जन्मादिकारणम् । प्रकुर्वे कारिकावस्या निगूढार्थप्रकायनम् ॥ १ ॥ श्री गुरुभ्यो नमः । पग्म कपायुत विश्व पन्चानन जीने वैविक न्याय व तत्व को संक्षेप से कारिकारूप में प्रकट करने हेतु प्राने रम्भ विषयग्रन्थ की निर्विघ्न समाप्ति के लिये मिष्टापरित मङ्गल को आचरण करके अन्य के प्रारम्भ मे शिष्य शिक्षा के ये उसे किया नितनेति नवीन मेघों की न्याई गोभायुक्त पानी की युवती स्त्रियों के वस्त्रों के हरण करने वाले संसार नक्ष के बीज अर्थात् निमित्त कारण सकल मंमार प्रसित किय देव को नमस्कार हो म श्लोक में परमात्मा की रूपी # रक्षित रय होने से प्रत्यक्ष विषयत्व बन नहीं चला गन्द सण विट) ईयरोक होने में प्रामाण्य लाभ करमका जब परवा सिंह न होगा तबतक वेदयामाएय नहीं बनेगा प्रतः में परमात्मा की प्रमा अनुमान से होती है मचित यह मङ्लत्वच विघ्नोत्सारणासाधारणकारणत्वे सति साध्य. R प्राचीननवीनयोर्मलेमतभेद: प्राचीनास्तु ममाप्तिम्प्रति प्लाय कारणत्व स्पीकुर्वन्ति नव्यास्तु विघ्नध्वसम्प्रत्येव समा- रितु बुद्धि प्रतिमादिकारपकलापन एवं तिवदन्ति । जपद किया तथाच क्षिति अक्षुरादिकर्तृजन्य हैं कार्य होने में घर को न्याई हम में से कोई कार्ग बन नहीं समा जो कर्ता है वही ईश्वर जब कार्य लिङ्गकानुमान से ईश्वर मिडि हुई तो पश्चात् । परमात्मोक्त वेद भी प्रमाण होकर प्रग्रेमर हुआ तथाहि द्यावा. ममी जनयन् देव पवा भास्ते विश्स्वयकर्ता मुंबनायगीप्ता"लोक और भूनीक के कर्ता और ममात सर का पालक परमात्मा एक है। (शं.)श्वर यक मानने से क्या दोष है (.) विका रश मे जगन्निर्माण न होगा एक ईश्वर कहेगा जगन्नतन दूसरा कहेगा नही प्राचीन रहे जिसकी इच्छा पूर्ण न होगी वही ईशवर नहीं कहावेगा सिनिये वर एक है। • द्रव्यं गुणस्तथाकर्म सामान्य स विशेषकम् । समवायस्तथा भावः पदार्थाः सप्तकीर्तिताः ॥२॥ ध्य गुण तेसे कर्म सामान्य (जाति) और विशेष समाय और भाव यह सप्त पदार्थ वैशविक भास्त्र सम्मत यद्यपि प्राचीन ग्रन्यों में भाव प्रभाव भेद से दो प्रकार के पदार्थ लिसे और समान तन्त्र में अर्थात न्याय में प्रमाणादि भेद से घोड़ा पदार्थ लिखे हैं तथा मीमामा शास्त्र में उम २ पदार्थ की भक्ति को जैसे वन्हिमें दाहानु कल मामय ऐसे ही सादृश्यको भी भिन्न माना है तथापि इन्हीं सप्त पदार्थों में हो सर्व का अन्तर्भाव हो जाता है घन: न्यू मता नहि ३/• प्रेक्षावत्महत्या होने से पन्य के प्रारम्भमेन अनुवन्धचतुष्टय का निरूपण करना आवश्यक था *पद लन्ध प्रतीति विषयत्व द्रव्यादि मप्ताकान्यतमत्वं का पदार्थत्वम् । * प्रत्यु पयोगि भानजनक ज्ञान विपनत्व मनुबन्धचतुष्ट यत्वम् ।

उसके बिना कहे अन्य प्रारम्भ उचित नहि (उ.) पदाधि से हि
अनुबन्ध चतुष्टय अर्थतः कह दिया है जैसे द्रव्यादि पदार्थ विषय
द्रव्यादि पदार्थ तत्वावकरण प्रयोजन एतत्तत्व,षधारणेच्छावाम्
अधिकारी और प्रतिपाद्य प्रतिपादक भाव सम्बन्ध /०) उद्दश
मे द्रव्य काही नाम पूर्व क्यों किया वों न गुणादि मे से किमी
दूसरे का (उ०) द्रव्य ही अपवर्ग भागी है द्रव्य हो गर्बका पायब है
अतः इसीका प्रथम यहण किया (श•) द्रव किमको कहते है (उ०)
गुणवत्वाधि करण को अयश द्रव्यत्य जाति वाले को ध्य कहते है
(.) पर्व को वो बोड़ते हो (उ.) न्याय मे द्रव्य उत्पत्ति क्षण में
निर्गण ही उत्पन्न होता है इस निये उत्पत्ति क्षण में दृध्य मे गुण
वत्व लक्षण न जान से अ-याप्ति रूप लक्षण दोप लगेगा जब दव्य
त्वजाति को लक्षण माना तो अगाप्ति इट मा कोकि ध्यत्य
जाति उत्पत्ति क्षण के दूध में भी अनि ध्याप्ति प्रयाप्ति और
और असम्भव इन तीन दृषणों से रहित धर्मको लक्षणकथन करते
है जिस का नन ए करना इष्ट हो उसे लोकहों जो लक्ष्य
नहि वह यलो अनदर मे लग जानेको अति व्याप्ति कर
ते हैं जैसे गौ का लक्षण शागिन किया तो गित्व अन्नध महिपो
में भी जाता है प्रतिव्याप्ति दे पछुपा मग गो का नील रूप
यत्व लदाय किया वह पीत गौ म रहि जाता परन्त मर्य गौ
सक्ष्य
है अत' एक देश लक्ष्य को पीत मे न रहने में अध्याति ई और
मम्भव वह जी लक्ष्य के किसी एक देश में भी नही जसे गौका
एकगफत्व लक्षण किया तो यह गो मात्र मे नहि रहता अपितु
रासभादि में रहता है अतः तीनों दोषों से शून्य गौ का लक्षण
गंगसारनावत्वं यक है।
क्षित्यप्तेजोमरुद्योमकालादिग्दहिनीमनः।
द्रव्याण्यथगुणारूपरसोगन्धस्ततः परं ॥ ३॥

(४) स्पर्शः संख्या परिमितिःपृथकश्चततःपरम् । संयोगश्चविभागइचपरञ्चापरत्वकम् ॥ ४॥ बुद्धिः सुखं दुःखमिच्छाद्वेपोयत्नोगुरुत्वकम्। इत्यत्वंस्नेहसंस्कारावष्टंशब्दावच ॥५॥ चितोति, चिति, प्रथिवी, अप, जल, तेजः, न्यादि, मस्त पायु, थ्योम, आकाश, काल, समय, दिक् दिशा, देही, मात्मा, मन, यह नव टूव्य है (i०) यदि देही से आत्मा की पहा करते हो तो केवल जीवात्मा काही होगा क्योंकि जीव का को गरीर शेताहै परमात्मा का नहि (उ.) भतावश न्याय यही लोगों के कमी से परमात्मा का भी देह गास्त्र सम्मत है यद्यपि मीमांसकतम को नवद्रव्यातिरिक्त द्रव्य मानते हैं और युक्ति में देते हैं कि यह प्रमिद द्रव्यों से विरुद्ध धर्मी वाला है कुपि द्रव्य वृथिवी जल लेजः यह सर्व प्रास्तोक सह शात नेत्र से गृहीत होते हैं और यह तो निरपेक्ष से ही गृहीत होता है और नीलतम चलता समीति से रूम वाला और क्रिया वाला होने से भी द्रव्य सक्षण इस में घटित होता है तथापि नौट प्रकाशक तेजः सामा. न्याभाव हो को तम मानने में लापन है और पति प्रतीति भी समरूप है (०) तमोभावही तेज मानले तो क्या हानि है (a.' उद्भतस्पर्गके प्राथय का वाध प्राप्त होगा वह भनिष्ट । प्रति रुपरसगन्धस्पर्शमस्या परिमाण पृथक संयोगविभाग परत्व पौर गुणवत्वं द्रव्यत्वज्ञातिमत्वं वा ढव्यस्यलक्षणम् । २ द्रव्यकर्माहतिजातिमत्वं गुणसामान्य लक्षणम् ।। गुणाबजातिमिहिरतु द्रव्यकर्म भिन्न सामान्यवति या कारपता सा किचकर्मावच्छिन्नाकारपसात्वात् दण्ड हतिकार एतावत् ॥

पपरत्व धुधि (ज्ञान) सुख दुःख इच्छा रेप प्रयत्न गुरुत्व द्रवत्व स्नेह(चिक्वणता) संस्कार और धर्म और अधर्म ये २४गुण इन्हीं गुणों में से सप्तदशको तो कणादजी ने करठ से मूत्र में ही पढ़ा और आगे चकार पढकर सप्तका ममुच्चय किया है (f.) लघु स्वमदत्य कठिनत्व भी और गण हैं तो २४ कैसे (४०) लघुत्व गुरुत्वाभाव रूप ही है और मदुत्व कठिनत्व भी अवयय संयोग विशेष ही है अतःप्राधिवय शडका व्यर्थ है।। ५ ॥ उत्क्षेपणं ततोऽपक्षेपणमाकुञ्चनंतथा। प्रसारणञ्चगमनं कर्माण्येतानि पञ्चच ॥६॥ उत्क्षेपणेतिउत्क्षेपणउईदेश संयोगहेनुकर्म अपक्षेपण अधोदेग संयोग हेतु पाकुचन अङ्ग कौटिल्य मंपादक्कर्म प्रसारण ऋजुता सम्पादककर्म गमन उत्तरदेश मंयोगजनककर्मये-पञ्चविधकम यह कर्म यह कर्म इस अनुगत प्रत्यय से कर्मत्वजाति तो प्रत्यक्ष भ्रमणं रेचनं स्यन्दनो ज्वलनमेवच तिय्यंग् गमनमप्यत्र गमनादेव लभ्यते ॥७॥ भ्रमणेति भ्रमण चक्कर रेचन तिनकना स्यन्दन प्रसवण जब व्यस्तन वन्हिकर्म तिर्यगगमनतिरक्षाचसनासादिक्रिया, ये सर्व गमन के ही अन्तर्गत होते है अतः अधिक नहीं। (पं.) उरक्षेपणादिभी गमन में आसक्त है तो फिर उनको पृयक क्यों लिखा (उ.) मुनिको स्वतन्वेच्छा है इस में प्रष्ण नहीं होता है। संयोग भिन्नत्येमति संयोगासमवायिकारणत्वम् कर्मत्वम् 4 सामान्यं द्विविधं प्रोक्तं परचापरमेवच। ट्रव्यादि त्रिकत्तिस्तु +सत्तापरतयोच्यते।। परभिन्नाचयाजातिः संवापरतयोच्यते । द्रव्यत्वादिकजानिस्तु परापरतयोच्यते ॥ ९ ॥ व्यापकत्वात्परापिस्याव्याप्यत्वादपरापिच ।। मामान्यति मामान्य (जाति) दो प्रकार का है एकपर पर्यात , अधिक देग में रहने वाली मग पपर पर्यात् न्यन में पर्तने वती द्रष्यादि तोनी में रहने वाली जाति मापौर वहीं परा भी कहाती हे शिमके होने में ही द्रध्यं मस् गुणः सन् कर्मसत् या प्रयोग होता भिन्न पनेक ध्यालियों में एक प्रकार का बोध जनक पदार्थ जाति होती मी जाति को दोह नहीं मानते क्योंकि यह नित्य पदार्थ नित्य उमको कहते हैं जिम का न तो को प्रभाव और नाही हो ऐसा पदार्य प्राकाग: मत्तादध्यादिषु विपु केवलमनुगतप्रत्ययजनयति नतुव्या- प्रतिमपि पतःसामान्यमेवोच्यते द्रव्यत्वादिशातुभ्यासत्यनुगते त्पुभयप्रत्ययोत्पादकत्वेन मामान्यविगेषो भयरूपम् नयास्त मध्यवहारस्य सार्वत्रिकत्वात्सत्तान नातिरपितुभावत्वमिति । नित्यत्वे सत्यनेक समवेतत्वं नार्लिक्षणम् । जाति खन्नुध्यमि मन्तराना वतिष्ठते तीनातिव्यथोनित्य मम्वन्ध स एवसमवाय पदेनीच्यते शं.सकलभावकार्यध्वंसो- महाप्रलय इत्यु का लक्षणवान्महाप्रलयस्य तक्षमस्तभ्यक्ति- नागाज्जात्यवश्थानं क्वेतिचेन्नमहाप्रलयानङ्गीकारादितरया' भाव कार्यान्तः पातित्वाददृष्टानामपि तन्नाशराष्ट्य नुदय प्रसङ्ग स्थान्नहि वीज प्रयोजनाभ्यां विनोत्पत्तिरिति नध्याः।

- - . और वो तो पदार्थमात्र को क्षणिक (द्वितीय क्षणध्वम प्रतियोगी) मानते हैं उनके मन में कोई भी नित्य नहीं अतः अपने मत में नातिरूप भेदक धर्म के न रहने मे गोत्व धर्म में जो गो का प्रश्य से भेद मिद होताहै गोत्व को असम्याति रूप मान कर निर्वाह किया तत् पद से गोत्व धरा उमकी व्याति नाम भेद अश्वपर रहा फिर भेद का अभाव गो पर आया इम तरह गौ व से भिन्न सिद्ध हुई मो यह प्रकार ठीक नहीं खण्डन प्रक्रिया मे ग्रन्थ बढ़ने का भय है अतः विराम करते हैं ॥८॥ पर भिन्न लो जाति वही अपर कहाती है दृत्व आदि गुणत्वादि पर और अपर कहाती है ॥ ८ ॥ व्यापक होने से पर्थात् अधिक देश में वर्तने मे पर और व्याप्य होने से अल्प देश में रहने में अपर जैसे द्रव्यत्व पृथिवीत्व अपेक्षा से अधिक देग अर्थात् नव दटयों में रहने मे तो पर और सत्ता की अपेक्षा न्य नदेश में रहने से अपर भी है क्योंकि मत्ता द्रव्य से अतिरिक्त गुण और कर्म में भी रहती है। "अन्त्यो नित्यव्यवृत्तिविशेपः परिकीर्तितः॥१० विशेष का निरूपण करते है अन्त्येति अन्त में जो होलो अन्त्य कहते है अन्त को साक्षेप होने से किस का अन्त कल्पना का अन्त अर्थात् घटादि पदार्थो का इणुक पर्यन्त अपने २ अयव भेद में भेद मिह होता है परमागापों के अवयव नहीं हैं अतः पृथिवी * विशेपलक्ष पन्तु सामान्यगन्यत्वेसति सामान्यमिन्नावेच मति ममतत्वम् स्थनो व्यावतंकत्व वा । नव्यन्यायिका भट्टकोमिन प्रभाकरादयस्तु विपन्नोररीकुर्वन्ति विशेषाणां ययैव स्वातिधर्म विनय च्यातत्व तथैवनित्यद्राणामपिन तत्रविपापेक्षणमिति (E) , परमाणु से जलीय परमायु का भेद मिा करने के लिये विश्व की कल्पना की नोकि नित्य ध्यों में रहते और अनन्त जिनका दुमरा कोई भेदक धर्म नहीं २ दस्वतः ही ध्यावत परूप पतएव उनमें विशेषत्व धर्म को जाति नहीं मामा नरों तो विशेष के स्वरूप की हानि होगो प्रतः विषय में विशेषस्य उपाधि है जाति भिन्न धर्म को उपाधि कहा यधपि पर. माणुगों में धमारो प्रत्यक्षं विषयता ही नहीं तो भेद व्यवहार की अपेक्षा ही कैम तयापि योगियों की तुल्याकति परमाणुपी में और मुखात्मायों तथा मन आदि में से एषप्रयं यह प्रत्य. भिज्ञा केमे होगी शं. केवन योगजधर्म माहात्म्य से हो मामे सो क्या होगा, ऐसा नहीं होता अशुक में शुका प्रत्यय होगा तो धमकी मिड होगा प्रमा नहि ॥१०॥ घटादीनांकपालादोद्रव्येपुगुणकर्मणोः। ते जातेश्चसवन्धःसमवायःप्रकीर्तितः॥११॥ अवयत्रियों का अवयवों मे गुण और कमी का द्रव्यो में और द्रव्य गण कमी में जाति का चकार से नित्य द्रव्य पौर विशेषों का जो सम्बन्ध वह ममाम कहाता है यह . १ नित्यत्वेसति समन्धि भिन्नत्वे च मति मधन्धत्वं समवायत्वम् नित्यत्वमा बक्तावाकाणादावति प्रमशिग्यात्तदर्थ गंवन्धत्व मुपारतं मम्बन्धत्वं समभयत्व मित्युक्तौ योगादापति प्रसङ्गोमाभूदिति नित्यत्वग्रह तावतापिरवरूप मबन्धेऽतिच्याप्ति स्यात् स्वरूप सम्बन्धानामान्न्त्येनाकाशादिश्वरूपसम्बन्ध- नान्नित्यत्वमेवास्ति तदर्थ मम्बन्धि भिन्नत्योपादानं स्वरूप बन्धरय च सम्बन्धि रूपत्वेन तदभिन्नावामा इति नाति ध्याप्तिः।

सम्बन्ध नित्य और एक न्याय और वैशिषिक शास्त्र सिम है परन्त कार्य कारण के परस्पर इह कपालयोघंट. इन कपालों में घट है इम प्रात्यक्षिकी प्रतीतिगम्य समशय है यह नैयायिक मानते है और समवाय अन्तीन्द्रिय गनुमेयवैशेषिक मत है अनुमान (म.)गुण क्रियादि मे युक्ता बोध विशेषण विशेष्य और उन के परस्पर मम्बन्ध विषयक इ विशिष्ट बोध होने मे दण्डी पुरुष इस विशिष्ट बोध की न्याई विशिष्ट बोध प्रकृतमें हुअा नील घट यहा पर नील विशेषण घट विगेप्य जो इनका सबन्ध होगा स्वरूप सम्बन्ध मानने में गोरव होगा सयोग के बल द्रव्यों का ही होता है और अन्य सम्बन्ध के बाध में अतिरिक्त नित्य एक समवाय सम्बन्ध की सिद्धि हुई श०)समवाय के एक मानने में जी समवाय रूपका है यही तो स्पर्श का है तो घायु रूपवान ऐसा ज्ञान होना चाहिये क्योंकि वायु में भी रूप समवाय है ममवाय को एक होने से(७०)सम्बन्धमत्ता ही केवल विशिष्ट बोध में नियामक नहि प्रत्युत सम्बन्ध सम्बन्धि दोनों की सत्तानियामक हैं तो वायु मे यद्यपि रूप समवाय है भी तथापि रूप प्रति योगिक ममवाय नहीं अर्थात् रूपके न होनेमे रूपवान् वायु यह ज्ञान नहि होता वायु में स्पर्य प्रति योगिक समवाय है प्रतारपणवान् बायु यही ज्ञान होता है कारणाभाव में हो समवाय नित्य है यदि इसका भी कोई सम- वायि कारण मानें तो उसमें समवाय का समवाय रहेगा तो अन यस्था सम्बन्ध की पडी अतः यह नित्य है।।१॥ अभावस्तु द्विधासंसर्गान्योन्याभावभेदतः। प्रतियोगितानाधीन-जानविषयत्वमभावत्वम् २ भेदैतरा 'भावत्वं संसगीमावत्यः ।

स प्रागभावस्तथापच्चंसोम्यन्त्यन्ता भाव एवचा१२ एवंविध्यमापन्नः संसर्गाभाव इप्यते । टीका-प्रभावनिरूपण्यभापस्विति संमभाष चौर अन्योन्या भावके भेदसे यमाय दो प्रकार का है प्राभाय अर्थात् कार्य को उत्पत्ति से पर्व अपने कारण में जो कार्य का समाप उसको मागभाव सो को प्रतियोगीजनक प्रभाव भी करते हैं और अपने पधिकरण में उत्पत्ति के पनन्तर मुद्गर पानादिम जायमान जो अभाव उसको ध्वस कहते हैं इन कपाली में घट नष्ट हुमा इस प्रतीति का विषय होता है और वायु में नो रूपाभाष पाह अत्यन्ताभाव ह क्योंकि वस्तु की तीन काल सत्ता न होने से जो निषेध.प्रत्यय ह यह अत्यन्ताभाव को गोचर कर्ता हे घट पट का जो परस्पर भेद घट पट नहीं है इसी को अन्योन्याभाष कहते हैं पाल प्रागभावादि भेद से संसर्गाभाय तीन प्रकार का होता है। मोमामिक प्रभाष को भधिकरण स्वरूप मानत है भूतल मे घटाभाव भतल स्वरूप नल में जल स्वरूप रस का सएन प्रकार में घट नहीं है यह बुद्धि यदि केवत्त भूतल का ही विषय करतो तो घट पाले स्थान में भी इस ज्ञान का प्रसंग होता कदाचित् कहें केवल भतल को गोचर करती है तो नहीं ३ तादात्म्य सबन्धा वन्नि प्रतियोगिताकाभावत्व मन्योन्याभावत्वम् ४ प्रतियोगिसमवायिकारणत्तिप्रतियोगिजनका भविष्यतीतिव्यवहारहेतु मागभावः प्रतियोगिसमयायिकारणत्तिः विस्तव्यवहारहेतु ध्वसः ॥ कालिक ससर्गावच्छिन्न प्रतियोगिताका भावत्वमत्यन्ता भावस्थम् ॥ कि भूतल कह सतो अतिरिक्त कैवल्य का स्वीकार नहीं है और अभेद में आधारा धेयभाव भी नहीं बन मता पोर जल मं गन्धाभाव गन्ध स्वरूप मानने से जिस इन्द्रिय मे जिस वस्तु का यहण होता है उसमें रहने वाली जाति और उसके प्रभाव का भी उसी से ग्रहपा होता है इस नियम से जल का ग्रहण घ्राणेन्द्रिय में प्राप्त होगा परन्तु होता नहीं अधिकरण भिन्न प्रभाव को मानने से लाघव भी होगा अतः प्रभाव पृथक् पदार्थ है ॥ १२ ॥ सप्तानामपि साधयं ज्ञेयत्वादिकमुच्यते ॥१३॥ टीका-अब मुक्ति के उपयोगी पदार्थो के साधय अर्थात् समान धर्म और वेधयं अर्थात् विरुद्ध धर्मा को कहते हैं सप्ताना मित्यादि ग्रन्थ मे वैशेषिक शास्त्र में जो साधर्म्य वैधम्य पूर्वक पदार्थ ज्ञान है उसी को मुक्ति का परम हेतु कहा है निरुक्त सप्त पदार्थों का समान धर्म जेयत्व ज्ञान विषयत्व आदि पद से अभि. धेयत्व अभिधा,नाम संकेत उसमे ग्राधत्व के ऐसे ही प्रमेययत्वादि भी कहा है अर्थात् सर्व पदार्थ ज्ञानगोचर है जो अस्मदीय भान विषय नहीं भी तथापि परमात्मा के ज्ञान के विषय तो अवश्य है जिसमे ईश्वर सर्वन है ॥ १३ ॥ * द्रव्यादि सप्तानाम्ममेयत्वादिकं समानो धर्मः। द्रव्यादि पटकस्य भावत्वम् भायत्वेसत्यनेकत्वं समवायित्वञ्च द्रव्यादि पञ्चानां गाधयम् । एतत्पदकत्यन्तु भावत्यमानोशौ समवायेऽति प्रसति स्यादित्यनेकत्वग्रहणं तावतापिदोपोऽभावेपतेदितिभावत्व- विशेषणम् । समवेत ममवेतत्यं द्रव्यादि चतुर्णा साधम्यम्। सत्ताजा त्याययत्वं द्रव्यगुणकर्मणां समानी धर्मः । कर्माहतिजातिमत्वं 'द्रव्यगुणयो साधयमा द्रव्यादयः पञ्चभावा अनेक समवायिनः। सत्तावन्तस्त्रपरत्वाद्या गुणणादिनिर्गुणक्रियः ॥१४॥ सामान्यपरिहीनास्तु सर्बेजात्यादयोमताः । टीका-द्रव्यादीति द्रव्य में लेकर पाचों का भाव होकर अनेक होना और समाधि होना समान धर्म है इस प्रकरण में सर्वत्र समान धर्म स्वयं समझ लेना। घोर प्रादि के तीन द्रव्य गुण कमी का मत्तावत्य पर्यात् सत्ता जाति का प्राश्रयत्व पौर गुण से लेकर छः पदार्थो का गुण रहितत्व तथा क्रिया रहितत्व साधर्म्य है (०) एक रूप रस मे पृथक है इस प्रतीति घन में गण रूप में भी एकत्या संरया और रमावधिक पृथक गुण सिर ही है तो गुण साधर्म्य निर्गुगत्य के से कहा (७०) एकार्थ समवाय से केवल रूप में संख्या प्रतीति है और साधयादि प्रकरण में तो समवाय मम्बन्ध मे गुएवत्व इष्ट है ॥ १४ ॥ और जाति से लेकर जितने पदार्थ हैं उनका सामान्या नधिकरणस्य माधय है पोंकि जाति में नाति मान तो अन. वस्था हो॥ पारिभाण्डल्य भिन्नानां कारणत्वमुदाहृतः॥ १५॥ टीका-पारिमाएडल्य परमाणु परिमाण तथा घणुक परिमाण से भिन्न पदार्थो का कारणता रुप साधर्म्य है। (श०) कारण के गुणों से कार्य के गुण उत्पन्न होते हैं तो परमाणुनी *(श)प्रत्यक्ष विषयस्य कारणत्वाद् योगिनानस्यच परमाणु परिमाणेऽप्यन्याइतत्वात्कथं परमाणुपरिमाय नकारणत्वमिति चेचकृष्ण तत्रयोगीतरप्रत्यचे विषयस्य कारणत्वमित्यभि प्रतत्यादि तरयानागतादि बोधोयोगिनामपि दुर्लभोभवेदिति ॥

से उत्पन्न होने वाले ध्यणुक के तथा घणक में उत्पन्न होने
धाले धणुक के परिमाण का उत्पादक परमाणु परिमाण और
इयणुक परिमाण ही होगा तब कैसे उनका कारणत्वमा-धयं
नहीं (8.) परिमाण का यह नियम है कि अपने सजातीय अपने
में उत्कृष्ट परिमाण को हि उत्पन्न कर्ता है जैसे कपालों के
महापरिमाण से घट का कपान परिमाण की अपेक्षा से उत्कृष्ट
उत्पन होता है और मनातीय अर्थात महत् भी है इसी
न्याय में परमाणु परिमाण इयणक परिमाण का कारण माने तो
इयणुक परिमाण से उत्कृष्ट नहीं है क्योंकि अण की उत्कृष्टता
अधिक अगए होगा जैने देवों में बड़ा देव कोन जो बहुत दयालु
हो ऐमा हो राक्षों में बड़ा रानम कोन जो बहुत निर्दय ही ऐमे
ही ध्यणुस परिमाण भी ध्यणुक परिमाए का सजातीय नहिं
क्योंकि पाक का महत् परिमाण है और यदि इयणुक परिमाण
सेरिस की उत्पत्ति होती तो इम में भी अधिक अणु पग्मिाय
पाता तब तो व्यगुफा का प्रत्यक्ष भी न होता वर्धाकि वक्ष्यमाण
पड़ विध पत्यक्ष में महत्व कारण है इम कारिका में पारिमागस्य
उपनक्षक है जो अपना बोधक होकर अपने से दुमरों का
भी बोधक हो उठे उपलनक कहते है पारिमाएडल्य ने
.अणु परिमाण का बोधन किया और परम महत और परमा'
गुत्व और विशेष पदार्य का भी बोधक है अर्थात् यह भी तीन
किमी के कारण नहीं (शं.) तो फिर ध्यणुक परिमाण तथा
यणक परिमाग कहा से उत्पन्न हुआ (उ०) परमाणुगत हित्व
मंख्या में प्याक परिमाण को और इयणुक गत विश्व मख्य'
गणुक परिमाप को उत्पत्ति होती है ।। १५ ।
अन्यथासिद्धिशन्यस्य नियता पूर्ववर्तिता।

कारणत्वं भवेत्तस्य विध्यं परिकीर्तितम् ॥ १६ ॥ समवायि कारणत्वं ज्ञेयमथाप्य समवायि हेतुत्वम्॥ एवं न्यायनयजेस्तृतीयमुक्तं निमित्तहेतुत्वम् ॥१७॥ यत्समवेतं कायं भवति ज्ञेयन्तु समवायि जनक तत् । तत्रासन्नजनक द्वितीयमाभ्यां.परं तृतीय स्पात् ॥ १८ ॥ टी. -अवधारण स्वरूप कहते हैं अन्यथा सिद्धि में जो रहित हो कार्य की उत्पत्ति हण में नियम से पूर्व रहे उसे पारण करते है और वह तीन प्रकार का कहा है ||१६ प्रथम का नाम समाधि दसरा अमवायि तृतीय निमित्त कारण न्याय वेत्ताओं ने कहा है ॥ १७॥ जिसमें समवाय संवन्ध से कार्य उत्पन्न हो उसे ममाथि कारण नानना चाहिये और समयायि कारण में रहनेवाले कारण को अक्षमवायि कारण और इन दोनों से भिन्न कारण को निमित्त कहा है ॥१८॥ कारण विचार संक्षेप , है कि तन्तुओं में पट ममवाय संवन्ध से उत्पन्न होता इसलिये पट के समाधायि कारण तन्नु हुये परन्तु यावत् तन्तु संयोग न हो तावत् पट उत्पन्न नहीं होता तन्तु संयोग भी पट का कारण हुआ और तन्तु संयोग तन्तुओं में रहता हैपटसमाथि *अन्यथा मिहि शुन्यत्वेसति कार्यानियत पर्वत्तित्वं कार. पत्वम् ममत्रायि कारणतित्वे सति कारणस्वमसवायि कारण त्वम् उभय भिन्नत्य मति निमितत्यम् कार्यस्वावच्छिन्न कार्यता निरूपित कारणतामालित्वं साधारण कारपत्वंम् । कार्यत्व ध्यायधर्मापच्छिन्नकार्यता निरूपितकारणता शातित्व मसाधारण कारणत्वम्। + में यह कारण तन्तुओं में रहने से तन्तु संयोग यट का असमायि कारण बना और जबतक तन्तुवाय तुरीवेमादि न हो फिर भी पट नहीं बनता आता यह भी सर्वकारण हुए। परन्तु न तो इनमें समवायि कारण लक्षण घटसाई नाही असमायिका अतः परिशेप से निमित्त कारण बने अन्यथा सिहि कहते है जिसको बिना कार्य के स्वरूप लाभ में कुछ क्षति न हो उसे अन्यथा सिख कहते सद्यत्ति धर्म को अन्यथा सिदि जैसे घट कार्य के लिये रासम यदि रासम द्वारा मही नाभी कुम्भकार लाता अपितु स्वयं लाता तो. रासभ के बिना भी घट बन गया अत: रासभ अन्यथा सिद्ध और कुलाल .कारण है इमी कारण के प्रकारान्त से दो भेद हैं साधार असाधारण जो सर्व का कारए हो वह साधारण होता है जैसे ईश्वरादि तत्तत् का नो कारण हो वह असाधारण जैसे कुलाल घट का। येन सहपूर्वभावः कारणमादायवायस्य । अन्यप्रतिपूर्वभावे ज्ञातेयत्पूर्वभावविज्ञानम् ॥१९॥ जनकप्रति पूर्ववर्तितामपरिज्ञायन यस्यगृह्यते ॥ 'अतितिमथापियद्भवेन्नियतावश्यक पूर्वभाविनः२० पन्यथा सिदिस्तु पूलिध्वन्ययासिहेषु वर्तमानरतदर्म वि- येषः मपिकारस्तु विविधोऽन्यथा मिकः । नवीनास्तु लघुनियत पर्ववर्तिन एव कार्य समये सद्विन्नमन्यथा सिहम्, प्रत्यनुगत सधणेनेक विधमेवान्यथा सिम् । एवं च विधापञ्चति प्रकारी मध्यमतिपद्यार्थम्, स्याहुः । इयचान्यथामितिः कारणत्व विघटिका नतु मम्पादिका भवतीति नेयम् ।

. टी०- अन्यथा मिकों को कहते हैं येनेति जिम कार्य के प्रति कारण की जिस रूप में पतिता हो वह रूप उस कार्य के प्रति अन्यथा सिद्ध होता है जैसे घट रूप कार्य के प्रति दण्ड दएकत्व रूप धर्म में पूर्व अत्ति हुआ अतः घटपति दण्डत्व अ. न्यथा सिद्ध दितीय कहते हैं अथवा निमुला केवल अपना. अन्धय व्यतिरेक नवने फिन्त अपने कारण के माथ ग्रहण हो वह भी अन्यथा मिह है मे घट के प्रति दपड कप अब तृतीय कहते है अन्य के प्रति प्रथम विद्यमानता जानकर ही जिस की प्रकृत कार्य में पूर्व वर्तिता मानी जाय वह भी अन्यथा सिद्ध जैसे घट कार्य के प्रति आकाम आकाश को मन्द ममायि कार- पत्वेन सिद्धि होने मे शब्द के प्रति पूर्व कृतित्व गृहीत ही है फिर घट प्रति पूर्व वृत्तित्वग्रहण करने में नाकाम को घटकार्य प्रति अन्यथा सित्व है |॥१८॥ चतुर्थ कहते हैं और शिमको कार्य जनकजनकत्व रूप में कार्य के पूर्ववृत्तिता ग्रहण की हो वह भी अन्यथा सिद्ध है जमे घट के प्रति कुलाल पिता उम को कु लाल पितृ त्धेम अन्य यासिहत्य कुन्तालत्वेन कारणता मानने में कोई हानि नही पन्चम कहते हैं जिनका नियम मे जिम र कार्य के प्रति पूर्वत्तिय है उनसे नो भिन्न सभी पदार्थ वे अन्यथा सिंह घट कार्य को प्रति नियम से पूर्व वर्तित्व दण्डादि को साइन्मत्व रामभादि मे है प्रत रामभादि घटकार्य के प्रति अन्यथा सिद्ध है।॥ २०॥ एतेपञ्चान्यथा सिद्धा पडत्यादिकमादिमम् । घटादो दण्डरूपादि द्वितीयमपिदर्शितम् ॥२१॥ तृतीयन्तुभवेद्योम कुलाल जनकोऽपरः । पञ्चमोरासभादिःस्या देतेप्वावश्यकस्त्वसो २२ .

टो०-ये पूर्योत पांच अन्यथा मिद हैं घटादिक कार्य के प्रति प्रथम अन्य या सिह दाइत्यादिक धर्म के हितोर दगड रूपादि है।। २१॥ तृतीय अाकाश है चतुर्य कुलाल पिता है पञ्चम रासभादि है। इन सर्य में यह पञ्चम अन्यथा सिब तो आवश्यक है॥२२॥ समवायिकारणत्व द्रव्यस्यैवेति विज्ञेयम् । गुणकर्ममात्रवृत्ति ज्ञेयमथाप्य समवायिहेतुत्वम् २३ अन्यत्र नित्यद्रव्येभ्य आथितत्व मिहच्यते। क्षित्यादीनां नवानांतु द्रव्यत्वं गुणयोगिता ॥ २४ टी.-समायि कारण होना केवल द्रध्य काही ममान धर्म के अममरायिकारण होना केवल गुणकाम या हो समानधर्म है यद्यपि आत्मा को विगेप गुण मिमी ने भी मममवायि कारण नदी तथापि असमयायि कारणत्व गुणकमी मे भिन्नों का विरुद्ध धम हे अर्थात् अमवायिकारण गुप्तकमी मे भिन्न कोई नहीं होगा 1 ॥२३॥ नित्य ट्रन्यो में गिन्नी में आथितत्य माधर्म्य है यहा आश्रितत्यपद में ममवायादि मतन्ध से रहना रूप अर्थ विवक्षित हे ऐसे अर्थ में कालिक विपण संबन्ध में परमाणुओं ननु परमाणनामपि संयोगेनहत्ते स्तच तिव्याप्ति मिति चेन्न तत्सयोगस्य प्रत्यनियामास्यात् पतनप्रतिवन्धकमयोगम्यव हरि नियाममत्वं जन्यगुरुत्वस्येथे पतन कारपतया तदभावादेव परमाणो: पतना संभवेनतत्मयोगस्य पतन प्रतिबन्धका माना भावात् अन्यथा यायादि प्रतिपयका मा उदगाया गुरुत्वेन मषां परमाणुनामा पतना पत्तेः।

३काल में रहने में प्रतिच्याप्त नहीं क्योंकि.कालिक संघन्धात सिमबन्ध में पाथितस्व अभिप्रेत होने से प्रति ध्याप्ति चोर प्रख्याप्ति की भी नहीं। पृथियो में लेकर मनः पर्यन्त का द्रध्यत्व जातिमस्य और गुपयत्य ममान धर्म है॥ २४ ॥ क्षितिजेलं तथा तेजः पवनो मन एव च । परापरत्व'मृतत्त्रक्रियावेगाश्रया अमीः॥२५॥ कालखात्मदिशाम गलत्वं परमं महत्। क्षित्यादि पञ्च भूतानि चत्वारिस्पर्शवन्तिहि ॥ द्रव्यारम्भश्चनुर्प स्यात् ।

(१८) द्रव्यत्यापेक्षा व्याघ्यजाति ऐसी जाति अधिवोत्वादि होगी की पृथिव्यादिमात्र में रहेगी तो उत्पत्ति का लीन घट रूप पृथिवीमें भी रही तो अध्याप्ति हट गई ॥२५॥ काल पाकाश प्रात्मा और दिया इन का मपंगत्व परम महत्पग्मिाणाययत्व समान धर्म है और पृथिम्यादि पार्कोका भूतत्व समान धर्म है पृथिवी जल तेल (अग्नि)वायुइन चारोंका स्पर्शवत्व समान धम है ।२६। और पृथिवी तेजजल षायु इन चारों का समवाय मवन्धसे अपनेमे द्रव्योत्पाद. कत्व समान धर्म जानना चाहियं स्मरण रह अन्याप्ति स्थल में सर्वच नाति घटित लक्षण को कार्य में लावो। अथाकाश शरीरिणाम् ॥ अव्याप्यवृत्तिक्ष. णिको विशेष गुण इष्यते ॥२७ ॥ रूपवत्व प्रत्यक्ष योगिनः प्रथमास्त्रयः॥ गुरुणीवरसवतोयोन मि- त्तिकाद्रवः ॥ २८॥ आत्माना भूतवर्गाश्च विशप गुणयोगिनः॥ यदुक्तंयस्य साधम्य वैधर्म्य मितरस्य तत् ॥ २९॥ टीका--आकाश तया जीवात्मा का अध्याप्य ति विशेष गुणवत्व तथा क्षपिक विशेष गुणवत्व ममान धर्म है लक्षण समन्वय प्रकार यह है अपने अधिकरण म जो एक देश में अपना हि प्रभाव उसका जो प्रतियोगी ऐमा जो वियप गुणउसका प्राधिकरण होना और तृतीयक्षण में होने वाला नो ध्वंस उसका जो प्रतियोगी उप्तको क्षणिक कहते है क्षणिक जो विशेष गुप तत्व समान धर्म है जैसे शरीरावच्छेदेन पात्मा में ज्ञान गुण उत्पन्न होता है परन्तु भात्मा को व्यापक होमे से भारुमा तो सन में भी है वहा पर अर्थात् रक्षावच्छेदेन आत्मा में ज्ञान नहि होता तो अपने अधिकरण यात्मा में वृक्षावच्छेदेन जो भान भी का प्रभाव उसका प्रतियोगि ज्ञान हुआ और वह विशष गुण हे तत्व प्रात्मा में रहा ऐसे ही मरी प्रदेश में पाकाय मे शब्द उत्पन्न होता है और कुड्यावच्छेद से आकाश में शब्दाभाष भी ह यतः पूर्वाक प्रकार से शब्द भी अध्याप्य वृत्ति हुआ और विशेष रगण भी है इमलिये आत्मरत् श्राकाम में भी अध्याय हात्त विशेष गुपवस्व समान धर्म रह गया और जान एक नय उत्पन्न होता है दृमरे में स्थित चौर तृतीय में नष्ट होता है यहही दशा शब्द की है अतः इन दोनी की क्षणिक और विशेष गुण होने में क्षणिक विशेष गुणत्व दोनों का तुल्य धर्म हुआ ॥ २७ ॥ रूपवत्व द्रवत्ववान और प्रत्यय विषयत्व पृथिवी, जल, तेज का समान धर्म जल मे तो सामिका टूवत्व है और ध. तादि पृथिवा में और सवर्णादि तेज में नैमित्तिक है निमित्त. पग्नि मयोगादिक है जहा प्रत्यक्ष विपयत्य भर्जन कपालस्थ वान में नहीं वति घटित लक्षणको कार्य में लायो जहा ऊष्मादि मे फसवय की शंका ही पड़ा पर घरत्यादि रेतयों से कप का अनुमान होता है पृथिवी और जल इनका गुरुत्व और रमवाव समान धम है और प्रधित्री पार तेज का मिः । तिक द्रव (पिघनना चांदि पिण्डीमार हेतु) समान धर्म है ॥ २८॥ प्रात्मा गार पृथिन्यादि पाच इन का विशेष गुण समान धर्म की जिमका ममान धर्म कहा हे वह दूसरे का विरुद्ध धर्म नाममा चाहिय संमें पृथिवी जल का ममान धर्म रम कहा वह तेज का विधर्म है। क्योंकि सभम बह नहिं ॥२८॥ स्पर्शादयोऽप्टोवेगारय संस्कारो मरुतोगुणाः ।। .

अष्टोम्पर्शादयोरूपं द्रवावेगश्च तेजसि ॥३०॥ स्पर्शादयाऽप्टोबगश्च गुरुत्वं च,द्रवत्वकम् ॥ रूपरसस्तथास्नेहा वारिण्यते चतुर्दश ॥ ३१ ॥ स्नेहहीना गन्धयुताः क्षितावेत चतुर्दश ।। वुद्धयादिषट्कसंख्या दिपञ्चकंभावनातथा ॥३२ धर्माधर्मों गुणाएते आत्मनः स्युश्चतुर्दश ।। संख्यादिपञ्चकंकाल दिशोःशब्दश्च तेचखे ॥३॥ , संख्यादयः पञ्चधुद्धिरिच्छायरनोऽपिचेञ्चरे॥ परापरत्वंसंख्याद्याः पञ्चगश्चमानसे ॥३४॥ टीका-पत्यादि। स्पर्ग में लेकर आठ और वेगनामक संस्कार यह वायु के गुण है और स्पर्शादि पाठ रुप द्रवत्व और धेग,य १९ गुण तेज के हैं ॥ ३०॥ स्पर्शादि पाठ और वेग गुरुत्व ट्रवत्व रूप रम और स्नेह यह चतुदग गुण जल में रहते है।। ३१॥ श्रीर जल के गुणों मे से स्नेह को त्याग कर और उसके स्थान में गन्ध का वेग कराकर येही चतुग प्रथिवी को गुण धुद्धि से लेकर छः ओर मण्या से लेकर पाच और भावना ना. मक मस्कार । ३५ धर्म भोर अधर्म ये चतुर्दग नीवात्मा के गुण १ सानात्यन्ताभावरहितत्वमात्मत्वम् अात्मनि परम. त्वच मृष्टि स्थितिलय कर्तृत्वम् । नित्यज्ञानांवधिकर णत्वमोश- रत्वम् । केचित्परमात्मनि नित्यमुखमपिमन्यन्ते वाहतस्तु दुःखा- भाव एव समानन्दः। वेदान्तिनः सख्यिाश्च मनस्ये वेच्छादीन् मन्यन्ते नात्मनि 'तेषां मसान्ते,तस्यज्ञानरूपत्याइत्वयोरभ्युपगमात् । ।

संबरा में लेकर पाच काल और दिशा के गुण है और सं- स्यादि पाच पोर शब्द ये छ: (२) श्राकाश के गुण हैं ॥३३॥ सख्या में लेकर पांच बुहि (ज्ञान) इच्छा, और यत्न ये आठ गुण पर मात्मा में रहते हैं इम स्थल में इतना अवश्य जानो कि जीव में इच्छा ज्ञान प्रयत्न ये अनित्य है और परमात्मा के नित्य है यदि परमात्मा के भी नित्य न हो तो परमात्मा (३। सृष्टिकर्ता है तो सृष्टि से पूर्व निमित्तरूप प्रारीरादि के अभाव होने से सृष्टिको उत्पत्ति की इच्छा कैसे होती और उपादानपरमा एया का ज्ञान भी कम होता अत: ईश्वरेच्छादि नित्य है पर अपरय सख्यादि पाच और वेग ये पाठ गुण मन के है ॥३४॥ 'तत्रक्षितिर्गन्धहेतुर्नानारूपवतीमता । पविधस्तुरसस्तत्र गन्धस्तुद्विविधोमतः ॥३५॥ टीका-सति अवक्रम प्रथिन्यादिका निरूपण करते है उन द्रव्यों के मध्य में प्रथिवी गन्धगण का हेतु अर्थात समाथि कारण है और अनेक शक्ल नीलादि पावाली मरादि (२) घेदान्तिनस्तुसमस्त भूतध्वपि शम्दगुणमुररोअषत तन्नयं पञ्चीकरण प्रक्रियाझोकागत् तद्यथा भूतपञ्चकेऽपि पञ्चतन्मा प्रजन्यत्वं नास्त्याकायस्यापि नित्यता श्रुतिध्याकोपात् वित करवाणोति युते: तनिष्तकरपस्य पञ्चीकरणोपलकमिति भाएया योगिनरच तथैवमन्यन्ते पृधिध्या चटचटेति मन्दोवाया मीमीति जले चनु चुल ध्वनिसनीधगधगेति । (२) उपादानापरोक्षसान चिकीर्षाकतिमत्य कर्तत्वम् । १ गन्धधत्व गन्ध समानाधिकरण दम्यत्व व्याध्य जाति मत्व वा पृयिश्या लक्षणम् तारानातिरच प्रथिवोत्यमेवता उत्पत्तिसपेघटादी उत्पन्न विनष्टेप ट्रध्यप्यातीतिनाव्याप्ति - (२५) मेद मेछ: प्रकार का रस भी पृथिवी में है जल में केवल मधर हो रम है जिम स्थान में जन में कट, आदि मा रस प्रतीत हो यह उपाधि से पृथिवीका ही जानना और सुरभी अमुरभी भेद में दो प्रकार का गन्ध भी पृथिवीका माना है (शं०) पापाणरूप पृथिवी में गन्ध नहिं तो गन्ध पृथियो का लक्षण वहा पर अध्याप्त होगा। (30) पापाण में भी गन्ध है परन्तु (२) अनकट होने के कारण प्रतीत नहि होता अन्यथा उपक भम्म (चना) में गन्ध का में पाता। (गं०) भस्म ( चूने) में गन्ध होने मे पाषाण में गन्ध है कैमा जाना जाय। (उ०) नो द्रव्य जिनके नाम से उत्पन हो, वह उमी द्रव्य के कारण का कार्य होता है यह नियम है तो भम्म रूप द्रव्य पा. पाण रूप द्रव्य के नाश में उत्पन्न हुआ है इम वारने पापा के कारण पृथियो प्रामाण्यों का हो कार्य है जब पृथिवी परमा. गुयों के कार्य भस्म में गन्ध है तो पाषाण में गन्ध अवश्य होगा क्योंकि पाषाण कारण और तद्भरम कारण एक हैं ।। ३५ स्पर्शस्तस्यास्तु विज्ञेयो धनुष्णाशीतपाकजः। 'टी-अनुष्णा गीत स्पर्श भी पृथिवी का जानना योग्य है अनुष्णागीत स्पर्श तो वायु का है परन्त पाक नहि जहां पटादि में उस स्पर्ग नहिं यहां जाति घटित लक्षण में कार्य लेना चाहिये। (२) मादिकाप्रत्यक्षाविषयीमतगन्धानधिकगन्धवत्वम. नुत्कटगन्धवत्यम् । यत्र ववापिजले रिमोभ्यभानग्याततापि पृथिमा एवगन्धोमन्तव्यः प्रतीतिम्त, स्थाययमयतत्वांवन्धेनाध्य धोया स्वंगन्धः तदाश्रयः पृथियो तत्मयत्वंना एवमन्यत्राप्य ध्ययमेयम्।

म नित्यानित्याचमावधानित्यास्या दणुलक्षणा३६ अनित्यातुतदन्यास्यात् सेवावयवयोगिनी। टीका-नित्य और अनित्य भेद में वह पृथिवी दो प्रकार की है उसमें परमाणु स्वरूप पृथिवी तो नित्य है और उससे भिन्न काट्यरूप पृथिवी मर्व ही अनित्य है और वही कार्यरूप ही पृथिवो मावयव भी है. सावयव कहने से यह प्रयोजन है कि बौद्ध परमाणु समुदाय को हि घट व्यवहार करते हैं उनके मत मे इचणुकादि क्रम में महावयवी पृथक् नहि उत्पन्न होता घत: उनके मत में अमचि प्रकट करते हुये कहते हैं कि मैवावयव यो- गिनी इति अरुचि में वीज यह कि परमाणुयों को अतीन्द्रिय. होने मे तत्समह घटादि को भी अतीन्द्रियत्व होगा तो घटादि १ व मान्नाल्पतरमस्ति यः परमोऽल्पस्तच निघतते ।। ये' तश्चगान्धीय ऽस्ति, तं परमाणु प्रचनमः" इति । (वाताया०भा० ४।२।१६।) यया-जालनय्य मरोचिायं यत्मचमं दृश्यतेरजः। तस्य पटतमोभागः परमाग स उच्यत" इति । मवजन्यद्रव्याच- यवः, अतीन्द्रियः, निग्वयक्ष नित्यरचेति नैयायिक वैशेषिक सि- धान्तः । क्षगभग वादिनो वोडास्तु परमाणू नामप्यत्पादम्ना शाच मोकरित तस्नियन मानञ्च जाननथ्यमरोचिस्यं मुचम रजः ग वन चक्षपदव्यत्वात् पटवत् । च्यणुकावयवोऽपि साव यवः महदासम्मकत्वात् तन्तुवत् सचावयवः परमाणुनित्यः का- यत्वेऽवस्त्रास्यादिति। २ मातियोगित्वेतति प्रागभावाप्रतियोगित्वं नित्यत्वम ३ वातये गिन्वं,अनित्यत्वमा प्रारम्भवादः कणभक्षपच: मघातवादस्तु दन्तक्षः । सामादिपचः परिपामादो वेदान्त पक्षस्तु विवतवाद. ॥ ॥ .

( २५ ) का प्रत्यक्ष न होगा क्योंकि प्रत्यक्ष में महत्व को कारण तारे किन जब मुटुगरणत से घट नष्ट हुमा तो वोह मत में कपाल प्रत्यक्ष नदिएमा चाहिये क्योंकि उनके मत में परमाणु युज से रचित घटकपालों में नहीं इसी तरह बोध सम्मत सात पादमें अनेक दोष है अधिक लिखने अन्य बढ्नेकामयर इसलिये न्याय वैशेषिक स्वीकत पारम्भवादही युक्तियुला होनेसे पानी। साचत्रिधाभवेद्देह मिन्द्रियं विषयस्तथा ॥ ३७॥ टीका-यह कार्य रूपथिषी देश इन्द्रिय पौर विषय भेदसे तीन प्रकार की है ॥ ३०॥ योनिजादि भवेदेहमिन्द्रियं घाण लक्षणम् । विषयो द्वयणुकादिश्च ब्रह्माण्डान्त उदाहृतः॥३८॥ चेष्टेन्द्रियार्थाययः शरीरम । न्या. द.(१।१।११) अन्त्यावयविधेसति चेष्टा भोगेन्द्रियाययत्वं गरीरत्वम् । २ शम्देतरोत विशेषगुणानाथयस्वेसतिजानकारण मनः संयोगाययत्वमिन्द्रियत्वम् । सदश्च शब्दादितरेये जमा विशेष मभिकारच गुणास्तेषा मनाययत्वेंसति जानस्य कारणी भूती यो मनः सयोगः (इन्ट्रि मनमः संयोगः ) तदाश्रयत्वम् । तच्च प्रत्यक्ष प्रमाण मित्युच्यते तस्सिविस्तु जान किया सकरणिका क्रियात्वात् विदिनियावत् रूपादिपु गन्ध मात्र प्रारक स्वमेव तस्य पार्थिवत्वानुमापक मित्येव मन्तव्यमयमेवग्यायोरसना * दोना अलीयत्वाटावनुमन्धेय रति । २ साक्षात्परम्परयावीप-भोगमाधमत्वमति जन्य-द्रध्यत्वं विषयत्वम् । म

व्ययुक से
(२६)
गे-योनिजामण्डल और जरायुज भेदसे अयोनिज, स्वेदज और
समिज भेद से दो २ प्रकार के जो शरीर या सर्व घधिवी के
शरीर (०) शरीरमें पंचही भूतों की प्रतीति होती है तो केवल
प्रपियो का हिकमे कहा (उ०) यद्यपि यांच ही शरीरमें दृष्ट होते
तथापि जिस का प्राधान्य होता व्यवहार उसी मे होता
अन्यचारों केवस्त निमित्त है और पृथिवी तो असाधारण कारण
है अतएव लय दशामें युति भगवती कथन करती है "सूर्यन्तेषा
गंध्छतात् पृथिवीन्ते गरीम" घ्राण इन्द्रिय भी केवल पृथिवी से
दी उत्पन्न हुआ है अतः घाण इन्दिय पृथिवी का
अध्याएड पर्यन्त पार्थिव पदार्थ सर्व विषय रूप पृथिवी है नित
अाजादि में अण्डज पक्षी और सादिकों का शरीर है खेदज
यूकादि, का और सद्विज ऋक्षादिकों का है ( • वृक्षादिक भी
शरोरी है इसमें क्या प्रमाण है। (उ०) आध्यात्मिक वायु (पाण)
रूप हेतु मे अनमान होता है (श. ) उसी में क्या प्रमाण (6.)
४पके कटने पर फिर कुछ समय के अनन्तर उसी रूप में दीखता
१चैत्र के शरीर को न्याई इस से जानते हैं कि इस में प्राणवायु
का सबन्ध सामान्य ज्ञान होने से प्रत्ययस्पष्ट नहीं होता इसीवी
पुष्टि में शब्द प्रमाण है " गुरुं हुं सत्य त्व ऋत्य विप्रं निर्मित्य
वादतः । रमगाने जायते वृक्षः कक गधोप सेवितः" गरीरत्वजाति
नही रे क्योंकि पृथिवीत्व के साथ इम का संकर और संकर
लाति बाधक इन्द्रियस्व भी जाति नहीं है ॥३८॥

वर्णः शुक्लोरसस्पर्शी जले मधुर शीतलो। ‘स्नेहस्तत्र दैवत्वं तुसांसिद्धिक मुदा हृतम् ॥३९॥ नित्यतादि प्रथमवत् किन्तु देह मयो निजम् । इन्द्रियं रसनं सिन्धु हिमादिविषयो मतः ॥ ४०॥ टो-भव जल का निरूपण करते हैं वर्णति जल में वर्ण गुल है : रस मधुर है और स्पर्श गीतल है स्नह जल मात्र हत्ति है और ‘ट्रवत्व इसमेंसांसिधिक है (शं.) यमुना नदी के जल में कालिमा प्रतीत होती है तो जल श्वेत ही रूप क्यों कहा (उ०) यमुना नदी के पाश्रय मतल में श्यामता है वही नल में प्रतीत होती १गीतस्पशसमानाधिकरण द्रव्यत्व व्याप्यजातिमत्वं नलस्य लक्षणम्। २(श.) जले हरीत को भक्षण व्यङ्गय स्तावन्मधुर रसः प्रत्यपादि तन्न सहते जलसंयोगादरीत क्या मेव माधुर्योत्पत्तिः किमिति नाही क्रियेत (उ.) पात्ररथ हरीत,क्यामपि जल संयोगेन मधु रिमोत्पत्त्यापत्ते। ३ भीतं मिलातल मिति प्रत्ययस्तु स्वसमवायि संयोग संव- न्धायत्तः। • ४ जलीयत्वमति रसग्रहजनकत्वं रसनेन्द्रियत्व-मेवम स्वयमधम् । ५ स्नेहरतु जल एष धृतादावपि तदुपष्टम्भक जलस्यैव स्नेह स्नेहोडिविधोऽपष्टः प्रकष्टश्चेति जलेऽपकप्टो घृतादि पत्तिजले प्रसष्टः प्रसष्टस्य दहनानुकूलत्वम् । जन्नं वायु विशेष एव न तु द्रध्यान्तर मिति इश विधा .. विपारदा ।

पतएव उस जल का पाकाम में प्रक्षेपण करने से त्यही उपलम्ध होता है (20) नल में तो कोई भी रस नहीं प्रतीत भोता तो कैसे कक्षा मधुर है (७०) उस में पनुत्केट माधुर्य । पौर रीत की भक्षण के अनन्तर जल पान करने में उस में माधुर्य भी स्पष्ट प्रवगत होता है ऐसे ही यह गिला शीतलरे वा यह जल उपयर दोनों प्रत्यय भी कम से मस और न के समय प्रत्याही जानने योग्य है ॥ २९॥ मिस्येति जसमें नित्य और अनित्यादि हार पर्व अर्थात प्रथियों की म्यार करने चाहिय केवल प्रथिवी से सना ही भेद कि जलीय गरीर प्रयोनिन है और जलीय गरीर तरुण सोक में प्रसिपौर नल से उत्पन्न इन्द्रिय रसना २ निशा के प्रम भाग में रहता है जिस मे मधुरादि ग्स का शान होता सिन्धु । समुद्र) और हिम (वर्फ ) भादि सर्व विषय कप जल २४.॥ स्पर्श उष्णस्तैजससस्तु स्याद्रूपं शुक्लभास्वरम् । नैमिकें द्रवत्वंतु नित्यतादि च पूर्ववत् ॥ ११ ॥ इन्द्रियं नयनं वह्रिस्वर्णादिविषयोमतः । टी.- तेग को निरूपण करते पति उम्प पर्म कारपार ते या पवित और प्रकागकर (.) पनि १ पण स्पर्म या म स्पर्य समानाधिकारमा द्रष्यस्व याप्प पाहिमामा नेत्री खपषम् । १ अषणाय नाव मादोऽपिपमा 'पारपाययरिएपम्" नमा मति दप पावरन्ट्रियाकमेन्दियस्वम् ।

( २८ ) पा.हरित रत्नों में तो शुक्लरूप प्रतीत नहीं होता (5.) उन में पार्थिवभाग के रूप से अमिभव है इस लिये प्रतीति नही होती और निमित्त अग्नि संयोग से उत्पन्न होने वाला टूवत्व तेज में नित्यानित्य व्यवहार तेज का जल की न्याई जानना चाहिये १४१॥ तेज के विशष को कहते हैं तेज का इन्द्रिय नेत्र और अग्नि स्वर्ण पुर्य चन्द्र विद्युत् मभूति सर्व विषय रूप तेज है (. उष्पारपर्ण तम का कथन किया है तो चन्द्र में प्रत्युत् गीत उप- लब्ध होता है चन्द्रतेज के मे(उ०) ४)चन्द्र किरण गत जसके शीत स्पर्श से अभिभूत है अतः वह गोत स्पर्थ तवत्य नस का ही मान घोता थे। (श सुवर्ण भारा है और पीत है इसको तेज क्यों माना लाय यह तो दोनों धर्म पृथ्वी के माने हैं (उ.) जय सुवर्ण की विना निती औषधो डालने के गालते हैं तो चाहे कितना ही तीम अग्नि संयोग करो परन्तु इसका द्रवत्व नष्ट नहीं होता और पृथिवीका द्रवत्व तो प्रतिबन्धकके बिना अग्नि सयोग पधिक होने में नष्ट हो जाता है ऐसी ही दशा बल के द्रवत्म की रे तो पस से ज्ञात हुआ कि ऐमें न नाश होने वाले द्रवत्वाधिकरण वायु आदि के वाध होने से तेज ही सद्द हुया तेजस शरीर सऱ्या लोक में प्रसिद्ध है परन्तु इतना अवश्य जानना कि यावत पर्यन्त (४) चन्दस्यतेजमत्वप्रतिपादनन्तु केवलं मोटिवादेन न केवर मष नव्यपाश्चात्यविज्ञानविरोधोपितुवेदविरोधोपि तद्यथा "प्रा. दित्यनचन्द्रमामाति" अयाध्यस्यैकोरश्मिश्चन्द्रमस प्रति दीप्यते मुष्मणः सूर्य रमिरचन्दमा गन्धर्व इत्यपि निगमो भवति । इति निरुताम् । दुर्गाचार्योऽपि स्पष्टमेव व्याख्याने चन्द्रस्य स्वकीय प्रकाशं निरस्तवान् व्यवस्था पिताश्चेन्टो सूर्यप्रकाशमितिमुपी. मत्प्रकाएडा एक विदाकुर्वन्तु इति ।

प तेजप्त वायवीय और जलीय शरीरों में पार्थिष भाग का लपटम्म सहारा ) न हो तावत् उपभोग सामर्थ्य नहीं हो सकता अतः सर्वच पृथिवी का उपष्टम्प मानना याग्य है ।। अपाकजाऽनुष्णशीतस्पर्शस्तुपवनमतः ॥ ४२ ॥ तिर्यग्गमनवानेपज्ञयः स्पशादि लिङ्गकः। पूर्ववन्नित्यतायुक्त देहव्यापि त्वगिन्द्रियम् ॥४३॥ प्राणादिस्तु महावायु पर्यन्ता विषयोमतः । टी-वायु स्वरूप कहते है अपाकजति अग्नि सयोगी नरोने वाला जो मध्यम स्पर्शअर्थत. न शीत न उष्ण वह वायु में रहता ४ा और यह वायु तिरधोगति वाला है रपय आदि पदसे धृति कम्पादियोंमे (३)अनुमित होता है परन्तु यह वैशेषिक सिद्धान्त है पाचीन न्याय सिद्धान्त में तो वायु का भी प्रत्यक्ष माना है वायु का भी नित्यतादि ध्यपहार जलवत् जानना वायु गरीर पिणा. चादियों का है केवल पाप सहात वायवीय परमाणुयोंसे पियाचीय १ कप रहित त्वेसति स्पर्थ रहितत्व वायु लक्षणम् । २ वायवीयत्वे सति स्पर्श ग्रह जनक मिन्ट्रियं त्वगिन्द्रियम् । ३ वायु मिडिप्रयोगातु योऽयं विलक्षण स्पर्मोनुभयते मचिदा- थितः स्पर्यत्वात् पृधिव्यादि स्पर्शवत् इतिसामान्यमो दृप्टेन स्पर्गाश्रयत्वमिहौ सस्पर्शाययोन पृथिव्यादित्रयात्मक: नीरूयत्वात नाकामादि पञ्चात्मकः स्पर्णवधात् इति, इतरवाध ग्रइसहकतन (अनमानेन ) अष्टद्रव्यातिरिक्षा द्रव्यमिति: तच्चवायु सज्ञिक. मिति तया च सूचं "स्पर्शाचवायो."तदर्थरच "लिङ्गम्" इतिशेषः चकारानि गन्दकम्पाः समुच्चीयन्ते ।।

शरीर की उत्पति है वाय में विशेष इतना है कि इस का इन्द्रिय सकल देह में रहता हे अतएय मर्व देश से उत्पादि मतीति हो सही परन्तु केशनग्मादि शरीर नहि हैं अतएव उनमें इन्द्रिय भी नहि है त्वम् चर्मको कहते हैं तथापि चर्म मे रहने वाले इन्द्रिय को भी न्यगिन्द्रिय मे व्यवहार लक्षणाद्वारा जानना चाहिये "त्व चिस्थित इन्द्रियंत्वगिन्द्रियम्" ऐमा अर्थ करना चाहिये अन्य था, चर्म को पाथिर होनम उतम स्पर्य पारकत्व कमे होगा ॥४॥ प्राणादि वाय म नकर महा वायु पथ्र्धन्त वायु का विषय है यद्यपि प्राण एक है नथापि स्थान रूपो उपाधि के भेद से भिन्न २ मंत्रा को प्राप्त होता है जैसे प्राण, अपान, समान, व्यान, और उदान, भैद में पच विध प्राण वायु के भेद होते है कई एक देव दत्त धनन्जय यादि भेद मे पञ्च और भेद मान कर प्राण (४) कोदा मख्या विशिष्ट कथन करते हैं। ४ "उदगार नाग पायाता कर्म उनमोलनेस्मृतः । ककर, शु. करोजेयोदेवदत्तो विज़म्भणे ।। न जहातिमृतं चापि सर्वव्यापी ध. नरुजयः"इति मचेपतः कार्यरूप पृथिव्यादि चतुष्टयस्योत्पत्तिवि नागझमः पदय॑ते प्राणिनांभोगभूतये परमेश्वरस्य सिसचानीयते ततोलव्धवृत्तिकाष्टविशिष्टात्मयागात्, दोधूयमानेषु प्रथमतः पवन परमाणुष कर्मोत्पत्तिः, ततो यो: यवनपरमाएवीः संयोगः सतो घणुकोत्पतिस्विमिणकैस्यणुकमिन्येवमग्रे महावायु पर्यन्तोत्पत्तिमन्तण्या इत्यधमन्येषामपिताना पुनःप्रलयेच्छा- यामपिझमगपरमाण कियोत्पत्ति विभागादि परस्म महावय विपर्यन्तोनाम इति (०)तस्मा हाएतस्मादात्मन याकाम:सम्भूत इत्यादि युताबाकायपरमाणु प्रभृतयोऽपिसोत्पत्तिकाः श्रूयन्ते चे. যাবলী আযযুলালি,(৩) অলিং ঘন অধত্ব 1 १२) ध्यतयर्थकत्वान्नदोषस्तरया भाकामाहाय रित्यादी पापादो स्पायभावप्रसा: स्यात्कारण गुण पूर्वकत्वात्कार्य गुणानां वेदा- न्तिभिः मुष्टिवावधानामतत्परत्वाभिधानाच्चान्यथा-तात्विक प्रपन्चानीकारऽपतिवान्त, स्यादितिपं०) प्रयोजनमानुद्दिश्यमन्दो पिनप्रवर्तत इतिन्यायात् किमितिस्वीयप्रयोजनवैधुर्यवतस्तस्य. जगत्पित्सेति (उ०)ननुचोक्तं भोगभूतये (शं.)भोगस्यजीवत्तित्वेन परमात्म प्रवृत्त्यप्रयोजकत्वात्पुनरपि प्रवत्त्यभावएव किञ्चप्रवृत्तिः सुखेदणाभावेषा मम्भवति परेशेचतयोनित्य मिहतयाप्रवृत्त्य भाष प्रसङ्गस्यताटवाध्यमेवेतिचेन्न तस्यस्वार्थाभावेऽपि करण्या प्रवृत्तिसम्भवात् प्रज्ञानार्णवनिमग्नान जीवान् ज्ञानधर्मोपदेश- मोडरिप्यामीतिकारुए यमयुक्लएषसजति (२०) करुणयामवर्तते चे त्सुखिन एवमृजेन्नदुःखिन इति (उ०) विचित्रकर्मसाविश्यस्येव वेलक्षण्यापादकतयानवेपम्यकपककलावकाशयहा“लोकवतु- लीलाकैवल्यम" इति वादरायणीयमचार्थप्रकाशितलोलामान में वजगन्निर्माणेवी लत्वेनाभ्यु गम्यमन्तोष्टव्यमित्यनवदामखिलम् । न च परमात्मज्ञानेशातीना नित्यतया नित्यमेवजगदत्पात विनश्यहा किमितिजातचित्सर्गादिः श्रूयते इतिवाच्य स्वभावतो नित्यायापीछायाः तत्तत्कीपाधि जनित वैरूप्यस्यसहावाय था वस्तुतः स्वच्छस्यापिस्फटिकस्यतत्तजपाकुम मादिमान्निध्य- कतवेचिश्यमुपजायते(०)परमात्माकर्ममापेक्षश्चेत् प्रवर्ती तत्पर तक्षतिनिरपेक्षश्चेदेषम्यमित्यभयथापाशारज्जुरिति (उ.) मापेक्षवेऽपिस्वास्वन्यवधायकनभवतीसिन्यायेन नकोऽपि दोषः पदमादधाति यथा कोषाध्यक्षहारीसत्यपारितोषिकम्प्रयच्छन्नपि स्वामीवतन्त्रएव नतनकोशाध्यक्षपातन्या प्रकृतेऽप्यधगन्तव्य मितरघाकर्मपार जडत्येनफतदातत्यायोगाभोगप्रयोनिकसृष्टयनु दया पत्तरिति।

r त -- " २ न च सोय मीमांसंयोरीश्वर प्रतिषधे जागति कयन्तर- नाम तदम्युपमः' मनीपर्थमारवेषातहरीतु तयोरप्यास्तिक मुख्यप्रणेतकत्वेनोंपादयतमत्वा दितिवाच्य, नहि निन्दोहि निध- निदिन्तु प्रभवत्यपितुविधेय स्तोतीतिन्यायेन " यत्परः गम्दः मगध्दार्थ तात्पर्थि सदस्य प्रामाण्यात्कपिलदेवस्यतु प्रति पुरुष विवेक पुरस्मरमपरगनिष्पत्तावेव केवल तात्प- यमितीश्वरप्रतिषेधाश तदप्रमाण्यमपिनदापावह सत्रतत्तात्पर्य विरहान्नाचेत् कय हारमित्थम्मन्नागालीरंपरावतारात्मा समस्त घेदतत्व विदीयसत्त्वसिदिता विरज्यत यहापाढिवादनवप्रतिषधो- निश्चेतव्य, कथमन्यथा "ईश्वरसिहा, सा, द. भ०१॥ सत्र स्थिान ईश्वरामावादिति स्पष्टमेवनाडाष्यत, यहावैराग्योस्कटघस म्पादने एवतात्पय्यमध्यवसथ यदिनामश्वराऽपि कश्चिन्नास्ति- ताई कस्यरागो विधेय इति, अनय दिया मामामायापि अन्त: करण सुधध साधारण कारणत्वात्कर्मणां कर्म निरूपण एव तात्प- यंमोरवरमियसिध्यास्तु मर्वथोदामीन्य मेवेत्यलमकारडता एडये. नाधिक जिन्नामुभिस्तु बानगए सर्दस्वहितोयभाग मतान्मुशिनि- रूपणप्रस्ताव मानवकिमिडिविषय द्रष्टव्य मित्युपरम्यान इति दिक् ॥ 'आकाशस्यतुविज्ञेयः शब्दोदेशपिकोगुणः।४। टी-श्रीकाम क' कहत हाकाय का दस विशगंप्य अर्थात् आकाश में शब्दातिरित और कोशिष गये नमो १ समायेन मम्द गुणवत्व माकायस्यलक्षणम । तेनकालिक मवन्धेन कालेऽवच्छेदकता सवन्धेन 'भेदिौच शब्दसत्त्वेनाति व्याप्ति a 8 गदा यय होने में ही पाकाय को सिबि(रेवा भाकाम एक पार विभु विभु होने से प्रात्मवत् नित्य है यद्यपि घटा काय मठाताय आदि व्यवहार से भाकापगत् नानात्व की प्रतीति होती तथापि उसको उपाधि छत होनेसे वास्तविक पायावय में दोप नहीं ॥४४॥ इन्द्रियन्तु भवेशोत्रमेकासन्नुपाधितः । जन्यानांजनकः कालःजगतामाश्रयोमतः॥४५॥ टी.-पाकाश के शरीर और विषय के प्रभाव से इन्द्रिय को निरूपण करते है इन्द्रियमिति, थोच इन्द्रिय पाकाय का यपि लाधव से भाकाश एच डी ई तथापि उपाधि कर्षण- कुस्यादि के भेदसे भिन्न २ योत्र स्वरूप होता है। प्रवास को करते हैं जन्यानामिति कार्य मात्र का साधारण कारण काल, क्योंकि कार्य मात्र हो पर उत्पत्ति में काम की पपेक्षा रखता अन्यथा सर्वदा सर्व वस्तु को उत्पत्ति होनी चाहिये पौर पर काल सर्व पदार्थो का भाधार रे अर्थात् सही पातु किमी न तिमी समय में हो उत्पन्न होतो ॥ ४५ ॥ २ भाकाम मिश्यनुमामध-गदायिभ्यायष्टध्यातिरिक्ट्र. च्यायित: परदध्यानाविहरति समशयितारपवस्वाद्यन्ने तन्ने यथारूपमिति न चास्मेवास्तु तदायय इति याच्यं तस्यत- दापयत्वे पाधिर्यपाधतापत्त: मुसवानित्यादि पसन्दवा मामिति प्रतीस्यापतरच ॥ १ भोग प्रयोजक पाम वैधुटयं मयुत वार्यि मेषमन्येन्धि पगापितहकार्याचमत्थयोध्यम् । "मतीतादिवसाप साभार, कार कापायम || ४ परापरत्वधी हेतु:-क्षणादिस्यादुपाधितः । टी.-परत्व ओर अपरत्व बुद्धि का हेतु भी कालही है यह परत्व और अपरस्य यह इस से बड़ा है और वह इस से छोरा इत्याकारक मानने चाहिये (गडा) काल भी लाघव से जव एक मानते हो तो यह (१) वर्तमान (२) भूत (३) भविष्यत् प्रभृतिथ्यव पारकैसा होगा (उ०) उपाधि भेदसेही यह भी सकल व्यवहार मिल होता और उपाधि यहा पर मयं क्रियादि रूप जानना चाहिये इमी पागय से कथन करते है कि क्षण दिन मास पर्यादि सर्व व्यवहार और वर्तमानादि व्यवहार उपाधि से होता है। दुरान्तिकादिधीहेतु-रेकानित्यादिगुच्यते ॥४६॥ उपाधिभेदादेकापि प्राच्यादिव्यपदेशभाक् । (१) वर्तमानत्व इह शब्दप्रयोगाधिकरणकालतित्वम् (२) पतं मानध्य सप्रतियोगित्यं भूतत्वम् (३) वर्तमान प्रागभावप्रतियोगित्वं भविष्यत्वम् । ज्येष्ठेपरत्यप्रत्ययः कनिाठेऽपरत्वात्ययः । सर. परत्वापरत्वाणविषाधीनः परत्वापरत्वे च सासमवायिकार के भावकार्यत्वात् । असमवायिकारणञ्चतयोः काल पिएड सयोगएष तदाययाकाल इति । ४ विभुत्वमतिदेगिक-परत्वापरत्वाममवायिकारप संयोगा- व्ययत्वाद्युपाधिरूप दिक्त्वम् । दैशिकपरत्या परत्वेवमासमवापि. कारण के भावकार्यत्वात् घटवत् । प्रममवायिकारपछ दिकपिएसंयोग सदाययोदिक् । "तपाहि" "शालीकमवधितस्मादिदंपूर्व चपश्चिमम् । प्रतिनिहि. स्यतेययासादिगितिस्मृता" इति। याविदफास्तुशब्दतम्माषपरिणाम एवदिक, त्या

-
.
1
टी.-अब दियाको निरूपण करते है दूरान्ति केति पदार्थों
में दर तथा समीप व्यवहार प्रयोजक एक तथा नित्य दिया पदार्थ
कमाता है यहॉपर दुरत्व और समीपत्व दिशाहत जानने
योग्य रे ऐसे जान का असाधारण कारण हो दिया पदार्थ है।
यही दिशा एक होकर भी उपाधि से ही प्राची - प्रतीची उदीची
अपाची प्रादि संज्ञा से व्यवचत होती जैसे जिस स्थान से जो
रघाम उदायाचल की भोर हो वह उस स्थान से प्राची और इससे
उलटा प्रतीची और जो स्थान जहां से सुमेरु पर्थात् केन्द्र की
भोर हो वह स्थान उस से उत्तर (उदोची) कहातापोर इस से
उलटा दक्षिण ( वाचो। कहाता है।
आत्मेन्द्रियाद्यधिष्टाता,करणं हि सकर्तृकमा४७॥
शरीरस्य न चैतन्य मृतेषु व्यभिचारतः।
तथा त्वं चेदिन्द्रियाणामुपघाते कथं स्मृतिः।
मनोऽपि न तथा ज्ञानाद्यनध्यक्षं तदा भवेत् ।
टीका-अब अपवर्ग भागो, पोरसय जड़ माइन जिम के
साघात वा परम्परा सम्बन्ध से मुठ दुग्ठ वा दुःपाभाव (मुक्षि)
के वास्ते ताग आत्म पदार्थको निरूपण करते हैं पात्मेन्द्रि.
येति पात्मा इन्द्रिय श्रादि पद मे शरीर का स्वामी र भर्यात् लेसे
स्वामी वियोगमे प्रकति किमी कायं में ममर्थ महों होमकतीरम
तर पात्म सम्बन्ध के प्रभाव होनेमे गरीरादि कुछ भी नहीं कर
सकते पोछे यह सर्व को मृतिका के तुमय हाजाते हैं परन्तु मतिका
में मुनादि भोप्य कन्पित घनित क्योंकि गतिमा में
मामा आदि नहों बन सकते वर्षोंकि यह बड़जो (२)
(२) चाांक: (मास्तिकः) परभ्युत्पत्ति: चारा लोक संमतो
यासःशयय यस्यमः।

चार्वाक गरीरादि में ही प्रात्म बुद्धि रखते हैं अतएव शरीरादि मे भिन्नऔर भात्म पदार्थ नहीं मानते उनको बोधन करते हैं कि करण सकर्तृक अर्थात् कभी करण वा साधन विना चतनको महायताके किसी भी काथ्य को नही कर सकता जैमे कुठार और काप्ट चाई कितना समय इकठे पड़े रहें तो एक तृण भी नहीं काटा जाता जब कोई चेतन तक्षक पादि कुठार को हाथमें लेकर काष्ठपर चलाता है उमी समय छेदन क्रिया उत्पन्न होती है ऐसे ही चक्ष आदि भी कारण अधिष्ठाता चेतन के बिना कुछ नही कर सकते अतएतद्विन्न चेतन अवश्य वो कर्त य है, अथवा-यद्यपि भई मुखी मै सुखोई मैं दुखो तू इत्यादि प्रत्यय मे मुखादि का अई के साथ सामाना धिकर गय अगाहित होता है तो विशेष गुण सुखादि पुरस्कार से आत्मा का प्रत्यक्ष हो होता है तथापि अहं इत्यादि प्रतीति में स्यात्म भाव का ही यहण होता है मग्वाधिकरण व्यवन्तर में पर बुद्धि सुग्मादि प्रह पूर्वक प्रत्यक्ष नहीं बन सकता इमलिये थाहा है "करणं हि मकर्तक" अर्थात् दम से प्रात्मा में अनुमान प्रमाप दिखलाया है। चार्वाक पृथिवी, जल, तेज, वायु, रुप भूत चतष्टय मिलाप से हि एक चेतन्यथति उत्पन्न होती जैसे किकर को हाल और गुड प्रादि के मिलने ही मे एक मादक शक्ति उत्पन्न होती है अत: ताग शशि विगिष्ट गरीर ही प्रात्मा है और मैं गौर हु कृष्ण हून्थूल चं सम इत्यादि प्रतीतिसे भो शरीरको आत्मा मिद ताऐमा कयन करते हैं इस भाको निवृत्ति को लिये कहने स कि गरीरस्येति, गरीर चेतन नही होमकता क्योंकि मृत शरांगें में चतनत्व नही मिलता और शरीर का गुण होता तो मृत शरीर में भी जान दृष्ट होता क्योंकि शरीर का विशेष गुण यावद । . द्रव्य भावी रोता प्रर्थात् लव तक द्रव्य सत्ता हो तब तक उसकी सत्ता होती है जैसे गन्ध जय तक गरीर रहेगा तब तक इसकी सत्ता ओगी और यदि शरीर में ही जान माने तो पापणदि भी इसी मेंहोंगे तो इस मरोर को यहां ही दग्ध होजाने से जन्मान्तर में निनिमित्त मुखादि की उत्पत्ति होने से छत नाम और प्रात माप्ति रूप दोप भी लगेगा चौर कामका बन तो अवश्य मानना चाहिये अन्यथा मुसादि में वैचित्र्य नहीं धनमकता पौर मद पति विशेष गुण नहीं है पौर कारण परमाणु प्रों में जानके पभाव होनेसे में तत्कार्य गरीर में भान कहां से होगा यदि उन में भी धान माने तो सदारम्ध घटादि में भी ज्ञान होना चाहिये पौर मेरा गरीर म प्रतीति मे भी गरीर भिन्न पारमा सिह शेता है पतएव में स्थून ईरम में पापंश का स्थलस्व के माय मामानाधिकरण्य धम मिह है। (०)यदि मेरा गरीर म प्रतीति गरीतिरित पारमा मिह करतो यह मेरा पात्मा २ म प्रत्यय में भी पात्मान्तर तुन्य न्याय से क्यों न मिहो(.) पद में भी भेद व्यवहार पौपचारिक बनतामे गए का गिर जब शिरोमात्र हो तो रा है तो राहुका गिर कैसे (i०) मी न्यायको मेरा गरीर रम प्रतीति में क्यों नही पक्षण करने (३०) युलियों में जब परीर में चैतन्य का पभाव मिह कर दिया तो अस्मदीय युति मनु पालक मापरीने में चरितार्थ है। मा इन्द्रियात्मवादी मंका पाता है कि भार के रोने मेरो चापमान होता है एवं ससस् रदियों में से सातत् जान निमें जिम रोग निमका रोमामा परम का तापमान, इन्द्रियों का गुबारम का पान करते हैं। तयारवति, दियभी पारमा नही रोमी पावि परमात यष्टिमिरविपनमत पदाधीकारी म्मर पता पर त्रिम मनुष्य ने श्रीमान रेसोरीमो माय को ल - । वस्तु का स्मरण गा परन्तु जब इन्द्रियों को चेतन माना तो भानादि सभी इन्द्रियों में रहे, फिर रूप का प्रत्यक्ष चषु में पा तो कप का स्मरण भी पछु में ही होगा क्योंकि जहा अनुभव उस का कार्य स्मरण भी वहां होगा व्यधिकरणों में कार्य कारण भाव नहीं होता परन्तु जिस पुरुपने मिन्न २ वो के भनेक वस्त्र बना रक्खे को फिर देवात् वा अन्धा होगया, तो उस समय में उस के चक्षु यदि है तो उसे सर्व पदार्थ दीखने चाहिये यदि नहीं तो रूपों का स्मरण न होना चाहिये मी पभिमाय से कहा कि "तचात्वं" यदि रन्द्रिय हो चेतन हो तो इन्द्रियों के नाम से स्म. रए कम होगा अर्थात् अनुभवित चक्षु नहीं है और इन्द्रियों के होने से मान का होना तो इन्द्रियों को करण मात्र होने से होसकता क्योंकि करण के बिना कोई भी क्रिया मिह नहीं होती यदि इन्द्रिय चेतन होता तो "चतुर्नानाति" ही प्रयोग होता"चदुपा जानाति" न होता अतः अप काण., इत्यादि प्रतीति भी औपचारिकी जाननी चाहिये ॥४॥ अव मन प्रात्म पाद का खण्डन करते है।मन प्रात्मवादी की ऐमोशका कि इन्द्रिय पात्मा मानने से एमृति की अनुपत्तिय प्रधान दोप दिया है क्योंकि इन्द्रिय पनित्य अब विज्ञात ही नहीं तो स्मरण किस को हो या कैसे हो परन्तु मन तो नुम मी नित्य मानते हो फिर उसी को वेतन क्यों न माने इस में स्मरण को अनुपपत्ति भी दूर होगई "इस को सएडन करते मनोऽपीति"अर्थ मनभीचेतन नहीं यदि मनकोचेतन मानोगे तो भान सुखदुःप प्रादि का प्रत्यक्ष नहीं होगा और होता तो म.)इन के प्रत्यक्ष में क्या बाधक है (उ०) एक क्षण म दो जान नहीं होते इसलिये मन परमाणु रूप है चेतन मानने पर मुखादिक भी इसी में मानने होंगे तो जैमे परमाणुषों का प्रत्यक्ष नहीं तो सात कपादिका भी नहीं है, सोन्याय से परमाणु प मन के करण प्रत्यक्ष न होने से उस में रहने वाले मुखादि का भी प्रत्यक्ष नी होगा क्योंकि प्रत्यक्षमें महत्वको कारणता होती है कि सकल क्रिया को करण साध्य होने में मुख ज्ञान रूप भी क्रिया को को अपेक्षा है तो बाधकरण की शक्ति उम मे न देखकर प्रान्तर करण का अनुमान होकर मन को मिदि होतो हे तो यदि मन ही चेतन (कत) हुआ तो उनको भी करण मरे की अपेक्षा होगी तो झिर भी गौरव पड़ा और नाममा वमेही विवाद रहा वस्तु नहीं। अब प्रकरए में सक्षेप मे योगाचारादिवौद्धों के मत को भी स्नुपान करने ,ये गाचार मंतिकवी विज्ञानकोही आत्मा मानते है,और उमको क्षणिक भी मानते हैं क्योंकि भाव मात्र उनके मत मे चणिक ( हिशीय क्षणम प्रतियोगि) है सम विज्ञान के भी दो भेद है एक प्रति विज्ञान दूसरा पालय विज्ञान घट पठादि विषयक प्रकृति और पह२ दम तरह के स्वरूप वाले को पालय कहते हैं यह मु पुस्ति दगा में होता और घट पट मभीही मानके काभेद। मकी खाइन प्रक्रिया यहहै । कि स्मर ए की अनुपत्ति रूप दीप से यह भी निर्मुश नहीं है क्योंकि विज्ञान विज्ञान के नष्ट शान में स्मरण दमा का काम होगा यदि पूर्व ज्ञान के संस्कार को ही इतर मानमें मत माने तो माता अनुभूत पदार्थका भी गाय वासकको स्मरण होना चाहिये पोर मस्कार भो तो तुम्हारे मत में घिर नहिरे और जिम में मे कल देखा था वही माज में समो वस्तु का स्मरण कर्ता ई म घशधित प्रतीति में भी स्थिर नित्य परमा मिह होता है किन पूर्व दिनमे एक वस्तु को देखा पापाज मोक नेम को राहु यदि स्थिर पारमा नसोता तो ममान विषयिणी रक्षा मे सोती ॥ "चत्र मोवान्तिको विराम करते "कि जानाकारमे धनुमित ने दाहाशपिक थान पदाची पात्मा मो या मो पप ठीक ना रे क्योकि मत्यध । (४१) प्रमाण सिद्ध घटादिकों का अनुमेयं कथन फर्ना प्रयुक्त है। 'वभा. पिक वोहनगिक वाद्य - पदार्थ का श्रात्मा कहते " सो यह भी ठीक नहिं क्योकि "सोऽयघट" हो या घट ६ क्षणिक प्रक्रिया में प्रत्यभिन्ना नदि हो सकती पारमी अष्टादश भद ई ग्रन्थ बढ़ने के भय से नहिं लिखें। मारय मारच में प्रात्मा का भान स्परूप और शुद्ध माना ई दुहि मे हो सर्व दुःखादि माने ह प्रयत्न इसका मा यदि म मानते हैं बुद्धि का सुखाकार दुःखाकारादि होकर पुरुष में प्रतिविम्बित होना ही पुरुषों का वन्ध तन्नित्ति हो पुरुषों को मति है सो यह भी मत ठीक नहिं वोकि यदि को प्रकृति कार्य होने स नत्व है और जान इच्छा कति इनका परस्पर सामानाधिधारण्य से ही कार्य कारण भाव है अर्थात ना जानता है वही चाहता पार दो फिर कार्ता । जब परुष मान स्वरूप तो शदि भी उस में मानने चाहिये। अब वेदान्त को दिखाताहदान्त में एक प्रत्य वही मत्य वस्तु मानी है तदिन्न (ज्ज म सर्पवत् सर्व ही यस्तु प्रद्य में कल्पित मानी है पार व मन भी ज्ञान स्वरूप हम मिधान्त को दृढ़ता म अलिय लो प्रमाण रुपम दिखाई ईमा जसे "सत्यं ज्ञानमनन्तंब""तत्वममि" प्रवद्यास्मि" इत्यादि और भी कयन करत ॥ खण्डननबतक याध मिति नतम मत्त्वेन प्रतीत नगत् को कल्पित कहना न्याय युहा नहि ह और जय मग दाण्यादि को विवक्षयता में नीयों का ही परस्पर मद मिह रहा तो पर मात्मा क माथ अभेद कम जाना आम और कल्पना मं प्रविध को कारण होने से अविद्या मुंब में कभी भी मध्यन्दिन वर्ती .

. सर्य में समकी सम्भावना नहि वन सकती यदि जोव ने कल्पना थी तो जीव भी तो कल्पित उसको भी किसन की इत्येव पन पाया होगी (प.) प्रत्यक्ष सिह भद प्रात्माभेद ग्राहक श्रुतिवावय से बाधित है क्योंकि यह प्रत्यक्ष प्रमाण अति की अपेक्षा स दुर्वल है जिस्म यधम प्रमाउमय का कारण बस चन्द्र प्रादपिक मान ज्योति शास्त्र से बाधित होता है। (३०) श्रुतिके अर्थ विचार से भी अमद नहि सिद्ध होता नाही ज्ञान पताही सिद्ध होती तथारि-“य, सवन.. स सर्ववित्' इस श्रुति में (सर्वजानाति) रस व्युत्पत्ति स मा धातु के आगे कर्ता में 'क' प्रत्यय ल भावार बना तो सर्व शब्द के उत्तर हितोया अर्थ कमता अर्थात् विषयता और सव शब्द का अर्थ सार पदार्य, 'ना' धातुका अर्थ ज्ञान और क प्रत्यय का पर्थ कर्ता और पाययता समन्ध तो सम्धको मा कापा से ही प्रतीत हो जाता है तो माम्द पाध यह होता समस्त पदा कशान का प्राधार इस गाब्द बोध म प्रत्यय के अर्थ वार्ता को शेडना युक्ति से सर्वथा विका, भत. इस युति के साथ विरोध दूर पारने के लिये 'मान' पद का अर्थ भी जानयत् कर्ना उचित और "तत्वमसि' युति को पूर्व भी प्रास्मा तस्वममि ऐसा पाठ है पत यहा पर भी प्रकार का प्रश्लेष अर्थात् प्रतत्वमसि करना पाहिय अथवा नानी का पसा रूप पर्प वाद जानना चाहिय अथवा प्रभेद भावना से उपासना करनी चाहिये पस युति का प्रप्रामाण्य भी नहि और "प्र प्रधारिम" इसका तात्ययं भी उच्चकोटि को पापक पवरण में दी जानना योग्य वनों कि पुण्य प्रभु में गरमा गति तीन प्रकारकी है। १ में प्रभु का इ, २ प्रभु मेरा में मान में तृतीय भेद उत्तम अधिकारों के पारते २जी सर्वया सममें माम शेकर परम प्रानन्द म सर्व वाध पदाको भक्ष गया ऐसे हिट " सके. विरूप में मग्न होकार में ब्रह्म हूं ऐसे कथन कर्ता है "एकमेवा. द्वितीयं मन" स युति का भी मजातीय क्षितीय के निषेध में की तात्पर्य है अतः "हासुपर्णास्युजा सखाया" इत्यादि युति से और "उत्तमः पुरुषस्त्वन्य:"इस स्मति से सर्वथा भेद हो जब बोधित तो फिर अभेद के जाने । इति संधेय.। इम पूर्व प्रकार से जव प्रास्मा देहादि से भिन्न सिद्ध हुमा "तो नानात्मानो व्यायातः" इस वैशिषक मत्र में अनेक और "विभवानाकाशस्तथाचात्म द० स० से विभु "इच्छा- पप्रयत्न सुख दुःख नानान्यात्मनो लिंगम्" इस न्या. द. सूत्र से इच्छादि विशिष्ट सिद्ध होने पर वह पदार्थों के साधर्म्य वैधयं जान पूर्वक तत्व जान भत्यादि द्वारा परमात्म माक्षात् कार मे * मुलि (आत्यन्तिक दुःख निवृत्ति) को प्राप्त होता है "तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्ग:" उस नन्मात्मक दुःख से अत्यन्त छुटना हि मोक्ष गौतम जी ने कहा है इसी की पुष्टि में कपिल ली भी माय में लिखते है "अथ विविधदःखात्यन्त नियतिरत्य. न्सपरुपा:" माध्यामिकादि तीन दुःखों की अत्यन्त्य निवृत्ति सो मन्धि पदार्थ है ऐमे मोक्षपद को प्राप्त होकर फिर आत्मा की संसार में प्राप्ति नहि होती यह वार्ता युति भगवती भी न च पुनरावर्तते २ चीप्सा द्वारा दृढ़ कराती है इस मुक्ति के लाभ में गौतम जी ने सूत्र में कम भी वोधन किया है" तयाहि दाखजन्मप्रसत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाय- तदनन्तरापायादपवर्ग:" अर्थ-जव पूर्व मंत्र से अनुवृत्त तत्वज्ञान में मिय्या ज्ञान ( कर्म मे विना हि शरीर जन्म जन्म निवृत्तिभी अनिमित्त मुक्ति दुःख रूप हे अथवा अनित्य में नित्य बुद्धि पशुचि 'म शुचितान प्रादि) को निति हुई तव तदधीन रागडेप मोड स्वरूप दोषों को नियत्ति होती है उसकी निवत्तिसे जन्म नोकि सर्व . (8) धेसरी, इतिवाणीचतुष्टये प्रथमाया: पगरयायाय द्वारुपाया था- ग्यादर्शगम, इतिपाणिनीयाः। पुरुषस्य निपस्य कैवल्ये नाव: स्थानं मति: इतिपातञ्जलाः । प्रतिमझपोऽधिक जिन्नामुभिस्तु मर्वदर्शनम्वरूप निर्मयादौद्रष्टव्यम् ॥ प्रकाशयिष्यतेचमयानिखिल. मतगर्भितोभापाटीकोपेतरस्वरूपनिर्णयतिसम्भाव्यते ॥ अथापिनव्यतरवैज्ञानिकमुक्तिविचारोऽपिदश्यतेम नाकायद्यपितस्यावनिवेशेवगौरवलाभारयात्तथापिदृष्टिपथमानी यैव विहामोहास्यभाजीभविष्यन्तीतितहिनोदएवास्यविन्यासेफल मनु मन्धानन्यं समीक्ष्यताम्वतयुक्तिपाट कोविदपवरैः कोऽपिवि- लक्षणपाण्डित्य वैभवापण्डितनानी "घटं छिन्द्यात् पटमित्यादि न्यायमवलम्ब्य निजममता मचिख्यापयिषुःशास्त्रीयगन्धविधुरसं मदि "मुक्तोऽपिपरावर्तते," इत्यभिमतमतान्तमाविरकरोत् । प्रादर्थ यच्चतश्युलिजालममत्तापरनामधेयं तथाहि-मुक्तरपिकर्मजन्य तया यज्जन्यंतदनित्यमितिव्याप्तः, कियत्काल मुतिसुखमनुभूय: कर्म समाप्ती पुनरपिपरावर्तते, इतियुलियुतं किञ्चयदि मन्यात पनराहत्तिर्नहि मम्भवति तदा परमात्मनःसन्निधौ महतीजनता मम्पोतेति बायकामाभावःस्यात् । अन्यच्च-कल्पानामानन्त्येन यकै कोऽपिप्रतिकल्पमपवर्ग माक् स्यात्तदापिक्रमगः समागेच्छेदापत्तिःस्यादिति । अपिच-निरन्तरस मन्ततिानातोवाचति ततः पिन्नास मारिकमुखमन्दोई यथामिष्टभोजभतृप्तः सलवणभक्ष्यमभिलपती तिमतम् तद्दर्शितप्रमाणञ्च-ऋगवेदे "कम्यननं कतमस्याम तानामनामहे चारुदेवस्यनाम कोनोमया अदितेप नर्दातमातरं च-दृपयंपितरन्चेति।

संक्षेपः। 4 (४७) तत्कतारच यन्मतः प्रार्थयते कस्यनामसर्वेभ्योऽधिक कस्य वा, उपासनयाई पूर्वतनमातापितरौपश्येयमितिभावः । इतिपूर्वपचे अथापिप्रत्युच्यतेऽत्रक्रमशः। १ मुक्तिकमफलमितिप्रथमोऽसत्तः। सोऽयंराहान्तः श्रुति तात्पर्यानभिन्नतयोद्भावित केवलन्नरकप्राप्तिहेतुर्नयात्र त्रिशुतयः प्रमाणतयादृश्य ते प्रत्युततहिपरीतार्थाभिधायिका एवतथाहि "त. दाइकमचितोलोक क्षोयते, एवमेनामुत्रपुण्यचितोलोक धीयते, इत्यादिश्रुतिर्यत्वतकं तदनित्यमितिसत्तीनुगृहीती दर्शनविषयता मानीयते। "नकर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेने के अमृतत्वमानः इत्यनयाच श्रुत्या सुस्पष्टमेवकर्मणामुतिकारणत्वन्निरामतम् । नच "हिरण्यदा अमृतत्वभनन्ते, कमणेवसिसिरिमास्थितानन· कादय इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यश्च कमणांमोक्षसाधनत्यागमात्कथं ज्ञानादेवमोचोभवतीत्युक्त मितिवाच्यम् । तत्रामतपदेनापेक्षिकामत त्वस्याभिधानात्, इतरघायुत्यन्तरविरोधोदुर्वारोभवेत् ससिधिप. देनचान्तःकरण शुदिरेपविचिता ।। २ अवकाशाभावरूपो द्वितीयोऽसत्तर्कः। अवापिस माधि:महोमीदविलसितं परमात्मनो व्यापकत्वमभ्युपगच्छन्नविय सस्य देशपरिच्छेदसम्भावितः कथम्चनानयाधाचोय न्याघकुटी प्रभातन्याये नानीप्सितोऽपिमाकारवादोजी कतीभवेत् । "मृतयोः "समान देशताविरोधः" इत्यपिनियमोऽनुभवपथन्नाधिरूढश्चेति । ३संसारोच्छेदापत्त्यात्मकस्तृतीयोऽसत्तःत धमनाक पराक्रम' यद्यप्यनयायुया जानलवदुर्षिदग्धजनास्तु प्रसादस्यप. राकाष्टामधिरोक्ष्यन्ति तथापि शेमुपीमस्मकापडन्देिजागतिजा. गर्तिच प्रामापिकजनवाक्यसन्दोहे कथशारंमामाणिकमसदि प्रति 4 (४) (५) तदर्शितप्रमाणम् तिस्योचरम् । रदञ्च प्रमाणे प्रकान्ताभिमतमतानुकलं नास्ति यत्तीयपकरणव. स्वादस्य निगमायन्यच्चय वक्ष्यमाण थुत्यादि विरोधाच्च तथाहि "तमैवविदित्वातिमृत्यमति नान्यपन्याविद्यतेऽयनाय" इत्यादि धर्षदपकपसको 'भचपुनरावर्तते' इत्युपनिषत् । पनात्तिगादाद नातिगन्दात्" इतिगारोरिक मचम " नमुहास्य पुनर्वन्धयोगोऽस्य. नात्ति युतः मा० ८० ५०६ ।" कुशनस्यास्तसंसारकमसमा प्तिर्नेतरस्य यो० भाष्य पा० ४ 'मामुपेत्यतुकोन्तेय पुनर्जन्मनवि पते" इतिगाता । इत्यायनेकारमाणमिवाप्य नात्तिर्यबुधिभुवि नावकालभते स समारार्णवमग्नमात्मानन्नीहर्तकामःस्वयन्न न्टः परान्नागयतीमालोकोक्तिमानमरतीइनमनागपिविमर्यगन्धः पथवि वाद्युतप्रमाणान्तरापयपिखरडनमईन्ति तथाति अन्धति मिया प्रधानमनिर्वणन्यायेन कथापि खलुपापानामलं मथेयसे यत इत्यु हिचानुरुध्ये देवीदास्यते, इत्यलं मतमारणेन । धर्मा धर्माश्रयोध्यक्षा विशेषगुणयोगतः॥४९॥ टो०- सो इनपुयाक्तयुशियों से जब पात्मा की शरीरादि यतिरेक में सिदि हुई अब उसके धर्मों का निरूपए करते है तर प्रात्मा धर्म तया अधर्म का आयय है, एवं विद्याप सुरसादि गुणों के मबन्ध मे उसका प्रत्यक्ष होता है। प्रत्याद्यनुमेयोऽयंस्थगत्येवसारथिः । अहंकारस्यानयोऽयंमनोमात्रस्यगोचरः॥५०॥ टी.-से रय की गति को देख पार रयवाही का अनुमान ता है वैसेही दूसरे शरीर में वर्तमान प्रात्मा चेष्टा से अनुमित .

।
होता है। और यह यात्मा घरहार अर्थात् अई प्रत्ययका पाश्रय
पौर केवल मन इन्द्रिय से गृहीत होता है ।।५०]
विभुर्बुद्धयादिगुणवान् ।
टो.-धन अात्मा विभु अर्थात् पर्व मूर्त संयोगी है तथा
पनि धादि चतुर्दय गुणों वाला है।
'घुद्धिस्तुद्विविधामता । अनुभूतिः स्मृतिश्च
स्यादनुभुति चतुर्विधा ॥ ५१ ॥
-प्रम में काई एक बुद्धि के दिखाते वह बुद्धि
दो प्रकार की है। एक अनुभवरूपा और दूमरो स्मरणरूपा एवं
पनभवरूपा बुद्धि पुनः चार प्रकार की है।
२प्रत्यक्षमप्यनुमितिस्तथापमितिशब्दजे।
१ युहित्य मामाम्यवती बुद्धिः माचात्म मात्तिः (नत्यन्त:
करपथ्यापार) यहिकपरिधानमित्यनर्यान्तरम गी. दा॥
1) वुजानपर्यायत्वकायनेन, मायमनिरामः । सन्मते डेर
त:करपधर्मत्यम् । २ अनुभूतिग्नुमत्र इत्यनर्थान्तरम् । स्मृति
an ! सरकारमा वनयभानस्य स्मासिस्वम्
मापदानु पादाने मेनार अन्य प्रत्यभिधानेऽतिट्याप्तिः सद
तदुपातं तस्यसरकारतरपोरिचन्यत्वात ॥
१ प्रमाता येनप, प्रमिणोति नु माणम् २ इन्द्रियार्य
अग्निकोपन्नं ज्ञानं प्रत्यक्षम् ।
तदम "पारमामरतिमनमा, मन इन्द्रिये ए, स्वायन
चम्दिय मिनिमम एपमोघम् । यगोऽयमेवमनसः किमगम्यमारत
यमिम मनाममितधातोऽयमात्मा ॥१॥

टो---उसाचार भेद भिन्न अनुभूति एक प्रत्यक्ष रूपा दुसरी अनुमिति रूपा तोमरी उपमितिरूपा और चौथो शब्दनम्या रेन्द्रिय में उत्पन्नज्ञान को प्रत्यक्षजान कहते हैं उममें इन्द्रिय प्रत्यक्ष प्रमाण है उसका विषय के साथ मंयोगादि सवन्ध व्यापार है ऐसे ही अनुमिनि ज्ञान में अनुमान प्रमाण है ट्याप्ति स्मरण व्यापार है इसी तरह उपमिति में (अर्थात् संशा पनि सबन्ध भान में) उपमान प्रमाण है अतिदेश वाक्याथ स्मरण व्यापार एवं चान्दतान में पदनान करण है पदजन्य पदा योपस्थिति व्यापार है गौतम दर्शन में चारही प्रमाण मानेर पाकि केवल प्रत्यक्ष को ही मानते हैं अनुमान को भी कायादस्वीकार करते है शब्द भी सौख्य मानते हैं अपमान भी नयायिक स्वीकार करते हैं अर्थापत्ति भी पञ्चम प्रमाण प्राभाकर मीमामक मानते हैं अनुपलब्धि भी भट्ट और वेदान्ती स्वीक्षत करते हैं एवं मामय ज्योतिर्विद ऐतिन पौराणिक और चेष्टा तान्त्रिक मानते हैं अन्तर्भाव दिखाने में अन्य बढने का भयरे अतः अन्यत्र देखो। घाणजादिप्रभेदेन प्रत्यक्षं पड्विधमतम् ॥५२॥ टरी -वद नियत प्रत्यक्ष प्रायज, रासन, चाक्षुष, स्पायन, पौत्र, और मानम भेद से छ: भेद का है (०) ईश्वर का प्रत्यच. तो इन पविध प्रत्यक्षों में नहीं प्रामला इम से न्यूनता होगी (३०) यहा पर जन्य प्रत्यक्ष री विवक्षित है क्योंकि सूचकार ने जन्य प्रत्यक्ष का ही लक्षण किया है ।। ५२ ॥ घाणस्यगोचरोगन्धोगन्धवादिरपिस्मृतः। तयारसोरसज्ञास्तयाशब्दोऽपिचश्रुतेः ।।२।।

। , टो०-गन्धगुगा गन्धत्व जाति तथा गन्धाभाव यह तीनों घ्राण इन्द्रिय के गोचर भर्यात ग्राध है। ऐसे ही रसगण तथा रसत्यादिजाति रसाभाव इन सबका रसना इन्द्रिय से प्राण होता है परन्तु गन्य यौर रम उद्भूत समझना अन्यथा परमाणु रस का भो जान होना चाहिये ॥५३॥ उद्भूतरूपं नयनस्यगोचरो द्रव्याणितन्ति- पृथक्त्वसंख्ये । विभागसंयोगपरापरत्वस्नेहद्रवत्वं परिमाणयुक्तम् ॥ ५४॥ क्रियांजाति योग्यवृत्तिं समवायंचतादृशम् । गृह्णाति चक्षुःसंबन्धादालोकोद्भूतरूपयोः ॥५५॥ टी.-उमृप्त रूप और गत रूप धाले दृध्य ऐमे हिं पृथमा तथा विभाग भयोग परस्य तथा अपरत्व स्ने तथा ट्रवत्य तथा परिमाण प्रत्यक्ष योग्य द्रव्यगत किया तथा नाति तथा समवाय रन मर्य का पहप नेच इन्दिय हारा होता है परन्तु नेघ रनो प्रत्यक्ष के वास्ते प्रकाग मबन्ध तथा उत रूप की सहायता मता ॥५४॥ १५॥ उद्तम्पर्शवव्यं गोचरःयोऽपिचवचः । 'इदन्न भातम्यं मस्र्यवयाय प्रस्थानत्यं यत्रममवायै नमः हस्परिमाा भवेत् । गलकर्मणोग्यतयोरेवप्रत्यक्षमा यत्रस्यन्नु मम. ব্যৰি মই নশ্বর মনি মাথা ঘষলাহিঙ্গা तरच प्रयतत्व यादमावयिममयतममयतापमधे महा गम्भवेदनाविषयायादि पदाधीना प्रत्यक्ष प्रकागमवन्धी तापयोरपिनत्यमययम्।

टी.-जिम दृश्य में उन्नत रूप और उड्न स्पर्ग.को वा द्रव्य त्वम् इन्द्रिय का गोचर अर्थात विषय है धैसे ही वह उत स्पर्य भी स्पर्णत्वादि मशित त्वगिन्द्रिय में गहीत होता है। रूपान्यच्चक्षुषोयोग्यं रूप मत्रापि ॥ ५६ ॥ टी-रूप तथा रूपत्वादि से भिन्न जी चक्षु इन्द्रिय से ग्रहोल होते हैं वे त्वगिन्द्रिय के भी ग्रहण योग्य है इस में महशादी पूर्वोक्त चक्षर्या द्य सभी त्वगिन्द्रिय के भी विषय में यह मि हुआ पौर द्रश्य त्वा च प्रत्यक्ष मे रूप हो कारण हैं। जो वायु का प्रत्यक्ष नही मानते वे बहिर्दव्य प्रत्यक्ष में केवल उद्भूत रूप को कारण मानते हैं और नवीन ती वायु का भी प्रत्यक्ष मानते हे स्पार्शन प्रत्यक्ष में स्वर्ण को कार गा मानते हैं अत: वायु रूप द्रव्य प्रत्यक्ष में उद्दत स्पर्श कार बनाने ६ ॥ ५६ ॥ द्रव्याध्यक्षेत्वची योगो मनसा ज्ञानकारणम् । भनोग्राह्यं सुखंदुख मिच्छाद्वषो मति कृति ॥ ५७॥ टी.- --मन को साय त्वगिन्द्रियका मम्बन्ध ज्ञान सामान्य में कारण है अर्थात् कई नैयायिक कहते हैं यावत जान में वे सभी मन के साथ त्वगिन्द्रिय के सम्बन्ध में होते हैं और इस में युति यह है कि मुषुप्ति काल में त्वचा को त्याग करके पुरीतन्नाड़ी में मन के प्रवेश करने पर कोई भी ज्ञान नहीं होता मुच्छ दस, इच्छा, हेप जान तथा यत्न ये छ; गुण भी मन इन्द्रिय के विषय है। ५७॥ ज्ञानं यन्निर्विकल्पाख्यं तदनीन्द्रियमिप्यते । यदुवम् * अस्तिवालोचन ज्ञान प्रथम निर्विकल्पकं वालम शादि विमान सय मध वलुजम् ॥ एकारना शुन्य ज्ञानत्वं विगेष्यता .

1-प्रान को निर्विकरप मंभिक "अर्थात विशेष्य विर्यपण के परस्पर सम्बन्धमानवगाहिन्धान है वह अतीन्द्रिय है अर्थात उस का प्रत्यक्ष नहीं होता उदारण "ययेदकिञ्चित्" जैसे यह कुछ है महत्त्वं पविधेहेतुरिन्द्रियं करणंमतम् ॥ ५८॥ टो ट्रध्य प्रत्यक्ष में महत्व समवाय सम्बन्ध इत्यादि पूर्व टिप्पण में स्पष्ट लिग दिया है पूर्वोत पाशुपादि भेद से छः प्रकार का नो प्रत्यक्ष पस में महत्व को कारणता है और इन्ट्रिय करण माना है ॥५८ ॥ विषयेन्द्रिय संबन्धो व्यापारः सोऽपि पड़ विधः । द्रव्यग्रहस्तु संयोगात् संयुक्तसमवायतः ।। ५९ ।। संसर्गता शून्य जानत्वं वा निर्विकल्पकत्वम् एवं विषयताया ज्ञान निरूपितत्वेन ज्ञानस्य च विषय निरूपकत्वात्पकारता निरूपक ज्ञानस्य मविकल्पस्य लक्षणम् ।। १ ।। तदुदाहरणन्तु यथाडित्थोऽयं पदत्वावविन्नविशेष्यतानिरूपक जित्यत्वप्रकारकं ज्ञानं विकल्पकमित्यर्थः । सौगतादयस्त सविकल्पक ज्ञानन्महि मन्यते उदाहरन्ति च तत्र युक्लि नाल यदर्थाना नाम्ना मंबन्धा भावात घट इति नामानुरजितं ज्ञानं न प्रमाण मिति भावः । विच जात्यादि कि मपि सबस्तु नास्ति चेत्कथंहि तथाभूत पदार्थस्य विशेषणतया घटादिचाने भान मिति तत्तुच्छ, इन्द्रियार्थमस्निकर्ष जत्वेननिर्विकल्पकवत् तस्यापि प्रमाणत्वात । मविकरपकमन्सरा निर्विकल्पकामिहेश्च मविकल्पकन वहेतुना निर्विकल्पक साध्य सिवि ঘিনা নয়াদি বিনিয়োৰ বিহু গালস দ্বিমির খান त्वात् दण्डीति विशिष्ट जानवदिति प्रयोगः ।

(५५)
री.-विषयों के साथ इन्द्रियों का जो सम्बन्ध वर व्यापार
और वर व्यापार भी प्रकार का है उसी को उदाहरण द्वारा
दिखाते हैं यथा द्रव्यों के प्रत्यक्ष में इन्द्रिय संयोग व्यापार
क्योंकि इन्द्रिय भी द्रव्य है थ्यों का ही परस्पर संयोग होता है
पौर द्रव्यों में समवाय सम्बन्ध मे वर्तमान गुण प्रादि पदार्थों के
प्रत्यच में इन्द्रिय संयुल समवाय क्योंकि इन्द्रिय तो द्रव्य से
संयत है और उसद्रव्य में फिर रूपादि समवाय सम्बन्ध से रहते
है क्योंकि गुण गुपि और जातिव्यक्ति प्रांदिका समवाय सम्बन्ध
माना है ॥ ५ ॥
द्रव्येषु समवेतानां तथा तत्समवायतः ।
तत्रापि समवेतानां शब्दस्य समवायतः ॥ ६॥
टी oइस कारिका मे 'द्रव्येषु समवेताना' कारिका भाग पूर्व
कारिका में व्याख्यात होचका है अब प्रागे 'तया'द्रध्यों में समवेत
जो गुणादि फिर उनमें समवेत जो गुणत्वादि नातियं उनके प्रत्यक्ष
में तत्समवायतः अर्थात् इन्द्रिय संयुक्त ममवेत ममवाय सन्निकर्ष
रेयोकि इन्द्रिय संयुक्ता हुआ घट रूप द्रव्य उस में समवाय छुपा
नील गुप्प का फिर उपमें समवाय गुणत्वका है अर्थात् द्रव्य समवेत
समवेत प्रत्यक्ष में इन्द्रिय संयु समवेत समवाय सन्निकर्ष या
अर्थ तथापि समवेतामा यहा तक निकला और थोष इन्द्रिय से
शरदके प्रत्यक्षकरने में श्रोत्र समवाय मन्निकर्ष है क्योंकि कविवर-
पर्सि आकागको ही तो थोत्र संज्ञा है और शब्द पाकायका गण
पौर गुण गुणिका परस्पर समवाय सम्बन्ध है।
तवृत्तीनां समवेत समवाये न तु ग्रहः ।
प्रत्याई समवायस्थ विशेषणतया भवेत् ॥६॥

(५६) विशेणतया तद्वदभावानांग्रहो भवेत् । टी.-तद्वत्तीना अर्थात् शब्द में रहनेवाले शब्द त्यादि धमी का 'ममवेत ममत्राय' सम्बन्ध से प्रहगा होता है, और ममवाय का 'विशेषणता सम्बन्ध में ग्रहण होता ।। तथा प्रभावों का प्रत्यक्ष भी विशेषणता सम्बन्ध से होता है दोनी स्थलों के उदाहरण यह है क्रमम"यहनील घटहै" इस वाक्य से गील विशिष्ट घटहै ऐम.साब्द बोध होनेमे समवाय भी विशेषण रूप से प्रतीत होता है अतः उम के प्रत्यक्ष में विशेषणता मन्नि- कर्प तथा भूतलादि निष्ट जो घटादिकों का प्रभाव से 'मतले घटो न' इस स्थन्नमें भूतल विशेषण है क्योंकि सप्तम्यन्त विशेषण होता है और घटा 'भाववद्भुतलम्' यापर घटाभाव विशेषण और भूतन विशेष्य है अतः पूर्व स्थल में तो चक्षुः सबद विशेष्यता सन्निकर्ष और उत्तर में चक्षुः सबद्ध विशेषणता सन्निकर्ष है। भ्यदिस्यादुपलभ्यतेत्येवं यत्र प्रसज्यते ॥६२ ॥ टी. •-इम पूर्वोक्स प्रभाव प्रत्यक्ष में गका करते हैं कि भूतल में जैसे घटा भाव का प्रत्यक्ष होता है एसे ही स्तम्भ में पिशाचा भाषचचाम गृहीत क्यों नहि होता उस में उत्तर करते हैं यदि स्यादुपलान्येतति" कि मर्वत्र घटा भाव की प्रत्युत अभाव मात्र की उपलब्धिनही होती अपितुजिम स्थलम यदि घट होतातो उप", लम्भ होता ऐमा तर्क का प्रयोग कर सकत हैं वहा पर ही घटाभाव का प्रत्यक्ष होता है सवत्र नही क्योंकि अन्धकार स्थल में घटामाव #उदभूत रूपावच्छिन्नालोक मयोगावच्छिन्न महत्त्वावच्छि. न्नचक्षुः सयोगस्य चाक्षुष प्रत्यचे हेतु त्वान्न पिशाच तदभावयोमह पति भावः।

का चाक्षुप प्रत्यक्ष नहीं होसकता क्योंकि यहां पर पूर्वोक्ता तक का प्रयोग ही नही कर सकते क्योंकि कदाचित् वहा क्या जाने घट हो परन्तु प्रकाश स्वरुप सहकारि कारण के न होने से ही न प्रतीत होता हो ऐसे ही पिगाच मे भी रूप के न होने से उम का और उस के प्रभाव का भी प्रत्यक्ष नही होता क्योंकि यहा तक योग्यता यहां पर भी नहीं बन सकती।६२ । अलोकिकस्तु व्यापारस्त्रिविधःपरिकीर्तितः । सामान्यलक्षणोज्ञानलक्षणोयोगजस्तया ॥३३॥ । *येगेपिक नयेतु समवायोऽतीन्द्रियः । तदशम् माक्षात्कारत्वभावस्य स्मरणं ततिरोधिनः । वदन्तिकारणयोग्यानुपलम्भन मेवच । १ । अर्थ:-प्रभाव प्रत्यक्षे प्रतियोगिनः स्मरणं प्रत्यक्ष योग्य प्रति धोगिन उनलम्भावरच कारणम् । इयास्तु विशेषोयन्न्यायनयेऽभाव स्येन्द्रियरेषग्रहः प्रतियोम्युपलमध्यभावस्य महकारिकारणत्यं प्राच्यो दीच्य मीमासाततस्तु प्रतियोग्यनुपलब्धेरैवस्वतन्त्रतया प्रामाण्यं मेनिरेतत्त्वपिक्षितजन प्रतारणमात्र यदि घटस्य प्रत्यक्ष चक्षुपाजा न्यतेतहि तदभावस्यापि किमितितेनैवनस्यात्स्याच्चतस्या:महकारि- कारणत्वम्तस्तर्कितप्रतियोगिमत्वविध्यनुपलब्धिमहतरोनेन्द्रिये. वाभावधानीपसायशुपनधेिर्मानान्तरत्वामम्भवत्याहुः तदरच तर्फिता प्रापादिता प्रतियोगिनो घटा देः सत्त्वस्य सत्वामहो- विरोधिनी या उपलब्धिस्तत्प्रतियोगिकोऽभावोऽनुपलब्धिस्तत्महका तेने ति । अन्यथा इह घटोनास्ति' इतिनिर्णयानन्तरं ' घटा भावं साक्षात्करोमि' इतिमाक्षात्कार विषयक प्रत्ययानुपपत्तरिति समरतमनवयम्।

यहां पर लक्षय पद को स्वरूप परक नही जानना क्योकि यदि ऐसा करेंगे तो मामान्य स्वरूप अर्थ निकलेगा और ममानो के भाव को सामान्य होने से 'ततलं घटवत्' इस स्थल में सट घट हो सामान्य पड़ेगा परन्तु दैवात् नब उस घट का नाम इमा तब घटाधिकरणत्वेन सकल उस घट वाले अधिकरणों का बोध नहीं हुआ चाहिये वोकि मामान्य रूप से भासमान घटत्व का, उस काल में प्रभाव है और वही अधिकरणों के साथ ज्ञान का सबन्ध क्योंकि इन्द्रिय मंबह विगेयक ज्ञान में प्रभारीभूत धर्म की तो सामान्यरूप है अतः लक्षपा पद का विषय अर्थ करना चाहिये तब सामान्य विषयकज्ञान अर्थ करना तब तो यद्यपि घट नष्ट हुपा है परन्तु उत का ज्ञान ती बना ही है तो पर्वोक्त वोध का होना अनुपपन्न नही हुआ द्रमलिये अग्रिमकारिका से स्पष्ट करते है।। ६३ ॥ चाक्षुषे चन्दनस्यचक्षुर्विषयत्वेऽपिमौरभस्यतदविषयत्वात, एवीनु- भूताय सौरभस्यालौकिकं प्रत्यक्षंजन्यते तथाच- सुरभिचन्दन मित्यत्र मौरभा लौक्षिकत्वम् तत्रयक्षु.सन्निकर्षस्यान हत्वात् चक्षुः मयुशचन्दनसमवायस्य तथसत्त्वेऽप्यप्रयोजकत्वादितिभाषा एवञ्च- रन्जुसर्पादिवोधेऽपिसर्पत्वाद्युपस्थिति नन्नवसन्निकर्षादेवभवति सर्पत्वादीचक्षुः सन्निकर्षाभावात् । प्रयच्चसन्निकर्प. पति न्द्रिय सहकारी, इतिसमदायविदमाहुः मनसएक्सहकारी इतिगनपानिमियाप्रमन्यन्त (50) निहासन्निकर्षयोईयोरेवं बुद्धिरूपत्ये तयोर्मेंदीनस्यादिति (७०) सत्यं तथापि कार्यभेदादेवभेदातिविति सामान्यलक्षणयातुजातिशानिनव्यतीना मानलक्ष षयाच जातिज्ञानेन जातीनामेवज्ञानं भवतीत्यसमदुल पवमा गितितत्वम् ॥

आसत्तिराश्रयाणान्तु सामान्यज्ञानमिप्यते । तदिन्द्रियजतद्धर्म वोधसामनथपेक्ष्यते ॥६॥ टी.-आसत्तिरिति, 'ग्रामतिः' अर्थात् घटादि सन्निकर्ष पाययों नाम अधिकरणों का तो सामान्य विषयक ज्ञान ही मानना चाहिये, (२०) यदि मामान्य विषयक ज्ञान को हि सन्निकर्ष मानोगे तो जिस स्थान पर चक्षुः मंयोगादि नामयी नहीं वहा पर भी सकल घटादिकों का चाक्षुपादि प्रत्यक्ष होना उचित है क्योंकि वहा पर सामान्य ज्ञान बना है (उत्तर) रेमे स्थल मे अन्य सामग्री के प्रभाव प्रयुक्ता प्रत्यक्ष का प्रभाव है उमी मामग्री को कहते है " नदिन्द्रियन " इत्यादि मे (तत्) नेपादि इन्द्रिय उस से उत्पन्न जो उस धर्म प्रकारक ज्ञान उम्र को भामग्री कारण ममुदाय अर्थात् लौकिक चाक्षुषादि प्रत्यक्षार्थ तो अपेक्षितचक्षुः मंगोदि उसको अपेक्षा अर्थात् यहा पर मकल घटादि पलोकिक धोध में भी आवश्यकता मी हेतु में ही तो अन्धधारादि में चक्षुरादिद्वारा घटत्वादि धर्म विशिष्ट धर्मोकामान नहीं होसकता, इस लिये वहां पर सामान्य लक्षण मत्यामतिमी नहीं होती।। ६४॥ विषयीयस्य-तस्येवव्यापारोज्ञानलक्षणः । योगजोद्विविधः प्रोक्तोयुक्तयुज्ञानभेदतः॥६५॥ १ योगाचामजनिताप्रवियपत्वं योगज्ञत्वम् ।। २ योग यामागासर्वदा सकच विषयक ज्ञानाधिकरणत्वं यत्वम् ॥ शचिन्तामहकारण मकान विषयकमान वत्वं युम्जानत्वम्।

. प्रत्यक्ष टी.-वितीय सन्निकर्प को कहते हैं 'विपयो' इत्यादि से जानलक्षण, व्यापार 'यस्यविषयो' अर्थात् यहिषयक ज्ञान को तस्यैव अर्थात् अपने विषयका हो व्यापार जानना जैसे कि जिस स्थान पर 'सुरभिचन्दनं, यह चनु चन्दन को देख कर भान हुआ है वहा पर मौरभ चन्दन और चन्दनत्य यह त्रितय जानके विषय है परन्त इन मे चन्दन और चन्दनत्व का बोने च मयोग तया नेत्रप्रयुक्त समवाय सम्बन्ध से मोलोशिया मन सकता है परन्तु मौरभागका चाक्षुषपत्यक्ष तो लौकिक संबन्ध मे सर्वघा दुःगक है अतः उसके माचात् फारके लिये कोई अलौकिक मंबन्ध मानना उचित है वह संबन्ध 'मेव संयुमा मनः संयह प्रात्मसमवेत जान रूप' परम्परा मंबन्धही कोवल बन ममता है इसी का नाम ज्ञानक्षलणा प्रमिह ह अक्ततीय मन्निकर्प कहते हैं योगाभ्यास मे दो मामध्य पुरुप में उत्पन्न होते है इम लिये योगियों को भी य और युजान नाम के दो भेद हुए और योगजधर्म भी विधि होता है॥६६॥ युक्तस्य-सर्वदा भानं चिन्ता सहकृतोऽपरः॥ टो० -उन दो भेद के योगियों में युक्तयोगी को तो समाधि आदिके यत्न मे पिनामारे पदार्थो जाग स्वभावसे.ही सर्यदा होता है और ममाधिद्वारा जिग को वाशित तत् २ पदार्थी का साचा. फार होवे वे यजान होते है। इतिकारिकावली रहस्य प्रकाशे प्रत्यक्ष परिच्छेदः ।

कारिकावलीरहस्य प्रकाश सहिता श्री सदगुरुप्रवरगङ्गाधर शास्त्रिभ्योनमः ॥ अम अनुमान परिच्छेद का प्रारम्भ करते हैं। व्यापारस्तु परामर्शः करणं व्याप्तिधीर्भवेत्॥६६ अनुमायांज्ञायमानं लिंगन्तुकरणंनहि। अनागतादिलिन नस्यादनुमितिस्तदा॥७॥ टीका-ज्येष्ठ होने में और निखिलवादि मम्मत और अनुमान का अनुग्राइक नेमे अनुमानमे पूर्व प्रत्यक्ष का निरूपण किया है अब हेतु हेतु महावसंगति ( ३) में प्रत्यक्ष के अनन्तर १-ध्याप्ति वलेन लीनमर्थमयीति लिद, अयवा ध्याप्ति वलेन यद्यस्यगमक, तत्तस्य लिङ्गम् । इदं लिग हिविध-सल्लिङ्गम् असनिम्तच तच व्याप्ति पक्षधर्मतावल्लिङ्गं मल्लिङ्कम तच व्यापकेन (माध्ये न) वाप्यं भवति तदिन्नतथा । मरियमतेतु महत्तत्वादिकार्यारो लिङ्ग पदेन परामृश्यते तत्र व्युत्पत्तिस्तु लयं गच्छति प्रधान इति । २-लिामानजन्य लिशिलानमनुमितिः परामजानजन्यंधा, उदाहरणन्तु पर्वतेवझिसाधने पर्वतेधूमदानानन्तरं पर्यतीति मान्, इतिज्ञानम्। १-प्रसाधन्यतमत्वं सतित्वं यद्यदनन्तरं निरूप्यं भाति, तत्तस्य मगत भवति। अतएव "नामंगत प्रयुजीत" इत्य मियुलोहितः । जायतेच काय कारणे था 'माते कार्यत्वस्य कारणत्वस्य पा भानात शिमग्यकारणकार्य पा इति, जिज्ञासा पतस्नयाईयोरपिमंगसिररस्त्येव ।।

- चनमान का निरूपण करते हैं-"व्यापारस्तु" इत्यादि ग्रन्थ में "अनुमायां,, अनुमिति स्वरूपज्ञान में व्याप्तिज्ञानतो करा है, जिसको अनुमान (४) भी कहते है औरपरामर्श जान, मध्य में व्यापार, व्यापार में व्यापारी को अन्यथा सिडि कदापि नधि होती इसलिये व्याप्ति ज्ञान स्वरूप करण परामर्ड के धारा अनुमिति रूप फलको उत्पन्न करता (१०) अनुमिति ही क्या पदार्थ है(उ.)नियम से इकट्ठे रहने वाले एका पदार्थक ज्ञान से दमरे पदार्थके जानने को अनुमिति कहते हैं जिम एक वस्तु के नानने से दूसरी बात जानी जाय उसको हेतु(५) कहते है जैसे पर्वत में लीन अग्नि धूम रूप हेतु से जानी जाती है, अतः धूम हेतु हुआ कई प्राचीन प्राचार्य अनुमितिमें ज्ञान विषयी भूत हेतु की करण मानते हैं, परन्तु सिद्धान्त मे व्याप्ति जान ही करण है इसी बात को मून मे दिखाते है कि "जायमान" इदानी मत्यक्ष विषयो भूत हो लिग (हेतु) अनुमिति में करण नाह है अन्यथा अनागत (भविष्यत) आदि पद से अतीत हेतु से अनुमिति नहि होनी चाहिये और होती तो है तथाहि - दूस यच के घर में भाग, जिम में प्रात काल में यहा धूम था इस अनुभान में यजगाला 'पक्ष' और भाग साध्य और धम हेतु है ती धूम करण हुआ परन्तु अनुमिति के समय करण (धूम) नहि रहा तदुतम्--"समसङ्ग योद्धातो हेतुताऽवसरस्तथा । निर्वा हे क्यकार्यक्ये पोढा संगतिरिष्यते" इति।' ४ मितेन लिङ्गेनार्थस्यपरचान्मानमनुमानमितिव्युत्पत्तिः । (वात्स्यायनमाध्यम् १।१०.३) अनुमीयतेऽनेनेतिया।

- और करण मे बिना कभी कार्य नहिं उत्पन्न होता तो अनुमिति यहा नहिं होनी चाहिये, इस निये धनुमिति में व्याप्ति जान को हि करण मानना उचित है हेतु करण नहि है। (०) माध्य किस को करते हैं (उत्तर) जो हेतु से सिड करनी हो वस्तु उमे माध्य कहते हैं ! (०) पक्ष क्या वस्तु है। (उत्तर) जिस स्थान में माध्य का जानना अभीष्ट हो, उसे पक्ष कहते हैं इस अनुमान प्रकरण में दृष्टान्त का नानना भी परम आवश्यक है जहा हेतु को देखकर साध्य का निश्चय किया हो उसे दृष्टान्त कहते हैं हमे उदाहरणमे स्पष्ट करता हूं यथा- "पवतो वन्दिमान् धृमात् महानमवत् इस में पर्वततो पक्ष है क्योंकि -भाग को इस में सिद्ध करना चाहते है और भाग की सिद्ध करना है अतः वहसाध्य है धूम से सिद्ध करना है इस लिये धूम हेतु है और धूम और वह्निका व्याप्य व्यापक भाव महानस (लार) में निश्चय हुपा है अतः महानस पृष्टान्त है ।। १७॥ लिङ्क लिझिनो सपन्धदर्गममनुमानम् । तच्च 'धुमोवधि- ध्याप्यः' इति व्याप्तिज्ञानमेव, अनच व्यापारस्वतीयलिङ्गपरामर्ग: येपामते लिङ्ग परामर्शएव'नरनुमितिकरणन्त नफलायोगव्यवहिन्न জাদ্যে ঘোনি নীলানাৰ বনসাল্লিল দ্বিগ, यमा न्यायभाप्येतु प्रकारान्तरेणानुमान विशेषानिर्दिष्टापूर्ववत्, शेववत्, सामान्य तो दृष्टम्चेति कारणलिङ्गकमनुमानं पूर्ववत् यत्र मेघोन्नत्याप्टधनुमानं यत्रपुमाकार्य कारणानुमानं तपः यथा " वोदकविपरीतमुदकनद्या पूर्णत्वगोवत्वञ्चदृष्ट्वा स्रो तमोऽनुमीयते भूताष्टिः, इति । कार्यकारणभिन्नानि मामा न्यतादृष्ट तृतीयम्, 'यत्र,-दूरादिभिरात्माऽनुमीयते । १ दयीगुषा गुणाचद्रव्यसंस्थानाः। इतरेषा पाधायदेमास्थानं ।

(३५) व्याप्यस्य पक्षवृत्तित्वधीः परामर्श उच्यते। टी. -अय परामर्ग का लक्षण कहते हैं । “च्याप्यस्य" इत्यादि से व्याप्ति के अधिकरण का नाम व्याप्य हे व्याप्य का अर्थात् माध्य निरूपित व्याप्ति र अधिनाभाव) के प्राथय का क्षर पक्ष में सदभाव विषयक वोध है वह परामर्श कहाता है जैसे जि पात्मेति। वात्स्या० १ ११। ५ ननु “निर्गुणं निष्कलंगान्त मित्यादि अत्यात्मनो निर्गुणत्वकथनाथमिशादि गुग्णाथयत यातत्मिद्धिरिति चेन्न त्या परिज्ञानात् तद्यथा निर्गता 'निष्पा दन्ना भानेच्छादयोगुणाधष्टादिवशाद यस्मिन सनिर्गुण इति तयाण्यानेन विरोधपरिहारसम्भवात् । न च भानस्वरूप प्रात्मा कस्यचिदनुभवमियः । अहं जानामि-इत्यादि प्रतीत्यान्नानाश्रय यैयानुभवात् । अहं ज्ञान-इति मतीत्यभावाच्चित्यलमनल्पेन। १व्याप्ति विशिष्टस्य ( हेतोः । पक्षण सह वैशिष्ट्यायम हि जानत्वं परामर्गत्वम् । सच परामर्थोहिविधः 'पक्षेव्याप्य इति पक्षप्रशारको व्याप्यविधेयक', 'पक्षीव्याप्ययान्' इति पक्ष विष्यको च्याप्य प्रकारकरच । तवाद्यी यथा 'पर्वते चन्दि व्याप्योधूमः' इति ज्ञानम् । दितीयो यथा 'वन्हिन्याप्यधूमवान् पर्यतः' इति ज्ञानम्। विवेचनं पगमर्श इत्यपिकेचिदाचक्षते एतस्यच परामशम्यानमितिं प्रति व्यापारत्वं व्यापार लक्षणा. मान्तत्वादेव तयाधि-यंजनयित्वैव यजनकर वम् सतस्य व्यापारः यथा-सन्मिक जनयित्वैवेन्द्रियस्य प्रत्यापन नकत्वम्, इति प्रत्यक्षे मन्निकर्ष इन्द्रियाय व्यापार: । एवमेष व्याप्ति जानं परामजनयित्वैवानमितिम्जनयति, इति परामर्श- ग्यांनुमितोव्यापारत्वम् । द्रव्यान्यत्वे. मतिभावस्वेति, तन्म- न्यव सति ताजन्य जन्मात्य व्यापारस्तम्।' यस्थ .

व्यायधम वनयं पर्वत प्रथ-"वन्हि निरूपित नो ध्याप्ति एमका प्राश्यतो धुम उस वाला यह पर्वत है" त्यात्मक अर्थात् व्याप्तिविभिष्ट पक्षधर्मता जानपरामर्श है जो कि अनुमिति रूप मन में व्यापार कहा परन्तु ध्याप्ति भी न्यय और व्यक्ति- रेफरूप से दो प्रकार की इसलिये परामर्ग भी दो भेद की होता रे इसका विस्तार अन्य देशो यह छात्रों को अनुपयोग समस कर छोड दिया है। च्यातिः साध्यवदन्यस्मिन्नसंवन्धउदाहृतः॥६८ टी.- -अथ ध्याप्ति स्वरूप का निरूपण करते हैं । "ध्याप्तिः" इत्यादि में माध्य झी विद्यमान जिस्में उसको माध्यवान् कहते हैं "माध्यवत." "अन्य." माध्यदन्यः ऐमे विग्रह में माध्यवत् पद १ माध्ययत्पदम्य निष्ट लक्षण या माध्यत्मनियं गिको- यो, तायचाभदैनान्यपदाधे क देश मेदेऽन्वयः एदेगान्त्रयमुररी सत्यवतम तिनलक्षणविधानादितिभाषः, ॐदग्यच रखपणाधिकरणे अधिकरणस्यनिरूपितत्वबन्धेन इतित्य सिस्वायच प्रतियोगितामा पन्नियति धा"पाध्यमतियोगिक भेदा- विपरममिपित तिरपाभात्र ध्याप्ति तिमच पर्ययमन्म माध्य माधनापने घनोपाधिशः भवन्धोया। भाभ्याप्तितिविधा অায়োনি হয়মিফতানি খােিনয়গিবি पूर्वपलभ्याति: मिहान्तम्यातिपय पोशात पूर्वपन दयास्तिवय- নাখাব্বিানি প্রথমথবিধাদিন খারথাঃষমাঘব मरित माचारमानेन, मोदगंतजनितमकार महशतेन माह- খয়েছি সবগলচিনষেধাঘম। বলuথমিয়া सिपारको वागमेन 'याप्तिपात याप्रणीमान्तयः "पदारप्रया" पाटाघानाति ..

(१०) में उत्तर जो पन्चमी उसका अर्थ प्रतियोगित्य करना अन्य शब्द का अर्थ भेदाधिकरण है और अन्य शब्द के अनन्तर सप्तमी का अर्थ निरूपितत्व है 'तथाच साध्यवदन्यस्मिन् न उत्तिर्यस्य अर्थ, साध्य वाले मे दुमरे में न हो "वृत्तिः" संबन्ध जिसका "संसाध्यवदन्या हत्तिः" वह हुआ साध्य वाले से भिन्न में न रहने वाला उमका जो भाव वह साध्य निरूपित हेतु निष्ठव्याप्ति रूप संबन्ध कहा है। उदाहरण मे लक्षण समन्वय प्रकार यह है "पर्वतोषन्हिमान् धूमात्" इस स्थान में साध्यवत्प्रतियोगिक भेद "वन्हिमन्न" इत्याकारक भेद ही होगा इस भेद का आश्रय । तो वन्हि वाला स्थान कोई भी नही होगा कयौ कि स्व मे स्थ भेद नही रहता किन्तु वन्हि के आययों से पृथक् जो पापी कप तडागादि है वही होंगे उन म "वृत्तित्व" अर्थात् रहना तो मोनशेवालादिनी का है पत्तित्व का प्रभाव हेतु धम में रहा तो लक्षण ममन्वय हुआ ऐमे ही “धूमपान धन्दः" इम अलक्ष्य व्यभिचारी में प्रतिव्याप्त भो नही है कयोंकि यह साध्यवन्न" इस पूर्वोक्ता भद का अधिकरण धुम शून्यतप्त लोई का पिएड भी है क्योंकि जबकि उसमें धम नहीं है तो धूम रूप साध्य पाले महानसादिको का भेद रह सकता है परन्तु उसमें हेतुभूत वन्हि का इत्तित्व ही है हत्तित्वाभाव नहीं हुआ तो अलक्ष्य में लक्षण के न घटने से पूर्वोक्त लक्षण प्रति व्याप्त भी नहीं हुआ। परन्तु यह लक्ष या केवलान्याय म सम. निवत नहीं होता क्योकि "इदं वाच्य शेयत्वात्" अर्थ- का विषय क्योंकि नाम का विषय है इस अनुमान में जगत्पक्ष है पाच्यत्व माध्य है पारशेयत्व हतु है परन्तु वाच्यत्वसारे पदार्थों में रहता है धम वास्ते माध्य वदन्य अप्रमिक है, उसकी प्रसिद्धि -यह नाम

.
से सन्निरूपित तित्य प्रतित्वाभाव मुतरां पवित्र
तोयत्वरूप लक्ष्य में सक्षण के न घटने प्रत्यापित
मिलिये पाग मिशान्त लघष करते प्रया
पम्य में
अथ वाहेतुम न्निष्ठविरहाप्रतियोगिना ।।
साध्येनहतो रेकाधिकरण्यं च्याप्तिरुच्यते ।।९।

अधिकरय पर्वतमानसादिनों मे पत्तने वाला जो अभाव पन्हि का प्रभाव नहीं धरसकते क्योंकि प्रत्यन्ताभाव का प्रतियोगोके साथ विरोध जब पूर्वीप्त अधिकरणों मे वन्हिरूपपदार्थ है तो उसका अत्यन्तामाय उनमे कैसे कहें इस लिय ऐसा अभाव घटाभावादि ही होगा क्योंकि ये घटादि उन पर्वतादिम नही है अत: उसके मतियोगी घटादि हुए अप्रतियोगि वन्हि है और वही साध्य हे उसके अधिकरण पर्वत में हेतु धूमका रहना है इसलिये लक्षण समन्वय हुआ। और धूमवानवन्हे, महानसवत्, ऐसे व्यभिचारी रूप अमडेतु में भी लक्षण मंगत नही होता जैसाकि उन्लाव्यभिचारी में शेतु पन्हि हे ओर पन्हि के धाश्रय लोहपिए इमेधूमनही रहता किन्तु धमाभाव ही रहता है तो धूमरूप साध्य प्रतियोगी हो होगया अप्रतियोगी नही रहा तो लक्षण समन्वय नहीं हुमा क्योकि हमे हेतु के अधिकरणमे रहने वाले प्रभावका अप्रतियोगी साध्य चाहिये वह प्रकत में नही हुआ। और "इदयाच्य ममेयत्वात् घटवत्" इस अनुमान में हेतु प्रमेयत्व है, और ममेयत्व का प्राय सकल जगत् है जगत् में घटपट प्रादि मारे पदार्थो का प्रभाव रहता है, किन्तु वाच्यत्व का प्रभाव कही नही रहा क्योंकि बाच्यत्वतो सारे ही जगत् में रहता है एमे साध्य वाच्यत्व के साथ प्रमेयत्यहेतु समस्त जगत् मे रहता है तो अम्माप्ति इटगई और प्रमेयत्व मोतु है यद्यपि ध्याप्तिमे बहुत विचार कर्तव्य रे (अर्थात् साध्य में माध्यता वच्छेदक सवन्ध और धर्मादियों का निधेश तथा हेतु में हेतुता बच्छेदक मंवन्ध और धर्मके निवेश कर्तव्य है) तथापि उम विचार को दुरूह होने से वालकों के लिये भनुपयोगी समझकर त्याग दिया है ।।६८ ॥

. पनता सिपाधयिषया शून्या सिद्धिर्यत्रनविद्यते। स पक्षस्तत्रवृत्तित्वज्ञानादनुमितिर्भवेत् ॥७॥ (अपक्षता और (२) पक्षके स्वरूप को दिखाते हैं। टी.-"सिपाधयिषया" प्रत्यादि ग्रन्धमे नहा पर व्याप्ति मान परामर्श आदि सारी सामग्री अनुमान को हो, परन्तु साध्यका निश्चय पक्ष में होजावे, तो अनमिति कभी नहीं होती तो सार कारण रहे भी और काव्य नहीं उत्पन्न हुआ,ससे किसी कारण को न्यूनता से सामग्री में न्यूनता जानी गई, वह कारण है।कई प्राचार्य माध्य मन्टेह: पक्षता" अर्थात् माध्य १ सिपाधयिका विर विशिष्ट मियभावत्वं पक्षता लक्षणम् भवेदंबोध्यम्-मि('पर्वतो वन्हिमान' ति निश्चय) मत्ये पर्वतो पनिइमान्पत्य नुमित्यनुत्पत्ते,मिधिरनमितौ प्रतिवन्धिका मिय भावोऽनुमितो कारणमिति यता म्यम् । एस सत्यपि, पर्वतादी पक्षे माध्य निरषये मत्यपि, मत्याञ्चमिपाधरिपाया पवतो कन्हिमान् त्यनुमिति दर्शनात् भव सिपाधयिषा उत्तेजिकावाच्या तप पक्षमा सम्पत्तये मिपाधयि चा विरह विगिष्टत्वं मिशेविगेपणम् । (२) पपताश्यत्वपक्षस्यमयणमा पनुमिन्यदेश्यरचं पचत्वं वा इदम्च "गगन मपनदिल्या कारक गगनस्व परिमन्न विधेयता कानुमिति दर्शना हमाचीनोज माध्य संदेशात्मक लक्षणं विहाय नयोन.स्थिरी छतम् । माध्य प्रकारक निश्चय विशेष्यत्वं मपनत्यम् मिरचयाच महान् मानिहमदिल्याकारकः माध्याभाव प्रकारक निरचय विगे. यविषयत्वम निरच्याच दो वध भात्रयानित्याकारकः । कार्यान्मधर्मविघटप्रतिबन्धकत्वम् । मति बन्धक प्रति पन्धस्त्वमसमयम्।

. का जो पक्ष मे अनुमिति में पूर्व मंशय है वही पक्षता ओर उस पाला पक्ष है उनका यह अभिप्राय है कि अगमिति से प्रथम साध्य का सन्देह नियममे रहता है इस लिये उस स्थल में साध्य का निरचय होने से साध्य का समय (पचता) नही है इसमे अनुमिति नहीं होती इस प्रकार में उक्त दीप को दर करते है परन्तु यह ठीक नहीं है जिससे गृह के भीतर स्थित पुरुप को भी मेघ गर्जन मे संदेह के बिना भी "गानं, मेघवत, गर्जनात्, इत्यादि स्थलों में मेधादि की अनुमति देखी गई है किन्च साध्य का प्रत्यक्षात्म निश्चय होने पर भी यदि अनुमित्सा भर्यात् मुभी अनुमित्यात्मक साध्य का ज्ञान हो ऐसी इच्छा हो तब भी अनमिति होती ही है क्योंकि "प्रत्यक्षेणावगतेषि पदार्थेऽनुमानेन वभुत्सन्ततकरसिकाः" अर्थ-प्रत्यक्ष प्रमाण में पदार्थ के निश्चित होने पर भी तार्किक इमे अनुमान प्रमाण मे हो जानना चाहते हैं प्रतएव अनुमित्सा मात्र भी पचत नहाशिमघ के गजने स विना इश के भी मेघ का चनमान होता सो न होना चाहिये इस वास्ते सिद्धान्त मूल से दिखाते हैं साध्य के सिद्ध करने की इच्छाका नाम 'मिषाधयि पा' है उसमे शून्य नो मिहि ( प्रत्यनात्म निश्चय ) अर्थात् मिपाधयिया विरह विशिष्ट मिति उमझा जो अभाव वह पक्षता है वह जिस्म वह पच उनमें हेतु वर्तन के भानसे अनुमिति होती है यह मूल कारिका का अर्थ है। अनेकान्तो विरुद्धश्चाप्यसिद्धः प्रतिपक्षितः ।। कालात्ययापदिष्टच हेत्वाभासास्तु पञ्चधा॥७॥ १"अनुमिति तत्करणान्यता प्रतिबन्धक नान विषयो भव प्रसार माति से स्वाभासोका स्वरूप दिखाते हैं। टो.--"अनैकान्तः" इत्यादि मुल अन्य से अनेकान्त विरुद्ध प्रसिद्ध मत्प्रतिपक्ष, (प्रकरण सम) चौर कालात्यापदिष्ट (पाधित) यह पाच हेत्वाभास होते हैं विवादी के अनुमानों में दोप देने वास्ते और अपने अनुमानों में मारे दोष हटाने के लिये हेत्वा भास ( दुष्टहेतुश्री का जानना भी अभीष्ट है इमलिये त्वामामो का निरूपण करना भी योग्य है इन पाचों का मिला दुपा लक्षण यह है, कि जिमका ज्ञान अनुमिति वा अनुमिति करण (व्याप्ति जान) का प्रतिवन्धक हो, ऐमे दोप पाले अनुमान के हेतु को हेत्वाभाम ( दुप्टछेतु ) कहते है । नेमाकि दोन्हिमान धुमात् म भनुमान में बन्धभाववद बाध वनयभावयाप्यान् इदमा प्रतिपक्ष और धमामाघ वदा स्वरूपामिदि है । इनका विष निरूपण विशेष लक्षण में स्पष्ट होगा । धर्मस्तत्व रत्याभासस्य लक्षणम्। पञ्चरूपोपन्नत्वाभाध ससि तटू पेण भाममानत्वं वा। पध्मष्पाणित--पक्षमत्त्व सपक्षमत्त्व विपक्षमत्त्यं, प्रवाधितत्व, अमत्प्रतिपक्षितत्वधेति एप केनापि रुपेगा रहिताः फेरिचदविता स्वामामा पञ्चधा गोलमेन प्रपञ्चिताः। "हेतोगमाम महग रति न्याय पिन्टोमाया मत्र माहण्यं च पञ्चम्यन्त पद प्रतिपायस्वेन । पयएवरेत्याभामा इति कापादा अचिरे तद्यथा--पमिहि, विरोधः, मन्दिाधत्व पदमाक तम्-धमत्प्रति पनौत नस्पतन्वी सत्र वाध पायय मियादी पनकान्तिकवाय चायति मन्प्रतिपक्षोप्यन्यतरर থাকবাহি য় রাহাহহাসিন্ধার যন্ত্রণায়নি, पति । तदुष्टम् -"विका मिा मदिग्धमान काम्यपोऽप्रवीत्" ।। .

- आयः साधारणस्नुस्या दसाधारणकोऽपरः। तथैवानुप सहारी "त्रिधाऽनेकान्तिकोभवेत्॥७२॥ री.-अब त्वामाप्ता के विशेष विभाग दिखाते है "प्राध इमि" पूर्वोहा उन पञ्चविध त्यामानॊ म अनेकान्तिक (ध्यमि" पारी) तीन भेद का है प्रथम माधारण, घितीय : असाधारण, और तृतीय का नाम अनुपस हारो है॥ ७२ ।। यः सपक्षे विपक्षच भवेत्साधारणस्तुसः । यस्तूभस्मायावृत्तः सत्वसाधारणामतः॥७३॥ १ माध्याभाववत्तित्वं साधारणत्यम् । २ सर्व पक्ष विपच व्याहत्तत्व मसाधारणस्य लक्षपाम् । ३ वस्तुमात्र पक्षकत्वमन पनहारित्वं ननस्यन्त "भव याच्यं पमेयत्वात्" पत्र मर्यस्यैव पक्षवन व्यतिरेक दृष्टान्तो मास्तीति प्रमेयत्वं हेतुरनपसहारी। एतज् धानस्य व्याप्ति संशय जनकतया व्यतिरेक व्याप्तिग्रह प्रतिबन्धः फल मितितत्वम् । पस्तुतस्तु, अ. स्यन्ताभावाप्रतियोगि माध्यकत्व मनप महारित्व तच्च महत रेती सजाघटीतीति लक्षण समन्वयः ॥ ४ अनम्युत्पत्तिः, एकस्य माध्यस्य तदमावस्यवायोऽन्ताः सहचारोऽध्यभिचरितसचारएकान्त: तस्येत्येकान्तिकः (गो.. ११४५) तदन्योऽनेकान्तिकः । अयमेवमव्यभिचार पटेम गीयते, वेगे पिकमतेतु मन्दिग्ध इत्यच्यते इतिज्ञेयम् । लक्षणन्तु सत्य भिधारात्मकदोपवयम् । न्यायभायेऽपि निदर्ग"नित्यागदीड स्पयंत्यात्"-नित्यत्वमप्ये कोऽन्तः । अनित्यत्वमप्ये कोऽन्तः । एकस्मिनन्त वियत प्रत्येकान्तिकः । विपर्ययादफान्तिकः । म यान्तध्यापकत्वास ।

। । टी०-जो खेत सपक्ष 'निश्चित साध्यवाले विपक्ष निश्चित साध्याभाषचाले म रह वह मावारण कहा जाता है। और जो इंतु सपक्ष विपक्ष दोनों में नहि वर्तता किन्त के धन पक्ष मात्र में हो रहे वह अताधारण कहा जाता है। ये तीनों भेद ध्याप्ति जान के प्रतिबन्धक है इनक उदाहरण क्रम मे "धूमधान् पन्।' इम मनमान में धूम शून्य लोइपिण्ड (विपक्ष) में तथा महानस (मपच) में वन्दि का निश्चय है अत: वन्ति रूप देत माधारण तो "धुमगन्यावृत्तित्वः" स्वरूप ध्याप्तिजान का प्रतिवन्य हुमा ३ क्योकि विपत्तित्य रूप व्यभिचार विषयक ज्ञान होने से व्याप्तिज्ञान का उदय पादापि मदि होता और "शब्दोनित्य: सदस्वात्" इस पगुमान में गन्दत्वहेतु सपक्ष गगनादि और विपक्ष घटादिको मे ध्यान है किन्त पञ्च (गन्द) मात्र में रहतार पतः 'शब्दत्य' अनाधारण ६ या हतु "माध्यतामाधि करण्य" रूप व्याप्तिज्ञान का पशिवाय हे यद्योकि इतुम नव माध्यबदसिय मिरचय या तो माध्यमदत्तिनमान कभी महिोगा ॥३॥ दन्तु बोध्यम्-यद प्यासिय प्रतिबन्ध नसणेशप्रयो जनकत्यन माधारपादानामेश रामामतम् । तत्र माधारणेन ध्यापकावश्य पभिच स्विस्या, साधारणेन मामानाधिकरण्यस्य पपमारिणाप व्यतिरेक घ्या ग्राम्य प्रतिबन्धार माधारपादो मप ममम. प्रमिति करण यति धान पतिक नाम विधाताप दासगणमान्य ना मगति लि । यद्यपि वश খে বিশ্বকর সিপানি ধাধা কল্যষি সাবি বুদয় तापी भेदारिपामन्तभ्य इति समात मेवामार मम् ।

तथैवानुपसंहारी केवलान्वयि पक्षकः । टी.-ऐ जिम हेतु का पक्ष केवलान्धयि हो वह भनु पर्म- भारी कहा जाता है "उदाहरण-" सर्व मभिधेयं प्रमेयत्वात् " इत्यादि स्थलों में बात मात्र को पक्ष होने से साध्य के साथ हेतु का सामानाविकरग्य ग्रहण करने के लिये कोई स्थल शेष नही है क्योंकि व्याप्ति यहभूमि ही तो दृष्टान्त होता है एवं सामानाधिकरपय प्रह रूप कारणी मत व्याप्ति मान के न होने से अनुमिति रूप कार्य भी ऐसे स्थली म नहीं होता या प्राचीनों का मत है इस पक्ष को त्याग करके नवीन "केवला. न्वयिमाभ्यकत्व" लक्षण करते हैं उनका यह तात्पर्य है कि यद्यपि पक्ष तिरित स्थल व्याप्ति ग्रह का न भी मिले तथापि पा के एक देश हो सहचार ग्रह हो जाएगा सा कुछ हानि नहीं है प्रय नवीन लक्षप में अर्थ जिस हेतु का साध्य अत्यन्ताभाव का प्रतियागो न हो उमे अनुपमहारी कहते हैं उनमा उदाहरण में वाध्य. त्व सारे जगत में रहने वाला माध्य यह निश्चय है कि वाध्यत्व का अभाव अममित है तो वाच्यत्वाभाव का व्यापक नो प्रभाव उमका प्रतियोगी प्रयमस्व है, इस व्यतिरेक ज्ञान को नहीं होने देगा यः साध्यपति नेवास्ति'सविरुद्ध उदाहृतः॥७॥ १माध्य व्यापकी भता भाव प्रतियोगित्यं विरुदम्य लक्षणम् पतविमेध्यक माध्याभाय व्याप्य रेतु प्रकारका मान. पक्षविशेष्यक माध्य प्रकारकानमिति प्रतिबन्धः फलम् । एवं सत्प्रतिपक्षऽपि । विरुद्ध मत्प्रतिपक्षयोविशेषस्तु तोरेकत्वेन रेतो रित्वेन चावगन्तव्य । माध्यामात्र वाप्य प्रहात सुर्षिक: । साभ्या टीक जो हेतु साध्य के पाश्चय में न रहे अर्थात् साध्या भाव को साथ -याप्ति रखे. उसको विरुद्ध कहते है, से "अयं गो रस्वत्वात" यहा पर जहा परवत्व ह वा २ गोत्वाभाव इस प्रकार को साध्याभाव के साथ ध्याप्ति होने स पश्वत्व हेतु विरुध है इस हतु का ज्ञान माक्षात् धनुमिति का प्रतिबन्धक है कोंकि गोस्वाभाव के माथ व्याप्ति बाले अश्वस्ववत्ता को मान होने पर गोत्वनिश्चय नही हो सकता ॥ ४ ॥ आश्रयासिद्धिराद्यास्यात्स्वरूपासिद्धिरप्यथ । व्याप्यत्वा सिद्धिरपरास्यादसिद्धिरत स्त्रिधा॥७५॥ -अम अमिति का विभाग कहते हैं "प्राययासिवि" त्यादि ग्रन्थ में अमिहि तीन प्रकार को है प्रथम का माम मायया मिडिदितीय या नाम स्वरूपासिधि चौर तीसरी का नाम च्याप्यवसिहि है। पक्षासिद्धिर्यत्र पक्षा भवेन्मणिमयोगिरिः। भाष ध्याप्य प्रति हेतुमत्पन, मत्प्रतिपक्ष इति विवेकः । विहे साध्याभाव माधका इंतु: माध्य माध्यमत्वेनोपन्यस्त रस्य सामर्थ्य मचनमपीत्यस पल्लविना १ पापयामियान्यतमत्वम सिदिमामान्य लक्षणम् । ध्याप्ति-पक्षधमता न्यता दिली तामिरः । पयमेव माध्य मम रयते ! (पात्रया• १६३ | ४८) उदयमापार्यान्तु पर धर्मता प्रानाभाषःच्याप्यग्य पधर्ममया मिति: मिति सदभावो पामिद्धिरित्यार: परामर्श प्रति बन्धक मान विषयो धो पा।

टी.-जिस स्थल में मणिमय पर्वत को पन करके उसमें वनित की अनुमिति की जाय वहा पर 'पचासिदिः' अर्थात् पाश्रयासिधि छाती में जैसे "मापमय पर्वतो वन्हिमान् धमार " इसका लक्षण यह है कि पक्ष मे पचतावच्छदक का प्रभाव माययासिधि कहो नाती का उदाहरण में पर्वत रूप पक्ष में मणिमयत्व नहीं पयोकि मणिमय पर्वत प्रमसिद्ध एव गगनारविन्दसुरभि भरविग्दत्वात् सरोजार विन्दवत्"इत्यादि स्थल में भी आययासिधि जाननी चाहिये यहा पर भी 'गगनीयस्व' अरविन्द में नहीं इसका जान भी अमिति का प्रतिबन्धक के कोकि अरविन्द में गगनीयत्वाभाव निश्चित होने पर गगनोयत्व विशिष्ट प्ररविन्द में सौरभ्य की अनुमिति कदापि नही होगी । हृदो द्रव्यं धूमवत्तादत्रा सिद्धि रथा परा ॥७॥ टी.-"इदो ट्रव्य धुमत्त्वात्" इत्यादि स्थल में स्वरूप सिहि ह क्योंकि पक्ष में हेतु को न रहने को स्वरूपासिद्धि करते हैं, और उसके अधिकरण को स्वरूपासि जानना चाहिये तो प्रक्षत हेतु धूम का पक्ष इद में प्रभाव है इसका भान परामर्म का प्रतिबन्धक है यथा हेतु के प्रभाव विशिष्ट पक्ष है ऐसा मान हो जाने से पर विशेष्यक हेतु प्रकारक परामर्य कदापि नहीं हो सकता ।। ७६ ॥ व्याप्यवासिद्धिरपरानीलधमादिके भवेत्॥ टी.-"पर्वतो वन्हिमान नीलधुमात्" इत्यादि स्थली में घ्याध्यत्वासिदि नामक तृतीय अमिति होती , प्रवत उदाहरण में नीलधुमत्व गुरुधर्म होने से तितावादक नहीं सकता क्योंकि जब शुबधमत्व ही क्षाधवतर्क युक्त हेतुनावच्छेदकवन

(५)
समतानो नीलधुमत्व के मानने में गौरणपत्ति असत
तुला बरेदकक प्रभाव को व्याप्यत्या मिचि कहते हैं तान्
()व्याप्यत्वामिह कहते हैं जैसे निबाट उदाहरण में अथवा 'पर्वतो
पन्हिमान याचमयमात्" या पर क्रममा व्याप्यतावाद
पारवेन अभिमत नील धमत्य या रितीय उदाहरण में काम्वन
मयत्ययेदीमो धर्म हेतु धूमम नहीं तो क्षण ममन्षय रोगया!
इसकामान भी परामर्गका मतिमन्धकई धुममें गोलधुमत्य नहीं

" अथवा काचनमयस्व नहीं है इम जान के होने पर ध्याप्य नील धूमवान् पयतः प्रयया "न्हिच्याप्य काचनमयधमवान् पर्षतः इत्यकारक परामर्श नही होसकता, क्योंकि यह परामग धूम मे नीलधमत्व अथवा काञ्चनमयत्व सबन्धावगाही है। विरुद्धयोः परामर्श हेत्वोः सत्प्रतिपक्षता ॥७॥ टी.-परस्पर विरुद्ध हेतुयोर्क परामशमें मत्मतिपक्ष होता है। पर्यास् जिम हेतु के साध्य के प्रभाव मिट्द करने वाला हितीय हेतु हो वह हेतु सत्पति पक्ष होता है जैन 'पवतो वन्दिमान् धमात् महान सवत 'पर्वतो वनाभाव वान पापाग मयत्वात् कुडययर' यहां दोनों अनुमानों में दोनों हतुर्यो को परस्पर साध्याभाव साधक होने में परस्पर मत्प्रतिपक्षता के 5 का ज्ञान साचात् अनुमिति या प्रतिबन्धक ६ क्योंकि नब 'हिन्यायधूमवान्' बन्धभाव व्याप्यवारच, पर्वत: इस प्रकार के दो पगमण हुए तो एक से भी पनुमिति नहीं होगी। 99 । साध्य शून्यो यत्र पक्ष स्वसो वाधउदाहृतः । उत्पत्ति कालोन घटे गन्धादियंत्र साध्यते ॥७८. (१)माध्याभाघ साधक यन्तरं यस्यम मत्प्रतिपक्षः पत्र तुल्य बलयारेष मप्रति पक्षत्वम्, नातुल्य बनयोरिति नियमः तेन হজ নৰ নাৰি লনদ নাইশায়বানা মনি স্বীয় मन् (विदामान. ) प्रतिपक्षो पिराधि ध्याप्त्यादि मत्तया पराम ग्यमापस्य तो ग्मी मत्प्रतिपक्ष इति विग्रहः। २ वाधा (रेत्वाभास:, हेतु दोष ) तल्लक्षणन्तु 'साध्या (८०) जिस पनमाने में पक्ष साध्य रहित हो वहांवाध दोष होतार जे "उत्पत्तिकालीनो घटः गन्धवान् पृथिवोल्वात्" इम मनमान में उत्पत्ति कालावच्छेदेन घट रूप पक्ष में गन्ध रूप साध्य की सिदिष्ट परन्तु उस क्षण में घट में गन्ध गुण नहीं होता क्योक्षि उत्पत्ति कादमें द्रव्य निर्गुण उत्पन्न होता है यह पूर्व फर चुके उदाहरणान्तर जैसे "वहिरनुष्णो द्रव्यत्वात् नलवत" यहां पर पन्हिपध में पनुष्णस्वाभाव उणय का स्वगिन्द्रय में पाप होने से व्यत्वहेतु बाधित है इम का प्रान भी मानात पनुमिति का प्रतिबन्धक है क्योंकि प्रत्यक्षादि में जब माध्य के बाध का निश्चय हुमा सो मार की मन मिति कभी नहीं होगी जिसमे सदभार,लोकिक निर्णय मासा बुद्धि का प्रतिवन्धक होती २॥6॥ इति कारिकावली रहस्य प्रकाशेऽनुमानपरिच्छेदः॥ भाववाय प्रमाविषयमा तयाच माध्याभाव पमेयदोपः। साथ प्रमात्वेन जात नापप मती साध्याभाव यत्पक्षको हेतुर्वाधित अयमेव वातात्यया पदिष्ट इति कथ्यते कालस्य (अनुमान कामायग्यर्थः सत्योपदिष्टो मिटिंठकानात्ययापदिष्टापति - (८१) कारिकावलीरहस्यप्रकाशसहिता। (१) व अवसर सङ्गति के अभिप्राय से उपमिति का निरूपण करते हैं। मामीणस्य प्रथमतः पश्यतो गवयादिकम् । साहश्यधीर्गवयादीनां यास्थासाकरणमतम्॥७९॥ वाक्यार्थस्यातिदेशस्य स्मृतियापारउच्यते । गवयादिपदानांतु शक्तिधी रुपमाफलम् ।।८०॥ टो-कोई नागरिक पुरुष जिसने कि बन के भग कभी नहीं देखे थे जिन में में एक गवय के विषय में किसी बन के रहने वाले मनुष्य से उसने सुना कि प्रायः गौ को भाई जिसके भर हो, उसे गवय कहते हैं। देवसयोग में वही कभी बन में चला गया, वहा उसने गौ के तुल्य एका मृग देखा, उस मृग को पन गौ के अङ्गों की नाई देखके उसे उता बात का स्मरण कृपा. किगो के तुल्य प्रों वाला मग गवय होता है, पीछे से उसे निश्चय हुमा, कि ऐसे २ मृगों को गवय कहेंगे इसी को पशि पर सहते हैं इस मृग के पडों का गौ के अड्डों की नाई जानमा उपमिति का करण है, इसी सादृश्य ज्ञान को (३) उपमान करते सेउवाश्य का स्मरण उपमिति में व्यापार, और शनिधान (ऐसे २ भूगों को गश्य करेंगे) उपमिति है। और अलंकार मारण में जिसे छपमा कहते हैं, यहा भी उसी को उपमिात करता। केवल सना ही भेद ,कि वह माधारण धर्म उपमा है और (१) पाययार्थाने पदार्थना नस्यहेतुःवेन पावयार्थ भानरया बेमिष्पयिष्यमाणसयासत: प्रागेयोपमिति विचारो युवति। .

(२)
पा साधारर धर्म का ज्ञान उपमिति रे जो धर्म उपमान पौर
उपमेव दोनों में से, उमे माधारण धर्म करते हैं 10॥८.
इति कारिकावली रहस्य प्रकाश उपमानपरिच्छेदः
(२) उपमानजन्य गादलिजानमुपमाया: (उपमितः) सपम्
निदर्शनम् -"गवयोगश्यपशवाय," । (क) sपमानत चपन्त
प्रसिमाधारमाध्यमाधनमपमागम् । SR "प्रमियरत
माधम्यादमिराय साधनम् । उपमानं ममायातं यथागोर्ग.
यतया ॥ १॥प्रमिहस्य पर्थ पमितस्य गवाद साधम्र्यात माश्यात्
तनमानात् मायायगव्यादि पदाध्ययाय माधनं मिडियत
स्यध्यारिएप करपातक्षणं. पश्यामाध्यसाधनमिनिकरण
श्युटा करपनरथमेयेदम । गोमगोगवयपदवाच्य स्याफारस
বাঘা শী মাহলি বিদ্ধ যায় মানুষগন্ধা
पमा जायसेतदेवकरच (पमान) कथ्यते । माग्य प्रमाकरप्प
मिति पदान्तिमामारिका"मास्यप्रतियोगि समानम् ।
यथा "पस्ट पमुपमित्यादी धन्द मानम् । गादिशात.
मापारधर्मपाने पदिता परिदास्यम, स्या: पापादार
मण्यार,
प्रमापानमा रगेकान्ति.
नपार पायायायार पाहण्यादि परामगांरपायाम
पपानमिति रेशानीपमा पमानासामिपाः । यथा--ग.
वरमानाय

- (८३ प्रशद और उपमान की परस्पर उपजीव्यापजीवक भाग रूपसङ्कति के अभिप्राय में शाब्द बोधका निरूपण करते हैं। 'पदज्ञानंतु करणं द्वारं तत्र पदार्थधाः । टो.--"पदनान" इत्यादि ग्रन्थ से अब मूलकारक माग्द बोधको प्रशान्त करते हैं प्राब्द बोध में पदभान करण : और पदजन्य पदार्थ की उपस्थिति उसमें व्यापार अर्थात याद न्तरमवश्यमेष्टव्यमिति किञ्च, उपमितेः प्रत्यक्षादि प्रमितिभ्यो सिरितस्वाद विलक्षणोपमिति करपस्टन पृथतयाचपृथकामस्ये. ति ममात मदात तदुक्तम् -तस्मादय सगवयो नामेत्येवंविधाम- तिः। उपमानजन्यव न प्रमाणान्तरोशवा ॥१॥ तच्चीपमान कि. विधम् । मादृश्य विशिष्टपिण्ड भानम्, असाधारण धर्मविशिष्ट বিজ্ঞান ও খ্রিষি এবং মনি। না শী माश्य विशिष्ट पिण्डनानम्, हितीयम-सलमग ( गैडा) भानम् पत्रासाधारण धर्मश्च नासिकालसदेक युनत्यम्, इति भयम् तृतीयम्--उष्ट्रनानम् । पत्रचवेधयं तन्नत पृष्ट दीर्घ पोवादि ऊध मिति। रगति लक्षणान्यतर हत्त्यापदार्थ मत्यय जनकत्वं पदस्य सक्षणम्। तच्च न्यायनये हिविधम् । मुख्यम्, गौणंच । यच्छति इत्यायमर्थम पस्यापयति तत्तस्मिन्नर्थे मुख्यम । यथा गोघटादि ध्यक्त्युपस्थापक गो घटादिपदम् । मण्यमपि चतुर्विधम। यो. गिकम, रूठम् योगरूटम, यौगिकरुट चेतित वाघम-पाचकादि पदम् । द्वितीयंमा नाप वाचक विपदम्,गोमएडपादिपदंच, तृतीय पंकजादि पदम् । चतुर्य मुद्धिदादि पदम,इति। यत् लक्षण्या यमर्य मुपस्यापयति तत् तस्मिन्नर्थे गोप म, ताक्षणिक, इति च उच्यते यथा गङ्गाया घोष इत्यत्र नक्षपात्यातीरोपस्थापकंगनापदम् इसलिये (8 ). केशारा जो वाक्यार्थ का ज्ञान से उसे भाग्द बोध करते हैं, परंत : पदों के जानने के बिना पायध और वाक्यार्थ का ज्ञानाना पस म्भव रस लिये गाद वोध में पद का चान करण (साधन) परन्तु विना व्यापार के साधन कुछ नहि कर सकता, पति वालक्षणा के हारा जो पद से पर्थ का ज्ञान हो, पर गारद वोध में ध्यापार इतना अवश्य जानना कि चायमान पद करण नहि किन्तु पद ज्ञान ही हो सकता है, अन्यथा मौनि पुरुष निर्मित रखोकमे गाद बोध नहीं हुधा चाहिये तात्पर्य यह है शि भन्द मात्र को भोष साध होने से “पद” भी तो परद विशेष हो. है परन्तु जब मौनिरचित रलोक अथवा लेख इस्तादि पेष्टा से टूसरे को.धोध दृष्ट होता है तो वहां पदश्ववणाभाष दया में भी शाब्द बोध रुप फल के उत्पन्न होने से व्यभिचार पड़ता है इस लिये करते हैं, पदनान करण है जायमान पद नहि है। 'शाब्दबोधः फलं तत्र शक्तिधीः सहकारिणी। टी.-पद शक्ति ज्ञान सहकारिकारण है और ऐसे स्थानमें माग्द वोध स्वरूप फल होता है तात्पर्य या है कि कुवचित शान्ति (१) 'गाब्द बोध लक्षणन्तु, गति लक्षणान्यतर संबंधन पदजन्य पदार्थस्मृतित्वावच्छिन्न कारणता निरूपित कार्यत्वम् गन्दियोध प्रक्रियात्थमगन्तव्या-प्रथमं गवादि पदानां गवादी 'वादिगंवादि पद शक्यो लक्ष्यो वा' इति सम्बन्ध ज्ञान, ततः कालान्तरे, कोनचित् 'गामानयत्वम् इत्यु हो गवादि पदेम्य एक 'सवधि मानमपरसम्बन्धिस्मारकाम्, इति न्यायेन गवादीनन् ग्मरति आकांचादीञ् जानतस्तदनन्तरं 'गोकर्मकानयनानुकल . प्रतिमारत्वम्, इति शाब्दबुद्धिीयते । सस्थाग्दबोधो वैयाकरपानां . " " भानमोर की सपणा मान भी गाब्द बोधमें कारप। (०)पति किसे कहते हैं । (७०) पट शब्दमे सूत्रस बना हुमा कपड़ा नाममा भौर पर्वत शरद से पथरेली ऊंची भूमि जाननी नदी शब्दसे जल को धारा का प्रवाह जानना इत्यादि प्राचीन संकेतको प्रति करते मसे धात्वर्थ मुख्य विशेष्यकः । नयायिकास्तु प्रथमान्तार्थ मुख्य विष्यक एपन्यायान्, इति प्राः । तपादोयथा--'घेण सुप्यते इत्यादौ 'चकत का स्थापः" इति क्रिया मुख्य विशेष्यकर पर्वतन्त्र सिकोयोधः । पश्य मृगोधावति' इत्यादी मृगाभिन्न कतक धावन पश्य' इति क्रिया मुख्य विशेष्य को बोधः ।न्यायनये यथा-'घटो न भवति पटः' इतिवाक्यात' घटमेदवान् पटः इतिप्रथमान्तमुख्य विषयकोयोधः । तत्रनैयायिकानामिदमातम् । "प्रयातिपुरुषस्त स्य धरणापभिवादयेत्।" अत्र पुरुषकको वर्तमान कातिक उत्तर देयसंयोगानुकलो घ्यापार इति क्रियामुख्य विशेष्यकः शान्दबोधः शाब्दिकमते भवति । तत्र सर्वादोनामुत्सर्गतः प्रधानपरामनित्व नियमेन तन्देन प्रयाण बोधो भविष्यति, तितत्संबन्धि परणा प्रसिद्धिरित्यसगतिवेदतस्तार्किकैर्वर्तमान कालिक मयाणकर्ता पुरुष इति प्रथमान्तमुख्य विशेष्यका साम्द बोधःस्वीक्रियते । मा- रख्यातस्यकतरि कर्मणि च ममि रिति पाब्दिकाः। तीयतिरिति नैयायिकास्तच तेषामयमाशयो यदिकर्तरिमति: स्वीक्रियतसहिप- क्यतावच्छदकं कतिर्भविष्यति सा पुरुपभेदाहिन्नेति गौरवं स्यात् यदिनामकती मन्येत तदा यतावच्छेदकं कृतित्वंतस्य नाति पतयेयमिति ज्ञाघवं यत्र पुना,रथो गच्छतीत्यादौ वापरता । व्यापारादोशक्षणा, इत्याहु: । अतस्तदनुभूत्येपर्कचिदिव्यमति - (" इसी पति के द्वारा जहां पद से पर्थ का मान हो, तो उस पद को शव भोर पर्थ को शक्य कहत है, (शं.) भाग्द बोध किसे पाहते (8.) पद घान हो करप जिस का ऐसे जान को साब्द बोध देशद्यायगारदबोध प्रकाराः प्रयन्ते तयाहि कास्यातस्थले (चैत्रापचति) 'पाकानुफलकतिमाश्चैत्र'तिगाम्दबोधः । कर्मणि. (क्षेत्रणपच्यतेतएडुलइत्यादी। तृतीयाया घाधेयत्वमर्थ. फल्लापछि म्नध्यापारोधात्वर्थः पाप्यात वलाच कृतेर्लाभः तथा पनि ष्ठकतिनन्यपाकजन्यफलशाली तण्डुलः, इत्यन्वयवोधः । देवदत्तो प्रामगति इत्यत्र हितोयाया अर्थःकर्मत्वम् धातोरीगमनम् ननकत्वं संसर्गमर्यादयालभ्यम्, लटोवर्तमानत्वम् भागतस्यकतिः तत्संबन्धः समर्गमर्यादयालभ्यः । एकवचनाद्युपस्थापितमकत्यादि सर्वच भयमान्तपदीपस्थापितेऽन्वेति । एपंच-प्रामकर्मकग . मन जनक वर्तमानहतिमान्,एकस्वविशिष्टो देवदत्तात्यन्वयबोध. रयोगच्छति' इत्यत्र-गमनलनकवर्तमानव्यापारवान् रपति बोधः भावप्रत्ययेत, 'देवदत्तेन सुप्यते' इत्यस्य 'देवदत्ततिकति नभ्यःस्वापः॥ सच गाब्द बोधोडिविधः, यर्थार्थोऽयथार्थश्च । तत्रायः गाग्द प्रमा साच यथा 'नद्यास्तीरे फलानि सन्ति' इत्यादि चाक्यार्थ गो. पर यथार्थ ज्ञानम् । वितीयः अग्निनासिञ्चति इत्याचयोग्य वावध जन्यः गाग्दबोधः । हिविधोऽपि पुनदि विधः, भेदान्वय विषयकः, प्रभेदान्धय विषयकरच त्रायो रातः पुरुष 'इत्यादि वाक्यजन्यः हितीयोयथानीलोघटइतिवाक्यजन्यःमभेदान्वय बोधं प्रति, समान रिमतिसिङ्गवचनकत्व प्रयोजकमइति सामान्यनियमोनिश्चेतम्या।

फरत हसी को ही वाक्यार्थ (४) जान भी कइसे में 'गामा
मय' इति, म वाक्य से ऐसा गान्द बोध होगा कि 'गोकर्मकानय
नानुकल अतिमात्वम्, एवं वैच: पचति देवदत्ती ग्राम गच्छति
इत्यादि स्थल में भी जान लेना।।
लक्षणाशक्य संबन्धस्तात्पर्यानुपपत्तितः ॥
टो-अबवलया को कहते हैं "लक्षणा" इत्यादि प्रन्य से
पश्य अर्थ के मम्बन्धको लक्षणा करते हैं और वह जहा वाहा
का तात्पर्य वाच्यार्थ में न बने वहा पर हुआ करती है और उस
.
प्राक
(२) 'अस्मारपदादयमर्योबोदन्यः' इत्या का रिकेश्वरेव
पतिः । नव्यास्तुईश्वरेच्छेवनधक्ति. किन्तु, अभियुक्त के तमात्र
शक्तिः, इतितेन प्राधुनिक सहितविमाऽस्ति, इतिवदति । तयाच'
न्यायभाये-अथक पुनरय ममयः, पस्ययम्दायेदमर्थजातमभिधेय
मित्यभिधानाभिधेयनियमनियोग तस्मिन्नुपयुक्त शब्दार्थमप्रत्ययो
भवति, २११। ५81 इति । अचमतभेदः जात्याततिविशिष्ट.
व्यक्ती तिः, सप्रदायविदोनेयायिकाः प्राहु । नात्याकतिन्यलिपु.
तिस्टपुराशि:, (शक्तित्रयम) इतिशान्दिका मन्यन्ते
सावेव:, इतिपतञ्जलि प्रभतय पाह, जाताधेवतियति.
लामम्त्वाचेपात, इतिप्राभाकराः। 'ध्यायाचतिजातयस्तपदार्थ:
इसितम्यायदाने २।२।६।।
(१)न्यायनये--
-वशवध मंबन्धोलक्षण तर्थदस्त व लाक्ष.
'पिक पद "यथा गडायाधीष" इत्यत्र गडापदम ) तम्य गक्यः
(प) तन्मबन्ध. मंयोग ममगयादियथायथं प्रायः । मच
संबन्जानिमित्तोऽपनि यादयोधप्रयोलमा एस्टायो
सिंवन्ध:॥
-

(८८)
खना उत्तिस प्रतीत होने वाला जो अर्थ उसको लक्ष्य करते
पहलवणा भी कई एक भेद को है परन्तु यहां दिग् दर्शन
कराते है जो सवय अर्थ को छोड़कर सय अर्थ को बनावे
उसे (३) जहरलक्षणा (जहत्स्वार्था) कहते हैं। जैसा कि किसी
पुरुपने कहा ( देवदत्त मंडप में बैठा बनकरता है) इस वाक्य में
नो मंडप सब्द है, इसका शक्य अर्थ मएड (चावलों को पीछे)
पोने वाला है परन्तु दस अयं से वar का तात्पर्य नहीं सिह
होता क्योंकि माण्डपोने वाला कोई मनुष्य वा पाही होसकता
और उसजी में बैठकर इवन करना सर्वथा विरुड इसलिये
मक्यमर्थ का परित्याग करके लक्षणा हारा मण्डप यन्न के गृहका
बोध करातारे,सोसे यहा नइल्सया । यह मण्डपपद ला.
दपिक और यन्न कागृह लक्ष्यपर्य है,जहा शक्य अर्थ के साथही
सश्य पर्थ भी जानाजावे पटा मजल्लवया होती है जैसा (घोण
दौड़ता है। यहां पर योण पदकी गति रघ रूपमें है उसमें धावन
क्रियाप तात्पर्य सिद्ध नहीं होमकता इस लिये भोषपद लक्षणा
रारा गोपगप विशिष्ट अश्यादि का बोधक है।
(२) पत्र पन्वयानुपपत्तिलक्षणावीजम्, इतिप्राच.प्रा:
तात्पर्यानुपपत्तिरेव सर्वत्र लक्षणामोजम तिनध्याजगदुः ।।
()लक्ष्यतावच्छेदक रूपेणनत्यमात्र योधपयोणिका जहरत
पायथा निमा निदर्शने गडापद शक्यप्रवाह संबन्धस्यतीरस
स्वात् ताध्ययक्यसंपन्धरूपलक्षायामानाद्गापदात्तोरोपस्थिति
(3) श्यतावशेदशरूपेण सत्यपक्योभयबोधप्रयोजिका,
पान्तवा यपा-काकेभ्योदधिरश्यताम् इत्यत्रकाकपदस्यद
ज्यु पधात सक्षपातयतारछेदक दध्यपधात काय तेनरूपेपद
যমঙ্গল বুরুন্ধৰিীয়া যায়নি।

आसत्तियोग्यताकांक्षा तात्पर्य ज्ञान मिप्यते॥८॥ कारणं-- टी.-पासत्तिरित्यादि । प्रासत्तिज्ञान, योग्यता धान, पा. कांक्षाजान, और तात्पर्यज्ञान ये चारी भी शाब्द बोध में कारण इसलिये इन चारों के स्वरूप को दिखाते हैं "सन्मिधानं त्यादि पन्थ से॥२॥ सन्निधानंतु पदस्या सत्ति रुच्यते । पदार्थे तत्र तद्वत्तायोग्यता परिकीर्तिता ॥३॥ डी.-पदों का विना व्यवधान के जो उच्चारण करना इसे पामत्ति कहते हैं, इसका यह फल है कि जिस मनुष्य स्वामी ने मातः काल उठ कर कहा "अरे भल्य' फिर मध्यान्ह को कहा "गीको" उसस पोछ सन्ध्या के समाकहा "ल प्रा" और पाधी रात को कहा कि "साटम" सीए से स्थल म भत्य कुछ भी नहीं समझगा क्योकि पूर्वात प्रामत्ति नहीं है किन्तु दा २ महर के पनन्तर एक एक पद कहा इ इसस भासत्तिका ज्ञान मान्द दाध में अवश्य कारण मानना चाहिये तो जहां स्वामी ने मृत्य स कहा कि "हे मृत्य गौ को ले पा दड में" इस स्थान में भृत्य सुनते ही चाय में दंड लेकर शीघ्र गौ को ले भागा। अव योग्यता का स्वरूप कहते हैं- एक पदार्थ में दूसरे दार्थ का यथार्थ सबन्ध योग्यता पाहाता है इसका जान भी गारद बोध में कारण है, जिससे पानी (१) पदानामध्यवधान मन्निधिः। (२) एक पदापर पदार्थ संघर्गोयोग्यता।

. 14 शिडकाता वा दूध छिड़कता है यह वाक्य प्रमाण है। और पाग छिड़कता है, या "पत्थर छिड़कता है"यह वाक्य प्रमाण नहीं है पोंकि यहां पर योग्यता जानका प्रभाव है इस लिये यहां बोध भी नहीं होता अर्थात् सेचन क्रिया को जल में ही योग्यता बिनित में नहीं रे,इस लिये शायद वोध नहीं होता ॥८॥ यत्पदेन विना यस्याननुभावकता भवेत् । वक्तुरिच्छातुतात्पर्य परि कीर्तितम् ॥ ८४ ॥ टी.-जिस पद से विना जिस पद में (अननुभावकता) माग्द,बोध उत्पन्न करने का सामर्थ्य न हो उस पद की उस पद के साथ पाकांचा होती है जैसाकि किसी ने कहा "दही" अब यहां कपात दही मदद से सुनने वाला कुछ नहीं जान सकता, कि दही- (१) एक पदार्थ विरह सहमता परपदार्थ निष्ठामुभव जन कता भावस्पमाकांक्षाया लक्षणम् ॥ (२) विवचात्वं तात्पर्यस्य लक्षणम् । इदमेतस्मिन्न न्य. यंप्रत्यायतु' इति प्रयोक्तरिच्छावा । तदर्थश्च--'एतत्पदमेतेन पदेन स भयान्वय बोध मनयतु' इति । पत्र प्रयोशातु भिम धापयितमात्रम्, नतु पौव मौनि रलोका क्याप्तेः । शुक वाक्येभ- गवदिश्व गति रिति । भव मत भेदा:--पपरे मास्ट्रोधं प्रति तात्पर्य भानस्य कारणत्वं नास्त्येव, रत्याधु: । फेचित्पना सैन्धव. मानय, रत्यादी नानार्य स्थल एव नात्पर्य संगयादः संभवन तण स्यमाद मोध एव तात्पर्य निश्चयोहतुः, नतु 'घटमानय इत्यादी माद बोध रेतात्यारापरतुतचापि (घटादिगादयोधायऽपि) "चटपदं कुम्मपरम, सभषयापटपरंपा, पति संयये घटयाग्द बोधा भावात सर्वच तात्पर्य निरचय मारपम्त्या:प्रति मम् ।

(१५) पाऊपासा जाऊं, वादही को ले जाऊं और जब वादा कि "दही को ले प्रा" तो सुनने वाला शोघ्र ही दही ले आता है इस से प्रतीत हुभा कि "ले पा" कहे बिना केवल दही शम्द से कुछ यथार्थबोध नहीं होता यही दही पदको “से भा" पदकी माकांक्षा ३ सो सिद्ध हुआ कि एक पद से विना दूसरे पद में अर्थ देने की सामर्थ्य न रहनी यही प्राकांक्षा है। और वाला को ध्या तात्पर्य कराती है यदि माग्द बोध में तात्पर्य जान को कारण न माना जाय तो "सैन्धव मानय" इत्यादि स्थानों में कहीं यात्रा में "मश्व' का तथा कहीं भोजनादि प्रसङ्ग में 'लवण' का बोध जो होतारे (अर्थात् तत्तत् प्रसार में विलक्षण बोध जो होता वा नहीं होना चाहिये। भासत्ति, योग्यता, भाकामा पौर तात्पर्य इन चारों का मान जिस वाश्य में हो वही वाक्य प्रमाण होता और पदों के समूह को वावध कहते हैं ॥८४ ॥ इति कारिकावली रहस्य प्रकाशे शब्द परिच्छेदः । मसर . अथमनो निरूपणम् साक्षात्कारे सुखादीनांकरणंमन'उच्यते ॥ अयोगद्याज-ज्ञानानां तस्याणुत्वमिहेप्यते 1८५॥ टी.-पब मन का निरूपण करते हैं 'साक्षात्कारे इत्यादि प्रन्यसे-सुखदुःखादि के प्रत्यक्ष में (करण) साधन को मन करते (१) स्पर्श रस्तित्वमति क्रियावत्त्वं मनसोलक्षणम् । पर पारचास्यरभिधीयते । 'युगपज मानानुपपतिमनसोतिम्' इति पर्यात् जिम हारा समुदायमादि का प्रत्याशात्मक जान से समे मन कहते हैं परन्तु मनुष्य का मनजवएक वामें होता तो दूसरे पदार्थ को कभी नहीं समझता, इसमें प्रतीत पता कि मन पणुपरिमाण है अर्थात् परमाए कोतव्य है,यदिमन मड़ा हो तो एक और चचमेके दूमरी और माणमे छक्के एक काल में अनेक धान उत्पन्न करादेवे क्योंकि इस बात को पूर्व कर चुके हैं कि पात्मा मन के साथ जुड़ता है मन इन्द्रिय के माध और इन्द्रियवस्तु के साथ नबजुड़ता है तब प्रत्यक्ष होता है । (सं.) जब कभी महा दोध जलेको अथवा कोई वस्तु खाने लगे तब उसके पप रस, गन्ध, गद' स्पर्ण इन मर्व का ज्ञान एका काल में देखते तो मन सक्षम कैसे माने। (30) मन में वात गरे : झटितिही एक इन्द्रिय के साथ जडकर फिर गोघ्र टमरे मे जुड़ता प्रतः यह क्रम से ही ज्ञान उत्पन्न होते हैं परन्तु क्रमको पति सूक्ष्म शेने में प्रतीति नहीं होती जैसे पानका मतपत्र ले और उसको जोड़कर उममें सची प्रवेश किया वहां ऐसा प्रतीत शेगा - एककाले नानाभामनपत्तिर्यतः मण्वधर्मोमनमोनिङ्गाम । नोवा- स्मनोयगपन्नानानानधारणेवाभाविकीकाचिदशशिविते तह विष्टएवात्मासनः पदेनानियते, इत्यादि । वेदान्तिनस्त सादि দুর্বল নলীঘিনাৰঘষ দাবিদ্বনাথ নন্মলীগ इतिश्रुतिसिझम । प्रत एवचतन्मध्यम परिमाणवत् न च ताय देवपरिमाणपरिमितत्वे यगपत्मन्ट्रिय मंबन्धमम्मवाचगपन्ना नाजानोत्पत्तिप्रमप्रतिश, एकन्टियेणैकमेवशानंअभ्यते, पति नियमातावदात्यो समानः। अन्यथायगपच्चाक्षुषशानदययोरुत्पत्तिः किंनस्यात् । सुषुप्त्यन्ययानपात्या त्वङ्मनः स्योगस्य भाममा ( १ ) विमर्म में एक कालमें ही मचीका प्रवेश हुआ है परन्तु वस्ततः जब प्रथम यच में मची का प्रवेश हुमा है उसी समय हितोय पण में सूची का प्रवेश नहीं हुआ ऐसा यहां भी मममें वह मन एका र पात्मा के लिये गिन्न है और नित्य यदि यदि सर्व पात्माों में एकही मन माना जाए तो जब एक को जान पा तब मरे को न होना चाहिये क्योंकि वह तो पूर्वोहा यति से पण मिह तो एक थान में मकल इन्द्रियों के साथ उसका संयोग नहीं होमकता ॥८५ ।। इति द्रव्य पदार्थ व्याख्या॥ कारणत्वेनगाभ्य पगमान । रमनाभिन्न त्वचन:मयमास्यगऽस्य पग पसरपर्णोपन्नाभस्तत्रापिदार इति मगिरन्ते, पत्र समाधी यताच नामन्यायमस्वपक्षपातरतै रिति, अस्माभितत्याध्यायति विकात्युनिमन मध्वोदास्यते ममाधो । अत्रमतमेदाचित् सम्मनोविभ. तिमीमामकाः तत्तशम् । तस्य विमत्वाङ्गीकारेतु पात्मनोमनमा मयोगम्य जिानकारणस्य) अनपपत्ति रितिदृषणमय म्भाव पारमाविभगितिमिहान्तः तथाच मनमोऽपिविभुत्वाङ्गीकारे विभुष्यग्यापि मंयोगापत्तिः । न च, 'विभहयमयोगोऽस्त, इति पाध्यम, नामयोगस्य मर्वदा मर्यप मत्वप्राप्तौ मुक्तिरेवानु पपन्नास्यात् । अतो 'मनोऽगवेव' इतिनैयायिका: । 'वायरेवमन.' प्रति कचित् । अगर कार्यमितिमरिया: । तचमनो न पत्य. क्षम, अपित अनुमेय मेव । तथाहि सखदःखादि माक्षात्कारावर. रादि व्यतिरिक्ष करणमाध्यः, अत्मस्वपिचक्षरादिषु जायमानत्वात्, घटवत् पतियच्चमुखादिमाक्षात्कारकरणम् तन्मनः मन्यतऽनेनेति (करणेऽम्) मम इति ॥

-
(४)
कारिकावली रहस्य प्रकाश
सहिता।
अवगुणों का निरूपण करते हैं।
अधद्रव्याभिनाजेया निर्गुणानिष्क्रिया गुणाः॥
रूपरसः स्पर्शगन्धौ परत्वमपरत्वकम् । ८६ ।
द्रवो गुरुत्वं स्नेहश्च वेगो मूतंगुणाअमी॥
टी.--"अति" जो मर्षदा द्रव्यमाचाश्रितको निगुप
और निष्क्रय उन्हें गुण जानना चाहिये, अब मिले
हुए गुणों को भिन्न २ कई संज्ञा जो पन्य कारोंने निर्णीत की
उन्हें दिखाने जैमे रूप, रस, स्पर्श गन्ध, परत्व, पप.
रत्व, ॥८६॥ द्रवाय, गुरुत्य स्नेह, तथा वेग, येदा मर्तगुण कहाते
पर्यात् इन दगों में से कोई एक भी विभुमी में नहीं रहता।।
धर्माधभिावनाच शब्दो वुड्यादयोऽपिच ।८७)
एते ऽमूर्तगुणाःसर्वे विद्वद्भिः परिकीर्तिताः
टी.-धर्म पधर्म, भावनादय मंस्कार, गाद, बुधि,मल, दुःख
रा, प, यत्न, इन दो को युद्धिमान् लोगों ने अमर्तगुण
कहा
संख्यादयो विभागान्ता उभयेपां गुणामताः ८८
॥शका भिम्नाय मनि मामाग्यवत्वं गुग्यम्य लक्षणम्
पर गुपो मेयायि शानो पेषिकानाच नये चतुर्विमनिया

। ५ टी.-संएया, परिमाण,प्रयकत्व, संयोग, तथा विभागये पांच गुष मतों पौर प्रमों के अर्थात् दोनों क मान है ॥८॥ संयोगश्च विभागश्च संख्या द्वित्वादिकास्तथा । द्विपृथकादयस्तद्वदेतेऽनेकाश्रितागुणाः ॥ ८९ ।। टी.-सयोग, विभाग, हित्वादिमख्या, हिपृथक आदि यह गुष पनेक पायित है अर्थात् केवल एकमें यह नहीं रहत ॥९॥ अतःशेपा गुणाः सर्वेमता २एकैकवृत्तयः ।। टी -इन से भिन्न और सर्व ही गुण एक एक में ही रहते । अर्थात् रूप रस गन्ध स्पर्शादि सव ही एक एक दध्य में रहते हैं। बुट्यादिषट्कस्पर्शान्ताःस्नेहःसांसिद्धिकोद्रवः९० को द्रध्य निष्ठः पदार्थ विशपः। समवाय निराकरणेन द्रव्या भिन्न एपेति सास्या वदान्तिनश्च मन्यन्ते। अकार: एकार, पोका ररचैतेश्योगुणा प्रतिपादिका' मत्त्व, रज, तमश्चैते द्रव्यात्मक भयोगुणा इति माख्या । ज्ञानानन्दादयोऽपिगपा इतिवेदान्तिन: समदमतितिचादयो गुणातियोगिन । श्लेषादयो दश, इति सा. हित्यविदः । प्रत्यलमनस्पेन (२) विम्पत्ति संख्यादिपञ्चक भिन्म गुणत्वम् मर्तगुणा ना लक्षणम् । (३) मूर्ताहत्ति संख्यादि पन्चक भिन्न गुणत्वम अमृत गुणानालक्षणम् ॥ (१) एकत्वानवच्छिन्नतिक गुणत्वम्-अनेकाधित गुप मां लक्षणम् । (२) एकस्यापच्छिन्न छत्तिक गुणत्वम्-एक मात्र पत्ति अपानांतषणम्।

स्थितिस्थापक इत्येते स्युः कारणगुणोद्भवाः। टी.-अपाकजरूप, पाक जरत, अपाशाजगन्ध, भपाका स्पर्य और पाक जट्यत्व, स्नेह, वेगाख्य साकार, 'गरत्व, एक प्रथा परिमाप ॥५॥ स्थितिस्थापक सस्कारये एकादय गुण कारणगुणोत्पन्न है अर्थात कारणों के गुणों से कार्यों में उत्पन्न होते। सयोगश्च विभागश्चवेगश्चैतेतु कर्मजाः ॥१६॥ टो.-मयोग विभाग और गाय मस्कारये तीनों कर्मज्ञ पर्यात किया से उत्पन्न होते हैं ॥८६॥ स्पर्शान्त परिमाणकपृथक्त्वं स्नेहशब्दके भवेद समवायित्व ॥ टी.-रूप,रस, गन्ध,स्पर्ण, परिमाण, एक पृथक, स्नेह मद इन में प्रसवायिकारणत्व रहता है,अर्थात् इन की गुणान्तर जान से भिन्नों के प्रति नियम से असमायि कारणता रहती २, जानकी प्रतितो उन की भी विषय विधया निमित्त कारणताही यहा पर स्पर्श अनष्ण ग्रहण करना और "एकपृथक्क यहां प्रत्यय का प्रत्यक क साथ अन्वय होने से एकत्व और प्रथमय जानना और पृथवा मे भो एक पृथा यह पभोष्ट। अथ वैशेषिक गुणे ॥ ९७ ।। आत्मनः स्यान्नि मित्तत्वं ॥ टी. जीवात्मा विशेषगुणों में (अर्थात बुद्धि मुख दु., THET, घ, यत्म, धर्म, अधर्म, भाषनाश्य सरकार इनमें -- - > टो.- (te ) मिमित कारण पता से जाम रहा के प्रति निमित्त बारए॥ : उष्णस्पर्शगुरुत्वयोः ॥ वेगेऽपि च द्रवत्वे च से यागादिद्वय तथा ॥९८ ॥ द्विधेवकारणत्वं स्यात् -उष्ण स्पय गुरुत्व वेगात्यसंस्कार, द्रवत्य, संयोग तथा विभाग इन छ: गुणों में ॥ ८॥ दो २ कारप्पता अर्थात् असमायि धारणता पार निमित्त कारणता रहता कि उष्णस्पर्श मार्यगत सध्यप का मसमवाय कारण पोर घटादि गत पाक ज़रूपादिका मं निमित्त कारण भी हैं पस ही भरा दएड संयाग याद में सा निमित्तकारण । परन्तु भरा पाकाय सयाग के मास घसमवाय कारण है। अथ 'प्रादेशिकोभवत् । वैशेषिको विभुगुणास- योगादि द्वयंतथा ॥१९॥ .टी.--पाकाश आदि विभद्रव्यों को शरद जानादि विशेषगुण चंयोग तथा विभाग य पारह गण पथ्याप्य त्ति हैं, अर्थात् ये जहा रस.वहा एक देश में हो रहा है, अपने प्राथय के संम्पर्ष देशों में नही रहते ॥ ८॥ यहा त पनक गुण िक एक र. माधम्य, का निरूपण किया अब इसस प्रागे प्रत्यकगुष्प के साधर्म्य कहते हैं, चक्षुर्याध " इत्यादि पन्थ से ॥ चक्षुमाझ भवेद्रूपं द्रव्यादे रुपलम्भकं चक्षुषः सहकारिस्यात् ॥ (स्वाभिकारक बत्तिस्यात्यन्ताभाव प्रतियागित्वं प्रादपिकत्वम् । . । (.) टो.-पतु इन्द्रिय मात्र से जिसका पहली और विष बात से उसे एप कहते हैं यह कप यादों का उपसम्मको पर्यात जिसमें रहे चक्षुसे उसी का प्रत्यक्ष होता है और ने इन्द्रिय का प्रत्यक्ष कगने में सहकारि कारण है, यह कई यह रूपएस अनुगत प्रतीति से पत्य नाति प्रत्यच सिध। शुक्लादिकमनेकधा ॥ १०॥ टो -4 रूप सात सम्मानों से विमान है। यया भुता नील, रमा पीत,हरित, कपिश और चित्र भेद से। (१०) साता (२) चित्र रूप क्यों मानते होनील पोत प्रादि का समुदाय से नो चित्र है इनम अतिरिक्ष चित्र कोर नहों किन्तु ही कप कहने चाहिय। 13.) पाच रडू के वस्तु में कौन सारूप मानोगे अध्याप्यत्ति गुणों म ता रूप परिगणित नहों ना एक देश में अन्य और दूसरम अन्यमानन से निर्वाह हो नाव । यदितन्तुओं में पृथक् २ रूपमाने पटम काई रूप न माने ता नेत्रों से पटका मत्यच नहो हुा चाहिय क्योंकि नेत्रों से उसी द्रव्य का प्रत्यक्ष होता, जिसम रूप हो, इसलिय सातवा चित्ररूप प्रपश्य मानना चाहिये । इमी तरह रमादिक भी अव्याप्य त्ति नहीं हैं किन्तु उपसे इतनी विनच पता कि अनक प्रकारक रसों वास प्रत्यय से उत्पन्न हुए अवयवी में चित्ररस न होने पर भी कुछ पति नहीं सयोंकि चित्र रस की प्रतीति तो भवयवगत भनेक रसों से भी जोसकती है।...॥ १ चक्षुर्मात्र पाय जातिमत्त्वे सति गुणात्य रूपस्य सक्षणम् पपगुपद प्रभागरपाति तर्क कौमुदी ।। (२) चिन्धित रूप मागी किन। . . - (२)ोषमाण प्राममातिम गन्धस्यमधA जलादि परमाणो तन्नित्यमन्यातहेतुकम् । टी-जल और भादि पद से तेज इनके परमाणुषों का प नित्य और सब कप पनित्य है पर्यात् कायं रूपं जस गत रूप और कार्य रूप सजागत रूप एवं पार्थिव पदाथ मात्र में जो रूपये भरूप "मस्तक" जन्य हैं ।। 'स्तुरसनांमाझा मधुरादिरनेकधा ॥११॥ सहकारीरसज्ञाया नित्यतादिच,पूर्ववत् ॥ टी.--रसना इन्द्रिय से प्राय क योग्य नो गुण उसको रस कहते हैं यह रस मधुरादि भद स अर्थात् मधुर, अम्ल वषय कट कापाय और तिलाभद स अनया भर्यात छः प्रकार का रे पौर रसनन्द्रियका सहायक है। इसकी नित्यता और अनित्यता पर्व को (कप) का नाई नानी अर्थात जलीय परमाणु का रस नित्यप सारे रस पनित्य है। घाणमाझोभवेदगन्धो घाणस्यैवोपकारकः ॥१०२ टी.-जिस का प्राण इन्द्रिय से प्रत्यक्ष हो ऐसे गुण को गन्ध करते हैं या गन्ध घायजन्य प्रत्यक्ष में "उपकारक" नाम सहायक ई यहां उपकारक गन्ध प्राणन्द्रियवर्ती जामना इसी तरह चक्षुगदि निष्ठपादि समझना योग्य है ।१०। सौरभश्चासौरभश्च सद्वेधा परिकीर्तितः । (O रसगमात्र पा जाति मश्वं रसस्यखचपम MAHARAJ HARE SNimme- टो-या गन्ध दो प्रकार का है, सुगन्ध और दुर्गम परन्तु सभी गन्ध भनित्य । 'स्पर्शस्त्वगिन्द्रियग्राह्यस्त्वच स्यादुरकारकः॥१०३ , टी.-जिसे स्त्र में भिन्न कोई इन्द्रिय ग्रहण न कर और स्वक ग्रहण कर ऐसे विशय गुण को स्पश कहत हैं। और या स्वाच मत्यक्ष में सहायक है परन्तु त्वा में उसी द्रव्य का प्रत्यक्ष होगा जिस म इदभूत स्पश होता ॥१३॥ अनुष्णाशीतशीतोष्ण भेदात्सविविधोमतः । काठिन्यादिक्षितावेव नित्यतादिचपूर्ववत् ।१०। टी. ----यह पर्व तान संमाया म विभई यथा अनुष्का पोत, भीत और एएए भद स, इनमें स पृथिवी और वायु का ता पनुष्यागोत : और जल का मीत पार तज का उष्ण पौर यर पर्ष काठिन्यादि धम पाला कवल पृथियो म रस्ता पार इसको नित्यता पनित्यता पूर्व की (रूपादिक को/ तरह नानको पर्थात जलीय परमाणु तेजम परमाणु पायरीय परमाणु म स्पर्य नित्य पर सव स्पर्य अनित्य ॥ १.४ ॥ एतेषां पाजत्वंतु क्षितीनान्यत्र कुत्रचित् । टो.-इन चारो रूप रस गन्ध स्पो का (पाकजस्व) तेश भयोग से उत्पन्न होना कर पृथिवरी में है अन्यत्र नसादिको में नहीं पता य मभी पशिश में पनित्य और जल पादि में ममें से भारत को नित्य और काही नित्यर। ( स्थगिष्ट्रियमाच पाच जातिमस्य स्पर्पस्यसपम् । -

दो-नेयायकों के मतमें तो धपुकादि ..अवधि में भी
पाश इष्ट है इनका यह तात्पर्य है कि प्रत्यवित्रों में हिंद प्राय
होता र अत: तहाग पनि के सूक्ष्म अध्यक्ष प्रवेश कारको विना
तरी घट नाय के पास वा करदेने में यदि ऐमान माना जाय तो
वैशेषिक मत में अनन्त अश्यवि पोर फिर उनके नाम स्वी-
कार कल्पना में गौरव होगा और हमारे मत में तो वही या
घटस तरह को प्रत्यमिन्ना भी हो सकती है षिक्षमत
में नहीं होनी चाहिये ।।
गणनाव्यवहारेत हेत: संख्याऽभिधीयते ।१०६।
'टो.-गणना के जवहार में असाधारण कारण कप जो
गुण उसे संख्या कहते हैं, वह एकत्व से लेकर पराई पर्यन्त
"एकंदातम्चैव सहन मयत तथा ॥ लईच नियुतं चैव कोरि
रर्वदमेश्च । धन्दाऽनिखर्वश्च सखापरच सागरः॥ अन्त्य
मध्यं पराये च दयपुड्या यथाक्रमम् ॥ १॥ इस गणित विद्या के
नियम से एश अंक के पागे "१................." सप्त
दम अन्य लगाने से पगई संघया बन जाती है ॥१०॥
नित्येपनित्यमेकत मनित्यंऽनित्यनिध्यते ॥
दित्यादयः पराधीन्ता अपेक्षायुद्धिजामताः॥१०७
टी.-उममें एकत्व स्वरूप संख्या नियों में नित्य और
पनियों में पनित्य और हित्व से पतक सभी पदया
चाबहिसे पती पतएव निस्य ॥१०॥
(१) तदनम् "यागवतिनिक्षिप्ता घरः पासायसन्दा
पायपितागवामा दुश्तोटस्यते ततः ॥ १॥

अनेकानयपर्याप्ता एतेतुपरिकीर्तिताः । अपेक्षावुद्धिनाशाच्च नाशस्तेषांनिरूपितः १०८॥ टी.- --यह हित्वादि सभी संख्या भनेक आश्रयों में पर्याप्ति संबन्ध से रहने वाली हैं ऐसा बुद्धिमत् पुरुषों का कथन है और किन्च-दृश्यतेच परवेऽपिकलपेनिपक्षानामा परि गीत स्पर्म प्ररपमिति। नैयायिका:-प्रोडमपदार्यानुभारिन्यायमाः । पत्र व्युत्पत्ति: "न्यायवेत्त्यधीते वा' इति नैयायिकः उक्प्रत्ययः । न्यायपारमन्तु गोतममुनिप्रणीतं "प्रमाणप्रमेयसंपय प्रयोजनसिधास्तष्टान्ता वयक्त निर्णयवादनल्पवितण्डा हेत्वाभासछलजाति निग्रहस्था नानां तत्वज्ञानानिनः श्रेयसाधिगमः" इत्याचारस्य "त्वाभा- सारच यथोला" इत्येतत्पर्यन्तं पञ्चाध्यायात्मकं सोपनिय समिति । अतएवेदं कारिकावलो नामकं प्रकरणन्तु वैविकमारच. रोत्याज्ञातव्य न्यायोलपदार्थानामत्रादर्शनात् प्रमाणचतुष्टयनि- प्पणं यद्यपि गोतममतेनायाम्यधायि तथापि तप तस्य सौष्टव्य मदने तात्पर्य प्रमाणहयानीकारेत प्रत्यक्षपर्पकत्वादनुमानस्य मत्यक्षमेवप्रमाणमिति पर्यवमन्नं स्यात्स्याच्च तेननास्तिक्य, पक्ष- पात रतीतः कारिकापल्या न्यायशास्माभिधानन्तु केवलं भम विस सितमेवदर्शनमारण परियोजनजमतियारपरिवान्तानामिति- जेयम् । तदुःखम्-"कणादेनचः सपो मास्त्रं वैथेषिक मात्। "गोतमेनतथान्यायं सांस्यचकपिलेन" इत्यादि। (२) एकात्यादि व्यवहारासाधारणकारपस्व पति गुपत्य पं. स्याया समपम्।

TA अनेकानंयपर्याप्ता एतेतुपरिकीर्तिताः । अपेक्षावुद्धिनाशाच्च नाशस्तेषांनिरूपितः १०८|| टी.-यह हित्यादि सभी संपया भनेक पाययों में पर्याप्ति संवन्ध से रहने वाली हैं ऐसा बुद्धिमत् पुरुषों का कथन है और किन्च-दृश्यतेच पक्वेऽपिकलमिषक्षानामा पधिः श्रोत स्पर्म प्राणमिति। नैयायिकाः-पोडयपदार्थानुसारिन्यायमाः । पत्र व्युत्पत्तिः "न्यायवेत्त्यधीते वा' इति नैयायिक ठक्प्रत्ययः । न्यायमारमन्तु गोतममुनिप्रणीतं "प्रमाणप्रमेयधय प्रयोजनसिहासष्टान्ता वयवतकानियवादनपवितएडा क्षेत्वाभामच्छलजाति निग्रहस्या नानां तत्वज्ञानान्निः श्रेयसाधिगमः" इत्याघारम्य "वाभा- सारच ययोला" इत्येतत्पर्यन्तं पञ्चाध्यायात्मकं सोपनिय मिति । अतएवेदं कारिकावन्नो नामकं प्रकरणन्तु वैशेषिकगारन. रोत्याज्ञातव्यं न्यायोलपदार्थानामबादर्शनात् प्रमाणचतुष्टयनि- . रूपपं यद्यपि गोतममतेनाचाभ्यधायि तथापि तत्र तस्य सोप्टव्य प्रदर्षने तात्पर्य प्रमाणहयानीकारेत प्रत्यक्षपूर्वकत्वादनुमानरव मत्यचमेवप्रमाणामिति पर्यवसन्न स्यात्स्याच तेननास्तिक्या पक्ष- पात इतीतः कारिकापल्या भ्यायशास्त्राभिधानन्तु केवलं धम वित सितमेवदर्शनशान परिशीलनजमतिवैशारीरियस्वान्तानामिति शेयम् ।, तदुहम्-~-"कपादेनच संप्री भास्त्रं वैशेषिकं महत् । "गोतमनतथान्यायं सांयचकपिलेन" इत्यादि। (२) एत्वादि व्यवहारासाधारणकारपत्वेसति गुणत्वं . च्याया सचपम्।

. अपंचा बुद्धि के नाम से इनका भी (पर्यात् :हित्यादिका भी) मायता अनेकैकत्वबुद्धिर्या साऽपेक्षा घुद्धिरुच्यते॥ टी.-"यह एक या एक" इस तरह पनेक पदार्थों में एकत्व भवगाइन करने वाली बुद्धिको अपेक्षा बुद्धि कहते रे अर्थात बरत पदार्थों के पलग १ एक ३ गिनको, अपेक्षा बुदि करते हैं। और इसमें कन्दलीकार का तो यह कथन है कि निम स्थल में एक हम धान नियम से नहीं होता उस स्थान में हित्वादि भिन्न बहत्व संयाकी उत्पत्ति होती है। जप्से सेना वा यन भादिमें एकत्वमान पमियत पिता यहां पर यत्व मण्या की उत्पत्ति है। परिमाणंभवेन्मान व्यवहारस्य कारणम् ।।१०९॥ १) मानेकायममहालम्बनल्याबुदिरपेशायुचिः, पने के क- स्वर्षाि भनेकानिच तान्येकत्वानि तेषांबहिरितिविया अपेक्षा बुरेरिचादि अनशत्वं नास्तीत्यवायं मन्तव्यम् । अन्यथा तेनेव तरया नापात् परत्रयायायिस्यमेवनस्यात् इनिचित (२)मान- ध्यारामाधारपकारपत्वं परिमावस्यपषम मानण्यवहार, समिनायादि व्यवहारः नतु पतसंपादिश्यहा। चतुर्विध मपि प्रत्येक परम्, मध्यम पैति । तच परमाणुस्वस्थत्वे पर. माधुमनमोस्तिष्ठतः। मध्यमापुत्वहरवत् प्रयुक तिष्ठतः । पर. ममा दोघस्व गगनादी। मध्यममायदीर्घत्वे पटादौतिष्ठतः पाण्यायेराम्तिमरष, परवमा एपपरिमार्थ चतुर्धा, ज्या:(काभ्यादभ्यरितमेपपरिमार्पसिनाया दप्याप्रतीतो मा प्रत्यया भागात् । (र.) मेवं दादरम्यपनि तरपरिमार विषाया। पतएव मानपरिवारयारयति।

दीर्घ (0) अणुदीर्घमहस्व मितितभेदहारतः ॥ अनित्येतदनित्यंस्या न्नित्यनित्यमुदाहृतम्११०॥ संख्यातःपरिमाणाच्च प्रचयादपिजायते ।। अनित्य- टी.-निस गुपके धारा वस्तुको मापें इस गुपका 'परिमाण करते॥१८॥ या परिमाय चार प्रकार का रे जैसे मात् पोर जाव पर्थात् छोटा, लंबा, भारी लका। यह परिमाप नित्य में नित्य और पनित्य में अनित्य होता ॥११॥ अनित्य परिमाण की तीन कारणों से उत्पत्ति होती संपया से परिमाण से पौर प्रचय से ॥ व्यणुकादौतुसंख्याजन्यमुदाहृतम् ॥१११॥ टी.--यणुकाकिकों का परिमाप संख्या से उत्पन्न होता पर्यात् परमाणुषों की हित्य संख्या से ज्यणुक का परिमाण पौर ध्यणुकों को वित्व सख्या से श्यणुक का परिमाए उत्पन्न होता है, क्योंकि परमाणु परिमाण और क्ष्यणुक का परिमाण किसी को कारण नहीं ॥११॥ परिमाणंघटादौतु पारमाणजमुच्यते । प्रचयःशिथिलाख्योयः संयोगस्तेन जन्यत।११२॥ परिमाणं तूलकादो नाशत्वाश्रयनाशतः टी.-घटादिकों में जो परिमावरे यह परिमाप उत्पन्न दुमा अर्थात् कपाल तन्तु भादि के परिमाए घट मे पट का टी- (106) '" परिमार उत्पनम होता। प्रचय माम शिथिल संयोग का ११२॥ उस संयोग 'मे ( तुल)कई आदिकों में जो परिमाण उत्पन्न होता है पर प्रघयजन्य है अर्थात् जब थोडी कई को चुनियां धुमता तो वह कई फूल कर बड़ी होजाती, या का का बड़ा परिमाण मा है यह प्रचय नाम शिथिल संयोग से की उत्पन्न होता है। और परिमाय का नाम पायय के नाम से उत्पन्न होता है जैस घट के नाम से घट के परिमाण का नाम होजाता। संख्यावत्तु पृथक्त्वंस्यात्पृथक् प्रत्ययकारणम् ११३॥ -यर इससे पथक त्याकारक भान का कारण जो गुप से प्रथम व करते हैं और इम का भी नित्यत्व पनित्यत्व पादि विचार संपया की तरह ॥ १३॥ । अन्योन्याभावतो नास्य चरितार्थत्वमुच्यते॥ अस्मात्पृथगिदनेति प्रतीतिर्हि विलक्षणा । ११४ टो. इस पृथला गुए को प्रन्योन्याभावसे चरितार्थता नहीं होती पर्यात् पन्योन्याभाव के मानने से ही इस का कार्य भी सिजाय ऐमा नहीं सकता क्योंकि "मयमामात् पृथक"रस में"दमिदं न" यर नाम विलक्षण (मिनस को स्पष्ट परता यद्यपि भेद भोर या एक में ही प्रतीत होते तथापि या घट मी या भेद को मतीवि पोर या घर से प्रयक रे, यह एषात को प्रतीति न प्रतोतिपोंके भेद मे प्रपत्र (१) प्रथगध्यभापरामाधारपसारण पचनाम् । (१) नश्या', मोमिनार एपल मस्योभाव एप ना. गुणा पतरमियमंग्यतेति। २ मामो गुप मानते हैं शिव एव दृश्य से दूसरे द्रश्य को नेस प्रथक कर लेते हैं, इस तरह गुणों को नहीं पृथक् कर सकते, परन्तु भेद गुणों का भी सिद्ध होसकता ,रूप जोरे पर रस नहीं इन युक्तियों में पृथक्त्व मामी गुण प्रभाव नहीं है ११४ । अप्राप्तयोस्तु या प्राप्तिः सैव संयोगईरितः । कीर्तित स्त्रिविधस्त्वेप आयोऽन्यतरकर्मजः।११५ तथोभयक्रियाजन्यो भवेत्संयोगजोऽपरः ॥ टी.-समाप्त द्रव्यों के परस्पर मिनाप को मयोग करतेरपर संयोग तीन मंजानों से विभा देनेमे अन्यतर कर्मज ११५ । उसय कर्मज और तृतीय संयोगज अर्थात् संयोग दो पदार्थों का होता है, जहां दो में से किया एक में हो दमरमें न हो वहां अन्यतर कर्मन संयोग होता है, जो दोनों को क्रिया से प्राप्ति उत्पन्न हो, उसे उभय कर्मज्ञ मंयोग कहते हैं, और जहा एक देय के संयोगसे सारे पदार्थ का संयोग हो,उसे पयोगजकहते हैं इनके क्रमसे उदाहरण मुलकार "पादिमः" इत्यादि पन्यसे स्वयं दिखाते हैं। आदिमाश्येनशैलादि संयोगःपरिकीर्तितः।११६॥ मेषयोः सन्निपातो यः सद्वितीय उदाहतः। कपालतरुलंयोगात्संयोगस्तरुकुम्भयोः ११७ तृतीयः स्यात् । (२) भप्रानि पूर्विका प्राप्तिः मयोगः। संयुक्त व्यवहारा माधारणकारणत्व वा 'अमाधारणत्व' विशेषणेन माधार पकारण कालादिध्यातिः । अयमचानित्यएप विभुयमंयागामडोकात् ।

--
टोमा-म विविध संयोगों में प्रथम र्शन पौर संवा पोत
पक्षी और पर्वत मादिकों का क्योंकि पर्वत में क्रिया नहीं हुई
फेवल पक्षी भादि को क्रिया से पर्वत में संयोग होता है।११एवं
परस्पर (मेष) मेरे पादिके (सन्निपात) रकर होना स्वरूप दूसरा
संयोग पोत् ऐसा मंयोग दोनी की क्रिया होने में उत्पन्न
तार एवं कपाल इक्ष के संयोग होनेवाला घट इच का संयोग
ततीय संयोग ॥
कर्मजोऽपि विधवपरिकीर्तितः ।
अभिघातो नोदनं च शब्द हेतुरिहादिमः ११८
शब्दाहेतुर्द्वितीयः स्यात् ।
टो-वाक्रिया जन्य संयोग फिर दो प्रकार का है। जैसे पभिः
घात और दूसरा नोदनापय जिस मंयोगसे गडद होय वा अभि
घासाख्य संयोग। १५८ एवं जिमके कोने मे शब्द न होय वा
मोदनापय संयोग
पविभागोऽपित्रिधाभवेत् । एककर्मोद्भवस्वायो
द्वपकमोद्भवोऽपरः। ११९ । विभागजस्तृतीयःस्या
ततृतीयोऽपिद्विधाभवेत् । हेतुमात्रविभागोत्थो हेव
हेतुविभागजः १२० ॥
.-पव विभागका निरूपण करते २ "विभागोऽवि"
इत्यादि प्रन्य से मिले हुए दो पदायों का पसग २ मा विभाग
दातार या विभाग भी मौन मनापी विभाव मे मबम एक
कोहिया मेस्पन्न सो पाता।
१ विमान प्रत्ययासाधारपणापा भिागायनरम्।

दूसरा दोनों को क्रिया से उत्पन्न होता है और तृतीय, विभाग से उत्पन्न होने वाला विभाग, पर विभागन विभाग भी दो प्रकार का है प्रथम कारण मात्र के विभाग से उत्पन्न होता और क्षितीय कारण और अकारण उभय के विभाग में उत्पन्न रोता है तीनों प्रकार संयोग की तरह जानने चाहिये अर्थात् श्वन शैलादि का विभाग अन्यतर क्रिया जन्य है तथा अपघयका विभाग उभय नियामन्य है, तीसरा विभागज विभाग एक देश के विभाग से जो मारे देश का विभाग होता है उसे विभागज विभाग कहते हैं जैसे पुस्तक से छुई हुई अंगुली के अलग करने से सारा परीर भी अलग होजाता है । दोनों भेदी के उदाहरण जैसे कपाली के परस्पर विभाग से जो अन्य देश के साथ कपालों के परस्पर विभाग से जो घट का भूतल से विभाग हो, उस हेत्व हेतु विभागन करते हैं ॥१२॥ 'परत्वं चापरत्वं च द्विविधं परिकीर्तितम् । देशिक कालिकं चेति मूर्तएव तु देशिकम् १२१॥ परत्वं मूर्तसंयोग भूयस्त्वज्ञानतो भवेत्॥ अपरत्वंतदल्पत्व बुद्धितः स्यादितीरितम्।१२२। टी.-परत्वा परत्व का निरूपण करते है। परममिति" देगक्षत कालात मेदसे परत्व तथा भपरत्व दो प्रकारकादेशिक कर दूरत्व समीपस्वसे व्यवहार करते हैं और कालिक का ज्येष्ठत्व और कनिष्ठत्व से व्यवहार होता है ये दोपकारफे परत्व पपरत्व अपेक्षा से बिना कही नहीं होते और उनमें १-परापर व्यवहारामाधारपकारपत्वं परत्वापरत्वयोसंशपम् दैभिया परत्व इसलिये लवपुर १२२॥ परस्यतो मूर्त पदार्थ में ही रहते हैं ॥२१॥ अधिक मूतं सयोग मान से परत्व उत्पन्न होता है, अर्थात् जो वस्तु जिस वस्तु की पपेक्षा अधिक देशलंघ के स्थित हो, वह वस्तु उस वस्तु से पर माहाती है, जैसे लवपुर के मनुष्यों से जालंधर अमृतसर की पपेक्षा अधिक देश के अन्तर से स्थित है इसलिये लवपुर के मनुष्यों को अमृतसर से जालन्धर पर है। प्रवदैषिक अपरत्व को कहते हैं एवं मूतं पंयोगाल्पत्व ज्ञान मे पपरत्व उत्पन्न होता पर्यात् जिस वस्तु से जिसवस्तु में थोड़े देश का अन्तर हो, उस वस्तु से वह अपर कहाती है, जैसे एलउदाहरण में जालन्धर की अपेक्षा पमतसर में थोड़े देश का अन्तर है, को जालन्धर को प्रपेशा धमतर पर (समीप) तयोर समवायी तु दिवस योगस्तदाश्रये ॥ टी.-उन दैषिक परवापरत्यो का असमवायि कारणदेषिक परत्वापरत्व पायय के साथ दिमा कासंयोग स्वरूप ही है। दिवाकरपरिस्पन्दभूयस्त्वज्ञानतोभवेत् ॥१२३॥ परत्वमपरत्वन्तु तदीयाल्पत्वबुद्धितः। टो.-एवं मर्य क्रिया के भयस्त्वज्ञान से कालिक परत्व उत्पन्न होता अर्थात् निमको अपेक्षा में जो पदार्थ बहुत दिनों से उत्पन्न हुभा हो, जैसे पुत्र की अपेक्षा पिता बहुत दिनों से भरपन्न हुमा है। इसलिये पुषसे पिता या शेता॥१२॥ पम पपगस्य को करते हैं तया मर्य क्रिया के परपोयाब जान से फाधिक पपरस्प उत्पन्न होता है अर्थात् नो पातु जिससे पोचे उत्पन्न हो पातु उससे कनिष्ठ घोटी कहाती से दार में परपिता ने पीई एस्पन्न रोता, मक्षिये पिता से पर कनिष्ठ (छोटा) कहासा या कामिक परता परस्य केवचजन्य द्रव्यही तारे और पदायों में नहीं होता। अत्रत्व समवायी स्यात्संयोगःकालपिण्डयो॥१२१ टी.-इस काक्षिक परत्वापरत्व में काल (विएड) जन्यद्रव्य के संयोग को पसमगायि कारपता है॥२४॥ अपेक्षा बुद्धि नागेन नाशस्तेषां निरूपितः । टी.-उन कालिक तथा दैगिक परत्वापरत्वों का प्रपेचा बुदि के नाम से नाय होता , घुद्धेः प्रकारः प्रागेव प्रायशो विनिरूपितः ॥१२५॥ अथावशिष्टोऽप्यपरः प्रकारः परिदाते अप्रमाच प्रमाचेति ज्ञानं द्विविधमिप्यते ॥१२६॥ टी.-पच क्रम प्राप्त बुद्धि का निरूपण करते "दुधिरिति इत्यादि अन्य से बुद्धि का प्रकार तो हम बहुत सा पीछे पात्म निरूपण ही में कर चुके हैं ॥१२५॥ परन्तु उसमें जो कुछ शेषरे वह पब यहां दिखलाते हैं, अममा (चम) प्रमा ( यथाय नाम) के भेद से ज्ञान (बुदि) दो प्रकार का होता है ॥१२॥ तन्छ्न्ये तन्म तिर्यास्यादप्रमासानिरूपिता। तत्प्रपञ्चो विपर्यासः संशयोऽपि प्रकीर्तितः॥१२७॥ । तदभाव वन्निष्ठविणेघ्य तानिरूपित तम्निष्ठ मकारता नरूपित प्रशारिताथाल्यनुभवत्वमप्रमाया लक्षणम् । पापि समूहालम्बनप्रमायामसिव्याप्तिवारणायेवनिम्वष्टसप माद। पस्या एव मिया जानापरयर्यायोऽयथार्थ निश्चयो नामान्तर मिति। दोपाच्चतस्याउत्पत्तिः। " है .4 17 टो-अम्मा का निरूपण करते हैं "तरम्य " स्यादि पाय (तत् रमतत्यादिधर्माभावशलो शक्ति में जो (तन्मति) "रजतस्यवदरजत" इत्या कारक ज्ञान उसका नाम 'पप्रमा विपर्यय तथा संशय पात्मनशान भी उसी प्रमा बुद्धिही का (पन्ध विस्तार समझना चाहिये ॥१२॥ आद्योदेहेप्वात्मबुद्धिः शशादौपीततामतिः । भन्निश्चयरूपाया संशयोऽयप्रदश्यते ॥१२॥ टी.-वर विपर्यय देश में पारम बुद्धि पर्थात् देह को हो पारमा मामना तथा यस रवत होता है उसे पीत समझना एवं सीपी को चादी जानना इत्यादि यदि निश्चय कप मति होय तो उसका नाम विया भय को दिखलाते र "जिजाम में एक पातु और उसी वस्तु का प्रभाव ये दोनों एका पन्य पदार्थ के विषय होजा" उसको संजय कहते-सका दाहरण मसवार स्वय दिखलाते हैं "किश्विदिति" ग्रन्थ से- 'किं स्विन्नरो वा स्थाणुर्वेत्यादि बुद्धिस्तुसशयः॥ 1. टी.-या या पुरुष है यहास्याणस्यादि नाम का माम मययतापच्य यारेविकिमान मोग मृगों में संत व पाने के लिये मन को मारेरा पा पंग जिम मातम पहें ऐमी मी मनाकर घाम फम उमरे सिर पर पगड़ी की मारपेट फर पे में गाड से निनिममे मग में मनुष्य नाम परदा में भागनायें और पेन में न घुमे ऐपो सो को एमेचमार शिमो समय मे मोथा जि पगही बधि सम्होर और वनाए पपा यावर मनाप्य वापरता पसा मोर वा यो पेमे परमर में मनुष्य का भान होता कि यह मनुष्य, है या नहीं", सज्ञान में मनुष्यत्व भोर मनुष्यत्वाभाव ये दोगी उस कड़ी में विशेषण इससे यह संशयमान है। तदभावा प्रकाराधीस्तत्प्रकारातु निश्चयः॥१२९॥ टो०- निश्चयका निरूपण करते हैं तदभावेति'उस परंतु गत प्रकार रूप में जिस भानमें नहीं है किन्तु उस वस्तु में पर्थात् निसका भान होता रहने वाला धर्म जिस जान में प्रकार (विशेषण ) है ऐसे भान को निश्चय कहते हैं। तात्पर्य यह है कि जिसमें विना निषेधके एक पदार्थ प्रतीत से उस भानका नाम निश्चय संगय में भाव और पभाव इस तरह उभयकोटि होती है अतः तदभाषा प्रकारक, मानमें विशषण दिया यह निश्चय यथार्थ और अयथार्थ भेद में दो प्रकार का होता रेमे घट पड़ापा टेख के, जानना कि यह घट है, इस मान में यह निषेध नहीं कि "यह घट नहीं है"इस से या मान निश्चयरे और इस ज्ञान से घटको हो घट समझा है. म किमी अन्य को घट जाना है इससे यह ज्ञान यथार्थ भी मा.तो मानो' यह ययार्थ जान निश्चय और नहा रज्जु पड़ा है, वहां जान हुभा कि " यह प" इस ज्ञान में भी यह निषेध नदी कि यह सांप नहीं है" इससे यह निश्चय एमा परन्तु रज को सांप समझा है इसमें यथार्थ भी है तो मानो यह प्रयथार्थ निचय॥ १२८॥ १-तदभावा प्रकारकाधे सति तत्प्रकारकावं. निरचयत्यह पम् सत्यन्ते नमंशयव्युदासा । समयस्योभयकोहिरपनिस्यात् । :

सस्शयो मतिर्यास्यादेकत्राभावभावयोः । ठीक-संचय का लक्षण करते " इत्यादि अन्य (एक) एक धर्मी में विरुष भावाभाव प्रकारक जान' का नाम "संपयशान है॥ साधारणादिग्धर्मस्य ज्ञानं संशय कारणम्॥१३०॥ टो०-माधारपणादि धर्मका ज्ञान संमयमें कारणीभूत है॥१३॥ १-यत्किञ्चिामिनिष्ठ विशेष्यता निरूपित-विहानामा धर्मनिष्ठ प्रकारता निरूपित प्रकारिता गाविज्ञान संशयः,पनव- धारणंभानं वा। २-साधारणस्य, भादिपदेन, असाधारणस्य धर्मस्य भानं संपये रेतः, नयथा स्थाणु पुरुषयोः साधारणधर्ममतादिसमर्थ पुरोवर्तिन्यु पक्षम्य स्थाणुपुरुपौरमत्या विशेषनिनासायां स्थाणुत्व निरचायक पक्रकोटरादिकंपुरुषत्वनिश्चायकं गिर पाएयादिक चामुपस्तभमानस्य दोसायमानं संययभानमुत्पयते 'किमयं पापु पुषपोवा' इति । अयं साधारणधर्मशानजन्यःसंचया रिती. यः यथा-यग्देचाकामविशेषगुणत्वमसाधारणधर्ममुपसममानस्य निर्णायकमनामतः संगयोमपति 'किंसदोमित्योनया' रति । न्याय भाष्येत विप्रतिपस्यादीन्यन्यान्यपिषीपिकारणानि प्रतिपादिता नि.पिकस्तुमातानितानीतियोधव्यम् । इदं सुपोध्यम्-संध्य समस्यचदपः, संनियाजस्वात. रति विचारस्य च, परभवति, यामात् मामुपसाधे न निर्घात विचार (न्याय:) प्रवर्तते किन्तु चितारतिमाभ्यम् ।। .

दोपोऽप्रमायाजनकः प्रमायास्तुगुणोभवेत् ॥ टी.-प्रमाजान के प्रति दोष कारण है तथा ममामान यो रतिगुण को कारणता है। अब दोषों को कहते है। पित्तदूरत्वादिरूपो दोषो नानाविधोमतः॥१३१॥ टी.-(पित्तेति) पित्तदात्वादि दोष भनेक प्रकार के २ अर्थात् कहीं कोई रहता है,कहीं कोई रहताडे,उन दोपोंको श्रममा पान के प्रति कारणता पन्यय व्यतिरेक धारा सिह अर्थात कोई एक दोष होय तो अप्रमाजान उत्पन्न होता है न होय तो नहीं होता और गुणको प्रमात्मक ज्ञानके प्रतिकारणका अनुमान भरा सिसके विशेष विवार को टियण में देको । ११॥ प्रत्यक्षेतुविशेष्येण विशेषणवतासमम् । सन्निकोंगुणस्तुस्या दथत्वनुमितौपुनः ॥१३२॥ पक्षेसाध्यविशिष्टेतु परामशों गुणोभवेत् ॥ शक्येसादृश्यबुद्धिस्तु भवेदुपमितौगुणः ॥१३३॥ शाब्दवोधेयोग्यतायास्तात्पर्यस्याथवाप्रमा॥गुणः स्यात् :- (१) पप्रमायाः पित्त मएकवसाम्जमचाकचवपदास्वादि जन्यत्वादुत्पत्तौ दोधोरेतुः सचाननुगतोऽप्यम्वयव्यतिरेकाम्यरितुः भक्तोतस्तदुत्पत्तोपरतस्त्वमितियोध्यम् । अनुमानादिनवाप्रमा मपिगमते तमामावपिपरतरस्वम् । तयादि इदं प्राममममा,विक्ष बादिमात्तिजनकत्वात, यन्नेषम् तम्भवम् यया ममा पति।

- -- टो-भय गुणों को कहते हैं"मत्यवति"विशेषण विमिष्ट विष्य के साथ जो नेवादि इन्द्रियों का सन्निकर्ष (पंध) पर प्रत्यक्षमा का उत्पादक गुण होता है॥१३॥ तथा साध्यविशिष्ट पच में पूर्वीय परामर्श भान अनुमिति जान का जनक गुण गव्यादिशय में नो "गो सहयो गर्वय पदपाच्या"इस्याकारक सा- हरपबुद्धिवह एपमितिञानका जनक गुण है॥१॥एवं यादवोध में योग्यताचान यहातात्पर्य का यथार्थ ज्ञान हो गुप रूपरे। भ्रमभिन्नंतु ज्ञानमत्रोच्यतेप्रमा ॥ १३४ ॥ अब प्रमाका निरूपण करते हैं "भ्रमभिन्नमिति" टो--इस प्रकरण में भ्रमभिन्नशान को प्रमा संचा। (a) पर मुति तयार भय में "मे रजते" त्याका रफ भान हुपारे वहां रस मान को रलसाय में भी प्रमात्व माी सेना पाहिये। क्योंचि यह मान भम भिन्न नदी किन्तु सुति फा मे मम रूप की है। (२.) इस का सार 'अथवा रस्यादि पन्य मे मशकार करते १५४. अधवा तत्प्रकार तजज्ञानं तददिशेयकम् 'तत्ममा- (৫মনিতে মিয়া শিবিলে মানে নিও, पित प्रशारिता माश्य नुमर प्रमायासपपम् । पताय लिहर सवत ममासम्बन ममाति ध्याप्ति पर्वदामः । समागम्बन माय रंगा रागारिन रमताये रंगत्यागारिनच रजना मता: जानियतामिपितामाभागत् । एवं ग्य मारा: मयता निविभाधान। पचार नाम मा प्रतिपय arreोपमा माना. Kिalkin Patna टी.-पयवा सदियष्यक तत्प्रकारकमान पा गाम, 'प्रमानान' है जैसा कि घटःइत्याकारक घटत्यहि शेष्यत घटत्वप्रकारकमान 'पमानान' है ऐसे ही वस्तुमात्र के मान में जानना चाहिये । नप्रमानापिभ्रमः स्यान्निर्विकल्पकम् ॥१३॥ प्रकारतादि शून्यहि संवन्धानकगाहितत् ॥ टी. -अब निर्विकल्प का निरूपण करते है.."न प्रति" इत्यादि ग्रन्थ से निर्विकल्पक ज्ञान को प्रमा रूप अथवा भ्रम रूप नहीं कह सकते क्योंकि यह प्रकारता विशेष्यता तया संमर्गता में गुन्य है इसका उदाहरण जैसा कि 'यह कुछ है' इत्याकारक है। प्रमात्र नस्वतो ग्राह्यं संशयानुपरत्तितः॥१३६॥ टी--अब "मानाधीनामेय मिहिः" इस नियम से यावत् ममाण तत्त्व निश्चय न होय तावत् किसी भी पदार्थ का निश्चय नहीं होता इस लिये प्रमाण तत्त्व निश्चय सवं मे पूर्व अपेक्षित और वह प्रमात्व के निश्चय बिना नहीं हो सकता इस लिये प्रमा. स्व निश्चय का उपाय चिन्तन करते है “प्रमा" इत्यादि ग्रंथ से यहां पर यह विवेचनीय है कि ज्ञान गत (प्रामाण्य) यथार्थव स्वतः अाध है प्रथया (परतः) नाम दसरे अनुमानादि में होता है इममें तोग्रायत्व मीमामयों का मत है मोमांमकों का यह भाव राम त्रयो मीमिका विप्रतिपेदिरे प्रभामगपरनामका गुरवः भटाः मुरारि नामका मियाश्चति । तत्र गुरुणांमसम्, पा. नस्य स्वप्रकाशरूपत्वात नान प्रमायं नैव गच्यते, इति भात- नमतं घ--मानमतीन्द्रियम, चान नभ्या मातता प्रत्यक्षातयाच भानमनुमायते, इति। मुरारि मिशया मतेतु पनघ्यवसायन कि जब दुर में प्रत्यक्ष हारा सादि का जाना तो लत: को यथार्थ जामल स्वरूप प्रामाएर का निराकाजल की रश पाखा महत्त होता क्योंकि जान पाने पर तात प्रामाण्य का पर भी हो जाताई न्याय मिशालत में परतो पात्र पप गृहीत रेस में नैयायिका का यह भाव कियदि जान गत प्रामाण्य पपने में ही गृहीत होता तो कदापि संभय नहीं होना ব্যথিত অগ্রীম্ অনয ব ম া গ জ অনার্স প্রী या जल भान हुभा है यह यथार्थ वा नहीं ऐसा मंशय नों एमा चाहिये क्योंकि निश्चय होने पर फिर संशय नहीं होता () जिस स्थल में संशय हुाव पर म भान हरी जानं गृह्यते, इति । तत्र प्राभाकर मतन्तु विशदो क्रियते तद्यथा-- भानस्य प्रत्यक्षत्वमेव । प्रमात्वं स्वतएवगवाते। प्रमात्वाश्रयी भूत यज जानम् तत् यया कारण सामनया (धात्ममनः सनिकर्षः, नि- यविषय मनिकषः, इत्यादिना) जन्यते तवृत्तिप्रमात्वमपि तयवसा. मा गृधते। तथाहि-स्वप्रकायमेव ज्ञानम्" अयं घटः, इति प्रा. मम्) गया घटादिकं विषयो करोति, तथा स्वात्मानं (स्वस्वरूपम्) स्वावस्याधिकरणम् (मात्मानम्) च विषयो कगेति । अतएव (भा. नस्यघटादि विषय स्वावल्य पात्म रुपाधिकरण एततत्रितय विष- यकस्या देव) सर्ष मेवनानम् 'घटमई जानामि'इत्याकारक मेव। त्यंच (सर्वस्यव्यवसायायानुव्यवमायात्मकत्येनच) भानस्य मिति मातमेय विषयत्वात् 'निपटी प्रत्यक्षता' इति प्रवादः । तयाच स्व प्रकास (स्पस्मिन स्वविषय कस्य) महिम्ना म्वमिर घमामाण्यमपि सियप्ति (विषयीभवति) स्यः) माम पाचासिरियानपेक्षा तो प्राचार स्वम् ।

1. ( ११) नही मानते (.) यदि ज्ञानका ग्रहही न मानोगे तो माम धार्मिक प्रामाण्य और उसका प्रभाव उभय कोटिक संशयी भी होगा क्योंकि संशय में धर्मि ज्ञान को कारणता है जैसे भागे स्थित बहुत अंचा मुंड बिना देखें कभी भी यह स्थापु है वा पुरुष है ऐसा संय 'नहीं होता इम लिये जानमें परतःही प्रामाण्य गृहीत होता site व्यभिचारस्याग्रहोऽपि सहचारग्रहस्तथा। हेतुव्याप्तिपहेतर्कः क्वचिच्छङ्कानिवर्तकः॥१३७॥ परतोपाधमितिनैयायिका तथा च तेषां 'प्रयोग:-'नातं मे समान प्रमा समर्थप्रवृत्तिजनशत्रात्, यत्प्रमानभवति तत्स. 'मर्थप्रवत्तिजनकनभवति, यथालनमाति 'व्यतिरेकोणामभ्यास. दगापन्नशानमामागय निश्चीयते, एवं व अनुमानादिपावत्यान जप्तीपरतरत्वम् । तदुस्तम्-"प्रमाणत्वाप्रमाणत्वे स्वतः साह्या समायिताः । नैयायिकास्ने परतः, सौगताश्चरमस्वतः। प्रथमपरतः मा: मामापयंवेदयादिनः । प्रमाणत्वस्वतामाः परतश्चाप्रमाण- ताम् ॥१॥रत्यलं पावितैन । (१) व्याप्यारोपाध्यापकासम्जनं तर्कलक्षणम् । यहा अविज्ञाततत्त्वेऽर्थकारणोपपत्तित तत्त्वज्ञानार्थमुभरतक:या• द. १1118.1 पयमर्थ:----तर्कातिलस्यनिर्देशः। कार योपत्तितजा इति लक्षणम् । अविज्ञाततत्त्वेऽर्थतत्वज्ञानार्थमितिप्रयोजनकथनम् कारणं ध्याप्यम् । तस्योपपत्तिगरोपः, तस्मात् उहः पारोपः पर्याध्यापकस्य, इति। प्रयचसोनप्रमाणसगृतो म प्रमाणात रम् । अपितु ममापानामनुपाइक तत्वज्ञानायकलप्यते। पारया. भा (२) किंध तर्को धमाग्योाप्तिपी (अत्यलायमाने) सार्य | HITS 5 -1 - र

।
-
( १९२
टी.-प्रवध्याप्तिग्रह के उपाय को दिखाते हैं यभि.
चारस्यति" पदार्थों के परस्पर व्यभिचार का न प्रहप होना तथा
साचार का परण होना च्याप्तिस्वरूप के ग्रहण में कारणी भत
बोंकि यभिचार ज्ञान प्रतिबन्धक पत उसका प्रभाव
कारण है और जहां पर वार २ सहचार दर्शन होने पर भी ध्यभि-
पार शंका नहीं दूर होती वहा पर तर्फ (क) की अपेक्षा होती
है। जैसे किसी ने कहा कि पर्वत में 'धूम को परन्तु वन्हि न हो
ऐसी शक होने पर तर्क हारा दूर करनी चाहिय व्याप्य के
भारोप से जो व्यापक का पारोपको उसे सर्व कहते हैं उदाहरण
यदि या पर्वत पनिहमान नहीं है तो इसमें धूम भी गरी
सेना पारिये यह यर व्याप्य' पनि का प्रभाव रे और
धूम का पभाष ध्यापक के तर्क कर्ता का या भाप कि
पनिए और धूम का परस्पर कार्यकारण भाव है कि जब २
मयकादिको निति के लिये धम को पावश्यकता होती है तब २
मियम में पति (पाग) कासा पानाता : मिपा कि
धुम पनि मे सरपमा सारे तो पति भी पायपाकि
कारण के बिना कार्य नहीं हो सकता पन्यथा काय कारण भाव
समीरगा। मरका कार्य कारप भाव भंग पसजन
आप पनिटाणदन तक महासा॥
कारणभावममानवीयभिचार शानिशाचता पायप
মনিখiথাৎ নব ঘনিবাসিগন্য
स्यपवानिमित्वमाम्निमाधमगमम्मोत्यपि प्रतीयो।
Varanाय पराशत् । वियंपए
बयपरमा परमातपिपया मर एयरएमा

- ( १२३ ) साध्यस्य व्यापको यस्तुहेतौरव्यापकस्तथा । स 'उपाधिर्भवेत्तस्य निष्कर्पोऽयंप्रदर्यते॥१३८॥ टी-निस पनुमान में उपाधि लगजाये वह दुष्ट होनाता है, इससे अनुमान की रचना में शुद्धि के लिये उपाधिका लानमा भी अपेक्षित है। क्योंकि उपाधिका यही प्रयोजन है, जिसपनुमान में उपाधि लगजाय, पर्दा व्यभिचार का अनुमान कराके उछ अनुमान (हेतु) को दुष्ट कर देता है, इस लिये उसके स्वरूप का निरूपण करते है. 'साध्यस्येति' जो धर्मसाध्य का व्यापको (माध्यके किसी भी अधिकरण में जिसका प्रभाव न रहे) और हेतु का जो न व्यापक हो (हेतु के किसी एक प्रधिकरण में जिसका प्रभाव रहजावे) उस धर्म को उपाधि कहते हैं। उस 'पाधि' का निष्कर्ष' अर्थात् यथार्थ मार भागे दिखलाते हैं॥१२८ स.साध्यसमानाधिकरणाः स्युरुपाधयः । हेतोरेकाश्रये येषां स्वसाध्य व्यभिचारतm१३९॥ टी-सर्व ही उपाधिस्वरूप धर्ममाध्य के साथ ममानाधि करण होते है अर्थात् साध्य के ध्यापक होते हैं जिन उपाधिप धों का हेतु के एक पायय में ख (अपना) भोर साध्य या व्यभिचार होता। wa (१) साध्यध्यापकत्वे सति साधमा व्यापकस्य मुपाधिनपणम् । उदयनाचार्यमते उपाधिषदंयोगवटम् । पत्रव्यत्पत्तिः-उपसमोपं वर्तिनि पादधाति संक्रामयति स्वीयं धर्ममित्युपाधिः, इति । इरावं सयमशन वनदेरियादो धमसमपादि कम पाधिः ।

JIT 7 TINT
व्यभिचारस्यानु मानमुपोधेस्तुप्रयोजनम् ॥"
टी. व्यभिचार का अनुमान कराना उपाधि का प्रयोग
२२सी को स्पष्ट करता अनुमान में सदा हेतु व्यापक साध्य
समा' परन्तु 'उपाधि युका अनुमान में साध्य का ध्यापक
सधि 'यदि रेतु का व्यापक मही तो उपाधि से न्यनदेय में
सने वाला साध्य कहा से हेतु का ध्यापक रोगा सी युति से
पाधि पाले चनुमान में व्यभिचार देते हैं साकि कि "पर्वतो
धर्मान् वन्द महानसपत एम व्यभिचारी में पानेन्धन सयोग
पाधि या पान्धनमयोग (गोली लकड़ीका सवन्ध) धूम मा
ध्यापका पर्चात विमा रम पाद काप्ट के मधम्ध से धम
नहीं
रोता पौरपलिका प्रध्यापक कि पनि पर्षिकरण स्तो
पिएड में पाकाष्ट का सम्बन्ध नरी, तो उपाधि ,सारण
पानधनमयोग घटित होगया मध प्रयोशन दिखाने तथापि
इम पनुमान में धम ध्यापक पार्द्र काट मयोग नव पनि का
ध्यापक नीतो धम माध्य कहां से पनि का ध्यापक होगा,
चिन्तु यह अनुमान व्यभिचारी या पाप्त उपाधि मे मिश।
+
T
1-प्यभिचारोम्नायकत्वेनोपाधवयम् । तथारि साध्य
स्यापमपाधि पसादध्यावतमामा मम् स्पच्याप्यं माध्यमादाय
प्यारतते । व्यापक निम्तो प्याप्यनिगायकस्यास् । तपार
मायाभलिपी विपरमपे पर्तमानो रेलयभिचारीभवति ।
तदुभम् । व्यभिचारोमयं कुर्वग्नुपार्यािति दोपताम् । एतदेल
संपाम पापीमा गयपम् । व्यभिचागेनवम । पपंरतुः
मामयभिचारी माग धापनोपाधि मिचालिया ये पाय
म्यापरम्पमियारोपण्यापयनिधारो, ति॥

13
(1)
शब्दो पमानयोनॆव पृथक् प्रामाण्य मिप्यताका
२अनमान गतार्थवादिति,वैशेषिकंमतम् ॥
तन्न सम्यग विनाव्याप्ति वोधंशब्दादियोधतः१४१
टी.--(धेगेपिस) कणद मनि के मन में गद प्रमाण और
उपमान प्रमाण पृयक नहीं है किन्तु प्रत्यक्ष और भनुमान इन
दोनों प्रमाका पङ्गीकार गम्द प्रमाण पत्य पोर उपमान
माध्य फल अनुमान हाग हो मित्र होता है इभी लिये कहत
हि "भनुमान गतार्थत्वात्" अर्थात अनुमान विधया ही हग का
१-पत्र,"घटदो ग प्रमाणम्" शब्दजानन्तु लेलिकमेव ।
सथा च शब्दोऽनुमामएवान्तर्भवति भाष्ये शब्दादीनामप्यनु
मामेरा व ममानविधिस्वास् ' 'एतानि पदानि स्मारितार्थ
समर्गभानपथकाणि,
प्रकाधादिमदाप्तोल पदत्वात् गामभ्याति
पदकदम्बयत् ' इसिमानायच्छेदकतया संमगमिहिरन मानादेव
भवति पगि पदपध कानुमानेन शब्दो न प्रमाणम् । एवमुपमान
मपि न प्रमाणान्तरम । तथाहि 'गवयपद मप्र इत्ति निमित्तकम,
साधुपदत्यात् ' रत्यनुमाननाचादि निर्वाह इति विकाणी
पदयामिति ॥
(२) नैयायिकास्तु-'पृथगेव गम्दोमानम् गदस्याध्याप्यत्वात्
नदि यत्र पदस्त पटानयनादिरूपाय: इतिव्याप्ति , शरदाया
कामियास, घटादेश्चतदलित्वात् । तथा च शग्दोतिरिय
प्रमाणम् 'सदात्प्रत्येमि'स्या यवमायमम्या मानस्य प्रत्यक्षानु
मित्यादि प्रतोतितो विलगत्येन साहा मानकरत्वेन मिति,
इत्या प्रमा एम्यप्रमाणान्तरत्येतु मागेरसमाधाथि, इतिपुनरव
नदुमलेएनपेषितम् ।

मामाण्य कुछ स्वतन्त्रता से नहीं है इस में वैषिकों को या भाव है कि जैसे "अनुमान का विषय परोक्ष होता है ऐसे ही शब्द का भी होता है और जैसे अनुमान प्रमाण में व्याप्तिरूप संबन्ध (निशिद्धि संबन्ध) की आवश्यकता होती ऐसेदो शब्द प्रमाण में भी संबंध की अपेक्षा होती है और जेमे प्रत्यक्ष से धुम को देख क्षर अग्नि का अनुमान होता है ऐसे हो शब्द को मुनकर पर्थ को प्रतीति होती है इत्यादि युतियों से शब्द अनुमान ही ह इति । भव इसका समाधान नेगायिककरते है तन्नति ' प्रत्यादि से यह आप का पूर्वी मिदान्त ठीक नहीं है क्योंकि व्याप्ति बिना भी गदादि शाब्दबोध अनुभव सिद्ध है अर्थात् जो अनुमान का फल अनुमिति है वह ध्याप्ति जानके बिना कभी नहीं उत्पन्न होती और गारदवोध तो उससे बिना भी मदादि से उदय होता अतः फल की तथा सामग्री की भिन्नता से शब्द पृथक् प्रमाण जैसे शब्द दो प्रकार का है एक पदस्वरूप दूसरा पाक्य स्वरूप उनमें पाक्य तो सम्बन्धज्ञान रहित भी वाक्यार्थबोधन कराने में पर्याप्त है क्योंकि नूतन निर्मित श्लोक के मुनने मे पद मस्कार पाते पुरुषों को उनके अर्थ को प्रतीति देखी गई है। वह वाक्य दो प्रकारका है वौकिक तथा वैदिक लौकिक केवल पापीनी प्रमाण है क्योंकि परप में धम प्रमाद विशिष्मा (पचन करने की शती पास वावध प्रमाण नहीं पोर दिल तो स्वरोका रोने से सही प्रमाण है पतप वेद ही रखता प्रमाण पर्यात पपने कोर पदाय की सत्यता निश्चय के चिये दूसरे किती प्रमाण को पायरय सता न रखता पर (१२७) अन्य समस्त की स्मृत्यादि वेदमन होने से ही प्रमाण है (५०) (३)वेद तो अनादि फिर वरोम कैसे । वेद पौरुषेय भर्यात पुरुष विरोध वगेता है क्योंकि यह भी धाक्य समूह महाभारत आदि की न्याई इस अनुमान द्वारा इसकी पौरुषेयत्व सिधि है। (०) वर का तो शरीर नहीं है तो मुखादि का प्रभाव होने. से वेद का उच्चारण कैमे पुमा (७०) भरीर रहित होने पर भी अपने हित पहित के प्राप्त करने और परित्याग करने के उपाय को म जानते हुए पुरुषों की देखता हुभा संतप्त होकर पितृसय पर सर्वत्र क्योंकर बिना उपदेश करने के रहसकता पतः मध्या (२) लौकिकवाक्य भिन्मवाक्यत्वं घेदस्य लघपम् । तासांच वृक्षशाखाना मेकस्माज्जन्मवीजतः। तथैवसर्वशाखानामेकस्मात्पुरुषोत्तमात् ॥१॥ - तदुक्तम्-कायएवजगतामखिलात्मवृत्ति कर्मप्रपं- चपरिपाकविचित्रताज्ञः। विश्वात्मनातदुपदेशपरा: प्रणीतास्तेनैववेदरचना इतियुक्तमेतत् ॥ २॥ राथा च युति स्मृति सूचदीन्येषोशन्यायं समर्थयन्ति "योम पाणं विदधाति पूर्वम् । यस्य निश्वसितं वेद इत्यादि यो वेदान् 'महिणोति तस्मै । सं देवमात्म बुद्धि प्रकागं मुमुक्षुधैगरएमई प्रपद्ये "(यजु: "साधनादाम्ना यस्य ममाएयम्"(२०१३)"युगान्ते अन्तर्हिसान वेदान् मेतिहासान् महर्षयः लमिरेतपद्यापूर्वमनुभाता: स्वयंभुवा (स्मतिः) परन्तु "फारमेर एवाग्ने रजायत,यजुर्वेदोवायोः । 'सामवेद पादित्यात्" इत्यादि तेस्तु ईश्वरम्याग्म्याः प्रेरकत्वेन निर्मातपरत्वंगम्यते । -11

-
IT
को उदय में अपने ज्ञानको प्रकाषित करता है और फिरतद,
भागे प्रकाशित होता है अथवा वा भी शरीकी से पुरुष के भाट
से
कान्ता के शरीर की न्याई इम र अष्टो सही स्वेच्छा प्रयत
। उसके शरीर को उत्पत्ति होमकती है अतएव चतुर्भुज आदि का
श्रवण भी होता है परमाणु ही ईश्वर का शरीर के कई ऐसा करते
कि लोग भताघश न्याय से परमात्मा का शरीर मानते सोय
कर्म विपाकागयरपरामष्टो निर्माणकायमधिष्ठाय , सप्रदाय
(२०) वेदनमापय पुरुषोतातयाध्यवस्थाप्यते ।
दाच्च पुरुषसिदिमिति कधन्नेतरतराययाति ।
(.),नुमानात्प्रमित कर्तरिवेदवाक्यैस्तत्मतीतेकपो ।
लनमिष्यते न त्यागमेकशरणएयकर्ष वगमः ।
(५०) पुरुषमुझेऽन्यत्रापिच वदचयो, ईत्ये वाघोष यतेत्रव्याच
भागयजु सामान्य वगृधन्ते तथाहि-" तस्माजु
" ऋच मामानिजनिर ' इतिपुरुषसूक्तम । पयोधर्ममधर्मा
वघमित्यादिमहाभारतेचाश्यतेपेकायमथर्ववेदन मघत्व प्रत्यपादि
टोकायामिनि (ड. अथर्ववेदस्यापित्रयीभागविशेषत्वान्नभयोवkि
सत्वमितिषयोपदेन तस्यापि प्रा प्रति नतदपामापय विधि
फिरसेति॥
वेदोऽपोपेय इति मीमासक मिहान्तः। तथा च या प्रयोग:
वेदाध्ययन गर्वध्ययन पूर्वक वेदाध्ययनत्वात्दानीताध्ययनपत
सत्यनुमानेमानादित्व माध्यन्ति ।
(४) ययातरोविक्षिप्ता माता भवन्ति नच कारन पप्पफल
परमेश्यो यातायो मनिमषित भवतिकितु कायाचितकरयाचित् ।
एव घेदस्यापि माषा' एयगा कर्मापदमिन्यो विचितारण)
-

(e) प्रवर्तको नुप्राहकाच"मर्थ प्रविधा (मिथ्याज्ञान ) अस्मिता (बुधि पौर प्रात्मा को एकरूप से जानना) अभिनिवेश (मरणभय) राग और हेप या पाच प्रकार के मेध तथा भुक्क छष्ण प्रादि कर्म विपाका उनके जात्यादि फन और श्रागय कर्म वासना इनसे जिसका कोई सम्बन्ध नहीं गरीर साध्यवेदादिके निर्माण के लिये गरोर को पारित करके संप्रदाय प्रवर्तक नामवेदका प्रचार करने वाला और अनुपाहक अर्यात् कार्यमाच बनाने को शिक्षा हारा रुपा करने वास्ता जो वह पर ऐसा योगशास्त्र का सिवान्तरे मतः पृष्टि के प्रारम्भमें ईश्वर के विना ध्यपहार के न सिंक होनेसे उसका होना तथा उसका सर्वप्रभाव पवाय मानने योग्य है (20) भारतमादिग्रन्थों में तो व्यास कर्ताका श्रवणारे अतः वह अनित्य को परन्त वेद का तो कता श्रुत नहीं पतः यह अनित्य कैसे (उ०) यदि ऐसा पक्षो तो वेद मे प्रजापति कर्ता स्मत है। (ग) प्रज्ञा. पति का नाम कीर्तन वेद मन्त्री की श्रेष्ठता के लिये रे (७०) ऐसा तो भारत में भी व्यास का नाम मी प्रयोजन के लिये समझा जायगा (पं.) वेद के निर्माण कर्ता को आज तक किसी में भी की नही देखा (४०) तो क्या ध्यास ली को पापके पिता प्रथया पितामह भी मे की देखा है। (शं.) यदि कहो कि भारतकर्ता ध्यास हे या सर्व का कथन (उ.) ऐसे हो वेदकर्ता प्रनापति या लोक में सिकिन्च स्वल्प भी माता पथवा पिताशे से उपदेय किया हुआ कम इम क्यों करते हैं जिससे इमे माता पिता पर यथार्थ ने का निरचय सोताह अनेक क्लेश और धमादिके व्यय मे सिद्ध होने वाला जो वेदसे कहा हुमा कर्म समुदाय क्या उसके उपदेश देने वाले यथार्थ वक्ता कर्ता का स्मरण मारकी बुद्धि युव मनुष्यों में किया जाता है । यह कथन पति मूर्खता का बोधक है। (०) वेद की तो साठवादि भेद से प्रमेक पाया है तो सर्व का एक ही कर्ता है कैसे जाने किन्तु जे अनेक ग्रन्थ अनेक कर्तात्रों से रचित होते हैं। ऐसे हो यहा पर भी अनेक कार्ता क्यों न माने । (०) वेद सर्व ही एक कर्ता पर मात्मदेव से रचित है । जिससे परस्पर सक्न्ध रखने वाले पदार्थ का इनमें उपदेश दृष्ट होता है। यथा एक हो यन्न स्वरूप कर्म चारों वेदों में कडे हए और एक ही अर्थ में सबन्ध रखते हुए पोसे मिला हुआ प्रयुक्त होता है। उसमें होत्र (होता का कार्य) ऋग्वेद से आध्वर्यव (अध्वयु का कर्म) यजुर्वेद से और घौडाप (हाता ऋत्विक का कम) सामवेद से और ब्रह्मत्व (सध्या का कर्म) अथर्व घेद से सिद्ध होता है। और ऐमे पैप्पलादि शाखा विशेषों में जो उपदेश है। यह र तत्तत अपतत्तत्कर्म में अपेक्षित होता है यदि तत्तत् शाखा और वेद भिन्म २ कर्ता में रचित तो एक पर्थ में सर्व का समावेशन होता क्योंकि सर्व कर्तानी का भागय एक नहीं होता। इस सर्व कथन से यह सिह इमा कि सर्व वेदोंका तथा (6) सर्वशाखापों का एक परमात्मा ही कर्ता। (t.) यदि मशाणाओं का एक ही कर्ता है। तो यह काठकरे। या पेप्पत है । इत्यादि ऋपि नामों का शाखामों मे निर्देश कोमे । (8.) नाम निर्देश तो प्रकष्ट अध्ययन प्रया अथवा विशिष्ट ध्यापयान कर्तृकत्व से जानना चाहिये। विध्यमनुमानस्य केवलान्वयिभेदतः ॥ दैविध्यंतभवेदव्याप्तेरन्वयव्यतिरेकतः ॥१२॥ अन्वयव्याप्तिरुक्तव व्यतिरेकादयोच्यते ॥

. (११) टी-पव लिङ्ग (पनुमान ) के तीन भेद करते हैं। रेविषय मिति केवलाम्वधि, केवल व्यतिरेकि। और मन्वय त्यतिरति भेद से अनुमान तीन भेदका है। अब फ्रमम: लक्षण और उदारप दिखलाते हैं। जिसका विपक्ष न हो वह केवलान्याय"पदोलि. धेयः प्रमेयत्वात् घटवत् । यहां पर भभिधेयत्व साध्य रे परन्तु उसका पभाव स्थल कोई नहीं मिलता A?कि सर्व ही परंतु पभिक धेय (नाम का विषय ) । अतः प्रमेयत्व हेतु कोषलाषयी पुषा जिसका सपक्ष न मिले वह केवल व्यतिरेको हेतु होता है। जैसे "जीप वशरीरं सात्मकं प्राणादिमत्त्वादनयदेवं नतदेवं यथा पापापः" यही पर जीव शरीर तो पक्ष है। उसमें सात्मकत्व पर्थात् पात्मा साध्य रे और प्राणादिक हेतु है और पापाए दृष्टान्त है यहां पर जर भात्मा नही है वहां २ प्राणादिका भी नहीं है। इसका दृष्टान्त पापाण मिल जाता है। पतःध्याप्तिरेक व्याप्ति तो सिर गई परन्तु जहां २ प्राणादि है वहा २ भात्मा है ऐसा दृष्टान्त कोई नही मिलता क्योंकि जीवशरीर मात्र ही तो पक्ष और दृष्टान्त पक्षसे भिन्न होता है। और भन्यस्थल में रेतु और साध्य ही नहीं है। पतः सपक्ष के न होने से प्रापादिमत्त्व देत केवल व्यतिरेकी हुभा । और जिसका सपक्ष और विपक्ष उभय होय प्रर्थात् जिसकी भन्वय व्याप्ति और व्यतिरेक व्याप्ति दोनोय वह हेत अन्वयम्यतिरेकी होता है। जैसे "न्दोऽनित्यः कार्य- स्वाद् घटवत् व्यतिरेकेगगनवत्" यहां पर जहाँ २ कार्यव। वा २ अनित्यत्व। इसका दृष्टान्त मपच घट युपा और जो पनित्य नहीं है वह कार्य भी नहीं है पृष्टान्त विपक्ष भाकामरे। प्रता कायंत्यत अन्वयव्यतिरेकी है। पत्र च्याप्ति के दो भेद यहरते। अन्यय और व्यतिरेक भेदसे व्याप्ति दो मशार की ।

( १९९) ५.१४२ ॥ उसमें पन्वय व्याप्ति का स्वरूप तो पूर्व, कानुयो । पत्त्यतिरकस्याप्तिका स्वरूप कहते है। साध्याभावव्यापकत्वं हेत्वभावस्य यद्भवेत्॥१३॥ माध्यामात्र निकमिंत स्वभाव में जो व्यापकता पर व्यतिरेक व्याप्ति कहाती है ॥ १४३ ।। अर्थापत्तेस्तु नेवेह प्रमाणान्तरतेष्यते ॥ ध्यतिरेकव्याप्तिबुद्धयाचरितार्थाहिसायतः॥१४॥ रो.अव मीमांसक और वेदान्तियोंकी मानी भर्थापत्ति की न्याय में प्रमाणान्तरता का सपडन फरते पर्थापतैरिति'न्यायमें সথানি সনাৎ লম্বা কিন্তু হয়নি প্রয়াছিন उसकी गतार्थता नाम अन्तर्भाव जैसे मोटा या देवदत्त दिन में नहीं पाता ऐमा देखने पयवा सुनने पर दिन को न खाने पाले का राविक भोजन विना मोटा पन हो नहीं सकता इस जान के पनगर देवदत्त राविको पश्य खाता है यह निर्णय होता इस निर्णय साधम (रात्रिभोजन के बिना मोटापन न रोमा स्या कारक्ष मान) पर्यापत्ति प्रमाण माना है और रात्रिभोजन को मिरिकन स्वरूप पर्यापत्तिय माप पोर प्रमाको (१) पपारामानमोपादककरपनमोपनि: 'यरिमायदनुप पत्नं तातोपपादकम् रतिराविभौषममपपाद योगत्वमुपपा. एम् । पर्यायापति: कम्पना ' रतियुत्पतिफसपरा, करताप स्वाति: यायातिथ्युत्पत्तिद्रष्टया पर मोमामामाममाय: पापयामि,पापयामि,रतिविषयानुमाहिम्मेवानमितिताति 4 एकही संज्ञा जैसे प्रत्यक्ष ही प्रमाण पोर प्रमाकी भी संभार घो यह रात्रि भोजन मिहि तो व्यतिरेको हेतु सेही होसकती है जैसे भयं देवदत्तो.राची भुडहो, दिवाभुजानत्येसति पीनत्वात् यस्तु रात्री नमुड्तो सदिवाऽभुजानत्वे सति पीनी नभवति, यया दिवा रात्री चाभीजी, इति अर्थ यह देवदत्त रात्रिको खाता है दिनको म खाकर मोटा होने से जो रात्रिको नहीं पाता धा दिन को न खाकर मोटा भी नहीं होता जैसे दिन और रात्रिको न खाने वाला यहां पर देवदत्त पक्ष रानिको साना साध्य है दिन को न खाकर मोटा होना हेतु है और दोनों ममय न रमाने वाला दृष्टान्त है इस तरह जब व्यतिरेकी हेतु से ही रात्रिभोजन सिह होगा तो पर्यापत्ति भी व्यतिरेकी काही दूसरा नाम है पथक प्रमाण नही है ॥ १४४ ॥ 'सुखतु जगतामेव काम्यं धर्मेणजन्यते ॥ टी.---दुषिका कार्य होनेसे दधि के पनन्तर सुख कानिरूपण करते हैं 'सुसमिति' यावज्जीवों को इश के विषय तथा गङ्गा (१) इतरेच्शनधीनेच्छाविषयत्पतिभावत्वंसुखस्य लक्षणम् अखेच्शधीनभोजनादावतिभ्यारितारपायतरेशानधीनेतीच्या विशेषग्यम् । दुःखामावस्यकाम्यत्वेऽपिस्वतापुरुषार्थत्वेऽपिच तस्य भावस्थाभाधान्नत पातिव्याप्तिरिति । वेदान्तिमने च सुखं हि- विधम,नित्य जन्यं च । तत्रनित्यं ब्रह्मस्वरूपमुखमजन्यम्(भनित्यं) विषयसंपर्काद्वषयिकसमिति। पातम्जलास्तु-वैषियकसलामा परिणामदुःयादिभिर्दु सत्यमेवैराग्यार्थमन्यन्तेतया च सूचम् परि पामतापमस्कारदः खेगुणवत्तिविरोधाच्च दुःखमेसर्वविवेकिमाति (पास.पा. २ म. १५) (i) स्नान, तीर्घयाचा, यज्ञ, तपस्या आदि तम कांके व्यापार में जो उत्पन्न हो, ऐसे पदार्थ को सुख कहते हैं वह सुखन्यायमत में चार प्रकार का वैषयिक, धाभिमानिक, मानोरथिक, पौर पाभ्यासिक प्रथम विषयके प्रत्यक्ष से उत्पन्न हितीय राज्यादि के पधिकार जनित गर्व से उत्पन्न तृतीय विषयक चिन्तन जन्य और शार्थ सूर्य नमस्कारायासादि लन्य लाघव रूप होता (सं.) गौतम दर्शन में सूत्र में एक्स पठित नहीं है फिर पाप पयाँ लिखते २।(उ०) गोतम सूत्र में सुरतो ग गणन का यह प्रयोजन कि वैराग्य हो अर्थात् मुखको भी दुःखरूप से चिन्तन करने से पुरुष को वैराग्य होगा ना शिसुख के घावी कार में तात्पर्य है जो लोग दुःखाभाव मात्र को हो मुखमानते हैं उनके मतमें पानन्द पता से जो अनुभव २ मी एषा चाहिये तथा मै हितको प्राप्त पारूंगा पौर पहित को त्यागंगा इस प्रकार को दिविध प्रति भी नही होनी चाहिये । कई लोग सुख और दुःख को भी जाम का ही भेद मानते हैं परन्तु यह ठीक नहीं क्योंकि ऐमा मानने से अनुभव विरोध दर्वारहोगा यथा मे मुखी ९ वा दाखी इस अनुभव से में जानता ई यह अनुभव विरुव है। वह सुख पात्मधर्म है या नया. पिक मिशान्त है। चित्तधर्म मु यह माय करते हैं। यदि मुख पात्मामे मानोगे तो धर्म (मुख) वि शय प्रयुमा पारमा विकार प्राप्त होगा (उ० धर्म (मुख) गत अनित्यत्वादि मे नित्य सप पात्मा को सनिकुछ नहों से मानो इति ॥ अधर्मजन्यं दःखस्यात्प्रतिकूलंमचेतसाम् १४५ रतरटेपानधानपरिषयत्वदुःखायमपणम् । परमपोदापति ध्यालिदापाय,सरस्पान धोनेतिपवियपपदतम् । नेम, म वह - टी.-प्रय सुखका प्रतिनिध होने से सुखके अन्सर दुःख या निरूपण करते हैं 'अधर्मजन्यमिति' जो अधर्म (पाप) में उत्पन्न हो और किसी पुरुषादि के चित्त को भी अच्छानप्रतीत से उसे दुःश्च कारते हैं दुःख और मुखके परस्पर भेदको प्रशस्त पादाचार्य भादिकों ने कार्य भेद से दिखलाया है जैसे दीनता मुखमालिन्य पादि दुःख काय्य है और मुख प्रमादादि मुख कार्य हैं दुःख भी पात्मा का गुणहै और साक्ष्य में रजोगुण का कार्य बुद्धि का ही परिणाम विशेष दुःख माना है साख्य में दुःखके तीन भेद माने हैं। यथा-१ पाध्यात्मिक, आधिदैविक, पौर ३ प्राधिभौतिक पौर म्याय मतमें सुख को न्या. दुःख भी चार प्रकार माना है इस दुःख के कई एकचोक सिड कविकल्पलता ग्रन्थ में कारण भी दिग्बताए सयाहि । १परतन्त्रता,-पाधि,(मानसिक चिन्ता,व्याधि,(वातपित्त श्लेष्मजनितरोग) मानच्युति,शत्रु कुभार्या निर्धनता, कुग्रामवास, कुश्वामिमेवा,वकन्या,बुढ़ापा दमरे के घर में निवास दोभार्या दुष्ट भृत्य इत्यादि । मुख और दुःख दोनों ही सिद्धान्तमें अनित्य के कई नित्य भी मानकर उसी की प्राप्ति की ही मोक्ष मानते परन्त दुःस्म किसी के भी मत में नित्य नहीं है ॥ १४५ ॥ निर्दुःखत्वे सुखेचेच्छातज्ज्ञानादेवजायते । १इच्छातु तदुपायेस्यादिप्टोपायवधीर्यदि ॥१४॥ टो०-प्रय इच्छा का निरूपन करते हैं। निदुखत्व रति दयाभाव तथा मुष की अपेक्षा वा कामना (चाह) को पा घस्यसर्पजन्यदुःखोपजन्यत्वात् नातिव्याप्तिः। वाधनासह पंवा ।०१।१।२१) वाधनापीडातदेवलक्षणस्वरूपंयस्यतदित्यर्थः (गो.१.११२१) १ इमाम सामान्यती, घr! (गौ.

(१६) करते दोनों के उपाय में यदि जीवको इष्ट साधनस्वमकारका जान होय सो उपाय विषियणो इच्श होती है अर्थात् इच्श दो प्रकारको फल विषियणी द्वितीय उपाय विवियपी मुख्य फन भी दो भेदके प्रथम मुख और हितोय दुःस का प्रभाव फसकी इश में फल का ज्ञान ही कारण है बम मे इष्ट साधनता मान की आवश्यकता नही है क्योंकि मुख हो तो अन्तिम फल है रसी लिये मुख ज्ञानमात्र मे ही सुखकी इच्छा उत्पन्न होजाती है और उपायेच्छाके प्रतितो इष्ट साधनता भान अर्थात् यह वस्तु मेरे मुखका साधन है ऐसे मान होनेसे उस अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति की इच्छा होती यथा स्वर्ग स्वरूप फल का उपाय याग है तो याग शिपियपी रछा के प्रति यागो मदिष्ट साधनम् ' अर्थ-याग मेरे रस्ट (स्वर्गात्मक फल्न) का साधन है साख्य में तो इसे भी चित्तका धर्म माना है और नित्य और भनित्य भेदमे फिर इच्छा दो प्रकार की उस में जोवकी तो भनित्येच्छाई और शिवर की नित्य तथा "सर्व लगद्यात्" इस प्रकार से समूहालम्वनामिका है और मायावादियों के मतमे तो ईश्वरेच्छाभी पाकामादिको नार पनित्य काम अमिलाप, राग, मंशल्प उपधा (परवचन श) कारुपय अपने प्रयोजनको अपेक्षा छोड़ कर दूसरेके दुःखदूर करने एला) भाव पादि क्रिया के भेद सभी रश के दो भेद ॥ १४॥ चिकीर्षा कृतिसाध्यत्वप्रकारेच्छाचयामभवेत् ॥ तहेतुः कृतिसाध्यष्टसाधनत्तमतिर्भवेत् ॥१७॥ टी-किसी काम करने को रक्षा को चिकीपी कार सिमाध्या पर कारिका সামিয়াবিদ্বিঘা विकीर्ण । यथा-' पात्यासाधयामि' त्याकारिकला।

अर्थात् जतिसाव्यस्य प्रकारक इच्छा का मान विकोपा रेस चिकीर्षा के दो कारण है एक तो यह कि कति साध्यत्व प्रकारक भान (पर्यात् इस काम को में अच्छी तरह करसकता ई) रस अपनी सामर्थ्य का जानना और दूसरा इष्ट माधनत्य धान अर्यात इस काम के करने से मेरा यह प्रयोजन विषयोगा) रस प्रयोजन मिति का जानना । और यह भी जानना कि यह दोनों भान केवल चिकीर्षा के कारण नहीं, प्रत्युत कार्यमा के कारण माने है और पानी को मोटे से मारने की समायं मनुष्य में भी है, तो भी भले पुरुप इस काम को नहीं करते, इस में यही रेतु है, किपानी को मोटे से मारने से कछ प्रयोजन नहीं मिह शेता तो मानो इष्ट साधनता नान नहीं रहा। इसी प्रकार स्वर्ण पर्वत के एक गिखर उठा लाने में प्रयोजन सिदिका ज्ञान है भी, महात्मा कोई भी इस काम को नहीं चाहता तो इसमें यही कारण उसमें गिजातक पहुंचने को मामर्थ्य किसी में नहीं,अर्थात् सति साध्यता भान नहीं रहा इस से सिद्ध हुभा कि दोनों जान जिममें होडमी को चिकोर्षा होती है जैसे अन्न प्रादि के खाने प्रादि में॥ वलवद्विष्टहेतुत्वमति स्यात्प्रनिन्धिका । तदहेतुत्वबुद्धेस्त हेतुत्वं कस्यचिन्मते ॥ १८ ॥ टी.-प्रबलप विषयक दुःखादि साधनसा जान "इद में महदु ग्व माधनम् 'त्याकारक जान पर्यो चिशोपी का प्रतिक्ष. न्धक पर्थात् पूर्वील दोना कारण रहें मी. और यदि ऐसा नाम साथ पड़ जाये,शि इस काम करने से मुझे कोई बड़ा भारोदुःख प्राप्त होगा तो कभी उम काम को नहीं करेगा। जैसे विष मधु युद्ध किसो पश्प को चिकोपी नहीं होतो पौर शिमो, . पन्न के खाने ( १) एक पिडामा के सिहालत में (तलवालपदनिष्ट के पजनक विषय भानको उता चिकीर्षा के प्रतिकारपता मानोरे ॥१४॥ । द्विष्टसाधनताबुद्धिर्भवेदद्वेषस्यकारणम् । टोप का निरूपण करते हैं। शिष्टेत्यादि से षिके विषय दुःखादि साधन विषयक ज्ञान हेप का निमित्त कारण है, अब कोई पदार्थ वा जीव प्रपने शोटु रख देता है,तो उस पर जो कोध होता है और फिर उम क्रोध से जो पुच्छा होती है कि इस का नाय करदें। उस का कमी पारस मे न देख माधव हेप कहते है ॥ प्रवृत्ति व निवृत्तिश्च तथाजीवनकारणम् ॥१९॥ एवं प्रयत्नविध्यं तान्त्रिकै परिदर्शितम । टो.-पथ प्रयत्न का निरूपण करत है। "uarरिति" प्रयम (उस्माइ) तीन प्रकार का से (२ महत्ति, नित्ति और जीवनयोनि इस भेद से मात्रकारों ने निरूपप किया है।४या चिकीकृतिसाध्यष्ट साधनयमतिस्तथा॥१५॥ उपादानस्यचाध्यक्ष प्रवृत्तौ जनकं भवेत् ॥ टो.-पोर कार्य करने का नया कतिमाभ्यस्व ग्राम सया कार्य की कारण सामग्री या प्रत्यच, ये सर्व पति स्वरूप याम के कारण।.. T १ प्रस्यायन्यतमत्व प्रयत्नत्वम्। तप प्रतियोधिपरोरारम्म इति । (गो. मनोनयरिप्स्यिभिमेतमा वायनेन तियुरियातिप्रत्येक दविधा पुण्याप पापापा पुए,कायेन परिचायम परिवरपम्, दानमिति । पापा मत्यम, इतम.मियम,भ्यायाति। मनमादया, मानित विर्ययप पापादशिक्षा प्रतिस्प्रत्युपधार - सांसिद्धिकं 'द्रवत्वंस्यान्नैमित्तिकमयापरम्।१५४॥ टो.-भाद्रपाका निरूपण करते 'मासिदिसमिति' विस गुपवे सबह होता है या जिस गुण के संबन्ध से सखी स्यारो पादिवाने लगती है, उस गुणको द्रवस्य करते हैं वह द्रवस्य मालिक्षिक तथा नैमित्तिक भेट्स दो प्रकार का ॥ १५४ ॥ सौसिद्धिनु सलिले द्वितोयं क्षितितेजसोमा 'परमाणाजल नित्यमन्यत्रानित्य भिव्यते ॥१५५॥ टी०-उसमें मासिदिना (अर्थात् पाप से भाप बिना किसी उपाय पो प्रग्ने समायि कारण में उपजा भा),केवल जल म होसार, पोरक्षितीय नैमित्तिक पृथिवी और तेल में रहतार वा दवाव परमाणु सरूप जल में नित्य है परन्तु और सस्थागों में पसिस्य (हिमोर मारकामें तो कठिनता का दर्शन होता है सोफिर जस में सामिडिक करना यलमही। (१०) उपस्थत में स्वाभाविक द्रवस्य नसमें देखने में पाता रम शिये मासिधिक का तो निश्पर हो परन्तु हिमकरकाम्या प कार्य में द्रव नहोप्टोसाई पत: वर्धा पर ऐसा नाममा पारिय किदिय (विद्युत) सेनमे मंपा जल के परमाणुगों का द्रस्यापER मघात नामक मंयोग परस्पर उत्पन्न होजातासी मे जस का द्रवत्य प्रतिया होजाता रे पत एव फिर भूमि तेज सेविसरवाने सगता नैमित्ति पन्हियोगात्तपनीय घृतादिषु ।। पापापदनामविकारपसपाही नोवारिभ्यापामगारवा पायनियमावरिषरम् ।। .

द्रवलं स्पन्दने हेतुनिमित्तं संग्रहेतुतत् ॥१५६॥ टो-नैमित्तिक द्रवत्व अग्नि संयोग से तपे हुए धृतादिको में प्रतीत होता है वह द्रवत्व स्यन्दन में रेतु है प्रर्धात् निमित्त कारण है और चर्यादिक पपडी भाववही दूपत्व निमित्त कारण है भाव यह है कि किसी निमित्त से उपजा हुभा द्वयत्व नैमित्तिका कहातारे जैसा कि चादी, स्वर्ण, ताख प्रादि वस्तुओं में प्राग्न के सबन्ध से और सुहागा आदि डालने से जो दवाव उत्पन्न होता है उसकी उत्पत्ति में प्राग, और सुहागा आदि निमित्त हैं इसी से उसको नैमित्तिक ट्रेवत्व कहते हैं ॥ १५६ ॥ स्नेहोजले सनित्योऽणावनित्योऽवयविन्यसौ॥ तैलान्तरे तत्प्रकर्षांहहनस्यानुकूलता ॥ १५७ ।। टी.. •-पब स्नेहका निरूपण करते हैं 'स्नेहाति। चिकनाई को स्मेन काइते यह गुण केवल जलमें रहताहै यह भी सूखी वस्तु के पिंडयांधने में असमायि कारण परन्तु जलके परमाणों में स्नेह नित्य ई और क य म रहने वाला सभी अनित्य (4) पृथिवीमें पर्यात् तेल स्वरूप पृथियो में जो स्नेह प्रतीत होता और यह जलका नहीं होसकता अन्यथा वन्धि के प्रति कस्ल होता पत: जलमें हो स्मेह है यह कथन अयुक्त है (3.) "तेलान्तर" अर्थात् (१) स्नेहंद्रवत्व-कारित: संयोगविशेषः (पिण्डीभाव:) सहि (मंप्रह) न द्रवस्वमात्रकारितः; काप-काम्चनद्रवत्वेन संग्रानु पप: । नापिस्नेहमात्रकारितः, रत्यनिवृतादिभिः संमहानुपपत्तः। तामातग्नेश-दवाय-फारिस', इति । वैशेषिकोपस्कार ॥ (२) पूर्णादिपिएडोमावरेतुर्गणः स्नः ।। है .

F
।
तेसमें भी जमा हो मे पान्तु लमें उसको कष्टता र
इसलिय मागका विपेगे नहीं पागका विरोधी केवल पक्षष्ट
ने प्रतः पागको हानि भी नहीं होती ।। १५७॥
संस्कारभेदोवेगोऽय स्थितिस्थापकंभावने ॥
मूर्तमात्रेतुवेग स्पारकर्मजोवेगजः क्वचित् ।१५८॥
टी.-संस्कारमा निरुपण करते हैं। संस्कार भेद पति'
संस्कार के तीन भेद वेग, यतिस्थापक तथा भावना उनमें
पेग नामी संकार मती मे प्रर्यात पृथ्वी, जल, तेज, वाय, मोर
मन इस पांचो द्रव्यों में ही रहता है, और यह किसी यसमें
तिभा से और कही येग से उत्पन्न होता , पोंग वेग मित्य
कहोनहीं होता ॥ १५८ ।।
स्थितिस्थापकसंस्कारःक्षितोकेचिच्चतुर्वपि ।।
अतीन्द्रियोसोविज्ञेयःकचित्स्पन्देऽपिकारणम्।१५९)
टी.-स्थिति स्थापक संस्कार मित्रान्त में तो पथिवी मेंरी
মা বা অনিয়া হি অ ফিী দাঙ্গী মান্ধী
संघ के अपनी पौर जाने और फिर छोड़ देता दामोजा
ठारगी कि परिने पो थो. तो जी गुप एम माता को मन
स्थान माशा मी प्रथम स्थानपर संत्रा ठागतासे
निघतस्याश मार पीर का पाचार्य बात जि.
यापति ग्याप माचार रयि प्रस, सेनवायुमचारों में
1) गम्यतमा मांसारम् । तदहमा "यजानीयामम
स्पायमांतीयाहारनार्ययारिजातीय: मेवारामा
भोलि (शादियापारग)॥

.. रसतारे यह स्थिति-स्यापक पतीन्दिय और किसी स्थल में स्पन्द रूप किया का भी कारण ॥१८॥ 'भावनाख्यस्तु संस्कारोजीववृत्तिरतीन्द्रियः ॥ उपेक्षानात्मकस्तस्यनिश्चयःकारणंभवेत्॥१६०॥ टी०-इसी तरह भावना नामो संस्कार जीव मात्र में रहता पौर प्रतीन्द्रिय है अर्थात् इसका किमी इन्द्रिय प्राग प्रण नहीं होता उपेक्षा अनात्मक निश्चय अर्थात् वस्तका दृट अनमय उस सरकार का कारणीभत है यह संस्कार पनि होता और किमी घड़े रोग (मिर्गी) अादि मे वा बहुप्त काल से था सारे प्रयोजन की सिद्धि से यह नष्ट होजाता है ॥ १६ ॥ • स्मरणे प्रत्यभिज्ञायामप्यसौहेतरुच्यते ॥ टी.--प्रब संस्कार होने में प्रमाण दिखलाते ।।माण इति, स्मरणात्मक ज्ञान में तथा प्रत्यभिन्ना धान में श्रमी' अर्थात संस्कार कारण है यहां पर या तात्पर्य है कि कोई मनप्य हरिकार प्रादि में तीर्थ यात्रा करने गया, वहा उसने किमी महात्मा के साथ मिचता बनाई फिर वह यात्रा करके अपने गृहको चला पाया। दश वर्ष व्यतीत हो कि देवाधीन बह महात्मा इस मायण के नगर में आया उसे देखते ही इस पाप को घाम पानन्द हुआ; पौर उसी समय गङ्गा के नील धारा पादि सभी स्थान तथा उस मामा के रहने का स्थान इन सब का स्मरण सुपा, इस स्मरण का कारण भावनापय संस्कार और चार प्रकार के पनभवों मेंसे किप्ती भी प्रकार का मन व जिम पदार्थ १ अनुभवजन्यत्वेतिरपतिजनकत्वमावास्यमस्कारस्य १ मान, और भोग से भी नष्ट होते (०)भगवडीता में ऐसा कथन किया है कि "नामुक्त क्षीयते कर्म कल्प कोटि तैरपि" पर्थात् कमी,का नाश भोग के बिना कभी भी नहीं होता तो फिर ज्ञान से कर्मनाथ केसे कहा (उ०) इस वाक्य में भोग पद से धान की भी धाक्षेप कर लेना यदि ऐसा न हो तो प्रायश्चित्त से कर्मनाय कैसे होता और गीता में स्वयं श्री कृष्णचन्द,कहते हैं "शाना निःसर्व कर्माणि भरमसात् कुरुते ऽर्जन । भौर श्रुति(४)भी कहती "चीयन्ते चास्य फर्माणि तस्मिन् दृष्टं परावरे" इस लिये रन वावों के साथ विरोध पड़ने से ध्यवस्था से प्रारब्ध कर्म की तो भोग से नित्ति होती है परन्तु सञ्चित कर्मों का तो भान नाप होता है इस में विवाद नहीं है। पशब्दोध्वनिश्चवर्णश्चमृदादिभवोध्वनिः॥१६॥ कण्ठ संयोगादिजन्या वर्णास्तेकादयो मताः!' सर्व शब्दोनभोवृत्तिः श्रोत्रोत्पन्नस्तुगृह्यते ॥१६॥ टो--- -~-अव सब्द का निरूपण करते हैं।'गग्दो ध्वनिरति गम्द दो प्रकार का एक पनि स्वरूप और टूमरा ( क ) वर्गात्मक पर्यात् संकटात भाषा स्वरुप जो मदह, बंसी, मितार, चंदन पादि में उत्पन्न उमे पनि करते॥१५४॥ (४) यमपीहानुमन्धेया " मुद्दा घाधुतल्या हिपता पापनत्या मिति" १ बोकेन्द्रियपात् मति गुपत्वं मम्दग्य सपषम् । (ब) पायं ध्रपति:. 'शायभायं त्यभिधीयसे माप्त (पारस्या..।।)

( १४७ ) ' टोका-और कंठ तालु भादि स्थानों में वायु कै संयोग से जो' पक्षर उत्पन्न होते हैं, उन्हें वर्ण कहते हैं वे वर्ण'क'ख'पादि भेदसे अमेक सर्व प्रकार का शब्द समवाय संबन्ध से केवल 'आकामही में रहताहै (सं.) दूरवर्ती गदका प्रत्यक्ष क्यों नहीं होता 1 (3.). 'श्रोत्रोत्पन्नस्तु' मृदन भादि के अवच्छेद से उत्पन्न हुमा शब्द' योध में उत्पन्न हुमार हो प्रत्यक्ष होता है अन्यथा नहीं (पं०) मृदङ्गावच्छिन्न आकाश में उत्पन्न हा शब्द थोत्राकाश में कैसे उत्पन्न होगा (उ०) जिस प्रकार योग में उत्पन्न होता रे उसका प्रकार स्वयं मूलकारही 'वीचीति' मुल से कहते हैं ।१६५।। वीचीतरङ्गन्यायेन तदुत्पत्तिस्तुकीर्तिता ।। टी.-बीचो तर न्याय से (तत्) इस शब्द को थोत्राकाए में उत्पत्ति कही है। भाव यह है कि कैसे जल में कोई टला गिरे तो पहिले छोटा सा गोल इत्त बन जाता है फिर भीघही यह छोटा हत्त नष्ट हो जाता है, और एक बड़ा इत्त बन जाता है इसी प्रकार छोटे २ मिट कर बड़े से बडे इत्त तव तक उत्पन्न होते जाते हैं जब तक इतना बडा हत्त उत्पन्न हो लेवे, कि नो उस जलायय के तटों से जा टकरे । इसी को वीचीतरंग न्याय कहते (छ) पत्र वैयाकरणा पाए:-'परा, पश्यन्ती, मध्यमा' वैपुरीति चत्वारिवाचःपदानि । एवं एकवनादात्मिकायाकलाधारा अदि तासती 'परा' इत्युध्यते । सैवदयाभिगामिनी 'पश्यन्ती' इत्युच्यते। सेव बुद्धिं गता विवक्षा प्राप्ता 'मध्यमा' इत्यच्यते । अथ यदा सेववतो स्थिता तात्योष्ठादि व्यापारणवधिनिंगति सदा वैखरी' इत्युच्यते । तथाच श्रुतिः। 'गुहात्रीणि निहिताने यनित 'तुरीयं वापी मनुष्या वदन्ति" इति। (ऋग घेदः ) .

न (1 १४८), सी प्रकार तोप पादि में पहिले जब अग्नि आदि की क्रिया में अभिघात होता है तो एक शब्द उत्पन्न होता है:- और उससे बड़ा शब्द एक उत्पन्न होता है, दूसरे पण में या शब्द स्थितहोता है,पौर उससे बड़ा एक माद उत्पन्न होता है तोसरे क्षणमें प्रथम शब्द नष्ट हो जाता है पार दसरा शब्द स्थित होता और दूसरे से बड़ा तीसरा शब्द उत्पन्न होता है। इसी रीतिसे बड़े से बड़े शध्द तब तक उत्पन्न होते जाते हैं, कि जहा तक उस अभिघात की शक्ति होती है और यह भी सम- झनाकि यह शब्द का तरग जिस क्रमसे जिम २ पुरुष के कानतक पहुंचता है उसी क्रम से उन २ पुरुषों को प्रत्यक्ष होता है अर्थात् जिस स्थान पर शब्द उत्पन्न होता है उसस्थान के जो समीप हो. उन्हें दूरपालेको अपेक्षा पूर्व वह शब्द सुनाई देगा, और समीप वाले की अपेक्षा पीछे से दूर घाला असे सुनेगा इस विचार से सिध हुमा,कि पहिला पद दूसरे शब्द का कारण है, और दूसरा शब्द पहिले शब्द के नायका कारण है, परन्तु सब से निकला सद पपने समीप रहने वाले पहिले सम्द का नाम करता है, और घर पहिला (उपान्त्य) गब्द अन्तिम शब्द का नाश करता है। इसे 'मुन्दीप सुन्दन्याय ' भी शास्त्रकार कथन करने २ पर्थात् सुन्द पोर उपमुन्द दोनों भाई थे, दोनों ने एक दूसरे पर ऐमी तरवार घसा, कि दोनों एक समय में ही मरगए और सास में भी प्राय: गब्द की उत्पत्ति में यही क्रम पाहत जब पाय पर प्रकार होता है तो पाय इस प्रहार को चुपचाप नहीं मारता. किन्तु वा भी पपने पास पाम के वायु पर उमी ना मार करता है भार फिर या वायु पपने याम के वाय पर यो पहुंचते पहुंचते वा प्रहार जो वाय पर एपाचा बहुत दर - - (182.) तब चला जाता है। अन्तको यह प्रहार हमारे तुम्हारे कानों तक पहुंचता है यह महार हमारे कानके पड़दे पर इतने वेगसे नहीं लगता कि हम नीचे गिरपड़े और इसी लिये हम इसको महार नहीं कहते किन्तु यह कहते हैं कि हमारे कानों में शब्द पाया रे अर्थात् हम शब्द सुनते हैं। साइंस मे अन्द के वायु में चलने को रीति । पहिले जब मील या दो मोल पर कोई तोप चलाई जायतो यह न समझना चाहिये कि वही परमाणु तोप से तुम्हारे कानोंतक चले आते हैं। तोपके यासके परमाणु अपने पासो परमाणुषों को प्रहार करके ठहर जायगे और जिन परमा- णुओं को प्रहार हुआ है वह भी अपने पाम्रके परमाणु पर प्रहार पहुंचाकर ठहर नायगे और इसी प्रकार होता रहेगा यहां तक कि पह प्रहार तुम्हारे कानों तक पहुंचेगा। जैसाकि कुछ लचकदार गोले लो इनको भिन्न भिन्न डोरों स एक श्रेणि में इस प्रकार लटका कि वह एक दूसरे से केवल स्पर्शात्र करें। अव पहिले गोले को उसी मीध में कुछ दूर पीछे हटाकर छोड़ दो कि दूसरे गोले को प्रहार करे। भव बघा होगा ? पहिला गोला दूसरे को प्रहार करके ठहर जायगा । दुसरा बहुत गीघ्र तीसरे को प्रहार पहुंचा कर उसो तहर ठहर आयगा तीसरा भी इसी तरह करेगा, यहां तक कि वह महार सब से पिछले गोले तक पहुंचेगा । इस के परे और कोई गोला नहीं इसलिये यह गति करेगा। अब पहिला गोला पायुके उन परमाणुपों के सहय नो तोपके निरंतर पास है, और सबसे पिछला गोला पायुके उनपरमाणुओं के सदृश है जो तुम्हारे यानके निरंतर पास अब तुम जानगए हो कि जो प्रशार तोप के गया, ३ (१५) पास वायुपर डुआ था बहकान के पास वाय तक किस प्रकारपहुंच और इस बात की आवश्यकता नहीं कि एक ही परमाणु। चल कर इतने दूरतक श्रावे ।। कदम्व गोलकन्यायादुत्पत्तिः कस्यनिन्मते॥१६६। टी.--किसी के मत में शब्द की उत्पत्ति कदम्घ गोलक न्याय से मानी है अर्थात जैसे कदम्ब पुष्प के सर्व अवयवों में एक समय में ही कोरकों की उत्पत्ति होतो इसी प्रकार शब्द में भी समझना चाहिये अर्थात् हितीय प्रादि शब्द न तो एक ही होता है और नं दश दिपायों में व्याप्त ही होता है किंतु दाही. दिशाओं में हितोय आदि शब्द दशही उत्पन्न होते हैं इस प्रकार में गौरव पड़ने से कहा कि कस्यचिन्मते' भाव यह है कि अनन्त भब्दी की कल्पना करने में गौरव होता पत' यह पक्ष ठीक नहीं है ॥१६॥ उत्पन्नः को विनष्टः कइति बुद्धे रनित्यतामा टीका-अव शब्द प्रतिज्ञात उत्पत्तिके समर्थन पूर्वक मीमा. सकोंके मतका मूल कार ग्नुपडन आप दिखलाते हैं उत्पन्न इति' फपठताल प्रादि के अभिघात में शब्द की उत्पत्ति होने से उत्पन्न १ अनगन्दव्यजकवायुरेवोत्पद्यते,नतुगम्दउत्पासे, अन्यथा प्रत्यभिज्ञानस्यात् तिमीमासकानांप्रदयम् । 'प्रयत्नेनगन्दमुच्चा. रयतापुंमोवायभिकत्यितः,उरसिविस्तीर्णः, फपठेविवर्तिमर्धानमा- प्रत्यपराहतोवविधान्नानाविधानशदानभिध्यानति' तिमीमांस कसिमान्तः ।। मानाविधान् पादाम मिष्पादयति' रतितार्किकाः ।।

हुपा यह प्रतीति तथा उस के अनन्तर शीघ्र ही क' नष्ट हुभा ऐसी प्रतीति होने से सिद्ध हुआ के शब्द (१) अनित्य है। मीमांसको के मत में शब्द नित्य माना है तथा व्य माना है दोनों पक्षो में अर्थात शब्द के नित्यत्व तथा शब्द,के द्रव्यत्वमें थे येर अनुमान प्रमाण दिखलातेहै यथा-'शब्दोनित्यो ध्योम मात्र गुणत्वात्, व्योमपरिमाणवत, अर्थ-गब्द नित्य है जिस मे केवल आकाश का हो गुण है' आकाश मात्र के गुण पाकायकेपरम महत्व परिमाणकी न्याई । परन्तुइतना इम स्थान में अवश्य जानना कि यह अनुमान प्रभाकर मोमासक के मत से है जो कि शब्दको द्रव्य नहीं मानता द्रव्य मानने वाले भर के मतसे अनुमान पकार तो यह है कि जैसे:- गन्दो नित्या,निःस्पर्ण द्रव्यत्वात् पात्मवत्। अर्थ भब्दनित्य है स्पर्श रहित ट्रव्य होनेसे आत्मा की न्याई । अब अब्दकी दव्यत्व को सिवि में मामकों का अनुमान दिखाते हैं यथा-श्रोच द्रव्य ग्राहक निरवयवेन्द्रियत्वात,मनोवत् । अर्थ योच इन्द्रिय द्रव्य का ग्रहण करने वाला है जिससे यह निरवयव इन्द्रिय इमनको न्याई परन्तु नैयायिक इसका मुण्डन इस प्रकार से करते हैं। शम्दो न द्रव्य एकमात्राथितत्वात् । अर्थ -गब्द द्रव्यनहीं हो सकता व कि यह एक प्रधिकरण प्रकाश में ही रहता और कोई भी द्रव्य एक में ही रहने वाला नहीं दृष्ट होता। (सदस्यानित्यत्वेप्रमाणमनुमानम् । तच्च,'शम्दोऽनित्य'सा मान्यवत्वमतिवहि रिन्द्रियजन्यलौकिक प्रत्यक्षविषयत्वात्, घटवत (गौतम सत्र हत्ती २।२।१) तया च मूत्रम्-"पादिमत्वादेन्द्रिय कत्वाकतावदपचाराच्च" इति । (गौ० ३।२।१४)।

(१२) (स.)सद(नित्याप वादी कथन करते हैं कि यहहीककार जो मैंने करह को सुना था इत्यादि प्रत्यभिज्ञा से शब्द स्थायि पदार्य(नित्य)सिद्ध होता तो फिर अनित्यकथन भयुक्त है। इसका धमाधान मूलकार स्वयं "सोऽयंक"इत्यादि अन्यसे करते हैं। सोऽयंकइतिबुद्धिस्तुसाजात्यमवलम्वतो।१६७॥ टो-गब्द सर्वाही अनित्य है नित्य कदाचित् भी (२)नहीं भोसकता और नो पापने 'सोऽयंकः' प्रत्यभिन्ना शब्द नित्यत्व में दिखलाई है उस मे भी पूर्वकालीनककार सादृश्य भासतारे पन्यथा सोऽयं घट" वही यह घट है इस प्रत्यभिन्ना में भी पभेद की हो तुल्य न्याय से प्रतीति की आवश्यकता होने से घर को भी नित्यता माननी पड़ेगो तात्पर्य यह कि पत्र पर लिखा देषकर यदि कहा जाय, कि यह वही, ककार अक्षर तो वहां उसे गाद नहीं जानना चाहिये जिसमे कि गन्द कनेन्द्रिय मे तो पहण कदापि नहीं होता किन्तु उमे गम्द के मरण कराने वासा स्याहो मे बना हुमा,पार्थिव पदार्थ जानना चाहिये । और यदि कहें कि यह पट्टी पधर मना जो पहिले दिन मुनाथा, तो यहां भी पदो पर नहीं किन्तु पहिले दिन जो भवर मनाया, इसमें जोजाति यो म प्रक्षर में कही जाति ॥ १५॥ तदेवोषध मित्यादो सजातीयेऽपि दर्शनात् ॥ तस्मादनित्या एवेति वर्णाः समतं हिनः॥१६॥ रो.-पूर्व पदी मष्य करता है कि 'मोऽयं स्याकारक मत्यभित्रा में मारय पर्यातरजातीयत्व में शिधयत में मतीत निम से पूर्ण समाधान तुमारा ययाचं प्रतीत से। इसका उत्तर करते हैं 'देवोषध मिति "सदेवोषध-मर्थात् यह पहो भौषध" इत्यादि स्थानों में सजातीय पदार्थो में भी प्र. त्यभिज्ञा देखने में पाती है यह तात्पर्य है जैसा कि किसो एक परुप ने अपने रोग दूर करने क लिये औषध खाया, कई एक दिन बीत चुके तो उसे औषध खासे देख कर किसी ने पृश, पाप क्या खाते हैं यह सुनकर इस न उार दिया, कि में वही भौषध पाताईनो उस दिन श्राप के सामने खाई थी, यह सुनकर उसने सोचा,कि वह पौषध तो इसने मेर सामन ही उस दिन वाली थी, पान फिर वही औषध इस के पास कैसे पागई कि यह उसेहोखा रहा है। और मेरे साथ यह मनुष्य झठ भो कभी नहोंबोलाकिंतु उस दिन जो औषध इसने खाया था,उसका सजातीय अर्थात् साथ का पौषधहै। इस रीतिसे शब्द में सजातीयकाबोधजानना चाहिये इस न्तिये सघ को वर्ण अनित्य हो है यह हमारा (नयायिकों का)मत ८८॥ इतिगम् ।। नमाऽस्तुपरमाय । नमस्तुमहरुभ्यः ॥ ॥इतिका कावलीरहस्यप्रकाश गुणनिरूपणम् ॥ श्री सनातनधर्मोपदेशक काश्यधीत दर्शनविद्य चन्द्रपुर (चिनयोट) वास्तव्य गोस्वामिवयं पण्डित लक्ष्मणदत्त सूनु लवपुरीय विश्व विद्यालय (ओरियन्टल कालेज) अ- ध्यापक पं० गणेशदत्त शास्त्रि कृतो रहस्य प्रकाश व्याख्या सहिता कारिकावली समाप्ता॥ साधेय पर महाभिन्न दशरथात्मजपदपकन्जयोः मसना. अतिरिवापितति ॥ मम् ॥ ॥ .

नमा यो रामचन्टू पदारविन्दयोः ।
॥ श्री गुरुभ्यो नमः ॥
भध कारिकावली परिशिष्टम् ॥
(१) समवाय संवन्धावच्छिन्न संयोगत्वावच्छिन्न संयोगनि-
ष्ठकार्यता निरूपिता घा तादात्म्य संबन्धावविन्न व्यत्वाव
किन्नद्रव्यनिष्ठा समयायिशारणता सा किञ्चिधर्मावच्छिन्ना
मारपतात्वात् समवाय संबन्धावच्छिन्न दण्डत्वावच्छिन्न दण्ड
मिष्ठ कारणतावत्, इति द्रत्वत्वरूप धर्मसिद्धिः ततः सचजाति
सपाधिों लाया जातिय एव, तत एकोऽनको वा लामादेवैः
कतता द्रव्यत्वजाति: नित्यत्वे सति, एकत्वच सत्यनेक समय
वेतत्वादघटत्ववत् इति द्रष्यत्व नाति सिद्धिः॥
(२) समवाय संबन्धावच्छिन्न गन्धत्वावरिन्न गन्ध नि
प्ठकार्यतानिरूपिता नादात्म्य सबन्धावच्छिन्न पनि
म्न थियो निष्ठा.यासमवाधिकारपतेत्यादि पूर्ववत् । इति प्रथि
पोस्वजाति मितिः।
(२) समय संबन्धापरिसन्न जन्यजतत्वापन्नि जन्य
समिष्ठ कार्यता निरूपिता तादात्म्य संबन्धारिशम्न जख.
स्वावधिन जलनिष्ठा,यासमवायिकारणता सा किन्चिार्मा.
पदिन्नत्यादि पर्ववत् तेन लत परमाणा यपि नवजाति सिरिः
रति जलस्य जाति सिःि।
(४) समय संवाधार शिन जन्यतेजरत्वापरिन्न जन्य
मोमिष्ठवार्यता निरूपित तादात्म्य संबन्धावधिम तेजस्था.

( tt ) परिइन्न तेजोनिष्ठा,या समायिकारशतेत्यादि पर्ववत्,तनतेजा परमाणावपितेजस्व सिधिः, इति तेजस्व जाति सिदिः। एव मप्रेस्वयमूधम् । परिशिष्ट प्राज्ञ विशारद परीक्षोप- योगि प्रष्णाः। (0 प्राकागाल्मानः कोय साधर्म्यभाजप्रति सम्यक् स्फुटी क्रियताम्॥ (२,पायुसाक्षात्क्षतिर्भवतिनवा.प्रथमेकथं,चरमेकर्यतमितिः। (२) मसमपाविकारणस्वरूपं वक्ष्ये संगमनीयं केन पुनः करपेम तन्तुरूपे पटरूपनिषपिताऽसमवायिकारएतेतियाथार्यन मतस्वरूपमतिव्याप्त्यादि दोषप्रदर्शन पुरुस्कारेप विपदरी करत ॥ मिष्ाष्टं ॥ (३) सामान्य समवाये च नातिरस्तिनदा मारित तो मातत्तिधर्मस्य च कथं व्यपदेश:चतरूलपणं पातविधरच सरति॥ (4) पारिमाएडल्य भिन्नानां कारपत्वमुदाशत मित्यादि कारिकारहस्यं किम् । पारिमापडश्येन कि गद्यते सत्कारपत्र कि पात्र दूषणं जागति। (७) वायवीय शरीरं वय कायमच सचायनादि व्यवहार () रूपत्व साचारका कत्वगत्वादिमत्यर्थ च की भ्यापार रतिखोपपत्तिकं निरूपयत।

(१५)
...(e)प्रभाष, प्रत्यक्षंक घरसम्भवि कुवचनेति सविस्तर मयुनिक
प्रकारयत
(१०) सामान्य लक्षपयोगलक्षणयो कदाहरणेप्रदर्शनीये
किन्चामयी सांकय्य विघटस मित्यपि विशदी कुरुत।
(११) शरोरेन्द्रिय मनशामात्मत्व ध्यपरिधति पुरस्सरं तव्य
तिरिख तयाऽऽत्म सिदिनीया।
(१)न्द्रिय लक्षणं कि कश्चतपस्य पदकदम्बस्य प्रयोजन
समवायः॥
(१३) योगाचाराप्य बोजात्यनम्युपगमें विभापतित दूषणं
कया वाचो युहाघापर्य हारि तार्किक श्चत किमुसमिति स्पष्टी
कुरता
(१४) पूर्व पधीय च्याम्तिहाने कि बीजम् । कथम्चोदोध्य
व्याप्तिसापेपेष्ट निष्पतिः।
(५)विरुद्ध समतिपक्षयोः किमवच्छेदकम् । कामसत्मारक
त्या व्यत्पत्तिः विचास्यनामधेयान्तरम् ।
(AO पसालक्षणे सिपिन कोऽर्थोऽभितकिच कि
वियप कुतरतिमम्यगुपाथित ।
(s) परामर्थ वरूप शमा कतिविधरप पराम।
(१७) कालात्यया पदिष्टस्य कुष प्रतिबन्धसत्व कायाप
बिमस्योदाहरणम् । करच पंप्रायां विप्राः॥
(৫) মালয় মলাঘাষাহিবিবর করি।
(२०) अपमान हत्यं किम् ! करण्यापरः।
(२) पदपप्पं किम् । कति विधम्चपदम् ।
१२) नेयाविहां पापसातस्य कुमानि पोतिने चत
7

विप्रतिपद्यन्त
विधेयः।
इत्यत्रतत्पक्षसाधकाधकयुत्युच्चयोपन्यासी
.
म्यायच्या करणयोः पादौकीदृशीविमतिपत्तिः । कथम्थे
इतार्किकविजयः।
(२४) लक्षणा स्वरूपंधीजचलेल्यमा
(२५) कारिकावल्या कुत्र २ नामनिर्देशपूर्वक नैयायिकमतं
प्रादपि कारिकायनीग्रन्थश्चवारयममाथित्यव्यरचिन्थक्वता ।
(२३) तकस्य कि स्वरूपम् । किनलक्ष्यम् । करचोपयोगः
(२७) उपाधे: वि लक्षणं तच्च लक्ष्य गमनीयम् ।
.(२८) धर्मग्योमय कारण कलापः क्षय हेतु समुहाचलेल्या ।
(२८) प्रत्युत्पत्तिक्रमो निरूपपोयः।
(३०) न्याये सध्दो नित्योनवा, अन्ते का युतिः कश्चतन्नि.
व्यतांबते।
११) नैयायिकामा मते घणुसे पाकः, वैगेपिकाणान्तु नये
त्यनयोः पक्षयोः का उपपत्तयः ।
हप स्वीकारे का युक्ति: कुतश्च रसो न तथा।
(३३) देवरेणैववेदोरचित इयत्रका प्रवलातकः ।
(२४)रवलाभार्थ सुमेरु मरने प्रतिबधं न जायते ।
(३५) लिङ्ग कति विध प्रत्येक लेदशोदाहरणभ्यामाविष्कार
पोयम् ।
(३६) चक्षुरादिष्यतिरिय सया मनः सिदि प्रदार्या ।
(३७) अन्योन्याभावतः पृथयवस्यको विशेषः।
(२८) मष्टस्य सिद्धिः कथम् ।
(३८) प्रभाव मेदाः के तेघर प्रत्येक नक्षपोदारणानि से.
'मीयामि।
1३२)
:

(8.) वियेष पदार्थाङ्गीकार को तुरतत्र जातिपतिनवा
अन्ते कुतीन ।
(४) पर्यापते पृथक् प्रामाण्यं स्वीकृत नयायिकश्च तत्
कयं पण्डितम् ।
(४२) प्रथिव्यागन्धयत्वलक्षणं विधायगन्धसमानाधिकरण
द्रध्यत्व व्याप्य जातिमत्वलक्षण करणे कोहेतुः।।
(४३) सधातारम्भपरिणामविवर्तवादेषुकतमोज्यायान कर
न्यायसम्मत: केपास्चतरे।
(४४) परमाणनित्यत्वं साधनीयम् ।
(४५) रसनेन्द्रिय जलीयत्वं साधनीयम् ।।
(४६) जलेमधुरोरसः प्रत्यपादितस्कयं घटतेगम्बीररस.
महोत्वोलधेरित समाधेयम् ॥
(४७) के प्रादेषिका गुणाः । केच प्रतीन्द्रिया।
(४८)ध्याध्यक्षेत्वचोयोगो मनमानान कारणम् ।
चक्षर्षाघम्भवद रूप द्रव्यादेपन्नम्भकम् । चक्षुष्या
कादिक मनेकधा । १। निरुता साईपचं
ध्यानाम् ॥
(४) पकारण गुण र गुणा दयनीयाः।
(५०) * एकेकेन्द्रियशेम शाः के हीन्द्रिय प्राधाचशे ।

आहुः॥
कारिकावली
परिशिष्टम् ॥
अय दर्शनभेदेन पदार्थाः नानाविधा तथाहि
(१)चिन्मात्रंत्रीवेक तत्त्वम् इति मायावादिनों
वेदान्तिन
(२) चिदचिदश्वर भेदेन त्रय, इति रामानुजीयाः।
(१) स्वतन्त्र परतन्त्र भेदेन ही पदार्यो, तिमामा।
(४) पूर्वोश कारिकावलीस्थाः सप्तेति वैये पिकाः।
(५) पूर्ण पोडपति गौतमीयाः।
(१) मून प्रक्षति; बुद्धिः अहहार,पवतन्मात्राणि, एका-
दगेन्द्रयाणि,पुरुषरचेतिपञ्चवियतिरिति साख्याः ।
(0) सांस्यस्याईश्चरश्चेतिषविंशतिरिति पातजलाः ।
हट्यगुणकर्म सामान्यसंख्या समवाय साध्य शायः,
पष्टी पदार्या इति प्रभाकामोमांसकाः॥
जलतेजो पायय इति चार्वाकाः।
(१०) शून्यमिति बोहविशेष
मिदयानन्दाः ।
(११) जोवो ना प्रक्षतिची...
NEL
अथ दर्शनैक्यम्।
सपा मेघ दर्गनामा जीगत्मपरमात्मभेदावगतावेष
वापारम्पर्यणनात्पर्यमितितु क्यन्निरिधनुमः तयारि-

साति
पसषद पुष्पा परमिनिस्वाजातविदेशान्तरम्पथितागा
नुपामसमपारावि.सम जनित विश्वाभोकामा माता
धन्यतम. कास्टमारत् प्रपोजमानयनमग्न इतरोपनिमान्य
लयत, प्रन्योग धूमवर्णनम्पादनायप्रवृत्त., एकोप्यम्जननिर्मित
सस्परोभूत,
ঋমি'নামনিষীগন্ধর্মবির
इदानीनिविचार्य सान्नामयतपानिमत्यात्मशक्कत्यशिपायल
परवेऽपितमस्तानामविशिष्टमेवनाथ मरिचसंधीतिलेगः । एव
मेष पड्दर्शनचनमहर्षय ऽपिदर्शनभदेोपिनोवेमभेदभाजदत्यपत्र
म्तव्यम् ।
सायास्वंपदार्थ (जीव) सयोधनसारपत्य मरयन्त्यभेद
भानम्। एतत्पदार्य (वास्वाप ) मगोधनन्याय सत्यम
कर्मधारा पन्त करप द्विधामोमासायाः । परचाजजीव प्रधणो
रेक्यमितिवेदान्तस्यति तदिदचरमफलमितिमायः॥
योग वैशपियोस्तु सापशन्यायाभिन्नतया
भिधानम् वितेकापच मय वा योगफलतदपिचार
नाधिकंप्रतम्यते ॥
अथवा अधिक व दोन पृयनिरूपणंवत्तत काम,
योधनेतापन्निहि प्रथमतएव समस्ताना वुहाव द.प्रस्फुरतिति
ययान तावर माजरोदाय सत्यमनासावशास्त्रिपरीक्षण दित्सर्ज।
सचिदननुमत्त कश्चिदधरोनामेत्यलमनस्पेनविपत्स्यिति ।
जमा
ASAN
युज्यत इति

Karikavali

Author
Vishvanath Bbhattachary
Title
Karikavali
File name
Karikavali
Text
OCR done
Citation
1908
Published
2012/08
Publisher
Lahore.,the Punjab Economical Press.
Language
Sanskrit
Pages
151
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
311177
Barcode
99999990320090.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
iomPWg1vnQD
Download PDF

Karikavali