Adarsh Library, Jaipur

Gotam Nanda

Miland · 2011/03

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राजस्थान संस्करण
गौतम नन्द
[एतिहासिक नाटक
रचयिता
जगन्नाथप्रसाद मिलिन्द

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स्व० डॉ० भगवत्सहायजी
की
स्मृति में

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शुद्धोदन के पुत्र,
नन्द
शुद्धोधन
देवदत्त
कुम्भक
ग्रानन्द
पात्रसूची
पुरुष
कपिलवस्तु के राजकुमार ।
कपिलवस्तु के राजा।
नन्द के मित्र।
शुद्धोदन के एक पुरोहित ।
गौतम युद्ध के शिष्य, भिक्षु ।
स्त्री
नन्द की पत्नी।
नन्द की माता।
सुन्दरिका
प्रजावती
माधविका
कुण्डेश्वरी
सुन्दरिका की सखी।
कुम्भक की पत्नी।

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छठे संस्करण के प्रकाशन पर अाज अपने इस 'गौतम-नन्द' नाटक के इस छठे सस्करण के प्रकाशन पर मैं पाठको तथा समालोचकों के प्रति अपनी हार्दिक कृतनता प्रकट करता हूं, क्योकि, यह उन्हीकी उदार कृपा का फल है। अब मुझे पागा होने लगी है कि, स्वतंत्रता के पहले के युग में मेरे 'प्रतापप्रतिना' नाटक ने पाठको को जिस प्रकार सेवा की एवं लोक. प्रियता प्राप्त की और जिस प्रकार वह याज भी लोकप्रिय है, उसी प्रकार स्वतत्रता की प्राप्त के बाद के युग में यह 'गौतम नन्द' नाटक भी पाठकों की सेवा करके उचित लोकप्रियता प्राप्त कर सकेगा। उक्त दोनों नाटको में मैंने उक्त दोनों युगों की आवश्यकतानों की प्रतिध्वनित करने का विनम्र प्रयास किया है। इस सस्करण के प्रकाशन के पूर्व मैंने इस नाटक पर मावधानी में दृष्टि डालने का प्रयल किया । मुझे प्रसन्नता है कि पाठ वर्ष बाद भी मुझे इसमे कोई उल्लेखनीय परिवर्तन करने की आवश्यकता प्रतीत नहीं हुई । अतः, मैं विश्वास करना चाहता हूं कि सहृदय पाटकों के अनु- ग्रह के फलस्वरूप काल के अगले प्रवाह में भी संभवतः यह नाटक धूमिल न होगा। यदि पाठकों; समालोचको तथा मास्कृतिक विकास में दिलचस्पी रखनवाले सज्जनों को इसी प्रकार मुझपर कृपा बनी रही, नो उममें प्रोत्साहित होकर मैं और भी कुछ नाटक लिखने का प्रयल कर मर्केगा। ग्वालियर, १६६०] -जगन्नाथप्रसाद मिलिन्द

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प्रयन संस्करण को भूमिका कान्त । दुध मान माहियानीमकों ने 'काया नाटकं रम्बन् कहकर हाय काय कृट ब्य नाटक की महत्ता का सार च्यिा है। नाटक का अनुव अनियनिवाहन मद्य होता है और पद्य कवीनां निकम वदलि' कहकर गय को कवि की मोटी घोषित करनेवाले माहिल्यरमिकों कानी प्राचीन माल में प्रभाव नहीं रहा । ग्रानिक माहित्यनमन भी नाहिल्लवगत् में नाटक का एक विर स्थान स्वीकार करने में संकोच नहीं करते । उनचि भी नाहित्य के सुरम्य अंग नाटक की और काफी आकृष्ट हो सकती और हम्य काव्य के इस मनोरम स्वरूप को पर्याप्त प्रोत्साहन दे सकती है। उनलचि के प्राचार की प्रागा पर निर्भर रहनेवाले अधिकतर प्रकाशक भी साहित्य के इस अंग का स्वभावतः अपेक्षाकृत अधिक उत्साह बाय स्वागत करते हैं। आधुनिक शिक्षा–स्याएं भी नाटकों के अध्ययन- अध्यापन को विशेष प्रोत्साहन देती हैं। इन सबने अधिक महत्व की बात यह है कि मनोरंजन और प्रानन्द-प्राति के मन्बन्ध में जनता में पाई जानेवाली प्रत्यक्षीकरण एवं स्वावलम्बन की स्वाभाविक प्रवृत्ति नाटक को अपने लिए मनने अधिक अनुकूल ा नकती है। देश के प्रत्येक स्थान के निवामियों में सह प्राकांक्षा होना स्वाभाविक ही है कि वे अपने नगर, उपनगर या ग्राम में नाटकों के अभिनय देने और पयानंभव व्यानीय दर्शकों हो मे ने या उन्ही- ये जातेजागठे मनुष्यों ही में में कुछ लोग उनका अभिनय भी करें। अपने ही ने मनुष्यों या अपने ही नाधियों या पड़ोसियों को अभिनय करने देवकर स्थानीय दर्गक को जो ग्रानन्द मिल मकता है, वह अनिर्वचनीय है। यह निकटता, प्रीति और अपनापन उन्हें मनवतः सिनेमाफिल्मा- कां देवन में प्रात नहीं हो सकता। और फिर अनी अनेक वर्षों तक न तो दिनों का हर नगर, उपनगर और ग्राम में पहुंच सकना संभव है और न व प्रना प्रकिनार भारतीय शील और संस्कृति के अनुकूल तथा गुरुचिपूर्ण ही हती है। नाओं के लिए अनुकूल यह विगंप स्थिति न केवल मुरुचिपूर्ण नाटको के देखों ही के लिए देशाप्रद है, बल्कि, जनता के मास्कृतिक विकास में . [ १० ] दिलचस्पी रखनेवाले कलाप्रेमी लोकसेवकों के लिए भी उद्बोधक विशेष स्थिति का पूरा उपयोग किया जाना आवश्यक है। यह अत्यन्त आवश्यक है कि स्वतन्त्र भारत के प्रत्येक ग्राम, नगर और उपनगर में संस्कृतिप्रेमी नागरिकों और ग्रामीणों की सुगठित नाटकसमितियाँ स्थापित हों और उन नाटक-समितियों के द्वारा सुरुचिपूर्ण नाटकों के अभिनय हों। उन अभिनयों के द्वारा जनता को स्वस्थ मनोरंजन और उच्चकोटि का आनन्द तो प्राप्त हो हो सकेगा, उसकी सांस्कृतिक उन्नति भी हो सकेगी। जनता की यह सांस्कृतिक उन्नति केवल बड़े नगरों ही तक सीमित न रहकर छोटे-छोटे उपनगरों और ग्रामों में भी पहुंचनी चाहिए । इस आवश्यकता में महत्त्वपूर्ण संभावनाएँ और आशाएँ भी निहित हैं और उनका स्वप्न देखनेवाले तथा सांस्कृतिक दृष्टि से विकसित भारतीय जनता के भव्य भविष्यत् की कल्पना करनेवाले कवि के लिए यह स्वाभाविक ही है कि वह दृश्यकाव्य के उत्कृष्ट अंग नाटकों के निर्माण में उचित उत्साह के साथ लगे । इन पंक्तियों का लेखक भी इस दिशा में अपने दायित्व का गम्भीरतापूर्वक अनुभव करना चाहता है और ऐसा करके वह अपना कर्तव्य- पालन ही करेगा। असत्य से सत्य का, अशिव से शिव का और असुन्दर से सुन्दर का संघर्ष जीवन की भांति ही साहित्य और कला के क्षेत्र में भी एक चिरंतन और निरन्तर संघर्ष है। प्राचीन युग में भी यह संघर्ष हुआ और वर्तमान युग में भी हो रहा है। पुरातन काल के इस संघर्ष के फलस्वरूप, जीवन, कला और साहित्य में जो कुछ सत्य, शिव और सुन्दर था, वह, काल और क्षेत्र की सीमा का उल्लंघन करके, बच रहा है और जो कुछ असत्य, अशिव और असुन्दर था, वह नष्ट हो चुका है। वर्तमान युग में भी जीवन, कला और साहित्य के क्षेत्र को जिस असत्य, अशिव और असुन्दर ने पाक्रान्त करने का उपक्रम कर रखा है, वह भी इसी संघर्ष के फलस्वरूप अन्ततः परास्त और नष्ट होगा और जो कुछ सत्य, शिव और सुन्दर होगा, वही, काल और क्षेत्र के व्यवधान को लांधकार, बच रहेगा। , [ ११ ] प्रत्येक मघर्ष के समय प्रारम्भ में मालूम तो यही होता है कि भलाई में बुराई जीत रही है, पर, अन्ततः, चरम विजय भलाई ही की होती है। मान जीवन, साहित्य और कला के क्षेत्र के जिम्मेदार कार्यकर्ताओं की बड़ी कठिन परीक्षा हो रही है। जिन मानवीय जीवनमूल्यों की ये अपनी प्रात्मा की सम्पूर्ण दृढता और गम्भीरता से प्यार करते हैं, उन्हीर चारों और गे बड़े पातक प्रहार हो रहे हैं। रास्ता बड़ा लम्बा और कठिन है। प्राणों में साधना का विनम्र दीपक जलाए वे तिमिर को चीरते हुए चल ई है। धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं । उनकी प्रांगों में, अाँसों ही में नहीं, प्राणों में भी, अपना लक्ष्यविन्दु बसा है और उसीके प्रारूपण, उसीको प्रेरणा से वे आगे बढ़ रहे है । उनको साधनहीनता और शक्तिहीनता उनके लक्ष्यप्रेम और उत्साह पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डाल पाती। जीवन से अलग कटकर कला के जीवित रहने का सिद्धान्त अब बहुत पुराना पड़ गया है । अाज कला और साहित्य भी जीवन ही के ग्राम वन गए है । वस्तुस्थिति यह है कि आज यदि जीवन पर प्रहार होता है, तो वह साहित्य और कला पर होता है और यदि साहित्य और कला पर होता है, तो जीवन पर होता है। मानवीय जीवनमूल्यों पर होनेवाले प्रहारो का उचित एव स्थायी प्रति- कार प्रतिप्रहार नहीं हो सकता, बलि, रचना ही हो सकती है। यह तथ्य जीवन को भांति ही साहित्य योर कला के क्षेत्र में भी प्रभावशील है। यदि हम कला और साहित्य के क्षेत्र में सत्य, गिव और मुन्दर पर होनेवाले अनत्य, प्रशिव और अनुन्दर के प्रहारो का उचित प्रतिकार करना चाहें, तो हमे नन्न, शिव और मुन्दर के प्रेरक, ग्राराधक और समयंक साहित्य और कला की अविरत रचना का पल करना चाहिए या ऐसे स्वस्य एव सुरुचिपूर्ण माहित्य और कला को सक्रिय प्रोत्माहन देना चाहिए। कलाकार या कलाप्रेमी या अपने क्षेत्र का यह रचनात्मक संघर्ष उसके जीवन का उतना ही महत्वपुर्ण संघर्ष है, जितना जीवन, राजनीति, अर्य और ममाज के क्षेत्र में कार्य करने- याले लोकसेवक का मपने क्षेत्र का जपर्प हो सकता है । किबहुना, सा- [ १२ ] तिक क्षेत्र के इस रचनात्मक संघर्ष का महत्त्व और भी अधिक है, क्योंकि, उसका प्रभाव अधिक स्थायी, गम्भीर और व्यापक होता है। इन्हीं राव भावनागों और विचारों से प्रेरित होकर इन पंक्तियों का लेखक अपनी विनम्र तथा प्रकिचन साहित्य-साधना में जीवन का मानन्द और सार्थकता अनुभव करता है और नाटकरचना को अपनी साहित्यसेवा में एक विशेष महत्त्वपूर्ण स्थान देना चाहता है। लेखक का सदा यह यल रहा है कि पह जो लिये, उसमें सुरुचि गा वह संस्पर्श अवश्य रहे, जो मानव को उठाता है, गिराता नहीं। यह उसके उपर्युक्त रचनात्मक संघर्ष का एक प्रमुख प्रेरणासूम रहा है। लेखक सोभाग्यशाली है कि इस मून से सम्बन्ध विच्छेद किए बिना ही वह थोड़ी-सी लोकप्रियता भी पा सका है। लाक पहले नाटक 'प्रतापप्रतिशा' की रचना सन् १९२६ ई० में हुई और उसी वर्ष उसके प्रथम संस्करण का प्रकाशन हुमा । यह बात छिपाई नहीं सकती कि वह नाटक इतना लोकप्रिय हुमा कि उसके अब तक एक दर्जन रा अधित संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। उसकी सफलता के फलस्वरूप साहित्यिक मिमी, पाठकों और प्रकाशकों के आग्रह मुझे और अधिक नाटक लिलाने की निरन्तर प्रेरणा देते रहे, किन्तु, सन् १९५० के पहले मैं अपना दुसरा नाटक पूरा नार रामा । 'प्रतापप्रतिज्ञा' और 'समर्पण' नी रचना के बीच के में लगभग बीस वर्ष अधिकतर दूसरे कार्यों में बीत गए । उन वीस वों में में जमकर यथेष्ट साहित्यसेवा न कर सका। बीच-बीच में जो कवि- ताएँ, निवन्ध सादि लिख लिया करता था, उनके संग्रह अवश्य तैयार हुए मोर प्रकाशित भी हुए, पर, हिन्दी-पाठकों को एक नाटकापलि भेंट करने की मेरी इच्छा मन की मन ही में रहती चली गई। ये वीस वर्ष व्यर्थ भी नष्ट नहीं हुए । अन्य दिशा में उनका संभवतः एक अच्छा उपयोग भी हुमा । एक विनय जनसेवक तथा एक अकिंचन पत्रकार के रूप में मैंने उन वर्षों में भारतीय जनता की राजनीतिमा और मार्मिक स्वतन्त्रता के लिए यथाशक्ति सक्रिय संघर्ष करने का यत्न किया। मैं सोचता हूँ कि मानव के नाते वह मेरा पहला तंजर भा । मानवता को में साहित्यिकता के ऊपर स्थान देता हूँ।

म [ १३ ] स्वतन्त्र भारतीय लोकतंत्र के अन्युदय के उप.काल ने मुझे प्रेरित किय था कि में साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में अधिक कार्य करने का पल करूं और में प्रमुखतः जो कुछ बन सकता हूँ, वह बनने की ओर अधिक ध्यान दूं। फलतः, मैं सास्कृतिक क्षेत्र के उपयुक्त रचनात्मक संघर्ष की प्रो अधिक मुड़ने की चेष्टा करने लगा। अपने इस नए निश्चय के फलस्वरूप दो नए कवितासंग्रह पाठको को अर्पित करने को प्रस्तुत कर चुका हूँ तया द नए नाटक भी तैयार कर चुका हूँ। इस प्रकार वस्तुस्थिति यह है कि मन १९२२ से लेकर १९४६ तक की लगभग २८ वर्षों को अपनी नम्र साहित्य सेवा के द्वारा में पाठकों को जितनी पुस्तके भेट 'कर सका था, उननी है पुस्तकें मैंने सन् १९५० से लेकर १९५२ तक के लगभग तीन ही वर्षों में उन अर्पित करने को प्रस्तुत कर दी। मुझे सन्तोप है कि मेरे अनेक साहित्यमर्म मित्रो ने यह सम्मति दी है कि मेरी ये नई पुस्तक मेरी पुरानी पुस्तयो से कुछ मच्छी बन पड़ी हैं और लेखक के अनुभव और वय की वृद्धि की दृष्टि से या विकास किसी हद तक स्वाभाविक ही समझा जा सकता है । पाठलो प्रो प्रकागको से भी इन नई पुस्तको के सम्बन्ध में मुझे सन्तोपजनक प्रोत्साह मिलता जा रहा है तथा मिलते रहने की मासा है। प्रस्तुत 'गौतम नन्द' नाटक 'प्रतापप्रतिज्ञा' तथा 'समपंग' के बाद नाटक क्षेत्र में मेरी तीसरी रचना है। मैंने पल किया है कि इसकी पृष्ठ-नन्या में पिछले नाटको की पृष्ठसख्या से अधिक न होने पावे । इसके पात्रो की सस्य तो निश्चित रूप से पिछले दोनो नाटको के पायों की सल्या से प्राधी मे में कम है । इसमे इसके अभिनय के लिए बहुत कम व्यक्तियों की आवश्यकत होगी। इसमें स्त्री भोर पुरुप दोनों प्रकार के पार है, अतः, यह मानवता दोनों अंगों को अभिनय का ममान अवसर देता है। इसमें भी मेरे पिछले दोन नाटकों की भांति केवल तीन ही अंक रखे गए हैं, अतः, यह हिन्दी के प्रने चार-पांच मंकोवाले नाटकों की भांति लम्बा नहीं है । अधिक लम्बे नाटक के अभिनय में, माधुनिक युग में, समय-सम्बन्धी अमुविधा होतो है । यह नाटः इतना छोटा भी नहीं है कि इसके अभिनय से दर्शक प्रतृप्त र म । वाम - [ १४ ] वार पट-परिवर्तन की आवश्यकता से भी अभिनय में असुविधा होती है। पिछले नाटकों की अपेक्षा इसमें यह असुविधा और भी अधिक सीमा तक दूर कर दी गई है। 'प्रतापप्रतिज्ञा' के तीन अंकों में कुल मिलाकर २३ दृश्य थे, 'समर्पण' में १२ और इसमें केवल ही दृश्यों में तीनों अंकों की परिसमाप्ति हो जाती है । इस प्रकार, पृष्ठों की संख्या कम न करते हुए, दृश्यों की संख्या कम करते जाने की और मेरी उत्तरोत्तर प्रवृत्ति स्पष्ट होती गई है। इसमें मैं दृश्यों की संख्या और भी कम कर सकता था, पर, उस दशा में दृश्य बहुत बड़े-बड़े हो जाते । अभिनेताओं तथा अभिनेत्रियों को वीच-बीच में कुछ विश्राम तथा कुछ परिवर्तित स्थिति का अवसर देने की इच्छा ने मुझे वैसा न करने दिया । इसी दृष्टि से इसमें यह भी यत्न किया गया है कि एक ही पृष्ठभूमि और एक ही पात्र लगातार दो दृश्यों में एकदम तत्काल न माने पावे । बड़े-बड़े और पाडम्बरपूर्ण मंचनिर्देश देने की कुछ अाधुनिक हिन्दी नाटककारों की प्रवृत्ति से भी इसमें परहेज किया गया है । मेरी राय में, इस दिशा में, निर्दे- दाकों को भी, स्वतन्त्रतापूर्वक, कुछ काम करने दिया जाना चाहिए । इसमें यथासम्भव ऐसे दृश्य उपस्थित नहीं किए गए हैं, जिनका अभिनय करना या जिनके लिए साधनसामग्री जुटाना कठिन हो । तात्पर्य यह कि इसे अभिनय को दृष्टि से अधिक से अधिक सुविधाजनक बनाने का पूरा यत्न किया गया है, साथ ही इसे साहित्यिक अध्ययन के योग्य भी बनाया गया है। अभिनय को महत्त्व देने की धुन में इसके साहित्यिक स्तर को उचित सीमा के नीचे नहीं उतरने दिया गया है । इसका साहित्यिक स्तर भी 'प्रताप- प्रतिज्ञा' तथा 'समर्पण' के समान ही है। भापा को क्लिप्टता से बचाने का यल अवश्य किया गया है, किन्तु, याधुनिक हिन्दी गद्य की प्रचलित प्रांजल परिपाटी को भी कोई आघात नहीं पहुंचाया गया है। नापा की दृष्टि से भी इसमें 'प्रतापप्रतिज्ञा' ही का अनुकरण किया गया है, जो अभिनय और साहित्यिक अध्ययन दोनों के सामंजस्य की दृष्टि से कतिपय समालोचकों द्वारा सफल घोपित की जा चुकी है। इन्हीं दोनों के सामंजस्य की दृष्टि से इस नाटक को प्रकाशन के पूर्व [ १५ ] अपने परिचित अभिनेतायो तथा साहित्य के विद्यार्थियों को दिखाकर उनकी सहमति तथा ममर्थन भी प्राप्त करने का प्रयत्न किया गया है। इससे व्यावहारिक रूप में भी यह विश्वास हो गया है कि यह उक्त दोनो वर्गों के लिए उपयोगी हो सकेगा। लेखक को यह भी विश्वास होता है कि मामान्य जनता को भी इमे पढ़ने और इसका अभिनय देखने में कुछ मानन्द मायगा । जो सामान्य पाठक हिन्दी की प्रचलित माहित्यिक पुस्तके पढ़ और ममझ लेते हैं, उनके लिए यह पुस्तक भी दुरुह सिद्ध नहीं हो मकनी। अगिक्षित जनता भी अच्छे अभिनेताओं तथा अभिनेत्रियों द्वारा अभिनीत होने पर इसके अभिनय के सवादों को उसी प्रकार समझ सकेगी, जिम प्रकार रामायण, महाभारत तथा भागवत के आधार पर निर्मित राम और कृष्ण मम्वन्धी ग्रामनाटकों के मभिनयों के सम्वादो को ममझ लेती है। जिन क्षेत्रो में हिन्दी भाषा का प्रचलित स्वरूप नही समझा जाता, उनमें अभिनय के समय, क्षेत्रीय मुविधा की दृष्टि से, निर्देशक तथा अभिनेता इममे भाषा-सम्बन्धी कुछ उचित परिवर्तन भी कर ले सकते हैं। इम नाटक में कपिलवस्तु के ऐतिहासिक गासक गौतम शुद्धोदन के कनिष्ठ पुत्र तथा तथागत गौतम बुद्ध के अनुज गौतम नन्द का कथानक है। कथानक कहने को तो ऐतिहासिक है, पर, इतिहास मे उसका उल्लेख विस्तार से नहीं मिलता। बीज के रूप में इतिहास मे इतना इगित मिलता है कि के गृह-त्याग के बाद भाक्यवगीय शासक शुद्धोदन ने जिस नन्द पर पाशा लगाई थी, वह भी गौतम बुद्ध के आदेश पर, अपने विवाह, नवगृहप्रवेग तथा राज्याभिषेक के ऐन मौके पर भिक्षु बन गया था। यह कथानक इतना हृदयस्पर्शी है कि मेरे पुराने प्राध्यापकों मे से एक सुप्रसिद्ध इतिहासज्ञ ने इसे नाटकरचना के योग्य बतलाया। फलतः, इतिहास द्वारा वीज-रूप में प्राप्त इस कथानक को कल्पना के द्वारा पल्लवित और पुप्पित करके नाटक का रूप देने का यल किया गया। गौतम बुद्ध इतने महान् थे कि उनके युग के इतिहास इत्य पर गौतम बुद्ध -- । [ १४ ] वार पट-परिवर्तन की आवश्यकता से भी अभिनय में असुविधा होती है। पिछले नाटकों की अपेक्षा इसमें यह असुविधा और भी अधिक सीमा तक दूर कर दी गई है । 'प्रतापप्रतिज्ञा' के तीन अंकों में कुल मिलाकर २३ दृश्य थे, 'समर्पण' में १२ और इसमें केवल ६ ही दृश्यों में तीनों अंकों की परिसमाप्ति हो जाती है। इस प्रकार, पृष्ठों की संख्या कम न करते हुए, दृश्यों की संख्या कम करते जाने की ओर मेरी उत्तरोत्तर प्रवृत्ति स्पष्ट होती गई है। इसमें मैं दृश्यों की संख्या और भी कम कर सकता था, पर, उस दशा में दृश्य बहुत बड़े-बड़े हो जाते । अभिनेताओं तथा अभिनेत्रियों को वीच-बीच में कुछ विश्राम तथा कुछ परिवर्तित स्थिति का अवसर देने की इच्छा ने मुझे वैसा न करने दिया । इसी दृष्टि से इसमें यह भी यत्न किया गया है कि एक ही पृष्ठभूमि और एक ही पाय लगातार दो दृश्यों में एकदम तत्काल न पाने पावे। बड़े-बड़े और आडम्बरपूर्ण मंचनिर्देश देने की कुछ आधुनिक हिन्दी नाटककारों की प्रवृत्ति से भी इसमें परहेज किया गया है। मेरी राय में, इस दिशा में, निर्दे- यसकों को भी, स्वतन्त्रतापूर्वक, कुछ काम करने दिया जाना चाहिए । इसमें यथासम्भव ऐसे दृश्य उपस्थित नहीं किए गए हैं, जिनका अभिनय करना या जिनके लिए साधनसामग्री जुटाना कठिन हो । तात्पर्य यह कि इसे अभिनय की दृष्टि से अधिक से अधिक सुविधाजनक बनाने का पूरा यत्न किया गया है, साथ ही इसे साहित्यिक अध्ययन के योग्य भी बनाया गया है। अभिनय को महत्त्व देने की धुन में इसके साहित्यिक स्तर को उचित सीमा के नीचे नहीं उतरने दिया गया है । इसका साहित्यिक स्तर भी 'प्रताप- प्रतिज्ञा' तथा 'समर्पण' के समान ही है। भाषा को क्लिप्टता से बचाने का यत्न अवश्य किया गया है, किन्तु, आधुनिक हिन्दी गद्य की प्रचलित प्रांजल परिपाटी को भी कोई आघात नहीं पहुंचाया गया है । भापा की दृष्टि से भी इसमें 'प्रतापप्रतिज्ञा' ही का अनुकरण किया गया है, जो अभिनय और साहित्यिक अध्ययन दोनों के सामंजस्य की दृष्टि से फतिपय समालोचकों द्वारा सफल घोषित की जा चुकी है। इन्हीं दोनों के सामंजस्य की दृष्टि से इस नाटक को प्रकाशन के पूर्व ।

[ १५ ] अपने परिचित अभिनेतामो तथा साहित्य के विद्यायियो को दिवाकर उनको सहमति तथा ममर्थन भी प्राप्त करने का प्रयत्न किया गया है। इससे व्यावहारिक रूप में भी यह विश्वाम हो गया है कि यह उक्त दोनो वर्गों के लिए उपयोगी हो मकेगा। लेखक को यह भी विश्वास होता है कि सामान्य जनता को भी इसे पढ़ने और इमका अभिनय देखने में कुछ मानन्द मायगा । जो सामान्य पाठक हिन्दी की प्रचलित माहित्यिक पुस्तकें पढ प्रौर ममझ लेते हैं, उनके लिए यह पुस्तक भी दुरुह सिद्ध नहीं हो सकी। प्रशिक्षित जनता भी अच्छे अभिनेतामों तथा अभिनेत्रियो द्वारा अभिनीत होने पर इसके अभिनय के संवादों को उसी प्रकार समझ सकेगी, जिम प्रकार रामायण, महाभारत तथा भागवत के आधार पर निर्मित राम और कृष्ण मम्बन्धी ग्रामनाटकों के अभिनयों के सम्बादों को समझ लेती है। जिन क्षेत्रो मे हिन्दी भाषा का प्रचलित स्वरूप नही समझा जाता, उनमे अभिनय के समय, क्षेत्रीय सुविधा की दृष्टि से, निर्देशक तथा अभिनेता इममे भापा-सम्बन्धी कुछ उचित परिवर्तन भी कर ले सकते हैं। इम नाटक में कपिलवस्तु के ऐतिहासिक गासक गोतम शुद्धोदन के कनिम्ठ पुत्र तथा तथागत गौतम बुद्ध के अनुज गौतम नन्द का कयानक है। कथानक कहने को तो ऐतिहासिक है, पर, इतिहास में उसका उल्लेख विस्तार से नहीं मिलता। बीज के रूप में इतिहास से इतना इंगित मिलता है कि गौतम बुद्ध के गृह-त्याग के बाद शाक्यवगीय शासक मुद्धोदन ने जिस नन्द पर आशा लगाई थी, वह भी गौतम बुद्ध के आदेश पर, अपने विवाह, नवगृहप्रवेग तथा राज्याभिषेक के ऐन मौके पर भिक्षु बन गया था। यह कथानक इतना हृदयस्पर्शी है कि मेरे पुराने प्राध्यापकों मे एक मुप्रसिद्ध इतिहासन ने इसे नाटकरचना के योग्य बतलाया। फलत , इतिहास द्वारा बीज-रूप में प्राप्त इस कथानक को कल्पना के द्वारा पल्लवित और पुष्पित करके नाटक का रूप देने का यल किया गया। गौतम बुद्ध इतने महान थे कि उनके युग के इतिहास मोर माहित्य, , - अधिकतर उन्हींकी छापे है। उन्हीके वर्णन से तत्कालीन इतिहास भरे पड़े हैं । उनके अनुज नन्द के साथ न तो इतिहास ने उचित न्याय किया और न साहित्य ने । इतिहास तो अधिकतर महान विभूतियों को केन्द्रविन्दु बनाकर चलता ही पाया है, साहित्य भी सामान्य व्यक्तियों के प्रति प्रायः कृपण रहा हैं। भदन्त अश्वघोष ने नन्द तथा उसकी पत्नी सुन्दरी के सम्बन्ध में 'सौन्दरनन्द' नामक एक काव्य संस्कृत में अवश्य लिखा है, किन्तु, उसमें भी तथागत गौतम बुद्ध ही को प्राधान्य और नन्द को गौण स्थान दिया गया है नन्द के सम्बन्ध में उससे भी मुझे वीजरूप कथानक के अतिरिक्त और कोई सहायता न मिल सकी। फिर भी, जो कुछ सहायता मिली है, उसके लिए मैं इतिहासकारों तथा कविवर अश्वघोष के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करता हूँ। अपनी असाधारण एवं अद्वितीय महत्ता के कारण गौतम बुद्ध के लिए वह सब तप और त्याग करना अत्यन्त स्वाभाविक ही था, जो उन्होंने किया, किन्तु, गौतम नन्द का त्याग और वलिदान भी अपना एक विशेष स्थान रखता है, क्योंकि, वह एक सामान्य राजकुमार थे। उनकी दुर्वलताएँ दुर्दम्य थी और उनके सामने अपार प्रलोभन थे। भरी जवानी में अत्यन्त अनुरक्त तथा अतीव सुन्दर पत्नी को छोड़कर उन्होंने गृह-त्याग किया था और ठीक ऐसे अवसर पर किया था, जब विवाह, नवगृहप्रवेश और राज्याभिपेक के तीन-तीन महान् अवसर उनके सामने उपस्थित थे। मेरी विनम्र संमति में, अवसरों को छोड़ने की यह पुरानी कहानी अवसरवाद, भोगवाद और स्वार्थ के नए ग्राक्रमणों के विरुद्ध भी रचनात्मक संघर्ष की दीपज्योति बन सकती है। नन्द के त्याग और बलिदान ने लेखक को प्रभावित किया है। आशा है, वे पाठकों को भी प्रभावित करेंगे । पाठकों के पुराने और सुपरिचित प्रेम के विश्वास के ग्राधार पर मैं अपना यह नया नाटक साहित्यक्षेत्र में सविनय प्रस्तुत करता हूँ। . ग्वालियर, २-१०-५२] -जगन्नाथप्रसाद मिलिन्द पहला अंक

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पहला दृश्य
[ राजकुमारी सुन्दरिका का उद्यान । सायंकाल ।]
सुन्दरिकर मोर माविका बैठी हैं।
दोनों मापस में बातचीत कर रहो
हैं । कुछ दूर वोरा रखी है।
माधविका
मखी सुन्दरिका, राजधानी का चसन्तोत्सव इस बार कुछ फोका.
फोका-सा लग रहा था । इसका क्या कारण या ?
सुन्दरिका
कारण तुम भी जानती हो माविका ! इस बार, उस अवसर
पर, हमारी राजधानी के निकट पाम्रवन मे तथागत गौतम बुद्ध का
भागमन हुमा या। अधिकार नागरिक मोर नागरिकाएं उनका उपदेश
सुनने वहां चली गई थी। जहां जनता ही न हो, वहाँ सार्वजनिक
उत्सव कैसा?

.."..
माधविका
उससे एक नई समस्या उत्पन्न हो गई है राजकुमारी ! जवसे
महाराज ने तथागत का उपदेश सुना है, तबसे वह राज्यकार्य की ओर
से कुछ उदासीन-से रहने लगे हैं। उन्होंने महारानी से स्पष्ट कह दिया
है कि अब वह युवराज को राज्य सौंपकर संन्यास ग्रहण करना चाहते
। महाराज का कथन है कि उनके गृहस्थ-जीवन का अव केवल एक
ही कर्तव्य और शेष रह गया है ।
सुन्दरिका
वह क्या?
माधविका
तुम्हारा विवाह।
[सुन्दरिका के मुख पर क्षण भर
लाली की एक झलक दिखाई
देती है । वह तत्काल प्रकृतिस्य
हो जाती है।
सुन्दरिका
व्यर्थ का प्रश्न है यह । आज का युग धीरे-धीरे तथागत गौतम
बुद्ध का युग बनता जा रहा है। इस युग में जब संन्यास ही जीवन की
सबसे अच्छी स्थिति समझी जा रही हो, तब विवाह का क्या मूल्य
पहले विवाह करना और फिर भिक्षु बन जाना ! पहले भवन का
निर्माण करना और फिर उसका विनाश करना ! मानो जीवन कोई
सेल हो ! ऐसे भवन को बनाया ही क्यों जाय, जिसे स्वयं ही आगे'
चलकर मिटाना हो?
मावविका
ये कैसी बातें कर रही हो राजकुमारी ? अपने पिता के हृदय की
कोमल भावनाओं को समझो ! महाराज के जीवन की इससे बड़ी
?

अंक १: दृश्य १] [२१ . इच्छा क्या हो सकती है कि वह अपनी प्रिय पुत्री को मुसमय विवाहित जीवन में प्रवेश करते देखें? सुन्दरिका मात उनकी मवसे बड़ी आकाक्षा तो प्रवज्या है, सबसे बड़ी साध तो संन्यास है । पुत्री तो उनकी प्राकाक्षा की पूर्ति के मार्ग में एक बाधा है, जिसे पराए घर भेजकर वह अपना मार्ग निष्कण्टक बनाना चाहते हैं । न जाने, इन पुरुषों को क्या हो गया है ! छोटे से लेकर बड़े तक, सब के सब, नारी को अपने मार्ग का कांटा समझते हैं। नारी को क्षुद समझना ही मानो महत्ता का लक्षण बन गया है। नारी के प्रति घृणा और उपेक्षा की दृष्टि मभी में विद्यमान है। प्रत्येक नागरिक में, और मैं क्षमामाथिनी हूँ, मेरे पिताजी मे भी मोर पूज्यपाद तथागत गौतम बुद्ध में भी। माधविका - तथागत में भी ? मुन्दरिका हाँ, तथागत मे भी । क्या तुम नहीं जानती कि तयागत नारी को प्रव्रज्या के योग्य नहीं समझते ? क्या तुमने नहीं सुना कि तथागत कहते है कि केवल पुरुषो को बौद्धधर्म के मंघ में सम्मिलित करना चाहिए, नारियो को नहीं ? क्या इम सिद्धान्त में नारी को होन समझने की भावना नहीं छिपी है ? यदि यह मेरा भ्रम हो, तो मैं क्षमाप्राधिनी हूँ ! माधविका भ्रम तो है ही ! तयागत की कितनी प्रशंसा माजकल जन-जन के मुख मे मुनी जा रही है ! तयागत-जैसे महात्मा नारीजाति को हीन नहीं समझ सकते । यह स्त्री और पुरुप में भेदभाव नहीं कर सकते। मंभव है, पुरुष की दुर्बलता से परिचित होने के कारण, तयागत नारी. !

२०] [ गौतम नन्द माधविका उससे एक नई समस्या उत्पन्न हो गई है राजकुमारी ! जबसे महाराज ने तथागत का उपदेश सुना है, तवसे वह राज्यकार्य की ओर से कुछ उदासीन-से रहने लगे हैं। उन्होंने महारानी से स्पष्ट कह दिया है कि अब वह युवराज को राज्य सौंपकर संन्यास ग्रहण करना चाहते हैं । महाराज का कथन है कि उनके गृहस्थ-जीवन का अब केवल एक ही कर्तव्य और शेष रह गया है सुन्दरिका -- वह क्या? माधविका तुम्हारा विवाह । [सुन्दरिका के मुख पर क्षण भर लाली की एक झलक दिखाई देती है । वह तत्काल प्रकृतिस्थ हो जाती है। सुन्दरिका व्यर्थ का प्रश्न है यह । आज का युग धीरे-धीरे तथागत गौतम बुद्ध का युग बनता जा रहा है। इस युग में जब संन्यास ही जीवन की सबसे अच्छी स्थिति समझी जा रही हो, तव विवाह का क्या मूल्य ? पहले विवाह करना और फिर भिक्षु बन जाना ! पहले भवन का निर्माण करना और फिर उसका विनाश करना ! मानो जीवन कोई खेल हो ! ऐसे भवन को बनाया ही क्यों जाय, जिसे स्वयं ही आगे चलकर मिटाना हो ? माधविका- ये कैसी बातें कर रही हो राजकुमारी ? अपने पिता के हृदय की कोमल भावनाओं को समझो ! महाराज के जीवन की इससे बड़ी . मक १ : दृश्य १] [ २१ इच्छा क्या हो सकती है कि वह अपनी प्रिय पुत्री को मुममय विवाहित जीवन में प्रदेश करते देखें? सुन्दरिका अनमान उनकी मबसे बड़ी पाकांक्षा तो प्रवज्या है, सबसे बड़ी साध तो मंन्याम है । पुत्री तो उनकी आकांक्षा की पूर्ति के मार्ग में एक बाधा है, जिसे पराए घर भेजकर वह अपना मार्ग निष्कण्टक बनाना चाहते हैं । न जाने, इन पुरुषों को क्या हो गया है ! छोटे से लेकर बड़े तक, सव के मव, नारी को अपने मार्ग का कांटा समझते हैं। नारी को क्षुद समझना ही मानो महत्ता का लक्षण बन गया है । नारी के प्रति घृणा और उपेक्षा की दृष्टि मनी में विद्यमान है, प्रत्येक नागरिक में, पौर में अमाप्रार्थिनी हूँ, मेरे पिताजी में भी मोर पूज्यपाद तयागत गौतम बुद्ध में भी। माधविका तथागत में भी? मुन्दरिका हों, तथागत मे भी। क्या तुम नहीं जानती कि तयागत नारी को प्राग्या के योग्य नहीं समझते ? क्या तुमने नहीं सुना कि तथागत कहते हैं कि केवल पुरुषों को वौद्धधर्म के मघ में सम्मिलित करना चाहिए, नारियों को नहीं ? क्या इन निद्धान्त में नारी को हीन ममझने की भावना नहीं छिपी है ? यदि यह मेरा भ्रम हो, तो मैं क्षमाणाधिनी हूँ! माविका श्रम तो है ही ! तयागत को कितनी प्रगंमा अाजकल जन-जन के सुख में सुनी जा रही है ! तथागत-जैसे महात्मा नारीजाति को हीन नहीं समझ सकते । वह स्त्री और पुरुप में भेदभाव नही कर सकते। संभव है, पुरुष को दुर्बलता से परिचित होने के कारण, तयागन नारी- [गति २२] को पुरुप से दूर रखना चाहते हो । पुरुप के हीन स्वार्थ की वलि वन- कर, नारी गृहस्थ-जीवन में बहुधा जैसी नारकीय स्थिति में पड़ी रहती है, वैसी स्थिति की छाया से अपने संघ को बचाने के लिए ही, संभवतः, तथागत ने नारी की प्रव्रज्या पर प्रतिवन्ध लगाया हो। - सुन्दरिका कारण कुछ भी हो, पर, स्त्री और पुरुप की असमानता की भावना पर आधारित कोई भी नियम चिरस्थायी नहीं हो सकता। एक भारतीय नारी के रूप में मेरे हृदय में जो दृढ़ आत्मविश्वास है, भविष्य के प्रति जो आस्था है, उसके सहारे मैं डंके की चोट यह कह सकती हूँ कि समदर्शी और न्यायप्रिय तथागत किसी दिन इस तिवन्ध को अवश्य समाप्त कर देंगे और पुरुष की भाँति ही नारी को भी भिक्षुणी वनकर धर्मसंघ में सम्मिलित होने की अनुमति देंगे। 2।। . माधविका परन्तु, मेरी वह विवाहवाली बात तो अधूरी ही रह गई। क्या तुम अपने माता-पिता से विवाह के प्रश्न पर विद्रोह करोगी? क्या तुम उनकी आज्ञा की अवहेलना करके सदा अविवाहित ही रहोगी? सुन्दरिका यह तो मैंने नहीं कहा वहन ? मैंने तो अपना एक विचार कट किया था । चिन्तन के गर्भ से नम्रता का जन्म होता है द्दण्डता का नहीं.। यदि माता-पिता का आग्रह ही होगा, तो उनक पाज्ञाकारिणी पुत्री के रूप में मुझे उनका करना ही पड़ेगा। अनुशासन स्वीक अंक १: दृश्य १ ] [ २३ माधविका कैसी भलो है मेरी सहेली ! अच्छा सली, यह तो बतायो कि वर- के निर्वाचन के सम्बन्ध में नहाराज के हृदय का असमंजस कैसे दूर हो सकता है ? सुन्दरिका कैसा असमंजस? माधविका महाराज उस दिन महारानी से कह रहे थे कि अपनी राजकुमारी सुन्दरिका के विवाह के लिए हम कपिलवस्तु के शापय नरेश शुद्धोदन पुत्र तथा गौतम बुद्ध के भाई राजकुमार नन्द को चुनना चाहते हैं । गौतम बुद्ध के राज्यत्याग के वाद अब गौतम नन्द हो गौतम शुद्धोदन के राज्य के उत्तराधिकारी हैं । किन्तु, नन्द को स्वीकार करने में एक बहुत बड़ा भय है। सुन्दरिका वह क्या? माधविका महाराज को यह भय है कि कहीं राजकुमार नन्द भी तमामत गौतम बुद्ध की प्रेरणा से प्रभावित होकर उनकी नाति ही निसुन बन जायें। सुन्दरिका यह भय तो प्रत्येक व्यक्ति के सम्बत्व में ही बना है। लिागी क्या आए-दिन यह नहीं सुनते कि एक के बाद एक, नरिक और शासक, राजा और राजकुमार, दयानन' मांगने लहर भिक्षु बनते जा रहे हैं ? तथागत गौतम ने इन देशाला की का शान्तिपूर्ण, किन्तु क्रातिकारी, लहर सत्र कर गई। बाद से बचना दिन-पर-दिन कितना कनि हदा कान्हा ई! द्धि, वास्तविक बात तो कुछ और ही है वहन ! नन्दिा अनुदार विश्वास नहीं है।

२४ ] [ गौतम नन्द - क्यों माधविका तुमपर अविश्वास का तो कोई प्रश्न उत्पन्न नहीं होता। सुन्दरिका। नहीं होता? क्या यह मुझपर, मेरी सारी क्षमता पर, सरासर अविश्वास नहीं है कि वह यह समझते हैं कि मेरे विवाह के बाद, मेरे जीते-जी, मेरे पति मुझे छोड़कर संन्यास ग्रहण कर सकते हैं ? यह तो मेरे नारीत्व का, मेरे भावी पत्नीत्व का अपमान है। खेद है कि स्वयं मेरे जन्मदाता पिता ने मुझे नहीं समझा। उन्होंने नहीं समझा कि एक भारतीय नारी के रूप में मुझमें एक विशेष क्षमता है, जो मुझे इतिहास से थाती के रूप में मिली है। 1 । । माधविका विशेप क्षमता कैसी ? सुन्दरिका एसा कि मैं अपने पति में अपने आपको उसी तरह विसर्जित कर दे सकती हूँ, जिस तरह सीता ने अपनेको राम . में कर दिया था। क्या सीता के जीते-जी राम का संन्यासी हो सकना सम्भव था? खेद है, वहन, आज की नारी, सम्भवतः, प्राचीन.. युग-की नारी से कुछ भिन्न स्तर, भिन्न कोटि पर उतरने का उपक्रम करने लगी है। यह मेरी समझ में नहीं आता कि. मेरी माता..के. रहते मेरे पिता -संन्यास ग्रहण करने की बात कैसे सोच रहे हैं और सौभाग्यवती यशोधरा देवी के रहते राजकुमार सिद्धार्थ घर छोड़कर कैसे जा M सके ! माधविका पूजनीया महारानी तथा माननीया यशोधरादेवी के सम्बन्ध में ऐसी असम्मान की भाषा बोलना तुम्हें शोभा नहीं देता सुन्दरिका ! तुम्हारा यह अभिमान तुम्हारे योग्य नहीं है ।

प्रक१:दृश्य १] [२५ सुन्दरिका अन्याय न करो माविका ! मेरा प्राशय उन पूज्य महिलामो का अपमान करने का नहीं है ! और अपना अहकार प्रकट करने का तो कदापि नहीं ! मैं तो केवल युग-परिवर्तन की एक बात कह रही थी। एक वह युग था कि पत्नी सीता ने अपने पति राम के हृदय पर अपने निःस्वार्थ पोर तन्मय प्रेम और सम्पूर्ण तया नि.शेप पात्म- समर्पण से ऐसा भधिकार प्राप्त कर लिया था कि राम को चौदह । वर्ष का यनवास पोर तपस्वी का कठोर जीवन तो सा था, किन्तु, सीता का एक क्षण का वियोग भी अमह्म। पतिप्रागा मोता से बिछुडते ही राम किस प्रकार पेडो और पशु-पक्षियों तक मे लिपटकर रोए थे! याद है वह कहानी ! मेरा अादर्श नो वही प्रेममयो पत्नी मीता है। मैं तो पली के वियोग की कल्पना-मात्र से प्रत्येक पति की प्रांतों में राम के वही अविरल प्रामू उमहते देखना चाहती हूँ। माधविका तव तो महाराज का मसमजस निराधार है। वह नही जानते कि राजकुमारो सुन्दरिका के रूप में उन्होंने कितनी महिमामय नारी को जन्म दिया है। सुन्दरिका हीनता (-11 प्रश्न महत्ता का नही, लघुता का है । मैंने जो कुछ पड़ा और मोचा है, उससे में इस परिणाम पर पहुंची हूं कि सामान्य मे मामान्य नारी भी जब अपने सारे महकार, महता मोर पृथक्ता के भाव को छोड़कर अपने तन्मय और नि:स्वार्थ प्रेम के द्वारा अपने मापे को अपने प्रियतम पति मे विसर्जित कर देवी है, तब स्वभावतः उसे यह मसाधारण अधिकार प्राप्त हो जाता है कि उसका पति भी उसमें पूर्णतया तन्मय हो मोर उसके बिना अपने जीवन को निरर्यक समझे। ) २६ ] [ गोतम नन्द माधविका तो अब मैं जाऊँ और जाकर महारानी के द्वारा महाराज के पास यह सन्देश पहुँचवाऊँ कि उनकी पुत्री सुन्दरिका ऐसी धातु की बनी हुई है कि उसके जीते-जी यह असम्भव है कि राजकुमार गौतम नन्द, उससे विवाह करके, उसे छोड़कर संन्यासी हो जायें ? सुन्दरिका मुझे इतना महत्त्व न दो माधविका ! मैं एक सामान्य नारी पिताजी, माताजी, तथागत गौतम और देवी यशोधरा के चरणों की धूल की बराबरी भी मैं नहीं कर सकती, किन्तु, कभी-कभी ऐसा होता है कि बड़े जिस छोटी-सी वात को अपने बड़प्पन के कारण नहीं समझ पाते, उसे छोटे अपनी लघुता के कारण समझ जाते हैं। माधविका कौन-सी छोटी-सी वात ? सुन्दरिका ऐसी कई बातें हैं। मेरा हृदय कहता है कि यदि भिक्षु बनना उचित है, तो वह सदा उचित होना चाहिए। जो संन्यास पिताजी 'स्वयं ग्रहण करना चाहते हैं, वह यदि उचित है, तो उन्हें अपने भावी जामाता के संन्यास-ग्रहण की कल्पना से क्यों कांपना चाहिए ? यदि नारी के अनन्य प्रेम और उसके विवाहित जीवन की शक्ति का पिताजी की दृष्टि में कोई महत्त्व नहीं है, उसपर उन्हें विश्वास नहीं है, तो उन्हें अपनी पुत्री के विवाह की इच्छा क्यों करनी चाहिए और यदि है, तो उन्हें यह भय क्यों होना चाहिए कि उनकी पुत्री अपने प्रेम की सारी शक्ति लगाकर भी उनके भावी जामाता को संन्यास ग्रहण करने से न रोक सकेगी? माधविका और फिर एक बात और भी तो है। राजकुमार गौतम नन्द, अंक १ : दृश्य १] [ २७ नन्द है, सिद्धार्थ नहीं। उनके सरस हृदय, स्नेहपूर्ण स्वभाव और ग्रामोदप्रिय जीवन के यश की सुगन्ध देश-देशान्तर में फैल रही है। हमारी अप्सरा से सुन्दर राजकुमारी को सहयमिणी के रूप में पाकर वह सन्यासी होने का कभी स्वप्न भी न देख सकेंगे। सुन्दरिका पागलपन की बातें न करो सखी! देखो, संध्या की सुन्दरता धीरे-धीरे कैसी सघन होती जा रही है ! ये बातें तो बहुत हो चुकी ! अब कुछ स्वर-साधना भी होने दो ! बहुत दिनो से तुम्हारा कोई गान नहीं सुना । अबकी बार तो वसन्तोत्सव भी सूना ही चला गया ! तुम गाती क्या हो, तुम्हारी तन्मय पाराधना के सूत्र में बँधकर मानो स्वयं भगवती सरस्वती धरती पर साकार होकर उतरने लगती है। कला के वैभव का उच्च शिखर तुम भले ही प्रकट न करो, पर, अपनी प्रात्मसमर्पण की भावना से तुम कला को तन्मयता का अनुभव अवश्य करा देती हो। तुम्हे यह किन शब्दों में बताऊँ, बहन, कि योगियों के निर्वाण और ब्रह्मानन्द से तुम्हारी स्वर-तरंग कम आनन्द देनेवाली नहीं होती। माधविका झूठी प्रशसा से कला की अवनति होती है राजकुमारी ! तुम मुझे इस प्रकार लग्नित न करो ! मैं यह अच्छी तरह जानती हूँ कि संगीत- कला के क्षेत्र में मैं क्या हूँ और तुम क्या हो ! तुम्हारी वीणा की झकार यदि मेरे कण्ठ के स्वर का साथ न दे, तो वह कला के ससार में आधारहीन बटोही की भांति भटकता हो फिरे । यदि तुम्हारा यही आदेश है, तो मैं तुम्हारी वीणा लिए पाती हूं। यदि तुम वीणा वजाने की कृपा करोगी, तो उसके सहारे मैं भी अपना कण्ठ खोलने का कुछ साहस कर सकूगी। TioN

[ गौतम नन्द
।
[माधविका तत्काल जाकर वीणा
ले पाती हैं । उसे सुन्दरिका के हाथ
में देती हैं । सुन्दरिका वीणा बजाती
और माधविका गाती हैं।]
माधविका
[गीत ]
,
भारति, छेड़ो ऐसी तान,
जिससे विषम-व्यया-विष विगलित,
सुखी, सरस यह जगत्-प्रांत हो;
जन-जन के मन-मन में ज्योतित
स्नेह-दीप निम, शान्त हो;
कोमल, करणारा हो करण करण,
मिटे होष, अभिमान ।
भारति, छेड़ो ऐसी तान !
.
मानव-उर के रससागर में
उठे हिलोरें सहृदयता की,
कला-कलाघर की किरणों के
स्पर्शपुलक को
प्राकुलता
हो झंकार श्वास जगतो की,
गान विश्व का प्रारण
भारति, छेड़ो ऐसी तान !
की;
[पट-परिवर्तन ।

दूसरा दृश्य [ कपिलवस्तु में राजकुमार गौतम नन्द का बासस्थान । मध्याह्न।] [राजकुमार गौतम नन्द तया राज- कुमार देवदत्त बैठे हैं। दोनों वार्ता लाप कर रहे हैं। नन्द मित्र देवदत्त, यदि तुम रुष्ट न हो, तो मैं यह पूछना चाहता हूँ कि तुम्हारे मुख पर निरन्तर किसी भयंकर सकल्प को छाया क्यों दिखाई देती है ! देवदत्त मैं तो निरन्तर प्रपना मुख नहीं देख सकता राजकुमार नन्द ! यह तो दूसरे ही जान सकते हैं कि मेरे मुख पर क्या दिखाई देता है। मैं तो केवल इतना ही जानता हूँ कि मेरे मन में एक टूट है। उस २. मन्ताद का मन्थन मुझे निरन्तर व्यस्त-मस्त रखता है। उस दन्द के , ३० [ गौतम नन्द मूल में आदर और द्वेष दोनों हैं। दोनों से प्रेरित दो भिन्न-भिन्न संकल्प हैं। आदर से प्रेरित संकल्प की छाया कोमल है और द्वष से प्रेरित संकल्प की छाया कठोर । कोमलता की छाया मुख पर देख सकना कठिन है, किन्तु, कठोरता की छाया अनायास दिखाई देती रहती है। नन्द अपने अन्तर्द्वन्द्व का रहस्य क्या मुझसे भी छिपाओगे भाई ? देवदत्त तुमसे तो, मित्र, कुछ भी नहीं छिपाया जा सकता । मेरा अन्तर्द्वन्द्व यह है कि गौतम बुद्ध द्वारा प्रवर्तित धर्म पर जहाँ दिन-पर-दिन मेरी श्रद्धा बढ़ती जा रहा है, वहाँ उनके व्यक्तित्व पर मेरा रोष प्रतिक्षण प्रवल होता जा रहा है। मेरी श्रद्धा अन्धी नहीं है, किन्तु, क्रोध अन्धा है। यदि किसी दिन मैं एक बौद्ध भिक्षु बन जाऊँ, तो तुम्हें आश्चर्य न होना चाहिए; यदि किसी दिन बौद्ध धर्म और संघ के सुधार के प्रश्न पर वुद्ध से मेरा विस्मय न होना चाहिए और यदि किसी दिन मैं व्यक्तिगत द्वेष से पागल होकर सिद्धार्थ की हत्या कर डालूँ, तो उस स्थिति में भी तुम्हें आश्चर्य न करना चाहिए। नन्द सिद्धार्थ की हत्या ! ऐसे शब्द मैं नहीं सुन सकता, नहीं सहन कर सकता ! धर्म के पचड़ों से तो मैं दूर हूँ, पर, अपने भाई सिद्धार्थ के व्यक्तित्व के लिए मेरे हृदय में बड़ा प्रेम है, बड़ा आदर है। तुम कैसे विचित्र मनुष्य हो, देवदत्त ! जिन तथागत बुद्ध के धर्म पर तुम्हारी श्रद्धा है, उन्हींके शरीर को तुम नष्ट करना चाहते हो। . .. "देवदत्त धर्म का शरीर से कोई सम्बन्ध नहीं है नन्द ! और धर्म के विषय में भी मैं बुद्ध का अन्ध अनुयायी न बन सकूँगा। मेरे मन की प्रवृत्ति मतभेद हो जाय, तो तुम्हें - अंक १ : दृश्य २] पूर्णता की मोर है और युद्ध को प्रवृत्ति मध्यम माग की पोर । बार भिक्षु बनकर भी मैं गौतम का निरा पिछलग्गू न बनूंगा। मैं बौद्ध धर्म को पूर्ण तया अधिक से अधिक शुद्ध बनाने में लग जाना चाहूंगा और यदि मिद्धार्थ मुझमे महमत न होगे, तो मैं उन्हें छोड़कर भागे बढ़ना चाहूंगा। यही नहीं, मैं उनकी ढीली नीति का घोर विरोधी हूंगा। नन्द तत्त्वचर्चा एक पलग वस्तु है देवदत्त ! उसपर मेरा कोई अधिकार नही, उसमे मेरी कोई रुचि नहीं ! उसके विवाद में मैं नहीं पड सकता, नही पड़ना चाहता। किन्तु, मैं एक मनुष्य हूँ, पोर, मनुष्य होने के नाते, मैं सिद्धार्थ के भ्रातृत्व के स्नेहबन्धन में बंधा हुमा हूँ। उनका भाई होने के नाते, मैं तुमसे यह जानना चाहता हूँ कि उनके व्यक्तित्व के प्रति तुम्हारे मन में क्यो इतना द्वैप है, क्यों तुम उनकी हत्या करना चाहते हो ! तुम मेरे घनिष्ठ मित्र हो, किन्तु, एक भाई का हृदय मुझे विवश करता है कि मैं इस विषय में तुम्हारी कड़ी से कडी निन्दा करू ! देवदत्त और एक भाई का हृदय ही मुझे विवा करता है कि मैं गौतम बुद्ध से अधिक से अधिक टैप करूं मोर अपने स्वाभाविक रोप के कारण, यवसर मिलते ही, उनकी हत्या करने का पल करूं। मेरे भी भाई का हृदय हे नन्द ! मैं यशोधरा का भाई हूँ भोर अपनी साध्वी पली यशोधरा के माय मनुचित व्यवहार करके मिद्धार्थ ने मुझे अपना घोर शत्रु बना लिया है। इस शवता मे उनको धर्म पौर मंघ सम्बन्धी मध्यममार्गो नीति भोर मेरी पूर्णतावादी प्रवृत्ति के कारण और भी वृद्धि होना स्वाभाविक है। नन्द यशोपरा-भाभी के मुख से तो मैंने कभी सिद्धार्य-नया की कोई मालोचना नही मुनी।

३४ ] [ गौतम नन्द R आखेट को न जा सका हूँ। लक्ष्यवेध का अभ्यास छूटा जा रहा है । हर के विना तुम्हारा अतिथि-सत्कार भी अधूरा ही रहेगा। यदि तुम भी मेरे साथ चलने को तैयार हो, तो मृगया का प्रवन्ध कराया जाय । देवदत्त शिकार . - मृगया मेरे लिए अव विस्मृति का विषय बना चाहती है। धीरे- धीरे अहिंसा-धर्म पर मेरा विश्वास बढ़ता जा रहा है। मैं यह समझने में असमर्थ हूँ कि सिद्धार्थकुमार के इतने प्रवल समर्थक होते हुए भी तुम पशु-पक्षियों की हत्या में इतनी अधिक रुचि क्यों प्रकट करते हो ? नन्द इसलिए कि मैं क्षत्रिय हूँ, राजकुमार हूँ, गृहस्थ हूँ; संन्यासी नहीं, भिक्षु नहीं, वर्माचार्य नहीं ! देवदत्त क्षत्रिय और राजकुमार तो मैं भी हूँ, किन्तु, पशु-पक्षियों को मनोरंजन या जिह्वा के स्वाद के लिए मारना मैं अपने क्षत्रियत्व और वीरता के लिए अत्यन्त लज्जाजनक समझता नन्द किन्तु, सम्भवतः, व्यक्तिगत द्वेष या क्रोध के कारण किसी मनुष्य की हत्या का संकल्प करना तुम्हारी दृष्टि में प्रथम श्रेणी का क्षत्रियत्व और वीरत्व है। देवदत्त तुमने फिर वह प्रसंग छेड़ दिया। मैं तुमसे फिर प्रार्थना करता कि तुम सिद्धार्थ के प्रश्न को लेकर मुझसे विवाद करना सदा के लिए छोड़ दो, अन्यथा, हम दोनों की यह मित्रता, जिसे मैं किसी भी मूल्य पर नष्ट नहीं होने देना चाहता, समाप्त हुए विना न रहेगी। नन्द अच्छा, अव भविष्य में ऐसा न होगा। पर, तुम मेरी प्रार्थना -

पंक १ : दृश्य २]
[ ३५
मानकर मृगया के लिए चलना तो स्वीकार कर ही लो ! एक बार
की मृगया ही ने तुम्हारा पहिमा का मकस न टूट जायगा ।
देवदत्त
क्या तुम मृगया के प्राग्रह के बन्धन में मुझे मुक्त नहीं कर सकते ?
इस विषय में तो मुझे क्षमा ही करो, भाई !
नन्द
अच्छा, तो फिर यशोधरा-भाभी की भोर चलो ! कितनी अच्छी
हैं मेरी भाभी ! चलकर उन्ही मे बातचीत करेंगे।
देवदत्त
क्या तुम्हारे पास केवल दो ही मार्ग हैं ? यदि मैं मृगया के लिए
जाना अस्वीकार करू', तो क्या यशोधरा-बहन के मामने जाना
पड़ेगा? अच्छा, तो फिर मृगया ही को पलो। यशोधरा के सामने
जाने में मुझे वडा दुःख होता है। जब-जब वह सामने माती
है, मेरे हृदय पर गहरा मापात पहुंचता है। मेरी वहन यशोधरा
ससार की एक मवमे भधिक दुखी नारी है और सबमे बुरी
बात यह है कि उसका प्रात्मसंयम उसे रो-रोकर अपना दुःस
हलका करने की भी अनुमति नहीं देता। उसके सामने जाते
हो दु.स से मेरी छाती फटने लगती है, वेदना भमा हो उठती
है। यशोधरा के पास जाने में अच्छा तो यही है कि मैं जगल में
जाकर, पागत की भांति, पशु-पक्षियों की हत्या करता फिरू! मधा,
चलो नन्द, मृगया को चलो, मृगया ही को चलो ! भौर कोई मार्ग
ही नही है !
[पट-परिवर्तन।]

तीसरा दृश्य
[ कपिलवस्तु । कुम्भक का वासस्थान । प्रातःकाल । ]
[ कुम्भक तथा कुण्डेश्वरी बैठे
हुए बातचीत कर रहे हैं ]
कुम्भक
उम्र के साथ-साथ तुम्हारी नासमझी भी बढ़ती जा रही है।
पनी बुद्धि की प्रतिष्ठा नष्ट होने को तुम्हें तिल-भर भी चिन्ता नहीं
। तुम कभी यह भी नहीं सोचतीं कि तुम मुझ-जैसे अत्यन्त बुद्धिमान
रोहित, सुप्रसिद्ध याज्ञिक और महान् कर्मकांडी पण्डित कुम्भकाचार्य
शर्मा मध्यममार्गी की धर्मपत्नी श्रीमती कुण्डेश्वरी देवी हो ! तुम अनेक
बार ऐसी भयानक भूल कर बैठती हो कि........
कुण्डेश्वरी
ऐसा क्या कर दिया मैंने ?
कुम्भक
सर्वनाश कर दिया, सर्वनाश ! लड्डुओं का हण्डा और
-

अंक १. रश्य ३] मौमरस का पड़ा पुला रह जाने दिया। इससे दो महाभयानक हानियाँ हो गई। कुण्डेश्वरी महाभयानक हानियाँ ! कुम्भक हो,महानयानक हानियाँ ! घर-भर के चूहे मोर विल्लियां सड्डू खा-साकर मोटे और सोमरम पी-पीकर मतवाले हो गए हैं। दोनों प्रापस का, युग-युग का, मारा वर-विरोप भूलकर, मेरे शत्रु हो गए हैं । मेरे घर-भर में उन्होंने भाजकल, मिल-जुनकर, ऐमी भोपण धमाचौकडी मचा रखी है कि उसके मागे बडे. बडे उपद्रय, बडे-बडे विप्नव पीर वडीबड़ी राज्य-कातियां फोयी पड गई है। कुण्डेश्वरी और दूमरी भयानक हानि ? कुम्भक भयानक नही, महाभयानक कहो । दूसरी महाभयानक हानि यह हुई कि परमप्रिय मोदकों और जीवन मर्वस्व मोमरस के प्रभाव में अपने- १ राम का हाथो-जैसा शरीर धीरे-धीरे मून्न-मूबकर केवल भैसे-जैसा हो रहा जा रहा है । कितनी बार तुमगे कहा कि 'शरीरमा मन धर्मसाधनम्' अर्थात शरीर ही सलो के धर्म का पहला माधन है । अरे, मरे, भूल हो गई ! खलु प्रति गलों का नहीं, मनु पर्यात वास्तव मे, वास्तव में, वास्तव में । हाँ, तो मेरा माशय यह था कि परीर ही वास्तव में धर्म का पहला साधन है । मैंने तुमसे कितनी धार कहा कि मेरे प्यारे शरीर के विकास के मार्ग में, मेरे खाने-पीने के कार्यक्रम में, कभी कोई बाधा न पड़ने दिया करो!

३८ ] [ गौतम नन्द ~ कुण्डेश्वरी ऐसी क्या बाधा पड़ गई? कुम्भक साधारण बाधा नहीं; महाभयानक वाधा ! मैं कह तो चुका तुमने अपनी असावधानी से घर के चिरसंचित समस्त मोदक और सेंगाल-रॉगालगार रखा गया सास सोमरस रहे बिल्लियों से चट करा दिया । उन्हीं दोनों पदार्थों के सहारे तो मेरा यह शरीर दिन- पुना और रात चौगुना विकसित हो रहा था। अब तो यह उनके धिरह में धीरे-धीरे सुखता जा रहा है। हाय, अवं मेरा व्यवसाय कसे चलेगा? कुण्डेश्वरी क्यों ? व्यवसाय क्यों नहीं चलेगा? कुम्भक शरी नासमझ, आजकल के यजमान उसी याज्ञिक को यज्ञ कराने से बुलाते हैं, जिसका शरीर सबसे मोटा होता है । इस ग में गुटापा ही पाण्डित्य का मुख्य चिह्न समझा जाता है, राण्डित्य ही धर्म हा ठोस साधन और धर्म ही धन्धे का मूलाधार । री भद्रा, तुमने मेरा धंधा चौपट कर दिया ! आजकाल मुझे सभण बहुत ही कम मिल रहे हैं । अव यह पांच लड़कों और आर. लड़कियों .जी. विराट् गृहस्थी कसे चलेगी? मेरा तो रोने को हि चाहता है, रोने को ! अपने युग का सबसे महान् कर्मकाण्डी म्भक शर्मा तुम्हारी आसावधानी से धूल में मिला चाहता है ! प, सब पया होगा? कुण्डेश्वरी भग्छ पुरुष हुए हो तुम ! पुरुषार्थ के बदले रुदन का पल्ला पकड़ना हते हो!

मंक १ : दृश्य ३] [३२ कुम्भक परी भद्रा, रोऊँ नहीं, तो क्या कर? अभी मैं जीवन के पिछले एक झटके से तो मभला ही न था कि यह दूसरा नया मटका मा गया। पहले मटके की तोड़ निकालने में मेरे तीस दिन युल गए थे, पूरे तीन दिन ! वय ही जाकर विगढ़ता हुमा खेल फिर से बना था ! वात यह हुई थी कि उन दिन अचानक मेरे एक मुत्य यजमान महाराज शुद्धोदन ने मुझसे कह दिया था कि प्रव प्राप पन कराने न माया करें; यज्ञ में पशु-वलि को प्रया है और राजकुमार सिदार्थ के परिव्राजक होकर अहिंसा का प्राग्रह करने के कारण हमारी रुचि प्रव पशुबति में विलकुल नही रही है। और कोई होवा, तो निराश होकर बैठ रहता, किन्तु, मालूम है, अपने राम ने क्या किया? कुण्डेश्वरी क्या ? कुम्भक पूरे वीम दिन तक इतने वेग से चिन्तन को धुरी पर मस्तिष्क के चक्र को दौड़ाया कि इस पहाड़ से शरीर से पसीने की धारे टूटने लगी। मन्त में समस्या का समाधान मूक ही तो गया। हमने भट महाराज शुद्धोदन से जाकर कह दिया कि कर्मकाण्ड और यज्ञ वसपरम्परागत है, वे किसी भी प्रकार बन्द नहीं किए जा सकते और पज्ञ मे पशुवलि की प्रथा भी सनातन है, उसे भी नहीं मिटाया जा मुकता । सारे मायोजन पहले की भांति ही चलेंगे, केवल इतना अन्तर होगा कि रक्त मास के पापो के बदले पगुमो को प्राटे को पूरे प्राकार को मूर्तियां बनवाकर उनकी बलि दी जाया करेगी। इससे पूर्वजो की प्रया भी न मिटेगी भोर सिद्धार्यकुमार का अहिमा का सिद्धान्त में बना रहेगा।

४०]
[ गौतम नन्द
कुण्डेश्वरी
फिर क्या हुमा
?
कुम्भक
और क्या होता? हमारी इस समन्वयवृत्ति, इस मध्यममार्गी
व्यवस्था से महाराज शुद्धोदन और उनकी सारी राजसभा गद्गद
हो गई । हमारे लिए सौ-सौ कण्ठों से 'धन्य, धन्य' की ध्वनि निकल
पड़ी। उसी समय हमारी पूरी नाम-उपाधि 'श्रीमान् पण्डित कुम्भका-
चार्य शर्मा मध्यममार्गी' स्वीकार की गई। हमारा याज्ञिक का, पुरो-
हित का, वंशपरम्परागत व्यवसाय नष्ट होते-होते बच गया । अरी भद्रा,
अव दूसरा संकट तुमने उत्पन्न कर दिया है ।
कुण्डेश्वरी
मुझे दोष देना तो तुम्हारा स्वभाव ही बन गया है।
कुम्भक
मैं दोष नहीं दे रहा । पुरोहित का व्यवसाय तभी तक चल
सकता है, जब तक उसका व्यक्तित्व प्रभावशाली हो। मोटा शरीर
और सूक्ष्म बुद्धि, इन्हीं दो पहियों के सहारे प्रभाव की गाड़ी चलती
है। तुमने इनमें से एक को चकनाचूर करने का यत्न किया है। अब
केवल एक पहिये के सहारे व्यवसाय की गाड़ी कैसे चलेगी? दुबले-
पतले पुरोहित को अाजकल कोई नहीं पूछता, कोई नहीं बुलाता।
स्थूल शरीर ही का यजमान पर प्रभाव पड़ता है। हाय, अब मेरा
व्यवसाय कैसे 'चलेगा!
कुण्डेश्वरी
अपनी सूक्ष्म बुद्धि का भी तो तुम्हें बड़ा अभिमान है। फिर,
निकालो कोई अच्छा मार्ग !
कुम्भक
झूठा अभिमान नहीं है मुझे ! नई-नई तिकड़में खोज निकालने में
मेरी सूक्ष्म बुद्धि की वरावरी कर सकनेवाले संसार में बहुत कम

मंक १ :दृश्य ३]
[४१
निकलेंगे ! यौवन में प्रवेश करने के पहले मैं केवल कुम्भक बटुक
कहलाता था। अपनी मूक्ष्म बुद्धि के महारे हो धीरे-धीरे कहलाने लगा
कुम्भकाचार्य शर्मा और इसीके बल पर एक दिन बन गया श्रीमान
पण्डित कुम्भकाचार्य शर्मा मध्यममार्गो । बलिप्रधान कर्मकाण्ड और शुद्ध
महिमा, दोनों को एक माय निभाना मिह और गाय को एक पाट
पर पानी पिलाना है । मुझे छोड़कर और किसमें ऐमी प्रतिभा हो
सकती थी कि संसार का यह अद्भुत चमत्कार करके दिखलाता!)
कुण्डेश्वरी
ऐसा ही कोई चमत्कार इम वार मोर करके दिखलामो, तब
जानू !
कुम्भक
यदि दिसलाऊँगा नहीं, तो मुरा के मुख को भौति बढते जानेवाले
परिवार को क्या सिलाऊँगा? प्रच्छा, एक काम करो !
कुण्डेश्वरी
क्या ?
कुम्भक
मुझे उठाकर मुला दो ! नगर में यह ममाचार प्रचारित करा दो
कि मुझपर किसी रोग ने माक्रमण किया है । ऋण के सहारे घर में
लड्डुमों मोर सोमरम के संचय का फिर से प्रवन्ध करो। कुछ दिनो
तक मुझे सुले हाथ से पिलाने-पिलाने की व्यवस्था करो और इतने
गुप्त रूप से करो कि किसीको पता न चले। जिस समय लोग
महानुभूति प्रकट करने मावें, उस समय रोग का अभिनय मैं कह'
मौर रुदन का अभिनय तुम करो मोर जब वे चले जायं, तब भीतर
में किवाड़ बन्द करके मुझे भरपेट मोदक सिलामो । ऊपर से
एककर सोमरस पीने दो!
कुण्डेश्वरी
समसे क्या होगा?

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पहला दृश्य
[कपिलवस्तु की सीमा से लगा हुआ वन । दिन का तीसरा पहर 1]
[ मगया की वेशभूषा तया सन्ना में
नन्द पोर सुन्दरिफा वार्तालाप करते
हुए प्रवेश करते हैं।
नन्द
कभी-कभी संयोगवा किसी विचित्र स्थान पर विभिन्न स्थितियों
के व्यक्ति एक-दूसरे के साथ हो जाते हैं ! मान भी ऐसा ही
हुमा है। पचानक इस निर्जन वन में मापफा मौर मेरा साप
हो गया, पर, यह मपरिचितों का माय है। यदि मापको कोई
मापत्ति न हो, तो कृपया मुझे एक बात जानने का अवसर
दीजिए।
सुन्दरिका
स्या?

४६]
[ गौतम नन्द
नन्द
आपका शुभ नाम क्या है ?
सुन्दरिका
नाम बताने में किसीको क्या आपत्ति हो सकती है ? मेरा नाम
सुन्दरिका है।
नन्द
सुन्दरिका ! राजकुमारी सुन्दरिका !
सुन्दरिका
क्या मनुष्य होना पर्याप्त नहीं है ? क्या राजकुमारी होने का कोई
विशेप महत्त्व है ?
नन्द
क्षमा कीजिए ! पूरे परिचय के लिए मेरे मुंह से 'राजकुमारी'
शब्द निकल गया!
सुन्दरिका
आपने तो मेरा पूरा परिचय पा लिया। पर, मुझे तो अभी तक
अापका अधूरा परिचय भी नहीं मिला । क्या आपको अपना शुभ नाम
वताने में कोई आपत्ति है ?
नन्द
नहीं तो ! मुझे आपत्ति क्यों होने लगी ! मेरा नाम नन्द है।
सुन्दरिका
नन्द ! महाराज शुद्धोदन के पुत्र, राजकुमार नन्द !
नन्द
क्या मनुष्य होना पर्याप्त नहीं है ? क्या 'महाराज शुद्धोदन के पुत्र,
राजकुमार' होने का कोई विशेप महत्त्व है ?

अंक २: दृश्य १]
सुन्दरिका
क्षमा कीजिए ! मुझने भी वही भूल हो गई। पूरे परिचय के
लिए मेरे मुन मे वे शब्द निकल गए।
नन्द
पर, पूरा परिचय तो अभी बहुत दूर है। मनुष्य के पूरे जीवन मे
भी किमीको उसका पूरा परिचय नहीं मिल पाता।
मुन्दरिका
हम लोग बहुत चल चुके ! अव तो पाप थक गए होगे !
नन्द
में पका तो नहीं हूं। पर, इसमे कोई सन्देह नहीं कि हम बहुत
पल चुके हैं । कुछ देर रुक लेने में कोई हानि नहीं । विश्राम के लिए
यह स्थान बुरा भी नहीं है।
मुन्दरिका
बुरा क्यों होने लगा ! मुझे तो यह स्थान पन्छा ही लग रहा है ।
[ दोनों बैठकर बातचीत करने लगते हैं। ]
नन्द
में जब मृगया के लिए इस वन में पाया, तब मुझे यह कल्पना
'न थी कि पाप-जैसी कोई राजकुमारी भी पानेट के लिए इसी वन में
माई होगी।
सुन्दरिका
मृगया पर तो राजकुमारो ही का अधिकार है न, कोई कुमारी
मागेट के लिए वन मे पाने की धृष्टता कर ही कसे मकती है !
नन्द
क्षमा पीजिए ! मेरा शाशय यह नही था कि कुमारो मोर
फुमारियों के अधिकारी में मन्तर होना चाहिए। मैं तो अपना
.
-
F

४८ ] [ गौतम नन्द स्वाभाविक आश्चर्य प्रकट कर रहा था। उससे भी बढ़कर एक आश्चर्य मुझे और हुआ। सुन्दरिका । वह क्या ? नन्द मैंने आपके अद्भुत साहस, शक्ति और वीरता का परिचय पाया। पहले ही वारण से सिंह को मार गिराना आप ही का काम था। आप-जैसी वीरांगनाएँ भारत के लिए वास्तव में गौरवस्वरूप हो सकती हैं। सुन्दरिका इतना बड़ा असत्य-कथन प्रापको शोभा नहीं देता। मेरा बारा लगने के पहले ही आपका खड्ग उस सिंह के दो टुकड़े कर चुका था। मुझे आश्चर्य है कि आप खड्ग के पहले ही-प्रहार से. सिंह को कैसे मार सके ! इतना साहस, इतनी शक्ति और इतनी वीरता तो मैंने इसके पहले किसी पुरुष में नहीं देखी। नन्द इस प्रश्न पर विवाद करने के बदले हमें समझौते का मार्ग अप- नाना चाहिए। लीजिए, मैंने समझौते का उपाय सोच लिया। सुन्दरिका क्या? नन्द हम दोनों को एकमत होकर यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि हमें एक-दूसरे के इस वन में होने की कोई कल्पना न थी। अचानक सिंह मेरे सामने आ गया। मृगया में मेरे तूणीर के सारे वाण उसके पहले ही समाप्त हो चुके थे। इसलिए, मुझे सिंह पर अपने खड्ग से

पा
अक २: दृश्य १
18
प्रहार करना पड़ा । उपर ग्राप सिंह का पौधा करती हुई पा रही थी।
मेरे सड़ग के साथ ही आपका वाण भी सिंह के शरीर को बैधार एक
पोर से दूसरी पोर निकल गया ।
सुन्दरिका -
पर, सिंह मरा तो पाप ही के सज के प्रहार में।
नन्द
नहीं, दोनों का सम्मिलित प्रहार एक-साय होने में भरा।
सुन्दरिका
यह तो भाप केवल समझौते के लिए कह रहे हैं।
नन्द
(जीवन भोर संसार में सदभावनापूर्ण समझौते का बहुत बड़ा
महत्त्व है। जिसे इस जगत् में जीवन भर अकेला रहना हो, पही
समझौते की मत्ता को अस्वीकार कर सकता है।
सुन्दरिका
मुझे रह-रहकर यह विचार दुखी कर रहा है कि माज को इस
मृगया में मेरी सखी माधविका मुझमे विद्युड गई है।
नन्द
मैं भी सिन्न हूँ कि मेरे मित्र देवदत्त पाज के मासेट में मुझसे
मलग हो गए हैं। पर, चिन्ता करने से कोई लाभ नहीं । कुछ देर
यही ठहरना चाहिए। सम्भव है, दित छिपने के पहले दोनों हमें
केंदते-इते यही मा पहुंचे। अच्छा, यह तो यताइए कि मृगया
को मोर मापकी रुचि कैमें हुई ?
सुन्दरिका
मेरे पितात्री भामेट के बिना एक दिन भी नहीं रह सकते थे।
उनका मुझपर स्नेह भी बहुत था। जब-जब वह मृगला के लिए नि:-
सते, तब-तव में उनके साथ जाने का हर करती । दिया
--

४८] [ गौतम नन्द स्वाभाविक पाश्चर्य प्रकट कर रहा था। उससे भी बढ़कर एक आश्चर्य मुझे और हुआ। सुन्दरिका । वह क्या ? नन्द मैंने आपके अद्भुत साहस, शक्ति और वीरता का परिचय पाया। पहले ही बाण से सिंह को मार गिराना आप ही का काम था। आप-जैसी वीरांगनाएं भारत के लिए वास्तव में गौरवस्वरूप हो सकती हैं। सुन्दरिका इतना बड़ा असत्य-कथन आपको शोभा नहीं देता। मेरा वारा लगने के पहले ही आपका खड्ग उस सिंह के दो टुकड़े कर चुका था। मुझे आश्चर्य है कि आप खड्ग के पहले ही. प्रहार से सिंह को कैसे मार सके ! इतना साहस, इतनी शक्ति और इतनी वीरता तो मैंने इसके पहले किसी पुरुष में नहीं देखी। नन्द इस प्रश्न पर विवाद करने के बदले हमें समझौते का मार्ग अप- नाना चाहिए । लीजिए, मैंने समझौते का उपाय सोच लिया। सुन्दरिका क्या? नन्द हम दोनों को एकमत होकर यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि हमें एक-दूसरे के इस वन में होने को कोई कल्पना न थी। अचानक सिंह मेरे सामने आ गया। मृगया में मेरे तूणीर के सारे वारण उसके पहले ही समाप्त हो चुके थे। इसलिए, मुझे सिंह पर अपने खड्ग से ल अक २: दृश्य.] [ ४३ प्रहार करना पड़ा । उधर प्राप सिंह का पीछा करती हुई पा रही थी। मेरे खड्ग के साथ ही मापका वाण भी सिंह के शरीर को बंधकर एक प्रोर से दूसरी पोर निकल गया। सुन्दरिका - पर, सिंह मरा तो पाप ही के सड़न के प्रहार गे नन्द नहीं, दोनो का सम्मिलित प्रहार एक-साय होने ने मरा । सुन्दरिका यह तो माप केवल समझौते के लिए कह रहे हैं। नन्द (जीवन मोर संसार में सद्भावनापूर्ण समझौते का बहुत बडा महत्त्व है। जिसे इम जगत् मे जीवन भर अकेला रहना हो, वही समझौते की सत्ता को अस्वीकार कर सकता है। सुन्दरिका मुझे रह-रहकर यह विचार दुसी कर रहा है कि प्राज को इस मृगया मे मेरी सपी माधविका मुझने विद्युड गई है । नन्द मैं भी सिग्न हूँ कि मेरे मित्र देवदत्त पाज के मामेट मे मुझसे अलग हो गए हैं। पर, चिन्ता करने से कोई लाभ नहीं । कुछ देर यही टहरना चाहिए। सम्भव है, दिन छिपने के पहले दोनो हम टूढते--इते यही पा पहुंचे। अच्छा, यह तो बताइए कि मृगया की मोर पापको रुचि कैसे हुई ? सुन्दरिका मेरे पिताजी मामेट के बिना एक दिन भी नहीं रह सकते थे। उनका मुझपर स्नेह भी बहुत था। जब-जब वह मृगया के लिए निक- लते, तब-तब मैं उनके साथ जाने का हठ करती । विवश होकर उन्होने

'५० ]
[ गौतम नन्द
मुझे मृगया का अभ्यास कराया और वह हर बार मुझे अपने साथ
पामेट को ले जाने लगे।
।
नन्द
पर, पाज तो आपके पिताजी आपके साथ नहीं पाए ।
मुन्दरिका
बहुत दिनों से वह नामेट न करने का व्रत ले चुके हैं।
नन्द
पयों?
सुन्दरिका
तथागत गौतम बुद्ध के अहिंसा के प्रवचनों का उनपर गहरा प्रभाव
पड़ा है।
नन्द
तथागत की महिमा ऐसी ही है। उनके सम्पर्क में जो कोई आता
है, वह उनका अनुयायी बन जाता है। अापके पिताजी भी मेरे
पिताजी ही के मार्ग पर पा गए हैं।
सुन्दरिका
क्यों ? क्या महाराज शुद्धोदन ने भी मृगया का परित्याग कर
'दिया है ?
नन्द
हो, बहुत दिनों से। वह तो मुझे भी रोवाना चाहते थे, पर
मैने उनसे क्षमा प्रार्थना कर ली। मुझसे तो मृगया के बिना नहीं
रहा जाता।
मुन्दरिका
मेरी भी यही दशा है। पिताजी ने मुझसे स्पष्ट शब्दों में पाह
दिया कि मैं मृगया के लिए जाना बन्द कर दूं। बहुत प्रार्थना करने
पर इस प्रतिवन्ध के साथ अनुमति दी कि मैं बहुत ही थोड़ी संख्या में
पशुओं का संहार करू और यह भी केवल हिंस पशुओं का ।

प्रक २ :हस्य १]
[५१
नन्द
हम दोनों को एक ही सी स्थिति है । मुझपर भी यही प्रतिस्प
लगा दिया गया है । इसका एक फल यह हुपा है कि गाकाहारी बन
जाना पड़ा है । वन में मृगया के लिए माने पर मुख्यतया प्रति के
वरदानम्वरूप वन्य फलो ही पर निर्भर रहना पच्छा लगता है। भाज
भी मेरे पास केवल कुछ फल ही हैं। मृगया में परिश्रम के कारण
भूस अधिक लगती है । गमय भी बहुत अधिक हो चुका है । माप
यदि अनुमति दे, तो कुछ फल प्रापको भी अपित कम्।
मुन्दरिका
भव मेरी थकान उनर चुकी है और में जाना चाहती हूँ। अब तो
पर पहुँचकर ही भोजन करूंगी।
नन्द
क्या अपनी महेली की प्रतीक्षा न कीजिएगा? देखिए, पन की
मृगया का साथी कठिन समय मोर कठिन स्वान का गायी होता है;
उससे इतना अधिक सकोच करना उचित नहीं होता । पापको मेरी
यह तुच्छ भेट स्वीकार करनी चाहिए।
निन्द प्रपने मृगया के वस्त्रों में से कुछ फल
निकालकर नन्दरिका के मामने रखते हैं ।
मुन्दरिका सफुदाती हुई उनमें से एक
फल लेती हैं।
मुन्दरिका
माप भी तो चाइए ! क्या अधिक श्रम मैंने ही किया है, मापने
नही? क्या अधिक समय मेरे ही लिए हमा है, पापके लिए नहीं ?
[नन्द एक फल लेकर पाने लगते हैं।
मन्दरिका नो एक प्ल पाती हैं। ]
नन्द
वन-भोजन इन्द्रपुरी में पकवानों से भी मधुर होता है।

। . ५२] [ गौतम नन्द दो व्यक्ति मिलकर वन-भोजन करते हैं, तव तो उसकी मधुरता दूनी हो जाती है। सुन्दरिका यदि हम दोनों के विछुड़े हुए दोनों साथी और मिल जाते, तो यह मधुरना चौगुनी हो जाती। मेरी सम्मति में, आधार के लिए एक-एक फल खाना ही पर्याप्त होगा। शेप फल उन लोगों की प्रतीक्षा में रख देना उचित होगा। नन्द मैं भी इस विषय मैं आपसे सहमत हूँ । (कुछ रुककर) क्षमा कीजिए, मुझे अपने विषय में भी आपसे एक वात और कहनी है । बड़ा संकोच हो रहा है कहने में, पर, यदि आप अनुमति दें, तो मैं इस समय आपसे वह बात कह देना चाहता हूँ। क्षमा कीजिए, उसपर मेरा जीवन निर्भर है । वह एक ऐसी बात है कि यदि जीवन में उसे कभी कहना ही हो, तो उसके लिए आज के इस अवसर से अच्छा अवसर कभी नहीं मिल सकता । सुन्दरिका ऐसी क्या बात है ? कहिए ! संकोच की क्या आवश्यकता है ! तन्द संकोच तो होता ही है । वहुत संकोच हो रहा है । ऐसे विषय में संकोच होना स्वाभाविक भी है । पर, वह बात कहना भी आवश्यक है। बात यह है कि मैंने अपने पिताजी से सुना था कि आपके पिताजी आप-जैसे नारीरत्न के योग्य मुझ अकिंचन को समझकर, मुझे जीवन का महान् सौभाग्य देना चाहते हैं । सुन्दरिका मैंने भी अपने पिताजी से सुना था कि आपके पिताजी मुझे आपके........... - अक २ : दृश्य १) [५३ नन्द विवाह के सम्बन्ध में दोनों के गुरुजनों के सन्देश तो एक-दूसरे तक पहले ही पहुंच चुके हैं । आज मुझे भी मनायास यह सौभाग्य मिल गया है कि मैं स्वयं भी आप तक अपना मनुरोध पहुंचा सकू। सुन्दरिका यथासमय स्वच्छ हृदय मे विवाह का स्पप्ट प्रस्ताव करने में कोई बुराई नहीं होती। स्थिति अनुकूल प्रतीत होने पर भी विवाह के मम्बन्ध मे प्रस्ताव करने में जो सकाच होता है, उसे मैं व्ययं समझती हूँ। आपने अपने मन की बात मुझसे कह दो, इसके लिए मैं मापको धन्यवाद देती हूँ। पर, मैं ग्रापको बता देना चाहती हूं कि यह मम्भव नहीं है। इस बात को धागे वढाने में कोई लाभ नहीं । क्षमा कीजिए, अव में जाती हूँ । ममय बहुत हो गया। यदि माविका पापको कहीं मिल जाय, तो, कृपया उसे मीधे मेरे घर जाने को कह दीजिएगा ! नन्द ठहरिए, कुछ तो और ठहरिए ! मापके इस व्यवहार को, इन उपेक्षा को मैं समझ नहीं पा रहा हूँ। मुझमे पापको ऐमा क्या दोष दिखाई दिया कि आप मेरी प्रार्थना को इस प्रकार अस्वीकार कर सुन्दरिका स्पष्ट कथन के लिए मुझे क्षमा कीजिए । पाप उमी शाक्य पस के राजकुमार हैं, जिसके युवराज मिझार्थकुमार निरपराध महादेवी वगोधरा को छोड़कर जा चुके हैं मोर जिसके महाराज शुद्धोदन मपनी धर्मपत्नी पुण्यशोला प्रभावतीदेवी का परित्याग करके प्राग्या ग्रहण करने का विचार कर रहे हैं। नन्द पया यही तुम्हारा न्याय है मुन्दरिका ! क्या केवल एक कुल में जन्म लेने हो में सब व्यक्ति एक से हो जाते हैं ? बहुत दिनों में मैं !

[ गौतम नन्द
सकता, जव तक उसमें किसी समझदार सहेली की सम्मति न ले ली
गई हो!
सुन्दरिका
तुम तो ऐसी विछुड़ीं, माधविका, कि पता ही न चला। तुम्हारे
आने से बड़ी प्रसन्नता हो रही है ! कितनी देर से हम दोनों तुम्हारी
प्रतीक्षा कर रहे थे!
माधविका
तुम अभीसे एक के बदले दो की भाषा बोलने लगीं ! तुम भले
ही प्रतीक्षा कर रही हो; राजकुमार गौतम नन्द को क्या पड़ी थी कि
मेरी प्रतीक्षा करते !
नन्द
आते ही आप मुझपर अकारण रोप क्यों प्रकट करने लगीं ? मैंने
ऐसा कौन-सा अपराध किया है ?
माधविका
अपराध ? आपका सारा कुल नारी की अवहेलना का सर्वविदित
अपराधी है।
नन्द
अव उस प्रश्न को न उठाइए ! उसपर बहुत विवाद हो चुका है
और मैंने शपथपूर्वक प्रतिज्ञा की है कि मैं कभी इनका साथ न छोड़ गा,
कभी भिक्षु न वगा, कभी संन्यास न लूगा।
माधविका
और इन्होंने आपकी प्रतिज्ञा पर विश्वास कर लिया ?
नन्द
यह तो इन्हींसे पूछिए !
माधविका
क्यों सखी?

मक २: दृश्य १] [ ५७ सुन्दरिका मुझे इनपर पहले से विश्वास था सखो, क्योकि, अपने-माप पर विश्वास था । इस विषय में अपने प्रात्म-विश्वास की बात मैं तुमसे पहले ही कह चुकी थी। फिर भी, परीक्षा के रूप में, प्रव्रज्या के प्रदन को छेड़कर, मैं इनसे अभी-अभी वचन ले चुकी हूँ। अब इनके और मेरे बीच में कोई अन्तर नहीं रह गया है। माधविका तब तो वास्तव में बड़ी प्रसन्नता की बात है ! अब तो यह सोचना पड़ेगा कि इस मगलमय अवसर पर हार्दिक प्रसन्नता प्रकट करने का पपा उपाय किया जाय । नन्द वास्तव में इससे बढ़कर प्रसन्नता का क्या अवसर हो सकता है ! दो हृदयों का सदा के लिए एक-दूसरे के ममत्व के बंधन में बंधने का निश्चय करना जीवन की सबसे अधिक हपंप्रद और सबसे अधिक महत्त्व- पूर्ण घटना होती है। [दूसरो प्रोर से मृगया की वेशभूषा पौर सजा में देवदत्त का प्रवेश । देवदत्त कौन किसके ममत्व के बंधन में बंध रहा है ? क्या इस वन में किसीका विवाह हो रहा है ? नन्द मामो भाई देवदत्त ! बहुत देर से हम लोग तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे थे। यही वह राजकुमारी मुन्दरिकादेवी हैं, जिनकी चर्चा मैं तुमसे किया करता था और यह इनकी सखी माधविकादेवी! हम दोनों का विवाह तो ममी नही हुमा, पर, मैं और मुन्दरिका उसके लिए परस्पर वचनवद्ध अवश्य हो चुके हैं ।

५६ ]
[ गौतम नन्द
सकता, जब तक उसमें किसी समझदार सहेली की सम्मति न ले ली
गई हो!
सुन्दरिका
तुम तो ऐसी विछुड़ीं, माधविका, कि पता ही न चला। तुम्हारे
आने से बड़ी प्रसन्नता हो रही है ! कितनी देर से हम दोनों तुम्हारी
प्रतीक्षा कर रहे थे!
माधविका
तुम अभीसे एक के बदले दो की भाषा बोलने लगीं ! तुम भले
ही प्रतीक्षा कर रही हो; राजकुमार गौतम नन्द को क्या पड़ी थी कि
मेरी प्रतीक्षा करते !
नन्द
आते ही आप मुझपर अकारण रोप क्यों प्रकट करने लगों ? मैंने
ऐसा कौन-सा अपराध किया है ?
माधविका
अपराध ? आपका सारा कुल नारी की अवहेलना का सर्वविदित
अपराधी है।
नन्द
अव उस प्रश्न को न उठाइए ! उसपर बहुत विवाद हो चुका है
और मैंने शपथपूर्वक प्रतिज्ञा की है कि मैं कभी इनका साथ न छोड़ गा,
कभी भिक्षु न बनूगा, कभी संन्यास न लूंगा।
माविका
और इन्होंने आपकी प्रतिज्ञा पर विश्वास कर लिया ?
नन्द
यह तो इन्हींसे पूछिए !
माधविका
क्यों सही?
---

यह सोचना अंक २: दृश्य १] [ ५७ सुन्दरिका मुझे इनपर पहले से विश्वास था सखी, क्योकि, अपने-माप पर विश्वास था। इस विषय मे अपने प्रात्म-विश्वास की बात मैं तुमसे पहले ही कह चुकी थी। फिर भी, परीक्षा के रूप मे, प्रव्रज्या के प्रश्न को छेड़कर, मैं इनसे अभी-अभी वचन ले चुकी हूं। अब इनके और मेरे वीच मे कोई अन्तर नहीं रह गया है । माधविका तब तो वास्तव में बड़ी प्रसन्नता की बात है ! अव तो पड़ेगा कि इस मंगलमय अवसर पर हार्दिक प्रसन्नता प्रकट करने का क्या उपाय किया जाय । नन्द वास्तव में इससे बढ़कर प्रसन्नता का क्या अवसर हो सकता है ! दो हृदयों का सदा के लिए एक-दूसरे के ममत्व के बंधन में बंधने का निश्चय करना जोवन की सबसे अधिक हपंप्रद और सबसे अधिक महत्त्व- पूर्ण घटना होती है। [दूसरी प्रोर से मृगया की वेशभूपा मौर सज्जा में देवदत्त का प्रवेश ।] देवदत्त कौन किसके ममत्व के दधन में बंध रहा है ? क्या इस वन में किसीका विवाह हो रहा है ? नन्द मामो भाई देवदत्त ! बहुत देर से हम लोग तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे थे । यही वह राजकुमारी सुन्दरिकादेवी हैं, जिनकी चर्चा मैं तुमसे किया करता था और यह इनकी सखी माधविकादेवी ! हम दोनों का विवाह तो भभी नही हुमा, पर, मैं और सुन्दरिका उसके लिए परस्पर वचनबद्ध अवश्य हो चुके हैं। !

५८ ]
[गौतम नन्द
देवदत्त
बड़ी प्रसन्नता का विषय है। हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए !
और मिठाई ?
नन्द
इस निर्जन वन में मिठाई कहाँसे खिलाई जा सकती है ! कुछ फल
मेरे पास बचे हैं, कुछ तुम्हारे पास भी अवश्य होंगे। उन्हीं सबको
एकत्र करके, प्रीतिभोज के रूप में, एक सम्मिलित वनभोजन कर
लिया जाय!
माधविका
हम लोगों को बड़े सस्ते में निवटा देना चाहते हैं राजकुमार ! मैं
तो पहले ही कह चुकी हूँ कि शाक्यवंश के राजपुत्र बड़े चतुर होते हैं ।
सुन्दरिका
और इस वन में संभव भी क्या है माधविका? सोचो तो
सही !
माधविका
तुम भी अभीसे राजकुमार नन्द का पक्ष लेने लगीं सुन्दरिका !
देवदत्त
विवाद की आवश्यकता नहीं है। प्रीतिभोज का प्राण है श्रद्धा
और स्नेह । साधन तो गौरण ही होते हैं। जो कुछ संभव हो, वही
आदर और प्रेम के साथ स्वीकार किया जाना चाहिए।
[नन्द और देवदत्त अपने-अपने
पास के फल निकालकर सामने रखते
हैं। चारों फल खाते हैं।
माधविका
अच्छा, अब स्वयंवर और विवाह कब होगा ?

भक २:हस्य ?
[५६
सुन्दरिका
स्वयंवर तो हो चुका।
माधविका
हो चुका ! कब?
सुन्दरिका
अभी, कुछ ही पहले !
माधविका
कसे ?
सुन्दरिका
स्वयंवर का आशय शक्ति, साहम और वीरता का प्रदर्शन ही तो
होता है। राजकुमार नन्द वह प्रदर्शन अच्छे रूप में कर चुके हैं ।
माविका
कर चुके हैं ! किस रूप में ?
सुन्दरिका
यभी बन में इन्होंने अकेले ही अपने सड्ग के एक ही प्रहार
भयानक सिंह के दो टुकड़े कर दिए थे!
"
राजकुमारी सुन्दरिका स्त्री और पुरुप की असमानता की बडी"
विरोधिनी है। इन्हें एक पक्ष का स्वयंवर सहन न हुमा । पुरुप के
साथ-साथ स्त्री के वीरता-प्रदर्शन को भी इन्होने स्वयंवर का
एक अगसमझा । इनका एक ही बाण उस सिंह के शरीर को वैधकर
निकल गया। इस प्रकार इन्होंने अपनी परीक्षा भी दे दी।
माधविका
प्रच्छा,
तो हम लोगों के भाने के पहले यहां बहुत-बुद्र हे
चुका है।

६०]
[गौतम नन्द
सुन्दरिका
। अच्छा होता सखी, यदि तुम भी उस समय उस स्थान पर होती
पौर अपनी आँखों से राजकुमार नन्द को खड्ग के एक ही प्रहार से
सिंह के दो टुकड़े करते देख लेती! कितना ओजस्वी और साहसपूर्ण
था वह दृश्य !
माधविका
अच्छा, स्वयंवर तो हो गया; अव आप दोनों अपने शुभ विवाह
का दृश्य कब दिखाएँगे?
सुन्दरिका
विवाह यदि दो आत्मानों की स्थायी एकता की प्रतिज्ञा ही का
नाम है, तब तो वह हो चुका है, किन्तु, यदि विवाह गुरुजनों के
आशीर्वाद की छाया में कुटुम्बियों और इष्टमित्रों की उपस्थिति
में होनेवाला उत्सव-प्रायोजन भी है, तो उसकी तिथि गुरुजन है
निश्चित करेंगे।
देवदत्त
तव क्या हम लोग यह मान लें कि आप लोगों का वास्त
विवाह तो वन-देवता के आशीर्वाद की छाया में इस विराट
के आंगन में हो ही चुका है, अब केवल औपचारिक प्रायोजन :
शेप है ?
नन्द
सत्य तो यही है।
माधविका
तव तो आज की इस संध्या को हमें अधिक से अधिक पान
बनाने का प्रयत्न करना चाहिए।
देवदत्त
फलों के प्रीतिभोज की मधुरता ने इसे बहुत-कुछ आनन्द
ही दिया है।

अंक २: दृश्य १]
[ ६१
सुन्दरिका.
इसमें एक प्रायोजन की वृद्धि और की जा सकती है, अनायास की
जा सकती है।
नन्द
वह क्या?
सुन्दरिका
माधविका का स्वाभाविक मधुर कठसगीत !
माधविका
यह तो तुम्हारा अन्याय है सुन्दरिका ! तुम्हें मालूम है कि तुम्हारे
वीणावादन के प्रभाव में मैं कदापि नही गा सकती !
सुन्दरिका
विशेप अवस्था में विशेष व्यवस्था करनी ही पडती है। यहाँ
वीणा कहाँ है, जो मैं बजाऊँ ! अव तो तुम्हें स्वीकार करना ही
पड़ेगा सखी, कि मेरे वाद्यसगोत से तुम्हारा कठसंगीत अधिक
महत्त्वपूर्ण है । मेरा वीणावादन प्रत्येक स्थिति में संभव नही हो
सकता, किन्तु, तुम्हारा कंठसगीत तो पक्षी के स्वर और निर्भर की
गति की भांति प्रत्येक स्थान पर और प्रत्येक समय पर प्रवाहित हो
सकता है । अब देर न कर सखी ! एक गीत सुना दो !
माधविका
[गीत ]
प्रेम, तुम्हारी जय जीवन में !
जप करण-करण में,
जय क्षरण-सरण में!
प्रेम, तुम्हारी जय जीवन में !

६२]
[गौतम नन्द
अनदेखे, अनजाने प्राणी
पल में अपने हो जाते हैं।
हृदय हृदय में तन्मय होते,
प्राण प्रारण में खो जाते हैं !
एक नया मधुमास महकने
लगता है जग के आंगन में !
प्रेम, तुम्हारी जय जीवन में!
जय तन-तन में,
जय मन-मन में!
प्रेम, तुम्हारी जय जीवन में !
जग को तुमने स्वर्ग बनाया,
सुगम बनाया जीवन-पथ को,
वारणी दी उर के युग-युग के
संचित मधुर रहस्य अकथ को !
मानव में मनुजत्व तुम्हीने
भरा, अमृत निर्मल यौवन में!
प्रेम, तुम्हारी जय जीवन में !
[ पट-परिवर्तन । ]

दूसरा दृश्य
[ पाटलिपुत्र । शुद्धोदन का प्रासाद । मध्याह्न ]
[शुखोदन तथा प्रजावती बातचीत
कर रहे हैं।
शुद्धोदन
समय को बदलते देर नहीं लगती प्रजावती! एक दिन था कि
लोग मुझसे कहते थे कि महाराज मुद्धोदन, आप बडे सौभाग्यशाली
हैं ! महाराज दशरथ के राज्य के समान विशाल राज्य के प्राप
स्वामी हैं, राम और लक्ष्मण के समान प्रापके पुत्र सिद्धार्थ मोर नन्द
हैं और कौशल्या पौर सुमित्रा जैसी प्रापकी रानियां महामाया और
प्रजावती हैं ! पर, अचानक समय बदल गया। अब मेरी कैसी बुरी
दशा है महारानी ! माज मेरे समान प्रभागा योर कौन हो

[ गौतम नन्द
प्रजावती
संयम के लिए आप प्रसिद्ध रहे हैं महाराज ! आपका धैर्य विशाल
चट्टान के समान रहा है । समय के बुरे से बुरे परिवर्तन के आघात से
भी उसे अटूट रहना चाहिए।
शुद्धोदन
ऐसे महाराज दशरथ की कल्पना करो प्रिये, जिनकी कौशल्या
राम को जन्म देते ही दिवंगत हो गई हो और जिनका राम केवल
चौदह वर्षों के लिए ही नहीं, सदा के लिए वन को चला गया
हो। महारानी महामाया के देहान्त और युवराज सिद्धार्थकुमार
के प्रव्रज्याग्रहण से मेरी ऐसी ही दशा हो गई है। महाराज दशरथ
भाग्यशाली थे कि राम के वनगमन पर देह के बन्धन से छूट गए थे,
मैं भाग्यहीन हूँ कि सिद्धार्थ के वियोग में भी जी रहा हूँ। मेरे धैर्य
का आधार टूट रहा है। प्रजावती, तुम मुझे कैसे सँभालोगी ?
प्रजावती
अपनेको स्वयं आप संभालेंगे स्वामी ! और किसमें इतनी शक्ति
है ? इसमें संदेह नहीं कि समय परिवर्तनशील है, पर, उसकी अनुकूलता
और प्रतिकूलता चक्र की तरह घूमती रहती है। यदि आज हमारा
समय हमारे प्रतिकूल है, तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि कल
वह हमारे अनुकूल न होगा।
शुद्धोदन
अब मैं किसके सहारे आशा का भवन खड़ा करूं प्रजावती ?
प्रजावती
आपका पौत्र राहुल आपकी आशा का आधार बन सकता है
महाराज!
शुद्धोदन
राहुल अभी बहुत छोटा है।
.

[६५ प्रजावती . तब आपका पुत्र नन्द है। मुद्धोदन हाँ, नन्द अवश्य है ! तुमने नन्द को जन्म देकर मुझे एक अच्छा प्राधार प्रदान किया है । सन्यास लेने के पहले नन्द को राज्य सौपकर में निश्चिन्त तो होना चाहता हूँ, पर, जब तक उसका विवाह न हो जाय, तब तक उनके राज्याभिषेक का प्रायोजन करता मुझे उचित नही प्रतीत होता । मैं सोचता हूं कि कही ऐमा न हो कि नन्द के मन में भी अपने भाई सिद्धार्थ के अनुकरण की इच्छा उलन हो जाय । यदि ऐमा हुग्रा, तो फिर राज्य का भार कौन संभालेगा? प्रजावती नन्द के लक्षण तो ऐसे नहीं दिखाई देते। मैं अपने दोनो वेठो को अच्छी तरह जानती हूँ। मैं जानती हूं कि नन्द क्या है और सिद्धार्थ क्या है। यदि माप उचित समझे, तो नन्द का विवाह कर सकते हैं । सिद्धार्थ के वियोग तथा आपके सभावित वियोग के कारण मेरा जी. भी घर म नहीं लग सकता । यशोधरा भी अपने पति के वियोग में दुखी रहती है । अव इसके अतिरिक्त और कोई मागं नही रह गया है कि मैं नन्द की बहू को घर मौर हूं। मुझे भी अपना कल्याण इनी- में दिखाई देता है कि मैं भी मिद्धार्थ के मार्ग पर चलूं। बहन महामाया के प्राकस्मिक देहात के कारण उनके पुत्र सिद्धार्थ पर मेरी ममता इतनी बढ़ गई थी कि मैंने उसे अपने पेट के बेटे में भी अधिक प्रेम से पाला था। जबसे सिद्धार्थ मुझे छोडकर गया है, मेरे मे सदा एक हूक-सी उठा करती है। मिद्धार्य का प्रभाव नन्द से पूर्ण नही हो सकता। शुद्धोदन मुझे धैर्य का उपदेश देनेवाली तुम । तुम भी विचलित हो रही हो!

६८]
]
[ गौतम नन्द
-
प्रजावती
कारण कुछ भी हो, वर्तमान अनिश्चित स्थिति का शीघ्र ही अन्त
होना चाहिए, अन्यथा, हमारा सारा कार्यक्रम बिगड़ जायगा ।।
शुद्धोदन
इसमें क्या संदेह है !
[ देवदत्त का प्रवेश ।]
देवदत्त
प्रणाम महाराज ! वन्दन महारानी !
शुद्धोदन
शतायु हो देवदत्त !
प्रजावती
चिरजीवी हो आयुष्मान
शुद्धोदन
क्यों राजकुमार देवदत्त, क्या तुम उस दिन नन्द के साथ मृगया
के लिए वन में गए थे ?
देवदत्त
गया तो था महाराज ! कहिए, क्या आज्ञा है ?
शुद्धोदन
आयुष्मान्, तुमसे मुझे एक अत्यन्त महत्त्व का रहस्य जानना है।
देवदत्त
आज्ञा कीजिए महाराज ! यदि मुझे कुछ ज्ञात होगा, तो अवश्य
सेवा में निवेदन करूंगा।
शुद्धोदन
बात यह है, देवदत्त, कि मेरी इच्छा अब निवृत्त होने की है।
महारानी प्रजावती भी प्रवज्या ग्रहण करना चाहती हैं। हम लोग
--

अंक,२: दृश्य २]
[६६
राज्यकार्य का भार नन्द पर और गृह-व्यवस्था का भार नन्द की
भावी बहू पर डालकर निश्चिन्त होना चाहते है ।
देवदत्त
इसमे रहस्य की क्या बात है महाराज ! यह तो पाप दोनो की
इच्छा का प्रश्न है।
शुद्धोदन
हमारी इस इच्छा में बाधा उत्पन्न होती दिखाई दे रही है । इसी-
लिए, तुम्हारी सहायता की प्रावश्यकता हुई है।
देवदत्त
मेरे योग्य सेवा मुझे बताइए महाराज !
शुद्धोदन
नन्द का विवाह राजकुमारी सुन्दरिका से करने का हमारा विचार
था । मायुप्मान् नन्द भी इससे सहमत था । सुन्दरिका के पिता की
अनुमति भी मिल गई थी। उन्होने स्वयवर की तिथि निश्चित करानी
चाही थी । नन्द इसके लिए भी तत्पर था । पर, उस दिन को मृगया
से लौटने के बाद जब तिथि निश्चित करने के प्रश्न पर उसका
परामर्श चाहा गया, तब उसने स्वयंवर के लिए जाना अस्वीकार
कर दिया।
देवदत्त
नन्द ने क्या कहा
शुद्धोदन
उसने कहा कि स्वयंवर की आवश्यकता नहीं है ।
देवदत्त
मापने इसका अर्थ यह लगाया कि राजकुमार नन्द मृगया के लिए
में गए, तब वहां कोई ऐसी रहस्यमय घटना हो गई, जिसके
कारण उन्होंने राजकुमारी सुन्दरिका से विवाह न करने
?
जब वन

६८]
[गौतम नन्द
प्रजावती
कारण कुछ भी हो, वर्तमान अनिश्चित स्थिति का शीघ्र ही अन्त
होना चाहिए, अन्यथा, हमारा सारा कार्यक्रम बिगड़ जायगा ।
शुद्धोदन
इसमें क्या संदेह है !
[ देवदत्त का प्रवेश।]
देवदत्त
प्रणाम महाराज ! वन्दन महारानी !
शुद्धोदन
शतायु हो देवदत्त !
प्रजावती
चिरजीवी हो आयुष्मान
शुद्धोदन
क्यों राजकुमार देवदत्त, क्या तुम उस दिन नन्द के साथ मृगया
के लिए वन में गए थे ?
देवदत्त
गया तो था महाराज ! कहिए, क्या प्राज्ञा है ?
शुद्धोदन
आयुष्मान्, तुमसे मुझे एक अत्यन्त महत्त्व का रहस्य जानना है।
देवदत्त
आज्ञा कीजिए महाराज ! यदि मुझे कुछ ज्ञात होगा, तो अवश्य
सेवा में निवेदन करूंगा।
शुद्धोदन
बात यह है, देवदत्त, कि मेरी इच्छा अव निवृत्त होने की है
महारानी प्रजावती भी प्रव्रज्या ग्रहण करना चाहती हैं। हम लोग

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७० ] [ गौतम नन्द कर लिया और उस घटना का रहस्य जानने के लिए आपने मुझे, नन्द के मृगया के साथी के नाते, यहाँ बुलाया है । यही बात है न ? शुद्धोदन वात तो यही है। देवदत्त तो सुनिए महाराज ! वन में एक रहस्यमय घटना हुई तो थी। प्रजावती हुई थी ! ऐसी क्या घटना हुई थी ? शुद्धोदन वन में रहस्यमय घटना हुई और तुम दोनों में से किसीने भी उसकी सूचना मुझे देने की आवश्यकता नहीं समझी ! देवदत्त क्षमा कीजिए महाराज! केवल संकोच के कारण यापकी सेवा में उस घटना का वृत्तान्त निवेदित न किया जा सका। और फिर वह घटना आपके संकल्प के प्रतिकूल न थी। वह तो आपकी इच्छा के अनुकूल ही थी। शुद्धोदन इच्छा के अनुकूल ! ऐसी क्या घटना हुई थी ? देवदत्त वन में मृगया के लिए इधर से गए हुए राजकुमार नन्द और उघर से आई हुई राजकुमारी सुन्दरिका की आपस में भेंट और वात- चीत हो गई थी। सिंह के आखेट में दोनों के सामने एक-दूसरे की शक्ति, साहस तथा वीरता. का प्रदर्शन भी हो गया था। उसके फल- स्वरूप स्वयंवर की आवश्यकता नहीं रह गई थी। यही अन्तिम बात राजकुमार नन्द ने आपसे कही थी !

प्रजावती
यह बात थी ! हमलोग न जाने किस दुसरा के जाल में फेम
गए थे!
शुद्धोदन
तब क्या दोनो स्वयंवर के बिना ही विवाह करने को प्रस्तुत
हो गए है ?
देवदत
इसमे क्या सन्देह है ! दोनों वचन-वद्ध भी हो चुके है । यह
इसलिए नहीं हुआ कि दोनो अपने गुरुजनों से विद्रोह करना चाहते है,
वरन्, इसलिए हुआ कि दिनों को यह ज्ञात हो चुका था कि दोनों
के माता-पिता भी पहले से उनके विवाह-सम्बन्ध के लिए प्रपल कर
प्रजावती
यह तो है ही। दोनों बडे सुशील हैं ।
शुद्धोदन
अच्छा देवदत्त, तुम नन्द को समझा-बुझाकर भेजी कि वह गोत्र
यहाँ माकर हमें इस विवाह की स्पष्ट स्वीकृति दे जाय । इन विषय
मे अब न तो सकोग की अावश्यकता है और न विलम्ब की।
देवदत्त
महाराजा का प्राज्ञापालन होगा । प्रणाम !
[देवदत्त का प्रस्थान । ]
प्रजावती
कभी-कभी मनुप्य को कैसा भ्रम हो जाता है । नन्द ने किम
याशय से स्वयंवर को मनावश्यक बताया था और हम लोगों ने
उतका क्या माशय सनक लिया ! मुन्दरिका वडी सुन्दर, नुमोल
और वीर लड़की है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि इससे विवाह कर
लेने के बाद नन्द शाक्य वस के राज्य को मान्य रस नांगा।

७२ ] [ गौतम नन्द शुद्धोदन इसलिए, पहले विवाह और उसके बाद राज्याभिषेक ! यदि नन्द हमारे परामर्श के अनुसार आचरण करना स्वीकार कर ले, तो हम दोनों कृत-कृत्य हो जायें, निश्चिन्त हो जायें ! [नन्द का प्रवेश।] निन्द प्रणाम पिताजी ! माताजी प्रणाम ! शुद्धोदन जीवित रहो ! प्रजावती यशस्वी हो ! नन्द तीर्थस्वरूप माता-पिता का आशीर्वाद जिस पुत्र को प्राप्त रहता है, उसे और किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं रहती। शुद्धोदन सुनो वेटा नन्द, राहुल अभी बहुत छोटा है । सिद्धार्थ गृहत्याग कर हो गए । यशोधरा सिद्धार्थ के वियोग में दुखी रहती है । अब शाक्य- वंश के राज्य और गृह-व्यवस्या के भविष्य का सारा भार तुम और तुम्हारी भावी वहू की आशा ही के आधार पर निर्भर है । अग तुमको हमारा परामर्श स्वीकार करके शीघ्र ही विवाह और राज्याभिषेक का उत्तरदायित्व ग्रहण कर लेना चाहिए। प्रजावती स्वीकार कर लो बेटा, हमारा अनुरोध स्वीकार कर लो ! नन्द यापके इन शब्दों से कुछ अविश्वास को-सी ध्वनि निकलती है।

-ngan यह मेरा कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि मुझे जन्म देनेवाले माता-पिता भी मुझपर अविश्वास करते हैं । मैंने प्रांज तक माप लोगो के किसी भी अनुरोध को कभी भस्वीकार नहीं किया, फिर भी, भापके मन में पाका है कि मैं पापकी पाना की अवहेलना करूंगा । तथागत गौतम बुद्ध ने मंसार को शान्ति दी है, उपसम्पदा दी है, पर, मेरे लिए तो उनका भाई होना ही एक अभिशाप वन गमा है | evently सुद्धोदन अभिशाप ! अभिशाप क्यों? नन्द अभिगाप इमलिए कि जिसे देखो, वही यह सदेह करता है कि मैं उनकी भांति ही भिक्षु बन जाऊंगा । मैं अपना हृदय चीरकर किस- किसको दिखाऊँ भोर कैसे दिखाऊँ? मैं यह कैसे प्रमाणित करूं कि मैं सामान्य हूँ, महान् नहीं: नन्द है, सिद्धार्य नही ? स्वयंवर को अस्वीकार करने का कारण भापको देवदत्त ने बता ही दिया है। मंकोच ही के मारे मैं वास्तविक कारण न बता सका था। इतनी-सी भूल का इतना बहा दण्ड तो मुझे न मिलना चाहिए कि मैं पाना की अवहेलना करनेवाला कुपुत्र ममझा जाऊँ ! मुद्धोदन सुब्ध न हो बेटा ! हम भ्रम हो गया था। भव हमे कोई मन्देश नहीं रहा कि तुम हमारे दग्प हृदव को गोतल करोगे, हमारी माता- लता को फिर से हरी-भरी करोगे । हम दोनों भाज ही मारी व्यवस्था का प्रायोजन करते है । शीघ्र ही राजकुमारी मुन्दरिका से तुम्हारा विवाह होगा। विवाह के बाद ही तुम्हारा राज्याभिषेक हो जायगा। नन्द बंसी मापको इन्धा ! मघा, अब मुझे माना दो ७४ ] [गौतम नन्द -- - प्रसिद्ध संगीतज्ञ आए हुए हैं, उनके स्वागत-सत्कार का आयोजन करना है। प्रणाम ! शुद्धोदन शतायु, सुखी और यशस्वी हो ! [ नन्द का प्रस्थान 1] प्रजावती कितना भोला और भला है यह नन्द ! शुद्धोदन आज की यह संध्या शाक्यवंश के जीवन में एक नया प्रभात लाना चाहती है । इससे बढ़कर हम दोनों का सौभाग्य और क्या हो सकता है कि नन्द कपिलवस्तु के राज्य की और सुन्दरिका अन्तःपुर के प्रासादों की व्यवस्था सँभाले । दोनों मिलकर आयुष्मान् राहुल का, पुत्र की भाँति, लालन-पालन करें और हम तीनों, मैं, तुम और यशोधरा, निश्चिन्त होकर, तथागत के आदर्शों के अनुसार, निर्वाण की खोज में अलग-अलग दिशामों में प्रव्रजन करें ! प्रजावती ऐसा ही होगा नाथ ! शुद्धोदन यदि ऐसा ही हुआ, तो हमारे जीवन की निराशा की मरुभूमि में आशा के हरे-भरे अंकुर लहलहाएंगे। हम धन्य हो जायेंगे प्रिये, कृत-कृत्य हो जायेंगे। प्राणप्रिय पुत्र के विवाह और राज्याभिषेक के सौभाग्य का सुख ! इतना बड़ा वैभव ! कुछ समझ ही में नहीं पाता कि उसे हम कैसे बटोरें, कैसे संभालें। अविरत उत्सव-पायोजनों का उत्साह ही हमें इतने बड़े सुख को संभालने की शक्ति दे सकता है। प्रजावती पहले कुछ समय विश्राम कर लीजिए महाराज ! फिर सारी व्यवस्थानों के सम्बन्ध में उचित प्राज्ञाएँ दीजिएगा।

भक २: दृपय २ [७५ शुद्धोदन विथाम ! मव विथाम के लिए प्रवकाय कहाँ है ? बड़े भाग्य से ऐसा अवसर मिलता है। मैं अभी प्रधान अमान्य को बुलाकर सारी व्यवस्था कराता हूं। इस अवसर पर में अपने सारे साधनों का उपयोग करना चाहता हूँ, नन्द का विवाह मोर राज्याभिषेक ऐसी घूम-धाम से होना चाहिए कि कपिलवस्तु में नया जीवन उत्पन्न हो जाय, घर-घर में नए उत्साह की तहर दौड़ जाय और सारे भारत में शाक्यवंश के वैभव का यच-सौरभ फल जाय । [पट-परिवर्तन।]

-७४ ] गौतम नन्द प्रसिद्ध संगीतज्ञ आए हुए हैं, उनके स्वागत-सत्कार का आयोजन करना है। प्रणाम ! शुद्धोदन शतायु, सुखी और यशस्वी हो ! नन्द का प्रस्थान ।] प्रजावती कितना भोला और भला है यह नन्द ! शुद्धोदन आज की यह संध्या शाक्यवंश के जीवन में एक नया प्रभात लाना चाहती है । इससे बढ़कर हम दोनों का सौभाग्य और क्या हो सकता है कि नन्द कपिलवस्तु के राज्य की और सुन्दरिका अन्तःपुर के प्रासादों को व्यवस्था सँभाले । दोनों मिलकर आयुष्मान राहुल का, पुत्र की भाँति, लालन-पालन करें और हम तीनों, मैं, तुम और यशोधरा, निश्चिन्त होकर, तथागत के आदर्शों के अनुसार, निर्वाण की खोज में अलग-अलग दिशाओं में प्रव्रजन करें! प्रजावती ऐसा ही होगा नाथ ! शुद्धोदन यदि ऐसा ही हुआ, तो हमारे जीवन की निराशा की मरुभूमि में आशा के हरे-भरे अंकुर लहलहाएँगे । हम धन्य हो जायँगे प्रिये, कृत-कृत्य हो जायेंगे । प्राणप्रिय पुत्र के विवाह और राज्याभिषेक के सौभाग्य का सुख ! इतना बड़ा वैभव ! कुछ समझ ही में नहीं पाता कि उसे हम कैसे बटोरें, कैसे संभालें ! अविरत उत्सव आयोजनों का उत्साह ही हमें इतने बड़े सुख को संभालने की शक्ति दे सकता है । प्रजावती पहले कुछ समय विश्राम कर लीजिए महाराज ! फिर सारी व्यवस्थात्रों के सम्बन्ध में उचित प्राज्ञाएँ दीजिएगा । - - प्रक २: दृस्य २ ] [७५ शुद्धोदन विश्राम ! अब विश्राम के तिए भवकाश कहाँ है ? बड़े भाग्य, से ऐसा अवसर मिलता है । मैं सभी प्रधान प्रमाय को बुलाकर सारी व्यवस्था कराता हूं। इस अवसर पर मैं अपने सारे साधनी का उपयोग करना चाहता हूँ, नन्द का विवाह और राज्याभिषेक ऐसी घूम-धाम से होना चाहिए कि कपिलवस्तु में नया जीवन उत्पन्न हो जाय, घर-घर में नए उत्साह की लहर दौड़ जाय भोर सारे भारत में शाक्यवश के वैभव का यश-सौरभ फल जाय। [पट-परिवर्तन।]

--
तीसरा दृश्य
[कपिलवस्तु । कुम्भक का वासस्थान । प्रातःकाल !]
[कुम्भक का प्रसन्न मुद्रा में प्रवेश ।
कुम्भक
अरी भद्रा ! कहाँ हो ? इधर तो आनो ! इधर तो पायो श्रीमती
कुण्डेश्वरीदेवी !
[ नेपथ्य में फुण्डेश्वरी का उत्तर
सुनाई देता है।
कुण्डेश्वरी
क्या बात है ? अभी आई ! अभी आई !
कुम्भक
अरे जल्द आयो, जल्द !
[कुण्डेश्वरी का प्रवेश ]

मंक २दृश्य ३]
[७७
कुण्डेश्वरी
लो मा गई ! कहो क्या बात है ? क्यों चिल्ला-चिल्लाकर घर
गुंजाए दे रहे हो?
कुम्भक
हर्ष के मावेग में नटराज शकर नृत्य किया करते थे और योगिरान
कपिल शीर्षासन ! मैं भी माज हपं के मारे फूला नहीं समा रहा हूँ।
कुछ समझ ही में नहीं पाता कि इस समय में क्या करू ! नानू या
सिर के बल सड़ा हो जाऊँ?
कुण्डेश्वरी
क्यों, क्यों ? ऐसी क्या बात है ?
कुम्भक
बात यह है कि मुझे मत्यन्त महान् हपं के मने समाचार
मिले हैं। इस अवसर पर यदि में किसी प्रकार का हपं-प्रकाशन
न करूंगा, तो पागल हो जाऊँगा । हपं का प्रकापन तो
मुझे करना ही पड़ेगा, मभी करना पड़ेगा भोर मन्द दंग में करना
पड़ेगा।
कुण्डेश्वरी
कसे हर्ष के समाचार ? कैसा ह?
कुम्भक
परी भद्रा, तुममें कब समझ भावेगी? यदि तुममे मीनिक बुद्धि
का प्रभाव है, वो श्रद्धा के साथ अनुकरण हो करती जामो !
जब में कह रहा हूँ "अत्यन्त महान हपं", तब तुम केवल "हां"
क्यों कह रही हो? हपं मत कहो; महान् हर्ष कहो, मत्यन्त महान्
हपं ! प्रत्येक वस्तु की कोटि के भनुमार उसका विशेषस निश्चित
करना पड़ता है । यह अत्यंत तीव्र और सूक्ष्म बुद्धि का काम है।
कुण्डेश्वरी
कुछ यतामो वो सही कि क्या हुआ !

कुम्भक
हुआ नहीं, होनेवाला है । अरे नहीं, होनेवाला नहीं, होनेवाले हैं।
एक नहीं, दो-दो प्रायोजन होनेवाले हैं। साधारण नहीं, महान्, महान्
नहीं, अत्यन्त महान्, दो-दो भायोजन होनेवाले हैं ! पहले महाराज
शुद्धोदन के राजकुमार नन्द का विवाह और फिर उनका राज्याभिषेक !
एक के बाद एक, दो-दो महामहोत्सव ! अरी भद्रा, क्या बताऊँ ! ऐसे
भाग्य खुले हैं कि किसीके न खुले होंगे !
कुण्डेश्वरी
कब होगा विवाह ?
कुम्भक
शीघ्र से शीघ्र ! तथागत गौतम बुद्ध जब तक सारे संसार को पूर्ण
रूप से भिक्ष नहीं बना लेते,तब तक गृहस्थ इस पृथ्वी पर रहेंगे ही जब
तक गृहस्थाश्रम का अस्तित्व है, विवाह भी होते ही रहेंगे; जब तक
विवाह होते रहेंगे, वालवच्चे भी होंगे ही और जब तक यह सव होता
रहेगा, तब तक भांति-भांति के श्रानन्दउल्लास, समारोह-सम्मेलन,
उत्सव-प्रायोजन भी होते ही रहेंगे ! इसीको यदि दार्शनिक भाषा में
कहूँ, तो यों कह सकता हूं कि मेरे पूर्वजों ने अपने जीवन में एक महान्
दार्शनिक सिद्धान्त की उपलब्धि की थी।
कुण्डेश्वरी
.
वह क्वा?
कुम्भक
वह यह कि मनुष्य अमर है, मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ अमर
हैं; फलस्वरूप, विवाह अमर है, गृहस्थाश्रम अमर है और वालकों के
जन्म भी अमर हैं।
कुण्डेश्वरी
की होगी कोई उपलब्धि ! उससे हमें क्या लाभ हुना
?

प्रक २: दृश्य ३]
[७६
कुम्भक
लाभ ? लान ही नहीं, महान् लान हुमा है ! उन्होंने इसी महान्
दार्शनिक मिद्धान्त के साथ अपने वमनो के जीवन पोर जीविका का
अटूट मूत्र बांध दिया है।
कुण्डेश्वरी
वह कैसे?
कुम्भक
ऐसे कि उन्होने अपनी महान् बुद्धिमत्ता के द्वारा अपने और अपने
वाजी के लिए पुरोहित का व्यवसाय चुन लिया। अब स्थिति यह है
कि जब तक संसार अमर है, तब तक मनुष्य अमर है, जब तक
मनुष्य अमर है, तब तक गृहस्थाश्रम अमर है, जब तक गृहस्याथम
अमर है, तब तक विवाह और पुत्रजन्म अमर हैं, तब तक विवाह
मोर पुत्रजन्म अमर हैं, तब तक पुरोहित अमर है, पुरोहित का व्यवसाय
अमर है और जबतक पुरोहित का व्यवसाय अमर है, तब तक पुरोहित,
उसकी पत्नी मोर उसके पुत्रपुत्रियों की विशाल सेना कभी भूखो नहीं
मर सकती।
कुण्डेश्वरी
अच्छी मला मिलाई !
कुम्भक
अरी भद्रा ! यह राखला माधारण नहीं है । इस महान् शू खला
के लिए हमें अपने पूर्वजो के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करनी
चाहिए और उनकी पवित्र स्मृति मे जीवन-भर वारवार दडवत्
प्रणाम करते रहना चाहिए ! करो दडवत् प्रणाम | मैं भी करना
हूँ, तुम भी करो ! उन महान् पूर्वजो का भक्तिभाव से स्मरण करो।
[कुम्भक सम्बे लेटकर दडवत् प्रणाम
करते हैं।

८०] [ गौतम नन्द कुण्डेश्वरी यह सब नाटक तुम्हींको शोभा देता है । मुझे इसके लिए अवकाश नहीं है। मुझे रसोई बनानी है। कुम्भक जिन पूर्वजों की कृपा से इतना द्रव्य मिलतां जा रहा है कि घर में प्रतिदिन दो वार रसोई बनाई जा सके, उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए प्रणाम करने में भी कृपणता दिखाती हो ! अरी भद्रा, तुम कब सज्जनों के संस्कार सीखोगी? कुण्डेश्वरी अपनी सज्जनता अपने पास रखो ! मुझे काम है । मैं जाती हूँ ! कुम्भक सावधान कुण्डेश्वरी ! हम स्पष्ट कहे देते हैं । यदि तुम हमारी इसी प्रकार अवहेलना करती रहोगी, तो हम केश कटवाकर और काषायवस्त्र पहनकर भिक्षु बन जायेंगे और सीधे तथागत गौतम बुद्ध के धर्मसंघ में जा मिलेंगे। फिर तुम कहाँसे धन पाकर रसोई बनायोगी और कहाँसे अपनी विशाल सन्तानसेना को खिलायोगी ? कुण्डेश्वरी क्या सन्तान मेरी ही है, तुम्हारी नहीं ? क्या मैंने ही तुम्हारी संतान को रसोई बना-बनाकर खिलाने का ठेका लिया है ? मैं ऐसी धमकी में आनेवाली नहीं हूँ। यदि तुम भिक्षु बनोगे, तो मैं भी तुम्हारे घर में आग लगाकर भिक्षुणी वन जाऊंगी। मैं वहाँ भी तुम्हारा पीछा न छोड़गी। कुम्भक वहाँ भी मेरा पीछा न छोड़ोगी ? पर, गौतम बुद्ध बड़े दयालु हैं । उन्होंने हम-जैसे पतियों पर दया करके स्त्रियों के लिए अपने भिक्षुसंघ का द्वार ही बन्द कर रखा है। तुम्हें वह भिक्षुणी बनने की अनुमति ही न देंगे। फिर क्या करोगी?

पंक २:दृश्य ३ -- यदि ऐना हुमा, तो मैं भिक्षुणी बने बिना ही, तुम्हारे पीछे-पीछे, तुम्हारे पाखड का भंडाफोड़ करती फिरूगी । वहाँ-जहाँ तुम वामोरे, वहाँ-वहाँ जाकर तुम्हारी वास्तविकता जनता, भिक्षुषों और स्वयं तथागत गौतम बुद्ध के सामने रखूगी ! कुम्भक प्ररी भद्रा ! तुम बड़ी प्रचंड हो ! मुझे विश्वास हो गया कि तुर मेरा किसी भी प्रकार पिंह न छोड़ोगी ! मेरे नाय में सदा तुम्हारे बन्धन में बंधा रहना हो लिसा है। उससे टूटने का कोई मागं हो नहीं है । जव जीवनभर तुम्हारे साथ रहना ही पड़ेगा, तब बीवन को क्यो न अधिक से अधिक मुखमय बनाने का पल क ? अधिक से अधिक सम्पन्न हुए विना अधिक से अधिक मुरा मिलना कठिन है। इसलिए, धन प्राप्त करने के नित्य-नवीन उपाय सोचने पड़ेंगे । अच्छा देवी, एक काम करो। आजकल तरुण पुरुषों में निशु बनने को प्रया बहुत प्रवल होती जा रही है । उनको पलियां बहुत दुखी हैं। तुम उनका एक महिला महाविद्यालय खोलकर उसकी प्रधान भाचार्या वन जाम्रो! कुण्डेश्वरी महाविद्यालय कसा? कुम्भक एक ऐसा महाविद्यालय, जो स्त्रियों को विधिवत् उन उपायों की शिक्षा दे, जिनसे पतियों को निशु बनने से रोका जा सके । तुमसे बढ़कर इस विद्या में निपुण मोर कौन हो सकती हैं ? तुम सब तरह से उसकी प्रधान प्राचार्या बनने योग्य हो । उसको विद्यार्थिनियो को संख्या इन दिनो ऐसे बढ़ेगी, जैसे वर्षाऋतु मे कंचुए बढ़ते हैं। कुण्डेश्वरी पर, उससे मुझे क्या लाभ होगा? ta २] [गौतम नन्द - कुम्भक लाभ ? महालाभ होगा ! संसार का सबसे महत्त्वपूर्ण लाभ, द्रव्य- भ ! तुम्हारी सैकड़ों शिष्याएँ जब सैकड़ों मुद्राएँ प्रतिमास दक्षिणा तुम्हें दिया करेंगी, तब तुम मुझसे अधिक कमाई करने लगोगी। रिवार की प्रधान सदस्य उस समय तुम गिनी जाया करोयी, मैं ही । इस संसार का नियम ही यह है कि इसमें जो जितना अधिक न कमाता है, उसका उतना ही अधिक सम्मान होता है। तुम अपने स महाविद्यालय की प्रधान संरक्षिका के पद के लिए भी कपिलवस्तु में शीघ्र ही एक सम्पन्न महिला पा सकोगी। कुण्डेश्वरी वह कौन ? कुम्भक राजकुमारी सुन्दरिका, जो शीघ्र ही कपिलवस्तु के भावी शासक राजकुमार गौतम नन्द की रानी बननेवाली हैं ! उनके भावी जीवन का मुख्य कार्यक्रम अपने पति नन्द को भिक्षु बनने से रोकने को निरन्तर वेष्टा करते रहना ही होगा और तुम्हें पति को गृहस्थी को रस्सी में निरन्तर वांधे रहने के ऐसे-ऐसे गुर याद हैं कि उन्हें बता-बताकर तुम सुन्दरिका देवी को सदा अपनी मुट्ठी में रख सकोगी ! कुण्डेश्वरी क्या, सचमुच, मैं इस प्रकार तुमसे अधिक धन कमाने लगूंगी ? कुम्भक निस्सन्देह ! समय की गति इस समय कुछ ऐसी ही है। इस परिवर्तनशील संसार में कभी कोई व्यवसाय उन्नति करता है, तो कभी कोई। एक युग था कि पुरोहित का व्यवसाय इस क्षेत्र में बड़े उच्च शिखर पर था। इधर गौतम बुद्ध के धर्मप्रचार ने पुशवलि, कर्मकांड और यज्ञ के वैभव के प्रति जनता और शासकों को अत्यन्त - अंक २: दृश्य ३ ] [३ उदासीन बना दिया है। इसके फलस्वरूप बड़े-बड़े प्रचंड कर्मकांडी : पुरोहित याजकत भूखों मरने लग गए हैं । किन्तु, इसने एक नए व्यवसाय के उत्कर्ष की सभावना पैदा कर दी है। बुद्धिमान् लोग समय के परिवर्तन को देसकर अपना व्यवसाय वदल देते हैं । अम तुम्हें मिस त्य- निवारक-महिलाविद्यापीठ सोलकर दोनो हाथों से धन बटोरना प्रारम्भ कर देना चाहिए। कुण्डेश्वरी क्या सचमुच मेरा विद्यालय चल निकलेगा? कुम्भक क्यो नही ? पर, यह निश्चित न समझ बैठना कि कमाई में मैं तुमसे पिछड़ ही जाऊँगा । भविष्य में तुम्हारे लड़के तुमसे इस विषय में भले ही हार जायें, मैं तो कमाई के सम्बन्ध में तुमसे सरलता से हार माननेवाला नहीं हूँ। अपने जीवनकाल तक के लिए तो मैंने अपना प्रबन्ध कर ही लिया है। मेरे जीवनकाल मे तो मेरे मध्यम- मार्ग के सिद्धान्त के पास में से निकलना धनिको और शासकों के यस की बात नहीं है। मैंने कर्मकाड और अहिंसा के ममझौते का स्वर्ण- सिद्धान्त दूक निकाला है । वह इस युग का सबसे महान् दार्शनिक सिद्धान्त है । उसने मुझ श्रीमान् पडित कुम्भकाचार्य शर्मा मध्यम- मार्गी का देशभर मे डका बना दिया है, डका ! कुण्डेश्वरी तो क्या तुम्हारा पुरोहित का व्यवसाय भी चलता ही रहेगा ? कुम्भक अपने मध्यम मार्ग के सहारे मेरा व्यवसाय ऐसा चलेगा कि माग सार भौचक होकर देखता रहेगा । ऐसा चलेगा, जैसे चक्रवर्ती सम्राट 7 सोने का सरा सिक्का चलता है। कुम्भकाचार्य की विकट खोपडी का लोहा संसार को मानना ही पडेगा । .

८४ ] [ गौतम नन्द कुण्डेश्वरी क्या एक पुरोहित के रूप में राजकुमार नन्द के विवाह और राज्याभिषेक में तुम्हें सचमुच बहुत धन मिलने की आशा है ? कुम्भक अरी भद्रा ! मुझे उन दोनों आयोजनों में इतना धन मिलेगा कि घर भर जायगा, घर ! इतनी मुद्राएं घर में प्रायँगी कि तुम्हें चोरी की शंका से रात-रातभर जागना पड़ा करेगा ! इतने लड्डू आयेंगे कि उन- के लिए कई नए हंडे मोल लेने पड़ेगे ! इतना सोमरस मिलेगा कि उसे भरकर रखने के लिए घड़ों की कमी पड़ जायगी । तभी तो मैं कह रहा था कि मुझे अत्यन्त महान् हर्प के समाचार मिले हैं । मैं फिर कहता कि हर्ष के प्रकाशन के विना मैं पागल हो जाऊँगा । हर्ष के प्रकाशन का मार्ग वताओ ! शीध्र बतायो कि मैं हर्प के मारे नाचू या सिर के बल खड़ा हो जाऊँ! कुण्डेश्वरी चाहे जो करो ! तुम बुद्धिमान् तो थे ही, भाग्यशाली भी सिद्ध हो रहे हो! तुम्हारी सफलता में मुझे अब कोई सन्देह नहीं रहा । - [ पटाक्षेप ।]

तीसरा अंक

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पहला दृश्य
[ कपिलवस्तु । नन्द का प्रासाद । मध्याह्न । ]
[मुन्दरिका बीया बजा रही हैं।
पास ही नन्द का प्रपुरा चित्र
चियापार पर लगा हुमा दिसाई
दे रहा है। चित्र के निकट चित्र
बनाने को सायनसामी रखी है।
नन्द प्रवेश करते हैं। उनके पाते
हो मुन्धारका चोणा गाना बन्द
कर देती हैं।
नन्द
एक क्यों गई सुन्दरिका ! बोगा बजाना बन्द क्यो कर दिया ?
बजायो ! बजाती क्यों नहीं हो ?

.... ] [ गौतम नन्द सुन्दरिका तुम आ गए। अब यह नहीं, अब तो हृदय की वीरगा अव तो बजेगी। नन्द क्या हृदय की वीणा मेरी अनुपस्थिति में नहीं बजती ? सुन्दरिका तुम्हारी अनुपस्थिति में जैसे यह घर सूना-सा लगने लगता है, वैसे ही मेरे हृदय की वीणा भी मौन हो जाती है । नन्द इसलिए यह वाहर की वीणा वजानी पड़ती है ? क्यों ? सुन्दरिका हृदय के स्वरों के मौन हो जाने पर बाहर की झंकारों से सहायता लेनी पड़ती है। [ नन्द अपने अधूरे चित्र तथा चित्रसामग्री- की ओर देखते हैं। नन्द और यह चित्र ? यह चित्र किसका है ? यह किसलिए ? [सुन्दरिका चित्र को ओर मुड़ती हैं। सुन्दरिका अभी यह चित्र अचूरा । पूरा बन जाने पर यह तुम्हें अवश्य अच्छा लगेगा। यह तुम्हारा ही चित्र है । इसीको बनाने के लिए आजकल चित्रकला का अभ्यास कर रही हूँ। .... कार: नन्द तुम्हारी संगीतसाधना अकेली ही हृदयों में उथलपुथल उत्पन्न के देने के लिए पर्याप्त है। यदि तुम चित्रकला की भी सापना कर तो यह संसार कहाँ रहेगा? है Y लगोगी, मक ३ : दृश्य १] [ ८६ मुन्दरिका मेरे हर कार्य को अनुचित प्रगंना करना तुम्हारा स्वभाव ही बन गया है। अभी तो मैंने केवल कुछ रेखाएं मींचना ही नीमा है । देखें, कब तक कुछ नीच पाती हूं. पार कब तक तुम्हाग यह चित्र पूरा कर पाती हूँ। नन्द यदि चित्र ही बनाने हैं, तो उन महान पूर्वजों के बनायो, जिनकी वीरता और उदारता की कहानियों से इविहान के पृष्ठ के पृष्ठ नरे पड़े हैं और जिनका पुण्यस्मरण करके प्राव भी भुजामों में स्फुरण होने लगता है, वृक्षःस्थल फूल उठना है और मस्तक उन्नत हो जाता है । मुन से अकिंचन का चित्र बनाने से क्या लान ? मुन्दरिका मानव केवल अपने हृदव की घदा ही की तो मूर्त रूप नहीं देना चाहता, वह अपने स्नेह को भी रेखामों, स्वरों और प्रक्षरों में साकार करना चाहता है । तुम्हारी अनुपस्थिति में तुम्हारे चित्र मे मुझे कितना महारा मिलेगा, यह में ही जान सकती है, तुम नहीं । और फिर अपने हाय की बनी प्रत्येक वस्तु की भांति यह चित्र भी मुझे अत्यन्त प्रिय होगा। नन्द किन्तु, में अनुपस्थित कब होता हूँ? मेरे दिन का अधिकाग भाग तुम्हारे ही माय तो बीतता है। मुन्दरिका मनी हम दोनों का विवाह हुए पोड़े ही दिन हुए हैं, इसलिए, नुन कुछ समर मेरे पास रह सकते हो । शीघ्र हो वे दिन भी मागे, जय नुम मेरे निनट न रह सकोगे।

६० ] [ गौतम नन्द नन्द क्यों ? क्या मैं भिक्षु बन जाऊँगा ? क्या तुम्हें अब भी मुझपर अविश्वास है ? सुन्दरिका ऐसी वात मुंह पर न लामो, भूलकर भी नहीं ! इस विषय में मैं विलकुल निश्चिन्त हूँ। तुम मुझे जो वचन दे चुके हो, उसपर मुझे पूर्ण विश्वास है । उसी पतवार के सहारे तो मैंने तुम्हारे साथ अपने । विवाहित जीवन की नौका संसार के सागर में छोड़ दी है। पर, और बातें भी तो.हैं। नन्द वे क्या ? सुन्दरिका अभी तो मेरे पूज्यपाद श्वशुर, महाराज शुद्धोदन, तथा स्नेहशीला सास, महारानी प्रजावती के पास तुम्हारे लिए अनेक योजनाएँ शेप हैं । वे तुम्हारे लिए जो नया प्रासाद बनवा चुके हैं, उसमें तुम्हारे प्रवेश करने का महोत्सव शीघ्र ही मनाया जायगा । उसके तत्काल वाद ही वे दोनों तुम्हें अपना राज्य सौंपकर संन्यास ग्रहण करेंगे । तुम्हारा राज्याभिषेक-महोत्सव भी कुछ ही दिनों में होनेवाला है। नन्द राज्याभिषेक का अर्थ तुम्हारा वियोग तो नहीं है। सुन्दरिका संयोग और वियोग दोनों के अनिवार्य ताने-बाने ही से तो जीवन- का वस्त्र बना हुआ है। संन्यास मुझे इसलिए असह्य है कि उससे पति- पत्नी में चिरवियोग हो जाता है। यों तो जीवन में संयोग के साथ-साथ वियोग भी समय-समय पर सहन करना ही पड़ता है। नन्द मैं तो तुमसे अपने वियोग की कोई संभावना नहीं देखता ।

अंक ३: दृश्य १] [६१ सुन्दरिका मैं तो देखती हूँ। राज्याभिषेक होते ही तुम्हें राजयोग की साधना करनी होगी । वह सन्यास की भांति ही कठिन साधना है । गामक बनने के बाद तुम्हारा यह स्नेह, जिमपर इस समय फेवल मेरा एकाधिकार है, दूसरे रूप में तुम्हारे प्रजाजनो मे बँट जायगा । तुम्हें दिनरात उनके हित को कामना मौर मुख की साधना करनी होगी। हिंस्र पगुमों तथा माततायी मनुष्यो से जनता की रक्षा करने के लिए तुम्हें शस्त्र धारण करने होंगे, अपना पसीना और रक्त बहाना पड़ेगा । माक्रमणकारियों से युद्ध करने में तुम्हारे दिन ही नहीं, महीने भी रणभूमि मे वीत जाया करेंगे और मैं कपिलवस्तु मे भोली ही रहा करूंगी। नन्द 4-2 क्या तुम मेरे साथ न चला करोगी ? तुम केवल सौन्दयं मोर कला ही की रानी नहीं हो, तुम्हे प्रकृति ने इतनी बुद्धि भी दी है कि तुम राजराना मे मेरे महामत्री का स्थान पोभित कर सको और इतनी शक्ति और वीरता भी तुम्हे प्राप्त है कि तुम युद्धभूमि में मेरे प्रधान- सेनापति का कार्य कर सको। सुन्दरिका यह उचित न होगा। तुम्हारे रणभूमि में चले जाने पर मुझे जनता की सेवा की व्यवस्था के लिए कपिलवस्तु हो मे रहना होगा और तुम्हारे राजसभा में जाने पर मुझे अन्त.पुर की व्यवस्था का उत्तर- दायित्व वहन करना पड़ेगा। समय-समय पर होनेवाले तुम्हारे ऐगे वियोगो के लिए मैंने अपनी एक व्यवस्था कर ली है। नन्द क्या व्यवस्था कर ली है?

६२] [ गौतम नन्द सुन्दरिका मेरी सखी माधविका दुर्भाग्य के चक्र में फंस गई हैं । वह तुम्हारे मित्र राजकुमार देवदत्त से विवाह करना चाहती हैं, पर, देवदत्त भिक्षु बनने के अपने निश्चय पर दृढ़ हैं । माधविका के जीवन पर दुःख की काली घटा छाई हुई है। मेरे साथ रहने से उनका भी जी वहलेगा और मेरी भी वियोग की सूनी घड़ियाँ कट जाया करेंगी। इस विचार से मैंने उन्हें अपने पास बुला भेजा है । वह आने ही वाली हैं। नन्द यह तुमने बड़ा अच्छा किया। उनके साथ रहने से तुम्हें बहुत सहायता मिलेगी। यों मैं देवदत्त को समझाने का यत्न कर सकता था, पर, वह सदा से स्वभाव के दुराग्रही हैं। वह माधविका को स्वीकार करने का मेरा अनुरोध न मानेंगे। सुन्दरिका कर्तव्य की पुकार पर जव-जव तुम मुझसे दूर चले जाया करोगे, तब-तब वियोग के कठिन क्षणों में मेरी वीणा की झंकार, मेरी सखी माविका का गान, मेरी चित्रकला की साधना और तुम्हारा चित्र- दर्शन ही मेरा सबसे बड़ा सहारा हुमा करेगा। नन्द और मेरा सहारा? राजयोग की साधना में मुझे जव-जव तुमसे अलग होना पड़ेगा, तब-तव मेरा साथी कौन होगा ? जानती हो ? सुन्दरिका कर्तव्यपालन की भावना ही तुम्हारा सबसे बड़ा सहारा होगी। नन्द नहीं । मेरा सहारा होगी तुम्हारी स्मृति, तुम्हारा वह मानसचिन, जिसे मैं प्रत्येक क्षण अपने हृदय में रखता हूँ। (माधविका का प्रवेश।)

अंक ३ : दृश्य १]
[ ६३
माधविका
नमस्कार राजकुमारी ! प्रणाम राजकुमार !
सुन्दरिका
मामो बहन मायविका ! मुझे विश्वास था कि तुम पापोगो पौर
शीघ्र ही प्रामोगी।
नन्द
आपको फिर अपने बीच में पाकर मत्यन्त हर्ष हो रहा है
राजकुमारी !
माविका
धन्यवाद राजकुमार ! सखी सुन्दरिका, तुम तो यहां अपने नय.
विवाहित जीवन में मुझे भूल ही गई थी, पर, मुझे तो तुम्हारा स्मरण
दिन-रात विकल किया करता था।
सुन्दरिका
यदि भूल गई होती, तो तुम्हें इतने शीघ्र पत्र लिखकर क्यों
बुलातो?
माधविका
कहिए राजकुमार नन्द, प्रापका राज्याभिषेक कर होने वाला है ?
नन्द
इस विषय में मैंने अपने माता-पिता को पूर्ण पात्म-समपंग करने
का निश्चय कर लिया है । वे जब चाहें, तब मुझे कोई भी उचित सेवा
या उत्तरदायित्व सौंप सकते हैं। मैं ययाक्ति उसके निर्वाह का पल
करूंगा । मच्छा, मैं अब चयूँ । माप दोनो बहुत दिनो में मिली हैं ।
वार्तालाप कीजिए !
सुन्दरिका
तुम्हारे पाने से मुझे बड़ा सहारा मिला है नसो ! विवाहित
जीवन के उत्तरदापिल का कोई अनुभव न होने के कारण

१४] [ गौतम नन्द व्यग्न थी। तुम-जैसी विश्वासपात्र सहेली का प्रभाव मुझे बुरी तरह अखर रहा था। माधविका तुम्हारा सन्देश पाते ही मुझे ऐसा अनुभव हुआ मानो तुमने मेरे ही मन की बात सोची हो। मैं भी चाह रही थी कि वचपन की भांति तुम्हारे इस नए जीवन में भी मैं तुम्हारी यथासंभव सहायता कलें । तुम्हारा सन्देश पाते ही मैं चल पड़ी। सुन्दरिका इसपर तुम्हारे माता-पिता तो अप्रसन्न नहीं हुए? माधविका उनका अप्रसन्न होना तो स्वाभाविक ही था । पर, वे समझाने- बुझाने से मान गए। उन्होंने अनुभव से बहुत कुछ सीख लिया है। उन्होंने कुछ ही दिन पहले अपने हृदय पर जो भीपण वज्राघात सहन उनकी तुलना में मेरा यहाँ पाना नगण्य की । सुन्दरिका वनाधात ! वज्राघात कैसा? F.. माधविका तुम सब सुन चुकी होगी सखी ! वे मेरे विवाह के लिए प्राग्रह करते ही रह गए और मैंने उनका आग्रह अस्वीकार कर दिया। अपने विवाह के सम्बन्ध में मैं अपना निश्चय पहले ही कर चुकी थी। उसके असफल होने पर अन्यत्र व्यवस्था कैसे की जा सकती थी ? किया था, . स सुन्दरिका राजकुमार देवदत्त का हृदय पत्थर का बना हुआ है । उन्हें कितना समझाया गया, पर, भिक्षु वनने के अपने निश्चय से वह अणुमात्र भी विचलित नहीं हुए।

प्रक३:श्च १] [५ माधविका उनके इस अाग्रह के पोछे अभिसघि पी, इसलिए, उन्हें पपने निरचय मे विचलित करना और भी कठिन हो गया। सुन्दरिका अभिमधि कसो? माधविका तुम जानती ही हो कि यह तयागत गौतम बुद्ध से, अपनी बहन यशोधरा के परित्याग के कारण, व्यक्तिगत प रखते हैं। उनका कथन है कि बौद्ध भिक्षु वनकर ही निशु गौतम ने प्रतिशोध लिया जा मकता है, मोर किसी प्रकार से नहीं । सुन्दरिका ऐसे व्यक्ति के पोधे तुम क्यो अपना जीवन नष्ट करना चाहती हो माधविका? माधविका क्षमा करो वहन, मैं उनकी निन्दा नहीं मुन मकती। उनमे अनेक गुण भी तो हैं । और फिर शीलवती नारी अपने हृदय में अपने भायो का चुनाव जीवन मे एक हो वार करती है । एक बार चुनाव कर लेने पर वह अपना निश्चय नहीं बदल सकती। वह दूसरा साथी नही चुन मकती, भले ही उसे पहला साथी कभी न मिले। सुन्दरिका तुम्हारे जीवन को मापापो के प्रकुरों पर भीषण तुपारपान हुमा है सखी । मेरा हृदय तुम्हारी महानुभूति में मदा द्रवित होता रहेगा। माधविका मैं अपने जीवन का अपने ढंग से सदुपयोग काँगी वहन ! उन्होंने तथागत गौतम बुद्ध से प्रतिशोध लेने को भिक्षु बनने का निश्चय किया है। में उनके इम मकल्प का प्रायश्चित्त करूंगी। मैं तपागत, प्रार्थना करगी कि यह मुझे इसलिए प्रनग्या ग्रहण करने कोई [ गौतम नन्द दें कि मैं अपने जीवन को बहुजनहिताय अर्पित करके उनके वदले स्वयं प्रायश्चित्त की आग में अणु-मण करके तपती रहूँ। सुन्दरिका तुम्हारा आदर्श महान है मावविका ! पर, यह व्रत कितना कठोर होगा ! शीघ्रता से ऐसा निश्चय न करो! कुछ दिन मेरे पास रहो ! मैं तुम्हारे दुःख में हृदय से तुम्हारे साथ हूँ। माधविका मुझे तुम्हारे स्नेह पर अभिमान है बहन ! पर, कर्तव्य का मार्ग निराला है। सुन्दरिका स्नेह की मनुहार को भी तो तुम्हें कुछ महत्त्व देना ही पड़ेगा। मैं कुछ दिनों तक तो तुम्हें अपने पास अवश्य रखूगी । आज के इस क्षण के लिए भी मैं तुमसे प्रार्थना करती हूँ वहन ! उसे स्वीकार करो ! माधविका तुम्हारे और मेरे बीच में न तो प्रार्थना की भाषा चल सकती है और न आज्ञा की। इच्छा ही हमारी परस्पर प्रार्थना और आज्ञा हो. सकती है। बोलो सखी, क्या चाहती हो? क्या इच्छा है तुम्हारी ? मुझे इस समय तुम्हारे लिए क्या करना चाहिए ? सुन्दरिका केवल एक गान ! घडीभर एक गान गाओ सखी ! संसार के सम्मान के कोलाहल में जैसे मनुष्य स्नेह की एक मुसकान के लिए तरसा करता है, वैसे ही अपने इस नवविवाहित जीवन के उत्सव- आयोजनों में मैं तुम्हारे एक गान के लिए तरस रही थी। राजभवन के कुशल गायक-गायिकाओं के उत्कृष्ट संगीत में मुझे स्वाभाविकता का प्राणस्पर्श न मिल सका । उसपर तो तुम्हारे सरल कंठस्वर ही का अधिकार है सखी!

अंक ३ : दृश्य १ ] ! माधविका वारंवार मेरे गीत सुनने की तुम्हारी यह इन्दर बचपन से लेकर अब तक ज्यों-की-त्यों चली आ रही है । तुम यह भी तो नहीं सोनती कि दो-एक दिन में तुम राजमहिपी बननेवाली हो । सुन्दरिका राजमहिषी तो तुम भी बन सकती थी बदन ! पर, तुमने नो उम मागं से मुरा ही मोड़ लिया। तुम्हे देखकर यह पता चलता है कि परिग्रह के मार्ग से परित्याग का मार्ग कितना महान है ! माविका सखियों की प्रशंसा करने के अपने इस पुराने स्वभाव को भी तुम्है, राजमहिपी वनने के पहले, बदल देना चाहिए । सुन्दरिका किसोका स्वभाव बदल सकना इतना सरल नहीं है वहन ! पन्छा तो मन मेरी एक गान की प्रार्थना स्वीकार करो! माधविका तो फिर तुम मेरे दुर्बल स्वरों को सहारा देने के लिए मरने हापों में अपनी महिमामयी वीणा धारण करो! [सुन्दरिका योगा हानों में लेकर बनाना प्रारम्भ करती है। नन्द- का प्रवेश । नन्द बन्द करो वीणा सुन्दरिका । अनर्थ हो गया | भारी पन हो गया। [मुन्दरिका शोम्रता से बोसा एक मोर रस देती हैं। वोगा के तार तार भनभना जाते है।

१८] [ गौतम नन्द सुन्दरिका अनर्थ ! अनर्थ कैसा? - नन्द तथागत बुद्ध मेरे द्वार पर भिक्षा के लिए आए और सत्कार पाए विना ही लौट गए! सुन्दरिका हाय ! यह तो बहुत बुरा हुआ ! नन्द इससे बुरा और क्या हो सकता है ! मेरे जीवन में कलंक का अमिट टीका लग गया ! लज्जा और दुःख के मारे मैं मरा जा रहा हूँ! मैंने तुम्हें यह वचन अवश्य दिया था कि मैं भिक्षु न वनंगा, पर, यह वचन कभी नहीं दिया था कि अपने घर पर आने पर भी अपने बड़े भाई का अतिथि-सत्कार न करूंगा। सुन्दरिका मैं कब कहती हूँ कि अतिथि-सत्कार न किया जाय ! तथागत तो आपके बड़े भाई हैं, मैं तो समान्य अतिथियों के सत्कार को भी अपना कुलधर्म मानती हूँ। मैं भी यह सहन नहीं कर सकती कि तथागत-जैसे अतिथि द्वार पर पधारकर यों ही लौट जायें। पर, यह हुमा कैसे ? A विवाह, नवगृहप्रवेश और राज्याभिषेक ! तीन-तीन महोत्सवों का आनन्द ! राजभवन के सेवक, सेविकाएँ और सारे परिजन मानो मदमत्त हो रहे थे। सब लोग अपने-अपने प्रानन्द-प्रायोजन में लगे हुए थे। तथागत द्वार पर भिक्षा के लिए पधारकर यों ही लौट गए। सुन्दरिका और उन्हें किसीने देखा तक नहीं ? नन्द किसीको क्या पड़ी थी कि उन्हें देखता ! सब लोग आनन्द में

अंक ३ : दृश्य १]
[९
मदमत्त जो हो रहे थे ! कितना बडा मनपं हो गया ! तथागत गौतम
बुद्ध, जिनके पदार्पण से प्राज राजभवन, नगर, ग्राम पौर कुटीर मच
अपने को घन्य मानते हैं. मुन अनागे के द्वार पर भिक्षा के लिए पाए
और मत्कार पाए बिना ही लौट गए !
माधविका
मारे संमार को शान्ति मोर निर्माण की उपसम्पदा यौटने को
राजपाट छोड़कर निकले हुए तथागत गौतम बुद्ध अपने भाई के द्वार
से भिक्षा भी न पा मकै, इसमें बढ़कर दुर्भाग्य और क्या हो
मकता है !
नन्द
में माज समार का सबने अधिक प्रभागा प्राणी हूँ । स्वयं तपा-
गत वुद्ध स्वेच्छा से मुझ प्रभागे के द्वार पर पाए पोर में मायाजाल
में ऐसा फैमा रहा कि उन्हें देस तक न पाया । पर के सारे नौकरों;
नौकरानियों पोर परिजनों पर भी मेरी ही मदाग्यता को धाया पड़ी
हुई थी । उनमे से कोई उन्हें न देख पाया। इतने बड़े कलंक, इतने
लग्जाजनक लाइन को सहन करते हुए जीवित रहना मेरे लिए
नरकवास से भी अधिक दु.सकर है ।
सुन्दरिका
तथागत को सौटे कितना समय हो गया ?
नन्द
• बाहर में मानेवाली एक सेविका ने सभी बताया कि उसने तया-
गत को अभी हमारे द्वार से लौटने देता है।
माधविका
तब तो तयागत मनी अधिक दूर न पहुंच पाए होंगे !
नन्द
हाँ, यह सभी निकट ही होंगे। में मभी जाकर उन्हें मादरसरित
लिए पाता हूँ।

१०० ] [ गौतम नन्द सुन्दरिका उन्हें अवश्य लाना चाहिए । पर, क्या उन्हें लाने को और किसी- को नहीं भेजा जा सकता? नन्द नहीं ! तथागत का असम्मान जघन्य अपराध है। इतने बड़े अपराध का प्रायश्चित्त मेरे जाए विना न हो सकेगा। किसी सेवक या सेविका को भेजकर वुलवाना तो और अधिक अपमान करना होगा ! माधविका यदि आप लोग आज्ञा दें, तो मैं जाकर तथागत को सादर लिवा लाऊँ। नन्द नहीं, आप क्यों जायेंगी ! अपराध मेरा है, उसका प्रायश्चित्त भी मुझीको करना होगा । संसार के इतिहास में इतने बड़े अनर्थ, इतने बड़े अन्याय का और कोई उदाहरण न मिलेगा । सिद्धार्थकुमार ने. मानवता के कल्याण के लिए सर्वस्वत्याग किया, इतने बड़े राज्य को तृण की भाँति ठुकरा दिया, पत्नी और पुत्र को छोड़ दिया ! यदि वह राज्यत्याग न करते, तो क्या मुझे राज्य का उत्तराधिकार मिल सकता था ! इतना महान् भाई केवल भिक्षा के लिए स्वेच्छा से चल- कर मेरे द्वार पर आया और मैं नराधम उसे मुट्ठी-भर भिक्षा देने योग्य भी न हुआ ! मुझे भारी कलंक लग गया ? मैं इसका प्रायश्चित्त करूंगा । तथागत के चरण पकड़कर क्षमा मांगूंगा । उन्हें लौटा लाऊँगा। उनका हार्दिक पादर-सत्कार करूंगा । मुझे अविलम्ब जाना चाहिए। मैं चला ! [नन्द गमनोद्यत होते हैं। ] . सुन्दरिका शीत्र लौटना प्रिय, मुझे न भूल जाना !

भंक ३ :हस्य १ ]
[ १०१
नन्द
सभी पाता हूँ प्रिये, अभी पाता हूँ ! मैं तुम्हें कैसे भूल सकता हूं,
तुम्हे दिए हुए अपने पचन को कैसे भूल सकता हूँ?
[ नन्द का प्रस्थान।]
[पट-परिवर्तन ।

१०० ] [ गौतम नन्द सुन्दरिका उन्हें अवश्य लाना चाहिए । पर, क्या उन्हें लाने को और किसी- को नहीं भेजा जा सकता? नन्द नहीं ! तथागत का असम्मान जघन्य अपराध है । इतने बड़े अपराध का प्रायश्चित्त मेरे जाए विना न हो सकेगा । किसी सेवक या सेविका को भेजकर बुलवाना तो और अधिक अपमान करना होगा ! माधविका यदि आप लोग आज्ञा दें, तो मैं जाकर तथागत को सादर लिवा लाऊँ। नन्द नहीं, आप क्यों जायँगी ! अपराध मेरा है, उसका प्रायश्चित्त भी मुझीको करना होगा । संसार के इतिहास में इतने बड़े अनर्थ, इतने बड़े अन्याय का और कोई उदाहरण न मिलेगा। सिद्धार्थकुमार ने. मानवता के कल्याण के लिए सर्वस्वत्याग किया, इतने बड़े राज्य को तृण की भाँति ठुकरा दिया, पत्नी और पुत्र को छोड़ दिया ! यदि वह राज्यत्याग न करते, तो क्या मुझे राज्य का उत्तराधिकार मिल सकता था ! इतना महान् भाई केवल भिक्षा के लिए स्वेच्छा से चल- कर मेरे द्वार पर आया और मैं नराधम उसे मुट्ठी-भर भिक्षा देने योग्य भी न हुआ ! मुझे भारी कलंक लग गया ? मैं इसका प्रायश्चित्त करूंगा । तथागत के चरण पकड़कर क्षमा मांगूंगा। उन्हें लौटा लाऊँगा । उनका हार्दिक अादर-सत्कार करूंगा। मुझे अविलम्ब जाना चाहिए। मैं चला ! [नन्द गमनोद्यत होते हैं।]. सुन्दरिका शीघ्र लौटना प्रिय, मुझे न भूल जाना !

अंक ३:हस्य १]
[ १०१
नन्द
सभी पाता हूं प्रिये, अभी पाता हूँ ! मैं तुम्हे कैसे भूल सकता हूँ,
तुम्हे दिए हुए अपने वचन को कसे भूल सकता हूँ?
[नन्द का प्रस्थान 1]
(पट-परिवर्तन 1]

दूसरा दृश्य
[ कपिलवस्तु । शुद्धोदन का प्रासाद । सायंकाल!]
[शुद्धोदन और प्रजावती वार्तालाप
कर रहे हैं।]
प्रजावती
अव और क्या चाहिए महाराज? आपके पुत्र नन्द का विवाह
हुआ । अप्सरानों से अधिक सुन्दर और ऋषिकन्यायों से अधिक
गुणवती पुत्रवधू घर में आई ! वहूबेटों के लिए नया प्रासाद बनकर
तैयार हुआ। शीघ्र ही वे दोनों नवगृहप्रवेश करेंगे । नन्द का
राज्याभिषेक भी शीघ्र ही हो रहा है । फिर भी आप चिन्तित क्यों
दिखाई देते हैं ?
शुद्धोदन
निश्चिन्त वही हो सकता है प्रजावती, जिसके सामने कोई समस्या

भक ३ : दृश्य २]
[१०३
न हो। मेरी चिन्ता का कारण एक नई समस्या है। सिमाध.
कुमार के वियोग ने मुझे मरणासन्न कर रसा या । मेरी इच्छा धी
कि किसी प्रकार एक बार अपने प्यारे पुत्र सिनार्य का मुख दे।
इसके लिए कितने प्रपल किए ! कितने लोगो को सिलापं को
कपिलवस्तु ले पाने को भेजा ! पर, जो गया, भिक्ष वनकर वही रह
गया। लोटकर समाचार देने तक न प्राया। कितनी लम्बी प्रतीक्षा
के बाद मेरे प्यारे सिद्धापं ने कपिलवस्तु में पदार्पण किया ! फिन्तु,
उसने पाते ही एक नई समस्या गडी कर दी।
प्रजावती
नई उमस्या कैसी?
मुद्धोदन
तुम क्या जानती नहीं हो प्रजावती ? अपनी ही राजधानी में
सिद्धार्थकुमार माजकल पर घर भीख मांगते फिरते हैं । कपिलवस्तु के
राजवश के लिए यह कितनी लज्जा की बात है ! हमने मेरी स्थिति
यह हो गई है कि लज्जा के मारे किसीको भपना मह नहीं दिया
सकता । अाजकल इसी समस्या की चिन्ता मुझे दिन-गन या जा
रही है। नन्द के विवाह, नयगृहप्रवेश मोर गग्यामिर की गारी
प्रसन्नता इससे फीकी पड़ गई है।
प्रजावती
चिन्ता करने से तो पापके स्वास्थ्य पर युग प्रभाव पडेगा । इनके
निराकरण का कुछ उपाय करना चाहिए।
शुद्धोदन
नारे उजाय असफल हो नुके है। मिद्धायामार को अत्यन्त
अनुनय-विनय करके समभाया, पर, यह नहीं मानने । कहते हैं-
"भिक्षाटन मेरा कुलधर्म है, मैं जहाँ जाऊंगा, इनी कुलधर्म का
अनुसरण करमा । मेरे लिए कपिलवन तथा अन्य स्थानों में
मन्तर नहीं है।'

[ गौतम नन्द ] प्रजावती कुलधर्म कैसा ? भिक्षाटन कुलधर्म कैसा ? शाक्यों के कुल का धर्म आदिकाल से राज्यसंचालन रहा है, भिक्षाटन नहीं। शुद्धोदन सिद्धार्थकुमार कहते हैं-अव मेरा कुल बदल गया है, अब मैं शाक्यों के कुल के बदले बुद्धों के कुल का हो गया हूँ और भिक्षाटन ही युगों से युद्धों का कुलधर्म रहा है । प्रजावती कैसा विचित्र लड़का है ! बचपन ही से इस लड़के की सारी बातें अनोखी रही हैं। रोगियों, वृद्धों और मृतकों को सब लोग प्रतिदिन देखते हैं, पर, किसीपर कोई विशेप प्रभाव नहीं पड़ता। किन्तु, मेरा वेटा सिद्धार्थ रोगी, बूढ़े और शव को देखते ही कह उठा - "मैं तो प्राणिमात्र को रोग, जरा और मरण के बन्धन से मुक्त करने को निकल रहा हूँ।" तबसे अब तक मेरा वच्चा लौटकर ही नहीं आया । कितने वर्ष बीत गए ! वहुत बुलाने पर अव जव दो-चार दिन को माया भी है, तो अपने ही पूर्वजों की इस राजधानी में घर-घर भीख मांगता फिर रहा है। जिधर से निकलता है, उसके पीछे भीड़ हो लेती है । शुद्धोदन यह तो और भी लज्जा की बात है ! उस भीड़ के सामने ही वह घर-घर से भिक्षा मांगता है ! अपने ही राज्य में भीख ! इस बूढ़े पिता- का अनुरोध भी नहीं मानता ! कैसा निर्मोही हो गया है ! क्या इसीके लिए मां-बाप बच्चों को जन्म देते हैं ? प्रजावती जन्म देना सरल है महाराष, पर, पाल-पोसकर बड़ा करना बहुत काठिन काम है ! मुझसे पूछिए स्वामी ! मैंने इस सिद्धार्थ को कैसी कठिनाई से पाला है। वहन महामाया तो इसे जन्म देकर ही चल वर्स प्रंक ३ : दृश्य २ ] [ १०५ थी ! मैंने इसके पौधे रतः पोर पसीना एक कर दिया था ! मैंने इतना किया, पर, मैं मिसायं मे उसके बदले कुछ नहीं चाहती, शपय फरके कहती हूँ, कुछ नहीं चाहती ! मैं केवल यह चाहती हूँ कि यह गुरासे रहे । उनका कापाय-यस्त्र पहनकर वन-वन फिरना पौर निभा फा रूपा-मूसा भग्न साना मेरे कलेजे में घेद किए देता है। मेरा हृदय मां का हश्य है । मां के हृदय को वेदना कोई नहीं गमन्ना ! शुद्धोदन मैं तुम्हारे हृदय की वेदना का मनुनय कर मकना हूँ प्रजावती ! कपिलवस्तु का बच्चा-बच्चा इस बात का साक्षी है कि तुमने सिद्धार्थ को गन्द से अधिक स्नेह से पाला था। इनमे कोई मुन्देह नहीं कि नन्द फे राज्यारोहण का मुम तुम्हारे जीवन का बहुत बड़ा सौभाग्य होगा, पर, उम मुग में भी जय तुम्हारे हृदय में मिसार्थ के वियोग का कोटा चटकेगा, तब तुम्हारी विकलता मराय हो उठेगी। किस दुर्दिन में सुमने मिसायं पर अपना मारा चालल्प उडेल दिया था प्रजापती ! प्रभागिनी मो! अभागिनी नारी ! [ मापपिका का प्रवेश माधविका पाप दोनों के लिए मैं बहुत बुरा समाचार लाई हूँ। राजकुमार नन्द भिधु बन गए हैं। गुसोदन गन्द भी भिक्षु बन पपा ! फर ? कहाँ ? प्रजावती नन्द भिक्षु ! कसे ? नन्द भिक्षु कैसे बन गया ? माविका उन्होंने तथागत गौतम युट के उपदेश पर संन्यास में लिया से लिया

:०६ ]
[ गौतम नन्द
शुद्धोदन
कब ले लिया संन्यास?
प्रजावती
हाय दुर्भाग्य ! नन्द ने भी संन्यास ले लिया !
माधविका
तथागत बुद्ध अाज राजकुमार नन्द के द्वार पर भिक्षा के लिए
आए थे।
शुद्धोदन
भिक्षा के लिए ? नन्द के द्वार पर सिद्धार्थ ? भाई के द्वार पर
भाई भिक्षा माँगने पहुँचा ! इससे बढ़कर दुर्भाग्य क्या हो सकता है !
इससे अधिक लज्जा की वात क्या हो सकती है ! नन्द ने उसे रोका
नहीं ?
माधविका
राजकुमार नन्द को तथागत के पधारने का पता ही न चला।
प्रजावती
पता ही न चला ! क्यों ?
माधविका
उत्सव-मायोजन की प्रसन्नता में मग्न सेवक-सेविकाओं ने तथागत
को देखा ही नहीं !
शुद्धोदन
देखा ही नहीं ! किसीने नहीं देखा ?
माधविका
जी हाँ, किसीने नहीं देखा और तथागत भिक्षा पाए बिना ही
.
लौट गए।
प्रजावती
अनर्थ हो गया ! भाई के द्वार से भाई को ही लौट गया ! उ
भिक्षा भी न मिली।

अंक : ३ हर २]
[१०७
मुद्धोदन
भिक्षा मीन मिती? सिद्धार्य यों ही लौट गया? यह पोर भी
धुरा हुमा !
माविका
कुछ देर बाद जब बाहर से प्रानेवाली सेषिका ने बताया कि
तथागत लौट गए हैं, तब राजकुमार नन्द दुगी होकर उसी समय उन्हें
चुलाने को चल पड़े।
प्रजावती
नन्द उसी समय पल पड़ा । भाई को बुलाने पल पड़ा ! भाई के
लिए भाई के हृदय में ऐमा ही प्रेम होता है । मेरे सिजापं पोर नन्द
एक दूसरे को सगे भाइयो मे अधिक प्रेम करते पाए हैं।
माधविका
राजकुमार नन्द के जाते ही राजकुमारो सुन्दरिका सो विस्तता
असत्य हो गई और जब वाहर से भाए हुए पन्य मेयर ने कुछ समय
के बाद यह ममाचार मुनाया कि राजकुमार नन्द ने मंन्याग ग्रहण
फर लिया है, तब तो उन्हें मूर्धा ही प्रा गई !
प्रजावती
हाय मभागी मुन्दरिफर !
मुखोदन
हमारे माव-नाथ उम निरपरा पिनी का भी भाग्य फूट गया!
माधविका
आते समय राजकुमार नाम मुन्दरिका को दिए हुए मपने पचन
फो बड़ी हडता से दुहरा गए थे । यह गए कि "म घोम ही लौटकर
घाऊंगा।" पर, हुमा कुछ मोर हो !
गुखोदन
नन्द ने प्रसन मन्यास में ले लिया ही सि

- १०८] [गीतम नन्द माधविका सेवक कह रहा था कि तथागत कुछ दूर जा चुके थे। उनके पास पहुंचते ही राजकुमार नन्द ने उन्हें प्रणाम किया और उनसे अपने घर चलकर सत्कार ग्रहण करने की प्रार्थना की। प्रजावती इसपर सिद्धार्थ ने क्या कहा ? माधविका कुछ नहीं; तथागत ने प्रणाम के उत्तर में केवल एक बार राज- कुमार नन्द के सिर पर हाथ रखा और आगे चलते गए। नन्द भी उनके पीछे चलते गए । चलते-चलतें, कुछ समय बाद, उन्होंने चुपचाप अपना भिक्षापात्र नन्द के हाथ में दे दिया ! शुद्धोदन हाथ में भिक्षा-पान दे दिया । माधविका जी हाँ, उन्होंने नन्द को अपना भिक्षापात्र दे दिया और उसी प्रकार मागे चलते गए। नन्द ने चाहा कि कुछ कहें, पर, तथागत के साथ चलनेवाली नगरवासियों की भीड़ के कारण वह कुछ भी न कह पाए ! इस प्रकार तथागत के पीछे नन्द भी उनका भिक्षापाक लिए हुए चलते ही चले गए। चलते-चलते दोनों पास के न्यग्रोध- उपवन में जा पहुंचे, जहाँ तथागत अपने सैकड़ों भिक्षु शिष्यों के साथ आजकल ठहरे हुए हैं ! प्रजावती नन्द भी वहीं जा पहुंचा? माधविका जी हाँ । कुछ समय के बाद उस सेवक को एक भिक्ष से ज्ञात हुना कि तथागत के उपदेश पर राजकुमार नन्द ने प्रव्रज्या ग्रहण कर ली है। नन्द के

प्रक३:हर २]
गुद्धोदन
हाय रे दुर्भाग्य ! मिसायं के बाद नन्द भी निशु दन गया !
निष्ठुर दुर्दय, तूने मुझे कहीका नहीं रखा ! १५ में ग !
पर नो मुझे कोई प्रामा दिमाई नहीं देता !
प्रजावती
मुहमारी मुन्दरिका ! रा भी मान्य मप्रकार टना या !
माविका
मुन्ने इवनी समता वो नहीं है कि मार लोगों ने धारण
करा गई, पर, मैं नम्रतापूर्वक पनुरोध पर कर नाती है।
राजकुमारी मुरिका सि पं के माप इन माप मापात की
महन करने का पल करने लगी है, उसी पं को मार दोनों ने मामा
करना क्या उचित नहीं है?
मुद्धोदन
धं ? अव धयं की बात न रहो । ६ कहा उस पार किया
सा माना है ! मनुष्य के धंयं की कोई सीमा होती है ! छोटे-
गले में एक गाय इतने पाद कंगनहन किए जानते हैं ? महा-
माया का देहान्त रहना वरात या, जिन मने मन थिा । मिसा
का गृहत्याग दूनग भीपरा भागात पा, बिन नार पार ठर नंग
दश्य निमा रहा है। नन्द के गन्दार ने तो मेरे को को बन ही
दाना है। पव में की पं धारा ?
নাৰী
इन नारकों को विधाता ने गुद-बुध कियापा, पर, मोहदर
की वंदना को नमन्ना नही मिनासा ! नगर को को
बनकर दंगे, तो इन मांगे गुन पाय !
गुदोदन
शेग्न की गारी पोवनाएँ पन में मिल गई ! मांगा -
जीरनार गरे पायात मन सग्नंगन हर को अन्तिम दि

११० ] { गीतम नन्द कुछ सुख देखने को मिलेगा । पर, यह सोचते समय में यह भूल गया कि सुख के नाम पर मेरे भाग्य में विधाता ने केवल वड़ा-सा शून्य ही लिख दिया है। माधविका वास्तव में आप लोगों के जीवन की कहानी एक अत्यन्त करुण और दुखान्त कहानी है । मेरा हृदय आप दोनों के लिए गम्भीर सहानुभूति से भरा हुआ है। पर, इस विषय पर एक दूसरी दृष्टि से भी विचार किया जा सकता है। शुद्धोदन वह क्या ? माधविका आपकी पुत्रवधू सुन्दरिकादेवी आपके लिए पुत्री ही के समान हैं । उनकी सहेली होने के नाते मैं भी आपकी एक पुत्री ही हूँ। यदि आप लोग मुझे क्षमा करें, तो, इस समय मेरे मस्तिष्क में जो कुछ दूसरे प्रकार के विचार आ रहे हैं, उन्हें भी मैं आपके सामने, निस्संकोच रूप में, प्रकट कर दूं। प्रजावती संकोच की क्या बात है वेटी ! तुम कोन कोई दूसरी हो ! जो कुछ कहना चाहो, निस्संकोच होकर कहो ! माधविका मेरा नम्र निवेदन है कि आप लोग दुःख और शोक के घने अध- कार को विवेक की ज्योति को किरण से दूर करने का यल कीजिए। विचार करने का एक और भी दृष्टिकोण हो सकता है। स्थिति पर शान्ति और गम्भीरता से विचार करने की आवश्यकता है। अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट करने के लिए मैं आपसे कुछ प्रश्न पूछना चाहती हूँ। शुद्धोदन क्या पूछना चाहती हो ? पूछो वेटी !

अंक ३ : दृश्य २] माधविका तथागत गौतम जहां-जहां जाते हैं, वहां-वहां बहुत बड़ी संख्या में लोग उनके अनुयायी बन जाते हैं । वह जिस मार्ग पर चलते हैं, उस- पर सैकड़ों व्यत्तियो की भीड़ उनके पीछे हो लेती है। ऐसा उन्हीके साय क्यों होता है, हममे से और किसी के साथ क्यो नही होता ? क्या..- इसका कारण यह नहीं है कि हम लोग अपने व्यक्तिगत क्षुद्र स्वार्थों में फंसे हुए हैं और तथागत बुद्ध ने जनकल्याण के महान लक्ष्य के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया है ? शुद्धोदन क्यों नही ! सिद्धार्थ ने उच्च यादर्शो ही के लिए गृहत्याग किया है। माधविका तब फिर उनके संन्यास पर आप लोग दु.ख के बदले गौरव का अनुभव क्यों नहीं करते ? आप लोग यह क्यो नही अनुभव करते कि मानवता के कल्याण के लिए, बहुजन के हित के लिए, यौवनकाल में राज्य, वैभव, सुन्दर पत्नी और सुख के समस्त साधनों को ठुकराकर वन-वन और ग्राम-ग्राम घूमनेवाले तथागत बुद्ध के माता-पिता कह- लाकर आप लोग गौरवान्वित हुए हैं, धन्य हुए हैं, कृतकृत्य हुए है ? प्रजावती यह तो है ही बेटी। माधविका यदि ऐसा ही है, तो आप लोग क्यो नही अपने दुःख, शोक, माया, मोह और ममता के सारे वन्धन तोड़कर प्रसन्न चित्त से तथागत का समर्थन करते, क्यों नहीं देश-देशान्तर मे मुक्त कंठ से उद्घोष करते फिरते कि गौतम बुद्ध केवल हमारे नहीं, वरन्, सारे संसार के है. इसीलिए, वह महान् है और हम सौभाग्यशाली हैं कि हम माता-पिता रहे हैं !

[ गौतम नन्द शुद्धादन तुम ठीक कहती हो बेटी ! हमारा कर्तव्य यही है । मोह ने हमारी 'दृष्टि धुंधली कर रखी थी । शोक के गहन अन्धकार में तुमने हमें "वेक की ज्योति की किरण दी है। प्रजावती इतनी-सी अवस्था में तुममें इतनी पात्मज्योति कहाँसे आ गई बंटी? माधविका मैं आपकी प्रशंसा के योग्य नहीं हूँ। अनुभव का आघात सहे विना मनुष्य की आँखें नहीं खुलती । मैं अपनी वेदना आप लोगों पर प्रकट तो नहीं कर सकती, पर, इतना कह सकती हूँ कि मैंने भी अपने जीवन में भीपण प्राघात सहन किया है। उस प्राधात की पाप लोग कल्पना नहीं कर सकते. पर, यह सत्य है कि उसीने मेरी आँखें खोली हैं । मैं चाहती हूँ कि राजकुमार नन्द के गृहत्याग के प्राघात से आप दोनों को भी जीवन का नया प्रकाश प्राप्त हो, नई दृष्टि उपलब्ध हो । प्राघात ही से प्रकाश मिलता है और अनुभव ही से ज्ञान की प्राप्ति होती है। शुद्धोदन मिल रहा है बेटी, हमें भी कुछ प्रकाश मिल रहा है । हम भी मोह के अन्धकार के पार कुछ-कुछ देख पा रहे हैं। संन्यास तो हम दोनों को भी ग्रहण करना था , पर, हम चाहते थे कि नन्द को राज्य सौंपकर फिर गृहत्याग करें। माधविका मुझे क्षमा कीजिए महाराज, बुढ़ापे का वैराग्य कोई वैराग्य नहीं है ! वैराग्य, त्याग और वलिदान तो वह है, जिसका उद्भव भरी जवानी में हो । त्याग तो किया है उन सिद्धार्थकुमार ने जो यौवन के' प्रथम चरण ही में यशोधरा-जैसी सुन्दर और सुशील पत्नी और ग्रक ३ : दृश्य २] । ११३ कपिलवस्तु- जैसे विशाल और समृद्ध राज्य को, आत्मप्रेरणा के एक ही क्षण में, छोड़कर चल दिए । और सिद्धार्थ से भी कठिन त्याग किसका है, जानते है आप लोग? प्रजावती निन्द सिद्धार्थ से भी कठिन त्याग ? सिद्धार्थ से भी कठिन त्याग किसक है बेटी? माधविका नन्द का ! सिद्धार्थ तो जन्म हो से महान् थे, बचपन ही से विशा विभूति से युक्त थे। उनका त्याग तो असाधारण पुरुप का, महा. क्षमताशाली व्यक्ति का त्याग था। उनके लिए कुछ भी कठिन नह था। उन्होंने जो कुछ किया, वह उन जैसे महापुरुष के लिए अत्यन्त स्वभाविक, अत्यन्त सरल था। किन्तु, नन्द तो सदा से सामान्य थे इसीलिए, उनका त्याग अधिक कठिन, अधिक महत्त्वपूर्ण है। उनमें ऐसी कोई विशेष विभूति नही थी कि उन्हे इतने बड़े त्याग के योग्य समझा जाता। वह नो सदा से साधारण राजकुमार की भांति खाने, पीने, हँसने, खेलने, गाने बजाने याखेट करने और सुख से रहने के अभ्यासी थे । सुन्दरिका के प्रेम मे भी वह इतने गहरे डूब गए थे कि उससे उनका उद्धार असम्भव था। फिर भी, अपनी नाकाक्षानों को दुर्बलतानो के होते हुए भी, उन्होने एक क्षण मे सर्वस्वत्याग कर दिया । उनका त्याग उनके लिए अत्यन्त कठिन था, इसीलिए, वह अत्यन्त असाधारण है ! यदि न्याय की तुला को विचलित न होने दिया जाय, तो महापुरुषो के त्याग की तुलना मे सामान्य जनो का त्याग अधिक महत्त्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है ।। शुद्धोदन वास्तव में नन्द ने आश्चर्यजनक साहस का कार्य किया है । उसमें किसीको ऐसी आशा न थी। समस्त [ गौतम नन्द शुद्धोदन तुम ठीक कहती हो वेटी ! हमारा कर्तव्य यही है । मोह ने हमारी दृष्टि धुंधली कर रखी थी । शोक के गहन अन्धकार में तुमने हमें विवेक की ज्योति की किरण दी है,। प्रजावती इतनी-सी अवस्था में तुममें इतनी प्रात्मज्योति कहाँसे प्रा गई टी? . माधविका मैं आपकी प्रशंसा के योग्य नहीं हूँ। अनुभव का प्राघात सहे वेना मनुष्य की आँखें नहीं खुलती । मैं अपनी वेदना आप लोगों पर प्रकट तो नहीं कर सकती, पर, इतना कह सकती हूँ कि मैंने भी अपने जीवन में भीपण आघात सहन किया है। उस आघात की श्राप लोग कल्पना नहीं कर सकते, पर, यह सत्य है कि उसीने मेरी आँखें खोली हैं । मैं चाहती हूँ कि राजकुमार नन्द के गृहत्याग के आघात से आप दोनों को भी जीवन का नया प्रकाश प्राप्त हो, नई दृष्टि उपलब्ध हो । आघात ही से प्रकाश मिलता है और अनुभव ही से ज्ञान की प्राप्ति होती है। शुद्धोदन मिल रहा है वेटी, हमें भी कुछ प्रकाश मिल रहा है। हम भी मोह के अन्धकार के पार कुछ-कुछ देख पा रहे हैं । संन्यास तो हम दोनों को भी ग्रहण करना था , पर, हम चाहते थे कि नन्द को राज्य सौंपकर फिर गृहत्याग करें। माधविका मुझे क्षमा कीजिए महाराज, बुढ़ापे का वैराग्य कोई वैराग्य नहीं है ! वैराग्य, त्याग और वलिदान तो वह है, जिसका उद्भव भरी जवानी में हो । त्याग तो किया है उन सिद्धार्थकुमार ने जो यौवन के प्रथम चरण ही में यशोधरा-जंसी सुन्दर और सुशील पत्नी और अक ३ : दृश्य २] [ ११३ कपिलवस्तु- जैसे विशाल और समृद्ध राज्य को, पात्मप्रेरणा के एक ही क्षण में, छोड़कर चल दिए। और सिद्धार्थ से भी कठिन त्याग किसका है, जानते हैं आप लोग? प्रजावती . सिद्धार्थ से भी कठिन त्याग? सिद्धार्थ से भी कठिन त्याग किसका है बेटी ? माधविका (नन्द का ! सिद्धार्थ तो जन्म ही से महान् थे, वचपन ही से विशेष निन्दक विभूति से युक्त थे । उनका त्याग तो असाधारण पुरुप का, महान क्षमताशाली व्यक्ति का त्याग था। उनके लिए कुछ भी कठिन नहीं था। उन्होने जो कुछ किया, वह उन जैसे महापुरुष के लिए अत्यन्त स्वभाविक, अत्यन्त सरल था। किन्तु, नन्द तो सदा से सामान्य थे; इसीलिए, उनका त्याग अधिक कठिन, अधिक महत्त्वपूर्ण है। उनमें ऐसी कोई विशेप विभूति नही थी कि उन्हें इतने बड़े त्याग के योग्य समझा जाता । वह नो सदा से साधारण राजकुमार की भांति खाने पीने, हँसने, खेलने, गाने बजाने आखेट करने और सुख से रहने के अभ्यासी थे । सुन्दरिका के प्रेम में भी वह इतने गहरे डूब गए थे कि उससे उनका उद्धार असम्भव था । फिर भी, अपनी समस्त आकांक्षाओ की दुर्बलतापो के होते हुए भी, उन्होने एक क्षण में सर्वस्वत्याग कर दिया । उनका त्याग उनके लिए अत्यन्त कठिन था, इसीलिए, वह अत्यन्त असाधारण है ! यदि न्याय की तुला को विचलित न होने दिया जाय, तो महापुरुषों के त्याग की तुलना में सामान्य जनों का त्याग अधिक महत्त्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है ।' शुद्धोदन वास्तव में नन्द ने आश्चर्यजनक साहस का कार्य दिया है। - किसीको ऐसी आशा न थी।

११४ ] [ गोतम नन्द माधविका नन्द का यह त्याग इतिहास में एक अनोखी घटना के रूप में लिखा जायगा । सुखोपभोग की आकांक्षाओं की समस्त दुर्वलताओं से घिरा हुमा एक सामान्य राजकुमार नन्द, नए विवाह, नवगृहप्रवेश के मायोजन और सामने आए हुए राज्याभिषेक के स्वर्ण-अवसर को क्षणभर में ठुकराकर चल देता है ! कैसा अद्भुत त्याग है ! आप दोनों गौतम बुद्ध के माता-पिता काहलाकर जितने धन्य हुए हैं, गोतम नन्द के माता-पिता कहलाकर उससे कम धन्य नहीं हुए हैं ! अपने इस महान् गौरव का स्वाभिमान के साथ अनुभव कीजिए ! पाप-जैसे सौभाग्यशाली व्यक्तियों के लिए मोह, शोक और दुःख का निर्माण नहीं हुमा है । बुद्ध और नन्द के माता-पिता होना तो आप लोगों का महान् गौरव है ही, इससे भी बढ़कर एक गौरव और है। प्रजावती वह क्या? माधविका वह यह कि आप लोग यशोधरा और सुन्दरिका-जैसी साध्वी पुत्र- यधुओं के सास-ससुर हैं, जिन्होंने यौवन के प्रथम चरण ही में पति- वियोग की उत्कट वेदना के हलाहल-विप को अपने प्राणों में पचाया है ! शंकर ने तो अपने विप को कण्ठ ही में रख लिया था, पर, उन दोनों देवियों ने अपनी व्यथा के विप को अपने हृदय के अन्तराल में धारण किया है । संसार की बहुत कम स्त्रियां इतने धैर्य का परिचय दे सकी हैं ! उनके सास-ससुर होकर आप दोनों और धन्य हुए हैं। अपने सौभाग्य पर सुख का अनुभव कीजिए ! विवेक की आँखें सोलिए ! दुःख का कोई कारण नहीं है ! [ पट-परिवर्तन ।]

तोसरा दृश्य
[कपिलवस्तु के पास न्ययोध-नामक शाक्य के उपवन में बौद्ध
भिक्षुओं के वासस्थान का एक भाग । दिन का तीसरा पहर । ]
[प्रानन्द और नन्द बातचीत
कर रहे हैं।]
नन्द
कंसी गम्भीर शान्ति है, भिक्षु अानन्द, इस उपवन के उस भाग
में, जिसमें तथागत बुद्ध ध्यानमग्न हैं। उनके आसपान नंकड़ो भिक्षु
अपनी-अपनी साधना में लगे हुए हैं, पर, इतने
कहीं कोई शब्द नहीं सुनाई देता । इतनो गम्भीर शान्ति उपवन के इस
भाग में क्यों नहीं है ?
ग्रानन्द
समुदाय में भी
उपवन के इन भाग मे कमी हो गम्भोर शान्ति होती,

११६ ] [गौतम नन्द यदि यह भाग पाने-वालों के ठहरने के लिए सुरक्षित न रखा गया होता। भिक्षुत्रों के समान शान्ति-साधना का अभ्यास अभी उन लोगों को नहीं है, जो दूर-दूर से तथागत से मिलने यहां पाते हैं। धीरे-धीरे उन्हें भी इसका अभ्यास हो जायगा। आनेवालों के साथ कठोरता का व्यवहार तो नहीं किया जा सकता । अनुशासन के सम्बन्ध में उनके साथ तो कुछ उदारता ही का व्यवहार करना पड़ता है। नन्द कैसे पाश्चर्य की बात है कि प्रातःकाल से सायंकाल तक व्यवस्था रखने पर भी पानेवालों का क्रम ही नहीं टूटता ! उनके स्वागत का उत्तरदायित्व प्राप बड़े धैर्य के साथ संभालते हैं। मैं देखता हूँ कि उनकी संख्या दिन-पर-दिन बढ़ती जा रही है। यानन्द तथागत गौतम बुद्ध की महिमा ही ऐसी है भिक्षु नन्द ! उनका उच्च प्रादर्श और निर्मल चारित्र्य जनता को उनके पास दूर-दूर से खीच लाता है। तुम्हारे सम्बन्ध में भी कैसा अद्भुत चमत्कार हुना ! तथागत के सम्पर्क में आते ही तुम्हारा युग-युग का मायामोह का बन्धन एक ही क्षण में टूट गया । तुम्हें भिक्षुसंघ में, अपने बीच में, पाकर हमें जो मानन्द हो रहा है, उसे शब्दों में प्रकट नहीं किया जा सकता। नन्द सच है, भिक्षु आनन्द, तथागत की महिमा ऐसी ही है ! पारस के स्पर्श से. लोहा नी सोना हो जाता है ! मेरे प्रणाम करते ही परम कारुणिक तथागत ने मेरे मस्तक पर अपना वरद हाथ रख दिया। उनके हाथ के अमृत-स्पर्श से एक ही क्षण में मेरे हृदय का सारा मोह दूर हो गया । तथागत की कृपा होते ही मेरे जीवन में व्याप्त माया के गहरे यन्धकार को उनके उपदेश से प्राप्त विवेक के प्रकाश की एक ही किरण ने दूर कर दिया।

अंक ३ : दृश्य ३] ग्रानन्द इसका श्रेय तथागत को तो है हो, तुम्हे भी है भिक्ष नन्द ! तथा. गत की करुणा तो पात्र और अपात्र सभीपर समान रूप से बरसा करती है, पर, उसे उचित रूप मे ग्रहण तो पात्र हो कर पाता है, प्रपात्र नही । तुम्हें भले ही उसका ज्ञान या अनुभव न हो, पर, तुम्हारे मन की गहराई में त्यागभावना पहले से छिपी हुई अवश्य थी। तथा- गत की प्रेरणा ने उसे केवल उभार दिया । यदि तुममे सात्विक भावना पहले से न होती, तो तुम्हें दीक्षा की उपसम्पदा कभी न मिली होती। यदि कुएं में पानी ही न हो, तो उसमें से घड़े में भरकर रस्सी द्वारा क्या खींचा जा सकता है ? नन्द आज तो प्रायुप्मान राहुल को भी तथागत ने दीक्षा की उपमम्पदा दे दी है। यह भी एक छोटे-से भिक्षु के रूप मे आज से हम लोगों के भिक्षुसघ में सम्मिलित हो गया है । भिक्षु के कापाय वेश मे प्रायुप्मान राहुल कितना अच्छा लगता है ! ग्रानन्द तथागत का पुत्र होने का गौरव जिस प्रायुप्मान राहुल को प्राप्त पा, वह तथागत के संन्यास के उत्तराधिकार से वचित कैसे रह सकता था? नन्द शाक्यवश पर तथागत की विगेप कृपा है। महाराज शुद्धोदन को छोडकर अब शाक्यों के राजकुल में ऐसा कोई पुरुप नहीं बचा है, जिसने संन्यास ग्रहण न किया हो । महाराज शुद्धोदन भी अपनी वृद्धावस्था के कारण पहले ही से संन्याम लेने का निश्चय कर चुके हैं । वह भी अब गीघ्र ही भिक्ष सघ में सम्मिलित होगे। शाक्यवश का इमसे यडा सौभाग्य क्या हो सकता है कि उसने तयागत के इंगित । गौतम नन्द पर अपनको सम्पूर्ण रूप में बहुजन के हित के लिए समर्पित कर दिया है। ग्रानन्द यह नयांगवा ही हुआ है । तथागत का तो अब न तो कोई बंश ही रह गया है और न किमी वंश के प्रति उनका विशेष कृपाभाव ही है। समष्टि नवागत तो प्राणिमात्र को अपना कुटुम्बी समझते हैं। तुम्हें भी अब सारी मानवता को अपना बंग समझना होगा। नन्द मैंने फेवल प्रसंगवश शाक्य-राजवंश की चर्चा की थी। मेरा प्राशय और कुछ न था । यह तो सव में भी जान गया है कि सारी मानवता भिक्षयों का वंश है, सारी पृथ्वी उनको जन्मभूमि और प्रागिमात्र उनके कुटुम्बी। इस उदार भादना को लेकर मानवता के कल्याण के लिए भिक्ष गण तथागत के नेतृत्व में निरंतर भ्रमण करते है, जिससे प्राणिमात्र जन्म, मरण, जरा, रोग आदि के बन्धनों में मुक्त होकर वास्तविक गान्ति और निर्वाण पा सकें। ग्रानन्द जनहित के लिए जीवनोत्सर्ग का यह महान् प्रादर्श युग-युग में प्रतिष्ठित है और सदा प्रतिष्ठित रहेगा । मानवता के कल्याण के उच्च लक्ष्य को लेकर निर्मल चारित्र्यवाले व्यक्ति पृथ्वी पर जब-जब लोकसेवा और निरन्तर भ्रमण का व्रत धागा फरेंगे, तब-तब संसार को मोह के अन्यकार में सत्य के प्रमाग की किरमा का दर्शन होगा। यह क्रम चिरंतन है और गदा बना रहेगा । रोग, दुःख, कष्ट, क्लेश में पीड़ित मानवता ऐसे पवित्र परिभ्रमणों को अपने लिए भूतकाल में भी पागा का मत ममन्ती रही है, वर्तमान में भी समझ रही है और भविष्य में भी समानती रहेगी । हम मव अत्यन्त भाग्यशाली हैं कि तथागत-जैसे उदार और माहमी सबंबत्यागी, अथक परिव्राजक

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१२० ] [गीतम नन्द माधविका महाराज गौतम शुद्धोदन तथा महारानी प्रजावती देवी को अपने यहाँ पाने का आशय स्वयं वताएँगी, पर, मेरे आज यहाँ आने का एक मुख्य प्रयोजन भिक्षु नन्द को प्रणाम करना भी है। नन्द प्रणाम के योग्य तो केवल तथागत बुद्ध हैं माधविकादेवी, मैं तो इस योग्य नहीं हूँ। माधविका हिमालय के उच्च शिखर की वन्दना करनेवालों की संसार में कोई कमी नहीं है; कमी यदि है, तो अपने संगठन, साधना, श्रम, श्रद्धा और उत्सर्ग से हिमालय को हिमालय बनानेवाले छोटे-छोटे रजकरणों की अर्चना करनेवालों की है । मैं तुम्हारी वन्दना करने इसलिए प्राई हूँ, भिक्षु नन्द, कि तुम सामान्य थे और सामान्य से महान बने हो। तुम्मारी साधना और तुम्हारा त्याग उन महापुरुषों की साधना और त्याग से अधिक महत्त्वपूर्ण है, . जो. अपनी विशेप क्षमता के कारण अनायास विशेष सफलता प्राप्त करते हैं ।) नन्द ऐसा न कहिए ! तथागत की महत्ता सर्वोपरि है । माधविका मैं कब कहती हूँ कि तथागत की महत्ता सर्वोपरि नहीं है ? गत यदि सूर्य हैं, तो तुम दीपक हो। सूर्य के लिए प्रखर प्रकाश अत्यन्त स्वाभाविक है, उसके लिए उसे कोई विशेष प्रयास नहीं करना.. पड़ता। पर, दीपक तो प्रकाश के लिए मिट्टी के पात्र के अतिरिक्त तेल भी जुटाता है, वत्ती भी जुटाता है। और फिर वह प्रयत्नपूर्वक धीरे-धीरे जल-जलकर अपनेको उत्सर्ग करने की साधना करता है, अपने को मिटाता है । मैं तो सूर्य की महत्ता की अपेक्षा दीपक की लघु साधना. को अधिक महत्त्व देती हूँ, क्योंकि, दीपक की लघुता प्रयास तथा- अंक ३:दृश्य ३] [ १२१ करके मानवता की सेवा के योग्य महान् बनती है। उसे प्रतिकूल परि- स्थितियों से कठिन संघर्ष करना पड़ता है । दीपक बीच-बीच में वायु के थपेड़े भी सहन करता है। नन्द मैं तो सदा साधारण रहा हूँ और ग्राज भी हूँ ! मेरा सर्वस्व तो तथागत की दी हुई दीक्षा की उपसम्पदा ही है । मेरी हार्दिक इच्छा है कि मुझे जो उपसम्पदा मिली है, वह सबको मिले । कितना प्रत्या होता, यदि आप भी तथागत के हाथों संन्यास की उपसम्पदा, भिक्षु. व्रत का सौभाग्य, प्राप्त कर सकती। प्रजावती इसकी सम्भावना कहां है ? स्त्रियों को संन्यास की दीक्षा देने पर तो प्रतिवन्ध लगा हुआ है । इससे बढकर निष्ठुरता क्या हो सकती है कि पतियों को पलियों से और पुत्रो को मातामो से अलग करके भिक्षु बना लिया जाय और पलियो और मातानो को भिक्षणी वन- कर अपने जीवन को सार्थक करने, साधना में लगने और अपनी वेदना भूलने का अवसर ही न पाने दिया जाय । आनन्द आप लोगों के पधारने का मुख्य प्रयोजन तो अभी तक मुझे ज्ञात ही न हो सका । तथागत तो इतने दयालु है कि विना प्रयोजन पाने- वालो को भी अपनी करुणा से कृतार्य करते हैं, पर, यदि विशिष्ट प्रयोजन पहले से ज्ञात हो जाता है, तो, बघ को उचित व्यवस्था .' करने में सुविधा होती है। शुद्धोदन में तथागत के पास इसलिए पाया हूं कि उनसे यह प्राधना करू कि वह पास से यह नियम बना दें कि किसी भी अल्पवयस्क नवयुवक या बालक को तव तक भिक्षु न बनने दिया जाय, जब तक उम पिता या कुटुम्बियो से अनुमति न ले ली जाय । मैं तथागर १२२ ] [ गति कहने आया हूँ कि उनके संन्यासी होने पर मुझे बहुत दुःख हुअा था, नन्द के संन्यास ग्रहण करने पर भी मुझे बहुत वेदना हुई और राहुल के भिक्षु बनने पर तो मेरे शोक की सीमा ही नहीं रही। सन्तान के स्नेह का आकर्पण और उसके वियोग की पीड़ा "मेरे चमड़े को छेद रही है, चमड़े को बेदकर मांस को छेद रही है, मांस को छेदकर नसों को छेद रही है, नसों को छेदकर हड्डियों को छेद रही है और हड्डियों को छेदकर" उसने मुझे बुरी तरह घायल कर दिया है । मेरी प्रार्थना है कि परम कारुणिक तथागत भविष्य में और किसी माता-पिता को ऐसी मर्मवेदना न होने दें। आनन्द आपका प्रयोजन उचित प्रतीत होता है गौतम ! तथागत का ध्यान का कार्यक्रम समाप्त होते ही आप अपना निवेदन उनके सम्मुख रखिएगा । आशा है, तथागत इसे अवश्य स्वीकार करेंगे । अच्छा, यह तो बताइए कि अपने संन्यास-ग्रहण के सम्बन्ध में प्रापका क्या विचार है ? शुद्धोदन मैं प्रस्तुत हूँ भिक्षु अानन्द ! तथागत के सामने अपना यह निवे- दन रखने के बाद ही मैं सन्यास ग्रहण कर लूंगा। ग्रानन्द आपका क्या प्रयोजन है प्रजावती देवी ? प्रजावती मैं तथागत के सामने नारी-जाति की करुण पुकार रखना चाह । तथागत को यह तो अधिकार है कि वह पुरुषों को भिक्षु बना नारियों को पतियों और पुत्रों की वियोगज्वाला में जलाएँ,पर, साथ उनकी करुणा को नारियों को भी यह अधिकार देना चाहिए कि वे अपनी वेदना को भूलने के लिए अपने जीवन को भी जनकल्यार लिए उत्सर्ग करना चाहें, तो उन्हें भी दीक्षा लेकर भिक्षुसं अंक ३: हाय ३ ] [ १२३ सम्मिलित होने का अवसर मिल सके। यदि मेरी यह प्रार्थना तथागत ने स्वीकार कर ली, तो हम चारों, मैं, मेरी दोनों पुत्रवधुएं और राजकुमारी माधविकादेवी, तत्काल संन्यास ले लेंगी। ग्रानन्द आपका प्रयोजन भी उचित जान पड़ता है देवी ! प्राशा है, तथागत आपकी प्रार्थना भी स्वीकार कर लेंगे। उसका फल यह तो होगा हो कि पाप चारो साध्वी महिलापो का निशु-संघ में प्रवेश होगा, यह भी होगा कि भविष्य के लिए स्थियों की दीक्षा का मार्ग भी मुत जायगा । अव याप अपना प्रयोजन बताइए मापरिकादेवी ! माधविका यदि तथागत स्त्रियों को दीक्षा का अधिकार न देंगे, तब तो मैं उनसे कुछ न कहूंगी । एक बार फिर, लघुता की महत्ता को प्रशशिका के रूप मे, भिक्षु नन्द की वन्दना करके लोट जाऊँगी । किन्तु, यदि तथागत ने प्रजावतीदेवी की प्रार्थना स्वीकार करकं नारियों को दीक्षा सेने का अधिकार दे दिया, तो मैं तयागत में अपनी मोर से कुछ विनम्र प्रार्थनाएं करूंगी। मानन्द वे क्या? माधविका मैं उनसे गहूंगी कि उन्होंने और भिक्षु नन्द ने यशोपरादेवी और मुन्दरिकादेवी के साथ अन्याय किया है कि मन्यास लेने के पहले उनने अनुमति नहीं ली। उस प्रन्याय के परिमार्जन के लिए व्यागत को एक वार यशोधरादेवी के भोर भिक्षु नन्द को मुन्दरिकादेवी के पास उनके निवासस्थान पर जाना चाहिए और उनके त्याग, बलिदान, कप्ट-सहन मोर धयं की प्रशसा करनी चाहिए। इसका फल यह होगा कि उन स्वाभिमानी महिलामो के स्वाभिमान की रक्षा होगी, उनके त्याग और बलिदान को प्रोत्साहन मिलेगा, वे उचित प्रतिष्ठा १२४ ] [ गौतम नन्द के साथ संन्यास ग्रहण करेंगी और संसार में नारी-जाति का गौरव बढ़ेगा। ग्रानन्द अाशा तो है कि आपका यह निवेदन भी परम कारुणिक तथागत स्वीकार कर लेंगे । आपको और क्या कहना है ? माधविका अपने लिए तो अन्तिम रूप में मुझे तथागत से केवल यही कहना होगा कि तथागत अपने उच्च आदर्शों के पथ पर मुझे भी अपनी एक अकिञ्चन और विनम्र अनुयायिनी के रूप में स्वीकार करें। मैं यत्न करूंगी कि अपने भिक्षु-जीवन का प्रत्येक क्षण दुखी मानवता की सेवा में निष्ठापूर्वक अर्पित करूं। ग्रानन्द औरों के सम्बन्ध में भी पाप कुछ कहेंगी? माधविका मैं यह कहूंगी कि तथागत की करुणा जगत् के जीवन का बहुत बड़ा सौभाग्य है। जब तक इस पृथ्वी पर तथागत जैसे नेताओं और पशोधरा, सुन्दरिका, आनन्द और नन्द जैसे अनुयायियों की परम्परा प्रवतरित होती रहेगी, तब तक मानवता को निराश होने का कोई कारण न होगा। उच्च आदर्श का ध्रुव तारा जिनके सामने और चारित्र्य का पाथेय जिनके साथ होगा, उन महान भ्रमणकारियों की यात्रा का प्रत्येक चरण. प्रत्येक ..समय में मानवता के कल्याण और बहुजन के हित के लिए ही होगा। नन्द औरों के सम्बन्ध में आप भले ही कुछ भी कहें, पर, मेरे सम्बन्ध में तो आपका प्रशंसासूचक शब्दों का प्रयोग करना अत्यन्त · अनुचित है, घोर अन्याय है । मैं फिर कहता हूँ माधविकादेवी, कि मैं एक अत्यन्त स

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। १२४ ] [ गौतम नन्द के साथ संन्यास ग्रहण करेंगी और संसार में नारी-जाति का गौरव बढ़ेगा। अानन्द पाशा तो है कि आपका यह निवेदन भी परम कारुणिक तथागत स्वीकार कर लेंगे । आपको और क्या कहना है ? माधविका अपने लिए तो अन्तिम रूप में मुझे तथागत से केवल यही कहना होगा कि तथागत अपने उच्च आदर्शो के पथ पर मुझे भी अपनी एक अकिञ्चन और विनम्र अनुयायिनी के रूप में स्वीकार करें। मैं यत्न करूंगी कि अपने भिक्षु-जीवन का प्रत्येक क्षण दुखी मानवता की सेवा में निष्ठापूर्वक अर्पित करूं । यानन्द औरों के सम्बन्ध में भी आप कुछ कहेंगी? माधविका मैं यह कहूँगी कि तथागत की करुणा जगत् के जीवन का बहुत बड़ा सौभाग्य है। जब तक इस पृथ्वी पर तथागत जैसे नेताओं और यशोधरा, सुन्दरिका, अानन्द और नन्द जैसे अनुयायियों की परम्परा अवतरित होती रहेगी, तब तक मानवता को निराश होने का कोई कारण न होगा। उच्च आदर्श का ध्रुव तारा जिनके सामने और चारित्र्य का-पाथेय. जिनके साथ होगा, उन महान भ्रमणकारियों की यात्रा का प्रत्येक चरण.. प्रत्येक - समय में मानवता के कल्याण और बहुजन के हित के लिए ही होगा। तपाप औरों के सम्बन्ध में आप भले ही कुछ भी कहें, पर, मिरे में तो पापका प्रशंसासूचक शब्दों का प्रयोग करना अत्यन्त अनुचित है, घोर अन्याय है। मैं फिर कहता हूँ माधविकादेवी, कि मैं. एक अत्यन्त भक ३ : दृश्य ३ ] [ १२५ अकिंचन भिक्षु के अतिरिक्त और कुछ नही हूं। मैंने कोई त्याग नहीं किया । मुझे भूल जाने मे इतिहास का हित है ।) माधविका इतिहास तुम्हें भले ही भूल जावे भिक्षु नन्द, पर, इससे तुम्हारा महत्त्व कदापि कम न होगा। तुम कहते हो कि तुम अकिञ्चन हो, मैं कहती हूँ कि तुम्हारी यही महत्ता है । अकिञ्चन होते हुए भी. सामान्य. होते हुए भी, दुर्बल होते हुए भी, तुमने इतना महान त्याग किया है, यह तुम्हारी-पहली - विशेषता है और अपने महान् त्याग को त्याग ही न मानना तुम्हारी दूसरी...विशेषता है.।..जिस राज्य के पीछे लोग सगे भाइयो और पितानों की हत्या कर सकते हैं, उसे.तुमने तृण की तरह ठुकरा दिया । जिस-नारी-सौदर्य के.पीछे लोग पागल बने फिरते हैं, उससे तुमने एक ही क्षण-मे- सदा.के लिए मुंह मोड़ लिया ! और यह सब तुमने कब किया है ? -उस-समय, जव तुम्हारे यौवन का प्रथम चरण प्रारम्भ हो रहा है । यह सव तुमने किस स्थिति में किया है ? उस स्थिति में, जब तुम अत्यन्त सामान्य, अत्यन्त साधारण और अकिंचन हो, तुममें विशेषता, अलौकिक महत्ता या विभूति का अणुमात्र भी नहीं है। कोटि-कोटि सामान्य मानवों की सरल त्याग-भावना के प्रतीक-!-तुम्हे वारवार प्रणाम ! नन्द इस अन्याय को रोको भिक्षु आनन्द ! यह अब मुझसे नही सहा जाता ! इस अनुचित प्रसंसा ने मुझे वस्त कर डाला है । मैंने कुछ नहीं किया, कोई त्याग नहीं किया । माधविकादेवी मेरी प्रशंसा करके बहुत बड़ा अन्याय कर रही है। प्रानन्द यदि यह अन्याय है, तो ससार में और कोई न्याय हो ही नहीं सकता ! तुम्हारी यह प्रशसा सर्वथा उचित है भिक्षु नन्द ! माधविका- १२४ ] [ गौतम नन्द के साथ संन्यास ग्रहण करेंगी और संसार में नारी जाति का गौरव बढ़ेगा। ग्रानन्द पाशा तो है कि आपका यह निवेदन भी परम कारुणिक तथागत स्वीकार कर लेंगे। आपको और क्या कहना है ? माधविका अपने लिए तो अन्तिम रूप में मुझे तथागत से केवल यही कहना होगा कि तथागत अपने उच्च प्रादर्शो के पथ पर मुझे भी अपनी एक अकिञ्चन और विनम्र अनुयायिनी के रूप में स्वीकार करें। मैं यत्न करूंगी कि अपने भिक्षु-जीवन का प्रत्येक क्षण दुखी मानवता की सेवा में निष्ठापूर्वक अर्पित करूं। ग्रानन्द औरों के सम्बन्ध में भी आप कुछ कहेंगी? माधविका मैं यह कहूंगी कि तथागत की करुणा जगत् के जीवन का बहुत बड़ा सौभाग्य है। जब तक इस पृथ्वी पर तथागत जैसे नेताओं और यशोधरा, सुन्दरिका, आनन्द और नन्द जैसे अनुयायियों की परम्परा अवतरित होती रहेगी, तब तक मानवता को निराश होने का कोई कारण न होगा। उच्च आदर्श काध व तारा जिनके सामने और चारित्र्य का-पाथेय जिनके साथ होगा, उन महान भ्रमणकारियों की यात्रा का प्रत्येक चरण...प्रत्येक -समय में मानवता के कल्याण और बहुजन के हित के लिए ही होगा। औरों के सम्बन्ध में आप भले ही कुछ भी कहें, पर, मेरे सम्बन्ध में तो आपका प्रशंसासूचक शब्दों का प्रयोग करना अत्यन्त अनुचित है, घोर अन्याय है । मैं फिर कहता हूँ माधविकादेवी, कि मैं एक अत्यन्त भंक ३ : दृश्य ३ ] [ १२५ अकिंचन भिक्षु के अतिरिक्त और कुछ नहीं हूँ। मैंने कोई त्याग नहीं किया । मुझे भूल जाने में इतिहास का हित है।) माधविका इतिहास तुम्हें भले ही भूल जाये भिक्षु नन्द, पर, इससे तुम्हारा महत्त्व कदापि कम न होगा। तुम कहते हो कि तुम अकिञ्चन हो, मैं कहती हूँ कि तुम्हारी यही महत्ता है । अकिञ्चन होते हुए भी, सामान्य होते हुए भी, दुर्बल होते हुए भी, तुमने इतना महान त्याग किया है, यह तुम्हारी- पहली - विशेपता है और अपने महान त्याग को त्याग ही न मानना तुम्हारी-दूसरी विशेषता है. जिस राज्य के पीछे लोग सगे भाइयों और पिताग्रो की हत्या कर सकते हैं, उसे तुमने तृण को तरह ठुकरा दिया। जिस-नारी-सौंदर्य के पीछे लोग पागल बने फिरते है, उससे तुमने एक ही क्षण-मे-सदा.के लिए मुंह मोड़ लिया ! और यह सव तुमने कव-किया है ? - उस समय, जब तुम्हारे यौवन का प्रथम चरण-प्रारम्भ हो रहा है । यह सब तुमने किस स्थिति में किया है ? उस स्थिति में, जब तुम अत्यन्त सामान्य, अत्यन्त साधारण और अकिंचन हो, तुममें विशेषता, अलौकिक महत्ता या विभूति का अनुमान भी नहीं है। कोटि-कोटि सामान्य मानवों की सरल त्याग-भावना के प्रतीक-|-तुम्हे वारवार प्रणाम नन्द इस अन्याय को रोको भिक्षु आनन्द ! यह अब मुझसे नही सहा जाता ! इस अनुचित प्रशंसा ने मुझे त्रस्त कर डाला है । मैंने कुछ नहीं किया, कोई त्याग नहीं किया । माधविकादेवी मेरी प्रशंसा करके बहुत बड़ा अन्याय कर रही हैं। प्रानन्द यदि यह अन्याय है, तो ससार मे और कोई न्याय हो ही नहीं सकता ! तुम्हारी यह प्रशंसा सर्वथा उचित है भिक्षु नन्द ! माधविका.

[ गौतम नन्द २६ ] स्वी के मुख से युग-युग का सत्य वोल रहा है । यह ध्रुव सत्य है कि केवल महापुरुष ही मानवता का चिरकल्याण-साधन नहीं कर सकते । इसके लिए उनके बहुसंख्यक और सच्चरित्र अनुयायियों के, सामान्य साधकों के सहयोग की भी आवश्यकता है। ऐसे साधकों के सहयोग की, जो साधारण होते हुए भी, किसी विशेषता या विभूति से युक्त न होते हुए भी, वड़े से बड़ा त्याग और बलिदान क्षण-भर में कर दिखाने का साहस प्रकट कर सकें और अपने त्याग और बलिदान को कभी त्याग और बलिदान न माने (मानवता का चिरकल्याण तभी सम्भव होगा, जब घर-घर से नन्द-जैसे त्यागी तरुण लोकहित की साधना के साहसपूर्ण कंटकाकीर्ण पथ पर आगे बढ़ेंगे, अपने युग पुकार पर, युग की आवश्यकता के अनुरूप, कर्तव्य-पालन करेंगे। भोगवाद, स्वार्थ, कायरता और अवसरवाद के प्रहारों से पीड़ित संसार का नया निर्माण साहस, त्याग और बलिदान ही के आधार पर हो सकेगा। की [पटाक्षेप ] श्री मिलिन्द के जीवन पर एक दृष्टि जन्मस्थान-श्री जगन्नायप्रसाद मिलिन्द का जन्म सदर बाजार, मुरार ग्वालियर, मध्यप्रदेश) में हुग्रा । स्थायी तथा पुराना वासस्थान भी वहीं है । जन्मतिथि-कार्तिकपूर्णिमा संवत् १९६४ वि० ( ता. १९ नवम्बर १६०७ ई.) वर्तमान वासस्थान तथा कार्यालय का नया पता-दाल बाजार, लस्कर (ग्वालियर, मध्यप्रदेश)। शिक्षा-- मुरार हाई स्कूल में प्रारम्भिक, तिलक राष्ट्रीय विद्यालय, याकोला (महाराष्ट्र) में मैट्रिक तक, तिलक महाराष्ट्र विद्यापीठ, पूना से मैट्रिक्युलेगन परीक्षा, उसके वाद, तीन वर्ष, साहित्य, इतिहास, अर्थशास्त्र और राजनीति-विज्ञान की उच्च शिक्षा काशी-विद्यापीठ, वाराणसी के तत्कालीन राष्ट्रीय महाविद्यालय में। आपको हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, उर्दू, मराठी, चंगला और गुजराती भाषाम्रो का ज्ञान है । पुस्तके-पापकी रचनाओ मे 'प्रताप-प्रतिज्ञा' (सन् १९२६ ई०), 'समपरण' (सन् १९५० ई०), गौतम नन्द' (सन् १९५२ ई०) तथा 'प्रियदर्शी' (सन् १९६२ ई०) नामक चार नाटक, 'जीवनसगीत' (सन् १९४० ई०), 'नवयुग के गान' (सन् १९४२ ई०), 'वलिपथ के गीत' (सन् १९५० ई०), भूमि की अनुभूति' (सन् १९५२ ई०) तथा 'मुक्तिका' (सन् १९५४ ई०) नामक पांच कविता-सग्रह, स्वतत्रता की बलिवेदी (सन् १९६२ ई०)-नामक एक खड-काव्य, 'चिन्तनकरण' (सन् १९४४ ई०) तथा 'सास्कृतिक प्रश्न' (सन् १९५४ ई.) नामक दो निबन्धसंग्रह और 'विल्लो का नकछेदन' (सन् १९५४ ई०) नामक एक व्यग्यविनोदकथासंग्रह, इस प्रकार तेरह अन्य अब तक प्रकाशित हो चुके हैं । 'समता के स्वर-नामक एक नया कवितासग्रह लिखा जा रहा है। मध्यभारत-शासन शिक्षा-विभाग द्वारा नियुक्त साहित्य-मनोपियों की समिति ने आपकी पुस्तक 'बलिपथ के गीत' को १००० रुपयों के प्रथम पुरस्कार के योग्य ठहराया था। उत्तरप्रदेश के शासन के शिक्षा विभाग ने भी विद्वानों की समिति के निर्णयानुसार, आपके 'यलिपथ के गीत' ( १२८ - र ८०० रुपयों का पुरस्कार दिया था, जो तत्कालीन मध्यभारत के साहित्य- कागेको यहनि प्राप्त पुरस्कारों में सबसे बड़ा था। प्रापणे भूमि की अनु. दुनि' तथा 'गौतम नन्द' नामक ग्रन्यों पर, मध्यमारत-शारान शिक्षा-विभाग की कालापरिषद् ने, विद्वानों का परामर्श पर, ७०० रुपयों का प्रथम पुरस्कार दया था। नीगरी बार फिर उक्त परिपद् ने प्रापक 'मुक्तिका', 'सांस्कृतिक परन' तथा 'चिलो का नकछेदन' नामक ग्रन्थों पर ५०० रुपयों का प्रथम रस्कार दिया था। कार्य-~विश्वभारती, शान्तिनिकेतन (बंगाल) तथा महिला-पाश्रम, पर्धा (महागाद) में अध्यापक तथा प्रयाग और अजमेर में साहित्य-रोधी था राष्ट्रका व रूप में रहे। पंजाब तथा ग्वालियर की भारती' नामक मागिया पत्रिकायो तथा ग्वालियर के पर्व-साप्ताहिक पर 'जीवन' के प्रधान- सम्पादक रहे। ग्वालियर स्टेट कांग्रेस के प्रधान-गंत्री तथा मध्यभारत प्रांतीय ग्रेग की कायंगमिति के सदस्य रहे । सन् १९४२ के स्वतंत्रता-पान्दोलन में तथा बाद में, सन् १९४८ तथा १६५० में भी, जलों में रहे । कांग्रेस द्वारा शागन ग्रहमा किए जाने पर, सन् ४७ में, मिनिस्टर-पद स्वीकार करने का अनुरोध किए जाने पर, उरो अस्वीकार कर चुपो है । सन् ५५ में शासकीय चा में लगभग ८०० गपाए मासिक का कार्य पाने का अवसर सामने पाने पर उसे भी स्वीकार करत स्वतन्य साहित्यकार तथा पत्रकार बने रहना पसन्द कर चुप हैं । मध्यभारत समाजवादी पल , सर्व-सम्मति से, दो बार लगातार, प्रांतीय प्रमुख तथा प्रांतीय संसदीय समिति के अध्यक्ष चुने गए थे। मध्यभारत श्रमजीवी पत्रकार-राध,नव संस्कृति संघ, मध्यभारत हिन्दी साहित्य समालन, ग्वालियर-रांगाग-साहित्यकार-परिषद् तथा साहित्य साधना संसद् प्रादि गंस्थानों के अध्यक्ष रह चुके हैं। शिक्षा विभाग द्वारा संस्थापित साहित्य तथा कलायों की संस्था 'मध्यभारत-कला-परिषद्' के गर्वसम्मति से प्रशासकीय उपाध्यक्ष चुने गए थे। भारत सरकार के शिक्षा तथा संस्कृति विभाग द्वारा संस्थापित राष्ट्रीय साहित्य अकादेगी की महासमिति तथा हिन्दी परामर्शदायी समिति के प्रशासकीय सदस्य, मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, ग्वालियर संभाग श्रमजीवी पत्रकार मंच, माहित्यकार परिषद तथा मध्यप्रदेश स्वतन्त्रता वाम सैनिक संघ की कार्यकारिणी नमितियों के सदस्य तथा बृहत्तर ग्वालियर इगर निगम के पार्षद भी रह चुके हैं। सन् १९५२ से ६० तक अपना अधिकांश नमय मुल्यतः स्वाध्याय, अन्य- खन तथा स्वतन्त्र पत्रकार के कार्य में लगाते रहे हैं । देश के अनेक प्रतिप्ति हन्दी, अंग्रेजी, गुजराती, बंगला, मराठी श्रादि भाषाओं के निक पत्रों के तिनिधि हैं या रहे हैं। स्वतन्त्र रहते हुए ही मध्यप्रदेशमानन के साताहिक न 'मध्यप्रदेश मदेश' के साहित्यिक विगेप-अंध के प्रशासकीय संपादन- रामदाता तया इन्दौर-भोगत अाकाशवाणी की कार्यक्रम-पराम-समिति प्रशासकीय सदस्य का कार्य भी कर चुके हैं। अप्रैल १६६१ से पुनः समारवादी दल के सदस्य के रूप राजनीति में क्षेत्र में भी कार्य करने लगे हैं। ता० १६ जुलाई १६६१ को सर्व सम्मति ने मध्यप्रदेश प्रान्तीय उमात्र- पदी दल के अध्यक्ष चुने गए। श्री ज० प्र० मिलिन्द को साहित्य-साधना पर विद्वानों, पत्रों तथा समालोचकों के कुछ अभिमत श्री जगन्नाथप्रमाद मिलिंद हिन्दी के उच्चकोटि के वाहित्यकार एव लाविद हैं। उनकी रचना बहुत ही सूर्तिदायक रही है। --(i०) वन्दावनलाल वर्मा श्री मिलिद के व्यक्तित्व और कवित्व का मैं मदा प्रससक रहा हूँ। वह कवि, नाटककार, साहित्यकार, मफत पसार एव प्रादर्श अध्यापक हैं । नवम पड़कर वह सहृदय और यंठ मानव है। -~-(i०) हरिशंकर शर्मा श्री मिलिंदी की वेदना और भावना केवल मन को छूती ही नहीं, उममें एक पालोदन भी पैदा करती है। उनमे माज और कल का वह स्तर. वह चिन्तन भी है, जिसमें एक धेष्ठ, मुवी और समृद्ध मानव-समाज की - [ १३० ] । प्रत्येक रचना में एक संदेश, साधना की एक छाप और मानवीय वेदना कसक है । इधर ऐसी उद्देश्यपूरक और सार्थक रचनाएँ हिन्दी में कम ही नेि को मिलती हैं। ----'नया समाज', अप्रैल १९५२ मिलिंदजी की अनुभूति जीवन की अनुभूति है । वह भूमि की अनुभूति ही : अपने को खड़ा करते हैं। इसलिए, जीवन की साधना को गतिवद्ध करते पय उनकी लेखनी पूर्णतया ईमानदार रह सकी है। उनका दृष्टिकोण स्वस्थ र आधुनिकतम है। उनमें वर्नार्ड शॉ की भांति सफल, सुन्दर व्यग्य भी है। नकी कृतियों में युग का अनोखा चित्रण है, जादूभरा-सा। वह नव-संस्कृति अधिकारी वाहक हैं। उनके साहित्य में मूक-शोपित मानवता के संगठित सन्तोप की वाणी और शृंखला-खण्डन की वास्तविक प्रेरणा मिलती है। ह शोपितों और दलितों के प्रहरी प्रतिनिधि कलाकार हैं । मानवता के इस न्दा-दीप में हिन्दी को साने गुरु जी मिला। - 'जनवारणो', जुलाई तथा सितम्बर, '५१ श्री मिलिंदजी की गणना निस्संदेह आधुनिक हिन्दी-साहित्य के उन तिनिधियों में की जा सकती है, जिन्होंने नए युग की नई चेतना को प्रभा- बत किया है और जिनकी कृतियाँ देश को नई दिशा की ओर मोड़ने में सफल ई हैं। उन्होंने अपनी सर्जनात्मक प्रतिभा और विचार-प्रवणता से युग का पथ दिया है। उनकी साधना की प्रखर ज्योति ने सर्वांगीण जन-जीवन को पालोकित किया है । उनको अनुभूति मानवता की सच्ची अनुभूति है। उनकी वागी युगदेवता की पाणी और उनके स्वरों में युग-देवता के स्वरों की कंकार है। -'जनसत्ता, दिल्ली, ३१ दिसम्बर ५२ मिलिंदजी ने सच्चे जन-कवि की भांति अपने युग की यथार्थ परिस्थिति को सरल और मार्मिक अभिव्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया है । सर्वत्र उनका दृष्टिकोण मानवतावादी और प्रगतिशील है । उनको दृष्टि की गहराई और सुझ अनोखी है। 'साहित्यसंदेश', जुलाई '५१ तथा माचं' ५३ ।

-- ती हैं । इस युग में भी श्री मिलिंद अचल, अटल और अभ्रप्ट हैं । ऐसे व्यक्ति म ही सही, पर, ऐसे लोगों पर देश को सदा गवं रहेगा। - मोहनसिंह सेंगर श्री मिलिंद का बहुमूल्य जीवन हम लोगो की शक्ति है। -(डॉ०) मासनलाल चतुर्वेदी मिलिंदजी की प्रतिभा बहुमुखी है । उन्होने समस्याओं को राष्ट्रीय दृष्टि- रोण से देखा है और उनपर अपने विचार बड़ी निर्भीकता और सरलता से कट किए हैं । वह बहुत दिनो से साहित्यसेवा करते आ रहे हैं । उन्होने गद्य र पद्य दोनो को अलकृत किया है। वह मध्यप्रदेश की विभूतियों में से -(डॉ.) गुलाबराय मिलिंदजी जो लिखते हैं, बहुत सुन्दर लिसते हैं । उनकी रचनाएँ उत्कृष्ट ~ (प्राचार्य) नरेन्द्रदेव मिलिंदजी अभी तरुण वने रह गए । कार्य की शक्ति अभी उनकी बनी ।। -लक्ष्मीनारायण मिश्र मिलिंदजी के तपोमय मूक जीवन की साधना को जो मूल्य मिलना हिए, वह नहीं मिला । फिर भी, वह दिन दूर नहीं, जब उनका पूर्ण सम्मान होगा। -उदयशंकर भट्ट मिलिंदजी अंधेरी रात मे मशाल जलाए जा रहे हैं । -रामवृक्ष बेनीपुरी मिलिंदजी ने सदैव ही स्वस्थ, सुरुचिपूर्ण सत्साहित्य का निर्माण किया है, जिसके कारण हिन्दी-साहित्य का भादार समृद्ध हुया है। ~मनन्त गोपाल शेवड़े मिलिंदजी के सर्वस्वत्यागी तपस्वी व्यक्तित्व ने कलम की फ़कीरी की है पौर वह कलमधारियो के लिए लडा-खपा है। -धोरेन्द्र कुमार जैन मिलिंदजी के नाम से हिन्दी के पाठक अच्छी तरह परिचित होगे। उनकी रचनामों में देश की राजनीतिक उथलपुथल, ऐतिहासिक घटनाचक्र था नवीन विचारधाराओं के संघर्ष की झांकी मिलती है। वह अपने -- [ १३२ ] । । में सफल रहे हैं । उनकी अनुभूति मानवता की अनुभूति तथा युग के प्रतिनिधि फलाकार की जोरदार आवाज है। ----'पाज', जून '५१ तथा २५-१०-५३ देश-प्रेम से प्रारम्भ होकर मिलिंदजी की साधना मानव के प्रेम तक पहुंची है । वह एक सिद्धहस्त कलाकार हैं। उनकी रचनाओं में सरलता है, प्रवाह है, अोज है। उनकी अनुभूति बहुत तीन है। इसी कारण उनकी रचनाएँ सच्ची और प्रभावशाली हैं। उनका स्थान साहित्य ही में नहीं, वरन्, इतिहास में भी निश्चित है, इसमें कोई सन्देह नहीं । 'विशालभारत', मई ४६ मिलिंदजी की रचनामों ने उन्हें पिछले कलाकारों से आगे प्रस्तुत किया है और स्पप्ट किया है कि वह आज भी तरुण हैं । वह आज के युग के साथ भी चल सकते हैं, अपनी उसी प्रतिभा और अमंद गति से । वह प्रगति- शील होने के साथ-साथ कलात्मक भी हैं और विचारप्रवण होने के साथ-साथ सिक्त भी। यही उनकी औरों से विभिन्नता है। वह हिन्दी के सफल नाटककार हैं और उदात्त विचार के कुशल कवि भी । जनजीवन से उनका सीधा सम्पर्क है और अपने देश के सांस्कृतिक अभ्युदय के लिए उनकी आत्मा तड़पती है। किसी भी सत्य से उनकी नजर कतराई नहीं । जीवन के सभी स्वस्थ पहलुगों को उन्होंने कृतित्व में उतारा है। जीवन और सद्गुणों के प्रति उन्होंने जो आस्था प्रकट की है, वह पथप्रदर्शन का कार्य करेगी। -~'नई धारा', सितम्बर '५१, अक्टूबर '५१ तथा अप्रेल '५२ मिलिंदजी आधुनिक हिन्दी कविता के प्रतिनिधि उच्चकोटि के उन साहित्यकारों में से हैं, जिनकी कृतियां देश को नई दिशा की ओर मोड़ सकने का तेज रखती हैं । आपने हिन्दी-साहित्य को जो कुछ दिया है, वह प्राण और वास्तविक अनुभूत सत्य से पूरित है। उनकी सभी कृतियाँ अनुपम सौन्दर्य और प्रगतिशील जीवन-दर्शन से पूर्ण हैं । हिन्दी में ऐसी गहम वेदना का स्वर इनेगिने साहित्यकारों की कृतियों में मिलता है । मिलिंदजी ने कोटि-कोटि [ १३३ 1 अमजीवियों को मूक व्यया को वाणी दी है । हिन्दी-साहित्य के विद्यार्थी और जनता इस साहित्यकार की महत्ता को कभी भुला नहीं सकेंगे। -'नवयुग', मई '५१ थी मिलिंदजी ने गोपित-उत्पीडित वर्ग के साथ रहकर उनसे हृदय का सम्बन्ध स्थापित किया है। उनकी रचनाओं में केवल बौद्धिक सहानुभूति के स्वर नहीं, रचनात्मक संघर्ष की प्रेरणा है। 'रानी' मई '५१ यह निस्संदेह कहा जा सकता है कि मिलिंदजी ने कविताओं के माध्यम से मानवता के प्रति, विशेषत: दलित और प्रताड़ित जन के प्रति, पाठक-वर्ग का ध्यान आकर्षित करने का सफल प्रयास किया है। मिलिंदजी ने अपनी काव्य-प्रतिभा को व्योम-विहारिणी न बनने देकर भूमि-चारिणी बनाया है और मानवता के हर्ष-विपाद को सबल अभिव्यक्ति दी है । यह उनकी एक चड़ी सफलता है। -'प्राजकल', दिल्ली, नवम्बर '५७ मौलिक अनुभूति मिलिंदजी की रचना का प्राण है। - 'कल्पना', हैदराबाद, अगस्त '५३ मिलिंदजी के विचार मौलिक, निर्भीक, सतेज एव ध्यानाकर्षक हैं । -बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' हिन्दी की सेवा तथा साधना ही में अपने यौवन के बड़े भाग को तपस्वी के रूप में मिलिंदजी ने सपा दिया। -सत्यदेव विद्यालंकार मिलिंदजी विद्रोही साधक मोर कलम के धनी कलाकार हैं। उनकी कातिकारी रचनायो का उद्देश्य बद्धमूल रूढ़ियों को मीमा के वाहर कदम रखना है । वह सर्वहारा, मानवता और जनता के कलाकार हैं। उनकी पक्तियां हुत्तन्त्री के तारो को भकृत कर देती हैं । नई धारा के उपकरणो में पारण ढालने का मिलिंदजी ने श्लाघनीय प्रयत्न किया है। -'ममतपत्रिका', प्रयाग, ६-६-03 .

'गौतम नन्द' की कुछ समालोचनाओं के अंश कथानक बहुत ही हृदयस्पर्शी है। यदि इस नाटक का अभिनय किया र, तो दर्शक इसकी कारुणिकता से पसीजे बिना नहीं रह सकते। अभिनय दृष्टि से भी नाटक अभिनन्दनीय है। इसमें प्रगतिशीलता और कलात्मकता गों पूर्ण रूप में हैं । विचारप्रौड़ता भी है और सरलता भी । हम इसे सफल गों की श्रेणी में ही रख सकते हैं। इसमें साहित्यिकता का अभाव है। लेखक का प्रयास सर्वतोभावेन श्लाघनीय है। -आज, वाराणसी, १६ अप्रैल '५३ हिन्दी के सफल नाटककार और कुशल कवि मिलिंदजी का यह तीसरा टक है। मर्मस्पर्शी कथानक है । लेखक ने इसे रंगमंच पर अभिनीत किए ने योग्य बना दिया है । सरल भाषा में प्रभावोत्पादक संवाद नाटककार कुशलता के साक्षी हैं। -सरस्वती, प्रयाग, मई '५३ 'प्रताप-प्रतिज्ञा' से मिलिंदजी ने नाटककार के रूप में जो ख्याति प्राप्त भी, यह नाटकीय भावोत्तेजन और सौष्ठव पर खड़ी हुई थी। इसके रान्त मिलिंदजी में विचार और कला दोनों का सौष्ठव-उदय हुमा, जो गरण' और उससे आगे इस प्रस्तुत (गौतम नन्द) नाटक में फलीभूत हुआ । भोज तथा भाषासौप्ठय की दृष्टि से नाटक अभिनन्दनीय है । निस्सन्देह अभिनेय भी है। -~~-साहित्यसन्देश, मागरा, दिसम्बर '५२ नाटक का सामायिक महत्त्व भी है। मिलिंदजी प्रस्तुत रचना में नाटका- जा की वर्तमान प्रगति के प्रति सचेत हैं । अभिनय की दृष्टि से 'गौतम नन्द' टक की वर्तमान 'टेकनिक के अधिक निकट है --अजन्ता, हैदरावाद, अप्रैल '५३ - - मिलिन्दजी एक अच्छे कवि और नाटककार हैं । प्रस्तुत पुस्तक उन ऐतिहासिक नाटक है, जिसमें गौतम नन्द' का चित्रण किया गया है और वत गया है कि मूलतः और निश्चयतः सामान्य एवं संसारी होते हुए भी एक छ सी घटना से वह किस तरह बुद्धानुयायी बन गए । उनका परिवर्तन अद और महत्त्वपूर्ण है, जिससे बौद्धधर्म एव तथागत के तत्कालीन पाकर्षण बोध होता है । नाटक अवश्य मनोरजक है। - साप्ताहिक हिन्दुस्तान, दिल्ली, २१ जून ' कवि के रूप में मिलिन्दजी को जो सफलता मिली है, नाटककार के में उससे कुछ अधिक ही मिली है । कथानक की नवीनता के कारण 'ग' नन्द' नाटक कई स्थलो पर अत्यन्त मार्मिक वन पडा है । मिलिन्दजी के नार की सर्वाधिक विशेपता उनकी सरल अभिनेयता मानी जा सकती है । उन सभी नाटक रंचमच की दृष्टि से लिखे हैं। -जनसत्ता,दिल्ली, ३१ सितम्बर भारत के नए और पुराने युग में जो कुछ प्रेरणादायी और प्रोज रहा है, उसका सफल प्रतिनिधित्व करनेवाले कवि और नाटककार मिलिन्द का यह तीसरा नाटक है। थी मिलिन्द मे कवि और नाटककार द में कौन प्रमुख है, यह कहना ऊठन है । प्रस्तुत नाटक भी अभिनय की मोर के साथ कवित्व और साहित्यिकता से अोतप्रोत है । जन-जीवन में घुले श्री मिलिन्द ने अपने सहज स्वभाव से उपेक्षित गोतम नन्द को इस ना का मुख्य पात्र बनाकर उसकी कीर्ति को प्रावरण से मुक्ति दे प्रकाश में दिया है । नाटक काफी सफल है। -लोकवाणी, जयपुर, ३ मई इतिहास गौतम नन्द के प्रति मौन है और इसीलिए शिल्पी मिलिन्द उपेक्षा को न सह सके । नाटक करुण रस से अोतप्रोत है । वार्तालाप ह छोटे वाक्यों में तथा रोचक ढंग से कहा गया है। भापा का प्रवाह तो दे ही बनता है। ऐसे त्यागोज्ज्वल चरित्र के माथ इन चीज़ो ने नाटक मे चांद लगा दिए हैं । लेखक इसके लिए बधाई के पात्र हैं घोरखा, इन्दी - यु ऐतिहासिक स्थानमा के रूप में पानों के कायोगलायन द्वारा वर्तमान की प्रगतिशील विचारधारा यत्रतम जिरा सुन्दर हा में नाटगाकार द्वारा व्य की गई है, वह लेखक की असाधारण प्रतिभा का घोतक है। नाटककार नन्द का त्याग और बलिदान को उचित महत्त्व देकर इतिहास के एक उपेक्षि- अंग के साथ उचित न्याय लिया है। इसरो नाटगा की राजीवता द्विगुणित है हो गई है । प्रांजल भाषा, गम्भीर निमन्तु प्रोजपूर्ण शेली,प्रगतिशील विचारधाम और राजीव एवं प्रभावोत्पादन कथोपकथन नाटक की अपनी विशेषता ऐतिहासिक कथानक होते हुए भी उसे मौलिक रूप देने में मिलिन्दजी पिलक्षण प्रतिभा का परिचय दिया है। दृश्यों की रचना में अभिनय ग सुगमता का ध्यान रखा गया है। गौतम गन्द' के अवतरणा से हिन्दी साहित्य में नाटक-रचना वा दोष में एक प्रेरणात्मक प्रवृत्ति का सृजन होगा और व गुगानुगुन गा नवीन दिशा की मोर साहित्यराजकों का पथ-प्रदर्शन करेगा निस्सन्देह गाहित्यसंसार में इस कृति का यथोचित स्वागत किया जायगा। मध्यभारतसन्येश, ग्यालियर, ३ जनवरी '५ श्री मिलिन्दजी की प्रसिद्ध लेखनी से निर्मित इस नाटगाने रूप गाहित्य-जगत् को एक स्वागतयोग्य भेट प्राप्त हुई है। कथानक ऐतिहासिक और उसे मचिकर बनाने में सफलता प्राप्त हुई है। भापा एवं भावों क सार ही गुस्पष्ट एवं प्रगतिशील प्टिकोण का भी पूरा ध्यान रखा जा सका है इस रचना को अगर सिनेमा-जगत् अपनाए, तो इसमें उसे ठीक उसी प्रकार शान दार सफलता मिल सकती है, जिस प्रकार श्री का० मा० मुन्शी की कृति पर निर्मित 'पृथ्वीवल्लभ' को प्राप्त हुई। इस नाटक के लिए लेखक एवं प्रकाशक पास्तव में बधाई के पाय हैं। -प्रभात, ग्वालियर, इन्दौर, १५ दिसम्बर ५२ [ १३७ प्रसिद्ध साहित्यकार श्री जगन्नाथप्रसाद मिलिन्द के समस्त ग्रन्थ कविता संग्रह र की अनुभूति ४.०० २.५० ४.०० का नपय के गीत जन-संगीत युग के गान .... खण्ड-काव्य तन्त्रता की बलिवेदी १.५० नाटक .... .... .... तिम नन्द १.५० यदर्शों २.५० मर्पण १.७५ तापप्रतिज्ञा १.२५ निबन्ध संग्रह स्कृतिक प्रश्न २.५० चन्तनकरण २.०० व्यंग्य-विनोद-कथासंग्रह बल्लो का नकछेदन २.०० यदि एक-साथ एक ही स्थान से मँगाने हों, या इनमें से कोई भी प्रन्थ मंगाना हो, तो कृपया लिखिए:- .. ....

ऐतिहासिक कथानक के रूप में पात्रों के कथोपकथन द्वारा वर्तमान युग की प्रगतिशील विचारधारा यत्रतत्र जिस सुन्दर रूप में नाटककार द्वारा व्यक्त की गई है, वह लेखक की असाधारण प्रतिभा का द्योतक है । नाटककार ने नन्द के त्याग और बलिदान को उचित महत्त्व देकर इतिहास के एक उपेक्षित अंग के साथ उचित न्याय किया है। इससे नाटक की सजीवता द्विगुणित हो हो गई है । प्रांजल भापा, गम्भीर किन्तु भोजपूर्ण शैली,प्रगतिशील विचारधारा और सजीव एवं प्रभावोत्पादक कथोपकथन नाटक की अपनी विशेषता है। ऐतिहासिक कथानक होते हुए भी उसे मौलिक रूप देने में मिलिन्दजी ने विलक्षण प्रतिभा का परिचय दिया है । दृश्यों की रचना में अभिनय की सुगमता का ध्यान रखा गया है । 'गौतम नन्द' के अवतरण से हिन्दी साहित्य में नाटक-रचना के क्षेत्र में एक प्रेरणात्मक प्रवृत्ति का सृजन होगा और वह युगानुकूल एक नवीन दिशा की ओर साहित्यसर्जकों का पथ-प्रदर्शन करेगा। निस्सन्देह साहित्यसंसार में इस कृति का यथोचित स्वागत किया जायगा। मध्यभारतसन्देश, ग्वालियर, ३ जनवरी '५३ श्री मिलिन्दजी की प्रसिद्ध लेखनी से निर्मित इस नाटक के रूप में साहित्य-जगत् को एक स्वागतयोग्य भेंट प्राप्त हुई है । कथानक ऐतिहासिक है और उसे रुचिकर बनाने में सफलता प्राप्त हुई है । भापा एवं भावों के साथ ही सुस्पप्ट एवं प्रगतिशील दृष्टिकोण का भी पूरा ध्यान रखा जा सका है। इस रचना को अगर सिनेमा-जगत् अपनाए, तो इसमें उसे ठीक उसी प्रकार शान- दार सफलता मिल सकती है, जिस प्रकार श्री क० मा० मुन्शी की कृति पर निर्मित 'पृथ्वीवल्लभ' को प्राप्त हुई। इस नाटक के लिए लेखक एवं प्रकाशक वास्तव में वधाई के पात्र हैं। प्रभात, ग्वालियर, इन्दौर, १५ दिसम्बर '५२ "rh [ १३७ سا .... प्रसिद्ध साहित्यकार श्री जगन्नाथप्रसाद मिलिन्द के समस्त ग्रन्थ कविता संग्रह भूमि को अनुभूति मुक्तिका बलिपय के गीत जीवन-संगीत नवयुग खण्ड-काव्य .... .... के गान स्वतन्त्रता को बलिवेदी नाटक .... गौतम नन्द प्रियदर्शी समर्पण মামনি निबन्ध संग्रह सांस्कृतिक प्रश्न .... चिन्तनकरण व्यंग्य-विनोद-कथासंग्रह बिल्लो का नकछेदन यदि एक-साथ एक ही स्थान से मंगाने हों, या इस ग्रन्थ मैंगाना हो, तो कृपया लिखिए:- साहित्य-प्रकाशन-मंदिर, हाईट ग्वालियर (न... -

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Gotam Nanda

Author
Miland
Title
Gotam Nanda
File name
Gotam Nanda
Text
OCR done
Published
2011/03
Publisher
Gwaliour,kitab Bhar
Language
Sanskrit
Pages
155
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
History
DLI number
552234
Barcode
4990010032980.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library of India
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Copyright permitted
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