Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Shrigyatadharmkathangam
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शाश्वतानन्ददायक-सफलमन्त्र-तन्याधिराजराजेश्वर-श्रीसिद्धचक्रेभ्यो नमो नमः । सकलसमीहितपूरक-धीशलेश्वरपार्श्वनाथो विजयतेतमाम् ॥ ॥ श्रीज्ञाताधर्मकथाङ्गे द्वितीयविभागे प्रस्तावना ॥ दुर्लम मानवजीवन- अनादिअनंतकालथी परिभ्रमण करनार जीनोने जन्म-जरा-मरण-शोक-दुःख-दरिद्रता-दौर्भाग्य-माधि-व्याधि-उपाधि आदि अनेकविध दुःखदायि भवचक्रनी परंपरामा अनुकूल साधन-सामग्री-संयोगोथी भरपूर मानवजीवन मलq ते अतीव दुर्लभ छे, छतां आ प्राप्त थयेल मनुष्यजीवनमा आर्यदेश-उतमकुल-उत्तमजाति-दीर्घायुप्य-परिपूर्णशक्तिशालिपांचइन्द्रियो-देवगुरुधर्मनी जोगवाइ- धीतरागवाणीनुं श्रमण-शासनमान्यश्रद्धा-श्रद्धानुसारपरिणति केळवीने प्रवृति-निवृत्तिमय जीवन जीवq ए विगेरे सर्वनी प्राप्ति थवामां तथाभव्यत्व-प्रबलपुरुषार्थ-प्रकृष्टपुण्यादि निगेरे अमोघ कारणो भाग मजवे छे, ए मूलवा जेवू नथी. मोक्षप्राप्तिनो प्रकार- शासनमान्य साधन-सामग्री-संयोगोथी भरपूर मानवजीवनने उजाळनाराओए समर्थ गीतार्थ ज्ञानीओना समागममां रहीने स्वयं ज्ञानी बनवु अगर ते गीतार्थ भगवन्तोनी निश्रा स्वीकारीने हेय-उपादेय पदार्थोनो विवेक करीने अनुक्रमे निवृति-प्रचिमय
नवराङ्गी-
१०१०
श्रीज्ञाता-
धर्मकथा)
द्वितीय-
विमागे-
प्रस्ताव
मोक्ष-
प्रासिनो
प्रकार।
जीवन जीव, कारण के-तेवु जीवन जीव्या वगर कोइ पण जीव मोक्षमार्गने अनुकूल कल्याण साधी शक्यो नयी, अने साधी शकशे
ज नहिं. आ प्रसंगने स्पष्ट करतां शास्त्रकारोए जणाव्युं छे के " पढमो गीयत्यो बीओ गीयत्यनिस्सिओ भणिओ" आ पचनो भावार्थ
ए छे के मोक्षमार्गना अभिलापिओ माटे त्रैलोक्यनाथ भगवंतोए चार घनघाती कर्म तोडीने केवलज्ञान पामवाना, अने ते पछी सकल
कर्मना क्षयपूर्वक मोक्ष मेळववाना बेज मार्ग कहेला छे, त्रीजा मार्गनी अनुज्ञा ते भगवंतोए आपीज नथी. ते वे मार्ग क्या !, प्रथम
मार्ग गीतार्थनो, अने चीजो मार्ग गीतार्थनी निश्रानो छे. आधी जेओ मोक्षे गया छे, जाय छे अने जशे ते वधाओए उपरना वे मार्ग
स्वीकारेला छे, स्वीकारे छे, अने स्वीकारशे ए वीना नि:संदेहपणे स्वीकार्य छे.
कल्याणकारि समागम-
जैनशासनमान्य-मोक्षतत्त्वनी परिणतिपूर्वकना ' तत्त्वसंवेदन- आस्वादन करीने मोक्षमार्गे गयेलाओनी अने मोक्ष सन्मुख
थएलाओनी परंपरानुं विवेकपूर्वक अवलोकन करीए तो उपरनी स्पष्ट वात नजर सन्मुख खडी थाय छे. इन्द्रभूतिने प्रमु महावीरनो,
नयसारने मुनिसमागमनो, धनासार्थवाहने धर्मघोपसूरिजीनो, जम्बूस्वामिने श्रीसुधर्मास्वामिनो, अने पंदरसो त्रण तापसोने श्रीइन्द्रमूतिनो
समागम थयो ते समागमनी साथे वीतरागनी वाणीनुं श्रवण, श्रद्धापूर्वकनी परिणति, अने वीर्योलासपूर्वक संयमर्नु सेवन थवाथी
अनुक्रमे पामवा लायकनी अमोघ चीज पामी गया छे एमां चतुर्विधसंघनी कोइपण व्यक्तिने आ निःशंक-सत्य समझाया वगर रहेतुंज
नथी. जिनेश्वरोनो, केवलिओनो, पूर्वधरोनो, अने बहुश्रुतघर-गीतार्थनो समागम थवो ए एक अलौकिक पुण्यनो प्रभाव छे, ते प्रबल
पुण्यादिप्रभावनाना जोरे साधन-सामग्री-संयोग पामीने उत्तरोतर उत्कृष्ट कोटिना पुण्यना-संवरना-निर्जराना भागी बनीने तेओ स्वजीवनने
॥ २ ॥
अने ते पछी समागममा आवनारा अनेक जीवोने कल्याणमार्ग पमाडवामा प्रवल उद्यमवन्त थाय छे. प्रमु महावीरना कल्याणकारि- समागमथी इन्द्रभूति अने सुधर्मानामना ब्राह्मणो शासनना मालीक-संचालक बन्या, प्रमु सुधर्मास्वामि गणधरना कल्याणकारि समा- गमथी श्रीजम्बूस्वामि नवाणु कोड सोनैया-आठ स्त्रीओ छोडवानुं सामर्थ्य केळवीने शासनमा अन्तिम केवली वन्या; शासनमान्य महापुरुषोना कल्याणकारि समागमयी प्रादुर्भाव पामेल श्रुतगंगा-सरिताओ आजे पण शासनमा ठामठाम अस्खलितपणे वही रही छे, के जे सरिताना मुघासम जलनु पान करीने पापी आत्माओ पोतानां पापो खपावता अद्यापि-पर्यंत पावन थई रह्या छे, अने भाविमां पण जरुर योग्य आत्माओ पावन थशे एमां लवलेश शंकाने स्थान ज नथी. श्रुतगंगार्नु मूळ- वर्तमानशासनमा सघळीए श्रुतसंपदाओना पद्महृदसमान मूळ तरीके त्रैलोक्यनाथ भगवन्त श्रीवीरविमु छे, अने शासनसंचालक- पंचमगणधर श्रीसुधर्मास्यामिजी छे; कारण के अर्थथी आघदेशना देनारा मगवन्त श्रीमहावीर महाराजा छे, ते देशनाने अनंतर शीलनारा भी सुधर्मास्वामिजी छे, अने ते देशनाने परंपराए झीलनारा श्री जम्बूस्वामिजी विगैरे छे. आयी ज अर्थी-त्रयी आत्मा- गम-अनंतरागम-परंपरागमना भेद समझनारने स्पष्ट मालम पडे छे के अर्थथी आरमागम श्रीमहावीर महाराजाने छे, अने सूत्रथी आरमागम पंचमगणधर श्री सुधर्मास्वामिजीने छे. आसनोपफारि श्रीमहावीरमहाराजाना निर्वाणसमयने २४७९ लगभग वर्षो पसार थइ गया छतां शासन स्थापनाना अवसरे अर्थथी-सूत्रथी आत्मागमादि मैदोने अनुसरीने अस्खलित प्रवाहरूपे परंपरागत ते ते सर्वज्ञमाषित-अर्थाने अने गणधरमापितसूत्रोने १०० भीडावा. धर्मकया) द्वितीय- विभागे प्रस्ताव धर्मकथा विशिष्टता प्राप्त करवानुं सुंदरतम-सौभाग्य प्राप्त करनार होय तो वर्तमानकालीन शासनमान्य-सूत्र अर्थ अने परंपराये प्रमाणभूत श्वेताम्बर. मन्दिरमार्गीय संप्रदाय हतो, छे, अने रहेशे. धर्मकथानुयोगनी विशिष्टता-- वर्तमानमा श्रुतसंपदाओने साचवी राखनारा अनेकविध अन्थोमा अगीआर अंगोनुं प्रधानपणुं अतीव प्रसिद्ध छे. ते अंगोमां छटुं अंग " श्रीज्ञाताधर्मकथान " नामे प्रसिद्ध छे, अने साथे साथे शास्त्रकारोए ठाम ठाम जणावेलं छे के आ छटुं अंग सर्वव्यापक- योगनी गरज सारे छे. शासनमा प्रवेश करनाराओ माटे, प्रवेश करेलाओना वीर्योल्लासनी वृद्धि माटे, अने शासनाभिमुख बनाववाना आरायथी अनेकानेक मव्यात्माओ माटे आ छटुं अंग वधु ने वधु उपकारक थयेल छे, थाय छे अने थशे ते निःसदेह बीना अर्थिओए स्मृतिपट पर स्थिर करवा जेवी छे. सर्वज्ञकथित सिद्धान्तोमा शुं रहस्य छे ,, ते ते सिद्धान्तोनुं पालन करनाराओने केवो लाभ थयो :, तेनी विरुद्ध वर्तनाराओने केवु नुकशान थयु !, आपत्तिकालमा धैर्य गुमावनारनी शी हालत थई :, अने विनोनो विजय करनार कह रीतिए आगल वध्यो ! विगेरे विगेरे चरणकरणानुयोगादिना अनेकविध प्रसंगोथी श्रोताना, वांचकोना, तथा अभ्यासकोना जीवनने नवपल्लवित वनावनार होय तो आ धर्मकथानुयोग स्वरूप-श्रीष्टुं अंग श्रीज्ञातासूत्र छे. द्वितीयविभागनी सामग्रीओ- आ छट्ठा अंग-'श्री ज्ञाताधर्मकथाननी प्रथम आवृत्ति स्व. पूज्य गुरुदेव आगमोद्धारकाचार्यनी पुनीत दृष्टिथी वहार पडेली हती, परन्तु अनेक वांचकोनी मागणीना सद्भावमां आ अन्यनुं पुनः द्वितीय आवृत्तिरूपे वे विभागमा व्हेंचीने प्रकाशन करेल छे. आ अंगना प्रथम श्रुतस्कन्धना प्रथम अध्ययनयी आठ अध्ययनो संपूर्ण साथे तेने अनुकूलनी प्रस्तावना-परिशिष्टो अने आठ अध्ययनोना सारांश- विषयानुकमयुक्त-श्रीसिद्धचकसाहित्यप्रचारकसमितिए गत वर्षमा प्रसिद्ध कर्यो छे, अने वांचको-विचारको-अभ्यासकोनी मांगणी बीजाभागनी शरू थतां आ बीजो भाग पण तेज समितिए प्रसिद्ध कर्यो छे. आ बीजा भागमा बाकी रहेला प्रथम श्रुतस्कंधना नवमा अध्ययनथी ओगमीसमा अध्ययन सुधीना नवे अध्ययनोना मूलसूत्र- वृत्ति साथे अने धर्मकथाओथी भरपूर बीजा श्रुतस्कंध पैकी दश वर्गोना सर्व अध्ययनोना मूलसूत्रवृत्ति साथे आ द्वितीय विभाग संपूर्ण थाय छे. साथे साथे आ वीजा विभागमा आवेल अध्ययनोनो सारांश वांचकोने अनुकूल पडे ते हेतुथी आपवामां आवेल छे. प्रथम विभाग माथेनो संवन्ध- आ छट्ठा अंगना प्रथम विभागमा प्रथम श्रुतस्कंधना आठ अध्ययनो मूल सूत्र-वृति-सारांश परिशिष्टो आपेला छे, ते अवसरे विस्तृत प्रस्तावनानुं आलेखन करेलं छे. आ द्वितीय विमागनी प्रस्तावनानी साथे प्रथम विभागनी ते प्रस्तावना संबंध राखे छे, माटे विवेकि-वांचकोने ते स्थले वांचवा आग्रहपूर्वकनी अत्र भलामण करवामां आवे छे; अने तेथी आ चाल प्रस्तावनामां उपयोगि प्रकरणोनुं आलेखन करीने पुनरावर्तन कयु नथी. प्रथम विभागनी प्रस्तावनामां आलेखन करेला मानवजीवननी महत्ता, श्रवणनी आवश्यकता, समर्थ वकानो योग, आय सदुपदेशक, आद्य संचालक-श्रीसुधर्मास्वामिजीनुं जीवन, अंतिम केवलिनी जीवनचर्या, सूत्ररचनानी मर्यादा, श्रुतसंपदाना मालीक, अंगोनो अनुस्यूत संबंध, आ ग्रन्थनुं नाम, आ ग्रन्थना वृधिकार, अने ग्रंथसामग्रीना प्रकारो विगेरे प्रकरणोने वांचवाथी आ ग्रन्थना रचयिता सूत्रकारनी, सूत्रोने अनंतर झीलनारा श्रीजम्बूस्वामिजीनी, अने वृत्तिकारना विशाल-आशयोनी साथे - नवाणी- १०पू० भीमावा- धर्मकपा द्वितीय- विमागे- प्रस्ताव उपसंहार। अतीव महता स्पष्ट समजारो ते ध्यानमा राखवा जेवू छे. उपसंहार- आ प्रस्तावनानी परिसमाप्ति साधे वांचकोए, विचारकोए अने अभ्यासकोए एक वात स्मृतिपट-पर स्थिर करवा जेवी छे, अने ते ए छे के स्याद्वाद-जैनदर्शने एकला ज्ञानने अपनाव्युं नथी, परंतु ज्ञानना अर्थिओ माटे ज्ञानाचारना आठे आचारोने अपनाव्या छे, भने तेनी किंमत पण एकसरखी अकिली छे. शब्दशुद्धि, आलेखनशुद्धि, उच्चारशुद्धि, अर्थशुद्धि अने वांचनशुद्धिना नामे “ काले भणवू, अकाले नहिं भगवू, विनय-बहुमानपूर्वक मणवु अने एक अक्षरना देनार गुरुओनो अपलाप पण न करवो" ए विगेरे पांच आचार प्रत्ये वेदरकारी सेवनाराओ स्व-परहित साधी शक्या नथी, साधी शकशे नहिं, अने साधी शकता नथी ते निर्विवाद छे. आधी आठ आचारोना सेवन साथे आ अन्यने भणशे-मणावशे ते आत्माओ उत्तरोत्तर सुन्दर साधन-सामग्री-संयोगो पामीने माविमां कल्याण-मांगलिकमालाओ क्रमशः प्राप्त करीने अव्यावाघ सुखना मोका बनो, एज एक शुभेच्छा. मायरयुण्डला ( सौराष्ट्र) लि. स्व० गुरुदेव प. पू. आगमोद्धारक- सौभाग्यपंचमी वि. सवत् २००९ श्रीआनन्दसागरसूरीश्वर-चरणारविन्दचश्चरीक:- चन्द्रसागरसूरिः। ता. २३-१०-५२ श्रीज्ञाताधर्मकथाङ्गद्वितीयविभागे- प्रकाशिकानुं निवेदन. नूतनवर्षमा प्रवेश- पातःस्मरणीय-पूज्यपाद-तपागच्छगगनदिनमणि-श्रीदेवसुरसंघपरम्परासंरक्षक-श्रीसिद्धक्षेत्र-सूर्यपूरस्थितश्रीजैनागममन्दिरतीर्थ- संस्थापक, आगमोद्धारक, स्वर्गस्थ-श्रीआनन्दसागरसूरीश्वरजीना हार्दिक आशीर्वादथी अने तेओधीना परमविद्वद्विनेय, श्रीसिद्ध- चमाराधनतीर्थ-श्रीचन्द्रप्रभासपाटणतीर्थोद्धारक, श्रीसिद्धचक्र-नवपदाराधकसमाजसंस्थापक, वैयाकरणकेशरी,श्रीआनन्दबोधिनी वृचिकार, श्रीवर्द्धमानतपोमाहात्म्य अने विंशतिविंशिका-पंचाशकशास्त्रसारांशादिविविधसामग्रीरूप साहित्यना आलेखनकार-पूज्यपाद-आचार्य- देवथी-चन्द्रसागरसरिजीनी शासनसंरक्षक प्रेरणाथी अमारी समितिना मुखपत्र श्रीसिद्धचक्र मासिकनो प्रादुर्भाव थयो, अने आराधकोनी आराधना आराध्यपदने अनुसरवानी साथे अतीव उज्वल बने ते हेतुथी शासनमान्य साहित्यना प्रकाशनार्थे साथे साथे अमारी श्रीसिद्धचक्रसाहित्य-प्रचारक-समितिनो पण जन्म थयो. आ समितिनी अने आ मासिकनी सुन्दर कार्यवाहीओथी चतुर्विधसंघना आशीर्वाद साथे तन-मन-धननी अनेकविध सहायथी ते बन्ने (समिति अने मासिक) प्रफुल्ल वनीने ओगणीसमा नूतन वर्षमा प्रवेश करेल छे.
नवाङ्गी- पुं० पू० श्रीशाता- धर्मपाहे द्वितीय विमागे- प्रस्ताव उपसंहार। अतीव महचा स्पष्ट समजाशे ते ध्यानमा राखवा जेवं छे. उपसंहार- आ प्रस्तावनानी परिसमाप्ति साथे वांचकोए, विचारकोए अने अभ्यासकोए एक वात स्मृतिपट-पर स्थिर करवा जेवी छे, अने ते ए छे के स्याद्वाद-जैनदर्शने एकला ज्ञानने अपनाव्यु नथी, परंतु ज्ञानना अर्थिओ माटे ज्ञानाचारना आठे आचारोने अपनान्या छे, अने तेनी किंमत पण एकसरखी अकिली छे. शब्दशुद्धि, आलेखनशुद्धि, उच्चारशुद्धि, अर्थशुद्धि अने वांचनशुद्धिना नामे " काले भणवं, अकाले नहि भणवं, विनय-बहुमानपूर्वक भणQ अने एक अक्षरना देनार गुरुओनो अपलाप पण न करवो" ए विगेरे पांच आचार प्रत्ये वेदरकारी सेवनाराओ स्व-परहित साधी शक्या नथी, साधी शकशे नहिं, अने साधी शकता नथी ते निर्विवाद छे. आथी आठ आचारोना सेवन साथै आ ग्रन्थने भणशे-भणावशे ते आत्माओ उत्तरोचर सुन्दर साधन-सामग्री-संयोगो पामीने भाविमां कल्याण-मांगलिकमालाओ क्रमशः प्राप्त करीने अव्यायाध सुखना भोक्ता बनो, एज एक शुभेच्छा. सावरकुण्डला ( सौराष्ट्र) लि. स्व० गुरुदेव प. पू. आगमोद्धारक- सौभाग्यपचमी वि. सवत् २००९ श्रीमानन्दसागरसूरीश्वर-चरणारविन्दचश्चरीका- ता. २३-१०-५२ चन्द्रसागरसूरिः।
श्रीज्ञाताधर्मकथाङ्गद्वितीयविभागे- प्रकाशिकानुं निवेदन. नूतनवर्षमा प्रवेश- प्रातःस्मरणीय-पूज्यपाद-तपागच्छगगनदिनमणि-श्रीदेवसुरसंघपरम्परासंरक्षक-श्रीसिद्धक्षेत्र-सूर्यपूरस्थितश्रीजैनागममन्दिरतीर्थ- संस्थापक, आगमोद्धारक, स्वर्गस्थ-श्रीआनन्दसागरसूरीश्वरजीना हार्दिक आशीर्वादथी अने तेओश्रीना परमविद्वद्विनेय, श्रीसिद्ध- चमाराधनतीर्थ-श्रीचन्द्रप्रभासपाटणतीर्थोद्धारक, श्रीसिद्धचक्र-नवपदाराधकसमाजसंस्थापक, वैयाकरणकेशरी,श्रीआनन्दवोधिनी वृत्तिकार, श्रीवर्द्धमानतपोमाहात्म्य अने विंशतिविशिका-पंचाशकशाखसारांशादिविविधसामग्रीरूप साहित्यना आलेखनकार-पूज्यपाद-आचार्य- देवधी-चन्द्रसागरसरिजीनी शासनसंरक्षक प्रेरणाथी अमारी समितिना मुखपत्र श्रीसिद्धचक्र मासिकनो प्रादुर्भाव थयो, अने आराघकोनी आराधना आराध्यपदने अनुसरवानी साथे अतीव उज्वल बने ते हेतुथी शासनमान्य साहित्यना प्रकाशनार्थे साथे साथे अमारी श्रीसिद्धचक्रसाहित्य-प्रचारक-समितिनो पण जन्म थयो. आ समितिनी अने आ मासिकनी सुन्दर कार्यवाहीओथी चतुर्विघसंघना आशीर्वाद साथे तन-मन-धननी अनेकविध सहायथी ते बन्ने (समिति अने मासिक ) प्रफुल्ल बनीने ओगणीसमा नूतन वर्षमा प्रवेश करेल छे.
नवाजी पू०१० श्रीज्ञाता- धर्मकथा) द्वितीय विमागे प्रकाशिका- निवेदन। हार्दिक सन्मान- विशेषमा हमारी समितिना मुखपत्र श्रीसिद्धचक्रमासिकमां मुख्यत्वे स्व० आगमोद्धारकनी अमोघदेशनादि विगेरेनुं वांचन एक सरखी रीते मलवाथी अने पू० आचार्यदेवश्री-चन्द्रसागरसूरिजीनी विवेकमरी नजर नीचे शासनमान्य अनेकविध साहित्य सामग्रीओनुं साथे साथे वांचकोने सुधास्वादन थतुं रहेवाथी वांचकोनी संख्यामां दिनप्रतिदिन वृद्धि थयां न करे छे, अने प्रकाशनोने वेगवंता वनाववा माटे आर्थिकसहायकोनी हरिफाइ थइ रही छे तेथी बन्नेनी (समितिनी अने मासिकनी) उज्वल कार्यवाहिओनी नोंधनो अतीव आदरभर्यो सत्कार आपवा माटे शासनमान्य-चतुर्विधसंघनी व्यक्तिओने आदरपूर्वक हार्दिक सन्मानीये छीए. ग्रन्थप्रसिद्धि अने उपसंहार- " समितिनो अने मासिकनो जन्म, बन्नेनी प्रशंसनीय कार्यवाहि अने संचालननुं पुण्यकार्य" आ त्रणे प्रकरणो आ अन्यना प्रथम विमागनी प्रस्तावनामां आपेलां छे, तेने वांचकोए पुनः पुनः विवेकपूर्वक विचारवानी जरुर छे, एम तेओने आग्रहपूर्वकनी मलामण छे. कारण के तेमा समितिना-मासिकना विशाल उद्देशो-हेतुओ स्पष्टपणे मालम पडे छे, साथे साथे पुण्यबन्ध करवाना परमनिमितरूप संचालनना सुन्दर कार्यनी म्हारी जवाबदारीनुं अने ते बन्ने साथेना सेवामावना सम्बन्धनुं ज्ञान वांचकोने स्पष्टरीतिर थइ शके छे. आ द्वितीय विभागरूपे छटुं अंग श्रीज्ञाताधर्मकथाङ्ग नामे प्रकाशन थतो आ ग्रन्थ द्वितीय आवृत्तिरूपे प्रसिद्ध थाय छे, अने तेथी प्रथमावृत्तिना सम्बन्धमा विस्तृत आलेखन प्रथम विभागनी प्रस्तावनामा करेल छे, तेथी अत्र ते संबन्धना आलेखननुं पुनरावर्तन करवु उचित नथी.
आ द्वितीय विभागना प्रकाशनार्थे पू० आचार्यदेव-श्रीचन्द्रमागरमरिजीना परमविनेय पू० उपाध्याय श्रीदेवेन्द्रमागरजी गणिवरना सदपदेशथी अमदावाद शाहपुर-मंगल पारेखना खांचा विपे आवेल उपाश्रयना वहीवटदारोए ७० २५०) बसो ने पचास रूपीआ आपेल छे, ते सिवाय मददना अमावे पडतर किंमतना भावे अमारी समिति तरफथी आ ग्रन्थ वांचको माटे अने अभ्यासीओ माटे प्रसिद्ध कराय छे. आ ग्रन्थने प्रकाशक करवामां संपादन भगीरथ कार्य पू. आचार्यदेव श्री चन्द्रमागरमरिजीए करेल होवाथी, घूमादि संशोधन अने सारांशनुं कार्य करनार पू. मुनिश्री चन्दनमागरजी म. ने, नियमित अवसरे प्रकाशन करवामां श्री महोदय पी. प्रेस मालीकने अने प्रेस-माणसोने अत्र याद करीने वांचको-विचारको-अभ्यासको पांचवा पहेलां शुद्धिपत्रकथी शोधीने यांचे-विचारे- अभ्यास करे एज एक शुभेच्छा. २२४ रामेमण स्ट्रीट, निवेदक- मुंबाई नं. २. पानाचन्द रूपचन्द झव्हेरी सौभाग्यपञ्चमी. २००९ श्रीसिद्धचक्र-मासिकना-तन्त्री अने श्रीसिद्धचक्रसाहित्यप्रचारकसमितिना प्रधान-संचालक.
हमारा प्रकाशनो। - नवागी. पृ ०० श्रीज्ञाता। धर्मकथा) २-८-० ७-०-० " १ श्रीहेमचन्द्रकृतिकुसुमावली. नूतन प्रकाशनो २ धीवर्द्धमानतपोमाहात्म्य. १२ थीमानंदचन्द्रसुघासिन्धु विभाग० ३ २-८-० ३ श्रीपंचप्रतिक्रमणसूत्राणि विधिसह (कमीशन वगर) १-२-० १३ थी हातासूत्र भा. १-२ नो सारांश तथा ४ श्रीपंचाशकशास्त्रसारांश-विभाग० १, श्रीसूयडांगसून मा. १ नो सारांश. २-८-० ५ श्रीआनंदचन्द्रसुधासिन्धु-विभाग० १, ४-०-० पत्राकार ६ श्रीआनंदवन्द्रसुधासिन्धु- ३-०-० १४ श्रीशाताधर्मकथाड्ग सटीक भाग १, सारांशसह ८-०-० ७ श्रीभगवतीसूत्रनी शास्त्रप्रस्तावनाथी शरु १०८ व्याख्यानो १५ थीमाताधर्मकथाङ्ग भाग २, ६.१२० १६ श्रीसिरियालचरितम् ३-०-० ८ श्रीआगमोद्धारफ. ३-०-० ९ थीतपोद्यापन. ११२० व्याकरणानि १० थीप्रमासपाटणतीर्थमाहात्म्य. १७ श्रीसिद्धहेमचन्द्र शब्दानुशासनम् ११ श्रीसिद्धचकनी वांधेली फाईलो. वर्ष ११ थी १८ (श्रीआनंदवोधिनी टीका ) भाग १, ३०-०-० प्रत्येकना. ४-०-० १८ श्रीसिद्धहेमचतुप्फवृत्तिस्यादिसमुच्चययुतम् प्राप्तिस्थान-श्रीसिद्धचक्र-साहित्य-प्रचारक-समिति C/संघवी चीमनलाल सवाइचंद, गलेमदी गोलशेरी, सुरत (गुजरात) W. Ry. - । . 1 - - . भद्रा,नामनी भार्या श्रीशवेश्वरपार्श्वनाथाय नमः । ॥ श्रीज्ञाताधर्मकथाङ्गे द्वितीयविभागस्य सारांशः ॥ ? ।। 13111 - 1 ९-श्रीमाकन्दीदारकाध्ययन-सारांशः। पूर्व आठमा अध्ययनमा मायाथी अनर्थ कही गया, हवे आ नवमा अध्ययनमा भोगोधी पाछा नहिं हठनारने यतो अनर्थ, अने भोगोथी पाछा हठनारने थतो राम अन दवाय छे. । हे जग्यू ! ते फाले अने ते समये चपा नामनी नगरी हती. त्या माकदी नामनो सार्थवाह वसतो हतो, तेने हत्ती, अने तेने जिनपालित अने जिनरक्षित नामना वे पूत्रो हता. ते पन्ने पूत्रोए अन्योअन्य विचार करीने लवणसमुद्रुना वाहणवटावाला धधामाटे आपणे चारमी वसत पण जर्बु तेवु नफी फयु, अने मातापितांनी रजा मागी. मातापिताए घणु संमजाव्यं पण मान्यु नहीं, आयी, अनिच्छाए मातापिताए रजा आपी; अने ते बने गया. समुद्रमा पणे दूर गया पछी वावटोलीमा विगेरेनो सरल उपद्रव थयो, अने पहाणो मांगी गया, अने घणा माणमो डूबी गया, तथा रावेला करीयाणां पण बाए समुद्रने तळीए गया. मारुन्दीना ते बने पुनोना दाथमा एका पाटीउ आव्यु ते पाटीयानी सदाययी तरता तरता रत्नद्वीपे गया. रत्नद्वीपना पर्वतविपे थाक खाइने फरादिनी शोध फरीने मेळपी-साइने गालीगेरगा पाणीयी तृप्त थया, अने नालीयेरनु तेल काढी अन्योअन्य मालीश करी वावोना पाणीयी स्नान करी स्वस्थ द्वितीय विमागे भीज्ञाता- धर्मकथाझे अध्यय ५ सारांशE थया. एक शिला पर वैसीने "चंपानगरीमा मातापितांनी पासे समुद्रनी मुंसॉफरीना वहेवार माटे जवानी मागणी करवी, मातापितार्नु निषेध फरवु, अने अति आग्रहेथी रजा मेळवी, लवर्णसमुद्रमा उतरवू, वावंटोलीयाना उपद्रवथी जानमालनी थेयेली नुकशानी, तरता तरता अहिं आवq अने खोराकमा फलादिनुं खावं विगेरेनो" विचार करे छे- ते समये आ रलद्वीपना मध्यभागमा रलद्वीप देवता नामे देवी वसे छे, ते अति पापीणी अने स्वभावे भयंकर छे. सदरहु अवधिज्ञानथी आ माकन्दीना बन्ने पुत्रोने त्यां आवेला जोइने भयंकररूप विकुर्वीने त्यां आवीने कठोर वचनोथी ते बन्नेने कहेवा लागी के-हे बन्ने माकंदियदोरको । तमे म्हारी साथे विपुल भोगो भोगवता म्हारी पांसे रहो, नहीं तो तमारुं मस्तक आ तलवारथी कापी नाखीश ! भय पामेला ते बन्ने श्रेष्ठीपुत्रोए कह्यु के तमारी आज्ञा प्रमाणे हमे रहीशु. आ केंबुलीत लेइ ते देवी पोतानां प्रासादे लइ गइ अने ते बन्नेनी साथे विपुल एवा भोगोने भोगवे छे, अने हमेशां ताजा मीठां फलो लावी-आपीने तृप्ति करावे छे. एक समये शक्रेन्द्रना आदेशथी लवणाधिपति सुस्थित नामना देवे रत्नद्वीपनी ते देवीने आदेश कों के " हारे २१ एकवीशवार लवणसमुद्रविषे फरी-फरीने घास-पावा-लाकडां-करो अने अशुचि वगेरे जे कंइ दुर्गन्धवाळु होय ते चोक्खं करी देवु ! " आवा आदेशथी ते बन्ने श्रेष्ठीपुत्रोने ते देवीए कह्यु के-हुं शक्रेन्द्रना हुकमथी समुद्रनी शुद्धि माटे जाउं छु, तमे अत्र सुखे रहेशो. कदाच तमने न गमे तो तमे पूर्व-पश्चिम-उत्तर दिशाओनो वनखंड विपे फरवा जशो तो त्यां जुदी जुदी ऋतुओना फलो छ, तेनाथी तृप्ति करशो; अने मारी राह अत्रे जोशो. परन्तु दक्षिण दिशामां जशोज नहिं, कारण के त्या एक भयंकर दृष्टिविषसर्प रहे छे, ते तमारा शरीरनो नाश करशे. आ प्रमाणे त्रणवार सावचेती आपी ते देवी समुद्र तरफ गइ.
बन्ने ऐष्ठिपुत्रो बणे वनखंडीमा फरें छे अने आनंद करे छे. एक समय त्यां त्रण दिशाना वनखडोमां पण नहीं आनंद पामता तेमने दक्षिण दिशामा जवा नकी कर्यु, अने दक्षिणदिशामां केटलेक दूर गयां पछी मरेला सर्प करतां पण वधु दुर्गन्ध आवता पोताना वरवडे नाक बंध फेरीने आगळ चालवा मांडयु, आगळ चालतों अनेक हाडकांथी व्याप्त एंवा वधस्थानमां शूलीवडे मैदाएलो फरुणस्वरने करतो एक पुरुष जोयो. उत्पन्न थयो छै भय जेने एवा ते वन्ने श्रेष्ठीपुत्रोए हकीकत पूछतां ते शूलीस्थित पुरुषे कयु के- "हुं भारतवर्षनी काकंदीनो अश्ववणिक छं. करीयाणी अने अधो वहाणामां भरी लेवणसमुद्र विपे धंधा अर्थे आवेलो, . पण मार्गमां समुद्रना तोफानथी वहाणो डुबी गयां, अने हुं पाटीयाना आधारे अहीं आवी पहोंच्यो; अने पछी रलद्वीप देवता नामनी देवीना भोग- विलासमां सपडायो. घणो समय तेनी साथे भोगादिमां गयो, पण एक समये सामान्य अपराध आवतां आ अवस्था पाम्यो छु, माटे माविमा तमारा शरीरोनें कोण जाणे शुं थशे !" आ सांमलीने भयभीत थयेला बन्ने भाइओए एना सकंजामाथी छूटवानो उपाय पूछयो. तेना जवावमा ते शूळीथी मेदाएला पुरुचे कंधु के पूर्वदिशामा शैलक नामना यक्षनु मन्दिर छे तेमां अश्वरूपने धारण करतो यक्ष वसे छे. ते शेलक यक्षं चौदश-आठम-अमावास्या-पूर्णिाना दिने प्राप्त थयेला संमये मोटा शन्दी एवी रीते वोले छ के-कोने तारुं !, फोनुं रक्षण करुं !; त्यां तमे जाव अने तेनी सेवा करो अने ज्यारे ते बोले त्यारे जवाबमां कहेजो के हमने तारो ! हमारूं रक्षण करो। रत्नद्वीप देवताना हाथमाथी हमोने तारो ! आ प्रमाणे ते पुरुषथी श्रवण करी शैलकंयक्षना मन्दिरमा गया अने ते पुरुपना कया मुजब सर्वे कयु. शैलंकयझे तेओनी मागणी कबुली अने कह्यु के समुद्रमध्ये थइ जतां ते देवी प्रतिकूल-अनुकूल उपसर्गो करशे, तमे जरा पण क्षोभ पामशो नहीं; तेम चलायमान पणं यशो नहीं, अने थशो तो हुं म्होरी पीठ परथी नीचे नाखी दइश । आ वातने ते
नवाजी-
भीवाता-
धर्मकथाङ्गे
द्वितीय-
विभागे
माकन्दी
अध्ययन
सारांश
॥२॥
बनेए कबूल करी, एटले अश्वरूप विकुर्वीने ते यक्षे पोतानी पीठ उपर वेसाड्या अने आकाशमार्गे समुद्र पर थइ चाल्यो. हवे ते
रत्नद्वीप देवता पोतानुं कार्य संपूर्ण करी ज्या पोताना प्रासादमा आवी त्यां तेओने देख्या नहीं, अने आजुबाजु तपासतां पण तेमने
देख्या नहीं, एटले अवधिज्ञानथी उपयोग मूकता दरीया पर थइने शैलक यक्षनी साथे जता ते वन्नेने जोया, अने तलवार हाथमां
लइ तेमनी पासे आवी.
कंइक कोमळ हृदयवाळा जिनरक्षितने जाणी अनेक प्रकारना अनुकूल उपसर्गो करवा लागी अने ज्यां जिनरक्षितनुं मन
चलायमान थयु एटले शैलकयक्षे तेने फेंकी दीधो. ते देवीए अनेक प्रकारे तिरस्कार करी तलवार वडे तेना टूकडे टूकडा करी
नांख्या, अने चारे दिशाओने बळिदान अर्पण कयु.
अत्र योजना-
एवी रीते हे श्रमणो । जे हमारी पासे संयम ग्रहण करी पाछा मनुष्य सम्बन्धि भोगोमा आस्वाद करे छे यावत् तेनी अभिलाषा
करे छे, ते आ भवमा घणा एवा साधु, साध्वी, श्रावक अने श्राविकाओने निंदवा लायक थाय छे; यावत् घणो संसार रखडे छे.
रत्नद्वीप देवता नामनी देवीए तेवार पछी जिनपालितने अनुकूल-प्रतिकूल घणा उपसर्गो करवा मांड्या, पण सर्व उपसर्गो
सहन करी जिनपालिते निष्फल कर्या, तेना परिणाममुं नहिं चलितपणुं थवाथी थाकीने ते देवी चाली गइ. शैलकयक्षे निर्विन्ने
जिनपालितने चंपाना उद्यानमा लावी पोतानी पीठ परथी उतार्यो अने जिनपालितनी रजा लइ पोताना स्थाने चाल्यो गयो.
जिनपालित पोताना घेर आन्यो अने मातापिताने मली जिनरक्षितना मरणनी वात करी, सर्वे कुटुम्बे लौकिक कार्यो करी शोक
॥२॥
दूर फों. एक समये मातापिताए जिनपालितने पूछयु के जिनरक्षितनुं मरण केवी रीते थयु !, त्यारे ते जिनपालिते ठेठ सुधीनी वार्ता करी. एक समये प्रभु श्रमण भगवान महावीर त्यां पधार्या-समवसर्या तेमनी पासे जिनपालिते धर्म श्रवण करी संयमने ग्रहण कर्यु अने अगीयार अंग मण्यो; यावत् महीनानु अनशन करी काळधर्म पामी सौधर्म देवलोकमां वे सागरोपमना आयुष्यवाळो देव थयो. हे जम्बू ! त्यांची ते च्यवी महाविदेहक्षेत्रविषे मोक्ष पामशे. योजना:-एवी रीते जे साधुओ मनुष्य सम्बन्धी भोगोनो त्याग करी तेनी वांच्छा आदि करता नथी ते जिनपालितनी माफक आ भवमां पण सुखी थाय छे, अने परभवमा मोक्षनां अनुपम सुखोने भोगवे छे. इति नवम-अध्ययन सारांशः समाप्तः १० श्री चन्द्रज्ञाताध्ययनसारांशः पूर्वना अध्ययनमा अविरतिने वश थनारने थतो अनर्थ, अने वश न थनारने थतो लाम वर्णव्यो, आ दशमा अध्ययनमां प्रमादीने थती गुणनी हानी अने अप्रमादीने थती गुणनी वृद्धि वर्णवाय छे. ए प्रमाणे निधये करीने हे जम्बू ! श्रमण भगवान् महावीर राजगृही नगरीमा समवसर्या हता, त्यारे श्री गौतमत्वामिए तेओश्रीने पूछयु के-हे भगवन् ! जीवो गुणनी हानि केवी रीते पामे छे, अने गुणनी वृद्धि केवी रीते पामे छे !, आवा प्रकारना प्रश्नना जवाबमां प्रभु कहे छे को- नवाजी ०१० भीमाता- धर्मकपात हे गौतम ! पूर्णिमाना चन्द्रने छोडीने वदी पक्षनो पडवानो चन्द्र वर्ण-सौम्यता-तेज-कान्ति-द्युति-छाया-यावत् मंडले करी हीण थाय छे; तेम वदी पक्षना बीजनो चन्द्र तेथी करी पण वर्णादिंए करी हीणादि थाय छे; यावत् अमावास्यांनो चन्द्र संपूर्ण हीण द्वितीय- विमाग याय छे. चन्द्रअ सारांश तेवी रीते जे साधुओ अथवा साध्वीओ संयम ग्रहण कर्या छतां क्षमा-मुक्ति-गुप्ति-आर्जव-मार्जव वगेरे सयमना गुणोथी हीण थाय छे, तेओ वदी पक्षना पडवाना चन्द्रथी मांडी यावत् अमावास्याना चन्द्रनी जेम सर्व गुणोथी हीण थाय छे. हे गौतम ! जेवी रीते.अमावास्याना चन्द्रने छोडीने शुक्ल पक्षना पडवानो चन्द्र-वर्णादिए करी अधिक थाय छे, यावत् पूर्णि- माए सर्वस्वरूपे संपूर्ण थाय छे; तेवी रीते जे साधु अथवा साध्वी संयम ग्रहण करी पोताना शान्ति आदि गुणोनी वृद्धि करे छे ते अनुक्रमे पूर्णिमाना चन्द्रनी जेम संपूर्ण गुणोने पामे छे. अत्र निगमन-योजना टीकाकारे जणावी छे, ते नीचे प्रमाणे:- चंदोषकालपक्से परिहाई पएं पए पमायपरो । तह उम्परविग्घरनिरगणो वि न य इच्छिये लहई ॥ १॥ भावार्थ:-कृष्ण पक्ष विपे जेम चन्द्र हाणी पामे छे, तेवी रीते आरंभ परिग्रहमा अनासक्त एवो पण साधु प्रमादमा तत्पर होय तो हाणी पामे छे, अने इच्छितने पामी शक्तो नथी. जह चंदो तहे साह राहुवरोहो जहा तह पमाओं। वण्णाई गुणगणो जह तहा खेमाईसमणधम्मो ॥२॥ भावार्थ:-जेवी रीते राहुयी प्रसायेलो चन्द्रमा तेज रहित थाय छे, तेवी रीते सोधु प्रमादयी साधु गुण रहित थाय छे. जेवी रीते चन्द्रमानो वर्णादि गुणनो समूह घटे छे, तेवी रीते ते साधुना क्षमादि दश प्रकारना धार्मिक गुणो घटे छे. पुण्णोवि पइदिणं जह हायंतो सबहा ससी नस्से । तह पुण्णचरित्तावि हु कुसीलसंमग्गिमाईहिं ॥३॥ भावार्थ-पूर्ण एवो पण चन्द्रमा वद पक्षमा दिने दिने घटतो सर्वथा नष्ट थाय छे, तेवी रीते पूर्ण एवा चारित्रवाळो पण कुशीलोनी सोबतथी सर्वथा नष्ट-चारित्रवान् थाय छे. जणियपमाओ साहू हायंतो पदिणं खमाईहिं । जायह नवचरित्तो ततो दुक्खाई पावेह ॥ ४ ॥ भावार्थ-उत्पन्न थयो छे प्रमाद जेने एवो साधु क्षमादि गुणोथी हमेशा हीण थतो नष्ट-चारित्री थाय छे, अने दुःखोने पामे छे. हीणगुणावि हु होऊ सुहगुरुजोगाइजणियसंवेगो । पुण्णसरूवो जायइ विवड्डमाणों मसहरोव ॥ ५॥ भावार्थ-हीण गुणवाळो पण उत्तम गुरुमहाराजथी उत्पन्न थयेलो छे संवेग जेने ते वधता एवा चन्द्रनी जेम पूर्ण स्वरूप- वाळो थाय छे. इति दशमाध्ययनस्य सारांश समाप्त ११-श्रीदाबद्रव-अध्ययन-सारांशः आनी पूर्वना अध्ययनमा प्रमादिने गुणहानि, अने अप्रमादिने गुणनी वृद्धि जणावी छे; आ अध्ययनमा मार्गनी आराधना, अने मार्गनी विराधनाथी गुणनी हानि-वृद्धि कहे छे. जे जम्बू ! ते काल अने समय राजगृही नगरी विषे गौतमस्वामिए प्रश्न कर्यो के-हे प्रमु ! जीवो आराधको अने विराधको केवी रीते थाय' छे !,- 7:46
नवाली-
०५०
भीहाता.
धर्मकथा)
द्वितीय-
विभागे-
दावद्रव
सारांश:
॥४॥
हे गौतम ! (१) जेवी रीते समुद्रना एक कांठे दावद्रव नामनां वृक्षो थाय छे, ते वृक्षो पत्र-पुष्पो-फलो आदिथी अत्यन्त शोमे
छे. ज्यारे द्वीप सम्बन्धीना जुदी जुदी दिशाओथी हलवा अने महावायरा वाय छे, त्यारे घणा एवा ते वृक्षो फलादिथी सुशोभित
थाय छे, अने तेमांना केटलाक वृक्षो सुकाइने म्लान पामे छे; तेवी रीते जे साधु अथवा साध्वी प्रवज्या अंगीकार कर्ये छते घणा
एवा स्वशासनना साधु-साध्वीथी सहन करे छे. अने अन्यतिर्थीमोथी तेम गृहस्थोथी सहन करवाना अवसरे सहन नथी करता ते
साधु-साध्वी देशविराधक थाय छे. (२) जेवी रीते समुद्रना एक कांठे दावद्रव नामना वृक्षो थाय छे ते पत्रादिथी अतिशय शोमे
छे परन्तु ज्यारे वायराथी घणा एवा जूना सुकाइ गयेला वृक्षो म्लान पामे छे, अने केटलाक वृक्षो शोभाने पामे छे तेवी रीते जे
साधु अथवा साध्वी प्रवज्या अंगीकार कर्ये छते अन्यति ओथी तेम गृहस्थोथी सम्यक् प्रकारे सहन करे छे, किन्तु-साधु-साध्वीथी
सहन कर्ता नथी ते देशआराधक थाय छे. (३) जेवी रीते समुद्रना किनारे सर्व दावद्रव नामना वृक्षो पत्रादि वडे शोमे छे परन्तु
वायरो वाये सर्वे म्लान पामे छे, तेवी रीते जे साधु अथवा साध्वी, साधु-साध्वीओथी तेम अन्यतिर्थीओ आदिथी सहन करतो
नथी ते सर्व विराधक थाय छे. (४) जेवी रीते समुद्रना किनारे सर्व दावद्रव वृक्षो पत्रादिवडे शोभे छे, अने ज्यारे वायरा वाय छे
त्यारे पण शोमे छे परन्तु म्लानी पामता नथी तेवी रीते जे साधु अथवा साध्वी प्रवज्या अंगीकार कयें छते साधु-साध्वीथी तेम
श्रावक श्राविका अने अन्यति ओथी थता परिपहो सहन करे छे ते सर्वआराधक थाय छे.
इति एकादश-अध्ययन-सारांश समाप्तः
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।
॥ ४॥
१२-श्रीउदक-अध्ययन-सारांशः। पूर्वे अगीयारमा अध्ययन विषे चारित्र धर्मनुं विराधकपणुं अने आराधकपणुं कडं, अहीं स्वभावे करीने मलीन एवा भव्य- आत्माओनुं सद्गुरुना संस्कारथी चारित्रनुं आराधकपणुं थाय छे ते उदकना द्रष्टांतथी कहे छे. • हे जम्बू ! ते काले अने ते समये चंपानगरीना पूर्णभद्र चैत्य विषे श्रीवीरप्रमु समवसर्या, ते नगरी विषे जितशत्रु नामनो राजा राज्य करे छे, अने तेने धारिणी नामनी राणी तथा अदीनशत्रू नामनो युवराज हतो; तथा श्रमणोपासक-सुबुद्धि नामनो मुख्य प्रधान हतो. ते नगरीनी वहार इशान दिशाए एक खाळ छे ते घणी गन्धाती छे, ते जोइने गौतमस्वामीर प्रमुने प्रश्न कर्यो के- हे प्रभु ! आ आज रूपे रहे ! प्रभुए कह्यु के-ए अर्थमा समर्थता नथी, एथी अतिअनिष्टगन्धवाळी पण थाय, अने सुरमि. गन्धवाळी पण थाय. एक समये जितशत्रू राजा घणा एवा क्षत्रियो-शेठीआओ साथे सुंदर एवं भोजन कर्या पछी ते भोजनथी आश्चर्य पामेला राजाए ते भोजनना घणा वखाण कर्या, अने घणा वीजाओए पण वखाण कर्या; त्यारे सुबुद्धि मंत्रीने मौन रहेलो जोइने वे त्रणवार राजाए पूठ्युं. ते समये सुबुद्धि मन्त्रीए कह्यु के-हे राजन् ! सारा लागता शहना पुद्गलो खराबपणे परिणमे छे, अने खराव लागता शब्दना पुद्गलो सारापणे परिणमे छे; सारा लागता रूपवाळा पुद्गलो खराव रूपपणे परिणमे छे, तेम खराव लागता रूपवाळा पुद्गलो सारापणे परिणमे छे, तेम सुगंधीदार पुद्गलो दुर्गन्धी पुद्गलपणे परिणमे छ, अने दुर्गन्धवाळा पुद्गलो सुगंधवाळा पुद्गलोपणे परिणमे छे; तेवी रीते रस अने स्पर्शना पुद्गलोमा पण थाय छे. आथी Rar नवाङ्गी- १०पू० भीमाता- धर्मकथाओं द्वितीय- विमागे उदका- ध्य० सारांश आ आहारोमा आश्चर्य शु पामवानु छ । अर्थात् आथी मने आश्चर्य थतुं नथी. सुबुद्धि मत्रीनी आवी वाणीने राजाए मौन रहीने स्वीकारी नहीं. एक समये जितशत्रू राजा घणा परिवार साथै घोडा उपर बेसी फरवा निकळ्यो, नगरनी ( खाळ ) खाइ आवता तेनी दुर्गन्धथी राजाए पोतानु नार्क कपडाना छेडाथी ढाकी दीधु, अने बीजी बाजु फरी गया. साधे बधाये कहेवा लाग्या के- मरेरा सर्प करतो पण वधु खराब गन्ध आनी छे, तेवी रीते तेनु रूप, स्पर्श अने रस पण निंदनीय छे आ समये पण मौन रहेला सुबुद्धि मन्त्रीने राजाए पूछयु त्यारे तेणे पहेलानी जेमंज जवाब आप्यो. आ वखते राजाए सुबुद्धि मत्रीने कयु के-हे सुबुद्धि ! आवी जुट्ठी मिथ्याभिनिवेश वातो न कर ! सुबुद्धि मन्त्रीने विचार थयो के अहो ! आ जितशत्रू राजा-सत्य तथ्य-अवितथ-सद्भूत एवा जिनेश्वरे मरूपेल मावोने जाणतो नथी, माटे ते भावो जणाववा काइक उपाय करु !'! आ प्रमाणे इच्छीने विश्वासु माणसो द्वारा कुमारनी दुकानेथी नवा घडा मगाव्या अने संध्याकाळे मनुष्यनी अवरजवर बध थये ते खाइ( खाळ )माथी पाणी मगाव्यु, अने गळावी ते घडाओमा मयु. सात रात्रि सुधी तेने झरवा दीधु अने भस्म-रक्षा विगेरे चूर्ण नाखी फरी पण ते रीतिए नवा घडाओमा भर्यु, एम वारवार सात वखत करता ते पाणी स्वच्छ-स्फटिकरल जेवु मनोहर अने स्वादिष्ट थयु. आ पाणीने मन्त्रीए चाखी जोइ खात्री करी, अने पाणीने सुगधी करवावाळा द्रव्योथी ते पाणीने सुगधीवालु कयु. जितशत्रू राजाना जलरक्षकने बोलावी भलामण करी के आ पाणी तु भोजनवेळाए राजाने आपजे | जितशत्रू राजाए भोजनवेळाए आ पाणी पी ते पाणीना घणा वखाण कयां, अने आ पाणी क्या स्थानथी लावामां आव्यु छे, तेनी तपास करता जलरक्षके सुबुद्धिमन्त्रीए आ पाणी आप्यानु जाहेर कर्यु. राजाए सुबुद्धिमन्त्रीने बोलाव्यो अने कबु के-हे मन्त्रीश्वर ! हु तमनें क्या कारणे अनिष्ट थयो छु के-तमे हमेशा मोजनवेळाए आ उदफरलने उपस्थित करता नथी ' पाणी तमे क्याथी प्राप्त कयु : आ प्रश्नना जवाबमा मत्रीए सर्व बीना कही. त्यारे ते वात पर विश्वास नहीं लावता राजाए पोताना अभ्यन्तर पुरुषने बोलावी मत्रीना कह्या प्रमाणे पाणी लावी कह्या प्रमाणे करवा सूचव्यु. ते प्रमाणे तेणे तैयार करेला पाणीनो आस्वाद राजाए करी मन्त्रीना वचन उपर श्रद्धा करी, अने मन्त्रीने बोलावीने आ तमे क्यार्थी शीख्या , जाण्यु ! तेवू पूछयु. सुबुद्धि मन्त्रीए जिनवचनथी वस्तुना स्वभावो में जाण्या छे तेवु जणाव्यु. जीतशत्रू राजाए जिनवचनो सामळवानी इच्छा दर्शावाथी सुबुद्धि मन्त्रीए चार प्रकारनो धर्म जिनकथित करो, तेम महावतो-अणुव्रतो पण जणाव्या. जितशत्रू राजाए जिनधर्म प्रत्ये श्रद्धा प्राप्त थवाथी मन्त्री पासे पाच अणुव्रतो अने वार प्रकारनो श्रावकधर्म स्वीकार्यो. एक समये पंधारेला स्थविर मुनि महात्मा पासे धर्म श्रवण करी सुबुद्धि मन्त्रीने संयम ग्रहण करवानी इच्छा थइ, अने ते हकीकत राजाने जणावी. बन्नेए साथै दीक्षा लेवानुं नक्की करीने ते पंछी ते राजाएं राज्यसुखो बार वर्ष सुधी भोगवीने अदीनकुमारने राज्याभिषेक करी मोटा महोत्सवपूर्वक राजोए मन्त्री साथे संयमने ग्रहण कयें यावत् अगीआर अग भण्या-घणा वर्षों संयम पाळी एफ मासनी संलेखना करी बन्नेए सिद्धपद प्राप्त कर्युअर्थात्-मोक्षे गया. उपसंहार-मिथ्यात्वथी मोहित मनवाला पापकार्योमा आसक्त अने गुण रहित एवाओ पणं उत्तम गुरूमहाराजना प्रसादथी- संसर्गी दुर्गधवाळी आ खालना पाणीनी जेम गुणवानो थाय छे. इति द्वादश-उदकाध्ययन सारांशः वारमा भीडाता- धर्मकपा द्वितीय विमागे श्रीदर्दुरा- ध्यक सारांश १३-श्रीदर्दुर-अध्ययन सारांशः। पूर्वे कहेला अध्ययनमा-संसर्गविशेषथी गुणनो उत्कर्ष थाय छे ते कडुं. आ तेरमा अध्ययनमा संसर्गविशेषना अभावथी छता गुणोनुं ओछं थर्बु जणावे छे. हे जग्वू ! ते काल अने समये राजनही नगरीमा गुणशैलचैत्यविषे प्रभु महावीर समवसर्या हता, त्यारे सौधर्मकल्प नामना देवलोक विपे दर्दुरावतंसक नामना विमानमा सुधर्मा नामनी सभा विषे दर्दुर नामना सिंहासनपर दर्दुर नामनो देव हतो. ते सूर्याम- देवनी जेम लीला करतो हतो ( अत्र वर्णन रायपसेणीयमा जोQ ), तेने विपुल एवा अवधिज्ञानवडे प्रमुने जोइ समवसरणमां आवी सूर्यामदेवनी जेम नाट्यविधि देखाडीने ते देव चाल्यो गयो. आ समये गौतमस्वामिए वंदन-नमस्कार करी प्रभुने पूज्यु के-हे प्रमु! आ मोटी ऋद्धिवाळा दर्दुर देवनी विर्कुवेली दिव्यसमृद्धि क्या गइ ! भने क्या समाइ गइ ! प्रमुए श्री गौतमस्वामिना प्रश्नना उत्तरमा जणान्यु के हे गौतम ! ते दिव्य समृद्धि तेना शरीरमा गइ अने तेना शरीरमा समाणी, ते शिखरना आकारवाळा घरना दृष्टांतथी जाणवू. पुन. गौतमस्वामिए प्रमुने पूछ्यु के-हे प्रमु! दर्दुर नामना ते देवे आवी देवऋद्धि शी रीते प्राप्त करी अर्थात् श्याथी मली ! दर्दुरदेवना पूर्वमवर्नु करेलु वर्णन. हे गौतम ! आ जंबूद्वीप नामना द्वीप विपे मरतक्षेत्रमा राजगृहीनगरी विष नंद नामनो मणिआर श्रेष्ठी वसतो हतो. ते काल अने ते समये हे गौतम ! हुं समवसर्यो हतो, ते अवसरे श्रेणिक राजा वगेरे जनो पर्पदामा देशना श्रवण करवा भाव्या. आ वात नंदमणिआरे सांमळी अने तेने पण देशना श्रवण करी सम्यक्त्वसहित जिनधर्मनो स्वीकार कर्यो. हमे बीजे विहार करी गया पछी साधुना नहीं देखवाथी सेवा रहित अने शिखामणना अभावे तथा श्रवण इच्छानो अभाव थतां सम्यग्मार्गथी खसवा लाग्यो भने मिथ्यामार्गमां वधवा लाग्यो. एक वखत उनाळामा अठुमना पच्चक्खाण करी पौपधशालामा रह्यो हतो, त्यां तरस अने भूखथी पराभव पाम्यो छतो चिन्तवन करवा लाग्यो के ते शेठीआओने पन्य छे के जेओए क्या-वावडी-पुक्खरणी अने तलावो-सरोवरो फराव्या छे, अने तेमां लोको स्नान करे छे, पाणी पीए छे, हुं पण श्रेणिकमहाराजानी पासे जइ अभयकुमारनी रजा लइ पुक्खरणी करावी कल्याण करु, सवारमा पौषध पारी मोटुं भेटणुं लइ श्रेणिक राजा पासे गयो अने भेटणुं करीने पुरखरणी कराववानी आज्ञा मागी. श्रेणिक महाराजाए तेने आज्ञा आपी एटले तेणे पोक्खरणीने योग्य जगा जोइने ते खोदावी, ( चारे खूणा सरखावाळी विशाळ चावडीने पुक्खरणी कहे छे) ते पुक्खरणी शुद्ध मिटजल अने कंमळोथी शोभवा लागी. ते वावडीनी चारे दिशामां वनखंड कर्या, तेमां (१) पूर्व दिशाना वनखंडमां एक मोटी चित्रसमा करावी, अने लोकने वेसवा योग्य तेमां आसनो कराव्यां. (२) दक्षिणदिशाना वनखंडमां अनेक थांभलाथी शोमती महानशशाला-रसोडा सहितनी दानशाला करावी, ते दानशालाने अनेक श्रमण-माहणो- अतिथिओ वगेरे सेवे छे. अर्थात् त्या आहारथी तृप्ति मेळवे छे. (३) पश्चिमदिशाना वनखंडमां अनेक स्तम्भोथी शोभित तेगिच्छियशाला-मोटुं वैद्योनुं औषधालय-अर्थात् दवाखानु कराव्यु, तेमां घणा वैद्योनो दरदीओ लाभ ले छे. (४) उत्तरदिशाना वनखण्डमां-अलंकारसभा-हजामो विगेरेनी जोगवाई करावी छे, तेमां श्रमादि दूर करवा विगेरेनो लाम लोको ले छ; अर्थात् राजगृहीनी जनता अने परदेशनी जनता तेनो उपभोग करी आनन्द माने छे, अने नंदमणीआरनां वखाण करे छे नंदमणीआर पोतानां वखाण सांभली पोताना आ कार्यने पुण्यकार्य मानवानो संतोष ले छे.
नवाडी- वृ०० भीज्ञाता. धर्मकथाओं द्वितीय- विमागे श्रीदर्दुरा- ध्ययन- सारांश ॥७॥ एक समय ते नंदमणीयारश्रेष्ठिने शरीरमां सोल रोगो एक सामटा प्रगट थया, अनेक दवाओ करावी घणा उपायो कराव्या, पण एके रोगर्नु शमन थयु नहिं; अने आरौद्रध्यान वश थयो थको नंदा पोक्खरणी पर मूर्छा करतो मरीने तेज वावडीमां देडकीना पेटे देडकापणे उत्पन्न थयो. जन्म पाम्या पछी यावत् मोटो थयो, ते पोक्खरणीनां अने नंदमणीयारनां वखाण त्यां आवेला जलार्थीओ करे छे, ते सांमली उहापोह करतां ते देडकाने जातिस्मरणज्ञान प्राप्त थयु आथी पोतानो पूर्वभव याद आव्यो, अने पोतान जैन धर्मर्नु पालचं, तेम संसर्गना अभावथी मिथ्यात्वीओना परिणामो थवा, तेम ते पापयुक्त परिणामथी देडका वरीके जन्मवृं, विचारी घणो पश्चाताप कयों, अने पूर्व स्वीकारेलां पांच अणुव्रतो अने सात शिक्षावतो स्वीकारी अभिग्रह कर्यो के, ज्यांसुघी जीवं त्यांसुधी छठ्ठना पञ्चक्खाणमा रहेQ अने पारणे फासु जल पीवं, अने मनुष्योए उतारेला मेलवडे आजीविका निमाववी, आ रीते (देडकना भवमां) जीवन चलाववा लाग्यो. ते काल अने ते समये हे गौतम ! हुं राजगृही नगरीना गुणशैलचैत्य विपे समोसर्यो, पर्पदा थई. आ वार्तालाप ते वावडी पर वेठेला लोको अन्योअन्य करवा लाग्या. आ वार्तालापने ते देडकाए सांभल्यो, आथी अहिं आववा ते वावडीथी बहार निकली उतावलो उतावलो आवी रह्यो हतो; तेवामां श्रेणिक राजा चतुरंगी सेना सहित म्हारी पासे आवतो हतो, तेमां तेमना घोडाना पग नीचे ते आवी गयो, आथी निर्वल बनेलो ते देडको एक वाजु खसी जई कायाने वोसरावी, आराधना करतो शुम ध्याने काल करी सौधर्म नामना देवलोकविपे दर्दुर नामना विमानमां दर्दुर नामनो देव थयो. देव थयेला तेने अवधिज्ञानथी उपयोग मूकी अहिं आवी ऋद्धि विकुर्वी हती, त्यांथी ते च्यवीने महाविदेह क्षेत्रमा मोक्षने पामशे. बनवजाना C- उपसंहार-नंदमणियारनी जेम संपूर्ण गुणवालो पण आत्मा उत्तम गुरु महाराजना संसर्गथी रहित थाय तो प्राये गुणनी हानि पामे छे माटे उत्तम गुरुना संसर्गमां सर्वदा रहेवू. इति १३-श्रीदर्दुर-अध्ययनस्य सारांशः समाप्तः ॥ ->sti १४-श्रीतेतलिपुत्र-अध्ययन-सारांशः। तेरमा अध्ययनमा सामग्रीना अमाचे छता गुणोनी हानि जणावी, आ चौदमा अध्ययनमा तथा प्रकारनी सारी सामग्रीनो योग थाय तो गुणोनी वृद्धि थाय छे ते जणावशे. हे जम्वू 1 ते काल अने ते समये तेयलिपुर नामर्नु नगर हतुं, त्यां प्रमद नामनुं उद्यान हतुं, त्यां कनकरथ नामनो राजा राज्य करतो हतो, तेने पद्मावती नामनी राणी हती अने तेतलिपुत्र नामनो प्रधान हतो, अने त्यां मूपिकादारक नामनो सोनी हतो. ते सोनीने भद्रा नामनी स्त्री हती अने पोट्टिला नामनी पुत्री हती. एक समये तेतलिपुत्र आमात्य केटलाक परिवार साथे फरवा निकळ्यो हतो, तेने एक मकानमां सोनाना दडाए रमती पोट्टिलाने जोई, तेना उपर आसक्ति थई. आयी स्थाने आवी तपास करी तो ते महेल जेवं मकान सोनी- हतुं, अने ते वालिका सोनीनी छे तेम जाण्यु. अमात्ये पोताना विश्वासु माणसो द्वाराए मुपिकादारक सोनीने फहान्यु के तारी पुत्री पोट्टिला साथे आमात्यने परणवा इच्छा छे. आवनार माणसोने सोनीए कह्यु के मारी पुत्रीने तेओ वरे वो तमारो उपकार मानीश. एम कही तेओनो सत्कार कर्यो, धणी धामधूमपूर्वक तेतलिपुत्र आमात्य ते पोट्टिला साथे परण्यो, अने तेनी
नवागी
१०१०
भीमावा.
धर्मकथा)
द्वितीय-
विमागे-
श्रीतेतलि.
सारांशः।
॥८॥
साथे आनन्दपूर्वक दिवसो गमन करे छे.
कनकरथा राजा राज्यपर-राष्ट्रपर-मंडारपर अने। अन्तेपुरी।उपर खुब आसक्तिवाळो थयो तेथी जे कोई : पोताने त्यां पुत्रादि थाय
छे तेना कोइनी हाथनी आंगळीओ, तो कोइनो अंगुठो, तो कोइनी: पगनी आंगळीओ, तो.कोइनो पगनो अंगुठो; तो कोइर्नु नाक,
तो कोदना कान; एम अंगोपांग छेदावे छ, अनोखराव अंग वाळा-खोडवाला करी दे छे एटले राज्यभोगववा, माटे अयोग्य
करी दे ,, तेनी पद्मावती' राणीए एक वखत प्रधान वेतलिने बोलान्यो अने राज्यने। योग्य एक पुत्र रहे. माटे. तमे, आ वखते, गुप्त
राखी उछेरवानुं कवुल करो तो आ वखते जे पुत्रा जन्मे ते तमने गुप्त रीते आपी दउ, प्रधान आ वात कबुल करी. समय प्राय थये
छते पद्मावती राणीए पुत्ररत्लने जन्म आप्यो, पुत्रना जन्मतानी: साथे वेतलिपुत्र आमात्यने गुप्ता रीते। बोलावी अर्पण कयों. दैवयोगे
ते समये आमात्यपली पोट्टिलाने मरेली पुत्री जन्मी ते पुत्री राणीने गुप्त रीते अर्पण करी, राजाए मरेली पुत्रीनी मरणक्रिया तमाम
करावी, पोहिलाए ते वालफने मोटो को अने कुटुम्बिजनो समक्ष कनकध्वज नाम: पाडयुं।
पोशिलानी दीक्षा-
केटलोक समय गया पछी पोहिला लेतलिपुत्र आमात्यने अनिष्ट थई, आथी उद्वेग पामेली पोटिला पणा एवा श्रमण-माहण-
भिक्षुकोने दान आपती-अपावती जीवन निमावी रही छे. एक समये घणा परिवार साथे मुख्य, सुव्रता नामनी साध्वी ते नगरमां
आवी छे, तेमांथी वे साध्वीओ तेतलिपुत्र प्रधानना महेले भिक्षा-गोचरी अर्थे पधारतां पोट्टिलाए उमा थइ सन्मान कर्यु, अने
आहारादि वहोरावी कहेवा लागी के हे पूज्य साध्वी महाराज ! हुं पहेला प्रधानने। इष्टा हती, हमणां अनिष्ट थह छु, तो तमो चूर्ण-
॥८॥
.. मन्त्र-तन्त्र-वशीकरण वगेरेमाथी कंइक आपो, जेथी' हुं तेमने इष्ट थकं ! आना जवावमा साध्वीजीए.जणाव्युं के हमे। ब्रह्मचारिणीओ छीए ! हमोने आवी वातो श्रवण करवी पण कल्पती नथी. आम कही। जिनधर्म तेने जणाल्यो-उपदेश्यो, पोटिलाने जिनधर्मप्रत्ये श्रद्धा थह अने तेमनी पासेथी पञ्चअणुव्रतो आदि गृहस्थधर्म स्वीकार्यो यावत् ते श्राविका थइ. एक वखत मध्यरात्रिए पोटिलाने संयम लेवाना परिणाम यया, आथी पोताना पति तेतलिपुत्रने • पोताना संयमनो भाव कहो. तेतलिपुत्र प्रधाने तुं देवलोकमां जा, त्यारे त्हारे मने प्रतिबोध करवो. आवी कबूलात तुं आपे तो हुँ तने रजा आपुं, पोट्टिलाए आना जवाबमां स्वपतिनी आ मांगणीनो स्वीकार कर्यो तेतलिपुत्र प्रघाने आडम्बरपूर्वक सुत्रता साध्वीजी पासे दीक्षा अपावी. सुव्रता पासे पोट्टिला अगीआर अंग भणी, घणा वर्ष संयम पाळी, महीनानुं अनशन करी; आलोचन प्रतिक्रमण करी, समाधिपूर्वक आराधना फरी अने काल करी देवलोकमां देवी थइ. कनकबजनो राज्याभिषेक अने तेतलिप्रधानने प्रतियोध-- कनकरथ राजा मरण पाम्या त्यारे तेओनी मरणक्रिया कर्या पछी-अन्योअन्य विचारवा लाग्या के अंगोए, करी हीण राजाना पुत्रो छे माटे राज्यसिंहासन पर फोने बेसाडवो ! छेवटे तेतलिपुत्र मन्त्रीने पुछ्युं त्यारे मन्त्रीए पद्मावती राणीना एक कनकध्वज नामना पुग्ने पोते गुप्तरीते केवी रीते मोटो कर्यो विगेरेनुं आमूल वर्णन कर्यु, अने सर्व रीते योग्य एवा ते कनकध्वजकुमारनो राज्याभिषेक सर्वेए मली कर्यो. पद्मावती माताए पुत्रने तेतलिपुत्र मन्त्रीना उपफारो जणावी सर्वेः भलामणो करी. कनकध्वजराजा तेतलिमन्त्रीन सर्व रीते विशेपे करी सन्मान करे छे.
नवाणी
द्वितीय-
विमागे
भीज्ञाता-
धर्मकथा)
तेतलि.
५ पोट्टिलादे०
आगमनमा
पोहिलादेवी तेतलिने वारंवार जैनधर्मनो बोध करे छे, परन्तु तेतलिने प्रतिबोध थतो नथी. आधी देवीने विचार थयो के ज्यांसुधी
नृपतिनो आदर छे त्यांसुधी पारंवार मारो फरातो प्रतिबोध फलीभूत थतो नथी, माटे अनादर प्राप्त थाय तेम करुं तेवो विचार करी
अनादर उत्पन्न कर्यो.
प्यारवाद तेतलिमन्त्री ज्यां राजसभामा गयो त्यां तो राजाए ते महामन्त्री तेतलिंने जोइने पोते पराङ्मुख कयु, अने मौन रही
मन्त्रीनो अनादर फर्यो. आधी तेतलिपुत्र महामन्त्रीने विचार थयो के अप्रीतिवाळो आ राजा मने मारी नंखावशे माटे चाल्या जर्बु
श्रेय छ, आम धारी मन्त्री घोडा उपर वेसी घर तरफ चाल्यो. मार्गमा आवता शेठी वगेरे उभा थइने जे मान आपq
जोइए ते आपता नथी, तेम हाथ पण जोडता नथी. परे पण बाह्यपर्पदाना माणसो पण आदर आपता नथी; तेम नोकर-चाकरो
अनादर करे छ. पिता-माता वगेरे पण आदर कर्ता नथी. आ प्रकारना असह्य अनादरथी आपघात करवा माटे मुखमां तालपुट.
विष नाख्युं पण ते परिणम्युं नहि, तलवारथी पोतानी खांधे घा को तो तलवार ज वुठ्ठी थइ गइ, गले फांसो खाध्यो तो
दोरडु-रसी ज त्रूटी गइ. आम मरवा माटे घणा उपायो कर्या पण तेना सर्वे उपायो निष्फल गया त्यारे जिनधर्म प्रत्ये श्रद्धा
लावया लाग्यो. पोट्टिलादेवी तेतलिपुत्रमहामन्त्रीने जिनधर्म प्रत्ये स्थिर करी हितशिक्षा आपी स्वस्थाने चाली गइ.
तेतलिपुत्रने शुम अध्यवसायथी जातिस्मरणज्ञान उत्पन्न थयु. आथी पोताना पूर्वभवो जोया तेमांजोयु के हुं महाविदेहक्षेत्रमा पोक्खला-
वतीविजयविपे पुंडरीगिणी राजधानीमां महापद्म नामनो राजा हतो. त्यां स्थविरमुनिओ पासेथी धर्म श्रवण करी दीक्षा में लीधी हती.
चौदपूर्वी थयो हतो. घणा वर्षो संयम पाली मासनी संलेखनापूर्वक काल करी महाशुक्र नामना देवलोकमां देव थयो हतो. त्यांथी
॥९॥
च्यवीने हुं आ तेतलि प्रधानने त्यां पुत्रपणे जन्म्यो छु. अपूर्व वैराग्यथी स्वयमेव पञ्चमहावतो उच्चरी संयमग्रहण कयुं यावत् पूर्वे अभ्यास करेला चौदे पूर्वोतुं ज्ञान पण स्वाभाविक ज थयु. शुभ परिणामनी वधती धाराए केवलज्ञान पाम्या. आकाशमा देवदुन्दमिओ वागवा लागी पंच वर्णना पुप्पोनी वृष्टि थइ, कनकध्वज राजा आ श्रवण करी त्यां आव्यो भने तेमनो उपदेश श्रवण करी श्रावक थयो तेम पांच अणुव्रतो, सात शिक्षावतीने ग्रहण कर्या. तेतलिपुत्र केवलिपणामां घणा वर्ष केवलिपर्याय पाली यावत् मोक्षे सिघाव्या. उपनय-ज्यांसुधी जीवो अति दुःखने के मानदंशने प्राप्त करता नथी त्यांसुघी तेतलिपुत्रनी जेम प्राये भावी धर्मग्रहण करता नथी. इति चतुर्दश-अध्ययन-सारांशः समाप्तः ॥ ॥१५-श्रीनन्दीफल-अध्ययनसारांशः॥ चौदमा अध्ययनमा अपमानथी विषयोनो त्याग प्रतिपादन कर्यो, आ पंदरमा अध्ययनमा जिनेश्वर प्रमुना उपदेशथी विषयोनो त्याग प्रतिपादन कराशे, एटले सर्वज्ञकथित उपदेश प्रमाणे वर्षे तो अर्थनी प्राप्ति थाय अने न वर्षे तो अनर्थनी प्राप्ति थाय ते अन फहेवाशे. हे जम्बू ! ते काल अने ते समये चंपा नामनी नगरी हती, त्यां पूर्णभद्रयक्षतुं चैत्य छे. अन जितशत्रू नामनो राजा छे, अने धनाव्य धन नामनो सार्थवाह हतो. चंपानगरीनी पूर्वोचरदिशामा घणे दूर अहिछत्रा नामनी नगरी हती, त्यां कनककेतु नामनो E नसाली- द्वितीय विमागे श्रीनन्दी- पर्मरूपारे फल० सारांश राजा राज्य करतो हतो. एक समये घनसार्थवाहने करीआणां वगेरे लइ । अहिछत्रा नगरीए जयाना भाव थवाथी गाडां विगेरे तैयार, करावी पडहो गगहान्यो के जेने जे सहाय जोरशे ते हु आपीश ! आवा प्रकारना साद पडावाथी शुभ मुहूर्ते धणा वेपारीओ, गृहस्थो, चरक गिरे भिक्षुको आव्या तेओने लइने मुखे समाधे धनसार्थवाह जइ रह्या छे. अंगदेशना छेडे. आवतां एक: मोटुं वन,आव्यु : एटले धनसार्थवाहे वे प्रणवार साद पडावया द्वाराए चेतवणी आपी के आ जंगलमा घणा एवा नंदीनामना वृक्षो छे. ते वृक्षोनां मूल-छाल-पत्र- पुष-फल कोइ खाशो नहीं, तेम तेनी छायामां पण कोइ वेसशो नहीं. जे कोइ तेनां मूलीयांविगेरे खाशे अगर तेनी छायामां बेसशे ठेने आरममा ठीक लागशे पण अकाले ते मृत्युने पामशे !!! माटे नन्दीवृक्ष सिवायना वृक्षो सेवशो अने नन्दीवृक्ष सिवायना फलो मानो तेनो वांधो नयी. आम जणाव्या छतां जेओए धनसार्थवाहना आ वचनो उपर विश्वास न राख्यो अने उलटा वा तेमने तेमनां अफाले जीवन गुमाव्यां अने जे धनसार्थवाहना आ वचनो उपर विश्वास धरावी तेमना वचन प्रमाणे वा ते सुखी थया. तेवी रीते ने साधु अथवा साध्वी जिनेश्वरे निषेध करेला होवा छतां पांच प्रकार विषयोमा तल्लीन रहे छ ते. आ भवमां दुःखी - थाय छे . अने अपयशने पात्र यह अनेक भयोमा रखडे छे. तेम जे साधु अथवा साध्वी जिनेश्वरे निषेध करेला छे तेम जाणी; पांच प्रकारना विषयोने त्याग फरे छे ते आ भवमा मुसी थाय छे अने यशकीर्तिने पामी शीघ्र मोक्षने साघे छे. जे कोद यच्या वेने धनसार्थवाह लइने अहिउत्रा नगरीए गयो, अने कनककेतृराजाने भेटणुं करी तेनी रजा पामी करीआणां यगेरे पेनी, लेया योग्य बीजी वस्तुओ लेइ, पाछा चम्पानगरीए आव्या अने सुखी.थया. एकासमये स्थवीर महात्माओनुं आगमन थयुं IIIII तेमनी पासे धर्मर्नु श्रवण करी धनसार्थवाहे पोताना पुत्रने कारभार सौंपी संयम ग्रहण कयें, अगीआर अंग मण्या, यावत् घणा वर्षी संयम पाळी, महीनाना उपवास करी, सलेखना करी देवलोकमां देव थया. त्यांथी च्यवी महाविदेहक्षेत्रमा मोक्षने पामशे. इति १५-श्रीनन्दीफलअध्ययनसारांशः॥ . ॥ १६-श्रीअपरकंका-अध्ययन सारांशः ॥ पूर्वना अध्ययनमां विषयोने विषे आसक्ति राखे छ तेने थता अनर्थ जणाव्या, आ सोलमा अध्ययनमा विपयोनी जे इच्छा राखे छे तेने पण अनर्थनी प्राप्ति थाय छे ते हकीकत कहे छे. हे जम्बू ! ते काले ते समये चंपानामनी नगरी हती तेना ईशान भागमा सुमिभाग नामर्नु उद्यान हतुं, ते नगरीमा चारे वेदोने जाणनार धनाढ्य-सोम, सोमदत्त अने सोममति नामना त्रण ब्राक्षणो हता तेमने अनुक्रमे नागश्री,-मूतश्री अने यक्षश्री नामे मार्याओ हती, एक समय त्रणे ते ब्राह्मण भाइओ मेगा मळी विचारवा लाग्या के आपणे घणा धनवाळा छीए, सात पेढी सुधी चाले तेटलं धन छे तो आपणे त्रणे वाराफरती एक घेर सुन्दर-स्वादिष्ट भोजन करीए ते ठीक छ, आ प्रमाणे विचार करी अंगीकार करी अन्योअन्य भोजन तैयार करावी वाराफरती भोजन कर्ता रह्या छे, कोइ एक दिवसे नागश्री ब्राह्मणीने घेर मोजन..करवानो वारो आन्यो. त्यारे तेणीए घणुं एवं स्वादिष्ट भोजन तैयार कर्यु, तेमां तुम्बडीनु शाक तेल आदि धणा द्रव्योथी ते तैयार कर्यु, · अने.शाकन एक बिन्दु चाखी जोयुं तो ते खारं, कडवू, खावा माटे अयोग्य, अने विषवाळु लाग्यु माथी ते नागधी पोताने धिक्कारी पश्चाताप करवा लागी, मारी -- ܕܒ नवाङ्गी- द्वितीय विमागे श्रीअपर- भीज्ञाता- धर्मकथाओं सारांश: ॥११॥ आ वात मारी देराणीओ जो जाणशे तो मारी निन्दा करशे माटे ते न जाणे तेम ते शाकने संताडी दउं एम विचारी ते शाकने संताडी दइ नवं मधुरतुम्बडानुं स्वादिष्ट शाक तेणीए तैयार कयु, ज्यारे ते त्रणे ब्राह्मणो आव्या त्यारे तेमने स्वादिष्ट शाक विगेरेथी भोजन कराव्युं तेओ त्रणे जणा भोजन करी मुखशुद्धि करी पोताना कामे लाग्या, त्यारवाद त्रणे ब्राह्मणीओए पण स्वादिष्ट शाक सहित भोजन कयु अने पोताना स्थाने गइ. नागश्रीए वहोरावेलु कडवा-तुम्बडा, शाक. ते समये धर्मघोष नामना स्थविरमुनि घणा परिवारयुक्त विहार कर्ता चम्पानगरीना सुमिभाग नामना उद्यानमां पधार्या छ, तेमने वंदन करवा माटे घणा लोको आव्या अने पर्षदा थइ. स्थविरमुनिए धर्म कह्यो ते श्रवण करी सर्वे गया. ते वार पछी धर्मघोषस्थविरना शिष्य तेजोलेश्यानी लब्धिवाळा धर्मरुचि नामना अनगारमुनि मास मासनो तप करनारा हता ते श्रीगौतमस्वामिनी माफक पात्रपडिलेहण करी धर्मघोपस्थविरनी आज्ञा लइ भिक्षा माटे चम्पानगरीमां फरता फरता ज्यां नागश्री ब्राह्मणीनु घर हतुं त्यां प्रवेश्या, ते नागश्री ब्राह्मणीए विषवाला कडवा तुम्बडानुं जे शाक गुप्त राखेलं ते वधुंए खुव हर्षपूर्वक साधुना पात्रमा नाखी दी. धर्मरुचि अनगार पण पोताना पुरतो आहार थइ गयो जाणी त्यांथी नीकली गुरुमहाराज पासे पाछा गया अने इर्यावही प्रतिक्रमी गुरुमहाराजने गोचरी बतावी. गुरुमहाराजे गन्धथी शंकित थया छता ते शाकना एक विन्दुने चाखी जोयुं, तो ते शाक विपवाळू जाणी धर्मरुचि अनगारने कहेवा लाग्या के-हे महानुभाव ! आ शाक तुं जो वापरीश तो अकाले मृत्यु पामीश, माटे शुद्ध भूमि विष परठवी घो! अने वीजो आहार लावी आहार करो।
धर्मरुचि अनगारे करेलु अनशन. गुरु-आज्ञाथी शुद्ध भूमिनी तपास करी परठवता, एक विन्दु भूमिपर नाखतां तेनी गन्धथी हजारो कीडीओ मेगी थइ, तेमांथी जे फीडीए तेनो आहार कर्यो ते तूरतज मृत्यु पामी. आथी धर्मरुचि अनगारने अध्यवसाय थयो के-आ बिन्दु नाखतां हजारो कीडीओ मरणने पामी छे, जो आ बधुंये शाक परठवीश तो घणा जीवोनो नाग थशे, अने तेनो वध करनारो हुं थइश. माटे आ सर्वे आहारने हुं खाइ जउं ते कल्याणकारी छे, एवो निश्चय करी मुहपतिर्नु पडिलेहण करी, आखा शरीरनुं प्रमार्जन करी पीलमा सर्प प्रवेशे तेनी जेम मुखमा आहारनो प्रवेश कराव्यो अर्थात् उदरमा नाखी दीg. एक अन्तर्मुहूर्तमा आखा शरीरमां विप व्यापी गयुं अने असह्य वेदना थइ, आथी मृत्यु नजदीक छ एम धारी पात्रां एक जगोए स्थापन करी, शुद्ध भूमिर्नु पडिलेहण करी, दर्भनो संथारो करी, पूर्वसन्मुख मुख रासी, पल्यंक आसने वेसी, वे हाथ जोडी, मस्तके अंजलि जोडी,-अरिहंत, सिद्धने नमस्कार करी-गुरुने नमस्कार करी फरीथी करेमिभंतेनुं पञ्चक्खाण उच्चरी देहने वोसराव्यो अने समाधिपूर्वक कालधर्म पाम्या. नागधीनो थयेलो तिरस्कार- धर्मघोपस्थविरे धर्मरुचि अनगारने परठवा गये घणो टाइम थयो छे तेम जाणी साधुओने चारे दिशाए तपास करवा मोकल्या, ते साधु भगवन्तो तपास करतां स्थंडिलभूमिविष तेमने काळधर्म पामेला जोइ आ अकार्य थयुं छे, तेम करी धर्मरुचि अनगारना काळधर्मनो काउस्सग्ग कर्यो. अने तेमना पात्रां आदि लेइ गुरुमहाराज पासे जइ, इरियावही प्रतिक्रमण करी धर्मरुचि अनगारना काळधर्म पाम्याना समाचार जणाव्या. t
भीमाता-
धर्मच्यारे
द्वितीय
विभागे-
श्रीअपर-
कंका०
धर्मरूचि
वृत्तांतम् ।
॥१२॥
धर्मपोषस्थविरे पूर्वां-(चौदपूर्वमांना कोइ पूर्वनां) उपयोग मेली साधु-साध्वीओने बोलावीने कयु के-हे आर्यों 1 मारो
शिप्य धर्मरुचि नामनो साधु-स्वमावथी भद्रक, यावत् विनीत हतो तेम निरंतर मासक्षपण तप करतो हतो, ते नागश्री ब्राह्मणीने घेर।
पारण माटे वहोरवा गयो हतो, नागश्रीवामणीए तेना पात्रमा कडवीतुम्बडीनुं सर्व शाक नांख्युं.
धर्मरुचि अणगार प्रतो आहार आवी गयो तेम करी अत्र आव्यो यावत् घणा वर्षो साधुपणुं पाळी आलोचना :प्रतिक्रमण करी
समाधिपूर्वक काळ करी तेत्रीश सागरोपमनी स्थितिवाळा सर्वार्थसिद्ध नामना विमानमा उत्कृष्टस्थितिए देवपणे उत्पन्न थयो छे त्यांथी
च्यवीने महाविदेहक्षेत्रमा उत्पन्न यह मोक्षे जशे. हे आर्यो! नागश्री ब्राह्मणीने धिक्कार छे, ते निर्भागी पुण्यहीन यावत् लीवोडीना जेवी
फडवी छे, कारण के तेणीए धर्मरुचि अणगारने मासक्षपणना पारणे कडवा तुम्बडा- शाक वहोरावी जीवित,रहित कर्यो.
ते पार पछी साधु-साध्वीओए नागश्रीब्रामणीनुं आ पापकर्म लोकोने कह्यु, आ सांभळी लोको नागीने धिक्कारवा लाग्या, लोको
पासेथी ते प्रणे ब्राह्मण भाइओ सांभळीने घेर आवी नागश्रीने कहेवा लाग्या, हे नागश्री ! मरणनी प्रार्थना करनारी ! दुष्ट अने अशुभ
लक्षणवाळी । हीन कृष्ण चौदशे जन्मेली तें मासक्षपण करता साधुने आवी रीते मरण पमाड्या !! आम अनेक प्रकारे वचनथी अने चपेटा।
आदिथी ताडन करी-तिरस्कार करी घरमांथी काढी मूकी, कादी मेलायेली चंपानगरीमां घेर घेर भटकती लोकोए घरना आंगणे
मुकेट बलीने खाती, अने अनेक रीते लोकोना तिरस्काग्ने पामती, मटकती एवी वेणीने-नागश्रीने सोल रोग उत्पन्न थया.
मवोभव अनेक अमय दुःखोने भोगवती नागश्री.
ते सोल रोगोना एकी साये दुःखो भोगवती आर्त-रोद्र ध्यान धरती मरण पामीने छट्ठी नारकीमा बावीससागरोपमनी उत्कृष्ट
॥१२॥
स्थितिए नारकीपणे उत्पन्न थइ, त्यांथी नीकलीने मत्स्यपणे उत्पन्न यई. त्यां शस्त्रवडे वध पामेली सातमी नारकीमा उत्पन्न यइ, त्यांथी नीकलीने पाछी मत्स्यपणे उत्पन्न थई फरीधी पण त्यां तेवां दुःखो भोगवी छट्ठी नारकीमा उत्पन्न थइ. एम गोशालानी जेम वारंवार सावे नारकमा नारकीनां दुःखो मोगवी पक्षी; पृथ्वीकाय आदि एकेन्द्रियना भवमा उत्पन्न थइ यावत् घणां दुःखो भोगन्यां. नागश्रीनो सुकुमालिका तरीके थयेल जन्म. त्यांथी उद्धरीने ते नागश्री जम्बूद्वीपना भरतक्षेत्रमा चम्पानामनी नगरीमा सागरदत्त नामना सार्थवाहनी भद्रा नामनी मार्यानी कुक्षिविपे पुत्रीपणे उत्पन्न यह अने तेनुं सुकुमालिका एवं नाम पाडयु. पांच धावमाताओथी लालनपालन कराती ते यावत् यौवन अवस्थाने पामेली एक समये पोताना महेलनी अगासी विषे सुवर्णना दडीने रमी रही हती, ते समये तेज चम्पानगरीनो धनाट्य-जिनदत्त नामनो सार्थवाह केटलाक मित्रो सह सागरदत्त सार्थवाहना धर नजदीक थइ जतो हतो तेने ते रूप लावण्यमरी सुकुमालिकाने दासीओथी परिवरेली जोइ, तेनुं रूप-लावण्य-यौवन जोइ आब्धर्य पामेल जिणदत्त सार्थवाहे कौटुम्बिक पुरुषोने चोलावी पूछयु के-आ कोनी पुत्री छे ! अने तेनुं नाम शुं छे ! कौटुम्बिक पुरुषोए जवावमा जणाव्यु के-आ सागरदत्त सार्थवाहनी सुकुमालिका नामनी कन्या छे. कौटुम्बिक पुरुषो पासेथी आ प्रमाणे श्रवण करी, पोताने घेर जइ, स्नान करी, मित्र ज्ञातिजनो सहित सागरदत्त सार्थवाहने घेर गयो. जिनदत्त सार्थवाहने पोताने घेर आवता जोइ सागरदत सार्थवाहे आसनथी उठी जिनदत सार्थवाहने बेसाड्या अने आववानुं प्रयोजन पूछ्युं. जिनदत्त सार्थवाहे जणाव्यु के-तमारी सुकुमालिका पुत्रीने मारा सागरदत्त नामना पुत्रनी भार्यापणे मागणी करूं छु. सागरदत्त सार्थवाह कहेवा लाग्या के आ मारी सुकुमालिका पुत्री म्हारे एकज - ३
नवाशी-
.
भीमाता-
पर्मयाने
द्वितीय-
विमागे
श्रीअपरकं०
सुकुमा-
लिकानो
जन्म।
॥१३॥
पुत्री छे तेम मने बहु बहाली छे. हुं वेनो क्षणभर वियोग इच्छतो नथी माटे जो तमारो पुत्र सागर म्हारा घरजमाइ तरीके रहे तो हुँ
म्हारी पुती तेने आपुं. जिनदत सार्थवाह धेर गया अने पोताना सागर पुत्रने हकीकत जणावी, ते हकीकत श्रवण करी 'सागर
मौन रसो. आथी जिनदत्त सार्थवाहे तेनी संमति जाणी, अर्थात् कबुलात करे छे तेम निर्णय को. शुभ मुहूर्त आव्युं त्यारे स्वादिष्ट
मोजन तैयार करावी ज्ञातिजनोने आमन्त्रण करी जमाडी सागरपुत्रने स्नान आदि करावीने आभूषणादिथी शणगारी शिविकामां
बेसाडी सर्वज्ञातिजनोसह आडम्बरपूर्वक सागरदत्त सार्थवाहने त्यां गया. सागरदत सार्थवाहे तेओर्नु यथायोग्य सन्मान कर्यु,
सुकुमालिकाने परणतां ( हस्तमेलापना समये) सुकुमालिकाना हत्तनो स्पर्श तलवारनी जेम अने धगधगता अग्निना स्पर्शनी जेम
सागर अनुमववा लाग्यो. सागर इच्छाविना परवशपणे आ स्पर्शने अनुभवतो मुहर्तमान बेसी रह्यो. सागरदत्त सार्थवाहे सागरपुत्रना
मातापिता विगेरेने जमाडी वस्त्रादिथी भक्ति-सन्मान करी विदाय कर्या. सागरपुत्र सुकुमालिकानी साथे शयनगृहे आव्यो. सुकुमालिकाना
अंगनो अत्यन्त कष्टपूर्वक अग्निनी माफक स्पर्श अनुभवतो पराधीनपणे मुहूर्त मात्र थये सुकुमालिका निद्राधीन थइ त्यारे पोतानी जुदी
शय्यामां सुइ गयो. सुकुमालिका पोताना पतिने बीजी शय्यामा सुतेला जोइ रागथी त्यां जइ सुती. ते समये पण पूर्वनी जेम सागर
कष्ट सहन करवा लाग्यो, त्या पण सुकुमालिका निद्राधीन थये छते कसाइखानामांथी जेम नाशी छूट्यो न होय तेम नाशी छूटयो
अने पोताना घेर आवतो रह्यो.
सुकुमालिका जान्या पछी पोताना पतिने न जोतां सर्वत्र तपास करी तो द्वार खुल्लु जोइ पोताना पतिने चाल्या गया तेम जाणी
विचारवा लागी. सेवामां तेनी माताए पुत्री तथा जमाइ माटे मुख घोवा पाणी लइने दासीने मोकली. दासीए विचारमम अमेली
॥१३॥
सुकुमारिकाने नोइ शु थयु छ तेम पूछयु, सुकुमालिकाए यथास्थित जे पन्यु ते कयुं. दासीए जइ तमाम हकीकत सागरदत्त सार्थवाहने कही. आ श्रवण करी कोपायमान थयेला सागरदत्त सार्थवाह जिनदत्त सार्थवाहने घेर गया अने जिनदत सार्थवाहने ठपको-उपालम्म अनेकरीते आप्यो. जिनदत्तसार्थवाहे-स्वपुत्र सागरने का के आ तें खोटु कयुं छे, तु त्या जा ! सागरपुत्रे जणाव्यु के-पिताजी. पर्वत उपरथी पडु । झाड परथी पडु ! मरुदेशमा चाल्यो जउ ! पाणीमा प्रवेशु ! अग्निमा प्रवेश करु ! विष भक्षण करु ! गळे फासो बाउ | गृदपृष्ठमा प्रवेशु । दीक्षा लउ । चाल्यो जउ परन्तु सागरदचने धेर नहि जवु. आ वधु भीतना आतरे रहेल सागरदत्त सार्थवाह श्रवण करी रज्जा पामेला पोताना स्थाने चाल्या गया अने पुत्रीने वोलावी आश्वासन आप्यु अने कयु के-जेने तु इष्ट-यावत् मनने गमती थइश तेने आपीश. ते वार पछी एक समये सागरदत्त सार्थवाह अगाशीमा वेसी राजमार्गमा जुवे छे तो एक भीखारी साधेला ककडावाल वस्त्र पहेरेलो, हाथमा सरावल अने हाथमा पाणी माटे पडो राखेलो तेम हजारो माखीओथी विंटायेलो जोयो, सागरदत्त सार्थवाहे कौटुम्विक पुरुषोने वोरावी भलामण करी के-आ मीखारीने खोराकथी लोमावी घेर लइ जइ, स्वादिष्ट भोजन करावी, भीशाना साधनो दूर करावी, वस्त्र-अलकारथी विपित करी मारी पासे लावो! कौटुम्विक पुरुषो तेना भीखारी वेपने ज्या दूर करवा राम्या त्यारे ते भीखारी राडो पाडया राग्यो अने रडवा लाग्यो. सागरदस सार्थवाहनी सूचनाथी तेना भीखारी वेप आदिने विश्वास उत्पन्न थाय देवी रीते तेनी पासे स्थापन कराव्यो अने हजामत करावी सहस्रपाक आदि तेलो वडे ते भीखारीने मालीश करावी, स्नान करावी, वस- आपण पहेरावी ते कौटुम्पिक पुरुषो सागरदच सार्थवाह पासे लइ गया. सागरदन सार्थवाहे ते भीखारीने पोतानी सुकुमालिका s नवाङ्गी- १०३० भीड़ाता. धर्मकपाले द्वितीय- विमागे श्रीअपरकं० सुकुमा- लिकानी दीक्षा। ॥१४॥ पुत्रीने भार्या तरीके अर्पण करी, भीखारीनी स्थिति पण सागरनी माफक थतां ते पण पोताना भीक्षाना साधनो लइने सागरनी माफक नाशी छूटयो. आ सर्व हकीकत ज्यारे सागरदच सार्थवाहे जाणी त्यारे सुकुमालिकाने प्रेमसह कहेवा लाग्या के-तुं पूर्वभवमा आचरेला पापकर्मना फलने अनुभवे छे, तुं आर्तध्यान कर्या विना हवे हे पुत्री ! तुं मारा रसोडा विपे विपुल एवं अशन-पान खादिम-स्वादिम हमेशा तैयार थाय छे तेने " पोट्टिलानी" जेम श्रमण-साधु वगेरेने आपत्ती छती रहे. सुकुमालिका पण ते प्रमाणे दान आदि करे छे. सुकुमालिकाए लीधेली दीक्षा. ते काले ते समये बहुश्रुत गोपालिका नामनी आर्या घणी आर्याओ सह समवसरी, तेमांथी वे आर्याओ भिक्षार्थे आ सुकुमालिकाने त्यां आवी. ते साध्वीओने आहार विगेरे वहोरावी, सुकुमालिका कहेवा लागी के-हे आर्याओ ! हुं सागरने अनिष्ट छु तेम तेना मनने गमती नथी वगेरे जे वीना बनेली ते कहीने कथन करवा लागी के-तमो घणा ज्ञानवान छो, यावत् मन्त्र-तन्त्र वगेरेना आम्नायने पामेला छो तेथी तमे मने एवो उपाय दर्शावो के जेथी हुं सागरने इष्ट थाउं. बन्ने आयओए कर्मनो विपाक-बन्ध विगेरे समजावी तेम जैन धर्म-साधु धर्म जणावी तेने श्राविका बनावी यावत् सुकुमालिकाए गोपालिका आर्या पासे दीक्षा ग्रहण करी. सुकुमालिका आर्या थइ. ईर्यासमिति पाळती यावत् ब्रह्मचर्य धारण करती घणा छठ्ठ-अट्ठम विगेरे तपस्या आचरती थकी विचरवा लागी. एक समय ते सुकुमालिका आर्याए-गोपालिका आर्याने वंदना नमस्कार करी चंपा नगरीनी बहार सुमिभाग नामना उद्याननी नजदीक छट्ठनी तपस्या वडे सूर्यनी सन्मुख आतापना लेती रहेवा माटे आज्ञा मागी.
गुरुपायानो करेलो मंग, यावत् करेलु नियाj. सुकुमालिका आर्याए मागेल आज्ञाना जवावमा गोपालिका आर्याए जणाव्यु के-हे आर्या ! आपणे साध्वीओ निग्रंथ छीए, ईर्यासमितवाळी छीए यावत् गुठ ब्रह्मचारिणी छीए तेथी आपणने गामनी वहार यावत् सन्निवेसनी बहार निरंतर छट्ठ आदि तप करी आतापना लेता रहेवार्नु कल्पतुं नथी, परन्तु वाड के वंडी सहित उपाश्रय विपे रही वस्त्रवडे काया ढांकी साधीओना परिवार साये रहीने पृथ्वी पर पगना सम तलीया राखीने आतापना लेवी कल्पे छे. गोपालिका आर्या( गुरुणी )नी आ वात पर श्रद्धा-रुचि-विश्वास नहीं फरती मुकुभालिका आर्या गुरुणीना ना कहेवा छतां सुमिभाग उद्यानथी योडा दूर छट्ट आदि तपस्या करती आतापना लेवा लागी. ते चंपानगरीमा राजाथी छूट अपायेली एक ललिता नामनी टोळी रहे छे ते माता-पिता-स्वजन विगेरे कोइनी अपेक्षा राखती नथी, अविनयी अने उद्धत एवी ए टोळी वेश्याने त्यां पड़ी रहे छे. ते टोळीमांथी पांच गठीआओ देवदचा नामनी रूपवान् वेश्यानी साथे एक समये आ उद्याननी शोभा अनुभवता आल्या अने ते देवदा वेश्याने एके खोळामां बेसाडी, वीजो तेना पर छत्र धरवा लाग्यो, त्रीजो तेणीना मस्तक पर पुप्पनो मुगट रचे छे, चोथो तेणीना पगने अलताथी रंगे छे भने पांचमो पुरुष तेणीने चामर वींझवा लाग्यो यावत् तेओ मनुष्य सम्बन्धी भोगविलास भोगववा लाग्या. देव- दधाना आ विलासो-पौद्गलिकसुखो जोइ सुकुमालिफा आर्यानुं चित्र चलायमान थयुं अने देवदत्ता वेश्याना पूर्वपुण्योने अनुमोदवा लागी. जो ा मारा तप-नियम-ब्रह्मचर्य- कंइ पण फलविशेष होय तो आगामी भवे हुं आवा काममोगने भोगवती यावत् विचलं ! आम फरी नियाणं करी आतापनानी भूमिथी पाछी फरी, ते वार पछी ते सुकुमालिका आर्या शरीरयकुशा (शरीरनी शोमा करवी तेने शरीरवकुश भीम नवाङ्गी- भीज्ञाता. धर्मकथा) द्वितीय विमागे श्रीअपरकं० सुकुमा- लिकानुं निया'। ॥१५॥ कहे छे) यइ वारंवार हाय-पग-मस्तक-मुख-स्तनांतर-काख-गुठभागने घोवा लागी, तेम उभा रहेवाना स्थानने-सुवाना स्थानने- स्वाध्यायना स्थानने-वेसवाना स्थानने प्रथम जलवडे छांटवा लागी. आधी गोपालिका आर्याए आ साध्वीओने कल्पतुं नथी वगेरे ममजाव्युं पण तेणीए गुरुना ठपकानो आदर को नहीं, आथी बीजी साध्वीओए पण सुकुमालिकानो अनादर करवा मांड्यो तेम तेनो पराभव करवा लागी. आथी सुकुमालिकाने एवो विचार आव्यो के-हुं घेर हती. संसारमा हती त्यारे स्वतन्त्र हती, हुं दीक्षा लेइने परवश थइ, आ साध्वीओ पहेलो मारो आदर करती, हवे ते आदर करती नथी माटे आवतीकाले हुं एकली जुदा उपाश्रये जइने रहुं. बीजे दिवसे ते जुदा उपाश्रये जइने रहेवा लागी अने स्वच्छंद मतिवाळी पासत्यविहारी-कुशीलविहारी आदि थइने घणा वर्ष संयम पाळी पंदर दिवसनी सलेखना करी, पोताना दोषोने आलोच्या नहिं, तेम पश्चातापरूप प्रतिक्रमण कर्या विना काल करी ईशान देवलोकमां गणिकापणे ( अपरिगृहितदेवीपणे ) देवी थई. द्रौपदी तरीके थयेल जन्म- नव पल्योपमनुं ईशान देवलोकनुं आयुष्य पूर्ण करी सुकुमालिका च्यवीने पंचालदेश विपे कांपील्यपुरना नगरमां द्रुपद राजानी चुलणी राणीनी कुक्षीविषे पुत्रीपणे जन्मी अने तेनुं द्रौपदी एवं नाम पाडयु. द्रौपदी बालिका पांच धावमाताओथी लालनपालन कराती वृद्धिने पामी. यावत् युवानी अवस्याने पामी. ते वार पछी द्रौपदीने अन्तःपुरनी राणीओए स्नान करावी, विभूषित करीने द्रुपदराजाना • पादने वन्दन करवा मोकली. द्रौपदी पण पिता द्रुपदराजानी पासे जइ तेमने पगे लागी. द्रुपद नृपतिए पोताना खोळामां बेसाडी, द्रौपदीना-रूप-गवण्ययी आर्थर्य पामेला द्रुपदराजाए द्रौपदीने कयु-हे पुत्री ! हुं पोते कोइ राजा के युवराजने परणाएं तो तुं सुखी माघ अथवा दुःखी थाय तेथी मने जीवनपर्यंत हृदयमा बलतरा थाय माटे हे पुत्री ! आजथी मांडीने हुं हारो स्वयंवर रचुं छु. तुं तारी जाते कोइ राजा के युवराजने वरीश ते हारो भर्ता थशे । एम कही आश्वासन आपी विदाय करी. स्वयंवरमा आववा मादे दूतोनुं प्रयाण. ते वार पछी द्रुपदराजाए दूतने बोलावी कह्यु के-हे देवानुप्रिय ! द्वारका नगरि विपे कृष्ण वासुदेव, समुद्रविजय विगेरे दस दसारो, बलदेव वगेरे पांच महान् वीरो, उग्रसेन वगेरे सोल हजार राजाओ, प्रद्युम्न विगेरे साडात्रण क्रोड कुमारो, सांप विगेरे साठ हजार उद्धत अने बलवान कुमारो, वीरसेन विगेरे एकवीश हजार वीरपुरुषो, महासेन आदि छप्पन हजार बळवानवर्ग, तेमने तथा बीजा घणा राजा, ईश्वर, तलवर, माळविक, कौटुंबिक, इभ्य, श्रेष्ठी. सेनापति अने सार्थवाह आदिने वे हाथ जोडी दश नखो मेगा करी मस्तक विषे फेरवी अंजली करी जय विजय शब्दोथी वधावी आ प्रमाणे कथन करजे! हे देवानुप्रियो 1 काम्पील्यपुर नगरमां दुपदराजानी चुलणी राणीथी उत्पन्न थयेली, धृष्टद्युम्नकुमारनी व्हेन द्रौपदी नामनी राजकन्यानो स्वयंवर थवानो छे तो आप जल्दी त्यां पधारो ! राजानी आ आज्ञा दूत अंगीकार करी पोताने घेर गयो, घेर जइने पोताना कौटुम्बिक पुरुषोने बोलावी चार घंटा बांधेला घोडावाळा रथने तैयार करी लाववा जपाव्यु. कौटुम्यिकपुरुषोए लावेला रथ पर वेसी आयुधो अने शस्त्रोवाळा घणा पुरुषो सहित ते दूत पंचाल देशनो सीमाडो उल्लंघन करी सौराष्ट्र देश विपे द्वारका नगरीनी बहार कृष्णमहाराजा-वासुदेवनी बहारनी सभामां जइ उतारो करी पगे चालतो कृष्णवासुदेवनी पासे गयो, अने कृष्णवासुदेव विगेरेने मस्तके अंजलि जोडी स्वयंवर सम्बन्धि सर्व वृतान्त कही सर्वेने पधारवानी विनंति करी. आ श्रवण करी हर्षित थयेला कृष्णमहाराजे तेनुं सन्मान कयु. यावत् तेने विदाय कों. कृष्ण-
नवाङ्गी-
१०१०
भीझाता-
धर्मकपा
द्वितीय-
विमागे-
श्रीअपरकंज
द्रौपदी.
स्वयंवर।
वासुदेवे, समुद्रविजय विगेरे राजाओ महासेन विगेरे तेम बीनाओनी साथे हस्तीरन उपर वेसी कांपील्यपुर नगर तरफ प्रयाण कयु.
द्रुपवराजाए-वीजा दूतने हस्तिनापुर नगरे युधिष्ठिर आदि पांच पुत्रो सहित पांडुराजानी, दुर्योधन आदि सो भाइओनी, गांगेय-
विदुर-द्रोण-जयद्रथ-शकुनी-कर्ण भने अश्वथामानी पासे विनंति करवा मोकल्यो, त्रीजा दूतने-चम्पानगरी विषे अंगराज कृष्णनी,
सेल्लकराजानी अने नंदराजानी पासे विनंति करवा मोकल्यो. चोथा दूतने शुक्तिमती नगरी विषे दमघोपना पुत्र, पांचसो भाइओथी परि-
वरेला शिशुपाल राजानी पासे विनंति करवा मोकल्यो. पांचमा दूतने-हस्तिशीर्ष नगर विषे दमदंतराजानी पासे विनंति करवा मोकल्यो.
छट्ठा दूतने मथुरा नगरी विषे धर नामना राजा पासे विनंति करवा मोकल्यो. सातमा दूतने राजगृहनगर विषे जरासंघना पुत्र
सहदेवराजानी पासे विनंति करवा मोकल्यो. आठमा दूतने कौडिन्यनगरविषे भीष्मकना पुत्र रुप्पीराजानी पासे विनंति करवा मोकल्यो.
नवमा दूतने विराटनगरविषे सो भाइओसहित कीचकराजानी पासे विनंति करवा मोकरयो. दशमा दूतने बाकीनां गाम-आकर
अने नगर आदिमां विनंति करवा मोकल्यो. अने सर्वेने स्वयंवरमां पधारवानी विनंति करवा कयु. दरेक दूतोए द्रुपदराजानी
आ आज्ञा स्वीकारी, दरेक दूतो द्रुपदराजानी आज्ञा प्रमाणे गया अने तेओए ते प्रमाणे दरेक स्थाने विनंति करी. तेवार पछी
हजारो राजायो कांपिल्ययपुर आववा लाग्या.
द्रौपदीनो स्वयंवर मंडप-
द्रुपदराजाए कौटुम्बिक पुरुषोने बोलावी आज्ञा करी के-तमे गंगानदीनी समीपमां एक सेंकडो थामला अने पुतळीओथी शोभतो
स्वयंवर मंडप बनावो अने वासुदेव विगेरे हजारो राजाओ माटे आवासो तैयार करो! कौटुम्बिकपुरुषोए द्रुपदराजानी आज्ञा प्रमाणे
SAX
॥१६॥
सर्वे तैयार कर्यु. देश देशथी आवेला अनेक सुभटो सह वासुदेव विगेरे राजाओगें योग्य सन्मान करी तेमने उतरवा आवासो अा. पोत-पोताना आवासोमा प्रवेशेला कृष्णवासुदेव आदि राजाओ विगेरे आसन पर वेठेला अने शयन पर सुतेला सुता सुता गंधर्वो पासे गायनो गवडावता तेम नटो पासे नाटको करावता आनंदपूर्वक रह्या छे. अने हुपदनृपतिए कौटुम्बिक पुरुषो मारफते मोकलावेल- मशन-पान-खादिम-स्वादिम तथा चार प्रकारनी-सुरा आदिनो तेम पुष्पो, वस्त्रो, गन्ध-माला-अलंकारोनो मोगवटो करे छे. ते वारपछी द्रुपदराजाए कौटुम्बिकपुरुषो मारफते कांपील्यपुरनगरमां द्रौपदीनो आवतीकाले प्रातःकाले स्वयंवर छे तो सर्वे पधारशो अने सहुए पोताना नामथी अंकित आसन विपे पधारी-द्रौपदीनी आववानी राह जोशो । तेवी उद्घोषणा करावी. अने कौटुंबिक- पुरुषोने बोलावी-स्वयंवरमंडपमा पाणीनां छांटणां छंटाव्यां, संमार्जन करावी लीपणथी लीपावी सुगन्धी द्रव्योथी सुगंधित करावी, पांचवर्णोनां पुप्पो-कालागरु, श्रेष्ठकंद्रुक अने तुरुष्क विगेरे धूपोथी मघमघायमान स्वयंवर मंडप बनान्या अने मांचाओ बंधाव्या. स्वयंवरमंडपमा वासुदेव वगेरे आवी पोताना नामथी अंकित आसन विपे वेसी द्रौपदीनी राह जोवा लाग्या, अने द्रुपद- राजाए पण त्यां आवी सर्वेने जय-विजयथी वधाव्या. श्रेष्ठ राजकन्या द्रौपदी स्नान करी गृहदेवतार्नु पूजन करी मसीतिलकादि कौतुको अने दुर्वादि मंगलकार्यों करी मांगलिक वसो पहेरी घरदेरासर विपे जइ जिनपूजा करी, द्रव्यभावस्तवने स्तवी प्रभूने वंदना-नमस्कार कर्या पछी अन्तःपुरमा आवी. त्यां अंतेपुरीए मेगा मली द्रौपदीने सर्वअलंकारोथी विपित करी पगमां नूपर पहेराव्यां. द्रौपदी दासीओथी परिवरी ज्यां बहारनी सभा हती त्यां आवी अने चार घंटावाला अश्वथी जोडेला रथ विषे धात्रीमाता अने लेखिका दासी सह वेठी. आ समये धृष्टद्युम्न नामना तेना वडीलबन्धुए FE
नवाणी
भीजावा.
धर्मकयाने
तेनुं सारथीपणुं कयु. कांपील्यपुरनगरनी मध्ये थइने स्थमा वेठेली द्रौपदी स्वयंवरमण्डपनी बहार रथ उभो राखी नीचे उतरीने पोताने
बालपणाथी रमाडनार धावमाता तथा लेखिका-(लखनारी) दासी साथे स्वयंवरमण्डप विषे प्रवेश कयों. प्रवेश करतानी साथे बे हाथ
जोडी, वासुदेव विगेरे हजारो राजाओने नमस्कार कर्या. त्यारबाद पाटला-मल्लिका-चंपक विगेरे पंचवर्णोना पुष्पोथी शोमतो पुष्प-
मारानो सुगन्धीदार दढो द्रौपदीए ग्रहण कर्यो.
पांडवो साये लग्न.
ते वार पछी-क्रीडा करावनारी धावमाताए डावा हाथमा दर्पण राख्यु, अने ते दर्पण विषे प्रतिबिम्ब पडता अनुक्रमे दश दसारो
विगेरे राजाओने जमणा हाये व्रौपदीने देखाढती ते ते राजाओना मात-पिता-बंश-सत्त्व-सामर्थ्य-गोत्र-विक्रम-कान्ति-कीर्ति-
ज्ञान-रूप-यौवन-गुण-लावण्य-कुळ अने शियल विगेरेनुं वर्णन धावमाता करती ते श्रवणा करती द्रौपदी हजारो राजाओने पूर्वे
करेला नियाणाना प्रतापे ओळंगती ज्यां पांच पांडवो छे त्यां आवीने पांचे पांडवोने द्रौपदीए पुष्पनी माला-वरमाळावडे चोतरफथी
वींटी दीपा अने द्रौपदी बोली. "आ पांच पांडवो में वर्या !"
स्यारवाद वासुदेव विगेरे हजारो राजाओ मोटामोटा शब्दथी बोल्या. अहो ! द्रौपदी राज्यकन्या सारं वरी एम कही स्वयंवर
मण्डपनी वहार नीकळी पोतपोताना आवासो विपे आल्या अने धृष्टद्युम्नकुमारे पांचपांडवोने द्रौपदी राजकन्या सह स्थविषे साडी
कांपीत्यपुर नगर मध्ये स्वभुवनमा पृष्टद्युम्नकुमार ला गया. ते वार पछी द्रुपदराजाए पांचपांडवो तथा द्रौपदीने पाटला उपर बेसाडावी,
सोनाना कळसोवहे मजन करावी, अग्नि होमनी क्रिया करावरावी, यावत् द्रौपदीनो पांच पांडवो साथे हस्तमेळाप (लग्नक्रिया) कराव्यो,
द्वितीय
विमागे
श्रीअपरक०
पांडवो
साथे
लग्नादि
क्रिया।
॥१७॥
ॐEE
॥१७॥
दुपर राजाए कन्यादानमा आठ करोड हिरण्य, पणुं धन, सो, तेम दासीओ पिगेरे आ{ मने वामदेव वगेरे राजामोर्नु सन्मान करी विवाय कर्या रयारपठी पांदुरानाप. वासुदेव बिगेरे हजारो राममोने ये हाय चोढी माए सर्वे मारा पर उपकार करी मा लग्नमहोत्मर उपर हस्तिनापुर नगरे जल्दी पधारजो!! तेती विनंति करी. आधी मर्वे राजाओ जवा वैयार श्या. ते कार पछी पांडुरा जाए कौटुबिक पुरुषोंने हस्तिनापुरे सात मजलाना पांच महेलो तैयार करावा मोकल्या, तेओर पण बह जल्दी पांचे महेलो तैयार कर्या. त्यारगद पशिगजा, पांग पाण्दयो अने द्रौपदी देवी सहित अध-हायी विगैरे सैन्य सहित त्यांनी नोकळी हस्तिनापुर नगरे माज्या मने पांदुराजाए आमा पारा वासुदेव गिरे हजारो राजाओ माटे कौनिकपुरुषो पाने आपासो तैयार करावी, आरना एरा वासुदेर गिरे हजारो राजाप्रोनु मन्मान-गरकार करी ययायोग्य तेमने आपासो आप्या, अने तेओने योग्य एरा आहारो-गणी विगेरे कोटुमिका पुलो साथे मोकल्या. पद्विराजाए पारपांदो अने द्रोपदी देवीने याजोउ उपर वेसाडी कलगोरडे मान करानी लग्न सम्बन्धी मंगल- क्रिया करा लाग पर पपारे राजामोनुं योग्य सन्मान करी विदाय कर्या. ते वार पड़ी पांचे पांडनो द्रौपदी देवीनी माधे अन्तःपुरना परिगा मदिन एक एक दिश्मना पारा प्रमाणे मोग भोगवता पिनरवा लाग्या. नारद मुनिनुं पागमन-अपरकंका प्रति गमन. एक सगमे पार पांडो-मोतीदेवी-गो द्रौपती पुरापपू तेग मंत.पुरना परिवार सह अन्तपुरमा पांदुराजा मिहामन विगे ठा दसा, ते समगे देगागा गति भद्रक-ग्निीत लागता पर इदय पिप मलिन, एक बमचर्यमत धारण करवाने ला मध्यस्थपनाने पामेना, देमनार भामितीने झाला लागे तेगा, सान्-अमंद-उगल वामने पहेरेला, पक्षस्यले फाई मृगचर्म धारण करेला, हायमा दंड Ca
Lutfie
नवाली.
१०३०
भीझाता-
द्वितीय-
विभागे
श्रीअपरक०
नारदर्नु
आगमन।
॥१८॥
अने कमण्डल राखेला, जटारूपी मुकुटवडे शोमता, रुद्राक्षनी माळारूपी आमरणो धारण करेला, मुंज जातिना घासनो कंदोरो पहेरेला,
हाथमां कच्छपी नामनी वीणाने धारण करेला, संगीतना प्रेमी, आकाशगमन करवानी शक्ति होवाथी पृथ्वी विषे अल्प प्रमण करनारा,
अने आवरणी, अवतरणी, उत्पतनी, श्लेषणी, संक्रामणी, अभियोगिनी, प्रज्ञप्ति, गमनी अने स्तंभिनी आवी घणी विद्याधरनी विद्याओमां
निपुण होवाथी जेमनी कीर्ति प्रसिद्ध हती, बलदेव, वासुदेव, तथा प्रद्युम्न आदि कुमारोने प्रिय, कलह, युद्ध अने घणा लोकोनो
कोलाहल थाय ते प्रिय छे जेने एवा, मांडन बोलवानी इच्छावाळा, युद्धो जोवामां रसिक, वीजाओने कलह-करावी असमाधि करा-
वता आवा अनेकप्रकारना गुणवाला नारदनामना मुनि घणास्थाने फरता फरता हस्तिनापुरमा आवी अत्यंतवेगथी पंडुराजाना महेलमा
उतर्या, पण्डुराजा-पांच पांडवो कुन्तादेवी सह आसनथी उभा थया, अने नारदऋपिनी सन्मुख सात आठ पगला गया, तेम
वंदना-नमस्कार फरी महापुरुषने योग्य आसनवडे आमन्त्र्या, नारदऋषिए भूमिविये पाणीनां छांटणां छांटी, दर्भने ते पर पाथरी
तेना विपे आसन कथु, अने नारदजी ते आसनपर वेठा. बेसीने पंडुराजाने तेमना तथा अन्तःपुरना कुशल समाचार पुण्या, पण्डुराजा
विगेरे ए तेमनो आदर सत्कार कर्यो.
किन्तु-असंयत, अविरति, पापकर्मनां पचक्साण नहिं करेला, समकित नहीं पामेला एवा नारदने जाणी द्रौपदीदेवीए नारदजीने
बन्दना-नमस्कार-आदर के सत्कार न कर्या, सन्मुख उमी पण थइ नहीं, आथी नारद मनमा विचारवा लाग्या के अहो आ द्रौपदी
पोताना रूपवडे अने पांच पाण्डवो रूपी पतिवडे अभिमानी थयेली होवाथी मारो आदर करती नथी, यावत् सेवा करती नथी, माटे
एन कंहक अप्रिय करुं आq चिन्तवी, जवा माटे पण्डुराजानी रजानी रजा लइ, आकाशमार्गे गमन करता लवणसमुद्रमध्ये थई पूर्व
॥१८॥
सन्मुख जतां धातकीखण्डनी पूर्वदिशामां आवेला दक्षिणार्ध भरतोत्रविपे अपरकंका राजधानी विपे सातसो राणीमो छे जेने एवा पद्मनाम नामना राजाना महेलमा उतर्या, अहिं पाण्डुराजानी जेम तेमनो आदर-सत्कार पद्मनाभ राजाए कर्यो, अने पोतानी अन्त:- पुरीना रूपयी आधर्य पामेला पद्मनाम राजाए पूछयु के-आप धणी अन्तःपुरीमा जाव छो तो मारा करतां अधिक रूपवाळी अन्तेपुरी कोइ ठेकाणे तमे जोर छे! नारदजी कंइक हस्ता कहेवा लाग्या के द्रौपदीना एक पगना अंगुठाना रूपना सो मा मागे पण तारी अन्तःपुरीनी स्त्रीओ नथी. तुं तो कुवाना देडका जेबो छु !! आ प्रमाणे नारदजी कहीने रजा लइने चाल्या गया. द्रौपदी, अपहरण- द्रौपदी पर आसक्त थयेला पद्मनाभराजाए अट्ठमनो तप करी आराधी पूर्वसंगतिक नामना देवने योलाव्यो, अने कथु के-हे देवा- नुपिय ! तमे द्रौपदीने मने लायी आपो ! एम हुं इच्छु छु. पूर्वसंगतिकदेवे पद्मनामराजाने जणाव्यु के-एवं थयु नथी, यतुं नयी तेम थशे नही के-"द्रौपदी देवी पांच पाण्डवोने मूकीने बीजा कोइ साये कामभोग भोगवती छती विचरे !" छतां तारुं प्रिय करवा माटे द्रौपदीने जस्दी सही लावू छु एम कही हस्तिनापुरे जइ ज्यां युधिष्ठिर राजा द्रौपदीदेवीनी साये महेलनी अगाशी विपे सुना हता, स्यां गयो भने द्रौपदीने अवस्वापिनी निद्रा आपी हरण करी पद्मनाभराजाना अशोकवनषि स्थापी, अवस्वापिनी निद्रा सहरी, पद्मनाम- राजाने सपर आपी, पद्मनाभराजाने कयु के-हये आ हकीकतमां तने जे मुश्केली याय तेमां हुं मदद करीश नहिं । एम कही पोताना स्थाने देव चाल्यो गयो. योडीवार पछी जामत थयेली द्रौपदीदेवी पोताने अन्यस्थाने जोई विचारवा लागी के-कोइ देव-दानव यावत् गंधर्व कोइ CE नवाङ्गी- ०५० भीमाता- धर्मकपाले द्वितीय- विमागे श्रीअपरकन द्रौपदीनु ५। अपहरण। अन्य राजानी अशोकवाटिका विष संहरीने मने लान्यो छे. आम विचार करवामां ज्यां गरकाव थइ त्यां तो अलंकारोधी विभूषित थयेलो अने पोताना अंतःपुरथी परिवरेलो पद्मनाभराजा आन्यो अने द्रौपदीने कहेगा लाग्यो के -तुं चिन्ता न कर ! में तारु अपहरण कराव्यु छ ! तुं मारी साथे भोग भोगव ! द्रौपदी देवीए तेना जवाबमां जगाव्यु के-हे देवानुप्रिय ! जंबूद्वीपना भरतक्षेत्र विष मारा पतिना माता कृष्ण वासुदेव छे, ते जो छ मास सुधीमां म्हारी व्हारे नहीं आवे तो हुं तमे कहेशो तेवी आज्ञामां हुं रहीश-वर्तीश । द्रौपदीनी आ वात अंगीकार करी पद्मनाभराजाए कन्याओना अन्तःपुरमां द्रौपदीने राखी. कन्याओना अन्तःपुरमा रहेली द्रौपदीदेवी निरंतर छट्ठनो तप करे छे, अने पारणे आंबिल करती तपकर्मवडे आत्माने भावती थकी रही छे. द्रौपदीनी शोधमा पांडवादि- आ तरफ अंतर्मुहूर्त पछी जागेला युधिष्ठिरे पोतानी पासे द्रौपदी न जोवाथी शय्यामाथी उमा थइ चोतरफ शोधखोळ करी परन्तु द्रौपदीनी माहिति न मळवाथी पांडुराजा हता त्यां आव्या भने द्रौपदीदेवीने कोइ देव आदि हरी गयो छे माटे तेनी गवेषणा करवाने इच्छं छु तेम कयु. पांडुराजाए पण फौटुम्बिक पुरुषोने कही आघोषणा करावी मोटुं इनाम जाहेर कयु छतां कंइ पत्तो न मळ्यो, त्यारे पांडुराजगए कुंतीदेवीने द्वारकानगरीमा कृष्णवासुदेव पासे तपास कराववा मोकली. कुंतीदेवी हस्ति पर बेसी द्वारकानगरीना उधानमा आवी, हस्ति परथी उतरी कौटुम्बिकपुरुषो मारफते कृष्णवासुदेवने खबर आपी के तमारा फोइ कुंतीदेवी उद्यानमां आव्यां छे, तेओ तमारा दर्शननी इच्छा राखे छे. कृष्णवासुदेव आ समाचार श्रवण करी हस्ति उपर बेसी तूरत कुंतीफोइनी पासे गया अने कुंतीफोइने पगे लागी हाथी पर बेसाडी, पन्ने (कुंती अने कृष्ण) कृष्णवासुदेवना महेल आव्या; महेल विषे आवी भोजन आदि कर्या पछी कृष्णवासुदेवे का कुंतीफोइने अर आगमन्नुं प्रयोजन पूछा, कुंतीर द्रौपदीना अपहरणयी यावत् शोर करतां नहीं प्राप्त थवानी हकीकत कही भने शोधी आपवा जणान्यु. कृष्णवासुदेवे फइने जणाव्यु के हुं जो कोइ स्थाने तेनो पत्तो पासु वो पाताल के भवनमा अयवा अर्धमरतमांयी म्हारा हाये शोधी लावीश. आम कही कुंतीफहनुं सत्कार-सन्मान कर्य, अने जवा माटे रजा आपी, कुंती पण हस्तिनापुर नगरे पाठां आयी गया, कृष्णवासुदेवे पोताना माणसो पासे तपास करावा मांडी, एवामां एक वखत नारद त्यां आव्या. तेमनो यथायोग्य सत्कार कर्यो अने ज्यारे नारदजीर कुशळना पूछी त्यारे द्रौपदीना हरणनी वात कहीने पूछयु के तमे घणा स्याने फरो छो तो तमे कंह मनर-पो जाणो छो! नारदजीए कधु के-घातकीखण्डना दक्षिणार्द्ध मरतक्षेत्र विषे अपरकंका नामनी राजधानी विपे पद्मनाम नामना राजाना महेलमा पूर्व में जोयेली एवी द्रौपदी हेवी हती. कृष्णवासुदेवे नारदजीने कछु के-आ कार्य तमारुंज जणाय छे. नारदजी तो आ श्रवण करतांज त्यांची आकाशमार्गे चाल्या गया. तेवार पछी कृष्णवासुदेवे हस्तिनापुरनगरे पोतानो दूत मोकली द्रौपदीनी माहिती जणावी अने चतुरंग सेना सह पांच पांडवोए पूर्व दिशाना समुद्ने कठि आवी म्हारी राह जोता रहेवू तेवो खबर आपी. पांडवो पूर्व समुद्रना कांठे चतुरंग सैन्य सहित जइने फणयासुदेवनी राह जोगा राग्या. हष्णवासुदेव पण पोतानी पतुरंगसेना सहित पूर्वसमुद्रना किनारे आल्या अने पांचपाण्डवोने मळ्या; ते पछी पोपयशालामा पपेशी अट्ठगनो तप करी मुस्थितदेवनी भाराधना करी प्रत्यक्ष फों अने द्रोपदीनी मददे जवा पांच पांडवो सह मने लवणसमुद्रमा मार्ग पापो ते जणाव्यु, सुस्थितदेवे जणाव्यु के-जेसी रीते पद्मनामराजाए पूर्वसंगतिक देवमारफते द्रौपदीनू अपहरण कयुं छे तेनी SUCCER-CA
नवानी-
१०५०
भीझावा-
धर्मकथा)
द्वितीय
विमागे
श्रीअपरकं०
सुस्थित-
देवर्नु
कथन।
३२०॥
रीते हुं द्रौपदीने उपाडी हस्तिनापुर विषे मूकुं ! के ते पद्मनाभराजाने तेना नगर, सैन्य अने वाहन सह लवणसमुद्रमां ना ! आम
ज्यारे सुस्थितदेवे पूछयु त्यारे कृष्णवासुदेवे जगाव्यु, हे देवानुप्रिय ! तुं तेम न कर, पण अमने छने रथ सह जवा माटे मार्ग आप! हुं
पोतेज द्रौपदीदेवीनी मददे जइश. आम कहेवाथी सुस्थितदेवे समुद्रमा जवानो मार्ग आप्यो. कृष्णवासुदेवे तथा पांच पांडवोए सैन्यने
पार्छ मोकल्यु. अने छए जणा रथमां वेसी लवणसमुद्रमा यइ अपरकंका राजधानीना उद्यानमा आवी, रथने स्थापन कर्या, अने दारुक
नामना पोताना सारथिने दूतपणे, पद्मनाभराजा पासे मोकल्यो.
पदनामसाथे युद्ध, अने विजयादि-
दारुकसारथि, दूत थइने अपरकंका राजधानीमा प्रवेश करी पद्मनाम राजा पासे गयो अने वे हाथ जोडी जय जय शब्दथी
वघावी बोल्यो के-हे राजन् ! आ मारी पोताना विनयनी क्रिया छे, हवे आ मारा स्वामिना पोताना मुखथी कहेली तमने आज्ञा छे !
एम कही जल्दी नेत्र लाल करीने क्रोध करीने पोताना डावापगे तेना पादपीठने दवावी भालाना अग्रभागवडे लेख आप्यो अने
कृष्णवासुदेवे द्रौपदीनी मददे आव्यानी हकीकत जणावी. द्रौपदीने आपो !! अथवा युद्ध माटे तैयार थाव !!! तेम जणाव्यु. दारुक-
सारथिना आ कथनथी नेत्र लाल थयेला छे जेना, अने कपालमां भृकुटि व्रण वळीयावाळी पडी छे जेने एका पदनामगजाए कह्यु के हुं
द्रौपदीने पाछी नहीं आपुंजा युद्ध करवा तैयार थइने नीकलु छु. हे दूत ! फक्त राजनीतिमा दूत अवध्य छे तेथी तने मारतो नथी
एम कही पाछलाद्वारथी काढी मूक्यो, दूते जहने सर्व वीना कृष्णवासुदेवने कही, युद्धने माटे आवता पद्मनाभने जोइ कृष्णवासुदेवे
पांच पांडवोने. कर्दा के-हे पालको ! तमे पद्मनाभनी साथे युद्ध करशो! के हुं युद्ध करुं अने तमे जोशो! आना जवाबमां पांच
॥२०॥
पांडवोए कयु हे स्वामि ! अमे युद्ध करशुं, तमे दूर रहीने जुओ. तेवारपछी पांचे पांडवो शम्रोधी सब थइ रयमा वेसी पद्मनामराजानी समीपे भावी युद्ध करवा लाग्या पद्मनामराजाए पांचे पांढयोने शत्रयी प्रहारो कर्या अने तेमना अहंकारने तोडी नाख्यो. ध्वजा-पताकाओने तोडी नाखी नशाडी मूक्या, इष्णवासुदेव आ जोहने तेमने मळ्या अने पूछयु के तमे शुं वोलीने युद्ध करवा लाग्या हता ! पांडवोए जणाव्यं के हमे जणाव्यु के " आजे अमे अथवा पद्मनाम राजा" एम कही युद्ध करतां आम बन्युं छे. कृष्णमहाराजे कयुं के तमारे " अमे राजा पद्मनाम राजा नहीं आम फही तमे युद्ध कयु होत तो आम यात नहीं. एम कही कृष्णवासुदेव पोते युद्ध करवा सज्ज यइ " हुंज राजा!!! पद्मनाभ राजा नहीं" एम प्रतिज्ञा करी रथ पर आरुद्ध थइने ज्यां पद्मनाभराजा हतो त्यां आव्या. आवीने पांचजन्यशंखने पोताना मुम्बना वायुथी वगाल्यो, ते शंसना अवाजयी पद्मनामराजानुं त्रीजा माग- सैन्य हणायुं यावत् नाशी गयु. तेगरपछी कृष्णवासुदेवे सारंगनामनुं पोतानु धनुप हाथमा लेइ तेनो टंकारव कर्यो, टंकारवने श्रवण यतां पद्मनाभराजानो सैन्यनो चीजो-पीजो भाग हणायो अने नाशी गयो. आ जोह पद्मनामराजा पराक्रमरहित थयो यको अपरकंका राजधानीमां पेशी गयो भने दरवाजा बरा करी दीधा. आयी कृष्णवासुदेव अपरकंका राजधानीए आव्या अने दरवाजा वन्ध जोइ रथमांथी नीचे उतरी वैक्रिया समुद्घात फरी नरसिंहरूप विकु ने मोटा शब्दो करता जोसपूर्वक पगर्नु आस्फालन करवा लागवाधी अपरकंका राजधानीना किल्ला- दरवाना-दारुमा-तोरणो मोटा मोटा महेल जमीनदोस्त धया. पद्मनामराजा आ स्थिति जोइ भयभीत बनेलो द्रौपदीदेवीना शरणे गयो. द्रौपदीदेवीए ठपको आपी जणायुं के हे देवानुप्रिय ! तमे स्नान करी एक पहेरेलं अने चीजें ओदेलं एम वे यस्रो जलपडे नीतरता नवाणी- १०० श्रीज्ञाता- धर्मकथा) राखी पहेरेला वस्त्रथी नीचे मुख राखी अन्तःपुरनी राणीओ, प्रधान सहित श्रेष्ठ रत्ननु मेटणुं लेइ मने आगल फरी कृष्णवासुदेव पासे जाओ, उपमपुरुषो प्रणाम करनारा पुरुषो पर प्रसन्न थनारा होय छे. द्रौपदीदेवीना कह्या प्रमाणे सर्वे करीने कृष्णवासुदेव पासे शरणे गयो, पगे पडी पोतानी मूलनी क्षमा याची द्रौपदीदेवीने पाछी सोपी. द्रौपदीदेवीने रथमां वेसाडी ज्यां पांडवो हता त्यां आवी कृष्ण- वासुदेवे पाच पांडवोने पोताने हाथे सोंपी. त्यारपछी पांच पांडवो सहित कृष्णवासुदेव रथमां बेसी लवणसमुद्रमध्ये थइ जम्बूद्वीपना भरतक्षेत्रे जवा माटे चाल्या. पदनामराजाने देशनिकालनी थयेली शिक्षा- ते काळे ते समये धातकीखण्डना पूर्वदिशाना अर्धभागविषे भरतक्षेत्रनेविषे चंपा नगरी छे, त्यां पूर्णभद्र नामर्नु चैत्य हतुं. त्यां मुनिसुव्रतनामना तीर्थकरनी पर्षदामा कपिल नामना वासुदेव धर्म श्रवण करता हता, ते समये शंखनो शब्द सांभली अध्यवसाय थयो के-शुं आ मरतक्षेत्रमा बीजो कोह वासुदेव उत्पन्न थयो छे के-जे मारासमान शंखने वगाडे छे । ते समये मुनिसुव्रत तीर्थकरे कपिल वासुदेवने कह्यु के तमने शंखनो शब्द श्रवण करी एवो विचार आन्यो के शुं आ क्षेत्रमा बीजो वासुदेव उत्पन्न थयो छे ! ते सत्य छे. प्रमुना प्रश्नको उत्तर हा प्रमु ते सत्य छे. मुनिसुव्रत तीर्थकरे जणाव्यु के-हे कपिल ! वासुदेव ! आ थयुं नथी, थाय नहीं अने यशे पण नहि, के एक युगमां अथवा एक समयमां वे तीर्थकर, बे चक्रवर्ती, वे बलदेव अथवा बे वासुदेव उत्पन्न थाय, परन्तु हे कपिल ! वासुदेव ! जम्बूद्वीपना भरतमाथी हस्तिनापुर नगरथी पद्मनामराजाए पूर्वसंगतिकदेवद्वारा द्रौपदीदेवी, हरण कराव्युं छे, तेथी द्रौपदीनी मददे पांच पांडवो सहित कृष्णवासुदेव छट्ठा रथमां बेसीने आव्या छे, तेओ कृष्णवासुदेव पद्मनामराजानी साथे युद्ध करे छे, तेमां थतो द्वितीय- विमागे श्रीअपरकं द्रौपदीने शरणे गयेल पानामा ॥२१॥ RE ॥२१॥ ( आ शंखनो शब्द तारा श्रवणमां आव्यो छे. आ श्रवण करी श्रीमुनिसुव्रतप्रमुने वंदना-नमस्कार कर्या अने कह्यु के-हे प्रभु ! हुं जइने पुरुषोमा उत्तम एवा कृष्णवासुदेवनां दर्शन करूं, प्रमुए कर्बु के-हे कपिलवासुदेव ! आई थयुं नथी, थाय नही अने यशे पण नहीं. के एक अरिहंत चीजा अरिहंतने, एक चक्रवर्ती वीजा चक्रवर्तीने, एक बलदेव वीजा वलदेवने अने एक वासुदेव बीजा वासुदेवने जुए, तो पण हे कपिल ! वासुदेव ! लवणसमुद्रना मध्यभागे थइने जता एवा ते कृष्णवासुदेवनी श्वेत अने पीली एवी बजाना अग्रभागने तमे जोशो. ते वार पछी कापिलवासुदेव प्रमुने वन्दना-नमस्कार करी हस्ति पर बेसी समुद्रकांठे गयो अने लवणसमुद्र मध्ये थइ जता एवा कृष्णवासुदेवनी ध्वजाना अग्रभागने जोयो अने शंख वगाडयो. कृष्णवासुदेवे ते श्रवण करी पोताना पञ्चजन्य शंखने वगाडयो एम करी शंखना अवाजो द्वाराए मेलाप कर्यो. ते वार पछी कपिलवासुदेव अपरकंका नगरीए गया अने घरो विगेरे पड़ी गयेला जोया, पद्मनाभ राजा तेमनी पासे आन्यो अने कृष्णवासुदेवना आगमननी बीना आमूली जणावी, तमने पण ए कृष्णे न गणकार्या ! कपिलवासुदेवे पदनाम राजाने हदपारनी शिक्षा फरमावी अने तेना स्थाने पद्मनाम राजाना पुत्रनो अभिषेक करावी राज्यगादीर बेसाज्यो. पांच पांडवोने देशनिकाल. आ बाजु कृष्णवासुदेवे लवणसमुद्रना मध्यभागे थइ गंगानदीनी पासे आल्या त्यारे पांच पांडवोने कह्यु के-तमे गंगानदी उतरो ।, हुं लवणसमुद्रना अधिपति सुस्थितदेवने मळी आq छु. कृष्णमहाराजानी आज्ञा पामेला पांचे पांडवो गंगानदी हती त्यां आन्या अने P
नवाङ्गी
द्वितीय-
विमागे
श्रीअपरकं०
पांडवो
भीबाता-
धर्मकथाङ्गे
॥ २२॥
निकाल।
एक नानी होडी शोधी काढी तेमां वेसी, नदी उतरी सामे कांठे गया. अने कृष्णवासुदेव पोताना मुजायलथी गंगा महानदी उतरंवा
समर्थ छे के नहीं ते जोवा माटे पेली नावडी संताडी दीधी. कृष्णवासुदेव सुस्थितदेवने मळी गंगा महानदीए आव्या अने चौतरफ
नावडीनी तपास करवा लाग्या परन्तु नावडी मळी नहि. आथी एक हाथे सारथि घोडा सह रथने ग्रहण कर्यो भने वीजा हाथथी साडी
वासठ योजन विस्तारवाळी गंगा महानदी उतरवा लाग्या. अधमार्गे आवतां परसेवो थयो भने थाकी गया. आथी विचार आव्या के-
अहो पांच पांडवो महाबलवान छ, आवडी मोटी नदी उतरी गया. कोइ पण कारणे पद्मनामराजाने तेओए हण्यो नही अने नसाडी
मूक्यो पण नहीं, आ वखते गंगादेवीए कृष्णवासुदेवना परिणाम जाणी ते जग्याए स्थळभूमि करी तेना पर कृष्णवासुदेव थोडीवार
थाफ उतारी आगल नदी उतरी यावत् पांच पांडवोने मळ्या अने तेमना बलना वखाण कर्या त्यारे पोते जणाव्यु के-अमे होडीथी
उतर्या हता परन्तु बळ जोवा नावडीने छुपावी तमारी राह जोता अहीं रचा छीए! आ श्रवण करी क्रोध पामी कपालमां भृकुटी करी
कृष्णवासुदेव कहेवा लाग्या के-अहो । ज्यारे में ये लाख योजनना विस्तारवाळा लवणसमुद्रने उतरी पद्मनाभने हण्यो यावत् नसाडी
मुक्यो अने अपरकंका भांगी द्रौपदीने हाथ करी त्यारे तमे म्हारं माहात्म्य जाण्युं नहीं, हवे तमे जाणशो ! आम बोली लोहदंडथी
पांचे पाण्डवोना रथने चूरी नाल्यो अने देशनिकालनी आज्ञा करी, जे स्थाने आ आज्ञा फरमावी ते स्थाने रथमर्दन नामर्नु तीर्थ थयु.
कृष्णवासुदेव पोताना स्कंधावारने मळ्या अने ते स्कंधावार सहित द्वारकानगरीए आन्या.
पांडवोए पांडुमथुरा नामनी नवी वसावेली नगरी.
द्रौपदीदेवी सह पांच पांडवो इस्तिनापुर नगरे आव्या अने पांडुराजाने द्रौपदीनी प्राप्तिथी मांडी हदपारनी सजानी हकीकत जणावी,
॥२२॥
पाडुरानाए ठपको आप्यो अने कुंतीदेवीने आ हकीकत जणावीने द्वारका नगरीए कृष्णवासुदेव पासे मोकली. कृष्णवासुदेव पासे जवा कुंतीदेवी हाथी पर सी गया. पांडुराजाथी आज्ञा पामेली कुतीदेवी द्वारकानगरीना उद्यानमा आवी, अने कौटुम्विक पुरुषोवडे पोताना आगमननी सवर कृष्णवासुदेवने आपी. कृष्णवासुदेव पूर्वनी जेम सन्मुख जइ महेले कुंतीफोइने लान्या अने आगमन, कारण पूछयु. कुंतीफोइए आगमननुं कारण जणावर्ता जणान्युं के हे पुत्र । तमे पांच पांडवोने देशनिकालनी आज्ञा करी छे. तमे तो समग्र दक्षिणार्ध मरतना स्वामि छो तेथी तेओ क्या जइने रहे ! कृष्णवासुदेवे कुंतीफोइने जवाय आपतां जणान्यु के-हे फोइ ! वासुदेव, बलदेव अने चक्रवर्ती वगेरे उत्तम पुरुषोनुं वचन मिय्या थाय नही तेथी दक्षिण दिशाना समुद्रकांठे जाय अने पांडुमथुरा नामनी नवी नगरी वसावी रहे, तेम म्हारी दृष्टिमा न आवे तेम रहे, आम करी कुंतीदेवीनो सत्कार करी विदाय काँ. हस्तिनापुर नगरे कुंतीदेवीए आवी पांडुराजाने सर्व हकीकत जणावी अने पांडुराजाए पांचे पांडवाने कृष्णवासुदेवनी आज्ञा जणावी, पांचे पांडवो ए वात कबुल फरी समुद्रकाठे आवी पांडुमधुरा नामनी नगरी वसावी तेमां रहेवा लाग्या. पांच पांडवोए द्रौपदीदेवी माथे लीघेली प्रव्रज्या. द्रौपदीदेवीने एक पुत्र जन्म्यो तेनु नाम पांडुसेन पाडयु. एकसमये धर्मघोप नामना स्थविर पांडमथुरामां पधार्या. तेमने वांदवा माटे पर्पदा नी फली तेर्मा पांच पांडवो गया अने धर्मश्रवण करी धर्मघोपस्थविरने विनंति करी के अमे द्रौपदीदेवीने पूछीए, तथा युवराज पाण्तुसेन कुमारने राज्य पर स्थापन करीए, त्यारपछी आपनी पासे दीक्षा लइए, आ सांभळी गुरु बोल्या के हे देवानुप्रियो । यथामुराम् पिलंग करशो नहीं ! पांचे पांडवोए महेले जइ द्रौपदीदेवीने पूछत्यारे द्रौपदीदेवीए हुं पण तमारी साये दीक्षा लइश तेम
भीमाता-
धर्मकया
जणाव्यु, त्यारपछी पांडुसेनने राज्यामिपेक करी राज्यगादीए स्थापन कर्या. पांडुसेन राजाए जल्दी दीक्षाभिषेकनी तैयारी करावी.
एक हजार पुरुषोथी उपाडाय तेवी शिविका करावी यावत् शिविकामां वेसाडी धामधूमपूर्वक श्रीधर्मपोपस्थविर पासे लाव्या अने
पांचे पांडवो दीक्षा लइ श्रमण थया. श्रमण थइने चौदपूर्वनो अभ्यास कर्यो. घणा वर्षों सुधी छट्ठ-अट्ठम-दशम-अर्धमासक्षमण-
मासक्षमणनी तपस्याओ करी आत्माने मावता थका विचरे छे, त्यारपछी ते स्थविर भगवंत एकसमय पांडुमथुरा नगरीना सहसाम्र.
वनउद्यानयी बहार नीकळी विचरवा लाग्या, ते समये श्रीनेमिनाथप्रभु विचरता विचरता सौराष्ट्रदेशमा विचरे छे तेवू पांडवमुनिओए
श्रवण फरी श्रीनेमिनाथप्रमुने वांदवा माटे पोताना गुरु धर्मघोष स्थविरनी आज्ञा मागी.
पांचे पांडवो केवलज्ञान पामी मोक्षे सीधाव्या.
गुरुमहाराजनी आज्ञा पामी युधिष्ठिर आदि पांचे पांडवमुनिवरोए विहार कयों अने गामानुगाम विचरता हस्तिकल्प नामना
नगरना सहसामवन नामना उद्यानविपे आव्या. युधिष्ठिरमुनि सिवायना चारे मुनिवरोए माससमणना पारणाने दिवसे पहेली पोरसीए
सज्झायध्यान कयुं अने वीजी पोरसीए ध्यान कर्यु ते पछी युधिष्ठिरमुनिवरनी आज्ञा पामी भिक्षा माटे फरवा लाग्या त्यां तेओए श्रवण
फयु के श्रीनेमिनाथममु उज्जयंतगिरिना(रैवताचलगिरिना ) शिखर विषे जलरहित एकमासना अनशनवडे पांचसो ने छत्रीस साधुओ
सहित मोक्षे पधार्या. आ श्रवण करी गोचरी फरता पाछा फरी युधिष्ठिरमुनिनी समीपमा आवी लावेला आहारपाणी आलोवी इर्यावहीयं
प्रतिक्रमी गोचरी युधिष्ठिरमुनिने देखाडी कयु के-गोचरी अमे श्रीनेमिनाथप्रमुना मोक्षे सिधान्याना समाचार सांभळता पहेला
वहोरेली छे, ते आपणे हवे परठवी दइ श्रीशQजयपर्वत पर धीमे धीमे चढी मरणनी अपेक्षा राख्या विना अनशन करतुं श्रेयस्कर छे.
द्वितीय-
विमागे-
श्रीअपरक०
पांडवो
साये
द्रौपदीनी
दीक्षा।
॥२३॥
॥२३॥
आ प्रमाणे अन्योअन्य नकी करी विधिपूर्वक गोचरी परठवी श्रीशत्रुजये आव्या भने श्रीशत्रुजये चया, श्रीशत्रुजय पर चढीने वे मासर्नु अनशन करी केवलज्ञान-केवलदर्शन प्राप्त करी सिद्धिपदने पाम्या. द्रौपदीसाधी काळ करी पांचमा देवलोकमा उत्पन्न थइ. द्रौपदीदेवीए सुनताआर्यानी पासे दीक्षा-प्रग्रज्या लइ अगिआर अंगनो अभ्यास कर्यो अने एक मासर्नु अनशन स्वीकारी आराधनापूर्वक कालधर्म पामी पाँचमा देवलोकमां-बझलोकमां दश सागरोपमना उत्कृष्ट आयुष्यवाला देवपणे उत्पन्न थइ. श्रीजम्बू- स्वामिए-श्रीसुधर्मास्वामिमगवन्तने पूठ्यु के हे.अमु ! ते द्रुपददेव त्यांची व्यवीने क्यां जशे ! भगवाने कयुं के-हे जम्बू ! ते दुपद- देव त्यांची च्यवी महाविदेहक्षेत्रमा उत्पन्न थइ सर्वकर्मनो अंत करी मोक्षे जशे. उपनय-तपनो क्लेश घणो कर्यो होय तो पण नियाणाना दोपथी जो तेने दूषित करवामां आवे तो ते तप मोक्षने माटे थतो नयी. तेम भक्तिरहितपणे कडवा तुम्बडानुं खराब दान पात्रने विषे आप्युं तेथी नागश्रीने घणा भव भटक पडयु. आथी नियाणा विनानो तप करयो तेम सुपात्रदानमा भक्ति सहित दान देवु ते श्रेयस्कर छे. इति श्रीज्ञातासूत्रना सोळमा अध्ययननो सारांश समाप्तः॥
नवाणी-
१०३०
भीज्ञावा.
धर्मकया
द्वितीय-
विभागे
श्रीअवज्ञा
५ पूर्वापर-
संबन्धादि।
॥२४॥
॥१७-श्रीअश्वज्ञात-अध्ययन सारांशः॥
पूर्वापर-संबंधादि.
सोलमा अध्ययनमा नियाj करवाथी तेम निंदनीयदान करवाथी अनर्थनी प्राप्ति थाय छे ते कडुं. आ सवरमा अध्ययनमा
इन्द्रियोने कावूमा न राखनारने अनर्थ प्राप्त थाय छे ते जणावे छे-
श्रीसुधर्मास्वामि गणधरमगवान् कहे ले के-हे जम्बू ! ते काळे अने ते ममये हस्तिशिर्ष नामे नगर हतुं. त्यां कनककेतु नामनो
राजा राज्य करतो हतो, तेम ते नगरमां घणा-घणा देशांतर जइ वेपार करनारा अने वहाणना साधनथी धंधो करनारा धनाढ्य
वेपारीओ हता. एक वखत नाववणिकोए मेगा मली विचार करी व्यापार माटे वहाणो लइने लवणसमुद्र विषे चाल्या. केटलाक गाउ
गया त्या तो घणा उत्पातो थवा लाग्या, प्रतिकूल वायुवडे नावो आमतेम डोलवा लागी, मुख्य खलासी आवा सकट समयमा मुंझायो
अने पोतानुं समुद्र सम्बन्धिन ज्ञान पण तेने विस्मरण थयु. आ समये घणा (पावडी चलावनारा)-हलेसां मारनारा-कूवाना रक्षक,
सदना रक्षक तथा सांयात्रिको मुख्य खलासी पासे आव्या, अने विचारमग्न थयेला मुख्य खलासी-निर्यामकने पूछवा लाग्या के-तमे
शुविचार करो छो ! आ प्रश्नना जवाबमा निर्यामके जणाव्यु के-हे भाग्यशाळीओ ! मारी मति खरेखर नाश पामी छे. आ श्रवण
फरी सर्वे भयमीत ययेला इन्द्र-स्कंघविगेरे देवोनी मानता करवा लाग्या. एक मुहूर्त पछी निर्यामकनी बुद्धि चाली अने समुद्र-
शामना ज्ञानने पाम्यो अने कछु के-आपणे कालिकद्वीपनी समीपमा आन्या छीए तेम सामे देखातो कालिकद्वीप छे.
३
॥२४॥
कालिकद्वीपे आगमन. आ श्रवण करी सर्वे हर्पित ययेला अनुकूल वायुवडे कालिकद्वीप आल्या अने वहाणने लंगारी नानी होडीओवडे कालिक- द्वीपमा उतर्या, ते कालिकद्वीपमा घणी एवी रुपानी खाणो, सोनानी खाणो, रलनी खाणो अने वज्रजातिना रलोनी खाणो जोइ तेम उपम लक्षणवाळा जुदा जुदा रंगवाळा घणा एवा घोढाओ पण जोया. वहाणमाथी उतरेला वेपारीओ विगेरेने जोइ तेम तेमनी गंधयी मय पामता अश्वो तो त्यांची नाशी घणा योजन दूर गया, आधी नाववणिको परस्पर आ प्रमाणे बोल्या के आ अधोवडे आपणने फांद प्रयोजन नथी. अहिं धणी एवी रुपा विगेरेनी खाणो छे तेनाथी आपणां वहाणो मरी लेवां ते कल्याणकारी छे तेम भन्यो अन्य नकी करी वहाणो भरीने दक्षिण तरफना अनुकूल वायुवडे गंभीरपोतवहनपट्टन हतुं त्या आल्या अने गाडाओमा रुपा आदिने मरीने गाढाओवडे हस्तिशीर्पनगरना उद्यानमां आवी गाडां छोड्यां. किंमति मेट' लेइने फनककेतु राजा पासे गया, अने राजाने भेटणु कयु. कनककेतु राजाए तेओने पूछयु के-तमे लवणसमुद्रमा वारंवार प्रवेश करो छो, तो तमे तेमां कोइ आश्चर्य जोयुं होय तो कहो ! नाववणिकोए कालिकद्वीपमा आश्चर्यम्त जोयेला अचोर्नु वर्णन कर्यु. तेओए करेला अर्चना वर्णनने श्रवण करी फनककेतु राजाए तेओने कधु के-तमे मारा कौटुम्बिक पुरुषो साथे त्यां जाओ अने त्यांची घोडा लायो ! नाववणिकोए कौटुम्धिक पुरुषो साथै जवा कबुल कयु. एटले कनककेतु राजाए कौटुम्पिक पुरुषोने आ पोडा पकडवानी तमाम सामग्रीपूर्वक नाववणिको सह कालिकद्वीपे जइ घोडा लेइ आववा जणाव्यु. इन्द्रियोने वश थयेला घोडाओर्नु फमावयु. कौटुम्बिक पुरुषो गाडी गाडां तैयार करीने तेमां श्रोत्रइन्द्रियने प्रिय लागे तेवा घणां एवां वाजिनो वीणाओ-वल्लकीओ-ग्रामरीओ-
नवाङ्गी-
जीवावा.
धर्मकपाङ्गे
द्वितीय
विमागे
सप्त-
दशाध्य०
इन्द्रिया-
धीनायो।
॥२५॥
कच्छपीओ अने भंभा विगेरे, तथा घणा एवा काठना पाटीया विपे चितरेला चित्रो, गुंथेली माळाओ आवी बीजी घणी एवी
चक्षुने व्हाली लागे तेवी वस्तुओ, धणी एवी कोठपुट विगेरे प्राण इन्द्रियने प्रिय लागे तेवी वस्तुओ, घणी एवी खांड-साकर-
गोळ विगेरे जिव्हा इन्द्रियने प्रिय लागे तेवी वस्तुओ अने घणा एवा रुथी भरेलां वस्त्रो, रलकम्बलो, ओढवानां वस्त्रो, मसरुनी
गादीओ गादलां वगेरे स्पर्शेन्द्रियने अनुकूल वस्तुओनां गाडां भर्या, भरेलां गाडांने लेइने पोतपट्टण आव्या अने वहाणो तैयार करी
वधी वस्तुओ वहाणोमां भरीने वहाणो मारफते अनुकूल वायुवडे कालिकद्वीप आव्या, द्वीपना किनारा नजीक वहाणो नांगरी होडीओ
मारफते वधी वस्तुओ किनारे लाव्या, अने घोडाओना वेसवाना-स्थानोए योग्य रीते वस्तुओ स्थापन करी, वाजिन्नो घगाडवा
राग्या. केटलाक अधो आ वस्तुओ विपे मूर्छा रहित थइ भय पामता ते स्थानेथी नाशी गया, अने केटलाक अश्वो आ वस्तुओ (
विर्ष मूर्छा पाग्या तेमने कौटुम्बिक पुरुषोए कपटथी, गळामां-पगमा पाशवडे बांध्या अर्थात् पकडीने बांधी लीघा. पकड़ी लीधेला
घोडाओने वहाणमा चढावी वहाण मारफते गंभीरपोतपट्टण बन्दरे आवी होडीओ मारफते घोडाओ अने वस्तुओ किनारे उतारी ते
घोडाओने, वस्तुओने लेइने हस्तिशीर्षनगरमा कनककेतु राजा पासे आल्या अने घोडाओ अर्पण कर्या. खुश थयेला, कनककेतु राजार
सर्वेनु सन्मान करी-सत्कार करी दाण माफ करी जवानी यावत् रजा आपी.
फसायेला घोडाओने पडेला दुःखो,
कनककेतु राजाए ते घोडाओने शिक्षा आपवा सारु अश्वपालने बोलावी आप्या, अश्वपाले ते घोडाओ अश्वशालामा लेइ जइ
मुखपंधनवडे, फानबंधनवडे, पुंछडाना वाळ बांधवावडे, खरीओ वाधवावडे, काडां बांपवावडे बांध्या, अने खसी कर्या, चौकठा
॥ २५॥
चढावी, नेतरनी सोटीवडे अने चावकवडे मार मारी तेमने विनीत कर्या, अने. कनककेतु राजाने अर्पण कर्या. आवी रीते ते समये ते अश्वो घणा दुःखी थया यावत् आखं जीवन बंधन पाम्या. कथा-उपनयः-आसकि नहीं पामी नाशी छूटेला घोडामओ मार खावावाळा न थया यावत् बंधन पाम्या विना यथेच्छ सुख मोगववावाळा थया, तेवी रीते जे साधु अथवा साध्वी-शब्द-रस-रूप-गंध-स्पर्श पदार्थो विपे आसक्त थता नथी ते आ लोक विषे पण पूजवा योग्य थाय छे अने संसारसमुद्रने तरी जइ मोक्षना अनन्त मुखो भोगवे छे. जेवी रीते आसक्ति पामवाथी फसाइ गयेला. अने तेथी दुःखनी परंपराने पामी यावत् जीवन बंधन पामेला अश्वो थया तेवी रीते जे साधु अथवा साध्वी दीक्षा लीघा पछी शब्द- रूप-रस-गन्ध-स्पर्शना विषयोमा आसक्त थाय छे ते आ लोकमां निंदनीय थाय छे अने अनन्त संसारमा भ्रमण करी दुःखोने पामे छे. ॥ इति श्री सत्तरमा श्रीज्ञाताध्ययननो सारांशः समाप्तः ॥ - ॥ अढारमा श्री सुंसमाज्ञात-अध्ययननो सारांश: ॥ चिलातिने काढी मुक्यो. पूर्वना १५ मा अध्ययतना सारांश विषे इन्द्रियवशवर्ति थवो अनर्थ अने जितेन्द्रियने थतो लाम कह्यो आ अढारमा अध्ययनमा लोमने वश नहीं थनारने थतो लाभ कहे छे. ते फाले ते समये ( महावीर प्रमु ज्यारे आ हकीकत जणावी रहा छे ते समये ) राजगृही नगरी विषे धन्य नामनो सार्थवाह
नवाही
भीडाता-
धर्मकथाओं
द्वितीय
विमागे
अष्टा-
दशान्य
चिलाविने
रजा।
॥२६॥
छे तेने भद्रावती नामनी भार्या छे अने धन, धनपाळ, धनदेव, धनगोप अने धनरक्षित नामे पांच पुत्रो अने सुसमा नामनी पुत्री हती,
तेम चिलात नामनो दासपुत्र हतो. आ चिलात वाळकोने रमाडवामां कुशळ हतो तेथी सुसमा बालिकाने रमाडतो तेम बीजां घणां
छोकरा-छोकरीओने, कुमार-कुमारिकाने रमाडतो हतो. केटलाक समय पछी ते चेलात दासपुत्र छोकरा विगेरेनी कोडीओ लाखना
गोळा, मोय, दडा, दींगलादीगलीओ, वस्रो, आमरणो, अलंकार हरी लेतो अने तेमना उपर आक्रोश करतो, तेमने मारतो, तेमनी
मश्करीओ करतो, आथी ते छोकराओ विगेरे रडवा लाग्या आथी तेमना मातापिताओए धन्यशेठने तेमना नोकर-चिलातना त्रासनी
हकीकत कही. धन्यशेठे चेलातने ठपको आपवा छतां चेलात छोकरा विगेरेने त्रास आपतो विरम्यो नहिं आथी धन्यशेठे चेलातने
काढी मूक्यो.
विजयचोरनुं मृत्यु.
धन्यशेठने त्यांची काढी मुकायेल चिलात राजगृहीना नाना मोटा वजारो विषे अने देवकुलो, डायराओ, परबो, जुगारखाना
स्थानो तेमज दारु( मदिरा )ना स्थानो विषे रखडतो-स्वच्छंदी-अंकुशविनानो थयेलो मदिरापान-चोरी अने मांस खावामां आसक्त
थयो यावत् जुगार वेश्या-परस्तीमां लंपट थयो अर्थात् साते व्यसनवाळो थयो.
आ समये राजगृही नगरीथी थोडे दूर अग्निखूणामां सिंहगुफा नामनी चोरपल्ली छे. ते चोरपल्लीमां पांचसो चोरोनो नायक विजय
नामे सेनापति हतो, ते अति पापिष्ठ हतो. चोरी करवामां बहादूर होवाथी तेने लोको शूरवीर-दृढप्रहार करनार साहसिक अने
शब्दवेधी कहेवा हता. आ विजयचोर, जारपुरुषो, गठीयाओ, विश्वासपातीओ, जुगारीओ, अने गुन्हेगारोने आश्रय आपतो अर्थात्
॥२६॥
तेओने शरणभूत यतो हतो, मा विजयचोर गामो विगेरेमां घाड पाडतो, गायो चोरवो अने लोकोने केद करतो. आम अनेक प्रकारे प्रजाजनोने कनडतो हतो. चिलात लोकोथी परामव पामवाथी विजयचोरने शरणे आव्यो अने रह्यो तेम विजयचोरनी साथे रही धाडो विगेरे पाडवा लाग्यो. चेलातनी होशियारी जोइ विजयचोरे चेलातने घणी चोरविद्याओ, चोरमन्त्रो, चोरनी मायाओ अने चोरना छळकपटोमां पारंगत को. एक समये विजयचोर काळधर्म पाम्यो. अर्थात् मरण पाम्यो. तेनी पांचसो चोरोए मळी बहोळी रिद्धिपूर्वक श्मशान यात्रा काढी अने तेनुं मृत्युकार्य कर्यु. सुंममार्नु अपहरणादि. घणी एवी विद्याओ अने वीरता चिलात पासे जोइ चोरोए मेगा थइ विजयचोरने स्थाने चिलातने स्थाप्यो. आथी चिलात पांचसो चोरोनो अधिपति थयो. अधिपति बनेला चिलाते पांचसो चोरोनुं सन्मान-सत्कार करी कर्यु के-राजगृही नगरमां धन्य नामे सार्थवाह छे ते घणो धनवान छे. धन्यसार्थवाहने पांच पुत्रो अने रूपवान सुंसुमा नामनी पुत्री छे. आपणे राजगृही नगरीमा जइ धन्य सार्थवाहनु घर लुटीए अने लुटमां.-जे धन, सोनू, वस्त्र आवे ते तमारे वघांये लेवु अने मारे सुसुमापुत्री ग्रहण करवी. वघाय चोरोए आ वात कबुल करी. चोर सेनापति चिलात पांचसो चोरो सह मंगलनिमिचे भींजायेला चर्म पर वेठो अने दिवसना छेल्ला पहोरे बरूवरो बांधी छातीए दालो पहेरी, म्यानोमाथी तलवारो काढी, पर धनुपो विषे पणचो चढावी बाणोने मूकवा माटे माथामांथी बाणो काट्या, बरछी-माला उछाळवा लाग्या, तेम जंघाए घुघरीओ लटकावी, शीघ्रपणे वार्जित्रो वगाडवा लाग्या अने सिंहनाद करता सिंहगुफामाथी नीकळी भवानी भीज्ञाता- धर्मकया द्वितीय- विभागे अधा- देशाध्यक सुंसमार्नु अपहरण । ॥२७॥ राजगृही नगरीथी थोडे दूरना जंगलमां संताया. मध्यरात्रिना समये ज्यारे लोको निद्रामा हता त्यारे पूर्व दिशाना दरवाजे आव्या अने चेलात सेनापतिए जलनी मसकमाथी थोडं पाणी लइ आचमन करी ताळा उघाडवानी विधान स्मरण कयु, अने दरवाजाना कमाड उपरा मन्त्रलं पाणी छांट्युं एटले दरवाजाना कमाडो उघडी गयां, खुल्ला थयेला दरवाजाथी सर्वेए नगरीमा प्रवेश कयों अने वोलवा लाग्या,-पांचसो चोरो सह चेलात सेनापती धन्यसार्थवाहने त्यां धाड पाडवा जाय छे, जेने नवी मातानुं दूध पीयूँ होय ते बहार नीकळो !!! एम वोलता बोलता धन्यसार्थवाहना घरे आव्या अने घर उघाडी लुटवा लाग्या. आ जोइ धन्यसार्थवाह पांच पुत्रो सह एक बाजु सताइ गया; चेलाते सुंसमान हरण कयु, अने पांचसो चोरे धन विगैरेनी छंट करी, राजगृहनगरीथी नीकळी गया. धनसार्थवाहे आजोइ नगररक्षकोनी पासे जइ कह्यु के-तमे मने सहाय करो, धन तमाएं अने छोकरी मारी, चालो! लश्करसहित धन्यसार्थवाह पांच पुत्रोयुक्त धाडपाडुओनी पाछळ पड्या अने युद्धमा हारी गयेला चोरो धन विगेरे छोडी नाशी गया. धन लइ लश्करना माणसो तो चाली गया, अने चिलाव सुंसमाने उपाडी वच्चे गाम न आवे तेवा मार्गे भागतो जोइ धन्यसार्थवाह पांच पुत्रोयुक्त तेनी पाछळ पड्यो. थाकी गयेला चिलाते पाछळ आवता धन्यसार्थवाह आदिने जोइ सुंसमावाळानुं पोतानी तलवारथी मस्तक कापी नास्यु अने ते मस्तक लइने जंगलमा चेलात नाशी गयो, अने निर्जन अटवीमा तृषाथी पराभव पामेलो दिशा मार्ग भूलेलो मरी गयो. . १ श्री आवश्यकसूत्रमा तेने 'मार्गमा साधु मळ्या तेमना मुखथी उपशम-संदर-विवेक था पदोने पामीने साधुना ठेकाणे कायोत्सर्गमा रही त्रणे पदोने भावतो कीडीओयी भासा शरीरे चालणी समान ययेलो शुभध्यानथी काळ करी देवलोको गयो तेम जणाभ्यु छे ॥२७॥ *" .
उपनय- जे साधु साध्वी प्रवज्या लेइनेवमनने झरनारा, अने नाश पामवाना स्वमाववाळा, शरीरनी शोमारूप माटे आहार करे छे, अर्थात् सापलोलपता भने विषयना पिपासु थाय छे ते साधु साध्वी चिलात दासपुत्र दुःखी ययो तेम दुःखी थाय छे यावत् श्रावक-श्राविका- ओने हीलना करवा लायक थइ दीर्घकाल संसारमा भटके छे. धन्यसार्थवाह पांचे पुत्रो सह चिलातनी पाछल दोडतां थाकी गया, आयी पकडवा असमर्थ थयेला पाछा फरतां सुसमापुत्रीनुं घढ जोह कुहाडायी कापेला चंपकना वृक्षनी जेम भूमि पर पड्या, अने ज्यारे सावधान यया त्यारे पणा समय सुघी विलाप करवा लाग्या. थाकनी साये तृपा लागवायी चारे दिशाए जलनी तपास करी पण जलनी प्राप्ति न थइ. धन्यसार्थवाहे पुत्रोने कयु केहे पुत्रो ! पाणी विना नगरीमा जवा अशक्त थयेला आपणे छए अहिं मृत्युं पामीशुं माटे हे पुत्रो ! तमे एम करो । मने जीवितरहित करो अने तमे सर्वे मारा मांस-रुधिरनो आहार करी स्वस्थ थई अटवी पार पामी राजगृहीमां जजो अने अर्थ, धर्म अने पुण्यना मागी थजो। जेष्ठपुत्र-हे पिताजी ! तमे अमारा पिता छो, गुरु छो, देवरूप छो, कप्पथी रक्षण करनारा छो तो हे तात ! अमे तमने कम जीवितयी दूर करीए ! तथा तमारा मांस-रुधिरनो आहार के करीए ! तेयी हे पिता ! तमे मारा जीवितने दूर करो ! तथा मारा मांस-रुपिरनो आहार फरी अटवी पार पामो ! त्यारे बीजा, जीजा, चोथा अने.पांचमा पुत्रने धन्यसार्थवाई कवू पण बधाय पुत्रोए जेष्ठपुत्रनी जेम जवान आप्यो.
नवाही
भीज्ञाता-
धर्मकथाङ्गे
धन्यसार्थवाहे विचार करी पुत्रोने कह्यु के-आ पुत्री सुंमुमा जीवरहित थयेली छे तेनुं मांस आदिनो आहार करी स्वस्थ थइए,
पांचे भाइओए आ वात अंगीकार करी. अरणिना काष्ठयी अग्नि उत्पन्न करी मांस पक्वी खाधुं अने रुधिरथी स्वस्य थया छता अटवी
उल्लंघी राजगृहनगरे आवी पोताना घेर आल्या. अने सुसुमा पुत्रीनु लौकिक कार्य फयुं यावत् अनुक्रमे शोक रहित थया.
ते काळे ते समये श्रमण भगवान महावीर प्रमु राजगृहनगरनी बहार गुणशीलचैत्यविषे समवसर्या हता तेमनी पासेथी धर्म
श्रवण करी धन्यसार्थवाहे प्रव्रज्या लीधी अने अगियार अंगना जाणकार थया तेम एक मासनी संलेखना ( अनशन ) करी सौधर्म-
देवलोकमां उत्पन्न थया, त्यांथी च्यवी महाविदेहक्षेत्रमा जन्म पामी संयम लइ सिद्धिपदने पामशे.
कथानो परमार्थ:-
धन्यसार्थवाहे वर्ण-रूप-वल के विषयोने माटे सुसुमापुत्रीना मांस-रुधिरनो आहार कयों न होतो, किन्तु राजगृह नगरने
पामवा माटे आहार कों हतो. तेम जे साधु अथवा साध्वी-वमन-पित्त-शुक्र अने रुधिरथी झरता यावत् अवश्य त्याग करवा लायक
आ औदारिक शरीरना वर्ण-रूप-बल के विषय माटे आहार करता नथी परंतु एक सिद्धिगति पामवामां सहायभूत थवा माटे
आहार फरे छे, ते आ भवमा साधु-साध्वी श्रावक अने श्राविकाओथी पूजनीय थाय छे, यावत् मोक्ष पामे छे.
॥ इति अष्टादशाध्ययनस्य सारांशः समाप्तः॥
द्वितीय-
विमागे-
अष्टा-
दशाध्य०
सारांशे
कथानो
परमार्थः।
॥२८॥
॥ २८॥
॥ ओगणीसमा श्रीपुण्डरीक-अध्ययननो सारांश ।। पूर्वना अध्ययन विपे संवर न करनारने अनर्थ, अने संवर करनारने लाम दर्शाव्यो, आ अध्ययन विषे चिरकाळ संवर कर्या छतां तेनो मंग करे तो पण अनर्थ थाय छे, अने अल्पकाळ पण संवर करे तो तेने लाम थाय छे ते कहे छे. पूर्व महाविदेहक्षेत्र विपे सीता नामनी महानदीना उतर कांठे सीतामुख नामना वनखंडनी पश्चिमे एक शेलक नामना वखारा पर्वतनी पूर्व दिशाए पुष्कलावती नामना विजयमा पुंडरीकिणी नामनी नगरीमा महापद्म नामे राजा हतो तेमने पद्मावती नामे राणी अने पुंडरीक-कंडरीक नामना पुत्रो हता तेमां पुंडरीक युवराज हतो, पांचसो मुनि साथै परिवरेला धर्मघोष नामना स्थविर पासे पुण्डरीक युवराजने गादी पर वेसाडी महापद्मराजाए दीक्षा लीघी. महापद्म अनगार चौदपूर्वी थइ घणा काल संयम पाळी मोक्षसुखने पाम्या. ते वार पछी पुंडरीकिणी राजधानी बहार नलिनीवन नामना उद्यान विपे स्थविर मुनि पधार्या तेमने वंदन करवा पुंडरीक राजा गया, कंडरीक पण लोकोना शब्दो श्रवण करी स्थविर पासे गया. पुंडरीक राजा प्रतिबोध पामी आवक थया अने पोताना घेर गया. त्यारपछी फंडरीक युवराज उमा थइ यावत् आ प्रमाणे कहेवा लाग्यो के-हे प्रभु ! हुं पुंडरीकराजानी रजा लेइ यावत् दीक्षा प्रहण करीश ! आ सांभळी स्थविरमुनिए पुंडरीकने कयुं के तने जेम सुख उपजे तेम कर, कंडरीक स्थविरमुनिने वंदन नमस्कार करी ज्यां पुंडरीक राजा हता त्यां गयो. कंडरीक पुंडरीकराजाने विनंति करे छ, अने कंडरीक दीक्षा ले छे. कंडरीफ पुंडरीकराजाने बे हाथ जोडी कहेवा लाग्या के-हे राजन् ! में स्थविर साधु पासे धर्म श्रवण कर्यो छे, ते धर्म रुच्यो
नवाजी-
१०१०
भीज्ञाता.
धर्मकयाझे
धन्यसार्थवाहे विचार करी पुत्रोने फह्यु के-आ पुत्री सुसुमा जीवरहित थयेली छे तेनुं मांस आदिनो आहार करी स्वस्थ थइए,
पांचे भाइओए आ वात अंगीकार करी. अरणिना काष्ठयी अग्नि उत्पन्न करी मांस पक्वी खाधु अने रुधिरथी स्वस्थ थया छता अटवी
उल्लंघी राजगृहनगरे आवी पोताना घेर आव्या. अने सुंसुमा पुत्री- लौकिक कार्य कयुं यावत् अनुक्रमे शोक रहित थया.
ते काळे ते समये श्रमण मगवान महावीर प्रमु राजगृहनगरनी बहार गुणशीलचैत्यविषे समवसर्या हता तेमनी पासेथी धर्म
श्रवण करी धन्यसार्थवाहे प्रव्रज्या लीघी अने अगियार अंगना जाणकार थया तेम एक मासनी संलेखना ( अनशन ) करी सौधर्म-
देवलोकमां उत्पन्न यया, त्यांथी च्यवी महाविदेहक्षेत्रमा जन्म पामी संयम लइ सिद्धिपदने पामशे.
कथानो परमार्थ:-
धन्यसार्थवाहे वर्ण-रूप-बल के विषयोने माटे सुसुमापुत्रीना मांस-रुधिरनो आहार फर्यों न होतो, किन्तु राजगृह नगरने
पामवा माटे आहार कयों हतो. तेम जे साधु अथवा साध्वी-वमन-पित्त-शुक्र अने रुधिरथी झरता यावत् अवश्य त्याग करवा लायक
आ औदारिक शरीरना वर्ण-रूप-बल के विषय माटे आहार करता नथी परंतु एक सिद्धिगति पामवामां सहायभूत थवा माटे
आहार करे छे, ते आ भवमा साधु-साध्वी आवक अने श्राविकाओथी पूजनीय थाय छे, यावत् मोक्ष पामे छे.
॥ इति अष्टादशाध्ययनस्य सारांशः समाप्तः ॥
द्वितीय
विभागे-
अष्टा-
दशाध्य.
सारांशे
कथानो
परमार्थः।
॥२८॥
॥ २८॥
॥ ओगणीसमा श्रीपुण्डरीक-अध्ययननो सारांश । पूर्वना अध्ययन विपे संवर न करनारने अनर्थ, अने संवर करनारने लाभ दान्यो, आ अध्ययन विषे चिरकाळ संवर कयां छतां तेनो भंग करे तो पण अनर्थ थाय छे, अने अल्पकाळ पण संवर करे तो तेने लाम थाय छे ते कहे छे. पूर्व महाविदेहक्षेत्र विषे सीता नामनी महानदीना उत्तर कांठे सीतामुख नामना वनखंडनी पश्चिमे एक शेलक नामना वखारा पर्वतनी पूर्व दिशाए पुष्कलावती नामना विजयमा पुंडरीकिणी नामनी नगरीमा महापद्म नामे राजा हतो तेमने पद्मावती नामे राणी अने पुंडरीक-कंडरीक नामना पुत्रो हता तेमां पुंडरीक युवराज हतो, पांचसो मुनि साथे परिवरेला धर्मघोष नामना स्थविर पासे पुण्डरीक युवराजने गादी पर वेसाडी महापद्मराजाए दीक्षा लीची. महापद्म अनगार चौदपूर्वी थइ पणा काल संयम पाळी मोक्षसुखने पाम्या. ते वार पछी पुंडरीकिणी राजधानी बहार नलिनीवन नामना उद्यान विषे स्थविर मुनि पधार्या तेमने वंदन करवा पुंडरीफ राजा गया, कंडरीक पण लोकोना शब्दो श्रवण करी स्थविर पासे गया. पुंडरीक राजा प्रतिबोध पामी श्रावक थया अने पोताना घेर गया. त्यारपछी कंडरीक युवराज उमा थइ यावत् आ प्रमाणे कहेवा लाग्यो के-हे प्रभु ! हुं पुंडरीकराजानी रजा लेइ यावत् दीक्षा ग्रहण फरीश ! आ सांभळी स्थविरमुनिए पुंडरीकने कयुं के तने जेम सुख उपजे तेम कर, कंडरीक स्थविरमुनिने वंदन नमस्कार फरी ज्यां पुंडरीक राजा हता त्यां गयो. फंडरीक पुंडरीकराजाने विनंति करे छे, अने कंडरीक दीक्षा ले छे. कंडरीक पुंडरीकराजाने से हाथ जोडी कहेवा लाग्या के-हे राजन् ! में स्थविर साधु पासे धर्म श्रवण कर्यो छे, ते धर्म रुच्यो तलामा
द्वितीय-
विमागे
मीवाता-
धर्मकवाने
॥२९॥
छे तेथी तमारी आज्ञा पाम्यो छतो प्रवज्या वा इच्छु छु , पुंडरीकराजा कंडरीकयुवराजनी आ वात श्रवण करी कंडरीकयुवराजने
फर्यु के-हे माइ ! तुं अधुना दीक्षा न लहश, हुं वने मोटा-मोटा राज्याभिषेकवडे आमिषेक करवानो छु. ते सांमळीने कंडरीके
पुंडरीकनी आ वातनो आदर न कयों अने मौन रह्यो. पुंडरीकराजाए वे प्रणवार कडं किन्तु कुंडरीक मौन ज रखो. त्यारे
पुंडरीकराजार वीजी घणी रीते समजान्यो छतां ज्यारे कंडरीक न समज्यो त्यारे.इच्छा विना दीक्षानी संमति आपी. उद्यानमा जइ
स्थविरमुनिने पुंडरीकराजाए कंडरीकनी शिप्यरूप भिक्षा आपी, कंडरीक प्रवज्या लइ अनगार यया यावत् अग्यार अंगना अभ्यासी
थया, अने स्थविरमुनिनी साथे गामानुगाम विचरवा लाग्या.
रोगथी व्याप्त थयेला-कंडरीकमुनि.
ते वार पछी कंडरीक अनगारने सुका-लखा आहारे करीने शेलकमुनिनी जेम दाहज्वर उत्पन्न ययो, यावत् व्याधियी व्याप्त
थयेला गामानुगाम विचरता स्थविरमुनि साथे पुंडरीकिणी नगरीना उद्यान विपे पधार्या. पुंडरीकराजा वांदवा माटे आन्या तेमने
गुरुमहाराजाए धर्म श्रवण कराव्यो. पुंडरीकराजा धर्म श्रवण फरी, वंदना-नमस्कार करी कंडरीकशनि पासे वंदना नमस्कार करवा
गया. वंदना नमस्कार करी कंडरीकमुनिनुं शरीर जोतां रोगग्रस्त लाग्या. आयी त्यांथी उठी पुंडरीकराजा स्थविरमुनिवर पासे जइने
कंडरीकमुनिनी चिकित्सा कराववा माटे यानशालामां पधारवा विनंति करी, पुंडरीकराजानी विनंति स्वीकारी स्थविरमुनि सहु साधुओ
साथे यानशालाए पधार्या. अहिं पुंडरीकराजाए शैलकमुनिनी मंडुकराजाए म चिकित्सा करावी हती तेम कंडरीकमुनिनी चिकित्सा
करावी तेथी रोगरहित थया यावत् शरीर भलवाला-थया..स्थविरमगवान राजाने पूछोने विहार-करी गया, किन्तु राज्यना आहार विषे
अध्ययन
सारांशे
कंडरीक-
दीक्षा।
॥२९॥
लब्ध थयेला कंडरीकमुनिए, विहार न कर्यो भने कमेक्रमे वधु शिथिलाचारवाला थइ गया. आसक्तिना प्रतापे कंडरीकमुनिनु थयेटु पतन, पुंडरीकराजाए ग्रहण करेलु संयम. पुंडरीकराजा-कंडरीकमुनिनो शिथिलाचार जाणी अन्तेपुरी सह कंडरीक मुनि पासे आव्या अने वंदना-नमस्कार करी का. हे मुनिवर । तमे धन्य छो! कृतार्थ छो ! पुण्यवन्त छो! तमे मनुष्यजन्म-जीवन- फल सारं प्राप्त कर्यु ! केमके राज्य अने अन्तःपुर त्याग करी संयम ग्रहण कयुं छे, हुं अधन्य छु ! पुण्यहीन छु ! राज्य अने अंतःपुर विषे आसक थयेलो-मूछित थयेलो छु ! यावत् संयम ग्रहण करवाने अशक्त थयो छु, तमे माग्यशाली छो! आम कह्या छतां कंडरीकमुनि राजानी आ वातनो आदर करता नथी पण मौन रहे छे. आथी वे प्रणवार पुंडरीकराजाए. का त्यारे लज्जाथी मोटा भाइना गौरवने लेइ राजानी रजा लेइ स्थविरमुनिनी पासे विहार करी गया, अने उम विहार करता स्थविरमुनिनी साथे विचरवा लाग्या. त्यार पछी चारित्रना परिणामथी रहित थयेला कंडरीक अनगार स्थविरमुनिनी आज्ञा लीधा। विना धीमे धीमे नीकली पुंडरीकिणी नगरीना अशोकवनमा आवी अशोकवृक्षनी नीचे पृथ्वीना शिलातळ विष वेट्या अने आर्तध्यानः करवा लाग्या, तेमनी आ स्थिति अशोकवनमा आवेली धावमाताए जोइने सर्व वृत्तात पुंडरीकराजाने जणान्यो. .पुंडरीकराजा तूरत अन्तःपुरसहित त्यां आव्यो मने वंदना नमस्कार करी पूर्वनी जेम तेना वखाण कर्या पण कडरीके तेनो आदर न कर्यो, त्यारे पुंडरीकराजाए पूछयुं के हे भगवंत | तमारे भोगवडे अर्थ छे ! कंडरीके जणाव्यु के हा ! मारे भोग भोगववानी इच्छा छे. पुंडरीकराजाए कौटुम्बिक पुरुषोने बोलावी कंडरीकनो राज्याभिषेक कराव्यो अने राज्यगादी विषे स्थापन कर्या. अने, स्वयं पोते-पुंडरीकराजाए कंडरीकनो साधुवेष पहेर्यो अने स्वयं लौच करी गुरुमहाराज पासे ज्यां सुधी व्रत Hit नवाङ्गी द्वितीय विमागे भीडाता- धर्मकथा) (संयमप्रतिज्ञाओ) न ग्रहण करुं त्यांसुधी मारे आहार न करवो तेवी प्रतिज्ञा करी विहार करी गया. कंडरीकनी थयेली दुर्गति. राजा थयेला कंडरीकने रसवाळा पान भोजन करवाथी तथा अति जागरण अने अति मोजन करवायी आहार पची शक्यो नहीं. आथी मध्यरात्रिना समये तेना शरीरमा असह्य गाढ वेदनाओ उत्पन थइ यावत् दाहज्वर उत्पन्न थयो, आ समये तेनी सारवार कोइए म करवाथी तेमनी उपर खुव दुर्ध्यान चिंतवतो तेम राज्य-देश अन्तःपुर विषे तन्मय थयो छतो काळ करीने सातमी नारकीमा उत्कृष्टस्थितिए नारकपणे उत्पन्न थयो. ॥३०॥ अध्ययन सारांशे कंडरीकनुं दुर्गति- गमनम् । उपनय- जे साधु अथवा साध्वी दीक्षा ग्रहण करीने फरीथी मनुष्य संवन्धी काममोगनी इच्छा करे छे ते कंडरीक राजानी जेम संसारमा रखडे छे. पुंडरीक अनगारनी थयेली सद्गति. पुंडरीक अनगार स्थविर मुनि पासे विचरता विचरता आल्या अने संयम प्रतिज्ञाओ ग्रहण करी, छट्ठना उपवासना पारणे प्रथम पोरिसीए स्वाध्याय करी यावत् भिक्षा माटे फरतां ठंडं-लूटुं भोजन व्होरी लावी गुरुने बतावीने तेमनी आज्ञा पामी लोलपता विना आहार कर्यो छे, ते वार पछी रसरहित खराबरसवाळा ठंडा अने लूखा पानभोजननो आहार करवाथी, मध्यरात्रिए धर्मजागरिका जागतां आहार पाचन थयो नहीं. आथी असह्य शरीर विषे वेदना उत्पन्न थह अने शरीरमा दाहज्वर उत्पन्न थयो. बळ रहित मयेला पुंडरीकमगारे पारघरमा अंगीकार करी, मालोचना-प्रतिक्रमण करी काळ समये पाळ पामो समिनि देवपो उपm घया, त्यांची प्यपीने महाविदेश क्षेत्रने विपे मिद्रपदने पागशे, यावत् सरसो त करशे. उपनप- जसा अथग साध्वी ममग्या प्रहण करीने मनुष्य सम्बन्धी काममोगमा आसफ न थाय, यायत् तेमा रागवाळा भाय ते, पणा पा सा-माध्वीओथी तथा पारक-याविकाओयी आलोकमा पूजनीय याय छे, पररोकमा-संसारनो अन्त करी पुंडरीक अन- गारनी जेम मगन्तगुमने पामे छे. इति ओगणीसमा श्रीपुंडरीक अध्ययननो सारांश समाप्तः ॥ एवं श्रीज्ञाताधर्मकथाङ्गे प्रथम श्रुतस्कन्धस्य सारांशः समाप्तः ।। Hast ॥ श्रीज्ञाताधर्मकथागना द्वितीय श्रुतस्कन्धस्य सारांशः॥ प्रथम श्रुतस्कंधमा आठपुरुषना हितशिक्षाना दृष्टान्तोयी धर्मर्नु रहस्य वताव्युं, हवे द्वितीय श्रुतस्कन्ध विषे धर्मकथाओथी धर्मीनां काले ते समये राजगृहनामर्नु नगर हतुं, अने तेनी बहार ईशानखूणे गुणशैलक नामर्नु चैत्य हतुं त्या उत्तम जाति अने उत्तम Sik गरियो, कयन करे छे.
नवाणी-
१०१०
भीमाता.
धर्मकपाले
द्वितीय
विमागे
द्वितीय
श्रु० दश-
वर्गोनुं
॥३१॥
वर्णन।
कुलवाळा-चौदपूर्वी तथा चार ज्ञानवाळा एवा श्री सुंधर्मास्वामि गणघर भगवान पांचसो मुनिवरो सह ग्रामानुग्राम विचरता पधार्या,
मेगी थयेली पर्पदाने तेओए धर्म प्रवण कराव्यो अने धर्म श्रवण करी पर्षदा गइ.
ते वार पछी तेमना शिष्य आर्यजम्बूस्वामि नामना अनगारे तेमने प्रश्न कर्यो के-हे भगवान् ! सिद्धिगति पामेला श्रीमहावीर-
स्वामिए छट्ठा अंगना पहेला श्रुतस्कंधना द्रष्टान्तो आपे कह्या ते प्रमाणे कह्या छे, तो हे भगवान् । वीजाश्रुतस्कंधमां तेओए धर्मकथा-
मोनो कयो अर्थ कयो छे!
हे जम्बू ! जातिसम्पन्न एवा महावीरप्रमुए आ बीजा श्रुतस्कन्धविषे दशवर्गो( विभागो) नीचे प्रमाणे प्ररूप्या छे. १ चमरे-
न्द्रनी अपमहिपीओ, २ वैरोचनइन्द्र( बलीन्द्र )नी अपमहिपीओ ३ असुरेंद्र सिवाय दक्षिण दिशाना भवनपतिना जे नव इन्द्रो छे
तेमनी अग्रमहिपीओ, ४ असुरेन्द्र विना उपरदिशाना नव इंद्रोनी अग्रमहिपीओ, ५ दक्षिण दिशाना वानमंतर इन्द्रोनी अग्रमहिपीओ,
६ उत्तरदिशाना वानमंतर इन्दोनी अग्रमहिपीओ, ७ चन्द्रनी अग्रमहिपीओ, ८ सूर्यनी अग्रमहिपीओ, ९ शकेन्द्रनी अग्रमहिपीओ अने
१० ईशानेन्द्रनी अग्रमहिपीओ आम दश वर्गो प्ररूप्या छे ( अत्र अग्रमहिपीओ एटले मुख्य देवीओ जाणवी).
प्रथमवर्ग-प्रथमवर्गमां १ काली, २ राजी, ३ रजनी ४ विद्युत् अने ५ मेघा एम पांच देवीओना पांच अध्ययनो छे. ते हवे
अनुक्रमे कहे छे ( आ पांचे चमरेन्द्रनी अग्रमहिपीओ-मुख्य देवीओ छे.)
कालीदेवी-१
ते काले ते समये राजगृहनगरीनी बहार गुणशील चैत्यमां श्री महावीरस्वामि समवसर्या, श्रेणिक महाराजा प्रभु पासे आवी
॥३१॥
प्रमुने वंदना नमस्कार करी देशना पण करता हता. ते समये चमरचंचा राजधानी विषे कालावतंसक नामना मनमां काल नामना सिंहासन पर काली नामनी देवी वेठी हती, ते चरा हजार सामानिकदेवीओ, चार महतरिकाकादेवीओना परिवार सह त्रण पर्षदाओ ( समाओ), सात प्रकारना लश्करना अधिपतिओ, सोल हजार आत्मरक्षकदेवो तथा वीजा ते भवनमा रहेला घणा असुरदेवो अने देवीओथी परिवरेली हती. ते कालीदेवीए श्री महावीरस्वामि भगवानने राजगृह नगर गुणशील चैत्यमा समवसरेला अवधिज्ञानधी जोया, अने प्रभुदर्शनथी हर्पित थयेली ते फालीदेवी सिंहासनथी उभी थई पादपीठथी उतरी मोजडीओ काढीने प्रभुसन्मुख सात-आठ डगलां चाली, डावा दीचणने उंचो अने जमणा दींचपने मि पर स्थापी, त्रण वार मस्तक पृथ्वीतलने अडकाडी कंडक मस्तक नमावे छे. तेम कडां अने याजुबन्ध विगेरे अलंकारोथी अलंकृत भुजाओवाळी, वे हाथ जोडी 'नमुत्युणं ' कही वंदना-नमस्कार करी पूर्वसन्मुख सिंहासन पर वेठी. कालीदेवीनुं प्रसु पासे आगमन. ते वार पछी ते फालीदेवीने प्रभुमहावीरस्वामिने वंदना नमस्कार करी सेरानो लाभ लेवा विचार थयो, अध्यवसाय थयो, आधी सूर्याभदेवनी जेम आभियोगिक देवो पासे तेणीए दिव्यविमान तैयार कराव्यु. एक हजार योजनना विस्तारवाळा ते विमानमा वेसी ममु पासे आवी पोताना नाम गोर कहेवापूर्वक नाट्यविधि देसाडीने गइ अर्थात् नाटक करीने जेवी रीते आवी हती तेवी रीते पाछी गइ. फालिदेवी-संबन्धि श्री गौतमसामिनी पृच्छा.
नवाणी-
पू०पू०
भीमाता-
वर्मकथाङ्गे
द्वितीय-
विभागे
द्वितीय शु०
कालीदेवी
३२॥
सम्बन्धि-
पृच्छा।
ते वार पछी श्री गौतमस्वामिए श्री महावीर प्रभुने वंदना-नमस्कार करी पूछयु के-हे भगवन् ! आ कालीदेवी क्या गइ ! अने
तेनी आवी मनोहर ऋद्धि क्या गइ !
श्री महावीर प्रभुए उत्तरमा कुटाकारशाळानुं दृष्टान्त पूर्वे कहेला प्रमाणे कटुं.
ते वार पछी श्री गौतमस्वामिए श्री महावीर भगवानने पूज्यु के-हे भगवान् ! ऋद्धिवाळी कालीदेवीने ते दिव्यऋद्धि शुं करवायी
मली ! देवभवमां ते ऋद्धि शी रीते प्राप्त यह तेना उपभोगमा ते ऋद्धि शी रीते तेनी पासे आवी !
कालीदेवीनो पूर्वमव.
प्रमु महावीरस्वामिए उत्तरमा जणाव्यु के-हे गौतम ! ते काळे ते समये जंबूद्वीपना भरतक्षेत्रने विषे आमलकल्पा नामनी नगरी
हती. ते नगरीनी बहार ईशान खूणे आम्रशाळ वन हतुं, अने ते नगरीमा जितशत्रु नामनो राजा हतो. तथा ते नगरी विष काळ
नामनो गाथापति हतो तेने कालश्री नामनी भार्या हती. ते कालपीने काली नामनी पुत्री हती. ते काली वयवडे मोटी होवा छतां
कुमारी हती, तेना स्तन नितंब सुधी लटकता होवाथी पति थवाने योग्य पुरुषो तेने जोइने वैराग्य यामता अर्थात् तेने इच्छता नहीं
होवाथी ते पति वगरनी रहेली हती.
ते काळे ते समये पुरुषादानीय श्रीपार्श्वनाथ अरिहंत सोल हजार साधुओ अने आडनीश हजार साध्वीओयी परिवरेला आमल-
कल्पा नगरीना ईशानखूणामां आवेला आम्रशाल वन नामना उद्यान विषे समवसर्या, ते कालीए प्रभु पधार्यानु श्रवण करी मातापितानी
आज्ञा पामी प्रमुनी देशना श्रवण करी आनंद पामीने प्रमुने वंदना-नमस्कार करी कधु के हे प्रमो ! हुं मारा पितानी रजा लेइने
॥३२॥
पछी हुँ मापनी पासे प्रमज्या ग्रहण करूं, त्यारे श्रीपार्धनाय प्रमुए कयु के-हे देवानुप्रिया! तने मुस उपजे तेम कर. ते वार पठी वे कालीकुमारिका हर्ष पागी प्रमुने यंदना-नमस्कार करी आमलफल्पा नगरी विप ज्यां पोताना मातापिता हता त्यां आयी. कालीए लीधेली दीक्षा. फाली कुमारिका-मातापिताने निति करसा लागी के-हे मातापिता ! हुं पार्धनाय अरिहंतनी पासे धर्म सामळी संसारना मयधी रद्वेग पामी छु, तेम जन्म, जरा ओ मरणयी भय पामी छु तेथी तमारी अनुज्ञा पामीने हुं पार्श्वनाथ प्रभु पासे प्रमज्या लेवा इच्छु छु. ते गामठी मातापिताए क-हे देवानुप्रिया ! जेम तने मुख उपजे तेम कर, धर्मकार्यमा विलंब न कर. रयारपछी फाल गाथापतिए विपुल यशन, पान, म्पादिम अने स्वादिम भोजन यार कराव्या अने-मित्र-ज्ञाति-स्वजन-संयन्धी भने परिजनने आमच्या, आमन्त्रेला महेमानोनो मत्कार करी, सम्बन्धी अने परिजननी पासे कालीदारिकाने फलशोवडे स्नान कराव्यु नेम सर्व सामूपणादियी अन करी, एक हजार पुरुषोधी वहन करवा योग्य शिविका विषे कालीपुत्रीने वेसाडी सर्व परिवार साये सर्व मार पानियोना नादोमहित कालीने आप्रशालने विषे श्री पार्श्वनाथप्रमु समीपे लाव्या. काल गाथागति विगेरेए थी पार्धनायममुने विनंति करी के-हे प्रभो । आ अमारी फालीपुत्री अमने वहाली छे, ते संसारना मगधी उद्वेग पामेली , आधी आपनी पासे दीक्षा ग्रहण लरवा इच्छे छे. तेथी अमे आपने आ अमारी कालीपुत्रीने शिप्यारूप मिक्षा रारी हे आपीए छीए ते आप प्रदान करो ! भगवाने कयु के-हे देवानुप्रियो ! जेम तमने मुख उपजे तेम करो. सेवारपाठी कालीकुमारी प्रमुने वंदना नमस्कार करीने ईशान दिशामा जइने पोतानी मेळे व आग्पण आदि उतारी लोच कर्यो, CURRHI नवासी द्वितीय विमागे मीवाता- अर्मकथाले द्वितीय श्रु कालीनी दीक्षादि अने प्रमु पासे आवी विनंति करी के हे विमो ! मने दीक्षा आपो एम हुं इच्छु छु ! तेवारपछी प्रभुए पोतेज कालीसाध्वीने दीक्षा आपी अने पुष्पचूला आर्याने शिप्या तरीके सुपरत करी. पुष्पचूला आर्याए तेणीने शिष्या करी, काली आर्या पुप्पचूला आर्यानी साथे विचरती अगीआर अंग भणी, छट्ठ-अट्ठम आदि तपस्या करती यावत् इर्यासमितिवाळी गुप्त ब्रह्मचारिणी थइ. काली आर्यानी जीवनचर्या. एकदा काली आर्या शरीरवकुसिका-एटले स्नानादिकवडे शरीरनी शुश्रूषा करवाथी ते शवलचारित्री थइ, तेथी ते वारंवार हाथ- पग-मस्तक-मुख-स्तनना आंतरा-काखना आंतरा अने गुह्यस्थानना आंतरा धोवा लागी. तेम ज्यां ज्यां ते कायोत्सर्ग-शय्या अने स्वाध्याय करती त्या त्या प्रथम जलना छांटनां नाखी पछी वेसती, सूती अने स्वाध्याय विगेरे करती हती. गुरुणी पुष्पचूला आर्याए कधु-" हे देवानुप्रिय ! साध्वीओने शरीरवाकुशिका थवं कल्पतुं नथी, तुं जे वारंवार हाथ-पग विगेरे धोवे छे, पाणी छांटीने वेसवा विगेरे करे छे तेनी तुं आलोचना कर ! यावत् प्रायश्चित् अंगीकार कर ! " आम हितशिक्षा आपी पण काली साध्वीए तेनो सादर न कर्यो. आथी वारंवार आ पापथी रोकवा टकोर करी, साध्वीओए पण तेने हेलना करी वारंवार निवारवा लागी. त्यारे काली साध्वीए जुदा उपाश्रये रहेबानो विचार कर्यो अने जइने जुदा उपाश्रये रही. हवे अहिं एणीने कोइ टकोर करनार न होवाथी वारंवार हाथ, पग आदि घोवा विगेरे करवा लागी यावत् पासस्था-पासस्थविहारी-शुद्ध क्रियामां आळसु-विहार करवामां आळसु-कुशीला- कुशीलविहारी अने इच्छा प्रमाणे वर्तन करनारी इत्यादि दोपोने अनुसरनारी थह. आवी रीने घणा वर्षो सुधी संयम पाळीने अर्धामांसना ३३॥
अनशनवडे शरीरने क्षीण कर्यु, आलोचना प्रतिक्रमण कर्या विना काळधर्म पामी चमरचंचाराजधानी विष काली नामनी देवीपणे उत्पन्न थइ. हमणा उत्पन्न थयेली कालावतसक भवनमा रहेनारा असुरकुमार देव-देवीओनु अधिपतिपणुं पामी छे ते कालीदेवीनुं आयुष्य अढीपल्योपम छे, ते त्याथी च्यवीने महाविदेहक्षेत्रमा उत्पन्न थइ सिद्धिपदने पामशे. ॥ इति प्रथमवर्गना प्रथम अध्ययनननो सारांशः ॥ सा प्रथमवर्गना द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ अने पंचमा अध्ययननो सारांशः राजी-२ हे जम्बू ! ते काले अने समये राजगृह नामर्नु नगर हतुं ते नगरनी बहार गुणशील नामना चैत्यविषे श्री महावीरस्वामि समवसर्या, ते समये पूर्वना अध्ययनमा कही गया तेम चमरचचाथी राजी नामनी देवी आवी. अने कालीनी माफक नाटक देखाडीने गइ. त्यार बाद श्री गौतमस्वामिए ते राजीदेवीनी पूर्वभवनी पृच्छा करी. प्रमुए कह्यु के-हे गौतम ! ते काले ते समये आमलकप्पा नगरी हती, त्या अम्बशालयन हतु, जितशत्रुराजा हतो, राजी नामनो गाथापति हतो, तेने राजश्री नाजनी भार्या अने राजी नामनी पुत्री हती. अत्र पार्श्वनाथप्रभुनु समवसरण, राजीनी दीक्षा, यावत् कालीनी जेम शरीरवाकुशिका थइ, यावत् कालीनी जेम काल करी ते देवगतिमा उत्पन्न थइ छे, त्याथी च्यवी महाविदेहक्षेत्रमा उत्पन्न थइ सिद्धिपदे जशे. त्रीजा अध्ययन विषे-आमलकल्पा नगरी,
नवाली.
द्वितीय
विभागे
द्वितीय श्रु
भीवावा.
धर्मकपाले
॥३४॥
रजनी गाथापति, रजनश्री भार्या अने रजनी पुत्री यावत् राजीनी जेम वधो सम्बन्ध अहिं कहेवो. चोथा अध्ययन विषे
एज नगरी, विद्युत गाथापति, विद्युतश्री मार्या अने विद्युत नामनी पुत्री शेष अधिकार राजीनी जेम कहेवो. पांचमा अध्ययन विषे
एज नगरी, मेघनामनो गाथापति, मेपश्री नामनी भार्या, मेघा नामनी पुत्री शेष अधिकार तेज प्रमाणे जाणवो.
इति वीजा, जीजा, चोथा, पांचमा अध्ययननो प्रथमवर्गनो मारांश समाप्तः ।
चीजो वर्ग-हे जम्बू ! वीजा वर्गनां पांच अध्ययनो कह्यां छे. ते आ प्रमाणे-१ शुभा, २ निशुंभा, ३ रंभा, ४ निरंभा अने
५ मदना आ प्रमाणे पाच अध्ययनो कह्यां छे. बलिचंचा नामनी राजधानी विषे शुंभावतंसक नामना भवनमा शुंभ नामना सिंहासन
विष वेठेली शुंभा नामनी देवी हती इत्यादि, कालीनी जेम नाट्यविधि विगेरे देखाडीने गइ, अहिं प्रभु श्रीगौतमस्वामिना प्रश्नोत्तर
पूर्वनी जेम समजवा. श्रावस्तिनगरी, कोष्टक चैत्य, जितशत्रूराजा, शुभनामे गाथापति, शुभश्री भार्या अने शुंभा नामनी पुत्री हती,
शेप अधिकार कालीदेवीनी जेवो जाणवो. विशेष शुभादेवीनी स्थिति साडा त्रण पल्योपमनी जाणवी, बाकीना चार अध्ययन विषे
थावस्ति नगरीना जाणवा विशेष एके-पुत्रीनां नाम सरखां मातापितानां नाम जाणवां.
श्रीजो पर्ग-हे जम्बू 1 त्रीजा वर्गमा चोपन अध्ययनो कह्यां छे, ते काले ते समये महावीरप्रभु राजगृह नगरी वहार गुणशील
चैत्य हतुं त्यां समवसर्या ते समये इला नामनी देवी धरणी नामनी राजधानीमां इलावतंसक नामना भवनविषे इला नामना सिंहासन
विपे वेठेरी हती विगेरे हकीकत कालीदेवी समान यावत् नाट्यविधि देखाडीने पाछी गइ. गौतमस्वामिना पूछवाथी तेनो पूर्वभव
श्री महावीरममुए कयो के-हे गौतम ! वाणारसीनगरी बहार काम नामनुं महावन हतुं इल नामनो गाथापति, इलश्री नामनी तेने
राजी
विगेरे
देवीओर्नु
वर्णन।
॥३४॥
मार्या अने इला नामनी पुत्री हती, शेष हफीकत काली समान जाणवी, विशेष धरणेन्द्रनी अग्रमहिषीपणे उत्पन्न थइ छे. तेनी स्थिति अर्धपल्योपमथी कंइक अधिक छे, बाकीनी हकीकत कालीदेवी प्रमाणे जाणवी. एज प्रमाणे अनुक्रमे २, सतेरा ३, सौदामिनी ४ इन्द्रा, ५ धना अने विद्युता आ पांच देवीओनां पांच अध्ययन जाणवां. आ सर्वे धरणेन्द्रनी अग्रमहिपीओ छे. ए प्रमाणे छ अध्ययनो वेणुदेवनी छ अनदेवीओनां, यावत् घोषेन्द्रनी अग्रदेवीओनां छ अध्ययनो कंइ पण फेरफार विना कहेवां, आ प्रमाणे दक्षिण दिशाना नव इन्द्रोनां चोपन अध्ययनो थाय छे. आ सर्वे अधिकार पण वाणारसी नगरीना काम महावनना चैत्य विषे जाणवां. चोथो वर्ग-हे जम्बू ! चोथा वर्गमा चोपन अध्ययनो कह्यां छे. ते काले ते समये महावीरस्वामी प्रमु राजगृह नगरीनी वहार गुणशील चैत्य विपे समवसर्या हता, ते काले ते समये १ रुचा नामनी देवी रुचानामनी राजधानी विपे रुचक नामना सिंहासन पर वेठी हती. विगेरे सर्व कालीदेवीनी जेम जाणवू, विशेष ए के-पूर्वभवमां चंपानामनी नगरी, पूर्णभद्र नामे चैत्य, रुचक नामनो गाथापति हतो तेने रुचकश्री नामनी भार्या अने रुचा नामनी पुत्री हती. शेष अधिकार पूर्वनी जेम जाणवो. विशेष ए के-भूतानन्द नामना इन्द्रनी अग्रमहिपीपणे उत्पन्न थइ छ, स्थिति एक पल्योपमनी छे. आ प्रमाणे चोथा वर्गनो-पहेला अध्ययननो निक्षेप करो, एज प्रमाणे अनुक्रमे २ सुरुचा, ३ रुचांशा, ४ रुचकावती, ५ रुचकांता अने ६ रुचप्रभा आ नामनी पांच देवीओनां पांच अध्ययन कहेवां, एज प्रमाणे कुल छ छ देवीओ यावत् नवमा महाघोष सुधी उत्तरदिशाना इन्द्रोनी कहेता चोपन अध्ययनो थाय छे. पांचमो वर्ग-हे जम्बू ! पांचमा वर्गनां वत्रीस अध्ययनो जणाव्यां छे, ते आ प्रमाणे-१ कमलादेवी-२ कमलप्रमा-३ उत्पला- ४ सुदर्शना-५ रूपवती-६ बहुरूपा-७ सुरूपा-८ सुभगा-९ पूर्णा-१० बहुपुत्रिका-११ उत्तमा-१२ भारिका-१३ पद्मा-१४ IRCREE
जीवाता-
पकपाझे
॥३५॥
वर्णन।
वसुमती-१५ कनका-१६ कनकपमा-१७ अवतंसा-१८ केतुमती-१९ वनसेना-२० रतिप्रभा-२१ रोहिणी-२२ नवमिका-२३ SH द्वितीय
ही-२४ पुष्पवती-२५ भुजगा-२६ मुजगवती-२७ महाकच्छा-२८ अपराजिता-२९ सुघोषा-३० विमला-३१ सुस्वरा अने ३२ विमागे-
सरस्वती. आ वत्रीस देवीओनां वत्रीश अध्ययन जाणवां.
द्वितीय श्रु०
पांचमा वर्ग विषे प्रथम अध्ययन-पावत् वत्रीश अध्ययन-
पांचमा
वर्गर्नु
ते काले ते समये राजगृह नगरी विषे महावीरस्वामि समवसर्या त्यारे कमला नामनी देवी कमला नामनी राजधानीमा कमला-
वतंसक नामना भवन विष कमल नामना सिंहासण पर वेठी हती. वेप अधिकार कालीदेवीनी समान कहेवो. विशेष ए के-पूर्वभवने
पि नागपुर नामर्नु नगर हतुं तेनी वहार सहसाम्रवन नामनु उद्यान हतुं अने कमल नामनो गाथापति हतो तेने कमलश्री नामनी
मार्या अने कमला नामनी पुत्री हती. तेणे पार्श्वनाथ प्रमु पासे दीक्षा लीधी विगेरे सर्व पूर्वनी जेम जाणवू. एज प्रमाणे वांकीना
एकत्रीस अध्ययनो दक्षिण दिशाना वानमंतरना आठ इन्द्रोनां कहेवां, कमलप्रभा विगेरे ३१ कन्याओए नागपुरमां सहस्राम्रवनना'
उद्यानमा दीक्षा लीची, मातापितानां नाम पुत्री सरखा जाणवा अने अर्धपत्योपमनी स्थिति जाणवी.
छटो वर्ग-छटो वर्ग पण पांचमा वर्ग समान छे. विशेषता ए छे के-ते सर्व कन्याओ महाकालेन्द्र विगेरे उत्तरदिशाना आठ
इन्द्रोनी ३२ अग्रमहिषीओ थइ, पूर्वमवमा साकेत नगर विषे उत्पन्न थई हती, उत्तरकुरु उद्यान विषे तेणीओए दीक्षा ग्रहण करेली,
तेमना मातापितानां नाम तेमना समान जाणवां, शेष हकीकत पूर्ववत् जाणवी.
॥ ३५॥
ॐ सातमो वर्ग-हे जम्बू! श्री महावीरस्वामिए सातमा वर्गना १ सूरप्रभा-२ आतपा-३ अर्चिौली अने ४ प्रमंकरा एम चार अध्ययनों का छे. तेमा प्रथम अध्ययनमा सूरपमा नामनी देवी सूरनामना विमान विषे सूरप्रभ नामना सिंहासन विपे वेठी हती विगेरे. बाकी सर्व वृतान्त कालीदेवी जेवो जाणवो. विशेष ए छे के-पूर्वभवमा अरक्खुरी नगरीमा सूरपमा नामनी पुत्री हती ते सूर्य नागना इन्द्रनी अग्रमहिपी थइ, तेनी अर्ध पल्योपम उपर पांचसो वर्ष अधिक स्थिति कहेली छे, बाकी सर्व अधिकार कालीदेवी समान जाणवो. एज प्रमाणे सूर्य इन्द्रनी ३ देवीओनो अधिकार जाणवो त्रणे देवीओ अखुपुरो नगरीमा पूर्वमवमा उत्पन्न थयेलो. आठमो वर्ग-हे जम्बू ! आठमा वर्गना चार अध्ययनो कयां छे. ते आ प्रमाणे-१ चन्द्रप्रमा-२ दोपीनामा-३ अर्चिमाली अने ४ प्रभंकरा. प्रथम अध्ययनमा चन्द्रप्रभादेवी चन्द्रमभनामना विमानमां चंद्रप्रम नामना सिंहासन उपर वेठी हती शेप अधिकार फालीदेवी समान जाणवो. विशेष ए के-पूर्वभवमां मथुरानामनी नगरी हती तेनी वहार चन्द्रावतंसक उद्यान हतुं ते नगरीमा चन्द्रप्रम नामे गायापति हतो तेने चन्द्रश्री भार्या हती अने चन्द्रप्रभा नामनी पुत्री हती ते यावत् चन्द्रदेवेन्द्रनी अममहिपी थइ तेनी स्थिति अर्धपल्योपग उपर पचास हजार वर्षनी कही छे, शेष अधिकार कालीदेवीनी सरखो जाणवो. एवी रीते पाकीनी प्रण देवीओ पण पूर्वभवमा मथुरा नगरी विषे उत्पन्न थयेली माता पिताओनां नाम पण पुत्रीओने अनुसरतां जाणवा अने वर्तमानभवमा चन्द्रेन्द्रनी अग्रमहिपीओ जाणवी, शेष कालीदेवी समान जाणवू. नयमो वर्ग-हे जम्बू ! नवमा वर्गना आठ अध्ययनो श्री महावीरस्वामिए कयां छे ते आ प्रमाणे-१ पद्मा २ शिवा ३ सती
द्वितीय
विमागे
नवाङ्गी-
१००
श्रीज्ञाता-
धर्मकघाझे
द्वितीय श्रु०
नवमा
॥३६॥
वर्गर्नु
वर्णन।
४ अंबू ५ रोहिणी ६ नवमिका ७ अचला अने ८ अपसरा. नवमावर्गना प्रथम अध्ययनथी यावत् अठमा अध्ययननो सारांश-
ते काले ते समये हे जम्बू ! पद्मादेवी-सौधर्मकल्प नामना प्रथम देवलोकमां पद्मावतंसक नामना विमानमा सुधर्मा नामनी सभा
विपे पद्मनामना सिंहासन पर बेठी हती, शेष अधिकार कालीदेवी सरखो जाणवो. एवी रीते आठे अध्ययनो कालीदेवी सरखां जाणवां.
विशेष ए के-पूर्वभव विषे वे श्रावस्तिनगरी विपे, वे हस्तिनापुर विपे, वे कांपिल्यपुर विषे अने वे साकेतनगर विषे उत्पन्न थयेली,
आ वधीयेनी माताओनुं नाम विजया अने पिताओगें नाम पद्म हतुं, सर्वेए श्री पार्श्वनाथप्रमुनी पासे दीक्षा लीधी हती. यावत्
शकेन्द्रनी अग्रमहिपीओ थइ छे, तेमनी स्थिति नव पल्योपमनी कहेली छे ते सर्वे च्यवीने महाविदेहक्षेत्रमा उत्पन्न थइ मोक्षे जशे.
दशमो वर्ग-हे जम्बू! दशमा वर्गना आठ अध्ययनो श्रीमहावीरस्वामिए कह्यां छे, ते आ प्रमाणे-१ कृष्णा २ कृष्णराजी ३ रामा
४ रामरक्षिता ५ वसु ६ वसुगुप्ता ७ वसुमित्रा अने ८ वसुंधरा. दशमावर्गना प्रथम अध्ययनथी यावत् अष्टम अध्ययननो सारांश-
ते फाले ते समये हे जम्बू ! राजगृहनगरमा श्रीमहावीरस्वामि समवसर्या त्यारे कृष्णा नामनी देवी ईशानकल्प नामना बीजा देव-
लोकमां कृष्णावतंसकनामना विमानमा सुधर्मानामनी सभा विपे कृष्ण नामना सिंहासन उपर बेठी हती, शेष अधिकार कालीदेवी सरखो
फहेवो, एज प्रमाणे आठे अध्ययनो जाणवा. विशेष ए के-पूर्वभवमां वे वाणारसी नगरी विषे, वे राजगृहनगरी विपे, अने वे कौशंबी-
नगरी विपे उत्पन्न थइ हती, ते सर्वना पिताओनुं नाम राम हतुं, माताओनुं नाम धर्मा हतुं, ते आठेए पार्श्वनाथप्रमुनी पासे प्रव्रज्या
लीधी हवी अने प्रमुए पुप्पचूला आर्याने शिष्या तरीके अर्पण करेली तेमनी स्थिति नव पल्योपमनी कही छे, तेओ त्यांथी च्यवी
॥३६॥
महाविदेहक्षेत्रमा उत्पन्न थइ दीक्षा लइ सिद्धिगतिने पामशे. आ प्रमाणे निचे हे जम्बू! श्रमण भगवानमहावीरस्वामि के जे धर्मनी आदि करनारा-तीर्थने करनारा यावत् सिद्धिपदने पामेला छे तेमणे कहेलं छे. इति श्री द्वितीय श्रुतस्कंध सारांश समाप्तः । एवं श्री सौराष्ट्रदेशे कुंडलानगरे प० पू० आचार्यदेव श्रीमचन्द्रसागरसूरीश्वरजीनी पवित्र निश्राए विक्रम संवत्सर २००८ वर्षे चातुर्मासस्थितः मुनिश्रीचन्द्रसागरे वि. सं. २००८ वर्षे आपाडकृष्ण अमावास्यासोमवासरे श्री ज्ञाताधर्मकथानना प्रथम श्रुतस्कंधना भाठमा अध्ययनथी यावत् द्वितीय श्रुतस्कंधसमाप्ति पर्यन्तनो सारांश तारवीने लख्यो. शुभं भवतु । FRI श्रीज्ञाताधर्मकथा) द्वितीयविभागस्य अनुक्रमणिका- नवाङ्गी. वृ० वृ० श्रीज्ञाता- धर्मकथाने पृष्ठांक: पृष्ठांकः अ० ॥३७॥ २०० " अध्ययनानि ९ श्री माकन्दीदारकाख्यम् १. श्री चन्द्राख्यम् ११ श्री द्रावद्रवाख्यम् १२ श्री उदकाख्यम् १३ श्री दर्दुराख्यम् १४ श्री तेतलिपुत्रज्ञानाध्ययनम् १७७ १७८ १८० १८५ अध्ययनानि १५ श्री नन्दीफलाल्यम् १६ श्री अपरककाल्यम् १७ श्री अश्वाख्यम् १८ श्री सुसुमाख्यम् १९ श्री पुण्डरीकाख्यम् २० श्री द्वितीयश्रुतस्कन्धम् २०३ २३४ २४२ २४९ २५३ जाजरा " ॥ ३७॥ 15 शुद्धिपत्रकम् . RE पृष्ठ० पंक्ति पृष्ठ० पंक्ति मशुद्धम् पणियमंड करेइ विरुव० अशुद्धम् पक बद्रुति इत्यर्थः मुयति, तत्थवि स्वरुपे रुपक० १८०-२७ १७४-८ १७४-१० १७४-१६ १७४-२४ १७८-२७ १८७-१० १८७-१० १८९-४ शुद्धम् पणियभंड १९०-१६ करेह । १९६-१९ विरुव० | १९६-२० स्वरूपे | १९७-२४ रूपक रूपकार्य मंदावाया, महावाया 'दिवाई 'वईहिं | २००-१२ अणेग० | २००-१६ शुद्धम् पक्क बहुति इत्यर्थः मुयति, तत्थवि से थाहे जाते, ततेणं से वेतलि. सुकंसि तणकुडंसि अग- णिकायं पक्खिवंति २, अप्पाणं मुयति, तत्थवि घण्णे कुंडियं रुपका महावाया, मंदावाया 'दिवाइ' 'वर्हहिं अगणे० घण्णे कंडियं ILESE
पृष्ठ पंक्ति
पृष्ठ० पंकि
नवाडी.
धृ००
श्रीज्ञाता-
धर्मकथाङ्गे
अशुद्धम्
पमाणं
शुद्धि
पत्रकम्।
पणाम
हमा०
हरमा०
२०१-१३
२०४-२८
२०५-२५
२०७-१५
२०९-२६
२१२-१०
छुल्ला०
कर्म
अशुद्धम्
तय० फल०
तय० पत्त० फल. २१७-१७
एगते
एगते । २२२-१०
चेवे
चेव | २२७-८
गोन्न
गोनं १ २२८-१६
निसामति
निसामेति । २२८-२७
'पुरा पोराणाणमित्यत्र यावत्
XXXXXJ २३३-७
करणादेवं द्रष्टव्यं 'दुचिण्णाणं KXXXX] २३५-५
दुप्परकंताणं कडाणं पावाणं xxxxx २३७-११
कम्माणं परवगं फलवित्ति
Xxxxx २३७-२८
विसेस'ति अयमर्थः पुरा XXपुरा-
'जाण०
ग्मटुं०
से तेर्सि
सालोवन्ना
"जण
म8
से कणगकेऊ तेसि
सालीवना
E
॥ ३८॥
॥९-श्रीमाकन्दीदारकाख्यं ज्ञाताध्ययनम् ॥ अथ नवमं वित्रियते, अस्य च पूर्वेण सहायममिसम्बन्धः, पूर्वत्र मायावतोऽनर्थ उक्त:, इह तु मोगेष्वविरतिमतोनों विरतिमतवार्थोऽभिधीयते इत्येवं मम्बद्धं-- जइ णं भंते !, समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स णायज्झयणस अयमढे पण्णत्ते; नवमस्स णं भंते!, नायज्झयणस्स समणेणं जाव संपत्तेणं के अहे पण्णत्ते ?, एवं खलु जंबू !, तेणं कालेणं२, चंपा नाम नयरी, पुण्णभद्दे, तत्थ णं माकंदी नामं सत्यवाहे परिवसति, अड्डे; तस्स णं भद्दा नाम भारिया, तीसे णं भद्दाए अत्तया दुवे, सत्थवाहदारया होत्था; तं०-जिणपालिए य, जिणरक्खिए य; तते गं तेसिं मागंदियदारगाणं, अपणया कयाई एगयओ इमेयारूवे मिहो कहासमुल्लावे समुप्पवित्था-एवं खलु अम्हे लवणसमुदं पोयवहणेणं एकारस वारा ओगाढा, सव्वत्थविय णं लट्ठा, कयकबा अणहसमग्गा पुण- रवि नियघरं हब्वमागया तं सेयं खलु अम्हं देवाणुप्पिया , दुवालसमंपि लवणसमुहं पोतवहणेणं ओगाहित्तए त्तिकहु अण्णमण्णस्सेतमढें पडिसुणेतिर त्ता, जेणेव अम्मापियरो, तेणेव उवा, एवं वदासी- एव खलु अम्हे अम्मयाओ!, एकारस वारा तं चेव जाव निययं थरं हव्वमागया, तं इच्छामो णं अम्म- याओ!, तुम्हेहिं अन्भणुण्णाया समाणा दुवालसमं लवणसमुई पोयवहणेणं ओगाहित्तए, तते णं ते मागंदियदारए अम्मापियरो एवं वदासी-इमे ते जाया 1, अजग जाव परिभाएत्तए तं अणुहोह ताव २८ नवाङ्गी- भीजावा. धर्मक्रयाने माकन्दी ज्ञाताध्य पुत्रेण सह ५ वार्तालाप वर्णन- जाया ! विउले माणुस्सए इड्डीसकारसमुदए, किं मे सपञ्चवाएणं निरालंबणेणं लवणसमुद्दोत्तारेणं ?, एवं खलु पुत्ता!, दुवालसमी जत्ता सोपसग्गा यावि भवति, तं मा णं तुम्मे दुवे पुत्ता!, दुवालसमंपि लवण जाव ओगाहेह, मा हु तुम्भं सरीरस्स वावती भविस्सति; तते णं मागंदियदारगा अम्मापियरो दोचंपि तचंपि एवं वदासी-एवं खलु अम्हे अम्मयाओ!, एकारस वारा लवणं ओगाहित्तए, तते णं ते मागंदीदारए अम्मापियरो जाहे नो संचाएंति बहूहिं आघवणाहिं, पण्णवणाहि य, आघवित्तए वा, पन्नवित्तए वा, ताहे अकामा चेव एयमé अणुजाणित्था; तते णं ते मागंदियदारगा अम्मापिऊहिं अन्भणु- पणाया समाणा गणिमं च, धरिमं च, मेनं च, पारिच्छेनं च, जहा अरहण्णगस्स जाव लवणसमुदं बहुइं जोअणसयाई ओगाढा ॥ सूत्रम्-८५ ।। तते णं तेसिं मागंदियदारगाणं अणेगाई जोयणसयाई, ओगाढाणं समाणाणं अणेगाई उप्पाइयसंयाति पाउन्भूयाति; तंजहा-अकाले गजियं जाव थणियसद्दे कालियवाते तत्व समुट्टिए, तते णं सा णावा तेणं कालियवातेणं आहुणिजमाणी२, संचालिजमाणी२, संखोभिजमाणी २, सलिलतिकाववेगेहिं आयट्टिनमाणी२, कोटिमंसि करतलाहते विव तेंदूसए तत्थेवर; ओवयमाणी य, उप्पयमाणी य; उप्पयमाणीविव धरणीयलाओ, सिद्धविजाहरकन्नगा ओवयमाणीविव गगणतलाओ, भहविजा विनाहरकन्नगाविव, पलायमाणीविव महागरुलवेगवित्तासिया, भुयगवरकन्नगा धावमाणी- एतदन्तर्गत पाठ. अ प्रतो नास्ति । सूत्रम् ।
विष, महाजणरसियमद्दवित्तत्था, ठाणभट्ठा आसकिसोरी णिगुंजमाणीविव, गुरुजणदिहावराहा सुयण- कुलकन्नगा घुम्ममाणीविव, वीचीपहारसततालिया गलियलंबणाविव, गगणतलाओ, रोयमाणीविव सलिलगंटिविप्पइरमाणधोरंसुवाएहिं णयबहू, उवरतभत्तुया विलयमाणीविव, परचकरायाभिरोहिया परममहत्भयाभिईया महापुरवरी झायमाणीविष, कवडच्छोमप्पओगजुत्ता जोगपरिवाइया णिसास- माणीविव, महाकंतारविणिग्गयपरिस्संता परिणयवया अम्मया सोयमाणीविव; तवचरणखीणपरिभोगा चयणकाले देववरवह संचुण्णियकट्ठावरा, भग्गमेढिमोडियसहस्समाला, सूलाइयवंकपरिमासा, फलहं- तरतडतडेतफुतसंधिवियलंतलोहकीलिया, सव्वंगवियंभिया, परिसडियरज्जुविसरंतसव्वगत्ता, आमग- मल्लगभूया अश्यपुण्णजणमणोरहोविव; चिंतिजमाणगुरुई हाहाकयकण्णधारणावियवाणियगजणकम्म- गारविलविया णाणाविहरयणपणियसंपुण्णा बहहिं पुरिससरहिं रोयमाणेहिं, कंद०, सोय०, तिप्प०, विलवमाणेहि; एग महं अंतो जलगयं गिरिसिहरमासायइत्ता संभग्गकूवतोरणा, मोडियझयदंडा, वलय- सयखंडिया, फरकरस्स तत्थेव विद्दवं उवगया; तते णं तीए णावाए भिंजमाणीए बहवे पुरिसा विपुलप- डियं भंडमायाए अंतो जलंमि णिमजावि याचि होत्था ॥ सूत्रम्-८६ ।। तते ण ते मागंदियदारगा छेया, दक्खा, पत्ता, कुसला, मेहावी, णिउणसिप्पोवगया, बहुसुं पोतवहणसंपराएसु कयकरणलद्वविजया,
नवाङ्गी-
१०पू०
भीज्ञाता-
धर्मकथा)
अमूढा, अमूढहत्था, एगं महं फलगवंडं आसाति, जैसिं च णं पदेससि से पोयवहणे विवन्ने, तसिं च
णं पदेसंसि एगे महं रयणदीवे णामं दीवे होत्या, अणेगाई जोमणाति आयामविक्खंभेणं, अणेगाई जो-
अणाई परिक्खेवेणं णाणादुमसंडमंडिउइसे सस्सिरीए पासातीए ४, तस्स णं बहुमज्झदेसभाए, तत्थ णं
महं एगे पासायवडेंसए होत्था, अन्भुग्गयमूसियए जाव सस्सिरीभूयरूवे पासातीए ४, तत्थ णं पासा-
यव.सए रयणद्दीवदेवया नाम देवया परिवसति, पावां चंडा रुदा साहसिया; तस्स णं पासायवडिंस-
यस्स चउहिसिं चत्तारि वणसंडा किण्हा किण्होमासा तते णं ते मागंदियदारगा तेणं फलयखंडेणं उवु-
ज्झमाणा२, रयणदीवंतेणं संवुढा यावि होत्था, तते णं ते मागंदियदारगा थाहं लभंति२ मुहुत्ततरं आस-
संति२, फलगखंडं विसब्जेतिर, रयणद्दीवं उत्तरंति२, फलाणं मग्गणगवेसणं करेंति२, फलार्ति गिण्हंति२,
आहारतिर, णालिएराणं मग्गणगवेसणं करेंतिर, नालिएराई फोडेंति नालिएरतेग्लेणं अण्णमण्णस्स गत्ताई
अभंगेति २, पोक्खरणीतो ओगाहिंति २, जलमजणं करेंति २, जाव पच्चुत्तरंति २, पुढविसिलापट्यसि
निसीयंति२: आसत्था, वीसस्था, सुहासणवरगया चंपानयरिं अम्मापिउआपुच्छणं च लवणसमुदोत्तारं च
कालियवायसमुत्थणंच पोतवहणविवत्तिं च फलयखंडस्स आसायणंच रयणद्दीवुत्तारंच अणुचिंतेमाणा २,
ओहतमणसंकप्पा जाव झियायेन्ति; तते णं सा रयणद्दीवदेवया ते मागंदियदारण ओहिणा आभोएति,
माकन्दी
ज्ञाताध्य०
समुद्र
स्थित
माकन्दी-
पुत्रवर्णन
॥ १६४ ॥
१ असि अ
.॥ १६४ ॥
असिफलगवग्गहत्था सत्तट्टतलप्पमाणं उ8 वेहासं उप्पयति २, ताते उक्किट्ठाए जाव देवगईए वीइचयमाणी २, जेणेव मागदियदारए तेणेव आगच्छति २, आसुरुत्ता मागंदियदारए खरफरुसनिट्ठरवय- णेहिं एवं वदासी-हं भो मागंदियदारया !, अप्पत्थियपत्थिया जति णं तुम्भे मए सदि विउलाति भोगभोगाई भुंजमाणा विहरह, तो मे अस्थि जीविअं, अहण्णं तुम्मे मए सद्धिं विउलातिं नो विहरह, तो मे इमेणं नीलप्पलगवलगुलिय जाव खुरधारेणं असिणा रत्तगंडमंसुयाई माउयाहिं उवसोहियाई तालफलाणीव सीसाई एगते एडेमि तते णं ते मार्गदियदारगा रयणदीवदेवयाए अंतिए सो० भीया, करयल० एवं जपणं देवाणुप्पिया ! बतिस्ससि, तस्स आणाउववायवयणनिद्देसे चिहिस्सामो, तते णं सा रयणदीवदेवया ते मागंदियदारए गेण्हति २, जेणेव पासायवडिसए तेणेव उवागच्छइ२, असुभपोग्गलाव- हारं करेति २, सुभपोग्गलपक्खेवं करेति २ त्ता, पच्छा तेहिं सद्धिं विउलातिं भोगभोगाई मुंजमाणी विहरति, कल्लाकल्लिं च अमयफलाति उवणेति ।। सूत्रम्-८७ ।। मर्व सुगम, नवरं-निरालंबणेणं'-निष्कारणेन प्रत्यपायसम्भवे वा त्राणायाऽऽलम्बनीयवस्तुवर्जितेन, 'कालियावाए तस्थ'-त्ति-कालिकावातः-प्रतिकूलवायुः, 'आहुणिजमाणी'त्यादि, आधूयमाना कम्पमाना विद्रवमुपगतेति सम्बन्धः, सञ्चाल्यमाना-स्थानात् स्थानान्तरनयनेन सझोम्यमाना-अधो निमजनतः तद्गतलोकक्षोमोत्पादाद्वा सलिलातीक्ष्णवेगैर- तिवर्त्यमाना-आक्रम्यमाणा कुट्टिमे करतलेनाहतो यः स तथा स इव, 'तंदूसए'-त्ति-कन्दुकः, तत्रैव प्रदेशेऽधः पतन्ती नवाली- भीड़ाता- धर्मकथा माकन्दी ज्ञाताध्यक सपद्रोत्पा- तवर्णनम् । ॥१६५।। वा-अधो गच्छन्ती उत्पतन्ती वा-ऊर्ध्व यान्ती तथोपतन्तीव धरणीतलाव , मिविद्या विद्याधरकन्यका तथाऽधः पतन्तीक, गगनतलाद् भ्रष्टविद्या विद्याधरकन्यका, तथा-विपलायमानेव-मयाद्धावन्तीव महागरुडवेगवित्रासिता भुजगकन्यका धाव- न्तीव, महाजनस्य रसितशब्देन वित्रस्ता स्थानभ्रष्टाऽश्चकिशोरी, तथा-विगुञ्जन्तीव-अव्यक्तशब्दं कुर्वन्तीन अवनमन्तीव वा, गुरुजनदृष्टापराधा-पित्राापलब्धव्यलीका सुजनकुलकन्यका कुलीनेति भावः, तथा-घूर्णन्तीव-वेदनया थरथरायमाणेच वीचिप्रहारशवताडिता हि स्त्री वेदनया घूर्णतीति वेदनयेव घूर्णयन्तीत्येवमुपमानं द्रष्टव्यं, गलितलम्बनेव-आलम्बनाद् भ्रष्टेव गगनतलाद्-आकाशात् पतितेति गम्यते, यथा क्षीणवन्धनं फलाद्याकाशात् पतति एवं माऽपीति, क्वचित्तु-गलितलम्बना. इत्येवापदेव दृश्यते, तत्र लम्ब्यन्ते इति लम्बना:-नगरास्ते गलिता यस्यां मा तथा, तथा रुदन्तीव, के केत्याह-सलिलभिन्ना ये ग्रन्थयस्ते सलिलग्रन्थयः ते च ते, 'विप्पइरमाण'त्ति-विप्रकिरन्तश्च मलिलं क्षरन्त इति ममासः त एव स्थूरा अश्रुपाता- स्तैर्नववधूपरतमनुका, तथा विलपन्तीव, कीदृशी केत्याह-परचक्रराजेन-अपरसैन्यनृपतिनाऽभिरोहिता-सर्वतः कृतनिरोधा या मा तथा, परममहामयाभिद्रुता महापुरवरी, तथा क्षणिकस्थिरत्वमाधात् ध्यायन्तीव कीदृशी केत्याह-कपटेन-वेषा धन्यथात्वेन यच्छद्म तेन प्रयोग:-परप्रतारणव्यापारः तेन युक्ता या मा, तथा, योगपरिव्राजिका-ममाधिप्रधानव्रतिनी- विशेषः, तथा निःश्वमन्तीव अधोगमनसाधर्म्यात् तद्गतजननिःश्वाससाधाद्वा निःश्वसन्तीव कीदृशी केत्याह-महाका- न्वारविनिर्गता परिश्रान्ता च या सा तथा परिणतक्या-विगतयौवना, 'अम्मय'त्ति-अम्बा पुत्रजन्मवती, एवंभूता हि स्त्री अमप्रचुरा भवति, ततश्चात्यर्थ निःश्वसितीत्येवं सा विशेषितेति, तथा तद्गतजनविषादयोगात् शोचन्तीक, कीदृशी केवेत्याह- . तपश्चरण-ब्रह्मचर्यादि तत्फलमपि उपचारात् तपश्चरणं-स्वर्गसम्भवमोगजातं तस्य क्षीणः परिभोगो यस्याः सा तथा, च्यवनकाले देववरवधूः, अथवा-' उप्पयमाणीविवे 'त्यादाविवशब्दस्यान्यत्र योगादुत्पतन्ती नौः, केव ?-सिद्धविद्या- विद्याधरकन्यकेवेत्यादि व्याख्येयमिति, तथा मञ्चूर्णितानि काष्ठानि कूपरं च-तुण्डं यस्याः मा तथा, तथा भग्ना मेढी- सकलफलकाधारभूतकाष्ठरूपा यस्याः मा तथा, मोटितो-मनः सहसा-अकसात् सहस्रसङ्घयजनाश्रयभूतो वा मालो- मालकः उपरितनभागो जनाधारो यस्याः सा तथा, ततः पदद्वयस्य कर्मधारयः, तथा शूलाचितेव-शूलामोतेव गिरिशृङ्गा. रोहणेन निरालम्बनतां गतत्वाच्छूलाचिता वको-वक्रः परिमर्शो-जलधिजलस्पर्शो-यस्याः मा तथा, ततः कर्मधारयः, अथवा-शूलायित:-आचरितशूलारूपा स्कन्दिनपरिकरत्वात् ; 'मूलाइत्त 'ति-पाठे तु शुलायमानो वक्तश्च-चक्रः 'परिमासो' त्ति-नौगतकाष्ठविशेपो नाविकप्रसिद्धो यस्यां सा तथा, फलकान्तरेपु-मईटित-फलकविवरेपु तटतटायमानाः-तथाविधध्वनि विदधानाः स्फुटन्तो-विघटमानाः सन्धयो-मीलनानि यस्यां सा तथा, विगलन्त्यो लोहकीलिका यस्यां सा तथा, ततः कर्मधारयः, तथा सर्वाङ्ग:-सर्वावयवैविजृम्भिता-विवृततां गता या सा तथा, परिशटिता रजवा-फलकसङ्घातनदवारिका यस्याः सा तथा, अत एव 'विसरंत'त्ति-विशीर्यमाणानि सर्वाणि गात्राणि यस्याः मा तथा, ततः कर्मधारयः, आमक्रमल्लकभूता-अपयशरावकल्पा, जलसम्पर्के क्षणेन विलयनात् , तथा अकृतपुण्यजनमनोरथ इव चिन्त्यमाना-कथमि- ममेवामापदं निस्तरिष्यतीत्येवं विकल्प्यमाना गुर्वी-गुरुका, आपदः मकाशात् दुःममुद्धरणीयत्वात् , निष्पुण्यजनेनापि , 'घहित० ।
. भीडाता- बर्मकथा माकन्दी ज्ञाताध्य० समुद्रो- स्पातादि. वर्णनम् । ॥ १६६॥ स्त्रो मनोरथः कथमयं पूरयिष्यत इत्येवं चिन्त्यमानो दुनिर्वहत्वाद् गुरुरेव भवन्तीति तेनोपमेति, तथा हाहाकृतेन- हाहाकारेण कर्णधाराणा-निर्यामकाणां नाविकानां-कैवर्चानां वाणिजकजनानां कर्मकराणां च प्रतीतानां विलपित-विलापो यस्यां मा तथा, नानाविध रत्नैः पण्यैश्व-माण्डैः सम्पूर्णा या सा तथा, 'रोयमाणेहिं 'ति सशब्दमणि विमुश्चत्सु, 'कंदमाणेहिति-शोकान् महाध्वनि मुश्चत्सु, 'सोयमाणेहि-शोचत्सु मनमा खियमानेषु, 'तिप्पमाणेहिति-मयात् प्रस्वेदलालादि तर्पत्त, 'विलपत्सु'-आर्त जल्पत्सु एकं महत् , 'अंतो जलगयं 'ति-जलान्तर्गत गिरिशिखरमासाद्य मम्ममः कूपक:-कूपकस्तम्भो यत्र यत्र सिवपटो निबध्यते तोरणानि च यस्यां मा तथा, तथा मोटिता बजदण्डा यस्यां मा तथा, बलकाना-दीर्घदारुरूपाणां शतानि खण्डानि यस्यां सा तथा, अथवा वलयशतैः-वलयाकारखण्डशतैः खण्डिता या मा तथा, 'करकर'ति-करकरेतिशब्दं विदधाना तत्रैव जलधौ विद्रवं-विलयमुपगतेति, 'पोयवहणसंपराएK'ति. सम्पराय:-मधामः तद्वद्यानि भीपणानि पोतवहनकार्याणि तानि तथोच्यन्ते तेषु, देवताविशेषणानि विजयचौरविशेषणवद् गमनीयानि; 'असिखेडगवग्गहत्य'त्ति-खड्गफलकाम्यां व्यग्रौ हस्तौ यस्याः सा तथा, 'रत्तगंडमंसुयाई "ति- रक्तो-रजिती गण्डौ यस्तानि रक्तगण्डानि तानि श्मश्रणि-कर्चकेशाः ययोस्ते रक्तगण्डश्मश्रुके, 'माउयाहिं उवसोहि- याईति-इह माउयाउ उत्तरोष्ठरोमाणि सम्भाव्यन्ते, अथवा-'माउया'-सख्यो मातरो वा तामिः उपशोभिते-समारचित- केनत्वादिना जनितशोमे उपभोमिते वा-निर्मलीकते शिरसी-मस्तके छिवेति वाक्पशेषो, 'जपणं देवाणुप्पिए'त्यादि, यं , 'शोषित, म । RECE .
कञ्चन प्रेष्याणामपि प्रेष्यं देवानुप्रिया वदिष्यति-उपदेश्यति यदुतायमाराध्यः, 'तस्सत्ति-तस्यापि आस्तां भवत्याः आज्ञा अवश्यं विधेयतया आदेशः उपपात:-सेवावचनं-अनियमपूर्वक आदेश एव निर्देश:-कार्याणि प्रति प्रश्ने कते यनियतार्थ- मुत्तरमेतेषां समाहारद्वन्द्वः तत्र, अथवा-यदेवानां प्रिया वदिष्यति, 'तस्स'त्ति-तत्र आज्ञादिरूपे स्थास्यामः-वतिष्याम इति, 'अमयफलाईति-अमृतोपमफलानि । तते णं मा रयणदीवदेवया, सकवयणसंदेसेणं सुहिएणं लवणाहिवइणा लवणसमुद्दे तिसत्तखुत्तो अणुपरियद्वियव्वेत्ति, जे किंचि तत्थ तणं वा, पत्तं वा, कटं वा, कयवरं वा, असुई पूतियं दुरभिगंधमचोक्खं तं सब्बं आहुणियर, तिसत्तखुत्तो पुगंते एडेयव्वं तिकटु णिउत्ता; तते णं सा रयणद्दीवदेवया, ते माग- दियदारए; एवं वदासी-एवं खलु अहं देवाणुप्पिया, सक्क० सुट्टिय० तं चैव जाव णिउत्ता; तं जाव अहं देवा , लवणसमुद्दे जाव एडेमि ताव तुन्भे इहेव पासायवडिंसए सुहंसुहेणं अभिरममाणा चिट्ठह, जति णं तुम्भे एयंसि अंतरंसि उब्विग्गा वा, उस्सुया वा, उप्पुया वा, भवेत्राह; तो णं तुम्भे पुरच्छिमिल्लं वणसंडं गच्छेवाह, तत्थ णं दो ऊऊ सया साहीणा तं०-पाउसे य वासारत्ते य,-" तत्थ उ कंदलसिलिंधदंतो णिउरवरपुष्फपीवरकरो । कुडयज्जुणणीवसुरभिदाणो पाउसउऊगयवरो साहीणो ॥१॥ तत्य य-सुरगोवमणिविचित्तो दहुरकुलरसियउज्झररवो । यरहिणविंदपरिणद्वसिहरो वासारत्तो उऊप- व्यतो साहीणो ॥ २॥" तत्थ णं तुम्मे देवाणुप्पिया !, बहुसु वावीसु य, जाव सरसरपंतियासु बहूसु E
भीवावा.
धर्मकथाओं
९-श्री-
माकन्दी-
ज्ञाताध्य.
रत्नद्वीप-
देवतादि-
वर्णन-
१६७॥
आलीघरएसु य, मालीघरएसु य, जाव कुसुमघरएसु य, सुहंसुहेणं अभिरममाणा विहरेजाह; जति णं
तुम्भे एत्यवि उब्बिग्गा वा, उस्सुया वा, उप्पुया वा, भवेजाह; तो णं तुन्भे उत्तरिल्लं वणसंडं गच्छेज्जाह,
तत्थ णं दो ऊऊ सया साहीणा तं०-सरदो य हेमंतो य,-" तत्थ उ सणसत्तवण्णकउओ नीलुप्पलपउम.
नलिणसिंगो । सारसचमवायरवितघोसो सरयऊऊगोवती साहीणो ॥ १ ॥ तत्थ य सियकुंदधवलजोण्हो
कुसुमितलोद्ववणसंडमंडलतलो । तुसारदगधारपीवरकरो हेमंतऊऊससी सया साहीणो ॥२॥" तत्थ
णं तुन्भे देवाणुप्पिया, वाचीसु य जाव विहरेजाह, जति णं तुम्भे तत्थवि. उबिग्गा वा जाव उस्सुया
वा भवेजाह, तो णं तुम्भे अवरिल्लं वणसंडं गच्छेजाह; तत्थ णं दो ऊऊ साहीणा, तं०-"वसंते य गिम्हे
य, तत्थ उ सहकारचारुहारो किंसुयकण्णियारासोगमउडो । ऊसिततिलगबउलायवत्तो वसंतउऊणरवती
साहीणो॥१॥ तत्थ य पाडलसिरीससलिलो मलियावासंतियधवलवेलो। सीयलसुरभिअनिलमगर-
परिओ गिम्हऊऊसागरो साहीणो॥ २॥" तत्थ णं बहुसु जाव विहरेवाह, जति णं तुम्भे देवा !
तत्यवि उब्विग्गा उस्सुया भवेजाह, तओ तुन्भे जेणेव पासायवडिंसए तेणेव उवागच्छेनाह, ममं पडि.
वालेमाणा २ चिट्ठाह, मा णं तुन्भे दक्खिणिलं वणसंडं गच्छेज्जाह, तत्थ णं महं एगे, उग्गविसे, चंड-
विसे, घोरविसे, महाविसे, अहकायमहाकाए, जहा तेयनिसग्गे, मसिमहिसामूसाकालए, नयणविसरो-
सपुण्णे, अंजणपुंजनियरप्पगासे, रत्तच्छे, जमलजुपलचंचलचलंतजीहे घरणियलवेणिभूए, उक्कडफुडकुडि-
सत्रम् ।
॥ १६७॥
लजडिलकक्खडवियडफडाडोवकरणदन्छे, लोगाहारधम्ममाणधमधमेतघोसे, अणागलियचंडतिव्वरोसे, समुहिं तुरियं, चवलं धमधमंतदिट्ठीविसे सप्पे य परिवसति; मा णं तुम्भं सरीरगस्स वावत्ती भविस्सइ, ते मार्गदियदारए दोचंपि तचंपि एवं वदतिर, वेउब्वियसमुग्घाएणं समोहणतिर, ताए उफिट्टाए लवणस- मुंई तिसत्तखुत्तो अणुपरियटेउं पयत्ता यावि होत्था ॥ सूत्रम्-८८ ।। 'सवयणसंदेसेणं'ति-शक्रवचनं चासौ सन्देशश्व-मापकान्तरेण देशान्तरस्थम्य भणनं शक्रवचनमन्देशः तेन, अशु- चिक-अपवित्रं, समुद्रस्याशुद्धिमात्रकारकं पत्रादीति प्रक्रमः पूतिक-जीर्णतया कृथितप्राय, दुरभिगन्धं-दुष्टगन्धं किमुक्तं भवति? अचोक्ष अशुद्ध 'तिसत्तखुत्तो'ति-त्रिभिर्गुणिताः सप्त त्रिमप्त त्रिसप्त वाराः त्रिसप्तकृत्यः, एकविंशतिवारा नित्यर्थः एयंसि अंतरंसित्ति-एतस्मिन्नवसरे विरहे वा, 'उधिग्गत्ति-उद्विनौ उद्वेगवन्तौ, 'उप्पिच्छ'चि-मीती, पाठान्तरेण-उत्प्लुतौ- भीतावेवा 'उस्सुय'त्ति उत्सुको अस्मत्समागमनं प्रति, 'तत्थ णं दो उदू'इत्यादि, तत्र-पौरस्त्ये वनखण्डे द्वौ ऋतू- कालविशेषौ सदा स्वाधीनौ-अस्तित्वेन स्वायत्तौ, तजन्यानां वनस्पतिविशेषपुष्पादीनां सद्भावात् , तद्यथा-प्रावृट्-वरात्रश्च, आपाढश्रावणौ भाद्रपदाश्वयुजौ चेत्यर्थः, अनयोरेव रूपकालङ्कारेण वर्णनाय गीतिकाद्वयम् , 'तत्थ उ'इत्यादि, तत्रैव पूर्ववनखण्डे नान्यत्रौदीच्ये पश्चिमे वेत्यर्थः, कन्दलानि च-प्रत्यग्रलताः सिलिन्ध्राच-भूमिस्फोटा, अन्ये वाहुः कन्दलप्रधानाः मिलिन्ध्रा-वृक्षविशेषा ये प्रायपि पुष्यन्ति, सितकुसुमाश्च भवन्ति त एव कुसुमिताः सन्तो दन्ता यस्य धवलत्वसाधात् सः कन्दलसिलीन्ध्रदन्तः, इह च मिलीन्ध्राणां कुसुमितत्वविशेषणं सामर्थ्याद् व्याख्यात, माकन्दी- ज्ञाताध्य बनवण्डा- दिवर्णन- सूत्रम् । नवाङ्गी कुसुमाभावे तेषां प्रावृषोऽन्यत्रापि कालान्तरे सम्मवादिति, तथा 'निउरो'ति-वृक्षविशेषः, तस्य यानि वस्पुप्पाणि तान्येव ) पीवर:-रध्रः करो यस्य स तथा, कुटजार्जुननीपा-वृक्षविशेपास्तत् पुष्पाणि कुटजार्जुननीपानि तान्येव सुरमिदानं- भीज्ञाता सुगन्धिमदजलं यस्य स तथा, प्राध्द ऋतुरेव गजवरः प्राइऋतुगजवरः स्वाधीनः, इह सिलिन्ध्रादिवनस्पतीनां धर्मकथाओं कालान्तराकतकुसुमानां सदाकुसुमितानां मावादात्मयशोऽस्तीति भावः ॥१॥ तथा तत्रैव वनखण्डे सुरगोपा-इन्द्रगोप- काभिधाना रक्तवर्णाः कीटास्त एव मणयः पद्यरागादयः तैर्विचित्र:-कवरो यः स तथा, तथा द१रकुलरसित-मण्डूकसमूहरटितं ॥१६८॥ तदेव उन्झरवो-निर्झरशब्दो यत्र स तथा, बहिणवृन्देन-शिखण्डिसमूहेन परिणद्धानि परिगतानि शिखराणि ऋतुपक्षे वृक्षसम्बन्धीनि पर्वतपक्षे कूटानि यत्र स तथा वर्षा रात्रऋतुरेव पर्वत इति विग्रहः, स्वाधीनः स्वायत्चस्तद्धर्माणां सर्वदा तत्र मावादिति ॥ २॥ 'वावीसु'इत्यादि प्रथमाध्ययनवत् , 'सरओ हेमंतो यति-कार्तिकमार्गशीपों पौषमाधौ चेत्यर्थः इहापि गीतिकाद्वयं-'तत्थ उइत्यादि, तत्रैव सनो-वल्कप्रधानो वनस्पतिविशेषः सप्तपर्णः-सप्तच्छदस्तयोः पुष्पाणि सनसप्तपर्णानि तान्येव कादं-स्कन्धदेशविशेषो यस्य स तथा, नीलोत्पलपमनलिनानि-जलजकुसुमविशेषास्तान्येव से यस्य स तथा, सारसाश्चक्रवाकाश्व-पक्षिविशेषास्तेषां 'रविय'ति रुतं तदेव घोपो-नर्दितं यस्य स तथा शरष्टतुरेव गोपतिः- गवेन्द्र शरहतुगोपतिः स्वाधीनः॥१॥ तथैव तत्र वनखण्डे सितानि यानि कुन्दानि-कुन्दाभिधानवनस्पतिकुसुमानि तान्येव 'धवला ज्योत्सा-चन्द्रिका यस्प स तथा, पाठान्तरण-सितकुंदविमलजोहोति स्पष्टं, कुसुमितो यो लोधवनखण्डः स एव मण्डलतलं-विम्यं यस्य स तथा, तुपारं-हिमं तत्प्रधानाः या उदकधारा-उदकविन्दुप्रवाहास्ता एव पीवरा:- स्थूलाः कराः-किरणा यस्य स तथा, हेमन्तऋतुरेव शशी-चन्द्र इति विग्रहः स्वाधीनः ॥ २॥ तथैव 'वसंते गिम्हे यति- फाल्गुनचैत्रौ वैशाखज्येष्ठौ चेत्यर्थः, 'तत्थ उ' इत्यादि, गीतिकाद्वयं, तत्र च सहकाराणि-चूतपुष्पाणि तान्येव चारुहारो यस्य स तथा, किंशुकानि-पलाशस्य कुसुमानि कर्णिकाराणि-कर्णिकारस्य अशोकानि चाशोकस्य तान्येव मुकुटं- किरीटं यस्य स तथा,-उच्छ्रितं-उन्नतं तिलकचकुलानि-तिलकय कुलकुसुमानि तान्येवातपत्र-छत्रं यस्यं स तथा, वमन्त ऋतुर्नरपतिः स्वाधीनः प्रतीतम् ॥ १॥ तत्र च पाटलाशिरीपाणि-पाटलाशिरीषकुसुमानि तान्येव सलिलं यत्र स तथा मल्लिका. विचकिलो वामन्तिका-लताविशेषः तत्कुसुमानि मल्लिकावासन्तिकानि तान्येव धवला-सिता वेला-जलवृद्धिर्यस्य स तधा, शीतलः सुरभिश्च योऽनिलो-वायुः स एव मकरचरितं यत्र स तथा, इह चानिलशब्दस्य अकारलोपः प्राकृतत्वात् 'अरणं रणं अलायं लाउय' मित्यादिवत् , ग्रीष्मऋतुसागरः स्वाधीन इति । 'उग्गचिसे' इत्यादि उग्रं दुर्जरत्याद्विपं यस्य स उग्रविपः, एवं सर्वत्र, नवरं चण्डं झगिति व्यापकत्वात् , पाठान्तरे तु-' मोगविसे' इति तत्र भोगः शरीरं स एव विषं यस्येति, घोरं परम्परया पुरुषसहस्रस्यापि घातकत्वात् , महत् जम्बूद्वीपप्रमाणशरीरस्यापि विपतयाऽऽभवनात् , कायान्- शरीराणि शेपाहीनामतिक्रान्तोऽतिकायः, अत एव महाकायः, 'जहा तेयनिसग्गे 'त्ति-शेपविशेषणानि यथा गोशालक- चरिते तथेहाध्येतव्यानीत्यर्थः, तानि चैतानि 'मसिमहिसमूसाकालगे' मपी च महिपश्च मूपा च-स्वर्णादितापन- भाजनविशेष इति द्वन्द्वः एता इव कालको यः स तथा, 'नयणविसरोसपुण्णो' नयनविपेण-दृष्टिविषेण रोपेण च पूर्ण इत्यर्थः, 'अंजणपुंजनिगरप्पगासे' काळपुञ्जानां निकर इव प्रकाशते यः स तथा, 'रत्तच्छे जमलजुयलचंचलचलं. का
नवाङ्गी.
वृ००
भीज्ञाता-
धर्मकथाङ्गे
॥१६९ ।।
तजीहे' यमल-सहवति युगलं-दूयं चञ्चलं च यथा भवत्येवं चलन्त्यो:-अतिचपलयोर्जियोर्यस्य स तया, 'धरणितल
वेणिभूए' धरणीतलस्य वेणीभूतो-वनिताशिरमः केशवन्धविशेष इच यः कृष्णत्वदीर्घत्वश्लक्ष्णत्वपयाभागत्वादिसाधा स
तथा, 'उफडफुडकुडिलजडिलकवडविगडफडाडोवकरणदच्छे' उत्कटो बलवताऽन्येनाध्वंसनीयत्वात् स्फुटो-व्यक्तः
प्रयत्नविहितत्वात् कुटिल:-तत्स्वरूपत्वात् जटिल:-स्कन्धदेशे केसरिणामियाहीनां केसरसद्भावात् कर्कशो-निष्ठुरो बलवचात्
विकटश्च-विस्तीर्णो यः स्फटाटोप:-फणासंरम्भः तत्करणे दक्षो यः स तथा, 'लोहागरधम्ममाणधमधतघोसे'-
लोहाकरे ध्मायमान-अग्निना ताप्यमानं लोहमिति गम्यते, तस्येव यद्धमधमायमानो-धमधमेतिवर्णव्यक्तिमिवोत्पादयन्
घोप:-शब्दो यस्य म तथा, 'अणागलियचंडतिव्वरोसे'-अनर्गलित:-अनिवारितोऽनाकलितो या-अप्रमेयश्चण्डतीत्रः-
अत्यर्थतीवो रोपो यस्य स तथेति, 'समुहिं तुरियं चवलं घमंतंति शुनो मुखं श्वमुखं तस्येवाचरणं यमुखि-कौलेयकस्येव
भषणतां त्वरितचपलं-अतिचटुलतया धमन्-शब्दं कुर्वन्नित्यर्थः ।
तए णं ते मागंदियदारया तओ मुहत्तंतरस्स पासायवडिसए सई वा, रति वा, धिति वा, अलभ.
माणा अण्णमपणं एवं वदासी-एवं खलु देवा० !, रयणद्दीवदेवया अम्हे एवं वदासी-एवं ग्वल अहं सका.
वयणसंदेसेणं सुट्ठिएणं लवणाहिवइणा जाव वावत्ती भविस्सइ, तं सेयं खलु अम्हं देवाणुप्पिया !, पुर•
च्छिमिल्ले वणसंडं गमित्तए, अण्णमण्णस्स एयमढे पडिसुणेतिर, जेणेव पुरच्छिमिल्ले, वणसंडे, तेणेव
उवागच्छंतिर, तत्थ णं वावीसु य जाव अभिरममाणा आलीघरएसु य जाव विहरंति; तते णं ते मार्ग-
माकन्दी-
ज्ञाताध्यक
माकन्दी.
पुत्र
परस्पर-
विचार-
णादि-
.
॥ १६९ ॥
दियदारया तत्थचि सई या जाव अलभमाणा, जेणेव उत्तरिल्ले वणसंडे, तेणेव उवा०२, तत्थ णं वावीसु य जाव जालीघरएसु य विहरंति; तते णं ते मागंदियदारया तत्थवि मतिं वा जाव अलभ० जेणेव पचत्थिमिल्ले चणसंडे, तेणेव उवा० २ जावविहरति; तते णं ते मागंदिय० तत्थवि सतिं वा जाव अलभ० अण्णमपणं, एवं वदासी-एवं खलु देवा० !, अम्हे रयणदीवदेवया एवं वयासी-एवं खलु अहं देवाणु- पिया!, सफरस वयणसंदेसेणं सुहिएण लवणाहिवइणा जाव मा णं तुन्भं सरीरगस्स चावत्ती भवि. स्सति, तं भवियव्वं एत्थ कारणेणं, तं सेयं खलु अम्हं दक्खिणिल्लं वणसंडं गमित्तए त्तिकहु अपणमा पणस एतमढे पडिसुणेतिर, जेणेव दक्खिणिल्ले वणसंडे, तेणेव पहारेत्थ गमणाए; तते णं गंधे निद्वाति से जहा नामए अहिमडेति वा जाच अणिट्टतराए चेव, तते णं ते मागंदियदारया तेणं असुभेणं गंधेणं अभिभूया समाणा सरहिं२ उत्तरिजेहिं आसातिं पिहेंति२, जेणेव दक्षिणिल्ले वणसंडे तेणेव उवागया, तत्व णं महं एग आघातणं पासंतिर, अहियरासिसतसंकुलं, भीमदरिसणिज, एगं च तत्थ सूलाइतयं, पुरिसं, कलुणातिं विस्सराति कट्ठातिं कुब्वमाणं पासंति; भीता जाव संजातभया जेणेव से सूलाति- यपुरिसे तेणेव उवागच्छंति२, तं सूलाइयं एवं वदासी-एस णं दे! कस्साघयणे तुमं च णं के कओ वा, इहं हव्वमागए केण वा इमेयारूवं आवतिं पाविए ?; तते णं से सूलातियए पुरिसे मागंदियदारए १ आयतणं, ।
नवाङ्गी- भीमाता- धर्मकथाने সবাহ ॥१७० ॥ एवं वदासी-एस णं देवाणु० ? रयणदीवदेवयाए आघयणे अहपणं देवाणुप्पिया! जंबुदीवाओ दीवाओ, ९-श्री- भारहाओ वासाओ, कागदीए आसवाणियए, विपुलं पणियमंडमायाए पोतवहणेणं लवणसमुई ओयाए, माकन्दी- तते णं अहं पोयवहणविवत्तीए निबुभंडसारे एगं फलगवंडं आसाएमि; तते णं अहं उबुज्झमाणे२; रयणदीवतेणं संबूढे, तते णं सा रयणदीवदेवया ममं ओहिणा पासहर, ममं गेहह २, मए सदि विपु. शूला. लाति भोगभोगाति मुंजमाणी विहरति; तते णं सा रयणदीवदेवया अण्णदा कपाई अहालहुसगंसि रोपित- अवराहसि परिकुविया समाणी ममं एतारूवं आवतिं पावेइ, तं ण णज्नति णं देवा०, तुम्हपि इमेसि पुरुप सरीरगाणं का मण्णे आवती भविस्सह ?, तते णं ते मागंदियदारया तस्स सूलाइयगस्स अंतिए एयमत्थं कयनादि- सोचा, णिसम्म, वलियतरं भीया जाव संजायभया सूलाइतयं पुरिसं एवं व०-कहण देवाणु, अम्हे मूत्रम् । रतणदीवदेवयाए हत्थाओ साहत्यि णित्थरिजामो ?, तते णं से सूलाइयए पुरिमे ते मागंदिय० एवं वदासी-एस णं देवाणु० 1, पुरच्छिमिल्ले वणसंडे सेलगस्स जक्खस्स जग्वाययणे सेलए नामं आसरूव- धारी जक्खे परिवसति, तए णं से सेलए जक्खे चोहमहमुदिपुण्णमासिणीसु आगयसमा पत्तसमये महया २ सद्देणं एवं वदति-कं तारयामि ?, कं पालयामि ?; तं गच्छह, णं तुम्भे देवा!, पुरच्छिमिल्लं वणसंडं सेलगस्स जक्खस्स महरिहं पुप्फचणियं करेहर, जण्णुपायवडिया पंजलिउडा विणएणं पज्जुवा- समाणा चिट्ठह, जाहे णं से सेल जक्खे आगतसमए पत्तसमा एवं वदेजा-कं तारयामि , के पाल ॥ १७०।
यामि ताहे तुम्भे वदह-अम्हे तारयाहि, अम्हे पालयाहिः सेलए भे जक्खे परं रयणदीवदेवयाए हत्थाओ साहत्यि णित्यारेजा, अण्णहा भे न याणामि इमेसिं सरीरगाणं का मण्णे आवई भविस्सइ ? ॥ सूत्रम् ८९ ॥ तते णं ते मागंदिय० तस्स सूलाइयस्स अंतिए एयमहं सोचा, निसम्म; सिग्छ, चंडं, चवलं, तुरियं, चेइयं जेणेव पुरच्छिमिल्ले वणसंडे, जेणेव पोक्खरिणी, तेणेव उवा०, पोक्खरिणिं गाहंतिर, जलमजणं करेन्तिर, जाई तत्थ उप्पलाई जाव गेण्हतिर, जेणेव सेलगस्स जक्खस्स जक्खाययणे, तेणेव उ०२, आलोग पणाम करेंतिर, महरिहं पुष्फवणियं करेंति२, जपणुपायवडिया, सुस्सूसमाणा, णमं- समाणा पज्जुवासंति; तते णं से सेलए जक्खे आगतसमए पत्तसमए एवं वदासी-कं तारयामि ?, कं पालयामि ; तते णं ते मागंदियदारया उहाए उठेति, करयल० एवं व०-अम्हे तारयाहि, अम्हे पाल- याहि तए णं से सेलए जक्खे ते मागंदिय०, एवं वया०-एवं खलु देवाणुप्पिया, तुभं मए सद्धिं लव- णसमुदेणं मज्झंर, वीइवयमाणेणं सा रयणदीवदेवया पावा, चंडा, रुद्दा, खुद्दा, साहसिया बहुहिं खरएहि य, मउगहि य, अणुलोमेहि य, पडिलोमेहि य, सिंगारेहि य, कलुणेहि य, उवसग्गेहि य, उवसग्गं करेहितितं जति णं तुम्मे देवा! रयणदीवदेवयाए एतमढे आढाह वा, परियाणह वा, अवयेक्खह वा, तो भे अहं पिट्ठातो विधुणामि, अह णं तुम्भे रयणदीवदेवयाए एतमहं णो आढाह, णो परियाणह, णो अवेक्खह, तो भे रयणदीवदेवयाहत्थातो साहत्यि णित्यारेमिः तए णं ते मागंदियदारया सेलग जक्ख, HE नगगी. भीवाना. धर्मकपाटे पर्य पदासी-जपणं देवाणु० ! वइस्संति तस्स णं उपयायवयणणिइसे चिहिस्सामो, तते णं से सेलए जश्न उत्तरपुरचिटम दिसीभार्ग अवफमति२, वेउब्वियसमुग्घागणं समोहणति२, संग्वेजातिं जोवणाई पंदं निस्सरह, दोपि तपि वेउब्वियसमु०२, एग मह आसरूवं विउब्वइ२, ते मागंदियदारण एवं बदामी-ई भो मागंदिया, आमह णं देवाणुप्पिया!, मम पिटुंसि, तते णं ते मागंदिय०, हट्ट, सेल- गरम जस्पस्स पणामं करेंति२, सेलगस्स पिटिं दुरूढा; तते णं से सेलए ते मागंदिय०, दुरूढे जाणित्ता, सत्ततालप्पमाणमेत्तातिं उड़े चेहासं उप्पयति, उप्पइत्ता य ताए उफिट्टाए, तुरियाए, देवयाए, लवण. ममुई मजनमज्ज्ञेणं, जेणेय जंयुहीवे दीये, जेणेय भारहे, जेणेव चंपा नयरी, तेणेव पहारेत्थ गमणाए ॥ सूत्रम् १० ॥ तते णं सा रयणदीवदेवया लवणसमुई तिसत्तखुत्तो अणुपरियति, जं तत्थ तणं वा जाय पडेति, जेणेव पासायवठेमए तेणेय उवागच्छति२, ते मागंदिया पासायवडिसए अपासमाणी जेणेय पुरचिमिरले वणसंढे जार सम्यतो समंता मग्गणगवेसणं करेति२, तेसिं मायंदियदारगाणं कच्छइ सुति या ३, अलममाणी जेणेच उत्तरिल्ले एवं चेव पचत्धिमिल्लेवि जाव अपासमाणी ओहिं पउंति; ते मागंदिगदारण मेलपणं मदि लवणसमुई मज्झमज्झेणं वीइवयमाणे२, पासतिर, आसुरुत्ता असिग्वेडगं गेण्डतिर, मत्तह जाय उप्पपतिर, ताए उफिट्टाए जेणेव मागंदिय० तेणेव उवा०२, एवं ०-हं भो मागं. ९-श्री- माकन्दी- ज्ञाताध्य शेलकयक्ष- सम्बन्धा- दिवर्णन- सूत्रम् । ।। १७१ ।।
दिय० अप्पत्धियपत्थिया किण्णं तुम्भे जाणह ममं विप्पजहाय सेलएणं जक्खणं सद्धिं लवणसमुदं मझं. मज्ञणं, वीतीवयमाणा ?; तं एवमवि गए जइ णं तुम्भे ममं अवयक्खह तो भे अस्थि जीवियं, अहण्ण णावयक्खह तो भे इमेणं नीलुप्पलगवल जाव एडेमि, तते णं ते मागंदियदारया रयणदीवदेवयाए अतिए एयमर्स्ट सो०, णिस०; अभीया, अतत्था, अणुब्बिग्गा, अक्खुभिया, असंभंता, रयणदीचदेवयाए एयमई नो आईति, नो परि०, णो अवयक्वंति; अणाढायमाणा अपरि०, अणवयक्षमाणा सेलएण जक्खेण सद्धिं लवणसमुदं मझमझेणं वीतिवयंति; तते णं सा रयणदीवदेवया ते मागंदिया जाहे नो संचाएति, पहहि पडिलोमेहि य, उवसग्गेहि य, चालित्तए वा, खोभित्तए वा, विपरिणामित्तए वा, लोभित्तए वा, ताह महुरेहि सिंगारेहि य, कलुणेहि य, उपसग्गेहि य, उवसग्गेउं पयत्ता यावि होत्था; हं भो मार्ग- दियदारगा , जति णं तुम्भेहिं देवाणुप्पिया, मए सद्धि हसियाणि य, रमियाणि य, ललियाणि य, कीलियाणि य, हिंडियाणि य, मोहियाणि य; ताहे णं तुम्भे सव्वाति अगणेमाणा ममं विप्पजहाय सेलए सद्धिं लवणसमुदं मझमझेणं वीइवयह तते णं सा रयणदीवदेवया जिणरक्खियरस मणं ओहिणा आभाएति आभोएत्ता एवं वदासी-णिचंऽपिय णं अहं जिणपालियस्स अणिहा ५ निचं मम जिणपालिए अणिढे ५ निचंपिय णं अहं जिणरक्खियस्स इट्टा ५ निचंपिय णं ममं जिणरक्खिए इहे ५, जति णं मम जिणपालिए रोयमाणी, कंदमाणी, सोयमाणी, तिप्पमाणी, विलवमाणी, णावयावति
H
नवाङ्गी-
पृ० ०
भीज्ञाता.
धर्मकथाओं
किणं तुमं जिणरकिग्वया !, ममं रोयमाणिं जाव णाक्यक्खसि ?; तते णं-"सा पवररयणदीवस्स
देवया ओहिणा उ जिणरक्खियस्स मणं । नाऊण वधनिमित्तं उवरि मागंदियदारगाणं दोण्हपि ॥१॥"
दोसकलिया सललियं णाणाविहचुण्णवासमीसं (सिय) दिव्वं । घाणमणनिव्वुइकरं सव्वोउयसुरभिकुसु-
महि पमुंचमाणी ॥ २॥णाणामणिकणगरयणघंटियखिखिणिणेऊरमेहलभूसणरवेणं । दिसाओ, विदि.
साओ पूरयंती वयणमिणं वेति सा सकलुसा ॥ ३॥ होल वसुल गोल णाह दहत पिय रमण कंत सामिय
णिग्विण णित्थक । छिण्ण णिकिव अकयलय सिढिलभाव निल्लन लुक्ख अकलुण ज़िणरक्खिय मज्झं
हिययरग्वगा! ॥ १ ॥णहु जुनसि एकियं अणाहं अयंधवं तुज्झ चलणओवायकारियं उज्झिउं महपणं ।
गुणसंकर ! अहं तुमे विहणा ण समत्थावि जीविडं ग्वणंपि ॥ ५॥ इमस्स उ अणेगझसमगरविविधसा-
वयसयाउलघरस्स । रयणागरस्स मज्झे अप्पाणं वहेमि तुज्झ पुरओ एहि णियत्ताहि जइसि कुविओ
खमाहि एकावराहं मे ॥ ६॥ तुज्झ य विगयघणविमलससिमंडलगारसस्सिरीयं सारयनवकमलकुमुद-
कुवलयविमलदलनिकरसरिसनिभं । नयणं चयणं पिवासागपाए सद्धा मे पेच्छिउं जे अवलोएहि ता
इओ मम णाह जा ते पेच्छामि वयणकमलं ॥७॥ एवं सप्पणयसरलमहुराति पुणो २ कलुणाई. वय-
गाति जंपमाणी सा पावा मग्गओ समण्णेह पावहियया ॥ ८॥" तते णं से जिणरक्खिए चलमणे
तेणेव भूसणरवेणं कपणसुहमणोहरेणं तेहि य सप्पणयसरलमहुरभणिएहिं संजायविउणराए रयणदी-
माकन्दी-
ज्ञाताध्य
रत्नद्वीप-
देवता-
विलापादि-
वर्णन-
मूत्रम् ।
॥१७२॥
वस्स देवयाए तीसे सुंदरथणजहणवयणकरचरणनयणलावन्नरूवजोवणसिरिं च दिव्वं सरभसउवगू- हियाई जाति विव्योयविलसियाणि य विहसियसकडक्खदिट्टिनिस्ससियमलियउवललियठियगमणपण- यखिजियपासादियाणि य सरमाणे रागमोहियमई अवसे कम्मवसगए अवयक्खति मग्गतो सविलियं, तते णं जिणरक्षियं समुप्पन्नकलुणभावं मच्चुगलथल्लणोल्लियमई अवयक्खंतं तहेव जक्खे ये सेलए जाणिऊण सणियं२ उम्विहति नियगपिट्ठाहि विगयसत्थं, तते णं सा रयणदीवदेवया निस्संसा कलुणं जिणरक्खियं सकलुसा सेलगपिट्ठाहि उवयंतं दास! मओसित्ति जपमाणी अप्पत्तं सागरसलिलं गेण्हिय पाहाहिं आरसंतं उर्दु उब्विहति, अंबरतले ओवयमाणं च मंडलग्गेण पडिच्छित्ता नीलुप्पलगवलअय- सिप्पगासेण असिवरेणं खंडाखंडिं करेति २ तत्थ विलवमाणं तस्स य सरसवहियस्स घेत्तृण अंगमंगातिं सरुहिराई उक्खित्तवलिं चउद्दिसिं करेति सा पंजली पहिहा ॥ सूत्रम् ९१ ॥ एवामेव समणाउसो !, जो अम्हं निग्गंधाण वा २, अंतिए पव्वतिए समाणे पुणरवि माणुस्सए कामभोगे आसायति, पत्थयति, पीहेति, अभिलसति से णं इह भवे चेव बहूर्ण समणाणं ४, जाव संसारं अणुपरियहिस्सति; जहा वा से जिणरक्खिए-"छलओ अवयक्खंतो निरावयक्खो गओ अविग्घेणं । तम्हा पवयणसारे निरावय- पत्रेण भवियव्यं ॥ १॥ भोगे अवयक्खंता पडंति संसारसायरे घोरे । भोगेहिं निरवयक्खा तरंति संसा. रकतारं ॥ २ ॥ (सूत्रम् ९२ ) तते णं सा रयणद्दीवदेवया जेणेव जिणपालिए तेणेव उवा० बहहिं अणुलो. न नाही- भीड़ावा. धर्मरूपाने मेहि य, पडिलोमेहि य, ग्वरमहरसिंगारेहिं कलुणेहि य, उवसग्गेहि य, जाहे नो संचाएह, चालित्तए चा, ग्वोभि०, विप०, ताहे संता, तंता, परितंता, निविण्णा, समाणा जामेव दिसि पाउ० तामेव दिसं पडि. गया, तते शं मे सेलए जक्खे जिणपालिएण सदि लवणसमुई मज्मज्झेणं वीतीवयतिर, जेणेव चंपा. नपरी, तेणेव उवागच्छति २, पाए नपरीए अग्गुजाणंसि जिणपालियं पहातो ओयारेति२, एवं व०-एस पं देवा.., पंपानयरी दीसति तिकटु जिणपालियं आपुच्छति २, जामेव दिसि पाउन्भूए, तामेव दिसिं पविगए । सूयम् ९३ ॥ तते णं जिलपालिए चंपं अणुपविसति २, जेणेव सए गिहे, जेणेव अम्मापियरो,' तेणेव उपागच्छदर, अम्मापिऊणं रोयमाणे जाव विलवमाणे जिणरविवयवावत्ति निवेदेति, तते णं जिणपालिए अम्मापियरो मित्तणाति जाव परियणेणं सद्धिं रोयमाणाति यहई लोइयाई मयकिचाई फरेतिर, फालेगं विगतसोया जाया तते गं जिणपालियं अन्नया कयाइ सुहासणवरगतं अम्मापियरो एवं पदासी-कहाणं पुत्ता ! जिणरक्तिए कालगए ?, तते णं से जिणपालिए अम्मापिऊणं लवणसमुद्दो. तारं प फालिपवायसमुत्यणं पोतवणविवत्तिं च फलहवंडआसातणं च रयणदीवुत्तारं च रयणदीवदेव. पागिहूं च भोगविनइं प रयणदीवदेवया अप्पाहणं च सूलाइपपुरिसदरिसणं च सेलगजवआरुहणं च रयणदीयदेवयाउपसग्गं च जिणरक्षियविवत्तिं च लवणसमुद्दउत्तरणं च चंपागमणं च सेलगजवा- पुच्छणं च जहाभूयमयितहमसंदिद्धं परिकहेति, तते णं जिणपालिए जाव अप्पसोगे जाव विपुलाति माकन्दी- ज्ञाताध्य जिनपालि- तस्य स्वस्थान- गमनादि- सूत्रम् ।
views . भोगभोगाई भुजमाणे विहरति ॥ सूत्रम् ९४ ॥ तेणं कालेणं २, समणे, समोसढे, धम्मं सोचा, पव्व- तिए, एकारसंगवी, मासिएणं, सोहम्मे कप्पे, दो सागरोधमे; महाविदेहे सिज्झिहिति । एवामेव समणा- उसो, जाव माणुस्सए कामभोए णो पुणरवि आसाति, से णं जाव वीतिवतिस्सति, जहा वा से जिण- पालिए । एवं खलु जंचू !, समणेणं भगवया नवमस्स नायज्झयणस्स अयमढे पण्णत्ते त्तिवेमि ॥ सूत्रम् ॥ ९५ ॥ नवमं अज्झयणं समत्तं ॥ 'सई व 'त्ति-सुखलक्षणफलबहुलतां स्मृति पा स्मरणं अतिव्याकुलचित्ततया न लमते स्म, रति-चित्तरमगं, 'घिई यत्ति-धृति चित्तस्वास्थ्यमिति, 'आसयाईति-आस्से-मुसे, 'पिहिंति'त्ति-पिधन्तः- स्थगयन्तः, 'आघयणति-वधस्थानं, 'सूलाइयगं 'ति-शूलिकाभिन्न, 'कलुणाई'ति-करुणाजनकत्वात् , 'कट्ठाईति-" कष्ट-दुःखं तत्प्रभवत्वात् , 'विस्सराई 'ति-विरुपशब्दस्वरूपत्वात् वचनानीति गम्यते, 'कूजन्त'-अव्यक्तं शब्दायमानं, 'काकंदीए'त्ति-कामन्दीनगरी तद्भवः, 'ओयाए 'त्ति-उपायातः-उपागतः, 'अहालहुस्सगंसि 'त्ति-यथाप्रकारे लघु- स्वरुपे 'उद्दिढति-अमावास्या, 'आगयसमए'चि आमनीभूतोऽनसरो-यस्य स इत्यर्थः, प्राप्तस्तु साक्षादेव, 'हत्थाओ'त्ति- हस्ताद ग्रहणप्रवृत्तात् , 'साहत्यि'ति-स्वहस्तेन, 'सिंगारेहिं 'ति-शृङ्गाररसोपेतैः कामोत्कोचकैः करुणैस्तथैव, उपमगैः- उपद्रवैचनचेष्टाविशेषरूपेः, 'अवयवह'-अपेक्षधं, 'मए सद्धि हसियाणि' इत्यादि इह क्तप्रत्ययो भावे तस्य चोपाधिभेदेन भेदस्य विपक्षणाद् बहुवचनं, अन्यथा यधुपाभ्या मया साद्ध हमितं चेत्यादि वाच्यं स्यात्, तथा रतानि च अक्षादिभिः ललितानि च ईप्सितानि लीला वा, 'कीलियाणि यचि-जलान्दोलनकक्रीडादिमिः हिण्डितानि च वनादिपु
नवानी.
भीज्ञाता.
धर्मकथाझे
निहतानि मोहितानि च-निधुवनानि, एतच्च वाक्यं काकाऽध्येयं, तत'उपालम्भः प्रतीयते; 'तए णं सा रयणदीवेत्यादि
संत्रं वाचनान्तरे-रुपकविशेपद्वयभ्रान्ति करोति, तथाहि-सा पवररयणदीवस्स देवया ओहिणा उ जिणरक्खिअस्स
नाऊण वहनिमित्तं उवरि माइंदिदारगाण दोण्हंपि' इत्येकं, 'दोसकलिया सलीलयं नाणाविहचुण्णवास-
मीसियं दिव्वं घाणमणनिव्युहकरं सव्वोउयसुरहिकुसुमबुढिकरं पमुंचमाणी' इति द्वितीयं; एवमन्यान्यपि
परिभावनीयानि पद्यानि, पद्यवन्धं हि विना तुकारादिनिपातानां पादपूरणार्थानां निर्देशो न घटते, अपरिमितानि च छन्दः-
शास्त्राणीति, अर्थस्त्वेवम्-सा देवता जिनरक्षितस्य ज्ञात्वा भावमिति शेपो वधनिमित्तं तस्यैव, वचनमिदं ब्रवीति स्मेति
सम्बन्धा; 'दोसकलिय'त्ति-द्वेषयुक्ता 'सलीलयंति-सलीलं यथा भवतीत्यर्थः, 'चुपणवासति-चूर्णलक्षणा वासाः चूर्ण-
वासा तैमिश्रा या सा तथा तां दिव्यां प्राणमनोनिवृत्तिकरी सर्वर्तुकानां सुरभीणां च कुसुमानां या वृष्टिः सा तथा तां प्रमु-
चन्ती । तथा नानामणिकनकरत्नानां सम्बन्धीनि घण्टिकाश्च किङ्किण्यश्च-क्षुद्रघण्टिका नुपूरौ च प्रतीतौ मेखला च-रसना
एतल्लक्षणानि यानि भूपणानि तेषां यो खस्तेन इति रुपका, 'दिसाओ विदिसाओ पूरयंती वयणमिणं बेइ यत्ति
दिशो विदिशश्च पूरयन्ती वचनमिदं वक्ष्यमाणं ब्रवीति सा देवता, 'सकलस'त्ति-सह कलुषेण पापेन वर्तते या सा तथेति
तृतीयं । हे हो (हा)ल हे वसुल हे गोल एतानि च पदानि नानादेशापेक्षया पुरुषाधामन्त्रणवचनानि गौरवकुत्सादिगर्भाणि
वन्ते, हो (हा)ल इति दशवकालिके होल इति दृश्यते, तथा नाथ !-योगक्षेमकरिन् !, दयित !-वल्लम !, रक्षित ! इति
वा; प्रिय !-प्रेमकतः!, रमण-मतः !, कान्त !-कमनीय ! स्वामिक !-अधिपते !, निघृण !-निर्दय !, सस्नेहाया वियोग-
९-श्री-
माकन्दी-
ज्ञाताध्यक
वधार्थ
रत्नद्वीप-
देवतादि-
पदार्थ-
निरूपणम्।
॥ १७४॥
॥ १७४॥
. दुःस्थाया मम परित्यागात् , 'नित्थकत्ति-अनयसरन अनुरक्ताया ममाकाण्डे एव त्यागादित्यद्धं, 'छिपण 'ति-स्त्यान!, कठिन मदीयात्पन्तानुकूलचरिताद्रवीकृतहृदयत्वात् निष्कृप!, मम दुःखिताया अप्रतीकाराव, अकृतज्ञ !, मदीयोपकारस्या. नपेक्षणात् शिथिलमार!, अकस्माद् मम मोचनात् निर्लज ! प्रतिपन्नत्यागात् । रुक्ष, स्नेहकार्याकरणात; अफरुण !, हे जिनरक्षित मम हृदयरक्षक!-वियोगदुःखेन शतधास्फुटतो हृदयस्य त्रायक पुनर्मम स्वीकरणत इत्यर्थः इति चतुर्थ, 'नहु' नैव युज्यसे-अर्हसि एककामनाथामवान्धवा तव चलनोपपावकारिका-पादसेवाविधायिनीमुज्झितुमधन्यामिति, इह च समानार्थाने- कशब्दोपादानेऽपि न पुनरुक्तदोपः सम्भ्रमाभिहितत्वात् , यदाह-"वक्ता हर्षभयादिभिराक्षिप्तमनाः स्तुर्वस्तथा निन्दन् । यत्पद- मसकद् त्यात् तत्पुनरुक्त न दोपाय ॥ १॥” इति अध, हे गुणसंकर !-गुणसमुदायरूप!, हे इति अकारलोपदर्शनादहमिति दृश्य त्वया विहीना न समर्था जीवितुं क्षणमपीति पञ्चमं । तथा 'इमस्स उत्ति-अस्य पुनः अनेके ये झपा-मत्स्या, मकरा- प्राहाः, विविधश्वापदाश्व-जलचरक्षुद्रसत्वरूपास्तेषां यानि शतानि तेषामाकुलगृह आकीर्णगेहं झपादीनां वा सदा-नित्यं कुल- गृहमिव कुलगृह यः स तथा तस्येत्यर्द्ध, रत्नाकरस-समुद्रस्य मध्ये आत्मानं, 'वहेमि'त्ति-हन्मि तव-मवतः पुरतः-अग्रतः तथा एहि निवर्तस्व, 'जइसिति-यदि भवसि कुपितः क्षमस्वैकापराचं वं मे इति पर्छ । 'तुज्झ यति-ता च विगतधन विमल च यच्छशिमण्डलं तस्येवाकारो यस्य श्रिया च मह यद्वर्त्तते तत्तथा, पाठान्तरेण-विगतमनविमलशशिमण्डलेनोपमा यस्य सश्रीकं च यत्तसथा; शारदं-शरत्कालसम्भवं यन्नव-प्रत्यग्रं कमलं च-सूर्यबोध्यं कुमुदं च-चन्द्रवोध्यं कुवलयं च- नीलोत्पलं तेषां यो दलनिकर:-दलवृन्दं तत्सदृशे नितरा मात इति-निमे च नयने यत्र तत्तथा, पाठान्तरेण-शारदनव- FISHASHANT म नगगी । कमलकमदे च ते चिमुकले च ते विकसिते शेष तथैव, वदनं-मुखं प्रतीति वाक्यशेषा, पिपासागताया:-मुखदर्शनजलपानेच्छया आयातायाः तो वा गताया:-प्राप्तायाः कस्याः?-मे-मम श्रद्धा-अमिलापः किं कत्तुं ?-प्रेक्षितुं-अवलोकयितुं जे इति पादपूरणे मोबावा. निपातः, मालोकय ता इति-ततस्तावदिति वा इत:-अस्यां दिशि मां नाथ जा इति-येन यावदिति वा ते-तब प्रेक्षे वदनकमल- मिति रूपऊं ॥ ७॥ एवं सप्रणयानि-सस्नेहानीव सरलानि-सुखावगम्याभिधेयानि मधुराणि च-मापया कोमलानि यानि तानि तपा) तथा करुणानि-करुणोत्पादकत्वात् वचनानि जल्पन्ती सा पापा क्रियया मार्गत:-पृष्ठतः, समन्वेति-समनु- गच्छति पापरदयेति ॥ ८॥ ततोऽसौ बिनरक्षितथलमना:-अम्युपगमाचलितवेताः 'अवयक्खइ'त्ति-सम्बन्धः, किंभूतः - मातद्विगुणरागः पूर्वकालापेक्षया, कस्यां ?-रत्नद्वीपदेवतायां; केन कैश्त्याह-तेन च-पूर्वोक्तेन भूषणरवेण कर्णसुखो मनोहरा यस्तेन तैय पूर्ववर्णितः सप्रणयसरलमधुरमणितः, तथा तस्या देवतायाः सुन्दरं यत्स्तनजघनवदनकरचरणनय- नानां लापपं-स्पृहणीयत्वं तम रूपं च-शरीरसुन्दरत्वं च यौवनं च-तारुण्यं तेषां या श्रीः-सम्पत् सा तथा तां च दिव्यां- देवमम्बन्धिनी स्मरमिति सम्बन्धः, तथा सरमसानि-सहर्षाणि यान्युपगृहितानि-आलिङ्गितानि तानि तथा 'विव्योयका' नीचेष्टारिशेषाः, विलसितानि च-नेत्रविकारलक्षणानि च-तानि तथा, विहसितानि च-अहसितादीनि, सकटाक्षा:-सापा- इदर्शनाः, दृष्टयो-विलोकितानि निम्श्वमितानि च-कामक्रीडायाः समुद्भवानि मलितानि च-पुरुषामिलपणीययोपिदङ्गम- र्दनानि च पाठान्तरेण-मणिवानि च-रतजितानि उपललितानि च-क्रीडिवविशेषरूपाणि, पाठान्तरेण-ललितानि-ईप्सि- तानि क्रीडितानि वा स्थितानि च-स्वमरनेषु उत्सङ्गामनादिषु वा अवस्थानानि गमनानि च-हमगत्या चमणानि प्रण• ९-श्री- माकन्दी- ज्ञाताध्यक सप्रण यादि- पदार्थ- वर्णनम् । साला ।। १७५ ।।
यखेदितानि च-प्रणयरोपणानि प्रसादितानि च-कोपप्रसादनानीति द्वन्द्वस्तानि च स्मरन्-चिन्तयन् रागमोहितमतिः अवश आत्मन इति गम्यते, कर्मवशं-कर्मणः पारतन्ध्यं गतो यः स तथा, पाठान्तरे-कर्मवशात् वेगेन मोहस्य नडितो-विडम्बितो पः स कर्मवश्वेगनढितः, 'अवदक्खइ'त्ति-अवेक्षते-निरीक्षते स्म मार्गत:-पृष्ठतोत्रलोकयति तामागच्छन्तीमित्यर्थः, 'सविलियंति-सबीड, सलअमित्यर्थः । 'मच्चुगलथल्लणोल्लियमईति-मृत्युना-यमराक्षसेन 'गलत्यल्ला' हस्तेन गल. ग्रहणरूपा तया नोदिता-स्वदेशगमनवैमुख्येन यमपुरीगमनाभिमुखीकता मतिर्यस्य स तथा, तं अवेक्खमाणं तथैव यक्षस्तु शेलको जात्या ना२ 'उव्यिहईति-उद्विजहाति-ऊई क्षिपति, 'तहेव सणियं-इत्येतत् पदद्वयं वाचनान्तरे-नोपलभ्यते निनस्पृष्ठात् शरीरायययविशेषात् , विगयसत्यंति-विगतस्वास्थ्य पाठान्तरे-विगतश्रद्धो यक्षः शैलक इति, 'ओवयंति- अवपतन्तं, 'सरसयहियस्स'चि-सरसं-अभिमानरसोपेतं वधितो-हतो यः स तथा तस्य, अंगमंगाईति-शरीरावय- वान् , 'उफ्षित्तयलिं'ति-उरिवप्तः-ऊर्द्ध आकाशे क्षिप्तो न भूमिपट्टादिपु निवेशितो यो बलिा-देवतानामुपहारः स तथा तं चतुर्दिश करोति, सा देयता 'पंजलि चि-प्रकृताञ्जलिः प्रकृष्टतोपवती, 'एवमेवे'त्यादि, निगमन; 'आसायत्ति-प्राप्ता- नाथयति मजते-अप्राप्तान प्रार्थयते, मद्धिमन्तं याचते, स्पृहयति-अप्रार्थित एव यद्ययं श्रीमान् मोगान् मे ददाति तदा साधु भवति इत्येवंरूपां स्पृहां करोति, अभिलपति-दृष्टादृष्टेपु शन्दादिपु मोगेच्छां करोतीत्यर्थः, अत्रार्थ-'छलिउँ गाहा-छलितो- व्यंसितोऽनय प्राप्तः 'अवकासन्'-पचाङ्गागमवलोकयन् जिनरक्षित इति प्रस्तुतमेव 'निरवयम्वो'-निरखकाहः पश्चाद्भा. गमनवेक्षमाणस्तनिस्पृह इत्यर्थों गवा-स्वस्थानं प्राप्तोऽविलेन-अन्तरायामावेन जिनपालित इति वक्ष्यमाणं; एप दृष्टान्ता-
नवाङ्गी.
०१०
भीबाता-
धर्मकथाने
९-श्री-
माकन्दी.
ज्ञाताध्य०
उपनयादि
वर्णनम् ।
॥ १७६॥
नुवादो, दार्शन्तिकस्त्वे-यस्मादेवं वसात् 'प्रवचनसारे'-चारित्रे लब्धे सतीति गम्यते, 'निरवकाङ्क्षण'-परित्यक्तभोगान्
प्रति निरपेक्षेण-अनमिलापवता भवितव्यमिति, 'भोगे' गाहा चारित्रं प्रतिपद्यापि भोगानवकाक्षन्तः पतन्ति संसारसागरे घोरे
जिनरक्षितवत् , इतरे तु तरन्ति जिनपालितवत् समुद्रमिति ॥ २ ॥ शेष सूत्रसिद्धं ॥ इह विशेपोपनयमेवं वर्णयन्ति व्याख्या-
वार:-"जह रयणदीवदेवी तह एत्थं अविरई महापावा । जह लाहत्थी वणिया तह सुहकामा इहं जीवा ॥ १॥ जह तेहिं
भीएहिं दिट्ठो आघायमंडले पुरिसो । संसारदुक्खभीया पासंवि तहेव धम्मकहं ॥ २ ॥ जह तेण तेसि कहिया देवी दुक्खाण
कारणं घोरं । तत्तो चिय नित्थारो सेलगजक्खाओ नन्नत्तो ॥३॥ तह धम्मकही भयाण साहए दिवअविरइसहावो ।
सयलदुहहेउभूओ विमया विरयंति जीवाणं ॥ ४ ॥ सत्ताण दुहत्ताणं सरणं चरणं जिर्णिदपन्नत्तं । आणंदरूवनिव्वाणसाहणं
तहय देसेइ ।। ५ ॥ जह तेसि तरियन्यो मद्दसमुद्दो तहेव संसारो । जह तेसि सगिहगमणं निवाणगमो तहा एत्थं ॥ ६ ॥
जह सेलगपिट्ठाओ भट्ठो देवीइ मोहियमईओ । सावयसहस्सपउरमि सायरे पाविओ निहणं ॥ ७ ॥ तह अविरईई नडिओ
सा. १ यथा रत्नदीपदेवी तथानाविरतिमहापापा । यथा लाभार्थिनी वणिजौ तथा मुखकामा इह जीवा ॥ ॥ यथा ताभ्या भीताम्या दृष्ट
आपातमण्डले पुरुष । ससारदु खभीता पश्यन्ति तथैव धर्मकथक ॥ २ ॥ यथा तेन ताभ्यो कथिता दुखाना घोर कारण देवी । तत एव शैलक्रय
क्षात् निस्तारो नान्यस्मात् ॥ ३ ॥ तथा धर्मकथको भव्येभ्य कथयेत् दृष्टमविरतिस्वभावम् । सकलदु खहेतुभूत विषयेभ्यो विरमयन्ति जीवान् ।
सस्वाना दुसानों शरण चरण जिनेन्द्रप्रशप्त । भान दरूपनिर्वाणसाधन तथैव दर्शयति ॥ ५ ॥ यथा ताभ्या तरणीयो रुद्र समुद्रस्तथैव ससार
यथा तयो स्वगृहगमन निर्वाणगमन तथाऽत्र ॥६॥ यथा शलकपृष्टात् भ्रष्टो देवीमोहितमतिक । श्वापदसहस्रप्रचुरे सागरे प्राप्तो निधनम् ॥ ७ ॥
॥ १७६ ॥
चरणचुओ दुक्खसावयाइण्णे । निवडइ अपारसमारसायरे दारुणसरूवे ॥ ८॥ जह देवीए अक्खाहो पत्तो सट्ठाण जीविय- सुहाइ । तह चरणढिओ साहू अक्खोहो जाइ निवाणं ।। ९॥ समाप्तमिदं नवमशाताध्ययनविवरणम् ॥ ॥ १०-श्रीचन्द्राख्यं ज्ञाताध्ययनम् ॥ अथ दशमं विवियते, अस्य चार्य पूर्वेण सह सम्पन्धः-अनन्तराध्ययनेऽविरतियशवर्यवशवर्तिनोरनर्थेतरावुक्तौ, इह तु गुणहानिवृद्धिलक्षणावनांौँ प्रमाद्यप्रमादिनोरभिधीयेते इत्येवं सम्बद्धमिदम्- जति ण भते !, समणेणं० णवमस्स णायज्झयणस्स अयमढे पण्णत्ते, दसमस्स के अटे०१; एवं खल जंबू, तेणं कालेणं २, रायगिहे नगरे सामी समोसढे, गोयमसामी एवं वदासी-कहण्ण भंते !, जीवा वटुंति वा हायन्ति वा ?, गो० !, से जहा नामए बहुलपक्खस्स पाडिवयाचेदे पुण्णिमाचंदं पणिहाय हीणो; वपणेणं हीणे, सोम्मयाए हीणे, निद्धयाए हीणे, कंतीए; एवं दित्तीए, जुत्तीए, छायाए, पभाए, ओयाए, लेस्साए, मंडलेण; तयाणतर च णं वीयाचंदे पाडिवयं चंदं पणिहाय हीणतराए वण्णेणं जाव मंडलेणं, तयाणंतरं च सा० । तथाऽविर त्या नटितवरणच्युतो दु सक्षापदाकाणे । निपतत्यपारससारसागरे दारुणस्वरूपे ॥ ८ ॥ यथा देव्याऽक्षोभ प्राप्त जोवितसुखानि च । तथा चरणस्थित साधुरक्षोभो याति निर्वाणम् ॥ ९ ॥ स्वस्थान पक्षाओं १०--श्री- चन्द्राख्य- ज्ञाताच्या चन्द्रवर्णन- सूत्रम्। ३१७७॥ णं तंतिआचंदे यितियाचंद पणिहाय हीणतराए वणेणं जाव मंडलेणं, एवं खलु पएणं कमेणं परिहायमाणे २, जाव अमावस्साचंदे चाउहसिचंदं पणिहाय नढे वण्णेणं जाव नट्टे मंडलेणं; एवामेव समणाउसो! जो अम्हं निग्गंयो वा, निग्गंधी वा जाव पञ्वइए समाणे हीणे खंतीए, एवं मुत्तीए, गुत्तीए, अजवेणं, महवेणं, लाघवेणं, सणं, तवेणं, चियाए, अकिंचणयाए, संभचेरवासेणं, तयाणंतरं च णं हीणे हीणतराए, मंती' जाव हीणतराए पंभचेरवासेणं; एवं खलु एएणं कमेणं परिहायमाणे २, णढे ग्वंतीए जाव हे संभचेरवासेणं, से जहा वा सुझपक्खस्स पाडिवयाचंदे अमावासाए चंदं पणिहाय अहिए वण्णणं जाव अहिए मंडलेणं, तयाणंतरं च णं विइयाचंदे पडिवयाचंदं पणिहाय अहिययराए वण्णणं जाव अहियतराए मंडलेणं; एवं ग्वल पाणं कमेणं परिघुड्डेमाणे २, जाव पुणिमाचंदे चाउद्दसिं चंदं पणिहाय पडिपुण्णं वणेणं जाव पडिपुणे मंडलेणं; एवामेव समणाउसो!, जाव पव्वतिए समाणे अहिए, खंतीए, जाव बंभ- रवासेणं, तयाणतरं वणं अहिययराए खंतीए जाव यमचेरवासेणं एवं खलु एएणं कमेणं परिवद्रुमाणे २, जाय पडिपुन्ने यमचेरवासेणं; एवं खलु जीवा वडंति वा, हायंति वा एवं खलु जंबू!, समणेणं भगवता महा. वीरेणं दसमरस णायज्झयणस्स अयमद्धे पण्णत्ते तियेमि ।। सूत्रम्-९६ ।। दसमं णायज्झयणं समत्तं ॥१०॥ मर्वे सुगमम् , नवरं जीवानो द्रव्यतोऽनन्तत्वेन प्रदेशतय प्रत्येकमसङ्खयांतप्रदेशत्वेनावस्थितपरिमाणत्वान् वर्द्धन्ते गुणः हीयन्ते च तैरेव । अनन्तरनिर्देशत्वेन हानिमेव तावदाह-से जहे'त्यादि, 'पणिहाएति-प्रणिधायापेक्ष्य, 'वर्णेन'-
शुक्लतालक्षणेन, 'सौम्यतया'-सुखदर्शनीयतया, 'लिग्धतया'-अरूक्षतया, 'कान्त्या'-कमनीयतया, 'दीया'-दीपनेन,
वस्तुप्रकाशनेनेत्यर्थः; 'जुत्तीय'त्ति-युक्त्या आकाशसंयोगेन, खण्डेन हि मण्डलेनाल्पतरमाकाशं युज्यते न पुनर्यावत्स-
म्पूर्णेन, 'छायया'-जलादौ प्रतिविम्बलक्षणया शोभया वा, 'प्रभया'-उद्गमनसमये यद् द्युतिस्फुरणं वया, 'ओयाए'ति-
ओजसा दाहापनयनादिस्वकार्यकरणशक्या, 'लेश्यया'-किरणरूपतया, 'मण्डलेन'-वृत्ततया; क्षान्त्यादिगुणहानिश्च कुशील-
संसर्गात,सद्गुरूणामपर्युपासनाव,प्रतिदिनं प्रमादपदासेवनाद, तथाविधचारित्रावरणकर्मोदयाच भवतीति; गुणवृद्धिस्त्वेतद्वि-
पर्ययादिति, एवं च हीयमानानां जीवानां न वाञ्छितस्य निर्वाणसुखस्यावाप्तिरित्यनर्थः; आह च-चंदोई कालपक्खे
परिहाई पए पए पमायपरो । तह उग्घरविग्घरनिरंगणोवि न य इच्छिय लहइ ॥१॥"चि गुणैर्द्धमानानां तु वाञ्छिता.
र्थावाप्रर्थ इति, विशेषयोजना पुनरेवम्-"जह चंदो तह साहू राहुवरोहो जहा तह पमाओ । वण्णाई गुणगणो जह तहा
खमाई समणधम्मो ॥ २॥ पुण्णोवि पइदिणं जह हायंतो सवहा ससी नस्से । तह पुण्णचरित्तोऽविहु कुसीलसंसग्गिमाईहिं
॥३॥ जैणियपमाओ साह हायंतो पइदिणं खमाईहिं । जायइ नट्ठचरित्तो तत्तो दुक्खाई पावेह ।। ४ ।। तथा-'हीणगुणो.
त्यर्थः अ । सा० १ चन्द्र इव कृष्णपक्षे परिहीयते पदे पदे प्रमादपरः । तथा उद्ग्रहविगृहनिरजनोऽपि द्रव्यतो नेप्सितं लमते ॥१॥ यथा चन्द्रस्तथा
साधुः राहूपरोधो यया तथा प्रमादः। वर्णादिगुणगणो यथा तथा क्षमादिः श्रमणधर्मः॥ २ ॥ पूर्णोऽपि प्रतिदिनं यथा हीयमानः सर्वथा नश्यति शशी ।
तया पूर्णचारियोऽपि कुशीलमंसर्गादिभिः॥ ३ ॥ जातप्रमादः साधुः प्रतिदिनं हीयमानः क्षमादिभिः। जायते नष्टचारित्रः ततो दुःखानि प्राप्नोति ॥ ४ ॥
बिहुँ होउं सुहगुरुजोगाइजणियसंवेगो । पुण्णसरूवो जायइ विवड्डमाणो ससहरोव ॥५॥ समाप्तमिदं दशमश्रीचन्द्राख्यज्ञाता- ध्ययनं विवरणम् ॥ ५॥ नवाङ्गी भीज्ञाता- धर्मकथाने ॥११-श्रीदाबद्रवाख्यं ज्ञाताध्ययनम् ॥ दावद्र० ज्ञाताध्यक पूर्वापर- सम्बन्ध वर्णन- CP- ।१७८ ॥ खत्रम् । अथैकादशमं विवियते-अस्य पूर्वेण सहायं सम्बन्धः-पूर्वत्र च प्रमाद्यप्रमादिनोर्गुणहानिवृद्धिलक्षणावनार्थावुक्ती, इह तु मार्गाराधननिराधनाभ्यां तावुच्येते इतिसम्बद्धमिदम्- जति णं भंते !, दसमस्स नायज्झणस्स अयमढे एकारसमस के अढे० १, एवं खलु जंबू, तेणं कालेणं २, रायगिहे गोयमे एवं वदासी-कह णं भंते !, जीवा आराहगा वा, विराहगा वा भवंति ; गो० !, से जहा णामए एगंसि समुद्दकूलंसि दावद्दवा नाम रुक्खा पण्णत्ता, किण्हो जाव निउरुंयभूया पत्तिया, पुफिया, फलिया, हरियगरेरिजमाणा सिरीए अतीव उवसोभेमाणा २, चिटंति; जया ण दीवि- चगा ईसिं पुरेवाया, पच्छावाया, महावाया, मंदावाया वायंति, तदा णं वहवे दावद्दवा रुक्खा पत्तिया सा० १ हीनगुणोऽपि भूत्वा शुभगुरुयोगादिजनितसवेग । पूर्णस्वरूपो जायते विवर्धमान. शशधर इव ॥५॥ ॥१७८।।
जाव चिट्ठति, अप्पेगतिया दावद्दवा रुक्खा जुन्ना झोडा परिसडियपंडुपत्तपुष्फफला सुकरुक्खओ विव मिलायमाणा २, चिट्ठति; एवामेव समणाउसो!, जे अम्हं निग्गंथो वा, निग्गयी वा जाव पव्वतिते समाणे यहणं समणाणं ४, सम्म सहति जाव अहियासेति; पहणं अण्णउत्थियाणं, वहणं गिहत्थाणं नो सम्मं सहति, जाव नो अहियासेति एस णं मए पुरिसे देसविराहए पण्णत्ते समणाउसो!। जया णं सामुद्दगा ईसिं पुरेवाया पच्छावाया, मंदावाया महावाता वायंति, तदा णं यह दावदवा रुक्खा जुण्णा झोडा जाव मिलायमाणा २, चिट्ठति, अप्पेगइया दावद्दवा रुक्खा पत्तिया पुफिया जाव उवसोभेमाणा २, चिट्ठति; एवामेव समणाउसो!, जो अम्हं निग्गंथो वा, निग्गंथी वा पवतिए समाणे बहणं अण्णउत्थि- याणं वहणं गिहत्थाणं सम्मं सहति, यहणं समणाणं ४, नो सम्म सहति; एस णं मए पुरिसे देसाराहए पन्नत्ते समणाउसो ! । जया णं नो दीविचगाणो सामुद्दगा ईसि पुरेवाया पच्छावाया जाव महावाया तते णं सव्वे दावद्दया रुक्खा जुण्णा झोडा० एवामेव समणाउसो! जाव पव्वतिए समाणे पहणं समणाणं २ "बहणं अन्नउत्थियगिहत्थाणं नो सम्मं सहति, एस णं मए पुरिसे सव्वविराहए पण्णत्ते समणाउसो!, जया णं दीविचगावि सामुद्दगावि ईसिं पुरेवाया पच्छावाया जाव वायंति तदा णं सव्वे दावदवा रुक्खा 'पत्तिया जाव चिट्ठति; एवामेव समणाउसो!, जे अम्हं पव्वतिए समाणे बहणं समणाणं बहूणं अन्नउत्थि- यगिहत्थाणं सम्म सहति, एस णं मए पुरिसे सव्वाराहए पं० !, एवं खलु गो०, जीवा आराहगा!
नवाजी- भीड़ाता- धर्मकया ॥७९॥ ११-श्री- दावद्र० ज्ञाताध्य० सूत्र स्थित- पदार्थ- वर्णनम् । वा विराहगा वा भवंति; एवं खलु जंबू !, समणेणं भगवया एक्कारसमस्स अयमट्टे पण्णत्ते त्तिवेमि ।। सूत्रम्-९७ ॥ एक्कारसमं नायज्झयणं समत्तं ॥ सर्व सुगम, नवरं आराधका ज्ञानादिमोक्षमार्गस्य विराधका अपि तस्यैव 'जया ण'मित्यादि, दीविच्चगा'-द्वैप्या द्वीपसम्मवा ईपत् पुरोवाता:-मनाक्-सस्नेहवाता इत्यर्थः, पूर्वदिक्सम्बन्धिनो वा, पथ्या वाता-वनस्पतीनां सामान्येन हिता वायवः पश्चाद्वाता वा मन्दाः-शनैः सञ्चारिणः महावाता:-उदंडवाता वान्ति, तदा 'अप्पेगहय'त्ति-अप्येके केचनापि स्तोका इत्यर्थः, 'जुपण 'त्ति-जीर्णा इव जीर्णाः, झोड:-पत्रादिशाटनं, तद्योगात्तेऽपि झोडाः, अत एव परिशटितानि कानि- चिच पाण्डूनि पत्राणि पुष्पफलानि च येषां ते तथा शुष्कवृक्षक इव म्लायन्तस्तिष्ठन्ति इत्येप दृष्टान्तो, योजना त्वस्यैवं 'एवामेवे 'त्यादि, 'अण्णउत्थियाणं'ति-अन्ययूथिकानां-तीर्थान्तरीयाणां, कापिलादीनामित्यर्थः; दुर्वचनादीनुपसर्गान् नो सम्यक सहते इति, 'एस गति-य एवंभूतः एप पुरुपो देशविराधको ज्ञानादिमोक्षमार्गस्य, इयमत्र विकल्पचतुष्टयेऽपि भावना-यथा दागद्रव्यवृक्षसमूहः स्वभावतो द्वीपपायुभिः बहुतरदेशैः स्वसम्पदः समृद्धिमनुमवति देशेन चासमृद्धि १, समद्रवायुभिश्व देशैरसमृद्धि देशेन च समृद्धिम् २, उभयेपां च वायूनाममावे समृद्ध्यभावम् ३, उमयसद्भावे च सर्वतः समृद्धिम् ४; एवं क्रमेण साधुः कुतीर्थिकगृहस्थानां दुर्वचनादीन्यसहमानः शान्तिप्रधानस्य ज्ञानादिमोक्षमार्गस्य देशतो विराधनां करोति, श्रमणादीनां बहुमानविषयाणां दुर्वचनादिक्षमणेन बहुतरदेशानामाराधनात् १, श्रमणादिदुर्वचनानां त्वसहने कृती. १ 'या महावीरेण । २ शनै:२१. अ ।। १७९॥
नवादी- ६० वृ० श्रीज्ञाता- धर्मकथाङ्गे १२-श्री- उदकारुय. ज्ञाताध्य० पूर्वापरा- ध्ययन- मम्बध. वर्णन- ॥१८०॥ ॥ १२-श्रीउदकाख्यं ज्ञाताध्ययनम् ॥ अधुना द्वादशं विवियते, अस्य चैत्र सम्बन्ध:-अनन्तरज्ञाते चारित्रधर्मस्य निराधमत्वमाराधकलं चोक्तमिह तु चारित्राराधकत्वं प्रकृतिमलीमसानामापि भव्यानां सद्गुरुपरिकर्मणातो भवतीत्युदकोदाहरणेनाभिधीयते,इत्येवं सम्बद्धमिदम्- जति णं भंते !, समणेणं जाव संपत्तेणं एकारसमस्स नायज्झयणस्स, अयम० घारसमस्स णं नायज्झयणस्स के अढे पं० ?, एवं खलु जंबू , तेणं कालेणं २, चंपा नाम नयरी, पुण्णभद्दे, जितसत्तू राया, धारिणी देवी, अदीणसत्तू नाम कुमारे जुवराया यावि होत्या, सुवुद्धी अमचे जाव रवधुराचिंतए समणो. वासए; तीसे ण चंपाए णयरीए, यहिया उत्तरपुरच्छिमेणं एगे परिहोदए यावि होत्या, मेयवसामंसरुहिर- पूयपडलपोचडे, मयगकलेवरसंछण्णे, अमणुण्णे वण्णेणं जाव फासेणं; से जहा नामए अहिमडेति 'वा, गोमडेति वा जाव मयकुहियविणहकिमिणवावण्णदुरभिगंधे किमिजालाउले संसत्ते असुहविगययीभत्य. दरिसणिज्जे, भवेयारूवे सिया', णो इणढे समहे, एत्तो अणिद्वतराए चेव जाव गंधेणं पण्णत्ते ॥सूत्रम्-९८॥ तते णं से जितसत्तू राया, अण्णदा कदाइ पहाए कयरलिकम्मे जाव अप्पमहग्याभरणालंकियसरीरे बहहिं राईसर जाव सत्यवाहपभितिहिं सद्धिं भोयणवेलाए सुहासणवरगए विपुलं असणं ४ जाव विहरति, मूत्रम् । ॥ १८०।।
जिमितभुत्तुत्तरायए जाव सुइभूते तैसि विपुलंसि असण ४, जाव जायविम्हए, ते बहवे ईसर जाव पभितीए एवं क्यासी-अहो णं देवा० !, इमे मणुण्णे असण ४, वपणेणं उववेए जाव फासेणं उववेते अस्सायणिज्जे, विस्सायणिज्जे, पीणणिजे, दीवणिजे, दप्पणिज्जे, मयणिज्जे, बिहणिजे, 'सविदियगाय पल्हायणिजे; तते णं ते यहवे ईसर जाव पभियओ जितसत्तुं एवं व०-तहेच ण सामी!, जपणं तुन्भे वदह ! अहो णं इमे मणुण्णे असणं ४, वपणेणं उववेए जाच पल्हायणिज्जे; तते णं जितसत्तू सुवुद्धिं अमचं एवं व०-अहो णं सुबुद्धी , इमे मणुण्णे असणं ४, जाव पल्हायणिज्ने; तए णं सुबुद्धी जितसत्तुस्सेयमई नो आदाइ जाव तुसिणीए संचिट्ठति, तते णं जितसत्तुणा सुबुद्धी दोचंपि तचंपि एवं वुत्ते समाणे जितसत्तुं रायं एवं वदासी-नो खलु सामी, अहं एयंसि मणुण्णंसि असण ४ केइ विम्हए, एवं खल सामी!, सुन्भिसहावि पुग्गला दुन्भिसहत्ताए परिणमंति, दुन्भिसद्दावि पोग्गला सुन्भिसदत्ताए परिणमंति; सुरू- वावि पोग्गला दुरूवत्ताए परिणमंति, दुरुवावि पोग्गला सुरूवत्ताए परिणमंति; सुभिगंधावि पोग्गला दुन्भिगंधत्ताए परिणमंति, दुन्भिगंधावि पोग्गला सुन्भिगंधत्ताए परिणमंति; सुरसावि पोग्गला दुर- सत्चाए परिणमंति, तुरसावि पोग्गला सुरसत्ताए परिणमंति; सुहफासावि पोग्गला दुहफासत्ताए परिण- मंति, दुहफासावि पोग्गला सुहफासत्ताए परिणमंति; पओगवीससापरिणयाचि य णं सामी., पोग्गला पण्णत्ता; तते णं से जितसत्तू सुवुद्धिस्स अमच्चस्स एवमातिक्खमाणस्स ४, एयमह नो आदाति, नो नवाजी १०० भीड़ाता. धर्मकथाझे परियाणई, तुसिणीए, संचिट्ठा तए णं से जितसत्तू अण्णदा कदाई पहाइ आसखंधवरगते महया भड- चडगरहआसवाहणियाए निजायमाणे तस्स फरिहोदगस्स अदूरसामतेणं वीतीवयइ । तते णं जितसत्तू तस्स फरिहोदगस्स असुभेणं गंधेणं अभिभूते समाणे सएणं उत्तरिजगेणं आसगं पिहेइ, एगतं अवकमर्ति, ते यहवे ईसर जाव पभितिओ एवं वदासी-अहो ण देवाणुप्पिया इमे फरिहोदए ! अमणुण्णे वण्णण ४, से जहा नामए अहिमडेति वा जाव अमणामतराए चेव तए णं ते बवे राईसरपभिइ जाव एवं व०- तहेव णं तं सामी!, ज णं तुम्भे एवं वयह, अहो णं इमे फरिहोदए अमणुण्णे वण्णेणं ४, से जहा णामए अहिमडे इ वा जाव अमणामतराए चेव, तए णं से जियसत्तू सुबुद्धिं अमचं एवं वदासी-अहो णं सुवुद्धी! इमे फरिहोदए अमणुण्णे वण्णेणं, से जहा नामए अहिमडेइ वा जाव अमणामतराए चेव, तए णं सुवुद्धी अमचे जाव तुसिणीए, संचिट्ठड्न तए णं से जियसत्तू राया सुवुद्धिं अमचं दोचंपि तचंपि एवं व०-अहो णं तं चैव, तए णं से सुबुद्धी अमच्चे जियसत्तुणा रन्ना दोचंपि तचंपि एवं कुत्ते समाणे एवं व०-नो ग्वलु सामी!, अम्हं एयंसि फरिहोदगंसि केइ विम्हए, एवं खलु सामी ! सुभिसद्दावि पोग्गला दुन्भिसद्द. ताए परिणमंति, तं चेव जाव पओगवीससापरिणयावि य णं सामी!, पोग्गला पण्णत्ता, ततेणं जित- सत्तु सुवुद्धि एवं चेव, माणं तुमं देवाणु० 1, अप्पाणं च परं च तदुभयं वा बहहि य असम्भावुभावणाहिं १२-श्री- उदकाख्य- ज्ञाताध्य जिवशनुषा सह वार्तालापा- दिवर्णन- सूत्रम् । ॥१८१॥ १०ति २ सा ते. अ।
मिच्छत्ताभिणिवेसेण य बुग्गाहेमाणे युप्पाएमाणे विहराहि, तते णं सुवुद्धिस्स इमेयारूवे अन्भत्थिए ५, समुप्पवित्था-अहो णं जितसतू संते तचे तहिए अवितहे सन्भूते जिणपण्णत्ते भावे णो उवलभति, तं सेयं वलु मम जितसत्तुस्स रण्णो संताणं तचाणं तहियाणं अवितहाणं सन्भूताणं जिणपण्णत्ताणं भावाणं अभिगमणट्टयाए एयमहूँ उवाइणावेत्तए, एवं संपेहेति २, पचतिएहिं पुरिसेहिं सद्धि अंतरा. वणाओ नयए घडयपडए पगेण्हति २, संझाकालसमयंसि पविरलमणुस्संसि णिसंतपडिनिसंतंसि जेणेव फरिहोदए तेणेव उवागए २, तं फरिहोदगं गेण्हावेति २, नवएसु घडएसु गालावेति २, नवएसु घडएसु पक्खिवावेति २, लंछियमुदिते करावेति २, सत्तरत्तं परिवसावेति २, दोचंवि नवएसु घडएसु गालावेति, नयासु घडएसु पग्विवावेति २, सज्जक्खारं पक्खिवावेई लंछियमुहिते कारवेति २, सत्तरत्तं परिवसा: वेति २, तचंपि णवएसु घडएसु जाव संवसावेति, एवं खलुं एएणं उचाएणं अंतरा गलावेमाणे अंतरा पक्खिवावेमाणे अंतराय विपरिवसावेमाणे २, सत्त २, रातिदिया विपरिवसावेति तते णं से फरिहोदए सत्तमसत्तयंसि परिणममाणंसि उदगरयणे जाए यावि होत्था, अच्छे, पत्थे, जचे, तणुए फलिह- वण्णाभे चण्णेणं उववेते ४, आसायणिज्जे जाव सविदियगायपल्हायणिजे तते णं सुवुद्धी अमचे जेणेव से उदगरयणे तेणेव उवा० २, करयलंसि आसादेति २, तं उदगरयणं वण्णेणं उववेयं ४, आसा. .orता अ। xx एतदन्तर्गतः पाठः अ प्रतो नास्ति ।
नवागी- भीमाता- पर्मकचाट्ने १२-श्री- उदकाख्य- ज्ञाताध्य. उदकरत्ना- दिवर्णन- सूत्रम् ॥ ।। १८२॥ पणिले जाव सविदियगायपल्हायणिहर्ज जाणित्ता, हद्वतुढे वहहिं उदगसंभारणिज्जेहिं संभारेति २, जितसत्तुस्स रण्णो पाणियपरियं सहावेति २, एवं व०-तुमं च ण देवाणुप्पिया! इमं उदगरयणं गेण्हाहि जितसनुस्स रन्नो भोयणवेलाए उवणेजासि; तते णं से पाणियधरिए सुवुद्धियस्स एतमहं पडिसुणेति २, तं उदगरयणं गिण्हाति २, जितसत्तुस्स रपणो भोयणवेलाए उवट्ठवेति; तते णं से जितसत्तु राया तं विपुलं असण ४, आसाएमाणे जाव विहरइ; जिमियमुत्तुत्तराययावि य णं जाव परमसुइभए तंसि उदगरयणे जायविम्हए, ते यहवे राईसर जाव एवं व०-अहो णं देवाणु, इमं उदगरयणे अच्छे जाव सविदिय- गायपल्हायणिज्ने, तते णं यहवे राईसर जाव एवं व०-तहेव णं सामी, जणं तुन्भे वदह जाव एवं चेव पल्हायणिजे, तते णं जितसत्तू राया पाणियपरियं सदावेति २, एवं व०-एस णं तुम्भे देवा० ! उदगरयणे कओ आसादिते,तते णं से पाणियपरिए जितसत्तुं एवं वदासी-एस णं सामी! मए उदगरयणे सुबुद्धिस्स अंतियाओ आसादित, तते णं जितसत्तू सुवुद्धि अमचं सद्दावेति २, एवं व०-अहो णं सुवुद्धी केणं कारणेणं अहं तव अणिहे ५, जेणं तुमं मम कल्लाकल्लिं भोयणवेलाए इमं उदगरयणं न उवट्ठवेसि , तए णं तुमे देवा० ! उदगरयणे फओ उवलहे ?, तते णं सुवुद्धी जितसत्तुं एवं व०-एस णं सामी!, से फरिहोदए, तते णं से जितसत्तू सुबुद्धि एवं व०-केणं कारणेणं सुवुद्धी !, एस से फरिहोदए ?, तते णं सुवुद्धी जितसत्तुं 1 पीपाएमाणे जा' । J॥१८२ ।।
एवं व०-एवं खलु सामी!, तुम्हे तया मम एवमातिक्खमाणस्स ४, एतमढें नो सद्दहह, तते णं मम इमे- यारूवे अन्भत्थिते ६, अहो णं जितसत्तू संते जाव भावे नो सद्दहति, नो पत्तियति, नो रोएति, तं सेयं खल ममं जियमतुस्स रनो संताणं जाव सन्भूत्ताणं जिणपन्नत्ताणं भावाणं अभिगमणट्टयाए एतमहं उवाइणा- वेत्तए, एवं संपेहेमि २, तं चेव जाव पाणियपरियं सहामि २, एवं वदामि-तुमं णं देवाणु० !, उदगरतणं जितसत्तस्स रन्नो भोयणवेलाए उवणेहि, तं एएणं कारणेणं सामी , एस से फरिहोदए । तते णं जितसत्तू राया सुबुद्धिस्स अमयस्स एवमातिवमाणस्स ४, एतमदं नो सद्दहति ३, असद्दहमाणे ३, अभित- रद्वाणिज्जे पुरिसे सदावेति २, एवं वदासी-गच्छह णं तुन्भे देवाणुप्पिया !, अंतरावणाओ नवघडए पडए य गेण्हह जाच उदगसंहारणिज्जेहिं दव्चेहिं संभारेह, तेऽवि तहेव संभारेंति २, जितसत्तुस्स उवणेति तते णं जितसत्तू राया तं उदगरयणं करयलंसि आसाएति, आसातणिजं जाच सबिदियगायपल्हायणिजं जाणित्ता सुबुद्धिं अमचं महावेति २, एवं व०-सुवुद्धी !, एए णं तुमे संता तचा जाव सम्भूया भावा कतो उपलद्धा, तते णं सुबुद्धी जितसत्तुं एवं वदासी-एए णं सामी! मए संता जाव भावा जिणवयणातो उवलद्धा, तते णं जितसत्तू सुबुद्धि एवं व०-तं इच्छामि णं देवाणु० !, तव अंतिए जिणवयणं निसामेत्तए, तते णं सुबुद्धी जितसत्तूस्स विचित्तं केवलिपन्नत्तं चाउन्नामं धम्म परिकहेइ, तमाइक्वति जहा जीवा पज्झति जाव पंच अणुव्वयातिं, तते णं जितसत्तू सुबुद्धिस्स अंतिए धम्मं सोचा णिसम्म हट० सुवुद्धिं नाही- १२-श्री- उदकाख्य- ज्ञाताध्य. धर्माशी- भीवावा. पक्याने ।। १८३ ॥ अमचं एवं व०-सदहामि णं देवाणुप्पिया!, निग्गंथं पावयणं ३, जाव से जहेयं तुम्भे वयहा तं इच्छामि णं तव अंतिए पंचाणुब्वइयं सत्तसिवावइयं जाव उवसंपज्जित्ताणं विहरित्तए, अहासुहं देवा! मा पडियंध०, नए णं से जियसत्तू सुबुद्धिस्स अमञ्चस्स अंतिए पंचाणुव्वइयं जाव दुवालसविहं सावयधम्म पडिवजह, तते णं जितसत्तू समणोवासए अभिगयजीवाजीवे जाव पडिलाभेमाणे विहरति । तेणं कालेणं २, थेरागमणं, जियसत्तू राया सुबुद्धी य निग्गच्छति; सुवुद्धी धम्म सोचा ज णवरं जियसत्तुं आपुच्छामि जाव पव्वयामि, अहासुह देवा०, तते णं सुवुद्धी जेणेव जितसत्तू तेणेव उवा० २ एवं व०-एवं खलु सामी!, मए थेराणं अंतिए धम्मे निसन्ते सेऽविय धम्मे इच्छियपडिच्छिए ३, तए णं अहं सामी!, संसारभउब्विग्गे भीए जाव इच्छामि णं तुम्भेहिं अन्भणुनाए स० जाव पव्वइत्तए, तते णं जितसत्तू सुबुद्धि एवं व०-अच्छासु ताव देवाणु० ! कतिवयाति चासाई उरालाति जाव मुंजमाणा ततो पच्छा एगयओ घेराण अंतिए मुंडे भवित्ता जाव पव्वइस्सामो, तते ण सुबुद्धी जितसत्तूस्स एयमढे पडिसुणति, तते ण तस्स जितसत्तस्स सुवुद्धीणा सद्धिं विपुलाई माणुस्स० पञ्चणुब्भवमाणस्स दुवालस वासाई वीतिक ताई तेणं कालेणं २, थेरागमण, तते पा जितसनू धम्मं सोचा एवं जं नवरं देवा, सुवुद्धिं आमतेमि जेट्टपुत्तं रने ठवेमिः तए णं तुम्भं जाव पव्वयामि, अहासुहं, तते ण जितसत्तू जेणेव सए गिहे तेणेव उवा० २, सुवुदि सहावेति २, एवं वयासी-एवं खलु मए थेराणं जाव पध्वजामि, तुम णं किं करेसि स्वरूपादि- वर्णन. सूत्रम्। ܕܐ ।। १८३॥
तते णं सुवुद्धी जितसत्तुं एवं व०-जाव के० अन्ने आहारे वा जाव पव्वयामि, तं जति णं देवा० जाव पव्वयह गच्छह णं देवाणु० ! जेट्टपुत्तं च कुटुंवे ठावेहि २, सीयं दुरुहित्ताणं ममं अंतिए सीया जाय पाउन्भवेति; तते ण सुबुद्धीए सीया जाय पाउन्भवइ, तते णं जितसत्तू को९वियपुरिसे सद्दावेति २, एवं व०-गच्छह णं तुम्भे देवा० 1, अदीणसत्तुस्स कुमारस्स रायाभिसेयं उवट्ठवेह जाव अभिसिंचंति जाव पव्वतिए । तते णं जितसत्तू एकारस अंगाई अहिज्जति, पहणि वासाणि परियाओ मासियाए सिद्धे; तते णं सुवुद्धी एकारस अंगाई अ० वहणि वासाणि जाव सिद्धे । एवं खलु जंबू, समणेणं भगवया महावीरेणं यारसमस्स अयमहे पण्णत्ते त्तियेमि ॥ सूत्रम्-९९ ।। बारसमं नाअज्झयणं समत्तं ।। सर्व सुगम नवरं, 'फरिहोदए'ति-परिखायाः-खातवलयस्योदकं परिखोदकं, चापीति ममुच्चये, ततश्चंपादिकोऽर्थोऽभूद् एवं परिखोदकं चाभूदित्येवं, चः समुच्चये इति, 'मेयेत्यादि, अत्र मेदःप्रभृतीनां पटलेन-समूहेन, 'पोचडं'-विलीनं मृतकानां यथा वा द्विपदादीनां कडेवरैः संछन्नं यत्तत्तथा, अह्यादिकडेवरविशेषणायाह-मृतं-जीवविमुक्तमात्रं सद्यत् कुथितं- ईपन्दुर्गन्धमित्यर्थः, तथा विनष्ट-उच्छूनत्वादिविकारवत् : 'किमिणं'ति-कतिपयकृमिवत् व्यापन्नं च-शकुन्यादिमक्षणाद्री- भत्सतां गतं सद्यदुरभिगन्धं-तीव्रतरदुष्टगन्धं तत्चथा, 'सुब्मिसदावित्ति-शुभशब्दा अपि, 'दुन्भिसद्दत्ताए'त्ति-दुष्टशब्दतया, 'पओगवीससापरिणय'त्ति-प्रयोगेण-जीवव्यापारेण, विश्रसया च-स्वभावेन परिणताः-अवस्थान्तरमापना ये ते तथा, 'आसखंधवरगए'त्ति अश्व एव स्कन्धः-पुद्गलप्रचयरूपो वर:-प्रधानोऽश्वस्कन्धवरोऽथवा स्कन्धप्रदेशप्रत्यासचेः पृष्ठमपि नरामी १०० भीमाता- धर्मरूपाने स्कन्ध इति व्यपदिष्टमिति, 'असम्भावुभावणाहिति-अमता मावानां-वस्तूनां वस्तुधर्माणां वा या उद्भावना-उत्क्षेप- पानि तास्तथा नामिमिथ्यावामिनिवेशेन च-विपर्यासाभिमानेन व्युद्ग्राहयन्-विविधत्वेनाधिक्येन च ग्राहयन् व्युत्पादयन्- अव्युत्तनमति व्युत्पन्नं कुर्वन् 'संते' इत्यादि, सतो-विद्यमानान्, 'तति-तत्वरूपानैदंपर्यसमन्वितानित्यर्थः, अत एवं मध्यान्-मत्यान्, एतदेव व्यतिरेकेणोच्यते-अवितथान् न वितथानित्यर्थः, किमुक्तं भवति ?-सद्भूतान् सता प्रकारेण भूवान-यावान् मद्भूतान् एकार्था चैते शन्दाः; 'अभिगमणट्टयाए'-अवगमलक्षणाय अर्थायेत्यर्थः, 'एतमति-एवं (सं)-पुद्गलानामपरापरपरिणामलक्षणमर्थ 'उवाइणावित्तए 'त्ति-उपादापयितुं ग्राहयितुमित्यर्थः; 'अंतरावणाउ'. ति-परिखोदकमार्गान्तरालपनिनो हवात् कुम्मकारसम्बन्धिन इत्यर्थः, 'सज्जखाति-सद्यो मस्म; 'अच्छे'त्यादि, अच्छं-निर्मलं, पथ्यं-आरोग्यकर जात्य-प्रधानमिति भावः, तनुकं-लघु सुजरमिति हृदयं, 'उदगसंभारणिन्नेहिति- उदकामकैः-पालकमुस्तादिमिः संमारयति-संभृतं करोति । इहाध्ययने यद्यपि सूत्रेणोपनयो न दर्शितः तथाऽप्येवं द्रष्टव्य:-"मिच्छत्तमोहियमणा पायपमचावि पापिणो विगुणा । फरिहोदर्गव गुणिणो हवंति वरगुरुपसायाओ ।। १॥"ति ममाप्तमिदं द्वादशनाताध्ययनविवरणम् ।। १२. श्री. उदकाख्य- ज्ञाताध्य. सूत्रोपन- यादि निरूपणम् । ॥१८४॥ गा.- मिप्यालमोदितमनगः पापप्रमका अपि प्रागिनो विगुणाः । परिशोदकमिय गुणिनो भवन्ति वरगुरुप्रसादात् ॥१॥ ॥१८४ ।।
॥ १३-श्री दर्दुराख्यं ज्ञाताध्ययनम् ॥ अथ त्रयोदशं व्याख्यायते, अस्य च पूर्वेण सहायं सम्बन्धा,-अनन्तराध्ययने संसर्गविशेपाद् गुणोत्कर्ष उक्तः; इह तु संसर्गविशेषाभावाद् गुणापकप उच्यते, इत्येवं सम्बद्धमिदम्- जति णं भंते , समणेणं० घारसमस अयमढे पण्णत्ते, तेरसमस णं भंते !, नाय० के० अढे पन्नत्ते १; एवं खलु जंबू, तेणं कालेणं २, रायगिहे, गुणसिलए चेतिए, समोसरण, परिसा निग्गया; तेणं कालेणं २, सोहम्मे कप्पे, दद्दुरबडिसए विमाणे, सभाए सुहम्माए, दद्दुरंसि सीहासणसि, दद्दुरे देवे, चउहिं सामा- णियसाहस्सीहिं, चउहिं अग्गमहिसीहिं सपरिसाहिं, एवं जहा सुरियाभो भाव दिव्वाति भोगभोगाई भुंजमाणो विहरह: इमं च णं केवलकप्पं जंबुद्दीवं २, विपुलेणं ओहिणा आभोएमाणे २, जाव नद्दविहिं उवदंसित्ता पडिगते जहा सुरियाभे । भंतेति भगवं गोयमे, समणं भगवं महावीरं वंदइ, नमसति २; एवं व०-अहो णं भंते !, ददूदुरे देवे महिड्डिए २, दुरस्स णं भंते ! देवस्स सा दिन्वा देविड्डी ३, कहि गया० ?; गो० ! सरीरं गया सरीरं अणुपविट्ठा कूडागारदिहतो, दद्दुरेणं भंते ! देवेणं सा दिव्या देविड्डी ३ किपणा लद्धा जाव अभिसमन्नागया, एवं खल गो० ! इहेब जंबुद्दीवे २, भारहे वासे, रायगिहे, गुण-
मीज्ञाता
धर्मग्यारे
॥ १८५॥
सिलए चेतिण, सेणि राया; तत्थ णं रायगिहे गंदे णाम मणियारसट्ठी, अड्डे दित्ते; तेणं कालेणं २, अहं १३-श्री-
गोयमा !, समोसद्धे, परिसा णिग्गया; सेणिए राया निग्गए, तते णं से नंदे मणियारसेट्ठी इमीसे कहाएर दर्दु।
लढे समाणे पहाए पायचारेणं जाव पज्जुवासति, गंदे धम्मं सोचा समणोवासए जाते; तते णं अहं
ज्ञाताध्य.
रायगिहाओ पढिनिकग्वन्ते, यहिया जणवयविहारं विहरामि; तते णं से गंदे मणियारसेट्ठी अन्नया कदाइ नन्दश्रेष्ठि
असाहुदंसणेण, य, अपज्जुवासणाए य, अणणुसासणाए य, असुस्सूसणाए य, सम्मत्तपनवेहिं परिहाय वर्णन-
माणेहिं २, मिच्छत्तपजवेहिं परिवड्डमाणेहिं २, मिच्छत्तं विप्पडिवन्ने जाए यावि होत्या; ततेणं नंदे मणि-
सूत्रम् ।
यारसेट्ठी अन्नता गिम्हकालसमयंसि जेहामूलंसि मासंसि अट्ठमभत्तं परिगेण्हति २, पोसहसालाए जाव
विहरति; तते णणंदस्स अट्टम भत्तसि परिणममाणंसि तपहाए, छुहाए य अभिभूतस्स समाणस्स इमेयारूवे
अन्भत्थिते ५-धन्ना ण ते जाव ईसरपभितओ जेसिं णं रायगिहस्स पहिया, वहओ वावीतो, पोक्खर-
णीओ जाव सरसरपंतियाओ, जत्थ णं यहुजणो ण्हाति य, पियति य, पाणियं च संवहति; तं संयं खलु
ममं कल पाउ० सेणियं आपुच्छित्ता, रायगिहस्स पहिया उत्तरपुरच्छिमे दिसिभाए, वेभारपब्वयस्स अदूर-
मामते, पत्युपाहगरोइतंसि भूमिभागसि जायणंदंपोखरणि ग्वणावेत्तए त्तिक, एवं संपेहेति २, कल्लं पा०
जाव पोसह पारेति २, पहाते कययलिकम्मे मित्तणाइ जाव संपरिबुडे महत्व जाव पाहुडं रायारिहं गेण्हति
२, जेणेव सेणिए राया तेणेव उरा० २, जाव पाहुडं उववेति २, एवं व०-इच्छामि णं सामी! तुन्भेहिं अ. ॥१८५॥
भगुन्नाए समाणे रायगिहस्स पहिया जाव खणावेत्तए, अहासुहं देवाणुप्पिया! ततेणं णंदे सेणिएणं रन्ना अम्भणुण्णाते समाणे हट्ट रायगिह मज्झमझेणं निग्गच्छति २, वत्थुपाढयरोइयंसि भूमिभागसि गंद पोक्खरणिं खणाविउं पयत्ते यावि होत्या, तते णं सा गंदा पोक्खरणी अणुपुब्वेणं खणमाणा २, पोक्ख- रणी जाया यावि होत्था; चाउकोणा समतीरा, अणुपुव्वसुजायवापसीयलजला, संछपणपत्तविसमुणाला, बहुप्पलपउमकुमुदनलिणसुभगसोगंधियपुंडरीयमहापुंडरीयसयपत्तसहस्सपत्तपफुल्लकेसरोक्वेया परिहत्य- भमंतमच्छछप्पयअणेगसउणगणमिहुणवियरियसदुन्नइयमहुरसरनाइया पासाईया ४ । तते णं से गंदे मणियारसेट्ठी णंदाए पोक्स्वरणीए चउहिसिं चत्तारि वणसंडे रोवावेति । तए ण ते वणसंडा अणुपुवेणं सारक्खिजमाणा संगोविजमाणा य संचड्डियमाणा य से वणसंडा जाया किण्हा जाव निकुरुंचभूया पत्तिया पुफिया जाव उपसोभमाणा २, चिट्ठति । तते णं नंदे पुरच्छिमिल्ले वणसंडे एगं महं चित्तसमं करावेति, अणेगखंभसयसंनिविढे पा०, तत्थ णं पहणि किण्हाणि य जाव सुकिलाणि य, कडकम्माणि य, पोत्थकम्माणि चित्त० लिप्प० गंथिमवेढिमपूरिमसंघातिम० उवदसिजमाणाई २, चिटुंति; तत्थ णं यहणि आसणाणि य, सयणाणि य अत्थुयपचत्युयाई चिट्ठति; तत्थ णं यहवे णडा य णहा य जाव दिनभइ. भत्तवेयणा तालायरकम्मं करेमाणा विहरंति, रायगिहविणिग्गओ य जत्थ बहू जणो तेसु पुवन्नत्थेसु आसणसयणेसु संनिसनो य, संतुयो य, सुणमाणो य, पेच्छमाणो य, सोहेमाणो य सुहंसुहेणं विहरइ; ब नयागी- ०० भीज्ञाता- धर्मकथाङ्गे १३-श्री- दर्दु ज्ञाताध्य. श्रीमहान- सादि. वर्णन- ॥१८६ ॥ तते णं गंदे दाहिणिल्ले वणसंडे एगं महं महाणससालं करावेति 'अणेगखंभ० जाव स्वं तत्थ णं यहवे पुरिसा दिनभइभत्तवेयणा विपुलं असण ४ उचक्खडेंति चहणं समणमाहणअतिहीकिवणवणीमगाणं परिभाएमाणा २, विहरंति, तते णं णंदे मणियारसट्ठी पचत्थिमिल्ले वणसंडे एग महं तेगिच्छियसालं करेति, अणेगखंभसय० जाव रूवं, तत्थ णं वहवे वेजा य वेजपुत्ता य जाणुया य जाणुयपुत्ता य कुसला य कुसुलपुत्ता य दिन्नभइभत्तवेयणा यहणं वाहियाण गिलाणाण य रोगियाण य दुव्यलाण य तेइच्छं करमाणा विहरंति, अण्णे य एत्थ वहये पुरिसा दिन्न तेसिं पहणं वाहियाण प रोगि० गिला. दुबला. ओसहभेसज्जभत्तपाणेणं पडियारकम्मं करमाणा विहरंति तते णं गंदे उत्तरिल्ले वणसंडे एग महं अलं- कारिसभं करेति, अणेगखंभसत० जावपडिरूवं, तत्थं णं यहवे अलंकारियपुरिसा दिनभडभत्त. यहणं समणाण य अणाहाण य गिलाणाण य रोगि दुव्व० अलंकारियकम्मं करमाणा २, विहरति । तते णं तीए गंदाए पोक्खरणीए बहवे सणाहा य, अणाहा य, पंथिया य, पहिया य, करोडिया, कारिया०, तणहार०, पत्त० कट्ट, अप्पेगतिया पहायंति, अप्पेगतिया पाणियं पियंति, अप्पेगतिया पाणियं संवहंति, अप्पे विसजितसेय जल्लमलपरिस्समनिद्दखुप्पिवासा सुहंसुहेणं विहरंति । राय गिहविणिग्गओवि जत्थ बहुजणो किं ते जलरमणविविहमजणकयलिलयाघरयकुसुमसत्थरयअणेग सउणगणरुपरिभितसंकुलेसु सुहंसुहेणं अभिरममाणो २ विहरति । तते णं पदाए पोक्खरिणीए सूत्रम् ।
बहुजणो ण्हायमाणो पाणियं च संवहमाणो य अन्नमन्नं एवं वदासी-धण्णे णं देवा० !, णंदे मणियार- सेट्ठी'कयत्थे जाव जम्मजीवियफले जस्स णं इमेयाख्वा गंदा पोक्खरणी चाउकोणा जाय पडिरूवा, जस्स णं पुरथिमिल्ले तं चेव सव्वं चउसुवि वणसंडेसु जाव रायगिहविणिग्गओ जत्थ बहुजणो आसणेसु य सयणेसु य सन्निसन्नो य संतुयट्टो य पेच्छमाणो य साहेमाणो य सुहंसुहेणं विहरति, तं धन्ने कयत्थे कयपुन्ने कयाणं० लोया ! सुलद्धे माणुस्सए जम्मजीवियफले नंदस्स मणियारस्स, तते णं रायगिहे संघाडग जाय बहुजणो अन्नमन्नस्स एवमातिक्खति ४, धन्ने णं देवाणुप्पिया, णंदे मणियारे सो चेव गमओ जाव सुहंसुहेण विहरति । तते णं से णंदे मणियारे बहुजणस्स अंतिए एतमढे सोचा०, हट्ट २ धाराहयकलंयगंपिव समूससियरोमकूवे परं सायासोक्खमणुभवमाणे विहरति ॥ सूत्रम्-१००। सर्व सुगम, नवरं 'एवं सुरियाभेत्ति-यथा राजप्रश्नकृते सूरिकाभो देवो वर्णितः, एवं अयमपि वर्णनीयः, कियता वर्ण- केनेत्याह-जावदिव्वाइ'इत्यादि, स चायं वर्णका-"तिहिं परिसाहि, सत्तहिं अणिएहि, मत्तहिं अणियादवहहि” इत्यादि। 'इमं च णं केवलकप्पति इमं च केवल:-परिपूर्णः, स चासौ कल्पश्च-स्वकार्यकरणसमर्थ इति केवलकल्पः, केवल एव वा केवलकल्पः, तं 'आभोएमाणे'-इह यावत्करणादिदं दृश्य,-'पासइ समणं भगवं महावीर'मित्यादि; 'कूडागारदि- टुंतेति एवं चासौ से केणद्वेण भंते ! एवं बुचइ सरीरंग अणुपविट्ठा ?, गोयमा! से जहा नामए कूडागारसाला सिया दुहओ पहिरन्तथ गुत्ता लिचा' सावरणत्वेन गोमयाग्रुपलेपनेन च उभयतो गुप्तत्वमेवाह-गुप्ता-पहिः प्राकारावृता गुचदु:
नवाङ्गी- भीज्ञाता- धर्मकथाने ॥१८७॥ वारा-अन्तर्गुप्तेत्यर्थः, अथवा-गुप्ता गुप्तद्वारा द्वाराणां केपांचित् स्थगितत्त्वात् कांचिचास्थगितत्वादिति; 'निवाया १३-श्री- वायोरप्रवेशात् , 'निवायगंभीरा-किल महद् गृहं निवातं प्रायो न भवतीत्यत आह-निवातगम्भीरा निवातविशालेत्यर्थः दर्दु 'तीसे गं कूडागारसालाए अदूरसामंते एत्थ णं महं एगे जणममूहे चिट्ठइ, तए णं से जणसमूहे एगं महं अन्मवद्दलयं वा, ज्ञाताध्य वासवदलयं या, महावायं वा एजमाणं पासड, पासित्ता तं कूडागारसालं अंतो अणुपविसित्ताणं चिट्ठह से तेणद्वेणं गोयमा! शाला- एवं वुच्चइ सरीरंग गया सरीरंग अणुपविट्ठ'त्ति, 'असाधुदर्शनेनेति-साधूनामदर्शनेनात एव, 'अपर्युपासनया'- ५ दृष्टान्त- असेवनया, 'अननुशासनया'-शिक्षाया अभावेन, 'अशुभ्रूपणया'-श्रवणेच्छाया अभावेन, 'सम्यक्त्वपर्यवै।'-सम्य वर्णनम् । कृत्वरूपपरिणामविशेपैरेवं, मिथ्यात्वपर्यवैरपि मिथ्यात्वं विशेषेण प्रतिपनो विप्रतिपन्नः, काष्ठकर्माणि-दारुमयपुत्रिकादि- निर्मापणानि एवं सर्वत्र, नवरं; पुस्तं-पत्रं, चित्रं तेप्यं च प्रसिद्धं, ग्रन्थिमानि-यानि सूत्रेण ग्रथ्यन्ते मालावत् , वेष्टिमानि- यानि वेटनतो निप्पायन्ते, पुष्पमालालम्बूस झवत् , पूरिमाणि-यानि पूरणतो भवन्ति, कनकादिप्रतिमावत् । सङ्घातिमानि- सवातनिष्पाद्यानि स्थादिवत् , उपदर्यमानानि लोकैरन्योऽन्यमित्यर्थः; 'तालायरकम्म'ति-प्रेक्षणककर्मविशेषः, 'तेगि- छियसालं'-ति-चिकित्साशालं अरोगशाला, वैद्या:-भिपग्वराः, आयुर्वेदपाठकाः, वैद्यपुत्राः-तत्पुत्रा एव; 'जाणुय'त्ति- ज्ञायका शास्त्रानध्यायिनोऽपि शास्त्रक्षप्रवृत्तिदर्शनेन रोगस्वरूपतः चिकित्सावेदिनः, कुशलाः-स्ववितर्काचिकित्सादिप्रवीणा 'वाहियाणंति-व्याधितानां विशिष्टचित्तपीडावतां शोकादिविप्लुतचित्तानामित्यर्थः अथवा-विशिष्टा आधिर्यस्मात् स व्याधिः- स्थिररोगा कुष्ठादिस्तद्वतां ग्लानानां-क्षीणहाणामशक्तानामित्यर्थः, रोगिताना-सबावज्वरकृष्ठादिरोगाणामाशुषातिरोगाणां ॥ १८७ वा, 'ओसहमित्यादि, औषधं-एकद्रव्यरूपं, भैपजे-द्रव्यसंयोगरूपं; अथवा-औपधं-एकानेकद्रव्यरूपं मैप तु-पथ्यं, मक्तं तु-भोजनमात्रं, प्रतिचारकर्म-प्रविचारकत्वं, 'अलंकारियसह'ति-नापिककर्मशाला, 'विसज्जिए'त्यादि, विसृष्टस्वे- दजल्लमलपरिश्रमनिद्राक्षुत्पिपामाः, तत्र जल्लोऽस्थिरो मालिन्यहेतुर्मलस्तु म एप कठिनीभूत इति, 'रायगिहे'त्यादि, राज- गृहरिनिर्गतोऽपि चात्र बहुजनः, 'किं ते'ति-किं तद् यत्करोति !, उच्यते-जलरमणैः-जलक्रीडामिः विनिधमजनैः-बहुप्र- कारखानैः कदलीनां च लतानां च गृहकैः कुसुमत्रस्तरैः अनेकशकुनिगणरुतैश्च रिभितैः-स्वरघोलनावद्भिर्मधुरैरित्यर्थः, सङ्कलानि यानि तानि तथा तेषु पुष्करणीवनखण्डलक्षणेषु पञ्चसु वस्तुष्विति प्रक्रमः, 'संतुयहो यत्ति-शयितः, 'साहेमा. णो यत्ति प्रतिपादयन् , 'गमय'त्ति पूर्वोक्तः पाठः, 'सायासोक्ख'ति सातात-सातवेदनीयोदयात् सौख्यं-सुखं ।। १० ।। तते णं तस्स नंदस्स मणियारसेहिस्स अन्नया कयाई सरीरगंसि सोलस रोयायंका पाउन्भूया, तं०- "सासे कासे जरे दाहे, कुच्चिसुले भगंदरे ६ । अरिसा अजीरए दिद्विमुद्धसूले अगारए ॥१॥ अच्छि. वेयणा कन्नवेयणा कंडू दउदरे कोढे १६ ।" तते णं से गंदे मणियारसेट्टी सोलसहिं रोयायंकेहिं अभिभूते समाणे कोडंबियपुरिसे सद्दावेति २, एवं व०-गच्छह णं तुम्भे देवा०, रायगिहे सिंघाडग जाव पहेसु महया सद्देणं उग्रोसेमाणा २, एवं व०-एवं ग्वलु देवाणु०, णंदस्स मणियारसेट्ठिस्स सरीरगंसि सोलस रोयायंका पाउन्भूता, तं.-'सासे जाव कोढे' तं जो णं इच्छति देवाणुप्पिया !, वेज्जो वा, वेबपुत्तो वा, जाणुओ वा २, कुसलो वा २, नंदस्स मणियारस्स तेसिं च णं सोलसण्हं रोयायकाणं एगमवि रोयायक धार नवाडी १०० भीज्ञाता. धर्मकथाङ्गे १३-श्री- दर्दू ज्ञावाध्य० शाला- दृष्टान्त- वर्णनम्। १९८७॥ वारा-अन्तगुप्तेत्यर्थः, अथवा-गुप्ता गुप्तद्वारा द्वाराणां केपांचित् स्थगितत्वात् केचिचास्थगितत्वादिति; 'निवाया- वायोरप्रवेशाव, 'निवायगंभीरा-किल महद् गृहं निवातं प्रायो न भवतीत्यत आह-निवातगम्भीरा निवातविशालेत्यर्थः 'तीसे णं कूडागारसालाए असामंते एत्थ णं महं एगे जणममूहे चिट्ठइ, तए णं से जणसमूहे एगं महं अन्मवद्दलयं या, वासवदलयं वा, महावायं या एजमाणं पासड, पासित्ता तं कूडागारसालं अंतो अणुपविसित्ताणं चिट्ठह से तेणद्वेणं गोयमा! एवं बुच्चद सरीरंग गया सरीरगं अणुपविट्ठीचि, 'असाधुदर्शनेनेति-साधूनामदर्शनेनात एक, 'अपर्युपासनया'- असेवनया, 'अननुशासनया'-शिक्षाया अमावेन, 'अशुश्रूपणया'-श्रवणेच्छाया अमावेन, 'सम्यक्त्वपर्यवे'-सम्य- क्त्वरूपपरिणामविशेषैरेवं, मिथ्यात्वपर्यवैरपि मिथ्यात्वं विशेषेण प्रतिपन्नो विप्रतिपन्नः, काष्ठकर्माणि-दारुमयपुत्रिकादि- निर्मापणानि एवं गर्वत्र, नवरं; पुस्तं-घखं, चित्रं तेप्यं च प्रसिद्धं, ग्रन्थिमानि-यानि सूत्रेण ग्रथ्यन्ते मालावद , वेष्टिमानि- यानि वेटनतो निप्पायन्ते, पुष्पमालालम्बूसम्बत् , पूरिमाणि-यानि पूरणतो भवन्ति, कनकादिप्रतिमावत् ; सदातिमानि- सातनिष्पाद्यानि रथादिवत् , उपदर्यमानानि लोकैरन्योऽन्यमित्यर्थः, 'तालायरकम्मैति-प्रेक्षणककर्मविशेपः, 'तेगि- च्छियसालं'-ति-चिकित्साशालं अरोगशालां, वैद्या:-भिपग्वराः, आयुर्वेदपाठकाः, वैद्यपुत्राः-तत्पुत्रा एव; 'जाणुय'ति- ज्ञायकाः शास्त्रानध्यायिनोऽपि शास्त्रज्ञप्रचिदर्शनेन रोगस्वरूपतः चिकित्सावेदिनः, कुशलाः-खवितर्काचिकित्सादिप्रयीणा, 'वाहियाण'ति-व्याधितानां विशिष्टचिचपीडावां शोकादिविप्लुतचित्तानामित्यर्थः अथवा-विशिष्टा आधिर्यस्मात् स च्याधिः- स्थिररोगा कुष्ठादिस्तद्वतां ग्लानानां-क्षीणहाणामशक्तानामित्यर्थः, रोगिताना-सातज्वरकृष्ठादिरोगाणामाशुषातिरोगाणां ॥ १८७ चा, 'ओसहमित्यादि, औषधं-एकद्रव्यरूपं, मैपज-द्रव्यसंयोगरूप; अथवा-औषधं-एकानेकद्रव्यरूपं मैपज तु-पथ्यं, भक्तं तु-भोजनमात्र, प्रतिचारकर्म-प्रतिचारकत्वं, 'अलंकारियस'ति-नापितकर्मशाला, 'विसजिए'त्यादि, विसृष्टस्वे- दजालमलपरिश्रमनिद्राक्षुत्पिपासा, तब जल्लोऽस्थिरो मालिन्यहेतुर्मलस्तु म एर कठिनीभूत इति, 'रायगिहे त्यादि, राज- गृहविनिर्गतोऽपि चात्र बहुजनः, 'किं ते'त्ति-किं तद् यत्करोति ?, उच्यते-जलरमणैः-जलक्रीडामिः विविधमझनैः-बहुप्र- कारखानैः कदलीनां च लतानां च गृहकैः कुसुमस्रस्तरैः अनेकशकुनिगणरुतैश्च रिभितैः-स्वरघोलनायद्भिर्मधुरैरित्यर्थः, साहुलानि यानि तानि तथा तेपु पुष्करणीवनखण्डलक्षणेषु पञ्चसु वस्तुष्षिति प्रक्रमः, 'संतुयहो यत्ति-शयितः, 'साहेमा- णो यति प्रतिपादयन् , 'गमय'चि पूर्योक्तः पाठः, 'सायासोक्रांति सातात्-सातवेदनीयोदयात् सौख्य-सुखं ॥ १० ॥ तते णं तस्स नंदस्स मणियारसेहिस्स अन्नया कयाई सरीरगंसि सोलस रोयायंका पाउन्भूया, तं०- "सासे कासे जरे दाहे, कुच्छिसुले भगंदरे ६ । अरिसा अजीरए दिद्विमुद्धसूले अगारए ॥१॥ अच्छि. वेयणा फन्नवेयणा कंडू दउदरे कोढे १६ ।" तते णं से गंदे मणियारसेट्टी सोलसहिं रोयायंकेहिं अभिभूते समाणे कोडंबियपुरिसे सहावेति २, एवं व०-गच्छह णं तुन्भे देवा० !, रायगिहे सिंघाडग जाव पहेसु महया सद्देणं उग्घोसेमाणा २, एवं व०-एवं म्वल देवाणु०, गंदस्स मणियारसेविस सरीरगंसि सोलस रोयायंका पाउन्भूता, तं०-'सासे जाव कोढे' तं जो णं इच्छति देवाणुप्पिया !, वेजो वा, वेजपुत्तो वा, जाणुओ चा २, कुसलो वा २, नंदस्स मणियारस्स तेसिं च णं सोलसण्हं रोयायंकाणं एगमवि रोयायक नवाङ्गी- १० पू० भीज्ञाता- धर्मकथाने १८७॥ वारा-अन्तगुप्तेत्यर्थः, अथवा-गुप्ता गुप्तद्वारा द्वारागां केपांचित् स्थगितत्वात् केयांचिचास्थगितत्वादिनि 'निवाया १३-श्री- वायोरप्रवेशाव, 'निवायगंभीरा'-किल महद् गृहं निपातं प्रायो न भरतीत्यत आह-निशातगम्भीरा निवातविशालेत्यर्थः द१० 'तीसे णं कूडागारसालाए अदूरसामंते एत्थ णं महं एगे जणममूहे चिट्ठइ, तए णं से जणसमूहे एगं महं अन्मादलयं था, वावाध्य० वासवद्दलयं वा, महावायं वा एजमाणं पासह, पासित्ता तं कूडागारसालं अंतो अणुपविसित्ताणं चिट्ठह से तेणद्वेणं गोयमा! एवं बुचा सरीरंग गया सरीरंग अणुपवित्ति, 'असाधुदर्शनेनेति-साधूनामदर्शनेनात एन, 'अपर्युपासनया'- ५। दृष्टान्त- असेवनया, 'अननुशासनया'-शिक्षाया अभावेन, 'अशुभ्रूपणया'-श्ररणेच्छाया अमान, 'सम्यक्त्वपर्यौ'-सम्प वर्णनम्। कत्वरूपपरिणामविशेपैरेवं, मिथ्यात्वपर्यवैरपि मिथ्यात्वं विशेषेण प्रतिपन्नो विप्रतिपन्नः, काष्ठकर्माणि-दारुमयपुनिकादि- निर्मापणानि एवं गर्मत्र, नारं; पुस्त-वस्त्रं, चित्रं लेप्यं च प्रमिद्धं, ग्रन्थिमानि-यानि सूत्रेण अध्यन्ते मालारत् , वेष्टिमानि- यानि वेटनतो निप्पायन्ते, पुष्पमालालम्बूसम्वत् , पूरिमाणि-यानि पूरणतो मान्ति, कनकादिप्रतिमावत् ; महातिमानि- सातनिष्पाद्यानि स्थादिवत् , उपदर्यमानानि लोकैरन्योऽन्यमित्यर्थः, 'तालायरकम्म'ति-प्रेक्षणकर्मविशेषः, 'तेगि- च्छियसालं'-ति-चिकित्साशालं अरोगशाला, वैद्या:-भिपरपराः, आयुर्वेदपाठकाः, वैद्यपुनाः-तत्पुना एक; 'जाणुय'त्ति- ज्ञायकाः शास्त्रानध्यायिनोऽपि शास्त्रज्ञप्रवृत्तिदर्शनेन रोगसरूपतः चिकित्सावेदिनः, कुशलाः-सवितर्काचिकित्मादिप्रवीणा। 'वाहियाणं'ति-व्याधितानां विशिष्टचिचपीडापतां शोकादिविप्लवचिचानामित्यर्थः अथपा-पिशिष्टा आधिपस्मात् स व्याधिः- स्थिररोगा कुष्ठादिस्तद्वतां ग्लानानां-क्षीणहीणामशक्तानामित्यर्थः, रोगिताना-सजातजराष्ठादिरोमाणामाशुपातिरोगाणां वा, 'ओसहमित्यादि, औषधं-एकद्रव्यरूपं, मैपर्ज-द्रव्यसंयोगरूप; अथवा-औपचं-एकानेकद्रव्यरूपं मैपजं तु-पथ्यं, मक्तं तु-मोजनमात्रं, प्रतिचारकर्म-प्रतिचारकत्वं, 'अलंकारियस'ति-नापितकर्मशाला, 'विसजिए'त्यादि, विसृष्टस्वे- दजष्लमलपरिश्रमनिद्राक्षुत्पिपासाः, ता जल्लोऽस्थिरो मालिन्यहेतुर्मलस्तु म एर कठिनीभूत इति, 'रायगिहे'त्यादि, राज- गृहयिनिर्गतोऽपि चात्र पहुजनः, 'किं तेत्ति-किं तद् यत्करोति ?, उच्यते-जलरमणैः-जलक्रीडामिः विविधमजन:-बहुप्र- कारतानः कदलीनां च लतानां च गृहकैः कुसुमस्रस्तरैः अनेकशकुनिगणरुतैश्व रिमितैः-स्वरघोलनावद्भिर्मधुरैरित्यर्थः, मडलानि यानि तानि तथा तेषु पुष्करणीवनखण्डलक्षणेषु पञ्चसु वस्तुपिति प्रक्रमः, 'संतुयद्दो यत्ति-शयितः, 'साहेमा- णो यति प्रतिपादयन् , 'गमय'त्ति पूर्वोक्तः पाठः, 'सायासोक्खंति साता-सातवेदनीयोदयात् सौख्यं-सुखं ॥ १० ॥ तते णं तस्स नंदस्स मणियारसेहिस्स अन्नया कयाई सरीरंगसि सोलस रोयायंका पाउन्भूया, तं०- "सासे कासे जरे दाहे, कुच्छिसुले भगंदरे ६ । अरिसा अजीरए दिद्विमुद्धसूले अगारए ॥१॥ अच्छि. पेयणा कन्नवेयणा फंटू दउदरे कोढे १६ ।" तते णं से गंदे मणियारसेट्ठी सोलसहिं रोयायंकेहिं अभिभूते समाणे कोडंयियपुरिसे सहावेति २, एवं व०-गच्छह णं तुम्भे देवा० !, रायगिहे सिंघाडग जाव पहेसु महया सद्देणं उग्घोसेमाणा २, एवं व०-एवं खलु देवाणु०!, णंदस्स मणियारसेविस्स सरीरगंसि सोलस रोयायंका पाउन्भूता, तं०-'सासे जाव कोढे' तं जो णं इच्छति देवाणुप्पिया!, वेजो वा; वेजपुत्तो वा, जाणुओ वा २, कुसलो वा २, नंदस्स मणियारस्स तेसिं च णं सोलसण्हं रोयायंकाणं एगमवि रोयायंकं नवाङ्गी- ६०० भीज्ञाता. धर्मकथाङ्गे १३-श्री- द१० ज्ञाताध्य. रोगाक्रा- न्तनन्दव. र्णनसूत्रम् । ॥१८८॥ उवसामेत्तए तस्स णं दे० मणियारे विउलं अत्थसंपदाणं दलयति, तिकट्टु दोचंपि तचंपि घोसणं घोसेह २, पचप्पिणह, तेवि तहेव पचप्पिणंति; तते णं रायगिहे इमेयारूवं घोसणं सोचा णिसम्म यहवे वेजा य, वेज्नपुत्ता य जाव कुसलपुत्ता य, सत्यकोसहत्थगया य, कोसगपायहत्थगया य, सिलियाहत्यगया य, गुलिया० य ओसहभेसजहत्थगया य सएहिं २, गिहेहितो निक्खमंति. २, रायगिह मज्झमझेणं जेणेव णंदरस मणियारसेहिस्स गिहे तेणेव उवा० २, गंदस्स सरीरं पासंति, तेसिं रोयायंकाणं णियाणं पुच्छंति, गंदस्स मणियार० यहहिं उचलणेहि य, उवटणेहि य, सिणेहपाणेहि य, वमणेहि य, विरेयणेहि य, सेयणेहि य, अवदहणेहि य, अवण्हाणेहि य, अणुवासणेहि य, वत्थिकम्मेहि य, निरूहेहि य, सिरावेहेहि य, तच्छणाहि, य, पच्छणाहि य, सिरावेदेहि य, तप्पणाहि य, पुढवाएहि य, छल्लीहि य, वल्लीहि य, मूलेहि य, कंदेहि य, पत्तेहि य, पुप्फेहि य, फलेहि य, वीएहि य, सिलियाहि य, गुलियाहि य, ओस- हेहि य, भेसजेहि य, इच्छंति तेसिं सोलसण्हं रोयायंकाणं एगमवि रोयायकं उवसामित्तए, नो चेव णं संचाएति उवसामेत्तए, तते णं ते यहवे वेजा य ६ जाहे नो संचाएंति, तेसिं सोलसण्हं रोगाणं एगमवि रोगा० उव० ताहे संता तंता जाव पडिगया। तते णं नंदे तेहिं सोलसेहिं रोयायंकेहिं अभिभूते समाणे णंदापोक्खरणीए मुच्छिए ४ तिरिक्खजोणिएहिं निबद्धाउते यद्धपएसिए अदृदुहद्दवस। कालमासे कालं किचा नंदाए पोक्खरणीए दहुरीए कुच्छिसि दहुरत्ताए उववन्ने । तए णं णंदे ददुरे गम्भाओ विणिम्मुक्के १८८॥
समाणे उम्मुफयालभावे विनायपरिणयमित्ते जोन्यणगमणुपत्ते नंदाए पोक्खरणीए अभिरममाणे २ विह- रति, तते णं णंदाए पोक्खरणीए यह जणे पहायमाणो व पियइ य पाणियं च संवहमाणो अन्नमन्नस्स एयमातिग्वति ४ धन्ने णं देवाणुप्पिया! गंदे मणियारे जस्स णं इमेयाख्वा गंदा पुक्खरणी चाउकोणा जाय पडिख्वा जस्स णं पुरथिमिल्ले वणसंडे चित्तसभा अगणेग्वंभ० तहेव चत्तारि सहाओ जाव जम्मजी- वियफले, तते णं तस्स ददुरस्स तं अभिवग्वणं २ बहुजणस्स अंतिए एयमदं सोचा णिसम्म इमेयारूवे अन्मथिए ६-से कहिं मन्ने मए इमेयारूवे सद्दे णिसंतपुब्वे त्तिक? सुभेणं परिणामेणं जाव जाइसरणे ममुप्पन्ने, पुष्यजाति सम्म समागच्छति, तते णं तस्स ददुरस्स इमेयारूवे अब्भत्थिए ५-एवं खलु अहं इहेव रायगिहे नगरे गंदे णामं मणियारे अड्डे । तेणं कालेणं तेणं समपणं समणे भगवं म० समोसढे, तप णं समणस्स भगवओ० अंतिए पंचाणुब्बइए सत्तसिक्खावइए जाव पडिवन्ने, तए णं अहं अन्नया फयाई असाहुदंसणेण य जाय मिच्छत्तं विप्पडिवन्ने, तए णं अहं अन्नया कयाई गिम्हे कालसमयंसि जाव उपसंपन्नित्ता णं विहरामि, एवं जहेब चिंता आपुच्छणा नंदापुक्ख० वणसंडा सहाओ तं चेव सव्वं जाय नंदाए पु० ददुरत्ताए उवयन्ने, तं अहो णं अहं अहन्ने अपुन्ने अकयपुन्ने निग्गंथाओ पावयणाओ नहे भट्टे परिन्भटे तं सेयं ग्बल मम सयमेव पुवपडिवन्नाति पंचाणुब्वयाति० उवसंपजित्ताणं विहरित्तए, एवं संपेहेति २ पुवपडियन्नाति पंचाणुव्ययाइं० आरुहेति २ इमेयारूवं अभिग्गहं अभिगिण्हति-कप्पइ मे CRET नवाङ्गी- ६० पू० भीज्ञाता- धर्मकयाले १३-श्री- दर्दु ज्ञाताध्य० दर्दुराभि- लापवर्णन- सूत्रम् । ११८९ ॥ जावजीवं छटुंछट्टेणं अणि० अप्पाणं भावमाणस्स विहरित्तए, छहस्सविय गं पारणगंसि कप्पड़ मे गंदाए पोक्खरणीए परिपेरंतेसु फासुएणं पहाणोदएणं उम्मद्दणोलोलियाहि य वित्तिं कप्पेमाणस्स विहरित्तए, इमेयारूवं अभिग्गहं अभिगेण्हंति, जावज्जीवाए छटुंछट्टेणं जाव विहरति; तेणं कालेणं २, अहं गो!, गुणसिलए समोसढे, परिसा निग्गया; तए णं नंदाए पुक्खरिणीए बहुजणो पहाय० ३ अन्नमन्नं०, जाव समणे ३ इहेव गुणसिलए०, तं गच्छामो णं देवाणु० समणं भगवं. चंदामो जाव पज्जुवासामो एयं मे इह भवे परभवे य हियाए जाव अणुगामियत्ताए भविस्सइ, तए णं तस्स ददुरस्स यहुजणस्स अंतिए एयमढे सोचा निसम्म० अयमेयारूवे अभत्थिए ५ समुप्पजित्था-एवं ग्वल समणे० तं गच्छामि णं वंदामि०, एवं संपेहेति २, गंदाओ पुक्खरणीओ सणियं २, उत्तरइ जेणेव रायमग्गे तेणेव उवा० २, ताए उनिहाए ५, ददुरगईए वीतिवयमाणे जेणेव ममं अंतिए तेणेव पहारेत्थ गमणाए, इमं च णं सेणिए राया भंभसारे पहाए कयकोउय० जाव सव्यालंकारविभूसिए, हृत्थिखंधवरगए, सकोरंटमल्लदामेणं, छत्तेणं०, सेयवरचामरा०, हयगयरह०, महया भडचडगर०, चाउरंगिणीए सेणाए सद्धिं संपरिबुडे, मम पायवंदते हुन्वमागच्छति; तते णं से दहुरे सेणियस्स रन्नो एगेणं आसकिसोरगणं वामपाएणं अते समणे अंत- निग्घातिए कते यावि होत्या, तते ण से दडुरे अत्थामे अयले अवीरिए अपुरिसकारपरकमे आधारणि- २, तिरत्ता,जा० । ॥ १८९ नमि तिकडे एगंतमयकमति० करयलपरिग्गहिय० नमोऽत्यु णं जाव संपत्ताणं, नमोऽधु णं मम धम्माय- रियस्स जाय संपाविउकामस्स पुस्विपिय णं मए समणस्म भगवतो महावीरस्स अंतिए थूलए पाणाति- वाए पञ्चक्खाए जाव थूलए परिग्गहे पञ्चक्खाए, तं इयाणिपि तस्सेव अंतिए सव्वं पाणातिवायं पञ्च- क्खामि जाव सव्वं परि० पच जायजीवं सव्वं असण ४, पच० जायजीवं जंपिय इमं सरीरं इदं कंतं जाव मा फुसंतु एयंपिणं चरिमेहिं ऊसासेहिं धोसिरामि त्तिकद्दु, तए णं से दद्दुरे' कालमासे कालं किचा जाय सोहम्मे कप्पे, दरवडिसए विमाणे, उववायसभाए, ददुरदेवत्ताए उचवन्ने; एवं खलु गो०!, दहुरेणं सा दिव्या देविड्डी लद्वा ३ । दडुरस्स णं भंते ! देवस्स केवतिकालं ठिई पण्णता , गो०, चत्तारि पलिओवमाई ठिती पं०, से णं दहुरे देवे० महाविदेहे वासे सिज्झिहिति, बुज्झि० जाच अंतं करेहिह य । एवं खलु समणेणं भग० महावीरेणं तेरसमस्स नायज्झयणस्स अयमहे पण्णत्ते तिमि ॥ सूत्रम्-१०१।। तेरसमं णायज्झयणं समत्तं ॥१३॥ 'सासे'त्यादि श्लोकः प्रतीतार्थः, नवरं 'अजीरएति-आहारापरिणतिः, 'दिट्ठीमुद्धसूले'त्ति-दृष्टिशूलं-नेत्रशूलं, मूर्द्धशूल-मस्तकशूलं, 'अकारपति-मक्तद्वेषा, 'अच्छिवेयणे'त्यादि, श्लोकातिरिकं, 'कंडु'त्ति-खर्जुः, 'दउदरति- दकोदरं-जलोदर भित्त्यर्थः, 'सत्यकोसे स्यादि, शस्त्रकोश:-क्षुरनखरदनादिभाजनं स हस्ते गतः-स्थितो येषां ते तथा, एवं सर्वत्र, नवरं शिलिका-फिराततिक्तकादिवणरूपाः प्रतवपापाणरूपा वा शस्त्रतीक्ष्णीकरणार्थाः, तथा गुटिका-द्रव्यसंयोगनि- RSSIA
भीमाता.
धर्मपाझे
१३-श्री-
दर्दु
ज्ञाताध्य०
रोगादि.
व्याख्या
१९०॥
नम्।
पादितगोलिकाः ओपघभेपजे तथैव 'उव्यलणेही त्यादि, उद्वेलनानि-देहोपलेपनविशेपाः यानि देहाद्धस्तामर्शनेनापनीयमा-
नानि मलादिकगादायोरलंतीति उद्वर्तनानि-तान्येव विशेषस्तु लोफरूढिममबसेय इति, स्नेहपानानि-द्रव्यविशेषपक्कतादि.
पानानि वमनानि न प्रसिद्धानि विरेचनानि-अधोविरेकाः स्वेदनानि-मप्तधान्यकादिभिः अवदहनानि-दम्भनानि अपस्ना-
नानि-नेहापनयन हेतद्रव्यसंस्कृतजलेन सानानि अनुपामना:-चर्मयप्रयोगेणापानेन जठरे तैलविशेषप्रपेशनानि बस्तिक-
माणि-मर्मवेष्टनप्रयोगेण शिरप्रभृतीनां स्नेहपूरणानि गुदे वा वादिक्षेपणानि निरूहा-अनुवासना एव केवलं द्रव्यकृतो
विशेषः निरोधा-नाडीवेचनानि रुधिरमोक्षणानीत्यर्थः तक्षणानि-स्वचः क्षुरप्रादिना तनूकरणानि प्रक्षणानि-इस्वानि त्वचो
विदारणानि गिरोयम्तयः-शिरसि पद्धस्य चर्मकोशस्य संस्कृततेलापूरलक्षणाः, प्रागुक्तानि पस्तिकर्माणि सामान्यानि अनु.
वामनानिरुदगिरोपस्तयस्तु तभेदाः, तर्पणानि-लेहद्रव्यविशेपैहणानि, पुटपाका:-कुष्ठिकानां कणिकावेष्टिवानामगिना
पचनानि, अथा-पुटपाका:-पाकविशेपनिप्पन्ना औपधविशेषाः, छल्लयो-रोहिणीप्रभृतयः, वरल्यो-गुडूचीप्रभृतयः,कन्दादीनि
प्रमिद्धानि एनरिच्छन्ति एकमपि रोगमुपशमयितुमिति, 'नियद्धाउए'ति-प्रकृतिस्थित्यनुभागवन्धापेक्षया, 'बंधपएसिए'त्ति-
प्रदेशबन्धापेक्षयेति, "अंतनिग्घाइपत्ति-निर्धातितान्तः, 'सवं पाणाइवायं पञ्चक्खामि' इत्यनेन यद्यपि सर्वग्रहणं तथापि
तिरमा देशपिरतिरेव, इहाथै गाये-"तिरियाणं चारितं निवारियं अह य तो पुणो तेसिं । सुबह बहुयाणंपि हु महब्बया.
रोहणं ममए ॥१॥ न महत्वपसमावेवि चरणपरिणाममम्मयो तेसिन बहुगुणाणपि जओ केवलसंभूइपरिणामो ||२||" इति
मा. निरपो चारित्र निवारिल अयम
तदा पुनस्तेशे श्रूयते पहनामपि महावतारोपणं समये ॥ १ ॥ न महावतसद्भाषेऽपि चरणपरिणाम-
समरस्तेषो । गहुगुमानामपि न यतः केवलमभूतिपरिणामः ॥२॥
॥ १९॥
इह यद्यपि सूत्रे उपनयो नोक्तः तथाऽप्येवं द्रष्टव्य:-"संपन्नगुणोवि जओ सुमाकुसंसग्गिवजिओ पायं । पावइ गुणपरि-
हाणी दहुरजीवोव मणियारो ॥ १ ॥"त्ति, अथवा-तित्थयरवंदणत्यं चलिओ भावेण पावइ सग्गं । जह ददुरदेवेणं पत्तं वेमा
णियसुरचं ॥ २॥" ति ममाप्तमिदं त्रयोदशज्ञाताध्ययनविवरणम् ॥ १३ ॥
॥ १४-श्रीतेतलिपुत्रज्ञाताध्ययनम् ॥
अथ चतुर्दशशात विवियते-अस्य चायं पूर्वेण सहाभिसम्पन्धः-पूर्वस्मिन् सां गुणानां सामय्यमावे हानिरुक्ता, इह तु
तथाविधसामग्रीसद्भावे गुणसम्पदुपजायते इत्यभिधीयते, इत्येवं सम्बद्धमिदम्-
जति णं भंते , तेरसमस्स ना० अयम? पण्णत्ते, चोदसमस्स के अढे पन्नत्ते ; एवं खलु जंबू, तेणं
फालेणं २, तेयलिपुरं नाम नगरं, पमयवणे उजाणे, कणगरहे राया, तस्स णं कणगरहस्स पउमावती
देवी, तस्स णं कणगरहस्स तेयलिपुत्ते णाम अमचे, सामदंड०, तत्थ णं तेयलिपुरे कलादे नामं मूसियार-
दारए होत्था, अड्डे जाय अपरिभूते, तस्स णं भद्दा नाम भारिया, तस्स णं कलायस्य मूसियारदारयस्य
सा० : संपपगुणोऽपि यतः सुमागुमसर्गवर्जितः प्रायः । प्राप्नोति गुणपरिहाणिं दर्दुरजीव इव मणिकारः ॥ १॥ तीर्थकरवन्दनार्थ चलितो मावेन
प्राप्नोति स्वर्गम् । यथा दर्दुरदेवेन प्राप्त वैमानिकपुरत्वम् ॥1॥
भीलाता- धर्मकथा) तेतलि. ज्ञाताध्यक्ष तेतलिपुत्र सम्बन्धि- वर्णन- ॥१९१ ।। धूया भद्दाए अत्तया पोटिला नाम दारिया होत्था, रूवेण जोवणेण य लावन्नेण उकिट्ठार, तते णं पोहिला दारिया, अन्नदा कदाइ पहाता सव्वालंकरविभूसिया चेडियाचकवालसंपरिबुडा उपिपासायवरगया आगा सतलगंसि कणगमएणं तिंदूसएणं कीलमाणी २ विहरति, इमं च णं तेयलिपत्ते अमचे पहाए आसखंधव. रगए महया भडचडगरआसवाहणियाए णिज्जायमाणे कलायरस मूसियारदारगस्स गिहस्स अदूरसामंतेणं वीतिवयति, तते णं से तेयलिपुत्ते मूसियारदारगगिहस्स अदूरसामंतणं वीतीवयमाणे २, पोट्टिलं दारियं उप्पि पासायवरगयं आगासतलगंसि कणगतिंदूसएणं कीलमाणी पासति २, पोटिलाए दारियाए रूवे य ३ जाच अज्झोववन्ने कोडंपियपुरिसे सद्दावेतिर, एवं व०-एस णं देवा० !, कस्स दारिया किंनामधेना ?, तते णं कोडुंबियपुरिसे तेयलिपुत्तं एवं वदासी-एस णं सामी !, कलायस्स मूसियारदारयस्स धूता, भहाए अत्तया, पोटिला नामं दारिया स्वेण य जाप सरीरा; तते णं से तेयलिपुत्ते आसवाणियाओ पडिनि- यत्ते समाणे अभितरहाणिज्जे पुरिसे सदावेतिर, एवं व०-गच्छह णे तुम्मे देवाणुप्पिया! कलादस्स मूसियार० धूयं भद्दाए अत्तयं पोट्टिलं दारियं मम भारिपत्ताए वरेह, तते ण ते अभंतरहाणिज्जा पुरिसा तेतलिणा एवं वुत्ता समाणा हद्व० करय. तहत्ति जेणेव कालयस्स मूसि० गिहे तेणेव उवागया, तते णं से कलाए मूमियारदारते पुरिसे एउजमाणे पासतिर, हतुढे आसणाओ अन्भुटेति २, सत्तट्टपदाति अणु- गच्छति २, आसणेणं उवणिमंतेति २, आसत्थे वीसत्थे सुहासणवरगए एवं व०-संदिसंतु णं देवाणु०1, सूत्रम् । १९१ किमागमणपओयण !; तते णं ते अभितरद्वाणिजा पुरिसा कलायमूसिय एवं व०-अम्हे णं देवाणु०!, तव धूयं भद्दाए अत्तयं पोहिलं दारियं तेयलिपुत्तस्स भारियताए बरेमो, तं जति णं जाणसि देवाणु जुत्तं वा पत्तं वा सलाहणिजं वा सरिसो वा संजोगो ता दिवउणं पोट्टिला दारिया तेयलिपुत्तस्स, ता भण देवाणु० , किं दलामो सुझ?, तते गं कलाए मूसियारदारए ते अभितरद्वाणिज्ने पुरिसे एवं वदासी-एस चेव णं दे०, मम सुंके जन्नं तेतलिपुत्ते मम दारियानिमित्तेणं अणुग्गहं करेति, ते ठाणिजे पुरिसे विपुलेणं असण, पुष्फरत्य जाय मल्लालंकारेणं सकारेइ स० २, पडिविसज्जेइ तए णं कलायस्सवि मूसि० गिहाओ पडिनि० २, जेणेव तेयलिपुत्ते अ० तेणेव एवा०, तेयलिपु० एयमझु निवेयंति; तते णं फलादे मूसियवारए अन्नया कयाई सोहणसि तिहिनक्खत्तमुहत्तंसि पोटिलं दारियं पहायं सव्यालंकारभू- सिपं सीयं दुरूहइरत्ता मित्तणाइसंपरिधुढे सातो गिहातो पडिनिक्खमति २, सव्यिड्डीए तेयलीपुरं मज्झं- मशेणं जणेच तेतलिस्स गिहे तेणेय उवा०, पोहिलं दारियं तेतलिपुत्तस्स सयमेव भारियत्ताए दलयति तते णं तेतलिपुत्ते पोहिलं दारियं भारियत्ताए उवणीयं पासतिर, पोहिलाए सद्धिं पट्टयं दुल्हति २, सेतापीतहिं कलसेहिं अप्पाणं मज्जावेति २, अग्गिहोम करेति २, पाणिग्रहणं करेति २, पोहिलाए भारिपाए मित्तणाति जाव परिजण विपुलेणं असणपाणखातिमसातिमेणं पुष्फ जाच पडिपिसजेति; तते पुष्फपत्य जा. अ।
१४-श्री- तेतलि० ज्ञाताध्य श्रीवाता. धर्मपाले प्रवृत्ति- वर्णन- ॥ १९२॥ णं से तेतलिपुत्ते पोहिलाए भारियाए अणुरत्ते अविरत्ते उरालाई जाव विहरति ॥ सूत्रम्-१०२ ॥ तते णं से कणगरहे राया रजे य रहे य पले य वाहणे य कोसे य कोहागारे य अंतउरे य मुच्छिते ४, जाते २, पुत्ते वियंगेति, अप्पेगइयाणं हत्थंगुलियाओ छिंदति, अप्पेगइयाणं हत्थंगुट्ठए छिंदति, एवं पायंगुलियाओ पायं- गुट्टएवि कन्नसक्कुलीएवि नासापुडाई फालेति, अंगमंगाति वियंगेति; तते णं तीसे पउमावतीए देवीए अन्नया पुचरत्ताव० अयमेयारूवे अन्भत्थिए समुप्पनित्था ४-एवं खलु कणगरहे राया रजे य जाय पुत्ते वियंगेति जाव अंगमंगाई वियंगेति, तं जति अहं दारयं पयायामि सेयं खलु ममं तं दारगं कणगरहस्स रहस्सियं चेव सारक्खमाणीए संगोवेमाणीए विहरित्तए, त्तिकट्टु एवं संपेहेति २, तेयलिपुत्तं अमचं सद्दा. वैतिर, एवं व०-एवं खलु देवा ! कणगरहे राया रजे य जाव वियंगेति तं जति णं अहं देवाणु !, दारगं पयायामि; तते णं तुम कणगरहस्स रहस्सियं चेव अणुपुब्वेणं सारक्खमाणे संगोवेमाणे संबड्डेहि, तते णं से दारए उम्मुकपालभावे जोव्वणगमणुप्पत्ते तव य मम य भिक्खाभायणे भविस्सति, तते ण सेतेयलिपुत्ते पउमावतीए एयमह पडिसुणेतिरपडिगए,ततेणं पउमावतीय देवीए पोहिलाय अमचीए सयमेव गभंगेह- तिसयमेव परिवहति, ततेणं सापउमावती नवण्हंमासाणं जाव पियदसणं सुरूवं दारगं पयाया, जं रयणि चणं पउमावती दारयं : पयाया तं रयणिं च णं पोटिलावि अमची नवण्हं मासाणं विणिहायमावनं सत्रम् । ॥ १९२॥ ममभ।
दारियं पयाया, तते णं सा पउमावती देवी अम्मधाइं सद्दावेति २, एवं व०-गच्छह-णं तुमे अम्मो! तेयलिगिहे तेयलिपु० रहस्सिययं चेव सद्दावेह, तते णं सा अम्मधाई तहत्ति पडिसुणेति२, अंतेउरस्स अवदारेणं निग्गच्छति२, जेणेव तेयलिस्स गिहे जेणेव तेयलिपुत्ते तेणेव उवा०२, करयल जाव एवं वदासी-एवं खलु देवा० 1, पउमावती देवी सद्दावेति; तते णं तेयलिपुत्ते अम्मधातीए अंतिए एयमटुं सोचा हट्टर, अम्मघातीए सद्धिं सातो गिहाओ णिग्गच्छति२, अंतेउरस्स अवदारेणं रहस्सियं चेव अणु- पविसतिर, जेणेव पउमावती तेणेव उवाग० करयल० एवं व०-संदिसंतु णं देवाणुप्पिया! जं मए कायव्वं?, तते णं पउमावती तेयलीपुत्तं एवं व०-एवं ग्वलु कणगरहे राया जाव वियंगेति अहं च णं देवा ! दारगं पयाया तं तुम णं देवाणु० , तं दारगं गेण्हाहि जाव तव मम य भिक्खामायणे भविस्सति त्तिकटु तेय. लिपुत्तं दलयति; तते णं तेयलिपुत्ते पउमावतीए हत्थातो दारगं गेण्हति, उत्तरिजेणं पिहेति २, अंतेउरस्स रहस्सियं अवदारेणं निग्गच्छतिर, जेणेव सए गिहे जेणेव पोहिला भारिया तेणेव उवा० २, पोहिलं एवं व०-एवं खलु देवाणु०, कणगरहे राया रजे य जाव वियंगेति अयं च दारए कणगरहस्स पुत्ते पउमा- वईए अत्तए तेणं तुमं देवा०, इमं दारगं कणगरहस्स रहस्सियं चेच अणुपुव्वेणं सारक्खाहि य, संगोवेहि य, संवड्डेहि य तते णं एस दारए उम्मुक्कबालभावे तव य मम य पउमावतीए य आहारे भविस्सति त्तिक? पोटिलाए पासे णिक्खिवति पोहिलाओ पासाओ तं विणिहायमावन्नियं दारियं गेण्हति २, उत्तरि- नवागी- १०५० श्रीज्ञाता- धर्मकथाने १४-श्री- तेतलि. ज्ञाताध्य. पद्मावती- चर्या वर्णन- ज्जेणं पिहेतिर, अंतेउरस्स अवद्दारेणं अणुपविसति २, जेणेव पउमावती देवी तेणेव उवा०२, पउमावतीए देवीए पासे ठावेतिर, जाव पडिनिग्गते । तते णं तीसे पउमावतीए अंगपडियारियाओ पउमावई देविं विणिहायमावन्नियं च दारियं पयायं पासंति २ त्ता, जेणेव कणगरहे राया तेणेव० २त्ता करयल०, एवं व०-एवं ग्वलु सामी, पउमावती देवी मइल्लियं दारियं पयाया, तते णं कणगरहे राया तीसे मइल्लियाए दारियाए नीहरणं करेति बहुणि लोइयाई मयकिचाई० कालेणं विगयसोए जाते; तते णं से तेतलिपुत्ते कल्ले कोडेवियपुरिसे सद्दावेति २ एवं व०-खिप्पामेव चारगसो० जाच ठितिपडियं जम्हा णं अम्हं एस दारए कणगरहस्स रज्जे जाए तं होउ णं दारए नामेणं कणगज्झए जाव भोगसमत्थे जाते ॥ सूत्रम्-१०३ ॥ तते णं सा पोटिला अन्नया कयाई तेतलिपुत्तस्स अणिहा ५, जाया यावि होत्था णेच्छइ य तेयलिपुत्ते पोटिलाए नामगोत्तमवि सवणयाए, किं पुण दरिसणं वा परिभोगं वा ?, तते णं तीसे पोहिलाए अन्नया कयाई पुव्वरत्त इमेयारूवे ५ जाव समुप्पजित्या-एवं खलु अहं तेतलिस्स पुचि इट्ठा ५, आसि इयाणि अणिहा ५ जाया, नेच्छइ य तेयलिपुत्ते मम नाम जाव परिभोग वा ओहयमणसंकप्पा जाव झियायति तए णं तेतलिपुत्ते पोहिलं ओयमणसंकप्पं जाव झियायमाणं पासति २, एवं व-मा णं तुमं दे०, ओह- यमणसं० तुम णं मम महाणसंसि विपुलं असण ४, उवक्खडावेहि २, यहूर्ण समणमाहण जाव वणीम- गाणं देयमाणी य दवावमाणी य विहराहि, तते णं सा पोटिला तेयलिपुत्तेणं एवं वुत्ता समाणा हट्ट सूत्रम् । ॥ १९३ ॥E तेयलिपुत्तस्स एयमढे पडिसुणेतिर, कल्लाकल्लं महाणसंसि विपुलं असण४, जाव दवावेमाणी विहरति । सूत्रम्-१०४॥ तेणं कालेणं२, सुब्बयाओ नाम अजाओ ईरियासमिताओ जाव गुत्तभयारिणीओ यहु- स्सुयाओ बहुपरिवाराओ पुवाणुपुब्बि जेणामेव तेयलिपुरे नयरे तेणेव उवा० २, अहापडिरूवं उग्गह उग्गिण्हंतिर, संजमेण तवसा अप्पाणं भावेमाणीओ विहरंति; तते णं तासिं सुब्बयाणं अजाणं एगे संघाडए पढमाए पोरसीए सज्झायं करेति जाव अडमाणीओ तेतलिस्स गिहं अणुपविठ्ठाओ, तते णं सा पोटिला ताओ अजाओ एनमाणीओ पासतिर हह आसणाओ अमुढेतिर, वंदति नमसतिर, विपुलं असण४, पडिलाभेतिर, एवं व०-एवं खलु अहं अजाओ, तेयलिपुत्तस्स पुब्धि इट्टा ५, आसी इयाणि अणिद्वा५, जाव दंसणं वा परिभोग वा तं तुन्भे गं अजातो सिक्खियाओ बहुनायाओ यहुपढियाओ पहणि गामागर जाव आहिंडह पहणं राईसर जाव गिहातिं अणुपविसह तं अत्थि याई मे अजाओ!, केइ कहंचि चुन्नजोए वा, मंतजोगे वा, कम्मणजोए वा, हियउड्डावणे वा, काउड्डावणे वा, आभिओगिए वा, वसीकरणे वा, कोउयकम्मे वा, भूइ०, मूले, कंदे, छल्ली, वल्ली, सिलिया था, गुलिया वा, ओसहे वा, भेसज्जे वा, उयलद्धपुष्वे जेणाहं तेयलिपुत्तस्स पुणरवि इट्ठा ५ भवेजामि, तते णं ताओ अजाओ पोहि लाए एवं वुत्ताओ समाणीओ दोवि कन्ने ठाईति २, पोटिलं एवं वदासी-अम्हे गं देवा० ! समणीओ १ गिति अ।
नवरात्री- १०१० भीडावा. पकपात १४-भी- तेतलि० ज्ञाताध्य० पोट्टिला. चर्या- वर्णन- ॥१९४॥ निग्गंधीओ जाव गुत्तयंभचारिणीओ नो खलु कप्पइ अम्हं एयप्पयारं कन्नेहिवि णिसामेत्तए, किमंग पुण उवदिसित्तए वा आयरित्तए? वा ?, अम्हे णं तव देवा० ! विचित्तं केवलिपन्नत्तं धर्म पडिकहिजामो; तते णं सा पोहिला ताओ अजाओ एवं व०-इच्छामि णं अजाओ !, तुम्हें अंतिए केवलिपन्नत्तं धम्म निसामित्तए तते णं ताओ अजाओ पोहिलाए विचित्तं धम्म परिकहेंति, तते णं सा पोटिला धम्म सोचा निसम्म हव०, एवं व० सद्दहामि णं अजाओ।, निग्गंधं पावयणं जाव से जहेयं तुन्भे वयह, इच्छामि गं अहं तुम्भं अंतिए पंचाणुव्वयाई जाव धम्म पडिवज्जित्तए, अहासुही तए णं सा पोट्टिला तासिं अजाणं अंतिए पंचाणुव्वइयं जाव धम्म पडिवजह, ताओ अजाओ वंदति, नमंसतिर, पडिवि- सन्जेति; तए णं सा पोहिला समणोवासिया जाया जाव पडिलामेमाणी विहरइ ॥ सूत्रम्-१०५॥ सर्व मुगम, नवरं 'कलाए चि-कलादो नाम्ना मूपिकारदारक इति पितृव्यपदेशेनेति 'अम्भितरठाणिजे'त्ति-आभ्य- न्तरानाप्तानित्यर्थः, 'वियंगेइ'त्ति-व्यङ्गयति विगतकर्णनाशाहस्ताद्यगान् करोतीत्यर्थः, 'विइंतेति'त्ति-विकृतन्तति छिन- तीत्यर्थः। 'मरग्यमाणीय'त्ति-संरक्षन्त्याः आपदः सजोपयन्त्याः प्रच्छादनतः, 'भिक्खाभायणे'त्ति-भिक्षामाजनमिव मिक्षामावनं तदसाकं मिक्षोरिव निर्वाहकारणमित्यर्थः, 'पढमाए पोरुसीए सज्झायमित्यादौ यावत्करणादिदं द्रष्टव्यं- 'वीयाए पोरिसीए साणं झियायइ, तईयाए पोरिसीए अतुरियमचवलमसंभंते मुहपोत्तियं पडिलेहेइ, मायणवत्थाणि पडिलेहेइ, मायणाणि पमह, मायणाणि उग्गाहेइ२, जेणेव सुव्याओ अजाओ तेणेव उवागच्छन्ति२, सुवयाओ अजाओ वंदन्ति, नम- सूत्रम् ।
सन्तिर, एवं क्यासी इच्छामो ण तुम्मेहि अन्मणुनाए तेयलिपुरे नयरे उच्चनीयमज्झिमाई कुलाई घरसमुयाणस्स मिक्खाय- रियाए अडिचए, अहासुई देवाणुप्पिया , मा पडिवंध, तए णं ताओ अजयाओ सुवयाहिं अजाहिं अभणुण्णायाओ समा. णीओ सुबयाणं अआण अंतियाओ पडिस्मयाओ पडिनिक्समिति अतुरियमचालमसंभंताए गतीए जुगंतरपलोयणाए दिट्ठीए पुरो रियं सोहेमाणीओ तेयलिपुरे नयरे उचनीयमझिमाई कुलाई घरसमुयाणस्स भिक्खायरिय अडमाणीउत्रिं गृहेषु समुदान-भिक्षा गृहममुदानं तस्मै गृहसमुदानाय भिक्षाचर्या-भिक्षानिमित्तं विचरणं अटन्त्यः-कुर्वाणाः, 'अत्थि याई मत्ति आइति-देशमापायां मेति-मरतीनां, 'चुपणजोए'त्ति-द्रव्यचूर्णानां योगः स्तम्मनादिकर्मकारी, 'कम्मणजोएत्ति-कुष्ठा- दिरोगहेतुः, 'कम्माजोति-काम्ययोगः-कमनीयताहेतुः, 'हियउड्डावणे'चि-हृदयोडापनं चित्ताकर्षणहेतुः, 'काउड्डा. यणे'त्ति-कार्याकर्षणहेतु', 'आमिओगिए'ति-परामिमानहेतुः, 'वसीकरणे'त्ति-वश्यताहेतुः, 'कोउयकम्मे'त्ति-सौभाग्य- निमिचं स्वपनादि, 'भूइफम्मेति मन्त्राभिसंस्कृतभूतिदानं ॥ १०५ ॥ तते णं तीसे पोटिलाए अन्नया कयाइ पुष्वरत्तावरत्तकालस० कुडुंघजागरियं० अयमेयारूवे अन्भ- त्थिते. एवं गल अहं तेतलि० पुब्धि इसाप, आसि इयाणिं अणिहा५ जाव परिभोग वा तं सेयं खलु मम सुब्बयाणं अजाणं अंतिए पव्यतित्तए, एवं संपेहेतिर कलं पाउ० जेणेव तेतलिपुत्ते तेणेव उवा०२ करयलपरि० एवं य०-एवं खलु देवाणुप्पिया, मए सुव्वयाणं अजाणं अंतिए धम्मे णिसंते जाव अन्भ- , fhp. अ) नवाजी. १०पू० भीज्ञाता- धर्मकथाओं १४-श्री- तेवलि० ज्ञाताध्य. पोटिला- दीक्षादि वर्णन- गुन्नाया पव्यइत्तए, तते णं तेयलिपुत्ते पोटिलं एवं व०-खलु तुमं देवाणुप्पिए ! मुंडा पव्वइया समाणी कालमासे कालं किच्चा अन्नतरेसु देवलोएसु देवत्ताए उववजिहिसि, तं जति णं तुम देवा०, ममं ताओ देवलोयाओ आगम्म केवलिपन्नत्ते धम्मे वोहिहि तोऽहं विसजेमि, अह णं तुम ममं ण संबोहेसि तो ते ण विसग्नेमिः तते णं सा पोहिला तेयलिपुत्तस्स एयमढे पडिसुणेति, तते णं तेयलिपुत्ते विपुलं असण४, उयकावडावेतिर, मित्तणातिजावआमंतेइ२ जाव सम्माणेइ२ पोटिलं पहायं जाव पुरिससहस्सवाहणीयं सि दुरूहित्ता मित्तणाति जाव परिबुडे सविड्दिए जाव रवेणं तेतलीपुत्तस्स मज्झमज्झेणं जेणेव सुव्व- याणं उवस्सए तेणेव उवा० सीयाओ पचोरहति २ पोट्टिलं पुरतो कट्टु जेणेव सुव्वया अजा तेणेव उवा. गच्छति२, चंदति-नमंसतिर, एवं व०-एवं ग्वल देवा०, मम पोट्टिला भारिया इट्टा ५ एस णं संसार- भउब्विग्गा जाव पव्यतित्तए पडिच्छंतु णं देवा० ! सिस्सिणिभिक्खं दलयामि, अहासुहं मा० प०, तते णं सा पोट्टिला सुव्वयाहिं अजाहिं एवं वुत्ता समाणा हट्ट उत्तरपुर० सयमेव आभरणमल्लालंकारं ओमु. यति२ सयमेव पंचमुट्टियं लोयं करेइ२, जेणेव सुव्वयाओ अजाओ तेणेव उवागच्छइ२, वंदति-नमंसतिर, एवं व०-आलित्ते णं भंते !, लोए एवं जहा देवाणंदा जाव एकारस अंगाई बहणि वासाणि सामनपरि- यागं पाउणइ२, मासियाए संलेहणाए अत्ताणं झोसेत्ता सहि भत्ताई अण. आलोइयपडि० समाहिं पत्ता 1 मुंडे भवित्ता प० । सूत्रम्।
कालमासे कालं किचा अन्नतरेसु देवलोएसु देवदत्ताए उववन्ना ॥ सूत्रम्-१०६॥ तते णं से कणगरहे रायो अन्नया कयाई कालधम्मुणा संजुत्ते यावि होत्था, तते णं राईसर जाव णीहरणं करेंति २ अन्नमन्नं एवं व०-एवं खलु देवाणु०! कणगरहे राया रजे य जाव पुत्ते वियंगित्था, अम्हे णं देवा० ! रायाहीणा राया- हिट्ठिया रायाहीणकजा अयं च णं तेतली अमचे कणगरहस्स रन्नो सव्वट्ठाणेसु सव्वभूमियासु लद्धपच्चए दिनवियारे सव्वकजवदावए यावि होत्या, तं सेयं खलु अम्हं तेतलिपुत्तं अमचं कुमारं जातित्तए त्तिक? अन्नमन्नस्स एयमद्वं पडिसुणेतिर, जेणेव तेयलिपुत्ते अमचे तेणेव उवा०२, तेयलिपुत्तं एवं व०-एवं खल देवाणु०, कणगरहे राया रज्जे य रहे य जाव वियंगेइ, अम्हे य णं देवाणु० ! रायाहीणा जाव रायाहीण- कज्जा, तुमं च णं देवा० ! कणगरहस्स रन्नो सचट्टाणेसु जाव रनधुराचिंतए, तं जइ णं देवाणु० ! अत्थि केह कुमारे रायलक्खणसंपन्ने अभिसेयारिहे तणं तुमं अम्हं दलाहि, जा गं अम्हे महयार रायाभिसे- एणं अभिसिंचामो, तए णं तेतलिपुत्ते तेसिं ईसर० एतमहं पडिसुणेति२, कणगज्झयं कुमारं पहायं जाव सस्सिरीयं करेइ २ त्ता, तेसिं ईसर जाव उवणेति२, एवं ०-एस णं देवा० !, कणगरहस्स रन्नो पुत्ते पउमावतीए देवीए अत्तए कणगज्झए नाम कुमारे अभिसेयारिहे रायलक्खणसंपन्ने मए कणगरहस्स रन्नो रहसिययं संयटिए, एयं णं तुम्भे महया २ रायाभिसेएणं अभिसिंचह, सव्वं च तेसिं उट्ठाणपरियावणियं परिकहेइ । तते णं ते ईसर० कणगज्झयं कुमारं महया २ अभिसिंचंति । तते णं से कणगज्झए कुमारे
नवाङ्गी-
१००
भीमाता-
धर्मकथाने
राया जाए महया हिमवंतमलय० वण्णओ जाव रज्जं पसासेमाणे विहरइ । तते णं सा पउमावती देवी
कणगज्झयं रायं सद्दावेति २ एवं व०-एस णं पुत्ता! तव० रज्जे जाव अंतेउरे य. तुमं च तेतलिपुत्तस्स
पहावेणं, तं तुमं णं तेतलिपुत्तं अमचं आढाहि, परिजाणाहि, सकारेहि, सम्माणेहि इंतं अन्भुट्टेहि
ठियं पज्जुवासाहि वचंतं पडिसंसाहेहि अद्धासणेणं उवणिमंतेहि भोगं च से अणुवड्डेहि, तते णं से कण-
गज्झए पउमावतीए तहत्ति पडि जाव भोगं च से वद्वेति ।। सूत्रम्-१०७ ॥
'रायाहीणा' इत्यादि, राजाधीनाः राज्ञो दूरेऽपि वर्तमाना राजवशवर्तिन इत्यर्थः, राजाधिष्ठितास्तेन स्वयमध्यासिताः,
राजाधीनानि-राजायत्तानि कार्याणि येषां ते वयं राजाधीनकार्याः, 'सव्वं च से उठाणपरियावणियंति-मवं च से-
तस्य उत्थानं च-उत्पत्ति परियापनिका च-कालान्तरं यावत् स्थितिरित्युत्थानपरियापनिकं तत्परिकथयतीति, 'वयंतं
पडिसंसाहेहित्ति विनयप्रस्तापात् वजन्तं प्रतिसंमाधय-अनुव्रज, अथवा वदन्तं प्रति संश्लाघय-साधूक्तं सावित्येवं
प्रशंसां कुर्वित्यर्थः, भोग-वर्तनं ॥ १०७॥
तते णं से पोहिले देवे तेतलिपुत्तं अभिक्खणं२, केवलिपन्नत्ते धम्मे संबोहेति, नो चेव णं से तेतलि.
पुत्ते संबुज्झति, तते णं तस्स पोहिलदेवस्स इमेयारूवे अब्भत्थिते५, एवं खलु कणगज्झए राया तेयलि.
| पुतं आदाति जाव भोगं च संवड्डेति, तते णं से तेतली अभिक्खण२, संयोहित्रमाणेवि धम्मे नो संबु-
ज्झति, तं सेयं खलु कणगज्झयं तेतलिपुत्तातो विप्परिणामेत्तए त्तिकटु एवं संपेहेतिरत्ता, कणगज्झयं तेत.
१४-श्री.
तेतलि०
ज्ञाताध्य
पोट्टिल-
देवसम्ब-
न्धिवर्णन-
सूत्रम्।
॥१९६ ॥
लिपुत्तातो विप्परिणामेइ । तते ण तेतलिपुत्ते कल्लं पहातेजाव पायच्छित्ते आसखंधवरगए बहहिं पुरिसे हिं संपरिखुढे सातो गिहातो निग्गच्छतिर, जेणेव कणगज्झए राया तेणेव पहारेत्थ गमणाए, तते ण तेतलि. पुत्तं अमचं जे जहा बहवे राईसरतलवर जाव पभियओ पासंति ते तहेव आढायंति, परिजाणंति, अन् द्वेतिर, अंजलिपरिग्गहं करेंति, इट्टाहिं कंताहिं जाव वग्गूहि आलवेमाणा य, संलवेमाणा य, पुरतो य, पिट्टतो य, पासतो य, मग्गतो य, समणुगच्छंति, तते णं से तेतलिपुत्ते जेणेव कणगज्झए तेणेव उवा- गच्छति, तते ण कणगज्झए तेतलिपुत्तं एजमाणं पासतिर, नो आढाति, नो परियाणाति, नो अन्भुटेति; अणाढायमाणे ३, परम्मुहे संचिट्ठति; तते णं तेतलिपुत्ते कणगज्झयस्स रन्नो अंजलिं करेइ, तते णं से कणगज्झए राया अणादायमाणे, तुसिणीए, परम्मुहे संचिट्ठति; तते णं तेतलिपुत्ते कणगज्झयं विप्परिणयं जाणित्ता भीते जाव संजातभए, एवं व०-रुटे णं ममं कणगज्झए राया हीणे णं मम कणगज्झए राया ण कणगज्झए, तं ण नजइ णं मम केणइ कुमारेण मारेहिति त्तिक? भीते तत्थे य जाव सणियं २, पचोसकोतिर, तमेव आसखधं दुरूहेतिर, तेतलिपुरं मज्झमझेणं जेणेव सए गिहे तेणेव पहारेत्थ गमणाए; तते णं तेयलिपुत्तं जे जहा ईसर जाव पासंति ते तहा नो आढायंति, नो परियाणंति, नो अन्मुटुंति, नो अंजलि०, इटाहिं जाव णो संलवंति नो पुरओ य, पिट्टओ य, पासओ य, (मग्गतो य), समणुगच्छति तते ण तेतलिपुत्ते जेणेव सए गिहे तेणेव उवागच्छति, जावि य से तत्थ बाहिरिया परिसा अवज्झाए नवागी १०० भीज्ञाता. धर्मकथाङ्गे १४-श्री- तेतलि० ज्ञाताध्य० अपमानित- तेतलि. वर्णन- ॥ १९७॥ भवात, त०-दासति वा, पेसेति वा, भाइल्लएति वा, सावि य णं नो आढाइ २, जाविय से अभितरिया परिसा भवति, तंजहा-पियाइ वा, माताति वा, जाव सुण्हाति वा, साविय णं वा नो आढाइ३, तते णं से तेतलिपुत्ते जेणेव वासघरे जेणेव सए सयणिज्जे तेणेव उवागच्छति२, सयणिज्जंसि णिसीयतिर, व०-एवं खलु अहं सयातो गिहातो निग्गच्छामि, तं चेव जाव अभितरिया परिसा नो आढाति, परियाणाति, नो अन्मुढेति, तं सेयं खलु मम अप्पाणं जीवियातो ववरोवित्तए त्तिकटु एवं संपेहेतिर, तालउडं विसं आसगंसि पक्खिवति, से य विसे णो संकमनि; तते णं से तेतलिपुत्ते नीलुप्पल जाव असिं खंधे ओहरति,तत्थवि य से धारा ओपल्ला; तते णं से तेतलिपुत्ते जेणेव असोगवणिया तेणेव उवागच्छतिर, पासगं गीवाए बंधतिर, रुकग्वं दुरूहतिर, पासं रुक्खे बंधतिर, अप्पाणं मुयति, तत्थवि य से रज्जू छिन्ना; तते णं से तेतलिपुत्ते महतिमहालय सिलं गीवाए यंधति२, अत्याहमतारमपोरिसियंसि उदगंसि अप्पाणं मुयति, तत्थवि य से अगणिकाए विज्झाए। तते णं से तेतली एवं व०-सद्धेयं खलु, मो समणा वयंति सद्धेयं खल, भो माहणा वयंति सद्धेयं खल, भो समणा माहणा वयंति; अहं एगो असद्धेयं वयामि, एवं खलु अहं सह पुत्तेहिं अपुत्ते को मेदं सद्दहिस्सति ?, सह मित्तेहिं अमित्ते को मेदं सहहिस्सति , एवं अत्थेणं दारेणं दासेहिं परिजणेणं, एवं खलु तेयलिपुत्ते णं अ० कणगज्झएणं रन्ना अवज्झाएणं समाणेणं तेयलि- पुत्ते तालपुडगे विसे आसगसि पक्खित्ते सेविय णो कमति को मेयं सहहिस्सति , तेतलिपुत्ते नीलुप्पल सूत्रम् । ॥ १९७।।
जाय खधंसि ओहरिए तत्थविय से धारा ओपल्ला को मेदं सदहिस्सति?, तेतलिपुत्तत्स पासगं गीवाए बंधेत्ता जाय रज्जू छिन्ना को मेदं सद्दहिस्सति ?, तेतलिपुत्ते महासिलयं जाव पंधित्ता अत्थाह जाव उदगंसि अप्पा मुके तत्वविय णं थाहे जाए को मेयं सदहिस्सति , तेतलिपुत्ते सुकंसि तणकूडे, अग्गी विज्झाए, को मेदं सद्दहिस्सति !, ओहतमणसंकप्पे जाव झियाइ । तते णं से पोहिले देवे पोहिलारूवं विउव्वतिर, तेतलिपुत्तस्स अदूरसामते ठिचा एवं व०-ई भो। तेतलिपुत्ता , पुरतो पवाए, पिडओ हत्यिभयं दुहओ अचक्खुफासे मज्झे सराणि परिसयंति, गामे पलित्ते, रन्ने झियाति, रन्ने पलित्ते गामे झियाति; आउसो!, तेतलिपुत्ता!, फओ वयामो?, तते णं से तेतलिपुत्ते पोहिलं एवं वयासी-भीयस्स खलु भो!, पव्वजा सरणं, उडियस्स सहेसगमण, छुहियस्स अन्नं, तिसियस्स पाणं, आउरस्स भेसनं माइयस्स रहस्सं, अभिजुत्तस्स पचयकरणं, अद्धाणपरिसंतस्स वाहणगमण, तरिउकामस्स पवर्ण; किचं परं अभिओजि- तुकामस्स सहायकिचं खंतस्स दंतस्स जितिंदियस्स एत्तो एगमवि ण भवति, तते णं से पोट्टिले देवे तेयलिपुत्तं अमचं एवं व०-सुटु णं तुमं तेतलिपुत्ता ! एयमझु आयाणिहि त्तिकह दोचंपि एवं वयइ२, जामेव दिसं पाउन्भूए तामेव दिसि पडिगए ॥ सूत्रम्-१०८ ॥ तते णं तस्स तेयलिपुत्तस्स सुभेणं परिणामेणं जाइसरणे समुप्पन्ने, तते णं तस्स तेयलिपुत्तस्स अयमेयारूवे अन्भत्थिते ५, समु०-एवं खलु अहं इहेव जंबुद्दीवेर, महाविदेहे घासे पोक्खलावतीविजये पोंडरीगिणीते रायहाणीए महापउमे नामं राया होत्था;
नवाणी. १०५० भीज्ञाता. धर्मकथाओं तते णं अहं थेराणं अंतिए मुंडे भवित्ता जाव चोइस पुब्वाति, बहणि वासाणि सामन्नपरियाए०, मासि- याए०, संलेहणाए, महासुफे कप्पे देवे; तते णं अहं ताओ देवलोयाओ आउक्खएणं इहेव तेयलिपुरे तेय. लिस्स अमचस्स भदाए भारियाए दारगत्ताए पचायाते; त सेयं खलु मम पुवदिवाइं महव्वयाई सयमेव उवसंपज्जित्ताणं विहरित्तए, एवं संपेहेतिर सयमेव महव्वयाई आमहेतिर, जेणेव पमयवणे उज्जाणे तेणेव उया०२, असोगवरपायवरस अहे पुढविसिलापट्टयंसि सुहनिसन्नस्स अणुचिंतेमाणस्स पुब्वाहीयातिं सामाझ्यमातियाई चोद्दसपुवाई सयमेव अभिसमन्नागयाई, तते णं तस्स तेयलिपुत्तस्स अणगारस्स सुमेणं परिणामेणं जाव तयावरणिजाणं कम्माणं खओषसमेणं कम्मरयविकरणकरं अपुवकरणं पविट्ठस्स केवलवरणाणदंसणे समुप्पन्ने ।। सूत्रम्-१०९॥ तए णं तेतलिपुरे नगरे अहासन्निहिएहिं वाणमंतरेदि देवेहिं देवीहि य देवदुंदुभीओ समाहयाओ दसद्धवन्ने कुसुमे निवाइए, दिव्वे गीयगंधव्वनिनाए कए यावि होत्या, तते णं से कणगज्झए राया इमीसे कहाए लढे, एवं व०-एवं खलु तेतलि मए अवज्झाते मुंडे भवित्ता पब्वतिते तं गच्छामि गं तेयलिपुत्तं अणगारं वदामि-नमसामि २, एयमझु विणएणं भुजो२, खामेमि; एवं संपेहेति२, पहाए चाउरंगिणीए सेणाए जेणेव पमयवणे उजाणे जेणेव तेतलिपुत्ते अणगारे तेणेव उवागच्छति२, तेतलिपुत्तं अणगारं वंदति-नमंसतिर, एयमटुं च विणएणं भुनोर खामेइ नचासन्ने जाव पज्जुवासह; तते णं से तेयलिपुत्ते अणगारे कणगज्झयस्स रन्नो तीसे य महइ. धम्म परिकहेइ, १४-श्री. तेतलि. ज्ञाताध्य प्राप्तजाति- स्मरण तेतलि० सूत्रम् । ॥ १९८॥ ॥ १९८ तते णं से कणगज्झए राया तेतलिपुत्तस्स केवलिस्स अंतिए धम्म सोचा णिसम्म पंचाणुव्वइयं सत्तसिक्खा वइयं सावगधम्म पडिवाइ२, समणोवासए जाते जाव अहिंगयजीवाजीवे । तते णं तेतलिपुत्ते केवली यहणि वासाणि केवलिपरियागं पोउणित्ता जांच सिद्वे । एवं ग्वेलु जंवू ! भगवया संमणेणं महावीरेणं चोदसमस्स नायज्झयणस्स अयमढे पन्नत्ते, तिमि ॥ सूत्रम्-११० ।। चउदसमं अज्झयणं समत्तं ॥ १४ ॥ 'रुट्टे ण मित्यादौ, हीनोऽयं ममें प्रीत्येति गम्यते, अपध्यातो-दुष्टचिन्तावान् ममेति-ममोपरि कनकध्वजः, पाठान्तरेण दुातोऽहं-दुष्टचिन्ताविषयीकृतोऽह कनकध्वजेन राज्ञा, तत्-तस्मान्न ज्ञायते केनापि कुमारेण-विरूपमारणप्रकारेण मारयिष्य तीति 'खधंसि उवहरई' इति स्कन्धे उपहरति विनाशयतीति, 'धारा ओपल्लत्ति-अपदीर्णा कुण्ठीभूतेत्यर्थः, 'अस्थाह'ति- अस्त-निरस्तमविद्यमानमधस्तलं प्रतिष्ठानं यस्य तदस्ताचं स्ताघो वा-प्रतिष्ठानं तदभावादस्ताघ, अतार यस्य तरण नास्ति पुरुषः परिमाणं यस्य तत्पौरुषेयं तनिषेधादपौरुषेयं ततः पदत्रयस्य कर्मधारयो, मकारौ च प्राकृतत्वात् । अतस्तत्र, 'सद्धेय'मित्यादि, श्रद्धेयं श्रमणा वदन्ति आत्मपरलोकपुण्यपापादिकमर्थजात; अतीन्द्रियस्यापि तस्य प्रमाणावाधितत्वेन श्रद्धानगोचरत्वात् , अहं पुनरेकोऽश्रद्धेयं वदामि पुनादिपरिवारयुक्तस्यात्यर्थ राजसम्मतस्य च अपुत्रादित्वमराजमम्मतत्वं च पिपखजपाशकजलाग्निभिरहिस्पलं चात्मनः प्रतिपादयतो मम युक्तिवाधितत्वेन जनप्रतीतेरविषयत्वेनाश्रद्धेयत्वादिति प्रस्तुतयत्रभावना, 'तए ण'मित्यादि, हं मो, इत्यामन्त्रणे, पुरवा-अग्रता, प्रपातो-गः पृष्ठतो हस्तिमय, 'दुहओ'त्ति- उभयतः अचक्षुःस्पर्शी अन्धकार मध्ये-मध्यभागे यत्र वयमास्महे तंत्र शरा-वाणां निपतन्ति, ततश्च सर्वतो भयं वर्तते इत्यर्थः, नवाङ्गी भीमाता- धर्म कथाओं तया ग्रामः प्रदीप्तोऽमिना ज्वलति, अरण्यं तु ध्मायतेऽनुपशान्तदाई वर्तते अथवा-ध्यायंतीव-ध्यायति, अग्नेरविध्यानेन जागी- वेत्यर्थः; अथवा-अरण्यं प्रदीप्तं ग्रामो मायते न विध्यायति, एवं सर्वस्यापि भयानकत्वात् स्थानान्तरस्य चाभावादायुष्मं- स्तेतलिपुत्र !, 'कउत्ति-क बजामा १, भीतर्गन्तव्यमस्माभिरिवान्येनापि भवतीति प्रश्ना, उत्तरं च भीतस्य प्रव्रज्या शरणं भवतीति गम्यते, यथोत्कण्ठितादीनां स्वदेशगमनादीनि, तत्र 'छुहियस्स'त्ति-चुभुक्षितस्य मायिनो-वंचकस्य रहस्य-गुप्तत्वं शरणमिति मर्वत्र गमनीय, अभियुक्तस्य-सम्पादितपणस्प प्रत्ययकरणं-दूपणापोहेन प्रतीत्युत्पादन अध्यानं अरियतो (अध्व- 'परिश्रान्तस्य)-गन्तुमशक्तस्य वाहनगमनं-शकटाचारोहणं तरीतुकामस्य नद्यादिकं प्लवनं-तरणं कृत्यं-कार्य यस्य तत् प्लव- नकृत्यं-तरकाण्डं परममियोक्तकामस्य-अभिमवितुकामस्य सहायकृत्यं-मित्रादिकृतं सहायकम्र्मेति, अथ कथं भीतस्य प्रव्रज्या शरणं भवति, अत उच्यते-रवते'त्यादि, क्षान्तस्य क्रोधनिग्रहेण, दान्तस्येन्द्रियनोइन्द्रियदमेन, जितेन्द्रियस्य विपयेपुरागादि- निरोद्धः, 'एत्तो'ति-एतेभ्योऽनन्तरोदितेभ्योऽग्रतः प्रपातादिभ्यो भयेभ्यः एकमपि भयं न भवति, प्रबजितस्य सामायिकपरि- णत्या शरीरादिपु निरमिध्वगत्वात् मरणादिमयाभावादिति, एवं देवेनामात्यः स्ववाचा भीतस्य प्रवज्या श्रेयसीत्यभ्युपगमं कार- यित्वा एवमुक्तः, 'सुटु'इत्यादि, अयमों-मीतस्य प्रवज्या शरणमिति, यदि प्रतिज्ञायते तदा सुन्छु ते मतं, भयाभिभूतस्त्वमि- दानीमसीति एतमर्थमाजानीहि अनुष्ठानद्वारेणावयुध्यस्त्र प्रव्रज्यां विधेहीतियावत् । इह च यद्यपि सूत्रे उपनयो नोक्तः तथा- प्येवं द्रष्टव्या,-जाव न दुक्खं पत्ता माणन्मसं च पाणिणो पायं । ताव न धम्मं गेहंति भावओ तेयलीसुउछ ॥१॥ समाप्तमिदं चतुर्दशज्ञाताध्ययनविवरणम् ॥१४॥ मा.प्रणिनः प्रायेण तायन धर्म गृहन्ति भावतः, यावद्दु ख न प्राप्ता मानभ्रंशं च तेतलिमुतवत् ॥ १॥ १४-श्री- तेतलि. ज्ञाताध्य तेतलि- पुत्रस्य विचारणा स्वरूपम् ॥१९९॥ ॥ १९९ ॥ १५-श्रीनन्दीफलाख्यं ज्ञाताध्ययनम् ॥ अधुना पञ्चदर्श विनियते, अस्य चैत्र पूर्वेण मह सम्बन्धः-पूर्वस्मिन्नपमानाद्विपयत्यागः प्रतिपादितः, इह तु जिनोपदे- शात्, नत्र च मत्यर्थप्राप्तिस्तदमापे वनप्राप्तिरभिधीयत इत्येवंसम्पद्धमिदम्- जति णं भंते !, चोदसमस्स नायज्झयणस्स अयम? पण्णत्ते, पन्नरसमस के अढे पन्नत्ते, एवं खलु जवु!, तेणं कालेणंर, चंपा नाम नयरी होत्था, पुन्नभद्दे चेहए, जियसत्तू राया; तत्थ णं चंपाए नयरीए धणे णामं सत्यवाहे होत्या, अड्डे जाव अपरिभूए; तीसे णं चंपाए नयरीए उत्तरपुच्छिमे दिसिभाए अहि- छत्ता नाम नपरी होत्या, रिद्धधिमियसमिद्धा वन्नओ; तत्थ णं अहिच्छत्ताए नयरीए कणगकेउ नाम राया होत्या, मया चन्नओ, तस्स धण्णस्स सत्यवाहस्स अन्नदा कदाई पुव्वरत्तावरत्तकालसमयंसि इमे. याख्ये अभित्थिते चिंतिए पत्धिए मणोगए संकप्पे समुप्पजित्था-सेयं खलु मम विपुलं पणियभंडमा. याए अहिच्छत्तं नगरं वाणिजाए गमित्तए, एवं संपेहेतिर, गणिमं च ४ चउविहं भंडं गेण्हइ२, सगडी- सागडं सजेइ२, सगडीसागडं भरेतिर, कोइंयियपुरिसे सदावेतिर, एवं व०-गच्छह णं तुम्भे देवा ! पाए नगरीण सिंघाडग जाय पहेसं एवं ग्वल देवाणु० ! धपणे सत्यवाहे विपुले पणिय० इच्छति, अहि- छत्तं नगरं पाणिजाए गमित्तते, ते जो णं देवाणु०, चरए वा चीरिए वा, चम्मखंडिए वा, भिच्छुडे वा पंडरगे या, गोतमे वा, गोवतीते चा, गिहिधम्मे था, गिहिधम्मचिंतए वा, अविरुद्धविरुद्ववुडसावगरत्तपड- AARI RECRURE नवानी १०पू० भीमाता धर्मकपाझे निग्गंथप्पभितिपासंडत्थे चा, गिहत्थे वा, तस्स णं धण्णेणं सदि अहिच्छत्तं नगरि गच्छइ तस्स णं घण्णे अच्छत्तगस्स छत्तगं दलाइ अणुवाहणस्स उवाहणाउ दलयई, अकुंडियस्स कुंडियं दलयई, अपत्थय. -रस पत्थयणं दलयइ, अपक्खेवगस्स पक्खे दलयइ, अंतराऽविय से पडियस्स वा भैग्गलग्गसा. हेज दलयति, सुहंसुहेण य णं अहिच्छत्तं संपावेति त्तिक8 दोचंपि तचंपि घोसेहरे, मम एंयमाणत्तियं पचप्पिणही तते ण ते कोथुपियपुरिसा जाव एवं 4०-हंदि सुर्णतु भगवंतो चंपानगरीवल्धव्वा यहवे चरगाय जाव पचप्पिणंति, तते णं से कोडेवियघोसणं सुच्चा चंपाए णयरीए बहवे चरगाय जाव गिहत्थाय जेणेव धणे सत्यवाहें तेणेव उवागच्छन्ति, तते णं धण्णे तैसिं चरगाण य जाव मिहत्थाण य अच्छत्तगस्सं छत्तं दलयइ जाव पत्ययणं दलाति, गच्छह णं तुम्भे देवाणुप्पिया!, चंपाए नयरीए यहिया अगुजाणंसि मम पडिवालेमाणा चिट्ठह, तते णं चरगा य० धणेणं सत्यवाहेणं एवं वुत्ता समाणी जाव चिट्ठति, तते णं धपणे सत्यवाहे सोहणंसि तिहिकरणनकावर्तसि विपुलं असणं ४ उवक्खडावेह२त्ता, मित्तनाई आमतेतिर, भोयणं मोयातिर, आपुच्छतिर, सगडीसागर्ड जोयावेतिर, चपानगरीओ निग्गच्छति; णाइविप्पगिद्धेहिं अदाणेहिं समाणे२ सुहेहि वसहिपायरासेहिं अंग जणवयं मझमज्झेणं जेणेव देसग्गं तेणेव उवाग- च्छति२, सगडीसागडं मोयापेति२, सत्यणिवेसं केरैतिर, कौटुंबियपुरिसे सहावेत; एवं व-तुम्मे णं देवा० १ .ति २ ता ए० । १५-श्री. नन्दी ज्ञाताध्य सार्थवाह- प्रवासादि वर्णन- सूत्रम् । ॥ २००॥ ॥ २०० मम सत्यनिवेसंसि महयार, सणं उग्रोसेमाणा२, एवं वदह-एवं ग्वलु देवाणु ! इमीसे आगामियाए छिन्नावायाए दीहमदाए अडवीए बहुमज्झदेसभाए बहवे पंदिफली नाम रुक्खा पन्नत्ता, किण्हा जीव पत्तिया, पुफिया, फलिया, हरियरेरिजमाणा सिरीए अईवं अतीव उवसोमेमाणा चिट्ठति, मणुण्णा वन्नेणं ४ जाव मणुन्ना फासेणं मणुन्ना छायाए, तं जो णं देवाणुप्पिया! तेसिं नंदिफलाणं रुक्खाणं मूलाणि वा कंद० तय० पत्त० पुप्फ० फल० धीयाणि वा हरियाणि वा आहारेति छायाएं वा वीसमति, तस्स णं आवाए भदए भवति, ततो पच्छा परिणममाणार, अकाले चेव जीवियातो ववरोति, तं मा णं देवाणुप्पिया ! केइ तेसि नंदिफलाणं मूलाणि वा जाव छायाए वा चीसमउ, मा णं सेऽवि अकाले चेव जीवियातो ववरोविजिस्सति तुम्भे णं देवाणु ! अन्नेसिं रुपखाणं मूलाणि य जाव हरियाणि य आहारेण छायासु वीसमहत्ति घोसणं घोसेह जाव पचप्पिणंति, तते णं धपणे सत्यवाहे सगडीसागड जोएतिर, जेणेव नंदिफला रुस्खा तेणेव उवागच्छतिर, तेसिं नंदिफलाणं अदूरसामंते सत्यणिवेसं करेतिर, दोचंपि तचंपि कोडंपियपुरिसे सहा बेतिर, एवं व०-तुम्भे ण देवाणु० !, मम सत्यनिवेससि महता सद्देणं उग्धोसेंमाणा२, एवं वयह-एए ण देवाणु 1 ते णदिफला किण्हा जाव मणुन्ना छायाए तं जो णं देवाणु०! एएसिं णदिफलाणं रुपखाण मूलाणि वा कंद० पुप्फ तय० फल० जाव अकाले चेव जीवियाओ ववरोति, तं मो णं तुम्भे जाव दूर दूरेणं परिहरमाणा वीसमह, मा णं अकाले जीवितातो ववरोविस्संति, अन्नेसिं रुक्खाणं मूलाणि य जाव नवाङ्गी. भीज्ञाता- धर्मकथाओं ॥२०१॥ सूत्रम् । वीसमह त्ति कटु घोसणं पञ्चप्पिणंति, तस्थ णं अत्धेगइया पुरिसा घण्णस्स सत्यवाहस्स एयमद्वं सद्दहति १५-श्री- जाव रोयंति, एयमद्वं सद्दहमाणा तेसिं नंदिफलाणं दूरं दूरेण परिहरमाणा२, अनेमि रुक्खाणं मूलाणि य नन्दी० जाच चीसमंति, तेसि णं आवाए नो भद्दए भवति, ततो पच्छा परिणममाणार, सुहरूवताए ५ मुजोर, ज्ञाताध्य परिणमंति; एवामेव समणाउसो ! जो अम्हं निग्गंथो वार जाव पंचसु कामगुणेसु नो मन्नेति, नो रज्जेति नन्दीफल- सेणं इह भवे चेव यहणं समणाणं ४ अचणिजे परलोए नो आगच्छति जाव वीतीवतिस्सति तत्य णंजे वर्णनादि से अप्पेगतिया पुरिसा घण्णस्स एयमद्वं नो सहति३, धण्णस्स एतमढे असद्दहमाणा३, जेणेव ते नंदिफला तेणेव उवागच्छंति२, तेसि नंदिफलाणं मूलाणि य जाव वीसमंति, तेसिणं आवाए भद्दए भवति, ततो पच्छा परिणममाणा जाव ववरोति, एवामेव समणाउसो! जो अम्हं निग्गंथो वा निग्गंधी वा पव्वतिए पंचसु कामगुणेसु सन्जेति३ जाव अणुपरियहिस्सति जहा व ते पुरिसा, तते णं से धण्णे सगडीसागडं जोया- चेतिर जेणेव अहिच्छत्ता नगरी तेणेव उवागच्छतिर, अहिच्छत्ताए णयरीए पहिया अग्गुनाणे सत्यनिवेसं करेतिर, सगडीसागडं मोयावेइ; तए ण से धपणे सत्यवाहे महत्थं३, रायरिहं पाहुडं गेण्हइ२, बहुपुरिसेहिं सद्धि संपरिघुडे अहिच्छत्तं नयरं मज्झमज्झेणं अणुप्पविसइ, जेणेव कणगके राया तेणेव उवागच्छति, करयल जाव वदावेइ, तं महत्थं३, पाहुडं उवणे; तए णं से कणगकेज राया हद्वतुट्ठ. धण्णस्स सत्यवा- हस्स तं महत्थं३, जाव पडिच्छइन, घपण सत्यवाहं सकारेह, सम्माणेइ२, उस्सुक्क बियरति २, पडिविसं. पद ॥ २०१
जेड भंडविणिमयं करेइर, पडिभंडं गेण्हतिर, सुहंसुहेणं जेणेव चंपानयरी तेणेव उवागच्छतिर, मित्त-
नाति० अभिसमन्नागते विपुलाई माणुस्सगाई जाव विहरति; तेणं कालेणं २ थेरागमणं धणे पम्म
सोचा, जेट्टपुत्तं कुडुवे ठावेत्ता पव्वइए एकारस सामाइयाति अंगाति बहणि वासाणि जाव मासियाए सं.
अन्नतरेसु देवलोएसु देवत्ताए उववन्ने, महाविदेहे वासे सिज्झिहिति जाव अंतं करेति । एवं खलु जंबू !,
समणेणं भगवया महावीरेणं पन्नरसस्स नायज्झयणस्स अयमढे पण्णत्ते त्ति वेमि ॥ सूत्रम्-१११ ।।
पन्नरसमं नायज्झयणं समत्तं ।
मा सुगमं नवरं 'चरए वे' त्यादि, तत्र चरको-धाटिभिक्षाचरः, चीरिको-रथ्यापतितचीवरपरिधानः, चीरोपकरण
इत्यन्ये; चर्मखण्डका-चर्मपरिधानः, चर्मोपकरण इति चान्ये; भिक्षाण्डो-भिक्षामोजी सुगतशासनस्थ इत्यन्ये, पाण्डुरागः-शैवः,
गौतमः-लघुतराधमालाचर्चितविचित्रपादपतनादिशिक्षाकलापवद्रुपभकोपायतः कणभिक्षाग्राही गोबतिकः-गोश्चर्यानुकारी,
उक्तं च-"गांवीहिं समं निग्गमपवेसठागामणाइ पकरेंति भुजति । जहा गावी तिरिक्खवासं विभावेंता ॥१॥ गृहिधर्मा-गृहस्थ-
धर्म एव श्रेयानित्यभिसन्धाय तद्यथोक्तकारी धर्मचिन्तको-धर्मसंहितापरिज्ञानवान् मभासदः अविरुद्धो-चैनयिका, उक्तं च-
"अविरुद्धो विणयकारी देईणं पराए भत्तीए । जह वेसियायणसुओ एवं अन्नेवि नायवा ॥ २ ॥" विरुद्धो-अक्रियावादी
सा• १ गोभि. समं प्रवेशनिर्गमस्थानासनादि प्रकुर्वन्ति । भुजन्ति यथा गावस्तिर्यमासं विभावयन्तः ॥ १ ॥
१ अविरुदो विनयकारी देवादोनों परया भक्त्या । यथा वैश्यायनसुत एवमन्येऽसि ज्ञातव्याः ॥ २ ॥
न नवागी- १०१० श्रीज्ञावा. धर्मकथा . , नन्दी ज्ञाताध्यक उपनयादि वर्णनम् । ॥ २०२॥ परलोकानम्युपगमात् मर्षवादिभ्यो विरुद्धः, एवं वृद्धः-तापम प्रथममुत्पन्नत्वात् प्रायो वृद्धकाले च दीक्षाप्रतिपत्तेः श्रावको- बामणः, अन्ये तु वृद्धश्रावक इति व्याचक्षते, स च ब्राह्मण एव, रक्तपट:-परिवाजको निमुन्या-माधु प्रभृतिग्रहणात् कापि- लादिपरिग्रह इति, 'पत्थयणं'ति पध्यदन-शम्बलं 'पक्खिवं' ति अर्द्धपथे दुटिवशम्बलस्य शम्बलपूरणं द्रव्यं प्रक्षेपको, 'पडियस्स' त्ति वाहनात्पतितस्य रोगे वा पतितस्य, 'भग्गरुग्गस्स' त्ति वाहनात् स्खलनाद्वा पतने भैग्नंस्य रुग्णस्य च जीर्णतां गतस्येत्यर्थः, 'हदिति-आमन्त्रणे, 'नाइविगिद्धेहिं अदाणेहिं 'ति-नातिविप्रकृष्टपु-नातिदीर्धेष्वध्वसु- प्रयाणकमार्गेषु चसन् शुमैरनुकूलैः 'वसतिप्रातराशै'-आवामस्थानः प्रातर्भोजनकालश्वेत्यर्थः, 'देसर्ग'ति-देशान्तं । इहोपनयः सूत्राभिहित एव, विशेषतः पुनरेवं तं प्रतिपादयन्ति-" चंपा इत्र मणुयगती धणोह भयवं जिंणो दएंकरसो। अहिछत्तानयरिममं इह निव्वाणं मुणेयत्वं ॥ १ ॥ घोसणया व तित्थंकरस्सं सिर्वमग्गदेमणमहग्धं । चरंगाइणोच इत्थं सिव- सुहकामा जिया यहवे ॥ २॥ नंदिफलाइ व इहं सिरपहपडिपण्णगाण विसया उ । तन्मखणाओ मरणं जह तह विमएहिं संसारो ॥ ३ ॥ तवजण जह इट्टपुरगमो विमयवअणेण तहा । परमानंदनिबंधणसिवपुरगमणं मुणेयव्वं ।। ४ ।। समाप्तमिदं पञ्चदशज्ञातविवरणम् ॥ १५ ॥ सा० पम्पैव मनुष्यगतिर्धन इव भगवान् जिनो दयेकरस: अहिच्छमानगरीसममिह निर्वाणं ज्ञातव्य ॥ ॥ घोषणमिव तीर्थकरस्य शिवमार्गदेशन- मगध । चरकादिवत्र शिवमुखकामा जीवा बहवः ॥ ३ ॥ नन्दीफलानीवेह शिवपथप्रतिपन्नाा विषयाः । तदक्षणात् मरणं यथा तह विषयः संसारः ॥३॥ तदर्जनेनेपुरगमो यथा विषयवर्जनेन तथा । परमानन्दनिवन्धनशिवपुरंगमनं ज्ञातव्य ॥ ४ ॥ ।। २०२ ॥ १६-श्रीअपरकङ्काख्यं ज्ञाताध्ययनम् ॥ अथ पोडशं व्याख्यायते, अस्य च पूर्वेण सहायममिमम्बन्धः-पूर्वत्र विषयाभिष्वद्गस्यानर्थफलतोक्ता, इह तु तद्विषय- निदानस्य सोच्यवे इत्येवंसम्बद्धमिदम्- जति णं भंते ! स० भ० म० पन्नरसमस नायज्झयणस्स अयम? प० सोलसमस्स ण णायज्झयणस्से पं सम० भग० महा० के अटे पण्णत्ते ?, एवं खलु जंबू । तेणं कालेणं २ चंपा नाम नयरी होत्या, तीसे णं चंपाए नयरीए वहिया उत्तरपुरच्छिमे दिसिभाए सुभूमिभागे उजाणे होत्या, तत्थ णं पाए नयरीए तओ माहणा भातरो परिवसंति, तंजहा-सोमे, सोमदत्ते, सोमभूती; अड्डा जाव रिउंब्वेद ४ जाव सुपरिनिहिया, तेसि णं माहणाणं तओ भारियातो होत्या, तं०-नागसिरी, भूयसिरी, जखसिरी; सुकुमाल जाव तेसिणं माहणाणं इटाओ विपुले माणुस्सए जाव विहरति । तते णं तेसिं माहणाणं अन्नयों कयाई एगयओ समुवागयाणं जाय इमेयारूवे मिहो कहासमुल्लावे समुप्पवित्था, एवं ग्वल देवाणुप्यिा! अम्हं इमे विपुले घणे जाव सावतेने अलाहि जाव आसत्तमाओ कुलवंसाओ पकामं दाउं पंकमि भोत्तुं पकामं परिभाए. ते सेयं खलु अम्हं देवाणु० अन्नमन्नस्सं गिहेसु कल्लाकल्लिं विपुलं असणं ४ उचक्खडेउं २ परिभुंजमणिार्ण विहरित्तए, अन्नमन्नस्स एयमढे पडिसुणेति, कल्लाकल्लिं अन्नमन्नस्स गिहेसु विपुलं असंण ४ उववडावेति :
नवागी- भीज्ञाता- धर्मकथा) ॥२०३॥ २ परिभुजमाणा विहरंति, तते णं तीसे नागसिरिए माहणीए अन्नदा भोयणयारए जाते यावि होत्या, तते णं सा नागसिरी विपुलं असणं ४, उवक्खडेति २, एगं महं सालतियं तित्तालाउअं यहुसंभारसंजुत्तं जेहाव- गाढं उवक्खडावेति, एगं विंदुयं करयलंसि आसाएइ तं ग्वारं कटुयं अक्खन अभोज विसन्भूयं जाणित्ता एवं व०-धिरत्थु णं मम नागसिरीए अहन्नाए अपुत्ताए दूभगाए दूभगसत्ताए दूभगणियोलियाए जीए णं मए सालइए पहुसंभारसंभिए नेहावगाढे उवक्पडिए सुयहुदवक्खएणं, नेहकग्वए य कए, तं जति णं ममं जाउयाओ जाणिस्संति, तो णं मम खिसिस्संति, ते जाव ताव ममं जाउयाओ ण जाणंति ताव मम मेयं एयं सालतियं तित्तालाउ बहुसंभारणेहकयं एगते गोवेत्तए, अन्नं सालइयं महुरालाउयं जाव नेहावगाढं उवक्खडेत्तए, एवं संपेहेति २ तं सालतियं जाय गोवेइ, अन्नं सालतियं महुरालाउयं उव. क्खडेइ, तेसिं माहणाणं पहायाणं जाव सुहामणवरगयाणं तं विपुलं असण ४, परिवेसेति; तते णं ते माहणा जिमितभुत्तुत्तरागया समाणा आयंता चोक्खा परमसुइभूया सकम्मसंपउत्ता जाया यावि होत्था, तते णं ताओ माहणीओ पहायाओ जाच विभूसियाओ तं विपुलं असण ४, आहारति २; जेणेव सयाई २ गेहाई तेणेव उवा० २ सककम्मसंपउत्तातो जायातो सूत्रम्-११२ ॥ तेणं कालेणं २, धम्मघोसा नाम थेरा जाव बहुपरिवारा, जेणेव चंपा नाम नगरी, जेणेव सुभूमिभागे उबाणे, तेणेव उवा० २ अहापडिरूवं जाव विहरंति, परिसा निग्गया, धम्मो कहिओ, परिसा पडिगया; तए णं अपर० ज्ञावाच्या ब्राधण- भोजनादि- वर्णन- सूत्रम् । ।। २०३।
तेसिं धम्मघोसाणं थेराणं अंतेवासी धम्मरुई नाम अणगारे ओराले जाच तेउलेस्से मासं मासेणं खम- माणे विहरति, तते णं से धम्मरुई अणगारे मासखमणपारणगंसि पढमाए पोरिसीए सज्झायं करेइ, २ वीयाए पोरसीए एवं जहा गोयमसामी तहेव उग्गाहेति २ तहेव धम्मघोसं थेरं आपुच्छइ जाव चंपाए नयरीए उच्चनीयमज्झिमकुलाइं जाव अडमाणे, जेणेव नागसिरीए माहणीए गिहे तेणेव अणुपवितु। तते णं सा नागसिरी माहणी धम्मरुई एबमाणं पासति २त्ता, तस्स सालइयस्स तित्ताडयस वहु० जेहा० निसिरणट्टयाए हहतुट्ठा उद्वेति २ जेणेव भत्तघरे तेणेव उवा० २ तं सालतियं तित्तकड्डयं च यहुनेहं धम्म- रुइस्स अणगारस्म पडिग्गहंसि सव्वमेव निसिरइ, तते णं से धम्मरुई अणगारे अहापजत्तमिति कटु णागसिरीए माहणीए गिहातो पडिनिक्ग्वमति २ चंपाए नगरीए मझमज्झेणं पडिनिक्खमति २, जेणेव सुभूमिभागे उन्नाणे तेणेव उवागच्छति २ धम्मघोसस्स अदूरसामंते अन्नपाणं पडिदंसेइ २, अन्नपाणं करयलंसि पडिदंसेति; तते गं ते धम्मघोसा थेरा तस्स सालइतस्स नेहावगाढस्स गंधेणं अभिभूया समाणा, ततो सालझ्यातो नेहावगाढाओ एगं बिंदुगं गहाय करयलंसि आसादेति तित्तगं खारं कड्यं अखजं अभोजं विसभूयं जाणित्ता धम्मरुई अणगारं एवं पदासी-जति णं तुमं देवाणु ! एयं सालइयं जाव नेहावगाढं आहारेसि तो णं तुम अकाले चेव जीवितातो ववरोविजसि, तं मा णं तुम देवाणु ! इम सालतियं जाव आहारेसि, मा णं तुमं अकाले चेव जीविताओ ववरोविनसि, तं गच्छ णं तुमं देवाणु !
नवाङ्गी १०० भीज्ञावा. धर्मकथा) ॥२०४॥ इमं सालतियं एगतमणावाए अचित्ते थंडिले परिवेहि २, अन्नं फासुयं एसणिज्ज असण ४, 'पडिगाहेत्ता आहारं आहारेहि तते णं से धम्मरुई अणगारे धम्मघोसेणं घेरेणं एवं वुत्ते समाणे धम्मघोसरस थेरस्स अंतियाओ पडिनिक्खमति २, सुभूमिभागउजाणाओ अदूरसामंते धंडिल्लं पडिलेहेति २; ततो सालइयातो एग बिंदुर्ग गहेइ २, धंडिलंसि निसिरति तते णं तस्स सालतियस्स तित्तकडुयरस यहुनेहायगाढस्स गंघेणं यहणि पिपीलिगासहस्साणि पाउ० जा जहा य णं पिपीलिको आहारेति सा तहा अकाले घेव जीवितातो ववरोविज्जति, तते गं तस्स धम्मरुइस्स अणगारस्स इमेयारूवे अन्भत्थिए ५-जह ताव इमरस सालतियस्स जाव एगमि विंदुगंमि पक्खित्तमि अणेगाति पिपीलिकासहस्साई ववरोविजंति, तं जति णं अहं पयं सालइयं थंडिल्लसि सव्वं निसिरामि, तते गं वहण पाणाणं वहकरणं भविस्सति तं मयं बलु ममेयं सालइयं जाव गाढ सयमेव आहारत्तए, मम चैव एएणं सरीरेणं णिजाउ तिकह एवं संपेहेति २, मुहपोत्तियं २, पडिलेहेति २, ससीसोवरियं कार्य पमजेति २, तं सालईयं तितकंडयं बहुनेहावगादं बिल- मिव पन्नगभूतेणं अपाणेणं सच सरीरकोटुंसि पक्विवति तते णं तस्स धम्मरुइस्स तं सालयं जाव नेहावगाढं आहारियस्स समाणस्स मुंहुत्तत्तरेणं परिणममाणसि सरीरगंसि वैषणा पाउठभूतां उज्जला जाव दुरहियासा, तते णं से धम्मरुची अणगारे अथामे अघले अवीरिए अपुरिसकारपरकमे अधारणिनमिः तिकडु आयारभंडगं एगं ते ठेवेइर थंडिल्लं पडिलेहेति २ भसधारण संचारेइ२ देब्भसधारगं दुहरूतिर अपर० ज्ञाताध्यक धर्मरूचि- मुनि- वर्णन- सूत्रम्।
पुरत्याभिमुहे संपलियंकनिसन्ने करयलपरिग्गहियं एवं व०-नमोऽस्थु णं अरहंताणं जाव संपत्ताणं, णमो. ऽत्थु णं धम्मघोसाणं थेराणं मम धम्मायरियाणं धम्मोवएसगाणं, पुष्विपि णं मए धम्मघोसाणं थेराणं अंतिए सव्वे पाणातिवाए पञ्चक्खाए जावज्जीवाए जाव परिग्गहे; इयाणिपि णं अहं तेसिं चैव भगवंताणं अंतियं सव्वं पाणाति० पचक्खामि जाव परिग्गहं पञ्चक्खामि जावजीवाए, जहा खंदओ जाव चरिमेहि उस्सासेहिं घोसिरामित्तिकटु आलोइयपडिकते समाहिपत्ते कालगए, तते णं ते धम्मघोसा थेरा धम्मरुई अणगारं चिरं गयं जाणित्ता समणे निग्गंथे सद्दावेंति२ एवं व०, एवं खलु देवाणु ! धम्मरुइस्स अणगारस्स मासखमणपारणगंसि सालइयस्स जाव गाढस्स णिसिरणट्टयाए बहिया निग्गते चिराति तं गच्छह णं तुम्भे देवाणु० ! धम्मरुइस्स अणगारस्स सव्वतो समंता मग्गणगवेसणं करेह, तते णं ते समणा निग्गंथा जाव पडिसुणेतिर धम्मघोसाणं थेराणं अंतियाओ पडिनिक्खमंतिर, धम्मरुइस्स अणगारस्स सव्वओ समंता मग्गणगवेसणं करेमाणा जेणेव थंडिल्लं तेणेव उवागच्छंतिर, धम्मरुइस्स अणगारस्स सरीरगं निप्पाणं निचेटं जीवविप्पजढं पासंतिर, हा हा अहो अकजमितिकटु धम्मरुइस्स अणगारस्स परिनिव्वाणवत्तियं काउस्सग्गं करेंति, धम्मरुइस्स आयारभंडगं गेण्हंति२, जेणेव धम्मघोसा थेरा तेणेव उवागच्छंति२, गमणागमणं पडिकमंतिर, एवं व०-एवं खलु अम्हे तुम्भं अंतियाओ पडिनिक्खमामोर सुभूमिभागस्स उ० परिपेरंतेणं धम्मरहस्स अणगारस्स सव्वं जाव करमाणे जेणेव थंडिल्ले तेणेव उवा०२ जाव इहं
नवाड़ी
१००
भीज्ञाता-
धर्मकथाने
हव्वमागया, तं कालगए णं भंते ! धम्मलई अणगारे इमे से आयारभंडए, तते ण ते धम्मघोसा थेरा
पुत्वगए उवओगं गच्छंतिर, समणे निग्गथे निग्गंधीओ य' सहावैतिर एवं व०-एवं ग्वल अजो! मम
अंतेवासी धम्मरुची नाम अणगारे पगइभद्दए जाच विणीए मासंमासेणं अणिक्खित्तेणं तवोकम्मेणं
जाव नागसिरीए माहणीए गिहे अणुपविहे, तए णं सा.नागसिरी माहणी जाव निसिरइ, तए णं से
धम्मई अणगारे अहापबत्तमितिकल जाव कालं अणवकंखेमाणे विहरति, से णं धम्मरुई अणगारे
यहूणि वासाणि, सामनपरियागं पाउणित्ता आलोइयपडिकते ‘समाहिपत्ते कालमासे कालं किचा उड्डे
सोहम्म जाव सम्बद्दसिद्धे महाविमाणे देवत्ताए उववन्ने, तत्य णं अजहरणमणुकोसेणं तेत्तीसं सागरोव.
माई ठिती पन्नत्ता, तत्थ धम्मरुइस्सवि देवस्स तेत्तीसं सागरोवमाइं ठिती पण्णत्ता, से णं धम्मरुई देवे
ताओ देवलोगाओ जाव महाविदेहे वास सिज्झिहिति ॥ सूत्रम्-११३ ॥ तं धिरत्थु णं अजो! णागसिरीए
माहणीए अधन्नाए अपुनाए जाव णियोलियाए जाए णं तहारूवे साहू धम्मरुई अणगारे ,मासखमण.
पारणगंसि सालइएणं जाव गाढणं अकाले चेवे जीवितातो ववरोविए, तते णं ते समणा निग्गंथा धम्म-
घोमाण राणं अंतिए एतमढे सोचा णिसम्म चंपाए सिंघाडगतिगजाव बहुजणस्स एवमातिक्खंति-
घिरत्यु णं देवा ! नागसिरीए माहणीए जाव णियोलियाए जाए णं तहारवे साहू साहरूवे सालतिएणं
जीवियाओ ववरोवेइ, तए णं तेसि समणाणं अंतिए एयमहूँ सोचा णिसम्म बहुजणो अन्नमन्नस्स एवमा-
अपर
ज्ञाता
धरुनि
कालग
नादिवर्ण
सूत्रम्
॥ २०५॥
॥२०॥
तिकावति एवं भासति-धिरत्थु णं नागसिरीए माहणीए जाव जीवियाओ ववरोविते, तते णं ते माहणा चंपाए नयरीए बहुजणस्स अंतिए एतमहं सोचा निसम्म आसुरुत्ता जाव मिसिमिसेमाणा'जेणेव नाग- सिरी माहणी तेणेव उवागच्छतिर, णागसिरी माहणी एवं वदासी-हं भो! नागसिरी! अपत्थियपत्थिए दुरंतपंतलक्षणे हीणपुण्णचाउद्दसे घिरत्यु णं तव अधन्नाए अपुन्नाए जाव णियोलियाते जाए णं तुमे तहा. रूवे साह साहुरूये मासग्चमणपारणगंसि सालतिएणं जाच वयरोविते, उचावहिं अकोसणाहिं अकोसंति, उचावयाहिं उद्वंसणाहिं उद्धंसेंति, उचावयाहिं णिभत्थणाहिं णिन्मत्थंति उचावयाहिं णिच्छोडणाहिं निच्छोडेंति तजेति तालेति तजेत्ता तालेत्ता सयातो गिहातो निच्छुभंति तते णं सा नागसिरी सयातो गिहातो निच्छुढा समाणी चंपाए नगरीए सिंघाडगतियचउपचचरचउम्मुह यहुजणेणं हीलिजमाणी खिसिज़माणी निंदिनमाणी गरहिजमाणी तबिजमाणी पव्वहिनमाणी धिक्षारिजमाणी थुकारिजमाणी कत्थइ ठाणं वा निलयं वा अलभमाणी २ दंडीखंडनिवसणा खंडमल्लयग्वंडघडगहत्थगया फुटहडाहडसीसा मचिण्याचगरेणं अन्निजमाणमग्गा गेहंगेहेण देहंवलियाए वित्तिं कप्पेमाणी विहरति, तते णं तीसे नाग- सिरीए माहणीए तन्भवंसि चेय मोलस रोयायंका पाउन्भूया, तंजहा-"मासे कासे जोणिसूले जाव कोटे," तए णं सा नागसिरी माहणी सोलसहिं रोयायंकेहिं अभिभूता समाणी अदुवमहा कालमासे कालं किया, छडीए पुदवीए उफोसेणं यावीससागरोयमद्वितीएमु नरएस नेरइयत्ताते उववन्ना सा र्ण तओऽणं- नवाङ्गी- भीज्ञाता- धर्मकथाने तरंसि उध्वहित्ता मच्छेसु उववन्ना, तत्थ णं सत्यवज्झा दाहवर्कतिए कालमासे कालं किच्चा अहेसत्तमीए पुढवीए उक्कोसाए तित्तीसंसागरोवमहितीएसु नेरइएसु उववन्ना, सा णं ततोऽणंतरं उब्वहित्ता दोबंपि मच्छेसु उवववति, तत्थविय णं सत्थवज्झा दाहवकंतीए दोचंपि अहे सत्तमीए पुढवीए उक्कोसं तेत्तीस- सागरोवमहितीएसु नेरइएसु उवववति, साणं तओहिंतो जाव उध्वहित्ता तचंपि मच्छेसु उववन्ना, तत्थविय णं सत्यवज्झा जाव कालं किच्चा दोचंपि छट्ठीए पुढवीए उकोसेणं० तओऽणंतरं उध्वहिता नरएसु एवं जहा गोसाले तहा नेयव्वं जाव रयणप्पभाए सत्तसु उववन्ना, ततो उन्वहित्ता जाव इमाई खहयरविहाणाई जाव अदुत्तरं च णं खरयायरपुढविकाइयत्ताते तेसु अणेगसतसहस्स खुत्तो ।।सूत्रम्-११४॥ सर्व सुगम, नवरं 'सालइयंति-शारदिकं सारेण वा-रसेन चितं-युक्तं सारचितं, 'तित्तालाउयंति-कटुकतुम्बकं 'बहुसंभारसंजुत्तं'-बहुमिः सम्भारद्रव्यैः-उपरि प्रक्षेपद्रव्यस्त्वगेलाप्रभृतिभिः संयुक्तं यत्तत्तथा 'स्नेहावगाद'-स्नेहव्याप्त 'मगसत्ताए'त्ति-दुर्भगः सत्रः-प्राणी यस्याः सा तथा, 'दूभगनियोलियाए चि-निम्बगुलिकेव-निम्बफलमिव अत्य- नादेयत्वसाधात् दुर्भगाणां मध्ये निम्बगुलिका दुर्भगनिम्बगुलिका, अथवा-दुर्भगानां मध्ये निर्दोलिता-निमजिता-दुर्भ- गनिर्दोलिता, 'जाउयाउत्ति-देवराणां जाया भार्या इत्यर्थः; 'बिलमिवेत्यादि, विले इव-रन्ध्र इव पन्नगभूतेन-सर्पकल्पेन आत्मना करणभूतेन सर्व तदलावु शरीरकोष्ठ के प्रक्षिपति, यथा किल विले सर्प आत्मानं प्रक्षिपति पार्थान् असंस्पृशन् एवममौ बदनकन्दरपार्थान् असंस्पृशन् आहारेण तदसञ्चारणतस्तदलाबु जठरविले प्रवेशितवानिति मात्र 'गमणागमणाए अपर ज्ञाताध्यक नागश्री. भवभ्रमणा- दिवर्णन- सूत्रम् । ॥ २०६॥ । २०६॥
- पडिकमंति'चि-गमनागमन-र्यापथिकीं, 'उच्चावयाहिं'ति-असमञ्जसामिः, 'अफोसणाहिति-मृताऽसि त्वमित्यादिमि- चनैः, 'उदसणाहिं'ति-दुष्कुलीनेत्यादिमिः कुलाधमिमानपातनाथैः, 'निच्छुहणाहिति-निःसरास्मद्गेहादित्यादिमिः, 'निच्छोडणाहिं 'ति-त्यजास्मदीयं वस्त्रादीत्यादिमिा, 'तन्नति 'ति-मास्यसि पापे ! इत्यादिमणनतः, 'तालिंति 'ति- चपेटादिभिः, हील्यमाना-जात्यायुद्घवनेन, विस्यमाना-परोक्षकुत्सनेन, निन्द्यमाना-मनसा जनेन, गईमाणा-तत्समक्षमेव वय॑माना-अजुलीचालनेन ज्ञास्यसि पापे इत्यादिमणनतः प्रव्यथ्यमाना-यष्ट्यादिताडनेन घिविक्रयमाणा-धिकशन्दविषयी- क्रियमाणा, एवं क्रियमाणा, दण्डी-कृतसन्धान जीर्णवस्त्रं तस्य खण्डं निवसन-परिधानं यस्याः सा तथा, खण्डमल्लक- खण्डशरावं गिक्षामाजनं खण्डपटकच-पानीयमाजनं ते हस्तयोर्गते यस्याः सा तथा, 'फुट 'ति-स्फुटितया स्फुटितकेश- सम्वपत्वेन विकीर्णकेशं, 'हडाहडंति अत्यर्थ-'शी' शिरो यस्याः सा तथा, मक्षिकाचटकरेण-मक्षिकासमुदायेन अन्वीय- मानमार्गा-अनुगम्यमानमार्गा मलाविलं हि वस्तु मक्षिकामिथ्यते एवेति, देह पलिमित्येतस्याख्यानं देहयलिका तया, अनुस्वारो नैपातिकः, 'सस्थयज्झ 'त्ति-शस्त्रवध्या जातेति गम्यते, 'दाहवझतिए 'त्ति-दाहव्युत्क्रान्त्या-दाहोत्पत्या 'ग्वहयरविहाणाई जाव अदुत्तरं चे'त्यत्र गोशालकाध्ययनममानं सूत्रं तत एव दृश्यं, बहुत्वात्तु न लिखितं ॥११४॥ मा णं तओऽणंतरं उचद्वित्ता इहेव जंबुद्दीवे दीवे भारहे वासे चंपाए नयरीए सागरदत्तरस सस्थवा- हस्स भदाए भारियाए कुच्छिसि दारियत्ताए पचायाया, तते णं सा भद्दा सत्यवाही णवण्हं मासाणं सुकुमालकोमलियं गयतालयसमाणं तीसे दारियाए निव्वत्ते यारमाहियाए अम्मापियरो दारियं पयाया
अपर०
नवाङ्गी-
१०१०
श्रीज्ञाता-
धर्मकथा)
ज्ञावाध्य०
1॥२०७॥
इम एतारूवं गोन गुणनिष्फन्नं नामधेनं करेंति-जम्हा णं अम्हं एसा दारिया सुकुमाला गयतालुयसमाणा
तं होउ णं अम्हं इमीले दारिपाए नामधेने सुकुमालिया, तते णं तीसे दारियाए अम्मापितरो नामधेनं
करेंति सूमालियत्ति, तए णं सा सूमालिया दा० पंचधाईपरिग्गहिया तंजहा-वीरघाईए जाव गिरिकंदर-
मल्लीणा इव चंपकलया निवाए निवाघायंसि जाव परिवड्डइ, तते णं सा सूमालिया दारिया उम्मुफबाल-
भावा.जाव रूवेण य जोव्वणेण य लावण्णेण य उकिट्टा उफिट्टसरीरा जाता यावि होत्या ।। सूत्रम्-११५ ॥
तत्थ णं चंपाए नयरीए जिणदत्ते नाम मत्थवाहे अड्डे०, तस्स णं जिणदत्तस्स भद्दा भारिया सूमाला
'हट्ठा जाव माणुस्सए कामभोए पचणुभवमाणा विहरति, तस्स णं जिणदत्तस्स पुत्ते भदाए मारियाए अत्तए
सागरए नाम दारए सुकुमाले जाव सुरूवे, तते णं से जिणदत्ते सत्यवाहे अन्नदा कदाई सातो गिहातो
पडिनिक्खमति२, सागरदत्तस्स गिहस्स अदूरसामंतेणं वीतीवयइ इमं च णं सूमालिया दारिया पहाया
चेडियासंघपरिवुडा उप्पि आगासतलगंसि कणगतेंदूसपण। कीलमाणी२ विहरति, तते णं से जिणदत्ते
“सत्यवाहे सूमालियं दारियं पासतिर, तूमालियाए दारियाए रूवे य ३ जायविम्हए कोडुयियपुरिसे सहा.
वेतिर, एवं व०-एस गं देवा० ! कस्स दारिया ?, किं वा णामधेनं से ?, तते णं ते कोडंबियपुरिसा जिण-
• दत्तेण सत्थवाहणं एवं वुत्ता समाणा हट्ट करयल जाव एवं वयासी-एस णं देवाणु० ! सागरदत्तस्स सत्य.
'वाहस्सधूया, महाए अत्तया, सूमालिया नाम दारिया, सुकुमालपाणिपाया जाव उकिट्ठा तते णं से जिण.
लिका-
जन्मादि-
वर्णन-
सूत्रम्।
॥ २०७॥
दत्ते सत्यवाहे तेसि कोडुपियाणं अंतिए एयमढं सोचा जेणेव सए गिहे तेणेव उवा० २. पहाए जाव मित्त- नाइपरिघुढे चंपाए जेणेव सागरदत्तस्स गिहे तेणेव उवागच्छइ, तए णं सागरदत्ते सत्यवाहे जिणदत्तं सत्थ- वाहं एजमाणं पासइ, एजमाणं पासइत्ता, आसणाओ अन्भुढेइ २ त्ता, आसणेणं उवणिमंतेति २, आसत्थं वीसत्थं सुहासणवरगयं एवं चयासी-भण देवाणुप्पिया ! किमागमणपओयणं, तते णं से जिणदत्ते सत्यवाहे सागरदत्तं सत्यवाई एवं वयासी-एवं ग्बल अहं देवा०, तव धूयं, भद्दाए अत्तियं, सूमालियं, सागरस्म भारियत्ताए वरेमि, जति णं जाणाह देवा० ! जुत्तं वा पत्तं वा सलाहणिलं वा सरिसो वा संजोगो ता दिनउ णं सूमालिया सागरस्स, तते णं देवा० ! किं दलयामो सुकं सूमालियाए ?, तए णं से सागरदत्ते तं जिणदत्तं एवं वयासी-एवं खलु देवा० । सूमालिया दारिया मम एगा एगजाया इट्टा जाव किमंग पुण पासणयाए तं नो खलु अहं इच्छामि सूमालियाए दारियाए ग्वणमवि विप्पओगं, तं जति णं देवाणुप्पिया! सागरदारए मम घरजामाउए भवति, तो णं अहं सागरस्स दारगस्स सूमालियं दलयामि। तते णं से जिणदत्ते सत्यवाहे सागरदत्तेणं सत्यवाहेणं एवं वुत्ते समाणे जेणेव सए गिहे तेणेव उवाग- छइ २ सागरदारगं सहावेति २ एवं च०-एवं ग्वलु पुत्ता सागरदत्ते स० मम एवं वयासी-एवं खलु देवा! सूमालिया दारिया इट्टा तं चेच तं जति णं सागरदारए मम घरजामाउए भवइ, ता दलयामि-तते णं से सागरए दारए जिणदत्तेणं सत्यवाहेणं एवं युत्तेः समाणे तुसिणीए, तते णं जिणदत्ते स० अन्नदा कदाइ
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१६-श्री-
नवागी.
अपर०
भीज्ञाता-
धर्मकथा)
ज्ञाताध्य.
सागरदत्त
दारकादि-
वर्णन-
प्र२०८॥
सोहणसि तिहिकरणे विउलं असण ४ उवक्खडावेति २, मित्तणाई आमंतेइ जाव सम्माणित्ता सागरं दारगं
पहायं जाव सब्वालंकारविभूसियं करेइ २ पुरिससहस्सवाहिणिं सीयं दुरूहावेति२, मित्तणाइ जाव संप-
रिबुडे सव्विड्डीए सातो गिहाओ निग्गच्छति २ चंपानयरिं मज्झमझेणं जेणेव सागरदत्तस्स गिहे तेणेव'
उवागच्छति २, सीयाओ पच्चोरुहति २, सागरगं दारगं सागरदत्तस्स सत्थ० उवणेति तते णं सागरदत्ते
सत्यवाहे विपुलं असण ४ उवक्खडावेइ २ जाव सम्माणेत्ता सागरगं दारगं सूमालियाए दारियाए सद्धिं
पवयं दुरूहावेइ २ सेयापीतएहिं कलसेहिं मजावेति २, होम करावेति २,सागरं दारयं सूमालियाए दारियाए
पाणिं गेहाविति ॥ सूत्रम् ११६ ॥ तते णं सागरदारए सूमालियाए दारि० इमं एयारूवं पाणिफासं पडि-
संवेदेति से जहा नाम ए असिपत्ते इ वा जाव मुम्मुरे इ वा इतो अणिट्टतराए चेव पाणिफासं पडि-
संवेदेति, तते णं से सागरए अकामए अवसव्वसे तं मुहुत्तमित्तं संचिति, तते णं से सागरदत्ते
सत्यवाहे सागरस्स दारगस्स अम्मापियरो मित्तणाइ विउलं असण ४ पुप्फवत्थ जाव सम्माणेत्ता
पडिविसवति, तते णं सागरए दारए सूमालियाए सद्धिं जेणेव वासघरे तेणेव उवा० २ सूमालियाए
दारियाए सदि तलिगंसि निवज्जइ, तते णं ते सागरए दा० सूमालियाए दा० इमं एयारूवं अंगफासं
पडिसंवेदेति, से जहा नामए असिपत्तेइ वा जाव अमणामयराग चेव अंगफासं पचणुब्भवमाणे
विहरति, तते णं से सागरए अंगफासं असहमाणे अवसव्वसे मुहुत्तमित्तं संचिट्ठति, तते णं से
सूत्रम् ।
॥ २०८ ॥
सागरदारए सूमालियं दारियं सुहपसुत्तं जाणित्ता सूमालियाए दारियाए पासाउ उठेतिर, जेणेव सए सय. णिज्जे तेणेव उवा० २ सयणीयंसि निवज्वइ, तते णं सूमालिया दारिया तओ मुहुत्तंतरस्स पडिवुद्धा समाणी पतिवया पइमणुरत्ता पति पासे अपस्समाणी तलिमाउ उद्वेतिर जेणेव से सयणिजे तेणेव उवागच्छतिर सागरस्स पासे गुवजह, तते णं से सागरदारए सूमालियाए दारि० दुचंपि इमं एयारूवं अंगफासं पतिसंवेदेति जाव अकामए अवसव्वसे मुहुत्तमित्तं संचिट्ठति, तते णं से सागरदारए सूमालियं पारियं सुहपसुत्तं जाणित्ता सयणिजाओ उटेहर वासघरस्स दारं विहाडेतिर मारामुक्के विव काए जामेव विसि पाउन्भूए तामेव दिसि पडिगए ।।सूत्रम्-११७॥ तते णं सूमालिया दारिया ततो मुहुत्तंतररस पडिवुद्धा पतिवया जाव अपासमाणी सयणिआओ उद्वेति सागरस्स दा० सव्वतो समंता मग्गणगवेसणं करेमाणी २ वासघरस्स दारं विहाडियं पासइ २ एवं व०-गए से सागरे तिकडे ओहयमसंकप्पा जाव झियायइ, तते णं सा भद्दा सत्यवाही कल्लं पाउ० दासचेडियं सहावेति २ एवं व०-गच्छह णं तुमं देवाणुप्पिए ! बहुव. रस्स मुहसोहणियं उवणेहि, तते णं सा दासचेडी भद्दाए एवं वुत्ता समाणी एयमई तहत्ति पडिसुणति, मुहधोवणियं गण्हति २ जेणेव वासघरे तेणेव उवागच्छति २ सूमालियं दारियं जाव झियायमार्णि पासतिर एवं व०-किन्नं तुम देवाणु०! ओहयमणसंकप्पा जाव झियाहिसि १, तते णं सा सुमालिया दारिया तं दासपेडियं एवं व० एवं खलु देवा० ! सागरए दारए मम सुहपसुत्तं जाणित्ता मम पासाओ उद्देति २ नवाजी- १०० भीड़ाता- धर्मकथा 'वासघरदुवारं अवगुण्डति जाव पडिगए,तते णं ततो अहं मुहुत्तंतरस्स जाव विहाडियं पासामि, गए णं से सागरए त्तिकटु ओहयमण जाव झियायामि तते णं सा दासचेडी सूमालियाए दारि० एयमढें सोचा जेणेव सागरदत्ते तेणेव उवागच्छइ २ त्ता सागरदत्तस्स एयमदं निवेएइ,तते में से सागरदत्ते दासचेंडीए अंतिए एयमढे सोचा निसम्म आसुरुत्ते जेणेव जिणदत्तसत्थवाहगिहे तेणेव उवा० २ जिणद० एवं व०-किणं देवाणुप्पिया! एवं जुत्तं वा, पत्तं.वा, कुलाणुरूवं वा, कुलसरिसं वा, जन्नं सागरदारए सूमालियं दारियं अदिट्ठदोसं पइवयं विप्पज हाय इहमागओ पहर्हि ग्विजणियाहि य कंटणियाहि य उवालभति, तए णं जिण., दत्ते सागरदत्तस्स एपमढे सोचा जेणेव सागरए दारए तेणेव उवा० २ सागरयं दारयं एवं व०-दुदु णं पुत्ता!' तुमे कयं सागरदत्तस्स गिहाओ इहं हव्वमागते, तेणं तं गच्छह णा तुमं पुत्ता! एवमवि गते सागरदत्तस्स गिहे; तते णं से सागरए.जिणदत्तं एवं व०-अवि यातिःअहं ताओ! गिरिपडणं-वा, तरुपडणं वा, मरुप्पवायं वा, जलप्पवेसं वा,विसमक्खणं घा; वेहाणसं वा,सत्योवाडणं वा, गिद्धापिटुं वा; पव्वळ वा,विदेसगमणं वा, अन्भुवगच्छिज्जामि नोरखलु अहंःसागरदत्तस्स गिहं गच्छिज्जा, तते ण से सागरदत्त सस्थवाहे कुइंतरिए। सागरस्सा एयमहूं-निसामतिर लजिए विलीए विडे जिणदत्तस्स गिहातो पडिनिक्खमई जेणेव सए गिहे। तेणेव उवा०' २ सुकुमालियंदारियं सद्दावेइ२,1 अंके निवेसेइ२, एवं व०-किण्णं तव पुत्ता ! सागरएणं १६-श्री- अपर० ज्ञाताध्यक सागर- दारकेण सह संबंधादि- वर्णन सूत्रम् । ॥२०१॥ ना तए । २०६ रत्ता में। ॥ २०९।।
दारपणं मुका?, अहं णं तुमं तस्स दाहामि जस्स णं तुम इट्टा जाव मणामा भविस्ससित्ति सुमालियं दारियं ताहि इहाहिं वाहि-समासासेइ २ पडिविसजेइ । त्तए। णं से सागरदत्ते सत्थ० अन्नया उपि आगासत- लगंसिसहनिसपणे रायमग्गं ओलोएमाणे २ चिट्ठति, ततेणं से सागरदत्ते एगं महं दमगपुरिसं पासई दंडिग्बंडनिवसणं खंडगमल्लगघडगहत्थगयं मच्छियासहस्सेहिं जाव अन्निजमाणमग्गं तते णं से सागरदत्ते, * कोइंघियपुरिसे सदावेतिर एवं व०-तुम्भेण देवा०! एवं दम्मगपुरिसं विउलेणं असण ४ पलोभेहिर, गिहं अणुप्पवैसेह २, खंडगमल्लगःखंडघडगं ते एगते एढेह २, अलंकारियकम्मं कारेह २, पहायं कयवलि जाव सवालंकारविभूसियं करेह २-मणुण्णं असण ४:भोयावेह २ ममा अंतियं उवणेह; तएणं कोडुंबियपुरिसा जाव : पडिसुणेति २ जेणेव से दमगपुरिसातेणेव उवा०.२.त्ता तं दमगं असणं उवप्पलोभेति २त्ता सयं गिहं अणुपवेसिंति २तं खंडगमल्लग खंडगघडगं च तस्स दमगपुरिसस्स एगते एडं ति, तते णं से दमगे तं खंडमल्लगंसि खंडघडगंसि य एगते एडिजमाणंसि महया २ सद्देणं आरसति, तए णं से सागरदत्ते तस्स दमगपुरिसस्स तं महया २ आरसियसई सोचा निसम्म कोडुबियपुरिसे एवं व०-किणं देवाणु० ! एस दमगपुरिसे महया २ सद्देणं आरसति ?, तते णं ते कोडंपियपुरिसा एवं व०-एस णं सामी! तंसि खंडमल्ल. गंसि ग्यंडघडगांस एगंते एडिज्नमाणंसि महया २ सद्देणं आरसड, तते णं से सागरदत्ते सत्थ० ते कोडं- यियपुरिसे एवं व०-मा णं तुम्भे देवा० ! एयस्स दमगरस-तं खंड जाव एडेह पासे-ठवेद जहा णं पत्तियं
नवाजी
५०१०
भीज्ञाता-
धर्मकयाने
भवति, तेवि तहेव ठविति; तए णं ते कोडुंबियपुरिसा तस्स दमगस्स अलंकारियकम्मं करेंति २ सयपा.
गसहस्सपागेहिं तिल्लेहिं अन्भंगेंति अभंगिए समाणे सुरभिगंधुव्वदृणेणं गायं उन्वदिति २ उसिणो-
दगगंधोदएणं सीतोदगेणं पहाणेति, पम्हलसुकुमालगंधकासाईए गायाई ल्हंति २ हंसलक्खणं पट्टसाडगं
परिहंति २, सव्वालंकारविभूसियं करेंति २, विउलं असण ४ भोयाति २ सागरदत्तस्स उवणेन्ति, तए
णं सागरदत्ते सूमालियं दारियं ण्हायं जाव सव्वालंकारभूसियं करित्ता तं दमगपुरिसं एवं व०-एस णं
देवा० मम धूया इट्टा एयं णं अहं तव भारियत्ताए दलामि भदियाए भद्दतो भविजासि, तते णं से दम
गपुरिसे सागरदत्तस्स एयमढे पडिसुणेति २ सूमालियाए दारियाए सद्धिं वासघरं अणुपविसति सूमा-
लियाए वा० सद्धिं तलिगंसि निवजह, तते णं से दमगपुरिसे सूमालियाए इमं एयारूवं अंगफासं पडि.
संवेदेति, सेसं जहा सागरस्स जाव सयणिज्जाओ अन्भुटेति २ वासघराओ निग्गच्छति२, खंडमल्लग
खंडघडं च गहाय मारामुक्के विव काए जामेव दिसं पाउन्भूए तामेव दिसं पडिगए, तते णं सा सूमा.
लिया जाव गए णं से दमगपुरिसे त्तिकटु ओहयमण जाव झियायति॥सूत्रम्-११८|| तते णं सा भद्दा कल्लं
पाउ० दासचेडिं सदावेति २ एवं क्यासी जाव सागरदत्तस्स एयमटुं निवेदेति, तते णं से सागरदत्ते तहेव
संमंते समाणे जेणेव वासहरे तेणेव उवा० २सूमालियं दारियं अंके निवेसेतिर एवं व-अहो णं तुम पुत्ता!
१६-श्री-
अपर०
ज्ञाताध्य
द्रमकेन
सह
संबंधादि-
वर्णन-
सूत्रम्।
५२१०॥
E
1.तिर वा प० ।
॥२१०॥
पुरापोराणेणं जाव पञ्चणुभवमाणी विहरसि तं मा णं तुमं पुत्ता! ओहयमण जाव झियाहि तुम णं पुत्ता, मम महाणसंसि विपुलं असणं ४ जहा पुट्टिला जाव परिभाएमाणी विहराहि; तते णं सा सूमालिया दारिया एयमé पडिसुणेति २ महाणसंसि विपुलं असण जाव दलमाणी विहरइ । तेणं कालेणं २ गोवा- लिपाओ अजाओ पहुस्सुयाओ एवं जहेव तेयलिणाए सुब्बयाओ तहेव समोसड्ढाओ तहेव संघाडओ जाव अणुपविढे तहेव जाव सूमालिया पडिलाभित्ता एवं वदासी-एवं खलु अन्जाओ! अहं सागरस्स अणिहा जाव अमणामा नेच्छइ णं सागरए मम नाम वा जाव परिभोगं वा, जस्स २ विय णं दिजामि तस्स २ विय णं अणिहा जाव अमणामा भवामि, तुम्भे य णं अन्जाओ! बहुनायाओ एवं जहा पुहिला जाव उपलद्धे जे णं अहं सागरस्स दार० इट्ठा कंता जाव भवेजामि, अजाओ तहेव भणंति तहेव साविया जाया तहेव चिंता तहेव सागरदत्तं सत्यवाहं आपुच्छति जाव गोवालियाणं अंतिए पव्वइया तते, णं सा सूमालिया अन्ना जाया ईरियासमिया जावे घंभयारिणी बहहिं चउत्थछट्ठम जाव विहरति, तते णं सा सूमालिया अन्ना अन्नया कयाइ जेणेव गोवालियाओ अन्जाओ तेणेव उवा० २ वंदति नमंसति २ एवं व०-इच्छामि णं अनाओ! तुम्भेहिं अन्भणुनाया समाणी चंपाओ वाहिं सुभूमिभागस्स उजाणस्स अदूरसामंते छह छटेणं अणिक्खित्तेणं तवोकम्मेणं सुराभिभुही आयावेमाणी विहरित्तए, तते णं ताओ १०वगुत्तबं० अ.
नवाणी- भीज्ञाता. धर्मकथाझे गोवालियाओ अजाओ सूमालियं एवं व०-अम्हे णं अज्जे ! समणीओ निग्गंथीओ ईरियासमियाओ जाव गुत्तयंभचारिणीओ नो वल अम्हें कप्पति पहिया गामस्स जाव सण्णिवेसरस वा छ8२ जाव विहरि अपरकङ्का- त्तए, कप्पति णं अम्हं अंतो उवस्सयस्सा यतिपरिक्खित्तस्स संघाडियद्धियाए पं समतलपतियाए आया. ज्ञाताध्य वित्तए, तते पं सा सूमालिया गोवालिया एयमद्वं नो सद्दहति, नो पत्तियइ, नो रोएति, एयमटुं अ०३ सुकुमालि. सुभूमिभागस्स उजाणस्स अदूरसामंते छ8 छटेणं जाव विहरति ॥ सूत्रम्-११९ ।। कादीक्षा- सुकुमालककोमलिकां-अत्यर्थ सुकुमारां, गजतालुसमानां, गजतालुकं हत्यर्थ सुकुमालं मरतीति, 'जुत्तं वा' इत्यादि दिजीवन- युक्त-मातं, 'पत्तंति प्राप्त प्राप्तकालं पात्रं वा गुणानामेप पुत्रः, श्लाघनीयं वा मदृशो वा संयोगो विवाहयोरिति, चर्या। 'से जहा नामए असिपत्तेइ वा' इत्यत्र यापस्कारणादिदं द्रष्टव्यं । ' करपत्तेह वा, खुरपत्तेइ वा, कलंयचीरिगापत्तेइ वा, सत्तिअग्गेति वा, कोतग्गेति वा, तोमरग्गेति वा, भिडिमालग्गेइ वा, सूचिकलावएति वा, पिच्छुपडं फेह था, कविकच्छूइ वा, इगा. लेइति वा, मुम्मरेति वा, अचीड वा, जालेइ वा, अलाएति वा, सुद्धागणीइ वा; भवेतारूवे , नो इणद्वे ममढे, एत्तो अणिट्ठः तराए चेर, अकंतराए चेव, अप्पियतराए चेर, अमणुनतराए चेर, अमणामतराए चेर 'त्ति तत्रासिपत्रं-खड़ा, करपत्रं-कचं, क्षुरपत्र-छुरः, कदमचीरिकादीनि लोकरूयाऽवसेयानि, वृश्चिकडकः-वृश्चिककण्टका, कपिकच्छु-खर्जुकारी वनस्पतिविशेषः, अङ्गारो-पिज्वालोऽग्निकणः, मुर्मुर:-अग्निकणमिश्र भस्म, अर्चिः-इन्धनप्रतिबद्धा घाला जाला तु-इन्धनच्छिन्ना अलात- उल्मुकं, शुद्धामि:-अयस्पिण्डान्तर्गतोऽमिरिति — अकामए 'ति अकामको-निरमिलापः, 'अवस्सवसे 'त्ति अपस्ववसा, । ॥ २११ ॥ HI - . . . अपगतारमतन्त्रत्व इत्यर्थः, 'तलियंसि निवजाति तल्पे-शयनीये निपद्यते-शेते 'पइंवय ति पति-मर्तारं व्रत- यति-तमेवाभिगच्छामीत्येवं नियमं करोतीति पतिव्रता, पतिमनुरक्ता-मर्चार प्रति रागवतीति, 'मारामुकेविव काए त्ति मार्यन्ते प्राणिनो यस्यां शालायां सा मारा-शूना तस्या मुक्तो ग स मारामुक्तो माराद्वा-मरणान्मारकपुरुषाद्वा मुक्तो- विच्छुटितः काको वायसः, 'बहुपरस्स 'त्ति वधूश्च वरथ वधूवरं तस्य, 'कुलाणुरूचं 'ति कुलोचितं वणिजां वाणिज्य. मिव 'कुलसरिसं 'ति श्रीमदणिजां रत्नवाणिज्यमिय ‘अदिट्टदोसपडियं 'ति न दृष्टे-उपलभ्यस्वरूपे दोपे-दपणे पविता-समापना अदृष्टदोपपतिता तां, ' खिजणियाहिं 'ति खेद क्रियामिः रुण्टनकादिभि:-रुदितक्रियाभिः, 'मरुप्प- वायं वत्ति निर्जलदेशप्रपातं ' सत्योवाडणं 'ति शस्त्रेणावपाटन-विदारणमात्मन इत्यर्थः, 'गिद्धपढें 'ति गृध्रस्पृष्टं- गूधैः स्पर्शन कडेवराणां मध्ये निपत्य गृधेरात्मनो भक्षणमित्यथा, ' अन्भुवेजामि 'ति अभ्युपैमि, 'पुरा पोराणाण मित्यत्र यावत्करणादेवं द्रष्टव्यं 'दुचिण्णाणं दुप्परकंत्ताणं कडाणं पावाणं कम्माण पावगं फलवित्तिविसेसं ति अयमर्थ:- 'पुरा पोराणाण' मित्यत्र यावत्करणादेवं द्रष्टव्यं 'दुचिण्णाणं दुप्परकंताणं कडाणं पावाणं कम्माणं पावगं फलविचिविसेस'ति अयमर्थ:-पुरा-पूर्वमयेपु, पुराणानां अतीतकालभाविनां तथा दुश्वीण-दुवरित मृपावादनपारदार्यादि तद्धतुकानि कर्माण्यपि दुधीर्णानि व्यपदिश्यन्ते अतस्तेपामेव दुष्पराक्रान्तानां नवरं दुष्पराक्रान्तं-प्राणिघातादत्तापहारादिकृतानां प्रकृत्यादिभेदेन, पुराशब्दस्यह सम्बन्धः, पापानां-अपुण्यरूपाणां, ' कर्मणां' ज्ञानावरणादीनां, पापकं-अशुभं 'फलवृत्तिविशेष' उदय- वर्तनमे, 'प्रत्यनु भवन्ती'-वेदयन्ती, 'विहरसि'-वर्चसे, ' कप्पइ णं अम्हं' इत्यादि 'अम्हं 'ति अस्माकं मते - नवाङ्गी- ०१० भीझाता- धर्मकथाझे अपरका ज्ञाताध्य. देवदत्ता- गणिकादि- स्वरूपम्। ५२१२ ॥ प्रबजिताया इति गम्यते, अन्तः-मध्ये 'उपाश्रयस्य' वमतेत्तिपरिक्षिप्तस्य परेपामनालोकवत इत्यर्थः, 'संघाटी' नियन्थि- कापच्छदविशेषः सा बद्धा-निवेशिता काये इति गम्यते यया सा संघाटीबद्धिका तस्याः, णमित्यलकारे समतले द्वयोरपि भुपि विन्यस्तत्वात् पदे-पादौ यस्याः सा समतलपदिका तस्या : आतापयितुं' आतापनां कत्तुं कल्पते इति योगः ॥११९॥ तत्थ ण चंपाए ललिया नाम गोट्ठी परिवसति, नरवइदिपणवि(प)यारा अम्मापिइनिययनिप्पिवासा वेसविहारकयनिकेया नाणाविहअविणयप्पहाणा अड्डा जाव अपरिभूया, तत्थ णं चंपाए देवदत्ता नाम गणिया होत्या, सुकुमाला जहा अंडणाए। तते णं तीसे ललियाए गोट्टीए अन्नया पंच गोहिल्लगपुरिसा देव- दत्ताए गणियाए सद्धिं सुभूमिभागस्स उमाणस्स उजाणसिरिं पञ्चणुभवमाणा विहरंति, तत्थ णं एगे गोहिल्लगपुरिसे देवदत्तं गणियं उच्छंगे धरति, एगे पिट्टओ आयवत्तं घरेइ, एगे पुप्फपूरयं रएइ, एगे पाए रएइ, एगे चामरुस्खेवं करेइ तते णं सा सूमालिया अजा देवदत्तं गणियं तेहिं पंचहि गोहिल्लपुरिसेहिं सद्धिं उरालाई माणुस्सगाई भोगभोगाई मुंजमाणीं पासति २ इमेयारूवे संकप्पे समुप्पज्जित्था-अहो णं इमा इत्थिया पुरा पोराणाणं कम्माणं जाव चिहरइ, तं जति ण केह इमस्स सुचरियस्स तवनियमवंभचेरवास. स्स कल्लाणे फलवित्ति विसेसे अस्थि तोणं अहमवि आगमिस्सेणं भवग्गहणेणं इमेयाख्वाइं उरालाइं जाव विहरिजामि त्तिक? नियाणं करेति २ आयावणभूमिओ पचोरुहति ॥ सूत्रम्-१२० ।। तते णं सा सूमालिया अन्ना सरीरयउसा जाया यावि होत्था, अभिक्खणं २ हत्थे धोवेइ, पाए धोवेइ, सीसं धोवेह, मुहं धोवेइ,थणं- मा २१२ ॥
तराई धोवेइ, कक्खंतराइंधोवेइ, गोज्झंतराइं धोवेइ; जत्थ णं ठाणं वा सेजं वा निसीहियं वा चेएति तत्थवि य णं पुवामेव उदएणं अन्मुक्खइत्ता ततो पच्छा ठाणं वा ३ चेएति, तते णं तातो गोवालियाओ अजाओ सूमालियं अज्ज एवं व०-एवं खलु देवा० ! अज्जे अम्हे समणीओ निग्गंथीओ ईरियासमियाओ जाव यंभ. चेरधारिणीओ, नो खलु कप्पति अम्हं सरीरवाउसियाए होत्तए, तुमं च णं अजे! सरीरयाउसिया अभि- क्खणं २ हत्ये धोयसि जाव चेदेसि, तं तुमं णं देवाणुप्पिए ! तस्स ठाणस्स आलोएहि जाव पडिवजाहि, तते णं सूमालिया गोवालियाणं अजाणं एयमद्वं नो आढाइनो परिजाणति अणादायमाणी अपरिजाणमाणी विहरति, तए णं ताओ अजाओ सूमालियं अजं अभिक्खणं २ अभिहीलंति जाव परिभवंति, अभि- क्खणं २ एयमद्वं निवारेंति, तते णं तीए सूमालियाए समणीहिं निग्गंथीहिं हीलिजमाणीए जाव वारिज. माणीए इमेयारूवे अभत्थिए जाव समुप्पजित्था, जया णं अहं अगारवासमज्झे वसामि तया णं अहं अप्पवसा, जया णं अहं मुंडे भवित्ता पव्वइया तया णं अहं परवसा, पुटिव च णं ममं समणीओ आढा. यंति २ इयाणि नो आदति २ तं सेयं ग्वल मम कल्लं पाउ० गोवालियाणं अंतियाओ पडिनिक्खमित्ता पाडिएक उवस्सगं उवसंपज्जित्ताणं विहरित्तए त्तिकद्दु, एवं संपेहेति २ कल्लं पा० गोवालियाणं अजाणं अंति- याओ पडिनिक्खमति २ त्ता पाडिएकं उवस्सगं उवसंपजित्ता णं विहरति, तते णं सा सूमालिया अजा अणोहदिया अनिवारिया सच्छंदमई अभिक्खणं २, हत्थे धोवेइ जाव चेएति; तत्थविय णं पासत्था पास-
नवाजी-
१००
भीज्ञाता-
धर्मकथाझे
-
॥२१३ ॥
स्थविहारी, ओसण्णा ओसण्णविहारी, कुसीला २ संसत्ता २ यहणि वासाणि सामण्णपरियागं पाउणति
अद्धमासियाए संलेहणाए तस्स ठाणस्स अणालोइय अपडिकंता कालमासे कालं किचा ईसाणे कप्पे अण्ण.
यरंसि विमाणंसि देवगणियत्ताए उववण्णा, तत्थेगतियाणं देवीणं नव पलिओवमाई ठिती पण्णत्ता, तत्थ
णं सुमालियाए देवीए नव पलिओवमाई ठिती पन्नत्ता। सूत्रम्-१२१ ।।
'ललिय'ति क्रीडाप्रधाना, गोहित्ति जनसमुदायविशेषः, 'नरवइदिन्नपयार'त्ति-नृपानुज्ञातकामचारा 'अम्मा-
पिइनियगनिप्पिवास'त्ति मात्रादिनिरपेक्षा 'वेसविहारकयनिकेय'त्ति वेश्याविहारेषु-वैश्यामन्दिरेपु कनो निकेतो-
निवामो यया मा तथा, 'नाणाविहअविणयप्पहाणा' कण्ठथे 'पुष्फपूरयं रपईत्ति पुष्पशेखरं करोति, 'पाए रएइ'
पादावलक्तादिना रञ्जयति, पाठान्तरे-'रावेईचि घृतजलाम्पामायति, 'सरीरवाउसियति वकुशः-शबलचरित्रः म च
शरीस्त उपकरणतश्चेत्युक्तं शरीखशा-तद्विभूपानुवर्जिनीति, 'ठरणति कायोमर्गस्थानं निपदनस्थानं वा शय्या-वरवर्तन,
'नैपेधिकी-स्वाध्यायभूमि चेतयति-करोति, 'आलोएहि जावे'त्यत्र यावत्करणात् 'निन्दाहि गरिहाहि पडिकमाहि विउ.
साहि विसोहेहि अकरणयाए अन्भुटेहि अहारिहं तवोकम्मं पायच्छित्तं पडिवजाहिति दृश्पमिति, तवालोचनं-गुरोनिवेदनं
निन्दनं-पश्चाचापो गईणं-गुरुसमक्षं निन्दनमेव प्रतिक्रमण-मिथ्यादुष्कृतदानलक्षण अकृत्यान्निवर्ननं वा वित्रोटन-अनुबन्ध-
छैदनं विशोधनं-व्रतानां पुनर्नवीकरणं शेष कण्ठयमिति, 'पडिएकंपति-पृथक, 'अणोहद्दिय'ति-अविद्यमानोऽपघट्नुको-
, ति २ ता अ. अ.
अपरका
ज्ञाताध्य.
सुकुमालि-
कांतिम-
जीवन-
चर्या।
ना
॥२१३॥
यदृच्छया प्रवर्गमानायाः हस्तग्राहादिना निवर्तको यस्या सा तथा, तथा नास्ति निवारको-मैवं कार्पोरित्येवं निषेधको पस्याः सा तथा ॥ १२०-१२१ ॥ तेणं कालेणं २ इहेव जंबुद्दीवे भारहे वासे पंचालेसु जणवएसु कंपिल्लपुरे नाम नगरे होत्था, धन्नओ, तत्व णं दुवए नामं राया होत्या, वन्नओ; तस्स णं चुलणी देवी धज्जुणे कुमारे जुवराया, तए णं सा सूमालिया देवी ताओ देवलोयाओ आउग्वएणं जाव चइत्ता इहेव जंबूद्दीचे २ भारहे वासे पंचालेसु जणवएसु कंपिल्लपुरे नयरे दुपयरस रणो चुलणीए देवीए कुच्छिसि दारियत्ताए पचायाया, तते णं सा चुलणी देवी नवण्हं मासाणं जाव दारियं पयाया, तते णं तीसे दारियाए निव्यत्तयारसाहियाए इमं एया- रूवं० नामं• जम्हा णं एम दारिया दुवयस्स रण्णो धूया चुलणीए देवीए अत्तिया तं होउ णं अम्हं इमीसे दारियाए नामधिजे दोवई, तए णं तीसे अम्मापियरो इमं एयारूवं गुण्णं गुणनिप्फन्नं नामधेचं करिति दोवती, तते णं मा दोबई दारिया पंचधाइपरिग्गहिया जाव गिरिकंदरमल्लीण इव चंपगलया निवायनि- व्यापासि सुहंसहेणं परिवड्डा । तते णं सा दोवई रायवरकन्ना उम्मुकबालभावा जाव उछिट्टसरीरा जाया यायि होत्या, तते णं तं दोवतिं रायवरकन्नं अण्णया कयाई अंतेउरियाओ पहायं जाव विभूसियं करेंति २ दुवयस्स रण्णो पायवंदिउं पेसंति, तते णं सा दोवती राय० जेणेव दुवए राया तेणेव उवाग. च्छइ २ दुवयस्स रपणो पायग्गहणं करेनि, तए णं से दुवए राया दोवति दारियं अंके निवेसेह २ दोवईए का
नवाजी.
भीज्ञाता-
धर्मकथाने
१६
अपरकका
ज्ञाताध्य०
सुमालि-
कादेवी-
च्यवनम् ।
॥२१४॥
रायवरकन्नाए रूवेण य जोवणेण य लावणेण य जायविम्हए दोवई रायवरकन्नं एवं व०-जस्स णं अहं
पुत्ता ! रायस्स वा जुवरायस्स वा भारियत्तार सयमेव दलइस्सामि, तत्थ णं तुमं सुहिया वा दुक्खिया
वा भविजासि, तते णं ममं जावजीवाए हिययडाहे भविस्सइ, तं णं अहं तव पुत्ता ! अज्जयाए सयंवरं
विरयामि, अजयाए णं तुम दिपणं सयंवरा जेणं तुम सयमेव रायं वा जुवरायं वा वरेहिसि से णं तव
भत्तारे भविस्सइ त्तिक? ताहिं इट्ठाहिं जाव आसासेइ २ पडिविसलेइ ॥ सूत्रम्-१२२ ॥ तते णं से दुवए
राया दूयं सहावेति २ एवं व०-गच्छह णं तुमं देवा ! चारवई नगरि तत्थ णं तुमं कण्हं वसुदेवं समुद्द-
विजयपामोक्खे दस दसारे, बलदेवपामुक्वे पंच महावीरे, उग्गसेणपामोक्खे सोलस रायसहस्से, पज्जुण्ण-
पामुक्खाओ अद्भुट्ठाओ कुमारकोडीओ, संवपामोक्खाओ सहि दुइंतसाहस्सीओ, वीरसेणपामुक्खाओ
इकवीसं वीरपुरिससाहस्सीओ, महसेणपामोक्खाओ छप्पन्नं वलवगसाहस्सीओ, अन्ने य घवे राईसरतल-
वरमार्डवियकोडंवियइन्भसिडिसेणावइसत्यवाहपभिइओ करयलपरिग्गहिये दसनहं सिरसावत्तं अंजलि
मत्यए कहु जएणं विजएणं वद्धावेहि २ एवं वयाहि-एवं खलु देवाणुपिया! कंपिल्लपुरे नयरे दुवयस्स
रण्णो धूयाए चुल्लणीए देवीए अत्तयाए धट्ठज्जुणकुमारस्स भगिणीए दोवईए रायवरकण्णाए सयंवरे भवि-
स्सइ, तंणं तुम्भे देवा० ! दुवयं रायं अणुगिण्हेमाणा अकालपरिहीणं चेव कंपिल्लपुरे नयरे समोसरह; तए
णं से दूए करयल जाव कटु दुवयस्स रपणो एयमé पडिसुणेति २ जेणेव सए गिहे तेणेव उवागच्छह २
॥ २१४॥
फोर्बुवियपुरिसे सदावेइ २ एवं य०-सिप्पामेव भो देवाणुप्पिया! चाउग्घंटं आसरह जुत्तामेव उवहवेह जाव उवट्ठवेंति, तए णं से दूर पहाते जाव अलंकार० सरीरे चाउग्घंटे आसरहं दुरुहइ २, यहहिं पुरिसेहिं सन्नद्ध जाव गहियाऽऽउहपहरणेहिं सद्धिं संपरिबुडे कंपिल्लपुरं नगरं मज्झमज्झेणं निग्गच्छति, पंचाल. जणवयस्स मज्झमझेणं जेणेष देसप्पंते तेणेव उवागच्छइ, सुरद्वाजणवयस्स मज्झमझेणं जेणेव वार- वती नगरी तेणेव उवागच्छइ २, यारवई नगरि मज्झमझेणं अणुपविसइ २, जेणेव कण्हस्स वासुदेवस्स पाहिरिया उवहाणसाला तेणेव उवागच्छइ २त्ता, चाउग्घंटे आसरहं ठवेइ २, रहाओ पचोरुहति २, मणुस्स- वग्गुरापरिक्खित्ते पायचारविहारचारेण जेणेव कण्हे वासुदेवे तेणेव उवा० २, कण्हं वासुदेवं समुद्दविजय- पामुक्खे य दस दसारे जाव पलवगसाहस्सीओ करयल तं चेव जाव समोसरह । तते णं से कण्हे वासु. देवे तस्स दूयस्स अंतिए एपमढे सोचा निसम्म हह जाव हियए तं दूयं सकारेइ सम्माणेइ २ पडिविस. बेइ । तए णं से कण्हे वासुदेवे कोडुबियपुरिसं सहावेइ एवं व०-गच्छह णं तुमं देवाणुप्पिया! सभाए सुहम्माए सामुदाइयं भेरि तालेहि, तए णं से कोडंबियपुरिसे करयल जाय कण्हस्स वासुदेवस्स एयमद्वं पडिसुणेति २, जेणेव सभाए सुहम्माए सामुदाइया मेरी तेणेव उवागच्छइ २,सामुदाइयं भेरि महया २, सणं तालेइ, तए णं ताए सामुदाइयाए भेरीए तालियाए समाणीए समुद्दविजयपामोक्खा दस दसारा जाव महसेणपामुक्खाओ छप्पण्णं पलवगसाहस्सीओ पहाया जाव विभूसिया जहा विभवइड्डिसकार
नवागी
भीडाता.
धर्मकयाले
अपरकङ्का
ज्ञाताध्य०
कृष्णवासु
देवादि-
निर्गमन-
समुदएणं अप्पेगइया जाव पायविहारचारेणं जेणेव कण्हे वासुदेवे तेणेव उवागच्छंति २ करयल जाव
कण्हं वासुदेवं जएणं विजएणं वदावेंति, तए णं से कण्हे वासुदेवे कोइंबियपुरिसे सहावेति २ एवं व०-
खिप्पामेव भो! देवाणुप्पिया! अभिसेक हत्थिरयणं पडिकप्पेह हयगय जाव पञ्चप्पिणंति, तते णं से
कण्हे वासुदेवे जेणेव मजणघरे तेणेव उवाग० २ समुत्तजालाकुलाभिरामे जाव अंजणगिरिकूडसन्निभं
गयवई नरवई दुरूदे, तते णं से कण्हे वासुदेवे समुद्दविजयपामुक्खेहिं दसहिं दसारेहिं जाव अणंगसेणा-
पामुक्खेहि, अणेगाहिं गणियासाहस्सीहिं सद्धिं संपुरिवुडे सब्बिड्डीए जाव रवेणं बारवइनयरि मज्झं-
मशेणं निग्गच्छइ २ सुरद्वाजणवयस्स मज्झमझेणं जेणेव देसप्पंते तेणेव उवागच्छइ २, पंचालजण-
वयस्स मज्झमज्झेणं जेणेय कंपिल्लपुरे नयरे तेणेव पहारेत्थगमणाए। तए णं से दुवए राया दोचं दूयं
सदावेइ २ एवं घ०-गच्छ णं तुम देवाणुप्पिया! हत्थिणाउरं नगरं तत्थ णं तुमं पंडुरायं सपुत्तयं जुहि-
हिलं, भीमसेणं, अज्जुणं, नउलं, सहदेवं, दुजोहणं भाइसयसमग्गं गंगेयं विदुरं दोणं जयदहं सउणी कीवं
आसत्थामं करयल जाव कटु तहेव समोसरह, तए णं से दूए एवं व०-जहा वासुदेवे नवरं भेरी नत्थि
जाव जेणेव कंपिल्लपुरे नयरे तेणेव पहारेत्थ गमणाए २ । एएणेव कमेणं तचं दूयं चंपानयरिं तत्थ णं तुम
कण्हं अंगरायं सेलं नंदिरायं करयल तहेव जाव समोसरह । चउत्थं दूयं सुत्तिमई नयरि तत्थ णं तुम
सिसुपालं दमघोससुयं पंचभाइसयसंपरिवुडं करपल तहेव जाव समोसरह । पंचमगं दूयं हत्थीसीसनयरं
स्वरूपम् ।
॥ २१५॥
तस्थ णं तुम दमदतं रायं करयल तहेव जाव समोसरह । छठें दूयं महुरं नयरिं तत्थ णं तुमं धरं रायं करयल जाव समोसरह । सत्तमं दूयं रायगिहं नगरं तत्थ णं तुम सहदेवं जरासिंधुसुयं करयल जाव समोसरह । अट्ठमं दूयं कोडिण्णं नयरं तत्य णं तुमं रूप्पि मेसगसुयं करयल तहेव जाव समोसरह । नवमं दूयं विराडनयरं तत्य णं तुमं कियगं भाउसयसमग्गं करयल जाव समोसरह । दसमं दूयं अवसे. सेसु य गामागरनगरेसु अणेगाइं रायसहस्साई जाव समोसरह । तए णं से दूर तहेव निग्गच्छद जेणेव गामागर जाव समोसरह । तए णं ताई अणेगाई रायसहस्साइं तस्स दूयस्स अंतिए एयमg सोचा निसम्म हढ० तं दूयं सकारेंति २, सम्माणेति २, पडिविसज्जिति; तए णं ते वासुदेवपामुक्खा वहवे रायसहस्सा पत्तेयं २ पहाया सन्नद्धहत्थिन्वंधवरगया हयगयरह महया भडचड़गररहपहकर० सएहिं २ नगरेहितो अभिनिग्गच्छंति २ जेणेव पंचाले जणवए तेणेच पहारेत्थ गमणाए ।। सूत्रम्-१२३ ।। तए णं से दुवए राया कोडुंबियपुरिसे सद्दावेइ २ एवं २०-गच्छह णं तुम देवाणु० ! कपिल्लपुरे नयरे पहिया गंगाए महानदीए अदूरसामंते एग महं सयंवरमंडवं करेह अणेगखंभसयसन्निविडं लीलद्वियसालभंजिआगं जाय पचप्पिणंति, तए णं से दुवए राया कोडुंबियपुरिसे सद्दावेइ २ एवं वयासी-खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया! वासुदेव- पामुक्खाणं पहणं रायसहस्साणं आवासे करेह, तेवि करेत्ता पचप्पिणति; तए णं दुवए वासुदेवपामु क्खाणं पहूर्ण रायसहस्साणं आगमं जाणेत्ता पत्तेयं २ हत्थिखंधजावपरिबुडे अग्धं च पज्जं च गहाय
नवाङ्गी-
१०१०
थीमाता-
धर्मकथाने
॥२१३॥
सव्यिड्डिए कंपिल्लपुराओ निग्गच्छइ २ जेणेव ते वासुदेवपांमुक्खा वहवे रायसहस्सा तेणेव उवागच्छद २,
ताई वासुदेवपामुक्खाई अग्घेण य पजेण य सकारेति सम्माणेइ २ तेसिं वासुदेवपामुक्खाणं पत्तेयं २
आवासे चियरति, तए णं ते वासुदेवपामोक्खा जेणेव सया २ आवासा तेणेच उवा० २ हत्थिखंधाहितो
पयोरुहंति २ पत्तेयं खंधावारनिवेसं करेंति २ सए २ आवासे अणुपविसंति २, सएसु २, आवासेस
आसणेसुयसपणेसु य सन्निसन्ना य संतुपट्टा य यहहिं गंधब्वेहि य नाडएहि य उवगिजमाणा य उवणचिज-
माणा य विहरंति, तते णं से दुवए राया कंपिल्लपुरं नगरं अणुपविसति २ विउलं असण ४ उवक्खडावेइ
२ कोईवियपुरिसे सदावेइ २ एवं व०-गच्छह णं तुम्भे देवाणुप्पिया! विउलं असणं ४ सुरं च मजं च मंसं
च सीधुं च पसणं च सुपहुपुप्फवत्थगंधमल्लालंकारं च वासुदेवपामोक्खाणं रायसहस्साणं आवासेसु
साहरह, तेवि साहरंति, तते णं ते वासुदेवपामुक्खा तं विपुलं असणं ४ जाव पसन्नं च आसाएमाणा ४
विहरंति, जिमियमुत्तुत्तरागयाविय णं समाणा आयंता जाय सुहासणवरगया बहहिं गंधव्वेहिं जाव
विहरंति, तते णं से दुवए राया पुव्यावरणहकालसमयंसि कोडुबियपुरिसे सद्दावेइ २त्ता, एवं व०-गच्छहं
णं तुमे देवाणुप्पिया! कंपिल्लपुरे संघाडग जाव पहे वासुदेवपामुक्खाण य रायसहस्साणं आवासेसु
हत्यिसंघवरगया महया २, सद्देणं जाव उग्घोसेमाणा २, एवं वदह-एवं खलु देवाणु० कलं पाउ० दुवयस्स
रण्णो धूयाए चुलणीए देवीए अत्तयाए घट्ठज्जुणस्स भगिणीए दोवईए रायवरकण्णाए सयंवरे भविस्सइ,
अपरकका-
ज्ञाताध्यक
वासुदेवा-
वासस्क-
धावारादि-
वर्णनम् ।
॥२१६॥
तं तुन्भे गं देवा० ! दुवयं रायाणं अणुगिण्हेमाणा व्हाया जाय विभूसिया हत्थिखंधवरगया सकोरंट. सेयवरचामर० हयगयरह० महया भडचरगरेणं जाच परिक्खित्ता जेणेव सयंवरमंडवे तेणेव उवा०२ पत्तेयं नामंकेसु आसणेसु निसीयह २ दोबई रायकण्णं पडिवालेमाणा २ चिट्ठह, घोसणं घोसेह २ मम एयमाणत्तियं पचप्पिणह, तए णं ते कोडंविया तहेव जाव पञ्चप्पिणंति, तए णं से दुवए राया कोडुविय. पुरिसे सद्दा०२ एवं व०-गच्छह णं तुन्भे देवाणु ! सयंवरमंडपं आसियसंमजिओवलित्तं सुगंधवरगंधियं पंचवण्णपुष्फपुंजोवयारकलियं कालागरुपवरकुंदुरुफतुरुमजाव गंधवटिभूयं मंचाइमंचकलियं करेह २ वासुदेवपामुक्रवाणं यहूर्ण रायसहस्साणं पत्तेयं २ नामंकाई आसणाई अत्थुयपचत्युयाई रएह २ एयमाण- त्तियं पचप्पिणह, तेवि जाव पचप्पिणंति, तते णं ते वासुदेवपामुक्खा बहवे रायसहस्सा कलं पाउ० पहाया जाव विभूसिया हत्थिखंधवरगया सकोरंट० सेयवरचामराहिं हयगय जाव परिवुडा सव्विड्डीए जाव रवेणं जेणेव सयंवरे तेणेव उवा० २ अणुपविसंति २ पत्तेयं २ नामंकेसु निसीयंति दोवई रायवर- कण्णं पडिवालेमाणा चिट्ठति, तर णं से पंडुए राया कलं पहाए जाव विभूसिए हत्थिखंधवरगए सकोरंट. हयगय० कंपिल्लपुरं मझमज्झेणं निग्गच्छति जेणेच सयंवरामंडवे जेणेव वासुदेवपामुक्खा बहवे राय- सहस्सा तेणेव उवा० २ तेसिं वासुदेवपामुक्खाणं करयल० पद्धावेत्ता कण्हस्स वासुदेवस्स सेयवरचामरं गहाय उववीयमाणे चिट्ठति ॥ सूत्रम्-१२४ ॥ तए णं सा दोवई रायवरकन्ना जेणेव मजणघरे तेणेव उवा. शा० ३७ भीजावा- नवाणी- गण्इ २ पहाया कययलिकम्मा कयकोउयमंगलपायच्छित्ता सुद्धप्पावेसाई मंगल्लाई वत्थाई पवर १६ १०० परिहिया मजणघराओ पडिनिस्खमइ २ जेणेव जिणघरे तेणेव उवागच्छह २ जिणघरं अणुपविसइ २ अपरकङ्का जिणपडिमाणं आलोए पमाणं करेइ २ लोमहत्वयं परामुसह एवं जहा सूरियाभो जिणपडिमाओ अचेइ २ ज्ञाताध्य० धर्मकयाने तहेव भाणियन्वं जाव पूर्व डहइ २ वामं जाणुं अञ्चेति दाहिणं जाणुं धरणियलंसि णिवेसेति २ तिक्खुत्तो जिन- मुद्धाणं धरणियलंसि नमेइ २ ईसिं पच्चुण्णमति करयल जाव कडु एवं वयासी-नमोऽत्थुणं अरिहंताणं १ प्रतिमा- ०२१७॥ भगवंताणं जाव संपत्ताणं बंदइ नमंसह २ जिणघराओ पडिनिक्खमति २ जेणेव अंतेउरे तेणेव वन्दनादि- उवागच्छइ ।। सूत्रम्-१२५ ॥ स्वरूपम् । 'अजयाए'त्ति अयप्रभृति, 'अग्धं चत्ति अर्घ पुष्पादीनि पूजाद्रव्याणि, 'पज्जं च'ति पादहितं पाय-पादप्रक्षालन- लेहनोद्वर्तनादि, मद्यमीधुप्रसन्नाख्याः सुराभेदा एव, 'जिणपडिमाणं अचणं करेइ 'त्ति एकस्यां वाचनायामेतावदेव दृश्यते, वाचनान्तरे तु 'व्हाया जार मन्यालंकारविभूसिया मजणघराओ पडिनिक्समह २ जेणामेर जिणघरे तेणामेव उगगच्छति २ जिणघर अणुपविसइ २ जिणपडिमाणं आलोए पणामं करेह २ लोमहत्थयं परामुसइ २ एवं जहा सूरियाभो जिणपढिमाओ अचेति तहेर माणियन्य जाय धूर उहइ'त्ति इह याप्रकरणात् अर्थत् इदं दृश्य-लोमहस्तकेन जिनप्रतिमाः प्रमाष्टिं सुरभिणा गन्योदकेन नपयति गोशीर्पचन्दनेनानुलिम्पति वस्त्राणि निवासयति, ततः पुष्पाणा माल्याना-प्रथिताना- । मित्यर्थः, गन्धानां चूर्णानां वस्त्राणामामरणानां चारोपणं करोति स्म, मालाकलापानलम्बनं पुष्पप्रकर तन्दुलैदर्पणायष्टमङ्ग ॥ २१७।। ( . लालेखनं च करोति, 'वाम जाणु अञ्चेहति उस्क्षिपतीत्यर्थः, दाहिणं जाणु धरणीतलंमि निहह-निहत्य स्थापयित्वे- त्यर्थः, 'तिक्खुत्तो मुदाणं धरणीतलंसि निवेसेइ-निवेशयतीत्यर्थः, 'ईसिं पच्चुन्नमति २ करतलपरिग्गहियं अंजलिं मत्थए कडु एवं वयासी-नमोत्यु णं अरहताण जाव संपत्ताणं वंदति नमंसति २ जिणधराओ पडि- निक्रसमइति तम वन्दते चैत्यवन्दनविधिना प्रसिद्धेन नमस्पति पश्चात् प्रणिधानादियोगेनेति वृद्धाः, न च द्रौपद्याः प्रणिपातदण्डकमात्र चैत्यवन्दनमभिहितं सूत्रे इति सूत्रमानप्रामाण्यादन्यस्यापि श्रावकादेस्तावदेव तदिति मन्तव्यं, परिता- नुवादरूपत्वादस्य, न च चरितानुपादयचनानि विधिनिषेधमाधकानि भवन्ति, अन्यथा सरिकामादिदेववक्तव्यतायां बहूनां शखादिवस्तूनामर्चनं थूयते इति तदपि विधेयं स्यात् , फिश्च-अविरतानां प्रणिपातदण्डकमात्रमपि चैत्यवन्दनं सम्मापते, यतो वन्दते नमस्पतीति पदद्वयस्य वृद्धान्तरव्याख्यानमेवमुपदर्शितं जीवाभिगमवृत्तिकृता-"विरतिमतामेन प्रसिद्ध चैत्यवन्दनविधिर्भवति, अन्येषां तथाऽभ्युपगमपुरस्सरकायोत्सर्गासिद्धेः, ततो वन्दते सामान्येन नमस्करोति आशययुद्धेः प्रीत्युत्थानरूपनमस्कारेणे'ति किञ्च-"ममणेण मावएण य अवस्स कायदयं हवइ जम्हा । अंतो अहो निसिस्म य वम्हा आवस्मयं नाम ॥ ॥१॥" तथा "जणं ममणो वा समणी वा सारओ ना सानिया या तचित्ते तल्लेसे तम्मणे उमओ कालं आवस्मए चिट्ठति तन्न लोउत्तरिए मावावस्मए" [श्रमणेन श्रावकेण चावश्यं कर्तव्यं भवति यस्मात् । अन्तरहो 'निशायाश्च तस्मादावश्यकं नाम ॥ १ ॥ यत् श्रमणो वा श्रमणी वा श्रावको वा श्राविका वा तचित्तः तन्मना: तल्लेश्य: उमयस्मिन् काले आवश्यकाय तिष्ठति तत् लोकोत्तरिक मानावश्यकं] इत्यादेरनुयोगद्वारवचनात् । तथा 'मम्यग्दर्शनः y नवाणी- भीवाता धर्मकथाने ॥२१८॥ मम्पन्नः प्रवचनमक्तिमान् पविषावश्यकनिरतः पट्स्थानयुक्तच श्रावको भवती 'त्युमास्वातिवाचकवचनाच आवकस्य पद्विधावश्यकस्य सिद्धावावश्यकान्तर्गतं प्रसिद्धं चैत्यवन्दनं मिद्धमेव भवतीति ॥ १२५ ॥ तते णं से दोवई रायवरकन्नं अंतेउरियाओ सव्वालंकारविभूसियं करेंति किं ते ? वरपायपत्तणेउरा जाव चेडियाचकवालमयहरगविंदपरिक्खित्ता अंतेउराओ पडिणिक्खमति २ जेणेव बाहिरिया उवट्ठाण- साला जेणेव चाउग्घंटे आसरहे तेणेव उवा० २ किड्डावियाए लेहियाए सद्धिं चाउग्घंटं आसरहं दूरूहति, तते णं से धट्ठज्जुणे कुमारे दोवतीए कण्णाए सारत्थं करेति, तते णं सा दोवती रायवरकण्णा कंपिल्लपुरं नयरं मझमझेणं जेणेव सयंवरमंडवे तेणेव उवा० २ रहं ठवेति रहाओ पचोरहति २ किड्डावियाए लेहियाए य सद्धिं सर्यवरं मंडपं अणुपविसति करयल तेसिं वासुदेवपामुक्खाणं बहणं रायवरसहस्साणं पणामं करेति, तते णं सा दोवती रायवर० एगं महं सिरिदामगंडं किं ते ? पाडलमल्लियचंपय जाव सत्त. च्छयाईहिं गंधद्धणि मुयंतं परमसुहफासं दरिसणिज्जं गिण्हति, तते णं सा किड्डाविया जाव सुरूवा जाव वामहत्थेणं चिल्ललगदप्पणं गहेऊण सललियं दप्पणसंकंतविंचं संदसिए य से दाहिणेणं हत्थेणं दरिसिए पवररायसीहे फुडविसयविसुद्धरिभियगंभीरमहुरभणिया सा तेसिं सब्वेसिं पत्थिवाणं अम्मापिऊणं वंस. सत्तसामत्थगोत्तविकंतिकतिवहुविहआगममाहप्परूवजोवणगुणलावण्णकुलसीलजाणिया कित्तणं करेइ, पढमं ताव पणिहपुंगवाणं दसदसारवीरपुरिसाणं तेलोकवलवगाणं सत्तुसयसहस्समाणावमहगाणं भव- अपरकहा- ज्ञाताध्य० कंपिल- पुरात द्रौपदीनि- र्गमनादि वर्णनसूत्रम् ॥२१८4 सिद्धिपवरपुंडरीयाणं चिल्ललगाणं यलबीरियरूवजोब्वणगुणलावन्नकित्तिया कित्तणं करेति, ततो पुणो उग्गसेणमाईणं जायवाण, भणति य-सोहग्गरूवकलिए परेहि वरपुरिसगंधहत्थीणं । जो हु ते होइ हिययदइओ, तते णं सा दोबई रायवरकन्नगा यहणं रायवरसहस्साणं मज्झमज्झेणं समतिच्छमाणी २ पुवकयणियाणेणं चोइनमाणी २ जेणेय पंच पंडवा तेणेव उवा० २ ते पंचपंडवे तेणं दसवण्णेणं कुसुमदाणेणं आवेढियपरिवेढियं करेति २ त्ता एवं वयासी-एए णं मए पंच पंडवा वरिया, तते णं तेसि वासुदेवपामोक्खाणं यहूणि रायसहस्साणि महया २ सद्देणं उग्घोसेमाणा २ एवं वयंति-सुवरियं खलु भो! दोवइए रायवरकन्नाए २ त्तिक१ सयंवरमंडवाओ पडिनिक्खमंति २, जेणेव सया २ आवासा तेणेव उवा०, तते णं धज्जुण्णे कुमारे पंच पंडवे दोवर्ति रायवरकण्णं चाउग्घंटं आसरहं दूरूहति २ ता कंपिल्लपुरं मझमज्झेणं जाव सयं भवणं अणुपविसति, तते णं दुवए राया पंच पंडवे दोवई रायवरकण्णं पद्दयं दुरूहेति २ सेयापीएहिं कलसेहिं मज्जावेति २ अग्गिहोम कारवेति पंचण्हं पंडवाणं दोवतीए य पाणिग्गहणं करावेद, तते णं से दुवए राया दोवतीए रायवरकण्णयाए इमं एयारूवं पीतिदाणं दलयती, तंजहा-अट्ट हिरण्णकोडीओ जाव अह पेसणकारीओ दासचेडीओ, अण्णं च विपुलं घणकणग जाव दलयति तते णं से दुवए राया ताई वासुदेवपामोक्खाइं विपुलेणं असण ४ वत्थगंध जाव पडिविसज्जेति सूत्रम्-१२६॥ तते णं से पंडू राया तेसिं वासुदेवपामोक्खाणं पहणं रा० करयल एवं व०-एवं खलु देवा !
नवाङ्गी- १०पू० श्रीज्ञाता धर्मकथा) हत्यिणाउरे नयरे पंचण्हं पंडवाणं दोवतीए य देवीए कल्लाणकरे भविस्मति तं तुन्भे णं देवा.! ममं अणुगिण्हमाणा अकालपरिहीणं समोसरह, तते णं वासुदेवपामोक्खा पत्तेयं २ जाय-पहारत्व गमणाए । तते णं से पंडराया को९वियपुरिसे सदा० एवं व०-गच्छह णं तुम्भे देवा! हत्धिणाउरे पंचण्हं पंडवाणं पंच पासायवर्टिसए कारेह अभुग्गयमसिय वपणओ जाव पडिरूवे, तते णं ते फोटुंबियपुरिसा पडि- सुणेति जाव करावेंति, तते णं से पंडए पंचहिं पंडवेहिं दोबईए देवीए सद्धिं हयगयसंपरिबुडे कंपिल्ल. पुराओ पडिनिक्खमइ २ जेणेव हत्थिणाउरे तेणेव उवागए, तते णं से पंडुराया तेमि वासुदेवपामो- क्खाणं आगमणं जाणित्ता कोडंवि० सदावेद २ एवं व०-गच्छह णं तुम्भे देवाणुप्पिया! हत्धिणाउरस्स नयरस्स बहिया वासुदेवपामोक्खाणं यहणं रायसहस्साणं आवासे कारेह अणेगखंभसय तहेव जाव पञ्चप्पिणंति, तते णं ते वासुदेवपामोक्खा यहवे रायसहस्सा जेणेव हथिणाउरे तेणेव उवागच्छति, तते णं से पंडराया तेसिं वासुदेवपामोक्खाणं आगमणं जाणित्ता हतुहे पहाए कपपलि० जहा दुपए जाव जहारिहं आवासे दलयति, तते णं ते वासुदेवपा० यहवे रायसहस्सा जेणेव सपाई २ आवासाई तेणेव उवा तहेव जाव विहरंति, तते णं से पंडुराया हत्थिणाउरं णयरं अणुपविसति २ कोडुबिय० सद्दावेति २ एवं व०-तुम्भे गं देवा० । विउलं असण ४ तहेव जाव उवणेति, तते णं ते वासुदेवपामोक्ग्वा यहवे राया 185 एतदन्तर्गत. पाठ. भ प्रतो नास्ति । । उवा० २, ता त. भ। अपरकका ज्ञाताच्या हस्तिनापु पाण्डरादि प्रवेशवर्णन सूत्रम् । ॥२१९ ॥२१९ 'पहाया कयवलिकम्मा तं विपुलं असणं तहेव जाव विहरंति, तते गं से पंडुराया पंच पंडवे दोवति च देवि पट्टयं दुरूहेति २ सीयापीएहिं कलसेहिं पहावेंति-२ कल्लाणकारं करेति २ ते वासुदेवपामोक्खे वह रायसहस्से विपुलेणं असण ४ पुप्फवत्येण सकारेति सम्माणेति जाव पडिविसजेति, लते णं ताई वासु- देवपामोक्खाइं बहुहिं जाय पडिगयाति ।। सूत्रम्-१२७॥ तते.णं ते पंच पंडवा दोवतीए देवीए सद्धिं अंतो अंतेउरपरियाल सद्धिं कल्लाकल्लिं वारंवारेणं ओरालातिं भोगभोगाई जाव विहरति. तते णं से पंडू राया अन्नया कयाई पंचहिं पंडवेहिं कोतीए देवीए दोवतीए देवीए य सद्धिं अंतो अंतेउरपरियाल सद्धिं संपरि- बुडे सीहासणवरगते यावि विहरति, इमं च णं कच्छुल्लणारए दंसणेणं अइभद्दए विणीए अंतो २ य कलु. सहियए मज्झत्थोवधिए य अल्लीणसोमपियदसणे सुरुवे अमइलसगलपरिहिए कालमियचम्मउत्तरासंग- रइययत्यो दण्डकमण्डलुहत्थे जडामउडदित्तसिरए जन्नोवइयगणेत्तियमुंजमेहलवागलधरे हत्थकयकच्छ. भीए पियगंधब्वे धरणिगोयरप्पहाणे संवरणावरणओवयणउप्पणिलेसणीसु य संकामणिअभिओग- पपणत्तिगमणीर्थभणीसु य पहुसु विजाहरीसु विज्जासु-विस्सुयजसे इहे रामस्स य केसवस्स य पज्जुन्न- पईवसंघअनिरुणिसढउम्पसारणगयसुमुहदुम्मुहातीण -जायवाणं अदुट्ठाण कुमारकोडीणं हिययदहए संधवए कलहजुद्धकोलाहलप्पिए भंडणाभिलासी बहुसु य समरसयसंपराएसु दंसणरए समंतओ कलह- मदविवर्ण अणुगवेसमाणे असमाहिकरे दसारवरवीरपुरिसतिलोकपलयगाणं आमंतेऊण तं भगवती एक- ६ १० वृ० भीड़ाता- धर्मकथाओं अपरकका झाताध्यक असंयत- ॥ २२०॥ मणि गगणगमणदच्छं उप्पडओ गगणमभिलंघयंतो गामागरनगरखेडकब्बडमडंबदोणमुहपद्दणसंवाहसह- स्समंडियं थिमियमेइणीतलं वसुहं ओलोइंतो रम्मं हथिणारं उवागए पंडुरायभवांसि अइवेगेण समो वइए, तते णं से पंडराया कच्छुल्लनारयं एजमाणं पासति २ पंचहिं पंडवेहि कुंतीए य देवीए सद्धि आस- णातो अन्भुट्टेति २ कच्छुल्लनारयं सत्तट्ठपयाई पच्चुग्गच्छइ २ तिक्खुत्तो आयाहिणपयाहिणं करेति २ दति णमंसति महरिहेणं आसणेणं उवणिमंतेति, तते णं से कच्छुल्लनारए उदगपरिफोसियाए दम्भोवरि- पचत्युयाए भिसियाए णिसीयति २ पंडुरायं रज्जे जाव अंतेउरे य कुसलोदंतं पुच्छह, तते णं से पंडराया कोतीदेवी पंच य पंडवा कच्छुछणारयं आढ़ति जाव पज्जुवासंति, तए णं सा दोवई कच्छुल्लनारयं अस्सं- जयं अविरयं अपडियपञ्चक्खायपावकम्मंतिक? नो आदाति नो परियाणइ नो अन्मुढेति नो पज्जु- वासति ।। सूत्रम्-१२८॥ तते णं तस्स कच्छुल्लणारयस्स इमेयारूवे अभथिए चिंत्तिए पथिए मणोगए संकप्पे समुप्पजित्था अहो णं दोवती देवी स्वेणं जाव लावण्णेण य पंचहिं पंडवेहिं अणुबद्धा समाणी ममं णो आढाति जाव नो पज्जुवासइ तं सेयं खलु मम दोवतीए देवीए विप्पियं करित्तएत्तिकद्दु एवं संपेहेति २ पड्डयरायं आपुच्छइ २ उप्पणि विनं आवाहेति २ नाए उक्किट्ठाए जाव विजाहरगईए लवण. समुई मज्झमझेणं पुरत्याभिमुहे वीइवतिउं पयत्ते यावि होत्या। तेणं कालेणं तेणं समएणं धायइसंडे दीवे पुरथिमद्धदाहिणड्डभरहवासे अवरकंका णाम रायहाणी होत्या, तते णं अमरकंकाए रायहाणीए पउ- प्रवेशादि- वर्णन- RAVAIL खत्रम् । ॥ २२० मणामे णाम राया होत्या महया हिमवंत यण्णओ, तस्स णं पउमनाभस्स रन्नो सत्त देवीसयाति ओरोहे होत्या, तस्स णं पउमनाभस्स रणो सुनामे नाम पुत्ते जुवरायायावि होत्या, तते णं से पउम- णामे राया अंतो अंतेउरंसि ओरोहसंपरिबुडे सिंहासणवरगए विहरति, तए णं से कच्छुल्लणारए जेणेव अमरकंका रायहाणी जेणेव पउमनाहस्स भवणे तेणेव उवागच्छति २ पउमनाभस्य रन्नो भवणंसि झत्ति वेगेणं समोयइए, तते णं से पउमनामे राया कच्छुल्लनारयं एजमाणं पासति २ आसणातो अन्मुट्ठति २ अग्घेणं जाय आसणेणं उवणिमंतेति, तए णं से कच्छुछनारए उदयपरिफोसियाए दवभोवरिपचत्युयाते मिसियाए निसीयह जाच कुसलोदंतं आपुच्छइ, तते णं से पउमनाभे राया णिअगओरोहे जायविम्हए फच्छुछणारयं एवं ०-तुम्भं देवाणुप्पिया! यहूणि गामाणि जाव गेहाति अणुपविससि, तं अत्यि- पाइं तं फहिंचि देवाणुप्पिया! एरिसए ओरोहे विठ्ठपुव्वे जारिसए णं मम ओरोहे , तते णं से कच्छु- छनारए पउमनामेणं रन्ना एवं बुत्ते समाणे ईसिं विहसियं करेइ २ एवं व०-सरिसे णं तुमं पउम. णामा तस्स अगडद रस्स, के णं देवाणुप्पिया से अगडददुरे १, एवं जहा मल्लिणाए एवं खलु देवा ! जंदीवे २ भारहे वासे हथिणाउरे दुपयस्स रण्णो धूया चुलणीए देवीए अत्तया पंडुस्स सुण्हा पंचण्हं पंडवाणं मारिया दोवती देवी रूपेण य जाव उफिट्टसरीरा दोवईए णं देवीए छिन्नस्सवि पायंगुढयस्स अयं तय ओरोहे सतिमंपि कलंण अग्घतित्तिकटु, पउमणाम आपुच्छति २ जाव पडिगए २, तते णं से पउम- नवाजी. पू०७० भीज्ञाता- धर्मकथाने ॥२२१ ॥ नाभे राया फच्छुल्लनारयस्स: अंतिए एयमढं सोचा णिसम्म दोवतीए देवीए रूवे य ३ मुच्छिए ४ दोवईए अझोववन्ने जेणेव पोसहसाला तेणेव उव० २ पोसहसालं.जाव पुव्वसंगतियं देवं एवं.२०-एवं ग्वल देवा० ! जंबुद्दीवे २ भारहे वासे हथिणाउरे जाव सरीरातं इच्छामि णं देवा ! दोवती देवी इहमाणियं, तते णं पुव्वसंगतिए - देवे पउमनाभं एवं व-नो खलु देवा० ! एयं भूयं वा भव्वं वा भविस्सं वा जणं दोवती देवी पंच पंडवे मोत्तूण अन्नेणं पुरिसेणं सद्धिं ओरालाति-जाव विहरिस्सति,-तहाविय णं अहं तवः पियट्टतयाए दोवती देवि इहं हव्वमाणेमि त्तिक१ पउमणाभं आपुच्छइ २ ताए-उकिटाए जाव लवणसमुई मज्झमज्शेणं जेणेव हथिणाउरे णयरे तेणेव पहारेत्थ गमणाए । तेणं-कालेणं २ हत्धिणाउरे जुहिहिल्ले राया दोवतीए सद्धिं उप्पि आगासतलंसि-सुहपसुत्ते याचि होत्या, तए णं से पुध्वसंगतिए देवे जेणेव जुहिहिल्ले राया जेणेच दोवती देवी तेणेव उवाग० २ दोवतीए-देवीए ओसोवणियं-दलयद २ दोवति देवि गिण्हह २ ताए उफिट्टाए जाव जेणेव अमरकंका जेणेव पउमणामस्स भवणे तेणेव-उवा०२ पउमणाभस्स भवणंसि असोगवणियाए दोवतिं देवीं ठावेड' र ओसोवणिं अवहरति २ जेणेव-पउमणाभे तिणेव उ० २ एवं व०-एस णं देवा ! मए हथिणाउराओ दोवती इह हव्वमाणीया तव असोगवणियाए चिट्ठति, अतो परं तुमं जाणसि त्तिक? जामेव दिसिं पाउन्भूए तामेव दिसि पडिगए । तते णं सा दोवई देवी ततो मुहुत्तंतरस्स पडिबुद्धार समाणी तं भवणं असोगवणियं च अपञ्चभिजाणमाणी एवं व० नो अपरकका ज्ञाताध्यक पद्मनाम समीपे नारदा- गमनादि वर्णन- सूत्रम् । ॥ २२१ खलु अम्हं एसे सए भवणे णो खलु एसा अम्हं सगा असोगणिया, तं-ण णज्जति णं अहं केणई देवेण या दाणवेण वा किंपुरिसेण वा किन्नरेण वा महोरगेण वा गंधब्वेण वा अन्नस्स रण्णो असोगवणियं साह रियत्तिकटु ओहयमणसंकप्पा जाव झियायतितते णं से पउमणाभे राया पहाए जाय सव्वालंकारभूसिए अंतेउरपरियालसंपरिबुडे जेणेव-असोगवणिया जेणेव दोवती देवी तेणेव उवा० २ दोवती देवीं ओहय. जावाझियायमाणी पासति २ ता एवं व०-किण्णं तुम देवा० । ओय जाव झियाहि ?, एवं खल तुम देवा० । मम पुब्वसंगतिएणं देवेणं जंबुद्दीवाओ २ भारहाओ वासाओ हत्थिणापुराओ नयराओ जुहि- हिल्लस रणो भघणाओ साहरिया तःमाणं तुमं देवा० ! ओहय० जावाझियाहि, तुम मए सद्धिं विपु- लाई भोगभोगाई जाव विहराहि, तते णं सा दोवती देवी पउमणाभं एवं व०-एवं खल देवा० जंबूद्दीवे २ भारहे वासे-यारवतिए णयरीए कण्हे.णामं वासुदेवे ममप्पियभाउए परिवसति, तं जति णं से छह मासाणं ममं कृवं नो हन्मागच्छइ तते णं अहं देवा ! जं तुमं वदसि तस्स आणाओवायचयणणिसे चिहिस्सामि, तते णं से पउमे दोवतीए एयमपडिसुणेत्ता २ दोवतिं देवि कण्णंतेउरे ठवेति, ततेसा दोवती देवी छठंछटेणं अनिक्खित्तेणं आयंबिलपरिग्गहिएणं तवोकम्मेणं अप्पाणं भावेमाणी विहरति ॥सूत्रम्-१२९॥ तते णं से जुहुहिल्ले राया तओ मुहुत्तरस्स पडिबुद्धे समाणे दोवतिं देवि पासे अपासमाणो, सयणिनाओ उढेइ २ ता दोवतीए देवीए सव्वओ समंता मग्गणगवेसणं करेइ २-त्ता-दोवतीए देवीए
अपरकक
श्रीज्ञाता.
धर्मकयाने
ज्ञाताध्य०
द्रोपदी.
हरणादि-
वर्णन-
॥२२२॥
कत्थए सुई वा खुइं या पत्ति वा अलभमाणे जेणेव पंडराया तेणेव उवा० २त्ता पंडरायं एवं व०-एवं
खलु ताओ ! ममं आगासतलगंसि पसुत्तस्स पासातो दोवती देवी ण णज्जति केणइ देवेण वा दाणवेण
वा किन्नरेण वा महोरगेण वा गंधव्वेण वा हिया वा णीया वा अवग्वित्ता वा ?, इच्छामि णं ताओ!
दोवतीए देवीए सव्वतो समंता मग्गणगवेसणं कयं, तते णं से पंडराया कोडंबियपुरिसे सद्दावेइ २एवं व०-
गच्छह णं तुन्भे देवा०ा हत्थिणाउरे नयरे सिंघाडगतियचउकचच्चरमहापहपहेसु महया २ सद्देणं उग्रोसे.
माणार एवं व०-एवं खलु देवा० ! जुहिदिल्लस्स रणो आगासतलगंसि सुहपसुत्तस्स पासातो दोवती देवी
ण णमति केणइ देवेण वा दाणवेण वा किंपुरिसेण वा किन्नरेण वा महोरगेण वा गंधव्वेण वा हिया वा
नीया वा अवक्खित्ता वा, तं जो णं देवाणुप्पिया! दोवतीए देवीए सुतिं वा जाव पवित्ति वा परिकहेति
तस्स णं पंडराया विउलं अत्थसंपयाणं दाणं दलपति त्तिकटु घोसणं घोसावेह २ एयमाणत्तियं पचप्पिणह,
तते णं ते कोदुपियपुरिसा जाव पचप्पिणंति तते णं से पंडू राया दोवतीए देवीए कत्थति सुई वा जाव
अलममाणे कोंती देवीं सहावेति २ एवं व०-गच्छह णं तुम देवाणु० यारवति णयरिं कण्णस्स वासुदेवस्स
णयमढ णिवेदेहि, कण्हे णं परं वासुदेवे दोवतीए मग्गणगवेसेणं करेजा, अन्नहा न नजइ दोवतीए देवीए
सुती या खुती वा पवत्ती वा उवल भेजा, तते णं सा कोंती देवी पंडुरण्णा एवं बुत्ता समाणी जाव
परिसुणे २ पहाया कयपलिकम्मा हत्थिखंघवरगया हथिणाउरं मझमझेणं णिग्गच्छह २ कुरु-
सूत्रम् ।
॥ २२२॥
जणवयं मझमझेणंजेणेव सुरद्वजणवए, जेणेच यारवतीणयरी, जेणेय अग्गुजाणे, तेणेच उवा० २ हस्थि- खंघाओ पचोरुहति २ कोडवियपुरिसे सहा०२ एवं व०-गच्छह णं तुम्भे देवा० । जेणेव बारवई णयरिं' बारवति णयरिं अणुपविसहर, कण्हें वासुदेवं करयल एवं वयह-एवं खलु सामी ! तुम्भं पिउच्छा कोंती देवी हथिणाउराओ नयराओ इह हव्यमागया तुम्भं दसणं कंखति, तते णं ते कोडंपियपुरिसा जाव कहेंति, तते णं कण्हे वासुदेवे कोडुंबियपुरिसाणं अंतिए सोचा णिसम्म हस्थिरखंधवरगए हयगय यार. वतीए य मज्झमझेणं जेणेव कोती देवी तेणेव उ० २, हत्यिखंधातो पचोरहति २, कोतीए देवीए पाय. गहणं करेति २, कोंतीए देवीए सद्धिं हत्यिखधं दुरूहति २, पारवतीए णयरीए मज्झंमज्झेणं जेणेव सए गिहे तेणेव उवा० २, सयं गिहं अणुपविसति । तते णं से कण्हे वासुदेव कोंती देवि पहायं कयवलिकम्म जिमियभुत्तुत्तरागपं जाव सुहासणवरगयं एवं ०-संदिसउणं पिउच्छा ! किमागमणपओयणं ?, तते सा कोंती देवी कण्हं वासुदेवं एवं व०-एवं खलु पुत्ता! हत्थिणाउरे णयरे जुहिदिल्लस्स आगासतले सुहः पमुत्तस्स दोवती देवी पासाओ ण णज्नति केणइ अवहिया जाव अवक्खित्ता वा, तं इच्छामि णं पुत्ता! दोवतीए देवीए मग्गणगवेसणं कयं, तते णं से कण्हे वासुदेवे कोंती पिउच्छि एवं व०- णवरं पिउच्छा! दोवतीए देवीए कत्थइ सुई वा जाव लभामि तो णं अहं पायालाओ वा भवणाओ वा अद्धभरहाओ वा I||* . xिxxxxxx अ अ। २८ नवासी भीड़ाता- पर्मकथा समंतओ दोवति साहत्थि उवणे मि त्तिक? कोंती पिउत्थि सकारेति सम्माणेति जाव पडिविसजेति, तते णं सा कोंती देवी कण्हेणं वासुदेवेणं पडिविसजिया समाणी जामेव दिसि पाउ० तामेव दिसि पडि० । तते णं से कण्हे वासुदेवे कोडंपियपुरिसे सदा० २ एवं व०-गच्छह णं तुन्भे देवा० ! बारवति एवं जहा पंडू तहा घोसणं घोसावेति जाव पचप्पिणंति, पंडुस्स जहा, तते णं से कण्हे वासुदेवे अन्नया अंतो अंते. उरगए ओरोहे जाव विहरति, इमं च णं कच्छुल्लए जाव समोवइए जाव णिसीइत्ता कण्हं वासुदेवं कुसलोदंतं पुच्छह, तते णं से कण्हे वासुदेवे कच्छुल्लं एवं व०-तुमं णं देवा० ! बहणि गामा जाव अणु. पविससि, तं अत्थि याई ते कहिंवि दोवतीए देवीए सुती वा जाव उवलद्धा १, तते णं से कच्छुल्ले कण्हं वासुदेवं एवं व०-एवं ग्वल देवा० ! अन्नया घायतीसंडे दीचे पुरथिमद्धं दाहिणभरहवासं अवरकंकाराय- हाणिं गए, तत्थ णं मए पउमनाभस्स रनो भवणंसि दोवती देवी जारिसिया दिट्टपुवा यावि होत्था, तते णं कण्हे वासुदेवे कच्छुलं एवं व०-तुम्भं चेव णं देवाणु०! एवं पुव्वकम्म, तते णं से कच्छुल्लनारए कण्हेणं वासुदेवेणं एवं वुत्ते समाणे उप्पयणि विजं आवाहेति २, जामेव दिसि पाउन्भूए तामेव दिसिं पडिगए, तते णं से कण्हे वासुदेवे दूयं सहावेइ २, एवं व०-गच्छह णं तुम देवा० ! हत्थिणारं पंडस्स रत्नो एपमहं निवेदेहि-एवं खलु देवाणु० ! धायइसंडे दीवे पुरच्छिमद्धे अवरकंकाए रायहाणीए पउमणाभ- भवर्णसि दोवतीए देवीए पउत्ती उवलद्धा, तं गच्छंतु पंच पंडवा चाउरंगिणीए सेणाए सद्धि संपुरिवुडा १६ अपरका ज्ञाताध्य वासुदेवस्य कुन्त्या सह वार्तालापा- दिसूत्रम् । २२३॥ ।। २२३॥
पुरस्थिमवेयालीए ममं पडिवालेमाणा चिटुंतु, तते णं से दूर जाव भणति, पडिवालेमाणा चिट्ठह, तेवि जाव चिट्ठति, तते णं से कण्हे वासुदेवे कोडंबियपुरिसे सद्दावेइ २ त्ता, एवं व०-गच्छह णं तुम्भे देवा ! सन्नाहियं मेरि ताडेह, तेवि तालेंति, तते णं तीसे सपणाहियाए भेरीए सई सोचा समुद्दविजयपामोक्खा दसदसारा जाव छप्पण्णं पलवयसाहस्सीओ सन्नद्वयद्ध जाव गहियाउहपहरणा अप्पेगतिया हयगया गयगया जाय वग्गुरापरिक्खित्ता जेणेव सभा सुधम्मा जेणेव कण्हे वासुदेवे तेणेवं २, करयल जाव यद्धाति, तते णं कण्हे वासुदेवे हथिखंधवरगए सकोरेंटमल्लदामेणं छत्तेणं० सेयवर० हयगय० महया भडचडगरपहकरेण पारवती णयरी मज्झमज्झेणं णिग्गच्छति, जेणेव पुरथिमवेयाली तेणेव उवा० २, पंचहिं पंडयेहिं सद्धि एगयओ मिलइ २, खंधावारणिवेसं करेति २, पोसहसालं अणुपविसति २, सुट्टियं देवं मणसि करेमाणे २, चिट्ठति, तते ण कण्हस्स वासुदेवस्स अट्ठमभत्तसि परिणममाणसि सुहिओ आगतो, भण देवा० ! जमए कायव्वं, तते णं से कण्हे वासुदेवे सुट्ठियं एवं व०-एवं खलु देवा० ! दोवती देवी जाच पउमनाभस्स भवणंसि साहरिया तणं तुमं देवा० ! मम पंचहिं पंडवेहिं सद्धिं अप्पछट्ठस्स छहं रहाणं लवणसमुद्दे मग्गं वियरेहि, जपणं अहं अमरकंकारायहाणी दोवतीए कूवं गच्छामि, तते णं से सुटिए देवे कण्हं वासुदेवं एवं वयासी-किण्हं देवा ! जहा चेव पउमणाभस्स रन्नो पुव्वसंगतिएणं पउवा । GE
नवाङ्गी-
भीशाता-
धर्मकयाते
॥२२४॥
देवेणं दोवती जाव संहरिया तहा चेव दोवतिं देवि घायतीसंडाओ दीवाओ भारहाओ जाव हृत्थिणापुर
साहामि, उदाहु पउमणाभं राय सपुरवलवाहणं लवणसमुद्दे पक्विवामि ?, तते णं कण्हे वासुदेवे
सुट्टियं देवं एवं व०-माणं तुमं देवा ! जाय साहराहि तुमं णं देवा० ! लवणसमुद्दे अप्पछट्टस्स छण्हं
रहाणं मग्गं वियराहि, सयमेव णं अहं दोवतीए कुवं गच्छामि, तए णं से सुहिए देवे कण्हं वासुदेवं एवं
वयासी-एवं होउ, पंचहिं पंडवेहिं सद्धिं अप्पछट्ठस्स छण्हं रहाणं लवणसमुद्दे मग्गं वितरति, तते णं से
फण्हे वासुदेवे चाउरंगिणीसेणं पडिविसजेति २, पंचहिं पंडवेहिं सद्धिं अप्पछट्टे छहिं रहेहिं लवणसमुद
मज्झमज्झेणं पीतीवयति २, जेणेच अमरकंका रायहाणी जेणेव अमरकंकाए अग्गुजाणे तेणेव उवागच्छह २,
रई ठवेड २, दारुयं सारहिं सद्दावेति एवं व०-गच्छह णं तुमं देवा०! अमरकंकारायहाणी अणुपविसाहि २,
पउमणामस्स रपणो वामेणं पारणं पायपीदं अक्कमित्ता कुंतग्गेणं लेहं पणामेहि तिवलियं भिउडि णिडाले
साहटु आसुरुत्ते गट्टे कुद्धे कुविए चंडिक्किए एवं य०-हं भो पउमणाहा! अपत्थियपत्थिया दुरंतपतलक्षणा
हीणपुनचाउद्दसा सिरीहिरिघीपरिवजिया अन्ज ण भवसि किनं तुम याणासि कण्हस्स वासुदेवस्स
भगिणि दोति देवि इहं हव्वं आणमाणे, तं एयमवि गए पञ्चप्पिणाहिणं तुम दोवतिं देवि कण्हरस वासु.
देवस्स अहव णं जुद्धसज्जे णिग्गच्छाहि, एस णं कण्हे वासुदेवे पंचहिं पंडवेहिं अप्पछठे दोवतीदेवीए कूवं
हव्यमागए, तते णं से दारुए सारही कण्हेणं वासुदेवेणं एवं वुत्ते समाणे हतुढे जाव पडिसुणेइ २,अमरकंका-
अपरकका
ज्ञाताध्य.
वासुदेवस्य
लवणं प्रति
गमनादि-
वर्णन-
सूत्रम् ।
॥ २२४॥
रायहाणि अणुपविसति २, जेणेव पउमनाहे तेणेव उवा० २, करयल जाव वद्वावेत्ता एवं व०-एस णं सामी! मम विणयपडिवित्ती इमा अन्ना मम सामिस्स समुहाणत्ति त्तिकटु आसुरुत्ते वामपाएणं पायपीदं अणुकमति २, कोतग्गेणं लेहं पणामति २ त्ता, जाव कूवं हव्वमागए, तते णं से पउमणामे दामणेणं सारहिणा एवं वुत्ते ममाणे आसुमत्ते तिवलिं भिउडिं निडाले साहटु एवं ०-णो अप्पिणामि णं अहं देवा० ! कण्हस्स पासुदेवस्म दोवति, एस णं अहं सयमेव जुज्झसजो णिग्गच्छामि त्तिक? दारुयं सारहिं एवं २०-केवलं भो! रायसत्येसु ये अवज्झे त्तिक? असकारिय असम्माणिय अवदारेणं णिच्छुभावेति, तते णं से दारुए सारही पउमणाभेणं असफारिप जाव णिच्छुढे समाणे जेणेव कण्हे वासुदेवे तेणेव उ० २, करयल. कण्हं जाव एवं च०-एवं खलु अहं सामी ! तुम्भं वयणेणं जाव णिच्छुभावेति, तते णं से पउमणाभे चलवाउयं सहावेति २ एवं ०-खिप्पामेव भो देवाणु ! आभिसेफ हत्विरयणं पडिकप्पेह, तयाणंतरं च णं छेया. यरियउयवेसमाविकप्पणाविगप्पेहिं जाव उवणेति, तते णं से पउमनाहे सन्नद्धः अभिसेयं० दूरूहति २, हयगय जेणेव कण्हे वासुदेव तेणेव पहारेत्य गमणाए, तते णं से कण्हे वासुदेवे पउमणाभं रायाणं एबमाणं पासति २, ते पंच पंडवे एवं य०-हं भो दारगा! किन्नं तुम्भे पउमनाभेणं सद्धि जुज्झिहिह उयाहु पेचिहिह ?, तते णं ते पंच पंडया कण्डं वासुदेवं एवं च०-अम्हे णं सामी! जुज्झामो तुम्मे पेच्छह, तते थे पंच पंडये सण्णद्ध जाय पहरणा रहे दुरूहंति २ जेणेच पउमनाभे राया तेणेव उ०२, एवं नवाङ्गी- १०१० भीज्ञाता- धर्मकथाझे अपरकहा- ज्ञाताध्य पबनामेण सहयुद्धकर- णादिवर्णन- ॥ २२५॥ व०-अम्हे पउमणाभे या राय त्तिकट्ठ पउमनाभेणं सद्धि संपलग्गा यावि होत्या, तते णं से पउमनाभे राया ते पंच पंडवे खिप्पामेव हयमहियपवरविवडियचिन्धद्धयपडागा जाय दिसोदिसिं पडिसेहेतित्ति, तते गं ते पंच पंडवा पउमनामेणं रना हयमहियपवरविवडिय जाव पडिसेहिया समाणा अत्थामा जाव अधारणिज्जत्तिक१ जेणेव कण्हे वासुदेवे तेणेय उवा०, तते णं से कण्हे वासुदेवे ते पंच पंडवे एवं व०- कहाणं तुम्मे देवाणु ! पउमणाभेण रन्ना सद्धि संपलग्गा ?, तते णं ते पंच पंडवा कण्हं वासुदेवं एवं व०-एवं खलु देवा० ! अम्हे तुन्भेहिं अन्भणुन्नाया समाणा सनद रहे दुरूहामो २, जेणेव पउमनामे जाव पडिसेहेति, तते णं से कण्हे वासुदेवे तं पंच पंडवे एवं २०-जति णं तुम्भे देवा० ! एवं वयंता अम्हे णो पउमनाभेराय त्तिक? पउमनाभेणं सद्धिं संपलग्गंता तो णं तुन्भे णो पउमणाहे हयमहियपवर जाव पडिसेहते, तं पेच्छह णं तुम्भे देवा० अहं नो पउमणाभे राय त्तिकहु पउमनाभेणं रन्ना सद्धिं जुज्झामि रहं दुरूहति २ जेणेव पउमनाभे राया तेणेव उवाग० २ सेयं गोखीरहारधवलं तणसोल्लियसिंनुवारकूदें- दुसन्निगासं निययबलस्स हरिसजणणं रिउसेण्णविणासकरं पंचवण्णं संखं परामुसति २, मुहवायपूरियं करेति तते णं तस्स पउमणाहस्स तेणं संखसद्देणं चलतिभाए हते जाव पडिसेहिए, तते णं से कण्हे वासुदेवे धणुं परामुसति वेढो धणुं पूरेति २, धणुसई करेति; तते णं तस्स पउमनाभस्स दोचे बलतिभाए तेणं धणुसद्देणं हयमहिय जाव पडिसेहिए, तते णं से पउमणाभे राया तिभागवलावसेसे अत्थामे अषले ।। २२५॥
अवीरिए अपुरिसकारपरकम्मे अधारणिन्न त्तिकहु सिग्धं तुरियं जेणेव अमरकंका तेणेव उ० २, अमरकंकं रायहाणि अणुपचिसति २, दारातिं पिहेति २, रोहसन्ने चिट्ठति; तते णं से कण्हे वासुदेवे जेणेव अमरकंका तेणेव उ० २ रहं ठवेति २, रहातो पचोरूहति २, वेउब्वियसमुग्धाएणं समोहणति; एग महं णरसीहरूवं विउव्यति २, महया २, सद्देणं पाददद्दरियं करेति; तते णं से कण्हेणं वासुदेवेणं महया २, सद्देणं पाददद्द. रएणं कएणं समाणेणं अमरकंका रायहाणी संभग्गपागारगोपुरावालयचरियतोरणपल्हत्थियपवरभवण- सिरिघरा सरस्सरस्स धरणियले सन्निवइया, तते णं से पउमणाभे राया अमरकंक रायहाणिं संभग्ग जाव पासित्ता भीए दोवति देवि सरणं उवेति, तते णं सा दोवई देवी पउमनाभं रायं एवं व०-किणं तुमं देवा ! न जाणसि कण्हस्स वासुदेवस्स उत्तमपुरिसस्स विप्पियं करमाणे ममं इह हब्वमाणेसि, तं एवमवि गए गच्छह णं तुम देवा० ! पहाए उल्लपडसाडए अवचूलगवत्थणियत्थे अंतेउरपरियालसंपरिबुडे अग्गाई चराई रयणाई गहाय ममं पुरतो काउं कण्हं वासुदेवं करपलपायपडिए सरण उवेहि, पणिवइय- पच्छला णं देवाणुप्पिया! उत्तमपुरिसा, तते णं से पउमनाभे दोवतीए देवीए एयमझु पडिसुणेति २, पहाए जाव सरणं उवेति २, करयल० एवं वा-दिहा णं देवाणुप्पियाणं इड्डी जाव परक्कमे तं खामेमि णं देवाणु- पिया। जाव खमंतु णं जाव णाहं मुखो २ एवंकरणयाए त्तिक? पंजलिबुडे पायवडिए कण्हस्स वासुदेवस्स दोवति देविं साहत्धि उपणेति, तते णं से कण्हे वासुदेवे पउमणाभं एवं व०-हं भो पउमणाभा!
नवाशी-
१०पू०
श्रीज्ञाता-
धर्मकथा)
अपरकङ्का-
ज्ञाताध्य०
दौपद्या
सह स्वदेश-
गमनम्।
॥२२६॥
अपत्थियपत्थिया ४ किण्णं तुमं ण जाणसि मम भगिणिं दोवती देवी इह हब्बमाणमाणे तं एवमवि
गए पत्थि ते ममाहिंतो इयाणिं भयमत्पित्तिकटु पउमणाभं पडिविसज्जेति, दोवतिं देविं गिणहति २, रहं
दुम्हेति २, जेणेच पंच पंडवे तेणेव उवा० २, पंचण्हं पंडवाणं दोवतिं देविं साहत्थि उचणेति; तते णं से
कण्हे पंचहिं पंडवेहिं सदि अप्पछट्टे छहिं रहेहिं लवणसमुई मझमज्झेणं जेणेव जंबुद्दीवे २, जेणेव
भारहे घासे तेणेव पहारेत्य गमणाए ॥ सूत्रम्-१३० ॥
'सारत्धति मारथ्यं मारधिकर्म, 'तए णं सा किड्डाविएत्यादौ यावत्करणादेवं दृश्यं-'साभावियहंसा चोद्दहजणस्म
उस्सुयकर पिचिचमणिरयणवदच्छरुदति, तत्र क्रीडापिका-क्रीडनधात्री 'साभावियहंस'त्ति साद्भाविक:-अकैतवकृतो घर्षों-
धर्षण यस्य म तथा तं दर्पणमिति योगः, 'चोद्दहजणस्स ऊसुयकरें'ति तरूणलोकस्य औत्सुक्यकर-प्रेक्षणलम्पटत्वकर
'विचित्तमणिरयणपदच्छाहति विचित्रमणिरत्नैर्बद्धः छरुको-मुष्टिग्रहणस्थानं यस्य म तथा तं 'चिल्लंग'-दीप्यमानं
दर्पम्-आदर्शम् , 'दप्पणसंकंतविसंदंसिए य से'त्ति-दर्पणे सङ्कान्तानि यानि राजां विम्मानि-प्रतिविम्बानि तैः संद
शिताः-उपलम्भिता येते तथा तांय से-तस्या दक्षिणहस्तेन दर्शयति स्म द्रोपद्या इति प्रक्रमः प्रवरराजसिंहान् , स्फुटमर्थतो
पिछदं वर्णतः विशुद्धं शब्दार्थदोपरहित रिभित-स्वरघोलनाप्रकारोपेतं गम्भीरं-मेघशब्दवत् मधुरं-कर्णसुखकर भणितं-भाषित
यस्याः क्रीडापिकाया मा तथा वां, मातापितरौ वंश-हरिवंशादिकं सत्त्वं-आपत्स्ववैक्लन्यकरमध्यवसानकरं च मामय-लं,
गोत्र-गौतमगोत्रादि, विक्रान्ति-विक्रम, कान्ति-प्रभा, पाठान्तरेण कोत्ति वा-प्रख्याति बहुविधामम-नानाविधशास्त्रवि-
॥ २२६॥
शारदमित्यर्थः माहात्म्यं-महानुभावां, कुलं-वंशस्यावान्तरभेदं शीलं च-खमावं जानाति या सा तथा कीर्तनं करोति स्मेति, कृष्णिपुङ्गयानां-यदुपुट्नवानां यदुप्रधानानां दशाराणां-ममुद्रविजयादीनां दशारस्य वा-वासुदेवस्य ये वरा चीराव पुरुषास्ते तथा ते च ते त्रैलोक्येऽपि वलयन्तश्चेति विग्रहस्ततस्तेषां, शत्रुशवसहस्राणां-रिपुलक्षाणां मानमवमृद्गन्ति ये ते तथा तेषां, तथा भविष्यतीति भवा-माविनी सा सिद्धिये॒पां ते मवसिद्धिकास्तेषां मध्ये वरपुण्डरीकाणीव वरपुण्डरीकाणि येते तथा तेषां 'चिल्लगाणं'ति-दीप्यमानानां तेजसा तथा वलं-शारीरं,वीर्य-जीवप्रमवं,रूपं-शरीरसौन्दर्य, यौवनं तारुण्य, गुणान्-सौन्दर्या- दीन, लावण्यं च-स्पृहणीयता कीर्तयति या सा तथा, क्रीडापिका कीर्चनं करोति स्म, पूर्वोक्तमपि किश्चिद्विशेषामिधाना- पाभिहितमिति न दुष्ट, 'समइच्छमाणी'ति समतिकामन्ती, 'दसवण्णेणतीह श्रीदामगण्डेन पूर्वगृहीतेनेति सम्बन्धनीयं 'कल्लाणकारे'चि-कल्याणकरण मङ्गलकरणमित्यर्थः, 'इमं च णति इतच 'कण्छुल्लानारए'चि-एतनामा तापसः, इह कचिद्यावत्करणादिदं दृश्यं, 'दसणेणं अइभदए भद्रदर्शन इत्यर्थः, "विणीए अंतो अंतो य कलुमहिपए' अन्तरान्तरा दुष्टचित्तः केलीप्रिपत्वादित्यर्थः, 'मज्झत्थउवत्थिए य' माध्यस्थ्य-समतामभ्युपगतो व्रतग्रहणत इति भावः, 'अल्लीण: सोमपियदसणे सुरूवे' आलीनाना-आश्रितानां सौम्य-अरौद्रं प्रियं च दर्शनं यस्य स तथा 'अमइलसगलपरिहिए' अमलिनं सकलं-अखण्डं शकलं वा खण्डं वल्कवास इति गम्यते परिहित-निवसितं येन स तथा, 'कालमियचम्मउत्तरा- संगरइयवस्थे' कालमृगचर्म उत्तरासनेन रचितं वक्षसि येन स तथा 'दंडकमंडलहत्थे जडामउडदित्तसिरए जन्नोवइयगणेत्तियमुंजमेहलावागलधरे' गणेत्रिका-रुद्राक्षकृतं कलाचिकाभरणं मुञ्जमेखला-मुञ्जमयः कटीदवरकः नवाजी- भीज्ञाता- धर्मकपाले अपरका ज्ञाताध्य. विद्याधरा- दिपदानां व्याख्या ०२२७॥ पत्कलं-तरुत्वक, 'हत्यकयकच्छ भीए'-कच्छपिका तदुपकरणविशेषः, पियगंधर्व'-गीतप्रिया, धरणिगोयरप्पहाणे- आकाशगामित्वात् , 'संचरणावरणउवयणिलेसणीसु य संकामणिअमिओगपण्णत्तिगमणीयंमणीसु य बहुसु विजाहरीसु विज्ञासु विस्सुपजसे' इह मशरप्यादिविद्यानामः शन्दानुमारतो वाच्यः, 'विजाहरिसुचि-विद्याघरसम्बन्धिनीपु विश्रुतयशा:- ख्यातकीर्तिः, 'इट्टे रामस्स केसवस्स य पज्जुन्नपईवसंवअनिरुद्धनिसढउम्मुयसारणगयसुमुहदुम्मुहाईणं जायवाणं अहाणं कुमारकोडीणं हिययदइए' वल्लम इत्या, 'संथवे' एतेषां संस्तावका, 'कलहजुद्धकोलाह- लप्पिए' कलहो-पागयुद्धं युद्धं तु-आयुधयुद्धं कोलाहलो-बहुजनमहायनिः; "भंडणाभिलासी-भंडनं पिष्टातकादिभिः 'पहुसु य समरसंपराएसु'-समरसचामेष्वित्पी, 'दसणरए समंतओ कलहं सदक्विणं' सदानमित्यर्थः, 'अणुगवेसमाणे असमाहिकरे दसारवरवीरपुरिसतेलोकयलवगाणं आमतेऊणं तं भगवतिं एकमणि गमणत्थं उप्पइओ गगणतलमभिलंघयंतो गामागरनगरखेडकपडमडंबदोणमुहपट्टणसंवाहसहस्समंडियं थिमियमेइणीयं णिन्भरजनपदं वसुहं ओलोयंतो रम्म हुत्थिणपुरं उवागए ' 'असंजयअविरयअप्पडिहय- पचक्सायपावकम्मेत्तिक?' असंयतः संयमरहितत्वात् अविरतो विशेषतस्तपस्यरतत्वात् न प्रतिहतानि-न प्रतिषेधितानि अतीतकालकतानि निन्दनतः न प्रत्याख्यातानि च भविष्यकालमावीनि पापकर्माणि-प्राणातिपातादिक्रिया येन अथवा न प्रतिहतानि सागरोपमकोटीकोट्यन्तःप्रवेशनेन मम्यक्त्वलामतः न च प्रत्याख्यातानि सागरोपमकोटीकोव्याः सङ्ख्यात- सागरोपमै!नताकरणेन सर्वविरतिलामतः पापकर्माणि-ज्ञानापरणादीनि येन म तथेति पदत्रयस्य कर्मधारयः, 'कूवं 'वि- नम् । ॥२२७14 . . कूजकं व्यावर्तकबलमिति भावः, 'सुई व 'ति-श्रूयते इति श्रुतिः-शब्दः तां, 'सुति व 'चि क्षुतिः छीत्कारादि- शब्दविशेष एवं तां प्रयुक्ति-वाना, वा पर्यायाश्चैते इति, 'हिया व 'ति-हृता प्रदेशान्तरे स्थापिता, 'नीता' नेत्रा स्वस्थान प्रापिता 'आक्षिपिता' आकृष्टेवेति, 'इमा अण्णे'त्यादि, इयमन्या अपरा मदीयस्वामिनः सम्बन्धिनी विनयप्रतिपत्तिरिति वर्तते, 'समुहाणत्ति त्तिक ' स्वमुखेन स्वकीयवदनेन भणिता आज्ञप्तिः-आदेशः स्वमुखाज्ञप्ति- रितिकृत्वा-एवमभिधाय, ' आसुरुत्ते 'त्ति क्रुद्धा, ' पलवाउए 'ति-वलव्यापृतः सैन्यव्यापारवान् , 'अभिसेक 'न्ति- अभिपेकमर्हतीत्याभिपेक्यं मुर्दाभिषिक्तमित्यर्थः, 'छेयायरियउवएसमइविगप्पणाविगप्पेहि 'ति-छको-निपुणो य आचार्य:-कलाचार्यः तस्योपदेशात्-तत्पूर्विकाया मतेः-युद्धेर्याः कल्पनाः-विकल्पा: क्लप्तिमेदास्ते तथा तैरिति, इह यावत्करणादिदं दृश्यं 'सुनिउणेहिं 'ति-सुनिपुणैनरैः, 'उज्जलनेवत्यहव्वपरिवच्छिय'ति उज्वलनेपथ्येन- निर्मलवेपेण 'हव्व 'न्ति-शीघ्र परिक्षिप्त:-परिगृहीतः परिवृतो यः स तथा तं 'सुसज्जं'-सुष्ठु प्रगुणं, 'वम्मिय. सन्नद्धवद्धकवचियउप्पीलियकच्छवच्छयद्धगेवजगलयवरभूसणविरायंत'-वर्मणि निपुक्ता वार्मिकास्तैः मन्नद्धः- कृतसन्नाहो यः स वार्मिकसन्नद्धः पद्धं कवचं-सन्नाहविशेषो यस्य स बद्धकवचा, स एव बद्धकाचिका, अथवा वर्मित: सन्नद्धः पद्धस्त्वक्त्राणवन्धनात् कवचितश्च यः स तथा, भेदश्चैतेषां लोकतोऽवसेयः, एकार्थाचते शब्दाः सन्नद्धता. प्रकर्षाभिधानायोक्ता इति, तथा उत्पीडिता-गाढीकृता कक्षा-हृदयरज्जुर्वक्षसि यस्य स तथा अवेयकं-ग्रीवाभरणं वद्धं गले- कण्ठे यस्य स तथा वरभूपणैर्विराजमानो यः स तथा, ततो वर्मितादिपदानां कर्मधारयोऽतस्तं, 'अहियतेयजुत्तं सललि. . .
नवागी-
श्रीज्ञाता-
धर्मकथाझे
तवरफण्णपूरविराजितं पलयंओचूलमहुयरफयंधगारं' प्रलम्बानि अवचूलानि करक(ट)न्यस्ताऽधोमुखकूर्चकाः यस्य
सः प्रलम्पावचूल: मधुकरैः-भ्रमरैर्मदजलगन्धाकटैः कृतमन्धकार येन स तथा, ततः कर्मधारयोऽतस्तं, चित्तपरिच्छेय.
पच्छदं' चित्रो-विचित्रः परिच्छेको-लघुः प्रच्छदो-वस्त्रविशेपो यस्य स तथा तं, 'पहरणावरभरियजुद्धसज्ज' प्रहरणानां-
कुन्तादीनामावरणाना च-कङ्कटानां भृतो यः म तथा स च युद्धसजश्वेति कर्मधारयः अतस्तं 'सच्छत्तं सज्झयं सघंटं
पंचामेलयपरिमंडिययाभिरामं' पञ्चभिरापीडः-शेखरैः परिमण्डितोऽत एवाभिरामश्च-रम्यो यः, 'ओसारियजमल-
जुयलघंट'-अवसारित-अवलम्बितं यमलं-समं युगलं-द्वयं घण्टयोर्यत्र स तथा तं, 'विज्जुप्पणिद्धं व कालमेहं' घण्टा
प्रहरणादीनामुज्ज्वलत्वेन विद्यूत्कल्पत्वात् हस्तिदेहस्य कालत्वेन महत्त्वेन वा मेघकल्पत्वादिति, “उप्पाइयपव्वयं व
चकमंतं' चक्रममाणमिवोत्पातिकपर्वत, पाठान्तरेण ओत्पातिक पर्वतमिक, 'सक्खंति साक्षात् , 'मत्त'ति-मदवन्तं 'गुल
२ गुलंतं' 'मणपवणजइणवेगं' मनापयनजयी वेगो यस्य स तथा तं, 'भीमं संगामियाजोग्ग' सानामिक आयोगः
मरिकरो यस्य स तथा तं, 'अभिसेफ हत्थिरयणं पडिकप्पंति २ उवणेति'त्ति 'हयमहियपवरविवडियचिंधधयप
डागे' इतमथिता-अत्यर्थ हताः अथवा हताः प्रहरतो मथिताः मानमथनात् हतमथिताः तथा प्रवरा विपतिताश्चिन्हध्वजा-
दगः पताकाश्च तदन्या येषां ते तथा ततः कर्मधारयोऽतस्तान् , यावत्करणात् 'किन्छोवगयप्पाणे ति दृश्यं कष्टगतजीवित.
व्यानित्यर्थः, 'अम्हे चा पउमनामे वा रायत्तिकहु' इति अस्माकं पद्मनाभस्य च बलवत्वादिह सङ्ग्रामे वयं वा भवामः
पानामो वा, नोमयेपामपीह संयुगे त्राणमस्तीतिकवा-इति निश्चयं विधाय सम्प्रलमाः योद्धमिति शेषा, 'अम्हे नो
अपरकङ्का-
ज्ञाताध्य०
ग्रीवा-
भरणादि
पदानां
व्याख्या-
२२८॥
नम् ।
॥ २२८॥
- पउमनाभे राय त्तिकैटुं' वयमेवेह रणे जयामो न पद्मनामो राजेवि, यदि विषये विजयनिश्चयं कृत्वा पद्मनामेन सार्द्ध योद्धं सम्पालगिष्यथ ततो न पराजयं प्राप्स्यथ, निश्चयसारत्वात् फलप्रासे, आह च-"शुभाशुभानि सर्वाणि, निमित्तानि स्युरेकतः । एकतस्तु मनो याति, तद्विशुद्धं जयावहम् ॥१॥ तथा-स्यानिश्चय कनिष्ठानां, कार्यसिद्धिः परा नृणाम् । संश- यक्षुण्णचित्ताना, कार्ये संशीतिरेव हि ॥ २ ॥” शङ्खविशेपणानि कचिद् दृश्यन्ते-'सेयं गोखीरहारधवलं तणसोल्लिय- सिंदुवारकुंदेंदुसन्निगासं' 'तणसोल्लियन्ति मल्लिका सिंदुवारो--निर्गुण्डिः, 'निययस्स बलस्स हरिसजणणं रिउसेपणविणासकर पंचजण्ण'न्ति-पाञ्चजन्याभिधानं, 'वेढो'त्ति-वेष्टकः एकवस्तुविषया पदपद्धतिः, स चेह धनुर्विपयो जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिप्रसिद्धोऽध्येतव्यः, तद्यथा-'अइरुग्गयबालचंदइंदधणुसन्निकासं' अचिरोद्गतो यो चालचन्द्रः-शुक्लपक्षद्वि- तीयाचन्द्रः तेनेन्द्रधनुपा च वक्रतया सनिकाश-सदृशं यत्तत्तथा 'वरमहिसदरियदप्पियदढयणसिंगग्गरइयसारं' वरमहिपस्य हप्तदर्पितस्य-सञ्जातदतिशयस्य यानि दृढानि धनानि च शृङ्गाग्राणि ते रचितं सारं यत्तत्तथा, 'उरगवरपवरगवलपवर परहुयभमरकुलनीलधतघोयपटुं' उरगवरो-नागवरः प्रपरगवलं-वरमहिपशृङ्गं प्रवरपरभृतो-वरकोकिलो भ्रमरकुलं-मधुकरनिकरो नीली-गुलिका एतानीव स्निग्धं कालकान्तिमत् ध्मातमिय मातं च-तेजसा ज्वलत् धौतमिव धौतं च-निर्मल पृष्ठं यस्य तचथा, 'निउणोवियमिसिमिसिंतमणिरयणघंटियाजालपरिक्खित्तं निपुणेन शिल्पिना ओपिताना-उजवलितानां मणिरत्न- घण्टिकानां यजालं तेन परिक्षिस-वेष्टितं यत्तत्तथा 'तडितरुणकिरणतवणिजपद्धचिं' तडिदिव-विद्युदिव तरुणा:- 1 हुत्ति २० ।
-
नवागी-
-
भीज्ञाता-
धर्मकचाट्ने
अपरकहा-
साताय०
वासुदेवस्य
शखशन्द.
भवणादि-
॥२२९ ॥
प्रत्यग्राः किरणा यस्य तत्तथा तस्य तपनीयस्य सम्बन्धीनि बद्धानि चिन्हानि-लाञ्छनानि यत्र तथा 'ददरमलयगिरिसि.
हरकेमरचामरवालयद्धचंदवित्र' दर्दरमलयाभिधानौ यौ गिरी तयोर्यानि शिखराणि तत्सम्बन्धिनो ये केसरचामरवाला:-
सिंहस्कन्धचमरपुच्छकेशाः अर्द्धचन्द्राथ तल्लक्षणानि चिहानि यत्र तचथा, 'कालहरियरचपीयमुकिल्लबहुण्हारुणितंपिनद्धजीय'
कालादिवर्णाः या स्नायवः-शरीरान्तर्वर्धास्ताभिः सम्पिनद्धा-पद्धा जीवा-प्रत्यक्षा यस्य तत्तथा 'जीवियान्तकर ति शवणा-
मिति गम्यते, 'संभग्गे'त्यादि, सम्ममानि प्राकारो गोपुराणि च-प्रतोल्यः अट्टालकाय-प्राकारोपरिस्थानविशेषाः चरिका
च-नगरप्राकारान्तरेऽष्टहस्तो मार्गः तोरणानि च यस्यां सा तथा, पर्यस्तितानि-पर्यस्तीकतानि सर्वतः क्षिप्तानि इत्यर्थः प्रवर-
भवनानि श्रीगृहाणि च-भाण्डागाराणि यस्यां सा वथा, ततः पदद्वयस्य कर्मधारयः, 'सरसरस्स'चि-अनुकरणशन्दोऽयमिति,
'उल्लपडसाडए'चि सयः मानेन आद्रौ-पट्टशाटको उत्तरीयपरिधाने यस्य स तथा, 'अवचूलगवत्थनियत्थेचि अव.
चूलं-अधोमुखचूलं मुत्कलाचलं यथा भवतीत्येवं वस्त्रं निवसितं येन स तथा, 'तं एवमवि गए नस्थि ते ममाहितो
इयाणिं भयमस्थिति तत-तस्मादित्थमपि गते अस्मिन् कार्ये नास्ति अयं पक्षो यदुत ते-तव मत्तो भयमस्ति-भवति ।
तेणं कालेणं २ धायतिसंडे दीवे पुरच्छिमद्धे भारहे वासे चंपा णामं णयरी होत्था, पुण्णभद्दे चेतिए,
तत्थ णं चंपाए नयरीए कविले णामं वासुदेवे राया होत्था, महया हिमवंत० वण्णओ; तेणं कालेणं २
मुणिसुब्यए अरहा पाए पुण्णभद्दे समोसदे, कपिले वासुदेवे धम्मं सुणेति, तते णं मे कविले वासुदेवे
मुणिसुव्ययस्स अरहतो धम्म सुणेमाणे कण्हस्स वासुदेवस्प्त संग्वसदं सुणेति, तते णं तस्स कविलस्स
सत्रम् ।
॥२२९॥
वासुदेवस्स इमेयारूवे अन्भत्थिए समुप्पज्जित्था-किं मण्णे धायइसंडे दीवे भारहे वासे दोचे वासुदेवे समुप्पण्णे ? जस्स णं अयं संखसद्दे ममंपिव मुहवायपूरिते वियंभति, कविले वासु० सदाति सुणेह, मुणिसुव्वए अरहा कविलं वासुदेवं एवं व०-से गूणं ते कविला वासुदेवा ! मम अंतिए धम्मं णिसामे. माणस्स संखसई आकपिणत्ता इमेयारूवे अन्भत्थिए-किं मन्ने जाव वियंभइ, से गूणं कविला वासुदेवा! अयमढे समझे ?, हंता ! अत्थि, नो खलु कविला! एवं भूयं वा ३ जन्नं एगे खेत्ते एगे जुगे एगे समए दुवे अरहंता वा चकचद्दी वा यलदेवा वा वासुदेवा वा उप्पजिंसु उप्पजिति उप्पजिस्संति वा, एवं खल वासुदेवा ! जंबुद्दीवाओ भारहाओ वासाओ हथिणाउरणयराओ पंडुस्स रण्णो सुण्हा पंचण्हं पंडवाणं भारिया दोवती देवी तव पउमनाभस्स रण्णो पुब्वसंगतिएणं देवेणं अमरकंकाणयरिं साहरिया, तते णं से कण्हे वासुदेवे पंचहिं पंडवेहिं सद्धिं अप्पछढे छहिं रहेहिं अमरकंकं रायहाणि दोवतीए देवीए कूवं हब्वमागए, तते णं तस्स कण्हस्स वासुदेवस्स पउमणाभेणं रण्णा सद्धिं संगामं, संगामेमाणस्स अयं संखसद्दे तव मुहवाया० इव इहे कंते इहेव वियंभति, तए णं से कविले वासुदेवे मुणिसुव्वयं वंदति २ एवं व०-गच्छामि णं अहं भंते ! कण्हं वासुदेवं उत्तमपुरिसं सरिसपुरिसं पासामि, तए णं मुणिसुव्वए अरहा कविलं वासुदेवं एवं व०-नो खलु देवा० !एवं भूयं वा ३ जण्णं अरहंता वा अरहंतं पासंति, चकवद्दी वाचकहिं पासंति, वलदेवा वा बलदेवं पासंति, वासुदेवा वा वासुदेवं पासंति; तहविय णं तुमं कण्हस्स
नवाशी-
भीज्ञाता.
धर्मकथा)
यासुदेवस्स लवणसमुई मझमज्झणं वीतिवयमाणस्स सेयापीयाई धयग्गातिं पासिहिसि, तते.णं से कविले
वासुदेवे मुणिसुव्वयं वंदति २, हत्थिखधं दुरूहति २, सिग्धं २, जेणेव वेलाउले तेणेव उ० २, कण्हस्स
वासुदेवस्स लवणसमुई मज्झमझेणं वीतिवयमाणस्स सेयापियाहिं धयग्गातिं पासति २, एवं वयइ-एस
णं मम सरिसपुरिसे उत्तमपुरिसे कण्हे वासुदेवे लवणसमुई मज्झमज्झेणं वीतीवयति त्तिकमु पंचयन्नं संखं
परामुसति मुहबायपूरियं करेति, तते णं से कण्हे वासुदेवे कविलस्स वासुदेवस्स संखसई आयन्नेति २,
पंचयन्नं जाय पूरियं करेति, तते णं दोवि वासुदेवा संखसहसामायारिं करेति, तते णं से कविले वासुदेवे
जेणेव अमरकंका तेणेव उ० २ अमरकंक रायहाणिं संभग्गतोरणं जाव पासति २, पउणणाभं एवं व०-
किन्नं देवाणुप्पिया ! एसा अमरकंका संभग्ग जाव सन्निवइया ?, तते णं से पउमणाहे कविलं वासुदेवं एवं
२०-एवं ग्वलु सामी! जंबुद्दीवाओ दीवाओ भारहाओ वासाओ इहं हव्वमागम्म कण्हेणं वासुदेवेणं
तुम्भे परिभूय अमरकंका जाव सन्निवाडिया, तते णं से कविले वासुदेवे पउमणाहस्म अंतिए एयमहें
सोचा पउमणाहं एवं य०-हं भो। पउमणाभा! अपत्थियपत्थिया किन्नं तुमं न जाणसि मम सरिस-
पुरिसस्स फण्हस्स वासुदेवस्स विप्पियं करेमाणे, आसुरुत्ते जाव पउमणाहं णिव्विसयं आणवेति,
पउमणाहस्स पुत्तं अमरकंकारायहाणीए महया २ रायाभिसेएणं अभिसिंचति जाव पडिगते ॥ सूत्रम्-
१३१ ॥ तते णं से कण्हे वासुदेवे लवणसमुई मज्झमज्झेणं वीतिवयति, ते पंच पडवे एवं व०-गच्छह
णं
अपरकर-
ज्ञाताध्य०
कपिल-
वासुदेवं.
प्रति-
समाधा-
नादि-
॥२३०॥
सूत्रम्।
॥ २३० ॥
Akar तुम्भे देवा० ! गंगामहानदि उत्तरह जाव ताव अहं सुद्वियं लवणाहिवई पासामि, तते णं ते पंच पंड वा कण्हेणं वासुदेवेणं एवं वुत्ता समाणा जेणेव गंगामहानदी तेणेव उ० २ एगट्टियाए णावाए मग्गणगवेसणं करेंति २ एगहियाए नावाए गंगामहानदि उत्तरंति २ अण्णमण्णं एवं वयन्ति-पहू णं देवा ! कण्हे वासुदेवे गंगामहाणविं पाहाहिं उत्तरित्तए उदाहु णो पभू उत्तरित्तए त्तिक? एगट्टियाओ नावाओ णूमति २ कण्हं घासुदेवं पडियालेमाणा २ चिट्ठति, तते ण से कण्हे वासुदेवे सुट्टियं लवणाहिबई पासति २ जेणेव गंगा महाणदी नेणेच उ० २, एगट्टियाए सव्वओ ममता मग्गणगवेसणं करेति २, एगढियं अपासमाणे एगाए पाहाए रहं सतुरगं ससारहिं गेण्हइ एगाए वाहाए गंगं महाणदिं यासहिं जोयणाति अद्धजोयणं च विच्छिन्नं उत्तरिउं पयत्ते यावि होत्था, तते णं से कण्हे वासुदेवे गंगामहाणदीए यहुमज्झदेसभागं संपत्ते समाणे संते तंते परितंते पद्धमेए जाए यावि होत्या, तते णं कण्हस्स वासुदेवस्स इमे एयारूवे अभत्थिए जाय समुप्पज्जित्था-अहो णं पंच पंडवा महायलबगा जेहिं गंगामहागदी यासहि जोयणाई अद्वजोयणं च विच्छिण्णा पाहाहिं उत्तिण्णा, इच्छतपहिं णं पंचहिं पंडवेहि पउमणाभे राया जाव णो पडिसेहिए, तते णं गंगादेवी कण्हस्स वासुदेवस्स इमं एयारूवं अन्भत्थियं जाव जाणित्ता थाहं वितरति, तते णं से कण्हे वासुदेव मुहुत्तंतरं समासासति २, गंगामहाणदि यावहिं जाव उत्तरति २, जेणेव पंच पंडया तेणेव उपा० पंच पंडवे एवं व०-अहो णं तुम्भे देवा० ! महायलवगा जेणं तुम्भेहिं गंगामहाणदी वासहिं जाव
नवागी-
१००
श्रीज्ञाता-
धर्मकथाझे
उत्तिण्णा, इच्छंतपहिं तुम्भेहिं पउम जाव णो पडिसेहिए, तते णं ते पंच पंडवा कण्हेणं वासुदेवेणं एवं
वुत्ता समाणा कण्हं वासुदेवं एवं व०-एवं ग्वलु देवा० ! अम्हे तुम्भेहिं विसजिया समाणा जेणेव गंगा
महाणदी तेणेव उवा० २ एगट्टियाए मग्गणगवेसणं तं चेव जाव णमेमो तुन्भे पडिवालेमाणा चिट्ठामो,
तते णं से कण्हे वासुदेवे तेसिं पंचण्हं पांडवाणं एयमé सोचा णिसम्म आसुरुत्ते जाव तिवलियं एवं २०-
अहोणं जया मए लवणसमुदं दुवे जोयणसयसहस्सा विच्छिण्णं वीतीवहत्ता पउमणाभं हयमहिय जाव
पडिसेहित्ता अमरकंका संभग्ग० दोवती साहत्थि उवणीया तया णं तुन्भेहिं मम माहप्पं ण विण्णायं
इयाणि जाणिस्सह त्तिक? लोहदंडं परामुसति, पंचण्हं पंडवाणं रहे चूरेति २, णिव्विसए आणवेति २, तत्थ
णं रहमपणे णामं कोडे णिविटे, ततेणं से कण्हे वासुदेवे जेणेव वा सए खंधावारे तेणेव उवागच्छइ २, सएणं
खंधावारेणं सद्धिं अभिसमन्नागए यावि होत्या, ततेणं से कण्हे वासुदेवे जेणेव पारवई णयरी तेणेव उवा०
२ अणुपविसति ॥ सूत्रम्-१३२।। ततेणं से पंच पंडवा जेणेव हथिणाउरे तेणेव उवागच्छन्ति २ जेणेव पंडू
तेणेव उ० २ करयल एवं व०-एवं खलु ताओ! अम्हे कण्हेणं णिविसया आणत्ता, तते णं पंडराया ते पंच
पंडवे एवं व०-कहण्णं पुत्ता ! तुन्भे कण्हेणं वासुदेवेणं णिव्विसया आणत्ता?, तते णं ते पंच पंडवा पंडरायं
एवं व०-एवं खलु ताओ ! अम्हे अमरकंकातो पडिणियत्ता लवणसमुदं दोन्नि जोयणसयसहस्साई वीति-
वतित्ता(स्था) तए णं से कण्हे अम्हे एवं वयामि-गच्छहणं तुन्भे देवा! गंगामहाणदि उत्तरह जाय चिट्ठह
अपरकङ्का-
झावाय
पाण्डवै-
५। स्सह कृष्ण
वार्तालापा-
दिवर्णन-
॥ २३१॥
सत्रम् ।
॥२३१॥
ताव अहं एवं तहेव जाव चिट्ठामो, तते णं से कण्हे वासुदेवे सुट्टियं लवणाहिवई दद्ण तं चेव सव्वं नवरं काहस्स चिंता ण जुन्ज (बुच)ति जाव अम्हे णिव्विसए आणवेति, तए णं मे पंडुरोया ते पंच पंडवे एवं व०-दुडु णं पुत्ता ! कयं कण्हस्स वासुदेवस्स विप्पियं करेमाणेहि, तते णं से पंडू राया कोंति देवि सहायेति २ एवं व०-गच्छ णं तुमं देवा० ! पारवति कण्हस्स वासु० णिवेदेहि-एवं खलु देवा ! तुम्हे पंच पंडया णिव्यिसया आणत्ता तुमं च णं देवा ! दाहिणड्डभरहस्स सामी तं संदिसंतु गं देवा. ते पंच पंडवा कयरं दिसि वा विदिसं या गच्छंतु ?, तते णं सा कोती पंडणा एवं वुत्ता समाणी हत्यिखधं दुरूहति २ जहा हेटा जाव संदिसंतु णं पिउत्था ! किमागमणपओयणं १, तते णं सा कोंती कण्हं वासु. देवं एवं व०-एवं ग्यल पुत्ता! तुमे पंच पंडवा णिव्विसया आणत्ता तुमं च णं दाहिणभरह जाव वि- दिसं वा० गच्छंतु, तत णं से कण्हे वासुदेवे कोंति देवि एवं घ०-अपूईययणा णं पिउत्था ! उत्तमपुरिसा वासुदेवा बलदेवा चकवढी तं गच्छंतु णं देवाणु० ! पंच पंडवा दाहिणिलं चेयालि तत्य पंडुमहुरं णिसंतु ममं अदिट्ठसेवगा भवंतु तिकट्ठ कोंति देवि सकारेति सम्माणेति जाव पडिपिसजेति; तते णं सा कोती देवी जाय पंदुस्स एयमढे णियेषेति, तते णं पंडू पंच पंडये सहावेति २ एवं ३०-गच्छह णं तुम्भे पुत्ता! दाहिणिलं यालिं तत्थ णं तुम्भे पंडुमहुरं णिवेसेह, तते णं पंच पंडया पंडस्स रपणो जाय तहत्ति पडि- सुर्णेति सपलयाणा हयगय० हत्तिणाउराओ पडिणिवमंति २, जेणेव दक्विणिले वेयाली तेणेव
नवाङ्गी-
१०३०
भीवावा-
धर्मकथाङ्गे
उपा० २ पंडुमहुरं नगरि निवेसेति २ तत्थ णं ते विपुलभोगसमितिसमण्णागया यावि होत्था ।। सूत्रम्-
१३३ ।। तते णं सा दोवई देवी अन्नया कयाई आवण्णसत्ता जाया यावि होत्या, तते णं सा दोवती देवी
णवण्हं मासाणं जाच सुरूवं दारगं पयाया सूमालं णिव्यत्तयारसाहस्स इमं एयारूवं जम्हा णं अम्हं
एस दारए पंचण्हं पंडवाणं पुत्ते दोवतीए अत्तए तं होउ अम्हं इमरस दारगस णामधेनं पंडुसेणे, तते णं
तस्स दारगस्स अम्मापियरो णामधेनं करेइ पंड्डुसेणत्ति, पावत्तरि कलाओ जाव भोगसमत्थे जाए
जुवराया जाव विहरति, घेरा समोसढा परिसा निग्गया पंडवा निग्गया धम्म सोचा एवं व०-जं णवरं
देवा० । दोयतिं देविं आपुच्छामो पंडुसेणं च कुमारं रज्जे ठावेमो ततो पच्छा देवा०! अंतिए मुंडे भवित्ता
जाब पव्ययामो, अहासुहं देवा०!, तते णं ते पंच पंडवा जेणेव सए गिहे तेणेव उवा० २ दोवति देवि
सहावेंति २ एवं व०-एवं खलु देवा ! अम्हेहिं राणं अंतिए धम्मे णिसंते जाव पन्चयामो तुमं देवाणु.
प्पिए ! किं करेसि ?, तते णं सा दोवती देवी ते पंच पंडवे एवं च०-जति णं तुम्भे देवा० । संसारभउ-
विगा पव्ययह ममं के अण्णे आलंये वा जाव भविस्सति ?, अहंपि य णं संसारभउविग्गा देवाणु:
प्पिएहिं सद्धि पव्वतिस्सामि, तते णं ते पंच पंडवा पंडुसेणस्स अभिसेओ जाव राया जाए जाव रज्जं
पसाहेमाणे विहरति, तते णं ते पंच पंडवा दोवती य देवी अन्नया कयाई पंडुसेणं रायाणं आपुच्छति
तते णं से पंडुसेणे राया कोडुपियपुरिसे सदावेति २ एवं वयासी-खिप्पामेव भो! देवाणु ! निक्ख-
अपरकका
ज्ञाताध्य०
पाण्डवादि-
दीक्षादि.
वर्णन-
सूत्रम् ।
॥२३२॥
॥ २३२॥
मणाभिसेयं जाच उचट्ठवेह पुरिससहस्सवाहणीओ सियियाओ उवट्ठवेह जाच पचोरुहंति जेणेव थेरा तेणेव० आलित्ते णं जाव समणा जाया चोहस्स पुयाई अहिवंति २ पहणि वासाणि छट्टमदसमदुः घालसेहिं मासद्धमासग्वमणेहिं अप्पाणं भाषमाणा विहरंति ॥ सूत्रम्-१३४ ॥ तते णं सा दोवती देवी सीयातो पचोरूहति जाव पव्वतिया सुव्ययाए अजाए सिस्सिणीयत्ताए दलयति, इकारस्स अंगाई अहिज्बइ यहूणि वासाणि छहमदसमदुवालसेहिं जाय विहरति ।। सूत्रम्-१३५ ॥ तते णं थेरा भगवंतो अन्नया कयाई पंड्डुमहुरातो गयरीतो सहसंयवणाओ उन्नाणाओ पडिणिक्खमंति २, पहिया जणवय- विहारं विहरंति, तेणं फालेणं २, अरिहा अरिहनेमी जेणेव सुरहाजणवए तेणेव उवा० २, सुरद्वाजाणवयंसि संजमेणं तयसा अप्पाणं भावेमाणे विहरति तते णं पहुजणो अन्नमन्नस्स एवमातिक्खइ०-एवं खल देवाणुप्पिया! अरिहा अरिदुनेमी सुरद्वाजणवए जाव वि०, तते णं से जुहिडिल्लपामोक्खा पंच अणगारा पहुजणस्स अंतिए एयमढे सोचा अन्नमन्नं सदाति २, एवं व०-एवं बलु देवाणु० ! अरहा अरिहनेमी पुव्वाणु० जाप विहरह, तं सेयं खलु अम्हं घेरा आपुच्छित्ता अरहं अरिहनेमि वंदणाए गमित्तए, अन्न. मन्नस्स एयमदं पडिसुणेति २ जेणेव धेरा भगवंतो तेणेव उवा० २, धेरे भगवंते चंदंति णमंसंति २त्ता, एवं व०-इच्छामो णं तुन्भेहिं अन्भणुनाया समाणा अरहं अरिहनेमि जाव गमित्तए, अहासुहं देवा०, तते णं ते जुहिद्विालपामोकवा पंच अणगारा थेरेहिं अन्भणुन्नाया समाणा धेरे भगवंते वंदति णमंसति २
नवाड़ी.
१००
भीज्ञाता
धर्मकथाने
धेराणं अंतियाओ पडिणिक्खमंति मासंमासेणं अणिक्खित्तेणं तवोकम्मेणं गामाणुगामं दूईज्जमाणा
जाव जेणेव हत्थकप्पे नयरे तेणेव उवा० हत्थकप्परस बहिया सहसंपवणे उज्नाणे जाव विहरंति, तते णं
ते जुहिहिलवजा चत्तारि अणगारा मासखमणपारणए पढमाए पोरसीए सज्झायं करेंति वीयाए एवं जहा
गोयमसामी णवरं जुहिडिल्लं आपुच्छति जाव अडमाणा बहुजणसई णिसामेंति, एवं ग्बलु देवा० !
अरहा अरिहनेमी उर्जितसेलसिहरे मासिएणं भत्तेणं अपाणएणं पंचहिं छत्तीसेहिं अणगारसएहिं सद्धिं
कालगए जाव पहीणे, तते णं ते जुहिढिल्लवजा चत्तारि अणगारा बहुजणस्स अंतिए एयमह सोचा हत्थ.
कप्पाओ पडिणिक्खमंति २, जेणेव सहसंबवणे उजाणे जेणेव जुहिडिल्ले अणगारे तेणेव उवा० २, भत्त.
पाणं पच्चुवेक्वंति २, गमणागमणस्स पडिकमंति २, एसणमणेसणं आलोएंति २, भत्तपाणं पडिसेंति २,
एवं व०-एपं खल्लु देवाणुप्पिया! जाव कालगए तं सेयं खलु अम्हं देवाणुप्पिया ! इमं पुव्वगहियं
भत्तपाणं परिहवेत्ता सेत्तुजं पव्ययं सणियं सणियं दुरूहित्तए संलेहणाए झूसणा सियाणं कालं अणवक-
खमाणाणं विहरित्तएत्तिक? अण्णमण्णस्स एयमढे पडिसुणेति २,तं पुव्वगहियं भत्तपाणं एगंते परिहवेंति २,
जेणेव सेत्तुळे पव्यए तेणेव उयागच्छइ २ त्ता, सेत्तसं पव्ययं दुरूहंति २, जाव कालं अणवकंखमाणा
विहरति । तते ण ते जुहिहिलपामोकावा पंच अणगारा सामाइयमातियाति चोइस पुवाई बहूणि
वासाणि दोमासियाए संलेहणाए अत्ताणं झोसित्ता जस्सहाए कीरति णग्गभावे जाव तमहमाराहेति २
अपरकका
ज्ञाताध्यक
पाण्डवा-
नामां-
तिमाराघ-
नादि-
स्वरूप-
॥ २३३ ॥
खत्रम् ।
॥ २३३ ॥
अणंते जाव फेवलपरणाणदसणे समुप्पन्ने जाय सिद्धा ॥ सूत्रम्-१३६ ॥ तते णं सा दोवती अजा सुब्धयाणं अनियाणं अंतिए सामाइयमाझ्याई एकारस अंगाति अहिवति २ यहूणि वासाणि मासियाए संलेहणाए. आलोइयपचिता कालमासे कालं किया यंभलोए उपवना, तत्थ णं अत्गतियाणं देवाणं दम सागरोवमाई ठिती प० तत्य णं दुवतिस्स देवस्स दस सागरोचमाई ठिती पन्नत्ता, से गंमते ! दुबए देपे ततो जाय महाविदेहे चासे जाप अंतं काहिति । एवं खल जंबू । समगेणं सोलमस्स अपमहे पण्णत्ते त्तियेमि ॥ सूत्रम्-१३७ ।। सोलसमं नायज्झयणं समत्तं ॥१३॥ 'पगद्वियत्ति नौः 'नमंति'त्ति-गोपयन्ति, श्रान्त:-खिन्ना तान्त:-तरकाण्डकाशावान् जातः परिवान्त:-सर्वथा खितः एकाधिका येते, 'इच्छतरहिति इच्छया कपाचिदित्पा, 'चेयालीए'त्ति वेलातटे इति । इहापि सूत्रे उपनयोन एश्यते, एवं चासो द्रव्यः-"सुर(पि वकिलेसो नियाणदोसेण सिओ संतो। न सिवाय दोवविए बह किल सुकुमालि. याजम्मे ॥१॥" अथवा-"अममममत्तीए पत्ते दाणं भवे अपत्याय । जह कहुयतुंवदाणं नागसिरिममि दोषार ॥२॥" ति [सुपरपि वपोशो निदानदीपेण पितः सन् । नशिशय द्रौपपा यथा सुकुमारिकाजन्मनि ॥१॥ अमनोबममच्या पात्रे दानं भवेदनाय । यथा कटुतुम्बदानं नागश्रीमचे द्रौपया अपि ॥२॥] समाप्तं पोडशमाताध्यपनविवरणम् ।। १६ ।। -Setc.
१७-श्रीअश्वाख्यं ज्ञाताध्ययनम् । SCRECE १७ झिाता- अश्वाख्य १३४॥ अथ सप्तदशाध्ययनविवरणम् ॥ १७ ॥ अथ सप्तदर्श व्याख्यायते, अस्य च पूण सहायमभिसम्बन्धा-दहानन्तराध्ययने निदानात् कुत्सितदानाद्वा अनर्थ उक्त इह त्विन्द्रियेभ्योऽनियन्त्रितेभ्यः स उच्यते, इत्येवंसम्बद्धमिदम्- जति णं भंते ! समणेणं भगवया महावीरेणं जाव संपतेणं सोलसमस्स णायज्झयणस्स अयमहे पण्णत्ते सत्तरसमस्स णं णायज्झयणस्स के अढे पन्नत्ते , एवं खलु जंबू! तेणं कालेणं २ हस्थिसीसे नयरे होत्था, वपणओ, तत्थ णं कणगकेऊ णामं राया होत्या, चण्णओ; तत्थ णं हथिसीसे गयरे बहवे संजुत्ताणावाचाणियगा परिवसंति अड्डा जाव यहूजणस्स अपरिभूया यावि होत्था, तते णं तेसिं संजुत्ता. णावावाणियगाणं अन्नया एगयओ जहा अरहणओ जाव लवणसमुहं अणेगाई जोयणसयाई ओगाढा यावि होत्या, तते णं तेसिं जाव पहूणि उप्पातियसपाति जहा मार्गदियदारगाणं जाव कालियवाए य तत्थ समुत्थिए तते णं सा णावा तेणं कालियवाएणं आघोलिन्नमाणी २, संचालिबमाणी २, संखोहिज-- माणी २, तत्थैव परिममति; तते णं से णिनामए जहमतीते णसुतीते णट्ठसण्णे मूढदिसाभाए जाए ज्ञाताध्य० सप्तदशा- ध्ययन संबन्ध. विवरण- सूत्रम् ।
याधि होत्था, ण जाणइ कयरं देसं वा, दिसं या, विदिसं वा पोयवहणे अवहित त्तिकटु ओहयमणसंकप्पे जाय झियायति, तते गं ते यहवे कुच्छिधारा य, कण्णधारा य, गम्भिलगा य, संजुत्ताणावाचाणियगा या जेणेव से णिजामए तेणेव उवा० २, एवं व०-किन्नं तुमं देवा० ! ओहयमणसंकप्पा जाव झियायह, तते णं से णिजामए ते यहवे कुच्छिधारा य ४, एवं व०-एवं ग्वलु देवा० ! णहमतीते जाय अवहिए त्तिकह ततो ओहयमणसंकप्पे जाव झियामि, तते णं ते कण्णधारा, तस्स णिज्जामयस्स अंतिए एयममु सोचा णिमम्म भीया ५, पहाया मयपलिकम्मा करयल पहणं इंदाण य खंधाण य जहा मल्लिनाए जाव उवाय. माणा २, चिट्ठति, तते णं से णिज्वामए ततो मुहुत्तंतरस्स लद्धमतीते३, अमूढदिसाभाए जाए यावि होत्या, तते णं से णिजामए ते यहवे कुच्छिधारा य ४, एवं व०-एवं खलु अहं देवा० ! लद्धमतीए जाय अमूदविसाभाए जाए, अम्हे णं देवा! कालिपदीयतेणं संबूढा, एस णं कालियदीवे आलोफति, तते णं ते फुच्छिधारा य ४ तस्स णिवागमस्स अंतिए सोचा हट्टतुट्ठा पयक्खिणाणुकूलेणं वाएणं जेणेव कालीयदीये तेणेव उवागच्छंति २ पोयवहणं लंयेति २ एगट्टियाहिं कालियदीवं उत्तरंति, तत्थ णं पहवे हिरण्णागरे य सुवण्णागरे य रयणागरे य वइरागरे य यहवे तत्थ आसे पासंति, किं ते ?, हरिरेणुसोणिसुत्तगा आईण. वेढो, तते णं ते आसा ते वाणियए पासंति तेसिं गंधं अग्घायंति २, भीया तत्था उच्चिरगा, उब्बिग्गमणा; ततो अणेगाई जोदणाति उम्भमंति, ते णं तत्थ पउरगोयरा पउरतणपाणिया निम्भया निरुव्विग्गा सा०४०
१७ श्री-
अश्वारूप-
ज्ञाताध्य०
नवाङ्गी- सुहं सुहेणं विहरंति, तए णं संजुत्तानावावाणियगा अपणमपणं एवं व०-किण्हं अम्हे देवा! आसेहिं ,
इमे णं बहवे हिरण्णागरा य, सुवण्णागरा य, रयणागरा य, वइरागराय; तं सेयं खलु अम्हं हिरण्णस्स य,
०१०
सुवण्णस्स य, रयणस्स य, वइरस्स य, पोयवहणं भरित्तए त्तिकद्दु अन्नमन्नस्स एयमद्वं पडिसुणेति २,
भीमाता-
धर्मकपाङ्गे
हिरण्णस्स य, सुवण्णस्स य, रयणस्स य, वइरस्स य, तणस्स य, अण्णस्स य, कट्ठस्स य, पाणियस्स य
पोयवहणं भरेंति २, पयक्खिणाणुकूलेणं वागणं जेणेव गंभीरपोयवहणपणे तेणेव उ० २, पोयवहणं लंति
॥ २३५॥
२, सगडीतागडं सजेति २, तं हिरणं जाव वरं च एगट्टियाहिं पोयवहणाओ संचारेंति २, सगडीसागडं
संजोइंति २, जेणेव हत्धिसीसए नयरे तेणेव उवा० २, हस्थिसीसयस्स नयरस्स बहिया अरगुजाणे सत्य-
णिवेसं करेंति २, सगडीसागडं मोएंति २;महत्थं जाव पाहुडं गेण्हंति २, हत्थिसीसं च नगरं अणुपविसंति
२, जेणेव कणगकेऊ तेणेव उ० २, जाव उवणेति, तते णं से कणगकेऊ तेसिं संजुत्ताणावावाणियगाणं तं
महत्थं जाव पडिच्छति ।। सूत्रम्-१३८॥ ते संजुत्ताणावावाणियगा एवं व०-तुम्भे णं देवा० गामागर जाव
आहिंडह लवणसमुदं च अभिक्खणं २, पोयवहणेणं ओगाहह तं अस्थि याई केइ भे कहिंचि अच्छेरए
दिद्वपुब्वे ?, तते णं ते संजुत्ताणावावाणियगा कणगकेउं एवं व०-एवं ग्वलु अम्हे देवा० ! इहेव हत्थिसीसे
नयरे परिवसामोतं चेव जाव कालियदीवंतेणं संवढा, तत्थ णं बहवे हिरण्णागरा य जाव बहवे तत्थ आसे,
किंते?, हरिरेणु जाव अणेगाइं जोषणाई उम्भमंति, तते णं सामी! अम्हेहिं कालियदीवे ते आसा अच्छरए
द्वीप-
संबन्धि-
अधादि-
वर्णन-
सत्रम् ।
॥ २३५॥
दिट्ठपुव्वे, तते णं से कणगकेऊ तेसिं संजत्तगाणं अंतिए एयमदं सोचा ते संजुत्तए एवं व०-गच्छह णं तुम्भे देवा० ! मम कोडंपियपुरिसेहिं सद्धिं कालियदीवाओ ते आसे आणेह, तते णं से संजुत्ता० कणग- केउं एवं व०-एवं सामि त्तिक? आणाए विणएणं वयणं पडिसुणेति, तते णं कणगकेऊ कोडुंबियपुरिसे सद्दावेति २ एवं व०-गच्छह णं तुम्भे देवा०! संजुत्तएहिं सद्धिं कालियदीवाओ मम आसे आणेह, तेवि पडिसुणेति, तते णं ते कोडविय० सगडीसागडं सजेति २, तत्थ णं यहूणं वीणाण य, वल्लकीण य, भाम. रीण य, कच्छभीण य, भंभाण य, छन्भामरीण य, विचित्तवीणाण य; अन्नेसि च यहणं सोतिदियपाउग्गाणं दव्वाणं सगडीसागडं भरेंति २, यहूर्ण किण्हाण य जाय सुकिलाण य कट्ठकम्माण य ४, गंथिमाण य ४, जाव संघाइमाण य अन्नेसिं च पडणं चक्खिदियपाउग्गाणं दव्वाणं सगडीसागडं भरेंति २, पडणं को?- पुडाण य केयइपुडाण य जाव अन्नेसिं च बहूणं घाणिदियपाउग्गाणं दवाणं सगडीसागडं भरेति २, पहुस्सखंडस्स य, गुलस्स य,सकराए य,मच्छंडियाए य,पुप्फुत्तरपउमुत्तर० अन्नेसिं च जिभिदियपाउग्गाणं दव्वाणं भरेंति २, बहूर्ण कोयवयाण य, कंयलाण य, पावरणाण य, नवतयाण य, मलयाण य,मसूराण य, सिलावाण जाव हंसगम्भाण य अन्नेसि च फासिदियपाउरगाणं दव्वाणं जाव भरेंति २, सगडीसागडं जोएंति २, जेणेव गंभीरए पोयट्ठाणे तेणेव य उवा० २, सगडीसागडं मोएंति २, पोयवहणं सति २, तेसिं उफिट्ठाणं सदफरिसरसरूवगंधाणं कट्ठस्स य, तणस्स य, पाणियस्स य, तंदुलाण य, समियस्स य,
नवाजी
श्रीज्ञाता-
धमकथा
गोरमस्स य जाच अन्नेसिं च यहूर्ण पोयवहणपाउग्गाणं पोयवहणं भरेंति २, दक्खिणाणुफूलेणं वागणं
जेणेव कालियदी तेणेव उवा० २, पोयवहणं लंति २, ताई उशिवाई सफरिसरसरूवगंधाई एगहि-
याहिं कालियदीवं उत्तारेंति २, जहिं २, च णं ते आसा आसयंति वा, सयंति चा, चिट्ठति वा, तुयति
चा तहिं २ च णं ते कोडंपियपुरिसा ताओ वीणाओ य जाव विचित्तवीणातो य अन्नाणि यहूणि सोइं.
दियपाउग्गाणि य दव्याणि समुधीरेमाणा चिटुंति, तेसिं परिपेरंतेणं पासए ठवेंति २, णिचला णिप्फंदा
तुसिणीया चिट्ठति, जत्थ २ ते आसा आसयंति वा जाव तुयति वा तत्थ तत्थ णं ते कोडुंबिय० यहूणि
किण्हाणि य ५ कट्ठकम्माणि य जाव संघाइमाणि य अन्नाणि य यहणि चक्खिदियपाउग्गाणि य दवाणि
ठवेंति तेसिं परिपेरंतेणं पासए ठति २, णिचला णिप्फंदा० चिट्ठति जत्थ २, ते आसाआसयंति ४, तत्थ
२, गं तेसिं पहर्ण कोदृपुडाण य अन्नेसिं च घाणिदियपाउग्गाणं दव्याणं पुंजे य णियरे य करेंति २, तेसिं
परिपेरंते जाव चिट्ठति जत्थ २, णं ते आसा आसयंति ४, तत्थ २, गुलस्स जाव अन्नेसि च बहणं जिभि-
वियपाउग्गाणं दव्याण पुंजे य निकरे य करेंति २, वियरए खणंति २, गुलपाणगरस खंडपाणगस्स पार-
पाणगस्स अन्नेसिं च यहूणि पाणगाणं वियरे भरेंति २, तेसिं परिपेरंतेणं पासए ठवेंति जाव चिट्ठति जहिं
२, च णं ते आसा आस० तहिं २, च ते बहवे कोययया य जाव सिलावघ्या अण्णाणि य फासिंदिया-
पाउगाई अत्युयपचत्युयाइं ठवेंति २, तेसि परिपेरंतेणं जाच चिट्ठति। तते णं आसा जेणेव एते उकिहा
१७ थी-
अन्धाख्य-
ज्ञाताध्य.
श्रोत्रेन्द्रि-
याद्यास-
ताश्चादि
वर्णन-
| २३६॥
सूत्रम् ।
॥ २३६॥
सफरिसरसरूवगंधा तेणेव उवा० २, तत्थ णं अत्थेगतिया आसा अपुव्या णं इमे सद्दफरिसरसरूवगंधा इतिकटु तेसु उफिटेसु सदफरिसरसरूपगंधेसु अमुच्छिया ४, तेसि उफिट्टाणं सद्द जाव गंधाणं दूरंदूरेणं अवमति, ते ण तत्थ पउरगोयरा पउरतणपाणिया णिन्भया णिब्धिग्गा सुहंसुहेणं विहरंति, एवामेव समणाउसो! जो अम्हं णिग्गंधो वा २, महफरिसरसरूवगंधा णो सज्जति से णं इहलोए चेव परणं सम. गाणं ४ अचणिजे जाव चीनिवयति ॥ सूत्रम्-१३९।। तत्थ णं अत्थेगतिया आसा जेणेव उफिसद्दफरिसरस. रूवगंधा तेणेय उवा० २ तेसु उकिठेसु सद्दफरिस ५, मुच्छिया जाय अज्झोववण्णा आसेविडं पयत्ते यावि होत्या, तते णं ते आसा एए उफिटे सद्द ५, आसेवमाणा तेहिं यहहिं कूडेहि य पासेहि य गलएसु य पज्झति, तते णं ते फोडुयिया एए आसे गिण्हंति २ एगट्ठियाहिं पोयवहणे संचारेंति २, तणस्स कट्ठस्स जाव भरेंति, तते णं ते संजुत्ता दकिवणाणुकूलणं वाएणं जेणेव गंभीरपोयपणे तेणेव उवा०२, पोयवहणं लंथेति २, ते आसे उत्तारेति २, जेणेव हत्धिसीसे णयरे जेणेव कणगऊ राया तेणेव उवागच्छन्ति २त्ता करपल जाय पदावति २, ते आसे उवणेति; तते णं से तेसिं संजुत्तावाणियगाणं उस्सुफ वितरति २ सकारेति संमाणेति २ त्ता, पडिपिसजेति, तते णं से कणगऊ कोपियपुरिसे सद्दावेइ २, सफारेति. पडिविसनेति, तते णं से कणगके आसमदए सदावेति २ एवं व०-तुम्भे णं देघा० ! मम आसे पिणएह, तते णं ते आसमहगा तहत्ति पडिसुणंति २, ते आसे यहहिं मुहबंधेहि य कण्णवंधेहि य III
नवाजी-
१७ श्री.
भीज्ञाता-
धर्मकथा)
णासाबंधेहि य वालबंधेहि य खुरबंधेहि य कडगधंधेहि य खलिणबंधेहि य अहिलाणेहि य पडियाणेहि य
अंकणाहि य वेलप्पहारेहि य चित्तप्पहारेहि य लयप्पहारेहि य कसप्पहारेहि य छिवप्पहारेहि य विण-
यंति २, कणगकेउस्स रनो उवणेति २ तते णं से कणगकेऊ ते आसमदए सकारेति २, पडिविसज्बेति, तते
णं ते आसा पहहिं मुहबंधेहि य जाव छिचप्पहारेहि य यहणि सारीरमाणसाणि दुक्खातिं पार्वति,
एवामेव समणाउसो ! जो अम्हं णिग्गंधो वा २, पव्वइए समाणे इहेसु सदफरिस जाय गंधेसु य सज्जति
रज्जति गिझंति मुझंति अज्झोवववति से णं इहलोए चेव यहणं समणाण य जाव सावियाण य हील-
णिजे जाव अणुपरियहिस्सति ॥ सूत्रम्-१४० ॥
मर्व सुगम, नवरं नहमतीएत्ति-चक्षुर्ज्ञानस्य विषयानिवायकत्वात् नष्टश्रुतिको-निर्यामकशास्त्रेण दिगादिविवेचनस्य
करणे अशक्तत्वात् , नष्टसंज्ञो मनमो भ्रान्तत्वात् , किमुक्त भवति १-मूहः-अविनिश्चितो दिशा भागो-विभागो यस्य स
मुददिग्भागः, कुक्षिधारादयो यानपात्रब्यापारविशेषनियोगिना, 'हिरण्णागरे'स्पादि, हिरण्याकश्चि सुवर्णाकरांश्च रत्नाकरांश्च
वैराकरांश्च तदुत्पत्तिभूमिरित्यर्थः, पहुंश्चात्राश्वान्-घोटकान् पश्यन्ति स्म, 'किंतेचि किंभूतान् ? अत्रोच्यते-'हरी'त्यादि,
'आइनवेहोति-आकीर्णा-जात्या अश्वाः तेषां 'वेढोति-वर्णनार्था वाक्यपद्धतिराकीर्णवेटका, स चाय-"हरिरेणुमोणिसुत्नग
सकविलमजारपायकुक्कडबोंडसमुग्गयसामवन्ना । गोहुमगोरंगगोरीपाडलगोरा पालवण्णा य धूमवण्णा य केह ॥१॥ तलपत्र-
रिडवण्णा सालोबमा य मासवन्ना य । केई जंपियतिलकीडगा य सोलोयरिद्वगा य पुंडपइया य कणगपट्ठा य केह ॥२॥
अथाख्य-
ज्ञाताप्प
इन्द्रिया-
५ सतावक-
दर्थनादि-
वर्णन-
॥२३७॥
बत्रम् ।
॥२३७॥
चकागपिट्ठवण्णा सारसवण्णा य हंसवण्णा य केई। केइत्थ अन्मपन्ना पतलमेहबन्ना य बहुवन्ना य केह ॥३॥ संशाणुराग. सरिमा सुयमुहगुंबद्धरागमरिसऽत्य केह । एलापाडलगोरा सामलयागवलसामला पुणो केइ ॥४॥ यहवे अन्ने अणिमा सामाकासीमरतपीया अचंतविसुद्धाविय णं आइण्णजाइकूलविणीयगयमच्छरा हयवरा जहोवएमकमत्राहिणोऽविय णं सिक्खा- विणीयविणया लंपणवग्गणधावणधोरणतिवई जईणसिक्खियगइ, किं ते, मणसापि उविहंताई अणेगाई आससयाई पासंति" त्ति तत्र हरिद्रेणवश्य-नीलवर्णपासवः श्रोणिसूत्रक व-बालकानां वर्मादिदवरकरूपं कटीवत्रं, तद्धि प्राय: कालं भवति, सह कपिलेन-पक्षिविशेषेण यो मार्जारो-विडालः म च तथा पादकुक्कुट:-कुक्कुटविशेषः स च तथा बोडं-कर्पासीफलं तस्य समुद् गर्क-सम्पुटममिन्नावस्थ कर्पासीफलमित्यर्थः, तञ्चेति द्वन्द्वस्तत एपामिव श्यामो वर्णो येषां ते तथा, इह च सर्वत्र द्वितीयार्थे प्रथमा, अतस्तानिति, तथा गोधूमो-धान्यविशेषः तद्वद् गौरमङ्गं येषां ते तथा गौरी या पाटला-पुष्पजातिविशेषस्तद्वये गौ- रास्ते तथा ततः पदद्वयस्य कर्मधारयः, गोमगौराङ्गगौरपाटलागौरास्तान् , तथा प्रवालवर्णाश्व-विद्रुमवर्णान् अभिनवपल्ल- चवर्णान् वा रक्तानित्यर्थः, धूमवर्णाश्व-धूम्रवर्णान् पाण्डुरानित्यर्थः, 'केइ'त्ति-काश्चिन्न सर्यानित्यर्थः, इदं च हरीत्यत आर. भ्य घोण्डशब्दे कलिता रूपकं भवति । १ । तलपत्राणि-तालाभिधानवृक्षपर्णानि रिष्ठा च-मदिरा तद्वद्वों येषां ते तलपत्र. रिष्ठावर्णास्वान्, तथा शालिवणांव शुक्लानित्यर्थः, 'भासवण्णा यत्ति-भस्मवर्णाश्च भापो वा पक्षिविशेषस्तद्वर्णाश्च काश्वि- दित्यर्थः, 'जंपिपतिलकीडगाय'ति यापिताः-कालान्तरप्रापिता ये तिला-धान्यविशेषास्तेषां ये कीटका:-जीवविशेषास्त- द्वद्ये वर्णसाधाव ते तथा वाच पापिततिलकोटकांच 'सोलोपरिट्ठगा यत्ति-सावलोकं-सोद्योतं पद्रिष्ठक-रत्नविशेष- BECAREE मीज्ञाता- मकथाले स्तद्वद्ये वर्णमाधात् ते सावलोकरिष्ठास्तांच 'पुंडपइया वनि-पुण्डानि-धवलानि पदानि-पादा येषां ते वधा ते एव पुण्ड. पदिकास्तश्वि, तथा कनकपृष्ठान् कांचिदितिरूपकं १२। 'चकागपिट्ठवपण'ति-चक्रयाका-पक्षिविशेषस्तत्पृष्ठस्येव वर्गों येषा ते तथा तान् मारसवर्णाश्च ईमवर्णान् कोविद् इति पधाई, 'केतित्य अब्भवणेति कोविदाप्रवर्णान 'पतलमेह- चण्णा यत्ति-पक्कपत्रो यस्तला-तालवृक्षः स च मेपश्चति विग्रहस्तस्ये वर्णो येषां ते तथा तान् , 'पचिरलमेहयषणति कचित्पाठः, तथा 'बहुवण्णा के 'त्ति-वर्णान् कांविपिङ्गानित्यर्थः, पाहुवर्णानिति कचित् दृश्यते, रूपकमिदं ३१ वया 'संशाणुरागसरिस'वि-सन्ध्यानुरागेण मदृशान् वर्णत इत्यर्थः, 'सुयमुहगुंजद्वरागसरिसत्य फेइचि-शुकमुखस्य गुजार्द्धस्य च प्रतीतस्य रागेण-सदृशो रागो येषां ते तथा तान् , अत्र-इह कोचिदित्यर्थः, 'एलापाडलगोर'चि एलापाद- ला-पाटलाविशेषोऽथवा एला च पाटला च तद्वत् गौरा ये ते तथा तान्, 'सामलयागवलसामला पुणो केइ'त्ति-श्या- मलता-प्रियङ्गुलता गवलं च -महिपशङ्गं तद्वत् श्यामलान् श्यामान पुनः कांविदिति रूपकं ।४। 'यहवे अन्ने य निदेस'त्ति एकवर्णेनाव्यपदेश्यानित्यर्थः, अत एवाह 'सामाकासीसरत्तपियत्ति-श्यामकाथ काशीसं-रागद्रव्यं तदघे ते कासीमा- स्ते च रक्ताश्च पीताच ये ते तथा तान् शबलानिया, 'अबंतविसुद्धाविय 'ति-निर्दोषप्रित्यर्थः णमित्यलकारे 'आइ. पणजाइकुलविणीयगयमच्छर'ति-आकीर्णाना- जयादिगुणयुक्तानां सम्बन्धिनी जाविले येषां ते तथा ते च ते विनी- ताव गतमत्सराच-परस्परामहनवर्जिता निर्मसका वेति तथा तान् , 'हयवर'त्ति-हयानां प्रधानां मध्ये वरान् प्रधानानि- त्या, 'जहोवदेसकमवाहिणोऽविय णं ति-ययोपदेशक्रममिव-उपदिष्टपरिसायनविक्रमेमेव बोचशील येषां ते तपा वा- १७ श्री. अचाख्य- घाताष्य० चकनाका दिपदाना- व्याख्या नम्। २३८॥ ॥ २३८ ।
नपि च णमित्यलकारे, 'सिक्खाविणीयविणय'ति-शिक्षयेव-अश्वदमकपुरुपशिक्षाकरणादिव विनीता अवाप्तः विनयो पेस्ते तथा वान्, 'लंघपावग्गणघावणधोरणतिवईजइणसिक्खियगई'चि-लहन गर्नादीनां वल्गन कूनं धावनं- वेगवद् गमनं धोरण--चतुरत्वं गतिविषयं त्रिपदी-मल्लस्येव रङ्गभूम्यां गतिविशेषः एतद्रूपा जविनी वेगवती शिक्षितेव शि. क्षिता गतियस्ते तथा वान् , किं ते इति किमपर, 'मणसावि उब्धिहंताई वि-मनसाऽपि- चेतसाऽपि न केवलं वपुषा 'उविष हताईति उत्पतन्ति, 'अणेगाई आससयाईति न केवलमधानेकैकयः अपि तु अबश्वानि पश्यन्ति स्मेति, गमनिकामात्रमेतदस्य वर्णकस्य मावार्यस्तु पहुश्तबोध्य इति । 'पउरगोयर'त्ति-प्रचुरचरणक्षेत्राा, 'वीणाण येत्यादि, वीणादीनां तन्त्रीसत्यादिकतो विशेषा, भमा- दका 'कोहपुडे'त्यादि, कोष्ठपुटे ये पच्यन्ते ते कोष्ठपुटा:- वासविशेषाः तेपो प, इह यावरकरणादिदं दृश्य- पत्तपुडाण य'-पत्राणि तमालपत्रादीनि 'चोयपुडाण य', 'चोय'ति-त्वपुट-पत्रादिमयं वमाजनं 'तगरपुडाण य एलापुडाण य हरिपेरपुडाण य चंदणपुडाण य कुंकुमपुडाण य ओसीरपुडाण य पंपगपुडाण य मरुअगपुडाण प दमणगपुष्ठाण य जातिपुडाण य जूहियापुडाण य मल्लियापुडाण य नोमालियापुडाण य वासंतिपापुडाण य फेयहपुडाण य कापूरपुडाण य पाडलपुडाण यत्ति, इह तगरादीनि गन्धद्रष्याणि गान्धिकासिवानि, हिरिचरं वालका उसीर वेरणीमूलं, केचित पुष्प जातिविशेषाः लोकप्रसिद्धा, पुष्पजातपत्र पायो यद्यपि पहुदिनक्षमा न भयन्ति सथाऽप्युपायतः कतिपयदिनक्षमा सम्माव्यन्ते, न च शुष्कतापामपि तामा सर्वया सुगन्धामाव इति तद्ग्रहणमिहादृष्टमिति, तथा 'पहुस्स'चि-बहोः खण्डादेः पुष्पोतरा पभोत्तरा च शर्कराभेदावेन, 'कोय.
नवाजी. भीमाता- धर्मकथाले वगाण यति-रूतपूरितपटानां प्रावारा प्रावरणविशेषा नवतानि जीनानि मलयानि मसूरकाणि चासनविशेषाः, अथवा मलयानि-मलयदेशोत्पनाः वनविशेषा, पाठान्तरेण 'मसगाण यति मशका:-कृचिमण्डिताः विशेषाः शिलापट्टाः-- मसृणशिलाः, 'समियस्त'ति-कणिकायाः, 'खलिणवंधेहि यत्ति-खलिन:- कविकैः. 'उवीलणेहि यत्ति-अवपीडना- भिन्धनविशेपैः, पाठान्तरे 'अहिलाणेहिं'-मुखबन्धनविशेषैः 'पडियाणएहि यति-पटतानकं पर्याणस्याधो यद्दीयते इति शेष प्रायः प्रसिद्ध । अथेन्द्रिपासताना स्वरूपस्पेन्द्रियासपरदोस्प चामिधायक गाथाकदम्बकं वाचनान्तरेऽधिका- पलभ्यते, तन- कलरिभियमहुरतंतीतलतालवंसकउहाभिरामेसु । सद्देसु रज्नमाणा रमंती सोइं दियवसदा ॥१॥ सोईदियदुइन्तत्तणस्स अह पत्तिओ हवति दोसो। दीविगरुपमसहंतो वहवंधं तित्तिरो पत्तो ॥२॥ थणजहणवयणकरचरणणयणगवियविलासियगतीसु । रुवेसु रजमाणा रमंति चक्खिदियवसा ॥३॥ चक्खिदियदुईतत्तणस्स अह एत्तिओ भवति दोसो । जं जलणंमि जलंते पडति पयंगो अबुद्धीओ.॥४॥ अगुरुवरपवरधूवणउउयमल्लाणुलेवणविहीसु । गंधेसु रबमाणा रमंति घाणिदियवसहा ॥६॥ पाणि- दियदुइंतत्तणस्स अह एत्तिओ हवह दोसो । जं ओसहिगंधेणं विलाओ निद्धावती उरगो ॥ ६ ॥ तित्त. कडुयं कसायंच महुरं बहुखजपेजलेज्झेसु । आसायमि उ गिद्धा रमंति जिन्भिदियवसदा ॥७॥ जिभि- दियदुईतत्तणस्स अह पत्तिओ हवइ दोसो। जंगललग्गुश्वित्तो फुरइ थलविरल्लिओ मच्छो ॥८॥ उउ. १७ थी- अचाख्य- ज्ञाताध्य. इन्द्रिया. सक्त. जीवानां- कदर्थ- ॥२३९॥ व्याख्या- नम्। ॥ २३९० भयमाणसुहेहि य सविभवहिययगमणनियुइकरेसु । फासेसु रजमाणा रमंति फासिदियवसहा ॥९॥ फासिदियदुइंतत्तणस्स आह पत्तिओ हवइ दोसो । जं ग्वणइ मत्थयं कुंजरस्त लोहंकुसो तिक्खो ॥१०॥ कलरिभिपमहुरतंतीतलतालवंसकउहाभिरामेसु । सद्देसु जे न गिद्धा वसट्टमरणं न ते मरए ॥ ११ ॥ पणजहणवयणकरचरणयणगव्वियविलासियगतीसु। रूवेसु जे न रत्ता वसहमरणं न ते मरए ॥१२॥ अगरुवरपपरपूषणउउयमल्लाणुलेयणविहीसु । गंधेसु जे न गिद्धा वसहमरणं न ते मरए ॥ १३ ॥ तित्त- फडपं फसायंप महुरं बहुग्वजपेजलेज्झेसु । आसाये जे न गिद्धा वसहमरणं न ते मरए ॥ १४ ॥ उउभ- यमाणसुहेसु य सविभयहिययमणणिब्युइकरेसु । फासेसु जे न गिदा वसहमरणं न ते मरए ॥ १५ ॥ सहेस ग भइयपावएसु सोपचिसयं उयगएसु । तुटेण व रुद्वेण व समणेण सया ण होयव्यं ॥१६॥ रूवेसु प महगपायपसु पक्सुविसयं उवगएसु । तुट्टेण व रुद्वेण व समणेण सपा ण होयव्यं ॥ १७ ॥ गंधेसु य भायपायएसु घाणयिसयं उपगएसु । तुटेण व रुटेण व समणेण सया ण होयचं ॥ १८ ॥ रसेसु य भष्ट- यावरसु जिम्भयिसयं गएसु । तुद्वेण व रुटेण व समणेण सया ण होयब्वं ।। १९ । फासेसु य भव- यपायगसु फायविसयं उवगएसु । तुटेण व रुटेण व समणेण सया ण होयव्यं ॥ २० ॥ एवं ग्यलु जंबू । ममणेणं भगवया महावीरेणं जाव संपत्तेणं सत्तरसमसणायज्झयणस्म अपमढे पन्नते त्तियेमि ।। सूत्रम्- १४१ ॥ सत्तरसमं नागजझयणं समत्तं ॥१७॥ ICCARE
१७ श्री.
अश्वारुय.
नवाजी.
१०१०
भीडावा.
धर्मकथाले
ज्ञाताध्य०
कलादिप-
दानां व्या-
ख्यानम् ।
२४०॥
'कलरिभियमहुरतंतितलतालवंसककुहाभिरामेसुत्ति-कला:-अत्यन्तश्रवणहृदयहराः अव्यक्तव्यनिरूपा अथवा
कलावन्तः-परिणामवन्त इत्यर्थः रिमिवा:-सरघोलनाप्रकारचन्त। मधुरा-श्रवणसुखकरा ये वन्त्रीवलतालवंशाः ते तथा,
वत्र तन्त्री-वीणा तलताला:-हस्ततालाः अथवा तला:-हस्ता। ताला:-कंसिकाः वंशाः-वेणवः, इह च तन्यादयः कला-
दिभिः शब्दधर्मविशेपिताः शब्दकारणत्वात्ते च ते ककुदा:-प्रधानाः स्वरूपेणामिरामाव-मनोज्ञा इति कर्मधारयोऽतस्तेपु,
रमन्ति-रति कुन्तीवि इति योगा, 'सद्देसु रज्जमाणा रमंति सोइंदियवसहात्ति-शब्देपु-मनोज्ञध्वनिपु श्रोतोविषयेषु
रज्यमाना-रागवन्तः श्रोत्रेन्द्रियस्य वशेन-बलेन ऋता:-पीडिता इति विग्रहः, ये शन्देषु रज्यन्ते-तत्कारणेषु तन्यादिषु
थोत्रेन्द्रिपरशाद्रमन्ते इति वाक्यार्थी, अनेन च कार्यतः श्रोत्रेन्द्रियस्वरूपमुक्तं ॥ ‘सोइंदियqइंतत्तणस्स अह पत्तिओ.
हवइ दोसो। दीवियरुपमसहतो वहयंचं तित्तिरो पत्तों ॥२॥ कण्ठ्या, नवरं शाकुनिकपुरुषसम्बन्धी पञ्जरस्थ.
तितिरो द्वीपिका उच्यते तस्य यो रवस्तमसहमान, स्वनिलयाभिर्गतो वधं-मरणं बन्धं च-पजरबन्धन प्राप्त इत्यर्थः ।
'घणघणवपपाकरचरणनयणगब्वियविलासियगईसुत्ति-स्तनादिषु तथा गर्विताना-सौमाग्यमानवतीनां स्त्रीणी
या विलसिता-जातविलासाः सविकारा गतयस्तासुघेत्यर्थः । 'रूवेसु रज्जमाणा रमति चविखदियवसहा' प्रतीतमेव,
'चक्खिदिपदुदंतवणस अह एत्तिो हवा दोसो । जं जलणमि जलंते पडइ पयंगो अबुद्धीओ ॥ ४ ॥ कण्ठ्या, अगुरुवर-
पवरघूवणउउयमलाणुलेवणविही । गंधेस रजमाणा मंति पाणिदियवसट्टा ।।५॥ कण्ठ्याः, नवरं अगुरुवरा-कष्णागरूः
प्रवरप्पनानि-नान्धयुक्रघुपदेशविरचिता धूपविशेषाः, 'उउय'चि-ऋतौ २ यात्पुपचितानि तानि आर्चवानि मारपानि-
॥२४॥
जात्यादिकुसुमानि अनुलेपनानि च-श्रीखण्डफुङमादीनि विधयः-एतत्प्रकारा इति ॥ घाणिदियदुइन्तत्तणस अहं एतिओ भवति दोसो। जं ओसहिगंधेणं पिलाओ निद्वावई उलगो' ॥६॥ कण्ठ्या, तित्तकडुअंकसायंवमहुरं बहुखजपेजलेज्झेसु । आसायंमि उ गिद्धा रमंति जिभिदियवसट्टा' ७ पूर्ववत् , नवरं तिक्तानि-निम्बकटु- कादीनि कटुकानि-शृङ्गवेरादीनि कपायाणि-मुद्गादीनि अम्लानि-तकादिसंस्कृतानि मधुगणि-खण्डादीनि खाद्यानि- कूरमोदकादीनि पेयानि-जलमद्यदुग्धादीनि लेयानि-मधुशिखरिणीप्रमृतीनि आस्वादे-रसे । 'जिभिदियदुइंतत्तणस्म अह एत्तिओ मवह दोसो । जं गललग्गुक्खित्तो फुरइ थलविरेल्लिओ मच्छो ॥८॥ कण्ठ्या, नवरं गलं-विडिपं तत्र लग्नः कण्ठे विद्धत्वात् उस्क्षिप्तो-जलादुदृतस्ततः कर्मधारयः, स्फुरति-स्पन्दते स्थले-भूतले 'विरेल्लिओ'ति प्रसारितः क्षिप्त इत्यर्थः यः स तया ॥ 'उउभयमाणसुहेसु य सविभवहिययमणनिव्वुइकरेसु फासेसु रज्जमाणा रमंति फार्सिदिय वसहा' ॥९॥ कण्ठ्या, नवरं ऋतुपु-हेमन्तादिपु मज्यमानानि-सेव्यमानानि सुखानि-सुखकराणि तानि तथा तेषु, मविभवानि-समृद्धियुक्तानि महाधनानीत्यर्थः, हितकानि-प्रकृत्यनुकूलानि सविभवानां वा-श्रीमता हितकानि यानि तानि तथा मनसो निर्वृतिकराणि यानि तानि तथा ततः पदत्रयस्य तवयस्य वा कर्मधारयोऽतस्तेषु, सक्चन्दनाङ्गनासन- तूल्यादिषु द्रव्येविति गम्यते, 'फासिदियदुइंतत्तणस्स अह एचिओ हवइ दोसो । जं खणेई मत्थयं कुंजरस्स लोहंकुमो तिक्खो ॥ १०॥ मावना प्रतीतेव, अथेन्द्रियाणां संवरे गुणमाह-'कलरिमियमंहुरततीतलतालवंसककहाभिरामेसु । सदेसु जे न गिद्धा वसट्टमरणा न ते मरए' ॥११॥ पूर्ववद, नवरमिह तन्त्र्योदयः शन्दकारणत्वेनोपचाराच्छब्दाः एव विवक्षिता
नवागी-
१७ श्री-
अथाख्य
ज्ञाताध्य.
अध्ययनो-
पसंहरणम्।
भीमाता-
धर्मकथा
॥२४१॥
अतः शन्देष्वित्येतस्य विशेषणतया व्याख्येयाः, तथा वशेन-इन्द्रियपारतन्न्येण प्रता:-पीडिता वार्ताः वशं वा-विषय-
पारतन्ध्यं ऋता-प्राप्ता वार्ताः, तेषां मरणं वशार्चमरणं वशमरणं वा न ते 'मरए'ति नियन्ते छान्दसच्चादेकवचन-
प्रयोगेऽपि बहुवचनं व्याख्यातमिति, 'थणजघणवयणकरचरणनयणगवियविलासियगईसु । रूवेसु जे न रत्ता वसट्टमणं न ते
मरए ॥१२॥' एवमन्यास्तिस्रो गाथाः पूर्वोक्तार्था वाच्याः, उपदेशमिन्द्रियाश्रितमाह-'सद्देसु य मद्यपावरसु सोयविसयं
उवगएसु । तुद्वेण व रुद्वेण व समणेण सया न होयवं ॥१६॥ कण्ठ्या, नवरं मद्रकेपु-मनोज्ञेषु पापकेपु-अमनोज्ञेषु क्रमेण
तुष्टेन-रागवता रुष्टेन-रोपवतेति, एवमन्या अपि चतस्रोऽध्येतव्या इति । इह विशेषोपनयमेवमाचक्षते-"जह सो कालियदीको
अश्वमसोक्खो तहेच जइधम्मो । जह आसा तह साहू वणियवऽणुकूलकारिजणा ॥१॥ जह सदाइअगिद्धा पत्ता नो पास-
पंधणं आसा । तह विसएसु अगिद्धा बझंति न कम्मणा माहू ॥ २ ॥जह सच्छंदविहारो आमाणं तह य इह वरमुणीणं ।
जरमरणाई विवजिय संपत्ताणंदनिवाणं ॥ ३ ॥ जह सदाइसु गिद्धा वद्धा आसा तहेव विसयरया । पावेंति कम्मबंधं परमा-
सुहकारणं घोर ॥ ४ ॥ जह ते कालियदीना णीया अन्नत्य दुहगणं पचा । तह धम्मपरिन्मट्ठा अधम्मपत्ता इहं जीवा ॥५॥
पाति कम्मनरवश्वसया आरवाहयालीए । आसप्पमदएहि व नेरइयाइहिं दुक्खाई ॥ ६॥" [ यथा स कालिकद्वीपोऽनुपम
सौख्यस्तथा यतिधर्मः । यथाऽश्वास्तथा साधवः वणिज इवानुकूलकारिणो जनाः ॥ १॥ यथा शब्दायेषु अगृद्धाः प्राप्ता न
पाशवन्धनं अश्वाः । तथा विषयेषु अगृद्धा वध्यन्ते न कर्मणा साधवः ॥२॥ यथा स्वच्छन्दविहारोऽश्वानां तथाचेह वर.
मुनीनां । जरामरणानि विवर्य संप्राप्ताऽऽनन्दं निर्वाणं ॥३॥ यथा शब्दादिषु गृद्धा बद्धा अश्वास्तथैव विषयरताः ।
॥ २४ ॥
प्राप्नुवन्ति कर्मपन्धं परमासुखकारणं घोरम् ॥ ४॥ यथा ते कालकद्वीपात् नीता अन्यत्र दुःखगणं प्राप्तः । तथा धर्मपरिभ्रष्टाः अधर्मप्राप्ता इह जीवाः ॥ ५॥ प्राप्नुवन्ति कर्मनरपतिषशगताः संसारवाद्यालो अश्वप्रमर्दकैरिव नैरयिकादिमिर्तुःखानि ॥६॥] इति सप्तदशं ज्ञातं विवरणतः समाप्तम् ॥ १७ ॥ १८-श्रीसुसुमाख्यं ज्ञाताध्ययनम् । अथाष्टादशमारभ्यते, अस्य चार्य पूर्वेण सहायमभिमम्बन्धः-पूर्वस्मिन्निन्द्रियवशवर्चिनामितरेषां चानर्थेतरायुक्ताविद तु लोभवशवर्तिनामितरेषां च तायेवोच्येते इत्येवंसम्बद्धमिदम्- जति णं भंते! समणेणं० सत्तरसमस्स अयमढे पण्णने अट्ठारसमस्य के अढे पन्नत्ते, एवं खलु जंबू! तेणं कालेणं २ रायगिहे णामं नयरे होत्था, वण्णओ, तत्थ णं धण्णे सत्यवाहे भहा भारिया, तस्स णं घण्णस्स सत्यवाहस्स पुत्ता भद्दाए अत्तया पंच सत्थवाहदारगा होत्या, तं०-धणे धणपाले धणदेवे धणगोवे धणरक्खिए, तस्स णं धणस्स सत्यवाहस्स धूया भद्दाए अत्तया पंचण्हं पुत्ताणं अणुमग्गजातीया सुंसु. माणामं दारिया होत्था सुमालपाणिपाया, तस्स णं धण्णस्स सत्यवाहस्स चिलाए नाम दासचेडे होत्था अहीणपंचिंदियसरीरे मंसोवचिए पालकीलावणकुसले यावि होत्था, तते णं से दासचेडे सुंसुमाए दारियाए यालग्गाहे जाए यावि होत्या, सुंसुमं दारियं कडीए गिण्हति २, यहहिं दारएहि य दारियाहि य डिंभ- -- नवाणी- भीज्ञाता- धर्मकथाद्ने १८ श्री- सुसुमाख्या ज्ञाताध्य० चिलाति- वर्णन- सूत्रम् । ॥२४२॥ एहि य डिभियाहि य कुमारएहि य कुमारियाहि य सदि अभिरममाणे २ विहरति, तते णं से चिलाए दासचेडे तेसिं बहूणं दारियाण य ६ अप्पेगतियाणं खल्लए अवहरति, एवं वद्दए आडोलियांतो तेंदुसए पोतुल्लए साडोल्लए अप्पेगतियाणं आभरणमल्लालंकारं अवहरति अप्पेगतिया आउस्सति एवं अवहसइ निच्छोडेति निब्भच्छेति तज्जेति अप्पे० तालेति, तते णं ते यहवे दारगा य ६, रोयमाणा ण ५, सार्ण २, अम्मापिऊणं णिवेदेतिः तते णं तेसिं यहणं दारगाण य ६, अम्मापियरो जेणेव धणे सत्यवाहे तेणेव उवा० धणं सत्यवाहं वहहिं खेजणाहि य रुटणाहि य उवलंभणाहि य ग्वेजमाणा य रुंटमाणा य उवलं. भेमाणा य धपणस्स एयमणिवेदेति, तते णं धपणे सत्यवाहे चिलाय दासचेड एयम€ भुजोर, णिवारेंति जो चेव णं चिलाए दासचेडे उवरमति, ततेणं से चिलाए दामचेडे तेसि बहणं दारगाण य ६, अप्पेगति- याणं खुल्लए अवहरति जाव तालेति, तते णं ते यहवे दारगा य ६, रोयमाणा य जीव अम्मापिऊणं णिवे. देति, तते णं ते आसुरुत्ता ५ जेणेव धणे सत्यवाहे तेणेव उवा० त्ता, बहहिं खिन जाव एयमढे णिवे. देति, तते णं से धणे सत्यवाहे यहणं दारगाणं ६, अम्मापिऊणं अंतिए एयमढे सोचा आसुरुत्ते चिलायं दासचेई उच्चावयाहिं आउसणाहिं आउसति उद्धंसति णिन्मच्छेति निच्छोडेति तज्जेति उच्चावयाहिं ताल- जाहिं तालेति सातो गिहातो णिच्छुभति ।। सूत्रम्-१४२ ॥ तते णं से चिलाए दासचेडे सातो गिहातो निच्छ्रे समाणे रायगिहे नयरे सिंघाडए जाव पहेसु देवकुलेसु ये सभासु य पचासु य जूयखलएसु य ।। २४२ ।।
घेसाघरसु य पाणघरएसु य सुहंसुहेणं परियडति, तते णं से चिलाए दासचेडे अणोहहिए अणिवारिए सर्छदमई सहरप्पयारी मज्जपसंगी चोजपसंगी मंसपसंगी जूयप्पसंगी वेसापसंगी परदारप्पसंगी जाए यावि होत्या, तते णं रायगिहस्स नगरस्स अदूरसामंते दाहिणपुरस्थिमे दिसिभाए सीहगुहा नामं चोर- पल्ली होत्था विसमगिरिकडगकोडंवसंनिविट्ठा वंसीकलंकपागारपरिक्खित्ता छिण्णसेलविसमप्पवायफरि. होवगूढा एगदुवारा अणेगग्वंडी विदितजणणिग्गमपवेसा अम्भितरपाणिया सुदुल्लभजलपेरंता सुबहुस्सवि फूवियबलस्स आगयस्स दुप्पहंसा यावि होत्या, तत्थ णं सीहगुहाए चोरपल्लीए विजए णामं चोरसेणावती परिवसति अहम्मिए जाव अधम्मे केऊ समुहिए पहुणगरणिग्गयजसे सूरे दढप्पहारी साहसीए सद्दवेही, से णं तत्थ सीहगुहाए चोरपल्लीए पंचण्हं चोरसयाणं आहेवचं जाव विहरति, तते णं से विजए तकरे चोरसणावती बहणं चोराण य पारदारियाण य गंठिभेयगाण य संधिच्छेयगाण य खत्तखणगाण य राया- वगारीण य अणधारगाण य यालघायगाण य वीसंभधायगाण य जयकाराण य खंडरावाण य अन्नसिं च यहणं छिन्नभिन्नयहिराहयाणं कुडंगे गावि होत्था, तते णं से विजए तकरे चोरसेणावती रायगिहस्स दाहिणपुरच्छिमं जणवयं पहहिं गामघाएहि य नगरघाएहि य गोग्गहणेहि य बंदिग्गहणेहि य पंथ- कुणेहि य ग्वत्तखणणेहि य उवीलेमाणे २, विद्वंसेमाणे २, णित्थाणं णिद्वणं करेमाणे विहरति; तते णं से चिलाए दासचेडे रायगिहे पहहिं अत्याभिसंकीहि य चोनाभिसंकीहि य दाराभिसंकीहि य धणिएहि ये
मकवारे
जड़करेहि य परम्भवमाणे २ रायगिहाओ नगरीओ णिग्गच्छति २ जेणेव सीहगुफा चोरपल्ली तेणेव उचा.
२ विजयं चोरसेणावती उचसंपज्जित्ताणं विहरति, तते णं से चिलाए दासचेडे विजयस्स चोरसेणावहस्स
अग्गे असिलद्वग्गाहे जाए याचि होत्था, जाहेविय णं से विजए चोरसेणावती गामघायं वा जाव पंधकोहि
वा काउं वचति ताहेविय णं से चिलाए दासचेडे सुबहुंपि हु कूवियवलं हयविमहिय जाच पडिसेहिति,
पुणरचि लवडे कयकले अणहसमग्गे सीहगुहं चोरपल्लिं हव्यमागच्छति, तते णं से विजए चोरसेणावती
चिलायं तकर पहइओ चोरविजाओ य चोरमंते य चोरमायाओ चोरनिगडीओ य सिकवावेई, तते णं से
विजए चोरसेणावई अन्नया कयाई कालधम्मुणा संजुत्ते यावि होत्या, तते णं ताई पंचचोरसयाति विजयस्स
चोरसेणावइस्स महया २, इड्डीसकारसमुदएणं णीहरणं करेंति २, बहई लोइयातिं मयकिच्चाई करेइ २, जाव
विगयसोया जाया यावि होत्या, तते णं ताई पंच चोरसयाति अन्नमन्नं सद्दावेति २ एवं 4०-एवं खलु
अम्हं देवा० ! विजए चोरसेणावई कालधम्मुणा संजुत्ते अयं च णं चिलाए तकरे विजएणं चोरसेणावहणा
बहइओ चोरविजाओ य जाव सिक्वाविए तं सेयं ग्वलु अम्ह देवाणुप्पिया ! चिलायं तकरं सीहगुहाए
चोरपल्लीए चोरसेणावहत्ताए अभिसिंचित्तए त्ति कटु अन्नमन्नस्स एयमटुं पडिसुणेति २, चिलायं तीए सीह-
गुहाए चोरसेणावइत्ताए अभिमिचंति, तते णं से चिलाए चोरसेणावती जाए अहम्मिए जाव विहरति,
१°१२ तास।
सुसुमाख्य
ज्ञाताध्य
चौरसेना-
पतिविजय-
वर्णन-
सूत्रम्।
२४३॥
॥ २४३॥
तए णं से चिलाए चोरसेणावती चोरणायगे जाव कुडंगे यावि होत्था, से णं तत्थ सीहगुहाए चोरपल्लीए पंचण्हं चोरसयाण य एवं जहा विजओ तहेव सव्वं जाव रायगिहस्स दाहिणपुरच्छिमिल्लं जणवयं जाव णित्याणं निदणं करेमाणे विहरति ।।सूत्रम्-१४३॥ तते णं से चिलाए चोरसेणावती अन्नया कयाइं विपुलं असण ४, उवावडावेत्ता पंच चोरसए आमंतेह तओ पच्छा पहाए कययलिकम्मे भोयणमंडवंसि तेहिं पंचहिं चोरसपहिं सद्धिं विपुलं असणं ४ सुरं च जाव पसणं च आसाएमाणे ४, विहरति; जिमिय- भुत्तुत्तरागए ते पंच चोरसए विपुलेणं धूवपुप्फगंधमल्लालंकारेणं सकारेति सम्माणेति २, एवं व०-एवं ग्वलु देवा ! रायगिहे णयरे धण्णे णाम सत्यवाहे अड्वे, तस्स णं धूया भद्दाए अत्तया पंचण्डं पुत्ताणं अणुमग्गजातिया सुसुमाणामं दारिया यायि होत्या अहीणा जाव सुरूवा, तं गच्छामो णं देवा ! धण्णस्स सत्थवाहस्स गिहं विलुपामो तुम्भं विपुले धणकणग जाव सिलप्पवाले ममं सुंसुमा दारिया, तते णं ते पंच चोरसपा चिलायस्स० पडिसुणेति, तते णं से चिलाए चोरसेणावती तेहिं पंचहिं चोरसएहिं सद्धिं अल्लचम्म दुरूहति २, पुव्वावरण्हकालसमयंसि पंचहि चोरसएहिं सद्धि सण्णद्ध जाव गहियाउहपहरणा माइयगोमुहिएहिं फलएहिं णिकट्ठाहिं असिलहीहि अंसगएहिं तोणेहिं सजीवेडिं धहिं समुक्खित्तेहिं सरेहिं समुल्लालियाहिं दीहाहिं ओसारियाहिं उरुघंटियाहिं छिप्पतूरेहिं वजमाणेहिं माया २ उकिट्ठसीहणायचोरकलकलरवं जाव सहरवभूयं करेमाणा सीहगुहातो चोरपल्लीओ पडिनि-
-
नवाङ्गी-
१०५०
श्रीज्ञाता-
धर्मकथा)
१८ श्री-
सुसुमाख्य
ज्ञाताध्यक
सुसुमादि-
ग्रहण-
वर्णन-
सूत्रम् ।
स्त्रमति २, जेणेव रायगिहे नगरे तेणेव उवा० २, रायगिहस्स अदूरसामंते एग महं गहणं अणुपविसति
२, दिवसं रखवेमाणा चिति, तते णं से चिलाए चोरसेणावई अद्धरत्तकालसमयंसि निसंतपडिनिसंतंसि
पंचहिं चोरसएहि सद्धिं माइयगोमुहितेहिं फलएहिं जाव मूइआहिं उरुघंटियाहिं जेणेव रायगिहे
पुरथिमिल्ले दुवारे तेणेव उवा० २, उदगवत्थि परामुसति आयते ३ तालुग्घाडणिविजं आवाहेइ २,
रायगिहस्स दुवारकवाडे उदएणं अच्छोडेति कवाडं विहाडेति २, रायगिहं अणुपविसति २, महया २,
सदेणं उग्रोसेमाणे २, एवं व०-एवं खलु अहं देवा० ! चिलाए णाम चोरसेणावई पंचहि चोरसएहिं
सद्धिं सीहगुहातो चोरपल्लीओ इह हव्वमागए धण्णस्स सत्यवाहस्स गिहं घाउकामे तं जो गं
णवियाए माउयाए दुद्धं पाउकामे से णं निग्गच्छउत्ति कटु जेणेव धण्णस्स सत्थवाहस्स गिहे तेणेव उवा०
२, धण्णस्स गिहं बिहाडेति, तते णं से धण्णे चिलाएणं चोरसेणावतिणा पंचहिं चोरसएहिं सद्धिं गिहं
घाइजमाणं पासति २, भीते तत्थे ४, पंचहिं पुत्तेहिं सद्धिं एगंतं अवकमति, तते णं से चिलाए चोरसे-
णावती घण्णस्स सत्यवाहस्स गिहं पाएति २ सुवहुं धणकणग जाव सावएजं सुंसुमं च दारियं गेण्हति
२ त्ता रायगिहाओ पडिणिक्वमति २ जेणेव सीहगुहा तेणेव पहारेत्थ गमणाए ॥ सूत्रम्-१४४॥
म सुगम नवरं 'खुल्लए'त्ति-कपर्दकविशेषान् 'वर्तकान्'-जत्वादिमयगोलकान् 'आडोलियाउ'त्ति-रुद्धा उभइयो ।
इति वा पोच्यते, 'तंदूसपत्ति-कन्दुकान्, 'पोत्तुल्लए'ति-पसमयपुत्रिका अथवा 'परिधानवस्त्राणि, 'साडोलए'ति-
॥२४४॥
॥ २४४॥
ISREK उत्तरीयवस्राणि, 'खेचणाहि य'ति-खेदनामिः-खेदसंसूचिकामिः वाग्भिः, रुदनादिमिा-हंदितमायामिरुपालम्मनाभि:- युक्तमेतद्भवादृशामित्यादिमिरिति 'अणोहहए 'त्ति-अकार्ये प्रवर्तमानं तं हस्ते गृहीत्वा योऽपहरति-व्यावर्त्तयति तदमावा- दनपहईकः अनपघट्टको वा वाचा निवारयितुरमावादनिवारकः, अत एवं स्वच्छन्दमति:-निरर्गलघुद्धिरत एव स्वैरप्रचारी स्वच्छन्दविहारी, चोजपसंगेति-चौर्यप्रसक्तः, अथवा 'चोज 'ति-आश्चर्येषु कहेटकेपु प्रसक्त इत्यर्थः, 'विसमगिरिकडग- कोलंयसन्निविट्ठ'ति-विपमो योऽसौ मिरिकटकस्य-पर्वतनितम्बस्य कोलम्बा-प्रान्तस्तत्र सन्निविष्टा-निवेशिता या सा तथा, कोलम्बो हि लोकेऽवन वृक्षशाखाप्रमुच्यते इह चोपचारतः कटकाग्रं कोलम्बो व्याख्यातः, 'सीकलंकपागारपरि- क्खित्तपति वंशीकलङ्का-वंशजालीमयी वृत्तिः सैव प्राकारस्तेन परिक्षिप्ता-वेष्टिता या सा तथा, पाठान्तरे तु वंशीकृत. प्राकारेति, 'छिन्नसेलविसमप्पवायपरिहोवगूढ 'चि-छिन्नो-विमक्तोषयवान्तरापेक्षया या शैलस्तस्प सम्बन्धिनो ये विषमाः प्रपाता-गर्चाः त एव परिखा तयोपगूढा-वेष्टिता या सा तथा, एकद्वारा-एकप्रवेशनिर्गममार्गा, 'अणेगखंडि'ति- अनेकनश्यनरनिर्गमापद्वारा विदितानामेव-प्रतीतानां जनानां निर्गमप्रवेशौ यस्यां हेरिकादिभयात् सा तथा, अभ्यन्तरे पानीय यस्याः सा तथा, सुदुर्लमें जलं पर्यन्तेषु-वहिपार्थेषु यस्याः सा तथा, सुबहोरपि 'कूविययलस्स 'चि-मोपव्यावर्त्तकसैन्य- स्यागतस्य दुष्प्रध्वंस्या, वाचनान्तरे पुनरेवं पठ्यते-'जत्थ चउरंगवलनिउत्तावि वियवला हयमहियपवरवीर- घाइयनिवडियचिन्धधयवडया कीरंति 'ति-अत्र चतुर्णामगानां हस्त्यश्वस्थपदातिलक्षणानां यदलं-सामर्थ्य तेन नियुक्तानि-नितरां मङ्गतानि यानि तानि तथा, 'फूवियवल 'त्ति-निवर्चकसैन्यानीति, 'अधम्मिए'ति-अधर्मेण चरतीत्य-
Korea
चाङ्गी-
भीमाता-
धर्मकथा
धार्मिका, यावत्करणात् ' अधम्मिहे अधर्मिष्टोऽतिशयेन निर्द्धा निस्वंशकर्मकारित्वात् , 'अधम्मकम्वाई'-अधर्ममा-
ख्यातुं शीलं यस्य स तथा, 'अधम्माणुए'-अघमें कर्तव्येऽनुन्ना-अनुमोदनं यस्प सोऽधर्मानुज्ञ: अधर्मानुगो वा
'अधम्मपलोई ' अधर्ममेव प्रलोकयितुं शीलं यस्यामावधर्मप्रलोकी 'अधम्मपलजणे'-अधर्मप्रायेषु कर्मसु पण
रज्यते इत्यधर्मप्ररजना, रलयोरेक्यमितिकृत्वा रस्य स्थाने लकार, 'अधम्मसीलसमुदायारे'-अधर्म एव शीलं-स्वभावः
समृदाचारय यत्किञ्चनानुष्ठानं यस्य स तथा, 'अधम्मेण चैव वित्तिं कप्पेमाणे विहरति'-अधर्मेण-पापेन सावधा.
नुष्टानेनैव दहनाकननिर्लान्छनादिना कर्मणा वृत्ति-वर्तनं कल्पपन्-कुर्वाणो विहरति-आस्ते स्म 'हछिंदभिदवियत्तए'-
हन-विनाशय छिन्द-द्विधा कुरु मिंद-कुंतादिना मेदं विधेहीत्येवं परानपि प्रेरयन् प्राणिनो विकन्ततीति इनच्छिन्दमिन्द-
विकका, होत्यादयः शब्दाः संस्कृतेऽपि न विरुद्धाः, अनुकरणरूपत्वादेपा, 'लोहियपाणि'-प्राणविकर्ननो (नतो)
लोहितौ रक्तरक्ततया पाणी-हस्तौ यस्य स तथा, 'चंहे '-चण्डा उत्कटरोपत्वात् , 'रुद्दे'-रौद्रो निस्तूंशत्वात् , क्षुद्रः
क्षुद्रकर्मकारित्वात् , साहसिक:-असमीक्षितकारित्वात् , ' उकंचणचणमापानियडिकवडकूडसाइसंपओगबहुले'
उत्कचनमुत्कोचा, मुग्धं प्रति तत्प्रतिरूपदानादिकममद्व्यवहारं कर्तुं प्रवृत्तस्स पार्श्ववर्तिविचक्षणभयात् क्षणं यत्तदकरणं
तदुत्कश्चनमित्यन्ये, वञ्चनं-प्रतारणं माया-परवञ्चनयुद्धिः निकृति:-चकत्या कुटादिकरणं अधिकोपचारकरणेन परन्छलन-
मित्यन्ये मायाप्रच्छादनार्थ मायान्तरकरणमित्यन्ये कपट-वेपादिविपर्ययकरणं कूटं कार्यापणतुलाव्यवस्थापनादीनामन्यथा.
करणं 'साइ'ति-अविश्रम्मा, एषां सम्प्रयोगः-प्रवचनं तेन बहुलः स वा बहुलो यस्य स तथा, ' निस्सीले'-अपगवशुभ-
सुसुमारूप-
वाताज्य
अधार्मिका-
दिपदाना-
व्याख्या-
नम्।
२४५॥
.
-
॥२४५॥
. स्वमायः 'निबए'-अणुव्रतरहितः, 'निर्गुणों-गुणवतरहितः, 'निप्पचक्वाणपोसहोववासे'-अविद्यमानपौरुष्यादि- प्रत्याख्यानोऽमपर्वदिनोपवामश्वेत्यर्थः, 'महणं दुपयचउप्पयामियपसुपरिखसिरीमत्राणं धायाए बहाए उच्छायणयाए अधम्म- केऊमहिए चि प्रती नारं घातः-प्रहारो अघो-हिमा व्यत्ययो वा उच्छादना-जातेरपि व्यवच्छेदनं तदर्थ 'अधर्मकेतुः' पापप्रधानः केतुः-प्रहविशेषः स हब य: म तया, द्विपदादिमचानां हि क्षयाय यथा केतुर्ग्रहः समुद्गच्छति तथाऽयं ममुस्थित इति मावना, बहुनगरेषु निर्गत-जनमुखानिसृतं यशा-ख्यातिर्यस्य म तथा, मूरो-विक्रमी दृढमहारी-गादप्रहारः, शन्द लक्षीकृत्य विध्यति यः सः शन्दवेधी, चौरादीन्येकादशपदानि प्रवीतानि, नवरं ग्रन्थिभेदका:-न्यामकान्ययाकारिणः घुर्घरकादिना वा ये ग्रन्थीन् छिन्दन्ति, सन्धिच्छेदका ये गृहमित्तिमन्धीन् विदारयन्ति, धात्रखानका ये सन्धानवर्जितमित्तीः काणयन्ति, 'अणधारयति ऋण-व्यवहरकदेयं द्रव्यं तघे तेषां धारयन्ति, खंडरक्षा-दण्डपाशिकाः, तथा छिबा-हस्वादिषु मिश्रा नासिकादौ याद्या देशात आहता-दण्डादिमिः ततो द्वन्द्वः, कुडंग-वंशादिगहनं तद्वद्यो दुर्गमत्वेन रक्षार्थमाश्रयणीय- त्यमाधात् म तया, 'नित्वाण'ति-स्थानभ्रष्ट, 'अग्गअसिलद्विगाहिति-पुरस्तात् खद्यष्टिग्राहः अथवा अध्या-प्रधानः, 'अल्लचम्म दुरूहति'त्ति आर्द्र चारोहति माङ्गल्पार्थमिति, 'माइय'त्ति-कफारस्य स्मार्थिकत्वात्, 'माइ'चि-रुक्षादिवाल- युक्तलाव पक्ष्मलानि तानि च तानि 'गोमुहीअ'त्ति-गोमुखवदुरापच्छादकत्वेन कृतानि गोमुखितानि चेति कर्मधारय- स्वतस्तैः फलकैः-स्फुरकैः, अबार्थे वाचनान्तराण्यपि मन्ति तानि च विमर्शनीयानीति, गमनिकैवेयं, निकष्टाभिः-कोशा- बाहिकतामिरसियष्टिमिः असङ्गः-स्कन्धापस्थितस्तूणैः-शरमवादिमिः सजीवैः-कोट्यारोपितप्रत्यचर्द्धनुर्भिः समुत्सिप्तैः-
१८ श्री.
नवागी-
श्रीज्ञाता.
धर्मकथाले
निसर्गार्थमाकुरैः 'शरधेः सकाशाच्छरैः चाणैः ‘समुल्लासियाहिं'ति-प्रहरणविशेषाः, 'ओसारियाहिति-प्रलम्वीकृतामिः
ऊरुघंटामिः-जवापण्टामिः 'छिप्पतूरेणं'ति-क्षिप्ततूर्येण, द्रुतं वाद्यमानेन तूर्येणेत्यर्थः, प्रतिनिःकामन्ति, इह बहुवचनं
चौरपक्त्यपेक्षया अन्यथा चौरसेनापतिप्रक्रमादेकवचनमेव स्यादिति ।
तते णं से धण्णे सत्यवाहे जेणेव सए गिहे तेणेव उवा० २, सुबहुं धणकणगं सुंसुमं च दारियं अव.
हरियं जाणित्ता महत्यं ३, पाहुडं गहाय जेणेव णगरगुत्तिया तेणेव उवा० २, तं महत्थं पाहुडं जाव उवणेति
२ एवं व०-एवं खलु देवा०i चिलाए चोरसेणावती सीहगुहातो चोरपल्लीओ इहं हव्वमागम्म पंचहिं
चोरसएहिं सद्धिं मम गिहं घाएत्ता सुबहुं धणकणगं'सुसुमं च दारियं गहाय जाव पडिगए, तं इच्छामो
णं देवा० ! सुसुमादारियाए कूवं गमित्तए, तुम्भे णं देवाणुप्पिया! से विपुले घणकणगे ममं सुंसुमा
दारिया, तते णं ते णयरगुत्तिया घण्णस्स एयमढें पडिसुणेति २, सन्नद्ध जाव गहियाउहपहरणा महया २,
उकिट्ट० जाव समुद्दरवभूयंपिव करेमाणा रायगिहाओ णिग्गच्छंति २, जेणेव चिलाए चोर तेणेव उवा०२,
चिलाएणं चोरसेणावतिणा सद्धि संपलग्गा यावि होत्या, तते णं जगरगुत्तिया चिलायं चोरसेणापति
हयमहिया जाव पडिसेहति, तते णं ते पंच चोरसया णगरगोत्तिएहिं हयमहिय जाव पडिसेहिया समाणा
तं विपुलं घणकणगं विच्छईमाणा य विप्पकिरमाणा यसवतो समंता विप्पलाइत्था, तते णं ते
‘णयरगुत्तिया तं विपुलं घणकणगं गेण्हंति २ जेणेव रायगिहे तेणेव उवा, तते'ण से चिलाए तं चोरसेण्णं
सुसुमाख्या
ज्ञाताध्यक
धन्यसाथ-
वाहस्य-
प्रयत्नादि-
वर्णेन-
सूत्रम् ।
॥२४६॥
॥ २४६॥
तेहिं गयरगुत्तिएहिं हयमहिय जाय भीते तत्ये सुसुमं दारियं गहाय एग महं अगामियं दीहमद्धं अडविं अणुपपिहे, तते ण धपणे सत्यवाहे सुंसुमं दारियं चिलाएणं अडवीमुहिं अबहीरमाणिं पासित्ताणं पंचहिं- पुत्तेहिं सन्दि अप्पछ सन्नद्वपद्ध० चिलापस्स पदमग्गविहिं अभिगच्छति, अणुगल्लेमाणे हकारेमाणे पुकारेमाणे अभितज्जेमाणे अभितासेमाणे पिट्टओ अणुगच्छति, तते णं से चिलाए तं घणं सत्यवाहं पंचहिं पुत्तेहिं अप्पी सन्नयद्धं समणुगच्छमाणं पासति २, अत्थामे ४, जाहे णो संचाएति सुंसुमं दारयं णिव्याहित्तए ताहे संते तंते. परिसंते नीलुप्पलं असिं परामुसति २ सुंसुमाए दारियाए उत्तमंगं छिपति २ तं गहाय ते अगामियं अडविं अणुपबिहे, तते णं चिलाए तीसे अगामियाए अडवीए तण्हाते अभिभूते समाणे पम्हुइदिसाभाए सीह गुहं चोरपल्लिं असंपत्ते अंतरा चेव कालगए। एवामेव समणा. उसो ! जाय पश्यतिए समाणे इमस्स ओरालियसरीरस्स तासवास जाव विद्वंसणधम्मस्स यण्णहे गाप आहारं आहारेति से णं इहलोए पेव पहणं समगाणं ४, हीलणिजे जाव अणुपरियहिस्सति जहा व से चिलाए तमरे। तते णं से धणे सत्यवाहे पंचहिं पुत्तेहि अप्पछ? चिलाय परिघाउमाणे २, तण्हाए छुहाए य संते तेते परितंते नो संचाइए चिलातं चोरसैणावति साहत्धि गिरिहत्तए, से णं तओ पडिनियत्तइ २, जेणेच सा सुंसुमा दारिया चिलाएणं जीवियाओ ययरोविल्लिया लेणतेणेव उवागच्छति २, मुगुमं पारियं. चिलाएणं जीविपाओ पयरोपियं पासह-२, परसुनियंतेव चंपगफायवे, तते णं से घणे नवाही- १०० भीमाता- धर्मकथाझे १८ श्री. सुसमाख्य- घाताध्य० सुसुमा- मरणादि- वर्णन- ॥ २४७॥ सत्यवाहे अप्पछडे आसत्थे कूयमाणे कंदमाणे विलवमाणे महया २, सद्देणं कुह २, सुपरुन्ने सुचिरं कालं वाहमोक्खं करेति, तते णं से धणे पंवहिं पुत्तेहिं अप्पछटे चिलायं तीसे अगामियाए सव्यतो समंता परिघाडेमाणा तण्हाए छुहाए य परिम(रद्धं)ते समाणे तीसे आगामियाए अडवीए सवतो समंता उद. गस्स मग्गणगवेसणं फरेंति २, संते तंते परितते णिव्यिने तीसे आगामियाए अडवीए उदगस्स मग्गण- गवेसणं करेमाणे नो चेव णं उदगं आसादेति, तते णं उदगं अणासाएमाणे जेणेव सुंसमा जीषियातो ववरोएल्लिया तेणेव उवा० २, जेहें पुत्तं धण्णे सहावेह २ एवं क्यासी-एवं खलु पुत्ता! सुंसुमाए दारियाए अट्टाए चिलायं तकरं सव्वतो समंता परिधाडेमाणा तण्हाए छुहाए य अभिभूया समाणा इमीसे आगा. मियाए अडवीए उदगस मग्गणगवेसणं करेमाणा णो चेच णं उदगं आसादेमो, तते णं उदगं अणा. साएमाणा णो संचाएमो रायगिह संपावित्तए, तणं तुभं मम देवा ! जीवियाओ ववरोवेह मंसं च सोणियं च आहारेह २ तेणं आहारेणं अवहिट्ठा समाणा ततो पच्छा इमं आगामियं अडवि जित्थरि- हिह रायगिहं च संपाविहिह मित्तणाइय अभिसमागच्छिहिह अत्थस्स य धम्मस्स य पुण्णस्स य आभागी भविस्सह, तते णं से जेट्टपुत्ते घण्णेणं एवं बुत्ते समाणे धण्णं सत्यवाहं एवं व०-तुम्भे णं ताओ! अम्हं पिया गुरूजणया देवयभूया ठावका पतिद्वावका संरक्खागासंगोवगा तं कहणं अम्हे तातो! तुन्भे जीवियाओ ववरोवेमो तुम्भ णं मंसं च सोणियं च आहारेमो ? तं तुम्भे तातो ! ममं जीविय सूत्रम् ।
ववरोवेह मंसं घ सोणियं च आहारेह आगामियं अडविं णित्थरह तं चेव सव्वं भणइ जाव अत्थस्स जाय पुण्णस्स आभागी भविस्सह, तते णं धणं सत्थ० दोचे पुत्ते एवं व०-माण ताओ! अम्हे जेडं भायरं गुरुं देवयं जीचियाओ ववरोवेमो तुन्भे णं ताओ ! मम जीवि- याओ ववरोवेह जाव आभागी भविस्सह, एवं जाव पंचमे पुत्ते, तते णं से धणे सत्यवाहे पंच पुत्ताणं हियइच्छिर्य जाणित्ता ते पंच पुत्ते एवं व-मा णं अम्हे पुत्ता! एगमवि जीवियाओ ववरोवेमो एस णं सुसुमाए दारियाए सरीरए णिप्पाणे जाव जीवविप्पजदे तं सेयं खलु पुत्ता! अम्हं सुंसुमाए दारियाए मंसं च सोणियं च आहारेत्तए, तते णं अम्हे तेणं आहारेणं अवत्थद्धा समाणा राय गिहं संपाउणिस्सामो, तते णं ते पंच पुत्ता धण्णेणं सत्यवाहेणं एवं बुत्ता समाणा एयमढे पडिसुणेति, तते णं धण्णे सत्थ० पंचहि पुत्तेहिं सद्धिं अरणिं करेति २, सरगं च करेति २, सरएणं अरणिं महेति २, अग्गि पाडेति २, अगि संधुक्खेति २, दारुयाति परिक्खेवेति २, अग्गि पज्जालेति २, सुसुमाए दारियाए मंसं च सोणियं च आहारेंति, तेणं आहारेणं अवत्थद्धा समाणा रायगिहं नयरिं संपत्ता मित्तणाईअभि. समण्णागया तस्स य विउलस्स धणकणगरयण जाव आभागी जायाविहोत्था, तते णं से धणे सत्य- पाहे सुंसुमाए दारियाए यह लोइयाति जाव विगयसोए जाए यावि होत्था ॥ सूत्रम्-१४५।। तेणं कालेणं २, समणे भगवं महावीरे गुणसिलए चेइए समोसढे से णं घपण सत्यवाहे संपत्ते धम्म सोचा पव्यतिए नवाडी. ०पू० भीमाता- वर्मकथा) २४८॥ एकारसंगवी मासियाए संलेहणाए सोहंमे उवयपणो महाविदेहे वासे सिजिशहिति, जहाविय णं जंयू! धपणेणं सत्यवाहेणं णो वपणहउँ वा नो रूपहेचा णो बलहे या नो विसयहेऊ या सुंसुमाए दारियाए मंससोपिए आहारिए नन्नत्थ एगाए रायगिहं संपावणयाए, एवामेव समणाउसो ! जो अम्हं निग्गंथो वा २ इमस्स ओरालियसरीरस्स वंतासवस्स पित्तासवस्स सुकासवस्स सोणियासवस्स जाव अवस्सं विष्पजहियव्यस्स वा, नो वपणहेउं चा, नो रूपहेउं वा, नो यल• विसयहेउंचा, आहारं आहारेति नन्नत्थ एगाए सिद्धिगमणसंपावणट्टयाए से णं इहभवे चेव यहां समपााणं २ बहणं सावयाणं यहणं साविगाणं अचणिजे जाप वीतीवतीस्सति, एवं खलु जंबू! समणेणं भगवया अट्ठारसमस अयमहे पण्णत्ते तिबेमि ॥ सूत्रम्-१४६॥ अहारसमं णायज्झयणं समत्तं ॥१८॥ 'मूइयाहिं 'ति-मूकीकतामिनिःशब्दीकृताभिरित्यर्थी, 'उदगवत्थिति-जलभृतहतिः जलाधारचर्ममयभाजन- मित्यर्थः, 'जो णं णवियाए 'त्यादि, यो हि नविकाया:-अग्रेतनमनमाविन्याः मातुर्दुग्धं पातुकामः स निर्गच्छतु, यो मुमूर्षरित्यर्थः, 'आगामियं 'ति अग्रामिकं 'दीहमद्धं 'ति दीर्घमार्ग, 'पथमग्गविहिं 'ति-पदमार्गप्रचार, 'पम्हट्ट दिसाभाए 'त्ति-विस्मृतदिग्भागः, 'अंतरा चेव कालगए 'त्ति-इह एतावदोपयोगीति आवश्यकादिप्रसिद्धं तदीयं शेषचरितं साधुदर्शनोपशमाघुपदेशेन सम्यक्त्वपरिमावनपजतुण्डकीटिकामक्षणदेवलोकगमनलक्षण नोक्तमिति न विरोधः सम्भावनीयः, उपनयग्रन्थः, पूर्ववत् ; 'वाहपामोकवं 'ति-अश्रुविमोचन: 'पिया 'इत्यादौ, पितोपचारतो लोकेऽ- सुसुमाख्य- ज्ञाताध्य. घन्यसाथ वाहस्यांति- मावस्थादि- वर्णन- सूत्रम् । . . २४८॥
न्योऽपि रूटो, यदाह-"जनेता चोपनेता च, यस्तु विद्यां प्रयच्छति । अन्नदाता भयत्राता, पञ्चैते पितरः स्मृताः ॥ १॥” इति जनकपदणं स्थापका:-गृहस्थधर्मे दारादिमन्त्रणात् प्रतिष्ठापका:-राजादिसमक्षं स्वपदनिवेशनेन संरक्षका:- नानाव्यमनेभ्यः सङ्गोपका:-यहच्छाचास्तिायां संवरणात् , 'अरणिं 'ति-अरणिरने उत्पादनार्थ निर्मथ्यते यद्दारु 'सरगं फरेइ 'त्ति-शरको निर्मथ्यते तद्येनेति, 'नो वन हेतु'मित्यादि, अनेन च किमुक्तं भवति ?-'नन्नत्थ'चि एकस्याः सिद्धि- गमनप्रापणार्थतया अन्यत्र नाहारमाहारयति, तां वर्जयित्वा कारणान्तरेण नादास्यतीत्यर्थः, तत्र सिदिगमनस्य-सिद्धि- गतेयः प्रापणलक्षणोऽर्थः प्राप्तिरित्यर्थः तस्य भावस्तचा तस्या इति, इह चैवं विशेपोपनय:-"जह सो चिलाइपुत्तो सुसुम- गिद्धो अफअपडियद्धो । धणपारद्धो पत्तो महाडवि वसणसयकलियं ॥१॥ वह जीवो विसपसुहे लुद्धो काऊण पावकिरियाओ। फम्मवसेणं पायइ मवाडगीए महादुक्खं ॥ २ ॥ धणरोट्ठीवित्र गुरुणो पुत्ता इव साहवो मवो अडवी। सुयमंसमियाहारोरायगिह इह सिवं नेयं ।। ३ ।। जह अडविनयरनित्थरणपावणत्थं तएहिं सुयमंसं । मुत्तं तहेह साहू गुरुण आणाए आहारं ॥ ४ ॥ भवलंपणसिवपावणहेउं भुअंति ण उण गेहीए । वण्णयलरूवहेउं च मावियप्पा महासत्ता॥५॥ अज्झयणं सम्मत्तं ।।१८।। [ सा• यया स चिलातिपुत्रः मुसुमागद्धोऽकार्यप्रतिबद्धः धन्येन प्रारब्धः प्राप्तो महाटवी व्यसनशतकलिताम् ॥ १॥ तथा जोको विषयमुखे लुन्धः करवा पापझियाः । कर्मवशन प्राप्नोति भवाटष्यो महादुःखम् ॥ २॥ धनश्रेष्ठीव गुरवः पुत्रा इव साधवो भवोऽटवी । सुतामांसमिवाहारो राजगृहं इह शिव शेयम् ॥ ३ ॥ यथाऽटवीनिस्तरणनगरप्रापणा तः मुतामांसं । भुकं तयेद साधवो गुरुणामाशयाऽऽहार ॥ ४॥ भवलञ्चनशिवपापणहतो अन्ति न पुनर्गद्वपा। वर्णवलरूपहतोच मावितात्मानो महासत्वाः ॥ ५॥] अादश शावविवरणं समाप्तम् ॥ १८ ॥ जान -
नवाङ्गी-
भीज्ञाता-
धर्मकथाङ्गे
१९ श्री-
पुण्डरी-
काख्य-
ज्ञाताध्यक
अध्ययन
स्य
पूर्वापर-
संबंधादि-
वर्णन-
सूत्रम् ।
१९-श्री पुण्डरीकाख्यं ज्ञाताध्ययनम् ।
अथकोनविंशतितम व्याख्यायते, अस्य च पूर्वेण महायमभिमम्बन्धः-पूर्वत्रासंवृतावस्येतरस्य चानर्थेतरावुक्ताविह तु
चिरं संताश्रवो भूत्वाऽपि यः पश्चादन्यथा स्यात्तस्य अल्पकालं संवृताश्रवस्य च तावुच्येते इत्येवंसम्बदमिदम्-
जति णं भंते समणेणं भग० म० जाव संपत्तेणं अट्ठारसमस नायज्झयणस्स अयम? पन्नत्ते एगण-
वीसइमस्स नायज्झयणस्स के अढे पन्नत्ते ?, एवं खलु जंबू ! समणेणं भगवया महावीरेणं तेणं कालेणं
२ इहेव जंबूद्दीवे दीवे पुव्वविदेहे सीयाए महाणदीए उत्तरिल्ले कूले नीलवंतस्स दाहिणेणं उत्तरिल्लस्स
सीतामुहवणसंडस्स पच्छिमेण एगसेलगस्स वक्खारपव्ययस्स पुरथिमेणं एत्थ णं पुक्खलावई णामं विजए
पन्नत्ते, तत्थ णं पुंडरिगिणी णामं रायहाणी पन्नत्ता णवजोयणविच्छिण्णा दुवालसजोयणायामा जाव
पचक्खं देवलोयभूया पासातीया ४ । तीसे णं पुंडरिगिणीए णयरीए उत्तरपुरच्छिमे दिसिभाए णलिणि.
वणे णाम उजाणे, तत्थ णं पुंडरिगिणीए रायहाणीए महापउमे णामं राया होत्या, तस्स णं पउमावती
णामं देवी होत्या, तस्स णं महापउमस्स रन्नो पुत्ता पउमावतीए देवीए अचया दुवे कुमारा होत्था, तं०-
पुंदरीए य कंडरीए य सुकुमालपाणिपाया०, पुंडरीयए जुवराया तेणं कालेणं २, थेरागमणं महापउमे
राया णिग्गए धम्मं सोचा पॉडरीयं रज्जे ठवेत्ता पव्वतिए, पोंडरीए राया जाए, कंडरीए जुवराया, महापउमे
॥२४९॥
॥२४९॥
अणगारे चोइसपुयाई अहिजइ, तते णं घेरा पहिया जणवयविहारं विहरति, तते णं से महापउमे, बहुणि यासाणि जाव सिद्धे ॥ सूत्रम्-१४७॥ ततेणं घेरा अन्नया कयाई पुणरवि पुंडरिगिणीए रायहाणीए णलिणवणे उजाणे समोसढा, पोंडरीए राया जिग्गए, कंडरीए महाजणसई सोचा जहा महव्यलो जाव पज्जुवासति, धेरा धम्म परिकहें ति, पुंडरीए समणोवासए जाए जाव पडिगते, तते गं कंडरीए उहाए उद्वेति उहाए उठेत्ता जाप से जहेयं तुम्भे वदह जं णवरं पुंडरीयं रायं आपुच्छामि तए णं जाव पव्वयामि, अहासुहं देवाणु- पिया!, तए णं से कंडरीए जाच धेरै वंदड नमसइ०, अंतियाओ पडिनिक्खमइ तमेव चाउघंटे आसरहं दुरूहति जाय पयोहद जेणेव पुण्डरीए राया तेणेव उवागच्छति करयल जाव पुंडरीयं एवं क्यासी-एवं खल देवा! मए थेराणं अंतिए जाव धम्मे निसंते से धम्मे अभिरुहए तए णं देवा! जाव पव्वइत्तए, तए णं से पुंडरीए कंडरीयं एवं वयासी-माणं तुमं देवाणुप्पिया! दाणि मुंडे जाव पवयाहि अहं णं तुमं महया २ रायाभिसेरणं अभिसिंचयामि, तए णं से कंडरीए पुंडरीयस्स रण्णो एयम8 णो आढाति जाव तुसिणीए संचिति, तते णं पुंडरीए राया कंडरीयं दोचंपि तचंपि एवं व०-जाय तुसिणीए संचिट्ठति, तते णं पुंडरीए कंडरीय कुमारं जाहे नो संचाएति यहहिं आघवणाहिं पण्णवणाहि य ४, ताहे अकामए चेव एयम अणु. मन्नित्था जाव णिक्खमणाभिसरणं अभिसिंचति जाव घेराणं सीसभिक्ख दलयति, पबतिए अणगारे जाए एफारसंगचिऊ, तते णं घेरा भगवंतो अन्नया कयाई पुंडरीगिणीओ नयरीओ णलिणीवणाओ उजाणाओ
नवाजी-
६० पू०
श्रीज्ञासा-
र्मिकथाले
पतिणिक्वमंति पहिपाजणवयविहारं विएरति ।। सूत्रम्-१४८॥ तते तस्स कंडरीयस्स अणगारस्स तेहिं
अंतेहि य पंतेहि य जहा सेलगस्स जाव दाहवकंतीए यावि विहरति, तते णं थेरा अन्नया कयाई जेणेव
पोंडरिगिणी तेणेव उवागच्छइ २ णलिणिवणे समोसढा, पोउरीए णिग्गए धम्म सुणेति, तए पां पोंडरीए
राया धम्मं सोचा जेणेव कंडरीए अणगारे तेणेव उवा० कंडरीयं वंदति णमंसति २, कंडरीयस्स अणगारस्स
सरीरगं सब्वायाहं सरोयं पासति २, जेणेच थेरा भगवंतो तेणेव उवा० २, थेरे भगवते वंदति णमंसह २
त्ता एवं घ०-अहणं भंते ! कंडरीयस्स अणगारस्स अहापवत्तेहिं ओसहभेसजेहिं जाव तेइच्छं आउहामि
तं तुम्भे गं भंते ! मम जाणसालासु समोसरह, तते णं घेरा भगवंतो पुंडरीयस्स पडिसुणेति २, जाव
उपसंपबित्ताणं विहरंति, तते णं पुंडरीए राया जहा मंडुए सेलगस्स जाव पलियसरीरे जाए, तते णं थेरा
भगवंतो पोंडरीयं रायं पुच्छति २, यहिया जणवयविहारं विहरंति, तते णं से कंडरीए ताओ रोयायंकाओ
विष्पमुको समाणे तंसि मणुपणंसि असणपाणखाइमसाइमंसिमुच्छिए गिद्धे गढिए अज्झोक्यपणे पो संचाएर
पोटरीय आपुच्छित्ता पहिया अन्भुजएणं जणवयविहारं विहरित्तए, तत्थेव ओसपणे जाए, तते णं से
पोंडरीए इमीसे कहाए लढे समाणे पहाए अंतेउरपरियालसंपरिवुठे जेणेव कंडरीए अणगारे तेणेव उवा०
२कंडरियं तिकसुत्तोआयाहिणं पयाहिणं करेइ २ वंदति णमंसति २ एवं व०-धन्नेसि णं तुमं देवा ! कयस्थे
कयपुन्ने कयलक्खणे सुलहे णं देवा० ! तब माणुस्सए जम्मजीवियफले जे णं तुमं रज्जं च जाव अंतेउरं
पुण्डरी-
काख्य-
ज्ञाताध्य०
कण्डरी-
कस्य
रोगादि-
वर्णन
।२५०॥
सूत्रम् ।
॥२५०॥
च छहत्ता विगोवइत्ता जाव पव्वति, अहं णं अहण अपने रज्जे जाव अंतेउरे य माणुस्सएसु य कामभोगेसु मुछिए जाव अज्झोववन्ने नो संचाएमि जावा पञ्यतित्तए, तं धन्नेऽसि णं तुम देवा० ! जाव, जीवियफले, तते णं से कंडरीए अगगारे पुंडरीयस्स एयमह णो आढाति जाव संचिति, तते णं कंडरीए पोंडरीएणं दोचंपि तचंपि एवं वुत्ते समाणे अकामए अवस्सवसे लजाए गारवेण य पाउरीयं राय आपु- च्छति २ थेरेहिं सद्धिं पहिया जणवयविहारं विहरति, तते णं से कंडरीए थेरेहिं सदि किंचि कालं उग्गं- उग्गेणं विहरति, ततो पच्छा समणत्तमरितंते समणत्तणणिविणे समणत्तणणिन्भस्थिए समणगुणमु. फजोगी थेराणं अंतियाओ सणियं २, पचोसकति २, जेणेव पुंडरिगिणी णयरी जेणेव पुंडरीयस्स भवणे तेणेव उया. असं. पिणियाए असोगवरपायवस्स अहे पुढविसिलापगंसि णिसीयति २, ओहयमण- संकप्पे जाव झियायमाणे संचिट्ठति, तते णं तरस पोडीयस्स अम्मघाती जेणेव असोगणिया तेपोष उया० २, कंडरीयं अणगारं असोगवरपायवस्स अहे पुढविसिलावद्दयसि ओहयमणसंकप्पं जाव झियाय- माणं पासति २, जेव पोंडरीए राया तेणव उवा० २, पोंडरीयं रायं एवं २०-एवं खलु देवा० ! तव पिउ- भाउर कंडरीए अणगारे असोगवणियाए असोगवरपायवस्स अहे पुढविसिलावट्टे ओहयमणसंकापे जाव झियायति, तते गं पोंडरीए अम्मघाइए एयमटुं सोचा णिसम्म तहेव संभंते समाणे उठाए उद्देति २, अंतेउरपरियालसंपरिखुडे जेणेव असोगवणिया जाव कंडरीयं तिक्खुत्तो. एवं व०-धण्णेसि नवाङ्गी १०१० भीमाता- धर्मकथा) ॥२५१॥ णं तुमं देवा० ! जाय पव्वतिए, अहण्णं अधण्णे ३ जाव पव्वइत्तए, तं धन्नेऽसि णं तुमं देवा ! जाव जीवियफले, तते णं कंडरीए पुंडरीएणं एवं युत्ते समाणे तुसिणीए संचिट्ठति दोचंपि तचंपि जाव चिट्ठति, तते णं पुंडरीए कंडरीयं एवं व०-अट्ठो भंते ! भोगेहिं ?, हंता! अहो, तते णं से पोंडरीए राया कोडंपि. यपुरिसे सदावेइ २, एवं व०-खिप्पामेव भो देवा० ! कंडरीयस्स महत्थं जाव रायाभिसे उवहवेह जाव रायाभिसेएणं अभिसिंचति ।। सूत्रम्-१४९ ॥ तते णं पुंडरीए सयमेव पंचमुट्टियं लोयं करेति सय. मेव चाउज्जामं धम्म पडिवजति २, कंडरीयस्स संतियं आयारभंडयं गेहति २, इमं एयारूवं अभिग्गहं अभिगिण्हइ-कप्पति मे थेरे वंदित्ता णमंसित्ताराणं अंतिए चाउजामं धम्म उपसंपजित्ता णं ततो पच्छा आहारं आहारित्तए त्तिकद्दु, इमं च एयारूवं अभिग्गहं अभिगिण्हेत्ता णं पोंडरिगिणीए पडिनिकावमतिर पुन्वाणुपुब्धि चरमाणे गामाणुगाम दूइज्जमाणे घेरा भगवंतो तेणेव पहारेत्थ गमणाए ।सूत्रम्-१५०॥ तते णं तस्स कंडरीयस्स रपणो तं पणीयं पाणभोयणं आहारियस्स समाणस्स अतिजागरिएण य अइभोयणप्प- संगेण य से आहारे णो सम्मं परिणमइ, तते णं तस्स कंडरीयस्स रण्णो तंसि आहारंसि अपरिणममाणंसि पुब्वरत्तावरत्तकालसमयंसि सरीरंसि वेयणा पाउन्भूया उजला विउला पगाढा जाव दुरहियासा पित्त- ज्जरपरिगयसरीरे दाहवतीए यावि विहरति । तते णं से कंडरीए राया रजे य रटे य अंतेउरे य जाव अज्झोववन्ने अदृदुहवसट्टे अकामते अवस्सवसे कालमासे कालं किचा अहे सत्तमाए पुढवीए उकोस. १९ श्री- पुण्डरी- कारूप- ज्ञाताध्यक मनपरिणा- मिफण्डरी- कस्यजी. वनचर्या दिवर्णन- सूत्रम्। ॥ २५१ कालहिइयंसि नरयंसि नेरइयत्ताए उववण्णे । एवामेव समणाउसो! जाव पव्वतिए समाणे पुणरवि माणुस्सए कामभोगे आसाइए जाव अणुपरियहिस्सति जहा व से कंडरीए राया (सूत्रम्-१५१) तते णं से पोंडरीए अणगारे जेणेव धेरा भगवंतो तेणेव उवा० २, थेरे भगवंते वंदति नमंसति २ थेराणं अंतिए दोचंपि चाउज़ामं धम्म पडिवज्जति, छट्टखमणपारणगंसि पढमाए पोरिसीए सज्झायं करेति २ जाव अडमाणे सीय. ५ लुक्खं पाणभोयणं पडिगाहेति २, अहापजत्तमितिकट्ठ पडिणियत्तति, जेणेव थेरा भगवंतो तेणेव उवा० २, भत्तपाणं पडिदंसेति२, धेरैहिं भगवतेहिं अन्भणुनाए समाणे अमुच्छिते ४, पिलमिव पण्णगभूएणं अप्पाणेणं तं फास्एसणिज्जं असण ४, सरीरकोटगंसि पक्विवति, तते णं तस्स पुंडरीयस्स अणगारस्स तं कालाइकतं अरसं विरसं सीयलुक्खं पाणभोयणं आहारियस्स समाणस्स पुव्वरत्तावरत्तकालसमयंसि धम्मजागरियं जागरमाणस्स से आहारे णो सम्मं परिणमति, तते णं तस्स पुंडरीयस्स अणगारस्स सरीरगंसि वेयणा पाउन्भूया उजला जाव दुरहियासा पित्तज्जरपरिगयसरीरे दाहवकंतीए विहरति, तते णं से पुंडरीए अण. गारे अत्यामे अवले अवीरिए अपुरिसकारपरकमे करयल जाव एवं व०-णमोऽत्थु णं अरिहंताणं जाव संपत्ताणं णमोऽत्यु ण थेराणं भगवंताणं मम धम्मायरियाणं धम्मोवएसयाणं पुधिपि य णं मए थेराणं अंतिए सव्वे पाणातिवाए पचक्खाए जाव मिच्छादसणसल्ले णं पञ्चक्खाए जाव आलोइयपडिकते काल- मासे कालं किचा सवसिद्ध उपचन्ने । ततो अणंतरं उव्यद्वित्ता महाविदेहे वासे सिज्झिहिति जाय ON स कथा) सम्वदुक्ग्वाणमत- काहितिः। एयामेव समणाउसो जाय, पश्यतिए समाणे माणुस्सएहिं कामभोगेडिं. णो सजति नो रज्जति जाच, नो विपडियायमावनति से णंइहमवे चैव पडणं समणाणं वहणं समणीणं. यजुर्ण सावयाणं बहणं साविगाणं अचणिजे चंदणिजे पूणिजे सकारणिजे सम्माणणिजे कल्लाण, मंगलं देवयं चेइयं पज्जुवासणिजे ति का परलोएऽपियाणं णो आगच्छति यहुणि दंडणाणि य मुंडणाणि या तज- गाणि य ताडणाणि य जाव चाउरंत संसारकतारं जाव बीतीधहस्सति जहा-च से पोंडरीए अणगारे । एवं, खल जंवू ! समणेणं भगवया महावीरेणं आदिगरेणं, तित्थगरेणं जाव सिद्धिगणामधेनं ठाणं संपत्तेणं, एगणवीसइमस्स नायज्झयणस्स, अयमढे पन्नत्ते ,एवं खल जंबूसमणेणं भगवया महावीरेणं जाव सिद्धि- गइणामधेनं ठाणं संपत्तेणं छदुस्स अंगस्त पढमस्स सुयक्खंघस्स. अयमढे-पण्णचे त्तिबेमि।। सूत्रम्-१५२॥ तस्स णं सुपखंधस्स एगणवीसं अज्झयणाणि एकसरगाणि एगुणवीसाए दिवसेसु समापंति-॥ सून्नम् १५३ ॥ एगुणवीसं अज्झयणं सम्मत्तं ॥ पढमो,सुयक्खंधो समत्तो.॥ सर्व सुगम, नवर उपनयविशेषोऽयम्-"वाससहस्सपि जई,काऊणं संजमं सुविउलंपि। अंते किलिट्ठमावो न विसुज्झद कंडर रोउच्च ॥१॥ तथा-अप्पेणवि कालेणं केइ जहागहियसीलसामण्णा । साहिति निययकज, पुंडरीयमहारिसिव,जहा ॥२॥" [वर्षसहस्र- मपि यनिः कता संयम सुविपुलमपि। अन्ते क्लिष्टमावो न विशुध्यति कण्डरीक इव ॥१॥ अस्पेनापि कालेन केचित् यथागृहीत- शीलसयुक्ताः साध्यन्ति निजकार्य यथैर पुण्डरीकमहर्षिः॥२०] इत्येकोनविंशतितम शादविवरणतः प्रथम श्रुवस्कन्धः समाः॥ १९ श्री- पुण्डरी- काख्य- ज्ञाताध्य. 'अध्ययनो- पसंहरणा- दिवर्णन- सूत्रम् । ५२॥ 11,२५२ ॥
२. श्रीज्ञाताधर्मकथाङ्ग-द्वितीयश्रुतस्कन्धविवरणम्। अथ द्वितीयो व्याख्यायते, अस्य च पूर्वेण सहायमभिमम्बन्धः-पूर्वत्राप्तोपालम्भादिमिझातेधर्मार्थ उपनीयते, , इह तु स एव साक्षात्कथामिरमिधीयते इत्येवंसम्बन्धोऽयम्- तेणं कालेणं २ रायगिहे नाम नयरे होत्था, वण्णओ, तस्स णं .रायगिहस्स पहिया उत्तरपुरच्छिमे पिसिभाए तत्थ णं गुणसीलए णामं चेहए।होत्था:वण्णओ, तेणं कालेणं २ समणस्स भगवओ-महावीरस्स अंतेवासी अजसुहम्मा णाम थेरा भगवंतो जातिसंपन्ना कुलसंपन्ना जाव चउद्दसपुवी चउणाणोवगया पंचहिं अणगारसएहिं सदि संपरिखुडा पुव्वाणुपुचि चरमाणा गामाणुगाम दुइज्जमाणा: सुहंसुहेणं विहर- माणा जेणेव रायगिहे णयरे जेणेव गुणसीलए चेहए जाव संजमेणं तवसा,अप्पाणं भावमाणा विहरंति, परिसा निग्गया, धम्मो कहिओ, परिसा जामेव दिसं. पाउभूया तामेव दिसिं पडिगया, तेणं कालेणं २ अजसुहम्मस्स अणगाररस अंतेवासी अनजंबू णाम अणगारे जाव,पज्जुवासमाणे एवं व०-जति णं भंते ! समणेण जाव संपत्तेणं छहस्स: अंगस्स पढमसुयक्खंधस्स पायसुयाणं अयमढे पन्नत्ते दोचस्स णं भंते ! सुयक्खंघस्स.धम्मकहाणं समणेणं जाव संपत्तेणं के अढे पन्नत्ते?, एवं खलु जंबू, समणेणं जाव - नवाङ्गी- १०५० भीमावा- धर्मकथाङ्गे २५३॥ संपत्तेणं धम्मकहाणं दस वग्गा पं०, तं०-चमरस्स अग्गमहिसीणं पढमे वग्गे १ बलिस्स २.द्वितीय- बहरोयणिदस्स वइरोयणरन्नो अग्गमहिसीणं बीए बग्गे २ असुरिंदवजाणं दाहिणिल्लाणं इंदाणं अग्गमहि श्रु० सीणं तइए बग्गे ३ उत्तरिल्लाणं असुरिंदवबियाणं भवणवासिइंदाणं अग्गमहिसीणं चउत्थे चग्गे ४ प्रथमवर्गे दाहिणिल्लाणं वाणमंतराणं इंदाणं अग्गमहिसीणं पंचमे वग्गे ५ उत्तरिल्लाण वाणमंतराणं इंदाणं अग्ग प्रथमा महिसीणं छट्टे वग्गे ६.चंदस्स अग्गमहिसीणं सत्तमे वग्गे ७ सूरस्स अग्गमहिसीणं अट्ठमे वग्गे ८ ध्ययन- सफस्स अग्गमहिसीणं णवमे वग्गे ९ ईसाणस्स अग्गमहिसीणं दसमे वग्गे १० । जति णं भंते ! समणेणं प्रारम्म जाव संपत्तेणं धम्मकहाणं दस वग्गा पं० पढमस्स णं भंते ! वग्गस्स समणेणं जाव संपत्तेणं के अहे पन्नत्ते, एवं खलु जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं पढमस्स वग्गरस पंच अज्झयणा पं० तं०-काली राई रयणी विज्जू मेहा, जइ णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं पढमस्स वग्गस्स पंच अज्झयणा पं० पढमस्स णं भंते ! अज्झयणस्स समणेणं जाव संपत्तेणं के अहे पं० १, एवं खल जंबू! तेणं कालेणं २ रायगिहे णयरे गुणसीलए चेइए सेणिए राया चेलणा देवी सामी समोसरिए परिसा णिग्गया जाव परिसा पज्जु- वासति, तेणं कालेणं २ काली नामं देवी चमरचंचाए रायहाणीए कालवडिंसगभवणे कालंसि सीहासणंसि चाहिं सामाणियसाहस्सीहिं चउहि मयहरियाहिं सपरिवाराहिं तिहिं परिसाहिं सत्तहिं अणिएहिं सत्तहिं अणियाहिवतीहिं सोलसहिं आयरक्खदेवसाहस्सीहिं अण्णेहिं यहुएहि य कालवडिंसयभवण ॥ २५३ ।।
वासीहिं असुरकुमारेहिं देवीहिं देवेहि य सद्धिं संपरिवुडा महयाहय जाव विहरइ, इमं च णं केवलकप्पं जंबुद्दीव २ विउलेणं ओहिणा आभोएमाणी २ पासइ, तत्थ समणं भगवं महावीरं जंबुद्दीवे २ भारहे वासे रायगिहे नगरे गुणसिलए चेइए अहापडिरूवं उग्गहं उग्गिमिहत्ता संजमेणं तवसा अपाणं भावे. माणं पासति २ ता हहतुद्वचित्तमाणंदिया पीतिमणा जाव हयहियया सीहासणाओ अन्भुति २ पायपीढाओ पचोरुहति २ पाउया ओमुयति २ तित्थगराभिमुही सत्तट्ट पयाई अणुगच्छति २ वामं जाएं अंचेति २ वाहिण जाणु घरणियलंसि निहट्टु तिक्खुत्तो मुद्धाणं धरणियलंसि निवेसेति २ ईसिं पच्चुपण- मइ २ कडयतुडिय/भियातो भुयातो साहरति २ करयल जाव कडु एवं व०-णमोऽत्यु णं अरहंताणं जाव संपत्ताणं णमोऽत्यु णं समणस्स भगवओ महावीरस्स जाव संपाविउकामस्स चंदामि णं भगवंतं तत्थ. गयं इह गए पासउ मे समणे भगवं महावीरे तत्थ गए इह गयं ति कटु वंदति २ नमंसति २ सीहासण- वरंसि पुरत्याभिमुहा निसण्णा, तते णं तीसे कालीए देवीए इमेयारवे जाव समुप्पवित्था-सेयं खलु मे समणं भगवं महावीरं वंदित्ता जाव पज्जुवासित्तए त्तिकद्दु एवं संपेहेति २ आभिओगिए देवे सद्दावेति २ एवं प०-एवं खलु देवा० ! समणे भगवं महावीरे एवं जहा सुरियाभो तहेव आणत्तियं देइ जाव दिव्वं सुरवराभिगमणजोग्गं करेह २ जाव पञ्चप्पिणह, तेवि तहेव करेत्ता जाव पचप्पिणंति, णवरं जोयणसह- स्सविच्छिणं जाणं सेसं तहेव तहेव णामगोयं साहेइ तहेव नदृविहिं उवदंसेइ जाव पडिगया। भंतेत्ति
नवाही
भीमाता-
मिकथाझे
२. द्वितीय-
श्रु०
कालीदेवी-
पूर्वमवादि-
वर्णन-
सूत्रम् ।
२५४
भगवं गोयमे समणं भगवं महावीरं वंदति णमंसति २ एवं व०-कालिए णं भंते ! देवीए सा दिव्वा
देविठ्ठी ३ कहिं गया० कूडागारसालादिहतो, अहो णं भंते ! काली देवी महिड्डिया, कालिए णं
मंते। देवीए सा दिव्वा देविड्डी ३ किण्णा लद्धा किण्णा पत्ता किण्णा अभिसमण्णागया १, एवं जहा
सूरियाभरस जाव एवं खलु गोयमा ! तेणं कालेणं २ इहेव जंबुद्दीवे २ भारहे वासे आमलकप्पा
णाम णयरी होत्था वपणओ अंयसालवणे चेहए जियसत्तू राया, तत्थ णं आमलकप्पाए, नयरीए काले
नाम गाहावती होत्था अड्डे जाव अपरिभूए, तस्स णं कालस्स गाहावइरस कालसिरी णाम भारिया
होत्था, सुकुमाल जाव सुरूवा, तस्स णं कालगस्स गाहावतिस्स धूया कालसिरीए भारियाए अत्तया
काली सामं दारिया होत्था, बड्डा वडकुमारी जुण्णा जुण्णकुमारी पडियपुयत्थणी णिविनवरा
घरपरिवजियावि होत्या, तेणं कालेणं २ पासे अरहा पुरिसादाणीए आइगरे जहा बद्धमाणसामी णवरं
णवहत्युस्सेहे सोलसहि समणसाहस्सीहिं अट्ठत्तीसाए अज्जियासाहस्सीहिं सद्धि संपरिबुडे जाव अंब-
सालवणे समोसढे परिसा णि जाव पज्जुवासति, तते णं सा काली दारिया इमीसे कहाए लद्ववा समाणी
हह जाव हियया जेणेव अम्मापियरो तेणेव उवा० २ करयल जाव एवं व०-एवं खलु अम्मयाओ! पासे
अरहा पुरिसादाणीए आइगरे जावा विहरति, तं इच्छामि.णं अम्मयाओ! तुन्भेहिं अब्भन्नाया समाणी
पासस्स अरहओ पुरिसादाणीयस्सा पायवंदिया गमिचए, अहासुहं देवा! मा पडियंधी करेहि, तते गं
॥ २५४ ॥
सा कालिया दारिया अम्मापिईहिं अन्भणुनाया समाणी हट्ट जाच हियया पहाया कययलिकम्मा कय. कोउयमंगलपायच्छित्ता सुद्धप्पवेसाई मंगलातिं वत्थातिं पवर परिहिया अप्पमहग्याभरपालंकियसरीरा चेडियाचकवालपरिकिपणा सातो गिहातो पडिणिक्खमति २ जेणेव याहिरिया उवट्ठाणसाला जेणेव धम्मिए जाणप्पवरे तेणेव उवा० २ धम्मियं जाणपवरं दुरूढा, तते णं सा काली दारिया धम्मियं जाण- पवरं एवं जहा दोवती जाव पज्जुवासति, तते णं पासे अरहा पुरिसादाणीए ,कालीए दारियाए तीसे य महतिमहालयाए परिसाए धम्म कहेइ, तते णं सा काली दारिया पासरस अरहओ पुरिसादाणीयस्स अंतिए धम्मं सोचा णिसम्म हट्ट जाव हियया पास अरहं पुरिसादाणीयं तिक्खुत्तो वंदति नमसति २ एवं ३०-सहहामि णं मंते ! णिग्गंधं पाययणं जाव से जहेयं तुम्भे वयह, जं णवरं देवा ! अम्मापियरो आपुच्छामि, तते णं अहं देवाणुप्पियाणं अंतिए जाव पव्ययामि, अहासुहं देवा, तते णं सा काली दारिया पासणं अरहया पुरिसादाणीएणं एवं युत्ता समाणी हट्ट जाब हियया पासं अरहं वंदति २ तमेव धम्मियं जाणप्पवरं दुरुहति २ पासस्स अरहओ पुरिसादाणीयस्स अंतियातो अंयसालवणाओ चेझ्याओ पडिणिग्वमति २ जेणेव आमलकप्पा नयरी तेणेव उवा० २ आमलकप्पं णयरिं मज्झंमज्झेणं जेणेच याहिरिया उचट्ठाणसाला तेणेव उवा० २ धम्मियं जाणपवरं ठवेति २ धम्मियाओ जाणप्पवराओ पघोकहति २ जेणेच अम्मापियरा तेणेव उवा० २ करयल एवं व०-एवं खलु अम्मयाओ ! मए पासरस
नवाङ्गी-
१०१०
२.द्वितीय-
श्रु०
कालिकु०
प्रव्रज्या-
५ ग्रहणादि-
धर्मकथाओं
॥२५५॥
सूत्रम् ।
अरहो अंतिए धम्मे णिसते सेविय घम्मे इच्छिए पडिच्छिए अभिरुतिए, तए णं अहं अम्मयाओ!
संसारभउधिग्गा भीया जम्मणमरणाणं इच्छामि णं तुम्भेहिं अभणुन्नाया समाणी पासस्स अरहतो
अंतिए मुंडा भवित्ता आगारातो अणगारियं पव्वतित्तए, अहासुहं देवा ! मा पडिबंधं क०, तते
णं से काले गाहावई विपुलं असणं ४ उवक्खडावेति २ मित्तणाहणियगसयणसंबंधिपरियणं
आमंतेति २ ततो पच्छा पहाए जाय विपुलणं पुप्फवत्थगंधमल्लालंकारेणं सकारत्ता सम्माणेत्ता
तस्सेव मित्तणातिणियगसयणसंबंधिपरियणस्स पुरतो कालियं दारिय सेयापीएहिं कलसेहिं पहावेति
२ सव्वालंकारविभूसियं करेति २ पुरिससहस्सवाहिणीयं सीयं दुरुहेति २ मित्तणाइणियगसयण-
संबंधिपरियणेणं सद्धिं संपरिवुडा सचिड्डीए जाव रवेणं आमलकप्पं नयरि मज्झमज्झेणं णिग्गच्छति
२ जेणेव अंयसालवणे चेइए तेणेव उवा० २ छत्ताइए तित्थगराइसए पासति २ सीयं ठवेई २ कालिय
दारियं अम्मापियरो पुरओ काउं जेणेव पासे अरहा पुरिसा० तेणेव उवा० २ वंदइ नमसइ २
त्ता एवं व०-एवं खलु देवा ! काली दारिया अम्हं धूया इट्टा कंता जाव किमंग पुण पासणयाए ?, एस
णं देवा० ! संसारभउब्बिग्गा इच्छइ देवाणुप्पियाणं अंतिए मुंडा भरित्ताणं जाव पन्चइत्तए, तं एयं णं
देवाणुप्पियाणं सिस्सिणिभिक्खं दलयामो पडिच्छंतु णं देवाणुप्पिया! सिस्सिणिभिक्खं, अहासुहं
१.१२ कालिय दारियं सौयातो पचोरहति २ ततेणं कालिय अ ।
॥ २५५॥
देवाणुप्पिया ! मा पडियघं, तते णं काली कुमारी पासं अरहं वंदति २ उत्तरपुरच्छिमं दिसिभागं अवक- मति २ सयमेव आभरणमल्लालंकारं ओमुयति २ सयमेव लोयं करेति २ जेणेव पासे अरहा पुरिसादाणीए तेणेव उवा० २ पासं अरहं तिक्खुत्तो वंदति २ एवं व०-आलित्ते णं भंते ! लोए एवं जहा देवाणंदा जाय सयमेय पव्वाचिउं, तते णं पासे अरहा पुरिसादाणीए कालिं सयमेव पुष्फलाए अजाए सिस्सिणि. पत्ताए दलयति, तते णं सा पुष्फला अजा कालिं कुमारि सयमेव पव्वावेति, जाव उवसंपजित्ताणं विहरति, तते णं सा काली अजा जाया ईरियासमिया जाव गुत्तयंभयारिणी, तते णं सा काली अन्जा पुष्फचूलाअनाए अंतिए सामाइयमाइयाति एफारस अंगाई अहिजइ यहूहिं चउत्थ जाव विहरति, तते ण सा काली अजा अन्नया कयाति सरीरवाउसिया जाया याचि होत्था, अभिक्खणं २ हत्थे धोवइ पाए धोवइ सीसं धोवइ मुहं घोवइ थणंतराई धोवइ कक्खंतराणि धोवति गुज्झंतराइं धोवइ जत्थ २ विय णं ठाणं चा सेनं या णिसीहियं वा चेतेइ तं पुवामेव अन्भुक्खेत्ता ततो पच्छा आसयति वा सयइ वा, तते णं सा पुप्फचूला अजा कालिं अनं एवं व०-नो खलु कप्पति देवा० ! समणीणं णिग्गंधीणं सरीरवाउ. सियाणं होत्तए तुमं च णं देवाणुप्पिया! सरीरयाउसिया जाया अभिक्खणं २ हत्थे धोवसि जाव आसपाहि वा सयाहि या तं तुम देवाणुप्पिए ! एपस्स ठाणस्स आलोएहि जाव पायच्छित्तं पडिवजाहि, तते णं सा काली अजा पुप्फचूलाए अजाए एपमहें नो आदाति जाव तुसिणीया संचिट्ठति,
नवाली-
६०३०
भीझाता-
धर्मकथाने
तते णं ताओ पुष्फचूलाओ अजाओ कालिं अजं अभिक्खागं २ हीलेंति णिदति खिसंति गरिहंति
अवमष्णंति अभिवणं २ एयम8 निवारेंति, तते णं तीसे कालीए अजाए समणीहिं णिग्गंधीहिं
अभिक्खणं २ हीलिजमाणीए जाव वारिजमाणीए इमेयारूवे अन्भत्धिए जाव समुप्पज्जित्थाजया पां
अहं आगारवासं मजे वसित्था तया णं अहं सयंवसा जप्पिभिई च णं अहं मुंडे भवित्ता आगाराओ
अणगारियं पव्वतिया तप्पभिई च णं अहं परवसा जाया, तं सेयं खलु मम कल्लं पाउप्पभायाए रयणीए
जाव जलंते पाडिक्कियं उवस्सयं उवसंपजित्ता णं विहरित्तए त्ति कटु एवं संपेहेति २ कल्लं जाच जलते पाडि.
एफ उवस्सयं गिण्हति, तत्थ णं अणिवारिया अणोहटिया सच्छंदमती अभिक्खणं २ हत्थे धोवेति जाव
आसयइ वा सयइ वा, तए णं सा काली अजा पासत्था पासत्थविहारी ओसण्णा ओसपणाविहारी
कुसीला २ अहाछंदा २ संसत्ता २ पहणि वासाणि सामन्नपरियागं पाउणइ २ अद्धमासियाए संलेहणाए
अत्ताणं झूसेति २ तीसं भत्ताई अणसणाए छएइ २ तस्स ठाणस्स अणालोइय अपडिकंता कालमासे कालं
किचा चमरचंचाए रायहाणीए कालवडिंसए भवणे उववायसभाए देवसयणिज्जंसि देवदूसंतरिया अंगुलस्स
असंखेजाइमागमेत्ताए ओगाहणाए कालीदेवीत्ताए उववपणा, तते णं सा काली देवी अहुणोववण्णा
समाणी पंचविहाए पजत्तीए जहा सूरियाभो जाव भासामणपज्जत्तीए, तते णं सा काली देवी चउण्हं
सामाणियसाहस्सीणं जाप अपणेसिं च यहूर्ण कालवडेंसगभवणवासीणं असुरकुमाराणं देवाण य देवीण य
२. द्वितीय
श्रु०
संयम-
स्थित
कालि.
आतघ्या-
नादि-
स्वरूप
सूत्रम् ।
॥ २५६ ॥
॥ २५६ ॥
आहेवचं जाव विहरति, एवं ग्बलु गो .कालीए देवीए सा दिव्वा देविड्डी ३. लद्धा पत्ता अभिसमण्णागया, कालीए णं मंते। देवीए केवतियं कालं ठिती पन्नत्ता ?, गो० ! अड्डाइजाई पलिओवमाई ठिई पन्नत्ता, काली णं भंते ! देवी ताओ देवलोगाओ अर्णतरं उववद्वित्ता कहिं गच्छिहिति कहं उववजिहिति', गो! महाविदेहे वासे सिज्झिहिति, एवं खलु जंबू! समणेणं जाव संपत्तेणं पढमवग्गस्स पढमज्झयणस्स. अपमहे पण्णत्ते त्ति येमि । धम्मकहाणं पढमज्झयणं समत्तं ।। सूत्रम्-१५४ ॥ सर्वः सुगमः, नवरं 'किण्णा लद्धति प्राकृतत्वात् केन हेतुना लब्धा-भवान्तरे उपार्जिता प्राप्ता-देवभवे उपनीता अमिसमन्वागता-परिमोगतः उपयोग प्राप्लेति, 'वति वृहती वयसा सैव वृहचादपरिणीतत्वाच बृहत्कुमारी जीर्णा शरीर- जरणादेत्यर्थः सैर जीर्णत्वापरिणत्वाम्यां जीर्णकुमारी जीर्णशरीरत्वादेव पतितपुतस्तनी-अवनतिगतनितम्बदेशवक्षोजा निर्मिण्णाथ परा:-परिणेतारो यस्याः सा निर्विण्णवरा अत एव चरपरिवर्जितेति शेष सूत्रसिद्धम् ।। जतिःणं भंते ! समणेणं जाय: संपत्तेणं धम्मकहाणं पढमस्स वग्गस्स पढमज्झयणस्स अपमहे प० यितियस्सा णं भंते ! अज्झयणस्स समणेणं भगवया महावीरेणं जाव संपत्तेणं के० अहे पण्णत्ते , एवं लल जंबू ! तेणं कालेणं २ रायगिहे नगरे गुणसीलए चेहए सामी समोसढे परिसा जिग्गया जाव पज्जु. यासति, तेणं कालेणं २ राई देवी, चमरचंचाए रापहाणीए एवं जहा काली तहेव, आगया णविहिं उपदंसेत्ता पडिगया, भंतेत्ति भगवं गो० ! पुष भवपुच्छा, एवं खलु गो० ! तेणं कालेणं २ आमलकप्पा नवाङ्गी- श्रीज्ञासा धर्मकथाने णयरी अंघसालवणे चेहए जियसत्तू राया राई गाहावती राईसिरी भारिया राई दारिया पासस्स समो. सरणं राई दारिया जहेव काली तहेच निक्वता तहेव सरीरयाउसिया तं चेव सब्ब जाव अंतं काहिति । एवं खलु जंबू! विइयज्झयणस्स निक्खेवओ २ । जति णं भंते ! तइयज्झयणस्स उक्खेवतो, एवं खलु जंबू ! रायगिहे णयरे गुणसिलए चेहए एवं जहेव राती तहेव रयणीवि, णवरं आमलकप्पा नयरी रयणी गाहावती रयणसिरी भारिया रयणी दारिया सेसं तहेव जाव अंतं काहिति ३ । एवं विज्जूवि आमल- कप्पा नयरी विज्जुगाहावती विज्जुसिरिभारिया विज्जुदारिया सेसं तहेव ४ । एवं मेहावि आमलकप्पाए नयरीए मेहे गाहावती मेहसिरि भारिया मेहा दारिया सेसं तहेव ५। एवं खलु जंबू समणेणं जाव संप. तेणं धम्मकहाणं पढमस्स वग्गस्स अयमढे पण्णत्ते ॥ सूत्रम्-१५५ ॥ जति णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं दोचस्स वग्गस्स उक्खेवओ, एवं खलु जंवू ! समणेणं जाव संपत्तेणं दोचस्स वग्गस्स पंच अज्झयणा पं०, तं०-सुंभा निसुंभा रंभा निरंभा मदणा, जति णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं धम्मकहाणं दोचस्स वग्गरस पंच अज्झयणा पं०, दोचस्स णं भंते ! वग्गस्स पढमज्झयणस्स के. अहे पं० १ एवं खलु जंबू । तेणं कालेणं २ रायगिहे णयरे गुणसीलए चेइए सामी समोसढो परिसा णिग्गया जाव पज्जुवासति, तेणं कालेणं २ सुंभा देवी पलिचंचाए रायहाणीए सुंभवडेंसए भवणे सुभंसि सीहासणंसि कालीगमएणं जाव गट्टविहिं उवदंसेत्ता जाव पडिगया, पुव्यभवपुच्छा, सावत्थी पयरी कोहए चेइए जियसत्तू राया सुंभे २.द्वितीय- श्रु० प्रथम- वर्गीय- द्वितीया- ध्ययनादि- सूत्रम् । ॥ २५७॥ ॥२५७॥ 12TI गाहावती सुंभसिरी भारिया सुंभा दारिया सेसं जहा कालिया णवरं अबुट्टाति पलिओवमाई ठिती, एवं खलु जंबू ! निक्खेवओ अज्झयणस्स एवं सेसावि चत्तारि अज्झयणा, सावत्थीए नवरं माया पिया सरिसनामया, एवं खलु जंबू ! निक्खेवओ वितीयवग्गस्स २ ॥सूत्रम्-१५६॥ उग्वेवओ तइयवग्गस्स एवं खल जंबू! समणेणं भगवया महावीरेणं जाव संपत्तेणं तइयरस वग्गस्स चउपण्णं अज्झयणा पन्नत्ता, तं०-पढमे अज्झयणे जाव चउपण्णतिमे अज्झयणे, जति णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं धम्मकहाणं तइयरस घग्गरस चउप्पन्नज्झयणा पं० पढमस्स णं भंते ! अज्झयणस्स समणेणं जाव संपत्तेणं के अहे पण्णत्ते, एवं खलु जंवू ! तणं कालेणं २ रायगिहे णयरे गुणसीलए चेइए सामी समोसढे परिसा णिग्गया जाव पज्जुवासति, तेणं कालेणं २ इला देवी धरणीए रायहाणीए इलावडंसए भवणे इलंसि सीहासणंसि एवं कालीगमएणं जाव णदृविहिं उवदंसेत्ता पडिगया, पुव्वभवपुच्छा, वाणारसीए णयरे काममहावणे चेहए इले गाहावती इलसिरी भारिया इला दारिया सेसं जहा कालीए णवरं धरणस्स अग्गमहिसित्ताए उववाओ सातिरेगअद्धपलिओवमठिती सेसं तहेव, एवं खलु णिक्खेवओ पढमज्झयणस्स, एवं कमा सतेरा सोयामणी इंदा घणा विज्जुयावि, सव्याओ एयाओ धरणस्स अग्गमहिसीओ एव, एते छ अज्ज्ञयणा वेणु- देवस्सवि अविसेसिया भाणियन्या एवं जाच घोसस्सवि एए चेव छ अज्झयणा, एवमेते दाहिणिल्लाणं इंदाणं चउप्पण्णं अज्झयणा भवंति,सव्याओवि वाणारसीए काममहावणे चेइए तइयवग्गस्स णिक्खेवओ।सूत्रम्- ०पू० भीज्ञाता- वर्मकथाझे २. द्वितीय- श्रु० चतुर्थ- वर्गीय- अध्ययना- दिसूत्रम्। २५८॥ १५७ ॥ चउत्थस्स उक्खेवओ, एवं खलु जंवू ! समणेणं जाव संपत्तेणं धम्मकहाणं चउत्थवग्गरस चउ प्पपणं अज्झयणा पं०, तं०-पढमे अज्झयणे जाव चउप्पण्णइमे अज्झयणे, पढमस्स अज्झयणस्स उक्खे. वओ गो० ! एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं २ रायगिहे समोसरणं जाच परिसा पज्जुवासति, तेणं कालेणं.२. रूया देवी रूयाणंदा रायहाणी रूयगडिसए.भवणे ख्यगंसि सीहासणसि जहा कालीए तहा नवरं पुब्वः भवे चंपाए पुण्णभद्दे चेतिए रूयगगाहावई रूयगसिरी भारिया रूया दारिया सेसं तहेव, णवरं भूयाणंद, अग्गमहिसित्ताए उचयाओ देसूर्ण पलिओवमं ठिई णिक्खेवओ, एवं खलु सुख्याविरूयंसावि रूयगावतीचि रूयकतावि रूयप्पभावि, एयाओ चेव उत्तरिल्लाणं इंदाणं भाणियब्वाओ जाव महाघोसस्स, णिक्खेवओ चउत्थवग्गस्स ।। सूत्रम्-१५८ ॥ पंचमवग्गरस उक्खेवओ, एवं खलु जंवू ! जाव पत्तीसं अज्झयणा, पं०, तं-कमला कमलप्पभा चेव, उप्पला य सुदंसणा । ख्ववती बहुरूवा, सुरूवा सुभगाविय ॥ १॥ पुण्णा पहुपुत्तिया चेव, उत्तमा भारियाविय । पउमा वसुमती चेव,कणगा. कणगप्पभाः॥ २॥ वडेंसा. केउमती. चेव, वइरसेणा रयिप्पिया। रोहिणी नमिया चेच, हिरी पुष्फवतीतिय, ॥ ३ ॥ भुयगा भुयगवती चेव, महाकच्छाऽपराया । सुघोसा विमला चेव, सुस्सरा य सरस्सती ॥ ४॥ उक्खेवओ पढमज्झयणस्स,. एवं बलु जंवू । तेणं कालेणं २ रायगिहे समोसरणं जाव परिसा पज्जुवासति,,तेणं कालेणं २ कमलादेवी. कमलाए रायहाणीए कमलवडेंसए. भवणे कमलंसि सीहासणंसि.सेसं जहा. कालीए तहेव गवरं पुत्वभवे. | २५८॥
नागपुरे नयरे सहसंबवणे उजाणे कमलस्स गाह्रावतिस्स कमलसिरीए भारियाए कमला दारया पार अंतिए निक्खता कालस्स पिसायकुमारिदस्स अग्गमहिसी अद्धपलिओवमं ठिती, एवं सेसावि अज्झ- यणा दाहिणिल्लाणं वाणमंतरिंदाणं, भाणियव्याओ सव्वाओ णागपुरे सहसंघवणे उजाणे माया पिया धूया सरिसनामया, ठिती अद्धपलिओवमं । पंचमो वग्गो समत्तो ॥ सूत्रम्-१५९ ।। छट्ठोवि वग्गो पंचम- वग्गसरिसो, णवरं महाकालिंदाणं उत्तरिल्लाणं इंदाणं अग्गमहिसीओ पुव्वभवे सागेयनयरे उत्तरकुरु- उज्नाणे माया पिया धूया सरिसणामया सेसं तं चेव । छट्टो वग्गो समत्तो ॥ सूत्रम्-१६० ॥ सत्तमस्स उक्खेवओ, एवं खलु जंबू! जाव चत्तारि अज्झयणा पं०, तं०-सूरप्पमा आयवा अचिमाली पभंकरा, पढमज्झयणस्स उक्खेवओ, एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं २ रायगिहे समोसरणं जाव परिसा पज्जुवासइ, तेणं कालेणं २ सूरप्पमा देवी सूरंसि विमाणंसि सुरप्पभंसि सीहासणंसि सेसं जहा कालीए तहा णवरं पुत्वभयो अरक्खुरीए नयरीए सूरप्पभस्स गाहावइस्स सूरसिरीए भारियाए सुरप्पभा दारिया सूरस्स अग्गमहिसी ठिती अद्धपलिओवमं पंचहि वाससएहिं अन्भहियं सेसं जहा कालीए, एवं सेसा- ओवि सध्याओ अरक्खुरीए णपरीए । सत्तमो वग्गो समत्तो ॥ सूत्रम्-१६१ ।। अट्ठमस्स उक्खेवओ, एवं खलु जंवू ! जाव चत्तारि अज्झयणा पं०, तं०-चंदप्पमा दोसिणाभा अचिमाली पभंकरा, पढमस्स अज्झयणस्स उक्खेवओ, एवं खलु जंबू । तेणं कालेणं २ रायगिहे समोसरणं जाव परिसा पज्जुवासति, घग्गरस वाङ्गी- कथा) २५९। तेणं कालेणं २ चंदप्पभा देवी चंदप्पमंसि विमाणंसि चंदप्पभंसि सीहासणंसि सेसं जहा कालीए, २. द्वितीय णवरं पुत्वभवे महुराए णयरीए भंडिवडेंसए उजाणे चंदप्पमे गाहावती चंदसिरी भारिया श्रु० चंदप्पभा दारिया चंदस्स अग्गमहिसी ठिती अद्धपलिओवमं पण्णासाए वाससहस्सेहिं अन्भहियं सेसं अष्टमवर्गी- जहा कालीए, एवं सेसाओवि महुराए णयरीए मायापियरोवि धूयासरिसणामा, अट्ठमो वग्गो समत्तो। याध्ययना. ॥ सूत्रम्-१६२ ॥ णवमस्स उक्खेवओ, एवं खलु जंबू ! जाव अट्ट अज्झयणा पं०, तं०-पउमा सिवा सती दिवर्णन- अंजू रोहिणी णवमिया अचला अच्छरा, पढमज्झयणस्स उक्खेवओ, एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं रायगिहे सूत्रम् । समोसरणं जाय परिसा पज्जुवासइ, तेणं कालेणं २ पउमावई देवी सोहम्मे कप्पे पउमवडेंसए विमाणे सभाए सुहम्माए पउमंसि सीहासणंसि जहा कालीए एवं अट्ठवि अज्झयणा कालीगमएणं नायव्वा, णवरं सावत्थीए दो जणीओ हत्धिणाउरे दो जणीओ कंपिल्लपुरे दो जणीओ सागेयनयरे दो जणीओ पउमे पियरो विजया मायराओ सव्वाओऽवि पासस्स अंतिए पन्चतियाओ सकस अग्गमहिसीओ ठिई १० सत्त पालिओवमाई महाविदेहे वासे अंतं काहिंति । णवमो वग्गो समत्तो ।। सूत्रम् १६३ ॥ दसमस्स उक्खेवओ, एवं खलु जंबू । जाच अह अज्झयणा पं०, तं०-कण्हा य कण्हराती रामा तह रामरक्खिया वसू या। वसुगुत्ता वसुमित्ता वसुंधरा चेव ईसाणे ॥ १ ॥ पढमज्झयणस्स उक्खेवओ, एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे समोसरणं जाव परिसा पज्जुवासति, तेणं कालेणं २ कण्हा देवी ॥ २५९ ॥ For: Ruite ईमाणे कप्पे फण्हवढंसर विमाणे समाए सुहम्माए कण्हंसि सीहासणंसि सेसं जहा कालीए एवं अहवि अन्झपणा कालीगमपण गेयव्या, णवरं पुञ्चभवे वाणारसीए नयरीए दो जणीओ रापगिहे नयरे दो जणीओ सावत्थीएनयरीए दोजणीओ कोसंपीए नयरीए दोजणीओरामे पिया धम्मा माया सव्याओऽपि पासस्म अराहगो अंतिए पत्र्यइयाओ पुष्फलाए अनाए सिस्सिणीयत्ताए ईसाणस्स अग्गमहिसीओ ठिती णव पलिओषमाई महाविदेहे यासे सिज्झिहिंति बुझिहिंति मुपिहिंति सव्यदुक्खाणं अंतं काहिति । एवं पाठ जंग। णिस्यओ दममयग्गस्स । यसमो यग्गो समत्तो ॥ सूत्रम् १६४ ॥ एवं खलु जंयू ! समणेणं 'भगयगा महावीरेणं आदिगरेणं तित्थगरेण सयंसंबुद्धेणं पुरिसोत्तमेणं जाव संपत्तेणं० । धम्मकहा सुपावधी समत्तो दहि यग्गेहिं नायाधम्मकहाओ समत्ताओ ॥ सूत्रम्-१३५ ॥ समाप्तोऽयं द्वितीयः ध्रुतस्कन्धः ॥ नमा श्रीमानाप, श्रीपार्यप्रमो नमः । नमः श्रीमत्सरसत्य, सहायेभ्यो नमो नमः॥१॥ इह हि गमनिझार्थ पन्मषा व्यहयोक्तं, किमपि समयहीनं तदियोध्यं सुधीभिः । नहि माति विधेया सघाऽस्मिन्नुपेक्षा, दयितजिनमतानां वामिना गालिया ॥२॥ परेप िदुर्लया मरति हि विपक्षाः स्फुटमिदं, विशेषाद् पृद्धानामतुलाननज्ञानमहसाम् । निरासायाधीमिः पुनरतित मारराजनैस्ततः भासा मे ननमनपं दुर्लममिह ॥३॥ ततः सिद्धान्ततः, स्वयम्मा प्रयत्नः । न पुनरस्म. वारपान, एस प्रापो नियोगः ॥en पापि माऽस्तु मे पाप, सद्धमत्युपजीवनात् । पद्धन्यायानुमारित्वाद्वितार्थ न प्रचितः ॥ ५॥ तपाहि-किमपि स्फुटी छतमिह स्फुटेऽस्यर्थतः, सकष्टमविदेशतो विपातनातोऽपि यत् । ममर्धपदसंश्रयादिगुण.
नवाजी- पू०पू० श्रीज्ञाता- मकथा) २. द्वितीय श्रु० अष्टमवर्गी- याध्ययना- दिवर्णन- सत्रम् । २५९। तेणं कालेणं २ चंदप्पभा देवी चंदप्पभंसि विमाणंसि चंदप्पभंसि सीहासणंसि सेसं जहा कालीए, णवरं पुव्वभवे महुराए णयरीए भंडिव.सए उजाणे चंदप्पमे गाहावती चंदसिरी भारिया चंवप्पभा वारिया चंदस्स अग्गमहिसी ठिती अद्धपलिओवमं पण्णासाए वाससहस्सेहिं अन्भहियं सेसं जहा कालीए, एवं सेसाओवि महुराए णयरीए मायापियरोवि धूयासरिसणामा, अट्टमो वग्गो समत्तो। ॥ सूत्रम्-१६२ ॥ णवमस्स उक्खेवओ, एवं खलु जंवू ! जाव अह अज्झयणा पं०, तं०-पउमा सिवा सती अंजू रोहिणी णयमिया अचला अच्छरा, पदमज्झयणस्स उक्खेवओ, एवं खलु जंवू ! तेणं कालेणं रायगिहे समोसरणं जाव परिसा पज्जुवासइ, तेणं कालेणं २ पउमावई देवी सोहम्मे कप्पे पउमवडेंसए विमाणे सभाए सुहम्माए पउमंसि सीहासणंसि जहा कालीए एवं अवि अज्झयणा कालीगमएणं नायव्वा, णवरं सावत्थीए दो जणीओ हथिणाउरे दो जणीओ कंपिल्लपुरे दो जणीओ सागेयनयरे दो जणीओ पउमे पियरो विजया मायराओ सव्वाओऽवि पासस्स अंतिए पव्वतियाओ सकस्स अग्गमहिसीओ ठिई सत्त पालिओवमाई महाविदेहे वासे अंतं काहिंति । णवमो वग्गो समत्तो ॥ सूत्रम् १६३ ॥ दसमस्स उक्खेवओ, एवं खलु जंवू ! जाव अह अज्झयणा पं०, तं०-कण्हा य कण्हराती रामा तह रामरक्खिया पसू या । वसुगुत्ता वसुमित्ता वसुंधरा चेव ईसाणे ॥ १॥ पढमज्झयणस्स उक्खेवओ, एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे समोसरणं जाव परिसा पज्जुवासति, तेणं कालेणं २ कण्हा देवी सा ।। २५९ ॥
ईसाणे कप्पे कण्हवडेंसए विमाणे सभाए सुहम्माए कण्हंसि सीहासणीस सस जहा कार अज्झयणा कालीगमएणं णेयव्या, णवरं पुवभवे वाणारसीए नयरीए दो जणीओ रायगिहे नयरे दो जणीओ सावत्थीए नयरीए दोजणीओ कोसंबीए नयरीए दोजणीओरामे पिया धम्मा माया सव्वाओऽवि पासस्स अरहो अंतिए पव्वइयाओ पुष्फलाए अजाए सिस्सिणीयत्ताए ईसाणस्स अग्गमहिसीओ ठिती णव पलिओचमाई महाविदेहे वासे सिज्झिहिंति बुझिहिंति मुचिहिति सव्वदुक्खाणं अंतं काहिंति । एवं । खलु जंबू! णिकग्वेचओ दसमयग्गस्स । दसमो वग्गो समत्तो ॥ सूत्रम् १६४ ॥ एवं खलु जंवू ! समणेणं भगवया महावीरेणं आदिगरेणं तित्थगरेणं सयंसंयुद्धणं पुरिसोत्तमेणं जाच संपत्तेणं० । धम्मकहा सुयक्खधो समत्तो दसहि वग्गेहिं नायाधम्मकहाओ समत्ताओ ॥ सूत्रम्-१६५ ॥ समाप्तोऽयं द्वितीयः श्रुतस्कन्धः ॥ नमः श्रीवर्द्धमानाय, श्रीपार्श्वप्रभवे नमः । नमः श्रीमत्सरस्वत्यै, सहायेभ्यो नमो नमः ॥ १॥ इह हि गमनिकार्थ पन्मया व्यूहयोक्तं, किमपि समयहीनं तद्विशोध्यं सुधीमिः । नहि भवति विधेया सर्वथाऽस्मिन्नुपेक्षा, दयितजिन मवानां १० तापिनां चागिवगें ॥२॥ परेषां दुर्लक्षा मवति हि विपक्षाः स्फुटमिदं, विशेषाद् वृद्धानामतुलवचनज्ञानमहसाम् । निरामायाघीमिः पुनरतितरां मादशजनैस्वतः शास्त्रार्थे मे वचनमनघं दुर्लममिह ॥३॥ ततः सिद्धान्ततत्त्वज्ञैः, स्वयमूद्या प्रयत्नः । न पुनरस्म दाख्यात, एक ग्राह्यो नियोगतः ॥४॥ तथापि माऽस्तु मे पापं, सङ्घमत्युपजीवनात् । पृद्धन्यायानुमारित्वाद्वितार्थ च प्रवृत्तितः ॥ ५ ॥ वथाहि-किमपि म्फुटीझतमिह स्फुटेऽप्यर्थतः, सकष्टमविदेशतो पिविधयाचनातोऽपि यत् । समर्थपदसंश्रयादिगुण- २. द्वितीय नवागी- १०० वीज्ञाता. मेकथा) वृतिकार प्रशस्त्यादि निरूपणम् । २६०। पुस्तकेभ्योऽपि यत्, परात्महितहेतवेऽनभिनिवेशिना चेतमा ॥ ६ ॥ यो जैनामिमतं प्रमाणमनघं व्युत्पादयामासिवान , प्रस्थानविविधैर्निरस्य निखिलं वौद्धादि सम्बन्धि तत् । नानावृत्तिकथाकथापथमतिकान्तं चक्रे तपो, निःसम्पन्धविहारम- प्रतिहतं शास्त्रानुमारात्तथा ॥ ७ ॥ तस्याचार्यजिनेश्वरस्प मदवद्वादिप्रतिस्पर्द्विनः, तद्वन्धोरपि बुद्धिसागर इति ख्यातस्य रे पि । छन्दोबन्धनिबद्वन्धुरवचा शब्दादिमल्लक्ष्मणः, श्रीसंविनविहारिणः श्रुतनिधेवारित्रचूडामणेः ॥ ८॥ शिष्येणाभय- देवाख्यमूरिणा विधुतिः कृता । ज्ञाताधर्मकथाङ्गस्य, श्रुतमक्त्या समामतः ॥९॥ निर्धतकालनमस्तलचन्द्रदोणाख्यभूरि- मुख्येन । पण्डितगुणेन गुणवत्प्रियेण संशोधिता चेयम् ॥ १० ॥ प्रत्यक्षरं गणनया, ग्रन्थमानं विनिधितम् । अनुष्टुभा सहस्राणि, त्रीण्येवाप्टशतानि च ॥ ११॥ एकादशसु शतेपथ विंशत्यधिकेषु विक्रमसमानाम् । अणहिलपाटकनगरे, विजयदशम्यां च सिद्धेयम् ।। १२ ॥ समाता चेयं ज्ञाताधर्मकथाप्रदेशटीकेति ।। EYESISESSEUREFEREFUSSYRUSSSSSSSSS FFERRATE *॥ समाप्तमिदं चन्द्रकुलन भस्तलोटुपतिप्रभश्रीमदभयदेवसूरिविवृतविवरणयुतं श्रीज्ञाताधर्मकथानम् ॥ 5055555 FFSSAYERISESHISHESERTISESA VIDYA ... - २६०॥
२. द्वितीय नवादी- १०१० धीनता मिपारे वृचिकार- प्रशस्त्यादि निरूपणम्। २६० पुस्तकम्योऽपि गन् , परात्महितहेववेऽनमिनिवेशिना चेतमा ॥ ६ ॥ यो जैनाभिमतं प्रमाणमनघं व्युत्पादयामासिवान् , प्रस्थानमिनिरम्य निसिलं पौद्धादि सम्बन्धि तत् । नानावृत्ति कथाकथापथमतिक्रान्तं चक्रे तपो, निासम्बन्धविहारम- प्रतिद्वनं शास्त्रानुमारात्तथा ॥ ७॥ तस्याचार्यजिनेश्वरस्य मदवद्वादिप्रतिस्पर्द्धिना, तद्वन्धोरपि बुद्धिसागर इति ख्यातस्य परेपि । छन्दोवन्धनिषद्वन्धुरवनाशब्दादिमलक्ष्मणः, श्रीसंविनविहारिणः श्रुतनिधेचारित्रचूडामणेः ॥८॥ शिष्येणामय- देवारपरिणा वितिः कृता । नाताधर्मकथाजस्य, श्रुतभक्त्या समामतः ॥ ९ ॥ निर्वतकालनमस्तलचन्द्रदोणाख्यसरि- मुगरेन । पण्डितगुणेन गुणवस्त्रियेण संशोधिका चेपम् ॥ १0 11 प्रत्यक्षरं गणनया, ग्रन्थमानं विनिश्चितम् । अनुष्टुमा महस्राणि, त्रीण्येवाटगतानि च ॥११॥ एकादशसु शतेष्वथ विंशत्यधिकेषु विक्रमसमानाम् । अणहिलपाटकनगरे, विनपदाम्पा च सिद्धेयम् ॥ १२ ॥ समाता घेयं घाताधर्मकथाप्रदेशटीकेति ॥ PLETERESENTERTYRSASURESS RUSSETTESENTS समाप्तमिदं चन्द्रकुलन मस्तलोडपतिप्रभश्रीमदभयदेवसूरिचिवृतविवरणयुतं श्रीज्ञाताधर्मकथागम् ।। TREATMEANIREES55555555 VIDYA REAYAN । २६० ॥