Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Udhay Asth

Mahmood Ahamaad · 2011/04

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मनोहर सीरीज न०५
उदय-अस्त
(श्रेष्ठ कहानियाँ)
सम्पादक
सैयद महमूद अहमद 'हुनर
मूल्य वारह थाना

मधराक-तोग्नमोहन मित्र,
माया कार्यालय,
इलाहाशा
Curyright reserved wins the publisher
मुद्रक-पारेग्दनाय,
माया मेस,
इलाहाबाद।

उदय-प्रस्त टोलों पर चाँदनी छिटकी हुई थी और दूर खजूरों के एक मुण्ड में कोई पसी सहमी-सहमी साने उड़ा रहा था। मैं उस जगल में शिकार खेलने पाया था। मेरा यूदा मौकर सो गया था, और चूंकि परदेश में मुझे नींद बहुत कम शाती है, और जगलों की चाँदनी रातें सोने के लिये नहीं, बल्कि जागने के लिये होती है, इसलिये पहले तो मैं विस्तर पर पड़ा करवटें बदलता रहा, मगर जब सजूरों के मुण्ड में किसी बेनाम के पक्षी की दुखी-दुखी, सहमी- सहमी ताने सुनी, और फिर इन तानों को मेंने वायु मण्डल के अथाह नीले, खिले श्राकाश में किसी भागती हुई भयभीत युवती के घरवाले बालों वाला रूप धारण कर लहराता देखा, तो मैं उठ खड़ा हुआ । मेरे कुत्ते दुम हिलाने लगे, और सुनहली रेत उनकी दुमों की हरकत पर उड़ने लगी। एक ऊँचे टीने पर चढ़ कर मैंने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई । इको-दुक्के खजूरों को प्रेती-जैसी छाया, और साय साय काती हुई निस्तब्धता के अतिरिक्त एका त के इस महाद्वीप में और कोई चीज़ मौजूद न थी। मैं ठरहो रेत को मुट्टियों में दबा कर उसे धीरे धीरे नीचे गिराने लगा। रेत के नन्हें-न है टीजे से उभर घाये और मैं सोचने लगा-'अगर ईश्वर ने पृथ्वी का इतना लम्बा चौड़ा टुकड़ा रेत और सिर्फ रेत के लिये दान कर दिया है, तो प्रातिर इसका मतलय ? ऐसा क्यों नहुधा कि यहाँ हरे-भरे और फूले फले खेत होते ? गेहूँ की सुनहरी पालें वायु के झोंकों के कारण उपेषा से अपनी गरदों मोची कर देती, और समस्त श्य रहटों का 'श-स' और 'सोतों के दवे दये गीतों से परिपूर्ण हो जाता। या ऐसा क्यों न हुधा कि यहाँ ऊँचे ऊँचे पवत होते, जिन पर ऊँ सनोवर के जगल होते १ छोटा-छोटी नदियों चट्टानों से टकराती, माग के बादख उदानी, घायल नागिनों का मोति लहराती फिरती, और हलानों पर अल्हड़ ढोर घराने पालियों पतली-पतली अंगुलियों में मोटी-मोटी बलियाँ थामे गुलाबी मोठी के जरा से स्पर्श से थायु मण्डल में सगात का रस घोलती होती। या ऐसा क्यों न हुमा कि यहाँ बड़े बड़े मगर 'मेरी कश्पना की उड़ान अचानक रक गई और चौदनी के रुपहले अँधेरे में मुझे ऊँटों की घटियों को धीमी धीमी आवाज़ सुनाई दी। निस्तब्धता के इस सागर पर इन मुरीले स्वरों की नौका सैरती हुई आई, और

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उदय प्रस्त और उपा की भाति नारगी है, तेरा समस्त शरीर कुमार युवकों की स्वम मूत्तियों से मिलता जुलता है, लकिन मैं तेरे वश में नहीं आ सकता, क्योंकि मैं सुझसे कहीं अच्छी प्रेमिका के साथ जा रहा हूँ !" एक जगह पर जा कर मैंने कुत्तों को रोक लिया और उ ह दुस्कार कर खेमे को और भगा दिया। अब ऊँट मेरे सामने से जा रहे थे । कजावों पर पुदी की चमक यद गई थी और ऊँगे की घटियाँ सैकड़ों जल वरगों की भाँति वरही थी। मुझे भी इसी मार्ग के किसी गांव तक पहुँचने की इच्छा थी। शिकार की धुन में सध्या हो गई या और रात भर किसी गाँव की खोज में टोलों पर भटकते फिरने के बजाय मैंने यही खेमा तान लेना अच्छा समझा था । अतएव मैंने आवाज दी-"भाई, किस गाँव जायगा यह काफ्लिा?" पद सारयानों ने मुड़ कर मेरी ओर देखा और सब एक साथ बोले- "सोसन।" मैं भाग कर एक सारथान के पास गया और कहा-"माई, मुझे भी सोसन ही जाना है। शिकार खेलने आया था, रात हो गई । रास्ता मालूम न था। हम अगर मेरे लिये कुछ देर ठहर सको, तो मैं सब सामान ले कर तुम्हारे साथ चला चलू । कल दिन को मैं किससे रास्ता पूछता फिरंगा?" सारवान, जिसने मुंहासे से सिर छिपा रखा था, बोला- 'हज सो कुछ " और उसने कुछ देर सोच कर जोर से पुकारा--"गुलाप खाँ! यह एक मुसाफिर है धारा । कहता है, मुझे भी सोसन ले चलो। कहो तो धन्द घड़ी यहाँ दम ले लें।" और क्राफ्रिले के अगले सिरे से अावाज घाई-"कौन है यह सारयान ने जवाब दिया-"कोई शिकारा है।" उधर से गुखाप खाँ ने कहा-"उहर आयेंगे । तुम उससे कहो, जरा अदी करे । पहिले ही बहुत देर हो चुकी है । बारात को पौ फटने से पहिले पहुँच जाना चाहिये-तारों को दाव में हो !" काफिला रुक गया। पण्टियों के स्पर मदिम पड़ गये, कमावा पर पहचह से मुनाई देने लगे चौर में अपने समे की घोर भागा । मेरा नौकर खेमे से यार मेरी प्रतीपा कर रहा था। बोला-"माप किधर निकल गये येत में इन रेगिस्aril में भूत प्रेत सेवा करते हैं। मापको तो अपनी जान की कुछ नहीं, लेकिन मुसाफिर" परपाह महीं।

मुप मरे पैरों में होना और में पाप हो- "मी, पेश nिam में भा रहे है। मेमा Rो पावक संगायो र मेरे मामा मोग अब मरा नीर रोगो से ये उपाहतामा हमे बग-"याम मी परकार ! सारा दुनिया मानतीन टीमों में बहुत से शिका भाप और वापस हो कर पीटा भी कामवासना मौजवान पर FREE ने भाया और पापम गपा,सोलापा-गोया। कामों में पा गया, तो उसने बताया कि पाई नही है, भूत प्रेत का प्रमावान पदाधी कोपामRET भागाim दिन मापण पापी भाई और यह उममें पेमा रोपाहिरिबीकानभाया। भारमो मेरीरात की माने" ri ातों में प्रेमाला लिया गया और हम काraat तार परे। टाले पक्ष में कुल ऊँ मुरता रहे थे। कृप गदन मोडेमारी भोर देश और बुध शुरधार न मानो कमायों में धैडी युवनियों का बातें सुन मुंडासे थामा युवा मेरो प्रतीपा कर रहा पा। मेरे पाचवे ही इसने गुलाम को को कूच करने को कहा और पहामिला धीरे धार टीमों के बीच रंगने लगा। "art से याद है भाप लोग' मैंने अपने साथी मे पूया। "समन से।' उसने अवाप दिया। "तुम ने अपने गांवों के लिये पत्रों के-से नाम क्यों चुन सकते है । समन ! सोसन बहुत प्यारे गाम है ये?" और वह पाखा-"यहाँ पूर्व नहीं मिज म, इमलिये !" मेरा नौकर मारी खेम को एक कन्धे पर से दूसरे कधे पर बदलते हुये योजा--"यहाँ पूज नहीं मिलते इसलिय! क्या मतलब " और सारवान अपनी यात्रों पर से मुंडासा उठाते हुये पोजा-'सुम शहरों में रहने वाले अपने पागांचों में नहीं नहीं मका पहादियाँ और हाट बाटे रेत के लिये बना लेते हो, इसलिये कि यहाँ पहार और रेगिस्तान नहीं है। हम रेगिस्तानवाले अपने गाँव को फूलों का नाम इसलिये देते हैं कि यहाँ फूलमही मिजते । वाव एक ही है । जो वस्तु माप्त न हो सके, उसका नाम लेने से हो उदय प्रस्त ० मन को सतोष हो जाता है। हम समन से मारहे हैं, हम सोसन जा रहे है। क्या तुम्हें इन नामों में कोई रस नहीं मिलता" और मैं हंसते हुये पोजा-"कुत्तों के पालने पाले को फूलों से क्या जगावटल्लू क्या जाने कि दिन का प्रकाश क्या धीज़ है! भैस को क्या और चूहा मेरी पात कारते हुये बोला-"पाप को तो मेरी हसी उड़ाने में मज़ा भाता है। अभी तो आप ने मुझे उल्लू और भैंस बनाया है। अम थगर मै आप को न दोकता, तो खुदा जाने, पाप मेरे लिये किन किन नामो का प्रयोग करते " "धनचकर "मैं बोला और सारपान और मैंने जोर जोर से ठहाके लगाये और जय हमारे ठहाके नरम हुये, तो मैंने कजाचे पर दो-दयो हंसी मुना। निगाह पलट कर मैंने ऊपर देखा और नये वस्त्रों को पेचैनी से अपने इर्द गिर्द खपेरती हुई युवतियाँ सिमट गई। मेरे मस्तिष्क में हलकी हलकी हवा-सी चलने लगी, जिससे मेरे अनुभव के अकुर मुक गये और देर तक मेरे स्वानों के फूज अपनी पखुड़ियों फाफड़ाते रहे और जप मुझे शान्ति-सी मालूम हुई, तो मेरा नौकर और सारयान भूत प्रेतों की बातें कर रहे थे। "भूत सो से भूत हुये," मेरा नौकर कह रहा था--"लेकिन इस प्रेत का क्या मजय" सारयान योला-"प्रेत परियों को कहते हैं न?" "और परियाँ क्या चीज होती है ?" मेरे नौकर ने पूछा। "परिया" "हाँ, परिया-और यह खेमा सो ऊपर किसी कजावे में भटका दो।" सारयान ने हंसते हुये खेमा उसके कन्धों से उठाया और ऊपर कजावे की पोर उठाते हुए पोला-"ले मरगिस, भपने भागे रख ले या उधर नश्तरन को दे दे।" मेरा नौकर एक दीर्घ नि श्वास लेते हुये थोखा-"हाँ, तो क्या होती है परियों " "परियों " तारपान सोचने लगा-"परियों सदर लड़कियाँ होती हैं। उन तुमहरे पर दारो है, ये वायु में सैरतो रहती है, और जब उनका साय, किमी पर पागाय, तो वह अपने पास सो पेडता है।"

८ उदय मस्त भौर में अनायास ही कजावे की पाया सरकर एक भोर हो गया। सुदर या-सुनहरे बालो वाली, जाद-मा सायों पाली और ससानक यह विचार मरे पदय में चुभने लगा कि कहीं मैं भून प्रेस के यरा में हो नहीं पा गया। यह पीडी, सनसनाती हुइ चादनी, पह धपियों को स्वमित टन टन, ये बम्पे-चम्पे डग भरते हुये , ये वायु में तली हुई परिया, यह समन से आने वाला और सासन को जाने पाया मित्रा-यह घजाब दुनिया है ! मैं धारा-सा गया । लेकिन अचानक मेरे सहपात्री सारपान ने फानों पर हाय रसना और गीत गा कर मुझे फिर उही रेताले मैदानों में से माया। "हे ससूर की दालों पर फुदकती हुई ममोसम | उड़ जा, और अपने भमोले का किसी और सर पर प्रतीक्षा कर, क्योंकि इस खपूर के सजे मात्र मेरी प्रेमिका धायगी। "हे खजूरों का दालियो । धीरे धीरे मुनो, और अपने सूखे हुये पत्तों को सदसदाभो नहीं, क्योंकि भाज यहाँ मेरा भमिका मायगी। "हे तेज वायु के झोंको। इन हाजियों से लिपट लिपट कर सरमरायो नहीं, और इस पद तने में घुस कर साटियो न दाभो, क्योंकि घाम यहाँ मेरी प्रेमिका पायगी। "ह तारागण ! प्रकाश के फौधारे यरसायो और हे तितलियो, अपने परों की एक सेज विधायो, क्योंकि यहाँ प्राज मेरा प्रेमिका भायगी।" 'किसका गीत है यह।'मैंने पूछा। "मेरा अपना!"चहयोला। 'अण्डा ! तो तुम गीत भी बना लेते हो" मैंने पूछा। "जी वह बोला-"जप चादनी रातों में एक नवयुवक अकेला ऊँट की नकेल थामे विस्तृत मैदान में किसी दूर स्थान को जा रहा हो, तो वह गीत धनाने पर मजबूर हो जाता है।" "ठीक है।' मैंने कहा--लेकिन गीत बनाने वालों को एक और चाल मी चाहिये।" " क्या ?" उसने पूछा, और फिर अचानक मेरा हाथ पकड़ कर धारे से योधा--'दखिये, कजावों पर कुमारी लड़कियों बैठी हैं" और यह विपय यहीं समाप्त हो गया। "किसको बारात है ?" मेरे नौकर ने पूछा ।

उदय प्रस्त है और सारपान ने सरार दिया--"समन के सफेदपोश के बेटे की। हम सोसन के एक बहुत गरीष घराने में जा रहे हैं।" "पर क्यों ?" मेरे नौकर ने पूछा । और सारथान ने मेरा हाय दवाते हुये कहा-"भूत प्रेत का असर है।" और ऊपर कशावों में नये पर सरसराये और जब हम सोसन के निकट पहुँचे, तो दूर हमें महुत सी धानटेने दिखाई दी। इधर से गाले छुने लगे। पाराज के भाले सिरे पर ढोल और शहनाइयाँ यगने लगी। ॐगे को गरदनों भोर धुरनों के साथ घुघरमों के हार काध दिये गये और विभिन्न सुरीली चायागों से मैदान में एक कोलाहल मच गया। सारवान ने मुममे पूखा--"पाप रात कहा बितायेंगे" और मैंने जवाब दिया-"मेरी यहाँ कोई जान पहिचान तो है नहीं। मैं सो गाँव इसलिये पाया हूँ कि यहाँ साने पीने की चीजें आसानी से मिल जायेंगी। यहीं याहर किसी सेत के किनारे पेमा सान लूंगा।" यह मेरा हाय पकरते हुये योक्षा-"क्या जरूरत है प्रेमा खड़ा करने की मेरे यहाँ पर रहियेगा। हम सप तो नाचने में खा जायगे और फिर आप भी मुसाफिर, हम भी मुसाकिर, सब मुसाफिर भाई माई होते हैं।" "यदुत अला।" मैंने कहा । शायद मैं इन्कार कर देता, लेकिन यह कवि था और कवियों के विषय में मैंने जो-कुछ किताबों में पढ़ा है, उससे यही निष्कर्ष निकाला है कि वे यहुत सरल और बहुत सहृदय होते है। यद्यपि उस रात मुझे नींद न भाइ, लेकिन मुझे एक सादा-सा विस्तर मिल गया और शहनाइयों, दोनों चौर पामो-ताशों की गूंज में मैं सोसता रहा कि सम्य समार से दूर रहने वाले इन अपद सारवानों को पातिथ्य-सरकार किसने सिसा दिया ? मुझे अच्छी याद है कि जय मैं पहिली मार देहली गया और यहाँ चादनी चौक में एक महाशय स काश्मीरी दरवाजे का रास्ता पूछा, तो यह नाक मी बदा कर योले- 'इधर चले जाइये, और फिर इधर मुद कर सीधे चले आइयेगा!" -और जब मैंने उधर देखा, तो एक ऊँची विशाल इमारत पड़ी थी, उधर एक मापाखाना था और सामने नाक की सीध में वही ट्रामों को खड़खड़ा हटों से पूर्ण घाँदनी चौक । समन का रहने वाला यह नवयुवक कितने प्रिय व्यक्तित्व का मालिक है और कितना अच्छा गाता है! और इसके गातों में कितना रस और कितना माधुर्य है। और यह कनावों में बैठी हुई स्त्रियाँ, जिहोंने बारात ६० उदय यस्त - के घचानक जाने को जरा भी पुरा न माना--और काफिले का सरदार गुलाय खा, जिसने एक अपरिचित के जिये धारान जगल में शामिले का काफिला रोक लिया और फिर ये सुळे मैदान और इन उमरे हुये टालों पर हितका हुई चोदनायह पालिम पचास घरों वाला नन्हा-सा गोव-यह ढोल और यह शहनाइयों-यह स्वालिस सदर का विस्तर और यह भी खालटेनें-कितना रखता है यह ससार और कितना पवित्र है इसका वातावरण ! साचते-सोधते में अपने विस्तर से उठा और दरवाजे पर खड़े हो कर मैंने सामने दृष्टि दौड़ाई। खम्बी जम्मा लपटें उबालती और धुओं उदाती हुई मशाबों के इद गिर्द नौजवान किसान घूम रहे थे और पास ही एक घर से कुमारियों के मिल कर गाने की यावाजें या रही थी। धीरे धीरे अदम उठाता मजम के निकट पहुँचा। ताज मुर से अज्ञात और उतार चढ़ाव से थेप्लयर टीन की भाँति बजती हुई पुराना ढालक के इद गिर्द सब नाच रह थे। मशालें उन सर के चहरों में भाग सा लगा रही थी और बहुत दूर कच्चे घरौदों की छतों पर नौजवान लकियों -~थौर पास पास रुपड मुड बेरियों पर नखट वरचे दम साधे पेठे गीत सुन रहे थे तथा नाच देख रह थे। चौड़े तलुओं और फरी हुई नदियों की बार थार फरक से ढोलक बनाने वाले के हद गिर्द एक यवएडर-या मंडरा रहा था थोर फेफड़ों के पूरे झार से निकले हुए स्वर सुनहरे गुबार में गरमते रूपहले टोला से टकराते, मानां सृष्टि स लिपटे पड़ते थे। 'थाली में कोरा धरा है। पनघर के पानी में तेरा चेहरा कॉप रहा है। बेरी सर तोता बैठा है। गबरू मुंदेरों की पोट में कुमारियों की ताक में हैं। भट्ठा स धुवाँ उड़ रहा है। इस पगडा पर किस मुसाफिर का घोड़ी ने गर्द-सी रड़ा दी है ? दुल्हिन मायके से भा रही है। दूल्हा मेंहदी रचे पाँव के लिये गेंदे को कलियाँ एकत्रित कर रहा है।' -धम धमाधम, धप धप, धम धमाधम, धपधप! और पाँव की हाल और गीत की लय में बीन सुनने वाले नवयुरकों की 'हाय हाय' 'वाह वाह' -और दोलक बनाने वाले की अंगुलियों का पुर्ती के साथ नृत्य-असत्य मरियाले पैरों की अव्यवस्थित करव। ढोजक को अन्तिम धप और फिर रहाक, हुक्के को गुरुगुद, कानापूसियों चौर नये गीत की तैयारिया।

उदय प्रस्त मुझे देख कर मेरा नौजवान सारयान मित्र मेरो घोर लपका और मेरा हाथ थाम कर बोला-"आप अभी तक सोये नहीं, मैं तो समझे येता था कि आप कर के श्राराम कर रहे होंगे । श्राप दिन भर के यके मौदे है, जा कर लेट रहिये। हमारे नाच गाने में क्या घर है ? सुना है, आप के शहरों में लड़किया कामी बात पहिन-पहिन कर नाचती हैं और जब भौति माति के वाद्यों को गत पर गाती हैं, तो ऐसा लगता है, मानो काँसे के प्रसस्य कोरे प्रापस में टकरा कर मनमना रहे हैं।" "ठीक है।" मैंने कहा- "लेकिन वह लड़कियाँ लड़कियों नहीं होती, पुतलियाँ होती है, पैसे दो और नचवा लो। अपनी खुशी से नाचने वालियाँ इन जगलों में रहता हैं । वहाँ तो नाच और गाना कौदियों के मोल मिकता है।" नाचते हुये पाँव रुक चुके थे और ढोलक बजाने वाला ढोलक की गठिं चान रहा था। सब लोग चुपचाप बड़े मेरी ओर घूर रहे थे मानो में प्राचीन काल की कथाओं का नायक हूँ और लका द्वीप का परिया और जिनों को कर से निकल कर पाया हूँ। मेरे सारमान मिन ने मुझे मेरे निवास स्थान तक पहुँचा दिया और कहा- "माप आराम करें, मैं सुबह तड़के, आपको जगा दूंगा। सुबह तड़के श्राप क्या चीज़ पाने के आदी है। "पतली छाछ !" मैंने मुस्कुराते हुये जवाब दिया, और यह हंसता हुआ दूर नाचने वालों के जमघट में जा मिला। में विस्तर पर लेटा था और इस विचित्र प्रानादमय वातावरण के विषय में सोच रहा था कि अपने निकट मुझे चूड़ियों का एक छनाका-सा सुनाई दिया। मैं सिर से पाँव तक चादर में लिपटा पड़ा था, और कल्पना-ससार में विचरण कर रहा था, इसलिये इस छनाके को एक वहम समझ कर करवट बदन ली। लेकिन अचानक मेरे कन्धों को किसी ने छुना, और साथ ही धामी मा आवाज भाई-"सुवुल, ऐ सुबुन, तुम तो कहते थे कि मुझे भान रात नींद ही नहीं मेरे काल्पनिक स्वर्ग में सिर्फ़ एक परी की कमी थी, जो अब पूरा हो गई। लेकिन परदेश में एक अपरिचित बालिका को अपने इतने निकट पा कर में धवरा-सा गया । चादर मुंह से उतार फेंकी और खार पर उठते हुये थोना- नींद तो मुझे मा नहीं पाता, लेकिन मैं सुघुल नहीं हूँ, मेरा नाम गज़न - श्रायेगी।

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उदय घस्त -और गजनफर, अगर तुम धुरा न मानो, तो मैं नित्य रात को तुम्हारे चरणों में अपने प्रेम के फूल पढ़ा जाया करूं, क्योंकि तुम मेरे स्वप्नों के देवता हो।" -ये कानाफूसियों मुझे अपने कोठे की चहरदीवारी में सरसरावी हुई सुनाई देती और मैं सोचने लगता कि उन सब लड़कियों में से यह कौन सी लड़की है, जो यों छिप छिप कर मेरे मन में जुगनू चमकाता रहती है और जय जुगनू चिनगारियों का रूप धारण करने लगे, जब मुझे इन टिमटिमाहटों में हलकी हलकी जलन का अनुमय होने लगा, तो मैं घबरा सा गया। क्योंकि मेरी मॅगनी हो चुकी थी और कहते हैं कि मेरी मावी पनी इतनी सुन्दर है कि मैं अगर उसे देख लूं, तो कवि बन जाऊँ। खिड़कियों से डर डर कर और सहम सहम कर झाँकने वाले के कन्धे से अगर महीन स्वर पाली युवती की अंगुली छु जाय, तो नींद कहाँ से पाये । मेरी नींद ६ गई, मेरी थकावट दूर हो गई और जब पौ फरने में एक घटे के तरीय पाक्री रहा, तो मैं बाहर निकल पाया। पीला चाँद दूर पश्चिमी क्षितिज के निकट ऊँघ रहा था और मोटे-मोटे तारे सलेटी धाकाश पर नाच रहे थे। वायु में उदक आ गई थी और गाँव से ढोलक की दबी-दधी थाप की धुन पर लड़कियों के थके-धके गीतों की मनक कभी-कभी मेरे कानों में पड़ जाती थी, जिसमें सिफ़ ये शब्द समझ सका-"नदियाँ-करने-चाँदनी राते-तारे--- प्रेमी-प्रवि-बाल-हॉट-" 'यह कैसी दुनिया है ? मैंने सोचा-'यहाँ के कवियों के मस्तिष्क में भरनों तारों, घाँखों और बालों के सिवा और कोई विषय नहीं ! क्या यहाँ के खोग मृत्यु के नाम से परिचित हैं कि इनके गीतों में जीवन ही के भाव मलकते हैं ? क्या यहाँ इस सत्य से कोई परिचित नहीं कि मरने रक जायेंगे, तारे हुय जायेंगे, अखि मुंद जायगी और माल झड़ जायेंगे और फिर इस नाचते और गाते हुये समूह से घाँस यचा कर इस धुंधले मकान में खिसक भाने वाली मनचला लड़की के मन में क्या समाया था कि वह सुयुख की धुन में विचारे ग़ज़नकर की रगों में चिनगारिया भर कर धुएं के गाले की माति वायु मण्डल में विलीन हो गई -गज़नार, जिसने देहली में रगान शीशों की भाप ले कर कई हवाई मइल बनाये और जो इन महीन स्वरों, लम्बे-मग्ये बालों और मुको मुको आँखोंगलियों के तनिक हपर्श के लिये पधीस वर्ष सरसता रहा गीता के स्वर थामे पड़ते गये और मेरे विचार देहखी और इस जगल की ta उदय मस्त मणियों की मूर्तियों में लिपरते गये । टीलों की ठएदी रेत मेरे जूतों में भर गई थी, जिसके कारण मेर जलते हुये सलयों को पड़ी शान्ति मिल रही थी। प्रात काल का तारा पूर्वीय नितिन पर किसी साँवनी दुलहिन के माथे पर सिंदूर के टाके की भाति धमक रहा था और पास पास के बलों में रिट्ढे दिला जा रहे थे कि अचानक मुझे अपने निकट ही एक भरोई हुई कानापूमी सुनाई दी। मैं घट रत पर दया गया । कान लगा कर मुना, तो अावाज बाई-हसीलिये तो मैं बार-बार तुम से पूछ रहा हूँ कि तुम श्राज इतनी उदास क्या हो ? समन से बाहर दरावनी खजूरों में जन हम छिप लिप कर बातें करते थे, तो तुम कितना प्रसन्न होती थी। पुम्हारे पाठों पर पपड़ियाँ और तुम्हारी प्रोखों में यह नमो मुझे सन दिनों न दिखाई पड़ी, यद्यपे प्रति सण हमें अपने भेद के प्रकट हो जाने का मय था, लेकिन अब यह सोसन का जगल चौर यह शुष्क चादना-लोग गाँव में नाच और गा रहे हैं और हम इधर पल की मोट में एक दूसरे के निकट-इतने निकट बैठे हैं । नरगिस तुम्हारे दिल में अाज कैसा कोश पटक रहा है ? सुम इतनी सुपचाप क्यों हो, नरगिस" और इसके बाद मुझे नरगिस की सिसकती हुई आवाज़ सुनाई दी- 'मुझे तो यह मनहूस मैदान जैसे निगल लेगा । मैं तो घबरा गई है सुनुल, मैं सोसन में घबरा गई हूँ, मुझे अाज बुखार चढ़ रहा है।" और इसके बाद बहुत सा उलझी हुई और निराशापूण कानापूसियाँ होती रही। और फिर बल को श्रोट से एक साया उठी और सुबुन की आवाज भाई-"चलो, चलें, या सम पहिले घला जायो, यहाँ अकेला प्रफेनी घवरा जायोगी" "नहीं," नरगिस ने जवाब दिया-"पहिले तुम जानो, पौ फटत ही में गाँव में या जाऊँगा । अपथगर मुझे रास्ते में कोई मिल जाय और पूछ बैठे कि में इस समय किधर गई थी, तो मैं क्या जवाब दूंगी?" और सुबुल बोला-'तो फिर पौ फटे तक मैं यही तुम्हारे पास ही क्यों न पड़ा रहूँ! 'नहीं, नहीं, मुबुल !" दवी दयी और विनयपूरण अावाज भाई-'तुम नायो, बस-प्रक्ष सुम जायो !" और सुबुल धारे धीरे अदम बदाता टीलों की दूसरी श्वोर गायब हो गया। मात काल का सारा बहुत ऊँचा चद आया था और पूर्व का अधकार कॅप- उदय भस्व कपाने लगा था। मेरे मन में दिल्ली की फसीदा कादती हुइ लड़कियों और यहाँ की मामीण रमणियों की मूर्तियों सिमटने डगी घऔर अन्त में एक परछाई में समा गई, जो मेरे सामने बमूल की पोट में बैठी जाने किधर देख रही थी। अचानक एक विचार मेरे हृदय को खरोंचता हुया मेरे मस्तिष्क में घूमने अगा । यह विधार ठीक ऐसा घूम रहा था, जैस बदके सालाना की सतह पर पर पकाते है और वह लम्बा-सी सद रेखा उत्पध कर यहुत स दायरे थनाते और बुलबुले घोरते तह की ओर दूयने लगते हैं। एक बहुत लम्या चक्कर काट कर मैं उस बल की ओर चला, जहाँ रगिस पी करने की प्रतीपा कर रही थी । साटा बजाता हुया मैं उसके निकट मे गुजरा । यह ययूल के नीचे गठरी की भाँति सिमटी जा रही थी। मैं या हो लापरवाही के ढग से बबूल के निकट से गुजरते हुये ठिठक कर बड़ा हो गया। "शाशी " करते हुये मैने ताला मजाई, और फिर दो पदमागे बद कर मैंने नरगिस के शरीर को छू लिया। 'शी!" मैं फिर ताबी मनाई, और अब नरगिस पागलों की तरह पाल मटक कर उठ बैठी । उसका सीना तेज वेज सांस लेने के कारण उभरा और दूबा जा रहा था और उसके केश सदद कर बबूल को सूखी रहनिया से लिपटे जा रहे थे। "कौन है तू?" मैंने डपट कर पूछा। "अरे ! गजनकर"दबी दबी आवाज़ में यह बोली। "तुम ने मुझे कैसे पहिचाना?" "तुम्हारी शिकारी पोशाक से?" "और तुम कौन हो?" "मैं मैं मैं इधर समन से बारात के साथ आई हूँ। वहाँ नाचते गाते थक गई, तो जी बहलाने इधर चली आई।" "हाहाहा!" मैं हँसा । 'मैंने सममा, कोई हिरनी छिपी बैठी है शिकारी जहाँ जाय, शिकार का भूत उसके सिर पर सवार रहता है। अच्छा हुश्रा कि मेरे पाम इस वक्त बदर नहीं थी, नहीं तो बड़ा पुरा होता।" वह चुप बैठी रही, उससे यात करने के कई बहाने तेज झोंका की तरह मेरे हृदय पर यहुत-सी लहर पैदा करते गुजर गये। पूर्वीय क्षितिज पर अंधेरा उसी तरह कॉप रहा था और प्रात कान का तारा, मानो मेरी भावनाओं के विहंगम तूफ़ान पर मन ही मन मुस्करा रहा था। आखिर में घोबा-"कहा तो मैं तुम्हें गाँव पहुंचा दूं।"

उदय श्रस्त उसने डरते हुये देशों को एक हाथ से इच्छा करके उप को पीछे सरकाने हुये कहा-'मैं चली जाऊंगी, मैं रास्ता जानती है।" 'रास्ता तो तुम जरूर जानती होगी।" मैंने कहा--"लेकिन मुझे मुख ही पिता है, यह तुम्हारी राह देख रहा होगा।" वह घो घौड पड़ी, असे नन्हें परचे सोते में बादल का गरम से दर कर घयरा आते हैं और पदहयास हो कर इधर उधर देखने लगते हैं। उसने चारों भोर निगाह दौड़ाई और फिर मुझे कुछ पण पागलों की माति घर का गरदन मुका ली और रेत को मुट्टियों में भाने लगी। "मैं सब-कुछ देख रहा था !"-मैंने उससे कलेने में एक और सुई धुमो दी। मुझे कमजोर की कमजोरी से लाभ उठाने में यदा घानार अाता है। बोला--"मैं सथ-कुन देख रहा था। लेकिन नरगिस, सुम पास इतना उदास क्यों थी । मुगुन येणारे का भानाज मसंह हुई था। न जाने इस रेत में उस पचार के कितने प्रोस् सूख चुके हैं। नागिस, यद्यपि मुझे कोई अधिकार नहीं कि मुम्हारे निजी मामलों में दखन हूँ, और मुझे प्राशा मा नहीं कि जो बात नुम मुगुन को न यता सकी, वह मरे सामने कह डालोगी, लेकिन मगर मैं मुम्हार किसी काम मा सक्तो में बड़ी मुशा में यहाँ चन्द दिन ठहर जाऊँगा । देखो न मुबुल मेरा मित्र है, परपि मेरी और उसकी मित्रता र घण्टे पूर्व ही हुई है, लेकिन मैं उससे स्नेह करने लगा हूँ। तुम्हें इसके निवास कोई शिकायत पदा हो गइ हो, तो मुझे पता दो। मैं उसे सीधे रास्त पर ले पाऊँगा । मैं शिकारी हूँ, और मस निशाना बहुत कम चूकता है। "ज्ञा ! मुन रही हूँ।" यह माला--"मुचुल से मुझे कोई शिकायत नहीं। सुबुल मेग बड़ा पुराना साया । सुबुल के मन में कभी मेरा तरह से मन सही याया। सुबुल गीत पनाता है और यह तो आप जानते ही होंगे किगीत अनाने वाले को लकियाँ बहुत चाहती हैं। लेकिन वह उन सके सौद्य का भार से इस प्रकार प्रति बद कर लेता है, मानो वह मेरे अतिरिक्त दुनिया को सारी कुमारियों के लिये मधा हो चुका है। लेकिन मैं मैंने मुझे वह रक गई और मुष्टियों में भरा हुई रेत नीचे गिराने लगी। "सुमन यात पूरा नहीं की" में उसके पास जा कर बोला। वह हकलाने लगी-"मैं श्राज बहुत उदास मैं बारात के साथ न पाती, सुनती हो। " अड़ा था।

उदय प्रस्त मैंने पूछा--"बेक्नि प्रातिर सुम्हारा यह उदासी सुउज के साथ लापरवाही से क्या सम्बन्ध रखती है।" और अचानक हया में उसका दुपट्टा फहराया और मेरा माहों से लिपट गया । उसन दुपा गायन करिये हाय बदाया । भर मैंने अपना यौह धान की कोशिश की, और हम दानों क हाय एक दूसरे छू गये। मेरी यह स उसका दुपहा लिपटा रह गया और यह पाछे हट गई । उसके पाल हवा में बनेगे और मैने उसका दुपदा यो से उतारते हुए कहा-"जा!" और हमारे बाय फिर टू गय । किन भय का जो हुए, मा यक्षग न हो सके, जैसे चिरक फर रह गय हाहम दानों की अंगुलियों में कोई विचित्र सा कपन भर गई । और यहाँ पपून का सूखी टहलिया का बाद में मन दसा कि पूर्वीय शितिज पर पौ फूट रही है । नरगिस फ घेहर के इद गिद मुझे एक धामा दिपाद पड़ने लगी। मैंने उससे नरगिसो आँखों की धमक, उसके गुलायी गानों का अनुमवहान नमी और उसक पसल अधरों की कंपा पर निगाहें गाद दी और पय हमारी प्रकार अंगुलियों सीला हुई और हमारे सिर पर सप पक्षी सन से गुजर गया, तो मैंने पूछा--"लकिन तुम उदास क्यों हो, भरगिस ?" और यह मेरा धपी के शास पर अंगुली फेरते हुए बोला-"HIT रात, जय में मैंने धाम की यात सुनी है, और पिर श्राप को मुयुल के घम्वे में जगा बैठी है तब समरे मन में आपका चेहरा थम रहा है। मुझे इन जगलों से भारत हो गई है। मुझे धाप से और श्राप के देश से प्रेम है, लेकिन आप परदेशी है । धार धान या कल यहाँ से चले जायेंगे और मैं राता को समन के खचूरों के गुण्डा में बैठ कर आप की परछाइयों से पाक्यिा करूंगी।- थाप कब जायेंगे?" में कभी नहीं जाऊँगा।" मैंने उसका हाय दवाते हुए कहा । पाठ दस कौवों का गोल हमारे सिर पर से काँव काय करता सोसन की सरफ उड़ चौर भय यह वधूल की ओर चल दी, तो मैंने अनुभव किया, मागो अचानक मुझ पर उल्लाम के पादल परस पद है। जैसे सोये हुए भाग्य की गरदन कट कर अलग ना गिरी है और जैसे समस्त विश्व का युवतियों और विशेषकर दिरली के उस कोठे की युवतियों लपक लपक कर मेरे चरणों पर अपने मस्तक इस रही हैं और कहता है-'हमें चाहो।'-ौर में सब को ३०-२ गया।

गप प्रान दुधराम हुए इता हैागिम के पूओं और पुर के कोरा बाबा आमो या शिक्षण में शिक्षा जगा-प्रो" और यग पुपहियों को टुमा काम में मने कई बार परेला एक शान शादिया। में मोसन पास पहुंचा और अब पारा पाने का संपारियों ने al, शोदाम मंगुश ने मेरे कन्धे पर हाप पर हुए-"अब पारा॥ में गुम्मा तुपाने लगा--"में समन में तुम्हारे साथ कुप दिगो रहना चाहता हूँ । गुमसुम सा माल मा बाधा या दोस्त की ही मिला और गुम्हारे पाप कृय पण दिगा कर मुमारिकमाता होगी।" और युख प्रमा होकर बोला-'मरा माता पर रहिये, मेरा पर भाप का घर है पाप शोक सराफ बाइये!' और मरा पड़ा मौकर सापकर यहम अगा लेडिज मिया, वह मेरी बुदिया पारी पाट पर पड़ी एरिया रगर नहीं होगी मेरे मिया मे रखने वाला हो कौन है ! पिर इस जगन में हिरनियाँ हो भय मिसी मही, जो समय त सके।" मी उसकी पीठ ठोंकते हुए कहा-"मिलती दिन मुम राणी से वापस धन पायो । मरे साथ तुम कहाँ रेत पाहते फिर,गे पुलों को भी साथ ले जायो मैं सुकुल माह के साप कुप दिनों रह कर वारस मा माउंगा।' और पढा भवें मुका कर और गुतलियाँ फेर कर मुझे यो घूरो अगा, मानो कह रहाचा-बच्चे, तुम पर भून प्रेत का असर हो गया है, और पराम पर मेरा वश नहीं चल सकता । सुदा ही मुम्हें वापस लाये होक्षाये! थौर जब बारात ममन को यापम स्थाना हुई तो सर मोमवान सारपानों ने मेरी भोर इशारे करते हुये मुथुख से पा कर पूछा-"क्या भाप भी सम्म जा रहे६॥ वा!'वह गर्व के साथ सब को उत्तर देता और सब एक दूसरे की भोर देख कर मुस्कराते और कहते-"बड़ी खुशा का बात है !" और ऊपर मुबुन के ॐ पर मूबते हुये कजावे में मैंने भरगिस को देशा सिका चहरा तेज धूर में कुद की तरह दमक रहा था और जिसके मागे पर मुस्कान थी, जो शायद मुबह के तारे की फंपकपाइटों से मिल कर बनी थी।

उदय प्रस्त १३ उस दिन मुझको मालूम हुधा कि फपि येचारे मुल नहीं लिसा करते, पिपुल सष कहते हैं। पाका कलाना में अतिशयोक्ति का दोष निकालने वाले किमी एसे कजाये का छापा में चल कर देगा, जिसपर एक सुदर मद युवती पैठा भूज रही हो, तो उन्हें अपनी इस धारणा को पदलने के लिये विवश होना पड़ेगा। मैं चाहता था कि इस कमाये के साथ मरते दम तक चलता रहूँ पीर फिर ऐसा हो कि यह ॐ अपने काफिले से अलग होकर भक जाय । असण्य लापाबे मुनसान विस्तृत मैदाा में यह कमाये पाले नीचे उतरे और वहाँ हम चादनी रातों और रुपहले प्रात कान की गोद में ऐसी मीठी माया पात करें जो कवि लोग अपनी कविताओं में लिखा करते हैं और फिर प्रधानक मुझे मुकुल का ध्याा ा गया-'उस ॐ के मटक जाने से चार मुचुल पर क्या बीतेगी किसी दीवार से सिर पाइ लेगा, पागल हो जायगा और तपनी दोपहर में, जलता रेत पर नगे पाय खोजता रहेगा और किमी उदास सध्या को, जम लेकिन अचानक मुझे सुयुल को अावाज ने चौंका दिया । वह गा रहा था- "सुम्हारा चेहरा चाँद की तरह येग और अप्रतिम क्षों है। तुम्हारे बालों पर यह गद और तुम्हारी पलकों पर यह नमी कैसी है मुम्हारी चाल में यह ढीलापन और तुम्हारी बातों में यह निराशा कैसी ? तुम यह क्यों नहीं कहा दी कि सुम ने कहीं मेरी मौत का रिश्ता देख लिया है।" ऊंटों की घटिया टन टन बजती जा रही थी और उनके कदम रेत पर हरकी-मी "निस खिस' का शब्द उत्पन्न करते, टीलों के बीच नाचते हु बढ़े जा रहे थे। कजाव पर एक यार मैंने नरगिस की शोर देना, जो सुम्वन पर दष्टि गाहे कुछ सोच रही थी और जैसे ही उसकी आँखें मेरी प्रोपों से मिली, वह मुस्करा दी और मैं समझा, मानो यह ऊँ अपने काफिले से मार गया है। समन बड़ा सुदर गाँध या । पचास साठ घिरीदे और फिर सारे गाँव को घरे हुये लम्बी लन्धी खजूरों की पत्तियों । इन खजूरों के आस पास खेत थे और खेतों के दूसरा नोर वही रत का समुद्र । सुम्बुल मुझे अपने घर ले गया। रगीन पायोबाले एक पलग पर सद्दर की नई चादर बिछाई गई और उसे एक छप्पर के नीचे रख दिया गया । फिर सधुल और उसके घर वाले मेरे पास आ कर बैठे तो ऐसा प्रेमपूर्ण यातों का सिलसिला शुरू हुआ कि मेरे मन में पाया कि यहाँ से खिसक कर नरगिस के पास चला जाऊँ और उससे कहूँ-- वन्नम्न और पर पूर्व की सरप Imam परेमा-"पर, बरमुख पास घर मेमे मन-ही-मग शुधा शुभाEिAIT अग पनि कीमोर था। म तीम स क य गुग म स पुर और पर ताराम था-और अम में नागि पर ATM कर उसे अस्तर धारा को एक कविता या अर्थ समझा रहा था, सो पचानक एक सो साया हमारे सामने पासाहो गई। हम दोनो भीर हमारे fat भरा गये । मैन मयभीत का पूड़ा-कौन देत " मुबल हूँ" पर पोसा-मोर या मागिम और मर घनश६१" और या निकर पाकर एक हाय मेरे पर और दूसरा नागिम के की पर रखते हुये पोला-"किन धाप को धान की महाभार कोसने नहीं पाया, मैं पप से सिर पक बात परने माया र शाम भरगिस ने मुझे कवि ममापा, नरगिस में मेरा रा रा रासाद, मरजिसमें मेर जीवन पर स्मो की फवार परसाई भार RT५ जानरा बयोंकि भात चौथा रात है। मैं इन समों का योग में पाप धोको पाते गुमना रहा चार मरे दोस्त है, मावि माप को यह अधिकार म था कि पाप मेरी प्रेमिका को हथिया मेसे, लेकिन कि मरगिस सुरपुल में एक शुभी है मै अपना पद अमानत थाप को सौंपता हूँ। मैं स्वामिमाना किमान है। मैं चाहता, जो पाप के कमरे में एक रोग मोक करके प्राप को इन्ही टीका पर फेंक देता और गाली गिय माप की याटिया माघमाध का पाप के शहर पर ा भंडराते । बेकिन मैं कवि हूँ, मैं गात मनाता है और मैं FR अपना प्रेम पिपासा बुझाने का कायलमही । मुझे प्रत्यक दिल के धपकने का अनुमव है। नरगिस से भाप को मेम हो गया तो इसमें प्रापका कुमर नहीं मैं अगर श्राप के प्रेम में बाधा दाल, तो यह मेरा पागलपा होगा क्योंकि नरगिस के दिन में प्रय मेर लिये कोई जगह नहीं रही। लेकिन इतना याद ररिय हि प्राप दशा, भाप मुसादिर है। नरगिस का दिल 7 वाहियेगा। अगर नरगिस का दिल श्राप के हामों टूटा, तो याद रखियं सेधित घोदिये इस विस्पेको, मैं सिप अपना नरगिस का भाप के हवाले करने घाया था। मैं अपने दो और अपने मेहमार पर हाथ साना गुनाह समझता हूँ। इसलिये उदय प्रस्त २३ - नरगिस, बैठ जानो यहाँ, और गजनफर अली खाँ का सिर अपनी जाधों पर रख लो। और गजनफर अली खाँ साहय ! आप इसे किसी कवि की कविता का मतलय समझा रहे थे, समझाइये, और अब मुझे इजाजत दीजिये और मेरे इस हस्ताक्षप को बुरा न मानियेगा, क्योंकि जब जलती हुई लकड़ियों पर पानी डाला जाय, तो उसमें स जो धुवाँ उरता है, वह कडु या होता है। अच्छा खुदा हाफिज हम दोनों अवाक् खड़े थे। और सुम्युल धीरे धीरे चल कर खजूरों को पक्ति में गायब हो गया था। कितनी ही देर तक हम ने एक-दूसरे से कोई बात न की और जय नरगिस की सिसकियाँ ऊँची हो गई, और मेरे हृदय की धड़कन से खजूर के तने भी कॉपते हुये प्रतीत हुये, तो मैं धम से रेत पर बैठ गया। नरगिस भी निर्जीव लोथडे के समान गिर पड़ी । वह रोती रही, मैं सोचता रहा और जब उसने रोते रोते अपना सिर मेरे कन्धे से लगा दिया, तो मैने भर्राये हुये स्वर में कहा-"यह सुम्सुल मनुष्य है या देवता ? और नरगिस ! हम भाग रहे हैं या स्वम देख रहे हैं।" और वह अपने घासू पोछते हुये बोली---"हम जाग रहे हैं, और यह सुम्वुल ही था, जिसने अपने प्रेम की लाश को खुद ही कफन दिया है। लेकिन मैं क्या करूं गजनफर ? में लाचार हूँ, तुम इतने अच्छे, इतने प्यारे हो-और मुझे तुम से और तुम्हारे देश से इतना प्रेम है " जल्द ही वे बादल छुट गये, जो सुम्जुन का साया हम पर पैजा गये थे। और जब मैं नरगिस से विदा हो कर सुम्बुल के घर पहुंचा, तो सोचने लगा कि मैं क्या मुँह दिखाऊँ अपने भेजबान को । मन में पाया कि धन हूँ यहाँ ले, लौट जाऊँ अपने शहर को, लेकिन एक श्रयाबील सजूगों के उसी स्वीय मुयः से उपती हुई भाई और सन से मेरे सिर पर से गुजर गई । समन से वापस चला जाना मेरे लिये बहुत कठिन पा-और अप, जन सुम्मुल ने इतना पड़ा स्याग किया, तो भव उससे झिझक कैसी, जब उसका मन इतना साफ है, तो अपने मन पर यह मैल कैसा और जब मैं उसके मकान की दालान में दाखिल हुधा, तो यह खाट पर उठ बैठा और मोजा--"पापा गये ?- आप को मेरी बातों का कुछ ज्याज तो नहीं है ! थाप मेरे भाई हैं और यकीन कीजिये कि मैं भाप से खफा नहा हूँ। मैं जिस अमानत का मार न उठा सका, घह भाप के हवाले कर दी और अय श्राप के हाथ में मेरी अमानस की लात है।"

२४ रदय मस्त और यह चुरचार बिस्तर पर लेट गया। और देर तक हैरान होता रहा कि यह मसार विधिन है, यहाँ एक दूसरे के प्रेम का ना अधिक भार किया पाया है और यह विचित्र प्रेमी है जिसने प्रभाव का महा अपने सीने में दिपा ला है-कुंक रहा है, देकिन दम नहीं मारना । सिलसिला शुरू हुधा कि रात को मन को मो जाते, तो वह arar-भाई साहब, श्राप अभी तर बाहर नहीं गये " मैं जित श्रीर परेशात यार चला जाता और जय लोरता ताय खार पर से उठते हुये कहता-'या गय भारी किसी चीज को जरूरत है? एक महाना बीत गया पति रात नरगिल का कानुले मे पाही पर बिवर ती उमा नमनाघों पर सिर रख कर मैं देर तक खजूरों की पत्तियों से इलझ हुये सारों को देखता रहता। मय हम बातें बहुत कम करते थे क्याकि वे सम दर मिार दूसरे के सामने गा चुके थे जो साधारण प्रेम कहानिया में प्रयुक्त होने है पर अब एक ऐसा रात मा पाई कि जब म वर्ग के उस मुण्ड के क पहुँचा तो मुझे उसके इर्द गिद फहराने हुये पियदीवाले भयानक भून जगला नाच नाचते हुये दिखाई दिये और घरों की डालें मुझो क पनरों का भौति वायु मएज में धार धारे मुस्ता दिखाई दी। मरे दमा में स तानना न था मेरो रगों में बह गीला नया में रंगना हुघा भुरा के पास पहुँचा । नरगिम मेरी प्रताचा में श्री वासी- तुम ने बाज नना देर क्यों लगा दी। जार करते करते मेरा घोव पधरा गई । तुम अा7 के थक क्यों हो और तुम्हारे चहरे पर यह उदास क्या है। गजनपर तुम अाज क्या सोच रहे हो।" चाता में मैं नागिस से थक चुका था मान प्रकृति शाति की इक होता हुई भी पर विशेष समय में शान्ति से भागना चाहती है। मुझे श्रव उसका मुहायम जाँघों में प्रौलाल की मो साता महसूस हाने लगी। और जव उपके बाल मेरी बाहों पर लहराते तो मेरे घर में एक मुरमुरासी और नाना, मानर पीरिया रंग रही है। यह विचित्र जावन है। मैं उस दिन मोचना नहीं कि दिन मर अनिचित किसानों के जमवर में बैरकर हिजल गप्पे हाके, चौर गन- अपरिचित लयकी के लिये इस भयानक पन में इन दगने म्बर्ग के कुण्ड में बिताया, 7 सिनेमा, न रेडियो नचादना चौक और न कना- सरकस न हुमायूँ का मायरा और न जामे मस्जिद को सादियाँ । र एक पेटीले तेज धूप और फिर रात को यह एक हा बहसी-नित्य उदय अरन ३५ वही थाल, यही बाह यही यि और पिर यहा गाते ।पिचोही हुई हलियाँ, हर वक्त प्राणों का भय और फिर एक उदास और थकी हुइ भीगी सी. वाला चुपचार मायान, 1 7 पहिले के समान गाता है और 7 रहाने लगा कर हंसता है, और यह देहाती छोकरी-यह मुझम प्रेम नहीं करती-मेरे देश से, नवीन सभ्यता के उस गहनारे से प्रेम करता है, जहाँ उसके शिधार में पालनार बिना किसा झिकर और भय के यामार के चौक बीचोयीचा हो कर उसके अधर घूम सकता है। यही ता कारण है कि वह अमर कहा करती है-- 'तुम मुझे अपने देश ले जानोगे 13म मुझे ट्रामों पर पढ़ायोग, तुम मुझ रडियो मुनायोगे मिनमा दिसामागे, ये नये कपदं दिलवामागे, मेरे कानों मनाने के थुन्दे होंगे और याँहों में हाथा दात का चूडा-हैन" मुझे उपकाई धान लगा। मैं अंगाइयों लेने लगा मेरी प्रॉस नींद से मोझल हो गई । मैं थक चुका था, मुझपने इद गिदं ठहरे हुए पानी की गध-सा धाने लगी। उस दिन पब नरगिस ने मेरी उदामा का कारण पूछा तो मैं बोला--"वास्तव में मुझे शिकार का यहुत शौक है परगिम ! एक महीने से मैंने कोई नया शिकार नहीं किया। कहा तो कल शिकार पर चला पाऊँदो चार दिन के बाद लौट पाउँगा और फिर मुम्ह शपन देश ले जाऊँगा, जहाँ हर काम बिजली के द्वारा हाता है । इमारता पर पदो के लिये सादियों की जरूरत पहा । बटन दबायो और बट में ऊपर । दूर जाने के लिये पैदल चलने की जरत नहीं मोर में घेठो और पाक स बह जा रहो । नय कपड़े खराद कर दरी का दूकान के चकर काटने की जरूरत नहीं सिने सिलाये पर और मादियाँ खरीदो और पल भर में दुलहिन पन जामो-चलोगीन?' लेकिन वह तो मोम की मूर्ति पा कर देगे थी। मैंने क पा हिलाया, तो रोने लगी। मैंने मना कर कहा-"विचित्र यात है, मैं अब उम्र भर इस मुण्ड के नीचे पदा पैसे सदता रहूँ ! प्रेम के अधाया पाश्मी को दूसरे काम भी तो होत है। मेरे माँ बार है, भाई-बहिन हैं। मेरे कामती शिकारी कुत्ते है। उनका देव माल करना मा मेरा पज है। शिकार मो गजना है, और किर लोट प्राऊँगा यहाँ । यहाँ से कभी न जाने का मैंने जो वादा किया था, उसका यह मतलब तो नहीं था कि यस यहीं जम कर बैठ रहूँगा अरे यही पाठ-दस दिन लगेंगे, फिर यही मुण्ड होगा और यहा राजनफर होगा और "लेकिन वह पे हो रोती रहा, उसके पासू की कुछ बूदें मेरी हथेली पर गिरी और मुझे ऐसा अनुभव हुया, मानो मेरे हाप पर किसा ने तेजाब छिदक दिया हो । मैं घबरा कर उटा-"अच्छा नरगिस, बाज इतवार है न ?

माते इसयार को इसा समप यही मौत रहना, मैं मर भाउँगा, मुनती हो !!" में उसके हाय का पक कर में चार For प्राया, लेकिन यह वहीं बैठी रही और अय पहुत देर के याद ठी, वो बड़ा तीयता धोर पर के माय! दम इस प्रकार धाय मानी उड़ जाय। उसके दम पर यो रेतने बगी, जैसे मैंने नरगिस से प्रथम मिशन के अवसर पर पो पर्ट ४ाई थी। दूसरे दिन सके हा मैंने मुम्युध से शिकार के बहाने में मत मांगी। उन भीगा हुई मोसों में पम-मी पैदा हो गई और यह मेरा गुलिया वाले हुए बोला--"प्राप वापत भायेंगे ! श्राप सा अपने घर को राह तो नही "नहीं, नहीं।' मैंने मुस्कुराते हुए पवाद दिया--"पर भी कमी हो मना है? यस हफ्ते भर के जिपे इधर उधर घूम धाम कर लोट पाऊँगा, अगली गावों में मेरे बहुत से मिलने वाले है, मैं उनसे मिल कर जद छोरगा, मैं तुम्हे कैसे छोड़ सकता हूँ। तुम तो मरद समझत हो !" 'जा हो।" यह कुछ साधो हुए बोला- 'सर कुछ समझता हूँ इसीलिये वो कहा था कि जल्द सीरियेगा। और जब मैं समन से निकला, तो सिर पर पाँव रस्त्र कर भागा, तितली किसा यस्चे की दापी में पहुत देर तक कैद रहता है और जब उस कारागार से निकलता है, ता इस प्रकार और साधी उपतो है, मानो सृष्टि के अन्तिम छोर पर जा कर दम ant। शाम को मैं एक स्टेशन पर पथा। देहली का 2कर ले कर गादी पर सवार हुथा भौर सुबह तड़के देहनी जा उतरा । भाने कोट पर पहुँचा, सो कुत्ते मेर दमों में लोटने लगे। मेरा दा नौकर मुंह वाले, भवे लटकाये मुझे पूरने खगा। बोला- 'माप घबराय हुये है बाप होप क्यों रहे हैं? पाप अमा पार जुम्मा से कोई गराडा ताबीज़ लाता हूँ। मैं क्या नहीं कहता था कि थाप पर भूत प्रेत का साया पड़ गया है? मैने जोर से ठहाका लगाया और हंसता हुशाजे पर पाया, तो अचानक रगान शार्ग का परखा ओर इनकम-सस असर साहब का एक लड़की मेरे कमरे की शोर इस प्रकार देखता हुई निवाई पहा मानो उसने यहाँ से कोई विचित्र अावाज मुनक्षी है। मेर ठहाके रुके, तो वह श्रखि माकाने खगी और पार मैं उदय प्रस्त अप मैने ताजी हवा के बहाने से खिड़की खोल दी, क्योंकि अब मुझे लड़कियों से यह पहिला सकोच नहीं रहा तो वह झट दीवार के पीछे छिप गई, लेकिन दीवार में असख्य छेद थे जिनमें मे मैंने देखा कि यह मेरी श्रोर देख रहा है। मेरे हृदय में जुगनू-से चमकने लगे-जीवन परिवत्ता का नाम है, और सूखी खजूरों की प्रोट में बैठी हुई छोकरी से ई टों की इस दीवार के पीछे दबकी हुई लड़की कितनी प्यारी लगती है । मैंने एक काराज के पुर्जे पर "मिजाज शरीफ लिखा और एक क्कद पर लपेट कर परली छत्त पर फेंक दिया। मैंने खिड़की बन्द कर दी। क्याकि अब नौकर कुत्ते बाँध कर मेरे जूते उतारने पा रहा था । यह मेरे पास श्रा कर घेटा ही था कि अचानक 'खट' से एक रगीन शीशा किरची किरची हो कर फर्श पर पिसर गया और एक काम में लिपट ककद मेरे सामने था गिरा। "कौन बेयरफ का बचा है ?" मेरा नौकर चिघाड़ता हुआ सिड़की की ओर लपका। "कौन है अपनी माँ का लादला ?" और फिर अचानक पाँव पकड़ कर प्रश पर बैठ गया था। बिलमिलाता और पत्थर फेंकने वाले को हजारों बातें सुनाता वह सीढ़ियों पर से उतर गया। मैंने काड़ पर से कागज़ उतारा। जनानी लिखावट में लिसा था- के रग रग में बिजलियाँ भर दी। वह आये थे मेरे दिल की लगी धुझाने को।" "शिक्षित मालूम होती है। मैंने घटननी खोलते हुये सोचा। हाय * इशारे ये उसे शेर की रसीद पहुँचाई, तो यह खड़ी हो गई। पड़ी दर gi देखती रही, मानो कह रही हो-'मेरी सय बहिनों की शादी हो चुकी है और मही यहाँ रह गई हूँ। मेरा यहाँ भने जी नहीं लगता । मुझे प Est जरूरत थी और मैं चकित था कि तुम इतने दिनों से इन रगान में नहीं झोकते । मैं तुम्हारी राह देख रही थी। अच्छा है कि तुम श्री गये। शुभ है - शुक्र है" और फिर उसका आँखों में आंसू धमक र प्राचल में अपना चेहरा छिपाती परे चली गई । दीयार - में इसका ऊँचा एदा की गुरुगापी देखो और मैं समझा, जैसी एका मरा पसलियां को मेटखाता मेर कलेजे में फंसी जागा यह कहने का ज़रूरत नहीं कि क्कड़ पंकने का तक जारी रहा और अगले इतवार को एक धुंधला tra : लेवेन्डर को मामा "मिज़ाज पूछ animurti

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उदय प्रस्त २६ एक मेज पर यह एक नवयुवक की जाँघों पर सिर रखसे लेटी दिखाई पड़ी। यह कह नही था-"कौन कहता है कि अपो मंगेतर से शादी से पहिले मिजना सभ्यता है लेकिन तुम अपने मित्रों में यह बातें करना कि परसों मॅगनी हुई और कल से मिलना-जुखना शुरू हो गया। कहगे कि मैं कोई और छोकरी हूँ।" "पगली " हंसते हुए नवयुरको उत्तर दिया। और अचानक कुछ विचार खजूरा के साये सुरसुराते हुण, लहराते हुए बालों, नारगी होठों और नम जोधा बाला एक युवती को माथ लिये हुए कहा से आये और मेरे मस्तिष्क के इद गिद अत्यात तीव्र गति से नृत्य करने लगे। लसम्माता हुया में वहीं मे दहली के स्टेशन पर पहुंचा और तड़के ही उसी नन्द स्शा पर जा उत्तरा और फिर समन का रुप लिया। तेज़ धूप के कारण टीले तप रहे थे और चारों ओर एक भाप सी उठ रही थी । जलती हुई रेग मेरे जूतों में भर गई, लकिन मैं हैरान व परेशान चलता गया-चलता गया--और जब सूर्य पश्चिमी टाला की प्रोट में श्रस्त हो गया, तो अचानक पूर्व की ओर से एफ घोंधी उठा और पण भर में चारों ओर छा गई । मेरा अाँखा में रेत भर गई । मेरे कपड़े फड़फड़ाने लगे, मेरे कदम सखद उखड़ गये । बजून सनसनाने लगे और कोई अज्ञात हाय लपक कर मेरे गले को इस ज़ोर से दबाने लगा कि मेरा दम घुरन लगा। एक जगह गिर गया और अचानक तीव झोंकों का भयमात चीतकारों में मुझे निर्भाव हो कर एक गीत सुनाई दिया- उदका कर तितिज में जा मिली। "प्राधियो और ज़ोर से चलो और सृष्टि को जड़ों से उसाद कर घायु में "तूपाना । चिलाते हुये भायो और खजूरों के मुण्ड अपने कन्धों पर रख "यो । श्रोले गिरायो और समन व सोसन की चरागाहें धुनक कर "क्योंकि हे प्राधियो, तूफानो और घटायो, इस ससार ने प्रेम को एक मैंने स्वर पहिचान लिया । “मुम्बुल ! सुम्वुल !" पुकारता हुअा में गरजते इधर उधर दौड़ने लगा। रख दो। - क्षणिक खेज समझ लिया है।" हुपतूफान उयम भरत और फिर सामो एक ॐका सापा उमरा । लपक कर मैं उसके निकट पहुँचा और चाला--"मुम्बुल, मुम्बुख" "धाइये जानकर यक्षा सो साहय, कहिये, तैरियत तो है।" "मैं तुम से मिलने घाया हूँ।" मैंने उससे लिपटने हुए कहा। यह निप्पाण प्रतिमा के समान घरा रहा और फिर बोला--"शौक से! मुझे बड़ी खुशी हुई।" 'तुम कहाँ से भा रहे हो?" "समन से।" 'मुझे नरगिस से भी मिलना है।" मैने कहा । 'मिजिय।" यह ॐ का नकेल को अपना अंगुली के चारों घोर लपेटते गोला-लेकिन देखिये यह व्यस्त होगो । सूर्य प्रस्त होने से प्य उदय होने तक वह लगभग दस नौजवानों से में कर लेती है। हमने उसे पक खिलौना समझ कर फेंका और वह सारी दुनिया के लिये खिलौना यन गई। सुम्सुल और रामनफर आज-कन उसके स्वमा के भून है ! जाइये, खुदा दारिज" और उसने नकेल खींचा और पण मर में यदते हुए अधकार में छाया बन गया। चारों थोर भूत से नाचने लगे और अब मैं अपने तपते दिमाग को दोनों हाथा से दवा कर चिंघाड़ते हुए अधकार में एक और मुंद उठा कर चल दिया, तो मुझे ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे मेरे हृदय में चमकते हुए जुगनुओं को अचानक किसीने मुहा में दवा कर मसज डाला हो। -श्री अहमद नदीम कासिमी वॉझ मेरी और उसकी भेंट आज से ठीक दो वर्ष पहिले अपोलो अन्दर पर हुई यो । सध्या का समय था, सूर्य की अन्तिम किरणे समुद्र का उन दूर बहती हुई लहरों के पीछे गायब हो चुका थीं ! तट के बेञ्च पर बैठ कर देखने से 4 मोटे कपड़े की तहें जान पड़ती थी। मैं 'गेट आफ इण्डिया' के इस तरल पहिली बेञ्च छोड़ कर, जिस पर एक आदमी चम्पी याले मे अपने सिर की मालिश करा रहा था, दूसरे बैंच पर बैठा था और दृष्टि सामा तक फैले हुये समुद्र को देख रहा था। दूर-बहुत दूर, जहाँ समुद्र और श्राकाश घुल मिल रहे थे, बड़ी बड़ी लहरें धीरे धारे उठ रही थी और ऐसा लगता था कि एक बहुत बड़ा गॅदले रग का कालीन है, जिसे उधर से इधर को लपेटा जा रहा है। तट के सभी विद्युत दीप प्रकाशित थे । उनका अक्स किनारे के प्रवाहित जल राशि पर पपाती हुइ मोटी मोटी लकीरों के रूप जगह जगह रेंग रहा था। मेरे पास पथरीली दावाज के नीचे कई नौकाओं के लिपटे हुये पाल और योस धीरे धीरे हिल रहे थे। वायु मण्डल में समुद्र की तरगों और दशकों की आवाज़ एक गुञ्जन बन कर घुल गई थी। कभी-कभी किसी याने जाने वाली मोर के भोंपू की सवाज़ उठता और ऐसा जान पड़ता, मानो पढ़ी मनोरजक कहानी सुनने के बीच किसी ने ज़ोर से हूँ की है। ऐसे वातावरण में सिगरेट पीने में बड़ा थानन्द पाता है। मैंने जेब में हाय डाल कर सिगरेट की डिक्या निकाली, मगर माधिस न मिली। न जाने कहाँ भूल पाया था। सिगरेट की दिबिया वापस रखो ही वाला था कि पास से किसीने कहा-"माधिस बीनियेगा" मैंने मुद कर देखा, वेंच के पाछे एक नवयुवक सदा था। यों तो पम्बई के साधारण निवासियों का रंग ही पीला होता है, लेकिन उसका चेहरा भयानक रूप से पीला था। मैंने उसको धन्यवाद दिया-"श्राप की बड़ी कृपा है।" यह सुन कर उसने माचिस की दिदिया, जो उसके हाय ही में थी, मेरी तरफ यदादा । मैंने फिर धयवाद दिया और कहा-"पैठिये।" असने जवाब दिया-"पाप सिगरेट सुजगा धीजिये, मुझे जाना है।"

उदय प्रस्त मुझे ऐसा महसुस दुश्मा कि उसने मूर कहा है, क्योंकि उसके बहने से इस न का पता चला था कि उसे काई शरदी नहीं है और न उसे कहीं जाना है। प्राप कहगे कि लहज मे ऐसा बातों का पता कैमे चल सकता है, नदिन सच यह है कि मुम उस समय ऐगा ही अनुमा हुथा। अतएव एक बार फिर कहा-'ऐसी जल्दी क्या है, येठिये।" और यह कह कर मैंने मिगर का डिरिया उसकी तरफ बढ़ा दो और कहा-"सिगरेट पीजिये।" उसने सिगरेट के छापे की तरफ देसा और जवाय दिया--'धयवाद, लेरिन में श्रग्ना नन्द पिया करता है।" अाप माने या न मान, मगर मैं एप्सम सा कर कहता हूँ कि इस बार उसने पिर मर कहा । इस बार फिर उस लहजे में धुगली खाई थी. मुझे उससे दिलचस्पा पैदा हो गई। इसलिये मैंने अपने मन में निश्चय कर लिया था कि इस पर बैठाऊँगा और उसे अपना सिंगरट पिलाउँगा! मेरे रयाली के मुताधिक इसम कोई कठिनाई हा न था, क्योंकि उसके दा वाक्यों हो न मुझ यता दिया था कि वह अपने आप को धोखा दे रहा है । उसका जा चाहता है कि मेरे पास बैठे थौर सिगरेट विये बेकिन एक ही समय में उसके मन में यह मा विचार पदा हासा है कि वह मेरे पास न थैरे और मेरा सिगरेट 7 पिये। अतएव हो और ना' का यह टक्कर उसके लही में स्पष्ट रूप से मुझ दिखाई पर रहा या श्राप विश्वास कीजिये कि उसका अस्तिवमा होन और नहाने के बीच में लटका था था। उसका चहरा, जैसा कि मैं कह चुका है, अत्यन्त भेला था। इस पर उसका नाक, आँखा और मुँह इतन स्पष्ट ये कि जान पड़ता था, माना किसान चित्र बनाया है और उसका पाना स धो डाला है। कभी कभी मेरा और देखते देखते उसके ओंठ उभर से थाते लेकिन फिर रास में लिपटा हुई चिनगारी का मोति सो जाते । उसके घर के दूमर चिह्नीं का भी यही हालया। थामें गदले पानी की दो बड़ी-बड़ा यूद था, जिसपर उनकी हिरनी पल भुका थी। बाल काले थे, मगर उनकी स्याहा जले हुये कागज का भौति था, जिसमें भूसखापन भी होता है। राम से देखने से इसकानाक का सदो नाशा मालूम हो सकता था लेकिन दूर से देखने पर यह विलकुल विपन सो मालूम होता थी। क्योंकि जैसा में इससे पहिले कह चुका हूँ उसके चेहरे के चिद बहुत अस्पष्ट थे। उसका दसाधारण बोगा पैसा था। यानी न छोटा, न महायजयत्ता मम यह एक प्रास दग से, यानी अपना कमर की हड्डाका ढाला छोड़ कर, सदा पाँम होता, तो इसके बाद में काली का पैदा हो जाता। इस तरह जब वह एकदम उठ खड़ा होता तो, द शरीर की अपेक्षा पहुत पड़ा दिखाई दता था। उसके कपड़े प्रस्ता हालत में थे, लेकिन मैजे नहीं थे। कोट की मस्तीनों के किनारे किमा पुरा यतन से ज्यादा घिस गये थे और कमीज घस एक और धुलाई में बरम था। मगर इन कपड़ों में भी यह स्यय को एक सम्मानित ढग से पेश करने की कोशिश कर रहा था। मैंने जय उसका तर देसा गा, तो उसके समस्त अस्तित्व में पचना की लहर सी दौड़ गई थी। और मुझे ऐसा मालूम हुधा था कि वह अपने पारो मेरी निगाहों सोमन रखना चाहता है। मैं उमड़ा हुआ और सिगरेट मुलगा कर फिर उसकी तर डिबिया यादी, और कहा-'पाजिये!" यह मैने कुछ इस ढग से कहा और सुरन्त ही माचित मुलगा पर उसको इस ढग स पेश किया कि यह मद कुछ भूल गया और उसे सुलगा कर पीना शुरू कर दिया । लेकिन एकाएक टस भूज का अनुभव हुमा, उसने मुँह में स सिगरेट निकाच कर बनायो खसी के लक्षण अपने गले में पैदा करते हुये कहा--"केवेण्डर मेरे लिये उपयुक्त नहीं। उसका तम्बाकू बहुत तेज होती है, मेरे गले में फौरन खराश पैदा हो जाता है।' मैंने उससे पूछा-"पाप कौन सी सिगरेट पसद करते है ?" उसने हकला पर जवार दिया-मैं मैं मैं दरसल सिगरेट कम पीता हूँ, क्योंकि टाकार घोलकर ने मना कर रक्सा है। वैसे 'थी प्राइस' ही पीता हूँ। उसकी तम्बाकू यहुत तेज़ नहीं होती।" उसने जिस डाक्टर का नाम लिया वह यम्यई का बहुत बड़ा डाक्टर है। उसकी फीस दम रुपये है। और जिस सिगरेट का उसने नाम लिया, उसके विषय में श्राप को भी मालूम होगा कि यह बड़े महंगे दामों में श्राता है। उसने एक ही साँस में दो मठ बोले, जो मुझे हजाम न हुये, मगर मैं रहा । यद्यपि में भाप स सच कहता हूँ कि उस समय मेरे मन में यहा इया घुरिकियों ले रही थी कि उसका गिलाफ उतार दूं और उसके भू का मरडा फोड़ दूं। और उसे इस तरह लजित फलं कि यह मुझ स धमा मागे। मगर उस का ओर जप मैंने देखा, तो मुझे ऐमा अनुमव हुधा कि उसने जो कुछ कहा है उसका प्रश्स बन कर रह गया है। मुठ योङ कर चेहरे पर जो एक सुर्खा सी दौड़ जाया करती है, यह मुझे न दिखाई पड़ी। पकि मैंने यह देखा कि वह जो कुछ कह चुका है उसको यथार्थ समझता भा ३० उदय मस्त मुझे पता महसूस हुया कि उसो मृर कहा है, क्योंकि उसके बदले से इस त का पता चलता का कि उसे कोई दो नहीं है और न उस कहाँ जाना है। श्राप बगै कि लहरे से दमा यातों का पता कैसे चज सस्ता है लेकिन सच यह है कि मुझ उस समय मा हा अनुमर श्रा। अतएव एक यार फिर कहा-'ऐमा जल्दी क्या है, वैरिये । और यह कह कर मैने सिगरट का टिविया उसकी तरफ बढ़ा दी और कहा--'सिगरेट पीजिये।" उसन सिगरेट के छापे की तरफ देखा और जवाब दिया-'धयवाद, लेकिन मैं अपना चन्ड पिया करता हूँ।' प्राप माने या न मानें, मगर में प्रसम मा कर कहता है कि इस बार उसने फिर मर कहा । इस बार फिर इसके बहने न धुराली बाई और मुझे उससे दिलचस्पा पैदा हो गई। इसलिये मैने अपने मन में निश्चय कर लिया था कि उसे १रूर वैगउँगा भार उस अपना गिरट पिलाऊँगा। मेरे श्यात के मुताबिक इसम काई कठिनाई हान थी, क्योंकि उसक द वापयों हा न मुझे बता दिया या कि वह अपने पापको धोखा दरहा है। उसका जो चाहता है कि मरे पास बेटे और सिगरट पिय, नकिन एक ही समय में उसके मन में यह मा विचार पैदा होता है कि वह मेरे पास न बैठे और मेरा सिगरेट न पिये। अतएव हो और ना' हा यह टक्कर उसके लहजे में स्पष्ट रूप से मुझे दिखाई पड़ रहा था। आप विश्वास कानिये कि इसका अस्तित्व मा होन और नहाने के याच में लटका हुया था। उसका चेहरा, जैमा कि मैं कह चुा हूँ अत्यन्त पाला था। इस पर उसका नाक, श्रीख और मुंह के चिह इतन अस्पष्ट थे कि जान पड़ता था, मा किसान बिनाया और उसका पानी से धो वाला है। कभी-कभा मेरा और देखते दखत उसके घाट उभर सात, लेकिन फिर रात में लिपट! दुई चिनगारी का मानि मोशात । उसके घहरे के दूसरे चिों का मा यही हालया। भाग गदखे पाना की दो बड़ी-बड़ा बूदें थी, जिसपर उनकी विदरनी पल के मुकी या बाल काल थे, मगर उनकी स्थाहा नहुये कान का माप्ति थी, जिसमें भूसमापन भी होता है। वरीय स देखने स ससको नाक का सदा नशा मालूम हो सकता था, लेकिन दूर से देखने पर वह यिनन चिपटा सी मासूम होता थी। क्योंकि जैसा मैं इसस पहिले कह धुश हूँ उसके चेहर के चिद बहुत अस्पष्ट थे। उसका पद साधारण लोगों जमा था। यामी म छोटा, न पड़ा । भन्नता सय घर एक प्रास दम से, पानी अपनी कमर को हटा को दीक्षा छोड़ कर, सड़ा बॉम " वह जोश, जो बातें करते समय उममें पैदा हो गया था, एक दम ठडा पड़ गया, और उसने धीरे स्वर में कहा- 'अापका कहना निरकुल ठीक है, मगर क्या पता है कि श्रापमे फिर कभा में हो?" इस पर मैंने कहा -'इस सदेव नहीं, बम्बई यहुत यदा शहर है, लेकिन हमारी एक नहीं, बहुत सी में हो सकता है। मैं एक बेकार श्रादमी हूँ, यानी कहानी लेयक शाम को नित्य इसी समय, रशस कि मै रिमार न हो जाऊँ, आप मुझे सदा इसी जगह पर पायेंगे। यहाँ असख्य लकियाँ घूमने श्राती है और मैं इसलिये भाता हूँ कि अपने श्राप को किसी के प्रेम जाल में सा स.। प्रेम कोई बुरी चीज़ नहीं ह "प्रेम प्रेम ।" उसने इसके धागे कुछ कहना चाहा, मगर न कह सका और जलती हुई रस्सा की तरह शातिरी बल खा कर चुर हो गया। मैने हवा में समस प्रेम की चर्चा को था । वास्तव में उस समय वायु मण्डल इसमा मनोहर था कि अगर मैं किसी युवती पर भामम हो जाता, ता मुझे अक्रमोस न होता । अब दाना वक्त आपस में मिल रहे हो, धुंधले अधकार में बिजली के लहुओं को पक्तियाँ बाँखें झपकाना शुरू कर दें, हवा में नमी पैदा हो जाय और वातावरण का यमय हो जाय, तो किसी अजनयी स्त्रो के पास होने की जरूरत महसूस हुआ करता ही है। नुदा जाने, उसने किस कहानी के विषय मुझस पूछा था। मुझे अपनी सय कहानियाँ याद नहीं और खास तौर से वे तो बिल्कुल याद नहीं, जो रोमांगिटक हैं। मैं अपने जीवन में बहुत कम स्त्रियों से मिला हूँ। ये कहानियाँ, जो मैंने खियों के विषय में जिम्बा है, या तो किमी आवश्यकतावश लिखी गई है, या सिर्फ दिमागी प्याशी के लिये । कि मेरी ऐसी कहानियों में वास्तविकता नहीं है इसलिये मैंने कमी उनके दार में गौर नहीं किया। एक विशय यग की नियों मेरा नजर मे गुजरी हैं भार उनके सम्बन्ध में मैंने च कहानियाँ लिखी है, मगर ये रोमायिक नहीं है । उसने कहानी का जिक्र किया था, यह अवश्य हो कोई घटिया दाज़ का कहानी थी, तो मैंने अपनी चद भारनामों की प्यास बुझाने के लिये लिखी होगी, लेकिन मैंोता अपनी कहानी शुरू कर दी है। हो, सो सय वह 'प्रेम' का कर चुप हो गया, तो मेरे मन में इरमा उत्पन्न हुई कि प्रेम के विषय में कुछ और कहूँ, अत मैने कहना शुरू किया-प्रेम को यों तो बहुत सी जिस्में, जो हमारे बाप दादा क्यान कर गये हैं, हैं, मगर ।

उदय मस्त है। उसके मूड में इतना सचाई था, यानी उसने इतनी सचाई के माय भूड कहा था कि उसके अनुभव का तराज जरा मो मा महिला था। इस विस्म का छोड़िये । प्रेमा पारीकियों यगर में धाप को मनाने बर्गे, सो पाने के पाने काल पद जायेंगे। और कहानी बहन नारस रह जायेगा। थोमा हायातचीत के बाद मैंने उसको राह पर क्षगा लिया और क और मिगरट पेश करके मैंने समुद्र के निता एप की यात दी। चूंकि मैं कहानी छपक हूँ इसलिय मेन इस दिवस हा से उसे समुद्र तो बन्दर धोर पहा थाने जाने वाले दशकों के बारे में पदयातें सुनाई मगरट पाने पर भी उसके गले में राह पैदा न हुइ। उमन मरा नाम पूछा । पर मैंने मनाया, तो वह उह सड़ा हुआ और कहने लगा- "द्याप मार हैं। भापकी कई कहानियों में पढ़ चुका है। मुझे मालूम न था कि भार हा है। मुम् धाप से मिल कर यहा सुशी हुई हैपसमुच बड़ा खुशी हुई है। मैंने उसको धन्यवाद ना चाहा मगर उसने अपना बात शुरू कर दी 'हा पूर्व याद आया, मा हाल दा में पापकी एक कहानी मैंने पढ़ी है शोक भूल गया हूँ उसमें धापने एक बदका पश की है जो किसा पुरुष से प्रेम करता था। मगर वह पुरुष उस घाखा दे गया। उसा लड़की से एक और पुरुप प्रेम करता था ये कहाना सुनाता है । जप उमको बहका का विपत्ति का पता चलता है, तो वह उससे मिलता है और उससे कहता है- 'नि दा रहा उन ६ घड़ियों का पाद में अपने ज्ञापन का नीव खक्षा करो जो तुमने उसके प्रेम में बिताई है। उस सुख का स्मृति में जियो, जो तुमो चादसों के लिये प्राप्त किया था, मुझे यसला शरयाद नहीं रहे, क्षकिम मैं पता हूँ, क्या ऐसा सम्भव है। सम्भव को छोड़िये, आप यह तो यताइये कि पद चादमा क्या याप तो नहीं थे। माफ कीजियेगा-मैं ऐसे सवाल पूछ रहा हूँ जो मुझे नहीं पूछने चाहिये, मगर क्या पाप हा ने उसस कोटे पर भेट का था और उसकी या हुई जवानी को पता हुइ खाँदनी में खोद कर नाच अपने कमरे में सोने के लिय चजे श्राये य?' यह कहते हुए वह एकदम ठहर गया। मगर मुझे ऐमा यातें नहीं पूना चाहिये-अपने मन का हाल कान बताता है।' इस पर मैंने कहा--"मैं शापको बताऊँगा लेकिन पहिली भे में सम कुछ पूछ लेना चोर सब कुछ यता देना अच्छानहीं लगता। श्राप का क्या रयाल है।"

मुझे अपनी बात बडो अच्छी बग रही थी और मैं चाहता था कि कोई मेरी यातें सुनता चला जाय । श्रतएव मैंन फिर से कहना शुरू किया-"सो मैं यह कह रहा था कि पुत्र प्रादमो भी प्रेम के मामले में बोझ होते हैं, यानी डाके मन में प्रेम करने की इच्छा तो मौजूद होती है, लेकिन उनकी यह इच्छा कभी पूर्ण नहीं होगी। मैं समझना हूँ कि इस याँझपन का कारण मान सिक दोप है। आपका क्या विचार है" उसका रगौर भी पीला पड़ गया, जैसे उसने प्रेत देखा हो। यह परि- बत्तन उसके अन्दर इतनी जल्दा हुमा कि मैंने घरा कर उससे पूछा--"कुराल सोहे, श्राप यामार है?" "नहीं तो, नहीं तो " उमकी परेशानी और भी अधिक हो गइ । "मुझे कोई बीमारी बीमारी नहीं है, लेकिन आपने यह कैसे समझ लिया कि मैं पामार हूँ।" मैंने जवाब दिया--"इस वक्त श्रापको जो कोई भी देखेगा, यही रहेगा कि आप बहुत भीमार है । अापका रङ्ग भयानक रूप से पाला पड़ रहा है। मेरा विचार है कि श्रापको घर चला जाना चाहिये । भाइये, मैं आपको छोड़ "नही में अपने आप चला जाऊँगा, मगर मैं बीमार नहीं हूँ। कमा कमी मेरे हृदय में मामूली सा दर्द पैदा हो जाया करता है, शायद यह वही हो मैं भी ठीक हो जाऊँगा । श्राप अपनी यात जारी रबिये" मैं घोड़ी देर चुप रहा । यह इस परिस्थिति में नहीं था कि मेरी बात ध्यानपूर्वक सुन सकता । लेकिन जब उसने थामह किया, तो मैंने कहना शुरू किया--"में ग्राप से पूछ रहा था कि उन लोगों के विषय में श्रापका क्या विचार है, जो प्रेम करने के मामले में चाम होते हैं। मैं ऐसे यादमियों के भाव और उनकी श्रातरिक मन स्थिति का अनुमान नहीं कर सकता। मगरे जय इस बाम स्त्री की कल्पना करता हूँ जो केवल एक थेग या ये 1 के लिये कामना करती है, मगवान् के सामने गिड़गिड़ाती है, जब उसे यहाँ से कुछ नहीं मिलता, तो टोटुका में वह अपना मनोरथ ढूँढ़ती है, श्मशानों से राख लाती है, कई कई रात जाग कर साधुओं के बताये हुये मन्त्र जपती है, मनौतियों मानता है, चढ़ावे चढ़ाती है तो मैं सोचता हूँ कि उस मनुष्य की भी यहा दशा होती होगी, जो प्रेम के मामले में दाम हो, ऐसे लोग सचमुच सहानुभूति के ।

३ ६ मैं समझता है कि प्रेम चाहे मुला7 में पेश हा या मायरिया के को मैदान में, जादों में पदादा या गर्मियों में, प्रमार शिख में पैदा हो या गराय के दिवा में, प्रेम रवान करे या बुरूप वचन करे पापान, प्रेम प्रेम हारहा है, इसमें कोई मातर मही पदमा । मिस पर पैदा होने की बात सदा से एक जैसा पी रहा है, FARPE प्रेम का कम भा १ हा रहता है। यह दूसरा यात ६ कि सईदा गम माताल में यथा और राजकुमारी जगत में। गुलाम मुहम्मद क य में भगिन प्रेम अरा कर दे और नाक कुमार के पदय में एक राशिद कोई यचे समय से पहिले पैदा होते है और कमजोर रहा है उसी तरह पद प्रेम भा दुधन रहता है, जो समय से पहिले जन्म ले। कमी उमा याच यदा तकनीक से पैदा होते है कभी कभा प्रेम भी पड़ा कष्ट देकर पक्ष हाता जिस तरह नियों का गम गिर जाता है, उसी तरह प्रेम मा गिर जाता है। मोका बामपन भी हो जाता है। इधर भा पापणे पई ऐसे ग्रा-मा दिम्बाई देंगे, सो प्रेम करने के मामले में योग हैं, इसका यह मतलब नहीं कि प्रेम करने की इशा ही उनके हृदय से सदा के लिय मिट जाता है या उनके मन में वह भाय हा नहीं रहता । महीं, यह इरमा का मन में मौजूद होता है, मगर वह इस योग्य ही नहीं रहते कि प्रेम कर सकें। जिस तरह खा अपने शारीरिक दोष के कारण बच्चा पैदा करने के योग्य नहीं रहती, उसी प्रकार ये लोग चार मानसिक दोषों के कारण किसी के हृदय में प्रेम पैदा करने की शक्ति नहीं रखते । प्रेम का गभ पात मा हो सकता है।" मुझे अपनी बातचीत दिलचस्प मालूम हो रही थी या में उसका घोर बिना देखे लेक्चर दिये चला ला रहा था। मगर अब मैं उसकी ओर देवा, तो मुझे जान पड़ा कि यह दूर सागर के उस पार भितिज को देख रहा है और अपने विचारी में सोया हुया है। मैं चुप हा गया, लेकिन मेरे मौन ने उसको मेरी भोर सावित न किया। जय जोर स किसी मोटर का हान बजा, तोप- धोका चौर भावहीन होकर कहने लगा- शापने बिलकुल सीक कहा है। मर मन में पाया कि मैं ससस पहूँ मन क्या टाक कहा है ?-इसको सोहिये, थाप यह बताइये कि मैंने कहा क्या है ?" लेकिाम चुप रहा और उसको श्रवसर दिया कि वह अपने प्रोमित विचार दिमाग से भर दे। वह कुछ दर सोचता रहा, इसके बाद उसने फिर कहा-यापने बिलकुल सीक कहा है, लकिन, और, छोड़ियं इस हिस्से को।" - याँम ११ दिखाई दिया । मुझे उसका नाम मालूम नहीं था, इसलिये में उसे पुकार न सका। लेकिन जब उसने मुझे देख लिया, तो उसकी निगाहे स्थिर हो गई, मानो उसे यह चीज मिल गई है, जिसको वह सोज रहा था। कोई पेंच प्राली नहीं थी, इसलिये मैंने उससे कहा-"श्राप से बहुत दिनों के बाद में हुई। चलिये, सामने रेस्तरां में बैठे। यहाँ कोई बैंच खाला नहीं है।" उसने शिष्णचार की दो चार बातें की और मेरे साथ हो लिया। बाद गा चलने के बाद हम दोना रेस्तरां की चेत की यड़ी बड़ी कुर्सियों पर बैठ गये। चाय का पाईर देकर मैने उसकी ओर सिगरेग का टिन बढ़ा दिया । सयोग की बात है कि मैंने उसी दिन दस रुपये दे कर डाक्टर भरोलकर से मशविरा लिया था और उसने मुझसे कहा था कि अवल ता तुम मिगरेट पीना ही छोड़ दो और अगर तुम सा नहीं कर सकते, तो घरछे सिगरेट पिया करो । उदाहरणार्थ पाच सौ पचपन, अतएव मैंने डाक्टर के कहने के अनुसार यह टिन उसी दिन शाम को खरादा था। उसने डिब्ध की घोर ध्यान से देखा, फिर मेरी भोर ष्टि उनाई । कुछ कहना चाहा, मगर चुप रहा। मैं हँस पड़ा.---"आप यह न सममियेगा कि मैंने श्राप के कहने पर यह सिगरेट पाना शुरू किया है । सयोग की बात है कि आज मुझे भी डाक्टर रोलकर के पास जाना पहा । कुछ दिनों से मेरे सीने में दर्द हो रहा है, उसने कहा कि यह सिगरेट पिया करो, लेकिन बहुत कम मैंने यह कहते हुये उसकी ओर देखा और न्याल किया कि उसको मेरी ये चाते अप्रिय लगा है। श्रत मैंने तुरन्त अपनी जेब से वह नुस्खा निकाला, जो ढाकर प्रोलकर ने मुझे लिख कर दिया था। यह कागज़ मैने उसके सामने मेज पर रख दिया-“यह इवारत मुझसे पढ़ी तो नहीं जाती, मगर ऐसा मालूम होता है कि डाक्टर साहब ने विरामिन का सारा प्रानदान इस काग़ज़ पर जमा कर दिया है।" उस कागज़ को, जिस पर उभरे हुए अक्षरों में डाकर रोजकर का नाम और पता छपा था, और तारीख़ भी लिखी हुई थी उसने चोर निगाहों से देखा और वह व्याकुलता जो उसके चहरे पर पैदा हो गई थी, तुरत' दूर हो गई । श्रतएव उसने मुस्करा कर कहा-"क्या कारण है कि अक्सर जिसने धालों के अंदर विटामिन सरम हो जाते हैं ?" श्रत "" पाय है। मुझे अधों पर इतमी दया नही मानी, शितमी हा झोगों पर भाती है। चमकी बातों में नाम था गये और यह धूक निगर समा र मा और दूसरा तर मुंह करके कहने लगा- मोद बडून देर हो गई। मुझे जरी काम स जाना था । यहाँ माता में किस समय गया मैं भी उठ ममा हुमा । यह पक्ष और सदा से मेरा दाप दया , किन यिना मेरी योर देगे, उसने 'भरमा विदा हा चौर पर दिया। IA x दूसरा पार पिर हमारी में अपोलो पन पर में घूमने ar मही है। मगर 21 दिनों नित्य सध्या समय को यादर पर जाना मेरा निग्य कम हो गया था। एक महीने का जब मुझबारे के एक कवि ने एक या चौदा पन लिमा जिममें उस पाये और यह मा होने पाया परियों का शिफ किया और मुझ हस से बात भाग्यवान कहा कि मैं यम्मई में है, राप्रपाका बन्दर में मेरी दिलचसी सदा कलिय मर गई । अब जब कभा कोई मुझे पानो दर जाने को कहता है, सागरे के यि का पन याद था जाता है और मेरा जी गतवाने जगता किन में उस समय की या कह रहा है यह पन मुझम मिजा था। श्रीर में नित्य शाम को अपोखा मदर जा कर उस बेंच पर बैग करता था, जिसके दूसरी ओर कई भादमो धम्पी पाला से अपना बोदिया की मरम्मत कराते रहर थे। दिन पूरी तरह दल चुका था और उजियाले का कोई विल भी बाकी न रहा था। लेकिन अक्टूबर का गर्मी में कमी न हुई थी। हवा चल रही थी लेकिन पके हुये मुसारि की तरह से करम पाली का मोह अधिक थी। मेरे पीछे मोर मोटो बड़ी धी । दमा सब-सब भरे थे। मैं जहा। था, यहाँ दोपवादा-एक गुजराती और एक पारमा न बाने कप के जम हुये थे। दोनों गुजराती बोलते थे, मगर विभिन ग स । पारसा का भावार में दोस्त्रर थे। कमी वह वारीक स्वर में शत करता था और कभी मटे स्वर में। दोगा सेकासे योजना शुरू कर देते सो ऐसा लगता, मानो तोता मैना की क्षमाई हो रही है। में उनकी कमी समाश न होने वाली बातों से तग श्रीकर उठा और टहलने के लिये ताजमहल ६ को रुम छियादा था कि सामने से मुझे यह माता - T याँम "सहानुभूति !" उसका घाँखों में प्रास् मा भाये-"मुझे किसा का महानुभूति की प्रापश्यकता नहीं इसलिये कि सहाभूति उसे घापम पहीला सकता-उस स्त्री को मौत की गहराइयों से निकाल कर मेरे हवाले नहीं कर सकसी, जिसमे मुझे प्रेम था। अापने प्रेम नहीं किया-मुझे विश्वास है कि श्रापने मेम हो किया । इसलिये कि उसको असफलता आपके हृदय पर कोई दा नहीं पाया मेरी तरफ देखिये।" यह कह कर उसने सुद अपने थापको देवा-"काइ जगह ऐसा न मिलेगी जहाँ मेरे प्रेम के निद मौजुद न हो । मेरा अस्तित्व स्वय उस प्रम को टूटा हुई इमारत का मलवा है। आपको यह दास्तान से सुनाऊँ ? और पिर क्यों मुनाऊँ ? क्याकि भाप उसको समझ ही नहीं सकेंगे। किमीसे यह कह देना कि मेरी मा मर गइ है पापक दिक्ष पर यह असर पैदा नहा कर सकता, जो मा की मृत्यु ने बेटे पर किया हो। मेरी प्रेम कहानी भापका- किसीको भी विकाकुल साधारण मालूम होगी, मगर मुम पर जो प्रमार उसने बाला है, उसे कोइ भी अनुमय नहीं कर सकता। इसलिये कि प्रेम में किया है और मय छ सिर मुमा पर पाता है।" यह कह कर यह सुप हो गया। उसके गले में कडू पाहट पैदा हो गई थी, पयांकि यह मार बार यूक निगलो का घेत कर रहा था। "क्या यह आपको धोखा दे गई ?" मैंने उससे पूछा-"या और कुछ परिस्थिति थी?" "धोया यह धोया दे ही नहीं सकता थी। ईश्वर के लिये धोखा 7 कहिय । पह खो नहीं, देवी थी। मगर पुरा हो इस मृत्यु का, यह हमें प्रसा मदेख सका और उसे सदा के लिये अपने परों में समेटकर ले गई पाह! धापने मेरे हृदय के धाप को हरा कर दिया है ! सुनिये सुनिये, मैं पापको इस पण कहानी का कुछ हिस्सा सुराता है-- "ग्रह पदे और धमोर पाने की लड़की थी। जिस समाने में उसकी और मेरी पहिली भेंट हुई मैं पोबार-वादा को सारी जायदाद राग रंग में परयार कर चुका था। मेरे पास एक कौपी भी नहीं था । अपा देश बाड़ कर लथा घना पाया। चूंकि मेरे पास अपनी माटर रहा करता थी, इसलिये सिमोर चलाने का काम जानता था। अतएय मैंने इसी को अपना पेशा का निश्चय किया । पहिली नौकरी मुझे एक हिरी माहप के यहाँ है। उनकी यह एकलौती लबडी थी "यह कहते कहते यह अपने विचारों ५ पपरत ॥ काकर परदा हो गया और मेरे कमरे में सपोशिश करने लगा। क्योंकि इस पाटी साग में मिया मा चौर चारपाई पर पय कुमपा पा रहा ये जियाही पामर के रमे मनापार का प्रयाबारी में उसनदास और उसमें और मसिना मेश है মা বা শয় বা খা খা । पी।समीना बड़ा भी, मगर इन धातासरह इनमें शती ala पियो-बी वाला भी TAR भो या मदते हुये क प RA RE और पुगिपा और कहा- न्यु पिनसमझ में मकाने याजा पास है। शासतौर पर यह समय TA कि यह गाना में प्राय #Rममता krar In US और शक्ति माजोपराप्योलमा किया का समग्र महा मुखमा पारखी मगर पोषिपेसTRan मैन शप कहा- नहीं मही, भाप मनाने जाधे । लेकिन I tar उचित सम सामपि सा में यह समझ रहा था कि भारत कभी प्रम कियादान होगा।' "यह मापस समम लिया कि मैंने कमाल किया हो महीधीर समाप्रमा तो पाप कर रहये कि मेरा आवन एमा कानाul पूर्ण होगा। यह फहसे हुय उमन मेरी चोर मान सूब रह से दगा। 'मने अगर प्रेम किया नहीं, का दुख मेरे हग्य में हो मा हो गया। मैंने अगर प्रेम ही छिया, तो मरे जावन में यह रोग कहाँ से सिमर गया। मैं उदाप क्यों रहता हूँ मुझे चग्ने अापका दारा नहीम दिन ब दिन माम की भाति विपक्ष श्यों रहा हूँ ?" मकट में यह सब प्रश्न पर मुझमे का रहा था, मगर यास्तव में यह सब कुन अपने थाप ही से पूल रहा था। मैंने कहा- मैं मूर धोला था कि आपके जीवन में ऐसी कई घटना होगी। मगर आप भी तो झूठ बोचे थे कि मैं उदाम नही हूँ और मुझ कोई रोग नहीं है। विमा के दिल का हाल जानना मामान सा ही है। पाकी उदासा क और बहुत से कारण हो सकते हैं, मगर जब मुझे थाप पुरन बनाये में किसानताजे पर कैसे पहुँच सकता है। इसमें कोई स नहीं कि आप सचमुच दिन-ब दिन कमजोर होते जा रहे हैं। भापको अवश्य हा बड़ा दुख पहुँचा है और और मुझे मापसे सहानुभूति है।

"सहानुभूति !" उसका प्रतिों में आँसू मा आये-"मुझे किसी की सहानुभूति का आवश्यकता नहीं--इसलिये कि सहानुभूति उसे वापस नहीं ना सकता-उमग्री को मौत की गहराइयों से निकाल कर मरे हवाले नहीं कर सती, जिससे मुझे प्रेम था। पारने प्रेम नहीं किया-मुझे विश्वास है कि आपने प्रेम नहीं किया । इसलिये कि उसको असफलता ने थापफ हदय पर कोई दाग नहीं छोड़ा मेरी तरफ देखिये।" यह कह कर उसने खुद प्रश्ने थापको देखा-"कोई नगद ऐमी 7 मिलेगी जहा मेरे प्रेम के सिद्ध मौजूद न हों। मरा अस्तिश्व स्वय उस प्रेम को टूटा हुई इमारत का मलया है। मैं आपको यह दाम्तान कैसे सुनाऊँ ? थोर पिर क्या सुनाऊ? क्योंकि यार उसको समझ ही नहीं सकेंगे। किसीस यह कह देना कि मेरी माँ मर गई है आपके दिल पर यह असर पैदा नहीं कर सकता, जो माका मृत्यु ने येटे पर किया हो। मेरा प्रेम कहानी भापको- किसीको भी बिन्दकुन साधारण मालूम होगा, मगर मुझ पर जो प्रभाव उसने डाला है, उसे कोई भी अनुभव नहीं कर सकता । इमलिये कि प्रेम मेो किया है और सब कुछ सिफ मुमा पर पाता है।" यह कह कर यह चुप हो गया। उसके गले में कद वाहट पैदा हो गई थी, क्योंकि वह बार बार थूक निगलने की चेष्टा कर रहा था। "क्या वह आपको धोखा दे गई ?" मैंने उससे पूछा- परिस्थिति थी ?" "धोगा यह धोखा दे ही नहीं सकती थी। ईश्वर के लिये धोखा न कहिये । यह वा नहीं, देवी थी। मगर युरा हो इस मृत्यु का, वह हमें प्रसा न देख सकी और उसे सदा के लिये अपने परों में समेट कर ले गई पाह आपने मेरे हृदय के घाव को हरा कर दिया है ! सुनिये सुनिये, मैं आपको इस करुण कहानी का कुछ हिस्सा सुनाता हूँ- MEE Dक बड़े और अमीर घराने को लड़का थी। जिस जमाने में उसका और मेरी पहिली भेंट हुई मैं अपने पाप-दादा को सारी जायदाद राग रग में बरगद कर चुका था। मेरे पास एक कौड़ी भी नहीं थी । अपना देश छोड़ कर में लखनऊ चला पाया । चूंकि मेरे पास अपनी मोटर रहा करती थी, इसलिये मैं मोटर चलाने का काम जानता था । अतएव मैंने इसा को अपना पेशा बनाने का निश्चय किया । पहिली नौकरी मुझे एक ढिरी साहब के यहाँ मिली। उनकी यह एकलौती लड़की थी यह कहते कहते वह अपने विचारों "या और कुछ - सय घरत में सो गया और एकाएक चुप हो गया । मैं मां चुप रहा। थोड़ी देर के बाद वह चौंका और कहने लगा--"मैं क्या कह रहा था?" "शाप हिरा साहब के यहाँ मौकर हो गया।" "पदही गिरी साहय क पनौता लकी यानित्य पनि मरे नौ जुहरा को मोटर मैं सूत जाया करता था। यह पर्ग करता थी। मगर मोर ड्राइवर से कोई कर तक घच सकता है ! मो उसे टमरे दिन देख सिया। वह मिफ मुर हो नहीं था कि उसमें एक विशपता भा था यह गम्भीर प्रकृित का लड़की था। उसका माग माग ने जमके पहरे पर एक तास सज पैदा कर दिया था। यह वह मैं क्या कहूँ यह क्या थी? मेरे पास शनहीं कि मैं उसके रूप और प्रक्ति का वर्णन कर सई बहुत देर तक वह अपना जहरा के गुणों का बखान करता रहा । इस बीच में उसने कई बार उसका मित्र बोचने का बहुत चष्ण का, मगर वह असफल गा। पेमा जान पड़ता था कि उसके मस्ति में प्रात्रश्यकता से अधिक विचार जमा हो गये है। कमी कभा यान करने करसे उसका घरा रामतमा उठता, किन रि उदासाला जाती धौर श्राहों में बातें करना शुरु कर देना। वह कहा। बहुत धीरे धीर सुना रहा था, "से गुद भी भाग ले रहा हो। एक टुकड़ा जोड़ कर उसने अपना सारा कहाना पूरी का हिसासराश यथा जुहरा से उसे अत्यधिक प्रेम हो गया। कुछ दिन सा मौका पाकर उसके दर्शन करने चार तरह तरह के ममूने योधने में बीत गये मगर जय गम्भीरता पूरक उसने इस मेम पर विचार किया, तो अपने को जुहरा से बहुत दूर पाया। एक मार ड्राइवर अपन स्यामा का लड़का से कैसे प्रेम कर सकता था आत नव इस क्टु सत्य का अनुभव उसके मन में पैदा हुमा, तो यह दुपा रहने सगा। लेकिन एक दिन बड़े साहम से काम लिया । राज के एक पुते पर उसने जुहरा को चन्द पक्तियों लिखों यह पनियों मुझे याद हैं- "जुहरा । मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि मैं तुम्हारा नौकर हूँ, तुम्हारे पिता मुमताप म्पया मासिक देत है मगर मैं तुम से प्रेम करता हूँ। मैं क्या करूं, क्या न करूँ, मेरी समझ में नहीं पाता ये दियो कागज पर लिख कर उसने उस कागज को उसकी एक किता रख दिया। दूसरे दिन जब यह उसे मोटर में ले गया, तो उसके हाथ कर रहे थे। दिल कई बार उसका पकड़ से बाहर हो गया। मार परमात्मा ने कुशल की - ।

४५ ने और कोई घटना न हुई । उस दिन उसकी विचिन्न हालत रही। शाम को वह जुहा को स्कूल से वापस ना रहा था, तो रास्ते में उस लड़की ने उसे मोर रोकने के लिये कहा । उसने जर मोटर रोक लो, तो जुहरा ने बड़ी गम्भीरता के साथ उससे कहा-'देखो, नईम ! भविष्य में तुम ऐसी हरकत कभी न कर मने अभी तक अब्बा जान से तुम्हारे उस पत्र का ज़िक नहीं किया, जो मेरी किताब में रस दिया था। लेकिन अगर तुम ने ऐपो हरकत फिर की, तो मुझे शिकायत करने के लिये विवश हो जाना पड़ेगा । समझे, चलो, अब मोटर चलाधी" इस वालाप ये याद उसने बहुत कोशिश की कि डिप्टी साहय की नौकरी छोड़ दे और जुहरा के प्रेम को अपने हृदय से हमेशा के लिये मिटा दे। मगर यह सफल न हो सका। एक महीना इस कशमकश में बीत गया। एक दिन फिर उसने हिम्मत से काम लेकर पत्र लिखा और उसको एक पुस्तक में रख कर अपने भाग्य के निर्णय को प्रताधा करने लगा। उसे विश्वास था कि दूसरे दिन सुबह उसे नौकरी से जवाब दे दिया जायगा । मगर ऐसान हुआ | शाम को स्कूल से लौटते हुये शुहरा ने उसमे बात की और कहा--यगर तुम्हें अपनी इजत का ग्याल नहीं, तो कम से कम मेरी इज्जत का तो कुछ खयालो चाहिये। यह उसने एक बार फिर कुछ इस गम्मारता के साथ कहा कि उसकी समस्त श्राशा न हो गई और उसने निश्चय कर लिया कि वह नौकरी छाप दंगा और हमेशा के लिये लपा छोड़ कर चला जायगा । महाले के थात में नौकरी छोड़ो से पहिले उसने अपना कोठरी में, लालटेन के मद्धिम प्रकाश में जहरा को अन्तिम पत्र लिखा। इसमें उसने अत्यन्त करुण घर में लिखा--- 'जुहरा मैंने बहुत कोशिश की कि तुम्हारे कइन के थनुमार चल स., मगर सदय पर मेरा अधिकार नहीं है । यह मेरा अन्तिम पय है, कल शाम को मैं लखनऊ छोड़ दूंगा । इसलिये तुम्ह अपने पिता से कुछ पहने की जरूरत नहा । तुम्हारा मौन मेरे भाग्य का निर्णय कर देगा। मगर यह जयाज रसना कि तुम से दूर रह कर में तुम से प्रेम नहीं करूंगा। म जहाँ कहीं भा रहूँगा, मेरा दिल सुम्हार चरणों में होगा। मैं सदा 7 दिनों को याद करता रहूँगा, जय में मोर को केवज्ञ इसलिये धारे धारे पलाता था कि तुम्ह धाका न लगे।भ इसके अतिरिक्त और तुम्हारे लिये कर ही क्या सकता था यह पत्र मा उसने मौका पाकर उसकी रिताब में रख दिया । सुबह को शुहरा ने कल जाते हुये उससे कोई बात न की, शाम को भी रास्ते में उसने , बुधन बहामन याविन निराश होकर भरतों कोओ में पापा जापोरा-बहन म उसके पास था, पर अपने एक जरिया धोर लाटन भी रोमा में चारपाई पर धेरर मोगा जगा कि गुरा उमर 1 में कितमा मन्तर! बद सरयधिक दुती मा । यर भरनी स्थिति समय र परिचित था। उस दस धारा का अनुभराति कम्नि प्रेती नाम और REATE WEIR प्रेम करने का अधिकार नौ दिन हम पाभा पर कभी-कमा मानना था कि अगर 4: TAR HAIR, साइपमें का यादापौर किर उसका प्रेमधमाशा महो। युन में या किमाधी उसी का कारनामा किया गया। उसका प प म रह गया । लेकिन फिर उसने मोगा कि माला होगा। सार, उस पर में कोई फापक बीमार पड़ गया चार पर हमारे सहायता के लिये माया लेकिन अब उमन पाता मोसा तो अबरा सामने एका यी-माहा, शुभ दिसम्याकी सर्दी में पड विना शाके RR मान ली थी। उसकी जुबान गंगा हो गई । उसको समग ममी याता था क्या कहे। कुछ पण मग रामा निम्तम्धता में पास गये, भार सुहरा के घोट मुझे भीर मा यस्यराने हुये स्वर में कहा-'नई! में तुम्हार पाम भाई है। बताया अब तुम क्या चाहत हो । पकिन इस पहले कि मैं कमर में प्रवेश करूं मैं तुम से कुछ सवाउ पुएना थाना हूँ।' नईम चुप रहा । लेकिन शुदरा उससे सवाल पपने घगा- क्या तुम सचमुच मुझसे प्रेम करत हो? महम को मानो रेस मी बगी। उस घेरा तमतमा अग-अहरा तुम 'एमा सवाल पूछ रहा हो किसका जवाब अगर मैं हूँ तो मरे प्रेम का अपमान होगा। मैं तुम मे पूलता है, क्या मैं मम नहीं करता? शुहरा ने इस साल का नयाय म दिया और योदी देर तक चुप रह कर अपना दूसरा मत किया--मेरे यार के पास काफी धन है मगर मरे पास एक पूर्ण कौदा भी नहीं । जो कप मेरा कहा जाता है, यह मा TET, उनका है। क्या तुम मुझे बिना धन के भा वैसा ही प्रिय सममोगे" नईम बहुत भातुक अादमा था।थत इस सवाल ने भा उसके भावों को चोट पहुँचाइ । अत्यन्त दुवा स्वर में उसन सुहरा से कहा-'शुहरा खुदा के बिय मुझसे ऐसे सवाल न पूछो जिनके जवाम इतने साधारण हो चुके हैं कि .

पॉम १७ . तुम्हें थड-क्लास की प्रेम कहानियों और उपन्यासों में मिल सकते है जुहरा असको काठरी में दाखिल हो गई श्रीर उसको धारपाई पर धैर कर कहने लगी-'म तुम्हारी हूँ और सदा तुम्हारी रहूँगी।' जुहरा ने अपनी बात पूरी का । दोनों लखनऊ छोड कर देहलो चले प्राय और विवाह करके एक छोट से घर में रहने लगे। विष्य साहव दूदते दते उसके यहाँ पहुँच गये। नईम को करी मिल गई थी, इसलिये वह घर में नहीं था। हिणे माहम ने जुहरा को पहुत पुरा मशा कहा । उनको सारी शान मिट्टी में मिल गई थी। वे चाहते थे कि जुदरा नईम को छोड़ दे और' जो कुछ हो चुका है, उस भूा जाय । वह नईम का दो तीन हजार राया देने को भी तैयार थे। मगर उन्हें असपज लौरना पड़ा। इसलिये कि जुहरा गईम को किसी मूल्य पर भी छोड़ो के लिये तैयार 7 हुई । उसने अपने पिता से कहा-'अन्ना जान, मैं नईम के साथ बहुत खुश हूँ । श्राप उससे अच्छा शौहर मेरे लिये कभी न हूँढ सकते । मैं और वह आपसे कुछ नहीं मांगते । अगर थाप हमें आशीर्वाद द सकें, ता हम आपक कृतज्ञ हागे।' हिरी माहव मे जम यह यात सुना तो बड़े रुष्ट हुये । उन्होंने नइम को बैद करा देने की धमकी भी । मगर शुहरा ने साफ साफ कह दिया- 'न्या जान, इसमें नईम वा क्या कुपूर है ? सच तो यह है कि हम दोनों बेकसूर है। हो, हम दोनों एक-दूसर म प्रेम जरूर करते हैं। और यह मेरा शौहर है यह कोई कसूर नहीं । में नायालिरा नहीं हूँ।" डिप्टी सादर घुद्धिमान् थे। तुरन्त समझ गये कि जय उनका ये ही राजी है, तो नईम पर दोष कैसे लग सकता है ? अत घे शुहरा को हमेशा के लिये छोड़ कर पजे गये। लेकिन कुछ दिनों बाद डिप्टी साहब ने विभिन्न लोगों द्वारा नईम पर दबाव डालने और उसको रुपये पैसे को लालच देने का कोशिश की, मगर फिर भी श्रमपल रहे। दोनों का जीवन बई मजे में बीत रहा था। यद्यपि नईम की भामदनी बहुत कम थो और शुहरा को, जो लाइ प्यार में पली थो, शरीर पर खुरदरे कपड़े पहिनने पड़त थे, और थपने हाथ से सत्र काम करने पड़ते थे। मगर यह प्रसग था। वह अपने को एक नई दुनिया में पाता थी, नहाँ दम-कदम नईम के प्रेम के नये नये पहलू उस पर प्रकट होते थे। वह बहुत सुखी था- अस्यन्त सुवा । और नईम भी बहुत खुश था। लेकिन एक दिन भगवान ने कुछ ऐसा किया कि शुहरा के सीन में एक दर्द उठा और इसके पहिले कि नईम पर ८ श्याय पापटी उR जिय कुणकामा सरे, पर इस संसार से विदा हो गई। और गईम या समार सदा के लिये दुपमय भौर परमव कर गई। पहनी उसने कभीर स्यं मानेर प्राम में गुनाई। सब पर अपने दिल का हाल मा हा उमा थारा मा पाला पन के समयमा उटाणे सदर भार पाt किन राशि कर दिया न समाबो में थे और उस पर सूब गया था। काना यमाई सा ar ITTER मा और उसे भग है और तबगा-'मने बड़ा भूम की कि अपनी प्रेमकहा सुनादा मेन या मूलका हरा का पर्दा केरल गुम्मा REART रहना चाहिये या किन का उसका स्वर मा गया-"मैं पीवित है और यह पर शाग कुछ न कर सका और नदी में मरा हाय दश कर कमरे स पादर " चला गया। x x मइम मे फिर मेरी मुलायम दुइ । मैं अपोलोर पर कई बार उसका सलाश में गया मगर यह मामला ।प पा सात महीने के बाद का एक पय मुझे मिला। सिको में उन्न करता है-- श्रापको याद होगा मैंने मार के महान पर अपनी प्रेम कहानी आप को सुनाई था । वा केवल कहानी थी--एक मुठी कहानी- कोई मुहरा है और न कोई नईम, मधेप मागता हूँ। मगर यह नईम ही है कि मुहरा भ प्रम था । मापने पक्ष भार कहा था कि कुछ बाग मा हाने हैं, मा प्रेम के मामले मयाँमाते हैं। मैं भी उन प्रभागे पुग्पों में से एक है जिसका पूरा जधानी अपना मन प्रहलाने में बात गई । जुहा से नहा का प्रेम एक मन बहलाव या । और हरा का मयु में अभी तक नहीं समझ सका कि मैंने उसे क्यों मार दिया। बहुत सम्मय है कि इसम भी मेरे जापन को स्याहा का मुझे मालूम नहीं, आपने मेरो कहा मूल समझो या सभो । लेकिन मैं श्राप को एक विचित्र पात बताता हूँ कि मैंने याना इस भूठा कहाना के गदने वाले ने, यह बिल्कुल सधी समझो । सो प्रतिशत स य ! मुझे ऐषा अनुमय दुप्रा कि मैंने सबब जुहरा से प्रेम किया है भार वा वास्तव में मर चुका है। श्राप को यह सुन का और भी पाश्वयं हागा कि जैसे जैसे समय कता गया, इस कहानी के अदर वास्तविकता अधिक होती गई और जुहरा को आवाज, उसकी हमा भो मेरे कानों में गूगने लगी। मैं उसकी साँस की गर्मा तक महसूस करने लगा। कहानी का प्रत्येक कण जाविन हो गया और मैंने और मैने यो अपनी क्रम अपने हाथों से वादी जुहरा कहानो न महो, म म ना कहानो हूँ । वहमा चुकी है, इस लिये मुझे भी मर जाना चाहिये । यह पत्र भार को मेरा मयु हो जाने के बाद मिजेगा विदा जुहरा मुझे जरूर मिलेगा कहाँ। यह मुझे मालम नहीं। मैंने ये कुछ पक्तियों आप को सिफ इसलिये जिन दो हैं कि पाप कहानी लेखक है। अगर इससे पाप कहाना तयार कर लें, तो श्राप का सात माह रुपये मिल जायेंगे, क्योंकि एक भार भार ने कहा था कि एक कहानी का पुरस्कार थाप को सात से दस हाये तक मिल जाया करता है। यह मेरी भेंट होगी। अभया विदा! पाप का-नईम" x नईम ने अपने लिये जुदरा बनाई और मर गया-मैंने अपने लिप्रेम कहानी की रचना का है और मैं जीवित हूँ -~यह मेरा ज्यादती है। --श्री समादत इसन 'मण्टो- x और एक ढाई-सेर आटा पुरवाई चल रही थी। मौला को पाइ ने पकड़ रखा था और यह पाठ दस रोश से काम पर जाने के काबिल नहीं रहा था। दो तीन मज तक, जो दो चार पेसे अमा थे वे खच हुए, पिर उधार पर काम चलता रहा। दो चार दिन बाद धनिया मा हाले हवाले करने लगा। लाचार हो कर मौला पनि शय में जरा पाराम पा कर सुबह तड़के टोकरी ले कर मजदूरी करने पाजार गया । पह कई कारागरों के साथ काम कर चुका था उन्हीं में से एक थे, जिसका काम गा था, उसको अपन साथ लो जिया। दिन भर ईट ढोता रहा। शाम को साढ़े चार थाने पैसे मिले, जि ले कर यह घर चला। रास्ते में एक पाना बनिये के सुधार का दिया, एक भाना घर के किराये के लिये रस किया पैसा दूसरे दिन के चने के लिये बचा लिया। पाका नौ पैसों में से पक का भालू, एक का बाजरे का प्राटा, पाँच पैसे के बावज, एक पैसे की दाल थोर एक की लकड़ी के कर एक लमी सी गली में घुस गया, जो धागे जा कर इतनी सग हो गई थी कि वही श्रमास अंधेरा छा गया था। इस गली में पावर-बराबर कई काउरियो पनी हुई थी, जिनमें से दो एक से धुचो निकल रहा था, जो उठा हो कर गला में धुम रहा था और गली के अधार को चौर मदा रहा था। मौला की घरवाजी-मुखा, जिससे बाकायदा विवाह तो नहीं हुधा था, मगर पन्द्रह वप से दोनों के सम्बघ पति पक्षी हीचैम ये दो बद किया और उनसे छाटे दो बदके जाड़े के मारे पास पास बैठे मौला की प्रतीक्षा कर रह थे। माला को देवत दो सब मे प्रसन हो कर उप घेर लिया। वह थका हुश्मा बहुत था, पोटखो रख कर जमान पर बिछे हुए टाट पर बनते पोला--"सब लेता धाया हूँ।" गुना चूल्हे के पास गई जो उसी कोठरी में एक तरण या हुआ था। श्राग सुन्नगाई गई और दाल चावल पकने को बढ़ा दिये गये । खड़कियों और सा घूल्हे को घेर कर बैठ गये और दाल की 'खदर पदर' सुना लगे। उन प्टोगों के लिये इपसे सुदर कोई रागना हो ही नहीं सकती था। कोटा में सील पीर मैले कपड़ों का दुग ध पैली हुई थी। मय यहा धुर्या मी भोगा, मगर सब का ध्यान चूल्हे पर या बड़क भूख से परेशान थे।

-- ५० बाई सेर भाटा दाल चारज जादी से पक कर तैयार हो जाए, इसलिये ये बहुत-सी नदीचूल्ह में लगा देते थे। यह देख कर डाकी माँ होती-"दुष्टो, कल खाना कैसे पकेगा ?" बड़ी बहकी घूल्हे के पास बराबर शरीर खुजलाये जा रही थी और थोड़ी- थोदी दर याद लकड़ी की दोई से दाल और चावल निकाल कर चुटकी से मन कर देखती भी जाता थी। लड़क यह देख उसमे पड़ते--"कितनी दर है?" "अम जरा सी कमर है।" यही एक उत्तर श्राध घटे तक दोहराया जाता रहा। मौला एक पुरानी दरी प्रादे, जिसमें सैकड़ों छेद थे टाट पर चुपचाप पड़ा था। थोडो देर बाद वह भी बोला--"नींद मा सुसुरा नहीं पाती।" इतने में किसी के रोने और चीसने की प्राचान पाने लगी। कोई मजदूर था, साही पी कर पाया था और जो अपना स्त्री को मार पीट रहा था और श्री चिल्ला रही था । जब शोर अधिक हुआ तो मुन्ना बोली-“इन लोगों के यहाँ रोज यहा रहता है। बान कैसे कमाने ?" मौला जसे उसकी बात सुन कर चौक पड़ा और बोला- । धावन महीं पका घर तक मुनी ने देखा, चावल गल गये थे । अस्तु होको उतार ली गई। हादी ढक्कन से बन्द थी, मगर उबाल में हादी का कगारों पर कुछ धापन आ गये ये बाग का बन्यू ने उससे दो चावल पोंछ कर खा लिये, यह देख उससे छोग सदका मुनू तुरन्त पोज उठा 'हुँ । मैं भी। और यह कद उसने और अधिक धावल पा लिये । हम पर दानों में झगड़ा हा होने वाला था कि मुभी ने दोनों को पटा-'अभागा को जरा मन नहीं ! मैं कहमी हूँ थोड़ी देर के मुना की बात पूरी होने का प्रतीक्षा करते रहे चौर जर यह कुछ न थाली तो फिर धान की ओर प्राप्ति हुए । अब मा कोदाल पका का सही यचैनो से इनजार था। प्रारिनर एक लडका नाग-ent अब घर । मा नेपाल देखी तो यह थी गल गई यी । अब अधिक मनीश और करता, अमन दाल घोट कर नम शाला और हासी उतार फिर सामचानी की तान प्रटें, जिनकी चीनी बगेय चिकुला उड़ चुका दी, और पर मिट्टी की रफा मामने रखी । पहिब एक यही जेट में बादल निकाले और... उस पर ना के सामने रख दिया। मौला " उदय मस्त साने लगा। म सप पाये की बाँध कर मुन्नी के हाथों की TET देवर । उसने मिहीको रकामा में चाव दाब निकाल कर कानों बरक्रिया को दी और शिममी की दोगान्टी में पराबर-बरार पावन निकाज और उस पा दास डाल कर दानी बदकी को दिये। पवनेक पार पनी र देखो और रियटिमों की माला पोषा--"अम्मा की प्लेट में इतना और इमामी महाना" मुत्री मे रासी दाश और उसकी कार में शानदार मुन्न पह देश अपनी झेर उसके सामने का का पोसा-"अम्मा इमे मा। मा ने दोधार चाय उसकी प्लेट में मा साथ दिये और पानी वायत्री पो हाली में दाल डाल कर शुदवाने लगी। सभी पूम्हे में कुछ कायने पार्टी थे जिनका प्रकाश में इन लोगों के बारे और गमते हुये मुरविवाद पर रहे थे। सात पाते थे और प्लेट का तरफ दब कर दाना करते मासे थे कि अभी इतना और पाशा, इतना भोर मास में मुम्न अपनी जेर पोकर बाजा--"वसा पुके।" मौजा भी चाव समाप्त कर चुका पौर योगा--भावों में प्रदा ने यही परासदी, रा-सहा बिय और पेट भर गया पारसी सासर मर मार की हो, तो कुछ नहीं और दो सेर मारे का हो, तो कुछ नहीं।' चम्बू पाना पा कर पोला-"अम्मा, मुबह क्या पकेगा " मुन्नी 1-'मैं कहती हैं इन लोगों का मन कभा मही भाता, कभी नहीं भरता भी था चुका है और सभी से पूछ रहा है कि कन क्या पगा' मुनी मे पलग के गाचे स, जो कोठरी क ना का चौथाई हिरसा घरे हुए था, एक पानदान निकाला, प्रिसका पैदा घिस गया था और सा कुहिया पक दप्रती पारखी दुर थी। यह पानदान मुन्नी को माँ का था चार से पहुन प्रिय था। यह सोचा करती थी कि मैं किसी घर में उपर का काम धंधा काने पर मौत हो जाऊँगो, सो सय से पहिब को ठीक कराऊँगी। उसने एक पान के चार टुकदै यि एक खुद खाया, एक मौजा को दिया और दो दोनों लकियों को दिये । इसके बाद कोत्री के पांच में एक परदाग दिया गया, जिससे उसके दो भाग हो गये। एक ओर पलग हो गया और दूसा और घाट का फर्श पलग पर मुन्ना और मौजा लेट गये। और रा पर दोनों के खड़कियों का वेज हो गया था। मौला भौर मुनी ने वही दरी धोद श्री ढाई-सेर भाटा और लड़के लड़कियों में से भी किसी ने मोटी चादर और किसी ने टाट का टुकड़ा दोहरा कर प्रोड़ लिया और फिर घिड़ियों के परचा की तरह एक-दूसरे से लिपट कर लेट रह । कोठरी के दरवाजे से उडा हया था रही थी, इसलिये मौला ने उठ कर द्वार बन्द कर दिया । इवा धानी बन्द हो गई और कोठरी में उमस के कारण गरमी हो गई। थोड़ी देर की निस्त भता के बाद मुन्नी योली-"धाज मुशी जी पाए थे और कह गये हैं कि नवार साहो हुरम दिया हेकि जिसपर किराया बाकी हो उसे निकाल दिया जाय।" मौला-"निकाल देंगे-निकाल देंगेहुँह ! जय सुनो यही। बाएँ, निकालें पाकर । हम जाड़ों में बच्चों को ले कर कहाँ जाएँ हुश्रा करें पद बड़े भादमी । हम तो नहीं निकलेंगे। कह दो जय किराया जमा हो जायगा, तो दे दो। ले कर भाग न जाएंगे । मर जाएँ तो बात दूसरी है, बड़े भाये कहीं के निकालने वाले!" इसके याद थोड़ी देर के लिये मौन छा गया। फिर मौला योला--"मुशी जी के यहाँ की नौकरी का पता चला ?" मुनो-"वह कहते है कि छोटी लड़की से काम नहीं चलेगा। ऐसी लड़की हो, जो झाडू पवार करे और दो घड़े पानी बहा सके।" यह कह कर मुन्नी जरा रुकी और फिर जरा आवाज लीची करके बोली- "मैं कहता हूँ मयानी एकी को कैपे भेज दें। इस निगोड़ो के दीदे भी तो हवाई है। पानी भरने जाती है, तो हे करती है।" मौला--"जायेगी हरामजादी नो अपने से जायेगी, एक चली गई, तो क्या कर लिया, बहका होती तो चार थाने रोज कमा के लाती।" मौला की बड़ी लहका माग गई थी और उसका साल भर से कहीं पता नहीं था। मुन्नी-करते क्या ? निगोड़ी था ही ऐसी । ऐसी न होती, तो मागती हो क्यों मप लड़के का अच्छे निकलते हैं ? किसने खा कर माँ बाप को खिलाया है। इधर कमाने लायक हुये उधर चल दिये । भूरे को देखो, ठेला चलाता है, दस पाने रोज पाता है और सब उड़ा देता है।" मुनीक उडी मास भर कर चुप हो गई और फिर निस्तब्धता छा गई, जिसे कमी-कभी इन लोगों की बांसी की श्रागा भग कर देती थी। अभी पाठ को बजे ये घऔर पाजार में चहल पहल थी, मगर यहाँ मोना या गया था। .

वश्यमय
घबद सय मोला को ना को रमने गुग्ना को जागने पाया।
पांच मिनट TT पर मेरा परि कराहमा हुमा उपची घोमा--
attaमार शाम निकला , पहा पहा हा गयाart
.
भुमा मेरठ का एक काम मादा का यान प्रौदलासा दिया
निकारकी मोसा एक दोदा मुलगा और पान | और यादी जा
AYUR पकन खाया उपन हाय से नही भर.। फिर पक्ष से
साभार खादा लेकर बाहर जागया। नमिर मार पी सेकामा
गुााया और कर बोजा-एक वादा भी मना न पर
चाया भोर धूर था कही पता नहीं।'
alan ने एक बाला और पाई और पि दारी उठा कर चोरी पोसा
हुमा बाहर पापा।
मौबा के जाने के दो पएट बाद मुशी ली और नीयों को कर
धाहर निकली धौर केरा मैं कुदा सगा पर जन स्वगो। पर पर सम्प
मारों का स्त्रिया धूप में थे बातें कर रहा था। पर भी जाकर में
मम्मिक्षित कागद बदके और योगी सरकी पोस पचा कर इधर-उधर
तीन चार घण्टे बाद मन भाया और मास कहने लगा--"प्रामा, भूख
लगी है।"
मुसो उस तरह धामों में ज्ञान रहा, म यह सुनने की बात ही नहीं थी।
घोसा देर क पार वायू पाया चौर 81 भी यहा राद दाहाये, लेकिन उसने
यय भी ध्यान नहीं दिया । उस समय बदकिसी पदे घराने ! स्त्रियों की
बदचलनी का चटरसाह के साथ घरमा कर रहा था। इस माह में यह
गव छिपा था कि यपि हम छोर पाति के लेकिन एपे नहीं हैं।
थोडी योहा दर माद एक बड़का था दोनों अपना अपमा सदा बगा दो। इस
प्रकार एक घग पीत गया । अय धारा मा कहीं से भाई और माँ के
पास बैठ कर चुपके से बोली- मम्मो चला।
मुनी-'मी सबेर है, जरा हो।"
दस मिनट और वीत । अब यमा का कथा पकड़ कर खदा हो गया

दूमर हो रही है।" खाई सेर आटा और रोती श्रावाज़ में रट लगा दी-"अौ साना दे, अम्मा खाना दे, अम्मा " मुली थोड़ी देर यह रे रे सुनती रही। फिर उसको डॉट दिया । बन्यू यह बोट सुन कर रोने लगा । अन्त में वह यहबढ़ाती हुई उठा-"मैं कहती है, या ये सय मर जाग या मुझा को मौत था जाए, जिन्दगी इनके कारण मुसरी ने कोठरी में ना कर भाग सुलगाई और पामरे के पाटे की पाँच टिकियों पकाई । दो छाग और तान पड़ा, उन पर जरा जरा सा गुद् रम्य कर छोटा टिकिया खदकों को दो और बड़ी एक पाप ली और दो दोनों लड़कियों को दी। इन लोगों का खाना तान चार ही मिनट में पत्म हो गया और फिर सब घूमो चले गए। शाम को जय मौला मजदूरी के पैसे लिये लौट रहा था, तो उसकी नज़र गली के कोने पर पदी। उसने देखा कि दा दाई र पाटा यों ही पड़ा हुआ है। उसने पाम जा कर घाटा चुटकी से उग कर देखा कि कहीं उसको पाखें धोखा तो नहीं पा रही है। चौर जब विश्वास हो गया, तो चकित स्वहा रह गया। मन कहता था उठा ले चनो, मगर एक तो यह डर था कि शायद कोई कुछ कहे और दूसरे यह झिमक कि उसके दूसरे मजदूर साथी भी पीछे ना रहे होंगे । यदि वे मुझे पाग उठाते देखेंगे, तो क्या कहेंगे। अाखिर आटा उठाने का साहस न हुआ धीर वह चल पड़ा। मगर हर कदम पर चाल धीमी होती जाता थी । अन्त में दम हा कदम पर जा का ऐया भौचका सा खड़ा हो गया, जैसे चौराहे पर पहुँच कर राह भूल गया हा । वह सोच रहा था कि कोई दूसरा मजदूर इस आटे को उठा लेगा, यह मुझको न मिलेगा और उसको मिल जायगा । क्रमश यह विधार इतना प्रबल होता गया कि मौजा काल्पनिक आटा उठाने वाले मजदूर को हद से ज्यादा ईर्ष्या से देखने लगा और यह सोचता हुआ आटे को ओर पलटा-उह! कोई हसेगा तो हंस लेगा, मान बय तो बाटा पा कर पूथ होंगे।' अर का मौला के प्रदम ऐपी फुर्ता से उठ रहे थे, जैस यह किसी दूबते हुए बच्चे को मदी से निकालने जा रहा हो । पाटे के पास पहुँच कर वह इतमीनान सधैठ गया, अपना अगोवा फैजाया और घाटा उठाने लगा। साथ माय पदवड़ाता भी जाता था-'न जाने कैसे लोग हैं। प्रनाल इस प्रकार मैक दिया है कि पेमा के गाचे अलग आए और नाली में अलग माय इससे तो अच्छा है कि मुसी ही खा ला" उदय प्रस्त जिस बात का भय था यही हुश्रा । पाँच छ मजदूरों की टोली पास से गुमरा, और चे सब यह विचित्र तमाशा देख कर खड़े हो गये। पक ने कहा-"क्या मिल गया दोस्त मोला" मौला--"कुछ नहीं, राय भाग है। मगर है तो आखिर नाम, मेरों तले पाएगा। मैंने कहा उठा मुर्गा बकरी बा लेंगा, सो स्वारथ ही जायगा।" दूसरा मजदूर बोला-"अरे, गली का पड़ी हुई ची! कहीं टोना-रोटका पहिला बोला-"उठा ले, मोबा, उठा! इसे पकने दे, काम हो या जायेगा।" मौला सिर मुकाए अपने कार्य में व्यस्त रहा। ये लोग पर खड़े हुए। कुछ ही दूर पहुँच कर एक मजदूर ने ठान बगाई- "सौ से बुरा तो एक से बदतर बना दिया! दूसरा उसकी तान के बाद ही में रोखा--"गरीय हैं सही, मगर हम गलीका गिरा पदासोनही उठाते।" ये मादूर वैसे तो दून की ले रहे थे, पर वास्तव में उनमें से प्रत्येक को मौला के भाग्य परयां हो रही थी कि उसे इतना घाटा यों ही पड़ा मिला गया। इस भाग का भी विचित्र किस्सा है। दस बजने के करीब थे, मगर अभी तक खाना तैयार नहीं हुआ था। शौकत मिया स्कूल जाने को तैयार हुए थे । मनको बुधा ने दो चार या जन्दा जल्दी उजवा दी और धार कबाब तब दिये और जल्दी से सम्त पर खाना परोस कर शौकत मियों को साने के लिये श्रावाज वा। शौकत मियाँ एक हाय में पुस्तके लिये और एक हाथ से शरवानी के बटन लगाते हुए पाने के कमरे में घुस गये थौर विना हाय धोये स्वाना शुरू कर दिया। मगर होने पहिला हा कीर मुंह में रखा था कि ऐसा मुंह विगाह जिया, जैस कुनैन खा गये हो । सरदी से वह कौर पानी के सहारे पट में पहुंचाया। और फिर रोटी का एक छोटा-सा टुकड़ा तोड़ कर मुंह में रखा, धाया और फिर मुंह बिगाड़ कर बोजे-'फीज्ञान ! अाठा खराब है।" "धारा प्रराब है। क्या' दाई-सेर भाटा "शायद अकरा गया है।" फूफी ने भी रोटी का ज़रा-मा टुकड़ा मुंह में रखा और फिर बोला- "तुम्हारी बातें कहा अकराया है | राटिया जरदा पकने में कुछ धुवा शौकत मियों ने कुछ जवाब नहीं दिया। जल्दी से कितारें घटा कर भागते हुए बाहर चले गये। बेगम साहया धूप में बैठी कुछ सो रही थी। पुत्र को इतना भएदी जाते देख कर बोली-"क्या बात है?" शौकत मियाँ की बुप्रा मोली-"कुछ नहीं, जरा रोटियो धुवाँ गई।" बेगम सहश-"मेरी समझ में नहीं पाता कि शौकत मियों का तक मासे करके स्कूल जाते रहेंगे । जरा मैं तो देखें वे रोटियाँ।" वुधा एक प्लेट में रोती रख कर सामने लाई । येगम माहवा ने रामा टुकड़ा मुँह में रखा और यूक कर दोली-'ये धुवो गई हैं ? मैं कहती है पहन । मुम्हें कब अल आगो ? अकराया हुभा प्राटा मेरे यच्च के सामने रख दिया । जहाँ मेरा ध्यान हटा और दलिद्दरपना होने लगा।" इस चाय का लक्ष्य थुप्रा थी। यह बेचारी शौकन मियों के चाप की मौसेरी बहन थी। दस वप हुए विधवा हो गई थी और उनका था उनकी लड़की का इस घर के सिवा कही ठिकाना नहीं था। मगट रूप में तो वह एक गरीष बहन की भाँति रखी जाती थीं, पर वास्तव में यह पक हेमामा' या नौकरी के वार्ज का काम करती थी, और हर प्रकार की प्रयध-सम्परा वियों का उत्तरायिव उही पर था । येगम साहबा का धारोप सुन कर बोली- "ए मैंने तो मजे की सोचा यो, घोटी मटकी में भाग था, मैंने सोचा क्यों पहरा रहेकामही मानाय ।" "यह न सा कि देख लेती, अशा है कैसा ! यह तो रोटी की सूरत से ही मालूम होता है, ऐरातन !" उनकी भावात पचीस गा का प्रासमा सय करके हमी कर के साथ रसोई घर में पहुंची। सैरातन पपरा कर बोली-"जो, धेगम साह, पका रही है।" "सब घाटा नाले में फेंक दे,बहे गगरे से भाग निहाल का पका" शौकत मियों को भी इस माशा का पालन कराने दोषी और रसोई घर माकर "नाडी में फेंक दो, नाली में कि दो। सप है उदयघात पर में पास होतो है, तो उस मादी होता, अनाम पी पी पहन, पा सातमध गुंगवा माटा, सय मेघमा--- "तुम कर को नहा लेता शायो करी का निरा देना, और देखो, मटका में श्रमा हाई पर मारा चौर हागा रामाने दम पैसे का मार है, पहभालता पाया में किया का पाक सातना तो साना घाइता भी, मगर यह मकराधान मरावधिया ममण के नाम कर एइमान करना चाहती हैं, वोगा--", पाटा नेला कर किसो कान में दाल दूंगा। पी राजे म पडे, मय यह है कि फुमा जान ने इस हर से अधिक पारा नहीं की कि ही समापन समुप भाटा जाने BETER न कर दे। और इस प्रकार रा-मा पसान करने का जो सवसर मिल रहा है, वद माप मे धना जाय ! मत फोली में कर अपन एक मजे दुपट्टे में पारा बाँध लाई और बोला- दुप का पाव रखना पनन पाय और शाम को अपने साथ हा साधाना" सतन ने अटे की रफ एक बार देखा धीर फिर अपने काम में लग गई । जब घर जाने लगा तो पकी हुई गेटियां गुधा हुमा भार और भाटे को पता सरसामान ले कर घर आई । रातन की धमाका मे, जो पति से माहाहा जाने का माहो के पास स्थाया से रहता थी इस सप सामान के विषय में पूदा।ITE ने सारा विवरण सुनाया तो उसने रोटीखा पार योजावान बाया नहीं है, धारा कर पा हो गया है।' "बकरी खा लेगी। "इसका दुध 7 घ जायेगा" प्रेसननन र शरिया मारा के पास वाश दी। उसने एक रोटा तो सा बामगर फिर मुंहग जिया । इन लोगों ने बहुत कुश घुमकारा पुम लाया मगर वह सम भार याकरित न हुई। और हाती मा कैसे ! वह तो धेशम क यहाँ के बच-सचे मोदार भाजन पर पड़ी थी। इस समय भी सा स पर भरा था। श्रय खतन साचने जगा कि आटे का उपयोग के हो १ बेटी ने राय दाकि दुलारे (अपने पुत्र) का नज़र उतार कर चौराहे पर दो। यह भसार उपयुम था। अगर भागार से BF हाना, तो यह प्रस्ताव वाई-सेर भाटा अवश्य ही स्वीकृत हो गाता, मगर एक दम ढाई सेर पाटा इस प्रकार फेंकने पर रातन नैयार न हुई। रान को जब खैरातन काम पा से खौरी और नापी कर निश्चित हो कर लटी, तो फिर यह प्रश्न उपस्थित हुमा कि आटे का क्या हो मियों और सम्बन्धियों का सूचा दोहराई गई, मगर काम का कोई प्रादमी समझ में न पाया। प्रात काल एक मिग्वारी ने धावाज लगाई । खैरातन ने मौका मत नाना । पाव भर बार निकाल कर भीख देने बगी। भिखारी था शहर का, माटा देख कर बाला-"माई, प्रकार को खराब चीज न दिया कर । जाह भला करे" वह यह कहता हुआ चला गया और खैरातन महमहाती हुई अन्दर भाई-"मुए, मोटे प्रकार ! भीख मांगने चले हैं।" प्रय फिर वहा समस्या उपस्थित हुई कि आटे का क्या होतीमरे पहर एक वा दो बच्चों को साथ लिये हुए उनके घर आई और अपनी कथा इस प्रकार सुनाई कि मैं केटे की रहने वाली हूँ, भूकम ने मेरा सा कुछ नष्ट कर दिया। मर कई बारा थे, बड़े बड़े मकान थे, कई नौकर चाकर थे, पति थे, और कई पञ्चे थे, पर अब कुछ नहीं रहा, भूकम्प ने सब कुछ छीन लिया और अप मैं दुखियारा हन बचा के साथ दर दर मारा मा फिर रहा हूँ।" खेसन और उसकी बेटी को इस बेचारी पर यहा तरस आया चौर सय पाटा एकदम उठा कर उन क्षों को दे दिया। वह स्त्री गरीब श्रादमी के घर से इतना भाग पा कर बड़ी चकित हुई । मगर थी वह भी खोइन नियों की सहानुभूति पर उसे सदेह हुमा । जरा दूर गली में जा कर उसो पोटली खोली घाग देखा और जब वास्तविकता का ज्ञान हुश्रा, तो खूब बड़ बदाई, कोमने लगी और पाया गली में दाम कर चलता हुई । उसे भला खरायपाटे का क्या परवाह ! उसकी जेब में भाज की ग्रामदना के पैसे सनक - सध्या समय मुनी मौजा की प्रतीक्षा कर रही थी और मयू उसके कंधे से बगारेर कर रहा था.-"अम्मा भूप लगी है।" मुनी--"दोपहर को मुम्हें और मुन्नू को बरावर की टिकियाँ दा थी, देखो यह कहाँ रोता है" मुन एक लाज पतग का फग का सिर पर लपेटे एक लकड़ी हाय में श्य प्रस्त खि सो बना रहा था। यह गुन र पोशा--"यम्मा, हमें और मा पम देना राय भी हम नगे, प्रामा!" गुमा-"अब पता पम्, मन सिमा ना पशमोर पुरोगया, मगर रियोदादर पार पार करने गाय गुन गुनी कौत्र-"मही, सो, साने होंगे भार मारेलये चान पाते होंगे, भा. इमने में गौमा पारे की पोटली किये हुए कमें मामु पोली साक्षी और रचकर पाश्चय से योमी- पाmal frant" जय मे मीसा पामार था. इन सागो मगहूँ की रामही या या भाज भागदेरासर प्रसरोगए। भौलामा सो कितना है।' गुधी दौर करको स राम् मागाई और पाटा सोलने के लिये बेसी। एक मेर मोटा और इसको एक कप में रम दिया फिर दूसरी बार तरार भर, परिणाम देखने को सम भायन रामुकथे, उसी प्रकार से खरके मन में परीक्षा का मतीजा भुनने को कहा। मातिर मुसा योगा---'यसमा दोसरस कम ग होगा, किमना सना आग है धन बोरी, रेस, इसके धुन सुन ले पहिले विराजमा, चंग बाम है।" पक खुदकी ने दौरा कर क मैजी लालटेन सा र शवाई और फिर दोनी थेट का धुन धुनने खी, दोनों छोटे आपके शोर मचाने लो-का मारा, गेहूँ का घाटा मुली पोड़ी देर भुप रही, रिमिक्षा कर बोली- सुप रहो प्रभारी ! कान फाड़ डालते हो" इसके बाद निरतधता दागई। थोड़ी देर सक पोटी बहकी के सपने या बको बाकी के शरीर सुजलाने का सरसर के अतरिक्त कोई शकरम सुनाई दिया। मिनट बाद मुझा ने दुश्म सुनाया- 'बस, घर साफ हो गया, माधा आटा कल के लिये रख दो।" मौला-"अब सयोगी स्या, समाज ही पका लो जी भर के खालें।" दोनों लड़के-"हाहा मेरी मम्मों !" मुखी भागधन लगी। भाटे में अब भी धुन था। वे ममम उसे कुछ सदेह हुघा, उसने भारा निशान कर सकता है कि मुंह विष का योजी-"नमक डाल कर पकाने वाला है, दो पैसे का तेज धाम्रो, तो भाज ।

वाई-सेर भाटा प्रिया प। दो पैसे के बालू भी ले लामो, और जरा पकाती के यहाँ से कदाई भी ले प्रायो।" दोनों लड़के चट उठ कर कड़ाही लेने दौर गए, उनके पीछे छोटी लड़की भी चली । मौला बनिये के यहाँ सामान लेने गया | मुन्नी ने भाटा गूंध कर रखा, इतने में लपकी कड़ाई से कर या पहुँची। मुझो ने कोठरी के बाहर निकल कर कदाई माँजी । मौला लकड़ी और तेल वगैरह ले कर पाया, हद कियों ने आग जलाई, मत्र लड़के नूल्हा घेर कर बैठे, कढ़ाई बढ़ाई गई। मुली ने एवं मिट्टी की रकाया में एक बड़ा मी रोटी बनाई, कदाई में दो बूंद तेल टपकाया जब वह कहकड़ाने लगा, तो उसने रोटी दाज दी। वह इन स बोली, तेल की गध काठरी में फैल गई । बदके खाँसो लगे। परियाँ पकते दस कर सब के चेहरों पर प्रसन्नता छा गई। मुन्न बोला-"श्राहा ! कैसा श्री महक है ?" मुन्ना ने रोटा दूसरी ओर पढरी । मुन बोला-"कैसी बाल-बाल है! यम्मा यह हम बायेंगे।" बन्यू-नहीं अम्मा, हम हिम!" मुम्ना ने पूरी उतारी फिर कदाई में दो बूंद टपकाई और दूसरी पूरी साल दी। इमा प्रकार उसने एक घंटे में धीमी धीमी आँच में सब पूरिया निकाल ली। खाने में देर हो गई थी, मगर यह विलम्ब खुशी के कारण किसी को महसूस न हुभा । पूरियाँ पका कर मुन्नी चिलाई--"अरे आलू लाश्री, भालू ! किसीने अभी तक काट ही नहीं, मैं कहता हूँ ये छोकरियों किसी काम को नहीं है, देखो तो, सबसपी तमाशा देख रहा है।" जन्दा जल्दा भालू के पतले रनले कतले काटे गए और फिर कढ़ाई में पकने के लिये चढ़ा दिये गये । यह बिलम्ब बेशक खल गया । सब खुप बैठे रहे । इम निस्तब्धता को कमा-कभी स्वामी का श्रावाज़ भंग कर देता थी। आग्निर माल तैयार हो गये, तेयार क्या हो गये ज़रा मुलायम पड़ गये। मुशी ने मिट्टी की रकाथियों, निकाली और सब में दो दो परियों और उन पर थोड़े योद भालू रख कर सब के सामने पढ़ा दिये । अब जो इन लोगों ने देखा, तो थब्यू सो रहा था। मुनू ने उसे मोदते हुए कहा-' "बन्यू छठ ! उठ देख, रियाँ तैयार न्यू अलि मजता हुआ उठा और रोने के लिए पूरा मुंह खोल कर एक । हो गई।"

उदय-प्रस्त
सो लगानी पाही, पर पहमा उसकी दृष्टि परियों पर पड़ गई, जिसको देख
कर रोना भूल गया । सहप-हम कर परियाँ खाने को।
मुनू -"अहाहाहा! कितना मजे की है।"
छोटी लड़को- 'शम्मा, सालन होता "
यही बहकी-"हा, और पुनायी शरदा न होता गया।"
फिर निस्तब्धता छा गई। ये लोग य मने ले ले कर पा रहे थे, जिसमे
अच्छा वा शोर पैदा हो गया था। पर पूरियाँ सरम हो गई, तो मुनी ने
भाधा प्राधी सप को और दी और फिर स्वय भाकी। मौलाना मिलने
का रिमा मुनाया। इस पर मुसो गोली- 'यह भी पुदा की देन है। मैं
चन्यू स कह रही थी कि भाजपच्या धीज़ खाते होगे।'
भब्यू-'अम्मा हम गरम गरम पूरी याने बनेंगे और खूब परियाँ
स्वाएँग।"
मुन-"हम सिपाही बनेंगे, सय को पकड़ पर मर जेवसा भेजा
घा--"हम तुम को पाया नहीं देंगे।"
मुनू-"हम तुम को राब पीटंगे और पकड़ कर थाने में याद कर देंगे।"
मम्-"हम हम तुम को "
यब्यू की समझ में नहीं थाया कि क्या कहे। उसने मुन्नू को मुँह विदा
दिया। इस पर मुन ने एक घुसा रसीद किया 1 मोखा ने दोनों को डाटा--
"मागो भाज्ञ तो खूब ट्रॅप-म कर खाया है। पान तो चुप रहो !"
दानों चुप हो गये। मीना योक्षा- 'मुदा अमरोज पेट भर दे"
लब ये लोग सोने लगे तो धन्यू बोला--'अम्माँ कहानी कहो।"
“हाह, शादशादेवाज्ञी।' सदकिया बोली।
मधी का मन भी श्राज प्रसन्न मा। वह कहने लगी-"एक था राजा, एक
या रानी"
यातुल्ला अन्सारी

मुहल्ला "मैं श्या पायाह करता हूँ मुहरले धानों को !"-मजूर ने गुस्से में कहा-"प्रातिर यह हमारा थपना मुहल्ला है और एक न एक दिन हमें वहाँ जाना ही होगा।" जवाब में सुरैया ने सिर मुका दिया और चुपचाप खड़ी रही। लेकिन यह कहने पर भी वह सुरैया को मुहरने में ले जाने से घबराता था। चूंकि यह मुहरले का लड़की न था थोर चौगान में खेत सेल कर और खिड़की में चौकी पर बैठ कर मुहल्लेवालियों की बातें सुन-सुन कर जवान न हुई था । मुहल्ले की लडकिया । गोरे चि बदों से भरी हुई चौकियाँ, चोरी चोरी ताकने वाला सादा नजरें, चढ़े हुए पायचे ! मन्जूर ने भुर भुगे ली। उसकी दृष्टि सामने सुरैया पर जा रहा, जैसे हवा में एक छोटा, किन्तु रगार सा जाला तना हुआ था। पाश्चर्य भरी आँखें, पतले और झुके हुए चौड, जर्न और उदास सौंदर्य, पतलामा सुराहादार शरार माना किसा जद बोतल में जान पद गई हो या 'मुग्नका गालिय' की कई तस्वीर सुपरम निकल कर ससके सामने प्रावही हुई हो । हाँ, मुहल्ले की लड़कियों में कितनी निती वह ! और फिर शादी में उसने मुमरले बालों की रजाम दी लेना तो दूर, उहें पुनाया सक न भेजा था। मजूर की यहिन ने प्रा कर चट मैंगनी पर ध्याद कर दिया था। यो मुहल्ले में ऐक नई लड़का ला कर यसाना, पसी के चुनाव में 37को विल्कुल उपेक्षा करना, मानो वे मुरक्षेवाले ही न हो। मुहल्लेवाक्षियों के लिये यह एक अनसुना सी बात थी। इसके प्रति अपनी सगी घrt, जो मुहल्ले में सब का प्रधान थीं, उनकी धान को इस प्रकार रह कर दे ! मुहल्ले में ऐसा कौन व्यक्ति था, जो यह न जानता हो कि चाची मातो. हो यातों में कई बार अपनी बेटी जुबैदा को मजूरक नाम कर चुकी थी। रही बातों के कारण पा सुरैया को मुहक्ले में लाने से घबराता था। खेकिन बेचारा लाचार था। दा महाने का छुट्टी कहाँ बिताता इसलिये हे मुहल्ले में थाना ही पड़ा और पे दानों यहाँ प्रा गये। के शोध म एक चौगान था, जिसमें तीन चार संरा अंधेरी गलियों पर पाती हुई, इधर-उधर को निकल गई या चौगान के चारो ओर उदय प्रस्त - काली काली झुकी हुई तान मजिली दीवार घेरा डाले खड़ी थीं । शताब्दियों के बोझ से घे मुक गई था और यही वहाँ कई एक जगह से ईटें निकल पाई थी, लेकिन वह मुकाव और छेद दाघ काल स इन दीवार के अंश हो चुके थे। चौगान में कुछ छोटी छोरी मेहरामदार खिड़कियाँ गुतती थीं, जिनपर मैजे से टूट-फूट सरकण्डे लटक रहे थे जो शायद किला समय में चि रही हो। चौगान के बाथ में एक कुबड़ा कुपही लालटेन मुका मुका खड़ी थी और रात को टिमटिमा कर अंधकार को भौर मा सष्ट किया करता । दाई घोर मुहरले की मसजिद का सिलेटी गुम्बद उभरा हुमा था, जो कयूनरों और घमगादों की धावाजों को उछाल कर मुहाल में पैजाया करता। दिन के समय मुहरले-धालियाँ अपना अपना काम ले कर चौगान में श्रा बैठनी । चाखों की रोय राय में कोई न कोई बात दिद आती। विवाह पामारी या मौत की धान या कोई पुरानी शिकायत किसी के हृदय के घावों को हरा कर देती। एक हाथ चमका चमका कर कुछ कहतो, दूसरा नाक पर थेगुली रम्य कर सुनती। कोई याच में बोल उठना । उस समय चाधी का कदा स्वर उन दोबारा से टकरा कर गुम्बद में साये हुए कवूनरों और चमगा दहों को जगा देता। चे पालने लगते । धानों की मद्धिम गुनगुनाहट में वह कदे और भयानक स्वर सुन कर थों महसूम दाता, मानो किमी निर्जन खण्डहर में ऊँच ऊँच खम्भे भूता की तरह पक्ष पर रहे हों। खिड़कियों में चौकियों पर धै। जवान लड़कियाँ ध्यान से उनकी माते सुनती और कमी-कमा वहां से किया न किसी बात पर टाकता रहती । चौगान से बच्चे देखते रहते और थक जाते, तो किमा देहलान पर बैठ कर मका बातें सुनते और श्रापम में कुछ न कुछ कह कर चारी चोरा इनको चिढ़ाते । कभा कमा किमी गुहल्ले वाले का खबार सुनाई दता और काई पुस्प सिर मुकाये दय पाव चौगान से निकल जामा । याहा दिन मान पाता, साब होत जाते, चौगान में सेजने वाली लड़कियाँ जवान हा कर खिड़का में चौकी पर जा बेटमों चौर मुहल्ले याजों का भातें सुनन लग जानी । बहु पुरानी हो कर नाचे चौगान में उतर पाती। बदके जवान हो का संवारना और सिर झुका कर दथे पार वक्षना सास पर मदर घरों में ना धैठते । पाटे घाटे परचे सिर घसिह का देहबाजों से उत्तर भाते और चौगान में जा पहुँचत । उनको काला काली दीवारों में एक प्राध मुकाव और पद जाता और यह भीर मा काली होकर स कुबड़ी लायटेन को कुछ और अभी कर देती । मसजिद के गुम्बद में से ।

मुहल्ला नई-नई, कहा आवाज गूंजती लेकिन मुहल्ले के जीवन में कोई अन्तर म पड़ता। यों ही दिन बीत जाते, साल यात जाते । मुहल्लेवालों ने पड़े तपाक से उनका स्वागत किया। चाची ने दौड़ कर देहलीज पर तल पकाया और सुरैया को गोद में उठा कर ऊपर ले गई, थोर मुहरल वालियों ने बढ़ कर उसके चारों घोर घरा डाल खिया । चौगान में बरचे शोर मचाने लगे। चाची पाली-"बिस्मिल्लाह, दुलहिन अपने घर मुहल्ले के नीच जाति के लोग पारी पारी सलाम करने को याये । लेकिन इन बातों के होते हुए भी मर दो-एक दिन परेशान-सा रहा । फिर धीरे धीरे घर की काली काला दीवारों ने उसके चारों ओर नाच कर, घरम्बा ने गागा कर और चौगान की कुबड़ी लालदेन ने मुस्करा मुस्करा कर न जाने उसके कान में क्या कह दिया। उसकी गदन मुक गई और वह अदा-बाहर दवे पाव थों चलने फिरने के लगा, मानो किसी यतक को कोई लालाय मिल गया हो। सुरैया को तो चाची ने इतना अधिक अपनाया कि वह सहम-सी गई। ससके हर कदम पर 'बिस्मिल्लाई' और छींक पर 'मलहम्दोलिल्लाह' पढ़ती और पात पात पर बोल उटता-"क्यों येटी, नर तो है, क्या हुआ तुम्हें १ शवना की तबीयत नराम है श्या" या मुहल्लेवालियों को चारों ओर घेरे रहते, कहती--"अय है । तुमने येचारी को घेर कर परेशान कर रखा है। जरा हवा तो लगने दो। लड़की की तबीयत अच्छी नहीं । देखो, जरा-सा मुंह निकल आया है, सूख कर काटा हो रही है। फिर यह गुस्से में हाय बना कर कहती-तोया, इन जवान लड़की का तो कुछ पो हो ही बस याद करने हो के भूखे होते हैं। देखो तो भाभी, एक हा साल में बड़का को क्या कर दिया है। मुंह हल्दी की तरह पोजा हो गया है और चलता है बहिन, तो मटके बगते हैं। अब तो आप आराम से अदर बैठा रहता है। न दवा, न दारू, अल्लाह करे मेरी बच्ची को पाराम हो जाय, तो माँ का दिल भी कैसा होता है, हारिसर मेरे लिये तो अपना ही बेटा है न, और जैसी मरी जुबैदा, वैसी ही दुल्हिन।" चाची के मुंह से यह बात सुन कर कई एक ने हो में हाँ मिलाई । एक पोजी-'येचा को चार दिन भी दुरिहन मन कर बैठना नसा न हुआ। नर्नेद ने तो चार कलमे पदा कर मुंह बाल कर लिया और अपने मियों के पास मा पैठी।

६ उदय प्रस्त हमारा कहने लगा-"मात की मो जिन्दा होगा, सो देखत कि कैसे जार से अपनी यह को!" सामने कहा- मैं कई बाधा, पम परमो झुबैदा को उनके भरार हो गई.पा उसे देगो को इस पर में 10 ने तो महनार को शमा, लकिन दुनिहन धाचा पात का फर यात्री-- 1 यहिन पसा याम न हो। साह पाहवा सो वित्त राम हो जायेगी। मैं नो मुबह शाम यहा दुचायें मांगता हूँ। मन की बहिन साह माने या न जाने पर मुझे इनसे पाकर और कीम प्यारा क्यों मामा तू अग्ने इमान में कहियो, है म यही थात ।" पा से लिपे वह मुगला बा काला कामा दायरें और उन औरतों की धात बजावली थी। उनके मुग्मुर में यह और भा परेशान हो जाती और उसके मलिन मुख पा राना या जाता। उस समय उसे दस कर घों मासूम होता, मानो कोई गुप्त बात सय मातारण में 8 कर दा गई हो। ने हुए सब गुहाले धालियों-~-विशेष कर चाची की बातें सुनी और यहुत प्रसन या कि वह सुरैया को अपना रहा थी। भाची सो विवकुज उप पर जान देनी थी । यद्यपि सहा विचार था कि चाची उनसे सीधे मुह यात भो म करेंगी । प्राखिर उदुम्ब तो हुधा होगा लेकिन कैसी प्राधा पाधापी । उन्होंने यह बात पताई हान थी उसे । मजूर दिल को- दिन में अपने पहले महा पापरता रहा था। उसका जी चाहता था कि जा कर पाया के पाद पड़ जाये और उनस घमा माग 1 उसे सुरैया के विषय में एक विश्वास सा हो गया यद्यपि इसके अतिरिक्त पानी की बात में इस पर धौर काई असर न किया । बारी के बारे में सुन कर यह मुस्करा पदा- औरत हैन छोया यान पर घबरा जाता है। शायद सुरैया सकर का परेशाना स रास सी दिखता हो। बेकिन इस शिपायो सुरैया के लिये ममूर से लड़ी, तो रसे महसूस होना शुरू हुआ कि सचमुच सुरैया को किसा द्वार को दिखाना चाहिय। चाया बदन लगी- यह मा काई दग है वेग कि पाई बेग को घर क्षा कर उसका यह दाक्ष कर दो। उसे दबो तो हल्दी की तरह पीली हो रही है। यम इसलिये ध्याकर लाये थे इसे अपना मतलब निकल गया तो मारा गई भाइ में। पर मैं ता मा न होने दूंगी । वापिर वह भी किसी की घटा है। उसका माँ का मा दिन है। इसे कितना दुल हागा, और फिटन - -- मुहल्ला है दगा न दारू मेरो अपनी जुबैदा है उसी की उम्र की होगी, किन्तु देखो, तो कैसी जवान निकली है । और इन मुहल्ले नालियों का नहीं जानते तुम ? वे तो पहले ही इस बात को भूम्बो बैठी है। जयानें केंची सो चलनी हैं। खुदा न कर, कोई ऐसा वैसी गत हो गई, तो कहेंगा, अाखिर पराइ लदकी या न, इनको क्या पहा थी कि उसकी फ्रिक रखत ? मर गई, चलो छुट्टी हुई, जान छूट गइ । पर बेटा, मुममे तो यह सुना न जायगा। अगर मेरे पटे हो, तो श्रेय भी चेता, प्रभा हाथ से कुछ नहीं गया । हाँ, और उसे इस हालत में काम काज तो करने दूंगा, सुना तुमने मुझे बिरादरी में अपनी ना नहीं करवानी । जब तक यह तदुरस्त नहीं होती, जुबैदा यहाँ श्रा कर रहेगी। आखिर तुम्हारी बहिन हा है न ! घर का काम भा कर दिया करेगी और दुल्हिन का खयाल मा रखेगी।" उस दिन यह दिन भर बेचैन फिरता रहा । बार बार सुरैया की ओर देखता और जाने क्या सोचता । फिर सुरैया को उठते बैरते देख कर एक उपढा सी थाह भर कर कहता--"ज्यादा चलो फिरो नहीं । यहाँ भी श्राराम न क्यिा तुमने, तो होगा क्या?" उस समय सुरैया का उदास चेहरा और मी उदास हो जाता और वह श्राह भर कर लेट जाती । रात को जब यह सो गई तो मन्तर छठ कर सहन में फिरता रहा, मानो कुछ खो बैग हो । चोदना में सुरैया का रंग चौर मा पीला दिग्व ई देता और वह बच्चों की तरह चारपाई पर गठरी यना पड़ी थी। जाने क्या हुआ है इस। उसने गौर से देखा और उसे चाची का यह पात पाद श्रा गई-'यह शहर की लडकिया ! यस, देखते रहो इन्हें । हाथ लगाया और छुई मुई हो गइ।" वास्तव में पाधी सच कहती थी। एक ही साल में कितनी कमजार हो गई है, अब क्या होगा !-किसी विचार पर उमने एक भुरभुरी ला और निगाह फेर ली। दूसरी चारपाई पर जुबैदा पड़ा थी । गुलाया गुलाबी यदन से चारपाई भरी हुई थी। शलवार के पायचे चढ़े हुए थे और क्रमीज का गला खुला था। लाहौल विल्लाबूवत ।' कह कर वह और इधर उधर घूमो जगा । चाची होती, तो मुझे इसकी यामारी का पता ही न चलता । उस1 सोधा-'मैं भला क्या जानें क्या होती है इनका घामारियों। येचारी इलाज के बिना हा तो है " उसन विदको से नाच झाँका | चौगान में कोई युदिया मिर पर दिया रव नाथ रही थी। चारों भोर फाली काजा गहरी दायारे हाथों में हाथ दिये घूम रहा थीं । सुरैया ! सुरैया कोई काला सी चाल चीन धीख चारों प्रार फदफदा रही थी।

६८ उदय शस्त जुबैदा ने या कर घर का सारा काम संभाल लिया था।यदि सुरैया उसका हाथ बटाने के लिय कुछ कान लगती तो वह घर बोल घटती--"न थहिन, अम्मा को मालूम हो गया, तो मैं उसे क्या जवाब दूंगा।" या तो सुरैया सार दिन लेश रहती या कमा उफना कर कोरे पर बढ़ जाता। उस समय अचा नक जुबैदा को दम थालमार से काई यातन निकालने की जरूरत पड़ जाती जिसके निकट म र कुरसी पर बैठा करता था। उसे देख कर मजूर लाच में पड जाता-'वैसा अछा स्वास्थ्य है । यस, स्वास्थ्य के सिवा जीवन में और है हा गया ?' रि उस ग्याल पाता कि वह टक्टकी मांध कर उसे दख रहा और वह धयरा कर रिमुभलता। उस समय जुबैदा मुस्करा कर उसका तर दमती । उसका पल्लू या उसका हाथ, या बदन का कोई हिस्सा सयोगवश उससे छू जाता । मुगधि की एक हल्की-सी लपर उसे घर लेती। जुबैदा तो बरतन ले कर, मुरकर, मुस्करा कर चली जाता लेकिन वह देर तक अपने विचारों में सोया रहता या निस्य व्यायाम करने का इच्छा करता । यगर सुरैया श्रा जाता, तो इसको देख कर उसकी आँखों में दया मलकता और वह मन हो-मन सोचता कि अगर सुरैया का स्वास्थ्य भी अच्छा होता अगर उसका शरीर भी भरा भरा होता मजूर की नजर में सुरैया के चेहरे-नने एक धौर ही गोरा-गारा, मरा हुश्रा शरार था जाता । उन पतली पतला बाहों की जगह दो भरी हुई महि उसकी तरफ उठती। फिर उसका घाख सुन्न जाता और वह एक माह भर कर कहता-- "मुरैया, तुम ज्यादा चला फिरा न करो। हाँ, और यह दवाई वाई था?" जवस ये मुहर में पाये थे, मुहल्ले वालिया को जैसे किसी और भात में दिलचस्पा ही न रही थी। चौगान में बैट कोई-न-कोई सुरैया का बात छेद देती और नहीं तो चाचा स्वय कुछ न कुछ कह दत। और जब चाची प्राप कोई यान दे दें, तो किसको मजाल था कि उनका ही में हो न मिलाय या उनका यात काट कर कोई और पात देते। वह मन्जूर हा का चाची न थी, कि सारा गुहला उनको चाची कह कर धुलाता । यहाँ तक कि मुइले के बड़े-बूई मी चाचा कहते। कोई भगदा हो मुख हो पा दुख हर मामला चाची के सामने पश किया जाता था। चाचा ओंठ पर अंगुला रख कर और से सुनती रहती और फिर हाथ चला चला कर अपना निणय सुनाती और अय सत्र औरतें सुपचाप श्री सुनता या कोई साच में गोल कर उनकी हाँ में हाँ मिलाती लाती। यात्री रहे मुहलेबाजे, मुहल्ला ६ 1 खबार कर, तो ऐसी बातों से कोई मतलब ही न था। वे समझते थे कि घरों की पाते औरत ही पानती है और औरतों के मामले में बम ठनका यही काम था कि मिर मुक्का लें और दरे पाँव पास से निकल जाय या कमा कर चायें, तो उनका मोली में डाल दें या अावश्यकतानुसार लहाद में या -थाह पर किसी कठिनाई के समय उई उला कर पर्छ कि ऐसी परिस्थिति में उन्हें प्रया करना चाहिये और उनके बड़े क्या करते थे? हाँ, तो चाची की बात को मूठ कहना कोइ सरल काम न था और फिर जब चाची स्त्रय सुरैया म इतनी दिलचस्पी लेती, तो फिर भला, वे कर ही क्या सकती थीं । कई एक का विचार था कि चाची मजर को मुंह तक न लगायेंगी। उसन जो व्यवहार चाची से किया था, वह किसी से छिपा हुआ न था । समी जानत थे कि वह शुरू से ही मजूर को अपना भावा दामाद समझती थीं । लेकिन यह होते हुए भी मजूर का यहिन ने उसे यों निकाल कर रख दिया, जैसे दूध का मक्सी। इन बाता के होते हुए भी जय वे चाची की बातें सुनौं और देखती कि वह सुरैया के नाम पर बिस्मिल्लाह पढ़ती हैं, तो मन हो मन उनकी प्रशसा करती। "तू नहीं जानती मामी " चाची ने रहस्यपूर्ण ढग से कहा--"ये श्राज- कल के नौजवान भला औरता की बामारियों को क्या जाने ? ये तो पस, कधी पट्टा करके टहलमा ही जानते हैं । अप, जाने दे तू इस बात को "बेकिन वह बात को जाने कैसे देती ? वह क्या जानती न थी कि जप चाची 'जाने दे इस बात को कहें, तो उसे जारी रखना अत्यन्त यावश्यक हो जाता है। भाभी योजी--"ले चाची, मदों को क्या पड़ा है कि यह जानें ? उनकी यला से एक न सही, दूसरी सही । बीवियों का क्या काम है?" "न भाभा यह कहा 1" चाची ने जवान घाँठो में दया कर कहा- "अप्लाह न कर, हमारे मुँह से ऐसी यात निकले । मदों का क्या कुसूर ! खुद अलाह मियों ने चार करने की इजाजत दी है, इसीलिये न कि एक यामार ही जाय या बाल बचा न हो। आखिर हजार यासे होती हैं। शरीप्रत (धर्म सम्बन्धी कानून) का बात पर टोका निप्पणी करना, तोषा । मेरी हजार पार तोवा"उहीने कानों पर हाथ लगा कर कहा। "लकिन चाची दुल्हिन को है क्या ?' किसी ने पूछा। चाची रहस्यमय ढग से कहने लगी-"वही अपनी बड़ी वाली बीमारी। देखा नहीं, रंग हल्दी की तरह पीला होता जा रहा है। यह मा सो इसी उदय भरत " उन्होंने यह कहते हुए अंगुली उठाई-'सूम कर काटश हो गह थी। ६ महीने मुश्किता मे बात होंगे क्यों मामा' पर सोया मेरा । श्रवाह मानी महायानी सो कोन सा वीमारी है निसा इदाज नहीं। लेकिन अब तू वहीं जा पर उसस न कह देना । रोगी से ऐमो बात दिपा कर रखते हैं।" अदर मजा ने मुसा, तो यह घरों गुम सुम बैग, न जाने क्या सोचता यद्यपि मुहलेदालियाँ मुरया स यह यात न कहतो यो, रि मा चाप जानत है जब मुहल्ले में कोई यामार हो तो दिन में एक बार सो उसका तिबियत का हाल जानने के लिये जाना ही पड़ता है और यह भी पूलना हो परता है कि ये अब क्या हाल है और अपना हादिक सहानुभूति प्रकर करन के लिये देखो, ना मुंह कितना उतर गया है। करना अनिघाय हो जाता । गुहल्लेवालियों अपने छत्तव्य के पालन में सुस्ती नहीं करता था। दिन भर घर में थाना जाना लगा ही रहता । मुरैया ो सुपचाप लेटी रहता लेकिन जुबै हर प्राने आने वाली के सवाल का जवाब देतो। या महुधा चाचा भाप बैठी होती और कोई पूछने चाती तो पहचट योल उरती-भी तो कुछ थामी नहीं हुई किन माह अपनी मेहरबानी करगा ! उसका कृपा स मायूस होना सब से बड़ा पाप है । धातिर होते होते हा पाराम होगा। अटर मन्जूर या तो चाची की बातें सुनता रहता या अपना स्वास्थ्य का करने के लिये काई न कोई व्यायाम करता और मा किसा भरे हुए भारी के निकट होने का कामना करता । सरैया का उदास सौदय जमकी निगाह में किसी बामारी के लक्षण के अतिरिक्त और कुछ न रहा था। यो हो दिन बातो गय । यहाँ तक कि मजूर की तान चार दिन टुट्टियों वाकी रह गई। हुए देख कर मजूर ने पूछा- किस विक्रम दो चा" चाची ने एक प्राह भरी । कहने लगी-~-'बेग, मुझे कैसा फ्रिम प्रस, यही सोच रहा हूँ कि अब क्या होगा?" “क्या होगा। मजर ने हैराना से पला। धाचा बोला--'दुल्हिन को भाराम हो जाना तो मुझे मिन रहती। यहाँ तुम लाने सारे दिन कहाँ पिरते रहते होगे । सुदा की मार दफ़र का काम भी तोम होने में नहीं माता होगा। और घर में वह अकेली बैठा रह। करेगा, इतना भी नहीं कि किसी बात ही करे। ऐसे भरे घर से यहाँ उजाड़ चाचा को सुपचाप बैठे मुहल्ला ७१ में ना पड़ना, मुझे तो इसका खयाल पाते ही हौल उठने लगती है। खदा करे तुम्हारी तरक्की हो जाय, वो नौशानी हो रस त । पर चालीस रुपये में थाकत क्या होता है ? फिर परदेश का मामला ठहरा और प्राजक्रम का जमा ! मैं तो जुबैदा को साथ हा भेज देता, पर तुम जानते हो, मुहल्ले वालियों की गज भर की ज़यान होती है, जान क्या कहती फ्रेिं। तुम्हारे घर में कोई बचावाला होता, तो भी हर्ज नहीं था । कहते हैं, अकेला एक और दो ग्यारह, पर बच्चे की हविश तो उम्र भर रहगा। पर अप इस बीमारी में कहाँ ? घरकत को भी यही बामारी थी भ, सारा उन बच्चे को तरसती रही। श्रय उस घर का नाम हो यामी न रहा । मुझे तो यह दुख साये जाता है, फिर प्रयाल प्राता है," यह कह कर वे रक गई , फिर बोली-"चलो, छोड़ो, इस बात को, जो अनाह को मजूर होगा, वही होगा फिजूल प्रिम करना है।" “सुम यात तो करा चाची।" मजूर बोला। "बात क्या करूँ, माँ का दिल तो जानते ही हो, अाखिर मैं तुम्हारी माँ का जग हुई न सोचती हूँ और कुछ नहीं तो यच हा के लिये दूसरी शादी कर लेते । कम से कम घर का नाम ता रहता। इसके अलावा यह तुम्हारी पनी का भी खयाल रखता । रोगा को जितनी भी सेवा हो, कम है बटा" "मात तो ठीक है चाची" मगर ने सिर पर हाथ फेरते हुये कहा--"मुझे सोच ले दो चाची" "छत पगला "चाची धोनी-ग्यधं सोच साच कर अपने पापको हल कान करना । यह याद रख कि जो होना है, पहन तर यस में है, म मेरे पस में । जो मलाइ को होगा, वहीं मर होगा। पैसे अगर यहा बात हर गई तो पेग, सू साच तो सही, यह कौन सी मा होगा जो अपनी मेरी को सौत के मार में झोंक दे किसका जी चाहता है ? मैंने मान लिया कि घनाद रपे, सेरो घीया मिजाज की बड़ी अच्छी है, पर लोग सो खौत के साये सभी दूर भागते हैं। हो, कोई अपरा स्तेिदार ARI करने वो करो, चिरादरी के लोग कहाँ सायलिदान करने लगे-दान हो हैन यह! क्यों यासो धाप माना है। फिर घर मुहरने का का भी हुई। मैं सास, सेरीही Eि में पुन रहा हूँ" चाचा ने एक माइ माी-"इमा स, मजूर, जी चाहता है कि जैसे मा हो, तुमे सुम्पी दे । भगर मे जलत हो, तो मैं अपने कजेनेही बोटी भी काट कर दे।"

उदय प्रस्त रात को भी कोनदिन भागोयामा " उसके कानों में पता और महमा दोवार और महान TEE मा पनादिसाई परत मानो पर माया हिना और रबर पूजे का एक निरनिमें शाम जोगाम इस प्रकार मुंह बाल थैम था मामो काई गए गुणा हो। उमन अनुसार किया कि वह उस गुफा में गिराहा-गिरामा रहा है।ग और घर संघारिन गारदा का सदसरा और यह अंधेरे में जिस मिक्षा घोगरया सो पार भोर कर पड़ी हुई पुरैया की पापों परशा ।। [मा की चारपाई पर कोई भरे हुए शरीर का यथा पाने हाय ठा कर गे सा था-"at माँ मा मो।" गुम्पद में कोई करता বিপ্না प्रदा। सन उस मोर पसार गुम्याद पर कमरों का पक जोदा मानियाई दे रहा था। ति उसका निगा शुभदा पर जा पा लोक असा समय Jशश न करया की और उसकी यह मार की गोद में था गिरी। गोरो-गोग गमगम यौदामा मास जाने क्यों चमक टी । उसके गोठ उस वाद पर मुहे फिर यह रुक गया और वह कर कोटा पद पर चाची के पास जा गया। उस समय यहा कोई ग्याप का सर्मप होगा। पापाठी शारद पुन रहा पी--- क्यों और तो है।" यह उसे दस कर घयरा कर - धेठा धोनी। "नहीं, बात तो कोई नहीं।" मन्जूर ने मिस कर जवाब दिया--"वैसे हो चाची, मुझे तुमसे कुछ कहना है।" "हा हो, शोझ से कहा। चाची बोली। "मेरा मतलब है। उसने कहा-"तुम जानता हो हो वाचा, इस हालत मैं मुरैया को साथ कैसे ले जा सस्ता हूँ, लकिन साय न ले जाऊँ, तो मुझे रोटी की भहुत फाग।' "हो, बग"चाचा कहने खगो-"याशार की रोटी किम काम की, उससे तो भूखा रहना अच्छा है।" 'तो चाचा, मेरा मतलब है, ग्रार तुम पुरा न मानो तो मैं क्या तेरी बात को बुरा मान सकता हूँ!मो जी में माये । 'ले पागल, मुहल्ला " 'मेरा मतलब है।" मजूर ने फिर दोहराया-"अगर चाची तुम मुझे अप गुलामी म वह कहते रहते रुक गया। चाची भी यों चुप बैठी रही, जैसे किसी सोच में पड़ गई हो। "तुम्हारा मतलब जुबैदा के रिश्ते से है ?" चाचा पूछने लगी। "चाचा, मैं जिन्दगी भर तुम्हारा एहसान मानूंगा," मजूर ने झुका झुकी घाखों से कहा। "र, पहसान को सो तू जाने ६," चाची योज--"मुझे तो शायद इस बात में भी कोई एतराज न होता अाखिर तुमसे बढ़ कर मुझे कौन प्यारा है बेग, पर मुहल्लेवाले क्या कहेंगे ?" "मुहल्लेवाले" मजूर ने सिर उठा कर गुस्से में कहा -"मुहल्जेवाले !" वह पृणा मे बोला और हँस पड़ा -"मुहल्लेवालों की में क्या परवाह करता हूँ, सुना तुमने घाची" "मुहल्लेवाले ''मसजिद का गुम्बद चिल्ला अग। नीचे चौगान में कोई चूदी जादूगरनी सिर पर दिया रक्से किसी चरसे की लय पर नाच रही थी। उसके चारों ओर काली काली मुका हुई दीवा" हाथ में हाथ डाले झूम रही थी । कोठे पर अंधेरे में चाची के सफ़ेद सफ़ेद दात चमक रहे थे। --श्री मुमताज़ मुनी नयना - परतर के यूनों के तल्लों में लोह के गाल हे हुये थे इसलिय यह किता बाव में दयाय, बहुस धारे धारे कदम उम्ता हुश्रा सादियों पर पद रहा था, ताकि दूमर कमरों तक शोर न पहुँचने पाये। भाग फिर उसको देर हो चुकी थी। मौलाना बलास में लेक्चर दे रहे थे। कहने को तो मौलाना थे मगर दादी-मूंछ सा, अचकन गायत्र, चूहादार पायजामा नदारत निकुन अपड-डेट, तेज चा का ताह चलती हुई जबान । इसलिये पहिले दा शायरा को हम छोड़ दत हैं । 'नाजीर' घशक अपने जमाने से कहीं धागे था, वह सा मानी में पहिला हिन्दुस्तानी शायर था। मगर उस वक्त उदू सिवाय हिदा, पारसी और शरया अदय (साहित्य) के किसा अदय से मुनरिसर (प्रभाविन) हुई थी। इसलिये नज़ीर' को भा हमें छोड़ देना पड़ेगा। दौरेजदाद (पत्तमान) का सालार, शायरे एशिया, एकसाल था अस्तर चुपके से क्लास में दाखिल हुआ, और सब से पिछला सीट पर दबक कर बैठ गया। हुश्रा यह कि गस्त में जब वह चमारों के मुहल्ले में से गुजर रहा था, तो उसने पहा एक बड़ा मामा देखा । वह भी रुक गया। पूछन पर मालूम हुआ किक खो मरा पड़ा है-कूड़े करका के ढेर पर एक मृत खा का नाश एक मृत शिशु सहित सून में लथपय पड़ा है। यह नवयुवता कुम्हारिन थाना के हाथों विवश हो कर एक ऐसा चपराध कर बैग कि आज निस्सहाय और निराधार वह साधारण रास्त पर एड़ियाँ रगड़- रगड़ कर भाषण देने पर बाध्य हो गह । जवानी से अधिक अपने सरल स्वमाध, बाद टकों का लालच और एक सभ्य वाचू की सम्पता का शिकार था। प्रवि हाति लड़की के पेट में गम के चिह्न देख कर विरादरी वाला ने उसका बिरा दरी से निकाल दिया । यह रोई चीखी, चिल्लाई फिर पागल हो गई। और श्राग्वीर में यह उसके अल्प जीवन का अन्तिम श्यया। ७४ नयना ७५ अमर कालेज की ओर चल दिया। लोग पड़बड़ा रहे थे-"पापिन, फल- मुंही मलकिनी।" कालज बिरकुल दरिया के किनारे स्थित था। नब अरतर कालेज के पाक के अ दर दाखिल हुअा, तो बड़ की घना छोर के नाचे नयना एक बकरा के कान पदे ठदा चौदना रात की भाँति मौन सही थी। वह पीले रंग का एक लहंगा, धारीदार कुर्नी पहिने हुये थी। अतर को एकदम अपने सामने देख कर हशमा गई । इस चित्तारूपक उत्सुकता ने उस और मा सुन्दर बना दिया। आज रात को घरतर से मिनने का वादा था। हाई स्कूल पास कर के जय प्ररनर ने कालेज में प्रवेश किया, तो उसने देगा कि कालेज में नयना हा की धूम थी यह धोरन था । हम कथा कहानियों में किसा सी मालिन का किस्सा, जिसके प्रेम में कोई राजकुमार पागल हो जाता है, पढ़ कर हंस देते हैं। चण्डादास का रामी के साथ प्रेम हमारे होठों पर एक म्यग्यमय मुस्कान पैदा कर देता है। लेकिन काश' हम पहिले एक नज़र नयना को देख कर फतवा देत। उसका असला नाम शाहजादा था। मगर नयना शायद उसे उसकी आँखा के कारण कहा जाता था । कटोरा सी आँखें छलकते हुए दो कोरे, भौहे अत्यधिक धनी और लम्बी, इतनी कि उनके बोझ से पपोटे सदा मुके रहते होठों पर नमी सी और निचला होठ दायीं ओर से ज़रा सा नीचे की ओर झुका हुमा, माई बाप के नीचे गाल के उभार पर नन्हा सा, काला तिल । उसका रंग खाल-सफेद न था, यस मदल की तरह-~~ॉन्च ऐसा कि हर समय रोपड़ने पर आमादा लकिन नासू पी लेने पर भा मजबू, होंठ ऐसे कि कुछ कह देने के लिये यचन, लकिन कुछ न कहने में भी मसलहत समझे। उसका माँ कहत-"हमारी विटिया को तो नबापजादी होना चाहिये था।" नयना भी यह यात अनुभव करती था। कल्लू मुनू, घुनुवा जैसे धोरी नव- युवक को वह मुँह न लग ती था। सारा कालेज उसके प्रेम का दम भरता था। घोषियों के घर काखेर के पास ही से नदी के किनारे किनारे फैले हुए थे। निकट का खेज होते समय अनायास गेंद उछल कर नयना के अहाते में जा गिरता । कोई नौजवान लड़का जाता और दरवाजे पर खड़ा हो कर पचता-"क्या मैं गेंद उठा सकता है?" नयना पीक कर चूंदरी से सिर दॉप मुंह फेर लेती । खाली घटा में लड़के टोलियों में खड़े नयना के घर देख देख कर थाहे मरते रहते और वध भरत करत कि काश ! नयना स्वयं अपने हाप से उनके कपड़े धोने पर भामादा हो, मो वे एक दिल का कपद के हिसाब से धुलाई शुधन को तैयार है। जमाना पातयात के अतिरित किसा प्रकार का कोई भी हरकत करने को किसा लाके में हिम्मत नहीं थी। एक मा एक मनचना नवयुगक सम्पता का सामा पार कर गया था तो मयना में प्रिसिपल से शिकायत कर दी थी और प्रिंसिपल साइम ने, जो इस विषय में बड़े कद ये उस लड़के को कालेज म निकाल दिया था। इमलिय अय नयना बड़कों के लिये सि क सुन्दर स्वा पन कर रह गई थी। मला श्ररर या मनुष्य न था कि नया को देख कर उसका तीन माता ! यह स्वय मुदाया-गौर पण पड़ी पड़ा मास ममे तक भीगी भागान या! मूछों की जगह रोग थे। ये रोग, जो छ महाने के परचे के मुंह पर भी होते हैं। पदहया सोलह वर्ष की प्रायु होगी। यानी लगभग नमना के परापर या साज मदाने अधिकारट्रेस का इम्तिदान देने के बाद उसो गर्मियों की सुहियों में कई प्रकार के कोकशास्त्र और कामशाला पिलिप फर पढ़ डाले। उसके बड़े भाई के मित्र थात थे तो वह परदे के पाये खड़ा उनकी पाते सुना करता । घेतारका में वे लोग यदे सुन्दर दर अनुभवों को चर्चा किया करते थे। किया एंग्जो इन्दियन मिस को पसने के मन्सूये किसा धकाल की सुन्दर बड़की पर डोर टालने के प्रोग्राम, किला सुदर अभि मात्रा के सुडौल शारारिक अगों का उत्तेजना बढ़ाने वाले गदों में शिक। ये सब बाने अस्तर के मन में किया जिया करती थीं। उसने अक्षिलेला पूर्ण किसा चार दरवेश, 'पदकाता, 'दरबार हरामपुर' इत्यादि नैसी कई फिना कई कई बार पद दालों । इसके अलावा एक दिन उसने अपने भाई को मेज़ की दराज में एक अलबम ससवीरों का भी देखा। द और दूसरे स्याहारों पर उसकी मां से मिलने के लिये औरत याती। उनके साथ नौजवान लड़कियों भी होती । वह उनको धुपके-चुपके किवाड़ों की दराज में से देखा करता था, लेकिन यह था पहुन शर्माजा। लड़कियों से बात करना तो बड़ा बात है, यह तो नवयुवता के सामने जाते ही कॉरने लग जाता। जबान फूल जाती, दिख घरकने लगता-यही हाल उसका अब हुश्रा। पर लड़कों की उन टोलियों से अलग रहता, जो नया के घर की ओर देस देख कर उडा अाहे भरा करते थे। वह अपना जवान पर नयना का नाम तक न जाता था, मानो उसको नयना से कोई काम ही न था। मगर वह नयना ७७ निरसदेह नयना का सबसे बड़ा प्रेमी था। अग्न्तर छिप छिप कर नयना के दशन करता। वह बकरियों को नदी- किनारे घास चराने के लिये ले जाता, ता यह खेता और माड़ियां में दरका उसको साझा करता । वह कुएं पर पानी भरने जाता तो, यह भी किसी न किसा पेड़ का श्राद में बढा उमे देखा करता । और जब कभा सयोगवश रास्ते में मुठभेड़ हो जाती, तो अरतर शरमा कर सिर झुका लेता और वहीं पर खड़ा का खड़ा रह जाता। उसके चौड़े माथे पर पमाने की वू दे चमकने लगती- गर्व, गम्भीरता और सम्मान की मिट्टी से नया का निर्माण हुआ था। वह सिर ऊँचा किये, मौन और घमयड के साथ रानियों की तरह प्रदम उठाता हुई उसके पास से निकल जाती । उसके पाव में पड़ी हुई पाजेम हर प्रदक पर एक रूपहली आवाज़ पैदा करती, और धीरे धीरे दूर पहुँच कर डाकी श्राबाज़ गुम हो जाती। उस समय अन्तर सिर उठाता, कभा-कभी उसकी आँसे पर दया श्रातीं। 1 नयना से उसके इस छोटे से प्रेमी के दिल का हाल छिपा न रह सका। उनको पहिलो भेट मेले के अवसर पर हुई। श्रय तो धार धारे मेलों की जगह नुमायरों से रहा है, और थियेरों को जगह बोलते फिल्म । लेकिन चूंकि यह एक धार्मिक स्थान था, इसलिये यहाँ के मेले का ढगही और था। छ सात दिन तक खूध पहल पहल रहती थी। हवाई पॅगोडे, चरखी, झूले, घार, कुलकी, मिठाइ कधौरी खिलौनों, फूलों और किताबों की मानें साधुओं का टोलियों, दगल और खेल-तमाशे, मोटो गरदन टूटे हुए छान, मैली सुग्दरी तहमदे मालियों, पान, मदारी, पदर, सब पाजागा, रग विरग की कपड़ों वाली धौरतें, घिर, चिड़ियाघर फरपुतलिया के मेज, गगों का रस और मनभनाता हुई मश्खियों। घरतर मेले में घूम रहा था । गजलो का दो पैस पाली किताय हाय में थी, और ऊपर मोटे शहरों में लिसा- "क्यों लूटे म बरले यार के" एक मोर कुछ ननियाँ नाप रही थी। कमी लम्या धूध निकाल आँचल माद से अपनी सुरमई काली खा से इशारे करतो, बिस्कृत नई-नवनी दुरिहन की तरह शामाती, भजाती और पहन चुराती और कभी बोलक की एकहा थाप के साथ पाव जोर जोर से जमान पर मारने लगती, पुँवरुषों की 4 एकदम पार कर दी, सिर नगे हो जाते. भावात ऊँची

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अनिवा धो पा रहने गal an RIT EAT माना गृप erat की सोगे बनी पोर कमा महार पर मिलो दुई पामे sari कभी ई-गई का ताजा हो कर मIT पर गिामे at कमाल form at साह गरदन चौr arm aान को, धौ जब तुझे गौम कमान मापन गो, प्राधा ममाग को शामा मुसकुममा पासी बाम्बी चोरियों या में उसने सगी, भागे माथे पर पसाने का में मनेगी दो म पल पल मने जगती, मज मथुने पकने गत । मुस्य बोध जप काई पनि उसको पेमा या विमा दसा सो यह वरनामा छोनिमागेको मा कालियों में ही खा-सा उगनिया शलम जाती पौर सिमर मरका, पडेनमरे के साथ हाय करमानी, फिर महान स्वर में बना रोप पाप मुंह विसर पर कहा--- 'ययों जी हमारा कला तोह ही वालोगे पपाधऔर फिर १७ an मार का साना यमाता पर भाग जाती और कमा पर हाथ रख कर खिविता कर हमती हुई मारने लगती र से भा रह गया । उसने पत्र मे कममिन नटिनी को हरा दियाई । मगर स ही बद हमके पास पहुँचा, बद यहाँ इक अमान पर कमाग खरा हुमा। अपन पासे दूर तक हम मारगा के साप ऊँचा और साक्षियों को पागों मुनाई देता रही। जिस जगहारों का मा याना चिड़ियाघर था, वहां पर एक पिटर सपना मा था! शरों के शरीर को विशेष प्रकार का गध धारों घोर फैली हुई थी। एक भादमी मोर मुंह मे लगाये परनी मोगे लेकिन मैदा हुई पावा मैं बाहर खड़ा पिला रहा था। याना थियेर कम्पनी में हुया करती थी। दिन समय तो ताश और जादू के मेज्ञों के अलावा गामा भी हाता और माघ भा दिखाया जाता था, लेकिन रात के समय गुलयकावजी, बामगर्ने , शीरी माहा, INT फमावपाशा, नब दमयता, सीता हरण शादि खेल हुधा करत । या पड़ा रोमा था । बाहर सस्ते जाम कर 1 घनाया गया था। दरवाने के एक और रिका येवने वाला अवकाश के समय लाह का पेरा के पास धैठा उस पर अपनी अंगुलियों स नयजा यजामा करता और दरवाजे के दूसरी भोर सड़क कियों के कपड़े पहिने, हागे और गानों पर मुर्ती लगाये, पूल्ही पर हाथ रस, मटक मटक कर नाचते थे। और एक मसतरामा चाहा योगा नयना पहिने उनके साथ दिल्लगी किया करता था। जय अस्तर यहाँ पहुँचा तो खेमा शीय करीय भर चुका था। बाहर इश्तहारी नाच हो रहा था। सैकडों लोग खड़े उनको देख रहे थे। रगीन और तुरदार पगड़ियाँवाले नटम्बर देहाती युवक हायों में वह लिये, चमेली के हारों में लिपी हुई यसियाँ बगला में दवाये पान चबाते हुए पड़े ध्यान से उन खड़कों की तरफ देख रहे थे । कुछ उनको सचमुच की लड़कियों समझ कर घटों तेज धूप में खड़े एक सास आवाज़ में खासते और खंखारते और कई कई तरह से घाख लड़ाते और जब कभी पकौड़ा सी माक घाला मसखरा उन नाचने वाले लड़कों में से किसी के गाल को छू कर पर भाग जाता और दशकों को देस देख कर और इनको इशारे कर कर के अपनी अंगुलियों यों चाटने लगता जैसे उनमें मुरख्या लगा हुआ हो तो ये देहाती घेचैन हो हो कर पहलू बदलने लगते इतने में प्रातर ने नयना को देखा । नयना वही एक मैजा सा पीला लहँगा और एक तग कुर्ती पहिने हुए थी। गर्दन में चाँदी की इंसुली, पाव में पाज़ेय, कलाइयों में माटे कंगन, आँखों में मुर्मा, पिंडलियाँ प्राधा के क्रीय गी, इशारबन्द के नीले पोले लाल फूंदन नाच खटक रहे थ । सिर के बीचोबीच मांग की धारी, काले और घने बालों याज अन्तर ने अपना भाग्य आजमाने की कोशिश की। वह नयना के सीव जा पहुँचा । नयना मसतरे की हरकते देख-देख कर मुस्करा का चोटी। रहा था। देखोगी" अन्तर कुछ देर चुप सदा रहा, फिर धीरे से बोला-"नयना तमाशा नयना ने मसरतरे पर से नजर हटा ली। वह उस समय मिट्टी के एक ऊँचे दर पर खड़ी थी। उसने ऊँमाई से अहतर की तरफ ऐसे दखा, मानो सम्राशी अपने किसी तुच्छ दास की अोर दये। एक पण के बाद कुछ जवाब दिये बिना उसने इसकी ओर से दृष्टि हटा ली और दूर आकाश में उपती हुई चोलों का और देखने लगी तथा अपनी एक टॉग को धीरे धारे घरावर हरकत देती रही। ने जल्दी से दो टिकट खरीदे और नयना के पास जा परा बोला- "मैंने रिट जरीद लिये।" नयना ने धमरा के साथ उसकी मोर देखा और बिना कुछ कहे-मुने मागे ܗ ܐ उदय घात चल दी । अहतर ने हकलाते हुए कहा-"नयना, मैंने किट खरीद मगर नयनारे कोई अवाय हा दिया। यह चलती गई धीर थियेगहाल में दावित हो गई। टिकट चेकर ने उसे रोकना चाहा । बम हाय में उसकी चूदरी का घायल पा गया। वह चिल्लाया--"घर, या छोमरो! कहाँ धुमा गाती है कि निकान" भातर ने बढ़ कर रिकर उसके हाथ में दे दिये-"यह श्या घेहदगा है। यह रहेटिका नयना ने युद्ध दृष्टि से निकर चकर का श्रोर देगा और अग्यात घृणा से भरका दे कर मसन अपना आँचल छुड़ा लिया। प्रस्ट सास के किट और अस्तर का रहसाना ठाठ सेम कर यह कुछ जित-सा हा गया । तर से बाला-"मात्र काजिय, मालिक, मुझे मालूम नहीं था।' यह था उनका प्रथम मिलन । अतर की प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था। X इस मिलन के बाद उनका मित्रता में उताति, कालेज के निकट हो एक नया टाका हाउस खुलने पर, हुई। जर बिरिउग के बाहर रग विरग का मतियों लग गई, सो बाजेवालों का शोर, मिस नाडिया की यादभ तस्वारे घड़े बड़े पोरर यह सय कुछ देखने के लिये लड़के प्रस्च इष्ट हो जात, उनमें नयना भी शामिल होता था। सध्या समय सिनेमा हाउस के सामने छिटकाव हो जाता। दो पक लाल पहिया वाले कानिसिविल भी घूमने लगत । बोता गॅडेरी थाना बड़े मधुर स्वर में धर्फ म दवी और गुजार में पसा हुई गडेरियों के गाने गाता, चाट और उयले हुए चने, और एक पैसे में शरबत का गिलास बेचने वालों का मजमा होता गानों का छोटी-छोरा किताब बेवने बाल छाकर गला पाई फाई कर चिलाते। अखाड़े में दो चार लड़ने वाले साई-बौंह काला नीली सहमद यधेि त हुए इधर से उधर मटरगश्ती किया करत । अरन्तर ने एक गेट कीपर को गाँठ लिया। चार धाने की घूस और नयना दोनों यज्ञ देख पाते । नयना सिनेमा बड़े चाव स देखता था। इसी प्रकार दिन यातते गये । नयना अस्तर से हिल मिल गई थी। मगर असने भाग तक प्रेम प्रकट किया था, न उसके घमय में कोई खास नयना परिवन ही हुआ था । वह पूर्ववत् चुपचाप रहती, जो-कुछ कहती वह भी बड़े सक्षेप में। लेकिन भरतर जो कुछ कहता वह चुपचार सुन लेतो । उसके प्रेम के दावों को न तो उसने कभी मुठलाने की कोशिश की और न उसके जवाय में स्वय उसने किसी प्रकार के प्रेम का दावा किया । मगर उसको अन्तर का साथ नापस द न था । श्राइ के पेड़ के नीचे, नदी किनारे, घर से दूर यह पटों बैठी उसकी बात सुना करती। उसके अपनेपन में भी एक प्रकार के परायेपन की मलक थी। जिसके कारण अस्तर अपने मन को सुछ सी इच्छा भी पूरी करने से झिमकता था। क्या यह नयना की थत्यधिक उदारता और ससके साथ प्रास रियायत नहीं थी कि यह केवल प्रस्तर ही से मिलती था। उसके पास जब तक चाहे वह बैठी रहती थी, उसके प्रेम की पद पढ़ कर की हुई पातों को चुपचाप शान्ति के साथ सुना करती थी। और सम्भव है, वह उन पर विश्वास भी रसती हो।-नयना की ये बातें अस्तर को इला अग्नि को भड़काती ही चली गई। । x x x गर्मियों की एक सध्या की बात है- अस्तर नदी किनारे वेता में प्राइ के पेड़ के नीचे बैठा नयना की प्रतीचा कर रहा था। सूर्य चितिज के पास पहुँच चुका था। उसकी किरणें पानी की लहरों पर नाच रही थीं। बड़ी-बड़ी नौकायें रेत की बोरियों से लदी हुई मन्दगति से यहती चली जा रही थी। चन्द पदा बड़ी तेजी से हवा में चार लगा रहे थे। मौका पा कर ये पानी पर झपटते और कुछ न कुछ ले उड़ते । दा ढाई फलांग पर नदी का लाल रंग का लोहे का दोरा पुल था। कभी कोई इजन शर करता। ऊपर वाजे पुल पर मोटरों, बारियों, एकही चौर साइकिलों का तांता मेधा हुमाया। कमी कमी तो ॐों को लम्बी कतार भी दिखाई दे जाती थी। नदी के किनारे किनारे दूर तक सरद सफ़ेद कपड़े बिछे हुये थे। धोपियों को 'बुमा' को मदिम आवाजें सुनाई दे रही थी। और गधे बड़ी सुस्ती से सूपी हुई पास पर मुंह मार रहे थे। नयना थाई। उसके हाथ में अभी तक वह घेडौल-सी पड़ी थी, जिससे यह दिन भर अपनी पारियों को हाँकती रही थी। यह रक गई। उसके पाजेयों का मकार भी सरम हो गई।

" "सुम कहाँ थी यना ! में दोपहर से पेशा तुम्हारी राइ देख रहा हूँ।" नयना के होठों पर हलकी मी मुस्साइट खला लगी। उसने अपने मैले हार्या को बहंगे से पोंछते हुये कहा-"देखो, आज मने मेंहदी लगाई है।" इसी प्रकार देर तक भाजस्यमय दातालाप होता रहा, यो हो, सिनेमा की पातें, किसी नाव के दूर जाने का किस्मा पेड़ों और नदी के पानी पर विचार विमर्प-ज्ञान-सी यातचीत, मिला राजा रास शौर से घबर का पुष भी मना नहीं पा रहा था । वह नयना के मइदा लगे हार्थों और पैरों की ओर देख रहा था। यात उपका बहँगा मी धुला हुआ था, चुस्त पुर्ती भी सा मालूम होती थो, आँखों में काजल भी सावधाना के साथ लगाया गया था और बाल भी चिकने थे । नई रंगी हुई प्रोदनी में अपरक के कण झिलमिल झिलमिल कर रहे थे। और अवरक के कुछ कण उसके स दली माथे पर चमक रहे थे। "भयना ! क्या तुम कपड़े धोने के लिये धार पर नहीं जाती ?" "नहीं" नयना हॉों को मनोहर दग से हिलाती हुई बोली। "क्यों?' "मेरी मां कहती है, मेरी बिटिपा शाहजादी है तर ने कहने की परम स कहा-'सो फिर 'क्या तू यों ही दिन मर वा मक्खियों मारा करती है" 'हाली, बैठी रहती हैं। बड़े प्राये यहाँ से काम कराने वाले मैं तो यकरियों धराया करती हूँ।" "उड, पदा पाई बकरियाँ घराने वाली । क्या शाहमादियाँ पकरियाँ चराया करती है।" नयना के पास इस अजाब तर्क का कुछ भी जवाब न था । वह बिगड़ कर उद खदी हुई थौर जाने लगा। अपनर न रोका । वह कधों को जोर से हिला कर पोली--'नहीं-नहीं, अब मैं नहीं ठहरूंगा।" बड़ी मुश्किल से अनर ने उसको मनाया। सूर्य अस्त हो रहा था । दूर से यसरी का धीमा प्राधा पा रही थी। ॐ बालों को तानें, बहुत दूर पर गधों की 'देवू ठेचूं' और एक अकेला कौमा बीच खोले पेड़ के ह पर बैठा खे) के कम पर दृष्टि दौड़ा रहा था। लेकिन सब श्राया धारे धीरे खत्म होती जा रहा थी। वातावरण पर निस्तधता मॅडराने छगी। नयना भी अपने स्वभाव के अनुसार चुप थी और अहतर के दिन में निस्य को भौति भावनाओं को उपख पुष नयना नयना ८३ नदी से परे सितिष में मिल जाने वाली पगदी पर जमाये हुये थी। और मानर नयना की ओर देख रहा था । सूर्य को अन्तिम कि अज की बातो मेंस रही थी और टनका घश्म नयना के मोने पर पड़ रहा था। बहरों का तार पदाव उस सोने पर सिनेमा के एक प की तरह दिखाइ पर रहा था। " तेजी से धमकी हुई प्रकाश को रेखायें उसके सीने पर प्रकर हो का वह रातो हुई उसकी गरदन का भार पदती भोर सादी तक पहुँच का लुस हो जाती। सध्या की इस पानन्दमयो शान्ति में नयना को सामने पाकर भटनर के धेय का बाँध टूट गया। अरतर ने नयना का हाप माम लिया। इसके होठ कर रहे ये-जा के पुल पर न कोई मोर था, न इजन, ने साइलि । भोर तां पर निस्त-पता का राज्य था। ऐसा लगता था, मानो प्रकृति पजे के बल चुपचाप खड़ो यो। कपित स्वर में अरतर योना-"नयना मैं तुमसे प्रेम करता हूँ। बहुत अधिक, बहुत हा अधिक । हर दम न जाने उसने और क्या-क्या कह डाला । नयना मौन रहो और सृष्टि पर भी निस्तब्धता का राज्य था। श्रमतर ने अपने श द स्वय याने कानों से सुने, वह उनके कपन, उनकी विनम्रता का अनुभव करके स्थय धरा उठा, यह परेशान हो कर चुप हो गया। यह रहस्यमय शान्ति उसके हृदय में एक विचित्र मय सा उत्पन्न कर रही थी। उसके मन में एक प्रधी इच्छा यह थी कि यह शान्ति विमी प्रकार मा हो जाय। और यह शान्ति भग हो गई। लोहे के धुन पर स्कूल के पद क्रिक दोकरे किसी स्काउट गीत को गत पर सीरी यपात हुये चले जा रहे थे। तिर्को टोपियों चमकती हुई प्रोत, योकी चाल, सड़क पर पड़े हुए छोटे-बाटे पथरी को ठोकरें लगाते हुए। अपोथगिरिक उन छोकरों की आवाजें सुन कर अरर के मन को बाइस-सा हो गया । मगर उसका शरीर चूर-चूर हो रहा था। नयना अब भी युत पना बैठी थी। घटतर ने उठने की कोशिश करते हुये कहा--"नयना, मैं जाता हूँ।" नयना ने उसका हाथ धीरे से क्या कर कहा-"हो।" यह उसने इतने धीमे स्वर में कहा था कि उसको थावाज और पूर्व मौन में अन्तर कायम करना असम्मय था। भरतर एक खरीदे हुये गुलाम की तरह वहीं जमीन पर ८४ पेगा और मयना का गारी दानों को यो पगा। मेशिन चास इसनी माणहीन भी किया को मोह होने लगा कि 'थे"शार मयमा कमही इस अपने होठोमनिकने थे। पातर मे मयना के छाप की सा रेवना धरू किया, उपके दायों में एक कफी की मालियापन पण-ौर नाम मा का दाय मुफ र सपने लिया सरमा नपना मे बड़ी के माप सपना हायपाद गय प्रिया । वह एकदम स उठ सदा दुई। उँधा सिर और चमिमामा ने मामाने लगी होडकापन एगे भुने फाइने माप मे सुपाना चाहती घी, मगर शोधागग में यम मुंह में शब्द निकालने थे। इसकी मुहियों मित्र कर रह गई- माता किम विचार में था। उसने मयमा को अपने पाहुपाश में दीप लिया। मपना ने उसके पात्र माप लिये, शिक्षा कर बोला- "छोष मुमका, मही प्रभा नि।' अमर मे दिना वृक्ष पार दिय अपने हो से उसके जलसे और कापत हुए छाउर दिये। नया सपने बगी। खेकिन अपतर को मजबूत बाद का पका होती चली गई। मयमा विश्य हो गई। उमन हाथ पैर हिलाना मन्द कर दिया। भातर ने अनुमय किया मानो यह किमा बास को गले से भगाय शहा हो। उसने अपना पाहें डीली कर दी और मयना टूश हुई शाग की तरह उस पैरों में गिर पड़ा-फिर यह फूट-फूट कर राने लगी। महार घरा कर उसके पास ही बैठ कर उसका रहे प्यार से दिखामा यो क्षगा-'मपना ! देखो, मरी भार देखो तुम सफा हो गई। पम इतनी सी बात पर । यस रा-सा हाम घूम लन पर मैन मुमको छहा ही क्या है ? सतायो बोलो, क्या सुमको प्यार करने में पुराई है? सा नयना बालो कहोग" नयना ने उसके गट में या दान दी और अधिक फूट-फूट कर रोने लगी। अरतर न उसको पहुत ढादस दादूर हडमास्टर के धगले क रेडियो से शह नाई का कोई पत उदने लगा। यही दवा घरहने लगा, जिसमें मा के टपटे पाना की-सा नमाया। पृच झूमन लगे । माह के पैर की पसियाँ तालियों बजाने शौं । नयना रोते-होते मुस्कराने सगी फिर शरमा कर धाँधल में मुंह छिपाने लगी। बड़े-बड़े पाल रग के मना नदी के किनारे दूर र तक बैठे चादनी का मानन्द ले रहे थे। कभी कभी ये पल उलूल कर छलांग लगाते और आज नयना का गहराई में दुर जाते । प्रस्तर और नयना उनको देख देख कर हंसते रहे और बात करते रहे मीठा-मीठी, मिमक मिझा कर । जय प्रातर जाने को तैयार हुमा, तो उसके साने पर नयना के गाल बगे थे। अरतर ने उसके बालों पर हाथ फेरते हुए कहा "अच्छी नयना! अच्छी शाइजादी। बतायो अब तुम मुझस सफा तो नहीं हो ?" नयना ने मुस्करा कर अपना बाहें उसकी गदन में डाल दी। श्रान्तर नयना के पास मुंह ला कर बोला-'देखो नयना कल कल नहीं परसों। हाँ परसा रात को जब तुम्हारे घर में सब लोग सो जायें, तो तुम यहीं, इस पेड के नीचे या जाना~यानी करीब ग्यारह बजे समझो और याद रह सूरज निकलने से पहिले वापस नहीं जाने दूंगा।" नयना शरमा कर पेड़ को थाई में हो गई। बदतर ने उसका हाथ थाम लिया । "श्राभोगी ? बोलो, नयना। शाहजादी" नयना हाय छुदा परे हट कर घाँदनी में दुविधा की मूति बनी खड़ो रही । एक क्षण के लिये मुका मुका प्रोगों से जमीन को पार देखती रही। अल्सर के दुपारा पूछने पर उसने मिर हिला कर स्वीकृति दी और फिर एक छलोग मार कर और दोनों हाथों से मुंह छिपा कर घर की ओर ऐसी भागी कि उसने पीछे घूम कर देखा तक नहीं। x सबसे पिछली पंच पर बैठा हुथा अन्तर विचित्र मानसिक इलझन में फैसा था। घाज सुवह यह उस मृत स्त्री को देख कर पाया था और आज ही नयना से भी मिलने का वादा था। अतर के मस्तिष्क में मैकड़ा विचार प्राते और चले जाते थे। उसको रिसी तरह धन 7 थाता था। दिन भर उपका मन उजमा रहा। तस्वीर का यह दूसरा रन उसकी रष्टि के सामने एकाएक भा गया। उसका शुद मारमा इस प्रकार के घृणित पाप का मार न सहन कर सकती य । शिष्टाचार या नैतिकता का कोई भय उसके निकट निश्चित न था, महिक उसके अपर यासना से भो प्रपल कोई भाव ऐमा भा था, जो उसको इस हरकर से पाज रहने पर विवश करता था। वह यना को अपना वासना तृप्ति का साधन नहीं यनाना चाहता था। उसने अपने इस मानमिक परिवतन को मन हा मन उदय भरत - अत्यात कायरतापूर्ण भी कहा, मगर फिर भी यह स्वय को ऐमा कार्य करने पर प्रामादान कर सका। पार पार वही श्य अपने समस्त धिनवनेपन के साथ उसकट के सामोश्रा जाता-मनमनाती हुई मक्खियों, पटे हुए विध, मुर्श बधा पपराइ हुद्द कास, भयानक शोतन चहरा, अधखुले अंधरे मुंह में स बहता हुई राल, सलाजनक हद तक ना या शरीर, काला डाला पेट अगर को प्रसा क्षागा मानो नयना का पेट फूल कर मटके के बराबर हो गया है। वह स्वय उसस कतराता है, और फिर जैसे धारे धारे गुरांती हुई आवाज़ कह रही हो- "पापिन, कला, कलकिना "इससे विवाह नहीं कर सकता था पिता की एक घुड़की से उसका प्रेम काफूर हो जाता। बेचारी पूले हुय पर यानी नयना कालेज से बाहर बड़े लेटर यास के पाम पागलों की तरह अपनी आँखों का कीषद विन से साफ करती रहता है उफ !' भरनर को नयना की आखों का, जिनमें सताय का अभिमान था, ध्यान या गया और उसका रसाह और भी शिथिल पड़ गया। उसनहे मे जबरदस्त प्रेमी का मस्तिष्क इस समस्या का हल सोच निकालने में असमय था-नयना का पवित्र प्रेम उसकी इस नाच कर्म से पाश रहो पर विवश कर रहा था। वह सोचने खगा-क्यों न इस स्वप्निल नयनों वाली कुमारी का लाज़ मेरे लिये एक पनि रहस्य होकर रह जाय-लेकिन ग्राह। वह अपना भोली प्रेमिका को क्या मुंह दिखा सकेगा। x घाकाश में चद्रमा चमक रहा था और रात का यधकार नयना की बातों में शरण लिये हुए था-नयना थाइ के वृक्ष के नीचे खड़ी था। खोई का पुल एक बहे मगरमच्छ की तरह प्रकर हो रहा था। मकानों से धुनों उठ-उठ कर पायु-मण्डल में पैजता जा रहा था-नयना हाय में एक कुराहत लिय अनार की प्रतीक्षा कर रही थी। आज उसके लिय इला बना कर लाई थी चौर एक सापी, जिससे बह वय अपने हाथ से अपने प्रेमी को हलुमा पिलाना चाहती था। उसके समान भावों का वध टूट चुका था और उस इस पर नाज था। माज वह सूर्योदय से पहिले घर नहीं जा सकती यो। यह सोचते ही वह आप ही पाप सिमरने लगat कितना गवपूर्ण था बस्तर का मश। x नयना ८७ अनतर अभी तक नहीं पाया था । कहीं यह प्रतीक्षा करके लौट तो नहीं गया १ मार नहीं, सामने कालेज का पड़ा घण्ण दिखाई पड़ रहा था। उसके अन्दर पीले रंग की रोशनी हो रही भी । टेनिस कोर्ट के पास नदी की भोर मुंह किये कालेज के रेस्तरी का काला मैने र सफ़ेद धोती बोधे खड़ा था। नयना उचक-उचक कर दूर जा र गुम हो जाने वाली पगडदी की थोर देख रही थी। घाट और मन्दिर पर सन्नाटा छाया था। कोई सुन्दर-सी बाँकी सूरत श्रमी प्रकट होगी-काला अचकन, सिर पर भजमल की किश्नीनुमा टोपी (यह लाल रंग की टोपी अन्तर के लाल सफेद शरीर में खूप सिलती यो) धरहरा शरीर कोमबाग बिना मूंछ का प्रेमी मुस्कराता हुश्रा माता ही होगा। कनपटी के पास, टोपी से बाहर गहरे भूरे रंग के दो तान लच्छे पालों के कोमल सी छड़ी घुमाता हुधा छोटा-सा अयोध प्रेमी यही मदिर के कोने में से निकलेगा । 'मयमा शाहजादी " यह कहेगा । उसको देखते ही नयना पीठ फेर लेगी रूर जायेगी, नहीं घोलेगी । गुदगुदाने पर 'सेगी भी नहीं । यस यों ही मुँह फुलाये बैठी रहेगी। यह कहेगा-'देखो, नयना ! सुनो, शाहजादा । भला तुमको प्यार करना भी पाप है' नयना मन ही मन ओर से कहेगी-'नहीं, पाप ही है। 'मगर कृमिम क्रोध प्रकट करती हुई कहेगी-'तुमने इतनी देर क्यों लगाई?" अाता भास झुका लेगा। वह माशेश के बैग से कहेगी-'मुंह खोलो, खिं पद करो।' फिर यह सीपी भर हलुवा उसके मुंह में ठूस देगी और अन्तर का अभी तक पता मथा। अस्तर अाज अपनी नयना को देखेगा । इसलिये नयना की तैयारियां पूर्ण थी। मेहँदी, काजल फूला के हार, धड़क्ता हुया हृदय, कापता हुअा शरीर, मद मरा स्वर-जैसे-जैसे देर होती जा रही था, नयना के कोमल हृदय के भाव सोते जा रहे थे। कितनी ही देर तक नयना अपने मेहँदी से खान हार्यों को देखती रही। फिर वह अपने धादी के कैंगनों का निरीक्षण करती रही-यों ही थालस्य और सुस्ती के साथ पहाड़-सी घड़ियाँ कारती रही । मगर बरनर ना | जाने कहाँ रह गया था। उसके केसरी गालों की जर्दी और भी बढ़ गई। क्या वह सचमुख न आयेगा। खेर्ती की धरा देने वाली निस्तब्धता में यह धारे धीरे सिसकने बगी-थाधी रात इधर, आधी रात उधर । उल्लू उदय-मस्त पिक्षाने लगे और में गुरों के भीषण शोर में नयना की सिसकियाँ दूर कर यह वहीं पारा के सने से पौडगा का ऊपने क्षमोति यह हम दोनों हाथों में थामे साने से बगामे यही पर सो गई। मुदर स्थानों में यह प्रेमी को निकर देख कर प्रक्षा होती रहा-पर्मियों की बग्मी रात-'सूर्यादय से पहिले धा यापप्त नहीं जा सकेगी उसके छोटे से रसीजे और रगीले प्रेमाने यदा तो कहा था। मुग बोसने लगे। नयना भाग उठी। उसमे हुए बाल, गई में सने हुए कपड़े हथ में चीटियों से भरा हुमा कुरा-उसकी पलकों पर भास् मोतियों को तरह , - कॉपने लगे। x x दूसरे दिन प्रातर ने बड़े बूतों की हर सम्भव घेष्टा के बाद भा सैकड़ों पहानी से कालेज जाने से इन्कार कर दिया । इसलिये घोड़े दिन बाद उसे दूसरे शहर में शिक्षा प्राप्त करने के लिये भेज दिया गया-उसने कसम साक्षी कि पहलमा भी नयना को अपना मुंह दिखाने का साहस न करेगा। हारे हुए धीर सैनिक और सिंहासन च्युत सम्राट की तरह वह दूर-नया से बहुत दूर, चला गया। शाहजादी नयना को जब घडतर वीसूरत कभी भी न दिखाई दो, तो उसने अपने नन्हे से हृदय के अपरिमित प्रभाव को अपने अल-हयाले नम्बर प्रेमी की जमाई से पूर्ण कर लिया। उसने प्रेम के दरवाजे सदा के लिये बन कर लिये । उसका विवाह हुआ, तो उसको मारमा पर विधवापन छा गया। चादनी रात के एक मनोहर पश्य की मांति उस सुदर चित चार की स्मृति को अपने हृदय की गहराइयों में सुरक्षित कर लिया। पहिले वह अपने प्रेमी के लिये शाहजादी से दासी बनी और श्रम पह उसको अपना भाराध्य देवता मान चुकी थी। लेकिन सच्ची श्रद्धा और धाराधना करते हुए मा भयना ने यग्ने देवता का यह महापाप आजीवन पमा नहीं किया। -सरदार पनवत सिंह -- शैतान उस रात सयोगवश मैंने शैतान को स्वप्न में देख लिया। ख्वाह मख्वाह दिखाई पड़ गया। मैं रात को अच्छा मला सोया था, न शैतान के बारे में कुछ सोचा था, न कोई चर्चा हुई थी। न जाने क्यों शैतान से सारा रात बातें होती रहों और शैतान ने स्वयं अपना परिचय नहीं दिया कि, "नामसार को शैतान कहते हैं।" यह मेरी अपनी कारपनिक तस्वीर थी, जिसने कान में चुपके से कह दिया कि यह हजरत शैतान हैं। छोटे-छोटे नोकदार कान, जरा जरा से सांग, दुपले पतले, पास जैसे लम्ये, एक लम्बी दुम, जिसकी नोक और के समान तेज थी । दुम का सिरा शैतान महोदय के हाथ में था। मैं डरता ही रहा कि कहीं ये धुभी न दें। एक अजीव यात और थी कि शैतान ने ऐनक लगा रक्खी थी। अब सुबह चाय की मेज पर बैठे तो मेरी घाखें खुली-को-खुला रह गई। रूफी की शकल बिलकुल शैतान से मिलता थी। शान क्या हरकतें भी वही थी वैसा ही कद, वहा छोटा-सा चेहरा, लम्पी गदन, वैसी ही एनक, वही कुटिल-सा मुस्कराहट । मुझसे रहा न गया। मैंने चुपके से रनिया के कान में कह दिया-"रूफो शैतान से मिलते हैं।" यह बोली-“श्रापको क्या पता?" मैने कहा-"अमी-अभी तो मैंने अमली शैतान को स्वप्न में देखा था।" हुकूमत थापा रजिया के साथ बैठी थीं। उन्होंने जो हमें काना फूसी करते देखा, तो बस बेकाबू हो गई । तुरन्त पक्षा-"क्या है ?" रजिया ने बता दिया। हुकूमत मापा को तो ऐसा मौका मिल भर जाय । यस मेज के गिर्द जो जो बैठा था उस पता लग गया कि रूफी का नया नाम रक्सा पा रहा है। लेकिन केश्न स्वप्न देसने पर तो नाम नहीं रक्सा मा सकता था। वैसे रूकी ने हमें तग बहुत कर रखा था। बच्चों तक की इच्छा थी कि इनका कोई नाम रखा जाय । हम चाय सस्म करने वाले थे। मुझे अपने प्रामबेट का इन्तजार था और रजिया को काफी का काखेत में घमा प्राध घण्ण माना था, इसलिये मजे मजे से नाश्ता कर रहा था इतने में गन्हा हामिद मागा भागा श्राया। स्थूल उदय प्रस्त का बात हो गया था इसलिये जरदी में पा । रती के परावर बैठ गया। हामिद को धुनार हो गया था इसलिये उसका हजामत रा पारीक करया दी गई थी। रकी मे यही सजधाई दुई टि से हामिद हे सिर को दबा । जैसे ही हामिद ने रोट खाना शुरु किया रकी ने एक इका-सा धरत हामिद के सिर पर तमा दागौर मैंने तुरन्त रशिया मे कह दिया--"प्रातिर, रूसी शैतान ही तो हैं उगुर्गो ने कहा है कि अगर कोई गे सिर खाए, तो शैतान धोख मारता हुमत पापा चाक कर हमारी घोर पाकृष्ट हो गई । दाको पता पलना था कि सारे कुटुम्ब को मालूम हो गया कि स्त्री थाप से शैतान बनायेगे। यह था सारा रिसा, जिसस सी शैतान महशूर हो गये। कुछ दिनों में हर एक का दान पर यह मया नाम पद गया । स्वय रमी ने इस शाम को पटुत पसन्द किया। चोख-"जय में हम करके लोगा, तब मुझे शैतान म फाइना । राय में इगलीस (शैतान का दूसरा नाम) बन कर पाऊँगा।" और मै बचपन के दोस्त थे, और मुझे उनका सारा कहानियाँ यादीं। जब हम विशाल छोटे-छोटे थे तय एक दिन रूकी को उनकी मानी अम्मा इतिहास पढ़ा रहा था। जब पत्थर और धातु के युग का जि पाया तो स्त्री ने मुंह बना कर प्ला--"नानी-अम्मा, थाप पत्थर के जमान में कितनी यही था?" फिर कहीं सुधरात, उपरान का शिब पापा, तो भाप कहने लगे- नाना अम्मा, सुकरात और बुरात कैस ये" उन्होंने पछा-'क्या मतलब तुम्हारा !" श्राप कहने लगे-'अापने को देखे होंगे" हर धरत रूपी को कुछ न कुछ सूझता रहती थी। हमारे स्कूल के सामने जो सहक थी, उस पर असण्य घोदे गुजरते रहते थे (सगरों सहित)। कोई सवार मजे मजे जा रहा है । एकाएक रूसी चिलाते-'थरे जनावमा सवार साहय ! यह कुछ गिर पड़ा है-घोड़े की दुम गिर गढ़ है उटा खाजिये, साहय, नहीं तो घोडा लहरा हो जायगा। और सवार तुरत चौक कर ठहर जाता और घूम कर देखता। प्रास कर घोहे को दुम तो अवश्य हो देखता। एक दिन रूनी क्लास में साता ले धाए । पूड़ा-यह क्या हात - शैतान यह बोले-"अभी पिछले महाने मैंने पढ़ा है कि तोता सौ साल तक जिन्दा रहता है। मैंने सोचा कि लिखो लिखाई बातों का क्या भरोसा ! खुद करके देख लेते हैं।" मास्टरों से तो सदेव मुन्दमाशजी रहती थी। एक दिन मार साहय ने चहलकदमी का अथ पूछा । किमीने जवाब न दिया। रूपा उठ कर बोले- "दो बार बोस कदमी।" उनकी समझ में न भाया । रुकी बोले-"जनाय, चहल के मानी हैं चालीस और बालास दमा से दो बार बोस सदमी कहीं अच्छा लगता है।" भूगोल के अध्यापक महोदय ने एक दिन रूकी से पूदा-"प्रगर तुम पूर्व की ओर मुंह करके दोनों हाथ फैला दो, सो तुम्हारे बाएँ हाथ पर क्या होगा?" रूकी न वही मुममुसी शकत बना कर कहा-"अंगुलियाँ।" और गणित में तो बिलकुल किसही थे । सवाल पूछा जा रहा है रसधे के सम्बन्ध में, जवार शिकलता है महीनों में । इसी तरह महीनी का पवाय कुत्ते और बिल्लियों में निकल रहा है। पछा- "प क्या बदतमीजा है" जवाय मिलता-जनार, मैं क्या करूं? यह कमबस्त जवाय इमो सरह आया था।" धौर फिर जब मजदूरी और समय का सवाल निकालते, तो जवाब प्राता सया तीन लड़के या साढ़े सास खियो । इम पर मास्टर साहब बहुत चिहते । एक दिन स्की ने जवाब निकाला '२/३ चौरत ।' मास्टर साहव गरज कर मोने-माखाया, २/३ औरत भा कभी देखी' धाज तक रूका सिर खुजला कर बोले-“जनाव, कोई लड़की होगा!" और जब दूसरी कक्षा में इन्सपेकर साहर मुषायना करने रूपी से बहुत सुश हुये चौर इनाम दे कर गये । उहोंने पक्षा--"अगर पानी किया आय, तो क्या बन जायेगा हमने सीधा RI Rो कह देंगे कि या बन जायेगा। स्फ्रोपोले-"कितना उएटा किया जाये।" यह योद्धे---"हुत ठपदा किया जाये।" रूसी सोच कर बोले-"तो वह बहुत ठपदा हो जायेगा।" "यहुत' शब्द को रूकी में बहुत खौध कर रहा। धगर और भी ठपडा किया पाय" "तो फिर यह और भी उपहा हा जायेगा,"-रूप मे पे साक्ष्य के थाए, होयह ठयदा उदय अस्त स्वर की नकल उतारते हुए कहा । हस्पेकर साहब मुस्कराने लगे। बोले-"अच्छा, अगर पानी को गर्म किया जाये, तब" "तब वह गम हो जायेगा।" "नहीं, अगर हम उसे बहुत गम कर और देर तक गर्म करते रहें, रूपा कुछ देर मोचते रह, फिर एकाएक उछल कर बोले-"हम जानते चाय बन जायेगा" इस्पेक्टर साहब ने बहुत ज़ोर का ठहाका लगाया। मासरों ने कोशिश की कि कहीं इधर-उधर ने जाय कि तुधे पूर्ववत् यहीं खडे रहे और रूप से सवाल किया--"बिल्ली का कितनी टाँगे होता है?" "करीब करीब चार" "और पाप?" "कम से कम दो " "और दुर्मे ?" ज्यादा से ज्यादा एक!" इन्स्पेक्टर साहब हँस हँस कर लोटन कवूनर बने पा रहे थे। "और कान" उन्होंने पूछा। 'तो क्या सचमुच श्रापने अय तक पिल्ला नहीं देखी" रुफी मुँह धमा कर बाछे। और इस्पेकर साइव हँसते-हँसते लुढ़क गये। इन दिनों हम और रूका दोस्त थे। x में जज साहब के यहाँ रहता था। पहले भाइम वहीं रहते थे। पर अश की बदली हो गई और यह एसा जगह बदल कर गये जहाँ कालेज तो एक पोर, कोई स्थूल तक न था । जज साहब ने होस्टल न जाने दिया। इधर सनकी बेगम ने अम्मा से पूछ लिया था। यत मैं उनके यहाँ रहने लगा। रूफी भी वहीं रहते थे। जग माहब से उनको कोइ दूर को रिश्तेदारी थी। मेरा अनुमान थाकिस्ता उनके मतीजे थे। मुटुम्ब के सारे लोग मुझे अच्छे लगते थे और इनमें एक हस्ती तो मुझे सबसे अधिक प्रिय थी-4 थी रशिया! और जिनसे मैं डरता था यह थी रजिया का यदी बहिन, जिनका असली नाम तो ख़ुदा जाने क्या था, सप पञ्चे उ हुकमत पापा कहते थे। मेरा हा थायु का यी या X शैतान शायद कुछ बड़ी ही होगी। यदि यह वही न होती, तो मैं चौर रज़िया कमी के बड़े गहरे दोस्त बन गये होते । लेकिन मैं उन्हें एक योग्य भी न माता था। सारा दिन काल में बीतता। शाम को खेलने चला जाता और रात को सिनमा । रजिया से बाते करो का समय ही न मिलता । हमे भर में एक-दो धार मौका मिलता था यह भी हुकूमत पापा की भेंट हो जाते । बनती तो उनकी किसीसे भी न थी हाँ, मुमसे और रफी से खास लगाकर थी! मैं तो चुप हो जाता, किन्तु रफी वह जवाब देते कि हुकूमत श्रारा खिसिया कर रह जाती। सारे दिन लहती मगढ़ती और दूसरों की व्यर्थ धालोचना करती रहती। किसी बात का शहर में हिंदोरा पिटवाना हो तो जा कर हुकूमत प्रापा से कह दाजिये । बस, हर एक को पता लग जायेगा। में बिलकुल न समझा कि आखिर इनकी पालिसी क्या है, इनके उद्देश्य क्या है ? क्री का प्रयाल यह था कि यह अपना भा समय नष्ट कर रही हैं और दूसरों का भी । और मुझे उनका यह खयान विलकुल सच मालूम होता था। उधर मैं और रूफ़ी बड़े गहरे मित्र थे। मैंने कोई बात भी उनसे छिपाकर न रक्खी थी यहाँ तक कि रजिया के विषय में भी सब कुछ उहें पता ससा था। और जो बाते हम भापस में करते वह तुरन्त मैं रूको से कह देता और सदैव उनकी सलाह से काम करता । रूकी बड़े प्रेम से मुझे बताते कि धान रजिया से यह कह देना आज यह पूछ कर दखना, प्राज यह करना, थान यह करना। और मैं उस तरह करता। x हमें एक साय ने सिनेमा देखने के लिये निमाण दिया । बिलकुल नये दोस्त बने थे। वह मा इस तरह कि एक दिन अपने पिता के साथ वह जज साहब से मिलने पाये। वहाँ मैं और स्फा धैठे थे। उनके पिता रूफ्री की पाती से पड़क उठे, बोले- क्यों, बेटे, माज-कल तुम क्या करते हो?' रूक्री बोले-"जी, अाज कल में थी० ए०का इम्तहान दिया करता है।" और धास्तव में रूपोन जाने कितने वर्षों से पी० ए० का इन्तहान दे रहे थे। पिर वह बुजुर्ग जज साहब से बोले- क्या बताऊँ, चिता भी चाहता है कि धाप को फोन कर, मगर नम्बर भूख जाता है। भाजकल तो कुछ भी x x उदय पात पादनही रहमा । पहले पारा के सौर पर पफ मोर-गुरु में ऐसी मान खिश दिया करता था लेकिन अब यह मार पुरुहोपोभूनामा हुँ।' मीधेि-नी कान का मा पा का सामने एक हिमाल में पद मास हो प्रहर" यह बोले-"पारूर।' मीयोले-"उR बिना या हिप हो कि ऐसे लोगोंदास राहो- रममा साहिये, जिनके प्रोन नम्बर विज भासा से-4ta हमार दोहार या पार सायास | प्रगा यह न होम, मो नारा तोर मे मुनाला (प्रवचन) करना शाहिये। गेम मोमाजी को याद बरमा विजयुत चामान है। अगर यह समय लिया आप कि इसमें पचपन "TRI कर दिये जाये, तो सात सौ बन जायेंगे और अगर सात सौ में तीन सौ जमा कर दिय जाय तो एक बार बन जायेगा। इसी घर मt तो पैतालीस को सौ पंगासीस में गुणा धर दिया माये, हा सिर्फ चार बार सो पास पन आयेगा और अगर हम याद रखे कि सौ पैंता वीस सिप रपये धार पाने और पाच पाई है, सो उसे कभी नही भूल सकते।" उधर यह युजग हंसी से लो पोट हुए जा रहे थे। सा कहल जा र६ थे-"अगर यह भी न हो सके, तो फिर यही ठीक होगा कि इतिहास की पुस्तक साल का जाय और उस नम्पर का सन् सलारा किया जाय । जैसे दमो कालो में से भगा ए का अक का देतो पैतालास रह जाता है, और सन् पैंतालीस ईसा के पहले सीज़र को हमेशा के दिये दुनिया का टिस्टा मान लिया गया था। उधर यगा इसमें एक हजार डोदद तो इसी सन् सोख सौ पैंतालीस में नैरोपी की लड़ाई हुई या।" यस, रसा दिन से यह मुग और उनके सुपुर हमारे दोस्त बन गए। सिनेमा में देर थी। मैं रूम के कमरे में गया । देखा कि बैठे हामि को पदा रह ६ पला--"यह क्या?" बोले-धेगम कह कर गई हैं।" मैं भी पास बैठ गया। रूपी बोले- क्यों न है, दुनिया में कुल कितने ॐ होंगे" वह धुप रहा। भड़ा, क्या शेमन लोग गाजरे खाते थे?"

शैतान १५ “पता नहीं।" "एक साल में क्तिने इञ्च होते हैं" नहोंने हिसाय लगा कर कुछ घजब उतरा तीधा सा जयाय निकाल दिया। "और एक मील में कितने घन्टे होते हैं।" असने फिर कोई जवाब निकाल दिया। अब रूफी माराज होकर बोले- "क्या तुम्हें सचमुच पता नहीं कि रोमन खोग गाजरे पाते थे या नहीं?" "जी नहीं," नहें डर कर बोला। "और यह भी पता नहीं कि दुनिया में कितने ऊँ है ?" "जी नहीं।" "जेहालत की हद है ! क्या तुम्हें सचमुच पता नहीं ?" रूकी जोर से थोले। "जी नहीं!" नन्हें सहम गया। "मुझे खुद पता नहीं," रूझो बोले । और नन्हें को छुट्टी मिल गई। हनने में स्ली के नाम एक नत पाया, जिसे पढ़ कर उन्होंने बहुत धुरा मुंह बनाया। नाक भी पढ़ाई, कुछ देर रहलते रहे, फिर बोले-"कुछ और भी सुना १ छोटे भाई साहब ने नई रस बी है। कितना मना किया था से। और छोटी छोरी दादा भी उगा ली है। गोया दादी, मूंछों की खेती हो सुर न नौकर को बुलाया और एक तार लिख कर दिया कि भेर दे। मैंने सार का मजमून पड़ा। लिखा था-"Share At once" 4 बार उसी समय भेज दिया गया। हम सिनेमा के लिये तैयार तो हो गए कितु यह महाशय अभी तक गायब थे। रूडी ने फोन करना चाहा, लेकिन नम्बर न मिला । आखिर सीक कर योले-'तो किसी और को फोन कर दें?" "किसी और को " "हो क्या इन है? किये देते हैं।" उन्होंने न जाने कौन से नम्बरको बुला लिया। मैं सरक कर चोगे के निकट आ गया। 'कौन साहम योन रहे है।" रूपी बोले । "नाकसार है भन्दुल मशीद 'ममवर ।"

उदय-घरत "थोइ ! अदुब मजाद 'तरयूज !' सो गोया पाप शायर हैं?" यद्यपि होंने साफ "मजनूर' कहा था। 'जी नहीं, मजयूर " षह योजे । "मा काजिये, मैं तो हरगिज़ यह प्रदयी नहीं कर सकता । चाप जरूर मजाव कर रहे है, यानी अब्दुल मजाद 'लगूर' !' "धोरफोह मनाप ' मजबूर मज यू ऊ ।" वह मोले। 'घरमा तो मजबूर साहय हैं ! तो आप एक कितने माह है।" चार हम!'यह बाले। "धगर श्राप पाँच होते तो हमारा क्या बिगाद लत"को बोने और जल्दी सटेलाफोन का चांगा रस दिया। इतने में वह महाशय आ गए और हम सिनेमा धन दिये। पूछा--"कौन सी पिक्चर" यह बोले-"इसाफ की तोप!' मैंने विरोध प्रकट किया कि क्रिकेट प्रादि जैसा दिलचस्प धीन छोर कर ऐसी स्मि दम्बना सरासर हिमाकत है। रक्रा मोजे-"चलो धब तैयार हो गए हो, तो चाहे 'बार पुन मही' हो क्यों न हो जरूर देखेंगे।" अब रास्ते में उन महाशय ने अपने पिताजी के सम्बध में जोबा शुरू का है, तो हम तग भा गये । उनका बातें समास होने हा में न आनी थीं। उसके पिता जी मुनसिक थे, अलेवासे भारी भरकम मनुष्य थे। यह उनकी तारा का रहे थे कि किस तरह होने लम्बा लम्बा सजा पाले अपराधियों को छोड़ दिया था और न छे भने थानाद लोगों को खाने में भेज दिया था और अब सार देश में उनक आश्चर्यजनक साल का हका बज रहा था ! भान्निर ताश्रा कर रूसी बोले-तो यह बहुत असा करते हैं।" "जर"जवाब मिला। "याना बहुत ही ऊँचे ६ का इसान करते हैं वह !" "फिर तो यह 'इ'सान की तोप हुए," रूपी ने कहा। और मेरे लिये हसी रोकना मुश्किल हो गया। x x कितनी बार मेरी इच्छा हुई कि हुकूमत पापा से पर-नाखिर श्राप शैतान . चाहती क्या है। हम क्या करें, जो श्राप के इस जीव-गरीब कोप से बच सकें, निसके हम हर समय शिकार हुमा करते हैं।' चौबीसों घटे हाय धो कर (बल्कि हाय-मुँह धो कर ) यह मेरे पीछे पड़ी रहती थी। रजिया की तरक मने जरा भी आँख उठाई कि श्राफ्त आ गई। इसमें मेरा क्या कसूर था ? घर में एक बच्ची बदकी है, जो इतनी प्यारी लगती है, तो उस क्यों न देखें ? अगर यही मरजी है, तो हुवूमत श्राप रजिया को किसी सदूक में क्या नहीं यद् कर दी, जिसमें कि कोई न देख सके ? मेरे सम्बध में तरह तरह की पालोचनाएँ करती रहती थी। पहले तो बहुत विरक्त हो जाता, किंतु याद में मुझे उनकी मालोचनाएँ स्टाई में गिरी हुई मालूम होने लगी और में उनका खयाल ही छोड़ दिया । उनको पालो- धनाएँ भी सुनिय-'शौकीन लड़का है, रंगीन मिजाज है, रंग बिरंगे कपड़े पहिनता है, मुशबू लगता है। इसका सोना काफा चौहा है, लेकिन चेहरा कुछ दुबला है । इसका कोई विश्वास नहीं । (न कीजिये विश्वास, किस मस खरे ने नुशामद की है आपसे ?) हर वक्त यानुप्रो पुट्ठों को टोलता रहता है (सूपसूरत पुढे हैं, क्यों न टाले), बेजारी को बनारी कहता है। (यह आपके कामों की शरारत है।) हर वक्त अका कर चलता है (तो क्या कुपमा हो कर चला कर), रजिया के बारे में सोचता रहता है, उसे घूरता रहता है, और उसीकी बात करता है (रजिया जो अच्छी लगती है।) मुझे जरा भी घरहा नहीं लगता । (मुझे भी श्राप जरा भी अच्छी नहीं खगी') और हुकूमत प्रापा का तकिया कलाम या यह वाक्य, 'मुझे पहले ही पता था' ('पहले शब्द पर खूप जोर देकर!) एक दिन मैंने रशिया के नाम की अंगूरी पहिन लो। हुक्मत थापा ने देख ली। बोली-"मुझे पहले ही से पता था!" एक दिन एक नाक में लगातार दो घण्टे तक रजिया को देखता रहा और पाट पाबत-सलत कर गया। हुकूमत आपा ने देख लिया । चिन्ता कर योली-"मुझे पहले हा से पता था" और रूकी घोले-"जय थाप को हमेशा पहले ही से पता रहता है, सो श्राप हमें रोक क्यों नहीं देती" रूकी उन्हें आहे हायों लेते थे। एक दिन बेगम साइया का कोई गहना खो गया । इम सय रहे थे। एकाएक रूकी बोले-"माहा । हुमत, तुम्हें तो पता होगा कि जेवर का?"

उदय भरत - "मुझे क्या पता !" मा मोली। "क्यो, अम्हें तो पहले ही से पता रक्षा गारेम!" रिक दिग एक अजीब सा मामला हो गया था, जो हमारी समझ में पिन कुन ग प्राता पास साहय भी पूरा जोर लगा चुका थाखे- 'बो, हुश्मय, पता दोसा!" सव हुमत पापा के पाये गए कि बतानो स्या है। हा पोले- 'भाइयो और बहिनो ऐप मौकों पर हमेरा नाम से सबाहलिया कीजिये। यह पहुँको हुई और प्रजाह पाखा चौरस है, और हर पीकापहले से ही पता रहता है।" मगर यह मय होने पर भी पापा की यह पाश्य बोलने को भारत ती रही। मी मुझे रशिया के बारे में सरह तरह का समारिया काते, किन्तु सर्दय मुके विरक्त कर देत । सबसे पाने तो यह सवाल पेश हावा या कि प्रातिर मेरे पास या मयूत है कि रजिया को मैं घमा बगता है। सिह, कोई सस्तन था। इसलिये यह सिफ एकतरफा कारवाइ बताई जाती थी। किमा को पसंद करने से कुछ नही बनता अब तक यह भा न करे। अतएव उसके सिद्धात के अनुसार में और रजिया दिनकुन पापित थे। यह हम यही कहा करते-"भैया, दुनिया बहुत पदो है। कही और जाकर कोशिश कर । रजिया से भी मामी बदकिपा मिलेंगी।" और उनकी यह पात मुझे तनिक भी पमदन बातो। एक दिन बोले-"शिया की निगाह कमजोर है, उसे दूर की धाने धुंधलो दिखाई पड़ता है।" "तुम्हें क्या पता "ईद का चदि उसे नार न पा सका, और इसलिये उसने ना साहस का ऐनक से देखा था।" "फिर क्या ! शादा तातो यह क्या ऐन बगाएगो हाँ, शादी के बाद फौरन लगा लेगी।" जागा कि इस तरह की उलटी-साधी बातें वह सुना जाते । उसो दिन शाम को रूसी और हुकमत थापा की बहस छिड़ गई। विवाद शैतान हुमत प्रापा बोली-"तामय किपाँचीम** दम मिना प्रामोशी रही, और पाच मिनट में का घोर हुकूमत थापा जल हो गह, पाया इतने में रम-रन' करता हुश्रा श्राप दम्र:HANT हुमत प्राशयोजी.-"कहा धाग amitram इतने में दूसराइसन दूसरी पार टन PPTE पोरदुमत भाग नाराज होघर पना "पार, पदसा इस तरह शायदrr.k+EER मरगों हो येठे रहे पिर या-A" पोखे-"कोई मोर भाषे, सार इमले में जम्मन (दामप) Mitra सधिपेमो टनकी मनि0 km और ममोहर सिग्दER- हमने गुनाहा महारा जायल नहीं हुये" हम सब सामोश हो गए। फा विषय था 'ऐनक' । न जाने कौन पेन विरोध में। कमरे में एक ग़दर मची थी। में कुछ देर तक बाहर सुनता रहा, फिर रूको योले-"तो गोया प्राकमार जीता।" "पाप घट की बहस के याद" मैने पक्षा 11 . गया। यानी--"मोह। उधर माग लगी है।" निका जाय। "क्या मरावय" "मे गायब हुई 18 गधे के मिtari मैं सिर हिला कर हा का। TET गई F

श्श्य घस्त
-
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Arket माई, दव (पान) ऐसे वैस योदे ही था
* #Yो मिसनी पड़ेगी।"
में IT गुजरा। हमने पुलाया, तो यह पा गया।
- पूरी घिसी थी। तुम पार ही नहीं ?"
* सतरा था, पर उस समय भस्य त उदास दिखाई पड्न
११t TV TREETसका तार आया है घर से, जिसमें सुरन्न पुखाया
Natural गाउँगा, नहीं तो भाप बुला लीजियेगा," वह
Marat, it मा होंगे," मैंने विश्वास दिलाया।
AWATER पते पर जन लिखेंगे ? मैं तो म जाने कहाँ कहाँ की खा
इसका अषाब हो सकता था?
Tant इसका तो यही इलाम है कि राम अपनी का एक
HTRA कि जब हम तुम्हें सुनाना पाहे, तो बाज को धूप में
IN भाषी भायेगी, फिर पाना और बाद में म उरते हुये या
ur fermfayार हंस पड़ा, और बोला- 'शादोजविस प्यत !'
wint सो वाम की, सो देखते हैं कि या कमरे में नहीं थे। दूसरे
Moral मकार की घग्ना घटा । मुझे सह-मा हो गया। मैंने रजिया
बम ए पोजना सोचो भौर सुबह का चाय पर रजिया में जान
For Antarnदा और बिजली का तरह रही कमरे से निकल गए
मी साय शुर भी मही हुई थी। मेो सपको पता दिया कि
Rahura गते हैं और पदिख माह प्रमाण दिये । पुके हैं, इसे
IATथ६ पूरे शंता हुए और भविष्य म उहैं कोई महमद
TAIT 2-int र सामन हिम्मत न पड़े सो कम-स-कम पारे सा कक्षा
स उसी दिन सोशंतान महर हो गए।
VE पस्त मनोहर पाना रत था। पूर्व मन्द्र पूर्ण भएE

शैतान १.१ उदय हुया था । वायु के शीतल मोकों से पौधे झूम रहे थे। मैं कौवारे के पास बैठा था । विचार धारा को महाँ कहाँ से भी शुरू करता था, रशिया पर टूटती यो । एकाएक जो देखा, तो रजिया बाट में बैठी चाँद को ताक रही थी। बिलकुल गुम सुम बैठी थी। यह पहिला पार नहीं हो रहा है। उन दिनों बहुधा मैं उसे एकान्त में बेठे देखा करता था । पारिनर, किसके सम्बन्ध में सोचा करती है यह? मैं येचैन हो गया। मुझसे न रहा गया । पहुँचा सीधा शैतान के कमरे में। वह सो गए थे। उन्हें जबरदस्ता जगाया। "धरे।' मेरे मुंह से निकल गया -"तुम ऐनक लगा कर सोते हो ?" कल ऐ Tक लगाना भूल गया था। रात भर सपने यहुधा धुंधले धुंधले दिखाई पड़े।" मैं इतना बचत था कि मुमस हँसा भी न गया । मैने जल्दी से समय उहें पता दिया, शौर कहा- 'भइ, रशिया को किपीका प्रयाज अरूप है। लेकिन यह पता नहीं कि वह भाग्यवान है कौन । वैसे यह भान फल चौवासों घर किमी के बारे में सोचता रहती है।" देर साहम इसी प्रकार की बात करत रहे। अब प्रश्न यह या कि यह कैसे हल हो। और वैसे मैं स्वय मह जानता था कि उसे मेरा कितना सयाज है। भातिर बड़े सोच विचार के बाद शैतान बोले-“भई, इसके लिये योदी सी हिम्मत करनी पड़ेगी।" वह क्या "अगर मेरी मानो, सो पार सुम दशा (माम हस्या) का लो।" गुदकशी कर ल!' मैं चौंक पड़ा । "श्रमजी नहीं नकला उदकुशा । पे हम यही जाहिर करेंगे कि हमने संयमुस सुदकशी कर ली है। फिर देखेंगे कि रजिया क्या करता है।" दिया । राम साहा को पना जरूर पल जायेगा, और भगर मम्मी को लिख दिया तो बाफन मा जायगा । चौर म खुदकुशी करना भी पिशूल-मा। ता मौजे-बाम माया को हर पता न चलने देगे। इस एत- यार को सारा कुनमा एक पार्टी में शा रहा है। रतिया का महान मासे . मैने साफ इनकार त है, यह यहीं रहेगा। इस मैदान साप पा र नुम तुइना करना। सारा साम में कर दूंगा।" यही मिराह के बाद तान में मुझे बहका हा लिया। दो दिन हमने यूमरिहत किये। एतबार का दिन माया । रतिया के विका सय पार्टी में धो गए।मुझे और शेतान (रा) को मी यहा हा गया, जितु हमने किमेव का महाना कर दिया। कई छोरी माटी बातों के पार ( जिपका उल्लेख गान यूम कर नहीं किया क्षा रहा है) मैंने ग्राम पा कर श्री। एक सो पर खेद गया। मेरा एक बाप मार लटक रहा था और प्रश पर अंगुलियों ना काली शाशी पहा थी, जिस पर शहर' लिखा था। संतान ने मेरी ओर देवा । बाल-शयार मैंने कहा-"ET" चौर -होंने एक पाय पेन्गे स्या में शोर मचाना शुरु कर दिया, जिस पर मुझे इंसाया गई । रशिया भागा मागी प्राई । मैंने तुरत विद कर ली पर पड़कों से सब कुछ देखता रहा। शैतान ने वरम्त उसे बताया कि मैंने ग्राम इस्या करता है। जियाने पहिले शाशीको उar पलटर देखा, फिर मेसी नादी दरखा। भला में नाली कैसे मद कर सकता था। बोली- 'अरे ! ममी थोड़ी सी जान याकी है।" घबराई हुई साथ के कमरे में गई। मुझे उसका प्रावा साफ मुनाई दे रही थी। उसके स्वर में घबरा हर था मैचैनी था। वह डाकर साहब को फोन कर रही था, यहिक विशय कर रही थी। उसके शटद थे-- खुदा के लिये जल्दा कामिये, शिदगी और मोस का सवाल है और मेरा दिल मानद से खिल उठा । किमकी जिन्दगी और मौत का सवाल है ! मेरी जि दशा का या रजिया का जिन्दगी का? या शायद दानां का।मैंने शैतान को इशारा किया! वह मुस्कराए। रजिया पराई हुई चाई और मेरा सिर दयाने लगी। मन जो उसका अंगुलियो गरदन तक पहुँची है, तो मुझे गुदगुदा लगा। पहले ता मैंने बहुत रोका किन जब रह सका, तो विमखिला कर हँस पड़ा और अक्षा में बैठ गया। "हाय रतिया के मुँह है निकला। हार्य"शैतान ने चिंघाड़ कर कहा। "दखा, हरा दिया न तुम्हें 'मैं बोला।

शैतान "सचमुच मैं तो ठर ही गई थी।" और मेरा मार प्रससता के युरा हाल हो गया। तो इसके अर्थ यह हुए कि रजिया को मेरा बहुत खयाल था। उसने जो कहा था कि जिन्दगी का सवाल है। "तो क्या सुम सचमुच बहुत घबरा गई थी!" मैंने यन कर प्ला। "का, कुछ घपरा हो गई था।" वह मुस्करा रही थी। "कुछ क्या ? यी कहो कि पूरे तौर पर घबरा गई थी, यहुत पुरी तरह घपा गई थीं।" "और इतनी तो नहीं घबराई । दरअसल खुदकुशी अच्छी तरह नहीं की गई, इसमें कुछ भूलें हो गई।" "य चाहे तुम कुछ भी कहो, एक बार तो बहुत ही परेशान हो गई थी।" "जैसे इसी जहर की शोशी को ले बीजिये," यह योली-"माना कि इसमें कभी टिंक्चर बायोडिन पाई थी। लेकिन दो साल से इसमें बादाम का तेल पड़ा था और अगर बादाम के तेल स सुदकुशी हो सकती है, तो यह असे से खाली पड़ी थी।" "लेकिन मुमने फोन हो या धबराहट में किया था।" मैं सिसियाना हो चला था। "अछा, यताइये, फोन है किस कमरे में ?" "हा रम में,"-मैंने कहा। और मैंने फोकस कमरे में किया था। साथ के कमर में न" "और साय का कमरा है गोदाम । अय पताइये, यहा टेलीफोन हासे मागया" और मुझे विश्वास हो गया कि मैं रजिया को विक्षन परसा नहीं प्रगता, बशिक शायद पुरा हा लगता हो। x भान दिम दम सरपक मतकका नाच देखने गये।बहुत मसख मत या सग्य लोग इसने चाय थे। पहले तो इधर उधर की चाहत रही, पिर नाष शुरू हुआ माट्रा पाने लगा। पहले तो या पुपचाप साह, x शिर उसने एकदम मेया में समा गई औuratी शामो मन्दीराम हो र मोt-भसा, पद पपा प्रमोद मानो सस भन्ने भादमी में छापा मारन रामगि हो भगो पपरा गई। मोबा-"या, परमो पाया!" मत प्रा योजी-मास रहा है।' महाबोना-इस तागाचा करने का मन मारा पो-शुपपार देखती रहा। इस Its माथ मम गई.--'मही सा, यह धारमा सोम और माशा कर मोलान योगे--- म't मा पसन या है कि सुपद को 'राम सा' पिया या चौर अप इसे रान प्रीगि हो रहा है।' शैतान में बाल को भेगाना पहिन रखता था और साग सबै ही देख रहे थे। विधाम की परी बना और में तथा शैतान बाहर गये । बाट का गरमा साथ एक अमीय-सी चीज थी । जो देखता था ठार माता पा कुछ लोगों ने तो सषमुपसमा शुरू कर दिया । शैमा गये, और पीये धूम का यो-'साहयान पापका सा सिर भोम्यों पर । लेकिन भाप मेह- रवा करके जहा से हूँग हाजिपे, क्योंकि मुझे एक रूरी काम और धापका शौक पूरा किया और मैं यहा से नहीं जा सकता। घेवेचारे शरमा गमे। "तो भाप इस चुके क्या "शैतान योग्ने । सुपरह। 'क्या में पा सकता है?" उममें से एक ने सिर हिला दिया। इम अब यापम हुये, तो अभी प्राधान्याप्ता दिन बाकी था। बाग से गुजरते हुये शेतात रक गय । माता का पुलाया और मिट्टी का कर दिया कर बोले-"यह देर यही नहीं होना चाहिये।" सरकार, यह बिना कई भादमियों के बाहर नहीं हा जा सकता।" "या! मामूली सा काम है। एक बड़ा सा गा खोद लो और उसमें या मिठी दवा हो।"

शैतान १०५ पात माली की समझ में आ गई। यह काम में लग गया। कोइ घटे भर के बाद वह फिर हमारे पास आया, और बोला-"सरकार, यह मिट्टी तो मर दी गई । पर जो नए गड्ढे की मिट्टी है, उसका क्या किया जाय !" "अरे भई, यह भी कोई पूछने की बात है ? एक और गड्ढा खोद कर सममें दाग दो,"शैतान ने कहा। माला फिर चला गया। कुछ देर बाद हाँगता हुआ पाया, और बोला- "हुजूर, वह मिट्टी तो दवा दी गई। पर अब नये गड्ढे को मिहा कहाँ का जाय " "हमें नहीं जानते," शैतान झला कर बोले-"मामूली सी यान है। एक और गड्ढा खोद लो। और माली थेचारा सिर सुजलाता हुआ चला गया। इतने में जा साहब 'आ गये, और यहीं बैठ गये । हम खेजों के सम्बन्ध में याते करने लगे। "तुम्हें कौन-से मेल पसन्द हैं " जज साहब बोले । कबड्डी और पोजो।" "कोई नाम अछे ग्वेन तो हैं नहीं," यह बोले । "भापशे कौन सा खेल पसन्द है ?" शंतान ने पुछा । "उसे खेल तो नहीं कहा जा सकना । मुझे घुड़दौड़ बहुत पसन्द है । अब योरोप में था, सो बढ़े शौक से घुड़दौड़ देखा करता था।" "माफ कीजिये, मुझे घुड़दौद बिलकुल पसन्द नहीं,"-शैतान थोखे । "यह क्यों ?" "देखिये, यह तो सब जाते हैं कि कुछ घोड़े कुछ घोड़ों से तेज दौड़ते है, और यह भो लाजिमो मात है कि अगर यहुत घोड़े दौदेंगे, तो कुछ थागे निकल जायेंगे और कुछ पीछे रह जायेंगे, धौर आखिर में एक घोड़ा सय से भागे निकल जायगा । भला यह जानने का क्या जम्मत है कि कौन-सा घोड़ा धागे निकलता है। या तो यह हो कि कोई घाड़ा घपना दोस्त हरे, तो प्रादमा उसे देखने चला भी जाय, नहीं तो सब घाड़े एक-से हैं।" जज साहव से काई जबाव बन पड़ा । छ देर साचत रहे, फिर मुस्करा कर योले-"बाहोद विजावत !" मुझे और शैतान को एक बहुत यदा दायत में दुनाया गया। यह परे उदय भस्त लोग शाये हुये थे। जन माय और बाम साहमा न जा सके, इसलिय हमें पूरा धावा मिल गई और शैतान उतर साये रखी साधी हाकतों पर एक खतरनाक से युग हम बहुत पुरा शाह से देख रहे थे। बुध मौलाना-से मालूम होत थे । न जाने क्यों इस साह ये फार-मार कर हमें घर रहे थे। घत में जब उनसे न रहा गया, सा शैतान से बोल---"साहबजाद, मैं देख रहा हूँ कि तुम परे चाधे घटे से उमकियों को घूर रहे हो। यह बहुत पुरा पात है।" शैतान योले-"किया ! घुरना दो किस्म का हाता है-'घूरना दिलतहास (खोज क लिये) और 'घाना विनतमराह' (मनोरजन के लिये)। यह खाकसार इस पर पहली बात कर रहा है, कोंकि मुझे मा फिमीने यताया कि उन सानून (महिला) का नार तिर्बा है और पक प्रॉस यही है और एक छोरा" मौलाना युष कहने ही पाले ये कि शैतान जल्दा से बोले- 'और प्राप ई क्यों नहीं मना करत, जो सराह के लिये धूरत है। एस यहा येशुमार खोग है। मिसाल के तौर पर उन साहय को (इशारा करके) ले बागिये, जो 'और मूंछ (मुंछ के नीचे) मुस्करा रहे हैं।' 'ज़ेरे मछ मुस्करा रहे हैं। क्या मतलय हुधा ?" लोग 'जेर-स्त्रय (होठों के नाच) मुस्कराया करते हैं, बकिन हाका मूंछे इसना घना और सरदार हैं कि हम इस मुस्कराहट को महज जेरे मूंछ मुस्कराहटा कह सकते है । शायद यह साहब बड़े फ (ग) से कहते होंगे कि-- Dr के साए में हम पल कर जवा हुए यात शुरू कहाँ से हुई थी और ना पहुँच। कहा ! मौलाना खिसियाने हो कर बोले-र । कुछ भी हो, बहरहाल इसान को परहजगार होना में परहेजगार है," शैतान बोले। 'तुम और परहेजगार! खूब ! 'जी नहीं, मुझे पता है कि सुदा के जल से मैं पाहेजगार हूँ और सुदा तो हमेशा रहूँगा। परहजगार यह भादमी है जाखटाई, चिकनी और गम चीज़ों से परहेज करे, और यह मैं करता रहूँ।" इतने में कुछ मेहमान था गए और उनस हमारा परिचय कराया गया। वह मौलाना इधर उधर हो गए । जहाँ चारों तरफ शोर गुल मचा हुया था चाहा शैतान यदा हमने एक साइन को देखा, जो चुपचाप बैठे थे, जैसे तपस्या करने को बैठे हो । शैतात मर यहाँ पहुँघे, और उसे घोले-"अगर अनाय बुरा न मानें सो एक घात पू, ?" "कहिये।" "बार चुप क्यों है" "यम पाहा।" "तो, साहब, अगर धाप अहमद है तो निहाया बेवकूफी कर रहे हैं, और अगर येवकूफ ई, तो निहायत प्रलमन्दी कर रहे हैं।" और यह महाशप सोचन बैठ गप कि इसका मसलय क्या हुआ। इधर उधर ददने पर यह मौलाना हमें फिर मिल गए, और पहले को सरह पिर यड़े गुस्से से हमें घूरन लगे। शैता चाहते कि उनसे पाते हो, कि कोई यहाना नहीं मिलता था । इतने में कुछ छोटे-छोटे कद का महिला दारिज हुई । मिनकुल पोटा छोटी थी। शतान जल्दी से दोहे-"देखिये बनाय, ये पेंगुइन सी' को औरते हैं" और मौलाना ने बड़े ही सतरनाक हरा से एक हूँ' की। उसी समय एक अत्यन्त दुयले साहय पERI माटे महाराय के साथ दाखिल हुए। दोना में सना अधिभर था कि दाना एक नगरे को धरा सप्रकरबरहथे। संतान टापुजुर्ग के मर कर बोल-"यह दनिये, अनार उनमें स 'सेमास पाले हैं, और दूसरे हानेमा के बाद हैं।" मायरसमझ न सके। नाम पाह-arपमे वात याने बानी यादों करनहार यो देने गे। यहाँ इस्तेमाल मे पहले इनमा काद भी देशा रोगा। यही पार यही देख लीजिये।" इस बार तो बहान पता गुहबनाया। एक परमामा गुजा, और परमाटे सहारमी और पा Part महाराण दाशियम र में कोई सार पर गा। मौत RHIT-'म पर शुमने पर मोहरो ॥

उदय प्रस्त लोग प्राय हुये थे। जज साहय धीर धेगम साहया न जा सक, इमलिये हमें सामामि गई और शैताग उत्तर प्राये उखा-साधी हरकता पर । एक प्रतरनाक-स गुर्ग में बहुत पुरा साह से देख रहे थे। बुध मौलाना से मालूम होत थे। न जाने क्यों हम सरहावे पार पार कर हमें घूर रहे थे। अन्त में जब उनस न रहा गया, तो शैतान से पोछे-"साहा, मैं देख आधे घटे से उन सदकियों को घूर रहे हो। यह बहुत पुरा यात है।" शैतान बोले-किनाचूरना दो किस्म का होता है-'घरना बिजनहा' (सोम के लिये) और 'धरना वितरह' (मनोरजन के लिये)। यह साकसार इस बार पहला बात कर रहा है, क्योंकि मुझे अभी किसीने बताया है कि उन बातून (महिला) की माक तिमी है और पक पोखधड़ी है और एक छोरी।" मोबाना पुष कहने ही वाले थे कि शैतान जल्दी से पोले-"थोर प्राप सक्यों नहीं मना करते, जो सफरीह के लिये धूरते हैं। ऐसे यहाँ पेशुमार लोग है । मिसाल के तौर पर उन साहब को (इशारा करके) हा स्ले कीजिये, जो मेरे मूंप (मूंछ के मीचे) मुस्करा रहे हैं।' जेरे मछ मुस्करा रहे हैं ! क्या मतलय हुया ?" "लोग 'मेरे-सर' (होठों के नीचे) मुस्कराया करते हैं, लेकिन इनकी मूले इतना घना और स्वार हैं कि हम उस मुस्कराहट को महज जेरे भूक मुस्कराह ही कह सकते हैं। शायद यह साहन घरेफ (गर) से कहते हांगे कि-- के साए में हम पल कर जा हुए हैं। मात शुरु कहाँ स हुई था और जा पहुँची कहा। मौलाना खिसियाने हो कर बोले-और कुछ भी हो, यहरहाल इसIT को परहजगार हाना चाहिये ।" 'मैं परहेजगार हूँ," शैतान बोले । 'तुम और परहमगार सूप 'जा नहीं मुझ पस है कि सुदा के फजल से मैं पाहजगार हूँ और खुदा न चाहा तो हमेशा रहूँगा! परहमगार वह आदमी है, साई, चिकनी और गम पानी से परहेज करे और यह में करता रहूँ।" इतने में कुछ महमान आ गए और उनस इमारा परिचय कराया गया। वह मौलाना इधर उधर हो गए । जहाँ चारों तरफ शोर गुल मचा हुआ था

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१०८ उदय शस्त शैतान योते-"शजी क्या साक कहूँ । साफ तो है कि गुरली डएका रहा है।" इतने में खाना शुरु हो गया। हम दोनों मान-घूम कर उन साहब के पाम थे । शायद उन्हें मछली बहुत पसद था, अतएर उन्होंने कई बार मला मंगवाई । श्रर जो वह मछली मँगवाते हैं, तो नौकर कई इधर उधर की चाजे तो दे जाता है, किन्तु मछला नहीं लाता । स्पष्ट था कि मछली खत्म हो गई है। किन्तु मोजाना बार बार यही कहे जाते थे कि मछला लामो। नौकर बेचा साफ जवाब नहीं दे सका था और हाँ भी कह जाता था। आखिर उनसे न रहा गया। बोले-"यह कमबरन मछली पयों नहीं खाता? और अब तो शायद ही हो गया। न जाने कहाँ मर गया?" "मलियाँ पकड़ने गया है। शैतान बोले। और एक बहुत बोरा का ठहाका पक्षा। दावत के बीच में ही वाहर बारा से पा होने लगी थी, अतएव साने के बाद यह निश्चय हुमा कि वर्षों के रुकने का तजार किया जाय और उता देर काफ़ी और धुरकुलों के दौर चले । सप लोग चुप हो गए । और एक साहब ने (जो मुरन्त ही ,पमापनि बना लिये गए थे) किमा एक का नाम लिया और कहा-"आप अपने जावन की कोई सचा धरना मुनाइये" उन्होंने मुना दिया। चौथा नम्बर शैतान का था । चूंकि पहले बहुत ही करण कहानियाँ सुनाई गई थी इसलिये सब लोग सहमे बैठे थे। शैतान थोले-“महिना और भाइयो। यह घटना मेरे जावन में माल के परपर का काम देता है। इसने मे जायन पर सबसे अधिक प्रभाव डाला है।' और सब चुप होकर यहे ध्यान से सुनने लगे। यह 7 दिनों का बात गदका रोजा करता था। वैसे अब भी मैं अपने कॉलेज का सब से अच्छा गदकायान हूँ पर उन दिनों बहुत ही अन्या गदका खजता था। एक दिन हम सब कॉलेश क बरामदे में सईये। मूसलाधार या हो रही था। हम इतजार कर रहे थे कि कर पाना बदही और बाहर निकले। इतने में हमने देखा कि एक जुगनू उड़ा जा रहा है।" "दिन में जुगन् !"-वहा मौलाना बोले। "मा हो, या जुगनू की किस्म का कोई और पा होगा।" 'चान पता है क्या ?" मौलाना बोझे। है जब शैतान १०३ . "ग्रजी शिवला, जो चीज उहती है, वह पड़ी है। हो तो, साहब, सब खड़कों का भी ललचाया कि उस पकड़े । मगर बारिश की वजह से किमीका हिम्मत न पड़ी। आखिर में बाहर जाने लगा। बदकों ने मना किया कि भीग जाओगे । मैं एक न सुनी और बाहर निकल पाया । गदके का माहिर (विशेपर) था । एक चूद भाई, उसे गरदन के एक झटक से बचा गया, दुसरी पाई, उसे एक पोर हट के यचाया तीसरी आई, उसे कमर को हिला कर गया । गरज इस तरह मुड़ता तुइता तरह तरह के पेतर यदजता हुधा में ऐसी मूसलाधार बारिश में उस जुगनू को माफ पकड़ खाया। और जय बरामदे में लौर कर थाया, तो मेर कपड़ों पर एक बूंद भी न थी।" श्रय जो ठहाक लगे हैं, तो वातावरण की गम्भारता एकदम खतम हो गई । सभापति महोदय उठ कर योले-"साह हम श्राप से एक गम्भीर घटना का वर्णन सुनना चाहते हैं, और भार को दस मिनट दते है। इस दरमियान में दूसरे सजन एक पुग्दुला सुनाएंगे।" अब यह वहा महाशव थे, जो इतनी देर से गुम सुम बैठे थे। ग्रेगर धरा गए । सोचा कि यह क्या श्राफ्त पाई । बहुत चाहा कि पीछा छुड़ा लें, किन्तु वर्षा कोन सुनता था। थाखिर तग पाकर बोले- 'मुझे तो कोई नया चुटकला याद नहीं। हाँ, एक पुराना धुटकना याद है, जो मैंने पहले किताब में पदा था। वह यह है कि एक जगह चार पर बैठे थे। एक बोला कि अगर दरिया में भाग लग जाय, तो मलिया किधर जायें ? दूसरा बोला-पेपों पर चढ़ जायें।" "अरे साइय, वह तो तीन थे। यह चौथा बेवकूफ श्राप कहाँ से लाए ?" एक थोर से धावाज भाई। "चौधे ये खुद थे,"-शैतान बोले । और लोग चीने मार मार कर अब सभापति महोदय ने शैतान से कहा कि यह एक गम्मोर घना सुना। शैतान योरो- मान से कुछ साल पहले की बात है। इसी कमरे का जिम है। यहाँ जाकिर साहय ( मेजवान के लड़के) के साथ श्रापा था। यही रात के दस बजे थे। विजकुल ऐमी ही वारिश हो रहा था। मैं घर न जा सफा और गुझे इसा कमरे में सोना पड़ा । ( इशारा कर के ) मेरा विस्तर यहाँ विद्या हुभा था। मैं पिस्तर पर लेट गया। मरा सिगरेट प्रतम हो गया, और मैंने सो लग।

उदय भस्व । "फिर क्या हुमा उसे घेखवरा की हालत में एक तरफ फेंक दिया। पिर अचानक मुझे ख़याल पाया कि नाचे माजीन विधा हुआ है। जलता सिगरेट का था। उठ कर जो देखता सो पलग के नीचे से सूपा हुमा एक हाथ निकला चौर सिगरेट को उठाकर पलग के नाचे गायब हो गया।" शैतान कुछ रुके । दखा, लोग सहम गए हैं। 'और साहबान ! में विश्वास के साथ कहता हूँ कि यह हाय किसोशावित मनुष्य का नहीं था बिजकुज सूखा हुआ पीला हाय था । र, मैंने कुरान की चायत पदो। सोचा कि शायद मुझे यहम हुआ होगा, और कुछ गुनगुनाने लगा। सोचा कि चब सो जाना चाहिये इसलिये मैंने यो हा का दिया-परे यह विजली जल रही है इसे धुझाना तो भूल ही गया। यह कहकर में घठने लगा था कि टिक' को अावाज अाई, और किला ने विजली बुझा दी। अब जो मैं इस कमरे से हत्या कर भागा हूँ तो पाछे घूम कर नहीं देखा । १" एक और से भावाज थाई। "फिर हमने इस मकान का कोना कोना तलाश किया पलग के नाचे भी देखा, पर कुछ न मिला । सो इस कमरे में रूा भून प्रेत है। चौर परे। यह मुर्गी कह से पा गई 'शैतान ने एक अधरे कोने का ओर इशारा कर के कहा । सब लोग उठ खड़े हुए। मर। शैतान ने उछलते-यूदते हुए कहा-'गाय मुदा का! यह गुद गुदा कौन रहा है। श्रीर एकदम से उखनन लगे । 'यह मेरे कानों में कौन धान रहा है?'शैतान चिल्ला कर बोले-"और यह परदे के पाछे से ॐ क्यों झोक रहा है " और कमरे में हलचल मच गई । भौतान ने मुझे इशारा किया और मैंने धुपके से बिजला धुझा दी। अब जो धमा चौकड़ी मची है, तो न पूछिये । सय के सब कमरे से बाहर निकल पाए और बाहर बरामदे में खड़े हो गए। थोड़ी देर बाद लोग अपने अपने घरों को जा रहे थे। वह मौलाना मी साथ थे, और नाचे सड़क पर झोक रहे थे। शायद उह किसीका इन्तजार था। इतने में एक शगा गुजरा। मौलाना चिल्ला कर बोले-'भई, ठहरना। सुम्हारा टॉगी पाजा है क्या।' उधर टोंगेवाले ने सुना ही नहीं । मुझे बढ़ी हँसी घाई। लेकिन को बड़ा गम्भारता से बोले- किबला, अगर आप या परमाते तो बेहतर या कि सुम्हारीवाबागी है क्या?" - शैतान मौलाना मर गए । उनके मुंह से गलती से निकल गया था। से यह भयभीत अवश्य थे। टाँगे का इन्तजार होता रहा। शैतान मौलाना बोटे-"क्यों, साहब, आपकी 'वजी' में क्या 'घड़ा है" "चारह बजने वाले हैं," शैतान का ध्यप समझ कर भी मौलाना धोरे से बोले। "मेरे प्रयास में अब घा चाहिये। सड़क पर गा जरूर मिल जायगा।" और हम तीनों नीचे उतरने लगे। "शिवला! इन सादियों के बारे में भी एक पुर असरार (रहस्यपूण) हिस्सा महशूर है, जिसे मैं थंधेरे में सुनाना नहीं चाहता।" और मौलाना और मीधीरे धीरे इतरने लगे। अजी, थाप तो हिने करक इतर रहे है । जरा जल्दी कीजिये"-शंसान x "वैसे हो रा ये चिकनी मौदिया है कहीं ."-यह पोले । "जी हा वीक है। सीदियाँ उतरते चदने बतायात रपना चाहिये, क्योंकि परसों की बात है कि मैं जली नल्दो जाओ मे उतर रहा था। एEOS जो एक 'फिसबा' से 'सोका तो दूर राक सीदता हुमा पन्ना गया।" मौलाना ने एक बार गुस्से से घूम कर देना , पर कुछ पोरे महीं। x शैतान को उपयों की समस्त दुई। मेरे पास भापे। महीने का अन्तिम साता पी। मैं अपना जैव-गार्थ और राक्षरशिप मादिसर प्रहर मुका था । सोच-विचार हे पाद निरस्प हुमा कि दुरमत भाषा सं अमीर सहयोडमसे उधार लिपा शाप । संसान दुरमत धारा के पास गये और बोले-राा में अनिये। धाप रोइ कहमा है।" उतारमा । बाग में पाया जाने शुरली ना और बोचे-"बरे, या सोही कमरे में कामा पारि कमरे में पहुँ। यह एक सोच रहे, शिरोडे मामा ना! माधान पर दी जा!" में पह सामा रहा था। रा-सी पइस रेभारानी कार सवार में इममा बिधिर में सुनाई बाप, पपा रहे पी.

उदमा सहता। - " हुमत प्रामधन गई। पैर, धार में पहुंचे। यासी-" में यहाँ मे हरगिज न हिलगा। शतान योद्ध-"तुम इन दिनों गुम बहुत पछा खग हो" भोर हुमत पापा तुरम्स बाजी- 'हाये दायस मेरे राम महा है।' जातान पाले- 'या करो हिमपात भी जगह" पर anal-anन कालिये हिइम पास दुलमी का मही ३ शेताम से महा-"कको ममता मांगता में तो सिप यह फराहता था कि तुम पहुत घरको छाहादा-परसा इसा सरदर तक साधा दान के बाद दुरामा पापा को विश्वास दिकाया कि वास्तव में सच कहा बा रहा है। यह शर्मा गई और धारेस 401-'या घरा लग रहा है भागिर" एका जाने क्या शम्मा लग रहा है । लेकिन परसों से मेरी हालत सब है परसों से "परतों क्या पात घी ऐसी ?"-होंने भौर भी शमा कर कहा। पास जर तुम अपने कमरे में कैग बिसूर रहा थी, सो बस सस या तुम मुझे बहुत ही अच्छी लगी। में हसा तसार में रहा कि तुम रोमा कर हो । लेकिन नम पार पक द भी न निकमा यो मेरी भाजुओं का मन हो गया। कि तुम और जोर से रोती र! इस बार जप कमा रोने का प्रामाम हरे, तो मुझ शस्ल बुला लोना।" श्रय तक हमें पता ही न चल सका कि रजिया किसके बारे में हर वक्त सोचती रहता है। ये हमें यह विश्वास अवश्य था कि उसे किसी न किमी का खयाल जरूर रहता है । चौथीप घटे शैतान का और मेरी हम रहती। वह मुझप अनाव प्रजीब हरकतें करवाते । एक दिन पोजे-रज़िया को मूंछे पसन्द है, तुम सब लो " मैंने ग्ग्य घो। फिर बोले- इसे रायर मूद पस द नहीं । एक तरफ का दड़ा हो, दूसरी तरफ का घोगे।" मैंने कुछ दिन अपना हँसी उड्याद घिर बोल- 'उसे मूंधे पमद हा महीं।" शत साप करा दी गई। एक दिन मुझे रजिया को उसकी सहमा के यहाँ छोइन जाना था। शैतान बोले- भाई से कपड़े पहन कर पाना । रजिया के साथ चलोगे, x x - शान रहेगी।"

शैतान "क्या" मैंने पूछा-"रजिया को किस तरह का लियात पसन्द है।" शैतान योले-"तुम इसी वक्त जा कर लाल रंग का पतलून पहिन लो। हरे रंग का कोट, पीले रंग की टाई, बाउन जूने, नाती कमीज और फारसाई रंग का स्माल । जायो, अनी पहिन कर था पायो।" और जब मैं और रजिया साथ साथ चल रहे थे, तो जो भी हमें मिलता यह न केवल पाखें फाद फाद कर मुझे देखता, परिक देर तक घूम घूम कर देखता पाता! आखिर, रजिया योली-"यह पापको सूफी क्या थी?" "यह लियास कैसा पहिन भाग है पाप ? विज 'टेकनीकलर' बने एक दिन अचानक शैता ने एक बाजवाय योजना सोधी कि एक नाटक खेला शाप, जो मरे माम से मशहूर किया जाय इन्तमाम सारा शेताम करेंगे। पोमा मुन्दर था। रजिया पर इसके द्वारा योदा सा रग जमाया जा सघता था। पूरे एक महाने की तैयारियों के पाद हमने एक रोमन्दिश माटक तैयार कर जिपा । प नाटक के नाम का सयाज माया, वा शैतान योगे-"इसका नाम 'बेगुनार ऊ' डीक रहेगा।" "लेकिन इसका साट तो रोमैटिक है, और इसमें ॐ कही मी महत "माज भोग ऐसी पन्ठी राम पर सो मा हो दोस से का नाम तापही है। और मा माम हैं जैसे 'गुलिस मापन या 'महामून' मा और मैं तुरनमान गया। "माय इसका ** मरा होना चाहिये । और तो पुम हो हामा हामी प्रमा मेमे एक बहुत ही पो मन्दिानियों कोकिलापही IAR नाम याममा पार सितारे शिया और बाकस उम्र 1 गुम पर इशना मार दिया कि मेरे स्त्रि चाये।" "सोमापियारो" "मेरे HTE मैं तो पे -'पगुनाद' र 'म पावा।" " उदय-ग्रस्त मार "लेकिन इसमें बैज भी कहीं नहीं पाता " मैंने सोच ही में टोका। "फिर वही पेपकों बाजा पातें को तुमने,"- -शैतान ने कहा और मैं मान गया। मुझे शाहजादा बनाया गया । शैतान ने अपना असलो पार्ट स्वाधार का लिया, याना यह शैतान का पाट करते थे। एक साहस परियों को शाहलाओ' बनाये गये, और उनकी हजामत इस घुरी तरह यनाई गई कि चेहरा सुरध दिया गया। शहर के समी सम्मानित व्यक्तिधामनित किये गये । स से यदी बात यह थी कि सर कमर भापधारे थे, जिन पर हमें गर्व था । क्लय में ट्रामा किया गया। एक बहुत बड़ा भीड़ के सामने परदा उठा। मैं एक अंधेरे यारा में और वहाँ परियों का शाहजादी पर श्राशिक हुधा । इतने में धोदय होना था और मुझे एक दर्द भरा सवाद घोजना था। अब मैं चाशिक हो कर घाँद का इतजार कर रहा है। उधर चोद है कि निकलता ही नहीं। अन्त में तग श्राकर मैंने बिना पद्रोदय के ही सवाद घोलना शुरू कर दिया। इतने में एकाएक पद पदय हुघा, और यही वेजी से आसमान (मच) को पार करता हुआ दूसरी बार चला गया। एक ठहाका पदाकि तु मैंने अपना सवाद जारा रवा थम चुपके से चाँद फिर निकल पाया और मैंने एक घुरने के बल भुक कर दाहिना हाय यहा कर कुम कहना शुरू किया ही था कि देखता क्या हूँ कि चाँद दूसरी ओर पहुँच सुका है। अब तो उस ओर मुंह करता हूँ, तो चाँद इधर था गया। सारांश यह कि मेरा और धोद को पूरा माँसमिघौली हुई, और खूब ठहाके लगे। इसी तरह एक भस्य त सुदर श्य पर एकदम सारे रिजली के लहू पुम गए और जब दोधारा जल्ले सो सारा मजा किरकिरा हो चुका था। अब जो परदे का सुमीयत शुरू हुई है तो मैं मुमला ठा। जरा अच्छा सा दृश्य श्राया और एकदम से परदा गिर गया, और लोगों ने तालियाँ बजानी शुरू कर दी। और, बड़ी कठिनाइयों के बाद हाप-सीन हुमा । शैतान साहब स्टेज पर पाए और कहने लगे-"महिलायो और सजनो में नाटक के लेखक (मेरा नाम ले कर) के आग्रह करने पर उनकी ओर स पर कमर से सामना करता हूँ कि यह स्टेज पर तशराफ खा कर दशकों को एक ठुमरी या दादरा सुनाएँ । हमारा तबलची पहुत हा होशियार है। सरकार चाहे जैसी रागिनी छा दें, यह साथ चल निकलेगा।" उपस्थित जन एकदम चुप रह गए, और सर कमर अपने कुदम्ब के सहित शैतान ११५ उठ कर चले गए। इतना अवकाश ही न था कि मैं शंतान से कुछ कहता। परदा उठा । थोड़ी ही देर में शैतान का पार्ट शुरू होना था। अब जो शैतान को हुँदते हैं, तो वह गायय। बड़ी परेशानी हुई, निश्चय हुआ कि जल्दी से एक और शैतान बनाया जाय । श्य था कि परियों की शाहजादी याग में टहल रहा है और उसे एक ठहाका सुनाई पड़ता है। वह धौंक कर कहती है-"मैं समझती हूँ कि सू शैतान है, और मुझे डराना चाहता है, लेकिन मैं तुझ पर विकार भेजती है। श्री नालायक शैतान । पूर्व कहीं के, थेवा !" यह कह कर वह एक गाना गाती है। ठहाका नकली शैतान से लगाया गया । नायिका ने अपना संवाद बोल दिया । एकाएक एक धमाका हुआ। सेन को छत से एक लपट सी निकली, और कोई विचित्र चीज पूदी जिसका रंग हरा था। थासां की जगह दो चिनगारियाँ दहक रहा थी, दो चमकीले सींग थे, नुकीले कान ऊपर को उठे हुए थे। बड़ी हा भयानक श्राकृति थी। नायिका ने एक हृदय विदारक चीन मारी और खड़ो की खड़ी रह गई। हम सब हैरान रह गए। अब जो गौर से देखते हैं तो ये असला शैतान (स्त्री) थे, जो अपना मेकअप स्वय कर पाप थे। नायिका इतनी डरी हुई थी कि उसने एक विचित्र येढगे स्वर में गाना शुरू किया-रस से भरे तारे नयन !" उसका राग बिलकुल अंगरेजी मालूम पड़ता था। शैतान ने अत्यात भयानक स्वर में हँसना शुरू कर दिया, और थियेटर हाल के सार यो बिल्ला चिल्ला कर रोने लगे । जो मो यथा रोता था, उसे घर भेज दिया जाता था। अब जो शीतान ने बराना घभिनय शुरू किया है, तो दर्शकों पर सखाटा या गया। एक एक करके समीनियाँ चली गई। सारांश यह कि शैतान ने जी प्रोस कर घमा धोकड़ा मघाईत में तो यहाँ तक नीयत पहुँच गई कि शैतान रे घने मन सराद बोझता तथा प्रत्येक एश्य में मर पर आना शुरू कर दिया चाहे बाका पार्ट हो या न हो। परम धाया, जहाँ शैता को मेरे एक मन पढ़ो पर मर जाना चाहिये था। मैं कई धार मन्त्र पढ़े किन्तु शैतान स मे मम न हुए । मैंने चुपके से कहा-"म मर भा जायो।" प्राम्पर में कक्षा-"मर मा जाइये, रूसी साहप !" मध के पीछे से मावा आई-"मर भी जाइये, जनाद घेकिन उदय मत . - वह फिर भी न मरे । अत में मने गुस्से से कहा-"अब मरते हो या नहीं।" शैतान ज़ोर से बोले-"महीं मरते।' शीर दशक हमने लगे। घच्छा, तो यह बात है। उ, फिर " मैं सचमुच उठने ही लगा था फिर रयाल थाया कि यह शाहजादों की शान के खिलाफ है कि मामूली से शैतान पर हाय उगा । अण्व मैंने ताली बजाई । कुछ सिपाहा पा गए । मैंने कहा--"ले नायो, इस शतान को पकड़ कर मार डालो।" "जहनुम में भेज दो दशकों में से किसाने नारा लगाया। "हा तरल फरके जहनुम में भेज दो।" 'नहीं जाते हम,"शैतान ने अपने लम्बे-लम्बे नुकीले नासून दिखाते हुए कहा। 'अच्या तो पिर लाहौलविलास्वत !'मैंने जोर से कहा। और शैतान एकदम तड्प और लोग मार कर जाने कहाँ शायद हो x x मुझे अब जो विश्वस्त सूत्र से सूचना मिली, तो मैं सुशा से बेकाबू हो गया। मुझे बताया गया कि रजिया को सिर्फ मरा प्रयास है। खयाल क्या वत है!वह खिची खिचा अवश्य रहता है बकिन इसका कारण हुकूमत थापा है। मै सीधा शैवाल के पास गया, और कहा कि मई शप तो पूरा विश्वास कर लेना चाहिये । मेरी हालत उन दिनों पागलों की ती थी। जो कुल शैतान कहते थे मैं तुरत कर बैठता था। पहले तो उन्होंने अपनी प्रादत के अनुसार मुझे रशिया से बेजार करने का काशिश की, उसके मायाल से बान या जाने के लिये कहा । जप मैं न माना तो होंने कहा कि दुनिया पहुव या है और रशिया की निगाह मा कमजोर है। मैं फिर भी न माना तो रहोंने एक सपन सी योजना यताई कि मै रशिया में बाहा में मिल खोटो समय अनारों के मुण्ड की ओर से माऊँ और यह। जो गड्ढा है, उसमें गिर पहूँ और बहोश हो जाऊ। रजिया जरर सिर दवाएगी। यह मैं बेहोशी ही में यक्ष्यहाने खD, और रजिया से ममलयात RIV साप कह दूँ । यस शस समय ओ जवाब मिलेगा यह प्रतिम होगा। में हिचकिचाया । शैतान भोज-यह आखिरी इम्तहान है। इस बार बरर मालिश अवाय मिलेगा। हिम्मत करवा दालो।"

शैतान ११७ में तैयार हो गया। मैंने न ही को जास्स बनाया कि जैसे ही रजिया यारा की ओर जाय, मुझे तुरन्त इशारा कर दे। इशारा पाते ही में भागा, और रज़िया को थारा में जा लिया । पहले तो अपने ड्रामे के बारे में पता। पोलो- 'कुछ ऐसा बुरा भी नहीं था।" फिर इधर उधर की बातें होने लगी। जय लोग्ने खगे, तो मैं उसे अनारों के मुण्ड की ओर ले गया । अथ वह छोटा सा गड्ढा पाया जहाँ मुझे गिरना था। पगडपही से गड्ढा दूर था, इसलिये मैं घास पर चलने लगा, और एकाएक अनायास ठोकर खाकर मैं गड्ढ़ में कुछ इस तरह गिरा कि सचमुच चोट लगी। गिरो का रिहर्सन मी तो नहीं किया था। रजिया पपरा गई । उसने मुझे होश में लाने के उपाय किये, लेकिन में भना कहाँ होश में माता । मैंने हिदायत नम्बर तीन के अनुसार धीरे से कहा--"जिया और प्राखें मपका कर देखा भी। मैंने पिर धीरे से कहा-"मेरो रजिया!" और वह मेरे पास घेठ गह । अब मेरा सिर दवाया जा रहा था। कहने को तो मैं 'मेरी रजिया कह गया था, लेकिन मारे डर के मेरा बुरा हाल था। मैंने पूरे एक मिनट के बाद फिर कहा- मेरी रजिया!" और रजिया चुपके से योलो-"हाँ" और मैं मानो भासमान में उड़ने लगा। अब उसने मेरा सिर अपनी यक्षी पर रख लिया, और मेरे बालों में अंगुलियो धज्ञाने खगी । नियपामा वाप मिल चुका था, मेरा जी चाहता था कि नाचने लगूं । रतिया का अंगुनियाँ बालों से खेजती-पेजता गरदन तक पहुँची, और मुझे पकदम जोरों से गुदगुदी सगी तो सारे यदा कर दाने, भोंड उपाय, अपनी धुरकिया की, पहुरा रोका, किन्तु वह कमयाम पुदगुदो काबू में न पाइ, और मैं खिरबिला कर ईस पड़ा । प्रय सो रनिया नाराज हुई है, यस पहिये। दूसरे दिन शाम को अस्पन्त उदामी के साथ मैंने शैतान को सारा हिमा सुमाया । यह यो-भैया, पहले ही से मुझे शक या, लेकिन अब मुझे यकीन हो गया है कि रजिया सुम्पस इमहीं करती। इममें रसको कोई धात नहीं है। डिसी का क्या जोर ! और जय मोहन्वत चा पयार मोदरपत में न मिले, वो पहा से चुना जाना चाहिये । ऐसे मौकों पर प्रायोदया कायद खना बहुत पसा होता है। पर यहा कर मिशय रमोगम के तुम्हें कम मिलेगा। इसलिये अदा पहा है कि भैया, तुम यहाँ से बड़े जाओ, और x x .

उदय प्रस्त 1 जाये। समझ लो कि रजिया को कभी देखा हा न था।" मैं और मा उदास हो गया । मैन भरे हुये स्वर में कहा-"श्रय में जहाँ भी जाऊँगा यहुत हा उदास रहा करेंगा क्योंकि रतिया मुझे इतना पछी लगती है जिसका कोई हद नहीं । अब मैं इसे हरगिज़ नहीं भुला सकता।" इस तरह का बातें करते रहे। आखिर शैतान ने मनवा कर भादा कि इस समय मेरे लिये अछा यही है कि मैं चुपके से चला माऊँ बिना जा साहब से बतजाये। "और कालेज के साफ्रिके मैंने पूछा। "वह मय में भेज दूंगा,"-शैता बोले । और थोड़ी देर बाद में सामान बाँध रहा था। शंतान मेरा मदद कर रहे थे। इतने में हुकूमत पापा आ गई । पीछे पीछे नहा भी, जिसे वह सदैव अपने साथ रखना था। मैंने जल्दा से सदूरु बद कर दिया । मुझे हुकूमत थापा बहुत बुरी लगी। मेरी और शैतान की यही इच्छा थी कि यह किसी तरह यहाँ से चली शैतान बोले-"नदी, देख तो सही साय के कमरे में जो क्लाक है, वह चल रही है, या खको । महा लौर कर बाला-"क्लाक चल तो नहीं रही है, खड़ी है, यस अपनी दुम हिला रही है।" शैतान नदी से बोले-"ता गोया चल रहा है न?" "चज कहाँ रहा है। चल किस तरह सकती है चारी ? कालों से सो गाड़ रक्खा है । बस अपनी दुम हिस्सा रही है। न ही योनी। हुकुमत पापा हँस दो। शतान चिढ़ कर बोले- "यह यही हो कर पूर्ण हुमत बनेगा । शायाश हुकूमत क्या लाजवाब ट्रेनिंग दी है तुमन इस बच्चो को परमानाश कर दिया!" हुकूमत पापा अभी कुछ कहन हो वाली थी कि शैतान बोले- तुम्हें चाहिये कि इस सारे सया पढ़ा कर एक सटोक्किर दे दो, हम तरह कि मैंने पूरे चार साल 8क इस बच्ची को अपनी ट्रेनिंग में रखा और इसे अली सरह विगाइने की कोशिश का और अब मै यह प्रस (ग) से कर सकती हैं कि यह एक छिछोरी, पटोरा और जिहा बाकी बन गई है। लागों को प्राहमजाइ अलोचना करने में तो इसने मुझे मात कर दिया है। हर क से लाना- मगदना, धुनों का हुक्म न मानना, अपना वक्त बराक्ष करना-इन सब शैतान पातों में यह ऐसी होशियार हो गई है कि क्या कहूँ । जहाँ भी यह जायेगी मेरा नाम रोशन करेगी, मेरी हिमाकतें इसके साथ हैं।" और हुकमत थापा ने एक तेज-सा जवाब दिया, और बाहर जाने के लिये उठ खड़ी हुई । नन्हीं बोली-'भैया, अब तो साप हुक्मत थापा को धमका लते है । जरा इनकी शादी हो जाने दो, पिर दखेंगे हे कौन धमकाता है ?" 'अस्या तो हुकूमत की शादा भी होगी ! कान कहता है?"-शैतान प्रय हुकूमत थापा उबल पड़ी। बोली-"और तुम्हारी बड़ी होगी। देस लेना जो कोई लड़की तुम्हारे नजदीक खड़ी हो जाय । ब्राहमरवाह रजिया को मी परशान कर रखना है और (मेरा भोर सकेत करके) इस येचारे को भी " इस पर मेरे कान खड़े हुए। और शैतान और हुकूमत थापा की खूब लड़ाई हुइ । हुकूमत प्रापा ने सब कुछ बता दिया। मुझे तन-बदन की सुध थी। मैंने शैतान को कालर से पकड़ लिया, और पूछा-"क्या सचमुच तुम रजिया को मेरे खिलाफ बहकाते रहे हो?" मैंने गैतान को अपनी ओर खींचा और मुक्का ताना ही था कि इतने में जज साहब मा गगे । वह सदैव की भाँति मुस्करा रहे थे। योजे- 'मैंने सब-कुछ सुन लिया है। बैठ जायो ! जय मैं योरप में था, तो यहा क लड़के से मेरी सरपट हो गई। हमारे प्रोफेसर ने हमें झगड़ते देख लिया । वह बोले कि तुम दोनों के दिलों में एक गुयार है, से निकाल देा अच्छा है। तुम किसी न किसी दिन जरूर खड़ोगे । इसके बाद वह हमें खेल के मैदान में गये और यहाँ हमारी मुक्का बाजी करवाई। हम सूर्य बहे । यहाँ तक कि दोनों पक कर गिर पड़े। और हम जब वापस भाये, तो पड़े अच्छे दोस्त बन गये थे। सुम दोनों आपस में जरूर दोगे, इसखिये अच्छा यही है कि हम लोग Ram में चले । मुम्हारा फैसला यहाँ हो जायगा।' रहाने ग्वाटक (Gloves) मंगा जिये, और हम सम कमरे से बाहर निकज भाये। प्लाट में बिजली के बटु जल रहे थे। निश्चय हुथा कि वहाँ बहाई हो। हमें 'लाज' पहिनाये गये। जग साइय ने घड़ी हाथ ले ली। हमारे चारों उदयप्रस्त और सारा कुटुम्ब खदा या जज साहरघोजे-"कितने उE" मैंने कहा-"जितने थाप धा!" शतान बोले-शान" जज साहब ने कहा--"तीन में तो फैसला नहीं होगा। पांच सही।" पहला राउद शुरू हुआ। न जाने मरे हाय पाव क्यों शिथिल हो रहे थे। मैं बिना किला धावक शैतान से रिहाया सबस्ने मेरो धार में और मेरा हिम्मत बढ़ा रहे थे। रशिया 0 भोर अकेला सीधी, बिलकुल सुपचाप। पहला राउर शैतान का रहा। दूसरे में उन्होंने फिर पीटना शुरू किया, धौर में बुत पना सदा रहा। यहाँ तक कि मेरा एक मुका भी उनको न जगा । बचे चि ला चिल्ला कर मेरा SHEKाने का मन कर रहे थे, और मैं म जान क्या सोच रहा था । शायद इस बार के यार and यहाँ से चला जाऊँगा । एक ट्रेन रात को ग्यारह बजे जाती है। सीसरे राइट में भी यही हुमा । शैतान उछल उछल कर हमला करते थे, और में बचा न कर पाता था । पञ्च बुरी घरह शोर मचा रहे थे। सीमरा रा सम दुधा। मैं गहा था कि रजिया न मेरे कान में कुछ कर दिया। मैंने कॉपती हुई आवाज में पूछा-"सच !" घर बोली-"ही" और मेरा चोखों के सामने तितलियो नाचने लगी। में उचल कर खड़ा हो शथा। খাঁখা যায় কুয়া। ঘাম-ঘষাম-কাম---ফী স্মার্ট স্লাই। मेरे ग्ला जन हरकत का और मेरे सामने शतान येहोश पड़े थे। घह ना पाउट हो गए ध । जज साहब ने मेरा हाय हवा में ऊँचा कर के हिला दिया। चौर रजिया मेरम्बामा उतारने लगी। हुकुमन भारा बोली- मुझे पहले हा पता पहले पता था आपको! यहा न' चौर रजिया बड़ा पारा मुंह बना कर बोली-"मुझे भी पहले ही से पता था !" -कैरेन शफीकुरहमान नरत धनबादी में दम दिगामबयाफाभी CM नही मिस १२३ हुए । तो उन्हें बचे हो कर भी सक तरह पान पनाका पादत नहीं हुई थी। पार सो अग्मों को सलाम किया और पछा-"धची जान, यह कौन सानम " से उसे पहिचान भी नहीं सकते थे। जब अम्मा ने कहा-' बनून है" और अम्मा भी यदी सीधी है, जैसा मगल का नयाय देना जरूरी पा, सो सुन कर मुमकराने लगे और कहा--"बनून ? अच्छा । मैं समझा था खका की राजकुमारा है।" यस इसके याद देस देख कर मुसकराते ही रहे, जैसे किसा बात का थानन्द ले रहे हों। पमून को याद आया कि पचपन में मामा हमें 'लका का राजकुमारी' की हामा मुआया करते थे और यह कहा करते थे-मैं मालका का राजकुमार। को याद कर बाऊँगा। जैसे ही यह यात याद भाई, शर्म से उसका मुंह खास हो गया। नासा कर मानदेय की यह या न पाया कि शायद यव- परका पात र पार हो न रही हो, या शायद सपोग ही में उनके मुह मे पर निकल पड़े हो। मगर शायद यह भी उनका भार तास ही रह थे। भने खगे-"मनार के फूल बहुत गवसरत होते हैं, मुझ ताय दूत पसन्द है, धारका पसन्द नही स्पा, बची जान " अामा यसरी बन पाती को स्या समझे ? उन्हें क्या पता लिये एक-ए पर पुन कर पापा कि पस धमी प्रेसजा रखो।पाद में न कहना कि मुझे अपना पूरा पमम्द महीं। और उसके लिये धार मे अनार का सुना था। भर बसून मोच रही थी "हो परो भय न पाय थेटना दी पाम तो नहा, यसमा पाम ठना ARENA र सर दर्शाया माये उभागये। धोगों को मार खा, मार रिया, मिकी देसी HITCHET"मामिया या जप कर मुसाहनीभार करने और उनसे को दानाTATE TRAI मामा uae ! भलिग पास में राम मोरा ने ED THERE ARE RATE मा urani misai समे पर मांगने-माने निधय लिया पार पा धान में काम - HTTERSnetreen - TION-माय १२२ उदय प्रस्त । वम पाते और दो एक मिनट देख कर शामिल हो नाते और उस समय उनके चहरे से प्रसनना यों फूट फूट कर निकलतो कि कोई उन्हें खेलाने से इनकार न करता । और इससे बनून पहुत कुदा काती कि यह क्या चतमोजी और काई कहे तो- मेरा जा नहीं चाहता," और पाप जप चाहें, तो लाट साहर की तरह थाकर शरीक हो जायें। उसे याद था कि यह खामोशा के साथ हर चीज़ को थपनी घड़ी पड़ी आँखों से दखते थे और फिर कभी कमा अपने होगे को पाई घोर मुका कर इस तरह मुसकराते कि बनूना बहुत चिढ़ता। कहते कुछ नहीं थे मगर इस प्रकार मुसकराते कि दूसरा व्यक्ति लजा ज्ञाता और उसे ऐसा अनुमय होता, मानो से किसीने कोई जुम करते हुये पकड़ दिपा हा। उसकी यह आदत उसे बिलकुल न भाती और फिर एक और बात जो याद अाना, तो अब उसकी याद से उसे बड़ा शम पाती। एक दमा रात को घर पाले किसी दूसरे घर में गए हुए थे। सय ने कहा- 'मानो, श्राख मिचौनी खेलें।" सब किसी न किसी जगह छिप गए। वह भा एक ओर भागा । उसे सदेह तो था कि सुलतान भाई कहीं उसी तरफ गए थे, मगर उसने परवाह न की । उसे हिप हुए थाधा मिना भी नहीं हुआ था कि किप्तीने उसकी कमर में हाथ डाल कर अपनी और स्त्रीचा । उसने कहा-'सुलतान भाई" बस आवाज़ पहिचान मते हा उन्होंने हाथ निकाल लिया। जैसे उसे छूना भी पसद नहीं करते। श्रोर अब कितने ही वर्षों बाद गरमियों की छुट्टी में वह अपनी माँ और छोट भाई बहिनों सहित अपने घर जा रही थी, और सारे रास्ते घे बचपन की न मिटन वाजी स्मृतियाँ उसके मस्तिष्क में घल चित्रों के रूप में चक्कर लगाता रहीं । थापा अनवरा के विवाह में यह ताया के यहाँ थाई थी भोर दस बारह दिन रही था, पर उन दिनां घर में इतने मेहमान थे कि वह बचपन के साथियों से पूरी तरह न मिल सका था। छोटे सिक दर और अलमास के अलावा सभी इधर उधर काम में व्यस्त थे। सुलतान भाई से तो किमा को क्या थाशा होती कि वह अदर पा कर एक मिनर भी यैठत, थोर फिर यय यह माशारजा भवान हो गये। चौड़ा छाती ऊँना माथा और घही मुस्कान मद सी, हृदय को जकड़ लने वाली रहस्यमयी मुस्कान । हाँ, पर मुस्कान के साथ अर्ति मो कोनों का मोर जरा सिकुड़ stal और उनमें एक चमक पैदा हो जाती, जिससे देखन याजा और भा मजा जाता । पहिले ही दिन कुछ देर के लिये भर घा कर बैठे। सितम्बर के दिन ये बादामी पोपलेन' की तुले गले और प्राधा बाहों पाखा कमान पहिने हुए थे और हाली मोही का पाजामा और थाल विखरे । - नफरत निकात की थी। पैसे निकहत पी ही सेज और धतुर कि इस पर दुनिया का निकहत ने कहा-"अम्मी!माजम अब बड़ा हो गया है, भाप सीकी समसन हागे। भोर टसे महम्मदुमा किबहुत-स पादमी अगर ऐनमा में भी प्रशसा कम ही होती। घर में कोई भी सुलतान की इच्छा के सम्बन्ध में निश्चित राय प्रकट नहीं कर सकता था, क्योंकि प्राय उसको रचि प्राशा के विरुद्ध हा होती। जैसे उसे लोगों को हैरान करने में अानन्द आता हो। केवल निकहत की तीक्ष्ण ष्टि हो कभी-कभी सुलतान के मतलय को माप आता 1 अम्मी कमी सार ही नकाती और यही कारण था कि उन्ह सुलतान का स्वमाय कमा टेदा या पेचीदा नहीं मालूम होता था । में बलवत्ता सय को विश्वास था कि सुल्तान को लड़कियाँ पसन्द नदी और यह यह योग्य, घेवा और पारमाभिमानी समझता है ।मुलतान का यही यहिन अनवरी का विवाह हो चुका था, और उ हे दो-तीन वप से मुखतान के विचारों के सम्बन्ध में कोई जानकारी नहीं थी। बड़ा भाइ कोई पा नहीं । बाज़म और सिकन्दर उससे कई वप छोटे थे । केवल निकहत हा उसकी उम्र की थी। पर निकहत को अपनी सहलियों ही से कम पुरसत मिलती थी। फिर भी किसी पर यदि सुलतान का रोव नहीं था ता यह कोई ध्यान रोव नहीं जमा सकता था। उसने शिक्षा तो दस मास हा तक मास का थी, मगर अपने अध्ययन के बल पर हर विषय पर अपनी राम भार दिया करती थी और मुलतान को सामोशी और उसके गहर विधार कभी ससे देर तक सुप नहीं रहने देते थे। और अब चूंकि धम्मो मुलतान से स्शन पर जाने के लिये कह रही थी, लिये नहीं आये, परना यह तो बहुत जाने को कहते थे। रोज याद करते थे कि समान को भायेंगे यह भी कहते, अयीको दिन रह गये है, भात तो निकास के न्यायमय लहजे की उपेश करते हुये सुखताग ने कहा- तो भातम धना जायगा, मुझे सचमुच काम है। अजयथा यह कयाकाRI, निकहत मारा येगम उन सोरान, TENNI RE रहने दो।" यह ६ कर पार पार पले गये, मगर निकहत का विश्वास हो गया कि सुयताा भार स्टान उधर जैसे जैसे स्टेशन रोप माता गया, यसको विश्वास होता गया और कोई उन लोगों को बनाया जाय, पर मुस्तान भाई रस पाय, वो बार भी सामान सतायाए याला " अगर जायगे।

दृश्य मण - पानी की तर से। पिसान भी माय थे, घोरे मियो भी साथ थे। पमह पर्ष का सप फागे होती है। हर मिया पयों में तो गिने नहीं मा सको थे। घर का रास्ता मह परदा तरह जानत धे, घर अपना था, फिर जिस पाने की जमात ही क्या थी ! म अप सम्मा ने कहा- हास साद ने किसी न किस को जरूर सेशन पर भेजा हागा, शागर मुलतान हा को भेजा हो।" तो पमूल में बड़े धार से कहा--कीन मुलतान माई १ या तो कमी 7 धायेंगे। और पिर हमें इनका रत ही क्या ! म सुर भी तो घर पहुँच सकते हैं।" जप स्टेशन मा गया, तो वम ने पविखा ग्यक्ति को देखा यह पालम या। सपारियाँ सरने की कोशिश कर रही थी और इधर अम्मा जशी मरदा' की रह लगाए हुए थी। मगर मी कुलियों ने सामडाक से उदाया भी नहीं था कि कोई साहय पसलूग की पाई जब मदापाले हेट माये से हराय धीरे धारे उपर पानिकले । पैसे घर से मैर करने पाये है।बतूल को कोई विशेष ध्यान देने की शाररत नहीं पी चौर न उसने कुछ कहा हा, और अधा हुमा बघु पहिने हुए था। नहीं तो मुखमाम माई सके चेहरे की कमियत देख कर पता नहीं, क्या कुछ म कहते, क्योंकि यह तो पता को स्वाकार करना पता कि उस चेहरे की रगत उसके सपने काय मैं नहीं थी। साधारण से साधारण यात पर मुम्ती की हर उसकी गरदन से लेकर उसके बालों तक पल जाती है। घर पहुँच कर बतूल को प्रापा निहत से गले मिल कर अपूर्व प्रानन्द हुआ, क्योंकि उसे निकहत का धमाव सदा से यहुत पसद था। उसने पहिला ही सवाल यह किया-"सुलतान माई स्टेशन पाए थे" यत्न ने कहा-'जी। इस पर उन्होंने कमर में हाथ डाल कर मार से इसे दवापा और साथ ही सिद्ध खिला कर हंस दी। इसने में सुलतान भाई भी श्रा गये। इस पर निकहत में सहानुभूतिपूर्ण बहजे में पूछा- 'सुलता आप यक तो नहीं गये धाप क्यों इतनी सकलान किया करते हैं? सरके किया ऐसे कामों को ! मेर चाँद से भाई का मुंह कुम्हला गया।' और हमदर्दी जाहिर करने के लिये यह अपना हसता हुइ मावों और होठा को इस तरह सिकोड़ा कि ताई भी हंस दी और सुलतान भाई भी हसने के लिये मजबूर हो गये । और फिर तो वे भाग निकहत के पीछे दौदे है वे भागे धागे और थाप पारे पाले, रसियों और मोदी को गिरा, सामान को तितिर-वितिर कर इसते हँसाते एसा उधम मचाया कि सब देखने वाले खोट नफरत पेट हो गये । और ताइ ने कहा-"यह तुम्हारे पाने की सुशी है, गही तो सुखतान तो कुछ दिन से बहुत चुपचाप सा था।" दो ही तीन दिन में बल को विश्वास हो गया कि उसका ख्याल मिलपुण सया । जहाँ कही यह बैठी होता, अगर मुलमान माइ श्रा जाय तो पहिले वो यह पमा याचना करके चले हो जाते और अगर अम्मों के अनुरोध या भाग निकहत के कहने पर बैठ मी जाते, तो जान-यूम कर उसीकी उपेक्षा कर के बातें करते रहते। इस कारण सिधे राने का एक ही श्रथ था कि उन उसस नफरत है। और अगर नपरत है, मो हो । प्रातिर पतूल ही को यह का पसन्द थे? यात करनी होती तो उसम भी पकाध बनावट दूर कूट कर मरी होती । "यो हो पतारी रयतो हैं ! श्रछा तो यह आपने कादा है बाहामक साई ! अापको तो यह चीज़े किसानुमायश में रखी चाहिये । इसमें सिवाय यग्य के और क्या है ? मान लिया कि हाथ पकड़ कर उंगलियों को बड़ी नरमी सदयाते और हागों को बनावट को पछी सरह देखते, पर इससे यह कहाँ सिद्ध होता था कि उन्हें मेरे हाथ पसन्द हा है। एक दिन प्रापा निवडत ने कहा-"प्राज शाम को सर को चलेंगे।" पतूल ने श्रापा निकहत से पूछा-"सुलतान भाई तो नहीं जायेंगे?" निकहत ने मुस्कराते हुये कहा-"कोई भरपी-सी साड़ी पहन कर पायो, सैयार राह में कर लूँगा। तुम्हारे पास आसमानी रंग की कोई साही है। पतून ने कहा-जी! जाजट मेप का है तो, और बाहर भी उस पर पहुन सूबसूरत लगा।" पप्त थापा निकहत ने अनुरोध किया कि पिर यही पहिनी । शाम हुई सो पोल नहा धोकर कपड़े पहिनने में लग गई और सादी पहन कर तैयार हुई तो पापा निकहत को चायाज दी। जय मुलतान ने दा दोनों को प्रात दया, तो होठों पर मुस्कराहट मा गई, यही व्यग्यमय गुम्काहर, पही पुराना मादा चल अकेली होती तो शायर सामने NEETint मगर प्रापा हित साथ थीं। यह पकड़ हुये पास गई, और कहा- "मुजसान गाई, नो, या, अप सैर को चन, गाम हो गई है। ग्राप को मारिन के पार की है न! प्राप के उसे उटते गरम इप मायगा" पर गुटतार में काई उत्तर नहीं दिया, केमा बन्द को अप-सुली मा देखता निकत ने कर दिया-"का, कासी देख लिया है, ही!" मगर शापर सुषमान को पहचोट पसाहा कहा-'गुम साकाम है, म मागम को और पोटे मियों का नामा। और फिर ranatime उदयन्माण - साय वा मका है। यह कहा और सह का सपने कम में पड़े गये। पनमा ने पापा निराहा को पावाद भा नहीं की। यह कहती रही टहरा मैं जानता हूँ हनक स्वभाव का, याम मार है। र सैयार होने को हो गये होंगे। मगर पतून न पुष्ट म मुना पौर विषका से निकन या सीधे थपन कमरे में चली गई। मनन उम जितनी घमासे पाया उतनी किसी और को कमान हुई होगी | VRITT पर गुम्पा था कि प्रापिर मैंने यनाय मिगार में इतना समय नष्ट किया हो क्यों मखिये कि मुनमान भाई मजाक करें। इसे अथ उस साही ही र नररत हो गई, गा में भाया कि पाल कर पंकदा इधा निकहत ऊर मुलतान को बुलाने गई और कमरे में दावित होते हा कान लगा---'सुलतान माइ, यह मार को प्रया प्रादा है कि किसी को सताया, किमा कारखाया ?' उसने कहा-"क्यों ।' और यह सचमुध चकित था, क्योंकि वह तो पड़े बदल रहा था। निकहत ने कहा- मा मा करने में यद हाशियार है, मगर प्रारमनार करते समय प्रान तो ही बन्द कर लिया काजिय । मुझे विश्वास है कि येचारा बनून इस समय रो रही होगा । सुलतान ने जहा से पूषा-"क्यों ?" निकहत ने दिया-"पों क्या! उस तो मैं मा मायना कर खाई और पाप ने इस प्रकार उमा दिन दुखा दिया। मैं उस रोकती ही रहो, क्योंकि मैं बाप के स्वभाव से नूग परचित हूँ, मगर यह क्या जाने प्रापको गुझसे हाथ गुड़ा कर भाग गई । भय समा नता इमाम हकि मना कर खायो ।" पहिले सो मुखतान हिचकिचया, पर थापा निकहत के मार करने पर वह पनून के कमरे में जा ही पहुँचा, यहाँ दबा कि सचमुच यतूल मिस्तर पर पौधा पड़ी रो रहा है । साड़ी मा साधारण ता पहिने हुए है if का पार सुना तो यतूल सिर रटाया, सुलतान का दगा, ता पहिल अदा से झाँस पाव और पिर मुस्कराने की कोशिश करत हुये कहा-“याइये, मेरे सिर में दद हो रहा है। मगर यह पहुत धक्ति हुई जय सुलतान ने कहा-"गुझसे नाराज हो गई हो क्या" घतूल ने कहा-"प्रा सेऔर फिर उसका घोसी से प्रोस डयडया याये । इसके पाद धतूस को याद नहीं कि क्या हुआ और कैमे । चौर मगर जब उसे विश्वास हो गया कि वह स्वश नहीं देख रहा है, तो उसने अनुभव किया कि उसका सिर सुलतान के चौडे सीने से लगा हुश्री था और सुलतान के वा उसका कमर को थामे हुये थे। -संयद फैयाज महमूद, एम. ए. A3-911 -

Udhay Asth

Author
Mahmood Ahamaad
Title
Udhay Asth
File name
Udhay Asth
Text
OCR done
Citation
1918
Published
2011/04
Publisher
Allahbad Maya Press
Language
Sanskrit
Pages
129
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
552314
Barcode
4990010033057.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
j04iAkJZpUa
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