Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Meri Sreshta Vyangya Rachnayan

Shri Lal Shukla · 2011/03

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मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएं
(ध्यग्य),

-
3M..
ज्ञान भारती
४/१४ रूपनगर दिल्ली ११०००७

मेरीअष्टव्यंग्य रचनायें श्रीलाल शुक्ल

लान मारती
४/१४ रूपनगर
दिल्ली ११०००७
द्वारा प्रकाशित
श्री श्रीलाल शुक्ल•मूल्य
२५००
द्वितीय संस्करण
१९८९
सरस्वती प्रिटिंग प्रेस
ए ९५ सेक्टर
नोएडा २०१३०१ में मुक्ति।
[228.2-06-589/G
MERI SHRESHTHA VYANGYA RACHANAYEN (Satire)
by Shrilat Shukla

परिचय
१
१९७० में साहित्य अकादमी का पुरस्कार पाने के उपरक्ष्य में बागी
की पत्रिका 'इडियन लिट्रेचर' ने मुझसे माग की कि मैं माहिपिर नीदर
और विचारो के संबंध में एक टिप्पणी दू। 'मेरी श्रेष्ठ Enary
सीरीज का लेखक होने के नाते मुझस सगमग मी firrrrrr
प्रकाशको की ओर से की गयी है। इस बार प्रre rsery
में सबध में अपने विचारों को लिपिवट पर।
'इडियन लिट्रेचर' को मैंने जो दिksrter
उमरणो का भावानुवाद मैं यहाँ धागे Super
त्यिक जीवनी के कुछ तथ्य तो पहा for
और विचारो के बारे में मैंने बसीtarntrrs
जिन कारणों से ऐसा हुया treater
मेमी में वही नोति का rry

1 ढग से शब्न्वद्ध र मूवता है,। (यह दूसरी बात है कि हिंदी के अधि- काश कवि और कथाकार अच्छी वैधारिक टिप्पणिया लिप सकते हैं और लिखते है, और यही नहीं, उनमे मि बटुत मे ओसन म चे र के चवता भी हैं।) एक ही व्यक्ति का एक साथ सजनात्मक लेखक, मनीषी (इटेलेक्चुअल) और विद्वान (अकेडेमीशियन) होना लाजमी नही और कम स-कम मैं इन तीनो हैसियता का मिश्रण नहीं ही है। इसलिए मिफ व्यग्य वथाए या राग दरबारी लिप सकने के कारण मैं व्यग्य पर कोई शास्त्रीय व्याख्या देने की अपन म क्षमता नहीं दयता । दूराग कारण कुछ ज्यादा व्यावहारिप है। सजनात्मक लेखा होने का एक बड़ा फायदा यह है कि लेखक अपनो मायतोआ और विचारो की स्वय व्याख्या न करके दूसरो से साफ उम्मीद कर सकता है कि वे ही उसके लखन मे अनिहित विचारों को साज करें। यानी खुद तली हुई मछलिया को स्वादपूर्वक चखते हुए वह पाठको और आलोचको को अपनी बसी के साथ उस नदी मे मछली फसाने के लिए भेज सकता है जिसमे लाजमी नहीं कि मछलिया हा ही। अपनी मान्य ताओ को बचारिक स्तर पर स्पष्ट बरन या उनको व्याख्या देने में और भी खतरे है । इससे आप पाठको और आलोचका के हाथ में एक ऐसा हथियार पक्डा दते हैं जिस थे जब चाहें उस आपकी रचनाओ की गदन पर चला सक्त ह । एसो -शा मे जरा सा प्रोत्साहन या डील पात ही अपन विचारो की बियर बातल स फेना बहाने वाले बहुत से दूसरे सहकर्मी लेखका के प्रति मेरी शमनामनाए पर हलाल होने के लिए परम भद्रता के साथ आगे बढने वाले ममन की भूमिका में मेरी दिलचस्पी नहीं है। एक कारण और भी, जो मेरे लिए सर्वाधिक महत्त्व का है। विचारो का एक बहुत यहा इलारा है जिसमें लेखर की हैसियत से यहा तक कि नागरिक को हैसियत तक से में नाज ता अपनी माय तामो का अपने लिए भी परिभाषित नहीं कर पाया है। वहीं तोह पोड और पुननिर्माण की एक आतरिद प्रक्रिया अनवरत रूप चल रही है जिम दशा दे मागे पेश करने की हिम्मत जुटाना मेरे [७ लिए मुश्किल है। इसलिए असमथता, विवेक और लोक-चातुय-सभी दृष्टियो से लेखकीय अधिकार का झडा उठाकर यह वक्तव्य देना तुझे ज्यादा अच्छा लगता है कि "मुझे जो कहना था वह मैंने अपनी रचनाआ मे कह दिया है। उसके अलावा मुझे कुछ नही कहना है।' २ पर परिचय के तौर पर अपनी साहित्यिक यात्रा के बारे मे मुझे कुछ कहना है। नियमित लेखन की शृपला में मेरा पहला व्यग्य-लेख 'स्वणग्राम और वर्षा है जो बगद का पाव में सगृहीन है । एक जमाना था- और अब भी है -~~जय आल इडिया रेडियो के प्रोडयूसरगण वर्षा, शरद, बसत जैसी ऋतुओ के प्रसग मे रोमाटिक सुबुब सुबुकवाद के पलडगेट खोल देते थे और अब भी खोल देत है। ग्राम्यजीवन की कठिनाइयों और निमम परिस्थितिया से उनका कोई सरोकार नही, के लिए मौसम का हर बदलाव 'होली है। होली है।' या 'बिरहिा नीर बहावे का मौका पेश करता है। अपने साहित्यिक बचपन में भी यथाथ का ऐसा तिरस्कार और रामाटिक जडता की ऐसी अधोपासना मुझे सिफ खिझा देती है। स्वणग्राम और वर्षा रेडियो पर आने वाले एक ऐसे ही सगीत रूपा के खिलाफ निकली हुई प्रतिक्रिया थी और चूकि वह प्रतिक्रिया आज मुझे उतनी श्रेष्ठ नहीं लगती इसलिए इस संग्रह मे आने से छूट गई है। 'इडियन लिटरेचर को १६७० मे मैंने जो टिप्पणी भेजी थी उसका एक प्रास गिव अश इस प्रकार है "अगर किशोरावस्था मे किये गए पपलो को न गिनें तो साहित्य मे मेरे प्रयोग २७ वष की अपेक्षाकृत परिपक्व आयु मे शुरू हुए । (सिविल सवेंट की हैसियत से मेरा रियर और भी पहले शुरू हो गया था।)

. R यह १९५३ ५४ की बात है। उस समय मैं, जिसे पिछरेप- मे बुदेलघड के सबसे विकट इलाकों में गिना जाता था, यानी राम के एक दूरस्थ हाब यगले में अस्थायी तौर से रहता था, बोट वहां मेरे सुख के साधनो में कुल मिलाकर एक बैटरी वाला रेग्यिो, एक रदूक और दो राइफलें, एक पटारा ऑस्टिन, मुटठी भर कितावें (ज्यादातर रिप्रिंट सोसाइटी के प्रकाशन) कभी-कभी आने वाली पत्रिकाए, बिना शिक्वा शिकायत वाली बीवी और दो बहुत छोटी बन्धिया थी जो बोल फूटते ही स्थानीय बुंदेलखडी की सुदरता के प्रति सजग होने लगी थी। एक दिन आकाशवाणी की रूमानी गिचिर-पिचिर से जो वहा के नाटको और दूसरे प्रसारणो मे लबालब भरी रहती है, बौखलाकर--और उसका लगभग ध्वसात्मक विरोध करते हुए--- मैंने 'स्वर्णग्राम और वर्षा' नामक निबंध लिख डाला और उसे धमवीर भारती के पास भेज दिया। रेडियो सेट तोडकर फेंक देने के मुकाबले-जिसे में भारी मारमनियतण से ही बचा पाया पाउस प्रसारण के खिलाफ ऐसी प्रतिक्रिया-कम-से कम उतनी नुकसानदेह न थी। यह निबंध निकप' के पहले अक में जो उस समय समकालीन लेखन का, बहुत कुछ प्रतिभा और उतनी ही मात्रा मे स्नावरी प्रदर्शित करने वाला अद्धवाषिक प्रकाशन था--- छपा। उसके बाद कई जगहों से भारती से पूछताछ होने लगी कि लेखक श्रीलाल शुक्ल कौन हैं। विजयदेवनारायण साही, भारती और केशवचंद्र वर्मा (ये तीनो पुराने साथी तब तक जमे हुए लेखक बन चुके थे) ने तब तय किया कि ऊबते हुए सिविल सर्वेट की मुद्रा छोडकर मुझे इस लेखक की ख्याति बरकरार रखनी चाहिए । दफ्तरी भाषा में मुझे एक अवसर दिया गया था और मुझे कोई भी पत्थर बिना उल्टे नही छोडना था।' 'जो पत्पर मैंने पहले उल्टे, वे कहानिया थी। पर गोन ही मुझे अनुभव हो गया कि कहानियों की विधा मेरे लिए बहुत मुश्किल है। इसके अलावा, उस जमाने मे-और कुछ हद तक अब तक चले आते साहित्यिक फैशन के हिसाब से कहानीकार के कारोबार में प्रतिभा के साथ कई और चीजें भी शामिल यो जैसे मह प्रभावित करने की मुखर आकाक्षा कि कहानियो में"मैं नई.." जमीन तोड रहा अपनी कहानियो के सौदे, समीक्षा, और प्रत्युत्तरीय समीक्षा से सबंधित लिखा पढी करने की जबरदस्त क्षमता और किसी साहित्यिक आदोलन का नेता बनने, या कम-से- म उसमे शामिल होने, या उसका विरोध करने या इस ढंग से उससे दूर रहन का रक्षान जो घूम फिरकर उसमे शामिल होने या विराध करने ही जैसा हो । सक्षप मे, उस समय कहानिया लिखने के लिए रेखकेतर स्तर की अदम्य ऊर्जा और 'युद्ध देहि' की प्रवृत्ति भी जरूरी थी। मुझमे काम भर की दोनो चीजें मौजूद थी, पर मैं अपने पेशे में इनका बचाकर उपयोग करने के लिए प्रशिक्षित हो चुका था। बहरहाल मैंने उप यास लिखने शुरू किए और आदित करने वाली हाम्य-कधाए और व्यग्य रचनाए भी लिखी जो लगता है अब बराबर कटुतापूर्ण होती जा रही हैं । (क्यो, इसका जवाब आलोधकों को खोजना होगा, यकीनन मुझे नही ।) लेखन मे मुझ कोई ऐसा सघप नही झेलना पड़ा जिसकी मैं डीग हाक सकू, इसके विपरीत साहित्य जगत में मुझे प्रोत्साहन सद्भाव और--भले ही यह मेरी खुशफहमी हास्नह के साथ ग्रहण किया " गया। ऊपर का उद्धरण १९७० का है। तब तक 'राग दरबारी प्रका- शित हो चुका था जिसे आद्योपात व्यग्य की विधा मे लिखा गया हिंदी का पहला बडा उप यास कहा गया, पर 'मकान नहीं लिखा गया था जिसम व्यग्य न शली है, न विधा है, और जो रचना का एक अनि हित तत्त्व बनकर उपयास में समाहित है । 'मवान' तक आते-आत भने ध्यग्य को आधुनिक जीवन और आधुनिक लेखन के एक अभिन्न १० •] अस्त्र और एक अनिवाप शत के रूप में पाया है। इन दोना पुस्तका का भी एक एक उद्धरण इस सग्रह में शामिल किया गया है। ऊपर कहा गया है कि नियमित लेखन मैंने २७ वष की आयु के बाद शुरू किया। यह सही है पर विशारावस्था के घपलो के प्रति अभी मरा मोह शायद समाप्त नही हुआ है। रचनाशीलता के उस छुटपुट दौर का एक नमूना 'धोखा है जिसे इस सप्रह सोच-समझकर डाला जा रहा है । यह कहानी १६४५ मे लियी गई और कुछ सशो धनो के साथ १९५६-५७ मे केशवचंद्र वर्मा द्वारा सपादित और अल्पायु मे ही खत्म होने वाल 'तुगशृग में प्रकाशित हुई थी। मेरी निगाह मे इस सग्रह की सभी वृतिया मेरी 'श्रेष्ठतम' रच- नाए ही हो, एसा लाजमी नहीं, क्योकि यह भी विचार रहा है कि इसमे ऐसी अपेक्षाकृत अच्छी रचनाए भी आ जाए जो सग्रह रूप में अभी तक नहीं आई हैं । सग्रह को (उप यास अश छोडकर) इक्कीस रचनाओ मे ऐसी तेरह असगहीत रचनाए हैं । 'धोखा' को छोडवर १९५४ से १६७६ तक के लव दौर मे लिखी गई इन रचनाओ का लखन वष मैंने जानबूझकर नही दिया है क्योकि, आशा है, पाठको को अपने आप अपेक्षाकृत प्रारभिक रचनाओ की पहचान हो जाएगी। हिंदी मे व्यग्य के साथ सबसे बहा व्यग्य यह है कि उस प्राय हास्य के साथ जोडकर उसका सहभागी या अनुपूरक मान लिया जाता है । हास्य शुद्ध मनोरजन के लिए है और इस हिसाब से, यदि य रचनाए पाठको का मनोरजन न कर सकें शायद मुझे क्षमा मागने की जरूरत 7 होगी । क्षमा तब मागनी पडगी जब ये रच. नाए पाठका का केवल मनोरजन करें या उनका या उनके साथ कुछ भी न कर सकें। --धालाल शुक्ल लखनऊ ७बुन १६७

अनुक्रम
जीवन का एक सुखो दिन १
कुत्ते की पिल्ले को नसीहत ५
एक जीत हुए नेता से मुलाकात
दो पुराने आदमी
लखनऊ १६
रवीद्र जमशती को रिपोट २८
एक शोक प्रस्ताव
घुडसरी का कवि सम्मला ४३
अगद का पाव
बया और बदर की कहानी
एक रिसच स्कालर वो जवानी ६१
देहाती की नज़र शहर
थे मीमीटर
दीवाली, जुआ और कविगण ७२
कुत्ते और कुत्ते
आह । वे दिन।
मनीषीजी की एक रात
आधुनिक कविता में भक्तिपाल
खाना मे अनुशासनहीनता कैसे रोकी जाए
दो सस्मरण
धोखा ११६
चौराहे पर
१२३
शिवपालगन १२८
मिया भी जूती मिया के सिर १३५
७७
१०६

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जीवन का एक सुखी दिन - सबेरे नहा धोकर मैंने लाड़ी से धुलवर आई हुई कमी और पतन पहनने को निकाली और ताज्जुब के साथ देखा, उनका कोई भी बटन टूटा नहीं है । तभी एक कोने में रखे हुए जूर्ता पर निगाह पड़ी, पुरानी आवत के मुताबिक आज के दिन नौकर ने उस पर काली पालिश लाल वाले अंश से नहीं की थी। जूते पर मही दुश का प्रयोग हुआ था। मन-ही-मन मैंने कहा, यह मेरे जीवन का एक सुखी दिन होगा। कॉलिज जाने के लिए बस पर पढा और एक रुपये का नोट कंडक्टर के हाय म दे दिया। जिसनी रेजगारी मिलनी थी, उसने यह पूरी की पूरी वापस कर दो । टिक्ट की पुश्त पर इकन्नी का प्रोनोट नही लिखा । सीट पर मेरी बगल मे कोई महिला नही बैठी थी, इस- लिए फिल्मी रोमांस की कमजोरी से फुरसत पाकर मैं आराम से पैर फैलाकर बैठ गया। मेरे पडौस में एक साहब आज का अखबार पढ रहे थे। मुझे उसकी ओर ताकता हुआ पार उन्होंने ऊपर वाला पता मेरी ओर बढा दिया। मसबार म मैंने देखा, न उस दिन किसी विदेशी ने हिंदुस्तान को तरक्की की सनद दी थी, न प्रधानमत्री की कोई स्पीच हो आई थी ! अब मैं इतमीनान से विना ऊबे हुए अधबार पढन लगा। रेलवे क्रॉसिंग पर रेलवे के प्वाइटमैन ने बस वो बाना हुआ देख.

1 कर मो फाटक को खुला रहने दिया । बस बिना रुके हुए ऐसी मासानी से फाटक पार कर गई मानो एसा रोज ही हुआ करता हो । कॉलिज के पास बस के रुकने ही में बिना किसी को ढकेले, बिना किसी के घुटनो म टकराए, विना 'चक्यू और 'सॉरी कह नीचे उतर आया। स्टह पर एक चाटवारा मुये मिला तो जरूर, पर उसने न तो मेरी ओर देखा और न मुझे फुमलाने वाली आवाज मे गरमागरम चाट की आवाज ही लगाई। दिन भर कॉलिज मे बडा मुख रहा । लहको को यूरोप-याना पर एक सीधा सादा लेख पढाया। दूसरे दर्जे म मदाचार की महिमा समझाई। न तो उसे कोई प्रेम मौत ही पढाना पड़ा, न क्सिी हास्य- व्यग्यपूण उक्ति का अथ समझाना पडा । खाली घटे मे मेरी कोई भी छाना अपनी क्सिी भाव प्रधान कहानी या कविता म सशोधन कराने नही आई। क्सिी चापलूस छान ने मेरी किसी असफल रचना की प्रशसा नही की । किसी लक्चरर ने विद्यार्थिया के सामने मुझे 'असा यार' कहकर नही पुकारा । मेरे एक प्रतिद्वंद्वी लेक्चरर के कमरे मे कुष्ठ विद्यार्थी प्राति के नारे लगाते बाहर निकल थाए । स्टाफरूम म प्रिंसिपल के बारे में खूब गदे गदे किस्मे, विना अपनी ओर से कुछ कह ही, फोकट में सुनने को मिल गए। पाम को घर वापस आने के पहले एक मिन मुमै एक यडे रेस्त्रा में चाय पिलाने ले गए पर बातें उहाँने मुझे ही करने दी, खुद श्यादा तर चुप ही रहे । रेस्त्रा के सामने रिक्शे वाल को पैसे देने के लिए मैंने अपनी जेवें टटोली, मेरी जेब से दस रुपये का नोट निकला पर मिन की जेब से पहले ही एक अठनी निकर आई। रेम्बा के भीतर भी मुझे कोई उल्यन नही हुई। चेटर का हुलिया बडे लव चौडे रोबदार बुजुग का न था। वह दुबला पता था और नौसिखिया सा दिखता था। पडोस की मेजो पर न कुछ मसखरे नौग्वान ये, न फशनेवल सहविया यों न हसी के टहारे थे न कोई मुझे घूर रहा या न कोई मेरे बारे मे पानाफूमी वर रहा था। रेम्बा मै भीड न थी, पर इतन लोग थे कि राउटर के पीछे मे मनेजर सिप हमी को नही, औरों का २ मेरी श्रेष्ठ व्यग्य रचनायें भी देख रहा था। हमारे चलने के पहले पास की मेज पर दो गभीर चेहरे वाले आदमी आ गए और जब मैंने आपसी बातचीत में 'एक्ति- स्टेंशिएलिपम' का अनावण्यक जिक्र किया तब उन लोगो ने निगाह उठाकर मेरी ओर देखा भी। रेस्ना से बाहर आने पर मेरा एक परि- चित बीमा एजेंट सहर के दूसरी ओर जाना हुआ दीख पडा, पर उसने मुझे देखा नहीं। उसके बाद अचानक ही मुपे तीन परिचित आदमी मिल गए। उन्होंने मुये नमस्कार किया और उसका जवाब पाया। मेरे मित्र को कोई परिचित आदमी नहीं मिला। घर वापस आकर मैंने धीमतीजी से सिनेमा चलने का प्रस्ताव किया पर उहोंने क्षमा मागी और कहा कि उहें लेडीज क्लब जाना है। इसलिए मैं पूनिश्चय के अनुसार अपने एक मित्र के साथ सिनेमा देखन चला गया । सिनेमा का टिकट खिड़की पर ही मिला और असली कीमत पर मिला । पखे के नीचे सीट मिल गई । सिनेमा शुरू हाने के पहले सावुन, तेल और वनस्पति घी के विज्ञापन वाली फिल्में नहीं दिखाई गई । पास की सीट से किसी ने सिगरेट के धुए वी फूक मेरे मुह पर नहीं मारी। पीछे बैठने वालो मे विसी ने अपने पर मेरी सीट पर नहीं टके । अधेरे मे रिसी ने मेरा अगूठा नहीं चला। हीरो की मुसीबत पर किसी पडोसी ने सिसकारी नही भरी। हिंदी की फिल्म थी, फिर भी वह मठारह रोल पूरी करने के पहले ही खत्म हो गई। सिनेमा से बाहर आने पर कई रिक्शेवालों ने मिलकर मुझ पर हमला नहीं किया । रिक्शा करने पर मजबूर हुए विना भी मैं पैदल वापस लौट आया । रात मे सुनसान सडक पर मेरे पैदल चलने पर भी कोई साइक्लि वाला मुय से नही टप राया, विसी मोटर वाले ने मुझे गाली नही दी, क्सिी पुलिस वाले ने मेरा चारान नहीं दिया। पर आर पाना खाने बा तो उस वक्त रूपये की कमी पर कोई घरेलू बातचीत नही हुई। नौकर पर गुरसा नहीं भाया । वातचीत के दौरान मैं श्रीमतीजी से साहित्य चर्चा करता रहा, यानी अपने साथ के साहित्यिमो को योसता रहा । ये दिलचस्पी से मेरी बातें सुनती रहा और मेरे टुच्चेपन को नहीं मार पाइ। जीवन का एक सुखी दिए ३

घर मे चारो ओर शाति थी। किसी भी कमरे मे बिना मतलब
बल्ब नही जल रहा था, न विना वजह किसी नस का पानी बह रहा
था, न दरवाजे पर कोई मेहमान पुकार रहा था, न रसोईघर में किसी
प्लेट के टूटने की आवाज हो रही यो, न रेडियो पर काई कवि-सम्मेलन
आ रहा था, न पडोस मे लाउडस्पीकर लगाकर कीतन हो रहा था।
और सबसे बड़ी बात यह कि कल आने वाला दिन इतवार था और
उस दिन मेरे सभी उत्माही मिन शहर से कहीं दूर पिकनिक पर चरे
जाने वाले थे
।
Y
मरी श्रेष्ठ व्यग्य रचनायें
--

कुत्ते की पिल्ले को नसीहत दो दो बूद दूध के लिए अपने ही भाइया की गरदन पर दात गहाया । एक एक हड्डी के टुबडे के लिए अपने ही पडोसियो से सौ-सौ बार दगा किया। जरा जरा मी वात पर घटे घटे भर चिल्ल-पो मचाई। इस प्रकार अपन सामाजिक गुणों का विकास करते हुए गव कुत्ते का पिल्ला बड़ा हो गया तो कुत्तं ने उसे राजनीति के संसार में होनहार समयकर निम्नलिखित नमीहत दी 'घटा वैसे तो मेरी जिंदगी बही ही बेतुकी जिंदगी थी। बहुत से इसाना की तरह यह केवल पेट भरने के लिए चारो ओर भटकने में बोतो। फिर भी मुये यह सुभीता था कि मुझे सब प्रकार के महापुरुषो का सत्मग वरावर मिरता रहा । नदिया के किनारे एकात मे पड़े हुए कृशागत अनासक्त कुत्तों की सोहबत में मैं बैठा हूँ । साथ ही परियों जैमी राजकुमारियो के माथ सोने वाले, वडीबडी मोटरो मे निकलने वाले रम कुत्तों स भी मेल मुलाकात रखी है। चौराहे पर हर छोटी बात पर आवाज दुलद करने वालों से लेकर एअर-कडीशद कमरों में जीभ निकालकर मिर हिलाने वाले कुत्तों तक से मेरा साथ रहा है। इस प्रकार मेरे पास कोई जायदाद तो नहीं, सिर्फ जिदगी का बजुर्ग है। और उसी को इस देश के सत्तर फीसदी बुजुर्गों की तरह मैं तुम्हारे - । लिए उत्तराधिकार मे छोद रहा हूँ। अब मेरी कुछ नसीहतें अच्छी तरह ध्यान लगार और दोना कान उठाकर सुनो। ' इसानो की अपेक्षा हम कुत्तो मे कुछ स्वाभाविक अच्छाइया हैं । हम सब काले, पीले, सफेद जाति के कुत्ते विना किसी भेदभाव के आपस मे रह रेत हैं । कुछ विशेष इलाको से आने वाले नौकरो को अपेक्षा हम अधिक वफादार और दूसरे विशेप इलाको से आने वाले चौकीदारो की अपेक्षा ज्यादा मुस्तैर होते हैं। निरतर दौरा करने वाले आदश बायकर्ताआ की तरह जहा जिस किसी से जो भी मिल जाता है, चुप चाप वही खा लेते हैं । किसी अच्छे पुलिसमैन की तरह महज सूधकर अपराधो का पता लगा लेते हैं । गीता में कह गए योगियों की तरह जब सब लोग सोते हैं तब हम निरतर जागत है। आदश नेताओ की तरह दुनिया को निगाह मे हमारी कोई व्यक्तिगत पूजी नही है पर वास्तव मे हम दूसरे पूजीपतियो के हितो की रखवाली में ही तल्लीन रहते हैं । उच्चकोटि के कूटनीतिनो की तरह हम तगडे विराध के सामने दुवक्कर दूसरी और चल देते हैं। और साधारण विरोध के सामने जमकर चीखते हैं। तजुकार अधिकारियो की तरह बडो के मागे दुम हिलाते और छोटो को देखकर गुर्रात हैं । परमहसो की भाति बिना किसी साज सामार के नीचे-ऊचे स्थानों का भ्रमण करते और अन्वेषक) की तरह गदी से गदी जगह पर छिपे पदार्थों को खोज करते हैं। 'ये तुम्हारे जातीय गुण हैं । साधारण मनुष्यो की देखादेखी तुम कभी भी इनका ह्रास न होने देना। मगर साथ ही हममे कुछ कमजोरिया भी हैं। हम बीसियो की सख्या म मिलते हैं चीख चौपकर लवी-लबी योजनाओ पर बहस करते हैं, पर काम के वक्त किसी गली में पड़े नजर आते हैं। हम ऐंठकर तिरछे तिरछे चरते हैं, पर अपने हाथ से सव भी कुछ पैदा नहीं कर पाते, वाहरी लोगो का ही दिया खाते हैं । बडे बडे सरल्पों के बावजूद हजारा झटके खान पर भी हमारी दुम अब भी टेढी की टेढी ही है। स्वरत्र होने पर भी अपने गले मे पट्टा हरवाने को हम आज भी गौरव की बात मानते हैं। 1 मेरी श्रेष्ठ व्यग्य रचनायें - वैसे तो आजकल इन बातो को लोग विता नहीं करते, पर अच्छा यही होगा कि तुम इन कमजोरियो से सावधान रहो।" एक बार एक आदमी अपना साना हजम नही कर पाया, इसलिए उसने उसे मुह से गिरा दिया । मेरा हाजमा उससे तगडा था। इसलिए मैंने उसे खाकर पचा लिया । वस्तुत यह अपने अपने हाजमे की बात थी। पर मैरी ताकत से कुडकर उस आदमी ने एक दोहा कहा कि- जो विषय सतन तजी मूरख तेहि लपटात । मनुज वमन करि देत है स्वान स्वाद सो खात ।। " मैंन इसका जवाब उस समय नहीं दिया था। पर आज देपा, जिम देश में मेरे ऊपर एसी भद्दी बात कही गई थी, वहा अब दूसरे देशो के छोडे हुए दूध के पाउडर के डिबे और अनाज ने वोरे हजारो की सख्या में वरावर उतर रहे हैं और स्वादपूवक बाए जा रह हैं । इससे यह नसोहन लो कि बिना समझे बूझे किसी को बुरा भला न कहना चाहिए। " अब तीन बातें ऐसी बता रहा है जिसमे तुम्हें अपना चलन छोड- कर हजरत इसान का चलन अपनाना होगा। " हाथी के दात खाने के और होते हैं, दिखाने के और। राष्ट्री को घरेलू नीति पकड धड और लाठी गोली को भले ही रहे, पर विदेशी नीति स्वागत, दावत और मुस्कान पर चलती है । इसके विरुद्ध तुम्हारी परेलू नीति में प्रेम है और विदेशी नीति मे भाग झपट और गुरहिट । अतर्राष्ट्रीय हैसियत पाने के लिए तुम्हें अपनी नीति उलटनी पड़ेगी। हम बिल्लिया को देखते ही पुरानी दुश्मनी के नाम पर उन पर झपट पड़ते हैं। पर आजकल ससार में शानिपूण सह-अस्तित्व की बात चल रही है। इसलिए खुले आम तुम्हें बिल्लियो को भी इतमीनान दिलाना होगा कि सुम उनके मिन्न हो । एक ही कमरे में, एy कालीन पर उन साथ तुमको लोटना होगा । यह दूसरी बात है कि आत्म रमा के लिए तुम उन पर किमी समय, किसी भी स्थान पर हमला कर सकते हो, और घरपुरलार मत भूलो कि प्रत्येक समय, प्रत्येर स्थान पर कुत्ते की पिल्ले को नसीहत " हमारे लिए आत्म रक्षा की समस्या बनी रहती है। " तीसरी बात तालीम के मामले में तुम्हें मेहनत करने की या परेशान होने की जरूरत नहीं है । आज भी अच्छे खानदान और प्रतापी मा-बाप के नाम के सहारे हजारो लोग अच्छी तरह पनप लेते हैं । इस- लिए तुम्हें सिफ अपनी चाल-ढाल, अपना रग-ढग ऐसा रखना चाहिए कि तुम्हें देखते ही लोग पहचान लें कि यह कुत्ता ऊची पीडी का है । " मेरे राहते जान, आखिर में तीन बातें ऐसी भी बता रहा हू जिन्हें लेकर हज़रत इसान कुछ भी करें, तुम अपने चलन पर अडिग रहना। " बडे-बडे दफ्तरो थानो और कोतवालियो मे जो कुछ भी होता रहे, तुम चोरों के सामने अपनी आन कायम रखना और उनसे कभी समझौता मत करना। लबे चौडे फार्मों और मालगोदामो के चौकीदार और कारिदे भले ही हाथ पैर फेंकते रहे पर तुम्हें जिस चीज़ की हिफाजत के लिए रखा गया है, उस पर कभी मुह मत मारना । ' और शान इसी में है कि हर वक्त छिपी ढकी जगहो मे लोग चाहे जैसा कहते और करते रहें पर बिना वक्त आए तुम कभी भी प्रेम के रास्ते पर क्दम न रखना। मत भूरो, हर वक्त भावुकता दिखाना और हर मोमम म प्रेम का राग अलापता निकम्मे इसानो का वाम है। मेरी श्रेष्ठ व्यग्य रचनायें एक जीते हुए नेता से मुलाकात जिन्होंने मेरा 'एक हारे हुए नेता से इंटरव्यू पढ़ा है उहें याद होगा कि हमारा वह हारा हुआ नेता अस्सी साल से ऊपर था और नकली इद्रियों के सहारे यानी चश्मा, नकली दात, इयरफोन आदि फिट करके देश की राजनीति का संचालन करता था। इसलिए जब मैं इस जीते हुए नेता से मिला और उसके पने, खुरदरे और स्पलपाते हुए व्यक्तित्व की चपेट झेली तो मेरा याशावाद फिर से जाग उठा। उस हारे हुए नेता से मिलकर मैं सोचने लगा था कि देश जहन्नुम मे जा रहा है । इस जीते हुए नेता से मिलकर मुझे यकीन हो गया कि हमारा देश सीधे स्वग जा रहा है। वसे तो यह नेता न युवा या, न तुर्क था, पर उसे अपने संगठन मे युधातुक कहा जाता था। उसकी उम्र पचपन के करीब होगी पर सकडो यूथ क्लवो और छात्र-सगठनो मे घुसते समय उसे सोग तुहाने की जरूरत नहीं भी। वह चुस्त और ऊची आवाज मे बोलता या और हमेशा बोला ही करता था । बहुत बोलने के कारण लोग उसे बहुत 'विचारशील मानते थे और मुह खोलकर वह जो भी आवाज निकाल देता था, वही विचार बन जाती थी। मोटर छोडकर जब सभी उसे पदल चलने का मौका मिलता तो वह बहुत तेजी से चलता ! कोशिश उसकी यही रहती कि उसकी तेज चाल देखकर लोगों को प्रात भ्रमण पर निकले हुए महात्मा गाधी को याद आ जाए, यह और बात है कि कुछ लोगो को उसकी तेज रफ्तार सिफ क्सिी पाकेटमार की पाद दिलाती थी। हम उम्मीद थी कि चुनाव जीतने के बाद यह नेता मत्री बन जाएगा और उसके बाद ही वह खुद जिस तेजी से चलता है उसी तेजी से देश भी चल निकलेगा। पर वह मत्री नहीं बनाया गया, या यू कहिए कि वह मनी नही बना । जो भी हो, क्योकि उसका एक जिगरी दोस्त मनी बन चुका था, इसलिए वह लगभग मनी की हैसियत मे आ गया। वह जिगरी दोस्त सीधा साधा भोला भाला आदमी था और बाबाओ और ज्योतिषियो को छोडकर लोगो से मिलने मे शिशकता था। इसलिए धीरे-धीरे वह असली मत्री से लगभग मत्री की हैसियत' पर आ गया और हमारा गतिशील नेता लगभग मनी की जगह असली मन्त्री का रोब खीचने लगा। बहरहाल, लगभग मनी को हैसियत भी काफी ऊची थी और उसके मकान पर जिसे अब मकान नही बल्कि बगला कहा जाने लगा पा, संक्डो आदमियो की भीड सुबह से रात तक मौजूद रहती थी। दूर-दूर तक शोहरत थी कि उस तक पहुचने के लिए न सिफारिश की जरूरत है, न रिश्वत की। भीड को पार करने लायक सिफ मजबूत कधा और हिम्मतवर फेफडो की ज़रूरत है। मैंने यह भी सुना था कि दूसरो का काम करते समय वह गलत सही, नैतिक-अनतिक के झमेले मे नही पडता, गीता के कमयोगी की तरह बस काम करता जाता है, यानी दूसरों का काम दूसरे आदमी की तरफ स करके अपनी लगभग मनी वाली हैसियत बेलौस बनाए रखता है। उमके मकान के पास फाटक से ही मुझे भीड मिलनी शुरू हो गई। दरअसल, कुछ लोग फाटक पर चढ़े हुए थे और कुछ ये । एक आर आम का भारी पेड था जिसकी एक शाख जमीन से चार पांच फुट ऊपर थी। कई लोग इस शाख पर बैठे थे। देहात से आए हुए कुछ लोग पोटिको तक पहुचने वाली सडक पर अगोछे विद्यार मेरी श्रेष्ठ ध्यग्य रचनायें बैठ भए थे। स्टेडियम में विकेट पा टेस्ट मैच होते समय बाहर जिस तरह निठल्लो की भीड जमा हो जाती है, कुछ वैसा ही माहौल था। पोटिको तक पहुचते-पहुचते मैंने देखा, आसपास जितने पेड थे, उनके वनों और निचरी शाखाओ का सहारा लिए हुए धई लोग बैठे हैं या बडे हैं या झूल रहे हैं। पाटिको तक पहुचते पहुचते मुझे दो-तीन बार सचमुच ही अपने कधों और फेफडो की मजबूती की परीक्षा देनी पटी, पर किसी चिमिरसी जैसे आदमी ने मुझसे कहा-'चले जाओ, बाबू साहेव पोटिको मे बैठे हैं । आज भीड कम है, जल्दी काम हो जाएगा।" । बात सही थी, पोटिको मे मोटर न थी, उसकी जगह वीसियो टेढी मेढी बतरतीब सिर्या पडी थी, उन पर दो शस्स फी कुर्सी की औसत दर से लोग बैठे या टिके ये। बीच मे एक कुर्सी पर हमारा नेता, युवा वग का प्राण, युवातुक, लगभग-मत्री, पैर फैलाये बैठा था, उसके बदन का ऊपरी हिस्सा एक घरेलू ढग के मटमैले कपडे से ढका था, चेहरे पर साबुन का फेन फैला था। उसकी हजामत बन रही थी। बार-बार बगल मे रखा हुआ टेलीफोन बजता और वह अपनी बात को बीच में काटकर फोन पर बात करने लगता, तब-तक नाई एक किनारे खडा होकर अपनी हथेली पर उस्तरे को लौटते पौटते उसकी धार तेज करता रहता। फोन रखते ही वह क्सिी नये आदमी से बात करने लगता और बीच-बीच मे नाई को ललकारता, "बनाते चलो, बनाते चलो।" नाई मौका देखकर गाल या वृड्डी के किसी हिस्से पर उस्तरे के एकाध हाथ चलाता और फिर उसकी बात पूरी होने का इतज़ार करने लगता। मैं पोटिको के एक कोने मे खडा हो गया था। नेताजी की भाखें चारो ओर नाच रही थी। मुझे देखते ही उसने कहा, 'खडे मत रहिए । बठ जाइए।' उसके बाद ही चारो ओर से 'बैठ जाइए' 'बैठ जाइए' के कोरस ने मेरे कानो पर हमला बोल दिया। नेता ने कहा, 'किसी के भी साथ बैठ जाइए । क्या बताए, चाहे जितनी एक जीते हुए नेता से मुलाकात । वह सबको कुसियां डलवाई जाए, कम ही पह जाती हैं।" उसने लाचारी से नाई की ओर देखा, नाई ने इस बार दाए गाल की दाढी साफ कर दी। नेता ने कुछ कहने को मुह खोला तो यह उस्तरे को आसमान की ओर उठाएर एक किनारे हो गया । नेता ने कहा, 'तुम्ही से रह रहा था। फटाफट दाढी बनाओ। जल्दी पत्म करो।' कहकर उसने दूसरी ओर गदन मोड दी। किसी से पूछा, 'तुम्हारा क्या काम है 'तुम' कह रहा था। कुर्सी पर बैठे हुए आदमी ने कहा, 'मनोजी से कहकर भूरेलाल का तबादला कराना है।' नेता ने कहा, "करा तो दूगा पर भूरेलाल ऊचे दर्जे के हामी हैं, यह याद रखना । तुम्हारे कौन लगते हैं ?" "जी, मेरा तो लडका है।' उसने जवाब दिया। नेता ने सपाट लहजे में कहा, 'तो उस सही रास्त पर चलाओ, नही तो किसी दिन थूल जाएगा। अब तुम रास्ता नापो, आज बातचीत के लिए ज्यादा टाइम नही है । भूरेलाल का काम हो जाएगा। मुशी, दज कर लो।" एक मुशी हो जैसे दिखने वाले आदमी ने रजिस्टर में कुछ लिख लिया। जिस कुर्सी के एक वटा बीस हिस्से पर अपने नितम्ब का एक बटा पचास हिस्सा टिकाकर मैं बैठने का अभिनय कर रहा था उसके दूसरे हिस्मे पर बैठे हुए व्यक्ति ने कहा, "इनका काम हो गया। मैंने देखत नही हो रजिस्टर मे इसे दज कर लिया गया है।' नेता एक दूसरे आदमी से कह रहा था, तुम हमेशा छोटा मोटा काम लेकर खड़े रहते हो। फला को चपरासी बना दा, फ्ला को क्लर्की दिला दो। इन कामो के लिए मैं ही बचा हू? नेता का दूसरा गाल अब भी फेने से सना था, एक गाल की दाटी साफ हो गई थी। कुल मिलाकर किसी मसखरे का चेहरा लग रहा था। मैंने सोचा इस देश के नेतृत्व के लिए यह आदश चेहरा है। वह आरमी खड़ा हो गया । बोला, तुम्हारे लिए क्लर्की दिलाना छोटी बात है तो बैजनाथ को कोई बड़ी नौकरी ही दिला दो। उसे कलेक्टर बना दो, या हो सके तो कहीं ऐम्बसेडर बनाकर भिजवा दो।' नेता हसा, बोला 'मुशी इसे दज कर लो। वजनाप को ऐम्बसेडर मेरी श्रेष्ठ ध्यग्य रचनायें पूछा "कैसे" -

बनवाना है ।" फिर वह लोगो को सुनाकर कहने लगा, "आप लोगो
का आशीर्वाद रहा तो कभी सूचमुच हो ऐनिसहरो की नियुक्ति
करूगा।" इससे कोई भी असहमत नहीं था.
"तुम क्या चाहते हो ? जल्दी' लोलो, मैं-कारहा हो।' ने
किसी से कहा और मैंन पाया कि वह मुझी दिपार कर रहा
उसकी ओर बढा । उसने कहा, "वही स बोली-और-किसी दूसरे से
बात करने लगा। फिर मुझे चुप देखकर को बोलो बोलो बोलते
जाओ।" मैंने एक कागज निकालकर कहा, 'मौर्जी "मुझ।'
"फ्यिट चाहिए न ? कोई बात नहीं, एलाट करा दूगा।" उसने
मेरी वात काटकर कहा । मैन वहा, "जी, फियट नहीं ।"
"तो स्कूटर चाहिए? दिला दूगा, पर छ महीने लगेंगे। अपना
नाम इधर मुशी को लिखा दो। दरखास्त छोड दो।" यह अम दूसरे
मादमी से बात करने लगा था। मैं नेता ये नजदीय पहप गया।
बौला, "मेर गाव ये अस्पताल मे दो साल से कोई डायटर नहीं है।
किसी की तनाती करनी है।"
'फिराकी तैनाती ? तुम जाना पाहत हो ?" सा ने पूछा।
"कोई भी डाक्टर भिजवा दीजिए।"
"साफ साफ बताया भाई । तुम्ह यहाँ थप्याइट परवा दू।"
पर मैं डाक्टर ही।"
"तो तुम्हारे एहो ना, गतीने पो, जिरायो बताओ उसको
अप्पाइट परादू।"
"उनम माई भी टापटर मारी है। हमे तो वहा के लिए एक डाक्टर
चाहिए ।" नेता ने पीयपर पहा, "मुशी, इनकी बात समझार दिन्टर
में दज पर लो। मुगे ता बुछ समझ में आया नहीं कि इनका काम
क्या है।' नाराजगी में एक क्षण के लिए जैस ही वह चुप हया, नाई
न दादी या पाम निबटाना शुरू कर दिया।
अचानर मास विसी महिला के गरजन की यावाज आई और
कद सोग घर में विभिन्न दरवाजों से जो डाग स्म, वेडरूम
वापरम पे हाग, निकलकर पाटिका और मदा में भरने ।
एक जीत हुए नवा स |

मेडों के झुड को भगाया जा रहा हो, इस तरह उहें भगाती हुई एक महिला वरामदे मे आ गई। वह काफी सुदर पो पर चीखने के कारण उसकी आवाज वीभत्स हो गई थी। नेता ने मुस्कुरावर रहा, 'लोगों का यह हाल है कि अपनी बात महने लिए मेरे बाथरूम तक मे जाकर बैठ जाते हैं। और इस बेचारी का यह हाल है कि दिन भर उहें हडकाते ही बीतता है।' इतना कहकर वह तेजी से बरामदे में पहुचा, अपनी पली मा कया थपथपाकर कहा, 'पवराओ नही, सबको दो मिनट मे निबटाता है।" बरामदे के एक कोन पर शायद वापरूम था। वहा मंठे हुए मुलाकातियो को नियटाने, और उसी के साथ नहाने के लिए यह उधर चला गया। रास्ते में कुर्ते के बटन खोलता रहा। पोटिको मे खडे हुए एक प्रोफेमरनुमा आदमी ने अंग्रेजी मे रहा, "क्तिने अफसोस की बात है कि इसे मनिमहल मे नहीं लिया गया । वहा इसके डाइनैमिषम का कोई मुकाबला न कर पाता।' - मेरी श्रेष्ठ व्यग्य रचनायें दो पुराने आदमी कुछ दिन हुए, रामानदजी और राकेशजी अपने-अपने पेशे से रिटायर होकर सिविल लाइस मे बस गए पे । अपने यहां का चलन है कि रिटायर होने के बाद और इस लोक से ट्रासफर होने के पहले बहुत से लोग सिविल लाइस मे बगले बनवा लेते हैं। इन्होंने भी वहा अपने- अपने बगले बनवा लिए। रामानदजी किसी समय में चोरी किया करते थे। वे पुराने स्कूल के पोर थे, इस कारण उनका विश्वास तात्रिक क्रियाओं में भी था। बाद में चोरी सिखलाने के लिए उहोंने एक नाइट स्कूल खोला । कुछ समय बीतने पर वही चोरी के माल के क्रय विक्रय की एक दुकान कर ली। इस सबसे अब ये रिटायर हो चुके थे और अपने को रिटायर कहा करते थे। राकेशजी रिटायर तो हो चुके थे, पर पूकि वे कवि ये इस कारण वे अपने को रिटापर मानने वा तयार न थे। कभी उहोंने एम० ए० पास किया था, फिर ये एक फॉलेज मे प्रोफेसर हो गए थे। उस पेशे में तो वे पयादा नहीं चल पाए पर वदि की हैसियत से उहैं कचा स्थान मिल गया था। अर्थात् अब तर उनके पास उनकी कविताए थी, अपने प्रकाशक थे, अपने ही आलोचक थे, अपने ही प्रशसन और पुरस्कार- दाता थे। इधर कुछ आलोचक उहे कविता के क्षेत्र में भी रिटायर कहने लगे थे। दोनो पडोसी थे। दोनो को एक-दूसरे के पुराने व्यवसाय का ज्ञान था। उनमे मित्रता हो गई। दोनो प्राय हर बात म एकमत रहते थे। दोनो यही समझते थे कि इस युग म योग्यता और क्ला का ह्रास हो रहा है और आज की पीढी बिल्कुल जाहिल, निरथक और अयोग्य है। इसीलिए एक दिन लॉन मे टहलत-टहलते राकेशजी ने कहा, "माज की पढाई मे रखा ही क्या है ? मैं आठवें दर्जे में हिंदी कविता का अय अग्रेजी मे लिखता था। अब बी० ए० मे अग्रेजी कविता का अय हिंदी मे लिखाया जाता है।' रामानदजी बोले- आप ठीक कहते हैं। हमारे ज़माने में कुछ लोग फश पर डडा ठोककर जमीन में गडे हुए धन का हाल जान लेते ये। आज के दिन सामन क्पड स ढकी तिजोरी रखी रहती है और लोग उसे मेज़ समझार विना छुए ही निकल जाते हैं।" राकेशजी ने कहा और जमकर साधना करने का तो समय ही चला गया है । आजकल ।" बात काटकर रामानदजी बोल, साधना अब कौन कर सकता है। हम लोगों ने अमावस की रात मे मसान जगाया था। मुर्दे की खोपडी में चावल पकाकर उसे जिस घर म डाल देते, वहा का माल ।" राकेशजी ने जल्दी से कहा, "नही नही, वैसी साधना से मेरा मतलव नहीं है । मैं साहित्य-साधना की बात कर रहा हू । आजकल रोग व्याकरण पिंगल, काव्यशास्त्र का नाम तक नही जानते और नयी नयी बातो के आविष्कारक बन जाते हैं। कोई दो दो पक्तिया को लिए मुक्तक लिख रहा है कोई अतुवात चला रहा है, कोई क्रियाओ के नये नये प्रयोग भिडा रहा है । और पूछ बैठिए कि अरमा त्रिया और सम्मक क्रिया म या भेद है तो मग्रजी वोरन लगेंगे। एवं गहरी सास पोचकर रामानदजी बोले, आप सब कहते हैं अपने यहां भी यही दशा है। दीवार का कौन कहे कागज पर कायदे की सेंध नही लगा सक्त और बात करेंग सिटकनी घोरन की, रोशन- 7 । मेरी श्रेष्ठध्यग्य रचनायें 1 " दान ताडने की, जेब काटने को। नयी-नयी तरकीबो की डीग हाकेंगे और पुरानी ।" राकेशजी अपनी धुन में फहत गए "और विनम्रता तो रही ही नहीं । कुछ सिखाओ तो सीखेंगे नही। कुछ बताओ तो बिना समझे- बूझे अकहने लगेंगे। आज के साहित्यिक, साहित्यिक नही~लठत हैं, लठन।" रामानदजी समथन करते हुए बोले, "साहित्यिको के क्या पूछने राकेशजी । यहाँ तो अबके चोर, चोर नहीं रहे। वे तो डकत हैं, सकत । अपना पुराना तरीका तो यह था कि घर में घुसे और बच्चे ने भी खाम दिया तो विनम्रतापूवक बाहर निकल आए । पर आजकल ये लोग किसी को जागता हुआ पा जाए तो समकर उन्होंने वाक्य पूरा किया, "बाप रे बाप!" अब राकेशजी उत्साहित हा गए और बोले, "ये सब जाहिल हैं, निरथक है । पहले तो लियत लिसने हाथ एसा मज जाता था कि बिना पढे ही दूर स समझ जाते थे कि अमुक कवि की कविता है । उस पर उनका व्यक्तित्व झलकता था ।" रामानदजी ने धीर स कहा, 'यही तो। सेंध की शक्ल देखवर लोग मह दते थे कि यह फ्ला ने लगाई है। अब तो सिटकनी खुली पड़ी है । उपमा राकेशजी को पसद आ गई। बोले, "हा, आजकल यह तो है हो । साहित्य के दरवाजे की सिटकनी अदर से घोल खोलकर न जान कितन लाग घुम आए हैं।" बिना समझे हुए रामानदजी ने कहा, 'जी हां पहले तो सेंध का ही चल्न था।" राकेशजी ने जल्दी से कहा, "जो आप मेरा मतलब नहीं समझे। मैं कह रहा था कि अस्मात उहान चोरकर युरत की जेब पकर ली। गमानदजी वा हाय उनकी मुट्ठी में आ गया। नाराजगी स राकेशजी बोले- 'यह क्या ? आप मेरी जे मार रहे थे?" दो पुराने आदमी

रामानदजी ने विनम्रता से हाथ छुडापर कहा, "यही समम
रोजिए । वात यह है कि बात यह है कि ये नौसिखिए कुछ काम
तो वही सफाई से कर दिखाते हैं । में मापस मे देख रहा था कि यह
व वाला काम मुझ से भी चल पाता या नहीं।"
राकेशजी नम पडे । बोले 'देख रिया आपने ।"
बिना उत्साह के, रामानदजी सास खीचकर बोले, 'देख लिया
राकेशजी, यह सब अपने बलबूते की बात नहीं । जो हमने कर लिया
वह आज वाले नही कर पात है । पर इनके भी कुछ ऐसे खेल हैं जो
हम नही खल पाते । अपना अपना ज़माना है।"
सहसा राकेशजी बिगडकर वाले, "यह सव आप ही के यहा
चलता होगा। अपने यहा तो अब भी जो वहिए, करके दिखा दू।
रामानदजी यह तो करने की विद्या है। चाहे कवित्त हो, चाहे कविता
हो, या हो नयी कविता । लिखूगा तो आजकल वालों से अच्छा ही
लिखगा।"
रामानदजी राकेशजी की ओर देखत रहे। उनमे कभी मतभेद
नहीं हुआ था । पहली बार उसे रगा कि कुछ ऐसी भी बातें हैं जहा
उनकी राय हमेशा एक नही होगी।
मग श्रेष्ठ व्यग्य रचनायें

लखनऊ "शरीफा का जवाल और कमीनो का जोर हुआ तिखफीफ का बाजार गम हुआ। अय्याशी का दौर शुरू हुआ । आवारा दौरतो की वन आई । बाजार का मामला भी देखादखी खराब हुआ हर चीज़ में मिलावट हुई नाजिम और आनिल सब नालायक थे।" मामन विलायती ढग की दुकानें सिनेमा, रेस्त्रा और बार थे। जिन, व्दिती और बियर के हवाई विज्ञापनो की नियॉन रोशनी जल निपेव की नीति को प्रमाणित कर रही थी। फियट और ऐम्बसेडर बारा की भीड म एकाध इम्पाला जब भी निकलती थी तो हम मुह फाडकर उसे बादर स दखते थे, जैसे देसी विश्वविद्यालया म विलायती विद्यापियो को देखा जाता है। फशनेबुल, दुबली-पतली “डरिया-निनो जीवन का मुख्य कायम अपनी ओर रफगो या और लफ्गों को पोर पुरिस को आरपित करना था--कूल्हे, वक्ष और टखन मान म सपूण- मचरती हुई राडर पर चरी जा रही थी। चमचमाती दूराना पर १ मिर्श रजदअसा सहर लिखित पसानए इन का एक उतरना इसरा सवध दागिरामनी गाह के पिता हजरत ममत्र अली शाह के साधनमान है।

चालाक छोकरे ढीली बुशट, लहलहाते बालों और घूडीदार पैटों में से हुए, पुल्लिगवान् वेश्याओ की तरह बैठे थे। हजरतगज का बाजार याफ़ी माधुनिक हो रहा था। पर यह आधुनिकता वैसी ही थी जैसी आज को कुछ कहानियो मे केवल ईसाई लडकिया को हीरोइन बनाकर पंदा की जाती है। मैं एक नये रेस्त्रां के सामने बहाया। मेरे साथ दो अदद पत्रकार, हिंदी के एक प्राध्यापक और एकाध होनहार होते-होते इरादा बदल देने वाले साहित्यकार थे। हिंदी प्राध्यापक ने कहा, "हजरतगज बड़ा फैशनेबुल होता जा रहा है।" खडन करने की अपनी पैदायशी प्रवृत्ति के अनुसार मैंने कहा, "मुझे तो बडा देहाती-सा लगता है।" फिर कुछ सोचकर मैंने कारण बताए, "क्योकि यहा राजधानी है, दूर-दूर की झोपडियो और टपरो के लोग यहां आकर बस रहे हैं । यही विधान-भवन है। कोटद्वारा से सिसवा बाजार तक के गावो और कस्बो की संस्कृति आपको यहा फूलती फलती मिरती है। कॉफी हाउस मे ही जाइए जाते ही किसी कस्बे के नाई की दूकान की याद आती है। सभी आपके मामला मे टाग अडाते हैं। सभी में काश्तकारो की सी घरेलू चालाकी है । कोई भी आपको चुपचाप जीने नहीं देता।" प्राध्यापक को मेरी बात जची नही, पर उसमे उलटबासी थी, इसरिए उहोंने कबीर की स्मृति मे उसे झेल लिया। फिर व मेरे पीछे वाल रेस्त्रा में लगी हुई एक आधुनिक चित्रकार की प्रदशनी का जिक करने लगे। रेस्त्रा मे विसी सदिग्ध चित्रकार ने अपने चित्रो की बेशम नुमाइश लगाई थी। अदर मेज़ पर कुछ मनीपी लोग (इटेलेक्चुअल) बिना रिसी खास वजह के कुछ समस्याओ पर विचार कर रहे थे। उन्हें विना सुने ही मैं जानता था कि न समस्याए उनकी हैं, न विचार उनके हैं । जो भ्रम यह रेस्त्रा और तस्वीरें पंदा करती थी, वही यं मनीपी भा पदा करते थे । बाहर भी, जसा वह चुका हूँ, आधुनिकता का भ्रम देने वाली बहुत-सी चीखें थी। २० मेरी श्रेष्ठ व्यग्य रचनायें ।

। पर जहाँ में बहा या, उसके दाए-बाए किसी ने इस आधुनिकता की करई खुरच दी थी, क्योकि एक ओर एक थाली वाला, सस्ते दाम का, निम्न मध्यवर्गीय भोजनालय था। दूसरी ओर हनुमानजी का एक मदिर था, जहा कई लोग अपने को भूलकर राधा-कृष्ण का कीतन कर रहे थे। कुछ पैट-कमीज वाले बाबू लोग झेंपोंपकर हनुमानजी को प्रणाम कर रहे थे। कुछ बिना झेपे उहें प्रसाद चढाकर तिलक लगवाकर हमे चुनौती-सी देते हुए आगे बढ़े जा रहे थे। मैं भारतीय तटस्थता की नीति से चुपचाप सडा था। मदिर से दस गज की दूरी पर जाकर एक नयी कार रुकी। उसमे दो आदमी बैठे थे। उनके चेहरों से लगता था कि ये अच्छी तरह खाने वाले और, खास तौर से, अच्छी तरह पीने वाले आवमी हैं। वको के शेयर, तस्कर-व्यापार, इनकम टैक्स की चोरी और किशोरियो को फुसलाने और अफसरों को खिलाने पिलाने का वातावरण, तस्वीर के सतो के तेजोमडल की तरह, उनके चेहरे के चारो ओर फैला था। उनके हाथो मे देखते देखते जादू के जोर से दो गिलास आ गए । मेरे देखते-देखते उहोंने गिलासो में बोतल से कुछ उडेला और उसे सतोष- पूर्वक पीने लगे। हिंदी के प्राध्यापक से में अब बातें करने लगा था। मैंने अपनी एक प्रिय बात बताई, 'छायावाद-काल हिंदी-याविता वा अधा-युग है।" वे चिढकर प्रसाद का एक उद्धरण देने की तैयारी करने लगे। बोले, "समसामयिक विश्व-साहित्य में प्रसाद के मुकाबले ।" मैंने जिनासा की, "समसामयिक विश्व साहित्य के बारे में आप क्या जानते हैं।" उन्होन बिगडकर पूछा, "माप क्या जानते हैं " मैंने समझाया, "मैं हिंदी-लेखक हूँ । आप इसी से समझ मक्ते हैं कि मैं 'एकाउटर' और 'टाइम्स लिटरेरो सप्लीमेट पढता है, जो अप नही पढते।" "मैं प्रसाद वा साहित्य पढता है, जो आप नहीं पड़ते।" मैंने सास खोकर कहा, मुझमे और आप मे लेखन और मध्यापर - - - लखनऊ २१ का मौलिर मतर है।" इसका भी कोई जवाब न मिल जाए, इन डर से मैं एक्दम से पत्रकार मित्रो से उपचुनावी की बात करने लगा। ऐसा करते ही मैं रखनऊ में हो गया। मोरर वालों ने दूसरा गिलास भरा। थाली वाले भोजनालय से वैवादगार पावो और छतनार मूछो का एक जत्था बाहर निकला। हनुमानजी के मंदिर मे बडे जोर से जय-जयकार हुई। पिसी देसी ग्यित की एक विलायती मोटर विगी यवरी औरत के हाथो में अटकी हुई, टढी मेढी होती सामने से निकली। उसकी नवर-प्लेट पर रियासत का नाम और गाडी का नबर हिंदी में लिखा था। हम इतने से ही वृत्य हो गए। तीन एंग्लो इडियन एडकिया फुटपाथ पर खड़ी होकर हनुमानजी को घूरने लगीं। जवार में हनुमानजी के भक्त लडगियो को घूरने लगे। सामने एक रिक्शा आपर रुका । उस पर सालहवी शताब्दी बठी थी। यानी दुरखे के अंदर एक औरत थी। मेरे साथ का एक पत्रकार रिक्शे के पास जाकर पडा हो गया। उसने दो एक बार नाक सिकोडी, जैसे कुछ सूघ रहा हो । फिर लौटकर हमारे पास वापस आया और अपने साथी से बोला "तुम जाओ। 'नही तुम जाओ। मेरी ओर इशारा करके कहा गया, 'ये जाएगे। र क्या जाएग? 'तो फिर तुम्हीं जाओ। वह उसी रिक्श पर बठकर चला गया । अग्रेजी शाम और हिंदुस्तानी रात के आठ बजे। अब गजिंग गुरू हुई। हम लोग गभवती स्त्रिया की अदा से धीरे धीरे टहरत हुए एक-दूमरे के क्ध से धा रडाते सड़क पर चलने लगे । चरते चरते गाधी आश्रम के सामने ऐस ही खडे हो गए--- वही गाधी-आश्रम जहा बनली मधुमक्खियो से निकला हुआ शहद मिरता है। हमारे ए सायी नै फुटपाथ पर सिगरेट सुलगाई। एक मेरी श्रेष्ठ व्यग्य रचनाये गदी कमीज़ और पतलून वाला आदमी हमारे पाम आवर खडा गया और मागार सिगरेट पीन लगा। लोग उसमे इज्जत के सा बातें करने लगे । मैंने पूछा, 'तुम्हारी जेब म आज किस म किस्मत है " उसने डेढ हजार और उससे ऊपर तनख्वाह पाने वाले चार पा अध-देवताओ के नाम लिए । यकीन दिलाने के लिए उसने अपनी जे से कुछ की जम-कुडलिया निकाल ली। फिर हमेशा की...तरह मे. जम कुडली मागी। मैंन कहा, 'मुये खद है कि मैं अभी मुस्ता ज्योतिषी पालने वाले इनकम ग्रुप मे नहीं है। जरूरत पन्ने पर पाथ पर हाथ देखन वाला या चिडिया के सहारे भासपात वाली काम चला लेता हूँ। 129 "इससे क्या ? आप कुडली तो लाइए।" मैं विनम्रता म कहता रहा, 'ज्योतिषी दो आर्गे कावास अभी कोई बाबा तक नही पाल पाया है। 'पर इससे क्या तब तक एक पत्रकार मित्र ने कहा, "दूसरी खेद की बात यह है कि आपको आज मैं बियर नही पिला सकता। मेरी जेब खाली है।" "ह हहें, ऐसी भी क्या ।' कहत-कहत उन्होंने जन्म-कुलिया लपेटनी शुरू कर दी। देखते दखते उनर प्रदेश के कुछ कणधारो के भाग्य सिमटकर एक गदे पतलून को जेब म घुस गए। सिगरेटो के आदान प्रदान के बाद हम फिर गभवती स्त्रियो की तरह अपनी राह पर लुइरने लगे। हमारे साथी ज्योतिष का मजाक उडान लगे । पर राजधानी मे ज्योतिपिया और बाबाओ के बढ़ते हुए आत वा मैं मजाक नही उडा पाया । मुझे रासपुटिन के रूप की यार आ गई । पर बात को मोड देने के लिए मैंने बात यहीं पर छोड़ दी। पास की इमारत में एक ग्रामोफोन रिकाड भाय भाप बजा। उसने बताया कि हम चीनियों को मारकर भगा देंगे। हमे याद पडा कि स्थिति सकटकालीन है। अचाचावर हम सब लोग एक पान की दूमान की ओर बढ गए । एक नौकरीपेशा आदमी कई बार की कही हुई । लखनऊ २३ बात यह रहा था "ऐसी नौकरी के मुकाबले पान की दूकान रखी होती तो ।' "तो अब तक पान बेच रहे होते ।" मेरे एक साथी ने कहा । किसी ने खबर दी, "परसा अली अरवर खो का सरोद वादन होगा।" "लखनऊ मे " मैंने ताज्जुब से पूछा। थोडी देर मे मेरे एक मित्र ने कहा कि शाम जवान हो रही है। वास्तव मे ऐसी बातचीत अनुवाद मान जान पहती है, पर चूकि हम खुद अनुवाद मान हो रहे थे इसलिए मुझे यह बात बही वास्तविक जान पडी। पैदल चलना छोडकर हमने मोटर का सहारा लिया। खुली सडक पर एक पान के सामने एक अस्थायी रेस्ता खुला या। फुटपाथ पर मुसिया पडी पी और लोग माइसक्रीम खा रहे थे। हम मोटर से नीचे नही उतरे, बल्कि वही डा सोडा और गिलास मगा लिए । इतमीनान से बठे हुए हम लोग पाक में खडी गाधीजी की प्रतिमा, नयी कार, चीनियो के आक्रमण और शराब के विज्ञापनों की हवा में अपने अपने फेफडो की हैसियत से मास लेते रहे । भगवती. घरण धर्मा अमृतलाल नागर और यशपाल पर बातें होती रही। बीच-बीच मे गजनीति की टुच्ची समस्याए आती रही, जाती रही । अपने हिसाब से वातावरण बौद्धिक हो गया । इस समय हम लोग तीन रह गए थे । हम सभी निरुद्देश्य थे और हमारी सबसे बड़ी समस्या ढेर से समय की थी। लगभग आध घटे बाद हम आगे बढ़े। हम एक धनी बस्ती के बीच से निकले जहां कुछ दिन पहले, दिन-दहाडे एक आदमी मार डाला गया था। किसी ने पुलिस को टेलीफोन करने की बात सोची तो टेलीफोन के मालिक ने मारे डर से मना कर दिया। वस, दिन दहाडे बाजार में किसी का मारा जाना किसी दुष्यवस्था का चिह्न नहीं, यह केवल दुस्साहस का चिह्न है । हत्या करने के लिए (और नेता बनने क लिए) दुस्साहस के सिया और पाहिए ही क्या? परन भर स ही आप करने के मामले में याविल मान लिए जाएग। मेरी घेष्ठ ध्याय रचनामें - . हम भडभूजो, छोटे दुकानदारों, कुजहों और विसातियों से भरे-पूरे जनसाधारण वाले बाजार से होकर एक ऐसे होटल के सामने से गुजरे तो उस इलाके के लिए बडा शानदार और हमारी वगभेद वाली निगाह में घटिया था। होटल के अदर जाकर हम लोग एक बडे से कमरे में पहुचे जिसकी दीवारो का गहरा रोगन मुरझा गया था। फर्श पर सगमरमर का नकली काम था। चारो तरफ सस्ते वार का वातावरण था। हम लोगो ने कॉफी मगाई। अडरवियर पहने हुए एक वेटर ने ताज्जुब से हमे देखा, फिर बहुत सोच विचारकर बोला, "अच्छा, देखिए देखते हैं।' एक आदमी हाथ मे गिलास लिए हुए आया और हमारी मेज के पाम खडा हाकर मुये पूरता रहा । फिर बोला, "तुम कौन हो?" यह मादमी पुराने तखनऊ का था, जिसके साथ पौष्टिक दवायो, कुछ सेकेंड हैंड यादा, घिसी पिटो गजलो और गडे तावीजो की हवा वधी थी। मैंने इरजत के साथ उसे बताया, "मैं लेखक हूं।" उसने आप मिल मिलाकर कहा, "शायरी करते हो?" "नहीं, पर चाहू तो कर सकता हू ।' वह थोडी देर मुझे घूरता रहा । फिर बोला, "पर से दिखते नही हो।' - 4 'यह रोज दाढी बनाने और नहाने का नतीजा है।" उसके चेहरे से लगा कि मैं उसकी निगाह में गिर गया । एक कोने की ओर इशारा करके उसने मुझसे पूछा, "उन्हें जानते हो? वे जमाने के उस्ताद हैं। बात सय थी। हमारे नजदीक के कोने में अपने जमाने के एक बड़े प्रसिद्ध तबला वादक वैठे हुए दारू पी रह थे। साथ में दो एक लोग थे जो उसी तरह के पेशा के रहे होगे। वे पीते हुए जान को, मानन भेज रहे थे कि खजडी बजाने वाले भी आजवर तबलची मत शुमार किए जाते हैं, यहा तो वही कलाकार हैं जिसे ऑल इंडिया रेडियो मानता है। लोगो ने अफ्मोस के साथ उनस सहमति प्रकट की। लखनऊ । व दुखाय । शायद कलाकारा का राजकाय मायता क सिलासल में, या जैस भी हो, इशा और गालिद का जिक्र आ गया था। मैं सोच हो रहा था कि मेरे बोलने का वक्त आ रहा है, तभी अचानक बुजुग उस्ताद ने बिना किसी प्रोत्साहन के कान पर हाथ रखकर एक गजल छेड दी। दो चार लोग उसे दोहरान लगे। उनकी पुरानी आवाज साफ सुधरी और सधी हुई थी पर ऊचे स्वरी पर जाकर वही टिक गई थी। उसके कारण वातावरण वढा उल्लासपण हाता जा रहा था, हालांकि गजल का कुल मिलाकर मतलब यह था कि हम बरवाद हो गए । मेरी तबीयत गिर गई । मुपे याद आया, बहुत देर हो गई है। हमने जल्दबाजी दिखानी चाही तो ही बताया गया कि यहा काफी नहीं मिल मानी। हम बाहर निकले । सडके वीरान होने लगी थीं। हम धनी वस्तियो से निकर रहे थे। एक ओर अमीनाबाद, मौलवीगज अफवाद चौक, नस्वास वाला ल नऊ था जो मुह ढापे पडा था। एकाध छोकर, कुछ बुर्केवाली औरतें मरियल घोडे और हिलत हुए तांग तबोलियो की दूकाने हलवाइयो की भट्टिया, कुजडो द्वारा फेक गए गोभी और मूली के सहत हुए पत्ते-उधर का लखनऊ कुल इतना रह गया था। इस पर एक नया भविष्य हमलावर हो रहा था । यह नया भविष्य नयी पीढी का हो ऐसी वान महो। वह मजबूती स कुछ होशियार, पुराने हाथा की मुटिठयो मे जकडा या । पर वे हाथ हमारे चिर परिचित हाथ न थे । चुस्त सलवारो ऊलजलूल बालो और खुली हुई रोमहीन बगलो वाली लडकिया और इन-पाइप पतलून और ढोली कमीज पहनन वार लड़के इस भविष्य को हथियाने का सपना भर देख रहे होग। पर वह ऐम्बसेहर कार के अदर बठकर हनुमान मंदिर के पास जिन पोन वालो और हजरतगज के रेस्त्रा के अदर सस्ती थारी मे अहिंसावादी वाना साने वालों के हाथ में चला गया था । हजारगज आत आत मैं मेफेयर मिनमा के सामने मोटर से उतर गया। मैं टहलना चाहता था और रोमाटि हो गया था। मैं सोच २६ मेरी श्रेष्ठ व्यग्य रचनायें रहा था कि आत्महत्या करने के बाद अगर किसी तरकीब से मैं लागो की प्रतिक्रियाए जान सक्ता तो एक बार जरुर आत्महत्या करता। अरेले टहलते टहलत मै एक ऐसी जगह पहुचा जहा बियर का एक अनिवाय विज्ञापन मेरी आखा मे चुभने लगा । ग्यारह के ऊपर बज चुका था । एक स्टकी विज्ञापन के खम्भे वे सहारे खड़ी हु इधर- उमर दख रही थी । दूर मे ही पुगनी बलियो, जावारा एडको और जीविकाहीन बुजुर्गों वाले क्सिी सानदान का सहारा दिखती थी। मुये अपनी एर 'माया' छाप कहानी याद आई, जिमम सडक पर घूमन वाली एक वश्या भाई की बीमारी की वात चलावर पस के सवाल पर आनी है। वह पहले बनाती है कि मेरा एक भाई मैडिक्ल कालिज म बीमार पड़ा है। सम्भक पास खड़ी हुई लड़की की जावाज ने मुये चौकाया उसने मुशम टाइम पूछा था। मैंन कहा ग्यारह बजकर पचीस मिनट । फिर, जाने कैस मैंन सम अचानक सवाल किया, 'तुम्हारा काई भाई क्या मेडिकल कालिन मे वीमार है ?" । आपका कैम मालूम उसन कुछ रुपयर कहा। उसकी आवाज मे विश्वमन्त्री का मदेश था। जवाब म पहेली मा यात हुए विलायती स्टाइल मे मैंने कधे भरका और बिना कोई वात वह टहरता हुआ आग बढ गया ! बिजली के खम्भा को राशनी मे फ्ली हा एकतर को काटती हुई. अपनी परछाप्यो को कुचलता हुआ एक परछाई सा ही धीरे धीरे अपन घरी जोर चलता रहा। रकम र बौ िक्तापूर्ण दिन चत्म हुआ. 7 लखनऊ

रवीन्द्र जन्मशती की रिपोर्ट
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स्थान-छगालाल विद्यालय इटर कलिज, ग्राम शिवपालगज, जिला
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)।
मुख्य पात्र-रवी द्रनाथ ठाकुर हमारी श्रद्धा और इस कहानी की
दया के पात्र।
वध जी जो देहाती लडके खेता, कारखानो और जेला
से बाहर थे उहें खदेडकर कॉरेन में ले जाने
वाले समाज सुधारक राजनीतिक कायकर्ता,
अत साहित्यिक समारोहा के अग्रणी । कॉलेज
के मैनेजर।
याबू हरिहरदास कॉलेज कमेटी के सदस्य । स्थायी रूप से
उत्साह और ताटी मे डूबे हुए।
प्रिसिपल कॉलेज की इमारत बनवाने के लिए मजदूरों
के ऊपर लगाया गया हैइ मेट जो सयोगवश
पढ रिख लेता था।
पन्ना / मालवीय कारिज के रेक्चरर । क्ला क्ला के लिए के
आधार पर पलन वाले प्रिसिपल विरोधी
अभियान के अगुवा।
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रुप्पन बाबू वद्यजी के पुत्र । कॉलेज के चिरस्थायी छात्र । विद्यापियो के लीडर । अध्यापकों के सहज शन। " बाबू हरिहग्दास आज सबेरे से ही ताडी पोकर एक साहित्यिक व्याख्यान दने की हालत मे पहुच गए थे। व्याख्यान का विषय 'मुख्य अतिथि का स्वागत करता था। मुख्य अतिथि जिला विद्यालय निरीक्षक घे जो किसी भी कॉलेज मे पहुचते ही मुख्य अतिथि वन जाते थे । बाबू हरिहरदास कह रहे थे "भाई मेर, हम सब जानते हैं कि रवी द्रनाथ ठाकुर कितने महान कवि थे। ठाकुरी का काम तलवार चलाना है, मातृभूमि की रक्षा करना है। पर वे एक ठाकुर थे जो कलम के जोर से वही काम कर दिखाते रहे जो महाराणा प्रताप तलवार की नोक स दिखाते थे। उन्होंने ऐसी- ऐसी वीरतापूण कविताए लिखी कि लिखते तो ५ इडिया में ये पर उन्हें पढ़कर लोगो को इग्लैंड तक म जोश आ जाता था। आज उनको मरे हुए सौ वर्ष पूरे हुए, पर हमारे लिए वे आज भी जिंदा हैं । रप्पन बाबू धोती के छोर को गले के चारो ओर लपेटे मास्टरो के साथ एक किनारे खडे थे । उन दिनो शिवपालगन के गुडो मे गले के पारी और स्माल बाधने का फशन था । यह उसी का नतीजा था । सबेर स ही उन्होन भग पी ली थी। हरिहरदास बात सुनकर रुप्पन बाबू सन्ना मास्टर से बोले 'दखिए मास्टर साहब, इतने बड़े कवि को यह साला जीत जी मारे डाल रहा है।' यायशास्त्रिया का मत है कि जहा जहा धुआ होता है, वहा वहा भाग होती है और जहाजहा शामियाना होता है, वहा वहा जलसा हाता है। इसी शामियाने के एक सिरे में नीचे रवीन्द्रनाथ ठाकुर व चित्र का उदघाटन दिया गया था। चित स्थानीय ड्राइगमास्टर को उन पला- कृतिया मे या जो माइर के प म विद्यायियो आग नकल के लिए नहीं रखी जानी । अत इस चित्र में कुछ एसी तरकीबें लगाई गई थी कि उसको नवल नहीं हो सकती थी। खास तौर स चेहर के इद गिद रवीन्द्र जमशती की रिपोर प्रकाश का जो परा बनाया गया पावसमे छोटे बडे न जाने स्तिने बुतपुरे उटा दिए गए थे। नासमानों को श्रद्धा के हो परन पहते गई सालमा यासी प्रमपूत या था। मानयता ये स्तर पर रवीदनाय अरने मम वयवार रिए मगहर हैं । शायद इसी महाग मास्टर न इस चित्र में युछ एमा मम वय दिवाया था कि यह एक माय मापस बनाड शा और टारम्टाय की भी तस्वीर हो सकती थी। उन्होंने गुन रया या शिये एष बऽ हो भायर कवि थे। अत इस तम्बार यो आवों में एक ऐसी अनीषिक भगिमा पी कि पुद पाने के साम ही माथ ट्राइग मास्टर ने पविगुरु को भी अफीम यी एप गोरी पिला दो पो । वा कुल मिलाकर यह तस्वीर मुरी न थी। गाधी नेहरू की हमारो चित्र विचिन तस्वीरें तमोरियो की दुपाना पर टिकी रहती है और उनम यतो की मुदा ऐसी हाती है कि उनका बडा से बड़ा विरोधी भी पिघल जाता है । यह तस्वीर भी उसी दर्जे की थी। हरिहरदाम का व्याख्यान चल रहा था। शामियाने पे नीचे इतनी भीह की दि बात बात पर हर कोन म तिल का तार पडा हो जाता था पर कही तिल नही रखा जा सरता था। स्कूल के सब लदवे पढाई की वास से छूटकर स्वेच्छापून मौजूर थे। साथ ही और राके । भी यहा आ गए थे जा आसपास के वागा म दिन भर जुआ खेलते, अपन मवेशी दूमरा के खैता म चरने के लिए छोडकर पेडी पी चाह में निबंध सोने या तहसीर थाने पर नौकरी लगन के लालच महाविमो के घर वार करते । रवी द्रनाथ ठाकुर की तस्वीर को बगल मे सनी हुई मेन और उसके पीछे बुसिया पी। हरे सूली रगो का चक्षुभेदी मेजपारा विकराम खड की ग्राम सेविका के हाथो सवारे हुए कागजी गुलदस्त सिगरेट की पानी की झिलमिलाहट शानिनिधन का अभी बहुत कुछ सीखना बाकी था। बीच । कुर्सी पर बद्दर की वमपच वालानशी वुशाट पहने जिला विद्यालय निरीक्षक ठे थ। वे जापत थे निदर किसी निंदी जखसार म दम जलसे का वणन आएगा उनका नाम छपगा। वे सीम प्रस। थे वाले 1 मेरी श्रेष्ठ यग्य रचनायें उनकी बगल मे एक ओर बाद हरिहरदास और दूसरी ओर वैद्य जी बैठे थे। प्रिसिपल साहब मच के नीचे दौड-दौडकर अरदरी का काम कर रहे थे। विद्यालय निरीक्षक का अरदली एव किनारे बंटा हुआ वाशनिक भाव से बीडी फूक रहा था। हरिहदास का व्याख्यान देते देत गला रुघ गया था।ल्डको ने सहप तालिया पीटी । शामियाने मे कुत्ते और बिल्लियों की आवाजें गजने लगी। तब प्रिसिपल साहब ने दहे होकर पाच मिनट तक लडको को अपना अनिवाय व्याख्यान सुनाया डिसिप्लिन पर । मास्टर लोग दौर-दोडकर अपनी तैनाती की गुम्टी पर पहुच गए और लडका को शात करन के लिए हाय पर जोडने लगे । राना मास्टर ने स्प्पन वायू से प्राथना की "हप्पन बाबू, प्रिमिपल मुझे ही ना रहा है । कहेगा कि मैंने शोर बद करने की कोशिश नहीं की। मेरी सहायता कीजिए। अपने साथियो को चुप कराइए ।" धूप और भग की गर्मी स रुप्पन बाबू पसीजे । वोले, 'आप क्यों परेशान हैं ? शोर बढता रहा तो इस्पेक्टर तो प्रिसिपल की गरदन पकहेंगा। आप के बाप का क्या जाता है विद्यार्थी नेता से अपन लिए यह रक्षा वाक्य सुनकर खाना मास्टर सोचने लगे । एप्पन बाबू बोले, "अग्रेजी पढाना एक बात है पालिटिक्स मिटाना कुछ और ही चीज है । अभी इसे सीखिए।" शोर अपने आप कुछ कम हो चला था। बाबू हरिहरदास अब फिर बताने लगे थे कि रवीन्द्र जयती के इस अवसर पर सबसे महत्व- पूर्ण घटना यह घटी है कि जिला विद्यालय निरीक्षक का कॉलेज में पदापण हुआ है इस्पेक्टर साहब हमारे कॉलेज के हित के लिए कामना कानन कुछ नहीं देखते। वे हमारे लिए हर मौके पर जवामर्दी दिपाने हैं । उहोंने इस बालिज मा बनाया है । मैंने सुना है कि माज कुछ अध्यापक यहाँ प्रिमिपल के खिलाफ गुटवदी कर रहे हैं । इस्पैक्टर साहब की निगाह या सव वातो पर है। यावधान देश द्रोहियो, तुम्हारी कुचालो पर हम सब की जर है।' यह कहार बाबू हरिहरदास ने मास्टरा को इस तरह ललकारा - रवीद्रजमगती की रिपोट पूरा का पूरा जैसे हम रोग बैठे हुए चीन-पारिस्तान जमन जापान अरब ईरान सभी को ललकारा करते हैं । लड़को ने फिर कुत्ते विल्लियो की एक अदृश्य फोज शामियान के नीचे छोड दी। काफी देर गोल-माल रहा, बडा मजा आया। हरिहरदास ने आखिर में कहा, "उही इस्पेक्टर साहब का आज की सभा का सभापति बनाकर हम कृताथ हुए हैं ।" पर उनकी यह बात इस्पेक्टर नही सुन पाए, विल्कुल मामने वठे लडको म भी काई-वाई कुत्ते दिल्ली की आवाज निकालने लगे थे। अग्रेजी में एक कहावत है, बढिया शुरुआत का अर्थ है कि आधा काम हो गया । यहा हरिहरदास के व्याख्यान का इतना बढिया असर पडा कि लगा रवीद्र शतादी का जलसा इस शुरुआत से खत्म हो जाएगा । पर लडको के असहयोग स वह पूरा नही खत्म हुआ। उनका मनोरजन अभी कुछ बाकी था। इसीलिए उन्हाने याशा के विपरीत चीखना कम कर दिया और शोर अपने आप कम हो गया। इसके बाद ब्लॉक पर काम करने वाली एक महिला अधिकारी ने दो तीन लक्यिो को खीचतान कर उनसे रवी द्रनाथ का एक गीत गवाया। जितने लोग मौजूद थे उहोंने यह समझा कि यह गीत बगला मे है । कोई बगाली होता तो समझता कि गीत गुजराती मे है । अर्थात गीत किसी की ममझ मे नहीं आया और अपनी न समझ के कारण वह एकदम से सावभौमिक हो गया । एक स्थानीय कोतन कलाविद ने रवी द्रनाथ ठाकुर का लिखा हुआ एक भावपूर्ण भजन गाया। वे ओकारनाथ ठाकुर के पोज मे पर बगल की आर फ्लावर शेरवच्या स्टाइल म बठ गए और भजन गाने लगे। उनको सिकुडी हुई भौहें और रोनी मुद्रा, समान की आर बार-बार उठन वाली या देखकर सबको यकीन हा गया कि भजन बडा करुण और भावपूर्ण है । एक हाथ की हथेली को चम्मच जसा बनाकर दूसरी हथेली का ढकान की तरह स रखने की तैयारी मे बैठे हुए वे अपना भजन गात रहे । लगता था जसे कोई मुर्गी उनके हाथ स निकल गई है और वे दोना हापो से उसकी मोटी-ताली या पर है. वठे हैं । लोग भाव विभोर हो गए । लड़कों न भी मुर्गी की याद म कुबडूक करना मरी श्रेष्ठ व्यग्य रचनायें आन वाली खूबी - N शुरू कर दिया । इतना शोर मचा दि भजन के अतिम चरण का पेटेंट माफ-~मीरा प्रभु गिरिधर नागर-~-~ ~सुनाई हो नहीं दिया और बहुत लोग इसा प्रारभिक मूचना दे मार अपने घर वापस मा वि होने रवीन्द्रनाय का भजन सुना है। इस बार वॉज में वरक साहब ने एवं उर्दू की कविता सुनाई। कविता मामरे म द हमेशा मे बतकल्लफ और जहा वह मोई बबिता पण आई ये उस अपनाए नि त । इस समय भी उन्होंने दो घार पुरानी अविनाको मिलाकर एक मौसमी धीज तयार कर दी थी। यह वास्तव म एक अमीदा प जिसका तापय यह यानि आज भचाना फल या शिल रह है, दिल' या पल रहे हैं, और गुर-गुचे पर afrr यो पहा रह है स्वा क्यो तातो हुई बह रही है और मानित पाए क्या मगराती हुई चरी आ रही है। इसी तरह से दम योम पनी सवालमा म बताया गया था मह सब इमलिए हा रहा है rि आज हमार दिन में जगाव इस्पक्टर माहब महादुर तराफाए। रवीनाथ की इस सातिर अभ्ययना के बाद मस्तृत पहित जी नगोनामरि पर एम प्रवचन देना शुरू किया। उन यी गोपनीय वपर दी वि भारत मा ही धमप्राण है, HIT उमरा प्रमाण यह है कि रवीद्रनाथ ठार तर ने गीता- लक्षिा है। वे गीता के बारे म मगमग पद्रह मिनट बोलते रहे और यम निप्प पा पर रि गीता गीता है और गीतांजलि Patar पर जागोनाम यही गीतालि म भी है। व पनि हो या जाता तोड देसधार पर रन Frman ने मो बात कायदार वा मि और वहीं PRER, बम, पर में, अनिल-अनर है। प, मारवाद हम ₹ और पूरि रवीनापन mat frm, मसिए रहस्यवानी है। गयी। रातीको रिपोट तालियां और भो भो, म्याव-म्पाव, घी ची का फिर से एक नया दौर चला। सस्कृत के पडितजी अब सिनेमा के किसी गाने का गलत उद्धरण देकर कह रहे थे कि हिंदी मे अब ऐसी ही कविता हो रही है चसमवह चसमवद्द ' जर वि ठाकुर साहब ने ऐसी ऐसी धार्मिक कविताए लिखी है, जसे अतर मम विकसित करो। तभी पडाल के एक कोने में सचमुच ही एक गाना होने लगा, 'चश्मे बद्द, र' । तव वैद्यजी लहको को शात पराने के लिए खड़े हो गए । उनरे लाल लाल स्वस्थ चेहरे को देखकर लड़को ने उल्लासपूर्वक सोटिया बजाई। इस मौके पर खला मास्टर प्रिसिपल साहब के पास आकर खड़ हो गए। बोले, "मालवीयजी ने रवीद्रनाथ पर एक निबंध लिखा है उसे सुनाना चाहते हैं।" प्रिंसिपल साहब ने चिढकर खना को देखा, कहा, "कसा निबध? यह रवीदनाथ पर निबध सुनाने का मौका है ?" मौका तो यही है । नहीं तो क्या ऐसी बातें क्लास रूम में की जाएगी।' प्रिसिपल ने चारो ओर निगाह डाली । सीदियों की आवाज कम हो गई थी। वैद्यजी अपनी थियेटरी आवाज मे नोटकी जसा गा गाकर रवी द्रनाथ पर राजनीतिज्ञो वाला व्याख्यान देने लगे थे 'देश में उन्नति करने के लिए सिफ रुपये की हो आवश्यकता नही । कला और साहित्य की भी उनति होनी चाहिए । खन्ना ने उघर अपनी बात दोहराई, तो मालवीय माहब अपना निवध पढ दें? प्रिंसिपल ने दात पीसकर कहा 'पालिटिक्स । जब देखो तब पालिटिक्स | भया तुम काजी हो कि मुल्ला था बोय सिर पर लिए घूम रहे हा मालवीय को क्या रकवा मार गया है। वे खुद क्यो नहीं कहते ' जहाँ देखो वहीं गुटबदी। किसी को लेख पढ़ना है तो यह भी सना साहब की माफत बात करता है । हुहू !" मेरी पेष्ठ व्यग्य रचनायें 7 तुम काहे दुनिया भर ३४ बन्ना ने कहा, 'मेरे कुछ बोलने से ही आपको धजली लगती है तो मैं जाता हू । मालवीय को ही भेजे देता है।" प्रिसिपल को छाती तन गई । हाय हाफपंट की जेबा में पहुंच गए। बास की तरह लपलपाते हुए उन्होंने बना का रास्ता रोक लिया। कहने लग, 'मालवीय तो मालवीय, मालवीय के बाप भी उतर भावें तो यहा उनका लेख नहीं पढ़ा जाएगा। यह साहित्यिक सभा है, कोई धावियो को पचायत नहीं है।" "साहित्य ने कहा, 'आप मजदूरो के साथ बैठकर कॉलेज का छप्पर छवाइए । थाप अपने मुह से यह लपज क्यो निकालते लडका का गोर बद हो गया था और वैद्यजी रवीन्द्रनाथ, गाधी, नेहरू, इस्पेक्टर आफ स्कूल्म, हरिहरदास, शिक्षामनी, प्रिसिपल, जिला कमेटी के अध्यक्ष इन सब पर बारी-बारी से अपनी प्रशमा का एक- एक वाक्य गिरात हुए ब्रह्मचय पर गए थे, रवी द्रनाथ के मुख कसा तज था, इसकी याद दिलाने लगे थे। प्रिमिपल ने आवाज को दबाकर दात के नीचे दात घिसते हुए कहा, 'खन्ना, इसी कॉलेज म तुम्हारे अदर भूसा न मर दिया तो बना । किए जाओ दलवदी। एक सज्जन छापेदार वुश्शद और पट पहने, पान खाए, चश्मा गाण, सडकियो को ओर निगाह केंद्रित किए वहा आर खडे हो गए। मना न कहा, भाई मालवीय, आपका निवध यहा नही पा जाएगा। मालवीय प्रिसिंपल की ओर देखने लगे। प्रिसिपल न ममपात हुए पा, अच्छा है । आपने निवध लिखा, उसम मुझे खुशी हुई । अपना अभ्यापन सासर आप र रिखते हैं तो क्या हुआ, दूसरे मास्टर उसी वस उदवर दावदी करत है, ताश खेलत है । आप लख लिखन है, "मम ग क्या है ? प्रिमिपर मात्र या वान रस्त रहे जम मालवीय रेख लि लेने की गनिमात्मा या कर मर जान वाले हा और उनकी मात्वना के हावारण अब नर मा परल म रुके हुए हो । उहोंने कहा, "पर ।' . रवीद्र अमाती की रिपोट "पर मैं पर पर नहीं जानता। यह तुम्हारे निबध ना समम मही है। वजी योल रहे हैं।" 'पर पर, यहां युछ तो होना चाहिए । रवीदनाप पर एक भी निबध नहीं पढ़ा गया!" "और हो क्या रहा है ? कान में रुई घोस ली है क्या ?" प्रिंसिपल बोले, 'कल्यता दिल्ली-इलाहाबाद-जहां देयो यहाँ रवीन्द्र जयती इसी तरह तो मनायी जा रही है। बड़े-बड़े नेता, मिनिस्टर, हाकिम सभी अपनी-अपनी श्रद्धाजलि दे रहे हैं। तुम्हारे जसे साहित्यिक निवध कौन पढ रहा है। यहां भी अब टाइम कहा है ? बाधा घटे बाद इस्पेक्टर साहब वो उठता है। उनका क्षर अभी पडा ही है। अपनी चतुरता पर खुश होते हुए प्रिसिपल साहब ने अत म कहा 'मौका समझो मालवीय । अक्ल यही कि मस? अपना निवध जेब में रख लो।' छायावादी कविता वा सत निकालकर जो आह बनाई गई है, उसे मह मे घीचकर मालवीयजी चुप हो गए । कुठित होकर उहोने फिर उसी ओर टकटको बाध ली जहा चार-छ लडरिया निगाह नीची किए बैठी थी और सारी दुनिया को बदमाश समझ रही थी। मेरी श्रेष्ठ व्यग्य रचनायें एक शोक-प्रस्ताव रखनऊ २७ फरवरी, १९६६ मित, कल हो मैंने एक मासिक पत्रिरा में तुम्हारे शहर की एव शोक सभा का वर्णन पढा है, सचिन और का यपूण । यह जानवर सतोय हुआ वि दिवगत प्रधानमन्त्री ने शोर में की गई इस सभा की अध्यक्षता तुमने की, और बाबू रामाधार टापते रह गए। तुम्हारे व्याख्यान मे दिवगत नेता के लिए दी गई उपमाए पुरानी होते हुए भी काफी चुस्त थी, खास तौर से वह सूरज और कोहरे वाली उपमा । उस मौके पर पढ़ी गई वविताओं में कुछ बहुत ही उम्दा थो, एक तो बिल्कुल देसी थी, जैसी कि अभी हाल में राकाशवाणी के एक शोरपूण कवि-सम्मेलन मे एक कवि ने-प्लेबप सिंगर मुहम्मद रफी को पछाडकर--मापी धी तुम्हे इस तरह पी लगना हेढ सौ सभामा में जाना पड़ा और पही या रामाधार अध्यक्ष न बा जाए, इसलिए खुद उनकी अध्यक्षता करनी पड़ी। मैं तुम्हारा शोक समयता हूँ। इधर अपने शहर में उन्ही दिनों मुझे भी एक शोक सभा में शामिल होना पड़ा था। उसकी रिपोट मैं दे रहा है। इसे पढकर बताना, क्या तुम भी मेरा शोक समझ सकते हो? पिछले साल तुमने करुणाशर दफेटार की एक पेंटिंग घरीदी थी । वह दफेदार अब नही है, जिन दिनो तुम शोक समाओं के कार्य- कम में जुटे थे, वह यहा एक बार-दुपटना में मर गया । हम बुद्धि जीवियो को इस पर वढा अफसोस हुआ और हमने तय किया कि इस महान कलाकार की मौत पर हम एक शोकसभा करेंगे। दिन का तीसरा पहर । हम लोग कॉफी हाउस के सामने एक पाक मे मिले जो कुछ बदनाम सा था । उसमे ज्यादातर लोग छिपकर प्रेम और लघुशका करने को जाते थे। हमारे एक दोस्त ने वहां शोक-समा करने पर ऐतराज भी किया, पर मैंने समझाया कि भावना सच्ची हो तो कोई भी जगह किसी भी काम के लिए अच्छी है । देखो पब्लिक लाइब्रेरी मे अब सिफ लडके रडदिया 'डेटिंग के लिए जाते हैं, दपतरों मे लोग काफी हाउस चलाते हैं, कॉफी हाउस में लोग । हम कई अदद चित्रकार, साहित्यकार, पत्रकार और यूनिवर्सिटी वाले थे। वैरायटी के लिए दो अफसर, तीन नेता, एक दूकानदार (कॉफी हाउस का मनेजर) और दो श्रमिक (वही के दो बैरे) भी थे। जाडे को धूप दिन का तीसरा पहर और लहलहाते अमेजी फूल, जिनका नाम भर गिना दो तो देसी भाषाओं की एक कहानी बन जाए। शोर सभा शुरू हुई । हम भरे हृदय और पेट के साथ दरी पर बैठे। भाइयो और बहिनो।' अध्यक्ष ने कहा। बहिना म अतिशयोक्ति थी क्योकि वहा सिर्फ एक औरत थी। 'भाइयो और बहिनो आज हम एक महान् शोक' को छाया में इकटठे हैं। हमारे प्रिय नेता स्व. प्रधानमत्री ।' अध्यक्ष के बारे मै अपवाह थी कि उसने किसानो के लिए एक सस्तो मीठ-डिल ईजाद की है। वह खेती के उनतिशील औजार सरवारी अफसरो की माफत क्सिानो मे बचता था। पर उसका यह पेशा सिफ बहाना था, वास्तव में वह एम०एल०मी० था, पर उसका वह पेशा भी सिफ बहाना था, क्योकि वह राज्य को ललित कला मरी श्रेष्ठ व्याय रचनायें अकादमी का सदस्य और उसकी चित्र खरीद-कमेटी वा कवीनर था। कुल मिलाकर दो ठिगने पावो पर खडी हुई एक बहुधधी योजना। व्यापार के वक्त वह खादी का कुर्ता पायजामा पहनता। विधान- परिषद में टेरिलीन का सूट । इस वका यह शेरवानी पहन था, और छाती पर लाल गुलाब की एक क्ली लगाए था। उनके आकस्मिक देहावसान से आज सारा देश शोकमय है। व हमारे महान राष्ट्रनायक थे ।' मैंने उसके कान मे धीरे से कहा, "करुणाशकर दफेदार मरो गया है । यह उसकी शोक-सभा है, प्रधानमत्री को नहीं।".. उसने सिर हिलाकर मुझे यकीन दिलाया कि घबराने की जरूरत " ww w नहीं। चूवि वहा पान नही वटना था इसलिए पहले से ही इतजाम के साथ मुह मे डाला हुआ पान लोग धोरे धीरे चबाने लगे। 'ऐसे शोक के समय हम पर एक और चोट हुई है। आप लोग देश के महान कलाकार श्री करुणाशकर मसबदार को जानते ही हैं ।" मैंने धीरे से कहा, "मसबदार नही, दफेदार ।" अध्यक्ष को आवाज अब तक हम सबको एक शोक-सभा बना देने की हालत में आ गई थी। उसने मेरी बात अनसुनी कर दी। मसबदार नयी पीढी के इलाकारो मे ।' मैंने उसके कान में दुवारा कहा, "मसबदार नही दफेदार ।' अध्यक्ष के चेहरे पर मेरी बात का कोई विकार नहीं हुआ। पर उसको अगली बात से लगा कि उसने मेरी बात सुन ली है। तो दफेदार को पहली बार मैंने ललित कला अकादमी के सालाना जलसे में देखा था। तभी मैं जान गया था कि वह एक ऊचे दर्जे का चित्रकार है क्योकि । 'क्याकि वह दाढी बढाए हुए था', मैंने अपने आपसे कहा । वह कहता रहा, क्योकि उसके हाथ में एक कचे दर्जे का चित्र । प्रस्तावना खत्म । दूसरे वक्ता को बोलने का मौका मिला। दूसरा ॥ एक शोक प्रस्ताव वक्ता कॉफी-हाउस का मैनेजर था। कॉपी-हाउस म दफेनार के साथ एक छत के नीचे बह जितना समय गुजार चुका था, उतना हममे से वहृतो ने अपनी वीवियो के साथ भी नही गुजारा होगा । पर मनजर ने दफेदार के बारे में बहुत कम वात की, वह चित्रकला की गयी प्रवत्तियो के बारे मे चोलता रहा । तीयों के पडे जिस इत्मीनान से धम की बात करते हैं कॉफी हाउस का मैनेजर उसी तरह चित्रकला की बात करता रहा। धूप और फूल और धीमी हवा । किमी ने ठोक मेरे पीछे बीडी पीनी शुरू कर दी और उसका धुआ मेरे सिर पे आमपास धकार काटने लगा। तुम जानते ही हो बीडी को मैं तभी तक वस्ति पर सकता हू जब तक कि वह जलायी नहीं जाती । मैंने गुस्स म बीडी पौन वाले को देखा पर वह सभा म बैठी ओली औरत को देख रहा था। अचानक मैंने महसूस किया कि ज्यादातर लोग उसी को दख रहे हैं। तीसरा व्याख्यान घरने लगा। पान के पास सडक पर एक कार आकर रुकी। उसका हान बिना ने काफी दर बजता रहा । मैं पहचान गया । गाडी में बैठा गोल मटाल आदमी यूनिवर्सिटी म अथशास्त्र वा वचार या। विरेशो सहायता का देश पर कुप्रभाव-इस विषय पर वह लप लिखने में माहिर हो गया था । अभी हाल ही मे वह एक विशी वजीफे पर पूराप का चक्कर काटकर सोटा था । वह मेरा एक प्यारा अत्पकालान दास्त था और हाल बजार यर शायट मुझे ही अपने पास बुला रहा था। हॉन की आवाज ने शोक सभा में अडचन हारी, पर ज्यादा नही क्योकि इस समय बागे वाला मोहरार मोदी और रामधारीसिंह निवर' की शलीम अपनी पहियल आवाज से दवार की कार दुघटना की तफ्मोल दे रहा था। हॉन हार गया । योडी देर मे ही मेरा लेक्चरर दोस्त पुलाया हुआ चेहरा लेपर मेरे पाग आया और उसने भी अरती औरत को घरना शुभ पर निया। इरा पर अध्या ने घोषणा कर दी कि अव उगी का भाषण होगा। मेरी अष्ट ध्याय रचनायें हुआ - AN एक प्रोफेमर, विचारक, विद्वान वह तेजी से जाकर अध्यक्ष के पास बैठ गया और शायद सोचता रहा कि माजरा क्या है। फिर कुछ सोचकर बोला, "आप सब जानते ही हैं, साहित्य समाज का दपण है, पर एक तरह से देखा जाए तो खुद समाज साहित्य का षण है।" उसके मुह से वेमौसम 'समाज और 'साहित्य' की बात सुनकर मेरा दिल दहल गया । मैं समझ गया कि वह शराब के नशे में धुत है । मैंने जाकर अध्यक्ष के कान मे कुछ कहा, पर तब तक मेरा दोस्त साहित्य और समाज के बारे में कुछ और बोल गया। अध्यक्ष ने मेरे दोस्त की बात काटकर लागो को शान रहने का इशारा किया और एक काग1 को रुक-रुवकर पड़ते हुए, नयी पीढी के महान् चित्रकार श्री करुणाशकर मसबदार-~~-'आई एम मॉरी- दूपदार के आकस्मिक निधन पर शोर प्रस्ताव पेश किया। थोड़ी देर मे ही हम फिर पहले जसे थे। हम लॉन पर लेटे हुए मजदूरो को कुचलते, मूगफली के फले छिलको पर जूले चरमराते, पुललया पर थूकते हवा में हाथ हिलाते पाक से बाहर की ओर रुपके। अचानक मेरा दोस्त परा हो गया और बोला, "यह फरेब है ! झाड ।" तुम नशे म हो ।” अध्यक्षा ने तीधेपन से रहा । मेरे दोस्त के माथे पर घाव का निशान था। शराब पीकर, धूसा सार, टूटे शीशे पर टूट पड़ने का अमर चिह्न। धूप मे वह निरन खासतौर से तमतमा रहा था। वह बाला, "प्रस्ताव में तुमने दो मिट ना चुप रहने के लिए कहा था। पर तुम लोग सिफ पत्तोस सेकष्ट तय चुप रह । तुमन दपेदार के साथ फ्रॉड किया है।" 'तुम जगी हो।" अध्यक्ष ने भी उसी तरह कर। 'हो सकता है। पर मैं घरी रेय रहा था। सुमने रुगभग देव मिनट का मॉड दिया है।" जस बाई बाजी जीती हो, इस तरह उसने मरी योर देखा और अपनी बात को दा चाही । अध्यक्ष ने मेरी ओर देवा । मने वहा, 'ऐसा नहीं है । जमाना बदल गया है। पहले दुध की पड़ी बादे नही पटतो थो । अब दुष के दो मिनट भी पैतीस मेच. शोष प्रस्तान

जैसे जान पड़ते हैं।"
दोस्त, साराश यह है, दफेदार अब नहीं रहा । उसके चित्र को
समालकर रखना । कुछ दिनो मे ही ललित कला अकादमी उस अमर
बनाना चाहेगी और उसके चित्रो के बारे में पूछताछ शुरू करेगी।
पन की प्रतीक्षा करूगा।
तुम्हारा,
श्रीलाल शुक्ल
मेरी श्रेष्ठ म्यग्य रचनायें

घुडसरीका कवि-सम्मेलन जाती थी वहा अब भी बलगाडी निकल सक्ती थी। जहा नाला था वहा नाला ही रहा। धीरे धीरे जैसे खेता पर सडक निकली थी बसे ही सडक पर खेन निक्ल आए। पर गाव, सहक के किनारे का गाव हो सारी दुनिया मे मशहूर इस कॉलेज में बस्लमटेर महराज के भतीजे प० दसादीन शर्मा प्रिंसिपल बने । जब यह मिडिल स्कूल था वे तभी से इसके हैडमास्टर थे। हाई स्कूल होते होते वे खुद हाई स्कूल पास हो गए । अब कॉलेज हो जाने पर उहोने बी० ए० भी पाम कर लिया था। वे अकबर की तरह कॉलेज का शासन सिफ बुद्धि के सहारे चलाते थे और इसके लिए थे इसी कॉलेज मे बाबू रामाधार उफ पल्लवनी हिंदी के अध्यापक नियुक्त हुए । वे हिंदी के एम० ए० थे। इसीलिए कवि भी थे। इस लिए उनके मन मे दूसरो को कविता सुनाने की इच्छा भी रही थी। इसलिए लोग उनमे पवरात थे। इससे अकेले रह जाते थे। इस हालत मे वे और भी कविता लिखते और उन्हे सुनाना चाहते । तब लोग उनसे और भी घबराते । इस तरह फिर वही चकार चलने एगता। इसी बीच विद्यालय निरीक्षक के तो आदेश आए । एक तो यह वि दसादीन शर्मा ट्रेनिंग पाम करें नही तो हैडमास्टर न रह सकेंगे और दूसरा यह कि कॉलेज की नाजायज कक्षाए तोल दी जाए । ५० दसादीन ने इसका भी हल टूढ निकाला । उहाने पर व जी से कहा दि यिद्यालय निरीक्षक कविता प्रेमी हैं। आगे की बात सुनकर पल्लव ती पल्लवित हुए। नोटिसें छप गई कि स्कूल का सालाना जलसा होगा जिसो अलगत खेल-कूद दगल अत्याक्षरी, एकात्री नाटक और अखिल भारतवर्षीय कवि सम्मेलन होगा जिसका सभापतित्व सुप्रसिद्ध विद्वान मा एम० ए० पास श्री गजादनदास विद्यालय निरीक्षा करेंगे। सालाना जलसा मब तरह से कामयाब रहा । मास्टरो और लडको पी रस्सा नी से लेकर प्रिंसिपल के भाषण तक और जोरदार दगल से पर बल्लमटेर महगा के हाथों पुरस्कार वितरण तक आनदपूवर्ष मेरी श्रेष्ठ व्यग्य रचनायें निबट गया। गडबडी सिर्फ पिछली रात के नाटक में हुई। एक टिकट कलेक्टर का अभिनय करते हुए एक बुद्धिमान् विद्यार्थी अभिनेता ने इतनी मजेदार बातें कही कि दशकगण हसते-हसते दुहरे हो गए और फिर वही लोट गए । बार-बार टिकट बाबू के लिए शोर मचने लगा। पर नाटक के बाद ५० दसादीन शर्मा ने टिकट बाबू को बुलाकर अश्लीलता के भारोप पर चार बेंत लगाए । जो भी हो, नाटक बडा कामयाब रहा और लोग यही कहते हुए वापस गए कि टिकट बाबू ने कमाल कर दिया और ऐसा खेल कही नहीं देखा। अब अतिम समारोह रह गया, "अखिल भारतवर्षीय कवि- सम्मेलन ।" पल्लवजी को इस सम्मेलन के बहाने कविता सुनने और सुनाने का अपूर्व अवसर मिल रहा था। इसलिए उन्होंने अच्छे से अच्छे कवि इकटठा करने में कोई कसर नही छोडी। उन्होंने स्कूलो लडको को दूर दूर के कई स्थानो पर भेजा, कई जगह जान-पहचान के सुराग लगाए, कई दूसरे कवियो से अपने साथी कवियो को चिट्ठिया लिखाई, पिछडे इलाके मे साहित्य के प्रसार का लालच दिखाया, अत मे हिंदी- हिंदू हिंदुस्तान का नारा लगाकर त्याग की भीख मागी और इस प्रकार हिंदी के कई अच्छे-अच्छे कविया के आने का आश्वासन पा लिया। कविया के रहने से इतजाम का जिम्मा बल्लमटेर महराज के छोटे भाई रामअजार ने लिया । कठपुतली का नाच और नौटकी से लेकर रामलीला तक के इतजाम का बोझा हर साल भाई रामअजोर ही समाला करते थे । कधे पर लाल मगोछा डाले, कान पर चूने की गोली रखे, गमछा और बनियाइन पहने, गले मे सोने की ताबीज लटकाए, भाग खाए, नीचे के मोठ और दातो के बीच तवाकू भरे हुए और हपेली पर भी तबाकू मलते हुए भाई रामअजोर को देखत ही सारी शकाए मिट जाती यो । यकीन हो जाता था कि ये कोई भी इतजाम सभाल सकते हैं । इसलिए जब उन्होंने तम्बाकू की पीय पल्लवजी के पर के पास यूपर बडी लापरवाही के साथ कहा, "सब हो जाएगा पल्लो जी, आप क्यो लिबिर लिविर परत हैं।" तो पल्लवजी को यकीन धुसरो का कवि-सम्मेलन- PM । हा गया कि लिदिर लिविर करना बिल्कुल बेकार है। हलवाहो को खेत से युटावर माई राममजोर ने कमियो के रहने का इतजाम शुरू करा दिया। छप्पर स छाई हुई एक पगलानुमा मरिया थी जिसमे उनकी गाय मसे वधा परती थी। उहे हाकरर सामने बरगद के पेड़ के नीचे बधवा दिया गया। सरिया के बाहर मट पट करते हुए घोर्ड और बछेटो को भी दूर बधवा दिया गया । उनके खूटे उखाह दिए गए । सरिया के भीतर जानवरो के पेशाब और गोबर को साफ करके उस पर पहले राख डाली गई फिर उसे भी बुहारकर पत्तिया बिछा दी गई। उसके ऊपर ढेर सा पुवाल फैलाकर स्कूल की टाट पट्टिया विछा दी गइ। सरिया के किनारे किनारे तीन तरफ जानवरों व पारे की नादें एक-दो हाथ की ऊचाई स गही हुई थी। मूसे, दाने, पली नमक आदि को कई दिन पुरानी मिलावट से गधाता हुआ पानी उलीचरर दूसरी ओर बाहर पिकवा दिया गया । नादो को धुलवापर पुछवाया गया, फिर उनमे सूखा भूसा भर दिया गया। एक कोने में दो नयी ना लगाई गई थी, जिनका अभी तक इस्तेमाल नहीं हुआ था। भाई रामअजोर न एक मे मिट्टी के कुल्हड और पत्तलें रखवा दी और दूसरी में पीने का पानी भरा दिया ताकि इन चीजो के लिए दूर न जाना पड़े । इतना कर लेने पर उन्होने पूरी स्थिति पर एक तजुर्बेकार सुपरवाइजर की निगाह डाली और गमछा सभालत हुए तेजी से छप्पर के एक कोने के पास जा पहुचे । हुमक्कर उन्होंने उसे कुछ ऊपर उठा दिया। बडी ताक्त लग रही है यह दिखाने के लिए दात भीच लिए, फिर वे बडे ताकतवर हैं यह दिखाने के लिए सीना उभारकर आगे फेंक दिया और छप्पर को कुछ ऊचाई पर दो बासो के सहारे खडा कर गिया । फिर एक फूक मे सास छोडकर बोले बुला लाओ पल्लो जी को, वे भी देख लें कि कैसा चमन बना दिया ।" दोपहर के बाद से ही पडोस के गाव के रहनेवाले उजागर शर्मा उस सरिया मे, जिस अब चौपाल कहा जाएगा आकर बठ गए | वे राधेश्याम क्यावाचक की क्या हारमोनियम पर गाते थे। पोडी ही दर बाद घुटनो तक धोती चढाए देह पर मिजई पहले, सिर पर सापा मेरी श्रेष्ठ व्यग्य रचनायें ।

के . गलमुच्छ रखाए, कोदईराम ब्रह्मभट्ट भी वहां आ गए। उन्हें देष उजागर शर्मा हसे । बोले, "पल्लो जी ने मानद कर दिया।" उतर से कोदई राम ने एक बात कही, 'कुछ कहिए नही, बुडा तिकडमी है।" शाम होते-होते दा बैलगाडियों में भरे हुए शहर के कई कविगण धुडसरी आ पहुचे । गाव के मजदीक आते-आते बलों ने कडबड कडबड दौड़ना शुरू किया। उनके गले मे पडी पटियो की तानी निझनाहट गाडीवालो की 'बा दा, का को और पहियो को गडगडाहट से लोगो को पहले ही मालम हो गया कि कवि लोग मा गए । हाई लड़कों ने अपना स्कूली बड बजाना शुरू कर दिया । प्राइमरी स्कूल के लहके लाइन में खड़े होकर अन झना अन लेजिम भाजने लगे। बछडे महक-मटककर खूटे सुहाने लगे। घोडा हिनहिनाने लगा, उसका बछेडा दुम उठाकर गांव के बाहर बगटुट भागा। दो एक हलवाहे चौपाल की मोर दोह पडे । बरगद को जड पर बैठे हुए भाई रामअजोर ने खडे हो पर फेफहातोड आवाज मे पुकारा, "अरे पल्लो जी, मेहमान आ गए।" कवि लोगो के चेहरे धूल से ढक गए थे। उतरते ही वे अपी कपडे शाने सगे। होल्हॉल, अटचिया, कम्बल, झोले बैलगाडियो से उतारे जाने लगे। एक हलवाहे ने यह सब सामान चौपाल मे ज्वार के गट्ठरा की तरह डालना शुरू किया । इसे देखने के लिए गांव के बेकार के लोगों की भीर इकट्ठा हो गई । धना चबाते हुए, ईख चूसत हुए और आपस मे चपतवाजो का खेल खेलते हुए लडको ने चौपाल का दरवाजा घेर लिया। पर लौटते हुए घरवाह ठिठक्कर लाठी के सहारे खडे हो गए। कई वाली काली औरतें, माली-काली धोतिया पहने, रंडी के तेल, संदूर और काजल की इफरात में अपने आप को हुवाए यही मार मठ गह और विचकित करने लगी। भाई रामअजोर ने एक्सपर्ट की निगाह से चारो ओर देखा, फिर पटककर मोड लगाने वालो स बोले, पला भागो, नही तो एक-एक थी टागे धीरकर रख दूगा।" और कवियों को उनकी ओर मुखातिब होना पहा । म पल्लवजी ने भाई राममोर का उनसे परिचय करापा। गमछे को अच्छी तरह कमर पर समेटकर दे पहलवानी पार से पविया तक भाए और दोनो हार्यो पुश्मरी का कवि-सम्मेलन से उनसे हाथ मिलाने लगे। ईस का रस छानकर उसे गरम किया गया | उसमे दूध मिलाया गया और मटर की धुपनी के साथ रवियो के सामने जलपान में दिया गया। उसके बाद गाय के दो नाइया का बुए ये कार लोदे लेकर वठाल दिया गया और हिदायत दी गई कि कवि लोगो ये हाप मुह घुलाने या इतजाम दिया जाए। खाने ये वन चौपाल म नादम उठा उठाकर पत्तल बार दिए गए और दूसरी नाद से भर भरकर कुल्हडो मे पानी रच दिया गया । अचानक रसोईघर की तरफ कुहराम मचा और पता लग गया कि खाना आ रहा है। रामअौर के साथ काई मा आठ पुस्तडे जवान घुटनी तक धोती चढाए चुटिया हिलात नगे बदन पर जनेऊ फटकारत खाना लेकर इधर स उधर दौडने लगे। एक ने कहा, 'भात' तो चौपाल से लेकर रसोईघर तक 'भान, भात का नारा लग गया। फिर दूसरे ने महा, 'दही चल जाए' तो 'दही, दही की गरज से घुडसरी के आसपास तक सत्तर कोस का इलाका गूज उठा। उगलियो म लपेट लपेटकर दिया गया दो दा चुल्लू दही और दाल और हाथ स गोला जैसा बना-बनाकर परोसा हुआ भात सामी देखकर कवि लोग पहले तो एक दूमर के मूह की ओर देखने लगे फिर एक कवि ने भाई रामअजोर से कहा, जरा क्या नाम है उनका, पल्लवजी को बुलाइए। भूस से भरी नाद वे सहारे अपनी कमर को टिकाकर भाई राम अजोर तिरछे खड़े हुए पाने का इतनाम देख रह थे। उन्होंने पल्लवजी के लिए एक दूमरी फेफडातोड आवाज लगाई और उस कवि के पास आकर पजो के बल बैठते हुए मसलहत के साथ बोले, ' क्या हुआ . 7 बात क्या है? कवि ने कुछ दूर वठी हुई कवियत्री से अंग्रेजी में कुछ बात की फिर रामअजोर से कहा मैं और शीलाजी ऐसा खाना नही खाएग। इस पर भाई रामअजोर ठठाकर हसे । बाले, 'चलिए, अभी धरतो पर आवार विचार घरम-वरम वुछ बचा तो है । काई बात नही, तुम मेरी श्रेष्ठ व्याय रचनायें कच्चा खाना न पाओगे तो पक्षी रसोई का इतजाम कराता है।" इसके बाद उन्होंने एक मुस्तहे नौजवान से कहा, "ऐ, जल्दी से पूड़ी बनवायो। घुइया बनवा लो। घट-पट इतजाम परो।" फिर कडक. पर बोले, "बिल्ली की चाल जाओ और कुत्ते की चाल याओ।" कवि लोग भाई रामअजोर का मुह देखते रह गए । फिर उस कवि से पल्लवजी के आने पर उनसे अग्रेजी मे कुछ कडी-कटी बातें की। उपर से कवियती जी ने कुछ और कोटा। फिर एक कवि ने पानी से भरी नांद की ओर इशारा किया। घौथे कवि ने बाद में नीचे से एक गोबर का टकडा उठाकर पल्लवजी पर फेवा। पाचवें कवि विसी खास मजमून पर न आकर उह सिफ हारते रहे । यह हालत देख कथावारकजी ने फोदईराम से चिल्लाकर कोई मात कही, जिस पर कोदईराम ने गुलमुच्छो पर ताव देकर और गला फाडकर 'हाडकरि चवचच्चट्टरी चही ।' से शुरू होने वाला एक एप्पय पढना शुरू कर दिया। तब भाई रामअजोर नै रुआंसे हो आए पल्लवजी को ललकार कर कहा, "क्या बात है, पल्लो जी घबराते क्यो है ?" इस पर चारों ओर से 'क्या बात है, क्या बात है' कहत हुए हे वही भाकर पिल पडे। इसके बाद कवियो मे एकदम से भाति छा गई और कुछ कवि या चुके और कुछ पूडियो का इतजार पहले किसी न भाई रामअजोर से कहा उन्होंने पल्लवजी गे, पल्लवजा ने कवियो से और फिर चारो तरफ शोर मच गया कि "बल्लभ जी आ गए, बल्लभ जी आ गए।" और सचमुच ही दूसरे क्षण बन्लभ जी नाम के रवि चौपाल में दाखिल हुए। एक कवि ने उहें भद्दी-मो गाली देकर अपने पडोसी से कहा, "पार साल इसे अपने सम्मे- न म बुलाया था तो सैक्डा रुपये माग रहा था। आज यहा पार स्पल्लो के पीछे आठ कोस माइकिल चलावर आया है।" एक दूसरे वि ने बल्लभ जी को प्रम से अपने पास बैठाररा और कहा, 'ऐसे घर और सर्दी में यहा तक साइक्लिपर माना, भापकर ही बूता या।" बलम जी फश पर पप् से बट गए। धीरे से बोले, 'मैं क्या घुड़सरी बा कवि-सम्मेलन ? जानता था कि यह जगह यहा पर है ? महेश जी की चिट्ठी मिली, चला आया। महेश जी की मुरब्बत ने मार डाला।" कवि राग आपस मे सम्मेलन की बदइतजामी की निंदा कर रहे थे। सयोजक को कोस रह थे। साइकिल स धुसरी पहुचकर बल्लभ जी न महेश जी का जिक्र क्या किया, जैस कविया को कोई भूला हुआ फारमूला याद करा दिया। एक कवि ने अपने पडोसी से कहा, 'मैं यहा हरगिज नहीं आता । पर महेश जी की चिटठी मरे पास भी आई थी। उन्ही के प्रम मे चला आया।' इस पर पडोसी ने कहा, "मैं ही क्यो आता। पर महश जी के पत्र ने मजबूर कर दिया।" फिर तो, कहीं एक अवि पूछता, 'आप दिल्ली जाने वाले थे?" जवाब मिलता, "पर कहा जपाया यहा के लिए महेश जी को चिट्ठी आ गई ।' दूसरा कवि पूछता आपका दफ्तर से छुट्टी कसे मिल गई?" उधर से कोई कहता 'छुट्टी कहा मिली? पर महेश जी की बात टालना काई धोरे स सवाल करता, "आपका कितना किराया त हुमा है तो दूसरा जोर से जवाब देता, किराए का क्या सवाल ? महेश जी के प्रेम मे चला आया। जो भी दे दें। अब बहुत से कवि जो पुडसरी पहुंचने के कारण एक-दूसरे के आगे झेंप रहे थे, महेश जी के नाम पर शहीद होकर हसने बोलने लगे । पल्लवजी ठुड्डी को उगलियो की चुटकी से दवाए हुए सोचते रहे नि य महेश जी कौन हैं? लमभग दस बजे रात से कवि-सम्मेलन शुरू हुआ। स्टेज पर जहा कल नाटक हुआ था और टिक्ट वावू का बोलवाला था, वहा आज कवियों के बठने या मच बन गया था। पीछे घोडे पर चढे शिवाजी को तस्वीर वाला पदा पा जिसकी सासा मे सालाब मे नहाती हुई परियो की तस्वीरें थी। सभापति और कवि लोग इसी मच पर बछ। सामने एक शामियाना था जिसके नीचे तीन चार सौ आदमी बंठ गए पे। पर उगवे आगे पारों ओर लगभग चार पाच हजार आदमियों का पौर मोम में बठी हुई थी। कुछ दूर पर फाटक के पास पेडरे नी तीन-चार पोशीदार अलाव ताप रहे थे। कुछ मिपाही पारपाइयो पर पर पीरी पी रहे थे। एप हया नोटकी मुना रहा पा। मानपान मेरी पेष्ठ म्यम्य रचना धएदार द्विवरियों की रोशनी में खोचेवाले मूगफली, रामदाने के लड्डू, लया कडाकेदार आदि का नारा बुलद कर रहे थे। सभापति जनादन- दाम ने इस सबको देखा और क्यूतर की तरह गर्दन फुलावर पल्लवजी से कहा, 'यह शोर बद कराइए । सम्मेलन शुरू किया जाए।" पल्लवजी ने यह बात भाई रामबजोर से कही, भाई राममजोर अपने वजनी पापो से यम थम करते हुए मच से नीचे उतरे और कांस्टेबलो के पास जाकर कहने लगे "दीवान जी, काम शुरू होने वाला है। नौटकी बद कराइए।" फिर खोचेवालों से धीखकर बोले, "चुपचाप बैठे रहो सालो, नही तो एक एक वी टाग चीरकर फेंक दूगा!" इसके बाद सन्नाटा छा गया। पहले ५० दसादीन शर्मा का भाषण यह बताने के लिए हुआ कि आजकल हिंदी म किसी को भी कविता लिखना नहीं पाता । फिर पल्लवजी ने अपने भाषण मे यह सूचना दी कि हिंदी में कुछ कवियो को वपिता रिपना थाना है और वे सब आज घुटमरी मे उपस्थित हैं। पिर कविता पाठ शुरू हुआ। पहले उजागर शर्मा ने राधश्याम कथावाचर का एक वदना वाला चौबोला सुनाया। फिर बाहर से आई हुई पवियत्री ने अपना एक प्रेम- गीत सुनाया । गीत गाते गाते वे भीड देखकर घबरा गइ । आसमान को छून थाली लबी-लबी लाठिया लिए हुए लगभग चार हजार आदमी मोम मे बचने के लिए सिर पर अगोछा बाधे बैठे हुए थे। सभी बीडी पी रहे थे या चिलम कर रहे थे । लगभग सभी चुप थे और इतना चुप थलि कवियत्री को नदियो के वीरान पछार, सुल्ताना डाकू मानसिंह और मशीनगनो की याद आने लगी। वे इतना हर गइ हि जब परियो ने उन गोत की एक लाइन पर आदत के मुताविक वाह वाह' की ना वा पडी। एक्दम से उहोने अपना गीत समाप्त कर दिया कविया ने तारिया बजाइ । जाता चुपचाप सुनती रही। इसके बाद वविताओं का समा वध गया। रस से सममान हुए प्रम गातो ने हवा बाध दो। दुछ देर बाद एवं कवि ने अपनी गचंयो पविता सुनाई | A1 ने यर सब कुछ चुपचाप सुन लिया। फिर दूसर घृहसरी का पवि सम्मेलन 1 पवि ने यह अनुभव किया कि जनता कुछ ज्यादा बामोश है। उन्होंने उसरा ध्यान शिवाजी की तस्वीर की ओर धींचा। लोगों की निगाहें पद पर शिवानी के पोडे और नहाती हुई सुदरियों पर अटकी रही। तब तक उस पवि ने शिवाजी की लहाइयों पर एक वीर रस की कविता सुनाई, गुरु गोबिंदसिंह के सडकों के बलिदान का वणन किया, मरे शब्दो का अय भी समझाया और बार-बार कवियों की वाहवाही बीची। सभापति ने इस कवि को एक मेडल देने का वादा किया । कवियो ने तालिया बजाई। शामियाने के नीचे से दो चार लोगो ने इन तालियो की नकल की। पर तालियां वहीं पिट-पिटाकर रह गई। जनता कुछ नहीं बोली। इस पर खीझकर एक कवि ने अभिनयपूर्वक वहां की स्थानीय देहाती चोली में एक मजेदार कविता सुनाई। दूसरे कपि इसे सुनकर हसने लगे। जनता ने भी कुछ दिलचस्पी दिखाई। मानी कुछ ने अपनी लाठियो को लबा-लबा करके जमीन पर लिटा दिया और कई ने वीडियो सुलगाई। फिर जो देहाती मे कविताए नहीं लिखते थे उहोंने भी देहाती की कविताए सुनाई। पर तबतक यह ठरकीय भी पुरानी हो गई । शामियाने के नीचे बैठे लोगों तक ने हसना बद कर दिया। इस खामोशी के सामने कवि लोग एक अजब-सी खीझ से भर गए। उह वे सम्मेलन तक प्रेम के साथ याद आने लगे जहां कवियों को किया जाता है और सभापति के लेक्चर पर आवाजें फसी जाती हैं। अत मे पल्लवजी ने अपने गीत सुनाए जिस पर भाई राममजोर धमधमात हुए सिपाहियो के पास जाकर बोले 'हमारे स्कूल मे पढाता है। अच्छा काम दिखाता है । पट्ठा है होशियार ।' जनता ने चुपचाप इन गीतो को भी निगल लिया। अपने भापण के पहले कवियो के आग्रह पर सभापति जनादनदास ने रन्तिदेव की कथा नामक अपनी एक पाठय-पुस्तकी कविता सुनाई। फिर भापण मे उसने सम्मेलन की भारी सफलता पर भारी हर प्रक्ट किया और घुडसरी जसी जगह पर इतना भारी आयोजन करने वाले दसादीन शर्मा और पल्लवजी को बधाई दी। पलवजी ने कवियो से क्ट के लिए क्षमा मागी, जनता ५२ मेरी घेष्ठ व्यग्य रचनायें को धन्यवाद दिया और एक बजे रात तक सम्मेलन खत्म हो गया। सब लोर मच से नीचे उतर आए। पर्दे के ऊपर शिवाजी की तस्वीर, तालाब मे नहाती सुदरिया, गैस के हहे चमकते रहे। पर ओस मे बैठे हुए लोग अब भी रजाई में दुबके बैठे रहे । कुछ ने चिलमे सुलगानी शुरू कर दी, कुछ ने पैर फैला दिए। पेड की ओर बैठा हुआ सिपाही क्सिी खोचे वाले को गालिया देने लगा। कुछ दूरी पर माई राममजोर गमछा सभालते और चिल्लाते हुए दीख पहे, "चाह पराली चाह ।" दो छोकरो ने हामिद डाकू की नौटको से गजल का एक मशहूर कोरस छेड दिया । तब लोग इतमीनान से हस-हसकर बात करने लगे, एक कोने से दूसरे कोने वालो को पुकारन लगे और कुछ घरेलू मजाक उछालने लगे। कुछ समझकर १० दसादीन शर्मा मच पर आकर खड़े हो गए और बोले, "सम्मेलन खत्म हो चुका है। अब आप लाग जा सकते हैं।" यह सुनते ही लोगों में कुहराम मच गया। जमीन पर पड़ी हुई लाठिया सीधी हा गई। रजाई और चादरो के पल्ले कधो पर फेंक- फेंकर लोग अपनी जगह खड़े हो गए । कुछ देर तक सब एक दूसरे से चौस चौखकर बातें करते रहे। फिर उसके बाद कुछ देर तक लोग उसी तरह चीख चीखकर एक दूसरे को चुप करते रहे । बलवा-मा होने लगा । १० दसादीन शर्मा जहा थे, वहीं चुपचाप सहमे हुए पड़े रह गए। काफी देर बाद लोग चिल्लाना छोडकर फिर से जमीन पर बैठो लग। उसके बाद दो-चार नौजवान लाठिया लिए गोल बाधकर १० दसादीन शर्मा के पास आए और उहें चारो ओर से घेरकर बडे हो गए । शर्मा जी ने घबराहट के मारे हालाते हुए पूछा, "क्या बात है? आप लोग क्या चाहते हैं।" उनके सामने एक तगहा आदमी सीना ताने खडा था। वह कुछ योलने के लिए आगे बढ़ा। उसका निहायत काला-कलूटा रग, चेचक- पार पहरा, विच्छू के हक-सी उठी हुई मूछे, गिरगिट-सी हिलती हुई गरदन- इसे देखते ही शर्मा जी पौक पहे। तेल मे सोची हुई वान- दार लाठी को ठनाके के साथ उसने उनके सामने जमीन पर पटका । घुडसरी का कवि-सम्मेलन शर्मा जी की आखें फैल गई। ये गला फार मदद के लिए चिल्लाने ही वाले ये पि उस आदमी ने बाए हाथ को मरपे तक ले जाकर उन्हें सलाम विमा, फिर वही भलमनसाहत के साथ पूण, "यह तो जो कुछ हुआ, ठीक ही हुआ, पर यह पताइए पडित जी, कि कल वाला असली खेल कब शुरू होगा ? टिकट बाबू कब आएगे?' ५४ मेरी श्रेष्ठ व्यग्य रचनायें अगदका पाव . वसे तो मुझे स्टेशन जाकर लोगो को विदा देने का चलन नापसद है, पर इस बार मुझे स्टेशन जाना पड़ा और मित्र को विदा देनी पड़ी। इसके कारण थे। पहला तो यही कि वे मित्र पे और मित्रों के सामने सिद्धांत का प्रश्न उठाना बेकार होता है। दूसरे, वे आज निश्चय ही पहले दर्जे में सफर करनेवाले थे जिसके सामने खड़े होकर हमाल हिलाना मुझे एक निहायत दिलचस्प हरकत जान पड़ती है। इसलिए मैं स्टेशन पहुंचा। मित्र के और भी बहुत से मिन स्टेशन पर पहने हुए थे। उनके विभाग के सब कमचारी भी वही मौजूद थे। प्लेटफाम पर अच्छी खासी रौनक थी । चारों ओर उत्साह फूटा-सा पर रहा पा । अपने दफ्तर में मिल जैसे ठीक समय से पहुंचते थे, वैसे ही मागे ठीक समय पर आ गई। अब उहोंने स्वामिभक्त मातहतो के हायों गले में माराए पहनी, सबसे हाथ मिलापा, सबसे दा चार रस्मो बातें कहीं और फस्ट क्लास के हिन्ले के इतने नजदीक खडे हो गए कि गाडी छूटने का खतरा न रहे । गाडी छूटने वाली थी। लोगो ने सिगनल की ओर देखा । वह गिर चुका था। बर चूकि कुछ और करना बाकी न था इसलिए उन्होंने उन लोगो मे से एक आदमी से बात करनी शुरू यो जो उपरो मन से हर काम के आदमी को दावत के लिए बुलात हैं और जिनकी दावता को हर आदमी ऊपरी मन स हसकर टाल दिया करता है । हमारे मित्र भी उनकी दावत टाल चुके थे। इसलिए वे पहले रगे, "इस बार माऊगा तो आपरे ही यहा रुकूमा। व हमने लगे। यहन लगे, "आप ही का घर है । आने की सूचना मेन दीजिागा । मोटर लेकर स्टेशन आ जाएगे। तव मित्र ने कहा वि मोटर की क्या जरूरत है । तब व बोरे विवाह साहब, मोटर आप ही सी है इसमें तकल्लुफ की क्या जरूरत है। तब मित्र बोले कि तकल्लुफ घर वालो से तो विया नही जाता। तब वे बारे जाइए साहब एसा ही घर वाला मानत ता आप बिना एक शाम हमारे गरीव खाने पर खा सूखा खाए यो हो न निकल जाते । तब मिन्न ने कहा कि ऐसी क्या बात है आप ही का खाता हू । तब वे हे हैं करन लगे। तभी गाडी ने सीरी दे दी और लोग आशापूवक सिगनल की ओर झाकने लगे। मैंने इस बातचीत में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई क्याकि मिन को हमेशा मेर हो यहा आकर रुकना था और हम दानो इस बात को जानत थे। ठीक वसे ही जम मिन दफ्तर मे आते तो समय से थे पर जाने मे हमेशा कुछ देर कर देते थे, समय हो जानेपर भी गाडी ने सीटी तो दे दी पर चली नही । इमलिए फिर रुक रुककर इन विषयों पर बातें होन स्गी कि मित्र को पहुंचत ही सबको चिठठी रिखनी चाहिए और उस शहर मे अमरूद अच्छे मिलते है और साहब आइएगा तो अमरूद जरूर राइएगा । तब पुराने नौकर ने बताया कि नाश्तेदान को बिस्तर के पीछे रख दिया है । तभी पुराने हेड क्लक बोले कि बिस्तर सीट पर बिछा दिया गया है । तब एकाउटेंट ने कहा कि विस्तर का सिरहाना उधर के बजाय इधर होता तो अच्छा होता क्योंकि उधर कोयला उडकर आएगा । तब हेड क्लक बोले कि नही कोयला उधर नहीं आएगा बल्कि उधर स सीनरी अच्छी दिखेगी। तभी फशियर बाबू आ मेरी श्रेष्ठ व्यग्य रचनायें गए। उहोंने मिन को दस रुपये की रेजगारी दे दी। तब मित्र ने खुले- माम उनके गधे को यपथपाया और खुले गले स उहें धन्यवाद दिया। पर इस सबसे न तो कुछ होना था, न हुआ। लोग महीना भर से जानते थे कि मिन को जाना है। इसलिए मतलब की सभी बातें पहछे ही अकेले मे खत्म हो चुकी थी और सबके सामने वे सभी बातें की जा चुकी थीं जो सबके सामने यही जाती हैं। सामान रखा ही जा चुका था, टिकट खरीदा ही जा चुका था। मालाए डाली ही जा चुकी थीं। हाथ या गले या दोनो मिल हो चुके थे और गाडी चलने का नाम तक न लेती थी। पिएटर मे जब हीरो पर वार करने के लिए विलेन खजर । तानवर तिरछा खडा हो जाता है, उस वक्त परदे की डोरी अटक जाए तो सोचिए क्या होगा? कुछ वैसी ही हालत थी। परदा नहीं गिर रहा था। चूकि मेरे पास करने को कोई बात नहीं रह गई थी इसलिए मैं मित्र से कुछ दूर जाकर खड़ा हो गया और किसी ऐसे आदमी की तलाश करने लगा जो बराबर बात कर सकता हो । जो ऐसा आदमी नजर मे थापा उसे मित्र की ओर ठेल भी दिया। उसने अपनी हमेशा वाली मुसकान दिखाते हुए कहा, 'आपके जाने से यहा का क्लव सूना हो जाएगा।" मित्र ने हसकर इस तारीफ से इनकार किया। उसने फिर कहा, "पहले ब्राउन साहब के जमाने में टेनिस इसी तरह चली थी पर बीच मे दब गई थी। आपके जमाने मे फिर जोर पडने लगी पो पर अब देखिए क्या होता है।" मित्र बोले, 'होना क्या है ? आप चलाइए।" तभी वे एकदम नाराज हो गए । तुनक कर बोले, "मैं क्या चला सकता हू जनाब, मुझे तो ये लडके क्लब का सेक्रेटरी ही नहीं होने देना चाहते । अब कोई टिकियाचार सेक्रेटरी हो तभी टेनिस चलेगी । मुझे तो ये निकालने पर आमादा है।" बोलते-बोलते के अकडकर खड़े हो गए। मिन्न ने हसकर इस विषय को टाला । उसके बाद इनकी बातो का भी दिवाला पिट गया। और बात आई-गई हो गई। पर गाड़ी नहीं चली। - . अगद का पाव मिव मुछ देर तक वैनी से सिगनल की ओर देखते रहे। कुछ लोग प्लेटफाम पर इधर उधर टहलकर पान सिगरेट के इतजाम में लग गए। कुछ को अतर्राष्ट्रीय समस्याओं ने इस कदर बेजार किया कि वे पास के युपस्टाल पर यषवार उलटने एगे। कुछ के मन मे क्ला-कौशल और ग्रामोद्योगो के प्रति एक्दम से प्रेम उत्पन हो गया। वे पास की एक दूकान पर जाकर हैहियफ्ट के नमूने देखने एगे। तब तक एक पुराना स्थानीय नोकर मित्र के हाथ लग गया। उसे देखते अचानक मित्र के मन में समाज की समाजवादी व्यवस्था प्रति विश्वास पैदा हो गया । वे हसकर उसकी प्रशसा करने लगे। तब वह रोकर अपनी पारिवारिक विपत्तिया सुनाने लगा। अब मिन वढे करुणाजनक भाव से उसकी बात सुनने एगे । तब कुछ टिक्ट-चेवर तेजी से आए और मगमने स निकले । मित्र ने उनकी ओर देखा पर जब तक ये कुछ बात करने की बात ते कर वे आगे निकल गए। तब तक एक लबा-सा गाड सीटी बजाता हुआ निकला। हेड क्लक ने कहा, "सुनिए साहव', पर यह उसने अनसुना कर दिया और सीटी बजाता हुआ आगे बढ गया। गाडी फिर भी नहीं चली। कुछ को परिस्थिति पर दया आई और वे फिर मित्र के पास सिमट आए । पर घूम फिरकर कई लोगो ने कई छोटे छोटे गुट बना लिए और कला के लिए जैसे क्ला-वंसे बात के लिए बातें चल निकली। एक साहब की निगाह मित्र की फूल-मालाओं पर गई। उनको उसी से प्रेरणा मिली। बोले गेंदे के फूल भी क्या कमाल पैदा करते हैं। असली फूल मालाए तो गेंदे के फूलो को ही बनती हैं।' बातचीत की सडियल मोटर एक बार जब धक्का खाकर स्टार्ट हो गई तो उसको फटफटाहट का फिर क्या पूछना । दूसरे महाशय ने कहा, "इडिया मे अभी तो जैसे हम बैलगाडी के लेवेल से ऊपर नहीं उठे वैसे ही फूलो के मामले में गेंदे से ऊपर नही उभर पाए । गाडियो में बलगाडी, मिठाइयो मे पेडा, फूलो मे गेंदा, लीजिए जनाब, यही है आपसी इडियन कल्चर ।" इसके जवाब मे एक दूसरे साहब ने भीर के दूसरे कोने से चीखकर मेरी श्रेष्ठ व्यग्य रचनायें बन्ट, 7 कहा, "अग्रेज चला गया पर अपनी बोलाद छोड गया।"। इधर से उहोंने कहा, "जी हा, आप जैसा हिंदुस्तानी रह गया पर दिमाग बह गया।" इतना कहकर, जवाब म आने वाली बात का वार बचाने के लिए, वे मित्र की ओर मुखातिब हुए और कहने लगे, बताइए साहब, गुलाब को वो-वो वैरायटी निकाली है कि तभी गाड ने फिर सीटी दी और वे चौंक कर इजिन की ओर देखने लगे । इजिन एक नये ढग से सी-सी करने लगा था। कुछ सेकड तक यह आवाज चलती रही पर उसके बाद फिर पहले वाली हालत पर आ गई, ठीक वैसे ही, जसे दफ्तर छोडने के पहले मित कभी-कभी कुर्सी से उठकर भी कोई नया कागज देखत ही फिर से बैठ जात थे। तब उस पुष्प प्रेमी ने अपना व्याख्यान फिर से शुरू किया, "हा साहब, तो अग्रेजो न गुलाब की वो वो वैरायटी निकाली हैं कि कमाल हासिल है । सन पिंक पल, लेडी हैलिंग्टन, ब्लंक प्रिंस । वाह, कमाल हासिल है। और अपने यहा यहा तो जनाब वही पुराना टुझ्या गुलाब लीजिए और खुशबू का नगाडा बजाइए।" वात यही पर थी कि इस बार गाड ने सीटी दी। वहस थम गई। पर कुछ देर गाडी म कोई हरकत नहीं हुई। इसलिए वे दूसरे महाशय भी भीट को फाडकर सामने आ गए । अकडकर बोले, "हो साहब, जग फिर से तो चालू कीजिए वही पहले का दिमाग वाला मजमून । मग तो भई, दिमाग हिंदुस्तानी ही है, पर आइए, आपके दिमाग को भी देख लें। तब मिन्न महादय बडे जोर से हसे और बोल, "हाशिम भाई और मरमना माहब म यह हमेशा ही चला करता है। याद रहेंगे, मग भी याद रहेगे।' इम तर यह बात भी खत्म हुई, मगडे को मजबूरन मदान धारना पडा । उघर सिग्नल गिरा हुआ था। इजिन फिर मे 'सी-सी' करन रगा या। पर गाड़ी अगदथे पाय-सी अपनी जगह टिकी पी। मार पिटर हिस्म म दशन शास्त्र के एक प्रोफेसर धीरे धीरे frमा मित्रा मममा हप, "जनाव, जिन्गी म तीन बटे चार वो साहब, ये अगद का पाव दवाव है, कोएर्शन का बोलबाला है, बाकी एक बटे चार अपनी तबीयत की जिंदगी है। देखिए न, मेरा काम तो एक तस्त से पल जाता है, फिर भी दूसरों के लिए डाइग रूम मे सोफे डालने पड़ते हैं। तन ढाक्ने को एक धोती बहुत काफी है, पर देखिए, बाहर जाने के लिए यह सूट पहनना पडता है। यही कोएशन है। यही जिदमी है। स्वाद खराब होने पर भी दूध छोडकर कॉफी पीता हूं, जासूसी उपन्यास पढ़ने का मन करता है पर काट और होगेल पढता है, और जनाब, गठिया का मरीज हू पर मित्रो के लिए स्टेशन आकर घटों खडा रहता है। थे और उनके थोता-दोनो रहस्यपूण ढग से हसने लगे और फिर मुझे अपने नजदीक खहा पाकर और जोर से खुलकर हसने लगे तापि मुझे उनकी निश्छलता पर सदेह न हो सके । गाडी फिर भी नहीं चली। अब भीड तितर बितर होने लगी थी और मिन के मुह पर एष ऐसी दयनीय मुसकान आ गई थी जो अपने लड़कों से झूठ बोलते समय, अपनी बीवी से चुराकर सिनेमा देखते समय या कोट मांगने मे भविष्य के वादे परते समय हमारे मुहों पर आ जाती होगी। लगता था कि ये मुसकराना तो चाहते हैं पर किसी से आख नही मिलाना चाहते। तभी अचानक गाड ने सीटी दी, शडी हिलाई । इजन का भोपू बजा और गाडी चलने को हुई। लोगो ने मिन स उत्साहपूर्वक हाप मिलाए । फिर मित्र ही डिब्बे में पहुवकर लोगो से हाथ मिलाने लगे। कुछ लोग रूमाल हिलाने लगे। मैं इसी दश्य के लिए वेचन हो रहा या। मैंने भी रूमाल निकालना चाहा पर रूमाल सदा की भाति घर पर ही छूट गया था। मैं हाथ हिलाने लगा। एक साहब वजन लेने वाली मशीन पर बडी देर से अपना वजन ले रहे थे और दूसरों का वजन लेना देख रहे थे। गाड की सीटी सुनते ही वे दौडकर आए और भीड को धीरते हुए मिन्न तक पहुंचे। गाडी के पलते-चलते उहोंने उत्साह से हाथ मिलाया। फिर गाड़ी को निश्चित रूप से चलती हुई पाकर हसरत के साथ बोले, "काश, कि यह गाडी यही रह जाती। मेरी श्रेष्ठ व्यग्य रचनायें बया और बदर की कहानी एक रिसर्च स्कॉलर की जवानी एक जगल मे एक बया' रहता था। उसने एक बबूल की कटीली डाल पर अपना घोसला बना लिया था। इधर उधर से तिनके बटोरकर यह १ 'बया एक चिठिया का नाम है ।' देखिए 'यवर महस, लेधक पी. स्मिथ (१० १२३) वह जंगल में रहती है और बस्ती में भी।' (वही . १२४), 'चिहिया यह है जिसके पैर भी हों और पब भी।" (वही पु० १२) । 'मनुष्य के पैर ही होते है पक्ष नहीं ।' (वही पृ. १३)। चिहिया चिडिया है, आदमी आदमी । केवल उल्लू एक ऐसा है जो दोनों कोटियों में होता है।' (मही, पृ.१५) साप ही देखिए, श्री केशव वर्मा को 'एक ईसपनुमा कहानी। इस बात क्या में माख्येय बया के वन में निवास करने का एक रहस्य है । मानवीय जीवन से व्यतिरिक्त परिस्थितियों में बया को रखकर उसमे जिन गुणों का समावेश किया गया है उससे यही साध्य है कि मानव जाति में वे गुग क्षीण हो पुके हैं। यदि बयास निवासस्थान वन न होकर कोई वाटिका होती तो संभवत मानवीय क्ष में प्रचलित मूठ बेईमानी छल कपट प्रपच आदि स्वाभाविक मानव-ताल या में समाविष्ट हो पाते। (देखिए, पक्षी मनोविज्ञान' पृ.३)।

घोसला बनाया गया था। कटीली डाल पर अपने मांत और सुखी भोसले में बया अपनी पली के साथ सानद जीवनयापन करता था।' वया के कुछ अहे पञ्चे भी पे जा उसी घोंसले मे शांति के साथ पडे सोया करते थे। इस प्रकार रहते माघ का महीना आया। पाला गिरने लगा। पछुआ जोर मे बहने लगी। शीत और तुषार के मारे हाथ-पैर ठिठरने लगे । बबूल के पीले फूल घर गए। उसकी बीजदार फलिया कडी पर गई । उसकी शाखाए और भी बाली हो गई। तने मे चिपका हुआ गोद सूख गया। उसमे दातुन लायक कोमल लक्डी का मिलना कठिन हो गया। उसके काटे तक सड गए। परतु बया आनदपूवक सपत्नीक, मिला। १ इसी परिस्थिति को ध्यान में रखकर में. एम. एस.गप्त एम. पो. ने 'पंचवटी में लिखा है- जितने टकटकों में हैं जिनका जीवन सुमन चिला। गौरव मध रहें उतना ही यत्र-तत्र-सवव बया के इस प्रकार के जीवन से उत्तरकालीन छामावादी कविर्यों ने (अति सन् १९३७ ई. से सन १९४१ ई. के दोष काल में एक मयी साहि त्यिक परपरा कायम करने वालों) एक एसे जीवन-दशन को कवना की थी जिसमें एकात कानन त निशीथिनी निमत-नीर श्रम प्रेयसी आदि का समावेश हुआ था और जो जीवन को मानवीय सणामों से परे ने जाकर एक शीत मुस्थिर वातावरण में बिताने की राह दिखाता है । "यह बयामार्गी दशन फारस से चमा था। उमरखधाम को रामों के प्रष्ट अनुवाद के सहारे यह रोमाटिक रिवाइवस के कवियों की वाणी म पनपा। बाद में वह बगास के रास्ते हिंदी साहित्य में आया। बालोषक दर्शन हो भारतीय मानते हैं रितु यह ध्यान में रखने की बात है रिया पर भारतीय चिड़िया है और बयामर्गी इन भारतीय दशन है। यह बात भयक स्वय बह रहा है पर धूकि वह चाहता है कि इसका उपयोग विद्वानों द्वारा दशन शास्त्र के रिसी इतिहास में हो अत उमे उल्ट अघविरामों (स्वर्टर कामार) में बांध दिया गया है । मेरी श्रेष्ठ प्यग्य रचनायें सतान-सहित, अपने शातिमय घोसले मे जीवनयापन करता रहाची सहसा एक दिन बादल घिर आए। हवा और जोर बिजली चमकी और ओलो की एक भयेकर बौछार के बाद पानी वेग साप गिरने लगा। चारो ओर अधेरा सा छा गया। नक्ता बढ गई।' जब बिजली चमकी तो बया ने अपना सिर घोसले से बाहर निकाला। उसने देखा कि घोसले से कुछ ही दूर एक बदर बैठा हुआ जगले को 4 ने मा १ बामार्गी दशन में इस प्रकार के आचरण से बाह प्रकृति की हीनता सिडको गई है। बयामार्मी के लिए आवश्यक है कि वह अपने शांत निमत-नीर में सान- परा रहे उस नोट का आधार भले ही प्रतिकूल परिस्थितियों में विनाश की मोर पा रहा हो । बाह्य परिस्थितियों की विषमता पयामागीं को निव-नीर प्रियता को आपात नही पहुचा सकती। (देधिए, एस० सास का 'प्रकृति और पलायनवाद, पृ. ३०५) । २ देखिए, वर्षा वर्णन, पपावती का विरह (पावत एम० एम० बायसी द्वारा सिखित) । साथ ही देखिए वर्षा वणन (टी. दास द्वारा लिक्षित रामचरित मानस' के किष्किघा कार मे)। बयामार्गी दशन में वर्षा करकापात आदिको पाए परिस्थितियों की विषमता का घोतक माना गया है क्योकि वर्षा में क्या अपने निभूत-नीर के लिए तिनो पुनकर नहीं ला सकता। मानवीय जीवन में वर्षा का नया महत्व है इस विषय में मतभेद है। परतु यह सब मानते हैं कि वर्षा का महत्व साधारण नहीं है। (देखिए, प्रकृति और पलायनवाद, पृ०५१०, साप ही देखिए ए सर्वे बान दरियन एग्रीकल्चर, पृ० २०३)। ३ कमी कमी क्यामार्गी बाह्य परिस्थितियों का मानद लेने के लिए अपनी स्थितियों से ऊपर सिर उठाता है। पर यह अपनी स्थितियों में इतना अभिभूत होता है कि उसे अन्य परिस्थितियो हमला कोतुक-बना सथा विचित्र-सी जान पडती है। (दखिए वहा प्रकृति और पलायनवाद ५० ५५०)। बया के पोसले का दरवाजा नीचे से होता है। अत बया जव सिर बाहर करके कुछ देखना चाहेगा तो उसे सब-कुछ उल्टो दिखाई पडगा। (प्लटा लिखित 'पशु पक्षियों को विचित्र वा, प.२०३ छठा संस्करण ।) बया और बदर की कहानी है। बदर बिना किसी सहारे के पेड की डाल पर चुपचाप घुटनो में मुह छिपाए बैठा था। पानी की बूदें तज हवा के कारण तिरछी होकर उसके शरीर पर पड रही थी। वह सर्दी म काप रहा था। वया को उस पर दया आ गई। उसने वदर से कहा 'ऐ भाई, तुम क्यो इस पोर वर्ग म कष्ट उठा रहे हो ? तुमने शायद मेहनत करके अपना घर नही बनाया । इसी कारण तुमको इतना कष्ट हो रहा है । देखो, हमने कितना सुदर घोमला बना लिया है। इसी से हम इस बरसात और १ 'बदर दो स्थितियों का प्रतीक है एक तो मनध्य की आदिम सस्कृति का दूसरे प्रकृति मे जो कुछ भी क्षिप्र पवन और हानिकारक है उस सबस। (रिसर्चर इन ऐग्रापालजी एजूकेशन ब्यूरो मगजीन एनुअल नबर प० २०१)। बदर में मानवीय संस्कृति के तथा प्रकृतिजन्य मस्कारों के सभी तस्व एक साथ मिलते हैं। शायद इसीलिए उसका सामना बया से कराया गया है जो बयामार्गी दशन का प्रवतक है। २ 'बयामार्गी को अपने निभत-नीर से बठे-बठ बाह्य परिस्थितियों से माक्रांत जतु परप्राय दया आ जाती है। दया से उसके मन में सवेदना उत्पन होती है। सवेदना से समझ बाती है। समझ सेवा-निकलते हैं। बाद से विवाद निकलते हैं। विवाद से बयागार्मी के मन में निमत नीड के प्रति और भी भास्पा बढती बयामार्गी राजनीति में आरामकुर्सीवाली कला में पलायनवादी साहित्य में साधनावादी दान में मास्थावादी छाया में प्रकाशवादी और प्रकाश में छायावादी होता है।' (देखिए, मुभाषित सचय')। ३ इसी परपरा से फ्रांस की राज्य कौति में प्रातुख का सिद्धांत स्वीकार हमा जिसकी परम परिणति नेपोलियन के शासनकाल में हुई। पाइयो और बहनों प्यारे भाइयो की बसताऊ चौगो से मेकर 'वसुधव कुटुम्बकम की भावना पा उवा इसी संबोधन से निपसा है। ४ मामार्गी दूसरे के कार को अपन कष्ट की माप से नापता है । कि उसके पास एप निमत-नीर है मन वह दूपरे के कष्ट का बगर उसके बेपरवार होने में हो कर सकता। ५ दूमरों स संदेमा करने में यह माश्यक है कि समोसमवेश के स्तर पर माए । स्तुि यामागों अपने विस्व का का पीटकर दुमरे मरवी के प्रति सवेना प्रकट करता है। मेरी श्रेष्ठ म्यम्य रचनायें । जाहे में भी सुखी हैं। तुम भी अगर आलस त्यागकर अपना पर बना डालो तो तुम्हें इस भयकर ऋतु का कष्ट न झेलना पडे ।' ऐ भाई, साहस और पुरुषाय से काम लो।" बदर को जाने क्या मूझा कि वह दात निकालकर घोमले पर उसने क्या वे अडे तोड हाले। उसका घोसला उजाड दिया। बया घबराहट म कुछ और न रखे चीखने लगा। उसका पोसला उजह गया और वह अपनी पत्नी के साथ दुखी होकर उजडे हुए घोसले पर शोक प्रकट करता रहा। सच है, नीच को कभी अच्छी सलाह न देनी चाहिए।' सपटा ४ १ दूसरे को उपदेश देना अपामार्गी का समगत अधिकार है। वह स्वयं पोसले मे रहते रहते दूमरों को धोंसलावादी बनाना ही अपना परम पत्तम्य मानता है। २ बयामार्गी साहस और पुरुषाथ में इसीलिए इतनी आस्था रखता है कि उसे माहम और पुरुषाय दिखाने का अवसर कभी नहीं मिलता । स्वभावजय सघय मति की हा वह पुरुषाय मानता है। ३ यह अनावश्यक और मौखिक सहानुभूति के मुकाबले कष्ट में पड़े हुए दुखी और विकृत मन का पुरुपाय मात्र है। जब दुखी मन और कुछ नही कर पाता हो उसे असहायता की स्थिति से उमा उत्पन्न होता है । उ माद में कुछ भी प्रोत्साहन मिलने पर यह अप्रिय वस्तुओ का विनाश आरम कर देता है ।' (देखिए सुभाषित संचय ) वदर जसा कहा गया है बाह्य परिस्थितियों का प्रतीक है । उसके द्वारा अपने निमत-नीड के नष्ट होन पर बयामागों शोक प्रकट करता है। उर्दू में इस शोक प्रकाश पर अनेक कविताए लिखी गई हैं। देखिए, जिगर' इसी चमन में हमारा मा एक जमाना था यही कही कोई छोटा-सा आशियाना था एसी मत्यापटाऊ कविताए मदा लिखो गा है और सिधो जाएगी। ६ यह कहानी तभी लाभप्रद हो सकती है जब कौन नीच है और कौन नोच नहीं है हम भद को समान लिया जाए। (देखिए महाभारत, नापृष्ट रस्यचिद् धूयात् । अयात् जब तब कुछ पूछा न जाए तब तक कुछ न बोसो। बया मार्गी ने इस नक सलाह का पालन नहीं किया। इसी से वह दुधको प्राप्त हुआ । बयामार्गी एसे हा वारणो सदुष को प्राप्त होता है। प्रय विषयक टिप्पणी ~इस लेख में दिए गए जो प्रथ आपको प्राप्त नही उह आप अप्राप्त समझे बया और बदर को कहानी एक देहाती को नजर में शहर के सो मोटर के सामने जो भी सवाल उठाया जाता है, वह उनकी ओर से प्रतिष्ठा का सवाल बन जाता है। हर जायज सवाल का जवाब उनकी प्रतिष्ठा के सवाल में है । यह हालत तो मम है, कही सचमुच ही उनकी कोई प्रतिष्ठा होती तब पता नहीं क्या होता ! बहरहाल, जिला बोर्ड के अध्यक्ष ने मध्यम माग अपनाया, यानी भेम्बर साहब को तीन रुपये में भस दे दी और मुझे ईमानदार कहकर अपने बेईमान सापियो में मेरी खूब तारीफ की। फिर मुझ से कहा, तुम पढ़े लिखे आदमी हो, अलाउद्दीन खिलजी का इतिहास जानते हो, आओ, तुम्हें मैं जानवरों के काम से हटाकर आदमियो का काम देता हू, तुम्हें आज से प्राइमरी स्कूल का अध्यापक बनाता है । इस तरह से में कांजी हाउस से हट गया और मेम्बर की प्रतिष्ठा बच गई। अध्यापक पद पर मुझे नियुक्ति तो मिल गई पर स्कूल नहीं मिला। दो महीने में अध्यक्ष के घर पर बैठा-बैठा मतदाताओ की सूचिया तैयार करता रहा । फिर तीर ही उनके फार्म पर अधिक सन्न उपजाओ' आदोलन करता रहा । आखिरकार एक दिन चोरी चोरी मैं उस गांव पहुंचा जहा के प्राइमरी स्कूल का में अध्यापक था। वहा कोई स्कूल न था, सिफ एक पॉजी-हाउस खडा था। तब मैंन विद्रोह किया और इस बार यह अध्यक्ष की प्रतिष्ठा का सवाल बन गया । उसने मुझे मुअत्तल कर दिया और मुझे भूल गया । कई बार याद दिलाने पर भी वह मुझे भूला ही रहा। तब उसके विरुद्ध एक शिकायती पत्र लिखकर मैं किसी को देने के लिए इस शहर में आया । बस, यहा से मेरी सौ मीटर लमो यात्रा शुरू हो जाती है। याता के आरमिक विदु पर पहुचने के पहले ही शाम हो गई थी। में थक गया था। किस से शिकायत की जाए, यह जानने मे और वह कहा है, यह खोजने में पूरा दिन बीत गया था। पर दफ्तरों में वही खोज बीन करने के बाद भी मुझे अपना मसीहा नही मिला, सिंफ यह जानकारी मिली कि जो दफ्तर जितना टुच्चा होता है उसकी इमारत उतनी ही शानदार होती है। सहक के किनारे जहा मैं खडा था, वहा एक विराता था । मेरे एक देहाती सी नजर में दाई भोर एक तिकोना पाक था जिसके किनारे सगमरमर के एक सफे महप नीचे गाधी की प्रतिमा थी। प्रतिमा कांसे की थी या पत्थर को-कहना मुश्किल है, पर काले रग की थी और सफेद पत्थर की छत के नीचे गोरे काले रगो का भेद बखूबी प्रकट कर रही थी। पाक मे बाबुओ की सभा हो रही थी । जो मागने की हैसियत थी, वे वही माग रहे थे-यानी महगाई भत्ते के चद रुपये । न उहें इससे कुछ ज्यादा चाहिए था, न कुछ कम -चुगी के टूटती छतों वाले स्कूल, अस्पताल के बरामदों मे बोरो की तरह पहे मरीज, कज का सूद चुकाने मे ही खत्म होने वाली तनख्वाह, एक ऐसी व्यवस्था की चौबीसो घटे सेवा जिसके बार मे वे कुछ नहीं समझते-इस सबके खिलाफ उन्हें कुछ नहीं कहना था । वे सिफ 'डी० ए०' चाहते थे, वही माग रहे थे। सामने तबोली की दुकान पर, कोढ में घाज की तरह, रेडियो गा रहा पा, 'ना मागू सोना-चादी, ना मागू होरा-मोठी, मेरे ये पिस काम के 'डी. ए. की माग के सामने यह गीत मुझे बहुत पसद आया। मैं सोचा, इस महान गीत का सिद्धात अगर सारा देश अपना ले तो तस्कर बद हो जाए, गाधी का रामराज्य आ जाए। क्यो न इसे हम अपने राष्ट्रीय गीत का दर्जा दे दें। मैं पवे पांव, सहब के विनारे किनारे चल रहा था और पाक की ओर देख रहा था। मचाना मेरा पाव एव गड्ढे में पड़ा । मेरा पाव अच्छा-यामा देहाती है, इसलिए न झुका, न टूटा, गहढे मे पहा और फिर बाहर निकल आया। मेरा चेहरा देखवर एक सामचे पाले ने यहा, साले अपन वा के लिए सहक पर फाटव बनात हैं और उसे उखाडने के बाद गहढा ता नही पाटते। मैंने सिर हिलाकर ताई की, पर जान नहीं समावि घामचे वाले के साले कौन हैं और उनके द पाप कौन हैं जिनके लिए सरक पर पाटर राजाये जाते हैं। माई और सिनेमा हाउस पा, जिससे आगे निटों की भीड पो। अचानर उसरी बगल म बिजली रोशी जरी और रानी के हरपो म मप्रेमी को एप द्वारत धमनी । फिर वह युनो और इस बार हीकी इबारत घमा उठी, रिसने मुझे बताया, 'यहा अग्रेजी शरा मरी थष्ठ पम्प रपये बिकती है।" मैंने गाधी की प्रतिमा की ओर निगाह दौडाई । वह अधेरै में डूब रही थी । तब निडर होकर मैंने अंग्रेजी शराब की ओर दुवारा देखा और रोब खा गया । अग्रेज भले ही चला गया हो, अग्रेजी शराब छोड़ गया है । वैसे भी, मैं दिन में बहुत अग्रेजी सुन चुका था। अग्रेजी शराब के रोब मे आकर गुनगुनाने लगा, ए, बी, सी, डी, ई, एफ, जी।' सहसा, 'ना मागू होरा-मोती' वाला गाना बद हो गया। पार्क की सभा में 'इकलाब जिदाबाद के नारे गूजे । लाउडस्पीकर पर कोई बात बडे जोर से कही गई। मैं सिफ इतना सुन पाया, 'अगर यह उनकी प्रतिष्ठा का सवाल है, तो हमारी प्रतिष्ठा का भी ।' मेरे मन में आया लपक्कर मैं उहे समझा कि भाई । बरियत चाहते हो तो भात यो उलझने से बचाओ, अगर कहीं यह उनकी प्रतिष्ठा के सवाल से जुड गई तो लाठी, गोली, जेल-सभी कुछ तुम्हारे लिए प्रस्तुत हो । जाएगा । पर मन मे बहुत-सी बातें आती हैं और चली जाती हैं, मैंने मुह नहीं खोला। इस बार गड्ढा नही था, पर किसी दूसरी चीज ने मेरा पाव जकर लिया । किसी जानवर के डर से मैं अपना पाव शटरने ही जा रहा था नि मुझे दिखाई दिया, दो रिरियाते हुए बच्चे-आदमी के बच्चे मेरे पाव से चिपके हुए हैं। सुना था, दान देते ही आदमी महिमावान बन जाता है । जब उन दोनो को पाच-पाच पसे देकर मैंने महिमा से अपना सिर ऊचा करना चाहा तो लगा आसमान का सारा बोझ मेरे सिर पर आ गया है। पाक के फाटर पर कई पोस्टर चिपके थे। उनमे सबसे बड़ा विमापन था, 'सिनेमा में चुबन की समस्या पर विचार-गोष्ठी।' पढ़ने से पता चला वबई में कई मनोपी और कलाकार इस शहर के मनी- पियों और कलाकारों के साथ बैठकर सिनेमा में चुबन की समस्या का धुबन करने वाले हैं। मेरे पावों मे दो रिरियाते बच्चो की उगलियो की ठिठुरन थी, मेरे पीछे असख्य कॉजी-हाउसो का गोबर और फर्जी प्राइमरी स्कूल को गर्दै एक देहाती की नजर में ।

पी। मेरे पीछे अट्ठानवें फीसदी हिंदुस्तानियों की भीड थी जो सिनेमा में पुबन की भीषण समस्या के बारे में अनजान थे। इस विज्ञापन ने जैसे अक्टकर मुझसे कहा-'तुम अहमको के लिए खाना-पीना, कपडे, मकान-ये ही समस्याएं हैं, तुम घुबन जैसी असली समस्या को कैसे जान सकते हो" चिढकर मैंने फाटक से विज्ञापन फाडकर नाली में फेंक दिया। फाटक को दीवार पर सब लिखा हुआ मिला-'यहाँ विज्ञापन चिपकाना मना है।' पाक मे सभा होती रही। मैं धीरे धीरे चलता रहा । तमोली की दुकान पीछे छूट गई थी, पर उससे एक नये गाने की आवाज आ रही यो । उस गाने को दो तीन नौजवान फटे-पुराने कपडे पहने, रिक्शा की सीट पर सिमटे हुए दोहरा रहे थे-'जहा तक महक है, मेरे गेसुओं की चले आइए यह है रेशमी जुल्फों का अधेरा न घबराइए।' घोडो की सी आवाज में वे इस गाने को तल्लीन होकर गा रहे थे। सुनते ही मारे उत्साह के मेरे रोयें फूल गए । क्या बात कही है ! आशावाद इसको कहते हैं । यह गाना कोई घटिया प्रेम-गीत नहीं है। इसे भी हम राष्ट्रीय गीत समझकर गा सकते हैं क्योंकि इसमे हमारा नेता कहता है कि इस मधेरे से घबरामी नहीं यह तो प्यारा प्यारा, जुल्फों का अधेरा है । सिफ नाक से सूपते हुए, महक के सहारे चले मायो-मजिल खुद ब-खुद आ जाएगी। फिर भी, सिनेमा के इस फटीचर गाने में आशा का जो सदेश पा, वह मुझे फुला नही सका । गाधी भी कभी इतनी बड़ी सांत्वना का सदेश नहीं दे सके थे। मेरे पांवो की रफ्तार तेज हो गई । म गांधी प्रतिमा की ओर बढ़ा। सिनेमा खत्म हो गया होगा। सडक पर अचानक ही भीड बढ गई पी। रिक्शो और मोटरो के शोर के कार 'महक है मेरे गेसुओं की आवाज कई ट्राजिस्टरो पर एक साथ कधी होकर हवा में पम गई। अचानक चाट लइया चना भुने हुए माल और शकरकद, मूगफली, किसी जघय चिकनाई में चले हुए कडे-भरे खोमचो से उठने वाली उस गध में मेरी सास रुधने लगी। बीस-पचीस कदम आगे आते ही में पाक मेरी श्रेष्ठ व्यग्य रचनायें - के उस कोने तक मा गया जहा एक चबूतरा था, जिस पर सफेद पत्पर का माप पा, जिसके नीचे गांधी की काली प्रतिमा थी। प्रतिमा के नीचे, खुली हवा मे, मैं एक सीढी पर बैठ गया । हवा बद थी। चारो और एक अजीब-सी भीड थी जिससे तरह- तरह की गध निकल रही थी । मजदूरो, बावुओ, मालिश कराने वालो, मालिश करने वाले छोकरो, बुकों में आवारा-सी घूमने वाली कुछ औरतो-इन सबकी भीड गांधी-मडप के आसपास छितरी हुई थी और जानना मुश्किल था कि कौन क्या चाहता है या धुधलके मे कौन क्या कर रहा है ? मैं शाति और सुरक्षा चाहता था पर एक अजीब, अस्वा भाविक, अश्लील माहौल मुझे घेरता आ रहा था। अब लाउडस्पीकरों पर कोई फिल्मी गाना पाक में भी बजने लगा। पर उससे कहीं ज्यादा साफ आवाज मे 'गेसुओ की महक' वाला गाना मेरे पास एक दूसरी सीढी पर होने लगा। आवाज साफ थी, पर उसको रिरियाहट और भी साफ थी। मैंने पीककर देखा, वे ही दोनो बच्चे- जो मुझसे सिक्के ले गए थे, मुझसे कुछ दूरी पर बोडी पीते हुए रेशमी जुल्फों के अधेरे में आगे बढने का गाना गा रहे थे। सब कुछ किसी न किसी की प्रतिष्ठा का सवाल है, पर ये रिरियाते बच्चे किस की प्रतिष्ठा के सवाल से जुड़े होंगे-~मैंने सोचना चाहा । पर तन-मन की थकान के आगे सोचना भी एक मेहनत थी। जो भी हो, इसना स्पष्ट हो चुका था कि सौ मीटर की वह लबी यात्रा अभी खरम नहीं हुई है। एक देहाती की नजर में दीवाली, जुआ और कविगण मुझे पता नही कि शहरो मे दीवाली कैसी होती है क्योकि दीवाली की छुट्टिया मैं प्राय अपने गाव में बिताता हूँ । पर मुझे लगता है कि शहर मे दीवाली का कुल यही अभिप्राय है कि अमीर इतनी ज्यादा अमीरी निखाए की गरीबो मे अपनी गरीबी का एहसास और भी गाढा हो जाए। अगर हम देश में सवहारा-यग को शांति के लिए खडा करना चाहत हैं तो इसका सबसे सस्ता नुस्खा यह है कि शहरो मे दीवाली का त्योहार तीन दिन के बजाय तीन मनीन के लिए पींच लिया जाए। लोग सफेट और वाले पम वा करिश्मा देखते देखते इतना उक्ता जाएगे गि अपन आप प्राति पर बैठेंगे। पर मेरे गाव में अगर माल में बारह महीने दीवारी होती रहे तब भी कोई प्राति नहीं होगी। दरअसल अगर जुए को दीवाली पा प्रमुख पक्षण माना जाए जो मेरे गाव में बारहा महीन दीवारी परती है. और वाति नहीं होती। दीवाली पर मरे गाव म राशनी-वोशनीमा ज्यादा चकार नहीं सिफ जो लोग पूरे गाल भागो मे, जगनो में या बाहरा छिपकर जुआ घेरते हैं, ये दरवाजो पर पुलबर पेलने लगते हैं और रपया पटटा करने के लिए जा हारे हुए जुआरी पहले अधेरे में इसो-दुक्ये मुमाफिर को टने की योजना बनाते पे दे इस मौरे पर सम्बनतापूवर सिफ अपने

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पाप गह जीत जाता है और उसके हाथ कोई रन लग जाता है। उसकी मनोवृत्ति इन पश्तियों से प्रकट होती है अब लो नसानी अब ना नसंहों। पायो नाम चारु चिन्तामनि उर कर ते न खसहीं। मीराबाई ने भी एक ऐसे ही जुआरी के उल्लास का वर्णन किया है जो पहले बहुत कुछ खो चुका है पर चलते-चलते जिसके हाय एक उम्दा दाव लग गया है पायो जी मैंने नाम रतन धन पायो। जनम-जनम की पूजी पायी जग मे सभी खोवायो । सूरदास अपने काव्य मे जीते हुए जुआरी के इस उल्लासपूर्ण मूड को बहुत बाद मे पकड सके हैं । प्राय वह ऐसे जुआरी को मन स्थिति मे रहते हैं जो जीतने के लालच मे अपना नफा-नुक्सान नहीं समझ पाता । वह कहते हैं माधौ जू, मन माया बस कीन्ही । लाम हानि कछु समझत नाही, ज्यो दीन्हो ॥ रसखान का प्रसिद्ध सवया 'या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहू पुर को तजि डारौं' पता नही क्सि मूर मे लिखा गया था, पर वह मेरे गांव के घरवाहो पर पूरा पूरा घस्सा होता है । मेरे गाव के चरवाहे भी उडा लेकर जानवरो के पीछे घूमते हैं बाम और महुवे के कगों में बैठकर जुआ खेलते हैं वन बाग-तडाग निहारते रहते हैं और दांव पर पांव लगाते जाते हैं, और जुआ खेलने के इस सुख के मुकाबिले उन्हें तीनों लोकों का राज भी दिया जाय या 'आठह सिद्धि नयों निधि को सुख' पेश किया जाय तो वे उसे रसखान की ही तरह सेने से इकार कर देंगे। जब जुए का दाव लगता है तो वातावरण बडा ही समरवमय हो जाता है और चाहे वह अशर्फीवाद का सूदखोर हो या मौजा अतरौली का घरवाहा-- 1-दोनों का दाव बराबरी की हैसियत से देखा जाता है। इसी भावना को मैथिलीशरण गुप्त से श्रद्धा विगलित वाणी से व्यक्त किया है मेरी थेष्ठ व्यग्य रचनायें पतग तन ७४ जम देषमदिर देहली सम-भाव से जिस पर पढ़ी नृप-हेम-मुद्रा और रक-~- पराटिका। पर पाहे हैम-मुद्रा वाला राजा हो, चाहे दस पैसे के सिक्के वाला रक-दाव हार जाने पर दोनों को अपने दिमाग में एक ही जैसे सन्नाटे का अनुभव होता है। हारे हुए जुआरी की दशा का वणन महादेवी वर्मा का इन पक्तियो में देखिए आज क्यों तेरी वीणा मौन ? शिथिल शिथिल तन, पवित हुए कर स्पदन भी भूला जाता तर, मधुर क्सक-सा आज हृदय में मान समाया को? पर हारे हुए जुआरी का एक दूसरा भी मूट है जिसमें यह न किसी से मगहा करता है, न बोलता है, न स्तब्ध होकर रह जाता है । कैलाश वाजपेयी की कविता 'जोड याकी' (तीसरा अधेरा, पृ० ३६) का जुभारी देखिए कैसे चलता है बिना तरस खाये बिना कोसे किसी को रोझे, दिना ऐंठे सिर झुकाए हुए चलता हूँ। हारे हुए लुभारी को भगवान का नाम भी याद माता है, पर वह अपना मात्मसम्मान नहीं प्रोता । अज्ञेय की कविता 'मैंने ही पुकारा भा' (सागर मुद्रा, पृ० १७) मे चित्रित जुआरी की छवि देखिए नाम नाम का एक तरह का सहारा था। में या-हारा या पर नहीं था किसी का गुलाम । रात भर जुआ खेलने के बाद थकावट, नीद और शाति की अनुभूति दीवाली, जुमा और कविगण L

निराला की प्रसिद्ध कविता 'जागृति में सुप्ति थी' में भी मिलती है
जाप्रत प्रमात में क्या शाति थी?
जागृति मे सुप्ति थी,
जागरण-क्लाति थी।
भगवतीचरण वर्मा की प्रसिद्ध कविता 'हम दीवानो की क्या हस्ती'
भी जुआरियो पर ही लिखी गई है। मरी हुई जेब रेकर खुश-खुश आए,
ठर्रा पीकर मस्ती से दो चार दाव लगाए, खल्लास होकर आसू बहाते
हुए, धूल उड़ाते हुए चल दिए, लोग कहते ही रह गए कि अरे, अरे
हम दीवानो को क्या हस्ती,
हैं आज यहा कल वहा चले,
मस्ती का आलम साथ पला,
हम धूल रडाते जहा चले,
आये बनकर उल्लास अभी,
आसू बनकर वह चले अभी,
सब कहते ही रह गये अरे
तुम कसे आये, कहा चले?
अगली दीवाली पर जुए के आलम मे कविता का गहन अध्ययन
करके मैं जो थीसिस लिखने जा रहा है उसका यह साराश (सिना-
प्सिस) भर है । पर यदि मेरी जगह कोई पाठक खुद यह काग करना
चाहें तो मुझे और भी प्रसन्नता होगी, क्योंकि तब मैं अपना वक्त
कविता के चक्कर मे नही गवाऊगा-उतने धक्न बठकर जुआ खेलता
रहूगा तो अपने परिश्रम को ज्यादा सापक समझूगा ।
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मेरी घेष्ठ म्यम्य रचनायें

कुत्ते और कुत्ते बाजार मे आजकल हिंदुस्तानी-अग्रेजी मे लिखी हुई बहुत सी किताबें आ गई हैं जो कुत्तो के असली कुत्तो के बारे में हैं । 'डॉग केयर, बाई ए डॉग लवर', 'शेफर डॉग्स ऑफ जमनी, बाई ए डॉग लवर', 'पॉफ डागस ऐंड विचेज, बाई ए डॉग लवर' आदि। डॉग-लवर का असली नाम जी० प्रसाद है जिनका असली रूप गिरीप्रसाद है। वे सीधे सादे, भोले भाले आदमी हैं। वक्त से जगे और वक्त से सोये, वक्त से हस और वक्त से रोये ।' कभी गोश्त नही खाया, कभी शराब नही पो। रोज दो घटे पूजा करते हैं । एक ज्योतिषी । स्थायी तौर पर पाले हुए हैं। साल में दो चार महीने के लिए एक बाबा भी पाल लेते हैं। आधुनिकता के नाम पर उहे अग्रेजी बोलने वाली बीवी, एक अच्छे दर्जी का सपक, मोटे शीशे का चश्मा और बवासीर. भर मिला है। वे, पता नहीं क्यों और कैसे, इनकमटक्स के महकमे के कचे अफसर हैं । इस सबके साथ, और इस सबके पहले (या इतिहास की दृष्टि से इस सबके बाद) व कुत्तों के विशेषज्ञ हैं। उनके पुराने साथी जानते हैं कि आज से दस साल पहले वे सिर्फ । अपने दफ्तर की बात करते थे, या अपने ससुर की, जो रेलवे में उचे ।

मोहदे पर हैं और जिनका वक्त ज्यादातर सगो को झाड़ने में आप होता है। ('हंडी को आप जानते नही, रेलवे बोड वालो को वही बहे बडे झाड दिया।) पर उसके बाद वे अचानक कुत्तों की बात करने लगे और 'डॉग-लवर' बन बैठे। बात कुछ इस तरह से शुरू हुई उनके बगले में कुछ दिनों से एक पडोसी का कुत्ता मान लगा था । प्रारभिक अवस्था में बहुत प्यारा लगता था। पता नही क्यो, पडोसी ने उसे अपनी दासता से छूट दे दी थी। इसीलिए ताजे ताजे स्वतम हुए बहुत से देशो की तरह उसकी हालत बिगड़ रही थी। बिगडती हालत के सबूत म वह एक पैर से सगडाने लगा था। बाद में, तस्वीर मुकम्मल करने के लिए, उसके जिस्म पर एकाध ऐसे धन्ने प्रक्ट होने लगे-शायद कुसग से या भुखमरी से--जिहें मदि वह मोई विकासशील देश होता तो अतर्राष्ट्रीय जगत मे दिखाकर बाहर से गेहू जरूर माग सकता था। पर सिफ कू-कू करके कोई कुत्ता एक देश नहीं बन सकता जसे कि कोई देश दिन रात निकम्मेपन और कूक करने का अभ्यास करके भी कुत्ता नही हो सकता । अत यह कुत्ता, पडोसी के घर से श्री जी. प्रसाद के बगले मे आकर नियमित रूप से क-कू करने और उनकी लॉन पर प्लैग के पूहे की तरह कई गोल-गोल चक्कर लगाने के बावजूद, उनके यहा से रोटी का एक टुकडा तक नहीं खींच सका । कुत्ते और मि० प्रसाद के बीच 'अपरिचय का विघ्यायल बहा रहा उपेक्षा या ब्रह्म-पुन लहराता रहा । ऐसी उपेक्षा रिसी विकसित और विकासशील देशो के दोष होती तो एक अतर्राष्ट्रीय तनावका कारण बन सकती थी। घोरे धीरे उसरे धावा में इजाफा होने लगा, बाल झडने लगे लगडापन बढन लगा। फिर भी उसकी ओर श्री जी प्रसाद मुखातिर नही हुए। तभी अचानर एन नि एक नौजवान व्यापारी ने उन वरिषय मे विध्याचल मे सुरग लगा दी। मह नौजवान घ्यापारी अपन बाप की तरह गहा मसनद 'श्री हमी जी सा सहाय', पंचदार पगडी, गौ-प्राह्मण की सेवा और भग मेरी पेष्ठ पाय रचनायें उडाई के वातावरण को उपज तो जरूर था, पर माडल' हो जाने की वजह से उसके घर पर कुत्तों को छूकर नहाने की मजबूरी न थी। उसके दफ्तर में मेज-कुर्सिया, शीशे की दीवारें, इटर-कॉम आदि का प्रवेश हो चुका था और उसे मालूम था कि अफसरो के यहा फूल पौधो, पिछली रात परब मे सुनी गई कव्वालियों, बाबा-बेबो की अग्रेजी कविताओं, कब्जियत की दवाओ, पपलू और फलश के दाव-पेंचों, फौज से कम कीमत पर उडाई गई स्कॉच बिस्ती की बोतलों, जमाना बहा खराब लगा है' और 'ईमानदार की मौत है' की तोतारटत बावृत्तियो और वगले की पालतू बिल्लियो और कुत्तो की बात करने से उसे घर का आदमी शुमार किया जाएगा। अत श्री प्रसाद इस नौजवान व्यापारी से मिलने के लिए जब बगले से निकलकर लान की तरफ आए तो उन्होंने उसे इस कुत्ते को पुचकारते हुए पाया। उसके माद जब पारस्परिक अभिवाचन और जमाना हा खराब लगा है और 'ईमानदार की मौत है' का आदान प्रदान हो चुका और दोनों लॉन मे पड़ी हुई कुसियों पर बैठ गए, तो नोजवान व्यापारी ने अपनी बात रोपकर कुत्ते को फिर पुचकारा और कहा कि मह पेडिग्री वाला कुत्ता है। श्री प्रसाद ने कुत्ते को पहली बार गौर से देखा और उनका जी पिना गया, जवाब में उन्होंने बताया कि इंडो-पानी ससुर बहुत बडे बडे कुत्ते पले हैं और उनके बगले पर तख्ती लगी है कि कुत्तों से होशियार रहो। नौजवान व्यापारी चुटक्यिा वजा-बजाकर कुत्ते को रिझाता रहा। पर वह इस प्रोत्साहन से लाभान्वित होन से इनकार करता रहा। आखिर में नौजवान व्यापारी ने कहा कि यह बीमार मालूम होता है इसे अस्पताल ले जाना पडेगा, और आपका ऐतराज न हो ना मैं खुद मोटर पर ले जाकर इस डॉ० हाफिज क' दिखा दू, क्योकि शहर में इस वक्त वही कुत्ते की बीमारी के एक्सपट हैं और मि० टडन, हजेला, शुक्ला, मित्रा, बेदी, द्विवेदी, त्रिवेदी चतुर्वेदी क और मेरे कुत्तो का वही इलाज करते हैं । जवाब मे मि. प्रसाद ने भूमिका के तौर पर कहा कि हडी के कुत्ते बड़े तगडे हैं और कभी बीमार नहीं पड़ते। इसके बाद उन पर कुत्ते और कुत्ते के यहा सचाई का दौरा पड़ गया । उन्होंने फूहहपन से कहा, 'आप इस कुत्ते को जितना चाहें प्यार करें, पर यह कुत्ता मेरा नही है।' सट्टेबाजी चेहरे की मासपेशियो को काबू में रखने की आदत हलवा देती है। व्यापारी व मन को धक्का लगा पर उसन पहले की तरह उत्साह स रहा कि यह आप वगरे म रहता है तो चाहे आपा हो या क्सिी और का, इसे बगल की हैसियत स ही रहना पडगा। इसके बाद कुत्ते का कायदे स इलाज शुरू हो गया। दसत-देखते वह विकासशील देशो की तरह पनपन रगा। बाहरी लाग आ-आकर उसे सेहत ये सर्टिफिकेट दन लग । यहा तक कि मि० प्रसाद ने कुछ दिन बाद कुत्ते को अपना लिया, बच्चो ने उससे खेलना शुरू कर दिया और व्यापारियो के गुट म कुत्ता एक एस मजमून के रूप में शुमार कर लिया गया जिस पर उनम जमाना खराब लगा है' और ईमानदार की मौत है के बाद, अगर डडी का जिक्र न आ गया तो, बात की जा सकती थी। पर एक दिन वह वुत्ता मि० प्रसाद के वगले के सामने ही एक व्यापारी को मोटर स कुचलकर मर गया। उस व्यापारी का व्यापार तो पुराना था पर अमीरो नयी थी। इसलिए वह घराब तस्वीरें और गलत गानो के रिकाड खरीदता जरूरत से ज्यादा शानदार कपडे पहनता बिना किसी पनिष्ठता के ऊचे अफसरो और नेताओं को शुरू के नाम से पुकारता । ठीक से चलाना न जानते हुए भी अपनी मोटर चलाता। इसलिए जिस वक्त वह अपनी मोटर पीछे की आर चलाते हुए श्री मि० प्रसाद के बगले से निकला, उसी वक्त यह कुत्ता गाडी की चपेट में आ गया और आत ही हैपी हटिंग ग्राउहस में पहुंच गया। मि० प्रसाद को स्वाभाविक था कि दुख हो। वही व्यापारी के लिए भी स्वाभाविक था। यह भी स्वाभाविक या कि व्यापारी किसी भी नुक्सान को पूरा न होने वाला नुक्सान न माने । इसलिए उसने एक वसा ही बल्कि उससे भी उम्दा कुत्ता खरीदा और उमे मि. प्रसाद के सामने क्षमा याचना के साथ, मुआवजे के तौर पर, पेश किया । उहाने उसे भले आदमी की तरह स्वीकार किया । मेरी श्रेष्ठ व्यग्य रचनायें इधर शहर के व्यापारियो में इस दुघर्टीका इसलिए दूसर एक व्यापारी ने आकर बताबारी मेरी ने अमुक वश के पिल्ला यो जम दिया है और जिम म एक पिल्ला आपका है। दूसरे घ्यापारी को कुतिया ने तमुक चा के जिलोको, जन्म दिया था। तीसर, चौथे, पाचवें, है.और सातवें व्यापारी पी. कुतिया न प्रमश तमुक, दमुक तमुक, लमुफ और हमुक पिल्ले पा किए थे। जत उन सभी व्यापारियो ने उहें एक या दो या तीन पिल्ल पेश किए और वे यह अपनी स्वाभाविक्ष उदारता मे स्वीकार परत गए। मान रेने म दान देने का जोश बढा । जब उनव पास दजना कुत्त आगरा तो वे उह अपन दोस्ता मे~खास तौर म दूसरे शहरों के नाम्ना म-वाटन लगे। दूर दूर ट्रक-वॉल करवे वे अपने दोस्तो को वतान लगे कि भाई साहब मेर पास एक अमुक पिडिग्री का कुत्ता आया है और जररत हा तो आपके पास भेज दू । इस तरह इस शहर म श्री जी० प्रसाद को माफत कुत्ता निर्यात का काम शुरू हुआ और या शाहरन हान लगी कि वे 'गग लवर है। कभी कभी यह भी होने गया कि श्री प्रसाद के दोस्त ग उसके किसी अपने दोस्त ने कहा कि म, बच्चे पीछे पड़े हैं मुये एक पेक्निीज चाहिए और मिल प्रसाद के दाम्न न का कि आज ही मैं उसको ट्रक काल करूगा और फिर मि० पाटन उम व्यापारी से जिमकी कुतिया अब हर दूसरे महीने पिल्ले पाकग्न रगी श्री टो पिल्ल मगाकर उसके घर उसके दोस्त के पास भजन काि भज दिए । और धीर गुना के बार मे भमरने-बूझने का शौक भी पा हुआ और अग्नि शहर का मशहूर चुक्सरर आया और कुत्ता में गायि म मबधित म बार- कितारें उह पकडा गया। दूसरे चुक 77 का मि० प्रमार को किनावा के सेट में कुछ कमी खटकी और न -गम राम पच्चीम पिता और जोर दी। तीसरे ने चुत्ता के चार मनान चार विजापता पत्रिका मगान का इतजाम कर लिया। frr पाटाग्राफा व मामान के दुकानदार न उह कई विस्म क कुत्तो कृत और बुने के कई फोटो दिए, अत मे एक पब्लिशर ने इन सब प्रयासा का समय और सामजस्य, यानी कोआडिनेशन और डब-टेलिंग' की। पब्लिशर इनकमटक्स के मामलो मे उलझकर उसी अनुपात से देश मे कुत्ता साहित्य की कमी का अनुभव कर रहा था। उसने निवेदन किया कि मि० प्रसाद, आप कुत्तो पर दो एक किताबें लिखकर मुझे दीजिए। इससे देश की एक भारी कमी पूरी हो जाएगी। उन्होने ऐतराज किया। बोले कि मैं सरकारी काम, पूजा पाठ, गिरिस्ती, ज्योतिष और स्वामी सत्यानद में फसा रहता हू । डडी भी लवी छुट्टी लेकर आने वाले हैं। पर पब्लिशर ने जिद पकड ली। कहने लगा कि अग्रेज अफसरो ने यहा की चिडिया और पेड-पौधों पर हजारो किताबें लिखी हैं । उसने आश्वासन दिया कि आपकी अग्रेजी बहुत उम्दा है और आपको सिफ किसी स्टेनोग्राफर को बोलते चले जाना है और मिस लिली, जो दो साल पहले मिस मसूरी चुनी गई थी हमारे यहा स्टेनोग्राफर हैं और मैं उन्हें इस काम क लिए छोड दूगा। पर वे यही कहते रहे कि हमे फुरसत नहीं है । तब उसने कहा कि स्टेनोग्राफर के अलावा मैं फला डिग्री कारिज फ्ला लेक्चरर को भी आपकी खिदमत मे लगा दूगा और वे जैसे 'एक ग्रेजुएट' के नाम से कुजिया लियते है इसे ही डॉग-लवर के नाम से वे आपकी किताबें भी लिख देंगे। इस तरह मजबूर किए जाने पर वे मजबूर हो गए और दयते-देखत 'ऑफ डॉग्स ऐंड विचेज, बाई ए डॉग-लवर छपर बाजार में आ गई। मि० प्रसाद का कुत्ता करियर यहा स सुगठित हुआ । एप के बाद दूसरी, फिर तीसरी, पोथी, पाचवी पिसाब छपती चली गई और वे नौररी पेशे के बाहर भी पता विशेषज्ञ मान लिए गए। उन्हें समा सासायटियों में व्याख्यान - फो बुलाया जान लगा । पर उन्हें भाषण दन म हिचक होती थी। वास्तव में अभी तर उहाने गाई में सरकारी भाषण दिया ही न था। इसके लिए मिस लिसी और र प्रजुएट से काम नही परता था। पर अचानर-इसी का भार बहत है-एक दिन दे बाल्न लगे । हुमा यह था कि उनसे ८२ मेरो श्रष्ठ म्यग्य रपनायें पडोसीन उनका अपमान कर दिया। पडोसी रेलवे का एक बडा अफमर था और दही के रिश्ते स इनके महा उसका काफी आना-जाना या। वह कई वार कुत्ता का मजाक उड़ा चुका था । एक दिन क्लब म, जर मि० प्रसाद कोकाकोला पी रहे थे और वह ह्विस्की पी रहा था, बात कुत्ता और बिल्लियो पर चल निक्ली । उसने मि० प्रसाद पर सोधे हमला किया और कहा कि कुत्ते पालने वाले खुद कुत्ते हो जात हैं और कोई प्यारी चीज होती है तो बिल्ली होती है। मिल प्रसाद को अब तक कुत्तो से सचमुच का प्रेम हा गया था। वे गुस्प मे कुर्सी से उठ खड़े हुए। वे अपने पडोसी के बारे में उसी तरह जानते थे जसे कि हर समझदार को अपने पडोसी के बारे में जानना चाहिए । उस जानकारी मा पूरा उपयोग करके और पड़ोसी या अपन ससुर का हम उम्र होने के कारण आदर के साथ सबोधित करत हए उहनि कहा, 'जनाव, बहस कुत्तो और बिल्लिया की नहीं निलात की है। पहले सैद्धातिर ार पर देख लिया गए कि पारी रविया पानी हॉबीज के पीछे कौन सी प्रेरक शक्तिया काम कर रही हैं । प्राय होता यह है कि हमें जो धीज यू ही मिल जाती है और मिरती रहती है उसी में हमारी रुचि पैदा हो जाती है। रुचियों के विराम का इस दष्टि में भी अध्ययन होना चाहिए। विकासशील देशो म मापन देखा होगा, जरूरी चीजो को छोडकर इसी तरह गैरजरूरी चीजें बनने लगती हैं। हमार यहा कमरा, दाजिस्टरों, टेप रिकाहरा, रमिजरग की भरमार क्यो है? इमलिए कि शुरू-शुरू मे यहा के गग यूरोप अमरिका या जापान गए और ये चीजें पोकट मे या कम दाम पर आए। बाद म दही चीजों के इद-गिद हमारी रुचियो का विशाम मा। जमाना 3ह गा कि लोग घुप हाकर,सुन रह हैं और ये या पान - रहे हैं। व पिपरे, पर एक बार फिर हिम्मत करके कहने यही व्याग गुना और विल्टिया पर भी लागू होती है । यह पर गपाग पा यात थी कि शुम्- म मेर यहाँ एक कुत्ता आ गया था और वियत जार र पहल मि० हाटन न अपनी विल्लिया उसे और पुस मापसे दे दी पों पर पर न भूलिये हि ये बिल्लियो मेरे यहां भी मा रापती ची और यह दुता मापरे यहां जा परसा था। इसलिए हो मुत्तों और बिल्लियों के बारे में प्रतियर होर बाल न बरनी चाहिए। असल बात हॉपीज में परियों के विकास की प्योरी गोपर पली पी, जिगो बारे में । पडोसी तो यही समझा कि छोराला पीकर भी रहें नशा हो गया है, पर उसी के दूसरे दिन ये रोटरी करब म 'डॉग-मेयर पर भाषण देने के लिए बुलाए गए। गुत्ता विशेषत दी हमियत से अब उहें यापी रहे पैमाने पर स्वीकार पर लिया गया। उनको कुत्ता- प्रदर्शनियों के उद्घाटन के लिए और उनकी बीवी को पुरस्कार वितरण के लिए बुलाया जाने लगा। वे जहा-जहा तबादले पर गए वहा-वहा उनकी अध्यक्षता में कुत्ता-वल्याण समितियां बनाई गई। सफलता की इन मजिलों को पार करके याधिर में उन्हें यह बाध्यास्मिक अनुभव हुआ कि उनके भी जीवन का एप अथ है और उस अप का नाम कुत्ता है। ८४ मेरी श्रष्ठ व्यम्य रचनायें आह । वे दिन सबेरे ही सबेरै वै मेरे बगले के सामने से निकले । नगे पाव, जिस्म पर रुईदार बडी, ऊपर से चेस्टर, सिर पर आदमी को बदर बना देने वाला कटोप, मुह में नीम की दातून, जिसे बडी फर्राहट से दातो पर नवा पहरे कचहरी के मगरमच्छ थे। अब रिटायर होकर भलमनसाहत की बारिश में भीगी बिल्ली बन गए हैं। मुझे देखकर ठिठके । दातून की बहवन के बावजूद मुह से "हो, हो, आप ! 'के फोवारे छोडे। फिर मेरे बगले के अदर आकर बोले, माप भी कहते होगे कि बुड्ढा कैसा वन्नी काटकर निकला जा रहा मैंने उहे यकीन दिलाया कि मैं सचमुच अपने माप से यही कह रहा था। इसी पर उन्होंने मेरे बाले को अपना बगला समझकर पुरानी वफादारी का एक नमूना पेश किया । दातुन को हाथ में लेकर, मुह से लेकर हृदय तक की बारी तरलता सिंथमम के एक गमले में मुक्तकठ से गिराते हुए बाल, 'वाह ! बगला हो आपने ऐमा समाया है कि- सीधा सादा लॉन था। उसके भारों कोनों पर टिशियम की आपको दे दी यों पर यह न भूलिये कि वे विल्लियां मेरे यहां भी आ सकती थी और यह कुत्ता आपके यहा जा सकता था। इसलिए हमे कुत्तों और बिल्लियो के बारे में प्रतिबद्ध होकर बात न करनी चाहिए। असल बात हॉवीज ने, मचियों के विकास की थ्योरी को रेकर चली थी जिसके बारे में ।' पडोसी तो यही समझा दि कोकाकोला पीकर भी उहे नशा हो गया है पर उसी के दूसरे दिन वे रोटरी क्लब में 'डॉग-केयर' पर भाषण देने के लिए बुलाए गए। कुत्ता विशेषन की हैसियत से अब उहें काफी बड़े पैमाने पर स्वीकार कर लिया गया । उनको कुत्ता प्रदर्शनयो के उद्घाटन के लिए और उनकी बीवी को पुरस्कार-वितरण के लिए बुलाया जाने लगा। वे जहा-जहा तवादले पर गए वहा-वहा उनकी अध्यक्षता में कुत्ता-कल्याण समितिया बनाई गई। सफलता की इन मजिलो को पार करके आखिर मे उहे यह आध्यात्मिक अनुभव हुआ कि उनके भी जीवन का एक अथ है और उस अप का नाम कुत्ता है। ८४ मेरी श्रष्ठ व्यग्य रचनायें

आह । वे दिन
सोहोरे में मेरे नगरे के सामने से निकले । नंगे पाव, जिस्म पर
दार बही, कार से पेस्टर, सिर पर आदमी पो दर बना देने वाला
स्टोप, मुह में नीम की पादन, जिी बी फर्राहट से दावी पर नया
पहले ही दे मगरम थे। रिटायर होकर भरमसाइत
की बारिश में भीगी बिली बन गए हैं।
भुशार ठिो। दातून को बयान के बावजूद मुह से "हो,
हो, मा!"पोशो छोडे। फिर मेरे माले में सर आले,
“मा भी कहन होंगे कि गुदा साली काटकर निकाला जा रहा
# रहें पसीन दिला सरमुर कपो भाप से पही रह
पापी पर उन्होंने मेरे जाने को मारा समर पुरानी
winter नमूना शासन को हाप मकर, महसे
रहुर हमारी तापमएर पपने में पुष्ठ
से , " पर हो कापी ऐगा गाया है कि
गोपा-रान पारा थारों कोनों पर नियम की

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इसकी क्या जरूरत कि दो मिचों के लिए अपने लॉन को खोदकर
तालाब बना दें।
अचानक दूसरी ओर मुह उठाकर यही स
एकदम से चीखे,
'रुको, रुको, आते हैं । आ रहे हैं। गला न फाडे डालो, हरामी कही
फिर नगे पावो का प्लग घास से लगाकर सुबह की ताजगी की करेंट
दिमाग तक खोचते हुए वे जिधर से आए थे उघर ही चले गए । जाते
जाते मुलायमियत के साथ मुझ से कहते गए, "आप ही का लडका है।
पुकार रहा है।"
मरी घेष्ठ ध्याय रचनाय

मनीषीजी की एक रात . पूर्वाद खुदा ने कहा, 'रोशनी हो', और रोशनी हो गई। वे इस शहर मे इतिहास समिति की वार्षिक बंठर के अवसर पर आए हुए थे। हर साल की भांति इस साल भी उनसे माशा की गई थी कि वे किसी सनसनीधेज तथ्य का उद्घाटन भरेंगे । और देखो, उन्होंने ऐसा ही किया। पिछले साल उहोंने भावात्मक समवय के हिसाब से सिद्ध किया या वि औरगजेब और शिवाजी बडे गहरे दोस्त थे। उनके ऊपर अब तक लिखे गए इतिहास को उहोंने फरेब बताया था, उनके इतिहासकारो पा उहोंने कुछ ज्यादा न कहकर सिफ पेशेवर और भावुक-इन दो चुटकियों में उता दिया था। इस साल उनके सामने एक दूसरी सामा- जिक धुनोती थी। आप से पश्मा उतारफर उहोंने रूमाल से चेहरा पोंछा। बड़ी- वही नगी आंखो से उन्हें हाल मे मधुमक्खियों जैसे लगभग एक हजार अस्पष्ट, अधूरे चेहरे दिखाई दिए। उनके मन में एक विशेषण बिना क्सिी को लक्ष्य दिए गुम्बारे जसा फूलकर फूटा 'टुच्चे'। अब उन्हें अपनी वारा बिना किसी शिक्षक के कहने में आसानी हो गई। इस साल की सामाजिक चुनौती मजूर करते हुए उन्होंने कहा, 'भारतवासी कभी किसी से नहीं हारे । विदेशी इतिहासकारो ने हम एक गिरी हुई, कई बार को पराजित जाति बताने की कोशिश की है। वे पर जाने दीजिए । मैं उनके बारे में नहीं, पहले एक पटना के बारे मे अपना पर्चा पढ़गा। 'मेरा मतलब भारत पर सिक्दर के आक्रमण से है।" लोगो ने तालिया पीटी । उन्हें यकीन हो गया, अब वे बिना समझे हुए मेरी बात सुनेंगे, तालिया पीटेंगे । उहोंने तालियो के बुझने का इतजार किया। फिर मौका देखकर वे श्रोताओ पर सिकदर की तरह हमला करने को तैयार हुए। इत्मीनान से माइक के नजदीर आकर वे अपना गाल बड़े प्यार से सहलाने लगे। उसे एक ऐतिहासिक तथ्य बनाकर उहोंने कहना शुरू किया, 'पुराने पेशेवर इतिहासकारो ने हमे बताया है और यही हम सब बचपन म पढते हैं कि हम आपस की फूट के कारण सिरदर से हार गए। पर मैंने, आप देखेंगे, इस_पर्चे मे साबित करने की कोशिश की है ।' सामने की कुसियो पर उहें सस्कृति और अनुसंधान जस कडे-बडे लफ्जों से जूझने वाले कई बडे-बडे अफसर दिखाई दिए। उनके लाभ के लिए उन्होंने देसी भाषा को छोडकर विलायती में वहा, साबित करने की कोशिश की है कि, नवर एक, हमम वापस मे फूट नहीं थी, आज की तरह हम तब भी एक थे, और नवर दो, कि हम यूनानियों से कभी नही हारे । हमने मिलकर सिकदर का मुकाबला उसे हराया था। एक जगह उन्हें वापी घुआ-सा उठता दिखाई दिया, विसी ने शायद सिंगार मा जोरदार स्श लिया हो । एक आवाज आई, 'और पोरस ? पोरस कैसे परहा गया था?' "पोरस से परहा गया था?" रहोने मजार मे यह सवाल दोहराया । ये हसे। दूसरे की बात की दुम को अपनी बात की नवे बनाने वाली बादत रहोंने प्रागतिहासिक काल , यानी जब लोग उन्हें मोतिर वा। समझते थे, सीदी पो। प्रागतिहासिर पाल अब विमा था, मेरी घेष्ठ यम्य रचनायें अनुपयोगी था, खत्म हो चुका था, पर उस आदत की उपयोगिता अव भी थी। वे कहते गए " ?" "पोरस तो पेशेवर इतिहासकारो की क्लम की नोक से पकड़ा गया था।" वे असर के लिए रुके, "उसे भूल जाइए। इस पर्चे में मैंने बताया है कि पोरस के दरबार मे खुद सिकदर को गिरफ्तार करखें लाया गया था । चौंकिए नही, यह सफ को, प्रमाण की बात है वे अपना नया माल बेचते गए पर सिक्दर के पक्ष मे यह बताना आवश्यक है कि मौत का सामना होने पर भी वह हिचका नहीं। वह टूट गया पर झुकानही । पोरस ने उससे पूछा, 'बोलो, तुम्हारे साथ कैसा सुलूक किया जाए इस पर सिकदर ने वही प्रसिद्ध जुम्ला कहा, 'असा एक राजा दूसरे राजा के साथ करता है ।" लोग एक क्षण चुपनाप बैठे रहे । फिर अचानक सभी को कुछ याद आया तालिया। वे अपना पश्मा पोछने लगे। बीच से एक दुबला-पतला, धोती. कुर्त वाला आदमी सिगार फूलता हुआ उनके सामने से निक्ला । उनके मुह पर घुआ छोहता हुआ चला गया । वे मजे मे मुस्कराए । उन्होंने अंग्रेजी मुहावरे मे सोचा कि ईश्वर अपने स्वग मे है और दुनिया म सब कुछ ठीक है । इत्मीनान से उन्होंने अपना पर्चा पढ हाला । पर्चा, कहने की जरूरत ही अग्रेजी मे था। उसमे समहो इतिहासकारो के नामों का उल्लेख था। हजारों उदाहरण थे। मनीषी लोग जैसा लिखते हैं, बिल्कुल उसी मॉडल पर था। उसमे कही भी कोई सुराख नजर नहीं आता था। लोग कुछ देर पर्चे की विद्वत्ता से सहमे बठे रहे । फिर तालिया बजाते रहे। "सवाल किसी को सवाल पूछने हैं ?" अध्यक्ष क इस सवाल पर एक बुजुग एक जगह खडा हो गया। बेला, 'पहले अपना परिचय दे दू । में पेशेवर इतिहासकार हू।" वे मुस्कुराये, "मैं जानता है।" मनीपीजी की एक रात

अध्यक्ष
अध्यक्ष ने कहा, "आप सवाल पूछिए।"
"इस निवध से हम लोगो को गहरा धक्का लगा है।"
उन्होंने कहा, 'इस निबध का यही उद्देश्य या।"
बुजुर्ग को कुछ और बोलने के पहले टोका, "सदाल
सिफ सवाल पूछिए । समीक्षा नहीं होनी चाहिए।"
"क्यो नहीं होनी चाहिए।"
"सवाल । सवाल पूछिए । समीक्षा नहीं।"
"मैंने सवाल ही पूछा है। मेरा सवाल है, समीक्षा क्यों नहीं होनी
चाहिए ?"
अध्यक्ष के कुछ बोलने के पहले ही वे माइक के नजदीक मुह लाकर
बोले, "वह इसलिए मेरे दोस्त, कि सवाल अभी मेरी मौजूदगी ही में हो
सकता है। समीक्षा तो बाद मे, मेरी पीठ पीछे भी हो सकती है । जसा
कि लोग पिछले बीस साल से करते रहे हैं।"
फिर सवाल नहीं हुए। सिफ तालिया हुई। लोग यह जानकर कि
वे हमेशा एक पे और कभी किसी से नहीं हारे थे, बच्चो को पीटने
पडोसियो के खिलाफ झूठी गवाही देने, रिश्वतखोरों के सामने दात
निकालने की घटनाए भूलकर अकहते हुए अपने-अपने घरो की ओर
चल दिए।
शाम कामयाब रही।
उत्तरार्द्ध
रात शहर के सभी प्रमुख मनीषियो ने उन्हें शहर के सबसे प्रमुख
होटल में दावत दी। मनीषापूवक शराब पीते रहे। जब शराब और
मनीषा अपने वजन और फैलाव में इतनी घुलमिल गई कि किस बात
के नीचे मनीपा है और किसरे नीचे शराब, यह जानना कठिन हो गया,
तब होने तय किया कि इस भावात्मर समय के बाद खाना खाया
जाए।
वे सभी सफ्ल मनीपी ये मोर कची मनीषा की जहा-जहा
दरकार यो वहा वे उसे साला से, थोक और खुदरा, सभी तरह से
मेरी येष्ठ ध्यग्य रचनायें

। पहुचाते चले आ रहे थे। जरूरत पड़ने पर, बिना विदेशी मुद्रा की दिक्कत महसूस किए, वे विदेशी मनीषा का आयात भी कर लेते थे। इससे वे सभी करीब करीव अतर्राष्ट्रीय हो गए थे और इस वक्त उनके मजाक, उनकी महत्वाकाक्षाए और उनके खाने का चिट्ठा-सभी कुछ अतर्राष्टीय हो रहा था। खाने के बीच से ही मनीषीजी के पेट मे एक हल्की सी चुभन होने लगी थी, पर उसका पूरा अनुभव उहें खाने के बाद लाउज में हुआ ज्यादातर लोग कॉफी पी रहे थे। जो कॉफी पी रहे थे वे मामूली मनीषी लोग थे, वे ज्यादा से ज्यादा सिकदर और पोरस की कुस्ती बराबरी पर घुडा सकते थे। मनीषीजी ने सिकदर को पोरस से हरा दिया था । वे खाने के बाद वाडी पी रहे थे। धोती-कुर्ते में एक पतला जिस्म दिखाई दिया। एक क्षण के लिए उनकी भौह चढ गई। उहोंने मुस्कराते हुए कहा, "प्रोफेसर राय, मैं यहा हू । आइए, जी भर कर धुमा छोड लीजिए। शाम वाला धुआ मुझे मिला नही था।" प्रोफेसर राय सिगार पोते हुए उनके आगे आकर खडे हो गए। बोले, "तुम्हारी आज वाली थ्योरी ताश का महल है। उसे गिरान के लिए धुए से ज्यादा क्सिी वजनी चीज की जरूरत नहीं है।" 'मुझ पर अपने लपज नही अपना धुआ फैकिए। आपने लीवाक का मजमून नही पढा, आक्सफोड ऐज आई सी इट।" उनके पास कोई महिला आकर खड़ी हो गई थी। उन्होने समझाया, 'लीकॉक ने कहा है, आक्राफोड मे विद्यार्थी पर पुराने प्रोफेसर जितना ही धुआ पंरते हैं-विद्यार्थी जितना ही धुआता है-उतना ही काबिल होता है।" महिला हसी। "मैं वहां वा घुआ पहल खा चुका है। अब प्रोफेसर राय ने सिगार माधुभा पाना चाहता है। प्राफेसर राय चलने को हुए । बाले, 'कालिख की चैसे ही इफरात है । तुम्ह अब धुए को और जरूरत नहीं है।' । मनीपीजी दी एक राव -- उहें मिलुस बुरा नहीं लगा । जब ये यूनिवसिटी में थे, कई बार विदश ना पुरे पे। याद में इस इतिहास-समिति म बाए। यहां रहते हुए उन्होंने भूगोल रे कई पारर गाए।पई जगहों पर ये नई गरह दे आदमियों से मिले थे और उनका शुभव या पि जानयरों की बात और है, पर आदमियों की यात का स्मो पुरा नहीं मानना चाहिए। राय महाशय के टलते ही वे उस अधेड महिला में गुम हो गए। नापी जिंदगी बितनी वीरान और आवारा रही, इस मजमून पर ये उसे एक सारगमित व्याख्यान सुनाने लगे। तभी जिस पुमन का पहले जिक माया है, उसका एक तीया-सा अनुभव उनके पेट में दुपारा हुआ। कोई भी हाक्टर उस घुमन का मतलब या इलाज नहीं बता सकता था, पर यह उनकी पुरानी तकलीफ पी और अभ्यास के सहारे वे इसे अच्छी तरह पहचानते थे। उन्होंने महिला से माफी माग ली। वे बची हुई बाडी एक सास मे निगल गए और जल्दी-जल्दी फिर से वधाइयां लेने और धयवाद देने के लिए मेजवानो की ओर चल दिए । उनके पेट की चुमन अव फलकर फेफड़े की ओर बढ़ रही थी और दूसरी ओर से घूमकर रीढ़ की हड्डी तक जा रही थी। उनके पैरो की नसें तनी-सी जा रही थीं। मेजबानो ने कहा, 'अभी से" गुडनाइट गुडनाइट । मुझे जरूरी, बहुत जरूरी काम है।" किसी ने उहें उनके होटल तक पहुचाने के लिए कहा । उहोंने टूटती आवाज में माफी मागी। बोले, 'मैं एक दोस्त की कार लाया घलत चलते उहोंने महसूस किया, उनके पायो को पिडलिया पत्थर जसी हुई जा रही हैं। जाडा था। चेस्टर से अपने जिस्म को ढके वे कार तेजी से चलाकर एक वीरान सडक पर आए । सडक छायादार थी और बत्तिया दूर-दूर थी। वे सीटी बजाने लगे पर सीटी ठीक से नहीं निकली । एक जगह उहोंने गाडी रोकी फिर थोडा आगे बढे । आखिर में एक पेड के नीचे गाडी खडी कर वे उतर पढे । उहोंने सिगरेट जलाई । एक हाय पट की जेब मे डाले हुए, दूसरे से वे अपना गाल सहलाने लगे। फिर मेरी श्रेष्ठ व्यग्य रचनायें - फुटपाय पर लबेलवे डगो मे टहलने लगे। भरपि गले से उहोंने एक गामा भी निकाला पर वह उन्हें कुछ वेगाना-सा जान पड़ा। वे धुप हो मए । उन्हें लगा कि ग्राही कुछ ज्यादा चढ गई है। लापरवाही से उन्होंने कहा, "उह, "कुछ दूरी पर बिजली के एक खर्भ को देखकर उन्होंने अखेिं सिकोडीं। अचानक उनकी पिंडलिया और कस गई। उनका पूरा जिस्म एक चुभन बन गया। ढीले सडिलो की अस्वाभाविक-सी आवाज निकालती हुई एक लडकी उनके पास से निकली। उन्होने अग्रेजी में कहा, 'इतनी देर बाद।" लडकी ठिठको, फिर फुसफुसाकर बोली, "चुप । पुलिस ।' वे कुछ सहम से गए। उन्हें अचानक प्रोफेसर राय याद आ गए। लहकी को अदर लेने के लिए उहोंने तेजी से कार का दरवाजा खोला। वे प्रौढ अवस्था के महापुरुष थे और उहें जो कुछ सुदरता मिलनी थी, वह शरीर की नहीं, मनीया की माफत मिली थी। किसी लकीर के आगे बडी लकीर खीचकर पहली लकीर को छोटा किया जा सकता है। इस हिसाब से वह लडकी उनके सामने कम उम्र और खूबसूरत थी। गाडी सावुनदानी जैसी थी और छोटी थी। वे सहक पर कुछ आगे निकल आए जहा विजलियो के ख और भी दूर-दूर हो गए ये उन्होंने गाडी को सहक से उतारकर एक पड के नीचे खड़ा कर दिया। लबा-चौडा मैदान था और अधेरी रात थी। इस वक्त उसमे वायरन, शैली और कीटस को आत्माए विरतन रहस्य और आनद की मुद्रा में विचर रही थी। दिन को मैदान का एक दूसरा उपयोगितावादी पहलू सामने आता मा जब वहां बच्चर और गधे घास चरने की कोशिश परत ये, लहके क्रिकेट खेलते थे। अपने समूचेपन मे मैदान कला की आनदपूण व्यथता और उपयोगिता इन दोनों पहलुओ की खाना पूरी करता था। मनीपीजी पस्टर जमीन पर विद्याए सेटे हुए थे। उनके जिस्म की धुमन खत्म हो गई थी। तहको अर्नेस्ट हेमिग्वे की रिसी नायिका की तरह उनकी छाठी से चिपकी हुई थी। उनको समी ऐतिहासिक गवे. मनीपीजी की एक रात पणाओ में यही एक ऐसी थी जिसे वे इस वक्त मुस्कराकर एकदम से 'हवग' नहीं बता सकते थ । उहें अब अपने से बड़ा प्यार छूट रहा पा और जम्हाइया आने लगी थी। इस भाव के उदित होते ही वे समझने लगे थे कि उनके लिए लडकी का उपयोग अव समाप्त हो रहा है । उहोंने प्रेमोत्तरकालीन बातचीत शुरू यो । वे उसे इतिहास समझने लगे। लडकी खिसककर उनके और पास आ गई और फुसफुसाकर बोली, "क्या तुम भी पुलिस से डरते हो?" अपने देश के गिरे हुए बौद्धिक स्तर पर उहें सचमुच ही अफसोस हुआ। पोट सईद के एक चक्ले मे उहाने एक बार मित्र के पिरामिडो की बात की थी। वहा उस लड़की ने उनकी बात समझ ली थी और जवाब मे एक शब्द कहा था, 'क्लियोपेट्रा ।" उनको डिी बोलती गयो, तुम कुछ नही समझी। अच्छा, कोशिश करो समझो । मैंने आज सावित क्यिा था तुम नही समझोगी। मैं तुम इतिहासकार का मतलब जानती हो। लडकी ने जम्हाई रेते हुए कहा में सिप इतना जानती कि तुम चिडी के गुलाम हो । सिफ बकबक करना जानते हो? उहोने लड़की की पसलियो मे उगलिया गडाइ । वह उनका मजाक था जिसपर वे खुद जोर से हस । लडकी ने घबराकर कहा "चुप । पुलिस उसकी घबराहट से वे खुद घबरा गए । न जाने क्या उहें प्रोफेसर राय की दुवारा याद आ गई । वे उठकर बैठ गए। उहांने धीरे से कहा, तुम नही समझोगी।' अधेरा था । उहोंने चारा ओर निगाह पुमाई । लहकी भी उठ- कर खड़ी हो गई थी। वे खुश हुए कि जो भी हो सेक्स का अध्याय ढग से समाप्त हुआ। सेक्म और धम और युद्ध-इन सबवे साथ या ही होता है । इनका कोई तव नही, इसलिए इनम कही न कही कुछ रह जाता है। जैसा भी हो, मनीषिया की यही थोडी-सी निर्वाधिक सोलाए हैं। उन्होंने सोचा, इस पर एक टिप्पणी लिखी जा सकती है। पर मन में उह कुछ खटक-सा रहा था। क्धे पर चेस्टर डाले, 1 ६ मरी श्रष्ठ व्यग्य रचनायें

'वेरी
कुछ लगडाते से वे कार की ओर लौटे। उहोने सडकी को अपराधी
बनाते हुए कहा, "तुम मुझे बिलकुल नही समझ पाई।"
"समी शराब पीकर इस तरह की बात करते हैं।"
अचानक उहें यह सभावना ठीक आन पड़ी । वे चुप हो गए।
कार के पास उन्होंने लड़की से पूछा, "तुम्हे कहा छोड दू।"
"यही मंदान के उस पार मेरा घर है।"
।"
वे बटुए से अदाज लगाकर नोट निकालने लगे ।
बचानक नोटा को हाथ से छूते ही उनके दिमाग से ब्राही और
गैर जिम्मेदारी का सारा असर खत्म हो गया । उहे आज का पर्चा
याद आ गया।
'फिर कहा मिलागे?" लडकी ने पूछा । सरसरात नाटों का स्पर्श
उनकी उगरियो पर अब भी ताजा था, लडवी का फिर से ग्राहक
बनने की बात उनके दिमाग से निकल चुकी थी।
क्योकि कल सबेरे से उहे धुद अपने ही ग्राहको से मिलना होगा।
यह याद आते ही उहे यवान ने घेर लिया। गाडी स्टाट पर लडकी
के सिर पर एक होनहार बाप की तरह रहाने प्यार से हाथ फेरा
और सोचने लगे कि कल के काम के लिए उहे अब जल्दी से गाराम
करना चाहिए, क्योकि इसना इतना कर चुकने के बाद किया गया
माराम हराम नहीं है।
मनीषीजीही एक राव
७

आधुनिक कविता में भक्तिकाल कुछ आलोचको की शिकायत है कि आज में कवि केवल अपने कवि- मित्रों के लिए ही कविताए लिखते हैं और उनकी कविता का जन- साधारण में प्रसार नहीं हो पाया है। मैं आधुनिक हिंदी-काव्य के बारे में इस प्रकार की निराशाजनक बातो को मुनने के लिए कतई तैयार नहीं हू । मेरा मत है वि वतमान हिंदी कविता एक अधिक व्यापक रूप में पुराने भक्ति-काल की प्रवृत्तियो का प्रतिनिधित्व करती है । वतमान कविता मे भक्ति नान, वैराग्य वा अपूर्व सामजस्य है। छायावाद तथा रहस्यवाद के आगमन के - तो प्रियप्रवास, पचवटी जयद्रय-वध आदि का बोलबाला था ही, जिनमे मा तो 'राधिका काहाई सुमिरन को बहानो है' वाली बात पाई जाती है या पुराणो के आख्यान और मर्यादा पुरुषोत्तम रामचद्र के चरित्र चित्रण मिलते हैं। मैथिली- शरणजी न यदि साक्त में राम को इष्ट माना है तो द्वापर में कृष्ण को, राम श्याम का ऐसा सयुक्त आराधन किसी मध्यकालीन कविम नहीं मिलेगा। वस्तुत द्विवेदी युग के सभी मवि भक्ति-पक्ष की कविताए लिखते हैं, और नही तो, नीति के वचन कहते हैं, 'नर हो न निराश करो मन दो।' छायावादवालीन कवियों में प्रसाद की धमप्रवण प्रतिमा ने कामायनी का सृजन किया जिसमें श्रद्धा को महिमा का वेदसम्मत वणन करके 'भक्षावाल्लभते लाम' की पुष्टि की है। उनकी कुछ भक्ति विभोर प्राथनाए तो बहुत ही प्रसिद्ध हैं 'पालना बों प्रलय की लहरें, 'करुणा- कादम्बिनि बरसे' आदि । 'अब भी चेत ले तू नीच' जैसे गीतो मे उहाँने मायालिप्त मन को वैराग्य का सदेश दिया है। चढवर मेरे जीवन रथ पर, प्रत्य चल रहा अपने पथ पर' जैसी पक्लियों मे उहोंने जीवन की क्षणमगुरता का निर्देश दिया है । प्रसाद जी को सर्वाधिक भक्ति-पूर्ण रचना है 'आसू । इसमे भू-लोक, नक्षव-लोक एव रहस्य-लोक की भावा- विष्ट सृष्टि करके कवि ने आसू को प्रभु की असीम करुणा का उप लक्षण माना है औ- उससे यना की है कि वह विश्व सदन मे चमके । निराला ने तो तुलसीदास पर एक काव्य अय लिखकर सिद्ध ही कर दिया कि राम ते अधिक राम कर दासा । फिर भी राम की शक्ति पूजा' में उन्होंने अपने शाक्त रूप का भी प्रचुर परिचय दिया है । बसे मानना होगा कि निराला स्मात वष्णव हैं। 'डोलती नाव अगम है धार, समालो जीवन खेवनहार' अथवा 'भर देते हो' जैसी रचनाए एक वष्णव ही लिख सकता है । उन्होंने 'पचवटी प्रसग' नाम्द एक लघुपुराण भी लिखा है। उनके कुछ गीतो से, यथा, 'हमे नाना है जग के पार' से 'चल चकई वा देश मे' वाला भाव स्पष्ट होता है । जिस प्रकार कबीर ने 'माया महाठगिन में जानो' मे माया की निंदा की है वसे ही निराला ने भी तू किसी के चित्त की है कालिमा' कहकर उसे तिरस्कृत किया -- सुमित्रानदन पत तो अरविंद के प्रभाव मे खुलेआम भक्तिवादी हो गए हैं और सुसार को भक्तिप्रवण होने का सदेश दे रहे हैं । 'आओ प्रभु के द्वार' में उन्होंने एक व्यग्र पुजारी की भावनाओ का चित्रण किया है। कविनियो मे महादेवी वर्मा जी द्वारा अज्ञात अव्यक्त परमात्म-तत्त्व की भाराधना तो जगद्विख्यात है ही, 'पथ होने गे अपरिचित, प्राण रहने दो अदेला मे 'एक एव चरेत्' वाले भाव की पुन पुष्टि की गई है। कोकिल जी के पदों में मीरा की सी और भक्ति भावुक्ता है। 'सखि अब रस बरसे मैं मोजू 'मा, आधुनिक कविता में , मुहाग भरी' या पदाको सुनते ही मन का सारा कलप घुस जाता है। रेद्र शर्मा ने युवावस्था में प्रमाद म प्रवासी ये गात लिये थे, परतु प्रवासी शरस ही परमात्मा से मिछुटी हुई यात्मा का बोध होता है और अनजाने ही जिग दान-तत्त्व ने उनकी धनी को तब परिप्पन दिया था वही उनकी अर्वाचीन पविताओं मे निद भाव से पंल रहा है शत गज-यल सयुत्त यन शिल्प व विश्वपम । शतरूपा गृष्टि शिवालय समुदाय विश्वधम ।। x X हो रही चतुर्दिर चिदाराश से पूक्ष्म वृष्टि । चिमय रस यी सब ओर रास, जग वृदावन ।। जब मैंन अजेय या नाम सुना था तभी ऋते शानाल मुक्ति' के आधार पर मान लिया था कि मुक्ति को पाने लिए उनके पाव्य का मान होना आवश्यक है । अपच की धार मे मग्न, वितु अपने आप मे स्वत तन मात्मा के लिए हम नदी के द्वीप हैं वाली पविता चिरकाल तक वेदातिया का ज्ञानवद्धन करेगी। जिसे कबीर ने 'जल का कुम कहकर छोडा था उसने आज द्वीप का-सा वृहदाकार ग्रहण कर लिया है। अरे यायावर, रहेगा याद' कहकर पोरासो योटि योनियों मे प्रमने वाले जीव को उसके वास्तविक रूप का बोध कराया गया है। अनेय की कविताए पानमूलक हैं किंतु उनका मूलाधार आस्था है। जिससे भक्ति की सृष्टि होती है। उसी प्रकार धमवीर भारती के अधा-युग मे यह जग अधा मैं फेहि समझायो की भावना के साथ ज्ञान भक्ति का अदभुत समन्वय करवे श्रीकृष्ण लीला वा सवरण किया है। श्रीकृष्ण- चरित्र पर लिखित यह एक पवित प्रय है। यहा मुये एक दूसरे सत कवि बच्चन की याद आती है जो कहते जय हो, हे ससार तुम्हारी । तुम जीते उस ठोर जहा पर हमने बाजी हारी। मेरी श्रेष्ठ व्यग्य रचनायें

इस भजन में एक अकेले व्यक्ति की तुलना मे ससार की महत्ता
का वखान हुआ है । ससार क्या है ? इसके उत्सर म गीता मे अर्जुन ने
भगवान कृष्ण से कहा है
प्रसीद देवेश जगन्निवास
त्वमक्षर सदसत्तत्पर यत
(गीत ११/३७)
अर्थात् हे भगवन, यह जगत् हो तुम्हारा निवास है । ससार प्रभु का
लीलामय निवास है, इसलिए बच्चन महाराज ने इस संसार के सामने
अपनी हीनता स्वीकार को है। भक्ति सूत्रो में से प्रति कहा गया
है। यही नहीं, ससार तो स्वय भगवान का रूप है। भागवत मे कहा
है
यस्मिन्निद यतश्चेद येनेद य इद स्वयम ।
योऽस्मात् परस्मान्ध पर न प्रपदये स्वयम्भुवम्
(भागवत 5/३/३)
ध्यान दीजिए य इद स्वयम् ।
उनका दूसरा भजन है
अकेलेपन वा बल पहवान ।
और इस प्रकरण में दतानेय का यह उपदेश सुनने लायक है
"वासे बहूना कलहो भवेत् वार्ता द्वयोरपि ।
एक एवं चरेत तस्मात बुमार्या इव ककपा ।
(भागवत ११४९/१०)
सासारित प्रपत्र में लिप्त प्राणियों को इस तिरस्कारपूर्ण भजन है
सचेत करने की चेष्टा की गई है तूने अभी नही दुख पाये।
नए कवि की आस्था वस्तुत विश्वास का ही नया नाम है जो
फलायक होकर रसानुभूति कराती है । और रस क्या है ? रसो ये
स । कवि पी बहु-णित अनुभूति भी गूगे का गुड है जिसका रस वह
अपने आप ही पाता है और वृथा दूसरो पर प्रकट करा की चेष्टा
करता है । अनुभूति का उत्तर अनुभूति ही दे सकती है, शब्द नहीं ।
थानिक कविता में भक्तिकाल

- ये तो दशन निरूपण की कुछ मौलिप बातें हैं जिनका यही तात्पर्य है किनवीन कवि भी परम भागवत एव धर्मतत्पर हैं सौर उनकी भाषा भी पुराने सत कवियों की सधुक्यही भाषा जसो अटपट और जटिल है। श्री सुरेद्र एव राम बहादुर 'मुक्त' द्वारा सपादित कविताए १९५७ नामक प्रथ की पहली कविता यों है तृप्ति की मयू मोहिनी का एप कण दे दो न मुत को X x छाह की ममता भरी श्य मल शरण दे दो मुझ को। (अपल) इस स्तोन मे 'रसो वैस' की मधुर कल्पनाएं विवृत्त करके प्रभु का भाव-कण पाने की याचना की गई है। दूसरी कविता यो है ये जो चेहरे पर खिंची लकीरें हैं x x X जो माये पर टेढे-मेढे आडे तिरछे बल हैं। x x X सब कुछ तो बदल गया पर मुख का भाव (अजित कुमार) इसमे माथे की लकीरो, अर्थात् प्रारब्ध के अमिट होने की बात कही गई है और उससे बचने के लिए प्रभु का आश्रय लिया जाए, प्रच्छन्न इगित किया गया है। तीसरी कविता यो है हरे भरे हैं बेत मगर खलिहान नहीं इस प्रकार जीवन के वाहा वैभव की वास्तविक निस्सारता को बताकर कहा गया है इसका १०२ मेरी श्रेष्ठ व्यग्य रचनायें

पकेगा फल पसना होगा
उन्ही को जो जीते हैं आज
जिन्हें है बहुत शोल का ज्ञान
(अज्ञेय)
इसमे पुन कमफल की अनिवार्यता सिद्ध करके नीति-काव्य दारा
शील की गरिमा की स्थापना की गई है।
चौथी कविता है निमिया की छाह तले। कवि हैं अधीर, बी० ए०।
इसके शोषक से ही विश्वताप से दग्ध जीव को प्रभु की करुण छाया के
प्रति प्रेरित किया गया है। पांची कविता में मनत कुमार 'पापाण' ने
शोषक दिया है 'फोरन् द्वार खोलो' । इससे भक्त की व्यग्रता और
भाव की उत्कटता प्रकट होती है । इसकी अतिम पक्तिया हैं
हे प्रभु, शव यह प्रपत्र का
तृष्णा के नयना से
घूर रहा है अब भी
बोलो द्वार, खोलो द्वार
फोरन् द्वार खोलो।
इस विह्वलता के आधार पर पाषाण जी को मनानद और रसखान
को कोटि में रखा जा सकता है।
इसके बाद 'भोर नामक कविता में अभय वर्मा गगा-स्नान और
राम-नाम आदि का महत्त्व गाते हैं
प्रसन्न हुई हदा नहाकर गगा
पडोस में राम का नाम जागा
इस संग्रह में कहीं गगाप्रसाद पाडेप मुक्ति की अकय कया कहते हैं
यह वही क्षण
मुक्ति मधुकण
सामने सागर निकट है
जो कगारों से कभी मिलता नहीं।
(मुक्ति)
बाधुनिक कविता में भक्तिकाल
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ये तो दशन निरूपण की कुछ मौलिक बातें हैं जिनका यही तात्पय है
कि नवीन कवि भी परम भागवत एव धर्मतत्पर हैं, गौर उनकी भाषा
भी पुराने सत कवियों की सघुक्तही भाषा जैसी मटपट और जटिल है ।
श्री सुरेन्द्र एव राम बहादुर 'मुक्त द्वारा सपादित कविताए
१९५७ नामक अप को पहली कविता यों है
तृप्ति की मधु मोहिनी का एप ण दे दो न मुन्न को ।
x
X
छाह की ममता भरी श्य मल शरण दे दो मुझ को।
(अचल)
इस स्तोत्र मे 'रसो वैस' की मधुर कल्पनाए विवृत्त करके प्रभु का
भाव-कण पाने की याचना की गई है।
दूसरी कविता यो है
ये जो चेहरे पर खिवी लकीरें हैं
x x x
जो माथे पर टेढ़े-मेढे आहे तिरछे बल हैं।
x x x
सब कुछ तो बदल गया
पर मुख का भाव
(अजित कुमार)
इसमे माथे की लकीरो, अर्थात् प्रारब्ध के अमिट होने की बात
कही गई है और उससे बचने के लिए प्रभु का आश्रय लिया जाए, इसका
प्रच्छन्न इगित किया गया है।
तीसरी कविता यो है
हरे भरे हैं खेत
मगर खलिहान नही
इस प्रकार जीवन के बाहा वमन की वास्तविक निस्सारता को
बताकर कहा गया है
१०२
मेरी श्रेष्ठ व्यग्य रचनाये

पकेगा फल पखना होगा
उन्हीं को जो जीते हैं माज
जिहें है बहुत शोल का पान
(अज्ञेय)
इसमे पुन कमफल की अनिवायता सिद्ध करके नीति-काव्य द्वारा
शील की गरिमा की स्थापना की गई है।
चौथी कविता है निमिया की छाह तले । कवि है अघीर, बी० ए० ।
इसके शीपक से ही विश्वताप से दग्ध जीव को प्रभु की करुण छाया में
प्रति प्रेरित किया गया है। पाचवीं कविता में मनत कुमार 'पापाण' ने
शीष दिया है 'फौरन् दार खोलो' । इससे भक्त की व्यग्रवा और
भाव की उत्कटता प्रकट होती है । इसकी अतिम पंक्तियां हैं
हे प्रभु, शव यह प्रपच का
तृष्णा के नयनो से
घूर रहा है अब भी
खोलो द्वार, खोलो द्वार
फोरन् द्वार खोलो।
इस विह्वलता के आधार पर पापाण जी को पनानद और रसथान
को मोटि मे रखा जा सकता है ।
इसके बाद 'भोर नामर कविता में अभय यमा गगा-स्ना और
राम-नाम आदि का महत्त्व गाते हैं
प्रसल हुई हवा महापर गगा
पडोस में राम का नाम जागा।
इस सम्ह में कहीं गगाप्रमाद पांडेय मुक्ति की आप सपा कहते हैं
पह वही क्षण
मुशि मधुपण
सामने सागर शिक्ट है
जोमगारों से कभी मिलता नहीं।
(मुस्ति)
थानिक कविता में मस्तिकात

कहीं गजानन माधव मुक्तिबोध' ब्रह्म का निरूपण करते हैं
निराकार सूने का घेरा किंतु अखड स्थिर रहा,
वह मेरा श्याम शूय
अनिमेष निहारता सहा रहा सत्यो को एक्टक
(कई बार)
गिरिजाकुमार माथुर अपनी प्राथना मे विराट रूप का ध्यान
करते हैं
जीवन को फिर विराट् गीत का आलाप दो
अग्नि दो, तपन दा, नया साप दो।
(नयी आग की खोज)
जगदीश गुप्त सासारिक व्यवहार की निस्सारता प्रकट करते हैं
हसी यह
खोखती है झूठ है, दिखावटी है
(हसी के पाश)
हरिनारायण व्यास शब्द ब्रह्म का माहात्म्य वणित करते हैं
चतय शिव आनद का उपभोग केवल शद मे
सोया हुआ है।
(आज यह दुनिया)
घमवीर भारती जीवन-यात्रा मे तष्णा की निस्सीमता पर कहते
हैं
यह सफर की प्यास, अबुझ, अथाह
(अतहीन याना)
विष्णुचद्र शर्मा जीव के देह धारण करने को कुत्सा पर क्षोम प्रकट
करते हैं
पयो जमा में,
क्यो मेरे मन मे जीवन की गाउँ खोली?
(वषगाठ के दिन)
मेरी श्रेष्ठ व्यग्य रचनायें
१०४

ये समस्त सत कवि साधुवाद, स्नेह और दया के पात्र हैं जो आज के नास्तिक-युग मे अपनो आस्पापूण भक्तियुक्त वाणी से लोक के बलुप को विशीण कर रहे हैं । आजकल मानव जाति अणुवम एव उदजन- अस्त्री के प्रबल तक मे डूब उतरा रही है, क्षुधा-तृपा की तुच्छ समस्याओं में प्रस्त है, अनेक आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक सघर्षों मे अपने आप को मूली हुई है। ऐसी दशा में हमारे सत कवि अपने स्वरो द्वारा हमें तात्कालिक यथाय से खीचर दूर ले जान की पवित्र चेष्टा कर रहे हैं और हमे उस चिरतन सत्य का दशन करा रहे हैं जिसे हम मूढतावश अपने लिए अनावश्यक समझते हैं । यह दृष्टि दोष है । यही माया है । किसी कवि ने कितनी सच्ची बात कही है एक कर्णनाभ मेरी आखो पर जाला बुनता है (धध, देवकुमार) याधुनिक पवित्रा में मस्तिवाल १०५ छात्रो मे अनुशासनहीनता कैसे रोकी जाए? छोटी कक्षामो में मुझे सिखाया गया था कि प्येक निबध को शुरुआत परिभाषा से करनी चाहिए, जैसे गाय पर निबंध लिखना हो तो शुरू इस सवाल से करना चाहिए कि गाय विस चिडिया का नाम है ? उसी तरह इस छोटे से निवध की शुरुआत इस सवाल से हो सकती है कि छात्रों की अनुशासनहीता है क्या चीज ? इतना तय है कि क्लास म न माना, फोस न देना, अध्यापको मे अबे-तबे करना, पितावो को कभी न देखना सहपाठिनी छात्रायो को लगातार देखते रहना, ऊलजलूल कपडे पहना, उससे भी ज्यादा ऊल- जलूल बोली बोलना-य, सब अनुशासनहीनता नहीं है, कम-से-कम इन्हें लेकर छात्रों को अनुशासनहीन नहीं कहा जाता । वैसे ही, सिनेमा में झगडा करना, रेल में बिना टिकट चलना, दुकानदारो से चोय या जजिया वसूलना, किसी भी रेस्त्रां मे पावकर अपनी सहशाही का “श्रुत्वा पढ़ते हुए फोक्ट में खाना और फोकट में खिलाना—यह सब भी अनुशासनहीनता मे नहीं आता। दरअसल, बगर कल के गुजरात और बार के बिहार की हालत पर गौर करें तो स्पष्ट हो जाएगा कि छात्रों की बगासनहीनता सिफ सडक पर जुलूस निकालने, हड्ताल करने, बसें जलाने, गोली खाने, जेल जाने, यानी सौ बात की एक बात--- पालिटिक्स भिडाने में है। सवाल यह है इस समय पानी जब जयप्रकाशनारारण जी सभी का सर्वोदय कर रहे हैं, छात्रो की इस अनुशासनहीनता को रोका कैसे जाए? अनुशासनहीनता का उपर्युक्त अथ जान लेने के बाद उसका हल आसानी से निकाला जा सकता है । सबसे सीधा रास्ता तो यह है कि पालिटिक्स ही खत्म कर दी जाएन रहे बास न बजे डहा । पर पालिटिक्स खत्म हो जाने से ग्राम स्तर से अखिल भारतीय स्तर तक के लाखो राजनीतिक नेता बेकार हो जाएगे और इतना बडा ले-आफ' होन से बेरोजगारी को समस्या और भो विकराल हो जाएगी। इस- लिए, पालिटिक्स मच्छी हो या बुरी, बेराजगारी को दूर रखन के लिए पासिटिक्स को कायम रखना ही पड़ेगा। उपाय यह है कि स्कूला, कॉलेजो और विश्वविद्यालयो को खत्म कर दिया जाए।न रहें छान्न और न रहे उनकी अनुशासनहीनता । पर इससे भी यह नुकसान होगा कि लाखा अध्यापक बेरोजगार हो जाएगे। और सभी मानते हैं आज की शिक्षा-सस्थाए छात्रों के लिए भले ही बेकार हो, अध्यापको की रोजी के लिए उनका कायम रहना लाजम है। वैसे भी, पदि शिक्षा-सस्थाए खत्म हुई तो उसी अनुपात से शराव- खानी, पागलखानो और जेलो की सख्या बढ़ानी होगी जो कि नैतिक दृष्टि से अनिष्टकर है । अत फिलहाल शिक्षा-सस्थाओ को अवध्य मानकर छूता छोड दिया जाए। तीसरा उपाय यह है कि कॉलेज खत्म न हो सकें तो छानो की परीक्षाए खत्म कर दी जाए, क्योकि 'इकलाब जिंदाबाद' के नारो की शुरुआत अव प्राय परीक्षा-कक्ष से ही होती है। पर पर्चा बनाने वालों, परीक्षा के निरीक्षको, अधोया, पयवेक्षकों और कापी पाचने वालों, नबर जोड़ने वालों, जोड की चेकिंग करने वालो, यानी परीक्षा से पैसा पैदा करने वालों की संख्या भी लाखों मे है और अगर परीक्षाए खत्म हो गई तो उनकी जीविका का एक साधन भी खत्म हो जाएगा, यानी छात्रों में अनुशासनहीनता कसे रोकी जाए? १०७ आज की परीक्षाए छात्रो के लिए भले ही बेकार हों, मास्टरों के लिए बड़े काम की हैं और सारी-की सारी शिक्षा मले ही खत्म हो जाए, परीक्षाए नही खत्म की जा सकती। तब सवाल उठता है कि पालिटिक्स को मिटाए बिना, शिक्षा- सस्थाओ को मिटाए बिना, परीक्षाओ को मिटाए बिना छानो की अनु- शासनहीनता कसे मिटाई जा सकती है ? इस प्रसग मे, सून रूप में, निम्नलिखित नुस्खो की आजमाइश की जानी चाहिए (१) राजनीति के दलदल मे वह खुद भले ही लोट रहा हो, पर प्रत्येक राजनीतिक नेता बार-बार यही चीखता रहे कि विद्यार्थियों को राजनीति से दूर रहना चाहिए । (२) सामाजिक जीवन की गुत्थियो और देश की समकालीन समस्याओ के साहित्य पर रोक लगा दी जानी चाहिए ! उसकी जगह 'यूष टाइम्स , 'माधुरी , 'फेमिना फिल्मफेयर', 'दीवानो' 'काफिडेंशल एडवाइजर' जैसी पत्र-पत्रिकाओं को रियायती दरों पर छात्रो मे बेचा जाए और स्कूलो मे मुफ्त बटवाया जाए। (३) गम हवा' जैसी गम फिल्मो रोक्कर 'मनोरजन', 'दोराहा', 'चेतना', 'जरूरत जैसी फिल्माने कलात्मक घोषित किया जाए, उन्हें मनोरजन कर से मुक्त किया जाए और प्रोड्यूसरों तथा डायरेक्टरों मे गदी फिल्में बनाने की वार्षिक प्रतियोगिता चलाई जाए। (४) किताबें बहुत महगी हो और शराब बहुत सस्ती हो। नशीली दवाओ का खुलेआम गुप्त प्रचार किया जाए। (५) गाधी की ब्रह्मचय साधना को लगोटीवादी राजनीति बताकर सेक्स सबंधी स्वच्छदता को राष्ट्रीय मान्यता दी जाए। (६) विश्वविद्यालय मे प्रजातन के सिद्धात, घाटे की ययव्यवस्था, मुद्रास्फीति आदि विषयों को छोडकर बराबर ऐसे सेमिनार होते रहें जिनका विषय हो "सिनेमा में सुक्न दिखाया जाए या नहीं' अथवा पत्नी के साथ एक प्रेयसी रपना तदुरुस्ती के लिए हानिकारक है या लाभकर।' (७) फिल्मो योर विनापनों की माफ्त बडे-बडे बालों, उल्टे-सीधे मेरी श्रेष्ठ यम्य रचनाए फैशनो, बेहूदा तौर-तरीका को प्रोत्साहित किया जाए। (८) होटलो, मिठाई की दुकाना, अहवापरा और शरायखानो पर उन्हें निरतर उधार लेने की पिरतन सुविधा दी जाती रह । (६) फौजी अफसरो प्रशासका, राजनीतिक नेताओ और असफल अध्यापको के अलावा सक्स-बम रेखा और मोगिता बारी मा राजेश खन्ना और शत्रुघ्न सिहा जैसे अभिनेताओ को विश्वविद्यालयो का वाइस चासलर बनाने का मौका दिया जाए। (१०) विश्वविद्यालयो का पाठ्यक्रम पच्चीस साल ताकि छान विश्वविद्यालय से बाहर आते आते बूढे हो जाए। (११) यह हालत तो सामान्य तौर पर रह पर बडे उद्योग पतियो, अफसरी और नेताओ + लडको के लिए खुफिया तौर पर छोट छोटे शिक्षा संस्थान चलाए जाए, जहा से वे भविष्य के उद्योगपतियो अफसरो और नेताओ की शक्ल में निकलकर अपा वाप का उत्तरा धिकार सुरक्षित रखें। (१२) सक्षेप में, कुछ ऐसा माहौल हो कि छात्रा का पूरा समाज 'गुलियस वेल्म' के याहू नामक जन्तुओं का समुदाय बन जाए व अपनी माधी से ज्यादा उम्र सिंफ उल जलूल ढग से बाल बढाने ऊल- जलूल फिल्में देखने, बेहूदा पनिकाए पढने, एक-दूसर पर खोझने चीखने- चिल्लाने, गुर्राने, सस्ता नशा करने, होटला म पोकट का खाना खान, हर तीसरे रोज बदलने वाले फैशन से हर रोज अपन को बहलान- बरगलाने और हर जगह से अपने को बरबाद करल मे बिताते रह । और, उसी प्रसग मे, देश मे जो जहा जिस गद्दी पर जिस तरह वठा है, वह वहा उस गद्दी पर उसी तरह बैठा रह । अब आप यह देखिए कि ये सुझाव तो मैं आज द रहा हू पर अपने देश मे ऐसी सूझ-बूझ वाले लोग हैं कि इनमे से अपने आप कई सुझावो पर बहुत पहले से अमल होने लगा है। छात्रो मे अनुशासनहीनता कैसे रोकी जाए? ।

दो सस्मरण (१) मेरे ध्यग्य लेखन का एक ऐतिहासिक क्षण १९४५ की बात है । तब तक विश्वविद्यालयों मे विद्यार्थी को देखते ही लफगा मानने का चलन नही हुआ था। ऐसे प्रोफेसर काफी संख्या में ये जो लडको को 'जेंटिलमेन' कहकर सबोधित करते थे, यही नही, उहें ऐसा समझते भी थे। में प्रयाग विश्वविद्यालय में था। वातावरण सब प्रकार से विद्यार्थी को जेंटिलमन बना डालने वाला था। हमारे छात्रावासों के मीटिंग हाल में योग्य और विशिष्टता पाने वाले विद्यार्थियो की वार्षिक सूचिया टगी हुई थी। ये० आई० सी० एस० में, पी० सी० एस० मे इसमें, उसमें-किसी भी तुक की सरकारी नौकरी की परीक्षा में सफल होने वालो की सूचियां थी। हम किसी न किसी दिन इन्हीं सूचियो में टगने की उम्मीद बाधे चुपचाप किताबें पढते रहते, उससे भी ज्यादा चुप होकर खेलते और छात्रावास के पुरातनकालीन शौचालयों, गध भरे, लगमप गदे भोजनालयो और बिना पानी के गुसलखानों में आते-जाते हुए अपने को जटिलमैन बनाए रखने की कला सीखते।

मेस और--रेलवे बोर्ड की भाषा मे सहास तो जैसे-तैसे चल जाते क्योंकि वे जैसे-तैसे अपने उद्देश्य की पूर्ति कर देते थे, पर बिना पानी का गुसलखाना कहा तक सहा जाता ' शायद पानी का दबाव कम था। जो भी हो, नल से चूद-बूद पानी टपकता था। चूद-बूद से घटे भर में वाल्टी भरती थी और चौथाई मिनट मे रीती हो जाती थी। गुसलखाने के मागे 'क्यू' लगता था, पर 'क्यू' का कोई नियम मानना जरूरी न था। नहाने वालो की भीड़ मे दर्ग की स्थिति पैदा हो जाती थी। इस स्थिति ने कुछ नेता पदा किए । नेताओ ने नहाने की व्यवस्था में सुधार करना चाहा। तब तक हम सीख गए थे कि किसी भी सुधार के लिए धुआधार आदोलन करना ही एकमात्र तरीका है । हम आदोलन पर उतर आए। सिफ बाथरूमी चप्पल और पैजामे पहने हुए, हाथ मे तौलिया और साबुन लिए न वदन जवामदों का एक जत्या हमारे छात्रावास से 'बाहर निकला । जुलूस की शक्ल मे हम वाइसचासलर डॉ० अमर- नाथ झा के बगले की आर बढे। आसपास के छात्रावासो वे लडके भी हमारे दुख से दुखित होकर जिस्म से कपड़े उतार-उतारकर, तौलिया झटकारते हुए, जुलूस में शामिल हो गए । 'इकलाब जिंदाबाद' का वातावरण बन गया। लोटे-लोटे की झनकार, सारे बाथरूम बेकार के नारों से खुद हमारे ही दिमाग गूज उठे। ऐसे मौके पर प्रयाण गीत के लिए मैंने एक कविता लिखी थी जिसे महा दोहराना ही इस टिप्पणी का असली उद्देश्य है। यह कविता उस जमाने के प्रसिद्ध प्रयाण गीत खिदमते हिंद में जो कि मर जाएगे, नाम दुनिया में अपना भी कर जाएगे। की तज पर लिखी गई थी और इस प्रकार थी "हम बिना बाथरूमो के मर जाएगे। नाम दुनिया में अपना भी कर जाएगे। दो सस्मरण यह न पूछो कि मरकर पर जाएग, होगा पानी जिधर, बस उधर जाएगे। जून में हम नहाकर थे घर से चले, यब नहाएगे फिर जब कि घर जाएगे। यह हमारा वतन भी अरब हो गया, आज हम भी खलीफा के घर जाएगे।" –यादि-आदि यह मरी पहली व्यग्य रचना थी। पता नहीं, उस 'क्रुण-करुण मसूण मसृण' वाले जमाने मे-जब कि ज्यादातर में खुद उसी वृत्ति का शिवार था-मैं यह प्रयाण-गीत स लिख ले गया। जो भी हो इसका यह नतीजा जरूर निक्ला वि लगभग दस साल बाद मैंने जब व्यग्य लिखना शुरू किया तो मुयमे यह आत्मविश्वास था कि मैं दस सार की सीनियारिटी का व्यग्य-रेखा हू थोर दूमरो की तरह किसी भी पोच बात को सोनियारिटी से सहारे पला सकता हूँ। पर, अपने व्यग्य-लेघन रे बारे में इतना तो मैंने लगे हाथ-यू ही-बता दिया । जहा तक बापम्मो की बात है, खलीफा-हॉ० झा ने हमारे आदोलन को सफल बनाने में बही मदद दी। आज की तरह विद्यापियो के जुलूस को देखते ही उही पुरिस नहीं घाई, गोली नहीं चलवाई, प्रेस के लिए सारीर नहीं दी, इसे अपनी इज्जत या सवाल नहीं पाया । सिफ दो एक छोटे छोटे वाक्यों में जुलूस के रानीपन का हवाला देते हुए उन्हाने आश्वासन दिया ठिोर गरे नए पापस्मों की व्यवस्था हो जाएगी। यही नहीं -आज थापको ऐसी बात गुगर अपम्मा भले ही हो उहाने जल्दी ही अपना भारदारान पूरा भी कर दिया। (२) मूतनापी चोरी मेरे पाणवठे हुए मेरे महपाटी गदे वस्त्र में एक पदी जिस वाली रिवाब रखी हुई दी। रिटमे पांच दिन से मेरा मन इसीरिवार मेरीग्रेडपम्प बनायें से पाच । मे लटका हुआ था। उसे हाथ से छूने के लिए, भाषा में लिए मैं उतावला हो रहा था । इस गदी जिल्द मे मतनाय के से आठवें भाग तक बधे हुए थे। पहले के चार भाग में पढ़ चुका था भागे के लिए मुझे इसी जिल्द का सहारा था। पर मेरे सहपाठी ने मुझे किताब देने से इकार कर दिया था। मेरे सहपाठी के बड़े भाई का नाम भूतनाय हो पाया था। असली बात जानने के लिए बहा शोध करना पड़ेगा, भूतनाथ की-सी ऐयारी करनी पड़ेगी। वह पहले कलकत्ते मे कुछ परता था। उत्तर प्रदेश के इन इलाको से लोग कलकत्ते जाते है यहा 'कुछ' करते है और पैसा कमाते हैं । शायद उसका कुछ बहुत बुछ जसपल रहा । इमीलिए कुछ दिन बाद वह घर लोट आया, साथ में चद्रकाता, चीता मतति और भूतनाय का पूरा सेट ले आया। कुछ दिना तक गाव मे तिलिस्म और ऐयारी का बोलबाला रहा । लागो की बातचीत के ढग और नाम तक बदलने लगे । उसी हल्ले मे मेरे सहपाठी के भाई को लोग भूतनाथ कहने लगे । मेरे सहपाटी का महत्त्व बढ़ गया । वह अचानक भूतनाथ का छोटा भाई हो गया । नब मैं मिडिल स्कूल गे छठी कक्षा में पढ़ता था । उसस मागकर मैंने भूतनाथ के चार भाग पढे । आग के भागी के न मिलने पर, उसका पुराना एहसान भूलवर, शुद्ध भारतीय परपरा के अनुसार मैं उसका दुश्मन बन बैठा । खरीदने या मागने स भूतनाथ के अग: भाग पाना गभव न था। गरफ्त कर मेर लिए यही रास्ता बचा था कि मैं इस जिल्द को चुरा ल। यह उन दिनो की बात है जब इस तरह की चारी करने से काई बाल अपराधा के रूप में एक मामाजिक समस्या बनने का अधिकारी नही होता था। परडे जान पर दा चार लप्पड लगा दिए जाते और किताब छीन से जाती, बस, बात यहा तक रह जाती । इमलिए किताब चुराने का प्रा प्रश्न मेरे नाग इसी रूप म आया कि किस तरह बिना पाट म आए विताव टाच दी जाए। जा भी हो, मैंन विताव टाच दी। वास्तव म यह बहुत आसान बात थी और मेरे लिए विल्कुल नई भी न थी। भूगोल के घट म मास्ट दो सस्मरण माहब का हम लोगों पर बड़ा द्रावक प्रभाव पड़ता था। सभी लहरे बार-बार पानी पीने या पानी निकालने के लिए बाहर जाते थे। मेरा सहपाठी भी कुछ देर के लिए वाहर गा और मैंने हाशियारी के साथ किताब टाव दी। मैं जानता था कि कुछ देर बाद वह विताव की चोरी का तमाशा खहा करेगा। अत मैं पल ही किताव छुपावर पानी पीने के लिए बाहर चला पाया। कुए के पास गदा पानी यम गया था, बडी बने घाम उगी थी और केले का एक झुरमुट था। वहा मैंने भूतनाय (भाग ५. ८) को पिता किमी रस्म के दपन कर दिया। शाम को निकालने । इरादा करके चुपचाप अपने निक्लक चेहरे के साथ दर्जे म पाकर अपनी जगह बैठ गया। एक घटे वाद क्लास मे छानबीन शुरू हुई। मेरे सहपाठी ने घोषणा की वि विसी ने उसकी विताय भूतनाथ (भाग ५-८) पुरा ली है। इस पर भास्टर मार ने उसके दो चार झापर गाकर प्रारभिन वक्तव्य दिया किसिफ उमा जस रफगे ही ऐसी स्तिाव पद सक्त हैं । जिल्द का देखते हुए विनाय का यह वणन अपर सत्य था । अब मास्टर मात्य दूसरा वरतय्य दिया, 'मव रडवे अपनी-अपनी जगह पड हो जाए । सबके बस्ती की तलाशी ली जाएगी। यह राज का काराबार था और हम सब इसके अभ्यम्न । हम खडे हो गए। मानीटर न मव के बस्तो को नलाशी भी शुरु मी, मैं दाशनिको की तरह चुपचाप पडा रहा । आदमी को पकड म आने वर सर न हा ता दाशनिक जसा नियन मे लगता ही क्या है? अचानक एक लड़के के वस्त म किताव कि गई। दर्जे प शार मन नगा । मैं अप प मारर इस रिश्म को देखता ही रह गया। मास्टर साह्म न हो वा एहरे पर चारा बत बिना कुछ पह ही पटवार पिर गारिया देत हा पूछा क्या , आग "रा हारगा मा रात रोन सहो या बहरापूर गया । ग्मिी सरह स नमन रहा, मैं "7 जुराया ही है। यह किताब ले १४व पाम पडी था। मरीष्ट याद रचनायें मैंने यू ही उठा लिया था।" मास्टर साहब ने उसे दो वेत और रसीद किए और कहा, "झूठे की औलाद । चो? । सब सच बता, किताब क्यो चुराई " अब मेरे लिए धागे बरदाश्त करना मुश्किल था। मेरे ही कारण मेरा साथी मार खा रहा था। मुझसे बोले बिना नहीं रहा गया । बागे क्या होगा, इसकी चिता किए बिना ही में अपनी जगह से चिल्लावर बोला, "मुशी जो, यह ठीक कह रहा है। पता नही कोन बदमाश इम केल के पास फें आया था। मैं जब पानी पीने गया था तब मैंने खुद देखा, यह किताब केले के पास ही पड़ी थी।" फिर तो क्लास के एक और मशहूर लडके ने मेरी बात श ममथन किया । अत मे इन गवाहियों पर अपराधी को रिहा कर दिया गया। भूतनाय फिर मेरे पडोसी के बस्ते मे रख लिए गए। कुछ देर इस बात पर बहस चलती रही कि किताव केले के पास कैसे पहुची । फिर बात खत्म हो गई। अपने साथी पर मार पडते देखार भी मैंने सच बात नहीं बताई, इसलिए आप मेरी फापरता की निंदा कर सकते हैं। वैसे, करने को आप सब कुछ कर सकते हैं, पर मेरे इस व्यवहार का एक कारण था। कारण यह था (और है) कि मैं हीरो नहीं है। यह मेरी बड़ी प्रारभिक कमजारी है। काश, मैं उस मौके पर चिल्ला सरता, "मुशी जी, उसे छोड दीजिए असली अपराधी में है।" तो मचमुच ही इस घटना से मेरे परिव में दुलभ भानवीय गुणो का परिचय मिल सकता था । पर इसका नतीजा आगे चलकर कुछ और ही होता । तब मुझे खुद लाज अपन हाय से यह सस्मरण न लिखना पटता । इस पटना को वीर पूजको ने पहले ही उडा लिया होता और छोटे दलों की पाठ्य पुस्तको में इसकी कहानी घलने लगी होती । खेद है दि स्कूल मास्टर के बेत के दर ने मुये सच नहते रहने भी झूठ वालन पर मजबूर कर दिम और इस तरह एक अच्छी खासी कहानी के आदशवादी मत को विगार कर रख दिया। दो सस्मरण धोखा . कथामुख बाबू मन्नालाल निगम, बी० एस सी०, एल. एल. बी०, एस० टी० ने इस साल लोक्ल सेल्फ गवनमंट का डिप्लोमा भी ले लिया और फिर वे सोचने लगे कि जीवन-समाम म परेवाजी दिखाने के लिए अभी कौन सा कोना मरसे ज्यादा माली है। प्रत्येक कोने में एक से एक तदुरुस्त तरेवाज बडे हुए अपनी मास पेशिया मरोड रहे थे। यह भीडभाउ बालू मनालाल पिछो छ साल से देखत चर आ रहे थे। बी० एस सी०, एल० टी० करने के बाद ही उहें अपना कालिज छोड़ देना पडा । उसके बाद उन्हें एक देहाती स्कल मविका अध्यापक बनाया गया।नीर घटे आठवें नवें और दसवें दर्जे मे विनान पढाकर और चौथे घटे म सातवें दर्जे का सस्त और बार के तीन घटो मे तीन छाटी कक्षामा म अग्रजी आर इतिहास पढा चुनि पर भी वे अपनी निगाहा म सभी मी मनी प्रतिमा के विद्वान होगीठ पाये । बेचार हानी विद्यार्थी जो रेवल इसी सतोय म पद 41" उ अनजी स्कर में पढाया जा रहा है और जा या पर वता की पू, उमेठत हुए अपन पाप के भाग-वायन डाई आक्साइड, ह इड्राउन, नाइट्रोजन, रिलेटिव हेजिटी विटामिन डी, लिवर आमडिज़, एक सांस में कहकर उसे यह संतोष देते पे कि उसका सहका साहबों जैसी अग्रेजी बोल रहा है, कभी भी बाबू मन्नालाल की मजबूरी को नहीं पहपान सवे। अटठावन रुपया प्रति मास तनख्वाह पाकर और अस्सी रुपया की रसीद पर बरावर हस्ताक्षर बनाने पर भी मायू मन्नालारा ने मन को समझा लिया कि अध्यापक-वृत्ति ही ससार को ऐसी वृत्ति है जिसम आदमी ईमानदारी से रह सकता है। पर, मई के महीने में उनकी जगह स्कूल के मैनेजर के पी० एस-सी० फैल भतीजे को नियुक्त कराने के लिए बाबू मन्नालाल को जब नौकरी मे हटने का नोटिस मिला तो विवश होकर अगली जुलाई स उन्हें थकालत के दर्जे में नाम लिखाना पड़ा। दो साल डाकघर की फ्लर्की और कानून की पढाई को साप साप निभाकर बाबू मनालाल स्थानीय कलक्टरी में वकील की हैसियत से प्रकट हुए । ईश्वर की कृपा से शरीर अच्छा था और कपडे रोबीले थे। पहले ही दिन एक मुकदमा हाय लगा। अदालत में दूसरे पक्ष की ओ- से घसीट उर्दू मे लिखा हुआ जवाब दावा पाकर बाबू मन्नालाल चकराए । न जाने किस धोखे में उन्होंने हाई स्कूल तक उर्दू के बजाए हिंदी ले रखी थी। वे चश्मा उतारकर और चेहरे पर अनगिनत मुरिया डालकर पढने ही जा रहे थे कि मुवक्किल ने पूछा, "क्या लिखवाया दुश्मन ने वकील शिकभी विवब्जेदारी ?" पूरी तरह कोशिश करने पर भी वरील साहब कुछ पढ न सरे । सपू और काटजू की तस्वीरो को मन ही मन प्रणाम करके बोले, 'शिवमी।" सुनते ही मुवक्किल उछल पडा। बगल में खडे हुए आदमी को झकझोर कर बोला, "अरे सुनते हो बरखडी दुश्मन ने अपने को शिक्मी रिखा दिया। तब तो मुकदमा ही खत्म हो गया। वही तो कहा, लिखाने के लिए भी कलेजा चाहिए, क्लेजा।" इस निमल उच्छास ने बाबू मनालाल निगम बी. एस पी०, एल. एल० बी० (वकील) के हृदय पर तानकर घमा मारा । बोले, 'एक जाओ भाई, अभी इतना साफ नहीं हो पाया।" साहब, धोखा मुवक्किल के मानद को धक्का लगा । उसने पूछा, "क्या साफ नही हमा" " बाबू मन्नालाल ने पास खड़े हुए एक आदमी को शक्ल से उद जानने वाला ममहकर कहा, "इसे पढिए", और पढ़ने के लिए जवाब- दावा उसके हाथ म दे दिया। मुवक्किल सनकी हुई निगाहों से कुछ देर देखता रहा, फिर बोला, "तुम उर्दू नही जानते वकील साहब इधर वकील साहब ने कहा, 'फ्यादा नहीं जानता।" उधर पढने वाले ने जोर से पढा, "मुद्दाअलेह आराजी मुतनाजिया पर अर्सा आठ पाल से बतौर फग्जेदार काबिज व दखील है।" मुवक्किल ने उसके हाप स कागज छीनकर कहा, "बडे धोखेबाज हो वकील साहब । यहा उमर अदालत ही मे बीती है और वही हमे चरान गले हो। उर्दू तक तो जानते नही और करोगे वकालत । अरे जाओ बरखडी, दे आओ पडित राघेसरन को वकालतनामा।" बाबू मन्नालाल सर नीचा किए हुए चल दिए । चुपचाप घर आए और किताब में शिक्मी और कब्जेदार का अप ढूढने लगे। इस पकार प्राय एक साल बीता। शिक्षा विभाग के कोने में हजारो सुदृढ मासपेशियों वाले पैतरेबाज दिखाई पडे । उधर जाने का साहस न हुआ । वकालत के कोने मे उससे भी अधिक सख्या मे पतरेबाज़ दिखाई दिए । उदू ज्ञान और कानूनी पेंचो नै बाबू मनालाल की हडडी चूर चूर कर दी। अब इस नये डिप्लोमा को लेकर वे म्युनिस्पलिटी के एक्जीक्यूटिव आफिसर बनने चले। लोगों से सलाह लेपर म्युनिस्पल कमिश्नरो से बाबू मन्नालाल ने मुलाकात की और सबने उन्हें सलाह दी कि वकालत का पेशा सबसे अच्छा है और एक्जीक्यूटिव आफ्सिर वे उसी को बनाएगे जो कुछ साल कही एक्जीक्यूटिव आफिसर रह चुका हो। बावू मन्नालाल के जीवन का एक वप और बीता। अत में उहोने तप किया कि किसी दूसरे शहर परकर कुछ दूसरा काम किया जाए, पैसा कमाया जाए, फिर अपशास्त्र में एम० ए० करके रिसच की जाए मेरी श्रेष्ठ व्यग्य रचनायें और इस प्रकार संग्राम-क्षेत्र के किसी ऐसे कोने मे जगह की जाए जहाँ बन से कम लोग हों। 'कुछ दूसरा काम' करना आसान पा, बशर्ते कि वह मिले। जूते में पालिश करने वाले प्रेजुएटो की कहानिया सुनी थी पर एक दश्प दख कर उन्हें ये कहानियां भी भूल गई। ट्रेन के जिस डिब्बे मे बैठे वै सफर कर रहे थे वही एक गदा लहका एक मुसाफिर के जूतो मे पालिश कर रहा था। बिजली की-सी फुर्ती से उसने जूते चमकाकर रखे ही थे कि मुसाफिर ने कहा, "अभी चमक नही आई । काम सिफ दो पंसा का हुआ है।" लडके ने जूता उठाकर अपने घुटनो मे दबाया और कुर्त के निचले हिस्से के दोनो सिरो को दोनो हाथो मे बीचते हुए जूते पर खराद-सी करनी शुरू कर दी। मुसाफिर के गाल हसी से फूल उठे। वह बोला, "बस यही तो जूता चमकाने का तरीका है । जूता ब्रुश से साफ भले ही हो जाय, पर कही चमकता भी है।" बाबू मन्नालाल की विचारधारा इस दृश्य से दूसरी ओर मुड गई। उन्होंने तय किया कि 'कोई और दूसरा काम' इसके अलावा होना पाहिए। अब तक उनके स्वभाव में काफी परिवर्तन आ गया था। ससार की सक्ट पाठशाला (यह शब्द उहोंने ट्रेनिंग कालिज में सीखा या') में पढ़ते पढते काफी समझदार हो गए थे। उनके साथ बैठने का अथ उनसे जान पहचान हा जाना था। जान-पहलान होने का अर्थ उनके साय शाम बिताना था। शाग बिताने का अर्थ अपने मनोबैग में आग लगा देना था। संसार की सक्ट पाठशाला में निपुणता मिलने हो वाली थी कि बाबू मनालाल को 'कोई दूसरा काम' टूढे मिल गया । यह काम मिला बाबू रायबहादुर दवाफरोश, डेंटिस्ट, जादूगर, प्रेतबाधा- निवारक, कीर्तन-क्ला विशारद की दयापूण दीक्षा से । कथा चौराहे के एक कोने मे घेरा बाधकर भीड खही है। इसमे न जाने घोखा कितने विद्यार्थी, व्यवसायी, याबू लोग और पुली-मरदर है। बीच में बाबू मन्नालाल कुछ ऐसे विश्वास से भाषण दे रहे हैं मानों प्रताडित मानवता के कल्याण के लिए पृथ्यो ने वर्षों की तपस्या के बाद ऐसे पुरुष रत्न को जन्म दिया है। तनके आगे एव ऊधी मेज है। उससे जमीन तक लटकता हुआ इश्तहार शाम की घलती हुई धूप मे चमक रहा है। उसमे उद, हिंदी, अग्रेजी और गुरमुखी के हरूफ मे लिखा है, "श्रीमान प्रोफेसर एम एल निगम ची० एस सी०, एल. एल० बी०, एल. टी०, एल० एस० जी०डी०, आयूर्वेद विशारद, सवबाधा निवारक!" मेज पर हजारों तरह की शीशियो व पकेटों में रग बिरगी दवाए रखी हैं। वाबू मनालाल ग्रीचेउ वा खाकी कमीज़ पहने हैं। कमीज पर चमडे की पट्टी से बधा हुमा, अपनी आवाज से शेर चीतों व डावुओं के दिलो म खौफ पैदा करने वाला नकली अमरीका तमचा झूल रहा है। सर पर काली क्लगी वाली एक अजीब सी हैट है । हैट पर एक बल्ब जलता है बुझता है फिर जलता है। उनका चेहरा पहले से अधिक स्वस्थ है और आवाज मे मजे हुए पेशेवरों का अभ्यास है । हजार बातें कर कर दाए बाए खडे हुए दो पहलवानो की ओर इशारा करके वे फिर कहते हैं 'तो हाजरीन, कौन कहता था कि वे दो पिद्दी से इसान जिनके गाल पिचके थे, आखें गढ़ों में थी, पीठ झुकी थी, सीना नादारद पा-वे दो इसान जिनके दिलो मे मायूसी थी, जेबो मे खुदकुशी करने के लिए उहर था वे दो इसान इस अक्सोर दवा के इस्तेमाल से इस कदर लह लहा उठगे कि उनसे हाथ मिलाते हुए गामा और विस्वो भी एक बार सवपरा जाए। भोड पर उसका मसर जानने के पहले ही बाबू मनालाल फिर कहावर कहते हैं "हमारी दवा ने इन लोगो का इसानियत की पुलदी पर लाकर खड़ा किया है। है कोई इस भीड में जो इनस हाथ मिलाए" भीड चुप है। १२. मेरीधेष्ठ भ्यम्य रचनामें फिर एक कडक "है कोई।" भीड मे कोई नहीं है। "तब ऐसी दवा के लिए अगर एक शीशी का चाज चार रुपया है है तो क्या ज्यादा है ' हम बेईमान नहीं । हम दवा नही, जिंदगी बेचता है । हम हिमालय की गुफाओ मे शेरो की जमान निकालकर उसके सत मे चीत का कलेजा मिलता है, जिससे यह दवा बनतो है । हम बेईमान नही जो एक पैसे की खडिया मे पाव भर पानी डालकर जरा-सा लेमनेड घघोल दे और उसे चार रुपयो मे वेच दे । हमने अपना जिस्म गराया है। कौन कहता है कि हम बेईमान हैं ?" कोई नही कहता कि बाबू मनालाल बेईमान हैं। "शम लगती हो तो यहा नही, महावीर के मदिर मे हम रुका है । पब्लिक वहा से दवा ले सकती है। पर शम किस बात की ?" शम किसी बात नहीं। कुछ आदमी रुपया निकालते हैं और विकी शुरू हो जाती है। फिर खेल खत्म होता है । कुछ हिस्सा पहलवानो को मिलता है, कुछ हिस्सा दलालो को। अपने हिस्से को ताक में चौराहे का सिपाही माता है । कहता है, "होशि- यार रहना उस्ताद । दीवारो के भी कान होते हैं।" चूकि दीवारो के भी कान होत हैं, जिनके पीछे हाय वाले मौजूद है, इसलिए उसी शाम कुछ का कुछ हो जाता है । गडिया मिले पानी को दवा कहकर वेचने व अनेक अय प्रकार के अपराधों के खुल्ने के सिलसिले में बाबू मनालाल हवालात मे डाल दिए गए है। रात है और बहुत दिन के बाद उहैं सोचने का अवसर मिला है कि वे पढे लिखे आदमी हैं । उन्होने बी. एम सी० दिया और विद्यालय ने उहें विज्ञान का बुमार बना दिया। तब भी आइस्टीन और न्यूटन की परपरा क्षितिज सो अस्पृश्य रही। उहें बताया गया था कि शिक्षा विज्ञान पढकर मनुष्य देश की मरती हुई नव-मानवता के माग को प्रशस्त करता है, वह अज्ञान और धोखा १२१ अधकार पर जिहाद बोलता है, युग को बदलने के लिए नये तत्त्वो का सृजन करता है। उन्हाने एल० टी० किया । अटठावन रुपया मासिक पाया, फिर फुछ नही पाया। उन्होंने जिहें शिक्षा दी, वे भी उही रास्ता मे मटक रहे हैं जहा अब भी बाबू मनालाल की बेबसी झलक रही है। उन्होने कानून पढा । साधारण माव-समुदाय पर अपनी विद्वत्ता मुखर दृष्टि फेंककर भाग्य का निणय तो दूर रहा, वे उनकी अज्ञानता का सकट तक न दूर कर पाए । वकील होकर भी वे गूगे की आवाज न बन सके । वे खुद अपनी आवाज से अनभिज्ञ रहे। फिर भी विश्वविद्यालयो ने मजबूत और चिक्ने कागजों पर चम- कते हुए अक्षरा मे लिखकर उनसे बताया, 'जाओ, तुम वैज्ञानिक हो, तुम शिक्षक हो, तुम विधानज हो।" उहें न जाने कितनी शीशियों मे अचूक कही जाने वाली दवायें मिली, पर वे दवायें न थी। वे पानी और खडिया का निरथक घोल भर थी। बाबू मनालाल की आखो म विवशता के आसू आ जाते हैं । बडे बड़े वैज्ञानिक, विद्वान्, यायपति मन मे आधी उठाते हुए आते हैं और ओखा से पानी बनकर निकलने लगते हैं। और बेहया नीद आकर उनकी आखें मूदती है उनके अग ढीले कर देती है और उहें अपने आंचल मे ढाक लेती है । उपसहार घूकि अभी अधेरा है और बाबू मन्नालाल अभी सो रहे हैं, इसी. लिए उनकी पलको का गोलापन तुम नही देख रहे हो। १२२ मेरी श्रेष्ठ व्याय रचनायें चौराहे पर चौराहे से थोडा हटकर चार-पाच टैक्सिया--शहो, चुनाव चिह्नों, लाउसस्पीकरों से लैस--खड़ी थी। उनके बानेट मे बठे हुए चुनाव- सेनानी अपने अपने उम्मीदवार की ओर से अपना अपना डायलाग बोल रहे थे । नागरिक भीड बन गए थे। चौराहे पर एक नागरिक एक टक्सी के नीचे आ गया। जब तक उसे बाहर किया जाए, मौत के हाथो उसकी नागरिकता के अधिकार छिन गए । नागरिको ने टैक्सी को घेर लिया। 'इकलाब जिंदाबाद' आदि के नारे लगने लगे। 'आदि मे गालिया भी शामिल थी। टैक्सी पर पीला शहा लगा था। उससे एक आदमी बाहर निकला। बॉनेट पर खड़े होकर उसने भीड को-यो देखा जैस क याकुमारी से मानसरोवर और मटक से क्टक तक निगाह फेंव रहा हो। यह इत्मीनान करक कि राष्ट्र उसी का है, वोला, "मधुआ, शान हो जामो । टैक्सी ड्राइवर को मैं पहले ही पुलिस के हवाले कर चुका है।" "पर पुलिस तो अभी आई नही है ।' नागरिको ने कहा । प्रात हमेशा की तरह सही थी, पुलिस अभी रास्ते मे ही थी। "पुलिस का सिपाही पहले ही से हमारे साथ था। हमने उ साप टक्सी ड्राइवर को पाने भेज दिया है।" उसके चेहरे पर दूरदर।

पा तेज झलकने लगा। मोड ने कहा, 'हम टक्सी म आग लगा दो।" "बधुओ, इसके लिए तुमने एक मिनट की देर कर दी है । वार्ता आरभ हो जाने के बाद हिमा का कोई यथ नहा है।" कुछ लोग मुर्दे का थान और अस्पताल के राम्न श्मशान ले गए। चौराहे पर कुछ और शार, मोटरवालो और बिना मोटर वालो का वग सघष, पुरानी दुघटनाओ की याद, गीता के उद्धरण, निंदगी पानी है का अवेपण-थोड़ी देर मे आमदरपन पहल की तरह जारी हो गई। पौराहे से कुछ दूर चुनाव अभियान के टक-रग बिरगे झडे और पोस्टरावाली टक्सिया-भाषणो के गोले निकालने लगे। चौराहे के एक ओर कॉपीहाउस था। जहा धुभा हाता है वहा आग होती है' के यास से कॉफीहाउस मे कुछ मनीपी-इंटेलेक्चुअल- मोजद थे और अपनी बहस से कुछ समस्याओ की समस्या में समस्या वान् ये । दुघटना की बात सुनकर एक इटेल्क्चुअल ने कहा, देवीतीन जी अब नही रहे।" 'कौन देवीदीनजी?" "वही जो अब नही रहे । उही वा ऐक्सिडेंट हुआ है।' "५ बौन?" 'स्तता संग्राम के मेनानी थे। १९२१ मे १९२६ म, १९४२ में हर मौके पर जेल गए थे। स्वाभिमानी से पुलिटिकल पेंशन तक नही ली, मिनिस्टरी भी नही ली खादी वोड ता को नहीं छूआ भारत सेवक समाज की जीर और उसके आनरेरियम का ठुकरा दिया- यारी बुछ कुछ पागल हो गए थे। आज बेचारे टैक्मी के नीचे आ गा। एक मनीपो-जो क्सिी दफ्तर मे गाम करत ये-बोले, 'ओह ! दवीदीनजी। द वी दोन जी व तो इस शहर के जाने माने शहीरो म ये। आज तो मरकारी दफ्तरा म छुट्टी हो जानी चाहिए, बाजार म हडताल, शोक्सभा।' मेरे पास ऐस मोरे की कविता है, पर यहा के अखबारवाने पमा बहुत कम देते हैं।' १२४ मेरी श्रेष्ठ व्यग्य रचनायें चौराहे से हटकर खड़ी हुई टक्सियो के आसपास अपनी-अपनी भीड यो । चुनाव के सभी उम्मीदवारों को सदमा पहुचा था। बिल्कुल ही बाए चलने वाली पार्टी का उम्मीदवार खुद अपनी टेक्सा के बानेट पर खड़ा होकर बोल रहा था "बताइए, क्या आप ऐसे हत्यारा को अपना वोट देंगे जिहोंने अपनी कार के नीचे अमर शहीद देवीदीनजी को कुचल दिया है ?" भीड म से कोई बोला 'अमरशहीद पहले नहीं है, पहले कुचले गए हैं उसके बाद अमर शहीद हुए हैं।" उसके साथी ने उस टाका, 'यह तो ममी जानत है । अमरशहद ही ऐसी पदवी है जिसके पीछे ब्रैकेट में हमेशा 'मरणोपरान' यानी 'पास्थ्यूमस लिंखा रहता है। दूसरी टैक्सियो के लाउडस्पीकर भी घुमा फिराकर वही बात कर रहे थे, क्या आप ऐसे प्रतिक्रियावादियो को-समाज के शत्रुओ को- हत्यारों को बोट देंगे' तब तक, जिन्हें हत्यारा कहा जा रहा था उनकी पार्टी की एक जीप आ गइ। उससे एक दूसरा नमूना निकलवर वानट पर खडा हा गया । जनता चौखती हुई उसकी ओर बढी । वह कहन लगा बधुओ अमरणहोद देवीदीनजी के न रहने का हमे खेद है। ये वद्ध थे और मोटर की चपेट को शल नही सके । पर उसली चवा करना आवश्यक है । उस पर यानूनी कारवाट हो रही है । 'प्रश्न यह है, उनके निधन का जिम्मेदार कौन है ? गीता मे कहा उसने जनता पर बाल्टिया गीता उलावर अपनो उगली उम पार्टी की टंक्सी की ओ- उठाइ जिसकी सरकार-चरमरान हुए भी प्रदशो म चल रही थी। चाम्बर कहा, 'योनीजी व हागरे वे है । वह चीखता रहा 'उनीस सौ बयालिम स अब ता उ होन स्व तनता सग्राम + अमर सनानी र लिए क्या या वधु उरी म जारर पूछो। वे स्वय तो बटे व पदा पर विराजमान है, गलो में रहन हैं बड़ी-बही मागे पर परते हैं, शारदार होटल म खान ह चौगह पर . - शासन चला रहे हैं। और उहोंने देवीदीनजी को क्या दिया। तिरस्कार | उपेक्षा ! भूख । पागलपन । "बघुओ। इन कृतघ्नो ने देवीदीनजी को पहले ही मार दिया था । बधुओ, देवीदीनजी की हत्या आज नही, पच्चीस साल पहले हुई थी।" सन्नाटा । फिर तालिया । क्या आपकी आखें अब भी नही खुली ? क्या आप अपना बहुमूल्य योट अपने ही शहीद साथियो को इस तरह ठुकराने वाले 'इधर हमारी पार्टी न हमेशा ऐसे शहीदो की पूजा की है। छिपा छिपाकर हम उनकी सहायता करते रहे हैं । आज भी हमने उनके शोकसतप्त परिवार को पाच हजार मुद्राओ का गुप्नदान दिया है ।' जिस पार्टी के प्रतिनिधि शासन चला रहे थे, बगलो में रहते थे, होटला मे आदि आदि थे, उनका नेता अपनी टैक्सी पर खडा होकर चीखने लगा था, 'वे हम जस पदलोलुप नही ये। जीवन भर होने किसी स कोई मदद नही ली, पर अब हमने उनके परिवार को दो सौ रुपये मामिक की पेंशन देने का निणय लिया है ।' और वामपथी पार्टी हमने जनता पुस्तक भडार की एजेंसी पहले ही उनके लडवे को दे दी है। कामरेड लेनिन का पूरा साहित्य ।' एक पार्टी जाहर घटना की कमजोर वर्गों से जोड-गाठ करती थी, चीखने लगी, अगर देवीदीनजी हरिजा नहीं होते तो क्या उह इस तरह भर चौराह पर कुचला जा सकता था ? अब शहर म दिन दहाडे ऐसा हो सकता है ता दूर के गाव मे क्या नही होता होगा? 'हरिजनो पर सवर्णो का यह अत्याचार । नही चरेगा, नहीं चलगा. फिर नही चलेगा, नही चलेगा।' नारे । यह हरिजन भाइयों का मुद्दा है। इस पर हमें सोचना होगा । यह भी याद रखें । हमारी पार्टी पूजीपतियो की पार्टी नहीं है । इसी. लिए हम दवीतीनजी के परिवार को रुपयो का घूस नही देशा चाहते । प हरिजन भाई खुद उनके लिए चदा कर रहे हैं। एक स्वतन्त्र उम्मीदवार कह रहा था, वह देखिए, देवीदीनजी के मेरी श्रष्ठ ध्यप रचनायें भतीजे मेरे पास खड़े हैं । आप उनकी बात सुनिये । वैसे तो उनके परिवार को इसी वक्त अपनी आदत मे पत्ती दे सकता हूँ पर राजनीतिक शुद्धता का तकाजा है कि ऐसी बात न उठाई जाए । देवीदीनजी अपने ही आदगी थे । तो, अब आप उनके भतीजे (~-क्या नाम है जी आपका--की बात सुनें।" दूसरे स्वतन्त्र उम्मीदवार, और उम्मीदवारो के उम्मीदवार भी बोरने लगे थे। दवीदीनजी के नाम पर नीलाम की फिजा पैदा हो गई थी, सिफ एक डुगडुगी की कमी थी। अच्छा खासा मजमा हो गया था और चौराहे-तक-पर- -पुलिस-द्वारा-दुधटना-रोकने की--असफलता-के-विरोध मे होने वाली नगरव्यापी हडताल के कारण बढ़ता ही जा रहा था । अमर शहीद का महा बुलद था। उनके त्याग की प्रशसा हो रही थी। उनके चरण चिह्नो पर चलने का उपदेश दिया जा रहा था । सडक एक किनारे एक नाराज नौजवान अपने निकम्मे बाप को डांट रहा था 'तुम्हे शम नहीं आती? तुम भी १९४२ मे जेल गए थे। देश के लिए तुम उतना कर सकते थे, पर अब अपने लडको के लिए इतना भी नहीं कर सकते जितना आज देवीदीनजी ने सड़क पर इधर से उधर जाते कर दिखाया है ?" चौराहे पर হিৰলাল शिवपालगज गाव था, पर वह शहर से मजदीक और सहक के पिनारे था। इसलिए बडे-बड़े नेताओं और अफसरो को वहा तक आने में कोई सैदातिर ऐतरान नही हो सकता था। कुओ के अलावा वहा कुछ है उपप भी लगे थे इसलिए बाहर से आनेवारे बडे लोग प्यास लगन पर अपनी जान को खतरे में डाले बिना, वहा का पानी पी सकते थे। खाने का भी सुभीता था। वहा के छोट छोटे अफमरो मे कोई न काई ऐसा निकल ही आता था जिसके ठाट बाट देखकर वहा वाल पर सिरे या बेईमान समझत पर जिग देखकर य बाहरी रोग आपम म क्हत कितना तमीजदार है । बहुन वडे पानदान का लडका है। देखो न इम चीका साहब की लडकी ब्याही है । इसरिए भूख रा र अपनी ईमानदारी को खतरे में डाले विना वे लोग पाना भी 31 मान गरण जो भी रहा हो उम मौसम मे शिवपालाजम जनतामा जार जनसवको का आना जाना बटे जोर म शरू हुआ था। उन मनमा विगर गज क विकास की चिंता थी और नतीजा यह होता था कि व रनर देत थ। व रक्चर गजही के लिए दिप प म दिननस्प ये क्यानि इनम प्राय शुरू स हा वक्ता श्रोता को और धाता वा का वेवकूफ मानार - चलता था जो कि बातचीत के उद्देश्य से गजहो के लिए भादश परि- स्थिति है। फिर भी लेक्चर इतने ज्यादा होत थे कि दिलचस्पी के बावजूद लोगो को अपच हो सकता था। लेक्चर का मजा तब है जब सुननेवाले समझें कि यह बकवास कर रहा है और बोलनेवाला भी समझे कि मैं बक्वास कर रहा है। पर कुछ लेक्चर देने वाले इतनी गभीरता मे चलते हैं कि सुनने वाल को कभी-कभी लगता था यह आदमी अपने कपन के प्रति सचसुच ही ईमानदार है । एसा सदेह होते ही रेक्चर गाढा और फीका बन जाता था भार उसका असर श्रोताआ के हाजमे के बहुत खिलाफ पडता है । यह सब देखकर गजहा ने अपनी- अपनी तदुरस्ती के अनुसार लेक्चर ग्रहण करन का समय चुन लिया था, कोई सबरे खाना खाने के पहले लेक्चर देता धा काइ दोपहर को खाना खाने के बाद । ज्यादातर लोग लेक्चर की सबसे बड़ी मात्रा दिन के तीसरे पहर ऊघने और शाम को जागने के बीच मे लेत थे। उन दिनो गाव मे लेक्चर का विषय खेती था। इसका अथ कदापि नहीं कि पहले कुछ और था। वास्तव में पिछले कई सालो से गाववालो को फुसलाकर बताया जा रहा था कि भारतवर्ष एक खतिहर देश है । गाववाले इस बात का विरोध नहीं करते थे, पर प्रत्येक वक्ता शुरू से ही यह मानकर चलता था कि गांववाले इसका विरोध करेंगे। इसीलिए वे एक के बाद दूसरा तक दूद कर लात थे और यह साबित करने में लगे रहते थे कि भारतवर्ष एक खतिहर देश है। इसके बाद वे यह बताते थे कि खेती की उन्नति ही देश की उनति है। फिर मागे को बात बताने के पहले ही प्राय दोपहर के खाने का वक्त हो जाता और वह तभोजदार लडका, जो बड़े सपन घराने की औलाद हुआ करता पा और जिसको चीको साहब की लडकी ब्याही रहा करती थी घक्ता की पीठ का कपडा बीच खीचकर इशार से बताने लगता कि चाचाजी खाना तैयार है। कभी-कभी कुछ वक्तागण आगे की बात भी बता से जाते थे और तब मालूम होता कि उनकी आगे की और पीछे की बात में कोई फक नही है, क्योकि घूम फिरकर बात यही रहती थी कि भारत एक खेतिहर देश है तुम खेतिहर हो, तुमको अच्छी खेती “रना ।

चाहिए, अधिक अन्न उपजाना चाहिए । प्रत्येक वक्ता इसी सनेह । गिरफ्तार रहता था कि काश्तार अधिक अन्न नहीं पा करना पाहते। लेक्चरो की कमी विज्ञापनो से पूरी की जाती थी और एक तरह से शिवपालगज में दीवारो पर चिपवे या लिखे हुए विनापन वहा की समस्याओ और उनके समाधानो का सच्चा परिचय देते थे। मिसाल के लिए, समस्या थी कि भारतवष एक खतिहर देश है और किसान बदमाशी के कारण अधिक अन्न नहीं उपजाते । इसका समाधान यह था कि किसानो के आगे स्क्चर दिया जाए और उहें अच्छी- अच्छी तस्वीरें दिखाई जाए। उनके द्वारा उहें बताया जाए कि तुम अगर अपने लिए अन पैदा नहीं करना चाहते तो देश के लिए करो। इसी से जगह-जगह पोस्टर चिपके हुए थे जो काश्तकारों से देश के लिए अधिक अन्न पैदा कराना चाहते थे। लेक्चरों और तस्वीरो का मिला जुला असर काश्तकारो पर बडे जोर स पडता था और माले से- भोला कास्तकार भी मानन लगता था कि हो न हो इसके पीछे भी कोई चार है। शिवपालगज म उन दिनो एक ऐसा विज्ञापन खासतौर से मशहूर हो रहा था जिसमे एक तदुरुस्त माश्तकार सिर पर अगोछा बाधे, कानों में वालिया लटकाये और बदन पर मिजई पहने गेहू को ऊची फसल को हसिये मे काट रहा था। एक औरत उसके हीछे खडी हुई, अपने आपम बहुत खुश कृषि विभाग के अफमरो वाली हसी हस रही थी। नीचे और ऊपर अग्रेजी और हिंदी अक्षरो में लिखा था, अधिक अन्न उपजाओ।' मिजई और चालीवाले काश्तकारा से जो अग्रेजी के विद्वान य उन्हें अग्रजी इबारत स और जो हिंदी के विद्वान् थे, उहें हिदी से परास्त करन की बात सोची गई थी, और जो दो मे स एक भी भाया नहीं जानते थे वे भी कम र-बम आदमी और औरत को तो पहचानते ही थे। उनस आशा की जाती थी कि आदमी के पीछे हसती हुई औरत की तस्वीर देखते ही वे उसकी और पीठ फेरकर दावाना की तरह अधिक अन्न उपजाना शुरू कर दग। यह तस्वीर मेरी श्रष्ठ व्यग्य रचनायें शिवपालगज में आजकल कई जगह पर्चा का विषय बनी थी, क्योकि यहाँ वातों की निगाह, मे तस्वीरवाले आदमी की शक्ल कुछ-कुछ बद्री पहलवान से मिलती थी। औरत की शक्ल के बारे में गहरा मतभेद था। वह गांव की देहाती लडकियो में से किसकी थी, वह अभी तय नही हो पाया था। से सबसे ज्यादा जोर शोरवाले विज्ञापन खेती के लिए नहीं, मलेरिया के बारे में ये। जगह-जगह मकानों की दीवारों पर गेरू से लिखा गया था कि "मलेरिया को खत्म करने में हमारी मदद करो, मच्छरों को समाप्त हो जाने दो।" यहाँ भी यह मानकर चला गया था कि किसान गाय भैस की तरह मच्छर भी पालने को उत्सुक हैं और रहे मारने के पहले रिसानो का हृदय-परिवतन करना पडेगा । हृदय-परि- वर्तन के लिए रोब की जरूरत है, रोब के लिए अग्रेजी की जरूरत है, तभी मलेरिया उन्मूलन में सहायता करने की सभी अपीलें प्राय अग्रेजी में लिखी गई थीं। इसीलिए प्राय सभी लोगों ने इनको कविता के रूप में नहीं, चित्रकला के रूप मे स्वीकार किया था और गेरू से दीवार रगने वालो को मनमानी अग्रेजी लिखने की छूट दे दी थी। दीवार रगती जाती थी, मच्छर मरते जाते थे। कुत्ते भूका करते थे लोग अपनी राह चलते रहते थे। एक विज्ञापन में भोले भाले उग से बताया गया था कि हमे पसा बधाना चाहिए । पैसा बचाने की बात गाववालों को उनके पूर्वज पहले ही बता गए थे और लगभग प्रत्येक आदमी को अच्छी तरह मालूम थी। इसमें सिर्फ इतनी नवीनता थी कि यहां भी देश का जिक्र था, कही कहीं इशारा किया गया था कि अगर तुम अपने लिए पैसा नही बचा सकते तो देश के लिए बचाओ। बात बहुत ठीक थी क्योकि मेठ साहूकार, बड़े बडे बोहदेदार, वकील, डॉक्टर-ये सब तो अपने लिए पैसा बचा ही रहे थे, इसलिए छोटे-छोटे किसानो को देश के लिए पैसा बचाने मे क्या ऐतराज हो सकता था ! सभी इस बात से सिद्धांत- रूप मे सहमत थे कि पैसा बचाना चाहिए। पैसा बचाकर किस तरह कहा जमा किया जाएगा, ये बातें भी विज्ञापना और लेक्चरो मे साफ शिवपालगज । तौर से बताई गई थी और रोगों को उनसे भी कोई मापत्ति न यो। सिर्फ लोगों को यही नहीं बताया गया था कि तुम्हारी मेहनत के एवन में तुम्हें क्तिना पैसा मिलना चाहिए । पैसे की बचत का सवाल आम- पनी बोर सत्र से जुड़ा हुआ है, इस छोटी-सी बात को छोड़कर बाकी सभी बातों पर इन विज्ञापनों में विचार कर लिया गया था और लोगों ने उनको इस भाव से स्वीकार कर लिया था कि वे बेचारे दीवार पर अपनाप चिपके हुए हैं न दाना मागते हैं, न चारा, न कुछ रेते हैं, ने देते है। चलो, इन तस्वीरों को छी नहीं। पर रगनाय को जिन विज्ञापनों ने अपनी ओर खींचा, वे पन्तिक सेक्टर के विज्ञापन न पे, प्राइवेट सेक्टर की देन थे। उनसे प्रकट होन माली वारों कुछ इस प्रकार यो "उस क्षेत्र में सबसे प्यादा व्यापक रोग दाद है, एक ऐसी दवा है जिसको दाद पर लगाया जाए तो उसे जह से आराम पहुंचता है, मुह से पापा जाए तो खासी जुवाम दर होता है बताशे में डालकर पानी मे निगल लिया जाय तो हैज़ म लाम पहुचता है। ऐसी दवा दुनिया में कहीं नहीं पाई जाती। उसके मावि धारक अब भी जिंदा हैं, यह विलायतादालो की शरारत है कि उहें आज तक मोवेल पुरस्कार नहीं मिला है।' इस देश में और भी बडे-बहे डॉक्टर हैं जिनसे नोबेल पुरस्कार नही मिला है। एक कस्वा जहानाबाद में रहते हैं और चषि वा पर विजली आ चुका है, इसलिए वे नामर्दी का इलाज विजली म करत हैं। अब नामों को परेशान होन की जरूरत नहीं है । एक दूसरे कार जो कम-से-कम भारत में तो मशहूर हैं ही, बिना आपरेशन के अवधि का इलाज करते हैं । और यह बात शिवपालगज मे किसी भी दीवार पर तारकोल के हरुफ म लिखी हुई पाई जा सकती है। वस बहुत से विनापन बच्चों में मूखा रोग आखो की बामारी और पेचिश आणि से भी सबद्ध है पर असलो रोग सम्या मे कुल तीन ही है---टाद अडी और नामर्दी, और इनके इलाज की तरकीब शिवपालगज परक अक्षर ज्ञान पा लेने के बाद ही दीवार पर अक्ति लषा के महार जानना शुरू कर दत हैं। मेरो श्रेष्ठ व्यग्य रचनायें - विज्ञापनो को इस भीड में वद्यजी का विज्ञापन नवयुवकों के लिए आशा का संदेश अपना अलग व्यक्तित्व रखता था । वह दीवारों पर लिखे 'नामर्दी का बिजली से इलाज' जैसे अश्लील लेखों के मुकाबले में नहीं आता था। वह छोटे-छोटे नुक्कडी, दुकानो और सरकारी इमा- रतों पर-जिनके पास पेशाब करना और जिन पर विज्ञापन चिपकाना मना पा-टीन की खूबसूरत बस्तियों पर लाल-हरे अक्षरों में प्रकट होता था और सिर्फ इतना कहता था, 'नवयुवकों के लिए पापा का संदेश', नीचे वैद्यजी का नाम था और उनछे मिलने की सलाह दी। एक दिन रगनाय ने देखा, रोगों की चिकित्सा में एक नया बायाम जुट रहा है । सबरे से ही कुछ लोग दीवारों पर बडे-बडे अक्षरों में लिय रहे हैं बवासीर । यह शिवपालगज की उन्नति का लक्षण था। ववा- सीर के चार आदमकद असर चिल्लाकर कह रहे थे कि यहा पेचिश का युग समाप्त हो रहा है, मुलायम बीयत, दफ्तर की धुर्सी, शिष्टतापूर्ण रहन-सहन, चौबीस घंटे चलनेवाले खान-पान और हल्के परियम का सुप धीरे धीरे सक्रमण कर रहा है और आधुनिकता के प्रतीप-सी बवासीर सवव्यापी नामदर्दी का मुकाबला करने के लिए मैदान में या रही है । शाम तरु यह दैत्याकार विज्ञापन एक दीवार पर रग-बिरगी छाप छोड चुका था और दूर-दूर तक ऐलान करने लगा पा उदासीर का शर्तिया इलाज। देखते-देखते धार-छ दिन में ही सारा जमाना बवासीर और उसके शर्तिया इलाज के नीचे दब गया। हर जगह वही विज्ञापन चमक्ने । लगा। रगनाथ को सबसे बड़ा अचमा तब हुआ जब उसने देखा, वही विज्ञापन एक दनिर समाचार-पत्र में या गया है। यह समाचार-पन रोज दम बजे दिन तक शहर से शिवपालगज आता था और लोगों को बताने में सहायक होता था कि स्कूटर और ट्रक कहा मिटा, अब्बासी नामक कथित गुहे ने इरशाद नामक अथित सजोफरोश पर कथित छुरी से कहा कथित रूप में वार किया। रगनाप ने देखा कि उस दिन षषबार के पहले पृष्ठ का एक बहुत बड़ा हिस्सा काले रंग में रंगा हुआ है और उस पर बडे-बड़े सफेद अक्षरों में चमक रहा है बवासीर । शिवपालगन अक्षरों की बनावट वही है जो यहां दीवारों पर लिखे विज्ञापन मे है। उन अक्षरीने पदासीर को नया रूप दे दिया था, जिसके कारण आस पास की सभी चीजें बवासीर की मातहती में आ गई थी। काली पृष्ठभूमि मे अखबार के पन्ने पर चमकता हुआ 'बवासीर' दूर से ही बादमी को अपने में समेट लेता था। यहा तक कि सनीचर, जिसे बडे बरे आतरिक अक्षर पढने मे कष्ट होता था, अखबार के पास खिंच माया और उस पर निगाह गडाकर बैठ गया । बहुत देर तक गौर करने के बाद यह रगनाथ 'बोला, "वही चीज है।" इसमें अभिमान की खनक थी। मतलब यह था कि शिवपालगज की दीवारो पर चमकनेवाले विज्ञापन कोई मामूली चीज नहीं हैं । ये बाहर अखवारो में छपते हैं, और इस तरह जो शिवपालगज में है, वही बाहर अखबारो में है। रगनाय तख्त पर बैठा रहा । उसके सामने अखबार का पाना तिरछा होकर पड़ा था। अमरीका ने एक नया उपग्रह छोडा पा, पाकिस्तान-भारत-सीमा पर गोलिया चल रही थी, गेहू की कमी के कारण राज्यों को कोटा कम किया जाने वाला था, सुरक्षा समीति में दक्षिण अफ्रीका के कुछ मसलो पर बहस हो रही थी, इन सब अबाबीलों को अपने पजे मे किसी दैत्याकार बाज की तरह दबाकर वह काला सफेद विज्ञापन अपने तिरछे हरुफ में चीख रहा था बवासीर ! इस विज्ञापन के अखबार में छपते ही बवासीर शिवपाल गज और अतर्राष्ट्रीय जगत् के बीच सपक का एक सपन माध्यम बन चुकी थी। बवासीर! -राग दरबारी' से। मरी श्रेष्ठ उपरय रचना मिया को जूतो मिया के सिर उन्होंने पहुचते ही देख लिया कि लबे चौड़े बगले के एक हिस्से में 'अमरूद विकास का क्षेत्रीय कार्यालय नामक सरकारी दफ्तर है और गुलदावदी के गमले, बगले के आगे को मुलायम व और गुलाब और नेशियम की ताजी क्यारियां दफ्तर की समृद्धि का अग हैं क्योंकि मगले जिस हिस्से में दफ्तर न या यहा यह सब भी न था । वहाँ यह भी देख लिया था कि मकान मालिक बगले के दुमजिले पर पुल कमरों में रहता है। पहली मजिल में अमरूद विकास में पार से राटे हुए दो कमरे थे जिनके आगे अगूर की लताए किसी पोटियों की धरा तरह बांस के हरे ढांचे पर फैली थीं। हरियाली में एमे पका अमरों में रहने की कल्पना ने मारायण को उठित किया, पर जा मन ने उसे पहीं टोका कि यह कल्पना कभी यथार्थ महीं होगी । बाद ही कुछ लतरों के बीच से शक्तेि हुए एमो पता चला कि इन कमरों में भी एक पतर है । साइनबोर में शिक्षा मा un. लय जिला मत्स्य क्रय विक्रय अधिकारी। मकान मालिक ने मिलते ही गए, fre form want बताया कि दोनों कमरे पल ही मे fultant fhi आफिसर साहब ने चार सौ रूपये माहवार fruit httriti - आपने हाथ आप पहर आ गए होते तो इनवार यो हो या, किराये म दम-बीम कम मिलत तय भी कोई हज न पा । वारीन न यहा हि तव भी आना बकार होता क्या क नारायण की तनख्वाह तो येवल पाच सौ रुपया है। मकान-मालिक बोला कि तब आपो रवीद्र नगर एस्टेंगन में मकान न ढूढना चाहिए । सरकारी एलाटमट या नगर निगम का कोई फ्लैट मिले, तभी आपका काम चल सकता है क्योकि 'सत्तर रुपय महाने मे तो अब सडास तक नहीं मिलता। सहास का उल्लेख कर चुकने पर मकान-मालिय ने अपने लडके को चाय लाने का हुक्म दिया। मकान मालिक और बारी। हालदार मवानो की समस्या पर बात करने लगे, पर अचानक विचित्र ढग से उनकी भूमिकाए उल्ट गइ । पारीन हारदार ने कहा कि मान ता आपने बनवा लिया पर सरकारी कर्जे की रिश्तें और व्याज चुवान म, पानी और मकान के टैक्स में और इनकम टैक्स मे पूरा किराया साफ हो जाता होगा तो वम झमट ही लगता होगा। इसके विपरीत मकान मालिक ने कहा वि चाहे जितना भी टैक्स देना पड़े, जेवरा योडे ही जाता है, कज को किस्त ओर टक्सो के बाद भी कुछ न कुछ बचा ही रहता है और सच पूछो तो इस तरह आठ-दस साल के बाद पूरा मवान फोकट का हा जाएगा। उसने कहा, "तुमसे क्या घोरी, बारीन दा, मुझी को देखो। मेरे पाप की भी दम न थी कि इतनी बड़ी वोठी बनवाता। वे तो वाड साहब ये जिहाने एक रात मुझे फोन किया । बोले, 'राजिदर, तू एक प्लाट चाहता था न? कल से नगर निगम के प्रांट एलाट होने वाले हैं । जो पहले दरखास्त लगा देगा, उसी को मिलेंगे। कल सबेर यहा दफ्तर मे हजारो की भीड़ लग जाएगी और तू टापता रह जाएगा। देख तू ऐसा कर तू अपनी दरखास्त इसी वक्त मेरे पास भेज दे । तेरा नाम नबर तीन या चार पर दज करा दूगा तुये क्यू में नहीं लगना पडगा । मैंने कहा कि 'साहब, दरखास्त के साथ दो हजार रुपये का चक भी लगाना पडता है। ये रुपया में किसकी जेब काटकर ले आऊ । दे बोले कि हाउसिंग इजीनियर हाकर भी एक प्लाट तरे लिए नही । मेरी श्रेष्ठ व्यग्य रचनायें दिला पाया तो लानत है मुझ पर । देख, तू ऐसा कर कि एक चेक मेरे पास भज दे। बक मे रुपया हो या न हो, तू फिक्र न कर । मैं दो तीन महीने तेरा चेक रुकवाये रहूगा और उसे बक मे तभी भेजूगा जब तू इसके लिए हरी झडी दे देगा।' इस तरह से तो बारीन दा, प्लॉट मिला । फिर, फज का झझट । किसी तरह सरकारी कज भी मिला, कुछ एल० आई०सी० वालो ने दिया और तब यह बगला बनकर तैयार हुआ। आपकी दुआ से सरकारी दफ्तरो ने किराये पर ले लिया है। चलो, एक काम होना था, हो गया। अब महकमे वाले नौकरी से जवरन रिटायर करन पर तुले हैं। मैं भी सोचता हूं कि कर दें रिटायर । कोई मेरा किराये का सोलह सौ रुपया तो छीन नही लेगा। इसी कुटिया में पड़ा रहूगा और जिंदगी के बाकी दिन हाईकोट की रिट लडने न काटूगा । हुह । बिना मुकदमा लडे यू ही रिटायर थोडे हो जाऊगा।" कमरा काफी बडा था। हलके हरे रंग की मोजेक के फश पर नया फर्नीचर डाला गया था। एक ओर दीवार से सटाकर दीवान रखा गया था। नीचे के कमरो के किराये पर उठ जाने की बात सुनकर नारायण इस मकान और मकान-मालिक से उदासीन हो गया था, पर बारोन उससे मकान बनाने की समस्याआ पर विस्तार स बात करने लगा था । नारायण उस कमरे को देखता रहा । देखत-देखते उस लगा कि वह यहा पहले भी आया है और इस दीवान पर बठकर सितार बजा चुका है। बारीन और मकान मालिक फो एक किनारे खिसकावर नारायण ने एक समानातर लोक की रचना की जिसमे सवेरा था, घने पेडो को थींधकर सूरज की धूपछाही रोशनी कमरे मे खुल रही थी। सबरा पा, पर सबेरे को परिचित आवाजें नही थी। वह दीवार पर सितार लिये बैठा था। चारों ओर घना नीरध्र सन्नाटा पा अहीर मरव की गत को तोड़ते हुए बारीन हालदार ने चको मई, तुम तो यहीं बैठकर सोने लगे।" मकान मालिक ने उन्हें मुदित मन विदा दो वादा क्यिा कि उधर मियो की जूती मिया के सिर - कोई यमरा-वमरा बाली हुआ तो नताळगा, वैसे इस तरफ किराये बहुत बढ़ गए हैं । सरकारी दफ्तरो बाले एक से एक नफीस बगले चार- चार हजार रुपये महावार पर लेने लगे हैं। कोई अब पुराने ढंग की इमारत मे बैठना ही नहीं चाहता, सब दफ्तर के लिए मोजेक का फश योर झिलमिलौआ बापल्म भागते हैं। और ये जो सरकारी कनिया हैं न, कट कारपोरेशन और हाथी कारपोरेशन--ये तो इतनी शाहदिली मे किराया देती हैं कि लेने वालो तक के दिल लरज उठते हैं। तब तुम्ही बताओ बारोन दा, इस कॉलोनी में प्राइवेट मकान लेने की भला हिम्मत होगी किसी की? सडक पर आते ही चारों ओर नयी-नयो काट के बगलो और हरी भरी फुलवारियों ने नारायण को अहीर भैरव की गत की ओर दुबारा बोचा, पर बारीन हालदार के चेहरे ने उसे रोज लिया। उसका मुह छाती पर हिलग आया था और लगता था कि उसकी याये अद- रूनी नाटक के दुखात दृश्य मे खोई हुई हैं। नारायण ने सोचा कि यह राजनीति मे मात खाने का सदमा है जिसके धमाके का असर बारीन-दा पर इतनी देर बाद हो रहा है। उसने चाहा, पर कुछ पहकर बारीन का उस बासद मुद्रा से उबारने का साहस नहीं बटोर सका। पर वह वारीन के लिए यू ही आशक्ति हो रहा था। बारीन की खली हमी ने उसे चौंका दिया । अपने काले-कलूटे गाल को जोकरों की तरह रगहता हुआ वह कह रहा था, "कभी यह कहावत सुनी है मियाँ की जूती मियों के सिर? इसका मतलब जानते हो? नही जानते हो तो सुनो। हसी, मखौल, उदासी अफसोस नाराजगी के बार-बार-बार बदलते मौसम मे तब बारीन हालदार ने एक रुककर कहा मरी बात समझने के लिए हरिजनों, सफाई मजदूरों या छोटे मा मियों के लिए बनवाई गई दस-पांच वही बस्तियों को भूल जाओ। मे कुछ ताकि लोग शराब पीने के पहले मां-बाली के नाम पर दो पार यूः जमीन पर छिडक देते हैं वंस ही हाउसिंग की पूरी की पूरी मैरी पेष्ठ म्यग्य रचनायें स्कीम गटकने के पहले चतुर लोग हरिजनो के नाम पर दस-बीस छोटे प्लाट निकाल देते हैं। और गटकते कौन हैं ? पसे वाले लोग जो पैसे वालो के लिए बहुत पैसे वाले मकान बनवाते हैं। 'हर बडे शहर में नयी बस्तिया दूर-दूर तक फैली हुई हैं। यह ऐसा मनीप्लाट है जिसकी जड पर लोगो की निगाह नहीं जाती, निगाह सिफ हरी-हरी पत्तियो पर है। इस मनी प्लाट की जड सार्व- जनिक निधियो मे है और इस तरह और गहरे जाकर वह जड हमारी- तुम्हारी जेब मे पहुची हुई है। "वैसे ये बस्तिया-जैसी कि यह रवीद्रनाथ एक्सटेंशन है- से बडी भोली भाली लगती ह । नाम सुनते ही मन पवित्र हो जाता है। किसी का नाम गौतमपल्ली है, लगता है कि गौतम बुद्ध का त्याग और तपस्या यहा के जरें-जरें मे झलक रही होगी । एक जगह किसी ने सर्वोदय नगर वसाया है, जैसे वहा घर-घर मे विनोबा भावे रहते हो। क्सिी वस्ती का नाम रामकृष्णपुरम, किसी का नाम है तात्याटोपे नगर जो शायद इट गारे से नहीं, खून और शहादत से बनाई गई होगी। पर इन बस्तियो मे रहने वाले हैं कौन ? वही अपने जाने पहचाने साहब-बीबी गुलाम, वही अफसर, वही नेता, वही व्यापारी । "नाम तो महापुरुषो के ऊपर रख लिए पर हालत यह है कि रामकृष्णपुरम और तात्पादोपेनगर कहते हुए जबान अटकती है । आदत तो ग्रीन पाक और क्ले स्ववायर की पड़ी है। तभी वहा वाले बडे सपाटे मे उन्हें आर० के० पुरम् या टी० टी० नगर सहकर फुरसत पा लेते हैं। अपने यहा भी तो यही हुआ। जहा हम लोग भगियो की एक शान- दार कालोनी बनवाना चाहते थे वहा हमारे आवास विभाग ने बनवा डाला-अमर-शहीद पडित जटाशकर-अवस्थी-नगर । और अब अमर शहीद का इतना बड़ा नाम लेने में जीभ लडखडान लगी तो उसे कहने लगे ऐस्पानगर । फिर भी बस्ती बनी उसी ढरें पर जिसका शहीद से कोई सरोकार नहीं । दो सौ फ्लैट अपने पिठ्ठओ को किराये पर देने के लिये नगर निगम ने बनवा लिए और बाकी हजारो प्लाट फिर उही साहब-बीबी-गुलामो मे बांट दिए गए। मिया की जूती मियां के सिर (३६ "अप पूरी बात सुन लो। इन शहराती यस्तियों के बनने का भी एक तरीका है। पहले घेतिहरों से उनकी जमीन ली जाती है, नगर के प्रसार या कागभगौडा खडा परके उहें भगा दिया जाता है । फिर वह जमीन किसी निगम या परिषद या सोसाइटी के हत्थे चढ़ती है । तब उसके टुकडे करके उसे बाटा जाता है और घूम फिर-पर सभी प्लाट साहब-बीवी गुलाम के हाथ मे आ जाते है। फिर वकों से या जीवन- बीमा निगम से या इधर उधर से किसी-न-किसी तरह काम बनाने के लिए कर्ज लिया जाता है। इस तरह धतुर लोग दूसरे की जमीन पर दूसरे के पैसे से अपना मकान बनवाते है । यही नहीं, वे उसे मनमाने किराये पर उठाते हैं और कोशिश रहती है कि मकान किसी सरकारी या अदसरकारी सस्था को दिया जाए ताकि किराये की वसूली मे सुभीता रहे । जिसके पसे से मकान बनवाया, कोशिश रहती है कि उसी से किराया लेकर उसका पैसा चुकता कर दें, ऊपर से कुछ बचा लें। यही है मिया को जूती और यही है मिया का सिर । "रह गये भगी-चमार, उनके लिए एक एक कमरे वाली बरके बनवा दो, चाहे उनके घर में एक आदमी हो या ग्यारह । बस, इतने से आर० के० पुरम् और टी. टी. नगर का कलक धुल जाएगा।' "मकान से। "

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Meri Sreshta Vyangya Rachnayan

Author
Shri Lal Shukla
Title
Meri Sreshta Vyangya Rachnayan
File name
Meri Sreshta Vyangya Rachnayan
Text
OCR done
Citation
1960
Published
2011/03
Publisher
Gyan Bharati Dehli
Language
Sanskrit
Pages
159
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551266
Barcode
4990010032024.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
j34JqUwI89D
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