Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Shri Lalit-stotradi Sandoh
Front matter
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श्री विजय पूर्णानन्दसूरि प्रन्थमाला पुष्प न २
श्रीमन्मानदेय विजयानन्द-चल्लम ललितपूर्णानन्दसूरीश्वर
पादपनेभ्यो नम
श्री ललित-स्तोत्रादि संदोह
सपादक
परमपूज्यपाद आचार्य प्रभु
श्री १००८ श्रीमद् विजय पूर्णानन्द सूरीश्वरजी महाराज
के शिष्यरत्न
पन्यास श्री हींकारविजयजी गणी
COM
प्रकाशक:
जैनतत्त्वज्ञ पडित कुवरजी मूलचद्र दोशी,
(जेसर सौराष्ट्र) मद्राम
प्राप्तिस्थान:
अलंकार सायकल स्टोर्स,
१३, केशव अय्यर स्ट्रीट, मद्रास-३.
13, Kesava Iyer Street, Madras-3
और
दी जैन मीशन सोसायटी (रजि०)
४०८, मिन्ट स्ट्रीट, मद्रास-१.
श्री वीर संवत् २४८९
विक्रम संवत् २०१९
ललित संवत् १४
वैशाख शुक्ला तृतीया शुक्रवार ता० २६-४-६३.
नकल १०००.
भारती विजयम प्रेस,
तिरुनलिकेणि, मद्रास-५॥
महान गुरुदेवों की आगमचर्चा
.
प पू आचार्य सम्राट श्री विजयवल्लभसूरीश्वरजी म मा तथा उसके
मुग्य पट्टप्रभाकर प पृ श्री विजय ललितमरीश्वरनी म मा
आचार्य भगवंत श्री १००८ श्रीमद् विजयललित- मुरीश्वरजी म. सा. के पट्टप्रभावक. door Mawa Akakkar 7 । ज्योतिपादि-श्रुतपारंगत महा तपस्वी परम पूज्यपाद आचार्यदेव श्री १००८श्रीमद् विजयपूर्णानन्दसूरीश्वरजी महाराज समर्पण भारत दिवाकर पजावकैमरी शासन सम्राट श्री १००८ श्रीमद् विजयरल्लभ मूरीश्वरजी महाराज के प्रधानपट्टप्रभाकर मरुधरदेशोद्धारक आचार्य भगवत श्री १००८ श्रीमद् विजय- ललितसूरीश्वरजी महाराज श्री के प्रधान पट्टधर, ज्योतिष- मार्तण्ड, दशम वार्षिक तप के महान तपस्वी, आचार्य भगवत श्री १००८ श्रीमद् विजय पूर्णानन्दसूरीश्वरजी महाराज सा श्री, आपके करकमल में श्री ललित स्तोत्रादि सदोह नामक अथ समर्पण करते हुए मुझे पडा ही आनद होता है आप ही के चरण कमल में नियाम करके जो कुछ प्राप्त हुआ है वे सब आप ही का आशीर्वाद का फल है। मुझे आप की कृपासे आत्म कल्याण की तीन वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं. (१) आशय की शुद्धि (२) प्रभु की प्रभुता की पहचान (३) समर्पण भाव. अत: मेरा सयम, तप, जप के साथ तीनों वस्तुए प्राप्त करानेगाला यह प्रय आपके चरण कमल में अर्पण करता हूँ। आपका पादपद्ममधुलिट प. हीफार विजय.
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श्री केपलचदजी खटोड के धर्मपत्नी अ मौ टमकुमाई
***
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परसीतप पारणु स २०१९ वैशाग्व गुदी ३
शुक्रवार पालीताणा (मिध्यक्षेत्र)
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. प्राक्कथन् परमकृपालु शास्त्रकार महर्षि भगवतोए चार प्रकारना अनुष्ठानो आत्मकल्याण माटे उपदेशेला छे प्रीति, भक्ति, वचन भने असंग अनुष्ठान पोतेमानेल देव-गुरु उपर पत्नी समान आदर्श प्रेम राखवो ते प्रीति अनुष्ठान आ अनुष्ठान मार्गानुसारीपणामा बने अपुनर्वधक अवस्थामा मिथ्यात्व गुणस्थानके होय छे भकति अनुष्ठान पण मार्गानुसारीपणाथी माडीने चतुर्थगुणस्यानक सुधी मुरयताए होय छे तेमा पोते मानेल देव गुरु अने धर्म उपर मात- पिता समान भक्ति होय छे प्रीति अनुष्ठानमा सुखना स्वार्थनी मुख्यता होय छे. ज्यारे भतिमा उपकारनास्वीकार साथे अनृणि- थवानी भावना मुख्य होय छे सम्यग द्रष्टिने आ अनुष्ठान चोथे गुणस्थानके होय छे वचन अनुष्ठान पाच थी सात गुणस्थानक सुधी होय. अने आठमाथी बारमा सुधी असग अनुष्ठानहोय छ अपिगम सम्यक्त्वनी प्राप्तिनु कारणतिर्थकरनी भक्ति के भेटले भक्ति अनुष्ठान सम्यग् दर्शननी प्राप्तिनु मुख्य कारण छै आधी तीर्थकर देवनी भक्ति महालाभदायी ठे वीजु बारमकल्याण ना विकास माटे तिर्थकर देवो चार भावनाओं मुरय बतावेल छे मैत्री, प्रमोद फारुण्य अने माध्यस्थ प्रीति अनुष्ठानमा मैत्री- भावनो विकास छे भकिन अनुष्ठानमा प्रमोद भावनी साधना के वचन अनुष्ठानमा कारुण्य मावनी प्रधानता भने अर्सग अनुष्ठानमा माध्यस्थभावनो विकास छे अहिंसा--संयम अने तप ए उत्कृष्ट धर्ममगल छे भक्ति अनुष्ठान वालो आत्माज्या सुधी देव गुरु नी भक्ति मा लीन छ vi त्यां सुधी ते अहिंसा-सयम अने तपनी आराधना वालो होय छे.ज्यां सुधी भक्ति मां लीन छे त्यां सुधी चार-प्रकारना आहार नो त्यागी होवाथी तपस्वी छे. विषय अने विकारोथी पराङ्मुरा होवाथी संयनी छे. आरम्भ भने समारंभ नो त्यागी होवाथी अहिंसक पण छे, आ प्रमाणे भक्ति योग मां लीनथयेलो भात्मा अहिंसादि धर्मोनो पण आराधक छे. अने एटलामाटे महा महोपाध्याय श्री यगोविजयजी- गणीए कइयु छ के १२ अंगोनो सार जिनेश्वर देवनी भक्ति छे. आ अखिल विश्वना एक नाथ तिर्थकर परमात्मा छे. षड् द्रव्यो पर तेनी सत्ता छे एवं अनुभवीओए कह्यु छ भने अनुभवी नणाय छे. तिर्थकर देवनी पूजा द्रव्योथी अनेभावथी एम वे प्रकारे छे. अष्ट-प्रकारी पूनाए द्रव्योथी करेली पूना छे. तेमा द्रव्योनी मुख्यता छे एटले द्रव्य पूजा कहेवाय छे. तेनां पण द्रव्य अने भाव एम वे प्रकारो छे. केवल आशसा पूर्वक कराती पूजाद्रव्य पूजा छे. ज्यारे आर्त-रौद्र-ध्यानना त्याग माटे अनेधर्मध्याननी पुष्टीनां हेतुथी आशंसा पूर्वक या केवल भक्ति माटे समर्पण भावथी कराती द्रव्यो द्वारा द्रव्यपूजा ए भाव द्रव्यपूजा छे. तिथंकरो नो प्रभाव अचिंत्य छे. तेनाथी यावत् मोक्ष सुधीनां सर्व-सुखोनी प्राप्ति याय छे. तेवीज रीते भाव पूजा पण चे प्रकारे छे. द्रव्य भावपूजा अने भाव भाव- पूजा. स्थापना निक्षेपानी अने द्रव्यपूजानी अवहेलना पूर्वक कराती भाव-पूना द्रव्य भाव पूजा छे. ज्यारे जिन-प्रतिमाने जिनेश्वर सहश मानी प्रत्यक्ष के परोक्ष कराती तेमनी स्तुति-गुणानुवाद प्रमोद- V11 भावनानो, मक्ति अने वचन अनुष्ठानोनो विकास करनार होवाथी भाव भावपूना छे द्रव्य भने भावनी वास्तवीक व्याख्या आवी छे आवा भाव अनुष्ठानो माटे जेमा तिर्थंकरोना नामोना वर्णनो होय, भनेकरीते स्तुति करेली होय तेवा स्तोत्रो खास उपयोगी छे अने आ युगमा ज्यारे खुदनी हिम्मत के ताकात नथी त्यारे तीर्थकर ने समर्पण यवु एनआत्म कल्याणकर सरल मार्ग छे गुमडानी गाठ थयी होय तो खुदनी चप्पुथी चीरवानी ताकात जोइए एवी ताकात होय तो पण सेप्टीक्नो मय १०० टका के अने भाजे एक- द्रव्य वीजा द्रव्यने कह करतु नयी एम पोतानी ताकात ऊपर रहेला सेप्टीकना रोगथी पीडाइ रहेल छे माटे सारा वैद्य डोक्टर नु शरणु गोतवु ए उत्तम मार्ग छे माटे ज्या गुमडानी गाठ मटे छे मने सेप्टीकनो भय नथी आथी आ कालमा तिर्थंकर देवनी भक्ति जेटली वधे एटला आपणे वघारे निर्भय छीए तेथी तिथंकर देवोनी भक्ति खुबज वधे अने जगतना जतु मान सुस पूर्वक नीराबाघ सुखने प्राप्तकरे एवा शुभ आशयथी आ जिन स्तोनादि संदोह बहार पाडवा प्रयास कर्यो छे अने जेथी आशयनी शुद्धिप्रमुनी प्रभुताइ भने समर्पण भावना विकास साधी प्राणीमात्र सुखीयाय । आ ग्रथना प्रकाशनमा परम पूज्य आचार्य भगवत श्रीमद् विजय पूर्णानन्द सूरीश्वरजी तथा तेमना वीनीत शीष्य पन्यास श्री हीकारवियजी गणी ना सदुपदेशथी जे जे भाइओ में आर्थीक सहाय आपी अनुमोदनानोलाम लीघो छ तेनी अमो वार, viii छे वार अनुमोदना करीओ छीए. पेपर आदिनी खरीदी मां श्रीभंवरलाल नी शेठीआए सारो सहकार आप्यो हतो. आ ग्रंथना प्रकाशन मा परोक्ष के प्रत्यक्ष जे जे व्यक्तितओए सहाय करीछे तेमनां कार्यनी पण हृदयपूर्वक अनुमोदना करुळु श्री हजारीमलजी चोपडाजीए ग्राहको बनाची अमने सारो सहकार आप्यो छे. तेमना ते कार्यनी अनुमोदना पण अत्रे प्रस्तुत स्तोत्रणि-गोत्राणि पठन्ति मंत्रान् कल्याण भानो हि जिने. भिषेके ।। वृहच्छान्ति ॥ जिनेश्वर देवोना नामो, स्तोत्रो अने गोत्रोनो पाठ कल्याण करनार छे. नामाकृतिद्रव्यभावः पुनतः त्रिजगज्जनम् ।। हेमचन्द्राचार्य ॥ नाम, स्थापना, द्रव्य अने मावथी तिथंकर परमात्मा त्रण लोकना प्राणीओने पवित्र करेछे चारमाथी एक पण निक्षेप त्याज्य नथी. चारमाथी एक पण निक्षेप ने न माननार चारेनी अमानता- वाला छे. अने जो तिर्थंकर परमात्मानुं सान्निध्य छुटी गयुं तो धर्म छुटी जवो ए जरापण मुश्केल नथो माटे जिनदेवना विरहमा जिनप्रतिमाने जिन-सरखी मानी सर्वे आत्म कल्याणमा लाग्यां रहे अने जिनदेवोनां नाम बोलवा पूर्वक आत्माने तन्मय बनावी आवा सुन्दर स्तोत्रोना पाठथी वातावरण पवित्र बनावी सर्वे सुखीनः सन्तु. ४. रावण अय्यर स्ट्रीट जैन तत्वज्ञानदर्शक मद्रास-३. पंडीत कुंवरजी मुलचंद्र दोशी चीर. सं. २४८९.वि. सं. २०१९ अध्यापक-जैन मीशन ता. १३.५-६३. चंद्रवार. धार्मिक पाठशाला, मद्रास.
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स्तोत्र परिचय
(१) श्री जिन सहस्त्र नाम स्तोत्र श्री पुण्यहर्षमुनीनाशीप्य
वाचक ज्ञानपं गणी ना शीप्य मुनिजीवहर्षे मा स्तोत्रनी रचना
करी छे सुन्दर रागथी गाय शकाय तेवु छे उच्चारमासरल छे कुले
९२ श्लोक छे १००८ नामो सलग जापल छे स्तोत्रकार कहेठेके
बहु वर्पना कोटि जो कष्ट कीजे, फल नामजापथी सद्य सीने"
(२) सिद्ध-सहस्रनाम वर्णन छद न्यायविशारद न्यायचार्य
महामहोपाध्याय श्रीमद् यशोविजयजी गणी ए आ छद रचेल छे कुल्ले
११ श्लोक छे भाषामा आ छद आपेल ११ मा छद मा
उपाध्यायजी कहेछे के "तारा नामनी साथे कोइ यत्र तन के मन
सरखामणीमा नथी" आवो एक्लो तारा नामनो प्रभाव छ
(३) जिन सहस्त्रनामस्तवनम् -दिगवर पडीत माशाधर
कृत मा स्तवन छे अंक मेक शतक मा १०८ नामो आपेल छे
कुले १० शतकमा १००८ नामो मापेर छे दशे शतकमा जुदा
जुदा शब्दोथी शरुथता नामो आपेल छे जिन सहस्रनामपूजनमा
आ स्तोत्रमा मायेल नामोनो उपयोगथाय के भापारम्य छे स्तोत्र
फार मतमा कहेछेके
-आ नामोनो नाप लोकोत्तम छे उत्कृष्ट
शरण छे मा मुख्य मगल छे आ परम पवित्र करनार के एक नाम
ध्या संसार समुद्री तारनार छे त्या १००८ नामना स्मरण माटे कहेबु
शु' मनुष्टुप श्लोकमा छे एक एक शतकमा १२-१२ श्लोक छे
(४) श्रीअर्हन्नाम सहस्रसमुचयः- कलिकाल सर्वज्ञ श्री हेमचन्द्राचार्य अर्हन् परमात्माना १००८ नामनी रचना करी छे. प्रथम श्लोकमां तेवो श्री जणावे छे के अर्हन् परमात्माना नामोने कानोथी सांभलनार अने शब्दोथी बोलनार प्रवर पुण्यलक्ष्मीने प्राप्त करेछे अने आथी सवारमा ऊठीने अर्हन् परमात्मानां नामोनो उच्चारकरवो जोइए. १० प्रकाशमां १००८ नामो आपेल छे. भाषासरल अने आनन्द दायक छे, नामोनो प्रभाव वतावता आचार्य श्री उपसंहार मां कहेछे के-आ सर्व अपराधो नो नाश करनार छे. समस्त दुःखोनोनाश करनार छे. महा पापोनो नाश करनार छे. सर्वे प्राणीओने जल्दीथी इष्ट आपनार छे. (५) श्री जिनसहस्रनामस्तोत्रम् :-महोपाध्याय श्री विनय विजयजीगणी अ आनी रचना करी छे. सुन्दररागथी गाय शकाय तेवु आहादजनक छे. कुल्ले १४४ श्लोक मां सम्पूर्ण १००८ नामो आपेले छे. रचयीताकहेछेके-आ १००८ नामो पापरुपी अन्धकार नो नाश करवा माटे हजार किरणो वाला सूर्य समान छे. (६) श्री परमात्मा द्वात्रिंशिका:--दिगंबर आचार्य श्री अमित गतिजीओ बनावेल आ स्तोत्र छे. वास्तवीक परमात्मा केवा होय ? तेनुं सुन्दरवर्णन आपेल छे. (७) शक्रस्तवः-मन्त्रगर्मित श्री सिद्धसेन दिवाकर सूरीश्वरे आ बनावले छे. महाप्रभावीक छे. स्तोत्र ने अन्ते कहयुं छे के प्रतिष्ठामा भने शान्तिक विधिमां भणवाथी महा-मंगल, माटेथाय छे आ स्तोत्र नो उपयोग करी जीन सहस्र नाम पूनापणभणावी- शकाय तेवु छे आनो पाठ महामगलकारी छे महाचमत्कारीक छे त्यार पछी ॥ श्री जिनममसूरि प्रणीत महामगल कारी। श्री गौतमस्वामिस्तोत्र ॥ मत्र साथे भापेल छे तेनी पछी श्री जिनचन्द्र विरचीत श्री वीरजिनस्तवन आवे छे (८) जिनसहमनाम लघुस्तोत्र --चौदपूर्वघर श्रुतकेवलि आचार्यभगवतभद्रबाहुस्वामी विरचीत मा स्तोत्र छे ४० श्लोक मा १००८ नाम आपेल छे आचार्य देव कहेछे के जिनेश्वरना नामोनु स्मरण करवाथी अवश्य निर्वाण पदनी प्राप्तिथाय छे त्यार पछी चन्द्रप्रम सूरि प्रणीत साधारण जिन स्तवनम् ।। आपल छे अद्याष्टक ~~आमा जिनेद्र दर्शननु फल १५ लोक मा मापेल छ प्रभु प्रतिमापासे बोलवाथी सुदर भावो उत्पन्न करनार छ दशभक्ति माथी उद्धृत करेल छे जिनसहस्रनाम --आदि पुराणमा दिगम्बार आचार्य श्री जिनसेने आनी रचना करेला छे १० शतकमा १००८ नामो पेल छे बहुन प्रसिद्ध छ त्यार पछी ॥ द्रष्टाष्टक | आपेल छ जेमा जिनेद्रभनननु- रोचक शैलीमा वर्णन छे दश मक्ति माथी उद्धृत करेल छ सुप्रभातम् -सघारमा मणवाथी महामगल कारी छे जिन- बाणी माथी उद्धृत
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अनुक्रम मणिका ध्व पैश्या १ श्री जीवहर्पगणी विरचित 'श्री जिन- सहस-नामस्तोत्र २ श्रीमद् यशोविजयजी उपाध्याय रचित 'सिद्ध सहस्रनाम छद' ३ पडीत आशापर कृत 'जिन सहस नाम- २० २४ स्तिवन' २५ ७२ १४ ४ यीमद् हेमचद्राचार्य कृत 'भी अहन्नाम सहस समुच्चय श्री महन्नामोचार ६ श्रीमद् विनयविजयजी गणी रचित 'श्री जिन-सहस नाम स्तोत्र ७ श्री अमितगति आचार्य रचित 'श्री परमात्मा द्वात्रिंशीका' ८ मी सिद्धसेन दिवाकर सूरिरचित शकस्तव ९ श्री गौतमस्वामि स्तोत्र १० भी वीरजिन स्तवन ११ श्री भद्रबाहु स्वामी रचित 'जिन सहरू नाम रघु स्तोत्र ९५ १०१ १०२ १०८
xiv
११५ ११६
११७
१२. साधारण जिन स्तवन
१३. अद्याष्टक स्तोत्र
१४. श्री जिनसेनाचार्य रचित "श्री जिन
सहस्त्रनाम
१५. दृष्टाष्टक स्तोत्र
१६. सुप्रभात स्तोत्र
१७. शान्ति पाठ
१८. सकलतीर्थ
नमस्कार "सद्भक्त्या
१९. अहन्नमस्कारावलिका
२०. सिद्ध नमस्कारावलिका
२१. गिरोलि-प्रत्तन
२२. शान्तिधारा पाठ
२३. समवसरण-स्तवन
११९ १३२
१३३
१३५
१३५
१४०
१४२ १४९
१५० १५७
१५८ १६१
१६२ १६५
१६६ १६८
::
"
दाताओनी शुभ नामावलि
रु. ५००.०० श्री केरलचदजी खटोडना धर्मपत्नी असो
टुमकुवाइ ना वरसीतप निमित्त
रु. ३००.०० नया मन्दिरजी श्राविका व्हेनो तरफथी
रु. २५२ ५. श्री सक्रेचदजी समदडीजा
रु. २५०.०० शा मोतीजी शीपराजजी सघनी कालुरामजी
ना धर्मपत्नी अ सौ सोनीचाइ ना उपधान
प्रसगे.
मद्रास
रु २५०-०० जीराउला परमार परतापमलजी ना धर्मपत्नी
अ सौ फुलीवाइ ना उपधान निमिते मद्रास
रु. १२७ ५० श्री सपभदामजी जैन
रु १२७-५० श्रीमती मजुलाव्हेन अभयचद घृन्द्रावनदास
कोइम्पतुर,
रु १२७५० लोढाधीसुलाल-सपत्तराजजी मूलबागल.
रु ११८-०० एक सदग्रहस्थ-ज्ञानखाताना
रु १०१.०० श्रीमति मणीव्हेन चीमनलाल कोठारी. मद्रास
रु. ५२५० श्री अचलमलजी
रु ५१-०० श्री श्रेणीकभाइ-जयानद कोठारी
रु. ३७५० श्री रसिकलाल भाइ रोपर्टसनपेठ.
रु २५०० श्री वाडीलाल येन्कस
xvi
मद्रास
रु. २५.०० श्री आर. चंपालाल.
रु. २५-०० श्री सुरतानमल सुमेरमल.
रु. २५.०० श्री निरमयलाल बहादरमल.
रु. २५.०० श्री शान्तिलाल पी-म्हेता.
रु. २५-०० श्री आणंदजी भाइ.
रु. २५-०० शा. सरेमल जेठमल.
रु. २५-०० शा. चंपालालजी मुथा.
रु. २५-०० शा. मुनिलाल मुलतानमलजी.
रु. २५.०० शा. शंकरजी मूलचंदजी.
रु. २५-०० शा. मोतिचंद गुणेशमलजी.
रु. २५-०० श्री छगनमलजी तिरुनेलवेली.
रु. २५.०० श्री मोहनलाल टोलिआ.
रु. २५-०० शा. देवीचंद-गुलाबचंद.
रु. २५.०० श्री. जे. एम-शेठ.
रु. २५-०० शा. भगवानजी. भूताजी.
"
॥ श्री जीवहर्षगणी विरचित ।
॥ श्री जिनसहस्र नाम स्तोत्र।।
॥ भुजग प्रयात् वृतम् ॥
ॐ श्रीमन् मानदेव हेमचंद्र विजयहीर विनयानद घाम ललित
पूणानदसूरीश्वरपाद् पद्मेभ्यो नम ।
चिदानद चिदुरूप ए मोहमारी
सदा विश्वरुपी अरुपी अभारी।
अनाथ सुनाय उदार गभीर
अलक्ष्य विलक्ष्य अनन्त्य अभीर ॥१॥
चिरची म्पयभू निभू वीतराग
जिन देवदेव विशाल अताग ।
सदा अक्षर शकर योगरूप
समस्तास्त दोप अरोप निलोप ॥२॥
अमुद्र अतीद्र अनिद्र अबाध
अभेदी अमेदी अछेदी अगाध ।
पर मोक्षद सौख्यद सिद्धिदाता ।
जगन्नाथ पूज्यो अगुह्यो सुनेता ॥३॥
अज आदिकर्ता कलो दुःखहर्ता
महाज्योतिपुज सित शासभा ।
पुराण प्रवीण प्रशस्त प्रसिद्ध
प्रमोदामोधी अरोधी सुसिद्ध ॥ ४ ॥
2
वरीष्ठं पटिष्ठं लघिष्ठं गरीष्टं
ध्रुवं नूतनो जीर्णरुपो अचेष्ठं ।
अनामी अनाशी विकाशी विभासी
अपारं अदारं अमारं विलासी ॥ ५ ॥
सहायी अमायी सदामुक्तिशर्मा
समीचीन शांतीन अक्षीणधर्मा ।
अयोगी अभोगी अशोकी अनिंद्यो
जिनेशो धनेशो मुनीशो सुवन्धो ॥ ६ ॥
प्रभुतातिशायी चतुर्गात्र धारी
चतुर्वक्त्र धर्मोपदेष्टा विचारी।
स्वयंवुद्ध बुद्धो प्रवन्धो अगम्यो
अतुल्यो अशल्यो सदारुपरम्यो ॥७॥
अगंधो अवों असंस्पर्शनीयो
अभितो विनीतो जगदगदर्शनीयो।
अजल्पो अतल्पो अकल्पो अरुची
अमर्मा अकर्मा अधर्मा असंची ॥ ८ ॥
त्रिकालप्रवृत्तिज्ञ हीनाष्टकमों
पवित्रो विचित्रो अमित्रो अभो।
शरेण्यो वरेण्यो महान् ध्वांतहारी
क्षमासिंधु बन्धु जगज्जंतुतारी ॥९॥
3
शमीध्यानशुक्लो दमी स्याद्वादी
यतिः शुद्धमार्गी ऋषी जैनादी।
अमोहो अलिंगी गतोच्छाह अच्छो
जितेन्द्री गताशी अलिंगी अतुच्छो ॥१०॥
जिनेन्द्रो स्वयतेज सूक्ष्मो अशको
समत्रो स्वतनो अयत्रो अपको।
सदा नीरसो निर्गुणो कालवारी
निराहार निर्लोभ ए ब्रह्मचारी ॥ ११ ॥
धरामूर्ति यज्ञाग वीरो विधाता
अधीन्द्रो महीन्द्रो गुणज्ञो सुपाता ।
वृपांको वृपाधीश ससारतातो
महेशो महात्मा वचस्वी अजातो ॥ १२ ॥
शमात्मा शुभात्मा जितानग वशी
धृतिः कीर्ति कांति कलादो असशी।
महाधर्मधीरो अनतधिवेदो।
अमोघो प्रदिप्तो स्फुटो त्व अखेदो ॥ १३ ॥
समभ्यर्चनीयो सदाभास इप्टो
स्थवीयान् दवीयान् परानद पुष्टो ।
जरामृत्युहीनो अरिमो सुधोपो
जितक्लेश सौम्यो कृतज्ञो मुतोपो ॥ १४ ॥
4
असंस्कृत्य सारो हरीराम ध्येयो
दयायागतुंगो सदृष्टी अमेयो।
सहस्त्राक्ष विश्वाक्ष वीरावंतसो
सुभोक्ता रमेशो अलेशो अंदशो ॥ १५ ॥
सदा आदिमूर्तिः प्रभापूर्तिगुप्तो
गणवामि शक्तो अगण्यो असुप्तो ।
कजाक्षो सुदक्षो अपक्षो अतकों
अहास्यो अलास्यो श्रुतांभोजअर्को ॥ १६ ॥
महातकनिनो अविघ्नो अशेषो
त्रिसंध्यानतो स्फार सिद्धांत वेषो ।
जगत् पालको सुश्रिको अंशुमाली ।
सदैको लयी शुद्धसम्यक्त्वशाली ॥ १७ ॥
सुधानिझरो वर्य धुर्यो प्रतिष्ठो
स्थविष्टो सुनिष्ठो बहिष्ठो बलिष्ठो।
महामूर्ति तेजो महानंदकंदो
महाबोधिशास्ता निरक्षो मुनीन्द्रो ॥ १८ ॥
सुसाक्षी भवांतो पीयान विभावो
सुधा संभवो धैर्ययुक्तो अरावो ।
श्रियोराशी उद्दामगीर्मागधीयो
मुमुक्षुस्तितीर्घश्चिरायुरजेयो ॥ १९ ॥
5
भवद्योतको भूष्णु भन्यात्मभासी
दिशास्त्रधारी सुखाराध्य आसी।
जगतपापघाती अलोकातदृष्टी
सदार्हन् जय श्रीमुरारी अकष्टी ॥ २० ॥
अशोकाक ओंकार आरोग्यकार
असर विसर प्रकार प्रतार ।
समग्रागमेगो हितार्थी अनर्थी
नयी नीतिदो निभ्रमो सुप्रमार्थी ॥२१॥
सदाव्यक्तरुपो समानो सहिष्णू
प्रजापाल पृथ्वीपती प्राग्यजिष्णू ।
भवामोजदती भनो भानुमतो
अजिम्हो अनटो अदृष्टो अचेतो ॥ २२ ॥
अकपस्थिती अग्रणी ऊर्जयायी
स्तुति स्वामी सत्त माध्यो सुछायी।
महास्था नमेशो महाजैन मुक्तो
अहिंसोपदेशी अनगो अनुक्तो ॥ २३ ॥
अवाग्गोचरो आर्तहा असिद्धी
अनेकातनादी अतलो विरद्धी।
सलब्धी सशक्ति सदुद्धारसेतो
अपीनो अधीनो अनाी अरेती ॥ २४ ॥
6
नभोरन निर्मानसो निर्विकारं
सुराध्यक्ष संकल्प सर्वर्तुसारं ।
रवहाशब्दवाची स्वधाभुक् सुवर्यो
सदास्थावरो साकरो त्वं अचच्यों ॥ २५ ॥
धराधारमाधार धन्यो धतारी
त्रिकालो त्रिवगों त्रिधमों त्रितारी।
महावैद्य मौनी महावीर्यमेधा
कलाकल्पकल्पं न कल्याणश्रद्धा ॥ २६ ॥
सदा धर्मदिशो सुमुद्रो समस्तो
जगजीवनं जीवनं जैनव्यस्तो ।
नतार्तिघ्न निर्वाहको धर्मधामा
अगों अखवों अकालो सुनामा ॥ २७ ॥
प्रभातो प्रमाणो परोक्षो प्रतीक्षा
विहारी विधेयो वरीयान् अनीक्ष्यो ।
बृहत्कीर्ति वाग्मी विवस्वान् विजेता
विराट् वेगवान् वृत्तिसारी सुवेत्ता ॥ २८ ॥
अकर्तापि कर्ता अहर्तापि हर्ता
अपायोऽपनेता प्रव्रज्याप्रधर्ता ।
महादेव मृत्युंजयो केशवेशो
महोच्छाह देवो महात्मा कुलेशो ॥ २९ ॥
7 - सदाविश्वविद्यो शिमो विश्वपादो महाविश्व चिन्तामणीश्चिन्तितार्थो । महामारिवारो अजग्यो श्रुतार्यो ॥३०॥ तथा दिव्यभापापति दिव्यदेवो निरुग् निश्चलो निर्ममो भानदेवो। कलिण्यालमोसुलोकायासी तिरीति नृसिंहो नृदेनो सुखासी ॥ ३१ ॥ तथा मृत्युमारी मुनिमार्गरक्ता महासद्गुरो मुत्करो विश्वनाता। महादित्य मृतॊ मनोऽभीष्टचद्रो सदा अग्रजो सर्वरो शातिमुद्रो॥३०॥ सुसौम्यात्मको सौम्यमूर्ति सुयज्या असगात्मको अग्निमूर्ति जग्गा । विधिर्धमानो विचेतोज नूत्यो तथा स्थाणु तद्पगो तत्वकृत्यो ॥ ३३ ॥ सुसत्ति सद्बुद्धिगो शैलसगी मुनिपुगो सत्यसधो दयागी। तथा निश्वत्तीय विद्याम्लिामी पुरु: पुण्यगी धन्यगी विश्वासी ॥ ३४ ॥ ।
००
गुणी गुप्तिभृत् गुप्तवृत्तांतविज्ञो
जयो विश्वसृट् विश्वशीपों श्रुतज्ञो ।
सदाभक्ति वात्सल्य कल्याणगेहं
अधोघाती अनघो रफूरयोगदेहं ॥ ३५ ॥
मनीपी सुलब्धाक्षरो देववाणी
गिगनाथ तृप्तो समस्तप्रमाणी।
तथा रत्नगर्भो महाज्ञानगमों
दयागर्भयुक्तो तथा पद्मगों ॥ ३६ ॥
हिरण्यांगभू विश्वगो विनोदी
मनोज्ञाह वाचस्पती सुप्रमोदी।
दृढीयान् इतो ईशिता ईश्वरांगो
अवाधापदस्थायुको धर्मरागो॥ ३७॥
सदासत्यविज्ञानसेनो शमीशो
महाकामधेनू यतिराट् दमीशो।
सदा श्लक्षणो गुप्तनेत्री गिरीशो
सदुद्योतको दीर्घवाणी हरीशो ॥ ३८॥
महाध्यात्मगो केवली योगमायो
वनेवेश्मपूज्यर्धि ऋत्विग् विहायो ।
गुणोच्छेदको याज्यसूक्ति स्वरीशो
स्वयू विस्मयो प्रोत्तमो शासनेशो ॥ ३९ ॥
9
मन, कलेशहारी कलिम्लानमुक्तो
तथा धर्मनेमी समस्तेट् निरक्तो।
हरत दुरत प्रतायान वेद्यो
स्फुरत चरत अमोघादिरिद्यो॥४०॥
अरगो निरगो रहस्य सुहार्द
चरातीत चित्कद चित्य सुगीदं ।
अनहींतको कर्मठो रुद्रभद्रो
महापातिहार्योचलो एरमेद्रो ॥ ४१ ।।
चतुर्धर्भभापी सुफर्मण्य सच्ट्री
प्रधीयान् प्रपची जगन्मिनमुच्छी ।
अचाल्यो अपाल्यो न वृद्धिन हानी
नमालो नशालो नरीति मखावी ॥ ४२ ॥
विलोलो अलोलो सदा धर्मजन्यो
सदा ज्ञानकल्योलकेशो अपुण्यो।
अधर्मा अनीहो असधी अदडो
तथा नेदीयान् सस्तियुक् ज्ञानपिंडो॥ ४३ ॥
तथा तीर्थग्यो स्वयतीर्थराध्यो
स्वयतीर्यकारी संयतीर्थसाध्यो।
स्मयतीर्थभोगी स्वयतीर्ययोगी
महातीर्थतीर्थो जगत्सप्रयोगी॥४४॥
10 महावैभवो निर्भवो देवसेवी तथा सप्तभंगी भजद्वाणीदेवी । समाधानसर्वांग लक्ष्मीविवक्तो तथा पद्मसंविष्टरो पायुक्तो ॥ ४५ ॥ श्रिया संश्रितो सुंदरो वप्रशाली पदन्यास पंकेरुहो संघमाली । शिरोछत्रराजा चलद्धमकेतू समस्तांगिवाणी वदन् शुद्धहेतू ॥ ४६॥ तथा द्रव्य पट्कस्वरुपज्ञ शंदो सदा ज्ञानलोकोत्तरज्ञो अफंदो। महामोक्षसया महामंत्रतच्यो अहेयो उपादेय विश्वाधिसत्त्वो ॥ ४७ ॥ असंसारभू ब्रह्मदेवो प्रदेशी चिदानंद मनो अनंतोपदेशी । तथा कोटिसूर्या सुधी मुख्यवीक्ष्यो महाबोधि सत्वो जगदत्तशिक्षो ॥४८॥ महानुत्तरज्ञान चारित्रधारी मदोन्मत्तमोहद्विपानां मृगारी । तथा सौगतो ग्रामणी स्वेशसूरी मनोभ्रांतिभित् विश्वशौंण्डीर भूरि ॥ ४९ ।।
11 तथा सद्दयो धर्मचक्री प्रभारी अघिद्वेपको सन्दुि र्भूतभावी। सुचैतन्यपागूवीजमत्रो कृपालो महाधर्मशफ्रेश भापो दयालो ॥५०॥ तथानत सशुद्धिज लोकमान सदानतवीर्य प्रमकिर्तियान । सुखापूर्ण मिनारित यो प्रतागी महाध्यान योगाधिको तचमगी ॥५१॥ सदासयमो वियमो धर्मलाभो महानायु मूर्तिः महानुत्तराभो। सुखानद गोविन्द विद्यात्मदीपो महापातिकाशमिद धर्मदीयो ॥ ५२ ॥ सदात्यो सनात्यो अनतेन्द्रशक्ती प्रभालोकसभासनी तत्तयुक्ती। असदुर्धरो धर्मरी सन्मनोज स्था भव्य पूत श्रुताम्मः सरोज ॥ ५३ ॥ सदानित्य द्रव्यो पतजधारी तक समावी बदुभासारी । सदा पुष्फलो चिन्मयो धर्मवृद्धि स्वयमगलो श्रेयसा धामवृद्धि ॥ ५४॥ .
14
समुत्पत्ति-विध्वंसनित्यस्वभावी
जगत् ज्ञापको जापको ज्ञानभावी ।
जगद्भुतनाथो दुराचारवामी
पराकार संसारवारी सुकामी ॥ ६५ ।।
तथोत्कृष्टदृष्टी विपर्यायबुद्धि
असद्भावनष्टी शुभाचारशुद्धि ।
तपस्वी यशस्वी सुवैराग्यसंगो
अनारंभ भाषी स्फूरद्वकारंगी ॥ ६६ ॥
स्वयं धूर्जटी पद्मनाभो नयात्मो
सदापुण्य कुंभो पुरस्कृत्यभात्मो।
धृतश्री व्रतश्री कृतश्री भृतश्री
वलश्री कलश्री गुणश्री वरश्री ॥ ६७ ॥
चतुवर्ण भिन्नो अलौकिकसांख्यो
सदा न क्षतो न क्षयोनाभिकांक्षो।
महाज्ञानरत्न प्रदो ब्रह्मलोको
तथा दुर्गतिनो भगो देवलोको ॥ ६८ ॥
महामर्मवारी असंसार चारी
निराधार साधार संन्यासकारी ।
जगद् भाल बिदु स्फूरद्धर्मरत्नो
गुणानां निधानं जगत्सुप्रयत्नो ॥ ६९ ॥
15 महामेरुतुगो सदाचार्यों जयशी रिवादी जगचित धार्यो। चलद्धर्म मृर्ती क्रियाहेतुकामो तथा सार्व सुश्रुकती विश्वकामो ॥ ७० ॥ महाकीर्ति पद्धो सदाकल्मपनो तथा कर्म साक्षी विमविलमो । अलाभो सुलाभो प्रकृष्ट प्रभावो महाध्यापको चाचको विश्वभावो ॥ ७१ ॥ सदाक्षेमशर्मा महाक्षेमकर्ता। महाविज्ञगम्यो अतिथि प्रधा। प्रतात्मको हेमगर्भो सुपन्या क्षमेशो सुरायो भवाब्धि प्रमन्या ॥७२॥ तथा मेरुशाली कमाली अतागो असगो सुसगो महागो अभागो। चलचामरौधो जगत्सपदीयो सुशोभाकरो भाकरो चेतनेशो ॥ ७३ ॥ सुनिनथकी सअनो शास्त्रगधो यथाख्यातनान् ज्ञाति वृद्धो सुगन्धो । शुभाज्ञा प्रधानो स्फुरद योगनाणी महामगलिको मथत्पचवाणी।
16 . अपर्याप्त पर्याप्त सज्जीववेत्ता । महाज्ञान शुद्धेन मिथ्यात्वमेत्ता ।। ७४ ॥ जगन्मौलि चुडामणी विश्वहारो रमाकेलिगेहं भवापारपारो। महोदार कर्मा सुवेश्मा सुदारो अनाचार आचार सर्वद्धिकारो ॥ ७५ ॥ अलंकार संचार संपन्नसंतो वदान्यो सदाप्राणवो बुद्धिकंतो। अनीगु दिनिधंधको चक्रपाणी गदाशंख छत्र प्रशस्तीकपाणी ॥ ७६ ॥ तमोघ्नो द्वितीयो अलीनो नवर्धि मितज्ञोऽमितज्ञो निवृत्तीगुणीं । तथा पुर्वलक्ष्मी सदापावनात्मा सदौचित्यकर्ता विवेकभृतात्मा ॥ ७७ ॥ महाऽक्षोभ्य रोगातिहा चीतदुष्टो सदावितमात्सर्यको ज्ञानपृष्टो । शुभास्वान् गुणज्येष्ठको गाह्यगोप्ता महानंद संवर्धनो पापलोप्ता ॥ ७८॥ महाकारुणीको जगत्साधनिको त्रिलोकेश देशाधिपो माननीको ।
17 क्षरद्वागीगगासरित्यूतविश्वो समुत्पत्तिनिस्पतिविज्ञातविश्वो ॥ ७९ ॥ चलस्वर्णदुर्गनयो चगीमागो मृगेन्द्रामनस्यायुको देनरागो। जगजागरुको दयादारधारी सदा निर्मलागो तथा व्यगधारी ॥८॥ महादुदुभीनिसनो योगनिद्रो महानाधिनार वारिदो तापसेंद्रो। महापुण्यलिप्तो सुधारूपगान दुराशानिवारी जरावेलिदान ॥ ८१॥ सदाभोगभामडलस्फारशोमी अमवाशुशीताशु भक्तैकलोभी। पराघातकर्मा तपोलब्धिलब्धो तथा क्षायिभानाकितो मोक्षलुब्धो ॥ ८२॥ लसत् ज्ञानवल्लीजल प्रार्थितार्थो श्रमामानहेतुः प्रथातो गुणार्थो । जगच्छेखरो पादचारी जयाको जगत्सत्प्रशस्ति प्रतिज्ञा शुभांको ॥ ८३ ।। महानामअष्टोत्तर ए हजार भजो चित्तमा नित्य थहने करार । 2 18 वहु वर्षना कोटि जो कष्ट कीजे फलं नामना जापथी सद्य लीले ॥ ८४ ॥ मुधा कां गमाडो भलो जन्म आले भजो नाममाला भली त्रण काले। नथी ए विना ईश को विश्वमाहे नमें रातिदीशं सुरा चित्त चाहे ॥ ८५ ॥ जिणे राग ने द्वेपनां मान मोड्या जिणे दुष्ट दुःकर्मनां बंध तोड्या । जरा जन्म ने मृत्युनी भीति वारी रहे ज्ञाननी लीलमा निर्विकारी ॥ ८६ ॥ मते मूढे जे मानुपा एम आखे । फरी विश्वना ईशने जन्म भाखे । विना पास दीधा यथा रंग नावे विना कर्म प्राणी भणी जन्म नावे ॥ ८७ ॥ जिणे गर्भना कंदमां दंद कीधा करी क्रोध झाझा घणां पाप लीधां। जिणे दुर्गने बंध बांध्या अनाणे कहो छोडवे भक्तने में प्रमाणे ॥ ८८॥ महामंदबुद्धि नही ज्ञानलेश कृपानाथने भाखता जन्मवेशं ।
119 रखे ते कदा कर्णमां वात आवे सदा माहरा चित्तमा जनभावे ॥ ८९ ॥ नथी ए विना मन को या रुडा विना एहथी भार ते मर्व कूडा । नथी ए पिना घुदि ने सिद्धि साची जिको ए बिना बात ते सर्व काची ॥९॥ ततो एहना नाममा ध्यान राखी करी नाममाळा जिसी देवशाखी । सदा जे भणे जे गणे नित्यकाल बसे तेहने मदिरे सच्छिवाल || ९१ ।। सुधी पुण्यहर्षाभिधानी मुनीशो गुणी वाचको ग्यानहों गणीयो। तयोचारुपादाब्जसेवासुसक्ती मुनि नहों वदे भानयुक्तो ।। ९२ ॥ जिनसहस्त्रनामस्तोत्र संपूर्णम् ॥ 1 20 न्यायविशारद-न्यायाचार्य श्रीमद् यशोविजयजीविरचित- सिद्ध-सहस्रनाम वर्णन छंद [भुजंगप्रयात वृत्त] जगन्नाथ जगदीश जगबंधु नेता चिदानंद चित्कंद चिन्मृति चेता । महामोहभेदी अमाइ अवेदी तथागत तथारूप भवतरु-उच्छेदी* ॥ १ ॥ निरातंक निकलंक निरमळ अबंधो प्रभो दीनबंधो कृपानीरसिंघो। सदातन सदाशिव सदाशुद्ध स्वामी पुरातनपुरुष पुरुषवर वृषभगामी ॥२॥ प्रकृतिरहित हितवचन नामातीत महाप्राज्ञ मुनियज्ञपुरुष प्रतीत । दलितकर्मभर कर्मफळ सिद्धिदाता हृदयपूत अवधूत नूतन विधाता ॥३॥ महाज्ञान योगी महात्मा अयोगी महाधर्मसंन्यास परलच्छीभोगी। महाध्यानलीनो समुद्रो अमुद्रो महाशांत अतिदांतमानस अरुद्रो ॥ ४ ॥ * भपर्मय उच्येदो।
21
महेंद्रादिकृतसेच देवाधिदेव!
नमो ते अनाहतचरण नित्यमेव ।
नमो दर्शनातीत दर्शनसमूह
नयी-गीत-वेदातकृत अखिल उह ॥५॥
वचनमनअगोचर महावाक्य घृत्त
कृतावेद्यसवेद्यपद सुप्रवृत्त।
समापत्ति आपत्ति सपत्ति मेदे
सकळ पाप सुगरिह तु दिछ छेदे ॥ ६॥
न तु दृश्य दृग्मान इति वेदवादो
समापत्ति तुज दृष्टि सिद्धांतवादो।
विगूता विनाअनुभवे सकळयादी
लसे एक सिद्धातधर अप्रमादी ॥७॥
कुमारी दयितभोगसुख जिम न जाणे
तथा ध्यान पिण तुज मुधा लोक ताणे।
करे कष्ट तुज कारणे बहुत खोजे
स्वय तु प्रकाशे चिदानद मोजे ॥८॥
स्टे अटपटे झटपटे वाद ल्यावे
न त्या तु रमे अनुभवी पास आवे।
महा नट न हठयोगमाहि तुज जागे
विचारे होये साइ आगे जु आगे ॥९॥
22
तथाबुद्धि नहीं शुद्ध तुज जेणे वहिये
कलौ नाममां एक थिरथोभ रहिये ।
सहसनाममां दप्प पणे अप्प जाणुं
अनंते गुणे नाम अणंता वखाणु ॥ १० ॥
अनेकांत संक्रांत बहु
अर्थ
शुद्ध
जिके शब्द ते ताहरां नाम वुद्ध ।
निराशी जपे जेह ते सर्व साचुं
जपे जेह आशाए ते सर्व काचुं ॥ ११ ॥
न को मंत्र नवि तंत्र नवि यंत्र मोटो
जिस्यो नाम ताहरो शमामृत लोटो।
प्रभो! नाम मुज तुज अक्षय निधान
धरं चित्त संसारतारक प्रधान ॥ १२ ॥
अनामीतणा नामनो श्यो विशेष ?
'ए तो मध्यमा वैखरीनो उल्लेख ।
मुनिरूप पश्यंति काइ प्रमाणे
अकळ अलख तुं इम होय ध्यानटाणे ॥ १३ ॥
अनवतारनो केह अवतार भाखे
घटे ते नहीं देवने कर्मपाखे।
तुनुग्रहण नहीं भूत आवेश न्याये
प्रथम योग छे कर्म तन्मिश्र प्राये ॥ १४ ॥
23
अछे शक्ति तो जननी उदरे न ऐसे
तनुग्रहण वळी पर अदृष्टे न वेसे।
तुरगभग सम अर्थ जे एह युक्ति
कहे सदहे तेह अप्रमाण उक्ति ॥ १५ ॥
यदा जिनपरे दोप मिथ्यात्व टाव्यो
ग्रह्यो सार सम्यक्त्व निज वाव यान्यो।
तिहाथी हुआ तेह अवतार लेखे
जगत लोक उपगार जगगुरु गवेखे ॥ १६ ॥
अहो! योगमहिमा जगन्नाथकैरो
टले पच कल्याणके जग अधेरो।
तदा नारकी जीव पण मुख पावे
चरण सेवा घसमस्या देव आचे ॥१७॥
तजी भोग ले योग चारित पाळे
घरी ध्यान अध्यात्म धनधाति टाळे ।
लहे केवळज्ञान सुरकोडि आवे
समवसरण मडाय सचि दोष जावे ॥ १८ ॥
घटे द्रव्य जगदीश अवतार एसो
कहो भाव जगदीश अग्रतार केसी।
रमे अश आरोप धरी ओघदृष्टि
लहे पूर्ण ते तत्व जे पूर्णदृष्टि ॥ १९ ॥
24 त्रिकालज्ञ अरिहंत जिन पारगामी विगतकर्म परमेष्ठी भगवंत स्वामी । प्रभु बोधिदाभयद आप्त स्वयंभू जयो देव तीर्थंकरो तुं न शंभु ॥ २० ॥ इस्यां सिद्ध जिननां कह्यां सहस्र नाम रहो शब्द-झगडो लहो शुद्ध धाम । गुरु श्री नयविजय वुध चरणसेवी कहे शुद्ध पदमांहि निज दृष्टि देवी ॥ २१ ॥ [श्रीमद् यशोविजयजीविरचित "गूर्जर साहित्यसंग्रह" माथी उध्धृत ] . - with 25 , ॥ ॐनम सिद्धम्य ॥ पण्डित आशाधरकृत जिनसहस्त्रनामस्तवनम्। ॥ अनुष्टुप् ॥ प्रभो ! भवागभोगेपु, निर्षिण्णो दु खमीरुकः । एप विज्ञापयामि त्वा, शरण्य करुणार्णवम् ॥१॥ सुखलालसया मोहाद् , भ्राम्यन् पहिरितस्ततः । सुखैकहेतो मापि, तब न ज्ञातवान् पुरा ॥ २॥ अद्य मोहग्रहावेश-शैथिल्यात् किश्चिदुन्मुग्वः । अनन्तगुणमाप्तेभ्य-स्त्या श्रुत्वा श्रो(स्तो)तुमुद्यतः भक्त्या प्रोत्साघमानोऽपि, दूर शक्त्या तिरस्कृतः । त्ला नामाप्टसहस्रेण स्तुत्वाऽऽत्मान पुनाम्यहम् जिनसर्वज्ञयजाई-तीर्थकृन्नाथयोगिनाम् । निर्माणबदायुद्धान्त-कृता चाष्टोत्तर शतः तद्यथा-जिनो जिनेन्द्रो जिनराड् , जिनप्रेष्ठो जिनोत्तमः । जिनाधिपो जिनाधीशो जिनस्वामी जिनेश्वरः जिननाथो जिनपति-जिनराजो जिनाधिराट । जिनप्रभुजिननिभु-र्जिनभर्ता जिनाधिभूः ॥७॥ जिननेता जिनेशानो, जिनेनो जिननायकः । जिनेट् जिनपरिवृढो, जिनदेवो जिनेशिता - 26 - जिनाधिराजो जिनपो, जिनेशी जिनशासिता । जिनाधिनाथोऽपि जिना-धिपतिर्जिनपालका ॥९॥ जिनचन्द्रो जिनादित्यो, जिनाकों जिनकुञ्जरः । जिनेन्दुर्जिनधौरेयो, जिनधुर्यो जिनोत्तरः ॥ १० ॥ जिनक्र्यो जिनवरो, जिनसिंहो जिनोद्वहः । जिनपभो जिनवृपो, जिनरत्न जिनोरसम् ॥ ११ ॥ जिनेशो जिनशार्दूलो, जिनाग्र्यो जिनपुङ्गवः । जिनहंसो जिनोत्तंसो, जिननागो जिनाग्रणीः ॥ १२ ॥ जिनप्रवेकश्च जिन-ग्रामणीर्जिनसत्तमः । जिनप्रवहः परम-जिनो जिनपुरोगमः ॥ १३ ॥ जिनश्रेष्ठो जिनज्येष्ठो, जिनमुख्यो जिनानिमः । श्रीजिनश्चोत्तमजिनो, जिनवृन्दारकोऽरिजित् ॥१४॥ निर्विघ्नो विरजाः शुद्धो, निस्तमस्को निरञ्जनः । धातिकर्मान्तकः कर्म-मर्मावित्कर्महाऽनघः ॥ १५ ॥ वीतरागोऽक्षुद(ब)द्वेषो, निर्मोहो निर्मदोऽगदः । वैतृष्णो निर्ममोऽसङ्गो, निर्भयो चीतविस्मयः ॥१६॥ अस्वप्नो निःश्रमोऽजन्मा, निस्वेदो निर्जरोऽमरः । अरत्यतीतो निश्चिन्तो, निर्विषादस्त्रिषष्टिजित्. ॥ १७ ॥ ॥ इति जिनशतम् ॥१ सर्वज्ञः सर्ववित्सर्व-दर्शी सर्वावलोकनः । अनन्तविक्रमोऽनन्त-वीर्योऽनन्तसुखात्मक ॥ १८॥ - -
27
॥ १९ ॥
॥ २० ॥
॥२१॥
॥ २२॥
॥ २३ ॥
अनन्तसौख्यो विश्वज्ञो, विश्वघ्श्वा खिलार्धर ।
न्यसा विश्वतचधु-निश्वचारशेपमित
आनन्दः परमानन्दः, सदानन्दः सदोदयः ।
नित्यानन्दो महानन्दः, परानन्दः परोदय:
परमोजा पर तेजा, पर धाम पर महः ।
प्रत्यग्ज्योतिः पर ज्योति., पर ब्रह्म पर रह:
प्रत्यगात्मा प्रयुद्धात्मा, महात्माऽऽत्ममहोदयः ।
परमात्मा प्रशान्तात्मा, परात्माऽऽत्मनिकेतनः
परमेष्ठी महेप्टात्मा, श्रेष्ठात्मा सात्मनिष्ठितः ।
ब्रह्मनिष्ठो महानिष्ठो, निरूढात्मा दृढात्मा
एकनिद्यो महाविद्यो, महानरपदेश्वरः ।
पञ्चनममयः मार्गः, सर्मविद्येश्वरः सभूः
अनन्तधीरनन्तात्मा--ऽनन्तशक्तिरनन्तर ।
अनन्तानन्तधीशक्ति-रनन्तचिदनन्तमुत्
सदाप्रकाशः सर्वार्थ--साक्षात्कारी ममग्रधीः ।
कर्मसाक्षी जगचक्षु-रलक्ष्यात्माऽचलस्थितिः
निरावाधोऽप्रतात्मा, धर्मचक्री पिदांवरः ।
भूतात्म सहजज्योति--निवज्योतिरतीन्द्रियः
केवली केरलालोको, लोकालोकपिलोकनः ।
विविक्तफेवली व्यक्ती, शरण्योऽचिन्त्यभवः
॥ २४ ॥
॥ २५ ॥
॥ २६ ॥
॥२७॥
-
॥२८॥
28
॥ २९ ॥
॥३०॥
॥ ३१ ॥
॥ ३२ ॥
विश्वभृद्विश्वरूपात्मा, विश्वात्मा विश्वतोमुखः ।
विश्वव्यापी स्वयंज्योति-रचिन्त्यात्माऽमलप्रभः
महौदार्यों महाबोधि-महालाभो महोदयः।
महोपभोगः सुगति--महाभोगो महाबलः
॥ इति सर्वज्ञशतम् ॥ २
यज्ञाहौं भगवानह-न्महार्हो मघवार्चितः ।
भूतार्थयज्ञपुरुषो, भूतार्थक्रतुपूरुषः
पूज्यो भट्टारकस्तत्र--भवानत्रभवान्महान् ।
महामोऽहंस्तत्रायु-स्ततो दीर्घायुरयवाक्
आराध्यः परमाराध्यः, पञ्चकल्याणपूजितः ।
दृग्विशुद्धिगणोदग्रो, वसुधारार्चितास्पदः
सुस्वप्नदर्शी दिव्यौजाः, शचीसेवितमातृकः ।
स्याद्रनगर्भश्रीपूतः, गर्भगर्भोत्मवोत्थितः
दिव्योपचारोपचितः, पद्मभूः निष्कलः स्वजः ।
सवीर्यजन्मा पुण्याङ्गो, भास्वानुभृतदैवतः
विश्वविज्ञातसंभृति-विश्वदेवागमाद्भुतः ।
शचीसृष्टप्रतिच्छन्दः, सहस्राक्षो दृगुत्सवः
नृत्यदैरावतासीनः, सर्वशक्रनमग्कृतः ।
हर्षाकुलामरखग-चारणषिमनोत्सवः
व्योमविष्णुपदारक्षा-स्नानपीठायिताद्रिराट् ।
तीर्थेशमन्यदुग्धान्धि-स्नानाम्बुस्नातवासवः
॥ ३३ ॥
॥३४॥
॥३५॥
॥ ३६॥
॥ ३७॥
॥ ३८॥
29
"
॥४०॥
11४२ ॥
गन्याम्नुपूतनैलोक्यो, पशुचिचियाः
कृतार्थितशचीहस्ता-शको घृष्टेटनामक
शक्रारब्धानन्दनृत्यः, शचीचिम्मापिताम्बिक ।
इन्द्रनृत्यन्तपितको, रैदपूर्णमनोरथः
आज्ञार्थीन्द्रकृतासेवो, देवीष्टशियोद्यमः ।
दीक्षाक्षणसुधजग-भूर्भुवःस्वापतीडिता
कुवेरनिर्मितान्याना, श्रीयुग्योगीश्वरार्चितः ।
प्रोड्यो ब्राझविद्वेव्यो, याज्यो यज्ञपतिकता
यज्ञानममृत यज्ञो, हवि स्तुत्यः स्तुतीश्वरः ।
भागो महामहपति-महायज्ञोऽग्रयाजक'
दयायागो जगत्पूज्यः पूजा) जगदर्चितः ।
देवाधिदेवः शक्राच्यों, देनदे जगद्गुरुः
सहूतदेवसधार्य:, पद्मयानो जयधजी।
भामण्डली चतुः पष्टी-चामरो देवदुन्दुभिः
वागस्पृष्टासनश्छर-जयराह पुष्पवृष्टिभाक् ।
'दिव्याशोको मानमर्दी, सगीतार्होऽष्टमङ्गाल:
इति यशाहशतम् ॥३
तीर्थकृतीर्थस्ट तीर्थ-करस्तीर्थकरा सुदृक् ।
तीर्थकर्ता तीर्थभर्ता, तीर्थेशस्तीर्थनायक
धर्मतीर्थकरस्तीर्थ-प्रणेता तीर्थकारकः ।
वीर्यप्रवर्तकस्तीर्थ-विधास्तीर्थविधायका
॥१७॥
॥४८॥
-- 30 ॥ ४९ ॥ ॥ ५० ॥ ॥ ५१॥ ॥ ५२ ॥ सत्यतीर्थकरस्तीर्थ-सेव्यस्तैर्थिकतारकः । सत्यवाक्याधिपः सत्यः, शासनोऽप्रतिशासनः स्थावादी दिव्यगीदिव्य-ध्वनिरव्याहतार्थवाक् । पुण्यवागर्थ्यवागर्ध-मागधीयोक्तिरिद्धवाक् अनेकान्तदिगेकान्त-ध्वान्तमिदुर्नयान्तकृत् । सार्थवागप्रयत्नोक्तिः, प्रतितीर्थमदन्तवाक् स्यात्कारध्वजवागीहा-पेतवागचलौष्ठवाम् । अपौरुषेयवाक् शास्ता-रुद्धवाक् सप्तभङ्गिवाक् अवर्णगीः सर्वभाषा-मयगीव्यक्तवर्णगी। अमोघवागक्रमवा-गवाच्यानन्तवागवाक् अद्वैतगीः सूनृतगी:, सत्यानुभयगीः सुगीः । योजनव्यापिगीः क्षीर-गोरगीतीर्थकृत्त्वगी: भव्यैकः श्रव्यगुः सद्गु-श्चित्रगुः परमार्थगुः । प्रशान्तगुः प्रानिकगुः, सुगुनियतकालगुः सुश्रुतिः सुश्रुतो याज्य-श्रुतिः सुश्रुन्महाश्रुतिः। धर्मश्रुतिः श्रुतिपतिः, श्रुत्युद्धर्ता ध्रुवश्रुतिः निर्वाणमार्गदिग्मार्ग--देशकः सर्वमार्गदिक् । सारस्वतपथस्तीर्थ---परमोत्तमतीर्थकृत देष्टा वाग्मीश्वरो धर्म-शासको, धर्मदेशकः । वागीश्वरस्त्रयीनाथ--त्रिभङ्गीशो गिरा पतिः ||५३ ॥ ॥ ५४॥ ॥ ५५ ॥ ॥ ५६ ॥ ॥ ५७॥ । ।। ५८ ॥
३ सिद्धाज्ञः सिद्धवागाजा-सिद्धः सिद्धकशासनः । जगत्मसिद्धसिद्धान्त-सिद्धमन्त्रः सुसिद्धवाक् ॥ ५९॥ शुचिश्रा निरुक्तोक्तिस्तन्त्रकृन्न्यायकद (शुचिः) । महिष्ठवाग्महोनादः, कनीन्द्रो दुन्दुमिस्मनः ॥६० ॥ ॥ इति तीयकृच्छतम् ॥ ४ नाथः पतिः परिवृढ', सामी भर्ता विभुः प्रभुः । ईश्वरोऽधीश्वरोऽधीशो-धीशानोऽधीशितेशिता ॥ ६१ ॥ ईशोऽधिपतिरीशान, इन इन्द्रोऽधिपोऽधिभूः । महेश्वरो महेशानो, महेश. परमेशिता ॥६२॥ अघिदेवो महादेचो, देवत्रिभुपनेश्वर । विश्वेशो विश्वभूतेशो, विश्वेद विश्वेश्वरोऽधिराह ॥ ६३ ॥ लोकेश्वरो लोकपति-लोकनाथो जगत्पतिः। त्रैलोक्यनाथो लोकेशो, जगन्नाथो जगत्प्रभुः ॥ ६४॥ पिता परः परतरो, जेता जिष्णुरनीश्वरः । का प्रभूष्णुभ्रांजिष्णु', प्रमविष्णुः स्वयप्रभा ॥ ६५ ।। लोकजिद्विश्वजिद्विश्व-विजेता विश्वजितः। जगजेता जगत्रो, जगजिष्णुर्जगजयी अग्रणीग्रामणीनता, भूर्भुवःस्वरधीश्वरः । धर्मनायक ऋद्धीशो, भूतनाथश्च भूतभृव गतिः पाता वृषो पर्यो, मन्त्रकृच्छुभलक्षणः । लोकाध्यक्षो दुराधों, भव्यनन्धुनिरुत्सुक
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|॥६९॥
॥ ७० ॥
॥ ७१ ॥
॥ ७२ ॥
धीरो जगद्धितो जव्य-स्त्रिजगत्परमेश्वरः।
विश्वासी सर्वलोकेशो, विभत्री भुवनेश्वरः
त्रिजगवल्लभस्तुग-स्त्रिजगन्मङ्गलोदयः ।
धर्मचक्रायुधः सघो-जातस्त्रैलोक्यमङ्गलम्
वरदो प्रतियोऽच्छेद्यो, द्रढीयानभयङ्करः ।
महाभागो निरौपम्यो*, धर्मसाम्राज्यनायकः
॥ इति नाथशतम् ॥ ५
योगी प्रव्यक्तनिर्वेदः, साम्यारोहणतत्परः ।
सामायिकी सामयिको, नि:प्रमादोऽप्रतिक्रमः
यमः प्रधाननियमः, स्वभ्यस्तपरमासनः ।
प्राणायामचणः सिद्ध-प्रत्याहारो जितेन्द्रियः
धारणाधीश्वरो धर्म-ध्याननिष्ठः समाधिराट् ।
स्फुरत्समरसीभाव, एकीकरणनायका
निर्ग्रन्थनाथो योगीन्द्र+, ऋषिः साधुर्यतिर्मुनिः ।
महर्षिः साधुधौरेयो, यतिनाथो मुनीश्वरः
महामुनिमहामौनी, महाध्यानी महाव्रती ।
महाक्षमो महाशीलो, महाशान्तो महादमः
निर्लेपो निर्धममस्वान्तो, धर्माध्यक्षो दयाध्वजः ।
ब्रह्मयोनिः स्वयंबुद्धो, ब्रह्मज्ञो ब्रह्मतत्ववित्
* “निसैपम्यौ' प्रती
॥ ७३ ॥
॥ ७४ ॥
॥ ७५॥
॥ ७६ ॥
॥ ७७॥
33 - पूतात्मा स्नातको दान्तो, भदन्तो गीतमत्सः । धर्मवृक्षायुधोऽक्षोग्य प्रभृतात्माऽमृतोदयः ॥७८॥ मन्त्रमूर्तिः स्त्र(सु)सौम्यात्मा स्वतन्त्रो ब्रह्मसभवः । सुप्रमन्नो गुणाम्भोधि , पुण्यापुण्यनिरोधकृत सुसवृत्तः सुगुप्तात्मा, सिद्धात्मा निरुपप्ला। महोदकर्को महोपायो, जगदेव पितामहः महाकारुणिको गुण्यो, महारलेशाकुश. शुचि । अरिंजय सदायोग,, मदाभोग सदाति ॥८१॥ परमौदासिन व्यताम्थीतः, मत्याशी: शान्तनायका । अपूर्ववेद्यो योगज्ञो, धर्ममूतिरधर्मयु(मु)क् ॥ ८२ ॥ नींद महाबमपतिः, कृतकृत्यः कृतक्रतुः । गुणाकरो गुणोच्छेदी, निर्निमेपो निराश्रयः ॥८३ ॥ सरि सुनयतचनो, महामनीमयः ममी । प्रक्षीणवन्धो निन्द्रा, परमपिग्नन्तग. ॥ इति योगिशनम् ॥६ निर्वाण सागर प्राज्ञ-महामाधुरुदाहन । विमलामोऽध शुद्धाभ , श्रीधरो दत्त इत्यपि ।। ८५ ।। अमलामोऽप्युद्धगेऽग्नि , सयमय शिरस्तथा । पुष्पाञ्जलि' शिरगुण , उत्माहो जानसनका ॥८६॥ परमेश्वर इत्युक्तो पिमलेगो यशोधर । कृष्णो मानमति शुद्ध-मति श्रीभद्रगान्तयुरु ॥८७ ॥ .
34 " ॥ ८८ ॥ ॥ ८९ ॥ ॥ ९० ॥ ॥ ९१ ॥ वृषभस्तद्वदजितः, संभवश्वामिनन्दनः । मुनिभिः सुमतिः पा-प्रभः प्रोक्तः सुपाठचका चन्द्रप्रभः पुष्पदन्तः, शीतलः श्रेयसाद्वयः। वासुपूज्यश्च विमलोऽनन्तजिद्धर्म इत्यपि शान्तिः कुन्थुररो मल्लिः, सुव्रतो नमिरप्यतः । नेमिः पार्थो वर्धमानो, महावीरः स वीरकः सन्मतिश्चाकथि मह-ति महावीर इत्यथ । महापद्मः सूरदेवः, सुप्रभश्च स्वयप्रभः सर्वायुधो जयदेवो, भवेदुदयदेवकः । प्रभादेव उदंकश्च, प्रश्नकीर्तिर्जयाभिधः पूर्णवद्धि+नि:पायो, विज्ञेयो विमलप्रभः । वहलो निर्मलश्चित्र-गुप्तः समाधिगुप्तक: स्वयंभूश्चापि कन्दर्पो, जय नाथ इतीरितः । श्रीविमलो दिव्यवादो-ऽनन्तवीरोऽप्युदीरितः सूरदेवोऽथ सुविधिः, प्रज्ञापारमितोऽव्ययः । *पुराणपुरुषो धर्म-सारथिः शिवकीर्तनः विश्वकर्माऽक्षरोऽच्छम, विश्वभूर्विश्वनायकः । दिगम्बरो निरातङ्को, निरारेको भवान्तक: ॥ ९२ ॥ ॥ ९३ ॥ ॥ ९४ ॥ ॥ ९५ ॥ ॥ ९६ ॥ *'धर्म:' प्रतौ । + 'ज्येष्ठ ' प्रतौ ।
35 दृनतो नयोत्तुगो, नि.क्लको (क) कलाधरः । सवक्लेशापहोऽक्षग्यः, क्षान्तः श्रीवृक्षलक्षण. ॥ इति निर्वाणशतम् ॥ ७ ब्रह्मा चतुर्मुखो धाता, विधाता कमलासनः । अब्जभूरात्म: स्रष्टा, सुरज्येष्टः प्रजापतिः ॥ ९८॥ हिरण्यगर्भो वेदज्ञी, वेदाङ्गो वेदपारगः । अजो मनुः शतानन्दो, हसयानत्रयीमय ॥ ९९ ॥ विष्णुखिविक्रम शौरिः, श्रीपतिः पुस्पोत्तमः । वैकुण्ठ• पुण्डरीकाक्षो, पीकेशो हरि स्नभूः ॥१०॥ विश्वभरोऽसुरध्वसी माधयो पलिचन्धनः । अधोक्षजो मधुढेपी, केशवो हिरवा श्रीवत्सलान्छनः श्रीमा-नच्युतो नरकान्तकः । विपक्सेनश्चक्रपाणिः, पद्मनाभो जनार्दन ॥ १०२ ॥ श्रीकण्ठः शङ्कर शम्भुा, कपाली वृषकेतनः । मृत्युजयो पिस्पाक्षो, वामटेनस्त्रिलोचन. उमापतिः पशुपति , स्मरारिस्त्रिपुरान्तक. । अर्धनारीश्वरो रुद्रो, भवो भर्ग मदाशिम ॥ १०४ ॥ जगत्वाऽन्धकासतिरनादिनियनी हर । महासेनस्तारकजि-द्रणनाथोविनायकः ॥ १०५ ।।
36
॥ १०६ ॥
॥ १०७॥
॥ १०८ ॥
॥ १०९ ॥
विरोचनः वियद्रत्नं, द्वादशात्मा विभावसुः ।
द्विजाराध्यो वृहद्भानु-श्चित्रभानुस्तनूनपात
द्विजराजः सुधारोचिरौपधीशः कलानिधिः ।
नक्षत्रनाथः शुभ्रांशुः, सोमः कुमुदवान्धवः
लेखर्षभोऽनिलः पुण्य-जनः पुण्यजनेश्वरः ।
धर्मराजो भोगिराजः, प्रचेता भूमिनन्दनः
सिंहिकातनयश्छाया-नन्दनो वृहतां पतिः ।
पूर्वदेवोपदिष्टा च, द्विजराजसमुद्भवः
॥ इति ब्रह्मशतम् ।। ८
बुद्धी दशवलः शाक्यः, षडभिज्ञस्तथागतः।
समन्तभद्रः सुगतः, श्रीधनो भूतकोटिदिक्
सिद्धार्थों मारजिच्छास्ता, क्षणिकैकसुलक्षणः ।
बोधिसत्वो निर्विकल्प-दर्शनो द्वयवाद्यपि
महाकृपालु रात्स्य-वादी सन्तानशासकः ।
सामान्यलक्षणचणः, पश्वस्कन्धमयात्मक
भूतार्थभावनासिद्ध-श्चतुर्भूमिकशासनः ।
चतुरार्यसत्यवक्ता, निराश्रयचिदन्वयः
योगो वैशेषिकस्तुच्छा-भावभित् षट्पदार्थदृक् ।
नैयायिका पोडशार्थ-वादी पश्चार्थवर्णकः
॥ ११०॥
॥ १११ ॥
॥ ११२ ॥
॥ ११३ ॥
॥ ११४ ॥
37 " ज्ञानान्तराध्यक्षपोधा, समवायवशार्थभित् । भुक्तैकसाध्यकर्मान्तो, निर्विशेषगुणामृता सादरूपः समीक्ष्यः कपिलः, पश्चविंशतितचवित् । व्यक्ताव्यक्तजानिज्ञानी, ज्ञानचैतन्यमेदहरु ॥ ११६॥ अम्नसरिदितनान-वादी मन्कार्यपादसात् । निप्रमाणोऽक्षप्रमाणा, स्याद्वाहकारिका ॥११७॥ क्षेनन आत्मा पुरपो, नरो ना घेवनः पुमान् । अफर्ता निर्गुणोऽमृत्ों, मोक्ता मगतोऽक्रियः ॥ ११ ॥ द्रष्टा तटम्य फुटस्थो, ज्ञाता निर्वन्यनोऽभवः । बहिपियारो निर्मोक्ष., प्रधान पहुधानम् ॥ ११९॥ प्रकृति ग्यातिराम्द-प्रकृति प्रकृतिः प्रिय.। अघानभोज्योऽप्रकृति-निगम्यो विक्रति कृतिः ॥१०॥ मीमांमकोऽस्तमर्वजः, श्रुतिप्त. गदोत्सव । परोक्षजानवादी-पापक मिद्धर्मक ॥ १२१ ॥ मार्गको भौतिकलानो, भृनाभिव्यक्तचेतनः । प्रत्यक्षरप्रमाणोऽस्त-पग्लोको गुस्थति ॥१२२ ॥ पुरन्दविरों, वेदान्ती सद्विद्वयी । शब्दादती गफोटयादी, पारखण्डघ्नो नयाँपयुस् ॥ १३ ॥ ॥ इति युद्धशतम् ॥ ९
38
अन्तकृत् पारकृत तीर-प्राप्तः पारेतमः स्थितः ।
त्रिदण्डी दण्डिताराति-निकर्मममुच्चयी ॥ १२४ ॥
संहृतध्वनिरुच्छन्न-योगः सप्तार्णवोपमः ।
योगस्नेहापहो योग-किट्टिनिर्लेपनोयतः ॥ १२५ ॥
स्थितस्थूलवपुर्योगो, गीर्मणो योगकार्यकः ।
सूक्ष्मवाचित्तयोगस्थः, सूक्ष्मीकृतापुःक्रियः ॥ १२६॥
सूक्ष्मकायक्रियास्थायी, सूक्ष्मवाचित्तयोगहा ।
एकदण्डी च परम-हंसः परमसंवरः
॥ १२७॥
नैःकर्म्यसिद्धपरम-निर्जरः प्रज्वलत्प्रभः ।
मोधकर्मा त्रुटत्कर्म-पाशः शैलेश्यलकृतः
॥ १२८ ॥
एकाकररसास्वादो, विश्वाकाररसाकुलः ।
अजीवन्नमृतोऽजाग्र-दसुप्तः शून्यतामयः
॥ १२९ ॥
प्रेयानयोगी चतुर-शीतिलक्षगुणो गुणः ।
निःपीतानन्तपर्यायो, विद्यासं कारनायकः
॥ १३०॥
वृद्धोऽनिर्वचनीयोऽणु-रणीयाननणुप्रियः ।
प्रेष्ठा स्थेयान् स्थिरोनिष्ठः, श्रेष्ठो ज्येष्ठस्तु निष्ठितः ॥ १३१॥
भूतार्थः शूरो भृतार्थ-दः परननिर्गुणः ।
व्यवहारसुषुप्तोऽति-जागरूकोऽतिसुस्थितः ॥ १३२ ॥
उदितोदितमाहात्म्यो, निरुपाधिरकृत्रिमः ।
अमेयमहिमाऽत्यन्त-शुद्धः सिद्धः स्वयंवरः ॥ १३३ ॥
39 मिद्धानुन: मिद्धपुरी-पान्य सिद्धगणातिथिः । सिद्धमनोन्मुग्वः सिद्धा-लिदग्या सिद्धोपगृहकः ॥ १३४ ॥ पुष्टोऽष्टादशसहस्त्र-शीलाच पुण्यशम्नगलः । वृत्तानयुग्मः परम-शुशलेग्योपचारक ॥ १३५॥ क्षेपिष्ठोऽन्त्यक्षणखा पचलमक्षरस्थिति. (१)। द्वासप्ततिप्रकृत्यासी योदशफलिप्रणुद (१) ॥ १३६ ॥ अवेदोऽयाजकोऽजग्यो-ऽयाज्योऽनग्निपरिग्रहः । जनमिहोनी परम-नि स्पृहोऽत्यन्तनिर्दय ॥ १३७॥ अशिक्षोऽशामकोऽदीक्षा-दीक्षकोऽदीक्षितोऽक्षयः । अगम्यगमको रम्यो, रमको पाननिमर ॥ १३८॥ ॥इत्यन्तएपडतम् ॥ १० महायोगीश्वरो द्रव्य मिद्धोऽदेहोऽपुनर्मवः । मानकविजीरपना, मिडो लोकाग्रगामुक' त्यन्ताटकम् ॥ इदमष्टोत्तर नाम्ना, महर भक्तितोऽर्हताम् । योऽनन्तानामधीनेऽमी, मुक्त्यन्ता भक्तिमश्नुते ॥ १४ ॥ इद लोकोत्तम पुमा-मिद शरणमूल्वणम् । इद मालमनीय-मिद परमपारनम ॥ १४१ ॥ इदमेन पर तीर्थ-मिदमेवेष्टमापनम् । इदमेगासिलक्लेश-सइंग्रतयकारणम् ॥ १४ ॥ एतेषामेरमप्यई-नाम्नामुपारपन्न । मुच्यते किं पुन: मर्ग-प्ययनम्तु जिनायने ? ॥१४३ ॥ रित्याशापापण्टिनरत जिनामाप्रनामस्नयन ममाप्तम् ॥
40 कलिकालसर्वत्र ॥ श्रीहेमचन्द्राचार्यविरचितः ॥ श्रीअर्हन्नामसहस्रसमुच्चयः अर्हन्नामापि कर्णाभ्यां, शृण्वन् वाचा समुच्चरन् । जीवः पीवर पुण्यश्री-लभते फलमुत्तमम् अत एव प्रतिप्रातः, समुत्थाय मनीपिभिः । भक्त्याऽष्टाग्रसहलाह-नामोच्चारो विधीयते ॥ २॥ श्रीमानहन जिनः स्वामी, स्वयंभूः शंभुरात्मभूः । स्वयंप्रभुः प्रभुर्भोक्ता, विश्वभृगपुनर्भवः ॥३॥ विश्वात्मा विश्वलोकेशो, विश्वतश्चक्षुरक्षरः । विश्वविद् विश्वविद्ये (श्वे)शो, विश्वयोनिरनीश्वरः 1॥ ४ ॥ विश्वदृश्या विभुर्धाता, विश्वेशो विश्वलोचनः । विश्वव्यापी विधुर्वेधा(धाः), शाश्वतो विश्वतोमुखः विश्वपो विश्वतः पादो, विश्वशीर्षः शुचिश्रवाः । विश्वदृग्विश्वभूतेशो, विश्वज्योतिरनैश्वरः ॥६॥ विश्वसृड विश्वसर्विश्वेद, विश्वभुग विश्वनायकः । विश्वाशी विश्वभूतात्मा, विश्वजिद् विश्वपालका ॥७॥ १. रनश्वरः' इति पुराणलिखितप्रतिपाठः, एवं सर्वत्र ज्ञेयम् । २. 'रनीश्वरः' प्रति०। ३ 'विश्वभूर्विश्वसृड् विश्वेट् ।' -
41
.
विश्वकर्मा जगद्विश्वो, विश्वमृतिर्जिनेश्वरः ।
भतमानिमार्ता विश्ववेद्यो यतीश्वरः
42 जगदच्यों जगद्वन्धु-र्जगच्छास्ता जगत्पिता । जगन्नेत्रो जगन्मैत्रो, जगद्दीपो जगद्गुरुः स्वयंज्योतिरजोऽजन्मा, परं तेजः परं महः । परमात्मा शमी शान्तः, परं ज्योतिस्तमोऽपहः ॥ ४॥ प्रशान्तारिरनन्तात्मा, योगी योगीश्वरो गुरुः । अनन्तजिदनन्तात्मा, भव्यवन्धुरवन्धनः ॥५॥ शुद्धबुद्धिः प्रबुद्धात्मा, सिद्धार्थः सिद्धशासनः । सिद्धः सिद्धान्तविद् ध्येयः, सिद्धः साध्यः सुधीः सुगीः ॥६॥ सहिष्णुरच्युतोऽनन्तः, प्रभविष्णुर्भवोद्भवः । स्वयंभूष्णुरसंभूष्णुः, प्रभूष्णुरभयोऽव्ययः ॥ ७॥ दिव्यभापापतिर्दिव्यः, पूतवाक् पूतशासनः । पूतात्मा परमज्योति-धर्माध्यक्षो दमीश्वरः ॥८॥ निर्मोहो निर्मदो निःस्वो, निर्दम्भो निरुपद्रवः । निराधारो निराहारो, निर्लोभो निश्चलोऽचल: ॥९॥ निष्कामी निर्ममो निष्क्, निष्कलको निरञ्जनः । निर्गुणो नीरसो निर्भी-निर्व्यापारो निरामयः ॥ १० ॥ निनिमेषो निरावाधो, निर्द्वन्द्वो निष्क्रियोऽनघः । निशिश्च निरातको, निष्फलो निर्मलोऽमलः ॥ ११ ॥ इति श्रीमहन्नामसहस्रसमुच्चये द्वितीयशतप्रकाशः॥२॥ १ 'जगन्मित्रं' इति पाठ. साधुः । २ 'दचिन्त्यात्मा' साधुः । ३ 'शुद्धः' साधुः । ४ 'नीरुक्'। ५. निष्कलः । . 4-44010- 43 तीर्घकृतीर्थसृट तीर्थ-करस्तीर्थकरः सुदृग् । तीर्था तीर्थमा, तीवतीर्यनायक- मुतीर्थोऽधिपतिस्तीर्थ-सेव्यस्तीचिकनायकः । धर्मतीर्थकरस्तीर्य-प्रणेता तीर्यकारक: ॥२॥ तीर्थाधीयो महातीर्थ-स्तीर्थस्तीथविधायक । सत्यतीर्थकरस्तीर्थ-सेल्यातीधित्तिायक तीर्थनाथस्तीर्थराज-स्तीफेंट् तीर्थप्रशाशकः । तीर्थरन्यम्तीर्घमुग्य-म्तीगिध्या मुतीथिन ॥ ५ ॥ न्यरिष्ट म्यपिरो ज्येष्ठः, प्रेट' प्रष्टो परिधीः । म्येष्ठो गरिष्ठो पहिष्ट', श्रेष्ठोऽणिष्ठो गरिएधी: शिमगो निभयो वीरो, विगोको पिजरो बरन् । विरागो विमटोऽम्पत्तो, रिषिक्तो पोतमत्मरः धीतरागो गतदेपो, चीतमोहो विमन्मथ । रियोगो योगनिद् विद्वान् , पिघाता पिनयी नयी ॥७॥ शान्तिमान् पृथिवीमूनि , शान्तिमा सलिलात्मक । यायुभूपिरमात्मा, वहिनिरधर्मधुर ॥८॥ अयचा यजमानारमा, मुत्रामस्तोमानितः । मलिग पगपतिज्यो याममत रवि १ 'सुतीयाधिपतितार्थ पनिम्तीयप न २ मष्टि ५ 'गो'। ५ 'पिविद्धपो, ६ 'पा'। ७ 'मुअमुशामिन । , 46 अग्रणीामणीगण्यो, गण्यगण्यो गणाग्रणीः । गणाधिपो गणाधीशो, गणज्येष्ठो गणार्चितः ॥४॥ गुणाकरो गुणाम्भोधि-गुणज्ञो गुणवान् गुणी । गुणादरो गुणोच्छेदी, सुंगुणोऽगुणवर्जितः शरण्यः पुण्यवाक् पूतो, वरेण्यः पुण्यगीर्गुणः । अगण्यपुण्यधीः पुण्यः, पुण्यकृत पुण्यशासनः अतीन्द्रोऽतीन्द्रियोऽधीन्द्रो, महेन्द्रोऽतीन्द्रियार्थदृक् । अंतीन्द्रियो महेन्द्रायो, महेन्द्रमहितो महान् ॥ ७॥ उद्भवः कारणं कर्ता, पारगो भवतारकः । अग्राह्यो गहनं गुंह्यः, परर्दिः परमेश्वरः ॥ ८॥ अनन्तरिमेयर्द्धि-रचिन्त्यद्धिः समग्रधीः । प्राप्यः प्रायहरोऽत्यग्रः, प्रत्यग्रोऽयोऽग्रिमोऽग्रजः ॥९॥ प्राणकः प्रणवः प्राणः, प्राणदः प्राणितेश्वरः । प्रधानमात्मा प्रकृतिः, परमः परमोदयः ॥ १० ॥ इति श्रीमहनामसहस्रसमुच्चये पञ्चमशतप्रकाशः ॥५॥ १ 'गणी गुण्यो'। २ 'गुणादरी' । ३ 'सगुणो गुणव' । ४ अनिन्द्रोऽहमिन्द्रार्यो। ५ 'गुह्य' । ६ 'प्रायः प्राग्र्याहरो'। ७ 'ऽयो' । ८ 'प्रामवः' ।
47 ॥१॥ ॥२॥ ॥४॥ महाजिनो महायुद्धो, महानमा महाशिरः । महाविष्णुमहाजिष्णु-महानायो महेश्वर' महादेवो महास्वामी, महाराजो महाप्रभु । महाचन्द्रो महादित्यो, महाशूरो महागुरुः महातपा महातेजा, महोदो महोमयः । महापको महाधाम, महामचो महापल: महार्यो महावीयों, महाकान्तिर्महाद्युतिः। महाराक्तिर्मदाज्योति-महाभूनिर्मदापति महामतिर्महानीति-महाक्षान्तिर्महाकृतिः । महामीतिर्महास्पति-महाप्रगो महोदय महाभागो महामोगी, महारुपी महारपुः । महादानो महागानो, महाशाम्ता महामहा. महामनिमहामोनी, महान्यानो महादमः । महाधमो मदागीलो, महायोगो महालय मदानवो महायज्ञो, महाथेष्ठो महाकपि । महामन्यो महातन्त्रो, महोपायो महानयः महामगिरी मन्ता, महानादो महायतिः । मंडामोदो मदापोपो, महेन्यो महमा पति , महार्यो। महादिया। महापामा' । १ 'मदारय महादया। - ॥८॥ . - - -- -- . 'मदायमा ३ . । , 50 सुघोपः सुमुखः सौम्यः, सुखदः सुहितः सुहृद् । सुगुप्तो गुप्तिभृद् गोप्ता, गुप्ताक्षो गुप्तमानसः ॥ ११ ॥ इति श्री अहंन्नामसहस्रसमुच्चये सप्तमशतप्रकाशः ॥७॥ वृहद् बृहस्पतिर्वाग्मी, वाचस्पतिरुदारधीः । मनीपी धिषणो धीमान , शेमुपीशो गिरांपतिः नेकरूपो नयो तंगो, नैकात्मा नैकधर्मकृत् । अविज्ञेयः प्रतात्मा, कृतज्ञः कृतलक्षणः ॥२॥ ज्ञानगर्भो दयागर्भो, रत्नगर्भः प्रभास्वरः । पद्मगर्भो जगदर्भो, हेमगर्भः सुदर्शनः ॥३॥ लक्ष्मीशः सैदयोऽध्यक्षो, दृढयोनिर्नयीर्शिता । मनोहरो मनोज्ञोऽहों, धीरो गम्भीरशासनः ॥४॥ धर्मयूपो दयायोगो, धर्मनेमिर्मुनीश्वरः । धर्मचक्रायुधो देवः, कर्महा धर्मघोपणः ॥५॥ स्थेयान स्थवीयान् नेदीयान् , दवीयान् दूरदर्शनः । सुस्थितः स्वास्थ्यभाक् सुस्थो, नीरजस्को गतस्पृहः ॥६॥ वश्येन्द्रियो विमुक्तात्मा, निःसपत्नो जितेन्द्रियः । श्रीनिवासश्चतुर्वक्त्र-श्चतुरास्यश्चतुर्मुखः ॥ ७॥ १ 'त्रिदशो' । २ 'नई'। ३ 'ज्ञा'। ४ 'यागो'। ५ 'मु'। ६ 'स्वस्थित '। ७ 'स्वस्थो'। - S1 . - अध्यात्मगम्योऽगम्यात्मा, योगात्मा योगिन्दिता। मर्मत्रग मदामाती, विशालविषयावर ॥८॥ गदर गुसदो दान्दो, दमी भान्तिपरायण. 1 मानन्द परमानन्दः, मूमरना परापर अमोघोऽमोधरा पात्रो, दिपरहिरगोचर । मुरुप मुमगारपागी, मूर्तोऽभूतः ममादित' एकोऽनेको निगलनो-नीरगनाधो निरन्तर । प्राध्यापय ममम्पयं-विजगन्मङ्गलोदय' ॥११॥ रति धीमसाममममुमतप्रकाश ॥८॥ ईसोऽधीयोऽधिपोधीन्द्रो, प्येयोऽमेयो दयामयः । शिर र शुभ सारः, मिष्ट. स्परः स्फुटोस्फुट' ॥१॥ re. पुष्ट धमोक्षामो-मायोऽमायोऽम्मपोऽमयः। रशा योऽगुरम्धूलो, जीणों नव्यो गुगल म चारमा पपपुद्र, पंग मैरीक्षा आपोल योऽपरोपो-पोंगटोऽग्दिहाहा ॥३॥ 'दीप्तोऽने योजमोऽगन्धो-ऽन्योऽभयोऽनगेऽमा। प्राली भन्यो पति पूज्यो मोऽन्य प्रामी यमी ॥४॥ १ सागर'। २ 'पाग। ३ 'स्वम्पदा 'दम परा' ५ 'रटिदियरमास । ६ 'मनोमय'! " सागुरो।। ८ 'या'। ९ । १. दीको - प. -N-NM -- 52 श्रीशः श्रीन्द्रः शुभः सुश्री रुत्तमश्रीः श्रियः पतिः । श्रीपतिः श्रीपरः श्रीपः, मच्छी: श्रीयुक् श्रिया श्रितः ॥५॥ ज्ञानी तपस्वी तेजस्वी, यशस्वी बलवान् बली । दानी ध्यानी मुनिमौनी, लयी लक्ष्यः क्षयी क्षमी ॥६॥ लक्ष्मीवान् भगवान् श्रेयान् , सुगतः सुतनुर्बुधः । बुद्धो वृद्धः स्वयंसिद्धः, प्रोचः प्रांशुः प्रभामयः ॥ ७॥ इति श्रीअन्नामसहस्रसमुच्चये नवमशतप्रकाशः ॥९॥ आदिदेवो देवदेवः, पुरदेवोऽधिदेवता । युगादीशो युगाधीशो, युगमुख्यो युगोत्तमः ॥ १॥ दीप्तः प्रदीप्तः सूर्याभो-ऽरिनोऽविघ्नोऽधनो धनः । शत्रुघ्नः प्रतिधस्तुङ्गो-ऽसंगः स्वगोऽग्रगः सुगः ॥२॥ स्याद्वादी दिव्यगीदिव्य-ध्वनिरुद्दामगीः प्रगी। पुण्यवागबवागर्धमागधीयोक्तिरिद्धगीः पुराणपुरुषोऽपूर्वो-पूर्वश्रीः पूर्वदेशकः । जिनदेवो जिनाधीशो. जिननाथो जिनाग्रणी: ॥४॥ शान्तिनिष्ठों मुनिज्येष्ठः, शिवतातिः शिवप्रदः । शान्तिकृत् शान्तिदः शान्तिः, कान्तिमान् कामितप्रदः ॥५॥ ॥३॥ ३ 'वो पुरु'। १ 'श्रीपर श्रीवर '। २ 'क्ष्म । ४ 'गर्थ्यवा' । ५ 'पुरुष पूर्वो' ।
53 - नियां निधिरधिष्टान-मप्रतिष्ट प्रतिष्ठिना। सुम्पिर म्याररः स्थाशु, योयान् प्रथितः पृथु' ॥६॥ पुण्यरामि. थियोराशि-प्नेजोरागिरमशयी। ज्ञानोदधिरनन्तीना, ज्योनिम॒निरनन्तधीः ॥७॥ विगानोऽप्रतिमो मिनु-मुमुधुर्मुनिपुगर । अनिद्रानुग्नन्द्राल-आगर प्रमामय' कर्मण्य कर्मठोऽपृष्ठो, न्द्रो भद्रोऽभयार। लोकोनगे लोपनि-लोकनो लोकायला विरोधिधारश-गिनागिपुगन्तक । suर करारोपाली कामण रामन्नभद्र शन्नादि-गियों - यानिधि । मन मुगागंग, कपाल गिर प्रतिहार्योाफीता-तिमानिलागय । सिद्धान्तनुपश्री-जागा मीनिनमार निभानामाप्रमगुपपITIATIमामयुगो Rarnaamn - -- १मानु' 'मी'1३ विभामा । ५'सार'। ६ । , 54 - ॥ १३ ॥ ॥ १४ ॥ ॥ १५ ॥ उपसंहार: एतदष्टोत्तरं नाम-सहस्रं श्रीमदर्हतः । भव्याः पठन्तु सानन्दं, महानन्दैककारणम् इत्येतजिनदेवस्य, जिननाममहस्रकम् । सर्वापराधशमनं, परं भक्तिविवर्धनम् अक्षयं त्रिषु लोकेषु, सर्वस्वर्गकमाधनम् । स्वर्गलोकैकसोपानं, सर्वदुःखैकसाधनम् समरतदुःखह सद्यः, परं निर्वाणदायकम् । कामक्रोधादिनिःशेष-मनोमल विगोधनम् शान्तिदं पावनं नृणां, महापातकनाशनम् । सर्वेषां प्राणिनामाशु मर्वाभीष्टफलप्रदम जगजाड्यप्रशमनं सर्वविद्याप्रवर्तकम् । राज्यदं राज्यभ्रष्टानां, रोगिनां(णां) सर्वरोगहत वन्ध्यानां सुतदं चाशु, क्षीणानां जीवितप्रदम् । भूतग्रहविषध्वंसि, श्रवणात् पठनाजपात् ॥ १६ ॥ 1॥ १७॥ ॥ १८ ॥ ॥ १९ ॥ ॥ इति श्रीहेमचन्द्राचार्यविरचितः श्री अहन्नामसहस्रसमुच्चयः ॥
55 कलि काल सवा श्रीमान् हेमचन्द्राचाय विरचित ।।श्री जिन सहस्त्र नाम स्त्रोत का भापातर॥ जिनेश्वर का नाम कानद्वारा श्रवण करने से या उच्चार करने से पुष्टपुण्यस्पी रक्ष्मीवाले भात्मा उत्तम फरको प्राप्त होता है। इस- लिए बुद्धिमान आत्मा को हर रोज प्रात काल उठकर भक्ति पूर्वक निनेश्वर का १००८ नामों का उच्चार करना । प्रथम १०० नामोच्चार १ श्रीमान् १५ विश्वतश्वन २९ शाश्वत २ अर्हन् ३० विश्वतोमुग्व |१७ विश्वविद |३१ विश्वप ४ स्वामी १८ विश्वविद्यश १९ पिथयोनी ३३ विश्वशीर्प २० अनीश्वर ३४ शुचिया २१ पिवया ३५विश्वदृशू २२ चिमु ३६ रिश्वभूतेश २३ धाता ३७ रिश्वज्योति २४ विवश ११ विध २५ पिवलोचन |३९ विश्वमृद १२ अपुनर्मर २६ विश्वव्यापी ४० विश्वम् १३ विश्वात्मा २७ विधु ४१ विचट १४ विचलोका २८ वेधा ४२ विधसर ३ जिन . ३२ विश्वत पाद ५ स्वय ६ गभू ७ आत्मभू ८ स्वयप्रभू ९ प्रभू १० भोक्ता ३८ अनवर 56 ६४ सर्वग ६६ सुथ ४३ विश्वनायक (६३ सर्वलोकजित् ८३ परब्रह्म ४४ विश्वाशी ८४ ब्रह्मात्मा ४५ विश्वभूतान्मा ६५ सुश्रुत ८५ ब्रह्मसंभव ४६ विश्वजित् ८६ ब्रह्मेट ४७ विश्वपालक ६७ सुवाक् ८७ ब्रह्मपति ४८ विश्वकर्मा ६८ मूरि ८८ ब्रह्मचारी ४९ जगद्विश्व ६९ बहुश्रुत ८९ ब्रह्मपदेश्वर ५० विश्वमूर्ति ७० सहस्रशीप ९० विष्णु ५१ जिनेश्वर ७१ क्षेत्रज्ञ ९१ जिष्णु ५२ भूतभाविभवदू ७२ सहस्त्राक्ष ९२ जयी ९३ जेता ५४ यतीश्वर ९४ जिनेंद्र ५५ सर्वादि ७५ ब्रह्मा ९५ जिनपुंगव ५६ सर्वक ७६ पचत्रह्ममय ९६ पर ५७ सार्व ७७ शिव ९७ परतर ५८ सर्वज्ञ ७८ ब्रह्मविदू ९८ सूक्ष्म ५९ सर्वदर्शन ७९ ब्रह्मतत्वज्ञ ९९ परमेष्ठी ६० सर्वात्मा ८० ब्रह्मयोनि १०० सनातन ६१ सर्वलोकेश ८१ अयोनिज ६२ सर्ववित ८२ ब्रह्मनिष्ठ ॥ इति श्री अर्हन्नाम सहस्त्र समुच्चये प्रथम शत प्रकाश ।। ५३ विश्ववैद्य [भर्ता ७३ सहस्रपात् ७४ युगादिपुरुष 57 अज द्वितिय १०० नाम १ जिननाथ जगन्नेत्र अनतात्मा जगन्नाध जगन्मिन भव्यबन्धु जगदस्वामी जगवदीप अवधन जगत् प्रभु जगद्गुरू शुद्धयुद्धि ५ जगत पूज्य /२५ स्वययोति ४५ प्रबुद्वात्मा जगद्य सिद्धार्थ जगदीश अजन्मा मिद्धगामन जगत्पति परतज जगन्नेता परमह मिद्धानविद् १० जगज्जेता ३० परमात्मा ५० ध्येय जगन्मान्य शमी सिद्धनाध्य जगद्विभु शात सुधी जगज्ज्येष्ठ परज्योति सुगी ভট্ট तमोपह सहिष्णु १५ जगतध्यये ३५ प्रशातारि अनतात्मा अनत जगदर्य योगी प्रभविष्णु जगदूपन्धु योगीश्वर भवोद्भव जगतूशास्ता २० जगतपिता ४० अनतजिद ६० असभूष्णु ५५ अच्युत जगन् हित स्य भूष्णु 58 ८० अचल प्रभूष्णु ७५ निरुपद्रव निर्व्यापार अभय निराधार ९० निरामय अव्यय निगहार निर्निमेप दिव्यभाषापति निलोभ निरावाघ ६५ दिव्यपूतवाकू निश्चल निद पूतगासन निक्रिय पूतात्मा निष्कामी ९५ अनघ परमज्योति निर्मल निःशंक धर्माध्यक्ष नीरुफ निशतंक ७० दमीश्वर निस्कलंक निष्कल निमोह ८५ निरंजन निर्मल निर्मद निर्गुण १०० अभल नि:म्ब नीरस निर्दभ निभीं ॥ इति श्री अहन्नाम सहस्त्र समुच्चये द्वितीय शत प्रकाशः ।। तृतीय १०० नाम १ तीर्थकृत तीर्थकर्ता अधिपति तीर्थस्ट तीर्थभर्त्ता तीर्थसेव्य तीर्थकर तीर्थेश तीथिकनायक तीर्थकर तीथनायक धर्मतीर्थकर सुदृक् १० सुतीथ १५ तीर्थप्रणेता 59 गरिष्ठ तीर्थकारक वरिष्ठधी तीर्थाधीश स्येष्ठ महातीर्थ तीर्थप्रर्वतक ४० बहिष्ट २० तीर्थविधायक श्रेष्ठ सत्यतीर्थकर অগি8 तीर्थस्रष्टा गरिष्ठधीः तीर्थिकगायक निभर तीर्थनाथ (४५ विभय २५ तीर्थराज विशोक तीर्थेट विजर तीर्थप्रकाशक जरन् तीर्यपद्य निराग तीर्थमुख्य ५० चिमद ३० तीराध्य अव्यक्त सुतीर्थिक विरिक्त स्थतिष्ठ स्थगिर वीतराग ज्येष्ठ ५५ गतद्वेष ३५ श्रेष्ठ प्रष्ट निमन्मथ वियोग योगविद् ६० विद्वान विधाता पिनयी नयी क्षातिमान ६५ पृथिनीमूर्ति शातिभाक् सलिलात्मक वायुमूर्ति असगात्मा ७० चमिमूर्ति अधर्मधुक सुयज्जा यजमानात्मा सुगमरतोम- पूजित ७५ ऋत्विक यज्ञपति याज्य चीतमत्सर बीतमोह 62 *- १ सुधर्मा - ३ वेदविद् विदांवर विवेद वेद्य वेदवैद्य १०० वदतांवर ९५ जातरूप स्वसंवेद्य ॥ इति श्री भईन्नाम सहस्त्र समुच्चये चतुर्थ शन प्रकामः ॥ पञ्चम १०० नाम भूतभावन गण्य धर्मधी प्रभव गणी धर्म विभव ३५ गुण्य घमात्मा २० भास्वान् गणाग्रणी ५ धर्मदेशक मुक्त गणाधिप धर्मचक्री शक्त गणाधिश दयाधर्म अक्षय गणज्येष्टा शुधर्म अक्षत ४० गणार्चित वृपध्वज २५ कूटस्थ गुणाकर १० वृपकेतु स्थाणु गुणांभोधि वृपाधीश अक्षोभ्य गुणज्ञ वृपांक शास्ता गुणवान् वृषोद्भव नेता ४५ गुणी हिरण्यनाभि ३० अचलस्थिति गुणादर १५ भूतात्मा अग्रणी गुणोच्छेदी भूतभृद् ग्रामणी सुगुण 63 ७० उद्भ पुण्यगी ५५ गुण अगुणार्जित अनिंद्र प्राप्य ५० शरण्य अहमिंद्राचार्य ८५ प्राम्यहर पुण्यवाक महेन्द्रमहित अत्यन महान प्रत्यग्र वरेण्य अग्रिम कारण ९० अग्रज कर्ता प्राणक अगण्य पारग प्रणा पुण्यधी भरतारक प्राण ७५ अग्राह्य प्राणद पुण्यकृत गहन ९५ प्राणितेश्वर ६० पुण्यशासन गुह्य प्रधान अतींद्र परद्धि आत्मा अतींद्रिय परमेश्वर प्रकृति अधींद्र ८० अनतद्धि परम महेन्द्र अमेद्धि परमोदय ६५ अतींद्रियार्थ अचिंत्यादि हक् समग्रधी ॥ इति श्री अईनाम सहस्त्रसमुच्चये पञ्चम शत पकाग !! पुण्य 64 पष्टम् १०० नाम महायश महाभाग महाभोग महाधाम महातच महारूप महावपु ४५ महादान महाज्ञान महाशास्ता १ महाजिन महायुद्ध महात्रह्मा महाशिव ५ महाविष्णु महाजिष्णु महानाथ महेश्वर महादेव १० महास्वामी महाराज महाप्रभु महाचन्द्र महादित्य १५ महाशूर महागुरु महातपा महातेजा महोदक २० महोनय महाबल २५ महाधैर्य महावीर्य महाकांति महाद्युति महाशक्ति ३० महाज्योति महाभूति महावृति महामति महानीति ३५ महाक्षांति महाकृति महाकीर्ति महास्फूर्ति महाप्रज्ञ ४० महोदय महामदा महामुनि ५० महामौनि महाध्यान महादम महाक्षम महाशील ५५ महायोग महालय महात्रत महायज्ञ महाश्रेष्ठ ६० महाकवि 65 महामत्र ७५ महा पूर्य महाधर्म महातन महेष्टनाक् ९० महाग महोपाय महात्मा महात्मन महानय महसाघाम महाशय ६५ महामारुणिक महर्षि महामोध मता ८० महितोदय महासौख्य महानाद महामुक्ति ९५ महानद महायति महागुप्ति महोदय महामोद महासत्य महामवाधि ७० महाधोप महाव सतारी महेज्य ८५ महाबुद्धि महामोहारिसदन महायोगीश्वरा- महसापति महासिद्धि राध्य महावीर महाशीच १०० महामुक्तिपदे- महाधीर महापसी श्वर ॥ इति श्री अहन्नाम सहस्त्र समुच्चये षष्ठम शत प्रकाश ॥ सप्तम् १०० नाम १ आनद अरिंजय नदन कामहा मनु नद कामद कलेशापद बद्य काम्य মাস্তু १० कामधेनु १५ उत्तम अभिनदन 5 68 मनोज्ञ ३५ अई घोर सुश्रा गौरशासन धारा दयायोग ४० धनी मुपश्वर धानकायुध देव कमहा ४५ धर्ममारण सोलान् स्थमोपान नेदीयान् दरियान् ५० दुग्दर्शन सुस्थित स्वास्थ्यभाक् सुस्थ निरजस्क ५५ गतस्पृह ७५ दमि वश्येन्द्रिय शान्तिपरायण विमुक्तात्मा स्वानंद निःमपत्न परमानन्द जितेन्द्रिय ६० श्रीनिवास ८० परापर चतुर्वत्र अमोध चतुरारय अमोधवाक् चतुर्मुख स्वाज अध्यात्मगम्य दिव्यदृष्टि ६५ अगरयात्मा ८५ अगोचर योगात्मा सुरुप योगक् सुभग योगिवंदित त्यागी सर्वत्रग मृत ७० सदाभावि ९० अमूर्त त्रिकालविपया समाहित र्यक् एक शंकर अनेक सुखद निरालम्ब दांन्त ९५ अनीटकनाथ ३५ स्वेश 69 निस्तर অ্যs १०० निजगन्मग प्राय समम्पर्य लोदय ॥ इति श्री अर्हन्नाम सहस्त्र समुच्चये अष्ठम शत प्रकाश ॥ नवमम् १०० नाम १ ईश क्षम अधीश अक्षाम स्रीश्वर अधिप २० अकाय स्वर अधीन्द्र अमाय आद्य ५ ध्येय अस्मय अमेय अमय ४० अपर दयामय दश्य अरुप शिव २५ अदृश्य अस्पर्श अणु अशब्द १० शुभ अम्थूल अरिहा सार जीर्ण ४५ अरुह যিঃ नव्य दिप्त स्पष्ट अलेश्य स्फूट अरम १५ अस्फूट स्वभू अगन्ध इष्ट स्वात्मा ५० अच्छेद्य पुष्ट स्वययुद्ध अमेष ३० गुरु 72 मुनिपुङ्गव लोकेश दयानिधि अनिद्रालु लोकवत्सल १०० सुक्ष्मदर्शी ७५ अतंद्रालु त्रिलोकीश सुमार्ग जागरुक त्रिकालझ कृपालु प्रमामय ९० त्रिनेत्र मार्गदर्शक कर्मण्य त्रिपुरान्तक प्रातिहार्योज- कर्मठ त्र्यंबक ८० अकुंठ केवलालोक १०५ स्फीतातिशय रुद्र केवली विमलाशय भद्र ९५ केवलेक्षण सिद्धानंत अभयङ्कर समंतभद्र चतुष्करी लोकोत्तर शान्तारि १०९ जिनपुङ्गव ८५ लोकपति धर्माचार्य ॥ इति श्री अर्हन्नाम सहस्त्र समुच्चये दशमम शत प्रकाशः ।। -- 73 ॥ महोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचितम् ॥ ॥ श्रीजिनसहस्रनामस्तोत्रम् ॥ नमस्ते समस्तेप्सितार्थप्रदाय, नमस्ते महार्हत्यलक्ष्मीप्रदाय । नमस्ते चिदानन्दतेजोमयाय, नमस्ते नमस्ते नमस्ते नमस्ते० ४ ॥१॥ नमस्ते जगन्नाथ ! विश्वकनेता, नमस्ते महामोहमछैफजेतः।। नमस्ते मता मोक्षशिक्षापिनेत: १, नमस्ते० ४ ॥२॥ नमस्ते जिनेन्द्र ! प्रभो! वीतराग!, नमस्ते स्वयम्भो! जगद्गन्धनाग।। नमस्ते स्फुरज्ज्ञानजाग्रद्विराग!, नमस्ते. ४ ॥३॥ नमस्ते जगजन्तुजीवातुजन्म!, नमस्ते प्रभो! भाग्यलम्यादघ्रिपद्म।। नमस्ते लसत्सत्यमन्तोपसम, नमस्ते० ४ ॥ ४ ॥ नमस्तेन धर्मार्थिना धर्मवन्धो!, नमस्ते सता पुण्यकारुण्यसिन्धो।। नमस्ते निरुद्धातिदष्टानान्धो!, नमस्ते०४ ॥ ५ ॥ १ नमाने पद चार वार पोख्नु ए चोयु पद छे 7
74
नमस्ते महरिवन् ! नमस्ते यशस्विन् !,
नमस्ते वचस्विन् ! नमस्ते तपस्विन् ! ।
नमस्ते गुणैद्भुतैरभुताय, नमस्ते०४ ॥६॥
नमस्ते महात्मन् ! नमरते चिदात्मन् !,
नमस्ते शिवात्मन् ! नमस्ते परात्मन् ! ।
नमस्ते स्थिरात्मन्! नमस्तेऽन्तरात्मन् !, नमस्ते०४ ॥७॥
नमस्ते गुणानन्त्यमाहात्म्यधाम्ने,
नमस्ते मुनिग्रामणे ध्येयनाम्ने ।
नमस्ते विशुद्धावयोधात्मकाय, नमस्ते० ४ ॥८॥
नमस्ते भवप्रान्तरस्वर्द्रमाय,
नमस्ते कृतासन्मनोविश्रमाय ।
नमस्ते गलज्जन्ममृत्युश्रमाय,
नमस्ते० ४ ॥९॥
नमस्ते सुधाधोरणीवल्लभाय,
नमस्ते भवेऽस्मिन् भृशं दुर्लभाय ।
नमस्तेऽत्र लब्धाय पुण्यैः (ण्य)प्रकः, नमस्ते० ४॥१०॥
नमस्ते सुधासारनेत्राजनाय,
नमस्ते सदाऽस्मन्मनोरजनाय ।
नमस्ते भवभ्रान्तिभीभञ्जनाय, नमस्ते० ४ ॥११॥
नमस्ते शुचिज्ञानरत्नाकराय,
नमस्ते सतां कल्पकारस्कराय ।
नमस्ते जगजीवभद्रङ्कराय,
नमस्ते० ४ ॥ १२ ॥
75
,
नमो मण्डिताखण्डभृमण्डलाय,
नमो भक्तिनम्रासिलाखण्डलाय ।
नमो युक्तयोगाय योगीश्वराय, नमस्ते० ४ ॥ १३ ॥
नमस्ते सदा सुप्रसन्नाननाय,
नमः सिद्विसम्पल्लताकाननाय ।
नमो दत्तविद्वानस्सम्मदाय, नमस्ते० ४ ॥ १४ ॥
नमस्तेऽपतीय विश्वोपकृत्य,
नमस्ते कृतार्थाय सद्धर्मकृत्यः ।
नमस्ते गरुत्या जगद्वत्सलाय, नमस्ते. ४ ॥ १५ ॥
नमस्तीर्थकृन्नामकर्मार्जिताय,
नमोऽचिन्त्यसामर्थ्यविस्फूर्जिताय ।
नमो योगिने योगमुद्रान्त्रिताय, नमस्ते० ४ ॥१६॥
नमोऽनुत्तरनिभिः पूजिताय,
नमस्तन्मनःसशयच्छेदकाय ।
नमोऽनुत्तरज्ञानलक्ष्मीश्वराय, नमस्ते० ४ ॥ १७ ॥
नमस्ते धरितीन (व्येव) संसहाय,
नमस्तेऽन्तरङ्गारिभिदुस्सहाय ।
नमस्ते तपम्सत्यधूपूंर्वहाय,
नमस्ते. ४ ॥ १८॥
नमस्ते शुभोपार्जिताईत्पदाय,
नमम्ने तृतीये भरे निश्चिताय ।
नमो धर्मसम्यरफलारश्चिताय, नमस्ते. ४ ॥१९॥
76
नमो नव्यदिव्योपभोगाभिधाय,
नमस्तेषु तत्रापि वैरझिकाय ।
नमो योगसात्म्यैकतासङ्गताय, नमस्ते० ४ ॥२०॥
नमस्ते भुवि स्वर्गलोकच्युताय,
नमस्ते सतीकुक्षिकोशङ्गताय ।
नमस्ते त्रिलोकोपकारोद्गताय, नमस्ते० ४ ॥ २१ ।।
नमस्ते शुभस्वमसंसचिताय,
नमस्ते जनन्याप्तसदोहदाय ।
नमस्ते भवत्तद्वपुःसौष्ठवाय, नमस्ते० ४ ॥ २२ ॥
नमस्ते जनुर्भूषिताढ्यान्वयाय,
नमो रत्नरवृष्टिपूर्णालयाय ।
नमो वर्द्धमानद्विधावैभवाय, नमस्ते० ४ ॥ २३ ।।
नमो दिकुमारीकृतस्वोचिताय,
नमस्ताभिरर्चाविधिखञ्चिताय ।
नमो ज्ञानरत्नत्रयोदञ्चिताय, नमस्ते० ४ ॥ २४ ॥
नमो घोतिताशेषविश्वत्रयाय,
नमः सर्वलोकैकसौख्यावहाय ।
नमः प्रोल्लसज्जङ्गमस्थावराय, नमस्ते० ४ ॥ २५ ॥
नमः सुप्रसन्नीकृताशामुखाय,
नमस्ते समुज्जृम्भितोर्वीसुखाय,
नमो नारकेभ्योऽपि दत्तोत्सवाय, नमस्ते० ४ ॥२६॥
77
नमस्तेऽद्भुतङ्कम्पितेन्द्रासनाय,
नमस्ते मुदा तैः कृतोपासनाय ।
नमः कल्पितधान्तनिर्वासनाय, नमस्ते० ४ ॥२७॥
नमस्ते सुराद्रौ सुरेः प्रापिताय,
नमस्ते कृतस्नानपूजोत्सवाय ।
नमस्ते विनीताप्सर. पूजिताय, नमस्ते. ४ ॥२८॥
नमोऽङ्गुष्ठपीयूपपानोच्छ्रिताय,
नमस्ते वपु सर्वनष्टामयाय ।
नमस्ते यथायुक्तमङ्गकाय, नमस्ते. ४ ॥ २९ ॥
नमस्ते मलस्वेदखेदोज्झिताय,
नमस्ते शुचिक्षीररुकशोणिताय ।
नमस्ते मुख वासहीणाम्नुजाय, नमस्ते० ४ ॥३०॥
नमस्ते मणिस्वर्णजिद्गौरभाय,
नमस्ते प्रसर्पद्वपु सौरभाय ।
नमोऽनीक्षिताहारनीहारसाय, नमस्ते. ४ ॥३१॥
नमस्ते सुरौधैरनुक्रीडिताय,
नमस्ते शिशुक्रीडया पीडिताय ।
नमस्ते सुराधी-धरैरीडिताय, नमस्ते० ४ ॥ ३२ ॥
नमो राजइसेभगोवद्गताय,
नमश्चातुरीमाधुरीमङ्गताय ।
नमः सर्वशास्त्रान्धिपारङ्गताय, नमस्ते० ४ ॥३३॥
78
नमः कोमलालापपीयूपवप!,
नमो बाललीलाकृतज्ञातिहर्ष! ।
नमस्ते प्रभो ! प्राज्यपुण्यप्रकर्य, नमस्ते० ४॥३४॥
नमः स्फारकौमारलीलालसाय,
नमस्ते स्वतस्त्यक्तदुलालसाय ।
नमस्ते शुचित्वेऽपि निःसाध्वसाय, नमस्ते० ४॥३५॥
नमस्ते कृतान्वर्थयुक्ताभिधाय,
नमस्ते स्वतः सिद्धविद्याविधाय ।
नमरते स्वतो लव्धशिक्षोपधाय, नमस्ते० ४ ॥ ३६॥
नमोऽष्टाढयसहस्रसल्लक्षणाय,
नमस्ते कृतप्राणिसंरक्षणाय ।
नमोऽक्षीणदाक्षिण्यधीदक्षिणाय, नमस्ते० ४ ॥ ३७॥
नमोऽनङ्कराकेन्दुजैत्राननाय,
नमो दक्षहल्लक्षसन्दानकाय ।
नमस्ते कपोलान्तशान्तसिताय, नमस्ते० ४ ॥ ३८ ॥
नमोऽनन्तगाम्भीर्यवर्याशयाय,
नमः संवृतानन्तशक्त्याश्रयाय ।
नमो धैर्यनिस्तजितेन्द्राचलाय, नमस्ते० ४ ॥ ३९॥
नमो यौवनेऽप्युद्गतस्थावराय,
नमः प्रातिभोत्थव्यवस्थावराय ।
नमो विष्वगुद्यत्प्रभापीवराय, नमस्ते० ४ ॥ ४०॥
79
-
नमो जन्मतोऽप्यार्यमार्गाध्याय,
नमो रुद्धदुनौतिचर्याऽपगाय ।
नमस्ते गिनाऽध्यापक शिक्षिताय, नमस्ते० ४॥४१॥
नमो यौवने प्राप्तपाणिग्रहाय,
नमो भुक्तभोगोपभोगाग्रहाय ।
नमस्ते कृतप्रान्यकमौपचाय, नमस्ते. ४ ॥ ४२ ॥
नमस्ते निवर्गक्रियासावकाय,
नमस्ते यथाई तदाराधकाय ।
नमस्तुर्यमगेऽप्यनिधिकाय, नमस्ते० ४ ।। ४३ ॥
नमो दान्तपञ्चेन्द्रियान्त म्यलाय,
नमः कीलिताजस्रकम्प्रोच्चलाय ।
नमो ज्ञानधाराधुतान्तर्मलाय नमस्ते० ४ ॥ ४४ ॥
नमो विभ्रते साचिकाश्चि(त्तवृत्ति,
नमो विभ्रते मानमैनोनिवृत्ति ।
नम पश्यते सर्वतस्तत्वदृष्टया, नमस्ते० ४ ॥ ४५ ॥
नमो भोगभङ्गीप्रमशानुगाय,
मो नोपलिप्ताय तत्तद्रजोभिः।
नमः प्रोक्लमत्पुण्डरीकोपमाय, नमस्ते०४॥४६॥
नमः सम्पतद्देवलोकान्तिकाय,
नमस्तैः स्तुतादम्रिद्वयोपान्तिकाय ।
नमो ज्ञाततीर्थप्रत्यर्थनाप, नमस्ते ॥४॥४७॥
80
नमो निश्चितात्मीयदीक्षाक्षणाय,
नमो ज्ञानशुद्धोपयोगक्षणाय,
नमस्ते निरीहाय वीतस्पृहाय, नमस्ते० ४ ॥४८ ।।
नमस्ते कृतज्ञातिवर्गार्हणाय,
नमः प्रीणितैतत्कृतोद्व्हणाय ।
नमस्तेऽपितवापतेयाय तेभ्यो नमस्ते० ४ ॥ ४९ ॥
नमो दत्तसांवत्सरोतार्जनाय,
नमो विश्वदारियनिस्तर्जनाय ।
नमस्ते कृतार्थीकृतार्थिवनाय, नमस्ते० ४ ॥ ५० ॥
नमः प्रत्यहं कारितोद्घोषणाय,
नमो भो घृणीतेति लोकंपृणाय.
नमो दानवीराधिवीरोधुराय, नमस्ते ४ ॥५१॥
नमस्तेऽपितानेकगर्जगजाय,
नमस्तेऽपितानेकवाहबजाय ।
नमरते समुत्तानदानध्वजाय,
नमस्ते० ४ ॥५२॥
नमस्ते प्रभो! दत्तदिव्याम्बराय,
नमस्तेऽपितस्वर्णरत्नोत् कराय ।
नमो दीनदीनारधाराधराय, नमस्ते० ४ ।। ५३ ॥
नमः प्रत्यहं यच्छते हेमकोटिं,
नमो यच्छतेष्टो च लक्षाणि तेषाम् ।
नमो यच्छतेऽन्यद्यथेच्छ जनानाम् , नमस्ते० ४॥५४॥
81
नमस्ते वदान्यीभवन्मार्गणाय,
नमस्ते धनापूर्णगेहाङ्गणाय ।
नमस्ते कृतानेककोटिध्वजाय, नमस्ते. ४॥ ५५ ॥
नमस्ते मन कामकल्पद्रमाय,
नमस्ते प्रभो! कामधेनूपमाय ।
नमस्ते निरस्तार्थिनामाश्रमाय, नमस्ते. ४ ॥५६॥
नमस्त्यक्तसप्ताङ्गराज्येन्दिराय,
नमस्त्यक्तसत्सुन्दरीमन्दिराय ।
नमस्त्यक्तमाणिक्यमुक्ताफलाय, नमस्ते० ४ ॥ ५७॥
नमस्तत्क्षणोपागतस्वधाय,
नमस्तस्कृतप्रौढदीदोत्सनाय ।
नमस्तन तत्तत्स्फुरद्वैभनाय, नमस्ते०४॥ ५८॥
नमस्ते प्रभो! याप्ययानस्थिताय,
नमस्तेऽवनाय प्रमो प्रस्थिताय ।
नमस्ते शमस्पृग्मन सुस्थिताय, नमस्ते० ४ ॥ ५९ ॥
नमो यानधुभिरद्वामयाय,
नमो दूरविक्षिप्तगर्नामपाय ।
नमा शुद्धभावानरुद्धाश्रमाय, नमस्ते० ४ ॥ ६० ॥
नमस्तेऽग्रगच्छन्महेन्द्रध्वजाय,
नमस्तेऽनगच्छद्गजाश्चनजाय ।
नमस्तेऽभित. सञ्चरद्राजकाय नमस्ते०४॥६१ ॥
82 नमोऽमर्त्यसङ्कीणितोर्वीतलाय, नमो देवदीप्यन्नभोमण्डलाय । नमस्ते नददिव्यतूर्यत्रिकाय, नमरते० ४ ॥ ६२ ॥ नमो दीपरत्नप्रभाडम्बराय, नमो वन्दिशब्दोर्जिताशाम्बराय । नमो नागरीनागरैर्वीक्षिताय, नमस्ते० ४ ॥ ६३ ॥ नमस्त्यक्तसर्वाङ्गिकाभूपणाय, नमो निर्गतत्रित्रिधादृषणाय । नमः पञ्चमुष्टयाऽलकोल्लुञ्चकाय, नमस्ते० ४ ॥६४॥ नमस्ते समुद्गीर्णसामायिकाय, नमः सर्वदैव त्रिधाऽसायिकाय । नमस्सर्वसावधयोगोज्झिताय, नमस्ते० ४ ॥६५॥ नमस्ते मनःपर्यवज्ञानशालिन् !, 'नमश्चारुचारित्रपावित्र्यमालिन् ! । नमो नाथ ! षड्जीवकायावकाय, नमस्ते० ४ ॥६६॥ नमस्ते समुद्यविहारक्रमाय, नमः कर्मवैरिस्फुरद्विक्रमाय । नमः स्वीयदेहेऽपि ते निर्ममाय, नमस्ते० ४ ॥६७ ॥ नमो ग्राम कैकरात्रोषिताय, नमः पत्तने पञ्चरात्रोषिताय । नमो भावशुद्धषणापोषिताय. नमस्ते९ ४ ॥ ६८॥ -
83
नमस्तुभ्यम्पाय रात्री दिशया,
नमस्तुन्यम्पाय त तपदिय ।
(नम गुल्पपिनाय से गुमे या), नमन ॥१९॥
नमम्युतिय पिये पिी या,
नमम्शुपतिनाप ताठ मणी या।
नमस्तुभ्यरिताय गाली गुना घा, नमाने० ॥७॥
नमस्तुम्पनिय मोमेमोया,
नमस्तुभ्यपिाप जी नये ।।
नमन्तुपरिवार मेघानी या, नमने ४॥7॥
नमर्ग प्रभो! पता निभाए,
नमग्ने प्रमो! जीतिनिहाय ।
नमग्ने प्रमा! नापंचिताय,नमन्ने ४॥७२॥
नमम प्रमोगरवानिर
नमम प्रो! निगम्युगि।
नम प्रमा! मारागागर, नममे ४ ॥ ७ ॥
नमी प्रमोगगरमपमान,
मम्मे मन.निधनाप ।
(मनोमानापन० ४॥२॥
मनोनिगमपार,
मो सागपारा
ना. म. ५ ॥७॥
84
नमः श्रेणिमारोहते निष्प्रपातम् ,
नमस्तन्वते सप्तदृग्मोहयातम् ।
नमस्ते प्रभो! निर्गतायुस्त्रयाय, नमस्ते० ४ ॥७६ ॥
नमस्ते क्रमोद्यद्गुणस्थानकाय,
नमस्ते परिक्षीणनिद्राभयाय ।
नमस्तेऽजुगुप्साय वेदोज्झिताय, नमस्ते० ४ ॥७७॥
नमो विप्रमुक्ताय हास्येन रत्या,
नमो विप्रमुक्ताय शोकारतिभ्याम् ।
नमस्ते क्षरन्नोकपायाय मूलान, नमस्ते० ४ ।। ७८ ॥
नमग्छिन्दते क्रोधमानौ दुरन्तो,
नमो निनते दम्भलोभौ समूलम् ।
नमस्ते यथाख्यातचारित्रराक्षे, नमस्ते० ४ ॥ ७९ ॥
नमः क्षीणमोहाय सुनानकाय,
नमो घातिकर्मद्विषद्घातकाय ।
नमो जातकर्मत्रिपष्टिक्षयाय, नमस्ते० ४ ॥ ८ ॥
नमः प्रज्वलद्ध्यानदावानलाय,
नमो दग्धनिश्शेषकर्मोपलाय।
नमस्ते चतुःकर्मशेषोदयाय, नमस्ते० ४ ॥ ८१ ॥
नमस्तेऽत्र कर्मद्वयोदीरकाय,
नमस्सत्तयाऽशीतियुपश्चकाय ।
नमो बनते त्रिक्षणस्थायिसातम् , नमरते० ४ ॥ ८२ ॥
85
नमो ध्यातशुलायमेदद्वयाय,
नमस्ते तृतीयान्तरालस्थिताय ।
नमः शुक्ललेश्यास्थितौ निश्चलाय, नमस्ते० ४ ॥८३॥
नम केवलज्ञानसदर्शनाय,
नमस्ते कृताहत्पदस्पर्शनाय ।
नमस्ते हताटादशाऽऽदीनपाय, नमस्ते०४॥८४॥
नमो जानते पश्यते सर्वलोक-
मलोक तथैवाशु निम्नमस्ते ।
नमो द्रव्यमानारयोधात्मकाय, नमस्ते० ४ ।। ८५ ॥
नमस्तत्क्षणायातदेवासुराय,
नमोऽनुत्तरद्धिप्रभामामुगय ।
नमो रत्नररूप्यवप्रत्रयाय, नमस्ते०४ ।। ८६ ॥
नमस्ते चतुर्दिग्विरानन्मुखाय,
नमस्तेऽभितः समदा सत्सुखाय ।
नमो योजनच्छायचैत्यमाय, नमरते०४ ८७॥
नमो योजनामीनतानसनाय,
नमर्थकासुद्धनानाजनाय ।
नमो भानुजैत्रप्रभामण्डलाय, नमस्ते. ४॥ ८८॥
86
--
-
नमो धर्मचक्रनसत्तामसाय,
नमः केतुहप्यन्युग्मानमाय ।
नमो व्योमयञ्चागिसंहायनाय. नमरत० ४ ॥ १० ॥
नमश्चामरष्टभिर्वी जिताय,
नमःस्वर्णपदाहिताघ्रियाय ।
(नमः सन्तताशोकायुताय), नमस्ते. ४ ।। ११ ।।
नमोऽधोमुखाग्रीभवन्त्रण्टकाय,
नमो ध्वस्तकारिनिष्कण्टमाय ।
स्तेऽभितो नम्रमार्गमाय, नमस्ते० ४ ।। ९२ ॥
नमस्तेऽनुकूलीभवन्मारुताय,
नमस्ते सुखाकृद्विदायोरुताय ।
नमस्तेऽम्बुसिक्ताभितो योजनाय नमस्ते० ४ ।। ९.३॥
नमो योजनाजानुपुष्पोचयाय,
नमोऽवस्थितश्मश्रुकेगादिकाय ।
नमस्ते सुपञ्चेन्द्रियाथोंदयाय, नमस्ते० ४ ॥ ९४ ॥
नमो नाकिकोठ्या विविक्तान्तिकाय,
नमो दुन्दुभिप्रष्टभूमित्रिकाय ।
नमोऽभ्रंलिहायोदितेन्द्रध्वजाय, नमस्ते ० ४ ॥ ९५ ॥
नमः प्रातिहार्याष्टकालङ्कृताय,
नसो योजनव्याप्तवाक्यामृताय ।
नमस्ते विनाऽलकृति सुन्दराय । नमस्ते० ४ ॥१६॥
87
,
नमस्तेऽन्यह द्विर्भनद्देशनाय,
नमस्सप्ततत्त्वाश्रितोद्देशनाय ।
नमः प्रोक्तपद्रव्यरूपत्रयाय, नमस्ते० ४ ॥ ९७॥
नमस्ते मतोत्पत्तिसचव्ययाय,
नमस्ते त्रिपयाचविश्वनयाय ।
नमस्रासितकान्तमादिद्विपाय, नमस्ते० ४॥ ९८ ॥
नम क्लप्ततीर्थस्थितिस्थापनाय,
नमः सचत सद्यसत्यापनाय ।
नमस्ते चतुर्भदधर्पिकाय, नमस्ते ०४॥ ९९ ॥
नम. प्रोक्तनिः श्रेयमश्रीपचाय,
नमो नाशितधारकान्तय॑थाय ।
नमस्तेऽस्तु रत्नत्रयीदीपकाय, नमस्ते०४ ॥१०॥
नृविर्यमुराप्तस्मसामायिकाय,
नमस्ते नमोऽमोघानायुकाय ।
नमो द्वादशप्रौढपपप्रियाय, नमस्ते० ४॥१०१॥
नम' सार्थाहाय मुक्त्यघगानाम् ,
नमोऽवारपाराय मुरत्यापगानाम् ।
हिरनमः पारितो/तरया, नमस्ते० ४ ॥१०२॥
नमोद्वादशालीनदीभृघराय,
नम सप्तमगीचमूदुर्घगय ।
नमम्चे प्रमाणोपपनामनाय,
नमरते. ४ ॥१३॥
88
नमो बुद्धतत्वाय तद्बोधकाय,
नमः कर्ममुक्ताय तन्मोचकाय ।
नमस्तीर्णजन्माब्धये तारकाय, नमस्ते० ४ ॥१०४ ॥
नमो लोकनाधाय लोकोत्तमाय,
नमस्ते त्रिलोकप्रदीपोपमाय ।
नमो निनिदानं जनेभ्यो हिताय, नमस्ते० ४ ॥१०५॥
नमः पावनेम्योऽपि ते पावनाय,
नमः सिद्धियोगैः कृतोद्भावनाय ।
नमो दत्तनिःशेपजीवाभयाय, नमस्ते० ४ ॥ १०६ ॥
नमोऽन्तर्मुहविशिष्टे यताय,
नमः सारशैलेश्यवस्थोचिताय ।
नमस्ते चतुःकर्मतुल्यांशताय, नमस्ते० ४ ॥१०७॥
नमस्ते क्रमाद्रद्धयोगत्रयाय,
नमो लेश्याय शुक्लयाऽप्युज्झिताय,
नमः पूर्णशुक्लान्त्यभेदद्वयाय,
नमस्ते० ४ ॥१०८॥
नमस्ते विशुद्धथा महानिर्जराय,
नमोऽशीतियुपञ्चकमोत्किराय ।
नमस्ते विभागोनदेहोच्छ्याय, नमस्ते० ४ ॥१०९॥
नमस्ते पतत्कार्मणौदारिकाय,
नमोऽनादिसम्बन्धमुक्ताणुकाय ।
नमस्तत्क्षणाप्तस्थिरस्थानकाय, नमस्ते० ॥११॥
189 नमस्तन गत्याऽस्मन्न्या गताय, नम मिद्धयुद्धाय पारगताय । नम मायनन्तस्थितिम्घायुकाय, नमस्ते० ४ ॥१११|| नमो वीतसमारसत्यता)काय, नमो निराजन्ममृत्युव्यथाय । नम साधतायामलायाचलाय, नमस्ते० ४ ॥११२॥ नमः केरल निगलक्षणाय, नमोऽनुक्रमस्वोधक्षणाय । नमो जातदृष्टाखिलार्थप्रयाय, नमस्ते०४॥११३॥ नमस्तेऽनुपाग्व्येयमौरयाहुयाय, नमः स्त्रोत्थितानन्तनीयर्योदयाय । नमोर्भाग्शा बारमनोऽगोचराय,नमस्ते ४ ॥११॥ नमो देहभृदेहदेवालयाय, नमस्तेऽत्र त्याय चतन्यमा । नमः साविमेदेन दक्षेधिताय, नमस्ते०४ ॥११५॥ नमो निर्विकागय नीरञ्जनाय, नमो योगिलक्ष्याय नियजिताय । नमस्तेऽनुमानोपमानातिगाय, नमस्ते० ४ ॥११६॥ नम च्यापनादयनामामसाय, नमस्ते नानाय कालायेऽम्मान । नमो भागमायनयानभानाम् नमन्ने ४॥११७॥ 8
90
नमस्ते प्रभो ! श्रीयुगादीश्वराय.
नमस्तेऽजिताय प्रभो! शम्भवाय ।
नमो नाथ ! सैद्धार्थतीर्थेश्वराय, नमस्ते० ४ ॥११८॥
नमो माङ्गलीयर फुरन्मङ्गलाय,
नमस्ते महासमपमप्रभाय ।
नमस्ते सुपार्थाय चन्द्रप्रभाय,
नमस्ते० ४ ११९॥
नमः पुष्पदन्ताय ते शीतलाय,
नमः श्रीजिनेन्द्राय ते वैष्णवाय ।
नमो वासुपूज्याय पूज्यायसद्भिः, नमस्ते० ४ ॥१२०॥
नमः श्यामया सुप्रसुताय नेतः !,
नमोऽनन्तनाथाय धर्मेश्वराय ।
नमः शान्तये कुन्थुनाथाय तुभ्यम्, नमस्ते० ४ ॥१२१॥
नमस्तेऽप्यराख्येश! नम्रामराय,
नमो मल्लिदेवाय ते सुव्रताय ।
नमस्ते नमिस्वामिने नेमयेऽर्हन् !,नमस्ते० '४ ॥१२२॥
नमस्ते प्रभो! पार्श्वविश्वेश्वराय,
नमस्ते विभो! बर्द्धमानाभिधाय ।
नमोऽचिन्त्यमाहात्स्यचिद्वैभवाय, नमरते० ४॥१२३॥
नमस्तेऽवसपिण्यभिख्येऽत्र काले,
नमस्ते चतुर्विंशतावञ्चिताघ्रिः ।
नमः केवलज्ञानिमुख्याह्वयाय, नमस्ते० ४ ॥१२॥
91
नमोऽनागतोत्सप्पिणीकालभोगे,
चतुर्विशतावेप्यदाईन्त्यशक्त्यै ।
नमः म्वामिने पद्मनाभादिनाम्ने, नमस्ते०४॥१२॥
दशवप्यर्थर नमः कर्मभूपु,
चतुर्दिशती ते नमोऽनन्तमृत्य।
नमोऽध्यक्षमृत्यै विदेहाननीपु, नमस्ते० ४ ॥१२६॥
नमस्ते प्रभो स्वामीसीमन्धराय,
नमस्तेऽधुनाईन्त्यलक्ष्मीनराय ।
नमः प्रापिदेहारनी मण्डनाय, नमस्ते.४॥१२७॥
नमस्तेऽधुना निदेहोद्गताय,
नमस्ते दशतदेवाड़ताय ।
नम मन्ततग्रातिहार्याष्टकाय, नमस्ते. ४ ॥१२८॥
नमो भूर्भुवः स्वनयीशाचताय,
नमस्ते त्रिलोकीस्थिरस्थापनाय ।
नमो देवमामराम्यचिनाय, नमस्ते ४ ॥१२९॥
नमः स्वर्षिमानेषु वार्चिताय,
नमो ज्योतिविन्दुमपर्नताय)
नमोऽयाऽपि नमामुरख्यन्तराय, नमस्ते० ४ ११३०॥
नमोऽरदानम्वेष्टभूभृद्वराय,
नमो ग्यामनिणेषणम्याम्पदाप ।
नम गरपियाम्पिनि पापराय, नमस्ते ॥१३॥
92
नमस्तीर्थराजाय तेऽष्टापदाय,
नमः स्वर्णरत्नादास्पदाय ।
नमस्ते नतश्राद्ध विद्याधराय. नमस्ते० ४ ॥१३२॥
नमस्तीर्थसम्मेतशैलायाय,
नमो विशतिप्राप्तनिःश्रेयसाय ।
नमः श्रव्यदिव्यप्रभावाश्रयाय, नमस्ते० ४ ॥१३३॥
नमश्चोजयन्ताद्रितीयोंचमाय,
नमो जातनेमितिकल्याणकाय ।
नमः शोभितोद्धारसोराष्ट्रकाय, नमरते० ४ ॥१३४॥
नमस्तेऽर्बुदायाप्तचैत्यार्बुदाय,
नमो भव्यहत्केकिलोकाम्बुदाय ।
नमः प्राच्यवंशेस्यकीर्तिध्वजाय, नमस्ते० ४ ॥१३४॥
नमस्ते प्रभो! पार्थशाखेश्वराय,
नमस्ते यशोगौरगोडीधराय ।
नमस्ते वरकाणतीर्थेश्वराय, नमस्ते० ४ ॥ १३६ ॥
नमस्तेऽन्तरिक्षाय वामाऽङ्गजाय,
नमः सूरतस्थाय ते दिग्गजाय ।
नमो नाथ ! जीराउलीमण्डनाय, नमस्ते० ४ ॥१३०॥
नमो देशपूर्यादिनानाह्वयाय,
नमो ध्येयनाम्ने महिम्नाव्ययाय ।
नमस्ते कृतारिष्टदुष्टक्षयाय,
नमस्ते० ४ ॥१३८॥
93 नमो पदमानप्रमोः शामनाय, नमन्त चतुर्णिमदसाय नित्यम् । नमो मन्दरानाय ते घेयपश, नमम्ने० ४ ॥१३९॥ नमो जनमिदान्ताधार्ण पाप, मोऽनेरावार्थानाधयाय । Tमो परिपेन्दिगाना, नमस्ते. ४ ॥१४०॥ नमो दानपानचारित्रमुग, नमो मध्यमर्यापधा(पाप)तु। नमो भारनिग्रंन्धतथ्यक्रियाप, नमस्ते ॥१४॥ नमः पादधर्माय दानोतमाप, नाम्न मार्गमिदिमाप। नगरते पापानन्याय, नमम्ने० ४ ॥१४२॥ नमो नागीमर्गौलाप, नमो पनापिरगा गुपी गिाये। मो पाइनपानोपपी पर, नमन. ४ ॥१४॥ नमसार पिपंगाधनत बनातारपसेर सवारपाद । सुदन गरम पुन विना- गापिनबिन पम् 94 तथा चाहुः- इको वि नमुकारो, जिणवरवसहस्स बद्धमाणस्स । संसारसागराओ, तारेइ नरं व नारिं वा ॥१४५॥ स्तवोऽयं प्रातरुदित-स्तमस्स्तोमच्छिदर्हताम् । नमस्कारसहस्रण, सहस्रकिरणायताम् ॥१४६॥ सहस्रकिरणस्येव, स्तवस्यास्य प्रभावतः । दूरे दोषाः पलायन्ते, पुण्याहः प्रकटो भवेत् ॥१४७॥ स्थित्वा वर्षारात्रं, गन्धारे माग्निसंयमनितेऽन्दे१७३१॥ श्रीविजयप्रभसरि-प्रसादतः स्तोत्रमिदमुदितम् ॥१४८॥ श्रीहीरहीरविजयाह्वयमूरिशिष्य- श्रीकीर्तिकीर्तिविजयाभिधवाचकानाम् । शिष्येण दौकितमिदं भगवत्पदाग्रे, स्तोत्रं सुवर्णरचितं विनयाभिधेन ॥१४९॥ ॥ इति महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयवाचकपुङ्गवविरचितं श्रीजिनसहस्रनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
95
भीममितगस्याचापपिरचिता
॥ श्री परमात्मद्वात्रिंशिका ॥
मारेषु मैत्री गुणिपु प्रमोद,
रित जीवेषु कपापरत्यम् ।
मध्ययमा विपरीतमी,
मदा ममारमा विदधात देव!
शरीरतः पर्समनन्तशतिः
विमिन्नमारमानमपाग्नदोपम् ।
निनेन्द्र रोपादिय पार्टि,
गर प्रमादन ममाग्त मनि
से गुपे बैरिनि मन्पुमंगे,
पोग पियोगे मग्न पनेया।
निगमतापममापद,
गम मनो मे पदापि नाप
गुनीनीनामिािति,
fuiiदिम्बितासि ।
पादरीपदीपी ममगा,
মা মুনা বিবি
समामा म!ि ना,
प्रमादिना पाया पाना
-
96 क्षता विभिन्ना मलिता निपीडिता, ममास्तु मिथ्या दुरनुष्ठितं सदा ॥ ५ ॥ मुक्तिमार्गप्रतिकूलवर्तिना, मया कपायाक्षवशेन दुर्धिया । चारित्र्यशुद्धेर्यदकारि लोपन, तदस्तु मिथ्या मम दुष्कृतं प्रभो ॥६॥ विनिन्दनालोचनगर्हणैरहे, मनोवाकायकपायनिर्मितम् । निहन्मि पापं भवदुःखकारणं, भिषग् विषं मन्त्रगुणैरिवाखिलम् ॥७॥ अतिक्रमं यं यमपि व्यतिक्रम, जिनातिचारं स्वचरित्रकर्मणः । व्यधामनाचारमपि प्रमादतः, प्रतिक्रमं तस्य करोमि शुद्धये ॥ ८॥ क्षितिं मनःशुद्धिविधेरतिक्रम. व्यतिक्रमं शीलवृतेविलचन्नम् । प्रभोऽतिचारं विषयेषु वर्तन, वदन्त्यनाचारमिहातिसक्तिताम् ॥९॥ यदर्थमात्रापदवाक्यहीनं, मया प्रमादादिह किञ्चनोक्तम् ।
97 रान्मे धगिल्या रिभातु दपी! परम्पती नियोधरधिम् ॥ १० ॥ पाधि ममाधि परिणामपुदि, परमोपरि शिरमारपपिदि । रिनामपि गिनिता नं. रा रन्मानम IIT ॥ ग मिर्पत गमतीदाद- र्य नृपने नगर यो गीया वैदपुगणारी म देशोदाममा नाम गोर्गनमानमार পাকামার। समाधिगम पाना नगर मनोवेमारनाम् निदने यो मार समाल गि पो गाना। पोनिमिtu. म देगा मालाम दिमागशिरोपो. སངྒྷཡཱཉྩ་ཀཱ ཎསཱན ། 93 त्रिलोकलोकी विकलोऽकलङ्कः, स देवदेवो हृदये ममास्ताम् ॥ १५ ॥ क्रोडीकृताशेषशरीरिवर्गा, रागादयो यस्य न सन्ति दोषाः । निरिन्द्रियो ज्ञानमयोऽनपायः, स देवदेवो हृदये ममास्ताम् ॥ १६ ॥ यो व्यापको विश्वजनीनवृत्तिः, सिद्धो विबुद्धो धुतकर्मबन्धः । ध्यातो धुनीते सकलं विकारं, स देवदेवो हृदये ममान्ताम् ॥ १७ ॥ न स्पृश्यते कर्मकलङ्कदोषै- यो ध्वान्तसङ्घरिव तिग्मरश्मिः । निरञ्जनं नित्यमनन्तमेकं, त देवमाप्तं शरणं प्रपद्ये ॥ १८ ॥ विभासते यत्र मरीचिमाली, न विद्यमाने मुवनाधिभासी । स्वात्मस्थितं वोधमयप्रकाशं, तं देवमाप्तं शरणं प्रपद्ये ॥ १९ ॥ विलोक्यमाने सति यत्र विश्वं, विलोक्यते स्पष्टमिदं विविक्तम् ।
99 . शुद्ध पिर शान्तमनाधनन्त, व देरमात शरण प्रपये ॥२०॥ पेन धता मन्मयमानमा- विपादनिद्रामगोपनिन्ना । धमानलेनेर सम्पपश- सा देवंदर गण अपये ॥२१॥ सम्नगेड मा न उण न मेटिनी, विधाननो नो पनर विनिर्मितम् । पवेनिरम्नावरपायरितिप, सुधीभिगमैर मुनिमंती मनः ॥ २२ ॥ न सानुगे मद्रममापिमापन, नगेफरना न प महमीरनम् । पतमसो पानगो मानिन, पिमुख्य मांगपि पायगाना || २३ ॥ न मन्नि पापा मग मनाया भवामि ने न । तिनिधिय पिपुजार्य, पE PARTो | ayu भागानमा समान-- TAITERAमुद। - 100 एकाग्रचित्तः खलु यत्र तत्र, स्थितोऽपि साधो ! लभसे समाधिम् ॥२५॥ एकः सदा शाश्वतिको ममात्मा, विनिर्मलेक्षाधिगमस्वभावः । बहिर्भवाः सन्ति परे समस्ता, न शाश्वताः कर्मभवाः स्वकीयाः ॥ २६ ॥ यस्यास्ति नैक्य वपुषाऽपि साध, तस्यास्ति किं पुत्रकलत्रमित्रैः । पृथककृते चर्मणि रोमकूपाः, कुतो हि तिष्ठन्ति शरीरमध्ये १ ॥ २७ ॥ संयोगतो दुःखमनेकभेदं, यत्तोऽश्नुते जन्मवने शरीरी । ततत्रिधाऽसौ परिवर्जनीयो, यियासुना निर्वृतिमात्मनीनताम् ॥ २८ ॥ सर्व निराकृत्य विकल्पजालं, संसारकान्तारनिपातहेतुम् । विविक्तमात्मानमवेक्षमाणो. निलीयसे त्वं परमात्मतत्त्वे ॥ २९ ॥ स्वयं कृतं कर्म यदात्मना पुरा, फलं तदीयं लभते शुभाशुभम् ।
101 परेन दा गहि लम्पने यूट, पयाप नियतना ॥३०॥ निनानिव फशिय टेदिनी, नमोऽपि भ्यापि ददाति विशन। रिचाश्यामनन्यमानम, परी दागी मिगेणीम् ॥ ३१ ॥ इतिहाशा , मामानमीक्षा। अनन्या पाना यो परमात्मा मिशिपि, मागिरिस्तो मनाया। मदीनो मनगि म पनिर्मित पिमपम ॥३२॥ rirner.irrfan' utoroya Firen
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103 वहस्तिने लोकोत्तमाय लोकाथाय लोकहिताय लोकप्रद्योत- कारिणे लोकप्रदीपाय अभयदाय दृष्टिदाय मुक्तिदाय मार्गदाय चोघिदाय जीवदाय शरणदाय धर्मदाय धर्मदेशकाय धर्मना- यकाय धर्ममारायये धर्मरचातुरन्तचक्रातिने व्यावृत्तच्छद्मने अप्रतिहतमम्यग्ज्ञग्नदर्शनसमने । ३ । ॐ नमोऽहते जिनाय जाप काय तीर्णाय तारकाप युद्धाप चोककाय मुक्ताय मोचकाय निकालनिदे पारङ्गताय कर्माष्टक- निदनाय अधीश्वराय शम्भरे जगत्प्रभवे स्यम्भुने जिनेश्व- राय म्याद्वादयादिने साय सनाय मर्गदर्शिने मतीर्थोप- निपदे सर्वपापण्डमोचिने मर्पयज्ञफलात्मने सर्वनकलात्मने सर्वयोगरहम्याय केलिने देवाधिदेवाय वीतरागाय । ४ । ॐ नमोऽहते परमात्मने परमाप्ताय परमकारुणिकाय सुगताय तथागताय महाहमाय हमराजाय महामवाय महा- शिवाय महाबोधाय महामैत्राय सुनिश्चिताय विगतद्वन्द्वाय गुणान्धये लोकनाधाय जितमारपलाय । ५। ॐनमोऽहते सनातनाय उत्तमश्लोकाय मुकुन्दाय गोवि न्दाय विष्णवे जिष्णवे अनन्ताय अच्युताय श्रीपतये विश्वरूपाय हपीकेशाय जगनाथाय भूर्भुवस्स मुत्ताराय माननराय काल जराय धूपाय अजाय अनेयाय अजराय नचलाय अन्पयाय रिम अचिन्त्याय असर रेयाय आदिसरयाय मादिकेशवाय आदिशिवाय महागाणे परमशिवाय एकानेकान्तस्वर पिणे 104 भावाभावविवर्जिताय अस्तिनान्तिद्वयातीताय पुण्यपापविर- हिताय सुखदुःखविविक्ताय व्यक्ताव्यक्तस्वर-पाय अनादि- मध्यनिधनाय नमोऽस्तु मुक्तीश्वराय मुक्तिस्वस्पाय । ६ । ॐ नमोऽहने निगतमाय नियाय निगलाय निम- याय निर्द्वन्द्वाय निस्तरसाय निरूमय निरामयाय निष्कलंकाय परमवताय सदाशिवाय महादेवाय शहराय महेश्वराय महावतिने महायोगिने महान्मने पञ्चमुखाय मृत्युञ्जयाय अष्टमूर्तये भूतनाथाय जगदानन्दाय जगत्पितामहाय जगद्दे- वाधिदेवाय जगदीश्वराय जगदादिकन्दाय जगदावते जगत्कर्मसाक्षिणे जगचक्षुपे प्रयीतनये अमृतकराय शीतक- राय ज्योतिश्चक्रचक्रिणे महाज्योतियोंतिताप महातमा(प.) पारे सुप्रतिष्ठिताय स्वयंकडे रवयंहा स्वयंपालकाय आत्मे- श्वराय नमो विश्वात्मने । ७। ॐ नमोऽहते सर्वदेवमयाय सर्वध्यानमयाय सर्वज्ञान- मयाय सर्वतेजोमयाय सर्वमंत्रमयाय सनरहस्यमयाय सर्व- भावाभावजीवजीवेश्वराय अरहस्यरहस्याय अस्पृहस्पृहणीयाय अचिन्त्यचिन्तनीयाय अकामकामधेनवे असङ्कल्पितकल्पद्रुमाय अचिन्त्यचिन्तामणये चतुर्दशरज्ज्यात्मकजीवलोकचूडामणये चतुरशीतिलक्षजीवयोनिप्राणिनाथाय पुरुषार्थनाथाय परमार्थ- नाथाय अनाथनाथाय जीवनाथाय देवदानवमानवसिद्धसे- नाधिनाथाय ।८।
105 - ॐ नमोऽर्हते निरञ्जनाय अनन्तकल्याणनिकेतनकीत- ना(तिता)य सुगृहीतनामधेयाय (महिमामयाय) धीरोदात्तधी- रोद्धतधीरशान्तधीरललितपुरुषोत्तमपुण्यश्लोकशतसहस्रलक्षको टिनन्दितपादारविन्दाय सर्वगताय । ९ । ॐ नमोऽहते सर्वममर्थाय सर्वप्रदाय सर्वहिताय मर्वाधिनाथाय कस्मैचन क्षेत्राय पापाय तीर्थाय पानाय परिवाय अनुत्तराय उत्तराय योगाचार्याय सप्रक्षालनाय अपराय आग्रेयाय नाचस्पतये माङ्गल्याय सर्वात्मनीनाय सर्ग- र्थाय अमृताय मदोदिताय ब्रह्मचारिणे तायिने दक्षिणीयाय निर्विकाराय वर्षभनाराचमूर्चये तत्चदर्शिने पारदर्शिने परम- दर्शिने निरुपमज्ञानपलवीर्यतेज शक्त्यैश्वर्यमयाय आदिपुरुषाय आदिपरमेष्टिने आदिमहेशाय महाज्योतिःस(स्त)चाय महा- चिनेश्वराय महामोहसहारिणे महामचाय महाजामहेन्द्राय महालयाय महाशान्ताय महायोगीन्द्राय अयोगिने महामही- यसे महाहसाय हसराजाय महासिद्धाय शिवमचलमरुजम- नन्तमक्षयमव्यायाधमपुनरागृत्तिमहानन्द महोदय सर्वदुःख- क्षय कैवल्य अमृत निर्माणमक्षर परसाम निःश्रेयसमपुनर्भव सिद्धिगविनामधेय स्थान सप्राप्तवते चराचर अरते नमोऽस्तु श्रीमहावीराय निजगत्स्वामिने श्रीवर्धमानाय । १०। ॐ नमोऽहते कैलिने परमयोगिने (भक्तिमार्गयोगिने) विशालशामनाय सनलन्धिसम्पन्नाप निर्विकल्पाय कल्पना- 9 106 तीताय कलाकलापकलिताय विरफुरदुरुशुक्लध्यानाग्निनिर्दग्ध- कर्मवीजाय प्राप्तानन्तचतुष्टयाय सौम्याय शान्ताय मङ्गल- वरदाय अष्टादादोपरहिताय संसृतविश्वसमीहिताय स्वाहा ॐ हाँ श्री अहं नमः । ११ । लोकोत्तमो निप्प्रतिमस्त्वमेव, त्वं शाश्वतं मङ्गलमप्यधीश! । त्वामेकमहन् शरणं, प्रपये, सिद्धर्पिसद्धर्ममयस्त्वमेव ॥१॥ त्वं मे माता पिता नेता, देवो धो गुरुः परः । प्राणाः स्वर्गोऽपवर्गश्च, तत्यं सत्वं गतिर्मतिः ॥ २ ॥ जिनो दाता जिनो भोक्ता, जिनः सर्वमिदं जगत् । जिनो जयति सर्वत्र, यो जिनः सोऽहमेव च ॥३॥ यत्किचित् कुर्महे देव !, सदा सुकृतदुष्कृतम् । तन्मे निजपदस्थस्य, हुं क्षः क्षपय त्वं जिन! ॥४॥ गुह्यातिगुह्यगोप्ता त्वं, गृहाणास्मत्कृतं जपम् । सिद्धिः श्रयति मां येन, त्वत्प्रसादाचयि स्थितम् ॥५॥ इति श्री वर्धमानजिननाममन्त्रं स्तोत्रं ।। इति शक्रस्तवः ॥ प्रतिष्ठायां शान्तिकविधौ पठितं महासुखाय स्यात् । १ इतीमं पूर्वोक्तमिन्द्रस्तवैकादशमन्त्रराजोपनिषद्गर्म अष्ट- महासिद्धिप्रदं सर्वपापनिवारणं सर्वपुण्यकारणं सर्वदोपहरं सर्वगुणाकरं महाप्रभावं अनेकसम्यग्दृष्टिभद्रकदेवताशत- सहस्रशुश्रूपितं भवान्तरकृतासंख्यपुण्यप्राप्यं सम्यग् जपतां - 107 पठतागुणयता शृण्यता समनुप्रेक्षमाणाना भव्यजीवानां चराचरेऽपि (जीरलोके) सद्वस्तु तन्नास्ति यत् करतलप्रणयि न भवतीति । किं च- २ इतीम पूोक्तमिन्द्रस्तकादशमन्त्रराजोपनिपदभ हत्यादि यात्सम्यगजपतां भव्यजीनाना भननपति व्यन्तर ज्यो तिष्क वैमानिकमासिनो देवाः सदा प्रसीदन्ति । व्याधयो चिलीयन्ते । ३ इतीम० भव्यजीनाना पृथिव्यप्तेजोवायुगगनानि भन- न्त्यनुलानि । ४ इतीम० भव्यजीवानांसर्गसंपदा मूल जायते जिना- नुरागः। ५ इतीम० भव्यजीनाना साधवः सौमनस्येनानुग्रहपरा जायन्ते । ६ इतीम० भन्यजीपानां खलाः क्षीयन्ते । ७ इतीम० भन्यजीवाना जल-स्थल-गगनचराः क्रूरजन्त- चोऽपि मैत्रीमया जायन्ते । ८ इतीम० भन्यजीवाना अघमवस्तृन्यपि उत्तमवस्तुभाव प्रपद्यन्ते । ९ इतीम० भव्यजीनाना धर्मार्थकामा गुणाभिरामा जायन्ते। १० इतीमा भव्यजीवाना ऐहिक्यः सर्ग अपि शुद्धगोत्र- 108 - कलत्र-पुत्र-मित्र-धन-धान्य-जीवित-यौवन-रूपा- ऽऽरोग्य-यशःपुरस्सराः सर्वजनानां संपदः परभागजी- वितशालिन्यः सदुदर्काः सुसंमुखीभवन्ति । किंबहुना ? ११ इतीमं० भव्यजीवानांआमुधिमक्यः सर्वमहिमास्वर्गाप- वर्गश्रियोऽपि क्रमेण यथेष्टं(च्छं) स्वयं स्वयंवरणोत्सव- समुत्सुका भवन्तीति । सिद्धिः(द्धः) श्रेयःसमुदयः(दायः । यथेन्द्रेण प्रसन्नेन, समादिष्टोऽहतां स्तवः । तथाऽयं सिद्धसेनेन, प्रपेदे(लिलिखे) संपदां पदम् ॥१॥ इति श्रीसिद्धसेनदिवाकरकृतः शकस्तव.॥
109 ॥ श्रीजिनप्रभसूरिप्रणीत ॥ श्रीगौतमस्वामिस्तोत्रम् मगर्मित ॐ नमस्त्रिजगन्नेतर्वीरस्याग्रिमसूनवे । समग्रलब्धिमाणिक्यरोहणायेन्द्रभूतये ॥१॥ पादाम्भोज भगवतो गौतमस्य नमस्यताम् । चशीभवन्ति त्रैलोक्यसम्पदो विगतापदः ॥२॥ तव सिद्धस्य युद्धस्य पादाम्भोजरज' कणः । पिपत्ति कल्पशाखीर कामितानि तनूभृताम् ॥३॥ श्रीगौतमाऽक्षीणमहानसस्य तव कीर्तनात् । सुवर्णपुष्पा पृथिवीमुचिनोति नरश्विरम् ॥४॥ अतिशेषतरां धाम्ना भगवन् भास्करी श्रियम् । अतिसौम्यतया चान्द्रीमहो ते भीमकान्तता ॥५॥ विजित्य ससारमायाचीज मोहमहीपतिम् । नरः स्यान्मुक्तिराज्यश्रीनायकस्त्वत्प्रसादतः ॥६॥ द्वादशागीनिधौ वेधाः श्रीन्द्रादिसुरसेवितः । अगण्यपुण्यनैपुण्य तेषा साक्षात्कृतोऽसि यैः ॥७॥ नमः स्वाहापतिवयोतिस्तिरस्कारितनुत्विपे । श्रीगौतमगुरो ! तुम्य वागीशाय महात्मने ॥८॥ इति श्रीगौतम! स्तोत्र-मन्त्र ते स्मरतोऽन्यहम् । श्रीजिनप्रभसूरेस्त्व भर मर्वार्थसिद्धये ॥ ९॥ मत्र ॐ नमोभगवतो गौतमस्य सिद्धस्य युद्धस्य अक्षीणमहान- सस्य भगवन् भास्करी श्रियम् ह्रीं नम स्वाहा
110
श्रीवीरजिनस्तवनम्
जय श्रीसर्वसिद्धार्थ ! सिद्धार्थनृपनन्दन! ।
सुमेरुधीर! गम्भीर! महावीर ! जिनेवर! ॥१॥
योऽप्रमेयप्रमाणोऽपि सप्तहस्तप्रमो मितः ।
पूर्णेन्दुवर्ण्यवर्णोऽपि स्वर्णवर्णसवर्णका
॥ २ ॥
सदृशं कौशिके शके सपै च क्रमसंस्पृशि ।
पीयूपवृष्टिसृष्टया यं दृष्ट्या दिष्टया विदुर्बुधाः ॥ ३ ॥
विष्टपत्रितयोत्सगरणदत्तुङ्गकीर्तिना।
सनाथं येन नाथेन विश्वं विश्वम्भरातलम्
॥४॥
यस्मै चक्रे नमः सेवाहेत्राकोत्सुकमानसैः ।
वीराय गतवैराय मामासुरेश्वरैः
॥ ५॥
यस्माद् द्वेषादयो दोपाः क्षिप्रं क्षीणाः क्षमाखने।
दोपा पूपमयूखेभ्य इव यक्षलक्षणात् ॥६॥
यद्देहयुतिसन्दोहसन्देहितवपुर्दधौ ।
रविः खद्योतपोतद्युत्याडम्बरविडम्बनाम् ॥७॥
भविनां यत्र चित्तस्थे रयु/(श्री)वृद्धिसिद्धयः ।
त वर्द्धमानमानौमि वर्द्धमानसुभावनः
॥ ८॥
इति स्ते स्तवं पठति वीर! जिनचन्द्र ! जातरोमाञ्चः।
यात्यपवर्ग स द्रुतमखर्वगर्वारिवर्गजयी ॥९॥
11 ॥ जिन सहस्त्रनामलघु स्तोत्रम् ॥ नमस्त्रिलोकनाथाय, सर्वज्ञाय महात्मने । चक्षे तस्यैन नामानि, मोक्षसौख्यामिलापया ॥१॥ निर्मल साचतो शुद्धः, निर्विकल्पो निरामयः । निशिरीरो निरातकः, सिद्धः सुक्ष्मो निरजनः ॥२॥ निष्कलको निरालयो, निर्मोही निर्मलोत्तमः । निर्भयो निरहकारो, निर्विकारोथ निष्क्रियः ॥ ३ ॥ निदोषो निरुजः शान्तो निर्भयो निर्ममा शिवः। निस्तरगो निराकारो, निष्फर्मों निष्फलप्रभुः ॥ ४ ॥ निर्मादो निरुपज्ञान:, निरागो निरघो जिनः । निःशब्दः प्रतिमश्रेष्ठ, उत्कृष्टो ज्ञान-गोचर. ॥५॥ निःसगः प्राप्तकाल्यो, नैष्टिकः शब्दवर्जितः । अनिंद्यो महापूतात्मा, जगत शिखरशेखरः ॥६॥ निःशब्दो गुणसपन्नः, पाप ताप प्रणाशनः । सोपि योगात् शुभ प्राप्त कर्मयोतिरलापहः ॥७॥ अजरो अमरः सिद्ध , अचितः अक्षयो विभुः । अमृतॊ अच्युतो ब्रह्मा, विष्णुरीशः प्रजापतिः ॥८॥ अनिद्यो विश्वनाथश्व, अजो अनुपमो भगः । अप्रमेयो जगन्नाथो चोधरूपो जिनात्मक ॥९॥ अव्यय सकलाराध्यो, निप्पन्नो ज्ञानलोचनः। अछेद्यो निर्मलो नित्यः सर्वशल्यविवर्जितः ॥१०॥ . .
112
.
अजेयः सर्वतोभद्रो निष्कपायो भवांतकः ।
विश्वनाथः स्वयंयुद्धो वीतरागो जिनम्बरः ॥११
अशंकः सहजानंदः अबाडमानस गोचरः ।
असाध्यः शुद्धचैतन्यः, कर्मनोकमवर्जितः ॥ १२ ॥
अनंतो विमलः ज्ञानी, निस्पृहीय निष्प्रकोपकः ।
काजितो महात्मानः, लोकत्रयशिरोमणिः ॥ १३ ॥
अव्याबाधो वरः शंभु, विश्ववेदी पितामहः ।
सर्वभूतहितो देवः, सर्वलोकगरण्यकः ॥ १४ ॥
आनन्दरूपचैतन्यो, भगवांस्त्रिजगद्गुरुः ।
अनंतानंतधीगक्तिः, सत्यव्यक्तव्ययात्मकः ॥१५॥
अष्टकर्मविनिर्मुक्तः, सप्तधातु विविर्जितः ।
गौरवादित्रयाद्दुरः सर्वज्ञानादि संयुतः ॥ १६॥
अभयः प्राप्तकैवल्यो निर्माणो निरपेक्षकः ।
निष्कलं केवलज्ञानी, मुक्तिसौख्यप्रदायकः ॥१७॥
अनामयो महाराध्यो, वरदो ज्ञानपावकः ।
सर्वेशः सत्सुखावासः, जिनेंद्रो मुनिसंस्तुतः ॥ १८ ॥
अन्युनः परमज्ञानी, विश्वतत्वप्रकाशकः ।
प्रबुद्धो भगवान्नाथः, पुस्तुतः पुण्यकारक: ॥ १९॥
शंकरः सुगतो रौद्रः, सर्वज्ञो मदनांतकः ।
ईश्वरो भुवनाधीशः, सचितः पुरुषोत्तमः ॥ २०॥
113 सद्योजातमहात्मान, विमुक्तो मुक्तिवल्लभः । योगींद्रोऽनादि ससिद्धः, निरीहो ज्ञानगोचर ॥२१॥ सदाशिवः चतुर्वक्त्रा सत्सौख्यस्त्रिपुरातकः । त्रिनेत्रः निजगत्पूज्यः, कल्याणकोष्ठमतिकः ॥ २२ ॥ सर्वसाधुजनैन्या, सर्वपापविनर्जितः । सर्वदेवाधिदेवश्वः, सर्वभूतहितकरः ॥२३॥ स्वयविद्यो महात्मान, प्रसिद्धः पापनाशनः । तनुमानश्चिदानदः, चैतन्यश्चैत्यवैभवः ॥ २४ ॥ सकलातिशयो देवः मुक्तिस्थो महतामहः । मुक्तिकार्याय सतुष्टो, निरागः परमेश्वरः ॥ २५ ॥ महादेवो महावीरो, महामोहविनाशकः । महाभागो महादर्श., महामुक्तिप्रदायक' ॥२६॥ महाज्ञानी महायोगी। महातपो महात्मकः । महर्दिको महावीर्यो, महांतिकपदस्थितः ॥ २७॥ महापूज्यो महावद्यो, महाविन-विनाशकः । महासौख्यो महापुसो। महामहिमो अच्युतः ॥२८॥ मुक्तामुक्तिजसबोधः, एकानेकविनिश्चलः। सर्वनधविनिर्मुक्तः सर्वलोकप्रधानका ॥ २९ ॥ महाशूरो महाधीरो, महादुःखविनाशकः । महामक्तिप्रदो धीरो, महाहृयो महागुरुः ॥३०॥ निर्मारो मारविघ्नसी, निष्कामो विषयाच्युतः। भगवतोमहाशातो शान्तिकल्याणकारकः ॥३१ .
116 प्रभो! त्वत्पादयोनित्य--मरुणामरुणोदये। स्पृशन्न स्पृश्यते नाथ!, पानपातकः ॥ १० ॥ त्वत्पादनखचन्द्राणां, ज्योत्सया लपिता विभो!। प्रणन्तारः प्रगे भान्ति, मृतपुण्योज्ज्यला इव किं गुणैः किं कुलेनापि, कि रूपेण किमाजया ? | किं विमो! विभवेनापि, न चेन्नित्यं त्वमीक्ष्यसे ? ॥१२॥ एतत्प्रभातकुलकं पुलकं दधानो, यस्ते निशान्तमुपगम्य निशान्त एव । स्वामिन् ! पठेत त्रिदिवासमुपास्य पश्चा- चन्द्रप्रभामलमुपैति पदं स मुक्तः ॥ १३ ॥ श्री चन्द्रप्रभसूरि विरचितं साधारण जिनस्तवन समाप्त 117 अद्याष्टकस्तोत्रम् wwwo- 1 ॥२॥ अद्य में सफल जन्म, नेने च सफले मम । त्यामद्राक्ष यतो देव, हेतुमक्षयसम्पदा ॥१॥ मद्य ससारगभीरपारावारः सुदुस्तरः सुतरोऽय क्षणेनैव जिनेन्द्र तर दर्शनाद अद्य मे क्षालितगान नेत्रे च विमले कृते । स्नातोह धर्म तीर्थेषु जिनेन्द्र तर दर्शनात् ॥३॥ अद्य मे सफल जन्म प्रशस्त सर्वमङ्गलम् । ससारार्णवतीर्णोऽह जिनेन्द्र तव दर्शनात् ॥४॥ अद्यकर्माएकज्वाल विधूत सकपायकम् । दुर्गतेपिनिवृत्तोऽह जिनेन्द्र तर दर्शनात् ॥५॥ अद्य सौम्या गृहाः सर्वाःशुभाथैकादशास्थिताः । नष्टानि विघ्नजालानि जिनेन्द्र तव दर्शनात् ॥६॥ अद्य नष्टो महावन्धः कर्मणा दुःखदायकः। सुखसग समापनो जिनेन्द्र तव दर्शनाद ॥७॥ अद्य कर्माप्टक नष्ट दुःखोत्पादनकारकम् । सुखाम्भोधिनिमग्नोऽहजिनेन्द्र तव दर्शनात् ॥८॥ अद्य मिथ्यान्धकारस्य हन्ता ज्ञान दिवाकरः । उदितो मच्छरीरेऽसिन् जिनेन्द्र तव दर्शनाद ॥९॥. ।
118 अचाहं सुकृती भूतो निघृताशेपकल्मपः । भुवनत्रयपूज्योहं जिनेन्द्र तब दर्शनाद ॥ १० ॥ चिदानन्देकरूपाय जिनाय परमात्मने । परमात्माप्रकाशाय नित्यं सिद्धात्मने नमः ॥ ११ ॥ अन्यथाशरणं नास्ति त्वमेवशरणं मम । तस्मात्कारुण्य भावेन रक्ष रक्ष जिनेश्वर ॥ १२ ॥ नहि त्राता न हि त्राता नहि त्राता जगत्त्रये । वीतरागात्परो देवो न भूतो न भविष्यति ॥ १३ ॥ जिने भक्तिर्जिने भक्तिर्जिने भक्ति दिने दिने । सदामेऽस्तु सदामेऽस्तु सदामेऽतु भवे भवे ॥१४॥ जिनधर्मविनिर्मुक्त मा भवचक्रवर्त्यपि । स्याश्चेटोऽपि दरिद्रोपि जिनधर्मानुवासितः ॥ १५ ॥ .
119 श्रीजिन सहस्र नामस्तोत्रम् । प्रमिद्धाष्टसहस्रद्धलक्षण त्या गिरा पतिम् । नाम्नामष्टसहस्रेणतोष्टुमोऽभीष्टमिद्धये श्रीमान्सयभूर्षुपम शमनः शभुरात्मभूः । स्मयप्रभः प्रभुर्भोक्ता विश्वभरपुनर्भव. ॥२॥ निश्वात्मा विश्व लोकेशो विश्वतश्चक्षुरक्षरः । विश्वविद्विश्वविद्येशों विश्वयोनिरनीश्वरः विश्वपश्वा निभुर्धाता विश्वेशोविश्नलोचनः । विशव्यापी निधिधाः शाश्वती विश्वतोमुखः ॥४॥ विश्वकर्मा जगज्ज्येष्ठो विश्वमृतिजिनेश्वरः । विश्वग्विश्व भूतेशो विश्वज्योति रनीधरः ॥५॥ जिनो जिष्णु रमेयात्मा निश्वरीशोजगत्पतिः। अनन्तचिदचिन्त्यात्मा भव्यगन्धुरवन्धनः युगादिपुरुपो ब्रह्मा पञ्चग्रह्ममयः शिवः । परम्परतरः सूक्ष्मः परमेष्ठी सनातनः ॥७॥ स्वय ज्योतिरजोऽजन्मा प्रायोनिरयोनिज । मोहारिविजयी जेताधर्मचक्री दयाध्वजः ॥८॥ प्रशान्तारिरनन्तात्मा योगी योगीश्चराचिंतः । ब्रह्मविद्वातत्वज्ञो ब्रह्मोद्याविद्यतीवर.
120
सिद्धो बुद्धः प्रबुद्धात्मा सिद्धार्थः सिद्धशासनः ।
सिद्धः सिद्धांत विद्धयः सिद्धसाध्योजगद्वितः ॥१०॥
सहिष्णुरच्युतोऽनन्तः प्रभविष्णुभवोद्भवः ।
प्रभूष्णु रजरोऽजयों भ्राजिष्णुर्थीश्वरोऽव्ययः ॥११॥
विभावसुरसंभृष्णुः स्वयंभृष्णुः पुरातनः ।
परमात्मा परंज्योतित्रिजगत्परमेश्वरः
॥ १२ ॥
इतिश्री मदादि शतम् ॥१॥
दिव्यभापापतिर्दिव्यः पूतवाक्पूतशासनः ।
पूतात्मा परमज्योतिर्धर्माध्यक्षो दमीश्वरः
॥ १॥
श्रीपतिभगवानहन्नरजा विरजाः शुचिः।
तीर्थकृत्केवलीशानः पूजाहः स्नातकोऽमलः ॥२॥
अनन्त दीप्तिर्ज्ञानात्मास्वयं बुद्धः प्रजापतिः।
मुक्ताशक्तो निरावाघो निष्कलो भुवनेश्वरः ॥३॥
निरजनो जगज्ज्योतिनिरुक्तोक्तिनिरामयः ।
अचलस्थितिरक्षोभ्यः कूटस्थः स्थाणु रक्षयः ॥४॥
अग्रणी मणीनेता प्रणेता न्यायशास्त्रकृत् ।
शास्ता धर्मपतिर्धर्योधर्मात्मा धर्मतीर्थकृत
वृषध्वजो वृषाधीपो वृषकेतुर्वृषायुधः ।
वृषो वृपपतिर्भर्ता वृषभाको वृपोद्भवः
हिरण्यनाभिभूतात्मा भूतभृद्भूतभावनः ।
प्रभवो विभवो भास्वान् भवो भावो भवान्तकः ॥७॥
121 - हिरण्यगर्भः श्रीगर्भः प्रभूतविभवोद्भवः । स्वयप्रभु प्रभूतात्मा भूतानाथो जगत्प्रभु सर्वादिः सर्वदृक् सानः सर्वज्ञ. मदर्शनः । सर्वात्मा सर्वलोकेशः मरित् सर्वलोफजित् ॥९॥ सुगतिः सुश्रुतः सुश्रुक् सूरि बहुश्रुतः । पिश्रुतो विश्वतः पादो विश्वशीर्प शुचिना ॥१०॥ सहस्रशीर्षः क्षेत्रजः सहस्राम सहस्रपात् । भूत भव्यभवद्भर्ता विश्वविद्यामहेश्वरः इति दिव्यादिशतम् ॥२॥ स्थनिष्ठ स्थपिरो ज्येष्ठ पुष्ठः पृष्ठो वरिष्ठधीः । स्येप्टो गरिष्ठो पहिष्ठः श्रेष्ठो निष्ठो गरिष्ठगी• ॥१॥ विश्वभृद्विश्वसृह विश्भेट् विश्वभुविधनायक। विश्वाशीनिश्वरूपात्मा विश्वजिद्विजितान्तकः ॥२॥ विभवो विभयो वीरो पिशोको विजरोजरन् । निरागो पिरतोमनो विविक्तो वीतमत्सरः ॥३॥ विनेयजनताबन्धु विलीनाशेपफल्मप. । नियोगो योगविद्विद्वान्विधाता सुनिधिः मुधी ॥४॥ क्षान्तिमाक्पृथिवीमूर्ति. शान्तिभाश्मलिलात्मक । पायुमूर्तिरमगात्मा यतिमूर्तिरधर्मभृक् सुयज्वा यजमानात्मा सुत्ता सुत्रामपूजितः । ऋत्तिग्यज्ञपतियज्ञो यज्ञाङ्गममृत हरिः ॥६॥ 10 122 व्योममूर्तिरमूर्तात्मा निलंपो निर्मलोऽचलः । सोममूर्तिः सुसौम्यात्मा सूर्यमृतिमहाप्रभः ॥७॥ मन्त्रविन्मन्त्रकृन्मन्त्री मन्त्रमूर्तिरनन्तकः । स्वतन्त्रस्तन्त्रकृत्स्वान्तः कृतान्तान्तः कृतान्तकृत् ॥८॥ कृती कृतार्थः सत्कृत्यः कृतकृत्यः कृतक्रतुः । नित्यो मृत्युंजयोमृत्युरमृतात्मामृतोद्भवः ॥ ९॥ ब्रह्मनिष्ठः परब्रह्म ब्रह्मात्मा ब्रह्मसम्भवः । महाब्रह्मपतिर्बलेट महाब्रह्मपदेश्वरः ॥ १० ॥ सुप्रसन्नः प्रसन्नात्मा ज्ञानधर्म दमप्रभुः । प्रशमात्मा प्रशांतात्मा पुराणपुरुषोत्तमः ॥ ११ ॥ इति स्थविष्टादिशतम् ॥३॥ महाशोकध्वजोशोकः कः स्रष्टा पद्मविष्टरः । पद्मशः पद्मसम्भृतिः पद्मनाभिरनुत्तरः ॥१॥ पद्मयोनिर्जगद्योनिरित्यः स्तुत्यः स्तुतीश्वरः । स्तवना) हषीकेशो जितजेयः कृतक्रियः ॥२॥ गणाधिपो गणज्येष्ठो गण्यः पुण्योगणाग्रणी। गुणाकारो गुणाम्भोधि र्गुणज्ञो गुणनायकः ॥३॥ गुणादरी गुणोच्छेदीनिर्गुणः पुण्यगीर्गुणः । शरण्यः पुण्यवाक्पूतो वरेण्यः पुण्यनायकः ॥४॥ अगण्यः पुण्यधीगण्यः पुण्यकृत्पुण्यशासनः । धर्मारामो गुणग्रामः पुण्यापुण्य निरोधका
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अतीन्द्रोऽतीन्द्रियो धीन्द्रो महेन्द्रोऽतीन्द्रियार्थदृक् ।
अनीन्द्रियोऽहमिन्द्राच्यों महेन्द्रमहितो महान् ॥ ५ ॥
उद्भयः कारणं कर्ता पारगो भवतारकः ।
अगायो गहनो गुद्यः परायः परमेश्वरः
अनन्तद्धिरमेयद्धि रचिन्त्यद्धि समग्रद्धिः ।
ग्राम्ह्यः प्राग्रहरोऽभ्यन्ह्यः प्रत्यग्रोऽग्रयोग्रिमोग्रजः ॥७॥
महातपा महातेजामहोदकों महोदयः।
महायशो महाधामा महासत्वो महाधृतिः ॥ ८॥
सहाधैर्यो महावीर्यो महासम्पन्महाबलः ।
महाशक्तिमहाज्योतिर्महाभूतिर्महाद्युतिः ॥९॥
महामतिर्महानीतिमहाक्षांतिमहोदयः ।
महाप्राज्ञो महाभागो महानदो महाकविः ॥१०॥
महामहा महाकीर्तिमहाकांतिर्महावपुः ।
महादानो महाज्ञानो महायोगो महागुणः ॥ ११ ॥
महामहपतिः प्राप्तमहाकल्याणपंचकः ।
महाप्रभुमहापातिहार्याधीशो महेश्वरः
॥ १२ ॥
इति श्रीवृक्षादिशतम् ॥५॥
महामुनिमहामौनी महाध्यानी महादमः ।
महाक्षमो महाशीलो महायज्ञो महामख: ॥१॥
महाव्रतपतिर्मह्यो महाकांतिधरोधिपः ।
महामैत्री महामेयो महापायो महोदयः
॥२॥
125
महाकारुण्यको मता महामो महायति।
महानादो महाघोपी महेन्यो महमापतिः
महाघरघरो धुर्यों महौदार्यो मद्दिष्ठयार ।
महात्मा महामाधाम महर्पिमहितोदयः
महाक्लेशांकुशः शूरो महाभूतपतिर्गुरुः ।
महापराक्रमोऽनतो महामोधरिपुर्वशी
महाभवाब्धिसतारि महामोहाद्रि सूदनः ।
महागुणाकरः क्षातो महायोगीश्वरः शमी
॥६॥
महाध्यानपतिर्ध्याता महाधर्मा महात्रता ।
महाकारिहात्मनो महादेवो महेशिता ॥७॥
सर्वक्लेशापहः माधुः सर्वदोपहरो हरः ।
असरयेयोऽप्रमेयात्मा शमात्मा प्रगमाकरः ॥८॥
सर्वयोगीश्वरोऽचिन्त्यः श्रुतात्मा विष्टरश्रया ।
दान्तारमा दमतीर्थेशो योगात्मा ज्ञानसर्नगः ॥९॥
प्रधानमात्मा प्रकृतिः परमः परमोदय ।
प्रक्षीणवन्धः कामारि क्षेमकृत्क्षेमशामनः ॥१०॥
प्रणरः प्रणयः प्राणः प्रणादः प्रणतेश्वरः ।
प्रमाण प्रणिधिदक्षो दक्षिणोधयुरपरः ॥११॥
आनन्दोनन्दनो नन्दो चन्योऽनियोऽभिनन्दनः ।
कामहा काम्यकामधेनुररिंजयः ॥
गुन्यादिशतम् ॥६॥
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असंस्कृतः सुसंस्कारः प्राकृतो वैकृतांतकृत् ।
अंतकृत्कांतगुः कांतश्चिन्तामणिरभीष्टदः
अजितो जितकामारिरमितोऽमितशासनः ।
जितक्रोधो जितामित्रो जितक्लेशो जितांतकः ॥ २ ॥
जिनेन्द्रः परमानन्दो मुनीन्द्रो दुन्दुभिस्वनः ।
महेन्द्रबन्यो योगीन्द्रो यतीन्द्रो नाभिनन्दनः ॥३॥
नामेयो नाभिजो जातः सुत्रतोमनुरुत्तमः ।
अभेद्योनत्ययोनवानधिकोऽधिगुरुः सुधीः ॥ ४ ॥
सुमेधा विक्रमी स्वामी दुराधर्षों निरुत्सुकः ।
विशिष्ठः शिष्ठभुक् शिष्टः प्रत्ययः कर्मणोऽनघः ॥ ५ ॥
क्षेमी क्षेमकरोऽक्षय्यः क्षेमधर्मपतिः क्षमी ।
अग्राह्योज्ञाननिग्राडो ध्यानगम्यो निरुत्तरः ॥ ६॥
सुकृती धातुरिज्याहः सुनयश्चतुराननः ।
श्रीनिवासश्चतुर्वक्त्रश्चतुरास्यश्चतुर्मुखः
॥ ७॥
सत्यात्मा सत्यविज्ञानः सत्यवाक्सत्यशासनः ।
सत्याशीः सत्यसन्धानः सत्यः सत्यपरायणः ॥८॥
स्थेयान्स्थवीयान्नेदीयान्दवीयान्दूरदर्शनः ।
अणोरणीयाननणुर्गुरुराधो गरीयसाम् ॥ ९॥
सदायोगः सदाभोगः सदातृप्तः सदाशिवः ।
सदागतिः सदासौख्यः सदाविद्याः सदोदयः ॥१०॥
127
सुघोपः सुमुख• सौम्य. सुसद सुहित. सुहृद ।
सुगुप्तागुप्तिभृद्गोप्ता लोकाध्यक्षो दमीश्वरः ॥११॥
इति अप्सस्कृतादिशम् ॥ ७ ॥
बृहन्वृहस्पतिग्मिी वाचस्पतिरुदारधीः ।
मनीपीधिपणो धीमान्छेमुशीपो गिरापविः ॥१॥
नैकरूपो नयस्तुङ्गो नैकात्मा नैकधर्मकृत् ।
अविज्ञेयोऽप्रतात्मा कतज्ञ कृतलक्षणः ॥२॥
ज्ञानगर्भो दयागर्भो रतगर्भ प्रभाम्परः ।
पद्मगों जगद्गर्भो हेमगर्म• सुदर्शनः ॥३॥
लक्ष्मीवा स्त्रिदशाऽध्यक्षोढियानिनि ईशिता ।
मनोहरो मनोज्ञाझो धीरो गभीरशासनः ॥४॥
धर्मयूपी दयायागो धर्मनेमिर्मुनीश्वरः ।
धर्मचक्रायुधो देवः कर्महा धर्मघोषणः
अमोघवागमोघाज्ञो निर्मलोऽमोघशासनः ।
सुरूपः सुभगस्त्यागी समयज्ञ. समाहित.
सुस्थितः सास्थ्यभास्वस्थो नीरजस्को निरुद्धयः ।
अलेपो निष्फलकात्मा वीतरागो गतस्पृहः ॥७॥
वश्येन्द्रियो विमुक्तात्मा निःसपत्नी जितेन्द्रियः ।
प्रशान्तोनन्तधामर्पिमैगल मलहानपः ॥८॥
अनीगुपमाभृत्तो दृष्टिदेवमगोचरः ।
अमूर्तो मूर्ति मानेको नैको नातैकतत्त्वदृक् ॥९॥
128
अध्यात्मगम्यो गस्यात्मा योगविद्योगिवन्दितः ।
सर्वत्रगः सदा भावी त्रिकालविषयार्थच्छ ॥ १० ॥
शंकरः शंवदो दान्तो दमी क्षान्तिपरायणः ।
अधिपः परमानन्दः परात्मज्ञः परात्परः 1॥ ११ ॥
त्रिजगहल्लभोऽस्यय॑स्त्रिजगन्मंगलोदयः ।
त्रिजगत्पतिपूतांतिस्वितोकानशिखामणिः ॥ १२ ॥
इति घृहदादिशतम् ॥ ८॥
त्रिकालदर्शी लोकेशो लोकधाता दृव्रतः ।
सर्वलोकातिगः पूज्यः सर्वलोकैकसारथिः
पुराणपुरुषः पूर्वः कृत्पूर्वांगविस्तरः ।
आदिदेवः पुराणाधः पुरुदेवोऽधिदेवता ॥ २ ॥
युगमुख्यो युगज्येष्ठो युगादिस्थितिदेशकः ।
कल्याणवर्णः कल्याणः कल्यः कल्याणलक्षणः ॥३॥
कल्याणप्रकृतिर्दीप्तः कल्याणात्मा विकल्मषः ।
विकलङ्काकलातीतःकलिलतःकलाधरः
॥४॥
देवदेवो जगन्नाथो जगद्वन्धुर्जगद्विभुः ।
जगद्धितैषी लोकझः सर्वगो जगदग्रजः ॥५॥
चराचरगुरुगोप्यो गूढात्मा गुदगोचरः ।
सद्योजातः प्रकाशात्मा ज्वलज्ज्वलनसप्रमः ॥६॥
आदित्यवर्णो भर्माभः सुप्रभः कनकप्रभः ।
सुवर्णवर्णों रुक्माभ सूर्यकोटिसमप्रभः ॥७॥
129 . तपनीयनिमस्तुङ्गो बालार्कामोऽनलप्रमः । सध्यान हेंमाभस्ततचामोकरच्छविः ॥८॥ निष्टप्स कनकच्छायः कनत्काञ्चनसनिमः । हिरण्यवर्णः सभ. शातकुम्भनिभप्रभा ॥ ९॥ घुम्नभाजातरूपाभो दीप्तजाम्मृनदद्यतिः । सुधौतकलधौतश्री.प्रदीप्तोहाटस्युति. शिष्टेटः पुष्टिदः पुष्ट. स्पट' स्पष्टा क्षरक्षमः । शत्रुघ्नो प्रतिघोऽमोध प्रशास्ता शासिता स्नभः।।११॥ शान्तिनिष्ठोमनिज्येष्ठ शिवतातिः शिरमदः । शान्तिदःशान्ति कृच्छान्ति. कातिमान्कामितप्रदः॥१२॥ श्रेयोनिधिरधिष्ठानमप्रतिष्ठः प्रतिष्ठित । सुस्थित स्थापरः स्थाणुः प्रथीयान्प्रथितः पृथुः ॥१३॥ इति निकाल दर्यादिशतम् ॥९॥ दिग्यासा वातरशनो निर्गन्येशी निरम्मत। निकिचनो निराशसो नानचक्षुरमोमुह तेजोराशिरनन्तौजा ज्ञानाधिः शीलसागरः । तेजोमयोऽमितज्योतिज्योतिर्मूर्तिस्तमोपहः जगन्चूड़ामणिर्दीप्त सचिमनिनायक । कलिमः कर्मशनुमो लोकालोकप्रकाशक अनिद्रालुरतन्द्रालुर्जागर' प्रभामयः । लक्ष्मीपति जैगज्ज्योतिधर्मराज प्रजाहितः
130
मुमुक्षुर्वन्धमोक्षज्ञो जिताक्षो जितमन्मथः ।
प्रशान्तरसशेलूपो भव्यपेटकनायक: ॥ ५॥
मृलकर्ताखिलज्योतिर्मलनो मूल कारणः ।
आप्तो वागीश्वरः श्रेयाञ्छ्यसोक्तिनिरुक्तवाक् ॥६॥
प्रवक्ता वचसामीशो मारजिद्विश्वभाववित् ।
सुतनुरतुननिर्मुक्तः सुगतो हतदुर्नयः ॥७॥
श्रीशः श्रीश्रितपादाब्जो वीतभीरभयंकरः ।
उत्सन्नदोपो निर्विघ्नो निश्चलो लोकवत्सलः ॥८॥
लोकोत्तरोलोकपतिलोकचक्षुरपारधीः ।
धीरधीवुद्धिसन्मार्गः शुद्धः सूनृत् पूतवाक्
॥९॥
प्रज्ञापारमितः प्राज्ञो यतिनियमितेन्द्रियः ।
भदन्तो भद्रकृद्भद्रः कल्पवृक्षोवरप्रदः ॥ १० ॥
समून्मूलितकर्मारिः कर्मकाष्टाशुशुक्षणिः ।
कर्मण्यः कर्मठः प्रांशुहेयादेयविचक्षणः ॥ ११ ॥
अनन्त शक्तिरच्छेद्यस्त्रिपुरारिस्त्रिलोचनः ।
त्रिनेत्रयम्बकस्यक्षः केवलज्ञानवीक्षणः ॥ १२ ॥
समन्तभद्रः शांतारिधर्माचार्यों दयानिधिः ।
सूक्ष्मदर्शी जितानङ्गः कृपालुर्धर्मदेशक
शुभंयुःसुखसाद्भूतः पुण्यराशिरनामयः ।
धर्मपालो जगत्पालो धर्मसाम्राज्यनायकः ॥१४॥
इति दिग्वासाद्यष्टोत्तरशतम् ॥ १० ॥
॥ १३ ॥
131
धाम्नांपते तपासूनी नामान्यागमकोपिदैः ।
ममुच्चितान्यनुध्यायन्पुमान्पूतस्कृतिभोद
गोचरोऽपि गिरामासा त्वगाग्गोचरो मतः ।
म्तोता तथाप्य सदिग्ध त्वत्तोऽभीष्टफलभवेद ॥२॥
त्वमतोमि जगद्वन्धुस्त्वमतोऽमि जगद्भिपा ।
त्वमतोऽसि जगद्धाता त्वमतोऽसि जगद्धितः ।। ३ ।।
त्वमेक जगता ज्योतिस्त्वद्विरूपोपयोगभाक् ।
त्व निस्पैकमुक्त्यग सोत्थानन्तचतुष्टयः ॥४॥
त्व पथब्रह्मतत्वात्मा पञ्चकल्याणनायकः ।
'पदभेदमानतत्यनस्त्व मप्तनयसग्रह'
दिव्याटगुणमूर्तिस्त्व नरकेललब्धिका ।
दशावतारनिर्धार्यो मा पाहि परमेश्वर ॥६॥
युष्मन्नामावलीब्धरिलमत्स्तोत्रमालया।
भवत परिसस्याम• प्रमीदानुगृहाण न.
इद स्तोत्रमनुस्मृत्य पूतोमनति त्राक्तिकः ।
यः सपाठ पठत्येनं स स्यात् कल्याणभाजनम् ॥८॥
ततः सदेद पुण्यार्थी पुमान्पठति पुण्यघीः ।
पौरुहूतीं श्रिय प्राप्तु परमाममिलापुक:
॥९॥
स्तुत्वेति मघवा देव चराचग्जगद्गुरुम् ।
ततस्तीनिहारस्य व्यधात्प्रस्तावनामिमाम् ॥१०॥
स्तुतिः पुण्यगुणोत्कीर्ति स्तोता मन्य प्रमनधीः ।
निष्ठितार्थोमवान्स्तुत्यः फल निश्रेयस सुखम् ॥११॥
132 यः स्तुत्यो जगतां त्रयस्य न पुनः स्तोता स्वयं कस्यचित् ध्येयो योगिजनस्य यश्चनितरां ध्याता स्वयं कस्यचित् । यो नेवनपि तेनमन्नतमलं नन्तव्यपक्षेक्षणः सश्रीमाजगतां त्रयस्य च गुरुदेवः पुतः पावनः॥१२॥ वं देवं त्रिदशाधिपार्चितपदं घातिक्षयानन्तरं प्रोत्थानन्तचतुष्टयं जिनमिमं भव्याब्जनीनामिनम् । *मानस्तम्भविलोकनानतजगन्मान्यं त्रिलोकी पति प्राप्ताचिन्त्यवहिविभूतिमनपं भक्त्या प्रवन्दामहे॥१३॥ ॥ इति भगवजिनलेनाचार्यविरचितादिपुराणान्तर्गतं जिनसहस्रनामस्तवनं समाप्तम् ।। *श्वेताम्बरीयागमनन्थेषु मानस्तम्भयर्णनं न दरीदृश्यते ये आशाम्बरीय ग्रन्थेभ्यः प्राचीनतमाः सन्ति ।
133
॥२॥
दृष्टाष्टकस्तोत्रम्
दृष्ट जिनेन्द्रभवन भवतापहरि
भव्यात्मना विभवसम्भवभूरि हेतुः ।
दुग्धाब्धिफेनधरलोज्ज्वलकूटकोटी-
नद्धधजप्रकारराजिविराजमानम्
दृष्ट जिनेन्द्र भवन भुवनैकलक्ष्मी-
धामचिद्वितमहामुनिसेव्यमानम् ।
विद्याधरामर वधूजनमुक्तदिव्य-
पुप्पाञ्जलिप्रकरणोभितभूमिभागम्
दृष्ट जिनेन्द्र भवन भरनादिवास-
विख्यातनाकगणिकागणगीयमानम् ।
नानामणिप्रचयभासुररश्मिजाल-
व्यालीढनिर्मलविशालगनाक्षजालम्
दृष्ट जिनेन्द्र भनन सुरसिद्धयक्ष
गन्ध किन्नरकरार्पितवेणुवीणा।
सङ्गीतमिश्रितनमस्कृतधीरनाद
रापूरिताम्बरतलोरुदिगन्तरालम्
दृष्ट जिनेन्द्र भवन निलसद्विलोलमाला
कुलालिललितालकविभ्रमाणम् ।
माधुर्यवाघलयनृत्यग्लिासिनीनां
लीलाचलद्वलयनूपुरनादरम्यम्
॥३॥
॥४॥
134
॥६॥
॥७॥
दृष्टं जिनेन्द्र भवनं मणिरतहेम-
सारोज्ज्वलैः कलशचामरदर्पणाद्यैः ।
सन्मङ्गलैः सततमष्टशतप्रभेदै
विभाजितंत्रिमलमौक्तिकदामशोभम्
दृष्टं जिनेद्र भवनं वरदेवदारु-
कपुर्रचन्दनतरुष्कसुगन्धिधूपैः ।
मेघायमानगगने पवनाभिघात-
चंचल द्विमलकेतनतुङ्गशालम्
दृष्टं जिनेन्द्रभवनं धवलातपत्र-
च्छायानिममतनुयक्षकुमारवृन्दैः ।
दोधूयमानसितचामरपक्तिभासं
भामण्डलद्युतियुतप्रतिमाभिरामम्
दृष्टं जिनेन्द्रभवनं विविधप्रकार-
पुष्पोपहाररमणीयसुरत्नभूमि ।
नित्यं वसन्ततिलकश्रियमादधानं
सन्मङ्गलं सकलचन्द्रमुनीन्द्रवंद्यम्
दृष्टं मयाद्यमणि काश्चनचित्रतुङ्ग-
सिंहासनादिजिनविम्बविभूतियुक्तम् ।
चैत्यालयं यदतलं परिकीर्तितं मे
सन्मङ्गलंसकलचन्द्रमुनीन्द्रवन्यम्
॥ इति दृष्टाष्टकस्तोत्रं संपूर्णम् ॥
॥८॥
॥१०॥
135 सुप्रभातस्तोत्रम् (श्रीपरमात्मने नम) यत्स्वर्गातरोत्मवे यद भवजन्माभिषेकोत्सवे यद्दीक्षाग्रहणोत्सवे यदखिलज्ञानप्रकाशोत्सवे । यनिर्माणगमोत्सवे जिनपतेः पूजाद्भुत तद्भव सङ्गीतस्तुतिमङ्गलैः प्रसरता मे सुप्रभातोन्सवः ॥१॥ श्रीमन्नतामरकिरीटमणिप्रभाभि रालीदपादयुगदुर्घरकर्मदूर। श्रीनाभिनन्दनजिनाजितशम्भपाख्य ! त्वद्धधानतोऽस्तु सतत मम सुप्रभातम् ॥२॥ छात्रयप्रचलचामरवीज्यमान देवामि नन्दनमुने सुमते जिनेन्द्र । पद्मप्रभारुणमणि धुतिभासुराग व ॥३॥ अर्हन् सुपार्श्वकदलीदलपर्णगान प्रालेयतारगिरिमौक्तिकरण गौर । चन्द्रप्रभस्फटिकपाण्डर पुष्पदत्त त्व. ॥४॥ सतप्तकाश्चनरुचे जिन शीतलाख्य श्रेयान्निनष्ट दुरिताटकलपक्ष। वधूपयधुररुचे निनवासुपूज्य त्व०
136
उद्दण्डदर्पकरिपो विमलामलांग
स्थेमन्ननन्तजिदनन्तसुखाम्बुराशे ।
दुष्कर्मकल्मपविवर्जित धर्मनाथ त्व. |॥६॥
देवामरीनुसुमसन्निभ शांतिनाथ
कुन्यो दयागुणविभूपणभूपितांग ।
देवाधिदेव भगवन्नरतीर्थनाथ त्व० ॥ ७॥
यन्मोहमल्लमदभजनमल्लिनाथ
क्षेमङ्करावितथशासनसुव्रताख्य।
यत्सम्पदा प्रशमितो नमिनामध्येय त्व०
॥८॥
तापिच्छगुच्छरुचिरोज्ज्वल नेमिनाथ
घोरोपसर्गविजयन् जिन पार्श्वनाथ ।
स्याद्वाद सूक्तिमणिदर्पणवर्द्धमान त्व० ॥ ९॥
प्रालेय नीलहरितारुणपीतभासं-
यन्मूर्तिमव्ययसुखावसथं मुनीन्द्राः ।
ध्यायन्ति सप्ततिशतं जिन वल्लभानां त्व० ॥१०॥
सुप्रभातं सुनक्षत्रं मांगल्यं परिकीर्तितम् ।
चतुर्विंशतितीर्थानां सुप्रभातं दिने दिने ॥ ११ ॥
सुप्रभातं सुनक्षत्रं श्रेयः प्रत्यभिनन्दितम् ।
देवता क्रपयः सिद्धाः सुप्रभातं दिने दिने ॥ १२ ॥
सुप्रभातं तवैकस्य वृषभस्य महात्मनः ।
येन प्रवर्तितं तीर्थ भव्यसत्त्वसुखावहम् ॥ १३ ॥
137 सुप्रभात जिनेन्द्राणा ज्ञानोन्मीलित चपाम् । अज्ञानतिमिरान्धाना नित्य मस्तमितो रविः ॥१४॥ सुप्रभात जिनेन्द्रस्य वीरः कमललोचनः । येन कर्माटवी दग्धा शुक्लध्यानोग्राहिना सुप्रभात सुनक्षत्र सुकल्याण सुमङ्गलम्। त्रैलोक्यहितकतणा जिनानामेन शासनम् ॥१६॥ ॥ इति सुप्रभातस्तोत्र समाप्तम् ॥
138
शांति पाठ।
दोधकवृत्तम्
शांतिजिनं शशिनिर्मलवक्त्रं शीलगुणाव्रतसंयमपात्रम् ।
अष्टशतार्चितलणगात्रं नौसि जिनोत्तममम्वुजनेत्रम् ॥१॥
पञ्चममीप्सितचक्रधराणां पूजितमिन्द्रिनरेन्द्रगणैश्च ।
शांतकरं गुणशांतिमभीप्सुः पोडशतीर्थकरं प्रणमामि ॥ २ ॥
दिव्यतरुः 'सुरपुष्प सुवृष्टिर्दुन्दुभिरासनयोजनघोपौ ।
आतपवारण चामरयुग्मे यस्य विभाति च मण्डलतेजः ॥३॥
तं जगदर्चितशांतिजिनेन्द्रं शांतिकरं शिरसा प्रणमामि ।
सर्वगणाय तुं यच्छतु शांति मह्यपरं पठते परमां च ॥४॥
येऽभ्यचिंता मुकुटकुब्डलहाररतैः
शक्रादिभिः सुरगणैः स्तुतपादपद्मा।
तेमेजिनाः प्रवरवंशजगत्प्रदीपा-
स्तीर्थकराः सततशांतिकाभवन्तु ॥ ५ ॥
संपूजकानां प्रतिपालकानां यतीन्द्रसमान्यतपोधनानाम् ।
देशस्य राष्ट्रस्य पुरस्य राज्ञः करोतु शांति भगवान् जिनेन्द्रः॥६॥
स्रग्धरावृत्तम्-
क्षेमं सर्वप्रजानां प्रभवतु चलवान धार्मिको भूमिपालः ।
काले काले च सम्यः वर्षतु मघवा व्याधयो यान्तु नाशम् ।।
दुर्भिक्षं चौरमारी क्षणमपि जगतां मस्मभूजीवलोके ।
जैनेन्द्रं धर्मचक्र प्रभवतु सततं सर्वसौख्यप्रदायि ॥७॥
139 प्रध्वस्तपातिकर्माणः केरलजानभास्करा । कुन्तु जगतः शातिं धूपमाद्या जिनेश्वरा ॥८॥ अथेट मायना। शास्त्राम्यासो जिनपतिनुतिमगति सर्वदार्यैः । सद्वृत्तानों गुणगणकथा दोपपाद च मौनम् ॥ सर्वस्यापि प्रियहितवचो भागना चात्मतत्वे । समपद्यन्ता मम भवभवे याव देतेऽपनगः ॥ ९ ॥ आर्यावृत्तम्- तर पाटो ममहृदये, मम हृदय तप पदवये लीनम् । तिष्ठतु जिनेन्द्र तारयावनिर्माणसम्पासि ॥ १० ॥ आर्या-- अक्सरपयत्यहीण मत्ताहीण च ज मये भणिय । त खमउणाणदेव यमज्झवि दु.क्खखय दिंतु ॥ ११॥ दुक्खखओ कम्मखओ समाहिमरण च वोहिलाहो य । मम होउ जगतवन्धवतव जिणार चरणशरणेण ॥ १२ ॥ -
140
अथ सकल तीर्थ नमस्कार ।।
(स्रग्धरा-वृत्तम् )
सद्भक्त्या देवलोके रविशशिभवने व्यंतराणां निकाये,
नक्षत्राणां निवासे ग्रहगणपटले तारकाणां विमाने ।
पाताले पन्नगेंद्रे स्फुटमणिकिरणे ध्वस्तसांद्रांधकारे,
श्रीमत्तीर्थकराणां प्रतिदिवसमह तत्र चैत्यानि वंदे ॥१॥
वैताठ्ये मेरुशृंगे रुचकगिरिवरे कुंडले हरितदंते,
वक्खारे कूटनंदीश्वरकनकगिरौ नैपधे नीलवंते ।
चैत्रे शैले विचित्रे यमकगिरिवरे चक्रवाले हिमाद्रौ, श्रीम० ॥
श्रीशैले विध्य,गे विमलगिरिवरे ह्यर्बुदे पावके वा,
सम्मेते तारके वा कुलगिरिशिखरेऽष्टापदे स्वर्णशैले ।
सह्याद्रौ वैजयंते विपुलगिरिवरे गुर्जरेरोहणाद्री, श्रीम० ॥३॥
आघाटे सेदपाटे क्षितितटमुकुटे चित्रकूटे, त्रिकुटे
लाटे नाटे च घाटे विटपि घनतटे हेमकूट विराटे ।
कर्णाटे हेमकूटे विकटतरकटे चक्रकूटे च भोटे, श्रीम० ॥४॥
श्रीमाले मालवे वा मलयिनि निपधे मेखलेपिच्छले वा,
नेपाले नाहले वा कुवलयतिलके सिंहले केरले वा ।
डाहाले कोशले वा विगलितसलिले जंगले वाढमाले,
श्री० ॥५॥
141 अगे बगे कलिंगे मुगतजनपदे सत्प्रयागे तिलगे, गौडे चौडे मुरडे वरतरद्रविडे उद्रियाणे च पौटे। आई माद्रे पुलिंद्रे द्रनिडकुवलये कान्यकुब्जे सुराष्ट्र, श्री०॥६॥ चपाया चद्रमुरया गजपुरमथुरापत्तने चोजयिन्या, कौशाच्या कोशलाया कनकपुरवरे देपगियां च काश्याम् । नासिक्ये राजगेहे दशपुरनगरे भदिले ताम्रलिप्त्या, श्री०॥७॥ सर्गमयेऽन्तरिक्ष गिरिशिखरहदै स्वर्णदीनीरतीरे, शैलाये नागलोके जलनिविपुलिने भूरुहाणा निकुजे । ग्रामेऽरण्ये बने ना स्थलजलरिपमे दुर्गमध्ये निसध्य, श्री० ॥८॥ श्रीमन्मेरी कुलाद्रौ रुचकनगारे शाल्मली जवृक्षे, चौञ्जन्ये चत्यनदे रतिक्ररुचके कोडले मानुषाके । इक्षुकारे जिनाद्रौ दधिमुखशिखरे व्यतरे स्वर्गलोके, ज्योतिलकि भवति त्रिभुवनरलवे यानि चत्यालयानि |॥९॥ इत्य श्रीजनचत्यस्तननमनुदिन ये पठति प्रजीणा, प्रोद्यत्क्ल्याणहेतु कलिमलहरण भक्तिभाजस्त्रिसध्यम् । तेषां श्रीतीर्थयात्राफलमतुलमल जायते माननाना, कार्याणा सिद्विन्य प्रमुदितमनमा चित्तमानदकारि ॥१०॥* * यह स्तोन दिगम्बर प्रन्योमें भी बहुत ममय मे प्रचार में है। ॥ अरहन मोक्षारापलिया।
142
॥ अहन्नमस्कारावलिका॥
(श्री महतोऽष्टोत्तरशतगुणवर्णनम् )
|| ओं श्रीवीतरागः ।।
नमो चउदसमहासुमिणसंसूइय अवयारकारगाणं अरिहंताणं ।।
नमो गभडियतियनाणसंजुत्ताणं अरिहंताणं ॥ २ ॥
नमो गभडियचउसहिदेविदसंथुआणं अरिहंताणं ॥३॥
नमो गमाहियमहाजोगमासीणं अरिहंताणं ॥ ४ ॥
नमो तेल्लोक-दिवायर-जम्सोदय-संपत्ताणं अरिहंताणं ॥ ५ ॥
नमो सव्व-जीव-सुहदायग-जम्मकल्लाणग-संपत्ताणं
अरिहंताणं ॥६॥
नमो छप्पन दिसाकुमारिकय सुइकम्माणं अरिहंताणं ॥७॥
नमो देविदकरसंप (पु) डसंठिआणं अरिहंताणं ॥८॥
नमो मेरुमत्थयठिअसिंहासण संनिविहाणं अरिहंताणं ॥ ९ ॥
नमो सवसुरासुरकयकुस (सु) मंजलिए संपूइआणं अरिहं-
ताणं ॥ १० ॥
नमो अट्ठसहस चउसहि पुण्णकलसखीरोदहिन्हविआणं
अरिहंताणं ॥११॥
नमो वरपडहमेरिझल्लरी देवदुंदुहि निनायपुव्वपूईआणं
अरिहंताणं ॥ १२ ॥
नमो मधमपंत वरगोसीसचंदण चचियाण अरिहंताणं ॥१३॥
143
नमो जलथलयदिपकुसुम महामहालइअकठाण अरिह
ताण ॥ १४ ॥
नमो पवरहारहार काडय कुडल मुउड मडिआण अरिह-
ताण ॥ १५ ॥
नमो यरवेणुवीणामुयगताल घुघरघुमघुमिअ कयनट्टविहीए
सपूइआण अरिहवाण ॥१६॥
नमो जयजयमद्द समुञ्चरिअसुरसमूहेण मायाभवणसमागयाण
अरिहताण ॥१७॥
नमो मधसठविय अगुठामयआहारकारगाण अग्हिताण ॥१८॥
नमो चम्मचक्खूणमदसिअकयाहार नीहाराण अरिहताण॥१९॥
नमो सेअमलरोगनिअसुहसि (मोरीर सपत्ताण अरिह-
ताण ॥ २० ॥
नमो गोक्खीरधाराधाल मसरुहिरधारगाण अरिहताण ॥२॥
नमो मदारपार(रि) जायकुसुमसजणिअसुरहिमामूसासाण
अरिहताण ॥ २२ ॥
नमो छत्त चामर पटाग जव जवलछि अकरचरणाण अरिह-
ताण ॥२३॥
नमो अबाहिअसहस्सेण लक्खणगणेण ससोहिआण अरिह-
ताण ॥२४॥
नमो देविदाइपचदेर गणाहिं कयाइकम्माण अरिह-
ताण ॥२५॥
144
नमो अवरावर सुरकुमारसमं संकीलगाणं अरिहंताणं ॥२६॥
नमो वालवणम्मि अबालभावाणं अरिहंताणं ॥ २७ ॥
नमो सव-कला-बिन्नाण-समूह पार-संपत्ताणं अरिहंताणं ॥२८॥
नमो तेलुकच्छरिअकारगरुवजुवणगुणसंपत्ताणं अरिहं-
ताणं ॥ २९॥
नमो गामायार परीसह विप्प मुकबाल भयारीणं अरिहं-
ताणं ॥ ३० ॥
नमो गामायार परीसह अहिआसगविवाहकंकणमंडिआणं
अरिहंताणं ॥ ३१॥
नमो पंचविहेसु माणुसभोगेसु अमुच्छिआणं अरिहंताणं ॥३२॥
नमो परमनीइए रजकरणेणं सव्वषयासुहदायगाणं अरिहं-
ताणं ॥३३॥
नमो विसुद्धसुहझवसायभावणा संपत्ताणं अरिहंताणं ॥३४॥
नमो सयमेव परमवरणसंपप्प सयंसंबुद्धाणं अरिहंताणं ॥३५॥
नमो अत्तिभरनमिरलोगतिआमरवंदिआणं अरिहंताणं ॥३६॥
नमो वरवरि आघोसपुव्वं संवच्छरिअदाणदायगाणं
अरिहंताणं ॥ ३७॥
नमो सव्वामरवईहिं कयदिक्खाभिसे आणं अरिहंताणं ॥३८॥
नमो सिबिया विमाणसंनिविठाणं अरिहंताणं ।। ३९ ॥
नमो असोअ पुन्नाग तिलय चंपयमंडिअवणसंडसंपत्ताणं
अरिहंताणं ॥ ४० ॥
145 नमो अहरसडपिसीहासणोपरिसठिआण परिहताण ||४|| नमो वरकडय डल हारहार मउड मालापिप्पमुकाण अरिहवाण ॥ ४२ ॥ नमो अजणद्यणमरिसाण केमाण पचमुहिए लोअकारगाण अरिहताण ॥ ४३ ॥ नमो लोगग्गमुगयसव्यसिद्वाण नमोकारकारगाण अरिहताण ॥४४॥ नमो सयमानअपानजोगपचरसाण कारगाण अरिहताण ॥ नमो नाण दसण चारित्तरयण मालामडिआण अरिहताण ॥ नमो विमल विउलमइ मणपजमनाणममुप्पन्नाण अरिहताण ॥ नमो मम(मि)इ गुत्तिगुणस्यण अलकिलाण जरिहताण ॥४८॥ नमो दमरिहममणधम्मस्म सधारगाण अरिहताण ॥४९ ।। नमो पुक्खरपत्तय निरुपलेनाण अरिहताण ॥ ५० ॥ नमो जीवोम अप्पडियाइ विहारारकारगाण अरिहताण ॥५१॥ नमो आयामुच्च निरासयगुण समोहिमाण अग्दिताण ||५२।। नमो अक्खलिय परणगुण ब्व अप्पडियद्वाण अरिहताण ॥५३॥ नमो सगोरि अगोवगम्मच गुत्तिदिआण जरिहताण ॥५४॥ नमो विहगमोच विप्पमुक्गुण सपत्ताण अरिहताण नमो वग्गिमिंग य एगग्गमानमुरगयाण अरिदवाण ॥५६॥ नमो मारड पविख च अप्पमत्ताण अरिहताण ॥ ५७॥ नमो लक्षणगुणोवेशपरमट्टच जाइयामाण अरिहताण ॥
146
नमो कुंजरोव्य सोंडीर गुणसंजुआणं अरिहंताणं ॥ ५९ ॥
नमो पंचाणणु व्य निभयाण अरिहंताणं ॥६० ॥
नमो सायरवरो व्य गंभीरियगुणमंडिआणं अरिहंताणं ॥६१।।
नमो संपुण्णसिसि (सस) हरं व्य सोमसहावाणं अरिहंताणं ॥
नमो गयणमंडणभाणु व्य दित्ततवतेआणं अरिहंताणं ।। ६३ ॥
नमो पुहवी व्य सव्वंसहगुण संजुआणं अरिहंताणं ॥६४ ॥
नमो सारथंबु व सच्छमणभावाणं अरिहंताण ॥६५॥
नमो गामागर नगर पट्टण मंडिय विसयेसु विहरमाणाणं
अरिहंताणं ॥ ६६ ॥
नमो बहुपुण्णोदयसंजुअभवियजणदारसंपत्ताणं अरिहंताणं ॥
नमो बायालीसदोसविरहियाहारगाहगाणं अरिहंताणं ॥ ६८॥
नमो छठहम दसम दुवालस मासद्ध मासखवणाइ तवकारगाणं
अरिहंताणं ॥ ६९ ॥
नमो वीरासणगाइ अणेगासण संठिआणं अरिहंताणं ॥ ७० ॥
नमो बावीस परीसह अहिआसगाणं अरिहंताण ॥ ७१ ॥
नमो बज्झभिंतर परिग्गहविप्पमुक्काणं अरिहंताणं ।। ७२ ॥
नमो महावणम्मि पडिमापडिवन्नाणं अरिहंताणं ॥ ७३ ॥
नमो विसुद्ध सुहधम्म सुक्कज्झाणसंपत्ताणं अरिहंताणं ॥७४॥
नमो खवगसेठीए संपत्ताणं अरिहंताणं
॥ ७५ ॥
नमो मोहमहामल्लखयकारगाणं अरिहंताणं ॥७६ ॥
नमो लोआलोअपयासगकेवलनाण संपत्ताणं अरिहंताणं ॥७७॥
147
नमो रुप्प सुमन रयणमय सालतय सठिाण अरिहताण ॥
नमो नमसुचनामलेसु पायसठावगाण अरिहताण ॥७९॥
नमो चउमुहचउसिहामण सठिआण अरिहताण ॥८० ॥
नमो पचदमण्ह छत्तरयण ससोहिआण अरिहताण ॥८१ ॥
नमो बारसगुणअसोअवरपायापूईआण अरिहताण ॥ ८२ ॥
नमो मणि कणगविचित्त दडमय चारुचामर वीईआण अरिह-
ताण।।८३॥
नमो जाणुप्पमाण भरियपु(फ) पयराण अरिहताण ॥ ८४ ॥
नमो दिणयरसमतेअ धम्म चक्ससोहिअ अग्गनिमागाण
अरिहताण ॥ ८५ ॥
नमो निम्मल भामडल मडिअपिढविभागाण अरिहताण ॥८६॥
नमो देव दुदुर्हिनिनायससुइय तिहुअणरायत्तणपत्ताण अरिह-
ताण ॥८७॥
नमो सुरनर तिरिआण सजणिय पडियोहे वाणीगुणसपत्ताण
अरिहताण ॥ ८८ ॥
नमो भविअजण कमलपयासगाण अरिहताण ॥ ८९ ॥
नमो चउद्दस पुन्याण बीयभूयपयतियदाणदायगाण अरिह
ताण ॥ ९० ॥
नमो चउद्दस पुत्रसुतकारगसीमाण गणहरपय सठावगाण
अरिहताण ॥ ९१॥
148
॥
नमो
सव्वसुरासुरनमू(म)सिअचरजिसमणसंघतंठावगाणं
अरिहंताणं ॥ ९२ ॥
नमो सयपाणभूअजीअसत्तकारुण्णभावपत्ताणं अरिहंताग ।
नमो अमरवई नकहर वासुदेव बलभबंदियाणं अरिहंताणं ॥
नमो अणुत्तरविमाणवासी अमरसंदेह अवहारकारगाणं
अग्हिताणं ॥१५॥
नमो सुक्कलेसाए तेरसमगुणठाण संठिआणं अरिहंताणं ॥१६॥
नमो जीवाजीवाइपयत्य पयासगाणं अरिहंताणं ॥ ९७ ॥
नमो परोक्यार करणेणं संपूरिअआउफम्माणं अरिहंताणं
नमो लोगग्ग गमणजुग्गखित्तमुवगयाणं अरिहंताणं ॥९९ ॥
नमो सिद्ध सुहदायगंतिमतवकारगाणं अरिहंताणं ॥१०० ॥
नमो चउद्दसमगुणठाणठियसेलेसीकरणमुवगयाणं अरिहंताणं ॥
नमो सबसुरासुरविरइय चरमसमवसरणसंठिआणं अरिहं-
ताणं ॥ १०२ ॥
नमो अणाइकरम संजोगविप्पमुकाणं अरिहंताणं ॥ १०३ ॥
नमो उरालियतेअकरमणसि (स)रीर पडिमुकाणं अरिहंताणं ॥
नमो रागदोसजलभरिअसंसारसागर समुत्तिन्नाणं अरिहं-
ताणं ॥ १०५॥
नमो सरीरतिभागुणघणविरईयजीवपएसाणं अरिहंताणं ॥१०६॥
नमो पुव्यज्झाणपओगाओसु धणविमुक्क व्व गइपरिणयाणं
अरिहंताणं ॥ १०७॥
149 (नमो पुयज्झाणपणोगाओ उम् धणु विमुकच्च गहपरिण- याण अरिहताण) नमो सिवमयलमरु अमणत मक्खय मयाचाहमपुणरानित्ति सिद्धिगइनामधेय ठाण (स) (प)त्ताण अरिहताण ||१०८॥* ॥ इति नमस्कार पलिका नमाप्ता ॥ * नमस्कार माध्याय प्राकृत विभाग से समुद्दत 150 ॥सिद्ध णमोकारावलिया। ॥सिद्ध नमस्कारावलिका॥ (श्री सिद्ध परमात्मनोऽष्टोत्तरशत गुणवर्णनम् ) नमो जिणवरिंदपयमणुहविऊण सिद्धिमृगयाण सन्म- सिद्धाणं ॥ १॥ नमो सामनेणं केवलितपय(यं) परिपालिऊण सिद्धि मुनगयाणं सव्यसिद्धाणं ॥ २॥ नमो तित्थयरस्स तित्थे सिद्धिमुवगयाणं सबसिद्धाणं ॥३॥ नमो तित्थं विणा जाईसरणाइणा सिद्धिमुंबगयाणं सव्व- सिद्धाणं ॥४॥ नमो सयंबुद्धभावेण सिद्धि मुवगयाणं सव्वसिद्धाणं ॥५॥ नमो पत्तेय बुद्धभावेण सिद्धिमुरगयाणं सध्यसिद्धाणं ॥ ६ ॥ नमो बुद्धवोहियभावेण सिद्धिमुवगयाणं सध्यसिद्धाणं ॥७॥ नमो पुरिसलिंगेण सिद्धिमुवगयाणं सव्वसिद्धाणं ॥ ८॥ नमो इथिलिंगेण सिद्धिमुवगयाण सव्यसिद्धाणं ॥ ९॥ नमो नपुंसकलिंगेण सिद्धिमुवगयाणं सव्वसिद्धाणं ॥ १० ॥ नमो मुणिवरलिंगेण सिद्धिमुवगयाणं सव्यसिद्धाणं ॥११॥ नमो अन्नतित्थियलिंगेण सिद्धिमुवगयाणं सबसिद्धाणं ॥१२॥ नमो गिहालिंगेण सिद्धिमुवगयाणं सव्वसिद्धाण ॥ १३ ॥ नमो एगसमये एगजीव सिद्धिमुवगयाणं सव्वसिद्धाणं ॥१४॥ नमो एगसमये अणेगजीव सिद्धिमुवगयाणं सबसिद्धाणं ॥
151
नमो सप(पुनसुयनाणी सिद्धिमुवगयाण सन्मसिद्धाण ॥१६॥
नमो परमानि (च) हिनाणी सिद्धिमुवगयाण सन्मसिद्धाण ॥
नमो मणपञ्जवनाणी सिद्धिमुवगयाण सबसिद्धाण ॥१८॥
नमो आयरियपयहिय सिद्धिमुअगयाण सव्वसिद्धाण ॥१९॥
नमो उपज्झाय पयहिय सिद्धिमुनगयाण सबसिद्धाण ॥२०॥
नमो अतगडकेलि सिद्धिमुनगयाण सव्यसिद्धाण ॥ २१ ॥
नमो पडिमापडियन्नमाहुसिद्धिमुवगयाण सबसिद्धाण ॥२२॥
नमो जघाचारण मुनिवर सिद्धिमुनगयाण सव्वसिद्धाण ॥२३॥
नमो विजाचारणमुनिवर सिद्धिमुनगयाण सबसिद्धाण ॥
नमो आमोसहिलद्धिसपन्न मुणिवर सिद्धिमुवगयाण मन्च-
सिद्धाण ॥ २५ ॥
नमो सेलोसहिलद्विसपन्नमुणिवर सिद्धिमुवगयाण सम्प-
सिद्धाण ॥ २६ ॥
नमो जल्लोसहिलद्धिसपन्नमुणियरसिद्धिमुवगयाण सन्च-
सिद्धाण || २७॥
नमो समोसहिलद्धिसपनमुणिवर सिद्धिमुरगयाण सव्व
मिद्धाण ॥ २८ ॥
नमो पयाण(णु) सारीमुणियर मिद्धिमुनगयाण सम्पमिद्धाण ॥
नमो सभिन्न सोई मुणियर सिद्धिमुनगयाण मयसिद्धाण ॥
नमो कुबुद्धि मणिपर सिदिमुनगयाण मयसिद्धाण ॥३१॥
नमो बीयबुद्धिमणिपरसिद्धिमुनगयाण सन्चासिद्धाण ॥ ३२ ॥
152
नमो अक्खीणमहाणसीलद्विसंपन्नमुणिवसिद्धिमुक्गयाणं
सध्यसिद्धाणं ॥३३॥
नमो खीरासवलद्धि संपन्नमुणिवरसिद्धिमुनगयाणं सब
सिद्धाणं ॥३४॥
नमो महुआसबलद्धिसंपन्नमुणियर सिद्धिमुचगयाणं सच्च-
सिद्धाणं ॥ ३५ ॥
नमो आसीविसलद्धिसंपन्नमुणिवर सिद्धिमुवगयाणं सब-
सिद्धाणं ॥ ३६॥
नमो दिट्टीविसलद्धि संपन्नमुणिवर सिद्धिमुवगयाणं सब-
सिद्धाणं ॥३७॥
नमो आगासगामी लद्धिसंपन्न मुणिवरसिद्धिमुवगयाणं सब-
सिद्धाणं ॥ ३८॥
नमो विउलमईलद्धि संपन्नमुणिवरसिदिमुरगयाणं सच्च-
सिद्धाणं ।। ३९ ॥
नमो पर)लायलद्धि संयन्त्रमुणिवरसिदिमुवगयाणं सब्ब-
सिद्धाणं ॥ ४०॥
नमो चकवट्टिमुणिवर सिद्धिमुवगयाणं सव्यसिद्धाणं ॥ ४१ ॥
नमों वलदेव सुणिवर सिद्धि मुवगयाणं सव्यसिद्धाणं ॥४२॥
नमो गणहरलद्धि संपन्न मुणिवर सिद्धिमुवगयार्ण सब्य-
सिद्धाणं ॥४३॥
153 नमो तेअलेमालद्धिसपन्नमुणिारमिद्विगुनगयाण सबसिद्धाण ॥४४॥ नमो भीअलेसालदिसपनमुणियर सिद्धिमुनगयाण मन्य- सिद्धाण ॥४५॥ नमो आहारगलद्धि सपन्न मुगिपर मिद्धिमुरगयाण सन्च- सिद्धाण ॥ ४६॥ नमो लटुमि(म)रीरकरणमहसिद्धिसपनमुणिपर सिनिमुरग- याण सन्चसिद्धाण ॥ ४७॥ नमो तियणयसिसरगमहपिदिसपन्नमुगियर सिदिमुर - गयाण मयामिद्धाण ॥ ४८ ॥ नमो तिहुयणईसरियमासिदि सपन्नमणिरमिद्धिमुनगयाण सबमिद्धाण ॥४९॥ नमो जयप(पुटिसीमज्ये थल्प जलोरिचस्मण महमि- दिसपन मुगियर मिति मुरगपाण मध्यमिद्धाण ॥५०॥ नमो अशुभ मुह(ह) ममि(मोरीरकरणमिति सपनमुणियर सिदि मृगपाण मन्यमिद्धाण ॥५१ ॥ नमो महमरीरमणममिति सपन मुनिवर मिद्धि मुरगयाण मन मिद्धाण ॥५०॥ नमो इमाचारणमहमिलिसपल मुगियरपिदिमुरगया। मन्मसिद्धा॥ ५३॥ 12
154
नमो भूमित्थ जोइसियफासकरणमहसिद्धिसंपन्नमुणिवर मिद्धि,
मुवगयाणं सबसिद्धाणं ॥५४॥
नमो मेरुपच(य)डियमुणिवर सिद्धि मुवगयाणं गुब्ध-
सिद्धाणं ॥ ५५॥
नमो निसह नीलपव्ययहिय मुणिवर सिद्धिमुक्गयाणं सब-
सिद्धाणं ॥५६॥
नमो महहिमवरुपि पव्ययष्ट्रिय मुणिवरसिद्धिमुक्गयाण मन्त्र-
सिद्धाणं ।। ५७ ॥
नमो हिमव सिहरीपचयद्विय मुणिवर सिद्धि मुवगयार्ण
सव्यसिद्धाणं ।। ५८ ॥
नमो वेअड्ढ पव्ययष्ठिय मुणिवरसिद्धि मुवगयाणं सव्वसिद्धाणं ।।
नमो पउमवरवेईयासंठिय मुणिवर सिद्धि मुवगयाणं सब-
सिद्धाणं ॥६० ॥
नमो गयदंत पव्ययडियमुणिवर सिद्धिमुनगयाणं सब-
सिद्धाणं ॥ ६१॥
नमो जमग पव्ययट्टियमुणिवर सिद्धिमुवगयाणं सव्व-
सिद्धाणं ।। ६२ ॥
नमो दिग्गयपव्ययहियमुणिवर सिद्धि मुनगयाणं सब-
सिद्धाणं ॥ ६३ ॥
नमो इसुआर पव्वयडियमुणिवर सिद्धिसुवगयाणं सच्च-
सिद्धाणं ॥ ६४॥
155
नमो उक्खारगिरीसुसठियमुणियर मिद्धिमुग्गयाण मा
सिद्धाण ॥६५॥
नमो वटवेयद पचय सठियमुणिपर मिद्धि मुनगयाण मग.
मिद्धाण ॥ ६६ ॥
नमो रिमहाडपचयद्वियमुणिर मिदिमु रगयाण मन्त्र
मिद्धाण ॥१७॥
नमो अहापय पव्ययडियमुणियर सिद्धिमृगयाण मय
मिद्धाण ॥ ६८ ।
नमो समोयमिहरपच्चयडिय मुणियर मिद्धिमुगयाण गम
मिद्धाण ॥ ६९॥
नमो सेनुनयपव्ययहियमुणिवर मिद्विमुरगाण मार
मिद्धाण ॥ ७० ॥
नमो उअिंतसेलमिहरहियमुणियर मिसियागया। गन्न-
सिद्धाण ॥ ७१॥
नमो माणुमोचरपन्चटिपगुणियर मिद्धिमुरगयाण मन्त्र-
मिदाण ॥७२॥
नमो पचगु महेसु मठियमुणियरसिद्धिसुरगयाम मन्च
सिद्धाण ॥७३॥
नमो पनमु सएनु सठियमशिनामिद्धिमुगायाग मन्त्र-
मिदारा॥ ७९ ॥
156
नयी पंचसु महाविदेहेसु संठियमुणिवरसिद्धिमुवगयाणं सब-
सिद्धाणं ॥ ७५ ॥
नमो समत्थ धाईसंडे सिद्धि मुवगयाणं सव्वसिद्धाणं ।। ७६ ॥
नमो समत्थ पुक्खरवरदीवे सिद्धि मुवगयाणं सबसिद्धाणं ॥
नमो समत्थ जंबूदीवे सिद्धि मुवगयाणं सबसिद्धाणं ॥७८॥
नमो लवण समुद्दमज्झे सिद्धि मुवगयाणं सव्वसिद्धाणं ॥७९॥
नमो कालोदसमुद्दमझे सिद्धि मुवगयाणं सबसिद्धाणं ॥८०
ननो सीआ सीउआनईमज्झे सिद्धि मुवगयाण सव्वसिद्धाणं ॥
नमो नारीका(कं) तानरकंतानइ (ई) मज्झे सिद्धि मुवगयाणं
सव्वसिद्धाणं ॥ ८२॥
नमो हरिकांता हरिसलिलानईमझेसिद्धिमुवगयाणं सवसि-
द्धाणां ॥ ८३॥
नामोरूप्पकूलारोहियानइई)मझे सिद्धिमुवगयाणं सव्व-
सिद्धाणं ।। ८४ ॥
नमोसुवन्नकूलारोहियानईमज्झे सिद्धिमुवगयाणं सबसिद्धाणं
॥ ८५ ॥
नमो रतारतवईभज्झे सिद्धिमुक्गयाणं सबसिद्धाणं ॥ ८६ ॥
नमो गंगासिधूमझे सिद्धिमुवगयाणं सव्यसिद्धाणं ॥ ८७ ॥
नमो अईयकाले सिद्धिमुवगयाणं सबसिद्धाणं || ८८ ॥
नमो संपई सिद्धि मुवगयाणं सब सिद्धाणं ॥ ८९ ॥
नमो ख(खा) इयपारिणामियभावजुअलेसंठिआणं (सिद्धिमुवग-
याणं) सव्वसिद्धाणं ॥ ९० ॥
157 नमो अणतनाणधराण (सिद्धिमुनगयाण) सम्पसिद्धाण ॥ ९१ ॥ नमो अणतदसणधराण (मिद्धिमुनगयाण) सव्यसिद्धाण ॥९२॥ नमो अणत परमाणदसुहसपत्ताण सन्मसिद्धाण ॥ ९३ ॥ नमो अणतवीरिय भानमुनगयाण सब्यमिद्धाण ॥ ९ ॥ नमो साइअणतठियसपत्ताण सम्पसिद्धाण ॥ ९५॥ नमो पचविहसठाण परिमुकाण सम्पमिद्धाण ॥ ९६ ॥ नमो पचनिहनननिसेमरहियाण मन्मसिद्धाण ॥ ९७॥ नमो दुविहगधविमुक्काण सव्यसिद्धाण 11 ९८॥ नमो पचनिहरमपिसेसरहिआण सध्यसिद्धाण ॥ ९९ ॥ नमो अहमिह फासविसेसनिप्पमुकाण सव्वसिद्धाण ॥१०॥ नमो जम्ग जरा मरणविप्पमुकाण सध्यसिद्धाण ॥१०१॥ नमो अविचलपयसठिआण सम्पसिद्धाण ॥ १०२ ।। नमो अहविहम्मक्लक पिप्पमुक्काण मन्मसिद्धाण || १०३ ॥ नमो सब्यसजोग विउ (ओ) गविप्पमुकाण सबसिद्धाण॥१०४॥ नमो पारगयाण सव्वसिद्धाण ॥१०५ ॥ नमो परपरगयाण सव्यसिद्धाण ॥१०६॥ नमो लोगमामुवगयाण सम्बसिद्धाण ॥ १०७॥ नमो अणताणतगुणमणिमडिआण सबसिद्धाण ॥१०८॥ ॥ इति सिद्धनमस्कारावरिका ।। नमस्कारस्वाध्याय प्राकृत विमाग से उद्धृत
153
गिरोली (पल्ली) पडे तेनो विचार
प्रकाशकः पं-कुंवरजीदोशी (श्रीभुराभाइ फुलचंद खीमचंद ना
सौजन्यथी)
अंगविचार
पल्ली श्रीमंतना माथा पर पडेतो दरिद्री थाय ॥ दरिद्री
ना सिर पर चढेतो दरद्रीपणु हणे ॥श्रीमंतने कष्ट पडयां जोपल्ली
सीर चढेतो कटहणे । कपाले चढेतो नवनिधान यथा ।।
कपालनी नीचे चढे तो राज्यमा मानमले ॥ डानाकान पर
पडेतो आयुप हणे ॥ जमणा कान उपर पडेतो कलेश थाय ।
नाकपर पडेतो वयरीमरे ॥ होठ पर पडेतो भोजननु सुख
थाय ॥ हृदये फरसेतो धननोनाश ॥
जमणे खभे पडेतो सरीररोगरहीत थाय || डावे खमे-
पडेतो घणारोग थाय ॥ दक्षिण अगे चढेतो मित्रनो लाभ ॥
जयणे अगे चठेतो स्त्रीऋतुवंती थई ने लाभ थाय (संतान)।
उदर (पेट) पर पडेतोमीटुं भोजन मले ।। नाभी पर पडेतो
संताननोलाम थाय । गुह्य पर पडेतो परस्त्रीनो संगमथाय ॥
जमणाहाथ पर पडेतो लक्ष्मी तथा कन्यानो लाभ
थाय ॥ डावा हाथ पर पडेतो परदेशमांजवानुं थाय ।
उंचीचढी पगपर पडेतो परदेश जर्बु पडे ॥ पगतलीये जायतो
अगर फरसे तो जगतमां जशवरते ।।
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रागनी आगली उपर फरसे तो शरीरे सुग्व ॥ पगना नखने
फरसे तो व्याधी थाय ॥ पुटे पडेतो धननो नाश ||
पुठथी आगळ उतरेतो पधव निरोगी होय।। निद्रामाहे
जो सुता शरीरे पडेली देखे तो पोतानी स्त्रीनु आयुष्य
छमासनु जाणवु जागेतो सुखविलास एटले सुख थाय।
तिथी विचार
पडवे पडीरोग मनुयान बीजे जीजे राजसमान ।
चोये चुरी पचम धन देहे, छठ सप्तमी प्रीत कहे ॥
आठम नवमी दसमी हाण, पुनलाभ अग्यारसजाण ।
चारसे धन सजोग अपर तिथी सविपरजणजोग ।।
बार
शशीयुध भृग गुरुप च्यारे वारे पल्ली पडी करे सुखकार ।
रवीशनी मगल अशुभ करत, एवा फल फोल्यांतन ॥
पोहरनी समजण
रनिगरे पहेले पहोरे पडेतो लक्ष्मीलाभ, चीजे पहोरे
राज्यमा मानमले जीजे पहोरे मस्तकमा दुःस घणु याय,
चोथे
पहोरे मायापर पडतो सज्जन मेलाप थाय।
सोमवारे पहेले पहोरे पडे उचाट कराने पीजे पहोरे
असमवीत चात सभळायत्रीजे पटोरे कलेशथाय चोथे पहोरे
लक्ष्मीनो लाभ होय॥
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मंगलवारे पहलेपहोरे मरण थाय बीजे पहोरे दुःखथाय
प्रोजे पहोरे नठारी वात संवळाय चीथे पहोरे धननी
प्राप्ती थाय ।
बुधवारे-पहेले पहोरे सजननो मेलाप थाय वीजे कलेशथाय
त्रीजे पहोरे घाव (कोइ हथीयारथी) थाय चोथे पहोरे
परदेश जq थाय ॥
गुरुवारे पहले पहोरे चीतव्यो लाम थाय, वीजे पहोरे लडाई
थाय, त्रीजे पहोरे सुखकरे, चोधे पहोरे मोटी पदवीमले।
शुक्रवारे-पहले पहोरे सारुंथाय वीजे पहोरे लक्ष्मीलाभ थाय,
तीजे पहोरे जुध्धथाय चोथे पहोरे सुखथाय ॥
शनीवारे-पहेले पहोरे अंगभोग थाय, वीजे पहोरे अंगे पीडा
थाय, त्रीजे पहोरे भोजननो लाभ, चोथे पहोरे अगनी
अगर पवननो भय थाय पल्लीपडे ते वारनो पहोर
समजवो।
चंद्रमा विचार
मेषमिथुन कर्क धन मकर कुंभ मीनमां पडेतो सुख
थाय, वृषभमां, सुखनो नाशथाय, सिंहमां सुतनु सुख, कन्यामा
पडेतो दुःख पडे, एम चंद्रमा पडते वारनो चंद्रमा समजवो ॥
नक्षत्र विचार
अश्वनी रोहीणी मृगशीर्ष पुष्य पुनर्वषु भरणी अनुरा-
धामां पडेतो सुख करे, कृतिकामां दुःख थाय, आर्द्रा अश्लेषा
.
161
ज्येष्ठा मूळ पुर्यापाढा उत्तरापाढा मा मरण करे, मघामा सुख
थाय पणरोगथाय, पुर्वाफाल्गुनी हस्त चीना साती विशाखा
मा धननोनाशकरे, धनीष्ठा सतरीका पुर्वाभाद्रपद उतराभाद्र
पद रेवतीमा पडेतो दुःख थाय, श्रवण मा यडेतो धणु सुख
मले सरवे जातनु मले पल्ली पडे ते पखतनु नक्षत्र समजषु ।।
162 ॥ प्रकाशकः ॥ ऊ] श्री जिनाय नमः श्रीरत्नप्रभसूरीश्वराय नमः ॥ [ही अथ श्रीमहाप्रभाविक बीजमंत्रगर्भित परमचमत्कारी सर्वकार्यसिद्धिदायक श्री शान्तिधारा पाठः ॥ ॐ ही श्री ली ऐ अहं वं मं हे सं तं व व ममं हह संसं तंतं पंपं डंडं म्वी म्बी क्ष्वी वी द्राँ दी द्री द्रावय द्रावय नमोऽहते भगवते श्रीमते ॐ ही क्रो मम पाप खण्डय हन हन दह दह पच पच पाचय सिद्धिं कुरु कुरु ॥ ॐ नमोऽहँ हुँ म्बी वी हं सं डं वं व्हः पः हः क्षा क्षी झू क्ष झै यो क्षौ दे क्ष ज्ञः ॥ १ ॥ ॐ ह हाँ हि हाँ हु हु है है हो हो हैं हा असिआउसाय नमः मम पूजकस्य ऋद्धिं वृद्धिं कुरु २ स्वाहा ॥ ॐ नमोऽईते भगवते श्रीमते डः डः डः मम श्रीरस्तु वृद्धिरस्तु तुष्टिरस्तु पुष्टिरस्तु शान्तिरस्तु कान्तिरस्तु कल्याणमस्तु मम कार्य- सिद्धयर्थं सर्व विघ्ननिवारणार्थं श्रीमद्भगवते सर्वोत्कृष्ट त्रैलो- क्यनाथाचितपादपद्म-अईत्-परमेष्ठि-जिनेन्द्र-देवाधिदेवाय नमोनमः मम श्री शान्तिदेव-पादपद्मप्रसादात् सधर्म 163 . श्री बलायुरारोग्यैश्वर्याभिवृद्धिरस्तु सस्तिरस्तु धनधान्य- ममृद्धिरस्तु श्रीमातिनाथो मा प्रति प्रसीदत, श्री वीतराग देवो मा प्रति प्रसीदतु, श्री जिनेन्द्रः परममागल्यनामधेयो ममेहामुत्र च सिद्धिं तनोतु ।। ॥ॐ नमोऽहते भगरते श्रीमते श्री चिन्तामणि पार्श्वनाथाय, तीर्थंकराय रत्नत्रय रूपाय अनन्तचतुष्टयसहिताय धरणेन्द्र फणमौलिमण्डिताय समरसरणलक्ष्मीशोभिताय इन्द्र धरणेन्द्रचक्ररादिपूजितपादपद्माय केलज्ञानलक्ष्मीशोभि ताय जिनराजमहादेवाटादशदोपरहिताय पटचत्वारिंशगुण सयुक्ताय परमगुरुपरमात्मने मिद्धाय सुद्धाय जैलोक्यपरमेश्व- राय देवाय सर्वसत्वहितकराय धर्मचक्राधीश्वराय सरिया परमेश्वराय त्रैलोक्यमोहनाय धरणेन्द्रपद्यावतीसहिताय अतुल- चलवीर्यपराक्रमाय अनेक्दैत्यदानव कोटिमुकुटधृष्टपाद - पीठाय नमविष्णु-रुद्रनारद-वेचर पूजिताय सर्वभव्य जनानन्दकराय सर्वजीवविध निवारणसमर्थाय श्री पार्श्वनाथ- देवाधिदेवाय नमोऽतु ते श्रीजिनराजपूजनप्रसादाद् मम सेन कस्य सनदोपरोगशोकभयपीडाविनाशन कुरु २ सर्व शान्ति तुष्टिं पुष्टिं कुरु २ स्वाहा । ॥ ॐ नमो श्रीशान्तिदेवाय सारिष्टशान्तिकराय हो ही हूँ है ह, असिआउमा मम सनिमशान्ति कुरु २ श्रीसघस्य (अमकस्य) मम तुष्टिं पुष्टि कुरु २ स्वाहा ॥
164 ॥ श्री पार्श्वनाथ पूजनप्रसादाद् मम अशुभान् पापान् छिन्धि २, मम अशुभकर्मोपार्जितदुःखान् छिन्धि २, मम परदुष्टजनकृत मंत्र-तंत्र-दृष्टि-पुष्टिच्छलच्छिद्रादिदोपान् छिन्धि २, मम अग्नि चोर जल सर्पव्याधि छिन्धि २, मारी- कृतोपद्रवान् छिन्धि २, डाकिनी शाकिनी भूत मरवादिकृतो- पद्रवान् छिन्धि २, सर्वभैरवदेवदानव वीरनरनारसिंहयोगिनी कृतवितान् छिन्धि २, भुवनवासि व्यन्तर-ज्योतिपीदेवदेवी- कृतदोपान् छिन्धि २, अग्निकुमार कृतवितान् छिन्धि २, उद- धिकुमार-सनत्कुमार-कृतविनान् छिन्धि २, दीपकुमारभयान् छिन्धि २ भिन्धि २, वातकुमार-मेषकुमा रकृतविघ्नान् छिन्धि २ भिन्धि २, इन्द्रादि दश दिक्पालदेवकृतविघ्नान् छिन्धि २, जय-वजय अपराजित-माणिभद्र-पूर्णभद्रादिक्षेत्रपालकृतविघ्नान् छिन्धि-२, राक्षस वैताल दैत्य दानवयक्षादिकृतदोषान् छिन्धि २, नवग्रह कृतग्रामनगरपीडां छिन्धि २, सर्व अष्टकुलनागजनित विपभयान सर्व ग्राम नगरदेशरोगान् छिन्धि २, सर्व स्थावर जंगम वृश्चिकदृष्टिविषजातिसादिकृतविषदोपान् छिन्धि २, सर्वसिंहाष्टापदव्याघव्यालवनचर जीवभयान् छिन्धि (२) परशत्रुकृतमारणोच्चाटनविद्वेषणमोहनवशीकरणादिदोषान् छिन्धि २॥ ॥ ॐ नमो भगवति! चक्रेश्वरि ज्वालामालिनी । अस्मिन् जिनेन्द्रभुवने आगच्छ २, एहि २ तिष्ठ २ बलिं गृहाण २
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मम धनधान्यसमृद्धिं कुरु २, सर्वभव्यजीवानन्दन कुरु २, सर्व
देशग्रामपुरमध्यक्षुद्रोपद्रवसर्वदोपमृत्युपीडाविनाशन कुरु २,
सर्वदेशग्रामपुरमध्यसुभिक्ष कुरु २,सनविनशाति कुरु२ साहा।।
॥ ॐ ओं को ही श्री पभादिवर्धमानान्तचशिति
तीर्थकरमहादेवाधिदेवाः नीयन्ता २ मम पापानि शाम्यन्तु,
पोरोपसर्गाः सर्वविघ्नाः शाम्यन्तु । ॐ आँ को ही श्री रोहि
ण्यादिमहादे या अत्र आगच्छन्तु २ सर्वदेवता प्रीयन्ता २ ।
ॐ आँ को ही थी चकेश्वरी ज्यालामालिनी पद्मावती
महादेवी प्रीयन्ता २। ॐ औं को ही श्री माणिभद्रादि
यक्षकुमार देनाः प्रीयन्ताम् २। सर्व जिनशासनरक्षकदेवाः
प्रीयन्ताम् प्रीयन्ताम् श्री आदित्य सोम मङ्गल बुध बृहस्पति
शुक्र शनि राहु केतवः स नवग्रहाः प्रीयन्ता प्रसीदतु देशस्य
राष्ट्रस्य पुरस्य राज्ञः करोतु शान्ति भगवान् जिनेन्द्रः ।
यत्सुख त्रिपु लोकेपु, व्याधिव्यसन वर्जितम् ।
अभय क्षेममारोग्य स्वस्तिरस्तु च मे सदा।१।
यदर्थ क्रियते कर्म, सप्रीति नित्यमुत्तमम् ।
शान्तिक पौष्टिक चैत्र, सर्वकार्येषु सिद्धिदम् । २।
॥ इति श्री शान्तिधारा पाठः समाप्तः ॥
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श्री समवसरणनुं स्तवन जुमखडानी देशी. त्रिशलानंदन बंदीये रे, लहीए आनंद कंद, मनोहर जुमखइं. जुमखडा जुी रह्यां रे, श्री वीर तणे दरवार; मनोहर समवसरण विराजता रे, सेवित सुरनर इंद्र. मनो० ॥१॥ आवी जोजन वृष्टि करे रे, फूल भरे जानु मान, मनो; मणिरयणे भूतल रचे रे, व्यंतरना राजान. मनो ॥२॥ कनक कोशीशा रूपा गढे रे, रचे भुवनपति ईश, मनो; रतन कनक गढे जोतिपी रे, मणि रतने सुर ईश. मनो० ॥३॥ भित्ति पृथुल तेत्रीश धनु रे, एक कर अंगुल आठ, मनो; वचे तेर धनु आंतरुं रे, उंची पणसें धनु ठाठ. मनो०॥४॥ पावडीयारों सहस दश रे, पंच पंच परिमाण, मनो०; एक कर पीहु उंचपणे रे, प्रतर पचास धनु मान. मनो०॥५॥ चड वार व्रण तोरणा रे, नील रतनमय रंग, सनो मध्ये मणिमय पीठिका रे, सुमिथी अढी गाउ तुंग. मनो० ॥ ० २ वैमानिकना स्वामी। ४ टनी भीतो १ रतनना कागरा। ४ पाचसो। ५ पगथीय।
167 दीर्घ पृथुल बम धनु रे, जिनतनु माने उच, मनो, चैत्य महित अशोक वरु रे, जिनथी बार गुण उच मनोगाथा चड दिदो ना सिंहामने रे, आर चामर उत्रनार, मनो०, धर्मचक्र स्फाटिक रत्ननु रे, सहम जोयण मज चार मनो॥ देवछदो ईशान खुणे रे, प्रभु वीमामना ठाम, मनो०, चउ रूपे दीए देशना रे, भामडल अभिराम मनो० ॥९॥ मुनि वैमानिक साधनो रे, रहे अग्निसुण मोझार, मनो°, ज्योतिषी भुगनपति व्यतरारे, नैरुत्य पुणे तस नारी मनो।। वायु गुणे ए देवता रे, सुणे जिनपरनी वाणी, मनो. वैमानिक श्रावक श्रानिका रे, रहे ईशान सुणे सुजाण मनी. चउ देवी अने साधपी रे, उभी मुणे उपदेश, मनो०, तिर्यच सहु चीजे गढे रे, जीजे नाहन विशेष मनो० ॥१२॥ वृत्तामारे' चउ वावडी रे, चउरसे आठ वान, मनो०, प्रथम पदरमें धनु आतरु रे, चीजे सहस धनुमान मनो० ॥ रयण भीत गढ आतरु रे वृत्ते धनु शत छोरा, मनो०, चउरसे प्रण महसनु रे, इम शाम दीये जगदीश मनो० ॥ तुवर पाह तीहा पोळीया रे, धूप घटी ठाम ठाम, मनो०, द्वार मगल घज पुतली रे, दुदुभि वाजे ताम मनो॥१५॥ २ गोल समवसरणे।
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दिव्य ध्वनि समजे सह रे, मीठी योजन विस्तार, मनो;
सुणतां समता सहु जीवने रे, नहिं विरोध लगार. मनो० ॥
चटतीश अतिशय विराजता रे, दोप रहित भगवंत,
श्रीजशविजय गुरु शिष्यने रे, जिनपद सेवा खंत. मनो० ॥
मनो०;
॥ इति श्री समवसरण स्तवन. ॥ (त्रीजु)
caroo
भारती विजयम प्रेस, तिरुवल्लिकेणि, सद्रास-५ ।
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