Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Chhand Ratnavali

Shastri,rajaram · 2011/04

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छन्द रत्नावली लेराक- मो० राजाराम शास्त्री तथा रामरूप शास्त्री, बी. ए. प्रभाकर (प्रोफेसर डी०ए० यी० फालिज, लाहौर) रितीय जुलाई १९३६ मूल्य १) समिन्द प्रकाशक- प.राजाराम मालिक-बाम्बे मैशोन प्रेस लाहौर। श्रीकृष्ण दीक्षित बाम्बे मैशीन प्रेस, मोहनलाल रोड, लाहौर।

विषय-सूची मध्याय पृष्ठ १ २ १३ ३ . ४ ६५ .. . विषय भूमिका छन्द-भषना मात्रिफ-समन्छन्द मात्रिक अर्धसम छन्द मात्रिक विषम छन्द मानिक डक छन्द वर्ण-सम-वृत्त पाधिसम वृत्त. पर्ण-विपम-वृत पर्ण-डफत्त उभयपन्द मुक या स्वच्छन्दछन्द साधारण अभ्यास ६ . १६७ २०० २०४

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1
छन्द-रत्नावली
भूमिका
एसान
जिस वाक्यरचना में अक्षरों घा मात्रायों
पी सख्या और गति-पति का नियम हो,
उसे छन्द फाहते है, और जिस अन्य में छन्दों की शिक्षा दी
हो, उसे छन्दशास्त्र या छन्द शास्त्र पहने हैं।
पिना उन्द फी पाक्यरचना फो गर और
गधौर पर
छन्दोपर पास्य-रचना पो पर पहते है।
गप मोर पप में ये मेद है। (१)ग में इच्छा के
मनुसार राम्द न्यूनाधिक लिसे जाने हैं, पर पप में उम छन्द
के नियत मसरों पा मायामों के अन्दर ही अपना पक्षप्य पूरा
htra न्द दीदी मन्द पोध जाग। यो हिन्दी
on अपने गला र पदप पा सोना
11 न्य, मन, पो-ग पर मी पर

छन्दलापली फरना होता है। (२) गध में कर्ना भादि अपने नियत क्रम में रफ्खे जाते हैं, पद्य में यह नियम नहीं होता। (३) गद्य में प्रचलित शब्द अपने अधिकृत रूप में योले जाते हैं, पध में कमी फमी विएन रूप में मी योले जाते हैं, जैसे दु ख को दूस। बिना छद फी रचना से छन्दोयद रचना में ये विशेषताएँ होती है। (१) छन्द का हर एक चरण अपने छन्द की विशेषताएँ तोल में पूरा उतरता है। इससे छन्द पढने में सुहावने प्रतीत होते हैं और सुस्थर गाए जाते हैं, अतएव बड़े प्यारे लगते हैं। और जय राग रागनियों में गाए जाते हैं सप तो चित्त को मोह ही लेते हैं। (२) याणी के तीन रूप है-- गद्य, पध और गीति । वाणी का ओ प्रभाव गद्य में है, पद्य में उससे कई गुना अधिक होता है और गीति में तो उससे भी कई गुना अधिक हो जाता है सो गीति वाणी के प्रभाव की परा फाष्ठा है । इस गीति का आधार भी छन्द ही होते हैं, अतएव छन्द ही वाणी में ऊँचे से ऊँचा प्रभाव ले पाते हैं। (३) छन्द रुचिकर होते हैं, उनमें जी लगता है, अतएव जल्दी फण्ठस्थ होते हैं, उचित अवसर पर उन्हीं अक्षरों में दुहराये जाते हे और फण्ठस्य यने रहते हैं। छन्दों में ऐसी मोहिनी शक्ति है कि हर एक व्यदि उस से प्यार करता है और हर एक अवस्था उन्दों की सर्वप्रियता प्यार करता है। उन्द परिजनों के बहुत प्या 'है, यह तो जगत्प्रसिद्ध है। पर क्या को भूमिका ऐसा व्यकि भी है, जिसको ये प्यारे न लगसे हों। देगो, पफ मोर यह ग्रहशानी अपने ब्रह्मानुभव को छन्दों में गाता हुमा मस्त हो होकर झूम रहा है। दूसरी ओर यह भक प्रभु-मक्ति के गीत गाता दुमा प्रेम में मग्न हो रहा है। तीसरी मोर एक धर्म शास्रोधर्म की व्ययस्थानों को मार नीतिशास्त्री नीति के नियमों को प्रभावशाली मनाने के लिए छन्नों में रचना कर रहा है। शास्त्रियों की पास भी रहते दो। यह देखो, गडरिये अपनी मेड-पफरियों के पीछे और ग्याले अपनी गौमों के पीछे मीठे मीठे उन्द (सइ) रचते भीर गाते फिरते हैं। मेलों में अपड़ गयार भी अपने प्यारे छन्द रच लाते और अपने प्रामीण बाजों के साप रे जोश मे गाते फिरते हैं। मेलों में लडक- सदकिया उस उस गेल के नियत छन्द योटते हैं। खियो घरमा कातती र छन्द गाती है। चको पीसनी हुई उन्द गाती हैं। विवाद में सुझाग मोर पोदिया उन्दों में गाती हैं। घर के लिए सेहरे पदों में रखे जाते है भौर पर से छन्दनियों पर उन्द धुटपाए जाते हैं। यहां तप कहें, विरह की पीटा छन्दों में, मिटामा छन्दों में, मृत्यु का शोशन्दों में, पिटाप पदों में पार यादों में गाए जाते हैं। उत्सयों में हर्ष के पढ़ाने पारे और शोक में भम्बर पाउपाल निमाल कर दुख के पौर मिटाने पारे होते हैं। इसीलिए सारी मायामों में मरनप्रिय शारे ।

४
Fमा तप गालिया माfare अम्बरमा
उन्नों में Rafrroristi
ITR भी अपग पर दमें मापार,
जो पोणे गरमान मोrfinitमादित्य में गमा
दुमा है और गप में भी गिर में विशेर
माम { गायत्री मादि) मी माए है।
पाकि
पन्दोंप दिगi ir earlपार में
दार दिपाया है। नए मायने में पर
गह है। पीछे, गहन के पियों न यदि दो में और
हा मरिन भए नए एन्दों में भी अपनी राय में।
सपी निमिए समपर FTII गर।
मम्मत में एन्दोरचना की जिनामा म मे पुराना प्रा. ओ
इस समय मिन्टना है, पिंगटापायं पा tarfrre
है। इसमें पैदिष और मषिक छन्दों के लक्षण मौर मेर
पतगप है। इस प्रकार पर गिरामागे इतना नाम
এই ফি ষ্টি বা ভর ফ যা যা যা
पिंगट महोदशाल पहो, एम दी पान ममाली जाती है।
मारत में अन्दा पी शिक्षा दिए पार भी
इस विषय का एक पूर्ण प्रय है। इसमें ममी प्रचलित छन्दों
के सदरण और दक्ष्य दिखाए है, और उन्दों में सर मी
पनलाए हैं। इसमें पर और विशेषता यह रफी है कि जिस
छन्द फाजो टक्षण किया है,वही उसपाहण्यमी।सस्में

भूमिफा
इस विषय के और दो अन्य प्रसिद्ध है, गादास की छदोमारी
और कालिदास का श्रुतवोध ।
हिन्दी में भीछन्दोमन्य यात सेरचे गए हैं जिसेमहाकयि
मनिराम फा छन्दसार पिंगल, फविराज मुपदेव मिध फा
वृत्तविचार,पलवीर का पिंगल मनहरण, कुँवर गोपाल सिंह फा
पिंगल प्रकाश, रसपुनदास पा वृत्तविनोद, मिपारीदास का
उन्दागर और छन्दमपारा, गोपाल भट्ट या पिंगटप्रकरण,
प्रजलाल महफा एन्दरताकर, पशाफर मट्ट कान्दमारी
इत्यादि, पर इन फा भय प्रचार नहीं रहा । आज फल श्री
जगनाय प्रमाद 'मानु' फेछन्द प्रभाफर,श्री अवध उपाध्याय के
नान पिंगट,धी पुत्सनलाल के मरल पिंगट,और प० रामनरेश
चिपाठीपी हिन्दी पद्यरचना का प्रचार है। नए ढग पर टिरो
हुए ये सप अन्य परीक्षार्थियों के लिये अधिक उपयुन हैं।
पे मयता मभी जारी और योग्य विद्वानों के नए प्रपत
उपयोगिता मया सररता पी एरिमें उत्तरोत्तरगचिर सफ्र
छन्द इसने ही हैं, इससे अधिक नहीं, यह
जान्दोमा
इपलान फमो दुन होगी। येदों में जितने
छन्द है, रासप से निरा पहुन से नये चन्द सम्रन
शायनाटकों में पाए जाने होड़ों में मदद या पर
ही मात्रा-नफाई महीनदिक सारन में मात्रा-छन्द
मोहिन्दी में कांन्द उसके अपने सम्म से

६ छन्दरतायली माए हैं, कई उर्दू से । भय नए उद न बनें, ऐसी कोई रोक नहीं । अक्षरों वा मात्राओं का जो भी तोल योलने-गाने में शोभा पाएगा, यही एक छन्द पन जायगा । हाँ, सस्कृत और हिन्दी में छन्दों के जो प्रस्तार दिये हैं उनसे एक एक छन्द के इतने भेद यन जाते हैं, कि दूसरी भाषाओं के सया सर्वथा नये उन्द भी उसके किसी एक प्रकार में आ ही जाते हैं। जैसाकि गालिय का यह उर्दू पद्य- रहिए अब ऐसी जगह, चलकर जहाँ कोई न हो। हमसुखन कोई न हो, और हम जयाँ कोई न हो। बे दरोदीनार सा, इफ घर बनाना चाहिए। कोई हमसाया न हो, औ पासयों कोई न हो। पडिप गर बीमार तो, कोई न हो तीमारदार । और गर मर जाइए, तो नोहयां कोई न हो। यह २६माधामोंका छन्द है। १२,१४ पर यति है । पहली पत्ति में 'रहिए और पांचवीं में 'पड़िए का ए इस्व योला जाता है । सो यह २६ मात्राओं के गीतिका छ द का एक भेद यन जाता है। पर सत्य पात तो यह है, कि एक ही गिनती के अक्षरों में गुरु लघु के स्थान-भेद और गनि-यति भेद से भिन्न भिन्न छद यन जाते हैं। जैसे १७ भक्षरोंके छन्द की ६, ११ पर यति हो और गुरु लघु का नियम य म नस * (पा. टि.) म न म य ज र स त, गल-ये अक्षर गणों और गुरु लगु के वाचक है। देखो प्रथम अध्याय का गण-विचार प्रकरण।

भूमिका
मट ग' के रूप में हो तो शिारिणी होता है। जैसे-
अनूठी मामा मे, सरस सुपमा मे सुरस से।
यना जो देती थी, यदु गुणमयी भूपिपिन की।
निराले फलों की, विविध दलयाली अनुपमा ।
जड़ी बूटी नाना, यहु फरवती थीं विलसनी।।
(अयोध्यासिंह उपाध्याय)
और १७ ही अक्षरों के छन्द फी ४, ६ और ७ पर यति
दो और गुगलघु फा नियम म मन त स ग ग के रूप में हो
सो मन्दाक्रान्ता होता है। नसे-
तारे ट्र, सम टल गया, लालिमा म्योम छाई।
पछी पोले,नमचर जगे, ज्योति फली दिशा में ॥
शासा खोली,सफल सर फो.यारि अम्मोजले।
धीरे धीरे, दिनफर को तामसी रात योती ।।
(मयोप्यामिह उपाध्याय)
इसलिए समानाचरन्दों में मो जय गनिर्यात एक
पूसरे में पिलक्षागहों तो उस पिसपना का मेद दिपटाने
के लिए माममेद होना उचित है मार गति-पति मिष्टमी
जुटती हों तो यदा समानावर एन्दों में एक छन्द के अनेक
मेरमानने चाहिये।
शाम्पस प्रन्पानाम री है। इसमें

८
छन्दरतालो
छ दहान म फाम माने याली सहा-परिमापार
छदानावली
सरल सुबोध भाषा में पहले लियदी हैं।
पीछे, छन्दों के वर्णा में पहले मात्रिफछन्द,
फिर अक्षर-छन्द या वर्णवृत्त दिए हैं। मात्रिक छन्दों में यह
क्रम रक्खा है-पहले सम, फिर मर्धसम, फिर विपम, पीछे
मानिकदण्डक दिये हैं। इसी प्रकार रणवृत्तों में भी पहले
सम, फिर अर्धसम, फिर निषम और तदनन्तर वर्णदण्डक
दिये हैं।
इस क्रम से मात्रिक छन्दों और वर्णवृत्ती का पूर
वर्णन करके, पीछे उमयछन्द दिये हैं। इनमें मानाएँ तो अपन.
गिनती में और वर्ण अपनी गिनती में पूरे उतरते हैं। सदन
न्तर मुक्त वा स्वच्छद छन्द दिये हैं। इनमें मानाओं या अक्षरों का
कोई बाधन नहीं,तथापि लय में पूरे उत्तरने से ये वैसे ही सुहा-
घने होते हैं। इस क्रम में छात्र-छात्राओं को कहीं झमेला नहीं
पडता। सारा विषय सरलता से समझ में आजाता है। लक्षण
सरल गध में दिये हैं, जो अपने आप समझ में आजाते हैं।
उदाहरण भी हूँढ ढूंढ कर सरल सुयोध और सरस दिये हैं,
जो झट समझ में आजाएँ, प्यारे लगें और कण्ठस्थ हो जाएँ।
छन्दों में यह चुनाव किया गया है, कि प्रसिद्ध छन्द
समी आ जायें । साथ ही अभ्यास भी दे दिये हैं, जिससे कि
छात्र-छात्राए इन छन्दों की पहचान में पूरे व्युत्पन्न हो जाएँ।
विधाधियों के लिए जो कुछ भी उपयोगी है, यह सय कुछ

भूमिफा ६ देने का यत फिया है। अप्रचलित या अल्पप्रचालित छन्द छोड दिए हैं ताफि विद्यार्थी अनावश्यक झमेले में न पढ़ें। हमें विश्वास है कि इस अन्य को सम्यक समझ फर विद्यार्थी छन्द विषय के न फेयल गूढ अन्यों को ही, परन् नप छन्दों को भी भली भांति जान जायेंगे।

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छन्द-रत्नावली
प्रथम अध्याय
छन्द-रचना
(1) गामान्य सान--उन्दों के पहचानने, सुम्पर पोलने,
गामौर रचने के लिए पहलेशन सामान्य विषयों का जानना
मापदपक है-मदर या वर्ण, गुद-रपु, गुण, माना, गति, पति
परम और तुफा
मतर
(मनिक ( Sounds)-मापा पनियों से बनी
पनियां दो प्रकार की होती एकजो मी पोती जा
गम्भीर समस्या है। 'गा, मो दोपनियां है।
पोनों किनी पूरी शनि कामापे पिता मागे मरेगे
भामरी ये भनि होगी जो तरीके
गी. अट्री मदी, पनको गन पाने

V
१२
छन्दरत्नावली
जैसे-'जागो' ये चार घनियां हैं-'ज् आ ग् ओ' इनमें से
जअ के साय और ग् ओ के साथ योला गया है। यदि मा,
ओ
को छोड कर योर्ट, तो उचारण होगा ज ग । ये फिर चार
ध्यानयाँ हो गई-जमग अ । म यलात् अन्त में योला गया।
क्योंकि व्यसन का अपना निज रूप इतना छोटा होता है कि
यह पफ पूरा उभारण, नहीं यनाता । पर हर एक वर एक
पूरा उच्चारण होता है।
३-अक्षर एक पूरा उशारण होता है । स्वर अकेला
भी और अपने साथ चौले जाने वाले व्यञ्जन वा व्यसनों समेत
मी पफ पक्षर होता है। आओ जामो, जागो, त्यागो, चारों
पद दो दो थार के उच्चारण है-आ मो, जाओ, जा गो, त्या
गो। सो चागें पद दो दो अक्षर के हैं। पर चिनियाँ क्रमश
पहले में दो मा ओ, दूसरे में तीन-जा मो, तीसरे में चार
ज् भाग ओचौथे में पाव-त्य या गू भो। साराशयद कि
हिन्दी में स्वर ११ हे- भाई ऐमो भौगये
११ अक्षर है। जैसे अष, माजे, इस, ईश, उस, ऊन, अषि,
एफ, ऐसा, मोस, मौर इन सब में मादि वर एक अलग मक्षर
है और स्वर से पूर्व एक या भनेक व्यञ्जन हों तो भी उन समेत
ये पफ एक ही अक्षर होते हैं जिसे 'क, का, कि, की, कु.
छ, के, के, को, फौ' ये मी एक एक अक्षर
लक्ष्मी' इन में कि क्ष्मी भी एफ एफ अक्षर मन्त में
यदि व्यसन हो तो यह अलग नहीं गिना जाता अपितु पूर्व
। 'मुक्त, मुक्ति-
AS

समा-परिमापा
.
-
स्वर फा भडही हो जाता है । सो 'मोम' एक अक्षर
गुरु लघु
गुय यहा या मारी; लघु टोटा या हरका । (फ) हस
(छोटे) अक्षर लघु होते हैं। सो अय, इम, उस, मुषि में आदि
के भाइ, उ, म और फय, फिस,फुल, रुनि में आदि के फ, कि
प.श. तथा फ्रम, फ्रिमि, थुति, स्मृति में मादि फेम, कि, थु,
स्म लघु है । ( ना दीर्घ अवर सप गुरु होते ६. मो 'भाज, ईश,
ऊन, पफ, ऐश्वर्य, ओस, और' में मादि फेमा, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ,
मो. सथा फाम, फीर फूल केश, फैसा, गोस, करय में भादि
फे का, की, क, के, के, को यो और ग्लास पास, पूर रेश,
लोक में भादि के ग्ला, श्री, म.गोरतो गुर हैं।
५-पाद (फ) इम्य लघु फहा है, पर जिस पम्प के
परे मपोग, मनुस्यार या विसर्ग हो यह गुर होता है। जमे
'कुत्ता, पस, दुम में 'क, क, दु' गुर है, क्योंकि मपोग से
पूर्व य पर शोर परता है इसलिए यह गुरुतो माना है और
र कानो पोगे में सए गुरु प्रनीन होने ही है । (ग) पाद के
मात्र मास मी, मायराना हो मो, गुग पदा और ना
माता है। जैसे-टीटा मुम्हारी मति दि विचित्र ।
(भानु पपि)
भनुम्रपाले एघु गुरु माने जाते हैं, पर पापित
पा
-
Amammunde

१४
छन्दरलायली
यह इन्द्रधना वृत्त का एफ चरण है। इसके अन्त में दो
गुरु होने चाहिये । यहाँ अन्तिम दो अक्षरों में चि से परे।
सयोग है, इस लिए 'चि' गुरु है, पर 'घ' लघु है । इसापादान्त
लघु को गुरु माना और पदा जायगा क्योंकि यहां गुरु वर्ण
आवश्यक है।
(ग) सयोग मे पूर्व के इसपर यदि जोर न पड़े तो यह
लघु ही माना जाता है। जैसे-
'लीला तुम्हारी अति ही विचित्र'।
यहाँ तुम्हारी के तु को सयोग से पूर्व होने पर भी लघु
माना गया, क्योंकि यहाँ तुम्हारी 'तुमारी सा पढा जाता है,
और तु पर जोर नहीं पडता । स्मरण रहे कि न्ह, म्हसे पूर्व
लघु प्राय हल्का पढ़ा जाता है।
सादर कहहि सुनहि धुध ताहीं।
यह चौपाई का एक चरण है। इसकी मात्राएँ १६ होनी
चाहिये । अब यदि हि,हि को गुर माने, तो मानाएँ हो
जाती है। अनुस्वार एक अलग घ्यनि है जो स्वर के उचारण के
पीछे नासिफा में उत्पन्न होती है, पर चन्द्रविन्दु कोई
पनि (वर्ण) नहीं । किन्तु सर दो प्रकार से पोले जाते हैं
एफ अकेले मुख से, दूसरे नासिका की सहायता से। इन दूसरों
को अनुनासिक फहते है और चद्रविन्दु इस बात का चिह
होता है कि यह स्वर अनुनासिक (नाक की सहायता से)
बोला गया है।
।

संगा-परिमापा
गुरु-लघु-चिव
६-गुरु का चिह लहरदार रेम्पा ' और लघु फा चित्र
खड़ी उही होता है। जमे का अर्थ है पहला गुय,
दूमय लघुसके उदाहरण होंगे-राम, विष्णु, फंस, दुस
इत्यादि । लक्षणों में गुरु के लिए 'ग' और लघु के लिए ''
योग जाता।
माना
७-छन्दों में रघु की एफ मात्रा भीर गुरु की दो
मामा मानी जाती है। उदाहरण-हर दो लघु-को मात्राए ।
'दीर' पहला गुरु दुसरा लघु-तीन माघाए । 'दीरा' दोनों
चार मात्राएँ ।'हीरादेवी' चारगुर-माठ मागाएँ ।माधिक
एनों में इसी प्रकार गुर फी दो और लघु की एक मात्रा गिन
कर मात्रामों की गिनती पूरी की जाती है। अमे-
।।11131
तुम मम भारत मनादि वर' में १६ मात्राएं हुई।
गण
--मधर-पन्दों में गुरु एफे म्यानपिन होगे रामय
पदि एक एक भार फरक गुरु सधु के स्थान मग,गो
प्रसपाटस्य नहीं रह मोंगे।हाट र जापा परेंगेम
पार प्रशारिखों में रह मोचाहिनीनगीन मदगें
काम मान लिया है। तीनो पर सीन

छन्दरक्षापटी
गुरु भी हो सकते हैं, तीन लघु भी हो सकते हैं, एक गुरु दो
लघु भी हो सफते हैं इत्यादि भेद से उनके ये भाउ मेद हो
सकते हैं । १ सर्व गुरु , २ सनलघु १, ३ मादि गुरु
5।।, ४ आदि लघु 155, ५. मध्य गुरु। 51,६ मध्यलघु
515, ७ अन्तगुरु ।। 5,८ अन्तलघु।।,मय और कोई भेद
नहीं हो सकता । ये गिनती में आठ गण और तुलना में चार
जोड़े पो हे। सर्वगुरु और सपलघु का पहला जोडा, मादि
गुरु और आदि लघु का दूसरा, मध्य-गुरु और मध्य-लघु
फा मीसरा, और अन्त-गुर और अन्त-लघु फा चौथा । इमी
कम से इन पाठ गणों के एफ एफ अक्षर के आठ नाम और
दो दो मिलाफर चार जोड़े नाम रको है--
न
5ss, III,II, 155,151,515, 15sst
मन मय
सत्त
हर एक अक्षर के आगे 'गण' लगाने से मगण, नगण
मगण, यगण, जगण, रगण, सगण, तगण ये आठ गण धने ।
चार जोड़े (मन मय जर स त) और यह क्रम याद
रखना चाहिये।
पहला जोडा
मन सन्गुरु संलघु
SSS
दूसरा जोड़ा
आदिगुरु आदिलघु
s1I 155

संमा परिमापा १७ सीसरा जोहा जर मध्यगुरु मध्यलपु 151 चोया जोडा सत अन्तगुरु अन्नलघु 15 मयमा यह दोहा * याद कर लेना चाहिए- मादि मध्य अवसान में, य रत सदा लघु मान। क्रम में होते म ज म गुय मन गुय लघु पय आन । भपरा इस सत्र को याद रखना चाहिए- यमाताराजमानसलग इम में पहले आठ मवर गणों के हैं। मन्तिम दो (ग) पु गुर के हैं। सप के लक्षण भी इसी में घट आए, इसके लिए मा तारामा दीयं भोर ग सानुम्यार पढा है। जिस गप का पालना दो,उसके प्रतिनिधि मदर फे मागे अगर दोमवर मिटा देने से उमस पपा जाता है । जमे यगण की पहचान लिए प मे मगले दो भवर मिल्गए तो 'पमाना' माइस में मादिगु मोर मन्त में दो गुरु।यही पगणा पES मगन की पहचान के लिए 'मामारा' डियापिनीनों गुर हैं। पड़ी मगाशमास सूत्र के मम में माठय मगन मिर मार्ग पदामो मादि में दो पु. अन्त में गुरु एमा, पही पानिमदोभारों में का • Kumar मार ला सामि पार | romitrea पा domraeka -amerm

.
--
छन्दरखापली
गुरु का याचक है।
सो छन्दों के लक्षणों में जिस छन्द के अचर तीन पर
पूरे विभक हो जाते हैं-जैसे ३, ६,६, १२ इत्यादि, उनके लिए
उसके रूप के अनुमार गण-अक्षर योले जाने हैं। यदि तीन पर
विभक्त होकर एक अक्षर यचे, तो उसके रूपानुसार 'ग' वा ''
बोला जाता है । ग-गुरु, ल-लघु । यदि दो बचें, तो उनके
रूपानुसार गग%D55 ल ल=i, ग ल ल ग=s योले
जाने हैं। वो लक्षणों में, मन भय जर सत गल, ये दस अक्षर
बर्ते जाते हैं। जैसे कि इस दोहे में कहा है--
मय रस तज भन गल सहित, दश भक्षर इन सीहि ।
सशास्त्र च्यापित लपो, विश्व विष्णु सों ज्योहिं ॥
(भानु कवि)
साम्प्रदायिक मर्यादाए
8-छन्द शास्त्रियों ने गणों के अलग अलग फल माने
हैं। जिनके फल शुम हैं वे गण शुभ और जिनके फट मशुम
है ये अशुभ माने जाते है । अशुमों को छन्द के आदि में
नहीं रखते।
नीचे दो प्रमाण दिये जाते हैं। दो दोहे और एक गीतिका
दोनों में पहले गण का नाम, फिर उसका देवता, पीछे फल
पतलाया है। दोहे या गीतिका में से कोई एक कण्ठस्थ कर
लेना चाहिये।
(6) मगण भूमि रक्ष्मीय जल पाये आयु विशेष ।
र पायक ताफल जलन, सगण यायु परदेश ॥
.

सहा परिभाषा तगण व्योम हे शून्य फल, गण भानु कम होय । नगण वर्ग मुसमद, म शशि, देत पशाहिहि सोय ॥ (२) मगण पृथ्वी सासफल थी, यगण जल भायुमद । रगण पायक दाह साफल, सगण यायु घिदेशद ।। सगण व्योम तु शून्य फल युत, जगण मादिन रामफल। नगण स्वगं सदा सुप्रसाद मराशि देये यश फल । गों के देवता, फल और शुमा शुम का स्पष्टीकरण निस मारिणी से जानो। गण उदाहरण देवता शुम परम १मगण 555 पोशाग पृषी टरमी २मगण एमण या। 157 सुमित्रा र आयु ५जगण 151 महा गेग सगुन ६गण SIS मा ७सगण | पिमा थायु विदेश मापाश साप उभागुम अपर १ ९पर तुम माने जारी है। प्रयानों में ये गुम है- पचगमापन राम! और पं.९ प्रम- " . " , "

२०
छन्द रमायली
अशुभ अक्षरों में भी भरपह, इन पाच मक्षरों को
अधिक हानिपर माना है । मशुभ गणों और मशुम भदरों
को छद के आरम्भ में नहीं रखते । पर देयता या मङ्गट.
पाची शब्दों के प्रयोग में यह दोष नहीं रहता और मशुम
मक्षर दीर्य हो, नो भी दुष्ट नहीं माना जाता । जैसे पहला
अक्षर श दूपित है, पर झा पित नहीं होता । यदि किसी
पर्ण वृत्त में टक्षण के अनुसार आदि में अशुभ गण माता ही
हो तो यह दुए नहीं माना जाता।
मात्रिकगण
११-प्राचीन छन्द लक्षणों में मात्रिषछन्दों के पाव
गण'ट ठ ड ढ' मान फर लक्षणों में उनको यर्ता है।६
मानाओं के लिए ट, पांच के लिए ठ, चार के लिए ,
तीन
के लिए ढ, दो के लिए ण, पर माज फल ये नहीं बन जाते ।
मात्राओं की गिनती ही फह दी जाती है।
गति-यति
१२-(क) हरएक छद की एक चाल होती है,उमे गति
कहते हैं। जैसे चोरोला के एक चरण में १५ माघाए होती हैं
और अन्त में लघु गुरु होते है । सो यदि हम यह पाठ पढ़ें-
सदा उन्नति की गैल गहो।
समाज में नेता बन रहो।
तो यह चौवोला छन्द नहीं कहलाएगा। इसी को जब
३
-
-

सहा परिमापा
--
ऐसा पढ़ें-
सदा उन्नति की गरे।
नेता पन समाज में रहो ॥
तो इसम चौमीरा की गति मा जाती है। गति को
फान पहचानते हैं और यह पदचा अभ्यामना होती है।
(म) यति विराम मय टहराय को फहने हैं। पाद के
गग्त में तो मभी उन्दों के यति होती है, पर य छन्दों में एफ
ही पाद में दो या तीन यतिया होती है। पति के अनुसार
विराम करऐ पोटो से उद मधिक मुहारने यन जाते हैं
देमो शिरिणी अरमन्याप्रान्ना के उदाहरण छ ।
चरण
१५-(
कन्द की एक पूी चाट को शरण पार या
पर पाइने ६.घरस पाप गार होते हैं। मे-
(१) मात्राभों पा सुगति उद ।
शिव शिव पहो, पदि सुष, महो।
जो एमसी मो मुगति ॥
'मानुषवि'
(1) मायामों का गीतिका छन ।
मम मममी म पनी हामहीं।
पर बना एमालमपान परमात
दार गायों में मपाना मागना मागामड़ी।
पागल भी दाना नही।

२२
छपरसायली
'प्राय' कहने का अभिप्राय यह है कि चार चरणों का
नियम सार्वत्रिफ नहीं । कुण्डिरिया छन्द छह चरण का होता
है। लोफोतिया कई एक एक चरण की प्रसिद्ध हैं।
(ख) दोहा, सोरठा आदि जो छद दो दो पक्तियों में
लिखे जाते है, उनकी हर एक पक्ति को दल कहते हैं।
अन्त्यानुमास चा तुक
१४-पादान्त के अक्षरों क मेल को तुफ कहते हैं।तुक के
चिना भी छन्द प्यारे लगते है। वाल्मीकि, फालिदास आदि
सस्हन के प्रसिद्ध कवियों ने तुफ का मिलान नहीं किया, तो
भी उनके छन्द घड़े सरस हैं । कारण यह कि एक तो ये
छन्द की गति-यति फो रे तोल में लाते हैं, दूसरे उनकी
फयिताए रमपूर्ण होती हैं। पर यह भी भूलना नहीं चाहिए,
कि तुफ के मेल में रस घढ ही जाता है । सस्कृत के फपियों
ने जहा जहां अत्यानुप्रास (तुक) या है, पहा माधुर्य बढ़
ही गया है। गीत में तो तुक पहुन जरूरी मानी गई है ।
सस्थत में चपटमजगे और गीतगोविन्द ये दो प्रसिद्ध गीत-ग्रन्थ
हैं । इन में तुक पर सर्वत्र पूरा ध्यान दिया है । हिन्दी कविता
में भारम्म ही मे तुफ के मिटान पर पूरा ध्यान रखा है, अत
एव हि दी में विन तुक के छन्द नाममात्र हैं, पर हैं सही । सो
एक भेद तो बिन तुप के उन्दों का हुमा,दूसरातुक वालों का।
तुफ बालों के फिर पाच भेद हैं। (२) चारों चरणों में तुक का
मेल (२) पहले दूसरे, तीसरे चौथे और यदि छ' चरण
हो तो पाचवे छठे चरणों की तुकों का मेल (३) मम चरण

संशा-परिमापा
(२,५,६) की तुफों का मेल (४) विषम धरणों की तुरुका
मेल। (५) दो यलों की तुक फा मेल। इन सब के उदाहरण
जमा नीचे दिए जाते हैं।
(क) निरित्ति दोनों तुप-हीन पध प्रमश द्रुतविलपिन पौर
मन्दामान्ता वृत्तों में है।
(१) किम्मतपोपल से किस पाट में।
सब पना मुरली पटनादिनी ॥
अपनि में तुम कोरसनी मिली।
मधुरमा, मृदुता, मादारिता
(२) मा के पागा, परिसदन में, येठ जाता पहों भी।
मो तन्यगी, उस मान पी, यो उमे भी सुनाती।
जोमाने हों.पर हथे, फाफ मो थेट जाम्।
में धान पाशी इन नु, दूध भी मान दगी ।
(मपोयासिड तपाप्याप)
(७) धारों परजों में समान तुम पारे।
दिकपाल उन्न
पापम सग भी।
गमभूमि में एनीमे दाना॥
दीपन परमा पा, पीर सामने है।
कप नदी महरा, परम निमा
(शनिपाडी)

छन्दरतावली गेला छन्द शथि पिन सभी रैन, शान विन हिरदे सुनो। पुल सूतो बिन पुत्र, पध यिनु तरुवर सूनो । गज सूनो इक दन्त, और यन पुहुपपिहूनो। घि साविन वेद,ललित पिन शायरसुनो। इम्स में तुफ 'ऊनों है। (घेताल) (ग) प्रमश दो दो पदों की तुक । चौपाई (१) शठ सुधरहि सत्सङ्गति पाई। पारस परसि कुधातु सुहाई ॥ विधि पश सुजन पुसङ्गति परहि । फणिमणिसम निजगुण अनुसरहि ॥ (तुलसीदास) (२) रहिये लटपट फाटि दिन, यरु घामे मा सोय । छाँह न पा की थैठिये, जो तह पतरो होय ॥ जो तर पतरो होय, एक दिन धोखा दे। जा दिन यहे ययारि, टूटि तय जर से जैहै ।। कह गिरिधर फपिराय, छोह मोटे की गहिये। पत्ता सन झरि जाय, तक छह मा रहिये । (गिरिधर कविराय) (घ) सम चरणों (२,४,६) की तुफ- सहा-परिमापा २५ रिचाना उद मनोखी यात है सेरे निराले प्रेम यन्त्रन में। उस पर मन उटगन में जगन को पार करते है ॥ महोती मागोमरी या माझ्या पाहोना । उनी मे दीन ा दिन रात हाहाकार करते हैं। हमें नमींचो ये मामुमों से पंजीयन का। जगत के साप मा दम तो यदी उपचार करने। (रामनरेश त्रिपाठी) सोरठा (छ) विपन चरणों की तुक-- रहिमन, मोहिं न सुदाप, थमी पियायन मान पिन । पर पिप देय पुगेप, मान महित मरियो मगे। (रहीम) (स) दो दमें पी तुष पा मंट- दोरा बनगा पाही पीर जी, माना गौरय-मान। पारधारोमानी. निराशा (शरिपाटी) परमानों की तुओं के मतिरिम चरण के पार की पहिलों में मौतों गुरु पाई जाती- पया माता पुदि की, मीमी रोटी, मल पर - ।

२६
छन्दरलावली
कीजे शिशुलीला, अतिप्रियशीला, यह मुम्ब परम अनूपा
सुनि वचन सुजाना, रोदा टाना, दुइयाटफ सुररूपा।
यह चरित ज गारहि हरिपद पायहि ,तेन परहि मनपा
(तुलसीदास)
छन्दों के भेद
छन्दों के चार मुख्य मेद हैं -मात्रिफ, अक्षर, उमय और
मुक घ स्वच्छन्द।
(क) मानिक छन्दों में मात्रामों फा तोट होता है।
इसके अान्तर मेद तीन है-सम, अर्धसम और विषम !
जिनके चारों चरणों में एक ही लक्षण घटे, घे सम, जिनके
पहले चरण का लक्षण तीसरे के साथ और दूसरे का चौथे
के साथ मिले, वे अर्धसम, और इन दोनों से मित विषम
कहलाते हैं । माथिफ का दूसरा नाम जाति है।
(घ) अक्षर छन्दों में अक्षरों फा तोल होता है। इनके
भी मात्रियत् तीन अवान्तर भेद होते हैंसम, अर्धसम
और विषम । अक्षर छन्दों का दूसरा नाम वर्णवृत्त है । मात्रिक
छन्द यौर वर्णवृत्त इन विभिन्न शब्दों के प्रयोग में दोनों में
मेद् अधिक स्पष्ट रहता है, इसलिए भक्षर छद के स्थान पर -
प्राय वर्णवृत्त प्रयुक्त होता है।
मानिक सम और धण सम छन्दों के दो दो अचान्तर
भेद हैं साधारण और दण्डकीमात्रिक छन्दों में ३२ मात्राओं
तक साधारण, उसके बागे दण्डक, और वर्णवृत्तों में २६ घणों
तर साधारण और उसके आगे दण्डफ कहे जाते हैं।।

समा-परिमापा
(ग) उभय छन्दोम मात्रा नियम और पर्ण-संख्या दोनों
पा ध्यान रपणा जाता है।
(घ) म्यच्छन्द उन्दों में रष्टि केयर ग्य पर रहती है,
मार कोई पन्धन नहीं होता।
नीचे फेछन्दो वृक्ष में इन मेदों का पट्टी फरण है।
।
वर्ण पृष्ठ
उमप-छन्द स्वच्छन्द
था
1
सम अर्घसम पिरम सम मघमम पिपम
1
।
माधारण पण्यफ माधारण एयर
मरिफर मरम्म मो एक दी मात्रासे हो जाते है, जैसे-
प्राग. द्विमाधिपापमप. अध, पय।
सपा-या, मामामी प्रकार पण मी एकप मे
भारमल है। परतर पर हरयार हैं। इनमें कोई
माम पूरा नहीं हो पप्पाइने पे लिए माधि मन्द पड
मावानी में मोर माप दापनी भारम्म दोले।
माधयों पार पाईमा उदाहार-द्वेषामप
Kare आजीन || धौरान
Timi में मामा म
(Rituठी)
-

-
छन्दरत्नारली
भय छन्दों के प्रत्येक प्रकार के उदाहरण दिए जाते हैं
(१) माग्रिक समछद-२८मायाओं का विधाता छन्द
मलाई फो न भूलेंगे सुशिक्षा को न छोड़ेंगे।
हठीले प्राण खो देंगे, प्रतिज्ञा को न नोड़ेंगे।
पढ़ेंगे प्रेम क पौधे, दया के फूल फूलेंगे।
भरे मानन्द से चारों, फलों के झाड झूटेंगे।
(नाथूराम शकर)
(२) मात्रिक अर्धसम दोहा । चार चरणों में क्रमश
मात्राए १३, २१ । १३, ११ ।
प्रातहिं उठिके नित्य निन फरिये प्रभु को व्यान ।
जात जग में होहि मुख, अरु उपज सत शान ॥
(३) मात्रिक विषम १५२ मात्राओं का छापय छन्द ।
जहा स्वतन्त्र विचार न बदलें, मन में मुख में।
जहाँ न याधक यनें मरल निगगें के सुप में "
सब को जहा समान निजोन्नति का अवसर हो।
शान्तिदायिनी निशा हर्पसूचक वासर हो।
सर मौनि सुशासित हों जहा, समता के सुनकर निय
यस, उसी स्वतन्त्र प्रदेश में, जाग हे जगदीश हम।
(रामनरेश त्रिपा-
(४) पण समवृत्त-मुजगी ( य य य ल ग वर्ण ११)
समुत्थान का ज्ञान ही मूल
यही मूल है।
सुशिक्षा जहा है वहीं सिद्धि है।
।
इमे भूल जा

सश-परिमापा
२६
जदा मिरिद होगी पदी द्धि है।
(मथिरीशरण गुप्त)
(२) यणार्धखम-पुषिमाना-(from चरण नन र य, मम
धरणनजर ग)
फिरि फिरि भ्रमिदं मवेली।
रिधि यह फोन प्रकार का चमेरी।
रंग धमि नल-पापुरा क।
हुपति तु पुष्पित भाग भांगुरी के।।
(मिमारीदास)
(३) पर्ण-विषम-मरमर-(प्रथम चरण पसरवितीय
नसग, चतुर्य मम जग)
सपन्यागिपे मसन मरण गहिपे सदाहरी।
परेर मर जायटरी। मजिये अदा निगिरी हरीहरी
(मानुपति)
उभय-न्द
(मात्रफ हरिणीरिया में पर्ण-ग्या समार)
पर, ड, चामल, सर, तु, पका-मन्द।
सभाम, सप, मुपर्य, मरिममिप TOP
मासन माम मा पल्याड, मू, बिम, मुगना ।
बनार, मारकरी पर पा उपरा॥

छन्दरत्नावली मुक्त छन्द मर देते हो- पार-धार मिय, फरुणा की किरणों से, शुन्ध हृदय को पुलकित कर देते हो। मेर अतर में आते हो देव निरन्तर, कर जाते हो व्यथा भार लघु घार-यार फरका पढा पर, अन्धकार म मेरा रोदन, सिक धरा के अञ्चल को, फरता है क्षण क्षण- कुसुम-पोलों पर वे लोल शिशिर फण; तुम फिरणों से अथु पोंछ लेते हो । नव प्रभात जीवन में भर देते हो। (सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला')

द्वितीय अध्याय
मात्रिक-सम-छन्द (साधारण)
जिन मात्रिक छन्दों के चारों चरणों में माना नियम
मान हो, ये मानिक मम-पन्न होते हैं।
(१) तोमर
(4) अप में मधुर रसार । पर में समा पार !
(समय में मौनि दिसुजन पी पद गति
(रामनीत मिणटी)
मोमर प्ररपेप परम में १२ मात्रा होती मष
पार मन्तिम दो पर्व गुणधोने । रे-
(स)माम शिरोपर मोरिन परिपाय ।।
पिन र पवित्र ।।
(in मानदंग। एएमा के मरमा
RRIE भनि । घर मा ।।
सायकल त्रि
।

छन्दरत्नावली
(घ) मुनि मान मानस हस । जप जोग जाग प्रशस ।
अग माम हे दुप जार । सुख है कहाँ इहि काछ ।
(द) सहँ राज है दुसमूर । सब पाप को अनुकूल ॥
अब ताहिरै पिराय । फहि कौन नरकहि जाय ।
(च) चहुँ माग बाग तडाग । मय देखिये यह माग ।।
फल फूल सों सयुक्त । अलियों रमे जन मुक।
(छ) सुनि रामवद्र कुमार । धनु आनिये यहि बार ॥
पुनि वेगि नाहि चढाव । यश लोक लोक बढाव ॥
(अ) सह भरत लक्ष्मण राम । चहुँ किये आनि प्रणाम ।
भृगुनन्द आशिप दीन । रण होहु अजय प्रधीन ।
(झ) सुनु राम शील समुद्र। तब वधु है अति क्षुद्र ।
मम पाडगनल फोप । अय कियो चाहत रोप।
(अ) तुम क्यों चलो यन माजु । जिन शीश राजत राजु ॥
जिय जानिये पतिदेव । फरि सर्व भातिन सेव ॥
(केशवदास)
२ उल्लाला (अन्य नाम चन्द्रमणि)
उल्लाला छन्द के प्रत्येक पाद में १३ मात्राएँ होती है।
१ उलाला नामक एक मात्रिक अर्धसम छन्द और भी
है। नाम-साम्य के कारण छात्र प्रायः गड़बड़ में पड़ जाते
हैं। इस थे तो सब चरणों में १३, १६ मात्राएँ होती है,
"परन्तु उस के विषम चरणों में १५५१५ और सम में १३, १३ ।
इस में उस में यहीअन्तर है।
-

- •r मात्रिकामम इन्द पाद के धन्तिम यणों में गुरु लघु फा कोई विशेष नियम नहीं । होता। दो, ११ घी मात्रा मपय लघु होनी है । जर्म- । (क) उरना होगा इंश में, और दुग्यी पी हाय में। निना होगा टोर पर, गम गीति अन्याय मे ॥ (स) पाली मशिर माम६, प्रेम पथ है दृर पा। मुगना मम या यही, मुली पर मन्मूर पा ॥ (1) मत-मिलिन्द मुसी पन्द फे, मरल मचल ईम पर गये। माण ग सो सौ पर, न्योछावर हा पर गये ।। (घ) जीवन में पम मेम हो, जिमया मालागर हो । सय गोपाहार हो, इनाम पर भारतीय (२)होगा मन प्यास कहीं, हम मानिन शिया में। अपने मात्र पर अटट, रहना पस मran (पो में भी गालिया, न अनुमय से पाएगा अम-सरि मे देपा, मारामाभा जायगा ! (परामाद) -- मी एन्थे मोष पाए में ४ मा महादर एम परदेशन में माय (1) पायगा15) करता मापारे- मामा में मुरे रनुग-पग रे मानी . videeo avi+ Searn ।

(ख)
उन्दरक्षायली
क्यों ध्यान-मन तुम येठे,
भर फर फूलों से डाली।
सुन्दर फूलों की फुहियो,
झर-झर तुम पर झरती हैं।
नत-मस्तक वृक्ष खडे हैं,
पत्तिया पयन करती हैं ।
(गुलायरत पाजपेयी)
फ्यों छलक रहा दुख मेरा,
ऊपा की मृदु पलकों में ।
हा ! उलझ रहा सुप मेरा,
सध्या की घन मटकों में॥
उच्छ्वास और आसू में,
विश्राम थका सोता है।
रोई माखों में निद्रा,
मन फर सपना होता है।
सन्या को मिलन प्रतीक्षा,
फह चलती कुछ मनमानी ।
ऊपा की रक निराशा,
कर देती मन्त फहानी ।
फिर विश्व मागता होवे,
रे नम थी खाली प्याली।
तुम से कुछ मधु की बूँदें,
(
ड)
(च)

मात्रिषा मम न्द
सोटा रेने को गली ॥
(अपराहून प्रमार)
(छ) सप घर घर की प्रजनारी।
दधि गोरम पेचनहारी ॥
मिल
मर मन कीन्हा ।
जमुना-सट मारण लीन्दा ।
(प्रजधामी दार)
2. हानि
उन्द के हर एक चरण में १४ मात्राएं होती है।
मग्निम वर्ग गुरु होगा शाम के पाद मती पीने के
मनन्तर एक गुरु माता| जैसे-
"पापन-मारन जीपा का,
मिल पना
आता में भी पर्दा,
माता ॥
गोर x पर भी
विपदी दोपय पर ,
पirre दीपिपु-मुत की,
गीमा भी शुरमा गुग की।
गत गरम हा
REET याम महा।
OR OM
-

सदरतापली.
बुद-फली-से रदन अहा।
(मैथिलीशरण गुप्त)
जहा मव चरणों में नोन तीन चौकल नहीं होते, वहाँ सो
छन्द को भागय कहले से-
मानव
(1) सीता ने सोचा मन में-
"स्वर्ग बनेगा अब यम में !
धर्मचारिणी गी मै,
धनविहारणी दगी में ॥"
साँप सिलाती थीं अलक,
मधुप पालती थीं परफे,
और पोलों की झल,
उठनी थीं छवि की छल ।
(ग) "मैंझली माँ तू मरीन क्यों?
लोक-लाज से डरी न क्यों ?"
टक्ष्मण ने नि.श्वास लिया,
माँ के जान सु-चास लिया !
(मैथिली शरण गुप्त)
५. मधुमालती
१ ऊपर १४, १४ मात्राओं के तीन छन्द दिये गये हैं-
सखी, हाफलि और मधुमालती । एक तो सीनों की गति
पृथक् पृया है और दूसरे सखी के अन्त में मगध (555)
--

मात्रिक-प्रम छन्द
मशुमाउनी पद के प्रत्या पाद म १४ माशार होती है।
यमि (विराम)पान, सामाप्राओं पर होनी है। प्रत्यक पाद
के मन में रगण (SIS)होमासे-
(क) है कार्य पूर्ण न एक भी
किम मानिसों, जायें अमी।
पानी की सायगी,
यदर यादी नाय
(ग) सनया समय ऐमें यो
हर मांद गारी है मरे,
जिम में फिम, फिर र पगे:
गोम्मापा यो मेंगे।
(रिपारामारण)
মালগ মূল বা স ম যদি চাপা কান্ত
नपों में पहीं बदों के मध्य में दीपmti
मागे पाशिर्षमान की नि-fruी की
पिपराभीमापारणे।
-
शE (1), ET D E गुर र
पौर मीन में राशन
गरे ।

छन्दरतावली
६. चौवोला
चौबोला उन्द के प्राइक चरण में १५ माघाए होती है।
अन्तिम दा वर्ण प्रमश लघु गुरु होते हैं । जैसे-
(क) मित्र सफल निज जीयन करो
हृदय पीच शुभ गुण-गण धरो।
गैल सदा उन्नति की गहो,
नेता यन समाज में रहो ।
(रामनरेश त्रिपाठी)
७ चौपई (अन्यनाम-जयकारी)
चौपई के प्रत्येक पाद में १५ माघाए होती है। हर एक
चरण के अन्तिम दो वण क्रमश गुरु लघु होते हैं। जैसे--
(क) करके शिक्षा कार्य समाप्त,
विद्यालय की पदवी प्राप्त
फिर तुम प्रामों में कर वास,
ग्रामीणों का क्रो विकास ।।
(ख) हिन्दू युवक उठो तुम याज,
रक्लोनिज समाज की लाज ।
हो तुम पर विभु की यर वृष्टि,
लगी तुम्हों पर भाशा इष्टि।
(ग) या मुंद न पीटो रीक,
सोच समझ देखो तुम ठीक ।
करोन असमय का भालाप,
-

मात्रिफ-ममन्द जो तुम कोही कोन माप॥ (प) मारम-सपटा परी मयुनि, दिन्द्र तुम्द मिलेगी मुकि । भागी में यद शामि जिस पर होसपी मनु (अ) समी प्रपाध, प्रमोद मे मारत मा पो गोद । मि पर फे उपजे माग्य-माय () অন্য নাম পা যায় না, पपा गुरप की मी पर भाग। . सिर हुए म प अपीरम (मपिटीशरण गा) ८. गुपाल (ना-मुमगनी ) सुपा के प्राय १४ मा होगा मान में malamma १. Xxx L PARE- Pा पो र गुE | Res, पुर, भोर में में अन्य

४०
उन्दरतावली
इस के आगे? पिदा विशेष,
हुए दम्पनी फिर अनिमेर।
कितु यहाँ है मोनियोग,
वहाँ कहाँ का निराहनियोग ?
(मैथिली शरण गुप्त)
९ पादाकुलक
पादाकुलक क प्रत्येक चरण में १६ मात्राएँ होती हैं।
हर एक चरण म चार चार सौष्ट होते है। जैसे-
(क) वायस पालिय थति अनुरागा।
होद निरामिप क्यहुँ कि कागा ।।
सन सहहि दुख पहित लागी।
पर दुम्य हेत असन्त अभागी ।
(ख) सेवक सुप चह मान मिसारी ।
व्यसनी धन सुभगति व्यभिचारा
लोभी जस चह चार गुमानी ।
नम दुदि दूध चहत ये पानी ॥
(ग) सुमति कुमति सय के उर रहहीं
नाय पुरान निगम अस फहही ॥
पहा सुमति तह सम्पति नाना
जहाँ कुमनि तह विपत्ति निदाना
(घ) निमुखानि म
परस फि होइ विहोन समीरा।

मात्रिक-मम उन्द पनि मिद्धिजिवितरिम्यासा। पिन रिभान पिमयमय नासा । (तुलसीदान। (:)शुम सर शोमै गनिमनगम । मरसिन परे अतिरम गरे । जनचा मोम या गग गोले। परणिम आदि उर अरमाही || (गरदास) सपन पदों पर चरम में चार चार प्रोपर। rrn fre'' मधम चरसीदी परीक्षा पर। र ५मामा पापना। जाग) TER h क र " H सारी १०. पहि परिपार पाप पादपक मेरम प्रदेश पारRAIEEEnt- . fair frमा मगुदव मोर- (सस vिran

छन्द्रनारटी
(ख) पर इन विहंगों में एक फीर ।
धा अग्रगण्य अति धीर चीर।
तरु पर नितान्त रह कर स्वतन्न ।
नित जपता था यह यही मन्त्र ।
(ग) “जय तफ तन में प्राण शेप ।
तय तक न तनूँगा मे स्वदेश ।।
तज बहमार का घृणित गर्य।
इस पर या सय युछ सगर्व ॥"
(घ) रथ को नज धर कर विप्रवेष ।
शुफ निकट पहुँच घोले सुरेश ।।
'तू क्यों देता है यहा प्राण ।
जा अन्य स्थल को शुफ सुजान ॥"
(ड)"मैं जमा था इस पर अयोध।
पाया इस ही पर सृष्टि-पोध ।।
इसने ही दे फर पर विशेष ।
है मिखाया उडना सुरेश !
(च) वे मृदुल मूदुल हैं याद डाल।
जिन पर बीता था पाल पाल ।
ये मौर युक्त वे छदन हाल ।
से भूलूँगा ये रसाल ।
(छ) ना कर जिन को मै शुको सग ।
यौवन में करता राग रग ॥
हैं याद मुझे ये दिन अतीत ।
.

मात्रिक सम छन
होती जप घाम शाम ॥
(ज) पर स्यय पान पर मयं ।।
पा मुरे पनाता है सुरेश ॥
जप दुमा अषिचन यही मान ।
अप मिटे निन्यमान्य मान॥
(अ) सब छोड़ उसे जाना मुरक्षा
हमानी दिल भपया विशेष ॥
इमोशना पति निधन।
स पर मर मिटना देण्यधर्म।
मेमे म स्याण गुनातीर ।
हसन स्पागे भामु अपीर ॥"
(गोमिया)
". जापाई
यौपाई परमें १६ मात्रा होगी।
गुरुपुमा गोपनिम महो। भोपाई दी
PM और गौर रो पति (पत)
Frers कोहली है। मन पर
TantITA RE पर कि पर
मे पार पार
Hiren feी ! 3 4
मागे पानी पोरीnir TIRTR is

सदरन्नायरी
रचा में इस यात पा ध्या अश्य रहना है कि मम-कर के
पी सम-यन्त पाए । यद प्रियम महर आ जाए, तो उन
के अनन्तर विषम प रय पर सममा फरही नाती है। इसक
पदों के अन्त में गुर रघु (51) कभी न होने चाहिए । जैसे-
(क) यिनु सताय न याम नसाहीं।
काम मन मुग सपने नाहीं॥
राम भजन यिन मिटहि कि यामा।
थल विही नरु फयहुँ कि जामा ।।
(ग्व) सुनु जननी मोर मुन पहभागी।
जो पितु मात यचन अनुगगी।
ननय मातु पितु तोपन हारा।
दुलम जननि सफल ससारा ॥
(ग) धन्य जाम लगतीतल तासू ।
पितहि प्रमोद चरित सुन जासू॥
चारि पदारथ कर तल ताके।
प्रिय पितु मातु प्रान सम जाके ।
(घ) तर प्रेम फर मम अब तोरा।
जानत प्रिय एक मन मोरा।।
सो मन सदा रहत तोहि पाहीं।
जानु प्रीतिरस पतन्हेिं माहीं ॥ ।,
() घरन धर्म नहि आम चारी ।
स्मृति-विरोध रत सय नर नारी ॥
५
है

माधिक-सम उद
हिज नि येसमा भूपं प्रशासन ।
फोउमहिमगिम गुमायन ।
(च) मारगमोर साप और माया।
पनि सोही गाल पापा ।।
मिप्यारम दम्म-रत जोई।
साझा सन्त माहि सपनोई ।।
(0) मोर सपान को पर पादारी।
जो पर दन्म मो पर माचारी।
जो भूट मसखरी जाना।
पनि जग सोर गुपयम एRIT
() निराधार यो पापमया
परिग मोरपानी परागी।।
मामा माजदा विमा
म
immuireदिया।
१२ गदा
rasia
Me'
-- १६ मारधारना ime
mart IIT, MR में
RRENT 1 ritr पार
भारत Twe ti-REE
PRETTE

छन्दरमावली शृङ्गार द क प्रत्येक चरण में १६ मात्राए होती है। प्रत्येक पाद के प्रारम्म में त्रिफल और विफल (३+२ मात्राए) तथा अत में गुरु, लघु (51) अवश्य माने चाहिए । जैस- (क) हरित धन पुसुमित है द्रुम-वृन्दा घरसता है मलयज मकरन्द । स्नेहमय सुधा दीप है चन्द, मेलता शिशु हो कर आनद । (जयशङ्कर 'प्रसाद') (ख) गूंजते थे रानी के फान, तीर-सी लगती थी वह तान- पद्धरि समझना चाहिए, परन्तु वर्तमान करि इसकी चाल (गति) को ही प्रथान मानते हैं और चौकल तथा नगण के नियमों की उपेक्षा भी फर देते हैं। यदि चौकल-नियम पूरा न हो भौर अन्त में गुरु, लघु न हों, तो वह चौपाई होगी । यदि चरयों के आदि में त्रिफल और विफल तथा अन्त में गुरु लघु हों तो उसे शृङ्गार समझना चाहिये। पन्द पढ़ने वाले छात्रों को चाहिए कि वे छन्दों के उदाहरणों को ऊँचे स्वर से बार बार पढ़ा करें। इससे विविध छन्दों की चाल उनके मस्तिष्क में स्वयं ही अक्ति हो जायगी और समय पाकर चे ध्वनि मात्र से ही पता सकेंगे कि अमुष पथ किस छन्द में है।

मिरर
13
'गररा-से सुन पर भी समेछ।
पुष्पा सकन उन्हें जो गेह ।
(भपिलीशरण गुप्त)
(ग) र रदता मौरी पा माझान,
नहीं रदता फूलों का गल।
कोपिमा नी मारधार,
राग आला पारा -गाज"
(घ) सिने. मुरक्षाो घो पर,
अपय होगा छिपने की पर।
नामे मेर
पर अपना रोने को मार
(मी दमां)
पदपार्टी परयों में 13,१. मागी।
मा uTERP12-
(2) र शार, द प्रो.गे।
कोपरामरची, घिर योग
किमी में गिरी।
for frien. fari
REVI

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माभिषा-समन्द
दिया शमु के पाय पंकज नहीं ।
पिशायाफ सहायक मदिरा पहों।
मनों राम मादके पर पो।
दिया जिापुम पौत के नंद पो॥
(धी पराम)
१५. पीयूपार्ष
पीपुल्य र प्रत्येक पाय में १६ माघार होती हैं। १० मार
९ मात्रामों पर पति होती है। चरपाल में "गु, गुम होने
-
Ma की धार, मैनी पक्षियो,
टीकमी पार, मापा-भूतियाँ।
এ বে-বৃহ শুষ,
সাহ ম মুমি, মা ও
पपिपामय दलि, गुगामार,
परमीनिपानिपगार दे.
द्वारा की पदप-पत्री मा.
रामसारों में नजर
(पिटीशाय गुण)
tner: RAEE RLY गुरकी
ओर What arm, Trirm भाषा
पर है। मात्र में दाrikar Arr का
भिष, FATER MYR TERE मार्च

१०
।
(क
)
(ग
)
इन्द्रजाधली
आनदवर्धक
हाय हम ने भी युलीनों की तरह।
जाम पाया प्यार से पाले गये ॥
सी-यचे फुटे फले तब क्या हुआ।
फीट से भी नीचतर माने गये ।।
छोड पर प्यारे पुराने धर्म को ।
हाज ईसाई मुसमाँ हम धने ॥
नाय, पेसा यह निराला न्याय है!
नो हमें सानन्द सय छुने लगे ।
(रामचन्द्र शुक्ल)
मारी सी जंगुलियों में यह कला,
देख कर में धयों न मुध भूलूँ भटा?
क्यों न अब मैं मत्त-मन-सा झूम लूँ ?
फरममल लामा तुम्हारा चूम लूं।
(मैथिलीशरण गुप्त)
१६. सुमेरु
१ ऊपर १६, १६ मानाओं के इन दो छन्दों का वर्णन
किया गया है-पीयूप-वर्ष क्या समरु । सुमेरु के पादों का
प्रथमावर अघ्र ही होता है परन्तु पीयूपवर्ष में लघु या गुरु कोई
भी हो सकता है । सुमेरु के अन्त में दा गुरुवर्ण होते हैं और
पीयूपदार्प फ अन्त मे लघु, गुरु । दोनों की चाल में अन्तर भी
स्पष्ट है।

-
भाषि-
पद
सुमैय के प्रफ पार में ११ मामा मो! पति १२.५
wn०.९पर होती है । पाद पाप्रपा पमपुरोगा
मोर पादान में गायन यातना
नदी मश, पारन फमोन,
धमी में ग, गौरव गमी ।
समा गधी गुदिन, मेष मो,
शुली पो !, दाप गरे॥
( যিম বলে গ)
मा मनिस-मार, रहे थे,
मागे-से ग गाणे पे ।
पछी परिणाम पर पड़े पो,
रहीद गरे,
मग पो !!
गमागम, पाया?
सी पर दरम, पन में रहेगा!
Frm army, मपण.
कारण सfte
{मपि गुण
(4)
karti Ke
-

+
छन्दापली
होता है गुण देन हदय मानदित ॥
पर प्रिय लगता नहीं, रूप से दुर्गुण ।
पुरूपता को ढंक, देता है सद्गुण ॥
(रामनरेश त्रिपाठी)
१८ चाद्रायण
चान्द्रायण के हर चरण में २१ मात्राए होती हैं। १५ और
२० मात्राओं पर यति होती है । इसकी ११ वी मात्रा जगण
के अन्त में और १० वीरगण के अन्त में आती है। जैसे-
(क) शिव दस जरा सु चन्द्र, अयन फवि फीजिये।
प्रभु जू दया-निपेत, शरण रस लीजिये।
नरवर विष्णु पाल, सयहि सुप दीजिये।
अपनी दया विचारि, पाप सय मीजिये।
-
।
(भानु फवि)
(स) धनदेवी गण आज, फौन सा पर्य है,
जिस पर इतना हर्ष, और यह गर्व है।
जाना, जाना, भाज, राम यन भा रहे,
इसी लिए, मुस-साज, सजाये जा रहे ।
(ग) पें, ये पल्पल! दृष्टि कहाँ मेरी रही?
कौतुक, अय तक देख न पाई वह यही!
१-जगणान्त ११ और रगणात १० कलाओं से चान्द्रायया
छन्द रचिए।
२,३-कहीं कहीं यति-स्थलों पर जगण-गण का विशेष
ध्यान नहीं रखा गया है।

छन्दरनावली
उपयुक्त स और ग पदों के किसी किसी पाद में यति
उचित स्थान पर नहीं पड़ती, परन्तु गति नितान्त निर्दोष है ।
हम कह ही चुके है कि आधुनिक कवि यति के नियम की
अधिक परवा नहीं करते।
२०. बिहारी
विहारी छन्द के प्रत्येक चरण म २२ मात्राए होती है।
यति १४ भोर माजाओं पर होती है। जैसे-
(फ) भूला न किसी भाति फडी टेक टिकाना ।
माना मनोका न कहीं ठीक ठिकाना ।
जीते अमख्य शत्रु रहा, दप दिखाता ।
शय्या शरों की पाय मरा, थमं सिखाता।।
(स) निशान पाठ वेद-पदों, पो पढ़ा गया।
विद्या विनास विशयरों, का यढा गया।
सारे असार पथ मतों, को हिला गया।
मानन्द-सुवा सार दया, का पिला गया ।
(ग) रफा जलाय काल सलों, को सुझा दिया ।
भारे प्रचंड दुष्प दिया, भी बुझा दिया ।
हनुमान यली वीर-चरा, में प्रधान है।
महिमा असपर ब्रह्मचर्य, की महान है ।।
(नाथूराम शकर)
१-क तथा स पद्यों का संत ययाक्रम भीष्म पितामह
स्वामी दयानन्द सरस्वती की ओर है।

।
छन्दरमावली
हरसि निरसि तुलसिदास, चरणनि रजपाई ।।
(तुलसीदास)
प्रथम पद्य पे तृतीय पाद में यति उचित स्थान पर
नहीं है।
२२ उपमान (अन्य नाम-दृढ़पट वा दृढपद)
उपमान के हर एक पाद म २३ मात्राए होती हैं । १३ और
१० माघाओं पर यति होती है। प्रत्येक पाद के अतिम दो घण
गुरु हों तो अच्छा है, नहा नो अतिम वर्ण अवश्य गुरु
चाहिए । जैसे-
फमी सुयश पाता नहीं, है अत्याचारी ।
निरुद्यमी होता नहीं, सुख का अधिकारी ।।
उसकी मजिल का नहीं, अन्त कभी होता।
जो मधा है एक तो, तिस पर है मोता।
(रामनरेश त्रिपाठी)
२३. रोला
रोला के प्रत्येक चरण में चौबीस मात्राए होती हैं । यति
२१तया १३ मात्राओं पर होती है। जैसे-
(फ) गूंज उठे अलि कूफ, उठे कोक्लि पुओं में
फूल फूल कर पूर, उठे पादप पुजों में ।
सब का यह आनद, मधुर सौरम कर सगी
गधयाह वह चला, तुम्हारी ओर उमगी।
(स) फरो नाथ स्वीकार, आज इस हृदय कुसुम को,
.

धन्दरत्नावली
आइ भग्गुल लोग घरण, युद्ध फी सय गाथ ॥
(सरस पिंगल)
(ग) रावर मुप के पिलोफ्त, ही भये दुस दूरि,
सुपटाप नहीं रहे उर, मध्य आनँद पूरि ।
देह पायन ६ गइ पद, पद्म फो पय पार ।
पूजन मयो वश पूजित, आशु ही मुनिराइ ।।
(घ) सनिधान भरे तपोधन धाम धी धन धर्म,
अद्य सङ्घ सय भये निरवैद्य यासर-कम ।
ईस यद्याप दृष्टि ही मई, भूरि मगल सृष्टि
छिरे फहँ होति है सो, तथापि पार्वविष्टि ।
सींचि मत्र सजीर यौनन, जी उठी तेहि पाल ।
पूछियो मुनि पौन की दुहिता यह अर याल ॥
ही सुना मिथिलेश की, दशरत्य-पुत्र-पलय ।
कौन दीपत जी न जानति, फोन आपुनु अत्र ।
(च) मुनिपुनिके, सुनि मोहिं जानहि, यालमीकि द्विजाति ।
सर्वथा मिथिलेश को गुरु, सर्वदा शुम भाँति ।।
होहिंगे मृत , सुधी पगु, धारिये मम ओर्क ।
१-युद्ध से भागे हुए।
२–आप ये । ३--शीन । ४-तुरन्त । ५-विन-रहित ।
६-बोलना।
७-लघुपडा जायगा।८-घर।

छन्दरक्षामही
ग) तुम हो अन न अनादि सर्वग सर्वदा, संबंश ।
अय एफ हो, कि अनेक हौ, महिमा न जान,त मह॥
भ्रमियो कर, जग लोक चौदह लोम मो,ह समुन्द्र।
रचना रची, तुम ताहि जानत ही न माझ न रुद्र ।
(केशवदास)
२७ गीतिका
गीतिका के प्रत्येक पाद में २६ मात्राए होती हैं। यति १४
और १२ मात्राओं पर होती है और कभी कभी १२, १५ पर
भी । अन्तिम दो वर्ण लघु, गुर होते हैं। इस की ३ री, १०वीं,
१७ धीं तथा २४ वी मात्राए लघु होनी चाहिए । जैसे-
(फ) ब्रह्मचारी प्रहाविद्या, फा विशद, विश्राम था ।
धर्मधारी धीर योगी, सव-सद्गुण-धाम था।
फर्म-धीरों में प्रतापी, पर निरा निफाम था ।
श्री दयानदपि स्वामी, सिर जिसका नाम था।
(प) सत्यवादी चीर या जो, पानिफ सग्राम का ।
साहसी पाया किसी को भी न जिस के काम का।।
प्राण दे प्रेमी धना जो, प्रेम के परिणाम का!
फ्या दया मानद धारी, धीर था यह नाम का!
(ग) साधु भक्तों में सुयोगी, सयमी बढने लगे ।
सम्यता की सीढ़ियों पे, सूरमा चढने लगे ।
१- सर्वव्यापक । २-मैं। 11.5.1
IMA

छन्दरतापली
निन विश्वास न छीनो हम से, किन्तु किमी भी ठौर।
(सियाराम शरण गुप्त)
(ग) फाम मोच मद लोभ मोह की, पॅचरगी कर दूर।
एक रग नन मन चाणी में, भर से तू भर पूर॥
प्रेम पसार, न भूल भलाई, बैर-विरोध विसार।
भत्ति-भार से मज शकर को, धर्म दया उर धार।
(घ) देस कुदृष्टि न पड़ने पाये, पर-अनिता की ओर।
विरश किसी को नहीं सुनाना, कोई बचन कठोर ।
अपडा अपलों को न सताना पाय यड़ा अधिकार ।
भक्ति भार से मन शकर को, धर्म दया उर धार।
(ड) माता पिता सुफयि गुरु राजा फर सप का सम्मान ।
रुग्ण अनाय पनित दीनों को दे जल भोजन दान ।।
सुभट गदारि शिल्पकारों को, पूज सुयश निस्तार।
भक्ति भाव से मज शकर को, धर्म दया उर धार।
(नाथूराम शफर)
२९. शुद्धगीता
शुद्धगीता छन्द के हर एक चरण में २७ मात्राप होती हैं।
१-वैद्य।
२-सरसी और शुद्ध गीता दोनों छन्द २७, २७ मात्राओं
के है, परन्तु दोनों को यति मिन भिन्न है, इसलिए पहचान
पासान हैं।

पाखापसी
मृग मे छग हैं किन्तु अनी सी, तीदय दृष्टि पामोली।
यड़ी की। सी यात न उस ने, सूक्ष्म युद्धि पर तोली।
(घ) काठी-दाह में तू क्यों फदा, डांटा तो हंस बोला-
'तू कहती थी-'और चुराना, तुम मनन का गोला !
छाये पर रख छोड़ेंगे सय, अप मिड-मरा मठोला ।
निकट उडी घे मिड़े प्रथम ही, भाग पचा मैं भोला ।"
(मथिरी शरण गुप्त)
(ड) है पदि पुत्र स्वर्गप्रद तो फिर, थर्म सार्थक ही है।
जिनके यहुन पुत्र है उनके जीवन सार्थक ही हैं
बहु सुत जननी स्नरी परी, अधम सूपरी नारी ।
नखी नागिनी आदि जीव फ्या, कमी स्वर्ग अधिकारी।
(च) शुद्ध पीच-समुदाय समी पदि, पुत्रपान होने से
सहज ऊगति पा सकते है. विषय पीज बोने से ॥
तो फिर पृथा फर्म-साधन सय, बाथम धर्म वृथा है।
म्वर्ग लाभ फरने की क्या ही, सधी सहज प्रथा है।
F
(वियोगी हरि)
३१ इरिगीतिका
इरिगीतिका प्रत्येक पाद में २८ मानाए होती है। यति
र सार और हरिगीतिका दोनों २८, २८ मात्राओं के छन्न
है, और इसकी पति भी समान मात्राओं पर पडती है । परन्तु
दोनों की पाच मं दिन-रात का अन्तर है, इस लिये परमानने'
में कुछ कठिनता बहीं पड़ती।

।
न्दरमापली
यैठे रहोगे और फय तफ, माय को रोते हुए
(मैथिलीशरण ग)
(घ) निरुपाधि नारायण निरसन, निर्भयामृत नित्य है।
अत्ता अनादि अनन्त अनुपम, अन्न जल आदित्य है ।
परिम् पुरोहित प्राण प्रेरक, प्राश पूज्य प्रजेश है ।
फरतार तारक है तुही यह, घेद का उपदेश है ॥
(छ) कवि काल कालानल रुपा फर, केतु फरुणाकन्द
सुखधाम सत्य सुपर्ण सच्छिा, सप्रिय स्वछन्द है।
मगधान माउफ-मक्त-वत्सल, भू पिम् भुग्नेश है।
परतार तारक है तुही यह, येद का उपदेश है ।।
(नाथूराम शङ्कर)
मरहटा छन्द के प्रत्येक भाग में २९ मात्राए होती है।
पादात में गुरु लघु होते हैं । यति १०,८, ११ मात्रामा पर
होती है। जैसे-
(फ) यह सुन गुरु पानी, धनु-गुन सानी,जामी द्विज दुख दानि ।
ताडका सँहारी, दारण भारी, नारी अति यल जानि ।।
मारीच विडार्यो, जलधि उतार्यो, मार्यो सरल सुवाई।
देवनि गुन पप्यों, पुप्पनि वो, ही अति सुरनाहु ॥
(ख) यफ दिन रघुनायक सीय सहायफ, रतिनायक अनुहार।
• शुम गोदावरि तट पिमल पञ्च घट, येठे छुते मुरारि ।
छवि देखत हों तन, मदन मथ्यो मग, शर्पनखा तेहिकाल।
३१. मरा
.
.

छदरमाचली
सुनि पचन सुजाना, रोदन टाना, हुइ यालक सुरभूपा।
यह चरित जे गारहि, हरिप पावहि ते न परहिँ भयकृपा
(तुलसीदास)
ताटक
ताटफ के प्रत्येक पाद् में ३० मात्राए होती हैं । यति १६
और १४ मात्राओं पर होती है। हर चरण के अन्त में मगण
(555) होता है। जैसे-
(का पवनीय यह देश जहाँ के, देमी निज अभिमानी हों।
थान्धयता में बंधे परस्पर, परता के अक्षानी हों।
निन्दनीय वह देश जहाँ के देशी निज-मनानी हों।
सर प्रकार परत पराई, प्रभुना के अभिमानी हो।
(श्रीधर पाठक)
(ख) देव तुम्हारे कई उपासक, पई दग से आते हैं।
मेया में यहुमूल्य मेंट घे, कई रंग के लाते हैं ।।
धूम धाम मे साज-याज से, वे मदिर में आते हैं।
मुकामण यहुमूल्य वस्तुए, लाफर तुम्हें चढाते हैं ।
(ग) फानपूर के नाना के मुंह, योली यहिन छबीली थी।
लक्ष्मीबाई नाम पिता की, वह सन्तान अकेली थी।
ना के संग पढ़ती थी यह माना के सम खेळी श्री।
परडी साठ कृपाण पटारी, उसपी यही सहेली थी।
(घ) इन की गाथा छोड़ चलें हम, प्रांसी के मैदानों में।
महा खड़ी है रक्ष्मीपाई, मर्द पनी मलों में .
Aad

(रूपनारायण पाडेय)
सन्दरतावली
(घ) गुणी जनों के मनीपधि से, चटपट उसका षि उतरे ।
गपने मन्त्रों से गुणियों का, सर्वनाश यह कितु करे ।
दोनों के प्रतिकार तीन है, विद्वानों ने पतलाए ।
मुख-मदन या दात तोहना, या हट जाना जय आप !
(ग) नहीं दान है नहीं दक्षिणा, पाली हाथ चली आई 1
पूजा की मी विधि न जाती, फिर भी नाय चली आई ।।
पूजा और पुनापा प्रभुवर, इसी पुजारिन पो समझो।
दान-दक्षिणा और निडानर, इसी भिखारिन को समझो ॥
(घ) में उन्मत्त प्रेम की लोभी, हृदय दियाने आई हूँ।
जो कुछ भी है यही पास है इसे चढाने आई हूँ।
चरणों पर अर्पण है इस को चाहो तो स्वीकार करो।
यह तो यस्तु तुम्हारी ही है, टुकरा दो या प्यार फरो॥
(मुमठा कुमारी चौहान)
(ड) होगा नहीं कहीं भी ऐसा, अति दुरात्मा वह प्राणी।
अपनी प्यारी मातृभूमि है, जिससे नहीं गई जानी।
"मेरी जननी यह भूमि है", इस रिचार मे जिसका मन ।
नहीं उमगित हुआ पृथा है, उसका पृथ्वी पर जीवन ।।
(च) क्या कोई ऐसा है जिसस मन न हर्ष से भर जाता।
दश विदेश घूम फर जिस दिन, यह अपने घर को माता।
यदि कोड है ऐसा तो तुम, जाघो उसको भले प्रकार ।
नाम न लेता होगा फोर्ड, फरता नहिं होगा सत्कार ।।
(छ) पान यह उपाधि यदि उत्तम, अथवालक्ष्मी का मडार।

গনী
पायजेर यज्ञ छनासान मारी एफ एक मयं छहरानी।
विछियाँ मान मननान मोरी, हेरत हूँ नहि दिसरानो।
(१) लाग्न घरमो न कछु नरजो, फरी र ना निगरानी।
पाय पहेंगी नद यया सों, न्याय पछुक दे हैं उानी ।।
कहि सकुचानी हग मचाती, जमुदामा की पहचानी।
यही सयानी अयमर जानी, योरी पानी नय-सा।
(ट) उन ते आप दुघर पदाई टग्यी मातु पर पथरानी।
कहो मातु ये झूठी सय मुहि, पारलेत पालक जानी।
माखन मुख परजोरी मेटत, चूमि पपोटन गहि पानी।
नाच अनेकन मोहिं नचाय, रग मरगन सरसानी ॥
(घ) भागत 17 पाओ छोड़ें, पड़ी हठीली गुण मानी ।
मुहिं पहरारत लंहगा लगरा, पहिरि चीर फोई मरदातो।
येइ थे। थेइ मुहि नाच नचायत, नित नेम मन मह ठानी।
मन मोहन की मीठी मीठी, सुनत यात सय मुसकानी ।
(भानु करि)
३७ रेचिरा
-
१-ऊपर ३०, ३० मात्राओं वाले इन पाच छन्दों का
वर्णन झिया है-चौपैया, ताटङ्क, लापनी, पुयुभ, रुचिर ।
चौपैया और रुचिरा तो यति-भेद के कारण ही शीघ्र पहचाने
जा सकते हैं । ताटङ्क, लावनी और मुसुम की यति मी समान
मानाओं पर पड़ती है इस लिए इन की पहचान में अधिक
सावधान होना पड़ता है । जब चारों पदों के अन्तिम तीनों
।

छन्दरत्नावली
गौर वर्ण समानु सुना फा, कादो काले तन पर माप
नाय उतारो मार मुकुट को सिर पे सजो साहिरी टोप ।
(ग) पौडर चदन पोंछ, रपटा मानन की श्री ज्योति अगाय .
अजन अखियों में मत आंजो, आला ऐनक रेहु लगाय ॥
रवधर कानों में लटका हो, कुडल फाद मेकराफून ।
तज पीताम्बर पम्पल फाला, डाटो कोट और पतलून ।
(घ) पटक पादुका पहिनो प्यारे, बूट इटाली का मुकदार।
डालो डर गच पास्ट में, चमके चेन पचनी चार ।
रख दो गाउ गठीली लकुटी, छाता पॅन यगर में मार।
मुरली नाह मोड यजामा, वामी विगुल सुने ससार॥
(ड) बनतेय नज व्योम यानप, परिए चारों ओर बिहार।
फक फर फैं . फको चुरटें, उगलें गाल धुओं की धार।
यो उत्तम पदवी फटकारो, माधो, मिस्टर नाम धराय ।
घाँटो पदक नइ प्रभुता के, भारत जाति मक्त हो जाय ॥
(नाधूराम शङ्कर),
(च) यादशाह गरजा- 'ओ काफिर,सोच-समझ कर तु मुंहस्त्रोल
मुमरमान हो ना, या अब क्या तुझ को भी मरना है बोल"
'करो मुसलमानी उन को जो, बेचार यथे अनजान ।
चाहे मेरा गला काट लो, में सदैव हिंदू-सन्तान ।।
(छ) गला नहीं, सिर पर मारा रख,डाटो इसे इसी दम ची।"
दात पीसने लगा शोध से, माशा देकर मालमगीर ।।
चिरता रहा हूँठ सा द्विजयर,प्रणय नाद का निधल ठाठ ।
"

छन्दरनारली
(फ) मुनि साप जो दीन्हा, अति भल कीन्हा,
परम अनुग्रह, मैं माना।
देखिउँ भरि लोचन, हरि भवमोचन,
इहै लाभ श,कर जाना ।
विनती प्रभु मोरी, मैं मति भोरी,
नाय न मांगो, घर माना ।
पदकमल परागा,
अनुरागा,
मम मन-मधुप कर पाना ।
रस
(तुलसीदास)
(स्त्र) करि बदन निमडित, मोज अबडित,
पडित झानपर
गिरिनन्दिनि नदन, असुर निकदन,
सुर उर चदन, कीर्तिकर ।
भूपण मृग लक्षण, धीर विचक्षण,
जन प्रण रक्षण पाशधर ।
जय जय गणनायफ, सलगणधायक,
दास सहायक, विघ्नहर ॥
(दास.
(ग) परसत पद पायन, शोक नशापन,
प्रकट भइ, तप पुज सही ।
देखत रघुनायक, अन सुखदायक,
सम्मुप द्वै फर, जोरि रही ॥
१-लघुवत् पढ़ा जायगा।
,

छन्दरनावली
सोहे सिंहासन, प्रभा प्रकाशन,
फर्मविनाशन, दुखनाशन ॥
सुप्रीव विभोषण, सुजन यधुजन,
सहित तपोधन, भूपति गन ।
आये सँग मुनि जन, सकल देवगण
मृग तप कानन चतुरानन ॥
(केशवदास)
समान सवैया
समान सरैया के प्रत्येक पाद में ३२ मात्राए होती है। यति
१६, १६ मानाओं पर होती है और पादान्त में भगण (51)
होता है। जैसे-
। सोरह सोरह मत्त धरौ जू, छद समान सवैया सोभत ।
श्री रघुनाथ घरण नहिं सेवत, फिरत कहा तू इत उत जोहत ॥
अब लगि शरणागतनप्रभु को, तब लगिभव-याधा तुहिबाधत ।
पापपुज हो डार छनक में, शुम श्री राम नाम आराधत ।।
(भानु कवि)
४१ दडेकला
दहकला के प्रत्येक पाद में ३२ मात्राए होती है। यति
१-ऊपर ३२, ३२ मानाओं के तीन छन्दों (त्रिमगी,
समान सवैया और देडकला) का वर्णन किया गया है। दोनों
की यति और पादान्त के वर्ण मिन मिन्न हैं, इसलिए इन की
पहचान में कोई कठिनता नहीं पड़ती।

+
.
प्रकार के अन्तर्गत है और क्यों? इन का अन्तर स्पष्टतया
छन्दरतावली
के उदाहरणों में इन के लक्षणों को समन्वित करक
दिखाओ।
३ तोमर उल्लाला और सखी छदों में क्या भेद है ? उत्तर
स्पष्ट और सचिप्त होना चाहिए ।
४ आप ने १४, १४ मात्राओं के जो छन्द पढ़े हैं, उन का
परस्पर भेद स्पष्टतया उदाहरण सहित दिखाओ।
५ सम्वी, हाफलि और मधुमालती छन्द, छन्दों के कौन से
प्रफट करो।
६ चारोला, चौपाई और गुपाल-इन छन्दों के लक्षण और
उदाहरण लियो।
७ १५, २५ मात्राओं के छद फौन कौन से हैं ? उन का
पारम्परिफ भेद एक एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट करो।
८ चौपाई, चौयोला और चौपया छन्दों का स्वरूप,
परस्पर भेद और उदाहरण विशद रीति से लिखो।
६ पादाकुटफ और चौपाई की चाल तथा मात्रा-सख्या
समान हैं । फिर इन दोनों में भेद क्या है ? उदाहरणों
द्वारा उत्तर की पुष्टि करो।
२० पद्धरि और शृगार छदों में क्या भेद है ? उत्तर सोदा.
हरण हो।
११ १६ १६ मात्राओं के छन्दों के नाम तथा लक्षण मात्र लिखो
१२ पीयूषपर्प, आनदपर्धफ और सुमेरु छदों के लक्षण और
उराहरण देकर इनके पारस्परिक भेद को स्पष्ट दिखामो।

छन्दरतायटी
यह स्वतत्रता की चिनगारी, अन्तरसम से भाई थी।
२१ ४ गरीर को नियाज, ही गरीय सेरो।
घारफ कहिए कृपाल, तुलसीदास मेरो॥
१२. लोचन अभिरामा, तन घनश्यामा, निज आयुध मुअचारी।
भूपन वनमाला, नयन विशाला, शोमा सिंधु वरारी।
१३. भयहुँ सुमिर हरि नाम शुभ, काल जात बीता।
हाय जोर विनती करौं, नाहि जात रीता ॥
१४ कृष्णा सुभद्रा आदि को मन,लोक कर रोते हुए ।
हरि के हृदय में भी वहाँ कुछ, कुछ फरुणरस-कण चुप ।।
१५ विद्या का भरपूर, इट अभ्यास किया था।
पर औरों की भाँति, न कोई पास किया था।
१६ उसे व्यापती है तो केवल, यही एक भय-याधा।
"कह दूंगी, सेलेगी तेरे, सग न मेरी राधा" ||
१७ गभीर मौन ऊँची, ये शैल-थ्रेणियाँ क्यों।
चिर काल से खड़ी हैं ?,किसकी उन्हें प्रतीक्षा ।
१८ पाय के नर देह प्यारे, व्यर्थ माया में न भूल !
हो रहो शरण हरी के, तौ मिटे भव जन्म शुल।
१९. देव पापन है गई पद-पद्म को पय पार ।
पूजतै भयो वश पूजित, आशु ही मुनिराय ।।
२० निर्दय बन कर फरो और भी, जो फरना हो और।
निज विश्वास न छीनो हम से, किन्तु किसी भी ठौर।
२१ अध अज्ञानी अँधेरे, में पड़े मर जायँगे।
माप वेंगे अविद्या, देश में भर जायेंगे।

छन्दरतापली
निसि मलीन यह निसि दिन, यह विगसाय |
(घ) चपफ हरपा अंग मिलि, अधिष मुहार।
जानि पर मिय दियरे, जप पुम्हिगार ॥
(ङ) सिम तुग भग रग मिलि, अधिक उदोत ।
हार या पदिराग चंपफ होत ॥
(च) गरय घरह रघुनदन, अनि मा मह ।
वसाहु आपकी मूरति, सिय, छौंद ।।
(छ) स्याम गौर दोउ मूरति, सधिमन राम ।
सते मा सित फीरति, अति भमिराम ॥
(ज) सिरह मागि उर ऊपर, जय अधिपाय ।
ए अँसियां दोउ परिनि, दहि यताय ॥
(A) अय जीपन है फपि, माम न फोर ।
पनमुरिया के मुंदरी, पापन हो ।
(अ) पछि गनती महँ गनती, जस यन घास ।
राम जपत भये तुटसी, तुलमीदास ॥
(पत्यै रामायण)
(8) पीतम मिरे सपनयाँ, मो मुग सानि ।
आनि जगायसिं चेरिया, मा दुपदानि ।।
(ड) विरहिन और विदेसिया मौइफ ठौर।
रहार!२-एक सफेद फूल। ३-सबसे छोटी अँगुली।
४-इन छन्दों में कहीं कहीं गुरु वर्णो को लघुक्त पढ़ना
पड़ेगा, तप ही छन्दों की गति ठीक होगी।

छन्दरत्नापठी
(घ) देयो परती फमल की, फीनों जलसों हेत।
प्राण तज्यो प्रम न सन्यो, सूख्यो सरहिं समेत ॥
(सूरदास)
(ड) जो विपया मातन सजी, मृद सादि लिपटात ।
ज्यों नर डारन यमन पर, भ्यान स्वाद सो वात।।
(च) फमला थिर न रहीम पहि, यह जानत सय फोय ।
पुरुष पुरातन की पधू क्यों न प्रयटा होय।।
(छ) 'रहिमन' अनुया नयन रि, जिय दुम्न प्रकट फरय ।
जाहि शिकारो गेह से, पस न मेद पनि देय।
(रदीम)
(ज) सीस मुकुट पटि फाउनी, कर मुरली उर माल।
यह यानिफ मो मन यमी, सदा पिहारी लाल ॥
(स) भूपन मार सँमारि है, किमि यह तन मुफुमार।
सूचे पाय न परत घर, सोमा ही के भार॥
(अ) फर को टेरत दीन है, होत न स्याम सहाय ।
तुमह लागी जगत-गुर, जग नायफ जग-याय ।।
(विहारी)
(2) मुह मागे, रण सूरमा, देत दान पर इतु ।
सीस दान इ देत पे, पीठ दान नहीं देतु।।
(ठ) परम्भापा पर भाष, पर-भूषण पर परिधान ।
पराधीन जन की अहै, यह पूरी पहचान ।
(वियोगी हरि)
(ड) सहज शत्रु हे मनुज के, चिर-निदा तन-रोग।

छन्दरतापली
(ग) मगल-मूल महेश, दूर अमङ्गल को करे ।
ब्रह्म कि दिनेश मोह महातम को हरे ।
(नाथूराम शङ्कर)
(घ) फूले फलइन रेत, यदपि मुधा परसहिं जलद ।।
मुरण हृदय न चेत, जो गुरु मिलहिं चिरचि सम॥
(ङ) जल पय सरिस विकाय, देसद्ध प्रीति कि रीति भर।
पिलग होइ रस जाइ, फपर सटाई परत ही ॥
(च) सो नर फ्यों दसकघ, यालि यधेउ'जेहि एक सर।
पीसहु लोचन बघ, घिग तय जनम पुजाति जड ॥
(छ) तव सोनित की प्यास तृपित राम-सायक-निकर ।
ती नोहि तेहि त्रास, फटु जरपफ निसिचर अधम ॥
(तुलसीदास)
उल्लाल छद पे चारों चरणों में कुल ५६ माघाए होती हैं।
विषम चरणों में १५, १५ और सम चरणों में १३, १३ । जैसे-
(क) कुछ मिथ्या से होता नहीं, मौज उधार निहार रो।
सुप्त चाहो तो सद्भार से शकर को उर धार हो।
(ख) गरिमा न गही गोपाल की, शान न गुणियों से लिया।
शठ शकर लोभी लालची, पाय प्रचुर पूजी जिया ।।
१,२-इन वर्गों को लघुवन् पढ़ना पड़ेगा, तभी छन्द की
चाल ठीक रहेगी।
.

९२
एन्दरत्नापटी
६. रुचिरा द्वितीय
इसके चारों चरणों में कुल ६० मात्राए होती हैं । विषम
चरणों में १६, १६ और सम में १४, १४ । अन्तिम दो
घर्ण गुरु होते हैं। यह छन्द, मात्रिक मम छन्द फुकुम का
आधा है । जैमे-
(क) हे भूतेश महायलचारी, तू सर सकट-हारी है।
तेरी मगल-मूल-दया का, जीय यूथ अधिकारी है।
(ख) धर्म चार जो प्राणी तुझ से, पूरी लगन लगाता है।
विद्या, बल देता है उससे, भ्रम का भूत भगाता है।
(ग) हे सुविश्वकर्मा शिव मष्टा, तू क्य साली रहता है।
निर्विराम तेरी रचना फा, सात सदा
(घ) जो मालस्य विसार विवेकी, तेरे घाट उतरता है।
उस उद्योग शील के द्वारा, सारा देश सुधरता है ।
(नाथू राम शकर)
(E) प्रसिध्यनि!प्रतिपनि क्यों रोतीहै। जलेहदयफोरोनेदे।
भासू की धारा से उसको, सारा विश्य भिगोने दे ॥
(च) सुख मिलता है व्यथित हृदय फो,अपनी यथामुनाने में।
सय तडपने में सुनने घा,ठों को भी तडपाने में 11
(भगवती चरण धर्मा)
यहता है।
-

उन्दरदायली
मदिमा अपाणी याप, समझाते ये सय काहीं
(ग) पोंके पिरचि सबर सहित,पोपमठ अदि फलमल्यो।
प्रशाण्डपहरियो चरपुनि,अपहिं राम सियधनुषल्यो।
(4) नाम मरोम नाम पट, नाम सनेह ।
म जनम रघुरादा, मुमहि देतु ॥
(४) जिस गुप-हीन मान मागर ने । सप गुणधारी धारे हैं।
उस के परम भन युर-योगी। श्री गुरुदेय हमारे है।

छन्दरत्नावली
(क) साई सघ ससार में, मतल्व का व्यवहार ।
जय लय पैसा गाठ में तय लगताको यार॥
तय लग ताको यार यार सँग ही सँग टोरे।
पैसा रहा न पास यार मुप मे नहि बोलें ।
यह गिरिधर फपिराय, जगत यहि लेगा भाई ।
फरत गरजी प्रीति, यार रिला कोई साई ।।
(ख) माई अवसर के पडे, कौन सहे दुप द्वन्द्व ।
जाय विकाने डोम घर, वै राजा हरिचन्द ॥
4 गजा हरिचन्द, परै मरघट रसवारी ।
घरे तपम्बी प, फिरे अजुन बरधारी ॥
कह गिरिधर फविराय, तप वह भीम रसोई ।
फो न फर पटि काम, परे अवसर के माई ॥
(ग) रिना विचारे जो करे, मो पाछे पछिताय ।
काम विगारे आप, जग में होत हंसाय ॥
जग में होत हँसाय, चित्त में चैन न पाय ।
सान पान सन्मान, राग रग मनहिन भावै ॥
पह गिरधर कविराय, दुग्व फछु टरत न टारे ।
पटकन है जिय माहि कियो जो पिना विचारे ।।
(घ) रहिए लटपट पाट दिन घर घामें मा मोय ।
छाह न वाकी धैठिए, जो तर पतरी होय ॥
जो तरु पनगे होय, एक दिन धोखा दे है।
जा दिन घहै ययारि, टूटि तव जर मे ज है ।
कह गिरिधर कविराय, छाँह मोटे की गहिये।

फिर मी आर शरण,
६८
छन्दरमावली
मानो तपसी नप फरे, मल फर भस्म शरीर॥
मल कर भस्म शरीर, तीर जर देगी मली।
पहे 'मीर' प्रमि चोंच,समूची फौरन निगली ॥
घर जो तज के अगला ।
उन के भी तू प्राण हरे, रे छी छी! यगटा ॥
(अमीर अली मीर)
छप्पय (अन्य नाम पटपदी)
छप्पय में छ पाद होते हैं। ऊपर चार पाद रोला के
और नीचे दो पाद उल्लाला या उलाल के। इस लिए कहीं
पर छपय में कुल १४८ माघाए होती है और कहीं पर
१५२ । जैसे-
।
1(क) कोई पीडा हुई, जरा सी भी जय मुझ फो।
मुझ से दूना दुख, हाय व्यापा तय तुझ को।
रात रात भर तुझे, हगों में नींद न आई ।
जिस प्रकार हो सका, शीघ्र यह व्यथा मिटाई ।।
मेरे सुख में सुख था तुझे, दुख में दुम्ब रहा सदा ।
मुझ से सर्वत्र अभिन्न था, तेरा तन मन सर्वदा ।
(ख) काटा मैंने नई उठी दन्तुली से तुझा फो।
किया और भी अधिक प्यार तय तू ने मुझ फो।
छींट दिया जल शीत-काल में तेरे ऊपर ।
तय मी तू ने प्रेम किया मा मेरे ऊपर ॥
जब इन बातों की याद ही, मुझ को आजाती कमी।

छन्दरत्नावली
लोट लोट कर वहीं हृदय को शान्त फरेंगे।
उस में मिलते समय, मृत्यु मे नहीं डरेंगे।
उस मातृ-भूमि की धूल में, जय पूरे सन जायेंगे।
हो कर भव-वधन-मुक्त हम, आत्मरूप बन जायेंगे।
(मैथिलीशरण गुप्त)
(छ) STटा हम न और पूर्व पीटा मर मर कर ।
पेल पेल कर तेल निकाला तुझ से जी भर॥
फिर दीपक म मर कर थोडा तूल मिलाया ।
निर्दयता से योद् सोद कर तुम्हें जलाया ॥
हम ने तो अस्तित्व तक नष्ट तुम्हारा कर दिया।
तुमने महा! प्रकाशसे,अखिल भुवनकोभरदिया।
(मोहनकाल महतो)
(ज) जिहि मुच्छन धरि हाय, फळू जग सुजस न लीनो।
जिहि मुच्छन धरि हाथ, फर परफाज न फीनो ।।
जिहि मुच्छन धरि हाथ, फ्छ पर-पीर न जानी।
जिहि मुच्छन धरि हाथ, दीन लखि दया न आनी।
मुच्छ नाहिं ये पुच्छ सम, परि 'भरमी' उर मानिये ।
बचन-लाज नहिं दान गति, तिहि मुख मुच्छन मानिये।
* छ और ज पद्यों में उल्लाला ५२, ५२ मानाथों का है.
शेप सब में ५६, ५६ का।
१-मलमल कर।२--सरसों की ओर सफेत है।

१००
छन्दरत्नावली
लोटलोट फर यहीं हदय को शात करेंगे।
उस में मिलते समय, मृत्यु से नहीं डरेंगे।
उस मातृ भूमि की घूल में, जय पूरे सन जायेंगे।
हो कर मव रधन-मुक्त हम, आत्मरूप बन जायेंगे।
(मैथिलीशरण गुप्त)
(छ) फाटा हम ने और खूब पीटा मर मर फर।
पेल पेल कर तेल निकाला तुझ से जी भर ॥
फिर दीपर में भर कर थोडा तूल मिलाया।
निर्दयता से ग्वोद सोद फर तुम्हें जलाया ।।
हम ने तो अस्तित्व तक नष्ट तुम्हारा कर दिया।
तुमने अहा! प्रकाशसे,अखिल भुवनको भरदिया।
(मोहनकाल महतो)
(ज) जिहि सुच्छन धरि हाथ, पछ् जग सुजस न ठीनो।
जिहि मुच्छन धरि हाथ, फळू परफाज न फीनो ।
जिहि मुच्छन धरि हाथ, फर पर-पीर न जानी ।
जिहि मुच्छन धरि हाय, दीन लखि दया न मानी ॥
मुच्छ नाहि घे पुच्छ सम, कवि 'भरमी' उर आनिये ।
पचन-लाज नहि दान गति, तिहि मुख मुच्छन मानिये।
* छ और ज पद्यों में उल्लाला ५२, ५२ माताओं का है-
शेप सब मे ५६, ५६ का।
१-मलमल कर।२-सरसों की ओर सफेत है।

१०२
उन्दरनावली
उन्हें ही उन छन्दों का मिलि दपाद कह देते हैं । पूर्यकाल में
यह चार न थी। सम छन्द चार चार चरणों के ही हुआ
फरते थे। परन्तु फाल के माथ साथ फपियों के अन्त मरण
में भी परिवर्तन होता रहता है। इसी लिए शफर मादि फवियों
नेछ छ पादों के उन्दों की रचना की है। जैसे,, गीतिका
मानिक सम छद है। गीतिका के नीचे गीतिका फे दो पाद
और रन दिए तो यह गीतिकात्मक मिलिन्दपाद कहा जायगा।
इसका उदाहरण देसिए ।
गीतिकात्मक मिलिन्दपाद
(क) तर्क झझा के अकोले, साडते चलने लगे ।
युक्तियों की आग चेती, जालिया जलने लगे।
पुण्य के पौधे फीले फूलने फलने लगे ।
हाथ हत्यारे हठीले, मादकी मलने लगे।
रोल देसे चेतना के, जड खिलोना खो गया।
देख लो लोगो दुबारा, भारतोदय होगया ।
(ख) तामसी थोथे मतों की, मोह माया हट गई।
ऐंठ फी पोली पहाड़ी सण्डनों से फट गई ।।
छूत छैया फी भर्ती, नाफ लम्बी फट गई ।
लालची पापण्डियों की, पेट पूजा घट गई ।।
ऊत भूतों का यखेडा, डूब मरने को गया !
देख लो लोगो दुपारा, मारतोदय हो गया ।
(नाथूराम शकर)
-

३
१०२
उन्दरतायली
उन्हें ही उन छन्दों का मिलि दपाद कह देते हैं। पूर्वकाल में
यह चाल न थी। सम छन्द' चार चार चरणों के ही हुआ
फरते थे। परन्तु फाल के साथ सोय फपियों के अतरण
में भी परिवर्तन होता रहता है। इसी लिए शकर आदि कवियों
ने छ छ' पादों के छन्दों की रचना की है। जसे, गीतिका
मात्रिक सम छद है। गीतिका के नीचे गीतिका के दो पाद
और रस दिए नो यह गीतिकात्मक मिलिन्दपाद कहा जायगा।
इसका उदाहरण देखिए ।
गीतिकात्मक मिलिन्दपाद
(क) तर्क झझा के अकोले, आडते चलने लगे ।
युचियों की आग चेती, जालिया जलने लगे।
पुण्य के पौधे फीले फूलने फलने लगे ।
हाथ हत्यारे हठीले, माठकी मलने लगे।
मेल देने चेतना के, जड खिलोना सो गया।
देख लो लोगो दुयारा, भारतोदय होगया ।
(स) तामसी थोथे मतों की, मोह माया हट गई।
ऐंठ की पोली पहाड़ी, खण्डनों से फट गई ।
छूत छैया की अछूती, नाफ लम्बी कट गई।
लालची पाखण्डियों की, पेट पूजा घट गई ॥
ऊत भूनों का यखेडा, डूय मरने को गया।
देख लो लोगों दुबारा, मारतोदय हो गया।
-
(नाथूराम शकर)

पंचम अध्याय
मात्रिक दण्डक
जिन मात्रिक सम छन्दों के प्रत्यक चरण में मात्रा सख्या
३२ से अधिक हो, उहे मात्रिक दण्डफ कहते हैं। इन के पाद
इतने लम्बे होते हैं कि बीच में सास लेने के लिए अवश्य रुकना
पडता है । यही दण्ड है और इसी से ये दण्डक कहे जाते हैं।
द्वितीय झूलना
द्वितीय झूलना प्रत्येक पाद में ३७ मात्राए होती हैं। यति
१०, १०, १०,७ मात्राओं पर होती है। पादान्त में यगण
(155) होता है । जैसे-
फनक गिरि-मुग दि, देखि मरकटे-फटक,
यदत मन्दोदरी, परम भीता ।
सहसभुज मत्त-गजराज-रन केसरी,
परसुधर-गर्व जेहि, देखि पीता ॥
दास तुलसी' समर, सूर कोसलधनी,
ख्याल ही यालि यल सालि जीता।
१-वानरों की छावनी । २-परशुराम । ३-सहज ही।
१
,

छन्दरत्नावली
झानगौरव-सी सिद्धिविस्तार-सी॥
कुन्द-सी फास-सी, भारती-यास-सी,
सुरतरु निहार सो, सुधारस-सार-सी।
गगजल धार-सी, रजत के सार-सी,
कीर्ति तव विजय की शभु भागार-सी ॥
(छन्दोऽर्णव)
अभ्यासार्य प्रश्न
१ माधिक विषम छन्द किस कहते हैं ? उसका मानिफ
सम और मात्रिक अर्ध-सम छदों में क्या भेद
होता है ?
२. मात्रिक सम, अर्धसम और नियम छदों का एफ एफ
उदाहरण देकर उनके अन्तर को स्पष्टतया लियो।
३ कुडलिया और छप्पय को विषम छन्दों में क्यों गिनते
हैं? दोनों का एफ एफ उदाहरण देफर सिद्ध फरो कि
ये विषम छन्द हैं।
४ मिलिन्दपाद छन्द पौन सा होता है ? उदाहरण द्वारा
स्पष्ट करो।
५. क्या आर्या छन्द को मात्रिक अर्धसम छन्दों में नहीं
गिन सकन ? उत्तर युक्ति-युक्त होना चाहिए।
दडक छन्द किसे और क्यों कहते हैं ? मात्रिक
साधारण और मात्रिक दडक में क्या मेद है ?
किसी मात्रिक दडक छन्द का नाम, लक्षण और
उदाहरण लिखो।
4
६

१४८
छदरवायली
५ उन तीनों छन्द कितनी कितनी मात्राओं के हैं ? उदा-
हरण देकर इनके मेद को स्पष्टता पूर्वक लियो ।
६ उद्धाला और रूप मालातयागुपाल और दिक्पाल छदों
के लक्षण, उदाहरण और पारस्परिक भेद स्पष्ट दर्शामो।
७ गीतिमा, हरिगीतिका और शुद्ध गीता छन्दों के पार
स्परिक अन्तर को विशदतया दिया।
८ २७, २७ मात्राओं के जो छन्द आपने पढ़े हैं, उन का
स्वरूप और उदाहरण लियो ।
६ सार और हरिगीतिका छदों में क्या भेद है । एक एक
उदाहरण द्वारा स्पष्ट करो।
१० ताटक, लायनी और कुकुम छन्दों में क्या भेद है ?
उदाहरण देकर बाशय को स्पष्ट करो।
११ चौपया और रचिरा छदों के भेद को सम्यक् स्पष्ट
4
करो।
१२ आप ने ३०, ३० मानाओं के जो छन्द पढ़े हैं उन के
नाम और लक्षण रियो।
१३ मानिक सोया और समान सरैया छदों के अन्नर को
उदाहरणों द्वारा स्पष्ट दिग्वानो।
१४ मिमी, समान सरैया और दडकला छन्दों का स्वरूप
उदाहरण और पारस्परिक भेद स्पष्ट फगे।
१५. झूलना प्रथम तथाझूलना द्वितीय के भेद को उदाहरणों
द्वारा स्पष्ट करो।

, . छदरत्नावली विष या पधु प्रिय जेहि । फाहिय रमा-सम फिमि देही । शरण जागो प्रभू, परहि दाया। नोर पाट सर, जाल माया। इसा क्षण भूप न कुछ शक्ति पाई । पिता 7 पुन की दृढ भक्ति पाई॥ यढा पर बाहु तय ये छरपटाये । उठे पर पर उन के लटपटाये ॥ १० तुम हुस्न प्रभा की, वाकी रे फिर, निधि ने यह फरफद दिया । चम्पस्दल सोनजु ही नरगिस चा मीपर चपला जगत ईस नर भूप, सिया ढिग सोहत । गल बज तो माल, सुजन मन मोहत ॥ ૨. जय लगि शरणागत न प्रभु की, तय लगि भव बाधा तुहि याचत । पाप पुञ्ज हो छार छनफ में, शुभ श्री राम नाम भाराधत ॥ १३ कहिए, ये किस लिए, भाज पहने गये! कहाँ राज-परिधान, और गहने गये। १४ विनती प्रभु मोरी, मैं मति भोरी, नाथ न मागौं, थाना । चद किया ॥ - -- - 4 वर

।
.
पष्ट अध्याय
CRETS
वर्ण-सम-वृत्त (साधारण)
जिन छन्दों के चारों पादों में वर्ण-सख्या और वर्ण क्रम ।
समान होते हैं, उन्न यण-मम-वृत्त रहते हैं। नीचे प्रमुख
वर्ण सम वृत्तों का उन्लेप किया जाता है ।
१, मल्लिका (रज, गल)
(अन्यनाम-समानी )
मलिका पृन के प्रफ चरण में रगण, जगण, गुरु और
लघु के कम से आठ पर्ण होते हैं। जैसे-
(फ) यारेश यूथ नाय । लफनाय-यन्धु साय ॥
मोमिज मरे समीप । देस देम के महीप॥
(केशवदास)
(स) सम्म ते प्रगट्ट होय । दैत्य को सु-अङ्क गोय।।
मार के नृसिंह ताहि । पालिक सुसक्त चाहि ।।
(गदाधर मह)

उदरत्नापली
प्रेम नहीं तो, यादर क्या है ?
प्यास नहीं ता, सागर क्या है?
(रामनरेश निपाठी)
भूमि सी ना, मान वृथाही ।
कृष्ण मगा है, या जग माही।
ताहि रिटीय, ज्यों प्रजयाला।
टारि गल म, चम्पकमाला ॥
(भानु कति)
८. सारपती ( भ भ भ, ग)
“चारमती वृत्त के चारों चरणों म तीन तीन भगण और
एफ एक गुरु के प्रम से १०, १० यण होते हैं। जैसे-
देसि त भृगुनन्दन को ।
छनिन के पुल पन्दन को ।
गोलि उठे, द्विज होन डरौं।
आयुपरे अव जुद्ध करौं ।
(गदाधर भट्ट)
भगण,
दो तगण और दो
५. शालिनी (म त त, गग)४,७
शाटिनी वृत्त के प्रत्येक पाद
गुरु के प्रम से ११ वण होते है। यति चौथे और सातवें वर्ण
के बाद होती है। जैसे-
लक्ष्मी दीज, लोफ में मान दीजै ।
विद्या दीजै, सभ्य स तान दीजै ।।

छदरतावली
द्विजाभास फोरे पहाना नहीं ॥
(घ) फरो प्यार पूरा सदाचार पै।
दुराचार से जी लगाना नहीं ।
निरालस्य विधा पढाते रहो ।
अविद्या नटी फो नचाना नहीं ॥
चलाना सदुद्योग से जीविफा ।
दिपा लोम लीला फमाना नहीं।
न चूको मिलो शङ्करानन्द से।
गिरे तर्फ के गीत गाना नहीं ।
(नाथूराम शङ्कर)
७ रथोद्धता (रन र, लग)
रयोद्धता वृत्त के प्रत्येक पाद में रगण, नगण, गण और
लघु, गुरु के क्रम से ११ वर्ण होते हैं। जैसे-
पात तोल फर सर्वदा कहो ।
सावधान राल से सदा रहो ॥
अत सोच तय धार में यहो ।
हानि ग्लानि सर धैर्य से सहो ।
-
(रामनरेश त्रिपाठी)
८. स्वागता (रन म, गग)
खागना वृत्त के हर एफ चरण में रगण, नपण,
दो गुरु के क्रम से ११ वर्ण होते हैं। जैसे-
मगण

(च)
छदनायली
मन्द मन्द घुति सों घा गाजें ।
तर तार जनु आवत बाज ।।
ठौर ठौर चपला चमके यों ।
इन्द्र लोक तिय नाचति ज्यों।
(केशवदास)
+
९ इन्द्रवना (त त ज, गग)
इन्द्ररत्रा वृत्त के प्रत्यक पाद मे दो तगण, जगण और दो
गुरु के कम से ११ वर्ण होते हैं। जैसे--
(क) मीता सु ले राघर औध आये ।
आनन्दु सों मङ्गल गीत गाये ॥
शोमा मर देसन चार नारी ।
ठाढी कर पुष्प सुदृष्टि भारी ॥
(गदाधर मह)
(ख)
ससार है एक अरण्य भारी ।
हुए जहाँ है हम मार्गचारी ॥
जो धर्म रूपी न कुठार होगा।
तो कौन निष्कण्टक पार होगा ।
(मैथिलीशरण गुप्त)
मैं जो नया ग्रन्थ लिोकता है।
माता मुसे सो नर मिन साहे।
दे, उमे में नित बार वार ।
मानो मिला मित्र मुझे पुराना ।।
(गिरधर शर्मा)

फ)
२२०
छन्दरक्षायली
यडा कि छोटा कुछ काम कीजे।
परन्तु पूर्वापर सोच लीजै ।
बिना विचारे यदि फाम होगा।
कमीन अच्छा परिणाम होगा।
(मैथिलीशरण गुप्त)
(ख) अनेक ब्रह्मादि न यन्त पायो ।
अनेक गा घेग्न गीर गायो ।
तिन्हें न रामानुज रधु जानौ ।।
सुनो सुधी पेयल ब्रह्म मानी।।
(देशय दास)
(ग) अन ल्याणि, सुधास्वरूपे ।
मजीयता दो भर रेखनी में।
विशुद्ध वीणा लय माधुरी से ।
बनू पा-पान मनखियों का।
(श्यामाकान्त पाठक)
निजेक्षया भूतल देहधारी ।
धर्मचारी॥
चले दशग्रीवहि मारिवे को।
तपी नती फेवल पारिये को।
चले यी पावन पादुका है।
प्रदक्षिणा राम-सियाहु को दे।
गये त' नदीपुर वास कीनों ।
१-इस का उचारण लघुग्न् होगा।
अधर्म-सहारक

में।
.
१२२
छदरत्नावली
उपर्युन पद्य के आदिम अन्तिम चरण उपेन्द्रवजा के
है और मध्यम दोनों इन्द्रवज्रा के।
(स)
"ब्रह्मन तजा पुस्तक-प्रेम आप।
देता अभी ह यह राज्य सारा'
को मुगे यो यदि चक्रवर्ती ।
"ऐसा न राजन कहिए",
कह
(गिरिधर शर्मा)
इस पद्य या तृतीय चरण उपद्रवज्रा का है, शेष सर
इन्द्रवज्रा के प्रथम पाद पा अन्तिम वर्ण पादात में होने के
कारण ही गुर माना गया है ।
असण्ड भण्डार भरा हुआ है।
सुरण का जो मम गेह म ही ॥
यताइए ६ मम मित्र-वय्य ।
फ्यों लूं किसी के फिर दान को मै ॥
(गिरिधर शमी)
इस पद्य का चतु4 चरण इन्द्रवत्रा का है, शेष सर
उपद्रवजा के।
(घ) गिने हुए सजन रद का तो।
कभी कभी मैं परता सुमग ।।
परन्तु पुस्तक मित्र ऐसा।
होता कभी जो मुत्य सेन न्यारा ।
उक्त पद्य के पहले तीन चरण उपेन्द्ररजा के है और चौथा
इन्द्रवना का।

१२४
(ट)
(च)
छन्दरत्नावली
कमला मिला पति फोऊ।
मुदर श्यामल राम सु जानौ ।
गौर सुरक्षमण नाम यखानी ॥
आशिप देहु इन्हें सर कोऊ ।
सूरज के कुल-मडन दोऊ ॥
हो भृगुनद् चली जग माहीं ।
राम विदा फरिये घर जाहीं ॥
हो तुम से फिरि युद्ध हिमाडौं ।
क्षत्रिय वश को बैर रे छाटौं।
राज-सभा न ग्लिोक्यि कोऊ।
शोक गहे तब मोदर दोऊ ॥
मदिर मातु विलोकि अकेली।
ज्यों कि वृक्ष विराजति बेटो॥
मातु सौ मिटिवे फहँ आई ।
ज्यों सुत की सुरमी सुलवाई।
लक्ष्मण स्यो उठि के रघुराई ।
पायन जाय परे दो भाई ।
मातनि क्ठ उठाय लगाये ।
प्राण मनो मृत देहनि पाये ॥
आइ मिलीं तय सीय मभागी।
देवर सामुन के पग लागी ।
(ज)
(केशवदास)
१-२, ३ इन वर्षों का उचारण लघुवन होगा।

छन्दरनावली
धिक ! वृथा हुई, ऊर्मिला व्यथा ।।
(घ)
समय है अमी, हा ? फिरो फिरो,
तुम न यों यश, स्वर्ग से गिरो।
प्रभु दयालु हैं लौट के मिलो,
न उनके कुटी द्वार से हिलो।
तुम मिरो मुझे, धर्म छोड के,
फिर मरूँ न क्यों, मुण्ड फोड के ?
यह शरीर लो, प्राण ये वुझे,
धरन हा सखी, छोड दे मुझे।
(मथिलीशरण गुप्त)
१४. भुजगप्रयात (य य य य)
भुजङ्गप्रयात वृत्त के प्रत्येक पाद में चार यगण
के क्रम से १२ वर्ण होते हैं। जैसे-
(क) जहा क्स के
कुञ्ज की मजुता थी,
एता पत्रिका पुष्पिता गुचिता थी।
जहा थ हरे कुज के पुज प्यारे,
जहा फज ये भृङ्ग की गुज वारे ॥
(Iss)
-
(सरस पिंगल)
(ब) / अजन्मा न आरम तेरा हुआ है,
पिसी स नहीं नन्म मेरा हुआ है।
रहेगा सदा अन्त तरा न होगा,
किसी फाल में नाश मेरा न होगा।
(नाथूराम शङ्कर)
n

- - छन्दरसाली १५. परिणी () सपनाम-शान्तिी नरिवली पुस र पाद में चार के म १२ पोतेम- पग्री धन्य है जो मनोकारिणी मिएमाण पुजीग मदारिता। मंगोग मतो पीरता-पारिणी, सुदरी युन प्रेम गालिली (মেনল থিম (ग) र राधिया, शाम मोपदों पर। मीप मो मानमान पाई घt! चिस में भारी बोध न मानिये ।। प्रम्धिनी मुतिको रणकी धारिणे॥ (गाकर राम मागे पले मय सीमा चली। पशु पाने मये माम मोमै मादी । पेगि दी मये कोटि के भो । जीय जीयेश के पीय माया मगो । (घ) जो रही पक्ष्मणे ऐन माग्यो जहाँ । मुष्टि डाली मन मारथी मही। पशु ही प्राण को नाश मोगियो। दरद तीनि में ततो पो भयो। (केशवदान ...... मालायुक

-
पदरजापनी
या दाम मयादि घाम जी।
विपया रिलीजी गई विशी।
सपसी घायत दरिद एदी ।
परि पौतुफ नात न मान पदी १
(घ) सुत मानहि मान पिता सपना।
भयग ही पीठ परी जय
ससुरारि प्यारि स्टी जय ।
रिपु रुप पुटुम्य भयो मय।।
(गुलसीदास)
सय पायन ज्ञार माए परे ।
उन भेंट स्टार के मा भरे ।।
सिर मधि पिलरोफ बगाई।
सुत सो पिन या पिपरीत मई।
(ज) यह पान सुनी उपनाय जी ।
शरमेस्टगे भापर
चिया
मुमते यछु यास न जा पही।
अपराध पिना प्रापि देहदही।
(पेशपदास)
१-पैसा, धन 10~
३-इस का उचारण लघुवा होगा।
४-दस का उगारणा लघुवन् होगा।
-वैराग्य।

(1)
(ग)
(घ)
छन्दरमावली
जिते नर नागर रोग पिचारि ।
सय घर नै रघुनाथ निहारि ।
किधी परमानंद को यह मूल ।
पिरोक्त हो सो हर सप शूल।
न हौं मपराक्ष 1 हो दजीत ।
विरगेकि तुम्हें रणदोहूँ न मीत ।।
सदा तुम सक्षमण उत्तम-गाप ।
फरी जनि थापनि मातु मनाय॥
शिलोचन लोचरारगि तोहि।
तजो इट मानि भनौ किन मोहि ॥
क्षम्यों अपराध भजो घर जाहु ।
दिये उपजाउ न मातहि दादु ।।
(केशवदास)
भदेयन की उर भाभि भनीति ।
नियाहन को सुरपालन रीति ॥
सुधारन यो जन को भधिकार
घरयो धरि घामन को अयतार॥
बड़े जन को नहि मांगन जोग।
फैर्य छल साधन में लघु लोग।
()
१-इस वर्ण का उभारण लघुवा (सु के समान) होगा!
१-फामदव । ३-इन्द्रजीत । ४-मत।५-अलान ।

१३४
(छ)
उन्दरत्नावली
प्रजागना वलभ को पिलरोकने ॥
चयम्ब बूढ़े यह बाल वालिका ।
सभी समुत्कण्ठित औ अधीर हो ।
सग आये ढिग मजु यान के।
स्व-सोचनों की निधि-चार फूटने ।
स्वरूप होता जिसका नभय है।
न वाक्य होते जिसके मनोश है।
अतीर प्यारा यनना सदैव है ।
मनुष्य सो भी गुण के प्रभार से ॥
"सदा फरूँगा अपमृत्यु सामना ।
सभीत हूँगा न सुरेन्द्र-धन से ॥
कभी करूँगा अपहेलना न मैं ।
प्रधान धर्माग परोपकार की।
प्रवाह होते तक शेष श्यास के।
सरत होते तक एक भी शिरा ॥
सशक्त होते तक एक लोम के।
किया पाँगा हित सभूत का ॥
मुकुन्द चाहे यदु-वश के धनें ।
सदा रहें या यह गोप वश के।
न तो सगे ब्रजभूमि भूल थे।
न भूल देगी प्रजमेदिनी उन्हें ।।
(अयोध्याप्रसाद उपाध्याय)

-
१३६
छदरत्नापली
२१. द्रुतरिलरित ( न भ भ र) अन्यनाम मुदरी
द्रुतविलम्बित वृत्त के प्रत्येक पाद में नगण, दो भगण मौर
रगण के क्रम से १२ वर्ण होते हैं। जैसे-
(क) विगत हे जलजात निशा हुई ।
द्युतिमयी यह पूर्व दिशा हुई।
छिप उलूक गये भय-मोति से।
अय विकास करो तुम प्रीति से ।।
(ख) जनम से पहले विधि ने दिये।
रजत, राज्य, रयादि तुम्हें स्वय॥
तदपि क्यों उसफो न सराहते।
मचलते चलते हो तुम वृथा ।।
तनिक चिंतित हो मत तू कमी।
मिट नहीं सफती भनितन्यता"
मुरुत रक्षक है सब का सदा।
भवन में धन में मन! मान जा।।
दुखित हे धन-हीन, घशी सुखी।
यह विचार परिपत है यदि ॥
मन, युधिष्ठिर को फिर क्यों हुई?
विमरता मर ताप-विधायिनी ॥
मन ! रमा, रमणी, रमणीयता ।
१-कमला
२–'दि' पादान्त में होने से गुरु माना गया है।
(घ)

छन्दरत्नावली
रोये बिना न छन भी मन मानता था।
इबी महान द्विविधा जनमडली थी।
(ख) रोगी दुखी विपत आपत में पड़े की।
सेवा अनेक फरते निज हस्त मे थे ।
ऐसा निकेत व्रज में न मुझे दिखाया।
फोई जहाँ दुरित हो पर घे न हो।
(ग) कुजे वही थक्ष वही यमुना वही है ।
घेले बही, यन घही, विटपी यही है।
पुष्प पल्लर घही, द्रा भी वही है।
ए किन्तु श्याम बिन हे न वही जनाते ।।
(घ) मा मन्द मन्द मन मोहन मण्डली में।
पाते यड़ी सरस थे सर को सुनाते ।।
मावों ममेत सर में मृदुता मिला के।
या थे महा-मधु मयी मुरली बजाते ।।
(3) फूले हुए पुमुद देय मरोघरों में ।
माधो सु-उति यह थे सप पो सुनाते ॥
उत्कर्ष देस निज अक्पले शशी का।
है यारि-राशि मिसकैरव दृष्ट होता ।
(च) फूलों दलों पर विराजित जोस बूंद ।
जो श्याम को दमकती दुति से दिखातो॥
तो ये समोद फहने-बन-देवियों ने ।
की है फला पर निछावर मुक्त माता ।।
(छ) कोई दुरवी जन विलोक पसीजता है ।

छन्दरदाधली
राजपुरिफा समीप साधु यधु राखि के।
हाथ चाप याण ले गये गिरीश नासिके।
चेद मत्रत शोधि अस्त्र सरन दै मले।
रामचन्द्र पन सु विप्र छिप ले चले।
लोम छोभ मोह गर्व काम फामना हुई।
नींद भूग प्यास त्रास वासना सयै गई ।
आर्समुद्र के क्षितीश और जाति को गर्ने ।
राज-मौन भौज को सय जने गये बने।
भौति भाँति अन्न पान व्यजनादि जैवहीं,
देत नारी गारि परि भूरि भूरि मेयहीं ।
मत्त-दति-राज-गजियाजि-राज-राजिक।
हेम हीर मुरु चीर चाय साज साजि के।
घेष पयाहिनी अशेष घस्तु सोधियो।
दाइजो निदेहराज भांति भाँति को दियो ।
देसि देसि फ यशोक राज पुत्रिका फहो।
देहि मोहिं आगित जो अगभागि है रह्यो ।
ठौर पाइ घात-पुत्र डारि मुद्रिका दई ।
आस पास देसि के उठाय हाथ के लई॥
(केशवदास)
१-लाघ फर। -शीघ। ३-नष्ट हो गई।
समुद्र तक । ५-माग-भाजी। -मिगोती है। ७-हायो ।
८-घोडे । ९-पक्ति। १०--दहेज। ११-लघु पढ़िए।

.
1
छन्दरत्नावली
२९ मालिनी (न न म य य) ८,७
मालिनी के प्रत्येक पाद में दो नगण, मगण और दो
यगण के क्रम से १५ वर्ण होते हैं । आठ और सात वर्षों के
बाद विराम होता है। जैसे-
यह कृषि कितनों को, अन्नदा प्राणदात्री,
अहह घन ! तुम्हारी, है रही प्रेमपात्री ।
जलधर, तुम ने ही, तो इसे था बढाया।
फिर उपल गिरा के क्यों स्वय ही मिटाया।
(ख) इन निपट चरों ने, हे मरुत् । मोदकारी,
मुरभि मतत दे के, की सु-सेवा तुम्हारी।
व्यथित अघ इन्हीं को, यहि मे आज देख,
ज्वलित कर रहे हो, और भी क्यों विशेष ?
(सियारामशरण गुप्त)
(ग) यह युसुम अमी तो, डालियों में धरा था।
अगणित अमिलापा, और आशा-भरा था।
फाल क्या पा गया रे!
फण-भर तुझ में क्या, हा! नहीं है दया रे ।
(घ) सहय जन क जो, कण्ठ का हार होता।
मुदित मधुफरी फा, जीवनाधार होता ॥
यह कुसुम रँगाला, धूल में जा पड़ा है।
नियति, नियम तेरा, भी घडा ही कडा है !
दलित फर इसे तू,
(रूपनारायण पाडेय)
(2) सह फर क्तिने ही, कट औ सकटों को ।

एन्दरतायली
तय उमय करों से, पामती घे फ्लेजा।
जय वह दिरालाना, दूसरी ओर जाता ।
नज हृदय, फरों से ढापती यों हगों को।
(अयोध्यासिंह उपाध्याय)
३०. चचला (रज रजर,ल)
अन्यनाम-चित्र
चाला के चारों चरणों में, रगण, जगण, रगण, जगण
गण और लघु के क्रम से १६, १६ यर्ण होते हैं । अथात इस
के प्रत्येम पाद में गुण, लघु (51) माठ माठ यार आते हैं।
जैसे-
(फ)
रक्षिो को यश कूल बैठ धीर सावधान !
होन लागेोम के जहां तहां संघ विधान।
मीम मांति ताडफा सो मन लागीपर्न आय।
घान तानि राम पननारि जानि छोडिजाय।
(फेशनदास)
पक्षिराज यक्षराज प्रेतराज यातुधान ।
देवता अदेवता नृ देवता जिते जहान ॥
पर्वतारि अर्घ सर्य सर्य सर्वथा पसानि ।
कोटि कोटिस सूरचद रामचन्द्रदासमानि॥
रामचन्द्रजू फहत स्ववर्ण-लदेखि देखि।
१,२,४-इन वर्णों का उच्चारण लघुक्त होगा।
३-भयङ्करवा से।

१४८
छन्दरतापली
(ग) किये विशेष सॉ अशेप पाज ऐयराय के ।
सदा घिटोफ लोपनाय धर्म विप्र गाय के।
अनादि सिद्धि राज-सिद्धि राज माज टीजई।
नृदयतानि देवतानि दीद सुफ्प दीनई ॥
(घ) न हो रही न जाजू विदेह धाम फो भये ।
पही जो पात मातु पै सो माज में मुगी मये ।।
लगे क्षुधा हि मा भली विपत्ति माह नारिये।
पियास पास नीर धीर युद्ध में सम्हारिये ।।
३२. मन्दाक्रान्ता ( म भ न त त, ग ग)४, ६,७
मन्दाक्रान्ता के प्रत्येफ पाद में मगण, माण, नगण, दो
सगण धौर दो गुरु के क्रम मे १७ वर्ण होते हैं। ४,६,७ वर्ण
पर विराम होता है। जिसे-
(क) जैसे पाता, सृपित जन है, तृप्ति पानी पिये से।
घसे उर्वी, मुदित धन के, घारि से हो रही है।
शोभा पाती,विविधरंग के शस्य से मेदिनी है।
मानो कान्ता, रुचिरसन पै, घेष भूपा किए हो।
(गोविन्ददास
(ख) जो म्ठेगा, नृपति मज पा, पास ही छोड दूगी।
ऊँचे ऊँचे भवन तज के जङ्गों में पढूंगी।
गाऊँगी फूल फल दल को, व्यसनों को सलूंगी।
१-पाक्षण।
२-में। ३, ४-इनका लघुवत् सधारणा होगा।

-
१
१५०
उन्दरक्षावली
क्यों धाता ने, पिलग उनके, गात को यों किया है।
फैसे आके, गुरु गिरि पड़े, रीच में हैं उन्हीं के।
जो दो प्रेमी, मिलित पय ओ, नीर ला नित्यश थे।
(स) जो मैं कोई, विहग उडता, देपती म्योम में हु।
तो उत्कण्ठा ,निश चित में, आज भी मोचती ह ॥
होते मेरे, नियर तन में, पक्ष जो पक्षियों से।
तो यों ही मै, समुद उडती, श्याम के पास जाती ।
(अयोध्यासिंह उपाध्याय)
3-शिखरिणी (य मन स भ, लग)६, ११
शिपरिणी के प्रत्येक पाद में यगण, मगण, नगण, सगण,
भगण और लघु गुरु के क्रम में १७ वर्ण होते हैं। और ११
घों के अनन्तर यति होती है। जैसे-
(क) मिली में स्वामी से, पर यह मकी या समल के।
वहे भासू हो के, मखि! सर उपालम्भ गल के ॥
उन्हें हो आई जो निरख मुझ को नीरव दया ।
उसी की पी का, अनुभव मुझे हा! रह गया।
(मथिली शरण गुप्त)
(घ) मनोहारी शय्या, परम सुथरी भूमितल की।
'सुहानी क्या ही है, ललित या फे दूध-दल से।
नदी के फूलों की, रिमल घर इन्दु-द्युति समे।
नई रती से जो, अति चमकतो है निशि दिने ।
१,२-पादान्त होने ये कारण ये वर्ण गुरु मान जायेंगे।
-

.
.
"
छन्दरतापली
क्यों धाता ने, चिलग उनके, गात को यों किया है ।
फैसे आ के, गुरु गिरि पड़े, बीच में है उहों के।
जो दो प्रेमी, मिलित पय औ, नीर लौं नित्यश थे।
(झ) जो मैं कोई, रिग उडता, देखती व्योम में हु।
तो उत्कण्ठा ,विवश चित में, माज भी सोचती ह॥
होते मेरे, नियल तन में, पक्ष जो पक्षियों से।
तो यों ही मै, समुद उडती, श्याम के पास जाती ॥
(अयोध्यासिंह उपाध्याय)
शिखरिणी ( य म न स म, ल ग) ६, ११
शिखरिणी के प्रत्येक पाद में यगण, मगण, नगण, सगण,
भगण और लघु गुरु के क्रम में १७ वर्ण होते हैं। ६ और ११
यणों के अनन्तर यति होती है। जैसे-
(क) मिली में स्वामी से, पर कह सकी षया सभल के।
यहे आसू हो के, सखि सर उपालम्भ गल के ॥
उन्हें हो आई जो निरप मुझ को नीग्य दया ।
उसी की पीड़ा का, अनुभव मुझे हा! रह गया।
(मैथिली शरण गुप्त)
(स) मनोहारी शय्या, परम सुयरी भूमितल की।
'सुहानी क्या ही है, ललित वा के दूध-दल मे॥
नदी के फूलों की, निमल पर इन्दु-द्युति समे।
नई रेती से जो अति चमकती है निशि दिन ।
१,२-पादान्त होने के कारण ये वर्ण गुरु माने जायेंगे।

उन्दरत्नावली
(क) दसि री बलभद्र मोहन पाट यारफ सङ्ग में।
प्यार मौतिन के करें, फिटफ महारस रङ्ग में ||
पारनी कटिम फस, पटगील पील निसाल है।
चन्द्रमा घन जुक्त मा,नहूँ अङ्क पियुन-जाल ।
(गदाधर मह)
आइयो तेहि फाल ग्राहक्षण यश को थल देपि ।
साहि उत घोलि केपि भानिमामि विशेष के।
स सुन्दर राम लमण दाम्प देसि सो हपई।
यदि के सोइ राजम,डल घई सुन यपई ।।
(ग) कौन हो क्ति त चले, कित जात हो केहि काम जू।
फोन की दुहिता पह, कहि फोन की यह धाम जू॥
एक गाँउर हो कि साजन मिश्र वधु यपानिये ।
देश के परदेश के, विधी पन्यपी पहिचानिये ॥
हाइ हाइ जहाँ तहाँ, सयह रही सिगरी पुरी।
धाम धानि सुदाी, प्रगटर्टी संय जे हुती दुरी।
है गये सुपनाथ को सय लोग श्री सरयू तटी।
राजपति समति पु,प्रनि विप्रलाप गढी रटी ॥
(केशवदास)
३५. शार्दूल विक्रीडित (म स स स त त, ग) १२,७
शार्दूलविक्रीड़ित के हर एक चरण में मगण, सजण, जगण,
सगण, दो तगण और गुरु के क्रम मे १९ वर्ण होते हैं । यति
१-४-श्रादि वर्गों का उधारण लघुवत होगा।

१५४
छन्दरत्नावली
इच्छा के अनुकूल कार्य सब मै, साध रेता सदा।।
शाता है कहते मनुष्य यश में, है काल फर्मादि के।
होनी है घटना-प्रवाह पतिता म्वाधीनता यत्रिता ॥
(च) ऊँचे दाडिम से रसाट-तरु थे, भी मान से शिशपा।
यों निनोच असख्य पादप कसे, वृन्दाटनी यीच थे।
मानो चे अवलोकने पथ रहे, वृन्दावनाधीश का।
ऊँचा शीश उठा मनुष्य जनता के तुल्य उत्कठ हो ।
(अयोध्यासिंह उपाध्याय)
(छ) सायकाल हया समुद्र तट की, नैरोग्य फारी यहा।
प्राय शिक्षिन सभ्य लोग नित ही, आते इसी से यहाँ ।।
वेडे हास्य विनोद मोद परते, सानन्द ये दो घडी।
मो शोभा उस दृश्य की हृदय को, है तृप्ति देती यड़ी।
(ज) छोटे और घड़ जहाज जल में, देसो वहाँ चे खड़े।
सो भी दृश्य विचित्र, पितु हम को, वे हानिवारी घड़े ।
ले जाते वर यस्तु देश-भर फी, जाने कहा की पहा ?
लाते फेयर ऊपरी चटफ की, चीजें विदेशी यहा ।।
(फन्हैया लाल पोद्दार)
३६ सम्परा ( म र म न य य य)७,७,७
स्नग्धरा वृत्त के प्रत्येक चरण में मगण, रगण, भगण,
नगण और तीन यगण के क्रम से २१ वर्ण होते हैं। हर सातवें
पण के बाद विराम होता है । जैसे-
नाना फूरों फलों से, अनुपम जग की,
घाटिका है विचिना ।

छन्दतावली
श्री मनमोहन रूप सुधा 'मदिरा'
मद मोहिं छकारहि त् ॥
भिखारी दास)
क्षनिन के प्रन युद्ध जुवा सजि
साजि चढ़े गजराजन
वैस को यानिज और कृषी प्रन
शूद्र के सेवन-साजन ही ॥
विप्रन को प्रन है जु यही सुख
सम्पति सों पुछ फाज नहीं ।
के पदियो के तपोधन है फन,
मांगत याँग्रन हार नहीं ॥
(ग)
में
तिहि आश्रित मान रहे ।
देयत चद की ओर चकोर रहे
मिलिये हु की आस गहै ।
प्रान-विथा न बने चकवान "कों
द्यौस संयोग सदा 'ही रहे ।
हेन निमित्त हु मिच ! इतो दुप
चित्त फहौ किहिँ आंति सहै ।।
(अर्जुनदास फेडिय)
१-५) * भासत एक गुर मदिरा गुरु
* इस सवये में अनेक सरैयों के लक्षण सक्षेप में दिए
गए हैं। हमारे द्वारा दिए गए लक्षयों से इस का अर्थ स्पष्ट
समझ में आजायगा!
चातक सयत
इक बूंद पिचे

छन्दरतावली श्री मनमोहन रूप सुधा 'मदिरा' मद मोहिं छफारहि तू भिखारी दास) (ख) क्षत्रिन के प्रन युद्ध जुवा सजि याजि चढ़े गजराजन चैत को यानिज और कृपी प्रन शुद्र के सेवन-साजन ही ॥ विप्रन को प्रन है जु यही सुत्र मम्पनि सों कुछ फाज नहीं । के पदियो के तपोधन है कन, मांगत घाँझनै लाज नहीं । चातक सपत तिहिं आधित देखत चद की ओर चकोर रहे मिलिये हु की आस गई ॥ प्रान-विथा न बने चकमानकों धौस सँयोग सदा 'ही लहै । है न निमित्त हु मित्त ! इतो दुख चित्त फही किर्हि आंति सहै। भामत एक गुरु मदिय गुरु * इस सर्वे में अनेक सरेयों के लक्षण संक्षेप में दिए गए हैं। हमारे द्वारा दिए गए लक्षणों से इस का अर्थ स्पा समझ में आजायगा! इक बूंद पिये पान रहे । th (बर्जुनदास केडिय) *

।
१५८
उन्दरतापली
३८. मत्तगयन्द सर्वया (७म + गग)
(बायनाम मालती)
मत्तगयन्द सरैये के प्रत्येफ पाद में सात मगण और दो।
गुरफ क्रम से २३ वर्ण होते है। जैसे-
(फ) जाल प्रपच पसार धने फुट गौरव का उर फाह रहा है।
मानव मण्डल में मिल दाहक दानय दुष्ट दहाद रहा है ।।
जाति समुन्नति की जड पो फर घोर पुषमे उसाड रहा है।
भूल गया प्रभु-सफर को जड जीवन जन्म विगाह रहा
(नाथूराम शफर)
(ख) हो रहते तुम नाथ जहा रहता मन साथ सदैव यहीं है।
मजुल मूर्ति इसी उर में यह नेक कमी रटती न कही है।
लोलप लोचन पो दिनती यह चारु घटा सप फाल यहीं है।
है वह योग मिला हम फो जिम में दुःख मूल नियोग नहीं है ।
(गोपाल शरणसिंह)
(ग) प्रान-प्रयाण-कथा सुन के उसके मुख-पफज का मुरझाना।
और जरा हँस के उसफा अपन मन का यह भाय छिपाना ।
किन्तु बचानक ही उसके घर लोचन में जल का भर माना।
समय है न कभी मुझ को इस जीवन में वह दृदय भुलाना ॥
(गोपाल शरणसिंह)
(घ) या ल्कुटी अरु कामरिया पर राज तिह पुर का तजि डारौं।
आठ सिद्धि यों निधि को मुख नन्द की गाय चराय विसारों।
खान है इन नैनन ते ब्रज के पन घाग ताग निहारों।
फोटिन हु फलधौत के धाम फरील फी कुजन ऊपर धारों ॥

छन्दरलावली
(१) दाम फी दाल छदाम के' चाउरधी अँगुरीनले दुरि दिखायो
टोनों सोनोनधरयो पछुआनि सबै तरकारीको नाम गनायो।।
विप्रबुलाय पुरोहित को अपनी विपती सय भौति सुनायो।
साहसी आज सराध कियोसोमली विधिसोंपुरखा फुसलायो
(कविता फौमुदी)
३९. चकोर सवैया (७ भ+गल।
चकोर सवैये के चारों चरणों में सात सात भगण और
गुरु लघु के क्रम से २३ २३ वर्ण होते हैं। जैसे-
(फ) सोहत है तुलसी बन
रुचि रास मनोहर नन्द किशोर ।
चारि हु पास है गोप वधू
मणि दास हिये में हुलासन थोर।
नीर-ज गोप यधून ' को आनन
मोहन नैन भ्रमै जिमि भौर।
मोहन-आनन
लखे
यनितान के" लोचन चार 'चकोर, ॥
(भिखारीदास)
(ख) हे प्रिय यन्धु, विरोध मिटा कर
प्रीति प्रचार फरो सय और।
में
१-११-इन वर्षों का ध्चारण लघुवत् होगा।

-
१६२
छन्दरत्नारली
(म द्विज वेद पद सुविचार पदें पल पाय चढ़े मय ऊपर को।
अनिरद्ध रहैं ऋजु पथ गहे परिवार फहें वसुधा भर को ।
धुम धर्म धरै पर दुम्व हरे नन त्याग तरें भर सागर को
दिन फेर पिता,पर दे सविता करदे कविता करिशकर को
(नाथूराम शङ्कर)
(ग) इसक अनुरूप कह किसो वह कौन सुदेश समुन्नत है।
समझे सुर लोक समान इसे उनका अनुमान असगत है ।।
काय गोविद वृन्द यमान रहे सय का अनुभूत यही मत है।
उपमान-विहीन रचा विधि ने यस भारत के सम भारत है।
(घ) पुर ते निकसी रधुवीर-वधू,
धरि धीर दये मग में डग द्वै।
भलकी मरि भाल फनी जल की,
पटु सुखि गए मधुराधर वै॥
पुनि चूझति हे चलनोऽय किनो,
पिय पर्नकुटी फरिहो फित है।
तिय की लसि आतुरता पिय की,
अघिया अति चारु चली जल च।
(ड) यर दन्त की पगति कुन्दवली अधराधर पल्लव सोलन की
चपला चमक घन चीच जग छवि मोतिन-माल अमोलन को
घुघुरोरी लटे लटके मुस ऊपर कुडल लोल कपोलन की।
निरछारि प्रान फर तुलसी यति जाउ ललाइन बोलन की॥
१,२-इन वर्गों का उशारण लघुवत् होगा।

छन्द्रत्नावली
४१ वाम संवैया (७ जगण+यगण)
(अन्यनाम-मफरद)
याम सवैये के प्रत्येक पाद में सात जगण और एक यगण
पेन से २४ वर्ण होते हैं। जैसे-
(क) लस द्विज औरहि मुत्तिय माल
पयोनिधि मै उपजे नहिं जो है।
भए न सरोवर अबुज और
सुरोचन काह कुमारहि मोहे ।
सरोरुह में न रहै अरु लच्छि
मतच्छ सुलच्छनि तो सम को है।
सदा परिपूरन तो मुस राधे
सुधाधर और धरा पर सोहै ।
(अल्फार माशय)
लेप उर यानि उगै घर
त्वचाऽति बुच सकुच मति-चेली।
न नवग्रीच थक गति केशव
पालव ते सँगही सँग खेली।।
लिए सय माधिन व्याधिन सग
१-दाँत।२-मोतियों की माला। ३-लक्ष्मी।
-सुलक्षणों वाली।५-चन्द्र।६-दृष्टि ।
-सिकुडे (८-फफ जाती है। 8-मानसी व्यया
(स
)

छन्दरत्नावलो
जान सफा यह क्यों न मुझे
पहने सर हैं यह है सब जानता ।
है नित्त ही रहता उर में
फिर क्यों न मुझे यह है पहचानता ।।
(गोपालशरणसिंह
(ख) आपु को घाइन ल यली
यनिताहु को वाहन सिंहहि पेखि के।
मूसे को पाइन है सुत एफ सु
दूजो मयूर के पच्छ बिसेखि के ।।
भूपन है कवि "चैन" फनिंद के
यर परे सर ते सय लेखि के।
तीन लोक के ईश गिरीश
सुयोगी भये घर को गति देसि फै।
(1) साज सज्यो नृप रामहि राज ठौं
रीति जथा कुल घेद पुरान की।
याज पधाई भरी बुनि धामनि
कोषित कठिन के फल गान की।
सो सपनो सो मयो सपने हु
न जानी यही भई यात अठान की।
आज अचानक सानुज जानकी
जानकी जीवन के यन जान की ,
।

छन्दरनावली
जान सफा यह क्यों न मुझे
फहने सय है वह है सय जानता ।
है नित्त हो रहता उर में
फिर क्यों न मुझे यह है पहचानता ।।
(गोपालशरणसिंह)
(ख) आपु फो पाहन बल यली
यनिताहु को वाहन सिंहहि पेसिके।
मुसे फो याइन है सुत एक सु
दूजो मयूर के पच्छ यिसेसि फै।
भूपन है कवि "चैन" फनिंद के
और परे सर ते सर लेपि के।
सीन हुँ लोक के ईश गिरीश
सु योगी भये घर को गति देखि फै।
(ग)'साज सज्पो नृप रामहि राज ठौं
रीति जथा कुल वेद-पुरान की।
वाजे बधाई भरी धुनि धामनि
कोकिल कठिन के फल गान की।
सो सपनो सो भयो सपने हु
न जानी वही भई घात अठान की।
माजु अचानक सानुज जानकी
जानकी जीवन के यन जान की ।

एन्दरतायली
जो जनरजन दुष्ट यिमजन
गजन-गर्व 'हरी' सुमधाम है ।
सोर त्रिलोक को नाथ गली,
पमानुलली की गली को गुलामई॥
(वियोगी हरि
(छ) आनन है अरविंदन फूले
अली-गन ! भूले कहा मँडरात हो।
फोर तुम्हें कहा याई लगी
भ्रम थिय के ओठन को ललचात हो।
'दासजू व्याली न येनी-यनाय
है पापी फलापी कहा इतरात हो ।
पोलती चालना याजती यीन
कहा सिगरे मिलि घेरत जात हो ।
(मिस्वारीदास)
(ज) प्यार-पगे पिय प्यारे सों प्यारी!
फहा इमि कीजत मान मरोर है।
है 'रतनाफर' पै निति यासर
तो छवि-पानिय को तरसो रहे ।।
है मन मोहन मोह्यौ पै तो पर

१७०
(ग
)
छन्दरनावटी
घर नारि सती पति सोंचित्त फाटत॥
भा विधिना प्रतिकूल
तप ऊँट चढ़े पर फूकर फाटन ।।
(कविता फौमुदी)
पुन्यहि पूरण
पाप विनाशन
निर्मल कीरति भक्ति पढाधन ।
दायक ज्ञान र घायक मोह
निगुद्ध सुप्रेममयी मुद पावन ॥
श्रीमद रामचरित सुमानस
नीर सुभक्ति समेत नहायन ।
'नायक' ते जन सूरज रूप
जहान के ताप को ताप नसायन ।
(चिनायक राव)
पायन पीरिये पाँवरिया
कटि फेशरिया दुपटा छवि छाजित ।
गुज मिरे गजमोरिय हार में
रीति सितासित भौति है भाजित ॥
अग यपार
अवलोक्त
होत हजार मनोभव सानित ।
(घ
)
प्रमा
२-नाशक । ३-सडाऊँ । ४-सफेद और काला।
४-कामदेव।

१७२
उन्दरतापली
फाह सौ न सके जननी।
जग में अपनी ये स्वमाय निवारन ।
(सेठ कन्हैयालाल पोदार)
४४. मुन्दरी सरैया (स+ग)
सुदरी सवैये के हर एक चरण में माठ सगण और एक
गुरु के क्रम के २५ यर्ण होते हैं। जैसे-
हम दीन दरिद हुताशन में,
दिन रात पड़े दहते रहते हैं।
दिन मेल पिरोध महानद में
मन योहित से यहते रहते हैं।
फवि शङ्कर फाल कुशासन की
फरफार फड़ी सहते रहते हैं।
पर भारत के गत गौरव की
अनुभूत कथा कहते रहते हैं ।
(नाथूराम शङ्कर)
(ख) सुख शान्ति रहे सब ओर सदा
अधिवेक तथा अघ पास न आयें।
गुण शील तया बट बुद्धि पदे
हठ वर विरोध घटें मिट जार।।
सय उन्नति के पथ में विचरें
रवि-पूर्व परस्पर पुण्य कमावै ।
१- अग्नि।

धन्दरत्नावली
पटुहास-पिलासन यो भवभीति
हमारी हरी घृषभानु-दुलारी।।
(अर्जुनदास फेडिया)
(ड) मुनिनाय के गात रुमाचन साहि
यो सहसा सिव-चाप उठायो ।
नर नाथन के मुख मडल-साहि
जो अपनी सल-ओर नमायो ।
मिथिलेस-सुता मन-सायहि त्यों
गुन संचिकै जोडिन माहिँ चढायो।
भृगुनाथ के गर्व भमडिन साथसो
पडित के रघुनाय गिरायो ।
(फन्ईयालाल पोदार)
४५ मुस (८ स+ल ल)
सुख संवैये के प्रत्यक पाद में आठ सगण और दो लघु के
फम से २६ वर्ण होते हैं। जैसे-
सिरजू-सरिता तट वाटिका में रट
लागि रही घरटा यिन सफहि ।
तिहि ही समझ नहिं फोकिल कों
चढि येठयो जुफाफ रसाल के अफ हि!
सब ही की महानता होयत है जब
थान को आन पर जु अतक हि ।
१-६ इन वर्गों को लघु माना और पढ़ा जायगा।
,

१७६
९
उन्दरक्षावली
११, ११ वर्णों के किन्हीं चार वृत्तों के नाम और
लक्षण मात्र लिखो।
भुजगी और भुनग प्रयान छदों में क्या मेद है ? उदा.
हरण देकर विशद फरो।
भुजगश्यात, नग्विणी और नोटक वृत्तों के भेद को
उदाहरणों द्वारा स्पष्ट करो।
मोतियदाम, तरल नयन और मोदक वृत्तों के उदाहरण
लिस कर सिद्ध करो कि ने उदाहरण इन्ही वृत्तों
के हैं।
द्वतपिलम्बित, शस्थ और इन्द्रवशाछन्दों में से किन्हीं
दो क लक्षण और उदाहरण दो।
कोई एमा पद्य लिम्रो जिस के प्रत्येक पाद में चार
यगण या चार रगण याने हों।
कोई ऐसा पद्य लियोजिस के हरचरण में चार सगण
या चार जगण आते हों।
फोई ऐसा पद्य लिखो जिस के चारों पादों में १२, १२
पूर्ण लघु हो।
१२, १२ वर्णो के वृत्तों में से जो चार वृत्त आप को
समे सुन्दर प्रतीत हों उनका एक एक उदाहरण दो।
प्रहर्पिणी और का अलि वृत्तों में क्या भेद है १ टोनों
का एक एक पाद लिख कर भाव को स्पष्ट करो।
घसन्त निटका और मुकुन्द वृत्तों में से किसी एक का
विस्तृत वर्णन करो।
१८

९
उन्दरतावली
११, ११ वर्णों के किन्हीं चार वृत्तों ये
लक्षण-मात्र लियो।
भुजगी और भुनग प्रयान छ दों में क्या मे,
हरण देकर विशद फरो।
भुजगप्रयात, स्रग्विणो और नोटक वृत्तों,
उदाहरणों द्वारा स्पष्ट करो।
मोतियदाम, तग्लनयन और मोदक वृत्तों
लिस कर सिद्ध करो कि वे उदाहरण'
११
के हैं।
है
१७
द्रुतनिटम्बित, यशस्थ और इन्द्रवशा छन्दों
दो के लक्षण और उदाहरण
कोई पमा पद्य लिसो जिस के प्रत्येक
यगण या चार रगण आने हों।
१५ कोई एसा पद्य लिखो जिस के हरचरण में
या चार जगण आते हों।
१६, कोई ऐसा पद्य लियो जिस के चारों पाद
वर्ण लघु हो ।
१२, १२ वणों के वृत्तों में से जो चार
सरसे सुन्दर प्रतीत हों उनका एक एकर
प्रहर्पिणी और का अवलि वृत्तों में क्या मे
फा एक एक पाद लिख कर भाव को स्प
घसन्त निलका और मुकुन्द वृत्तों में से दि
विस्तृत वर्णन करो।
१८
,

सप्तम अध्याय
वधिसम वृत्त
जिन छन्दों के पहरे तथा तीसर और दूसरे तथा चौथे
चरणों म पण सख्या और वर्ण-क्रम ममान होते हैं, उन्हें वार्ध
सम वृत्त फहते हैं । हिन्दी भाषा में इन छदों का व्यवहार
पहुन कम होता है तो भी हम ने इनका अति सक्षित वर्णन
फरना उचित समझा है, ताकि विद्यार्थी छन्द क इस भेद से
नितान्त अनमिशन रह जायें ।
१. मुन्दरी
सुन्दरी वृत्त के विषम पादों में दो सगण, जगण और गुरु
फेयम मे १०, १० वर्ण तया सम पादों में सगण, मगण, गण
और लघु गुरु के क्रम से ११, ११ वण होते है । इस प्रकार
समस्त वृत्त में कुल ४२ वर्ण होते हैं। जैसे-
चिर-कार रसाल ही रहा,
जिस मायन फवीन्द्र का कहा।

1
छन्दरत्नावली
विहगावली बोलने लगी,
यह प्राची पट सोलने लगा।
अटी हिल डोलने लगी,
सरसी सौरम घोटने लगी।
(मैथिलीशरण गुप्त)
दुतम या
द्रुतमध्या वृत्त फे विषम चरणों में तीन भगण और दो
गुरु के क्रम से ११, ११ पण होते है तथा सम चरणों में नगण,
दो जगण और यगण के क्रम से २, १२ । इस प्रकार समस्त
वृत्त में कुल ४६ वर्ण होते हैं। जैसे-
रामहि सेवहु रामहिं गायो ।
तन मन दैनित सीस पायो ।
जन्म भनेकन के अघ जारो ।
हरि हरिगा निज जन्मसुधारो॥
(भानुफवि)
३ पुप्पिताग्रा
पुष्पिताग्रा वृत्त के विपम चरणों में दो नगण, रगण और
यगण के प्रम से १२, १२ वर्ण होते हैं और सम चरणों में
नगण, दो जगण, रगण और गुरु के कम से १३, १३ । इस
प्रकार समस्त छन्द में कुल ५० वर्ण होते हैं। जैसे-
फिरि फिरि भ्रमि के कहे नवेली,
विधि यह कौन प्रकार की चमेली ।

(ग
)
(घ
)
१८४
छन्दरत्नावली
कुछ मी न रहा सर नाश हुआ।
रजनीश प्रताप-पतग हुया
यस भारत का रस भग हुआ ।
मत भेद भयानक पाप
पिन प्रेम न मेल-मिलाप रहा ॥
अमिमान अधोमुस ठेल रहा ।
अधमाधम ढोंग ढकेल रहा ॥
सुस जीवन का मग तग हुआ।
यस भारत का रस भग हुआ ॥
अवधेश धनुधर राम नहीं ।
वजनायक श्री घनश्याम नहीं।
अब कौन पुकार सुने इस की।
परमाकुल गैल गहे किस की।
तपै मृग-तोय तरङ्ग हुमा ।
यस भारत का रस मङ्ग हुआ ।
(नाथू राम शङ्कर)
जिस छन्द में भुजगी ( य य य ल ग) के छ चरण हों,
3 से भुजग्यात्मक मिलिन्द पाद कहते हैं । जैसे-
(ख) भुजगी-आत्मक मिलिन्दपाद
सुधी साधु को मान साना न दो।
किमी दीन को एक दाना न दो।
यड़े हो बड़ा दान देना यहाँ ।

१८६
छन्दरनावली
मजेदार मछ मरोड़ा फरो ।
निठल्ले रहो काम थोडा फरो॥
चयाते रहो पान दौरे डली ।
न विज्ञान फूला न विद्या फलो ।।
(नाथूराम शङ्कर

छन्दरनावली
(क) साधारण दडक
१.मुपानिधि ( १६ यार।)
सुधानिधि के प्रत्येक पाद में १६ वार गुरु लघु के कम से
३२ वर्ण होते हैं। जैसे-
वाकर समाधि साधि का कर विराग जाग
फा फरै मोफ योग भोगह पर सु फाह ।
फा फरै समस्त येद मो पुराण शास्त्र देसि
कोटि जन्म लो पदै मिरे तऊ कडू न थाह ।।
राज्य ले कहा कर सुरेश भो नरेश है
न चाहिए पहूँ सु दुःस होत लोक लाज माह ।
सात द्वीप पड नौ त्रिलोक सपदा अपार
ले कहा सुकीजिये मिलें जु भाप सीयनाद ।।
(काव्य सुघाफर)
• अनगशेखर ( ल ग यथेष्ट)
अनगरोखर के प्रत्येक पाद में वर्ण सरया २६ से कम नहीं
होती, अधिक चाहे जितनी हो । इस में लघु गुरु की अनेक
मारुत्तियाँ होती है । यह भूलना न चाहिए कि चारों चरणों में
पर्ण-सस्या समान हो रहेगी । जैसे-
तडाग नीर-हीन ते सनीर होत देशोदास
पुडरीफ झुडभौर मडलीन मडहीं ।
तमाल घल्लरी समेति सखि सूखिकै रहे ते
१,२-इन वयों का उच्चारण लघुवन् होगा।

१९०
छन्दरत्नावली
(ख) चामर-सी चदन-मी चद्रिकासी चन्द-ऐसी,
चाँदनी चमेली चार चांदी-सी सुघर है।
कुद-सी कुमुद सी पूर-सी कपास-ऐसी,
परपतरु-कुसुम सी
कीरति सी यर है।
'पूरण' प्रकास-ऐमी फांसऐमी हास-ऐमी,
सुप के सुपास ऐसी सुषमा की घर है।
पाप को शहर ऐमी कलि को कहर ऐसी,
सुधा की छहर ऐसी गगा की लहर है।
(देवीप्रसाद पूर्ण)
(ग) चर्चा जहाँ देश की हो मेरी जीभ नहीं खुले,
और नही खुले कहीं सुदाकी खुदाई में।
मेरे कान गान सुने साँचे देश भक्तन के,
और गान याचे कभी मेरे न सुनाई में।
मेरे अग रग चढ़े एक देश-प्रेम को ही,
और रंग भग हो के बूड जा सराई में।
मेरो धन मेरों तन मेरो मन मेरो जीप,
मेरो सर लगे प्रभो देश की भलाई में।
(गिरिधर शर्मा)
(घ) इन्द्र जिमि जम्भ पर बाडर सुअम्भ पर,
रापण सदम्म पर रघुकुल राज है ।
पौन वारियाह पर सम्मु रतिनाह पर,
ज्यों सहस्रयाह पर राम द्विजराज है ॥
दावा दुमड पर चीता मृगझुड पर

1१६२ । छन्दरनावली यषों पर घिराम होता है। मन्तिम दो वर्ण क्रमश गुरु लघु होते हैं। शेष षणों में गुरु लघु को कोई नियम नहीं। जैसे- (क) उमड धुमड धन धन भावत अटान भोट, छन धन जोति छटा छटकि छटकि जात । सोर कर चातक चकोर पिक चहूं ओर, मोर प्रीव मोरि मोरि मटकि मदाकि जात. सारन लौ माधन सुनो है घनश्याम जू फो, आगन लौ माय पाय पटाकि पटकि जात । दिये विरहानल की सपनि अपार उर, हार गज मोतिन के चटकि चटाकि नात ॥ (कविता कौमुदी) (a) फटकित केतकी गुलाय फरि डारे, फारे, काफन से कोकिल, फलकित फलानिधान । दरसे दरिदन के दस पाच पूत प्राय, एफहि लौं सरसै घनेस मनुजेस जान से ब्रज में फरीर, नीर नीरधि से सारे किए, दाता धन-हीन दीन, कृपन समृद्धिमान । नाम भज ही ते परै जान, पै भठान चार- भानन के कैसे एक मानन कर पखान ॥ (अर्जुनदास केडिया) (ग) मगल करन हारे फोमल चरण चाल, मगल से मान मही गोद में धरत जात । 4.

छन्दरक्षावली ७ द्वारा स्पष्ट फ्रो। धर्म सम, वधिसम और धर्ष-विपम वृत्तों के पार- स्परिक मेद फो उदाहरणों द्वारा व्यक फरो। ६. मिलिन्दपाद छन्द कौन सा होता है । किसी पर्णात्मक मिलिन्द-पाद का उदाहरण दो । ललित और भुजग्यात्मक मिलिन्दपाद के लक्षण लियफर दोनों का एक एक उदाहरण दो। वर्ण दण्डक किन्हें और क्यों कहते है? वर्ण-दडक मुख्यतया कितने प्रकार के होते है, औरउन फा परम्पर क्या अन्तर है? १० जय मुक दडकों में यण-मम निधित होता तो उन्हें वर्ष वृत्त क्यों कहा जाता है ? ११ साधारण दण्डकों में से किसी एक का लक्षण और उदाहरण दो। १२. मुक्तक दडकों में से किस का प्रचार सर से अधिक है ? उसका लक्षण लिख कर दो उदाहरण दो। १३ रूप घनाक्षरी और जल हरपा दड़कों के भेद को उदा हरणों द्वारा व्यक्त करों। १४ घनाक्षरी और देवघनाक्षरी मुस्कों के पारस्परिक अन्तर को स्फुट फरो। दोनों का एक एक उदाहरण भी दो। १५ वर्ण वृत्तों के मुख्यतया कौन २ से भेद होते हैं ? सक का लक्षण और एफ एक उदाहरण दो । 4.

उन्दरतापली (a) जो सय छोर सदा फिरते हैं, निमय देश विदेश। सर्फ-सिर धेयस्फर जिन मे, मिटते हैं उपदेश ऐमे अतिथि महापुरपों फा, फर सादर सत्कार। भक्ति-माय से मर शहर को,धम दया उर धार॥ (नाशूराम शर) उपर्युन दोनों पर सरसीनामफ माविमा छन्द में है, क्योंकि प्रत्येक पाद में मात्रा-तल्या २७ है, यति १६, ११ पर है, और पादान्त में गुरु लघु है। परन्तु इन दोनों में पर्ण-वृत्त के लक्षण भी घटते हैं। क्योंकि प्रत्येक पाद में ११ के यिराम से १९ पर्ण है । सो दोनों के लक्षणों से युक्त होने के कारण ये उमप - यहां यह यात याद रपती चाहिए कि वर्ण-सम वृत्तों में भी वर्ण-सण्या, पर्ण-मम और फट-मरूप मात्रा-सल्या समान होती है,परन्तु उन्हें उमय छन्द नहीं फहते। उमय छन्द तमी होगा जय मात्राएं भपणी सख्या में समान दो और पर्ण अपनी सरया में, परन्तु घणं फम फा नियम न हो । पक-दो उदाहरण और देसिए- (ग) दीपफ पे पर प्यार, पतग प्रताप दिपाते । स्याग स्यागसन प्राण, प्रीतिरस-रीति सियासे। अविचल-प्रेम, निठुर से जो फरते हैं। घे उस प्रिय की रूप, अग्नि में जल मरते हैं। (घ) अपनी सन्तति काफ। कृपण से पलयाती है। पेड पेड पर येठ, मुदित मङ्गल गाती है। जाना,

एकादश अध्याय
मुक्त या स्वच्छन्द छन्द
शताब्दियों से कविता मात्रा-रख्या, वर्ण-सस्या,षण-क्रम,
यति, तुफ आदि की शृद्धलायों से बंधी चली आ रही थी।
वर्तमान के कई विद्वानों का विचार है कि ये यन्धन कवि-
फल्पना की स्वच्छद उडान में वेतरह याधफ बनते हैं। इन
धन्धनों के कारण वह अपने मावों को उस स्वाभाविक और
प्रभावशाली भाषा में प्रकट नहीं कर सकता जिममें ये अनायास
निफटना चाहते हैं। इसलिए कवियों के लिए उक बन्धन नहीं
होने चाहिएं। इसी मत के अनुसार अनेक देशी तथा विदेशी
कवि कविता कर रहे हैं। उन की कविता में कोई पति १०
अक्षरों की है तो कोई २० की, कोई पाद ६ मात्राओं का है सो
कोई २६ फा। ऐसे ही तुफ और यति के भी यधनों को भी तोड
भरोड फर फेक दिया गया है। मो मुक्तया स्वच्छन्द छन्द उसे
कह सकते हैं जो मात्रा और पूर्ण के पुराने बन्धनों से मुक्त हो
और जिस में केवल भानों और लय का प्राधान्य हो। जैसे-
-

२०२ अन्दरतापली भारत की विधवा यह इष्ट देव के मन्दिर की पूजा सी, या दीप-शिखा सी शान्त भाव में लीन, यह फर काल ताडय फी स्मृति-रेसा सी, घह टूटे तरु की छुटी लता सी दीन- दलित भारत की ही विधवा है। पडू ऋतुओं का शृङ्गार, कुसुमित फानन में नीरव पद-सञ्चार, अमर कल्पना में स्वच्छन्द विहार- व्यथा की भूली हुई फया है उसका एक स्वप्न अथवा है। (सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला) उपर्युक्त तीनो कविताओं में पुराने मात्रिकभथवा वर्ण-छन्दों की खोज परना समयसोना है । परन्तु ऊँचे स्वरसे पढने पर स्पष्ट प्रतीत होता है कि इसमें लय का अभाव नहीं है। ऐसे ही मर्थ विचारने पर सिद्ध होता है कि ये सभी कविताश उत्कट मावों से छलछला रहे हैं। सो हम नि शब्द कह सकते हैं कि ये रचनाए स्वच्छन्द छन्दों में की गई हैं। अभ्यासार्थ प्रश्न १. उमय-सन्द किसे कहते हैं ? उदाहरण देकर माशय को स्पष्ट करो।

२.
२०४
छन्दरनावली
साधारण अभ्यास
(फ)१ "हर एक व्यक्ति छन्दों से प्यार करता है और हर एक
अवस्था में प्यार करता है" इस उक्ति पर अपने विचार
विस्तार पूर्वक प्रकट करो।
छन्दों के प्रारम्भ और विकास के सम्बन्ध में अपने
विचार प्रकट करो।
छन्द-शास्त्र किसे कहते हैं ? सकत और हिन्दी के
प्रमुख छन्द-प्रन्थों का परिचय दो।
छन्द कितने हैं ? क्या उनकी संख्या नियत की जा
सकती है ? उत्तर युक्ति-युक्त होना चाहिए ।
छन्द शास्त्र में अक्षर वा वर्ग, गुरु, लघु, मात्रा, गति,
यति, चरण दल और छन्द, किन्हें कहते हैं ? अपने भाव
को स्पष्ट करने के लिए प्रत्येक का उदाहरण भी दो।
छन्द-शास्त्र में गण किसे कहते हैं। वे कितने प्रकार के
होते हैं ! उन का महत्त्व क्या है ?
वर्ण वृत्तों में कौन से गणों से काम पड़ता है | उन के
नाम लतय, उदाहरण, देवता वथा शुभाशुभ फल लिखो।
कौन कौन से गण और अक्षर दूपित माने गये हैं । यदि
वे छन्दों के आरम म आ जाये तो उन का दोष कैसे
निवारण किया जाता है।
तुफ कितने प्रकार की होती है। प्रत्येक प्रकार की तुक
का एक एक उदाहरण दो।
६

२०६
छन्दरत्नावली
११ सनाढ्य-पूजा अघ-ओघ हारी ।
असंट प्रारंदल-लोक-धारी ॥
१२ बताइए हे मम मित्र-वर्य ।
क्यों तु किसो फे फिर दान
को मैं
१३ दुई फा घटाटोप घेरा रहेगा।
मिटेगा नहीं मेल मेए रहेगा।
कर सुकथन, हदय हरन।
सुखद अमृत, सदश वचन ।
२५ देसि देही सनै कोटिधा के मनो।
जीव जीवेश के बीच माया मनो।
१६ तुझ तर्क ने तोल पाया नहीं।
किसी युक्ति के हाथ आया नहीं।
१७ सारे अकयादि बलिष्ठ भारे ।
सग्राम में अगद वीर मारे ।
२८. कचन के उपवीत हि साजै।
ब्राह्मण सो यह सह विराजै ॥
समय था सुनसान निशीथ का।
अटल भूतल में तम राज्य था ।
यह बात सुनी भृगुनाथ जबै ।
कदि रामहि लै घर जाहु अवै।।
२१ मारग की रज तापित है अति ।
केशव सीतहि शीतल लागवि ।।
भ्राता भरत्यादि करें प्रनाम हैं।
२०
२२

४
छन्दरमावली
१ सय मो ललुआ, मिलि के रहिये
मम जीवन मूरि सुनो मनमोहन ।
वान को तब रावण सों
अव वैगि चहाउ शरासन को।
३ पिफ चातक कीर चकोर शिरवी
सन का श्रव तो अपमान करेंगे।
सास मरे ससुरा पजरे
इस यासर में पल को न रहूँगी।
५ भीपन भोरहि त यनि पूपन
है जन के तन को बहु तावत ।
१. चैत फरो, चिक जीवन है यदि
नाम मिला जग मैं कुन घोर।
७ तीन हु लोक कि ईश गिरीश मु
योगि भये घर की गति देसि के।
८ लहै मलि वाम अरू धन धाम
तु काह भयो बिनु रामहि जाने ।
६. परिवार घना धन पास नहीं
मुज भन्म दरिद्र भरा घर है।
(प) निम्नलिखित पद्य वा पशश किन छन्दों में हैं ? उत्तर युधि-
युक्त होने चाहिए।
ससि, देख, दिगन्त है खुला।
तम है, किन्तु प्रकाश से धुला॥

२१२
है
१०
१२
१३
छन्दरत्नावली
क्रोध से विवाद से दया या पूर्व प्रीति ही से,
किसी भी बहाने से नो याद किया कीजिए।
घर येर बेर लै सराहै येर पर बहु
रसिक बिहारी दत घंधु कह फेर फेर ।
सोल दो नयन मत मुझे तरसायो और
सुस सरसाम्रो प्रेम सुधा परमाओ तुम ।
झिल्ली मनकार पिक, चातक पुकारें धन,
मोरनि गुहारें हैं, जुगुनू चमकि चमकि ।।
जन दीन दुवी न । हरता भय भीर को।
लोक तीनिहु में फैल्यो ! श्लोक श्री रघुवीर को।।
जब दिनश की ओर, मोर मरने झड़ते हैं।
इन्द्र चाप तर अन्य घने धन पे पडत है।
नील अरुण के साथ, पीत छवि दिसज्ञान हैं।
हम को मिश्रित रंग, बनाना सिखलात है ।।
पाल फुटुम्ब सदुद्यम-द्वारा भोग सदा सुख भोग ।
करना सिद्ध ज्ञान गौस से, नियम प्रद योग ।
जप तप यज्ञ दान दवेंगे, जीवन के फल चार ।
भक्ति-भान से भज शङ्कर को, धर्म दया उर धार ।।
(नाथूराम शहर)
जागो फिर एक बार।
उगे अरुणाचल में रवि,
आई भारती रति कवि फठ में,
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Chhand Ratnavali

Author
Shastri,rajaram
Title
Chhand Ratnavali
File name
Chhand Ratnavali
Text
OCR done
Citation
1939
Published
2011/04
Publisher
Lahora.missan Press
Language
Sanskrit
Pages
139
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
552269
Barcode
4990010033017.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
j6bPQpn52Re
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