Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Shri Kalp Lat Va Tarika
Front matter
प्रकाशक:-
श्री जैनसाहित्य-वर्धक सभा,
श्रेष्ठि चम्पालाल देवचन्द
शिरपुर (प० खानदेश)
प्राप्तिस्थान
[१]
श्री अमृतसूरीश्वरजी ज्ञानमन्दिर,
दौलतनगर, बोरीवली (पूर्व)
[२]
[३]
श्री सरस्वती जैन पुस्तक भण्डार,
शाह चालूभाई रुगनाथ,
पण्डित भूरालाल कालीदास अम्बाजी वड पासे
झवेरीवाड, अहम्मदाबाद.
भावनगर (सौराष्ट्र)
मुद्रक:-
पं० परमेष्ठीदास जैन
जैनेन्द्र प्रेस, ललितपुर (उ० प्र०)
प्रकाशकीय
या पुस्तकनी महत्ता तथा उपपोगिता सायना परिपयमा सुन्दर
समजावी है. जमने तो भाषा गौरवान्वित अन्य प्रकाशन
सरपानुं गौरय प्राप्त यं छे, एस महत् पुष्प समजाय
टे, मा प्रकाशनमां अनेफनी सहाय
उपयुफ पनी है-ते सर्वनो
जमे हार्दिक आभार
मानीए छीप.
मा प्रसंगे बनाने सं० १९९७ मां पूज्यपाद
जापार्य महाराजश्रीए
गो फरेल चातुमति याद आवे छे.
वृत्तान्त भगाए
'इन्दुदून' खण्डकाव्य पुस्तकमां जगाव्यं है. मा
समानी उपस्थिति से प्रसंगे छे, जाया
प्रकाशनी अनेक अमारे हाथे थाय
एवी जमिलापा साथै ए
प्रकाशनोधी विश्व
सन्मार्गाभिमुख
ते
घने एम
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छीए.
प्रसासका
परिचय आत्मा अनन्त शानादि गुण युक्त छे, परन्तु अनादिकाळयी कर्मना सम्बन्धने कारणे ए जद जेत्रो, पराधीन, दु:ग्यी अने अब भासे छे. प्रात्माने कोई कोई समय कर्मर्नु बम प्रोछु थतां निज- गुणनी माँखी थाय छे-पोताना ए विशिष्ट गुणोनो पालो अनुभव पण तेने कोई अपूर्व आनन्द उपजावे छे. एवा अनुभवोनी सरवानो वधतां--प्रात्माने निजगुणो प्राप्त करवा अने प्राप्त गुणो कायमी स्थिर रहे, ए माटे प्रबळ इच्छा जागे छे. आत्मानी ए अभिलापा सफळ थाय ते माटे अनेक आत्माओए विविध प्रकारे मार्गदर्शन कराव्यु छे. आत्मा ए भिन्न भिन्न मार्गे धीरे धीरे आगळ वधतो जाय छे-पण तेने कोई एचो मार्ग नथी मन्तो के जे मार्गे पागक वधता ते पूर्णताने प्राप्त करे. एवो मार्ग नथी एम नथी, पण तेनी प्राप्ति सुलभ नथी. एवा शुद्धमार्गने दर्शावनारा करतां ऊंधे मार्ग दोरी जनारा विश्वमा घणां होय छे, एथी पण शुद्धमार्गनी प्राप्तिमा विषमता वधे छे. आ स्थितिमा शुद्धमार्गर्नु स्पष्ट दर्शन कराववा माटे श्रीहरि- भद्रसूरिजी महाराजे प्रबळ पुरुपार्थ को. मार्ग-उन्मार्ग अने कुमार्गर्नु दर्शन करावतो तेओश्रीनो 'शास्त्रवाता-समुच्चय' ग्रन्थ ते पूज्यश्रीना प्रबळ पुरुपार्थनी साक्षी पूरतो चिरंजीव जीवे छे. तेश्रोश्रीना विरचित अनेक प्रन्थो ले. पण या ग्रन्थने पर सोनलले - [५] प्रस्तुत ग्रन्थ ७०१ श्लोक प्रमाण छे, तेना पर सवा वे हजार लोकप्रमाण स्वोपज्ञवृत्ति छे. ते मन्य वि० सं० १९८५ मां मुंबई- गोडीजी जैन उपाश्रये प्रसिद्ध कर्यो छे. या ग्रन्थ उपर महोपाध्याय श्रीयशोविजयजीमहाराजे सद्भधाबंध दार्शनिक शास्त्रार्थोथी भरपूर 'स्याद्वादकल्पलता' नामे लगभग पन्दर हजार श्लोकप्रमाण विस्तृत वृत्ति रची छे. ए ग्रन्थ संवत् १६७० मां श्रेष्ठि देवचन्द्र लालभाई जैन पुस्तकोद्धारना १६ मां ग्रन्थाङ्करूपे प्रकट थयो छे. मूळ ग्रन्थ- काए सातसो ये श्लोको एक साथे राख्या छे-तेमां ते ते दर्शननी मीमांसानी शरूपात तथा समाप्ति समजी शकाय छे, पण श्लोकाङ्क जूदा कर्या नथो. ज्यारे पूज्य उपाध्यायजी महाराजे ते ते दर्शनोनी विविध विचारणाने अनुरूप विभागो करीने अन्थने ११ स्तवकमां विभक्त को चे. तेमां स्तवकदीठ श्लोकसंख्या आ प्रमाणे छे १-११२, २-८१, ३-४४, ४-१३७, ५-३६, ६-६३, ७-६६, ८-१०, १-२७, १०-६४, अने ११-५८, एम सर्व मळीने ७.१ थाय छे. पूज्य उपाध्यायजी महाराजनी वृत्ति विशिष्ट होवा छतां दार्श- निक विचारोना गंभीर समागमरूप होवाने कारणे तेना वाचन- अध्ययन माटे विशिष्ट योग्यतानी यावश्यक रहे छे. एथीज एना मुद्रण पछीथी पण तेनो उपयोग करनारा गणत्रीना नीकल्या थे. भंडारोमा केटलीक प्रतिश्रो पत्रो तेनी यथावत् स्थितिमा रह्या होय- एवी पडी छे. आ वृत्तिमा प्रवेश करवा माटे जो काइक प्रयत्न करवामां आवे तो तेनो उपयोग वधे एवा आशयथी प्रस्तुत 'कम्पलवावतारिका' रचपामां आवी छे. आ वृत्तिमां स्तवकना 151 विभागो स्वीकाया दे. उगारे प्राग नोमानानांची मार रोगां बापता प्रासंगिक गुणोप सामाग निगन गा पाकर्षण कर्यु हतु. ते सूक्तोने जूदा तारखीने तेने गटीक फरमा-पने " द्वारा कल्पलतामा प्रवेश भाग एनो प्रयत्न करवो प्रमाणे दिनार को इतो. ए विचारने अनुमार मुनीने प्रणा नारवीने टंक पानसान कर्यु हतुं. पण पछीथी जे रूपे पा प्रसिद्ध थायले ते प्रकार लेखन व्यवस्थित करवामां ते ते सूको माथे मूलमन्याना उपयुग श्लोको अने प्रासझिक दार्शनिक विचारो पण ऊमेर्या; एम कर- वाथी स्याद्वादकल्पलतामा प्रवेश करवान सुलभ थशे-ए स्पष्ट छे. १-स्तवक:--प्रारम्भमांप्रत्यकार अने वृत्तिकारना माल वगेरे विपयोने वर्णवता विशद सूक्तो छे, तेमां पण ऐन्द्रश्रेणिनताय' ए कल्पलताकारनो मनालश्लोक उदात्त अने प्रासादिक छे, जे कण्ठस्थ कर्या बाद वारंवार पाठ करवाने मन यया करे एवो छे. मूळ्यन्य मङ्गलश्लोक परनी लतामा मङ्गलवादनी विचारणा सूक्ष्म अने नवीन तर्कयुक्तियोथी भरपूर छे, केटलोक युक्तियो तो अहीज जोवा मळे छे. द्वितीय श्लोकमां मोक्षपुरुपार्थनी सिद्धि छे. शास्त्रवाना-बीजा श्लोकथी २६ मा श्लोक सुधी सुन्दर उपक्रम को छे, जे उपदेशरूपे पण उपयोगी छे, तेमाथी चार श्लोक अहीं उद्धृत कर्या छे. ३० मा श्लोकथी चार्वाक (नास्तिक) मतनो प्रारम्भ थाय छे. पार्वाको आत्माने मानता नथीं, शरीरादिमा जे चैतन्य जणाय ते पृथिवी आदिना संयोगथी जन्मे थे अने ते महाभूतो विखराता चैतन्य नाश पामे छे. प्रत्यक्ष सिवाय अन्य कोई प्रमाणने पार्वाको - छे [७] मानता नथी. जो फेवळ प्रत्यक्ष प्रमाण मानवामां आवे ने अनुमान-पागम प्रादिने प्रमाणस्वरूपे स्वीकारवामां न आवे-तो व्यवहारमा पण अनेक अपरिहार्य दोपो प्रावे, ए माटे अनुमानादिने प्रमाण मानवा आवश्यक छे. श्रा चर्चामा प्रासनिक अन्धकारने स्वतंत्र द्रव्य नहि माननारा नैयायिकनी पण सारी खबर हाईलीधी छे. नैयायिकना वचमा प्रवेश माटे जणव्यं के जे-'पारकी यातमा माथु मारीने विलम्य फरावता नगायिकने | यथार्थ शास्त्री संस्कारितमतियाने टुं शिक्षा न कह ! अर्थात् फरंज. क्षसाकारनो ए श्लोक आ प्रमाणे : स्या कयायां प्रविशन् परस्य, नैयायिकः कारयति प्रतीक्षाम् । तथा यथायोगमबद्धबुद्धिर्दास्यामि नास्यापि किमेष शिक्षाम् ॥१॥ आम नैयायिकने चूप फरीने तर्क-युक्ति-प्रमाणथी आत्मा छेए सिद्ध फयु छे. अात्मसिद्धि थई एटले पराजय पामेला चार्वाकर्नु वदन शोकयी श्याम पडी गयुं छे. -खरी वात जणावता जूठाजनने दुःख थाय एपी शु? ए प्रमाणे चार्वाकमतनो उपसंहार फरता लताकारनो नानो पण ध्वनिभर्यो श्लोक स्मरण राखथा जेयो , आतसिद्धेः परं शोकाल्लोका: । लोकायताननम् । समालोक्रामहे म्लान, तत्र नो कारणं वयम् ||२|| पाकिनी चीना अनुसन्धानमा ज धर्माधर्म-पुण्यपाप कर्म पगेरे शब्दोथी समजाता अष्टनी सिद्धि साधी छे. ए प्रमाणे प्रथम स्तवक परिपूर्ण फर्यो छे. २-स्तरक-आत्मा अने अदृष्ट सिद्ध यया एटने विश्व- तन्त्रता सवालक वे महत्त्वना अझ सिद्ध यया. विश्वतन्ननु ते
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(१) मा.--.ittी
दोन मजालना marit.lfist ti, ना,
नमुने
जमाने का fift.t-aft
गरेप माने या न का, मा. नाना पायी कारन
माता . त्रागनी ने युगीन काल
धीन पट. गागादि भायमा का प्रभाग. त्राम
फेटलाय मार्शनिको ने मत्र हातो कती मानीन नियमी
बाय छे.
(२) स्वभाव ---स्वभाय, प्रry गर्ष कार्य कर म
माननारा कहे ई-के गमे तटर्नु करी पगा जनी जो सभाष
होय एर्बुज कार्य थाय छ, फलाफी मुधी अग्नि उपर राया पण
फोरदं मग सीमशे नहि कारण के तनो त स्वभाव नथी. माटोमाथी
घट थाय छे श्रने वस्त्र तन्तुओधी थाय छ, ते स्वभावने कारणेज.
मोरना पीछाने कोण घीतरे छ ? स्त्रीने दादीमूछ कम ऊगता नथी ?
हथेलीमां के कपाळमां वास केम नथी ? पक्षीयो आकाशमा
भविरत उडी शाथी शके छ ? माछलीओ शाथी पाणीमां विहरे थे ?
या सर्व स्वभावाधीन छे. ए प्रमाणे स्वभाववादी सर्वत्र स्वभायने ज
भागळ करे छे.
[] (३) नियति-नियति, भवितव्यता, भाविभाव, जे धवार्नु होय तेज धाय, इत्यादि विचार घरावनारा कार्यमात्रमा नियतिने कारण माने छे. गमे तेटलुं फरवामां आवे पर होनहार मिथ्या थाय नहि, ए एमनो मुद्दालेख छे. कोई परण कार्य माटे नियति- वादीने पूछो तो कहेशे के ए तो एमज थवार्नु हतुं, कार्य न थाय तो कहेशे के एतो थवानुज न हतुं, रीते भवितव्यतावादीओ मतिनो सर्व निचोड भवितव्यताने अपंग करी दे छे. (४) कर्म-कर्म, भाग्य, अदृष्ट, पुण्य-पाप, पूर्वकृत वगैरे समानार्थक शब्दो छे. कर्मवादीयो कर्मवश कार्यमात्र थाय , कर्मथी दुःखी सुखी बने हे अने सुखी दुःखी थाय छे. रव राजा याय अने राजा रक बने, ए कर्मनी बलहारी छे. फर्म नचावे ए प्रमाणे सर्वे नाचे छे. पाम फर्मवादीयो कर्मनेज प्रधान माने थे. (५) पुरुषार्थ-यत्न, उद्यम, पुरुषार्थनेज कार्यमा कारण माननारा कहे छे के काळ-भाविभाव-स्वभाव के य.मने यागक करीने हाथ जोडीने वेसी रहेg ए मूढता छे. असाध्य पण प्रयत्नथी साध्य बने छे. कल्पनामां पण न श्रावी शके एवा क यो उद्यमथी सिद्ध यया छे, ए हकीकत छे. इत्यादि कहीने उदामवादीयो पुरुषार्थ उपरज निर्भर रहे थे. काळादि पांचेमा आंशिक कर्तृत्व के अने पांचे एकत्रित थाय त्यारेज तेमा पूर्ण कर्तृत्व छे ए सिद्धान्त छे. कोई पगा कार्यने सूक्ष्मदृष्टिए विचारतां तेमां पांचेनो यथायोग्य अंश स्पष्ट जणाशे. केरी आपवानो स्वभाव आंबानो छे-लिंबडामा केरी प्रावती नथी. श्रांबो पण योग्य काळे फलेहे. फनेला प्रवामां पण भवितव्या- .
[१०] -- नुसार मंजरी आदि आवे छे, पूर्वकृत सुकृतानुसार फळरूपे ते परिणमे छे. अने उद्यम न करवामां तो कोई पण ऊपजतु नथी, रक्षणादि उद्यम पण आवश्यक छ. सम्मतितर्क महामन्थमा श्रीसिद्धसेनदिवाकरे प्रौढशब्दमा श्रा हकीकत जणाची छे~ ते श्राप्रमाणे- कालो सहाव गियई, पुत्रकयं पुरिसकारणेगन्ता । मिच्छतं ते चेव उ, समासो हुन्ति सम्मत् ।। आ पंच समवायवादने विशदरीते समजावतो द्वितीय स्तवक छे. ३-स्तवक-त्रीजा स्नवकमां मुख्यत्वे सांख्यमतनी विचारणा छे. सांख्य अने योग बहुधा सर्व विचारोमा मन्ता छे, फक्त सांख्ये ईश्वरनुं जगत्कर्तृत्व स्वीकार्यु नथी अने योगे स्वीकार्यु छे. कानादिनी विचारणाना अनुसन्धानमा केटलाक ईश्वरनेज जगत्ना कर्ता-नियन्तारूपे माने छ, ए चर्चा अहिं गम्भीरपणे करी छे. श्रा चर्चा खूबज महत्त्वनी छे. पा स्तवकनी ए रीते अति उपयोगिता छे. ईश्वरना कर्तृत्वने स्थापित करनारा वादीयोमा पतञ्जलि अने अक्षपाद (नैयायिक) मुख्य छे. पूर्वपक्षमा ईश्वर जगतकी होवोज जोईए ए वात जणावा छे. तेमां ते ते ग्रन्थोना प्रमाणो पण रजू कर्या छे. उदयनाच यनो कुसुमाञ्जलि ग्रन्थ था विपयमां खूबज तेमा कार्यायोजनधृत्यादेः, पदात् प्रत्ययतः श्रुतेः । वाक्यात् संख्याविशेषाञ्च, साध्यो विश्वविदव्ययः ।। ए श्लोक प्रधान छे, तेनुं उपपादन करीने पछी क्रमशः तेर्नु खएडन कयुं छे. ईश्वरनु कर्तृत्व उपादान करवामां जैनदर्शनने विशिष्ट छे. .
[ ११ ] याध न आवे एवी फेटनीक विचारणामो पण दर्शावी छे, तेमां ज्ञातृत्वने कर्तृत्व मानवु ए एक छे अने बीजी आत्माने कर्ता मानवो. वास्तविकता पण पज. छे-आ रीते जगत्कर्तृत्वने सङ्गत करवामां ते ते विचारणा दर्शावनारानुं गौरव जम्वाई रहे छे. साथ- दर्शनकार कपिल अने पतञ्जलि पक्षपात जन्मावे एवा विशिष्ट महात्माश्रो छे, तेमनां फथनने सङ्गत करवु ए समुचित छे. श्री हरिभद्रसूरिजी महाराज पण या चर्चाने अन्ते उपसंहार मां कहे छे. शास्त्रकारा महात्मानः, प्रायो वीतस्पृहा भवे । सत्त्वार्थसम्प्रवृत्ताश्च, कथं तेऽयुक्तभाषिणः ॥१५॥ सर्वभावेषु कर्तृत्व, ज्ञातृत्वं यदि सम्मतम् । मतं नः सन्ति सर्वज्ञा, मुक्ता:कायभृतोऽपि च ॥ ए श्रीहेमचन्द्राचार्यनुं वचन पण सुन्दर समन्वयप्रेरक छे. ईश्वरवादनी समाप्ति पछी सासय जे प्रकृतिजन्य जगत्ने माने छे, ते पञ्चीस तत्त्वोनी मीमांसा करी छे. प्रकृतिथी महान, महत्तत्त्वथी अहङ्कार, अहङ्कारथी पांच ज्ञानेन्द्रिय, पांच कर्मेन्द्रिय, पांच तन्मात्रा अने मन एम सोम. पांच तन्मात्राथी पांच भूत, अने स्वतन्त्र आत्मा प्रा पचीस सालथाभिमत तत्त्वो छे. साथ सत्कार्यवादने माने छे. श्रात्मा कर्ता नथी पण भोक्ता छे इत्यादि विचारो केवा विसङ्गत छे अने ते कई रोते सगत करो शकाय ए दर्शाव्युं छे. प्रकृति ए कर्मप्रकति छ, तेथोज सर्व काई जन्मे छे. निश्चय- नयथी आत्मा अलिप्त छे, इत्यादि विचार-भूमिकाओ द्वारा साधने पोता तरफ खेंची लईने श्रीहरिभद्रसूरिजी सुन्दर समन्वय साधे छे. "
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[ १३ ] अर्थो ज्ञानसमन्वितो मतिमता, वैभाषिकेणेष्यते । प्रत्यक्षो नहि बाह्यवस्तुविसरः, सोत्रान्तिकैराश्रितः ।। योगाचारमतानुगैरभिमता, साकारबुद्धिः परा । मन्यन्ते किल मध्यमाः कृतधियः, स्वस्थां परां संविदम् ।। बौद्धदर्शननी मुख्य वे विचारणाओ छे. एक क्षणिकवाद अने वीजो विज्ञानवाद. 'यत् सत् तत् क्षणिकम्' जे काई सत् छे ते सर्व क्षणिक छे, ए तेश्रोनो मुख्य सिद्धान्त छे. आ क्षणिकवादने सिद्ध करवा माटे तेश्रो पारावार प्रयत्न करे छे. एकान्ते जो सर्व क्षणिक छे ए मानवामां आवे तो विश्वतन्त्रनी सर्व व्यवस्थानो विनाश थाय, काई करवा जेवू न रहे. सापेक्षभावे क्षणिक मानवू ए सत्य छे. क्षणिकवादनी जेवी-जे कांई छे ते सर्व विज्ञान- स्वरूप छे-विज्ञानज पदार्थीकारे परिणमन पामे छे अने पदार्थनी भ्रान्ति जन्मावे छे. ए पण बौद्धोनी विचित्र-विचारणा छे. आम जो पदार्थमात्रने विज्ञानरूप मानवामां आवे तो सर्व एकज थई जाय अने सर्व एकस्वरूप छे ए कदी जणातुं नथी, भिन्न भिन्न स्वरूप छे ए तो स्पष्ट जणाय छे. ए भ्रम छे एम कहेवू घराबर नथी.. भ्रम सनातन सर्वने न होय, भ्रममा फसाएला भ्रम छे एम कहे ए सत्य केम मनाय ! आ त्रण स्तवकोमाते ते विचारणाश्रो उपपादन करीने तेनुं खण्डन कयुं छे. उपाध्याय जी महाराज तो प्रसङ्गे प्रसङ्गे विनोद पण एवो सुन्दर करे छे-जे आपणे जोयाज करीए. सौत्रान्तिकनो उपहास करतां तेश्रोश्रीए का छे जे-सर्व क्षणिक छे ए प्रमाणे सिद्ध करवाना आग्रहमा आसक्त थयेल सौत्रान्तिक 'इत एकनवतो कल्पे' 'कप्पट्टाइ पुइई एवा बुद्धना सूत्रोनो विनाश
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आहेतसिद्धान्तनु अहिं फरेलु निरूपण टूकमां श्रा प्रमाणे छे.
(१) जगत् जीवाजीवात्मक छे.
(२) उत्पादव्ययध्रौव्यस्वरूप सत् छे.
(३) स्याद्वादथी सत्नी यथावत् विचारणा सगत बने छे.
(४) सप्तभङ्गीथी स्याद्वादनु स्वरूप स्थिर थाय छे.
(५) नयवाद विसङ्गतिश्रोने दूर करवा समर्थ छे.
आ सर्व सातमा स्तवकमां सारी रीते समजाव्यु छे.
८-स्तवक-आठमा स्तवकमां वेदान्तदर्शननी विचारणा छे.
वेदान्तीओ 'ब्रह्म सत्,
जगन्मिथ्या' ए सूत्रने प्राधान्य आपे छे.
ब्रह्म सिवाय अन्य कोई छेज नहिं, देखातुं जगत् एतो प्रपञ्च छे.
माया छे. स्वप्नमां जेम देखाय छे तेना जेवु छे. अद्वैतवादना
निरसन माटे आ एक सरल तर्क याद राखवा जेवो छे. मायाने
वेदान्तीओ माने छे. ए माया सत् छे के असत् ? जो सत् छे तो
ब्रह्म ए एकज सत् छे, ए रहेतुं नथी. अने जो माया असत् छे तो
माया छे एम फेम कही शकाय ? ए तो वदतो व्याघात छे. पदार्थ
मात्र कूटस्थ नित्य छे एवी पण वेदान्तीनी मान्यता छे. बौद्धोथी
तद्दन ऊलटी दिशानी ए विचारणा छे. सापेक्षभावे पदार्थो नित्य छ
एम मानवू ए सङ्गत छे. वेदान्ती ज्यां त्यां भ्रमनेज जोया करे छे,
ते माटे पू० उपाध्यायजीम. तेने सारी शिक्षा करे छे. ते प्राप्रमाणे-
. . . मुक्तौ भ्रान्ति/न्तिरेव प्रपञ्चे, भ्रान्तिः शास्त्रे भ्रान्तिरेव प्रवृत्तौ ।
कुत्र भ्रान्तिनीस्ति वेदान्तिनस्ते, क्त्तृप्ता मूर्ति न्तिभिर्यस्य सर्वा ।
आ पछीना वे सूत्रो ते ते दर्शनोनी खासीयतो समजवा
माटे याद राखवा जेवा दे. ते था-
"
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। १; } । This . HTTER: ॥ उगई हो ही की, लगा। गोनोगामा माग समाज-11: 5.1 ||१|| न करना --नीति शशी- निहिती नगर समितिः ॥ मरालाः समन्त समिः समा जनमतपः सरोज स्मार-प्रसार काशिः ॥२॥ छेवटे स्याद्वादनी स्तुति फरवापूर्वक पाठमा स्ताक समारा फो छे. ९-स्तवक-नवमा स्तवाफमा मोक्षवादनी चद. छात्माने मान्या छतां जो मोक्ष-सिद्धि न थाय तो आत्माने मानयो के न मानवो ए वने घरावर छे. मोक्ष | छे ? क्या छ ? फेवी रीते ते प्राप्त थाय ? वगेरे विचारोमा ते ते दर्शनो मार्ग-भूल्या मुसाफरनी माफक जेम फावे तेम चलाये जाय छे. आ स्तवकमां से ते सर्वे क्या भूल्या छे ते विचारणा करी छे. तेमां ते ते दर्शनोनी मोक्षविषयक मान्यता केवी छे, ते सङ्गत कई रीते नथी, मोक्षप्राप्तिना साधनोमा फेवी विसङ्गतिमो तेओना मते आवे छे वगेरे दर्शान्यु छे. आज स्तवकमां सम्यग-ज्ञानदर्शनचारित्र ए मोक्षमार्ग छे ए समजाव्युं छे. अने तेमां प्रासङ्गिक दिगम्बरो जे वस्त्रधारीने मुक्ति नथी, स्त्रीने मुक्ति नथी, ए प्रमाण माने छे-तेनुं सचोट निरसन फर्यु छे. मोक्षनी ते ते दर्शनकारोनी मान्यताओनो श्रा स्तवकमां अपूर्व संग्रह छे. ते मान्यताओ जाणवानी इच्छावाळाने माटे आ स्तवक अतिशय उपयोगी रे.
[१७] १०-स्तवक-दशमास्तवफमां मीमांसकोनी मान्यता संबंधी मांसा मुख्यत्वे फरी 2. ए विचारणाने अनुरूप प्रारंभना प्रण को रोचफ अने भावपूर्ण . मीमांसफो सर्वशने स्वीकारता नथी. मान्यतानी सिद्धि माटे ए घणु पगुं लल्यु छे. सोकवार्तिक बगेरे अन्योमा विस्तारथी विचारणा आये थे. अहिं तेर्नु संकलन फरीने प्रथम तेस्रो र्वज्ञ नयी' ए विप केवी रीते रजू करे छे, ए जणाव्यु छ- रपक्षमा 'सर्वम ए वातनी सिद्धि करी छे. प्रा विचारणा करता प्रासनिक-वेद पौरुषेय हे. ए पण वेन्यु छे. प्रमाणपश्चकनी विवेचना करी थे. वेदविहित हिंसा रणीय छ, ए प्रमाणेना मीमांसफना मन्तव्यनु ससत शब्दोमां इन फयु छे. सर्वशवादमा अनुरूप केवलमुक्तिनी विशद विचारणा छे. दिगम्बरो केरलीने भोजन स्वीकारता नथी, ए मान्यता प्या छ, ए समजाव्युं छे. ए प्रमाणे दशमस्तवक पूर्ण कर्यो छे. ११-स्तवक-अगीयारमा स्तवफा शब्द अने अर्चना अन्धनी विचारणा छे. बौद्धो वगेरे अपोहादिनी जे स्थिति जणाये सेमां केवा दोषो आवे छे, ते सर्व समजाव्यु छ. शेवटे मुक्तिमा परमानन्दस्वरूप सुख छ, ते फेबु छ, कई रीते छे, इत्यादि युक्तियी सिद्ध कयुं छे. छवां ए अनिर्वचनीय छ, ए पण फयुं छे. छेवटे अन्य समाप्त करतां प्राचार्य श्रीहरिभद्रसूरिजीमहाराजे मीरलोक रच्यो थे,जे वारंवार पठनीय छे. ते था- यं बुद्ध बोधयन्तः शिखिजलमस्तस्तुष्टवुलकिवृत्त्य, ज्ञानं यत्रोदपादि प्रतिहतभुवनालोकवन्ध्यत्वहेतुः ।। " - .
[१८] सर्वप्राणिस्वभाषापरिणतिसुभगं कौशलं यस्य वाचा तस्मिन् देवाधिदेवे भगवति भवता धीयतां भक्तिरागः ॥१॥ श्रावा सुन्दर ग्रन्थन वारंवार अध्ययन करीने मति निर्म करवी ए जन्मनुं परम सौभाग्य छे. स्थल- श्री करमचंद जैन पौपधशाला ईरलानीज, मुंबई-२४ विजयामृतमरि । चैत्र पवन पञ्चमी, दि० २३-५-५८ विशुद्धि-पत्रकम् अशुद्धम् शुद्धम् पनाह पक्तिः ध्वंस ध्वंसस्य है हत्याकर. शब्दावन्त १३ १३ १८ १४ १४ १८ इत्याफार शब्दानृत- एवकार हेतेपु फ्रोधादिनां शानादाव निहिता तत्तथा यहाशात् विस्तारोनस्यात निजमन- प्रीविनाम् नयतिजा हेतुत्वे श्रयते एवकारः हेतुपु मोधादीनां ज्ञानादानव निहना तन्तथा १४ २४ २१ ४ १ ३३ ३४ ६-१४ ३५ २२ यद्वशात् विस्तारः निजमत प्रीतीनाम् नियतिजा हेतुत्व भूयते शानाद्या ४२ ४५ ७ ज्ञानाच १५ [२०] अशुद्धम् स्यानुच्छेद पत्राकः पंक्तिः २ स्वभाववद वसानो स्वीकारणम् स्वभाव- नेय शुद्धम् स्याप्युच्छेद स्वभाववद् वसाने स्वीकरणम् स्वाभाव नेव ५६ ६३ १७ - २१ ६४ ४ ६४ ७ रूप्य रूपप्य ऽऽदि सा ६४ ऽऽरोग्यादि २२ १६ ७१ ननव सेन धातो योग नानव सेनः घाती योगि २१ ८७ २ मजनम् तत्रा. ६६ खनम् ११ -भाव तव १५ . -द्वार अभाव २१ द्वार १०१ १०४ २१ मनमा मता रचन:, रचनेभ्यः एव ११२ रायन्त्र रान्यत्व. प्रत्यान्नगर यलम्भ. प्रत्ययान्तराण्यर्थापनम्भ ११२ ११० १६ १ ११२ ६ [ २१ ] पंक्तिः पनाङ्कः ११५ मशुद्धम् सजात- गातो मुमोद- शुद्धम् मसात गतो मुमुद १२२ १२५ १२६ १८ सन्ध सन्धा भता- २२ भूता ज्ञाना विशीर्ण mr १३३ १३५ १४५ ५ १४८ w ज्ञा. विशीणं सव- विनश्यते प्रदेशि कायभा- घटो काश्वि वृत्यार्थ- क्लूप्रसप्तभङ्गस्वा- विहित- घटारदे साव विनाश्यते प्रादेशि कामा घटो कश्चि वृत्यर्थी क्लुप्तसप्तभङ्गेव विहितस्य घटादे १५३ १६५ १६५ १६६ १७१ ९७३ १८४ १० २० १७ १६० १६४ स्वध्यायस्त भ्रातिः १६ स्वाध्यायाध्यस्त भ्रान्तिः २८४ त्वाव २०७ स्वाध्व तज्ञा प्रकरो २८८ ताज्ञा प्रकारो २ २८८ ७
( १ )
श्रीमच्छास्त्रकलाकलापकलितो, हर्पप्रकाश्वितो,
रिक्तो नैव कदापि तकनिकभिट्टारको धीमताम् ।
द्रव्यागां गुणपर्ययः स्थितिभृतां, सूर्यस्तमोदारणे-
रिन्दुनवचाऽन्धी विजयत, श्रीभद्रसूरिईरिः ॥
(२)
अग्रन्थ ग्रन्थरत्नानां, नानावर्णविराजितः ।
श्राचार्यहरिभद्रण, हारस्तगुणोज्ज्वलः ॥
(३)
यशोऽधिगन्तुकामेन, यशोवाचकवाचिकम् ।
यशयिचनमा चिन्त्य, सत्तभरमभृतम् ॥
यो हो नमः
सालदिवसाय गतामिन नमः ।
शासनसनाट -भीविजयनेमिनीपारसदगुरुभ्यो नमः ।।
१४१५ गन्धमप्रधार-निपुरन्दर-त्यासादगतमन्टन-मण्डनमृत-
श्रीहरिभद्राचार्यविरचितम्य-
शारत्र भातासमुन्यस्य
महामहोपाध्याय-महाताकिक-
श्रीयशोविजयन्द्गिणिवर विनितायाः पल्पलताया अनुमारिणी
शारविशारद-फाधिरत्न-पीगृपपाणि-
भट्टारकाचार्यश्रीविजयामृतसूरीश्वरमणीना-
श्री कल्पलतावतारिका टीका
प्रधरःस्तवफ:
म नया विघटिता निरपेक्षभावा-
दन्योऽन्यरोधचरणादहितं चरन्ति ।
स्याद्वादपक्षसरणाद्वितचारिणः स्युः,
ज्यादादसन्मतमनन्तनयं नमामि ॥२१॥
भयामान्तं विश्व निजनिजमतोन्मादकलिलं,
भयोन्मुक्तं तत् स्या-दविरतमनेकान्तसरणात् ।
यथा स्पाद्वादात् तद् भवति तदवोचसिनपत्ति-
र्नुमः सत्स्याद्वाद-प्रवरवचनं वीरमभयम् ॥२॥
शास्त्रवार्तासमुच्चयस्य [ प्रथमः - सर्वान् नयान् समीक्तुं, हारिभद्रं वचः शुचि । उचितं वर्तते प्रौढं, शारूवातासमुच्चये ॥३॥ गभीरं तद्वचो वेत्तु, स्वोपज्ञां विवृति व्यधात् । नातिशब्दां न चाव्यक्तां, श्रीहरिभद्रसूरिराट् ॥४॥ नव्यन्यायपरिष्कार-परिष्कृता बुधोचिता । कल्पलता-महावृत्तिः, श्रीयशोवाचकैः कृता ॥५॥ तां गभीरार्थगूढार्थी, वगाहितुमभीप्सया । विधीयते शुचिस्पष्टा, कल्पलतावतारिका ॥६॥ कल्पलता कृपा यस्य, शं ददाति पदे पदे । नमस्तस्मै मुनीशाय, श्रीमते नेमिसूरये ॥७॥ तत्कृपालेगमाहात्म्यं, कृत्येऽत्र कारणं महत् । नद्विना चेननो मूढः, स्यानडोऽपि ततः सुधीः ॥८॥ माबादधि विगायदं, शास्त्रं चक्रुचिरन्तनाः । नत्रावनारिका बद्धा, विजयामनगृरिणा ।। ९ ॥ शानवानापन गयाभिधानं ग्रन्थानमन्यमनमीमांमापूर्वक मददममर्थन विधान मातोपान व्याग्यातुकामो पदनापानाम: श्रीमान यशोविजयवाचकः प्रत्यूहाः काममा नियनानि ऐन्द्रग्रेणिन हो..." ܕܝܙܝ स्तवकः ] कल्पलतावतारिका [३ (कल्पलता) ऐन्द्रश्रेणिनताय दोषहुतभुग-नीराय नीरागता- धीराजद्विभवाय जन्मजलधेस्तीराय धीरात्मने ।। गम्भीरागमदेशिने मुनिमनो-मानन्दकीराय स- नासीराय शिवाध्वनि स्थितिकृते वीराय नित्यं नमः ॥१॥ अन्वयः-ऐन्द्रश्रेणिनताय, दोपहुतभुग-नीराय, नीरागताधीराजद्विभवाय, जन्मजलधेः तीराय, धीरात्मने, गम्भीरागमदेशिने, मुनिमनोमाकन्दकोराय, सन्ना. सीराय, शिवाध्वनिस्थितिकृते, वोराय नित्यं नमः ||१|| ( कल्पलतावतारिका ) ऐन्द्रश्रेणिनवाय-इन्द्रस्य देवाधिपतेरियमैन्द्री सा चासौश्रेणिः पद्धितरैन्द्रश्रेणिः, तया नताय नमस्कृताय, देवेन्द्र कदम्बकप्रणताये- त्यर्थः । दोपहुतभुगनीराय-दोपा दूपणान्येव हुतभुजो वह्नयो दोष- हुतमुजस्तेषां कृते नीराय जलरूपाय, दोपानलशमनस लिलस्वरूपाये. त्यर्थः । अत्रालकृतिः परम्परितरूपकम् । नीरागताधीराजद्विभवाय. रागाद् अनुरागात्, द्वेषात, रागद्वेपाभ्याश्च निर्गतो नीरागः, तस्य भावो नीरागता, तया संवलिता धी:- बुद्धिर्नीरागताधीः 'मयूरव्यंसकेत्यादयः' ३३१४१२६॥ इत्यनेन शाकपार्थिवादेराकृतिगणत्वान्मध्यमपदलोपी स. मासः । 'रागोऽनुरागे क्लेशादौ, मात्सर्ये लोहितादिपु' इति शाश्वत:, तयोराजमानोदीप्यमानो विभव ऐश्वय्य यस्य सनीगगताधीराजद्विभव. स्तस्मै तथा-विभवोरैमोक्षश्वर्ये' इति मेदिनी । यद्वा नीरागता रागाभावः, वीतरागतेति, धीः सम्यगबुद्धिः केवलज्ञान वा, नीरागता च धीश्च नीरा- गताधियौ ताभ्यां राजमानोविभवो यस्य तस्मै तथा, सम्यग्बुद्धि केवल- ।
- धीरात्मने-धीरो गर्यगुणगापन मामा मनी गनीपाम्पवमानो सन्नासीराय-सत्सु सज्जनेपु नासीरोऽग्रगण्यः सन्नासीरस्तस्मै तथा ५ ] शानं नाप्रति गगामा ! नीरागवापसम्म निगालोनी । माना: भागागरण तीराय-अपरगटागकाग, माणसासमा नि भावः । भवः ओमेशगमारे, मनाया IIT:' for मेदिनी । यस्य स धीरात्मा नस्मै नथा। पागा पुगि समाऽपि, प्रयत्न मनसोरपि । भृनायपि मनीपागां, शरीरातागोरपि' इनि मेदिनी । गम्भीरागमदेशिने--गम्भीरो गृढाभिप्राययुक्ती ग: गम्भीरागमस्त देशितुं शीली गम्भीरागमदशी 'अजाते: सुपि' । ५।१।१५४ इत्यनेन तच्छीले णिन्प्रत्ययस्तम् तथा । अनन्तनयगम भङ्गगभीरागमदेशनसमर्थायति भावः । मुनीनां महाग्रतधारिणां मनांस्यन्तःकरणानिमुनिमनांसि तान्येव माकन्दाः सहकारतरवः तत्र कीराय कीररूपाय कीरा यथा रसालपाद- पेष्वानन्दसन्दोह विकसितमनसा निवसन्ति तथैव मुनिजनानां चित्तेपु हर्पण स्थितिशालिने, मुनिवृन्दान्त:करणानन्ददायिने भागमः शास्त्र मुनिमनोमाकन्दकीराय- इति भावः । . 'नासीरं त्वग्रयानं स्यात्' । ३।४६४ । इत्यभिधानचिन्तामणिः । शिवाध्वनि-मोक्षमार्गे, स्थितिकृते- निवासशीलाय । वीराय- भगवते वर्द्धमानस्वामिने महावीरायाहते इति । नित्यं-सर्वदा । नमः नमस्कारः, अस्तु । नमःशब्दयोगे चतुर्थीविभक्तिरवसेया, तेनास्मि तं प्रति प्रणत इत्यर्थो व्यज्यते । नमस्कारश्च स्वावधिकोत्कृष्टत्वज्ञाना- नुकूल कर शिरःसंयोगाद्यात्मकव्यापारादिसपोऽवसेयः । वृत्तं शार्दूल- स्तनक: ] कल्पलतावतारिका [५ -- - विमोदितम् । तल्लक्षणन्तु 'सूर्यास्वर्गसजान्तत: सगुरयः, शार्दूल- विकीरित मिति । अलकारस्त्यनुमासः स्पष्टः। श्रीवर्धमानमहायीर. स्वामिविपयकफविनिष्ठरत्याख्यो भाववाभिव्यज्यते इति ध्वनिका- व्यमिदम् । अनुप्रासाधिक्येऽपि फविशतिप्रीदियशात् प्रसादगुग्णा-- भिव्यजनद्वारेण तस्याप्यत्र भावध्वनिपोषकतेवायसेया॥1॥ विद्याधिष्टातृत या शारदायास्तत्पदत्वेन गुरूणावापि नमस्कारो प्रन्यफर्तुनर्नानुचित इत्याशयेनाह- (कल्पलता) प्रणम्प शारदां देवीं, गुरुनपि गुणैर्गुरून् । विवृणोमि यथाशक्ति, शाखवार्तासमुचयम् ॥२॥ अन्वयः-शारदाम् , देयोग, गुगैः, गुलन् , गुरून भवि, प्रगम्य, यथाशकि, शारयातां सनुपपन, विणोमि ॥३॥ (कल्पलतावतारिका) शारदाम् -सरस्वतीम्। देवीम्-देवताम् । गुणैः-ज्ञानादिभिः, कृत्येतिशेष:, गुरुन्-श्रेष्ठान् , गुरुन्-धर्मोपदेशकान् विद्यादातॄन् वा, अपि-समुच्चये "अपि सम्भावनाप्रश्नशक्षागासमुधये" इति मेदिनी। प्रणम्य-प्रकर्षण नत्वा । यथाशक्ति-स्वशक्त्यनुसारेण । शास्त्रवार्ता- समुच्चयम्-शास्त्राणां पौद्धवैशेपिकादिदर्शनानां या वार्ताः सिद्धान्त- प्रवादास्तामा समश्य एकत्र सङ्कलनम् शाम्नवातासमुच्चयः, "कृदभि- हितो भावो द्रव्यवत्प्रकाशते" इति न्यायाश्रयणात् समुचिताः शास्त्रवार्ता इत्यर्थः, तन्तथा । विवृणोमि-व्याख्यानादिना प्रकाशयामि। स्वकीयमौद्धय॑ परिहरति फल्पलताकारः हारिभद्रमित्यादिना- " ६] शानी कल्पलता) हारिभद्रं वनः कोर, बहामनेलिगम् । फ चाहं शारालेशज्ञस्ताकान्नागिशारदः ॥३॥ अन्वयः-२, हारिमा, मी, मन, 41 ? शारलेशश:, ताहकतन्त्राविशारदः, आई, न, का? (कल्पलतावतारिका) इदम्-शास्त्रया संग्राहकमेतत् प्रत्याश्यमानम् । हारिभद्रम्- स्वनामधन्यस्य सूरिचकचक्रवर्तिन इन्दै हारिभद्रम् । सदुदीरितमित्यर्थः । बहुतर्कपचेलिमम्-नानाविधयुक्तिपरिपूर्णम् । तर्कनिवहपरिपफमिति यावत् । वचः-श्लोकात्म वचनं वाक्यं वा । क-कुत्र, अतिगहन- मित्यर्थः। शास्त्रलेशज्ञः शास्त्राणां सिद्धान्ताना लेशो लवः शास्त्रलेशरत जानातीति तथा अल्पविषयज्ञातेति यावन् । अत एव तादृक्तन्त्राविशा- रदः-तादृशसिद्धान्तावबोधनापटुः। अहम्-मल्लक्षणो जनः। च-पुनः। क-कुत्र । मादृशः सर्वर्था तदीय सिद्धान्तप-लोचनातम इति भावः । तथापि तत्र प्रवृत्तिनिदानमहन्मतानुरागमाह-श्रमो ममेत्यादिना- (कल्पलता) श्रमो ममोचितो भावी, तथाप्येप शुभायतिः । अहन्मतानुरागेण, मेघेनेव कृपिस्थितिः ॥३॥ अन्वयः-तथापि, मेघेन, कृषिस्थितिः, इव, महन्मतानुरागेण, उचितः, मम, एपः, श्रमः, शुभायतिः, भावो । (कल्पलतावतारिका) तथापि-पूर्व कथितप्रकारेण तदीयसिद्धान्तप-लोचन-
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सायनाममा ] शास्त्रीगवान विना मग पशुपमा मनामिनि- यावन । इदगेन नगगामि मानामिनि लोग बीज. गवगन्तव्गम । हितकाम्यगा-शुकामगा। शासवाासगुगयम् - पूर्वदर्शितम्याए ग्रन्थामा बागा। वक्ष्यागि-पामिनाम्गे।। अर्थतावना ( "निर्विनारिमामय गाला मानरन्" इत्ये- तावता ) निर्विघ्नपन्थपरिममालि प्रति मालम्य कारगाव गुप्त भवति परं तन्न साच्छते रागामि प्रति मालस्यान्वयव्यतिरेकाभ्यां व्यभिचारात् तत्सत्त्वे तत्सत्त्वम् तदभावे तदभावः" इत्यन्वयव्यति- रेकस्वरूपम् तयोरेव कार्यकारणभावग्राहकत्वम् दण्डादिमत्त्वे घट- सत्त्वस्य तदभावे तदभावस्य दर्शनात् घटदरा छायो: कार्यकारणभावः सम्पद्यते, घटे कार्यता दण्डादौ च कारणता स्वीक्रियते, महलसमा प्त्योः परस्परमन्वयव्येतिरेकी न स्तो यतो मङ्गलसत्त्वेऽपि ग्रन्थ-- समाप्त्यभाव: किरणावल्यादौ नास्तिकग्रन्थे च मङ्गलविरहेऽपि समाप्तिदृश्यते, अतो हेतोरन्वयव्यतिरेकव्यभिचारान्मङ्गलं न समाप्तिमात्रे कारणम् ॥ न च स्व (मङ्गल ) समसंख्यक विघ्नस्थलीयसमाप्तित्वावच्छिन्न प्रति स्वस्य कारणतोच्यते, कादम्बादी मगलाधिकविघ्नसत्त्वान्न समाप्ति: किरणावल्यादौ च जन्मान्तरीयमङ्गलादेव समाप्तिः स्वी- करिष्यते तथा च नान्वयव्यतिरेकाभ्यां व्यभिचार इति वाच्यम् । एवं- विधकार्यकारणभावस्वीकारे समसंख्यकत्वाभावात् विघ्नाधिक- संख्यमङ्गलस्थलेऽपि समाप्त्यभावप्रसङ्गात् । न च स्वानधिक-न्यून- संख्यविघ्नस्थलीयसमाप्ति प्रति मङ्गलस्य कारणता स्वीकारान्न तादृशस्थले समाप्तिविरहप्रसङ्ग, इति वाच्यम् । यत्र दश विघ्नाः पञ्च , स्तबकः ] कल्पलतावतारिका प प्रायश्चित्तेन नाशिता, पस्त च मजलानि तत्र समाप्त्यभाव- प्रसगात् । न च प्रायश्चित्ताधनाश्यस्वानधिफसंख्यविघ्नस्थली-- यत्वं समाप्ती निवेश्यते तथा च नोक्त दोप इति वाच्यम् । बजवतो विघ्नस्य यहुभिरपि महलैरनाशात् , बलवता मझलेन बहूनामपि विघ्नानां नाशाच्च । तथा च मङ्गलं व्यर्थमेव, न चाऽऽवश्यकत्वाद् विघ्नध्वंस एव मङ्गलफलमातु समाप्तिस्तु कारीरीतोऽवग्रह निवृत्ती वृष्टिरिव प्रतिबन्धकनिवृत्तौ स्वकारणबुद्धिप्रतिभादिक रण क जापा-- देव भविष्यतीति वाच्यम्, मगलं विनापि विघ्नध्वंस प्रायश्चित्तादितो भावेन व्यभिचारात् "विघ्नो मा भूत्" इति कामनया प्रवृत्तेर्विघ्न- प्रागभाव एव फलमित्यादि नो मनोरम वचनम् प्रागभावस्यासाध्य- त्वात् , स्वत आगन्तुफस्य समयविशेपस्य सम्बन्धरूपस्य तत्परि- पालनस्यापि महालासाध्यत्वात् , तस्मान् मङ्गलं निष्फलमिति चेत्- अत्रोपाध्यायाः- - विघ्नध्वंस एव मङ्गलं हेतुः । अर्थात् विघ्नध्वंस प्रत्येव मङ्गलस्य कारणता स्वीकार्या । न च मङ्गता विनापि विघ्नध्वंसस्य प्रायश्चित्तादितो भावेन पूर्वोक्तव्यभिचार इति वाच्यम् , प्रायश्चित्तादीनामपि मङ्गलत्वात् , प्रारिप्सितप्रतिवन्धक. दुरितनिवृत्त्यसाधारणकारण मङ्गलमिति तल्लक्षणं परैरुच्यते, तत्र चास्माभिलाघवात् "प्रारिप्सितप्रतिबन्धक' इति दुरितविशेषणं त्य- ज्यते, "स्वाध्यायादेरपि मगलत्वाविरोधात्" इत्याकारग्रन्थोऽत्र प्रमाणम् । तादृशविशेषणत्यागे लाघवञ्च कार्यकारणभावेऽव्यवहितो- त्तरत्वनिवेशामावमूलकमवगमनीयम्, अन्यथा प्रायश्चित्तादीनां मङ्ग- लत्वास्वीकारे यत्र केवलं मङ्गलेन विघ्नध्वंसस्तन प्रायश्चित्तादि. कारणविरहेऽपि कार्यसत्त्वात "तदभावे तदभावः" इति व्यतिरेकस्य [प्रथमः १२ ] शामवार्तासगुशयस्य निवृत्त्यर्थमन्नपानादिप्रवृत्तिवपुग्य-निवृत्त्यर्थमेव सिद्धी प्रेक्षावतां प्रवृत्तिः सेत्स्यतीति प्रेक्षावत्प्रवृत्तेरन्यथोपपत्तौ न तदनुपपत्तिस्तत्र मान मिति वाच्यम्, अन्नपानादावपि सुम्वार्थमेव प्रवृत्तेः। अन्यथाऽस्वाद परित्यागस्वादूपादानानुपपत्तेः । पर्यालोचनया वस्तुतः सर्वत्र सुखार्थ- मेव प्रवृत्तिरिति । न च बहुदुःखग्रस्तानां मरणादावपि प्रवृत्ति- दर्शनात् कथं सुग्वार्थमेव प्रवृत्तिरिति वाच्यम् । विवेकिप्रवृत्तेरेवाऽत्रा. धिकृतत्वात् । अतः साधूच्यते-- दुःखाभावोऽपि नावेद्यः, पुरुषार्थतयेष्यते । नहि मूर्छाद्यवस्थार्थ, प्रवृत्तो दृश्यते सुधीः ॥ इति "दुःखं मे माभूत" इत्युद्दिश्य प्रवृत्तेर्तुःखाभाव एव पुरुषार्थः । तज्ज्ञान त्वन्यथासिद्धमिति चेत-सत्यम अवेद्यस्य तस्य (क्षुदादेः) ज्ञानादिहानिरूपाऽनिष्टानुविद्धतया प्रवृत्त्यनिर्वाहकत्वात् । सुखमात्यन्तिकं यत्र, बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् । तं वै मोक्षं विजानीयाद्, दुष्प्रापमकृतात्मभिः ॥ इत्यादि वचनमप्युपपद्यते, इति संक्षेपः ॥ वक्तव्ये शास्त्रबार्तासमुपये पूर्व सर्वविप्रतिपत्त्यविषयां शास्त्र- वातीमाह- ( शास्त्रवाती ) दुःखं पापात सुखं धर्मात्, सर्वशास्त्रेषु संस्थितिः । न कर्तव्यमतः पापं, कर्तव्यो धर्मसञ्चयः ॥३॥ अन्वयः-पापात् दुवं, धर्मात् सुग्वं (इयं ) संस्थितिः सर्वशास्त्रेषु, अतः पार न कर्तव्यं, धर्म सञ्चयः कर्तव्यः । अतएव--- स्तवकः ] कल्पलतावतारिका [१३ पापात्--अधर्मात , दुःखं भवति । धर्मात् सुरसं-भवति । इयं सर्वशास्त्रेषु,सं-समीचीना-अधिप्रतिपत्तिविषया, स्थिति मर्यादा । अतो-दुःखहेतुतया, पापगशुभफर्भहेतु, न कर्तव्यम् , सुखदेतुतया संचितोऽवैफल्यादिविरहितो धर्मः धर्मसञ्चयः कर्तव्यः ॥३॥ शुभाऽशुभहेतूनाह- ( शाखवार्ता) हिंसाऽनृतादयः पञ्च, तत्त्वाश्रद्धानमेव च । क्रोधादयश्च चत्वार, इति पापस्य हेतवः॥४॥ अन्वयः-हिंसामृतादयः पन्त, तत्त्वाभवानम् एव च, चत्वारः कोधा- दयाच, इति पापत्य हेतयः । हिंसानृतादयः पञ्च- हिंसाऽनृताऽदत्तादानाऽब्रह्मापरिग्रह- पञ्चकम् । तत्र प्रमादयोगेन प्राणव्यपरोपण हिंसा | धर्मविरुद्धं वचन. मनृतम् । धर्मविरोधेन स्वामिजीवाद्यननुज्ञातपरकीयद्रव्यग्रहणम- दत्तादानम् । स्त्रीपुंसव्यतिकर (संसर्ग) लक्षणमब्रह्म । सर्वभावपु मृ लक्षण: परिग्रहः । "हिंसादयः" इत्येतावतैव आदिशब्दानृत. प्रहणसम्भवात् पुनरनृतग्रहणं प्राधान्यख्यापनार्थमवसेयम् । कथिताः पश्चाऽविरतिरूपा च्यन्ते । तत्त्वस्य यथास्थितवस्तुनोऽश्रद्धानं यस्मा- दिति बहुव्रीधाश्रयणात् तत्त्वाऽश्रद्धानं मिथ्यात्वम् । एवकार प्रसि- द्धयर्थः। च-पुनरर्थः । क्रोधमानमायालोमात्माश्चत्वारः क्रोधा- दयश्च 1 इति-एतावन्त:, पापस्याशुभकर्मणो, हेतवः-कारणानि कथितानि॥४|| - १४] शास्त्रवार्तासमुशयस्य [प्रथमः धर्मस्य हेतून् व्यतिरेकेण व्यनक्ति- (शास्त्रवार्ता) विपरीतास्तु धर्मस्य, एत एवोदिता बुधेः। एतेषु सततं यत्नः, सम्यक् कार्यः सुखैपिणा ॥५॥ अन्वय:- तु विपरीताः एते एव बुधैः धर्मस्य { हेतवः) उदिताः, सततं सुखैषिणा एतेषु सम्यक् यत्नः कार्यः । तु-विशेषणे। विपरीता:-अहिंसा. सत्या-ऽस्तेय-ब्रह्मा-ऽप. रिग्रह-सम्यग्दर्शन-शान्ति-मार्दवाऽऽर्जवाऽनीहारूपाः, एत एव बुधै- रहद्वचनानुसारिगीताथैः, धर्मस्य गुणाः शुभाशयलक्षणस्य हेतव उदिताः प्रतिपादिताः, अत एतेषु धर्मकारणेषु सतत-निरन्तर सुरदै- पिणा- कल्याणेच्छुना सम्यक्-विधिना यत्नः कार्यः सुखोपाये प्रवृत्तेरेव सुखोत्पत्तेः । स्वभावतः सुखदुःखेच्छाद्वेषवतामपि प्राणिनां सुखोपाये धर्मऽनिच्छा दुःखोपाये चाधर्म एवेच्छा खलु मोहमहाराज- निदेशविलसितम् । तदुक्तम्- धर्मस्य फलमिच्छन्ति, धर्म नेच्छन्ति मानवाः । फलं नेच्छन्ति पापस्य, पापं कुर्वन्ति सादगः ।। उक्तहेतेपु प्रवृत्त्या च, अहिमादिनाऽविरते:, सम्यग्दर्शनेन च मिध्यात्वन्य, क्षमादिना च क्रोधादिना निवृत्तेस्तन्मूलकदुःखविरहात अप्रतिहतः मुग्यावकाशः । “अहिंसया क्षमया क्रोधस्य, ब्रह्मचर्यण वातुविचारेगा कामम्य, अस्तेयाऽपरिप्रहरूपेगण मन्तोपेण लोगस्य, सत्येन यथार्थतागापेरण विवेकन मोहस्य, तन्मूलानां च सपा निवृतिः।" इनि तु यानलमतानुसारिण: । - स्तवक] पाल्पलतावनारिका गई विशयनीमअनिमादिना गुलगुरापातिशोधादिनिश. सायपि संस्थलमादिकपोनिवृत्ति समागुतरगुगामामायादेव ।।५।। II मूललोकपर प्रसादावश्यावलोशिसमय में यम् ।। अध चार्याकपूर्वपक्ष:- (शाखबात) पृथिव्यादिमहामृत-मात्रकार्यमिदं जगत् । न चात्मा,दृष्टसद्धा, मन्यन्ते भृतवादिनः॥३०॥ স:- ১ যিলাদি-মাদকাল না মানা ন भरवादिनः मा मन्लन्ते । इदं प्रत्यकोपनभ्यमानं जगत् चगपरं विश्वम पृथिव्यादि- महाभूतमात्रकार्यम् पृभिधी श्रादिपा तानि धिम्यादीनि वृधि- घोलनेनोशयुन्नसणानि यानि पत्यारि महाभूनानि, गृथिव्यादिमहा. भूनानि, नेपामेय तन्मायम तस्य फान्यन्तथा, एयफारार्थकमानपदेना. IS कासादिव्यवच्छेदः । ननु जगदन्तर्गतस्याऽऽत्मनो न पृथिव्यादि- महाभूतमात्र कायंत्वम, तथा पयस्य कस्यचिदेकम्यापि तन्मानकायं. स्वाभाव प्रनिशामा इति चेत् सत्यम्-"अनन्यविशिष्टः कायः पुरयः" इतियधनात शरीरातिरित्याई प्रत्ययालम्पनरयासत्त्वाभ्युपगमात, भूनचादिभिः प्रत्यक्षवस्तुन एवं पारमार्थिकत्वस्य स्वीकारात्, मानामा- यात, "अवस्या तत्त्वानभ्युपगमाञ्च । प्रत्यतातिरिक्तस्य वस्तुनः पारमार्थिकत्वाभ्युपगमेऽनुमानमस्ति प्रमाणमिति चेत तैरनुमानस्य प्रामाण्यानलोकागत, व्यभिचारिसाधा. रण्येन तन्य (अनुमानस्य) अप्रमाणत्वात्, पर्वतादी धूमादिदर्शनेन { रविमलासमानामागभाना मामा, शमय बम्पतः" इत्यभिहितम् । ततोऽन यस्तुनि मानाभावान्नास्त्यात्मेति १६ 1411THIT'1:1 नम:। माना: सी.mmmm, वासनामामामा मानिषाद शब्दप्रयोगो दुर्गट गाना , गति नापामोनियोजनः गा. दिति चेत्र-न, पर प्रति पगापयोगा, परम्ग तनुत्तरमाण निग्रहे च तत्मायगा । लागत : पर्गनुगोगपराणि सूत्राणि - लोकायतिकवादः। श्रात्मवादिनां मतमुपन्यस्यति 'अचेतनानीति'- ( शास्त्रवार्ता) अचेतनानि भूतानि, न तद्धर्मो न तत्फलम् । चेतनास्ति च यस्येयं, स एवात्मेति चापरे ॥३१॥ अन्वयः-अपरे च भूतानि अचेतनानि, चेतना तद्धर्मः न, तत्कलं न, इयं च यस्य स एव आत्मा इति (मन्यन्ते)। अपरे च-प्रात्मवादिनः पुनः, भूतानि-पृथिव्यादीनि, अचेतनानि चैतन्याभाववत्त्वेन प्रमितानि, अतश्चेतना-तद्धर्मो न, भूतस्वभावभूता न, अत एव च तत्फलं न-भूतोपादान कारणजन्या न, मृदो घटस्येव तत्स्वभावस्यैव तदुपादेयत्वात् अस्ति च चेतना, प्रति प्राण्यनुभवसिद्धत्वात्, अतो यस्येयं चेतना स्वभावभूता, फलभूता च, स एवाऽऽत्मा, परिशेपात्, । इति-मन्यन्ते इति शेषः ।
स्तवकः] कल्पलतावतारिका [१७ न चैकत्र भेदाभेदोभयाविरोधसम्पादनार्थ कालोऽवश्यमाश्रय- णीयः, कथमन्यथा पक्वताशायां घटादौ "अयं न श्यामः" इत्यादि धी: ? कालावीकारे च फालभेदेने कत्रोमयसमावेशः सम्भवतीति । "इदानी घटः" इत्यादि-प्रतीती सम्बन्धघटकतया परत्वादिलिन वा कालसिद्धिस्तथा च लोकसिद्धत्वात काल एव स्वीक्रियताम् , लोकासिद्धत्वादात्मस्वीकारो वृथैवेति वाच्यम् । जातिस्मरणस्य भवा- न्तरानुभूतार्थविपयस्य मतिज्ञानविशेषस्य लोकेन संनयादात्मनोऽपि लोकसिद्धत्वात् । तथाहि-न हि भवान्तरानुभूतार्थस्मरणमन्वय्यात्म- द्रव्यं विनोपपद्यते, शरीरस्य भवान्तराननुयायित्वात् । न चैवं भवान्त- रादागमनाऽविशेपेऽपि केपाश्चिदेव जातिस्मरणं न सर्वपामिति विशेष: कयमिति वाच्यम् , संबंपाम भिमतव्यतिरिक्तानां जातिस्मरणाभावस्थ नानाविधकर्मविपाकतः सिद्धत्वात् । तथा चोक्तं हरिभद्रसूरिवर्यः- "लोकेऽपि नैकतः स्थानादागतानां तथेक्ष्यते । अविशेपेण सर्वेपामनुभूतार्थ- संस्मृतिः ॥ इति ॥ पवञ्च लोकसिद्धत्वाऽविशेपेऽपि सकलप्रयोजन हेतोरनन्य. साधारणगुणस्याऽऽत्मनोऽनङ्गीकारस्तत्तद्वस्तु परिणामान्यथासिद्धस्य कालस्य चाडोकार इति पुर: परिस्फुरतोर्मणिपापाणयोर्मध्ये मरिणत्याग पापाणग्रहणवदतिशोचनीयं, विलसितं देवानांप्रियस्य लोकायति- कस्येति । - उपाध्यायास्तु- वस्तुत: स्मरणान्यथाऽनुपपत्त्याऽपि लोकसिद्ध एवाऽऽत्मा, शरीरस्य चैतन्ये बाल्येऽनुभूतस्य तारुण्येऽस्मरणप्रसंगात्, चैत्रेणा- नुभतस्येव मैत्रेण, बालवशरीरयोर्भेदात् , परिणामभेदे द्रव्यभेदा-
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सायात "व्यत्तेभिदस्त्यत्वं मझगडथानस्थितिः । म्हपलानिरसम्बन्धी
भूतचतुष्कप्रकृतित्वेन शरीरमतिरिच्यते, स्वाश्रयसमवेतत्वसम्बन्धेन
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अत्र नयनास्तिका:-अवकानगा नानादिक प्रति नादा
म्येन यायका गानाकाण शोर मालायन मानादिक पनि हेतु.
त्वकल्पन मुनिनम् न माग शानिमिद्धत पृथिवीन्यादिना
जातिवाचकसंग्रहः ॥” इत्यभियुक्तोक्त्या परम्परमगागाधिकरणात्यन्ता
भावप्रतियोगित्वझपम्य साय॑भ्य भूतत्व गर्नत्ययोरिव प्रकृतेऽपि
पृथिवीत्वादिना साहादात्मत्वस्य जानित्ववाधान इति वाच्यम्।
घिसाकर्य्यस्येव जातिसाहर्य्यस्याप्यदोपात । न च तथापि पृथिव्यादि.
उपा.
वाद्यभावस्य गन्धादिकप्रतिवन्धकत्वेन तस्य भूतचतुष्कप्रकृतित्या-
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[प्रथम न्याभावात्), घटत्वघटरूपादिवत् । विशेपजिज्ञासुभिः शास्त्रवार्तास. शरीरातिरिक्तस्य सत्तया प्रतीतस्याऽऽत्मनः सिद्धिर्भवति, सतश्चाभा- वाप्रतीतेः । तथाहि "नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ।" इत्यादिनाऽसतो भावस्य प्रतिपद्यते शशशृङ्गे भावत्वेनाऽपरिच्छेदात् एवमेव भावस्तुच्छस्वभावं नाप्नोति। नन्वभावोऽपि भावरूपतामापद्यत एवं भावरूपस्य दीपस्या- ऽऽलोकाभावात्मकान्धकारस्वरूपताप्रतिपत्तेरितिचेन, दीपसम्बन्धिनों ऽन्धकारपरिणामस्य सर्वथाऽभावरूपत्वाभावात् । भास्वरपरिणामत्या- गेऽपि द्रव्यत्वापरित्यागात् । नैयायिकैः स्वीकृतमन्धकारस्य तेजोऽभा- वरूपत्वमपि न । "तमो नीलम्" इति प्रतीतेः सार्वजनीनत्वेन तमो द्रव्यं रूपवत्त्वात् घटवत्, इत्यनुमानेन तत्र द्रव्यत्वसाधनात् । तथा २० ] शाम्यवार्तासमुपगम्ग अन्वयः-गृतदेहे न सर्वशा, देहभादिमानेन, नेतन्यम् उपलभ्ये: भन्यथा न तद् (तद्-) कर्मादि न ।। मृतदेहे च सर्वथा-सर्वप्रकारैः, यथा सजीवशरीरे सर्व प्रका चैतन्योपलब्धिस्तथेति भावः । देहधर्मादिभावेन-देहधर्मत्व-देहकार त्वाभ्याम् । चैतन्यमुपलभ्येत-देहत्व-देहरूपादिवत् । अन्यथा-योग्या पलम्भे, न-तदभाव एव स्यात् , तथा च तच्चैतन्यं, तद्धर्मादि न-तद्ध- मभूतं तत्कायंभूतं च न, तद्भावेऽपि (देहभावेऽपि) तदभावात मुच्चय आलोकनीयः ।। “योऽहं बाल्येऽन्वभूवम् सोऽहं स्मरामि” इत्यादिप्रतीत्या सतश्चाभावस्य निषेधप्रतिपादनात् । एवञ्चाभावः पारमार्थिकत्वं न (चैत- चोपाध्याया:- तया ফানুশনায়বিষ্কা [ २१ - (कल्पलता) तेजसोऽतिविनिवृत्तिरूपता, स्वीकृता तमसि या कणाशिना । द्रव्यता वयममी समीक्षिण-स्तत्र पत्रमवलम्व्य चक्ष्महे ॥५॥ अन्वयः-गाशिना, या, तमसि, तेजसः, अतिपिनिवृत्तिरूपता, स्वीता, समीदिन:, मो, वयम्, परन्, अबलम्न्य, तन, द्रव्यताम, नामदे । (काल्पलतावतारिका) कणागिना-कणादेन मुनिना। यातमसि-अन्धकारे। तेजसः वः। अतिधिनिवृत्तिरूपता-अत्यन्ताभावस्वरूपता । स्वीकृता-अजीकता। समीक्षिणः-समीचीनतया पर्यवेक्षकाः । अमी-वयम् आईताः । पत्रम् अवलम्प-पत्रावलम्बनं कृत्वा । तत्र- तमसि । द्रव्यताम्-द्रव्यस्य- भावताम् । चक्ष्महे-चूमः । अत्र पत्रमवलम्व्येति विशेषणं वक्तुरनु- पमप्रतिभाभिव्यञ्जनात् काव्यस्य ध्वनि प्रयोजति । तन पन्नेत्येतद्- शेच्छेकानुप्रासोऽलङ्कारः । अथ "तमो नीलम्" इति प्रतीत्या तमसो नीलरूपवत्त्वे तस्य पृथिवीत्वापत्ति: नीलत्वावच्छिन्न प्रति पृथिवीत्वेन हेतुत्वादिति चेन्न, 'आईनानां स्वभाव विशेपस्यय विशिष्टनीलनियामफत्वात् , फणादमता- नुयायिनोऽपि अवयवनीलादिनवाऽवयविनि नीलादुत्पत्तौ पृथिवी. खेन तत्समवायिफारणत्वाभावात् । न च तमसो द्रव्यत्वे आलोक- निरपेक्षचाह्यत्वं न स्यात्, द्रव्यचाक्षुपत्यावच्छिन्नं प्रत्यालोकसंयो- गत्वेन हेतुत्वात्, इति वाच्यम् । आलोक विनापि घूकादीनां द्रव्य- चाक्षुपोदयाद व्यभिचारात् । किन तमसोऽभावत्वे तेजोज्ञानं विना ज्ञानं न स्यात, अभावक्षाने प्रतियोगिमानस्यान्वयव्यतिरेकाभ्यां हेतु- ।
२२] [ प्रथमः अत्र-समायाम् । ध्वान्ते-अन्धकारे, तद्विपय इत्यर्थः । अभावत्व- शास्त्रया सगुणगस्य त्वावधारणात् । पालोक जानतामेव तमः प्रत्यक्षस्वीकारादिष्टापत्तिः कर्तुमशक्या,तेजसोऽप्रतिसन्धानेऽपि तमोऽनुभवस्य प्रत्यक्षसिद्धत्वात्। अधिकं कल्पलतायामालोकनीयम् । तथा चोपाध्यायाः- (कल्पलता) इमां गिरं समाकप, सकर्णा जाङ्गलीमिव । उद्वमन्तु सुखं ध्वान्ते-वाभावत्वभ्रमं विपम् ॥६॥ तस्मान्न जायते किञ्चि-देकान्ताद् न च नश्यति । प्रसिद्ध निखिलानां, चैलक्षण्यं हि लक्षणम् ॥७॥ अन्वयः--सकर्णाः, जागुलीमिव, इमाम्, गिरम्, समाकर्ण्य, अत्र, ध्वान्ते, अभायत्वभ्रमम् , विषम् , सुखम् , उद्वमन्तु, । तस्मात् , किधित्, एकान्तात् , न च, जायते, न च, नश्यति, हि, निखिलानाम् , त्रैलक्षण्यम् , प्रसिद्धम् । (कल्पलतावतारिका) सकर्णाः - विद्वांसः। जालीम् - विपापनयनविद्यामिव । इमाम्-प्रत्यक्षमनुभूयमानाम् । गिरम्-वाणीम् । समाकर्ण्य- '. -- -श्रुत्वा भ्रमम्-अभावत्वभ्रान्तिरूपम् । विपम्-गरलम् । सुखं-यथा स्यात्तथा । उद्वमन्तु-प्रतिकर्पन्तु । रूपकोपमयोः संसृष्टिरत्रालङ्कारः । तस्माद- "नाभावो भावतां याति” इत्यस्य सिद्धत्वात् । किञ्चित्-किमपि वस्तु एकान्तात् --एकान्ततः । न-नहि। जायते-उत्पद्यते । च-पुनः न-नहि । नश्यति-विनश्यति । हि-यस्मात् । निखिलानाम्- [ ༢༣ ༤ དདཔསྶ ༣ པ ཕ7: : • p: ts༣ ཨུས''- པr པ སྔཡ; { giཔཱམ༌མཧཱ t ཙ ཚ ས ཧ ༣༣ ཡས་ ཙfr ff; r+༔༌ཙཀ Fri::; ༑n: rr; gyz རིསཱཀ, • ཨtit' rr'' ra༔ སཱr * སཱ༔ དྷེཝཱ༔ ཨཝཱai | :: +སf; ༣:༣n: 1: * fi ཨ ཀ མryསུ ་ པ :༠ ་ཙ; Fཚུ་ ཡསྶ•པའ རrཙF ;; ཝ } སན ་. ཙཝཱ ཙམྤ༔ ན བྱཱ ཎ ཙ;; 1 Jལཝཾ: ; པ་ཙ། * སྶ བryཡབྷ ཎ ཡr: '' པས། ༈ • ནirit:1;-- पया या प्रतिमन पाम्प, नापिरः शरपनि मनीताम् । fi། རristTH༥སུ iiqiid #ff-Tiའ f1tfqlcil པrs: སམསྶ, པཎསཱ, ཚུt, inཔf:, prསུ ;E''t, ༣ - ;པ• པ :, ;, ཙནi, fest:…, , *, trཎན, པསྶ''irr) ༥། -•། སྐ:: | གཅལུ-- 1 ཙ : བཙ1|པ་ : | Tཀ་ནཱ-titi7 1 ཀiའrq-༥།༢ #17:| intff; -fii: } ་ཀཾ་Tig-GI༣༣༣isriq, Fr1ཝེའiti ཀw, •rtifr t: | ༣rafii-rrra{{ { fI7t- arra | २४ ] शानवासगुजयस्य [ प्रथमः यथार्थागमवद्धबुद्धिः-यथार्थाऽऽईतागमा गासपरिपकमतिः। एपः- प्रत्यक्षदश्योऽहम् । अस्य-नैयायिकस्यापि । शिक्षाम्-दण्डम् । न- नहि । दास्यामि करिष्यामि, अपि तु करिष्याम्येवेति यावत् । अनु- प्रासोऽत्रालङ्कारः । चार्वाकादीनुपहसन्त्युपाध्यायाः (कल्पलता) बोधः स्वार्थावबोधक्षम इह निहताऽशेपदोपेण दृष्ट- स्तस्मादस्माकमन्तविरचयति चमत्कारसारं विलासम् । येपामेपाऽपि वाणी मनसि न रमते स्वाऽऽग्रहग्रस्ततत्त्वा- ऽऽलोका लोकास्त एते प्रकृतिशठधियो हन्त हन्ताऽनुकम्प्याः॥९॥ अन्वयः~-तस्मात्, इह, निहिताऽशेषदोपेण, दृष्टः, स्वार्थावबोध- क्षमः, बोधः, अस्माकम् , अन्तः, चमत्कारसारम् , विलासम् , रचयति, येषाम् , मनपि, एपाऽपि, वाणी, न, रमते, स्वाग्रहग्रस्ततत्वालकाः प्रकृतिशठधियः, ते, एते, लोकाः, अनुकम्प्या, हन्त ! हन्त ! (कल्पलतावतारिका) तस्मात्-पूर्वोक्तहेतोः। इह-लोके। निहिताशेपदोपेण-विना- शितसमस्तदोपजातेन, वीतरागादिनेति भावः । दृष्टः-अनुव्यवसितः । अनुव्यवसायविपयीकृत इति यावत् । स्वार्थावबोधक्षमः-स्वविषयाव- बोधनसमर्थः । “अर्थो विपयार्थनयोर्धनकारणवस्तुपु। अभिधेये च शब्दानां निवृत्तौ च प्रयोजने"इति मेदिनी। वोधः-ज्ञानम् । अस्माकम्- आर्हतानाम् । अन्तः-अन्त:करणमध्ये । चमत्कारसारम्-चमत्कार अानन्दविशेषः सारः श्रेष्ठो यस्मिन् तत्तथा । विलासम्-विभ्रमविशे- -- १ - .
स्तयक: ] फापलतावतारिका - । पम् । विरचयति-सगुत्पादयति । येपाम्- चार्वागादीनाम् । मनसि- हदये । एपा-यम्। अपि-सम्भावनायाम । वाणी-बोतरागवचनम् । न-नादि । रमते-पानन्दं लभते । स्वाऽऽग्रहग्रस्ततत्यालोका:-स्वाऽऽ. प्रहैनिज्ञाभिनिवेशविशेस्तो दूपितस्तत्वस्य यायायस्य पालोकः प्रकाशो यस्ते तथा। प्रकृतिगटधियः-स्वभावतो दुश्वुद्धयः । ते-ताद- शदुष्टबुद्धित्वेन प्रसिद्धाः । एते-इमे । लोका:-चार्वाकादयो जनाः। हन्त हन्त-अव्ययस्यमत्यन्तखेद सूचयति । अनुकम्प्या:-दयनीयाः। तेषां कृतेऽन्या कापि गतिनास्तीति भावः । पर्व समीचीनयुक्तिततिभिरात्मानं प्रसाध्य चार्वाकानुपहंसति, वाचकप्रया: आत्मसिद्धेगिति (कल्पलता) आत्मसिद्धेः परं शोका-लोकाः ! लोकायताननम् । समालोकामह म्लानं, तत्र नो कारणं वयम् ॥१०॥ अन्यय:--लोकाः! परम् , आत्मसिद्धेः शोकाद् , लोकायताननं, म्लान, समालोकामा तत्र, वयं, कारणं, नो ( कल्पलतावतारिका) लोका:-अयि भव्य जनाः ! परम्-केवलम् । आत्मसिद्धेः-युक्ति- ततिकरणकदेहातिरिक्ताऽऽत्मसिद्धितः । पञ्चम्यर्थो जन्यत्वम्, तथा च श्रात्मसिद्विजनितादित्यर्थः । शोकात्-हार्दिकशुचः । लोकायता- ननम्-चार्वाकवदनम् । म्लानम्-वैलक्ष्यमत्तिनम् । समालोकामहे- पश्यामः । तत्र-चार्वाकवदनन्लानतायाम् । वयम्-अाईताः । कारणम्- -- - ।
4 ] ".. { : नामता. तो TREE HIR गान न TETTTTTT IT. गगनमानमा | ft for Mittyff 1-1 for 1 नन नगशिरीर नागोग शरीर. वैनिध्यात, शरीरगंगोगामाशालाविता 3T. गोग, इति नागम.... शरीगोमाका गीग मागि भोगापर:, उपप्रसंगोगेन शरीर भोगनिगामाले तु नाश संयोगप्रयोजकतवादमिः । न नैवमपि गजामिपरिगणनभूनानां विनिमोगहेतुम्लभाय- त्वात् , फलभेदोपपत्ती न त नरम् गायशकतति वाच्यम् । "भूतात्मक एवाऽऽत्मा न" इत्येतस्य पूर्वप्रघट्टा व्यवस्थापितत्वात् । अथैवमपि भोगनिर्वाहकस्याऽऽत्मधर्मम्मेवाऽदृष्टस्य कल्पनात सर्वमिदमसङ्गतम् । “संभोगो निर्विशेषाणां न भूतः संस्कृतैरपि" इति स्मरणात् । किञ्च-चित्रस्वभावमप्यदृष्टस्याऽनुपपन्नम्,- तद्वैजात्ये मानाभावात, तत्सत्त्वे कर्मणां वि शिप्याऽदृष्टहेतुत्वे गौरवाः । न च कीर्तनश्यतावच्छेदकतया तस्मिद्धिः । तत्र दृष्टत्वस्य स्वाश्रयजन्यताविशेषसम्बन्धेनाऽश्वमेवत्वादि- घटितस्य वा तथात्वात् । अन्यथा मयाऽश्वमेधवाजपेयौ कृती", "मया वाजपेयज्योतिष्टोमौ कृतौ' इत्यादि कीर्तननाश्यतावच्छेदकजातिसिद्धौ साकर्य्यस्यापि सम्भवात् । अस्तु वा तत्कीर्तनाभाव विशिष्टतत्तत्कर्मत्वेन हेतुन्वम्। अतो न समूहालम्बनहरिगङ्गास्मरणजन्याऽपूर्वस्य गङ्गास्मृति. कीर्तनादनाशे हरिस्मृतेरपि फलानापत्तिः, तज्जन्यापूर्वयोरेकस्य नाशे- सयपरस्य सत्त्वे गडास्मतेरपि वा फलापत्तिरिति चेदनोच्यते-
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.. ३०] [ OR ཨུifཀit13r1:14:། अन्वयः--तत्, रपि फर्मामीनो या योनिनजागवाहिना पानिपगा। न चेश्वराचीननेन, नरम (ग) निम्नाहिन किसिनिमोए ? इति मागितमा गमभिगवाऽनिननीगानगो महोपा- ध्यायश्चार्वाकानुपाहमति, मरीनिरिनि-- (कल्पलता) मरीचिरुच्चीः समुदातीयं, जैनोक्तभानोर्यदष्टसिद्धिः । निमील्य नेत्रे तदसौ वराक-इचार्वाकधूकः श्रयतां दिगन्तम् ।।११॥ जीनोकभानोः, मरीनिः, गम् , अहसिद्धिः, उच्चैः, समुदश्चति, तत्. वराकः, असो, नायकः, नेने, निमीत्य, दिगन्तम् , श्रयताम् । (कल्पलतावतारिका) यत्-यस्माद्धेतोः। जैनोक्तभानो:-जिनस्य सर्वज्ञस्य ऋपभा. देरिदं जैनम्, तच तदुक्तं तदुपदिष्टम् जैनोक्तम् . तदेव भानुः जैनोक्त- भानुस्तस्य तथा। मरीचिः-किरणरूपा । इयम्-रपा । अदृष्टसिद्धिः- वादिविप्रतिपत्तिपिशाचीकवलितस्यादृष्टस्य कर्मापरपर्य्यायस्य सिद्धि- निष्पत्तिस्तथा । उच्चः-सातिशयम् । समुदञ्चति-समुल्लसति । तत्-तस्माद्धेतोः । वराकः-मूर्खः । असौ- --एपः। चार्वाकधूकः- चार्वाक एव घूक उलूकः चार्वाकधूकः, सूर्यकिरणमसहमान उलूक इव जैनोक्ततेजोऽसहमानश्चार्वाक इति भावः । नेत्रे-नयने । निमील्य- संकोच्य । दिगन्तम् - दिक्प्रान्तभागम् । श्रयताम् -श्राश्रयतु । रूपकमलकारः। सादृश्यातिशयमहिम्नोपमानोपमेययोरभेदस्यैव रूप- कालद्वारात् । अष्टे दर्शनान्तरसम्मतिं दर्शयति,-अपमिति- - रतवर] पल्ललतायनारिका [३१ (शास्त्रयाता) अदृष्ट कर्मसंस्कारः, पुण्यापुण्ये शुभाशुभे । धर्माधर्मा तथा पाशः,पर्यायास्तस्य कीर्तिताः।।१०७॥ अन्य यः-सान, कर्म, संस्कारः, पुमायुचे, अभापुमे, धर्माधर्मी, तपा पाराः, तत्य, पपांचाः, पहिताः । "अदृष्टम्" इति पैशेषिका: । "कर्म" इति जैनाः। "संस्कारः" इति मौगताः । "पुण्यापुण्ये" इति वेदान्तिनः । "शुभाशुभे" इति गरणका | "धर्माधर्मा" इनि सांख्या: । "पाशः" इति शैवाः । एपनेते तस्य-अदृष्टस्य पायाः-प्रतिशब्दाः, मनीपिभिः कीर्तिताः । तदेवमनट भिन्नभिन्न नाम्ना सर्वऽपि दार्शनिकाः स्वीकुर्वन्तीति । श्रयानेनाइटेनाऽऽत्मनः कथं संयोग इति चेन, अत्रोच्यते- अस्यादृष्टय हिंसाऽनृतादयो ये हेतवः पूर्व मुक्तास्तक्रियाध्यवसाय- परिणत प्रात्मा, तेन कर्मणाऽन्योन्यमन्बन्धेन बन्धनप्राप्तेः । अमू- तस्यापि मूर्तेन सहाऽऽकाशादी संयोगस्य दर्शनात, आत्मनोऽपि कर्म- संयोगे स्वीक्रियमाणे क्षत्यभावाग । अतन हेतोमुमुक्षुभिः सूक्ष्मे क्षिभिश्च सिष्टकर्मसमूहकार, यथार्थपदार्थज्ञानप्रतिकूलमज्ञानविवर्धनं लोका- यतमतं विज्ञेयं, त्याञ्चन । अन गयोगमपाध्यायप्रवर :, युक्तिरिति- (कल्पलता) युक्तिमुक्तिप्रसरहरणी नास्ति का नास्तिकानां, सर्वा गर्वात् किमु न दलिता सा नयैरास्तिकानाम् ।। ध्वस्तालोका किम न जगति ध्वान्तधारा वत स्यात्, किं नोच्छेत्री रविकरततिर्दुःसहोदेति तस्याः ।।१२।। - ... 14. - - पता: --- : 1EM . , 11111:ो, Itetin, मी, IM , , hitr, of, : II, fi! | , tal, HTTTT, Hff, I Tilr, Fri, TI:, :... it, it.cा, राति:, 57 Rafti ? (अवतारिका) नास्तिकानाम-नाम्गार परलोको गति निर्गपात नानिका- भार्याकारतेपान्तथा । का युक्तिीशी निगारगा,गी शस्तकों वा । मुक्तिप्रसरहरणी-गुर्गादास्य प्रार: प्रवाही मार्गा वा गुक्तिप्रसरस्तस्य हरणी दूरीकी अपहारिका विनाशिक तिगावत्यान-गहि । अस्ति- वर्तते । अपितु सर्वापि तदीया युक्तिमुक्तिप्रसारावरोधिकैवेति भावः परन्त्विति शेषः । सा-प्रसिद्धा पूर्ववर्णिताः सर्वा निखिलाऽपि तदीया युक्तिः। आस्तिकानाम्-अस्त्यदृष्टं परलोकः सिद्धिश्चेति मतिर्यपां त आस्तिका, पाहतादयस्तेपान्तथा । नयः-न्यायः सप्तनयादिभि- रिति यावत् । गर्वात्-मदात् , अभिमानादिति यावत् । न-नहि । दलिता-पच्याविता । किमु-प्रश्नार्थकमव्ययम् । कलसे निजहेतुदण्डजः किमु चक्रभ्रमकारिता गुणः । स तदुच्चकुचौ भवन्प्रभाझरचक्रभ्रममात नोति यत् ॥ इति नैपधीयचरित-द्वितीयसर्गस्थ-सप्तविंशतमे श्लोके प्रश्नार्थकस्य किमु शब्दस्य दर्शनात् । वत-खेदार्थकमव्ययम् । ध्व- तालोका-ध्वस्तो विनाशित भालोकः प्रकाशो यया सा तथा । वान्तधारा-अन्धकारपरम्परा । जगति-संसारे । न-नहि । स्यात्- भवेत् । किमु-सम्भावनायाम् । तस्या:-ध्वान्तधारायाः । उच्छेत्त्री- उच्छेदनकर्ती, समुन्मूलयित्रीति यावत्। दुःसहा-दुःखेन सोढुं योग्या । - .
स्लम] फरपालवायसारिका [ ३३ रविशरततिः-सूर्यकिरणविस्तारो न माय । न-मादि । उदेति- तम्ते, प्रशासने इनि यावत् । किम्-प्राना कम्ययम् । प्रकाशन एलेति तापम् । सूर्यकिरणासन्तनियंधा जगनि पाना- निवृत्ति पुरस्सर प्रकाशने नयाऽऽनिकमया मुशिलली नास्ति- कानां युकिं गदुविधामासादयन्तीनि भायः । अत्र काव्यप्रासादिरीत्या हातालझारः । पाव्यानुशासनो. ঘমা ছালৰ নিয়নৰামাঙ্গিনা। श्राइतमामायणाय प्रेरयशि, वातामिति- (वल्पलता) वाळमिमामत्र निशम्य सम्यक् , त्यतया रसं नास्तिस्दर्शनेर । ऐशान्तिकात्यन्तिकशर्म हेतुं, अपन्तु बादं परमाहतानाम् ॥१३॥ अन्वयः-अत्र, दमा, पानी, सम्यक . गया . निराम्य, नास्तिकदर्शने, रसं मादेशान्तिकात्यन्तिकमी, परमाहतानां (याताना परं ), . वाद, भयन्तु। (बचलतायतरिका) अत्र -शान्त्रवानाममुगयात्मग्रन्थे । इमाम्-पूर्वन काशिताम् । वार्ताम् - दर्शनसिद्धान्तम् । सम्यक् - अधिकलम्, समीचीगतयेत्ति यावन् । निशम्य-समाकर्ण्य । नास्तिकदर्शने -चार्वाकादिदर्शनेषु । रसम्-अनुरागम् स्पृहामिति यावत् । त्यक्त्वा-सन्त्यज्य । एकान्ति- कात्यन्तिकशर्महेतुम्-'नयमेनात्यन्तकल्याण कारणम्। परमार्हतानाम् - हतो जिनस्यमे पाहताः, परमाय ते पाहताः परमाईतास्तेपान्तथा । चट्ठा आईतानाम्-श्रईसम्बन्धिनाम् । परम्-उत्कृष्टम्, परमश्रेयस्करम् ।
३४ ] शामावानीस गुपयाग [ प्रथमः " - वादम्-निद्वान्तवादम् । श्रयन्तु-श्राश्रयन्तु । संसेवन्तामिति यावत् । ऐकान्तिकात्यन्तिकशर्महेतु-परमाईनवादाश्रयणे पूर्वोक्तवातीश्रवण-ना. स्तिकदर्शनानुरागत्यागयोहतुत्वाकाव्यलिगमलारः । (कल्पलता) अभिप्रायः रेरिह हि गहनो दर्शनतति- निरस्या दुर्धर्षा निजमनसमाधानविधिना | तथाप्यन्तः श्रीमन्नयविजयविज्ञाहिभजने, न भग्ना चेद्भक्तिर्न नियतमसाध्यं किमपि मे ॥१४॥ अन्वयः-हि, इए, सूरेः, अभिप्रायः, गहनः, निजमतसमाधानविधिना, दुर्धर्षा, दर्शनततिः, निरस्या, तथापि, चेत्, श्रीमन्नयविजयविज्ञादिभजने, अन्तः, भक्तिः, न, भग्ना, मे, किंगपि, असाध्यम् , न, नियतम् । (कल्पलतावतारिका) हि-निश्चयेन । इह-शाम्नवातीसमुच्चयात्मकग्रन्थे । सूरेः-सूरि- पदभाजनमनीपिप्रवरस्य,हरिभद्रसूरेरिति यावत्। अभिप्राय:-प्राशयः । "याशयः स्यादभिप्राये पनसाधारयोरवि” इति मेदिनी। गहन:-कठिन: । निजमनसमाधानविधिना - स्वमतसाधकसमाधानप्रकारेण । दुर्धर्षा- दुःखेन धपितुं योग्या। दर्शनतत्तिः-परदर्शनकदम्बकम् । निरस्या- निराकरगीया । तथापि-ताशदर्शनततिनिराकरणपकार्यसत्त्वेऽपि । चेन्-यदि । श्रीमन्नयविजयविज्ञालिभजने-उपाध्यायनीनयविजय जिदगुरुपवर चरगवायाम । अन्त:-अन्तःकरगे । भक्तिः- भजनमः भाष इति यावत । न-जहि । भग्ना-विनया । तहीति शेषः । । । ।
[३५. mAmraneman में- सोधिने : किमपिलिपि । अमाध्यम् -मानाम । न म मुगामिनि नापन । पोन भीमसमविजयशिवभिननिगुना माफिन । समान पन्नुमामिः । - . पध्यासन गुरवोन जीतविन्यमानाः प्रयागया, भाजन्न नया नयादिविजयप्रासार विधानदाः । प्रेगा पम्य र मन पविजयां जानः सुधीः सोदर- मन पापविशारदेन रन्ति ग्रन्थ मन्द्रिीयताम् ॥१५॥ अन्य प्रत्यारा, गुणा, न, मनमा, ममानिया विधाना. गुर), प्राणी, चना, मेगा , t: मोदर: म त मायारदेन, सेम, गणिो, या, नन्ग, मानः मतान् । (कापातायताका यस्य-गीयशाविजयोपाध्यायस्य प्रकृष्टागया: उत्तनामिनायः। जीतविजयमाना:-जीवविजयनामानी मनीषिणः । गुरवः-पितृव्य- गुरवः । "प्राजन्ते" इनि पदत्य मेहलोदीपन्यानोभयत्र सम्पन्चात् । मानन्त-दीयन्तं । च-पुनः । सनया:-नवविवेकशालिनः । नयादि- विजयमानाः-श्रीनगविजया मनापिणः । विद्याप्नदा:-मानदातारी गुरयः । मानन्त- विज्ञते । पहिशेषणं निजगुमभिवाराणस्या- दिस्यले ग्यं नीत्या साथियाऽऽन्याधिपचादिधिमाः पाठिता इति व्यमभि । च-पुनः। यभ्य-महोपाध्यायस्य । प्रेम्णाम्-प्रीतिनाम् । -- ।
३६
भाजन
[TE
--
सम-परमम् । गुणी:-। सोदर:-11111: 1 पानि-
जपा-गाजिनामा । जात:
-तिन माश. १५ गुम
सम्प्रत्ययोगमा । गापतिशारदेन माग
विशारदेनिकाशी
निग, :-"गी
न्याविशारद, RIPA SHRAFT मा गायशानिज.
रोन । रनिते-गिनित | Nut-कल्पलाये।
"
पाना मन्तः।" विशयी पिपरा पूर्व स्तोतरम् ।
निर्णयश्चेति पत्र शास्त्र निरिग स्मृतम् ।” प्रवा--म्बन्धप्रयो.
जनशानातिशुश्रूपाजन्गश्रुतिविपगशनसम्म अन्तः । मतिः-बुद्धिः।
दीयताम्-न्यस्यताम् । सावधानेन विदुपा प्रन्योऽयगालोचनीय इति
भावः ।
ग्रन्थोऽयं विशुद्धगुरुसम्प्रदायप्रयोज्य शुद्धविद्याभाजनन्यायवि-
शारदविवेचित्तो नहि येन केनापि सुप्रवेश, इति व्यायस्यैवार्थस्य-
भङ्ग याऽभिधानात्पर्यायोक्तनामाऽलवारः । पर्यायोक्तम्य च वैशयेन
प्रतीयमानार्थतया धनावेवाऽन्तर्भाव आलोकनीयो ध्वन्यालोकादौ ।
"पर्यायोक्तं तु गम्यस्य वचो भङ्गयन्तराश्रयम्" बहुत्र लक्षणश्रवणात् ।
अनुप्रासश्च शब्दालङ्कारो विज्ञेयः । कविनिष्टसुधीवग्गुरुवरजीतविजय-
नयादिविजय-सोदरपझविजयविषयकरत्याख्यभावस्य पर्यायोक्तान-
तया प्रेयोऽलङ्कारश्चाप्यवसेयः ।
चरमसूक्तदर्य प्रतिस्तवकप्रान्तेऽवतार्यम् ।
आत्मसिद्धिन्तथाऽदृष्टसिद्धिं चार्वाकखण्डनम् ।
मङ्गलं साधयित्वा च, प्रथमः स्तवकोऽभवत् ॥१॥
स्तवकः ] कल्पलतावतारिका [ ३७ इति शासनसम्राट-तपागच्छाधिपति-स्वतन्त्रस्वतन्त्र-जगद्- गुरु-वालवायचारिभट्टारकाचार्य महाराजश्रीविजयनेमिसूरीश्वरमहाराज- 2. पट्टालङ्कारशास्त्रविशारदकविरत्नपीयूपपारिणपूज्यपादाचायश्रीविजया- । मृतमरिवरसन्न्यायां महोदधिशल्पशास्त्रवातीसमुच्चय-कल्पलानु- सारिण्यां-कल्पलतावतारिकायां प्रथमः स्तवकः । ARA ६ अथ द्वितीयः स्तवकः द्वितीयस्तवकादिममगलं निबध्नाति अप्रतीपायेति- (कल्पलता) अप्रतीपाय दीपाय, सतामान्तरचक्षुपे । नमः स्याद्वादितन्त्राय, स्वतन्त्राय विवस्त्र ते ॥१॥ अन्वयः-अप्रत पाय, दीपाय, सताम् , आन्तरचक्षुपे, स्वतन्नाय, विवस्वते, स्याहादितन्त्राय, नमः । (कल्पलतावतारिका) अप्रतीपाय-न प्रतीपं प्रतिकूलं किमपि पवनादिकं यस्य तस्मै, अप्रतिहतायेति यावत् । दपाय-प्रदीपाय हृत्कन्दरावभासनप्रदीपा. त्मने । सताम्-सत्याभिलापलसित्तात्मनाम् । आन्तरचक्षुपे-आभ्य- न्तरनेत्रस्वरूपाय। स्वतन्त्राय-यथेच्छकरणसमर्थाय । विवस्वते-सूर्य- स्वरूपाय विश्वदीपायेति यावत् । स्याद्वादितन्त्राय-अर्हच्छासनाय, जिनागमायेति यावत् । "अहंजिनः पारगतस्त्रिकालवित, क्षीणाष्टकर्मा परमेष्ट्यधीश्वरः । शम्भुः स्वयम्भूभगवाञ्जगत्प्रभुस्तीर्थङ्करस्तीर्थकरो जिने-
[प्रथमः
-
शारदविवेचितो नहि येन केनापि सुप्रवेश, इति व्यङ्ग यस्यैवार्थस्य-
३६ ]
शास्त्रवार्तासमुच्चयस्य
सम-सदनम् । सुधी:-समीचीनवुद्धिः । सोदरः-सगर्भः । पद्मवि-
जयः-पद्मविजयनामा । जात:-समजनि। तेन-तादृशेन विशुद्धगुरु-
सम्प्रदायप्रयोज्य शुद्धविद्याभाजनेनेत्यर्थः । न्यायधिशारदेन-न्याय-
विशारदेतिकाशी विद्वत्प्रदत्तविरुदेन, तथा च तेपामेवोक्तिः
"यस्मै
न्यायविशारदत्वावरुदं, काश्यां प्रदत्तं बुधै” रिति। महोपाध्याययशाविज-
येन । रचिते-विरचिते । अत्र ग्रन्थे-कल्पलताभिधपश्चाङ्गकवाक्ये ।
"पञ्चाङ्गकं वाक्यं ग्रन्थः ।" "विशयो विषयश्चैव पूर्ववक्षस्तथोत्तरम् ।
निर्णयश्चेति पञ्चाङ्ग शास्त्रेऽधिकरणं स्मृतम् ।” अथवा-सम्बन्धप्रयो-
जनज्ञानाहितशुश्रूपाजन्यश्रुतिविपयशब्दसन्दर्भो ग्रन्थः । मतिः-बुद्धिः ।
दीयताम्-न्यस्यताम् । सावधानेन विदुपा ग्रन्थोऽयमालोचनीय इति
ग्रन्थोऽयं विशुद्धगुरुसम्प्रदायप्रयोज्य शुद्धविद्याभाजनन्यायवि-
भावः ।
भङ्गयाऽभिधानात्पर्य्यायोक्तनामाऽलङ्कारः । प-योक्तस्य च वैशयेन
प्रतीयमानार्थतया ध्वनावेवाऽन्तर्भाव आलोकनीयो ध्वन्यालोकादौ ।
"पर्यायोक्तं तु गम्यस्य वचो भयन्तराश्रयम्" बहुत्र लक्षणश्रवणात् ।
अनुप्रासश्च शब्दालङ्कारो विज्ञेयः । कविनिष्टसुधीवरगुरुवरजीतविजय-
नयादिविजय-सोदरपद्मविजयविपयकरत्याख्यभावस्य पर्यायोक्ताङ्ग-
तया प्रेयोऽलङ्कारश्चाप्यवसेयः ।
चरमसूक्तदयं प्रतिस्तवकप्रान्तेऽवतार्यम् ।
आत्मसिद्धिन्तथाऽदृष्टसिद्धिं चार्वाकखण्डनम् ।
मङ्गलं साधयित्वा च, प्रथमः स्तवकोऽभवत् ॥१॥
स्तवर ] বাকি [३७ ति शासनामाट-तर अधिति-पतन्त्रम्वतन्त्र-जगद्- । गुरु-बालभारियनाराजश्रीविजयनेमिनरीश्वरमहाराज- 7. प्वालारशाररविशारदकविरदाय युपचारिणापूज्यपादाचायश्रीविजया- 7. मृनशविरमानन्यायां गोदविकल्पशास्त्रातीमुअय-मान्यतानु- सांवलाललायतरियाया प्रम: स्तरकः । ॥ अथ द्वितीयः स्तवकः हितीयनयकाधिनमाल निम्नानि अप्रतीपायेति- (पल्पलता) अप्रतीपाय दीपाय, सतामान्तरचक्षुपे । नमः स्याहादितन्वाय, स्वतन्त्राय विवस्वते ॥१॥ अन्यय:-अमर पाय, दीपाय, मनाग, बान्तरनभुपे, स्यान्वाय, বিপণন, বহুবিধা, না। (करबलतावतारिका) अप्रतीपाय-न प्रतीप प्रतिकूलं किमपि पवनादिकं यस्य तस्मै, अप्रतिहनायेनि गावात दिपाय-प्रदीपाय हत्कन्दरायभासनपदीपा- त्मने । सताम्-लत्याभिशापल सितात्मनाम् । आन्तरचक्षुपे- लरनेत्रस्वरूपाय । स्वतन्त्राय-यथेच्छारणममर्याय । विवस्वते-सूर्यः ग्वरूपाय विश्वदीवायेति यावत् । स्याद्वादितन्त्राय-अईच्छासनाय, जिनाममायेति याचन । "अईजिनः पारगतनिकालयित, क्षीणाटकर्मा परमेप्टाचीधरः । शुम्भुः स्वयम्भूभगवालगत्प्रभुस्तीर्थरस्तीर्थकरो जिने- - . TE ||2||सातारा 1211 : 1. 11tft: 1 नमः- नमगारोम-fiii. : .. :: : 'T: । (शागवाना.) कालादीनां न कनवं, मन्नान्ग प्रवादिनः । केवलानां तदन्ये तु, मियः गागाध्यक्षया॥५२॥ अन्यय:-गे, नि:, Ti, inाना, कहा, मन्यन्ते, तदन्ये, , fre:, गामा ( मगर)। (अव) अन्ये च - एकान्तवादनः । प्रवादिनः काला- दीनां केवलानां-परवतृनहेतुरक्षिनानागन्यनिषनागामिति यावन । कर्तृत्वम्-असाधारणत्वेन हेतुन् । मन्यन्ते तदन्ये तु-अनेकान्त- वादिनः परमाईता इनि यावत् । सामग्रपेक्षया-सामग्रीप्रविष्टत्वेन । मथः-परस्परम, सहकारितनगा यतृत्वं मन्यन्त, इत्यर्थः । तथा च सम्मनिसूत्रम्-'कालो सहाव-गिायई पुव्यकयं पुरिस- कारणेगन्ता । मिच्छत्तं ते चंब 3, समासो हुँति सम्मत्तं । ( कालः स्वभावनियती पूर्वकृतं पुरुपकारणमेकान्तान । मिथ्यात्वं त एव तु समासतो भवन्ति सम्यक्त्वम ) इति । तत्र केवलकालकर्तृत्ववादिनामभिप्रायः, तथाहि-कालव्यति- रेकेण म्नीपुंससंयोगादिजन्यत्वेन पराभिमनन्यापि गर्भस्य जन्म न विनि । नहि नजन्मनि गर्भपरिणतई नुत्यम अपरिणतस्यापि कदा. चजन्मदर्शनान । तथा कालोऽपि शीनोगावर्षानुपाधिः, तद्व्यतिरे- स्तबक ] कल्पलतावतारिका [ ३६ केण न भवति । तथा शुभादिकम् --स्वर्गादिकम् लोके यत्किञ्चित घटादिकाच उश्यते, तदपि कालव्यतिरेकेण न भवति । कर्मदएडा- दिसत्त्वेऽपि कालान्तर एवं स्वर्गघटानुत्पत्तेः । तस्मात् असौ काल: स्वातन्त्र्येण संतति । किन-काल उत्पन्नानां प्रकृतपरायोपचयं करोति। तथा काल: प्रकृतपर्यायान्तरपर्यायभाजः करोति । तथा काल:-अजनितकारणेपु पराभिमतकारणेपु सत्सु विवक्षितकार्यमुपदधानि, प्रतश्च हेतोः कालः सृष्ठिस्थितिप्रलयहेतुतयाऽनपलपनीयकारणताकः । एवं स्थाल्यादिम निधाने सत्यपि कालाइते शुद्धानां विलक्षण- रूपरसादिपविकितिपरिणामोऽपि न दृश्यतेऽतोऽपि कालस्य कर्तृ- त्वमुपपद्यते । किंबहुना-कालाभावे गर्भादि सर्व कार्यजालमन्य- वस्थयाऽनियमेनैव स्यान । पराभिमतमातापित्रादिहेतुसन्निधानमात्रा- देवाऽविलम्वन गर्भाशुत्पत्तिप्रमात । ननु कालोऽपि यक एव सर्वकार्यहेतुस्तदा युगपदेव सर्व- कार्योत्पत्तिः। तत्तवार्य तत्तदुपाधिविशिष्टफालस्य हेतुत्वे चोपाधीना- मेवाऽऽवश्यकत्वात् । कार्यविशेपहेतुत्वमिति गत कालवादेनेति चेत् । अत्र नव्या:-क्षणरूप: कालोऽतिरिच्यत एव, स्वजन्यविभागप्राग- भावविशिष्टकर्मणस्तथावे जातं विभागे तदभावापत्तेः। तदाऽन्यवि- शिष्टकर्मणस्तथात्वेऽननुगमात् । तस्य च तत्क्षणवृत्तिकार्ये तत्पूर्वक्ष- रगत्वेन हेतुत्वम् तत्क्षणवृत्तित्वञ्च तत्क्षणस्याप्यभेदेऽपि "इदानी क्षण:" इति व्यवहारात कालिकाऽऽधाराधेयभावसिद्धेः । अतस्तत्तत्क्षणतन्ना- शानां तत्तत्पूर्वक्षणजन्यवाद् न क्षणिकत्वानुपपत्तिः । एवञ्च क्षणि- केनैव क्षणेन कार्यविशेषजननात् नातिरिक्तहेतुसिद्धिरिति । ।
[ द्वितीयः - किञ्च सर्वे भावाः स्वभावेन विशिष्टसंस्थानादिप्रतिनियतरूपेण भवति । न ह्यश्वमापे विलक्षणाग्निसंयोगादिक नास्तीति वक्त शक्यते तत्स्वभावरहितादपि चेदाधिकृतकार्योत्पादः स्वीक्रियेत तदाऽनि- ४० ] शासवार्तासमुशयस्य केवलस्वभावकारणतावादिनामभिप्रायः- ( शास्त्रवार्ता) न स्वभावातिरेकेण, गर्भवालशुभादिकम् । यत्किञ्चिजायते लोके, तदसौ कारणं किल॥५७॥ अन्वयः-लोके, गर्भवालशुभादिकं, यत्किञ्चित् , स्वभावातिरेकेण, न जायते, तत्, असो, कारणं, किल । (अव०) यस्मात् स्वभावमतिक्रम्य, गर्भवालशुभादिकं-किश्चिदपि कायं । लोके न जायते-तस्मादसौ स्वभावः । कारणम् -कादाचित्कत्व- नियामक इत्यर्थः । आकाशादीनां कादाचित्कत्ववद् घटादीनां कादा चित्कत्वस्येतरानियम्यत्वात् । स्वीयस्वीयसत्तायां वर्तन्ते, नाशकाले निवर्तन्ते च, अनियतभावनि- रपेक्षा भवन्ति । जगति स्वभावेन विना प्रतिनियतकालव्यापारादिसामग्रीसमव- धानेऽपि मुद्गपक्तरपि नेप्यते, यतोऽश्वमापन्य कदुकस्य पक्तिन एकयैव क्रियया तत्तदन्यव हिसंयोगात्, नचादृष्टवैपस्यात् तदपाकः, दृष्टसाद्गुण्ये तद्वैपम्याऽयोगात् । अन्यथा दृष्टदण्डनुन्नमपि चक्र न भ्राम्येत् । पृप्रसंगोऽनिवारितः स्यात् । अतत्स्वभावस्य तुल्यतया मृदा फुम्भ एव जन्यने न पटादीति नियमो न स्यात् ।
स्तकका ] শাপাকি [४६ ननु मानवमा जनामयोगाच्यते नेगमापतिमाम देता किन्तु मामीनेष कार्वजनिक प्रगप्रधमापस्य प पति मनि स्वापयोगीय नेमि को दोष इति न पत्र स्वभाववादिनः-- अन्तरमा समाय एय फातुन यायकारणम् । म मृत्यमायाविशेषाद घटादिकामविशेष "दस्य माय: कार्य- অনশন: মায়ানমার বাবা। नगदेवगारजननयमाचं बीज प्रागेयाङ्कर जनचेत । सहकारिलाभा- लामाभ्यां तोः काम्यंजननाशनने त्यसयते इति चेत्र न, महापारि गमानन्नभयेन विलक्षणवीजयनयाकरहेनु पौचित्यान । न च साहकारियमस्याऽतिशयाशय व्ययाऽपि फल्पनीय- मिनि तत्व कार्यतनत्यपालनमेयो चिममिति याच्यम् । पूर्वपूर्वो- पादानारामानामयोत्तरोत्तरोपादेवपरिणामहेतुल्यान । नात एक कालवादाप्रयेशात । न घरमाएपरिणामरूपयीजम्यापि द्विती. यादिगणपरिणामरूपानुराजनात्यान व्यक्तिविशेपमवलम्ध्येय हेतु. हेतुमालावो वाच्योऽन्यथा व्यावृत्तिविशेषानुगनप्रथमादिचरमपरयन्ता- रजणान प्रनिश्यावृत्तिविशेषानुगतानां परमवीजक्षणादियोपान्त्या. सुरहणानां हेतुत्वे कार्यकारणतावच्छेदककोटायेकक्षणप्रवेशाप्रये- शाभ्यां विनिगमनाविरप्रमशान । तया ए सजातीयान काग्यांग सनातीयकारणानुमानभनयम इति वाच्यम् । साहस्यतिरोहित- बैंमाश्यनारादिना ताशयोजादीनामनुमानसम्मयात् । प्रयोज्य. प्रयोजकमावस्येव विपश्यधिकनकस्य जागरूकत्वात् । अधिकमध्या- मतपरीज्ञायाम्। ततः स्वभाव हेतुकमेव जगदिति स्थितम् । तथा घोक्तम्- ४४ ] शास्त्रवातासमुच्चयस्य [द्वितीयः . .. भोगप्रसङ्गात् । अतो जगहेतुत्वं कर्मण्येव नान्यत्र । पराभिातहेतूनां व्यभिचारादिनि भावः । किञ्च तत्कर्मवैधुर्ये मुद्गपक्तिरपि न स्यान । अतएव दृष्टकारणानाम हटव्यञ्जर त्वम्' इति सिद्धान्तः । तदुक्तम्- यथा यथा पूर्वकृतस्य कर्मणः फलं निधानस्थमिवाऽवतिष्ठते । तथा तथा तत्प्रतिपादनोद्यता, प्रदीपहस्तेव मतिः प्रवर्तते ।। न च विपाककालापेक्षणात कालबादप्रवेशस्तस्य कर्मावस्थाविशेष- रूपत्वात्। नच कर्महेत्वपेक्षया वैयग्रथम् अनादित्वात् कर्मपरम्परायाः। एवञ्च केवलानां कालादीनां जगद्धेतुत्वं न तु समुदितानामिति तेषा तात्पर्यम् । ॥ इति कर्मवादः ॥ अथ सिद्धान्तवादः- (शास्त्रवार्ता) तत्तत्कालादिसापेक्षो, विश्वहेतुः स चेन्ननु । मुक्तः स्वभाववादः स्यात्, कोलवादपरिग्रहात्॥७६ अन्वयः- तत्तकालादिसापेक्षः, स:, विश्वहेतुः, चेत्, ननु. मुक्त., स्व. भाववादः, स्यात् , कालवादारिग्रहात् । (अव०) तत्तत्कालादिसापेक्षः-तत्तत्क्षणादिसहकृतः । सः-स्वभावः । विश्वहेतुः -कालक्रमेण कार्यक्रगोपपत्तेरि ति चेत् ननु-इत्याक्षेपे । स्वभाववादो मुक्तः- म्यान । कालवादपरिग्रहात्-काल हेतुत्याश्य- एन । ननु क्षगाकन्दम वेगाय दोष पनवेति चेा उत्तम्, पर न युनमा एक जातीयतु विना माकजान्याऽमवार । जानियामायेन घटे प्रति घटयुबटप येन हेतु यम्य वनुमशययत्वात । पुर्वपत्यस्य स्तवकः ] फल्पलतावतारिका [ ४५ सामग्रीलेन कार्यव्याप्यत्वस्य वास्तविकत्वेन गौरवस्याऽदोषत्वात्, प्रत्यभिज्ञादिवाधेन क्षणिकवाय निपेत्स्यमानत्वाच । किन कत्र घट. फुर्वपसत्त्वेऽन्यत्र घट नुत्पत्तेदेशनियामपत्याश्रयणे स्वभाववाद- त्याग: । दाहादी घटादिहेतुत्वं प्रमायैव प्रेक्षावत्प्रवृत्तेश्च । अन्यथा दण्डादिकं विनापि घटादिसम्भावनया निष्कम्पप्रवृत्त्यनुपपत्तेरिति दिक् । न च निर्हेतुकाभावा इत्यभ्युपगमेनापि स्वभावधादसाम्राज्यम् । तत्र हेतूपन्यासे बदतो व्गयातात । तदुक्तम्- न हेतुरस्तीति वदन् सहेनक, ननु प्रतिज्ञा स्वयमेव वाघते । अथापि हेतुप्रलयादसी भवेत, प्रतिज्ञया केवलयाऽस्य किं भवेत् ।। न च ज्ञापकहेतू गन्यासेऽपि कारकहेतुप्रतिक्षेपवादिनो न स्वपक्ष- बाधेति वाच्यम्,ज्ञानजनरुत्वेनैव ज्ञापकत्वात्. अनियतावधित्वे कादा. चित्कत्वव्याघातात्, नियतावधिसिद्धी तत्त्वस्यैव हेतुत्वात्मकत्वाच । अन्यथा “गर्दभात् धूमः' इत्यपि प्रमीयेत । श्रत एव केवलकालवादोऽपि न साधीयान् । अन्यानपेक्षात् केवलान कालान कस्यचिदपि काम्यानुत्पत्तेः । यदि केवलात् कालात् काय॑म्योत्पत्तिः स्यात्तदा तेन कारणेन भवितव्यम् । सैव नास्तीति फुतस्तस्य जगद्धेतुत्वम् । विवक्षितसमये कार्यान्तरस्याप्युत्पत्तिप- सङ्गात् । न च तत्क्षणवृत्तिकार्य तत्पूर्वक्षणहेतु-चे कथनान्न दोप इति पूर्वमुक्तमेवेति वाच्यम् । अग्रे भाविनस्तत्तणवृत्तित्वम्यैव फलन आपा- द्यत्वात । तत्क्षणवृत्तिकार्ये तत्पूर्वक्षणेन हेतुत्वम् । तदुत्तरक्षणविशिष्टे कार्य तत्क्षणत्वेन वा ? इति विनिगमनाविरहाच । किश्च यस्माद्धेतोः समयादावविशिष्ट पि तत्कालजन्यं घटादि सर्वत्रैव नोत्पद्यते तन्त्वादी तदनुपपत्तेरतस्तत्फलं विचक्षणः कालाति- १६] lin11:il:13:: {T [हितीगः A रितदेशाविशनुजन्य गिग । नन मोगा पायानगपनिरेय, काले हेतुमतोऽपि शेमार्गानापरिनियम । गाजन्गत्वेन मृदयत्तित्वयाऽऽपागल्यान, माना जन्मनागमन गृहिन्न- त्वम् । अतो न तळगूलव्याप्त्यमितिः । न न तस्वभावादेव तम्य फाचित्कत्वम् फलाननम्बगावत्वम्यवाऽऽपागवान । तथा चोक्त सृरिपाद:- अतः कालादयः सर्व समुदायेन कारणम् । गर्भादेः कार्यजातस्य विज्ञेया न्यायवादिभिः ॥७९।। न चैनैकत एवेह कचित्किचिदपीक्ष्यते । तस्मात् सर्वस्य कायस्य सामग्री जनिका मता ॥८॥ इह जगति नियन्यादरेककनः कापि किम्चिद् घटादिकार्य जाय. मानं न प्रतीयते । तस्माद्धेतोः सर्वस्य घटादेः कार्यस्य सामग्री कार्यो पधायिका मता। सामय्या कारणकृटेनैव कार्यजातस्य जनननियमात । एवं ये केवलं पुरुपार्थस्य कार्यमानहेतुत्वं वदन्ति तेऽपि भ्रान्ता एव। सत्यपि पुरुषार्थे वहुशः कार्यानुत्पादस्य दर्शनादिति सर्वं सुस्थम् । सामग्रया एवं हेतुत्वं, कालादेर्न पृथक पृथक् । इतीदं साधयित्वाऽयं, द्वितीयः स्तवको गतः ॥२॥ इति शासनसम्राट-तपागच्छाधिपति-सर्वतन्त्रस्वतन्त्र-जगद्- गुरु-बालब्रह्माचारिभट्टारकाचार्य महाराजश्रीविजयनेमिसूरीश्वरमहाराज- है, पट्टालङ्कारशास्त्रविशारदकविरत्नापीयूपपारिणपूज्यपादाचार्यश्रीविजया- मृतसरिवरसन्दृव्यायां महोदधिशल्पशास्त्रात्रातीसमुच्चय-कल्पलानु- सारियां-कल्पलतानतारिकायां द्वितीयः स्तवनः । THDAI - " सात] PATRA १ अथ नृतीयः स्तवर: པནྟིཏྟཾ ཨཱནནཨན – : ༌་༣ རྩཡ (मरममा पर्वः शामिता-मातालमेोऽपि यत्.--- मालामालले ने दि नामा.लीयेन पम्भिन मनाक! ययनर्यापारलं च नगद पाइपिनिगन- तिं निवग्रहानाहानन्दाय वादामहे ||१|| RET:- मन, मरिमान- Tirsa, म. म. am: (.yi (A), 5, सोत, न.प.in form ori , iPTETTES. . --- - कामनाया। पन्सावासारत-पायामागम । " पनेर नाद" अनि फोग: शमयताम् -शानिमालानाम योगीश्यामिनि वाया। आरालम्-ममभिध्यायः। नामयिष्यहनंगानमाल. मग्बन्धिपानपुनरनि नायगा । एकोऽपि-कायसंगा- विशिमोनीयः । शारापरिश्रमः-नाविपरयामायः । सर्व:- समानशास्त्रविषयक प्रत्ययः : यस्मिन-चारशे वैये । मनाक-घन । (पषि मन्मारमा प्रति सम्मायना प्रश्न-शक्षा गर्दा समुच्यते" नि मेदिनी । दि--का। मृत-मापिन। (मति) तमाशानन्धमा । लीयेत-विनश्यत् । च-पुनः । यस्य- .. -- ४८ ] शाखवार्तासमुच्चयस्य [ तृतीयः यादृशग्य-भगवतः सर्वज्ञस्य । एश्वर्यम्-माहात्म्यम् । जगदुत्पाद- स्थितिध्वंसनैः - संसारोत्पत्त्यवस्थितिविनाशन. । अपङ्किलम् - पट्किल कलवितं न । निर्दुमित्यर्थः । निरवग्रहग्रहमहाऽऽनन्दाय-निरवग्रहो निरर्गलोऽप्रतिहत इति यावद् ग्रहो ज्ञानम् निरवग्रहग्रहः, तेन यो महाऽऽनन्द आनन्दातिशयो ब्रह्ममाक्षात्कारम्वरूपानन्द इति यावनि- रवग्रहग्रहमहानन्दस्तस्मै तथा । तम् - तादृशम् । देवम् –देवाधिदेवं प्रभुं जिनेश्वर मिति यावत् । वन्दामहे-वन्दनक्रियानिरूपितकर्मता. भाजन कुर्म इत्यर्थः । प्रणमाम इति यावत् । जिनेश्वर विपयकर- त्याख्यो भावः कविनिष्ठोऽभिव्यज्यते इति भावध्वनिः, अनुप्रासश्चा. लङ्कारः । द्वितीयस्तवके स्वतन्त्रस्य प्रत्येक कालादेर्जगत्कृर्तृत्वं निरस्य सामग्रथास्तत् समर्थितम् । अथेदानी सामग्रयामीश्वरोऽपि नित्यशुद्धबुद्धमुक्ताचिन्त्यचि- च्छक्तियुतोऽनादिसिद्धश्च निक्षिप्यते कैश्चित् तं निक्षेपमसहमानाः सूरिचकचक्रवर्तिहरिभद्रसूरिपादास्तदीयपक्षव्युत्पादनपूर्वकं तं निरा- करिष्णवः कारिकामवतारयन्ति ईश्वरःप्रेरकत्वेने यादिना- (शास्वार्ता) ईश्वरः प्रेरकत्वेन, कर्ता कैश्चिदिहेष्यते । अचिन्त्यचिच्छक्तियुक्तोऽनादिसिद्धश्च सूरिभिः॥१॥ अन्वयः-१, कैश्चित् , सूरिभिः, अचिन्त्यचिन्छक्तियुक्तः, अनादि- सिद्धच, प्रेरकत्वेन, ईश्वरः, कर्ता, इष्यते । (अव०) इह-सामप्र याम् । कश्चित्-सरिभिः-पातञ्जनायायैः ।
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५० ] शाखवार्तासमुच्चयस्य [ तृ - -- । फा-मननं तन्ववस्था, अभिव्यक्तस्यापि जनितकार्य्यस्य केना बलवता सजातीयेन विजातीयेन वा लब्धवृत्तिकेनाऽभिभवाद् भ प्यवृत्तिकत्वेनावस्थान विच्छिन्नावस्था । अभिव्यक्तस्य प्राप्तस कारिसम्पत्तेर प्रतिवन्धेन लब्धवृत्तिकतया स्वकार्यकरत्वमुदारावस्थ तत्राद्यमवस्थाद्वयं प्रतिप्रसवाख्येन नि:जसमाधिना हीयते । अर तु शुद्धसत्त्वमयेन भगवद्ध्यानेनेति । अविद्याभावात् तन्नाशजा कथं तत्त्वज्ञानं तस्य १ इति चेत्-अत एव नित्यं तत् नित्यज्ञानवर देव चायं कपिलप्रभृतिमीणामपि गुरुः । यस्य जगत्पतेनिमप्रतिघम्-नित्यत्वेन सर्व विषयत्वात् करि दप्यप्रतिहतम् । वैराग्यं माध्यस्थ्यं च रागाभावादप्रतिघम् , ऐश्वर च वाधाभावादप्रतिघम् । तच्चाष्टविधम्-अणिमा, लघिमा, महिम प्राप्ति:, प्राकाम्यम् , वशित्वम् , ईशित्वम् , कामावसायित्वश्चेति । यतो महानगुर्भवति सर्वभूतानामप्यदृश्यः सोऽणिमा । यते लघुर्भवति सूर्यरश्मीनप्यालम्ब्य सूर्यलोकादिगमनसमर्थः स लघिमा। यतोऽल्पोऽपि नागनगादिमानो भवति स महिमा । यतो भूमिस्थरया प्यमुल्यग्रे गगनस्थादिवस्तुप्राप्तिः सा प्राप्तिः । प्राकाम्यमिच्छानभिघातः यत उदक इव भूमावुन्मजति निमजति च वशित्वम् । यतो भूत भौतिक पु स्वातन्त्र्यम् ईशित्वम् । यतस्तेपु प्रभवस्थितिव्ययानामीप्टे, यत्र कामावसायित्वं, यतः सत्यसङ्कल्पता भवति, यथेश्वरसङ्कल्पमेव भूतभावादिति । धर्मश्च प्रयत्नसंस्काररूपोऽधर्माभावादप्रतिषः । एतश्चतुष्टय. मन्यानपेक्षतयाऽनादित्वेन व्यवसितम् । अत एव नेश्वरस्य कूटस्थताव्याघातः, जन्यधर्मानाश्रयत्वादिति वोध्यम् । - स्तयः] फलानाशारिका [५१ प्रय सेमारी जीयो दिशादिसप्रतिनिवृत्त्युपायानभिात्यात प्रात्मनः सुबदुःखचारकर्ता, अनः स्वर्ग नरक या परमेश्वरप्रेरितो गरडेन । अमानां तो पररणाचा हेतुत्वावधारणात् पश्वा विप्रवृत्ती ज्या दर्शनान । अचेतनरचापि चेतनाधिष्टानेनैव व्यापाराश। अतएव भगवद्गीतायाम - "गयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः, सूयते सचराचरम् । तपाम्यहमहं वर्षे, निगृह गायल्स जागि च ॥" इत्यनेन सर्वाधिष्टानत्यं भगवतः भयते । तथा च प्रेरकत्येन फर्ता परमेश्वरोऽभ्युपगन्तव्य एवेति पानाजलाः । बनाईता:- ( शान्तवार्ता) अन्ये त्वभिदधत्यत्र, वीतरागस्य भावतः। इत्यं प्रयोजनाभावात्, कर्तृत्व युज्यते कथम् ॥४॥ अन्यय:-~-यन्ये, B, अत्र, त्या , अभिदधति, पोतरागस्य, प्रयो. जनाभावात् , मावनः, कर्तृत्व, कथं, युज्यते । (सव०) अन्ये तु-जैनाः । यत्र-ईश्वर विचारे । इत्यं-परीक्षन्ते। वीतरागस्य-वैराग्यवत ईश्वरस्य पातञ्जलैरभ्युपगतस्य, प्रेरकत्ये प्रयोजनाभावात् भावतः-इच्छातः । कर्तुत्वं कथं युज्यते । यो हि परप्रेरको छः स स्वप्रयोजनमिच्छनिष्टः । ततोऽग्र व्यापिकायाः फलेच्छाया प्रभावाद व्याप्यस्य परप्रेरकत्वस्याभावः सिद्धयति । व्यापकामावस्य व्याप्याभावसाधकत्यनियमात् । निखि. लेऽपि हि वलयभावाधिकरणे जलहदादौ धूमाभावस्य हटत्वात् । यत्र यत्र परप्रेरकत्वं तत्र तत्र फलेच्छति नियमात । श्रनयो. ाप्यव्यापकभावाभ्युपगमात् । -
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स्तरक: ] फत्पशतायवारिफा [ ५३ सत्यापि व्यभिचारिणः ( व्यभिचारनिरूपफाधिकरणस्य ) अयोगोलकाः पातायां निवेशेऽनै कान्तिफदोपोच्छेदापतिप्रसज्ञात् । एवमप्यादिसर्ग तस्यैव (परमेश्वरस्यैव ) स्वातन्त्र्यमस्त्यिति चेन फतफत्यस्य वीतरागस्य तस्य प्रयोजनामायादादिसर्गनिर्माणेऽप्य. प्रवृत्तेः । अधेशः परमेश्वरस्य स्वभाव एव यत्प्रयोजनामावेऽप्यादिसर्ग स्वातन्त्र्येणेव फरोनि । अन्यदा त्यापेक्षयवति चेन्न धर्मिणः परमेश्वरस्यासिनो स्वभावकल्पनाधाराप्रसिद्धः प्रागुतस्य स्वभावत्यैवा. प्रमाणत्वात् । अथैवमपि विश्व हेतुनया धर्मि-(परमेश्वर ) प्राइफमानेन पूर्वोक्तम्वभाव एव भगवान् स्वीकरणीय इति चेत्, अत्रोच्यते- ईश्वरमनपेक्ष्य कर्मादेगजननस्वभाव ये विभोः फिनिम्न बाध्यते । विभोस्तु स्वातन्त्र्येण, अन्यहेतुसापेक्षतया वा जगजननस्य- भावत्वे वीतरागत्वव्याघातात् । कारणतया प्रकृतित्वप्रसमाश कृतकृत्य. त्वबाधनम् । न च फारशन्वेऽपि परिणामित्वाभावात न प्रकृतित्वम् । प्रयोजनाभायेन जन्येच्छाया अमावेऽसि नित्येच्छासत्वात् न वीत. गगत्वव्याघातः । जन्येच्छाया एव रामपदार्थत्वात् । सर्गादी रजःप्र. मृत्युदेकोऽपि तत्र तत्कायंका रवयेव गोयते इति न फूटस्थताहानि- रिति वाच्यम् । अत्रोपाध्यायाः- (कल्पलता) जन्पता गिरिराज्ञाधने गिरं, न्यायदर्शननिवेशपेशलाम् । साय ! सम्प्रति निजं कुलं त्वया, हन्त ! हन्त ! सकलं कलङ्गितम् ॥२॥ - ५४ ] शाम्नवार्तासमुच्चयस्य [ तृतीयः - . । अन्वयः- साहय ! गिरिशसाधने, न्यायदर्शननिवेशपेशलां, गिरं, जल्पता, स्वया, हन्त, हन्त, सम्प्रति, निजं, सकलं, कुलं, कलक्षितम् । (कल्पलतावतारिका) साढ्य !-कपिलानुयायिन् साल्याचार्य ! गिरिशसाधने- गिरी पर्वते शेते इति गिरिश: शहरः, उपलक्षणतया परमेश्वरः, तत्साधनविधौ । न्यायदर्शननिवेशपेशलाम्-न्यायदर्शनसम्बन्धिशैली. विशेपनिवेशेन सुकोमलाम् । गिरम्-वाणीम् । जल्पता-निगदता । त्वया-भवता साडयेनेति यावत् । हन्त ! हन्त !- अत्यन्तखेदसूच- नार्थमव्ययम् । सम्प्रति-नैयायिकरीत्यनुसरणकालेऽधुनेत्यर्थः । सकलम्-समस्तम् । निजम्-आत्मीयम् । कुलम्-वंशः । कलङ्कितम्- कलङ्कयुक्तं विहितम् । नैयायिकमतप्रवेशात्। येन ते शाश्व तिको विरो- धस्तन्मतप्रवेशे तवैव पराजय इति ध्वन्यते । यस्मादेवं कार्यजनकज्ञानादिसिद्धौ तदाश्रयतया वुद्धिरेव नित्या सिद्धयेत् , नत्वीश्वरः बुद्धित्वस्यैव ज्ञानाद्याश्रयतावच्छेदकत्वात । आत्मत्वमेव ज्ञानाद्यश्रयतावच्छेदकं कुतो नेति चेत् ,-जन्यज्ञानादी. नामप्यात्माश्रिततया प्रकृत्यादिप्रक्रियाविलोपापत्तेरिति संक्षेपः । इति पातखलमतखण्डनप्रकारः। अथेश्वरसिद्धौ नैयायिकानां पूर्वपक्षः नैयायिकास्तु-कार्यायोजनवृत्यादेः, पदात् प्रत्ययतः श्रुतेः । वाक्यात संख्याविशेपाच, साध्यो विश्वविदव्ययः ।। इति कुसुमाञ्जलिपञ्चमस्तवकप्रथमकारिकोक्तप्रकारेण परमेश्वर साधयन्ति ।
स्तवका ] फल्पलतायतारिका [ ५५ अत्यार्थ:-कार्यादीश्वरसिद्धिः-फारिफायां फाळपर भावप्रधान- निर्देशपरम् । तथा प कार्यात्मात्यहेतुफानुमानादीश्वरसिद्धिः। "काय सफईफम फायत्वाद् घटयन" इत्यनुमानादीश्वरसिद्धिः । न च फाय॑त्वम्य फुतिसाध्यत्यलक्षणस्य तित्यादावसितिरिति वाच्यम् । फालत्यत्यन्ताभाषप्रतियोगित्वे मनि प्रागमायप्रतियोगि. खे सति ध्वंसप्रतियोगित्वे सति या मत्वस्य हेतुत्वान । पक्षतावच्छेदकावच्छेदेन माध्यसिद्धन्देश्यत्वाश न फार्म्यत्य घटादेः सफरी फत्त्वसिद्ध योऽशत: मिसमाधनम् । न वा पक्षतावच्छेद- फस्य हेतुत्वं दोषः । “कायंत्य साध्यममानाधिकरणम्" इत्येवं सह- चारपहेऽपि "फाय सकर्तृकम्" इति बुझेरभावाच । श्रय तथापि सकतकत्वं यदि कसाहित्यमानम् तमाऽस्मदा- दिना सिद्धसाधनम् । यदिच फजन्यत्वम् तदा पाधोऽपि ज्ञानादेरेव जनकतया कर्तुजनकत्वाभावात् इति चेन,~-न, प्रत्यक्षजन्यत्वेच्छा. जन्यत्वादिना साध्यतायां पूर्वोक्तसिद्धसाधनयाधादिदोषभावात् । अह- टाद्वाराजन्यत्वस्य विशेष्यतासम्पन्धावच्छिन्नकारएताप्रतियोगिफसम. वायावच्छिन्नजन्यत्वस्य वा साध्यत्वाश नारजनकारगदादिज्ञान- जन्यत्येन सिद्धसाधनम् । अथात्र शरीरजन्यत्वमुपाधिः अरादी साध्यव्यापकतासन्देहे सन्दिग्धोपाधितासाम्राज्यात , तदाहितव्यभिचारसंशयेनानुमानप्रति- रोधान । लाघवाद् व्यभिचारज्ञानत्वेनैव व्याप्तिधीविरोधित्वात् । पक्षतत्समयोरपि व्यभिचारसंशयस्य दोपत्यादिति चेत्-न, प्रकृते ज्ञान- त्वादिकाय॑त्वाभ्यां हेतुहेतुमद्धावनिश्चयात । लाघवतर्कावतारे तदुपा- घिसंशयस्याविरोधित्वात् । अनुकूलतानवतार एव सन्दिग्धोपाधे- - ५६ ] शामगाोग गुगगाग [ तृतीयः । -- यभिचार संशयाचार कल्यान । पन्यथा पोतलोपाधिशकया प्रसि. सानुमानत्यानुच्छेदप्रसझान इति प्रधानाचार्याः । भन्ये तु द्रव्यागिण झानेच्छातिमन्नि, कार्यत्वात कपालवत । साध्यता विशेष्यतासम्बन्धेन, हेतुना न समवायेन । पक्षनावच्छेदका. वच्छेदेन साध्यसिद्धरुदेश्यत्वाद नांशतः सिद्धसाधनम् । न च ज्ञाने- च्छाकृत्यात्मसाध्यव्यापकत्वात । कार्यत्वात्मकसाधनाव्यापकतया "पर्वतो धूमवान् बढेरित्यत्र" "पाईन्धनसंयोग झ्यानापि" यहिरिन्द्रि- यायावत्वमुपाधिः । तस्माघ स्वभावववृत्तित्वेन हेतौ साध्याभाववद- वृत्तित्वात्मकव्यभिचारनिश्चयात्कुतोऽनुमितिरिति वाच्यम्,- अनुकूल तःण हेतोर्व्याप्यतानिर्णये तदनवकाशात् । न च ज्ञानादित्रितयस्य मिलितस्य साध्यत्वेऽप्रयोजकत्वम् । मिलितत्वेनाहेतुत्वान, प्रत्येकं साध्यत्वे ज्ञानेच्छावत्त्वेन साधने सर्गा- न्तरीयज्ञानादिना सिद्धसाधनमिति वाच्यम्। मिलितत्वेन साध्यत्वेऽपि कार्यकारणभावत्रयस्य प्रयोजकत्वात् । "सर्गाद्यकालीनं द्रव्यं ज्ञान- वत् कार्य्यत्वात् , पक्षतावच्छेदकावच्छेदेन साध्यसिद्धेः" इत्यप्याहुः । केचित्तु-"क्षित्यादिकं सकृर्तृकं कार्य्यत्वात्" इत्येवानुमानम् । प्रकृतविचारानुकूलविवादविपयत्वेन च क्षित्यादीनामनुगमः । सक. र्तृकत्वं च प्रतिनियतकर्तृनिरूपितः सम्बन्धो व्यवहारसाक्षिकः घटादि- दृष्टान्तहष्टः, नित्यवर्गव्यावृत्त इति नानुपपत्तिरिति वदन्ति । आयोजनादपीश्वरसिद्धिस्तथाहि-पायुज्यन्ते संयुज्यन्तेऽन्योन्य द्रव्याण्यनेनेति व्युत्पत्तेरायोजनपदं कर्मपरम् । भावप्रधाननिर्देशाच कर्मत्वपरमवगन्तव्यम् । एवञ्च सर्गद्यकालीनद्वयणुककर्म प्रयत्न- जन्यम् , फर्मत्यात् अस्मदादिशरीरकर्मवत् । तादृशकर्मजनकप्रयत्न. .
स्तपः कल्पलताचवारिका शालिताया अस्मदादी पाघाताशप्रयनशालितया परमेश्वरसिद्धिरिति। न च परमाणुनां नित्यत्वात्तेषु सर्गाद्यकालीनद्ववणुककर्मजनफ- प्रयत्नशालितास्वीकारानेश्वरम्यातिरिक्तस्य सिद्धिरिति वाच्यम् - तेपा तादृश्यप्रयत्नवत्वाचीकारे अडताहानिप्रसङ्गात् । एवं धृतेरपीश्वरसिद्धिस्तथाहि-त्रामाण्डादिपतनाभावः पतन- प्रतिवन्धप्रयोज्य: धृतित्वात् उत्पत्तत्पतत्रिपतनाभाववत, उत्पतत्पत. त्रिसंयुक्ततृण दिधृतिवद् वा । एतेन (धारकप्रयत्नधृतत्वव्युत्पादनेन) इन्द्राग्नियमादिलोकपालप्रतिपादका भागमा अपि व्याख्याताः । तेषां तदधिष्ठानदेशानामीश्वरापेशेनैव पतनाभावश्त्वात् । तथा च श्रुति: "एतस्य चाक्षरस्य प्रशासने गार्गि द्यावापृथिवी विधृते तिष्ठतः" इति प्रशामने दण्डभूतः प्रयत्नः, श्रावेशस्तच्छरीरावच्छिन्नप्रयत्नवत्वमेव । सर्वावेशनिबन्धन एव च सर्वतादात्यन्यवहार इति । प्रात्मैवेदं सर्वम् प्रौवेदं सर्वम् इत्यादिकम् । कारिकःयामादिपदेन नाशादापि परमेश्वरसिद्धिः, ब्रह्माण्डनाशः प्रयत्नजन्यः नाशत्वान, पाट्यमानपटनाशवत् । पदादपं श्वरसिद्धिः । पद्यते गम्यतेऽनेनेति पदं, व्यवहारः, ततः घटादिव्यवहारः स्वतन्त्रपुरुषप्रयोज्य: व्यवहारत्वान, आधुनिककल्पित लिप्या दिव्यवहारवत् इत्यनुमानात् । न च पूर्वपूर्वकुलालादिनैवान्यथा. सिद्धि', प्रलयेन तद्विच्छेदात् । प्रत्ययतः प्रमाया अपीश्वरसिद्धिः। वेदजन्यप्रमा वक्तृयथार्थ- वाक्यार्थज्ञानजन्या शाब्दप्रमात्वात, आधुनिकवाक्यजशाब्दप्रमावत् । श्रुतेर्वेदादपीश्वरसिद्धिः । वेदोऽसंसारिपुरुषप्रणीतः, वेदत्वात् . इति व्यतिरेकिणः । न च परमते साध्याप्रसिद्धिः, आत्मत्वमसंसारि- वृत्ति, जातित्वात्, इत्यनुमानेन पूर्व साध्यसाधनात् ।
६० ] शाखवार्तासमुश्चयस्य [ तृतीयः । ईश्वर- (कल्पलता) श्रुत्वैवं सकृदेनमीश्वरपरं, सांख्याऽऽक्षपादागर्म, लोको विस्मयमातनोति न गिरो, यावत् स्मरेदार्हतीः । किं तावद् बदरीफलेऽपि न मुहुर्माधुर्यमुन्नीयते, यावत्पीनरसा रसाद् रसनया, द्राक्षा न साक्षात्कृता ॥३॥ अन्वयः- लोकः, एवम् ईश्वरपरम्, सांल्याक्षपादागमम् , सद् श्रुत्वा. ( तावत् ) वित्मयम् , आतनोति यावत् आर्हती:, गिर, न स्मरेत्. यावत् पीनरसा, द्राक्षा, रसात् रसनया. साक्षाकृता, न ( भवेत् ), तावत्, बदरीफलेऽपि, मुहुः, माधुर्य्यम् . न, उन्नीयते, किम् । ( कल्पलतावतारिका ) लोकः-दर्शनतत्त्व बुभुत्सुर्जनः । एवम्-पूर्वोकप्रकारेण । परम्-परमेश्वरास्तित्वप्रतिपादकम् । सांख्याक्षपादागमम्-मांख्यनैया यिकसिद्धान्तनिरूपकशास्त्रम् । सकृत्-एकवारम्, श्रुत्वा-श्राकर्य, ( तावत्- तावत्कालपर्यन्तम् ) विस्मयम्-प्राश्चर्यम् । आतनोति- विस्तारयनि, करोति, समधिगच्छति वा धातूनामुपसर्गयोगादन्यथा- ऽपि वाऽनेकार्थबोधकत्वात् । तादृशी तदीय गतिपादनशैलाति भावः । पावत्-यावत्कालपर्यन्तम् । आईती:-'जनसम्पन्धिनीः, जिनप्रतिपा- दिना इनि यावना गिरः-सिद्धान्ततत्त्वप्रतिपादनपरा वाचः। न-नहि। म्मरेत्-ग्मरणपथे ममानयेत् । एतदेव दृष्टान्तेन सगर्थयति किं ताव दिल्यादिना . यावत्-गावत्कालपर्य्यन्नम् पीनरसा-परिपुष्टरमवती । द्राक्षा-गोननी न्यनामप्रमिद्वनाथुग्यपरिपूर्ण फल विशेषा वा । रसान्- अनुगगात । रमनया-मनेन्द्रियगण, जिहयेति यावा । साक्षातकता- ।
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६२ ] शासवाासमुनयम्य [ तृतीयः फर्चजन्यं शरीराजन्यत्वात श्राकाशयत इति विरुद्ध माध्यसाधकहेत्वा. त्मकसत्प्रतिपक्षदोपेणानुमानस्याप्रमाणत्वान् व्यभिनारशका निवर्तका. नुकूलतर्करहितत्व रूपमप्रयोजकत्यमपि तुल्गमेव । ईश्वर साधकानुमान- स्थलेऽप्यनुकूलतर्काभावात् । कर्तृत्वेन कार्यात्वेन कार्यकारणभाव एव तत्रानुकूलतर्क इति तु नाशवयम् , कुलालकृतिसत्त्वे घट: कुलालकृत्य- भावे घटाभाव इति विशिष्यवान्वयव्यतिरेकग्रहेण विशिष्यैव कुलाल. त्वेन घटत्वेन कार्यकारणभावग्रहात , सामान्यतः कृतित्वेन कार्य कारणभावग्रहे मानाभावात् । न च विशेषतः कार्यकारणभावग्रहेऽपि यद्विशेषयोः कार्यकारणभावस्तत्सामान्ययोरपीति न्याय एव सामा- न्यत: कृतित्वेन कार्यत्वेन कार्यकारणभाव ग्रहे मानमिति वाच्यम् । उक्तन्याये मानाभावेन सामान्यतः कार्यकारणभावग्रहे गानाभावात् । न च कुलालकृतित्वेन घटत्वेन कार्यकारणभावस्वीकारेऽपि प्रलयात्पर सर्गाद्यकालीनो घटः कुलालकृतिजन्यो घटत्यात इत्यनुमानेन सर्गः: द्यकालीनकुलालात्मकेश्वरसिद्धिः । ईश्वरस्य कुलालत्वापत्तिन्तु नमः कुलालेभ्यो नमः कर्मकारेभ्यः" इति श्रुत्येप्रैवेतिवाच्यम् । प्रलये माना- भावात् । तथा चोक्तमुपाध्यायपादे:-तथाहीत्यादिना कार्येण तत्साधने श्राद्यानुमाने नानुकूलस्तर्कः । तत्तत्पुरुपीयपटाद्यर्थिप्रवृत्तित्वावच्छिन्नं प्रति तत्तत्पुरुपीयपटादिमत्त्वप्रकारकोपादानप्रत्यक्षत्वेन हेतुत्वावश्य. कत्वात् प्रत्यक्षत्वेन कार्यसामान्यहेतुत्वे मानाभावात् । चिकीर्षाया अपि प्रवृत्तावेव हेतुत्वात् कृतेरपि विलक्षण कृतित्वेनैव घटकपटत्वा- द्यवच्छिन्नहेतुत्वात् । तथा चोक्तं हेमसूरिभिः- सर्वभावेषु कर्तृत्वं, ज्ञातृत्वं यदि सम्मतम् । मतं नः सन्ति सर्वज्ञा, मुक्ता कायभृतोऽपि हि ।। -- [१६ * गु, मैगन " MATER विyि" इगि मापनमागोवापि- ཀ མཎa'' : 1:༥ ', निगार मलिशयम् । सामान निर्मा, परमात कामशरिचयः॥ इगि परेऽपि प्रनिगमगप्याया:- froen for मनियतयामितिः, स्वाद माना मिचिनिर्मित। "प्रति सापित गनिन, या मापसे जति अगाय सथितः ।। (टिपणे )- समाचार । Krishn: अंग- अमोरार जा. मागीयांनाः । सुने | गुवननाथस्य-tra । नियो- गार-अनुवामाननः । नानाग (माये)-प्रानि मा शुद्र- ध्वपिazameenetraदेशग्धिागलपम् - परिमित कामायणानायगानी गमालोय-ममम पितानामितिशेषः । मीमांसनाम-चिनारदपराज मोगरिकाना , भामिनि माया । सवाम-समाग अपि भान्ति फायं भगनानारिता या व्यवस्थात:-प्यपरियतिपूपिन् । काय जगनि-पियामन थिये । जगदीशापरिचय:-नियुगधराशायीकारणम् । दियारादिक, साम, कार्यस्य , पट्यत् , परपनुगानेन जियक्षुरादेविधानुः परमेश्वरस्य सिद्धायपि सदपलापः प्राधियों मोमामासमतीना मयतामनुभयपियद इति ।
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, स्तवकः ] कल्पलतावतारिका [६५ सिद्धिः, ब्रह्माण्डधृतेरप्यष्टप्रयुक्तत्वात् । तथाचोक्तम्- निरालम्बा निराधारा, विश्वाधारा वसुन्धरा । यच्चावतिष्ठते तत्र, धर्मादन्यद् न कारणम् ।। युक्तमेवैतत्, ईश्वरस्य व्यापकत्वेन समरेऽपि शरपाताऽनापत्तेः। पतनाभावावच्छिन्नेश्वरप्रयत्नस्य तथात्वे ताशज्ञानेच्छाभ्यां विना विनिगमनाविरहात्, लप्तजातीयस्यादृष्टस्यैव ब्रह्माण्डधारकत्वकल्प- नौचित्यात् । नचाऽऽत्माऽविभुत्ववादिनः (कायप्रमाणात्मवादिनः ) जैनस्य सम्बन्धानुपपत्तिः असम्बद्धस्यापि तत्का>जननशक्तस्य तत्का- यंकारित्वात् अयस्कान्तस्याऽसम्बद्धस्यापि लोहाकर्षकत्वात्। प्रयत्नस्य तु विलक्षणप्रयत्नत्वेन पतनप्रतिबन्धकसंयोगविशेष एव हेतुत्वमिति । ब्रह्माण्डनाशकतयाऽपि नेश्वरसिद्धिः। यदि प्रलयः स्यात्तदा तज्ज- नकप्रयत्नशालितयेश्वरसिद्धिः सम्भाव्येत, स एव नास्ति प्रलयान- भ्युपगमात् । कुत: पुनरीश्वरसिद्धिः । कुतः प्रलयानभ्युपगम इति चेत्, अहोरात्रस्याऽहोरात्रपूर्वकत्वव्याप्यत्वात् । यदि प्रलयः स्यात् तदा- ऽनायाससिद्धो मोक्षः, किं पुनर्बहाचर्यादिलेशानुभवेन । एतेन "श्राद्यव्यवहारादीश्वरसिद्धिः, प्रतिसग मन्वादीनां बहूनां व्यवहारप्रवर्तकानां कल्पने गौरवादेकस्यैव भगवतः सिद्धेः" इत्यपास्तम्। सर्गादेरेवाऽसिद्धेः । इदानीमिव सर्वदा पूर्वपूर्वव्यवहारेणैवोत्तरोत्तर- व्यवहारोपपत्तेः । यदि तु सर्गादिः स्वीक्रियते तदा तदानी प्रयोज्य- प्रयोजकवृद्धयोरभावात् कथं व्यवहारस्तदीयव्यवहारदर्शनेनैव च तट- स्थवालकानां सङ्केतग्रहस्य व्यवस्थितत्वात् , व्यवहारस्यैव च शक्ति- ग्राहकशिरोमरिणत्वात् । अथ यथा मायावी सूत्रसंवाराधिष्ठितदारपुत्रके "घटमानय" - पयोजन न दोप इति चेत् न, घटादावतथात्वेऽपि तदीयशरीरे तदीयादृष्टत्वेनैव तस्माद् मायाधिवत् समयग्राहकत्वम् घटादिसम्प्रदायप्रवर्तक- E:"पाnिt; marge पनी गोप it : httpry. गुरपति कारता मनाfy, fitnाने स्थितनाग तुला. माझा पायानहेतु गा. नुमाय रामनामनामनगमतगणनात्यानु. मेयम् । एमाग गयो : गास, माना अगलात पति नान्गम् । गोपिनियन प्रमाणात नरमपरामर्शस्य प्रमात्यसम्भवाय । परागीभर पय मलाला शिरीर परिगृय पटादि. सम्प्रदायप्रवर्तकः, अत एव श्रुति:- "कुतालेभ्यो नमः, फरिभ्यः" इत्यादीति चेन, अत्रोपाध्यायाः- ईश्वरम्यादृष्टाभावेन प्रयोज्यादिशरीरपरिप्रहस्यैवायुतत्यम् । अन्यदीयमदृष्टमादाय शरीरपरिग्रह इति चेत-अन्यादृष्टेनाऽन्यस्य शरीरपरिग्रहे चैत्राष्टाकृष्ट शरीरं मैत्रोऽपि परिगृलीयात । प्राण्यः दृष्टेन घटादिवत् तच्छरीरोत्पत्तिः तत्परिप्रहस्तु भगवतस्तदावेश एवेति हेतुत्वात् , अन्यथाऽतिप्रसङ्गात् । -- त्वञ्च पराभिमतेश्वरस्य मायावितामेव विद्याधरविशेपस्य व्यञ्जयति, पितुरिव पित्रादेर्युगादौ युगादीशस्य जगतः शिक्षया तु तथात्वं युक्तिमत्, स्वभावत एव तीर्थकृतां परोपकारित्वात् , अत एव "कुलालेभ्यो नमः" इत्याचा श्रुतिः सङ्गच्छत इति युक्तमुत्पश्यामः । .
स्तवकः ] फल्पलतापतारिका [ ६७ प्रत्ययादिनेति कारिफोक्तेन हेतुनाऽपि वेदप्रामाण्यवादिनामाप्त. तद्वक्तृसिद्धावपि नेश्वरस्य सिद्धिः, अतस्तदुपन्यासेनालम् । एतेन कार्यादिपशानामर्थान्तरमपि प्रयासमात्रम् । “जन्यतत्प्रमासामान्ये तत्प्रमात्वेन गुणतया हेतुत्वात् आद्यप्रमाजनकपमानयतचेश्वरसिद्धिः" इति तु वचने युक्तिशून्यम् । घटत्वादिमद् वृत्तिविशेष्यतथा तत्र घट- स्वादिविषयतत्वेनैव हेतुतयासंस्कारेणैव घटत्वादिसम्बन्धहेतुतयैव वा नैयायिकस्यापि निर्वाहात् । अस्माकमाईतानान्तु सम्यग्दर्शनस्यैव गुणत्वात् । संख्याविशेपादपि नेश्वरसिद्धिः, द्वघणुकपरिमाणजनिकायां संख्यायां नैयायिकस्यापि लौकिकापेक्षाबुद्धेरेव कारणत्वात् ममाऽऽई- तस्यापि लौकिकापेक्षाबुद्धेरेव तथान्यवहारनिमित्तत्वात् तजन्याति- रिक्तसंख्यासिद्धिसम्भवात् । परिमाणेऽपि संघातभेदादिकृतद्रव्यपरि. माणविशेषरूपे संख्याया अहेतुत्वाच्च । द्विकपालात् त्रिकपालघटपरित माणोत्कर्पस्य दलोत्कर्षादेवोपपत्तेः । अत्रत्यमधिकं तत्त्वमाईतवार्ताया. माकलनीयम् । सस्मादीश्वरसिद्धौ न किमपि साधीयः प्रमाणम्, न वा तदभ्यु- पगमेनापि तस्य सर्वज्ञत्वम् उपादानमात्रसिद्धावप्यतिरिक्तज्ञानासिद्धेः, कारणाभावात् मानाभावाच्चेति नैयायिकानुपहसन्त्युपाध्यायाः- सन्तुभ्येति- (काल्पलता) सन्तुष्प नैयायिन्मुख्य ! तस्मादस्माकमेवाश्रयपक्षमप्रथम् । सबोचकरीश्वरकतताया मनोरयं सम्प्रति पूरयामः ॥४॥ अन्वयः-नैयायिकमुख्य ! तस्मात् , सन्तुष्य, भप्रथम् , भस्माकम् , - ६८] शास्त्रवातीस गुजयम्य [ तृतीयः -- , । एव, पक्षम् , आश्रय', सम्पति, तव, ईश्वरमततायाः, मनोरथम् , उच्चकैः, पूरयामः । ( कल्पलतावतारिका) नैयायिकमुख्य !--मुग्यं वदनमिव प्रधानत्वान्मुख्यः प्रथमः, नैयायिकेपु मुख्यो नैयायिकमुख्यस्तदामन्त्रणे तथा, नैयायिकप्रवरेति यावत । उदयनाचार्यतितात्पर्य्यम् । तदीयकारिकाया एव विव. रणपूर्वकखण्डनात । तस्मात्-स्वपक्षम्य खण्डितत्वात् । सन्तुष्य- सन्तोपमाधान । मन्तोपं धेहीति वा । सन्तुष्येति पदस्य क्त्वाप्रत्ययेन पञ्चमीमध्यमपुरुपैकवचनात्मकप्रत्ययेन गेभयथासाधनान । अग्रयम्- अग्रगण्यम् , श्रेष्टमित्यर्थः । अस्माकम्-आर्हतानाम् । एव-अवधा- रणार्थकमव्ययम्। तेनान्यस्य व्यवच्छेदः । पक्षम्-मतम् , सिद्धान्त वादं वा । आश्रय-अवलम्बस्त्र । सम्प्रति-अधुना । तब-नैयायिकस्य ईश्वरवर्ततायाः-श्वरकर्तृकजगत्कर्तृत्ववादस्य । मनोरथम्-अभिला- पम् । उच्चकैः-सातिशयम् । पूरयामः-परिपूर्णीकुर्मः । ईश्वरकर्तृत्व- विषयकनैयायिका भिलापस्य वक्ष्यमाणरीत्या प्रपूरणात । अत्र "तस्मा दरमा" इत्यत्र च्छेकानुप्रासो नामालकारः । ईश्वरकर्तृत्ववादस्वीकारे- ऽपि भवेदस्माकं पक्षस्यैव संसिद्धिनं तु नैयायिकपक्षग्येति वस्तु ध्वन्यते। (कल्पलता) नयः परानप्यनुकूलवृत्ती, प्रवर्तयत्येव जिनो विनोदे । उक्तानुबादेन पिता हितात् किं वालस्य नालस्यमपाकरोति ।।५॥ अन्वयः-जिनः, नयः, परान् , अपि, अनुकूलवृत्ती, विनोदे, प्रवर्तयति, एव, पिता, हितात् , उक्तानुयादेन, चालत्य, आलस्यम् , न, अपाकरोति, किम् । - रतत्रकः ] [६६ । . (कल्पलतावतारिका) जिनः-भगवान पाईन् । नया-द्रव्यायिकपागाधिकलितनयः नीतिभिश्न । परान्-अन्यान किं पुन: स्वानितिभावः । अपि-अपि: मनुथयार्थः । "अपि सम्भावनाप्रमशागहान मुगये प्रति गेदिनी । अनुकूलवृत्ती-अनुचूला धर्मादिसाकारिगी वृत्तिर्वतन व्यवहागे या यमिगत सोऽनुलवृत्तिन्तरिमनधा । विनोद-प्रानन्दे । प्रवर्तयति- प्रेयनि । एव-अवधारणावमव्ययम् । वास्तविकानन्दप्रवर्तको मगरान जिन इति भावः । विषयपिम मान्तेन समर्थनि. समानुवादेन पिरोत्यादिना । पिता-जनाः। हितात्-कस्मारणात , हित. युश्चेति यावन् । उक्तानुवादेन-उसस्य बालेन कथितन्य अनुवादः पुनराधारणम् , जानुवादतन तथा । बालस्य-बाल कम्य स्वपुत्र. स्येति बावन । आलस्यम्-विनोदादिप्रतिबन्धकमलसभा मन्दतामिति यायत, विच्छायत्वमिति दयम् । न-महि । अपाकरोति-दुरीकरोति । किम्-प्रश्नार्थकाव्ययम् । 'कि मुत्सायां वितर्क च निषेत्रमश्नयोरपी'. तिमेदनी । यथा फश्चिापिता बालकप्रसन्ननानवे गदुदीरितमेव वचः पुनः पुनमगारयति तय जिन: परदर्शनिप्रसन्नताहेतयं तत्स्वीकृत- मीश्वरकर्तृत्ववाद स्वीकरोति वक्ष्यमाणप्रकारेण स्वातसंरक्षकमिति भावः । तदिदमाह-ततरचेवरेत्यादि- (शास्त्रवार्ता) ततश्चेश्वरकर्तृत्ववादोऽयं युज्यते परम् । सम्यग्न्यायाविरोधेन, यथाहुः शुद्धबुद्धयः ॥१०॥ अन्ययः--ततच, अयम्, ईश्वरकर्तृत्ववादः, परं सम्यग, यायाविरो- धेन, युध्यते, यथा, शुदयुद्धकः, पाहुः । " ७२ ] साना ग ( शाला) शामाकारा महात्मानः, पागो नीतम्यहा भवे । मत्त्वार्थसम्प्रवृत्ताश, कथं तेऽयुक्तभाषिणः।।१५॥ पन्नग:- मायारा', IIT:, महामान:, गो, गो, सरार- सम्मताभ, कणे, रो, नमापिणः । (ब) शाराकारा:-पर्शनमा कपिलप्रमुगाः। प्राय:- बहुशः नाव कादीन् पापपवर्तमान त्याला। महात्मानः-धर्मगृत्तितः प्रकृष्टपुरुषाः । भो-समारं । बीतस्पृहाः-गगाभिलापाः, न तु धन- मानप्रसिद्धिलिप्सान्विताः। सत्त्वार्थसम्मवृत्ताभ-यथानुभवं परहिता. र्थप्रवृत्ताश्च । ततः कथं ते अयुक्तभापिणः-ज्ञात्वा विरुद्धार्थीपदेशिनः । परहितार्थप्रवृत्तेविरुद्धार्थीपदेशित्वस्य च परस्परं न साहचर्य जलज्वल- नवत् । एवमीश्वरविचारणायामुपाध्याया उपसहरन्ति इत्येवमिति- (कल्पलता) इत्येवं पटुरीवरव्यतिकरः, सतर्कसम्पर्कभाग् , येषां विस्मितमातनोति न मनस्ते नाम वामाशयाः। अस्माकं तु स एक एव शरणं, देवाधिदेवः सुखा- म्भोधौ यस्य भवन्ति विन्दव इव, स्वःसद्मनां सम्पदः।।६॥ अन्वयः- इत्येवम् , सत्तर्कसम्पर्कभाक् , पटुः, ईश्वरव्यतिकरः, येषां, मनः, विस्मितम् , न, आतनोति, ते, वामाशयाः, तु. अस्माकम् , एका, सः, देवाधिदेवः, एव, शरणम् , यस्य, सुखाम्भोधौ, बिन्दवः इव, स्वःसझना, उम्पदः, भवन्ति । " नाम, स्तरकः ] कल्पलतावतारिका [७३ . (कल्पलतावतारिका) इत्येवम्-पूर्वकथितप्रकारेण । सत्तर्कसम्पर्कभाक्-सन्तः समी- चीनाश्च ते ती ऊहाः सत्तस्तैिः सम्पर्कः सम्बन्धः सत्तर्क- सम्पर्कस्तं भजते सेवते इति सत्तकसम्पर्कभाक् । पटुः-समर्थः । ईश्वरव्यतिकर:-परमेश्वरसम्बन्धः, वीतरागतीर्थङ्करात्मपरमेश्वरसा- धनं वा। येषाम्-यादृशानां जनानाम् । मन:-चित्तम् । विस्मितम्- विस्मययुक्तम् पाश्चर्यरसारिष्टमिति यावत् । न-नहि । तनोति- करोति, सम्पादयतीति यावत् । नाम-कोमलामन्त्रणे । ते-ताशाः । वामाशया:-कुटिनाभिप्रायाः, दुष्टचेतस इति यावत् । तु-किन्तु । अस्माकम्-आर्हतानाम् , वीतरागप्रणीताऽऽगमपरिपक्कबुद्धीनां जैना- नामिति यावत् । एक:-अद्वितीयः । सः-प्रसिद्धः । देवाधिदेवः-देव- श्रेष्ठः, जिनेश्वर इति यावत् । एव-अवधारणार्थकमव्ययम् । शरणम्-- रक्षकः, गतिरिति यावत् । "शरणं गृहरक्षित्रोधरक्षणयोरपि" इति मेदिनी । यस्य-तीर्थकृतो जिनेश्वरम्य । सुखाम्भोधौ-सम्मदसिन्धौ । चिन्दवः-पतः । इव-यथा । स्वःसद्मनाम्-स्वः स्वर्गः सा- गृहं येपान्ते स्त्रःसनानम्तेपान्तथा देवानामित्यर्थः । सम्पदः-सम्पत्तयः । भवन्ति-जायन्ते । देवानां सम्पदो यदीयशर्मसमुद्रबिन्दुतुल्या इति भावः । उपमालङ्कारः । ॥ समाप्ता च नैयायिवार्ता ॥ । अथ वार्तान्तरमाह-प्रधानोद्भवमित्यादि- ७६]] ༈ 1: 111།༌་ '''' [HT . । नागम IIM गनगा प्रमानानुगरगोन जियोगिन पाया। 'पमत कारणानुपाति:- ... पसनः शशनिपाणागि गा मागि मश- क्यम् , तो हेतो. ग. गरमागमतगणीराम , ता. गत्यात्तस्य । लोऽणि निता गा पाit निष्पीनागेन गम्पादन दृश्यते यथा न तशागत: कार्गम्य शक्ति के नागि सम्पादनामिति । न च सत्कार्यगादे विमानप्रागभावप्रतियोगित्यरूपायाऽरात्त्वस्य विद्यमानत्वरूपाय सत्त्वस्य च न विरोध इतिवाच्यम्। अविद्यमान- त्वस्यैव लाघवादमत्त्वरूपतास्वीकारान तम्यवानुगताऽसत्त्व व्यवहार प्रयोजकत्वात् । एवं कार्यगात्रं प्रति तदुपादानापेक्षागादपि पार्य सदिति मन्तव्यम् । अन्यथा शालिबीजकोट्यवीजयोगभयत्रापि शालिफलात्मककार्यायोगस्याऽविशेपेऽपि शालि फलार्थिनः शालिबीज- स्यैवोपादानम् न तु कोद्रयबीजादेरिति प्रतिनियमानुपपत्ति: स्यात । एवं सर्वस्मात् सर्वस्यानुत्पत्तेश्चापि कार्य सदिति स्वीकार्यम् , अमतः कार्य्यस्य सम्पादनेऽसम्बद्धत्वाविशेपेण मर्यं सर्वस्माद् भवेत , तम्मा दुत्पत्तेः प्राक् कार्य कारणेन सह सम्बद्धमवसे यम् । तथा चाहु- रभियुक्ताः- असत्वाद् नास्ति सम्बन्धः, कारणैः सत्त्वसङ्गिभिः । असम्बद्धेपु, चोत्पत्ति-मिच्छतो न व्यवस्थितिः ।। एवमशक्तस्य वस्तुनः कारणत्वस्योकारे पूर्ववदतिप्रसङ्गाच्छ- तस्य तस्य कारणत्वं वक्तव्यम् । शक्तत्वञ्च शक्तिमत्वम्, सार्वत्रिकी स्वीकर्तुं शक्या, तथैवातिःसङ्गात् । एवञ्च कचिदेव शक्तिश्च स्तवक्र: कल्पलतांवतारिका [७७ शक्ति: स्वीकरणीयतामहति । ततश्च काय॑ऽसति कारणस्य शक्तिः क्यं नियता स्यात् । असतो वस्तुनो विषयत्वायोगात् , तस्मात् कार्य प्रागपि सदेव । एवं कारणतारतम्यादपि सदेव कार्यमित्यभ्युप. गन्तव्यम् । कारणरूपेभ्योऽवयभ्योऽवयविरूपं कार्य न भियते तथाप्रतीतेरभावात । कपाल घटीभृतम् तन्तुः पटीभूनः सुवर्ण कुण्ड- लीभूतम्" इति तयोरभेदप्रतीतेश्च । तस्माद् महदादिकार्यस्योत्पत्तेः प्रागपि यत्र सत्त्वं सा प्रकृतिरवगन्तव्येति । एतत्समहाकस्येनोळ यया-"असदकरणानुपादान-ग्रहणात सर्वसम्भवाभावात् । शक्तस्य शक्यकरणात, कारणभावाच सत्कार्यम्।।६।। ( साहयकारिका) ततश्च प्रकृतेः सकाशाद् बुद्धयपरनामक महत्तत्त्वमुत्पद्यते । यतश्चैतन्यं स्वभावतो विपयावच्छिन्नं प्रकृत्यधीनं या स्वीकरणीय. तामहति । विपयावच्छिन्नत्वेऽनिर्मोक्षप्रमशः, प्रकृत्यधीनत्वेऽपि तस्या- नित्यतया तदोपानुद्धार एवेत्यतो यत्सम्बद्धन्द्रियस्य विपयचैतन्या- वच्छेदनियामकत्वम् , यद्वयापाराज सुपुप्राविन्द्रियव्यापारविरतावपि श्वास-प्रश्वासादि-तन्महत्तत्वम् । तस्य धर्मा ज्ञानाऽज्ञान-श्वानेश्व- ये-वैराग्यावैगम्य-धर्माधर्मरूपा अष्टो, बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्ना अपि, भावनायास्तैरनङ्गीकारात् । अनुभवत्यैव स्मृतिपर्यन्तं सूक्ष्म- रूपतयाऽवस्थानात । तन्य ज्ञानरूपपरिणामेन सम्बद्धो विपयः पुरु- पत्य स्वरूपतिरोधायकः । एवञ्च बुद्धितत्त्वनाशादेव पुरुपस्य विपया- बच्छेदाभावाद् मोक्षः । भेदाग्रहाय चेतनोऽहं करोमीत्यध्यवसायः । अचेतनप्रकृतिकाव्या बुद्धेश्चैतन्यानुपपत्त्येव स्वाभाविकचैतन्य. रूपस्य पुरूपस्य सिद्धिः । आलोचनं व्यापार इन्द्रियाणाम्, विकल्पस्तु ८२] [ तृतीमः न स्यात् । छिन्नाच्छिन्नयोः कथं पश्चात संघटनमित्ति चेत, न, एका. निमित्तमन्निधानाभावान कथं शुभाशुभवन्ध इति । शुभाशुभवन्धादिक शासवार्तासमुख्यस्य न स्यात् । ब्राह्मणशर रावच्छिन्नमानजनकमनः संयोगविशेषनाशानु कूनो व्यापार एव ब्रह्महत्येति चेत् न, तादृशमनासयोगम्य स्वत एन नश्वरत्वात, साक्षाघातानुपपत्तेश्च । ब्राह्मणशरीरावच्छिन्नदुःखविशेषा नुकूलव्यापार एव ब्रह्महत्येति चेत, शरीराच्छरीरिणः सर्वथा में तच्छेदादिना तस्य दुःखमपि कथम् ? परम्परासम्वन्धेन तदात्म म्बन्धादिति चेन, साक्षादेव कथं न तत्सम्बन्धः ? शरीरावयवच्छे दादात्मावयवच्छेद एव हि शरीरात्पृथग्भूतावयवस्य कम्पोपलब्धिरु' पद्यते, नान्यथा, प्राणक्रियाया अपि तन्मात्रोपग्रह विनाऽभावात् । अथैवं छिन्नावयवानुप्रविष्टस्य पृथगात्मत्वप्रसक्ति: स्यादिति चेत्, न, यस्माच्छरीरावयवः पृथग्भूतस्तस्मिन् शरीर एवच्छिन्नावयवाय पश्चात प्रवेशात, छिन्ने हस्तादौ कम्पादितल्लिङ्गादर्शनादित्य कल्पनात। न चैकत्वे प्रात्मनो विभागाभावाच्छेदाभाव इति वाच्यम् । शरीर. द्वारेण तस्यापि सविभागत्वात् । अन्यथा सावयवशरीरव्यापिता तस्य न्तेनाच्छिन्नत्वात, पदानालतन्तुवदच्छेदेऽपि च्छेदाभ्युपगमात् । संघटन मपि तथाभूतादृष्टरशादविरुद्धमेव । हन्त ! एवं शरीरदाहेऽप्यात्मदाहः म्यादिति चेत्, न, क्षीरनीरयोग्विामिन्नत्वेऽपि भिन्नलक्षणत्वेन तहो. पाभावान । तम्माद्देदात्मन एकान्तपृथक्त्वे हिंसादाभावः, तदभावेच . विना देवनार कादिम्पः समारो मुक्तिश्चास्य नोपपदाते । मुक्तः कर्ममयः रुपवान । मुक्त्यभावे च मर्वमेव यमनियमादियोगनुष्ठानं व्यर्थ यान । क; ग्यशु फलमन मिल पन्नेव दुष्करकोशेरात्मानमवसादयेत् । म्यादनद-पामा न यध्यत, नापि कदाचन गुच्यते, तस्य च स्तनः कल्पलतावतारिकता [२३ मदाबदत्वात । फिन्तु प्रहतिरेय वपरिणामलक्षणेन बन्धेन बध्यते तेनैवं मुच्यते च । प्रफनावेव यन्धविश्लेपी। पुम्पे तु बन्धमोक्षायपु. चयेते, भृत्यगताविद जयपराजयो स्वामिनि । तदुत्तम्-~~ तस्माद न बन्यते नापि मुच्यते नापि संसरति कश्चित् । संसरति बध्यते मुच्यते च नानाश्या प्रकृतिः || इतिचेयोच्यते---सबंधेफस्वभावायाः सर्वथा नित्यायाश्च प्रकृते. निवृत्तिझियाया अभावात् सन्न्यायाद् बन्धमोक्षी न प्रकृतिपुरुपान्यता. ख्यातिरुपो हि व्यापारः पुरुपस्यैवेति तस्यैव मोक्ष उचितो न तु प्रकृतेः, तस्याः प्रवृत्त्येकरूपत्वान्. पुरुषार्थमचेतनत्वेन व्यापारायोगाघ । अपि च प्रकृतेर्मुनो पुरुषस्य स्वरूपावस्थाने तस्याः साधारण- स्वादेकमुक्ती संसारोच्छेदः, प्रकृतिवदात्मनोऽपि सर्वगतत्वेन "एका. वच्छेदेन मुक्ति न्यावच्छेदेन" इत्यपि वक्तुमशक्यत्वात् , तद्बुद्धध- वच्छेदेन मुक्तत्वम् , नान्यबुद्धयवच्छेदेन इत्यपि वक्तुमशक्यम् बुद्धः क्षीणत्वात् , बुद्धियोगेन पुरुपस्य संसारित्वे तस्यैव मोक्षप्रसनाथ । "प्रकृतिवियोगो मोक्षः" इति वचनान् प्रकृतेर्मोक्षः कथं भवेत् । प्रकृतिस्वरूपनिवृत्तिप्रसङ्गात , पुरुपे तु प्रकृति निवृत्तिद्वारा तन्निवृत्ति- युच्यते, न तु स्वस्मिन् स्वनिवृत्ति: संभवति, घटे घटनिवृत्त्यदर्शनात् अप्रसकस्य प्रतिषेधभावात, प्रकृतेर्मोक्षे तन्त्रविरोधाच । इत्यञ्चोक प्रकारेणोपपादिता पुरुषस्य मुक्तिः कथमपि न संघटत इति हेतोः साइयोक्तं सर्वमयुक्तम् । आर्हताः पुनः सावधवादेऽपि पुरुषस्य प्रकृतिवियोगलक्षणा मुक्ति मिच्छन्ति प्रकृतिमपि समीचीनतर्कात् कर्मप्रतिमेवेच्छन्ति, बुद्धया- दीनां निमित्तत्वात् , तत्समन्वयश्च कश्चिदात्मादावेवोपपद्यते, सर्वथा ? lopeensoorlopussit र्यापात:, पाक रानेवाऽविभूतो न्यानंतन, पावावस्यापि ननु रूपादिसन्निवेशरहितममूत मूर्ततां (रूपादिमत्परिणतिम्) परमाएवादिपु तत्सद्भावाऽप्रसिद्धेः, यस्मादेवं न स्वरूपविपर्ययो भवति :::::. :::.:.: 11:41 १.६५ : ११! ! 1 11:11:11 .!!! ......111111 1 : 11111!! !!: • Amit.१९१17 ।। if HIT ... ११ .. ... | ( Hit fr". 17.10 1 41 1111fricitati, Print. भीमा को 1111111111: '' 111417 को ५.५५ ? गा fift +1:411। भगोषणा fifierrif4f11. '' इति चेन, माता, If पिगमानाय पश्चाद भावान । विजातीय गोगाय नमन किया गया स्याऽभावाद् न प्रागुणमा निरिनित, दिया प्रागमत्वेऽमत्का. सदसद्विकल्पप्रासात् । स्थूलम्पावच्छिन्नस्य प्रागमत्यानोपलब्धिः, धर्मधर्मिणोः सौम्यस्थौल्ययोश्चकत्याननयस्थति चत तर्हि सूक्ष्मरूपा पच्छिम्नस्याऽहेतुकत्वेऽतिप्रसङ्गः, प्रकृतिमाहतुकत्वं च स्थूलतादशा- यामपि तदापत्तिरिति न कितिदेतत् । तस्माच्छवलस्यैव वस्तुनः कथ- श्चित् सत्त्वमसत्त्वश्चाप्युचितम्, तथा बुद्धयादीनामहन्त्वसामाः नाधिकरण्येनाध्यवसीयमानत्वात् तद्धमतया तत्रैव समन्वयः कर्म- प्रतिस्तु तत्र निमित्तमात्रमिति प्रतिपत्तव्यम् । न याति, आकाशादौ तथा दर्शनात, एवं मूर्तममूर्तपरिणतिं नाऽऽयाति - - ततो नियमात् कर्मप्रकृत्याऽऽत्मनो बन्धाद्यसङ्गतम् इति चेद् आह- स्तवमा कल्पलतायतारिका [८५ - देहेत्यादि- (शास्त्रवार्ता) देहस्पर्शादिसंविच्या, न यात्येवेत्ययुक्तिमत् । अन्योऽन्यव्याप्तिजाचेयमिनिबन्धादिसङ्गतम् ॥४२॥ अन्ययः-देशलादिसवित्या, म, पास्येव इति, अयुचिमत् । इयम्, च, अन्योन्यच्यारिजा, इति. न्यादि, सातम् । (अव०) देहस्पदिसंवित्या-दहे शरीरे यःस्पर्शः करटकादि- स्पर्शः अपघातनपनिपात इति यावन् , देहस्पर्शादिस्तदादिस्तत्ममुम्नः अनुप्रहदेनूपनिपात इति यावत् देवस्पर्शादिम्तस्य संवित्ति:-सननित- सुनदुःखानुभूतिस्तया तथा। न यात्येवेति-अमूर्त मूर्ततां न यात्येवे- त्यादि पूर्वोकम् । अयुक्तिमत्-अनुभवबाधितम् अत एवानुचितमित्यर्थः । इयम्--देहम्पर्शादिसवित्ति: । च--पुनः । अन्योन्यव्याप्तिजा-परस्पर- च्यामिजनिता गुहशुण्ठीद्रव्योरिव शरीरात्मनो स्यन्तरतापत्तिप्रभया। प्रतिप्रतीकं तनुभवात् । इति-हेतोः । बन्धादि-नागुदीरितं पन्धः मोक्षादि । सङ्गतम्-युक्तिमत, इति । युफन्तत-अविभागदर्शनात, नरत्वादेरेकनिष्ठत्वेऽतिप्रसङ्गात् । एकत्वानवच्छेद्यपर्याप्तिप्रतियोगित्वरूपध्यासज्यवृत्तित्वे च सांख्यस्य भवेदपसिद्धान्तः । व्यासध्यवृत्तिजात्यनभ्युपगमात, एकाश्यत्वानुभव- विरोधात, शरीराप्रत्यक्षेऽप्यन्धकारे नरत्वप्रतीत्यनुपपत्तेश्च । एवं ताई ज्ञानादयोऽपि भवेयुः शरीरे, रूपादयोऽपि जीव इति चेत-इष्टापत्ति- स्तदाह सम्मती श्रीसिद्धसेन-- -
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कायनारिफा proting - गुपान्याशापति निममनो सादिनेयमाणा जो सोनामगोऽनुहोभामो तु सायनमयदेवक स्मादिति पानाम् । नगालादिमा माया पपि कम. : ফায় গাথায় যায় গা ঘাসায় मायभावप्रयोगायान ! wriमहिमगिमानोऽपिनु नि, गदेश भदानीमपि म मिमिका निमियमैयामानोऽनुमान, वनसामानापिनोपपः । न इण्यापा- स्थायमिनोमान्यायानिमिती तयारमयमपासन्यत्वेन দিলেন মা নিলাখো মাগ গ্যাস বন पिभुन्यमेव गुजमिन बागम । नित्यमा परिमाणपत्रे पायकामायनाप्रोजपयाग ! ना मन्य जन्मत्यापलिभिया, गानमाल्याशिफापन सत्यजन्यतायदयास्यामितियाज्यम् परमाणुपरिमाणमापारणतया कार्यशायदफायाभायात, त्रुदिम. हण्यायधिोका मर्म माझा नादशजायसवेध! एवं मनि कयमारमनी थिमुत्ये खाग्गिन कियादिप्रतीतिः, सौर्य. गमनारसम्युल्यवशादियोपपानीयम् ? फर्य घाऽऽत्मनः सर्व- गावात स्व शरीराचन्यत्रापि न मानास्पायः ? शरीरामायान्यन न शानायूत्पाद इन पेज, न, श्यन्य शरीरस्य सस्यात् । घशरीराभाया. दिति ? त्यसंयुफन्न तयाए म्यीयवान । खारट्रोपगृहीतरी. रामायादिति च तर्हि पोयत्यान तवष्टम्यैव तदानादिहेतुस्यात् तस्य शरीरस्यापितयाऽऽत्मनानधात्वमितिः। तदुराम- यौव यो दृष्टगुणः स तत्र, सुलभादिवनिप्रतिपयमेतत् । शाय दहाद यहिगत्मतत्त्व महत्त्ववादोपहता वदन्ति ।।
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स्तबकः ] कल्पलतायतारिका [८६ - (कल्पलतानतारिका) सालय ! कपिलप्रमुग्यमाख्याचार्य । यत्-यस्मान । (त्वम) जगत्-भुवनम् । प्रकृतिजन्म-रकृते:-प्रकृतिशब्दवाच्यात् गुणप्रया- मप्रकतेः कर्मप्रकृतेश्र जन्म यस्य तत्तथा । मन्यसे-वं कुरुषे । इदम्-एतत् । एर-खलु । फेवलम्-तन्मात्रम । आवयो:-त्वं सांख्य. वाइमाईतश्र भावाम् परत्वादस्मच्छब्दस्यैकशेपे “य शिष्यते स लुप्य. मानार्याभिधायो" इत्यभियुक्तोक्त्या द्वित्वविवक्षायां द्विवचनविभक्तिः तयोस्तथा। सख्यम्-मैत्रीभावः । तु-पुनः । एवम्-अनेन प्रकारेण । विधर्मणः-विगतो धो ज्ञानादिर्यम्मादसौ विधर्मा तस्य तथा ! मणिती- कयने, निरूपणे इति यावन । (भाषयोः) संख्यम्-युद्धम् । एव- अवधारणार्भकमव्ययम् । केवलं मस्यमेवेत्यर्थः । भजन-प्राप्नुवत् । वर्तते इति शेषः । भवचक्रपरिभ्रमणात्मकस्य जगत: प्रकृतिजन्यत्व- विपये भरता सह विवादो नागित, कर्मप्रतिकम्य जगतोऽस्माभिरपि स्वीकारात, केवलमात्मस्वरूपविषये विवादो यतचया विधर्माऽऽत्मा मन्यते मया तु सधर्मेतिभावः । पूर्वोक्तमेव स्पष्टयति भगवन्तुतिमुखेन आत्मानमित्यादि- (कल्पलता) आत्मानं भवभोगयोगसुभगं, विस्पष्टमाचष्ट यो, यः कर्मप्रकृति जगाद जगतां, वीजं जगच्छर्मणे । नद्योऽन्धाविव दर्शनानि निखिलान्यायान्ति यदर्शने, तं देवं शरणं भजन्तु भविनः, स्याद्वादविद्यानिधिम् ॥८॥ अन्वय:- जगन्धर्मणे, यः. भवभोगयोगसुभगम् , आत्मानम् , विसष्टम् , भावट, यः, मर्मप्रकृतिम् , जगताम् , बीजम् , जगाद, नधः, अन्धी - . - [ रस्तु: । शस्य सांव्यवहार्य-तात्त्विकत्वेन द्वैविध्यात् , अागस्य भावनिवृत्तिाप- त्वेऽपि द्वितीयस्थ भावरूपत्वादिति वाच्यम् , क्षणस्थिशिधर्मकत्व. नाभावो भावतां यातीत्याद्युपसंहरन्ति सूरिपादाः सतोऽसत्त्व- १८] शाग्नागीरा गुणगग स्वेनापरिच्छेदान । भायोऽगभावनां नैव प्रगाति, भावोत्पत्यादि. दोपप्रसङ्गात् । यतः क्षणिकभावस्य द्वितीगादिशोऽमत्त्ये मति भवेद. सत्योत्पादोऽपि, कादाचितकत्वात, उत्पादान तस्यामत्त्वस्य स्थाठि. नाशोऽपि, कृतकत्वात् । ततो नस्य सनः पुनावः स्यात , नाश्य नित्यत्वात् न दोप इति चेत्- तर्हि सदानाशे प्रथमदणेऽपि भाव: स्यानवस्थानात् । न च भावनाशो भावस्थितिधाभाव एवं विना- स्यापि द्वितीयादिक्षणास्थितौ सत्यामेव सम्भवादुक्तदोपापरिहारात । - मित्यादिना । ( शास्त्रवार्ता० ) सतोऽसत्त्वं यतश्चैवं, सर्वथा नोपपद्यते । नाभावो भावमेतीह, ततश्चैतद्वयवस्थितम् ॥३८॥ अन्वयः--यतश्च, एवम् , सतः, भसत्त्वम् , सर्वथा न उपपद्यते, ततश्च, इह, अभावः, भावम् , न, एति, इति, एतद् , व्यवस्थितम् । (अव०) यतश्च-यतः कारणात् खलु । एवम्-पूर्वोक्तप्रकारण ! सतः-भावस्य । असत्त्वम्-प्रभावत्वम् । सर्वथा-सर्वैः प्रकारविचार्य माणम् । न उपपद्यते-भावोन्मजनप्रसङ्गान्न सङ्गतिमङ्गति । ततश्च- तस्मात्खलु । इह-प्रस्तुतविचारप्रस्तावे । अभावः, भावम्-सत्ताम् । प्रधाननिर्देशः। न एति- नाधिगच्छति। इति एतद्, पूर्वकथितमुपपन्नम् । भावविच्छेदेनाभावानुपपत्तेः. तदविच्छेदे च द्रव्यांशान्य यादिति । । भाव. ति। इति एतद्, व्यवस्थितम्-
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[ चतुर्थः तत्र तदभावाभावत्वमेकमेवेति चेन, किं तत् ? घटत्वादिकमिति चेत्, कथमस्य तत्त्वम् ? तेन रूपेण घटादिमत्ताप्रतीतो घटाय. भावाभावव्यवहारादिति चेत्, कथं तर्हि तदसाधारणधर्मान्तरा. णामपि न तथात्वम् ? किम्ब, एवं घटत्वादिज्ञान प्रतियोगिज्ञान विना न स्यात् , अभावप्रत्यक्षे योग्यधर्मावच्छिन्नज्ञानत्वेन हेतुत्वात अन्यथा तन्निर्विकल्पकप्रसङ्गात् । यदि च निर्विकल्पकीयविषय- कारे विशेष्यतानवच्छिन्ननिर्विकल्पकीयविषयतया या प्रत्यक्षेऽभा. वत्वभेदस्य कारणत्वात् तनिर्विकल्पकं वार्यते तदा घटत्वादेरपि निर्विकल्पकाप्रसङ्गात् , भावावृत्तितयोक्तविषयतया विशेषणे चाप. सिद्धेः । अस्तु तर्हि अभावाभावोऽप्यतिरिक्त एव, तृतीयाभावादे: प्रथमाभावादिरूपत्वेनानवस्थापरिहारादिति चेत् । तीनन्ताभावानां तत्राभावत्वस्य कल्पनामपेक्ष्य क्लुमाधिकरणेष्वेव वरमेकोऽभावत्वप. रिणामोऽनुभूयमानः श्रद्धीयताम् । नह्ययमभावः इति स्वातन्त्र्येण कस्याप्यनुभवोऽस्ति, किन्त्वधिकरणस्वरूपमेव तत्तदारोपतत्तत्प्रतियो- गिग्रहादिमहिम्ना तत्तदभावत्वेनानुभूयत इति । अधिकं लतायामे- वावलोकनीयम् । तथा चाभावो भावत्व नैति, भावश्चामावतां न यातीति भावानां क्षणिकत्वं न युक्तिसङ्गतम् । रूपादीनामपि कार्य: योधजनकत्वं विचार्यमाणं नोपपद्यते । वास्यवासकभावाद्यपि विक ल्पानुपपत्तितः सङ्गतिं नैवाश्चति । एवञ्च सतां कथञ्चिद् ध्रौव्यमली करणीयम् । मतां ध्रौव्यस्वीकारे सत्यार्पवचनविरोधो परिहतो भवति १०२ ] शास्त्रवार्तासमुनयस्य स्वादिरूप न बाधकम् । नचाधिकरणस्वरूपत्वेऽननुगमो बाधक तथासत्यभावाभावस्यापि प्रतियोग्यात्मयत्वविलयेऽपसिद्धान्तात् । तया घटत्वादिनाऽभावस्य प्रत्यक्षस्याभावत्वांशे निर्विकल्पकस्य स्वी- रसबरः ] কুনোব্যাকি [१३ नाग्यमालियारे सुमनले पल्प, शमत्या में दुग्योदतः। तेन कर्मविपकेन, पाद विलोऽनि भिषयः ||२||नि युसर पाटन पारे पि भिभिः पयोग विहिनेऽनुगोगा मोगगो विक. भो । मनानापेशादि पुरस्मयोपवानपिरोगपरिहार: ममेनफा- रामायमनुमानि सन्तानाशादिगोगांसा व गनिमांसला ! पिप भगवता मोगवन मिशन पागलर म्यरमेय पृथिव्याः पर. स्थापित्य यदुपदिष्ट रपटा पुरा अभिमाया त्यादि तन मानि- मदनि शरिणत्यया । रूपादयः पायाला हिचिया इत्यप्या शणिमा पर सहचर, शशिकाये तु पादरी नामिन्द्रियमनो. विहानमालत्यात्मक नियोग न स्यात् । हिविशेषत्वशनायों दि मिनाममा एयरोपपतं । एककालम वंशम्यानयादप्रमाणत्वं मलिनि । परमनेसोपपितमेफान्तेन धाणियरन भावानामपर. शीयमेय । नो पेन पदामादमाहप्रस्ताव सौगतस्य पादमगरे यथा विनिगमो भवति यान्यस्यापि स्यारेण । अतः माधृपदम्गले याचक- वरया सरम्भमित्यादिना- (कल्पलता) संरम्भमस्मासु वितत्य सत्य-मतो पानिपपात बौद्धः अनेन शोच्यां तु दशा सहायी-मतोऽपि योगो यदसी जगाम ॥४॥ अन्वय:--अतः, मौदा, अरमासु, संरम्भम, विज्ञत्य, उसे, निपात, सत्यम् , रस, यत्, तु, अनेन, सहायोस्तः, अति, असो, योगः, शोच्याम् , दशाम, जगाम (पल्पाहावतारिका) अत:-माणिकत्यवादखएडनादेतोः । चौद्धः-बुद्धमतानुयायी - ------ स्य भगवन्तरेण कथनात । 'पर्यायोत्ता तु मायस्य, वचो मत्यन्तराश्रयम्' पश्यन्तु नश्यन्ति जवेन भीताः, दीना न मीना इव किं तदेते ॥५॥ १.] मो. ना - Nir-मानिनन्ग- विमान, नि नि || उ:- HTRA माया. । नि-fini-t. THE इति गान । सत्यम्-का-ए। यत्-गा। तु-पुनः। अनेन-गुगनगन गहागीता-गोगा मा गानितः । अपि-सम्भावनागाम् । असो-:, पुरोगा । योग:-गोगाचारः । शोच्याम्-गजननी । दशाम्-पायथाम् । जगाम-प्राप्तवान् । पर्यायोकमल हारः प्रस्तुतगून । गोलो गोगा पराजिताविति व्याय- इति तल्लक्षणात। उक्तमेव भगवन्तरेणोपपादयन्ति - ताथागतानामिति- (कल्पलता) ताथागतानां समयं समुद्र, तर्कोऽयमौर्वानलबद्ददाह । । अन्वय-और्वानलवत् , अयं, तर्कः, ताथागतानाम् , समयम् । समुद्रम् , ददाह, तत् , मीनाः, इव. भीताः, दीनाः, एते, जवेन, ना नश्यन्ति, किम् -पश्यन्तु । (कल्पलतावतारिका) और्वानलवत्-वडवाग्निरिव । अयम्-प्रत्यक्षीक्रियमाण एप.! तर्कः-युक्तियुक्त आर्हतमतविचारः । ताथागतानाम्-यथातथवादिनां तथागततनयानां बौद्धानाम् । समयम्-क्षणिकत्वादिसिद्धान्तम् ।
स्तनकः ] कल्पलतारतारिका [१०५ समुद्रम्पारावारप्रतिमम् । ददाह -श्रदहन । तत्-तस्मान । मीनाः इन-मायवत् । भीताः-साध्वसमापनाः । दीना:-न्यान्विताः । एते-सौगताः । जन-शी । न नश्यन्तिकिम् ?--किमु न पलायन्ते? मपि तु नश्यन्त्येव । तत्पलायनं पश्यन्तु-विलोकयन्तु, भवन्त इति शेषः । पर्यायोक्ति-रूपकानुप्रासा अलहागः । सौत्रान्तिक सौगतविशेषमुपहसन्नाह रक्त इति । (कल्पलता) रक्तः प्रसक्तः क्षणिकत्वसिद्धी, यदुक्तमत्रं हतवान् स्वकीयम् । स्त्रान्तकोऽप्येप लिपिभ्रमेण, सौत्रान्तिको लोक इति प्रसिद्धः ॥६॥ अन्धय:-क्षणिन्दसिद्धी, रकः, प्रसकः, एपः, यत्, स्वकीयम् । उकसूत्रम् , हतवान् , (इते) सूत्रान्तकः, अपि लिपिभ्रमेण लोके, सोत्रा न्तिकः, इति, प्रसिद्धः। कल्पलतावतारिका) क्षणिकवसिद्धौ- यत् सत् तत् क्षणिकम्' इति व्याप्तेः साध. नार्थम् । रक्त:-रागवान , तदेकरसः । अत एव प्रसक्त:-क्षणिकता. साधनाय संलग्नः,अन्योद्योगमात्रमपहायात्रैव दत्तदृष्टिः । एपः-प्रत्यक्षं दृश्यमानः सौत्रान्तिकाभिधानः सौगतः । यत्-यतः । स्वकीयम्- नैजम् , बुद्धसम्बन्धीति यावत् । उक्तसूत्रम्-पूर्वप्रतिपादितं वचनम्, 'इत एकनवते कल्पे- 'कापहाइ पुइ-' इत्यादिसूत्रम् । हतवान्-नएं चकार, असगन्तं विदधे, क्षणिकत्वे सिद्धे उक्तसूत्रं नैव तथ्य स्या- दिति भावः। इति अयं सूत्रान्तकः--सूत्रमन्तयतीति सूत्रान्तक इत्यन्व- - .
बत अनुकम्पानापकम्, कृतेऽपि प्रचलप्रयत्ने नाईच्छासनं स्वल्पमपि विलयितुमीशास्ते इति सन्तोपव्यञ्जकमिदम् । अहो अच्छासन- .. 141 भगा तिनक 4:11. Fat : Irf.1 भागी Int- (ला) सामी मनामीनिवमिळगली ग नामीकर कान्तिगतः । वामोमान्तोऽपि परे गतामी, क्षमा न गा.निल मानाय ।।१।। पानग:- ना, मो, गति, गरे, गो, ग, शमा, सः, अत्तांगी, नागी htfor:, SIT, Eमी, साग, सिद्धये, (ला)। (अल्पलतावतारिका) यदर्शनलसनाय-यम्य प्रभाः शायन लागिह,म् , अाईटुप. दिष्टस्याद्वाददर्शनापाकरणाय । बत-ग्वेद, हो त्रामी बराका एतादृश सर्वजनश्रेयस्करमईच्छासने विघटयितुं यतन्ते इति खेदोद्गारसूचा, एवञ्च दुरितभरभृता एते दुर्गतिं गमिप्यन्तीति अनुकम्प्यास्ते इति स्याद्भुतं सामर्थ्य यन्न केऽपि तदभिद्रवन्तीति विस्मयापादकं बताव्य- यम् । 'खेदानुकम्पासन्तोप-विस्मयामन्त्रणे बत' इत्यमरः । वामी- भवन्तः-अवामा वामा भवन्त इति वामीभवन्तः, वकतामाचरन्तः । वामाशब्दस्य स्त्रीवाचक त्वमपि, तथा च वामीभवन्त इत्यनेन स्त्रैण- मनुसरन्त इति व्यज्यते, स्त्रीप्राया नि:सत्त्वा न कमपि विलयितुं प्रभवन्ते किं पुनरर्हच्छासनं प्रबलम् । अपि-तथापि । परे अमी- पुरोवर्तिनः शत्रुमाया: सौगताद्याः । न-नैव । क्षमाः-अलम् । . । समर्था
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[पञ्चम - - - यावत् । न-नहि। उपपद्यते-उपपत्तियुक्तं भवति, उपयुक्तं भवतीति झ-उत्प्रेतायाम् । 'गन्ये शहः ध्रुवं प्रायो, नूनमित्येवमादिभिः । ११४ ] शाग्रवातीसगुणयस्य अन्वयः-गत् , तत् , अमरूणाम् , स्वसंवेद्यम् , इष्यते, तद्भेदने तस्य, ग्रहः, तत:, किम्, न, उपावते । अब०) यत्-यस्मात्कारणात । ता-बुद्धिविषयतामापन्नं विज्ञाः नम् । अर्थग्रहणरूपम्-नायवस्तुपरिच्छेदात्मकं सत् । स्वसंवेद्यम्- निजसंवेदनविपयनाविशिष्टम् । इप्यते-इच्छाविपयीक्रियते, "नीलमह वेमि” इति विच्छिन्नार्थग्रहणरूपतयाऽनुभवात् । तद्वेदने-एवम्भूत- विज्ञानानुभवे । तस्य-वालार्थस्य । ग्रहः-ज्ञानम् । भवतीति शेषः । ततः-तस्मात्कारणात् । किम्-किमात्मकं वस्तु, कः पदार्थ इति यावत् , अपि अपि तु सर्व वस्तूपपद्यत एवेति भावः । तथा चोपाध्याया:-खलस्येति-- (कल्पलता) खलस्य योगाचारस्य, ज्ञात्वार्थद्वेपितामिव । सभायामधुना सभ्याः, अनर्थ उपतिष्ठते ॥४॥ अन्वयः-सभ्याः, खलस्य, योगाचारस्य, अर्थद्वेपिताम् , ज्ञात्वा, इव अधुना, सभायाम्, अनर्थः, उपतिष्ठते, । (कल्पलतावतारिका) सभ्या:-हे सज्जनाः ! सदस्याः ! खलस्प-दुर्जनस्य । योगा- चारस्य-तदभिधानसुगतशिष्यस्य । अर्थद्वेपिताम्-बाह्यपदार्थद्वेषम् । ज्ञानातिरिक्तवाद्यपदार्थास्वीकरण मितियावत् । - । ज्ञात्वा-विज्ञाय ।
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.... रणगुपन्यस्त तदपि ग्यपध्यते वायदाईतस्तथाहि यत्तैः क्षणिके तदुत्पत्यानन्तरं नाशात, ततः किमायातमिति चत, यतोऽसावकिया. स्यात्, द्वाविमा प्रकारावन सम्भवतस्तत्र नायाः पक्ष: समीचीन: अर्थक्रियायास्तदात्मकत्वेऽर्थक्रियायां सामर्थ्यायोगः, अखिलस्वधर्मा- युक्तम्, सामथ्र्यसामर्थ्यवतोरभेदात , सामथ्र्यवदन्यत्र तदभावात, दण्डादः सकाशात् घटाधुत्पाद एव सामर्थ्यमिति चेन्न, उपादानमन्त- रेणान्यभावस्यान्याय्यत्वात् । फुतोऽन्याय्यत्वमिति चेदनोच्यते-- 2534537 [ .:: ::mi" ... नीममोहित { . 13 . FREE: 11 12 17, FEATUtsnfiniरवान गांत ( Fit 1. ) .{{{st ( 11.far.irecामान । ग1ि1111tter at IA, तग शुभरादिलगा is firingणभिप्रायेण गाभाग, राम्ग ( गाय ) गगना गुपपरमारियाय व्ययो- पाताभागात पाय मानावयात मनानविशेषप्रभयेऽहेतुत्या. दित्यधिक गावापागामनी जिज्ञामभिः । यश शाणिकये 'प्राझियासमर्थत्वात" इति द्वितीय फार (निरन्वयनश्वरे वस्तुनि ) अर्थक्रियासमर्थत्यमुक्तम्, तन्न युक्तम्, जनकत्वाभिमतः पदार्थ एव वा स्यात, तदनन्तरभावी पदार्थ एव वा न्वितस्य तस्य स्वहेतोः समुद्भवान् । नापि द्वितीयः अर्थक्रियायाः स्व भिन्नत्वेऽभ्युपगम्यमानेऽन्यस्य हेतोरन्यत्रार्थक्रियायां सामथ्र्यमित्या यस्मादन्यसत्त्व स्थितावपि किमुत तन्निवृत्तौ असत् सद् न जायते, स्तयकः ] कल्पलतावतारिफा [१३१ सच्छक्त्यभावेनातिप्रसङ्गात, पूर्वक्षणस्यैव चोत्तरतणरूपतया भवनेs. न्वयः कथमसिद्धः, भावाविच्छेदस्यैवान्धयात् ? किन्च प्रस्तुतभावानां क्रियात्मिका भूतिर्भवतोक्ता सा भूतिया- यत: फचिद् न युज्यते, कर्तृभोक्तृस्वभावत्वविरोधात , सा किं कर्तृ. स्वभावा वा स्याद् भोक्तृस्वभावा चा ? कर्तृस्वभावत्वे न भोक्तृत्व- भावत्वम्, भोत्कृस्वभावत्वे न कर्तृत्वं स्यात् । नच कर्तृस्वभावत्वमेव भोक्तस्वभावत्वम्, घटकलशादिपदानामिव कर्तृभोक्तृपदयोरभिन्नप्रवृत्ति- निमित्तकत्वेन पर्यायत्वापातात् चरमस्य कर्तृत्वाभावाच्च भावे, वा चरमत्वविरोधात् नचादौ कर्तृस्वभावैव अन्ते च भोक्तृत्वभावा मध्ये तूमयस्वभावेतिवाच्यम् द्वैरुप्यविरोधात् । एवञ्च क्षणिकत्वसाधको द्वितीयोऽपि हेतुर्निरस्तः । क्षणिकत्वसाधकस्तृतीयोऽपि परिणामात्मको हेतुः पूर्वप्रदर्शितः सुगततनयैरयुक्तस्तथाहि-अतादवस्थ्यलक्षणः परिणामोऽपि क्षणिक- त्यसाधने (निरन्वयनाशसाधने) न समर्थः सर्वकालमेव बालकुमारादि भावेन घटशरावादिभावेन च विभिन्नरूपत्वेऽपि देहमृदादिभावो. पलब्धेः । अयमाशयः चित्रज्ञाने नानाकारोपलम्भेऽप्येकरूपोपलम्भात यथा चित्रैकरूपताऽविरोधस्तथा परिणामित्वेन भेदसिद्धावपि 'सोऽय देहः' इत्याद्यभेदोपलम्भाद् न स्थैर्य्ययाधः, अनुभवसिद्धयोर्भेदाभेदयो- रपि समावेशात । एवञ्च यस्मात्कारणात् न सर्वथाऽर्थान्तरगमनम् नचैकान्तेनार्यान्तरागमनम् एतादृशः परिणामः पण्डितैः स्वीकरणीयः "तद्भावः परिणामो यत् तत्तेन तथाभूयते” इतिवचनात् । युक्तमेतत् सुवर्ण हि कुण्डलतया परिणममानं न सर्वथैव कुएउलभावं भजते, सुवर्णरूपस्यापि परित्यागापत्तः, नच सर्वथा न भजतेऽपि अकुएड. .
श्राश्रयन्यनवृत्तरेवाच्छेदपत्पेन घटदैन घटेऽनित्यताया द्रव्यान
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महागना) kaat यादव
परिमन प्रतिवाद • Hiftनागन।
स्थर मिप ममय नियानि पाप बस्नुन: मितिः, घट.
नियोगिकत्वेन बंमानुभवका ममानवियवदातगाट बंगप्रति
योगवनप्रतियोगिवत नामानिन्यबानित्यचार्विनाम । अध
पर्यायतया च नित्यानित्यत्वगुपपत्म्यनं गुलाफलादी श्यामनारकतयो.
विभिन्न देशावच्छेदम्पाया खगशो व्याप्तवल नगगनवान्योन्यव्यानि
व्यवस्थितविभिन्न देशानवच्छिन्नापृथग्भावस्येव तदर्थत्वादिति चेन्न
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अत्र शेपकारAft नामिशिष्यादितासो
वृने शाग्यागलाद्यवच्छंदन कपिपयोगदभाववदकत्रापि द्रव्यतया
.
स्तवंकः ] कल्पलतावतारिका [ १३३ च नित्यताया असम्भवात् , न हि भवति शाखायां शाखात्वावच्छे- देन कपिसंयोगाभावः, वृक्षत्वावच्छेदेन कपिसंयोग इति किश्चैवं नित्यत्वादिज्ञानम्यानित्यत्वादिधी प्रतिबन्धकताया अव्याप्यवृत्तित्वज्ञा- धुत्तेजकत्वं वाच्यमिति गोरव मिति कथयन्ति । अत्राहुः सिद्धान्तिन:- प्रत्यभिज्ञैव वस्तुनो नित्यानित्यत्वे मानम्, पूर्वोत्तरतत्तेदन्तास्व. भावभेदानुविद्धस्यैवोलतामामान्याख्याभेदस्य तया विषयीकरणात् । नच तत्तेदन्तोभयनिरूपितकस्वभावमेव तत्, भिन्न काले तदभावादेव च तदननुभव इति युक्तम् , "इदानीं तत्रास्वभाव मिदम्" इति व्यव- हारप्रामाण्यप्रसगात् । किश्च विशिष्टात्यन्ताभाववद् विशिष्टध्वंसोऽपि परेणाकामेनापि स्वीकर्तव्यः, " शिखी विनष्टः" इति प्रतीतेरन्य- थाऽनुपपत्तेः। प्रतियन्ति च लोका अपि नित्यानित्यत्वं वस्तुन:- "घटरूपेण मृद्रव्यं नष्टं, मृद्रूपेण न नष्टम्' इति घटरूपेण घटो नष्टः न तु मृद्रूपेण इत्यादि, अधिकं स्याद्वादकल्पलतायामवलोकनीयम् । क्षणिकत्वसाधकं "क्षयेक्षणात्" इति पूर्वमुपन्यन्तं, तुरीयं हेतु. मधुना निराकरोति सिद्धान्तशिरोमणिराहतमुख्यः सूरिराट् । तथाहि-यत्पूर्व क्षणिकत्ववादिभिः अन्ते क्षयदर्शन प्रथमक्षणे वस्तुनः सर्वथा नाशस्यानुमापक मति प्रोक्तम्, तन्न समीचीनम् , तस्यैव वस्तुनोऽन्त एवं क्षयस्वभावत्वात् , अन्ते क्षयदर्शनस्य प्रथम- तणनाशानुमापकत्वाभावात् , अन्यथाऽतत्स्वभावत्वात् । यदि प्रथम- क्षण एव नाशस्वभावं वस्त्वभ्युपगम्यते, तर्हि अन्त एव क्षयदर्शनं . कथम् , आदावेव फुतो न तदर्शनं स्यात्, न च भवति ततः प्रथमक्षणे क्षयस्वभावता नाभ्युपगन्तव्येति । न च सहशोत्तरोत्तरक्षणप्रतिरोधात् 7 . - नहि। वतन्त इति शेषः । किम्-प्रश्नार्थ कमव्ययम् । अपितु वर्तन्त . 1!! - 1111.11.1: . 1 | | art- Attiti ti नाप-fifi Hassff; {{{ff.! . . ! पामापा ५.१ ५.fier of गायः पुal वामाननम: १११, fall in Iran सादगा या महिती वामाननगः । भावना: श्रीपाच- नाथम्य । पदो-चरगी। चन--। दृदय-अन्तःकरणे । पदम्- म्यानम् । धत्तः-धारयाः । तत्-नाई । गुग्दु-कामकलश-स्वर्धेनवः- कल्पवृक्ष मनोरथपूरकपूर्णकुम्भ-मर भयः । अन्तिक-मीप न- एवेति भावः । किं कुत्मायां विन च निपक्षप्रश्नयारपी' तिमेदिनी । भगवच्छीपार्श्वनाथविषयककविगतरन: प्राधान्येनाभिव्यज्यमानत्वा- द्भावध्वनिर्व दितव्यः अनुप्रासचालकारः । (कल्पलता) आगच्छत्रिपदीनदीसमुदयद्भङ्गभ्रमप्रोच्छल- तर्कोर्मिप्रसरस्फुरन्नयरयस्याद्वादफेनोच्चयः । ६.१ .in ::: : : { 13.4.२६ . firf bf ....:.1{{1}{{.. " মানন- - स्तवक्र: ] कल्पलतावतारिका [१४७ . यस्याद्यापि विसृत्वरो विजयते, स्याद्वादरत्नाकर-- स्तं वीरं प्रणिदध्महे त्रिजगता-माधारमेकं जिनम् ॥३॥ अन्वयः-- अद्यापि, यस्य, आगच्छत्रिपदीनदीसमुदयन्द्रमभ्रमप्रोच्छ- लतामिप्रसरस्कुरमयरयस्यावादफेनोश्यः, पिस्त्वरः, स्याद्वादरत्नाकरः, विज- यते, निजगताम्, एकम, आधारम्, तम्, वीरम्, जिनम्, प्रणिदामहे । (कल्पलतावतारिका) अद्यापि-अगत्वेऽपि । यस्य-बुद्धिविषयीभूतस्य चरमतीर्थ- कृतो धर्द्धमानस्य । आगच्छत्रिपदीनदीसमुदयङ्गभ्रमप्रोच्छलतों- मिप्रसरस्फरन्नयरयस्याद्वादफेनोचय:-त्रयाणां पदानां समाहारनि. पदी सैव नदी तरङ्गिणी। अपनेइ वा विगमे इ वा धुवे इ वा' इत्यात्मिका आगच्छन्ती भिन्नभिन्न प्रदेशादायान्ती चासो त्रिपदी नदी आगच्छत्रिपदीनदी ततः समुदयन्तः समुत्पद्यमानाः भङ्गाः सप्तभङ्गी एवं भ्रमा आवर्तास्तत: प्रोच्छलन्तः प्रकर्षणोद्गच्छन्तस्तकी विचा- रणा एवोमयस्तरङ्गास्तेषां प्रसरः प्रसरणन्ततः स्फुरन्तो विजृम्भमाणा विलसन्त इति यावत् नयाः सद्वचनरचनप्रकारा एव रया वेगा. स्तेभ्यः ( समुत्पद्यमानः) स्याद्वादः- स्यात्पदलाञ्छितवाद एव फेनो- घयो डिण्डीरसमूहो यस्य यस्मिन् वा स तथा । विसृत्वर:-विस्ता. रयुक्तः । स्याद्वादरत्नाकरः-स्याद्वादोऽनेकान्तदर्शनमेव रत्नाकरः समुद्रमंथा। विजयते-सर्वोत्कर्पण वर्तते। त्रिजगताम्-त्रिभुवनानाम् । एकम्-मुख्यम् । आधारम्-आश्रयस्वरूपम् । तम्-बुद्धिविषयीभूतम्। वीरम्-नामैकदेशे नाममहणान् महावीरम् । जिनम्-तीर्थकृतम् । ।
उच्छिद्यते, तत्. सकः ? सम्प्रति कर्णामृतम्, आईतशास्त्रवार्ताम् , पोदकम् , तस्मिंस्तथा । पीते-पानकर्मीकृते पानक्रियानिलपितकर्म. तामापादिते इति यावत । अपि-सम्भावनायाम् । वः-युष्माकम् । सलिलं निपीयाऽपि तप्तिमलमत्तागमानेन समीचीनममृतं (जलम) १४८ ] शासवातीसगुणयस्य [पटः प्रणिदध्महे-सम्यग्यानविषयीकुर्मः । सावयवरूपकमलङ्कारः । अनुः बन्धचतुष्टयसूचनाप्यनुसन्यम् । प्रस्तुत विषयमवतारयन्ति-पीत इति । (कल्पलता) पीतेऽन्यवार्ताकलुपोदकेऽपि, नोच्छिद्यते तत्वपिपासया वः । आकर्णयन्त्याईतशाखबाती, कर्णामृतं सम्प्रति तत् सकर्णाः ॥४॥ अन्वयः - अन्यवार्ताक्लुपोदके, पीते, अपि, वः, तत्त्वपिपासया, न, आकर्णयन्तु । (कल्पलतावतारिका) अन्यवार्ताकलुपोदके अन्येपां चार्वाकादीनां वार्ताः सिद्धान्ता अन्यवार्ताः, ता एव कलुपोदकम्-कालुप्ययुक्तं जलम् अन्यवार्ताकलु, स कर्णानामितिशेषः । तत्त्वपिपासया-तत्त्वं याथायमेवामृतम् तस्य पिपासा पातुमिच्छा तत्त्वपिपासा, तया तथा। न-नहि । उच्छिद्यते- समुच्छेदः प्राप्यते विनश्यते इति यावत् । तत्-तस्माद्धेतोः । सकर्णाः !-सज्जकर्णन्द्रिया भवन्तो भवन्त विबुधाः ! सम्प्रति-अधुना । कर्णामृतम्-श्रवणसुखकरम् । आईतशास्त्रवार्ताम्-जैनाऽऽगमसिद्धा न्तम् । अमृतपदस्याजलिझतया वार्ताविशेषणत्वेऽपि नपुंसकतैव । आकर्णपन्तु-शृण्वन्तु । यथा सातिशयपिपासुना कालुप्याकुलित - - - [१४६ भागुफामेन मुमकिन भूगो सौर गत्ययुगुनिरन्गीय पिता मिशन समारोऽपि मनोनयनियनः स्योऽपि सुबई जैनागमिता पायनानिनिमायः । पासिमियमदीपिका परमनस्योपनियतां द्वितनुम्मानि:से. মাগলনানান, লাশকা মানা मूरिंग: अन्य इनि- (माया) अन्ये वाहुरनायेव, जीवाजीवात्मकं जगत् । सदुत्यादव्ययधोव्य-युक्तं शासकृतश्रमाः ।।१।। अन्यग: बातममा, अन्ये, 3 जवानी मामलम् . सगुलार- पोन्मयुना, कगण , अनाति, , पाद: । (क) शासनश्रमा:-तापु प्रयरनोपनियमादिपु हतो विदितः भमो यानादसा: फलप्रवचनोपनिषध्ययनमायाः । अन्ये- पाकादिभ्यः परं पाहताः । तु-पुन: । जीवाजीवात्मकम्-जीपा- तनाबाजीया अचननामाऽऽस्मानः समुदायनो यस्य तराया । सेन चिन्नामादिषादनिगमः मनुत्पादव्यपत्रीव्ययुक्तम्-सन्ति पार- मायिफसत्तावन्ति न तु मानिमासिफामसायन्ति उत्पादन्ययाधीच्याणि मदुत्पादन्ययाव्याणि तेचुभम् विशिष्टं तथा पारमार्थिकोत्पादव्यय. : भौष्यमयमित्यर्थः । जगन्-जगत्पदप्रतिपाद्यम् , विश्वम् । अनादि- प्रयाहापेश्या सातनम् । एव-व्यवस्थायाम् । तेन नेचराविन नया प्रधानपरिणामादितमिति लभ्यते । आयु:-पाययन्ति ।
१५० ]
शास्रवातीसमुच्चयस्य
[ सप्तमः
"
सूरिवरैर्जगत उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तत्वं व्यवस्थापितन्तत्रोत्पादः-
"उत्पन्नमिदम्" इति बुद्धिसाक्षिको धर्मविशेषः, स द्विविधः, प्रयोग-
जनितो विनसाजनितश्च, तयोः पुरुपव्यापारजन्यः प्रथमः, स च
मूर्तिमद्रव्यारब्धावयवकृतत्वात समुदयवादः, अत एवासावपरिशुद्ध
,
इति गीयते, तदुक्तम्-
। उप्पासो दुवियप्यो, पयोगजणिो का वीससा चेव ।
तत्थ य पोगजणिओ, समुदयवाओ अपरिसुद्धो ॥३॥३२॥
इति सम्मतिसूत्रे गाथा ।
अत्रापरिशुद्वत्वं स्याश्रययावदवयवोत्पादापेक्षया पूर्णस्वभाय.
त्वम्, 'अपूर्णावयवस्य घटस्योत्पद्यमानन्य साकल्येनोत्पन्नस्वव्यवहा.
राभावात् । ननूत्पादम्य भवदुक्तं प्रयोगजन्यत्वमनुपपन्नम्, प्रयत्न
जन्यत्वस्य घटादावेव सत्त्वात, उत्पादस्य पुनराद्यक्षणसम्बन्धरूपस्य
तजन्यत्वाभावान इतिचेन्न "मुद्गरपाताद नष्टो घटः" इति विश्वजनी.
नव्यवहारतो नाशे
मुद्गरपातजन्यत्ववत् "पुरुपच्यापारादुत्पन्नो घट:"
इनि मर्वजनीनव्यपदेशतः पुनरुत्पादेऽपि पुरुपच्यापारजन्यत्वस्या-
वश्यकत्वात, विविच्याननुभूयमानत्वेनोत्पादापलापे स्वीकृते च नाश
म्याप्यपलापप्रमझान, उत्पत्तेगवाक्षण सम्बन्धेनान्यथासिद्धी नाश
म्यापि चरमक्षणसम्बन्धनाशेनान्यथामिद्धेः सुवचत्वात, अन्यत्र तदा
धारनायत्ययम्योत्पन्याधारताप्रत्ययम्यवावच्छेदकत्वनोपपत्तेः ।
ন দুনিয়াবিন নাহ বিন মুখন নি মা মরা
नयोत्पादोऽपि दिल नाण एवंनि तुल्यम् । किटोव मादादाणे 'प्रादा
गदि
.
दिलाः प्रयोगजानन पियमानीय ।
न प्रसंग ना मादसवावारिसादः ॥३॥३२॥
स्तवत्राः ]
নাখনাকি
[ १५१
एसम्मन्धवान् घट: "इतिवत आदानण उत्पन्नो घट." इति प्रयोगो
न सूपपादः स्यादिति न किञ्चिदेता ।
पुरुपच्यापाराजन्य उत्पादो द्वितीयः, पुरुपेतरकारकच्यापार.
जन्यत्वं तु स्वरूपकथनमेव, न तु लक्षणम्, प्रायोगिक ऽतिव्याः ।
लद्विविधः-समुदयजनित ऐकत्विकम्य । तत्र मृर्तिमव्यावयवारब्धः
समुदानित: इतर कत्विकः, प्रायोऽभ्रादीनामुत्पादः, बटादीनाम-
प्यप्रथमतया विशिष्टनाशस्य विशिष्टोत्पादनियतत्वात । न हि मृा.
वयवसयोगकृतत्वं समुदयजनितम्बम् विभागकृतपरमाण्यागुत्पादेऽ.
व्याः, किन्तु मूर्तावयवनियतत्वम् । द्वितीयस्तु. गगनधर्माधर्मास्ति-
कायानामवगाइकगन्तस्थानद्रव्यसन्निधानतोऽवगाहनगतिस्थितिकियो-
त्पत्तेरनियमेन
स्यात् परमत्ययः, मूर्तिमदमूर्तिमदवयवद्रयद्वयोत्पाद्य-
त्वात् । अवगाहनादीनां स्यादेवस्विकः स्यादनकात्विकश्चेति भावः ।
तटुक्तम्-
1 साभाविओं वि समुदयकउच्च एगत्तिउव्व होजाहि ।
आगासाईबाणं तिण्हं परपञ्चमोऽणि अमा ॥३॥३३॥
इति सम्मतिगाथायाम् ।
व्ययोऽपि स्वाभाविकः प्रयोगजनितश्चेति द्विविधः, तद्वयाति-
रिक्तस्य वस्तुनोऽभावात पूर्वावस्थाविगमव्यतिरेकेणोत्तरावस्थोत्पत्स्य-
नुपपत्तेः । न हि बीजादीनामविनाशेऽनुरादिकार्यप्रादुर्भावो हः ।
नचावगाहगतिस्थित्याधारत्वं तदनाधारत्वस्वभावप्राक्तनावरणध्वंसम-
न्तरेण संमवतीति ।
। स्वामाविकोऽपि समुदवकृतो चैकल्पिको वा भविष्यति ।
आकाशादिकानां प्रयाणां पर प्रत्ययोऽनियमान् ॥३॥३३॥
[ १४:
१७८]
शापानमा
मियानामिकामानेगेणिमालामावान
को मागनोनिगमः' :T, IT लागावागणः
समुदाय गो पर्यायान, नविपणापरित्यागातीनां
शानानां मगुहागाभागात । लिगु मनिपनो-
: ता कि गागा मिलती सणसापनिवादा।
अण्णागिम्सिना उगा सति समतसम्भावा ॥२॥२१॥
ननु यथा बहुगुल्गान्यपि रत्नान्यननुम्यूतानि "रत्नावली" इति
व्यपदेश न लभन्त, अनुम्यूतानि न तान्येव "रत्नावली" इति
व्यपदेशं लभन्ते त्यजन्ति च प्रत्यकमज्ञाः, तथा नया अपि प्रत्येक
सम्यक्त्वव्यपदेशं न लभन्त समुदितास्तु तं लभन्ते, जहति च दुर्न-
यसंज्ञाः इति कथं दृष्टान्त इति चेत , निमित्तभेदेन व्यपदेशभेद एवार्य
दृष्टान्तो न तु प्रत्येकसमुदायभाव इति दोपाभावात् ।
ननु "घट उत्पन्न एव" इति स्यादेशविनिर्मुक्तस्य दुर्नयस्यापि
नयवत् स्व विपयावधारकत्वमस्त्येव, एवकारेणानुत्पन्नत्वाभावज्ञापने-
ऽप्युत्पन्नत्वप्रकाशनव्यापारापरित्यागात् , अनेकान्तवलादुभयोपपत्तेः,
रक्ततादशायां घटे "न श्यामः" इतिवुद्धिवदिति चेत् सत्यम्, इतर
नयविपयविरोधावधारणे भजनां विना स्वविपयावधारणस्यैवाप्रवृत्तेः
प्राक् श्यामत्वेन ज्ञाते इदानीम् इति विनिर्मोकेण "न श्यामः" इति
बुद्धिवत् प्रवृत्तस्यापि च तस्यान्यथाविपयत्वरूपमिथ्यात्वोपस्थितेः
तदिदमुक्तं सम्मतिसूत्रगाथायाम्-
६ तस्मात् सर्वेऽपि नया मिथ्यादृष्टयः स्वपक्षप्रतिबद्धाः ।
योगमिश्रिताः पुनर्भवन्ति सम्यनस्वसद्भावाः ॥१॥२१॥
PRE]
परमारमारिया
ye
M
i niyam पनि हालतमा
के उस Fिeो व अलिप वा ।। १।२८।
-निजपनीयं-यमित परिमरा । सत्पा:-
मम्मru.: । मनपा:-बहादय:, नाति नायगाहित्याग ।
पररिचालने-माग । मोहा:
-नीति गया यस.
मर्श नि परविषमयापि सायनोन्मूलगिनुमानयान , नरमाये
स्वविमायाधिः, परम्पर माननीमकाया, अन. परविषय.
स्थामा नियन्यायमन्यान गम्मानियस्यमयपधारयन्
रममा फागः पुमान.न् नान्न विमत सत्यानलीवान
पा शिनियायियममा प्राय द्रव्यायः" इत्येवं
भजनया सायाभिनय मलवायभारगति, गदा या यापेक्षा
गाडीन कम्य मतपत्रमा प्रायव्येन नगपामाग्यान । पत एवं
নানিফাঃ সানুষ নবিন বায়
परिमागिना-
। बत्ति समा गास्थि रोगियममुख जातीओ।
में य प मटिको रणाम बोइ भयरणार उ बिसेसो ॥१८
सम्मतिमन्थे ।
प्रागनुभूनापायिर्मयनगुत्पादः म्यनान्तरीयकमाक्पायनाश.
निकवचनीगमगा: सर्वनगाः परविवारी माहाः ।
तान पुन समयो गिमा गमान बालीकान् पा ॥१२
लगानि irani नगी नियम मातितः ।
जगमगायाindan Esमिया नियोगः ॥१९॥
[ सप्तमः यञ्च पूर्वं शोकप्रमादादिवासनातुकं परिकीर्तितं पूर्वपक्षिणा नतु भिन्नवस्तुनिमित्तकमिति तदयुक्तम् - यतो हि शोकादिजनकत्वेन सम. इत्यादिना ग्रन्थेन श्रीहरिभद्रसूरिणाऽनेकान्तजयपताकादौ । स्याद्वादिनः कचिदप्यधिकृते वस्तुनि निश्चयो न युज्यते इति यत्पूर्वपक्षिणोदीरितम् तदपि न समीचीनम् , तस्य निश्चयस्यैकान्त- निवन्धनत्वात् । तथाहि-न तावदस्माकमाईतानां माने कश्चिदमा. त्रिदविरोधात् अवधृतविरोधयोर्धर्मयोरेकत्र धर्मिणि प्रतिभासस्यैव संश. यत्वात् , प्रत्यक्ष मानमेवेति कथम्, अनुमानमानस्वाभावात, प्रत्यक्ष मानमेव' इति प्रयोगो न दुर्घटः," 'न हि मानमेव' इत्यत्र कास्यमेव. च्छेदः, तत्र च व्युत्पत्तिवशाद् मानत्वावच्छिन्नप्रतियोगिताकागोगो पस्थितन दोपः, प्रत्यक्षेऽनुमानत्वावच्छिन्नायोगसत्वेऽपि मानत्वाव. १६२ ] शास्त्रवातासमुचयस्य नन्तरज्ञानक्षणलक्षणा सा वासना न कदाचिन्निर्हेतुका भवितुमर्हति, निर्हेतुकत्वे तस्या उत्पत्तिशीलत्वे च सदाऽनुत्पत्त्यापत्तिरिति । व्यवस्थापितश्चायमर्थः यतः स्वभावतो जातमेकं नान्यत्ततो भवेत् । कृत्स्नं प्रतीत्यते भूतिभावत्वात्तत्स्वरूपवत् ॥१॥ अन्यच्चैवविधं चेति यदि स्यात् किं विरुध्यते । तत्स्वभावस्य कात्स्न्येन हेतुत्वं प्रथमं प्रति ॥२॥ नत्वसमावेशादप्रामाण्यसंशयादानिश्चयः, मानत्वाऽमानत्वयोः कथ- स्य स्वमानत्वेनैव मानत्वात्, अनुमानमानत्वेन चामानत्वादिति । अत्र नैयायिकादय:--"ननु प्रत्यक्षस्यानुमानान्यत्वेऽपि 'प्रत्यक्ष कारार्थ: कस्याप्येकस्य फरस्नमानरूपत्वाभावात , टिनायोगाभावान। किन्त्वयोगव्यव- .
स्तमकः ] फल्पसताववारिका [१६३ पत्रेययकारमयादाऽवसेगा, नधादि-विशेष्यसगन्तवफार- स्यान्ययोगव्यवनडेदोऽयः, यया "पार्थ एवं धनुर्धरः" इत्यादौ, विशे. पणसातैयफारस्यायोगव्यवच्छेदोऽर्थः, यया "शलः पाएहर एय" इत्यादी, शियासगीय कारग्यात्यन्तायोगव्यवच्छेदोऽयः, यथा "सरोज नौल भवत्येवा इत्यादी अन तत्तविशेष्यसतैवकारादेतत्तदन्ययोग- व्ययपदादी शतिरिति । अपरे पुन: पवफारस्यात्यन्ताभावः, 'अन्योन्याभावश्चार्यः । "पृथिव्यां गन्धः' इत्यत्र पृधियोपदे पृथिव्यन्यस्मिलक्षणया गन्चे प्रत्यान्वित विभक्त्ययस्य लाक्षणिकार्यान्वितविभक्त्यान्वितस्यैव- कारार्थव्यवच्छेदम्य वात्ययः । "पार्थ एव धनुर्धरः" इत्यत्र शक्ये पार्थे विशेषणस्य धनुर्धरम्य तादात्म्येन, लक्ष्ये च पार्थान्यस्मिन् धनु. धरान्योन्याभावस्याचाराधेयभावेन । शीत एव स्पर्शो जलवृत्तिः" इत्यत्र शीतपदोपस्थापितयोः शीततदन्ययोरभेदेन स्पर्शेऽन्वयः, शोता. न्वितस्पर्श जलवृत्तितादात्म्यम्, शीवान्यस्पर्श घ जलवृत्तेरन्योन्या- भाववत्त्वं प्रतीयते" इति वदन्ति । अन्ये च--प्रन्यो व्यवच्छेदश्च तदर्थः, व्यवच्छेदोऽपि द्वयी अत्यन्तामावश्च अन्योन्याभावश्च । एवकारे च प्रायेण समभिव्या. हृतप्रातिपदिकसमान विभक्तिकत्यम् , विभक्तिनवणन्तु न लुप्तत्वात् , स्वभाववैचित्र्याच। तदर्थेऽन्यस्यान्वयो न व्यवच्छेदस्य समभिन्याहृत- प्रातिपदिकाय चैवकारोपस्थितेऽन्यस्मिन्नप्यन्वयः, एवमन्वयान्तर- नियमोऽपि स्वीयैकार्यान्विताधान्तरयोधकत्वमपि तस्य स्वभावधि- ध्यादेव । एवं पृथिव्यामेव गन्धः" इत्यन पृथिव्यां गन्धः, पृथिव्यन्य- स्मिन् न गन्धः इत्यन्वयः । "चत्रो जलमेव भुक्त" इत्यत्र चत्रो जलं - [सप्तमः स्कुलिङ्गा न तस्यैव साकल्येन तदप्रतिपादकाः) अंशिभूतस्य स्याद्वाददर्शनस्यैव परिक्लेशाय स्थादादविद्याश्रयः, रम: (स:) टेकधिया, एकः, न, गम्यते, यः, प्रीमी- १७८ ] शास्त्रवार्तासमुच्चयस्य कणाः । "त्रिपु म्फुलिङ्गोऽग्निकणः” इत्यमरः । तस्य-अग्नेः । एव-खलु । पराभवाय-पराजयाय । भवन्ति-जायन्ते । किम्- प्रश्नार्थकमव्ययम् । "किं कुत्सायां वित: च निषेधप्रश्नयोरपि" इति मेदिनी । यथाऽग्ने: सकाशादुत्पन्नास्तदंशभूताः पराभवाय भवन्ति प्रत्युत तत्सहायभूता एव जायन्ते तथैव स्याद्वाद- दर्शनस्य पृथगेकदेशभूता एव परेपां नयाः (अंशतः स्याद्वादप्रतिपादकाः नैव भवितुमर्हन्ति, उपजीव्यविरोधादिति भावः। दृष्टान्तालङ्कारः "दृष्टान्तस्तु सधर्मस्य वस्तुनः प्रतिबिम्बनम्" इति तल्लक्षणम् । (कल्पलता) एकश्छेदधिया न गम्यत इह, न्यायेषु बाह्येषु यो, देशप्रेक्षिपु यश्च कश्चन रसः, स्याद्वादविद्याश्रयाः ? यः प्रोन्मीलितमालतीपरिमलो-गारः समुज्जृम्भते, स स्वैरं पिचुमन्दकन्दनिकर-क्षोदान मोदावहः ॥८॥ अन्यय:-दह, देशप्रेक्षिपु, बाह्येषु, न्यायेपु, यः, च, यः, निमालनीपरिमलोद्गारः, (मोदावहः) समुज्जृम्भते, सः, स्वैरम् , पिनुमन्दः केन्दनिकारोदात्, मोदावहः, न । (उत्पल लावतारिका) इद-ए। दंगप्रेक्षिपु-देशमेक देशम, कश्चिदेवांशमिनि यायन प्रेशन्ने दन्ट्रीला देशप्रनिगाः "अज्ञात: शील",1१1१५४॥ शिन प्रन्ययः, नया : वायंग-अनेकान्नादि । श्रन, - - - स्तक] [ १७६ न्यायेषु-मन्यदर्शनपु । य:-युरिषिपोभूतः, ( रम:- आरवादः, मानन्द इति यायन) च-पुनः । य:-बुद्धिविपयोभून: । पाश्चन- अनिर्वचनीयः, अपूर्व इनि यापन । म्पावादविद्याश्रयः-अनेकान्त विद्यालम्मनः । रसः-धानन्यः । (म: रम:) शधिया-विवन्धयुरुषा। एक:-समान: 1 न-नादि । गम्यते-शायते । एकान्त विशालम्बनो रसोऽन्यः (अपकत्वामयः ) पर स्यामादविशालन्यनन्तु लोकोतरो विलक्षण एप तयोः साम्पलेशो नास्ति, अनेकान्न विगाया एकान्त- विद्यासम्मिश्रणासहिष्णुस्वाग, पतदेव उष्टान्तेन समर्थयनि-यः प्रोन्मी- लितमालतीत्यादिना-य:-चुद्धिधिपयीभूतः । प्रोन्मीलितमालतीपरि- मलोद्गारः प्रफुटितमालतीफुसुमविग त्यसौगन्ध्योमासः । विजृम्भते- विशेषेण पुरति, निरनिशयमोददायको भवतीत्यर्थः । सः-ताहरा. परिमलोद्वारः । पिनुमन्दकन्दनिकरलोदात्-निन्यफन्द्रकादम्पचूर्ण- सम्मिान । मोदापहः-प्रमोदसम्पादकः । न-नहि भवतीविशेषः । यया-प्रोन्मीलितमालतीपरिमलोद्वार: स्वाप निम्यफन्दनिकरसम्मि- अरणादशोमनो भवतीति तयोः साम्य दुर्घटन्तथैव स्वावादविदा- लग्मनोऽपि रसः स्थापेक्षयाऽपएबागदर्शनालन्यनरससम्मिश्रणाद- शोभन एवं भवेदिति स्यामादविद्यायाः परम उत्कर्योऽनेन ध्वन्यते । (वल्पलता) अभ्यास एकः प्रसरद्विवेकः, स्पाहादतत्त्वस्य परिच्छिदाप्यः । कपोपलान्ना परः परस्य, निवेदयत्यत्र मुवर्ण शुद्धिम् ॥९॥ अन्वयः-- सादादतत्त्यस्य, प्रमरद्रियेकः, एक अभ्यासः, परिसिया, भाषः, श्रा, मोपकात , पर:, परम, सुपर्ण न
२१६ ]
शास्त्रवार्तासमुच्चयस्य
"
ग
-
अन्वयः-अत्र, अपि, अन्ये, वर्णयन्ति, मं
भाषितः, दर्शनादिकः, उपायः, विद्यते ।
(अव०) अत्र-मोक्षाभाववादे । अपि-स
परे मोक्षवादिनो जैना इत्यर्थः । वर्णयन्ति-नि
तत्त्वस्य द्रव्यक्षेत्रकालभावभेदेन शुद्धात्मस्वरूपा
श्रेष्ठः, उत्कृष्ट इति यावत् । सर्वज्ञभापितः-
पुनरसर्वज्ञभाषितोऽभापितो वा । दशनादिक
रूप: । उपायः-प्राप्तिहेतुः । विद्यते-अस्तीति
अत्र श्लोके मोक्षतत्त्वस्य इति तत्त्वपदे
भावादेव तदुपाय: शशश्रङ्गोपायतुल्य इति ध्व
समानाधिकरणदुःखप्रागभावासहवृत्तिदुःखध्वंस
यिकमतं न रमणीयम् अतीतदुःखवद् वर्तमान
नाशादपुरुपार्थत्वप्रसङ्गात् । न च हेतुविनाशा
श्चित्तवदिति वाच्यम् तथा सति दुःखानुत्पादस्य
वा प्रयोजनत्वप्रसङ्गात् । न च चरमदुःखध्वंसे
तत्त्वज्ञानस्य प्रतियोगिवद् हेतुत्वम् प्रतियोगिनः
दनात् , पुरुपार्थसाधनतया दुःखतत्साधनयोरहि
वाच्यम्, चरगत्वस्याऽऽर्थसमाजसिद्धत्वेन कार
अन्त्यदुःखे उपान्त्यदुःखस्यैव हेतुत्वेन तस्य तत्त्वः
क्यत्वात् , भोगेनैव कर्मणां नाशे नानाभवभोग्य
मशक्यत्वात् , तत्कर्मभोगस्य चापूर्वकर्माजकत्वेन
च तत्त्वज्ञानवलार्जितेन कायव्यूहेन तत्तत्कर्मभोग
३
स्तनकः ] कल्पलतावतारिका [ २१७ २ , समीचीनम्, मनुजादिशरीरसत्वे शूकरादिशरीरोत्पादायोगात , देवा- दीनां तु वैक्रियशरीगदिकर्मोदयमहिम्नैव नानाशरीरमरणोपपत्तेरिति । "दुःखेनात्यन्त विमुक्तश्चरति" इतिश्रुतिस्वरमाद दुःखात्यन्ता- भाव एव मुक्ति, दुःखसाधनध्वंस एव च स्ववृत्तिदुःखम्यात्यन्ताभाव. सम्वन्धः, स च साध्य एव" इति नैयायिकैकदेशमतमपि न समी. चीनम् दुःखसाधनध्वंसस्य दुःखात्यन्ताभावसम्बन्धये मानाभावात् । "दुःखध्वंसस्तोम एव मुक्तिः" इति कंपत्तिदेकदेशिमा मत- मपि नो वार्तम् , स्तोमस्य कथमप्यसाध्यत्वात । "आनन्दमवपरमात्मनि जीवात्मलयो मुक्तिः" इति त्रिदण्डि- मतमपि न पेशलम्, एकादशेन्द्रियसूचममात्रापस्थित पश्चभुतात्मक- लिङ्गशरीरापगमरूपलयस्य नामान्तरेण नामकर्मक्षयरूपत्वादेव यदि चोपाधिशरीरनाशे औपाधिकजीवनाशो लय इत्युच्यते तदा तेन रूपेणाकाम्यत्वादपुरुषार्थत्वात "अनुपप्तवा चित्तसन्ततिर्मुक्तिः" इति बौद्धबुद्भिरपि न सूक्ष्मा सन्ततेरवस्तुत्वेनासाध्यत्वान । न च सन्ततिपतितक्षणानामेव पूर्वोत्तर- भावेन हेतुहेतुमद्भायान तत्साध्यत्वम् , संसारानुच्छेदप्रसङ्गात सर्वज्ञ मानचरमक्षणायापि मुन ज्ञानप्रथमक्षण हेतुत्वेन तत्सन्ततिपतितत्वात । अथ न हेतुफलभावमात्रादेकसन्ततिव्यवस्था, अपि तूपादान- हेतुफलमावात, न च सर्वज्ञज्ञानन्य चरमक्षण उपादानम्, आलम्बन- प्रत्ययो हि सः समनन्तरप्रत्ययश्चीपादानमिति चेत् न तुल्यजातो. यस्योपादानत्वे मुक्तचित्तसर्वज्ञज्ञानयोस्तुजातयल्यीतानपायात सर्वश- मानघरमक्षणस्याऽऽधमुक्तचित्तानुपादानत्ये तस्यानुपाए २२६ ] शास्त्रवार्तासमुच्चयस्य [ नवमः - (कल्पलता) शृणु गुणान् वहतां सुकृतस्पृशां, किमुपधेर्वत दुस्त्यजताऽपि न । अभिनिवेशमपास्य विमृश्यतामिदमुदीरितमुज्ज्वलभावतः ॥६॥ अन्वय:- शृणु, गुणान् , वहताम् , सुकृतस्पृशाम् , उपधेः, अपि, दुत्यजता, न, किम् , अभिनिवेशम् , अपात्य, उज्ज्वलभावतः, इदम् । उदीरितम् , विमृश्यताम् । (कल्पलतावतारिका) शृणु-समाकर्णय । गुणान्-दयादाक्षिण्यपरोपकारित्वादीन् । वहताम्-संसेवमानानाम् , महात्मनामिति यावत् । उपधेः-वस्रा. छुपकरणस्य । अपि-खलु । दुस्त्यजता-दुःखेन त्यक्तु योग्यता । न-नहि । किम्-प्रश्नार्थकमव्ययम्, अपि तु दुस्स्यजतेतिभावः । अभिनिवेशनम्-दुराग्रहम् । पक्षपातमिति यावत । अपास्य-अपनीय। उज्ज्वलभावतः-विशुद्धभावनात: । इदम्-प्रत्यक्षम् । उदीरितम्- निगदितम् । मयेति शेषः । विमृश्यताम्-विचार्य्यताम् । एकल्पलता) दीर्वदेहस्थितहतो-राहारो दुस्त्यजो यथा । तयोपकरणं धाष्टर्यमुभयत्र समोक्तिकम् ॥७॥ अन्वयः-दीर्घदेहस्थिते:, हेतोः, आहार:, यथा, दुस्पजः, तथा उपकरणम् , धार्टयम् , उभयत्र, समीकिकम् । (कल्पनु तावतारिका) दोवदेहस्थिते-मुचिरकालपश्यन्नशरीगवाथाना । हतो:- कारण । आहार:-भोजन । यया-येन प्रकारगण । दम्पन:- " स्तन ] শােনা [२२७ दुन्येन न्युम चोगः । तथा-गन प्रकारेण । उपकरणम्-त्राचार- साधनं यादि । दुग्ल्यागिनि शेषः । पाष्टर्यम्-महारथ बुरत्यजत्वं न पारस्यति गात्यम् । उभयत्र-यमवरे । समोक्तिकम्- समा गुल्या ar: कयने याम नत्तधा। उपकरणं सर्पया दुस्त्यश. मित्वयारमाभिरपि निगदितुं शक्यवान । - शुत्पीरिनातेप्यानस्य, यया पशनमापधम् । तया शीतादिमीनाना-मपि बसादिसेवनम् ॥८॥ अन्नय:-रोहिताचानस्य, हि, गया, अशनम , औषधम् , नीलादिभातानाम्, वनादिसंगनम्, अषि, गया। (कारलतास्तारित्रा) सुत्पीडितातध्यानस्प-शुपारितानां बुभुज्ञाव्यथितानो पदार्त- ग्यानन्नस्य तथा । हि-नियेन । यथान्येन प्रकारेण । अशनम्- भोजनम् । औषधम्-मेषजम् . भवतीनिशेषः । शीतादिभीतानाम्- शीतादियस्नुभयोज्यमययताम् । बसादिसेवनम् -बनादिधारणम् । अपि--पनु । तया-वेन प्रकारेण । श्रोपधरूपमेवेति भावः । क्षुत्पी. डितातध्याननिवारणार्यमशनमिव शीतादिभयापनयनार्य पखादिसे- बनमध्योपवरूपमिति वनादिधारणमावश्यकम् । (कल्पलता) कामिनीविरहसमवदुष्टध्यानसन्ततिमपासितुमेवम् । कामिनीमपि किं न कमनीयां स्वीकुरुध्वमिति चेत्सममवत् ॥९॥ अन्धयः-एपम् , कामिनीविरहसंमपनुष्टध्यानसन्ततिम्, अपासितुम् कमनीयाग , कामिनीम् , अपि, किम् , न, स्योकुयध्वम् , इति, चेत् , २२८ ] शास्त्रवार्तासमुच्चयस्य [ नवमः श्वं. -- एतत् , समम् । (कल्पलतावतारिका) एवम्-अनेन शीतादिभीतसम्बन्धिवस्त्रादिसेवनादिप्रकारेण । कामिनीविरहसम्भवदुष्टध्यानसन्ततिम्-लल नाविप्रयोगजनितदुष्टध्यान- परम्पराम् । अपासितुम्-अपनेतुम् , दूरीकर्तुमिति यावत । कमनी- याम्-मनोरमाम् । कामिनीम्-अङ्गनाम् । अपि-खलु । किम्-कथम् । न-नाहि । स्वीकुरुध्वम्-अङ्गीकुरुध्वम् । इति एवं प्रकारेण, कश्यते इति शेष: । एतत्-कामिनीसंसेवनापादनम् । समम्-तुल्यम् । ताम्बर दिगम्बरयोरिति शेषः । तामेव तुल्यतामाद-अन्यथेत्यादि- कल्पलता) अन्यथा पलगुजो न कुतः स्युदिक्पटा उचितपिण्डभुजयेत् । प्रन्युन प्रकटनाममवृत्तेविनं, तत इहापि समानम् ॥१०॥ प्रत्यय:-अगणा, उचितविभुजाः, दिसाटा:, पलमुन:, पुतः, ना म.टनाममता, भावना , चा, नत:, ६६, बार, मानम् । 3) अन्यथा-कामिनी धनयोजयत्र नुयायामा । उचिपिष्ट मा:- प्रामाशाना: । दिवपटा: -41. । परा:- ६.:. ! न:-11-गान न- म्यू:-ए । नाम iiiiiii . -22-23: प्र-: : ! = .......;.. प्रा. . . . . . . . , " ! - , + स्तका ব্যাধি . , भावनम्-गायनानगरम् । भतिः कामिनीविधसभवाननिया- रखा कामिनीदेवनागावयाऽपि मांगमरणम्य दुर्भावनाउनक- वया नानामिनामवनगिनि । चन् यहि । तन:-बग्गा । इह- अग्गिन , फागिनीलेवने । अपि-मनु । समानम्-तुल्यम । फागि- नौसेवनायापि बमोदिताम्माभित्याच्यामिनि भाय: । कामिनीसेवगन्य मागोजगासमुपपादयत- सामयादिना- (फत्वमाला) सहमत ! समयाप्य तहण्याः, पम्प नाम न मनः कलपं स्यात् । निर्मलान्यपि जलानि न कि न्युः, पहलाहरवशान मलिनानि ॥११॥ अन्यय:-! मला, मान, समपात पस, नाम, मनः, मान, स्था, निगनि, अनि, जानि, परमार, मलिनानि, ना तुः, पिम् । (महम्लतायतारिका) । अङ्ग! आमन्त्रणायफमध्ययम् । तरुण्याः-लावण्यशालिन्या अनायाः । सङ्गम्-सम्पम् । समवाप्य -समाधगत्य । नाम- कोमलामन्त्रणे । कास्य-यस्य फस्य । मन:-हदयम् । कालपम्- कालुप्यकरन्यितम् , व्यामोद्दापन्निमिति यावत् । न-नहि । स्पात्- मवेत । अपि तु सर्वस्यापीति भावः । दृष्टान्तेन समर्थयति निर्म- लान्यपीत्यादि-निर्मलानि-बच्छानि । अपि-स्खलु । जलानि- मलिलानि । पङ्कसकरवशात्-कर्दमसम्मिन्नणाधीनत्वात् । मलि- नानि-मलीममानि, कनुपाणीति यायत । न-नहि । स्यु:-भवेयुः । किम्-प्रश्नार्थकमव्ययम् । अपि तु भवन्त्येवेति भावः । सामसत्ति- - .. .. ...... 15 : 11 mins 11 १९.१.१.१ ५.१ PHT- माभिnिii। ...। (जालना) गायोऽरगत शिक्षिका गोऽगानोदयाः । मूर्तिमग हा माणविf नतादिना: ॥१२॥ T:- 11111:, :, iffinal:, fraterः, अगरानोला, अशनमः, ता:, 17, for::, irf TI:, १, , निगदिताः, किम् । (कल्पलतावतारिका) अरसगुवः-अगदिमागताः । व्याधयः-रोगाः, तद्रपा इत्यर्थः । अभृमिका:-अभूम्युत्पन्नाः । विपल्ल्यः-गरलवलारीरूपाः । अगगनोत्या:-अनाकाशोत्पतिताः । अशनयः बझपा: । ताः-धुद्धि- विषयीभूताः कामिन्यः । श्रुतवृद्धः-शास्त्रकारप्रवरैः । मूर्तिमत्यः- शरीरधारिण्यः । मारणविद्याः-तदाख्यविदाः । इव- यथा । न-नहि। निगदिताः-प्रतिपादिताः । किम्-प्रश्नार्थकमव्ययम् । अपि तु निग- दिता एवेति तास्त्याज्याः सर्वे रिति भावः । उपमाधिकारूढवैशिष्टन्य- रूपकालङ्कारौ। तस्माद् विहिताहारवत् विहितस्योपकरणस्यापि दुनिहति- शुभध्यानोत्पत्तिहेतुत्वाद् युक्तं यतीनां तत्परिशीलनम् । विधिश्चात्र "तिहिं ठाणेहिं वत्थ धरेज्जा, हिरिवत्तियं दुर्गछावत्तियं परीसह- । । वत्तियं" तथा- त्रिभिः स्थानवस्त्र धारयेत् , ही प्रत्ययम् जुगुप्सापत्ययम् परीषह- , प्रत्ययम् ।
स्तबकः ] फल्पलतावतारिका [ २३१ पि वर्थ च पायं वा कमल पायपुंकणं । त पि संजमलबट्टा धारति परिहरति ।। एयवादधदइनन्यायेन याचप्राप्त तावद् विधेयम्, इति वनधारणत्य लोकत एव प्राप्तत्वात होकुत्सापरीपहनिमित्तं तद्ग्रहण नियम्यते, तन च निमित्तत्रयमपि जिनकल्पायोग्यानां निरतिशयाना- मधिकारिणामावश्यकम् । अथ ज्ञानादिपुष्टालम्बनेनाटुप्पाहारग्रहणे न दोपः, वस्त्रादेस्तु मलादिदिग्धस्य यूकादिसमूछनानेकसत्त्वहेतुतया तद्ग्रहणे तव्या- पत्तेरवश्य भावात् तद्ग्रहणमपौष्टालम्पनिकत्वाद् न न्यायमिति चेतन श्राहारमहणेऽप्यस्य दोपस्य समानत्यान संभवन्त्येव साग- 'तुकाः संमूर्च्छनजाध्यानेकप्रकारात्तत्र जन्तवः, तत्परिभोगे चार्य भावी तेषां विनाश:, मुक्तस्य च कोप्टगतस्य संसक्तिमत्त्वात् तदुत्सर्गे- उनकाम्यादिव्यापत्तिरवश्यंभाविनीति । यदपि च कथं द्रव्यतः क्षेत्रतः फालतो भावतो वा तपरि- महप्रत्याख्यानस्य वस्त्रोपादाने न पचममहानतमः ? इत्युक्तम् । तदपि मृच्छीपरित्यागे भायत: परिग्रहप्रत्याख्यानोपपत्तावपि द्रव्यतः परिग्रहप्रत्याख्यानमालाभिप्रायेणावगन्तव्यम् । यदपि च "कथं चैयं परद्रव्यरसिमाम्राज्ये स्वात्मप्रतिवन्धमात्र. विश्रान्तश्रामण्यसमृद्धिः ?" इत्युक्तम् तदप्ययुक्तम् परद्रव्यसनिधान- मात्ररूपाया रतेमुक्कावप्यनुच्छेदात अभिबनरूपाया रतेस्तु धर्मोप- करणेऽभावात अनिष्पक्षविपयस्य सतः शरीरादेरप्यधर्मोपकरणत्वात् । यदपि या च पानं वा कम्बलं पादपोष्टनम । तदपि संयमलजार्थ धारयन्ति परिहरन्ति च ॥इति।।
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स्तबकः ] कल्पलतावतारिका [२३१ जपि वत्थं च पायं वा कंवल पायपुंबणं । तं पि संजमलजटा धारति परिहरति अ ॥ एवश्चादग्धदहनन्यायेन यावदप्राप्तं तावद विधेयम्, इति वसधारणस्य लोकत एव प्राप्तत्यात् होकुत्सापरीपहनिमित्तं तद्ग्रहणं नियम्यते, तत्र च निमित्तत्रयमपि जिनकल्पायोग्यानां निरतिशयाना- গিন্ধ্যায্যমামু। अथ ज्ञानादिपुवालम्बनेनादुष्टाहारग्रहणे न दोषः, वस्त्रादेस्तु मलादिदिग्धस्य यूकादिसंमृच्छनानेकसत्वहेतुतया तद्ग्रहणे तव्या- पत्तेरवश्यं भावान् तद्ग्रहणमपौष्टालम्पनिकत्वाद् न न्याय्यमिति चेत् न श्राहारमहणेऽप्यस्य दोपस्य समानत्वात् संभवन्त्येव धाग- न्तुकाः समूछनजान्याने कप्रकारास्तत्र जन्तवः, तत्परिभोगे चावश्य भावी तेषां विनाशः, मुक्तस्य च कोष्ठगतत्य संमक्तिमत्त्वात् तदुत्सर्गे- ऽनेककम्यादिव्यापत्तिरवश्यंभाविनीति । यदपि च कर्य द्रव्यतः क्षेत्रतः फालतो भावतो वा कृतपरि- ग्रहप्रत्याख्यानस्य वनोपादाने न पश्चममहानतभन्नः ? इत्युक्तम्, तदपि मू_परित्यागे भावतः परिग्रहप्रत्याख्यानोपपत्तावपि द्रव्यतः परिग्रहमत्याख्यानभाभिप्रायेणावगन्तव्यम् । यदपि च "कथं चैवं परद्रव्यरतिसाम्राज्ये स्वात्मप्रतिवन्धमात्र- विश्रान्तश्रामण्यसमृद्धिः ?" इत्युक्तम् तदप्ययुक्तम् परद्रव्यसन्निधान- मात्ररूपाया रतेमुकावप्यनुच्छेदात् अभिष्वङ्गरूपाया रतेस्तु धर्मोप- करणेऽभावात् अभिवाविषयस्य सतः शरीरादेरप्यधर्मोपकरणत्वात् । यदपि वानं च पा वा कम्बलं पादपोच्छनम । तदपि संयमलाजार्थ धारयन्ति परिहरन्ति च ॥इति।।
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स्तबकः कल्पलतावतारिका [२४५ मम् । नास्तिकत्वम्-मर्वज्ञाभावस्वीकरण जनिताऽऽस्तिकाभावः । आपतति-समागच्छति । वेदनैपुणपटाऽपगमेन-वेदे नैपुणं प्रावीण्य- मेव नास्तिकत्वाच्छादक वात् पटो वनम् तस्यापगमो दूरीकरणम् वेदनैपुणपटावगमस्तेन तथा । अनेकसमक्षम् -बहुजनप्रत्यक्षम् । तत्-ताहरानास्तिकत्वम् दर्शयन्ति-कटीकुर्वन्ति सिद्धान्तिन आर्हता इति शेषः । अथ मीमांसकाक्षेपसमाधानम्- (शास्त्रबार्ता.) अत्रापि त्रुवते केचिदित्थं सर्वज्ञवादिनः । प्रमाणपञ्चकाऽवृत्तिः, कथं तत्रोपपद्यते ॥१२॥ अन्वयः- अत्र, अपि, वंशवादिनः, केचित् इत्यम् ब्रुवते, तत्र, प्रमाणाञ्चकात्तिः, कथम् , उपपद्यते, इति । (अव.) अत्र-मीमांसकानां सर्वज्ञाभाववादे । अपि खलु । सर्वज्ञवादिनः-सर्वज्ञास्तित्वमन्तारः । केचित्-अनितिसामान्या:, जैना इति यावत् । इत्यम्-एवम् । ब्रुवते-निगदन्ति । यत्, तत्र- बुद्धिविषयीभूते सर्वज्ञे। प्रमाणपञ्चकावृत्तिः-प्रभावप्रमाणोत्थापिका प्रमाणपञ्चकाऽविषयता । कथम्-केन प्रकारेण । उपपद्यते-संगच्छते, उपपना भवतीति यावत्, नैवोपपद्यते इति भावः । तथाहि-सर्वज्ञनिषेधकारिप्रत्यक्षं चेद्विश्वगोचरम् तदा सर्वज्ञा- मावोऽमिद्धः, विश्वगोचरज्ञानाश्रयस्यैव सर्वक्षत्वात्, न चेत्तत्प्रत्यक्ष सर्वाय विषयम् तदाऽपि सर्वज्ञाभावोऽसिद्ध एव, प्रत्यक्षेण सतोऽप्यर्थ- " - ।
२६० ] शास्त्रवार्तासमुश्चयस्य [एकादशः 8 अयैकादशः स्तवकः नानी चिपिनसमाप्तिप्रतिबन्धकदुरितोपशमनाय मालाय शोभत्रयं निर्दिशन्युपाध्यायाः- (कल्पलता) अपापायामायानुसृतमतिरभ्येत्य सदनं, क्षमाया निर्मायापहृतमदमायान् गणभृतः । सभायामायातान् य इह जनतायां मुदमदा- दपायापायादो जिनपभवीरः स सततम् ॥१॥ अवन्य:-आयानुगतमतिः, आपापायाम , क्षमायाः, सदनम् , अन्येश्य, सनायाम् , आयातान , गणत:, अपहलमदमायान , निर्माय, यः, ३४, अनना याम , गुदा , अदान , सः, जिनपभवीरः, सततम् , वः, सायात , - पाया। (कापावतारिका) बायानुमृतमतिः -- श्रागं शिष्यसम्पतिलानानुगताउनुगना माय गर नथा । शियम निनामानन्दधान व्यर्थः । भाषायाम निधानायां नगरीय , अपना "पावापुरी"f4f- नाम । अमावा:-नायाः । मदनमू-114। अध्यय-या राय: । ममायाम - यार , मग तिन 17 : पादान- मान । मान:-मन यादीन कादर - अापनमायान ननिय -पा ....... मनायाम-११ सम- - स्तवकः ] कल्पलतायतारिका [२६१ सदुपदेशगणपरप्राप्युभयप्रयोज्य हर्पम् । अदान--व्यतरत् । स:- ताराः । जिनपमवीरः-पहच्छेठो भगवान् बर्द्धमानो महावीर- स्वामी । सततम्-अनिशम् । वः--युष्मान् - श्रद्धासम्पन्नान्-भक्त- अनानिति यावत् । अपायात्-विनाशान् । पायात्- रक्ष्यात् । अनु. प्रासः शब्दालकार: । स चैकवर्णत्यानेकश आवृत्त्या वृत्त्यनुप्रासा- त्मकः, छेकानुप्रासश्च । श्रीमयरमतीर्थकतिपयकः कविनिप्ठो रत्या- ख्यो भावश्चामिन्यज्यते इति ध्वनिकाव्य मदम् । (कल्पलता) प्रत्यूहापोहमन्त्रः सकलजनवशीकारकृत्सिद्धविद्यो, दुर्नीतिव्याधिदिव्यौपधमधमजनव्यालपारीन्द्रनादः । अज्ञानध्वान्तधारारविकिरणभरो यस्य नामार्थसिद्धि, दत्ते विश्वस्य शाश्वत् स भुवि विजयतामाधसेनिर्जिनेन्द्रः ।।२।। अन्वयः-सकलजनयशीकारकृरिसद विद्यः, प्रत्यूहापोहमन्त्रः, दुनःतिच्या. घिदिव्यौषधम् , अधमजनव्यालपारीन्द्रनादः, अशानध्वान्तधारारविकिरणभरः, यस्य, नाम, शाश्वत् . विश्वस्य, अर्थसिद्धिम् , दत्ते, स:, आश्वसे निः. जिनेन्द्रः, मुवि, विजयताम् । (कल्पलतावतारिका) सकलजनवशीकार कृत्सिद्धविद्यः-सकलजनानां निखिललोकानां वशीकारो वशीकरणम् सकलजनवशीकारकृत् तथा सिद्धा निष्पन्ना विद्या झानं यतः स तथा । प्रत्यूहापोहमन्त्रः-विघ्ननिवारणमन्त्र- रूपम् , नामविशेषणवाचकत्वेऽपि मन्त्रशब्दस्य नित्यपुल्लिङ्गतया तथा २७२ ] शामवातासगुशयस्य [ एकादशः शात् , शक्तिलक्षणान्यतरत्वेन प्रयोजकत्वापेक्षया शक्तित्वेनैव तत्त्वो- चित्याच । नचैवं समयस्य क्षयोपशमार्थत्वे सर्वत्र गलितावरणानां योगिनां वाचकप्रयोगार्थ तदपेक्षा न स्यादिति वाच्यम् इष्टत्वात् समयापेक्षणं विनैव स्वयमेव योगिनां वाच्यवाचकभावं ज्ञात्वा वाचक- प्रयोगात् । एवञ्च यौद्धपरिकल्पितस्यापोहग्य वाच्यत्वं युक्त्या नोप. पद्यते, वस्तुभिन्नतया तम्याऽसत्त्वात , विजातीयव्यावृत्तेरपि समान- परिणतिरूपतया वस्तुवाच्यत्वपक्षप्रसङ्गात, तुच्छस्य वस्तुना सम्बन्धा- योगात् , विकल्पबुद्धयभिन्नस्यापि तस्यापोहम्य भेदेनासत्त्वादद्वय. बोधात् । अपि च लिङ्गसंख्यादियोगोऽप्यनन्तधर्मात्मकबाह्यवस्तु- समाश्रित एवेति नापोहस्य वाच्यत्वम् , एकत्र स्त्रीपुन्नपुंसकाख्यभाष. त्रयस्य, एकत्व द्वित्वादिसंख्यायाश्चाविरोधात, यथाविवक्षितमनन्तधर्मा- ध्यासिते वस्तु नि कस्यचिद्धर्मस्य केनचिच्छब्देन प्रतिपादनात् , प्रति- नियतीपाधिविशिष्टवस्तुप्रतिभासस्य प्रतिनियतक्षयोपशमविशेषनिमि- त्तत्वेन शबलाभासानापत्तेः। अपि च शब्दस्य बहिरर्थाप्रतिपादकत्वे. ऽदृष्टेपु नदीदेशपर्वतद्वीपादिष्वातप्रणीतत्वेन निश्चिताच्छब्दात् प्रति- पत्तिन अदृष्टे विकल्पानुपपत्तेरिति विस्तरेण स्याद्वादकल्पलता- यामाकलनीयम् । अथ "ज्ञानक्रियाभ्यां मुक्तिः" इत्यत्र नयमतजनित वार्तान्तर- मुत्थापयति- (शास्त्रवार्ता० ) ज्ञानादेव नियोगेन, सिद्धिमिच्छन्ति केचन । अन्ये क्रियात एवेति, द्वाभ्यामन्ये विचक्षणाः॥३०॥ - स्यात्, : } { ~ , , , , , , " {:} ধন-1: গ্রানা-ন! - ?? নিন-পzি-। দিন- Bre !! ! - নিশান:- লাখ { -. :, মুম-৫৫ সাল ? নে। -: জাতি। বিলা-ান, না হাসাগ: f । শিমু-গামালি- fা। এ । -' নয় 'শ্ন চানি, বীণা সব গান শােনো, বা {fা- #fa7 দ্য গান, f; নুনিয়া বনদশাত্ব দাগ্নিনি। কান গরম না বলা মাহি। নীল কাকীধি যান - খে, কিগাথাখানা। এ যান। মালা থি চিবিংঃ ঃযাথা হয়, যা যালেরিয়া খান। তিনি বিনা মনি, ন? বিষণাথী মনি। মে মুবি মন নমিত্ব, লাগীতি ননাতি ন মানি, মাদি মুদিনা নয় ছিল সি পি বনি। झियायादिन-प्रशिलपणा झियेय पालागिपुरुषाणां फसाया মপি, ন ন , শংসায় সংঘর্ষীয়া এন; মীময়- २७४ ] शास्त्रवार्तासमुच्चयस्य [ एकादशः भोगज्ञानमात्रान्न सुखितो भवति किन्तु से भक्ष्यभोगेनैवेति । अत्त एव व्यापारविरहिता ज्ञानिनोऽध्यालस्योपहताः सुखसम्पद्विवर्जिता लोके पश्यतां प्राणिनां करुणाभाजन दृश्यन्ते, व्यापारप्रवणा हि क्रिया- सामर्थ्यात् विशिष्टफलसिद्धेमूर्खा अपि सन्तो भूयांसः पण्डिताधि- पतयोऽपापाच दृश्यन्ते, तत: फलसिद्धावतन्त्रं ज्ञानम् , आगमेऽपि क्रियाया एव प्राधान्यमुक्तम् । तथाहि- सुबहुं पि सुअमही, कि काही चरणविष्यहीणस्स । अंधस्स जह पलित्ता, दीवसयसहस्स-कोडावि ॥१॥ ज्ञानोत्कर्षादेव मुक्तिन्तु क्रियोत्कर्षादिति पूर्वोक्तं न समीचीनम् , सर्वज्ञस्यापि शैलेशीकरणाख्यव्यापागेत्कर्षे सत्येच मुक्तिः, शैलेश्या अर्वाक् केवलित्वेऽपि सति मुक्तिनं भवतीत्यतो मुक्तिः क्रियानिमि- त्तिकैव । । - उभयवादिनश्च सर्वमेव पुरुपार्थत्वेन व्यवहियमाणं ज्ञानक्रिया- योगे एव समुत्पद्यते, विशिष्टफलमधिकृत्य प्रत्येक देशोपकारितायाः समुदाये सम्पूर्णतोपपत्तेः । उक्तं च भाध्यकृता- + वीसुंण सबञ्चिय, सिकतातेल्लं व साहणाभावो । देसोबगारिया जा सा, समवायरिम संपण्णा ॥ अथ सम्पूर्णता फलोपहितहेतुत्वम् , देशोपकारिता च हेतुत्व- मात्रम् तच न पृथक् ज्ञान क्रिययोः परस्परमुक्तदोपात , तथा च कथं सुबहपि श्रुतमधीतं किं करिष्यति चरणविग्रहीनस्य । अन्धस्य यथा प्रदीता दीपशतसहसटिरपि । । विष्वग न सर्वथैव सिकतातेलमिव साधनाभावः । देशोपकारिता या समवाये सम्पूर्णा ॥
स्तवमा कल्पलतायतारिका [२७५ . A प्रवर्तते । समवाये पूर्णता ? इति चेन्न प्रत्येकमपि ज्ञान मिययो बोरन्वययति- रेफानुविधानाविशेषेण हेतुन्वान , 'अमन्यगाने फव्यभिचारल्य चासन्यकामियायामपि तुल्यत्वादिति भावः शानक्रिययोरपि निश्चयेन सानक्रियान्यपदेशात , फलानुपादितत्य सतोऽकार गत्यात , पुशूलस्थ- बीजायोजयोरविशेपान , कारणस्य च सत: फज़ोपहितत्वात् क्षेत्रस्थ- चीजयत् । तथा चाभियुक्ताः साध्यम परिज्ञाय, यदि सम्यक ततस्तत् साधयत्येव, तथा चाह वृहस्पतिः ।।१।। सम्यक प्रवृत्तिः साध्यस्य प्राप्त्युगायोऽभिधीयते । तदप्राप्तावुपायत्वं न तस्या उपपद्यते ||२|| असाध्यारम्भिणस्तेन सम्यगनानं न जातचित् । साध्यानारम्भिरणश्चेति टूयमन्यान्यसङ्गतम् ||२|| अत एवाऽऽगमज्ञस्य या क्रिया सा क्रियोच्यते । आगमज्ञोऽपि यस्तस्यां यथाशक्ति प्रवर्तते ॥ प्रज्ञापनासूत्रे तीर्थादिभेदात् पञ्चदशविधाः सिद्धाः प्रज्ञप्ताः, तंद्यथा--तीर्थसिद्धाः, अतीर्थसिद्धाः, तीर्थकरसिद्धाः, अतीर्थकरसिद्धाः, स्वयंबुद्धसिद्धाः, प्रत्येकवुद्धसिद्धाः, बुधबोधितसिद्धाः, स्त्रीलिङ्गसिद्धाः, पुरुपलिङ्गसिद्धाः, नपुंसकलिङ्गसिद्धाः, स्वलिङ्गसिद्धा, अन्यलिङ्गसिद्धाः, गृहिलिङ्गासिन्दाः , एकसिद्धाः, अनेकसिद्धाः (१५) इति । तत्र तीर्थ चतुर्व श्रमणसंघरूपे चोत्पन्ने सति सिद्धात्तीर्थ सिद्धाः, तीर्थस्याभा- चेऽनुत्पत्तिलक्षणे प्रान्तरालिकन्यवच्छेदलक्षणे वा सति सिद्धा नतीर्थ- सिद्धा मरुदेव्यादयः, सुधिघिस्वाम्याद्यपान्तराले विरज्याप्तमहोदयाश्च । " २७६ ] शाखमालागाणा [काराः तीर्थ करा लिमनागोमानियाग: मस: मिजास्तीकर- सिद्धाः, पसीकर मिलाः, समानातिना गनः मिला पती- कर सिताः । स्वगमेन मागपत्यान्तरेगोर निजजातिमारणादिना बुखाः सन्तः मिला: सगलगिताः, से च तीकिरातीर्थकरभेदेन द्विविधाः । प्रत्येक पाही भाविकारगामभिसमीदा गुला: मन्त: सिद्धाः प्रत्येकबुद्धसिद्धाः । जुबै गुर्वादिभिर्गाधिताः सन्त: मिसा वुद्ध- चोधितसिद्धाः। स्त्रिया लि स्त्रीलिङ्गम् , स्त्रीत्वस्योपलावाणमित्यर्थः । तच विधा वेदः, शरीरनिवृत्तिः, नेपथ्यग्रोति । इद च शरीरनिवृत्त्यै- पाधिकारो न वेदनेपथ्याभ्याम् , तयोर्मोचानात्यात , तयोर्माज्ञानत्वात , ततस्तम्मिलिन्ने घर्तमानाः सन्त: सिद्धाः स्त्रीलिङ्गसिद्धाः, तथा पुलिस पुंशरीरनिर्वृत्ति रूपे व्यवस्थिताः सन्तः सिद्धाः पुंल्लिमसिद्धाः । एवं नपुंसकशरीरे व्यवस्थिताः सन्त: सिद्धा नपुंसकलिङ्गसिद्धाः। स्वलिङ्गे रजोहरणादि. रूपे व्यवस्थिताः सन्त: सिद्धाः स्वलिङ्गसिद्धाः । अन्यलिङ्ग परि- ब्राजकादिसम्बन्धिन्येव व्यवस्थिताः सिद्धा अन्यलिङ्गसिद्धाः । गृहि- लिङ्गे व्यवस्थिताः सिद्धा गृहिलिङ्ग सिद्धा मरुदेव्यादयः । एकस्मिन् समये एकका एव सन्त: सिद्धा एकसिद्धाः । एकस्मिन् समये अनेकैः सह सिद्धा अनेकसिद्धा, इति सम्प्रदायः । अत्र प्रत्यवतिष्ठन्तेऽभिनिवेशपेशलचित्ता: क्षपणकाः-"स्त्रीलिङ्ग- सिद्धाः" इत्यत्र पूर्व क्षीणस्त्रीवेदाः सन्तः सिद्धाः इत्यमर्थ आश्रय- णीयः, लिङ्गपदेन मोक्षानङ्गस्यापि वेदस्यात्रोपादानात् , अतीर्थकर- सिद्धादाविव मोक्षाङ्गोपाध्युपादाने नियमाभावात् , स्त्रीशरीरावस्थितास्तु न मुक्तिभाजः स्त्रीत्वात् व्यतिरेके पुरुपवत् । अथवा स्त्रियो मोक्षभाजो न भवन्ति विशिष्टपूर्वाध्ययनलव्ध्यभाववत्त्वात , अभव्यवत्, इति ते - ।
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| 1:11: '' ། [: - मन मोTR" TITUTE TIM नियामागितामसीजीवन, नरिणामणि नार- दादीनां गागाHिTTTT लगी गागा न नारित विरोधिनीति गंगानामपि वा। गान तथा ? नन रावागां मायापक नियमोऽगिनभानगि पि तया (मागाया:) भूगमीपु विपरीत परिणामेन निनिदर्शनात । एतेन "बियो न चारित परिणामयत्यः पुरुषानया नीसागतात न गवा" इत्यः पाम्नम् । तीताम्गापि कागम्य शूगगीमु नानु श्रमपरिशीलान-साधूपा- सनादिप्रसूतविपरीतपरिगामेन निगृत्तिदर्शनात । न च गिध्यात्व- सहायेन महापापेन बीत्वस्य निवर्तनाद न त्रीशरीरवर्तिन प्रात्म- नश्चारित्रप्राप्तिरिति शनीयम् , सम्यक्त्वप्रतिपत्त्यैव मिथ्यात्वादीनां क्षयादिसम्भवात , श्राझीशरीरं तदनुवृत्तौ तम्याः सम्यक्त्वादेरप्यपला. पप्रमगात । उक्तच "सम्यक्त्वपतिपत्तिकाल एवान्त:कोटिस्थिति- कानां सर्वकर्मणां भावेन मिथ्यात्वमोहनीयादीनां क्षयादिसम्भयात्।" न. च कक्ष स्तनादिदेशेषु संसजनाद्यशुद्धः प्राणातिपातबहुलत्वान्न तासां चारित्रमिति वाच्यम् , शुद्धशरीराया अपि भूयग्या दर्शनात, प्राणातिपातपरिणामाभावात । यदि च स्त्रीणां चारित्रं न स्यात्तदा "साधुः साध्वी श्रावकः श्राविका” इति चतुर्विधसंघव्यवस्थोत्सोदेत् । अथाणुव्रतधारिणी भाविकाऽपि साध्वीतिव्यपदेशं भजत इति न दोप इति चेत् हन्त ! तर्हि केवलसम्यक्त्वधारिण्येव श्राविकाव्यप. देशमासादयेत, एवञ्च श्रावके प्वपि तथा द्वैविध्यप्रसङ्गेन संघग्य पञ्चविधत्वमापद्येत । अथ वेपधारिणी श्राविका साध्वीति व्यप- दिश्यते श्रावकस्तु तथाभूतो वस्तुतो यतिरेवेति चातुर्विध्यं व्यवतिष्ठते * तवनः ] যারাথনায় [२७४ इति चेन्नन गुर्ण बना येषधारणे विसावाटेव सेति । अथ- पुरुषानभिवन्यात्वात खंगां न गुनिरिति ग, भगतजनन्यादीनां जगन्त्वयवात । आचाच्या भिवगत्वेन शिष्ये साधुमात्राम- भिवन् शंक्षे या व्यभिचारान, पुरुषानभिवन्धत्वत्य मुक्तिप्रात्यप्रति- पन्धकत्येनाप्रयोजकत्याश। यदि तदनभियन्तात्वेन तदपेज्ञयाऽनुत्त- मगुग्णत्वाद् न श्रीणां गुरितीप्यते तदा तीर्थद्गुणापेक्षया गगा- घगदेरप्यनुत्तमत्वाद मुशिमाप्तिर्न भवेत् । अधाशेपकर्मक्षयनियन्धमत्याध्ययसायस्य गणधरादिपु तीर्थकद- पेक्षया तुल्यत्वादयमदोप; तदा समानमेतवार्यकाम्वपि । यदि च तीर्थस्य भगवदभियन्तान प्रथमगणधरस्यापि तं शब्दाभिधेयस्येन वयात्वादन दोपः, तदा पातुर्यनमसंघस्यापि तत्रान्तर्भावात् समानमेव ।। अयाफल्याणभाजनयाद नियो न मुक्तियोग्या इति चेत् न, तीर्यकरजननात नहात; परं कल्याणमस्ति लोके । हीनयलत्यादेव स्त्रीणां न मुक्तिरिति चेन्न, रत्नत्रयसाम्राज्ये ही नवलवत्वस्याप्रयोज- कत्वात , अन्यथा बीभ्योऽपि हीनयला: पनवादयः पुरुपा रत्नत्रय- साम्राज्येऽपि न मुच्येरन् । हीनयलानां विशिष्टच-रूपं चारित्रमेव न स्यादिति चेन्न, यथाशक्त्याचरणरूपस्य सत्त्वसाध्यस्य तस्य तासा. मप्यविरोधात् । न हि दुर्धरबहाचर्यधारिणीनामसदभियोगादौ तृण- वन्माणपरित्याग फुर्वाणानां सत्त्वं तासां नातिरिच्यत इति वक्त शक्यम् । नचानुपम्याप्यतापाराश्चितकानुपदेशेन तासु सत्त्वहीनता सिद्धपति सत्त्वापेक्षयैव शाले विशुद्धयनुपदेशात् , योग्यतापेक्षयैव सत्र तवैचित्र्योपदेशात् । उक्तब--- W २८० शाय 1 : 15 -guaranameroon +AAL.... सानियो । (infift: शाग्ने । गोगना .:ht पनि । पनगाभिनुमानमपि पगाम, - गगनीजाति. मुरगुपतिमान मनी प्रतिकारमागिलात गुरुपजानिमा इति । न न तामां प्राधिकारण पारम्परा मोतहेतुगगा निवडाद- प्रयोजगत्ला ? नयागामगाणे तुरेशावरत्गादावर प्रवृत्ति: स्यानतु गागागमागमविरतामिति वाच्या देशविरत्यादिभूयो. भयावटितपारम्पर्गेगा मोवाईतुत्वेऽपि पारितस्यैवाल्पभवघटितपारम्प- यण गोनहेतुल्यात , ताशपारम्पर्य मोक्षार्थितया तत्र प्रवृत्तेर्युक्त- त्यात कथगन्यथा दुःपमाकालयतिनो गुमुचायतन प्रवर्तिध्यन्ते ? इति वाच्यम् । तामां चारित्रस्य पारम्पयेणेव मोनहेतुत्वाश्रवणात, साक्षा स्कारणम्य चारित्रम्यासति प्रतिबन्धके तद्भव एव मुक्तिप्रापकत्वोप- पत्तेः, स्त्रीत्वस्य प्रतियन्धकत्वे मानाभावात् , अन्यथा तत्र साक्षाचारि- त्रार्थितयैव प्रवृत्त्यापत्तेरिति, "मनुष्यस्त्री काचिद् निर्वाति, अविकल- तत्कारणत्वात् पुरुपत्रा" इत्यनुमानमपि प्रमाणम् । तदेवं स्त्रीमुक्ति- सिद्धेः सिद्धाः पञ्चदशसिद्धभेदा इति शिवम् । शब्दानामथ चार्थानां, सम्बन्धोऽस्ति परस्परम् । मुक्तिभाज: स्त्रियः स्युस्तत्, सिद्धमेकादशे स्तवे ॥११॥ है इति शासनसम्राट-तपागच्छाधिपति-सर्वतन्त्रस्वतन्त्र-जगद्गुरुवालन- हाचारिभट्टारक्राचार्यमहाराजश्रीविजयनेमिसूरीश्वरमहाराजपट्टालङ्कार- शास्त्रविशारदकविरत्नपीयूपपाणिपूज्यपादाचार्यश्रीविजयामृतमरिवर- सन्दृधायां महोदधिकल्पशास्त्रवातीसमुच्चय -- कल्पलतानुसारिण्या- कल्पलतावतारिकायां एकादशः स्तवक्र: ।
घरमः उपसंहारः] कल्पनतावतारिका [२८१ - फ्र एवं समीचीनयुक्तिततिभिर्विमतानां विमतीरपास्य तदद्वारेण सिद्धान्तयन्तः स्वमत ग्रन्थान्ते प्रयोजन-शोकसलयाऽऽशीर्वादावश्य- कर्तव्यतासूचकं मोकचतुष्टयं निर्दिशन्ति सूरिवरा:-- (शास्त्रवार्ता) एता वार्ता उपश्रुत्य, भावयन् बुद्धिमान नरः। इहोपन्यस्तशास्त्राणां, भावार्थमधिगच्छति ॥५५॥ अन्वयः-बुद्धिमान् , नरः एताः, वार्ताः, उपश्रुत्य, भावयन् , इह. उपन्यस्तशालाणाम् , भावार्थम् , अधिगच्छति । (अव) बुद्धिमान्-प्रेक्षावान् । न तु यः कोऽपीति भावः । नरः-मनुष्यः । एताः-समुपस्थापिता बुद्धिविषयीभूताः । वार्ताः- सिद्धान्तप्रवादान् । उपश्रुत्य - श्रावणविपयतामापाद्य, आकरयेति यावत , भावयन्-चिन्तयन् , अनुसन्धान इति यावत् । इह- अस्मिन् प्रन्थे । उपन्यस्तशास्त्राणाम्-समुपस्थापितवौद्धवैशेपिकादि- दर्शनानाम् । भावार्थम्-अभिप्रायतत्त्वम् । अधिगच्छति-प्राप्नोति, निश्चितमिति शेपः । (शास्त्रवार्ता) शतानि सप्तश्लोकाना-मनुष्टुप्छन्दमां कृतः । आचार्यहरिभद्रेण, शास्त्रबार्तासमुच्चयः ॥५६॥ अन्वयः-आचार्यहरिभद्रेण, अनुष्टुप्छन्दसाम् , - - SE. रसानामाय.. कतः ।
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उपसंहारः ] पाल्पलतापतारिफा [२८५ । सवा ) युद्धम्-श्यसम् । “सयसंधुसाग" इनिशारत- योतः । यम्-सियियीभूत तीर्यम् । लोकवृत्त्य-मोकानां जनानां पृत्तिविका सत्य तया । दीक्षा दिवसापर्यावधिफालामागेव नबलोकान्तिका पेचा भगवन्त लोकपृत्त्य प्रापयन्ति भगोश्च सूर्यो- यादारभ्य फल्पवर्त समयपर्यन्त प्रतिदिनमालपाधिकामेकां सौवर्ण- कोटि ददाति, देवाश्य " वृणुत वर वृणुत वरम् " युद्घोषयन्ति, सदीयामुपोषणामाफल्यं यो यन्मार्गयति तस्मै तददाति, तस सर्व देवा इन्द्रादेशेन पूरयन्ति, एयता भगवान् दोक्षाप्राकनवर्षे वार्षिकदान- रूपेण १८०००००० दीनाराणां x ३६० दिवसर्गुणनात् ३८८८०००००० अशीतितक्षाधिकाटाशीतिकोटिसंबनितमजनयं दीनाराणां ददाति । तयाचोक्तम्-तिनेत्र य कोडिसया, अढरासोई य हुँति कोहीमो । असीई च सय हरसं, एवं संवच्छरे दिन्नं ॥१॥" दानप्रभावाच दरिद्र। अपि धनाया: सम्पद्यन्ते, लोकानामनायास जीविका निर्वहतीति समा- यातम् । कत्रयोऽपि तदीयं दानमधिकृत्य वर्णयन्ति- तत्तद्वार्षिकदानवर्पविरम दारिद्रयदावानला:, सद्यः सज्जितबाजिराजिवसना-लसारदुर्लक्ष्यभाः । सम्प्राप्ता: स्वगृहेऽर्थिनः सशपथ, प्रत्याययन्तोऽङ्गनाः, स्वामिन् । पिङ्गजननिरुद्धहसितैः, के यूयमित्यूचिरे ॥१॥ यद्वा-लोकानां तिरन्तर्जीवानात्मकधर्म: तस्य तथा, सच धमतीर्थकृत्प्रवर्तिततीर्थादेव प्रभवति, नवलोकान्तिकदेवा आगत्य तीर्थस्थापनानिमित्त प्रबोधयन्तीति । यद्वा-लोकानां भुवनानां वृत्तिर्वर्तनं परिवर्तनं स्वरूपप्रकाश- नादि वा लोकवृत्तिस्तस्यै तथा। नवलोकान्तिदेवैः प्रबोधितो दीक्षा- २८६ ] शान्तवार्तामगुणगस्ग [चरमः मादाय केवलज्ञानोत्पादनबारेण जगतां स्थिति प्रकाशयतीतिमर्यमागम- वेदाम् । बोधयन्त:-प्रज्ञापगतः, प्रबोधयन्न इति यावत । यगपि स्वयं बुद्धो भगवास्तदुपदेश नापेक्षते तथापि तेपागयमाचारो वर्तते । शिखिजलमस्तः अग्निमतिताप्रमुग्या देवाः, नवलोकान्तिकदेवा इति यावत् । यदुक्तम्-"सारस्सयामाइचारवण्हो३वरुणा यष्टगद्दतोया य ५ तुडिआ६अव्याबाहाअग्गिाचायचेव रिटा य ६ ॥१॥ तुष्टुवुः-अभिष्टु- तवन्तः। सर्वोऽप्ययं प्रथमपादप्रतिपाद्योऽर्थः कल्पसूत्राऽऽगमसम्मतः। तथाच कल्पसूत्रे- पुणरवि लोयंतिएहिं जीयकप्पिएहि देवेहिं ताहिं इटाहिं जाव वग्गूहिं अणवस्यं अभिनंदमाया य अभिथुब्बमारणा य एवं वयासी ॥ ११०॥ जय जय नंदा! जय जय भद्दा ! मद्दते जय जय खत्तियवरवसहा ! बुज्झाहि भगवं ! लोगनाहा ! सयल जगजीबहियं पत्र- तेहि धम्मतित्थं हिमसुनिस्सेयसकर सबलोए सम्बजीवाणं भविस्सइत्ति कट्टु जयजयसई पउंजति ॥१११।। यत्र-बुद्धिविपयीभूते देवाधिदेवे । प्रतिहतभुवनालोकवन्ध्यत्वहेतुः-भुवनं जगदालोकयन्ति प्रकाशयन्तीति भुवनालोकाः, प्रतिहताः कदाचित् कथानद्वाधिताश्च ते भुवनालोकाः प्रतिहतभुवनालोकाः, लौकिकसूर्यचन्द्रादिप्रकाशास्तेपां वन्ध्यत्वम् वैफ- ल्यम् विफलीकरणम्, प्रतिहतभुवनालोकवन्ध्यत्वम्, तत्र हेतु: कार- णम्, प्रतिहतभुवनालोकवन्ध्यत्वहेतुः, केवलज्ञानप्रकाशेन चन्द्रसूर्या. दिप्रकाशा वैफल्यमायान्तीति केवलज्ञानस्य भुवनालोकवन्ध्यत्वकार. रणत्वमवसेयम् । यद्वा अविसर्गान्त "प्रतिहत वनालोकवन्ध्यत्वहेतु" इत्येवपाठस्तथा च भुवनालोकवन्ध्यत्वे हेतवः कारणानि, भुवना- लोकवन्ध्यत्वहेतवः, प्रतिहता: प्रतिवद्धा: विनाशिता इति यावत् भुवनालोकवन्ध्यत्वहेतवो येन तत्तथेति व्याख्येयम् । ज्ञानम्- -केवल- उपसंहारः] कल्पलतापतारिफा [ २८७ । ज्ञानम् । उदपादि-समजनि । सगुत्पन्नमिति यावत् । यस्य-बुद्धि- विषयीभूतस्य देवाधिदेवग्य। वाचाम्-देशनावचनानाम् । कौशलम्-- कलामाहात्म्यमिति यावत् । सर्वप्राणिस्वभाषापरिणतिसुभगम्-सर्व- प्राणिनां निखिलजीवानाम् न्यभाषायाम् परिणत्या परिणामेन सुभगं ललितन्तथा । समसजीवसम्बन्धिस्वस्वभाषापरिणमनललितम् । श्रम- वदिति शेपः । तथाचोक्त वीतरागस्तवे भगवता हेमचन्दाचार्येण- यद्यो जनप्रमाणेऽपि, धर्म देशनसद्मनि । सम्मान्ति कोटिशस्तियनदेवाः सपरिच्छदाः ॥१॥ तेषामेव स्वस्त्रभाषा-परिणाममनोहरम् । अप्येकरूपं वचनं, यत्ते धर्मानबोधकृत् ॥२॥ स्वभापयेव यदीयया बाचा देवतिर्यमनुध्या ययार्थं धर्मस्व- रूपमवयुध्यन्ते इति भावः । एतेन भगवद्वाचां पञ्चत्रिंशद्वाणीगुणा- तिशयसाहित्य सूचितं भवति । तथाचोक्तमभिधानचिन्ताम् "संस्कारवत्त्वमौदात्य-मुपचारपरीतता । मेघगम्भीरघोपत्वं, प्रतिनादविधायिता ॥१॥६५॥ दक्षिणत्वमुपनीत-रागत्वं च महार्थता । अच्याहतत्वं शिष्टत्वं, संशयानामसम्भवः ॥१॥६६ निराकृतान्योत्तरत्वं, हृदयङ्गमताऽपि च । मिथः साकांक्षता प्रस्ता बौचित्यं तत्त्वनिष्ठता ||६७ अप्रकोणप्रसृतत्वम-स्वश्लाघान्यनिन्दता। आभिजात्यमितिस्निग्ध-मधुरत्वं प्रशस्यता ॥१॥६८ अमर्मवेधितीदाय, धमार्थप्रतिवद्धता । कारकाद्यविपर्यासो, विभ्रमादिवियुक्तता ||३||६६ २८८] शास्त्रवातीसमुच्चयस्य [चरमः उपसंहारः चित्रकृत्त्वमद्भुतत्वं, तथानतिविलम्बिता । अनेकजातिवैचित्य मारोपितविशेषता ॥१॥७० सत्त्वप्रधानता वर्ण-पदवाक्यविविक्तता। अव्युच्छित्तिरखेदित्वं, पञ्चत्रिंशच वाग्गुणाः ॥१||७१ तस्मिन्-तादृशे बुद्धिविषयीभूते । भगवति-पड्विधैश्वर्यशालिनि । देवाधिदेवे-तीर्थकरे । भवता-त्वया । भक्तिरागः-सेवाविषयका- नुरागः । धीयताम्-धायंताम् । आधीयताम् इतिच्छेदे संस्थाप्य. तामित्यर्थोऽवसेयः । एवञ्च क्रमशः पादत्रयेण पूजा-ज्ञानवचनाति- शयाः प्रतिपादिताः । अपायापगमातिशयं विनाऽनुपपन्नैस्तैराक्षिप्तोऽपा. यापगमातिशयोऽपि भगवति वेदितव्यो भवतीति । अत्र भगवत्तीर्थ- कृतिपयक-कविगतरतिभावाभिव्यञ्जनाद्ध वध्वनिकाव्यमिदमवसेयम् । ॥ इति समाप्तोऽयं ग्रन्थः ॥ ।
अफ इत्तिकृत प्रशस्तिः
सिंहाको जन्मतोऽभूत सुरगिरिशिखरं स्नात्रकालेऽधवद् यो,
देव मिथ्यान्विन यो परफानना-नागयामास पाल्ये ।
पर्ष मोई मृगार्भ मृगपतिरिव य: संजघानाप चोधे,
में श्रीयार स्तषीमः नास्तितस-घोधियोधाय सिद्धम् ।।
[२]
पट्टे बीरजिनस्य पनमगणी, स्वामी सुधर्माभिधो,
जन्यूम्बामियमोधरः समभवत् । तत्पन्मुधियत ।
स्वामी श्रीप्रभयस्ततस्ततयशाः, शव्यभव: पट्टमा,
इत्येवं बहवो जिनेशवचन-व्याख्याकरा जनिरे ।।
[३]
अष्टौ निधनाम्नि प्रथमत उदिताः सूरिराजोऽत्र गच्छे,
रंतुः श्रीकोटिगच्छे तदनु मुनिमिता: सुस्थिताद्या मुनीन्द्राः ।
सूरिश्चन्द्र स्फुरद्धा-नुरजनि रजनीकान्तवचन्द्रगच्छे,
सामन्ताचार्य मुख्या अजनिपत वना-द्वासिगच्छे दश द्विः ॥
[४]
गच्छेऽष्टी पटनाम्नि धाम्नि महसां, श्रीसर्वदेवादयो,
जाग्रत्तेजसि सद्यशोऽम्भसि तपा-गच्छे जगचन्द्रतः ।
श्रीसोमप्रभ-सोमसुन्दर-मुनि-श्रीहीर-देवादयो-
ऽने के धर्मधुरन्धराः शुशुभिरे, श्रीवृद्धिचन्द्रास्ततः ।।
२८८] शाग्नवातीसगुजयस्य [चरमः उपसंहारः चित्रकृत्तास्तत्वं, तथानतिविलम्बिता । अनेकजातिवैचित्र्य - मारोपितविशेषता ॥१॥७० सत्त्वप्रधानता वर्ण-पदवाक्यविविक्तता। अव्युच्छित्तिरखेदिलं, पञ्चत्रिंशय चारगुणाः ॥१॥७१ तस्मिन्-तादृशे बुद्धिविषयीभूते । भगवति-पड्विधैश्वर्यशालिनि । देवाधिदेवे-तीर्थकरे । भवता-त्वया । भक्तिरागः-सेवाविषयका- नुरागः । धीयताम्-धार्य्यताम् । श्राधीयताम् इतिच्छेदे संस्थाप्य तामित्यर्थोऽवसेयः । एवञ्च क्रमशः पादत्रयेण पूजा-ज्ञानवचनाति- शयाः प्रतिपादिताः । अपायापगमातिशयं विनाऽनुपपनैस्तैराक्षिप्तोऽपा. यापगमातिशयोऽपि भगवति वेदितव्यो भवतीति । अन्न भगवत्तीर्थ- कृतिपयक-कविगतरतिभावाभिव्यञ्जनाद्भवध्वनिकाव्यमिदमवसेयम् । ॥ इति समाप्तोऽयं ग्रन्थः ॥
।
अध वृत्तिकृत प्रशस्तिः
[१]
सिंहाको जन्मतोऽभूत सुरगिरिशिखरं स्नाफालेऽधवद् मो,
देवं मिथ्यास्विनं यो वरकरहनना-नामयामास बाल्ये ।
एवं मोहं मृगाम मृगपतिरिव यः संजघानाप बोध,
तं श्रीवीरं स्तवीमः सततक्तितसद-बोधियोधाय सिद्धम् ।।
[२]
पट्टे वीरजिनस्य पञ्चमगणी, स्वामी सुधर्माभिधो,
जम्बूस्वामियमीश्वरः समभवत् , तत्पभृन्मुक्तिवृत्।
स्वामी श्रीप्रभवस्ततस्ततयशाः, शय्यंभवः पट्टमा,
इत्येवं बहवो जिनेशवचन-व्याख्याकरा जज्ञिरे ।।
[३]
अष्टौ निग्रंन्धनाम्नि प्रथमत उदिताः सूरिराजोऽत्र गच्छे,
रेजः श्रीकोटिगच्छे तदनु मुनिमिता: सुस्थिताया मुनीन्द्राः ।
सूरिश्चन्द्र स्कुरद्धा-नुरजनि रजनीकान्तवञ्चन्द्रगच्छे,
सामन्ताचार्यमुख्या अजनिपत वना-द्वासिगच्छे दश द्विः ॥
[४]
गच्छेऽष्टी पटनाम्नि धाम्नि महसां, श्रीसर्वदेवादयो,
जाग्रत्तेजसि सद्यशोऽम्भसि तपा-गच्छे जगचन्द्रतः ।
श्रीसोमप्रभ-सोमसुन्दर-मुनि--श्रीहीर-देवायो-
ऽनेके धर्मधुरन्धराः शुशुभिरे, श्रीवृद्धिचन्द्रास्ततः ।।
संवत् २०१३ मा माणि आगना गाणी माग.गोनो--- R ३ । ५. . कमान प्रतिरूया १-श्री शानिमानी सादर २-शेठ भगाजी गमातो, दादर गुनीनाला संशयाना बोटादवाना, दादर १? ४-" बरधीचन्नती गंगागमती, दादर मनमुग्नालाल देवमीमाई गारंग दादर हा अमृतलाल) ५ ६-" मोहनलाल अजेराज महेना, १६ भावेरी बजार ७-" जगजीवनदास केशवलाल बोटादवाला, दादर (हा. प्रकाशमा) ८-" तीलाधर वीरचन्द महेना, दादर " नवनीतलाल अनोपचन्द शाह, दादर १०-- " गीसुलाल फोजमलजी, दादर ११--शेठ बाबुलाल तिलोकजीनी कु, लालवाही ११ १२-" देवीचन्दजी चनेचन्दनी कु., नायगाम १३- नाराचन्द्रजी पुखराजजीनी कु०, लालवाडी १४---- " जुगराजजी जेराजजी, तालवाडी १५-" पोपटलाल सुरचन्द महुवावाला, दादर १६-" मन्नालाल शांतिलाल शाह, दादर ५ ४. ह- ५ , ५ " ० XXXX - KK कमात्र प्रतिसंख्या १७-" मोठालाल देवीचन्दजी, दादर १८-"भेरुलालजी प्रेमचन्दजी, दादर १६-" कपूरचन्दजी कस्तूरचन्दजी, दादर २०-" देवीचन्दजी गमनाजी, दादर . २१-" गणेशमलजी वनेचन्दजी, दादर २२-- " पुखराजजी भूरमलजी दोबाजी, दादर २३-" चुनीलालजी नवलाजी, दादर २४-" चन्दनमल धुलाजीनी कु०, दादर (हा. अमृतलाल) : २५-- " डाह्यालाल वाडीलाल राजवाला, दादर २६-" मूलचन्द मनसुखलाल एण्ड कांक, लालवाडी २७ - " गुलाबचन्दजी सुमरमलजी, दादर २८-" भूताजी बनाजी, दादर २६ -- " मगनलाल करसनजी, दादर ३०-" जे० हेमचन्दनी कु, मस्जीदवन्दर ३१-- " कुपाजी सदाजी, परेका फुलचन्द छोगमलनी कु. कालाचोकी ३३-शेठ ताराचन्दजी श्रमीचन्दजीनी कु०, कालाचोकी (हा. बाबूलालजी) ३४-" चुनीलाल मांगीलालनी कुां, दादर मनसुखलाल मणीलाल अमदावादवाला " पदमशी प्रेमजी बोटाद जीनवाला ३७--" भँवरलाल जेठमलजी, एलफोस्टन रोड ३८-" जयन्तीलाल रतनचन्द, लुहारचाल ३६-" वसनजी रतनशी, शिव " योगीला मलदास (हा. चम्पकलाल) ५ ५ ५ ५ ३५-" KKKK K..
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करनानिमविद शाम्यशारोगा ।
সসাসালিশিiণালি :
भूपिनाम्नायगापाशः गजनी गजमानः ।।
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.
सम्यक्तत्वं समभिलपता शावाताग्यमन्थ,
धैर्य धृत्वा विततमतिना भद्रा हारिभद्रम् ।
प्रौढप्रौढ वचनरचन चर्षणाचर्वणीय,
दुत्तानां रमयति मनो-हारि नो हारिभद्रम् ।।
[]
शानाद्वाती- गहनगहनग्रन्थगूढार्थभावान ,
व्यकीकतु मुनिवर यशोवाचको लब्धवर्गाः ।
वृतिं चक्रे सुरतनलता--कल्पकामाथपूरणी,
स्याद्वादान्तां विबुधफलिनां कल्पपूर्वा लताख्याम् ।।
,
सेयं तर्क-प्रकरविभवा पद्यलालित्यलीला ।
नव्यन्यायप्रकटघटना गद्यगाम्भीर्यशीला ।।
तत्त्वप्राप्ति: कुमतिविमतेः खण्डनी मण्डनी वा।
सद्भावानामधिगमयति श्रीयशोवागविलासम् ।।
वृत्तिकृत्-प्रशस्तिः ।
[३
[१०]
तस्यामस्यां प्रवेशाय, विदुपामुपकारिका ।
तरणिरिव ससिन्धौ, कल्पलतावतारिका ॥
[ ११ ]
उपद्रङ्गे महारङ्गे, मोहमय्याः सदादरे ।
दादरे शान्तिनाथोपा-श्रये ज्येष्ठस्थितिस्थितैः ।।
[ १२ ]
श्रेष्ठिश्रीप्रेमचन्द्राख्य-तेजराजाभिधादिभिः ।
सयवस्थापकैर्मुख्यै-विज्ञप्तै रिभक्तितः ।।
[१३ ]
वैकमेऽनलचन्द्रद्यो-नेत्रशरदि कार्तिके ।
राकार्कवासरेऽकारि, विजवामृतसूरिभिः ।।
[ १४ ]
इमामालम्ब्य धीमन्तः, सन्तः सन्तु सुराजिताः ।
कल्पलताफल प्राप्तः, प्राप्तयोधाः सुराजिताः ।।
[१५]
सद्धिः पापच्यमानेय-माचन्द्रामवाधिता ।
विद्वद्भिः शोधिता कर्म-मोक्षमातनुतां सताम् ॥
[१६]
वृत्तयेऽत्र निरात प्रवृत्तिः प्रथते नृणाम् ।
धर्मे शाने पर वृत्तिगिजति विवेकिनाम् ।।
[१७ ]
वृत्तिमिमां समारच्य, श्रेयो यत् समुपार्जितम् ।
दूरीभूयाद्भवभ्रान्ति - भूयातिस्ततस्तता ।।
॥श्रेयोऽस्तु श्रीश्रमणसहस्प ॥
,
संवत् २०१२ ना चातुर्मासप्रसंगे दादर-श्रीशान्तिनाथजी उपाश्रये आ ग्रन्थना अगाउथी ग्राहक थएला सद्गृहस्थोनी- * नामावली ५. - ५ क्रमाङ्क नाम प्रतिसंख्या १-श्री शान्तिनाथनी पेढी, दादर २-शेठ भगाजी रामाजी, दादर ३ " चुनीलाल केशवलाल बोटादवाला, दादर " वरधीचन्दजी गंगारामजी, दादर ५- " मनसुखलाल देवसीभाई पारेख दादर (हा. अमृतलाल) ५ ६-" मोहनलाल अजेराज महेता, १६८ झवेरी बजार ७-" जगजीवनदास केशवलाल बोटादवाला, दादर (हा. प्रकाशभाई) ८-" लीलाधर वीरचन्द महेता, दादर " नवनीतलाल अनोपचन्द शाह, दादर १०-" गीसुलाल फोजमलजी, दादर तिलोकजीनी कु, बाबुलाल ११ लालवाडी १२- " देवीचन्दजी वचन्दनी का , नायगाम १३-" नाराचन्दजी पुग्वराजजीनी कु०, लालवाडी २४-" जुगगजजी जेराजजी, मालवाड़ी १५-" पोपटलाल मुरचन्द महुवावाला, दादर १० १६- " मन्नालाल शांनिलाल शाह, दादर ५. ५. - ११-शेठ ५. .
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21. "मी, पाटन डाशेपाममी)
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छटन ग्रेन जैन संप ताफ्यो अगाउपी पएला
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(दिनलाल चिमनलाल पालनपुरयामा)
१- छोटामाल गोदमाई, गुम्पा
५-" मोहनलाल त्रिभुयनाम, ईमारावासा
- मालास माणेकलाल धानेरावाला
.. " भारेमक्ष जोईणरागभाई पासमपुरपाला
iii । ४ 4 . । ....... If ..., .:: A) । १५.११.१ ३.११. ..६१ १९६४ : : ܀ PM 1 ܀ 2. HistottIf fir if it :, 11: ३ १ - १२. २ +- . ५०-" पतनानागामा11.दादा ५१-" मल प्रादयन्दतीनायगाण प्रतापगनानी ५३-" बायुमा मांजान मनावनगापुर 12-शेट मोम चन्द दलमायगम अगदावादवाला, दादा " मूलचन्यजी छनाजी, दादर ५६-" नमना. हिमनमलजी, दादर ३७-" प्रतापचन्दजी यायदानी नावाला, दादर ५८-" जुहारमत्ती हजारीमलजी वीजावावाला, दादर फुलचन्दजी भभूनमन्तजी, दादर ६० " नन्दरामजी जमरा जी, दानाइका रोड "हिमतमलजी जवानमलजी, दादर जुहारमलजी गुलाबचन्दजी, दादर लालचन्दजी जुहारमल जी मुत्ता, पोडवावडी वाराचन्द योरीदासजी, परेल " १ २ ६१- .. ३ - - १ १ or कमाङ्क प्रतिसंख्या ६५-"जुहारमन उमेदमलजी, नायगाम ६६-" फत्तेचन्द चमनीरामजी, दादर १ ६७-" प्रवीण गन्द धनजी, तारदेव गनराज भीसमचन्दनी वालीवाला, दादर ६६ गुलाबचन्द मूलचन्दजी शिवरी ७.-" पोपटलाल वीरपान महेना, दादर ७१-" बनाजी धूलाजी, नवी हनुमान गली, मुम्बई . २ ७:-" मावरचन्द रामाजी टोलीया, दादर ७३-- " प्रेमचन्दजी भगाजी, गल्फीस्टन रोड (हा. शेषामलजी) १ " रतनशी शिवजी, लोअर परेल ७५-"कानजी रतनशी चोरा, दादर १ -- -- २ १ 0 कोटन ग्रेइन जैन संघ तरफयी अगाउथी यएला ग्राहकोना शुभनामो . १ १-शेठ धारशी भाई (हा: कुँवरयाई ) " रमणलाल अमृतलाल शाह ३- " चीमनलाल नगीनदास (हा. हिंमतलाल चिमनलाल पालनपुरवाला) ४-" छोटालाल गोदड़भाई, मुम्बई ५- " मोहनलाल त्रिभुवनदास, कुंभाराणवाला ६-" दलपतलाल माणेकलाल धानेरावाला ज ओईसारागभाई पालनपुरवाया। ५ ५ ५ १ MARA- . . 4 am ५ ५ क्रमा नाम प्रतिसंहर "कांतिलाल चिमनलाल पालनपुरवाला है- " चोथमलभाइ देवीचन्द १०- श्रीमती लक्ष्मीबहेन चुनीलालभाई (हा. नटवरलाल चुनीलाल पाटणवाला) ११- शेठ भोगीलाल अनराजमाई ढालोपवाला १२- " चीमनाजी उमाजी सांडेरावाला १३- " भभूतमलजी चुनीलाल कोशोलाववाला १४- " नगीनदास श्रोतमचन्द १५- " भमराव गंगारामभाई (हा. लक्ष्मीचन्दभाई) १६- " पानाचन्द लालचन्दभाई १७- शेठ रिखबचन्द अनराजभाई १८-" गेमाजी दोनाजीभाई १६- " जीवाभाई जोराजीभाई २०- " नालचन्द दीपचन्दभाई २१- " रसीकलाल मूलचन्दभाई २२ मगनलाल मायाचन्दभाई तथा " गिरधरलाल मायाचन्दभाई २३- " कचराभाई रवचन्दभाई (हा. शांतिलाल के० शाह ) २४- " मंछाचन्द मेघराजभाई २५- " जोईताराम लालाचन्दभाई (हा. बाबूलाल जोईताराम) ५ २६- " मोतीराम हीराचन्दभाई २७- " कालीदास ईश्वरभाई तथा शेठ रतिलाल चंदुलाल २८- " चंदुलाल दोलचन्दभाई २६- " बचुभाई ककलचन्द ३०- " लक्ष्मीचन्द छगनलाल बाबुलाल कालीदास टोकड ५ २ १ ५ ५ १ १
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आगमोद्धारक-ग्रन्थमालायाः पट्चत्वारिंश रत्नम् ।
णमोत्थु न समणस्स भगवओ महावीरस्स ।
आगमोद्धारक-याचार्यप्रवरधी-आनन्दसागरसूरीश्वरेभ्यो नमः
आगमोद्धारक-कृतिसन्दोहः
(तस्याऽयमष्टमो विमागः)
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संशोधक:
पूज्य-गच्छाधिपति-आचार्य-श्रीमन्माणिक्यसागरसूरीश्वरशिभ्यः
शतावधानी मुनिराज-लाभसागरगणिः
वीर संवत् २४९७ विक्रम सं.२०२७ मागमोद्धारक सं. २१
प्रतय: ५०० ]
[ मूल्यम्: १-५०