Prakrit Bharati Academy, Jaipur
Siddhbheshajmanimala
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प्रकाशक:- आर. के. भट्ट, सस्कृत-चिकित्सा (जयपुर), सुरेन्द्र निवास, दादाभाई रोड, विले पार्ले (पश्चिम), मुंबई नं. ५६ - (इस अनुवाद का पुनर्मुद्रणादि-सर्व अधिकार लेखक के स्वाधीन है) पुस्तक-प्राप्तिस्थान- १ प्रकाशक के उपरोत-पते से. २ श्रीब्रह्मकुमार गिरिजाशकर जोशी, बी कॉम. ज्योतिर्विद् -भास्कर रायपुर, हजीरानी पोल, अमदावाद-१ ३ भिषगाचार्य श्रीरामप्रकाशस्वामी एम् ए 'आयुर्वेदमार्तण्ड श्रीस्वामिलक्ष्मीरामचिकित्सालय' जयपुर. प्रिन्टर: लक्ष्मीवाई नारायण चौधरी, निर्णयसागर प्रेस, २६।२८ डॉ एम् वी वेलकर स्ट्रीट, मुंबई नं. २
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वैद्य - कुल - गुरवः
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स्वर्गताः सर्वतंत्रस्वतंत्रा रा. वै. महाकविभट्ट- श्रीकृष्णराममहाभागाः
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प्रार्थना मन्ति धीमाधवाधीशकृपाभूरिसमृद्धिमत् । प्रभावीरिताशेषपत्तनं जयपत्तनम् ॥ १ ॥ तत्राप्यपारपाण्डित्यसौजन्यप्रमुसर्गुण । विराजमानर्विनि पाठशाला विराजते ॥ २ ॥ तत्राज्ञानतमोरानिभास्कर निन्यमङ्गलम् । बुध कवि द्विजपति वैयविद्या वृदम्पतिम् ॥ ३ ॥ श्रीकृष्णरामनामान गुरं शरणमाश्रितः । समनमायुपो वेदमविद तत्प्रसादतः ।। ४ ।। क्रमण तत्र निनोऽपि परीक्षाला महत्तरा। समुत्तीर्याभव सद्यनकृषाभाण्डतहजः ॥ ५ ॥ मनन्तर तदाज्ञसस्तत्पनेर्गुम्फपूर्वकम् । लेखन शोधन च टिप्पणी कर्नुमारभे ॥ ६ ॥ पूणां निजाज्ञामालोक्य गुरणा कीर्तिचारुणा । प्रमनमनमा दत्ता शुभाशिपमवामयम् ॥ ७ ॥ तच्छुभाशी प्रभावेण प्रधानासनमास्थित । भध्यापयामि सततं चिकित्सितपट्न् बट्टन् ॥ ८ ॥ सोऽहं कृताञ्जलि त्वा भूयो भृयो विमर्पितम् । दो सप्रार्थये मुग्धो विदग्धप्रारान् बुधान् ॥ ९ ॥ मल्पीयानपि मान्यो भवति हि लोके महान्तमाश्रित्य । गुरकृतिचरणन्यस्ता मत्कृतिरभितश्चमत्कुरुताम् ॥ १० ॥ विद्वत्कृपाकामः श्रीलक्ष्मीरामः, जयपुरराजकीयसरकृतपाठशालायामायुर्वेदप्रधानाव्यापक ।
भूमिका विदाकुर्यन्तु तावत्सकलविद्यापारपारावारावगतान्तास्तग्रभवन्तो भवन्त इह किल सकलधरणितलललाटायमाने भारते वर्षे तिलकायमानं स्वकान्तितिरस्कृतनिखिलनगरा- भिमान श्रीमथुरापुष्कराख्यप्रसिद्धतरक्षेत्रद्वयान्तरालवर्तिमत्स्यदेशप्रतिष्ठमान सर्वसपत्स- मेधमान श्रीसूर्यवशीयश्रीरामचन्द्रात्मजकुशकुलजमहाराजाधिराजपाल्यमानमस्ति जय- पुराभिधानं पुर पुराणम् । तत्र श्रीमन्महाराजाधिराजश्रीप्रतापसिंहदेवराज्यसमयेऽधीतायुर्वेदो गुर्जरभूनिर्ज- रान्तर्गतभट्टमेवाढजातीय स्वयम.प्रख्यापनकृतमतिर्लक्ष्मीरामनामा सुमतिरहम्मदाबाद- नामकप्रसिद्धपुटभेदनादाजगाम । एत्य च रोगिनैरोग्यसपादितप्रसिद्धि मिपतेरपि समान- भवाप । अथ लटुरामनामा तदात्मज पितृसमान एवाल्पेनैव कालेन महाराजाधिराज- प्राप्तराजवैद्यप्रतिष्ठ. श्रीयशसामेक निधानमभवत् । भय तस्य पौत्र. श्रीवैद्यकुन्दनरामपुत्र. श्रीकृष्णरामनामा च मे पितासीत् । य खलु- श्रीमन्माधवसिहभूपसमिती लब्धप्रतिष्ठास्पद साहित्याम्बुधिकुम्भसभवमुनिर्धन्वन्तरिवैद्यके । कीर्तिर्यस्य दिगन्तगा च, कवने य कालिदासोपम. सोऽयं राजभिपग्वरो विजयते श्रीकृष्णशर्मा गुरुः ॥ अथ धर्मादयश्चत्वार पुरुषार्था. पुरुषैः स्वस्वजीवनपर्यन्तं संपादनीया इति निखिलागमपुराणधर्मशास्त्रादीना दृढतरसमतम् । ते च सर्वथा शरीरस्थितिनैरोग्याधीना । न हि शरीरस्थितिमन्तरा नैरोग्येण विना च कस्यापि धर्मादिसाधनमुपलभामहे । पूर्वस्मिन्नपि काले दृढतरशरीरसामर्थ्य नैव सपाद्य तपस्तीनं महर्षयोऽनेकानेका. सिद्धी- रलभन्त । न हि वैद्यशास्त्रमन्तरा शरीरस्थितिनैरोग्ययोः कारणमिति तत्कारो धर्म- शास्त्रादिसहिताकर्तृभ्योऽप्यधिकतरं मान्या वन्दनीयाश्च । वर्तन्ते च चरकसुश्रुतादिसहिता सर्यलोकमान्या अतिगभीराशया., परतु तासामतिश्रमसाध्यत्वादुर्विज्ञेयत्वाच्च सर्वेषां नाधुनोपकर्तृत्वं संघटते । किंच सन्ति तादृश्यपि गूढान्यौषधानि लोके यानि सहितादि- अन्थेष्वलिखितान्यप्यनेकेष्वसाध्येपु रोगेपूपयुज्यन्ते । न हि तेषां दृष्टफलानामद्यावधि संग्रह. कुत्रापि मुद्रितो दृश्यते, इति मत्पितृचरणा यावज्जीवनं यत्र कुत्रापि मिलतो वैद्या- अटिलाश्च काव्यकथाकथनेन द्रव्यप्रदानेनाध्यापनेन सेवास्वीकारेण वाऽन्यैश्चानेकैरुपायै. संतोप्य सतोप्य तान्यतिचमत्कारीणि गूढौपधानि संगृह्य सगृह्य चरकादिसहितातोऽपि परीक्षितान्यनुभूय चौषधान्येकीकृत्येमां सिद्धभेषजमणिमालां गुम्फितवन्तः । यांच- उपासते येऽनुभवन्ति ये च ध्यायन्ति ये भेषजसिद्धमालाम् । प्रयोगनित्या सुखजीवदानाल्लोकद्वये ते शुभमाप्नुवन्ति" ॥ , भूमिका तत्राप्यरसाया मालाया न हि लोके भादरणीयता दृश्यते इति काव्यरसोऽपि सिक्त । पञ्चगुच्छात्मकेऽस्मिन् ग्रन्थे प्रथमगुच्छे पूर्वपीठिका, द्वितीयस्मिंश्च पक्वान्नादीनां गुणा , तृतीये च रोगिणश्वेत. स्वास्थ्यसपादनायानेकानि कौतूहलानि, चतुर्थे सर्वरोगो- पशमन पञ्चमे रसप्रक्रिया, इति क्रमोऽत्र प्रकटीकृत । एतद्वन्थसमाप्तिसमनन्तरमेव कश्चिदसाध्यो व्याधि श्रीपितृचरणानां समुत्थित येन शरीरस्थितिमविज्ञायतद्वन्यस्य मुद्रापणं शीघ्र प्रारब्धम् । परतु समाप्तिमकृत्वैवाध्या पयितुमिवाश्विनीकुमारौ दिव गता । स्वर्यातेपु पितृचरणेपु भतीवोपयोगितया एतद्न्थस्य मुद्रणमत्यावश्यकमिति मत्वा स्वेनैव द्रव्यन्ययेन मयाऽयं ग्रन्थो मुद्रापित । इति मत्परिश्रमसाफल्याय ग्रन्थस्वीकारेण स्वेषामन्येषां चारोग्यसपादनेन मामन्याश्च कृतार्थयन्तु श्रीमन्त इति विज्ञापयति- श्रीकृष्णरामात्मजः-व्यासोपाख्यराजवैद्यभट्टगद्गाधरशर्मा, जयपुरसस्कृतपाठगालायामायुर्वेदाध्यापक । - प्रस्तावना लेखक:- वैद्य -मूर्धन्य प हरिदत्तशास्त्री आयुर्वेदाचार्य (भूतपूर्व-डायरेक्टर ऑफ आयुर्वेद महाराष्ट्र प्रांत, प्रधान वैद्य तथा अन्वेषक यूनीवर्सल हेल्थ् इन्स्टीटयूट हॉस्पिटल, मुबई,-सप्रति, डायरेक्टर एम् सी के. भार - हॉस्पिटल, न्यू दिल्ली।) 'सिद्ध-भेषज-मणिमाला' सस्कृत - साहित्य मे, विशेषत आयुर्वेद-वाड्मयमे, एक अद्वितीय, अनुपम, अन्यत्र-अलभ्य, सचमुच अमूल्य ग्रंथरन है - गुरुपरपरा से प्राप्त, अनुभव सिद्ध भेषजरूपी मणियो की यह माला ही है। इसके निर्माता वैद्यकुल - गुरु, संस्कृत-वाङ्मय के प्रखर पडित, स्वभाव-सिद्ध- महाकवि, जयपुर के परंपरागत राज्य वैद्य स्व-नामधन्य पुण्यश्लोक श्रीभट्ट श्रीकृष्णरामजी थे। महामहिम श्रीभट्टजीने, भावुर्वेद - विज्ञानमय इस प्रथ-श्रेष्ठ की रचना, अपनी स्वभाव-सिद्ध रमणीय काव्योचित-शैली में की थी। संप्रति, काल-प्रभाव से विलीन होती हुई सस्कृत - भाषा से अनभिज्ञ - आधुनिक - वैद्य - समाज, इन सिद्ध - भेषज- मणियों की अपार समुज्वलताका-उनकी उपादेयताका-यथार्थ मूल्यांकन करने में प्राय असमर्थ हो चुका है। वैद्योंकी इसी असमर्थता की निवृत्ति के लिये, अपेक्षित प्रकाश-दानमे समर्थ 'विश्वान् नरान् नयति, विश्वे वा नरा एन नयन्ति'- (यास्क) इस अन्वर्थ से युक्त 'वैश्वानर' नामक हिंदी विवृति, प्रथकारके अभिप्राय का अनुसरण करते हुये, प्रकरणानुसार समयोचित विचार के आधारपर, प्रकट की गयी है।
६ सिहभेपजमणिमालायां किसी भी 'टीका' की उत्तमता की कसौटी 'नामूलं लिख्यते किचित् - नान- पेक्षित मुच्यते' समझी जाती है - अर्थात 'टीका' निर्मूल न हो, लाय ही, वृथा वार माढम्बर भी न हो । प्रस्तुत 'वैश्वानर' विवृति मे, पाठक यत्र तत्र सर्वत्र, सूल के गुप्त रहस्यों का, गुरुपरपरा से प्राप्त, अपेक्षित - समुचित - विवरण पायेंगे। तदुपरांत, विवृति-कारने, इस ग्रंथ मे, महर्षि अग्निवेश प्रणीत 'गागर में सागर' रूप 'अंजन- निदानम् ' का सक्षिप्त कितु सुबोध, प्राजल- हिंदी भाषा -हिंदी भाषा मे भावानुवाद निवेगित करके, कुगलता पूर्वक, 'रोगमादौ परीक्षेत तदनन्तरमौपधम्' इस प्रसिह - सिद्धान्त के प्रतिपादन के साथ साथ, प्रस्तुत -अथ की उपादेयता में अधिकाधिक अभिवृद्धि करदी है । जहां कहीं मूल-प्रोक्त-प्रयोग में अपेक्षा समझी गयी, वहा, अनुवादक ने अपने पू पितारूप गुरु से प्राप्त रहस्य को भी, नि.सकोच प्रकट किये है। जिज्ञासु को इसके उदाहरण पुस्तक के प्राय प्रत्येक पृष्ठपर प्राप्त होगे-'हाय कंगन को भारसी क्या? मूल ग्रंथ 'सिद्ध - भेपज-मणिमाला' के निर्माता, विविध काव्य - विधाता, अभिनव-पारद सस्कारानुसधाता, अविराम - कविता-धाम भट्ट श्रीकृष्णरामजी महा- कवि ही नही किंतु धन्वन्तरि सम अद्वितीय चिकित्सक एव पारद - सस्कार-प्रकारो में दूसरे सिद्ध नागार्जुन ही थे- 'सूते गंधकजारणावधि कृता येन क्रिया नकश ' सौभाग्यवश, उनके सुपुन श्री कलाधर भट्टजी भी पितातुल्य मेधावी, सुकवि तथा पडित-प्रकाड थे। इनको तथा इनके ज्येष्ठ भ्राता पड्-शाची श्री गगावर भट्टजी को चरक - सहिता अनुलोम-विलोम गति से कठगत थी!! श्रीफलाधरजीने चाल्यावस्थामे ही अपने पू पिताजीसे स-रहस्य आयुर्वेदशास्त्रसहित प्रस्तुत ग्रंथ का अध्ययन किया था। सौभाग्यवश श्रीकलाधर भट्टजीके सुपुत्र श्रीरणछोड कलाधर भट्ट (भार कलाधर भट्ट) भी जन्मसिद्ध भाशुरुवि तथा सस्कृत-वाङ्मय के उद्भट विद्वान है। आपश्री ने महामहोपाध्याय श्रीदुर्गाप्रसादजी से ज्योतिष शास्त्र का तथा उनके ही शिष्य श्रीचद्रशेखरजीसे व्याकरण, सांख्य तथा न्यायसहित सपूर्ण सस्कृत - साहित्य का बाल्यावस्था ही अध्ययन कर लिया था। इन्होंने अपने पिताश्री से ही विधिवत् समग्र आयुर्वेद शास्त्र पढा है। 'अष्टांग-हृदय' वाग्भट जैसे सुप्रसिद्ध सहिता-प्रथ आद्योपात स्मृति से ही आप आज भी पढाते है 11 मुंबई का वैद्यसमाज आपकी इस विचक्षण-स्मृति को अजमा चुका है। आप एक अच्छे सफल - चिकित्सक भी है। यही नहीं, अग्रेजी साहित्य से भी आप एम ए एल एल. बी पद प्राप्त हैं। आप व्यवहार-वाणिज्य-विद्यापटु होते हुये, औद्योगिक कारखानों के स्थापक तथा सचालक हैं। धी एवं श्री समन्वित इस विचक्षण महानुभाव में अपने पिता एवं पितामह के उत्तम-गुणों का अवतार हुआ । प्रस्तुत सिद्ध भेषज-मणिमाला' की दुरुहता अच्छे अच्छे संस्कृतज्ञों को भी अखरती है- भतएव इसका उत्तरोत्तर । है प्रस्तावना प्रचार संकुचित हो रहा है। वर्तमान में, 'एकमान श्री मार के. भट्टजी ही इसपर अपेक्षित हिंदी टीका लिसकर प्रकाशित करें" ऐसी मेरी विनयोक्ति को स्वीकारकर श्रीभट्टजीने हिंदी टीकायुक्त इस ग्रंथको, भली प्रकार सपादित करके, प्रसिद्ध निर्णय सागर प्रेस मे, स्वकीय द्रव्य - व्यय पूर्वक, उत्तमोत्तम कागजपर छपाई सहित सोत्साह प्रकाशित किया है। अपने इस स्तुत्य कार्य के लिये श्रीभट्टजी, वर्तमान तथा भावी वैद्योद्वारा, धन्यवाद के पात्र है। चरकोक्त पंचाशत् महाकपायों के गद्य -प्रघट्टकों का उत्तमोत्तम अनुष्टुप्- श्लोकों में सुख-स्मरणीय रमणीय अनुगुफन, भापकी आशु कवित्वशक्ति के मूर्त उदाहरण रूप से, इस ग्रंथ के अंतिम प्रकरण में प्रकट है। पाठक महाभाग इससे प्रसन्न होंगे ही। इति शम् विजयादशमी स २०२४ नयी दिल्ली वैद्य हरिदत्त शास्त्री रा. वै. भट्ट श्री श्रीकृष्णरामजी मुगल राज्य के चरम-विकास के धुरि · रूप मानसिंह के पुत्र, छत्रपति शिवाजी के समकालीन तथा सम्राट औरंगजेब के महासेनाधिपति कच्छवंश शिरोमणि जय- सिंह ने जयपुर नगर का निर्माण किया था। श्रीजयसिंह विचक्षण प्रतिभासपन्न महा- पुरुष थे। इन्होने भारत के सुदूर प्रांतो में से चुनेहुये उत्तमोत्तम कलाकार, कवि, ज्योतिर्विद्, प्राणाचार्य, संगीतज्ञ, स्थपत्य-कला-विशारद, चित्रकार आदि विद्वानों को अपने यहां प्रश्रय दिया था। उनके वंशज महाराजाओने यह संग्रह कार्य गतिमान रखा । परिणामत , जयपुर, भारतीय संस्कृति, सस्कार तथा विद्याभो का, अभीतक, एक सजीव केन्द्र माना जाता है । उपरोक्त महाराजाके वंशज श्रीप्रतापसिहदेव के शासनकाल मे, अहमदावाद निवासी, भायुर्वेद - शास्त्र के परम ज्ञाता, वेद-शास्त्रपारगत श्रीव्यास श्रीलक्ष्मीराम भट्टने जयपुर में प्रश्रय प्राप्त किया। हल्दी-घाटी के सुप्रसिद्ध रणप्रांगण में अपने शौर्य की यशोगाथाओं से समुज्ज्वल भट्ट -मेवाडा जाति के भाप ब्राह्मण थे। बप्पा रावल के गुरु श्री हारीत ऋषि भट्ट-जाति के पूर्वज माने जाते हैं। श्रीभट्टलक्ष्मीराम के चिकित्सा नैपुण्य से सु-प्रसन्न महाराजा प्रतापसिहदेव ने इनका प्रचुर सन्मान किया। इनके पुत्र श्रीललुराम- अपरनाम श्रीविष्णुराम-पिता के समान ही असाधारण प्रतिभा से सपन्न थे। वेदवाड्मय के साक्षात् -प्रतीक रूप, प्रकृतित. परमउदार एवं दयालु श्रीविष्णुराम के चिकित्सा-शास्त्र में अगाधज्ञान से मुग्ध श्रीप्रतापसिहदेवने मापश्री को 'राज-वैद्य' पद प्रदान किया। इनके पुत्र, चरित्र में वस्तुतः कुन्दन ।
सिद्धभेषजमणिमालायां ८ . 1 श्रीकुन्दनराम अपने पिताके समान ही उद्भट विद्वान थे-आपने यावन चिकित्सा शास्त्र को छन्दोबद्ध किया। 'हिकमत् -मंदारवन्ध' नाम से सुप्रसिद्ध यह कान्यमय शास्त्र इसके निर्माता की विचक्षण प्रतिभा का बोध करा देता है । आयुर्वेद -ज्ञान के प्रकाशद्वारा सपूर्ण भारत को समुद्भासित करनेवाली वर्तमान जयपुर राजकीय- सस्कृत पाठशाला की प्रदीप-शिखा को, इसी पडितप्रकांड ने मायुर्वेद के भाय. प्रध्यापक के रूप मे, प्रथम ही प्रथम प्रज्वलित की थी। श्रीकुन्दनरामजी की प्रथम पत्नी से, क्षीरोदधि से साक्षात् धन्वन्तरि के समान, विक्रमाव्द १९३२ श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की पुण्य-तिथि में पुण्यश्लोक श्रीकृष्णरामजी अवतीर्ण हुये। द्वितीय पत्नी से, इनके अनुज 'कविमल' श्रीहरिवल्लभजीने जन्म लिया, जिन्होंने 'जयनगरपंचरगम् , कान्तावक्षोजशतोक्तय ' मादि रसमय काव्यो की रचना की। गुजरात के सुप्रसिद्ध विद्वान् आचार्य श्रीभानन्द शकर ध्रुव इनके कुछ कालतक अन्तेवासी रहे थे। परममेधावी श्रीश्रीकृष्णरामने, बाल्यकाल में ही माने पूज्यपिताश्री से समग्र आयुर्वेद, व्याकरण, न्याय, वेदात आदि शास्त्रों का तलस्पर्शी ज्ञान प्राप्त करलिया था। आपने, उस कालके अप्रतिम पंडित श्रीजीवनाथ गुरु से काव्यप्रकाश के आशयसहित सपूर्ण सस्कृत साहित्य का तथा श्रीचन्दनदास साधुसे सगणित छन्दशास्त्र का विगेप मध्ययन किया। इस तरह युवावस्था में पदार्पण करने के साथ ही साथ, धी एव श्री दोनो ने आपका मानो सर्वात्मना वरण कर लिया था। सर्वतोमुखी विचक्षण प्रतिभा से सपन्न, ज्ञानप्रौढ, पञ्चीस शरदातिकात युवक श्रीश्रीकृष्णरामको, उनके पिताश्री कुन्दनरामने, जयपुर-राजकीय-सस्कृत - पाठशाला का, अपना आयुर्वेद अध्यापन कार्यभार सुपुर्द करदिया 'गुणा पूजास्थानं गुणिपु न च लिङ्ग न च वय। श्रीभट्टजी के अध्यापन नैपुण्यकी कीर्तिगाथा से मुग्ध होकर भारत के दूर दूर प्रांतों से, पजाब, बगाल, नेपाल, बर्मा, सीलोन मादि प्रदेशो से, छात्रसमूह जयपुर साने लगे। आपही के एक पृथक् निवासस्थान में, इनके रहने का, भोजन का तथा अध्ययन का निःशुल्क सुप्रबंध किया गया । सपत्ति तथा सरस्वती का, मुक्त हस्त एवं मुक्तहृदय से, इस तरह वितरण करने के अतिरिक्त अन्य और कौनसा उपयुक्त विनि- योग कहा जा सकता है ? पाठशाला मे, पाठशाला से अवकाश मिलने पर, घर मे, अनवरत एकनिष्ठा से श्रीभट्टजी इन ज्ञान-तृषातुरो को अपनी भलौकिक प्रतिभापीयूष से आप्यायित करते रहते थे। आज भी, ऐसी कोई दिशा नहीं, ऐसा कोई देश नहीं, ऐसा नगर नहीं जहां इनकी परिपल्लवित शिष्यपरंपरा उपलब्ध न होती हो। 'न सा दिङ् न स देशोऽपि न च तन्नगर क्वचित् - यन्त्र श्रीकृष्णवैद्यानां शिष्य व विजृभ्यते'। राजस्थानके प्रज्ञाड भायुर्वेदीय विद्वान् -चिकित्सक चूडामणि श्रीश्यामजी तथा भिपगा- चार्य श्रीलक्ष्मीराम स्वामीजी-मापही के निकटतम अन्तेवासी थे। पू श्रीभट्टजी के ।
प्रस्तावना स्वर्गारोहण उपरांत, उनके शिष्य महानुभावो ने, अपने पूज्य गुरुमहाशय के भायुर्वेद प्रचारकार्य को उसी निष्ठा से यथावत् गतिमान रखा था। इस शिष्यपरपरा के पांडित्य एव नि स्वार्थ भावना की अप्रकंप्य पार्वतीय नीव पर निर्मित भारतीय आयुर्वेद तथा सस्कृति माज मनश्वर बन चुकी है। पू श्रीश्रीकृष्णराम रूपिणी मंदाकिनी मे से नि सरित शिष्यप्रशिप्यरूप भनेको नहरोकी शाखा-प्रशाखाओं से परिसिंचित आयुर्वेद वसुंधरा निरतर शस्यशामला रहेगी। पू भट्टजी के अद्यावधि स्मारक के अभाव मे यह कार्य ही उनका एक अमिट, अमर एवं दिव्य स्मारक बना रहेगा। 'सिद्ध - भेषज मणिमाला' ग्रंथरत, पू. श्रीभट्टजीकी, अक्षर से संबंध रखने- वाली, कीर्तिमय देह है। इस रूपमे भी उनकी सरस्वती तथा सपत्ति का वितरणकार्य निरतर गतिमान है और रहेगा । पाश्चात्य -चिकित्सा शैलीके प्रारभिक विकासकाल में पू श्रीभट्टजीका जन्म हुभा था। अपनी सद्य.फलदायिनी औषधियों के चमत्कारी प्रभाव से, जनसाधारण, उपरोक्त चिकित्सापद्धति की तरफ भाकर्षित हो रहा था। सप्रति, पाश्चात्य -चिकित्सापद्धती के अन्तर्गत शल्यचिकित्सा अत्यधिक विकसित हो रही है, साथ ही, वैज्ञानिक आधारपर रोगों के निगूढ हेतुभो की शोध करके, उनके सद्य प्रतिकार के लिये अमोघ भेपजो का निर्माण किया जा रहा है। पाश्चात्य चिकित्सा की सर्व प्रियता के अनेको हेतुओ मे से, उपरोक्त हेतुद्वय मुख्य है। प्रश्न यह है कि क्या आयुर्वेदीय शल्य-चिकित्सा अपूर्ण थी? क्या आयुर्वेद में रोग का सद्य प्रतिकार करनेवाली औषधियो का अभाव हे ? आयुर्वेदीय शल्य-चिकित्सा, सुश्रुतकालमे वस्तुत विकसित हो चुकी थी। नासादि-सधान कर्म, सुश्रुतकाल की अपूर्व मौलिक गवेषणा थी। पाश्चात्य - देश की 'प्लास्टिक सर्जरी,' वस्तुत सुश्रुतोक्त शल्यचिकित्सान्तर्गत- सधान-कर्म का एक अंग मात्र है। आयुर्वेद के इस विकसित अंग को अपने मूलस्वरूप में उपस्थित करने की, विशेषतया वर्तमानयुग में, नितात आवश्यकता है। पू श्रीभट्टजीने, अपने समय में, काय-चिकित्सा-गत रोग का सद्य. प्रतिकार करनेवाली मौषधियो के शोध का भगीरथकार्य प्रारभ किया। रोग की सद्यो निवृत्ति के विषय मे आयुर्वेद, आधुनिक पाश्चात्य-चिकित्सा के सिद्धांत से सहमत नहीं है। पाश्चात्य -चिकित्सा, रोग का सद्य. प्रतिकार अवश्य करती है, किंतु, उससे प्राय अन्यविकार उत्पन्न हो जाते है । एक विकार को शमन करनेवाला किंतु अन्यको उत्पन्न कर देनेवाला प्रयोग, भायुर्वेद के मत में, भशुद्ध है। 'प्रयोग शमयेत् व्याधि योऽन्य- मन्यमुदीरयेत् । नाऽसौ विशुद्ध शुद्धस्तु शमयेत् यो न कोपयेत्' । 'एतीत्यायु ' जो सतत गत्वर-शील हो उसे भायु कहते है। इस गत्वर - शील-भस्थिर आयु अधिकाधिक स्थिर बनाकर, मानव किस तरह अपने अभीप्सित पदार्थों का यथावत् उपभोग कर सकता है ? इसी प्रयोजन को लेकर भायुर्वेद की अवतारणा की गयी। कृत्रिम फुफ्फुसवाला, नकली दंतपंक्तियुक्त, अन्यान्य अंगो से विकल, आयुर्वेदीय - को सिद्धभेषजमणिमालायां परिभाषा के अनुसार, स्वस्थ नही । इन्द्रियों की स्वस्थता, मानसिक स्वस्थता का हेतु है । मानसिक स्वस्थता की सपूर्णता मे ही, इन्द्रियसमूह की, अपने विपयो से यथावत् रसोपभोग करने की, सामर्थ्य निहित है। अत भायुर्वेद, रोगकी चिकित्सा के साथ साथ रोगी की चिकित्सा पर अधिक भार देता है। रोग की भागति की अपेक्षा उसकी निर्गति-जलौघवत् -अल्पाल्परूप से मानी गयी है। अतः रोग का सहसा निवारण आयुर्वेद को इतना सम्मत नहीं है । तथापि, असुक अवस्थाभो मे, स्वसिद्धांत में अवरोध न भाता हो वहां, शीघ्र-चिकित्सा का आदेश भी मायुर्वेदने दिया है। 'धारयेदन्यथा शीघ्रमग्निवत् शीघ्रकारि यत्' । रोग के माशु-निवारक प्रयोगों का वर्णन सहिताग्रथो में मिलता अवश्य है, कित्तु मनहरूप से नहीं, यत्र तत्र प्रकीर्णरूप से ही उपलब्ध होता है-जैसे अतिसार चिकित्सा के भनेको प्रयागो मे से कौनसा आशुफलप्रद है ? कौनसा नहीं ? इसका निर्णय प्राय नही किया जा सका। रोगियोपर सतत प्रयोग के द्वारा ही औषध के प्रभाव की प्रतीति निर्णयात्मक रूप से की जाती है। इस प्रकारकी गवेपणा के अभाव मे, अनुभूत योगोंका शास्त्रीय आलेखन भायुर्वेद मे अल्पप्रमाण मे ही उपलब्ध होता है। 'सिद्ध -भेपज - मणिमाला' इस क्षेत्र मे, एक सवांग, नूतन शास्त्रीय-ग्रंथ है। रोग के सद्य प्रतिकार के सदर्भ मे, आयुर्वेद के जो निःसदिग्ध-वैज्ञानिक सिद्धांत है, उनके अनुरूप - अविरुद्ध-मौलिक-प्रयोगो का सकलन इस ग्रथ मे हुमा है, । साथ ही शास्त्रीय प्रयोगों को भी, जहां आवश्यकता हुई, परिवर्तित अथवा सशोधित करके इसमें स्थान दिया गया है। आयुर्वेद के मूर्तिमान् विग्रह पू श्रीभट्टजी में, उनका हृदय एक सादर्शछात्र की भतृप्त - जिज्ञासा वृत्ति से समन्वित था। जिज्ञासा मानव के विधायक तत्व के प्रकर्ष की जननी है, तथा उसकी मौलिक - वृत्तियों को सस्फुरित रखती है। 'सिद्ध-भेषज-मणि-माला' मायुर्वेदीय माशु चिकित्सा का, तत्सबंधी औषधीय द्रव्यो का तथा पारदादिरस प्रक्रियामओ का मौलिक शास्त्र है । वातादि दोषो को शमन एवं कोपन करनेवाले, तथा उनके प्रति उदासीन रहनेवाले द्रव्यो की विवे- चना, तथा साथ ही, इस प्रकार के कुल सत्तावन द्रव्यों की शोध, श्रीभट्टजी की, आयुर्वेद जगतको, अपनी ही एक गवेषणात्मक मौलिक भेट है। तदुपरात, आयुर्वेदोक्त औषधीय द्रव्यों को भिन्न भिन्न वर्गों में विभक्त करके, प्रत्येक वर्ग मे, रोग-प्रतिरोध मे प्रभावातिशय दर्शाने वाले विशिष्ट द्रव्यों का ही इस ग्रंथ में, सकलन किया गया है । सतत अनुसधानपूर्वक औषधीय द्रव्यों का यह सिद्ध संचयन पू श्रीभट्टजी के अगाध परिश्रम एवं मति-वैमल्य का निगूढ -परिचय करा देता है । रसों की तथा दोषों की परम- जटिल-विस्तार विधि को जिस सरल, सुदर एवं चमत्कार पूर्ण शैली में समझाया गया है वह भन्यत्र सहिता-ग्रंथों मे विरल रूपसे ही उपलब्ध होती है। ।
प्रस्तावना १५ - - चतुर्थ-गुच्छ में सर्व रोगोपशमन के सिद्ध प्रयोगों का सकलन है। प्रत्येक योग अनुभूत हे । 'सिद्ध-भेपज-मणि-माला' गत इन योगो के, सेरे पास, पू श्रीभट्टजी के श्रीहन्त से भालेसित भनेको जीर्ण-पत्र है। प्रत्येक योग के नीचे प्राय. इस तरह रिखा हुभा मिलता है-'मजमा कर देख लीनी छै-सही छै'। इससे इतना सुनिश्चित है कि इन योगों को, उनकी, यथा रोगपर प्रयोगद्वारा, सिद्धि की दृढ प्रतीति होनेपर ही पद्य - बद्ध करके, इस ग्रंथ में, स्थान दिया गया है। ये योग अत्यंत सरल है। इनके घटक द्रव्य प्राय. सर्वत्र अनायास उपलब्ध होनेवाले अल्प - ध्यय साध्य है। घर में या वन मे, वैद्य इन योगोद्वारा सस्ती कितु सद्य फलदायिनी चिकित्सा कर सकता है। इस प्रथरत्न को अपने हस्तगत रखनेवाला वैद्य वस्तुतः 'पीयूष -पाणि' है। शास्त्रीय योगो का निगूढ रहस्य, पू श्रीभट्टजीने गुरु परपरा से भी प्राप्त किया था-तदुपरांत, अन्यान्य चमत्कारिक - प्रयोगो को उन्होंने, साधुनों से तथा अनुभवी वृद्धजनों से सेवा- शुश्रूपाद्वारा, अपने शिष्यों से स्नेहद्वारा, ग्रामीण जनो से द्रव्य, उपकार, प्रभाव, परिश्रम तथा अन्यान्य साधनोद्वारा, प्राप्त किये थे। जिन जिन महा. नुभावो से इस तरह के योग प्राप्त हुये, उनके नामों का उल्लेख उन योगों के साथ करके, पू श्रीभट्टजी उनको भी अपने ग्रंथ के साथ अमर कर गये। पू श्रीभट्टजी की कृतज्ञतामयी यह मनोवृत्ति वैद्य-समाज का एक अनुकरणीय गौरवान्वित मादर्श है। इसी तरह, पंचम-गुच्छ - गत पारद-प्रक्रिया पर भी, आपश्री ने, अपनी निजी मौलिक पद्धति प्रस्तुत की है। पारद की, गर्भयत्र द्वारा मन्तधूम ‘जारणा' विधि, तेजो-जल का निर्माण, सौर को वह्नि-क्षम बनाने का प्रकार आदि इस सदर्भ में विशेष उल्लेसनीय हैं। यह सिह वैद्य, स्वयं अपनी ही पद्धतिद्वारा, पारद-प्रधान सभी रसो का निर्माण करता था। शास्त्रो का माधार लेकर, अध्ययनात्मक व्याख्या कर देना एक बात है। किंतु, शासोल्लिखित प्रयोग को क्रियात्मक रूप में प्रत्यक्ष करके, प्रत्यक्षी-कृत उसी सत्य को, उसके मौलिक स्वरूप मे, अपने अनुभव का पुट लगाकर प्रस्तुत करने से, भाप - शास्त्रों के प्रति श्रद्धा में अभिवृद्धि होती है और इसी में, उस ज्ञान को प्रस्तुत करने वाला अपनी कृतकृत्यता समझता है । भात्मज्ञान से साक्षात् करने वाले, ब्रह्म-सूत्र के व्याख्याता श्रीशकराचार्य, वेदव्यास से कदापि न्यून नहीं है। आयुर्वेद विज्ञान-वारिधि स्व श्रीभद्दजी नागार्जुनादि रस वैज्ञानिकों की समकक्षा के उद्भट विद्वान थे। क्योंकि, चीसवीं शताब्दि में सर्व प्रथम यही एक ऐसा रस- विद्या- वैज्ञानिक रहा, जिसने रस-ज्ञान के विषय मे अपना यह परिचय दिया- सूते गधक- जारणावधिकृता येन क्रिया नैकश" आयुर्वेद शास्त्र का विवेचन, चरकसहितादि के अमुक अंशों को छोडकर, अधिकांश में पद्य-बद्ध मिलता है। कदाच , छान की सुख-स्मृति के लिये इस शैली का भाग्रह रहा हो। किंतु, मायुर्वेद कदापि काव्य का विषय नहीं बनाया जा सकता सिदभेषजमणिमालायां है। वह । १ अधिपति पलाण्ड यदि वनाया जा सकता हे तो 'संस्कृत वाङ्मय' में यह एक नूतन एवं अद्भुत शैली मानी जायेगी। पू श्रीभट्टजी की जन्मसिद्ध काव्य-प्रतिभा के विषय में पृथक् निबंध लिखना होगा। कच्छ-वंश भादि महाकाव्यों के प्रणेता श्री श्रीकृष्णरामजी 'अनामिका सार्थवती बभूव' इस उक्ति के अपवाद रूप अपने युग के वस्तुतः कालिदास ही थे। श्रीभट्टजी के समकालीन महामहोपाध्याय श्रीदुर्गाप्रमादजी ने उनके विषय में 'कवने यः कालिदासोपमः' कह कर उनका यथानुरूप परिचय दिया था। भायुर्वेद को कान्य का विषय सर्वप्रथम पू. श्रीभट्टजी ने बनाया। इस प्रसग मापका ‘पलाण्डुराजशतकम् ' आयुर्वेद-वाड्मय में एक परम नूतन एवं रमणीय काव्य है। कान्यारभ कन्द-प्रकांड पलाण्दुराज के दिग्विजय-प्रस्थान वर्णन से किया गया है । समग्र कदजाति के एकमात्र जो श्वेतवर्ण हो गये वह अपने ही यशोविपाक से!!! 'प्रतापखर्वीकृतसर्वकन्दो यशोविपाकेन विशिष्य पाण्डु ।' पलाण्डुराज के सेनापति, विभन्न का सधान करने में निपुण, अमृत-विन्दु से उत्पन्न मत एव रस मय सयं रसोन हैं-'समन्ततो मर्मपिनद्धवर्मा विभन्नसधानविधा- विदग्ध । पफाण पीयूपपृषत्समुत्थो रस दधानो मिषतां रसोन ' । अर्श सहार में कृत प्रतिज्ञ परमवीर सूरण, सेनाप्रभाग को अलंकृत कर रहे हैं-'सामर्षमर्शोवध- बढदीक्षो विरूढशस्त्रवणकर्कशानः। स सूरणः सद्गुणपूरणश्रीरमुप्य नासीरमलञ्चकार' । अटोपर आरूढ, दोपत्रय-नाशक वाल 'मूलक ' सेना के साथ साथ प्रस्थान कर रहे है । क्रमे लकानामुपरि क्रमेण विस्तार्य हंसच्छदतूलकानि । भारुह्य दोपत्रयघस्मराणि प्रतस्थिरे बालझमूलकानि'। कितना रमणीय है यह कान्य पलाण्ड, रसोन आदि कदवर्गीय- शाक मात्र न रहकर, अपने अपने विशिष्ट-गुणो से युक्त मानो सजीव योद्धाओं के रूप मे उपस्थित हो गये हो।।। भाव के साथ भापा का मधुर समिश्रण दर्शनीय है। आपश्री के सभी काव्यों मे से, मक्षर अक्षर मे से, पद पद मे से एक अनिर्वचनीय मधुरता, सजीवता एवं अनूठापन छलकता हुभा प्रतीत होगा। इनकी साक्षात् प्रतीति के लिये 'सिद्ध-भेपज -मणि-माला' का कोई भी पद्य ले सकते है । यह ग्रंथ स्वयं काव्यमय आयुर्वेद है। 'कवित्व' साधनोंद्वारा प्राप्त की जानेवाली वस्तु नहीं है-यह एक स्वयंभू मान- सिक वृत्ति है। नैसर्गिकी प्रतिभा के साथ साथ निरतर अध्ययनशीलता से ज्ञान की मतिविमलताद्वारा काव्य की संपदा मे वृद्धि की जा सकती है। कितु काव्य-गत चारुत्व' की निष्पत्ति के लिये 'व्युत्पत्ति' की प्राप्ति इतनी सुलभ नहीं । नैसर्गिकी च प्रतिभा श्रुतञ्च बहु निर्मलम् । अमन्दश्याभियोगोऽस्या कारण काव्यसंपद.॥ कवित्वं जायते शक्तिर्द्धतेऽभ्यासयोगत. । तत्र चारुत्वनिष्पत्तौ व्युत्पत्तिस्तु गरीयसी ॥ व्युत्पत्ति समन्वित ही महाकवि कहलाता है। पू. श्रीभट्टजी महाकवि थे। 'सिद्ध - भेषज-मणि-माला', 'चारुत्व' के प्राचुर्य से मानों उभराती है। यवानी ।
प्रस्तावना १३ 4 . (भजवायन) कृशोदरी यवनी के समान 'तीक्ष्ण' होती हुई भी 'रुचिकर' क्यो न होगी? 'तीक्ष्णाऽपि रुच्या नवला सवातला प्रदीपनी शुक्रहरी कृशोदरी। हिनस्ति जंतून् द्रवभावभाविनी लघुर्यवानी यवनीव भाराते'। सिन्द-भेषज-मणि-माला से ऐसा एक भी पद्य नहीं जो मनुप्रास रहित हो- यमक, अर्थालंकार, सामयिक मनूटि उपमाये, संगीतमय भाषा मे मनोगतभाव की अभिव्यक्ति, नैसर्गिक कोमलकांत पदावलि मादि काव्यसंपदा से चकचकित यह मणिमाला वस्तुत. परम- स्पृहणीय बन गयी है । कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं- 'पलाण्डकन्दपानीयमानीय द्विपलं पिबेत्' । 'कर्षन्ति काश्य क्रमश. कृशानो'। 'पित्तात्रमारुतविदाहरुजोविदारी-म्तन्या विदारयति दाररतिं ददाति'। 'कटुरसपरिपुष्टं तिक्तभावेन जुष्टं, पवनविजयतुष्ट शुक्रकारि प्रदिष्टम् । विधमति बहु दुष्टं श्लेष्मवीसर्पकुष्ठं, श्वसनकसनकष्ठं दु सह हन्ति 'कुष्टम् ' । 'भक्तं मियोविभक्तं साधय सितशर्करासमासकम् । तदरति-रक्तपित्तं वेश्याचित्त यथा वित्तम् ॥ भरुणधवलचलकिसलयनवकिसलयपुटविपक्कफणिफेनम् । भतिसरणमसुहरणमपि हरिस्मरणमिव रुणद्धि ससरणम् ॥ रसायन सर्वरसो विशारद पराक्रमाप्तौ भजता विहारदः । त्रिदोपनुद्योगवहोऽर्तिपारद. करोति कुष्टक्षपणानि पारद ' । गुटकर्पूरवटिका श्वास सद्यो व्यपोहति । प्रभा प्रभाकरस्येव सकोचं सरसीरुहाम् ॥ 'शूलं समूलं हरति प्रसा कूलं यथा निर्झरिणी - प्रवाह '। हरन्ति मेहानपि दीर्घकालजान् - गुरूपदेशा दृढसशयानिव' ।। नस्य कृतं मत्कुणरसृम्भिहरत्यपस्सारमुदप्रवेगम् । मदीयकाव्यं सितया समान वृथाभिमान द्विषता कवीनाम् ॥ 'निहन्ति जठरान्तक कृतघ्न इव सौहृदम् । 'म उ मधुर गव्य पय कुन्दसहोदरदन्ति । त्रुटिमधुकप्रतिसारितं कण्ठगद लघुहन्ति' । करालङ्कतावग्रतो विस्फुरन्त्यामपेक्षा भवेत् किं पुनर्दर्पणस्य' । खलजनता स्तुतिभिरहो विनीतभाव दधाति न वापि । नवनीतभाविता कि लोहशलाका मृदुर्भवति' ॥ हेमन्तकालेऽत्र वियोगिकाले शीतस्य रुक् पश्य न तस्य यस्य । अङ्के हसन्नी दयिता हसन्ती पार्थे हसन्ती वसनानि सन्ति' ॥ कोमलकान्त पदावलियुक्त अतिसार के असाध्य लक्षणोवाली समस्यापूर्ति पठनीय है.- 'सोऽसाध्य परिकीर्तितोऽतिसृतिमान् यस्येति सार्येतविण् नीलाभाऽधिकनिर्मलाग्रविलसत्सौरभ्यसभारयुक् ।
१४ सिद्धभेपनमगिमालायां अन्तर्दुहितयाऽनिविद्रमलिना यता मिरासन्तुभि- जम्मन जलविन्मुक्त जन जम्माया जालपत' । जिस वृत्त में रचना की गई हो उसमे तहतनामाडेप रप रचा कागल दर्शनीय है 'गोमूत्रे कथित स्नुहीपयमि च न्यम्नम्मत. शालिनी- मल्ल सन्मदिराभिषेकनिधित सिनसिना सर्पर । मान्यश्लेष्मसमीरराकमनरुवामामहिवापर- व्यात कुरम केषु कुम्ने शादलनिशीतितम् ॥ इत्यादि । शिखरिगी छद मे शिसरिणी (ददी - निर्मित - लेख) का वर्णन कितना रचिकर बन गया है मरुलीला लीना भवति च नवीना रुचिरल- समुद्रिक्तं पित्तं मलिनयति चित्तं क्षयभिया । बलास. कि हास नजति बलती वल्गनि यलं. समीक्ष्योचरेलोपणशशिवयस्या शिसरिणीम् ॥ मायुर्वेद के निगूढ ज्ञान की प्राप्ति के साथ साथ दुर्लभ काव्य - रस की आनन्दानु भूति के लिये, भब, माप 'मिड-भेज - मणि-माला' को ही क्यो न धारण करें ? पू श्रीभट्टजी ने अपने भगाध ज्ञानको, देव - वाणी - पर अपने अप्रतिम वर्चस्व के अनुरूप शैली में अभिव्यक्त किया है • त यह अथ अपने भापको समझाने में, समझने वाले के सपूर्ण पाण्डित्य की एकाग्रता माग लेता है। जिन्होने इस ग्रंथ का गुरुपरपरा से अध्ययन किया है वही इसे समझ सकते है - अन्य कदापि नहीं । बहुत से प्रयोग ऐसे हैं जिनका सपूर्ण रहस्योद्घाटन नहीं किया गया। अमुक प्रयोग कूट - पद मे कह गये है-तो अमुक प्रयोग के घटक - द्रव्य अनुक्त रहे हैं अमुक स्थलोपर भौषधीय द्रव्यों के क्लिष्टातिकिष्ट पर्यायो का उपयोग किया गया है-'यथा मानदल, रूक्ष, धननाद, त्रिवार्षिक माढि जिसका टिप्पणी मे भी स्पष्टीकरण नहीं मिलता। औषधियो के मान 'कटपयादिक्रम' को जानने वाला ही समझ सकता है। कहीं मनुक्त ही रही है तो कहीं कहीं अर्थ तिरोहित सा रहा है। मेरे मत मे, इस प्रथका सपूर्ण अनुवाद एक परम-दुरूह कार्य हे-तथापि पू पिताजी की आज्ञासे श्रीगणेश कर ही दिया, प्रारभ के दो गुच्छो का विवरणसहित भनुवाद समाप्त हुभा ही था कि उस दिन पू पिताजीने मुझे बुलाकर कहा कि बेटा। आज हम 'अमरपथ' की यात्रा करेंगे। मैं दिङ्मूढ था- पिताजी को कोई रोग- विशेष नहीं था। उन्होने मुझे अपनी नाडी बताई और कहा इस तरह जब नाडी चलनी हो तब समझना कि व्यक्ति चार प्रहर के पीछे देह त्याग करदेगा। अपने अंतिम समयतक मेरे पिता मुझे ज्ञान देते रहे। , गुरूक्त-विधि' प्रस्तावना पिताजी के साथ साथ इन दो गुच्छों के अनुवाद की भी उपरति हो चुकी थी, कितु, मेरे ‘कल्याण-मित्र' वैद्य - मूर्धन्य पं श्री. हरिदत्तजी शास्त्री की सतत प्रेरणा एवं नियोग से, मैंने भवशिष्ट अनुवाद मपूर्ण कर ही दिया- किंतु मुझे सतोप जो नहीं हो रहा वह इसलिये की विस्तृत - व्याख्या मांग लेने वाले अमुक प्रयोगों के प्रति पुस्तक के कलेवर में अभिवृद्धि के भय से, न्याय नहीं कर सका। 'चितादग्ध स्वावस्थि' 'तक्षककलेडिकातल पर्पटिका' उन प्रयोगो मे से कुछ है। महर्पि अग्निवेश-प्रणीत अंजन निदान के हिंदी अनुवाद का सयोजन इस ग्रथ- रत्र की उपादेयता में अभिवृद्धि करेगा। इसकी मूलप्ररेणा प श्रीहरिदत्तजी से ही प्राप्त हुई । महानुभावों की सत्मगति मानव के अभ्युदय का मगलमय सोपान है। पू श्रीशास्त्रीजी ने प्रूफ सशोधन से लेकर शुद्धिपत्र के निर्माण-सीमातक इस ग्रंथ के सपादन मे जो अपना अमूल्य समय दान किया उसके लिये मैं उनका तथा उतनी ही मात्रा में - अपनी संस्कृत एव भाड्ग्ल - साहित्य पडिता-पत्नी श्रीमती चढ़ा भट्ट एम् ए का हृदय से कृतज्ञ हूं । अंत मे, विद्वानों से प्रार्थना है कि यदि अनुवाद मे कहीं कुछ सदिग्धता प्रतीत हो तो परिशिष्ट गत शुद्धि-पत्र अवश्य देखले । गुरु परपरा से प्राप्तबोध के अनुरूप ही यथामति, मैंने, यह अनुवाद किया है । अधिकांश मे यह स्वतन्त्र अनुवाद है-भत कही कहीं मूल मे अनुक्त द्रव्य, मान मादि स्पष्ट करके, इसमें, लिख दिये हैं। ग्रथ-गत, विशेषतया, विष - प्रधानयोगो का उपयोग अनुभवी वैद्योद्वारा ही कराना हितावह होगा। पृ श्री श्रीकृष्णरामजी ने इस ग्रंथ रत्न की सपूर्ति करके, इसका मुद्रापण कार्य शीघ्र ही प्रारभ करदिया था। किंतु, हाहन्त, इसी समय, विक्रम सवत् १९५४ वैशाखकृष्ण प्रतिपदा के दिवस, ४९ वर्ष की अवस्था में आप यश शेषता को प्राप्त हो गये। स्वर्गारोहण से कुछ समय पूर्व, चिकित्सा-गत अनुसधान कार्य को अक्षुण्ण रूप से गतिमान रखने के अभिप्राय से, आपश्रीने, 'सस्कृत चिकित्सालय' के नाम से एक सस्था स्थापित की थी। अपने अनुसधानकार्य में उत्तरोत्तर वृद्धिंगत यह सस्था स्त्र पू श्रीभट्टजी का एक सजीव-स्मारक बन गया है । स्व. पू श्रीभट्टजी के कुल में, पुत्र-पौत्र तथा प्र-पौत्र-वराजो से - आयुर्वेद- शास्त्र के अविस्मरणीय विद्वान् है तथा होगये । षड्शास्त्री भट्ट श्रीगगाधरजी- माशु- कवि भट्ट श्रीकलाधरजी एवं प्रसिद्ध चित्रकार श्रीधनश्यामजी आपकी सतान-त्रयी मूर्तिमान बृहत्रयी थी। मेरे प पू पितृव्य श्रीगगाधरजी - आयुर्वेद महासम्मेलन पनवेल के सभापति - अपने पिता के समान ही आयुर्वेद तथा संस्कृत के उद्भट विद्वान थे। मेरे स्व प पू पिताश्री को चरक-सहिता- अनुलोम-विलोम गति से कठाय थी। स्व. पू श्रीभट्टजी के निकटतम पट्टशिष्यो मे से, साधु श्रीलक्ष्मीरामस्वामी, एवं आयुर्वेद के सुप्रसिद्ध पडित श्रीनन्दकिशोरजी के पिता श्रीश्यामजी विशेष उल्लेखनीय है । san १६ सिदभेषजमणिमालायां 'सिढभेपज मणिमाला' के टिप्पणीकार मिपगाचार्य श्रीलक्ष्मीरामस्वामी, ५ श्री. भट्टजीरूप ज्ञान-प्रदीप से प्रवर्तित अपर प्रदीप ही थे। मणि-माला पर, श्रीखामि- जीकी टिप्पणी उनकी एक समर साहित्यिक कृति है। श्रीस्वामिजी-वाग्भट के सुप्रसिद्ध टिप्पणीकार भरणवत्त एवं हेमाद्रि से कदापि न्यून नहीं थे । 'टिप्पणी' में उनके मधुर कवित्व एवं भायु. शास- गत अगाध - पाण्डित्य का म्यत. परिचय मिल जाता है । टिप्पणी गत प्रायः प्रत्येक पंक्ति पद्य-बद्ध अथवा कोमल - कारा पदालि समन्वित है- 'फाणितप्रवर ह्येतद्वान्तावप्याचार्यते'- 'लोक यस्याः चारणीति प्रसिद्धि '-' -'हैगुण्य स्यादौपधान्माक्षिकस्य'- 'लोकमज्ञा''एलिया' चारय माना ग्राया यारन्त्यमुलीपर्य- युग्मात् ' । श्रीस्वामिजी के किमी स्वतंत्र कान्यमय प्रबंध के अभाव मे- श्रीमहजी पर स्वरचित प्रशम्ति के केवल सार्धश्लोकद्वय उनको महाकवि रूप से अमर कर देने में पर्याप्त होगे- तत्राऽज्ञानतमोराशिभास्कर नित्यमगलम् । बुध कविं द्विजपति वैद्य - विद्या वृहस्पतिम् ॥ श्रीकृष्णरामनामान गुरु शरणमाश्रित. ॥ श्रीस्वामिजी के श्रीगुरु अलौकिकत्वसे समन्वित थे। अज्ञानरूप शनि तथा तमो राशि रूप राहु केतु के लिये साक्षात् सूर्य ये। आप द्विजपति (चद्रमा), मगल मय, बुध (विद्वान्), वृहस्पति तथा कवि (शुक्र) ये। नवग्रह- मय इस लोकसहित श्रीस्वामीजी को वन्दन हो।" 'बले. सर्वस्वहरणं प्रवणं भव-तारणे । साधूनामेकशरण श्रीकृष्णचरण नुम' ।। यह हे काव्य ! यथार्थ चारुत्व ! नैसर्गिकी प्रतिभा ! अष्टाग-हृदय का आयोपात -मुख-पाठ सुनकर इस ग्रंथ के अनुवादक को 'जन्म- मिन्द्ध -प्राणाचार्य की पदवी अर्पण करने वाले, विद्वत्ता, साधुता एव सहृदयता के, साक्षात् -प्रतीक, सर्वत्र-पवित्र- वृत्तिमय साधु श्रीलक्ष्मीराम - स्वामीजी की मधुरस्मृति पूर्वक इस लेख को, में यहा सपूर्ण करता हूँ। - विजयादशमी - -विनयावनत रणछोड कलाधर भट्ट
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morea ३ 1 - - -- । media + anduaamsoom- - MORMAN MAHARAMIN - खर्गताः रा. . भट्ट श्रीकलाधरमहाभागाः
**"*"**
।। श्रीः ॥
समर्पण म् हर
त्रयीमयाय प्रतिभाप्रभाणा
गुणापगाना वरुणालयाय ।
क्रियाविधी सिद्वसुधाकराय
प्रणागि सपूर्णकलाधराय ।
E立空空如也改不改
个个空空空如容茲罕立於容。空空如空空如空立容
श्री १०८ गुरुवर्य-पितृतीर्थश्रीकलाधरभट्टमहाभागानां
चरणारविन्देपु
परमादरेण प्रणम्य
प्रस्तुतग्रथरत्नानुवादरूपपुष्पाञ्जलि
'सा नुन य
समर्पयति
तत्रभवद्वशंवदः
रणछोडभः
॥ श्री॥ भायुर्वेद-वाचस्पति, वैद्य राम -प्रकाश स्वामी एम ए भिषगाचार्य, दर्शनशास्त्री. आचार्य गवर्नमेंट आयुर्वेद कालेज, जयपुर. -सम्मति- मायुर्वेद के उद्भट विद्वान् एव अनेकशास्त्रो के मर्मज्ञ रा. वै महाकवि स्व भट्टश्री श्रीकृष्णरामजी प्रणीत : सिद्ध - भेषज मणिमाला' आयुर्वेदीय चिकित्सा विज्ञान पर, एक नूतन एवं अनुसधानात्मक मौलिक शास्त्र है। श्रीभट्टजी के पट्ट शिष्य, आधुनिक आत्रेय स्व. श्रीलक्ष्मीरामजी स्वामी ने अपनी अनुपम टिप्पणीद्वारा, इस ग्रंथोत्तम की सिद्धि के निगूढ रहस्य का-तत् - गत भेषज रूप मणियो के यथार्थ वैभवका, वैद्य - समाज को परिचय दिया एव इस तरह अपने पू गुरु महाशय की ज्ञान-धारा को अविच्छिन्न रूप से प्रवहमान रखा। कालप्रभाव से, तलस्पर्शी- पाण्डित्य के उत्तरोत्तर हास के कारण मणिमाला के सर्वोपयोगी प्रयोगों से आधुनिक चिकित्सक वर्ग अपरिचित सा होता जा रहा है, इनके भववोध के लिये, स्व. श्री भट्टजी के पौत्र जन्म - जात 'प्राणाचार्य श्री भार के. भट्ट ने मणिमाला पर 'वैश्वानर' नामक हिंदी विवरण लिख कर, वैद्य जगत् का अतिशय उपकार किया है। चरकोक्त महाकपायो के पद्यबद्ध निरूपण मे, श्री भार के. भट्टकी, कुल परंपरा प्राप्त, कवित्व प्रौढी का दर्शन होता है। तदुपरात, 'अंजन- निदानम् ' के हिंदी रूपान्तर को सन्निविष्ट करके, आपने इस ग्रंथ रत्न को अधिका- धिक उपयोगी बना दिया है। यत्र तत्र वैमन्य का दिग्दर्शन भी किया गया है जो कि भविष्य में समाधेय होगा । यह प्रथ सग्रहणीय है और इस कृति के लिये श्री आर. कलाधरभट्ट का प्रयत्नस्तुत्य है। 'वैश्वानर' टीका अज्ञानान्ध को भस्म करके ज्ञानालोक का प्रमार करेगी। वैद्य राम प्रकाश स्वामी अनुक्रमणिका श्लोक १ १-२ ६-१२ १३-२२ १ GG विषय पृष्ठ १ प्रथम गुच्छ - उपोद्धात मगलाचरण ववशपरिचय २ कूर्मवपरिचय ३ ग्रयप्रयोजन २ द्वितीय गुच्छ - द्रव्य-गुण परिचय मगलाचरण हरीतक्यादिवर्ग पौष्टिकवर्ग ३९ सुगधिवर्ग ४२ पुष्पवर्ग फलवर्ग ५४ वान्यसग्रह ५९ सिद्धान्नसग्रह ६१ सधान ६९ शाक तेल दुग्धादि दधि ८१ तक ८१ नवनीत ८२ घृत गोमूत्र ८३ इक्षु मधु ८४ ८५ पारदादिवर्ग द्वितीय गुच्छसमाप्ति ९४ ३ तृतीय गुच्छ-स्वास्थ्यसरक्षण मगलाचरण ९५ दिनचर्या ९५ रात्रिचर्या १०२ ऋतुचर्या १०२ ९५-१०६ १०७-१३६ १३७-१४९ १५०-१६९ १७०-१७९ १८०-२१५ २१६-२२३ ०२४-२४८ २४९-२५२ २५३-२६६ २६७-२६९ ०७०-२७२ २७३-२७४ २७५ २७६ २७७-२८० २८१ २८२-२८७ २८८-३१६ ३१५ १ २-३२ ३३-३५ ३६-५६ ४ श्लोक ३-१०० १-४७ ३ १-१३ १-३८ १ १ २-१५ ६ १ २-५१ १-१८ १-२० १-२४ सिद्धभेषजमणिमालाया विषय कुलयोग-सख्या पृष्ठ सौजाकोपदश-चिकित्सा ४९ २८२-२९८ कुष्ठरोगचिकित्सा २९९-३०५ शीत-पित्त-चिकित्सा ३०५-३०६ स्नायुक-रोग-चिकित्सा १२ ३०६-३०९ क्षुद्ररोग-चिकित्सा २५ ३०९-३१४ मुखरोग-स्वरूप ३१५ मुखरोग-चिकित्सा ३१५-३२२ कर्णरोग-स्वरूप ३२३ कर्णरोग-चिकित्सा १५ ३२३-३२५ नामारोग-चिकित्सा ३२५-३२६ नेत्ररोग-स्वरुप ३२६ नेत्ररोग-चिकित्सा ३४ ३२६-३३३ शिरोरोग-चिकित्सा ३३३-३३७ भसृग्दर-चिकित्सा १२ ३३७-३४० स्त्रीरोग-चिकित्सा ३४०-३४४ बालरोग-चिकित्सा ३४४-३४९ विष-चिकित्सा २२ ३५०-३५३ चतुर्थ गुच्छ समाप्ति- पञ्चम गुच्छ - रस-प्रक्रिया ३५५ पारदस्तुति ३५५ रसामुशास्तुति हिगुलसे पारदोत्थापन ३५५-३५६ पारदसस्कार प्रकार ३५६-३६० षड्गुण गधक जारण-यत्र वर्णन ३६० गर्भयंत्र द्वारा षड्गुणगधक जारणविधि तेजाव निर्माण प्रकार ३६१-३६२ भनिक्षम-शोरा निर्माण विधि ३६२-३६४ १० ३६४-३६७ ૮૨ ३६७-३९० ग्रंय - समाप्ति-मगल श्लोक ३९० ग्रथकार- परिचय ३९१-३९२ अनुवाद सपूर्ति-मगलश्लोक तथा अनुवादक का परिचय ३९२ चरकोक्त पचाशत-महाकषाय श्लोकवद्ध ३९३-३९६ परिशिष्ट-शुद्धिपत्र आदि आदि १-२० २१ । १ - २ । । " 1 - ३-६ ७-१७३ १८ - १९ २०-२५ २६-३३ ३४-४८ ४९-१८७ रस-योग अन्य -प्रयोग १८८ १८९-१९३ १-५० ३९७ से ॥ श्रीहरिः॥ श्रीमहागणाधिपतये नमः । सिद्ध - भेषज मणि-माला च्यासोपाख्य राजवैद्य -भट्ट-श्रीकृष्णरामकविगुम्फिता। तत्पौत्र राजवैद्य भट्ट श्री आर् कलाधर कविरत्न-विरचितया 'वैश्वानराख्यया' हिंदीविवृत्या समलङ्कृता । प्रथमो गुच्छ आविर्वभूव कलशं दधटर्णवाद्यः पीयूपपूर्णममरत्वकृते सुराणाम् । रुग्जालजीर्णजनताजनितप्रशंसो धन्वन्तरिः स भगवान् भविकाय भूयात् १ परागमहितो सदालिभिरतीव संसेवितो स्वतापपरिशान्तये प्रवरराजहंसाहती। प्रकाममृदुलारुणोदरतया चमत्कारिणौ वयं गुरुपदौ स्तुमः कमलसंपदा लुण्ठको ॥२॥ हि दी अनुवाद मंगलाचरणम्- सुदक्ष मस्तुत्ये मदमथननृत्ये फणिपते समादिग्ध स्निग्ध पशुपयुवतीना कुचमदै । स्वकीयान् गोवत्साननुचरितुमुत्कंठितमहो प्रभो पद्मासमाऽवतु मुदितपद्माभियुगलम् ? सस्मृत्य वाक्यान्यपरो हि कृष्णो नैरोग्यधर्माभ्युदयाय जात. । पायाटपायात् स तनोनिकायात् श्रीकृष्णरामो भविकाय भूयात् ॥२॥ क्षीर-सिधु से हुये प्रकट अमि मय घट धरकर, करने, परमकृपाल, देव गण को अजरामर रोग-जाल से जीर्ण-जगत-वदित विश्वभर धन्वन्तरि भगवान करे कल्याण निरतर ॥१॥ अपनी अत्यत मृदुता तथा तल गत अरुणिमा से कमल के सौंदर्य को परास्त करने वाले, गुरु के चमत्कारपूर्ण चरण युगल को, हम प्रणाम करते है, जो चरण श्रीकृष्णरामशिप्यो लक्ष्मीराम प्रणम्य त भक्त्या । तत्कृतनिबन्धसमयं व्यक्तीकुरुते यथाबुद्धि । न सा दिड् न स देशोऽपि न च तन्नगर क्वचित् । यत्र श्रीकृष्णवैद्याना शिष्यैर्नेव विजृम्भ्यते ॥ १-इह खल्वस्मद्गुरव श्रीकृष्णरामपादा “कीर्तिरक्षरसम्बद्धा स्थिरा भवति भूतले" इत्युक्तेर्भेषजमाला प्रश्नन्त गिष्टस्थितिपालनार्थ ग्रन्यस्य निर्विघ्नपूर्वक समाप्त्यर्थं च द्वाभ्या पद्याभ्या मङ्गलमाचरन्ति-आविरित्यादि । २-जनसमूह । ३-परागमहितो, परागम- हितो। ४-सदा अलिभि , सतामालि भिश्च । ५-राजहसै , राजतल्लजैश्च । . -- २ सिहभेपजमणिमालायां [उपोद्घात- आयुर्वेदवचाप्रपञ्चचतुरो विद्यावतामग्रणीः संख्यातीतगुणाश्रयो गदहतो साक्षाद्धि धन्वन्तरिः । विश्वस्मिन्नुपकारबुद्धिरधिकं कल्पद्रुवत्प्रेष्ठदः श्रीमद्भवरेन्द्रगुर्जरकुले श्रीलल्लुरामोऽभवत् ॥ ३ ॥ तस्मादिन्दुरिवाम्बुधेः समभवद्वेदार्थपारगमः प्रौढः कर्मसु सर्वविद्वदगदकाराग्रणीः कुन्दनः । यो रामक्षितिपेन पाठनिलये सत्कृत्य संस्थापितः सर्वेषां गदगञ्जनाय हिकमन्मन्दारवन्धं व्यधात् ॥ ४ ॥ श्रीकृष्णस्तनयस्ततः समजनि श्रीपाठशालासन- स्थायी नैविचित्रकाव्यरचनाप्राप्तप्रतिष्ठाभरः। कमल पराग की महिमा से युक्त अथवा परा-ज्ञान की प्राप्ति कराने में समर्थ है, नो सदा भ्रमर समूह से अथवा सज्जनो से ससेवित है, एवं जिनका समाश्रय-सम्मान, अपने सताप की शाति के लिये, उत्तम राजहंस अथवा श्रेष्ठ राजपुरुप करते है ॥ २ ॥ मेरे पितामह श्रीमद् लल्लुरामजी (अपर पर्याय श्री विष्णु रामजी) ने श्रीभट्ट श्रेष्ठ-गुर्जर कुल मे जन्म लिया-आप आयुर्वेद - वाङ्मय मे परम विद्वान् , विद्वद् समाज मे अग्रगण्य एवं अनत गुणों से समलकृत थे। रोग निवारण विधि मे साक्षात् धन्वन्तरि के समान तथा अपनी परमोदार-वृत्ति के कारण अभीष्ट - पूर्ति करने में स्वय कल्पवृक्ष ही थे ॥३॥ इनसे, महासमुद्र मे से चंद्रमा के समान, श्रीकुन्दनराम-पुत्र-रत्न ने जन्म लिया। आपका अपर नाम श्रीजीवनराम भी है। भाप वेदार्थ मे पारगत, चिकित्सा शास्त्र में प्रौढ तथा पंडित एवं वैद्य समाज में सर्वश्रेष्ठ थे । आपको ' सस्कृत विद्या- लय' में सस्थापित करके श्रीरामसिह भूपति ने आपके प्रखर -पाडित्य का प्रचुर सम्मान किया था। सर्व-प्राणियो को रोग-मुक्त करने के लिये आपने यावन- चिकित्सा- शास्त्रपर 'हिकमन् -मंदार' नामक काव्य-मय मौलिक ग्रंथ की रचना की थी ॥४॥ इनसे पुत्र-रत्न श्रीकृष्ण अवतीर्ण हुये। श्रीसस्कृत पाठशाला मे पदारूढ, अनेकों उत्तम - काव्यो की रचना द्वारा प्रचुर प्रतिष्ठा एव यश को प्राप्त वही मै श्रीकृष्ण विद्वान १-श्रीविष्णुरामापर पर्याय । २-श्रीजीवनरामापरपर्यायः । ३-यवनशास्त्रानुसारेण सदर्भविशेषम् । वैद्यविद्या यवनैहिकमच्छब्देनोच्यते । उक्त च-"विद्यैषा हिकमत्प्रोक्ता नज़ी अम्लीति सा द्विधा” इति ( हिकमत्प्रकाशे )। ४-श्रीगुरुचरणरचितेपु बहुषु काव्येषु चमत्कारप्रधानानि कियन्ति काव्यानि प्रत्यभिज्ञार्थ चतसृभिरार्याभिः प्रदर्यन्ते- आर्यालङ्कारशत पञ्चमहाकाव्यसारशतक च। जयपुर विलासकाव्यं मुक्तकमुक्तावली नाम ॥१॥ श्रीकच्छवाहवंश छन्दोगणित पलाण्डुदिग्विजयम् । गोविन्दभट्टभङ्ग तयैव होलोत्सवो भाग २ जयपुरमेलककुतुकं गप्पसमाधानमद्भुतं तद्वत् । नाथस्तव कनीयान् काशीनाथस्तवोऽपि तया३ सम्राट्सुताभिनन्दन-माधवपाणिग्रहोत्सवावच्छौ। गोपालगीतपत्रप्रशस्तिमुख्यानि खण्डकाव्यानि ॥ ४ ॥ - प्रथमो गुच्छः। गुच्छ ] ३ सोऽहं संप्रति सिद्धभेषजमणीनाहृत्य मालामिमां गुम्फासि स्फुरदच्छगुच्छरुचिरां विद्वद्भिपक्प्रीतये ॥ ५॥ श्रीकच्छवाहकुलपुष्करचित्रभानुर्मानो बभूव नृपतिः प्रथिताभिमानः । यः काबुलावधि विजित्य महीं महाब्धावक्षालयद् द्विपदसूक्कलुषं कृपाणम्६ तस्यान्वये समभवजयसिंहवर्मी धर्मादरः समधिकं हयमेधकर्मा । उच्चैश्चतुष्पटिविचित्रचतुष्पथं यः शिल्पिव्रजैर्जयपुरं परमं व्यधत्तं ॥ ७ ॥ जातस्तस्यान्ववाये महति महितधीर्दूपणध्वंसदीक्षः श्रीरामः प्रौढकामः सुकृतमतिरसत्सम्प्रदायप्रमाथी । वैद्य -समाज की प्रीति के लिये, सिद्ध' -भेपज रूपी मणियों को एकत्रित करके -समुज्वल निर्मल-गुच्छों मे विभक्त इस रमणीय-माला की रचना प्रारभ करता हूं ॥ ५ ॥ परम-मनस्वी मानसिंह-भूपति, श्रीकच्छवाह-वंश-कमल के लिये साक्षात् सूर्य के समान थे-जिन्होने काबुल - पर्यंत-पृथ्वीपर विजय प्राप्त करके शत्रुओ के रक्त से रजित अपनी कृपाण को महासमुद्र मे धोकर स्वच्छ की थी ॥ ६ ॥ इनकेही वंग मे श्रीजयसिह वर्मा उत्पन्न हुये। धर्म मे प्रगाढ'- श्रद्धोपेत इन्होंने अश्वमेध यज्ञ किया था। कुशल शिल्पियों द्वारा सुंदर-चतुष्पथों से समन्वित, दीर्घ राजमार्ग वाले रमणीय नगर जयपुर का निर्माण इन्होंने ही किया ॥ ७ ॥ इसी महावंश मे, उत्तम-प्रतिभा-सपन्न, पुण्य - मतिवाले, असत् संप्रदाय के विनाशक, दूषणरूपी दूपणासुर के सहार मे कृत-निश्चयी, लोक के योग-क्षेम की १-अनेन प्रेक्षावत्प्रवृत्त्यर्थमभिधेयोक्तिस्तया भिषक्प्रसाद. प्रयोजनम् । मुख्यप्रयो- जनमनायासेनारोग्य मित्यपि ज्ञेयम् । २-सूर्यः । ३-श्रीमानसिह । अयं च महावीर- तया जगत्प्रतीत श्रीमदकारशाहदिल्लीदुश्चयवनस्य प्रधानसेनापतिः कच्छवाहवंशमहाकाव्ये सपरिवारो वर्णितः। प्रसमात्तत्रत्य कञ्चिदेक श्लोक विलिख्य दर्शयाम मातुं मानमहास्यतीव न गुरु प्रौढोऽपि सन् स्वर्गुरु सा गीर्गायति कि तु नान्तमयते काव्यस्य कक्षा कुत । वल्मीद्वीपभवी कवी तु जरठौ का मादृशाना कथा यत्सख्याकलन -क्रियासु विकल शेषोऽपि शिष्यायते ॥ इत्यष्टमसर्गममाप्तौ श्रीगुरुकृतिर्द्रष्टव्येति । ४-अयमपि तत्रैव महाकाव्ये दशमैकादशसर्गयोः सव्यास वर्णितः । यथा- 'राज्यं वर्धितमाहवेषु विजितं स्वच्छं यशोऽप्यर्जित शिल्पिक्षुण्णमयस्मयं जयपुर निर्माय विख्यापितम् । येनायाजि तुरङ्गमेवविधिना द्रव्यं द्विजेभ्योऽर्पित सोऽय श्रीजयसिंहवीरनृपति स्यात् कस्य वाग्गोचर ।' इत्यलमप्रस्तुतेन । ५-अस्य पुनर्वर्णनं जयपुरविलासे द्रष्टव्यम् । ६-व्यधापयत् । ७-दूषणध्वसे दूषगनामरक्षोविनाशे दीक्षा यस्य स तथा। एतेन श्रीरामचन्द्रौपम्य ध्वनितम्। 1 चा 111 सिद्धभेषजमणिमालायां [उपोद्धात- योगक्षेमक्षमधिः शशिविशदयशा राजराजेश्वरीतों यो “जी, सी, एस, आई" त्यलभत परमां नीतिशस्तः प्रशस्तिम् ॥ ८ ॥ महति तस्य पदे तदनु प्रभुर्विनिहितः सचिवेनं तदाज्ञया । सुरपुरी मघवेव महामहा जयपुरीमधुनाऽवति माधवः ॥९॥ सोऽयं चिरं स्फुरतु विस्फुरितप्रतापप्रौढानलाहुतसपत्नपतगपतिः । कन्दर्पदर्पदलनक्षमयौवनश्रीविद्वत्सुकल्पितकृपो नृपमाधवेन्द्रः॥ १० ॥ हंहो माधवसिंहो द्विपदः पुनरपि सदा द्विपदः । जगति प्रसिद्धनागो नांगो यस्य प्रसिद्धिमुपयाति ॥ ११ ॥ तदन्नोदकमास्वाध श्रमं शास्त्रेषु कुर्वतः । ममात्र साहसं किंवा शक्तिरित्यवधार्यताम् ॥ १२ ॥ सामर्थ्य से युक्त, चंद्र-ज्योत्स्ना के समान विस्तृत यशवाले, नीतिज्ञों से प्रशंसित साक्षात् श्रीराम के समान श्रीरामसिंह ने जन्म लिया । आंग्ल-महाराज्ञी श्रीमति विक्टोरिया ने इनको जी सी. एस् आई, का परमोच्च पदवी प्रदान किया था ॥ ८॥ उपरोक्त महाराजा के आसन पर उनकी यथा आज्ञा, सचिव फतेसिंह वर्मा ने, श्रीमाधवसिह को अभिपिक्त किया। वर्तमान मे यही माधव-इन्द्र के समान-स्वर्ग- भूमि जयपुर नगरी का परिपालन कर रहे है ॥ ९ ॥ कंदर्प के लावण्याभिमान का विदलन करने वाली यौवन - सपद् से सुशोभित, अपनी दिगन्त - व्याप्त-प्रताप की प्रचंड पावक मे शत्रुओ की पक्तिरूपी पतग-समूह को भस्म करनेवाले, विद्वद् -जनों के प्रति कृपा-कटाक्षवाले -श्रीमाधवेन्द्र नृपति चिरकालतक देदीप्यमान रहें ॥ १० ॥ अहो । आश्चर्य । श्रीमाधवसिह द्विपद है, क्योकि वे नित्य द्विप-हाथीयों का दान करते है। जगत मे, अपने पराक्रम से नाग-गजेन्द्र के यश को प्राप्त श्रीमाधवेन्द्र वस्तुत नाग है- अर्थात् न -आग-दोषों से रहित है। (कविता मे एकही पदकी पुन आवृत्ति - पुनरुक्ति दोप कहलाती है। इस श्लोक मे, द्विपद तथा नागशब्द की पुन आवृत्ति होने से, आपातत पुनरुक्ति दोष जैसा लगता है. वस्तुत यहां पुनरुक्ति- वदाभास अलकार है ॥ ११ ॥ यहां यह जानलेना चाहिये, कि भूरि श्रम से, अनेकों शास्त्रो के अभ्यास पूर्वक - इस सिद्ध-भेपज -मणि-माला ग्रंथ के प्रणयन का जो साहस किवा शक्ति मेरे मे है, वह केवल इसी नरेश के अन्न और जलके उपभोग की परिणति है ॥ १२ ॥ १-योगोऽनवस्त्रादिभि सबन्ध , क्षेमस्तेषा चौर्याधुपद्रवरक्षणम् । २-श्रीविक्टो- र्यायाः सकाशात् । ३-'G c s I ' हिन्दुस्थानस्य महती तारेत्यर्थ । ४-त्रिभिर्वर्त- मानमहाराजवर्णनम् । ५-फत्तेसिंहवर्मणा। ६-हे पदे यस्येति । ७-द्विपान् गजान् ददातीति पौनरुक्त्यव्युदास । ८-न आग इति छेदः । ९-घोषणम् ।
गुच्छ प्रथमो गुच्छ.। विद्विपां रोपपोपार्थ तोपार्थ माधवप्रभोः । रोगिरोगप्रमोपार्थ मालेय ग्रथ्यते मया ॥ १३ ॥ अपारमगदवारं कथङ्कारं मयोच्यताम् । न्यक्कारार्थ विकाराणां सारं सारं प्रसारितम् ॥ १४ ॥ विगुणाऽपि मदुक्तिर्वो हर्षायैव भविष्यति । केपां न मोदमाधत्ते गद्गदं वालजल्पितम् ॥ १५ ॥ सुमवर्षिणीति नाम क्वापि न घटते यथा प्रमार्जन्याः। अस्माकमसर्वविदां वैद्यत्वं तद्वदेव जानीत ॥ १६ ॥ खलजनता स्तुतिभिरहो विनीतभावं दधाति न क्वापि । नवनीतभाविता किं लोहशलाका मृदुर्भवति ॥ १७ ॥ भवेदियं व्यासतयाँ निरर्था धियं विधायेति न जातु हेया। यहा परोद्योगनिरर्थकत्वे सन्तो न सजा इह तत्किमुक्तैः ॥ १८ ॥ नानानिवन्धेष्वपि विस्फुरत्तु सिद्धाः क्रियाः ख्यापयितुं समन्तात् । कुर्वेऽहमेतं कमपि प्रवन्धं क्षिपन्त्विहार्याः करुणाकटाक्षान् ॥ १९ ॥ विरोधियो के क्रोध मे अभिवृद्धि करने के लिये, माधव प्रभु के सतोष के लिये तथा रुग्णके रोग - शमन करनेके लिये मैं इस माला को गूंथता हूं ॥ १३ ॥ आयुर्वेट - शास्त्र अपार है अत विकारो के शमन मे परम उपयोगी मुख्य मुख्य सारभूत प्रयोगों के भालेखन के अतिरिक्त और मै कर ही क्या सकता हूं? आप ही बताइये ॥ १४ ॥ मेरी वाणी, गुणों से रहित होती हुई भी भापको अवश्य हर्षान्वित करेगी, बालक की गद्गद् जल्पना किसको प्रमुदित नहीं करती ॥ १५ ॥ पुष्प-वर्षिणी नाम जिस तरह प्रमार्जिनी (झाडू) मे कदापि नहीं घटता उसी तरह सवकुछ न जाननेवाले हमारे जैसोके लिये 'वैद्यत्व'का प्रयोग है ॥ १६ ॥ प्रशसा- प्रशस्ति से भी दुष्ट-जन कभी विनीत नहीं होते. नवनीत से भावित लोह शलाका क्या कभी मृदु हो सकती है ॥ १७ ॥ यह केवल एक सग्रहात्मक-अथ है मत निरर्थक है यह मत स्थिर करके इस ग्रंथ की कभी अवहेलना मत करना । अथवा, यहां यह कहने की आवश्यकता नहीं होगी कि अन्य-जनद्वारा आचरित उद्योग के निरर्थक होजाने पर भी क्या सन्त जन स्वोद्योग से उसे सार्थक करने में तत्पर नहीं बनेंगे ? ॥ १८ ॥ भनेको ग्रंथों मे विखरे हुये चमत्कारिक - सिद्ध प्रयोगों का एकत्र उपचयन करके उनकी उपयोगिता प्रकट करनेके लिये मैं इस अद्भुत प्रथ की रचना मे प्रवृत्त हुवा हूं। इसलिये सहृदय-जन अपने कृपा-कटाक्ष से मुझे अवश्य अनुग्रहीत करेंगे ॥ १९ ॥ १-प्रयोजनान्तरदर्शनम् । २-आयुर्वेदशास्त्रम् । ३-विनयोक्ति । एवमग्रेऽपि । ४-विस्तृततया, व्याससबन्धितया वा। - - - सिहभेपजमणिमालायां [उपोद्घात- निवन्धेऽत्र दृष्टे प्रयोगाः परं ते परिस्फूर्तिमेष्यन्ति ये स्यन्ति रोगान् । करालङ्कतावग्रतो विस्फुरन्त्यामपेक्षा भवेत् किं पुनर्दर्पणस्य ॥ २० ॥ गुच्छरच्छाऽऽमुखद्रव्यचित्रोपायरसाहयैः । भैषज्यमणिमालाऽसौ कण्ठस्था क्रियतां वुधैः ॥ २१ ॥ श्रीलालुरामात्मजकुन्दनाद्यो लेभे जनि कृष्णकवेर्हि तस्य । भैपज्यरत्ननजि सहुणायां गुच्छोऽयमच्छः प्रथमः समाप्तः ॥ २२ ॥ ॥ इत्युपोद्धातगुच्छः प्रथमः॥ इस निबंध मे भालेखित प्रयोगो की विशेषता तभी चरितार्थ हो सकेगी जब वे रोगों का नाश करदें-इसमे यदि शंका हो, तो इनका प्रयोग करके देसलें। हाथ कान को आरसी क्या ? ॥ २० ॥ भामुख-गुच्छ, (उपोद्घात) द्रव्य - गुच्छ, चित्र - गुच्छ, (पताका भादि प्रम्तार) उपाय गुच्छ (चिकित्सा) तथा रस-गुच्छ (पारदादि रस) इस तरह स्वच्छ पांच गुच्छो से युक्त इस भेषज-मणि-माला को विद्वद् -जन कण्ठस्थ करे ॥ २१ ॥ श्रीलल्लुरामजी के पुत्र कुन्दनरामजी से उत्पन्न, उपकार • वृत्ति से युक्त श्रीकृष्ण कविद्वारा गुम्फित इस सुदर-गुण -युक्त (गुण-धागा) भेपज-मणि - माला का यह प्रथम स्वच्छ -गुच्छ संपूर्ण हुआ ॥ २२ ॥ -प्रथम उपोद्घात-गुच्छ समाप्त- १-'षोऽन्तकर्मणि' इत्यस्य प्रथमपुरुषबहुवचनम् । नाशयन्तीत्यर्थ । २-लोकोक्ति- रियम् । ३-चिकित्सा । ४-पादपूरणार्थ, हितस्येति गुरविशेषणं वा । य प्राचा भिपजा विवेद महितास्तिस्रोऽपि ता. सहिता साहित्य च सधर्मशास्त्रमभितः स्वच्छन्दवाक्छन्दसि । लक्ष्मीरामसुधी स एष भिषगाचार्यप्रशस्ति वहन् व्याचष्ट प्रथमं गुलच्छममलं भैषज्यरत्नस्रज ॥१॥ इति लक्ष्मीरामसुधीकृते सिद्धभेषजमणिमालाव्याख्याने प्रथमो गुच्छः समाप्तः॥
द्वितीयो गुच्छ.। अथ हरीतक्यादिवर्णनं नाम द्वितीयो गुच्छः। स्फुरत्प्रभामण्डलमण्डिताङ्गी पुण्यैकलभ्यां दुरितापहन्त्रीम् । शूलिप्रियां पर्वतजामपर्णा महोपधि कामपि भावयामि ॥१॥ द्रव्ये गुणा यत्र समीरिता ये त एव तस्यावयवेऽपि दृष्टाः। भेदे विकारेऽपि ततोऽत्र कुर्या द्रव्यप्रभेदैः किमु तुन्दिलत्वम् ॥२॥ -द्वितीयो गुच्छः- परम-पुण्यसे प्राप्य दुरित करती जो खंडित । प्रभा पुंजसे अंग अंग जिसके परिमडित ॥ पर्वतजा,अतिदिव्य, अपर्णा,इष्टशूलि को। करता सविनय-नमन किसी उस महा-मूरिको १ मैं किसी उस अनिर्वचनीय महौषधि (भगवती महादेवी) का ध्यान करता हू जिसका उत्पत्ति-स्थल हिमपर्वत (पार्वती) है, जो पत्रसे रहित (अपर्णा) है, जिसके अंग उद्दीप्त तेजोमंडलसे देदीप्यमान है, जो केवल पुण्य-बलसेही प्राप्त की जा सकती है, जो दुरित (रोग) का नाश करनेवाली एव शूलसे युक्त (महादेव) को पथ्य (प्रिय) है ॥ १ ॥ (विशेष-वाल्मीकि रामायणमे इस महौषधि का वर्णन मिलता है 'हरयस्तु विजानन्ति पार्वती तां महापधीम् ॥ सजीवकरणी दिव्या विशल्यां देवनिर्मिताम्' । युद्धकांड ५० सर्ग). शास्त्रमें जो द्रव्य जिन गुणोंसे युक्त माना गया है प्राय. वही गुण उस द्रव्यके अवयवोमें (स्कध-फल-मूल-पत्र-पुप्पआदिमे), उसके भेदोमे (सजातीयद्रव्योंमे) एवं कलितविविधत्वत्पा विगलितदोपा मुद वितन्वाना। स्फुरतु सदायतिसुखदा (क) श्रीपथ्या (ख) सर्वजनपथ्या ॥ १ ॥ १-अथ हरीतक्यादिद्रव्यगुलच्छ जुगुम्फिपवः समुचितमहलमाचरन्ति-स्फुरदित्यादि। २-शूलरोगी, शिवश्च । ३-पर्वतरोहिणीम् । ४-पर्णरहितामिति लक्षणनिर्देश । भवन्ति तथाविधा अपि महौपचय । यथा मन्थानभैरवागमे-सोमवल्लीव निष्पना कज्जलाभरसा- ञ्चिता । अपर्णाऽसौ भवेद्विन्ध्ये नात्युच्चा रसवन्धिनी” इति । सुश्रुतचिकित्सिते निवृत्तसता- पीयेऽपि-"निष्पत्रा कनकाभासा मूले व्यङ्गुलसमिता। सर्पाकारा लोहितान्ता श्वेतकापोति- रुच्यते ॥ पक्षे भगवत्या सज्ञा। ५-भवज्वरोपशयतया भगवत्या अपि महौषधित्वं सगच्छत एव । ६-प्रायोवादमाप्रित्यैवमुक्ति सर्पस्य सविषत्वेऽपि तन्मणेविषघ्नत्वात् । पटोलपत्रस्य पित्तनत्वेऽपि वल्लीप्रभृतीना भिन्नगुणत्वात् । यदाह माधव.-"पटोलपत्र पित्तघ्न वल्ली चास्य कफापहा । फलं त्रिदोषशमन मूलं तस्य विरेचनम् ॥” उक्तं च-"ये यत्रोक्ता गुणा द्रव्ये ते तस्यावयवेष्वपि । मेदेष्वपि विकारेपु अपवादाते मता ॥" (क) हरीतकीपक्षे सत्या शोभनया आयत्या उत्तरकालेन सुखदा, पक्षे सदा सर्वदा यत्या विच्छेदसज्ञिकया सुखदा पक्ष सदा यतीना यतात्मना सुखदेति । (ख) हरीतकी, पथ्यार्या छन्दोविशेष , भगवती चेति व्यर्थेयमार्या । स्पष्टमन्यत् ।
-- ܬ . सिद्धभेपजमणिमालायां [हरीतक्यादि- द्रव्यं यत् पित्तकफी व्यस्तसमस्तो न हन्ति नो कुरुते । शुद्धं वा मिश्रं वा निहन्ति वातं तदस्ति वातघ्नम् ॥ ३ ॥ शुद्धं निहन्ति वातं शुद्ध मिश्रं करोति वा पित्तम् । वातघ्नपित्तलं तद्रव्यमिह द्रव्यवेदिभिर्विदितम् ॥ ४ ॥ वातघ्नपित्तलमिव शेपमेदद्वयं यथा । वातघ्नश्लेप्मलं वातजित्पित्तश्लेष्मवर्धनम् ॥ ५ ॥ शुद्ध वा सान्वयं पित्तं न करोति न हन्ति यत् । वातं निहन्ति वातघ्नपित्तोदासीनमस्ति तत् ॥ ६॥ उसके विकारोंमे (स्वरस, वाथ, कपाय आदिमें) भी उपलब्ध होते है। इसलिये, यहां मै, द्रव्यके उपरोक्त भनेकविध भेदोकी कुछ विस्तृत चर्चा करूगा ॥ २ ॥ (तात्पर्य यह है कि जिस द्रव्यम जो गुण होते है वही गुण प्राय उस द्रव्यके अवयवोमे, विकारोमे और जातियोंमें भी पाये जाते है यह शास्त्रका सिद्धांत है 'ये यत्रोक्तगुणा द्रव्ये ते तस्यावयवेवपि ॥ भेटेष्वपि विकारेपु ह्यपवाटादृते मता इस सिद्धांतके अपवाद भी है-'पटोलपत्र पित्तन वल्ली चास्य कफापहा ॥ फल त्रिदोप- शमन मूलं तस्य विरेचनम्' अर्थात् पटोलका पत्र पित्तन्न है, उसकी लता कफन है, फल त्रिदोप-शामक है तथा मूलमे विरेचन गुण है।) जो द्रव्य केवल पित्तका, या केवल कफका, अथवा ससर्गरूपसे कफ-पित्त का न शमन करता हो न प्रकोप, किंतु जो केवल वायुका ही शमन करता हो, अथवा जहां पित्तसह वात हो, अथवा कफसह वात हो-वहा भी केवल वातका ही शमन करने वाला हो-वह द्रव्य वातन' कहलाता है ॥ ३ ॥ जो द्रव्य केवल वात का शमन करता हो, किंतु शुद्ध या मिश्र पित्त का प्रकोपक हो, उस द्रव्यको-द्रव्य य-वैज्ञानिक-वातघ्न-पित्तल कहते है ॥ ४ ॥ वातघ्न पित्तल की तरह, वातघ्नश्लेष्मल तथा वातघ्नपित्तश्लेष्मल इन भवशिष्ट दो भेदोकी भी योजना कर लेनी चाहिये ॥५॥ जो द्रव्य शुद्ध या मिश्र पित्तका-न शमन करता हो, न प्रकोप, कितु केवल वातका शमन करता हो वह वातघ्न पित्तोदासीन कहलाता है ॥ ६ ॥ १-अय पञ्चदशभिर्वातघ्नादिसप्तपञ्चागद्देदान् यथाक्रमं दर्शयन्ति । यद्व्यं शुद्ध मिश्र वा कफ पित्तकफ वा न निहन्ति नापि करोति कि तु शुद्धं मिश्र वा वात हन्ति तद्वातघ्नमिति । २-यच्छुद्ध वात निहन्ति शुद्ध मिश्र वा पित्त करोति तद्वातघ्नपित्तलम् । ३-वातघ्नपित्तलवद् 'वातघ्नालेष्मलं वातघ्नपित्त श्लेष्मल च बोध्यम् । पित्तं न करोति नापि हन्ति कितु वात हन्ति तद्वातघ्न पित्तोदासीनम् । ४-यच्छुद्ध मिश्र वा - वर्ग.] द्वितीयो गुच्छ.। एवमेव समीरनश्लेष्मोदासीनमौषधम् । वातघ्नमितरद्वन्द्वोदासीनं चापि कीर्तितम् ॥ ७ ॥ वातघ्न श्लेष्मलं पित्तोदासीनं पुनरष्टमम् । वातघ्नं पित्तलं श्लेष्मोदासीन नवमं स्मृतम् ॥ ८ ॥ पित्तघ्नस्यै कफनभ्य भेदा वातघ्नवन्नव । वातपित्तापहं द्रव्यं त्रिप्रकारमुदीरितम् ॥ ९॥ वातपित्तापहं वातपित्तनाश्लेष्मलं तथा । वातपित्तापहश्लेष्मोदासीनं चेति भेदतः ॥ १० ॥ मारुतपित्तापहवद्वातश्लेग्मन्नपित्तकफहभिदाः । दोपनुटेकं दोपत्रितयोदासीनमप्येकम् ॥ ११ ॥ यहव्यं पित्तकफी व्यस्तसमस्तौ न हन्ति नो कुरुते । शुद्ध ा मिश्रं वा करोति वातं तदस्ति वातकरम् ॥ १२ ॥ वातन पित्तोदासीनकी तरह, वातनश्लेप्मोदासीन औषधीय द्रव्य है। इसी तरह वातघ्नपित्तश्लेप्मोदासीन द्रव्यभी है ॥ ७ ॥ इसी तरह वातघ्नश्लेष्मल पित्तोदासीन, तथा वातघ्नपित्तलश्लेप्मोदासीन क्रमशः आठवा तथा नवमा द्रव्यभेद है। इसी तरह वातशामक द्रव्यके भी नौ भेद है ॥ ८॥ वातन-द्रव्य की तरह, पित्तप्त-द्रव्य की भी योजना कर लेनी चाहिये, उसके भी इसी तरह नौ भेद है। इसी तरह कफन्त द्रव्य के भी नौ भेट बनते है। इस तरह वातघ्न पितन तथा कफन-इन तीनोके-पृथक् पृथक् नौ नौ भेद के अनुसार-कुल सत्ताईस भेद होते है। मम्मिलित दोनो दोषो के शामक द्रव्यो मे से वातपित्तन- गव्य तीन प्रकारके है ॥ ९ ॥ यथा-वातपित्तन-वातपितेवश्लेप्मल-वातपितैनश्लेप्मोदासीन ॥ १० ॥ वातपित्तनकी तरह-वातश्लेष्मन्न एव पित्तश्लेष्मन-द्रव्योके प्रत्येक के पृथक पृथक् तीन तीन-भेदों की योजना समझनी चाहिये । इसके अतिरिक्त द्रव्यके दो भेद ओर होते है यथा-एक त्रिदोपन्न तथा दूसरा दोष-त्रयोदासीन ॥ ११ ॥ जो केवल पित्तको-अथवा केवल कफको-अथवा (ससर्ग रूपमे) पित्त- कफ दोनों को न शमन करता है और न प्रकुपित, कितु केवल वातको, अथवा ससर्ग १-वातपित्तलवद्वातन्न लेष्मोदासीनं तया वातघ्नपित्त क्षेप्मोदासीनमिति । २-एवं वातनश्लेष्मलपित्तोदासीनं, वातघ्नपित्तल लष्मोदासीन मिति नव वातघ्नद्रव्यमेदा व्याख्याता । ३-वातघ्नवत् पित्तन लेष्मन्नयोरपि प्रत्यक नव मेढा । एवमेते। मिलित्वा सप्तविंशति- भवन्ति । ४-द्वन्द्वघ्नेषु वातपित्तन तावत्रिविवम् । वातपित्तन वातपित्तनश्लेष्मल-वात- पित्तन्न श्लेष्मोदासीनभेदादिति । ५-वातपित्तघ्नमिव वातश्लेप्मन्न-पित्तश्लष्मन्नयोरेवमेते द्वन्द्व- नभेदा नव, दोषन्नमेकं, दोषत्रयोदासीनमप्येकम् , इत्येकादशभेदा पुनरन्ये फलन्ति । ६-यच्छुद्ध मित्र वा पित्त कर्फ पित्तकर्फ वा न हन्ति नापि करोति कितु शुद्ध मिश्रं वा चातं करोति तद्वातलम् । द्रव्य, मिढभेपजमणिमालायां [हरीतक्यादि- शुद्धं वो सान्वयं पित्तं न करोति न हन्ति यत् । वातं मूते पवनलं पित्तोदासीनमेव तत् ॥ १३ ॥ एव वातकरलेप्मोदामीनमवगच्छत । चतुर्थ वातलं श्लेष्मपित्तोदामीनमित्यपि ॥ १ ॥ पिनकच्छेमकहव्यं चातकृञ्चतुर्विधम् । द्रव्याणि द्वन्द्वकारीणि द्विहिमेदानि मन्महे ॥ १५ ॥ अस्ति पवनपित्तकरं श्लेग्मोदासीनवातपित्तकरम् । एवं वातश्लेप्मलपित्तश्लेप्मपदार्यमेदो स्तः ॥ १६ ॥ एकं दोपलमित्येते सप्तपञ्चाशदीरिता.। अनन्ताः स्युः पुनरमी तारतम्यादिमेदतः ॥ १७ ॥ स्थिति में भी अर्थात् कफ-वात एव पित्तवात में भी अकेले वात को ही प्रकुपित करता हो वह 'वातकारक' कहलाता है ॥ १२ ॥ जो द्रव्य, कंबल पित्तको अथवा बातमह पित्त एव क्फसह पित्तको (अर्थात् संसर्ग रूपमे मी स्थित क्वल पित्तको) न शमन करता हो और न प्रकुपित, किंतु केवल बातको प्रकुपित करता हो, वह 'वातलपित्तोटीसीन' है ॥ १३ ॥ वातलपित्तोदासीन की तरह, वातलालेप्मोटोसीन की योजना करनी चाहिये, इसी तरह चतुर्थ भेट वातलउलेप्मपित्तोटीमीन समझना चाहिये ॥ १४ ॥ वातल द्रव्यो की तरह पित्तल तथा उलेप्मल द्रव्योके भेद समझलें (इस योजनासे वातल द्रव्योकी तरह पित्तल तथा श्लेष्मल, द्रव्योंक-प्रत्येक के चार चार भेदसे माँठ मेट होते हैं। इसी तरह द्वन्द्वल द्रव्योंक (प्रत्येकके दो दो भेटोके अनुसार) पड् भेद होते हैं । यथा वातपित्तल वातपित्तलेश्लेप्मोदासीन, वातश्लेप्मल, वातश्ले- प्मल पित्तोदासीन, पित्तश्लेप्मल, पित्तईलेप्मल वातोटासीन । इसी तरह 'त्रिदोपल' मी द्रव्यका एक अलग भेद है। इस तरह द्रव्यके कुल सत्तावन भेद हैं। ये द्रव्य तर- तम भेद से अनगिनत प्रकाराम विभक्त किये जा सकते है । १५-१६-१७, द्रव्योंके सत्तावन-भेदोकी सोदाहरण तालिका नीचे दी जाती है । १ यच्छुद्धं मिश्रं वा पित्तं न करोति न हन्ति किंतु वातं करोति तद्वातलपित्तोटा- सीनम् । २-वातलपित्तोदासीनवद्वातललेष्मोदासीनं, वातलपित्त लेष्मोदासीनमिति चत्वारो चातलमेटा.। ३-चातलवत् पित्त लेप्मलयोरपि पृथक् चातुर्विध्यम् । द्वन्द्वल द्रव्यं तावद् द्विद्विभेदम् । यथा-वातपित्तलं वातपित्तल-लेप्मोदासीनम् , इति षटू द्वन्द्वलमेदाः, दोपलमेकमिति सप्तपञ्चाशद्वानन्नादिमेदा विशदीकृत्य प्रदर्शिता । ४-तरतमादिभेदास्तथा वातघ्नपित्तलाल्पश्लेष्मलादिमेदाश्च अनन्तत्वादुपेक्षिता । एषामुदाहरणजिज्ञासा चेत् पश्य सिद्धमन्त्रप्रकाशामिति ।
वर्ग:] ११ द्वितीयो गुच्छः । १ वातन-तिन्दु, कपास, तालमखाना, एरंडफल आदि । २ वातघ्नपित्तल-अम्ल, तक, तैल-सिद्ध-पूरि आदि । ३ वातघ्नश्लेप्मल-हडजोड (अस्थिशृंखला) मीठा पालेवत, जीरा आदि। ४ वातघ्न पित्तश्लेष्मल कौच के चीज, विदाम अखरोट, करज फल आदि । ५ वातानपित्तोदासीन-पूरणीय । ६ वातप्तश्लेप्मोदासीन-पूरणीय । ७ वातन- पित्तश्लेप्मोदासीन-मसूर, गेहूं, कुलत्थ, भूगका यूप तथा अजामास यूप । ८ वातन- श्लेप्मलपित्तोदासीन-प्याज, पक मात्र, इलायची भादि । ९ वातप्तपित्तलश्लेप्मो- दासीन-तिलका तेल मादि । १० पित्तन-चदन, कदली, कास, वशलोचन आदि । ११ पित्तन वातल-एरका, वशिर-फल, तडाग जल आदि। १२ पित्तनश्लप्मल- शाल्मली, कमल, शाली मादि तथा उबालकर शीतल किया गया दूध । १३ पित्ततवातलेपाल-मानकन्द, माल, शृगाटक, कसेरु आदि । १४ पित्तप्तवातोदासीन- पूरणीय । १५ पित्तनश्लेष्मोदासीन-विम्बी (कटुतुण्डिकेरी)। १६ पित्तनवातश्लेप्मो- दामीन-काकोदुम्बरिका-फल (कठूमर)। १७ पित्तनश्लेष्मलवातोदासीन-पूरणीय । १८ पित्तनवातश्लेम्मोदामीन-पालक्या आदि । १९ श्लेष्मन्न-शाल, शमी, कदव, शिशिपा, मदनफल, धत्तूरा, लताकस्तूरिका आदि। २० श्लेप्मन्न-पित्तल-रक्तशि- ग्रुके अकुर, बडवाका दही भादि । २१ श्लेष्मन्नवातल-लागली, कुसुभ, क्षार आदि । २२ श्लेप्मन्नवातपित्तल-द्रोणपुप्पी, चक्रमर्द, वेणुयब, टकण आदि । २३ श्लेष्मन्न- बातोदासीन-पुरणीय । २४ श्लेष्मन्नपित्तोदासीन-मेपीघृत । २५ श्लेष्मनवातपित्तोदा- मीन-अरिष्ट । २६ श्लेग्मन्नपित्तलवातोदासीन-उद्दालक तथा मधु की शराब । २७ लेमनवातलपित्तोदासीन-उहालक, यवनाल, श्यामाक तथा ईखकी शराब आदि । २८ वातपित्तन-शाक, मुलहटी, शतावरी, प्रियंगु, रजत आदि। २९ वातपित्तनश्ले- प्मल-अष्टवर्ग, विदारी, कदलीफल, नारिमल आदि । ३० वातपित्तनश्लेप्मोदासीन- फालसा, काश्मर्य, गोधूम, मिश्री भादि । ३१ वातश्लेष्मन-देवदारु, कट्फल, सुही, गुग्गुल, राना मादि । ३२ वातश्लेग्मन्नपित्तल-वरुण, भगरु, शिग्रु, भाकडा, राई, नागवल्ली आदि । ३३ वातश्लेष्मान्तपित्तोदासीन-विल्व, आद्रक, अम्लदाडिम मादि । ३४ पित्तश्लेष्मन्न-जांबु, खदिर, पिप्पल, उदुम्बर, भूर्ज, कुटज, आदि । ३५ पित्तश्लेप्मन- वातल-निव, भगस्ति, वासा, पर्पटक, सूरण, अमलतास आदि । ३६ पित्तश्लेष्मन्नवातो- दासीन-कारवेल्ल, बहेडा, कदली-कन्द, मधु आदि । ३७ त्रिदोपन्न-ब्राह्मी, काश्मरी, शिरीप, अशोक, गुडूची, तामलकी (भुई आंवला)। ३८ दोपत्रयोदासीन-मधुयुक्त दही, हिम का पानी, रागखाडव आदि । ३९ वातल-खोल (पिन्याक), शाक, कुल्माष आदि। ४० वातलपित्तोदासीन-पूरणीय । ४१ वातलश्लेप्मोदासीन-पूरणीय । ४२ वात- लपित्तोदामीन-पूरणीय । ४३ पित्तल-शमीफल, तैलपक्वमांस । ४४ पित्तलवातोदासीन- पूरणीय । ४५ पित्तलश्लेष्मोंदासीन-चौड्यजल । ४६ पित्तलबातश्लेष्मोदासीन-पूरणीय । ४७ श्लेष्मल-शाल्मली-गोंदकी पेया, पायस आदि। ४८ श्लेष्मलवातोदासीन- पूरणीय । ४९ श्लेष्मलपित्तोदासीन-पूरणीय । ५० श्लेष्मलवातपित्तोदासीन-पूरणीय । ५१ वातपित्तल-कच्चा आम्र तथा विरूढ अन्न । ५२ वातपित्तल श्लेष्मोदासीन-कच्चा - । - .
१२ - मिदभेषामणिमालायां [समय- कासश्वास विगोपालजठगमानवणांगाग्निक- ग्वस्वर्यज्वरकामलाग्रहणिकाहियाप्रमहापहा । गुल्मप्लीहहदामयादिशमनी दोपत्रयोन्मूलिनी चक्षुष्याऽतिरसायिनी लधुमग मेध्या शिवाऽऽयुःप्रदा ॥ १८ ॥ केग्यं कपायं नयनामयघ्नं स्पर्श रिमं मेदि रितं म्बरेऽपि । वीयाप्णरुक्ष मधुर विपाके विभीतकं पित्तक्फप्रमाधि ॥ १९ ॥ हरीतकीवामलकीफल मतं परं तु पित्तात्रहरं विटोपतः। अपि' त्रिदोपोन्मथनं त्रिदोपहन प्रसिदतत्तहणयोगदर्शनात् ॥२०॥ कैथ, यशाकुर । ५३ गानाले मल-मूप, गाक, निडिम, पुत्रजीवक आदि के फल । ५४ वातश्लप्मलपित्तोदासीन-सुवर्चला, यानुसरा (संगपत्रिका नाम का मार-चरपाणि) ५५ पित्तश्लेप्मल-आन, पुप्पकरिणी का पल, गाण्डाकी। पित्तालेमल बातोदानीन- कुसुंभतेल । ५७ त्रिदोपल-सपंप का शाक, मन्द-दही, भेड का दही, फाणित आदि । (वातादिदोपों को शमन एव कोपन करने की तथा उनऊ प्रति उदामीन रहने की भी अपनी भिन्न भिन्न विशिष्ट-वृत्ति के कारण द्रव्यो के कुर मत्तानन भेदो का उल्लेस करके अब उन दन्यो के, तथा, विशेष करके, अधिक उपयोग में जाने वाले प्रमुस द्रव्यो के भी सामान्य गुणी का, उनके वीर्य, विपाक नया प्रभाव आदि का काव्य-मयी चमत्कृत शैली मे सविशेष व्यारयान ग्रंथकार करते हैं)। हरीतकी-स्वास्थ्य तथा मायुप्रद, अत्यत रसायिनी, मेधाकर, कुछ मारक गुण से युक्त, भासो को हितकर, त्रिदोष उन्मूलक, गुल्म, प्लीहा तथा हृदय के रोगादि में उपकारक, काम, श्वास, क्षय, शूल, उदर, आध्मान, व्रण, भर्श, अनिमार, ज्वर. कामला, ग्रहणी, हिका तथा प्रमेह भादि को मिटानेवाली एवं स्वर्य है ॥ १९॥ (हरीतकी को वाग्भट ने रूक्ष' कहा है। चरकने रूक्ष भोजियोके लिये हरीतकी को अपथ्य माना है-'मजीणिनो रूक्षभुज स्त्रीमद्यविषकर्षिताः । सेवेग्न नाभयामेते क्षुत्तृष्णोष्णार्दिताश्च ये' । सुश्रुतने 'कपाय दीपन चाम्लं चक्षुष्यं चाभया- फलम् ' अभया को कपाय बताते हुये उसके रुक्षत्व-गुण का निर्देश किया है । प्रस्तुत श्लोक मे, हरीतकी के रूक्षत्व गुण का जो उल्लेख नहीं किया गया वह यह मानकर कि मभया कपाय वर्ग की औषध है। मत उसमे रुक्षत्व है ही। उल्लिनित गुण बडी हरडे के है-छोटी के नहीं। छोटी में रसायन-गुण न्यून है । हरीतकी की क्रिया पचन-यंत्र पर साक्षात् होती है । दोनो ही मृदु-विरेचक है । छोटी हरडै भजीर्ण-जन्य- अतिसार, पेचिश, जीर्ण भाव तथा जीर्ण कक्ष में विशेष गुण दिखाती है क्योकि उसमें १-अग्निसाद । २-हृद्रोग । ३-हरीतकी। ४-अपिभिन्नक्रम । उक्तं च तन्त्रान्तरे- "हन्ति वात तटम्लत्वात् पित्तं माधुर्यशैत्यत । कर्फ रक्षकपायत्वात् फलं धाग्यास्त्रिदोपनुत् ॥ कुर्यात पित्त तदम्लत्वात् कर्फ माधुर्यगेल्यतः । वातं रक्षकपायत्वादेवं किं न विपर्यय ॥ धान्यास्त्रिदोषहन्तृत्वं प्रभावान्मुनिभिर्मतम् । मभावनावशादुक्ता रसाटेरपि हेतुता" इति । । । - वर्ग.] द्वितीयो गुच्छ.। योज्याऽभयकर विभीतको हौ फलानि चत्वारि तथाऽऽमलक्याः। नेत्रार्तिमेहज्वरकुष्ठपित्तकफार्तिहन्त्री त्रिफलेयमुक्ता ॥ २१ ॥ कपायत्व गुण अधिक है-वस्तुत छोटी हरडे, वही हरडै का बाल-स्वरूप ही है। विरेचन के लिये बडी हरीतकी की मात्रा तीन से छह माशा है-रसायन गुण के लिये १३ से ३ माशा है । बडी हरडे का चूर्ण उसकी गुठली निकालकर बनाना चाहिये ।) विभीतक (बहेढा), केगो को हितकारी, कपाय, नेत्र-विकारो को नष्ट करने- वाला, उष्णवीर्य, स्पर्ग में शीतल, भेदन, स्वर को उत्तम करनेवाला, रूक्ष एवं विपाक में मधुर है । यह पित्त एव कफ का गमन करता है ॥ २० ॥ (सुश्रुत ने 'विभीतकमनुष्णं तु कफपित्तनिवर्हण' विभीतक को 'अनुप्णं' कहा है। वाग्भट भी 'कटुपाके हिम कश्यमक्षमीपच तद्गुणम्' विभीतक को उष्ण नहीं मानते । इसरे विल्ड 'राज निघण्टु' 'विभीतक. कटुस्तिक्त कपायोप्ण कफापह · इसे उष्ण बताते है । यही अभिप्राय धन्वन्तरी-निघण्टु का है 'चक्षुप्यं कटुरूक्षोप्ण, पाके स्वादुकफात्रजित्' । वस्तुतः सुश्रुत तथा वाग्भट ने जो इसे हिम कहा उसका तात्पर्य 'स्पगे हिमम्' में हैं। निघण्टुकारो ने जो इसे 'उष्ण' बताया उसका अर्थ 'वीर्य-उष्ण' से है। मानो इन दोनो दलो के परस्पर विरुद्ध कथनो के समाधान रूप में प्रथकार ने, इस श्लोक को रचा हो!! इसमें विभीतक को 'स्पर्शे- हिमम्' तथा 'उष्ण-वीर्य' बताया गया है । इस कथन को मदनपाल के इस श्लोक से मिलाइये 'उप्णीर्यो हिमस्पशी भेदन कासनाशन '। इन अवतरणो का मनन करने पर वाग्भट के टीकाकार 'अरुणदत्त' ने जो विभीतक को शीतवीर्य' माना (पाके कटुक शीतवीय) वह कहा तक सुसगत है ? वेहडा केशो को श्याम बनाता इसकी मुरय क्रिया गले एव श्वास नलिका पर होती है। इसकी मांगी मादक (Sedative) है। तथा इसका तैल खाज में लाभ देता है।) मामलक के गुण हरीतकी के समान है। विशेषतया यह रक्त-पित्त में परम उपकारक है। यह विदोपकारक होता हुआ भी अपने प्रभाव से तीनो दोपो का गमन करता है । इसका यह प्रभाव इसकी प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया से स्वत.सिद्ध है ॥२०॥ १-आयुर्वेदप्रसिद्धा पारिभापिकीय सज्ञा । नचैव सख्यावेषम्ये- "पच्याविभीतवात्रीणा फलै स्यात्रिफला समै ।" इति भावस्य साम्यकयन विध्यते । यतो हरीतक्यादिफलाना मियो मानभेदाद्यथोक्ता- कृतिमानेन गृह्यमाणानामेव साम्य सभवति । विमीतकामलकयोहरीतक्या सम तोलने द्विचतुष्फलग्रहण एव साम्यम् । तथा हि हरीतकीफल "नवादिगुणयुक्तत्व तथैकत्र द्विकर्पता। हरीतक्याः फले यत्र" इत्युक्तेर्द्वि कर्पमित, विभीतक च कर्षप्रमाणं भवति, एवमामलकेऽपि द्रष्टव्यमिति । । - - मिहभपनमणिमाल्गया [नया:- कृमि हितं' मरिचं कटु पित्तलं श्वसनगलहरं का.फवानजिन । मधुरमा मिदं न च पित्तलं न च कर्फ कुम्ने यलिनं गुरु ॥ २८ ॥ दी सज्ञा | इसके 'जिहा-कट-विमोचन' गुण को भाग ने यरायर परिवाना तदनुसार यह गले के एक विदोपरोग मे जिस भाशुनिकनिरियर Reharrl-Thurst, कहते है-उपयुक्त होती है। उाल की यह उत्तम औषधि, 1 अपने हम गूग के कारण यह विरेचन औपधियो का प्रधान अग बनी हुई है। कफ, कफापर, कफ कास आदि में अदरक के रस मे मयु मिलाकर सेवन करने में उनमगमगा। अदरक के कयोष्ण रस की दो तीन वृद्ध टपकाने में पूर्ण · शल मिटना है। टमी कारण उत्पन्न गीप वेदना में मोठ को जल में घिमिरर कपाल पर रगा नसान तथा निद्रानाश मे सोठ का उपयोग अपभ्य है।) पिप्पली रश, 7 दा चात तथा कफ को दूर करने वाली, पाक मे मधुर तथा कटु है । काम, श्वास, स्वर, उदर तथा प्रमेह का मथन करती है। भाई पिप्पली भी निग्ध, शीतल, मधुर नथा पफ. कारक है। गुड मे मिलाकर सेवन करने मे, मजीर्ण, भरचि, कास तथा पा गाडि रोगो मे हितकारी है ॥ २७ ॥ (टिप्पणीकार श्रीस्वामीजी ने मनुष्णा का नर्थ पदुष्णा पिया है। उनका मन्तव्य है कि यदि यह अर्थ न किया जाये तो वाग्भट में विरोध सायेगा। 'ईपट उष्ण' अर्थ करने पर भी वाग्भट से विरोध तो रहेगा ही क्योकि बाग्भट ने इसे 'उष्ण' कहा है ईपद उष्ण नहीं। उनके मत म भाई पिप्पली गीन है। शुष्क पिप्पली उससे विपरीत अर्थात् उप्ण है-'लम्मला स्वाह गीतादी गुी सिधा च विपरीताऽत तिग्धा वृप्या रग्ने कटु ।' प्रथकार का 'मनुष्ण सुश्रुत तथा चरक से मिलता है। सुश्रुत ने पिप्पली को 'पित्ताविरोधिनी' कहा है। 'शुष्का कफानिलनी सा वृप्या पित्ताविरोधिनी' तथा चरक ने 'नात्य सिन्धोणा।' कहा है (वि स्था भ १ श्लो १८) पिप्पली में दाहक गुण होनेसे नाचार्यों ने एक वर्ष पुराणी उपयोग में लाने का विधान कहा है। वर्धमान पिप्पली का प्रयोग मास- वर्धक, स्वयं, भायु प्रद मेध्य तथा वय स्थापक है। भगवान् भात्रेय के मत में, दो पिप्पली के चूर्ण-कल्क में शहद तथा घी मिला कर एकवर्ष पयंत नियमित प्रात काल लेने से रसायनोक्त गुणो का लाभ होता है । शोढल के कथनानुसार पिप्पली चूर्ण को शहद मे मिलाकर मसूढो पर घिसनेसे छोटे बच्चोक दात विनाकष्ट निकलते हैं। पिप्पली चूर्ण को शहद के साथ दो बार नियमित सेवन करने से दो चार मासम ही मेद तथा कफ का हास हो जाता है। पिप्पली विशेषतः कफ वात-प्रधान विकारो में व्यवहत पिप्पली । सा शुष्का -- १-“द्रुमामये भवेत् पुसि कीटे च कृमिवत् क्रिमि" इति रमम । २-बल- ग्रहणादीपत्प्रकोपोऽभिप्रेत , अन्यथा “स्वादुपाक्यार्द्रमरिच गुरु ग्लेष्मप्रकोपि च ।” इति विरोध अकारप्रश्पो वा।
वर्ग:] द्वितीयो गुच्छ.। व्योपं विदुर्विश्वकणोपणानि संदीपनं पीनसगुल्मनुत् तत् । सश्लीपदश्वासकफप्रमेहत्वनोगमेद कसनानि हन्ति ॥ २९ ॥ शमयति कफवाती पाचयत्यन्नमग्निं द्विगुणयति कटुत्वं लाघवं च व्यनक्ति । श्वसनजटरगुल्मष्ठीहजन्तुक्षयाति क्षपयति मगधाया मूलमारोग्यमूलम् ३० होती है। पित्त-प्रधान व्याधियों में इसका उपयोग नहीं करना चाहिये। काली मिर्च - कद, कृमिन्न तथा पित्तकारक है । श्वास, शूल, वात तथा कफ का नमन करती है। भाई मिरच, गुरु तथा मधुर है न अधिक पित्त करती है न अधिक कफ। ('नच कर्फ कुरुने बलिनं गुरु' यहा टिप्पणीकार ने बलिन का अर्थ 'बल- ग्रहणात ईपत् प्रकोपोऽभिप्रेत.' किया है। यदि यह अर्थ न किया जाये तो उनके । मत में, सुश्रुत से विरोध होता है । 'स्वादुपाकामरिच गुरु श्लेष्मप्रकोपि च' टिप्पणीकार ने जो सुश्रुत का यह श्लोक उमृत किया उसका शुद्ध पाठ श्लेष्म-प्रसेकि' है न कि सेम-प्रकोपि'। लेष्म-ग्रसेकि' का अर्थ होता है, कफ नि सारक । आई मिरच सुश्रुत मत मे, कफ नि सारक ( Expectorant) है। निघंटुकार भाव मिश्र का भी यही भाव है । 'तदाद मधुर पाके नात्युष्णं कटुकं गुरु-किचित्ती- क्ष्णगुणं श्लेष्म प्रसेकि स्यादपित्तलम् । अर्थात् भाई - मिरच सचित कफ का स्राव करती है तथा नृनन सचय को रोकती है। 'नच कर्फ कुरुते बलिन' का अर्थ यही है कि मरिच कफ के बल का हास करती है तथा उसे बलबान नही होने देती। काली मिर्च, वस्तुत उसका सुखाया हुमा भर्ध पक फल है । सपूर्ण परिपक फल की उपरि त्वचा को उतारने पर श्वेत मिर्च बनती है । श्वेत मिर्च चक्षुप्य है तथा 'युक्त्या चव रसायनम्' पथ्य आहार विहार पूर्वक इसका सेवन रसायन गुण दिसाता है। चरकाचार्य ने शहद तथा घृतमिश्रित काली मिर्च के चूर्ण को कास की उत्तम औपध बताया है। श्वेत मिर्च को दधि मड में घिसकर प्रात साय अंजन करनेसे रतौधि दूर होती है। यह वाग्भट का मत है। मुस के पक्षाघात मे (अर्दित मे) काली मिर्च के चूर्ण को जिह्वापर घिसने से उसका खिचना बद होता है।)॥२८॥ काली मिर्च तथा पिप्पली, इस समित्रित त्रयी को 'व्योप-त्रिकटु' कहते है। व्योप अग्निप्रदीपक तथा पीनस, गुल्म, श्लीपद, श्वास, कफ, प्रमेह, त्वचा के रोग-मेद तथा खासी को नष्ट करता है । (सूठ, मिर्च, पिप्पली तथा पिप्पलीमूल इनके योग को 'चतुरूपण' कहते है । इसके गुणभी व्योष के समान ही है।)॥२९॥ पिप्पलीमृल आरोग्य की मूल है । कफ वात का शमन करती है। इससे अन्न का पचन सम्यक होता है। यह अग्निवर्धक, कटु तथा लघु है। श्वास, उदररोग, गुल्म, प्लीहा, कृमि तथा क्षय का क्षय करती है। (पिप्पलीमूल की क्रिया फुफ्फुस और गर्भाशय पर विशेष रूप से होती है। गीत तथा कफप्रधान रोगों में इससे लाभ होता है। प्रसवोत्तर काल में पिप्पलीमूल का फाँट देने से जरायु सरलता से नीचे है। प्रसूतिज्वर, कफज्वर, आमवात तथा शीतज्वर मे शहद के साथ पिप्पली- ( मूल का प्रयोग लाभदायी है । इसकी मात्रा ४ रत्ती तक है)॥३०॥ . । गिर जाता सि. २ सिद्धपतामणिमालायां [दगार:- श्वासो नोच्छासलेशं सृजति न लभते कापि कामः प्रकागं तृष्णा तेक्षायं न धत्ते मरेति च मरणं दाइमामोति दाहः। दोपाः सर्वेऽपि दुटिं परिजहनि रुचिचीयते मेटनान्त- मूत्रं नो मात्यवृष्ये मधुरपरिणतो धान्यके सेव्यमाने ॥ ३७ ॥ अरोचरेतःकफवातहारिणी विपाचिनी शोणितपित्तकारिणी। मेदोऽक्षिनिद्रानिलमान्यदारिणी विसूचिकां कृन्तति पित्तकारिणी ॥३८॥ कटुढीपनेपाचनोष्णरक्षमतिसारज्वररुकामानिलनम् । हृदयङ्गममेध्यवृष्यदृश्यं जरणानां त्रितयं हाचं चिनोति ॥ ३२ ॥ कहते हैं। यह शीतल तथा मामाशय की गरमी को गांत करनेवाले माने जाने हैं। उत्तम-मात्रा में दारुहरिद्रा पाली के घर को रोकती है। दार हल्दी के मूल और काड के नीचे के भाग की पीत रग की लकडी को उपयोग में लेना चानिये।) धनिया विपाकमे मधुर है। इससे श्वास का उच्चाय यद होता है। काम को कहीं भी प्रकाश नहीं मिलता। तृष्णा अपनी तीक्ष्णता का त्याग कर देगी है। अनिमार सरक जाता है । दाह का दहन हो जाता है । सभी दोष अपनी सटोपता त्याग देतो। रुचिका उपचय होता है। प्रमेह नि संदेह दूर होता है। बग्निमें मूत्र नहीं माता, बपता शता को प्राप्त होती है। (धनियां त्रिदोपहर, गीतप्रशमन तथा ज्वरनागक है। हरा धनिया सुगन्धियुक्त एवं हृद्य है । विशेषतः, पित्त-गामक है । घर में धनिये का हिम लाभ देता है। उदर-वेदनामे इसका तेल प्रगम्त माना गया है-सिरदर्द में नया मिरा के सेवन से उत्पन्न दाह एवं शोथ में धनिये के लेप का विधान है।) लाल मिर्च-मरचि, शुक्र, कफ तथा वात का नाश करती है । पाचक है, रत्नपित्त करती है । मेद, नेत्र, निद्रा और अग्निमांद्य को दूर करती तथा विसूचिकामे लाभ देनी है ॥ ३५-३८ ॥ जीरा तीनो प्रकारका रुचिकारक है । कटु, दीपन, पाचन, उरण, रक्ष है-अनिमार, ज्वर, कफ तथा वायु का नाश करता है-हृद्य, भमेध्य, भवाय तथा चक्षुप्प है। (तीन प्रकारका जीरा होता है। श्वेत छोटे, वटे के भेदसे-दो प्रकार का तथा कृष्ण जीरा । जीर्णज्वर मे जीरा देने से भूस बटनी है। नूतनज्वर में प्रयोग करने से शरीर का तथा मूत्र का दाह कम होता है। प्रसवोत्तर काल में इसके कार का सेवन करने से गर्भाशय सकुचित होता है-तथा दूध चढता है। काला जीरा रज - स्रावकारी है । अतः रज कृच्छ्रता तथा रजोरोध में उपयुक्त होता है। त्वचा के रोगो में इसका प्रलेप कण्डू, दाह तथा वेदना को दूर करता है।)॥ ३९ ॥ १-गच्छति । २-अतिमाराख्यो रोगविशेष । ३-हेतुव्याध्युभयहेतुत्व प्रतिपादि- तमनेन तथा च शोणितदुष्टौ पित्तकोपे तद्वदेव च रक्तपित्तव्याधावपि निदानमित्यर्थ । ४-'लाल मिरच' 'पित्तकाली'नाम्ना लोके प्रसिद्धिमावहति। ५-अग्नि पचति तस्य पचतो ये विवन्धादयो भवन्ति तानिषिध्य पाटवमादवान पचेति प्रयुत इव तत् पाचयतीति पाचन मुच्यते। हेतुमण्णिजन्तात् पचेर्वाहुलकात् कर्तरि ल्युट् । “यदुपयुक्तमनपानोपवमामाना धातूना पाचने समर्थं तत् पाचनम्” इत्यरुण । ६-श्वेतमहल्लघुकृष्णप्रभेदतो जीरकत्रितयम् । । । । - २१ वर्ग] द्वितीयो गुच्छ.। कल्वलिको पाचनदीपनी परं संधानयोग्या कफवातवारिणी। प्रवर्तयत्यार्तवमुष्णवीर्या भक्तेऽपि भक्ति वहुलीकरोति ॥ ४० ॥ गृह्णाति वर्चः शिशिरं व्यनक्ति प्रसादयत्यत्रमुदीर्णवेगम् । निहन्ति दाहज्वरमुप्णवातं वलावलम्बीश्वरवोलसंज्ञः ॥ ४१ ॥ आनाहविष्टम्भवलासवायुहृद्वस्तिवाधां न निहन्ति किं नु । तीक्ष्णं मनोज पुरुपित्तसंपत् कटु प्रपाकेऽपि रसेऽपि हिङ्गु ॥ ४२ ॥ कलौंजी - उत्तम दीपनपाचन, सधान में उपयोगी तथा कफ वात कारक मार्तव-जनन एव उष्णवीर्य है। इसके सेवन से रुचि बढती है। (कलौजी कृष्णजी- रकका ही एक भेद है। इसको सस्कृत में उपकुंची कहते है। इसके बीज सधान मे व्यवहृत होते है। यह मेध्य, वृष्य तथा गर्भाशयशोधक है। यह त्वचा, स्तन तथा मृत्रपिंड के मार्ग से बाहर आती है अत. त्वक् रोग में लाभ देती हुई मूत्रपिड को साफ करती तथा प्रचुर मात्रा में दूध बढाती है । इसको विरेचन द्रव्यो के साथ मिला कर देने से पेट में मरोड नहीं आती । इसके प्रयोग से आर्तव साफ आता है)॥ ४० ॥ ईश्वरवोल (इसबगोल) मलावरोध दूर करता है, शीतल है, रक्त की उष्णता को दूर करता है । दाह, ज्वर. तथा सौजाक को मिटाता है तथा वलकारक है। (इसव- गोलको घी मे मसल कुछ गरम करके लेने से अतिसार तथा प्रवाहिका मे लाभ होता है)॥४१॥ हींग-आनाह, विष्टंभ, कफ, वायु, हृदय तथा वस्ति के रोगो का नाश करने- वाला, तीक्ष्ण, रुचिकर पित्तल तथा रस एव विपाक दोनों में कटु है। (हींगमे तैल- युक्त राल तथा गन्धक उपलब्ध हुआ है-हींग में स्थित तैल श्वासनलिका, त्वचा तथा वृक्-मार्ग से बाहर निकलता है तदनुसार कफ पतला होता है, तदन्तर्गत कीटाणु नष्ट होते तथा दुर्गध दूर होती है । हींग को पानी में घोलकर पीने से फुफ्फुस रोग मे लाभ होता है। शीत ज्वर मे भी हींग उपयोगी है। हींग को गुड मे मिला कर खिलाने से स्नायुक मर जाता है । फुफ्फुस रोग मे कच्चा तथा पेट के रोग में घी मे भूनकर हिग देने का विधान है। हृदय की धडकन, हृत्पीडा तथा घबराहट मे 'हिगु कर्पूर-वटिका' का प्रयोग प्रसिद्ध है। इस वटिका मे १ भाग कस्तूरी मिलाने से विशेप लाभ होता है। 'हिगु-कर्पूर-वटिका' मे १ भाग हींग १ भाग कपूर मिलाना चाहिये । मात्रा १ से २ रत्ति है। चिरकारी उदर रोग की हींग उत्तम औषध है। अपस्मार तथा मनोविकार में भी यह लाभ करता है)॥ ४२ ॥ १-स्यूलकृष्ण 'कलोजी'नामा जीरकविशेप । जीरकत्रयेऽपि कल्बल्या विद्यमानतया पुनर्विशेषगुणलाभाय जानीत प्रतिपादनम् । २-आम्रसधानादिष्वतीवोपयोगिनी। ३-अयं च लोके 'सौजाक' इति गीयते । ४-'इसरवोल', 'इसबगोल' इति च ख्यात सूक्ष्मपत्र- श्छनाकारस्तस्य च वीजानि व्यवह्रियन्ते । -- Moon २४ सिन्भेषजमणिमालायां [हरीतम्यादि- पौष्कर फफमरुज्वरगोफपारुच्चमा नकारनवमितम् । शुङ्गिका अयसमीरबलासश्चासतृट्कसनहियानहन्त्री ॥ १८ ॥ फट्फलं तुवरकं कटु तितं हन्ति मेहकसनश्वसनादीन् । गुल्मरक्तकफपीनसशोथश्वासकासपवनानथ भार्गी ॥ ४२ ॥ विकिरति कर्फ कासहासं समारभते मचि स्फुटयति हृदातवं मन्नात्युदीरयति स्वरम् । द्यति मन्दपस्माराध्मानान् प्रदीपनपाचनं गिलति गलजान् व्याधीन्मेध्यं कुलिअनमीरितम् ॥ ५० ॥ उदरग्रहणीगुदजान् सहसाऽनिलपित्तपरानपहन्ति रुपा । जनितज्वलना सकपायरसा हवुपा गुरुरेव किमत्र मृपा ॥ ५२ ।। पुष्करमूल-कफ, वायु, ज्वर, गोथ, पाश्वपीडा, श्वास, काम तथा वमन का नाम करता है। ऋगिका (काकडासींगी) क्षय, वात, कफ, श्वास, काम, तृष्णा तथा हिया को दूर करती है । (पुष्करमूल आकार प्रकार में कृठ से मिलता जुलता है। चरक ने पुष्कर- मूल को 'हिकाश्वासकासशूलहराणाम्' में परिगणित किया है। श्वास, श्वासनलिका- शोथ, फुफ्फुस, कलाशोय, क्षय तथा पसली के दर्द में इसका उपयोग होता है। काक- डासीगी कफरोग में उत्तम कार्य करती है। नृतन भयवा जीर्ण श्वासनरिका के शोय में इससे जमा हुमा कफ बाहर निकलता है तथा नया उत्पन्न नहीं होता।) ॥ १८ ॥ कट्फल (कायफल ) कपाय, कटु तथा तिक्त है। प्रमेह, श्वास, कास आदिका नाश करता है। भार्गी (भारगी) गुल्म, रक्तविकार, कफ, पीनम, शोध, श्वास, तथा वायुका गमन करती है। (कायफल की छाल का उपयोग चूर्ण या काय के रूप से होता है । यह शुक्रशोधन तथा वेदनास्थापन गण की औषधि है । राजनिघण्टु इसे प्रतिश्यायहर तथा मुस रोग का नाश करनेवाली मानते है। इसके चूर्ण के उपयोग से मसूढे दृढ होते है ॥ ४९ ।। कुलिंजन कफ को काट डालता है, श्वास का हास करता है तथा रुचि को उत्पन्न करने वाला है । हृदयरोग मे हितकर एव स्वर्य है । वायु, अपस्मार तथा सामान को नष्ट करनेवाला, गले की व्याधियो को निगल जानेवाला, दीपन पाचन तथा मेध्य है। (कुलिजन त्वचाका ही एक भेद है । अमुक वैद्य पान के मूल को ही कुलिजन कहते है। यह भ्रातिमूलक है । कुलिंजन लताजातीय भोपधि है। इसके मूल गाठढार, रक्तवर्ण तथा सुगधित होते है । धन्वन्तरी निघण्टु मे इसी को 'अगस्त्य' वच कहा है।) ॥५०॥ हाऊबेर बात तथा पित्त-प्रधान उटर, ग्रहणी तथा गुदा के रोगो का शीघ्र विनाश कर देता है। इसको अग्नि प्रदीपक, रस मे कपाय तथा भारी कहा गया इसमें जरा भी असत्य नहीं। १-कुष्ठविशेपः । २-वचाभेद । ३-'हाऊवेर' इति लोके विख्याता। काम -- है २५ -- वर्ग] द्वितीयो गुच्छ । कटुत्वरुक्षत्वलघुत्वतैणान्युरीकरोति प्रतनोति वहिम् । आध्मानकोष्ठक्रिमिवन्धवायुवलासशूलादिहरं विडङ्गम् ॥ ५२ ॥ कटूप्णतिक्तो रुचिदोऽग्निदीप्तिदो हितोऽक्षिकर्णीदररुक्षु किं गुरुः क्षणात् क्षिणोति श्वसनप्रभञ्जनौ कफक्रिमिष्ठीहरुजोऽपि तुम्बरुः ॥५३॥ पित्तास्रक्रिमिगणतृद्विपातिसारे धातक्या लघु मदकारि पुप्पमुक्तम् । गुल्माशोहदयभगार्तिकृच्छ्रमेहलीहाश्मव्रणशमनो हिमोऽश्मभेदः ॥ ५४॥ (हाऊबेर के मटर के समान बडे कुछ श्यामता को लिये हुये किरमिजी रग के फल होते है। इसमें मत्स्य के समान गंध भाती है। इसीलिये इसे मत्स्यगधा भी कहते है। इसकी लकडी कलम बनाने के काम में भाती है। यह लेसन तथा शोपक । होने के कारण जलोदर, हृढयोदर, एव श्वेत प्रदर में उपकारक है।) ॥ ५ ॥ वायविडग कटु, रूम, लघु, तीक्ष्ण तथा अग्निवर्धक है । आध्मान, कोप्टगत कृमि विवन्ध, वात, कफ तथा शुल भादि को दूर करता है । (वायविडग उत्तम कृमिन्न तथा रसायन है। ‘विडग कृमिनानाम् ' । बच्चो की चिरकारी बढ कोष्ठता तथा तीन कास में पिप्पली चूर्ण के साथ इसे देने से लाभ होता है । जुलाब लेने के उपरात एक तोला भर विडंग चूर्ण लेकर तथा उस पर पुन: जुलाव देने से गोल तथा चपटे कृमि मर कर गिर जाते है। विटग के फलो को मसल कर उसके ऊपर के रक्ताभ रज णो को उतार कर एकत्र किया जाता है। इसे ही कम्पिल्लक या कवीला कहते है।) ॥ ५० ॥ तुबरु (तेज बल) कटु, उष्ण, तिक्त, रुचिकारक, अग्नि प्रदीपक, नेत्र, कर्ण तथा उदररोग मे हितावह एव गुरु है। श्वास और वात को ही नहीं, कफ, क्रिमि, तथा प्लीहा की व्याधि को भी यह एक ही क्षण में क्षीण कर देता है। (तेजवल के वृक्ष के फल को तुंबर कहते है । इसके फल, धनिया के आकार जैसे चीजो से युक्त होते है । आपधार्थ फल का उपयोग, वीजो को निकाल कर ही करना चाहिये।)॥ ५३ ॥ धातकी (धाय) पित्त, रक्तविकार, कृमि, तृपा तथा मलाधिक प्रवृत्ति मे लाभ देता है । इसके पुष्प लघु तथा मादक है। अश्म-भेद (पाखानभेद) गुल्म, अर्श, हृदय तथा योनि रोग, मूत्रकृच्छ्र, प्रमेह, प्लीहा, अश्मरी तथा व्रण का शमन करनेवाला एवं शीतल है। (धायके फल पासवादि में खमीर उठाने और रग लाने के लिये उपयोग में आते है। इसीलिये इसका एक नाम मद्यपुप्प भी है । यह सग्राहक है । अत्यातव, अतिसार तथा जीर्ण आंव में फूल देते है । पाखानभेद पत्थर मय चहानो मे पैदा होता है । यह भश्मरी की अमोघ औषधि मानी जाती है । उदर शूल मे, इसके पत्र स्वरस में लवण मिला कर देने से आशु-लाभ होता है। यह आतों को शक्ति देता है, भत. भांव तथा अतिसार में उपयोगी है।) ॥ ५४ ॥ १-चन्धो विवन्ध । २-मरिचवद्व्यात्तमुख फलमिति । ।
सिहभेषजमणिमालायां [हरीतक्यादि- स्निग्धा हिमा वनप्सा तत्काथो ज्वरमपस्मृतिं जयति । अथवा यष्टिसहायः श्वयथु लेपाद्विलोपयति ॥ ५५ ॥ पिनष्टि पित्तं श्वसनं सुनोति कासं च निष्कासयति प्रसह्य । विवन्धवाधां विरलीकरोति रूक्षस्वभावा चिरैपूर्वपोटिका ।। ५६ ॥ लघुस्तिक्तकः सारको रूक्षशीतस्तुपाकुष्ठजन्तुव्रणश्लेप्मगीतः । निहन्ति ज्वरश्वासकासान्किरातः सपित्तास्त्रशोफान्यथैणान्किरातः॥५७॥ हिमकटु त्रिमलोन्मथनं ज्वरक्रिमिगुदोद्भवकुष्टविसर्पहृत् । रुधिरमारुतशूलभरश्रमातिसृतिनाशनमिन्द्रयवं नवम् ॥ ५८ ॥ वनप्सा स्निग्ध तथा शीतल है, इसका काथ ज्वर तथा अपस्मार को दूर करता है। मुलहठी के साथ इसके लेप से शोथ का विलयन होता है । (बनप्सा रककी अप्मा को शमन करता है-तथा निद्रा लाता है। कण्ठ की रूक्षता में हितकर है । बस्ति - शोथ मे इससे परम लाभ होता है)॥ ५५ ॥ चिरपूर्वपोटिका (काकमाची) पित्त को पीस डालती है, श्वास का हास तथा कास का बलात् नाश कर देती है। विवन्ध का बन्धन तोडनेवाली एवं रूक्ष स्वभावकी होती है। (मकोय के पत्र गरम करके लगाने से वेदना तथा अंडकोष की सूजन मे लाभ होता है । काकमाची के रस को मिट्टी के पात्र मे गरम करके छान कर पीने से मूत्र सरलता से उतरता है । यह रस विविध प्रकार के चर्मरोग मे लाभप्रद पाया गया है । वाग्भट ने इसे स्वयं तथा रेचक कही है 'काकमाची सरा स्वर्या' ।)॥ ५६ ॥ किरात (चिरायता), मृग समूह का किरात की तरह, रक्तपित्त, शोथ, ज्वर, श्वास तथा कास का, सहार कर देता है । यह लघु, तिक्त, सारक, रूक्ष, शीतल तथा तृपा, कुष्ठ, कृमि, व्रण एवं कफ विकारो मे लाभ कारक है। (यह भूनिंब नामसे भी प्रसिद्ध है। यह गर्भ कालीन वमन को रोकता है-स्तन्य शोधक तथा उत्तम ज्वरघ्न है। यह आनुलोमिक अत एव दस्त को साफ लानेवाला है। आमाशय की शिथिलता म यह परम औषधी है।) ॥ ५७ ॥ नूतन इन्द्रयव शीतल, कटु, त्रिदोषहर, ज्वर, कृमि, गुदा के विकार, कुष्ठ तथा वीसर्प को दूर करता है। रक्तविकार, वायु, शूल, श्रम तथा अतिसार को मिटाता है । (इन्द्रजौ के मूल तथा वीज उपयोग मे लेने चाहिये । चरक (कल्पस्थान) के टीकाकार ने पुकुटज तथा स्त्रीकुटज भेद से दो प्रकार के कुटजो का उल्लेख किया है। पुरुष जाति का श्वेत तथा स्त्री जाति का कृष्णवर्ण कहा गया है। श्वेत कुटज तिक्त तथा श्याम कुटज मधुर होता है। दृढवल के मत मे उभय जाति समान गुणवाली है । सुश्रुत टीकाकार ढल्हण श्वेत कुटज को गुण मे अधिक मानते है। श्वेत कुटज-त्वक १-यवनभाषानुसारेण सुप्रसिद्धतरमिदं नाम द्वीपान्तरीयघासविशेष इति 'करावादीन सफाई', केचित्तु-काश्मीरदेशोत्यो घासविशेप इत्याहु , अन्ये पुनस्नायमाणाभेदमाहुः । २-चिरपोटिका-काकमाची, 'मक्को' इत्यु भापाया, 'पीलूडी' इति गुर्जरभापायाच प्रसिद्धा ।
वर्ग.] द्वितीयो गुच्छः। रुक्षा हिमा लघुसरा दहनप्रवोध- दक्षा विपाककटुका कटुकाऽतितिक्ता। ही प्रमेहकसनक्रिमिकुष्ठपाण्डु- श्वासासरुग्दवथुपित्तकफज्वराणाम् ॥ ५९ ॥ उद्गाढपित्तमधिरोद्धरशूलकालः प्रध्वस्तहद्दमरुज्वररोगजालः। संबोटितातिमलसंभृतकोष्ठताले: स्वादुर्हिमो गुरुतरस्तरजातिपालः ॥ ६० ॥ रक्तातिसार की उत्तम औषध है। गुद कील में इससे लाभ होता है। प्रसवोत्तर- कालीन योनि तथा गर्भाशय की शिथिलता में यह उपकारक है। इसके पत्ते चबाने से दन्त शल का शमन होता है। जीर्ण भाव मे ताजी छाल का काथ असर कारक है। हमना ताजी छाल ही उपयोग में लेनी चाहिये, सूसने पर इसके गुण मे न्यूनता मा जाती है । इन्द्रयव का फाट रक्तार्श में लाभ दिसाता है।) ॥ ५८ ॥ कटुका (कुटकी) रुक्ष, शीतल, उत्तम-सारक, दीपन, विपाक मे कटु तथा तिक्त है। प्रमेह, कास, कृमि, कुष्ट, पाण्डु, श्वास, रक्तविकार, दाह, पित्त, कफ एवं ज्वरको हरनेवाली है । (इसके मूल का उपयोग होता है । गुडूची की तरह यह भी काण्डरुहा है। स्वाद में भति तिक्त होने से यह कटुका नाम से प्रसिद्ध है। तोडने से इसके पर्व के अपर मत्स्याकृति तथा गोलाकार चिह्न दीख पड़ते है। भत इसके चक्राझी तथा मत्स्यरोहिणी नाम भी है। ग्रंथकार ने इसे 'लघुसरा' कहा है। अधिक मात्रा में यह संसन गुण दिसाती है। कामला में अपने पित्त नि.सारक गुण के कारण यह उत्तम लाभ देती है । विषम ज्वर मे यह परम उपकारक है।)॥ ५९ ॥ तरजातिपाल (ममलतास)लका काल तथा अतिप्रवृद्ध पित्त एवं रक्तविकृति से मुक्त करता है । हृदय रोग, वायु एवं ज्वर के जाल को नर्जरित कर देता है । मल सग्रह से ठसा ठस भरे हुये कोष्ठ के तालेको तोड डालता है । स्वादु शीतल तथा गुरु है । ('चतुरनुलो मृदु विरेचनानाम् ' अमलतास मृदु विरेचन औषधियो मे श्रेष्ठ है । यह नत्र ज्वर मे भी विरेचनार्थ प्रयुक्त की जा सकती है। यह कोष्ट शुद्धि की परम औषध है। पित्त की प्रधानता मे इमली के साथ, शीत की प्रधानता में निसोथ के साथ एवं यकृत् विकृति मे मकोय के साथ इसका उपयोग होता है। गले की ग्रथिशोथ मे, गो दुग्ध अथवा मकोय रस के साथ इसकी छाल का क्वाथ शनै शनै. पीते रहने से लाभ होता है। अमलतास का गृदा मांतो से चिपक जाता है मत. इसका प्रयोग बदाम तेल के साथ करना चाहिये । इसके गूदे को कभी नहीं उकालना चाहिये। गरम पानी को उतार कर फिर उसमे गूदा मिला कर उपयोग करने से यथावत् लाभ होता है।)॥६० ॥ १- "कर्तृकार्ययोरक्तादौ कृति षष्ठी" इत्यनुशासनात् कर्मणि षष्टी । २-द्वारपिधान- सावनम्। ३-राजवृक्ष ।
२८ सिन्दभेपजमणिमालायां [हरीतस्यादि-- यकृत्क्रिमिप्लीहविवन्धगुल्मशूलादि केवलमुशन्ति वैद्याः । केचित् पुनः संभवमेतदीयं कुमारिकायाः स्वरसाद्वदन्ति ॥ ६१ ॥ विस्फोटरक्तातिसृतिप्रमेहव्रणज्वरग्रन्थिविपामहन्त्री। भिनत्ति मूत्रस्य परं निरोधं गुर्वी हिमा रेवतिका प्रदिष्टा ॥ ६२ ॥ रूक्षोप्णा शोधिनी बाद वातश्लेप्मविरोधिनी । शस्ता सनामकी नाम मनाक् पीततनुच्छदा ॥ १३ ॥ एल - एलिया यकृत् , प्लीहा, विवन्ध, गुल्म, शूल भादि में लाभदायी है-ऐसा वैद्य लोग कहते है। अमुक इसकी उत्पत्ति घी कुवार के रस से मानते हैं। (पलिया को मुसब्बर कहते है। प्राचीन ग्रथो मे इसका उल्लेख नहीं मिलता। मुमव्यर घी कुवार के रस से बनाया जाता है जिसे 'सेकोटॉइन् ' कहते है। सेकोटॉहन् मुसब्बर के अतिरिक्त 'भरवियन्', जाफराबादी, मैसूरी मुसब्बर भी बनाये जाते हैं । अथकार का, मुसब्बर के विपय मे, वक्तव्य यथावत् है। बच्चो के नाभिप्रदेश मे एरट तेल के साथ मुसब्बर का मर्दन करने से कोष्टशुद्धि होती है। अर्शरोग जनित आव युक्त रक्तस्राव मे यह परम उपयोगी है।)॥ ६१ ॥ रेवतिका-रेवन्दचीनी (पीतमूला, अम्लपर्णी), विस्फोट, रक्तविकार, अतिसार, प्रमेह, व्रण, ज्वर, ग्रथि, विष तथा भाव का नाश करती है। मूत्रकृच्छ मे हितावह, गुरु तथा शीतल है । (रेवंद फारसी नाम है, आंग्लभाषा मे इसे 'रुवर्य' कहते है। इसकी एक छोटी जाति काश्मीर मे भी होती है जिसे रेवास कहते है। रेवट भरप मात्रा मे ग्राही है। अधिक मात्रा मे मरोड के साथ यह जुलाव का काम करती है। इसलिये इसका उपयोग शुण्ठि अथवा सौफ के अर्क के साथ ही करना चाहिये । पहिले जुलाब लाकर पीछे से कब्ज का काम करनेवाले दो औषधीय द्रव्य है । एक एरड तैल दूसरी रेवद । भेद इतना ही है कि एरड क्षार स्वभावी नहीं है, अत पेट की अम्लता इससे दूर नहीं होती। रेवतिका अम्लता दूर करती है । रेवंटका क्षार स्वभाव अल्प है। अत इसमे थोडी सर्जिका क्षार मिलानी चाहिये। यूनानी मतसे रेवद मूत्रल है और यही मत ग्रथकार का है।) ॥ ६२ ॥ सनामकी (सनाय) कुछ पीताभ पतले पत्तोवाली, रूक्ष, उप्ण, उत्तम, शोधन गुणवाली वात तथा कफ की विरोधी है। (सनाय हरे पीले पत्तों की एक लता जातीय औपधिका नाम है, इसे 'भीढी आवल' भी कहते हैं । अमुक इसे ही मार्कंडी लता बताते है। इसके पत्ते रास्ना से १-'एलिया' इत्यस्य सुप्रसिद्ध नाम । २-अप्रतिषिद्धत्वात् स्वाभिमतमपि । ३-रेवत(न्द)चीनी' इति प्रसिद्धा पीतवर्णा । 'रुवर्य' इत्याङ्ग्लभाषायाम् । ४-'सनाय', 'मीढी ऑवल' इति प्रसिद्धा हरित्पीतपत्रा काचिल्लता। केचिदेता मार्कण्डीलतामाहु । अपरे च-रास्नासदृशपत्रत्वात् सर्पसुगन्वत्वाच्च रानाभेदं 'नाकुली' सज्ञमाचक्षते ।
वर्ग:] द्वितीयो गुच्छः। विड्जन्तुजालक्षपणान्यपानावर्तीदरातङ्कनिषूदनानि । कटूनि सोष्णानि विपाचनानि बीजानि कालाअनिकांजपि ॥ ६४ ॥ सुस्निग्धं गुरु रेचि पित्तकफनुन्नेपालवीजं रसे पाके स्वादु जयेत् क्षतक्षयमरुद्दाहास्नकासापदः। उप्णा स्वादुरसा त्रिवृन्निगदिता तिक्ता समीरापहा पित्तश्लेष्मगदोदरश्वयथुजिद्रूक्षा मलक्षालिनी ॥ ६५ ॥ तत्ताद्देशानुल्यणवृकशूलगामयान हन्तुमतीव वीरः । कल्याणकारी मलरोधहारी प्रशस्यते मध्यविलो ममीरः ॥ ६६ ॥ मिलते है और सर्प सुगन्ध के कारण राना के एक भेद 'नाकुली' नाम से भी यह प्रसिद्ध है। सनाय रेचक है। इससे पेट में ऐठन होती है अतः शुण्ठी अथवा सोंफ के साथ इसका उपयोग किया जाना चाहिये । मनाय दूधके द्वारा बाहर आती है, अत. धावन काल में माता को सनाय देने से बालक को भी जुलाब होता है । पित्त-ज्वर में सनायका अमलतास के साथ जुलाब देना शास्त्र सम्मत) ॥ ६३ ॥ काला दाना मल संग्रह तथा कृमि समूह को बाहर निकाल देता है। अपान तथा उदावर्त के मातंक का अंत करता है। यह कटु, उष्ण तथा पाचक है। (काले टाने की क्रिया निसोत के समान है। इसके लेप से किलास तथा झाई में लाभ होता है।)॥ ६४ ॥ निवृत (निशोथ) उष्ण, रस मे मधुर, तिक्त, वात, पित्त, कफ, उदररोग तथा गोथ को दूर करने वाली, मलनिःसारक एवं रूक्ष हे । नेपालबीज (जमालगोटा) स्निग्ध, गुर, रेचक, रस तथा पाक मे मधुर, पित्त, क्षत, क्षय, वात, दाह, रक्त विकार तथा कास को उत्पन्न करता है । (निशोथ की लता होती है। मृल का उपयोग तत् -गर्भ- गत - काष्ठ को निकाल कर ही करना चाहिये। निशोथ श्वेत और श्याम भेट से दो प्रकार की मानी गयी है। अरुण-मूल वाली निगोथ अधिक गुणयुक्त होती है । 'मूल तु द्विविध तस्या श्याम चारणमेव च-तयोर्मुख्यतरं विद्धि मूल यदरुणप्रभम् । सुकुमारे शिशौ वृढे मृदुकोप्टे च तच्छुभम्' । निशोथ को 'रेचनी' भी कहते है। त्रिवृत् सुखविरेचनानाम् । हरीतकी के साथ त्रिवृत् , आमवात, पक्षाघात, मनका अवसाट, वातगोथ तथा कुष्ट रोग में लाभ दिखाती है। जमालगोटा तीन रेचक तथा अधिक मात्रा में विप हे । जब रक्तगत जलाग कम करना हो, अथवा हृदयोदर मे हृदय पर के पानी के दबाव को न्यून करना हो तब जमालगोटा देते है। इसके तैल्की एक चूद से पानी जेसे पतले बहुत से दस्त हो जाते है । यदि विरेचन अधिक हो तो कत्था पानी में मिलाकर या निबू का गर्वत देना चाहिये।)॥६५॥ ममीर, अति वृह वृक्क शूल तथा नेत्र रोग में अत्यत हितकर है। स्वास्थ्य की १-मिरचाड', 'कालादाना, इति च प्रसिद्धानि । २-दन्तीबीजं 'जयपाल, जमाल गोटा' इति च ख्यातम् । ३-तत्तादृशानिति च्छेद । ४-आन्ध्यहर्ताऽतीव दुर्लभो ग्रन्थिलः काष्ठौपधविशेष । 'यस्य स्पर्शात् काकपनमपि कालिमान जहाति' इति वृद्धजनश्रुति । - ३० । सिद्धभेषजमणिमालायां [हरीतक्यादि- पुनर्नवोप्णा मधुरा सतिक्ता सरा कपाया कटुका च रूक्षा। विपार्तिपाण्डुश्वयथूदरा चातव्रणश्लेष्मगदेपु पूज्या ॥ ६७ ॥ ब्राह्मी तिक्तकषायगीतमधुराऽऽयुष्या सरा वुद्धिदा स्वर्या शोफविषज्वरात्रकसनी पाण्डुप्रमेही हरेत् । छिकोष्णा कटुकाऽग्निदाऽरुचिमरुच्लेष्मास्त्रजन्तुप्रणु- गोजिह्वाऽनिलकृद्धिमातिसृतिहृन्मेहे कफे स्याज्वरे ॥ ६८ ॥ सुरक्षा करनेवाला एव मलावरोध हटाता है। मध्य भाग में छिद्र युक्त ममीर ही प्रशस्त कहा गया है। (हरिद्रा जाति की छोटी ग्रथियुक्त जड को ममीर कहते है । इसके वृक्ष काश्मीर जैसे पार्वत्य देशों मे पाच हजार फीटकी ऊचाई पर पाये जाते है। यह आध्य-दूर करनेवाली ग्रथियुक्त, काष्ठ - गर्भा दुर्लभ औषधि है, जिसके स्पर्श से काफ के पक्ष की कालिमा भी दूर हो जाती है' यह मत इस ग्रथके विद्वान् टिप्पणीकार का है। ग्रंथकर्ता के पुत्र श्री कलाधर राज-वैद्य के मत में २१ वर्ष पुरानी जगली चमेली (पुष्पलता) की जड मे भी यही गुण है। अपने इसी गुणधर्म के कारण यही ममीर कहलाती है)॥६६॥ पुनर्नवा - उष्ण, मधुर, तिक्त, सारक, कषाय, कटु, रूक्ष तथा विष, पाण्डु, शोथ, उदावर्त, अर्श, वात, व्रण एव कफ जन्य विकारो मे परम पूज्य है। (पचाग, विशेषतया मूल उपयोग मे लाये जाते है । यह ऊंची जलाई भूमि मे, वर्षाकाल मे, परिवर्धित होती है इसीलिये इसका एक नाम 'वर्षाभू' भी है। श्वेत तथा रक्त भेद से यह दो प्रकार की होती है । फल पाकान्त पर इसका क्षुप सूख जाता है-कितु मूल नही सूखते । शोथन्न होने से इसे 'शोथनी' भी कहते है । यह मूत्रल है इसका प्रलेप विपाक्त कीट-दशमे विशेषतया वृश्चिक दश मे महौषधी का कार्य करता है।)॥ ६७ ॥ ब्राह्मी, तिक्त, कपाय, शीत, मधुर, आयु तथा बुद्धि को बढाने वाली, सारक तथा स्वर्य है । यह शोफ, विप, ज्वर, रक्त-विकृति, पाण्डु, तथा प्रमेह मे लाभ देती है। छिका नकछिकनी, उष्ण, कटु, दीपन, रुचिकर तथा वात, कफ, रक्तविकार तथा कृमि को दूर करने वाली है। गोजिह्वा (बनगोभी) वात-कारक, शीतल, अतिसार, हृदयरोग, प्रमेह तथा कफ ज्वर मे प्रशस्त है । (ब्राह्मी का समग्र-क्षुप औषधार्थ उपयोग में आता है। यह मूत्रल, मृदु रेचक तथा बल्य है। मूत्राघात मे कोष्ठबद्धता भी हो तब ब्राही के उत्तम गुण की प्रतीति हो जाती है। वातज दौर्बल्य, शुक्रक्षीणता तथा अपस्मार मे इसका उपयोग होता है । नकछिकनी, जलाई भूमि मे अधिक होती है। इसे सूचनेसे लगातार छीके आने लगती है, अत इसका एक नाम 'घ्राणदु खदा' भी है। हिक्का-तथा प्रतिश्याय आदि नासिका जन्य रोगो मे इसका शिरोविरेचनार्थ प्रयोग प्रशस्त है । इसके तैल का प्रयोग खुजली मे लाभ देता है।)॥ ६८ ॥ १-शोफादीना गासिनी 'कसि गति शासनयो. इत्यस्माद्युट । टित्वान् डीप् ।
वर्ग.] 07 द्वितीयो गुच्छः। त्रायन्ती तुवरा सरा कफहरा नश्यद्रा विचरा पित्तच्छेदकरा भृशं भ्रमभराऽत्युग्राऽस्ननाशोद्धरा । विध्वस्तप्रदरज्वरा गुस्तरा स्निग्धाऽतिशुकोत्तरा विट्सारं स्यति सारिवाऽल्परुधिरा दोषोकिरा भो नराः ! ॥६९॥ उप्णा विपाकमधुरा कटुका कपाया तिक्ता लघुरहरा वलदा गुडूची। दोपत्रयामवमिमेहविदाहकासदृट्पाण्डुविसरणवेधविधानसूची' ॥ ७० ॥ वरं वालं बिल्वं कटुतुवरतिक्तोप्णमुदित मरुन्मान्द्यश्लेष्माञ्छथयति च पित्तं रचयति । ब्रायन्ती (वायमाणा) तिक्त, सारक, कफ तथा गरविनाशक, विषमज्वर तथा पित्तकी छेदक, भ्रम हारक तथा उग्र रक्त विकृति की विघातक है । सारिवा, अनन्तमृल-प्रदर तथा ज्वरका नाश करने वाली, भारी, निग्ध तथा अत्यत शुक्रल है। मलनि सारक तथा रुधिराल्पताजन्य विकारो की सहारक है। (बायमाणा गिमले के सोलन गांव के पर्वतो की चोटी पर होती है, यहा इसे कडू नाम से भी पुकारते है। जम्मू मे वैश्नवीदेवी के पहाडो पर भी उपलब्ध होती है । यहा यह तीता नाम से प्रसिद्ध है। 'मुहिते भाजम' में गॉफिस् का सस्कृत नाम त्रायमाण दिया है। यह मूतिकागल का नाग करती है। इन्द्रलुप्त रोग मे इसके प्रलेप से लाभ होता है । यह पित्त स्त्राव कराती है तथा उत्तम मृत्र विरजनीय औषधि है। मारिवा, श्वेत, कृष्ण भेद से दो प्रकारकी होती है। सारिवा के मूल सुगवित तथा उड्डयनशील तैल से युक्त होते है, भत. इसे अधिक नही उकालना चाहिये । सारिवा के यह गुण उसके मूल में है-तत्-गर्भ-गत-काष्ट में नहीं, अत एव काष्ठ रहित ताजे पतले को ही उपयोग में लेना चाहिये । शास्त्र में जहा सारिवा लेने को कहा हो वहा अनन्तमल ही ग्रहण करना चाहिये-जहां सारिवा-द्वय लिसा हो वहा श्वेत एवं कृष्ण दोनों प्रकार की ही मारिवा लेने का शास्त्रीय विधान है। चरकज्वरचिकित्सा मे शिवदास कहते है कि 'यन्त्र सारिवैका पठ्यते तत्रानन्तमूलमेव' । सारिवा रसायन तथा रक्त के विकारो में विशेष उपकारक है। उपदंश अथवा सुजाक से वारवार गर्भ- पातकी स्थिति में सारिवा मूल का सेवन अत्यंत प्रशस्त है ॥ ६९ ॥ गुडूची (गिलोय) अण, पाकमे मधुर, कटु, कषाय, तिक्त, लघु, ज्वरनाशक, तथा वलकारक है । त्रिदोप, वमन, दाह, खांसी, प्यास, पाण्डु तथा अतिसार को गुडूची, सूची की तरह विद्ध कर देती है। (गिलोय की लता को कहीं भी रख दिया जाये-उसमे से नूतन लता प्रस्फुटित हो जाती है अत इसे अमृता कहते है। इसके टुकडे करने पर भी इसमे से पुन नये अकुर निम्ल आते है। अत यह छिन्नोद्भवा भी कहलाती है। शुष्क की अपेक्षा भाई गिलोय मे अधिक गुण होते है । गुडूची का बल्य, ज्वरन एवं मूत्रल गुण सर्वत्र प्रसिद्ध है। ) ॥ ७० ॥ १-दोपत्रयादिविट्सरणान्ताना गदाना वेधविधाने सूचीव सूचीत्यर्थ ।
- ३२ सिन्भेषजमणिमालायां [हरीतक्यादि- अथो वासा वातस्वरवलकरा तिक्ततुवरा लघुर्हद्या गीता ज्वरवमनतृष्णाकसननुत् ॥ ७१ ॥ उष्णा ज्वरश्वसनशूलकफाग्निसादान् हन्याहुणोधवृहती वृहती सवातान् । पाॉर्तिपीनसहृदामयजन्तुपु स्याद्रूक्षा सरा तदुपमा लघुकण्टकारी ॥७२॥ लघुर्यवासो मधुरः कपायः सरो हिमः पित्तकफानिला। तृवान्तिमेदोभ्रमकुष्टकासज्वरास्रवीसपमदान् धुनोति ॥ ७३ ॥ विल्य अपक्क ही श्रेष्ठ है, कटु, कपाय तथा तिक्त है । पकाहुमा बिल्व वात- कारक, अग्नि-मद करने वाला, कफ को पतला बना देने वाला तथा पित्त प्रकोपक है वासा, अरडूसा वातकर, स्वर्य, तिक्त, कपाय, लघु, हृद्य, शीतल, तथा ज्वर, वमन, तृष्णा और खासी को मिटाने वाला है। (विल्ब का मूल, त्वचा, पत्र तथा फल का गृदा औषधार्थ व्यवहत होते है। दशमूलादि कषायो मे मृल या त्वचा का उपयोग करना चाहिये । इसका मूल मादक तथा ज्ञान ततुओ पर शामक असर करने वाला माना जाता है। अत यह निद्रानाश भादि मे प्रशस्त है । कच्चा वित्व-फल सौंफ तथा वचा के काय सह, आव में विशेष लाभ देता है । दाख, आवला, हरीतकी आदि फल शुष्क होने पर अधिक गुण वाले होने है । वेल फल के अतिरिक्त अन्य फल पकने पर उत्तम गुण वाले होते है । वल कचा ही उत्तम माना गया है। अडूसा, उत्तम कफ नि सारक है पत्र की अपेक्षा मृल में यह गुण अधिक है। कफको पतला करके खासी के वेग को न्यून करना-यह अडूसा का प्रधान-कर्म है । रक्त पित्त तथा क्षय मे तथा फुफ्फुस में से रक्त-स्राव मे, रक्तार्श तथा रक्त प्रदर मे अडसा का पत्र स्वरस पीना चाहिये । अडूसाकी शुष्क पत्तियों में कुछ धत्तूर पत्रका चूर्ण मिलाकर धूम्र पान से श्वास के वेग में गाति मिलती है ॥ ७ ॥ बृहती, बडी कण्टकारी उष्ण, ज्वर, श्वास, शूल, कफ, भग्निमाद्य तथा वातरोग की नाशक गुणयुक्त औपधि है । लघुकण्टकारी भी बडी के समान रूक्ष तथा सारक एव पार्श्व शल पीनस, हृद्रोग तथा कृमि मे उपयोगी है । (इस क्षुपका पचाग औषधार्य व्यवहृत होता है। श्वेत पुष्पयुक्त कण्टकारी लक्ष्मणा के समान गर्भ कारक कितु अप्राप्य है। दोनों प्रकार की कण्टकारी स्वेद जनन, उष्ण, मूत्र-जनन तथा कफ-नि मारक इसका प्रयोग गले एव श्वास नलिका के शोथ की प्रथमावस्था में होता है ॥ ७२ ॥ यवास, जवासा लघु, मधुर, कपाय, सारक, शीतल तथा वात-रक्त में प्रशस्त है , यह तृपा, भ्राति, मेद, वमन, कुष्ठ, कास, ज्वर, रक्त विकार, विसर्प तथा मद का नाश करता है। (वर्षा ऋतु मे जब अन्य औषधियां उत्पन्न होती-जवासा जल जाता है। इस विषय मे, ग्रंथकार की एक सुदर रचना है-'घनासा चौमासा घन घन-घटा १-अत्र रसस्यानुक्तावपि रौक्ष्योष्ण्यादियोगात् कटुतिक्तरसावत्रगन्तव्यौ। २-'शस्त इति शेप । -- है वर्ग:] द्वितीयो गुच्छ.। तुहिनतुवरतिक्तः कुष्ठकण्डुप्रमेह- श्चययुरुधिरपित्तश्लेष्मपाण्डुप्रहारी । ज्वरभरबहुमेदोऽरोचकासद्विजाति तिरयति खदिरोऽसौ शुक्रलस्तस्य सारः ॥ ७४ ॥ मायाफलं मनागुणं कपायं पवनालजित् । केशसात्म्यं वितनुते संकोचं प्रतिसारणात् ॥ ७५ ॥ सावन धुटी-जनासा का रासा जलकर जरासा रह गया। हरासा ये घासा वन-विच भराला गुथ रहा- तमासा हे खासा त्रिभुवन पिपासा मिट गई। धमासा भी जवासा के समान ही है-भेद इतना है कि धमासा के फल होते हैं जिसके उपर एक तीक्ष्ण कांटा रहता है जवासा के फलिया लगती है। दुरालभा, धन्वयास भादि धमासा के सस्कृत नाम हैं। जवासा उत्तम कफन्न है। श्वास में जवासा का धूम्रपान करने से लाभ होता है। जबासे के क्षुपको वस्त्र के ऊपर भालोडित करने से उसपर श्वेत रज-कण जैसा द्रव पदार्थ जम जाता है इसे आयुर्वेद में यासशर्करा तथा यूनानी मे 'तुरजवीन' कहते हैं। चरकसहिता में यासशर्करा के गुण मिलते है 'कषायमधुरा शीता सतिक्ता यासशर्करा' । सुकुमार-प्रकृतिवालों के लिये यह उत्तम-विरेचन औषधि है। यह पित्त को सरलता से बाहर निकाल देता है।)॥ ७३ ॥ खदिर-गीतल, कपाय, तिक्त है-तथा कुछ, खुजली, प्रमेह, शोथ, रक्तपित्त, पाण्दु, ज्वर, मेद, अरुचि, एव दतपीढा को दूर करता है। खदिर का सार, खैर- सार शुक्रल है । (सैर की लकड़ी से कत्या बनाया जाता है। खैरसार वृक्ष के मध्य भाग में स्वत. उत्पन्न होता है । कत्था सग्राहक है-किंतु इससे पाचक - रस का क्षय होता है । गर्भाशय की शिथिलता से उत्पन्न प्रदर, रक्त-स्राव तथा योनि-शैथिल्य मे समभाग कत्था तथा बोल गुणकारी है। काकडे ( Tonsils) के कष्ट में खैरसार के रस को चूसने से लाभ होता है । यह रसायन एव शुफल है । खदिर की अन्य दो जातिया और है-एक सोमवल्क या श्वेत खदिर दूसरा विट्खदिर या इरिमेद- यह दुगंधयुक्त होता है । ) ॥ ७४ ॥ मायाफल, मांजूफल-कुछ उष्ण, कषाय, वात-रक्त-नाशक तथा केश्य है। इसके प्रतिसारण से योनि - सकुचित होती है। (यह फल नहीं एक प्रकारका कीट- गृह है, यह भति - कपाय होता है। माजूफल को पानी मे घिसकर गले मे लगाने से टॉन्सिल के शोथ में तथा इसके काय के गण्डूप लेने से दातो और मसूढों के शैथिल्य में लाभ होता है। योनि-शैथिल्य में इसके चूर्ण की कपडे मे पोटली बाधकर योनि में रखने है-अथवा इसके काथ की उत्तर -बस्ति देते है।)॥ ७५ ॥ १- माजूफल' इति नाना प्रसिद्ध हरिद्वर्ण वर्तुलं च । २-पालित्यादिहरत्वात् । ३-योनिसोचम् । सि०३ - ३ सिद्धभेपजमणिमालाया [हरीतक्यादि- शीतो निम्बतर्विपाककटकस्तोतुप्यते पित्ततृद हल्लासज्वरजन्तुकुष्टकसनच्छर्दिप्रमेहव्यथाः। रूक्षस्तिक्तकपायकः क्रिमिकफच्छर्दिप्रमेहासविट्- सारप्रौढरुजो रुणद्धि च महानिम्बोऽपि दुर्नामहृत् ।। ७६ ॥ लोध्रः कषायः शिशिरो लघिष्ठः संग्राहको नेत्रगदेवपीटः । वलासपित्तप्रदरप्रहर्ता दाहस्य शोथस्य विनाशकः ॥ ७ ॥ विपा जितविपा विपी हतविपा सृतो रंहसा प्रसारितरुपा कृशानुगदशातिनी कि न सा । निव-शीतल, विपाक में कटु तथा पित्त, तृपा, हृल्लास, ज्वर, कृमि, कुष्ठ कास, वमन और प्रमेह को मिटानेवाला है । महानिंब - रूक्ष, तिक्त, कषाय है तथ कृमि, कफ, वमन, प्रमेह, रक्तदोष और भति प्रवृद्ध अतिसार को रोकता है विशेष तया यह अर्श का नाश करता है । (नीम के सभी अंग औपधार्थ व्यवहृत होते हैं निव का तैल उसके सभी अंगों से अधिक गुणयुक्त माना जाता है । यह कुष्ठ में उत्तर लाभ देनेवाला तथा रसायन है। नीम की अन्तर्जाल का ज्वर प्रतिबंधक गुण सिंकोन की छाल के समान ही है । अन्तर्जाल का करीब ३ माशा चूर्ण सौंफ के भर्क के साथ लेने से आशु-असर होता है। सधि-शोथ तथा आमवात में तेल की मालिश करते हैं । महानिब देखने में निब जैसा ही है-इसके पुष्प सुगवित तथा श्वेत होते हैं इसे ही बकायन कहते है। इसके गुण-धर्म निंव के समान ही है। बकायन का प्रयोग वाग्भट ने अर्श मे किया है-'लवणोत्तमहिंगुकलिगयवान् -चिरविल्वमहापिचुभन्दयुतान पिब सप्तदिनं मथितालुडितान् यदि मर्दितुमिच्छसि पायुरुहान् ') ॥ ७६ ॥ लोध्र - कपाय, शीतल, अतिलघु, सग्राही, नेत्रो को हित कर तथा कफ, पित्त प्रदर, दाह एव शोथ का नाश करनेवाली है । (लोध्र-ग्राही, रक्तस्तभक तथा शोथन है। इसकी मुख्य - क्रिया छोटी रक्तवाहिनियों पर होती है-उनके सकुचित होने से रक्त-स्राव बद होकर शोथ उतरती है। गर्भाशय शैथिल्य से श्वेतप्रदर तथा अत्यातव में लोध्र-चूर्ण से लाभ होता है। यह योनि-रोग मे उपकारक, स्तंभक तथा वर्य है। प्रसूतावस्था मे योनिक्षत मे इसका लेप करते है अथवा क्वाथ की उत्तर बलि देते है । भाख की रताग और सूजनको उतारने के लिये- आंख की पलक पर इसक लेप किया जाता है।) ॥ ७७ ॥ विषा, अतिविषा भतीस-अपने प्रभावसे विष-नाशक, अतिसार में आशुलाभ देने वाली, अग्निमाद्य-विकारो की विनाशक, अति कटु -रस से पूर्ण, अन्न-रस मे से १-अतिविपा। सा च त्रिविधा भवति शुक्लकृष्णारुणकन्दभेदात् । तथा च राजनिघण्टु "त्रिविधाऽतिविषा जेया शुक्ला कृष्णा तथाऽरुणा । इति" तत्र प्रशस्ततया शुक्लमेदुरकन्दाया गुणाः । त्विषा जितविषेति । . ।
• वर्ग] द्वितीयो गुच्छ.। ३५ भृशं कटुरसा विशादयति सामपित्तं रसात् प्रशान्तवमिसाध्वसा ज्वरतृषार्तकूलङ्कषी ॥ ७८ ॥ दुष्टव्रणास्त्रहन्त्री कटुका शीता विपस्य संहीं । शङ्गाकृतिविशेपात् प्रशस्यते निर्विपा नाम ॥ ७९ ॥ गुदकीलकपित्तवलासतपारुधिरातिसृतिप्रलयप्रवलः। जठरज्वलनं ज्वलितं कुरुते कटुकः कुटजस्तुवरः शिशिरः ॥ ८० ॥ पाटोप्णा कटुका कफानिलहरी तीक्ष्णा लघुाहिणी शूलच्छर्दिविपज्वरक्रिमिमहाश्वासवणध्वंसिनी । अपक्क पित्त को निकाल देने वाली, वमन में हितकर तथा ज्वर-जन्य-तृपा से भाकुल के लिये साक्षात् निर्मरिणी - सरिता है । (राज- निघण्टु मे शुक्ल, श्याम तथा रक्त भेद से तीन प्रकार की भतीस कही गयी है। भतीस के मूलके चूर्ण की मात्रा दो रत्ती से दो माशा तक है। इसके विष-नाशक गुण का वर्णन राज-निघण्टु ने किया है। मदनगोपाल ने इसके लेप को श्वयथु में लाभ-प्रद कहा है । 'लेपात् श्वयथुनाशिनी'। चक्रदत्त ने इसे ज्वरातिसार में उपयुक्त बताया है। मतीस बल्य, वृष्य तथा ज्वर प्रतिषेधक है। विडग के साथ लेने से अंत्रस्थ कृमि बाहर निकल आते हैं । समभाग अतीस और दाडिम के पुष्पचूर्ण को वचो के दस्त बंद करने के लिये देते हैं। मतीस, शुद्ध भाग तथा वचा चूर्ण का प्रयोग भतीसार में लाभ करता है।) ॥ ७८ ॥ निर्विपा, जटवार-शुग के समान आकारवाली, कटु तथा शीतल है । दुष्ट व्रण, रक्तपित्त तथा विषका नाश करती है। (जद्वार एक बूटी की जड का नाम है-जो वच्छनाग के समान ऋगाकार होती है। जद्वार उष्ण-प्रकृतिवालो के लिये अहितकर है । इसका निवारक धारोष्ण दूध है । यह सभी प्रकारके विषो को हरने वाली असर कारक औषधि है। दंशज विपो में दंश-स्थानपर मद्य में घिसकर इसका लेप करते है। यह वेदना-स्थापक है। खाने तथा लेप करने से वाह्य तथा आन्तर पीडा में लाभ देती है। जद्वार प्रतिश्याय आदि कफ रोगो में प्रयुक्त होती है। यह अपस्मार तथा त्वक्-शून्यता में उपकारक है।) ॥ ७९ ॥ कुटज-कषाय, शीतल, कटु है तथा गुद-कील, पित्त, कफ, तृषा, रक्त दोष और मतीसार का प्रचढ - प्रलय कर देता है-तथा जटर की अग्नि-ज्वाला को प्रदीप्त करता है। (कुटज- मूल की ताजी छाल के चूर्ण को खट्टी-छाश में पीसकर-५ तो मात्रा मे ४-४ घटे के अंतर से देने पर ज्वर, अतिसार तथा मल मे से रक्त स्राव दूर हो जाता है । रक्त-प्रवाहिका मे कुटज-मूल की छाल के तुल्य अन्य - औषधि नहीं है।)॥४०॥ पाठा, पाढ - उप्ण, कटु, तीक्ष्ण, लघु, ग्राही है - तथा कफ, वात, शूल, वमन, 'विप, ज्वर, कृमि, महाश्वास और व्रण का नाश करता है। मूर्वा (मरोडफली), भारी, सारक और मधुर है। यह तृष्णा, हृदय-रोग, प्रमेह, पित्त, रुधिर-विकार, १-ज्वरतृपार्ताना कूलङ्कषेव कूलङ्कषेति । "कूलङ्कषा निर्झरिणी" इति कोश । २-'निर्विषी' तथा 'जदवार' इति नाना प्रसिद्धा कृष्णवर्णा प्रायो लेपेन ग्रन्थ्यादिषूपयुज्यते। है 4 ४- * । मिद्धभेयजमणिमालाया [ हरीतक्यादि.. तृप्णाहृद्दमेहपित्तरुधिरव्यापत्रिदोपज्वरान कण्डूकुष्ठसखान् हरेहुरुसरा स्वादुर्हि मूर्वा मता ॥ ८१ ॥ गीता विपव्रणविसर्पविदाहलता- भूतातिसारविनिवारणपण्डिताऽस्ति । रक्तं ततं हठतया विदधाति रिक्तं शस्ता मरालपदिकोऽऽपदि पित्तजायाम् ॥ ८२ ॥ एरण्डो मधुरगुरुः सरो निहन्यादानाहश्वयथुकफवरामवातान् गुल्मा यकृदुदरक्रिसिव्रणातौ स्यादर्कः कफपवमानकच्छुकुष्ठे ॥ ८३ ॥ अष्ठीलोदरकफवातगुल्महर्ता सेहुण्डः कटुगुरुरेचनोणतीक्ष्णः । धत्तूरो मददहनानिलप्रवोधी यूकौघव्रणविपकुष्टनाशशूरः ॥ ८४ ॥ , त्रिदोष, ज्वर, खुजली तथा कोढ का नाश करती है। (पाड की छोटी और बडी ऐसी दो जातिया है । वडी को राजपाठा तथा छोटी को लघुपाठा कहते है । चरकचिकित्सा अध्याय १८ के त्र्यूषणादि घृतमे 'द्वे पाठे ऐसा उलेख है। इसकी व्याख्या में चक्रपाणि - दत्त लिखते है कि 'द्वे पाठे इत्यनेन स्वल्पपत्रा द्वितीया पाठा पाहयन्ति' पाठा की लता होती है, अत्यंत तिक्त होने के कारण इसे 'वरतिक्तिका' भी कहते है । इसके रस को मिलाने से पानी जमकर सान्द्र हो जाता है।)॥ ८१ ॥ मरालपदिका, हसराज - पित्तज-विकारो मे प्रशस्त है। शीतल है तथा विप, व्रण वीसर्प, दाह, लताविष, भूत-बाधा और भतिसार के निवारण मे पंडिता है ।। ८२ ॥ एरड-मधुर, भारी तथा सारक है। यह आनाह, शोध कफ, ज्वर और नाम चात को दूर करता है। अर्क, आक्डा-गुल्म, अर्श, यकृत् , उदर रोग, कृमि, व्रण, कफ, वात, कण्डू तथा कोढ मे प्रशस्त । (एरड-तैल सौम्य -स्रसन तथा वातहर है। यह आतो की श्लेष्मल- त्वचा को मृदु बनाता है जिससे मल की गाठे नीचे सरकती है। एरड तैल को प्रात आईक - रस में मिलाकर खाली पेट लेना चाहिये। कटि-शूल, गृध्रसी, पार्श्व-शूल, हृदय -शूल, आमवात तथा सधि शोथ में एरड -तैल एव अल्प-मात्रा मे शिलाजीत मिला कर देते है । स्तन पर एरड तेल लगाकर उसक' पन्न बाधने से स्तन - शोथ कम होता है।)॥ ८३ ॥ सेहुण्ड, स्नुही, डडा थोर - कटु, गुरु, रेचन, उष्ण तथा तीक्ष्ण है । भष्ठीला उदर रोग, कफ, वात और गुल्म को दूर करता है। धत्तुरा मादक, दीपन तथा वातकर है। यूका, व्रण, विष और कुष्ठ का नाश करनेवाला है । (थूहरका दूध तीक्ष्ण - विरेचन है अत मृदुकोष्ठवालो पर इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये-तीक्ष्ण एवं अधिक काटेदार, दो या तीन वर्ष पुराने वृक्ष का ही क्षीर ग्रहण करना चाहिये। 'ता विपाव्य हरेत् क्षीर शस्त्रेण मतिमान् भिषक्-द्विवर्षा वा त्रिवर्षा वा शिशिरान्ते १-'मरोडफली' इति वैद्या -इयं धनुर्गुणोपयोगिनी । 'मूर' इति महेश्वर । 'मोरवेल इत्येके । २-हसराज' नाम्ना प्रसिद्धो रक्तवर्णस्तृणविशेष प्रायो जलसमीपे भवति ।
वर्ग] ३७ . - द्वितीयो गुच्छ । किं स्तम्भनेमाफूकं कसनश्वसनापहं किमाफूकम् । किं शोषणमाफूकं वलासपैवनापहं किमाफूकम् ॥ ८५ ॥ सहास्यरंगां मदमोहतुगां विट्सारभङ्गां पृथुपित्तसगाम् । उच्चैरनहां हरिदऑरगां क्षुधोत्तरङ्गां स्पृहयामि भङ्गाम् ॥ ८६ ॥ आवर्तमानपयसि क्षिप भङ्गाज्यं विधत्स्व दधि तस्य । तज पुनस्तदाज्यं स्वच्छमगन्धं ददीत सुमकन्दे ॥ ८७ ॥ स्यात् सैन्धवं स्वादु हिमं मनोज्ञं सूक्ष्म लघु स्निग्धमतीव दृश्यम् । त्रिदोपतुद्दीपनपाचनं च सर्वेषु मुख्यं लवणेषु वृष्यम् ॥ ८८ ॥ विशेषत '-दृढबल । दृढबल ने दो प्रकार के सेहुण्ड बताये है-'द्विविध स मतो यैश्च 'बहुभिश्चैव कण्टकै.-सुतीक्ष्णै कटकैरल्यै प्रवरो बहुकटक । इसकी जड सर्पदंश में हितकर है। सुश्रुत ने कुत्ते के विष मे धत्तरे का उपयोग बताया है। धत्तूरे के पत्र स्वरस में अफीम और पुनर्नवा मूल पीस कर लेप करने से बात - वेदना तथा हाथ-पैर का शोथ दूर होता है।)॥ ८४ ॥ आफूक, अफीम-शुक्र पुरीष आदि का स्तभन करनेवाली कौनसी वस्तु अफीम । श्वास तथा कीटनाशक कौन है ? अफीम । शरीर का शोषण करनेवाली कौन है ? अफीम । कफ का तथा कफावृत वायु का नाश करनेवाली कौन है ? अफीम । (किसी द्रव्य - विशेष के गुण दोप का वर्णन इतनी प्रभावोत्पादक काव्य- मय शैली मे क्वचित् ही पढने मे आता है)॥ ८५ ॥ भाग हास- विलास के रग को जमानेवाली, मद तथा मोह मे अतिवृद्धि करने वाली, विट्सग्रह की भेदक, पित्ताधिक्यवाली, अनग-रग तथा क्षुधा की तरग को बढानेवाली हरित-रग के अंगवाली भाग स्पृहणीय है। भाग से सिद्ध किये गये धृत को दूध मे मिला कर उसका दही जमा देवे - फिर उसको मथकर घृत निकाललें । इस स्वच्छ तथा निगंध घृत का गुलकद के साथ सेवन करे। (भाग का सुजाक और ग्रहणी मे प्रयोग किया जाता है । गुद-प्रदेश पर भाग का लेप करने से अर्श वेदना मे लाभ । होता है । भाग धनुस्तंभ तथा विपूचिका की लाभदायी औषध है।) ॥ ८६-८७ ॥ सैंधव कुछ मधुर, शीतल, रुचिकर, सूक्ष्म, लघु, स्निग्ध, नेत्रो को १-शुक्रपुरीषादीनाम् । २-केवल लेष्मणस्तथा लेष्मावृतवायोश्च नाशकम् । श्लेष्मणा मार्गावरोवाद्यो वायुकोपस्तत्रोपशयम् । तदुक्त-“वायोर्वातुक्षयात् कोपो मार्गस्यावरणेन च।” इति । न तु स्वतन्त्रपवनापह, धातुशोपणात्तथा निद्रानाशजृम्भादिवातकार्योत्पादना- दनुभवाच्च वातवर्धनोपपत्ते । ३-हास्यविलासाभ्या सहिताम् । ४-रङ्गशब्दोऽत्र देशीवर्ण- मात्रवाचक । ५-प्रसङ्गाद्भगाघृतस्य सस्कार प्रतिपाद्यते । ६-अधिपुष्पवर्गे वक्ष्यमाण- कर्तव्यताके । ७-लवणद्रव्यत्वादनुक्तोऽपि लवणरस प्राधान्येन समुच्चीयते, तेनेपत्स्वादुत्वम् । * • तन्त्रान्तरेऽपि-त्रिदोपन्न समधुर सैन्धवं लवणोत्तमम् ।” इति । तत्र समधुरमितीषन्मधुरम् । ८-सूक्ष्मस्रोतोऽनुसारित्वात् । । m - सिद्धभेषजमणिमालायां [हरीतक्यादि- सौवर्चलाख्यं विशदं लघूष्णं प्ररोचनोद्दीपनपाचनं च । आनाहविड्वन्धसमीरशूलनाशप्रपञ्चप्रवणं प्रसिद्धम् ॥ ८९ ॥ सक्षारतीक्ष्णोष्णलघु व्यवायि रुच्यं सरूक्षं सरमग्निकारि । विष्टम्भहृदुग्गुरुताविवन्धश्लेष्मानिलघ्नं विडमामनन्ति ॥ ९० ।। तिक्तं विपाके मधुरं विभेदि नात्युष्णपित्तं कफलं मरुन्नत् । वनिप्रदं गुर्वविदाहि वैद्याः सामुद्रसंझं लवणं लपन्ति ॥ ९१ ॥ अत्यर्थमुष्णं लघु भेदि तीक्ष्ण व्यवाय्यभिष्यन्दि समीरहारि । सूक्ष्मस्वभावं कटुकं विपाके गडाभिधं पित्तविकारकारि ॥ ९२ ॥ ग्रहण्यशःशुलश्वसनकसनश्लेष्मगलरुङ्- मरुत्पाण्डुप्लीहान् व्यपनयति गुल्मामसहितान् । यवक्षारः स्निग्धो लघुरतुलवैश्वानरकर- स्त्वथ स्वर्जिक्षारो विलसति यवक्षारसदृशः॥ ९३ ॥ अत्यंत हितकर, त्रिदोष-शामक, दीपन पाचन, वृप्य तथा सभी लवणो में उत्तम है। (सैंधव को ईषत् मधुर अन्यत्र भी कहा गया है 'त्रिदोपन्न समधुर सैंधवं लवणोत्तमम्'।)॥ ८८ ॥ सौवर्चल, काला नमक-विशद, लघु, उष्ण, रुचिकर तथा दीपन-पाचन है। माध्मान, मलावरोध, वायु तथा शूल आदि के प्रपंच का नाश करने में परम प्रशस्त है ॥ ८९॥ विड् नमक कुछ क्षार-स्वभावी, तीक्ष्ण, उष्ण, लघु, व्यवायी, रुचिकर, रूक्ष, सारक तथा दीपन है। विष्टंभ, हृद्रोग, गुरुता, मलावरोध, कफ तथा वात- नाशक है ॥ ९० ॥ समुद्र लवण पाक में तिक्त, मधुर, भेदक, किंचित् उष्ण, किचित् पित्त तथा कफ करने वाला, वातनाशक, दीपन, गुरु और विदाही है ॥ ११ ॥ गड्-नमक, साभर देशोद्भव-शाकम्भरीय-नमक अत्यत - उष्ण, लघु, भेदक, तीक्ष्ण, व्यवायी, स्रोतों को रुद्ध करने वाला, वातनाशक, सूक्ष्म-स्वभावी, विपाक कटु नथा पित्त - विकार करनेवाला है। (गड्-लवण ही शाकभरीय-लवण है- 'शाकंभरीयं कथितं गडाख्यम् ।)॥ ९२ ॥ यवक्षार-स्निग्ध, लघु, तथा उत्तम दीपन है । ग्रहणी, अर्श, शूल, श्वास, कास, कफ, गल-रोग, वायु, पाण्डु, प्लीहा तथा गुल्म सहित आव का नाश करता है। १-श्लेष्मानिलघ्नमिति च तयो वखमार्गप्रापकत्वात् , यदुक्त- "विडं सक्षारमूर्खाव कफवातानुलोमनम् ।” इति । २-दक्षिणसमुद्रे भवतीति सामुद्रम् । ३-साम्भारदेशोत्य लवणं 'गड' नाम्ना कथ्यते । यथा-"शाकम्भरीयं कथित गडाख्यम्" इत्यादि । मे वर्ग:] ३९ द्वितीयो गुच्छः। साबुक्षारस्तैलचूर्णाम्बुजन्मा स्फीतच्छायो बस्तिवासोविशोधी। नक्तान्धत्वं विस्नतामण्डैकण्डूं सोदावर्त जन्तुजालं निहन्ति ॥ ९४ ॥ इति हरीतक्यादिवर्ग ॥१॥ सर्जिका - क्षार, गुणधर्म मे यवक्षार के समान ही है । (जब यव परिपक्क हो जाये तब ताजी अवस्था में ही क्षुप को उखाड कर सुखाना चाहिये । फिर इसे जला कर इसकी राखको पानी में भिगोते हैं। इस तरह क्षार भाग पानी में घुल जाता है। इस जलको धूप में सुखा देने पर क्षार भवशिष्ट रह जाता है-यही यवक्षार है।)॥ ९३ ॥ साबु-क्षार, कलिका चूर्ण में घुले हुये पानी को नितार कर उसको तैल मे मिलाने से, तैयार होता है । श्वेत-वर्णवाला यह साबु-क्षार बस्ति तथा वस्त्र को स्वच्छ करता है-अंजन से राज्यंधत्व दूर करने वाला, अंडकोष पर मालिश से उसकी खुजली को मिटानेवाला तथा बस्तिद्वारा उदावत सहित कृमि-समूह का नाश करनेवाला है। (इसकी निर्माण - विधि - चिकित्सा-गुच्छ मे दी गई है।)॥ ९४ ॥ हरीतक्यादि-वर्ग समाप्त हुमा ॥ १ ॥ अथ पौष्टिकवर्गः। रसायनी स्वादुरसा गुरुर्हिमा हिता दृशोः स्तन्यकरी शतावरी । चलप्रदा मारुतपित्तरक्तरुकृशानुसादश्वयथुव्यथाहरी ॥ ९५ ॥ स्निग्धा हिमा समधुरा स्वरदाऽतिवृष्या मूत्रप्रदा गुरुरतीव रसायनी च। पित्तानमारुतविदाहरुजो विदारीस्तन्या विदारयति दाररतिं ददाति ॥१६॥ पौष्टिक वर्ग। शतावरी-रसायन, बलकारक, रस मे स्वादु, गुरु, शीतल, स्तन्य, नेत्रों को हितकर, वायु, पित्त, रक्तपित्त, अग्निमाद्य तथा शोथ को हरनेवाली है ॥ ९५ ॥ विदारीकंद, स्निग्ध, शीतल, कुछ मधुर, स्वर्य, अत्यंत वृष्य, मूत्र-जनन, भारी, एवं उत्तम रसायन है । पित्त, रक्तविकार, वायु और दाह का विदारण करता है तथा चाजीकर है। (भत्यार्तव मे विदारीकद उत्तम लाभ देता है। ) ॥ ९६ ॥ १-अस्य कर्तव्यताविधिश्चिकित्सागुलच्छेऽनुसधेय । २-अजनेन । ३-म्रक्षगेन । ४-बस्तिविवया । इति हरीतक्यादिवर्गः । ५-पुष्टयर्थमवश्योपादेयानि सुखग्रहणार्थ कानिचिद्रव्याणि पृथग्वर्गनिर्देशेन समुचिन्वन्ति । ६-विशिष्टरसजनकत्वेन जराहरीत्यर्थ । ७-वाराहीकन्द , भूकूष्माण्डीकन्दो वा। ८-वाजीकरत्वात् । ।
[पौष्टिक- सिद्ध भेषजमणिमालाया पवमानवलासचैर्मचित्रक्षयमाकर्षति वीर्यवृद्धिदात्री। वलदाऽतिरसायिनी कपाया हयगन्धा गदिता वुधैः सतिक्ता ॥ ९७ ॥ नारीपु वाजिनमिव प्रवलं मनुष्यं सद्यः करोति कुपितं पवनं पिनष्टि । श्लेष्माणमुत्क्षिपति पित्तभयं भिनत्ति प्रौढं वलं वितनुते कपिकच्छ्बीजम् ९८ कषायतिक्तः कटुको रसायनः सरोऽनिलार्शकफशोफमेहहा। वलानिशुक्रस्वरकान्तिकारकः प्रियो न केपामिह वृद्धदारकः ॥ ९९ ॥ मधुरा वलदा युवभावकरी गुदजानिलकोपहरी मुशेली। उपभुज्यत एव हि येन सदा भुवि तेन परं सदृशो मुशेली ।। १०० ॥ इक्षुर्रस्तु मधुरस्तुहिनोऽम्ल स्निग्धपित्तलगुणो वहुवृष्यः । तिक्तको मरुदसृग्गदतनाममायतिवलं विनिहन्ति ॥ १०१ ॥ अश्वगधा, असगध-वीर्यवर्धक, कपाय, तिक्त, बलकारक तथा उत्तम रसायन ह। यह वात, कफ, श्वेत- कुष्ठ तथा क्षय का नाश करती है। (औपधार्थ इसके मूल का उपयोग किया जाता है । असगध अवसादक है। इसके मूल का चूर्ण दूध के साथ देने से बालकों के शरीर का अच्छा विकास होता है। ) ॥ ९७ ।। कौंच के बीज-यह उत्तम वाजीकरण है । कुपित वात को पीस डालता है । कफ को बाहर निकाल फेक देता है। पित्त- भय का भेदन करता है एव परम बल-कारक है। (इसे आत्मगुप्ता भी कहते है। चरक (सू अ 4) के बल्य - वर्ग मे इसका वर्णन ऋपभी शब्द से किया गया है-कौच के वीज आर्तव जनन तथा बल्य है। प्रदर, कष्टार्तव तथा आर्तव की अनियमितता में इसका उपयोग होता है।) ॥ ९८ ॥ वृद्धदारक (विधारा)-कषाय, तिक्त, कटु, सारक तथा रसायन है। वात अर्श, कफ, शोथ, प्रमेह का नाश करता है। बल, अग्नि, शुक्र, तेज तथा स्वर को उत्तम करने वाला वृद्धदारक किसे प्रिय नहीं है । ॥ ९९ ॥ मुगली-जो व्यक्ति सतत मुशली का सेवन करता है - उसके समान, भूतल पर मुशली (बलराम) ही है। मुशली मधुर, युवावस्था देनेवाली, गुद-रोग तथा वातकी नाशक है ॥ १०॥ इक्षु, तालिमखाना-मधुर, शीतल, अम्ल, स्निग्ध, अत्यंत वृप्य, पित्तल-गुण- युक्त तथा तिक्त है। यह वात, रक्तदोप, तृपा तथा प्रवृद्ध आमवात को नष्ट करता है। (कोकिलाक्ष के बीज, मूल, पत्र तथा पचाग के क्षार का उपयोग होता है । यह शुक्र शोधक तथा अश्मरीन है। यह सतर्पण औपधियो मे उत्तम है। इसके वीज कामो- तेजक कहे गये है। मूल का काथ सुजाक तथा बस्तिशोथ मे देते है।)॥ १० ॥ १-पवमानो वायु पवमान प्रभजन " इति कोशात् । २-"चर्मचित्रं श्वेतकुष्ठे" इति शब्दार्थचिन्तामणि । ३-अश्वगन्धा । ४-सा च श्वेतकृष्णभेदाद् द्विविधकन्दा । ५-बलराम । ६-तालमखाना' इति प्रसिद्ध । ७--अत्रामशब्देन आमवात परामृश्यते।
१ , वर्ग] द्वितीयो गुच्छः। क्षयज्चरश्वासमीरकामलातृडतपित्तानि निहन्ति शीतला। अलं वलं यच्छति वंशलोचना नृणां नवीनेव कुरङ्गलोचना ॥ १०२ ॥ त्वक्षीरी' स्वादुशिशिरा हृद्या रुधिरशोधिनी। पित्ततापप्रशमनी गुणतः शर्करासमा ॥ १०३ ॥ सालिमो मैसरः कन्दः स्वादुरच्छच्छविर्गुरुः । वातपित्तहरो चल्यः संस्चिन्नः शुक्रलः परम् ॥ १०४ ॥ करोति रेतः परिपूरितं जनं निषेविता भञ्जयति प्रभञ्जनम् । बलासजिपित्तकरी जराहरी प्रमेहपीडाप्रणुदस्ति तोदरिः ॥ १०५ ॥ कसेलिका मेदुरसूक्ष्मवल्कप्रभेदतोऽत्र द्विविधा प्रदिया । काऽपि युक्त्या नियमेन भुक्ता स्त्रीणां पुनविनमादधाति ॥ १०६ ॥ इति पौष्टिक्वर्ग ॥ २ ॥ वंशलोचना-नवयौवना कुरगलोचना के समान मनुष्यो को पर्याप्त बल देती । यह शीतल है-क्षय, ज्वर, श्वास, वात, कामला, तृपा, रक्तदोप तथा पित्त का नाश करती है ॥ १०२ ॥ त्वक्षीरी, तवासीर-मधुर, शीतल, हृद्य, रक्त - शोधक, पित्त और दाह शामक तथा गुणमे शर्करा के समान है ॥ १०३ ॥ सालम मिश्र- देश में उत्पन्न होने वाला कद विरोप है। यह भारी, स्वच्छ वर्ण- वाला, स्वादु, वात-पित्त- नाशक एव बल्य है । क्षारादि द्रव्योंद्वारा खिन्न करके इसका उपयोग करने से यह शुक्र की अत्यत वृद्धि करता है । (सालम - मिश्री मस्तिष्क तथा नाडियो को उत्तेजन देता है । यह उत्तम वाजीकर तथा स्तंभन द्रव्य है । पचन नलिका के दाहयुक्त-रोगो मे हितकर है। अतिअभ्यास, मतिमैथुन तथा प्रसवोत्तर कालीन दुर्बलता से अथवा थकावट मे यह अपना गुण दिखाता है। इसके चूर्ण को १॥ या ३ माशा भर मात्रा मे, वकरी या गाय के मधुर दूध के साथ लेना चाहिये।)॥१०॥ तोदरी का सेवन करने वाले मनुष्य का शुक्र प्रचुर मात्रा में बढता वात नाशक तथा पित्तकारक है, वृद्धावस्था को दूर करती है। कफ तथा प्रमेह मे हितकर एव वेदना गामक है। (तोदरी श्वेत, रक्त तथा पीतवर्ण के भेद से तीन प्रकार की होती है। औपधार्थ इसके बीजो का उपयोग होता है। यह शुक्र को गाढा करती है।)॥ १०५ ॥ कसेलिका-स्थूल एव सूक्ष्म छाल के भेट से दो प्रकार की कही गयी है । इसका पाक अथवा मोदक बनाकर नियम- पूर्वक सेवन करने से स्त्रियो को पुन यौवन प्राप्त होता है ॥ १०६ ।। पौष्टिक वर्ग समाप्त ॥ २ ॥ १-तबाखीर' इति ख्याता। २-मिसरदेशोद्भव । ३-क्षारयोगादियुक्या । ४-अनेनैव नाम्ना प्रसिद्धा वीजस्पा श्वेतारुणभेदाद् द्विविधा च । ५-अनेनैव नाना प्रसिद्धा। ६-पाकमोदकादिस्वरूपया । है। यह । - सिढभेषजम पै.मालाया [सुगन्धि- अथ सुगन्धिवर्गः। कर्पूरो' लघुलेखनोऽथ मधुरो वृप्यो नमस्यो गुण- श्चक्षुप्यः क्षिपति प्रदाहजनुषां पूरं सुदरं रुजाम् । वैरस्यं विधुनोति कर्पति तृपं मनाति मेदोगदं पित्तश्लेमविपं विवायति स त्सौरभ्यतः श्लाघ्यते ॥ १०७ ॥ कर्पूरमर्धस्फटिकासहायं समुद्गके ताम्रमये निरुद्धम् । विपकमन्तः कृशरं प्रमाणाद्विवर्धते छापि मया श्रुतं भोः ॥ १०८ ॥ इन्दुं न्यस्य शरावे तदुपरि संमुन्य करकर्मधरास्यम् । दीपाग्नौ खलु दत्ते सिध्यत्युट्ठीय हीररुचिरिन्दुः ॥ १०२ ॥ सुगन्धित द्रव्य-वर्ग। कर्पूर अपने गुणों के कारण वन्दनीय एव उत्तम सुगध के कारण प्रगमनीय है । यह लघु, लेसन, मधुर, वृष्य, चक्षुष्य, पित्त, श्लेष्म तथा विष को दूर करता है । दाह से उत्पन्न रोगो को बहुत दूर फेंक देता है । मुख के वरस्य को मिटाता है, तृपा का शमन करनेवाला तथा मेदो-रोग का मन्थन करता है । (कपूर भल्पमात्रा में वाजीकर किंतु अधिक मात्रा में कामावसादक है । भौषधीय मात्रा से अधिकमात्रा में कपूर दाह-जनक तथा मादक-विप है। उणता अथवा अन्य कारणो से उत्पन्न हृदय की विकृति में कपूर देने से लाभ होता है-इसी कारण कपूर को हृदय का रक्षक कहा -गया है। अपक्व कपूर, पक्क-कर्पूर की अपेक्षा अधिक गुणयुक्त कहा गया है।) ॥१०७।। कर्पूर तथा इससे प्रमाण में अर्धभाग जितनी स्फटि इन दोनों को मिला कर एक ताम्र की डिविया में सपुटित कर दे, इस डिविया को खिचडी में रख कर पकाने से कर्पूर अपने प्रमाण से अधिक हो जाता है । यह मैंने कहीं भी सुना है ॥ १०८ ॥ भीमसेनी कपूर बनाने की विधि-कपूर को शराब में रख कर, उस पर मिट्टी के करवे को मोधा ढककर दोनो के सधि-भाग को सुदृढ - मपुटित कर दें। १-अथ पौष्टिकेयु प्रयोगेपु कर्पूरादीना प्रायो नियतत्वात् सुगन्धिवर्गारम्भ । २-“कर्पूरमस्त्रियाम्" इत्यनुशासनात् पुल्लिङ्गोऽपि । ३-" भेषजम्नेहलवणगन्धधान्यगुडा- दिपु । पण्येषु प्रक्षिपन् हीनं पणान् दाप्यरतु पोडग।" इति स्मृत्युक्तदण्डयोग्यै साहसि- कैरधिकलाभाय क्रियमाणप्रकारस्य प्रदर्शन भिपजामवधानेन प्रवर्तनार्थम् । ४-'करवा' इति लोकप्रसिद्धमृत्पात्रविशेपम् । वरकाश्च हिरण्मयान्" इति । वाल्मीकि । ५-अष्टमाश किंचिदधिको वा सिध्यति । स च लोके "भीमसेनी कपूर बरास" इति । योगरत्नाकरेऽपि- "सुधाशोर्वसुभागा स्युरेलाभागद्वयं तया। चन्दनं चाब्धिफेनं च वीज कतकसभवम् ॥ रसाजनं भद्रमुस्त प्रत्येकं कर्षसमितम् । सर्व दुग्धे विमर्याथ पिण्ड गोयूमपिष्टवत् ॥ कृत्वा पात्रे निधायाय क्षिपेत् पात्र तथोपरि । अध प्रज्वालयेद्दीपं वाऽङ्गुष्ठसमानया ।। - - वर्ग:] द्वितीयो गुच्छः। ४३ त्रुटिशीतभूतकेशीप्रभृति नियोज्यं गुरूक्तमार्गेण । उपयुक्तमत्र यन्त्रावरणमसकृदावनखण्डेन ॥ ११० ॥ मेपीपयोभिर्मसृणीकृतस्य विधोविधेया गुलिका सरन्ध्रा । माला तदीया शिशिरा मनोमा गले ललन्ती दवथु निहन्ति ॥ १११ ॥ इसके नीचे निल तैल के दीपक की तीन घटे तक भग्नि दे, ऊपर के करवे मे हीरक मणि - तुल्य स्वच्छ द्रव्य लग जायेगा। यही सिन्द्व भीमसेनी कपूर है। इसे वरास भी कहते है ॥ १०९॥ उपरोक्त शराव में कपूर के साथ इतने द्रव्य और मिला देवें, स्थूल तथा छोटी दोनो प्रकारकी इलायची, जटामांसी, चंदन, उठगीर, बागी, कपूरकाचरी, तुत्थ, कस्तूरी, केसर, अंबर, गीतल मिर्च, टकण, सौरा, गिलारस, मुरा, शिरीप, पिप्पली, हरिदा, केतकी, गुलाब, स्कटी, मिश्री, शिलाजित, मुम्ता, लताकस्तूरी, लविंग, अगुरु, मुलहठी, त्वर, जायफल, चम्पा, नख, शालकीसार, कंकोल, प्रियंगु, दूर्वा, तावूल, तुलसी, कदली स्तंभ-रस और गोदुग्ध । भराव संपुटवाले उपरी घट पर तीन चार तह किया हुआ आई वस्त्र पुन पुनः रसते रहें । दीपक की अग्नि तीन घंटे से अधिक नहीं देनी चाहिये, अधिक अग्नि लगने से घट लग्न द्रव्य पुन नीचे गिर जाता है। अत तीन घंटे के उपरात यंत्र को नीचे उतार कर, ऊपरी घट-सलग्न कपूर निकाल लेना चाहिये। शराव में स्थित कपूर यदि सपूर्ण उठकर उपरी घट में जमा नहीं हुआ हो तो उसे पुन उडा लेना चाहिये)॥ ११० ॥ भेट के दूध में कपूर को पीसकर मणके जैसी छोटी गोल-गुटिकायें बना लें, इनमें छिद्र करके - तथा सूत्र में पिरोकर माला बनालें। मौंदर्य प्रसाधन रूप से गले में धारण की गई यह माला शीतलता देती एव दाह का शमन करती है। भेड के दूध में पीसने से कपूर उडता नहीं है ।। १११ ।। . एवं प्रहरपर्यन्तं वहिं कुर्याच युक्तित । पात्रस्योपरिभागं तु शीतलं रक्षयेद्बुधः ॥ सदाऽऽचलखण्डेन शीतलेन च वारिणा । स्वाङ्गशीत ततो ज्ञात्वा पश्चात् कर्पूरमाहरेत् ।। स्फटिकाकारमत्यच्छं श्वेतं हीरमणिप्रभाम्। भीमसेनाख्यकर्पूरमौपधेपु प्रयोजयेत् ॥” इति । केचित् पुन-" पक्कात् कर्पूरत प्राहुरपक्क गुणवत्तरम् ।" इति वदन्ति । १-त्रुटि स्थूला सूक्ष्मा च द्विविधाऽत्र विवक्षिता। २-"वाशी गन्धसठी तुत्थ कस्तूरीकुंकुमाम्बरे । कवावा टकणं चण्डी (क) मौरक शिहकं मुरा। शिरीपं पिप्पली नक्तं केतकी तरुणी रफटी । सिताकेसरशैलेयोशीरमुस्तकपाणिजम् (ख)॥ लवडागुरुयष्टी- त्वरजातीकोप सचम्पकम् । पत्रिका(ग)शल्लकीसार ककोलं च प्रियद्गुका ॥ दूर्वाताम्बूल- तुलसीरम्भावारि पयो गवाम् । एतान् कर्पूरसस्कारे ययालाभं प्रयोजयेत् ॥” इति- प्रमृतिशब्दार्थ । (क) लताकस्तूरी । (ख) नखम् । (ग) पनडी' इति लोके । '- करती है, सिद्धभेषजमणिमालायां [सुगन्धि- कस्तूरिका परितनोति दधाति हन्ति मुष्णाति नाशयति शोषयति क्षिणोति । शुक्र कटुत्वमनिलं सकफ विषार्ति वान्ति विशोपमपि शीतभरं क्रमेण ॥ ११२ ॥ अम्बरं नाम किमपि गन्धद्रव्यं समीरितम् । शैत्यजित् पित्तलं हृद्यं ग्रहघ्नं चपलासखम् ॥ ११३ ॥ कस्तूरी-शुक्र को बढाती है - कटुता देती है, वातको कफ सहित नष्ट करती है। विषपीडा को दूर वमन को बन्द करती है, शोप का गोपण करती तथा शीत - भार को कम करती है। (असली कस्तूरी की परीक्षा-जो कस्तूरी, पिजर वर्ण युक्त केतकी पुप्प की सी सुगन्ध-वाली, स्वाद मे तिक्त अथवा कटु, वजन मे हलकी, मसलने से चिकनाहट देने वाली, दग्ध किये जाने पर भी न जलने वाली, अग्नि पर डालने से चिमचिम करनेवाली-अथवा मानों चर्म जल रहा हो ऐसी गध देनेवाली हो, वह असली है। परीक्षण की दूसरी विधि-कस्तूरी को हथेली मे रख कर उसमे थोडे जलबिदुः डाले, यदि कुछ समय पीछे वह जल आरक्तता लिये पीले रंग का हो जाये तो समझना यह कस्तूरी कृत्रिम है। 'ईपत् क्षारानुसौगन्ध्या दग्धा याति न भस्मताम् । पीता केतक गधा च लघु स्निग्धा मृगोत्तमा'1)॥ ११२ ॥ अंबर एक सुगधित-द्रव्य - विशेष का नाम है । पिप्पली-चूर्ण के साथ यह शीत को जीतता है-पित्तल एवं हृद्य है । ग्रहो के अनिष्ट को यह दूर करता है । (यावन- निघण्टु मे अंबर के विषय मे यह वर्णन है-'द्वीपान्तरीयस्य वृपस्य फेनो रोमन्थजो ह्यंवरनामधेय । सौरभ्यसपन्नतृणाशनाद्य कस्तूरिकातुल्यगुणाकर स्यात् ।)॥ ११३ ॥ १-परीक्षणमेतदीय यथा- "या गन्ध केतकीना वहति समधिकं वर्णत पिजराभा खादे तिक्ता कटुर्वा परिलघु तुलिता मर्दिता चिक्कणा स्यात् । भस्मत्व नैति दग्या चिमिचिमि कुरुते चर्मगन्धा हुताशे सा शुद्धा शोभनीया वरमृगतनुजा राजयोग्या प्रदिष्टा ॥" अन्यदपि- "करतलजलमध्ये स्थापयित्वा मनि पुनरपि तदवश्यं चिन्तनीय मुहूर्तम् । भवति यदि सरक्त सज्जलं पीतवर्ण न भवति मृगनाभि कृत्रिमोऽसौ विकारः॥" "ईषत्क्षारानुसौगन्ध्या दग्या याति न भस्मताम् । पीता केतकगन्धा च लघु स्निग्धा मृगोत्तमा ॥” इत्यपि कश्चित् । २-इदं च द्वीपान्तरीयवृपविशेषफेनरूपम् । तया चोक्तं यावने निघण्टुविशेषे- "द्वीपान्तरीयस्य वृषस्य फेनो रोमन्थजो ह्यम्बरनामधेय । सारभ्यसपन्नतृणाशनाद्य कस्तूरिकातुल्यगुणाकरः स्यात् ॥” इति ।
वर्ग:] द्वितीयो गुच्छः। लुनाति' मन्नाति रुणद्धि हन्ति ददाति चोत्कृन्तति कुङ्कुमाख्यम् । व्यङ्गं त्रिदोपं वमनं व्रणोघं कान्ति रुजां मस्तकजां प्रसह्य ॥ ११४ ॥ विपक्लमश्लेप्मग्किारभञ्जन विदाहपित्तात्रतपादिगञ्जनम् । सतिक्तगीतं लघु चित्तरञ्जनं सुगन्धि वृष्यं स्मरबोधि चन्दनम् ॥११५॥ 'अगुरु 'नगुरु वातश्लेष्मशीतेषु शस्तं कटुरसमतिहृद्यं पित्तलं तिक्ततीक्ष्णम् । श्रवणनयनरुक्त्वग्दोपरोपप्रमोपि प्रवरमगुरु नीरे मजनं यत् करोति ॥ ११६ ॥ पद्माकं शिशिरतिक्तकपायं वातलं वमिहरं लघु रुच्यम् । दाहकुष्ठककपित्ततृडस्रस्फोटरुग्वणविसर्पविनाशि ॥ ११७ ॥ केसर-व्यङ्ग को काटता है, विदोप का मथन करता है, वमन को रोकता है, व्रण समूह को हटाता है, कान्ति को बढाता है, शीर्पवेदना को हठात् नष्ट कर देता है ॥ ११ ॥ चंदन-विप, क्लम तथा कफ के विकारो को तोडनेवाला एव विदाह, पित्त, रक्त-विकार तथा तृपा आदि को दूर करता है । तिक्त, शीतल तथा लघु है । चित्तको प्रसन्न करने वाला, वृष्य, सुगधित तथा कामोद्वोधक है ॥ ११५ ॥ अगुरु-गुरु नहीं है, यह वात, कफ तथा शीत - जन्य विकारों में प्रशस्त, रस में कटु अत्यंत हृद्य, पित्तकारक, पित्तकारक, तिक्त तथा तीक्ष्ण है। यह कर्ण, नेत्र तथा त्वचा के उग्र विकारो का नाश करता है। जो भगुरु जल में न डूबे वही उत्तम है-और ऐसे ही भगुरु को औषधि व्यवहार में लेना चाहिये ॥ ११६ ।। पद्मक शीतल, तिक्त, कपाय, चातकर, वमि मे हितकर, लघु, रुचिकारक तथा दाह, कुष्ठ, कफ, पित्त, तृपा, रक्त विकार, विस्फोट, व्रण और वीसपे का नाश करने वाला है। (पद्माक की नयी लकडी ही काम में लेनी चाहिये । इसकी छाल में एक विशेष प्रकार का विषैला सत्त्व मिलता है। स्तभन तथा कटु पौष्टिक गुण इसकी लकडी में है। कितु वेदना स्थापन गुण इसकी छाल में ही उपलब्ध होता है। आमाशय के क्षत में इसका उपयोग किया जाता है। हृदय पर मेट बढ जानेपर एक प्रकारको कास उठती है, इस में यह गुण कारक है । पद्माख का वाथ करने से इसका सत्त्व उड जाता है। अत. गुनगुने पानी में इसका फाट बनाकर देना चाहिये । पद्माख को जल मे घिस कर लेप करने से सूखी खाज में लाभ होता है।) ॥ ११७ ।। १-अनापि क्रमेणान्वय । २-मुसन्छायाम् । ३-"काकतुण्डाकृति. स्निग्धो गुरु, श्चैवोत्तमोऽगुरु ।" इति परीक्षा । "अगुरु पुंस्यपि" इत्यमरटीका । ४-लघु इत्यर्थ ।
४६ सिद्भेषजमणिमालायां [सुगन्धि- स्थात्तिक्तं ग्राागीरं लघु हिममधुरं छर्दितृष्णास्रकृच्छे मांसी' गीता कपाया द्युतिमतिबलदा दोपवीमर्पकुष्ठे। शैलेयं शीतहy कफदवथुविपासाइमरीकुष्टकटे मुस्ता संव दविवा कृमिकफपवनारोचताणावरास्त्रे ॥ १८ ॥ कबोलमुग्ण लघु तीक्ष्णतिक्तं रुच्यं मनोज श्वसनग्रहारि । कामप्रदं हन्ति बलासवेगं हृद्रोगदोर्गन्ध्यममद्विदारि ॥ ११९ ।। हिकामकण्डुकफमारुतरक्तशोथ- श्वासप्रमेहगदपीनसरुक्षु चारुः। तन्द्राविवन्धशमनो मथनो ज्वरस्य स्निग्धोष्णतिक्तकटुकः किल देवदारुः ॥ १२० ॥ जातीफलं कटुकतिक्तलघूणतीक्ष्ण- स्वर्यप्रटीपनसुगन्धिमनोनमच्यम् । कुर्यात् तृपाविपवमिक्रिमियोपकास- श्वासार्तिमारतकफानभिधावशेषान् ॥ १२१ ॥ उशीर-तिक्त, लघु, शीतल तथा मधुर है। यह वमन, तृपा, रक्तपित्त तथा मूत्रकृच्छू में हितावह है । जटामांसी शीतल, कपाय तथा बल्य है । यह शरीर के तेज को तथा मति को बढानेवाली, त्रिदोष नाशक, वीसर्प तथा कुष्ठ को शमन करनेवाली है । शैलेय, छारछरीला-शिलापुष्प शीतल तथा हृद्य है । कफ, दाह, विष, रक्त, पित्त, अश्मरी तथा कुछ को दूर करता है । मुस्ता, नागरमोथा-मल को बांधता है। कृमि, कफ, वात, अरुचि, तृष्णा, ज्वर एवं रक्तपित्त-विकार में उपकारक है ॥ ११८॥ ककोल-उष्ण, लघु, तीक्ष्ण, तिक्त, रुचिकर, मन को प्रिय, श्वासहर, कामोत्तेजक, तथा कफ, हृद्रोग, दुगंध और वात का नाशक है ॥ ११९ ॥ देवदारु-स्निग्ध, उष्ण, तिक्त तथा कटु है। हिक्का, भाम, खुजली, वात, विकार, शोथ, श्वास, तथा प्रमेह में उत्तम लाभ देता है। तंद्रा तथा विबन्ध का शमन और ज्वर का मंथन करता है। (इसका सार, काष्ट तथा काष्ठ को जला कर निकाला हुआ तैल, औपधार्थ प्रयुक्त होते है। देवदारु का तैल तिक्त, कटु, कपाय, दुष्टव्रण शोधक, कृमि, कुष्ठ तथा वात का नाशक है। जीर्ण त्वचा के विकारो में इसका तेल खाने तथा लगाने से लाभ होता है। ज्वर में इसके प्रयोग से स्वेद आता तथा मूत्र का प्रमाण बढता है। जीर्ण आमवात मे यह उपकारक है।)॥ १२० ॥ जातीफल, जायफल कटु, तिक्त, लघु, उष्ण, तीक्ष्ण, स्वर को उत्तम करनेवाला, मन को भाह्लादक, सुगन्धित, रुचिकर तथा दीपन है। यह तृपा, विष, वमन, कृमि, शोष, कास, श्वास, वात, एवं कफ का सपूर्ण नाश कर देता है ॥ १२१ ॥ १-मासी पिङ्गलजटाकृतिरिति । २-शिलापुष्पं 'छारछरीला' इति लोके ख्यातम् । ३-"जातिफलं सशब्द च निग्ध गुरु च शस्यते"। ४-नाममात्रावशेषान् ।
वर्ग.] । द्वितीयो गुच्छ । जाविन्त्रिका लघु स्वाद्वी कटूष्णा रुचिवर्णदा । कासश्वासक्रिमिवमिनाशिनी सुरभिः सरा ॥ १२२ ॥ हिकाशूलश्लेष्मपित्तास्नतृष्णाच्छाध्मानश्वासकासक्षयनम् । रुच्यं नेत्र्यं स्वल्पशीतं लवज तिक्तोदनं पाचनं दीपनं स्यात् ॥ १२३ ॥ कवावचीनी शिशिरा प्रमेहप्रहारिणी किंचिदिवौष्ण्यदाऽपि । संग्राहिणी तूर्णवितीर्णमूत्रा लवगभद्र त्रिपुटावदुक्ता ॥ १२४ ॥ एला कासश्वासहल्लासवाते पित्तासार्शीमूत्रकृच्छ्रेषु शस्ता । शीता लध्वी वक्रसौगन्ध्यकी हृद्या वृष्या पाटवं च व्यनक्ति ॥ १२५॥ त्वक स्यादुप्णा तिक्ता स्वाद्वी कट्टी लध्वी रूक्षा रुच्या। जन्तावामे वातव्याधौ श्लेप्मोद्रेके पाण्डौ पूज्या ॥ १२६ ॥ जावित्री-हलकी, स्वादु, कटु, उष्ण तथा रुचिकारक है । वर्णको उत्तम करती है। कास, श्वास, कृमि एव वमन का नाश करने वाली, सुगधित तथा सारक है ॥ १२२ ॥ लवज, (लौंग)-हिका, शूल, कफ, पित्त, रक्तदोष, तृषा, वमन, आध्मान, श्वास, कास तथा क्षय को दूर करती है। रुचिकर, नेत्र को हितकर, कुछ शीतल, अत्यंत तिक्त तथा दीपन-पाचन है ॥ १२३ ॥ कबाबचीनी, शीतल मिर्च-शीतल तथा कुछ उष्ण है, प्रमेह को हरती है। यह सग्राहक, शीघ्र मूत्र लानेवाली, लौंग तथा इलायची के समान गुणवाली है। (इसके बीज और तेल उपयोग मे आते है। बीज को चबाने से एक विशेष प्रकार की मनोज्ञ, तीक्ष्ण गध आती है। स्वाद चरपरा होता है । और जीभ पर कुछ ठंडक प्रतीत होने लगती है। जीर्ण सुजाक और अर्श पर यह उत्तम औषधि है। मुखपाक मे कबाबचीनी लाभ करती है। यूनानी मत मे यह ध्वजोड्राय - जनक तथा वाता- नुलोमक है। इसके प्रयोग से दात तथा मसूढे मजबूत होते है।) कंकोल एवं कबाबचीनी को बहुत से वैद्य एक ही मानते है। वस्तुतः यह दोनों भिन्न भिन्न औषधीय द्रव्य है ॥ १२४ ॥ एला (इलायची)-कास, श्वास, हल्लास, वात, पित्त तथा मूत्रकृच्छ्र मे प्रशस्त है। - शीतल, लघु, मुखको सुगन्धित करने वाली, हृद्य तथा वृप्य है । स्वास्थ्य की सुरक्षा करती है। (पाटव का अर्थ स्वास्थ्य भी होता है ।) (पचन नलिका की शिथिलता' तथा प्रदाह-प्रधान विकारो मे एला प्रचुर लाभ दिखाती है। अंत्र-रस कम उत्पन्न होता हो-तथा पित्त - साव उचित मात्रा मे नही होता हो तब इलायची देते हैं ।। नाडीशूल मे-२-३ ग्रेन कुनैन के साथ इलायची का प्रयोग उपकारक है।)॥ १२५ ॥ त्वकू, ( दालचीनी)-स्वादु, उष्ण, तिक्त, कटु, लघु, रूक्ष तथा रुच्य है । क्रिमि, आम और वात - त्याधि मे, श्लेष्मा की अधिकता मे तथा पाड-रोग में पूज्य है।।१२६॥ १-जातिपत्री। २-अनेनैव नाना प्रसिद्धा कृष्णमरिचाकृति । 'शीतलमरिच' इत्यपि कुत्रचिदुच्यते । ३-एला सूक्ष्मफला श्रेष्टा । ४-'तज-दालचीनी' इति ख्याता । - सिहभेपजमणिमालायां [पुग्ण- भिन्दन्छुलभयं व्रणानभिभवन्छिन्दन् विसर्पादिका- वालो भाति समाचरन्नतिसृतौ शार्दूलविक्रीडितम् ॥ १३६ ॥ इति सुगन्धिवर्ग ॥ ३ ॥ को छेदती तथा अतीसार को रह करती हुई शार्दूल - विकीटित का अनुसरण करती है । (ग्रंथकार ने 'शार्दूल - विक्रीडित' वृत्त में ‘राल' के बहुविध गुण-धर्म का यह वर्णन किया है। शार्दूल- विक्रीडित का शब्दार्थ है 'सिंह- फ्रीडा' । राल की गुण- धर्म-मय क्रियाओं को वैद्य महाकवि श्रीकृष्णरामजी ने 'शार्दूलविक्रीडित' के समान बताते हुये-छद का नामोलेख भी साथ ही साथ कर दिया है । यह पद्धति वाग्भट ने भी अपनायी है । यथा-हिगूदाविढशुण्ठ्यजाजिविजयावाल्याभिधानामयश्चूर्णः कुभनिकु- भमूलसहित गोत्तर वर्धिते । पीत कोप्णजलेन कोटजरजो गुल्मोदरादीनय शार्दूल प्रसभं प्रमय हरति व्याधीन् मृगौघानिव' । यहा 'शार्दूलविक्रीटित' वृत्त में 'वृत्त का नाम' 'शार्दूल' भी उल्लिवित हुआ । इसे रचना- कौगल कहते है । अस्तु, शकर के साथ राल का चूर्ण आव तथा रक्तातिसार मे उत्तम लाभ दिखाता है। उपजिहा के बढने पर इसके चूर्ण का मर्दन उपकारक है।) ॥ १३६ ॥ सुगन्धि- वर्ग समाप्त ॥ ३ ॥ अथ पुष्पवर्गः। दाहोदन्यासविस्फोटविसर्पगरलादिपु । मृद्गाति मधुरं वयं कमलं कमलं न हि ॥ १३७ ॥ पुष्प-वर्ग। कमल-तृषा, दाह, रक्तपित्त, विस्फोट, विसर्प, गरल आदि में से किसे यथेच्छ नष्ट नही करता? यह मधुर है एवं वर्ण को उत्तम करता है। (श्वेत कमल को पुंडरीक, रक्त कमल को कोकनद या राजीव एवं नीलकमल को इन्दीवर कहते है । श्वेत की अपेक्षा रक्त एव नीलकमल न्यून गुण वाले होते है। सूर्य-विकासी कमल के बीज को कमलगट्टा कहते है। रात्रिविकासी कमल को कुमुद कहते है। इसके फल-कोष मे सरसो के समान आरक्त दाने होते है जो सूखने पर कृष्णवर्ण हो जाते है । इसके लड्डु हलके तथा शीघ्रपाची होने है । कमल पुप्पो की पंखुडियो के बीच बीच पीताभ जीरे जैसा द्रव्य कमल-किजल्क, केसर कहलाता है, एवं पीतवर्ण के धूलिकण कमल-रेणु रज कहे जाते है। फूलों के पूर्ण विकास काल मे एक कोप की उत्पत्ति होती है १-शालनिर्यास. १२-सिंहचेष्टितं छन्दोविशेपश्च । इति सुगन्धिवर्ग । ३-घ्राणेन्द्रिय- सतर्पकत्वेन पुष्पवर्ग सुगन्धिवर्गानन्तर सदर्यते। ४-कम् अलमिति च्छेद के नाल मृगातीति योजना।
के • 'वर्ग.] द्वितीयो गुच्छ.। लघुशिशिरगुणाऽथ शुक्रकी कटुकरसा रुचिरा त्रिदोपही । पृथुतररुधिरातिसारहन्त्री वलमहसोः शतपत्रिका सवित्री ॥ १३८ ।। तरुणी शिशिरा हृद्या शुक्रला स्त्रंसिनी मनाक् । त्रिदोषशमनी वा दाहपित्तास्ननाशिनी ॥ १३९ ॥ जातीयुग मस्तकनेत्रवरदार्तिकुष्ठानविपेपु शस्तम् । यूथीयुगं चापि तथैव किं तु व्रण विशेषाद्विकलीकरोति ॥ १४० ॥ कफानिलासृग्विषजन्तुकृच्छ्रपित्तापदो गन्धफैली पिनष्टि। दन्त्यो विपश्चित्रकृमिव्यथानोऽनुष्णः कषायो हरिकेसरोऽपि ॥ १४१ ॥ कपायलवणस्वादुर्नीपो रूक्षो हिमो गुरुः। वलासस्तन्यपवनप्रदो विष्टम्भकः सरः ॥ १४२ ॥ जिसमे बीज निकलते है। इन्ही कच्चे वीजो को कमलगट्टा कहते है । इसकी पेया वमन, हिचकी तथा प्रदर बंद होता है । कमल की पंखुडियां हृदय संरक्षक तथा रक्त- सग्राहक है । रक्तार्श, अत्यार्तव और दाह मे कमल-केसर, मिश्री तथा मक्खन के साथ देते है। गर्भिणी के गर्भाशय से रक्तस्राव मे कमल के फाट से लाभ होता है। कमल फूल, चदन, रक्त- चंदन, खस, मुलहठी तथा नागरमोथा का काथ मिश्री के साथ, पित्तज्वर की उत्तम औषधि है।)॥ १३७ ॥ शत-पत्रिका (सेवन्ती गुलाव) लघु, शीतल, शुक्रल, रस मे कटु, रुचिर, त्रिदोष- शामक तथा तीव्र रक्तातिसार का नाशक है । बल तथा तेज को बढाता है ॥ १३८ ॥ तरुणी (गुलाब पुष्प ) शीतल, हृद्य, शुक्रल, कुछ सारक, त्रिदोष शामक और वर्ण्य है तथा दाह, पित्त एव रक्त दोप को दूर करता है ॥ १३९ ॥ जातीपुप्प (श्वेत तथा पीत चमेली और सोन चमेली दोनो ही) मस्तिष्क मुख, नेत्र तथा दात की वेदना को मिटाता है। कोढ, रक्त-विकार तथा दायी है। दोनो प्रकार की जूही- जुही तथा सोनजुही भी गुण मे चमेली के समान ही है। विशेषतया व्रण मे उपकारक है ॥ १४० ॥ गन्धफली (चम्पा पुष्प) कफ, वात, रक्तदोष, विष, कृमि, मूत्रकृच्छ्र तथा पित्त व्याधि को पीस डालता है। हरिकेसर (बकुल पुष्प) दन्त्य है, विष, श्वित्र तथा कृमि की व्यथा मिटाने वाला, अनुष्ण एवं कषाय है ॥ १४१ ॥ नीप (कदंब पुष्प) कपाय, क्षारयुक्त, स्वादु', रूक्ष, शीतल, तथा गुरु है। कफ तथा वातकर, विष्टभी, सारक एव स्तन्य है ॥ १४२ ॥ १-श्वेतपुष्पा तरुणी 'सेवन्ती गुलाव' इति प्रसिद्धा । २-लाक्षापुप्पा तरुणी "गुलाब'नाना लोकव्यवहृता । ३-श्वेतपीतपुष्पमेदात् । 'चमेली-सोनचमेली' इति प्रसिद्धम् । ४-इदमपि तथैव 'जुही- सोनजुही' इति मालाकारैराकार्यते । ५-चम्पक- .. कलिका । ६-चकुल: 'बोलसरी' इति प्रसिद्ध । विषमे लाभ- ५२ सिद्धभेपजमणिमालायां [पुष्प- केतकस्तिक्तकटुकलघुभावात् कफापहः । तिक्तोष्णामोदवहुला नेत्र्या काश्चनकेतकी ॥ १४३ ॥ रक्तपित्तशिरोवाधाविषघ्नः प्रतिविष्णुकः । माध्याहिकैस्तु संग्राही कफद्वातपित्तहत् ॥ १४४ ॥ हृद्या संग्राहिणी केश्या कफमारुतजिजपा'। सुलभा पवनश्लेष्मकुष्ठकृच्छ्रास्त्रशूलनुत् ॥ १४५ ॥ केतक (केवडा) तिक्त, कटु, लघु और कफहर है। कांचन-केतकी तिक्त, उष्ण, अत्यत सुगंधयुक्त तथा नेत्रों को हितकर है। (केवडे के मूल, पुष्प तथा फल व्यवहार से आते है। मूलक्षार १-२ माशे, पुष्प काथ ५-१० तोले मात्रा मे लेना चाहिये। केवडा धर्मकारक तथा आक्षेपनिवारक है। मूर्छा तथा भ्रम में इसका प्रयोग होता है। जीर्ण तथा नूतन शिरोवेदना मे लाभदायी है। कर्ण-शूल अथवा पूतिकर्ण मे इसके तैलविंदु डालने से शांति मिलती है। केतकी के मूल को दूध के साथ पीस कर सेवन करने से गर्भस्राव की शंका नहीं रहती। यह शीतवीर्य है । ज्ञानेन्द्रिय, हृदय एवं मस्तिष्क को बल देता है। रक्त की तीक्ष्णता एव हृदय की धडकन मे लाभदायी है।)॥ १४३ ॥ प्रति- विष्णुक (मुचुकुन्द, क्षत्रवृक्ष)-रक्तदोष, शिरोवेदना तथा विप का नाश करता है । माध्याह्निक (दुपहरिया, बप्पोरियो)-ग्राही, कफकारक तथा वात- पित्तनाशक है ॥ १४४ ॥ जपा (गुडहल)-हृद्य, ग्राही, केश्य, कफ-वात शामक है। सुलभा (तुलसी) वात, कफ, कुष्ठ, मूत्रकृच्छ्र, रक्तदोष तथा शूल को दूर करती है। (गुडहल के पुष्प प्रयोग मे आते है। पुष्प-कल्क १-२॥ तोला तक लिया जा सकता है। गुडहल के फूलों को कृष्ण-गाय के मूत्र मे पीसकर लगाने से सिर की गंज मे लाभ होता है तथा बाल बढते है। जपा-पुष्प की १० - १२ कलिया दूध मे पीस छान कर पीने से, तथा केवल दूध पीकर रहने से -प्रदर मिटता है- 'कृष्णगवीमूत्रयुतै पिष्टैराले- पितैर्जपाकुसुमै ॥ शतमखलुप्त नश्यति भवन्ति केशाश्च तत्र धना' रा निघण्टु । 'कलिका क्षीरसपिष्टा जपाविटपजा. पिवेत् । दश द्वादश वा, नारी प्रदरार्ता पयोऽशनी' -गदनिग्रह । तुलसी शीत- प्रधान रोगो मे दी जाती है । ज्वर मे इसका स्वरस काली मिर्च के चूर्ण के साथ, सर्वांग-वेदना एवं सधिशोथ मे अजवायन और सभालु के साथ देने से अच्छा लाभ होता है। इसका स्वरस वमन बद करता तथा दस्त साफ लाता है । अश्मरीशूल, तथा वस्तिशोथ मे इसके बीजका हिम दूध तथा शक्कर के साथ दिया जाता है। ) ॥ १४५ ॥ १-क्रकचच्छद 'केतकी, केवडा' इति ख्यात २-मुचुकुन्द ३-'दुपहन्यो', 'वप्पोरिओ' इति च ख्यात । ४-सुकुमाराऽतिलोहितपुष्पा 'भोडल जासूल' इति प्रसिद्धा। ५-तुलसी। , - वर्ग.] द्वितीयो गुच्छः। ५३ विपशूकप्रभृतिविपक्रिमिकुष्ठवलासवातजिन्मरुकः । ग्रहकुष्टरक्तकण्डूविपत्रिदोषापहो दमैनः ॥ १४६ ॥ सेवन्तीतरुणीसहस्रमिहिरव्याघ्रीवलाधातकी- पीकादण्डसुवर्णशाल्मलिजपाफूकानववूलजाः । स्वस्वप्रेत्ययगैर्विशिष्य सुमन कन्दा अमन्दा गुणैः किंतूच्चै रुचिसौमनस्यमहिताः सौम्याः सितासङ्गतः ॥ १४७ ।। प्रसून केन्दविपये पुष्पेभ्यस्त्रिगुणा सिता । वर्प सूर्यातपः सिद्धौ त्रुटिक्षेप इति स्थितिः ॥ १४८ ॥ मरुक (मरवा) विष-शूक आदि विषाक्त जन्तुओ के विषका, कृमि, कुष्ठ, कफ तथा वात का नादा कर देता है । दमन (दमनक) ग्रह, कुष्ठ, रक्तदोष तथा त्रिदोष को दूर करता है ॥ १४६ ॥ सेवतीगुलाब, गुलाब, सूरजमुखी, माकडा, व्याघ्री, बला, धाय, सेहुण्ड, अमलतास, सेमल, गुडहल, अफीम, बबूल आदि के पुष्पो से तथा भान की मजरी मादि से बनाये गये गुलकंद, अपने अपने पुप्पों के गुणो के समान ही गुणयुक्त होते है। किंतु, यदि इनमें मिश्री मिला दी जाये तो ये विशेष रुचिकर, सुगन्धयुक्त तथा गुणों में अधिक हो जाते है ॥ १४७ ॥ गुलकद बनाने मे पुष्प से तिगुनी मिश्री लेनी चाहिये । एकवर्षपर्यंत सूर्य - ताप में पकने से गुलकन्द तैयार - सिद्ध होता है। इस तरह सिद्ध हो जाने पर इलायची का चूर्ण इसमे डालना चाहिये । १४८ ॥ १-'मरवा' इति प्रसिद्ध पर्णाशभेद । २-दोनाप्रसाद । ३-सितया सह पुष्प- कलिकादिम्रक्षणजातस्य 'गुलकन्द'नाम्ना यवनवैद्यै प्रसिद्धीकृतस्य साधारणो गुणज्ञानोपायः; अत्र च सहस्र ‘गैन्दहजारा' इति प्रसिद्धम् । मिहिरोऽर्क । इपीका 'तुलियाथोर,' दण्डः 'दण्डायोर' इति । सुवर्ण कृतमाल । आफूकम् अफीमपुष्पम् । ४-खस्वोपादानगतै- रित्यर्थ । ५-तत्साधनार्थ परिभाषेयम् । निघण्टुसारे त्वन्यया परिभाप्यते यथा- "पिष्ट्वादौ कलिका द्विघ्न खादौ क्षिप्त्वा करैस्तत । घृष्ट्वा घृतेऽभ्रेऽहोरात्रै खाब्धिसख्य प्रजायते । तत्तदृक्षगुणः कन्दो नून श्रेष्ठो गुणाधिक ।" इत्यादि होलामहोत्सवे मुक्तकमुक्तावलौ वा श्रीगुरुभिर्देशभाषावन्धेन मादकोऽपि सुमकन्दः स्वीयदेशभाषावृत्तेन वर्णितः । यथा- "मिश्री लेकर वंगलोचन सही तामें मही डारिकै भङ्गाको घृतदे गुलावदल औ एला मिला दीजिये। पीछे पात्र विषे पचीसदिन लों नीके जमा कीजिये लीजे ये गुलकन्द फेर झगरो कीजे कलाकन्दतै” इति ।
[फट- सिदभेषजमणिमालायां गुलावादिप्रसूनोत्थः स्नेह कोऽप्यत्तरः स्मृतः। सौरभप्रीणितघ्राणो यजातस्तहुणागुणः ॥ १४९ ॥ इति पुष्पवर्ग. ॥ ४॥ गुलाब आदि पुप्पों मे से निकाला गया स्निग्ध - द्रव्य - सार 'इत्र' कहलाता है। इत्र अपनी सुगन्ध से घ्राणेन्द्रिय को परितृप्त करनेवाला होता है। जिस पुष्प का जो 'इत्र' होता है, उसके गुण-धर्म उस पुष्प के तुल्य ही समझने चाहिये ॥ १४९ ॥ पुष्प - वर्ग समाप्त ॥४॥ अथ फलेवर्गः। शिशिरमधुरा गुर्वी नेत्र्या सरा बहुधृहिणी ज्वरमरुदसृपित्तश्वासक्षयार्तितषः क्षिपेत् । दवथुमदरुमूर्छामूत्रापदोऽपि च गोस्तनी प्रविलसदसृपित्तोष्णाऽऽमा मताऽम्लरसाधिका ॥१५०॥ वमिमददवभ्रान्तिश्रान्तिज्वरानमरुत्तृषा- रुचिमृतिमहामूर्छापित्तापहं मधुरं लघु । प्रकटयति कफेऽप्यौदासीन्यं हिमं बलशुक्रलं परिणततरं वालं हीनं ततो वरदाडिमम् ॥ १५१ ॥ फल-वर्ग। गोस्तनी (पक्क अंगूर) शीतल, मधुर, भारी, नेत्र्य, सारक तथा अत्यत बृहण है। ज्वर, वायु, रक्तविकार, पित्त, श्वास, क्षय तथा तृषा को मिटाती है । दाह, मद, मूळ एव मूत्र कृच्छू को भी नष्ट करती है। अधिक अम्ल रस से युक्त एवं अपक्क अंगुर उष्ण तथा रक्त-पित्त कारक है ॥ १५० ॥ परिपक्क दाडिम (अनार), वमन, मद, दाह, भ्रम, मानसिक तथा शारीरिक थकान, ज्वर, रक्त-विकार, वायु, तृषा, अतीसार, महामूर्छा और पित्त का नाश करने वाली, मधुर, रुचिकर, कफ मे उदासीन, शीतल एवं बल और शुक्र की वर्धक है। कच्ची अनार मे परिपक्वकी अपेक्षा न्यून गुण है ॥ १५१ ॥ १-अनेनैव नाना प्रसिद्धो न च केवलं प्रसूनोत्य एव कि तु अम्बरीशीरपनडी- चन्दनादिसुगन्विद्रव्यसयोगेनापि जायते । प्रायो गान्धिकापणेषु मिलति । २-पुष्पानन्तर- मेव फलोत्पत्तिदर्शनात्तदनन्तर फलसग्रह । ३-द्राक्षा मुनक्का । ४-वरमिति विशेषणात् काब्वुलं परिणत सदुक्तगुण, वाल सत्तत परिणताद्धीनगुणमिति ।
man वर्ग:] द्वितीयो गुच्छ । वहति तुवरं वाल वद्धास्थ्यपि त्रिमलोदयं परिणतमसृक्शोफरलेप्मातिपित्तलमीरितम् । मधुरममरुत्पित्तं स्निग्धं विपकतमं हिम तृपि सदवथौ पथ्यं त्वानं रसः स्मरदः सरः ॥ १५२ ।। अपित्तं खर्बुजं विरचयति रेतो गुरु हिम मरुन्मायि स्वादु श्रमजिदतिसारं त्वरयति । समानं तवूज तदपरिणतं स्यादितरथा कपायं संग्राहि प्रथितपवनं जाम्बवफलम् ॥ १५३ ॥ दशाङ्गुलस्य प्रतनूनि कृत्वा खण्डानि खण्डेन विमिश्रितानि । पित्तप्रतापक्षपणक्षमाणि कामं लिहन्तो धनिनोऽपि धन्याः॥ १५४ ॥ विष्टम्भि सुस्वादु सर समीरसमीरणं क्षुत्क्षपणं सुगन्धि । गुणौघवित्तं परिजित्य पित्तं मुदं किमूदञ्चति नामरूंदम् ॥ १५५ ॥ बलासवीर्यपात्राणि दात्राणि दवसंपदाम् । प्रायशः स्वादुमात्राणि गण्डगात्राणि मन्महे ॥ १५६ ॥ कच्चा मान कपाय, कच्ची गुठलीवाला विटोप कारक, पक्क कितु खट्टा रक्तविकार, शोफ मार कफ करनेवाला, पक्क मधुर, वात-पित्त नाशक तथा स्निग्ध होता है । अत्यंत परिपक्क आम्र शीतल तथा तृपा और दाह में पथ्य है। आम्र का मधुर रस सारक तथा कामोद्योधक है ॥ १५२ ॥ खर्वज पित्त न करने वाला (अर्थात् किचित पित्तकारक ) शुक्र-वर्धक, भारी शीतल स्वादु, वात-नाशक, श्रमहारक तथा सारक है। त—ज भी खवूज के समान गुणयुक्त है। किंतु कच्चा तरबूज इससे गुणो में विपरीत होता है । जाम्बवफल (जामुन) कपाय, ग्राही तथा वात-कारक है ॥ १५३ ॥ खरबूज के छोटे छोटे टुकडे करके, उसमे शर्करा मिलाकर यथारुचि सेवन करने वाले धनिक वस्तुत धन्य है। खरबूज का यह पानक पित्त प्रभाव का नाश करने मे समर्थ माना जाता है ॥ १५४ ॥ अमरूद विष्टभी, सुस्वादु, सारक, वातकारक, भूख को मिटानेवाला और सुगंधित है। अपनी गुण सपदा से पित्त को जीतकर एक विठोप आल्हादमय तृप्तिकी अनुभूति कराता हे। (कच्चे अमरूद को स्वच्छ शिलापर पानी से थोडा घिसकर उसका लेप करने से 'आधा सीसी' अर्धावभेदक में तत्काल शाति मिलती है।) ॥ १५५ ॥ सीताफल मधुर, कफकारक, शीतवीर्य और दाह शामक है। (सीताफल को 'गण्डगात्र' तथा 'कृष्ण चीज' भी कहते है। इसके बीज के कल्क का मस्तक पर १-दरपक्क मध्यं तु पित्तलमिति दर्शनात्। -दशादुल वल्लीज फल प्रायो ग्रीष्मे प्रचरति। ३-अनेनैव नाम्ना प्रसिद्धम् । क्वचिच्च ‘मतीरा' इति ख्यात खजान्महत्तर जलबहुलम् । 'कालिङ्गम्' इति देववाण्यामुच्यते । ४-अन्तर्भावितण्ययमिदम् । तेन प्रापयतीत्यर्थ । ५-'जाम्फलम्' इति गुर्जराः । ६-गण्डा गात्रे यस्येति आतृप्य सीताफलमिति यावत् ।
- सिन्दभपजमणिमालायां [फल- अतिसारभ्रमच्छर्दिपिपासापित्तवसरम् । मधुराम्लरसं रुच्यमेलचीफलमारितम् ॥ १५७ ॥ कर्फ वितनुतेऽनिलं प्रवलयत्यपक्कं ततः परं मधुरमम्लकं किमपि वायुवारि स्मृतम् । अथो परिणतं वमिश्रममदाशि बल्यं सरं नियच्छति तृपं भृशं वदरमालयोत्थं वरम् ॥ १५८ ॥ कसेरुद्वयं क्षुण्णपित्तं पिपासाप्रमेहाक्षिपीडाविदाहेपु दद्यात् । कपायं गुरु ग्राहि मिष्टं तुपारं मरुत्स्तन्यशुक्रक्रिमिलेग्मकारि ॥ १५९ ॥ लेप करने से जूये मर जाती है। कल्क का प्रलेप करके मस्तक को एक स्वच्छ महीन वस्त्रसे बांध देना चाहिये । एक प्रहर पीछे सिर को धो डाले । साफ करते समय पानी भाखों में न चला जाये इसकी सावधानी रखनी चाहिये।)। १५६ ॥ एलची फल मधुर, रस से अम्ल, रुचिकारक तथा अतीसार, भ्रम, वमन, तृप और पित्त का नाश करनेवाला है। (एलचफल कलकत्ते का प्रसिद्ध फल है। यह पिण्डिकाओं से युक्त, हरितारुण वर्णवाला तथा वर्तुलाकार होता है।)॥ १५७ ॥ अपक-वटर कफ-कारक तथा वायु को प्रवल करनेवाला है। किचित् -पक बदर - फल स्वाद मे मधुर और अम्ल तथा वात-नाशक है । सपूर्ण परिपक्व गृहवदर वमन, और मद को दूर करनेवाला, बलकारक, सारक तथा तृष्णाधिक्य में उप- कारक है। (वदर की बहुत सी जातिया है, जिनमे राज - वदर सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। भरवी-भाषा मे इसे उन्नाव कहते है। राजनिघटु में इसके गुण यह कहे गये है- "राजवदरः सुमधुर शिशिरो दाहार्तिपित्तहर । वृष्यश्च वीर्यवृद्धि कुरुते गोषश्रम हरते"। उन्नाव खासी मे लाभ देता है। उन्नाब, कतीरा गूद, गुलाब और शकर इनके घन की गोलिया मुंह में रखने से कास मे शाति मिलती है। राजबदर के अतिरिक्त बदर की. अन्य जातियो मे सौबीर, कोल, कर्कन्यु, गोप- घोण्टा (क्षुद्र बदरी-सुश्रुत) आदि मुख्य है-इनके गुणधर्मों मे यत्किचित् ही विभिन्नता है। वेर के वीज हिक्का तथा नेत्र - विकार मे, ताजी पत्तियो का लेप ज्वर-जन्य-दाह में तथा त्वचा का लेप विस्फोट में लाभकारी है। 'बदरस्य पत्रलेपो ज्वर-दाह विना- शन । त्वचा विस्फोटगमनी, बीजं नेत्रामयापहम्'-रा नि ।)॥ १५८ ॥ दोनो प्रकार के कसेरू पित्तनाशक, भारी, कपाय, ग्राही, मधुर तथा शीतल है। वीर्य, स्तन्य, क्रिमि, वात और कफ को बढाने वाले तथा प्यास, प्रमेह, नेत्ररोग और विदाह मे उपकारक है। (कसेरू दो प्रकार के होते है, एक राजकसेरू जो प्रमाण मे बडा होता है, दूसरा चिचोड जो छोटा होता है । ) ॥ १५९ ॥ १-“हरितारुणवर्णाभि पिण्डिवाभिरिवाञ्चितम् । वर्तुल कलिकाताया प्रसिद्ध फलमेलचम् ॥” इति । २-गृहबदरमश्नन्ति वनिन इति प्रशंसाश्रवणात् । ३-जलमध्ये जायते । श्रम ।
वर्ग ] द्वितीयो गुच्छ.। प्रमेहार्शलेप्मानिलगदनुदालूनिगदितो हिमाऽदोषा क्षीरी प्रकटितवला पिच्छिलतरा। भवेदामाऽम्लीका पवननुदपित्ता परिणता त्वशुक्र निम्बूकं हगरुचिमरन्मार्दवजयि ॥ १६० ॥ विभावनीयं शुचि भूरिवारार्जेऽम्बरं निम्वुकजाभिरद्भिः। तदम्वु भैषज्यविभावनायां दद्यादलाभे सति निम्बुकानाम् ॥ १६१ ॥ लॉ स्यान्मुखशोध्यरोचकहरं वहिप्रद वल्कलं जन्तुश्लेष्ममरुत्प्रणुन्मतमतिस्वादूष्णतिक्तं गुरु । भास्क (आलूबुखारा) प्रमेह, अर्श, कफ और वात का नाश करता है। दोनो प्रकार की खिरणी, शीतल, त्रिदोषन्न, बल्य और अत्यंत पिच्छिल है। कच्ची इमली वात-शामक तथा परिपक्व इमली पित्त तथा शुक्र - नाशक है। निंबू नेत्र विकार, भरुचि और वायु का नाश करता है । (भालूबुखारा की चार जातिया होती है-'विद्यात् जातिविशेषेण तच्चतुर्विधमाल्कम् । आड, भालू बुखारा, भालुवालु और भालुचा । स्वत्प, दीर्घभेद से खिरणी दो प्रकार की होती है। खिरणी के बीजो के प्रलेप से गर्भस्राव होता है। तथा चीजो का तेल -मादक है । पित्त-ज्वर मे दाह शमन के लिये तथा मलावरोध दूर करने के लिये इमली का पानक देते है-'पूर्व तोये वासर वासि- ताना चिचाऽस्थीनां दुग्धकल्कीकृतानाम् ॥ पीत्वा कप सुदरीपूरुषौ द्वागस्थिस्रावात् सोमरोगाच मुत्तौ' ॥ एक तोले भर इमली के बीजो को रात्रिपर्यत जल मे भिगोकर फिर प्रात त्वचा निकाल दूध मे पीसकर कल्क बनाले । इसको लेने से अस्थिस्राव तथा सोमरोग मे विलक्षण लाभ होता है । कल्क मे विदारीकद तथा वृद्ध - दारुक का चूर्ण मिलाकर देने से श्वेत प्रदर में यह परम उपकारक सिद्ध हुआ है। हमारे यहां का यह अनुभूत प्रयोग है।)॥ १६० ॥ कार्तिक मास के फालवाले निबु लेकर उनके रस में शुद्ध वस्त्र को पुन पुन विभावित करके हिफाजत से रखले। अब, आवश्यकता होने पर इस वस्त्रपट को स्वच्छ जल में भिगो कर मसल ले। फिर निचोड लें। किसी भी ऋतु मे इस तरह प्राप्त निबु- जल का, निंबु-रस के अभाव मे, औषधादि निर्माण कार्य मे, निर्भय उपयोग करें ॥ १६१ ॥ वीजपूर (मातुलुग) मुखको स्वच्छ करने वाला, रुचिकर और अग्निप्रदीपक है। इसकी छाल तिक्त, उष्ण, भारी, दुर्जर, अत्यत सुस्वादु तथा वात, कफ और कृमि का १-'आर, आरुक' इति लोकैरुद्धष्टो मधुरकपाय फलविशेष । २-राजादन- फल ‘सिरिणी, रायण' इति ख्यातं दीर्घाकृति स्वल्प फलमिति । महत्वल्पमेदाद् द्वेधा। ३-निम्बूरससाध्यकार्यार्थ सर्वेष्यतुपु तद्रसलाभोपायप्रदर्शनमेतत् । ४-कार्तिके । ५-बीजपूरकम् ।
सिद्धभेषजमणिमालायां - तन्मध्यं गुरु वृंहणं हिममसृस्पित्तानिलोन्मूलनं ग्राही तस्य तु केसरो जठरजिद्वीजं भवेद्गर्भदम् ॥ १६२ ॥ अम्लतसमत्यम्लं गुल्मामामचिशूलजित् । जम्भो न्यूनस्ततोऽन्यद्यदम्लं श्लेष्मविवन्धनुत् ॥ १६३ ॥ निम्बूकमुक्त मधुरं पिपासापित्तारुचिच्छदिविपास्ननाशि। स्वादरलशीतं कफमारुतघ्नं संग्राहि रुच्य लघु कर्मरङ्गम् ॥ १६४ ॥ हरेद्धिमं गुर्वतिसारनिन्दकं प्रमेहपित्ते सकफे च तिन्दुकम् । सगौरवं स्यात् कदलीफलं वरं हिमं सपित्तात्रवव्यथाहरम् ॥ १६५ ॥ संक्षोद्य सम्यक् कदलीफलानि सर्पिः सितां चाप्युपरि प्रकीर्य । यथेच्छमास्वादयतां नराणां कदाऽपि वीर्यस्य न हानिरस्ति ॥ १६६ ॥ हिक्कादम्लं मधुरं कपित्थं विट्सारपित्तानिलतृट्सु पथ्यम् । विष्टम्भ्य वातं गुरु नारिकेरं रोगे हितं नो किमु पैत्तिकेऽरम् ॥ १६७ ॥ नाश करने वाली है। विजौरा का गूदा भारी, बृंहण तथा शीतवीर्य है। वात और रक्तपित्त का उन्मूलन करता है। इसका केसर ग्राही तथा उदर रोग नाशक है। वीज गर्भप्रद है ॥ १६२ ।। अमलवेत अत्यत खट्टा तथा गुल्म, भाव, अरुचि और शूल का नाश करने वाला है। ('अम्लवेतसो भेदनीयदीपनीयानुलोमिक्वातश्लेप्महराणाम् ' । चरक ) जम्भीरी निवू अमलवेत की अपेक्षा न्यून गुणवाला हे । अम्लता को लिये जम्भीरी निवू कफ और विबन्ध को दूर करता है ॥ १६३ ॥ मधुर निंबू तृष्णा, वमन, विष तथा पित्त का नाश करनेवाला, रुचिकर और रक्तशोधक है । कमरख स्वादु, अम्ल, शीतवीर्य, कफ और वात नाशक, ग्राही, रुच्य तथा लघु है ॥ १६४ ॥ तिदुक (तेद) शीतल, भारी, कफकर तथा अतीसार, प्रमेह और पित्त को हरनेवाला है । परिपक्व देला गुरु, शीतल तथा रक्त, पित्त एवं दाहजन्य वेदना का नाशक है ॥ १६५॥ केले को अच्छी तरह छूदकर उससे घृत तथा शक्कर मिलाकर यथेच्छ सेवन करने से वीर्य कदापि न्यून नहीं होता ॥ १६६ ॥ कपित्थ मधुर, अम्ल तथा हिक्कानाशक है । अतीसार और तृषा मे पथ्य कारक तथा वात-पित्त हारक है। नारियल विष्टभी, भारी तथा वात - शामक है। पित्तज विकार मे इससे अधिक उपकारक अन्य औषधि नहीं है । ( मेदोवृद्धि मे खोपरेल का सेवन करने से मेद का ह्रास होता है।) ॥ १६७ ॥ १-त्वक्केसरयोर्मध्यभागस्थ गूदापदवाच्यम् । २-मिष्टनिम्बूगुणाः । ३-'कमरख' इति प्रसिद्धम् । ४- तेंडू-जीडू' इति । ५-पैत्तिके रोगे अर किमु नो हितमित्यन्वय ।
वर्ग] द्वितीयो गुच्छ । अजीरनारगपरूपचारखर्जूरतूदानि ससेवकानि । वृष्याणि पित्तानिलरक्तदाहहराणि वल्यानि हिमानि सन्ति ॥ १६८ ॥ मुंकूलाक्षोटवादामचौरवो गुणचारवः । वल्या वृप्याः सरा उष्णा गुरव स्वादवोऽप्यलम् ॥ १६९ ॥ इति फलवर्गः ॥५॥ अंजीर, सतरा, फालसा, चारोली, खजूर, शहतूत और सेव यह सभी वृष्य, बल्य, गीतल, रक्तपित्त और दाह के शामक तथा वात पित्त को दूर करनेवाले है ॥१६८ पिस्ता, अखरोट, बादाम और चिरौंजी उत्तम गुण देनेवाले, बल्य, वृष्य, उष्ण, भारी, सारक तथा परम सुस्वादु है ॥ १६९ ॥ फलवर्ग ममाप्त ॥ ५॥ . है अथ धान्यसंग्रहः । सर्वोऽपि शालि. शिशिरोऽल्पवातबलासकारी मधुरो मनोज्ञः । वल्यः सशुक्रो लघुरस्तपित्त संवद्वविट्को रुचिदः प्रदिष्टः ॥ १७० ॥ गोधूमकः स्वादुसरोऽसमीरपित्तो गुरुः शुक्रवलप्रकी । यवः कपायो मधुर. सशीतो विलेखनः पाककटुः सवातः ॥ १७१ ॥ धान्य-सग्रह । खेत में उगे हुये भन्न को सस्य कहते है, परिपक-सतुप सस्य 'धान्य' कहलाता है। यही निस्तुप, 'भाम' गब्द से जाना जाता है। स्विन किया गया आम 'अन्न' कहाता सभी जाति के चावल शीतल, किचित् कफ-वात कारक, मधुर, पथ्य, बल्य, शुक्रवर्धक, हलके, पित्तशामक, मल को बाधनेवाले तथा रुचिकर कहे गये है। (श्वेत चावल को शालि कहते है । ) ॥ १७० ॥ गेहू स्वादु, सारक, भारी, पित्त-हर, शुक्र और बल के वर्धक है । यव कषाय, मधुर, शीतल, लेसन, पाक में कटु तथा वात कारक है ॥ १७१ ॥ १-काष्ठोदुम्बरि काफलमिति वृद्धा । २-चार फाल 'चिरोजी, चारोलि च'। ३-'तौंत, सेतोत' इति च प्रसिद्धम् । ४-निकोचफलम् । लोके 'पिस्ता' इति । ५-चार- चारमित्यनान्तरम् । मुकुलादिवर्गेऽपि चारुपाठादजीरादीनामपि प्रकृतिभेदेन सरत्वम- विरुद्धं, न पुन पुनरुक्तिरिति । इति फलवर्ग । ६-पेयादिपथ्योपयोगित्वेन भपजान्त पाति- त्वाधान्यप्रस्ताव । “ सस्य क्षेत्रगत प्राहुः सतुप धान्यमुच्यते । आम वितुषमित्युक्तं स्विन्न- मनमुदीरितम् ॥” इति वशिष्ठ । ७-“क्षुण्णः सित स्मृत शालि ” इत्यरुणदत्त ।
६० सिद्धभेपजमणिमालायां [धान्य- अदोपलौ मुद्गमकुष्ठको लघू ज्वरापही बद्धमलौ दृशोहितौ । गुरुस्तु माषः कफपित्तशुक्रद्वलानदः स्निग्धसरोऽनिलान्तकः ॥१७२ ॥ ग्राही कषायो मधुरो विरूक्षो गुरुर्मरुत्कृत् किल राजमाषः । शीतो मसूरस्त्वसरः सवातो वलासपित्तानहरो ज्वरघ्नः ।। १७३ ।। विष्टम्भी चणको ज्वरानकफजिदूक्षः कषायो लघु- तिं पुष्यति पुंस्त्वपित्तमथनस्तद्ववदाम्याढकीम् । पित्तास्त्रप्रवरो लघूष्णतुवरो हिक्काश्मरीशुक्रदृक्- श्वासानाहमरुत्कफज्वरविपे पथ्यः कुलत्थः कटुः ॥ १७४ ।। स्वादूप्णस्तुवरस्तिलः कटुगुरु ही सतिक्तोऽग्निदः केश्यः पित्तकफोत्तरोऽनिलहरस्त्वच्योऽल्पसूत्रो वली। तीक्ष्णोष्णः कफवातभूतदमनोऽसृक्कृत् कटुः सर्पप- स्तीणों तीक्ष्णतरा कफानिलहरा पित्ताग्निरक्तादरी ॥ १७५ ।। अतसी मधुराऽतिगुरुः कटुकाऽनिलशुक्रकफाक्षिहरोष्णतरा । कफपित्तजिदल्पमरुच्छिशिरं सुकुसुम्भभवं तदिवास्ति शणः ॥ १७६ ॥ मूग और मोठ दोनो दोपन्न, लघु, कफ-पित्त - नाशक, मल को वाधनेवाले, आंखों को हितकर तथा ज्वर को नष्ट करनेवाले हैं। उडद भारी, स्निग्ध, सारक, वातनाशक तथा कफ, पित्त और शुक्र को बढानेवाले, बलदायक तथा रक्त-पित्त कारक है ॥ १७२ ॥ राजमाष (चोला) कषाय, मधुर, रूक्ष, भारी और वातकारक है। मसूर शीतल, ग्राही, वात-कर, कफ, पित्त, रक्त-विकार तथा ज्वर का नाश करने वाला है ।।१७३॥ चना विष्टभी, कपाय, लघु, रूक्ष, वात-पोषक, पुस्त्व और पित्त का शोषक तथा ज्वर, रक्त विकार और कफ को दूर करनेवाला है। आढकी (अरहर) गुण-धर्म मे चने के समान ही है। कुलत्थ पित्त और रक्तविकार -कारक, कटु, लघु, उष्ण तथा हिका, अश्मरी, शुक्र और दृष्टि का नाश करनेवाला है। श्वास, भानाह, ज्वर, विप तथा कफ-वात -प्रधान विकारों मे पथ्य है। तिल स्वादु, उष्ण, कषाय, पाक में कटु, ग्राही, तिक्त, अग्नि- प्रदीपक, केश्य, कफ-पित्त-कारक, वात-नाशक, त्वच्य, बलदायक और सूत्र को अल्प करनेवाला है। तीक्ष्णा (राजि, राई) अति- तीक्ष्ण, कफ-वात-हर तथा पित्त, अग्नि, और रक्त की वर्धक है। सर्षप (सरसों) तीक्ष्ण, उप्ण तथा कफ, वात और भूतादि-बाधा का दमन करने वाला, रक्त-विकार- कारक तथा कटु है ॥ १७४-१७५ ॥ अतसी (अलसी) मधुर, अत्यत भारी, पाक मे कटु, अत्युष्ण तथा दृष्टि, वीर्य और कफ का नाश करने वाली है। कुसुम्भ- बीज, शीतल, किचित् वातकारक तथा १-'चोला' इति प्रसिद्ध । २-राजिका । ३-पित्तादिवर्धिनी । ४-कुसुम्भवीजम् ।
सग्रह] द्वितीयो गुच्छ । श्यामाककगुनलकोद्रवयावनाल- नीवारचीनतृणजादि समस्तमेव । कीलालैपित्तकफदाहविनाशि शीतं संग्राहकं पवनपोपि लघु प्रदिष्टम् ॥ १७७ ॥ एकान्तसात्म्यानि रुचिप्रदानि लघुनि दोषत्रयपूजितानि । सर्वेपु रोगेष्वनिवारितानि दानानि साबूप्रथमानि विद्मः ॥ १७८ ॥ श्लक्ष्णाण्यÜनि शुक्लानि वर्तुलानि स्वरूपतः । इड्ग्रेजैर नीतानि साबूदानानि नामतः ॥ १७९ ॥ इति धान्यवर्ग ॥ ६॥ कफ-पित्त का नाश करनेवाले हैं। शण (मातुलानी, महाशना) के गुण धर्म कुसुंभ-वीज के समान ही हैं। (शण का पुष्प रक्त-प्रदर-सत्यार्तव-मे हितावह है।)॥ ७६ ॥ श्यामाक (सावा), कगु, नल, कोद्रव ( कोदो) यावनाल (ज्वार ), नीवार (तीनी), चीनाक तथा तृणान्न एवं अन्य वज्रादि (बाजरा आदि) क्षुद्र-धान्य यह सभी रक्त, पित्त, कफ और दाह का नाश करनेवाले, शीतल, सग्राही, वातकारक, तथा हल्के कहे गये हैं ॥ १७७ ॥ सावृदाने अत्यत - सात्म्य, रुचि दायक, लघु, तीनो दोपो मे उपकारक तथा सभी रोगो में अनिवार्य -पध्य माने जाते है ॥ १७८ ॥ भारत मे सावृदानो का आगमन अंग्रेजो से हुआ। साबूदाने अत्यत सूक्ष्म भाकृति मे गोलाकार, श्वेत, तथा चिकने होते है ॥ १७९ ॥ वान्य-वर्ग समाप्त ॥ ६ ॥ . अथ सिद्धान्नसंग्रहः। सिष्टं नटीनामधरोष्टवत् परं प्रवुद्धपीनस्तनवत् सुवर्तुलम् । स्नेहप्रगाढं सुहृदां चरित्रवल्ललत्यलं लोचनलोभि लड्डुकम् ॥ १८० ॥ सिद्धान्न-सग्रह। नर्तकी के अधरोष्ठ के समान परम मधुर, उसके उकसे हुये पीन उरोज के समान सुंदर वर्तुलाकार, सहृदयो के स्वभाव की तरह प्रचुर स्नेह से ओत प्रोत, लोचन को लुभाने वाले लड्डु हृदय को अत्यत लालायित कर देते है ॥ १८० ॥ १-मौक्तिकतन्दुलम् । लोके ‘जुन्हरी, जुवार' इति प्रसिद्धम् । २-आदिशब्दाद्वजका- दिक्षुद्रवान्यपरिग्रह । ३-कीलाल रुधिर, रक्तपित्तमित्यर्थो वा। ४-साबुदानानीत्यर्थ , एपामभक्ष्यत्वमुक्तमाकरव्रज्याया वनपति मित्रै । तच्च सर्वमालकोपरि द्रष्टव्यम् । ५-सावू- दानालक्षणमिदम्। ६-लेण्ट्जजनै तया चात्र मेस्तन्त्रम्- “पूर्वानाये नव शत षडशीति प्रकीर्तिता । फिरजभापया मन्त्रास्तेषा ससावनात् कलौ ।। अधिपा मण्डलाना च सग्रामेष्व- पराजिता । इग्रेजा नवषट्पञ्च लेण्ड्रजाश्चापि भाविनः ॥” ७-इदानीं धान्यसामान्यगुणान- ६२ सिद्धभेपजमणिमालायां [सिद्धान्न- मृदितविरलसर्पिः शुद्धगोधूमचूर्ण सलिलनिविडवद्धं गोमयाग्नौ विपक्वम् । तितउशुचि घृतेन प्लावितं शर्कराढ्यं त्रुटिसुरभि सुहृद्भिर्भुज्यतां चूर्णमाख्यम् ॥ १८१ ॥ अत्युज्वलैरवयवैर्मृदुतां दधाना भुक्ताऽऽवलं वितरति स्मरदानदक्षा । स्निग्धाशया गुरुगुणग्रथिता मनोज्ञा फीणी नवीनललनेव मुदं ददाति ॥ १८२ ॥ जलवलिवलयानि प्रौढपित्तक्षयानि क्षतपवनभयानि प्रोल्लसद्विस्मयानि । मधुररसमयानि श्लाघनीयानि यानि स्फुरदकचिजयानि प्रेमतो वर्णयानि ॥ १८३ ॥ संपक्कं मृदुवह्निना चणकजं चूर्ण समाने घृते क्षेप्यं खण्डजकर्दमे द्विगुणिते स्थाल्यामिदं ढालयेत् । उत्तम गेहूं के भाटे मे घी का मोयन देकर अच्छी तरह, पानी से गूधे । फिर इसे कडों की अग्नि (जगरे) मे सेकें । अच्छी तरह सिक जानेपर कूट पीट कर चालनी से सूक्ष्म चूर्ण छानलें । इस चूर्ण को प्रथम घृत से प्लावित करके फिर उसमे शक्कर मिलादें । सुगंधि के लिये ऊपर से इलायची चूर्ण यथा मात्रा विखेर दें। इस 'चूरमे' का सन्मित्र मडली सहित आस्वादन करें ॥ १८१ ॥ अपने अत्यत उज्ज्वल अवयवो से परम- कोमल, उपभोग करने वाले को यथेच्छ बल देनेवाली, काम-भाव अर्पण करने मे निपुण, स्निग्ध-आशय से युक्त, गुरु गुणो (दीर्घसूत्रो) से ग्रथित, मनको प्रिय, फीणी नवीन नवोढा-रमणी की तरह आह्लाद देती है ॥ १८२ ॥ प्रवृद्ध-पित्त का क्षय करने वाली, क्षत और वात के लिये साक्षात् भय - रूप, अपनी आकृति से विस्मय-भाव को जगाने वाली, अरुचिपर जय करनेवाली, मधुर रसमय जलवलिवलय (जलेबी) की हम यह सप्रेम स्तुति करते है ॥ १८३ ॥ चने का आटा तथा घी दोनों को समान-भाग मे लेकर, मदाग्नि से अच्छी तरह पकालें। फिर द्विगुणित - शक्कर की चासनी मे इसे मिलाकर एक थाली मे भिधाय तद्विशेषाणा भक्ष्यादीना गुणा अभिधीयन्ते। अत्र केपाचिद्गुणाभिधान प्रसिद्धत्वादु- पेक्षितम् । तच्च सुधीभि स्वयमूह्यमिति । १-"चालनी तितउ पुमान्" इत्यमर । २-लोके 'चूरूं, चूरमो' इति, तच्च माष- सूपेन सह भुञ्जते जयपुरीया इति। ३-भक्षिता, पक्षे सभुक्ता। ४-फेणिका समिताकृता। लोके 'फीणी' इति नाम्ना प्रसिद्धा। ५-कुण्डलिनी। लोके 'जलेवी' इति ख्यायते । ६-लोट्लकारस्योत्तमपुस्पैकवचनम् । ७-त्रिगुणे चतुर्गुणे वा लोकस्य भिन्नरुचित्वात् । , सग्रहः] द्वितीयो गुच्छ । कर्पूरत्रुटिकुकुमैः कतलिकां कृत्वा शुभां भक्षयेत् सैषा मानसमोहिनी बहुगुणा श्रीमोहनस्थालिका ॥ १८४ ॥ पतति पवनग? हीयते पङ्गुपित्तं विलसति वलमग्निमनत्वं व्यनक्ति । प्रसरति कफराज्यं सेवितायां हि यस्यां जगति सुकृतवद्भिर्लभ्यते लप्सिका सा ॥ १८५ ।। सर्वाशनं यत्पुरतो वराकं प्राप्नोति यो भाग्यमृते सदा कम् । स्पर्धा विधत्ते सुधयाऽपि साकं सखे तमास्वादय दुग्धपाकम् ॥ १८६ ॥ मजानं नागरगं पच हविपि सितासङ्गतं तत्र पके निक्षिप्य क्षीरमर्धक्कथितमथ समुद्भूलय द्राविडीभिः । नारङ्गक्षीरणीयं सुरपतिभिरपि प्रार्थिता वातपित्त- व्यापत्तिं हन्त हन्ति प्रथितगुरुगुणा सौमनस्यं प्रसूते ।। १८७ ॥ सुक्ताऽपि वाञ्छां बहुलीकरोति कान्त्याऽक्षिसौख्यं दद्धती जनानाम् । समुन्मिपद्गन्धरसा नवीनी वासौदिका स्त्रीच मुदे न कस्य ॥ १८८ ॥ डाल दें। कर्पूर, इलायची तथा केसर के चूर्ण का ऊपर से प्रक्षेप करके - अच्छी तरह जमजाने पर उसकी सुंदर चकत्तियां बनाकर भक्षण करें। यही अनेक-गुणों से पूर्ण, मन को मुग्ध करनेवाली 'मोहनस्थालिका' है ॥ १८ ॥ जिसके सेवन से वायु का गर्व-खडित हो जाता है । पित्त पगुवत् हीन हो जाता है। बल का विकास होता है, अग्नि क्षीण हो जाती है, तथा कफ में वृद्धि होती है एंसी लप्सिका (लापसी) जगत् में पुण्य-शालियो को ही प्राप्त होती है ॥ १८५ ॥ जिसके समक्ष अन्य सभी भोज्य-व्यजन तुच्छ है, जो विना भाग्य हमेशा प्राप्त नहीं होता और जो अमृत की स्पर्धा करता हे - उस दुग्ध-पाकका, हे मित्र ! भास्वादन करें ॥ १८६ ॥ नारगी के भीतरी गूदे को मिश्री चूर्ण में मिलाकर घी मे पकावें । पक जाने पर, इसे अर्धक्कथित दूध में डाल दे। ऊपर से इलायची-चूर्ण का प्रक्षेप करें। इस तरह नारग क्षीरणीय सिद्ध होता है। अपनी सुगध से मनको प्रिय, अनेको गुणो से युक्त, यह क्षीरणीय, वात-पित्त का नाश करता है ॥ १८७ ॥ तृप्ति- पूर्वक उपभुक्त होने पर भी, अधिकाधिक सेवन करने की लालसा को बढाने वाली, अपनी काति से मनुष्यो के नेत्रो को आनन्द देने वाली नवीन वासौटिका ( बासुंदी) नवीना रमणी के समान रस तथा गध को वितीर्ण करती हुई किसे आह्लाद नहीं देती ॥ १८८ ॥ १-'मोहनथाल' इति प्रसिद्धा। २-'लापसी' एपा गुर्जरे बहुप्रचरति। ३-सतन्दुल- दुग्धकृतो लेह्यविशेष । 'खीर, तस्मै' इति च मध्यदेशे प्रसिद्ध । ४-एलाभिः। ५-समु- न्मिपन्तौ गन्धरसौ यस्या सा तथा । पक्षे समुन्मिषन् गन्धरस सुगन्धिवस्तुविशेषो यस्या इति। ६-नवीना स्त्रीवेति सवन्ध । ।
६४ सिहभेपजमणिमालायां [सिद्धान- ऊधस्यमावर्त्य विधाय पिण्डं शनैः सितातन्तुलिकाविमर्दितम् । पश्चादधिस्थालि वुधेन ढालितं नाम्ना कलाकन्दमिति प्रचक्ष्महे ॥१८९॥ धाराभिरुत्तमघृतस्यै कृताभिषेका गोधूमजा शरदखण्डितचन्द्रवृत्ता । सिद्धाढकीदलगुडप्रतिपूरितेयं श्रीपोलिका जगति कस्य मुदं न धत्ते ॥ १९० ॥ स्थालीपुटस्य जठरे पिहितां दलाभ्यां वाताममजसितयोविनिवेश्य पोलीम् । अङ्गारकैरुपरि संनिचितैर्विपक्का मित्रैः समं रहसि भुक्ष्व सुधासपत्नीम् ॥ १९१ ॥ पयो रार्दा सर्कलप्रियाणां दाल्यो घृतान्तस्तलिताः प्रियाभिः । पटूपणक्षोदचमत्कृता स्युस्ता भक्तदाल्यो रुचये न केषाम् ॥ १९२ ॥ मरुल्लीला लीना भवति च नवीना रुचिरलं समुद्रिक्तं पित्तं मलिनयति चित्तं क्षयभिया। दूध को उकाल कर उसका खोवा बनावें। फिर इसे शक्कर की चासनी मे अच्छी तरह मिलाकर एक थाली मे ढाल देवे । इसे कलाकन्द कहते है ॥ १८९ ॥ स्विन्न की गई अरहर की दाल तथा गुड को परस्पर अच्छी तरह मिलाकर पिष्टी बनाले। इस पिष्टी से परिपूरित गेहू के लोये वेलकर, शरद के पूर्ण चद्रमा जैसी वृत्ताकार रोटिया पकाले। उत्तम - घृत की धारा से अभिपिक्त यह पोलिका (पूरण -पोली, बेढमी) जगत मे किसे आल्हाद नही देती ॥ १९० ॥ बादाम की मजा तथा शक्कर को अच्छी तरह मिलाकर - उसकी पूरी बना स्थाली सपुट मे रखकर अंगार -राशि पर अच्छी तरह पकाले । अमृततुल्य इस बादामपूरी को, कागज मे लपेट कर (दृष्टिदोष न लग जाये इस कारण) एकांत से मित्र-मडली के साथ खाये ॥ १९ ॥ दूध मे सिक्त, प्रियतमाओ द्वारा घृत मे तली हुई चने की दाल में नमक तथा मिरच के चूर्ण को प्रक्षेप करके सेवन करें। ये भक्तदाल (भक्तादाल) किसे रुचिकर नहीं है ॥ १९२ ॥ प्रतिक्षण पर्याप्त रुचि उत्पन्न करनेवाली, इलायची, मरिच तथा कर्पूरके चूर्ण से मिश्रित शिखरिणी को देखते ही वात-की लीला विलीन हो जाती है। १-'चासनी' नाम । २-'वर्फी' इति प्रसिद्धम् । ३-उत्तमत्वं गव्यत्वे सति नव्य- त्वम् । ४-उपलक्षणमिदं, तेन शर्करादिभि पूरण भवतीति बोध्यम् । ५-दक्षिणे 'पूरण- पोली', गुर्जरे 'वेडमी' इति प्रसिद्धा। ६-'कागज' इति प्रसिद्धाभ्याम् । ७-अतिसौन्दर्य- वत्तया दृष्टिदोपभयात्। ८-"चणको हरिमन्य स्यात् सकलप्रिय इत्यपि" इति निघण्टु । उपलक्षणं चेदम् । सर्वशमीवान्यस्येति । ९-'भक्तादालं' इति प्रसिद्धश्चय॑विशेष । .
म - सग्रह 1 द्वितीयो गुच्छ । ६५ बलासः कि ह्रासं व्रजति चलतो वल्गति बलं समीक्ष्योचैरेलोपणशशिवयस्यां शिखरिणीम् ॥ १९३ ॥ बाह्रीकजीरार्द्रलवङ्गसौरभास्तके निमग्ना जलधाविवेन्दवः । जिद्घालताग्रं चटका मनोहरा. कल्लोलयन्ति त्रिदिवौकसामपि ॥ १९४ ॥ लवणमरिचदोपाहिड्डधान्याकजीरैः पयसि चणकचूर्णर्लोलयित्वा विपक्वम् । घृतमहणतलायां ढालयेत् स्थालिकायां भवति दधिनिमनः पित्ततोः पितोडः ॥ १९५ ॥ कचवलिको विष्टभ्य प्रायो जीर्यति गुरुर्मरुजयिनी । पूरी पुनरूरीकृतवला विदूरीकरोति पित्तवलौ ॥ १९६॥ सत्तानि धेनो. सलिलेन मापमकुष्ठमुद्गान्यतमोद्भवानि । रुचेरैपि द्रागभिसारकाणि समर्मर भक्षय पर्पटानि ॥ १९७ ॥ वृद्धिंगत-पित्त अपने नाशके भयसे विकल-चित्त हो जाता है। कफ का हास तथा बलका पूर्ण विकास होता है। (शिखरिणी छद मे शिखरिणी का वर्णन-कवि के रचना कौशल को प्रकट करता है। शिखरिणी - पानी से रहित दही-निर्मित लेद्य विशेप का नाम है । इस मे शकर तथा कर्पूर, मरिच आदि का चूर्ण मिलाकर खाने से रचि के साथ जठराग्नि प्रबल होती है।) ॥ १९३ ॥ हींग, जीरा, आर्द्रक तथा लवंग की सुगंध से परिपूर्ण, तक मे निमन - अत एव मानो समुद्र-मन- चद्रमाओं के समान, मनोहर वटक, देवताओ की भी जिह्वा- रूपी लतान भाग पर कल्लोल करते हैं ॥ १९४ ॥ नमक, मरिच, हरिद्वा, हींग, जीरा तथा धनियाँ मिलाकर चने के माटे को पानी में अच्छी तरह गूध कर अग्निद्वारा पकावे । सान्द्र होने पर, घृत-लिप्त अत एव सचिक्न तल-वाली थाली में इसे ढाल दे। इस तरह, पित्त-तोड पितौड सिद्ध होता है । दही में डुबोकर इसका सेवन किया जाता है ॥ १९५॥ कचौरी भारी, विष्टभी, वात-हर तथा विलंब से पचनेवाली है। पूरी पूरा बल देती तथा पित्त के बल को दूर करती है ॥ १९६ ॥ उडट, मकोय, मूग इनमें से किसी के भी, गोमूत्र से सिह, पापड को मर्मर- शब्द पूर्वक खाये । यह रुचि को गीघ्र वढाने वाले तथा सधानकारी है ॥ १९७ ॥ १-एलादीनामुर्लनत्वाच्छाणम् । उक्त च--"शुद्धशर्करया युक्त निनीर द्विगुण दधि । शाणमुझूलन देयमेतन्मानं वुधे स्मृतम् ॥” इति । २-दधिजो लेह्यविशेष । अत्रोभययापि शिखरिणीति चित्रम् । दुग्धखण्डगालित निरेलं दधि द्रवन्ती व्यवहियते । उक्त च- दध्यम्बुरहित पात्रे खण्डदुग्धेन गालितम् । कर्पूरमरिचोन्मिश्र द्रवन्ती परि- कीर्तिता ॥” इति । ३-हरिद्रा। ४-पित्तं तोडति । 'तुड तोडने' इत्यस्मात् कर्मण्यण् । ५-लोके 'कचोरी' नाम । ६-अवधारणार्यों भिन्नक्रमश्च । ७-अभिसारकाणीति विशेप- गेन रुचौ नयिकात्व पर्पटेषु च सधानकारित्व ध्वन्यते । सि० ५ ६८ सिद्धभेषजमणिमालायां [सिद्धान्न- राज्यक्तजातं रुचिरं समीरवलास जियञ्जनसार्वभौमम् । अजनमिष्टान्नजडस्य जिहातलस्य तारल्यमपि व्यनक्ति ।। २०८ ॥ विट्सारभाजामहिता न लाजा धाना तु रूक्षा गुरुताप्रधाना। पृथुप्रभावाः पृथुकाः प्रथन्ते न जातु चित्ते पृथुकाय देयाः ॥ २०९ ॥ प्रमृष्टपैट्टा विजनं सजोऽच्छा धूपः सुगन्धिय॑जनं वयस्याः। रम्भापलाशानि समस्तमेतद्विभूपणं भोजनमण्डपस्य ॥ २१० ॥ चूर्णयुजि पूर्णपाथसि धात्रीफलसेवगर्जराम्राणि । बुडितानि द्वित्रिदिनं चतुरस्रं शङ्कुविद्धानि ॥ २११ ॥ संस्वेद्य संपरीक्ष्य प्रक्षाल्य सृशं पटेन निष्पीड्य । अधिसान्द्रसितातन्तुलि विरतोष्मणि विनिमजयेन्मड्ड ॥ २१२ ॥ करनेवाला तथा वृद्धजनों का हितैपी है। (वृद्धावस्था मे दांत गिरजाने पर सीरा परम उपयोगी भोजन माना गया है।)॥ २०७ ॥ रायता रुचिकर, वात और कफ का नाशक तथा सभी भोज्य-द्रव्यो में सर्वोपरि है। तथा सतत-मिष्टान्न-लोलुपता-सुलभ-जडता को प्राप्त जिह्वा - तल मे तरलता उत्पन्न करता है ॥ २०८ ॥ लाजा अतीसार से पीडित का अहित नहीं करता, धनियाँ रूक्ष और भारी है। पृथुका (पौंमा) स्थौल्य उत्पन्न करते है। दुर्जर होने के कारण बालकों को पृथुका प्रशस्त नहीं है ॥ २०९ ॥ साफ पोंछे हुये पाटे, एकान्तता, उत्तम पुष्पमालायें, धूप, सुगन्धि, पंखा, समवयस्क मित्र-मडली, कदली पत्र यह सभी भोजन- भवन के विभूषण है ॥२१०॥ आमलक, सेव, गाजर तथा आम्र-इनके फलो को, सुधाचूर्ण युक्त जल में सपूर्ण रूप से निमन करदे, दो तीन दिवस पीछे इनको निकाल कर चारों ओर से सोये से विद्ध करे। फिर इन्हें उबाल लेवें । तदनन्तर, धोकर, साफ करके, वस्त्रादि से पोंछ इनके पानी को सुखाले। शक्कर की गाढी चासनी में, शीतल होनेपर शीघ्र १-लोके 'रायता'नाम्ना प्रसिद्धम् । २-पूवा चिडवा चेति । ३-पृथुको वालस्तस्मै न देया, दुर्जरत्वात् । ४-'पाटा, पाटला'। ५-भोजनशालाया । ६-अनेनैव नाना प्रसिद्वफलविशेप । “मुष्टिप्रमाण वदर सेव सिञ्चितिकाफलम् ।" इत्युक्तरूपो भावेन । ७-'गाजर' इति प्रसिद्ध काप्टगर्भोऽरुणकन्दविशेषो नत्वभक्ष्यप्रकरणपठितो गृञ्जनसज्ञोऽयम् । "पलाण्डु विड्वराहं च छत्राक ग्रामकुक्कुटम् । लशुनं गृञ्जनं चैव जग्ध्या चान्द्रायण चरेत् ॥” इति स्मृतौ गृञ्जन लशुनाकारि लोहितसूक्ष्मकन्दमिति व्याख्यात विज्ञानेश्वर- भट्टारकेण । तदस्मिंस्तल्लक्षणस्यानवस्थानात् । तथा शब्दार्थचिन्तामणावपि । “गन्धाकृति- रसैस्तुल्य सूक्ष्मनाल पलाण्डुना। इत्युक्तम् । तथा चास्य पलाण्डुसदृशगन्धाकृतिरसा- भावाद्गृजनादन्य एवायं खादुकन्द , पलाण्डुशतकेपि-स्वमाधुरीरञ्जितसज्जनानि प्रभजना- रम्भविभजनानि । सेवापराणा गदगञ्जनानि जग्मुर्जवाद्गर्जरगृजनानि ॥ इति मे देनैव समु- पात्त इत्यलम् । ८-जलशोपणार्थम् । 7 वर्ग.] ६९ द्वितीयो गुच्छ.। गतवति सति सप्ताहे पूर्वकृतां तन्तुली द्रवीभूताम् । तेभ्यो विनाव्य पृथक् तत्र सितां तत्क्षमां क्षिप्त्वा ॥ २१३ ।। संसाध्य दृढं पश्चान्निमजयेदिति फलावलेहः स्यात् । प्रातर्वा सायं वा तत्तगुणलब्धये लिह्यात् ॥ २१४ ॥ द्रव्योढके स्फटीतः शाणो विल्वं पुराणचूर्णस्य । उपयुक्ता इह पेश्यो हृतत्वचां गर्जराम्राणाम् ॥ २१५ ॥ इन फलो को, डुबोदें। एक सप्ताह व्यतीत होने पर, पूर्वापेक्षया चासनी कुछ तरल हो जायेगी। इसको अलग नितार कर यथोचित मात्रा से, इसमें और शक्कर मिलाकर गाढी चासनी बना लेवें। भव, इसमें उपरोक्त फलो को पुन डाल देवें। फिर इन्हें स्वच्छ चीनी की बरणी में भरकर उसका मुह बंध करके रखदें । इस तरह फलावलेह (मुरव्या) सिद्ध होता है। प्रात. अथवा सायकाल को तत् तत् फल गत विशेप- गुण की प्राप्ति के लिये तत् तत् फल का अवलेह सेवन करे । एक आढक -द्रव्य के उपयुक्त चासनी में तीन माशा स्फटी डाले । सुधा-चूर्ण पुराना चार तोला भर लेवें। गाजर तथा मान को, उनके छिलके तथा भीतर की अस्थि निकाल कर तथा गूदे के टुकडे बनाकर, उपयोग में ले ॥ २११-२१५ ॥ अथ संधानम् । आम्राणामपिकानां कुर्यात् पेशीहतत्वचाम् । मनाग्विशोध्य भाण्डान्तः संभारेऽस्मिन् विनिक्षिपेत् ॥ २१६ ॥ आम्रपादो गुडः किं च तत्पादं पाटवं रजः । तत्तुल्ये मेथिकासुर्यों भ्रष्टे सर्पपतैलतः ॥ २१७ ॥ तथाऽत्र तच्चतुर्थांशा तलिता पित्तकारिणी। रात्रिस्ततोऽपि तुर्याशा हिड्डु राज्यष्टमांशकम् ॥२१८ ॥ कटाहपककटुकतैले योग्ये सरामठे। गुडं विनैव संभारं सर्वमेवावचारयेत् ॥ २१९ ॥ अर्धपक्क माम्रफल के छिलके उतार कर गूढे के टुकडे बनालें । फिर एक कढाई में इन्हें थोडा उबाल कर, निम्नलिखित पद्धति से निर्मित सभार मे इन टुकडो को डाल दें। आम्रफल के टुकडो से चतुर्थ - भाग गुड, गुड से चतुर्थाश लवण, लवण तुल्य सर्पप-तैल में सिद्ध मेथी और राई, मेथी से चतुर्थांश जितनी तली हुई पितकाली (लाल मिर्च का चूर्ण), पितकाली चूर्ण से चतुर्थ भाग हरिद्राचूर्ण तथा हरिद्राचूर्ण से भष्टमांश भाग हींग लेवें। गुड के अतिरिक्त, इन सभी मसालों को एकत्र करके तथा इनमें उचित -मात्रा से शुण्ठिचूर्ण मिलाकर, कढाईगत पकतैल में डाल देवें । १-'मुरब्बा' इति लोके प्रसिद्धः। २-तत्साधनार्थं परिभाषेयम् । ३-मेथीराज्यो मिलित्वा लवणतुल्ये ग्राह्ये न तु पृथक् । ४-मेथिकातश्चतुर्यांशा इति पाठ साधु । ५-पित्तकारिणीत ।
७० सिद्धभेषजमणिमालाया [शाक- एकीकृत्य समुत्तार्य गुडं प्रविकिरेदनु । न्यसेत् पिधाय भाण्डास्यमिति संधानपद्वतिः ॥ २२० ॥ सिद्धं स्यादाम्रसंधानमतिकान्तत्रिमासकम् । उच्चकै रसनाजाड्यमोचनं भक्तरोचनम् ॥ २२१ ॥ मेथीलवणनिशाभिः संभृतगर्भऽधितैलमामुक्ते । ज्वालामरिचशेलाटुनि मिलति निमीलति पराऽप्यरुचिः ॥२२२॥ मांसं संग्राह्यवातं गुरु मधुररसं शुक्रलं वल्यमुच्चै- हृद्यं साग्नि द्विधा तजगति निगदितं जागलानूपभेदात् । मेहनं स्वादु रूक्षं रुचिमदतिलघुच्छर्दिवातघ्नमाद्यं स्निग्धं मन्दाग्यपथ्यं कफि गुरु मधुरं पिच्छिले वृष्यमन्यत् ॥२२३।। अच्छी तरह मिलजाने पर नीचे उतार लेवें । अव इस सभार मे गुड भी मिला दे। इन सभी को एक पात्र मे भरकर उसका मुख बट करके रखदें। इसे ही सधानपद्धति कहते है। तीन मास पीछे इस तरह 'भाम्रसधान' सिद्ध हो जाता है । यह मान- सधान जिह्वागत जडता को मिटाता, भुक्त अन्न का पाचन करता है। हरी (ताजा) पितकाली के अन्तर्भाग में मेथी तथा लवण और हरिद्राचूर्ण भर दें। फिर इन्हे तैल मे निमन कर दें। इनके सेवन से परम अरुचि भी आख मीच लेती है, अर्थात् रुचि उत्पन्न होती है ॥ २१६-२२२ ॥ सभी प्रकार के मांस प्राय सग्राही, वातहर, भारी, रस में मधुर, शुक्रल, अत्यंत वलकारक, हृद्य तथा अग्निप्रदीपक होते है । जगत मे मांस, जांगल और मानूप भेद से, दो प्रकार के कहे गये है। इसमें जागल मांस प्रमेह - नाशक, स्वादु, रूक्ष, रुचिकर अत्यंत लघु तथा वमन और वात - विकार का नाश करने वाला माना जाता है । भानूप मांस स्निग्ध, मदाग्नि मे अपथ्य, कफकारक, भारी, मधुर, पिच्छिल, तथा वृष्य कहा गया है ॥ २२३ ॥ अथ शाकानि। वास्तूद्वितयं विपाककटुकं वल्यं सरं क्षारलं दुर्नामासृगरोचकाग्निमृदुतालीहत्रिदोषापहम् । पोताकी कफलाऽसपित्तपवनारोचापहा शुक्रदा पालङ्कया कफवातला गुरुहिमा विम्भिनी भेदिनी ॥ २२४॥ शाक-वर्ग क्षुद्र तथा बृहद् पत्रभेद से दोनों प्रकार का बथुमा विपाक मे कटु, बल्य, सारक, क्षारयुक्त तथा अर्श, रक्तपित्त, अरोचक, अग्निमांद्य और तीनों दोषो को नष्ट करता है। १-'अचार, अथाणूं' इति प्रसिद्धम् । २-पित्तकारिण्या "आमे फले शलाटु स्यात्" इत्यमर । ३-त्यागे फलश्रवणान्न विशेपगुणाभिधानप्रयोजनमस्येति सतोष्टव्यम् । ४-"भक्ष्याथै सह भोज्यत्वाच्छाकवर्गोऽभिधीयते"। इति । ५-बृहदल्पपत्रभेदात् । ६-उपोदिका 'पोई' इति ख्याता ।
वर्ग ] द्वितीयो गुच्छ.। पित्तनस्तन्दुलीयो लघुशिशिरसरोऽसृक्कफघ्नोऽतिरुच्यो लोणा रूक्षाऽम्लगुर्वी कफपवनहरी दीपनी शीतलाऽपि । चुना स्वाद्वी सपित्ता रुचिकृदपवना श्लेष्मलाऽम्ला लघिष्ठा मेथी हृद्याऽग्निदात्री क्रिमिकफपवनध्वंसिनी बद्धविट्वा ॥ २२५ ॥ किंचित्सरा गीततरा सवातश्लेष्मा सरोक्ष्या मधुरा च नीली। दद्रुघ्नपत्रं मृदुलं कृमिघ्नं श्वासे च कासे कथितं कफघ्नम् ।। २२६ ।। सवह्निमान्द्यारुचिवन्धकानि साष्ठीलिकाशूलकफानिलानि । आध्मानगुल्मश्वयथूदराणि क्षिणोति सेहुण्डुदलस्य शाकम् ॥ २२७ ॥ पौनर्नवं किसलयं नयनामयाह श्वालक्षयश्चयथुपाण्डुकफज्वरघ्नम् । विश्वस्तपित्तरुधिरक्षयकासमेह- च्छर्दिज्वराणि नववासकपल्लवानि ॥ २२८ ॥ गुडूचीपत्राणां जनितदहनानां ज्वरहतां लघूनां वल्यानां त्रिमलमथनानां जिततृषाम् । प्रमेहे पथ्यानामतिमृतिहराणां रुचिकृतां कथङ्कारं यामो गुणगणनपारं वयमपि ॥ २२९ ॥ पोतकी (पोई) कफकारक, शुक्रल तथा रक्तपित्त, वात और भरुचि को दूर करती है। पालक्या (पालक) कफ-वात - कारक, गुरु, शीतल, विष्टभी और भेदक है ॥२२४॥ तादलजा (चौलाई) पित्तन्न, लघु, शीतल, सारक, रुचि- उत्पादक तथा रक्त- पित्त और कफ का नाश करनेवाला है। लोणा (लूणख्यो) नोनिया रूक्ष, अम्ल, गुरु, कफ-वात - नाशक, दीपन और शीतल है । चुक्रा (चूको) स्वादु, पित्तकर, रुचिकर, श्लेष्मल, अम्ल, लघु तथा वात-नाशक है। मेथी हृद्य, अग्निप्रदीपक, मलको बांधने वाली तथा क्रिमि, कफ और वात का विध्वस करनेवाली है ॥ २२५ ॥ नीली किचित् सारक, अत्यत शीतल, वात-कफकारक, रूक्ष और मधुर है। दद्रुघ्न - पत्र कोमल तथा क्रिमिनाशक है । कफप्रधान कास तथा श्वास मे प्रशस्त कहा गया है। सेहुण्ड के पत्तो का शाक अग्निमाद्य, अरुचि, विबन्ध, अष्ठीला, शूल, कफ, वात, आध्मान, गुल्म, शोथ तथा उदर-रोग का नाश करता है। पुनर्नवा के नूतन पत्तो का शाक नेत्र -विकार, श्वास, क्षय, शोथ, पाण्डु, कफ और ज्वर को नष्ट करता है ॥ २२६-२२८ ॥ दाहयुक्त ज्वर को हरने वाले, लघु, बलकारक, त्रिदोष को मथनेवाले, तृषा को जीतनेवाले, प्रमेह मे पथ्य, अतीसार के नाशक तथा रुचि के उत्पादक गुडूची पत्रो के गुण - गणना का पार हम भी नहीं पा सकते ॥ २२९ ।। १-'चौंलाई' इति मव्यदेशे 'तादलजो' इति गुर्जरे प्रसिद्धा। २- लूणख्यो' इति प्रसिद्धा । ३-'चूको' नाम ।
७२ सिहभेपजमणिमालायां [शाक- वरं भगाशाकं मदयति न हा कं कफह निहन्याद्विसारं हुतवहविकारं लघुतरम् । कफा” वातकं वरमनिलवाती न सहते करोत्युग्र पित्तं ज्वररुचि घिरक्तं सरमपि ॥ २३० ॥ कूष्माण्डशाकं कफकार्यनुष्म गीतं भिपग्भिर्गुरु कान्तिपीतम् । प्रहारि पित्तस्य हुताशकारि चेतः स्थिरं भेदि करोति रेतः ॥ २३१ ॥ कि वर्णितुं वीतकफा नु तुम्बी शक्येत शिवी गुरुरेव विम्बी । धातुं विधातुं दवधु विहातुमेता हि मान्या जगतीह नान्याः ॥ २३२ ॥ अमरुदगुरु रक्तद्वेपि पित्तप्रमोपि ज्वरहरमतिसारि प्रोढवहिप्रसारि । कृमिकवलनकारि श्लेष्ममेहप्रहारि प्रकटितकटुभावं कारवेल्लं ब्रवीमि ।। २३३ ।। अनुभव हिमभावं पित्ततः शत्रुभावं कुरु पवनकफाभ्यां मित्रभावं भजस्व । भांग का शाक उत्तम है, अतीसार और अग्निमाद्य को दूर करने वाला, कफ- हर तथा लघु है । अरे । यह किसको उन्मत्त नहीं करता? वार्ताक (बैंगन) कफ- जन्य वेदना में उपकारक है। यह बात की बात भी सहन नहीं कर सकता, पित्त को उग्र कर देता है-तथा ज्वर के प्रति विरक्त और सारक है ॥ २३० ॥ वैद्योने, कूष्मांड के शाक को कफकारक, गुरु, शीतल तथा शरीर को स्वर्णाभ- पीतकांति अर्पण करनेवाला माना है । यह पित्तप्रहारक, अमिप्रदीपक, चित्त-स्थैर्य- कारक, वीर्योत्पादक तथा भेदक है ॥ २३ ॥ कफ से रहित तुंबी (घीया, दूधी) तथा शिंबी (फूली) का कहां तक वर्णन करें ? बिवी गुरु ही है । शुक्र की वृद्धि तथा दाह के हास में इनके अतिरिक्त विश्व में अन्य कोई भी मान्य नहीं है ॥ २३२ ॥ कारवेल्ल (कारेला) वातहर, लघु, रक्तविकार और पित्त का नाशक, ज्वरहर, सारक, जठरानल का उत्तम प्रसारक, क्रिमिका कबल करजानेवाला, कफ और प्रमेह का प्रहारक तथा कटु-भाव का प्रकाशक माना गया है ॥ २३३ ॥ राजकोषातकी (गिलगिल तोयू) के समक्ष शीतल स्वभाव की दीक्षा ले । १-अतिसारम् । २-अग्निमान्यम् । ३-पित्तकर्तृत्व चास्य जीर्णविपयं, तेन 'हृद्यं रुच्य- मपित्तलम्' इति माववोक्त बालविषय न विरुध्यते । तयाहि सा वाला कफपित्तनी पक्का सक्षारपित्तला" इति। तन्त्रान्तरेऽपि-" तद्वाल कफपित्तन्न वृद्धं पित्तकर लघु ।" इति । ४-अननुरागि ज्वरन्नमित्यर्थः । ५-'घीया' 'दूधी' इति प्रसिद्धा । ६-'फली ७-'किन्दूरी, गीलोडा' इति । ८-शुक्रम् । ९-लघु ।
वर्ग] द्वितीयो गुच्छ । ७३ ज्वरमपहर कासं किं करोपि प्रकाशं दमय दवथुभीति राजकोपांतकीतः ॥ २३ ॥ कोपांतकी स्यात्तुहिनावशेपा सश्लेष्मदोपाऽपि लघुर्विपात् । वृष्य पैटोल ज्वरनाशलोलं कासापहं खण्डितवन्धगोलम् ॥ २३५ ॥ कर्कोटक कीर्तितमग्निकारि कासज्वरश्यासविकारहारि । हलासकुष्ठारुचिकटनाशि प्रभेदि पाके कटु शैत्यराशि ॥ २३६ ॥ अर्शसां विदधती क्षयमानं कुर्वती वलमलं कलयन्ती। जन्तुगुल्मविपपित्तविलासान् डोडिको विलसति क्षपयन्ती ॥२३७ ॥ अगस्त्यसून ज्वररोगमूनं करोति तिक्तं कफपित्तरिक्तम् । पुप्पं कदल्या गुरु रक्तकुल्यापित्तक्षयनं पवमानविघ्नम् ॥ २३८ ॥ कदलीमध्यमदण्डश्चण्डः पित्तास्त्रसंहरणे। प्रदरार्तिकालदण्डो मान्द्यमरोचं च खण्डयति ॥ २३९ ॥ विदोपकालं हिमभेदि वालं वृद्ध तु मूलं त्रिमलानुकूलम् । तटीयपन कफकच्चरित्रं पित्तस्य मित्र स्वगुणैः पवित्रम् ॥ २४० ॥ पित्त से शत्रुभाव तथा वात कफ से मित्र भाव रसे । ज्वर को हटा दें । दाह के भय का दमन कर दे तथा कास के प्रकाश को समेट ले ॥ २३४ ॥ कोपातकी (तुरई) सपूर्ण शीतल तथा क्फ दोष से युक्त होते हुये भी विशेषतया लघु है । पटोल (परवल) वृष्य, ज्वर नाशक, कासहर तथा विबन्धको दूर करनेवाला है। कर्कोटक (ककोढा) अग्निप्रदीपक, कास, ज्वर और श्वास विकार का विदारक, हल्लास, कुष्ठ और भरुचि के कष्ट का सहारक, भेदक, पाक से कटु तथा अत्यंत शीतल है। डोडीका अग्निवर्धक, भत्यंत बलकारक तथा अर्श, क्रिमि, गुल्म, विष और पित्त के विलास को खत्म करदेने वाली है। अगस्त्य-पुष्प ज्वर (विशेषतया चातुर्थिक) नाशक, तिक्त तथा कफ-पित्त हारक है । कदली पुष्प (केले का फूल) भारी, रक्त- सग्राहक तथा वात पित्त और क्षय को नष्ट करनेवाला है। केले के मध्यभाग का दड (कदली स्तंभ) रक्त-पित्त का प्रचढ सहारक, प्रदर रोग के लिये साक्षात् कालदड तथा अग्निमाद्य और अरुचि को खण्ड खण्ड कर देनेवाला है ॥ २३५-२३९ ॥ छोटी मूली गीतल, भेदक तथा त्रिदोष नाशक है। बडी मूली त्रिदोष करती है। मूली के पत्र अपने चरित्र से कफको काटनेवाले, पित्त के मित्र और गुणो से पवित्र १-'गिलगिलतोयू, गलकातूरिआ' इति च प्रसिद्धवल्लीफलशाकविशेष. । २-तद्भेद एव । ३-'परवल' इति प्रसिद्ध फलशाकम् । ४-'ककोडा' कारवेल्लाकृति । ५-अनेनैव नाना गुर्जरे प्रसिद्धा शास्त्रे तु 'जीवन्ती' इति । ६-रक्तप्रवाह । तेन रक्तपित्त-रक्ताति- सार-प्रदरादिहरमित्यर्थ । ७-उक्त च पलाण्डुराजशतके- “क्रमेलकानामुपरिक्रमेण विस्तार्य हसच्छदतूलकानि । आरुह्य दोषत्रयघस्मराणि प्रतस्थिरे वालक्मूलकानि ॥” इति । ।
सिद्धभेपजमणिमालायां [गाफ- अलं समीरः कफयुद्धवीरो वेणोः करीरः किल दाहधीरः । सौपण्यः सफण्डुः सकटुः सवह्निः स्याच्छूरणोऽकफकोपहन्ता ॥२४॥ अतीव वल्या रुचिदा वलासविबन्धविष्टम्भकदाटुकी' स्यात् । आलूनि भेदीन्यपि दुर्जराणि सश्लेष्मवातानि महावलानि ॥ २४२ ॥ वातध्वंसविशारदः कफकलासंवर्धकः शीतलो वल्यः स्वादुरसो न पित्तवहुलः प्रोक्त पलाण्डुर्बुधैः । पित्तार्शास्त्रककानिलग्रहणिकारुग्गलनं गृञ्जन तीक्ष्णोष्णं लघु तिक्तकं हुतवहप्रोहोधि संग्राह्यपि ॥ २४३ ॥ माने गये है। (वैद्य बृहस्पति श्रीकृष्णराम महाकवि कृत 'पलाण्डराजशतकम् ' मे मूली के काव्यमय शैली में उपवर्णित आयुर्वेदोक्त गुण धर्मों को अवश्य ही पढें, भिपग श्रेष्ठ श्रीलक्ष्मीरामने उन्हें अपनी टिप्पणी में नीचे उद्धृत भी किये है)॥ २४० ॥ वेणु के अंकुर वात को नष्ट करने में समर्थ तथा कफ युद्ध के विजेता वीर है। सूरण उप्ण, कण्हप्रद, कटु, भग्निप्रदीपक तथा कफ के कोप को नष्ट करनेवाला है। भालुकी (अरवी) अत्यत बलवर्धक रुचिकर तथा कफ, विवध और विष्टभ करनेवाली है। भालू भेदक होते हुये भी दुर्जर कफ-वात-कारक तथा अत्यत बलदायक है ॥ २४१-२४२ ॥ बुद्धिमान् वैद्योंने, पलाण्ड (प्याज) को, ‘वातविध्वसविशारद', कफ कला का सवर्धक, शीतल, बल्य रस मे मधुर तथा अधिक पित्त नहीं करनेवाला कहा है। (महाकवि श्रीकृष्णरामजी की 'पलाण्डुराजशतकम्' एक परमोत्तम कवितामय मौलिक कृति है। आयुर्वेदवाङ्मय मे इस तरह का यह प्रथम ही नूतन-तम काव्य १-'अर्शोघ्न सूरण कन्द.' इति कोश । उक्त च पलाण्डराजशतके पमर्शोवधवद्धदीक्षो विरूटशस्त्रवण करूंगाङ्गः । स सूग्ण सद्गुणपूरणश्रीरमुष्य नासीरमल. चकार ॥' इति । २-'अरी, अलवी' च । ३-एषामभक्ष्यत्वमुक्तं धनपतिमित्रै । तथा च तत्पाठ - "कन्दो बहुविधो लोकैरालुशब्देन भण्यते । कचालु चैव घण्टालु पिण्डाल शर्करादिकम् ॥ इड्ग्रेजैर्यत् समानीत विलातीपदपूर्वकम् । कोषादिपु न दृष्टं यद्गक्षितं चावि- वेकिमि ॥ निघण्टौ नास्य पर्याया न गुणा परिकीर्तिता । स्मार्तेरेतब्यवहृतमभक्ष्यं तद्धि- तार्थिभि ॥ साबूदाना यथाऽभक्ष्यस्तयैतत् कथितं बुधै । निजधर्ममजानद्भिहीत बालिश. व॒या ॥” इति । ४-'प्याज, डूंगली' इति प्रसिद्ध कन्दविशेषः । स च श्रीगुरुभि पलाण्डु राजशतकाभिधानेन विचित्रप्रवन्धेन वर्णित । तस्यान्तिमोऽयं श्लोक - "तदा प्रमृति वैदिक स वरवर्णिनीसस्कृत पलाण्डुरुपसेवित पटुचमत्कृति स्नेहत । चिर रुचिमुदञ्चयन बुरि रसायनाना स्थितो गदानहह सहरनिह दधातु कामं सताम् ॥” इति । ५-'सलगम इति ख्यात पलाण्डुभेदः । उक्तं च वाप्यचन्द्रेण-"गन्धाकाररसैस्तुल्यो गृञ्जनस्तु पलाण्डुना। सूक्ष्मनालाग्रपत्रत्वाद्भिद्यते तु पलाण्डत ॥” इति । अस्य नपुसकलिङ्गत्व चिन्त्यमिति । नाम- - वर्ग] - द्वितीयो गुच्छ.। दोपोत्सारिणि धीप्रसारिणि महानैवल्यसंहारिणि श्लेमच्छेदिनि वातमेदिनि भृशं भग्नास्थिसंमेलिनि । रक्तोद्रेकिणि पित्तहेलिनि लघावप्यौषधीनां गुरौ दुर्गन्धः सुगुणे किमत्र लशुने धातस्त्वया स्थापितः ॥ २४४ ॥ गुणेष्वेको दोषो वहुपु नियतं मजति यथा करेष्विन्दोरङ्कः श्रुतिरियमलीकेति कलये । तथा ह्युच्चैः पित्तं कफहृदमरुद्भेदि लशुनं महावृष्यं लोकैरसुरभितया त्यज्यत इह ॥ २४५ ॥ स्फट्या समं स्वेदनविप्रमुक्ततिक्तत्वनिम्बच्छदसिद्धशाकः । चलासपित्तज्वरकुष्ठजन्तुच्छर्दिप्रमेहारुचिग्गदन्नः ॥ २४६॥ है । भट श्रीकृष्णराम की लोकोत्तर प्रतिभा के जिज्ञासुभों से साग्रह निवेदन है कि वे इस सर्वाग रसमय काव्य का एकवार अवश्य पारायण करें।)॥ २४३ ॥ लशुन दोषो का उत्सारक, मेधा का प्रसारक, अत्यंत निर्बलता का सहारक श्लेग्मा का छेदक, वात का भेदक, भन्न अस्थियो का समेलक, रक्तवर्धक तथा पित्त का प्रेरक है । लघु होता हुआ भी औषधियों का गुरु है। (अपने गुणों के कारण गुरुवत् पूज्य है) इन भनेकविध उत्तम गुणो से युक्त लशुन में, हे विधाता' तू ने न जाने क्या यह दुर्गध दोप रख दिया है ?)॥ २४४ ॥ शास्त्र का यह वचन कि बहुत से गुणो मे एक दोप विलीन हो जाता है जैसे चंद्रमा की समुज्वल - किरणो मे उसका काला धब्बा-वह इस कलिकाल मे असत्य है । (महाकवि कालिदास ने अपने 'कुमार - सभव' महाकाव्य में कहा है कि-'एको हि दोपो गुणसन्निपाते निमजतीन्दो. किरणेष्विवा.' ग्रंथकार इसी भाव को यहा उद्धृत करते हुये लशुन में उक्ति चरितार्थ नहीं होती यह स्पष्ट करने के लिये कहते हैं कि) क्योंकि, लशुन पित्त का भेदक, कफ- का छेदक तथा वात का नाशक एवं परम वृष्य है। इतने गुणों से युक्त होते हुये भी यह अपने एक ही दुगंध-दोष के कारण जन-समाज से परित्यक्त है ।। २४५ ॥ नीम के पत्तो को स्फटी डालकर उबाल लेवें, इस तरह करने से उनकी कटुता जाती रहती है। इन पत्तों से सिद्ध किया गया शाक कफ, पित्त, ज्वर, कुष्ट, कृमि, वमन, प्रमेह, भरुचि तथा नेत्र-विकार को नष्ट कर देता है ॥ २४६ ॥ १-अस्यापि तत्रैव शतके वर्णनम् । यथा-" समन्ततो वर्मपिनद्धमर्मा विभन्मसधान- विधाविदग्ध । पफाण पीयूपपृपत्समुत्थो रस दधानो मिपता रसोन ॥” इति । २-"एको हि दोपो गुणसनिपाते निमजतीन्दो किरणे निवास' इति । कुमारसभवोक्तेराक्षेप । ३-दुर्गन्धि- तया। कार्यवशाद्भुक्तस्यास्य दुर्गन्धापनयनप्रकारो ग्रन्यान्तरोक्त “कुष्ठैलवालुकैलासुस्तक- वान्याकयष्टिमचुकवलः । हरति मुखपूतिगन्ध रसोनमदिरादिगन्ध च ॥” इत्यनुस्मर्तव्यः । यह सिदभेपरमणिमालायां [नेट- अरोचरस्ययकृतमिक्रिमिनभानले मगदप्रभशनः । रुक्षस्तथोग्णः सुरभी रजःप्रदः पोटीनकः कन्कविधी प्रास्यते ॥२४७ ।। क्षीरैः सहीजैः प्रतिभावितस्य संस्वेद्य चौतस्य मुर्जलेन । दना तथा हिडपटूपणाद्यैश्चमत्त स्याल्लवणस्य शाकम् ॥ २४८ ॥ पोदीना अरुचि, मुख की चिरमता, यकृत् - विकार, वमन, कृमि, वात और कफ को दूर कर देता है-यह रूक्ष, उष्ण, सुगधित तथा आर्तव - जनन है। इसका उपयोग चटनी आदि मे प्रशस्त है ॥ २४७ ॥ लवण को मुही क्षीर की तीन बार भावना दें-फिर पानी में पुन: पुन उकाल कर इसे प्रक्षालित करते रहे । अन्त में, दहि तथा हींग, मिरच, नमक, भादि ममाले मिला कर लवण-शाक सिढ कर लें । यह शाफ चमत्कार - पूर्ण गुण दर्शाता है ॥ २४८ ॥ अथ तैलम् । 'तैलं तैलं व्यवायि व्रणहृदपवन श्लेष्म चोष्णं विकाशि त्वग्गर्भागारशोधि प्रकटयति वलं केश्यचक्षुष्यवृप्यम् । मेध्यं मिष्टं प्रमेहक्रिमिजठरशिरःकर्णरुग्भग्नपथ्यं सूक्ष्मं तिक्तं कपायं सरमुरुदहनं रक्तपित्तप्रकोपि ॥ २४९ ॥ तीक्ष्णोष्णं लघु सार्षपं कटुरसं पित्तानसंदूपणं मेदोर्श कफमारुतश्रुतिशिरोरुक्कुष्ठकोठापदः । कण्डूजन्तुगणवणान् विजयते तैलं न पथ्यं दृशो राजीतैलमतीव तीक्ष्णकटुकं तद्वत्वर्या अपि ॥ २५० ॥ तैल-तिलका वैल व्यवायी, विकाशी, उष्ण, सूक्ष्म, तिक्त, कपाय, मधुर, मेध्य. केश्य, वल्य, चक्षुष्य, वृष्य, त्वच्य, गर्भाशय -शोधक, उर में दाह का उत्पादक, रक्तपित्तकारक तथा प्रमेह, क्रिमि, उदर, मस्तक और कर्णरोग में पथ्य है। सर्पपतैल तीक्ष्ण, उष्ण, लघु, रस मे कटु, रक्तपित्तदूपक, तथा मेद, अर्श, कफ, वात, कुष्ठ, कर्ण और मस्तक के रोग, कोट, खुजली, क्रिमि और व्रणसमूह का नाशक है। मालिश करने से तैल त्वचा तथा नेत्र को लाभ करता है। यही खाने से त्वचा तथा नेत्र को हानि- कारक है। राई का तैल अत्यंत तीक्ष्ण तथा कटु है। तुवरी का तेल भी गुणधर्म मे राई तैल के समान ही है। अलसी का तैल उष्ण रक्तपित्त प्रदूषक, कफकारक तथा १-प्रभजनो वायु पवमान प्रभञ्जन " इति कोशात् । २-'चटणी' इति प्रसिद्ध । ३-त्रिकृत्व इति शेप । ४-पुष्फलजले ससाध्येत्यर्थ । ५-शाकसस्कारप्रयोज्यत्वात्तदनु तैलगुणाभिधानम् । ६-तिलोद्भवम् । ७-त्वचः शुद्धिकरत्वमभ्यङ्गेन, न पानाभ्यासेन । त्वग्दोपपकृदचक्षुष्यम् ,” इति वाग्भटोक्ते । ८-पश्चिमार्णवतीरजो वृक्षविशेषः । . . । .
वर्ग:] ७७ द्वितीयो गुच्छ.। तैलं त्वतस्याः पवनप्रकम्पि कफास्त्रपित्तप्रदमुष्णमुक्तम् । ऐरण्डमुणं सरमामवातकोष्ठार्तिगुल्मज्वरशोथसादि ॥ २५१ ॥ रालस्य तैलमकफानिलकुष्ठपामा- विस्फोटकं गुरु कुसुम्भभवं सदोषम् । अन्यत् स्वयोनिसदृशं गुणतः प्रदिष्टं श्रीवाग्भटेन तदिहापि विचारणीयम् ॥ २५२ ॥ वातनाशक है। एरण्ड तैल उष्ण, सारक तथा आमवात, कोष्टगत विकार, गुल्म, ज्वर और शोथ को नष्ट करनेवाला है। राल का तैल कफ, वात, कोढ, पामा और विस्फोट को दूर करता है तथा भारी है। कुसुभतैल त्रिदोषकारक है। जो तैल जिस द्रव्य मे से निकाला गया हो वह तैल उसही द्रव्य के गुणधर्म के समान होता है। 'तैलं स्वयोनिवत् ' यही वाग्भट का मत है ॥ २४९-२५२ ॥ । अथ दुग्धादि । मदभ्रान्तिश्वासानिलरुधिरपित्तप्रशमनं गरिष्ठं संदिष्टं तुहिनमतिमिष्टं कफकरम् । क्षये क्रुद्धं स्निग्धं रचयति विवुद्ध मनसिजं सुधामुग्धं दुग्धं वलविधिविदग्धं पिव विभो ॥ २५३ ॥ पयः पीत्वा पीनो भव कफविलासाञ्छ्रय लभ प्रभां पित्तातर् जहिहि वहु दूरं क्षिप जराम् । शतं स्त्रीणां शश्वद्रमय शमय प्रौढमनिलं धियं तीक्ष्णां धेहि प्रकटय शरीरे निविडताम् ॥ २५४ ॥ गवां दुग्धं स्निग्धं कफि गुरु सरं जीवनतरं मरुत्पित्तच्छेदि श्रममदविदाहभ्रमहरम् । दूध आदि -मद, भ्रांति, श्वास, वात और रक्त - पित्तविकार का शामक, कफ- "''कारक, क्षयनाशक, कामप्रबोधक, गरिष्ठ, शीतल, अत्यत- मधुर, स्निग्ध, बल देने मे निपुण तथा सुधा को भी मुग्ध करनेवाले दुग्ध का, हे भगवन् ! आप पान करें। दूध का पान करके पुष्ट होइये, कफ के विलास-केन्द्र बनिये, तेज प्राप्त कीजिये, पित्त के आतक को नष्ट करिये, वृद्धावस्था को सुदूर फेक दीजिये, शतरमणियो के साथ रमण कीजिये, प्रवृद्ध वात को दबा दीजिये, बुद्धि को तीक्ष्ण कीजिये, तथा शरीर मे दृढता प्राप्त करिये ॥ २५३-२५४ ॥ १-अलसी' इति प्रसिद्धाया । २-तद्विदाहप्रशान्यर्थ भोजनान्ते पय पिबेत्' इति नियमस्मरणादुग्वगुणा , तत्साहचर्याच सतानिकादधितकादेश्च गुणा प्रोच्यन्ते । ३-क्षये अद्ध क्षयन्नमित्यर्थ । ४-कामम् ।
सिन्ठभेपजमणिमालायां [ दुग्धादि- विपास्त्रघ्नं जीर्णज्वरविजयि रेतो वितनुते हिमं बल्य स्तन्यं प्रचुरयति कृच्छ्रे शमयति ॥ २५५ ।। कृष्णायाः पवनापहं गुणकरं पीतप्रभाया मरु- मायुर्हन्ति विचित्ररक्तवपुपो धेनोरवातं पयः। शुक्लायाः कफि कि च वत्सवियुजो दोपत्रयीदूपकं वल्यं वाकयिणीभवं त्रिमलजित् संतर्पणं भेद्यपि ॥ २५६ ॥ शीतं स्याहरु माहिपं वहुवलं नुस्वाभिप्यन्धलं निद्राशुक्रहुताशमार्दवकरं गच्यादतिस्नेहलम् । छागक्षीरमदोपलं लघु हिमं संग्राहि पित्तास्त्रट्- कासश्वासमदक्षयज्वरगदप्रोत्सारि सर्वोत्तमम् ॥ २५७ ॥ गाय का दूध स्निग्ध, कफकारक, गुरु, सारक, जीवनीय, वात-पित्तका छेदक, श्रम, मद, विदाह और भ्रम का नाशक, वीर्य -वर्धक, विष, रक्त-विकार तथा जीर्ण ज्वर को नष्ट करनेवाला, गीतल, वल्य, अत्यंत स्तन्य तथा मूत्रकृच्छू शामक है। कृष्ण गाय का दूध वातशामक तथा गुणकारक है । पीतगाय का दूध वात- पित्त - शामक है। चित्रित तथा रक्ताभ गाय का दूध वातहर होता है। श्वेत- गाय का दूध कफकारक तथा जिस का वत्स मर गया हो उसका दूध त्रिदोपकारक कहा गया है। बाखडी गाय का दूध वलकारक, सतर्पक, भेदक तथा तीनो दोपों को दूर करने वाला है ॥ २५५-२५६ ॥ भैस का दूध शीतल, भारी, अत्यत-बल-कारक, मधुर, अभिष्यदी, निद्राप्रद, शुक्रल, जठरानल की तीक्ष्णता को मंद करने वाला तथा गोदुग्ध की अपेक्षा अधिक स्नेहयुक्त होता है । ( गाय के दूध की अपेक्षा भेस के दूध में अधिक-स्नेह होता है गव्यात् स्निग्धतर गुरु' - यह सुश्रुत का मत है। चरक मतानुसार भेस के दूध की अपेक्षा गाय का दूध अधिक स्नेहवाला कहा गया है । यह परस्पर विरुद्ध कथन है। खरनाद भी गोदुग्ध मे माहिप-क्षीर की अपेक्षा, अधिक स्नेह मानते है। 'गव्य स्नेहोत्तमं क्षीर, गव्याच्च पयस. पयः। यथोत्तर स्नेहहीनं औरभ्रच्छागमाहिषम् ॥ १-मृतवत्सायाः। २–'बाखडी' इति ख्याताया धेनोर्दुग्वमिति । ३-गव्यदुग्धमपेक्ष्य महिषदुग्धे मानत स्नेहाधिक्यमित्यर्थ , तथैव प्रत्यक्षसिद्धत्वात् , “स्निग्धतरम्” इति सुश्रुतदर्शनाच्च । न च तथात्वे चरकविरोव । 'महिषीणा गुरुतर गव्याच्छीततरं पय । स्नेहादूनमनिद्राणामत्यमीना हित च तत् ॥” इति । यत स्नेहादूनमित्यस्यार्थविवेचनाया माहिषस्य स्नेहोनत्व हृद्यादिगुणविषयम् । महिषीक्षीरजात् स्नेहाद्व्यक्षीरज स्नेहो हृद्यादि- भिर्गुणैरधिक इत्यर्थ " इति हेमाद्रि । तस्मादत्र गव्यस्नेहादूनमिति योज्यम् । तेन महिषीक्षीर गव्यस्नेहाद् हृद्यादिविपये न्यून हीनं, गव्यक्षीरात् पुन स्नेहे विषयेऽधिकमे- वेत्यर्थ" इति च चन्द्रिकाकार । . ।
७९ . . वर्ग] द्वितीयो गुच्छ.। सुधावद्धारोष्णं त्रिमलहरमुणं न हि पयः स्मृतं धाराशीतं भवति गुरु पीतं त्रिमलकृत् । अभिष्यन्दि त्वामं गुरु कफि कृतामं पुनरिदं शतोष्णं वातघ्नं जितदवथुविघ्नं स्मृतिकरम् ॥ २५८ ॥ सितासहायं कफि वातहारि शृतं सितायुक्तमदोपि वृष्यम् । पित्तं कर्फ वा तरलीकरोति पयो गुडाढ्यं विनिहन्ति कृच्छ्रम् ॥२५९ ॥ वल्यं प्रभातेऽग्निहर कफाय मध्याह्नकाले कफवातवाधि। प्रायोऽपराहेऽनिलनुन्निशायामायु प्रदं रोगहरं वलाय ॥ २६० ॥ अर्धाम्बु दुग्धमवशिष्टपयोविभाग दोपापहं लघुतरं वरमामनन्ति । नीरं विना बहुशतं सघन यदास्ते मन्दाग्नि तत्तु वलकारि सर ससारम् ॥ २६१ ॥ फणामि फेन' पयस. समीरवलासपित्तात्रनिरासशूरम् । क्षये विरेकेऽग्यरुचौ स्वरेऽपि कृशेऽपि वृद्धेऽपि शिशौ प्रशस्तम् ॥२६२॥ सभव है चरक कालीन गाय के दूध में अधिक सेह उतरता रहा होगा। बकरी का दूध त्रिदोप-हर, लघु, शीतल, सग्राही तथा रक्त पित्त, प्यास, कास, श्वास, मद क्षय भार ज्वर का नाश करनेवाला तथा सर्वोत्तम माना गया है ॥ २५७ ॥ धारोष्ण दूध (माताके स्तनकी तरह सीधा मुंहद्वारा पीया गया) अमृततुल्य गुणो से युक्त होता है । जो दूध दुह लेने पर शीतल हो गया हो, वह धाराशीत कहलाता है। गाय का धारागीत दूध भारी तथा तीनो दोषो को प्रकुपित करनेवाला होता है । कच्चा दूध अभिप्यदी, भारी तथा कफ और आम को बढानेवाला है। गरम किया हुभा दूध वात और दाह का नाशक तथा स्मृति देने- वाला कहा गया है। दूध को गरम करके तदुपरात शक्कर मिलाकर पीने से कफ की वृद्धि तथा वात का हास होता है । शक्कर के साथ उकालकर गरम किया गया दूध त्रिदोष शामक तथा वृष्य माना जाता है। गुड-युक्त दूध कफ पित्त के प्रभाव को • मिटाता तथा मूत्रकृच्छ्र को नष्ट करता है। प्रातःकाल मे दूध का सेवन, अग्नि को मद करनेवाला तथा कफवर्धक कहा गया है। दूध में, उससे माधा जल डालकर उकाले जलभाग नि शेष होने पर, अवशिष्ट दुग्धभाग, दोषनाशक, अत्यत हलका तथा उत्तम होता है । बिना जल के ही खूब औटाया गया मलाईवाला दूध मंदाग्नि करनेवाला, बलदायक तथा सारक होता है ॥ २५८-२६१ ।। धारोष्ण दूध को मथकर निकाला गया फेन वात, कफ, तथा रक्त-पित्त को १-मुखमेव यस्य पात्रम् । २-रवडी' इति प्रसिद्धम् । ३-सन्तानिकासहितम् । ४ वारोष्णदुग्धज, रात्रावाकाशे चन्द्रनक्षत्रशीतीकृतस्य पयस. प्रातर्मन्थनदण्डेन युक्त्या समुत्यापितं वा।
सिद्ध पजमणिमालरायां [दुग्धादि- जातीजातीफललाघुसृणपरिचयां मातुलानीं विनीय क्षीरे पादांशनीरे परिपचत समुल्लोलदोलाधिरूढाम् । क्षीरस्यार्धावशिष्टां स्थितिमनुभवतः शर्कराठ्यस्य साय स्फारा द्विस्त्रिः कटोराः पिवत यदि चिरं चन्दितं युप्मदिच्छा २६३ दानादग्नेरुत्फणदुग्धमाः काहीशाखाकूर्चकैश्चालनेन । लब्ध्वा साम्यं सिद्धगोधूमचूर्णैर्धत्ते सर्पिःखण्डतो लड्भावम् ॥ २६४ ॥ सायं भृत्वा कनकलशी क्षीरसंतानिकाभ्या- मास्ये तस्याः सुपिरसुपम मल्लकं चापि धृत्वा । कोष्णैरच्छच्छगणभैसितैरागलं संपिधेहि प्रातर्वृप्यां रसय सितया सान्द्रसंतानिकों ताम् ॥ २६५ ॥ किंचिद्विपाचयित्वा सर्पिपि संतानिकां सान्द्राम् । मजय रैसे सिताया निवेद्य देवाय मात्रया भुव ।। २६६ ॥ नष्ट करने मे शूरवीर एव क्षय, अतीसार, अरुचि और ज्वर में तथा कृग, वृद्ध और वालक सभी के लिये प्रशस्त है ॥ २६२ ॥ भाग में जावित्री, जायफल, इलायची तथा केसर यथामात्रा मिलाफर दोलायंत्र मे रख उसे दूध में उससे चतुर्थांश पानी मिलाकर, खूब औटावें । फिर भनुमान से यह जानकर कि अब दूध ओटकर आधा रहगया है उसे उतारलें । यदि दीर्घ काल तक की आनन्दमयता प्राप्त करनी हो तो गक्कर युक्त इस दूध के छलकते हुये दो तीन कटोरे सायंकाल को पीये ॥ २६३ ॥ अग्नि पर खूब उकलते हुये दूध को बला की ताजी मोटी टहनी से जल्दी जल्दी हिलाते रहें । इस तरह करने से दूध, सिद्धगोधूम चूर्ण जैसा सुर्ख हो जायगा। इसमें घी और शक्कर मिलाकर लड्डु बनाले । इसे दूध का चूरमा कहते है ॥ २६४ ॥ सायंकाल को स्वर्ण कलश में दूध की मलाई भरकर उसके मुख को छिद्रपूर्ण मालसे से ढकदें। इस कलश को सरकडो की गरम गरम भोभल में भाकठ १-जावन्त्रिका २-कुडमम् । ३-भङ्गाम् । ४-'कटोरा' इति प्रसिद्धान् पात्रविशे- पान् । “कटोरा स्त्री खनामख्याते पात्रे' इति ब्रह्मवैवर्तपुराणम् । जैमिन्याश्वमेधिके पर्वणि नवमाध्यायेऽपि-"रम्यान्न देवकीदत्त पात्रे काश्चननिर्मिते। कटोराणा चतु पष्टि पात्रस्योभयत स्थिता ॥” इति 'कटे ओलच् । रलयोरैक्यम्' इति चिन्तामणि । ५-अनेनैव नाम्ना प्रसिद्धो बलाभेद । ६-'दुग्धका चूरमा' इति प्रसिद्धम् । ७-वल्लभसाप्रदायिकै क्रियामाणोऽयं प्रकार । ८-'वचने का दरिद्रता' इति भाव । ९-'मालसा' इति प्रसिद्धमावरकं मृत्पात्र- विशेपम् । १०-'भोभल' इति प्रसिद्ध । ११-प्रातराशसमये, न तु प्रातरेव श्लेष्मभयात् । १२-चाताम मजम वणी 'मलाई'नाना सनाख्याताम् । १३-'चासनी' इति लोकप्रमिद्धे । ।
. वर्ग] द्वितीयो गुच्छ.। भापूरित कर देवें । प्रातःकाल इस वृष्य गुणयुक्त घट्ट बनी हुई मलाई को सिता- निर्मित चासनी में डालकर भगवान को निवेदित करके फिर यथामात्रा इसका सेवन करें। (वल्लभसप्रदाय में वस्तुतः रजतकला में तथा स्वर्णकलश में भी उपरोक्त 'सतानिका' सिद्ध होती है । मत टिप्पणीकार की इस उक्ति 'वचने का दरिद्रता' को 'वचने यथार्थता' इस अर्थ में समझे ।) ॥ २६५-२६६ ॥ दधि। दध्युप्णं गुरु दीपनं कफकरं पित्तास्त्रशोथप्रद स्वाद्वम्लं तुवरं रुचिप्रदमभिष्यन्यस्ति संग्राहकम् । गव्यं तत्र वरं विपाकमधुरं वल्यं पवित्रं परं वातोन्माथ्यथ माहिपं कफि बहुस्निग्धं मरुत्पित्तनुत् ॥२७॥ आज दधि ग्राह्यमलं लघूक्तं श्वासक्षयार्शःकसनानि हन्ति । सितासहायं मधुरं पिपासापित्तास्रदाहक्षपणं क्षयनम् ॥ २६८ ॥ ससारं नक्षारं दधिपवनपारं रचयते सभारं धिक्कारं प्रकटयति होऽरं हि दवथौ । असारं नो सारं जठरजविकारं स्यति रुचि- प्रसार संहारं लघु मलविहारस्य कुरुते ॥ २६९ ॥ दधि-दही उण, दीपन, कफहर, रक्त-पित्त और शोथ करने वाला, मधुर, अग्ल, कपाय, रुचिकर, अमिप्यदी तथा ग्राही है। गाय का दही सभी प्रकार के दही मे अधिक गुणयुक्त कहा गया है। यह विपाक मे मधुर, वत्य, वातहर तथा परम पवित्र माना जाता है। माहिप दही कफकारक, अत्यत स्निग्ध तथा वात- पित्तनाशक है । बकरीका दही ग्राही, त्रिदोप-नाशक तथा लघु है। यह श्वास, क्षय, भर्श और सासी को दूर करता है । शकर युक्त यही दही मथुर तथा पिपासा, रक्त-पित्त विकार दाह और क्षय का नाश करने वाला होता है। मारसहित दूध का दही पवन को उस पार धकेलनेवाला तथा दाहको भारसहित (गुरु, भारी) हा। पूर्वक प्रचुर धिकार देनेवाला है। असार दूध का दही मनुष्य के जठरजन्य विकार को तोडता है तथा रुचि का प्रसार और लाघवतापूर्वक मतीसार का सहार करता है ॥ २६७-२६९॥ तक्रम् । तकं ग्राहि कपायमॉलमधुरं वीर्योष्णमग्निप्रदं दोषप्लोपि लघुप्रियं ग्रहणिकाकृच्छ्राश्मदुर्नामजित् । तक (छाछ) ग्राही, कपाय, अम्ल, मधुर, वीर्य मे उष्ण, अग्निप्रद, त्रिदोष- नाशक तथा लघु है। यह ग्रहणी, मूत्र-कृच्छ और अर्श को नष्ट करता तथा पाण्ड, १-गुरु । २-हा अरम् इति च्छेद । ३-अग्निमान्द्यादिकम् । ४--'षोऽन्तकर्मणि' इत्यस्य रूपम् । ५-अतिसारस्य । - सि०६ ८२ N सिद्धभेषजमणिमालायां [नवनीत- पाण्डुप्लीहगदप्रमेहजठराजीर्णोग्रगुल्मक्षय- व्यापार निरुणझ्यथो दधिसमं जानीहि शेषं गुणैः ॥ २७० ॥ सुरैः सदैव स्पृहणीयमच्छप्रभोज्वलं सारनिधानमेकम् । भिनत्ति दोपान भजतां जनानां शक्रोपमं तक्रमुदाहरामि ॥ २७१ ॥ कपित्थमध्यस्य रजांसि सप्तकृत्वः पयोभिः परिभावितानि । निक्षिप्य नीरे मथितानि वाढं तकं किमद्धा न विडम्वयन्ति ॥ २७२ ॥ प्लीहा, प्रमेह, उदर, उदावर्त, उग्र गुल्म, अजीर्ण तथा क्षय के व्यापार को रोकता है। अपने अन्य गुणों मे यह दही के समान ही माना जाता है ॥ २७० ॥ देवताओ को सदैव स्पृहणीय, श्वेत (इन्द्रपक्ष मे प्रकाशमान प्रभा-मडलसे युक्त), सार (बल) का एकमात्र निधान तथा अपने सेवन करने वालो के (भक्तो के) दोषो को (दारियादि दोपो को) हटानेवाला तक्र, गक्र (इन्द्र) के समान ही है ॥ २७१ ॥ कृत्रिम तक बनाने की विधि-कपित्थ के मध्य भाग-गत गूदे को सुखाकर उसका चूर्ण बनाले । इस चूर्ण मे दूध की अथवा बोल की सात भावनायें दे। इस तरह भावित चूर्ण को जल मे डालकर खूब मथकर छाछ बनाले । यह छाछ असली छाछ को भी परास्त करती है ॥ २७२ ॥ नवनीतम् । टीपनं सुरभिज नवनीतं रक्तपित्तपवनान् यति शीतम् । ग्राहि वीर्यवहुलं जितकासं शस्तमर्शसि तनोति विकाशम् ॥ २७३ ॥ नवनीतं गुरु गीतं वातश्लेष्माणमुद्धरं धत्ते । महिपीसम्भवमुच्चैः शुक्र विस्रस्तपित्तास्रम् ॥ २७४ ॥ नवनीत-गाय का मख्खन दीपन, रक्तपित्त और वात का नाशक, शीतल, ग्राही, वीर्य - वर्धक, कासहर, अर्श मे प्रगस्त तथा तेजको बढाने वाला है। भैंस के दूध का मख्खन भारी, कफ-वात कारक, शुक्रल तथा रक्त- पित्त शामक है ॥ २७३-२७४ ॥ । १-श्वेतम् , पक्षे प्रकाशमानप्रभामण्डलम् । २-सघृतम् । ३-वातादीन् , पक्षे दारियादीन् । प्रसगात्तत्रान्तरीय तक्रवर्णनं लिख्यते-“कैलासे यदि तक्रमस्ति गिरिश किं नीलकण्ठो भवेद्वैकुण्ठे यदि कृष्णतामनुभवेदद्यापि कि केगव । इन्द्रो दुर्भगता क्षय द्विजपतिर्लम्बोदरत्वं गण , कुष्ठित्व च कुबेरको दह्नतामग्निश्च कि विन्दति ॥” इति । ४-कृत्रिमतककरणस्य प्रकार । ५-दुग्धे । घोलेनापि कपित्यगर्भसस्कार इति प्रकारा- न्तरम् । ६-गव्यम् । ७-'दो अवखण्डने' इत्यस्य स्पम् ।
वर्ग.] द्वितीयो गुच्छ । ८३ घृतम् । विपाकमधुरं वरं दवथुदारि गव्यं घृतं प्रभञ्जनजयि प्रभामतिविकाशि वृष्यं स्मृतम् । वलासि महिपीघृतं रुधिरपित्तवातापहं हितं कसनसंकटे सुखकदाजमाज्यं दृशोः ॥ २७५ ॥ घृत-गाय का घृत सभी घृतों मे उत्तम, विपाक मे मधुर, दाह-शामक, वात- विनाशक, वृष्य तथा शरीर की काति का अभिवर्धक है। भैंस का घी कफ - कारक तथा रक्त-पित्त और वात- नागक है। बकरी का घी कास के कष्ट मे हितकर तथा नेत्री को आरोग्यप्रद है ॥ २७५ ॥ गोमूत्रम् । गोमूत्रं कटुतिक्ततीक्ष्णतुवरक्षारोष्णलध्वग्निदं मेध्यं पित्तकरं कफानिलहरं गुल्मोदरानाहहत् कण्डूशूलमुखाक्षिरोगकसनश्वासोग्रकुष्टक्रिमि- क्लेशप्लीहविवन्धपाण्डुगररुक्पामामशोथप्रणुत् ॥ २७६ ।। गो-मूत्र कटु, तिक्त, उष्ण, तीक्ष्ण, कपाय, क्षार-युक्त, लघु, अग्नि-प्रदीपक, मेध्य, पित्तकर तथा वात-कफहर है। यह गुल्म, उदर, आनाह, खुजली, शूल, मुख तथा नेत्र के विकार, कास, श्वास, उग्र कुष्ट, क्रिमि-पीडा, प्लीहा, विवन्ध, पाण्डु. गर-वेदना, पामा, मामवात तथा शोथको दूर करता है ॥ २७६ ॥ इक्षुः। संचूपितः पवननुल्लघुरिक्षुरनपित्तश्रमभ्रमविमोहविदाहहारी। स्वादुः सितेव रसतः कफमान्धमारी गीतःसरोऽधिकगुणो वलवीर्यकारी॥ ग्राही कफाढयो रस आम इशूद्भवः समारोऽथ सरोऽग्नितप्तः । विदाहि सुस्वादु गुरूष्णमक्ष्णोर्न शर्मद फाणितमाहुरायः ॥ २७८ ॥ इक्षु (गन्ना)-चूसा हुमा गन्ने का रस वात -हर, रक्तपित्त, श्रम, भ्रम, मोह और दाह का नाशक, मधुर, रस में शक्कर के समान तथा कफ - कारक, शीतल, सारक, १-दुग्वादिभि सहैक्योनित्वाद्गोमूत्रगुणा । २-दुग्धवर्गे सितासहायमित्युपदिष्टम् , अतस्तदनन्तर सितोपादानस्येक्षोर्गुणा गण्यन्ते । स च बहुविध , उक्त च तन्त्रान्तरे- पौण्डूको भीरुकश्चापि वशक शतपोरक । कान्तारस्तापसेक्षुश्च काण्डेक्षु सूचिपत्रक । नैपालो दीर्घपत्रोऽपि नीलपोरोऽय कोशकृत् । इत्येता जातयस्तेपा गुणा बोध्या ययास्थलम् ।" ३-द्वितीयमिक्षुविकारम् । विकाराश्चास्य-"लसीका-फाणित-गुड-खण्ड-मत्स्यण्डिका-सिता । निर्मला लघवो ज्ञेया शीतवीर्या ययोत्तरम् ॥” इति । ~ सिद्धभेपजमणिमालायां [मधु- खण्डों विखण्डयति मारुतमायुदाहान् का हानिरक्ष्णि भजतां तुहिनः सरोऽपि । श्वेतोपलाऽनिलवसिज्वररक्तपित्त- दाहानिहार्दयति सौम्यगुणा सशुक्रा ॥ २७९ ॥ नवः क्षारः स्वादुर्गुरुरनलदो वातमथनो- ऽत्यभिष्यन्दी पित्तं कफरुधिरमौष्ण्यं द्रढयति । पुराणः पित्तघ्नः प्रथयति पृथुत्वं हुतभुज- स्तुषारो दोषघ्नो लघुरपि वलं यच्छति गुडः ॥ २८० ॥ गुणों में अधिक तथा बल और वीर्य का वर्धक है। गन्ने का, यंत्र-निष्पीडित कच्चा रस ग्राही तथा कफकारक है । अग्नि से पकाया हुआ रस भारी, सारक, विदाही, मधुर, और उष्ण है - फाणित (राब) नेत्रों को अपथ्य है ॥ २७७-२७८ ॥ खण्ड (खांड) वात-पित्त तथा दाह को खंडित करनेवाली, नेत्रो को हितकारी, शीतल और सारक है। श्वेतोपला-मिश्री (सिता) वात, वमन, ज्वर, रक्तपित्त तथा दाह को मिटाती है । सौम्य - गुणो से युक्त तथा शुक्रल है ॥ २७९ ॥ नूतन-गुड कुछ क्षार-गुण-युक्त, मधुर, गुरु, अग्नि-वर्धक, वात - नाशक, अत्यंत अभिष्यंदी, उष्ण तथा पित्त, कफ और रुधिर को दृढ करता है। पुराना गुड पित्तहर, अग्नि-प्रदीपक, शीतल, त्रिदोष- नाशक तथा लघु होता हुआ भी बल- वर्धक है ॥ २८० ॥ . मधु। मधु लघु मदश्वासालार्शस्त्रिदोषवमिक्रिमि- क्लमकसनतृण्मेदोमेहारुचिक्षयकुष्ठजित् । हरति मधुरं मान्द्यं हिक्कां विदाहहरं हिम स्वरबलकरं रूक्षं ग्राहि प्रभामतिदं परम् ॥ २८१ ॥ मधु (शहद) लघु, मधुर, शीतल, रूक्ष, ग्राही, अग्नि-वर्धक, स्वयं और वृष्य है। यह मद, श्वास, रक्त विकार, अर्श, त्रिदोष, वमन, क्रिमि, क्लम, कास, प्यास, मेद, मेह, रुचि, क्षय, कुष्ट, हिक्का और विदाह का नाश करता है। यह अत्यंत मेध्य १-माधुर्यात्तथा मधुनोऽपि शर्करा जायते इत्यतस्तदनु मधु प्रस्तूयते। २-चरके मधुनो गुरुत्वमत्र लघुत्वं, गुरुत्व गुणेन, लघुत्व पाकेनेत्यविरोध । चरको गुरुलघुगुणावे- वेच्छति, सुश्रुत पाकावपि । तत्र यच्चिरेण पच्यते तद् गुरुगुण, यच्छीघ्रं तल्लघुगुणम् । यत्पक्कं विण्मूत्र सृजति लेष्माणं करोति तद्गुरुपाक, यद्विणसूत्रे ,गृह्णाति वायुं करोति तल्लघु- पाकम् । ३-इयं पुनरत्र बृहती विप्रतिपत्ति । चरक खलु “वातल गुरु शीत च" इत्या- दिना ग्रन्थेन मधु वातल व्याजहार, कथमत्र त्रिदोषजिदुक्तमिति ? नैवं, चरकवचनमससृष्ट- वर्ग] द्वितीयो गुच्छ.। तथा वर्ण को उत्तम करनेवाला माना जाता है । (ग्रंथकारने मधु को त्रिदोष नाशक कहा है । सुश्रुत ने भी मधु को त्रिदोष शामक माना है। चरक मधु को 'वातलं गुरु शीतं च' वातल बताते है। यही वाग्भट का मत है-'चातल मधु' । ग्रंथकार और सुश्रुत तथा चरक और वाग्भट से परस्पर जो विरोध भासता है-वह केवल विषय-भेद को लेकर । हेमाद्रि ने इसका युक्ति-युक्त निर्णय किया है । वस्तुत , केवल वात-दोष मे, केवल मधु का प्रयोग वातवृद्धि करेगा, किंतु पित्तादि-दोषों से सश्लिष्ट वायु को वातन-द्रव्यो से युक्त मधु, अवश्य नष्ट करेगा। शुद्ध वायु को नहीं, कितु पित्तयुक्त भथवा कफयुक्त अथवा कफ पित्त युक्त वायु को, मधु अवश्य दूर करता है। इसी भभिप्राय को लेकर प्रथकार भौर सुश्रुत ने मधु को त्रिदोषशामक कहा है।)॥२८१॥ - जलम् । सामान्यमम्बु मदमोहविदाहनिद्रातन्द्राश्रमलमवमिभ्रमतर्षधर्पि । मन्दाग्नयजीर्णगलरोगविनाशि शीतं संजीवनं लघुनिलीनरसंप्रहर्षि २८२ तोयं तटिन्यास्तनुते समीरं रूक्षानभिष्यन्दि कृशानुकारि । कटु प्रपाके विशदं सुमिष्टं कफ सपित्तं कवलीकरोति ॥ २८३ ॥ जल -सामान्य रूप से जल मद, मोह, विदाह, निद्रा, तंद्रा, श्रम, कुम, भ्रम, तृपा, मदाग्नि, अजीर्ण और कंठ-रोग का विनाशक, शीतल तथा लघु है। जल मे छहों रस अव्यक्तरूप से स्थित है। यह आल्हाट जनक तथा प्राणि-मात्र के लिये सजीवन है ॥ २८२॥ गगा आदि नदियो का जल वातकारक, रूक्ष, अनभिष्यंदी, अग्निवर्धक, पाक मे कटु, विशद, मधुर और कफ को पित्त सहित नष्ट करनेवाला होता है। निर्झर का जल रुच्य, अग्नि-प्रदीपक, रूक्ष तथा कफहर है। (पृथ्वी की सतह को फाडकर निकला हुमा जल - औद्भिद जल कहलाता है) औद्भिद -जल पित्तन, शीतल, पवित्र वातविषयम् , अत्र तु ससृष्टवातविपयत्वेन त्रिदोपजिदिति विपयभेदात् । तथा च सुश्रुत "त्रिदोषशमनम्" इत्यारभ्य "तत्तु लघुत्वात्कफनं पैच्छिल्यान्माधुर्यात्कषायभावाच्च वात- पित्तनम्" इति । कि च यत्र शुद्धो वायु शुद्धं मधु तत्र वातलत्वं, यत्र वातघातिभिर्मिश्र मधु पित्ताद्यैर्वा मिश्रो वायुस्तत्र वातघ्नत्वम् , उभयोर्योगवाहित्वात् । सुश्रुतेन हि पित्त- श्लेष्मन्नत्व पठित्वा त्रिदोपशमनं पठता पित्तश्लेष्माणौ शुद्धौ वातमिश्रौ वा वायु मिश्रमेव मधु हन्तीति चोतितम्' इत्यायुर्वेदरसायनम् । बोपदेवेन तु म पित्तकफनवातोदासीनवर्ग- मध्ये पठितम् । तत्पाठस्तु विस्तरभयादुपेक्षित इति । १-सर्वद्रवपारिशेष्यादधुना जल जल्प्यते। २-जीवनहेतुत्वात् । यदुक्तम् “जीवन जीविना जीवो जगत्सर्वं तु तन्मयम् । अतोऽत्यन्ततया सुज्ञो न क्वचिद्वारि वारयेत् ॥ इति । ३-अव्यक्तषड्रसमित्यर्थ । ४-गझादिनद्या ।
- वातलं सिहभेषजमणिमालायां [जल- रुच्यं नैरमम्बु दीप्तिजननं रूक्ष वलासापहं पित्तघ्नं हिमेमौद्भिदं शुचि लघु स्यात् सारसंश्लेप्मलम् । ताडोगं कटु लघु हिमं वाप्यं मरुच्लेष्मजित् स्वादुम्लेष्महृदग्निकारि रुचिद स्वल्पानिलं चौड्यजम् ॥ २८४ ॥ पानीयं स्वादु कोपं त्रिमलनुदनलोद्वोधि पथ्यं प्रदिष्टं शीतं स्वच्छं कपायं त्वथ लघु विकिरें दोषविश्लोपदक्षम् । कैदार्य पाल्वलं वा जलधिजमथ वा गुभिष्यन्द्यपथ्यं मिष्टाम्भोधेस्तु पथ्यं लघुगुणममलं श्रूयते शुक्रकारि ॥ २८५ ॥ प्रतिश्याये श्वासे ज्वररुजि विरेके सतिमिरे ग्रहण्यां गुल्मातौ व्रणजठरहिकाप्रभृतिषु । शृतं तोयं शस्तं मरुति वहुपित्ते कफगदे क्रमादेवैकद्वित्रिलवपरिहीनं सुखकरम् ॥ २८६ ॥ और हलका होता है। सरोवर का जल कफ-कारक, तडाग-जल कटु, वातल, लघु तथा शीतल, वापी का जल वात-कफ-नाशक तथा चौड्य जल स्वादु, कफहर, अग्नि-प्रद, रुचिकारक तथा किचित् वात प्रकोपक है। (ऊंचे-प्रदेश से आया हुआ तथा निम्न भूमि मे शिलादि से बद्ध किया गया जल 'ताडाग' जल कहलाता शिलादि से विना बाधा गया सहजही प्राप्त होनेवाला, 'चौड्य'-जल होता है।) कूप-जल स्वादु, त्रिदोषनाशक, अग्नि-प्रदीपक तथा पथ्य है। विकिर जल (नदी आदि के निकट ही रेतीली भूमि को खुदवाने से जो जल निकल माता है, उसे विकिर जल कहते है) शीतल, स्वच्छ, कपाय, लघु तथा त्रिदोष - नाशक होता है। (खेत के जल को केदार -जल कहते है। तथा सूर्य जब मृगशिर नक्षत्र पर आता है, तब जिस तलाई मे पानी सूखकर भल्प रह जाता हो-उस तलाई के जल को पाल्व कहते है।) केदार तथा पाल्व दोनो प्रकार के जल तथा समुद्र-जल, गुरु, अभिप्यदी तथा अपथ्य कहे गये है। वर्षा का-स्वच्छ तथा मधुर-जल पथ्य, लघु-गुण-युक्त और शुक्रवर्धक सुना गया है । उकाला हुआ जल प्रतिश्याय, श्वास, ज्वर, भतिसार, तिमिर, ग्रहणी, गुल्म, व्रण, उदर, हिक्का, आदि विकारो मे प्रशस्त है। उकालकर तीन भाग, दो भाग तथा एक भाग अवशिष्ट जल क्रमशः वात मे, पित्त मे तथा कफ में स्वास्थ्य- १-उच्चप्रदेशात् प्रस्रवजलम् । २-निम्नप्रदेशादुत्तिष्ठजलम् । ३-तट उच्चप्रदेश , तस्मादागो गतिर्यस्य स तटागः, स चोच्चप्रदेशादागच्छज्जलस्य निम्नदेशे बन्धनाद्भवति, तत्र भवम् । ४-इष्टिकादिबद्धसोपाना दीर्घिका वापी, तत्रभवम् । ५-चौड्यो नवोऽवद्धकूप प्रत्यासन्नजल:-" चौड्यमुक्तो वृहत्कूपो न बद्धो य शिलादिभि ।” इत्युक्तस्वरूप । स पुनर्नद्यादिसमीपे तत्कालकृता लघुकूपिका । ६-वालुकादीन् विकीर्य गृह्यमाणजलस्थानं विकिर, तदुद्भवं जलमपि विकिरम । ७-तृणाद्याच्छन्नजलं मन्दसरस्तदुद्भवम् । है - वर्ग] द्वितीयो गुच्छः। प्रसून कुक्षेरधिवासितानि वलक्षमृत्स्नाकरकस्य खण्डैः । नवीनमृत्कुम्भभृतानि भीष्मे ग्रीष्मे यथेच्छ पिव रे पयांसि ॥ २८७॥ इति दुग्धादिवर्ग ॥ ११ ॥ प्रद माना जाता है। मिट्टी के नूतन घट मे भरे हुये जल को, श्वेत मिट्टी के करवे में रसे हुये पुप्पों से सुगधित करके तथा सिता मिलाकर, प्रचड ग्रीष्म मे यथेच्छ मात्रा में पीयें ॥ २८३-२८७ ॥ दुग्धादि वर्ग समाप्त ॥ ११ ॥ पारंदादिवर्गः। रसायनः सर्वरसो विशारदः पराक्रमाप्तौ भजतां विहारदः। त्रिदोपनुद्योगवहोऽतिपारदः करोति कुष्टक्षपणानि पारदः ॥२८८ ॥ कटुकतुवरतिक्तमुष्णवीर्य शिथिलयति क्षणमात्रतो विवन्धम् । क्रिसिपवनकफक्षयोग्रकुष्ठप्रभृतिषु पूजितमालपामि गन्धम् ॥ २८९ ॥ स्थाली चीनमृदुत्थिता तदुपरि स्फीता त्रिपादी ततः पात्रे पूरितकोकिले च चपकं तत्रापि गन्धस्ततः । पारदादि-वर्ग। पारट छहों रसो से युक्त, रसायन तथा सभी रसों में प्रतिष्ठित है, अष्टादश सस्कारो से सिद्ध किये गये पारद का सेवन करने से आकाश आदि मे तथा तरुणियो के साथ विहार करने की यथेच्छशक्ति प्राप्त होती है । यह त्रिदोप-शामक' योगवाही, रोग-मात्र से उद्धार करने वाला तथा सभी प्रकार के कुष्ठो को नष्ट करने वाला माना गया है ॥ २८८ ॥ गन्ध (गन्धक) कटु, कषाय, उष्ण-वीर्य, विबंध को शिथिल करने वाली क्रिमि, कफ, वात, क्षय, उग्र कुष्ठ आदि रोगों से पूजित है ॥ २८९ ॥ गंधक मे से तैल निकालने के यंत्र का वर्णन इस श्लोक में दिया गया है । इस १-प्रसूनानि कुक्षौ यस्येति करकविशेषणम् । २-त्रिविध हि द्रव्यम् । तदुक्तं चरके- तत् पुननिविवं ज्ञेयं जाङ्गमौद्भिदपार्थिवम् ।” तत्र मासदुग्धदधितक्रमधुप्रभृति जागम- मुक्तमेव सक्षेपेण, तथोद्दिमपि हरीतक्यादिवर्गेण फलपुष्पवान्यादिवर्गेण च दर्शितमेव, तदधुना पारिशेष्यात्पार्थिवद्रव्यमभिधीयते । पार्थिवद्रव्यसग्रहोऽपि तत्रैव "सुवर्ण समला पञ्चलोहा. ससिकना सुधा ।मन शिलाले मणयो लवणं गैरिकाजने । भौममौषवमुद्दिष्टम्" इति । तत्रापि प्रधानत्वेन प्रथमं पारद । ३-बन्धनादिना व्योमविहरणादीननेकान् विहा- रान् ददातीति। ४-अर्ते रोगमात्रस्य पारमन्तं ददातीति । ५-गन्धकतैलोपयोगियन्त्र- प्रतिपादनमिदम् । यन्त्रस्थापन निर्वातदेशे कार्यमित्युपदेश. । . .
- ८८ सिहभेपजमणिमालायां [पारदादि- न्युब्जास्यं चपकं निदण्ड्यवसतो किं च त्रिदण्ड्यास्तिरो. धानं सान्द्रपटेन हस्ततुलितो यन्त्रस्य सर्वोदयः ॥ २९० ॥ कफपित्तहरं नेत्र्यं हृल्लासज्वरकुष्टजित् । प्लीहामवातदरद रेदं सरमीरितम् ॥ २९१ ॥ अभ्रं स्वादु हिमं कपायमुद्रव्यापत्रिदोपव्रण- अन्थिप्लीहविपक्रिमीन् प्रशमयत्यायुष्करं शुक्रलम् । तद्भस्म प्रमदाशतं रमयति प्रौढप्रभावं नरं कुर्यान्मृत्युभयं नियच्छति सुधातुल्यं गुणैः स्यात् परम् २९२ स्निग्धमुष्णकटुकं सकपायं कच्छुकुष्ठहरणं हरितालम् । श्लेप्मपित्तमुखरोगविपास्नं संनिगृह्य कुरुते करतालम् ॥ २९३ ॥ यंत्र की ऊंचाई चौडाई एक हाथ भर होनी चाहिये । अर्थात् सर्वतः एक हस्त प्रमाण माप का यह होना चाहिये। चीनी मिट्टी की रकाबी के ऊपर एक मजबूत तिपाई रखदें। तिपाई पर अंगार पूर्ण एक पात्र फिर इस पात्र पर गधर्क से भरा हुमा एक चषक तथा इस चषक पर (पैंटे मे छिद्रयुक्त) एक दूसरा चपक औंधा ढकटें । (दोनों चषको की मुख सधि को संपुटित कर देना चाहिये । औंधे ढके हुये चपक छिद्र मे एक छिद्र तथा नली के मुख को सपुटित करके नली के दूसरी ओर के मुख को रकाबी मे स्थापित करदें।) तिपाई के नीचे हवा लगने से तैल के उड जाने की सभावना रहती है। अत इस तिपाई को साद्रपट द्वारा चारो ओर से अच्छी तरह ढक देना चाहिये । इस यंत्र को त्रिदंड सन्यासी के मठ जैसे एकांत तथा निर्वात प्रदेश में रखकर उपयोग में ले। जिससे अंगाराग्नि एक समान प्रज्वलित होती रहे तथा तैल की उग्र गंध से किसी को आपत्ति अथवा असुविधा न हो ॥ २९० ॥ दरद (हिगुल) हृल्लास, ज्वर और कुष्ठ को नष्ट करने वाला, प्लीहा और आमवात का दारण करने वाला, वात-पित्त- नागक, नेत्र्य तथा सारक कहा गया है ॥ २९१ ॥ अभ्र (अभ्रक) मधुर, शीतल, कषाय, भायु और शुक्रवर्धक तथा उदर, त्रिदोष, व्रण, ग्रन्थि, प्लीहा, विष और किमि का विनाश करने वाला है। इसकी भस शतग प्रमदाओं के साथ रमण करने की शक्ति देती तथा मनुष्य को यौवन प्रभाव से सपन्न करती है। यह अमृततुल्य परमोत्तम गुणो से युक्त अतएव मृत्यु के भय से मुक्त करती है ॥ २९२ ॥ हरताल स्निग्ध, उप्ण, कटु, कषाय तथा खुजली, कोढ, कफ, पित्त, मुखरोग और रुधिर-विकार को पकडकर हस्त-गत कर लेती है ॥ २९३ ॥ १-हिगुलम् । नली लगाकर, ।
। , वर्ग] द्वितीयो गुच्छः। व्रणज्वरार्धाङ्गमहोपदंशवलासवैरी शतमलंसंज्ञः । पित्तास्त्रधारी पुरुषार्थकारी बलं विधत्ते शतमल्लतुल्यम् ॥ २९४ ॥ मरुद्वलासज्वरमान्द्यकासश्वासार्तिदवणशैत्यहारी । वितीर्णकामस्मृतिमल्लतैलं मार्तण्डमुद्री नलिकाऽत्र यन्त्रम् ॥ २९५ ॥ असृक्कफश्वासविवन्धभूतचातुर्थकक्ष्वेडपुरःसराणाम् । गर्वी गदानां चतुराननेन मनःशिलाऽकारि मनःशिला सा ॥ २९६ ॥ शतमल्ल (सोमल, सखिया) शतमल्लो के तुल्य बल देने वाला, व्रण, ज्वर, पक्षाघात, उग्र उपदश और कफ का शत्रु, रक्तपित्त कारक तथा पुरुष के सभी अर्थ संपादित करने वाला कहा गया है । ताम्रमुद्रा नामक नलिका यत्र मे से निकाला गया गतमल का तैल काम एवं स्मृति को अर्पण करनेवाला तथा वायु, कफ, ज्वर, अग्निमाद्य, कास, श्वास, दद्रु, व्रण और शीतका विनाशक होता है ॥ २९४-२९५ ।। मन शिला (मैनसिल) का निर्माण ब्रह्मा ने मन की शिला (शिरा) मे से किया है। यह रक्तविकार, कफ, श्वास, विवध, चातुर्थिक ज्वर, भूतबाधा और विष आदि अग्रगण्य विकारों को मिटानेवाली तथा गुरु (भारी) है। (हरताल वस्तुत सखिया तथा गधक का यौगिक है । भूगर्भ मे अनन्त दिनो तक पास पास पडे रहने से सखिया तथा गंधक हरिताल का रूप धारण करते है। रासायनिक विश्लेषण द्वारा हरताल मे सखिया तथा गधक २।३ के अनुपात मे उपलब्ध होते है । हरिताल कृत्रिम रूप से भी बनाया जाता है। मन शिला उपधातु है। यह भी सखिया तथा गधक का योगिक है तथा दोनो के समान अनुपात मे होने के कारण, यह लाल रग की होती है। गंधकाधिक्य से हरिताल का वर्ण पीत रहता है। शतमल्ल के विषय मे मतभेट है। सादिविषाक्त जन्तुओ के दश से भस्मीभूत पत्थर को शतमल्ल कहते है। सुश्रुत ने दो प्रकार के धातु-विषो का उल्लेख किया है एक फेणाश्म - भस्म दूसरा हरिताल। यही फेणाश्मभस्म शतमल्ल है। इससे उपरोक्त कथन को पुष्टि मिलती है। अमुक रस-वैद्यो १- सोमल, तथा 'सखिया' इति नाम्ना लोके प्रसिद्ध । स च श्वेतकृष्णपीतादि- भेदाबहुविध । तस्य वर्णन च निघण्टुसारे यथा--" महाविषो माखनिज शासिकश्चाखु- हारक । व्रणज्वरोपदशार्धाङ्गादिवातामयान् हरेत् ॥ अपरादिशिदेशेषु रुक्मरूप्यखनेर्मलम् । वदन्त्येके सित ताल परे क्षार तु निश्चितम् ॥ युक्तिसिद्ध नृणा दत्तं शतमल्लसम बलम् ।। पर यशोर्थिना ज्ञेन न देय राजमन्दिरे ॥” इति । महाविपकीटदंशनाद्स्मीभूत प्रस्तर- विशेष इति च जनश्रुति । तेन सुश्रुतकल्पस्थाने यत् “फेणाश्म भस्म हरिताल च द्वे धातुविषे” इत्युक्तं तत्र फेणाश्मभस्मनाम्ना अयमेव सभवेत् , इत्येके । य खलु रसशास्त्रे गौरीपाषाणसजया गीयते सोऽय शतमलसार इत्यपरे । २-ताम्रमुद्रा। ३-अनेनैव नाना प्रसिद्ध उपधातुविशेष लक्ष्मीवीर्यमिति यावत् । यदुक्त शब्दार्यचिन्तामणौ-"हरिताल हरेवींज लक्ष्मीवीर्य मनःशिला । पारद शिववीर्यं च गन्धक पार्वतीरज" इति । -'.
९२ सिद्धभेषजमणिमालायां [पारदादि- प्रहरति गरं मेदो मेहं कर्फ कृमिसंकटं श्वयधुदवथू शूलप्लीही हलीमकसंगतौ ॥ ३०७ ॥ मेहं कर्पति यत् समस्तविपदां गेहं शरीरव्यथां सद्यो यहुणभास्करस्य पुरतः खद्योतवद्दयोतते । श्वासं जन्तुहलीमको विजयते कासं वलासं क्षणात् कं गम्भीरगुणं न यच्छति रुजां रङ्गं सरं गञ्जनम् ॥ ३०८ ॥ वगोपमगुणो नागो युक्त्या संततसेवितः । नागाधिकं वलं दत्ते हन्ति मेहं विशेषतः ॥ ३०९ ॥ जसदं हिमतिक्तकपायरसं कफपित्तविकारविनाशकरम् । श्वसनं कसनं नयनार्तिसखं सहलीमकमेहमपि क्षिपति ॥ ३१०॥ स्यान्माक्षिकं स्वादुरसं सतिक्तं स्वयं च वृष्यं च रसायनं च । शोफक्षयार्शस्त्रिमलप्रमेहवस्त्यर्तिकुष्ठं असते सकण्डु ॥ ३११ ॥ रसे कटुक्षारकषायशीतं दृश्यं सरं वामकलेखनं च । विषार्तिकुष्ठाश्मविलासपामापित्तानि तुच्छानि करोति तुत्थम् ॥३१२॥ कृमि-रोग, शोथ, दाह, शूल और प्लीहा सहित हलीमक नामक पाण्डु और विष का संहार कर देता है ॥ ३०७ ॥ रङ्ग (रागा)-विकारो को तोड देनेवाला तथा सारकगुण से युक्त रांगा, किसको अचिंत्य -गुण अर्पण नहीं करता समस्त आपत्तियो के एक मात्र निवास स्थान प्रमेह को यह गिरा देता है। इसके गुणरूपी सूर्य के आगे शरीर की पीडा खद्योत के समान क्षीण हो जाती है। यह एक ही क्षण मे श्वास, कृमि, हलीमक, कास तथा कफ पर विजय प्राप्त कर लेता है । ३०८ ॥ नाग (सीसा).-नाग गुणधर्म मे रागे के समान ही है। निरतर युक्ति- पूर्वक इसके सेवन से हाथी से भी अधिक बल की प्राप्ति होती है। यह विशेषतया प्रमेह को नष्ट कर देने वाला माना जाता है ॥ ३०९ ॥ जसद (जस्ता) शीतल, तिक्त, रस मे कषाय तथा कफ पित्त के विकार का विना- शक है। यह श्वास, कास, नेत्र - पीडा, हलीमक और प्रमेह को भी दूर फैंक देता है ३१० माक्षिक (स्वर्णमाक्षिक तथा रूप्यमाक्षिक) रस मे मधुर, तिक्त, स्वर्य, वृष्य तथा रसायन है। यह शोफ, क्षय, अर्श, त्रिदोष, प्रमेह, बस्ति - गत व्यथा, कोढ तथा खुजली का ग्रास कर जाती है ॥ ३११ ॥ तुत्थ (तूतिया) रस मे कटु, कषाय, सक्षार, शीतल, नेत्र की ज्योति को १-द्वितीयाद्विवचनम् । २-समस्तविपदा गेहं मेहमिति योजना । ३-रुजा गजन- मिति योजना। ४-सीसक । ५-द्विवियं हि तत् पीतश्वेतभेदात् वर्णमाक्षिकरूप्यमा-- क्षिकसज्ञमुपधातुरुपम् । -- वर्ग.] द्वितीयो गुच्छ । ९३ तुत्थं कटाहकुक्षौ तदुपरि वसनं ततोऽपि रचय वराम । पूरय कटाहमद्भिस्तदन्तरर्क निरीक्षस्व ॥ ३१३ ॥ कटुकमहिमं तिक्तं छेदि क्षयक्षपण कफ- क्रिसिमरुदपस्मारोन्मादप्रमेहभराश्मजित् । श्वयथुजठरश्वासानार्थीहलीमकमूत्ररु- निविडसिकताकुष्ठं वल्यं निहन्ति शिलाजतु ॥ ३१४ ॥ सौरक्षारो मल्लतालादिरोधी शीतस्पर्शी व्योमधूपोपयोगी । शङ्खद्रावद्रव्यवर्गे प्रधान कृच्छ्रप्रायं मूत्रकृच्छ्रे निहन्ति ॥ ३१५ ॥ निश्चारकप्रतिश्यायप्रमेहगदगञ्जनः । दस्नायुकविध्वंससादरो नवसादरः ॥ ३१६ ॥ इति पारदादि-वर्ग ॥ १२ ॥ । बढानेवाला, सारक, वामक तथा लेखन है। तुत्थके भागे विष की पीडा, कुष्ठ, अश्मरी, कफ, पामा तथा पित्त आदि तुच्छ (नगण्य, मानों अस्तित्व ही नहीं-ऐसे) हो जाते हैं ॥ ३१२॥ तुत्थ मे से भर्क निकालने की विधि -एक घट में तुत्थ डालदें। फिर उसपर एक वस्त्र बिछाकर उस वस्त्रपर तुत्य से द्विगुणित त्रिफला फैलादें। अब इस पात्र को पानी से भरद । फिर सभालकर अर्क निकाल लेवें ॥ ३१३ ॥ शिलाजतु (गिलाजीत) कटु, उप्ण, तिक्त, छेदन, तथा बल्य है । यह क्षय को क्षीण कर देता है । यह कफ, क्रिमि, वात, अपस्मार, उन्माद, प्रमेह तथा अश्मरी को जीतनेवाला तथा शोथ, उदर, श्वास, रुधिर-विकार, अर्श, हलीमक, मूत्रकृच्छ्र तथा अत्यत वृद्धि को प्राप्त सिकता नामक कोढ को नष्ट करनेवाला कहा गया है ॥३१४ ॥ सौरक्षार (कलमी सोरा) शतमल्ल, हरिताल आदि रसों को रुद्ध करने के लिये तथा भातशवाजी में उपयुक्त होता है। यह स्पर्श में शीतल एवं शख-द्राव मादि द्रव्य-वर्ग की प्रधान औषधि है तथा कृच्छ प्राय मूत्रकृच्छ्र को नष्ट करता है ॥३१५॥ नवसादर (नोसादर) प्रतिश्याय को बाहर निकालने वाला, प्रमेह-रोग का मौर स्नायुक के विध्वस मे परमोत्सुक कहा गया है ॥ ३१६ ॥ पारदादि वर्ग समाप्त- विनाशक तथा द्रु १-तुत्यादर्काकर्षणप्रकारोऽयम् । २-त्रिफला तुत्याद्विगुणमिति रहस्यम् । ३-"हेमाद्या सूर्यसतप्ता. स्रवन्ति गिरिवातव । जत्वाभ मृदुमृत्स्नाच्छं यन्मल तच्छिलाजतु ॥” इत्युक्त- रूपं हेमरजतताम्रलोहसभवत्वाच्चतुर्विवम् । तत्रायस सर्वोत्तमम् । यदुक्तम्-“यत्तु गुग्गुलु- ९४ सिहभेषजमणिमालायां [पारदादि- श्रीलल्लुरामात्मजकुन्दनाद्यो लेभे जनि कृष्णकवेर्हि तस्य । भैपज्यरत्ननजि सगुणायां गुच्छो द्वितीयोऽगमद्वितीयः ॥ इति हरीतक्यादिवर्णनं नाम द्वितीयो गुच्छः संपूर्णः । श्री लल्लुरामनी के पुत्र कुन्दनरामजी से उत्पन्न, उपकार - वृत्ति से युक्त श्रीकृष्ण - कवि-द्वारा गुम्फित इस सुदर-गुण-युक्त (गुण - सूत्र) भेषज-मणि - माला का द्वितीय के समान ही यह द्वितीय गुच्छ (मर्थात् यह अनुपमेय द्वितीय-गुच्छ) सपूर्ण हुआ ॥ ३१७ ॥ हरीतक्यादिवर्णन नामका द्वितीय गुच्छ समाप्त । - उक्षाप्र सकाग तिक्तक लवणान्वितम् । विपाके कटु शीत च सर्वश्रेष्ठं तदायसम् ॥” इति । तत्परीक्षा च-" लोहकीटायते वह्नौ विचूमं दह्यतेऽम्भसि । तृणात्यग्रे कृत सर्वमवो गलति तन्तुवत् ॥” इति । ४-लोके 'कलमीसोरा' इति । ५-चहिक्रीटापरपर्यायः । खवूप- लोके “ आतिशबाजी' इति ख्यात । माप्रचक्रुर्नगरम्य मार्गान् ध्वजान् ववन्धुर्मुमुत्रु- खधूपान्" इति भट्टि । ६-'नोसादर' इति प्रसिद्ध । १-अनुपम इत्यर्थ , पूर्तिमिति शेष । लेशोक्त सुधियः स्वय सुवहुधा ह्यर्थ स्फुटी- कुर्वते-मन्दानामधिक प्रजत्पितमनुत्साहस्य सर्वकम् । इत्येव करुणाकरेण गुरुणा सचिन्त्य सक्षेपत -प्रोक्त द्रव्यकटम्बकं सुभिपजा हर्षाय वोभूयताम् ॥ य प्राचा भिषजा विवेद महतास्तिस्रोऽपि ता सहिता -साहित्यं च सधर्मशास्त्रमभित स्वच्छन्दवाक् छन्दसि । लक्ष्मीरामसुवी स एप भिषगाचार्यप्रशस्ति वहन्-श्रीभैपज्यमणिस्रजो विवृतवान् गुच्छ द्वितीय परम् ॥ इति लक्ष्मीरामसुधीकृते सिद्धभेपजमणिमालाव्याख्याने द्वितीयो गुच्छः समाप्तः ॥
.. 1 अथ स्वास्थ्यसंरक्षणप्रकरणं नाम तृतीयो गुच्छः । तृतीयो गुच्छः। रिपुहृदयं भित्त्वा नखैस्त्रातः प्रह्लादस्तु । जपरि हरिलक्षणं वस्तु स्वस्तिकृदस्तु ॥१॥ उत्तिष्ठेदगदः प्रभातसमये रक्षार्थमेवायुपो दृष्ट्वा दर्पणरत्नबिल्वसुरभिस्रग्वैद्यदध्यादिकान् । स्मृत्वा किं च हरि हरं गणपति देवीं रवि श्रीगुरुं नत्वा वृद्धजनांस्ततः सुखतया शौच विदध्यात् कृती ॥२॥ तृतीय-गुच्छ नसन फारि रिपु हृदय किय, दैत्य पुत्र परित्राण । सिहाकृति वह जत्रु गत वस्तु करहु कल्याण ॥ १ ॥ स्वस्थ पुरुप को, प्रात उठकर, आयु की रक्षा के लिये दर्पण, रत्न, विल्व, सुगधित पुप्पमाला, वैद्य, दधि आदि के दर्शन करने चाहिये। फिर, विष्णु, शिव, गणपति, देवी, सूर्य तथा अपने श्रीगुरु का स्मरण करके वृद्ध जनों को नमस्कार करना चाहिये । तदुपरात, सुस पूर्वक शौचादि क्रिया से निवृत्त हो जाना चाहिये ॥ २ ॥ (क) मार्चसप्तमुस सार्वद्वाविंशतिविलोचनम् । अष्टादशभुज वन्दे तीपुसाकृतिमोश्वरम् ॥१॥ (ख) गत्वाऽऽयुर्वेदोदवे पार सारमभाणि । नत्वा तं श्रीगुरुमिमा टिप्पणिका करवाणि ॥२॥ १-अयो द्रव्यगुणाभिवानानन्तर चमत्कारचञ्चव श्रीगुरवश्चतुरचिकित्सकचेतासि चन्दयितु रुग्णजनमनासि नन्दयितुं चमत्कारचञ्चद्विचित्रवस्तुजात कियदपि समुच्चिन्वन्ति । तत्रापि प्रथमं चित्राकारस्यैव श्रीसिंहावतारस्य वर्णनरूप समुचितमङ्गलमाचरन्ति दोहानाम- च्छन्दसा-रिपुहृदयमिति । हरिलक्षणं सिंहाकृति । २-अवीतसर्वायुर्वेदस्य विज्ञातद्रव्य- गुणागुणस्य चिकित्सा कर्तुं प्रवत्तस्य भिपज कार्य धातुसाम्य भवति । यथोक्त चरकविमाने- "इह कार्यप्राप्ते कारण भिषक् , करण पुनर्भेषज, कार्ययोनिर्धातुवैपम्य, कार्य वानुसाम्य कार्यकल सुसावाप्ति" इत्यादि । तच्च स्वास्थ्यरक्षाव्याधिमोक्षाभ्या भवितुमर्हति । तत्र खल्पवक्तव्यत्वात् सूचीकटाहन्यायेन वा प्रथम स्वास्थ्यरक्षणमेव वाच्यम् । तस्य च चर्या- वीनत्वात् प्रथम चर्यामेवाचक्षते । तथाहि-" दिनचर्या निशाचर्यामृतुचर्या यथोदिताम् । आचरन् पुरुष स्वस्थ सदा तिष्ठति नान्यया।" स्वस्थलक्षण च सुश्रुतादवगन्तव्य यथा- समदोप समाग्निश्च समधातुमल क्रिय । प्रसन्नात्मेन्द्रियमना स्वस्थ इत्यभिधीयते।' इति । (क) अत्र भगवती दशास्या त्रिंशलोचनाऽष्टादशभुजा विवक्षिता । भगवाश्च पञ्चास्य. पञ्चदशलोचनोऽष्टादशभुज इति । “विभ्राणं शुभ्रवर्णं द्विगुणनवभुज पञ्चवक त्रिनेत्रम्' । इति श्रुते । (ख) येनेति शेप । - ११४ - - सिद्धभेपजमणिमालायां [रसादिभेद- प्रत्येकं हव्यवाहाः समभृशयुगलैः खेचरा निर्भरैक- द्वन्द्वेपण्मध्यवृद्धस्त्रिभिरनलनिशानाथसंरयाः क्रमेण | इत्येते वृद्धिभेदाः सह गगनशराः क्षीयमाणैगेक- क्षीणोच्चैः क्षीणमध्याभ्यधिकसमुदया द्वादशैवं द्विषष्टिः ॥ ६३ ।। दूसरे को रसदें। फिर सतरह को चार से और आठ से योग देने पर एकवीस तथा पच्चीस आते है। दोनों ही अंक आचुके है। अतः इन्हें छोड दें। भय, सतरह के अंक को बत्तीस से जोडने पर उन्चास के अंक को एकचालीस (४१) के अंक के नीचे लिखलें । अब, उद्दिष्टांक के नीचे तृतीय कोष्टक को तथा उसके नीचे दिये गये शेष कोष्टको को भरें। उद्दिष्टांक चार को आठ से जोडने पर बारह के अंक को भाठ के अंक के नीचे रखे । पुन. चार को सोलह से तथा बत्तीस से जोड़ने पर भाने वाले वीस तथा छत्तीस के अंको को, बारह के नीचे वाले कोष्टकों में यथाक्रम आलेखित करदें। अब, पुन उहिष्टांक चार के अंक के नीचे छह के अंक को उहिष्टाक आठ से जोडने पर चौदह के अंक को छत्तीस के अंक के नीचे भरटे। इसी तरह, उद्दिष्टांक को अपने से अग्रिम उद्दिष्टांक के साथ जोडने से जो अंक आवे उन अंको से, एकके नीचे दूसरे के क्रमद्वारा सभी कोष्टको को पूर्ण करदे, कोष्टक के अपूर्ण रहने पर, उसी उहिष्टाक के नीचे वाले कोष्टकों के यथाक्रम अंको को उहिष्टांक से जोडकर, उसे भर दें। एक वार सिद्ध हुये अंको को छोडते जायें। चौसठ से अधिक अंक को भी ग्रहण न करें। इसी युक्ति से पताका सपूर्ण भरले ॥ ६१-६२ ॥ मधुरादि रसो के तरेसठ भेद होते हैं-प्रत्येक रस के उदाहरण की तालिका नीचे दीजाती है । इसका मनोयोगपूर्वक अध्ययन करें- १ मधुर-मलाई गोदुग्ध आदि। २ अम्ल-भान, कमरख भादि । ३ लवण- रोमक आदि। ४ तिक्त-नीम, पर्पट भादि । ५ कटु-चव्य मादि । ६ कपाय-कमल- गहा, वट के अंकुर मादि । ७ मधुराम्ल-कपित्थ फल आदि। ८ मधुरलवण-ऊंटनी १-रसभेदानभिधाय तत्प्रयोगार्थ दोषभेदानपि दरीदर्यन्ते । तत्र दोषाणा वृद्धि- क्षयस्थानस्पा त्रिविधा गतिर्भवति । तत्र वृद्धिभेदा पञ्चविंशति , तावन्त एव क्षयभेदा । द्वादशस्थानगतिमेदा , स्थानशब्देनात्र समत्वम् । समोऽपि दोष आशयापकर्यवशात्तथा- ऽन्यदोषस्य क्षयवृद्धिसभवे च रोगारम्भको भवत्येव । लक्षणानि चैषाम्- "ययाबलं यथास्व च दोपा वृद्धा वितन्वते । रूपाणि जहति क्षीणा समा स्वं कर्म कुर्वते ॥” इति वृद्धि- क्षीणाना वाग्भटोक्तानि द्रष्टव्यानि। एकक्षयद्विसाम्यद्विक्षयैकसाम्यैकवृद्धयैकक्षयैकसाम्यादि- भेदानां च चरके कियन्त शिरसीयाध्याये विलोक्यानि । “प्रकृतिस्थं यदा पित्त मारुत श्लेष्मणः क्षये । स्थानादादाय गात्रेषु यत्र यत्र विसर्पति ॥ तदा भेदश्च दाहश्च तत्र तत्रा- नवस्थिताः । गात्रदेशे भवन्त्यस्य श्रमदौर्बल्यमेव च ॥ साम्ये स्थितं कफ वायु क्षीणे पित्ते यदा वली। कर्षेत् कुर्यात्तदा शूलं सशैयस्तम्भगौरवम् ॥” इसारभ्य "पित्तश्रेष्मक्षये वायुर्मर्माण्यतिनिपीडयन् । प्रणाशयति सज्ञा च वेपयत्यथवा नरम् ॥” इत्यन्तेन प्रन्थेन । ।
११५ - प्रकरणम् ] तृतीयो गुच्छः। का दूध, भेड, मत्स्य आदि का मांस आदि। ९ मधुरतिक्त-देवदारु, सर्ज आदि का निर्यास आदि। १० मधुर कटु-कुत्ता तथा शृगाल का मांस आदि। ११ मधुरकषाय- तैल तथा धामन का फल आदि। १२ भम्ललवण-उरण तक्षा क्षार मृत्तिका आदि । १३ अम्लतिक्त-सुरा आदि। १४ अम्लकटु-चुक्र आदि। १५ अम्ल कषाय-हथिनी के दूध का दही तथा शुकमांसादि । १६ लवणतिक्त-तांबा, सीसा भादि । १७ लवण कटु-गोमूत्र, स्वर्जिका मादि । १८ लवण कषाय-समुद्रफेन आदि। १९ तिक्तकटु- कपूर, जायफल आदि । २० तिक्तकषाय-लवलीफल, हथिनी का घी आदि। २१ कटु- कषाय-भिलावे की मजा, हरिताल आदि। २२ मधुरमम्ल लवण-हथिनी का मांस मादि । २३ मधुराम्लतिक्त-गेहूं की सुरा आदि । २४ मधुराम्लकटु-शल्यमासादि । २५ मधुराम्लकषाय-मस्तु तक आदि । २६ मधुरलवणतिक्त-शम्बूकमांसादि । २७ मधुरलवणकटु-अपूप, मृगमास आदि । २८ मधुरलवणकषाय-ताबा, कासीस आदि । २९ मधुरति कटु-कटुका मादि । ३० मधुरति कषाय-गुडूची, बदर का मांस आदि । ३१ मधुर कटु कषाय-गोधामास, एरंडतेल भादि । ३२ अम्ललवणतिक्त-हाथी, मृग मूषक आदि का मांस आदि। ३३ अम्ललवणकटु-चांदी, शिलाजित आदि। ३४ अम्ललवणकषाय-हथिनी के दूध का दही। ३५ अम्लतिक्तकटु-मरिच युक्त सुरादि । ३६ अम्लति कषाय-तोते के मांस युक्त सुरादि । ३७ अम्लकटुकषाय-अमलवेत आदि । ३८ लवणति कटु-भेड का मूत्र आदि। ३९ लवणति कषाय-समुद्र मे स्थित समुद्रफेन आदि । ४० लवणकटुकषाय-भिलावा, आसव, रोमक लवण आदि। ४१ तिक्त कटु कपाय-कृष्ण-अगुरु, देवदारु आदि का तैल । ४२ मधुरलवणतिक्त-गोमूत्र, घोडी आदि का दूध । ४३ मधुराम्लल कटु-गोमूत्र युक्त शिलाजित मादि । ४४ मधुराम्लल कषाय- सैंधवयुक्त तक आदि । ४५ मधुराम्लति कटु-लहसुन सहित सुरा । ४६ मधुराम्लति. कषाय-शख आदि। ४७ मधुराम्लकटुकषाय-काजियुक्त एरंडतैल । ४८ मधुराम्लति. कटु-उदुम्बर युक्त यव आदि । ४९ मधुराम्लति.कषाय-समुद्र फेन, शर्करा युक्त चंदन मादि । ५० मधुरलवण कटुकषाय-गोमूत्र युक्त तैल । ५१ मधुरति. कटुकषाय-तिल, गुग्गुल आदि । ५२ अ. ल ति. कटु-सैधव सौवर्चल युक्त हस्तिनी आदिका मांस तथा सुरा आदि । ५३ अ.ल.ति. कषाय-उद्भिदलवण युक्त शुक मांस । ५४ म ल कटु कषाय-सौवर्चल युक्त हस्तिनी दूध का दही । ५५ म ति कटुकषाय-बालमूली युक्त हस्तिनी दूध का दही । ५६ ल ति कटु कषाय-रोमक नमक कच्चा विल्व आदि । ५७ मधुराम्लल ति कटु-आम्र, कमरख युक्त स्विन्न वार्ताक फल आदि । ५८ मधुराम्हल. ति कषाय-उद्भिद् नमक युक्त तक । ५९ मधुराम्लल कटुकषाय-त्रिकटु, यव युक्त तक । ६० मधुराम्लति कटुकपाय-हरीतकी फल आदि । ६१ मधुरल ति कटुकषाय-लहसुन आदि । ६२ अम्लल ति.कटुकषाय-भिलावा, रजत, शिलाजतु मिश्रित निंब आदि । ६३ म भ ल ति.कटुकपाय-पारद, मृग मास आदि । रसो के भेदो का सविस्तर वर्णन करके इनके प्रयोग के लिये प्रथकार दोषी के भेदो का वर्णन प्रारभ करते है । . प ११८ सिन्डभेपजमणिमालायां [दूतादि- दूतादिप्रकरणम् । सदण्डशस्त्रो रुधिरोशितागो व्यगो विजातिः नवदश्रुधारः । शिरोरुहलिएकरो विवर्णः खरोष्ट्रवाही प्लुतकृच्छ्वास्यः ॥६५॥ तैलप्रलिप्तावयवोऽथ पण्डः पापण्डयुक्तोऽशुभदीनभापी । एतेऽतिनिन्द्या इतरे तु दृताः सुजातयः सन्मतयः प्रास्ताः ॥६६॥ द्वाभ्यां दूतवचो हत्वा भजेद्भूर्जटिलोचनैः। व्योनि मृत्युः समे कष्टं विषमे सुखसाध्यता ॥ ६७ ॥ यात्राखं वैद्यस्य शुभाय सौम्यं दूतस्य दीप्तं शकुन शुभाय । युतो निजैर्वर्णवलस्वभावै रोगी जितात्मा भिपजा चिकित्स्यः॥ ३८ ॥ धातुओं के भेदों की सूक्ष्मातिसूक्ष्म सविस्तर व्याख्या करते हुये, भव, इस प्रकरण में, रोग निदान मे साहाय्यभूत चिकित्साचतुष्पाद, नाडी मलमृत्रादि की परीक्षा तथा अरिष्टादि विषयोंपर विचार प्रदर्शित करते है। प्रथम, वैद्य को बुलाने के लिये भाये हुये दूत के लक्षणो का वर्णन किया जाता है । दूत के लक्षणों से भी अरिष्टादिका निर्णय किया जा सकता है ॥ ६४ ॥ दण्ड अथवा शस्त्रधारण किये हुये, रुधिर से सिक्त अंगो वाला, व्यङ्गयुक्त, कुल- हीन, रुदन करता हुमा, मस्तक पर चिपके हुये केशवाला, विवर्ण, गदहे अथवा ऊट की सवारी किये हुये, कठिनता से दीर्घ उच्चार करनेवाला (अर्थात् तोतली वाणीवाला) तैल लिप्त देहवाला, नपुंसक, पाखडी, भशुभ तथा दीनभापी दूत अत्यंत निदनीय है। तदतिरिक्त, कुलीन तथा सम्यक् मतिवाले दूत प्रशंसनीय होते हैं ॥ ६५-६६ ॥ दूत से कहे गये वाक्य के अक्षरो की संख्या को दो से गुणा करके तीन से भाग दें। यदि शून्य आये तो समझना कि रोगी का मरण होगा, सम अंक आये तो रोगी को कष्ट होगा, यदि विषम अंक भाये तो रोग सुखसाध्य ऐसा जानना ॥ ६७ ॥ यात्रा करते समय वैद्य के लिये सौम्य शकुन तथा दूतको दीप्त शकुन शुभ का सूचक माना गया है । वैद्य को उसी रोगी की चिकित्सा करनी चाहिये जो जितात्मा हो, अपने स्वाभाविक वर्ण तथा बलसे युक्त एवं स्वस्थ प्रकृतिवाला हो ॥ ६८ ॥ १-सक्षेपत स्वस्थरक्षणमभिधाय ततश्चिकित्सककौतुकार्थ रसदोपधातुभेदान् चिकि- त्साबीजभूतान् प्रदर्याधुना चिकित्साचतुष्पादास्तथा रोगज्ञानसहायका नाडीमूत्रादिपरीक्षाश्च सक्षेपतोऽरिष्टादि च प्रदर्श्यन्ते । तत्र प्रथमं वैद्याहानायागतस्य दूतसज्ञा गतस्य विचार । २-शकुनविचार । ३-वैद्याह्वानाय गन्तुं प्रवृत्तस्येति शेष । ४-चतुष्पादेषु रोगिगुणकथ- नम् । गुणयुक्ता हि पादा कार्यकरणसमर्था भवन्ति । यदुक्तं चरके-"भिषग्द्रव्याण्युपस्थाता रोगी पादचतुष्टयम् । गुणवत् कारणं ज्ञेयं विकारव्युपशान्तये ॥” इति ।
प्रकरणम् ] तृतीयो गुच्छः। अधीतायुर्वेदो विविधरसकर्ता मधुरगी स्पृहाशून्यः शुद्धो नवविशदवासा धृतिधरः । कृपासिन्धुर्विप्रः शिवचरणसेवी बहुवयाः। सुधाहस्तो वैद्यो नरवरचिकित्सास्वधिकृतः ॥ ६९ ॥ वातावक्रतराऽतितीव्रगमना पित्तात्कफान्मन्दगा तीतोष्णा ज्वरतः कृशा हिमतमा वेगाकुला मृत्युदा । नाडी तृप्तिमतः स्थिरा कुशलिनो गुर्वी तु सामाऽसृजा कोष्णाऽतिक्षुधया चला कफसमा क्षीणाग्निरेतोवला ॥ ७० ॥ पुंसः सिरा दक्षकरप्रकोष्ठे वामेऽवलायास्तु परीक्षणीया । अतद्वैयीधर्मतया युतस्य मन्ये द्वयोरेव नपुंसकस्य ॥ ७१ ॥ वामदक्षिणयोनाड्योर्या नाडी वलवत्तरा। ततः स्वरवलं विद्यात्तेन दोषं च वैद्यराट् ॥ ७२ ॥ अब वैद्य के गुण सुनिये.-आयुर्वेद का विद्वान्, विविध रसक्रियाओ मे कार्यदक्ष, मधुरभापी, निर्लोभी, शुद्ध अन्तःकरण वाला, नूतन तथा स्वच्छ वस्त्रो को धारण करने वाला, धैर्यवान् , कृपालु, ब्राह्मण, वृद्ध, भास्तिक, अमृतपूर्णहस्त अर्थात् अभय देनेवाला, शिवचरणों का उपासक वैद्य, श्रेष्ठ मनुष्यो की चिकित्साकार्यों में नियुक्त किया जाना चाहिये ॥ ६९॥ नाडीपरीक्षा. वातप्रधान-नाडी वक्र गति, पित्तप्रधान शीघ्रगामी, तथा कफ- प्रधान मद गति होती है। ज्वर से पीडित की नाडी तीव्र गति तथा उष्ण होती है कृश, अत्यंत शीतल और वेगाकुल नाडी मृत्यु की सूचक मानी गयी है। भोजनादि से तथा वैभवादि से सतृप्त मनुष्य की नाडी स्थिर, सामावस्था मे भारी, रक्ताधिक्य उष्ण, अत्यंत क्षुधा चपल, एवं भग्नि, बल तथा शुक्र से क्षीण की नाडी, कफ प्रधाननाडी के समान, मंदगति होती है ॥ ७० ॥ पुरुष के दक्षिण हस्त के प्रकोष्ठ की तथा स्त्री के वाम हस्त के प्रकोष्ठ की नाडी देखनी चाहिये। नपुसक मे पुंस्त्व तथा स्त्रीत्व दोनों धर्मों के विद्यमान होने के कारण उसमे जब स्त्रीभाव प्रकट हो तब वाम हस्त की, मुभाव प्रकट हो तब दक्षिण हस्त की नाडी की परीक्षा करनी चाहिये। अथवा-उसके दोनो ही हाथो की नाडी देखनी चाहिये ॥ ७१ ॥ वाम तथा दक्षिण नाडी मे से जो नाडी बलवत्तर हो उस से स्वरबल तथा स्वरबल से, चतुर वैद्य, रोग बल को पहिचान लेता है ॥ ७२ ॥ १-पादप्रधानस्य वैद्यस्य गुणाभिवानमिदम् । २-नाडीपरीक्षारम्भ । ३-स्त्रीपुस- वर्मविलक्षणमिश्रधर्मवत्त्वेनेत्यर्थ । नपुसकस्य तु स्त्रीपुसयोरन्यतराकारप्रकटतामपेक्ष्य परीक्षा, "साम्यं तु न स्यादेव कृत्रिमस्य तु प्रकृतिप्थता" इति नाडीप्रकाग । ४-नाडीगत्या • खरविचार । से से ।
सिद्धभेपनमणिमालायां [वृतादि- यः स्वप्नमध्ये विवुधान्मुनीन्द्रान तीर्थानि धेनूपतीन् वयम्यान । पुष्पाणि वासांसि सितानि पश्येत्त्यक्तो गदैः शर्म लमेत रोगी ।। ८३ ॥ तोयानि तीवा मलिनानि जित्वा रिपून्मनोवानि फलानि लब्ध्वा । स्थित्वा द्विपेऽश्वेऽपि भृशंरुदित्वाविष्ठांच लित्वा कुशली नरःम्यात् ८2 साधारणानूपकजाङ्गलाख्या देशास्त्रयस्तत्र समान आद्यः । वलासवातप्रचुरो द्वितीयो व्यम्बुद्रुमो मायुरुजाफरोऽन्त्यः ॥ ८५ ॥ वयोऽपि कौमारयुवत्ववाय॑मेदास्त्रिधैवेति वयं वदामः । कफोपपन्नं प्रथम सपित्तं द्वितीयमन्त्यं पवनप्रधानम् ॥ ८६ ॥ वातेन पित्तेन कफेन युक्ता क्रमेण पुंसां प्रकृतिस्त्रिधा स्यात् । रूक्षः कृशश्चञ्चलहत्त्वकेशः स्वप्ने खगामी पवनस्वभावः ॥ ८७ ॥ अकालपालित्ययुतोऽतिगौरः प्रकोपनः स्विन्नतनुर्बुधोऽपि । स्वप्नेपु नक्षत्रगणावलोकी प्रोद्दामपित्तप्रकृतिर्मनुष्यः ॥ ८८ ॥ महावलः स्निग्धविलम्विकेशः सुश्यामलस्थूलकलेवरश्च । आलस्ययुक्तोऽतिगभीरवुद्धिः स्वप्नेऽम्बुदर्शी सुमना विलासी ॥ ८९ ॥ स्तोत्रो का पारायण करते हुये रात्रि के समय देवालयो मे निवास करना चाहिये । यदि रुग्ण, स्वप्न में, देवता, मुनिश्रेष्ठ, तीर्थ, गाय, नृपति, मित्र, पुष्प, श्वेतवस्त्र भादि सौम्य पदार्थों को देखे तो वह रोग-मुक्त होकर स्वास्थ्य लाभ करता है। मलिन जल- पूर्ण जलाशयो को तैरकर, शत्रुलो पर विजय प्राप्त करके, सुदर फलो को ग्रहण करके, गज अथवा भश्व पर भारूढ होकर, अत्यंत रुदन तथा विष्ठा का लेप करनेवाला मनुष्य नैरोग्य प्राप्त करता (सफल चिकित्सा के लिये, वैद्यको, दूप्य, देश, बल, काल, अनल, प्रकृति, वय, सत्व, साम्य तथा आहार भादि भवस्थामो का परिज्ञान होना मावश्यक है। इन्ही अवस्थामो का यहां सक्षेप मे, उल्लेख किया जाता है।) देश तीन प्रकार के होते है। तीनों दोपों की समान अवस्थावाला 'साधारण देश, कफवात की बहुलता वाला 'भानूप' देश, जल और वृक्ष रहित पित्त प्रचुरता वाला 'जांगल' देश । वय भी तीन प्रकारके होते है-कफ प्रधान कौमार- वय, पित्तप्रधान युवा - वय और वायु- प्रधान वार्द्धक्य । वात, पित्त और से युक्त मनुष्यों की यथाक्रम तीन प्रकार की प्रकृति होती है-वातप्रकृतिवाला रूक्ष, कृश, चंचल और अल्प केशवाला होता है। १-शुभस्वप्न । २-चिकित्सायामवश्यज्ञातव्याना दशाना मध्ये पूर्व केचिदुक्ता , केपाचिच्चात्राभिवानम् । ते दश च-" दूष्यं देशं बल कालमनलं प्रकृतिं वय । सत्त्वं सात्म्यं तथाऽऽहारमवस्थाश्च पृथग्विधा ॥ सूक्ष्मसूक्ष्मा समीक्ष्यैपां दोपौषधनिरपणे । यो वर्तते चिकित्साया न स स्खलति जातुचित् ॥” इति । शेपा. सत्त्वसात्म्यानलादयो वुद्धया ग्रन्थान्तराद्वाऽनुसधेया सुधीभि । है ॥ ८२-८४ ॥ कफ १२३ से प्रकरणम् तृतीयो गुच्छः। 'मेहे श्लेष्मणि पीनसे गलगदे कुष्ठे विषे स्यादमि- गर्मिण्यां तिमिरे शिरोरुजि मरुद्रुक्पाण्डुके नो हिता। कुष्ठार्श:क्रिमिपाण्डुशोणितमरुद्धीसर्पविष्टम्भिनो रेच्या दुर्बलगुर्विणी क्षययुजो नो रेकयोग्या मताः ॥ ९० ॥ सुधाद्वक्षालितभित्तिभागरोचिष्णुधन्वन्तरिचारुचित्रम् । उच्चावचप्रोज्वलकाचकूपीविन्यस्ततत्तद्रसदर्शनीयम् ॥ ९१ ॥ यथाभिषक्तन्त्रविचित्रयन्त्रं कोशस्फुरत्कङ्कमुखादिशस्त्रम् । दीप्तद्विपेन्द्रादिपुटं प्रलम्विशिक्यस्थनानाविधलेह्यभाण्डम् ॥ ९२ ॥ पवित्रपट्टासनराजमानश्रीवैद्यराजेक्षितरुग्णहस्तम् । उपर्युपर्यापतदातसार्थप्रदीयमानोचितजायुजातम् ॥ ९३ ॥ विशालवातायनमन्दमन्दप्रवातवाताङ्कुरजोषजुष्टम् । लघुत्रयीं हन्त बृहत्रयीं वा स्पष्टं पठद्भिर्वटुभिः प्रघुटम् ॥ ९४ ॥ वातप्रकृतिवाले को भाकाश में उडने के स्वप्न भाते है । पित्तप्रधान प्रकृतिवाला अकाल- पलित, अत्यंत गौर, क्रोधी, चतुर तथा पसीनों से स्विन्नगात्र युक्त होता है। वह स्वम में, नक्षत्रसमूह देखता है । कफप्रकृति मनुष्य बलिष्ठ, स्निग्ध तथा दीर्घकेशकलाप युक्त, सुदर, श्यामवर्ण सहित स्थूलशरीरवाला, आलसी, गभीरबुद्धिवाला, विलासी एवं हृदय से शुद्ध होता है। स्वप्न मे वह जल देखता है ॥ ८५-८९ ।। प्रमेह, कफ, पीनस, कुष्ठ, तथा विष और कण्ठ के रोगों से वमन प्रशस्त है। तिमिर, वात, पाण्डु और शीर्षरोग से पीडितों को तथा गर्भिणी को वमन कराना निषिद्ध है। कुष्ठ, अर्श, क्रिमि, पाण्डु, वीसर्प, वात, विष्टंभ और ऊर्ध्वग-रक्त-पित्त के रोगियो को विरेचन कराना चाहिये। दुर्बल और क्षयग्रस्त को विरेचन निषिद्ध है ॥ ९०॥ अव, चिकित्सालय कैसा होना चाहिये, इसका वर्णन करते है चिकित्सालय ऐसा होना चाहिये जिसकी चारो भोर की भित्तियां लिपी पुति हुयीं स्वच्छ चकचकित हो, जहा एक तरफ भगवान धन्वन्तरी का पवित्र चित्र सुशो- भित हो रहा हो, जहां अनेक प्रकार की छोटी बड़ी स्वच्छ चमकदार, विविध रस रसायनो से परिपूर्ण काच कूपियां यथाक्रम सजा कर रखी हुयीं हो, जहा, एक तरफ भिषक् तंत्रोक्त अनेक प्रकार के यन्त्र तथा कोश गत चमकते हुये विविध प्रकार के शस्त्र स्थापित हो, अनेक प्रकारके अवलेहों से भरे हुये भाण्ड शिक्यो मे रखे हुये हों, गजपुट भादि पुटों को देने के लिये जिसमे यथावत् स्थानों की व्यवस्था हो, जहां एक १-पञ्चकर्मप्रधानभूते वमनविरेचनकर्मणी येषु विहिते महात्ययकारके सपद्येते तत्रा- वधानार्य तद्योग्यपुरुपनिदर्शनम् । २-अधुना चिकित्सागृहस्य 'असपताल' इति प्रसिद्धस्य वर्णनम् । ३-उपर्युपर्यापतन्त आगच्छन्तो ये आर्तसार्था रोगिसमूहा । सुगममन्यत् । 2. ४-निदानशाधिरनिघण्टुरूपाम् । ५-चरकसुश्रुतवाग्भटरूपाम् । - - + १२४ . सिद्धभेषजमणिमालायां [दूतादि- आच्छादनालम्बितलोहशदुविलोलकाचद्रुचमत्कृताम् । शिलाविभङ्गश्चतुरस्रवद्धचतुष्कचञ्चत्कदलीकदम्बम् ॥ ९५ ॥ सर्वत्र सर्वर्तुसुखप्रदेशं समीपतः कृपतटीनिवेशम् । प्राचीमुखं तद्वदुदङ्मुखं वा तत्ताडगुत्सेधनिरुद्धखं वा ॥ ९६ ॥ उदूखलाभ्यर्णनिषण्णखल्वं ततान्तरं तत्तदुपस्करोघैः । अप्युच्चशालं परितो विशालं वुधाश्चिकित्सागृहमीगाहुः ॥९७॥ कुलकम् । पवित्र पट्टासन पर विराजमान वैद्यवर रोगियो की नाडी परीक्षा कर रहे हो तथा एक ओर, एक के पीछे एक आते हुये रुग्णसमुदाय को यथोचित ओषधिया दी जा रही हो, जो विशाल वातायनो मे से मन्द मन्द प्रवहमान पवन के मनोनुकूल झोंकों से युक्त तथा लघुत्रयी (माधव निदान, शार्ङ्गधर तथा निघण्ट) एवं बृहत् त्रयी (चरक, सुश्रुत, वाग्भट) का स्पष्ट उच्चारण करते हुये छात्रो के उद्घोष से प्रतिध्वनित हो, जहां, छत से लटकते हुये लोहमय शंकुओ पर अवलंबित हिलते हुये काच के फानूस आदि से सुसज्जित अतएव मनोग्राही प्रतीक्षालय की व्यवस्था हो, जहां, हवा में झूमते हुये कदली वृक्षो की कतारो से युक्त तथा शिलाखंडों से आवद्ध सम चतुष्कोणवाला बाहरी प्रागण हो, जहां, सर्वत्र सभी ऋतुओं के अनुकूल निवास कक्ष हो, तथा निकट ही मे कूप के परिसर पर एक शिबिर की व्यवस्था हो, चिकित्सागृहद्वार पूर्वाभिमुख अथवा उत्तरा- भिमुख हो एवं जिसके ऊपर का अत्युच्च विवरभाग निरुद्ध कर दिया गया हो, जहां औषधीय द्रव्यादि से परिपूर्ण खरल तथा निकट ही उदूखल रखे हुये हो तथा चारो ओर से विशाल और उची छतवाले कमरे हों, पंडितो ने इस प्रकार के चिकित्सा गृह को आदर्श माना है। फुटकर रचनाओ का संग्रह -(विषाद से रोग मे वृद्धि होती है 'विषादो रोग- वर्धनानाम् ।' मन के प्रसन्न होने पर विषाद स्वयमेव शान्त हो जाता है। परिणामत ज्वरादि रोगो के शमनपूर्वक स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है । चरक के मतानुसार, ज्वरित को, चमत्कारिक, विलक्षण, कौतुकमय तथा आल्हाद जनक साधनों और प्रसगो द्वारा मनोरजन पूर्वक, ज्वर की वेला तथा वेग आदि की विस्मृति करा देनी चाहिये। वैद्य को, इस प्रकार के मनोविनोद आदि साधनों से सुसंपन्न करने के लिये ही 'मुक्तकसग्रह' की अवतारणा की गई है। इसमे अमुक प्रसग वस्तुत चमत्कार पूर्ण एवं अद्भुत है। अटपटे प्रसगो का आर्जव गुणोपेत रसमय शैली मे जो सहज एवं सुरम्य वर्णन किया गया है वह अपूर्व है।) (मुक्तकसंग्रह के प्रथम श्लोक द्वारा उस सांकेतिक भाषा तथा व्याकरण का दिग्दर्शन किया गया है जिसमे प्रकट किये गये भाव और अर्थ को वही समझ सके जिसे उस भाषामादि का पूर्व से ही परिचय हो। इस प्रकार की भाषा का प्रयोग तभी होना चाहिये जब प्रसगवशात् अपने खास मित्र को ही वह भाव अथवा अर्थ अभिव्यक्त करना अभिप्रेत हो, अन्य को नहीं ।) प्रस्तुत श्लोक में शिव की स्तुति है।
१२५ 1 तृतीयो गुच्छ.। मुक्तकसंग्रहः। श्रीमृडः प्रौढखट्वाङ्गी झपादारिः फणीशधः । भसिताच्छोऽथ जयदो घनाक्षश्च बली हैंठी ॥ ९८ ॥ 'सुवर्णरूप्यत्रपुतुत्थवीजवद्धस्य बीजस्य पुरारिजस्य । यथारुचि क्रीडनकानि चित्राकृतीनि कुर्वन्तु कृतिप्रकाण्डाः ॥१९॥ सर्पिश्चिक्कणचपके निःक्षिप्य वलिं वं घनेऽथ वलौं। गर्भगवलिं द्रवं लघु निरस्य गृह्णीत वलिचपकम् ॥ १०० ॥ चलवान, हटी स्वभाववाले, सपूर्ण शरीर में श्वेत भस्स रमाये हुये, सर्पराज को (गले में) धारण किए हुये, मेघसदृश गंभीर नेत्रवाले, खटांग (एक ऐसी गदा जिसके सिरे पर नरमुंड हो) नामक विशाल आयुध से सुशोभित, कामदेव के रिपु भगवान् मृड (शंकर) तुम को विजय प्रदान करें। (इस श्लोक के प्रत्येक अक्षर का साकेतिक अक्षर है। जैसे श्री का क, मृ का स, ड का ग-इत्यादि । सांकेतिक अक्षरो में यह श्लोक इस तरह भी लिखा जा सकता है। 'कखगायौ, चच्छजझा, टाठाडाढाणतो- सथदौ-धनपाफो बभमायो रोल. श प. सहोक्षश्री)॥ ९१-९८ ॥ स्वर्ण, रजत, रागा तथा तुत्य के योग से प्रथम, पारद, को यथाविधि सिद्ध करके पिण्डित बनालें। अब, निर्माणक्रिया में निपुण व्यक्ति इस पिण्डित पारद से विविध भाकृतिवाले विलौने बनाले। इन खिलौनो को गधक वयोग से पकाकर सुदृढ कर लेना चाहिये ॥ ९९ ॥ प्रथम, एक पात्र को उसके भीतर घृत चुपड कर चिकना कर लें । फिर इसमे गंधक चूर्ण भरकर, उसको भग्नि से पिघलाले । जब गधक पूर्णतया द्रवित हो जाये १-अय चित्रगुच्छानुगुणा सहृदयचेतश्चमत्कारावहा विजातीया अपि वेचन प्रकारा वैद्यानामपि कवितारसलवास्वादनार्थ स्वरसिकताप्रक्टनार्थ चाभिधीयन्ते गुरुभि प्रयोजनानि चैपामातुरस्वान्तप्रसादकतया ज्वरवेगविस्मरणादीनि वहूनि कल्पनीयानि स्वय सुधीभि । सति खल प्रहृष्टे मनसि विपादनाशोऽवश्यंभावी, विपादो हि रोगवृद्धिहेतु , "विषादो रोग- वर्धनानाम्" इत्यागमात् । तन्नाशाच्च रवास्थ्यमिति । चरकेऽप्युक्तम्--"ज्वरकाल च वेगं च चिन्तयश्चर्यते तु य । तस्येप्टैस्तु विचित्रैश्च विपयैर्नाशयेत् स्मृतिम् ॥” तत्रैव च- "ऋत्वहोरात्रदोषाणा मनसश्च वलावलात् । कालमर्यवशाच्चैव ज्वरस्तं त प्रपद्यते ॥" इत्यादि । तत्रादौ सभाया पत्रे च स्वमित्रं प्रति भाषणाय लेखनाय गुह्यार्थस्य निगृहनप्रकार । २-खट्वाज आयुधविशेप । ३-झषाको मदन , तच्छत्रुरित्यर्थ । ४-अस्य व्याकरणमपि विरचितं तैरेव । (इत. पर प्रकरण प्राप्ता टिप्पणी परिशिष्टे प्रतीयताम् ।) ५-सुवर्णादीनि चत्वारि बीजानि, तै सह यथाविधि पाकात् सजातपिण्डकस्य पारदस्य यथेच्छ प्रतिमा- गुटिकाकटोरादीनि खेलनकानि विधेयानि, गन्धकद्रवपाकादृढानीति शेष.। ६-अग्नियोगाद् द्रुतम् । ७-गन्धके । ८-शीघ्रम् । ।
१२६ मिनभेपलमणिमालायां [मुगाफ- कर्पूरमुहाय्य गुरूक्तयन्त्रयुक्त्या शनराममृदः गराये । अद्भिः पृथकृत्य मृदः शरावं गृहन्तु कर्पूरशरावमच्छम् ॥ १०१॥ चूर्णन सैन्धवसितादिसमुत्थितेन बम्बूलगुन्द्रसलिलोक्षणपिण्डितेन । नानाविधानिचपकप्रभृतीनि काम पात्राणि लग्णरुचये रचयन्तु वैद्याः१०२ लाक्षासत्त्वं पलं चेद्वितर सरुदपामाढकं काथहेतो. मध्येक्वार्थ त्रिक प्रविकिर मसृणं टाक्षणं चूर्णमेव । काथे त्वर्धावशिष्टे भ्रमय समुचितां पोहली कजलस्य । प्रायः प्रक्षालनेऽपि स्थिरलिपि लिख रे कागदं काऽत्र शङ्का १०३ - तव पान को उतारले । कुछ शीतल होने पर जब पान के चारो भोर लगा हुभा गंधक धनभाव को प्राप्त होने लगे तब मध्य भाग गत वरल गंधक को, धनीभूत होने के पूर्व ही शीघ्र बाहर नितार ले। इस तरह, पात्ररूपी वीये में निर्मित तत पात्राकृति गंधकमय पात्र को सावधानी से निकाल लें। इसे बलि-गंधक - चपक (सकोरा) कहते हैं ॥ १०॥ कपूरचूर्ण को एक तवे पर फैलादे तथा उस पर मिट्टी का कद्या सकोरा मांधा ढकदें। नीचे मदाग्नि योग से कपूर को इस कच्चे सकोरे में धीरे धीरे उडालें। इस तरह सकोरे के चारों भोर कपूर लग कर चोट जायेगा। सकोरे को उतार कर उसके भीतर चारो ओर भेड का दूध चुपट दें। इस तरह करने से कपूर दृढ हो जायेगा तथा उडेगा नहीं । अब, जल से कच्चे सकोरे को पिघला दें (गला दें) तथा भीतर से स्वच्छ कपूर शराव को ग्रहण करें ॥ १०१॥ बबूल के गूद को पानी में मिलाकर उसके द्रव से, सैंधव, शक्कर, लौंग, जायफल मादि में से किसी के भी चूर्ण को, पिंडित वनाले । कुगल वैद्य इस पिड से अपने रोगी की रुचि के अनुसार अनेक प्रकार की भाकृतिवाले पात्रो का निर्माण करें ॥ १०२ ॥- करीब २५६ तो पानी में चार तोलाभर लाक्षा सत्व मिलाकर उकालें । इस उकलते हुये काथ मे तीन तोला टकणक्षार का सूक्ष्म चूर्ण मिलादें । जव वाथ भाधा ही रह जाये तब उसमे काजल की पोटली डुबोकर चारो ओर घुमावें। इस तरह १-सचूर्णितं कर्पूरं तवके समास्तीर्य उपर्यपक्वमृच्छराव दत्त्वाऽधो मन्दामितव्य इति । तया मेषीदुग्धेन सह म्रक्षणादपि पिण्डीभूतस्य घटनीयम् । २-आदिशब्देन लवङ्गजातीफलादीना ग्रहणम् । एतेषामपि मेपीदुग्धेन सभवति । 3-पक्कमपीविधिरयम् । ४-कागदशब्दो नपुंसके, अभिधायकतया च ‘कागज' इत्यरवीभाषाया 'कागल' इति गुर्जरभाषाया प्रसिद्ध शणपत्रे। यथोक्त मन्त्रकल्पद्रुमोक्तहनुमत्कवचे-"भूर्जे वा वसने रक्के सौमे वा तालपत्रके । कागदे वाऽष्टगन्धेन पञ्चगन्धेन वा पुनः ॥ त्रिगन्धेनायवैकेन विलिख्य वारयेन्नर ॥” इति । । - संग्रह.] तृतीयो गुच्छ.। लाक्षां साक्षात् क्वाथयेत् साधु धौतां स्वर्जीपट्टीटकणैः पोडशांशैः । काथस्यायःपात्रघृष्टस्य वट्यो वारिक्लिन्नाः स्युर्मपीमातरस्ताः॥ १०४ ॥ शैतमल्लकसौभाग्यनवसादरधूलिताः। धर्मन्यस्ता विनश्यन्ति मपीवर्णा दलस्थिताः ॥ १०५ ॥ रविदुग्धघृताक्षरमपि निरक्षरमिव प्रतीतमझेन । पत्रं कृशानुतप्तं तदक्षराणि व्यनक्ति सहसैव ॥ १०६ ॥ कदलीरसेन वसने विन्यस्तान्यक्षराणि लेखिन्या। सुचिरं स्थिरीभवन्ति क्षारैः प्रक्षालितानि शतशोऽपि ॥ १०७ ॥ सोरेकसादरटपणतुत्थस्फटिकाकसीसमिति तुल्यम् । निम्बम्बुघृष्टमयसि व्यनक्ति चित्राणि धर्मसंवन्धात् ॥ १०८ ॥ बीजपूरजठरे रजः कुरु लोहस्य विशिष्य । त्रिचतुर्भिर्दियसैवं तस्य विलोकय शिष्य ॥ १०९ ॥ निर्मित स्याही से आलेखित अक्षर, प्रक्षालित होने पर भी प्राय. स्थिर रहते है । यदि शंका हो तो पत्र लिखकर परीक्षा करले ॥ १०३ ॥ जल से अच्छी तरह स्वच्छ की गयी लाक्षा को, उससे सोलह भाग जितने, सजी सार, पठानी-लोध तथा टंकण के चूर्ण के साथ, काथ विधि से उकाल लेवें। फिर, इस छाय को लोह के खरल में खूब घोटकर गाढा होने पर उसकी टिकियां बनाले । स्याही की साक्षात् जननी रूप, इन टिकियो को पानी मे पिघला कर उपयोग म लेवें।।१०४॥ शतमल, सुहागा तथा नौसादर के चूर्ण को पत्रगत स्याही के अक्षरो पर भुरकाकर सूर्य के ताप में रखदें। इससे भक्षर विलीन हो जायेंगे । अर्क दूध से पत्र पर लिखे गये भक्षर, अनभिज्ञ के अक्षर ज्ञान की तरह अत एव निरक्षर (मानो अक्षर है ही नहीं) जैसे प्रतीत होगे। कितु पत्र को अग्नि तप्त करते ही वही भक्षर उस पर सहसा प्रकट हो जायेगे । कदली रस से वस्त्र पर आलेखित भक्षर दीर्घ काल तक स्थिर रहते हैं तथा क्षार से शतश. बार धोने पर भी नष्ट नहीं होते। सोरा, नौसादर, टकण, तुत्य, फिटकरी और कासीस इनका सम भाग सूक्ष्म चूर्ण बनालें। फिर इसको निवू रस मे अच्छी तरह खरल करें। लोहपट्ट पर इस रस से आलेखित चित्रादि सूर्य ताप में ही प्रकट दीख पडेंगे ॥ १०५-१०८ ॥ विजौरा निंबू के भीतर लोह चूर्ण भरदे । तीन चार दिवस मे ही वह चूर्ण पिघल कर द्रवरूप हो जायेगा ॥ १०९॥ १-पटिकारोन 'पठाणी लोद' इति प्रसिद्ध । २-पत्रलिखितमषीवर्णोत्सादन- प्रकार । ३-लौहे वर्णोत्पादनप्रकारोऽयम् । ४-अयोद्रवीकरणप्रकार ।
१२८ , सिहभेपजमणिमालायां [मुक्तक- सारैस्फटीसादरटवणानि कासीसर्दुर्वर्णलसन्महांसि । संसाध्य निम्बूकपयोभिरारपात्राणि घृष्टा कुरु रौप्यभांसि ॥ ११० ॥ चेल समास्तीर्य रवेण वेणोराहूय लोकं कुतुकोपजीवी । नितम्बमास्फोट्य निपीड्य कुक्षि मुखात्मुखं प्टीवति गोलकानि ॥ १११॥ आवेष्ट्ये वेगादसद्विमर्पितप्रान्तद्वयीकेन गुणेने घर्पिता। हहो क्षणादेव यथामनोरथं द्वेधा भवेत् काचन काचपिका ॥ ११२ ॥ कागदकृतं कटाहं सतैलमारोप्य चुल्लिकामूर्ध्नि । अवतारय निश्शझं पूरीकचवल्यपूपाढीन् ॥ ११३ ॥ मधुकतैलप्रतिसंस्कृतस्य गोधमचूर्णस्य विधाय लोत्रीम् । पूरीस्तटीयास्तलयन्तु वाढमावर्तमानाम्भसि सत्कटाहे ॥ ११४ ॥ जपाप्रसूनप्रकरप्रमार्जितच्ठुरीसुतच्छिन्ननवीननिम्बुकम् । क्षतादलं लोहितलोहितच्छवीन रसस्य विन्दून कियतोऽपि वर्पति ॥११५ कलमी सोरा, फिटकरी, नौसादर, टंकण, कासीस तथा रजत इन सबके चूर्ण को निंबू रस में सिद्ध करके इनका मुलम्मा-गिलेट- देने से पीतल के पात्र चादी के समान चमकने लगते है ॥ ११०॥ एक वस्त्रखड को जमीन पर विछाकर, बासुरी के स्वर से अपने इर्द गिर्द मनुप्यो को एकत्रित करता हुमा, दोनो हाथो से अपने नितंब प्रदेश को बारबार फटा फट फटकारता हुभा, वाजीगर अपने पेट को दवा दवा कर मुख मे से, सभी को आश्चर्य मन करता हुआ सरलता पूर्वक, एक के पीछे एक, गोलो को निकालता है ॥ ११ ॥ काचकूपी को एक सूतली से लपेटकर तथा सूतली के दोनो छोर पकड अत्यत वेग से पुन पुन घर्षण करने से अहो। एक ही क्षण में वह काचकूपी दो भागो में विभक्त हो जायेगी ॥ ११२ ॥ कागजका, कटाह जैसा एक पात्र बनाकर उसे तैल से परिपूर्ण भरदें । फिर इसे चूल्हे पर रखकर उसमे पूरी, कचौरी, अपूप आदि तल तल कर उतार लें ॥ ११३ ॥ मधूक तैल का मोमन देकर, गेहूं के आटे को पानी से गूध कर लोये बनालें । एक कटाह मे पानी भर कर उकालें। इस उकलते हुये जल मे उपरोक्त भाटे की पूरियां वेलकर तल लेवें। (पानी मे पूरी तलने का यह चमत्कारिक तरीका है।) ११४ जपापुप्पो से चाकू को खूब घिसकर साफ करलें । भव इस चाकू से ताजा नींद को सवारें । सवारते समय रक्तवर्ण के बहुत से रसविदु उसमें से टपकेंगे ॥ ११५॥ १-रजतस्वर्णान्यतरलेपनप्रकार । स च लोके 'गिलेट, मुलम्मा' इति प्रसिद्ध. २-रजतम् । ३-'वादीगर' इति प्रसिद्ध ऐन्द्रजालिक । ४-काचकूपीद्वैधीकरणप्रकार ५- सूतली' इति प्रसिद्धेन । ६-प्रसज्ञात् कानिचित्तत्सदृशाश्चर्यकारीणि प्रदर्श्यन्ते खेलन कानि । तैलं चात्रामुखं पूरणीयमन्यथा तदाह । ७-चाकु' इति प्रसिद्धिः । ।
१२९ संग्रह ] तृतीयो गुग्छ। पंटेन पीतदुग्धेन द्वित्रिकृत्वः पवित्रितम् । पानीयमप्यलं धत्ते दुग्धभावं न संशयः॥ ११६ ॥ कथिते चीनघासेन पयसी द्वे सहैव च। उररीकुरुतश्शीघ्र स्त्यानभावं न संशयः ॥ ११७ ॥ शुद्धकट्टीरनिर्यासप्रतिसारणतो मना । तक्रमप्येति दधितां दुग्धस्य तु कथैव का ॥ ११८ ॥ पुप्पयोरश्वमारस्य लोहितार्जुनयोः क्रमात् । स्याद्गन्धगुडधूपाभ्यां वर्णव्यत्ययकौतुकम् ॥ ११९ ।। मध्येभ्राष्ट्र भृष्टः स्नुहीपयोभिर्विभावितश्चणकः। सकृदेव जलोक्षणतस्तत्क्षणमङ्कुरमहो समुद्गिरति ॥ १२० ॥ प्रेत्यग्रमृत्करकयोः शुचि दीर्घसूक्ष्म मध्यस्थनिय॑थनयोरवचार्य सूत्रम् । चक्रायदत्तकरकेण यदुक्तमारात् कर्णाग्रदत्तकरको लघु तच्छृणोति ॥१२१॥ दरान्तरं लिप्तदशोऽधिखल्वं पिन योग्याम्भसि गन्धकेन । प्रवर्तितो हन्त निशि प्रदीपः प्रतिक्षणं प्रज्वलति प्रशाम्यति ॥ १२२ ॥ एक स्वच्छ वस्त्र मे दूध को सोख लें। फिर इस वस्त्र को दो तीन बार पानी में दुवोकर निचोट लेने से पानी नि संदेह दुग्ध ही बन जाता है ॥ ११६ ॥ पानी अथवा दूध को चीनी घास में उकालने से दोनों ही निःसदेह जम जाते हैं ॥ ११७ ॥ कनीरे गूद को किंचित् मात्रा में मिला देने से तक भी दही हो जाता है, फिर दृध की तो यात ही क्या ॥ ११८ ॥ करवीरका रक्तपुष्प, गधक की धूप से, श्वेतवर्ण का, तथा श्वेतपुष्प, गुडकी धूप से रक्तवर्ण का हो जाता है ॥ ११९ ॥ चने को भावित करले । भाड मे भूने गये इस चने पर पानी छिकडते ही उसमें से उसी क्षण अंकुर प्रस्फुटित हो आता है ॥ १२० ॥ (सुदूर स्थित होने पर भी परस्पर वार्तालाप का यह प्रकार सुस्पष्ट है । आधु- निक विज्ञानयुग की 'टेलीफोन' पद्धति का, वालको के कौतुकार्थ, यह एक निराला ही अनुकरण है।) ॥ १२१ ॥ गधक को यथामात्रा जल से खरल करले। वत्ती के कुछ भीतर करें। इस वत्ती से रात्रि को प्रदीप्त किया गया प्रदीप प्रतिक्षण प्रज्वलित तथा प्रशमित होता रहेगा । कपास और एरंड के बीज, गंधक, तिल, अलसी तथा राल की, एक दो या अधिक घटो में धूप देकर उन्हें धूमित करलें । प्रत्येक घट के पाव में पहिले से ही १-पानीयस्य दुग्धीकरणप्रकार । २-लोहितकरवीरपुष्पस्य गन्धधूपेन श्वैत्यं, सितस्य गुडधूपेन लोहिताभासत्वमिति । ३-दूरस्थितेन सह भाषणप्रकार । इसका प्रलेप सि०१ सिद्धभेपनमणिमालायां [नाथप कसिपश्चागुलबीजगन्धतिलानसीनिर्जरधृपध्मः । घटद्वयीपार्शनिखातनालीवान्तः प्रदीपीभवति प्रटीमः ॥ १२३ ॥ पात्रस्य पृष्ठवलये विततं खण्डमाम्वरम् । अद्गारो नदहत्येव किमतःपरम द्रुतम् ॥ १२४ ॥ न चोप्णतेले विच्छकाकभस्मावकीर्णम्य करम्य दाहः । आश्चर्यमेतत् पुम्पोत्तमेन विद्यार्थिना मद्यमिह प्रदत्तम् ।। १२५ ।। गर्भधृतसौधशकलं काय जलेन परिपूर्णम् । शब्दायते गुडगुडं वमति च धूमं विनैव पातारम् ॥ १.६ ॥ अम्भोभृतामर्जुनकाचकृपी निस्तन्द्रमालोकयनां शिगनाम् । भूतं भवद्गावि च वस्तुजातं प्रत्यक्षपदाति पुगे निपण्णम् ।। १२७ ॥ खधूपवर्णनम् । सौरात् प्रस्थ. साद्विराम्राणि पञ्च गन्धात्ते च है शिलातोऽक्षमिन्दो. । सर्व पिष्टवा न्यस्तमन्तश्शरावं चन्द्रज्योतिर्जाज्यलत्यन्नियोगात् ।। १२८ ।। लगाई गयी नलिका से बाहर निकलने हुये इस धूम को प्रचालित करने से वह दीपक के समान प्रदीप्त रहेगा । यह प्रकार गैम लाइट' का अनुकरण ? ॥ १२२-२३ ॥ पात्र के बाहरी भाग के वलय पर कपडे का टुकडा रपेट दें। अंगार से यह कदापि दग्ध नहीं होगा। इससे अधिक मत और क्या हो सकता है। बिच्छु के ठक की भस्म लगाकर हाथ को गरम तेल में रसे। यह जलेगा नहीं। यह माश्चर्य पूर्ण प्रयोग मुझे मेरे छात्र पुरुषोत्तम ने बताया है। पानी से परिपूर्ण दुपे में कलिकासंड टाल दें। पीनेवाले के विनाही, उसमें से गुडगुड पनि पूर्वक धूम इस तरह निकलता रहेगा मानो सचमुच उसे कोई पीरहा हो । जलपूर्ण वेतकाचके पान को सात माठ वर्षीय बालक के सम्मुस रखदे। अब, निनिमेपदृष्टि से इसकी ओर देखते हुये वालको का भूत भविष्य तथा वर्तमान-वृत्त इस के सामने बैठे हुये को प्रत्यक्ष दिखाई देगा।। ॥ १२४-१२७ ॥ मातगवाजी का वर्णन.-एक सेर सोरा, पाव भर गंधक, सवा सेर मन मिला १-इग्लेण्डवासिचतुरजनप्रचारितग्यामाख्यधूमदीपनिर्माणप्रकारस्य दिक्प्रदर्शन- मिदम् । अत्र वर्षासेरण्डयोवीजानि ग्राहाणि । निर्जरचूपो ‘राल' इति प्रसिद्ध शाल. निर्यास । घटद्वयीत्यत्र द्वयीत्युपलक्षणम् । तेन यावत्प्रयोजन घटवृद्धि कार्या। तत्र प्रथमघटस्यैकपार्वं द्वितीयादीनां द्वयोरपि पार्श्वयोनलिकारोपणमिति । २-काचकूपी कुमारात् प्राग्दिशि स्थाप्या, कुमारश्च सप्ताष्टवर्षदेशीय , एव च दिवेव रात्रावात्ययिक कर्मणि एपेति- कर्तव्यता । यया मदनफलमूर्वे दग्ध्वा तत्कोकिलानि तैलघृष्टानि कास्यपाने हस्ते वा आलि- प्यानिमेपं दीपसविधे तहने तथैव चमत्कृति । ३-अग्निसपर्कज्वलखेलनकाना सज्ञेयम् । तया च शब्दार्यचिन्तामणी-"सधूप पुसि अग्निकीडाविशेपे। 'हवाई' टति भापायाम्"। तथा “उक्षाप्रचकुर्नगरस्य मार्गान् ध्वजान् ववन्धुर्मुमुचु खधूपान।" इति भट्टि । भापायाम् 'आतशबाजी' इति श्रीमन्माधवक्षितीगविवाहवर्णने गुरुभिरपि वर्णनं व्यवायि तद्विशेषा- ग्रहण की वर्णनम् ] तृतीयो गुच्छ.। आग्नेयक्षोद सारैर्निरवधिनिभृता पिच्चिता पुच्छभागे वह्निस्पर्शेन तेजोमयकुसुमझरीरुच्चकैरुगिरन्ती । नेत्रानन्दं विधत्ते निशि दलनलिका सस्पृहं सुन्दरीभि- हस्ते न्यस्ता प्रकीर्णस्फुटकनकसुमस्तोमवर्षेव वल्ली ॥ १२९ ॥ आकाशतैः काश्चननिम्नगायाः पतेत् सपुष्पो यदि शीकरोघः । तेनाप्नुयुः सारचमत्कृतानि तुलां ज्वलत्पुष्पझरीमहांसि ।। १३० ॥ पश्यत पश्यत हाहा स्वाहापतिचुम्बिताधरप्रान्ता । पुष्पझरी पुष्पझरी वर्षति मिपतां प्रहर्षाय ॥ १३१ ॥ इह विल लन्ति विलासा युवतीनां युवविशेषमासाद्य । पश्यत पुग्पझरीयं विकसति निशि पावकादेव ॥ १३२ ॥ तथा कपूर एक तोला, इन सबको पीसकर एक शराव में ठसाठस भरदें। इसको प्रज्वलित करने से 'चंद्रज्योति' खिल उठेगी ॥ १२८ ॥ भाग्नेयद्रव्यो के चूर्ण से खूब लिप्त, पुच्छ भाग में चिपटी, अग्नि के स्पर्शमान से तेजोमय पुप्पों को ऊचे उछालती हुई-सुदरियो द्वारा सस्पृह हाथ मे गई, चारो ओर मानो स्वर्ण के पुष्प गुच्छो की वर्षा करने वाली लता के समान यह पुष्पझरी रात्रि मे किसके नेत्रों को आल्हादित नहीं करती ॥ १२९ ॥ स्वर्ण की सरिता के जलबिन्दुमो का धोध यदि पुष्पगुच्छों सहित भाकाश से पतित हो तो वह देदीप्यमान पुष्पझरी के सारभूत चमत्कृत तेज से समता प्राप्त कर सकता है ॥ १३०॥ भो हो । देखिये, देखिये, देखने वालो को आनन्दित करती हुयी यह पुष्पझरी अग्नि से अधरप्रात पर चुवित होते ही पुष्पो की झरी का अभिवर्पण कर रही है। जिस तरह युवकविशेष के समागम से, युवति अपने विलास को उन्मुक्त होकर अभि- णाम्। यथा हि-" उच्चैर्दुर्गमदुर्गवप्रनिहितादाग्नेययन्त्रात्ममुद्गन्छगोलविकासविप्रसमरा व्योम्नि स्फुलिङ्गोत्करा । भान्ति माधवमाधवस्य सुभग द्रष्टु विवाहोत्सव तारानाथ गिराम्बरादवत- रत्तारानुकारा सखे। भवनच्छवीनि दहनक्रीडानकानि समुदश्चद/षि । अयि राजन् स्मर- यन्ति त्वदीयरिपुभवनदाहस्य ॥” इत्यादि । तद्विशेषाणा केषाचिन्निर्माणप्रकारस्तथा केषा- चिद्वर्णनमत्रापि प्रदर्यते तत्रादौ चन्द्रज्योति प्रकार । लोके च 'चन्द्रज्योति' तथा 'महताव' इति प्रसिद्धि । ४-पलानि । १-फूलझडी' इति प्रसिद्धाया वर्णनम् । २-अत्र काञ्चननिम्नगातोऽसवद्धानामपि पुष्पझरीमहसा तत्सवद्धत्वेनाध्यवसायादसम्बन्धे सम्बन्धरूपातिशयोक्तिरलङ्कार.। तथा चोक्तं दर्पणे-"सिद्धत्वेऽध्यवसायस्यातिशयोक्तिर्निगद्यते। भेदेऽप्यभेद सबन्धेऽसवन्धस्तद्विपर्यया । पौर्वापर्यात्ययः कार्यहेत्वो. सा पञ्चधा तत ।" इति । अभूतोपमा वा । ३-अत्र प्रस्तुताया पुष्पझर्यामप्रस्तुतरजम्बलाव्यवहारसमारोपात् समासोक्तिरलङ्कृति । तल्लक्षण च यथा-"समा- सोक्ति समैर्यन कार्यलिङ्गविशेषणे । व्यवहारसमारोप प्रस्तुतेऽन्यस्य वरतुन ॥” इति । ४-इह सामान्यस्य विशेषेण समर्थनादर्थान्तरन्यास ।
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सिद्धभेषजमणिमालायां
[सधूप-
अर्धोदञ्चितचारुचन्द्रमसृणज्योत्स्नावलक्षच्छवि-
वैल्गध्यालकरालफूत्कृतिचलद्गगातरङ्गाकुलः ।
मन्दारस्फुरिताशयः सरभसं रामाववद्धारुति-
भद्रं वो विधातु धूर्जटिजटाजूटो नदीनच्छटः ॥ १३३ ॥
श्रीलल्लुरामात्मजकुन्दनायो लेमे जनि कृष्णकवेर्हि तस्य ।
भैषज्यरत्ननजि सगुणायां गुच्छस्तृतीयोऽयमवाप पूर्तिम् ॥ १३८ ।।
इति तृतीयो गुच्छः समाप्तः।
व्यक्त करती है-उसी तरह अग्नि-समागम से रात्रिकाल में पुप्पझरी भी विकसित हो
उठती है ॥ १३१-१३२ ॥
(इस से अग्रिम श्लोक, ग्रंथकार के अप्रकाशित काव्य ‘जयपुरमेलककुतुकम् ' से
सगृहीत किये गये हैं। इन मे से कतिपय श्लोको को हमने इस पुस्तक की प्रस्तावना में
उद्धृत किये है। इस काव्य का शीघ्र ही प्रकाशन हो रहा है । अतः काव्यरसिक वैद्य
इन श्लोको को अपने सपूर्ण सदर्भ मे वहां ही देखे ।)
प्रस्तुत श्लोक व्यर्थक है । इस मे श्रीशकर के जटाजूट के साथ समुद्र का रमणीय
वर्णन किया गया है। यह मंगल श्लोक ग्रंथ के पूर्वाध की समाप्ति का सूचक है।
चंद्रकला की (समुद्रपक्ष मे-मंथन के समय समुद्र में से उदित होते हुये-
अर्धोदित चंद्रमा की) स्निग्ध ज्योत्स्ना से पाण्डुर-वर्ण शोभा को धारण किये हुये
उछलते हुये कराल सपा की फूत्कार से विक्षुब्ध बनी हुई गगा की (पक्ष में नदिय
की) तरग मालाओं से भाराक्रांत (पक्ष मे परिपूर्ण), मंदार की (पक्ष में-मंथन है
समय बाहर निकलते हुये मंदार वृक्ष की) सुषमा से युक्त, अपनी रामा-भार्या रं
शीघ्रता पूर्वक लपेट कर बाधा हुमा (पक्ष मे-राम से सेतु- बद्ध) भगवान शंक
का, समुद्र की छटा जैसा-जटाजूट आपका कल्याण करे ॥ १३३ ॥
श्रीलल्लुरामजी के पुत्र कुन्दनरामजी से उत्पन्न, उपकारवृत्ति से युक्त श्रीकृष्ण
कविद्वारा गुम्फित इस सुदर गुणयुक्त (गुणसूत्र) सिद्धभेपजमणिमाला का यह तृतीर
गुच्छ सपूर्ण हुमा ॥ १३४ ॥ तृतीय गुच्छ समाप्त ।
सिद्धभेषजमणिमाला का पूर्वार्ध समाप्त ॥
१-पूर्वार्धसमाप्तिसूचक मङ्गलम् । व्यर्थोऽयं श्लोक । अत्र धूर्जटिजटाजूट समुः
इवेत्युपमालङ्कारः । भक्त्या निष्पादितं कर्म लोकोपकृतिहेतवे । मालोक्य करुणापारावार
कृष्ण प्रसीदतु ॥१॥ नानाभेदचमत्कृतिरसमलधात्वादिपूरितश्चित्र.। मेषजमणिमालाय
गुच्छोऽच्छोऽय सुमेरुवद्भाति ॥ २॥ यः प्राचा भिषजां विवेद महितास्तिस्रोऽपि त
सहिता साहित्य च सधर्मशास्त्रमभित स्वच्छन्दवाक् छन्दसि । लक्ष्मीरामसुधी. स ए
भिषगाचार्यप्रशस्ति वहन् श्रीभैषज्यमणिस्रजो विवृतवान् गुच्छे तृतीय परम् ॥ ३ ॥
अथ चतुर्थो गुच्छकः। 'निष्कलङ्ककलं धत्ते यः कपर्दै तमीश्वरम् । भुजङ्गभूषितभुजं वन्दे देवं तमीश्वरम् ॥१॥ सिद्धप्रयोगगुरवो विशिष्य गुरुगौरवाः। श्रीकृष्णगमभिषजा प्रणम्यन्ते पुनः पुनः ॥२॥ प्रत्यक्षसिद्धिसंयोगा रोगानीकविमर्दिनः। विश्वेषामुपयोगाय सिद्धयोगाः समर्थिताः ॥३॥ श्रीकृष्णाख्यो व्यासो विहिताभ्यासो बृहन्नयीपैठने । नातिसमासव्यासं कलयति सिद्धप्रयोगविन्यासम् ॥ ४ ॥ - चतुर्थ गुच्छ - मंगलाचरण हरण निखिल बलि के, निपुण, भव तारण-अभिराम । साधु-शरण श्रीकृष्ण के प्रणमहुं चरण-ललाम ॥ १ ॥ (श्री स्वामीजी के टिप्पणीगत श्लोक का यह अनुवाद है । यह श्लोक स्वामीजी की कवि-सुलभ प्रौढ प्रतिमा का दिग्दर्शन कराता है।) अपनी जटाजूट में निष्कलंक चंद्रकला को धारण किये हुये भुजंगविभूषित भुजाओं वाले अधक के सहारक भगवान शंकर को मैं प्रणाम करता हूं ॥ १ ॥ मैं श्रीकृष्णराम, विशेष गौरवसे युक्त तथा सिद्ध प्रयोगोमे सपूर्ण अनुभवी गुरुजनोको पुन पुनः नमस्कार करता हू ॥ २ ॥ सिद्धप्रयोग, प्रत्यक्ष सिद्धि देनेवाले, रोगसमूह का नाश करनेवाले तथा प्राणी- मात्र का हित करनेवाले माने गये है ॥ ३ ॥ बृहत्रयी के सपूर्ण ज्ञानसे युक्त मैं व्यास श्रीकृष्ण, सिद्धप्रयोगो का, अतिसक्षेप और अतिविस्तार से रहित वर्णन करता हूँ ॥ ४ ॥ १ बले (क) सर्वस्वहरणं (ख) प्रवण भवतारणे (ग)। साधूनामेकशरण श्रीकृष्ण- चरणं नुमः ॥ १॥ सदा शिवाराधनतत्परोऽपि (घ) भूय शिवाराधनतत्परो (ड) य । सदा शिवाराधनतत्पर. (च) स भूयाच्छिवाराधनतत्परो (छ) न ॥२॥ अथ खलु सिद्ध भेषजमणिमालापूर्वार्धसमाप्त्यनन्तरमाविर्भूतदीनार्तसतापजिहीर्षा प्रकृष्टप्रयासप्रगुणीकृतत- तत्प्रयोगगुरुप्रसादप्राप्तनवनवप्रयोगमणिभिरारभन्ते तदुत्तरार्धमाकलयितुं गुरवः । चिकित्सा- लक्षणं चालोकनीयं चरकखुवाकचतुष्पादे-"चतुर्णा भिषगादीना शस्ताना धातुवैकृते । प्रवृत्तिर्धातुसाम्यार्या चिकित्सेत्यभिधीयते ॥" तत्र पादत्रयं सक्षेपेणाभिहितमेव, अत. परिशिष्टभेषजपादाभिधानस्यौचित्यमिति । २-"मङ्गलादीनि मङ्गलमध्यानि मङ्गलान्तानि - १३४ सिन्दभेपजमणिमालाया [ज्वर- भक्तिं कृत्वा खनित्रं गुरुहृदयनिधिस्थानमनः खनिन्या तत्र प्राप्य प्रयोगद्रविणमनुपम वैद्यदारियहारि । श्रीकृष्णः कीर्तितृष्णः सहृदयहृदयारच्चनृत्तः सुवृत्तः संदर्भ तत्त्वगर्भ विरचयति गदग्रस्तलोकोपकृत्यै ॥ ५॥ आचार्यैरधिनिगम निगृहितानि प्रत्यक्षस्फुटविभवानि भेषजानि । तान्यस्मिन् गुरुवदनात्कियन्त्यवाप्य वैद्यानामुपकृतये निवेगितानि ॥ ६ ॥ तत्र तावद्दं वुद्धा बुद्धिमान् दोपलक्षणैः । एपामन्यतमं कंचित् प्रयोग योक्तुमर्हति ॥ ७ ॥ आतङ्कप्रत्यनीकेपु प्राप्तेपु कृपया गुरोः । सिद्धयोगेपु नो न्याय्या विचिकित्सा विपश्चिताम् ॥ ८ ॥ मैंने भक्तिरूपी सनित्र द्वारा, गुरु के हृदयरूपी सानमेसे, वैद्यों के दारिद्रय को दूर करने वाला अनुपम रत्न प्राप्त किया है । यश की अभिलापा से मैं भय रोगग्रन्न मानव जाति के उपकारार्थ सहृदयो के हृदयको रसमय कर देनेवाले सुदर पद्यो में सारपूर्ण सदर्भ का प्रारभ करता हूं ॥ ५ ॥ प्राचीन भाचार्योंने प्रत्यक्ष चमत्कार दिखाने वाले बहुत से सिद्ध प्रयोगों का उल्लेख अपने अपने शास्त्रो मे किया है। कितु वह निगृढ है। उनमे से कतिपय प्रयोगो के रहस्यका ज्ञान मैंने साक्षात् गुरुमुख से प्राप्त किया है । उन्हीं का वर्णन वैद्यजनोप- कारार्थ इस ग्रथ मे किया जायेगा ॥ ६ ॥ अत. बुद्धिमान वैद्य, सर्व प्रथम, दोष एवं लक्षणो द्वारा रोग का निर्णय करके, फिर इनमे से किसीभी एक सिद्धप्रयोग का उस रोग पर निर्भय उपयोग कर सकता है। केवल गुरुकृपा से प्राप्य इन सिद्धप्रयोगो मे रोग के दमन करने की भचित्य शक्ति है । अत इस विषय मे किसी को जरा भी शका नहीं करनी चाहिये ॥ ७-८ ॥ शास्त्राणि प्रयन्ते" इति वचनात् पुनर्मगलाचरणम् । ३-चन्द्रम् । ४-चरक्सुश्रुतवाग्भट- सहितात्रयीपठन इत्यर्थ ॥ (क) बलिराजस्य, पक्षे गन्धकस्य । (ख) वामनरूपेण, पक्षे जारणादिविधिना । ग) भवससार , पक्षे पारद । (घ) ईश्वरध्यानपर इत्यर्थ । (ट) शिवा धनुर्धरी- सज्ञका कुलदेवी, तदाराधनतत्पर , अथवा शिवस्य पारदस्याराधने तत्तत्सस्काराचरणे कुशल । (च) शिवा हरीतकी, अशिवस्याकल्याणस्यावारणे प्रवण इति वा । (छ) नोऽस्माकं श्रेयश्चिन्तनपरो भूयादिति ॥
चिकित्सितम्] चतुर्थों गुच्छ.। १३५ तत्रादौ ज्वरंचिकित्सितम् । रुद्रावतार इति यं विवुधा. स्तुवन्ति दक्षं हि योऽदमयदीश्वरहासदक्षम् । पथ्यद्विषो व्यथयति ज्वरनामधेयो वीरः कृपां मयि करोतु स वीरभद्रः ॥९॥ ज्वर-चिकित्सा (निदानादिसे रोगका निर्णय करके, चतुर्थ गुच्छमे उल्लिखित सिद्धप्रयोगों का उपयोग करना चाहिये । प्रत्येक रोग की सद्य चिकित्सा मे उपयुक्त सिद्धप्रयोगों का निर्देश करने के पूर्व मुनिकल्प श्रीभट्टजीने, प्रारभमे, उस रोग की आकृतिका सक्षेप किंतु निगूढ वर्णन अपनी सहज काव्यमय शैली में अवश्य किया है, तथापि, यहां " इस छोटेसे निबंध मे, प्रत्येक रोग का उसके लक्षणों और प्रकारों सहित उल्लेख, रोगोंके स्वरूप को अपेक्षाकृत अधिकाधिक स्पष्ट समझाने के आग्रह से ही, किया जा रहा है। महर्षि अग्निवेश प्रणीत अंजननिदानम् ' आयुर्वेद का रोगविज्ञान पर एक उत्तमोत्तम सक्षिप्त प्रथ है । यहा इसी आर्षग्रंथ का हिंदी रूपातर दिया जाता है। हेतु, प्राग्रूप, रूप, उपशय और सप्राप्तिसे अथवा इन सभी मे मुख्य केवल ' से ही रोग का निर्णय करना चाहिये । अजीर्ण से प्रकुपित दोष कोष्ठाग्निको, त्वचा की ओर, वाहर धकेलकर ज्वरोत्पत्ति कर देते है। वातज, पित्तज, कफज, द्विदोषज, त्रिदोषज तथा आगुन्तज भेद से ज्वर आठ प्रकार के होते हैं । Mभा, और अंगमर्द, अरति और नेत्रदाह, भारीपन और मरुचि ये क्रमश वातज, पित्तज, एवं कफज ज्वर के पूर्वलक्षण है। ससर्गज और सन्निपातज ज्वर मे क्रमश दोनो दोषो के तथा तीनो दोषो के लक्षण मिलेंगे। कंठ और ओष्ठ मे शोष, मल की शुष्कता, कप, छींक का अभाव, मस्तक, उदर और शरीर मे वेदना, कभी शीत एव कभी दाह की प्रतीति, निद्रानाश, विरसता तथा जुभा यह वातज्वर के रूप है । देहका पीला पडजाना, दाह, प्यास, स्वेद, मूर्छा, अल्पनिद्रा, मुह मे कडवापन, वमन, भ्रम, प्रलाप तथा विरेक यह पित्तज्वराकृति है। स्तमित्य (आर्द्रवस्त्र से वेष्टित हो जाने जैसी जडता) कास, भरुचि, गुरुता, उत्क्लेद, मुख मे मीठापन, प्रतिश्याय, भालस्य, तृप्ति, श्वेतवर्णता, शीतता, यह श्लेष्मज्वराकृति है और मुख मे शोष, प्यास, मूर्छा, दाह, अनिद्रा, वमन, भ्रम, तम, सधि और सिर से पीडा यह वातपित्तज्वराकृति है। स्तमित्य, कास, सताप, गुरुता, सधि और सिर मे वेदना, निद्रा, स्वेदोत्पत्ति, प्रतिश्याय यह वात श्लेष्मज्वराकृति है। शीत, दाह, वारवार तद्रा, मोह, कास, अरुचि, प्यास, मुख मे चिपचिपापन और कटुता पित्तकफज्वराकृति है । जिह्वा मे खुरदरापन, नेत्रों में वक्रता, १-सर्वरोगप्रधानत्वादादावभिधान सर्वत्र क्रियतेऽस्य, अतस्तदनुसारतोऽस्मिन्नपि तन्त्रे कृतमिति । प्रधानत्वं च वाग्भटोऽपि वर्णयति-"ज्वरो रोगपति पाप्मा मृत्युरोजो- शनोऽन्तक । क्रोधो दक्षाध्वरध्वसी रुद्रो नयनोद्व ॥ जन्मान्तयोर्मोहमय सतापात्मा- ऽपचारज. । विविवर्नामभि क्रूरो नानायोनिषु वर्तते ॥” इति । । कण्ठ १३६ [ज्वर- सिद्धभेषजमणिमालायां भारतता और जलमयता, प्यास, अस्थियों में वेदना, चेष्टाओ में असबढता, म्वेद, निद्रा, कभी शीत, कभी दाह, तद्रा, प्रलाप, मोह, अंगो में शिथिलता, कंठ में कंटका- कीर्णता, थूक में रक्त इत्यादि सन्निपातज्वराकृति है। तीनो दोपो के प्रकोप वाला, सभी इन्द्रियों की चेष्टामो से हीन, अभिन्यास ज्वर कहाता है। दोपो की अतिवृद्धि तथा अग्निक्षीणता के कारण सलिपातज्वर मसाध्य होता है । वात, पित्त और कफप्रधान सन्निपातज्वर क्रमशः सात दिन, दस दिन और बारहवें दिन अथवा इनसे क्रमश. द्विगुणित दिन, प्रवल होकर या तो शात हो जाता है अथवा रोगी की मृत्यु कर देता है। सन्निपात ज्वर के प्रारभ, मध्य तथा अंत मे, कर्णमूल-गत भयंकर शोथ क्रमश. सुख साध्य, कष्ट साध्य तथा असाध्य माना जाता है। प्रकुपित दोष, रस को, रक्त को, मांस को, मेद को, तथा अस्थि और मजा को दूषित करते हुये यथाक्रम सन्तत, सतत, अन्येशुष्क, तृतीयक और चतुर्थक ज्वर को उत्पन्न कर देते है । इन ज्वरो के तथा इनके भेदादि ज्वरों के प्रारभ, काल और क्रिया विषम होते है अत. इन्हे विषमज्वर भी कहते हैं । सात, दस या बारह दिवस पर्यंत वेगवाला सन्तत, अहोरात्र मे दो वेग वाला सतत तथा एक ही वेग वाला अन्येधुप्क, प्रति तीसरे दिन आनेवाला तृतीयक तथा प्रति चतुर्थ दिवस आने वाला चतुर्थक कहलाता है। दिन रात मे किसी एक काल को छोड़कर शेष समय में ज्वर का रहना 'अन्येद्युक' विपर्यय, तीन दिवसो मे, आदि तथा अन्त में न आकर मध्य मे एक दिन आनेवाला तृतीयक विपर्यय, दो दिवस निरतर रहकर एक दिवस उतरकर पुन आनेवाला चतुर्थक विपर्यय होता है। रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मजा तथा शुक्रगत ज्वर क्रमश. हृत्पीडा, रक्त-वमन, दाह, देहमे दुर्गध, अस्थिपीडा, कुम तथा शुक्र स्रवण आदि लक्षणो से युक्त होता है। इनमे, रसरताश्रित तथा मांस-मेदो-गत ज्वर साध्य, अस्थि-मज्जा गत कष्टसाध्य एव शुक्रगत असाध्य है । गौरव युक्त तया पसीनो से शरीर को लिप्त सा कर देने वाला तथा नित्य रहनेवाला मन्द ज्वर 'प्रलेपक' कहा गया है। यह राजयक्ष्मा में होता है। आगन्तुज ज्वर चार प्रकार के हैं । अभिशाप, भभिचार, अभिषंग और अभिघात । सर्वत्र विस्फोट तथा मोह ये लक्षण प्रथम दोनों ज्वरों शापज तथा मभिचारजके है, आवेश-ज्वर में, भूतादि आवेश जन्य पीडा होती है। कामावेश ज्वर मे रज्जा, बुद्धि तथा निद्रा आदि का नाश हो जाता है । दाह तथा अतिसार के लक्षणो से युक्त विषसवधि ज्वर तथा अभिघातज ज्वर - अभिघात (चोट) के अनुसार-वातप्रधान लक्षणो वाला होता है। बहुत अधिक एव बलवान कारणों से उत्पन्न, शैत्य, स्वद, अन्तर्दाह आदि लक्षणों की प्रचुरतावाला, धातुक्षीणता तथा इन्द्रियो की दुर्बलतायुक्त ज्वर असाध्य है। अल्प उपद्रवोवाला ज्वर ‘लघु तथा अधिक उपद्रवो से युक्त 'गुरु' कहा जाता है । वर्षा, शरद् तथा वसंतऋतु में होने वाले यथाक्रम वातज, पित्तज और कफज ज्वरों को प्राकृत कहते हैं, इनसे अतिरिक्तों को वैकृत । अजीर्ण, लालास्राव, छींक का अभाव, तंद्रा, अरुचि, भारीपन, विरसता, मालस्य और बहुमूत्रता ये आमज्वर के रक्षण होते हैं; इनसे विपरीत रक्षणों वाला निराम ज्वर .
mur मध्य भूख का चिकित्सितम्] चतुर्यो गुच्छः। १३७. होता है । अन्तर्दाह, प्रलाप, प्यास, सन्धिपीडा, मलावरोध, भ्रम, श्वास, स्वेदाभाव, ये अन्तर्वेगज्वर के लक्षण हैं; बहिर्वेग ज्वर के लक्षण इन से विपरीत होते है। लघु, निराम, प्राकृत, बहिर्वेगवाला ज्वर साध्य एवं साम, वैकृत और अन्तर्वेग वाला ज्वर असाध्य होता है । मलकी प्रवृत्ति अथवा अवरोध, प्यास, कास, श्वास, शरीरमें पीडा, वमन, हिक्का, मूर्छा और अरुचि ये ज्वर के दश उपद्रव है। निद्रानाश, अरुचि, अरति, प्यास, वलका नाश, गुरुता, विष्टंभ, नाभी और हृदय के में जकडाहट, वेदना आदि ये धातुपाक के लक्षण है। अत्यंत प्यास, उग्र श्वास, ज्वर का तीव्र वेग और भ्रम ये पच्यमानज्वर के लक्षण है। दोषों मे, ज्वरमें और शरीर में लघुता ये दोषपाक (मलपाक) के लक्षण हैं। शरीर मे दाह, स्वेद, भ्रम, प्यास, वमन, मलभेद (अतिसार), सज्ञानाग, कराहना, सिर मे खुजली, मुखपाक, छोंक और आगमन ये ज्वरमुक्त होने के लक्षण है। इस तरह, विधिभेद से ज्वर दो प्रकार का होता है शारीर और मानस, सौम्य (शीत पूर्व ) और आग्नेय (दाह पूर्व)। इसी तरह, अन्तर्वेग और बहिर्वेग, साध्य और असाध्य, प्राकृत और वैकृत आदि भेदों से भी ज्वरो के दो दो प्रकार है । दोष तथा काल के बलावल से ज्वर के सन्तत, सतत, अन्येषुष्क तृतीयक एव चतुर्थक ये पांच भेद है। सातों धातुओंके आश्रय भेद से सात प्रकार के तथा दोषादि एवं अभिशापादि उत्पादक कारणो के अनुसार आठ प्रकार के ज्वर माने गये है। प्रकुपित जलीयधातु (रस, रक्त, मूत्र, कफ, स्वेद आदि 'अप् धातु') पाच- काप्ति को मन्द करके, शकृत मे मिलकर, अधोमार्ग से, वायुद्वारा धकेला जाकर, प्रचुर- मात्रा में बाहर निकलता है। अत एव इस व्याधि को अतिसार कहते है। वातज, पित्तज, कफज, त्रिदोषन, शोकज और आमज भेद से यह छ प्रकार का होता है। वातन में रूक्ष और अरुण झाग युक्त, पित्तज मे पीत, रक्त और श्यामवर्णवाला, कफज में शीतल, श्वेत, कफयुक्त और गाढा त्रिदोषज मे तीनो दोपो के लक्षणो से युक्त मल का नि सरण होता है । शोकज मे शोकतप्त मनुष्य के नेत्र, नासा तथा गले से सवित अतिवाप्प (जल) त्याग से उत्पन्न उमाद्वारा क्षुभित रक्त, मल सहित अथवा रहित, निकलता है। मामज मे, अजीर्ण से प्रकुपित दोष, कोष्ट को तथा रक्तादिधातु और मलों को दूपित करके भनेक वर्णयुक्त यथादोष शूल सहित मल को निकालते है । जब कोष्ट- गत सचित मल से युक्त कफ, वायु से प्रेरित होकर निरतर बाहर निकलता रहता है तब इस अवस्था को प्रवाहिका कहते है। पित्तवर्धक पदार्थों के सेवन से रक्त का निःसरण रक्तातिसार कहलाता है । वमन, मूत्रकृच्छ्र, ज्वर, कास, श्वास, प्यास, शोक, सागपीदा, हिक्का और अरुचि ये लक्षण अतिसारी की मृत्यु के सूचक होते हैं । अतिसार के निवृत्त हो जाने पर भी, अपथ्यादि के कारण पुनः मन्दीभूत जठरानल से दूपित ग्रहणी, भुक्तपदार्थ को मामावस्था मे ही अथवा कभी कभी पवावस्था में, वाता- नुबन्ध से बद्ध एवं पित्तानुबन्ध से द्रवरूप में, अनेक वार त्याग करती है। यह ग्रहणी रोग कहाता है। ग्रहणी में शोथ, अग्निमांद्य, वैवर्ण्य, ज्वर, अजीर्ण, अरुचि, बलक्षय, .
- सिद्धभेपजमणिमालायां [उचर- वीर्यक्षय, प्यास, आध्मान, उद्गार आदि उत्पन्न होते है। वात, पित्त और कफ से तथा त्रिदोष से उत्पन्न यह चार प्रकार की होती है। इसके लक्षण, अतिसार के लक्षणों जैसे ही होते है। अति दुर्गंध युक्त, कुछ पतला, पिच्छिलतायुक्त, वेदना कारक, तथा पानी मे इव जाने वाला मल माम मल कहलाता है । वातादि दोष त्वचा, मास एव मेद को दूपित करके गुदा मादि मे विविधाकृति मास अंकुरो को उत्पन्न कर देते है। इन्हें अर्श कहते है । वातज, पित्तज, कफज, त्रिदोपज, सहज और रक्तज भेदसे ये आठ प्रकारके होते है । शोथ, अग्निमाद्य, विष्टभ, जघाओ मे वेदना, मलाल्पता, पाण्डता, रक्तक्षीणता, निर्बलता, माध्मान, उदगार ये सभी भर्श के विकार है। अर्शगत दोषोंका निर्णय दोप के अपने अपने लक्षणोद्वारा करलेना चाहिये। सहज अर्श, त्रिदोषज के लक्षणोवाला होता है। रक्तस्रावी भर्श रक्तज कहलाता है। गुदा की सवरणी नामकी बाह्य वलि मे होने वाला, नवोत्पन्न, एकदोपोल्बण अर्श सुखसाध्य, विसर्जनी नाम की दूसरी वलि मे उत्पन्न, दो दोपो- ल्बण, कृच्छ्रसाध्य तथा प्रवाहणी नाम की अन्त स्थित तृतीय वलि से होने वाला त्रिदोपज अर्श असाध्य कहा गया आहार की विपमता से उत्पन्न अजीर्ण तीन प्रकार का होता है । वात से, शूल तथा मलावरोध वाला विष्टब्ध, पित्त से, खट्टी डकारों से युक्त तथा मुह को धूमितसा करदेनेवाला विदग्ध और कफ से, भोजनोपरात अम्लतारहित उद्गारवाला आमाजीर्ण । 'रसशेष ' यह अजीर्ण का चतुर्थ भेद है। इसमे अन्न के प्रति विद्वेष उत्पन्न हो जाता है। प्रथम तीन प्रकार के अजीर्णो से विपूचिका की तथा अलसक एव विलविका की भी उत्पत्ति होती है । वमन, अतिसार, प्यास, शूल, भ्रम, तोदयुक्त उद्वेष्टन ( Painful clamps), मूत्राघात, अनिद्रा, कप, अरति और मोह आदि लक्षणो से युक्त विपूचिका असाध्य हे । वात की वृद्धि, पित्त की अतिवृद्धि तथा कफ की क्षीणता से भस्मक रोग उत्पन्न होता है जिस मे उपभुक्त सभी अन्न शीघ्र-भस्मसात् हो जाता है। ज्वर, विवर्णता, शूल, हृद्रोग, श्वास, भ्रम, भोजन से अरुचि तथा मलातिप्रवृत्ति क्रिमि रोगो- त्पत्ति के लक्षण हे । अतिमैथुन, मद्य, अम्ल पदार्थों का अति सेवन, दिवा - स्वप्न तथा मिट्टी आदि भक्षण करने से, वातज, पित्तज, कफज, त्रिदोपज तथा मृदुद्भव ये पाच प्रकार के पाण्डुरोग उत्पन्न होते है । पांडुरोगी के त्वचा, नेत्र, मूत्र, मल तथा नाखून पीले पड जाते है । वह शोथ, वमि, ज्वर, श्वास, कास, मंदाग्नि भादि से ग्रस्त रहता है। हाथ-पैर में शोधयुक्त तथा मध्य भाग में क्षीणतावाला, अथवा इससे विपरीत अर्थात् मध्य में शोययुक्त तथा हाथ पैर में क्षीणतावाला, तीव्रज्वर एवं अतिसार -पीडित पाण्डुरोगी असाध्य है । अत्यत पित्त-वर्धक पदार्थों के भतियोग से, पित्त, रक्त और मास के अत्यधिक दूषित होने पर कामलारोग उत्पन्न होता है । इसमे त्वचा, मूत्र, -मल, नेत्र, नाखून आदि पीले पड़ जाते हैं। वृद्धिंगत यही कामला, पीत एव कृष्णत्वचा आदि से युक्त, कुंभ-कामला कहलाता है। प्रकुपित - पित्त, रक्त को दूषित करके, इसी . .
The . चिकित्सितम] चतुथा गुच्छ.। १३९ रक्त के साथ, ऊर्ध्वमार्ग अथवा अधोमार्ग से निकल कर ऊर्ध्वग एवं अधोग भेद से दो प्रकार के रक्तपित्त को उत्पन्न कर देता है। कभी कभी अत्यत कुपित होने पर यह शरीर के समस्त रोम- कृपो मे से भी निक्लने लगता मुस भादि ऊर्ध्व-भाग से निकलने वाला रक्तपित्त कफानुबन्धी, गुदामआदि अधोमार्ग से प्रवृत्त, वातानुवधी एव दोनो मार्गों से युगपत् नि.सरित रक्तपित्त कफवातानुबधी होता है जो क्रमश , साध्य, याय और असाध्य माना गया है। ज्वर, अपचन, वमि, श्वास, तृपा, कास, निर्बलता, पाण्डुता, भोजनोत्तर प्रबल दाह, शिर सताप, अतिसार, अबुभुक्षा ये रक्तपित्त के उपद्रव है। मतिमैथुन, अति व्यायाम, व्रण, शोक, ज्वर, अत्यत मार्गाटन भादि से प्रकुपित कफ-प्रधान तीनो दोप यक्ष्मा को उत्पन्न कर देते है। हाथ-पैर मे दाह, पार्श्व तथा स्कव-प्रदेश में पीडा, मुख मे से कफ तथा रक्त का निर्गमन, वमन, ज्वर, वैस्वयं, क्षुद्रश्वास, कास, मस्तक में भारीपन, नेत्रो मे श्वेतवर्णता, मास-भक्षण एव स्त्री से रमण करने की प्रबल इच्छा ये सब यक्ष्मा के लक्षण है। उर क्षत से उत्पन्न यक्ष्मा, वेदनासहित दुर्गधमय कफ, पूय तथा रक्त की वान्ति से युक्त होता है। कास, भति- सार, पाचवेदना, स्वरभेद, भरुचि तथा ज्वर इन छ. लक्षणो से युक्त अथवा ज्वर, कास और रक्तप्टीवन इन तीनो लक्षणों से युक्त राजयक्ष्मा असाध्य होता है । प्रकुपित प्राण वायु उदानवायु से मिलकर, जब, ध्वनिपूर्वक, कफ-पित्त दोषोसहित सहसा मुख से बाहर निकलता है, तब इस अवस्था को कास कहते है। वात-पित्त तथा कफ से, क्षत से तथा क्षय से उत्पन्न कास पाच प्रकार की होती है। वात से शुष्क, पित्त से कटु और पित्तसहित पीले वमनवाली एवं कफ से मुख को कफ से लिप्त कर देने वाली सासी आती है। क्षतज एव क्षयज कास असाध्य, कितु बलवान रोगी को साध्य अथवा कभी कभी याप्य भी होती है । कास की तरह हिक्का भी प्रकुपित-प्राण वायु से उत्पन्न होती है। अपनी- गति के क्रम से इसके भी पाच भेद हे । यथा-अन्न के अधिक खाने से अन्नजा, एक बार मे दो वेगवाली यमला, जत्रुमूल (कंठ और उर स्थल का सधि - स्थान) से उठनेवाली मदवेग युक्त क्षुद्रा तथा नाभिप्रदेश से गभीरध्वनिपूर्वक निकलने बाली गभीरा तथा मर्मो को पीटित करती हुई सपूर्ण देह को कपित कर देनेवाली महाहिक्का । अतिम दो हिकायें असाध्य है । कफ-प्रकोप - पूर्वक चारो ओर से, कफ द्वारा सरुद्ध गति होकर प्रकुपित - वायु, जब वारवार ऊपर तथा नीचे उठता तथा भाने लगता हो, तब श्वास रोग की उत्पत्ति होती है। हेतु - लक्षण -भेद से श्वास पाच प्रकार के होते हैं। महाश्वास, ऊर्ध्वश्वास, छिन्न, तमक और क्षुद्र । महाश्वास में निरतर फुफ- कार शब्दयुक्त वेदनासहित श्वास उठता है। ऊर्ध्वश्वास मे श्वास केवल ऊपर की ओर ही देर तक उठता है नीचे की ओर बहुत कम खिचता है । छिन्नश्वास मे पूर्ण शक्ति लगाने पर भी रुकरुक कर श्वास लिया जाता है। तमक श्वास ग्रीवा और मस्तक मे तीच वेदना युक्त होता है । क्षुद्रश्वास अल्प - हलके वेगवाला होता है। क्षुद्र और तमक साव्य एव अन्य तीनों श्वास असाध्य हैं।
१४० । . सिद्धभेषजमणिमालायां [ज्वर- बहुत ऊचे स्वर में बोलने से, विष-सेवन से तथा अभिघात सदृश अन्य प्रकोपक कारणो से प्रकुपित-वायु स्वरवाही स्रोतो में अधिष्टित होकर स्वर को नष्ट करती हुई स्वर-भेद रोग की उत्पत्ति कर देती है। वातज, पित्तज, कफज, ग्रिदोषज, मेदोज और क्षयज भेद से स्वरभेद छह प्रकार का होता है। ये अपने अपने उत्पादक दोषों के लक्षणो से युक्त रहते हैं। अंतिम तीन स्वरभेद असाध्य माने गये हैं। जब स्वाद- पूर्ण भन्न भी मुख में स्वादु न 'प्रतीत हो तब भरोचक होता है। यह वातज, पित्तज, कफज, त्रिदोषज, क्रोधज एव भयज-भेद से पांच प्रकार का है। अंतिम प्रकार के दोनो अरोचक आगन्तुज है। इसमे मुखस्वाद दोषानुसार होता है, किन्तु आगन्तुज मे मुखास्वाद स्वाभाविक रहता हुमा भी अरुचि बनी रहती है। मन के प्रतिकूल घृणा उत्पन्न करने वाले, नमकीन और चिकने पदार्थों के अतिसेवन से मजीर्ण एव अतिभोजन से, गर्भवती तथा भतिशीघ्र भोजन करने वाले को, वमन-रोग होता है । वातज, पित्तज, कफज, त्रिदोषज एवं घृणोत्पादक प्रसगो को देखने से पाच प्रकार के वमन उत्पन्न होते है। वात से श्याव, पित्त से पीत, कफ से श्वेत तथा त्रिदोष से, बीभत्सवस्तु से और गर्भवती को अनेक वर्णों से युक्त वमन होता है । कास, श्वास, ज्वर, हिक्का, तृष्णा, जीका मिचलाना, हृद्रोग, तमक- श्वास आदि, वमन के उपद्रव हैं। निरतर पानी पीते रहने से भी जब तृषा का शमन न होता हो, प्रत्युत अधिकाधिक पानी पीने की इच्छा बनी रहती हो, तब तृष्णा रोग की उत्पत्ति होती है। रस के क्षय से उत्पन्न, हृदय में पीडा करनेवाली, नमकीन पदार्थों के तथा भोजन के अधिक करने से मोह, ज्वर, श्वास और कास को उत्पन्न करने वाली तृष्णा असाध्य है। वात- सहित प्रकुपित पित्त, तालु का आश्रय लेकर, तृषा को उत्पन्न करता है। तृष्णा के सात भेद हैं। वातज, पित्तज, कफज, त्रिदोषज, क्षतज, क्षयज, भामज और भक्तज । पित्त की प्रधानता वाले प्रकुपितदोष सज्ञावाही नाडियो को रुद्ध करके जब ज्ञानेन्द्रियों में प्रवेश करते है, तब मनुष्य चेतनार हित होकर मूर्छित हो जाता है। वात, पित्त, कफ, रक्त, मद्य तथा विष से उत्पन्न यह मूर्छा रोग छह प्रकार का होता है। जिस दोष की मूर्छा हो, उसमें उसी दोष के वर्ण से युक्त आकाश को देखता हुभा रोगी मूर्छित हो जाता है । मद्यज मूर्छा में रोगी विक्षिप्त चित्त होकर प्रलाप करता है। विषज मूर्छा में दाह, हृत्पीडा तथा वमन होता है। रक्त की गंध-मात्र से आनेवाली रक्तज मूर्छा के लक्षण पित्तज मूर्छा के समान जानने चाहिये। शरीर तथा मन के व्यापार को अवरुद्ध कर देनेवाला रोग सन्यास कहलाता है। विधि-रहित मद्य पान करने से पानात्यय, परमद, पानाजीर्ण तथा पानविभ्रम नामकी व्याधिया उत्पन्न हो जाती हैं। वमन, मूली, दाह, ज्वर, प्रलाप, भ्रम, अरुचि, मल-प्रवृत्ति, भरति और कफाधिक्य भादि पानाजीर्ण आदि के लक्षण हैं। विधिरहित पान करने से शरीरस्थ ऊष्मा, पित्त तथा रक्त से निकल कर जब त्वचा में पहुंचती है तब भयकर दाह उत्पन्न होता है। इसे मद्यज-दाह कहते है। - १४१ चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छः। विरुद्ध, दुष्ट और अपवित्र भोजन से, पूज्य व्यक्तियों का अपमान करने से, काम, भय, और शोक से मनोवाही स्रोतों के दूपित हो जाने पर उन्माद रोग की उत्पत्ति होती है। उन्माद रोगी किसी भी जगह विना प्रयोजन हंसने तथा गाने लगता है । बुद्धि और स्मृति दोनो ही खो बैठता है। विचित्र स्वप्न देखता है । भ्रम और उद्वेग से ग्रस्त रहता है। मन की छिपी बात को भी कह डालता है। वातज, पित्तज, कफज, निदोपज, शोकज, और विषज भेद से उन्माद छह प्रकार का होता है। देव, दैत्य, पिशाच, राक्षस, सर्प, गधर्व, यक्ष, ग्रह और पितरों से यथाक्रम माविष्ट उन्मादरोगी पवित्र रहता है, देवतामो से विद्वेष रखता है, नग्न फिरा करता है, सर्प के समान पेटके वल सरकता है, अत्यत भोजन करता है, गाता है, पिण्डदानादि देता और तर्पण करता है। जो कापता रहे, जिसे निद्रा अधिक आये, फेनयुक्त वमन करे, अथवा पर्वत, वृक्ष, वाहन आदि से गिरकर पागल हुआ हो वह असाध्य होता है । इसी तरह तेरह वर्ष पुराना उन्माद रोग भी असाध्य माना जाता है। चिंता और शोक आदि से प्रकुपित दोप मस्तिष्क-गत स्रोतो को दूपित करते हुये स्मृतिनाश- पूर्वक अपस्मार रोग को उत्पन्न करते हैं । अंधकार, मुख में से फेनोद्गम, कंप, नेत्रादि की विकृति ये इस व्याधि के लक्षण हैं । वातज, पित्तज, कफज और त्रिदोषज भेद से अपस्मार चार प्रकार का है । वातिक, पैत्तिक तथा श्लैष्मिक अपस्मार यथाक्रम बारह दिन, पंदरह दिन और एक मास पश्चात् अथवा त्रिदोषज किसी भी समय दौरा करता है । वात से, आक्षेपादि अस्सी प्रकार की व्याधियां उत्पन्न होती है। उनमे से अति प्रसिद्ध कितने ही रोगो का यहा उल्लेख किया जाता है। यथा-आक्षेपक इससे शरीर में पुन पुन झटके आते हैं, खल्ली-पैर और जघामो मे, अरु और हाथ के मूल मे ऐठन उत्पन्न करनेवाली व्याधि, भष्ठीला-नाभि के नीचे मलमूत्रकी अवरोधक वेदना- 'पूर्ण ग्रंथी यदि यही प्रथी उदर मे तिरछी उठी हुई रहे तथा पीडा युक्त हो तो प्रत्य- ठीला कहाती है । आध्मान-उदर में पीडायुक्त माटोप, प्रत्याध्मान पार्श्व में, हृदय को छोडकर आमाशय मे, पीडायुक्त आटोप, तूनी-मलाशय और मूत्राशय से प्रारंभ होकर गुदा तथा मूत्रेद्रिय का भेदन करने वाली पीडा, प्रतितूनी-गुदा तथा मूत्रंद्रिय से प्रारभ होकर पक्वाशय की तरफ आवेगपूर्वक गति करने वाली पीडा, अर्दित -प्रकुपित वात से मुख के अर्धभाग का टेढा हो जाना तथा उसमे वेदना उठना, गृध्रसी-स्फिक् प्रदेश से प्रारभ होकर क्रमश. कटि के पिछले भाग, अरु, जानु, पिण्डली तथा पैरतक जाने वाली पीडा, क्रोष्टुशीर्ष (गीदड के मस्तक के समान स्थूलता)-घुटनो मे वात और रक्त की विकृति के कारण तीव्र पीडा युक्त शोथ, विश्वाची-बाहु के पृष्ठभाग से अंगुलियों के पृष्ठभाग पर्यंत तथा प्रकोष्ठ और हस्त तल - गत-भाग की कडरा को दूपित करके भुजा मे पीडा करने वाली व्याधि, खंज-जघा के अर्ध्व भाग गत कंडरा के आक्षेप पूर्वक टाग को अकर्मण्य बना देने वाली व्याधि, पमु-दोनो टागों को अकर्मण्य करने वाली व्याधि, ऊर्ववात - ढकारों को प्रचुरमात्रा करने वाला रोग, मूकता वाणी को नष्ट कर में उत्पन्न १४२ - सिद्धभेषजमणिमालाया [घर- देती है, कलायसंज रोग मे व्यक्ति चलता हुमा कापता तथा लगदाता । गया मधि बंध शिथिल पड़ जाते है । अवबाहुक मे अंगप्रदेश गत सिरामो का सकोचन - प्रसारण स्थगित हो जाता है । हनुग्रह - इस मे मुस पूर्णतया मुला रहता है, भयया सर्वथा वर ही हो जाता है। सर्वांग की तथा गरीर के अर्ध भाग की चेष्टा नष्ट कर देने वार रोग सर्वान अथवा एकाङ्गघात कहलाता है। अंगों को धनुष्य के समान गुका नि वाली तथा उनमे मूछी और आक्षेप उत्पन्न करनेवाली व्याधि भपतन्त्रक मानी गयी। जिहातिभ मे जिहा के स्तंभित होने से रोगी भन्न पान करने में तया बोलने में नाममः हो जाता है। शरीर को बाहर (पीठ) की तरफ झुका देने वाला तथा भीलर (उदर) की तरफ धनुष्य के समान झुका देनेवाला रोग क्रमश. बायाम और अन्तरायाम कहलाता है । वातजन्य रोग अत्यत वृद्धिगत होने पर, मांस, बल और अग्नि से भी व्यक्ति को मार डालते है। अत्यत मार्ग चलने से, अधिक सवारी करने से, विदाही भन्नादि के सेवन से क्रोध करने से, वात तथा रक्त दूपित होकर वातरक्त नामका रोग उत्पन कर देते हैं शरीर में भारीपन, तोदन, खुजली, त्वचा का विवर्ण हो जाना तथा चकत्तो का प: जाना, उदर्द, अगों मे सकुचन भौर शोथ ये वातरक्त के लक्षण हैं । वातरक्त में वाता धिक्य से तीव्र वेदना, पित्ताधिक्य से दाह तथा रक्त में अधिक सुखी, कफाधिक्य से शरीर में भारीपन उत्पन्न होता है। द्वन्द्वज तथा त्रिदोपज वातरक्त दोनो तथा नान दोपो के लक्षणो से युक्त होते है। मोह, दाह, ज्वर, अनिद्रा, पछुता, अगुलियो में टेढापन, मर्म (सिर, हृदय और वस्ति में) पीडा, श्रम और भर्बुद ये वातरक्त के ने उपद्रव है । अपने अपने प्रकोपक कारणो से आम - रस तथा वायु युगपत् प्रकुपित हैं कर आम - वात रोग उत्पन्न करते हे । यह शोथ -युक्त होता है तथा मांधयो में पीडा उत्पन्न करता हुआ देता । ज्वर, अजीर्ण, अग्निमाद्य तथा तृ ये आमवात के लक्षण है। वात - जन्य प्रवृद्ध भामवात में वेदना, पित्तज में दाह कफज मे स्तमित्य एवं देह मे भारीपन, तथा त्रिदोषज आमवात में तीनो दोपो ये लक्षण होते हे। अंगों में जडता, अन्न कूजन, भानाह, प्यास, वमन, बहु मूत्रता शूल तथा निद्रानाश ये आमवात के आठ उपद्रव है। शरीरके किसी एक ही प्रदेश मे अत्यत वेदना को शूल कहते हैं । मटर, सूग अरहर, शिंवीधान्य आदि के भत्यत सेवन से प्रकुपित दोप-वातज, पित्तज, कफज द्वन्द्वज, त्रिदोपज, और आमज भेद से भाठ प्रकार के शूलों को उत्पन्न करते है। पित से नाभि मे, वात से बस्ति, हृदय तथा पाश्व मे, कफ से एवं भाम से आमाशय शूल उठता है । इसी तरह दो दो मिलित दोषो से उत्पन्न शूल दोनो दोपों के स्थान मे तथा त्रिदोपज, तीनो दोषों के स्थानो मे उत्पन्न होता है । वेदना, भानाह, सर्भ प्रकार के मूीय, तृपा, मूत्रकृच्छ्र, भारीपन, अरुचि, कास, श्वास और हिका ये शर के दश उपद्रव हैं । अपने स्थान से प्रच्युत कफ, पित्त मे मिलकर वायुसहित, भोजन परिसक काल में जिस शूल को उत्पन्न करता है, वह परिणाम -शूल कहलाता है। उनको जकड है . म - चतुर्थों गुच्छः। 1. चिकित्सितम्] १४३. भधोवायु, मल, मूत्र, जंभा, अश्रु, छोक, उद्गार, वमन, शुक्र, श्रमश्वास तथा तिद्रा के वेग को रोकने से उदावत रोग की उत्पत्ति होती है। वात के निरोध से माध्मान, मल से मल की ऊर्ध्व प्रवृत्ति, मूत्र से बस्ति में शोथ तथा वेदना, जुभा से शीर्प - पीडा, अश्रु से नेत्र-रोग; छोंक से इन्द्रियदौर्बल्य तथा ग्लानि; उद्गार से वात- रोग, वमन से कुष्ट आदि, शुक्र से शुक्राश्मरी आदि, क्षुधा से दृष्टि की मंदता, प्यास से अत्यधिक तृपा, श्रमश्वास से हृदय रोग, निद्रा से भालस्य मादि विकारो की उत्पत्ति होती है। मल का वमन करने वाला, बेचैन, क्षीण, शलयुक्त, तथा तृषा पीडित उदावत रोगी असाध्य है। हृदय और नाभि के बीच मे चल अथवा अचल, कभी घटने भौर कभी बढने वाली गोलाकार ग्रन्थि को गुल्म कहते है। यह दोनो पाच, हृदय, नाभि और बस्ति इन पांच स्थानो में होता है । वातज, पित्तज, कफज, त्रिदोषज तथा रक्तज भेद से पाच प्रकार क गुल्म होते है । वातज गुल्म अन्न के जीर्ण होने पर, पित्तज अन्न की पच्यमान अवस्था में तथा कफज अन्न के खाते ही प्रकुपित होता है । त्रिदोषज गुल्म हमेशा प्रकुपित रहता है । नवीन -प्रसव होने पर, गर्भ - स्राव होने पर, अथवा आर्तव के प्रवृत्ति काल में मिथ्या आहार-विहार से गर्भाशय-गत प्रकुपित - वायु रक्त को अवरुद्ध कर के, पैत्तिक-गुल्म के समान ही गुल्म की उत्पत्ति कर देता है । यह गुल्म अंगों से रहित, कितु स्पंदन से युक्त, पीडा तथा दाह करने वाला, पिण्डित आकार का, लक्षणो में गर्भ से मिलता जुलता होता है । इसकी चिकित्सा दसवां मास व्यतीत होने पर ही करनी चाहिये। जिस गुल्म का मूल दृढ हो, जिसमे श्वास, शूल, पिपासा तथा भोजन आदि से अरुचि हो जाये तथा दुर्बलता उत्पन्न हो गयी हो वह गुल्म असाध्य है । प्रकुपित दोप हृदय में अपस्थित होकर रस को दूपित करते हुये हृदय मे विकार उत्पन्न कर देते है । इसी को हृदय-रोग कहते है। वातज, पित्तज, कफज, और त्रिदोषज तथा कृमिज भेद से हृद्रोग पाच प्रकार का होता है । कुम, अवसाद, भ्रम, शोष ये हृद्रोग के उपद्रव है। मूत्र नलिका के मूल, मध्य अथवा अग्र भाग मे रुकरुक कर दाह एवं पीडा युक्त एक एक विदु जब मूत्र उतरने लगे तब वह मूत्रकृच्छ्र रोग कहलाता है। वातज, पित्तज, कफज, त्रिदोपज, शल्याभिधातज, पुरीषज, शुरुज और अश्मरीजन्य इस तरह यह आठ प्रकार का माना गया है। बात से पीडा, पित्त से दाह और कफ से मूत्रेन्द्रिय मे भारीपन भादि लक्षण उत्पन्न होते है। त्रिदोषज मे सभी दोपो के लक्षण उपलब्ध होते है। अश्मरीज मूत्रकृच्छ्र मे मूत्र दो धाराओ मे विभक्त होकर उतरता है । विड्-क्षोभ से उत्पन्न मूत्रकृछू मे पुरीष की दुर्गंध आती है । शल्याभिघातज में मूत्र भयकर वेदना सहित उतरता है। शुक्रज मे शुक्रसहित, अत्यत वेदना पूर्वक मूत्रत्याग होता है। बस्ति तथा मेढ़ मे वेदना और दाह युक्त, आटोपवाला मूत्रकृच्छू असाध्य कहा गया है। मलमूत्रादि के वेग को रोकने से प्रकुपित वायु के कारण जब मूत्र रुक ।
१४४ - सिद्धभेषजमणिमालाया [ज्वर- रुक कर धीरे धीरे उतरता हो तब मूत्राघात की उत्पत्ति होती है। जब वायु वम्तिगत 'शुक्र, मुत्र, पित्त अथवा कफ को दूपित करके सुखा देता है तब गाय के पित्ताशय में रोचना के समान क्रमशः अश्मरी की उत्पत्ति होती है। सभी अश्मरी त्रिदोपज कहीं गयी हैं । नाभी, सेवनी या अण्डकोष एव गुदा के मध्य में तथा बस्तिशिर (पेडू) मे पीडा होना, अश्मरीद्वारा मूत्रमार्ग के अवरुद्ध हो जाने पर मूत्र का अनेक धाराओ में विशीर्ण होकर निकलना, गोमेद के समान कुछ रक्तवर्ण मूत्र का कष्टपूर्वक त्याग करना, ज्वर का रहना आदि ये अश्मरी के लक्षण हैं। दोपज अश्मरिया प्राय वाल्को में ही पायी जाती हैं। शुक्राश्मरी-शुक्र का वेग धारण करने से युवा पुरुषों को ही होती है जिस रुग्ण के अण्डकोप वा नाभि मे शोथ आ गया हो, मूत्र रुक गया हो, जिसे अत्यधिक पीडा होती हो तथा अश्मरी के साथ शर्करा अथवा सिकता का अनुबन्ध हो उसे असाध्य समझना चाहिये । अधिक वैठे रहने से, विधिरहित शयन करने से, दही, सुरा, आनूप मांस, नवान्न तथा गुढनिर्मित एव कफवर्धक सभी पदार्थों के अति सेवन से प्रमेह रोग उत्पन्न होता है। मूत्रगत वर्ण एवं गध मादि के भेद से प्रमेह के भेद कहे गये हैं। कफोत्य प्रमेह, चिकित्सा सौकर्य के कारण, पित्तज, चिकित्सा की विषमता के कारण तथा वातज, चिकित्सा की महा असफलता के कारण क्रमश साध्य याप्य एव असाध्य माने जाते हैं। कफज प्रमेह दस हैं-उदक, इक्षु, सान्द्र, सुरा, शुक्र, पिष्ट, लाला, शनैः, सिकता, और शीत । पित्तन प्रमेह छ हैं-माजिष्ठ, हारिद्रक, नील, काल, रक्त और क्षार । वातज प्रमेह चार है- मजा, वसा, हस्तिमेह और मधुमेह । अमेह के उपद्रव, दोषों के प्रकोपलक्षणो के समान ही होते हैं । प्रमेह की उपेक्षा करने से, शराबी, कच्छपी, मसूरी, विनता, पुत्रिणी, जालिनी, अलजी, चिदारिका, चिलेपी, आदि अपने नामानुरूप आकृति वाली विधिया-प्रमेह पिडिकायें- उत्पन्न होती हैं। प्रमेह में लेम्मोत्पादक आहार विहार करने से मेदोवृद्धि पूर्वक मनुष्य के उदर, नितंब, स्तन आदि स्थूल हो जाते हैं एव वह किसी भी कार्य करने की शक्ति तथा उत्साह से रहित हो जाता है। रोग से दुर्बल की चिकित्सा हो सकती है किंतु जो स्वभाव से भी दुर्वल वनगया हो उसकी चिकित्सा नहीं है। अहित भन्न के सेवन से, अग्नि के मंद हो जाने पर, वातज, पित्तज, कफज, त्रिदोषज, प्लीहोदर, वडोदर, क्षतोदर तथा जलोदर भेद से आठ प्रकार के उदर रोगो की उत्पत्ति होती है । अधोवात तथा मल का अवरोध, दुर्वलता, उदर का फूल जाना, अग्निमाद्य, वस्ति में वेदना, दाह, आध्मान मादि सभी प्रकार के उदरो के लक्षण है। वात, पित्त एवं कफ से, उदरगत सिराये, क्रमश. कृष्ण, पीत तथा श्वेत हो जाती हैं दुष्टजल, नख, मल, लोम, स्त्रियो का, अन्यद्वारा (वशीकरणार्थ) प्रदत्त आर्तव, दूपी- विप, कृत्रिमविप आदि से नाभी के ऊपर मेरुवत् उभरा हुआ दाहयुक्त सन्निपातोदर उत्पन्न होता है। जीर्णज्वर से वामपाश्रित प्लीहोदर की तथा शोणित से दक्षिणपार्श्व में यकृत् दाली नामक उदर की उत्पत्ति होती है । वेदनापूर्ण जिस उदर में, वात से १४५ प्राप्त प्रकार चिकित्सितम्] चतुर्थों गुच्छ.। गुद के बद हो जाने पर मलमूत्रादि बाहर न निकलते हों वह बद्धोदर कहलाता है। भोजन गन-तृण-कण्टकादि तीक्ष्णशल्यो के कारण छिद्रित अंत्रों मे से जल गुदामार्ग- द्वारा बाहर निकलता रहता है। जो नि सरित नहीं होता वह भीतर ही सचित होता हुआ नाभी से नीचे उदर को बढाता रहता है । इसे परिस्रावी अथवा छिद्रोदर कहते हैं । स्नेहपानानन्तर, अति शीतल जल पीने से, वमन से और विरेचन से, जल - पूर्ण पखाल के तुल्य, नाभी के नीचे के भाग से जलोदर उत्पन्न होता है। बद्धोदर तथा क्षतोदर पंदरह दिवस पीछे मृत्यु कर देते हैं। इसी तरह अतिम अवस्था में जलोदरता को सभी के उदर प्राय मृत्यु सूचक माने गये हैं। नमकीन, अम्ल, दूषितजल, विरुद्धभोजन, दही, मिट्टी और विष से, वमनविरे- चनादि पंचकर्मजन्य क्षीणता से तथा अपचारादि कारणों से मनुष्य को श्वयधु हो जाता है। सिराओं का सूक्ष्म हो जाना, निर्बलता, रोमांच, शरीर मे उभरापन, भारीपन, दाह तथा अनवस्थितता ये सभी श्वयथु के लक्षण है । वातज, पित्तज, कफज, द्वन्द्वज, त्रिदोपज, अभिघातज और विषज इस तरह श्वयथु नौ प्रकार का होता है। इन श्वयथुमो के लक्षण, इनके प्रकोपक दोषों के लक्षणों से, तथा अमिघातज के लक्षण उसके उत्पादक - हेतु लक्षणो से समझ लेने चाहिये। (जैसे भिलावे से उत्पन्न श्वयधु पित्त लक्षणवाला होता है)। विषैले प्राणियों के दंश, मल, मूत्र आदि से उत्पन्न श्वयथु विपज कहलाता है। अनेकों उपद्रवो से युक्त शोथ, पैरों से ऊपर की ओर फैलनेवाला, पुरुप का शोथ, मुख से नीचे की भोर फैलनेवाला, स्त्री का शोथ, कुक्षि तथा गुह्यभाग में उत्पन्न शोथ मृत्यु के सूचक है। प्रकुपित वायु अभिसरण करता हुआ जब चंक्षण से अंडकोषों को प्राप्त होता है तब वह अंडकोषों की सिराओं में पीडा उत्पन्न करता हुआ उनकी वृद्धि कर देता है। इसे वृद्धिरोग कहते हैं । मभिधातादि से प्रकुपित वायु वक्षण के नीचे क्षुदान को धकेल कर वेदना तथा ध्वनि युक्त अंत्रवृद्धि रोग की उत्पत्ति करता है। वायु से उत्पन्न वंक्षणगत- ग्रन्थि को वर्म- कहते हैं। पादगत शोफ श्लीपद कहाता है । उपेक्षित व्रण जब नाडी में दूरतक फैल जाता है, तब वह नाडीव्रण कहलाता है। गुदा के आस पास दो अंगुल परिसर में चेदनायुक्त, भिन्न मुख वाली पिडिका (व्रण) को भगंदर समझना चाहिये । वात से अनेक मुखवाला, वेदना और क्लेद से युक्त शतयोनक; पित्त से उष्ट्रग्रीव, कफ से परि- स्रावी, त्रिदोष से शंबूकावर्तक और उन्मार्गग इस तरह भगंदर पांच प्रकार के होते है । अत्यंत गहरा, शुक्र और मूत्र के स्राव से युक्त, भगंदर असाध्य है । गले के एक ही भाग में उत्पन्न अपक्क श्वयथु गलगंड कहलाता है। वातज, पित्तज, कफज, त्रिदोषज, रक्तज और भागन्तुज भेद से ग्रंथि छह प्रकार की होती है । यह अपक्व ही रहती है। पक्क होने पर यही अर्बुद कहाता है। मेद तथा कफ से गले में उत्पन्न गंडे जैसी अनेकों ग्रंथियां गण्डमाल रोग कहलाता । यह ग्रंथियां चिरकाल तक अपक्क अवस्था ही में रहती हैं। दाह तथा वेदना युक्त मुष्टिप्रमाण-शोथसह ग्रंथी, विद्रधि कहलाती है। - है २ सि०१० किटिभ, सिद्धभेपजमणिमालायां [ज्वर- भीतर और बाहर उत्पत्तिभेद से यह दो प्रकार की मानी गयी है। वातज, पित्तज, कफज, रक्तज और क्षतज भेदसे विधियां छह प्रकार की है। ग्रथितोन्नतबाद्यविधि नाभी आदि प्रदेश मे, भान्तर विद्रधि वस्ति, यकृत् , प्लीहा, लोम, हृदय, कुक्षि, वंक्षण, वृक्क आदि स्थानों में कहीं भी उत्पन्न हो सकती है। पायुगत विद्रधि अपानवायु तथा मल का रोध करती है। कुक्षिगत विद्रधि वातजन्य वेदना को, नाभि गत हिका को, हृदयगत श्वास को, प्लीहागत श्वासावरोध को, यकृत् गत निरतर सांसी को तथा वक्षण गत कटि-ग्रह को उत्पन्न करती है। युवास्त्रियो के स्तनगत रक्तविद्रधि को स्तन- विधि कहते है। यह विधि शोथ, पीडा, दाह और पाक से युक्त होती है । विरुद्ध माहार, पापकर्म, वमनविरेचनादि पचकर्म मे अपचार, कलुपित स्त्री. से रति, मद्य, मांस, दुष्ट जल आदि कुष्ठ को उत्पन्न कर देते है । वात से रूक्षतायुक्त कापाल, पित्त से औदुंबर, कफ से श्वेतवर्ण युक्त मडल और विचर्ची, विदोष से गुजा के समान वेदनापूर्ण काकण, वातपित्त से कफयुक्त तथा रक्त और श्वेतवर्णवाला ऋक्षजिह्व, कफपित्त से श्वेत-कमल-दल के समान पुडरीक, द्रु, शतारुपी, विस्फोट, पामा और चर्मदल तथा वातकफ से चर्म, एककुष्ठ, किटिभ, सिध्म, भलस, विपादिका नाम के कुष्ठ उत्पन्न होते है। इनमे कपाल, औदुवर, मडल, दद्रु, काकण, पुंडरीक तथा ऋक्षजित ये सात महाकुष्ठ कहलाते हैं । हस्तिचर्मवत् - चर्मकुष्ठ, किण (दाने) के समान, त्वचा का दारण करने वाला- चर्मदल, पाणि - तल - गत - पामा, खुजली तथा अरुचि उत्पन्न करनेवाला - विचर्ची, सभी कुष्ठों के लक्षणो से युक्त काकण, मेदू के भास पास होने वाला कच्छू, पैरो का दारण करने वाला विपादिका, ऊर्ध्व देह मे होनेवाला, अलाबु-पुष्प के वर्ण जैसा, सिध्म, स्थूल - मूलवाला तथा भनेको व्रणो से युक्त शतारु, शोण-मडलवाला अलस तथा मत्स्य के टुकडे के समान एककुष्ठ कहलाता है । श्वेतवर्ण के चकत्तोवाला श्वित्रकुष्ठ माना गया है। शरीर पर, भ्रमरी से दष्ट शोथ के समान, शीतपित्त के कारण खुजली से युक्त वमन तथा ज्वर उत्पन्न कर देने वाला रोग उदर्द कहलाता है। भरुचि, भजीर्ण, कम, गुरुता, उत्क्लेद युक्त, तिक्त और अम्ल उद्गारो सहित तथा हृदय और कण्ठ मे दाहो- त्पादक अम्लपित्त रोग कहा गया है। अत्यंत दाह, पीडा, अरति, रक्तस्राव तथा भरुचि करने वाला, क्षुद्र व्रणो से युक्त, शरीर मे सर्वत्र परिसर्पण (फैलने) करने वाला विसर्प रोग होता है । ज्वर, वमन, और भ्रम से युक्त, बालको के हस्त - पाद - तल पर होने वाली छोटी छोटी फुन्सियों को मसूरिका रोग कहते है । मंदाग्नि से ग्रस्त होने पर यह रोग असाध्य कहलाता है। अग्निदाह-जन्य स्फोट के समान अत्यधिक वेदनावाला, विष के सदृश मृत्युकारक विस्फोट, स्वनाम से प्रसिद्ध रोग है । वातज, पित्तज, कफज, त्रिदोषज और रक्तज भेद ये पाच प्रकार के होते है। वयस्कों को होने वाले रोग छोटे बच्चों को भी होते है। कितु देह, अग्नि तथा दोषादि की अल्पता के वे अल्प-वेग वाले ही रहते है। क्षीरालसक, को उत्पन्न कारण १४७ - चिकित्सितम्] चतुर्थों गुच्छः। लालास्राव, अतिरोदन, गुदा और मुख में पाक, दन्तोद्भेद, ग्रहादि से ग्रस्तता आदि खास बालको के रोग है जिनके कारण बालक भनिद्रित रहते हैं, रोते है तथा कृश हो जाते है। चतुर्थ मास तक गर्भ-पात, गर्भस्राव कहलाता है। इससे भागे के महिनो मे अपने स्थान से च्युत किंतु बाहर न निकलने वाले गर्भ को मूढगर्भ कहते है। भपचारादि से गर्भ के नष्ट हो जाने के कारण, बुद्धि -विनाशपूर्वक गर्भिणी का गर्भ स्पंदन से रहित हो जाता है। इसमे, मलकी अत्यंत प्रवृत्ति, शैत्य, प्यास, कप तथा ज्वर इन लक्षणो से युक्त होने पर गर्भिणी असाध्य कही जाती है। अंग मर्द, ज्वर, कप, प्यास, शरीर में भारीपन, दाह, शोथ और भतिसार ये सूतिका-रोग के लक्षण है। योनि से रक्त-स्राव प्रदर रोग कहाता है। अनार्तव रोग मे वेदना, अंगमर्द, दुर्बलता, प्यास, क्षुधा, पाण्डुता और दाह उत्पन्न होते है। शशक के रक्त जैसे वर्ण वाला एव पानी से धोने पर जिसका रग वस्त्र पर से हट जाये वह शुद्ध आर्तव कहलाता है । अत्यंत मैथुन परायण तथा वाजीकरण औषधियों का सेवन न करने वाले को शुक्र- क्षय के कारण ध्वजभग-रोग हो जाता है। सहज एव मर्मच्छेद से उत्पन्न नपुसकता मसाध्य है । अन्य साध्य कैव्य मे वाजीकरण चिकित्सा हितावह है । धूलि, धूप तथा धूम के अतियोग से, अम्ल और तीक्ष्ण पदार्थों का तथा शाको का प्रचुर मात्रा में सेवन करने से, अत्यत स्त्रीप्रसग से, अधिक जागरण से, गडूप, अंजन, नस्य आदि न लेने से मनुष्य को नेत्र के विविध रोग हो जाते है। तिमिर, पटल, काच, अभिष्यंद, अधिमन्थ, पक्ष्मकोप, व्रणकोप आदि नेत्ररोग कहे गये है। वातज, पित्तज, कफज, त्रिदोपज, रक्तज भेद से पाच प्रकार के नेत्रकोप होते है। यह रोग आमावस्था में वेदना, अश्रु-स्राव, रताश, शोथ आदि से तथा पक्कावस्था इनसे विपरीत लक्षणो से युक्त होता है। तिमिर में एकरूप तथा पटल में सभी रूप अस्पष्ट दीख पडते हैं । काच-रोग मे दृष्टि सूक्ष्म-वस्त्र से आच्छन्न जैसी हो जाती है। इसमें नेत्र ऊपर की ओर ही देखते है नीचे की तरफ नहीं। अकालपालित्य, पीडायुक्त सूर्यावर्त, भावभेदक, इन्द्रलुप्त, केशपात आदि शिरोरोग है । प्रकुपित वायु कफ को साथ मे लेकर कर्ण - मल को दूषित करता हुआ, कर्ण -पाक, बाधिर्य, शूल, कर्ण -स्राव, आदि कान के रोगो की उत्पत्ति कर देता है। अर्श, रक्तस्राव, पिडिका, पूयस्राव, पीनस, प्रतिश्याय, छल्लिका इत्यादि नासिका के रोग है। कफ, रक्त से युक्त होकर, दन्तार्श, दन्तचालन आदि दात के तथा दौर्गध्य, पिडिका, पाक, मूकता मादि मुख के रोगो का हेतु बनता है। जिह्वागत जडता, शीर्ष - पीडा, दाह, भ्रम, उन्माद, अरुचि, ज्वर, श्वास, हिक्का और दंतहर्ष ये स्थावरविष के लक्षण है। दंश स्थल की विवर्णता और शोथ से, सेक, विरेक, तम और भ्रम से, निद्रा, नेत्र-गत रक्तता और जिह्वा की जडता से, सर्प - विष के लक्षण जानने चाहिये । वृश्चिक के दंश से, प्रज्वलित अंगार से दग्ध हो जाने जैसी - वेदना होती है। इसी तरह अन्य विषोका भी दाह, वेदना, मोह आदि अपने अपने लक्षणोद्वारा, निर्णय कर लेना चाहिये।) । ।
- १४८ सिद्धभेषजमणिमालाया [ज्वर- क्षुधाऽथवा दोप इति स्म संशये कांस्यं सतोयं ह्यधिनाभि वर्तयेत् । स्वास्थ्ये मनाक् पथ्यमरं प्रदापयेन्नो चेत् पुनर्लङ्घनमेव कारयेत् ॥ १० ॥ योगसख्या १ एरण्डरास्नामिषितीक्ष्णपंत्रकैः सकृष्णजीरत्रुटिनागकेसरैः । कपायकः पाचनदीपनः परः पितामहैमऽयमुदाहृतो नवः ॥ ११ ॥ २ अमृताचपलाद्धिविश्वतोयं पिवतः स्यात् पवनज्वरः कुतोऽयम् । ३ अथ नागरधान्यदेवदारुवृहतीसाधिततोयमत्र चारु ॥ १२ ॥ ४ पीयूषव्रततिवरीजलं गुडेन पीतं सजयति मरुजवरं क्षणेन । ५ गोपैस्त्रीमिपिमधुराभिधोपकुल्याकौन्त्यः स्युस्तरलतराक्षि ! पूर्वतुल्याः ६ द्राक्षामिषिक्लीतकलावनप्साशम्पाकपोटासुमकन्दसिद्धः। सितासहायः कुरुते कपायः पित्तज्वरानाहविदाहहानिम् ॥ १४ ॥ रुद्रावतार के रूप मे जिसकी स्तुति देवगण भी करते हैं, जिसने भगवान शकर का उपहास करनेवाले दक्ष का दमन किया, वह ज्वरनामधारी, अपथ्य सेवी को अत्यत त्रास देने वाला परम वीर वीरभद्र' मेरे ऊपर कृपा करे। जब यह शका हो कि यह मनुष्य क्षुधा से पीडित है, अथवा रोग से तब उसकी नाभिप्रदेश पर जलपूर्ण कांस्य- पान रखना चाहिये। यदि जल मे कुछ भी विकृति न हो तो समझ लेना चाहिये कि वह क्षुधात है तथा शीघ्र ही पर्याप्त मात्रा में उसे पथ्य भोजन कराना चाहिये। जल के विकृत होने पर उसे रोगात जानकर लंघन ही करना उचित होगा ॥ ९-१०॥ एरड, राना, सौंफ, पोदीना (अथवा तेजपत्र), काला जीरा, इलायची और नाग- केसर इनका कषाय उत्तम पाचनदीपन है। यह नूतन प्रयोग मुझे मेरे पूज्य पितामह विष्णुरामजी से प्राप्त हुआ है ॥ ११ ॥ गुडूची, पिप्पलीमूल और शुठि से सिद्ध जल का पान करनेवाले को वातज्वर कहा हो सकता है ? अथवा शुठि, धनिया, देवदारु और कण्टकारी से सिद्ध किया गया पानी वातज्वर मे प्रशस्त कहा गया है ॥ १२ ॥ शतावरी एवं गुडूची से साधित जल मे गुड मिला कर पीने से वातज्यर क्षण में नष्ट हो जाता है। हे अतिचपल नेत्रवाली ! सारिवा, सौंफ, द्राक्षा, पिप्पली तथा रेणुक-बीजद्वारा सिद्ध - जल भी पूर्ववत् गुणकारक होता है ॥ १३ ॥ द्राक्षा, सौंफ, मुलेठी, खूबकला, बनप्सा, अमलतास, चिरपोटा और गुलकंद इनसे सिद्ध कषाय मे मिश्री मिला कर पीने से पित्तज्वर, आफरा और दाह क्षीण हो जाते हैं ॥ १४ ॥ १-तीक्ष्णपत्र ‘पोदीना' इति प्रसिद्धम् । २-पिप्पलीमूलम् । ३-सारिवा । ४-द्राक्षा। ५-सबुद्धि । ६-मरुज्वरघ्य । ७-मधुक्म् । ८-'खूबकला' इति लोके यवनवैद्यै प्रचारितनामधेया। ९-'चिरपोटा, मको' इति ख्याता । १०-गुलकन्द । स च गुलावपुष्पजो व्याधिघातपुष्पजो वाऽत्र शस्त । . १ - " १ चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छः। ७ प्रेयस्याह्वय पद्मजं दयित! (क)स्वर्णोपमेयद्युते ! संवुद्धिं वददुर्जनस्य किमु(रे)का सूक्ष्मवाच्यस्त्यणुः [अणुः ] । त्रातः को हरिणा (करेणु)रथ स त्यक्त्वाऽधुनाऽऽद्याक्षरं वक्तव्यो हरिणाक्षि ! (रेणु)रिति तत्काथोऽत्ति पित्तज्वरम् ॥ १५ ॥ ८ नयनचुलुकनीये ! तानि पेयानि पुंसा ज्वररयरुजि चत्वार्योषधानि प्रपाच्य। रसिक ! कथय तेषां नामधेयानि मा शृणु शशिमुखि ! 'मिश्री, सौंफ, मक्को, वनप्सा' ॥ १६ ॥ ९ वादरदलकल्कं जललुलितं पूतं प्रमथ्य फेनान्तम् । लवणं किमपि विकीर्य क्वथितं पिव विहितपित्ततापान्तम् ॥ १७ ॥ पित्त-ज्वर मे रेणु (कमल - केसर अथवा पित्तपापडे) का काथ-प्रशस्त माना जाता है। इसी प्रयोग को प्रस्तुत श्लोक मे विलक्षणरूप से व्यक्त किया गया है। किसी पित्तज्वरित की चिकित्सार्थ एक युवति वैद्य के पास जाती है। वैद्य - मस्त- प्रकृति के है-वह सीधी रीति से उपरोक्त प्रयोग न बताते हुये पूछते है । हे सुदरी ! रुग्ण के लिये पद्मज (कमल - रेणु अथवा पित्तपापडे) का आह्वान करो' । स्त्री बराबर न समझने के कारण पूछती है । 'यह स्वर्ण-वर्ण- तेज वाला' का (ब्रह्मा) है क्या (पद्मज का अर्थ ब्रह्मा भी होता है।) वैद्य उसकी अज्ञानता समझ गये, भत फिर पूछते है । अच्छा, कहो, दुष्ट का क्या सवोधन है ? सुदरी कहती है 'रे' । वैद्य पुनः प्रश्न करते है । 'सूक्ष्म-वाच्य कौनसा शब्द है' 2 उत्तर मिलता है 'भणु'। इस तरह 'करे अणु' यह तीन शब्द कहलवा कर, वैद्यराज, युवती को अपने अभिप्रेत औषधीय द्रव्य-वाचक शब्द के और भी निक्ट लाते हुये पुन पूछते है 'भच्छा, वताभो भगवान् 'हरि ने किस की रक्षा की' ? उत्तर मिलता है ‘क रेणु' (हाथी) की'। वैद्य महोदय प्रसन्न होते हुये कहते है, हे सुंदरी रोगी से कहो कि 'करेणु'के आदि अक्षर 'क' को छोडकर अवशिष्ट शब्दवाच्य 'रेणु' का क्वाथ पीएं, यह पित्तज्वर को मिटा देगा। (चरक ने पद्म-किजल्क • केसर को रक्त-पित्त-हर औषधियो मे प्रधान माना है । यथा- 'उत्पलकुमुदपद्मकिंजल्क समाहिकरक्तपित्तप्रशमनानाम्'- च सू भ २५) ॥१५॥ हे चपल-नेत्रवाली । ज्वर वेग से पीडित को चार औषधियो का वाथ सिद्ध करके पीना चाहिये। हे रसिक! 'उनके नाम तो कहिये' हे चन्द्रमुखी ! उनके नाम ये है मिश्री, सौफ, मक्को और बनप्सा' ॥ १६ ॥ बैर के पत्तो को महीन पीस उसमे पानी मिला कर छानलें । फिर उसे तब तक १-अस्य योगस्य प्रसिद्धत्वेऽपि विच्छित्तिविशेषदर्शनार्थमभिधानम् । २-इदं सस्कृत- प्राकृतजातेरुदाहरणम् । यदुक्त विदग्धमुखमण्डने-“भाषाभिश्चित्रितं यत् स्यात् सस्कृत- प्राकृतादिभि । सन्तश्चित्रं तदिच्छन्ति सशुद्ध त्वेकभाषया ॥” इति । एवमग्रेऽप्यनेकभाषा- निबद्धाना पद्यानां तथा चित्रगुच्छकोक्तचतुर्भाषानिवद्धपद्यस्यापि चित्रत्वमवधेयम् ।
सिदभेपजमणिमालायां [स- १० भागीकुलिञ्जन किरातगटीमरीचदेवदीप्यचविकानलयुष्टविश्वः । सिंहीसुंधाव्रततिपौकरशङ्गिकाढ्यः सप्तः कफचरजयी सफणः कापायः ११ देवदारुबृहत्यग्निशुण्ठीपौष्करसाधितः । कपायो वारयेद्वायुसहायं श्लैष्मिकं ज्वरम् ॥ १९ ॥ १२ मौक्तिकसुवर्णगिलनं लवद्गमण्ट्रकपर्णिकातोयम् । मक्षीगीतकपायो चान्नं मौक्तिर्कज्वरे शस्तम् ॥ २० ॥ १३ संचूष्य भुक्तमसकनवमृदुलमिलिन्दमोदिनीमूलम् । मौक्तिकारज्वररुजं जयति न कि झटिति गाढतरमूलम् ॥ २६ ॥ १४ वनप्सिकाशार्करसंगतात्मना किरातपीपलतागृतेन यः । द्विसंध्यमासप्तदिनं पिवेत् कलां न तस्य जीर्णज्वरनिर्मिता रुज. ॥२२॥ १५ धान्यनागरनियूहः सनिम्बूकाम्बुशर्करः । शारद ज्वरमहाय प्रसह्य हरतेतराम् ॥ २३ ॥ मथते रहे जब तक फेन न निकलने लगे। जब फेन खूब उभर भायें उब उसमें थोडा सैंधव डाल कर उसे उकाल कर पी जावें । इससे पित्त - जन्य ताप का अन्त हो जाता हे ॥ १७ ॥ भारगी, कुलिंजन, चिरायता, कपूरकाचरी, मिर्च, देवदारु, अजवायन चच्य, चित्रक, कृठ, शुण्ठि, बडी कण्टकारी, गुडूची, पुष्करमूल और अति-चिपा (अथवा काकडासोंगी) इनके कपाय में थोडा पिप्पली चूर्ण मिलाकर पीने से कफ-वर पर विजय प्राप्त होती हे ॥ १८ ॥ देवदारु, वृहनी (बडी कण्टकारी) चित्रक, सूठ तथा पुष्कर - मूल से मिट्टै कषाय कफ-वात ज्वर को हटा देता हे ॥ १९ ॥ मोती और स्वर्ण का निगलना, लौंग और मण्डूकपणी से सिद्ध जल का पान, दो या तीन मख्खियो का कषाय एवं बाजरे (वाजरे के फुले) का सेवन, मोतीझरे मे प्रशस्त हे। बबूल वृक्ष की नूतन कोमल जट को वारवार चूस कर, सहित, चवाकर खाजाने से मोतीझरा ज्वर, जड सहित उसड जाता हे ॥ २०-२१ ॥ चिरायता और गुडूची के कपाय मे वनप्सा का शार्कर मिलाकर उकाले । इसके अनुपानपूर्वक खूवकला की फाकी ले । इस तरह सुबह साझदो बार, सात दिवस पर्यंत प्रयोग से जीर्णज्वर जन्य वेदना दूर होती है। (वनप्सिका शार्कर की निर्माण विधि अग्रिम श्लोक ४४ मे देख ले ।)॥ २२ ॥ धनिया और सूठ के मे निंबू का शर्वत मिलाकर पीने से शरद् ऋतु- जन्य ज्वर शीघ्र ही दूर हो जाता है ॥ २३ ॥ १-अनेनैव नाम्ना प्रसिद्धो वचाभेदः । २-गुडूची । ३-ब्राह्मी । ४-मक्षिकाहिमः । मक्षिकाया द्वय त्रय वा। ५-'वाजरा' इति प्रसिद्ध शालिविशेष । ६-मधूरा, मोती- शरा' इति च लोकप्रसिद्ध सनिपातज्वरविशेषे। ७-चम्वूलविशेष । ८-शरद्भवम् । - उसके रस - कपाय १५१ चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छः। १६ पञ्चाशन्मरिचानि विश्वशकलं प्रस्थाविनीरे पचेत् काथे सामिनिपेदुषि प्रविकिरेत् स्फोटान् सिताया वहून् । उत्पद्येत यदा पुनःक्वथनतस्तत्रार्थतन्तूद्गमः सेद्धं सावृतिरुष्णमेव हि पिबेच्छीतज्वरोच्छित्तये ॥ २४ ॥ १७ द्राक्षाकलागुडूच्यः प्रत्येकं तोलकोत्तुलिताः । गाणः कासिन्याः क्वाथः सर्वस्वरान् हन्ति ॥ २५॥ २८ कुंडवकुलत्थक्कथितं पाथः कोणं विशिष्य निष्पीतम् । शीतज्वरं विजयते रेकं वा वान्तिमुद्भाव्य ॥२६॥ १९ नीरे' सितीनुहृदि तिष्ठति पादशेपे निक्षिप्य कालजैरणं त्रिपुंटां त्वचं च । वाष्पं पिधाय नखरोष्म निपीतमुच्चै- रुद्भाव्य धर्मसलिलं ज्वरमाशु हन्ति ॥ २७ ॥ पचास मरिच और के एक टुकडे को सोलह तोला जल मे उकाले । अर्धा- चशिष्ट जल में बहुत से पतासे, कपाय मधुर वन जाये उतने, डालकर उसे पुन. उकालें। आधे तार जितनी चासनी हो जाये तब उसे उतारकर कुछ शीतल होने पर पीजायें। इसका पान करके एक चद्दर ओढकर सो जावें। इस तरह करने से शीतज्वर नष्ट हो जाता है ॥२४॥ द्राक्षा, खूबकला तथा गुडूची प्रत्येक एक एक तोला एव कासिनी छह माशा लेकर कषाय सिद्ध करलें । इससे सभी प्रकार के ज्वर नष्ट होते है । सोलह तोला भर कुलत्थ को पानी में उकाल ले । इस क्वाथ को कुछ गरम गरम ही पी जाने से विरेक अथवा वमनपूर्वक शीतज्वर उतर जाता है ॥ २५-२६ ॥ एक प्रस्थ जल में चार तोला मिश्री मिलाकर उसके चतुर्थ भागावशिष्ट क्वाथ में एक तोलाभर काला जीरा, पांच इलायची तथा तीन गुंजा भर दालचीनी के चूर्ण को डाल कर शीघ्र ही ढकदें जिससे बाप्प न उड जाये। कवोष्ण होने पर उसे पी जायें। प्रचुर स्वेटपूर्वक शीतज्वर शीघ्र नष्ट होता है ॥ २७ ॥ १-अर्धावशिष्टे । २-'पतासा' इति प्रसिद्धान् । ३-यावद्भिर्माधुर्य तावन्त इत्यर्थ । ४-काथ पीत्वा तूलवस्त्रावृत शयीतेति तत्त्वम् । ५-सायमिति शेष । ६-अष्टरक्तिक- द्वादेशमाषकैस्तोलकम् । ७-माषषट्कं, 'गद्याणो माषकैः षड्सि' इति वचनात् । ८-सामान्यपरिभाषया कुडवकुलत्थाना क्वाथ कार्य । ९-प्रस्थप्रमाणे । १०-सिता पल- प्रमाणा। ११-'कालाजीरी' इति प्रसिद्धमक्षप्रमाणम् । १२-एलापञ्चकम् । १३-वाल- प्रमाणम् । १४-कोष्णं लोके 'नोनिवाया' इति प्रसिद्धम् । ।
- सिद्धभेषजमणिमालायां [ज्वर २० पटपिहिते पात्रमुखे समं समाकीर्य कारवीमा म् । तदुपरि विमुन्य गगनं शिखिनाऽक पातयेज्वरार्तितम् ॥ २८ ॥ २१ पुटस्विन्नामरिष्टस्य शरीणामेकविंशतिम् । पिष्ट्वा तत्तुल्यमरिचर्जलं दत्त्वा द्रवीकृताम् ॥ २९ ॥ तप्तमृद्भित्तनिक्षेपान्मनागशिशिरीकृताम् । निपीय मुच्यते जन्तुर्वरातङ्कान संशयः ॥ ३० ॥ २२ शतकृत्वो जलधौता कारवी सकणापटुः । पिष्वाऽम्बुगालिता कोप्णा पीता जीर्णज्वरापहा ॥ ३१ ॥ २३ ननु रामसे फाण्टः प्रविरलधान्याकदलधन्यः । किं कुरुते वैद्यपते ! ज्वरं झटिति जर्जरीकुरुते ॥ ३२ ॥ २४ रात्रावल्ला जले क्षिप्ता पिष्टा पीता सितायुता। निहन्ति पित्तजं दाहं दुर्गा शुम्भासुरं यथा ।। ३३ ।। समान भाग मे भाद्र (हरी) अजवायन एवं अभ्रक लेवें । एक पात्र के मुख पर वस्त्र बांध कर उस पर यवानी रखदें। यवानी के ऊपर अभ्रक का पट विछाद। फिर उस पर एक और पात्र रख कर सपुटित कर दे। ऊपर से अग्नि देकर, अध.-पातन यंत्रविधि अनुसार इनमे से अर्क टपकाले। इस अर्क से ज्वर वेदना दूर होती है ॥२८॥ निब की इक्कीस (२१) कोमल शाखाओं को पुट पाकविधि से स्विन्न करलें। इनमे इतनी ही काली मिर्च मिलाकर खूब बारीक पीसकर एक पल पानी मिला तरल बनालें। इसमें अग्नितप्त-ईंट का टुकडा डाल कर कुछ गरम करले। इसके पीने से मनुष्य नि.सदेह ज्वरमुक्त हो जाता है ॥ २९-३० ॥ एकमाशा भर अजवायन एव एक पिप्पली इन दोनों को सांझ के समय एकत्र जल मे भिगोकर रख देवें । सुवह पिप्पली को अलग निकालकर, अजवायन को शतवार जल से मर्दन करके धो डाले। इस तरह करने से वह निस्तुष हो जायेगी भव, इसमे एक माशा भर लवण मिलाकर फिर (अलग निकाली गयी) पिप्पली सहित खूब बारीक पीस नौ तोले भर पानी से वस्त्रपूत कर लेवें । इसे कुछ गरम करके पीने से जीर्णज्वर से मुक्ति मिलती है । हरे धनिये की कुछ पत्तियों से युक्त चिरायतें के फाण्ट को धन्य है । हे वैद्यराज! इसमे ऐसा क्या गुण है ? अरे यह ज्वर को शीघ्र ही जर्जरित कर देता है। रात्रि को जल मे भिगोकर रखे हुये धनिये को प्रात. पीस १-यवानिकाम् । २-अभ्रकपटलम् । ३-तदुपरिस्थितेनाग्निना। ४-निम्बस्य । ५-इपीकाणाम् । ६-पलमानम् । ७-विधिश्चायं माषोन्माना यवानिका पिप्पली चैका सायं जले स्थापयेत् , प्रातश्च पिप्पलीमपनीय, यवानिका जलै शतवारप्रक्षालनान्निस्तुपा विधाय, माषिक लवणं दत्त्वा, पिप्पल्या सह प्रपिध्य, पादोनत्रिपले जले पटेन पावयेत् , तत. पैत्तले पाने समुत्वाथ्य पलद्वयावशेषं शतशीतः पिवेदिति । ८-किरातफाण्ट । ९-धान्यकम् । - १५३ । - चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छः। - २५ आस्तीर्य कियन्ति घटे कुनिम्वपर्णानि धान्यकान्युपरि । संभृतमम्बु निशोपितमपहरति कराशितलतापम् ॥ ३४ ॥ २६ पांशुजक्षारसमितीतुपक्षोदेन घर्षयेत् । पाणिपादतलान्युप्रतापार्तावनुपूर्वशः ॥ ३५ ॥ २७ लवणसहचरेण क्षीरसारेण लिवा करचरणतलानि प्रौढपित्तज्वरातों। अविरलमनुलोमं मर्दयेत् कांस्यपात्रैः प्रतिविलसति यावच्छयामता क्षामता वा ॥ ३६॥ २८ 'चिञ्चाम्बुपूर्णघोपजपात्रं गात्रे विवर्तितं परितः। ज्वरमवतारयतितरां भीष्मग्रीष्मोग्णवात्योत्थम् ॥ ३७ ॥ २९ आम्रगलाटुभटिनं जलैर्द्रवीकृत्य जीरपटुमरिचैः। प्रतिसार्य मात्रया पुनरातपदग्धः सुखाय पिवेत् ॥ ३८ ॥ कर उसमे मिश्री मिला शर्वत सा बनालें। यह पेय पित्तज्वर के दाह का उसी तरह सहार कर देता है जिस तरह दुर्गा ने शुभासुर का किया था ॥३१-३३॥ एक घट में चिरायते के थोडे पत्ते बिछाकर फिर ऊपर कुछ पत्ते हरे धनिये के फैलाद । रातभर इन्हे पानी में भीजने दें। प्रातः पानी को कपडे में से धीरे धीरे टपकाकर उपयोग में लें। इससे हस्त एव पदतल - गत - दाह दूर होता है। पांशुज क्षार एवं चापड इन दोनों के चूर्ण को हस्त एव पांव की तलियो पर भनुलोम-गति (ऊपर से नीचे की तरफ) से मर्दन करे। इससे तत्काल उग्रदाह भी शमन हो जाता है ॥ ३४-३५॥ तीव्र-पित्त-ज्वर से पीडित के हाथ और पांव की तलियों पर नमक-मिश्रित (दूध में से निकाले गये) नवनीत का लेप करदें, फिर अनुलोम - गति से, कांसी के पात्र-तल से, तब तक अविरत घर्षण करते है, जब तक तलियां काली न पड जायें-अथवा उनपर छाले न दिखायी दें । इससे शीघ्र ही दाह का शमन हो जाता है ॥ ३६॥ इमली के पानी से भरे हुये कांस्यपान को शरीर के ऊपर चारो तरफ फिराने से प्रचड ग्रीष्म की लू से उत्पन्न ज्वर सपूर्ण दूर हो जाता है। कच्ची केरी (भाम) को बाफकर पानी मे मसलकर छानले । उसमे यथामात्रा जीरा, नमक, मरिच आदि का चूर्ण मिलाकर पीये । इससे लू-जन्य सताप मे शान्ति मिलती है । ३७-३८ ॥ १-भूनिम्बपत्राणि । २-औद्भिदं 'खारी' इति ख्यातम् । ३-गोधूमतुपाणि 'चापड' इति प्रसिद्धानि। ४-अनुलोमरीत्या। ५-क्षीरोत्थनवनीतेन। ६-'आमली' इति प्रसिद्धा । तत्फलाम्बु ग्राह्यम् । तत्पूर्ण कांस्यपात्रम् । ७-'लू' इति प्रसिद्धा । ८-आम्रस्यामफलं 'कैरी' इति ख्यातम् । 'आमे फले शलाटु स्यात् ' इत्यमरः । । ।
१५४ सिद्धभेषजमणिमालायां [उचर- ३० भूनिम्वनीरविकसन्कलिकारसेन वासःनुतेन परितो धवलीकृतान्ने । हीबेरगुम्फिततिरस्करिणीसुगन्धे सौधेशयीत सुखमुणतरज्वरातः३९ ३१ दिवा दिवाकीर्ति कुटुम्विनीभिः प्रमृष्टकेशा धृतपुष्पवेपाः । क्लमं कथाभि. श्लथयन्तु कान्ताः समीरलीलालुलितालकान्ताः ॥१०॥ ३२ पित्ततापितशरीरवल्लरी सा सखी वद 'हकीम दवाई। औषधं शुणु मृगाक्षि ! मनोक्षं 'जा गुलावगुलकन्द खवादे ॥४१॥ ३३ ज्वरादिता या कटुकान् कषायान चेत् पिवेत् किं वद वैद्य ! देयम् । निवोध हंसीमधुरमचारे ! 'वहां वनप्सासरवत् पिलावै ॥ ४२ ॥ ३४ वनप्सिकामष्टगुणे निशायां नीरे निधायाथ विपाच्य चुल्हयाम् । अष्टावशेष शृतमाकलय्य संगालयेगाढपटेन युक्त्या ॥ ४३ ॥ चतुर्गुणां तत्र पचेत् सिताख्यां तन्तूद्गमो राजति यावदस्याम् । वनसिकाशार्करमेतदाहुः पित्तज्वरे देयमतीव सौम्यम् ॥ ४॥ शार्करपरिभाषा- अम्भस्यष्टगुणे निधाय च निशि द्रव्यं पलं कुट्टितं प्रातर्मन्दकृशानुना परिपचेदष्टांशशेषं नयेत् । चिरायते के जल से बनाये गये सुधारस (कली) से लिपे पुते हुये तथा उशीर विनिर्मित पडदों (खसकी रट्टियों) से महकते हुये महल मे सुख- पूर्वक शयन करने से, प्रखर-ग्रीष्म-सताप-जन्य ज्वर की पीडा का शमन हो जाता है। कुशल- दासियोंद्वारा सपादित केश-रचनाओ से सुशोभित, पुष्पो के आभूषणो से सुसज्ज तथा मंद मंद पवन से अस्तव्यस्त किये गये केश-कलापों से मनोरम प्रियतमाये, मधुर कथाओद्वारा दिवस भर के ग्रीष्मजन्य सताप को दूर कर देती है ॥ ३९-४० ॥ "हे हकीम ' मेरी सखी की देह-लता से झुलस रही है, कुछ दवा बताइये'। "हे मृगनयनी ! मै तुम्हे इसकी मन प्रिय औषधि बताता हू । तुम उसे गुलाब के गुलकन्द का सेवन कराओ'। 'हे वैद्य। विकट समस्या है। मेरी सखी पित्तज्वर से पीडित है कितु कटु -कषाय लेने के लिये इन्कार करती है। भाप ही कहें क्सि औषधि की व्यवस्था की जाये।' 'हे मधुर-भाकृति (आचरण) वाली सुन, उसे बनप्सा का शर्वत पिला दे॥४१-४२॥ बनप्सा को भाठ गुने पानी मे भिगोकर रातभर रहने दे-प्रात. मन्द अग्निद्वारा इसे उकाले । भष्टावशेष जल रहने पर उतारकर घट्ट- वस्त्रसे छानलें । द्रव से चतुर्गुण शक्कर मिलाकर इसकी गाढी, तार बधने लगे ऐसी, चासनी बनालें । इसे 'बनप्सिका १-सुधाघोलेन । २-उशीरम् । ३-'चिक, पडदा' इति ख्याता। ४-दिवाकी तिर्नापितस्तत्त्रीभि । ५-इदमपि तथैव चित्रजातिकाव्यम् । ६-इदमपि तथा । ७-वनप्सा- -शार्करविधिरेवाभिधीयते । ८-त्रिगुणां वा। ९-सामान्यत शार्करपरिभाषेयम् । पित्त-ताप हसी। ध्यान से -- चिकित्सितम्] चतुर्थों गुच्छ । तत् संगाल्य पटैश्चतुःपलसितां निक्षिप्य भूयः पचे- द्यावत्तन्तुभवोऽवतार्य तदिदं प्राहुर्बुधाः शार्करम् ॥ ४५ ॥ ३५ श्रीखण्डस्थलपद्मकेतकजले पक्त्वा सितां संक्षिपे- देलाशीतमरीचचन्द्रमधुकत्वक्क्षीरिका क्षीरकाः। पश्चाद्रूप्यदलान्यपि प्रविकिरेत् सिद्धो द्रवः स्यन्दलो भैष्मी कृष्ण इव प्रसह्य हरते पीडां परां पैत्तिकीम् ॥ ४६ ॥ ३६ श्रीखण्डश्रपितजलेन साधितायां तन्तुल्यां चिरमुषितानि शर्करायाः । खण्डोनि प्रवितर मोचगर्भजानि द्रागेव प्रशमयितुंद्वितीयधातुम्॥४७॥ ३७ दयिताधरपीयूपे पित्तज्वरनाशके जयति । यदितरभेपजकरणं सति चूतफलेऽम्लिकाभ्यासः ॥४८॥ शार्कर' कहते है। यह सौम्य, पित्तज्वर में निर्भय उपयोग मे लाने योग्य औषधि है । जिस द्रव्य का शार्कर बनाना हो, उसको एक पलभर मात्रा में लेकर जौकुट कर लें। फिर इसे अष्टगुण पानी में रातभर भिगोकर रखदें । प्रात: मन्दाग्नि से उकाल अष्टमाश जल शेष रहनेपर उतारलें । इस द्रव को एक घट्ट कपड़े में बांधकर एक एक वृद टपकालें । अब इस जल मे चतुर्गुण शक्कर मिलाकर ति तारी, चार-तारी चासनी बनालें । विद्वानों ने इसे ही शार्कर कहा है ॥ ४३-४५॥ चार तोले भर श्वेत चंदन के चूर्ण को गुलाव और केवडे के सोलह तोला भर अर्क में साझ के समय, भिगोकर रखदे । प्रात सोलह तोले जल इस मे और मिलाकर उकाले । अर्धावशेप जल रहने पर, उतार कपडे से छान उसमे वत्तीस तोला शक्कर मिलादे । अग्नियोग से चासनी को कुछ गाढी बना कर स्वागशीतल होने पर इसमें इलायची, शीतल मिर्च, मुलेठी और गुडूची सत्व प्रत्येक एक एक तोला, वंशलोचन एवं तवाखीर प्रत्येक छह माषा, थोडा कपूर, सोने चांदी के वरक सब यथामात्रा यथाक्रम डालकर अच्छी तरह मिलालें। इस तरह निर्मित इस दव को 'स्यदल' कहते है । यह पित्तजन्य तीन पीडा को उसी तरह बलात् हर लेता है, जिस तरह कृष्ण ने सत्यभामा को हर लिया था ॥४६॥ चदन चूर्ण मे उकाले गये पानी की चासनी वनाले । इसमे, कदली- स्तभ के अन्तर -गत कद-स्तंभ के, उसके चारों ओर माच्छन्न सूत्रो को अलग निकालकर, टुकडे डाल कर कुछ दिवसों तक रहने दें । यह पित्तजनित वेदना को दूर करते हैं । पित्तज्वर १-तरुणीकेतकजलकुडवे श्वेतचन्दनक्षोदपलं सायमाप्लाव्य, प्रातर्जलकुडव क्षिप्ता, पक्त्वा, अविशेष पटपूतं शरावशर्कराया परिपाकघने द्रवे स्वाङ्गशीते निक्षिप्य, दा प्रचाल्यैलायष्टीशीतलमरिचामृतासत्त्वानि प्रत्येकं तोलकमितानि वशलोचनतवक्षारक्यो पृथ- गद्याण मनाक् कर्पूर समेलयेद्रूप्यदलानि स्वर्णदलानि चेत्यस्य ‘स्यन्दल' इति प्रसिद्धस्येति- कर्तव्यता । २-नि शेषमाकृष्टसूत्राणि कृत्वेति रहस्यम् । ३-द्वितीयधातुं पित्तं रक्कं च ।
सिद्धभेषजमणिमालायां रि- ४२ किराततिक्तकप्रस्थं पुराणचपलापलम् । पचेत् पयसि निक्षिप्य यावत् सर्वपयःक्षयः ॥ ५६ ॥ किरातवक्कसात् कृष्णाः पृथकृत्य विशोषयेत् । तद्रजो मधुना लिह्याजीर्णज्वरपराजितः ॥ ५७ ॥ ४३ रामसेनभवं सत्त्वं सर्वचरनिवारणम् । ४४ गुडूचीभवमप्येकं किमन्यै गैपधक्रमैः ॥ ५ ॥ ४५ पच पलतुलितं क्षीरं चपलावितयं चतुःपलं नीरम् । निःशेपदग्धनीरं जीर्णज्वरहारि तत् कणाश्रीरम् ॥ ५९ ॥ ४६ स्वर्ण मुक्ता च दरदं मरिचं भागवृद्धितः । खर्पर्यटौ कलांशं स्यान्नवनीतं पयोभवम ।। ६० ॥ निम्बूकैर्मर्दयेत्तावद्यावत् स्नेहो लयं व्रजेत् । मालती प्राग्वसतोऽयं रसो धातुज्वरं जयेत् ॥ ३१ ॥ मात्रा गुञ्जाद्वयोन्माना कणामधुचमत्कृता । प्रेकुञ्चपञ्चके पश्चनवतिनिम्बुकान्यलम् ॥ ६ ॥ करके उसे तुलसी-रस में पीस, पिप्पली और लवण चूर्ण मिरा, कुठ निवाया करके सेवन करे । यह सभी-प्रकार के ज्वरो को नष्ट कर देता है ॥ ४ ॥ । चिरायता और कुटकीचूर्ण प्रत्येक एक एक प्रस्थ, पुराणी साबित पिप्पली धार तोला इनको चतुर्गुण जलमें उकाल लेवे । जब पानी पूरा जल जाये तब किरातादि चूर्ण क्टि मे से पिप्पलीयो को निकाल लेवें। इन्हे छायाशुष्क करके चूर्ण बनार मधु के साथ लेने से जीर्ण -ज्वर पराजित हो जाता है। चिरायते का सत्व सर्व प्रकार के ज्वर को दूर कर देता है। गुड़ची का सत्त्व भी यही कार्य करता है। इस सत्यके रहने अन्य औषधियो से प्रयोजन ही क्या? एक पल दूध में चार पल पानी मिलाकर उसमें नीन नग पिप्पली के उकाले । जब दूधमें से जलाश निशेप हो जाये तब इसे उतार लें। यह कणाक्षीर' कहलाता है तथा जीर्ण ज्वर को नष्ट करता है ॥ ५६-७९ ॥ स्वर्णभस्म १ तोला, मुक्तापिष्टी २ तोला, हिगुल तीन तोला, मरिच चार तोला और खर्पर भाउ तोला इन सब को एकत्र करके, इनमें गाय के दूध में से निकाला गया नवनीत १३३ मामा (करीव दो तोला) मिला देवें । इन सब को निंबू के रस में तब तक खरल करते रहे जब तक स्नेहांश विलीन न हो जाये । इस तरह वसत-मालनी नामक रस सिद्ध होता है, इसकी मात्रा २ रत्ति है। मधु भौर पिप्पली के साथ सेवन करने से चमत्कार पूर्ण असर दर्शाता है । यह धातु गत ज्वर को नष्ट कर देता है। बीस तोले भर द्रव्य के लिये करीब ९५ निवू का रस पर्याप्त होता है। क्योकि इतने रस से खरल करने पर प्राय. नवनीत की चिकनाहट निकल जाती है ॥ ६०-६२ ॥ १-द्विगुणे चतुर्गुणे वा जले। २-वसन्तमालतीनाम्ना प्रसिद्धस्य रसस्य विधि । ३-पटपञ्चके। ।
१५९. स्थूल शाखा से चिकित्सितम् चतुर्थी गुच्छः। ४७ निर्वाप्य जसदं तप्त निम्बुकाम्बुनि सप्तधा। निक्षिप्य तत्र चपलं पचाध्यग्नि कटाहगम् ॥ ६३ ॥ क्षेपं क्षेपं सिताक्षोदं द्रेष्काकाष्ठेन घर्षय । सुजातं देहि तद्भस्म शार्करेण ज्वरापहम् ॥ ६४ ॥ ४८ गोमयशतद्वयेन प्राक् तदनु तदर्धगोमयैर्युक्त्या । कन्यारसेन सिद्ध माक्षिकमुक्तं ज्वरादिजेयि ॥ ६५ ॥ ४९ अंभ्रसंपुटगं तालं किंचिदगारसाधितम् । वातश्लेष्मज्वरे शस्तं माणिक्यरसशब्दितम् ॥ ६६ ॥ --- ५० तालं कुट्टितमभ्रपत्रपुटगं संस्थाप्य मृत्खपरे तंद्रन्ध्राणि नवीनकोलदलजैः कल्कैः कृती पूरयेत् । जसद को तपा तपा कर सात बार निबू के रसमे बुझाये । फिर एक लोह कटाह मे इस जसद को तथा इतने ही वजन भर पारद को रखदें। तीव्र अग्नि से इनको पकावें । पारद द्रवीभूत हो जाये, तब बीच बीच मे मिश्री के चूर्ण को कटाह मे डालते हुये महानिब की एक मोटी इन सभी द्रव्यों को हिलाते रहे । मिश्री का चूर्ण जैसे जैसे जलता जाये, तैसे तैसे पुन पुनः यही चूर्ण डालते रहे एवं उपरोक्त शाखा से निरतर हिलाते रहे । भस्म बन जाने पर इसे उतार ले। इसकी मात्रा एक रत्ति है। इस ज्वरम्न उत्तम भस्म का सेवन 'शार्कर' के साथ करें। (शार्कर निर्माण विधि श्लोक ४५ मे देख लें)॥ ६३-६४ ॥ शुद्ध माक्षिक को ग्वारपाठेके रस मे मर्दन कर, प्रथम, दोसो गोमय की अग्नि दें। स्वागशीतल होने पर, पुन कन्यारस मे मर्दन करके दूसरी वार, एक सो गोमय की अग्नि दें। इस तरह करीब दस पुट देने से 'माक्षिक' सिद्ध होता है। इसकी मात्रा एक रत्ति है। सामान्य ज्वर, मौक्तिक ज्वर तथा श्वास, कास, क्षय आदि मे इसका प्रयोग करें। इसके ऊपर, इक्कीस पतासे तथा सात या नौ मरिच के चूर्ण को, सोलह तोले जल मे उकाल अर्धावशेष काथ को वस्त्र पूत करके, अनुपान रूप से पीये। पुट देते समय पुट-गर्त को एक बडे सच्छिद्र मिट्टी के सकोरे अथवा ठीकरे से ढक दे । इस तरह करने से अग्नि शात न होती हुयी एकरूप से लगेगी। पत्राख्य (तबकी) हरिताल के सूक्ष्म पटलों को, अभ्रक के दो पत्तों के बीच मे संपुटित करके अग्नितप्त बना ले। यह 'माणिक्यरस' कहलाता है, तथा वात-श्लेष्म-ज्वर में प्रशस्त है ॥ ६५-६६ ॥ हरिताल के सूक्ष्म-चूर्ण को अभ्रक पत्रो मे सपुटित करदे । अभ्रक पुट १-पारद जमदतुल्यम् । २-महानिम्बकाष्ठेन । ३-रक्तिप्रमाणमिति शेष । ४-पुटगर्तोपरि सच्छिद्रमृत्खर्परपिधानम् । मात्रा रक्तिमिता। उपरिष्टादेकविंशतिसिताबुद्ध- दानि सप्त नव वा मरिचानि कुडवजले समुत्काथ्यार्धावशेषं पटपूतमनुपिवेत् , इति युक्ति-- शब्दार्य । ५-मामान्यज्वर मौक्तिकज्वर च । आदिशब्दात् श्वासकापौ। ६-अभ्रपटल- द्वयमध्यस्थितं सूक्ष्मपटलीकृतं पीततालम् । ७-अभ्रपुटरन्ध्राणि । के १६२ सिद्धभेषजमणिमालायां [ज्वर- प्रकार:- तैलोपयोगि यत्रं तु शस्तमत्र रसातलम् । सहायो नारिकेलस्य मजा पन्था गुरूदितः ॥७४ ।। ५७ राले चतुःपलमिते द्रवितेऽग्नियोगात् संमेल्य शुक्र्तविषमपलप्रमाणम् । खल्वे क्षिपेत् सपदि पर्पटिकारसोऽयं हन्यात् कफानिलमतिभ्रमवान्तिवेगान् ॥ ७५ ॥ ५८ इष्टीमध्यविशोभिकूपपिहितं सप्ताहमार्के स्थितं क्षीरे शम्बलमष्टयाममनिशं चुल्ह्यग्निना पाचयेत् । सिद्धोऽयं हिममूर्छनो रस इति प्रस्तूयते पण्डितै- दत्तस्तन्दुलतोलितः समयतो वेलाज्वरज्वालनः ॥ ७६ ॥ ५९ स्फटिकां मल्लजठरां विपाच्य गुरुमार्गतः । ज्वरी पर्णेन भुक्षानो लभते सुखमुच्चकैः ॥ ७७ ॥ जायेगा । मन.शिला का तेल, किसी अनुभवी वैद्य गुरु की देखरेख के नीचे, पातालयंत्र द्वारा निकाल लेना चाहिये । तैल निकालने से पूर्व मन शिला में परिपक्व नारियल की भीतरी मज्जा का चूर्ण अवश्य मिला देवे ॥ ७३-७४ ॥ 1 सोलह तोले भर राल को अग्नि से पिघला उसमे दो तोला शतमल्ल मिलाकर शीघ्र ही खरल मे डाल देवे। इस तरह सिद्ध किया गया यह 'पर्पटिकारस' वात, मतिभ्रम और वमन के वेग को दूर कर देता है ॥ ७५ ॥ एक पुराणी ईट के बीच में खड्डा करके उसमे भाकडे का दूध भर, सखिया डाल कर ताम्रपान से ढकदें। इस तरह सात दिन तक रहने । कदाच अर्क - दूध ईट से शोपित हो जाये तो उसमें पुन दूध भरदे । सात दिवस पीछे उस ईंट को आठ प्रहर निरतर चुल्हे की अग्नि से पकावे । इस तरह पडिवों से प्रशंसित 'हिममूर्छन रस' सिद्ध होता है । समयानुसार प्रयुक्त इसकी एक चांवल भर मात्रा वेलावर को जला देती है ॥ ७६ ॥ सोलह तोलाभर लाल फिटकरी तथा अठारह माशाभर शतमल्ल लेवें। प्रथम स्फटी के आधे चूर्ण को एक शराव में दवा दबा कर भरदें। फिर इसके मध्य मे- १-शतमलसनम् । २-इष्टिका च पुराणा ग्राह्या, पिधानं च ताम्रपात्र्या । ३-शोणस्फटिकां कुडवमिताम् । ४-अशुद्ध एव शतमलोऽष्टादशमाषप्रमाणो यस्यामिति । ५-स्फटिका सर्वां चूर्णयित्वा तदर्धचूर्ण मृत्करके समावाप्यागुल्या गाढ निष्पीड्य मध्ये मलसमावेशयोग्य गतं कृत्वा तत्र मल्लचूर्ण धृत्वोपरि शेष स्फटिकाचूर्ण समावाप्य तथैव दृढतर निष्पीड्य मुखे चैका मुद्रा दत्त्वाऽध्यर्धप्रस्थवनोपलैः पुटेत् । मात्रा चैका रक्ति- रिति गुरुमार्ग । कफ, ।
चतुर्यो गुच्छ.। १६३ चिकित्सितम्] ६० मृत्स्तापात्रगतं विमृद्य पलिकं शहामलं शम्बल- क्षोदं सप्तपलारुणस्फटिकया संक्षुण्णया गर्भितम् । अष्टप्रस्थवनोपलैः परिपुटे दद्यात् प्रपक्वं पुन- स्तं गुलाममितं ज्वरे रसवरं सट्टाक्षया भक्षयेत् ॥ ७८ ॥ मूपायां मल्लमावाप्य कलसौरेण गर्भितम् । मस्त्रया विधमेद्वैद्यो यावत् स्याद्रवसंक्षयः ॥ ७९ ॥ प्रकार नन्दुलोत्तुलित युक्त्या देयं चातुर्थके ज्वरे । कि तु सुस्निग्धमधुरं पथ्यं किंचित् प्रकल्पयेत् ॥ ८० ॥ ६१ गर्भस्थमल्लशकलं भस्मप्रस्थं पुटेडिपेन्द्रपुटे । मसृणीकृत्य कफानिलगीतज्वररुक्षु मात्रया देयम् ॥ ८१ ॥ ६२ मल्लमक्षं जलप्रस्थे पक्त्वाऽम्भःक्षपणावधि । दीयतां तन्दुलोन्मानं गैरिकेण ज्वरार्तिपु ॥ ८२ ॥ शतमल समा जाय इतना गहरा - एक गर्त बना उसमे शतमल्ल ढूंस ढूंस कर भर देवे । इसके ऊपर अवशिष्ट स्फटीचूर्ण को पुन. दवाकर भरदें। शराव के मुख को ताम्रपान से सपुटित करके डेढ प्रस्थ गोवरी में फूक दें। नागरवेल पान के साथ, एक रत्तिभर मात्रा मे लेने से ज्वरित सपूर्ण स्वस्थ हो जाता है ॥ ७७ ॥ भास के समान वेतमल्ल चार तोला भर लेवें। इसे भठ्ठावीस तोला रक्तस्फटी के चूर्ण मे रख कर पूर्वोक्तविधि से सपुटित करके आठ प्रस्थ वनोपल की अग्नि देवे । एक गुजाभर माना में द्राक्षा के साथ सेवन करने से यह रसश्रेष्ठ ज्वर को दूर कर देता है। एक भाग मल तथा दो भाग कलमी सोरा ले । एक मूपा मे, पहिले आधे भाग जितना सोरा डाल कर उस पर मल रस कर उसके ऊपर पुन अवशिष्ट सोरा भर दें । अब धोकणी से अग्नि दें। जब तक सोरे का द्रव सपूर्ण न जलजाये तब तक अग्नि देते रहे। इस तरह मल्ल सिद्ध हो जायेगा। इसके प्रयोग की विधि-दूध की मलाई के साथ एक चावल भर मात्रा में लेने से चातुर्थिक ज्वर दूर हो जाता है । इसके प्रयोग काल में पथ्यरूप से मलाई, शक्कर, कलाकन्द, खूब उकाला हुमा मधुर दूध आदि स्निग्ध एवं मधुर द्रव्यों का भोजन करे ॥ ७८-८० ॥ चुदहे की एक प्रस्थ राख मे शतमल्ल के टुकडे को रखकर गजपुट में फूक देवें। स्वांग शीतल होने पर इसे निकाल खरल करके खूब मुलायम बनालें। यह भस्म कफ, वात एवं गीतज्वर में मात्रापूर्वक देने से लाभ करती है । एक तोला भर मल को एक प्रस्थ जल में तब तक उकालें, जब तक पानी नि शेप न हो जाये । ज्वरपीडित को गरिकचूर्ण के साथ एक चावल भर मात्रा में देवें ॥ ८१-८२ ॥ १-अस्मिन् पुनर्मानभेद एव केवल प्रकारश्च पूर्वोक्त एव । २-मल्लापेक्षया द्विगुणेनेति तत्त्वम् । ३-कलाकन्दशर्करापावकदुग्वसतानिकाद्यन्यतमोपहितमिति । ४-गजपुटे ।
M । मिदभेषजमणिमालायां ६३ हरीतकीशम्बलवेल्लजानां कुर्याद्रटी वारिणि सर्पपाभाम् । वेगं गणदि प्रथमं प्रदत्ता ज्वरस्य वेलेव महाम्बुरागः ॥ ८३ ॥ ६४ वृन्ताकलिद्धमलं चपलां दरदं च तन्दुलीयाद्भिः। घुष्टी घटिता घट्यः शिशिरज्वरदपदारिण्यः ॥ ८४ ।। ६५ द्विगुणं दरदं मल्लाभृङ्गाद्भिश्चक्रिका तयोः । घृताक्ते तप्ततवके शोषयेतां विवर्तयन् ।। ८५ ॥ एवं पुनः पुनः कृत्वा सर्पपाभा वटी कुम । निगीर्णाः समयात् पूर्व गीतज्वरगतिच्छिदः ॥ ८६ ॥ १६ व्यहं विभाव्य दरदं नहीधीः पलोन्मितम् । सुधारमचूर्णमावाप्य भाव्यं तैरेव पूर्ववत् ॥ ८७ ॥ भगवसंपुटे रुद्धा चक्रिकां द्विरदे पचेत् । रसं गुजानिमानेन पर्णखण्डेन दापयेत् ॥ ८८ ॥ । हरीतकी, गतमल तथा काली मरिच इनके पृथक् पृथक समभाग चूर्ण को लेकर पानी में खुन बारीक पीस - घोटकर सर्पप-तुल्य गोलियां बनालें । वेला के पूर्व देने से यह भन्म महासमुद्र की वेला के समान वेलावर के वेग को रोक देती है ॥ ८३॥ बैंगन में सिद्ध किया गया मल, पिप्पली तथा हिंगुल इन तीनों को चौलाई के स्वरस में खरल करके गुटिकाये बनालें। यह शीतज्वर के दर्प का दलन कर देती है। मल, इसन द्विगुणित हिंगुल इन दोनो भृग-राज के रस खरल करके टिकियां गोलियो को घृताक्त तवे पर तब तक सेकते रहे, जब तक टिकियों की आद्रता का शोषण न हो जाये। उन्हें उतार कर पुन भृग-राज के रस में स्वरल करकं पूर्ववत् टिक्यिां बना कर फिर तवे पर सेकें । इस तरह तीन बार करें। अन्त में सर्पपतुल्य गोलिया बनाकर वेला से दो घटी पूर्व ही इसे निगल जाने से शीतज्वर का पुनरागमन नहीं होता। यदि प्यास लगे तो केवल दूध ही पीना चाहिये। मात्रा एक गुटिका ॥ ८४-८६ ॥ द। अन्त चार तोलाभर हिगुल को, तीन दिवस पर्यंत, स्नुहीक्षीर की भावना में, चार तोलाभर चूने के सूक्ष्म चूर्ण को इसमें मिलाकर पुन. तीन दिवस पर्यंत स्नुही- क्षीर की भावनायें दे। तदनन्तर, इनकी टिकियां बना कर शराव मे सपुटित करके गजपुट की भाच देवें। एक गुंजा के चतुर्थ भाग जितनी मात्रा मे नागरबेल पान साथ इसका सेवन करना चाहिये। यह श्रेष्टरस राजामो के उपभोग के लिये है। पथ्य १-वृन्ताकानि पञ्चविंशतिसख्यानि ग्राह्याणि । २-त्रिदिनमिति शेष । ३-भृङ्ग- राजरसे । ४-त्रीन् वारानित्यर्थ । त्रिवार तद्रसेन घर्षण तप्ततवके युक्त्या शोषणमित्यर्थ । ५-सति तर्षे दुग्धपानमित्युपदेश.। ६-दरदसमं, पलमिति यावत् । ७-त्र्यह स्लुक्क्षीरे- रेवेत्यर्थ । ८-गजपुटे। ९-ज्वरवेगाद् द्विघटिकापूर्वम् । में बनालें। इन - १६५ चिकित्सितम्] चतुर्थों गुच्छ । शीतज्वरगति हन्ति पथ्यमोधस्यमोदनम् । राजा)ऽयं रसश्रेष्ठः क्वापि किंचिद्विरेचयेत् ॥ ८९ ॥ १७ शतमैल्लं मृदाऽऽमेल्य न्युप्ता तत्र तु मेथिका । शाकार्थ शस्यतेऽवश्यं ज्वरितानां यथानुखम् ॥ ९० ॥ ६८ अध्यर्कदुग्धमुपिता शोणस्फटिका स्फुटाशुशुक्षणितः । कफकसनश्वसनसख सखे! प्रसह्य ज्वरं जयति ॥९१ ॥ ६९-७० अल्पानियोगसंफुल्लं गुजैकं नवसागरम् । भुक्तं पर्णेन शिशिरज्वरघ्नं टङ्कणं यथा ॥ ९२ ॥ '-७१ पलाण्डुमुत्कीर्य तदन्तराले यथायथं फेनमहेर्निधाय । आलिप्य पक्कं पुटपाकरीत्या संभुज्यं वेलाज्वरवान् सुखी स्यात् ॥९३॥ ७२ गुग्गुलुना फणिफेनं विनीय वा किङ्किरातकोकिलकैः । कवलय गुलामानं वेलाज्वरवारणाय सखे ! ॥ ९४॥ दूध और भात हे । ज्वर की वेला के दो घटी पूर्व इसे लेना चाहिये। यह शीतज्वर के वेग को रोक देता है । कभी कभी इससे यत्किचित् विरेचन भी हो जाता है ।। ८७-८९ ॥ शतमल्ल को थोडे से प्रमाण मे, मिट्टी में मिलाकर उसमे मेथी के बीज बोदेवे । उसमे से उगी हुई मेथी का साफ, शीतज्वर मे, निर्भय अवश्य सेवन करना चाहिये। प्रशस्त है। (मिट्टी में अधिक विष - क्षेप से अकुर नष्ट जाने की सभावना रहती है। अत अल्प -मात्रा मे ही प्रक्षेप करना चाहिये)। आकडे के दूध की भावना देकर रक्तस्फटी को भाग पर फुला लेवे। यह कफप्रधान कास और श्वास मे हितकारी एव बलात् ज्वर को दूर कर देने वाली है । एक गुजाभर नवसादर को मंद अग्नि देकर फुला लेवे । नागरवेल के पान में लेने से शीतज्वर नष्ट हो जाता है। इसी तरह सिद्ध किया गया टंकणक्षार भी यही गुण दिखाता है ॥ ९०-९२ ॥ एक प्याज को खुरचकर उसमे गत बना उस गर्त में जितनी अफीम समा सके उतनी भर कर उसपर खुरचकर निकाला गया प्याज का टुकडा पुन ढककर कपडमिट्टी करले । अब, इसे अग्नि में रख कर भूनले । तदनन्तर, इसमे से अफीम निकालकर शीतल होने पर प्रयोग करें। वेलाज्वर में यह प्रशस्त है ॥ ९३ ॥ अफीम को गुग्गुलु मे, अथवा बब्बूलवृक्ष की शाखाओ को जला कर उनके कोयलो की राखमे, अच्छी तरह मिलाकर, हे मित्र । एक गुजाभर मात्रा में, शीतज्वर १-दुग्वम् । २-अधिकविषक्षेपेण मेथिकाङ्कुरोत्पत्तिर्न स्यादत किचिदेव क्षेप्यामिति रहस्यम् । ३-'नवसादर' इति प्रसिद्ध क्षारविशेषोऽयम् । ४-पलाण्डु शीत कृत्वा ज्वरात् पूर्वम् ।
- १६६ सिन्भेषजमणिमालाया [ज्वर- ७३ फणिफेनधर्मपत्तनवीम्बूलेङ्गालकानि संपिष्य । एकत्रिषविभागं शीतज्वरमोपि मात्रया दत्तम् ॥ १५ ॥ ७४ अध्यर्धत्रीणि पत्राणि जानकीफलशाखिनः । पटुना कलितान्याशु निघ्नन्ति शिशिरज्वरम ॥ ९६ ॥ ७५ भगा सुभ्रष्टकचणकाश्चूर्णिता गुडयोजिताः । वेलातः प्रथम दत्ता हन्ति शीतज्वरं जवात् ॥ ९७ ॥ ७६ विमृद्य मर्कटीजालं गुडेन गुटकीकृतम् । निगीर्ण पूर्वमेव द्राग्यन्ति शीतज्वरं ब्रुवे ॥ ९८ ॥ ७७ स्फटिकान्धिफेनपटुविषभूतिमरीचविपमुष्टिकक्षोदः । ख्यातो ज्वराङ्कुश इति क्षिणोति गुञ्जामितो ज्वरं जवतः ॥ ९९ ॥ को रोकने के लिये, सेवन करें। अफीम, काली मरिच एव बब्बूल के कायलो को एकत्र पीसकर, वयमर्यादा के अनुसार एक, तीन अथवा छह भाग मात्रा में देने से मुहती ज्वर दूर होता है। प्रात काल कुछ नास्ता लेकर इसका सेवन करना चाहिये। यह अतिसार में भी लाभदायी है ॥ ९४-९५ ॥ सीताफल वृक्ष के साढे तीन पत्तों को नमक में बारीक पीस कर खाने से शीत ज्वर शीघ्र शान्त हो जाता है ॥ ९६ ॥ । भांग एवं भूने हुये चनो के चूर्ण को गुड मे अच्छी तरह मिला कर, वेला से दो घटी पूर्व खिलाने से शीतज्वर तत्काल नष्ट हो जाता है । (यह अनुभूत एव अद्भुत प्रयोग है ।।। इसमें सभी चने फूले हुये होने चाहिये । छिलको को अलग करके चनों का उपयोग करें। अनुपान कवोष्ण जल है ।) मकडी के जाले को गुड मे मिला कर गुटिका बना निगल जाने से पूर्वोक्त लाभ होता है। यह मैं दृढतापूर्वक कहता हू॥ ९७-९८ ॥ । फुलाई हुयी स्फटी, समुद्रफेन, सैंधव, शुद्ध शृगीविष, मरिच एवं शुद्ध कुचला इनको समानभाग मे एक मृत्पात्र मे सपुटित करके गजपुट में फूंक दें। इसे ज्वराङ्कुश कहते है । यह शीघ्र ही ज्वर को क्षीण कर देता है। मात्रा एक गुंजाभर है। (यह शीतज्वर की अव्यर्थ अनुभूत औषधि है।) शुद्ध कुचला चार तोला, सौवर्चल तथा १-वम्वूलकोकिलानि । २-वयोपेक्षया कत्पितया, किचित्प्रातराशं कृवा देयमिति सप्रदाय । वेलाज्वरे तथाऽतिसारेऽप्येतद्दीयते । ३-गण्डगात्रस्य 'सीताफल' इति प्रसिद्धस्य वृक्षस्य । ४-'मकडी' इति प्रसिद्धस्य कीटविशेषस्य शुभ्रतरश्लक्ष्णजालकम् । ५-स्फटिका भ्रष्टा ग्राह्या, सैन्धव समुद्रफेनेन सह सपुटे पञ्चप्रस्थैरारण्यगोमयैर्भस्म कृत्वा ग्राह्यम् । शुद्धशङ्गिकविषभस्म, शुद्धानि विषमुष्टिकानि वक्ष्यमाणरीत्या। मात्रा चैषा तोलक- प्रमाणा पूर्वमेव ग्राह्या, ततो यथायथ भस्मादि कार्यम् ।
चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छ.। ७८ विषमुष्टिकतो मुष्टिः सौवर्चलमरिचतः पृथक्प्रैसृतिः । मसृणीकृतो रसः स्याज्वराङ्कुशो नाम तथ्यार्थ ॥ १०० ॥ ७९ संशोधितानां विपमुष्टिकानां तुल्यांशमारीचरजोयुतानाम् । वट्यो विशालाफलवारिवद्धा विवन्धवातज्वरमुद्धरन्ति ॥ १०१॥ ८० धत्तूरवनसंफुल्लकलिकावेल्लजावटी। याम निपिद्धपानीया वेलाज्वरनिवारिणी ॥ १०२ ।। ८१ कृष्णकुकुरमूत्रेण भाविताया मृदो वटी। निगीर्णा हन्ति समयज्वरं सत्यमिदं ब्रुवे ॥ १०३ ॥ । ८२ एकविंशतिपत्राणि तुलस्या मरिचान्यपि । कृत्वा तिस्रो वटीया वेलावरनिवृत्तये ।। १०४ ॥ ८३ करञ्जमजातिविषे मरीचं छदैस्तुलस्यास्टिंगुणैर्विमर्थ । चणप्रमाणा गुटिका हिनस्ति ज्वरातिसारानलमार्दवानि ॥ १०५ ॥ मरिच प्रत्येक ८-८ तोला, इनको एकत्र खूब बारीक पीसलें। इसे ज्वराङ्कुशरस कहते है एवं यथा नाम तथा गुण युक्त है ॥ ९९-१०० ॥ (कुचला का शुद्धिप्रकार -कुचले को गीली मिट्टी मे एक सप्ताहपर्यत गाढकर रखदें। फिर, इसका छिलका उतार, बीच की जिह्वा को निकाल, घी में भून, लोह पात्र में चूर्ण बनाकर उपयोग मे लेवें।) "मच्छी तरह शुद्ध किया गया कुचला एव मरिचचूर्ण इन दोनो को समभाग एकत्र लेवें । इनकी इन्द्रवारुणी फल के रस से खरल करके गोलिया बनालें । ये मलावरोध सहित वातज्वर को दूर कर देती है ॥ १०१ ॥ धत्तूरा, ह्रीवेर, पानी में खिलाया हुआ सुधाखड और मरिच इन सब को सम- भाग लेकर गोलियां बनालें । ये वेलावर को मिटाती है। इनको लेने के उपरात एक प्रहर तक, यदि प्यास लगे तो भी, पानी नहीं पीना चाहिये ॥ १०२ ॥ काली मिट्टी को, कृष्णवर्ण श्वान के मूत्र की भावना देकर गुटिका बनाले । इसे निगीर्ण करने से वेलाज्वर नष्ट होता है। यह सत्य कथन है ॥ १०३ ॥ कृष्णतुलसी के इक्कीस पत्ते और गिनती में इतने ही काली मिरच के दाने इनको एकत्र पीसकर तीन गुटिकाये बनालें। इसके प्रयोग से वेलाज्वर निवृत्त हो जाता है १०४ करज की मज्जा, अतिविषा और मरिच प्रत्येक एक एक तोला लेकर, तीन तोलाभर तुलसी के पत्तो के साथ इनको पीस कर, चने के समान वटिकायें बनालें । १-विषमुष्टिकानि 'कुचिला' इति लोकख्यातानि शुद्धान्युपादेयानि । शुद्धिप्रकार- श्वाय-सर्वत्र सप्ताहं सजलमृत्स्नाया निवाय, पश्चात् विगतत्वञ्चि विधाय, मध्यस्थ जिह्निका विहाय, किंचिदाज्येन सभयं, चूर्णयेलोपात्रे इति । प्रोक्तमपि तन्त्रान्तरे-"किचिदाज्येन सभ्रष्ट विषमुष्टि विशुध्यति।" इति । २-पलम् । ३-पलद्वयम् । ४-ज्येष्ठा मात्रा वल्लमिताऽस्य पर्णखण्डेन प्रात साय च देया। ५-कृष्णमृत्तिकाया । ६-कृष्णतुलस्या । ७-करञ्जमजादीनि त्रीणि प्रत्येकं कर्षमितानि, तुलसीछदास्त्रिकर्षमिता । ८-साय प्रात शीतजलेन देया ।। .
१६८ सिद्वभेषजमणिमालायां [ज्वर- ८४ मज्ज्ञः करजस्य कामतल्लया मापाः पृथग्द्वादश कल्पनीयाः। वम्बूलपत्रं जरणो वलक्षो गद्याणगद्याणमितावुभो स्तः ॥ १०६ ॥ जलेन वस्तून्य खिलानि पिष्ठा परूपकल्पा वटिका विधेयाः । बलासपित्तज्वरजर्जराय प्रातस्तथा सायमपि प्रदेयाः ॥ १०७ ॥ ८५ करञ्जमजा प्रकृतिप्रमाणो गद्याणयुग्मं घुणवेल्लभायाः । सितासहायान्यनयो रजांसि बल्लद्वयानि ज्वरमुजयन्ति ॥ १०८ ॥ ८६ पक्कानि धत्तुरदलानि पिष्ट्वा पटेन पूतानि सितायुतानि । चल्लप्रमाणानि निषेवितानि सर्वज्वरनानि समीरितानि ॥ १०९ ॥ ८७ हरितालशिखिग्रीवंचूर्णपः प्रयोजितः । वेलाज्वरं रुणझ्याशु वेलेव मकरालयम् ॥ ११० ॥ ८८ आर्द्र पाणितले क्षुण्णमलावूपर्णमेककम् । पटावगुण्ठितं जिवन्मुच्यते ना तृतीयकात् ॥ २११ ॥ ८९ उलूकपक्षं परिवेष्ट्य तृलकात् प्रज्वालयेत् सर्पपतैलमन्जितम् । तत्कजलेन स्वयमञ्जितक्षणश्चातुर्थिकव्याधिभयाद्विमुच्यते ॥ ११२ ॥ ये ज्वर, अतिसार तथा अग्निमाद्य को नष्ट करती है। काजमजा तथा उत्तम पुराणी पिप्पली दोनों एक एक तोला, बबूल के पत्ते और श्वेत जीरा प्रत्येक छह छह माशा इन सब को एकत्र पानी में पीसकर फालसे जितनी मोटी वटिकाये बनाव । प्रात तथा साझ को देने से कफ एव पित्तजन्य ज्वर जर्जरित हो जाता है। करज की मजा माठ तोला और अतिविपा एक तोला इन दोनो के एक माषाभर चूर्ण को मिश्री चूर्ण मे मिलाकर फाकने से ज्वर पराजित हो जाता है ।, धत्तूरे के परिपक्क पत्तो के वस्त्रपूत सूक्ष्म चूर्ण को तीन गुजाभर मात्रा मे चतुर्गुण मिश्री के साथ लेने से सर्व प्रकार के नष्ट हो जाते है। (इसकी तीन गुजाभर मात्रा प्रवल रोग मे वलिष्ट व्यक्ति को ही देनी चाहिये । अल्प वेग मे इससे न्यूनमात्रा में ही प्रयोग करे।) ॥ १०५-१०९॥ हरिताल और तुत्थ के चूर्ण की धूम का पान, समुद्र के उठते हुये ज्वार के समान वेगवाले वेलाज्वर को रोक देता है। इस धूमपान से कभी कभी वमन भी हो जाया करता है । वस्त्र मे लिपटे हुये कटुतुंबी के केवल एक पत्ते को हाथ मे मसल कर सूघने से तृतीयक ज्वर से मुक्ति मिल जाती है । उलूक पक्षी के पख को रुई मे लपेट कर सर्षप तैल से सिक्त करले । फिर उसे जला कर कज्जल पाडले । इस कज्जल को आजने से चातुर्थिक ज्वर के भय से मुक्ति मिलती है। तीन दिवस पर्यंत प्रात. कोण १-प्रशस्तकणाया , प्रशस्तत्व चास्या पुराणत्वादि, मज्ज्ञ मजाया इत्यर्थ । २-अतिविपाया । ३-सिताऽत्र चतुर्गुणा। ४-पूर्णमात्रेय प्रबलरोगे । तेन दुर्वलादावल्प- मेव देयम्, अन्यथ द्वेग स्यादिति । ५-तुत्यम् । ६-धूपग्रहणात् कदाचिद्वमनमपि भविष्यति । ७-कटुतुम्बीपत्रम् ।
- चिकिसितम्] चतुर्थो गुच्छ । १६९ ९० पीत्वा व्यहं वमति यः प्रातः कोष्णं पदकम् । तं कश्चातुर्थिकातङ्कः सहसा न विमुञ्चति ॥ ११३ ॥ ९१ समुदञ्चति वश्चित्ते चातुर्थिकभयं यदि । भो! जना भोजनं हित्वा पयः पिबत केवलम् ।। ११४ ॥ ९२ परिपिष्टया पयोभिभृशमधिगिलमेकपित्तकारिण्या। लिहवा पाणिकनिष्ठागुलिपर्वयुगं पटेन परिवेष्ट्य ॥ ११५ ॥ जलभाजने निमजय दृढमपि चातुर्थिकं ज्वरं जय रे । मनसा गच्छ गिरीशं प्रयच्छ कापालिकाय वलिम् ॥ ११६ ॥ ९३ ज्वरागमनतः पूर्व तल्पे कल्पितरल्लके । मुशलं स्थापयित्वा द्राक् कुशलं विन्दति ज्वरी ॥११७ ॥ ९४ चान्तिविरेककषायप्रभृतिभिरपि ये ज्वरा न शाम्यन्ति । दातव्यं तत्र घृतं परिणतफणिवल्लरीपलाशशुतम् ॥ ११८ ॥ लवणोदक पीकर वमन करनेवाले को चातुर्थिक ज्वर सहसा छोड कर चला जाता है यदि आपका चित्त चातुर्थिक ज्वर के भय से आतकित रहता हो तो हे जनो। तुम अन्य सभी भोजनो को छोड कर केवल दूध का ही पान करो। (दूध गाय का कवोप्ण, गर्करा सहित पीना चाहिये । भूख प्यास आदि लगने पर भी सात दिवस पर्यंत केवल इस तरह दुग्धपान ही करने रहने से चातुर्थिकज्वर चला जाता है । ) एक लाल मिरच को शिला पर जल से सूक्ष्म पीस कर, उसकी पिष्टी से रुग्ण के हाथ की कनिष्ठ अंगुली के दो पर्व जितने भाग को लिप्त करने और उसपर एक वस खंड लपेट दें। भव इस अगुलि को, ज्वरागमन की दो घटी पूर्व ही जलपूर्ण पात्र से डुबोदे। इससे हटीला चातुर्थिक भी पीछे हठ जाता है। इस विधि मे भगवान शकर के शरण मत्र का मानसिक जप करते रहना चाहिये तथा विधि समाप्त होने पर किसी कापालिक को बलि अवश्य दे ॥ ११०-११६ ॥ ज्वरागमन से पहिले एक पलंग पर कबल विछा उसपर 'मुशल' रख दें। इस विधि से ज्वरित को शीघ्र ही नैरोग्य प्राप्त होता है । वमन, विरेचन, कषाय, आदि से भी यदि ज्वरो का गमन न होता हो तो नागरवेल के पक्क पत्ते मे घृत को सिद्ध करके दीजिये । गुडूची के पत्तो को अङ्गारो पर सेक कर करीब दो तोलाभर रस निकाल लेवें। इसमे दो तोलाभर एरड तैल एव तीन माषा भर फुलाई हुई स्वर्जिकाक्षार मिलाकर कुछ गरम करके पीजाये । इससे ज्वर, उदर एव कफ से १-भोजनशब्देन पानमपि गृह्यते । २-गव्य क्दुप्णमशर्कर च । अस्य प्रयोगस्य सप्ताहं परा काष्ठा, क्षुधि तृपि च दुग्वमेव पेयम् । प्रयोगगुरवस्तु कदाचिजलपानेऽपि न दोष इत्याहु , जल्वर्जने च गुणाधिक्य मिति । ३-ज्वरागमनतो द्विघटिकाया पूर्वमिति शेष । ४-नागवल्लीदलतलितम् । ।
- १७० सिढभेपजमणिमालायां [चर- ९५ अङ्गारसंतप्तसुधाच्छदानां रेसं सुखोष्णं रुवुतैलमिश्रम् । सस्वर्जिकक्षारमुदाहरामि ज्वरोदरश्लेष्मभवासु रुक्षु ॥ ११९ ॥ २६ सरस्वती द्विढवूका दिनापा खरंपर्णिनी। शङ्खिनी चापि दिनापा गद्याण धर्मपत्तनम् ॥ १२० ।। गोस्तनी वाणढब्बूका गुटिका मापगौरवा । हृत्कम्पश्वासनयनारुण्यजागरजृम्भणे ॥ १२१ ॥ पित्तावृते शीतवाते गिलेद्विस्त्रियथायथम् । इच्छा चेदत्र तरुणीसेवन्तीकन्दमावपेत् ॥ १२२ ॥ ९७ कुर्यात्तृतीयकचतुर्थकयोः शमाय वारे रवेविधिमिमं पुरचत्वरेऽथ । मृत्कुम्भखर्परतले वरधूपयुक्त विस्तीर्णपूपक्रशरामदिरां निधाय ॥ १२३ ॥ उत्पन्न विकारो मे शीघ्र ही लाभ होता है। (यह परमोत्तम अनुभूत प्रयोग है। इसका उपयोग प्रबलरोग मे ही करना चाहिये ।)॥ ११७-११९ ॥ ब्राह्मी तीन तोला, गावजवा और शंखावली प्रत्येक चार चार मापा, काली मरिच छ माषा इन सबको एकत्र करके खूब बारीक पीपकर करीब साडेसात तोलाभर द्राक्षा कल्कमें खरल करके अच्छी तरह मिला लेवें । एक एक माषाभर इनकी गोलिया बनालें । पित्तयुक्त गीत - वातज्वर मे दो या तीन गोलियो को निगल जावे । यदि भावश्यकता पडे तो इसके ऊपर गुलाब अथवा सेवन्ती के गुलकद का सेवन करना चाहिये ॥ १२०-१२२ ॥ (तृतीयक एवं चतुर्थक ज्वर में, युक्तिव्यपाश्रय कर्म (चिकित्साकर्म) के असफल होने पर, दैवव्यपाश्रयकर्म करने का आदेश महर्षि चरकने दिया है । 'कर्म साधारण जह्यात् तृतीयकचतुर्थको'। शास्त्र के इसी वचनानुसार ग्रथकार, अब यहा, दैवव्यपाश्रय कर्म का उल्लेख करते है।) तृतीयक तथा चतुर्थक ज्वर को वश में करने के लिये-रविवार के दिवस, शहर निम्नविधि अनुसार बलि देनी चाहिये। मिट्टी के एक विशाल, धूप से । . के चौराहे पर, । १-तोलकद्वयमितं तुल्यैरण्डतैलमिश्रितं च । २-भ्रष्टवर्जिया माषत्रयम् । महा- प्रयोगोऽय सद्य फलट प्रालरोगे प्रयोक्तव्य । ३-ब्राह्मी । ४-ढब्यूकशब्देनाष्टादश- मापका । ५-'गावजवा' इति प्रसिद्वा गोजिह्वाभेद । ६-मरिचम् । सर्वाणि पिष्ट्या द्राक्षाकल्न सनीय गुटिका कार्या । ७-“कर्म साधारण जमातृतीयकचतुर्थको" इति महर्षिवचनात् साधारणमणि विषमज्वरनाशकत्वेन स्थिते युक्तिव्यपाश्रयं धर्म सप्रदर्या- धुना दैवव्यपाश्रयं कर्मापि सप्रदीते। तत्रादौ कुर्यादित्यायेन ब्रुवाण इयन्तेन वलिदानम् ।
चतुर्थो गुच्छ.। ५७१ चिकित्सितम्] संपकमत्स्यपिशितं लकुचात् फलं च शाल्युत्थकण्डनविनिर्मितमल्लकाट्यम् । पुष्पैः सुशोणकरवीरभवैजपोत्थै- रुद्भासुरं धृतभृतं निदधीत दीपम् ॥ १२४ ॥ वैद्यो निशाततरखगविशोभिहस्तः प्रत्युद्धरस्वरहिताय निवेदयेत्तत् । एवं वलि प्रतिगृहाण महाज्वर! त्वं तुष्टो भवाशु कुरु सौख्यमिति ब्रुवाणः ॥ १२५ ।। ९८ ग्रंन्थीन् सप्त शनावुलूकरसितावच्छिन्नकाले गुणे दद्यादेहलिकास्थिता विवसना नारी निशीथोत्थिता। प्रातः पर्युपितानना प्रयतवाग्ध्यात्वा महाभैरवं कण्ठे गुग्गुलुधूपितं ज्वरवतः सौख्याय तद्वन्धयेत् ॥ १२६ ॥ ९९ त्रिशैद्गद्याणमानः परिमितममलं राजतं वाऽपि तानं भासा देदीप्यमानं कनकमणिगणप्रायपुच्छाक्षिजिह्वम् । मीनं श्यामाम्बराढ्यं घृतभृतविलसत्कांस्यपानस्तिथानि पाथोयुक् ताम्रपात्रस्थितमथ वितरेद्राह्मणाय ज्वरातः ॥ २२७ ॥ सुगंधित ठीकरे में बडे बडे अपूप, खीचडी और मदिरा भर दें। मछली के पकाये हुये मास को और लकुच फल को भी यथास्थान रखदें । करवीर एवं गुडहल के रक्त- वर्ण पुष्पो की लालिमा से अधिक रक्तिम बने हुये प्रकाश से उद्दीप्त तथा शालिधान्य के कुटित कण चूर्ण से बनाये गये-विशाल मालसे में प्रज्वलित दीप को स्थापित करें। तदनन्तर, ज्वर को प्रसन्न करने के लिये, वैद्यराज, तीष्ण -धारवाले कृपाण से शोभित अपने हाथ को ऊंचा उठाकर, उपरोक्त सामग्री, यह कहते हुये, समर्पण करदें 'हे महाज्वर। इस वलि को स्वीकार करके भाप शीघ्र ही सतुष्ट हो जाये तथा रुग्ण को नीरोग कर दे' ॥ १२३-१२५ ॥ शनिवार के दिवस, वैद्य-पत्नी, मध्यरात को, एकान्त मे नग्न होकर अपने घर की देहलीपर बेठकर, अपने आगे धूप सेकर, उल्क की ध्वनि - समकाल मे ही एक सूत्र के पाच अथवा सात गांठ वाधले। फिर, प्रात काल मुह धोये बिना ही, मौन-धारण किये, महाभैरव का ध्यान करती हुयी, उस सूत्रको ज्वरित के गले मे बांध देवे । इससे ज्वर चला जाता है ॥ १२६ ॥ पंदरह तोलेभर चादी अथवा ताम्र की मछली बनवाये। इसकी पूंछ, आंख और जिह्वा रन-जटित स्वर्ण की बनानी चाहिये । इस मछलीको कृष्ण वस्त्र से १-वैद्यस्त्री वैद्यो वा निशीथे रहो नग्नीभूयाविदेहलिस्थिता पुरो धूप प्रवर्त्य घूकोक्ति समकालं पञ्च सप्त वा ग्रन्थीन् विदधीतेति त्रोटकविवि । २-त्रिभिर्मीनप्रदानप्रकार । .
- सिद्धभेषजमणिमालायां [ज्वर- शैवैर्वा वैष्णवैर्मबर्हविर्तुत्वा द्विजन्मने । दद्यात् पुराणपठितं मन्त्रमेनमुदीरयन् ॥ १२८ ॥ भक्त्याऽर्चितौ शङ्करवासुदेवौ स्वभक्तरक्षाकरणप्रवीणौ । मीनप्रदानेन विनाशयेतामेकान्तरादीन् सकलज्वरान्मे ॥ १२९ ॥ १०० 'स्वस्ति श्रीलङ्कातः समस्तकोणपपतिर्विभीपणराट् । आज्ञापयति ज्वरमिति यदस्य ( २) देहम् ॥ १३० ॥ क्लिश्नासि त्वं वेगैर्मया श्रुतं तन्न शोभनं कुरुषे। कि बहुना मम लेखं दृष्ट्वा त्वरितं पलायस्व ॥ १३१ ॥ नो चेद्भवदीय शिरश्छिननि खलु चन्द्रहासखङ्गेन ।' इति ह विभीषणलेखं दृष्ट्वा श्रुत्वा ज्वरो याति ॥ १३२ ॥ इति ज्वरचिकित्सितम् । सजाकर, घृतपूर्ण कास्यपान में अथवा जलपूर्ण ताम्र पात्र मे रखकर, ज्वर पीडित व्यक्ति, इसे ब्राह्मण को दे देये। इस तरह मीन का दान करते समय, मत्रोच्चारण पूर्वक अग्नि में आहुति देते हुये पुराणोक्त मत्रो का उच्चारण करना चाहिये । 'अपने भक्तो की रक्षा मे तत्पर, हे भगवान शकर और वासुदेव । मैंने आपकी भक्ति-भाव सहित अर्चना की है । इस मीन के दानसे आप प्रसन्न होते हुये मुझे इकातरा आदि सभी प्रकार के ज्वरो से मुक्त करदे ॥ १२७-२९ ।। "स्वस्ति श्री लका से समग्र राक्षसो के अधिपति विभीपण राज ज्वर को भाज्ञा करते है कि तू ( देवदत्त) की देह को बहुत कष्ट पहुचा रहा है। यह मैने सुना है । तुमने यह अच्छा नहीं किया । अस्तु, मेरे इस लेख को देखते ही तुम शीघ्र उठन्तरी करदो। यदि ऐसा नहीं करोगे तो तुमारे सिर को मै 'चद्रहास' खड्ग से काट डालूगा"। विभीषण के इस लेख को देखकर अथवा सुनकर ज्वर भग जाता है। (उपर 'देवदत्त' की जगह ज्वरित का नाम लिख देना चाहिये) ॥ १३०-१३२ ॥ -ज्वर - चिकित्सा-समाप्त- - १-त्रिभिरेव वरपलायनार्थ लेखप्रकार । स च लोके 'उठन्तरी' इति ख्यात । २-यदर्थ लेखस्तन्नामात्र निवेश्यमित्यर्थ ।
- अतिसारचिकित्सितम् । यः प्राप्यते वेगनिरोधशीलिभिनिरन्तरं स्निग्धगुरूपसेवया। स संचितान्तर्मलपातने पटुर्मयाऽतिसारः किल कोऽपि वर्ण्यते ॥१॥ • १ सूर्पमर्णः शनैः पक्त्वा शेषयेत्तिन्दुकद्वयम् । तत् पीतं सर्वरोगनं मतं धन्वन्तरेरिदम् ॥२॥ २ धातुकीविश्वमालूरमोचमेघविषाक्तम् । अतिसारप्रत्यनीकं मया कुत्रापि विश्रुतम् ॥ ३॥ - अतिसार-चिकित्सा (कुल प्रयोग ४०)- (अतिसार सुपरिचित व्याधि का नाम है। अतिसार का दूसरा अर्थ 'अति- श्रेष्ठ पुरुष' अर्थात् 'पुरुषोत्तम' यह भी होता है । सार-शब्द 'बल, पुरुष, श्रेष्ठ, सत्य' आदि भिन्न भिन्न अर्थों में व्यवहृत होता है। सार का अर्थ यदि 'पुरुष' करें तो 'अतिसार' का अर्थ होगा 'अति पुरुष' अर्थात् 'पुरुषोत्तम'। महाकविश्री भट्टजीने इस तरह प्रस्तुत प्रथम श्लोक मे, पुरुषोत्तम-स्तुति-परक मगलाचरण द्वारा अतिसार चिकित्सा का प्रारभ करते हुये, इस व्याधि के निदान आदि का सक्षिप्त किंतु सूचक निर्देश भी किया है।) वेगोके (मलमूत्रादि, पक्षान्तर मे ईर्ष्या, द्वेष, मात्सर्य आदि मानस वेगो के) निरतर निरोध से, स्निग्ध, गुरु, चिकने और भारी पदार्थों के सेवन से (पक्षान्तर मे, अनुराग-पूर्वक गुरु की सेवा से) वायु मलाशय मे व्याप्त होकर, जलीय धातुओंके स्राव - पूर्वक जठरानल को मंद करके जब चिर-सचित मल को सद्रव बनाता हुआ बाहर धकेल देता है (पक्षान्तर मे, हृदय के सचित - मल-किल्बिष बाहर निकल जाते है) तव अतिसार की (पुरुषोत्तम की) प्राप्ति होती है। इसी विषय का यहा वर्णन किया जाता है ॥ १ ॥ दो-द्रोण (२०४८ तोला) पानी को धीरे धीरे दो तोला शेष रहने तक उकाले। इस अवशिष्ट जलके पीने से सर्व रोगो का शमन होता है। यह धन्वन्तरी का मत है। धाय के फूल, सूठ, विल्व, मोचरस, मुस्ता और भतिविषा इनके सम-भाग काथ से अतिसार मिटता है । यह मैने कहीं भी सुना है ॥ २-३ ॥ १-सग्रहे चास्मिन् परस्परसाधर्म्य रुग्विनिश्चयनिवद्ध क्रमोऽनुसरणीय इत्यत- स्तदनुसारेणेव ज्वरानन्तरमतिसाराभिधानम् । २-वातमूत्रपुरीषादिना प्रवृत्त्युन्मुखाना शारीराणा वेगाना, पक्षे मानसाना लोभेादीना वेगाना निरोधोऽवगन्तव्य , तद्वेगरोधाच भवति शिवप्राप्ति । यदुक्तं वाग्भटे-"धारयेत्तु सदा वेगान् हितैषी प्रेस चेह च । लोभेयोद्वेषमात्सर्यरागादीना जितेन्द्रिय ॥” इति। ३-स्निग्धाना पायसादीना गुरुणा च द्रव्याणा सेवया। पक्षे अनुरक्ताचार्यशुश्रूषया । ४-पुरीषादिकम् , अन्यत्र किल्बि- पादिरूपं मलम् । ५-रोगविशेषो, भगवान् पुरुषोत्तमश्च । ६-द्रोणद्वयमित जलम् । ७-तिन्दुक कर्षपर्याय , तथा च वाग्भट -“कर्षों विडालपदक तिन्दुक. पाणिमानिका । शब्दान्यत्त्वमभिन्नेऽर्थे” इत्यादि। ८-तन्त्रान्तरे त्वतिसारहन्तृत्वमभिहितम्-" यथा शृत भवेद्वारि तयाऽतीसारनाशनम् । अतिसार निहन्त्येव शतभागत जलम् ॥” इति ।
१७४ सिहभेषजमणिमालायां [अथानिगार- ३ मालूरनीरदमिपिस्थलपद्मपाकैः संपक्कमम्बु सितया सितया विमिश्रम्। आमातिसारमतिशोणितशोणभासं हन्ति क्षणादिव पतद्गमहस्तमिस्रम् ॥ ४ ॥ ४ पिप्पलवल्काग्निकृतः सामितदारसंस्कृतार्णस्कः । तद्नोलजः कपायो निरुणद्धितरामतीसारम् ॥ ५॥ ५ त्वक्सारत्वगुपरिगच्छल्लफलेन्द्रानवच्छदा. पिष्टाः । सजलाः सनागफेनाः शतगीताः पानतोऽतिसारहराः॥६॥ ६ जम्व्वा वा शम्या वा मृदुलानि दलानि सोपणानि ससे!। खल्वे प्रपिण्य पयसा पटपूतान्यतिमृतिनानि ॥ ७ ॥ ७ न्यस्तं घटे चणकक कभाजि वारि विस्राव्य शरतनिर्व्यथनाध्ययातः। योऽल्पं पिवेदविरतं विरतौषधोऽपिदाहातिसारविपदांन पदं भवेत् सः८ ८ जातीफलं सविश्वं जलघृष्टं शीतमेव दातव्यम् । वनाति पथ्ययुक्त्या मलं द्रवीभूतमहाय ॥९॥ विल्य, मोथा, सौंफ और गुलकंद इनमे जल को उकालकर छान लें। इसमें मिश्री मिलाकर पीने से रक्तपूर्ण भामातिसार उसी तरह विलीन हो जाता है जैसे सूर्य के तेज से अंधकार ॥ ४ ॥ पिप्पल के अर्ध - दग्ध अंगारो को एक चलनी में रस उनपर पानी डालकर वुझावें। इस पानी को, चलनी के नीचे रखे हुये एक पात्र में एकत्रित करले । इस तरह सस्कृत-जल मे पिप्पल के फलों को कूट कर डाल देवे । फिर पिप्पल-वल्क की अग्नि से इसका कषाय - विधि से वाथ करले। इस काथ से गर्भवती स्त्रीके भनिसार में उत्तमोत्तम लाभ होता है ॥५॥ बांस की छाल, जांबू के ताजे कोमल पत्ते और अफीम इन सबको एकत्र जल से खूब महीन पीसकर उबालले । शीतल होने पर इसको पीकर सोजावें। इससे अतिसार मे लाभ होता है। जांबू के अथवा शमी के कोमल पत्तोको मरिच सहित जल में खरल करलें । फिर, वस्त्र-पूत करके पीने से अतिसार नष्ट हो जाता है ॥ ६-७ ॥ चनो के तुष को जल मे मिलाकर एक घडे में भरदे । इस जल को, घडे के पैदे मे शकु-कृत- छिद्र मे से बूद बूद टपकाले । अव, इस जल को एक एक घूट करके धीरे धीरे पीने से मन्य औषधियो से थका हुमा दाह एव भतिसार की विपदा से निरापद हो जाता है। जायफल एव सूंठ को जल मे घिसकर शीतल ही देने से तथा युक्ति पूर्वक पथ्य सेवन से शीघही पतला मल बद्ध हो जाता है ॥ ८-९ ॥ १-बिल्व । २-गुलावगुलकन्दै । ३-अश्वत्यफल लोके 'गोल' नाम्ना व्यवहियते। तज कषाय । अय गर्भिण्य देय । ४-त्वक्सारो वश ,तस्योपरिस्थवल्कलम् ।फ्लेन्द्रा जम्बू, तस्या नवपल्लवानि। ५-पीत्वा स्वप्यादिति तत्त्वमत्र । ६-चणकतुषाणि । ७-छिद्रात् । .
- चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छः। ९ खाखसाख्यानि पञ्चैव तावतीनुटुंग्धिकाः। नीरे संनीय संमर्य तन्नीरं स्त्रावयेत् पटात् ॥ १० ॥ तत्र मृत्स्ना सिंतां सर्पिः क्षिप्त्वा कुर्वीत शार्करम् । तत् पीतं मात्रया द्वित्रिः सर्वातीसाररोधकम् ॥ ११ ॥ १० चिञ्चावीजानि भूशि तोयान्तर्मजयेच्छनौ । रवौ तानि हृतत्वञ्चि सामि शृङ्गाटचूर्णकम् ॥ १२ ॥ फणिफेनं ततः सामि सर्वमेकत्र कल्कयेत् । कल्कस्य चक्रिकां कृत्वा तवकोपरि भर्जयेत् ॥ १३ ॥ । शकलं मात्रया तस्या वितीर्ण तन्दुलाम्बुना। अतिसारं निहन्त्याशु विष्णुचक्रमिवासुरान् ॥ १४ ॥ ११ दाडिमीकलिकाकल्कः प्रनमाक्षिकसाक्षिकः । सहदेव प्रयुक्तश्चेदतिसारस्य का कथा ॥ १५ ॥ • पोस्त के पांच ढोडे तथा इतनी ही सख्या मे कचरी (धेनुदुग्ध - फल) दोनों को पानी मे मसलकर वस्त्र-पूत करके फिर उसमे दो तीन माषा मुलतानी मिट्टी, दो तीन पल शर्करा और दो तीन माषा घृत मिलाकर उसका शार्कर बनालें। इसे यथामात्रा मे दो तीन बार पीने से सभी प्रकार के भतिसार शमन हो जाते है ॥ १०-११ ॥ शनिवार के दिवस इमली के इक्कीस बीजो को पानी मे भिगोकर रखदें, रविवार को दूसरे दिवस इन चीजो के छिलके निकालले । इनसे आधा वजन भर सिघाडे का चूर्ण तथा इस चूर्ण से अर्ध मात्रा मे अफीम लेवे । अब, इन तीनो को एकत्र पीसकर उनकी टिकियां बना एक लोह के तवे पर सेकले । इनमें से एक चक्रिका को चावल के मड के साथ लेने से, विष्णु के चक्र से असुरो की तरह, अतिसारका नाश हो जाता है। दाडिम की कलियो के कल्क को पुराणे मधुके साथ एक ही बार लेने से अतिसार नामशेष हो जाता है। वटके कोमल अकुर तथा मिश्री प्रत्येक तीन तीन तोला लेकर इनके कल्क को, सर रहित, बत्तीस तोला भर दही के साथ लेनेसे घोर अतिसार भी प्रशमित होता है ॥ १२-१६ ॥ कृष्ण एवं श्वेत दोनो प्रकार के जीरे, मरिच और चित्रक इनके चूर्ण को दही मे मिलाले । यह प्रयोग भतिसार को उसी तरह पीजाता है जिस तरह अगस्त्य मुनि ने एक ही भाचमन में समुद्र को पीलिया था। गुलाब का गुलकद, सौफ, इलायची, जीरा, रूमीमस्तगी इनके चूर्ण का सेवन करने से अहो । तीन ही दिवस मे कष्ट -साध्य आमातिसार से मुक्ति मिल जाती है। गेहू के चूर्ण मे सौंफ मिला बाटियां बनाकर अंगारो पर सेक लें । अच्छी तरह सिक जाने पर इनका कूट पीसकर चूरमा जैसा बना- १-'छोतरा, पोस्त' इति प्रसिद्धानि । २-खर्वाणि धेनुदुग्धानि 'कचरी' इति प्रसि- द्धानि। तानि च मारवाणि शस्तानि। ३-द्वित्रिपले। ४-'मुलतानी' इति प्रसिद्धा द्वित्रिमाषाम् । ५-द्वित्रिपलमिताम् । ६-मृत्तुल्यम् । ७-एक विंशतिसख्यानि । ८-अतिरोहितार्थमिदम्। । + सिढभेपजमणिमालायां [अथानिमार- १२ वटाकुरास्त्रिपिचवस्तावन्त्येव सिता द्वयोः। कल्को देना निवद्धन घोरातीसारनाशनः ॥ १६ ॥ १३ शितिजैरणजरणमरिचज्वलनक्षोदो विमिश्रितो दना। अतिसारं चुलुकयति प्रसह्य सागरसिवागस्त्यः ॥ १७ ॥ १४ तरुणीसुमकन्दमिपित्रुटिजीरकरूमंगुन्द्रमुपसेव्य । आमातिसारकृच्छ्राद्विमुच्यते त्रिभिरहोमिरहो ॥ १८ ॥ १५ अध्यगारविपक्का पिण्डी गोधूमचूर्णमिपिवद्धा । क्षुण्णा सिताघृताक्ता हन्तितरामामवेदनां घोराम् ॥ १९ ॥ १६ शुण्ठी मजा रसालँस्य मिपिः खाखसवल्कलम् । समभागानि संभj घृते किचिच्छनैः शनैः ॥ २० ॥ भागेकं जीरकं भ्रष्टं निक्षिपेद्विगुणां सिताम् । शाम्यत्यामातिसरणं चूर्णनानेन निश्चितम् ॥ २१ ।। २७ फलानि तिन्तिडीजानि भर्जिते सिपिजीरके। प्रत्येकमेकभागानि दाडिमी च द्विभागिका ॥ २२ ॥ शर्करा पञ्चभागैव चूर्णमेतदनुत्तमम् । घोरामामातिसारात विनिहन्ति न संशयः ॥२३॥ कर, उसमें शक्कर और थोडा घृत मिला सेवन करे । यह भामातिसार की उम्र वेदना का सहार कर देता है ॥ १७-१९ ॥ । सूंठ, आम की गुठली की अन्तर्मजा, सौंफ और पोन्त के छोतरे इनको सम. भाग लेकर घी से धीरे धीरे अग्नि के ऊपर भूनलें। फिर इसमें एक भाग भूना हुमा जीरा एव इन सभी द्रव्यो से द्विगुणित मिश्री मिलादे। इससे आमातिसार नि संदेह दूर होता है ॥ २०-२१ ॥ इमली, भूने हुये सौंफ और जीरा यह तीनो द्रव्य एक एक भाग, दाडिम दो भाग, शर्करा पाच भाग इनका बनाया गया उत्तम चूर्ण आमातिसार की उग्र वेदन को शात करता है। इसमे सदेह नहीं ॥ २२-२३ ॥ ककोल, देवदारु, दालचिनी, सैंधव, बिल्व, मरिच, जायफल, श्वेत और श्याहजीर तथा जावित्री इनके कपड छान चूर्ण को बिजौरा के रस की भावना देकर गोलिय बनाले, यह कफ, वात, अरुचि तथा अतिसार को दूर कर देती है ॥ २४ ॥ सौंफ चार तोला, इलायची एक तोला इनदोनो के बराबर वजन मे मिश्री चूर्ण इन सबको एकत्र मिलाकर लेने, जलकी हेर फेर से उत्पन्न मामातिसार नष्ट होजात १-शरावोन्मितेन सररहितेन च । २-कृष्णजीरक । ३-रूमदेशोद्भव गुन्दं लो 'मस्तगी' इति प्रसिद्धम् । ४-आम्रफलस्य । ५-सर्वसभारतो द्विगुणा समाना वा ।
१७७ चिकित्सितम्] चतुथी गुच्छ.। १८ ककोलदारुसिंतिकापटुबिल्वतीव- जातीफलद्विजरणौषधजातिकानाम् । चूर्णानि लुङ्गजरसेन विभाषितानि श्लेष्मानिलारुचिसरत्त्वहराणि सन्ति ॥ २४॥ १९ मिपेस्त्रुटेः पलं कर्पः सिता सर्वसमा रजः। निहन्यात् सामविड्भेदं पानीयपरिवृत्तिजम् ॥ २५ ॥ २० दना सिचर्यवद्धन तिन्तिडीकत्वचो रजः अतिसारं पराजित्य रुचिमुच्चैः प्रयच्छति ॥ २६ ॥ २१ फणिफेनकत्थविश्वं गन्धिवसुरक्तिकं पिष्ट्वा । तिनो हरन्ति पुटिकास्त्रिभिर्दिनैस्तन्दुलाम्भसाऽतिसृतिम् ॥२७॥ २२ अङ्गारसगोद्गतगर्भतैले दत्त्वाऽहिफेनं शुचि नारिकेले। मनागुपेक्षेत ततोऽस्य खण्डं प्रातः प्रदद्यादतिसारशान्त्यै ॥ २८ ॥ २३ भ्राष्टभ्रष्टे खाखसधात्रीफलवल्कले क्षुण्णे। निहतोऽतिमृति यद्वा खाखसफलवल्कमेथिके तद्वत् ॥ २९ ॥ २४ भ्राष्ट्रविभर्जितखाखसफलवल्कचूर्णतुल्यभागस्य । अतिसरणार्ति स्विन्नामलफलकल्कस्य मोदका नन्ति ॥ ३० ॥ है । वृक्षाम्ल की छाल के चूर्ण को वस्त्र में से पानी निकालकर गाढे दही के साथ लेने से अतिसार के शमन पूर्वक यथेच्छ रुचि उत्पन्न होती है ॥ २४-२६ ॥ माफीम दो रत्ती, खदिर चार रत्ती, इनका सूक्ष्म वस्त्रपूत चूर्ण बनालें। इस चूर्ण को चावल के धोवन की तीन भावनायें देकर सेवन करने से तीन दिन में ही अतिसार शमित होजाता है ॥ २७ ॥ एक अच्छे परिपक्क नारियल को अग्निपर तपाये । उसमें से जव अन्ततैल बाहर निकलने लगे तब उसमें अफीम डाल दें। कुछ क्षणों तक उसे इसी तरह रहने दें। फिर, उतार कर उस अफीम को, यथादोष, बल और काल के अनुसार मात्रा से प्रातः • उपयोग में लेवें। इससे अतिसार का शमन होता है ॥ २८ ॥ आंवला और पोस्त की त्वचा को अग्नि के ऊपर भूनकर कपडछान चूर्ण बनालें अथवा इसी तरह पोस्त के छोतरे एवं मेथी का चूर्ण सिद्ध करले। यह दोनो ही अतिसार का नाश कर देते हैं ॥ २९ ॥ आंवलो को विना जल के मंदाग्नि से स्ववाप्प द्वारा स्विन्न करके, उसका कल्क बनालें । इस कल्क मे इसके समान भाग जितना अग्निपर भूने गये पोस्त के छोतरो का चूर्ण मिलाकर मोदक बनालें । यह मोदक अतिसार की वेदना को दूर करता है ॥३०॥ १-गुडत्वक् , 'दालचीनी' इति प्रसिद्धा । २-मरिचम् । ३-देशान्तरीयदुष्टजल- पानजम् । ४-पटवद्धन स्रुतजलेन । ५-खदिरविशेष । ६-'हन हिंसागत्यो ' इत्यस्य लट. प्रथमपुरुषद्विवचनम् । ७-जल विना खिन्नामलकफलानि । । , सि० १२ सिद्धभेपजमणिमालायां [अथातिमार- २५ अरुणधवलचल किसलयनवकिसलयपुटविपक्कफणिफेनम् । अतिसरणमसुहरणमपि हरिस्मरणमिव रुणद्धि संसरणम् ॥ ३१॥ २६ पृदाकुफेनभसितं लीढं माक्षिकयोगतः । अतिसारं रुणद्धि द्रागानाहं न करोत्यपि ॥ ३२ ॥ २७ एकनिम्बूकजै रैरैवलेहीकृता सिता । संस्तम्भयत्यतीसारं वेलेव सरितां पतिम् ॥ ३३ ॥ २८ चलपर्णमूलवल्कलफाण्टः पीतो यथा सृर्ति जयति । २९ जन्तुफलपयोद्धा भगावटिकाऽपि तथ्यमेव तथा ॥ ३४ ॥ ३० पादांशदेवकुसुमं धोतं विजयाविशेषदलम् । घृतसिद्धं गुंडमृदितं हन्त्यपि फणिफेनिनां महातिमृतिम् ॥ ३५ ॥ ३१ गुडे घृतेन कथिते प्रणीय ससर्पफेनं क्रमुकस्य चूर्णम् । माषप्रमाणा गुटिका विधेया विट्सारकं द्वित्रिदिनैहरन्ति ॥ ३६ ।। ३२ यन्त्रेणं धूममौद्वेगं पिबन् द्विस्त्रिः शनैः शनैः। घृतांशी मुच्यते घोरादुच्चैरामातिसारतः ।। ३७ ॥ वसतवस्तु मे पिप्पलवृक्ष के नूतन, अरुणाभ श्वेत, कोमल पत्ते भाते हैं। इन पत्तो के पुट में अफीम को पकावें । यथामात्रा में इसके सेवन से प्राणघातक भतिसार भी उसी तरह स्थगित हो जाता हे जिस तरह हरिस्मरण से सांसारिक मायाजाल ॥३१॥ अफीम की भस्म को यथामात्रा मधु के साथ लेने से अतिसार के शीघ्र शमन के साथ साथ आध्मान में भी लाभ होता है । एक अच्छे पक्क निबू रस के साथ मिश्री मिला कर चाटने से भतिसार का वेग उसी तरह रुक जाता है जिस तरह सीमा से समुद्रका । पिप्पल वृक्ष के मूल की त्वचा का फाण्ट बनाकर पीने से अतिसार परास्त हो जाता है । उदुंबर फलके रस में भाग को पीस कर गुटिका बनालें । यह भी, उपरोक्त प्रकार से, अतिसार को दूर कर देती है। गांजा एवं गाजा से चतुर्थांश लौंग लेवें। प्रथम गांजे को हस्त तल मे लेकर सभाल पूर्वक मसलकर सो बार पानी से धो डालें। फिर, गांजे को और लौग को, दोनो को, घी मे सेक ले। इनमे गुड मिलाकर खरल मे खूब घोटे । इसके सेवन से अफीम खाने वालो का भी अतिसार शमन हो जाता है । इसकी पूर्ण मात्रा एक गुंजा भर ही है। गुड को घृत मे सेककर द्रव बनालें। फिर उसमे अफीम और सुपारी का चूर्ण मिला कर एक माषाप्रमाण मे गोलियां बनालें । इसके प्रयोग से दो तीन दिवस में ही अतिसार मिट जाता है ॥ ३२-३६ ॥ चिलम मे सुपारी के चूर्ण को रखकर उसके धूम को, धीरे धीरे, यथाक्रम, १-चलकिसलयोऽश्वत्थ । २-अहिफेनभस्म । ३- सद्योऽभिपूतपूतस्तु फाण्ट ' इत्या- धुक्तलक्षण । ४-उदुम्वररसवद्धा। ५-अधिहस्ततल जलै शतकृत्वो धौतम् । ६-'गाजा' इति लोकप्रसिद्धम् । ७-खल्वे खल्वयित्वा गुडेन विनीय गुटिकीकृतमित्यर्थ । साधारणरोगिणे गुजाधिका गुटी न देया। ८-जलार्द्रस्य प्रत्नपूगस्य चूर्ण, तत्राफूक मकुष्टप्रमाणं देयम्। ९-धूम- यन्त्रेण 'चिलम' इति प्रसिद्धेन। १०-पूगफलजम्। ११-गोघृतं मात्रया पोलिकादिषुप्राश्यम् । - ।
' चिकित्सितम्] चतुर्थों गुच्छ.। ३३ लेपो लवड्गकाश्मीररूमगुन्द्रः प्रकल्पितः । अतिसारं रुणयेव छगनेन निवेदितः ॥ ३८ ॥ ३४ नवसादरस्य भागो द्वौ भागौ धर्मपत्तनस्यापि । पिष्ट्वा सलिलेन वटी हन्त्यतिसारं तनोति जठराग्निम् ॥ ३९ ॥ ३५ वाहीकैकाकोदरफेनकत्थैर्वट्यो विधेया हरिमन्थसोदराः। उच्चैरतीसारमसुप्रहारं जलेन गीर्णा विनिवारयन्ति ॥ ४० ॥ ३६ भ्रष्टामेकतरे पार्श्वे रामठाफूकचक्रिकाम् । अतिसारे गिलेदद्भिः शीताभिश्वणकोपमाम् ॥ ४१ ॥ ३७ समजो मस्तगीसारः फणिफेनं सहिङ्गुलु । विट्सारे स्यात् कृता वर्तिजलैरीश्वरवोलजैः॥ ४२ ॥ ३८ गरलँदरदमरिचकणाः सुधांशुचक्षुः समुद्रनयनांशाः । आनन्दभैरवः स्यान्निम्बूकरसैविभावनादसवेत् ॥ ४३ ॥ जोर से कस खींच खींच कर पीयें। इस तरह दो तीन दिवस धूम्रपान करें। पथ्य मे, गोघृत मिला कर पूरणपोली (वेढमी) आदि खानी चाहिये । इस तरह करने से घोर भामातिसार से भी मुक्ति मिल जाती है। लौंग, केसर और रूमी- मस्तगी इन तीनों का उदर पर शीतल लेप करने से अतिसार मिट जाता है। यह प्रयोग मुझे मेरे शिष्य छगन (सुरत निवासी) ने बताया है। (श्रीछगनकाका के दर्शन का सौभाग्य अनुवादक को भी मिला है। शतायु भोग कर इन्होने हमारे यहां ही देह त्याग किया था)॥ ३७-३८ ॥ एक भाग नोसादर, दो भाग मरिच, इनको एकत्र जल के साथ खरल करलें, एवं मरिच प्रमाण मे गोलिया बनालें । यह अतिसार को मिटाती एव जठरानल को प्रदीप्त करती है। हींग, अफीम और खैरसार इनका कपडछान सूक्ष्म चूर्ण करके, जल मे पीसकर चने के प्रमाण गोलिया बनालें। पानी के साथ निगीर्ण करने से प्राण-घातक भतिसार को भी ये दूर कर देती है ॥ ३९-४० ॥ हींग और अफीम दोनों को घोट कर अच्छी तरह मिला लेवें । इनकी टिकिया बनाकर उनको तवे के ऊपर एक तरफ से ही सेक लेवें। दूसरी तरफ का भाग नहीं सेकें। इस तरह एक ही पार्श्व मे सेकी गई टिकियों में से एक चने जितना हिस्सा लेकर शीतल जल के साथ निगल जावें । इससे अतिसार में लाभ होता है। रूमी. मस्तगी, अफीम और हिगुल इनकी ईसबगोल मे सिद्ध किये गये पानी से वर्ति बनालें । गुदामार्ग मे इसे रखने से अतिसार शमन हो जाता है ॥ ४१-४२ ॥ एक भाग शृगी-विष, दो भाग हिगुल, चार भाग मरिच और दो भाग १-उदरोपरि शीत एव कृत इत्यर्थ । २-गुर्जरवासिना गुरुशिष्येण । ३-मरिचस्य । ४-मरिचाभा । ५-हिड्ड । ६-आफूकम् । ८-शृङ्गीविषम् । ९-सप्तधेत्यर्थ । । . १ ७-चणप्रमाणा.।
१८० सिद्धभेषजमणिमालाया [अथातिसार- ३९ अहिफेनमल्लदरदं विमर्च वटदुग्धगं बधान वटीम् । शोथातिसाररुजि सा प्रशस्यते क्षुधि तृषि क्षीरम् ॥ ४४ ॥ ४० क्षिप्रार्थमव्ययं किं शिथिलयति रयेण किं नदीपूरः। वितरन्ति कं वलासे विल्ववटी के रुणझ्यतीसारम् ॥ ४५ ॥ सोऽसाध्यः परिकीर्तितोऽतिसृतिमान् यस्यातिसार्यंत वि- पनीलाभाऽधिकनिर्मला प्रविलसत्सौरभ्यसंभारयुक् । अन्तर्दृष्टितयाऽतिविश्रमलिना बद्धा सिरातन्तुभि- जिम्बूवजलबिन्दुवजलजवजम्वालवजालवत् ॥ ४६॥ इत्यतीसारचिकित्सितम् । पिप्पली इनको एकत्र करके नींबू के रस की सात भावनाये दे। इसे आनन्दभैरव रस कहते है । यह अतिसार मे परम उपकारक है । अफीम, मल्ल और हिगुल इनको एकत्र लेकर वटदुग्ध मे खरल करके गोलिया बांधले । ये शोथ एवं अतिसार की वेदना मे प्रशंसनीय असर दिखाती है। इसके प्रयोगकाल में भूख तथा प्यास लगने पर, पथ्य रूप में, केवल दुग्ध-पान ही करना चाहिये । अन्न और जल का सेवन निपिद्ध है ॥ ४३-४४ ॥ शीघ्र के अर्थ मे किस अव्यय का प्रयोग किया जाता है ? (मरम्), नदी का वेग किस को शिथिल बना देता है ? (तीरम् ), कफ को पतला करके बाहर निकाल देनेवाला कौनसा द्रव्य है ? (सारम् - नवसादर), बिल्व-वटी किस को रोकती है ? (अतीसारम्)। (व्यस्तरूप में प्रत्येक प्रश्न के क्रमश उत्तर है 'अरं, तीर, सार= अतीसारम्' । समस्त रूप मे सभी प्रश्नों का एक ही उत्तर 'भतिसार' इस शब्द से दिया गया है ॥ ४५ ॥ (प्रस्तुत श्लोक की अंतिम पंक्तिगत समस्या की पूर्ति महाकवि श्रीकृष्णराम ने, वैद्योचित ढग से, अतिसार के असाध्य लक्षणो के वर्णन द्वारा की है। महाकवि यदि सिद्ध वैद्य भी हो, तभी यह सभव है।) अतिसार पीडित रोगी का मल यदि नीलाभ, स्वच्छ, सुगंधयुक्त, मलिनता लिये, सिराततुमय भतएव जांबू जैसे वर्ण का (नीलाभ), जल बिदुओं जैसा (स्वच्छ), कमल जैसा (सुगध-युक्त), काई जैसा (मलिन), तथा तृण घास आदि से सकुल (सिराततुमय) जैसा हो तो उस अतिसार को असाध्य समझना चाहिये ॥ ४६ ॥ अतिसार चिकित्सा समाप्त- १-अर, तीर, सारम् , इति व्यस्तोत्तराणि, अतीसारमिति च समस्तोत्तरम् । २-न्य समस्या अतिसारासाध्यलक्षणवर्णनेन पूरिता ।
- अथ ग्रहणीचिकित्सितम् । १ उत्स्वेद्य किमपि कदलीफलानि संनीय कल्पिता पोली। संतानिकाविरहिणा दना सह सेविता जयेद्रहणीम् ॥ १॥ २ उदुम्बरशलादूनि स्विन्नानि जलवाष्पतः । दना विनीय भुजीत ग्रहणीग्लपितो नरः ॥२॥ ३ तके प्रस्थ रसगुणे वासयेत् सिंहचर्मणः । तत्तकं मानतो हन्ति ग्रहणी दुस्तरामपि ॥ ३ ॥ ४ जातीफलयवमुस्ताविल्वरजस्तकलोलितं पीतम् । संधुक्षयति ज्वलनं ग्रहणीं सद्यो निगृह्णाति ॥ ४॥ ५ वृक्षाम्लफलप्रस्थं सितोपलायाः पडेव विल्वानि । लवणं द्विपलमजाजीत्रिपिचू रुचिरं रजो द्यति ग्रहणीम् ॥ ५॥ ६ कुआरंभक्ष्यच्छल्लकचूर्ण ससितं जलानुपानेन । ग्रहणीरुधिरातिसृतिग्रसनग्रहिलं विजानीयात् ॥ ६॥ -ग्रहणी-चिकित्सा (कुल प्रयोग १०)- कच्चे केले को थोडा स्विन्न करके उसके अंदर का गूदा निकाल, उस मे गेहू का मआटा मिलाकर अच्छी तरह गूध ले-आटा उतनाही ले जितना गूढे से बराबर बंधजाये। फिर इसकी भासरी (वाटी) बना कर अंगीठी मे सेकले । मलाई रहित दही के साथ इसे खाने से ग्रहणी वश में आ जाती है ॥ १ ॥ उदुंबर के कच्चे फलो को जल की बाप्प से स्विन्न करके ग्रहणी रोग से परिक्षीण व्यक्ति को दही में मिला कर सेवन करना चाहिये। एक प्रस्थ छाछ मे उससे चतुर्गुण भरडूसे की अन्तर्जाल मिला कर मिट्टी के पात्र मे भर एक सप्ताह पयंत छत पर रहने दे। फिर, इसे वस्त्रपूत करके एक पल भर मात्रा मे पीयें, यह दु.साध्य ग्रहणी को भी वश मे कर लेता है। जायफल, जौ, नागरमोथा और बिल्व इनके सूक्ष्म कपडछान चूर्ण को तक मे मिला कर पीने से जठरानल प्रदीप्त होती है तथा ग्रहणी शीघ्र ही शांत हो जाती है । कोकम चौसठ तोला, मिश्री चोवीस तोला, सैधव भाउ तोला, जीरा तीन तोला इनका कपडछान सूक्ष्म चूर्ण रुचि उत्पन्न करता तथा ग्रहणी को मिटाता है ॥ २-५॥ पिप्पल-वृक्षकी छाल के सूक्ष्म चूर्ण मे मिश्री मिला कर जलानुपान पूर्वक लेना चाहिये । यह चूर्ण ग्रहणी एव रुधिर के अजस्र-स्राव को अढग होकर ग्रास कर जाता है। (पीपल की छाल स्तभक, रक्तसग्राहक एव पौष्टिक भी है। इसके कोमल पत्ते प्रथम विरेक करा के पीछे से स्तभन करते है।) ॥ ६ ॥ १-अपक्कानि । २-पड्गुणे। ३-मृदाण्डे सप्ताह हर्म्यपृष्ठे स्थापयेत् । ४-आट- स्पान्तरत्वच । ५-पटपूत पलप्रमाणम् । ६-पलानि । ७-पिप्पलवल्कलचूर्णम् ।
१८२ [ग्रहणी- सिद्धभेपजमणिमालायां ७ प्रत्येकरसंगद्याणौ शिवयोर्वल्कतल्लजी । सप्तकं विषमुष्टीनां गोघृते भर्जयेत् क्रमात् ॥ ७ ॥ चूर्णमेषां कशरया खादतां तूर्णमेव हि । प्रयाति ग्रहणीरोगो योगः श्यामाभिभाषितः ॥ ८॥ ८ शुद्धं शिवांशमेकांशमेकांशं फणिफेनकम् । यंशं गन्धमिति त्रीणि पिष्ट्वा कुर्वीत पर्पटीम् ॥ ९ ॥ विर्षमुष्टिकधत्तूरबीजजातीफलान्यपि । एकांशानि पृथक् तत्र दत्त्वा महणतां नयेत् ॥ १० ॥ दाडिमीतिन्तिडीतोयैर्भावयेत् सप्तधा पृथक् । वटीवनीत जरणक्षौद्रेस्ता ग्रहणीच्छिदः ॥११॥ ९ स्वादुस्निग्धवलक्षकोमलकणा घ्राणेन्द्रियग्राहिणी मृत्स्ना देवतरङ्गिणीपुलिनजा कृत्स्नापदुद्धारिणी। हरीतकी और मांवला इन प्रत्येक की तीन तीन तोलाभर छाल एवं सात नग कुचले इन को क्रमशः पृथक् पृथक् गाय के घी में भूनलें । फिर, इनके एकत्र चूर्ण को खीचडी में मिलाकर लेने से ग्रहणी में शीघ्र आराम मिलता है। यह प्रयोग श्यामजी (प्रथकार के विद्वान शिष्य) ने बताया है ॥ ७-८ ॥ शुद्ध किया हुआ पारद और अफीम प्रत्येक एक एक भाग, गंधक दो भाग, इन तीनों को पीस कर, बोर की शाखामो की अग्नि से पर्पटी-निर्माण-विधि द्वारा पर्पटी बनालें। फिर, शुद्ध कुचला, शुद्ध धत्तुरे के बीज और जायफल प्रत्येक एक एक भाग लेकर उपरोक्त पर्पटी में मिला बारीक पीस कर मुलायम बनालें । अब, इस चूर्ण को दाडिम तथा इमली के रस की पृथक् पृथक् सात सात भावनाये देकर टिकियां बनाले। इनको पुराणे शहद के साथ लेने से ग्रहणी रोग का उच्छेद हो जाता है ॥ ९-११॥ घ्राणेन्द्रिय को प्रिय अर्थात् अत्यत उग्र-गंध से रहित, स्वादु, स्निग्ध, श्वेत, तथा कोमल पिप्पली लें। सपूर्ण विपदाओं से मुक्ति देने वाली भगवती भागीरथी नदी तट की मिट्टी लेवें । इन दोनों को स्वर्ण-गैरिक के साथ पानी में घोलकर अच्छी तरह मिला वस्त्र से छान लेवें। अब इस जल को मंदाग्नि से खूब उकाल कर नि.शेष करदे । अवशिष्ट तल - लग्न शुष्क दन्य को लेकर खरल करके चूर्ण बनाले । इस चूर्ण १-षड्गद्याणौ । २-शिवा हरीतकी शिवा धात्री चेत्येकशेष । ३--इमे श्रीगुरुशिष्या एव वैद्यतल्लजा । ४-पारदम् । ५ बादराग्निनेति शेष । ६-शुद्धानि विषमुष्टिकानि धतूर- बीजानि च । धत्तूरबीजशोधनं च यया-“धत्तूरबीजं गोमूत्रे चतुर्यामोपितं पुन । खण्डितं निस्तुषं कृत्वा योगेषु विनियोजयेत् ॥” इति ।
चिकित्सितम्] चतुर्थी गुच्छ । १८३ साकं काञ्चनगैरिकेण सलिलैरालोल्य विस्ताविती सिद्धा मन्दकृशानुना ग्रहणिकापित्तानवित्ता न किम् ॥ १२ ॥ १० द्विजीरव्योपमुस्तैलापुष्पैजातीफलच्छदम् । मुकूलैला वातामनारिकेरनृपादनम् ॥ १३ ॥ श्रीखण्डं दाडिमीवांश्यो तालीसं जातिपत्रिका । गुडत्वग्विद्रुमं कोलं शनाटकवितुन्नके ॥ १४ ॥ प्रत्येकं शाणमानानि शाणार्ध कुङ्कुमोत्तमम् । त्रितोलं चिकणं पूगं सर्वमेकत्र चूर्णितम् ॥ १५ ॥ शनैः शरावपयसि पाचयित्वा घनावधि । क्षिपेत् सितोपलां सर्पिः पृथक्कुडवमात्रया ॥ १६ ॥ सिद्धोऽवलेहराडेष विधुनोति गदानिमान् । ग्रहणीमसृगासि निर्वलत्वमरोचकम् ॥ १७ ॥ इति ग्रहणीचिकित्सितम् । को मधु मे मिलाकर फिर, जल में घोलकर पीये । अथवा शक्कर की चासनी बनाकर इस चूर्ण को उसमें मिला देवें। फिर इसमे से यथामात्रा पानी में घोलकर पीजायें। अथवा चूर्ण को केवल शक्कर मे ही मिलाकर जल के साथ ही फांक लेवें । गंगा-तटकी मिट्टी की मात्रा एक तोलाभर है । पथ्य मे सांझ को दूध तथा गेहूं का दलिया सेवन करें। इससे ग्रहणी, रक्तपित्त, हैजा भादि शमन होते है ॥ १२ ॥ श्वेत और श्याह दोनो प्रकार के जीरे, त्रिकटु, मोथा, इलायची, लौंग, जाय- फल, तेजपत्र, पिस्ता, चिलगोजा, बादाम, नारियल, प्रियालफल की मजा, चंदन, दाडिम, वंशलोचन, तालीसपत्र, जावित्री, दालचीनी, प्रवाल, बौर, सिंघाडा, धनिया प्रत्येक तीन तीन माशा, केसर १३ माशा, चिकनी सुपारी तीन तोला इन सब को एकत्र लेकर सूक्ष्म चूर्ण बनालें। इस चूर्ण को बत्तीस तोला दूधमे उकाल कर गाढा करले । अव, इसमे घृत तथा मिश्री प्रत्येक सोलह तोला प्रमाण मे मिला देवे। इस तरह से सिद्ध किया गया यह अवलेहराट् , ग्रहणी, रक्तार्श, निर्वलता और भरुचि का संहार कर देता है ॥ १३-१७ ॥ -ग्रहणी-चिकित्सा समाप्त- १-पटेन छानिता । २-मधुना विनीय लेहीकृत्य जलेन घोलयित्वा पाययेत् । अथवा सिता सजला विपाच्य तन्तुमत्त्वं विज्ञाय तत्र क्षिपेत् । किवा शर्करासहितस्यास्य चूर्णमेव जलेन गिलेत् । मात्राप्रमाण तोलकावधि मृत्स्नाया.। पथ्यं सायं दुग्धं गोधूम- दलिका (दलिया)। ग्रहणिकापित्तात्रेत्युपलक्षणं, वान्तौ हैजाख्ये पैत्तिकेऽप्यवचार्येति । ३-लवङ्गम् । ४-तेजपत्रम् । ५-'पिस्ता' इति प्रसिद्ध दन्तीबीजसदृशम् । ६-'लौंजा, चिलगोजा' इति प्रसिद्धम् । ७-प्रियालफलमजा।
[अथार्ग- - १८४ । सिद्धभेपजमणिमालायां अथार्शश्चिकित्सितम् । मूलद्वारप्रतीहारी शूलधारी भयङ्करः। बलिदत्तोदवसितैः शत्रुनर्मोगदः स्यतु ॥१॥ १ गुंदचक्र मार्जय रे तर्जन्या वदनलग्नवालुकया। स्यादर्शसां विनाशो मित्र! विनाशोकमत्र वर्तस्व ॥२॥ २ विषमुष्टिकप्रलेपश्चत्वारिंशदिनैनिहन्त्यर्शः । ३ अथवेन्द्रवारुणीफलशटितजलक्षालनमपि तथा ॥३॥ ४ मूत्रेण मुहुरभ्यक्तान्यासि प्रद्रवन्ति हि । स्वस्य वा भिषजो मूत्रमेकमासावधिर्विधिः ॥ ४ ॥ ५ उपदेहोऽशसि शस्तः कोणैः सागरेपलाण्डुजैः कल्कैः । ६ मधुना कपोतविष्ठावलक्षेसंतानिकाप्रलेपोऽपि ॥५॥ भर्श-चिकित्सा-(कुल प्रयोग ४२)- प्रस्तुत श्लोक में अर्श के स्वरूप का वर्णन किया गया है। यह मूल-द्वार का सतरी है (मूलद्वार अर्थात् गुदामार्ग, पक्षान्तर मे नगर का सिहद्वार)। भयंकर भाकृति वाला है। शूलधारण किये हुये हे (शल उत्पन्न करने वाला, पक्षान्तर मे त्रिशूल हाथ मे लिये हुये)। प्रवाहिणी - आदि वलियो मे रहता है (पक्षान्तर मे, बलि पुरुपोद्वारा प्रदत्त स्थान-स्थल में निवास करने वाला है)- ऐसा भर्शरूपी प्रतीहारी -सतरी हमारे शत्रुओं का सहार करे ॥ १ ॥ अरे । अपनी तर्जनी के अग्र भाग मे थोडा कपूर लगाकर उससे अपने गुदमार्ग का मार्जन कर, इस से अर्श का विनाश होने पर, विना शोक (शोक-विगत होकर) जीवन व्यतीत कर सकेगा। कुचले का चालीस दिवस तक लेप करने से मर्श का नारा हो जाता है। अथवा, इन्द्रवारुणी फल में से निकाले गये स्वरस द्वारा गुदा का प्रक्षालन करने से भी तद्वत् लाभ होता है। एक मास पर्यंत अपने अथवा वैद्य के मूत्रद्वारा पुन पुन सिक्त करते रहने से अर्श विलीन हो जाते है ॥२-४ ॥ प्याज और एक बालभर नवसादर के कल्क का कोप्ण उपदेह (पुल्टिस्) अर्श १-ग्रहण्यधिकारानन्तरमझेरोगेऽभिधेये प्रथम तत्स्वरुप प्रदर्श्यते-सूलेत्यादि । मूल द्वार गुद, पक्षे प्रधानद्वारम् । २-प्रवाहण्यादिवलिभिः, पक्षे बलवद्भिर्दत्तमुदवसितं स्थान यस्मै स तथाभूत । ३-विधिरय सप्राप्तिनाशकतया दुर्नामन , प्रायेण खल्वासि गुदादिए मलातिसचयक्लेदभावात् सभवन्ति । यदुक्तम्-"ईदृशैश्चापरैर्वायुरपान कुपितो मलम् पायोवलीपु सधत्ते ताखभिष्यण्णमूर्तिषु ॥ जायन्तेऽर्शासि ।" इत्यादि । तदेव मार्जनेन युक्तस्तदुपघात.। ४-सागर नवसादरम् । तच वल्लादधिक न ग्राह्यमिति । ५-कपोत विष्ठाया उपरिस्थश्वेतभागस्य प्रलेप इत्यर्थ ।
१८५ ९ चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छः । ७ पलाण्डू, पटमुल्लिप्तांश्चतुरो गोमयोपलैः । चतुष्प्रस्थमितैर्दग्ध्वा गृह्णीयाद्भस निर्मलम् ॥ ६ ॥ रसकर्पूरकं धौते धृते तद्भस मर्दयेत् । असि तेन लिप्तानि यान्त्यस्तं नात्र संशयः॥७॥ ८ तुत्थं सुजातदना लेपादासि हन्ति नव्यानि । कस्यापि कवीन्द्रशिशोरासि गतान्यनेन लेपेन ॥ ८ ॥ जगालसंशं मुलतानमृत्स्नया विघृष्य दना विदधीत वर्तिकाः । तासां प्रलेपादपयान्ति पायुजा विघर्षितानां दधिसर्वतोमुखैः ॥ ९॥ ...... १० शवामा पर्पटीकाथो जाशदं कजलं त्रुटिः । चतुर्यो विधुरांशः सर्पिः सर्वचतुर्गुणम् ॥ १० ॥ एप सिद्धो मलहरी धोतो वारी सहस्रशः। रक्तपित्तोल्वणाासि निर्वापयति लेपतः ॥ ११ ॥ ११ कृत्रिमहिमोपलशिलाशकलस्य विशिष्य वन्धनतः । स्रवदननिर्झराणि प्रयान्ति विध्वंसमासि ॥ १२ ॥ में प्रगम्त है । कपोतविष्ठा के उपरिगत श्वेत भाग को शहद में मिलाकर लेप करने से भी मर्श में लाभ होता है ॥५॥ चतुर वैद्य चार प्याज को कपडमिट्टी करके चार प्रस्थ गोबरी की मांच में फूंककर उनकी निर्मल भस्म वनाले। इस भस्म में रसकर्पूर मिलाकर शतधौत घृत के साथ खरल करले। इसके प्रलेप से रक्तार्श नि.सदेह अस्तंगत हो जाते है। अच्छी तरह जमे हुये दही के साथ तुत्थ को मिलाकर लेप करने से नूतन मर्श दूर हो जाते है । इस लेप से किसी कविशिरोमणि के पुत्र के मर्श में लाभ हुआ है ॥ ६-८ ॥ मुलतानी मिट्टी में जंगाल को अच्छी तरह घिसकर दही मिला वर्तिकायें बनालें। इन वर्तिकामो को दही के तोड में घिसकर लेप करने से नूतन अर्श हट जाते हैं ॥ ९॥ मुरदासींगी, कत्थे का काथ, जसद से निर्मित कजल (सफेढा), इलायची तथा इन चारो द्रव्यो से अर्धभाग कपूर, इन सभी द्रव्यो से चतुर्गुण धृत, इन सब को यथाविधि मिलाकर, मलहम सिद्ध करले। इस मलहम को, फिर, शतबार धोकर लेप करने से रक्तोल्वण अर्श प्रशमित हो जाते है ॥ १०-१५ ॥ बरफ के टुकटे को गुदा में रखकर उसे कसकर बाध देवे। इससे रक्तस्रावी १-न किंचित्तिरोहितमत्र, द्वाभ्यामेको योग । २-रोधिराणीति शेप । ३-तुत्यमत्र गुनाहयादधिक न ग्राह्यम् । ४-हतानीति पाठान्तरम् । ५-वात्वनुकारि द्रव्यविशेषम् । ६-अनतिक्रान्तसवत्सरा । ७--दधिजलै । ८-'मुरदासीगी' इति प्रसिद्धः । ९-'पपडी कत्या' इति प्रसिद्ध । १०-'मरहम' इति यवनवैद्यै प्रचारिताभिधेय । ११-जलेन । १२-यन्त्रद्वारा निष्पादितस्य 'वरफ' इति प्रसिद्धस्य ।
१८६ सिद्धभेषजमणिमालायां [अथा- १२ चक्रिका शुक्लमृत्स्नाया वद्धा पायुमुखोपरि । पित्तोद्रेकवतां हन्ति दुर्नाम्नां दाहमुच्चकैः ॥ १३ ॥ १३ निम्वपत्राणि कम्पिल्लं पारसीकयवानिका । प्रत्येकमेकभागानि वृषशृङ्गभवाकुराः ॥ १४ ॥ मालिवापचिका चेति द्वयं भागद्वयं पृथक् । एषां धूपो धुनोत्यर्शः शतधौतघृताञ्चितम् ॥ १५ ॥ १४ पनद्याणमितं तुत्थं शल्लकीकण्टकत्रयम् । धूपो नाशाय दुर्नाम्नामगारावरणं मृदा ॥ १६ ॥ १५ यवतुपयुतया धूपो वृषदर्शविशा नियोजितो युक्त्या । दिनसप्तकप्रयोगात् कुरुते रुधिरार्शसां ध्वसम् ॥ १७ ॥ १६ शाखामृगशकृद्योनिधूमो यन्त्रेण योजितः। अर्शस्संरम्भसंहारकर्मकर्मठ उच्यते ॥ १८ ॥ २७ मूलगर्जरवीजाहिकञ्चकीसिक्थधूपतः। त्रिभिर्दिनैः शमं यान्ति गुदजा रुधिरोल्वणाः ॥ १९ ॥ अर्श नष्ट हो जाते हैं । मुलतानी मिट्टी की टिकिया को गुदा मुख के ऊपर बाध दे । इससे पित्तोल्यण मर्श के उग्र दाह में लाभ होता है ॥ १२-१३ ॥ निंब के शुष्क पत्ते, कवीला, तथा खुरासानी अजवायन प्रत्येक एक एक भाग, बैल के सींग पर उत्पन्न शृगाङ्कुर और मालिवापची प्रत्येक दो दो भाग इनकी धूप लेने से तथा शतधौत घृत का प्रलेप करने से अर्श नष्ट हो जाते है। तीन तोला तुत्य और शल्लकी के तीन काटे इनकी धूप देने से अर्शी का नाश होता है। यहा प्रज्वलित अंगारो को मुलतानी मिट्टी से थोडा ढककर फिर धूप लेनी चाहिये । मार्जार-विष्ठा मे यव के तुप मिलाकर युक्तिपूर्वक धूप लेवें । सात दिवस प्रयोग करने से रक्ताशी का विध्वंस हो जाता है। वानर - विष्ठा की धूप को नाडीयन्त्र द्वारा लेवें । इस उत्तम क्रिया से अर्श- जन्य शोथ का अथवा मर्श के प्रचंड उत्पात का सहार हो जाता है ॥ १४-१८॥ मूली और गाजर के बीज तथा सर्पकंचुकी इनका सूक्ष्म कपडछान चूर्ण बनाकर इसमे सम भाग सिक्थ मिला अच्छी तरह कूट लेवे। यथामात्रा मे गुटिकाये बनाकर १-मुलतानदेशीयया । २-शुष्काणि । ३-एतन्नाम्नैव लोके प्रसिद्धः सोमराजीभेद । ४-अर्शी घृताभ्यक्तं कृत्वा धूपो देय । ५-प्रथमं मुलतानमृदा किञ्चिदझानावृत्य ततो धूप गृहीयादिति। ६-मार्जारविष्ठया । 'ओतुर्विडालो मार्जारो वृषदंशक आखुभुक्' इत्यमर । ७-वानरविष्टाविहितो धूप । ८-सच्छिद्रसपरयन्त्रेण नाडीयन्त्रेण वा। ९-मूलकबीज- गर्जरपीजसर्पकञ्चकीनां पटपूतं रज कृत्वा सिक्थेन समं सकुट्य मात्रया गुटिका कर्तव्या , प्रमाणमत्र समम् ।
श्चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छः । १८ नवसादरं च पीतभ्रमरच्छेत्रमसिताहिनिर्मोकः । द्विगुणो यथोत्तरमयं धूपोऽस्सुि प्रशस्ततरः ॥२०॥ १९ कल्कस्य देशिच्छदैकल्पितस्य धूपः सयन्त्रं भिपजा प्रयुक्तः । अासि वाहानि हठेन हन्ति हरिर्यथा दैत्यवलानि वेगात् ॥ २१ ॥ २० पादांशैलसहायस्य पीतमल्लस्य वर्तिका । गुदाध्वना विवन्धार्शःप्रणुदन्तःप्रवेशिता ॥२२॥ २१ कपिशाखुजितः पिचुना पयःप्लुतेन व्यहं गुदस्थेन । यलिगा अपि गुदजा बहिरायान्ति विलाद्यथा सर्पाः॥ २३ ॥ धूप लेवें। तीन दिवस में ही रक्तार्श शमन हो जाते हैं। नवसादर एक भाग, पीत भ्रमर का छत्ता दो भाग, और कृष्णसर्प की कंचुकी चार भाग, इनको एकत्र कूटकर इनकी धूप लेवें। यह भी में उत्तम लाभ देती है। देशी कागज का कल्क बनाकर, उसकी, वैद्य, यत्रपूर्वक, धूप देवे । विष्णु ने जिस तरह दैत्यसेना का सहार कर दिया था उसी तरह यह धूप शीघ्र ही बलपूर्वक बाह्य पर्शी का विध्वंस कर देती है ॥ १९-२१ ॥ पीतवर्ण का मल और उससे चतुथांश जितना एलिया दोनों को एकत्र मिलाकर कनिष्ठ अंगुली जितनी मोटी तथा डेढ पर्य जितनी लंबी एक वर्तिका बना लेवें । इस वर्ति को घृताक्त बना गुदामार्ग से मलाशय के भीतर प्रविष्ट करके रख देवें । प्रविष्ट करते समय रुग्ण को चने का मोदक खिलाना चाहिये । यह वर्ति मलावरोध सहित अर्ग में चमत्कारिक लाभ दिखाती है। जलोदर, उदावत आदि उग्र विकारो में भी यह माशु असर करती है। इमली वृक्ष की शाखा के निव जल में बुझाये गये कोयलो की राख भी इसमें मिलानी चाहिये ॥ २२ ॥ प्रस्तुत तीन श्लोको से भर्शी को मूलसहित नष्ट कर देने वाले प्रयोग का वर्णन किया जाता है। एक तोलाभर पीतवर्ण मल्ल को पानी मे खूब महीन पीसकर उससे १-पीतभ्रमर: 'टाट्या' इति प्रसिद्ध , तस्य छत्रम् । २-देशीयस्थूलकागदकल्पि- तस्य । ३-चर्तिका हस्तकनिष्ठागुलीपरिणाहा सार्धपर्वदीर्घा कार्या, घृतेन किचिदिव विलिप्य - प्रवाहणविस्फारितेन गुदमार्गेण मलाशये फलवर्तिरिव प्रवेशनीया, गुटिकाप्रवेशसमनन्तरमेव हरिमन्यमोदको भक्षणीयः महाफलेयं वर्तिका जलोदरोदावर्तादिमहाव्याविप्वपि स्फुटचम- त्कारा। निम्बजलनिर्वापितानि कोकिलानि तिन्तिडीकस्येह प्रक्षिपन्ति । ४-अथ त्रिभिः लोकैरशंसा समूलमुत्खननप्रकार: सिद्धिदोऽभिधीयते । तत्र पूर्व पीतमल्लचूर्ण सूक्ष्म पानीये आप्लान्य, तत्प्लुतेन सूक्ष्मवत्रखण्डेन विनापुरीपोत्सर्गकालं सर्वदा चतुर्विशतिप्रहान् गुदं समावण्वीत, प्रक्षालनमपि सुखस्पर्शमेव कुर्यात् , एव त्र्यहेऽतिक्रान्ते तदैव पश्चाद्वा अन्यत- मवलिस्थगुदजजालं बहिनिस्सरति, ततो निस्सरणानन्तर गुञ्जादीना लेप , तत्समकालमेव करीरशलाहचूर्णभक्षणमपि कार्यम् , आलेपात्तैलपित्तकारिणीप्रमृतितीक्ष्णद्रव्याणा परिहारः । एवमासि समूलमुत्पतन्तीति ।
[अथार्ग- १८८ सिद्धभेपजमणिमालायां जलक्लिन्ना रक्तगुञ्जा संभ्रष्टं काकतिन्दुकम् । सौवु चेति गुटी लेपाढुर्नामविनिपातिनी ॥ २४ ॥ संस्वेर्थे कोमलकरीरशलाटुकानि क्षिप्त्वा कटे खरतरातपतः प्रशोप्य । भुञ्जीत मेदुरसरेण सुजातदना रक्तार्शसा प्रशमनाय वशी प्रभाते ॥२५॥ २२ कोऽपि न यं देवमृते सिञ्चति चूतस्य तस्य पत्राणाम् । परिपाकपिञ्जराणां धूमः पीतो निहन्ति रुधिरार्शः ॥ २६ ॥ २३ वज्रर्दन्त्याः प्रकुञ्चैकं शकलीकृत्य किञ्चन । घृतक्षौद्रसमावापे द्वित्रिप्रस्थे जले पचेत् ॥ २७ ॥ एक सूक्ष्म कितु स्वच्छ वस्त्रखंड को सिक्त करके, गुदामार्ग मे रस देवें। इस तरह इसे , तीन दिवस पर्यंत रहने दे । तथा उपरोक्त मल्ल जल से, सुख-स्पर्श पूर्वक, गुदा का प्रक्षालन भी करते रहें। मलत्याग-काल के अतिरिक्त सभी समय तक, सर्वदा इस वस्त्रखंड से गुदामार्ग को आच्छादित रखना चाहिये । तीन दिवस व्यतीत होने पर बलिगत अर्शाकुर, विल में से सर्प की तरह, बाहर निकल आयेंगे। अर्शी के बाहर निकल आने पर उनपर निम्नलिखित गुंजादिवटी का लेप करें। रक्तगुंजा को रातभर पानी में भिगोकर रहने दें। प्रातःकाल, इन रक्तगुंजामों में शुद्ध कुचला तथा देशी बनावट का साबुन मिलाकर उनको बारीक पीसकर गुटिका वनालें । अव, इसका लेप (उपरोक्त) अर्शाङ्कुरो पर कर देवें । इससे वे नीचे गिर जायेगे। अर्शों पर गुजादिवटी का लेप करते समय रुग्ण को करीर के कच्चे फलो का चूर्ण खिलाना चाहिये । तथा गुंजा-वासित पानी भी पिलाना चाहिये । करीरफल - चूर्ण निम्न विधि से बनाकर उसे अच्छे जमे हुये तया प्रचुर मलाई वाले दही के साथ मिलाकर प्रात काल देना चाहिये। करीर के कोमल कच्चे फलो को विना जल के स्विन्न करके सूर्य के उग्र ताप मे सुखा उसका चूर्ण बनाये । इस चूर्ण की एक मात्रा छ माशाभर है ॥ २३-२५ ॥ केवल भेघजल से परिसिचित एव परिवर्धित अतएव एकात जगल मे उगे हुये आम्र के परिपक्व पीले पत्तो का चूर्ण बनाकर उसके धूम का पान करने से रुधिराशे मिटता है ॥ २६ ॥ वज्रढती चार तोलाभर लेकर उसके छोटे छोटे टुकडे करलें । इनको दो तीन प्रस्थ जल में उकाल लेवें । इस जल मे, पहिले, चार तोलाभर घृत एव इससे आधी मात्रा मे शहद लेकर, मिला देना चाहिये। जव उकल कर पानी अर्ध भाग शेप रह १-सर्वां रात्रिम् । २-'सावून्' इति प्रसिद्धं वक्ष्यमाणनिष्पत्तिप्रकारम् । तच्च देशीयमेवादेयम् । ३-जलयोगावटी कार्या। गुञ्जावासितजलमप्यत्र देयम् । ४-जलं विनेति शेष । मात्रा चास्य गद्याणमिता। प्रयोगश्चाय केवलमपि प्रचरति । ५-मेघ विना । ६-मेपशृङ्मयपरपर्याया भवति वज्रदन्ती नाम काचिदौपवि , तस्या । ७-घृतमत्र पल, तदधं क्षौद्रं, समानयोस्तयोर्विरोधादिति ।
१८९ । श्चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छ.। क्वाथस्यार्धावशिष्टस्य भागाः कार्यास्त्रयः क्षमाः। तेवेकं प्रपिवेद्भाग द्वाभ्यां गण्डपकांश्चरेत् ॥ २८ ॥ निरुध्यतेतरामसमर्शसा वेगवाह्यपि । दाय भवति दन्तानां भवितव्यं हिताशिना ॥ २९ ॥ २४ कलिकाः सविधविकाशा दाडिमजा द्विगुणशर्कराकलिताः। द्वादशगुणेन वारा लुलिताः पीता जयन्ति रुधिरार्शः॥ ३०॥ २५ चिञ्चाकिसलयकल्को जललुलितः पट्टपावितः सपटुः । रुधिरात्मकानि हन्यादस्यिासामयोगिनिर्दिष्टः ॥ ३१ ॥ २६ द्वीपान्तरीयचूक्रकपत्राणि मरीचमित्राणि । पिष्ट्वा लुलितानि जलै रुधिरं रुन्धन्ति दुर्नानाम् ॥ ३२ ॥ २७ कल्कमपामार्गमयं विमिथ्य सुजाततक्रेण । सुवसनविलुलनगलितं पिच रुधिराशःसु भेपज ललितम् ॥ ३३ ॥ जाये, तब इस बाथ के सममात्रा मे तीन भाग करलें। इसमें से एक भाग क्वाथ को पीयें। भवशिष्ट दो भाग क्वाथ से गंडूप लें। यह प्रयोग तीव्र वेगयुक्त रुधिराश को प्रशमित कर देता है। तदुपरात, पथ्यपूर्वक रहने से यही प्रयोग दातो को भी मजबूत बनाता है ॥ २७-२९ ॥ अर्धविकसित दाडिम की कलियां दो तोलाभर (हस्तलिखित प्रतिवाले प्रयोग के अनुसार एकादश कलियों को प्रातःकाल ही ग्रहण करके उपयोग मे लेनी चाहिये) तथा इनके वजन से द्विगुणित मात्रा में शर्करा इन दोनो को शिलापर चटनी की तरह महीन पीस लें। इनको बारह गुणित पानी से छानकर पीये। ग्यारह दिवस प्रयोग करने से रुधिरा मिट जाते हैं । पथ्यरूप में गाय का मख्खन, वेढमी भादि शस्त तथा तैल, लवण, अम्लादि वयं हैं ॥३०॥ इमली के कोमल पत्तों के कल्क को पानी में मिलाकर वस्त्रपूत करलें । फिर - थोडा सैंधव मिलाकर पीने से रुधिराश शांत होजाते है। यह प्रयोग भासाम के एक सन्यासी (योगी) का बताया हुआ है ॥ ३१ ॥ इंग्रेजी चूके में मिरच मिलाकर पीस लें। फिर जल में मिलाकर पीने से अर्श- गत रक्त स्राव वद होता है ॥ ३२ ॥ अपामार्ग के पंचांग कल्क को अच्छी तरह जमे हुये दही से बनाई गयी छाछ मे घोल लेवें। फिर, स्वच्छ वस्त्र से छानकर, रुधिराश में पीयें, यह उत्तम औषधि है ॥३३॥ १-विकाशोन्मुसा इत्यर्थः । मानं तोलकद्वयं, सप्तरात्र प्रयोगोऽयम् । पथ्यं गव्य नवनीत, तच द्वादशतोलक्रम् । पोलिकाऽपि देया लवणाम्लवर्जम् । पित्तानुबन्धे रक्तार्शसि देयम् । २-इमली' इति प्रसिद्धवृक्षस्य दलकल्क । ३-आसाम इति प्रसिद्धो १ विशेष , तद्वासियोगिनोपदिष्ट । ४-'इग्रेजी चूका' इति लोके प्रसिद्धि । .
[अथार्श- १९० ५. सिद्धभेषजमणिमालायां २८ कल्कं निम्बमहानिम्बसहस्रसुमपत्रजम् । पलोन्मितं गिलेदर्शस्त्रवदननिवृत्तये ॥ ३४ ॥ २९ अभयातिलभल्लातैः कल्पयेत् कल्कमुत्तमम् । गद्याणं तस्य शाणं वा गिलेद्वातासृगैसि ॥ ३५ ॥ ३० द्विगद्याणासुरी' ग्राह्या तत्रार्धा भर्जयेद्धृते । द्वयीं पिष्वा गिलेत् प्रातर्जलैर्दुर्नामंशान्तये ॥ ३६ ॥ ३१ कम्पिल्लराजिकाचूर्ण दना गद्याणगौरवम् । सप्ताहं पिवतां नृणां शुष्कमर्शो न तिष्ठति ॥ ३७ ॥ ३२ कुटजत्वग्रजएवं निगीर्यान्वेव चर्वयेत् । ससितान् भ्रष्टचणकाजु शाम्येद्रुधिरमर्शसाम् ॥ ३८ ॥ ३३ लघुचूर्ण त्रिगुणसितं प्राज्येनाज्येन संनय रे । रोधिरमर्शः शमयति निषेविता कतलिका तस्य ॥ ३९ ॥ ३४ घृतकृतमितसंस्कारा रसगन्धककजली द्विगुणवोला । अरदस्पर्श गिलिता सलिलैरसृगर्शसां प्रशमलोला ॥ ४० ॥ निंब, महानिब और हजारापुष्प इन तीनों के कोमल पत्तो का कल्क वनाले । इस कल्क को चार तोला भर अल्पाल्प मात्रा से निगल जाये । इससे अर्श-गत रुधिर स्राव निवृत्त होता है ॥ ३४ ॥ हरडे, तिल और भिलावा इनका खूब बारीक कल्क करलें । छ अथवा तीन माशा भर मात्रा में इस कल्क को निगल जाने से वातप्रधान रक्तार्श में लाभ होता है ॥३५॥ राई एक तोला भर लेवें। इसमे से अर्धभाग जितनी राई को घी में भूनले । इस भूनी हुई राई को अवशिष्ट राई मे मिला बारीक पीसकर जल के साथ, प्रात. फांक जाये। इससे रक्तार्श शांत हो जाता है ॥ ३६ ॥ कवीला और राई के छ माशा भर चूर्णको, सात दिवस पर्यंत, दही के साथ लेने से वातश्लेग्मजन्य शुष्क अर्श निवृत्त हो जाता है। कुटज त्वक् के चार माशा भर सूक्ष्म चूर्ण को निगल उसके ऊपर मिश्री मिलाकर भूने हुये चनों को चबाने से रक्तार्श शमन होते है । चूर्ण लेने के पीछे तीन घटे तक जल नहीं पीना चाहिये ॥३७-३८ ॥ अगुरु के चूर्ण मे उससे त्रिगुणित मिश्री तथा प्रचुर मात्रा में घृत मिलाकर थाली मे जमा दे। इसकी कतलिका बनाकर खाने से रुधिराशे शात हो जाते है ॥ ३९ ॥ पारद तथा गधक की कज्जली मे थोडा घी डालकर खरल करले, उसमे कजली से १-सहस्रसुमं लोके 'गैदहजारा' इति प्रसिद्धम् । २-अल्पाल्प क्रमेण गिलेत् , जल चानुपिवेत् । ३-वातानुबद्धरक्तार्शासि । ४-राजिका । ५-रक्तार्शश्शान्तये इत्यर्थ । ६-वातश्लेष्मजातमित्यर्थ । यदुक्तम्-"शुष्काणि वातश्लेष्मभ्यामार्द्राणि त्वपित्तत ।" इति । ७-अत्र प्रयोगे याम जल न पिबेदिति रहस्यम् । ८-अगुरुचूर्णम् । ९-बोल. वीजावोल' इति लोके प्रसिद्धिं गता । ।
श्चिकित्सितम्] चतुर्थों गुच्छः। ३५ घटे पटग्राहितृणान्तरस्थं पिधाय तुत्थं दह गोमयाग्नौ । सिद्धं सित पाटलखण्डंगूढम निवृत्त्यै गिले रक्तिमानम् ॥ ४१ ॥ ३६ पूर्णान्तरं सौररसाजनाभ्यां मूलं पृथग्विल्वसमुंद्धृताभ्याम् । सम्यग्विपक्कं पुटपाकरीत्या दुर्नामरोगे हितमामनन्ति ॥ ४२ ॥ ३७ मूलकमुत्कीर्य महत्तत्र पिधाय पिचुमन्दमजानम् । पुटपाकरीतिपकं पिष्ट्वा गुटिकीकृतं निहन्त्यर्शः॥ ४३ ॥ द्विगुणित हीराबोल भी मिला देवें । इसको पानी के साथ इस तरह से निगल जावे, जिससे दांतो का स्पर्श न हो । यह रक्तार्श को शीघ्र प्रशमित कर देती है ॥ ४० ॥ विल्लीघास मे (बीज-कणों सहित इस घास का उपयोग करें)तुत्थ को लपेट कर एक घट मे भरदें। इस घट को गजपुट की अग्नि देवें। जब तुत्थ की श्वेतवर्ण भस्म हो जाये तब दोनो को लेकर उनको पृथक् पृथक् खरल कर लेवें । तुत्थभस्म के साथ पटग्राहि-तृण (उपरोक बिल्लीघास) की भस्म को मिलाकर जल के साथ निगल जाये। इसकी मात्रा एक रत्ति है। जबतक भस्म श्वेतवर्ण की न हो तब तक पुन पुन. गजपुट देवे। उपरोक भस्म - मिश्रण को छालखाड में लपेट कर देना चाहिये । इससे अर्श निवृत्त हो जाते है। इस भस्म के सेवनानन्तर शीघ्र ही शक्कर तथा दूध मिलाकर भात खिलाना चाहिये । विलब होनेपर रोगी को वमन हो जाने का भय रहता है। यदि तुत्य एक तोला लेवें तो घास एक प्रस्थ (चौसठ तोला) लेना चाहिये । इस प्रयोग में वैद्य को, रुग्ण से द्रव्यादि ग्रहण करने का सर्वथा निषेध है ॥ ४१ ॥ सोरा और रसाजन प्रत्येक चार चार तोला लेवे । इनको एक बडी मूली मे अच्छी तरह भर देवें । मूली के बडे बडे टुकडे करके (जिस तरह वृन्ताक आदि को चीरकर उसमें मसाले आदि भरे जाते है, उसी तरह) उनको चीरकर उसमें सोरा और रसा- अन चूर्ण को भर उन टुकडों को कपडमिट्टी कर लेना चाहिये। इन टुकडों को पुट- पाकविधि से अच्छी तरह पकाले । पित्तप्रधान रक्तार्श मे यह प्रशस्त है ॥ ४२ ॥ एक स्थूल मूली को चीरकर उसमे निम्बोली की मज्जा भरकर उसको पुट-पाक विधि से पकालें। तदनन्तर उसे खरल करके गोलियां बना लेवें । ये अर्श को मिटा देती है ॥ ४३॥ १-'विल्लीघास, कुतरीघास' इति ख्यातम् । तच्च सवीजकणमेवोपयोगि। २-गज- पुटे। ३-सितमिति सिद्धपरीक्षा, अन्यथा पुन. पुटनीयम् । ४-'छालखाड' इति प्रसिद्धम् । ५-जलेनेति शेष । अत्रेदं रहस्य-पटग्राहितृणभस्मापि तुत्थेन साकमेव देयम् । पथ्यं भक्तं सदुग्धसित, तच्च समनन्तरमेव देय, विलम्ब वमनभयम् । प्रयोगश्च त्रिदिना- वधिः । तुत्थ कर्षमितं चेद् घासः प्रस्थमितो ग्राह्य । अत्र रोगिसकाशाद्व्यं न प्राह्यमित्यु- पदेश । ६-मूलककन्द, तच्च महद्वाह्यम् । ७-पलप्रमाणेनोद्धृताभ्यामित्यर्थ । ८-पित्तो- ल्वणे । ९-'निम्बोली' इति प्रसिद्धफलमजानम् । - . १९४ सिद्धभेषजमणिमालाया [अग्निमान्द्यादि- तुल्यान्येतानि वृक्षाम्लं सर्वतुल्यमिदं रजः । दीपनं पाचनं रुच्यं ग्रहणीगदमोचनम् ॥ ५ ॥ ५ सूत्रकृच्छ्रेऽभिधातव्यः सारो यः पिञ्जरच्छविः । आदित्यमाषकोन्मानं तं समादाय मेलयेत् ॥ ६ ॥ द्विद्विमाषैर्भृशं भ्रष्टैः पाक्यसामुद्रसैन्धवैः । विश्वैलाजीरमरिचैः पृथक् शाणमितैरपि ॥ ७ ॥ हिङ्गुना माषमात्रेण ततः सर्व विचूर्णयेत् । तंचूर्ण मात्रया प्सातं मान्धाजीर्णहरं परम् ॥ ८ ॥ ६ सौवर्चलं सादरमर्कपुप्पं मरीचमेकत्र समं विमर्थ । गुखाप्रमाणा गुटिका विधेयाः कर्पन्ति कार्य क्रमशः कृशानोः॥९॥ ७ आफूककृष्णाविपमुष्टिकानां जैवातकक्ष्मानयनांशिकानाम् । विधाय वर्तीस्तरुणीसुमार्केः क्षुन्मान्धवासश्वसने दद्यात् ॥ १० ॥ धनिया, चित्रक और भग्लवेत इन सब को समान भाग मे लेवं तथा इन सभी द्रव्यो के समान भाग से डाँसरिया- फल के चूर्ण को लेकर भापस मे अच्छी तरह खरल करके मिला देवे । यह चूर्ण दीपन, पाचन, रचिकर तथा ग्रहणी - रोग प्रमक कहा गया है ॥ ४-५॥ लोह के तवे पर अग्नि योगसे अच्छी तरह सेके गये विढ, सामुद्र तथा सैधव, नमक प्रत्येक दो दो मागा, झूठ, एलरा, जीरा और मरिच प्रत्येक तीन तीन माशा और हींग एक मागा इन सब को एकत्रित करके सूक्ष्म - चूर्ण बनालें। इस चूर्ण में, मूत्रकृच्छ चिकित्सा मे उल्लिखित 'पीतवर्ण - सार' बारह मासे भर, मिला देवें । इस चूर्ण को गुलाब के अर्क मे खरल करके थोटा गृद मिला कर गोलिया बनाले । यथा मात्रा लेने से ये अग्निमाद्य तथा अजीर्ण को दूर कर देती है ॥ ६-८ ॥ सौवर्चल, नवसादर, अर्क - पुप्पान्तर्गत फुल्लिका (ल्वंगिका) और काली मिर्च इनको समान भाग में घोटकर गुजा -प्रमाण गुटिकायें बनालें । ये क्रमशः कृगानुकी कृशता को दूर कर देती है ॥ ९ ॥ अफीम और पिप्पली प्रत्येक एक एक भाग, कुचला दो भाग इनको गुलाब के अर्क मे घोटकर गुटिकाये बनाले । अग्निमाद्य, कास, श्वास, अतिसार एवं ग्रहणी आदि रोगो में इसका उपयोग करें। उपरोक्त द्रव्यो को गुलाव- अर्क मे एक सप्ताह पर्यंत भिगोकर पीछे, खरल मे घोटने से सुविधा रहती है ॥ १० ॥ १-'डासरया' इति प्रसिद्धम् । २-तरुणीपुष्पार्के किचिद्गुन्द्र प्रक्षिप्य अस्य गुटि- काऽपि रचनीया । ३-अर्कपुष्पान्तर्गतलवनिका ग्राह्या । ४-'गुलावजल' इति प्रसिद्ध. तरुणीसुमार्के सप्ताहमालाव्य दिनमेकं पश्चाद्विमर्थ गुटी स्चयेदित्युपरिष्टादवगन्तव्यम् । ५-बहुवचनस्याद्यार्थवाचित्वादतिसारग्रहण्योरपि दाप्याः ।
१९५. चिकित्सितम्] चतुर्थों गुच्छः । ८ विपमुष्टिकनवसागरवाल्हीकैरम्लभावितहुशः। मन्दाग्निसूलविकृतीहरन्ति हरिमन्थमेदुरा वटिकाः ॥ ११ ॥ ९ शतपोनेपावितानां जगदौपधलवणपूर्वदेवानाम् । घटिता निम्बूकरसैश्चतुर्गुणैर्मोदकाः स्युरनलकराः ॥ १२ ॥ १० स्विन्नानि रविदलानि द्विजीरपटुपित्तकारिणीमरिचैः । राजिकया धान्येन च लिवा देयान्यजीर्णेषु ॥ १३ ॥ ११ सस्वर्जिकान्यर्कदलानि पीतान्युत्स्वेद्य धौतानि यथोपदेशम् । निम्बुद्रवे क्षारपट्टपणाढ्ये मन्दानलं नन्ति चिरोषितानि ॥ १४ ॥ कुचला, नवसादर और हींग इनके चूर्ण को विजौरा, निबू, दाडिम, नम्मीर प्रभृतिके अम्लरसो से दो तीन भावनाये दे। फिर इनकी चने जितनी मोटी गोलियां बनालें । ये मन्दाग्नि की मूल-भूत विकृति को नष्ट कर देती है ॥ ११ ॥ झूठ, लवण और गन्धक को एकत्र पीसकर इनके चूर्ण को सूक्ष्म - छिद्रों- वाली चालनी में से छानकर निवृ का चतुर्गुण रस मिला मोदक बनाले। ये अग्नि-प्रदीपक हैं ॥ १२ ॥ अर्क के पत्तों को, किचित स्फटी डालकर, जल में उबाल लेवें । सुस्विन्न होने पर उनको नीचे उतारले। दोनो प्रकार के जीरे, लवण, लाल मिर्च, काली मिर्च, राई और धनियां इनका सूक्ष्म चूर्ण बनाकर उसमे निबू रस मिला उनका लेह जैसा वनाले । इस लेह को उपरोक्त स्विन्न पत्तोपर चुपडकर सेवन करने से अजीर्ण मिटता है। इसी तरह इसी लेह मे आकडे के स्विन्न पुप्पो को सान कर खाने से अजीर्ण आदि से प्रचुर लाभ होता है ॥ १३ ॥ अर्क के परिपक्व अत एव पीत-वर्ण पत्तों को थोडी सज्जीखार डालकर पानी में उबाल स्विन्न करलें। अव, एक काचपात्र मे क्षार, लवण एवं कणा चूर्ण से युक्त यथामात्रा निवू का रस भरदे । इस निबू के रस मे उपरोक्त स्विन्न पत्तो को अच्छी तरह साफ करके तथा कपडे से पोछकर डाल देवें। एक दो सप्ताह पयंत उसी रस मे उन्हें रहने दे। ये मंदाग्नि को नष्ट कर देते है। अर्क -पत्रों को उबालते समय उनकी वाप्प आखों को न लगे इसकी सावधानी रखनी चाहिये । श्लोक - गत 'यथो. पदेशम् ' का यही अर्थ है ।। १४ ॥ १-मातुलुङ्गनिम्बूकदाडिमजम्वीरान्यतमैरम्लैर्दिनिवार भावितै । २-बहुच्छिद्रो यन्त्रविशेप 'चालनी' इति प्रसिद्ध । ३-पूर्वदेवो गन्धक । ४-अर्कपत्राणि परिमिता स्फटिका दत्त्वा जले मन्दाग्निना स्वेद्यानि। ५-निम्बूकरसयोगेनेति शेष । मात्रा चैषा नियता नास्ति, विभिन्नरुचित्वाल्लोकानाम् , अतो यथारुचि विधेया । उक्तप्रक्रियया रविपुष्पाण्यपि साधनीयानि । ६-सशब्द ईपदर्थे, तेनेषत्स्वर्जिकाणीत्यर्थ । ७-परिपाकपिञ्जराणि । -८-तद्वाष्पस्पर्शादृष्टिं रक्षेदित्युपदेश । ९-आप्लावनयोग्ये ।
सिद्धभेषजमणिमालायां [अग्निमान्द्यादि- १२ निम्बूकनीरामहौषधस्य कल्कः सितातन्तुलिकाप्रणीतः । त्रिजातकक्षेपविशेपहृद्यो रोचिष्णुरग्निं द्विगुणीकरोति ॥ १५ ॥ १३ निम्बूकतीणच्छदनाकाणां प्रत्येकमम्बु द्विपलं कटाहे । रूप्ये निधाय द्विगुणं च खण्डं पचेदिद फाणितमग्निवोधि ॥ १६ ॥ १४ केल्वञ्जीग्रन्थिपथ्यामिषिधनहवुपादीप्यकुष्ठद्विजीर- येलाक्षारद्वयाम्लॅनयगजकुस्मत्वंग्लवङ्गाग्निपाटैः। पोटांककोलगन्धागुरुलवणगणव्योपकर्चुग्मक्षी- विष्टातालीसपत्रैर्भवति पलमितैः कत्पितोऽर्कः क्षुधाकृत् ॥ १७ ॥ १५ पोदीनाकनिम्बूककुमारीरससंभवः । अर्को जीरविजातीधै रोचनो वह्निवोधनः ॥ १८ ॥ १६ भगाया निकाकृष्टः कुर्यादर्को धनञ्जयम् । १७ अथवा निम्बुकरससौवर्चलसमुद्भवः ॥ १९ ॥ निबू रस को पीकर फूली हुई सूठ के कल्क को उससे चतुर्गुण गाकर की चासनी मे अच्छी तरह हलाकर मिलादेवे । इसमें त्रिकटु चूर्ण का ऊपर से प्रक्षेप करें यह लेह विशेष हृद्यगुणो से युक्त, रोचिष्णु, तथा जठरानल को द्विगुणित कर देनेवाला कहा गया है ॥ १५॥ निम्बू , पोदीना और आर्द्रक इन प्रत्येक के आठ साठ तोला रसको द्विगुणित शर्करा के साथ चादी के पात्र मे पकावे । यह सिद्ध फाणित जठरानल को प्रदीप्त करता है १६ कलोजी, प्रथिपर्ण (अथवा पिप्पली मूल) हरडे, सौंफ, धनियाँ, हबुपा, लौंग, दालचीनी, अजवायन, कूठ, जीरकद्वय, एलाद्वय, क्षारद्वय (स्वर्जिका क्षार, यवक्षार) अम्लत्रय (दाडिम, अम्लवेत और इमली) नागकेसर, चित्रक, पाठा, काकमाची, कंकोल, कुलिंजन, अगुरु, लवणपचक, त्रिकटु, कर्चुर, पोदीना और तालीसपत्र प्रत्येक चार चार तोला लेकर, अर्क निकाल लेवें । यह क्षुधावर्धक है ॥ १७ ॥ पोदीना, भाईक, निबू और ग्वारपाठे के रस का अर्क रुचिप्रद एवं भग्निप्रदीपक है । इस भर्क मे त्रिजात (तज, तेजपात और इलायची) तथा लवण आदि का प्रक्षेप करके पीना चाहिये ॥ १८ ॥ • भाग सोलह तोला तथा अजमोदा चौसठ तोला इनका अर्क निकाल लेवें। इस १-निम्बूकरसवासादापादितातिशयस्थौल्यस्य । २-सिताऽत्र चतुर्गुणा । ३-तीक्ष्ण- च्छदन 'पोदीना' इति ख्यात । ४-फाणितप्रवरं ह्येतद्वान्तावप्यवचार्यते । ५-'कलोंजी' इति ख्याता । ६-धान्यकम् । ७-दाडिमाम्लवेतसतिन्तिडीरूपम् । ८-नागकेसर. । ९-काकमाचिका 'मको' इति प्रसिद्धा। १०-यद्यपि गन्धाशब्देनोग्रगन्धा प्रतीयते, तथाऽपि तस्या वामकत्वादत्र कुलिञ्जनं ग्राह्यम् । ११-गणशब्देन लवणपञ्चकम् । १२-'पोदीना' इति लोके । १३-आद्यशब्दालवणमपि । प्रक्षेपश्चैषा निष्कृष्यमाणार्के यन्त्रस्थे एव पानसमये वा। १४-अत्र भगा कुडवमिता, यवानिका प्रस्थमितेति सकेत । । " चतुर्थो गुच्छ । १९७. । चिकित्सितम्] १८ तेजोप्सु सौधासु पडेपणाग्लजीरं चतुर्जातलवङ्गदीप्यम् । क्षारौ ससौवर्चलनिम्वुशुक्तौ संधाय साध्योऽग्निदर्क एषः ॥ २० ॥ १९ छिकिकारसमन्नानां च्युतं पातालयन्त्रतः। सत्त्वं हन्ति लवङ्गानामजीणं सशिवायुधम् ॥ २१ ॥ २० राजजम्बूफलरसः सपटुत्र्यूषणार्द्रकः । निपीतो मात्रया धत्ते क्षुधा दीपनपाचनः ॥ २२ ॥ कर्थनेन पृथग्भूतकल्कभागोऽधिकं तनुः । स्वरसः स्वच्छतां धत्ते वसनव्यूहविच्युतः ॥ २३ ॥ २१ राजजम्बूफलरसं सूर्यतापे निधापयेत् । प्रत्यहं वस्त्रपूतं तं कुम्भात् कुम्भे विवर्तयेत् ॥ २४ ॥ अर्क को 'धनंजय' कहते है। इसी तरह, निंबू रस और सौवर्चल दोनों का अर्क निकाल लेवें । ये सभी अर्क रुचिकर एव भग्निवर्धक है ।। १९ ।। कलिकाखंड के जल से निर्मित 'तेजी' नामक पानी में, पडूपण (चव्य, चित्रक, पिप्पली, पीपलामूल, सोठ और मरिच), अम्लत्रय (अम्लवेत, दाडिम, तथा इमली), श्याह श्वेत जीरा, चतुर्जात ( तज, तेजपाज, इलायची, और केसर), लौंग, अजमोदा तथा खुरासनी अजवायन, स्वर्जिक्षार, यवक्षार, सौवर्चल और नींबू का सिरका इनका भर्क सिद्ध करलें। यह भग्निको प्रदीप्त करता है। 'तेजी' जल चौसठ तोला लेवे तो सिरका सोलह तोला एवं उपरोक्त अन्य सभी सम्मिलित औषधीय द्रव्य भी सोलह तोलाभर ही लें ॥ २० ॥ नक छिंकनी के रस में निमन्न लविंग का पातालयंन विधि से सत्वपातन करलें। यह सत्त्व स-शुल अजीर्ण को नष्ट कर देता है ॥ २१ ॥ उत्तम पके हुये राजजम्बू फल स्वरस मे आक कल्क को घोलकर छान लेवें । फिर, उसमें लवण तथा त्रिकटु चूर्ण मिलाकर यथा मात्रा पीये। यह भूख बढाता तथा दीपन पाचन करता है ॥ २२ ॥ घट्ट-स्वरस को निम्न विधि से स्वच्छ बनालें। स्वरस को कथित करने पर जब तत् -गत कल्क भाग पृथक् हो जाये तब उसके अधिक तरल भाग को, बहुतसी तहवाले वस्त्र में से छान लेवें। इस तरह प्राप्त धन- स्वरस स्वच्छ होता है ॥ २३ ॥ राज-जवू- फल के रस को सूर्य - ताप में रख दें। प्रतिदिन, उसे वस्त्रपूत कर, १-कलिकाखण्डसवन्धिजलेपु 'तेजी' इति ख्यातेषु । २-“पञ्चकोलं समरिच पडू- पणमुदाहृतम्” इति परिभाषितम् । ३-अम्लवेतस दाडिम तिन्तिडीकमिति त्रितयम् । ४-जीरकद्वयमेव । ५-दीप्यशब्देनाजमोदायवान्यो। ६-निम्बुशुक्तं 'सिरका' इति प्रसि- द्धम् । अब तेजोपा प्रस्थश्चेत् कुडवं सर्वमौषधजात निम्वुशुक्तं पृथक् कुडवमिति परिमाणम् । ७-सशुलम् । ८-जम्बूफलरसे आर्द्रकल्क घोलयित्वा वस्त्रपूतं च कृत्वा कृष्णलवणादिक योग्यं प्रतिसार्य पाययेदिति । ९-घनस्वरसाना स्वच्छतापादनप्रकारोऽयम् । - - सिद्धभेपजमणिमालाया [अग्निमान्द्यादि- दिवसेषु व्यतीतेपु विन्दु तस्य क्षितौ क्षिपेत् । उद्गच्छेद्बुद्बुदस्तत्र तदा सिद्धं समादिशेत् ॥ २५ ॥ इत्येतजाम्बवं शुक्तं सितापङ्केन दीयताम् । विसूचिकानमत्यम्लं रुच्यं दीपनपाचनम् ॥ २६ ॥ २२ त्वक्सुमैलं सुवर्णाध मरिचं पित्तकारिणी। पृथगक्षं ततः क्वाथो विसूचीक्षपणक्षमः ॥ २७ ॥ २३ पलाण्डुकन्दपानीयमानीय द्विपलं पिवेत् । विसूचिकां विशेपेण निश्शेपयति निश्चितम् ॥ २८ ॥ २४ पिप्पलवल्काहारप्रतिनिर्वापितपयोनुपानेन । भ्रष्टमसूरद्विदलक्षोदः शाणो विसूचिका हन्ति ॥ २९ ॥ २५ पश्चैव पित्तकारिण्यः सितावुद्बुदसप्तकम् । पिष्वाऽम्भसा परिस्राव्य विसूच्यां प्रपिवेन्मुहुः ॥ ३० ॥ एक घट में से दूसरे घट में बदलते रहें । इस तरह कुछ दिवस व्यतीत होनेपर, इस रस की एक बूद जमीन पर डालें। यदि इस वृंद में से बुदबुदे उठने लगे तो जान लेना यह सिद्ध हो गया है। इस विधि से सिद्ध जबू- फल - रस के सिरके को शक्कर की चासनी के साथ दे । यह विसूचिका- नाशक, अति अम्ल, रुचिकर और दीपन पाचन होता हे ॥ २४-२६ ॥ तज, लौंग और इलायची प्रत्येक दोमाशा, काली मिर्च और लाल मिर्च प्रत्येक एक तोला इनका काथ विसूचिका-रोग को क्षीण कर देने में समर्थ है ॥ २७ ॥ प्याज के सद्यस्क जल को, आठ तोला मात्रा में पीजाने से, विशेप करके, विसूचिका नि सदेह नामशेष रहजाती है ॥ २८ ॥ पिप्पल वृक्ष की छाल के अंगारों के बुझावे देकर सिद्ध किये गये पानी के साथ, भूनी हुई मसूर -दाल के तीन माशा भर चूर्ण की फाकी से विसूचिका और चमन शान हो जाते हैं ॥ २९ ॥ पाच लाल मिर्च और सात पतासे इनको पानी में पीसकर शर्बत-सा बनालें । इसे वस्त्रपूत करके दो दो तोला मात्रा में एक एक प्रहर ठहर ठहर कर पीयें । इससे विसूचिका नष्ट हो जाती है। उपद्रव शात होने पर यदि प्यास लगे तो लौंग का जल पीना चाहिये ॥३०॥ १-कर्षावम् । २-पलाण्डुराजशतके विसूचिक्या सहास्य युद्ध निवद्धं द्रष्टव्यं, तथा विसूचीस्वस्पवर्णनमपि। तदेकपद्यं यथा-"अत्यर्थमन्तर्गतनेत्रविम्वा प्रवर्तयन्ती वमिमुग्र- वेगाम् । शूलातिमारादिभिरात्मवर्ग. साकं न सा कं विकलीचकार ॥” इति । इदं च पानीय सद्यस्कमेव ग्राह्य, विलम्बे वैगुण्यात् । ३-सामान्यवमनमपि च । ४-कुडवमितेन । ५-पलाध पला पिवेदिति । उपद्रवे शान्ते तृषि लवशाम्बु पिवेत् ।
१९९ । चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छ.। २६ प्रत्नफणिफेनरामठमरीचशशिपित्तकारिणीवीजैः। गुटिका हन्ति विसूचीमतिसारं वा निगृह्णाति ॥ ३१ ॥ २७ प्रत्येकं भर्जयित्वाऽग्नौ कुचेलाहिङ्गुसादरम् । विमर्याद्भिः कृता वट्यो विसूचीविषयाः स्मृताः ॥ ३२ ॥ २८ छायाविशुष्कं रवमूलवल्कं विशिष्य निम्बूकरसैर्विमर्थ । वट्यो निवद्धाश्चणकप्रमाणा विसूचिका नन्ति कफानिलोत्थाम् ॥३३॥ २९ शोणकसीसमतल्ली मूलस्वरसैविमर्च दिनमर्धम् । मितमेककाकणन्त्या कोष्णजलैान्तिकृद्वाढम् ॥ ३४ ॥ ३० गर्भे गुडस्य पिहितानि तनुत्रशिव्यो रोमाणि वक्रमभितो हविपा विलिप्य । । पुराणी अफीम, हींग, मिर्च, कपूर और लाल मिर्च के वीज इनकी गोलियां विसूची को हटाती और अतिसार को मिटाती हैं ॥ ३१ ॥ पाठा, हींग और नौसादर इन प्रत्येक को अग्नि से भूनकर, पानी से बारीक पीस गोलिया बनालें । ये गोलिया विसूची के भोग विलास रूप है । अर्थात् विषयों से भोगविलास से-जिस तरह, मनुष्य क्षीण होजाता है, उसी तरह, उपरोक्त वटिका रूपी विषयों से विसूची क्षीण हो जाती है ॥ ३२ ॥ अर्क के मूल की छाल को छाया शुल्क बनालें। फिर त्रिकटु, निजात तथा लवणादि मिलाकर उसको निंबू के रस से खूब बारीक पीसले । इसकी चने प्रमाण गोलिया करलें । ये कफ वातप्रधान विसूचिका को नष्ट कर देती है ॥ ३३ ॥ रक्तवर्ण सीसे को, भाधे दिन तक, मूलक स्वरस मे खरल करें । एक गुजाभर मात्रा में कबोष्ण जल के साथ इसे लेने से पर्याप्त वमन होते हैं । यह प्रयोग, अलसक आदि वमनसाध्य रोगों में परम प्रशस्त है। इसके सेवन से यदि वमन अधिक मात्रा मे होने लगे तो मकई के सिरे से दाने निकाल कर उनकी भस्म बनालें। इसको दो माशा भर शीतल नल के साथ लेने से वमनातियोग मे शान्ति मिलती है ॥ ३४ ॥ कौंच की कोमल सेम के ऊपर आच्छन्न रोमावलि को गुड के भीतर रखकर उसको चारो ओर से घृत द्वारा लिप्त करदें (जिपसे रोम का एक भी रेशा बाहर निकला हुमा न रहे)। इसको दिवस में दो तीन बार निगल जाने से क्रिमिजन्य पीडा, विसूचिका तथा तीव्र रक्त वमन मे भी लाभ होता है। (प्रस्तुत श्लोकगत-कौंच के कोमल लोम की औषधीय उपयोगिता को खौरी के इस कथन से मिलाइये- १-त्रिकटुत्रिजातलवणादिक्षेपोऽत्र कार्य । २-प्रशस्तारुणकसीसम् । अलसकादिषु तथा सर्वेषु वमनसाध्येपु प्रयोज्योऽयं प्रयोगो वमनकारी । अनेन वमनातियोगश्चत् मक्किकान- कोपादनं निष्कास्य निरन्नकोपभस्म कृत्वा द्विमाषं शीतलजलैर्देयम् । ३-प्रसङ्गात् क्रिमिनि- कासनप्रकारोऽभिधीयते । क्रिमिकृतजठरमसृणशूलेष्वप्ययं प्रयोग । ४-कवचशिम्ब्योः ।
२०० [पाण्डुरोग- सिहभेषजमणिमालाया द्विस्त्रिर्गिलेत् क्रिमिजरुक्षु विसूचिकाया- नुद्रिक्तरक्तवमथावपि शर्मकामः ॥ ३५ ॥ इत्यग्निमान्द्यादिचिकित्सितम् । पाण्डुरोगचिकित्सितम् । कनककलेवरकान्तिः कपालधारी क्रमेण बलहारी। मुशलपयोगकुशलो वर्जितभोगः स कामलारोगः ॥१॥ १ सितैया कटुकीको द्रोणपुष्पीरसोऽञ्जनम् । देवदालीरजोनस्यं पाण्डुरोगं व्यपोहति ॥२॥ “The hails of the Pods are Vermifuge and given in round wolms They work mechanically by injuring the worms and piomoting then expulsion ” szita Praia de que el गोलकृमि नष्ट होकर बाहर निकल जाते है- Matella Medicn. of India- R N Kholy कौंच के रोमो का स्पर्श करने से शरीर मे असह्य कण्डू उत्पन्न होता है। इसलिये गुढ आदि में मिलाकर लेने की यह योजना मौलिक एव युक्ति युक्त ॥ ३५॥ अग्निमाद्यादि चिकित्सा समाप्त- है - - - पाण्डुरोग - चिकित्सा (कुलप्रयोग १३)- प्रस्तुत श्लोक मे पाण्डुरोग के स्वरूप का वर्णन है। स्वर्ण के समान पीताभ शरीरवाला, कपाल को धारण किये हुये, क्रमशः बल को हरने वाला, मुशलायुध के प्रयोग में कुशल तथा विपयोपभोग-सामर्थ्य से रहित इन्द्रियो वाला, कामला रोग कहलाता है। (कामला रोग का भायुध वस्तुत. 'मृशल' ही है। पाण्डुरोग से आक्रान्त मनुष्य का सपूर्ण देह मूशल से पुन पुन• कुट्टित की तरह छिन्न भिन्न सा हो जाता है। 'मृद्यमानैरिवाइँ ' वाग्भट के 'मृद्यमान' पद का निगूढ अर्थ- मुशल -प्रयोग कुशल' - पाण्डुरोग के इस विशेषणद्वारा यथावत् - चमत्कृत शैली में अभिव्यक्त किया गया है)॥ १ ॥ इस श्लोक मे कोष्ठ, नेत्र और नासा के विरेचनद्वारा पाण्डुरोग के प्रशमनप्रयोग कहे गये है। एक तोला कटुकी चूर्ण को मिश्री में मिलाकर फाकने से कोष्ठ- विरेचन- द्वारा, द्रोणपुष्पी के रस को आंखो मे आंजने से तथा देवदाली के रस का नस्य से पाण्डुरोग तिरोहित हो जाता है ॥ २ ॥ १-अथ क्रमेण पाण्डुचिकित्सिते वक्तव्ये आदौ तत्स्वरूपमेव वर्ण्यते-कनकेत्यादि । २-मुशलायुध इत्यर्थ । ३-अत्र त्रिभि पादै कोष्टनेत्रनासाविरेचनद्वारा पाण्डुरोगनास्त्रयो योगा अभिहिता । ४-द्रोणपुष्पी फलेपुष्पा, सा च 'दणघल' इति लोके ख्याता । 3 ma चतुर्थो गुच्छ । २०॥ चिकित्सितम्] २ रसेन नस्यं कटुतुम्बिकायाः क्षिणोति कोपं किल कामलायाः। योगो महानेप पितामहेन ममोपदिष्टः सदनुग्रहेण ॥ ३ ॥ ३ पिष्टिका चूर्णसितंयोधूमयन्त्राम्भसा कृता । न्यस्ताधि घृताभ्यक्ते पाण्डं लावयति ध्रुवम् ॥ ४॥ ४ रोगिमूत्रप्ठता सप्त प्लोती धार्या गृहोपरि । हृतेपु तेषु काकेन पाण्डव्याधि पलायते ॥ ५॥ ५ तेलेन तन्वतां प्रातः पुंसां गण्डूपसप्तकम् । आपत्तिः पाण्डुजा याति नाशं कतिपयैर्दिनैः ॥ ६॥ ६ पलं वालकमूलीम्बु शर्करामधुरीकृतम् । अयुच्चैर्दुर्जयं हन्ति पाण्डु कतिपयैर्दिनैः ॥ ७ ॥ ७ मापान द्वादश मार्कण्ड्याः पिण्डखजूरपोशीम् । शाणिकामेरुणां सायं जैले क्षिप्त्वोपरि न्यसेत् ॥ ८ ॥ कटुतुवी के रस का नस्य लेने से कामला- प्रकोप क्षीण हो जाता है। यह महान प्रयोग मेरे पितामह ने कृपा करके बताया है ॥ ३ ॥ हुक्के के पानी से चूना और मिश्री को पीसकर पिष्टी बनालें । इस पिष्टीका मस्तक के 'अधिप' नामक मर्म पर लेप करने से निश्चयपूर्वक पाण्डु रोग द्रवित होकर निकल जाता है । पिष्टी का लेप करने से पूर्व अधिप-मर्म को घृतद्वारा अभ्यक्त कर लेना चाहिये ॥ ४ ॥ रूई के सात फोहों को, रोगी के प्रात कालीन मूत्र मे सिक्त करके घरकी छत पर रखदे। काकद्वारा इन फोहो के अपहरण के साथ ही साथ पाण्डुरोग भी अपहृत हो जाता हे ॥ ५ ॥ प्रात काल तिलतैल के सात गंडूप धारण करने से पाण्डु - विकार कुछ ही दिवसों मे नष्ट हो जाता है ॥ ६॥ बाल-मूलि के स्वरस को शर्कराद्वारा मधुर बनाकर पीने से उग्र पाण्डुरोग भी सात अथवा नौ दिवसो में मिट जाता है ॥ ७ ॥ सनाय बारह मासे, पिंडखजूर सोलह तोला तथा मंजिष्ठा तीन माशा इन को जल में भिगोकर सायंकाल को घर की छत पर रखदें। (इनमें मञ्जिष्ठा को थोडी कूट १-तिक्तालाब्वा । २-सुधाखण्डजचूर्णसितोपलयो । ३-धूमयन्त्र लोके 'हुक्का' इति प्रसिद्धं, तदभ्यन्तरस्थजलेन । ४-"आन्तरो मस्तकस्योर्ध्व सिरासधिसमागमः । रोमावर्ती- ऽधिपो नाम मर्म सद्यो हरल्यसून् ॥” इति प्रोक्तखरूपे । ५-मूत्र च प्रात कालिकं ग्राह्यम् । ६-कासखण्डानि ‘फोहा' इति च प्रसिद्धि । ७-तैलं चात्र सामान्योक्तत्वेन मुख्यमेव ग्राह्यम् । ८-बालमूलकाना स्वरसम् । ९-सप्तभिर्नवभिर्वा । १०-'सनाय' इति प्रसि- द्वाया । ११-पलम् । १२-मञ्जिष्ठां मनाक क्षुण्णामित्युपरिष्टात् । १३-कुडवप्रमाणे ! १४-प्रासादस्योपरीत्यर्थ । इच्छा चेच्छकराया पलमपि क्षेप्यम् ।
सिद्धभेषजमणिमालाया [पाण्डरोग- प्रातर्निष्कम्पमानाव्य तदम्वु परिशीलयेत् । पाण्डुपित्तास्त्रकण्डूतिज्वरघ्नं मूत्ररेकतः ॥९॥ ८ वर्षासु यत्र यान्ति ग्रामप्रक्षालनोदकानि वहिः । तत्रत्यशमीकिसलयकल्क ससितं पिवन्तु पाण्डुरुजि ॥ १०॥ ९ शकटाक्षकिट्टवठ्यः शनैः शनैः पाण्डुरोगनाः । तदुपादानपदार्थ कथयामश्वाञ्चचं तैलम् ॥ ११ ॥ २० कलसोरैमरालपदं विडालपदकानि पञ्च मधुरायाः । चूर्णं गद्याणमितं पय॑सा सह पाण्डुमपहरति ॥ १२ ॥ ११ मण्डूरपथ्याकटुकीरजांसि पीतानि गोमूत्रविलोडितानि । कुर्वन्ति मृत्स्ना परिपूर्णकोष्ठसंमार्जनं सत्यमिदं वदामि ॥ १३ ॥ लेनी चाहिये । अवशिष्ट द्रव्य यथावत् भिगो देने चाहिये ।) अब, प्रात काल, पात्र- गत जल को, हिलाये बिना, वस्त्र-पूत करके उपयोग मे लेवें । यह पाण्ड, पित्त, रक्तविकार, खुजली और ज्वर को प्रशमित करता है। इससे मूत्र प्रचुर मात्रा से खुल कर आयेगा। क्वचित् विरेक की भी सभावना है ॥ ८-९॥ वर्षाऋतु मे, गांव में से बहकर पानी जिस जगह एकत्रित होता हो उस जगह उत्पन्न होने वाले विशाल शमीवृक्ष की (दो तीन तोलाभर) कोमल पखुड़ियों को लेकर कल्क बनाले । इसको पानी में घोलकर वस्त्रपूत करले। फिर शक्कर मिला- कर पीने से पाण्डुरोग मे लाभ होता है ॥ १० ॥ बेल-गाडी के पहिये की, एरड तैल से सिक्त धुरी के स्नेह-किह की गोलिया बनाकर सेवन करने से पाण्डुरोग शनै शनै. शान्त हो जाता है। (धुरीगत एरड- तैल के अतिरिक्त अन्य द्रव्य के तैल का किट्ट यह प्रभाव नहीं रखता। इस ‘स्नेह- किट्ट' को सौराष्ट्र मे 'मली' कहते है। वहा के ग्रामीण-जन पाण्डु रोग मे इसका उपयोग करते है।)॥ ११ ॥ कलमी सोरा एक माशा, मिश्री सोलह माशा, इनको मिलाकर चूर्ण करलें। इसकी तीन माशाभर, शीतल जल के साथ फाकी लेने से पाण्डुरोग मिट जाता है॥१२॥ । मंडूर, हरडे और कटुकी इनको यथामात्रा में लेकर चूर्ण बनाले। इनको गोमूत्र में घोलकर पीजाये। यह कोष्ठ- गत मिट्टी को बुहारकर बाहर फैंक देता है । यह सत्य है ॥ १३ ॥ । १-उपलक्षणमिदं, तेन पुरीषरेकोऽपि भवतीति लभ्यते । २-शमी लोके 'खेजहा' इति ख्याता, सा च महती नाल्पेति । तस्या किसलयाना द्वितोलकमिताना कल्कं शर्क- रया जलेन लुलित पेयम् । ३-शकटस्याक्षे चक्रे स्थितं यत् स्नेह कि तन्निर्मिता वध्य । .४-एरण्डोद्भवम् । ५-'कलमी सोरा' इति प्रसिद्धक्षारविशेपस्य मरालपदं सुवर्णम् । ६-सितोपलाया । ७-शीतलजलेन । ८-दोषदृष्यप्रकृत्यायनुसारं कल्पितमानानि ।
२०३ चिकित्सितम्]] चतुर्थों गुच्छ.। १२ भाण्डस्थमाढकं साभि गुडानोऽयंसः पृथक् । भूगूढं पच सप्ताहं स्यादर्कः पाण्डुरोगनुत् ॥ १४ ॥ १३ पिचुमर्दविशालाभागृध्रनखीकोविदारनियूहः । शमयति गुडेन मधुरः पाण्डुविवन्धोपदंशार्तिम् ॥ १५ ॥ इति पाण्डुरोगादिचिकित्सितम् - - गुड २५६ तोला, तथा इससे चतुर्थभाग दही और इतनी ही मात्रा में पुराणा- मलाढ्य - लोहचूर्ण, (ग्वारपाठे का रस और गोमूत्र प्रत्येक चोसठ तोला, सोरा सोलह तोला, ये द्रव्य अधिक लेवें) इन सबको एक पात्र मे भरदे । इस पात्र को खूब गहरे भू-गर्त में स्थापित करके उसके ऊपर अजा की शुष्क गोवरी तथा तुष आदि की अनवरत अग्नि दें। इस तरह सात दिवस पर्यंत अग्नि से इसे पकावें । यह सिद्ध अर्क पाण्डुरोग को नष्ट कर देता है ॥ १४ ॥ निव की अन्तर्जाल, इन्द्रवारुणी के मूल, बम्बूल के फल, कण्टकारी के मूल, कच- नार की छाल, (और कटुकी, यह अधिक ले) प्रत्येक सोलह तोला लेकर जौकुट करले। फिर एक दिन भर बारह प्रस्थ जल मे भिगोकर रहने दें। दूसरे दिवस इसमे करीव बत्तीस तोला पुराणा गुड मिलाकर इसे उकाले । जब तीन प्रस्थभर पानी अवशिष्ट रह जाये, तब इसे उतार कर कुछ शीतल होने पर वस्त्रपूत करले। इस कपाय का रोग और रोगी के बलानुसार मात्रा मे सात दिवस तक ही सेवन करें। इससे पाडु, मलावरोध, रुधिरविकार, उपदंश आदि उग्र व्याधिया प्रशमित हो जाती है। पथ्य मे चांवल, मूंग की खीचडी घी मिला कर ले । नमक की जगह सैवव अल्पमात्रा में लेवें ॥ १५ ॥ - पाण्डुरोग-चिकित्सा समाप्त- १-अयश्चात्र पुराणतरं मलाढ्यमेव ग्राह्यम् । कुमारीगोमूत्रयो पृथक्प्रस्थं सौरकुडवमि- त्यधिकमत्र । २-तदुपरि छागकरीषचूर्णतुषादितापश्चानवरत रक्षणीय इत्युपदेश. । ३-पिचु- मर्दो निम्ब , तस्यान्तरत्वग्ग्राह्या। विशालायाश्च मूलम् । आभा वम्बूल , तस्य फलम् । गृध्रनखी कण्टकारी, तस्या मूलम् । कोविदार. 'कचनार' इति ख्यातः, तस्य त्वग्ग्राह्येति । एतदौषधजात पृथक्कुडवमितं यवक्षुण्णं द्वादशप्रस्थे जले दिनमेक समावाप्य शरावसमित पुराणगुडं प्रक्षिप्य द्वितीयदिने पाकात् प्रस्थत्रयशेषेऽवतार्य पटपूतं काचभाण्डे विन्यसेत् । महान्याधौ सर्वमेवैतद्यथायथ विभज्य सप्तदिनैरेव पिबेत् । अपव्याधौ च दोषानुसार मात्रा कल्पनीया । पथ्यमत्र तन्दुलमुद्गकृशरा सघृता अल्पसैन्धवा, अथवा अर्धचणकगोधूमफुल्लिका वृतप्लुता । इच्छा चेदुग्धमपि, केचिदत्र कटुकीमपि प्रक्षिपन्ति । रक्तविकारेऽप्ययं प्रचरति । -- सिन्भेषजमणिमालाया [रगपिन- अथ रक्तपित्तचिकित्सितम् । १ न्यस्य साप्त पुष्पाणि द्वित्रिनिम्वृकपायसि । तरुणीकेतकोत्थार्क द्विपलं द्विपलं क्षिपेत् ॥ १ ॥ प्रमृतिप्रमितं खण्ड काचकृप्यां समापेत् । दृढदनपिधानां तामाकण्ठं वारि विन्यसेत् ॥२॥ व्यहादूर्ध्वं तु संगाल्य कृप्यां भृत्वा जले न्यसेत् । तमेतमौद्रपुप्पार्क सिद्ध गोणितशोणिमम् ॥ ३ ॥ कर्ष कर्प पिवेद्वित्रिः पित्तास्रक्षुभितो नरः । २ अनेनैव विधानेन कर्तव्योऽर्कः परपकः ॥ ४॥ ३ वरा खैर्वा शिवा मजा वितुनकसमुहवः । पृथक् सपादपलिका चूर्णयित्वा विभावयेत् ॥ ५॥ - रक्त-पित्त चिकित्मा (कुल बारद प्रयोग)- गुडहलके ताजे सात पुप्पो को (छह पंसुढियो बाले अधिक गुण युक्त होते है) प्रात. दो या तीन निबूमो के रस मे काष्ठ की कडली से अच्छी तरह हटकर मिला देवें। फिर, एक काच की शीशी में भरकर रसंद । उसी दिन मां को, उनी शीशी में गुलावअर्क, केवडामर्क, स्वच्छ बूरा भार जल प्रत्येक भाठ भाठ तोत्रा लेकर भाकल भरदें। शीशी के मुख को मजबूत डाट से वध करें। तीन दिवस पीछे इस रस को वस्त्रपूत करके, पुनः मजबूत डाटवाली गीगी में भरकर उसे जलपूर्ण पात्र में रख देवें । इस तरह रक्तवर्णाभ प्रौढ़- पुष्पार्क सिद्ध होता है। दिवस मे, एक - एक तोला दो तीन बार पीने से रक्तपित्त से पीडित मनुष्य को शाति मिरनी है। इसी विधिपूर्वक, उपरोक्त गुणो से युक्त, फालसेका मर्क भी निर्माण करें। फारमा, यहा भाठ तोरा भर मात्रा मे लेवें ॥ १-४ ॥ त्रिफला, जवाहरडे और धनिये के ठठल का भीतरी रेशेदार भाग (मजा) प्रत्येक १-पित्तोद्रेकसायात् पाण्टुरोगानन्तर रत्त.पित्तमभिधीयते। तनादी न्यसेत्यादि- चतुर्भि श्लोकैरेको योग । २-चतुर्याममिति शेप । ३-पुप्पसख्येयम् । ४-सद्योल- नानि जपापुष्पाणि । तानि च सप्तच्छदानि चेद् गुणाधिक्यम् । ५-अनुक्तमपि पटपलं जलमत्र क्षिपेत् । ६-सण्डं च धोतमादेयम् । ७-समावापविधिश्च यथा-प्रात काचपाने सुमानि योग्यैनिम्बुरसैराप्लाव्य दारूदा सक्षोभ्य कूप्या मृत्वा यावद्दिनं रक्षेत् , साय च पुष्पार्क सखण्ड जल च निक्षिप्य दृढं पिदध्यादिति । ८-सप्तम्यन्तम् । ९-विनान्यासे वैशिष्ट्यं प्रतिपाद्यते, तेन च शिलादिना दृढ कूपी यन्त्रितव्येति ध्वन्यते, नोचेदर्कवेगादु- फणनसभव । १०-पूर्ववदृढपिवानमत्राप्यावश्यकम् । ११-पित्ताखस्योपलक्षक्त्वात् सौजाकरक्तमण्डलादेरपि ग्रहणम् । १२-द्विपलप्रमाणे , विधिश्च पूर्वोक्त एव । बहुवचनं चाद्यर्थोपलक्षक, तेन राजजम्बूफलादीनामपि ग्रह । १३-खर्वा शिवा चेतकीनामा हरीतकीविशेप, 'जवाहरडे' इति लोके प्रसिद्धि । । .
२०५ । चिकित्सितम] चतुर्थों गुच्छ । वातामजेन तैलेन द्विगुणे माक्षिके क्षिपेत् । खादेदृप्रमाणं तद्भुक्तस्यान्ते सुखप्रदम् ॥ ६॥ रक्तपित्ताक्षिरुकोष्ठदाहविष्टम्भनाशनम् । नास्त्यनेन समः कश्चित् प्रयोगो यावने मते ॥ ७॥ ४ स्वाहीफैलानां परिचूर्णितानां प्रत्नत्वेभाजा मधुनाऽवलेहः । असृग्विकार परिहत्य पुष्ट्यै प्रकलायते तथ्यमुदीरयामः ॥ ८ ॥ ५ द्विगुणितसितानि पयसा किशुककुसुमानि कुडवकलितानि । पित्तात्रसृतिहराणि स्त्रीणा तारुण्यमपि दधति ॥९॥ ६ दुरालभाकिसलयैः कल्कं विरलवेल्लजम् । सुखाय मेहतां रक्तं सर्वतोमुखंगालितम् ॥ १० ॥ ७ लवङ्गघूमपानेन रक्तवान्तिः प्रशाम्यति । मानं मन्ये लवङ्गानां शाण गद्याणमेव वा ॥ ११ ॥ समाचार तोला, इनका एकत्र सूक्ष्म चूर्ण बनाकर इस मे इस चूर्ण से द्विगुणित दोनों माक्षिक (स्वर्णमाक्षिक तथा रूप्यमाक्षिक) मिला । फिर इन सबको बादाम के तैल की भावना दे । भोजनोपरात, चार माशा भर मात्रा में सेवन करने से स्वास्थ्य लाभ होता है। यह प्रयोग रक्तपित्त, मासो की पीडा, कोष्टगत दाह तथा मलावरोध नष्ट करता है। इन रोगों मे, यावनमतानुसार, इसके समान कोई अन्य उत्तम औपधि नहीं हे ॥ ५-७ ॥ छुहारों के सूक्ष्म चूर्ण में पुराणा शहद मिलाकर अवलेह बनाले। यह लेह रुधिर- विकार को दूर करता तथा पुष्टि देता है। यह तथ्यपूर्ण कथन है ॥ ८ ॥ पलाश के पुष्प सोलह तोले तथा इससे द्विगुणित मिश्री इनको पानी के साथ लेने से रक्तपित्त नथा रक्तस्राव में लाभ होता है। दूध के साथ सेवन से स्त्रियो को तारुण्य की प्राप्ति होती है ॥ ९॥ जवासे की कोमल पत्तियो मे थोडी उत्तम जाति की काली मिर्च मिलाकर क्ल्क बनालें । इस कल्क को पानी मे छानकर पीने से मूत्र गत रक्तस्राव बन्द हो जाता है ॥१०॥ लौंग के धूम्रपान से रक्तवमन प्रशमित होता है । लौंग तीन अथवा छह माशा भर ही लेनी चाहिये ॥ ११ ॥ १-सर्जूरीफलाना 'छुहारा' इति लोकख्यातानाम् । २-मधुनश्च प्रत्नत्वेनैव गुणा- धिक्यमित्यायुर्वेदसमय । ३-दुग्धेन जलेन चेत्यर्थद्वयमपि व्यवस्थितविकल्पविषयत्वेन सघटते, तथा च पित्तास्रस्त्रीविपये दुग्धेन, अतिसूतौ जलेनेति । पक्षावधि प्रयोगसेवा। किच योगोऽय कोठोदर्दादिपु रक्तविकारे पाण्वादिपु चाप्यवचारणीय । ४-धन्वयासपल्लवै । ५-सर्वतोमुख जलम् ।
२०६ सिहभेपनमणिमालायां [रमापिन- ८ चिञ्चावल्कलकरकं गौरीपापाणमिश्रितं निहितम् । अधिपोपरि तदनु वरास्वरसाठोतं रुणद्धि नासानम् ॥ १२॥ ९ नासारुधिरनिरोधकरमिति योगं समवेहि । खरीपुरीपभवं रसं नासिकयोलघु देहि ॥ १३ ॥ १० सितासहायो मोरंटो मायुज्वरजोपेपु । सखे ! यथारुचि पीयता मधिरारुचिशोपेषु ॥ १४ ॥ ११ गव्यं धारोष्णमौधस्यं यथेच्छं पिवता नृणाम् । रुधिरक्षोभैजा रोगा जायन्ते न हि जातुचित् ।। १५ ।। १२ भक्त मिथो विभक्तं साधय सितशर्करासमासक्तम् । तद्वरति रक्तपित्तं वेश्याचित्तं यथा वित्तम् ॥ १६॥ इति रक्तपित्तचिकित्सितम् । घीयाभाटा को इमली की छाल में मिलाकर कल्क बनाल । हम कल्क को मस्तक के 'मधिप' नामक मर्म पर कुछ देर के लिये रवंदे। फिर उसपर त्रिफला स्वरस से सिक्त फोहे को स्थापित कर देने से नासिका - गत रक्तवाव बंद हो जाता है ॥ १२॥ गदही के लीद का थोटा रस नाक में डालने से, नासागत रुधिर साप रुक जाता है ॥ १३ ॥ फटे हुये दूध के जल भाग मे मिश्री मिलाकर पीने से, पित्त-ज्वर, रुधिर- स्राव, अरुचि और शोप मे लाभ होता हे ॥ १४ ॥ गाय के धारोप्ण दूध को यथेच्छ मात्रा में पीने वाले मनुष्य को, प्रथि, दद्रु, विस्फोट आदि रक्त-दुष्टि जन्य रोग कभी उत्पन्न नहीं होते ॥ १५ ॥ स्विन्न भात मे समान भाग स्वच्छ बूरा मिलाकर भोजन करे । वित्तसे वेश्या के चित्त की तरह यह सिद्धभात, रक्तपित्त को हर लेता है ॥ १६ ॥ रक्तपित्त-चिकित्सा समाप्त । १-गौरीपाषाण ‘गाईभाठा' इति नान्ना प्रसिद्धः । २-मुहूर्तमात्रम् । ३-दोहा- वृत्तमिदम् । ४-इदमपि तथा । ५-नष्टक्षीरस्य द्रवभाग । ६-क्षीरम् । ७-ग्रन्थि- दगुस्फोटादिकाः ।
अथ राजयक्ष्मचिकित्सितम् । १ मुस्तामरिचचव्याग्निं निशाकृष्णाविडङ्गकम् । आमलोगीरशैलेयपूगलोध्रद्विपत्रकम् ।। १ ।। कवीश्रीखण्डतगरमांसीदारुसितासुमम् । गुन्दणीनागपुष्पाणि त्रिपिचूनि पृथक् पृथक् ॥ २॥ प्रस्थार्ध धातकीपुष्पं द्राक्षा प्रस्थैस्त्रिभिर्मिता । पुराणः पञ्चदशभिः प्रस्थैः संकलितो गुडः ॥ ३ ॥ भाण्डे पड्विंशतिप्रस्थशम्बरे घृतंचिक्कणे । क्षित्वा सर्व पिधायाथ पक्षमा निधापयेत् ॥ ४॥ प्रमृद्य गालितोऽत्यर्थ फाण्टः स्याञ्चित्तचन्दिरः । कासं श्वासं क्षयं मान्यं वन्धं हन्ति प्रकाशते ॥५॥ - राजयक्ष्मा- चिकित्सा (कुल चार प्रयोग)- नागरमोथा, मरिच, चव्य, चित्रक, हलदी, पीपल, वायविडंग, आंवला, खस. छाडछडीला, सुपारी, लोध, तमालपत्र, वर्कतिवाका, कटुकी, चदन, तगर, जटामासी, देवदारु, दालचीनी, गूदी, नागकेसर प्रत्येक चौवीस माशा लेवे । (पिचु, कर्षका अपर- पर्याय है। कप एक तोला वजन का नाम है । आप्टे के कोष के अनुसार पिचु- तथा कर्ष दो तोलाभर वजन में प्रयुक्त होते है। प्रस्तुत श्लोक मे पिचु से आठ मापा का ग्रहण किया है। अत त्रिपिचुका अर्थ चौवीस मापा हुआ।) धाय के फूल बत्तीस तोला, किसमिस दास तीन प्रस्थ तथा पुराणा गुड पदरह प्रस्थ लेवे । अब, एक मिट्टी के घट को भीतर घृत से चुपड कर चिकना बनालेवें। इस घट मे उपरोक्त सभी औषधीय- द्रव्य तथा छब्बीस-प्रस्थ जल डाल देवे। घट के मुख को अच्छी तरह बंद करके पदरह दिवस पर्यंत इसी तरह रहने दे। फिर, घट- गत द्रव्य को खूब मरालकर छानलें । इस तरह से सिद्ध किये गये इस फाण्ट को 'चित्तचन्दिर' कहते है। यह फाण्ट यथानाम तथा गुणवाला है (अर्थात्-चित्त चन्दयति-चित्त को आल्हादित करता है।) कुछ मादक गुण से युक्त यह फाण्ट कास, श्वास, क्षय, अग्निमाद्य, मलावरोध आदि को मिटा देता है ॥ १-५॥ १-राजयक्ष्मण्यपि शोणितनिर्गमनं भवतीत्यतो रक्तपित्तानन्तर शोषचिकित्सित मु- च्यते । तत्रादौ पञ्चभि श्लोकैश्चित्तचन्दिरफान्ट । २-शिलापुप्पं 'छाडछडिला' इति लोके प्रसिद्धम् । ३-एकं तमालपत्रं 'पत्रज' इति नाम्ना प्रसिद्ध, द्वितीय च 'कश्मीरीपट्टा' इत्य- परप्राकृतं 'वर्कतिवाका' इति नाम्ना प्रसिद्धमिति द्विपत्रकम् । ४-गुडत्वक् 'दालचिनी' इति प्रसिद्धा । ५-गुन्दणी 'गून्दी' इति ख्याता। ६-पिचुरत्राष्टमाषो विवक्षित । ७-षड्विंशतिप्रस्थमितं शम्बर जल यस्मिन् तत्तथा। ८-'चित्त चन्दयति आहादयति' इति चित्तचन्दिरोऽन्वर्थसज्ञ । मात्रा चास्य तोलद्वयोन्मिता, पथ्य च गोधूमफुल्लिका मुद्ग- सूपः पुरातनतन्दुलकृतभक्तम् । ९-किञ्चिन्मदयतीत्यर्थ ।
२१० - सिद्धभेषजमणिमालायां [ कासहिकाश्वास- १ क्षुद्रामुकूलसुमदारुसिताटरूपभैपज्यपौष्करकुलिञ्जनजूफिकाभिः। संसाधितात् खदिरसारसखात् कपायादाप्नोतिनोविकसनंकसनं कदाऽपि २ मधुककुलिञ्जनवृहतीदारुसितापञ्चवक्त्रसंभूतः। क्वाथः सितासनाथः कासहासं समारभते ॥५॥ ३ त्रुटिमरिचकपायःस्फीतखण्डासहायः कसनपरिभवाय स्याद्रुचेर्वैभवाय गलगदशमनाय श्लेष्मणोनिग्रहाय ज्वलनसमुदयाय च्छर्दिविच्छेदनाय ४ आफूकवीजानि पलोन्मितानि पानीयपिष्टानि सितासितानि । पृथक्पयासि क्वथनाद्यदा स्युस्तदा पवित्राणि दृगूपणानि ॥ ७ ॥ प्रातर्निपीतानि दिनैः कियद्भिः शुष्कस्य कासस्य निवर्हणानि । पानीयविल्वं यदि वा द्विविल्वं सिता समाना यदि वाऽर्धमाना ॥ ८॥ ५ अङ्गारतप्तकरके कीर्णमरिचचूर्णधूमसंस्कारे । भृतमुत्फणनजवाद्वहिरभिपतितं खलु पयोऽपि कासघ्नम् ॥९॥ । छोटी कण्टकारी (अथवा पिण्डखर्जूरी - छुहारा), पिस्ताके फूल, दालचीनी, अरडूसा, झूठ, पुष्करमूल, कुलिंजन और जूफिका इनको एकत्र करके कषायसिद्ध करलें । इस में खैरसार मिलाकर पीने से कास का विकास रुक जाता है ॥ ४ ॥ मुलेठी, कुलिंजन, बडी कंटकारी, दालचीनी और अरडूसा इनके क्वाथ मे मिश्री मिलाकर पीने से कास का हास होता है ॥ ५॥ स्वच्छ - शर्करा से युक्त, इलायची और मरिच का कपाय, कास को हटाने वाला, रुचि को बढाने वाला, गलेके रोगका शामक, कफका अवरोधक, जठरानल का वर्धक और वमन का विच्छेदक कहा गया है ॥ ६ ॥ b करीब चार तोलाभर खसखस के दानो को, उनमें मिश्री मिला पानी से खूब बारीक पीसकर, दूध में उकाले । उकलते उकलते जब दूध फट जाये, तब वस्त्रपूत करके तथा उसमें दो तीन श्वेतमरिच का चूर्ण मिलाकर नियमित प्रातःकाल पीये। इस तरह सात या नौ दिवस मे ही शुष्ककास की निवृत्ति हो जाती है। उपरोक्त योग मे खसखसके दाने तथा मिश्री प्रत्येक चार तोले एवं पानी चार या आठ तोले लेवें ॥ ७-८॥ मरिच-चूर्ण भुरकाकर उसकी धूम से सुवासित किये गये, अग्नि- तप्त सकोरे १-मुकूल 'पिस्ता' इति लोके, तस्य पुष्पम् । २-अनेनैव नाम्ना प्रसिद्धा । ३-पञ्चवक्त्र आटरष । ४-'खसखसदाणा' इति प्रसिद्धानि । ५-सितया शुभ्राणि । ६-नष्टक्षीरवत् क्वयनाद्यदा पृथग्भूतपयासि भवेयुस्तदा पटपूतानि कृत्वा चौताना द्वित्रिम- रीचानां रजोभिश्चमत्कृतानि पिबेदिति । ७-सप्तभिर्नवभिर्वा । ८-समासे गुणभूतस्यापि पानीयशब्दस्य बुद्धया विभज्योभयत्राप्यनुवृत्ति कार्या “अय शब्दानुशासनं, केषा ? शब्दाना लौकिकाना वैदिकाना च" इतिवत् । ९-बीजसमाना जलसमाना वा। १०-क्रवा' इति प्रसिद्धमृत्पात्रविशेषे ।
चिकित्सितम्] चतुर्थी गुच्छ.। २११ ६ निर्वाप्य खादिरोल्मुकमणसि संरुद्धधूमनिर्गमनम् । तत्पिच यथापिपासं कासं हातुं यदीच्छसि भ्रातः॥ १० ॥ ७ श्लप्णां पिष्ट्वा जूफिकां वस्त्रपूतां कृत्वा पङ्के शार्करे मेलनीया। लोके सैपा स्याद्दयाकुञ्जनाम्नी कासं का संनाशयेद्यां विनाऽत्र ॥११॥ ८ अच्छाच्छशर्कराशुक्लगुन्द्रजः गीतशार्करः। पित्तांशविद्धवातोत्थं शुष्ककासं नियच्छति ॥ १२ ॥ ९ स्विन्नफणिफेनफलयुगरसजनुषि सितोपलाम्रतन्तुल्याम् । वाम्बूलो निर्यासो यष्टीसत्त्वं सवातामम् ॥ १३ ॥ प्रत्येकतोलतुलितं प्रणीय सान्द्राऽवलेहिका कार्या । लिह्यात् द्विसंध्यमेनामनिलोल्वणशुष्ककासातः ॥ १४ ॥ १० सिंहास्यरससंसिद्धहरिद्राखण्डचूर्णकम् । दुग्धसंतानिकालीढं शुष्फकासनिवर्हणम् ॥ १५ ॥ में उफान के वेग से छलक कर बाहर पडे हुये दूध को, भरदें। इस दूध के पीने से सासी नष्ट हो जाती है ॥ ९॥ अर्ध- दग्ध सदिर वृक्ष की जलती हुई शाखा को पानी में बुझादें । बुझाते समय पानीके पात्र-मुख को शीघ्र ही ढकटें जिससे धूम बाहर न निकल सके। इस जल को, जब जब प्यास लगे, तब तब पीने से सांसी नष्ट हो जाती है ॥ १० ॥ जूफिका को पानी से खूब बारीक पीसकर वस्त्रपूत करलें। फिर इसे शक्कर की चासनी में मिला देवें । इस तरह से सिद्ध इस 'दयाकुंज' के अतिरिक्त भूतलपर खांसी को नष्ट करनेवाली अन्य कौनसी औषधि हे ॥ ११ ॥ अत्यंत स्वच्छ बूरे के समान श्वेतवर्ण, बबूल के गुंद्र से निर्मित शीत 'शार्कर' के सेवन से, पित्तानुबन्ध-वातप्रधान - शुष्क कास मिटजाती है ॥ १२ ॥ पोस्त के डोडे नग दो लेकर उन्हे स्विन्न करके उसमें से रस निकाललें, इस में दो तोलाभर शक्कर मिलाकर चासनी बनालें । इस चासनी में बबूल का गूद, मुलेठी का सत्व तथा वादाम प्रत्येक एक एक तोला मिलाकर अवलेह निर्माण करलें । इसको प्रतिदिन सुबह साझ लेने से वातप्रधान शुष्क कास की वेदना से मुक्ति मिलती है ॥ १३-१४ ॥ भरदसे के रस में सिद्ध किये गये हरिद्रा खण्ड के चूर्ण को दूध की मलाई के साथ लेने से शुष्ककास शांत हो जाती है ॥ १५ ॥ १-ज्वलदर्वदग्धसदिरकाप्ठम् । २-या दयाफुलनाम्नी विना अत्र लोके का औपधिः कास रोगविशेष सनाशयेत् , न काऽपीति काकु । ३-वम्बूलगुन्द्र । ४-सिंहास्य आटरूप । १ २१४ सिद्धभेषजमणिमालाया [कासहिकाश्वास- २३ दीप्तच्छगणभस्मान्तःसिद्धं क्लीतकेसैन्धवम् । चूर्णितं कासनुत् पर्णक्षौद्रसंतानिकादिभिः ॥२८॥ २४ कसनश्वसनवलासैवलवद्भिर्यदि विशिष्य परिभूतः । लवणहरिद्रासंभृतधत्तूरफलस्य भस्म भुक्ष्व सखे! ॥२९॥ २५ परिणामविदलितानां भस्म फलानां फलेन्द्रायाः। कसनेषु श्वसनेषु प्रयोजयेत्तत्तदनुपानैः ॥ ३० ॥ २६ लोहितगुरुतरगैरिकमतल्लिकामर्धकोकिलां पिष्टा । लुलितां पयोभिरम्वरपूतां परिढालयेदधिस्थालि ॥३१॥ कलिता तत्कत्तलिका भिषजामुपकारिणी नियतम् । कसनश्वसनादिजये सारं सर्वात्मना हसति ॥ ३२॥ - इति कासचिकित्सितम् - A मुलेठी को सैंधव-जल की भावना देकर सपुटित करके प्रदीप्त कण्डों की राख (भस्म) के भीतर रखदें। नागरवेल के पान के साथ अथवा मधु, मलाई भादि के साथ इस चूर्ण को लेने से कास का शमन होता है ॥ २८ ॥ । धत्तूर - फल में से थोडे वीज निकाल उसमें नमक और हरिद्रा के चूर्ण को भर कर कपडमिट्टी करके कण्डों की अग्नि से उसकी भस्म बनालें। हे मित्र' यदि भाप श्वास, कास तथा कफ के उग्र-वेग से परिपीडित है तो इस भस का उपभोग करें २९ राज-जामुन के परिपक्व फलो को छाया-शुष्क करके उनकी भस्म बनाले । यथोपदिष्ट भनुपान पूर्वक इस भस का उपयोग सभी प्रकारके कास और श्वास मे प्रशस्त कहा गया है ॥ ३० ॥ वजन में भारी एवं रक्त- वर्ण युक्त उत्तम स्वर्णगैरिक, तथा इससे अर्ध मात्रा में बादामी कोयले (soft cocke) इन दोनों को खूब बारीक पीस तथा वस्त्र-पूत करके एक थाली में ढाल देवें । जमजाने पर इसकी छोटी छोटी चक- त्तियां (कतलिका) चाकू से काटकर निकाल लें। ये कतलिकायें श्वास, कास आदि विकारो में परम हितावह अत एव वैद्यों की निःसदेह उपकारक तथा गुण और वर्ण मे, सभी प्रकार से, लोह - भस्म से भी उत्तम मानी गयी हैं ॥३१-३२ ॥ -कासचिकित्सा समाप्त- दूध में घोलकर १-भस्मान्तरेऽवकूलनात् सिद्ध पुटपाकरीतिसिद्धमिति यावत् । २-फ्लीतकं यष्टीमधु । तच्च सैन्धवजलमावितम् । ३-किञ्चिन्निष्कासितवीजस्य । ४-पक्कतरपरीक्षेयम् । ५-राज- जम्ब्वा । ६-प्रशस्तवर्णगैरिकम् । प्रशस्तत्वं च लोहितगुरुतरत्वमेव । कोकिलानि चात्र मार्तिकाणि 'भरावाकोईला' इति प्रसिद्धानि । ७--गोदुग्धै । ८-लोहभस्म । ९-तत्स- इशत्वादिति कूटलोहभस्मकरणप्रकारोऽयं वर्णितः ।
अथ हिक्काचिकित्सितम् । १ पृथक् स्वादुसुरक्षानमृत्खण्डे' वार्धितोलके । यासं प्रस्थकलामानं द्विप्रस्थेऽम्भसि साधयेत् ॥ १॥ अष्टमाशं समुत्तार्य पूतमल्पाल्पशः पिबेत् । कलांशखण्डमसकृदुग्धमुष्णं पिबेदपि ॥२॥ समाप्यन्ते ततो हिकाश्वासकासव्यथाकथाः । २ तैलप्लुता विवस्वत्सूनगर्भगलवङ्गिकैकैव । सहसा कण्ठे क्षिप्ता हिक्कां हन्ति महदेतदाश्चर्यम् ॥ ३ ॥ ३ विनिवेश्य कुटीयन्त्र रहसि हसंन्त्यां विशिष्य विहसन्त्या । तत्रस्थ मिहिरदैलं पच दोनवदुग्धिकाभित्तैः ॥ ४॥ एवं मुहुः कृते सति नभोनिभं भस्म तस्य जायेत । हिकाकासश्वासचन्मान्धवलासवातरुजि देयम् ॥ ५ ॥ द्राक्षापर्णक्षौद्राण्यनुपानान्यस्य रक्तिका मात्रा। भेपजसिदमर्पितवानन्तेवासी स मे सदानन्दः ॥ ६ ॥ इति हिकाचिकित्सा। . - हिक्का चिकित्सा (कुल प्रयोग-३)- मीठा सुरजान, ठीकरी तथा जवासे के मूल प्रत्येक चार चार तोला लेकर, १२८ तोले पानी में भष्टमाश शेप रहने तक उकाल लेवें। फिर उतारकर वस्त्रपूत करके अल्प मात्रा से दिवस मे कई बार पीवें । साथ ही गरम गरम दूध को भी उसमे चतुर्थांश शक्कर मिलाकर पीते रहे। इससे हिक्का, श्वास और कासजन्य व्यथा की कथा का अन्त हो जाता है ॥ १-२॥,अर्कपुप्प के अन्तर्गत लवद्भिका नग एक लेकर उसे तैल में सिक्त करके सहसा गले में डाल देवें। इससे हिक्का नष्ट हो जाती है। यह परम आश्चर्य पूर्ण प्रयोग है।। ॥ ३ ॥ छह माशाभर एक सूक्ष्म ताम्र पत्र को प्रतप्त अर्क दुग्ध मे सात बार बुझावे देकर शुद्ध बनालें। फिर निर्वात प्रदेश में, एक प्रज्वलित अंगीठी पर रखे हुये कुटीयन के भीतर इस पत्र को स्थापित करके उसपर करीव आठ १- मीठा सुरजान' इति प्रसिद्ध, तच्च मैसरो वन्यशृङ्गाटविशेषः । २-मृत्खण्ड “ठीकरी' इति ख्यातम् । ३-कटपयादिक्रमेण सख्याभिधानमिदम् । तेन चतुश्चतुष्टोलके इत्यर्थ । प्रत्येकं चतुष्टोलके इति यावत् । ४-यासमूलम् । ५-पलमानमित्यर्थ । ६-दुग्ध- विशेषणम् । ७-अर्कस्य फुल्लिकान्तर्गतलव निका। ८-पार्श्वद्वये तिर्यगूर्वीकृतकपालान्तरित- छगणकद्वयेन तनिष्पत्ति । ९-अङ्गारधानिकायाम् । १०-ज्वलदगारकायाम् । ११-ताम्र- पत्र गद्याणमितं, तच्च शुद्धमादेयम् । शुद्धिश्चास्य कपालस्थस्य प्रतप्तस्य रविदुग्धे सप्तकृत्वो निर्वापणात् । १२-दानवो गन्धक , स च द्विपल. । दुग्धिकाशकलानि पलमितानि दुग्धिका चात्र सूक्ष्मपत्रा स्वल्पतरा चान्वेष्टव्या । Manavimanand - सिद्धभेषजमणिमालायां [श्वास- अथ श्वासचिकित्सितम् । १ शुद्धार्कपत्रचूर्ण विमर्च वाढं पयोभिरर्कोत्थैः । पुटपक्वं शतकृत्वः कासश्वासादिरुक्षु हितम् ॥ १ ॥ २ जम्बूफलरसे जम्ब्बास्तनुच्छल्लं कलांशकम् । विनीय स्थापयेद्धर्म प्रचण्डे दिवसाष्टकम् ॥२॥ अनातपे पक्षमेकं ततो द्विस्त्रिः पवित्रयेत् । अनेन लोहजं पिष्वा जॉम्ववासवतो रजः ॥ ३ ॥ पुटेत् पुनः पुनर्यावत् पुटाः स्युः पञ्चविंशतिः । इत्यदो लोहजं भस्म श्वासहृच्छूलसूदनम् ॥ ४॥ ३ वन्यानां विंशतिप्रस्थाश्चूर्ण स्याल्लोहजं पलम् । कलसोरं खंमिभपुटे पक्त्वा पूतं विमर्च रविपयसा । संशोण्य पक्वमिति खं कासश्वासेपु देयमनुपानैः ॥ ५॥ तोला भर गंधकचूर्ण का तथा दुग्धिकाक्षुप के छोटे छोटे शुष्क टुकडो का थोडी थोडी मात्रा में प्रक्षेप करते रहें। इस तरह पुन. पुन. करते रहने से ताम्रपत्र की भाकाश- तुल्य नीलवर्ण की भस्म हो जायेगी। इस भस्म का, हिक्का, कास, श्वास, अबुभुक्षा, अग्निमांद्य, कफ और वातप्रधान विकारों मे प्रयोग करें। यह सिद्धप्रयोग मुझे मेरे शिष्य 'सदानन्द' ने बताया है। इसकी मात्रा एक रत्ती भर है। इसके अनुपान, द्राक्षा, नागरवेल का पान अथवा मधु है॥ ४-६॥ - हिक्काचिकित्सा समाप्त - ३०)- । श्वासचिकित्सा (कुल प्रयोग शुद्ध ताम्रपत्र के चूर्ण को अर्क दुग्ध मे खूब खरल करे । सो पुट देकर इसकी भस्म बनालें। यह भस्म कास श्वास आदि विकारो में प्रशस्त है ॥ १॥ एक भाग जम्बूफल के रस में, जंबू वृक्ष की षोडशाश अन्तर छाल को थोडी कूट कर मिला देवें। इसे आठ दिवस पर्यंत सूर्य के प्रचड ताप मे, फिर, पंदरह दिन तक छाया में रखदें। तदनन्तर, इसे दो तीन वार वस्त्रपूत करके, इससे लोहचूर्ण को खरल में खूब घोटे । फिर इसकी टिकियां बना शराव सपुटित करके वन्यगोवरी की अग्नि से पुट देवें । इस तरह पुन पुन कुल पञ्चीस पुट देकर उत्तम लोह भस्म निर्माण करलें । यह भस्म श्वास और हृदय शूल को निर्मूल कर देती है। इस प्रयोग मे लोह चूर्ण चार तोलाभर तथा वनोपल वीस प्रस्थ लेवें ॥२-४ ॥ अभ्रक चूर्ण को कलमी सोरे में रखकर, शराब सपुटित करके गजपुट की आच देकर भस्म बनाले । इस भस्म को कपडे से छानकर । १-शुद्धताम्रपत्रस्य चूर्णम् । २-'अन्तरच्छाल' इति प्रसिद्धमाभ्यन्तरवल्कम् । ३-मनाक् सक्षुद्य । ४-तृतीयायामत्र तसि । ततोऽनेन जाम्बवासवत इति सामानाधि- करण्यम् । ५-वनोपलानाम् । ६-अभ्रक कलसोरेणान्तरितं मृत्कोष्टीस्थ कृत्वेति शेष । ।
चतुर्थो गुच्छः । -- चिकित्सितम्] ग्रीष्मे द्राक्षा, प्रावृपि पर्ण, स्वाद्वीफलं च शिशिरतौ । तन्दुलमेकं शिशवे, यूने च त्रीणि तानि मात्राऽस्य ॥ ६ ॥ ४ कन्याम्बुकल्कीकृतमेव हिडुलं दहेदरण्योपलयुग्मसंपुटे । तद्धिमुलं स्याच्छ्सनेऽनु पावकं वन्योपलप्रस्थयुगी हि गौर्जरी ॥७॥ ५ शङ्कः पूरितकुक्षिः शतमल्लयुजा दिनेशदुग्धेन । दन्तावेलपुटसिद्धः श्वाले कासे ज्वरे प्रसिद्धोऽयम् ॥ ८ ॥ ६ सुधार्खण्डचूर्णाद्यवानी द्विभागा दिवाकृद्दलेभ्यो विभागा दशैव । पचेन्न्यस्य चुल्यां द्वियाम पुनस्तत् पुटेत् कौक्षरे श्वासकासौ निहन्तुम् ७ तेजोम्बुंनि निकंटे लवणक्षारादितीक्ष्णवस्तुभ्यः । तत्किट्टपिण्डखण्डं वल्लमितं श्वासहारि पणेन ॥ १० ॥ माफडे के दूध में दिनभर खूब मर्दन करके टिकियां बनाकर उसे सुखा, शरावसपुटित करके पुन. गजपुट की अग्नि दें। इस भस्म को कास एव श्वास रोग में यथा निर्दिष्ट अनुपान सहित प्रयोग में लें। ग्रीष्म ऋतु मे द्राक्षा के साथ, वर्षा में नागरवेल के पान के साथ तथा शिशिरऋतु में छुहारा के साथ सेवन करें। इसकी मात्रा, वालक को एक चांवल तथा युवक को तीन चावल भर है ॥ ५-६ ॥ एकतोला भर हिंगुल का ग्वार पाठे के रस से कल्क करके शराव संपुट मे रख एक प्रस्थ भर जंगली उपलो की अग्नि में फूक दें। यह हिंगुल श्वास रोग में प्रशस्त है। इसके ऊपर सीरेका (हलवेका) भोजन करना चाहिये। गुर्जरप्रदेश में बत्तीस तोले का एक प्रस्थ माना जाता प्रस्तुत श्लोक में दो प्रस्थ उपलो का ग्रहण इसी मान के अनुसार किया गया है। प्रचलित आयुर्वेदीय मानके अनुसार चौसठ तोले का एक प्रस्थ होता है। इसी गणना के भाधार पर हमने एक प्रस्थ (चौसठ तोले) ही यहा ग्रहण किया है, जो गुर्जरदेश के दो प्रस्थ मान के अनुसार ठीक उतरता है ॥ ७ ॥ भाकडे के दूध से शतमल्ल को मर्दन करके उसको शंख के उदर में भर गजपुट फूक दें। स्वांगशीतल होने पर वारीक पीसकर उपयोग मे लें । यह भस्म श्वास, कास, तथा ज्वर मे प्रसिद्ध है ॥ ८ ॥ सुधा-चूर्ण एक भाग, अजवायन दो भाग, तथा भाकडे के पत्ते दस भाग + इनको एक पात्र में भर चूल्हे की आच से दो प्रहर तक पकावें । तदनन्तर, इन्हे शरावसपुटित करके गजपुट से फूंकदें। यह भस श्वास तथा कास को नष्ट कर देती है ॥ ९ ॥ लवण, क्षार आदि तीक्ष्ण द्रव्यों से तेजाब निकाल लेने पर इनके अवशिष्ट ७-अहरेकम् । ८-चक्राकार कृत्वा शरावसपुटे निरुध्य सडसडशब्देन तदन्त शुप्कमनु- माय पुटेत् । १-खर्जूरीफल लोके 'छुहारा' इति ख्यातम् । २-तोलकप्रमाणम् । ३-सयाव उप- रिष्टवोज्य । ४-गुर्जरदेशप्रचरिता । तत्र चाप्टपलिक प्रस्थ प्रचरति । ५-गजपुटसिद्धः। ६-कलिकारखण्डचूर्णात् । तानि च लोके ‘कलीटाटा' इति प्रसिद्धानि । ७-'तेजाप' इति प्रसिद्ध क्षारद्रवे। ८-यन्त्रविधिना । अस्य सेवनात् हृदुद्वेष्टनादौ सति दुग्धसतानिका शर्करा विना देया। है की भाच मे JAIN २१८ सिद्धपनमणिमारगयां [भाग- ८ चणकलवणमसृणरजो मानदलजलेन गोलकं कृत्वा । पंटपिहितं पुटदग्धं जग्धमरं श्वासघस्मरं भम्म ॥ ११ ॥ ९ पकाम्लदाडिमीफलगर्भगतं लवणमर्जुनच्छायम् । पुटपाकरीतिपकं कराल कफमाशु छन्तति ध्यानम् ॥ १२ ॥ १० येन स्वर्णदलानि प्रलिन्य चाही विशिष्य गोध्यन्ते । तत्पककल्ककि संतानिकया सह श्यति ध्यासम् ॥ १३ ॥ ११ मूलकमूलविभूतिहममिता श्वासकासकफराक्षु । शार्करकवोप्णपावर्ककवलेन करोति शर्म सह भुत्ता ॥१८॥ १२ धूमयन्त्रच्युतं भस्म धूमवल्लीदलोद्भवम् । स्नुकाण्डजठरे धृत्वा मृदाऽऽलिप्य दहेदिपक ॥ १५ ॥ तत्काण्डतः पृथकृत्वा भस्म तद्यत् पुरा धृतम् । सखण्डं मात्रया दत्तं श्वसनं खण्डयेत् ग्बलु ॥ १६॥ किट संड से एक वालभर गुटिकायें बनाकर पान के साथ लेने से मारय मिट जाता है । इसके सेवन से कदाचित् हृदय - उद्वेष्टन मादि पीडा होने लगे यो कर मिनाये बिना दूध की मलाई सानी चाहिये ॥१०॥ शामली पत्ती के म्वरम में चणक र पण को सूब मुलायम पीस कर उसका गोलक बनालें । हमको एक शराय में रस कपडमिटी करके कडो की अग्नि में फूंक दें। इस भस्म के माने से श्वास का शमन होता है ॥३॥ पके हुये किंतु अम्ल दाडिमी - फल के भीतर म्वच्छ-वेत - मामुद्र रावण को भरकर कपडमिट्टी करके पुट - पाक विधि से स्विन करले। स्वांगशीतल होने पर इसे लेकर खरल करके मटर -प्रमाण में गोलियां बनाये । ये उन-फफ-युक्त शाम को कार डालती हैं। ये गोलिया अत्यत रुचिकर भी होती है ॥ १२ ॥ जिस क्षार का लेप करके स्वर्ण-पत्रो का शोधन किया जाता है, उस परिपा क्षार के कल्क-किट का, दूध की मलाई के साथ, सेवन करने से श्वास नष्ट हो जाता ॥ १३ ॥ छोटी मूली को छाया शुष्क करके उसकी भस्म बनाले । एक मापाभर इस भस्म के सेवन से श्वास, कास तथा कफजन्य विकार नष्ट होजाते हैं । इस भस्म के साथ शार्कर तथा कवोष्ण सीरे (सयाव) का भोजन करने से विशेष लाभ होता है ॥ १४ ॥ धूम -यंत्र (हुबा) गत तमाख अथवा गाजे की जली हुई 'गुल' भस को, स्नुही-कांड में भरकर कपदमिट्टी करके भर्ध गजपुट की आंच में फूक दे । स्वागशीतल होने पर, स्नुही काढ में से उपरोक्त भस अलग निकाल लेवें। रोग और रोगी के बलानुसार मात्रा में, इस भस्म को खांड के साथ लेने से, श्वास खडित हो १-शरावस्थं कृत्वा पटपिहित कार्यम् । २-अनेन रक्तलाणयुदास । ३-रुचि- कारकमप्येतद्भवति । ४-क्षारविशेषेण । ५-माषामितेति यावत् । ६-पावकः सयाव । स च लोके 'सीरा, मोहनभोग' इति च प्रसिद्धो भक्ष्यविशेष । ७-'गुल' इति प्रसिद्धम् । तमाखू' इति प्रसिद्धा 'गांजा' इति वा । । - २१९ चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छ.। १३ अर्धदग्धां हरिद्रां द्राक् पिदधीत शरावतः। तत्कोकिलरजः क्षौद्रैर्द्विमा श्वासकास जित् ॥ १७ ॥ १४ व्युषिता पैटुपयसि निशा भ्राष्ट्रभ्रष्टा मुखाम्बुजे धार्या । हिक्काकासश्वासश्लेषमविकारापहाराय ॥ १८ ॥ १५ पिप्यल्येका त्रुटियुगलकं क्लीतकं द्वित्रिमा द्वे गोस्तन्यौ दृषदि सकलं कल्कयेदाकाद्भिः। वह्नर्योगान्मधुनि विकसदुद्दे शाणमात्रे कल्कं क्षिप्त्वा मथितममृणं श्वासनाशाय लिह्यात् ।। १९ ।। १६ स्वर्जिकाक्षारशकलं तप्तं निर्वापयेजले। तजलं पिवतां पुंसां श्वासः सद्यः प्रशाम्यति ॥ २०॥ १७ परिणतदलं तमाल्याः प्राचीनगुडेने किंचिदधिकेन । विहितं विकुट्य भसितं श्वसितानाही निहन्ति तप्ताद्भिः ॥ २१ ॥ जाता है ॥ १५-१६ ॥ अर्धदग्ध हरिद्रा को एक शराव से शीघ्र ढक दें। इस हरिद्रा के कोयले की भस्म को दो माषा (अथवा एक माषा) प्रमाण में मधु के साथ लेने से श्वास और कास पराजित होजाते हैं ॥ १७ ॥ भट्टी मे हरिद्रा को भून कर उसे लवण- जलसे पूर्ण एक पस्तर-पात्र में डुबोकर एकवीस दिवस पर्यंत रहने दें। तदनन्तर, इसके सेवन करने से हिक्का, कास, श्वास तथा कफ-जन्य विकार नष्ट हो जाते है ॥ १८ ॥ पिप्पली नग एक, छोटी और बड़ी इलायची प्रत्येक एक एक माषा, मुलेठी तीन माषा, तथा गोस्तनी द्राक्षा नग दो, इन सबको एकत्र, शिलापर, आर्द्रक - रस से घोटकर, कल्क बनालें । भब, एक पात्र मे तीन माषा भर मधु को अग्नि पर रख गरम करें। जब बुद्दे उठने लगे, तब उपरोक्त कल्क इस में डालकर कड़छी से हिलाकर अच्छी तरह मिला अवलेह जैसा बनालें । श्वास को मिटाने के लिये इस अवलेह का सेवन करें ॥ १९ ॥ स्वर्जिका क्षार के टुकड़े को अग्नि से तपाकर पानी मे बुझावें । इस वुझावे के - जल का पान करनेवाले मनुष्य का श्वास रोग शीघ्र शान्त हो जाता है ॥ २० ॥ तमाखू के परिपक्व पत्तों मे, इनसे वजन मे कुछ अधिक पुराणे गुड को मिला दोनो को कूटकर चूर्ण बनालें । इस चूर्ण को गरम जल के साथ लेने से श्वास एव आनाह शात होजाते है। यहा छह वर्ष पुराणा गुड लेवें। एक प्रस्थ भर तमाखू के पत्तो में डेढ प्रस्थ गुड मिलावे। इस योग मे पिप्पली, नागरबेल का पान, मरिच, चित्रक, गुड और १-एकमाषमपि दीयते । २-एकविंशति दिवसान् प्रस्तरपात्रे लवणजलेन भाविते- त्यर्थ । ३-हरिद्रा । ४-'जरदा' इति प्रसिद्धि । ५-प्रायोऽतिकान्तवर्षपकेन । ६-तमाल. प्रस्थश्चेद् गुडस्य सार्ध सपादो वा। “पिप्पल्या नागवल्ल्याश्च वेलजाग्निगुडत्वचाम् । महाप्रभावे योगेऽस्मिन् प्रक्षेपः केन वार्यते"।
२२० सिद्धभेपजमणिमालायां [श्वास-- १८ तमालपत्रस्वरसे समं गुडं विनीय संसाधय साधुतन्तुलीमें । तामेकतोलोत्तुलितां यथावलं प्रातः प्रयच्छ श्वसने महत्यपि ।। २२ ॥ १९ मधुनैलेयं लिहितां तदनु मुहर्त पयांसि नो पिवताम् । श्वसनश्चयथुविवन्धा न भवन्ति भवन्ति शर्माणि ॥ २३ ॥ २० रैसं पिबेन्नागफणीफलोद्गवं समाक्षिकं श्वासगदे सटवणम् । तोलौ रसाद् द्वौ मधुनः स एकस्तैलाभिधं टङ्कणमत्र वल्लम् ॥ २४ ॥ २१ गुञ्जाभां रचय गुटीं मरिचसिपीकास्नुहीदलं पिष्टवा । निःशवं वितर पुनः श्वसनेपु तथैव कसनेषु ॥ २५ ॥ २२ संशोधितानी विषमुष्टिकानां कृत्वा शुतान्यप्रगुणैर्जलैस्त्रिः। पुनः पचेत्तानि धनानि यावत्तकिट्टचट्याः श्वसनं द्विपन्ति ॥ २६ ॥ २३ साङ्गोपाङ्गं मृगपरिवृदं क्षुण्णमुत्काथ्य पाकात् सान्द्रेऽमुष्मित्रुटिकणविपावंशजाताः कलांशाः। प्रत्नं फेनं शुचि फणिपतेस्तुर्यभागं विनीय वद्धा वट्यश्वणकतुलिताः श्वासमुन्मूलयन्ति ॥ २७ ॥ दालचीनी इनके चूर्ण को मिलाने से अधिक लाभ होता है ॥ २१ ॥, तमाल पत्र के स्वरस मे समान भाग गुढ मिलाकर उत्तम चासनी सिद्ध करलें । रोग और रोगी के बलानुसार इसको एक तोलाभर मात्रा मे प्रात. सेवन करायें। यह उग्र-श्वास को भी शमित कर देती है ॥ २२ ॥ एलिया में द्विगुणित मधु मिलाकर चाट जायें । फिर कुछ ठहर कर ऊपर से दूध पीयें । इस तरह करने से मनुष्य को श्वास, शोथ तथा विबन्ध नहीं होते । तथा इन विकारों से मुक्त होकर वह स्वास्थ्यलाभ करता है ॥ २३ ॥ थूहर - फल के दो तोले रस मे, दो तोलाभर मधु तथा तेलिया-टंकण के एक वालभर चूर्ण को मिलाकर चाटने से श्वास रोग नष्ट हो जाता है ॥ २४ ॥ मरिच और तुलिया थोर के पत्ते को पीसकर गुंजा -प्रमाण गुटिका बनालें । श्वास तथा कास मे इसका निर्भय उपयोग करें ॥ २५॥ पूर्व कही गयी विधि के अनुसार कुचलों को शुद्ध करके फिर घी में भूनकर उनके चार चार टुकडे करलें। अब इनको आठगुणे पानी में तीन तीन वार खूब उकालें । अन्त मे, उन्हें फिर पानी से उकालने पर वे सीज कर अवलेह जैसे घट्ट हो जायेंगे। इनके इस सान्द्र-किट की अर्ध-गुंजा प्रमाण मे गुटिकाये बनालें । ये श्वास को मिटा देती है ॥ २६ ॥ मूलसहित अरसे के क्षुप को उखाड उसे सूक्ष्म पीसकर उकाललेवें। जब उकलकर यह अवलेह जैसा घट्ट बन जाये तब इसमे छोटी इलायची, पिप्पली, १-लोके यस्या 'चासणी' इति प्रसिद्धि । २-द्वैगुण्य स्यादौपधान्माक्षिकस्य । ३-लोके सज्ञा 'एलिया' चास्य, मात्रा ग्राह्या यावत्यगुलीपर्वयुग्मात् । ४-तिरोहितं नात्र किंचित् । ५-प्रसिद्ध 'तेलिया' इति । ६-पूर्वोक्त विधिशुद्धानामन्तरा घृतनर्जन, चतु खडीकृताना च । ७-गुट्यो गुजार्धमानिका । ८-आटरुष तदप्या ग्राह्यम् । ९-प्रत्येकशस्तथा । 1 ।
२२१ चिकित्सितम्] चतुर्थों गुच्छ.। २४ गुडकर्पूरगुटिका श्वासं सद्यो व्यपोहति । प्रभा प्रभाकरस्येव संकोचं सरसीरुहाम् ॥ २८ ॥ २५ पक्कं द्विधापाट्य फलं कदल्या निष्कास्य तद्गर्भसिरां समग्राम् । तोलांशमावाप्य मरीचचूर्ण श्वासेषु तस्य प्रथितं भटित्रम् ॥ २९ ॥ २६ सेहुण्डपयोभ्यक्तं भ्रष्टं पर्पटकमेकमुपभुक्तम् । श्वसनं प्रसह्य शमयति भिनत्ति वन्धं वर्मि प्रवर्तयति ॥ ३० ॥ २७ प्रातः पीत्वा तिक्ततुम्बीरसं यः कुर्याद्वान्ति रज्जुनद्धप्रगण्डः । तस्य श्वासःशाम्यति श्लेष्मभङ्गानाभक्तं साज्यमत्रास्तिपथ्यम् ॥३१॥ समितातस्योर्वसुगुणपयोभिरुत्कारिकां विपाच्य धनाम् । उरसि न्यसेत् सतैलां स्त्यानवलासप्रवृत्तिफलसिध्यै ॥ ३२ ॥ २९ पैकीकृत्य पटुं तैले पटुस्तत्पुटपोट्टलैः । सुखोष्णैः स्वेदयेच्छासक्लिष्टं जठरवक्षसोः ॥ ३३ ॥ अतीस तथा वंशलोचन इनके चूर्ण का प्रक्षेप करें। प्रत्येक द्रव्य अरसे के अवलेह से पोडशांश मात्रा में लेवें। फिर, चतुर्थांश मात्रा में शुद्ध की हुई पुराणी अफीम भी इसमे अच्छी तरह मिलादें। इसकी चने -प्रमाण वटियां बाधले। यह श्वास का उन्मूलन कर देती है ॥ २७ ॥ गुड - मिश्रित कर्पूरवटिका श्वास को उसी तरह हर लेती है, जिस तरह सूर्यकी प्रभा कमलो के सकोच को ॥ २८ ॥ एक पके हुये केले को दो भागों में सीधा काटकर तदन्तर्गत सिरा को अलग निकाल उसमें एक तोलाभर मरिच चूर्ण का प्रक्षेप करके फिर भङ्गारो मे ढक कर भडीता बनालें । श्वासरोग मे इस भडीते का उपयोग प्रशस्त माना गया है ॥ २९ ॥ मूंग के एक पापड को स्नुही क्षीर से चुपड अङ्गारोंपर सेककर खाजावें। इससे श्वास हठात् नष्ट हो जाता है। मलावरोध दूर होता है तथा वमन की प्रवृत्ति होती है ॥ ३० ॥ कटुतुंबी के रस को प्रात पीकर यदि कोई चमन करे तो उसका, कफ के छूटकर निकल जानेसे, श्वास रोग शमित हो जाता है । चमन करते समय प्रगड - प्रदेश को (केहुनी से स्कध-प्रदेश पर्यत भाग को) रज्जु से मजबूत बाध देना चाहिये । बमनोपरात, दही के साथ धृतयुक्त भात का भोजन पथ्य है ॥ ३१ ॥ मैदा और अतसी को माठ गुणे दूध मे खूब वारीक पीसकर अंगीठी पर पका गाढी टपरी बनालें। इस लूपरी में किचित् तैल मिलाकर छातीपर लेप करदे । इसके स्वेदन से घनीभूत कफ पिघलकर बाहर निकल आता है ॥ ३२ ॥ नमक को तैल से लथपथ करके एक पोटली मे बाधले । श्वास रोग से पीडित व्यक्ति के उदर तथा १-अझारेष्ववकूलनाद्वति, यत् ख्यात 'भडीता' इति । २-लोके 'पापड' नामत प्रचलितम् । तच्चान मौद्ग वरम् । ३-तिक्तालावुरस पलं हि । ४-समिता ‘मैदा' इति ख्यापिता। ५-तत्स्वेदेन विलीयते घनकफ । ६-स्पष्ट समस्तं पुर ।
२२२ सिदभेषजमणिमालायां [स्वरभेद- ३० दीपोपरि चालनिका तदुपरि बसनं वितत्य तनुतन्तु । स्विन्नानि नागवल्लीदलानि बध्नीत वक्षसि श्वासी ॥ ३४ ॥ इति श्वासचिकित्सा। स्वरभेदचिकित्सितम् । १ तीक्ष्णानि सप्त पञ्चैलाः सार्धमापं कुलिअनम् । यष्टी मापत्रयोन्माना समिता तुपतिन्दुकम् ॥ १ ॥ यक्षा सितोपला चेति काथः कोप्णो निषेवितः । स्वरभेदं कण्ठरोग प्रतिश्यायं विनाशयेत् ॥२॥ २ कृष्णायाः सुरभेट्त्रं पिवेतां मण्डलावधि। कोष्ठाशुद्धिं पुरस्कृत्य स्वरमेदं नियच्छति ॥ ३ ॥ इति स्वरभेदचिकित्सा। वक्ष को इस सुसोपण पुष्टपोटली से स्वेदित करें ॥ ३३ ॥ प्रज्वलित-दीप के ऊपर एक चालनी रखदें । चालनी में सूक्ष्म वस्त्र का टुकढा विछादें। इस वस्त्रसंडपर नागर- वेल के पान रसकर उन्हें गरम करके श्वास रोग से पीड़ित व्यक्ति की छाती पर बाध दे। इस प्रक्रिया से श्वासी को आराम मिलता है ॥ ३४ ॥ --श्वासचिकित्सा समाप्त- - - स्वरभेद चिकित्सा (कुलप्रयोग २)- । सात मरिच, पाच इलायची, डेढ मापा कुलिजन, तीन मापा मुलेठी, एक तोला चापड तथा दो तोला मिश्री इनके कबोष्ण क्वाथ का सेवन स्वरभेद, कंठरोरा और जुकाम को मिटाता है ॥ १-२ ॥ कृष्ण गाय के मूत्र को, टोप बल तथा प्रकृति के भनुसार यथामात्रा मे चालीस दिन तक पीते रहने से को शुद्धि पूर्वक स्वरभेद रोग नष्ट हो जाता है ॥३॥ स्वरभेदचिकित्सा समाप्त- - १-उदानदुष्टिसावान्निदानकमतस्तथा । कासाद्यनन्तर युक्तं स्वरभेद चिकि- सितम् ॥ तत्र च खानुभूतत्वाद्योगयुग्ममेवोपदिशन्ति-तीक्ष्णानीत्यादि । २--मरिचानि । ३-समितातुपाणा 'चापड' इति प्रसिद्धाना कर्ष इत्यर्थ । ४-नासारोगविशेष लोके जुकाम' इति प्रसिद्धिं गतम् । ५-मात्राऽस्य दोषवलप्रकृत्याद्यनुसारत कल्पनीया । ६-चत्वारिंशद्दिनावधि ।
अथारोचकचिकित्सिसतम् । १ गद्याणमारीचरजो द्विवल्लं सौवर्चलं मुष्टिमितेने वारा। शनैः शनैः साक्षहविर्विपाच्य पिबेद्वलासारुचिमान्धमुग्धः॥१॥ २ अम्लदालिमवीजानामञ्जलिहिङ्गुवल्लकम् । लवणोषणजीराणि प्रत्येक पलमात्रया ॥२॥ पृथ्वीको कर्षकलिता सर्व स्थूलं विचूर्णयेत् । चूर्ण दाडिमषट्काख्यं रोचनं पाचनं परम् ॥ ३ ॥ अनुक्ताऽपि सिता देया चूर्णेऽस्मिन् पलमात्रया। वर्षाकालं विना देय एकनिम्बूकजो रसः॥४॥ ३ द्वीपान्तरीयवृक्षालपोदीनानागरोषणम् । प्रत्येकमेकगद्याणं पलं दाडिमसारतः॥५॥ कणाशाणः सुमान्माषो भद्रेला तु त्रिमाषिका । लवणात्तोलकं सार्धमजाजी तोलकैस्त्रिभिः ॥ ६॥ सितोपला सर्वसमा चूर्ण कुर्याद्यथाविधि । तचूर्णमचिरादेव चूर्णयेदरुचिं पराम् ॥ ७ ॥ -भरोचकचिकित्सा (कुल प्रयोग १८)- मरिचचूर्ण छह माशा तथा सौवर्चल एक माशा इन दोनों को चार तोला भर पानी मे पकावें। पानी के नि शेष होने पर इन मे एक वोला घी मिलाकर कवोष्ण ही पी जाये । इससे कफ, अरुचि तथा अग्निमांद्य दूर होता है ॥ १॥.खट्टी दाडिम के दाने सोलह तोला, हींग तीन गुंजा, लवण, झूठ और जीरा प्रत्येक चार तोला तथा बडी इलायची के दाने एक तोला इन सब का स्थूल चूर्ण बनालें । इस चूर्ण को 'दाडिम पट्क' कहते है। यह उत्तम रोचक तथा पाचक है ॥ २-३ ॥ इस चूर्ण में चार तोलाभर मिश्री भी मिलादे। तथा वर्षाऋतु के अतिरिक्त अन्य ऋतुओं मे इस चूर्ण में एक निबू का रस मिला कर सेवन करे ॥ ४ ॥ गोवा की कोकम, पोदीना, सूंठ और मरिच प्रत्येक छह माषा, दाडिम का स्वरस चार तोला, पिप्पली तीन माषा, लविग एक माषा, बडी इलायची तीन माषा, नमक डेढ तोला, जीरा तीन तोला, तथा इन सभी द्रव्यों से समान वजन जितनी मिश्री इनको एकत्र मिला यथाविधि चूर्ण बनाले । यह चूर्ण शीघ्र ही परम अरुचिका चूरा १-रुग्विनिश्चयक्रमादेवानन्तरमरोचकचिकित्सितमुच्यते। २-पलप्रमाणेन। ३-कुडव । ४-चतुर्मुक्षाप्रमाण विवक्षितम् । ५-स्थूलेला, तस्या बीजानि । ६-द्वीपान्तरीयवृक्षाम्लं सीमाक' इति ख्यातम् । ७-"गद्याणो माषकै षड्भि ” इति । ८-ल्वङ्गात् ।
२२४ सिद्धभेपजमणिमालायां [अरोचक- ४ सेवा द्विसन्ध्यं ममृणीकृतस्य कपित्थगर्भस्य सितासखस्य । दुर्धर्पत(रुचिशोपचोपवैरस्यविट्सारविरोधिनी स्यात् ॥ ८ ॥ ५ वितुषं धनिकाविदलं किमपि भ्रष्टं शरावके युक्त्या । मरिचनिशापटुसरसैरम्लरसैः प्रोक्ष्य चर्वयेदरुचौ ॥ ९ ॥ ६ कुडवे कृष्णजरणे सूर्यास्फालननिस्तुपे । भ्राष्ट्रभ्रष्ट समाचान्तरुचिराङ्गरचुक्रके ॥ १० ॥ पृथग्गधाणतुलितौ भद्रैलातीक्ष्णतल्लजौ। गुजैकं हिङ्गु लवणं तौलकैस्त्रिभिरावपेत् ॥ ११ ॥ ततस्तजरणं नीरैर्नभः पाण्डवनिम्बुजैः । भावितं धर्मसंशुष्कं रोचिष्णु परमं स्मृतम् ॥ १२ ॥ ७ शरावलवणक्षोदे द्विप्रस्थे निम्बुकाम्बुनि । स्वाद्वीफैलानि पुष्टानि प्रस्थमानानि मजयेत् ॥ १३ ॥ कर देता है ॥ ५-७ ॥ कपित्थ की मज्जा को छाया शुष्क करके बारीक पीस वस्त्रपूत कर मुलायम चूर्ण निर्माण करलें। इसमें मिश्री मिलाकर सुबह सांझ दो बार फांकी लेनेसे तीव्र प्यास, अरुचि, शोष, दाह, मुख की विरसता तथा अतिसार दूर होता है ॥ ८ ॥ धने की दाल को पानी में रातभर भिगोकर रखदें। प्रात इसे शतबार पानी से तब तक धोयें जब तक वह निस्तुष न हो जाये । तदनन्तर, इसको एक शराव में रख धीरे धीरे भूनलें। फिर, इसमें मरिच, हरिद्रा तथा लवण भादि मिलाकर निवृ आदि के रस का प्रोक्षण कर मसल लेवें । इसको चवाने से मरुचि दूर होती है ॥ ९ ॥ सोलह तोलेभर काले जीरे को कूट फटक कर निस्तुष बनाले । फिर, चूल्हे पर भून इनको उत्तम अगूरों (द्राक्षा) का सिरका पिलादे। यहां, जीरे के समानभाग जितना सिरका लेना चाहिये। तदनन्तर, इसमे, बडी इलायची तथा अच्छी तरह धोकर साफ की हुई मरिच प्रत्येक छह माषा, हिंगु एक गुजा तथा लवण तीन तोला, इन सबके सूक्ष्म चूर्ण का, प्रक्षेप करें। तत्पश्चात् इस जीरे को पचास निंबुओ के रस की भावना देकर धूप मे सुखाले। इस तरह सिद्ध किया गया यह जीरक परम रुचिकर माना गया है ॥ १०-१२॥ बत्तीस तोले भर लवण मे १२८ तोला निबू रस मिलाकर उसमें चौसठ तोले पुष्ट छुहारे डाल देवें । पिप्पली, मरिच, बडी इलायची तथा अकरकरा प्रत्येक तीन तीन 1-सूक्ष्मचूर्णीकृतस्य पटपूतस्य चेत्यर्थ । २-कपित्थमध्यभागस्य । ३-यवानी- प्रक्रियया जलभावनादिकया वान्यकस्यापि निस्तुपताऽऽपादनीया । ४-निम्ब्वादीना खरसे । ५-'स्याह जीरा' इति ख्याते। ६-सूर्प ‘छाज' इति प्रसिद्धो धान्यास्फा- लनयन्त्रविशेष । ७-समाचान्त भावनया पीत रुचिराणामझूराणा द्राक्षाविशेषणा चुकं 'सिरका' इति प्रसिद्ध येन तत्तयाभूते । चुकं चात्र जीरकसममेव । ८-प्रशस्तमरिचमति- प्रशस्तत्वं चैषा धौतत्वादिना । ९-पञ्चाशनिम्बुरसै । १०-'छुहारा' इति प्रसिद्धानि । - - - --चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छः। २२५ कृष्णामरिचभद्रेलाकलं गवाणषट्कम् । सार्धाने द्वे पृथग्जीरे पत्रं वस्वेकमाषकम् ॥ १४॥ कर्ष जातीफलं जातिपत्री जातीफलोन्मिता। विश्वौषधं द्विपलिकं पटुस्त्रिपलिकस्तथा ॥ १५॥ स्वाद्वीफलान्यनस्थीनि पलान्यत्र षडेव हि । स्थूलं संक्षोद्य निम्बूकनीरप्रस्थेन भावयेत् ॥ १६ ॥ प्रावृत्ये समुपेक्षेत त्रिदिने वा चतुर्दिनम् । सर्वमेकत्र संपिष्ट पूरणं तेन पूरयेत् ॥ १७ ॥ निम्बूकनीरमग्नानि तानि स्वाद्वीफलान्यलम् । उपर्युपरि संचिन्त्य पात्रे शेष रसं क्षिपेत् ॥ १८ ॥ पक्षं प्रतीक्ष्य मतिमानेकैकं रसयेच्छनैः । अरुचिग्रहणीच्छर्दिहल्लासाध्मानवेदनाः ॥ १९ ॥ नश्यन्त्यास्वादमात्रेण नात्रेपदपि विस्मयः। उदञ्चति चमत्कारो महानुद्गारशुद्धिजः ॥ २० ॥ ८ निम्बूरसे पटुं साध्रिप्रस्थे न्यस्य चतुःपलम् । पचेत् स्तोकघृतक्षेपं द्विपलं शेषयेद्रसम् ॥ २१ ॥ तोला, श्वेत भौर कृष्ण जीरक प्रत्येक साढे चार तोले, तेजपात डेढ तोला, जायफल तथा जावित्री प्रत्येक एक एक तोला, सूठ आठ तोला तथा सैंधव बारह तोला, इनको एकत्र लेकर सूक्ष्म कपडछान चूर्ण बनाले। अब, अंदर की गुठली रहित करीब चौवीस तोले छुहारो को स्थूल कूट कर निंबू के चौसठ तोला रस मे निमग्न कर पात्रमुख को वस्त्र से ढक तीन चार दिवस पर्यंत अलग रखदे । तत्पश्चात् , इन कूटे हुये छुहारों को निवू रस मे से निकाले । निबू रस को अलग रखकर, इन छुहारो मे उपरोक्त औषधीय द्रव्यों के चूर्ण को मिला बारीक पीस, पूरण बनालें । इस पूरण को, निबू रस में मन्न उपरोक्त चौसठ तोला छुहारो को निकाल उनमें एक एक मे थोडा थोडा उपरोक्त पूरण भरकर पुन पात्र मे यथाक्रम चुन कर स्थापित करदे, तथा ऊपर से, अलग रखे हुये उपरोक्त निवू रस को, भर देवें । पदरह दिवस पश्चात् पात्र में से एक एक छुहारे को लेकर धीरे धीरे चूसकर खावें । अरुचि, ग्रहणी, वमन, हृल्लास तथा आध्मानजन्य वेदनाये इसके मास्वादमात्र से नष्ट हो जाती है इसमे जरा भी सदेह नहीं, उद्गार शुद्धि मे यह महान् चमत्कार दर्शाता है ।। १३-२०॥ निवू के अस्सी तोला रस मे, सोलह तोलाभर नमक मिला, तथा इसमें दो १-'अकरकरा' इति लोके ख्यातम् । २-द्वे जीरे पृथक् सार्धाने इति सबन्ध । जीरे च भ्रष्टे । ३-अष्टादशमाषकम् । ४-पटादिनेति शेप । ५-चतु पलावशिष्टे सिता तोलकद्वयमिता केचित् प्रक्षिपन्ति । सि० . । ० १५ - २२६ सिद्धभेपजमणिमालाया [अरोचक- व्योषद्विजीरसौभाग्यं चतुर्विशतिमापकम् । षट्त्रिंशन्मापमाकलं क्षिप्त्वा तत्र विमर्दयेत् ॥ २२ ॥ तत्किट्टवद्धवटका हरिमन्थविडम्विनः। रोचन्ते पाचयन्याशु दीपयन्त्याशु शुक्षणिम् ॥ २३ ॥ ९ चरणांशमरिचलवणां वरवी(डी) कामालिकां शरावतले । उत्क्वाथ्य निम्बुनीरैर्वा वटका रुचेर्घटकाः ॥ २४ ॥ १० अत्यल्पपर्युभिर्निम्वुनीरनिर्यासपिच्छिलैः। सितां संनीय घटिता वटिका रुचिवोधिनी ॥ २५ ॥ ११ घृततलिता व्योषलवणधान्यैलाहिङ्गुजीररचितार्चाः । रुचिवीतिहोत्रघटका बत वटको ब्रह्मदर्भायाः ॥ २६ ॥ घी चार बूद अग्नि से पकावे । जव आठ तोला उसम झूठ, मरिच, पीपल, दोनों जीरा तथा फुलाया हुआ टकण प्रत्येक दो तोला एव तीन तोला अकरकरा, इन सभी द्रव्यों के सूक्ष्म चूर्ण को डालकर अच्छी तरह मिला देव । तत्पश्चात्, इसकी चने -प्रमाण गोलिया बनाकर लेने से रुचि बढती है, अन्न पचता है, तथा अग्नि शीघ्र प्रदीप्त होती हे ॥ २१-२३ ॥ मरिच, लवण तथा डीकामाली प्रत्येक तीन माशा- इनके सूक्ष्मचूर्ण को, इनसे द्विगुणित निवू-रस मे मिला एक सकोरे मे भरकर उकाल लेवें। इनसे निर्मित वटिकाये रुचिवर्धक होती है ॥ २४ ॥ अत्यल्प -लवणयुक्त तथा गुन्द्र - मिश्रित अत- एव पिच्छिल निवू- रस मे शर्करा मिलाकर वटिकाये बनाले । यह वटिकाये रुचिवर्धक तथा वमन, मुखशोष, तृषा आदि की प्रशमक कही जाती है। इसमे थोडा कपूर तथा इलायची चूर्ण भी मिलादेना चाहिये ॥ २५ ॥ अजवायन को पूर्वोक्त-प्रकार से निस्तुष करके उसकी पिष्टी वना उसमे, त्रिकटु, लवण, धनिया, इलायची, हींग और जीरे का सूक्ष्म चूर्ण मिला देवे । अब, इनके वटक बनाकर घी मे तल लेवें । ये रुचिकर तथा अग्निवर्धक होते हे ॥ २६ ॥ जाये तब डालकर रस शेप . १-व्योपस्यापि प्रत्येक चतुर्विशतिमाषकत्व द्रव्यप्रधानत्वान्निर्देशस्य । २-टवणं, तञ्च भ्रष्टं ग्राह्यम् । ३-जठराग्निम् । ४-'वी( डी )कामालिका' अनेनैव नाम्ना प्रसिद्धा । ५-तलशब्द उपरिवचनो भूतलवत् । ६-सर्वसभारतो द्विगुणै । ७-चन्द्रले अप्यनुत्पे क्षेप्ये । अत्र लपण न क्षिपन्ति केचिद् , इतीच्छैव नियामिका । ८-निर्यास श्वेतगुन्द्र , स च पेच्छिल्यापादकमात्र । ९-रुचिवोविनीत्युपलक्षण, तेन वमिजिह्वाजाड्यमुखशोपपिपा- सादीनां हारिणीत्यपि वोध्यम् १०-वटका इत्युपलक्षण, तेन मोदकधानावर्तिकाकच- वल्यादयो भक्ष्यविशेषा यथारुचि सपादनीया , कितु तत्र व्योषादिकस्य नावश्यक्त्वम् । ११-यवान्या पूर्वोक्तप्रकारेण निस्तुषीकृताया पुनश्च पिष्टीकृताया ।
२२७ चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छ.। १२ पयःसेकात् सद्यो विकसितसुधाखण्डजनुषि द्रवे स्वर्जिक्षारोद्युजि विमलबादामगुलिकाः । चतुर्यामं धृत्वा पयसि पुनरुत्काल्य वितुषी- कृताः कुर्युः केषां न रुचिमुपिताः शार्कररसे ॥ २७ ॥ १३ वांशीमरिचतो द्वौ द्वौ तोलौ ते च त्रयस्त्रयः । धान्यप्रटीजरणत्रुटिदाडिमसारतः ॥२८॥ द्वीपान्तरीयवृक्षाम्लजरीप्कात् पट षडेव ते । शर्करातस्त्रिपष्टिः स्युलेहो रोचनपाचनः ॥ २९ ॥ १४ निम्बूकमातुलुगाकपोटीदाडिमीरसैः संसितैः । जीरत्रुटिमरिचसखो वमिमरुचिं हन्ति शार्करो विहितः ॥ ३० ॥ १५ पोटीनागुरुकृष्णजीरलवणद्राक्षेमपुष्पोपणै- रेलादाडिमशृङ्गवेरकलितैः पाण्मापिकः कल्पितम् । कल्कं जीरवितुन्नरामठयुतं निम्बूकनीरप्लुतं स्वादिष्टं रुचिवह्निकारि वमिरुक्संहारि लोके श्रुतम् ॥ ३१ ॥ स्वच्छ चूर्णोदक मे स्वर्जिकाक्षार मिलाकर उसमे बादाम की गुलिकाये डाल देवें । चार प्रहर तक उनको उसी मे सिक्त होने दे। तत्पश्चात् , उनको निकाल कर पुन. पानी में उकाल, छिलके उतार, शक्कर की चासनी मे डाल देवें। इस तरह वादाम का सुरब्बा सिद्ध होता है। यह किस को रुचिकर नहीं है ? इसी विधि से चंदन, आर्द्रक, ईख, सालम-कद आदि के मुरब्बे भी निर्माण किये जा सकते है ॥२७॥ वशलोचन और मरिच प्रत्येक दो दो तोला, धनिया, पोदीना, जीरा, छोटी इलायची तथा दाडिमसत्व प्रत्येक तीन तीन तोला, वृक्षाम्ल और जरिष्क प्रत्येक छह छह तोला इनके सूक्ष्म चूर्ण को, छत्तीस तोला शक्कर की चासनी मे डालकर अवलेह निर्माण करें। यह अवलेह उत्तम रोचक और पाचक होता है । उपरोक्त चासनी को गुलाब अथवा केवडे के अर्क से सिद्ध करे। (दारुहरिद्रा के फल को 'जरिश्क' कहते है)॥२८-२९॥ निबू, मातुलुंग, आईक, पोदीना और दाडिम इनके रस मे, रस से चतुर्गुण मिश्री-चूर्ण मिलाकर 'शार्कर' निर्माण करलें । इस शार्कर को, जीरा, इलायची तथा मरिच के सूक्ष्म-चूर्ण सह लेने से वमन तथा अरुचि दूर हो जाते है ॥ ३० ॥ पोदीना, अगरु, कालाजीरा, लवण, द्राक्षा, नागकेसर, मरिच, इलायची, दाडिम १-वातादगुलिकालेहस्य 'बादामका मुरव्वा' इति ख्यातस्य प्रकारोऽयम् , अनया दिशा अन्येषामपि चन्दनाकेक्षुसालमकन्दप्रभृतीना कार्यम् । २-तन्तुल्यामिति । अयं योग- श्वारोचकपठितोऽपि वल्यमेध्यवृहणवृष्यक्षयहितत्वादिगुणयुक्तो वोध्य । ३-प्रत्येक तोलक- द्वयम् । एवमग्रेऽपि धान्यादितस्तोलकत्रयादिकं बोध्यम् । ४-प्रदीनस्तीक्ष्णपत्र । ५-'जरिष्क' एतेनैव नाम्ना लोकप्रसिद्धम् (दारुहरिद्राफलम् )। ६-गुलाबकेतकजले साध्य । सुवर्ण- रजतदलान्यप्यत्र प्रक्षिपेत् । ७-सिद्धरसापेक्षया चतुर्गुणसितैः । ८-इभपुष्प नागकेसरम् । ।
२२८ [छर्दि- सिन्डभेपजमणिमालायां १६ मेथीलवणनिशाभिः संभृतगर्भेऽधितलमामुक्ते । ज्वालामरिचशलाटुनि मिलति निमीलति पराऽप्यरुचिः ॥ ३२ ॥ १७ खर्वद्राक्षाकल्कं पटुजीरनिशार्द्रपुप्प हिगुरुचा । दना संक्वाथ्य कृता क्वथिता रुचिकारिणी कथिता ॥ ३३ ॥ १८ नारङ्गवल्कत्रुटिजीग्शुण्ठीमरीचसिन्धृत्थरजोवचारम् । वितीर्णधूपं घृतरामटेन स्यादीश्वरीतकमतीव रुच्यम् ॥ ३४ ॥ - इत्यरोचकचिकित्सा- अथ छर्दिचिकित्सितम् । १ श्वेतीयाः पलमेकमाकपलं त्रुट्यो दश द्वादा द्राक्षा विंशति वेल्लजानि लवणं शाणप्रमाणोन्मितम् । पिष्ट्वा सर्वमिदं विलोज्य मिपिजैरकैः पटे पावयेत् कोष्णं जीरकवासितं वमिपारोचक्षयार्थ पिवेत् ॥ १ ॥ तथा भाईक इनके एकत्र कल्क में जीरा, धनियां भौर हींग मिलाकर तथा निंबू रस में सिक्त करके सेवन करें। यह भवलेह परम स्वादिष्ट, रुचि एव जठरानल वर्धक तथा वमन रोग का सहारक कहा गया है ॥ ३१ ॥ हरी मिर्च (लाल मिरच के कच्चे फल) मे मेथी, लवण तथा हरिद्रा चूर्ण को भरकर तेल में डुबो दे। एक सप्ताह उपरांत इसे निकाल कर सेवन करें। इससे परम अरुचि भी दूर हो जाती है (यह श्लोक पूर्व भा चुका है, कितु यहा मरोचक चिकित्सा मे इसका मालेखन युक्तियुक्त होने के कारण यह पुन- रुक्ति में परिगणित नही किया जाना चाहिये) ॥ ३२ ॥ नमक, जीरा, हल्दी, भादू, लौंग और हींग इनके चूर्ण से युक्त दही के साथ किसमिस द्वाक्षा के कल्क को उकालकर 'कढी' बनालें। यह कढी रुचिकर कही गयी है ॥३३॥ नारगी का शुष्क छिलका, इला- यची, जीरा, झूठ, मरिच तथा सैंधव इनके चूर्ण से अवचारित तथा घृत एव हींग की धूप से धूपित इस तरह सिद्ध की गयी शक्तिमयी तक अत्यत रुचिकर होती हे ॥ ३४ ॥ भरोचक चिकित्सा समाप्त - - वमन चिकित्सा ( कुलप्रयोग ११)- मिश्री चार तोला, आईक चार तोला, इलायची नग दस, दाख नग बारह, मरिच नग वीस, तथा लवण तीन माषा-इन सवको एकत्र पीसकर, सौंफ के भर्क में घोलकर १-ज्वालामरिच 'लालमरिच' इति प्रसिद्ध तस्य फलमाम, तस्मिन् । अस्य पद्यस्य पूर्वाभिहितस्याप्यत्र लेखनमरुचिप्रकरणप्राप्तत्वादिति न पौनरुत्यम् । २-खर्वद्राक्षाया किसमिस' इति लोकभाषाप्रसिद्धाया । ३-आर्द्रकम् । ४-लवङ्गम् । ५-' कढी' इति ख्याता। ६-नारङ्गफलवल्कलम् । तच्च शुष्क्मादेयम् । ७-प्रायोऽरोचकप्रयोगाणामपि वमिहन्तृत्वात् क्रमप्राप्तत्वाच्च छर्दिचिकित्सिते प्रयोगैकादशकमुच्यते । ८-सितोपलाया । ९-शतपुष्पाभवै , तदभावे तरुणीकेतकजै । १०-जीरक श्वेत भ्रष्ट च ग्राह्यम् ।
२२९ चिकित्सितम्] चतुर्थों गुच्छ । २ संसाध्य निम्बुनीरे त्रिगुणे कलसौरसागरक्षोदम् । प्रपिवत सिताद्वैः सह वमनोत्क्लेदारुचिक्षत्यै ॥२॥ ३ पक्कं पटान्तर्गलितं पुनः पुनः क्षारं सितैलाजरणोपणोल्वणम् । निम्बूकनीरे कुसुमार्कसाक्षिणि प्रक्षिप्य सद्यः पिबतां कुतो चमिः॥३॥ ४ पिष्टवा स्रोतोञ्जनं जम्भजलैर्यामचतुष्टयम् । मरिचाभा वटी कार्या छर्यतीसारहारिणी ॥४॥ ५ विधुभित्तसुरभिसंव(मम्वरवान्तं वमि निवारयति । ६ समलोककनकमृत्स्नापिण्डीनिर्वापितमपि तथा ॥५॥ ७ हंहो संभृतमम्भो मृत्कुम्भे लोहवाणधूमवति । छर्दि प्रसह्य शमयति भाषितमादित्यरामेण ॥६॥ वस्त्रपूत करलें । इस द्रव को, भूने हुये श्वेत जीरे से सुवासित करके कवोष्ण पीने से वमि, तृपा तथा अरुचि का क्षय हो जाता है ॥ १ ॥ कलमीसोरा तथा नवसादर के चूर्ण को, इनसे त्रिगुणित निंबू के, रस मे सिद्ध करके मिश्री के शर्बत सह पीवें इससे वमनजन्य उत्क्लेद तथा भरुचि क्षीण हो जाते है ॥ २ ॥ यवक्षार को भूनकर पुनः पुनः कपडे मे से छान लेवें । मिश्री, इलायची, जीरा तथा मरिच चूर्ण सहित इस क्षारको गुलाब अर्क से युक्त निंबू के रस में मिलाकर शीघ्र पी जानेवालो को वमन कहा ॥३॥ जभीरी निंबू के स्वरस में काले सुरमे को चार प्रहर तक मर्दन करके उसकी मरिचप्रमाण गोलिया बाधलें। ये वमन तथा अतिसार को दूर करती हैं । इस गुटिको, बालको के अतिसार मे काली बकरी के दूध के साथ देनी चाहिये । इसमें दही-भात का भोजन पथ्य है। ज्वर में, के साथ इसी गुटीका प्रयोग प्रशस्त कहा गया है ॥ ४ ॥ कर्पूर से सुरभित जल को वस्त्रपूत करके पीनेसे वमन निवृत्त हो जाता है। इसी तरह, सम भाग सूठ और पीली मिट्टी लेकर उसकी पिण्डी बनाकर अग्नितप्त करके उसका पानी मे बुझावादें । इस बुझावे के जल को पीने से भी वमन में लाभ होता है ॥ ५॥ लोहबाण से धूपित मृत्पात्र मे भरे हुये पानी को पीने से वमन बलात् शमित हो जाता है। कितने आश्चर्य की बात है। यह प्रयोग मुझे श्रीआदित्यरामजी ने बताया है। (श्रीमादित्यरामजी ज्योतिष के उत्तम विद्वान तथा ममदावाद निवासी १-सागरो नवसादराख्य भारविशेष । २-सामान्योक्तत्वाद्यवक्षारम् । ३-तस्णी- केतकान्यतरकुसुमार्को ग्राह्य । ४-लोके 'श्याह सुरमा' इति ख्यातम् । ५-जम्बीरस्वरसै । ६-वालातिसूतौ कृष्णच्छागीपयसा देयेति ज्ञेयम् । पथ्यमत्र दधिसहितं भक्तं, ज्वरे च दुग्धेनैव दातव्या, पथ्य त्वत्र मुद्गसूप । अयं योगोऽतिसारे प्राय प्रचलतीति गुरूक्ति । ७-कर्पूरखण्डसुरभि । ८-जलम् । ९-पटपूतमित्यर्थ । १०-शुण्ठी। ११-पीता मृत् । १२-अङ्गारतप्तया पिण्ड्या निर्वापितम् , अन्यथा निर्वापितत्वमेव न सभवति । १३-पूरि- तम् । १४-गुर्जरदेशवासिना दैवज्ञशिरोमणिना पलाण्डुराजशतककाव्यप्रयोजकेन चेति । -- , दूध २३० [मूर्छा- सिद्धभेषजमणिमालायां ८-९ घृताक्लूताम्वरवर्तिधूमप्रपूर्णपात्रे भृतमाम्रमैम्भः । वमौ यथा साधु तथाऽञ्जनं स्यात्तद्दीपिकाधूमजकजलेन ॥ ७ ॥ १० राजिकाद्विजराजाभ्यां लेपः कोष्णो हदि स्थितः। वमनं विनिहन्त्येव महादेवेन भाषितम् ॥ ८॥ ११ अजाजीसैन्धवक्षोदैर्द्विसन्ध्यं शोधयेद्रदान् । उल्लेदभ्रमदोर्गन्ध्यवमनारुचिशान्तये ॥ ९ ॥ -इति छर्दिचिकित्सा - अथ मूर्छादिचिकित्सितम् । १ रालमावर्त्य मृत्पात्रे चिरमगारवह्निना । काश्मीरक्षोदमावाप्य ढालयेचीनभाजने ॥१॥ सैषा ममायिकी नाम घृतदुग्धानुपानतः । अभिघातनिपाताभ्यां मूर्च्छितानां प्रबोधिनी ॥ २ ॥ थे। इन्हीं की प्रेरणा से स्व श्रीभट्टजी ने 'पलांडुराज - शतकम् ' नामक विचक्षण काव्य की रचना की थी।)॥६॥ मकडी के जाले की घृताक्तवर्ति के धूम से धूपित मृत्पात्र मे दश तोला भर पानी भरदे । इसके पीने से वमन में लाभ होता है। इसी तरह उपरोक्त घृताक्तवर्ति के धूम से उत्पन्न काजल को भाजने से भी पूर्ववत् असर होती है ॥ ७ ॥ राजिका एव कपूर का हृदय प्रदेश पर कवोष्ण लेप वमन को मिटाता है । यह प्रयोग मेरे शिष्य महादेव का बताया हुआ है ॥ ८॥ उत्क्लेद, भ्रम, मुखगत दौगंध्य, वमन तथा अरुचि की शान्ति के लिये, जीरा तथा सैधव के चूर्ण से, दिवस मे दो बार, दांतों को साफ करना चाहिये ॥ ९ ॥ - वमन चिकित्सा समाप्त- - मूर्छादि-चिकित्सा-(कुल प्रयोग ४)- मृत्पात्र मे चार तोला राल को, प्रज्वलित अंगार-भग्नि से देर तक उकालते रहे । जब उकलकर वह कृष्ण-वर्ण होजाये, तब उसमे दो माषाभर केसर मिला एक , चीनी के पात्र में डाल देवें । ममायिका नाम से सुपरिचित इस औषधी को एक रत्ती १-लूताम्बरस्य द्वयं त्रय वा ग्राह्यम् । २-पलमपि द्रवद्वैगुण्येन दशरूप्यकप्रमाणं ग्राह्यमत्रेति । ३-द्विजराज कर्पूर । ४-जयपुरराजकीयसस्कृतपाठशालातो लब्यभिषगुपा- धिना गुरूणामन्तेवासिना महादेवशर्मणा । ५-क्रमप्राप्ततया मूर्छादीना केषाचिचिकित्सि- तमुच्यते । ६-कृष्णवर्णत्वं यावता कालेन भवेत्तावदित्यर्थ । ७-रालपले माषकद्वयं कुनुमस्येति । रक्तिप्रमाण मल्लमप्यत्र प्रक्षिप्यते । ८ अनेनैव नाम्ना लोके ख्याता, मात्रा रक्तिमारभ्य वलपर्यन्तं यथायथ कल्पनीया ।
२३१ - चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छ.। २ विपिनोपलज भस्म तुत्थं नस्यमिति ध्रुवम् । मूर्छापस्मारवाग्रोधतन्द्रासर्पविषार्तिषु ॥ ३ ॥ ३ हरति भ्रमं पटूषणरजोभिरङ्गारवर्तिता द्राक्षा। ४ उक्तो दुरालभाया घृतसुरभिस्तद्वदेव नियूहः ॥ ४ ॥ इति मूर्छादिचिकित्सितम् - अथ दाहचिकित्सितम्। १ इशूदकैरामलकीरजांसि त्रिसप्तधा साधु विभावितानि । प्रातर्निपीतानि सितापयोभिर्महान्तमन्तर्दव) हरन्ति ॥ १॥ २ 'पैसा प्रमान मिश्री धेलाभर सौंफ नेकै मस्तगी। एला छदामभर लै चूरन यह कण्ठदाहपै जङ्गी ॥२॥ - इति दाहचिकित्सितम् - अथोन्मादचिकित्सितम् । १ उद्दामोन्मादविधुराः पलमर्धपलं तथा । पिवन्तु च्छागलं मूत्रं हिमुना प्रतिवासितम् ॥१॥ भर मात्रा मे घृत और दूध के अनुपान पूर्वक लेनेसे अभिघात तथा निपातजन्य मूर्छा दूर होती है ॥ १-२ ॥ जगली उपलों की भस्म तथा तुत्य का नस्य मूर्छा, अपस्मार, .वाणी- निरोध, तन्द्रा तथा सर्प - विष के विकारों से नि संदेह उपकारक है ॥ ३ ॥ अंगारो पर सेकी गयी द्राक्षा को नमक और मरिच के चूर्ण - सह लेनेसे 'भ्रम' दूर हो जाता है। दुरालभा का घृत - सुवासित - कषाय भी यही प्रभाव दर्शाता है ॥ ४ ॥ - मूी-चिकित्सा समाप्त - दाह - चिकित्सा (कुलयोग २)- • आंवले के चूर्ण को इक्षु-रस की एकवीस भावनायें देवें । प्रात , मिश्रीयुक्त धारोष्ण - दूध के साथ इसे पीने से अन्तर्गत -महान-दाह नष्ट हो जाता है ॥ १ ॥ • एक पैसाभर मिश्री- एक धेलाभर (एक तोला) सौंफ, दो तीन माषा रूमीमस्तंगी तथा एक छदामभर (आधा तोला) इलायची इनका चूर्ण कण्ठ - दाह मे जंगी (महान) असर दिखाता है ॥ २ ॥ - दाह- चिकित्सा समाप्त - - उन्माद - चिकित्सा (कुल प्रयोग ५) तीन उन्माद रोग से पीडित व्यक्ति, मजा के चार या दो तोला भर मूत्र को, १-सितायुक्तैर्धारोष्णदुग्धै । २-कर्षाधप्रमाणे 'धेला' इति प्राकृत शब्द , तदर्धे 'छदाम' इति प्रसिद्ध । ३-द्वित्रिमाषेति नेकशब्दार्थ । तथा ।
२३२ सिद्धपजमणिमालाया [उन्माद- २ कृतंगदभङ्गां भगां गव्यक्षीरेण निर्भपिष्ट्रा । अधिपतिकरचरणतलं मल मुरिह चेष्टसे किमुन्मनः ॥२॥ ३ कार्पासमजकणपुरगन्धकवटिकाभवो धृपः ४ भूतावेशं शमयति रामठलशुनाञ्जनं यत् ॥ ३ ॥ ५ अधिमातुलपुत्राशयमुपणानां पक्षमेकमुपितानाम । चर्वणतो मुग्धवधूभूताविष्टेव वक्ति चित्राणि ॥ ४ ॥ ६ सितावगूढोदकतन्तुवायपूर्वार्धपश्चार्धममर्पणेन । प्रभूतभूतागमतन्निरासी स्त्रीणी शिशूनां भवतः मेण ॥ ५॥ - इत्युन्मादचिकित्सितम् - । हींग से वासित करके, पीये ॥ १॥ भांग को शुन्द करके गायक दृध में खूब बारीक पीसकर शिरोगत भधिपति मर्म पर उसका मर्दन करे, इससे उन्माद रोग में लाभ होता है । इस श्लोक का दूसरा अर्थ यह है -शुद्ध भाग को पत्र यारीक पीस उसका गो- -दुग्ध के साथ पान करके तू उन्मत्तवत् चेष्टा क्यो करता है? अपने अधिपति स्वामी के कर-चरण का अच्छी तरह सवाहन कर ॥ ॥ कपास-फल की मना, कश- गूगली तथा गन्धक इनकी वटी बनाकर धूप सेवें । इससे भूतावेग शमित हो जाता है।, हींग और लहसुन को सूक्ष्म पीसकर भाजने से भी यही लाभ होता है ॥ ३ ॥ धत्तुर फल के भीतर मरिच -दाने भरकर एक पक्ष पयंत रहने दें। इनको चबाकर खाने से, मुग्ध -वधु (नव - परिणीता) भूताविष्ट की तरह अनाप-शनाप बोल्ने लगे. गी॥ ४ ॥ मिश्री, कलाकन्द भादि मे 'जलका जुलाहा' जन्तु - विशेष को अच्छी तरह लपेटकर वटी बनालें। इसमे से अर्ध भाग को पहिले, तत्पश्चात् , अवशिष्ट अर्धभाग को पीछे, खिलाने से स्त्रियो मे प्रचुर -भूतावेश होता है, कितु, वारको मे से यही भूतावेश निकल जाता है ॥ ५ ॥ उन्माद-चिकित्सा समाप्त- १-द्यर्थोऽयं श्लोक । २-पेपणेन मधूच्छिष्टवन्मसृणीकृत्येति निर्भरशब्दस्वरसः । ३-पक्षे पेषणपूर्वक पान लश्यते । ४-प्रकृते द्वन्द्वसमासोऽधिपतिश्च शिरस्थ मर्म, पक्षे अधिपति खामी, तस्य करचरणतलमिति पष्ठीतत्पुरुष । ५-मर्दय । ६-द्वितीयपक्षे भझा पीत्वोन्मत्त सन् कि चेष्टसे खामिकरचरणसवाहन कुर्वित्युपदेश फलति । ७- कणगूगली' इति ख्यातम् । ८-वत्तूरफलाभ्यन्तर इत्यर्थ । ९-सितेत्युपलक्षण, तेन कलाकन्दादिष्वपि गृहन कार्यम् । १०-जलका जुलाहा' इति प्रसिद्ध क्षुद्रजन्तुविशेष । ११-भक्षणेन । १२-कोमलप्रकृतित्वात् प्रपञ्चशीलत्वाच । १३-क्रमेणेति पदं प्रभूतभूतागमतन्निरासा- वित्यनेन सवध्यते। -- 4 .. अथापस्मृतिचिकित्सितम् । १ वहेलग्रन्थिलमूला गम्भीरी नाम काचन व्रततिः । सलिलेन मूलमस्या निघृष्य पीतं हरत्यपस्मारम् ॥१॥ २ कुडव दधि रामाक्षशर्कराचूर्णमुज्वलम् । वज्रपोली घृताक्तैका द्वौ च वल्लौ घृतामैतः ॥२॥ इत्येतत् सर्वमेकत्र कृत्वा खादेदहर्मुखे। बूमो मासप्रयोगेण तस्य नश्यत्यपस्मृतिः ॥ ३ ॥ ३ मधुकक्वाथसहिते कुमारीस्वरसे शृतम् । घृतं स्मृतमपस्मारे हृदुत्फाले सशर्करम् ॥ ४॥ पञ्चप्रस्थजले पक्त्वा मधुकं नवतोलकम् । द्विप्रस्थो रक्षितः क्वाथोऽर्मणकन्या घृताढकम् ॥५॥ अपस्मार चिकित्सा (कुल प्रयोग ८)- अनेकों कठिन अथियों से युक्त मूलवाली गभीरी नामकी एक लता होती है। यह लता जयपुर के सुप्रसिद्ध अतिप्राचीन भाभानेरी कुंड के पास पास, बहुधा शरद्- ऋतु मे उपलब्ध होती है। इस लता के मूल को जल मे घिसकर पीने से अपस्मार नष्ट होता है ॥ १॥ दही सोलह तोला, परिशुद्ध बुरा तीन तोला, बाजरे की घी से चुपडी हुई बासी मोटी रोटी तथा गोदंती दो वाल इन सबको एकत्र करके प्रात काल खाये। इस तरह एक मासपर्यंत प्रयोग से अपस्मार निश्चय दूर हो जाता है। यहां गोदंती को अग्नि पर फुलाकर उपयोग मे लें ॥२-३॥ मधुक के क्वाथसहित ग्वारपाठे के रस मे सिद्ध किया गया घृत अपस्मार मे प्रशस्त माना जाता है। हृदय- स्पंदन यदि अधिक होता हो अर्थात् यदि हृदय की गति शीघ्र चल रही हो तो इस घृत को शक्कर के साथ देना चाहिये । इस प्रयोग मे, नौ तोले मधुक को पांच प्रस्थ जल मे उकाल, दो प्रस्थ जल शेष रखकर क्वाथ सिद्ध करलें। ग्वारपाठे का रस एक द्रोण (एक मण भर) तथा घृत २५६ तोला लेवें। (अर्मण, एक द्रोण १०२४ तोले जितना १-मनोदुष्टिसाधादुन्मादानन्तरमपस्मार । तत्रापि प्रथम दिव्यौषधिप्रयोग । तस्याश्चदं स्वरूपवर्णनम् । २-एतन्नाम्नैव प्रसिद्धा, सा च आभानेरीकुण्डोपकण्ठभूपरिसरे प्राय शरदि भवति । ३-विंशतितोलकमितम् । ४-शर्कराचूर्णस्याक्षत्रयमित्यर्थः । ५-वज्रो 'वाजरी' इति प्रसिद्धो धान्यमेद तस्य स्थूलरोटिका, व्यवहारश्च पर्युषितया । ६-'घापाण' इति गुर्जरदेशे, 'गोदन्ती' इति गौडदेशे प्रसिद्धात् । स चापि पावकफुल्लो ग्राह्य इति रहस्यम् । ७-' गवारपाठा' इति ख्याता कुमारी। ८-अस्योपलक्षणत्वाद्रस- क्षयबद्धकोष्ठश्वासकाससौजाकादिष्वप्यवचार्यम् । ९-पूर्वोक्तयोगस्यैव परिभाषापद्यमिदम् । अर्मणशब्दश्चात्र लोकप्रसिद्धमणवाची । मणश्च चत्वारिंशत्प्रस्थात्मक । , - २३४ सिहभपजमणिमालायां [वातव्याधि- ४ गधाणसंमितामेकां वचा क्षोद्रेण लोलिताम् । प्रातः प्रातर्लिहन्मासमपस्माराद्विमुच्यते ॥ ६ ॥ ५ नावनं स्वरसैः खर्वकण्टकारीफलोद्भवः । अपस्मारं विनिर्धूय सद्यो बोधाय कल्पते ॥ ७ ॥ द विपखर्परसंज्ञस्य स्वरसो नस्ययोजित.। अपस्मारं समुत्सार्य कल्याणाय प्रकल्पते ॥ ८ ॥ ७ सितकरवीरच्छदभवरजसा नम्यं नित्यपस्मारम् । अवधिः किन्तु पुराणे प्रोक्तः पाण्मासिको गुरुणा ॥ ९॥ ८ नस्यं कृतं मत्कुणजैरसृम्भिहरत्यपस्मारमुदग्रगम् । मटीयकाव्यं सुधया समानं यथाऽभिमानं द्विपतां कवीनाम ॥ १० ॥ - इत्यपस्मृतिचिकित्सितम् - अथ वातव्याधिचिकित्सितम् । भयङ्करपराक्रम करगृहीतपाशायुधं कुरङ्गगतिमस्थिरं गुणवहं सहस्थायिनाम् । होता है । मण, भर्मण, द्रोण आदि पर्यायवाची शब्द है।)॥ ४-५ ॥ छ मागा- भर वचाचूर्ण को मधु मे मिला प्रात चाटने से, अपस्मार से मुक्ति मिलनी है । यह प्रयोग एक माम पर्यंत करना चाहिये ॥ ६ ॥ छोटी कंटकारी फल - स्वरस का नावन लेने से, अपस्मार के गमन पूर्वक गीघ्र चैतन्यलाभ होता है ॥ ७ ॥ खर्पर नामक स्थावर विष के स्वरस का नस्य लेने से, अपस्मार के नाश- पूर्वक स्वास्थ्य प्राप्ति । होती हे ॥ ८ ॥,श्वेत करवीर के पत्र - स्वरस का नस्य अपस्मार को नष्ट कर देता है। कितु जिस गुरु ने मुझे यह प्रयोग बताया है, उनके कथनानुसार, प्राचीन अपस्मार मे उपरोक्त नस्य का प्रयोग छह मासपर्यंत करना चाहिये ॥ ९॥ खटमल के रक्त का नस्य लेने से अत्युन वेगवाला अपस्मार भी, अमृत के समान रस- पूर्ण मेरे काव्य से ईर्ष्या करनेवाले कवियो के अभिमान की तरह, नष्ट होजाता है ॥ १० ॥ - अपस्मार चिकित्सा समाप्त - वात-रोग-चिकित्सा (कुल प्रयोग २८)- भयकर शक्ति से युक्त, हरिण के समान चपल गति, अस्थिर, साथ में रहनेवाले के गुणो का संवर्धक (अर्थात् योगवाही), जगत की उत्पत्ति स्थिति तथा विनाश का १-स्पष्टम् । २-पुनर्नवामेदस्य । ३-प्राचीनेऽपस्मारे । ४-'सटमल' इति प्रतिद्धो जन्तुविशेप , स च ग्रीष्मे विशेषाद्भवति । ५-क्रमप्राप्त वातव्याधिचिकित्सितं वक्तुकामै श्रीकृष्णरामै प्रथम वायो स्वरूपमेव वर्ण्यते। ६-योगवाहिनमित्यर्थ । , RPAN चतुर्थी गुच्छ । चिकित्सितम्] २३५ जगजननपालनप्रलयकारणं शर्मणे वशीकुरुत केवलं पवनमुच्चकैः स्नेहतः ॥ १॥ १ प्रपुन्नाटकपत्राणां शाको वा वटिकाऽपि वा। वातव्याधि शमयति विस्मयः किमतः परम् ॥ २ ॥ २ तिलप्रस्थो गुडप्रस्थो भल्लातकपलद्वयम् । पालिकी गुटिका हन्ति वातव्याधि शनैः शनैः ॥ ३॥ ३ गन्धकं पट्पलं शुद्धं त्रिफला चित्रतन्दुलम् । त्रिकटु त्रिसुगन्धं च फणामूलं सजीरकम् ॥ ४ ॥ चित्रकं च पलेकैकं चूर्णितं वस्त्रगालितम् । शाणप्रमाणमादेयं मधुना प्रथम ततः ॥ ५॥ प्रत्यहं वर्धयेन्मापं यावत् कर्पप्रमाणता। ततः स्थिरा भवेन्मात्रा चत्वारिंशहिनावधि ॥६॥ एवं निषेविते योगे शून्यवातः प्रणश्यति । केवलं चणका भ्रा. पथ्यमन्यन्न किचन ॥७॥ ४ रसेन्दुर्दरदं दालिचिकणं तारतन्तवः । कर्प कर्प समाहृत्य कणिकाः कल्पयेत्तनूः ॥ ८॥ कारण, हाथ में पाश नामक भायुध को धारण किये हुये वायु को, सुख की (आरोग्य की) प्राप्ति के लिये केवल 'स्नेह' (तैलादि) से ही वश मे (शमन) कीजिये (स्नेह से सभी बगीभूत हो जाते है।)॥ ५ ॥ प्रपुन्नाड (चक्रमर्दक) के पत्तो का शाक, अथवा उनकी पानी में पीसकर बनाई गयी वटिका, वातरोग का शमन करती है। इससे अधिक आश्चर्य कारक और क्या हो सकता है ॥ २ ॥ शुद्ध भिलावा आठ तोला, तिल और गुड प्रत्येक चौसठ तोला इनकी एकत्र चार चार तोला भर गुटिकायें बनालें । ये वातव्याधि को शनैः शनै नष्ट कर देती है ॥ ३ ॥ शुद्ध गधक चोवीस तोला, त्रिफला, विडंग, त्रिकटु (सूठ, मरिच, पीपल), निजात (तज, इलायची, तेजपत्र) पीपलीमूल, जीरा और चित्रक प्रत्येक चार चार तोला- इनका एकत्र वस्त्रपूत सूक्ष्म चूर्ण वनाले । इस चूर्ण मे से प्रथम दिवस मधु के साथ तीन मापा सेवन करे । प्रत्येक दिन १ मापा मात्रा बढाते जाये। जिस दिवस चूर्ण की मात्रा एक तोले पर पहुंचे उस दिन से, इसी एक तोले प्रमाण से, चालीस दिवस तक चूर्ण का प्रयोग करते रहें। इस प्रयोग से शून्य-वात शमित हो जाती है। प्रयोगकाल मे केवल भूने हुये चने ही पथ्यान्न रूप से लेने चाहिये। इसके अतिरिक्त अन्य सभी पदार्थ अपथ्य है ॥ ४-७ ॥ रसकपूर, हिंगुल, दालचिक्कण विष और (चांदी के) गोटा कदला प्रत्येक एक एक १-तैलादित । स्नेहेन लोको वशीक्रियत इति श्लेषोत्थापितो ध्वनि । स चालङ्कारा- द्वस्तुव्यजनरूप । २-भल्लातकाना वृन्तच्छेद कार्य । ३-विडङ्गम् । ४-कर्षशब्देन तोलक- ।
२३६ सिद्धभेषजमणिमालायां [बातव्याधि- तेवके पंटुमास्तीर्य तत्र ताः कणिका न्यसेत् । विधाय पटुंना नेमि पिदध्याचीनपात्रतः ॥ ९ ॥ तद्धो ज्वालयेद्वति ठानकैः प्रहरत्रयम् । स्वागशीतं समुद्भुत्य पात्रोदरगतं रसम् ॥ १० ॥ अद्यादमीरनामानं ग्रन्थिबातोपदशवान् । अहानि सप्त नव वा मर्यादाऽमुप्य भक्षणे ॥ ११ ॥ सितासखं पयो गव्यं पथ्यं गोधूमफुल्लिका । घनश्यामेन भिपजा रसोऽयं महामर्पितः ॥ १२ ॥ गुका वा द्विगुजा वा मात्राऽमुग्य यथामयम् । पिधाय द्राक्षया प्रातर्गिलेद्दन्तैर्न च स्पृशेत् ॥ १३ ॥ पँटोस्त्रीणि पलानीह तत्र त्यास्तरण पलात् । द्वाभ्यां पलाभ्यां घटयेत् परितो नेमिवन्धनम् ॥ १४ ॥ ५ मरुभूरुहमूलस्य क्षोदो नल्वणसंमित । चतुष्प्रस्थं कणामूलं द्विप्रस्था च यवानिका ॥ १५ ॥ तोला लेकर जोकुट बनाले । तदुपरात, बारह तोला संधव लेकर, उसमें से चार तोले भर जितना एक लौह के तवे पर फैलादे । भवशिष्ट आठ तोले संधर से उसके चारों ओर एक परिधि-छोटीसी दीवार-बनाले। अब इस परिधि में, उपरोक्त भौषधीय द्रव्यो का जोकुट चूर्ण विछाकर, उसपर एक चीनी मिट्टी का सकोरा औंधा ढकदं । फिर, इनको तीन प्रहर तक अग्नि योग से पकावें । स्वाग शीतल होने पर शराव-तल सरन रस को सावधानी पूर्वक निकाल लेवें । इस रस की निर्माण विधि मुझे वैद्य घनश्याम- दास से प्राप्त हुई है। यह 'अमीर' रस उपदंश युक्त ग्रंथीवात मे उपयोगी है । इसकी सेवनावधि सात अथवा नौ दिवस से अधिक नहीं है। इस रस को द्राक्षा में अच्छी तरह लपेट कर, दातो को स्पर्श न हो इस तरह, सावधानतया निगीर्ण करना चाहिये । इसे गुजा अथवा दो गुंजा भर मात्रासे प्रात ही लेवें। मिश्रीयुक्त गाय का दूध और गेहू की धाणी पथ्य है ॥ ८-१४ ॥ करीर के ताजे एव भाई मूल सोलह प्रस्थ, पिप्पली मूल चारप्रस्थ, यवानी दो प्रस्थ और हरताल दो पल इन सबको एकत्र जौकुट करके पातालयत्र विधि से मर्क मुच्यते । ५-स्पर्शाज्ञानरूप 'शूनवैरी' इति लोकख्यातो रोगविशेष । ६-रसकर्पूरम् । दरद हिड्डुलम् । दालचिकणमेतन्नान्नैव प्रसिद्ध विषम् । तारतन्तव इति गोटाकन्दला' इति नामतो लोके प्रसिद्धा ,ते च राजता प्राह्या । १-अनेनैव नाम्ना प्रसिद्ध रोटिकापाकप्रयोजने लोहे यन्त्रविशेषे । २-वक्ष्यमाणप्रमाण सैन्धवम् । ३-वक्ष्यमाणमानेन । ४-परिधिम् । ५-पिधानानन्तर सैन्धवपले कतीराख्य- गुन्द्रकर्ष समेल्य जलेन सपिष्य चीनपात्र परित सन्धिरोध विधाय सशोष्य च पश्चाद्वहिर्दय । ६-चतु प्रहरमपि। ७-अनन्तरोक्तयोगे लवणमानप्रयोजनप्रदर्शक पद्यम् । ८-मरुभूरुह करीर कैर' इति ख्यात , तस्य मूल सद्यस्कमाई ग्राह्यम् ।
चिकित्सितम्] चतुर्थों गुच्छ.। २३७ हरितालं पलद्वन्द्वं स्थूलमेकत्र खण्डयेत् । अर्क पातालयन्त्रेण पातयेदुग्रसौरभम् ॥ १६ ॥ अमुष्य पुनरर्कस्य मण्डलावधि सेवनात् । वातव्याधिः पुराणोऽपि प्रशाम्येत् कि पुनर्नवः ॥ १७ ॥ ६ उसव्वाचोपचीनीभ्यां क्वाथो माक्षिकसाक्षिकः। सन्धिवातं विशेषेण निःशेपयति पथ्यतैः ॥ १८ ॥ ७ मल्लः सूतो वलिः कत्थं पृथग्वल्लचतुष्टयम् । समुद्रान्तारसैः कार्या गुडाः सर्षपसोदराः ॥ १९ ॥ संधिवातगलत्कुष्ठदुष्टनाडीव्रणज्वरान् । फिरशोथपवनकफमान्द्योदरापदः ॥ २० ॥ कासश्वसनहिकाढीन निघ्नन्त्येव न संशयः। अनुपानं जलं शीतं तैलाम्लादि विवर्जयेत् ॥ २१ ॥ ८ कुपीलोः पीतसिद्धार्थात् कुडवं कुडवं कुरु । द्वौ च तौ सवितुर्मूलाद् द्वौ कौ शतमल्लतः ॥ २२ ॥ निकाल लेवें । यदि उग्र गंध के कारण इस भर्क के पीने में असुविधा हो तो इसमें सूठ का चूर्ण मिला गुटिका बनाकर निगल जानी चाहिये। रोग के बलाबल अनुसार उचित मात्रा में इसका उपयोग करे। इस अर्क के, एकचालीस दिवस पर्यंत, सेवन करने से जीर्ण वात रोग भी नष्ट होजाता है । फिर नूतन की तो चर्चा ही क्या? १५-१७ उसव्या और चोपचीनी के यथाविधि साधित कषाय मे यथामात्रा शहद मिलाकर पीने से वातरोग का, विशेषतया सधि-वात का, शमन होता है। प्रयोग कालमे तैल अम्लादि पदार्थ सर्वथा अपथ्य है ।। १८॥ शतमल्ल, शुद्ध पारद, शुद्ध गंधक, और कत्था प्रत्येक बारह गुंजा भर, इनको एकत्र खरल मे पीसकर अच्छी तरह मिलालेवें। फिर धमासे के स्वरस मे घोटकर इनकी सर्पप समान गोलियां निर्माण करे । तैल, अम्लादि अपथ्य पदार्थों के त्यागपूर्वक, शीतल जल के अनुपान सहित इनके प्रयोग से सधिवात, गलितकुष्ठ, दुष्ट नाडीव्रण, ज्वर, उपदश, शोथ, कफ-वात की विकृति, अग्निमाद्य, उदर-रोग, कास, श्वास, हिक्का आदि का नि सदेह शमन हो जाता है ॥ १९-२१ ॥ कुचला और पीत सरसो, प्रत्येक सोलह सोलह तोले, आकडे के मूल की छाल बत्तीस तोला, शतमल्ल दो तोला तथा १-एकचत्वारिंशद्दिनावधिसेवनात्। उग्रसौरभत्वादकं पातुमशक्यश्वेच्छुण्ठीचूर्णेन गुटी प्रकल्प्य गिलेत् । रोगवलावल वीक्ष्य मात्राऽस्य प्रकल्पनीया। २-द्वीपान्तरीयवटजटा उसब्बाशब्दवाच्या, द्वीपान्तरीयवचा च चोबचीनी नाम्नाऽऽख्यायते। ३-तैलाम्लादि- वर्जनस्वरूपात् । ४-सूतः पारद । पारदगन्धौ च शुद्धावुपादेयौ। ५-दुरालभाखरसै । ६-अनेनैव नाम्ना प्रसिद्ध उपदंशविशेषो भावप्रकाशोपदिष्टवरूपश्च । ७-काकतिन्दुकात् कुचला' इति प्रसिद्धात् । ८-मूलवल्कलादित्यर्थ । ~ A २४० - सिद्धभेषजमणिमालायां [वातव्याधि- १६ भेषजक्ष्वेडवटिकांस्तैलान्तस्तलयेद्धृशम् । हन्ति मर्दनमात्रेण तत्तैलं वातवेदनाः ॥ ३५ ॥ १७ मापिकैश्चक्ररुक्फेनैस्तैलं द्वादशमाषकम् । मन्दानले चिरं सिद्धं खल्ली मर्दनतो द्यति ॥ ३६ ॥ १८ शिखिपिच्छविभूतिशृतं तैलं खण्डयति खल्लिकाखेलान् । १९ अशिशिरतरसलिलनिभृतकाचघटीस्वेदनमपि तथा ॥ ३७ ॥ २० एरण्डबीजसंसिद्धः कवोष्णः सान्द्रपायसः। समन्ताद्युक्तितो बद्धो हनुकण्ठग्रहापहः ॥ ३८ ॥ २१ मुहुर्मुहुर्धू नफुल्लतूलसारावृतिस्विन्नकलेवरस्य । संधीनधिष्ठाय रुजन्नजस्रं प्रभञ्जनो भङ्गमवश्यमेति ॥ ३९ ॥ सधिवात से लाभ होता है। राधा-गाली विष की एक जाति है । यह गुर्जर प्रदेश के अन्तर्गत 'डाकोर' से जहा श्रीरणछोडराय भगवान का प्रसिद्ध मंदिर भी है, उसके निकट गोमती नदी के किनारो पर उपलब्ध होता है। इसके मूल शकरकंदी के मूल से आकृतित साम्य रखते है । यह गुर्जर प्रांत मे 'दुधियो वत्सनाभ' 'वढवाडिओ' आदि नामो से सुप्रसिद्ध है ॥ ३४ ॥ शुंठी तथा शुगी विष के एकत्र चूर्ण से वटिकायें बनाकर उनको तैल मे तब तक खूब तलते रहें जब तक वे जल भुनकर कोयले के समान काली न बन जायें । इस तेल की मालिश करने से वात वेदना शांत हो जाती है ॥ ३५ ॥ चुक्र, कूठ और अफीम प्रत्येक एक एक माषा भर लेकर बारह माषा तैल मे दीर्घ काल तक मदाग्नि से पकावे । इस तरह साधित तेल की मालिश करने से, वातरोग विशेषतया 'खल्ली' नष्ट हो जाती है। निबू रस के अधस्तल मे स्थित घनीभूत चिकने द्रव को चुक्र कहते है सल्ली पैर जांध तथा हाथ आदि मे होनेवाली ऐठन' का नाम है जिसे 'बांयटा' भी कहते है ।। ३६ ॥ मयूर पिच्छ की भस्म मे यथा विधि सिद्ध किया गया तैल ‘खल्ली के खेल को खदेड देता है। इसी तरह उष्ण जल से परिपूर्ण काचके घट-द्वारा स्वेदन करने से खल्ली की खिल्ली उडजाती है ॥ ३७ ॥ एरड बीजो मे सिद्ध किये गये कवोष्ण घट्ट-पायस को चारो तरफ युक्तिपूर्वक बाध देने से हनुग्रह तथा कंठग्रह आदि वात -व्याधिया छूट जाती है ॥ ३८ ॥ कपास के ढेर के पास रोगी को बिठाकर उसे पुन पुन तब तक पींजते रहे जब तक १-शुण्ठीभृङ्गिकविषयोटिका । २-यावटिका कोकिलाकारा स्युस्तावदिति भृशशब्दार्थ । ३-चुक्र । लोके 'चूक' इति ख्यातो निम्बूरसजन्य कल्काभो द्रव्यविशेषः, रुक् कुष्ठ, फेनमहिफेन, ते । ४-खल्लीमित्युपलक्षणं, तेन सर्ववातव्याधिम् । ५-मयूर पिच्छभस्मशृतम् । ६-"खली तु पादजडोरुकरमूलावमोटिनी" इत्युक्तलक्षणा 'बायटा इति लोके प्रसिद्धा । ७-रोगिणमभ्यण सस्थाप्य धूननारम्भ कार्य । यथा च धूननफुल्ल तृललवाम्तदगोपरि तिष्ठेयुस्तथेति । .
२४१ , , चिकित्सितम्] चतुर्थी गुच्छ । २२ सर्वाङ्गमारुते तीव्रतोदशूलादिकारिणि । कवोष्णकारवीतल्पे शयानः स्वेदमाचरेत् ॥ ४० ॥ २३ हेममिहिरचञ्चुजलं स्थितमधिभूगर्तमष्टाहम् । अध्यातपमभ्यगाह्मजयति रुजं प्रभजनजाम् ॥४१॥ २४ तीक्ष्णपत्रीरजः सूक्ष्म प्रपिप्य ढमर्णसा। कोणीकृतं प्रलेपेन वातपीडां नियच्छति ॥४२॥ २५ मक्षीशकदर्णसा समं किमपि कथितं प्रलेपितम् । शनकैरनलेन तापितं कवलीकुरुतेऽनिलव्यथाम् ॥ ४३ ॥ २६ मयूरचन्द्रस्य गुडेन मध्यं विनीय बद्धां गुटिकां प्रभाते । मास गिल कोष्टकशीर्षशान्त्यै तैलाम्लवाह्नीकगुडादि मुञ्च ॥ ४४ ॥ २७ चितादग्धं रवावस्थि विचूर्ण्य गुडयोगतः । प्रकल्प्य मोदकं खादेत् प्रातः क्रोष्टर्कशीर्षके ॥ ४५ ॥ उस रूई के सूक्ष्म रेशो से रोगी परितः आच्छादित न हो जाये। इस तरह देह के स्विन्न होने पर, रोगी को सधिगत वात की निरतर वेदना से नि सदेह मुक्ति मिल जानी है ॥ ३९ ॥ तीव्र तोद और शूल युक्त सांग वातरोग मे कोष्ण अजमोदा से भास्तृत शय्या पर लेटे हुये स्वेदन लेना हितावह है ॥ ४० ॥ धत्तुरे, माकडे तथा एरड पत्तो के स्वरस को घडे में भर गहरे गर्त के भीतर गाडकर आठ दिवस पर्यंत रहने दे, इस रस की, धूपमें मालिश करने से वातजन्य वेदना भग हो जाती है ॥४१॥ एरड पत्तो के स्वरस से, तमाखू पत्र के सूक्ष्म चूर्ण को खूब पीसकर फिर थोडा निवाया करके उसका लेप करें। इससे वातवेदना नष्ट हो जाती है ॥ ४२ ॥ मख्खी की विष्ठा को पानी में घोलकर उसमे पोदीने के कल्क को खूब उकाल सांद्र बनाले। कुछ शीतल होने पर उस पिष्टीका, पीडित स्थान पर लेप करके धीरे धीरे अग्नि का ताप देवे । इससे वातवेदना शांत हो जाती है ॥४३॥ मयूरपिच्छ की भस्म को गुड के भीतर रख उसकी गुटिका बनाले । एक गुटी नित्य प्रात काल निगल लेनी चाहिये । इस तरह एक मास तक इसका सेवन करने से क्रोष्टुकशीर्ष वातव्याधि से मुक्ति मिल जाती है । इसके प्रयोग काल मे तैल, गुड, इमली, हींग प्रभृति पदार्थों से परहेज करें। रोगाधिक्य मे एक मासावधि, सामान्य रोग में एक सप्ताह अथव एक पक्ष पर्यत, प्रयोग का विधान है ॥ ४४ ॥ आकडे के भीतरी काष्ठ को तीव्र अग्नि मे जलाकर उसका सूक्ष्म चूर्ण करलें फिर गुड मिलाकर इसके लडू बनाले । इनको प्रात काल लेने से कोष्टकशीर्ष का शमना १-चत्तूराकरण्डखरस । २-तीक्ष्णपत्रीशब्देन 'जरदा' इति प्रसिद्धस्य ग्रहणम् । ३-एरण्डदलोद्भवेन स्वरसेनेति रहस्यम् । ४-'पोदीना' इति प्रसिद्धम् । ५-महति रोगे मासोऽवधिर्दुर्वलरोगे पक्ष वा । ६-"वातशोणितज गोयो जानुमध्ये महारुज । १. ज्ञेय. क्रोष्टमशीर्षस्तु स्थूल क्रोष्ठकीर्षवत्" इति प्रोक्तलक्षणे । सि०१६ - -- सप्ताह २४२ [शूल- - सिद्धभेपजमणिमालायां २८ महिपीसूत्रमसकृत्पटपूतं निशासखम् । पिवतामामवातातिः क्षिप्रमेच प्रशाम्यति ॥ १६ ॥ - इति वातव्याधिचिकित्सितम् - अथ शूलचिकित्सितम्। १ चलदलतरुमूलच्छल्लजातः कपायो लवणगुडसहायो मात्रया पीतमात्रः । अधिकनिविडमूलं दुःसहं कुक्षिशूलं शमयति यदि शङ्का तर्हि दत्त्वा परीक्ष्यः॥१॥ २ एरण्डमेथिकागुडनि!हो हरति जठरशूलानि । वाराङ्गनाविलासस्तरुणानां मानसानीव ॥ २॥ ३ वम्बूललम्बिकण्टकसैझ सकीटं विपाच्य कुडवजले । अर्धावशिष्टमम्भः पीतं द्यति जठरशूलानि ॥ ३॥ ४ क्षपाऽक्षमाना यवसा समाना पटुस्त्रिमापः कुरु चूर्णपाम् । पलप्रमाणेन घृतेन पक्त्वा कोणं महाशूलरुजासु देहि ॥ ४॥ हो जाता है ॥ ४५॥ भैस के मूत्र को एकवीस बार वस्त्रपूत करके उसमें हरिद्रा मिलाकर पीते रहने से आम-वात-जन्य पीडा शीघ्र ही शात हो जाती है ॥ ४६ ॥ वातव्याधि चिकित्सा समाप्त - - शूलचिकित्सा (कुल प्रयोग १७)- पीपलवृक्ष के मूलकी छाल से सिद्ध कषाय मे लवण और गुड मिलाकर यथा- मात्रा मे पीने मान से, अत्यधिक वेदनायुक्त, अतएव असह्य उदरशूल प्रशमित हो जाता है। इसमे यदि शंका हो तो प्रयोगद्वारा परीक्षा कर लीजिये ॥ १ ॥ एरडमूल, मेथी और गुड से साधित - कषाय, युवतियो के विलास से युवको के हृदय-शूल की तरह, उदर शूल को शमन कर देता है ॥ २ ॥ बबूलवृक्ष के काटो पर कीट विशेषद्वारा निर्मित आवास को कीटसहित लेकर, उसे एक सेर पानी मे, अर्धावशेप रहने तक, उबालकर पीने से, उदरशूल शमित हो जाता है ॥ ३ ॥ हरिद्रा एक तोला, उतने ही प्रमाण मे अजवायन तथा नमक तीन माषा, इन तीनो का सूक्ष्म चूर्ण बनाले । फिर, इनको चार तोलाभर घी मे भून, १-वातरुजासामान्याच्छूलमुच्यते। २-पिप्परमूलवल्कलजात । ३- मशक- विलाई' इति लोक्ख्यात कीटविशेषस्त सहितमेव कण्टकसङ्कट तद्गृह ग्राह्यम् । ४-हरिद्रा । ५-यवानिका । ६-अक्षमानेत्यर्थ । ७-पलमत्र चतुस्तोलकपरम् । कवोप्ण चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छ.। २४३ ५ करञ्जमज्ज्ञो द्वितयं त्रयं वा विभय साकं पटुना निगीर्णम् । शूलं समूलं हरति प्रसह्य कूलं यथा निर्झरिणीप्रवाहः ॥५॥ ६ मल्लकान्तर्मनाग्भ्रष्टं बम्बूलफलज रजः। गृतेन वारिणा पीतं समूलं शूलमुद्धरेत् ॥ ६॥ ७ आर्द्रचूर्णनै संघृष्टा कारवी निस्तुषीकृता । सौवर्चलेन सहसा शूलं मूलान्निकृन्तति ॥ ७ ॥ ८ तैलमलितखण्डसखी चूर्णवटी द्वित्रिवेलमपि गीर्णा । भवति तया खलु किं नो शूलविशेषव्यथा शीर्णा ॥ ८ ॥ ९ शिग्रुस्वरसेन वटी सैन्धवसौभाग्यविश्वानाम् । जयति जठरशूलरुजं योगोऽयं श्यामरामभिषगुक्तः॥९॥ मृद्भाण्डपूर्णे खरपुङ्गवस्य मूत्रे शनैः शुष्यति सूर्यतापात् । या पर्पटी स्त्यायति मात्रया सा दत्ता निहन्यादुदरार्तिमुग्राम् ॥ १०॥ ११ प्रक्षालितानि शनकैर्मरिचोत्तमानि सिद्धानि सर्पिषि मनाग्विषमुष्टिकानि । ही सेवन करने से उदर की तीव्र शूलजन्य वेदना मे लाभ होता है ॥ ४ ॥ करज फल की मजा को भूनकर, नमक के साथ लेने से, नदी के वेगवान प्रवाह से कूल की तरह, उदरशूल बलात् प्रवाहित हो जाता है ॥ ५॥ बवूल के शुष्कफलचूर्ण को शराब मे रखकर थोडा भूनलें। इस चूर्ण को, उकले हुये जलके साथ फांकने से उदरशूल समूल नष्ट हो जाता है ॥ ६ ॥ ताम्बूलो- पयोगी चूने के चूर्ण के साथ अजवायन को खूब मसल मसल कर निस्तुप बनाले । फिर, इसमे थोडा काला नमक मिला फाक जाये। उदरशूल को यह शीघ्र ही निर्मूल कर देता है ॥ ७ ॥ चूने की वटी को तिल की भूसी मे मिलाकर दो या तीन वार निगीर्ण करने से पेट की चूक (शूलजन्य पीडा विशेष) विशीर्ण हो जाती है ॥ ८ ॥ सैधव, टकण तथा सूठ के सूक्ष्म चूर्ण को सहजने के पत्रस्वरस से खूब मर्दन करके वटी बनाकर सेवन करे। यह उदरशूल की वेदना को मिटाती है। यह प्रयोग वैद्य श्यामरामने बताया है ॥ ९॥ स्वस्थ गदहे के मूत्र को एक मिट्टीके घट मे भरकर सूर्य के ताप मे रखदे । इस मूत्र के धीरे धीरे सूखजाने पर, घट मे चारो तरफ पर्पटी जैसी सूखी तह जम जायेगी। इस पर्पटी का, रोग और रोगी के बलानुसार मात्रा स्थिर करके, प्रयोग करें। इससे अत्युग्र उदर शूल जन्य पीडा प्रशमित हो जाती है ॥१०॥ पानी से धीरे धीरे मसलकर अच्छी तरह साफ किये गये मरिच के दाने तथा १-करञ्जफलमज्जाया । २-मल्लक शरावविशेष 'मालसा' इति प्रसिद्ध । ३-सुधा- खण्डजेन ताम्बूलाधुपयोगार्हेण । ४-यवानिका । ५-चूर्णेन सह गाढघर्षणेन निस्तुषा कार्या । ६-सुवाजचूर्णवटी । ७-चूकशब्दवाच्या। ८-सौभाग्यं टकणम् । - २४४ मिन्द भेषानमणिमालायां [शल- 'गोली गुलावजलने करिये चणेमी सोह कहा नहिं मिटावत पेटपीरा' ॥ ११ ॥ १२ मल्लादिन्द्वक्षिगुणितमुपणं कन्यया व्यहम् । खल्वयित्वा मकुष्टश्रीगुंटी जठराल जित् ॥ १२ ॥ १३ चक्रिकाः पोडगीमानास्तन्व्यः शम्बरहजाः । घटान्तर्हिः पुटेत् कन्यामांसप्रस्थद्यान्तरे ॥ १३ ॥ तद्भस्म चन्द्ररुचिरं घृतेन सह सेवितम् । हृच्छ्लभ्रमनैवल्यवातरलेष्मनिपूदनम् ॥ १४ ॥ १४ रङ्गच्छटेन तनुना परिवेष्टय मुंद्रां ताम्रस्य सावयवमार्कवकल्कमध्ये। सम्यक्पुटेदतिपटुः सुरमेः शहिः स्यात् सोमनाथरस एप समीरहर्ता ॥ १५ ॥ घृत मे थोडे भूने गये शुद्ध कुचले इन दोनों को मिलाकर गुलाब जल से घोट करके चने प्रमाण गोलिया बनाले । क्या इनके सेवन से भी पेट की पीडा न मिट संकंगी? ॥ ११ ॥ एक भाग मल्ल तथा मल से इधीस गुणित पिप्पली इन दोनो को एकत्र ग्वारपाठे के रस से तीन दिवस तक सरल करें। इनकी, उत्तम मकुष्ट जैसी गुटी बनालें । यह उदर शूल को नष्ट कर देती है ॥ १२ ॥ सांभरसींग की पतली एव चक्राकार, चार चार तोलेभर, चक्रिकाये सवार ले । एक मिट्टी के घट में, चौसठ तोला ग्वारपाटे का गुदा भरकर, उसपर इन सींग की चक्रिकामो विगदे । तथा इनके ऊपर, पुन चौसठ तोला ग्वारपाठे का गूदा और भरदे । घट के मुस को कपढमिट्टी करके दो बार पुट देने से, इनकी चद्रमा के तुल्य श्वेत - भस्म बन जायेगी। इस भस्म का एक रत्तिप्रमाण मे धृत के साथ प्रयोग करें। इससे हृदयशूल, भ्रम, निर्बलता, यात एव कफजन्य विकार नष्ट हो जाते है। इसके प्रयोगकाल में करीब पाव सेर घृत का अवश्य सेवन करें । तैल, लवण, मम्ल भादि अपथ्य है ॥ १३-१४ ॥ तांवे के एक पैसे को, रागे के पतले पतरे में अच्छी तरह लपेट भांगरे के पंचाङ्ग कल्क के भीतर रखदें। फिर, गायकी गोवरी से अच्छी तरह पुट दें। इस तरह ग्यारह पुट देने से उत्तम तानभस्म बन जायेगी। इसे 'सोमनाथरस' कहते है। पार्श्वशूल की यह परम औपधि है ॥ १५ ॥ कर, १-चणकप्रमाणा । २-एकविंशतिगुणम् । ३-पलप्रमाणा । ४-शम्बर. 'साभर इति लोकप्रसिद्धो मृगविशेषो विक्टविषाण । ५-रक्तिप्रमाणमिति शेष । तैलाम्लवणादिक न भक्ष्यमेतद्स्माशिनाऽवश्यं कुडवमितं पादोनकुडव वा घृत भक्षितव्यमिति । ६-त्रपुर पत्रेण। ७-पण 'पैसा' इति ख्यातम् । ८-पार्श्वशूलजित् ।
२४५ चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छ । १५ मकुष्ठजीर्णच्छदजैः कषायैर्भूत्वा घटं तत्र निधाय नाडीम् । तया शनैः स्वेदय पार्श्वमुग्रशूलार्तमाच्छादितमम्बरेण ॥ १६ ॥ ९६ पार्श्वशूलाधिकरणमरुणक्षीरलेपितम् । अङ्गारधूपितं शूलानधिकरणं भवेन्न किम् ॥ १७ ॥ १७ शाणमध्यर्धशाणं वा केवलं स्वच्छपारदम् । तैलाम्लप्रभृतित्यागी पिबेच्छूलनिवृत्तये ॥ १८ ॥ नानाक्रियासु मोघासु वैद्येषु व्यग्रबुद्धिषु । रुदत्सु रुग्णदारेपु प्रयोगमवचारयेत् ॥ १९ ॥ - इति शूलचिकित्सितम् - अथ गुल्मचिकित्सा। १ गुडेन साधु संनीय गजाशनदलत्रयम् ॥ वातगुल्मगदग्रस्तो असेत सुखसिद्धये ॥१॥ मकुष्ठ के परिपक्क जीर्ण पत्तो के कषाय को एक मिट्टी के घट मे भरदे । घट मे नली लगाकर, उसमे से बाहर निकलती हुई, कपाय की बाष्प से पार्श्व का स्वेदन करें। स्वेदन करते समय पाव भाग को वस्त्र से आच्छादित रखे। इस तरह धीरे धीरे वाष्प स्वेदन लेने से पाच शूल शमित हो जाता है ॥ १६ ॥ पार्श्व में जहा शूल उठता हो वहा, आकडे के दूध का लेप करके अंगीठी के अंगारो से सेक करे । इस तरह करने से क्या रुग्ण शूल का अनधिकारी नही होगा ॥ १७ ॥ तीन अथवा साढे तीन माषा भर मात्रा मे स्वच्छ (शुद्ध) पारद का पान करने से तथा प्रयोग काल मे तैल अम्लादि द्रव्यो से परहेज रखने से पाचशूल निवृत्त हो जाता है । यह महाप्रयोग भाशु असर दर्शाता है। अनेकों उपचार भी जब असफल जाये, वैद्य गण भी चिकित्सा करते करते जब कुंठित हो जाये तथा रुग्णपतिया जव रुदन करने लगे, तब ही उपरोक्त । प्रयोग भजमाना चाहिये ॥१८-१९ ॥ -शूलचिकित्सा समाप्त - गुल्मचिकित्सा (कुल प्रयोग ३)- वातज गुल्म से ग्रस्त रुग्ण को, रोगमुक्तिरूपी सुखसिद्धि के लिये, पिप्पल वृक्ष के तीन कोमल पत्तों को गुड मे अच्छी तरह लपेट कर चबाना चाहिये ॥१॥ रात्रि - पर्यंत, १-पार्श्वशूलस्थानम् । २-अर्कक्षीरलेपितम् । ३-महाप्रयोगोऽयम् । ४-पूर्वोक्त- योगस्य दानावस्थावर्णनम् । ५-चातरुजासामान्याच्छूलानन्तरं गुल्मोऽभिधीयते। ६-गजा- शन पिप्पल , तस्य पत्रत्रयमित्याकृत्या ग्रहणम् ।
२४८ सिन्भेषजमणिमालायां [ मसाल- ऊर्ध्वगं पिक्षरं सारं काचकृप्यां निधापयेत् । नाभिस्थेनास्य पिचुना मूत्रकृच्छं निवार्यते ॥ ६ ॥ ४ सौरे प्रकुञ्चे द्रवति प्रणीय मापं बलिं ढालय खल्बकुक्षा। सिद्वो रसः शीतलपर्पटीति कृच्छेऽपि कृच्छे कथितः लजीरः ॥ ७ ॥ ५ सौरादजाज्याटितोऽपि मापी बटाकुरेभ्यश्च नवैव मापाः । एकैव पिष्ट्वा गुटिका विधेया कृच्छ्रे' धारोष्णपयोभिरयात् ॥ ८ ॥ ६ निवशरीः संक्षुण्णा मृत्पाने सायमानु विनिमग्ना'। प्रातस्ताः पुनरापः पीताः पित्तोग्रकृच्छमपसन्युः ॥ ९ ॥ ७ प्रणीतः प्रनढळूकैः क्वाथो माक्षिकसाक्षिकः । मूत्रकृच्छ्रे सदाहाति हन्ति ताम्बूलगीलिनः ॥ १० ॥ ८ महिपीश्रुतिनिष्कासितकिट्टैः कीलाललोलितैः पूतः । नाभि प्रलिम्प कृच्छ्रे नाभिरि, पराभिरुक्तिभिस्तोपः ॥ ११ ॥ - इति मूत्रकृच्छचिकित्सितम् - करीब चार तोले कलमी सोरे को अग्नि से पिघलाकर, उसमें एक माषा गंधर्व मिला खरल मे ढालदे । इस तरह सिद्ध किये गये रस को 'शीतल -पर्पटी' कहते हैं। कृच्छ्रातिकृच्छ्र मूत्रकृच्छ्र मे भी जीरे के साथ लेने से उत्तम लाभ देता है ॥ ७॥ करमी सोरा, जीरा और इलायची प्रत्येक दो दो मापा तथा वट के अंकुर फेवल नौ मापा इन सवको एकन पीसकर एक वटी बनालें। धारोष्ण दूध के साथ इसको लेने से पित्त तथा वातप्रधान मूत्रकृच्छ्र प्रशमित हो जाते हैं॥८॥ इफीस नग निबोली को कृटकर सायं- काल एक जल पूर्ण मृत्पात्र में भिगोकर रसटें । दूसरे दिन, प्रातःकाल इन्हे जल-सहित पी जाने से पित्त - प्रधान उग्र-मूत्रकृच्छू शामित होता है (इसकी प्रयोग मर्यादा तीन दिवस तक ही है)॥९॥ एक ताम्र पात्र मे ताम्र के पुराणे सिक्को का, काथ - विधि से उकाल कर, काथ सिद्ध करलें। फिर इसमे थोडा शहद मिलाकर पीये । इससे दाह एव वेदना- पूर्ण पित्तज मूत्रकृच्छ्र शान्त हो जाता है। इसके प्रयोगकाल मे तांबूल - चर्वण पथ्य है ॥ १० ॥ भैंस के कर्णमल को जलमे घोलकर वस्त्रपूत करले। मूत्रकृच्छ्र रोग मे, यदि अन्य प्रयोगो से लाभ न हुआ हो तो, नाभीपर इसका प्रलेप करने से अवश्य सतोष होगा ॥ ११ ॥ मूत्रकृच्छ्र चिकित्सा समाप्त - - १-मार्तिके नव्यशरावे तरुणीपुष्पाःण सारमालोज्य पिचु कार्य । २-पलप्रमिने । ३-अग्नियोगादुत्पद्यमानल्लेदे । ४-प्रत्येक माषकद्वयम् । ५-पित्तकृच्छ्रेषु, बहुत्वमत्रादिपर तेनोप्णवातेऽपि देया, त्रिदिन च सेवनमर्यादा । ६-एकविंशतिसख्या । ७-पुराणतरै- स्ताम्रिकै पणे , कायश्चापि ताम्रपान एव कार्य । ८-महिपीकर्णमलै । ९-जलघोलितै । १०-आभि पराभिरुक्तिभिर्न तोष इति योजना । 4 अथ मूत्राघातचिकित्सितम् । १ मूत्रं क्वाथोऽश्वगन्धाया द्राक् प्रवर्तयतेतराम् । सेतुभङ्गस्तटाकस्य प्रवाहं पयसासिव ॥१॥ २ तन्वीं वेतसनाडी प्रदीप्तवदनां विधाय तद्भूमम् । मूत्राघातस्तूर्ण शाम्यति नृणां शनैः शनैः पिवताम् ॥ २ ॥ ३ अजापुरीषतन्मूत्रक्लिन्नमृत् सौरसंस्कृता। नाभ्यधः सान्द्रसंनद्धा मूत्रवन्धं भिनत्ति हि ॥ ३ ॥ ४ विण्मूत्राभ्यां छगलसुदृशां यत्स्थलं वाढवित्रं तजा धूलिः सुरभिसलिलैः सम्यगावर्तयस्व । मूत्राघाते प्रतुदति तया वाष्पमुष्णं वमन्त्या वारंवार विरचय सखे ! नाभ्यधः साधु लेपम् ॥ ४ ॥ ५ आवय॑मानगोमूत्रे खण्डमाप्लाव्य काम्बलम् । मनागापीड्य तत्स्वेदान्मूत्राघातः प्रणश्यति ॥५॥ ६ तमाखुकुलुमस्वेदो मूत्रं रुद्धं प्रवर्तयेत् । ७ नवसादर खण्डं नाभ्यधो भ्रामणादिव ॥ ६ ॥ - मूत्राघात चिकित्सा (कुल प्रयोग ९)- अश्वगंधा के क्वाथ को पीने से, बांध के टूट जाने पर तालाव के जल-प्रवाह की तरह, मूत्र की शीघ्र प्रवृत्ति होती है। (जयपुर के समीप नागोरदेश से होने वाली अश्वगधा से यहां अभिप्राय है)॥१॥ वेत की पतली आठ अंगुल लंबी नली के मुख को जलाकर उसके धूम को (बीडी अथवा सिगरेट की तरह) धीरे धीरे पीने से मूत्रा- घात शीघ्र प्रशमित हो जाता है ॥२॥ बकरी की पावभर मींगणी (पुरीष)को, बकरी के ही मूत्र से भिगो उसमे करीब दो तोला कलमीसोरा मिलाकर अग्निसे कवोप्ण करके नाभी के नीचे प्रलेप करदें। इस लेप को भी, अजा के कवोप्ण मूत्र से निरतर सिक्त करते रहे । यह प्रयोग मूत्र-बंध को तोड देता है ॥ ३ ॥ बकरियो के निरतर मलमूत्र त्याग से जहां की भूमि परम दुगंधमय हो गयी हो, उस स्थल की धूलिको गोमूत्र से अच्छी तरह मसल ले। भव, हे मित्र । मूत्राघात से पीडित की नाभी के नीचे, गरमा- गरम इस मिट्टी का अच्छी तरह पुन पुन लेप करते रहो ॥ ४ ॥ खौलते हुये गोमूत्र मे कंबल के टुकडे को भिगोकर फिर, थोडा निचोडकर, सवाष्प उस कंबल वस्त्रद्वारा नाभी के नीचे स्वेदन करने से मूत्राघात शीघ्र निवृत्त हो जाता है ॥ ५ ॥ तमाखुपुष्प के स्वेदन से रुका हुआ मूत्र प्रवृत्त होता है। इसी तरह, नवसादर के १-नागोरदेशोद्वाया । २-अष्टागुलदीर्घामिति शेष । ३-कोष्णा। तत्राजामूत्र मपि देयम् । कुडवपुरीषे तोलकद्वय सौरकम् । ४-गोमूत्रै । ५-तेन सबाष्पेण कम्बल- सण्डेन नाभ्यध. शनै शनै कृतात् स्वेदात् ।
२५२ [प्रमेह- । सिहभेषजमणिमालाया रजोविमुक्तं रविमूलवल्कं छुर्या तनूकृत्य नियम्य वस्त्रे । निष्पीड्य गृह्णीत पयः पवित्रं दद्दीत त पजभावनालु ॥ ७ ॥ २ द्रवीभूते वङ्गे कुडवतुलिते पारदपलं विनिक्षिप्य स्फीता उपदि करणीया हि कणिकाः। ततः प्रस्थद्वन्द्वोन्मितनरेशटीक्षोदनिहिताः पुटेद्युक्त्या वासःशिखिभिरिति बङ्गेश्वररसः ॥ ८ ॥ ३ सूतेन्द्रवद्भवलिसादरकजलीभिः कूपी प्रपूर्य विधिवत् पच कोकिलाना सिद्धः सुवर्णरुचिरेप लधुर्मंगाको मेहान्निहत्य महतीं विदधाति पुष्टिम् ९ ४ नवनीतीकृत्य घनै रंग संताज्य संताब्य । सितया विमर्च मसृणं मधुना लीढं प्रमेहहरम् ॥ १० ॥ प्रस्तुत श्लोक मे, प्रसगवशात् , भाकडे मे से, सरलतया अधिकाधिक मात्रा मे, दूध निकालने की विधि प्रदर्शित की गयी है। आकडे के मूल की छाल को पहिले अच्छी तरह जल से धोकर उस पर लगी हुई मिट्टी मादि को निकाल दें। फिर इस छाल के चाकू से सूक्ष्म टुकडे करके, उनको एक स्वच्छ वस्त्र में बांधकर सावधानी पूर्वक निचोडकर दूध निकाल लेवें । औषधियों में भावना आदि के लिये इस विधि से निकाले गये अर्क - दूध को उपयोग में ले ॥ ७ ॥ सोलह तोला शुद्ध वग को अग्नि से पिघला कर उसमें चार तोला शुद्ध पारद मिला, एक खरल मे डाल देवें । फिर, घोटकर उसकी स्वच्छ सूक्ष्म कणिकायें बनाले । तत्पश्चात् , इनको, करीव १२८ तोला नरकचूर के कल्क मे रखकर, उसे करीब १२८ तोला वस्त्र खडों से परिवेष्टित करके, इन्हीं वस्त्रखडो की आच के युक्तिपूर्वक पुट देवे । इस तरह निर्मित वंगभस्म को 'वगेश्वर-रस' कहते हे ॥८॥ पारद, वंग, गधक और नवसादर प्रत्येक २३ तोला लेकर उनकी एकत्र कजली बनाले । इसे, फिर, काच की शीशी मे भरकर कपडमिट्टी करदे । फिर, यथाविधि, उसे सोलह सेर कोयलो की आच देवें। इस तरह सिद्ध की गई स्वर्णाभ भस्म को 'लघु-मृगाङ्क' कहते हैं । यह प्रमेह को नष्ट करके अत्यत पुष्टि - अर्पण करती है ॥९॥ लोह-घण के अनवरत प्रहारों से वग को जैसा मुलायम बनाले । इसके चूर्ण को मिश्री से अच्छी तरह मिलाकर शहद के साथ चाटने से प्रमेह नष्ट हो जाता है ॥ १० ॥ निबुरस द्वारा समर्दित हरताल से चांदी के सूक्ष्म पतरो को लपेटकर, तीव्र निर्धूम अग्निपर तपावें । हरताल मे से जब धूम निकलना बद होजाये, तब पुन १-प्रसङ्गादकक्षीरलाभोपायप्रदर्शनम् । अनेनैव विविना प्रचुरक्षीरप्राप्तिर्भविष्यति । २-'नरकचूर' इति ख्याता हरिद्राभा भवत्यौपधि । ३-वस्त्राग्निभि , वस्त्राणि च द्विप्रस्थ- मितानि वेष्टनीयानि । ४-गुणकयनं प्रसिद्धत्वादुपेक्षितम् । ५-पारदादीनां प्रत्येकं सार्ध- द्वितोलमानम् । ६-मृद्वस्त्रादिप्रलिप्ताम् । ७-कोकिलानामाढको ग्राह्य । ८-'घण' इति प्रसिद्धन लोहकाराणा यन्त्रविशेषेण । ९-वन च शुद्ध ग्राह्यम् । - मख्खन चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छः । २५३ ५ तालेनै लिप्त्वा खलु सप्तकृत्वः प्रतापितानां रजतच्छदानाम् । स्यात् कारवेल्लस्वरसप्लुतानां विभूतिरच्छा निचतुःपुटोद्धैः ॥ ११ ॥ ६ मृत्स्नाशरावपुटसंकलितं प्रवालसूलं वनोपलगणैर्विदहेत् प्रकृष्टम् । वल्लोन्मितं रसमितं भजतां नराणां प्रावालिकं प्रबलमेहनिषेधनिष्ठम् १२ ७ वीजवन्धेक्षुरक्लीतवांगीसिलकसालिमम् । शुक्तिविद्रुमयोर्भूती मजानावक्षपथ्ययोः॥ १३ ॥ शिलाजतु त्रुटिर्वङ्गः सर्वं संचूर्ण्य माक्षिकैः । वटीर्वधान सुखदा बहुमूत्रप्रमे हिणाम् ॥ १४ ॥ ८ कलय नयननिष्कं दुग्धपाषाणखण्ड कुडवसहशि पिण्डे निम्वसंवर्तिकानाम् । करिपुटपरिपाट्या पाच्य तस्माद्विवलं स्रवति चरमधातो छच्छिकोभिः प्रदेहि ॥ १५ ॥ हरताल का लेप करके इन पतरो को इसी तरह तपावें। इस तरह सातवार तपाकर, इनको, वन्य करेले के रस से (अथवा, निबू- स्वरस से) खरल करके गजपुट देवे। इस तरह तीन चार पुट देने से चादी की स्वच्छ भस्म बन जायेगी। यह भस्म प्रमेह भादि विकारों मे आशु असर दिखाती है ॥ ११ ॥ प्रवाल - मूल के चूर्ण को, अर्क - दूध से, अथवा घी-कुवार के रस से, अथवा गाय या बकरी के दूध से खरल करलें । 'फिर, शराव-सपुटित करके बन गोबरी का गजपुट देकर उसकी भस्म बनाले । इस प्रावा- लिक- रस' का एक वालभर मात्रा मे सेवन करने से, प्रबल प्रमेह निष्ठा-शून्य बन जाता है ॥१२॥ वीजबन्ध, तालीमखाना के मूल, जेठीमध, वंशलोचन, लोबान, सालिम, शुक्ति - भस्म, प्रवाल भस्म, बहेडा तथा हरडे की मींगी, शुद्ध-शिलाजित, इलायची, बगभस्म इन सभी द्रव्यो को खरल मे एकत्र खूब घोटकर सूक्ष्म चूर्ण बनाले । इस चूर्ण की, मधुयोग से गोलिया बाधले। यह 'सुखदा' वटी बहुमूत्र और प्रमेह मिटाती है ॥ १३-१४ ॥ सोलह तोलाभर निंव की नूतन कोपलो को पीसकर पिण्ड बनाले । फिर, इसमें करीब दो तोला घीयाभाटा के टुकड़े को रखकर, शराव सपुटित करके, गजपुट १-नीम्बुरसपिप्टेन हरितालेन । २-निधूमाङ्गारोपरि स्थापयित्वा तालधूमक्षयाववि प्रता- पितानाम् । ३-वन्यकारवेलस्य 'वाडकरेला' इति प्रसिद्धस्य रसेन, तथा निम्बुरसेनापि, इति द्वयोर्विकल्प: । ४-प्रशस्तपुटैर्गजपुटैरित्यर्थ । गुणाश्च प्रसिद्धत्वेन नाभिहिता । ५-प्रवाल- मूल गव्याजार्कक्षीरकुमारिकामासान्यतमसहितम् । ६-बीजबन्ध' नाम्ना लोकप्रसिद्धानि बीजानि । ७-क्लीतशब्देन यष्टीसत्त्वम् । सिहकशब्देन च 'वेरजा' इति प्रसिद्धनिर्यासविशे- षस्य सत्त्व गृह्यते । ८-द्विवचनान्तम् । ९-शिलाजतु च शुद्धं ग्राह्यम् । १०-घृताश्म- सण्डम् । घृताश्मा च 'घाईभाटा' इति ख्यात । ११-निम्वनवदलानामिति । “सवर्तिका नवदलम्" इति कोशात् । १२-शुक्र। १३-तकै । h [प्रमेह- १५४ सिद्धभेपजमणिमाल्गयां ९ पूगप्रसूनचूर्णस्य गद्याणं सार्धशर्करम् । सद्यस्कपयसा पेयमुशनःक्षरणादिषु ॥ १६ ॥ १० चलावाँच्चटावीजमापैः सौमिसितं रजः। दुग्धानुपानतः सायं रेतो गृहाति विप्लुतम् ॥ १७ ॥ ११ कृष्णगुन्द्राश्मभेदाधिशोपदारुसितारजः । शुक्रदोपं निहन्त्येव दुग्धरर्धसितोपलम् ॥ १८ ॥ १२ गुन्द्रत्वक्फलपुष्पाणि कैङ्किरातानि चूर्णयेत् । लसीकया सखण्डानि रेतसः क्षरणे पिवेत् ॥ १९ ॥ १३ कलांशभृङ्गं द्विसितं सुजातबम्बूलशिम्न्याः शुचिकान्ति चूर्णम् । सद्यस्कदुग्धेन सह प्रभाते निर्णिमुन्मूलयति प्रमेहम् ॥ २० ॥ १४ चत्वारः शर्कराया द्वौ त्रुटेः स्फट्याश्च तोलकः । तिस्रः पुट्यः परं शस्ता मेहे दाहसखे सखे ! ॥ २१ ॥ की अग्नि मे फूकदें । इसमे से दो वाल मात्रा को लाल के साथ लें। यह शुक्र - स्वार को मिटाता हे ॥ १५ ॥ शुक्र-स्राव मे, सुपारी के पुप्पचूर्ण को, ह मापा माना में, धारोष्ण-दूध के साथ पीने से उत्तम लाभ होता है ॥ १६ ॥ संरटी के बीज, कपि- कच्छु, और उटीगण के बीज (अथवा श्वेत गुजाफल) प्रत्येक एक एक मापा तथा इन सभी द्रव्यो से अर्धमात्रा मे रजतभस्म, इन मिलाकर सायकाल के समय सेवन करने से शुरु नाव बद हो जाता है ॥ १७ ॥ पलाश का निर्यास, पापाणभेद, समुद् - शोप, देवदारु और मिश्री इनके समभाग चूर्ण में, चूर्ण से अर्धमात्रा सितोपलादि मिलाकर, इसमें से एक गापाभर दुग्धानुपानपूर्वक लेने से, शुक्रढोप नष्ट हो जाना है ॥ १८ ॥ बवूल के गूद, छाल, पुष्प, फल इनको पीसकर वस्त्रपूत सूक्ष्म चूर्ण बनाले । इस चूर्ण को, मिश्री मिश्रित लस्सी के साथ लेने से शुक्र- स्त्रवण बद हो जाता है ॥१९॥ पकी हुई बबूल की सेम का शुभ्र चूर्ण, रक्त चदन और श्वेतचदन' का चूर्ण तथा इनके चूर्णो से सोलहवा भाग जितना तज का चूर्ण, इनको मिलाकर, धारोष्ण - दूध के साथ प्रात काल लेने से प्रमेह निर्मूल हो जाता है ॥ २० ॥ शर्करा चार तोला तथा इलायची और स्फटी प्रत्येक दो दो तोला इनको एकत्र मिलाकर समान मात्रा मे तीन पुडी ( Doses ) वनाले । प्रतिदिन दूध के साथ एक १-शुक्रक्षरणप्रभृतिषु । २-वर्म पिकच्छु । उच्चटा ‘उटींगण' इति प्रसिद्धा, तस्याः सरोमाणि वीजानि, यद्वा श्वेतगुञ्जाफलविदलानि, द्वयमपि यौगिकमत्र । ३-सर्वापेक्ष- याऽर्धसितम् । ४-कृष्णगुन्द्र पलाशनिर्यास । ५-चम्बूलभवानि निर्यासवल्कलफलपुष्पाणि । ६- मिलित दुग्धजल लसीकाशब्देनाभिधीयते लोके । सौजाकेऽपि देयमिदम् । तैलाम्लादि च वय॑म् । ७-भृङ्ग ‘तज' इति ख्यातम् । ८-वचनविपरिणामेन चत्वार द्वावित्याभ्या सामानाधिकरण्यम् । ९-मात्रा 'पुडी' इति अत्र ‘पडीका' इति गूर्जरेऽभिधीयते । सबको एकन्न दुग्धानुपान पूर्वक । ।
२५५ १ चिकित्सितम्] चतुर्थों गुच्छ.। १५ स्वाद्वीफलौषधकदक्षिणगोक्षुराणि प्रत्येकमक्षदशकानि सकोलकानि । एभ्यः सिता द्विरिति सर्वमिदं विचूर्ण्य खादेद्धृताक्तमुपसि क्रमशः प्रमेही ॥ २२ ॥ १६ सद्योभुवा गोपयसा प्रपीता विलोड्य शाखोटकदुग्धविन्दैवः । हरन्ति मेहानपि दीर्घकालजान् गुरूपदेशा दृढसंशयानिव ॥ २३ ।। १७ मार्कण्डी कुडवोन्माना द्वे जीरे द्वे च चन्दने । भद्रदारुर्मिपिर्वी धान्यं चेत्याक्षिकं पृथक् ॥ २४ ॥ सूक्ष्ममेषां रजः प्रस्थे क्षौद्रे पाकाद्धने न्यसेत् । लेहोऽयं हन्ति मेहा:कासश्वासवमिभ्रमान् ॥ २५ ॥ शीर्षतापामवातघ्नो रुच्यो नेत्र्यो विवन्धभित् । किं चात्र तरुणी द्राक्षा कुश्माद्यपि निक्षिपेत् ॥ २६ ॥ १८ चूर्णस्य शाणं सुरनायिकायास्तैलेन किंचित् करयुग्मकेन । चतुर्दशाहान्युपसि प्रपीतं मेहोर्णवातौ क्षणुते यतानाम् ॥ २७ ॥ पुडी लेने से, हे मित्र । दाहपूर्ण प्रमेह मे परम लाभ देती है ॥ २१ ॥ खजूरीफल, गोदुग्ध मे शुद्ध किये गये दक्षिणी गोखरू तथा सूठ प्रत्येक साढे दश दर्श तोला लेकर वस्त्रपूत सूक्ष्म चूर्ण बनाले । इस चूर्ण मे द्विगुणित मिश्री मिलादे । प्रमेहरोगी इस चूर्ण में घृत मिलाकर, उप काल मे, नियमित सेवन करें। अर्ध तोला मात्रा मे ४८ दिवस पर्यंत लेने से क्रमश प्रमेह शान्त हो जाता है ॥ २२ ॥ सद्य प्रसूता गाय के दूध मे शाखोटक (सिहोरा, भूतावास) वृक्ष के दुग्ध बिन्दु डाल कर तथा मथकर पीने से, जीर्ण -प्रमेह भी, गुरु के उपदेश से दृढ - सशयो की तरह, दूर हो जाते है ॥ २३ ॥ सनाय के पत्ते सोलह तोला, श्वेत श्याह दोनो जीर, श्वेत - रक्त दोनो चंदन, देवदारु, सौंफ, दारुहरिद्रा तथा धनियाँ प्रत्येक एक एक तोला, इनका एकत्र वस्त्रपूत बारीक चूर्ण बनालें । अब, चौसठ तोले शहद को अग्नि से पकावे । शहद जब घट्ट हो जाय तब उपरोक्त चूर्ण उसमें डाल देवें । यह अवलेह, प्रमेह, अर्श, कास, श्वास, वमन, तथा भ्राति को दूर कर देता है । यह शीर्षगत दाह एव आमवात मे हितावह, रुचिकर, नेत्री को लाभदायी तथा विवन्ध-भेदक है। इस लेह मे, तरुणी (गुलाब) पुष्प, द्राक्षा, कसर भादि मिलाने से, इसकी गुणमपदा मे विशेष अभिवृद्धि होती है ॥ २४-२६ ।। भांबाहलदी के करीब तीन माषाभर चूर्ण को, करीव अठारह माषाभर तिल- १-खजूरीफलशुण्ठीदक्षिणदेशोद्वगोक्षुराणि । गोक्षुराणि च गोक्षीरशुद्धानि ग्राह्याणि । पथ्यमत्र लवणवर्जितमुद्यूपगोधूमफुल्लिके । २-कोल वर्षार्धपर्याय. । ३-उक्तनाना प्रसिद्ध- वृक्षस्य क्षीरविन्दवः । ४-आम्रगन्धिहरिद्राया लोके 'आमीहलद' इति ख्याताया । १ .
[अयोदावर्त- सिहभपजमणिमालायां १९ यथा वहुमूलत्रत्वे तिला वैद्यैः किलादृताः । तथा न किंचिदपरं भेपज प्रतिभाति मे ॥ २८ ॥ - इति प्रमेहचिकित्सा ।- अथोदावर्तचिकित्सितम् । १ निरुद्धधूममुत्स्वेद्य फलानि मरुशौखिनः । लवणक्षारजरणदीप्यच्यूपणहिमुभिः ॥ १॥ मर्दिते नि निक्षिप्य शोपोटातपे चिरम् । सायं तानि निगीर्णानि प्रातः साधु विरेचयेत् ॥ २॥ तैल के साथ, चौदह दिवसपर्यंत नियमित, उप काल मे, पीते रहने से, पथ्य मे रहने- वाले के, प्रमेह और सुजाक क्षीण हो जाते है ।। २७ ॥ बहुल-मूत्रत्व की उत्तम औषधि रूप से, कृष्ण-तिलों का वैद्यसमान में विगेप सम्मान है। इस विषय मे मेरा यह अभिप्राय है कि वस्तुतः इस रोग मे इससे उत्तम अन्य औषधि हे ही नहीं (कृष्ण- निलों की प्रशसा मे, किर्तनी उत्तम उक्ति है यह।")॥ २८ ॥ - प्रमेह चिकित्सा समाप्त । सूर्यताप में -उदावत चिकित्सा (कुल प्रयोग २१)- करीर के फलो को कलईदार एक स्वच्छ भगोनी मे डालकर, भगोनी के मुखपर बराबर आ जाये ऐसी एक थाली से उस भगोनी को ढकदं। थाली में थोडा पानी भरदें। फिर, अंगीठी की मन्दाग्नि से उन्हे पकावे । भगोनी से वाष्प वाहर न निकले यह ध्यान मे रखें। कुछ ही समय में करीरफल खिन्न हो जायेंगे। अब, इन स्विन्न फलो मे, लवण, क्षार, जीरा, अजमोदा, त्रिकटु तथा घी मे भूनी हुई हींग के सूक्ष्म चूर्ण को डाल, उनको चमचे से हिलाकर पूर्ववत् थाली ढककर कुछ समय तक पुन मंदाग्नि से पकावें । फिर, इन सब द्रव्यो को दही के मछे से डालकर, कुछ दिनों तक रखकर सुखाले । सायकाल के समय इनका सेवन करें। प्रात: सुखविरेचन होगा १-२ ५-कर्पद्वयमितेन । यद्यप्यत्र कर्पद्वयोक्तिस्तयाऽपि गद्याणत्रितयोन्मितमेव तैल ग्राह्यमिति रहस्यम् । ६-प्रमेहसौजाकरोगौ । ७-यतात्मना पथ्यशीलिनामिति यावत् । पथ्यं च वन- क्गोधूमान्यतरपोलिका लवणरहिता खल्यसैन्धवा वा, मुगाडकीसूप , भक्तं, दुग्ध योग्य- शर्कर, यथारुचि पेयम् । कितु द्विप्रस्थतो न्यून न पेयम् । शाकादिकं घृतसिद्धमिति तैलाम्ल- मरिचादि तीक्ष्णमन्यत् सर्वमपथ्यम् । १-कृष्णवर्णा । २-उदावर्तशब्दश्चात्र वातविड्रोधमात्रवाची, तेनात्र सर्वे योगा मुखविरेचनकरा वातानुलोमनाश्च सगृह्यन्ते। ३-करीरस्य ।
२५७ चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छ। २ कलाकन्देन पिहितामरुणां द्वित्रिमापकाम् । नक्तं निगिरतां प्रातः कोष्ठशुद्धिः प्रजायते ॥३॥ ३ कालाअनीजनपि भ्रष्टानि मनाग्घृतेन बीजानि । पिष्टा सितया गिल रे सुखेन किल रेचनं भविता ॥ ४ ॥ ४ मूत्रार्द्रखर्वपथ्याचूर्ण वातारितैलसंभृष्टम् । पटुयवजहिङ्गुदीन्यकसखमनुलोमयति मूढपवमानम् ॥ ५ ॥ ५ अजातवीजा कृतमालशिम्बी सखर्वपथ्या तलिता घृतान्तः । प्रयुक्तपादांशपटुः कवोष्णैर्गीी जलैर्हन्ति विवन्धमूलम् ॥ ६॥ ६ सैन्धवसनामुकिशिवाशुण्ठीशतपुष्पिकाकृतः क्षोदः । नाना पञ्चसकारः शकृति विवद्धे समुपयोज्यः॥७॥ ७ तरुणी द्विपटु द्विजरणयवजवराव्योपटङ्कणत्रुभ्यः । मार्कण्डी सर्वसमा चूर्णमिदं हन्ति विएम्भम् ॥ ८ ॥ दो तीन माशा मजिष्टा के चूर्ण को कलाकन्द में मिलाकर रात्रि के समय खा लेने से, प्रातः कोष्ठशुद्धि हो जाती है ॥ ३ ॥ कालेदानों को घी में थोडा भूनकर, फिर, मिश्री मिला पीसकर फांक जायें। इससे निश्चय सुखविरेचन होता है ॥ ४ ॥ गोमूत्र में जवाहरडे के चूर्ण को, तीन दिवसपर्यंत भिगोकर रहने दें। प्रतिदिन गोमूत्र बदलते रहना चाहिये। चतुर्य दिन इस चूर्ण को छायाशुष्क करके, एरड तैल मे भूनले । फिर, इसमें काला नमक, यवक्षार, हींग तथा अजवायन का चूर्ण मिलाकर, इसकी फांकी लेने से मूढ-बात का अनुलोमन होता है ॥ ५ ॥ गुडची, अमलतास की कच्ची सेम तथा जवाहरडे इनके चूर्ण को घी में तल लेवें। (उतने ही घी में तलें जितने से तलजाने पर फिर धी अवशिष्ट न रहे ।) फिर, इस चूर्ण में, चूर्ण से चतुर्थ भाग कालानमक मिलादें । कवोष्ण जल के साथ इसकी फाकी लेने से विबन्ध तथा तज्जन्य शूल नष्ट हो जाता है ॥ ६ ॥ सैंधव, सनाय, शिवा (हरडे), शुठी तथा सौंफ इनका एकत्र सूक्ष्म चूर्ण बनालें। इसको ‘पचसकार' चूर्ण कहते है। मल के विवन्ध मे इसका उपयोग करें ॥ ७ ॥ गुलाबपुष्प की पखुडियां, सैंधव, काला- नमक, श्वेत - कृष्ण जीरा, यवक्षार, हरडे, त्रिकटु, टकण तथा इलायची, इनका एकत्र चूर्ण तथा इस चूर्ण के समान भाग जितना मनाय का चूर्ण इनको एकत्र मिलाकर यथामात्रा मे लेने से विष्टम्भ नष्ट हो जाता है ॥८॥ १-'वरफी' इति पर्यायान्तर लोकेऽस्य । २-मजिष्टाम् । ३-'मिरचाई', 'काला- दाना' इति ख्यातानि । ४-सर्वपथ्या 'जवाहरडे' इति प्रसिद्धा , ता गोमूत्रोपिता एरण्डतैलसतलिता कृत्वा पवादीनि द्रव्याणि योग्यानि समेल्य चूर्णयेदिति । ५-मार्कण्डी मनाय' ते प्रसिद्धा। । सि० १७ - २५८ सिद्धभेपजमणिमालायां [उदावर्त- ८ माषाः षट् त्रिपुटाद्विजीरधनिकामिप्युग्रगन्धात् पृथक प्रोक्तं सार्धपलं सुदाडिमशिवासिन्धूद्भवाख्यं तथा । कर्ष स्यादिह तिन्तिडीकममलं मार्कण्डिकायाः पलं सार्धं चूर्णमिदं विवन्धहुतभुमान्द्यारुचिध्वंसनम् ॥ ९॥ ९ द्विजीरविश्वपुष्पैलातीक्ष्णदीप्याभयाच्छदम् । तिन्तिडीकं सधान्याकं पृथक्तोलचतुष्टयम् ॥ १० ॥ द्वितोलका दारुसिता पट्तोला त्रिवृता स्मृता । सौवर्चलात् सैन्धवाञ्च मार्कण्ड्याः कुडवः पृथक् ॥ ११ ॥ पक्कदाडिमबीजानि तुलितानि शरावतः । द्रव्याण्येतानि मसृणं चूर्णयित्वा विभावयेत् ॥ १२ ॥ एकेन वीजपूरेण निम्बूकैः प्रस्थसंमितैः । चूर्णेनानेन शाम्यन्ति मान्द्योदावर्तसंभवाः ॥ १३ ॥ १० प्रस्थे निम्बूकपयसि कुडवं जगदौषधम् । सौवर्चलं च कुडवं रामठं पलिकं क्षिपेत् ॥ १४ ॥ तदौषधं रसे शुष्क भर्जितं भ्राष्ट्रपांसुभिः । उद्गारशोधनं रूच्यं मूढवातानुलोमनम् ॥ १५ ॥ छोटी इलायची (अथवा श्वेत निशोथ), श्वेत - कृष्ण जीरा, धनिया, सौंफ तथा कुलिंजन प्रत्येक छह माषा, परिपक्व दाडिम, हरडे तथा सैंधव प्रत्येक ४३ तोला, इमली एक तोला तथा सनाय ४३ तोला इन सभी द्रव्यो का एकन सूक्ष्म चूर्ण बनालें । यह चूर्ण निबन्ध, अग्निमांद्य तथा अरुचि का विध्वंस कर देता है ॥ ९ ॥ सफेद तथा काला जीरा, सूठ, लौंग, इलायची, मरिच, अजमोदा, हरडे, तमाल पत्र, इमली भौर धनिया प्रत्येक चार तोला, दालचीनी दो तोला, निशोथ (श्वेत तुरबुद) छह तोला, सौवर्चल, सैधव और सनाय प्रत्येक सोलह तोला, परिपक्क दाडिम के दाने बत्तीस तोला इन सभी का वस्त्रपूत सूक्ष्म चूर्ण बनालें । अव, इस चूर्ण को एक बीजपूर के रस की तथा निबू के एक प्रस्थ (चौसठ तोला) रस की यथाक्रम भावात देवें । यह चूर्ण अग्निमांद्य तथा उदावर्त से उत्पन्न रोगो को शमन करता है ॥१०-१३ निबू के चौसठ तोले रस मे, सूठ तथा सौवर्चल प्रत्येक सोलह तोला तथा चार तोला भूनी हुई हींग डाल दें। निबू रस को मंदाग्नि से पकावें । जब निबूरस शोपित हो जाये तब अवशिष्ट औषधीय द्रव्य को भट्टी की गरम गरम मिट्टी की अग्नि से भूनले । यह उद्गारशुद्धि करती है, रुचिवर्धक है, तथा मूढवातानुलोमक है ॥ १४-१५ ॥ १-उग्रगन्ध 'कुलिञ्जन' इति प्रसिद्धो वचाविशेषः । २-पलविशेषणम् । ३-तीक्ष्ण मरिचं, दीप्या अजमोदा, छद तमालपत्रम्। ४-'दालचीनी' इति प्रसिद्धा। ५-त्रिवृता- शब्देन चात्र यवनभाषाप्रसिद्धतुरवुदनाम्नस्त्रिवृताविशेषस्य ग्रहण, स च श्वेतवर्णो ग्राह्य । ६-बीजपूरनिम्बूकशब्दावत्र लाक्षणिको लक्ष्यश्च तद्रस । ७-रोगा इति शेष । ८-शुण्ठी ।
चतुर्थों गुच्छ.। २५९ 1. चिकित्मितम्] ११ तीक्ष्णानि धौतशुभ्राणि सममेभिः पटूत्तमम् । मार्कण्डी गौर्जरी' ग्राह्या सर्वसंभारसंमिता ॥ १६ ॥ विचूर्ण्य भावनास्तिस्रो दत्त्वा निम्बूकनीरतः। गद्याणसंमिता वट्यः सानाहं घ्नन्ति विग्रहम् ॥ १७ ॥ १२ व्योपद्विजीरदहनत्रिपुटाकल्लसैन्धवात् । पड़ गद्याणाः पैलद्वन्द्वं सौवर्चलमनुत्तमम् ॥ १८ ॥ दाडिमीफलत प्रस्थौ प्रस्थो निम्बूकत. स्मृतः । निम्बूकदाडिमीवारि पटुं पक्त्वा धृतैः सह ॥ १९ ॥ स्वाद्वी द्राक्षां सितां तत्र यानां संक्षोद्य मिश्रय । गेपद्व्याणि संचूर्ण्य संमेल्य कुरु पिण्डिकाम् ॥ २० ॥ पाचिनी दीपिनी रुच्यां मूढवातानुलोमिनीम् । वमनानाहमन्दाग्निशुलनी साधु सेवय ॥ २१ ॥ १३ द्वे पले मृदुरेचिन्याः पथ्या पाथोधितोलिका। भद्रेला कृष्णवीजानि द्राक्षा कन्दः सुमोद्भवः ॥ २२ ॥ मरिच के दानो को, पानी से धोकर ऊपर की त्वचा निकाल, स्वच्छ बनालें । मरिच समभाग संधव तथा मरिच एव सैधव दोनो के समान भाग सनाय (धोली मीठी) लेकर इनका सूक्ष्म चूर्ण करले । इस चूर्ण में निंबू रस की तीन भावनाये देकर छह मापा प्रमाण वटिया वाधले, भानाहसहित मलग्रह को ये दूर कर देती हैं ।।१६-१७ त्रिकटु, श्वेत भौर श्याहजीरा, चित्रक, इलायची, भकलकरा तथा सैंधव प्रत्येक तीन तीन तोला लेकर सूक्ष्म चूर्ण बनालें । खर्जुरी फल, द्राक्षा तथा मिश्री प्रत्येक भाठ माठ तोला लेकर बारीक पीस चटनी करलें । दाडिम का १२८ तोला रस तथा निंबू का चौसठ तोला रस दोनों को एक करके उसमे सौवर्चल चूर्ण तथा घी प्रत्येक भाउ तोला प्रमाण ढाल देवें। अब इस रस को अग्नियोग से पकावें। जब रस जलकर घट्ट होने लगे तब उसमें उपरोक्त त्रिकटु भादि के चूर्ण को तथा खजूर भादि की चटणी को मिला -- कर पिण्ड बनालें । रस को उकाल कर उतना ही शेष रखना चाहिये जितने से चूर्ण तथा चटनी का पिंड बंध जाये । इस पिंड मे से यथामात्रा सेवन करना चाहिये। यह रुचिकर दीपन, पाचन तथा मूढवातानुलोमक है तथा वमन, भानाह, मदाग्नि और शूल का शमन करता है ॥ १८-२१ ॥ सनाय माठ तोला, हरडे चार तोला तथा बड़ी इलायची, काला दाना, द्राक्षा १-गुर्जरदेशोद्भवा 'सूरती' इति प्रसिद्धा । २-एला। ३-दशतोलकमितम् । ४-सप्तम्यन्तम् । ५-द्विपल मितें । ६-खर्जूरीफलम् । ७-मार्कण्ड्या । ८-चतुस्तोल- केति यावत् । ९-लोके 'मिरचाई' इति प्रसिद्धानि, 'कालादाना' इति च । १०-गुल- कन्द , स च तरुणीपुष्पजो ग्राह्यः ।
२६० सिद्धभेषजमणिमालायां [उदावर्त- 'पृथक् पृथगिहैतेभ्यो ग्राह्यो हौ द्वौ च तोलको । पृथक् प्रकुञ्चयुगलमुपलासर्पिषोः पुनः ॥ २३ ॥ कल्कीकृत्येदमखिलं मोदकांस्त्रिंशदाचरेत् । तेवेकं भक्षयेन्नक्तं कोष्णं चानु पिबेजलम् ॥ २४ ॥ तावद्विरिच्यते जन्तुः शीतं यावन सेवते । अनेन परिशाम्यन्ति व्याधिव्यूहा विवन्धजाः ॥ २५ ॥ १४ हारहरा पिचून्माना तदर्धा तु सनामुकी । तदर्ध सैन्धवं तस्मात्तृतीयांशे तु जीरके ॥ २६ ॥ सौरभार्थं मनागेला श्लक्ष्णं पिष्टा चरेगुटीः । सितारजसि मसृणे लोठिता निगिलेन्निशि ॥ २७ ॥ नखम्पचोष्णमम्भोऽनुपिबेत् प्रातर्विशुद्धये । नातः परतरो योगो दृष्टः सुखविरेचने ॥ २८ ॥ १५ वलक्षस्फटिकाक्षोदः पुराणो द्विगुणो गुडः । गुटी विबन्धमुन्मूल्य विदधाति चमत्कृतिम् ॥ २९ ॥ १६ धूमयन्त्रगतमाखुमलँस्य भस्म साम्बु वसनेन विशोध्य । क्षारमस्य कुरु तं मधुमिश्रं देहि देहि नलवन्धसमीरे ॥३०॥ प्रत्येक दो दो तोला मिश्री और घृत प्रत्येक भाठ तोला, इन सभी द्रव्यों को एकन पीसकर कल्क बनालें। इस कल्क के समानभागमे तीस मोदक बाधे। एक मोदक रात्रि के समय कवोष्ण जलानुपान पूर्वक खायें। इसके लेने से तबतक विरेचन होता ही रहेगा जब तक शीतल पदार्थों का सेवन न किया जायेगा। इस प्रयोग से मलावरोधजन्य विकारसमूह का सर्वश नाश हो जाता है ॥ २२-२५ ॥ द्राक्षा दो तोला, सनाय एक तोला, सैंधव आधा तोला, जीरकद्वय दो दो माषा इन सबको एकत्र करके सुगध के आग्रह से थोडे इलायची दाने मिला खूब महीन पीसकर गुटिकायें बनाले। इन गुटिकाओ को मिश्री चूर्ण मे लपेटकर रात्रि के समय कवोष्ण जलानुपानसहित निगल जाये । प्रात निःसदेह विरेचन होता है। सहज विरेचन का इससे उत्तम अन्य प्रयोग नहीं देखा गया ॥ २६-२८ ॥ श्वेत-स्फटी की भस्म, भस से द्विगुणित पुराणा गुड, इन दोनो को मिलाकर गुटिका वाधलें । यह गुटी विबन्ध का उन्मूलन करके, चमत्कार दिखाती है ॥ २९ ॥ हुक्के से जली हुई तमाखु की भस्म-गुल को जलमे घोलकर वस्त्रपूत करके, उसका क्षार बनालें । नाभी के नीचे नाडीजाल मे अवरुद्ध वात के विकार से ग्रस्त देही (मनुष्य) १-उपला सितोपला। २-द्राक्षा। ३-'नों निवाया' इति ख्यात क्वोष्णमिति यावत्। ४-आखुमलस्य धूमयन्त्रगत भस्मेति नभ्रमितव्य, किंतु तमाखोर्मलं 'गुल' इति ख्यातं ग्राह्यम् । ५-मधु चोपलक्षणं, तेन ताम्बूलेनापि देय, मात्रा चास्य वल्लचतुष्टयम् । ६-देही जन्तुस्तस्य नलबन्धसमीरे नाभ्यध स्थितनाडीघु रूद्धवायौ, जलपरिवृत्तिजाते रोगेऽपि देयम् । और गुलकद --- चिकित्सितम्] चतुर्थों गुच्छ । १७ पृथग्वल्लो समुत्फुल्लौ पर्पटेंक्षाररामठौ । जलानुपानतो गीर्णो स्यातामाध्मानहारिणौ ॥ ३१ ॥ १८ तरुणीप्रसूनचूर्ण भक्तन भजेत पाणितलतुलितम् । शिथिलीकृत्य पुरीषं पातयति शनैः सुखेन सखे ! ॥ ३२॥ १९ स्वादुर्णी निगद्याणां पिष्टा तोयेन गालयेत् । सितामावाप्य माकां प्रातः प्रातः पिबेत्र्यहम् ॥ ३३ ॥ विण्मूत्रबन्धपिटिकाग्रन्थिपित्तास्त्रजा रुजः। शाम्यन्त्यनेन योगेन गर्भ विभ्रति सुभ्रवः ॥ ३४ ॥ २० द्राक्षा 'यहं जले प्लाव्याश्चतुःपञ्चाङ्गुलाधिके । शनैर्विमर्थ पाणिभ्यां तस्मिन्नेव जले पचेत् ॥ ३५॥ तृतीयांशं कषायं तं वाससा साधु गालयेत् । लोकत्वक्पुष्पघुसृणत्रिपुटापोट्टलीसखम् ॥ ३६ ॥ पचेदष्टांशमधुना मध्वंशाम्बुक्षयावधि । ततोऽवतार्य निष्पीड्य पोलीं विक्षिपेद्वहिः ।। ३७ ॥ को, चार वालभर इस क्षार को मधु के साथ देनी चाहिये। (देहि देहि नलबन्धसमीरे कितनी रमणीय रचना है ")॥ ३० ॥ पापडखार तथा हींग, इन प्रत्येक को दो दो वालभर लेकर अग्नि पर फुला लेवें। जलानुपान पूर्वक लेने से यह माध्मान को कर देता है ॥ ३१ ॥ पाणितल भर गुलाबपुष्प चूर्ण को चावल के साथ सेवन करने से हे मित्र मल शिथिल होकर सुखपूर्वक, धीरे धीरे, बाहर निकल आता है ॥ ३२ ॥ 1 अठारह माषा दुग्धिका (छत्तादूधी) को पानी से पीस वस्त्रपूत करले । अब, इस मे एक माशाभर मिश्री मिलाकर प्रात काल पीयें। इस तरह तीन दिवसपर्यंत प्रयोग करें। इससे मलमूत्र का विवध, फुसियां तथा रक्तपित्तजन्य विकार दूर हो जाते है। इतना ही नहीं, इस योगसे सुंदरिया गर्भ धारण करती है ॥ ३३-३४ ॥ दो सो छप्पन तोला द्राक्षा को, दो या तीन दिवस पर्यंत २४ हस्त भर जल मे डुबो कर रहने दें। फिर, हाथ से उनको मसलकर, पानी में मिला उसी पानी से उकाले । तृतीयाश जल शेष रहनेपर इसको उतार, सावधानीपूर्वक वस्त्रपूत करले । अव, सूंठ, तज और लविग प्रत्येक तीन तीन माषा, केसर और इलायची प्रत्येक छह माषा, इनको लेकर एक पोटली मे बांधले । उपरोक्त द्राक्षा कषाय में उससे अष्टमाश मधु मिलाकर, उपरोक्त द्रव्ययुक्त पोटली को इस द्रव में डाल देवें। अब इस द्रव को, मधुभाग जितने जलभाग के नि शेष हो जाने तक उकालते रहे । अब, पोटली को बाहर निकाल १-अग्निसयोगादित्याक्षेप । २-'पापडखार' इति ख्यात क्षारविशेष । ३-ओदनेन । ४-दुग्विकां लोके 'छत्तादूधी' इति ख्याताम् । ५-द्राक्षारिष्टोऽभिधीयते । द्राक्षाश्चाढक- तुलिता । ६-त्र्यहं वा । ७-शुण्ठीत्वग्लवङ्गानि पृथक् शाणिकानि, बुङमैले तु प्रत्येक गद्याणमिते, इति रहस्यम् ।
[अथोदर- - २६२ सिदभेषजमणिमालायां काचकोशे रसं भृत्वा रक्षेच्छतदिनाधिकम् । पलाध वा पलं पीत्वा बन्धादिभ्यो विमुच्यते ॥ ३८ ॥ २१ सावुनपिण्डीशकलं प्रवेश्य पायावुपेक्ष्येत । भित्त्वा गाढविवन्धं पुरीषमञ्जः प्रवर्तयति ॥ ३९ ॥ - इत्युदावादिचिकित्सा ।- अथोदरचिकित्सितमें। क्रूरः प्रकृत्या महिषप्रतिष्ठितो वहन कराभ्यां करवालचर्मणी । शूनाकृतिः पीतदुकूलसंमदः परेषु विस्फूर्जतु जाठरो गदः ॥१॥ दुर्निरीक्ष्याः कृशाः पाशखगदण्डप्रहारिणः । यकृत्प्लीहप्रभृतयो भीषणा गदिता गदाः ॥ २ ॥ १ शरकूर्चकत्रिवार्षिकघननादचरणसमुत्थितः काथः । २ जठरं भिनत्ति, किं वा मधुना धननादभूतिरेकैव ॥ ३ ॥ अच्छी तरह निचोडकर अलग रखदें । इस रसको एक काच के पात्र मे भरकर मुख बंद करके, शतदिवस पयंत उसी मे रहने दें तथा कालपाक होने दे तदनन्तर, दो अथवा चार तोलाभर मात्रा में इसको पीयें। इससे विवधादि से मुक्ति मिलती है ॥ ३५-३८ ॥ साबुन के छोटे से टुकडे को गुदा में प्रविष्ट करके, कुछ काल तक प्रतीक्षा करे। कुछ ही देर में यह गाढ विबंध को तोडकर, मल को, वेग-पूर्वक, बाहर धकेल देता है ॥ ३९॥ - उदावर्तचिकित्सा समाप्त -- उदरचिकित्सा (कुल प्रयोग २९)- स्वभाव से ही क्रूर, भैंसे पर विराजमान, हाथ में कृपाण तथा ढाल धारण किये हुये, पीतवस्त्र से वेष्टित, उन्मत्त, शोथयुक्त-विकृत-भाकृतिवाला उदरामय हमारे शत्रुओं पर ही गान की तरह टूटपडे ॥ १ ॥ यकृत् -प्लीहादि रोग भीषण, कृश, दुर्निरीक्ष्य तथा पाश एवं दंढ से प्रहार- करनेवाले कह गये हैं ॥२॥ मुंज, पलाश तथा त्रिवृत् -मूल का क्वाथ उदररोग को नष्ट कर देता है, अथवा पलाश-पंचाग की अकेली भस्म ही, मधु के साथ इस रोग का शमन कर देती है ॥३॥ १-शतदिनानन्तर कालपाकात् पेयमिति । २-क्षुद्ररोगे वक्ष्यमाणविधान मलप्रक्षा- लनप्रयोजनं 'साबुन्' इति लोकख्यातं, तस्य शकलम् । ३-विरेचनसाध्यत्वादस्य चिकि- सितमुच्यते । तत्रापि प्रथम द्वाभ्या तद्रोगमहिमप्रकाशनम् । wma २६३ चिकित्सितम्] चतुर्थों गुच्छ.! ३ कटुफा निम्बगवाक्षीन्याघ्रीद्वीपान्तरीयवटाभाः। रत्नज्योतिः पथ्याः कथिताः पीता गुडेन सरीः स्युः॥४॥ ४ प्रस्थं कुमारिकामांसात् प्रस्थं पूषप्रसूनतः । किं च पञ्चपटुभ्योऽक्षान् स्वर्जिकाक्षारतः पलम् ॥ ५ ॥ गुरूक्तसंप्रदायेन परिकल्प्य यथायथम् । अर्क युक्त्या विनिष्कास्य पाययेजठरापहम् ॥ ६ ॥ पथ्यं वज्रकधान्यस्य फुल्लिका गुडसंयुता। पक्षावधि प्रदातव्या घृतं कि तु विवर्जयेत् ॥ ७ ॥ कुटकी, निंब की छाल, इन्द्रवारुणीमूल, कण्टकारीमूल, उसब्बा (वट - शुङ्ग), बबूल, रतनजोत तथा हरडे प्रत्येक माठ तोला लेकर जोकुट करलें । सायकाल को, आठ अथवा बारह गुणित जल मे, मिट्टी के पान के भीतर, भिगोकर रखदें। प्रात. बत्तीस तोला पुराणे गुड के साथ कथित करके चतुर्थांश शेष रहने पर उतार, वस्त्रपूत करके, इस कपाय को काचपात्र में भरले। यह केवल सारक ही नहीं अपितु उपदंश, रक्तपित्त आदि का भी शमन करता है ॥ ४ ॥ गवारपाटे का गूदा तथा भाकडे के फूल प्रत्येक चौसठ तोला, पांचो नमक प्रत्येक एक तोला तथा सज्जीखार चार तोला लेवें । गुरु-संप्रदाय के अनुसार, आठ तोला अजवायन भी लेवें । भव, पातालयंत्र की थाली मे, प्रथम, कुछ मात्रा मे, पाटे का गूदा, उसपर भर्क - पुष्प तथा तदुपरि भजवायन की तह विछादे। इनपर, फिर गूदा, गूदे पर पुष्प, पुष्प पर अजवायन की तह फैलादें । इसी क्रम से, पुन. एक के ऊपर एक तह बिछाटे। अन्त मे, युक्तिपूर्वक अर्थात् पाताल-यत्र से इनका निकाल ले। इस मर्क को एक तोला मात्रा से उदर-पीडित को पिलावें । यह अर्क जठररोग शामक है। प्रयोगकाल मे, एक पक्षपर्यंत बाजरे के फूले गुड के साथ खाने चाहिये। घी का सर्वथा त्याग करदें। ५-७ ॥ १-निम्बस्य त्वक् । २-इन्द्रवारुणीमूलम् । ३-कण्टकार्या अपि मूलम् । ४-लोके “उसब्वा' नामत प्रसिद्धि । ५-चम्बूलस्य फलिका ग्राह्या । ६-अनेनैव नाना ख्याती- पधिः । ७-क्वायप्रक्रिया च सर्वोषधजातात् पृथक् द्वे द्वे पले गृहीत्वा यवक्षोरीकृत्य साय- मष्टगुणे द्वादशगुणे वा जले मृद्धटान्त समालाव्य प्रस्थार्धेन पुराणगुडेन सह समुत्त्वाथ्य पादशेष भृतमुन्नयेत् , काचकूपीस्थितस्यास्य पल द्विपलं वा पेयमिति । -सरा इति कथन- मात्र, तेनोपदंशरक्तविकारादिहरा इति बोध्यम् । ९-कन्यामध्यभागात् । १०-भर्कपुष्पतः । ११-पञ्चेति पदस्यावृत्त्या पञ्चपटुभ्यः पञ्चाक्षानित्यर्थ. फलति । १२-यवानिका प्रमृतिमि- तात्र क्षेप्याऽवश्यमिति सप्रदाय । १३-यन्त्रस्थाल्या पूर्व किचिन्मास प्रस्तार्य तत पुष्पाणि तत. कारवीप्रभृतिकं ततस्तदुपरि मांस तत पुष्पाणि तत. कारवीप्रभृतिक ततो मासमित्थं पुन पुन प्रस्तारयेत् । १४-पातालयन्त्रयुक्त्या । मात्रा चास्य चतु शाणिका प्रायः । १५-'बाजरी' इति लोकप्रसिद्धस्य । गवार- A अर्क २६४ सिद्धभेपजमणिमालायां [उदर. • ५ कन्यारसाढके प्रनगुडतः कुडवद्यम् । मण्डूरं टङ्कणं क्षारौ पञ्चैव लवणानि च ॥ ८॥ नवसादर इत्यस्माद्वर्गादेयं पलं पलम् । काचकोपे समाधाय मुखमस्य विमुद्रयेत् ॥९॥ अष्टाहमातपन्यस्तमेकीभूतरसं पिवेत् । यकृल्लीहोदरेवेनं कुमार्यासवमारयया ॥ १० ॥ ६ चतुश्चतुर्थिकं कृष्णलेयमक्षशतोत्तरम् । पादोनत्रितयं हि कि तु हीनं द्विमापतः ॥ ११ ॥ अधिखल्वतलं पिष्टवा प्रेस्थे निम्बूकपाथसि । निक्षिप्य काचकोशान्तधृत्वा संमुद्य मुद्रया ॥ १२ ॥ अष्टाहमातपे सिद्धं हिङ्गुसंधानमित्यदः । यकृत्प्लीहोदरं हन्ति पीतं चेन्मात्रयाऽखिलम् ॥ १३ ॥ ७ प्रस्थं निम्बूकनीरं द्विपलिकमनलोद्भर्जितं टङ्कणाख्यं त्रिशत् पीताः कपोऽखिलमिति पटमुल्लिप्तभाण्डेऽवरुन्ध्यात् । , गवारपाटे का गूदा २५६ तोला, पुराणा गुड ३२ तोला, मंडर, टकण, क्षारद्वय (सज्जीखार तथा टकणसार) लवण -पचक और नवसादर प्रत्येक चार तोला, इन सबको एक काचपात्र उसके मुस को कपडमिट्टी करदे । आठ दिवस तक सूर्यताप मे इसे रखदे । जब सभी औपधीय द्रव्य एकरस होजायें, तव इसका उपयोग करें। यह रस कुमार्यासव कहलाता है। यकृत् , प्लीहा तथा उदरामय से प्रशस्त कृष्णवर्ण एलिया १९२ मापा (टिप्पणीकार के मतानुसार १६० माषा) तथा हींग ११० मापा इन दोनो को निबू के चौसठ तोला रस मे खरल करलें। फिर एक काचपात्र मे भरकर, पात्रमुख को कपडमिट्टी करदे । भाठ दिवसपर्यंत इसको सूर्य के ताप मे रख देवे । इस तरह सिद्ध इस 'हिगु-सधान' को १३ तोले मात्रा से प्रारभ करके ४१ तोले मात्रा तक पीये। यह यकृदोदर एव प्लीहोदर को नष्ट कर देता है। प्रयोगकाल मे हलका भोजन पथ्य है ॥ ११-१३ ॥ । निबू का रस चौसठ तोला, अग्नि पर भूना हुमा टंकण माठ तोला तथा पीली कपर्दिका नग तीस, इन सबको एक पुराणे मृत्पात्र से भरकर, पात्रमुख को कपडमिट्टी करदें । धान्यराशी मे चारो ओर से ढककर, एक पक्षपर्यंत इसे रहने दे । इस रसको १-कुमार्यासवप्रक्रियाया न किचित्तिरोहितम् । २-चतु पल, पलं चात्र चत्वारिंश- न्माषप्रमाणम् । ३-कृष्णवर्णमेलेय, तस्यैव प्राशस्त्यात् । ४-पादोनत्रिपल दशाधिकशत- मापकप्रमाणमिति यावत् । ५-प्रस्थे पादोनप्रस्थे वा'। ६-अष्टाहमातपे धृत्वेति सबन्ध । ७-यथामय सार्वतोलकमारभ्य साचतुस्तोलकपर्यन्ताऽस्य मात्रा देया, पथ्य लघ्वशनम् । ८-पुराणे भाण्डे मृत्वा मृत्कर्पटतोऽवसन्ध्यात् समुद्रयेदिति । मे रसकर है ॥ ८-१० ॥
1 . चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छ । २६५ पक्ष तद्धान्यराशौ परिपिहितमथोद्धाव्य युक्त्या त्रिशाणं निम्बूकद्रावमेनं पिव यदि जठरप्लीहगुल्मादिपीडा ॥ १४ ॥ ८ कोष्टनिविष्टोद्गततलकोरितसुपिरां निवेश्य काचघटीम् । सक्षारभाजनोपरि तेजोर्कः प्लीहहा ग्राह्यः ॥ १५ ॥ ९ आवर्तितस्य दुग्धस्य दन्तीवीजैस्त्वगन्वितैः । दधिभावं गतस्याज्यं निरुद्वेगं विरेचनम् ॥ १६ ॥ १० दन्तीवीजानि संज्वाल्य निर्यज्वालाशमावधि । निम्बुकाम्बुनि निर्वाप्य कोकिलानुपकल्पयेत् ॥ १७ ॥ ततः कलजिका गन्धरसयोरर्धभागिका। कृष्णासौभाग्यमरिचयावशूकं तदर्धकम् ॥ १८ ॥ एकत्र घटयेद्गादं पक्वनिम्बूकले रसैः। लव लामृगमदैरधिवास्य वटीश्चरेत् ॥ १९ ॥ 'निवृक- द्राव' कहते है। इसे नौ माशा भर मात्रा मे पीये । उदरामय, यकृत् , प्लीहा, गुल्म आदि विकारो से, यह द्राव, नि संदेह मुक्त कर देता है ॥ १४ ॥ प्रस्तुत श्लोकमे, लौषधीयद्रव्यो मे से अर्क, तैल आदि निकालने के लिये एक नूतन यत्र की विधि बताई गयी है । यदि क्षार का अर्क निकालना हो तो प्रथम एक पात्र मे क्षार भरटें । फिर, काच की एक ऐसी स्थूलाकार शीशी-काचघटी ले जिसका तल भाग इस शीशी के करीव भीतरी मध्य-भाग तक उभरा हुआ हो । इस उभरे हुये भाग के मध्य में एक छिद्र करदे । अब, इस काचघटी को उपरोक्त क्षार पूर्ण पात्र पर इस तरह रखदें कि जिससे काचघटी का तल - भाग क्षार-पात्र के मुखपर बरावर बैठ जाये। भव, क्षार-वाले पात्र के नीचे अग्नि देने से क्षार का अर्क उपरि गत काचघटी के उभरे हुये तल-छिद्र में से निकल कर उसके पाच-गत भाग के चारो ओर एकत्रित होता रहेगा। यह 'तेजोऽर्क' कहलाता है एव प्लीहोदर को दूर कर देता है । (अर्क निकालते समय काचपात्र को भाई वस्त्र से परिवेष्टित रखना चाहिये ।) ॥ १५ ॥ छसो चालीस तोला दूध को, उसमे त्वचासहित सोलह तोला दन्ती-बीजो को डालकर खूब उकाल लेवें । दूध जब शीतल हो जाये, तब उसका दही जमाले। इस दही को मथकर मख्खन निकाल घी बनाले । इस घी को चावलकी खीचडी और दूध के साथ खाये । जितने घृतके विन्दु उतने ही उद्वेग-रहित विरेचन के वेग ॥१६॥ दंती वीजो को अग्निमे तब तक जलावें, जव तक जलते जलते उनमे से निकलती हुई अग्निज्वाला शात न होजाये । अर्थात् अग्निमे जलकर जब वीज अगार तुल्य हो जायें, तव निवू रस में बुझाकर इनके कोयले बनाले । दंतीबीज के इन कोयलो से अर्धभाग १-अर्कतैलादीना नव्ययन्त्रविधिरयम् । २-तेजोऽर्क इत्युपलक्षण, तैलादिकमपि निष्का- श्यम् । काचकूपीमावस्त्रेण वेष्टयेदिति रहस्यम् । ३-दशप्रस्थदुग्धे वीजकुडवम् । ४-कृशरया दुग्धेन च सहोपयोज्यम् , आज्यस्य च यावन्तो विन्दवस्तावन्तो विरेकवेगा भवन्तीति । - । । २६६ सिद्धभेषजमणिमालायां [उदर- तास्वेकां सुखरेकार्थी गिलेत् कोष्णेन वारिणा। द्वे गुजे गुटिकामानं रेकान्ते पथ्यमाहरेत् ॥ २० ॥ ११ सिद्धा तैले रुचकजनुषि श्रेयसी नाम खर्वा स्वच्छं सौवर्चलमिति युगं भागतो विद्धि तुल्यम् । सर्पिUष्टं सदृशमुभयोः शुद्धनेपालमेपां वट्यो बद्धा द्विगुणगुडतो रेकमुद्भावयन्ति ॥ २१ ॥ १२ रसेन्दुस्तालमाषश्चेत् सुमं नीरसमाषकम् । अनकैयमेकत्र मर्दयेद्वारुणीफलैः ॥ २२ ॥ माषोन्मेषां वटीमस्य पयःपेटकगर्भिताम् । निगीर्यानुपिवेदुष्ट्रीपयः शर्करया सह ॥ २३ ॥ तृषि क्षुधि निषेवेत दुग्धं केवलमौष्ट्रिकम् । मासमात्रप्रयोगेण विद्रवेदौदरो देरः ॥ २४ ॥ जितनी मात्रा मे, पारद तथा गधक की कजली तैयार करें। इस कज्जली से अर्धभाग मात्रा मे, पिप्पली, सौभाग्य, मरिच तथा यवक्षार का चूर्ण लेवें । भव, दतीबीज के कोयलों को, कजली को तथा इस चूर्ण को, खरल में एकत्र करके निबूरस से खूब घोटे। फिर इसमे लविग, इलायची और कस्तूरी डालकर सुवासित करके, गुटिकाये बांधलें । सुखविरेचन के लिये इनमे से एक गुटि को, कवोष्ण जलसह निगीर्ण करे । गुटिकाये दो गुजाप्रमाण में बाधनी चाहिये । विरेचनोपरात, चांवल की खीचडी, दूध आदि पथ्य भोजन करना चाहिये ॥ १७-२० ॥ एरडतैल मे जवाहरडे को भूनकर सिद्ध करले । जवाहरडे से समान भाग स्वच्छ कालानमक लेवें । कालानमक तथा जवाहरडे दोनो के वजन बराबर नेपाल- बीजो को धृत में सेकले । इन सभी द्रव्यो से द्विगुणित गुड के साथ इनको पीसकर गोलियां बाधलें । विरेचनार्थ इनको उपयोग में लेवें ॥ २१ ॥ रसकर्पूर छत्तीस माषा तथा लविंग सातसो बीस माषा अथवा इससे अर्ध मात्रा मे, इन दोनो को एकसो (अथवा पांचसो) इन्द्रवारुणीफल के साथ एकत्र खरल मे घोट लें। इसकी एक माषा जितनी गुटिका को पेडे में रखकर खायें। उसके ऊपर ऊटनी का दूध ही पीयें। इस तरह मासावधि प्रयोग से, उपदशादि सहित उदररोग प्रश- मित हो जाता है। मल्पोदररोग में एक मास तक प्रयोग करने की मथवा पथ्यादि के कठिन नियमो की इतनी आवश्यकता नहीं है ॥ २२-२४ ॥ १-एरण्डभवे । २-हस्खा हरीतकी 'जवाहरडै' इति प्रसिद्धा । ३-रसकर्पूरम् । ४-कटपयादिक्रमेण व्यवस्थेय, तेन षट्त्रिंशन्माषक इत्यर्थ । ५-लवजम् । ६-विंशत्य- धिकसप्तशतमाषकं, रेकोत्कर्षेच्छा चेदतोऽर्धम् । ७-शतसख्यै । गुणोत्कर्षेच्छा चेत् पञ्चशत सख्यैः । ८-इन्द्रवारुणीफलै 'गरडूबा' इति लोकप्रसिद्ध । ९-'पेढा' इति ख्यातो भक्ष्य- विशेषस्तद्गर्भिताम् । १०-उपदंशादिकेऽल्पोदररोगेऽपि देय. । किंतु तत्रैतदनुपानपथ्यमा- समात्रप्रयोगा नादरणीया इति ।
m चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छ.। २६७ १३ प्रस्थं राजदुसारं द्विगुणितसलिले प्लावितं रात्रिमध्ये प्रत्यूपे मर्दितं द्राक् करकिसलयतः श्वेतवास पवित्रम् । शाणोन्मानस्य धूमैः सुरभिणि सुतरां रामठस्य स्फुरद्भि- वहिप्रोत्तप्तमृत्स्नाघटशकलतले पातयेद्वित्रिवारम् ॥ २५ ॥ एवं संस्कार्य सम्यक् पुनरितरघटे हिमुसौरभ्यभाजि क्षिप्त्वा संशोप्य वध्यः स्थलकमलजलैर्भावयित्वा विधेयाः। तास्वेकां गोस्तनीभिः सह पलतुलितां ध्वस्तदुर्गन्धहृद्यां खादेदर्केण दीप्यत्रुटिमिषिजनुषा विविवन्धक्षयाय ।। २६ ।। १४ सारेवतमैलेय विमर्थ सलिलेने मोदको कार्याः । विविधविवन्धविघट्टननिपुणा निर्णीय निर्दिष्टाः ॥ २७ ॥ १५ द्राक्षामृकण्डभवमेषजपुष्पकन्द- स्वाद्वीफलानि ससितानि सपूतनानि । शाणत्रयाण्यथ वितुन्नर्कमेकशाणं भेदि गुरूँक्तिविहितो मधुना गुडोऽयम् ॥ २८ ॥ अमलतास के चौसठ तोले गूदे को, रात्रि के समय, इससे द्विगुणित जल मे भिगो देवें। प्रात. उसे हाथ से खूब मसलकर स्वच्छ वस्त्र से छान लेवें। अब, एक मृत्पात्र के भीतरी भाग को तीनमाषा हींग की धूम से सुवासित बनाकर उसे प्रज्वलित अग्निपर रस, उसमे उपरोक्त रस को, अल्पमात्रा में, दो तीन बार ठहर ठहरकर डालदेवें। इस तरह सस्कार प्राप्त इस रस को, तीनमाशा हींगकी धूमसे सुवासित मिट्टी के एक दूसरे घट में भर देवे । इस घट को अग्निपर रख तदन्तर्गत रस को सुखाकर, तल -लग्न शुप्फ चूर्ण को निकाल लेवें। इस चूर्ण में गुलाबअर्क की भावना देकर चार चार तोलाभर टिकिया पांधलें । एक टिकिया को गोस्तनी अंगूरो में मिलाकर, अजवायन, इलायची और सौंफसे निकाले गये भर्क के साथ निगीर्ण करे । यह मल के विवध को नष्ट करती है। गोस्तनी अंगूर मिलाने से, अमलतास की अप्रिय गध दूर - होकर, टिकिया रसना-ग्राह्य हो जाती है ॥ २५-२६ ॥ एलिया सहित अमलतास के गूदे को पानी के साथ (पित्त-प्रधान व्याधि में गुलाब - जल के साथ)घोटकर उसके मोदक बनालें । यह मोदक भनेक प्रकार के मल विवध विकारों को दूर कर देते हैं। इस प्रयोग को अनुभूत करके यहा मालेखित किया है। यह मोदक, विशेष करके रातमें ही, अपना विरेचन-प्रभाव दिखाते है ॥ २७ ॥ द्राक्षा, सनाय, सूठ, खजूर, गुलकंद, हरडे और मिश्री प्रत्येक नौ माषा तथा तुत्य तीन माषा लें । प्रथम, खजूरी फलो के भीतर तुत्यचूर्ण भरकर कपडमिट्टी करके, १-आरग्वधफलमध्यम् । २-तरुणीसुमार्के । ३-सारग्वधम् । ४-पित्तोद्रेकश्चेत्त- रुणीसलिलेन । ५-एते मोदका निशि विशेषेण विरेचयन्ति प्रभावात् । ६-तुत्य, यद्यपि तस्य शाणोकिस्तथाऽपि माषकत्रयमेव ग्राह्य वमनसभवात् । ७-तुत्यं, खाद्वीफलोदरेषु gr २६८ मिपगमगिगा गया १६ पलं मृकण्डजा विश्व पृथक नोल कमाया। सौवर्चलं मन्धवं च पृयक तोलार्धमाप्रया ॥ २० ॥ विडा रेवतीकाष्ठं पृथक नोलातिमात्रया। मधुनी चटिका बद्रा विन्धियधदीक्षिताः ॥ ३० ॥ १७ पश्याधात्रीकणाहित्यग्न्योपान्दमिमिजिन्यत निर्दन्ती सर्वतः सिन्धुगुणा श्यामा लिनास पट् ॥ ३१ ॥ मधुना साधु संनीय मोदक. पलसंमितः । शिशिरेणार्णसा गी! मोदक शुनिमियता ॥ ३२ ॥ १८ स्नुहारदुग्धमार्फवनिम्बुरसेषु पृथगेकर नवयु। भावितमभयाप्रस्थं प्रसारिनीकगति जटगांग ॥ ३३॥ १९ स्नुक्क्षीरोक्षितचणको याबहार शशानुना नमः । क्रूरजठरमपि पुम्पं तावहार विरेचयति ॥ ३४॥ भट्टी के प्रतप्त भोमल में पकायें । तदननार, नम से प्रत्य पूर्ण को निरा। भाद, इन सञरी फलो को तथा द्राक्षा एवं गुलकंद को परान यार्गक पीगर बनायें। फिर इसमें सनाय मादि का चूर्ण मिग माइट से आमरक - पार प्रमाग में नोटा वाध सेवन करें। (मोटक पनाने की यह 'गुरु-भिपिडिग' fiधि है।) या गुढ-मोदक मलका भेदन करता है ॥ २ ॥ पुलिया, सनाय, भार सूठ प्रत्येक एक एक नोला, मापन सौर मंधर प्रत्येक भाधा तोला, वायविटंग और रेवदनीनी प्रत्येक - तोयानक चूर्ण की मनु के साथ याधी गई वटी, विसंध का वध करने में निपुण मानी गयी। ॥ २०-३० ॥ हरडे, मामला, पिप्पली-मूल, राज, त्रिकटु, मुम्ना, पायपिटग और नेतन प्रत्येक तीन भाग, दन्ती बीज चार भाग, त्रित तथा मिधी छह माग इनको एकत्र करके, चार मापा शहद के साथ चार तोला - भर मोटक बनाले। मीराल. जल के साथ सेवित यह मोदक कोष्ठकी शुनि करना हुमा वस्तुतः 'मोदक.' (मोद उत्पन्न करनेवाला) है ॥ ३१-३२ ॥ सुही-क्षीर, भर्फ-क्षीर, भागरे भौर निवृ का रस प्रत्येक सोलह तोशलेकर, चौसठ तोला हर को, इनसे भावित करें। यह हरटे कोष्ठ की मर्यश शुदि करती है ॥३३॥ स्नुहीक्षीर से भावित चने को अग्नि से जितनी बार परितप्त करके सायंगे, उतनी ही यथायथ विभज्य मृत्वा मृत्कर्पटं च दत्त्वा भ्राष्ट्रपामुभि पाचयेत , पुन फोहरतस्तुत्थम- शेष निष्काश्य तानि फलानि द्राक्षापुष्पक्न्दाभ्या सह कल्कीकृत्य मार्कपदीप्रभृतिचूर्ण निक्षिप्य मयुना विनीय धात्रीपलप्रमाणान्मोदकानाचरेदिति गुरूक्ति । १-एलेयम् । २- रेवतचीनी' नामा प्रतिद्धस्य काष्टम् । ३-वटिकात्यापत्तिमान- कारकमात्रेण । ४-त्रित् । पञ्चगुणाऽपि सा गृहाते । ५-दर्पद , तेन न पौनरुत्तयम् । ६-दोषाद्यनुसाराकरिपतदेयमात्राप्रमाणमतो भक्षणीयम् ।
चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छः। २६९ २० पादांशपटूनि परं कृतमालशलाटुशकलानि । निम्म्यम्बुभावितानि श्यानक्षुण्णानि रेककारीणि || ३५ ॥ २१ दीप्यकं सलवणं पटपूतैरैन्द्रवारुणरसैः प्रतिभाव्य । मात्रया गिलितमुष्णजलेन क्रूरमप्युदरमाशु भिनत्ति ॥ ३६ ॥ २२ यवानी प्रस्थतुलितां राजी प्रस्थासंमिताम् । तके त्रिस्त्रिश्च निम्बूकरसैः शुचि विभावयेत् ॥ ३७ ॥ त्रिकटु त्रिफला वह्निः क्षारौ लवणपञ्चकम् । प्रत्येक सप्तमिष्ट.व्याण्येतानि मेलयेत् ॥ ३८ ॥ तपूर्ण निम्बुकरसैस्त्रित्वो दत्तभावनम् । निहन्ति जठरातङ्कं कृतघ्न इव सौहृदम् ॥ ३९ ॥ २३ मार्कण्डी सामुद्रं बुपो यवान्या धराक्षिवसुभागाः। दीनदय नाम रजो जठरगिरीन्द्रभेदने भिदुरम् ॥ ४० ॥ २४ आम्रगन्धिनिशा सावु टङ्कणं हिमु पांसुजम् । स्वर्जिका कृष्णलवणं लशुनं चञ्चजं फलम् ॥ ४१ ॥ बार, क्रूरकोष्टवाले को भी, विरेचन होगे ॥ ३४ ॥ एक भाग अमलतास की कच्ची सेम के टुकडो को इनसे चतुर्थभाग सैंधवसहित निंबूरस की भावना दे। यह शुष्कमल के टुकडे टुकडे करके बाहर निकाल देता है ॥ ३५॥ दो सो छप्पन तोले अजमोदा में चौसठ तोला सौवर्चल मिला, घरह यंत्र से पीस, इन्द्रवारुणी के पाच सो फल के वस्त्र- पूत स्वरस की भावना देकर, चूर्ण को सुखाले। यथामात्रा से इस चूर्ण को उष्णजल के साथ फाक जाये । यह र उदर मे भी आशु असर दर्शाता है ॥ ३६ ॥ अजवायन चौसठ तोला, राई बत्तीस तोला इन दोनो को, तक की और निंबू-रस की पृथक् पृथक् तीन तीन भावना दे । फिर इनमें त्रिकटु, त्रिफला, चित्रक, यवक्षार, सज्जीक्षार, लवण -पचक (तथा समुद्र क्षार) प्रत्येक सात सात टक अर्थात् प्रत्येक २८ माषा लेकर उपरोक्त भावितद्रव्य मे मिलादें । अब, इन सपूर्ण औषधीयद्रव्यो को निबू रस की तीन भावना दे। जिस तरह कृतघ्नता मैत्री को नष्ट कर देती है, उसी तरह यह चूर्ण भी जठर - विकार को निर्मूल कर देता है ॥ ३७-३९ ॥ सनाय, सामुद्र - नमक तथा अजवायन की भूसी प्रत्येक क्रमश एक भाग, दो भाग, तथा आठ भाग लेकर, सूक्ष्मचूर्ण बनाले । 'दीनदय' नामक यह चूर्ण, उदर-रोगरूपी सुमेरु को भेदने के लिये साक्षात् वज्र है ॥ ४० ॥ आवाहलदी, साबूदाना, टकण, हींग, पासुज - नमक, सज्जीक्षार, सौवर्चल, लहसुन, 'पुरडफल और एलिया प्रत्येक दो दो तोला लेकर इनका क्ल्क करलें । इस कल्क को, १-आरग्ववस्यामफलिका सण्डानि । २-कर्मधारय । शुष्क्क्षुण्णानीत्यर्थ । ३-आढके दीप्यके प्रस्थ सौवर्चल दत्त्वा घरट्टयन्त्रेण सपिष्य विशालाफलपञ्चशत्या विभाव्य चूर्ण शोष- येत् । ४-अत्र समुद्रक्षारोऽपि मेलनीयः। ५-एरण्डफलम् ।
-- सिद्धभेषजमणिमालायां [ उदर- एलकं द्विद्वितोलानि द्रव्याणीमानि कल्कयेत् । एरण्डतिलतैलाभ्यां कल्कमालोडयेद्भिषक् ॥ ४२ ॥ मले लुलायकन्यायास्तन्मूत्रेण शनैः पचेत् । सान्द्रं भवेद्यदा पाकात्तदा तमवतारयेत् ॥ ४३ ॥ घृताक्तान्यर्कपत्राणि तापितानि कृशानुना। जठरोपरि विस्तीर्य सिद्धकल्कं प्रसारयेत् ॥ ४॥ अर्कपत्रैः समाच्छाद्य वाढं पट्टेन बन्धयेत् । तूलेन स्वेदयित्वैवमुदरं तु प्रसाधयेत् ॥ ४५ ॥ २५ उत्स्विन्नतन्दुलीयं लशुननिशारुचकटङ्कणलेयैः । रामठसुरभिणि तैले भर्जितमुदरेषु वनीत ॥ ४६॥ २६ अजापुरीषक्षतपत्रटङ्कणैः पटुक्षपाक्षारगुडैलहिङ्गुभिः । कुर्यात् प्रदेहं गुरुदर्शितावा विड्ग्रन्थिशान्त्यै सरसोनतैलेः ॥ १७ ॥ एरड तथा तिल-तैल मे अच्छी तरह मिलादेवें । अब, इसको माहिप वत्सा के सोलह तोला गोबर तथा मूत्र में धीरे धीरे पकावें । पकते पकते जब यह घट्ट हो जाये तब उसे उतारले । अब, भाकडे के घृताक्त अग्नितप्त पत्तो को पेट पर फैलाकर, इन पत्तों को उपरोक्त विधि से सिद्ध किये गये कल्क से प्रलिप्त करदे । इस कल्क के ऊपर पुनः अर्क-पत्र फैलाकर पेट को वस्त्र से अच्छी तरह कसकर बांध दे । अब, उष्ण कपास के सेकद्वारा स्वेदन करते हुये उदर-रोग पर विजय सिद्धि करे ॥ ४१-४५ ॥ चौसठ तोला चावलो को पानी के योगविना, स्विन्न करके उसमे, लहसुन, हरिद्रा, सौवर्चल, टकण तथा एलिया एक एक तोला लेकर, तथा इनका कल्क बनाकर, मिला देवें । एक तोलाभर हींग से सुरभित सोलह तोला एरड तैल से, उपरोक्त तन्दुलीयादिकल्क को अग्निपर भूनकर, उदर-विकारो में पेट पर लेप करे, या बांध दे ॥ ४६॥ मजापुरीष के चौसठ तोला कल्क को चौसठ तोला रसोन से सिद्ध किये गये तैल मे भून लें । क्षत-पत्र (घावपात) के २५६ तोला रसमें चौसठ तोला गुड को मिला एक रस करके वस्त्र से छान लेवें । इस रस मे, उपरोक्त भूना हुमा कल्क मिलाकर उकाल लेवें। इसमे टकण, लवण, हरिद्रा, सज्जीखार, गुड, एलिया और हींग के करीब सोलह तोलाभर चूर्ण का प्रक्षेप करें। गुरुप्रदर्शित इस प्रकार की विधि से निर्मित यह प्रदेह मल -ग्रथि को शिथिल कर देता है ॥ ४७ ॥ १-महिषीवत्साया मले कुडवमात्रे । २-तन्दुलीयप्रस्थं निरम्बु समुत्स्वेद्य प्रत्येक तोलकानि लशुनादीनि कल्कीकृत्य समेलयेत् । अथ च कुवोन्मिते तैले हिडतोलकं प्रविकीर्य तन्दुलीयादिकल्क विनिक्षिप्य भर्जयेदित्युपदेहमार्ग । ३-'धावपात' इति लोके प्रसिद्धिः । ४-अजापुरीषक्षोदप्रस्थं प्रस्थतैलभर्जितं कृत्वा चतु प्रस्थक्षतपत्ररसे गुडप्रस्थं सगाल्य तद्रस सक्वाथ्य च तत्र क्षिपेत् , तदनु कुडवमितं द्रव्यजातं प्रक्षिपेदिति मार्ग ।
चिकित्सितम्]] चतुर्थों गुच्छः। २७ तनूकृतान्यर्कदलानि पीतामेरण्डतैलं लवणं तमाखुम् । एकत्र संसाध्य समस्तमेतत् पट्टेन कोष्ठोपरि चोपनद्यात् ।। ४८ ॥ २८ उत्कारिता भास्करमूलवल्कसिद्धा जलान्तः स्फटिकासहाया। पटेन गूढे यकृति प्रदत्ता भिनत्ति वृद्धं यकृतं क्रमेण ॥ ४९ ॥ २९ ससौवर्चलसौभाग्यैः पुटपक्कस्नुहीरसैः। अङ्गारमण्डका कल्प्यः शोथोदरनिवृत्तये ॥ ५० ॥ जठरेपु पिपासायामौष्ट्र गव्यं पयः परम् । आग्रहे तु तयोरेव जलं युञ्जीत युक्तिजम् ॥ ५१ ॥ -- इत्युदरचिकित्सितम् ।- अथ शोथचिकित्सितम् । अथो दशाक्षः शरकार्मुकच्छुरीदम्भोलिघण्टास्फुटपाणिपञ्चकः । तीक्ष्णो विशेषादातिसाररोगिणां प्राणप्रहारी श्वयर्थः प्रदिष्टः ॥१॥ माकडे के पत्तों के छोटे छोटे टुकडे, एरडतैल, लवण तथा परिपक्क अतएव पीत तमाखु-पत्र, इन सपको एकत्र सिद्ध करके पेट के ऊपर वस्त्रसे अच्छी तरह बांध देवें। इससे भी मल- ग्रंभी ढीली पड़ जाती है ॥ ४८ ॥ स्फटिकासहित नाकहे की मूल-त्वक् मे जल मिलाकर उसकी उत्कारिका (पुल्टिस्) बनाकर वन में लपेट यकृत् स्थल पर रखने से परिवृद्ध यकृत आदि क्रमश शमित होजाते हैं ॥ ४९ ॥ उदर-शोथ की निवृत्ति के लिये, सौवर्चल, टकण तथा पुटपक्क स्नुही-क्षीर से 'अंगार मंडक' बाटियां बनावें । उदर के विकारों मे प्यास लगने पर ऊटनी अथवा गाय के दूध का पान परम प्रशस्त माना गया है यदि रुग्ण जल पीने का हठ पकडले तो उपरोक्त दूध का, नलिकायत्रसे अर्क - जल निकाल लें । प्यास लगने पर, पानार्थ इसी जल का उपयोग करें ॥ ५०-५१ ॥ - उदरचिकित्सा समाप्त- - - शोथचिकित्सा (कुल प्रयोग ६)- अब श्वयथु का स्वरूप सुनिये - श्वयथु दश नेत्रो वाला, शर, शख, छुरी, वज्र तधा घण्टा से सुसज पांच भुजामो वाला, विशेषतया अतिसारपीडितों का प्राण हरने वाला एव कठोर कहा गया है ।। १ ।। गोरखमुण्डी तथा सैंधव का कषाय उग्र-शोथ का कलेवा (भक्षण) कर जाता है। उपरोक्त कपाय मे गोरखमुंडी का फल तथा सैंधव एक एक तोला तथा जल २५६ १-प्लीहानमपि । २-अर्कवद्यन्त्रयुक्त्या निष्पादितम् । ३-उत्सेधसाधादनुक्रमाच्च शोथचिकित्सितमुच्यते। ४-श्वयथुरोगमूर्तिवर्णनम् ।
सिद्धभेपजमणिमालाया [गोय- . १ गोरक्षमुण्डीपटुजः कपाय शोथं महान्तं कवलीकरोति । मुण्ड्याः फलं सैन्धवतः पिचू द्वौ जलाढकं शेपय सागरांगम् ॥२॥ २ कारवीटीप्यवर्षाभूनधुरी एकभागिकाः । काकमाच्यास्तु भागौ द्वौ सिद्धोऽर्कः शोथवस्मरः ॥३॥ ३ पलमानानि वानानि शलाटूनि मन्द्रुतः । जर्जरीकृत्य गीर्णानि निघ्नन्ति श्वयथु क्रमात् ॥ ४॥ ४ भसनि द्रोणपुष्पीजे मल्लस्तद्रससंस्थितः । अष्टयामाग्निससिद्धो यतीनां शोथमान्द्यनुत् ॥ ५॥ ५ अधितप्ततैलममलं सिक्थ निर्माल्य तेन लितानि । चञ्चिदलानि निहन्युर्वद्धानि श्वयथुमनिलोत्थम् ॥ ६ ॥ ६ स्त्यानभावं स्फुटयता स्फटिकाप्रतिसारणात् । दुग्धेनाभ्यअनं हन्ति गोथमारु'करोद्रवम् ।। ७ ॥ - इति शोथचिकित्सितम् । सात तोला लेवें। चतुर्थाश जल शेप रहने पर इसी मिद्ध कपाय को ४५ दिवस तक पीयं ॥२॥ कालाजीरा, अजवायन, पुनर्नवा और सौंफ एकत्र एकभाग, काकमाची दो भाग इनको लेकर अर्क निकाल ले यह मर्क शोथ को नष्ट कर देता है॥३॥ कर के कच्चे सूखे फल चार तोला लेकर जौकुट करलें । इसकी फाकी क्रमश. शोथ को हट देती हे ॥ ४ ॥ द्रोणपुष्पी के रस मे दिवस पयंत भावित एक तोला मल्ल को द्रोणपुप्पी के पचाग की ३२० तोला भस्म मे रखकर आठ प्रहर अग्नि देकर मिन्द करले । लवणरहित घृतमिश्रित गेहू की फूली तथा दृध को पथ्य रूपसे लेते हुये इस सिद्ध मल्ल का सेवन करने से शोथ तथा मदाग्नि नष्ट होते हैं ॥ ५ ॥ सिक्थ (मोम) को गरम तेल मे पिघलाकर वस्त्रपूत करलें । एरड के पत्तो को, इससे चुपडकर, वात प्रधान शोथ पर वस्त्र से बाध दे । इससे शोथ उतर जाता है॥ ६ ॥ फिटकरी के योग से किचित् घट्ट बने हुये दूध द्वारा मर्दन (अभ्यग) करने से मिलाये के रस- स्पर्श से उत्पन्न शोथ नष्ट हो जाता है ॥ ७ ॥ शोचिकित्सा समाप्त - 1-सन्माधित एवायं कषायश्चनु पञ्चदिनानि पेय । २-शतपुष्पा । ३-चिरपो- टिकाया । ४-'शुप्के वानम्' इत्यमर । ५-'कर' इति ख्यातस्य वृक्ष विशेषस्य । :-पञ्चप्रस्थप्रमाणे । ७-मलम्तोलकमित सप्तदिनानि तद्रसभावित । ८-पथ्यं च किचिद्धृतम्रक्षिता विलवणा फुलिका दुग्ध च। ९-मधूच्छिष्टम् । १०-मल्लातफरस- सस्पर्शोद्भवम् ।
अथ वृद्धिवर्मचिकित्सितम् । १ तैलं कटाहे कियदेव दत्त्वा तत्राग्निना भर्जय हस्तिलेण्डम् । वधान पट्टेन नखम्पचोप्मप्रणाशहेतोवृषणप्रवृद्धः ॥ १॥ २ उत्कारिका वज्रकधान्यपिष्टजा वद्धा सुखोष्णा वृषणानिले मता। ३ तैलं तिलाः किशुकपुष्पमम्भसा संसाध्य वनीत यथायथं भिषक् ॥२॥ ४ पानीयपर्युक्षणलब्धमार्दवं नखम्पजोष्णीकृतमग्निदर्शनात् । बनीत विश्ववृषणं प्रयत्नतो वृद्धिदस्तेन शमं प्रपद्यते ॥ ३ ॥ ५ विपमुष्टिकरोहिपतृणलेपो गोमूत्रकल्पितः कोणः । उत्पद्यमानरूपं वर्म विशेषेण विघटयति ॥४॥ ६ वर्म जयति पुरकणपुरसिहकैसिन्दूरकल्पितो लेपः। किं त्वत्र चतुर्यामं वनोपलाङ्गारतस्तापः ॥ ५ ॥ ७ प्रलेपो रूक्षसौभाग्यशुक्लगुन्द्रारसाजनैः। अङ्गारतापनाद्व कक्षाग्रन्थीनिवारयेत् ॥ ६॥ भण्डवृद्धि-वर्मचिकित्सा (कुल प्रयोग-१०)- हाथी की लीद को कटाह-गत थोडे से तैल मे भग्निद्वारा भूनलें । इसको नो निवाया करके पीडित स्थानपर वस्त्र से बाध दे। वृषणवृद्धि इससे शान्त हो जाती है ॥ १ ॥ वृषण-वायुविकार से, बाजरे के भाटे की सुखोप्ण उत्कारिका बाधने से लाभ होता है। इसी तरह, वैद्य, समुचित प्रकार से किशुकपुष्प-रस मे सिद्ध तिल तथा तैल की उत्कारिका बना कर बांधे ॥ २॥ पानी के प्रोक्षणद्वारा वृषण को मृद्ध बनाकर तथा अग्निसपर्क से उसे यत्किंचित् गरम करके, उसको चारो ओर से यन- पूर्वक वस्त्र द्वारा बाध देने से वृद्धिविकार शांत हो जाता है ।। ३ ॥ गोमूत्र से सिद्ध की गयी-कुचला तथा रोहिप घास की कोष्ण उत्कारिका, वंक्षण-प्रदेश मे उत्पद्यमान ग्रंथि-वर्म (बद) को चिखेर देती है ॥ ४॥ चार प्रहर तक वन्यकडो की अग्नि-ताप से प्रतप्त माहिष-गुग्गुल, कणगूगली तथा शिलारस से सिद्ध किया गया प्रलेप, बद को वश मे कर लेता है ॥ ५॥ शिग्रु के वीज (मरिच विशेष), टंकण, श्वेताद तथा रसांजन का प्रलेप करके, अंगार की ऊष्मा देने से वर्म तथा कक्षा-ग्रंथि का निवारण होता है ॥ ६॥ १-शोथसधर्मत्वादण्डवृद्धिव चिकित्सितमुच्यते । वर्भ च वंक्षणजो ग्रन्यिविशेषो लोके 'बद' इति ख्यात । २-हस्तिपुरीषम् । ३-पुरं महिषाख्यो गुग्गुलु , कणपुरं च 'कणगूगली' इति ख्यातस्तद्द । सिहक 'शिलारस' इति ख्यातो निर्यासविशेष । ४-शुक्रगुन्द्रो लोके बोलो गूद' इति ख्यातः । सि० १८ २७४ सिदभेषजमणिमालायां [गण्डमालामन्यादि- ८ गुडचणकचूर्णचूर्णर्दक्षाण्डरसेन सप्तधा लेपः। अङ्गारखण्डतप्तो वसंग्रन्थि विलाययति ॥ ७ ॥ ९ वर्मोपरि परिवद्धा चुकाच्छदचक्रिका चार्वी । दुर्जयमपि तत्कष्टं शमयति सहसा वयं ब्रूमः ॥ ८॥ १० किमरिचविलेपादुपर्युपरि योजिताबहुशः। एकेनैव दिनेन वर्मग्रन्थिः स्वयं समुपविशति ॥ ९ ॥ - इति वृद्धिव चिकित्सितम् । - अथ गण्डमालाग्रन्थयाँदिचिकित्सा । १ सितचञ्चचरणचूर्णैर्विपाच्य मेपीपयो विधाय दधि । तजं हविः प्रलेपाजनालंसखं निहन्ति गलमालाम् ॥१॥ २ मुद्कार्पासवीजानां भूर्ति युक्त्या प्रकल्पिताम् । घृतेन ग्रन्थिमभ्यज्य तच्छान्त्यै प्रतिसारयेत् ॥ २॥ गुड, बेसन (चने का आटा) तथा सुधाचूर्ण इनका सात वार लेप करके अंगार का ताप देने से वर्म-ग्रंथि बिखर जाती है ॥ ७ ॥ इमली के पत्तों को बारीक पीसकर उसकी मुलायम टिकियाँ बनाकर वर्म के ऊपर वांधने से, वर्मजन्य दुसह वेदना भी सहसा नष्ट हो जाती है ॥ ८॥ शृगी-विप और मरिच इन दोनों को जल में खूब बारीक घोटकर उसका, एक के ऊपर एक के क्रमसे, सातवार लेप करें। एकही दिन में वर्मग्रंथि स्वयमेव बैठ जाती है ॥ ९ ॥ - वृद्धिवर्म चिकित्सा समाप्त . - - - गडमालाग्रंथ्यादि चिकित्सा (कुल प्रयोग ५)- श्वेत एरड मूल- त्वक् का चूर्ण चौसठ तोला लेकर उसे पांच गुणित भेड के दुध में उकालें । वस्त्रपूत करके इस दूध का दही जमा उसमें से घृत निकाल उसको जंगाल चूर्ण में मिलाकर लेप करने से गंडमाल नष्ट हो जाती है। (नीलहरित वर्णवाला एक रंगविशेष का नाम अंगाल है। यह रगरेजो मे इसी नाम से प्रसिद्ध है।)॥१॥ मूंग और कपास-बीज इन दोनों को जलाकर भस्म बनालें। ग्रंथि को घृत से अभ्यक्त करके इस भस्म को धीरे धीरे प्रथिस्थल पर मलें। इससे ग्रंथि शांत हो जाती है ॥२॥ १-चणकचूर्णं 'बेसन' नाम्ना ख्यातम् । चूर्णं च कलिकाचूर्णम् । २-सप्तकृत्व. कृत इति । ३-चुक्रा अम्लीका, तस्या पत्रैर्घटिता चक्रिका । ४-शृङ्गिक विप, तच्चाशुद्धमेव प्राह्यम्। ५-लेपश्च जलेन भृशं घृष्ट्वा कार्य । ६-सप्तधेत्यर्थ । ७-ग्रन्यिसाम्यागण्ड- मालादिः । ८-शुफ्लैरण्डचूर्ण प्रस्थमित चेत् पञ्चप्रस्थमितं दुग्धम् । ९-नीलहरितवर्णो रअकोपयोगी द्रव्यविशेष एतन्नाम्नैव ख्यात । १०-उभयं मेलयित्वा भूति कार्या।
२७५ .. चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छ.। ३ अर्कमूलाध्यवहिता मृत्स्ना पिष्टा यह जलैः। लेपाइन्थीन् व्रणान् घोरान् विनिहन्ति प्रभावतः ॥३॥ ४ ममृणं कारवीचूर्ण मनाकाम्पिल्लसंस्कृतम् । घृतेन मुदितं लेपानन्थीन् हन्त्येव निश्चितम् ॥ ४ ॥ ५ शनैः शनैघृते गव्ये पादांशं टङ्कणं पचेत् । निहन्ति लेपमात्रेण ग्रन्थ्यादीन्महणीकृतम् ॥५॥ - इति गण्डमालाग्रन्थ्यादिचिकित्सा।- अथ व्रणचिकित्सितम्। १ भज शुद्धशङ्गिकविषं तुर्याशं धौतधर्मपत्तनतः। प्रातः सपादगुरुं व्रणविपदि व्यालवल्लरीदलतः॥१॥ २ पुरपारदौ समानौ द्वयोः समानं रसाञ्जनं जलतः। मसृणं विमर्थ विहितो मलहरराजो व्रणेपु दातव्यः ॥२॥ ३ दैत्यसूतकयो पिष्टी तदर्ध धर्मपत्तनम् । गोघृतेन समालोड्य क्षालयेच्छतशो जलैः ॥ ३ ॥ आकडे के मूल से लगी हुई मिट्टी को लेकर, दो दिवस पर्यंत, जल से खूब खरल करें। इसके लेप से सभी प्रकार की ग्रंथियां तथा भयंकर व्रण भी नष्ट हो जाते है। भर्क - मूल से चिरकालीन-ससर्ग के कारण मिट्टी का यह सविशेष प्रभाव है|॥ ३॥ कालाजीरा का मुलायम चूर्ण बनालें । इसमे थोडा कवीला का चूर्ण मिला देवें। इस चूर्ण-मिश्रण को घी में मसलकर ग्रथिप्रदेश पर लेप करें। इससे नि.सदेह लाभ होता है ॥ ४॥ गाय के धीमे, इससे चतुर्थांश भाग टंकण को धीरे धीरे पकावें । फिर टंकण को बारीक पीसकर इसका प्रलेप करें। इसके लेप मान से ग्रथि मादि विकार प्रशमित हो जाते हैं ॥५॥ गण्डमाला ग्रंथ्यादिचिकित्सा समाप्त - व्रण चिकित्सा (कुल प्रयोग ८)- जल से साफ की गयी काली मरिच, इससे चतुर्थांश शुद्ध-शृंगी-विप इन दोनो को खरल मे खूब घोटकर इसमे से १ गुंजाभर मात्रा को तांबूल-दल के साथ प्रात. सेवन करें। इससे क्वेद एवं स्रावयुक्त व्रण शीघ्र ही भर जाते हैं ॥ १ ॥ गुग्गुल तथा पारद समान भाग, दोनो के वजन बराबर रसाजन, इनको जल में खूब महीन पीसलें। व्रणों पर लगाने के लिये इस 'मलहरराज' का उपयोग करें ।। २ ॥ गंधक तथा पारद १-मृत्तिका । २-चिरससर्गसङ्गान्तादप्रभावात् । ३-ग्रन्थ्यादीना पाकाद्णावस्था भवति, इत्यतस्तदनन्तर व्रणचिकित्सितमुच्यते । ४-शुद्धिश्च गोमूत्रेण भवति । ५-क्लेद- सावरूपायाम् । ६-नागवल्लीदलत । ४-मलहर इति व्रणोपरिदेयकल्कस्य सज्ञेयम् । ८-मरिचम्। .
२७६ सिहभेपजमणिमालायां [व्रण- अयं मलहरोत्तंसो दामोदरसमर्थितः । व्रणविस्फोटकग्रन्थिप्रभृतिक्षपणक्षमः ॥४॥ ४ मृताश्मा टङ्कणं तुत्थं कत्थकम्पिल्लकोषणम् । कारवी चेति पलिकं पूगीफलचतुष्टयम् ॥ ५॥ कपर्दिकाश्चतस्त्रोऽत्र कर्पूरो नवमापकः । वलक्षकजलात् किं च माषा अष्टादश स्मृताः ॥ ६॥ कारवीमरिचोद्वेगान्यर्धदग्धानि कल्पयेत् । वराटीनां तु भसितं सर्वमेकत्र चूर्णयेत् ॥ ७ ॥ पटपूतं प्रणीयाज्ये क्षालयेद्वहुंशो जलैः। एष हन्यान्मलहरो ग्रन्थिस्फोटवणादिकान् ॥ ८ ॥ ५ पलं शिखरिवीजानां मधुनः कवल ग्रेहः । सर्पिः पलं विपक्तव्यं व्रणान्मलहरो हरेत् ॥९॥ ६ वीकांशैसिद्धतैलार्द्रतूलप्लोतोऽवचारितः । नरगोवाजिकरिणां विनिहन्ति व्रणक्रिमीन् ॥१०॥ की कजली, इससे अर्धमात्राभर मरिच-इनको गोघृत में मिला सोवार धो डालिये। यह मलहर-रत, जिसके समर्थक मेरे पैतृवसीय ज्येष्ठभ्राता श्री दामोदर है, व्रण, विस्फोट, ग्रंथि प्रभृति को नष्ट कर देने में समर्थ माना गया है ॥३-४ ॥ मुरदासींग, टंकण, तुत्थ, खैरसार, कवीला, मरिच तथा अजमोदा प्रत्येक चार चार तोला (टिप्पणीकार के मतानुसार प्रत्येक ३६ माषा) सुपारी नग चार, पीली कपर्दिका नग चार, कपूर नौ माषा, सफेद काजल अठारह माषा लेवें । अजमोदा, मरिच तथा सुपारी को प्रथम अर्धदग्ध बनाले । कपर्दिका को जलाकर उसकी भस्म करलें। फिर इनका एकत्र वस्त्रपूत सूक्ष्मचूर्ण बना, चूर्ण से चतुर्गुण अथवा तिगुणे घृत मे मिलाकर पुन पुनः (सोवार) जल से धोवें। यह मलहर ग्रंथि, स्फोट, व्रण, दगु आदि को नष्ट कर देता है ॥५-८॥ अपामार्ग के बीज चार तोला, शहद एक तोला, इन दोनों को चार तोलाघृत मे पकावें। यह मलहर और व्रणहर- कहा गया है॥९॥वीकामाली मे सिद्ध तैल से सिक्त-कपासप्लोत को लगाने से मनुष्य, गाय, घोडा तथा हाथी के व्रण तथा तत् -गत क्रिमि-समूह नष्ट हो जाते हैं ॥१०॥ १-अयं गुरूणां पैतृष्वतीयो ज्येष्ठम्रातेति ज्ञेयम् । २-'मुरदासींग' इति ख्यात । ३-निर्देशस्य द्रव्यप्रधानत्वात् पृथक्पलिकम् । पलमत्र षट्त्रिंशन्माषिक सकेतितम् । ४-पीता इति शेष । ५-लोके 'सफेद काजल' इति ख्यातात् । ६-उद्वेग पूगीफलम् । ७-सर्वसभारतश्चतुर्गुणे त्रिगुणे वा। ८-शतकृत्व केचित् क्षालनं नेच्छन्ति । ९-आदि- शब्दादूप्रभृतीनां ग्रहणम् । १०-अपामार्गवीजानाम् । ११-कर्ष "सुवर्ण कवलग्रह इति दर्शनात् । १२-बीकामाली' इति प्रसिद्ध । । । - २७७ चिकित्सितम्] चतुर्थों गुच्छ । ७ एकं शुद्ध शिलाजतु पयोभिरालोज्य लेपेन । सद्योजातं जयति क्षतजातममृग्वियोध्य तत्रस्थम् ॥ ११ ॥ ८ कोष्ठविभेदविनिर्गतमन्नं परुपीकृतं समीरेण । मक्षीपुरीपपृक्तैः पयोभिरभ्युक्षितं विशत्यन्तः ॥ १२ ॥ - इति व्रणचिकित्सितम् । - अथ भग्नेचिकित्सितम्। १ सिक्थं शरावकलितं त्रयः प्रस्थाः पटूत्तमात् । मल्लो जातीफलं जातीपत्रिकाकल्लकं सुमम ॥१॥ चतुर्गद्याणमानेन पृथगेतानि संहरेत् । शरावार्धप्रमाणेन मिता ज्योतिष्मती मता ॥२॥ पार्श्वच्छिद्रे डमरुणि यन्त्रे सर्व निधाय तत् । अधिचुल्लि समारोप्य यन्त्रं साचीकृतं मनाक् ॥ ३ ॥ प्रज्वाल्य तद्धो वहि पातयेत्तैलमुत्तमम् । तत्तैलं भग्नसंधानं वल्यं भक्षणमर्दनात् ॥ ४॥ २ चिञ्चाफलमांसरसं भूमौ क्षित्वा विमर्च करतलतः। लिम्पेत चूर्णसहितं तापय शिखिनाऽभिधातपीडायाम् ॥ ५॥ पानी में घोलकर केवल शिलाजीत का प्रलेप, शस्त्रादि से उत्पन्न सद्य व्रण को मिटा देवा है। लेप करने से पूर्व, व्रण को प्रच्छान से छेदकर उसमें से थोडा रुधिर निकाल लेना चाहिये ।। ११॥ कोष्ठ में से अन्न बाहर निकलकर वायु के कारण यदि कठिन बन गया हो तो जल को माखी के पुरीष में घोलकर उससे कठिन भाग पर मालिश करें। इस तरह मर्दन करने से, काटिन्य के विलय होने पर, अंत्र सरलता से भीतर चला जाता है ॥ १२॥ व्रणचिकित्सा समाप्त भग्नचिकित्सा (कुल प्रयोग ६)- मधूच्छिष्ट बत्तीस तोला, सैधव १९२ तोला तथा मल्ल, जायफल, जावित्री, भकल- करा और लविंग प्रत्येक दो दो तोला तथा ज्योतिष्मती सोलह तोला, इनका डमरुयंत्र- द्वारा तैल टपकालें । डमरुयंत्र की उपरिस्थ-स्थाली के पार्श्व में छिद्र करलें - तथा यंत्र को चूल्हे पर थोडा टेढा करके स्थापित करें। इस तैल के मर्दन से भग्नसंधान होता है १-जलै । २-शस्त्रादिजम् । ३-प्रच्छानेन रुधिर प्रदर्थ लेप कार्य । ४-कोष्ठ- विनिःसृतान्त्रस्य कठिनीभूतस्यान्त प्रवेशनार्थं मार्दवोपायोऽयम् । ५-भमोऽप्यभिघातादेव सभवति, अत प्रोच्यते तचिकित्सा। ६-मधूच्छिष्टम् । ५-लवङ्गम् । ८-उपरिस्थ स्थालीपार्श्वे छिद्र कार्यम् । ९-“यन्त्र डमरुसज्ञ स्यात्तत्स्थाल्योर्मुद्रिते मुखे" इत्युक्तखरूपे । १०-चिश्चाफलमांसे जलं दत्त्वा रस कार्य , तं रस चूर्णेन सह भूमौ क्षिप्त्वा विमृद्य गृह्णी- *, यात् । ११-चूर्णं लोके 'चूना' इति प्रसिद्धम् । १२-अङ्गाराग्निना ।
सिर्भपजमणिमालाया [नारीमन- ३ न्युप्तनिशैः पटेघटितैस्तैलान्तर्जातमतिभ्रष्टः । निम्बुकशकलैः स्वेदय गात्रं लकुटादिरुग्णमतिमात्रम् ॥ ६॥ ४ सद्यः कुलालपचनोद्धतकुम्भखण्टे भ्रऐन खाखसपयः सुनकपटेन । उच्चैः प्रपातकुपितानिलरुग्णमामाच्छादयेत्प्रवलम्पप्रशमाय भग्नम् ७ ५ अभिघातरुग्णरदनप्रकीर्णरुधिरप्रवाहरोधाय । अभ्यअनमेव परं नवोद्भुतैरश्वलेण्डरमैः ॥ ८॥ ६ शङ्गादिभिन्नादुदरानिरीयाद्धस्ता दिकं गर्भगतम्य जन्तोः । संतप्तसूचीमुखविद्धमन्तर्विगेद्विधिः कापि मर्यप दृष्टः ॥ ९ ॥ - इति भन्ननिकित्सितम् । - अथ नाडीव्रणचिकित्सितम् । १ धुर्सणं सराजहंसं नाडीव्रणवारि वारिणा पीतम् । यावन्तोऽब्दा नाडीवणस्य तावन्त एव घुसणाक्षाः ॥ १ ॥ तथा खाने से वल प्राप्त होता है ॥३-इमली के गूदे को पानी में घोल्पर एक रस बनाले । इस रस मे चूना मिला, भूमि पर साल सूब मसल लें। इसका भन्न स्थान पर लेप करके उस स्थान को अग्नि से तपावें । इस तरह करने से भन्नगन्य पीडा शारा जाती है ॥ ५॥ हरिद्वारस से प्रलिप्त नियू के टुकडो को तेल में छोककर, पोटली में बाध उसके द्वारा, लकडी के प्रहारो से पीडित - Pाण के शरीर का, पर खेदन करें। इससे प्रहारजन्य वेदना नष्ट हो जाती है । हरिनाम से प्रलिप्त निवृ के टुकटो को गरम तेल में छोककर शीघ्र उतार लेना चाहिये अर्थात् छोकन की झंकृत-अनि ममकाल में ही उतार लें । अर्थात् इन्हे अधिक नहीं भून ॥ ६ ॥ हाव में से निकाले गये सद्यक मृत्पात्र के टुकड़े पर, खाखस दूध से सिक्त वस्त्रसड को तपाल । ऊंची जगह से गिर पड़ने के कारण वात-प्रकोपजन्य वेदना-पूर्ण स्थान पर इस वस्त्रसंड को लपेट दे। मनजन्य प्रबल वेदना इससे प्रशमित हो जाती है ॥ ७ ॥ चोट लगने से, रुग्ण के ढीले पडे हुये दातो में से निकलते हुये रुधिर प्रवाह को रोकने के लिये, भव की सद्यस्क लीद के रस का अभ्यजन उत्तम प्रयोग है ॥८॥ पशुमो के विपाण आदि से भिन्न उदर में से, गर्भस्थ बालक का हस्तादि अग यदि वाहर निकल आया हो तो, वहिर्गत उस अंग को प्रतप्त सूचीमुखद्वारा विद्ध करने से वह अन्दर चला जाता है । इस विधि को मैंने एक जगह प्रत्यक्ष देखी हे ॥ ९ ॥ भग्नचिकित्सा समाप्त- नाडीव्रणचिकित्सा (कुल प्रयोग ११)- हंसराज के चूर्ण मे केसर मिलाकर जल के साथ पीने से नाडीव्रण मिट जाता है । नाडीव्रण जितने वर्ष पुराणा हो उतने ही तोला (टिप्पणीकार के मत में उतने ही शाण १-चर्चितहरिदै । २-स्वेदनकाले पटवद्धरित्यर्थ । ३-कुलालपचनं 'हाव' इति प्रसिद्धम् । ४-अश्वपुरीषरसै । ५-प्रमादादनुपचरितव्रणस्यैव नाडीव्रणवमतस्तदनन्तरं . - . चिकित्सितम्] चतुर्थों गुच्छः। २७९ २ नृशिरोस्थिंभस्म हविपा चत्वारिंशद्दिनानि परिलीढमें । क्षरदस्थिशलाकमपि क्षिणोति नाडीवणं ब्रूमः ॥२॥ ३ सौभाग्यक्षारसिन्दूरकम्पिल्लकयवानिकाः । पृथक् पिचूंन्मिताः सिक्थसर्जी पट्तोलको तथा ॥३॥ तालं तुत्थं च मरिचं निम्बमजों शवोपलम् । करकच्छदाः सूतो निर्दिष्टा द्विद्विमापकाः ॥ ४॥ चतनः शुक्तयः क्षुद्रा गन्धकात् सप्त वल्लकाः । मापक रामठं कि च शशी द्वादशमाषकः ॥ ५ ॥ सर्पिपः कुडवे सर्व यथारीति विमर्दयेत् । न स्युर्मलहरादस्मान्नाडीप्रभृतयो व्रणाः ॥ ६ ॥ ४ पष्टिमापो मरुद्भूपंः सिक्थमष्टादशोन्मितम् । कत्थं मस्तङ्गिका स्यातां प्रत्येकं दशमापके ॥७॥ भर मात्रा मे) केसर लेना चाहिये । अर्थात् यदि व्रण एक वर्ष पुराणा हो तो केसर एक तोला (अथवा एक शाण) दो वर्ष पुराणा हो तो दो तोला (अथवा दो शाण) इत्यादि । प्रयोगकाल में लवणवर्जित रूक्ष - फुलके -रोटी पथ्य है ॥ १॥ मनुफ्य-मस्तक की अस्थि - भस्म को मयु क साथ चालीस दिवस पर्यंत लेने से अथवा इसके लेप से अस्थिक्षय करने वाला नाडीव्रण भी दूर हो जाता है। अस्थिचूर्ण की मात्रा एक मापा भर है। तेल, नमक तथा अम्लपदार्थ वयं है ॥२॥ सौभाग्य, सजीसार, मिदूर, कपीला, प्रत्येक नौ मापा, सिक्थ तथा सर्जरस प्रत्येक छह तोला, ताल, तुत्य, मरिच, निंबोली की मजा, मुरदासोंग, ककेज के पत्ते तथा पारद प्रत्येक दो दो माषा, छोटी शुक्ति नग चार, गधक तीन माषा (सात- वाल -तीन मापा से एक बाल अधिक), हींग एक माषा, कपूर बारह माषा तथा घी सोलह मापा-इन सभी भौषधीयद्रव्यों को लेकर इनका निम्नविधि से मलहर निर्माण । प्रथम सिस्य को सोलह तोला घी मे पिघलालें। फिर, पारद गंधक की कजली सहित, टकणादिद्रव्य -समूह के सूक्ष्म-कपडछान चूर्ण को इस द्रव में मिलाकर खरल में खूब घोटले । इस मलहर से नाडी भादि के व्रण शीघ्र भर जाते है ॥३-६ ॥ राल साठ मापा, सिक्थ अठारह मापा, कत्था और रूमीमम्तगी प्रत्येक दश तचिकित्सिनमुन्यते । ६-कुखमम् । ७-'हसराज' इति नाना प्रसिद्धन तृणविशेषेण सहितम् । ८-नाडीव्रणवारणकारीत्यर्थ । ९-अत्राक्षशब्दस्तोलकपर , मात्रा चास्य शाण- प्रमाणा । अलवणरुक्षपोलिका पथ्यम् । १-मात्रा चास्य मापैकमिता, पथ्य तैलाम्ललवणवर्जम् । २-परिलीढमित्युपलक्षण, तेन लेपोऽपि विवेय । ३-पिचुरत्र नवमापको विवक्षित । ४-पृथगित्यर्थ । ५-निम्बफला- स्थिमजा। ६-मुर्दासीङ्गी । ७-'ककोडा' इति नाम्ना लोकज्ञेयस्य वृक्षविशेषस्य पत्राणि । ८-रीतिरत्रेयं-तप्तघृते शिस्य द्रवीकृत्य, टकणक्षारादि सर्व द्रव्यजातं महणीकृतं मेलयित्वा, दृढं खल्वे मर्दयित्वा, समवचारयेदिति । ९-राल । अजवायन कर २८० सिहभेपजमणिमालायां [नाढीव्रण, वस्त्र षण्मापः शवपाषाणष्टकणं दरदं पुनः। सिन्दूरमेकमाषाणि घृतं कुडवमात्रकम् ॥ ८॥ विनिक्षिपेवृते तप्ते चूर्णमेतद्यथायथम् । किंचिद्विश्रम्य वसनपूतं पाने निधापयेत् ॥ ९ ॥ एष सिद्धो मलहरः परिपूरणलेपनैः । नाडीवणक्षतस्फोटपिटिकाग्रन्थिघस्मरः ॥ १० ॥ ५ आर्मकुष्ठद्विदलं पयोभिराप्लाव्य सप्ताहमयःप्रभृष्टम् । घृतेन पिष्ट्वा परिलेपितं तनिहन्ति नाडीव्रणमप्यसाध्यम् ॥ ११ ॥ ६ मदनफलबीजकलितो गुग्गुलुरेको जलेन संपिष्टः । नाडीव्रणमुत्तानं लेपेन द्यति गभीरमपि वा ॥ १२ ॥ ७ नरगजनखरककेलककिशलयवादामसिक्थमुर्दारम् । प्रत्नघृतभर्जितमयसि घृष्टमरिष्टेन नाडीघ्रम् ॥ १३ ॥ माषा, मुरदासींगी छह मापा, टंकण हिंगुल और सिदूर प्रत्येक एक मापा तथा घृत सोलह तोला लेवें । प्रथम, सिक्थ को गरम घी में पिघलालें, फिर इसमें उपरोक्त औषधीय द्रव्यों का वस्त्रपूत सूक्ष्मचूर्ण मिला देवें । कुछ समय पश्चात् , इन सबको मे से छानकर पात्र मे भरदें। इसके पर्याप्त-लेप से नाडीव्रण, क्षतस्फोट, फुन्सियां तथा ग्रंथियां नष्ट हो जाती है ॥ ७-१० ॥ लोहकटाह मे भर्जित-जौकुट-मकुष्ठ को, एक सप्ताह पर्यंत आकडे के दूध में भिगोकर रखदें। फिर इसको, लोह के खरल मे घी मिलाकर खूब घोटलें। इसके लेप से असाध्य नाडीव्रण भी मिट जाता है ॥ ११॥ मदनफल के वीज के साथ केवल गुग्गुल को ही पानी से पीसकर, उसकी वर्ति बना लेप करने से प्रवृद्ध तथा गंभीर नाडीव्रण भी नष्ट हो जाता है ॥ १२ ॥ मनुष्य तथा हाथी के नख प्रत्येक २-२ माषा, ककेरक पत्र ३ तोला, बादाम की गुली नग १, सिक्थ और मुर्दासोंगी प्रत्येक १-१ माषा तथा पुराणा घी छह तोला-इनको लेकर, प्रथम, घी को कटाह में पिघला कर उसमे दोनो प्रकार के नख डाल देवें, फिर, ककेरक के पत्ते, फिर, यथाक्रम मुर्दासीगी, सिक्थ एवं बादाम की गुली डालकर इन सभी द्रव्यों को भूनले । तत्पश्चात् , कटाहगत औषधीय द्रव्यो को, एक दिवस भर, निंवकी स्थूल शाखा से हिलाते रहें। १-पेषणमपि लोहपात्र एव । २-'ककेडा' इति ख्यातस्य कण्ट किनोवृक्षविशेषस्य किसलयानि, प्रक्रिया चास्य दशवर्षोंषित पुराणघृत षट्तोलकं, तदर्धमानमितानि ककेरक- पत्राणि, नखद्वयं पृथग् द्विद्विमाषं, शिक्यमुर्दारे पृथाषिके, वादामगुलिकैकेति । प्रक्रिया च अधिक्टाहमधिशृते घृते पूर्व नखद्वयं, तत किसलयानि, ततो मुर्दारम् , अनु शिक्थं पश्चाद्वातामगुलिका निक्षिप्य भर्जयेत् , ततो निम्बकाष्ठेन तस्मिन्नेव कटाहे दिनमेकं विमर्य, पटपूत विधाय, नाडीव्रणे पूरयेत् , यच्च पटावलन कि भवेत् तद्न्थ्यादिलेपेऽवचरेत् ।
चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छ। ८ कूर्मकपालास्थिकृतं भस्म शिलायां विशिष्य घृतघृष्टम् । पूरयति गभीरमपि प्रसह्य नाडीव्रणं ब्रूमः ॥ १४॥ ९ जन्तुफलवल्कमध्यं कल्कीकृत्य किल सुरभिमूत्रेण । विधिद्वधान कोणं गम्भीराइएनाडिकाशान्त्यै ॥ १५ ॥ १० विरचय मलहरराज छोहाराभस्म सर्पिषाऽऽमर्थ । नाडी नश्यति निभृता तेन प्लोतप्रलिप्तेन ॥ १६ ॥ ११ धूमयन्त्रसमुच्छिष्टकांक्षीवातारिपल्लवैः । धूमयन्त्राम्बुना बद्धा वठ्यो नाडीवणापहाः ॥१७॥ इति नाडीव्रणचिकित्सितम् । - अथ भगन्दरंचिकित्सितम् । भगन्दरः प्रांशुविशीर्णकेशो विशिष्य हृन्नाभिविवन्धभीष्मः । महावलीवर्दघनोन्नतांसः पीठासनः पङ्गुररीन हिनस्तु ॥१॥ अंत में, वस्त्रपूत करके, इस विधि से सिद्ध इस द्रव - द्रव्य को नाडीव्रण में भरदें। वस्त्र-सलग्न किट का उपयोग ग्रथि आदि के प्रलेप मे करें। इससे नाडीव्रण नष्ट जाता है ॥ १३ ।। कूर्म के कपालास्थि की भस्म बना कर, शिलापर घी के साथ अच्छी तरह पीसलें। यह गहरे नाडीव्रण को भी सपूर्णतया भर देती है। हम प्रमाण हैं। ॥ १४ ॥ गोमूत्र से उदुम्बर की छाल का कल्क करके उसे थोडा घी में भून लेवें। इसे कवोपण करके व्रण पर वाघ देवें। यह गहरे तथा अदृष्ट नाडीव्रण को शमन कर देता है ॥ १५ ॥ छुहारे की भस्म को धृत से मर्दित करके 'मलहरराज' निर्माण करलें। इस मलहर से प्रलिप्त-प्लोत को व्रण पर बांधदें। इससे नाडीव्रण चुपचाप नष्ट हो जाता है ॥ १६ ॥ हुक्का का गुल, खरेंटी के बीज तथा एरंड के पत्ते इनको हुक्के के जल से पीसकर वटी बनालें । इस वटी से लिप्त प्लोत को बांधने से नाडीव्रण मिट जाता है ॥ १७ ॥ - नाडीव्रणचिकित्सा समाप्त - - भगन्दरचिकित्सा (कुल प्रयोग ३)- अस्तव्यस्त विखरे हुये दीर्घकेशों से युक्त, महाबलिष्ठ बैल के कठिन तथा उन्नत कुकुम के समान स्कंधवाला, हृदय तथा नाभि भाग के निबंध से अत्यंत भयंकर, पीठ पर आसीन, पंगु- भगंदर शत्रुओं का सहार करे ॥ १ ॥ १-गोमूत्रेण । २-गोमूत्रेण कल्कीकृत्य घृते मनाग्भर्जयित्वोपनह्यात् । ३-धूमयन्त्र- समुच्छिष्ट 'हुकागुल' इति प्रसिद्धम् । ४-बलाभेदस्य लौकिकसज्ञेयम् । ५-धूमयन्त्रजलेन घृष्ट्वा प्लोतद्वारोपयुक्ता । ६-नाडीव्रणस्यैव स्थानप्रभावाद्भगन्दरशब्दाभिधेयस्य स्वरूपवर्णन- पुर सरमुच्यते चिकित्सितम् ।
मिग्मेपनमणिमागयां [ गृहीत्वाऽध्यर्थमापं ने पथपतुन्यमुमोषणम् । चत्वारिंशत्फणिलतादलोहनरसः सह ॥ २ ॥ तावद्धि मर्दयेयावत् स रसः शुष्कतां प्रजेत् । सदुग्धाम्भोनुपानेन सार्धमापममुं रमम् ॥ १० ॥ गिलेदरदनस्पर्श प्रातः प्रातरिखवासम्म । नासाकोथोपदंशातिनाडीग्रन्थ्यनिलानितः ॥ ११ ॥ एवं कृतेऽपि चेजातु मुग्नपाकः समुद्भवेन । संघर्य तुत्यकथेला लालां मुञ्चेत मुग्याप्तये ॥ १२ ॥ चाहिये । भव मंदाग्नि से, दोला-गत रसकपूर को तय राक पकार र गफ भाग्टगत जल नि.शेप न हो जाये। इस तरह शुद्ध किये गये रमपूर में में मापा भर जिवना भाग लेकर उसमें, लविंग तथा मरिच प्रत्येक देश मापा, मिरा देयं । भय नागरदेवक चालीस पत्र - स्वरस से इनको एकत्र सरल में तब तक घोटने ही रहे जय तक यह रस सूस न जाये । इस रस को, प्रति प्रात काल, देठ मापा मात्रा में तीन दिवस पर्यंत, या जल के साथ, टांतो का इनको सर्श न हो इस तरह, निगीण करें। नामिफागत प्रण, उपदंश जन्य वेदना, नाडीव्रण, प्रथि, बात मादि से प्रग इसका पध्यपूर्वक सेवन करें। इस प्रयोग से कदाच कभी मुखपाक हो जाये तो मुह में नुत्य, फत्या तया इलायनी का चूर्ण लगाकर लालानाव करना चाहिये । इमरी स्वास्थ्य प्राप्ति होती है । (रमकपूरका दांतों से स्पर्श होनेपर दांत शीर्ण हो जाते हैं । मत रसकपूरको गले के मीयर वित करके पानी से नीचे उतार देना चाहिये । इसको निगीर्ण करने पर विरेचन होता है। रसकपूर का सेवन प्रमेह पिडिका तथा पीठगत गहरे रफोट में राभकारी है। इसके प्रयोग काल में गेहूं की चपाती, वाटी, मढ, यवागू, पीले, फुले मादि घृत तथा लाण से रहित, लेना चाहिये । भाट दिवस पीछे यथेच्छ मात्रा में घी का, पंढरह दिवस पीडे भत्यल्प सयेत् । ६-मरिचाभा । ७-कदलीफलकूष्माण्डौ, 'झालर' इति गुर्जरप्रसिधान्यं च । ८-यद्यप्याढकोक्तिस्तथाऽप्यत्र प्रस्थोत्तर आटक समत । ९-द्वादशयाम वेति विकल्पः। अत्रायं विचार -भाण्डान्तरसमृतं जलं यावता कालेन यत्रभाण्डे क्षयं मजेत्तावन्त कालं पचेदिति । १०-अत्रेदमवधेय-सुधासण्डविकाशसमसमयमेव भाण्डे रसगर्भादोलाऽवलम्ब- नीया, यद्वा रसगर्भदोलावलम्बनानन्तर सुधाखण्डानि विकाशयेदिति । १-पूर्वविधया शुद्धम् । २-अधिकण्ठमूलं रस क्षिप्वाऽनुपानेन गिलेदिति सप्रदाय.। गिलनानन्तर विरेको भविष्यतीत्यनुभव । ३-उपलक्षणत्वादस्य गम्भीरपृष्टस्फोटप्रमेहादि- पीडितोऽपि गिलेदिति । पथ्यमत्र गोधूमभवं पोलिकामारमण्डकधानायवागूसयावफुल्मापा- द्यन्यतमं, तच्चापि सर्वथा रूक्षमेव, का वार्ता पुनलवणलेशस्यापि । ततोऽटमदिनमारभ्य यथेच्छं घृत मनाक्सैन्धव च यावत्पक्ष शीलयेत्, पक्षादनन्तर गनै शनै सामुद्रलवणा- भ्यासो, मासानन्तरं शर्कराप्रभृतीनामभ्यास , ततो नियन्त्रणो यथेच्छ विहरेदिति । ४-तुत्थ च भृष्टं ग्राह्यम् ।
चतुर्थो गुच्छ । चिकित्सितम्] २८५ ४ त्रिशाणं रसकर्पूरं पृथळापत्रयोन्मितः । भद्रेलावीजकुसुमैरधिखल्वं प्रपेषितम् ॥ १३ ॥ मन्दाग्निना सगोदुग्धं ताने तात्रेण घर्षयेत् । तत्किदृघटिता वट्यो मुग्धाः सन्मुद्गमेदुराः ॥ १४ ॥ उपदंशमरुच्लेष्मकासश्वासोदव्यथाः। घ्रन्ति तैलादियोगेऽपि मुखपाकं न तन्वते ॥ १५ ॥ भङ्गाईमुद्गसूपौदि वस्तुजातं न भक्षयेत् । दुग्धं रसेन्दुघर्षार्थ कुडवं गुरुणोदितम् ॥ १६ ॥ ५ रसशीतनवसागरददानि पृथक् त्रिटङ्कतुलितानि । अधिडमरु समुड्डाय्य स्फीतमुपरिगं रजो गृहाण शनैः ॥ १७ ॥ शवशङ्गीकत्थैलास्तत्र प्रक्षिप पृथक् त्रिभिः कोलैः। पिष्टी चतुष्टयमिदं वारा वटिका बधान गुञ्जाभाः ॥ १८ ॥ मात्रा में सैधव का, तदनन्तर सामुद्र - लवण ग्रहण करना चाहिये। एकमास पीछे शर्करा का अभ्यास करना चाहिये। मासानन्तर फिर कोई नियन्त्रण नहीं)॥८-१२ ॥ रसकपूर नौ माषा, बडी इलायची, विहीदाना तथा लविंग प्रत्येक तीन माषा- इनको एकत्र खरल करलें। फिर इसे, तानपान मे, मदाग्निपूर्वक, गोदुग्ध से पकाते हुये ताम्र की कढछी से घिसते रहें। जब सब मिलकर किट्ट जैसे घह हो जायें, तब इस किह की मूंग जैसी गुटिकायें बांध लेवें। यह उपदंश, वातकफजन्य कास तथा श्वास, पावशूल आदि को नष्ट कर देती है। इसमे विशेषता यह है कि यदि इसके सेवनकाल मे कदाच तैलादि का योग हो भी गया हो तो उससे मुख -पाक नहीं होता। भांग, आईक, मुद्गसूप, त्रिकटु तथा तीक्ष्ण-द्रव्यो का सेवन वर्ण्य है। लाल मिर्च यथा प्रकृति ली जा सकती है । उपरोक्त प्रयोग में रसकपूर को घोटने के लिये दूध सोलह तोला ग्रहण करना चाहिये । यह रहस्य मुझे श्रीगुरुदेवने समझाया था ॥ १३-१६ ॥ रसकपूर, कपूर, नवसादर तथा शुद्ध हिगुल प्रत्येक करीब बारह माषा लेकर जोकुट करलें । (यहां, हंसपाद नामक उत्तम हिगुल को ही उपयोग में लेवें ।) इनमें एकवाल भर दाल-चिक्कण विष भी मिलादे । अब, इनको डमरुयत्र मे रखकर, सधिरोध करके, २३ मुहूर्त मध्यमाग्नि से उडाले । डमरु-यन के शिरोभाग को मा-वस्त्र-खंड से १-उदरव्यथाशब्देन पार्श्वशूलग्रहणम् । २-आदिशब्देन त्रिकटुप्रभृतीनि तीक्ष्ण- द्रव्याणि च न भक्षयेत् , पित्तकारिणी तु यथाप्रकृति भक्षयेत् । कि च यस्य पूर्व जातु रसकर्पूरसेवनान्मुखपाकादि जातं तस्मै इदमौषधं न देयमिति वृद्धवैद्यनियम । ३-दरद च हंसपाकाख्यमादेयम् , उत्तमत्वात् , एकवल्लमितमनुक्तमपि दालचिक्कण प्रक्षेप्यम् । ४-रस- कर्पूरादीनि यवस्थूलं क्षोदयित्वा यन्त्रे निधाय सधिरोध च विधाय सार्धमुहूर्तद्वयं मध्या- मिना समुड्डाययेत् , कि च यत्नशिरस्यालोत निदध्यादिति । ५-खाशशीतमिति शेप । ६-कथं धवलं लघु च परीक्ष्य प्राह्यम् । ७-द्वित्रियामम् ।
U २८६ सिद्धभेषजमणिमालायां [सौजाकोपदंश- एकामुषसि तथैकां गिल सायं पाथसा रदैः स्पृश मा । उपदंशमेहनाडीग्रन्थिमरुत्कुष्ठमण्डलक्षतये ॥ १९ ॥ गोधूमफुल्लिकाद्यान् सौम्यपदार्थान् घृतोत्तरान भुस । तैलाम्लपटुपलमधुप्रभृतीनि जहीहि तीक्ष्णवस्तूनि ॥ २० ॥ यदि हन्त मनागति वा वदनविपाकः कदाऽपि वाधेत । तर्हि सितोपलया सह सुखाय पिव तन्दुलीयमूलाम्भः ॥२१॥ ६ दरदं टङ्कणं रूक्षं प्रत्येकं खेटहेमकम् । बीजानि किञ्च मदनफलद्वितयजान्यपि ॥ २२ ॥ पृथक् पिष्ट्वाऽम्बुना कुर्याद्विनीय दश चक्रिकाः । तासु त्रिसन्ध्यमेकैकां धयेद् द्राग्धूमयन्तः ॥ २३ ॥ अशक्तो द्विः सकृद्वाऽपि धयेत् पथ्यी यथावलम् । समनन्तरमेवाशु विधीत विधामिमाम् ॥ २४ ॥ आच्छादित रखे । स्वांगशीतल होने पर यत्र के ऊपर के तल भाग में लगे हुये स्वच्छ- रज कणों को सावधानीपूर्वक धीरे धीरे एकत्रित करलें । मुरदासींगी, वजन मे हलका श्वेत- कत्था तथा इलायची प्रत्येक एक एक तोला लेकर इनके सूक्ष्म वन-पूत चूर्ण को, उपरोक्त यंत्र - सग्रहित रस - द्रव्य मे, मिला देवें। फिर, इनको दो तीन प्रहर पानी मे पीसकर गुंजा-तुल्य वटिकाये बनाले । एक वटी प्रात तथा एक सांझ के समय जल के साथ दातों का स्पर्श न हो इस तरह निगल जायें। इससे उपदंश, प्रमेह, नाडीव्रण, प्रथि, वात, कुष्ठ-समूह तथा तालुछिद्र, बहुमूत्रता, भगन्दर आदि विकार क्षीण हो जाते है । गोधूमफुल्लिका, मूंग का यूष, चूरमा, शर्करा, दूध, घृत आदि सौम्य पदार्थ पथ्य है । तैल, खटाई, मधु, कटाहसिद्ध - व्यंजन, चने, तावल, धान्य, जीरक प्रभृति तीक्ष्ण- उष्ण आहार तथा भातप, भ्रमण, विषाद, श्रम आदि विहार वर्ण्य है। कदाच , भधिक अथवा अल्प मुख-पाक, पीदा भादि उत्पन्न हो जाये तो तांदलजा के मूल -स्वरस में मिश्री मिलाकर पीना चाहिये । इससे सुख-स्वास्थ्य - लाभ होगा ॥ १७-२१ ॥ हिगुल, टंकण भौर मरिच प्रत्येक एक एक तोला, तथा दो तोलाभर मदन-फल मे से जितने बीज निकलें, उतने बीज, प्रथम, इन सबको अलग अलग पीसकर, फिर यथामात्रा जलके साथ, एकत्र खरल करके, इनकी दस टिकियाये बाधले। इनमें से एक एक टिकिया को हुके मे रखकर, दिवस मे तीन बार-सुबह, मध्याह्न तथा साझ, उसकी १-तालुच्छिद्रवहुमूत्रताभगन्दरादिष्वपि दीयते। २-मुद्गसूप-चूर्ण-शर्करा-दुग्ध-घृत भक्तादीन् । ३-कटाहसिद्धान्नचणकनागपर्णधान्यजीरकप्रभृतीनि, आतपनमणश्रमविषाद- प्रभृतीनि ताहशानि विहाराण्यापे । ४-तोलकमितम् । ५-अपिशब्दाद्वितोलकमितानामदन- फलाना यावन्ति बीजानि नि सरेयुस्तावन्ति सर्वाण्येवात्र ग्राह्याणीति मतान्तर गृहीतं भवति, साधीयश्चैद पूर्वमतापेक्षया। ६-सर्वाणि पृथक् पिष्वाऽधिखल्व समेल्य योग्येन जलेन चक्रिका कार्या । ७-तमं पिबेदित्यर्थ । ८–'हुक्का' इति प्रसिद्धान्मार्तिकात् ॥ - । चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छ.। पश्चप्रस्थैरपां कृत्वा गण्डूपान् किकिरातजम् । संचयं दन्तपवनं पुनर्गण्डूषकांश्चरेत् ॥ २५ ॥ पथ्यं गोधूमजं चूर्ण घृतं गव्यं च शर्करा । एवं कृतेऽपि चेजातु मुखपाको भवेत्तदा ॥ २६ ॥ सलिलैस्तुत्थमालोज्य गण्डूषान् सम्यगाचरेत् । हन्ति कण्ठस्रज दर्बु गम्भीरमुपदंशकम् ॥ ग्रन्थिवातं प्रयोगोऽयं नात्र कार्या विचारणा ॥ २७ ॥ ७ जाती जातीफलं कत्थं तुत्थं पुष्पं च कुडमम् । प्रत्येकं शाणिकानि स्युर्दरदं कोलसंसितम् ॥ २८ ॥ कस्तूरी सार्धमापैव क्रमुकद्वयकोकिलाः। लौहे लोहेन निम्बूकचतुण्यरसैदिनम् ॥ २९ ॥ संपिण्य वटकान् कुर्याद्धरिमन्थसहोदरान् । गिले द्विसन्ध्यमेकैकं प्रथमे तु दिनेऽम्भसा ॥ ३० ॥ ततो द्विसन्ध्यमेकैकवृद्धिः पञ्चदिनावधिः। अव्यक्तलवणं पथ्यमुपदंशी समभ्यसेत् ॥ ३१ ॥ धूम का पान करें। रोग से यदि अशक्ति आगयी हो, तो दो वार अथवा एक ही चार धूम-पान करें। धूम-पान के पश्चात् रुग्ण शीघ्र ही, विधिपूर्वक, करीब ३२० तोला जल से कुल्ले करके बबूल-शाखा को चबाकर दत-धावन करे । तत्पश्चात्, पूर्ववत् पुनः जल से कुल्ले करले। पथ्यरूप से नित्य गोधूम, शर्करा तथा गोघृत-प्रत्येक सोलह तोला लेकर, भोजन करे। इतना करने पर भी यदि मुख-पाक का शमन न हो तो फुलाये हुये तुत्थ को जल मे घोलकर उसके यथेच्छ कुल्ले करे। गंडमाल, ददु तथा गंभीर स्थिति को प्राप्त उपदश, प्रथिवात आदि को भी यह प्रयोग नष्ट कर देता है। इसमें जरा भी शंका नहीं करनी चाहिये ॥ २२-२७ ॥ जावित्री, जायफल, कत्था, फुलाया हुमा तुत्थ, लविंग तथा केसर प्रत्येक ३.३ माषा, हिगुल एक तोला, कस्तूरी डेढ माषा तथा दो सुपारीके कोयले इन सबका सूक्ष्म चूर्ण करके, निंबू के रस से, लोहेके खरल मे लोहे के दस्ते से, एक दिवसपर्यंत खूब घोटकर चने प्रमाण गोलियां बनालें। प्रथम दिवस, सुबह, सांझ एक एक वटी पानी के साथ निगल जायें। दूसरे दिन, दोनो बार एक एक वटी अधिक लेवें । इस १-किकिरातज दन्तपवनमिति सम्बन्ध । फिकिरातश्च बम्बूल । २-कुडव गोधू- मचूर्ण कुडवं घृतं कुडवा शर्करा चेति प्रतिदिनमवश्य भक्षयेत् , अन्यथा व्यापत्ति स्यात् । ३-गण्डमालाम् । ४-जातिपत्रिका । ५-मृष्टम् । ६-प्रारम्भदिने प्रात सायमेकैक पटक शीताम्भसा गिलेत् , द्वितीयदिमे द्विसध्यं द्वौ द्वौ, तृतीयदिने त्रीस्त्रीन् , चतुर्थे चतुरश्चतुर पक्षमे पञ्च पञ्च द्विसध्यं गिलेदित्यर्थ । । - २८८ सिद्धभेषजमणिमालाया [सौजाकोपदश- ८ कस्तूयी रक्तिकामेकां त्रुटेवाश्याः पिचुं पिचुम् । पिष्टा पटीरतैलेन वटीस्तिस्त्रः प्रकल्पयेत् ॥ ३२ ॥ एकस्मिन्नेव दिवले सन्ध्यासु तिसृपु क्रमात् । निगीर्य गीतसलिलशरावं प्रयतः पिवेत् ॥ ३३ ॥ उपदंशविशेषार्तिर्विशिष्य खलु नश्यति। वर्जयेहुग्धमधुरतलाम्ललवणादिकम् ॥ ३४ ॥ ९ भानुभागमयोवाणं सर्ज सागरभागिकम् । पिष्ट्वा पटीरतैलेन वटीः कल्पय माषिकाः ॥ ३५ ॥ दाडिमीशार्करेणैव प्रातः सायं सखे ! गिल । तेन ते हन्त सौजाकव्याधिः प्रशममेष्यति ॥ ३६॥ तैलालितीक्ष्णलवणदुग्धवृन्ताकमुत्त्यज । स्वामिना रघुनाथेन योगोऽयमुपढौकितः ॥ ३७ ॥ तरह पांच दिवस तक, दोनो बार एक एक वटी मात्रा बढाते हुये प्रयोग करें। लवणा- धिक्य रहित भोजनादि पथ्यपूर्वक लें। इससे उपदंश शमित होता है ॥२८-३१ ॥ कस्तूरी एक रत्ती, इलायची तथा वंशलोचन एक एक तोला (अथवा वंशलोचन आधा तोला) इन सबको एकन्न बारह माषा चदनतैल मे पीसकर वरावर वजन की तीन वटियां बनाले । अब, ब्रह्मचर्यपूर्वक अधिक भोजन न करते हुये, एक ही दिवस के तीनो सधिकाल में एक एक वटी को क्रमशः सकोरे में भरे हुये शीतल जल के साथ निगीर्ण करें। इसके प्रयोग से, विशेषतया सौजाकजन्य वेदना मिट जाती है। दूध, शर्करा, तैल, लवण, अम्ल, धूप, भ्रमण, मैथुन भादि सर्वथा वर्ण्य है ॥ ३२-३४ ॥ बारह माषा कोडिया लोबान तथा चार माषा सर्जरस दोनों को चंदनतैल में पीस कर एक एक माषा भर पदरह गोलियां बनाले (सोलह मापा द्रव्य मे से करीब एक माषा भर शिलादि से लगकर न्यून होजाने से कुल औषधीय-पिष्ट करीब १५ मापा ही रह जाता है।) इन गोलियो का दाडिमी-शार्कर-('शार्कर' निर्माण विधि 'ज्वर चिकित्सा के ४५ वें श्लोक मे देख ले।) के साथ सुबह साझ सेवन करने से, हे मित्र! भापकी सौजाक व्याधि प्रशमित हो जायेगी। तैल, अम्ल, लवण, दूध, वृन्ताक, गुड मादि को त्याग दें। यह प्रयोग मुझे स्वामी रघुनाथ ने अर्पण किया है ॥ ३५-३७ ॥ १-पिचुरत्र द्वादशमाषकः । २-अत्र तु तदर्धमानपरो विवक्षित । ३-चन्दन- तैलेन द्वादशमाषेणाथवा यावता गुट्य स्युस्तावन्मानेन । ४-ब्रह्मचारी भोजनालोलुपश्च । ५-सौजाकरोग । ६-आदिशब्दादातपाध्वादीना ग्रहणम् । ७-द्वादशमाषम् । ८-लोह- वाणनाम्ना प्रसिद्धम् । तच्च कोडियोपपदं ग्राह्यम् । तत्कृत्रिममपि भवति, तदनादेयम् । ९-चतुर्माषम् । १०-इति प्रमाणकथनेन पञ्चदशगुटिका भविष्यन्ति, एकमाषोन्मितद्रव्यस्य शिलालेपादिना व्ययितत्वात् । ११-गुडमपि । - चिकित्सितम् चतुर्थों गुच्छः। २८९ १० मायाफलानि त्रुटिकत्थवांगी पटीरतैलेन वटीविधाय । सिताद्भिरुष्णे, पयसा तु शीते गिलेद द्विसन्ध्यं चिरमुष्णवाती ॥३८ ॥ ११ भृरिमापं मलयज म कत्थौ तु माषको । क्षोदः सचन्दनस्नेहः शाणः सेव्यः सिताम्भसा ॥ ३९ ॥ अहो अहोभिर्नवभिः स्यादन्तरुपदंशजित् । प्राज्याज्या पोलिका पथ्या गोधूमचणकोद्भवा ॥ ४० ॥ १२ रसाञ्जनकाथपुराणपूगमायाफलानां विरचय्य चूर्णम् । गिलाङ्कमापं ज्वलदुष्णवाते सितासखीभिश्वणकत्वंगद्भिः ॥४१॥ १३ एकढवूकतः क्रीताः कोकिलाक्षास्तदर्धतः । अस्थिसंहारिको किच त्वगप्यत्र तदर्धतः ॥ ४२ ॥ ढबूकद्वन्द्वतश्चीणीशर्करेति कृतं रजः । सायं प्रातर्गिलेहुग्धैश्चतुर्दश दिनानि यः ॥ ४३ ॥ न तस्य जातु सौजाकः प्रकोपमुपगच्छति । विना तैलाम्ललवणं पथ्यमत्र प्रकीर्तितम् ॥ ४४॥ मांजूफल, इलायची, कत्था तथा वंशलोचन इनको लेकर चदनतैल से वटियां बांधलें । उष्णकाल मे मिश्री के शर्वत के साथ तथा शीतकाल मे दूध के साथ-दो बार नित्य दो वटी निगीर्ण करें। इससे जीर्ण उष्ण - वात शमन हो जाता है ॥३८॥ श्वेतचंदन चूर्ण चौवीस माषा, मांजूफल और कत्था प्रत्येक छह माषा, इनके चूर्ण को, एक तोला चदन तैल में मिलाकर, तीन माषा-मात्रा में, मिश्रीमिश्रित जल के साथ सेवन करें। हो! नवदिवस में ही (महोभि ) अन्तर्गत- उपदंश शांत हो जाता है । प्रचुरघृतयुक्त किंतु लवणरहित गेहूं और चने की चपाती, चूरमा भादि का भोजन इसमे पथ्य है ॥३९-४०॥ चने के तुप (फोलरा) से सिद्ध मिश्रीमिश्रित जल के साथ, अठारह दिवस पर्यंत, रसां- जन, कत्था, पुराणी सुपारी तथा माजूफल इनके चूर्ण की नौ माषा भर फांकी लेने से प्रज्वलित उप्णवात शांत हो जाता है ॥ ४१ ॥ एक ढब्बूक से जितने खरीद मे मिलें उतने प्रमाण मे तालमखाना, इनसे माधी मात्रा में मैदालकडी, इससे आधी मात्रा मे तज तथा दो ढब्बूक - मूल्य जितनी चीनी शक्कर इन सबका एकन चूर्ण बनालें। चौदह दिवस पर्यत दूध के साथ इस १-माजूफल' इति प्रसिद्धानि । २-गोदुग्धेन कोष्णेन धारोष्णेन वा । ३-चतु- विशतिमाषम् । ४-श्वेतचन्दनचूर्णम् । ५-मञ्ज मायाफलम् । ६-पृथक्षण्माषौ । ७-तोल- प्रमाणचन्दनतेलसहित । ८-अलवणेति शेष । ९-क्वाथशब्देनात्र कत्थम् । १०-नव- मापम् । ११-चणकतुपादि । चणकतुषाणि च जयपुरादिदेशे 'फोलरा' नाम्ना प्रसि- द्धानि । प्रयोगसेवा च वसुभूदिनानि । १२-अत्र-ढब्बूका दि मूल्यपर, न तु मानपरम् । १३-'मैदालकदी' इति प्रसिद्धा। सि० ०१७ ३९० सिद्धभेषजमणिमालायां [सौजाकोपदंश- १४ धौतानि माषविदलानि वसुप्रकुञ्चा- न्याभाशलाटुजरसेन विभावितानि । 'विल्वैः पृथब्युशलिकेचरवीजबन्धै- र्युक्तानि लोचनपलेन च सालिमेन ॥ ४५ ॥ मध्येघरट्टमधिकं मसृणीकृतानि निष्कत्रयत्रपुविभूतिविभासितानि । सेवेत तानि पयसा ससितेन मासं सौजाकमेहर्युगनस्यजबोधनानि ॥ ४६॥ १५ सहस्रवीर्या मुशली कवचं तोदरीक्षुरम् । प्रवालं रूप्यमेतेषां प्रत्येक सप्त माषकाः॥४७॥ विदारी द्राविडी कैण्टमभ्रं गद्याणसंमितम् । पीयूषसत्त्वममलं भद्रेला शाणमात्रया ॥४८॥ कतीरगुन्द्रकं मोर्चेश्चन्दनं माषकत्रयम् । सालिमाख्यं द्विगधाणं तत्समानं शिलाजतु ॥ ४९ ।। शीतलपाश्चि तीक्ष्णानि निर्यासः किं च शाल्मलः। स्यातामेकैकगद्याणौ वङ्गं कोलप्रमाणकम् ॥ ५० ॥ चूर्ण की, सुबह तथा सांझ को, फांकी लेनेसे, सौजाक कभी प्रकुपित नहीं होता। तैल, लवण, अम्लादि वर्जित भोजन यहां पथ्य माना गया है ॥ ४२-४४ ॥ पानी से धोकर स्वच्छ की गयी उडद की दाल बत्तीस तोला लेकर उसको बबूल के कच्चे फल रस की भावना देवें । श्वेतमूलवाली मुशली, तालमखाना तथा बीजबंध प्रत्येक चार तोला तथा सालिम आठ तोला प्रमाण में लेकर इनका सूक्ष्म चूर्ण बनालें । इस चूर्ण को उपरोक्त विधि से भावित उडद की दाल में मिलाकर शिलापर खूब बारीक पीस, उसमे तीन तोला बग भस्म मिला, मिश्री-मधुर-दुग्ध के साथ एक मास पर्यंत सेवन करें। चौसठ तोला शतशीत दूध मे बत्तीस तोला मिश्री मिलावें । यह योग सौजाक और प्रमेह को मिटाकर कामोद्दीपन करता है ॥ ४५-४६ ॥ शतावरी, मुशली कौच, तोंदरीसुर्ख, तालमखाना, प्रवालपिष्टी तथा रजतभस प्रत्येक सात माषा, विदारी- कंद, छोटी इलायची, गोखरू, मुस्ता, प्रत्येक छ माषा, गुडूची सत्व, बडी इलायची प्रत्येक तीन माषा, कतीरा गूद, सेमल, चदन प्रत्येक तीन माषा, सालिम बारह माषा १-आभा बम्बूल तस्यामफलिकारसेन । २-पृथक् पलप्रमाणैः । ३-श्वेतमूला ग्राह्या। ४-बीजबन्ध' इति लौकिकसज्ञेयम् । ५-द्विपलिकेन। ६-शाणत्रयोन्मितवङ्गभस्मसहि- तानि । ७-शृतशीतेन प्रस्थप्रमाणदुग्धेनाष्टाशसितासहितेन । ८-सौजाकमेहयुगिति कर्तृ- पदम् । ९-कामोद्दीपनानि । १०-शतावरी । ११-गोकण्टकम् । १२-अत्रापि प्रत्येकमिति सबध्यते । १३-गुडूचीसत्त्वम् । १४-मोचरस । १५-प्रत्येकं द्रव्यप्रधानत्वानिर्देशस्य । १६-शीतलमरिचानीत्यर्थ । म चतुर्थों गुच्छ.। २९१ चिकित्सितम्] सितोपलायाः कुडवचूर्णमेषां प्रदापयेत् । सौजाकपित्तमेहातौ दाडिमीशार्करादिभिः ॥५१॥ वांगी विरोजसः सत्त्वं रालः कहरवाभिधम् । अनुक्तान्यपि चूर्णेऽस्मिन्नाक्षिकाणि विनिक्षिपेत् ॥ ५२ ॥ १६ रालामकृष्णनिर्यासाः स्युरष्टादशभागिकाः। वंशजा जीरयुगलं प्रत्येक नवभागिकम् ॥ ५३ ॥ द्राविड्यो विंशतिः सिहृसत्त्वं द्वादशभागिकम् । शर्करा षष्टिभागा स्यात् सर्वमेकत्र चूर्णयेत् ॥ ५४ ॥ चूर्णमेतत् पिचून्मानमजादुग्धानुपानतः । सौजाकं साधु जयति तैलाम्ललवणत्यजाम् ॥ ५५ ॥ १७ गद्याणतुलिता वांगी त्रुटिवंशजया समा। त्वचस्तु नव गद्याणाः सिताया द्वादशैव ते ॥५६॥ गद्याणौ कलसोरादौ सर्वमेकत्र चूर्णयेत् । पुंट्यः पञ्चदशैव स्युरेकैकामिति योजयेत् ॥ ५७ ॥ और इतने ही प्रमाण मे शिलाजीत, शीतल मिर्च, शाल्मली निर्यास (मोचरस) प्रत्येक छह माषा, वगभस्म एक तोला, मिश्री सोलह तोला-इन सभी औषधीय द्रव्यों का सूक्ष्म चूर्ण बनाले । सौजाक तथा पित्तज - प्रमेह से पीडित को, यह चूर्ण 'दाडिमी- शार्कर' के साथ सेवन करायें। वशलोचन, गधाविरोजा तथा कहरवा पिष्टी ये गन्य इस योग में अनुक्क हैं तथापि इनके एक एक तोले भर चूर्ण को भी उपरोक्त चूर्ण में मिला लेवें ॥ ४७-५२ ॥ राल, घीयाभाटा (घृताश्म), कूटशाल्मली का निर्यास प्रत्येक अठारह भाग, वंशलोचन तथा दोनो प्रकारके जीरे प्रत्येक नौ भाग, स्थूल इलायची नग वीस बिरोजा का सत्व बारह भाग, शर्करा साठ भाग-इन सबका एकत्र चूर्ण बनालें। इस चूर्ण को, दो तोला माषा में मजा - दूध के साथ सेवन करें। यह सौजाक का पूर्णतया शमन कर देता है । तैल, अम्ल, लवग, प्रभृति अपथ्य है ॥ ५३-५५ ॥ वंशलोचन छह माषा, इतनी ही मात्रा में छोटी इलायची, तज चौपन मापा, मिश्री ७२ माषा, कलमी सोरा बारह माषा-इनका एकत्र वस्त्र-पूत चूर्ण करले। इनकी पढरह पुडियां (Doses ) बनाये। एक एक पुडी को, प्रात तीन पतासे के चूर्ण से युक्त लस्सी के साथ तथा, एक पुडी को, साझ के समय, शीतल जल के साथ लेवें । लवण, मम्ल, १-'गंधा बेरजा' इति प्रसिद्धनिर्यासस्य सत्त्वम् । २-अनेनव नाना प्रसिद्धस्तृण- प्राही निर्यासविशेप , 'रत्नमेद ' इति केचित् । ३-अश्मशब्देन घृताश्मा 'घाईभाटा' इति ख्यात । ४-कृष्णनिर्यास शाल्मलीगुन्द्र । ५-एला । ६-विरोजस सत्त्वम् । ७-मात्राविशेषा । १ . २९४ सिद्धभेषजमणिमालायां [सौजाकोपर्दश- २६ कर्ष निरस्थि खर्जूरं तत्प्रमाणा मृकण्डजा। कर्षा, शवपाषाण चूर्ण स्यादुपदंशनुत् ॥ ७२ ॥ २७ कत्थमुर्दारतुत्थानि तुल्यान्येरण्डपर्णतः। पयस्यावर्तनात् सान्द्रे कांस्ये कांस्येन धर्पयेत् ॥ ७३ ॥ त्रिचतुस्तोलसमिताफुल्लिकाभक्षणादनु । पर्णेन भक्षयन्मापमुपदंशाद्विमुच्यते ॥ ७४ ॥ यामा द्वादश संघर्षः प्लावनार्ह घनं पयः । वर्जयित्वा पयोमुद्गौ पथ्यमत्र प्रचक्ष्महे ॥ ७५ ॥ २८ हेमारांपादस्खण्डानि पिष्ट्वा त्रीण्यूपणैत्रिभिः । पाथःपलेन विनान्य पिबेत् प्रातस्त्रिवासरम् ॥ ७६ ॥ योगराशेष सौजाकमपि हन्यात्रिवार्षिकम् । पथ्यं विलवणा पूरी दुग्धं सप्तदिनावधि ॥ ७७ ॥ अष्टमेऽहनि वृन्ताक स्वच्छन्दमुपशीलयेत् । यदि स्यात् पुनरुद्भेदो योगं पूर्ववर्तीयसेत् ॥ ७८ ॥ एक तोला लेकर, जलके साथ सात दिवस पीने से उपदंश शांत होता है ॥ ७१ ॥ गुठली रहित खजूर तथा सनाय प्रत्येक एक तोला, आधा तोला मुर्दार, इनका चूर्ण उपदश को दूर करता है । चूर्ण की मात्रा पांच से छह मापा है । प्रात., शीतल जल के साथ लेना चाहिये । घृत, लवण, गेहू के फूले तथा उडद की दाल पथ्य है । उढद की दाल में भनुत्कट लवणादि निर्भयरूप से सेवन कराये जा सकते है ।। ७० ॥ एररुपन्न तथा समान वजन मे कत्था, मुर्दार और तुत्थ-सव को एकत्र लेकर चूर्ण बनालें। इस चूर्ण को दूध मे खूय मसलकर, फिर कांस्य - पात्र मे कास्य दंड या कटोरी के पैंदे से इसको घिसें । भव, तीन चार तोला गोधूम के फूले खा लेने के उपरांत उपरोक्त औषधीय द्रव्य को नागरवेल पान के साथ सेवन करें । उपदंश से छुटकारा मिलता है। बारह प्रहर तक घर्षण करने से जब दूध घट्ट बन जाये, तब इसको लेना चाहिये। दूध तथा मुद्ग, उपदश मे पथ्य माने गये है, कितु उपरोक्त प्रयोगकाल मे, ये अपथ्य है। इन दो के अतिरिक्त, अन्य व्यजन पथ्य कहे गये हैं ॥७३-७५॥ स्वर्णक्षीरी मूल के तीन टुकडो को तीन मरिच के साथ पीसलें, फिर एक तोला जल मे घोल छानकर, प्रतिदिन, प्रात , तीन दिवस तक पीये। यह ‘योगराष्ट्र तीन वर्ष पुराणे सुजाक को भी मिटा देता है । औषधप्रयोग के दिवस से, प्रथम सात दिवस लवण रहित पूरी और दूध का ही भोजन करे । भाठवें दिवस से वृन्ताक का १-कर्षोऽत्र द्वादशमाषको विवक्षित । २-खर्जूर 'छोहारा' इति, ख्यातफलम् । ३-मात्राऽस्य पञ्चषण्माषिका प्रातर्देया शिशिराम्भसा । पथ्यमत्र सघृतलवणगोधूमफुल्लिका माषसूपोऽपि, माषसूपे लवणादिकमनुस्ट नि सशयं देयमित्याज्ञा । ४-स्पष्टमिदम् । ५-हेमाह्वा स्वर्णक्षीरी, तस्या मूलशकलानि । ६-सौजाक्स्येति शेषः । .
२९५ चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छ.। २९ वदरीमूलविभूति तैलनाविणि रसालसंधाने । उपयुज्याम्बु पिवेदनु शिशिरं तीव्रान्तरोपदंशातौ ॥ ७९ ॥ ३० माकन्दचर्मकैल्कं पयसा संगाल्य शर्करामधुरम् । सौजाकजन्यशुक्रक्षरणक्षपणाय पिव पक्षम् ॥ ८० ॥ ३१ प्रातः पिबेदाडिमवल्कफाण्टकं सौजाकवान कर्करशर्करासखम् । निधेहि नीरे कुडवे द्विकर्ष वल्कं प्रकुञ्च क्षिप शर्करायाः ॥ ८१ ॥ ३२ सहस्रद्रुच्छदानव्यान् पिष्ट्वा विरलवेल्लजान् । पिवन्तु लुलितानद्भिः सौजाकरुधिराशंसोः ॥ ८२ ॥ ३३ जलं जपागोक्षुरयोः सपर्णया विलोलयेदन्यतरस्य शाखया। यदा भवेन्मन्ददधीव तच्छृथं तदा निपीतं स्मृतमुष्णवातनुत् ॥ ८३॥ शाक यथेच्छ खायें। कदाचित् सुजाक पुन उत्पन्न हो तो उपरोक्त 'योगराट्' का पुन, प्रयोग करें ॥ ७६-७८॥ बदरीमूल - त्वक् की भस्म को तैल से प्लावित आम के आचार के साथ लेकर ऊपर से शीतल जल पीयें। इससे अन्त उपदशजन्य वेदना शांत हो जाती है। यह कण्ठीरव' श्रीकृष्णराम गुरुमहोदय की कठोक्ति (व्यक्तिगत -प्रामाण्य) है। इसमें संशय न करे। क्योकि तैलाम्ल वर्जन इस रोग में पथ्य माना जाता है और यहां तैलमय पदार्थ लेने की अनुज्ञा है। इतना ही नहीं, उसपर शीतल जल के भनुपान की भी 11॥ ७९ ॥ मान वृक्ष की अन्तछाल छह माषा लेकर उसका कल्क बनालें। इस कल्क को धारोष्ण दूध मे घोल कर वस्त्रपूत कर ले। दूध को दो तोला करकर- शक्कर से मधुर बना, एक पक्ष पयंत, सौजाफजन्य शुक्रस्राव को बद करने के लिये पीये। ।। ८० ।। सौजाक पीडित रुग्ण प्रात काल, करकर -खाड से युक्त, दाडिम - त्वक् के फाण्ट का पान करे । यहा दाडिम- त्वक् दो तोला लेकर, साझ को सोलह तोला पानी मे भिगो देवें । करकर-खाड भी चार तोला साथ ही मे मिलादे । यह फाण्ट तीन दिवस पर्यंत पीना चाहिये ॥ ८१ ॥ गुलहजारा की नूतन पत्तियो को थोडे मरिच के दानों के साथ पीसले । फिर, इनको जल मे घोलकर, सौजाक तथा रक्तार्श में इसका पान करें ॥ ८२ ॥ जपापुष्प अथवा गोखरू इनमे से किसी एक की सपत्र-शाखा द्वारा पानी को खूब हिलायें। इस तरह हिलाते हिलाते जब पानी अर्ध जमे हुये दही जैसा श्लथगाढा हो जावे तब उसको पीजाने से उष्णवात शांत हो जाता है।। ८३॥ १-अत्र तु तैलाम्लानुपानस्य कण्ठरवोक्त सशयो न कार्य , पथ्यं तु तैलाम्लवर्ज- मेवोपदेशविरोधात् । २-आम्रवृक्षस्यान्तरा वग्गद्याणमिता। ३-कुडवमितेन सद्योदुग्धेन । १४-शर्कराया मान द्वित्रितोलकम् । ५-'कडकड खाड' इति लोकप्रसिद्धि । ६-साय वत्क मनाक् सक्षुद्य सशर्करं मृत्पात्रे यथोक्तजले मजयित्वा प्रात प्रमृद्य पटपूत पिवेत् त्र्यहम् । ७-लोके 'हजारा' इति नानोपवनेषु प्रसिद्ध पीतपुष्प क्षुपक , तत्किसलयानि । ८-औद्रम् । यच्च ‘भोडल' इति मध्यदेशे, 'जासूदी' इति गुर्जरे पसिद्धम् ॥ - २९६ सिद्धभेपजमणिमालायां [सौजाकोपदंश- ३४ करीरपदकोकिली मृदुविरेचिनी शर्करा प्रकुश्चयुगयोजिता भुवनभेजं पोडेशी । पिचुत्रितयमूपणं सलिलमेभिरुद्वासित दलावधि पिपासिताञ्चुलुकयन्तु सौजाकिनः ॥ ८४ ।। ३५ कुष्ठजीरगुडैर्गुट्यो गीर्णाः सौजाकनाशनाः । ३६ किं वा केवलकुष्ठस्य धूमः पीतस्तदर्थकृत् ॥ ८५ ॥ ३७ प्रव्यक्तरक्तोष्णसमीरदूनाः पक्त्वा सिताम्भोभिरदन्तु पोलीम् । कर्के सधान्येश्वरवोलवारिण्युपस्थमस्वस्थदशं दिशन्तु ॥ ८६ ॥ ३८ विरोजसं शैलरजोविमिश्रितं निधाय यन्त्रे डमरुण्यरन्ध्रके। मन्दाग्निना तैलवरं समुद्धरेत्तद्विन्दवो नन्त्युपदर्शमान्तरम् ॥ ८७ ॥ ३९ पादोनशाणिकं खण्डं तावती स्फटिका स्फुटा। लसीकया पिबेत् प्रातः सौजाके लिङ्गरेकदम् ॥ ८८ ॥ करीरमूल को जलाकर किये गये कोयले, सनाय और शर्करा प्रत्येक दश रुपये भार, सूठ चार तोला, मरिच तीन तोला- इनको एकत्र पोटली में बाधकर, ६४० तोला जल मे भिगोकर रखदें। अब, पदरह दिवस पर्यंत, सौजाक -पीडित को तृषा लगनेपर, यही पानी पिलाते रहे। भाठ दिवस पीछे पोटली बदल देनी चाहिये अर्थात् नूतन पोटली रखनी चाहिये तथा लवणादिसे परहेज रखना चाहिये ॥ ८४ ॥ कूठ, जीरा और गुड इनकी गोलिया बना जल के साथ निगीर्ण करने से सौजाक शात होता है । अथवा, केवल कूठ का धूम पीने से उपरोक्त अर्थ सिद्ध हो जाता है ।। ८५ ॥ उष्णवात से पीडितो को, शक्कर - मिश्रित जल से बनायीं गयी गेहू के आटे की रोटियां खानी चाहिये। धनियां एव ईशबगुल से उद्वासित-जल पूर्ण - मृत्पात्र मे अपने अस्वस्थ- उपस्थ को मग्न करना चाहिये ॥ ८६ ॥ अतिसूक्ष्म रध्रवाले डमरु-यंत्र मे गधाविरोजा को कंकरीली रेती मे मिलाकर भरदे । फिर, मदाग्नि से तैल निकाल लेवें। इस तैल को लगाने से अंत. - उपदंश नष्ट हो जाते है। इसी तैल को कान मे डालने से कर्णशूल खावादि भी शांत होते है ॥ ८७ ॥ करीब अठारह रत्ती शक्कर, इतनी ही मात्रा में भृष्टस्फटी-दोनों को मिलाकर प्रातः लस्सी के साथ पीने से सुजाकस्थिति मे मूत्रविरेक १-मस्तुमूलकोकिलानि । २-मार्कण्डी । :-पृथक् द्विपला। अत्र पलशब्देन रूप्यकपञ्चकमभिप्रेत, तेन दशरूप्यकमिता प्रत्येकं ग्राह्या । ४-शुण्ठी । ५-पलम् । ६-दशप्रथमितं जलम् । ७-पोडलिकाबद्धरिति शेष । ८-पञ्चदशदिनावधि । ९-पिबन्तु । १०-सौजाकिभिलवणादि त्याज्यम् । अत्राष्टाहात् पोट्टलिका परिवर्तनीयेति रहस्यम् । ११-उष्णवात । १२-निमजयन्तु इत्यर्थ । १३-बिरोजसस्तैलनिष्कासनविधिरयम् । १४-शैलप्रान्तभूमिभवा कर्करिकाप्राया शर्करामृत् । १५-अत्रेषदर्थे नत्र, तेन सूक्ष्मरन्ध्रे इति प्रतिपादित भवति, अन्यथा तैल कुतश्श्योतेत् । १६-उपदशमित्युपलक्षणं, तेन कर्णपूरणात् कर्णशलस्रावादिष्वपि योज्यम् । १७-मूत्ररेकप्रकारोऽयम् । .
. चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छ.। २९७ ४० सितामुष्टिलसीकायाः पात्रं पिचु मिपित्रुटि । शतमावर्त्य पुरतः पेयं वस्तिविशोधनम् ॥ ८९ ॥ ४१ दृक्सिन्धुदमजलैः समुद्रशरमापसौधजलकलितैः । दत्तत्रिमापतुत्थैः क्षालनमुपदंशमुपहन्ति ॥ ९० ॥ ४२ कोलिमूलत्वचा प्रस्थं यार्सेकेऽपां शनैः पचेत् । काथेनार्धावशिऐन क्षालयेल्लिङ्गगान् व्रणान् ।। ९१ ॥ ४३ सितकर्जलतः कर्प हिङ्गुलं मापपञ्चकम् । कपूर शाणिकं धौतहविपा मेसृणीकृतम् ॥ ९२ ॥ लेपयेच्छनकैविप्वग्वित्रिवारं प्रयत्नतः। शाम्यन्ति तेन तत्रत्या व्रणा दाहोत्तरातयः ॥ ९३ ॥ ४४ शीतलमरिचद्वितयं त्रुटिरेका वल्लसंमितं तुत्थम् । शतधौते नवनीते विनीय लिङ्गं समालिम्प ।। ९४ ॥ ४५ शवाश्मरालतुत्थानि तैलपृक्तानि वारिभिः । शतधौतानि लेपेन विनिघ्नन्त्युपदंशकम् ॥ ९५ ॥ होता है । ८८ ॥ मिश्री चार तोला, लस्सी २५६ तोला, सौंफ और इलायची एक तोला इनको सोवार हिलाकर पीजायें। यह पेय बस्तिको शुद्ध करता है ॥ ८९ ॥ बेतालीस कलदार रुपयाभार जल में, विगलित सुधाखंड के उपरि-भाग-गत, पिस्तालीस- मापा स्वच्छ जल मिलादें। यहां कुछ पुराणे सुधा-खंडोका उपयोग करें। फिर, इसमें तीन मापा प्रमाण में तुत्थचूर्ण डालकर उपरोक्त जल- द्वय में अच्छी तरह मिला लेवें । इस जलद्वारा प्रक्षालन करने से उपदंश तथा व्रणादि शात हो जाते है ॥ ९० ॥ बोर झडी (बदरी-मूल-स्वा) चौसठ तोला लेकर उसे ५१२ तोले पानी में उकालें । अर्धावटोप रहनेपर उतारलें । इससे उपस्थ- गत व्रणो को धोने से उनका शमन होता है ॥ ९१ ॥ कासगरी सफेदा एक तोला, हिगुल पांच मापा तथा कपूर तीन माषा इनमें घृत मिलाकर पीछे कांस्य - पात्र में अनेक बार धोकर मुलायम बनालें। फिर, इसको धीरे धीरे यलपूर्वक दो तीन वार, चारो ओर प्रलेप करें। इससे उपदंश-व्रण तथा दाहजन्य वेदना शांत हो जाती है ।। ९२-९३ ॥ दो शीतल मरिच, एक इलायची, एक वाल-तुत्थ इनको नवनीत से कांस्य - पात्र में शतवार प्रक्षालित करे। फिर, निव की शाखा से लिंगपर लेप करे ।। ९४ ॥ मुर्दार, राल, तुत्थ इनको तैल मे सिक्त करके १-आढकम् । २-पिचुरत्र तोलकपर । ३-प्रथमम् । ४-द्विचत्वारिंशत्कलदाररूप्य- प्रमितजलै । ५-चतु पश्चागन्माषतुलितकलिकोपरिस्थाच्छजलकलितै । जल च पुराणकलि- कोत्थं ग्राह्यम् । ६-व्रणसामान्यमपि । ७-बदरीमूलवल्कलानां लोके वोरझडी' इति प्रसिद्धा- नाम् । ८-'कासगरी सफेदा' इति लोकख्यातात् । ९-कास्यपात्रे इति शेष । घृतेनौषधं समेल्य पश्चाजलेन बहुश प्रक्षालयेदिति । १०-आकृतिमानादेव ग्रहणम् । एवं त्रुटेरपि । ११-पञ्चतोलकमिते । १२-निम्बकाष्ठशलाकयेति शेष । १३-लेप कृत्वा पट्ट वनीयात् । - २९८ सिद्धभेषजमणिमालायां [साँजाकोपदंश- ४६ क्षीरिणीच्छत्रभसितमायागैरिकैकत्थकम् । गलवंशदलाम्भोभिरधितानं विमर्दयेत् ॥ ९६ ॥ अस्य प्रलेपमात्रेण दाहार्तिश्वयथूत्तराः। उपदंशव्रणा घोराः प्रणश्यन्ति न संशयः ॥ ९७ ।। ४७ प्रशमयति तन्दुलीयस्वर्णच्छदकल्पितः कल्कः । पिडिकामुपस्थजातां दवोल्वणां पट्टखण्डसंनद्धः॥९८ ॥ ४८ पोदीफॅणिजौ रसमाईको पृथक् पलं सिताया मरिचानि विंशतिः । प्रपिष्य चन्द्रोडुहिमेन वारिणा निर्माल्य कल्ये पिव पारदार्तिपु ॥९९ ॥ ४९ हंसराजतृणं किंच कुङ्कुम जातिपत्रिकाम् । पिष्वाऽम्भसा वटीः कुर्यात् प्रस्रवद्णशोपिणीः ॥ १०० ॥ इति सौजाकोपदंशचिकित्सा । - १ शतवार प्रक्षालित करले। इसके लेप से उपदंश शांत हो जाता है । प्रलेपोपरांत, पट्टी वांध देनी चाहिये ॥ ९५॥ खिरणीपर उत्पन्न छत्रक को छायाशुष्क करके उसकी भस्म बनालें । माजूफल, गैरिक, श्वेतकत्था तथा छत्रक की भस्म इनको एकत्र लेकर, गुलैवांस के पत्र- स्वरस से, ताम्रपान में मर्दन करें। इसके लेपमात्र से उपदंश के घोर व्रण तथा तजन्य दाह, वेदना, श्वयथु आदि प्रनष्ट हो जाते है इसमे सशय नहीं ॥ ९६-९७ ॥ तादलजा तथा धत्तूरा इनके पत्तो का कल्क बनाले । इस कल्क को पट्टी से युक्ति- पूर्वक बाध दें। इससे दाहातिशययुक्त उपस्थ - पिटिकाये प्रशमित हो जाती हे ॥१८॥ पोदीना तथा मरवा प्रत्येक छह मापा, मिश्री चार तोला, मरिच नग वीस इनको एकत्र पीसकर 'चंद्र - नक्षत्र' से शीतल जल में घोल, वस्त्रपूत करके पीये । इसका प्रयोग, अशुद्ध रसकपूर, हिगुल, पारद आदि के भक्षण से, अथवा दुराचरण से उत्पन्न विकृति में, परम प्रशस्त है ॥९९॥ हसराजतृण, केसर तथा जावित्री इनकी, पानी मे घोटकर, वटिया बनालें । यह वटिया, असम्यक् -मारित धातुके सेवन से उत्पन्न स्रावयुक्त व्रणो का, अथवा दोषजन्य स्रावसह व्रणो का शोषण करके उन्हे सुखा देती है ॥ १०॥ - सौजाक उपदश चिकित्सा समाप्त - १-'विरणी' इति प्रसिद्धपादपोत्पन्नं शिलीन्धं शुष्कं कृत्वा भस्म कार्यम् । २-माया- फलानि । ३-सुवर्णगैरिकम् । ४-धवलकत्थम् । ५-'गुलैवास' इति प्रसिद्धस्य पत्रखरसै । ६-तन्दुलीय वत्तूरदलकल्पित । ७-रसकर्पूरहरितालपारदभक्षणाद्दुरवचारितादुत्पन्नाया विकृताधय प्रयोग इध्यते । पोदी 'पोदीना' इति प्रसिद्ध । फणिजो मरुवक. 'मरवा' इति ख्यात । ८-पण्माषिको पृथक् । ९-प्रात काले । १०-असम्यमारितधातुजन्यस्रवद्ण- -शोषिणीर्दोषव्रणशोपिणीश्च ॥ -- कुष्ठरोगचिकित्सितम्। १ साधितं वालुकायन्त्रे तृणप्रज्वलनावधि । तुत्थं निहन्ति पर्णेन कुष्ठमुत्थं समग्रशः ॥१॥ २ ऐन्द्रासनं रजो लेह्य हविषा मधुसंयुजा। अशेषकुष्ठशमनं नास्त्यतः परमौषधम् ॥२॥ ३ पालाशवीजगन्धानीन् दुग्धे संस्वेद्य निर्भरम् । विशोष्य साधु संचूर्ण्य चालयेत् सूक्ष्मवाससा ॥ ३ ॥ तचूर्ण मापयुगलं जलेन सह साधितम् । निहन्ति मण्डल कुष्ठं मासमात्रप्रयोगतः ॥४॥ ४ संभाव्य देवदाली सौधाकैः सप्तधा पृथदुग्धैः । कुष्ठेपु वल्लमानां पिव पयसा त्यज पटुप्रभृतीन् ॥ ५॥ ५ आणि निम्बपर्णानि गिलेत् प्रातर्हिमाम्बुभिः । मासमात्रप्रयोगेण कुष्ठं हन्त्यहितत्यजाम् ॥ ६ ॥ ६ द्विपलं निवज कल्कं प्रत्यूषे गिलतां नृणाम् । प्रभिन्नमपि वातास्रं व्येति पथ्यघृताशिनाम् ॥ ७ ॥ - कुष्ठरोग चिकित्सा (कुल प्रयोग ३५)- तुत्थ को वालुकायंत्र में अथवा सपुट मे रखकर, तृण प्रज्वलित रहे तब तक अग्नि देकर सिद्ध करले । फिर, एक चावल जितनी मात्रा मे पान के साथ इसको लेने से समग्र शरीर में व्याप्त कुष्ठ नष्ट हो जाता है ॥ १ ॥ भगा के चूर्ण को मधु तथा धृत के साथ दीर्घकाल तक लेने से, समय कुष्ठ शात हो जाते है । कुष्ट की इससे अधिक उत्तम अन्य औषधि नहीं है ॥ २ ॥ पलाशबीज, गधक तथा चित्रक इनको दूध में यथेच्छ उकाल लेवें। फिर इनको सुखाकर वस्त्रपूत चूर्ण बनाले । इस चूर्ण को दो मापा भर मात्रा में पानी के साथ एक मास पर्यंत लेने से मडल कुष्ठ प्रशमित हो जाता है ॥ ३-४ ॥ देवदाली के फल को सुधाजल की तथा अर्कदूध की पृथक पृथक् सात भावनाये देवें । कुष्ठ - विकारो मे दूध के साथ इसकी एक वालभर मात्रा लेवें । प्रयोगकाल मे लवणाम्ल प्रभृति को त्याग दें ॥५॥ निब की ताजा माई कोपलों को, प्रात. शीतल जलानुपानसह, एकमासपर्यत, पथ्यपूर्वक लेने से, कुष्ठ शात हो जाते है ॥ ६॥ निंब की आठ तोला नूतन कोपलो के कल्क को प्रात सेवन करने से, तथा १-अधुना क्रमप्राप्त कुष्ठरोगचिकित्सितमभिधीयते । २-तुत्यखण्ड केवल सपुटस्थ वा चालुकान्त सावयेदिति । मात्रा चास्य तन्दुलोन्माना। ३-भङ्गोइव चूर्ण चिराभ्यासात् फलदम् । ४-पालाशबीजगन्धकचित्रकान् । ५-'वन्दाल' इति ख्याता काचिद्वली, तस्या फलम् । ६-कर्पप्रमाणानि । ७-गुडतैलदुग्धादीन्यहितानि त्यजन्ति तच्छीलानाम् । ८-निम्नसवर्ति काजम् । ९-तैलाम्लादिवर्ज घृत कुडवमितं प्रत्यहं पथ्ये प्राश्यम् । - पुटरोग- . सिदभेपजमणिमालाया ७ तिक्तभृगमरुदल्लीरसो निम्बमदान्वयः। सक्षौद्रोऽष्टाहमध्युप्णं सिद्धः कुष्टानसूदनः ॥ ८॥ ८ तोलद्वयं सिताया जुड्यास्तोलो निशाऽर्धतोलेव । मरिचानि निशार्धानि प्रत्येक सर्वमेतदापिय ॥९॥ पाणी यथोपदेशं प्रकल्प्य कल्ये गिलेद्दिनः पद्भिः । हिममम्बु पिबेच्चानु अपणाय प्रदुष्टरक्तस्य ॥ १० ॥ ९ सिताप्रयोगान्मधुरीकृतं मनाग्जीरप्रयोगात् सुरभीकृतं पुनः । रसं पलाण्डोः पलसंमितं प्रगे पिवन्तु पामान्यथमानपाणयः॥ ११ ॥ १० वदराशिवल्कलजनुपि शिशिरशते तंन्दुलानि संसाध्य । गव्यधृतशर्कराभ्यां हन्युर्भुक्तानि पामातिम् ॥ १२ ॥ ११ प्रपिष्य गन्धममलसारभिन्नं भिपग्वरः। दद्यात् क्षौद्रेण शाणाध कण्डूपामादिरोगिणे ॥ १३ ॥ पथ्यरूप मे तैलाम्लादि के त्यागपूर्वक, सोलह तोले घी का पध्यरूप से प्रतिदिन भोजन करते हुये, प्रवृद्ध वात-रक्त भी शमित होता है ॥ ७ ॥ चिरायता, भुंगराज तथा अमरवेल इनके प्रत्येक के बत्तीस तोला स्वरस में, करीव यत्तीस तोला निव-मद मिलावें । फिर, बत्तीस तोला शहद के साथ इनको एक काच-कुपी में भरकर सूर्य के ताप मे अठारह दिवस पर्यंत रहने दें। यह सिद्ध-रसायन कुष्ठ तथा रक्त-पित्त का नाश कर देता है । इसकी मात्रा चार तोला भर है । नमकरहित केवल चने के आटे की रोटियो के अतिरिक्त अन्य सभी पदार्थ वर्ण्य है ॥ ८॥ मिश्री दो तोला, मजिष्ठा एक तोला, हरिद्रा अर्ध तोला, मरिच तीन मापा इन प्रत्येक को एकत्र पीस लें। इसके चूर्ण को, हस्त-तल मे रखकर, षड् - दिवस पर्यंत नियमित फाक जायें। ऊपर से शीतल जल पीयें। इससे रक्त -दुष्टिजन्य पामा का क्षय हो जाता है ॥ ९-१० ॥ प्रथम मिश्री मिलाकर मधुर किया गये, फिर, जीरक-चूर्ण से सुगंधित बनाये गये पलाण्डुरस को, पामापीडित पुरुप, एक पलमात्रा में, प्रात काल पीयें ॥ ११ ॥ वटरी मूल-त्वक् के, अनग्नि-सिद्ध हिम-कपाय से चावलो को पकाकर सिद्ध करलें। फिर, इसमे गाय का घी और शक्कर मिलाकर भोजन करें। इससे पामा की पीडा पराजित हो जाती है ॥ १२॥ आमलासार गधक को पीसकर, उसमे से डेढ मापाभर १-तिक्त किरात , भृग भृङ्गराज,मरुदली अमरवल्ली, एतत्स्वरसो निम्बवृक्षस्रावश्च । २-एते सर्वे द्रवा प्रत्येकं शरावमिता ग्राह्या । ३-काचकूपीमध्ये भूत्वाऽऽतपे सस्थाप्यं, सिद्ध मात्रा पल, पथ्य च केवलचणक्रोटिका विलवणा नान्यत्किंचिदपि। ४-मञ्जिष्ठाया । ५-प्रोक्तक्रमेण । ६-प्रदुष्टरक्तजपामाया इत्यर्थ , कार्ये कारणोपचारात् । ७-लवणादिवर्ज- मत्र पथ्यम् । ८-हिमकपाये अनग्निसिद्ध इति यावत् । १०-'आमलासार' इति नाना प्रसिद्धगन्धकविशेपादन्यो गन्धक आदेय । ९-अनि खुतमण्डानीति शेष । .
चतुर्थों गुच्छः । चिकित्सितम्]] ३०१ १२ वाकुचीगन्धपापाणौ क्रीतौ ढब्बूकशुल्कतः । कर्के निक्षिप्य सजले सायं सौधोपरि न्यसेत् ॥ १४ ॥ उत्थाय तज्जलं प्रातर्निपीय पटपावितम् । पटस्थं वक्कसं तैले पिष्वा लित्वाऽऽतपं भजेत् ॥ १५ ॥ विधाविति कृते पामा दिनेनैकेन नश्यति । अहानि त्रीणि सेवेत भक्तं दुग्धेन केवलम् ॥ १६ ॥ १३ कम्पिल्लवस्तगन्धामृताश्मवलितुत्थजं चूर्णम् । मसृणं वृतेन लेपात् पामां हन्त्यातपे निषण्णस्य ॥ १७ ॥ १४ चूर्ण पलं मिश्रितनक्तंशाणं संनीय तैलेन रुबूद्भवेन । धौतं पयोभिः शतशः क्षिणोति पामाप्रकोपं त्रिभिरेव लेपैः॥ १८ ॥ १५ मधूकपुप्पाणि पयःप्लुतानि बद्धानि पामोपरि कर्पटेन । तत्ताडगुद्रिक्ततदीयदाहपीडाप्रभृत्यापदमाक्षिपन्ति ॥ १९ ॥ १६ श्वेतगुञ्जारसाफूकसिन्दूरोषणशुक्तिकम् । पिष्वा वधान तैलेन मोदकं वैद्यमोदकम् ॥ २० ॥ मात्रा का, वैद्य-श्रेष्ठ, कण्डूपामादि से पीडित रोगी को सेवन कराये ॥ १३ ॥ मालि- वापची (वाकुची) तथा गन्धक दोनो को एक ढब्बू के मूल्य से जितने मिलें उतनी मात्रा में लेकर जल - पूर्ण सकोरे में भिगोकर, साझ को, छतपर रखदें। सुवह, सकोरे के जल को वस्त्रपूत करके पीजायें। फिर, वस्त्रलम-भूसे को, तैल अथवा घी मे पीसकर हाथो पर प्रलेप करके धूप मे बैठ जाये । विधिपूर्वक इस तरह करने से एक ही दिवस में लाभ दीख पडेगा। यह प्रयोग तीन दिवस पर्यंत करें। भोजन मे केवल दूध ही पीयें। (इस प्रयोग को यथोपदिष्ट विधिपूर्वक करने से ही लाभ होगा, अन्यथा नहीं ॥ १४-१६ ॥ कपिला, याकुची, मुर्दार, गन्धक और तुत्थ इनके चूर्ण को घी में घोट कर मुलायम प्रलेप करके धूप मे बैठ जाये। इससे पामा शात हो नाता है ॥ १७ ॥ कलिकाचूर्ण चार तोला तथा हरिद्रा तीन माषा इनको एकत्र चार तोला भर एरडतैल मे पीसलें । फिर, पानी से सोवार प्रक्षालन करे । इसके तीन वार प्रलेप से पामा का प्रकोप क्षीण हो जाता है ॥ १८ ॥ मधूकपुप्पो के जल-पिष्ट कल्क को पामा के ऊपर प्रलिप्त करके पट्टी से बाध टे। प्रवृद्ध पामा तथा तजन्य दाह, वेदना प्रभृति सकट को यह क्षीण कर देता है ॥१९॥ श्वेत गुंजा, पारद, अफीम, सिदूर, मरिच तथा शुक्ति इनको एकत्र तैल मे पीसकर, फिर, वैद्य को मोद देनेवाला मोदक बनाकर, १-चाकुची 'मालियापचा' इति जयपुरे प्रथिता । २ - एकेनेव ढब्बूमनोभयमपि वणिगापणन कीत्वा समानेतव्यम। ययोपदेश कृते प्रयोग फल नान्यथेति । ३-'करवा' इति प्रसिद्धमृत्पात्रे । ४-घृतेऽपीति मतान्तरम् । ५-'मालीवापची' इति प्रसिद्धा । ६-कलिकाग्वण्डोत्यम् । ८-समेल तहरिद्रागाणम् । ८-पलमानेन । ९-जलै । १०-जलेन वस्कीकृतानि । ११रस पारद । बनालें। इसका - .
[कुष्टरोग- ३०२ सिद्धभेषजमणिमालायां तप्ते चतुर्गुणे तैले पच फेनोद्मावधि । मर्दितस्यास्य लेपेन पामाऽपैति त्रिमिर्दिनैः ॥ २१ ॥ १७ पारदटङ्कणगन्धयुगकजलिका भवतीह । घृतलुलिता लेपैस्त्रिभिः पामाद्रुहरी है ॥ २२ ॥ १८ दद् वन्योपलैः कृत्वा मनागुद्गतशोणिताम् । भृशं लिप्त्वैड्दैमसैविकीर्योपरि शर्करोम् ॥ २३ ॥ आच्छाद्य स्विन्नपञ्चास्यच्छदैः पट्ट विवन्धयेत् । अष्टयामात् पुनः कुर्यात् पट्टान्तं सकलं विधिम् ॥ २४ ॥ एवं पट्टैस्त्रिभिर्दर्भवेदुत्सन्नकण्डुरा। शाम्यत्युद्दम्य सा जन्तञ्जलस्पर्श विवर्जयेत् ॥ २५ ॥ १९ तूलं निम्बाम्बुसंसिक्तं घृतेन तलितं भृशम् । दद्रूपरि पटैबंद्धं दर्बु तक्षति पक्षतः ॥ २६ ॥ २० लिप्तः संघृष्य तैलेन वलिरामलसागर । उग्रान दद्रूगदानत्ति तायः कसुतानिव ॥ २७ ॥ २१ सौभाग्यगन्धसादरसितोपलाः पीतनिर्बुकस्वरसाः। अधिपानीयं पिष्टा लेपान्निघ्नन्ति दद्रूणि ॥ २८ ॥ इसको, इससे चतुर्गुण तेल मे तब तक पकावें, जम तक तैल मे से फेन निकलना बंद न हो जाये । इसके लेप से मर्दित पामा तीन ही दिवस मे दूर हो जाता है ।। २०-२१ ॥ टंकण, पारद, गधयुग, कजलिका घृतघृष्ट । करती तीन-प्रलेप मे, पामा, दगु, विनष्ट ॥ २२ ॥ वन्य-उपल से दद्रु को घिसकर उसमें से रक्त निकाल लें। फिर, उसपर इड्डदी फल की मजा का यथेच्छ लेप करके उसपर मिश्री चूर्ण भुरकाकर, ऊपर से, एरट के स्विन्न पत्तों को विछादे और पट्टी बाध दे। इस तरह तीन बार पट्टी बांधने से दद्रु जन्य खुजली मिट जाती है। तथा तत् - गत कृमियो के बाहर निकल जाने पर वह स्वयमेव शांत हो जाता है। इसके प्रयोगकाल मे जल-स्पर्श वर्ण्य है ॥ २३-२५ ॥ कपास को निंबू रस से सिक्त करके घृत मे खूब तल लेवें। इसको दगु के ऊपर वस्त्र-पट्टी से अच्छी बांध देवें। इससे उद्गु एकपक्ष मे विशीर्ण हो जाता ॥२६॥ गंधक तथा मामलासार गधक दोनो को तैल मे अच्छी तरह पीस लेवें । यह लेप उग्र द्रु, पामा भादि का उसी तरह भक्षण कर जाता है, जिस तरह गरुड ने कद्रूपुत्रों का किया था ॥ २७ ॥ टंकण, गधक, नवसादर और मिश्री इनके चूर्ण को निबूरस की भावना १--'आमलासार, छाछिया' इति लोक प्रसिद्ध ग यकयुग्मम् । २-ह इत्याश्चर्ये । ३- हिंगोटा' इति प्रसिद्धफलमध्यभाग । ४-खण्डशब्दवाच्याम् । ५-पट्ट मोक्षसमये जलप्लोतेन समाय॑ ले गादिक कृत्वा पट्ट वनीतेति पद्धति । ६-तन्दुलमित सौर देयमेवेति नाग्रह । ७-पामामपि हन्ति । ८-निम्बूवरसभाविता इत्यर्थ । 10 तरह तु चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छः। २२ रालटङ्कणदैत्येन्द्रपारसीकयवानिकाः पिष्टा जलेन वटिकीकृता दहूँ जयन्ति हि ॥ २९ ॥ २३ स्फुटटङ्कणवलिमार्तिकसर्जास्तुल्याः सिता समा सर्वैः । मसृणं विमर्च पयसा लेपो दद्रून् विलोपयति ॥ ३० ॥ २४ पीतमृत्स्ना सलवणां कोष्णैरुत्वाथ्य शंवरैः । लेपोऽवचारयेदुच॑दविध्वंससिद्धये ॥ ३१ ॥ । २५ पिच्छिलाच्छल्लककाथप्लुतप्लोतेन सर्वतः । L द्रुरश्रान्तमभ्यक्ता प्रणश्यति शनैः शनैः ॥ ३२ ॥ २६ धात्रीफलप्रपुन्नाटबीजजीरककल्पितः । प्रलेपो वितरत्यद्धा दद्रुदारिन्यमुच्चकैः ॥ ३३ ॥ २७ हेमक्षीरीरसो यद्वा रसोनलिकोद्भवः । क्षोदो वा लोहकिट्टस्य दद्रुद्रावी प्रलेपतः ॥ ३४ ॥ २८ ददुघ्नः कोलि निर्यासंश्छागक्षीरेण लेपितः। मृतनामरिचचूर्ण वा गोदुग्धेन तथा स्मृतः ॥ ३५ ॥ देवें। फिर पानी में पीसकर इसका लेप करनेसे ददु भादि नष्ट हो जाते हैं ॥ २८ ॥ राल, गंधक, टंकण, खुरासानी भजवायन इनकी जल मे पीसकर वटी बनालें। इससे दगु पर विजय मिलती है ॥ २९॥ भृष्ट टंकण, गधक, मटिया राल प्रत्येक समान भाग तथा इनसे समान भाग मिश्रीचूर्ण इन सबको एकत्र पानी में बारीक पीसलें । इसका प्रलेप दद्रुओं का विलोप कर देता है ॥ ३० ॥ लवण सहित पीली मिट्टी को, कवोष्ण-क्षार- जल में पकावें। ददु विध्वंसरूपी उच्च सिद्धी के लिये इसका लेप करें ॥ ३१ ॥ चौसठ तोला शिशिपामूल-त्वक् को जौकुट करके ५१२ तोला जल से उकाल कर ६४ तोला जलके अवशिष्ट रहनेपर उतार लें। इस क्वाथ के प्लोत से ददु को निरतर सिक्त रखने से वह शनै शनै नष्ट हो जाता है ॥ ३२ ॥ आवला, पवाड के वीज तथा जीरा इनका प्रलेप शीघ्र ही दुदु के दारिद्रय को नितांत स्पष्ट कर देता है ॥ ३३ ॥ स्वर्णक्षीरी का रस अथवा शुद्ध किये गये लहसुन की कलियों का रस, अथवा लोहकिट्ट का चूर्ण इनमें से किसी एक के प्रलेप से दगु द्रवीभूत हो जाता है ॥ ३४ ॥ बदरी वृक्ष के गूढ का, अजादुग्ध के साथ प्रलेप दगु का नाश कर देता है । इसी तरह मुलतानी मिट्टी और मरिच चूर्ण का गोदुग्ध के साथ प्रलेप भी यही प्रभाव दिखाता है ॥ ३५ ॥ १-मार्तिकसों मृत्तिकावर्णो राल । स च मटिया राल' इति प्रसिद्ध । -लवण- मत्र शाकमम्भरीयम् । ३-क्षारपानीयंन तु मधुरैरिति यावत् । ४-पिच्छिला शिशिपा, तस्या वल्कलं द्विप्रस्थ यवस्थूल विधाय घ्याढकजले सक्काथ्य द्विप्रस्थ शेपयेत् । तत्प्लोतेन प्रक्षिता दटूर्नश्यतीति । ५-शुद्धरसोनभवो रस इत्यर्थ । ६त्वदरीगुन्द्रम् । ७-मृत्स्ना च मुलतान देशोद्भवा । ८-दहन इत्यर्थ ।
[कुष्टरोग- - सिन्दभेपजमणिमालायां २९ तेजोवाः साधनद्रव्यवकसं लिम्पतां नृणाम् । द्रुविचर्चिकाचिन्ता न जातुचन मुश्चति ॥ ३६ ॥ ३० आवाप्य तप्ततेलान्तः पादिकं सिक्थैमुत्तमम् । शतकृत्वो जलै|तं फुल्लमो नाम सिध्यति ॥ ३७ ॥ विपादिकामयं लेपमात्रेणेव व्यपोहति । ४ शवाश्मसंगत्या दाहं कर्पूरसंस्कृतः ॥ ३८ ॥ ३१ शुष्कं रजः सुधाजं विमथ्य तैलेन मर्दिते गात्रे । कुष्ठं विभूतिसंशं कष्टमपि हहा भवति नष्टम् ॥ ३९ ॥ ३२ मलयोद्वकपूरकल्पितो लेपसत्तम । विभूति रंहसा हन्ति परां काष्ठां गतामपि ॥ ४० ॥ ३३ नीरे द्विनल्वणे प्रस्थान वरीया दश पञ्च च । भाण्डे निक्षिप्य संमुन्य स्थापयेदिवसाष्टकम् ॥४१॥ अर्क जातरसात्तस्मादुन्नयेनल्वणोन्मितम् । पथ्यापटुगुटीं तेन गिलेच्छित्रविचित्रितः ॥ ४२ ॥ जिन द्रव्यों से तेजाप बनता है, उन द्रव्यो के अर्थात् नवसादर, स्फटिका, कामीस भादि के भुक्के के लेप से दद्रु विचर्चिका की चिंतासे मनुष्य को मुक्ति न मिले यह कदापि सभव नहीं ॥३६ ॥ प्रतप्त तैल से तैल से चतुर्थाश उत्तम सिक्थ डालकर पिघलाले । फिर जल से शतवार प्रक्षालित करे। यह सिद्ध औषधि 'फुल्लम' कहलाता है । पाददारी इसके प्रलेपमान से विदारित हो जाती है । मुर्दार के साथ इसका प्रलेप दद्रु को तथा कपूर के साथ, दाह को मिटा देता है ॥ ३७-३८ ॥ सुधाचूर्ण को तैल में मथकर शरीरपर लगाने से, कष्टपूर्ण सिध्म भी, अहो ! नष्ट हो जाता है ॥ ३९ ॥ श्वेतचदन के साथ कपूर को घिसकर बनाया गया लेप अत्यंत प्रवृद्ध सिध्म को भी मिटा देता हे ॥ ४० ॥ अस्सी प्रस्थ पानी मे पदरह प्रस्थ त्रिफला के चूर्ण को मिला एक मृत्पात्र उसके मुख को सपुटित करके आठ दिवस पयंत रहने दें। फिर, इसमें से करीब चालीस प्रस्थ जितना अर्क निकाल लेवें । अब, हरडे तथा सैंधव दोनो समान भाग लेकर, जल मे पीसकर एक माषा प्रमाण गुटी बाध उपरोक्त भर्क के साथ उसको निगीर्ण कर जायें । वर्षमात्र के प्रयोग द्वारा मैने इसका प्रत्यक्ष चमत्कार कहीं भी देखा है। श्वित्रकुष्ठ से पीडित मानव जाति के उपकारार्थ यह प्रयोग में यह १-तेजोवा तेजापसज्ञक, तस्य साधनद्रव्याणि नवसादरस्फटिकाकासीसप्रभृतीनि तेषा बक्कसम् । २-मधूच्छिष्टम् । ३-पाददारीम् । ४-सिधमापरपर्यायम् । ५-अधुन 'श्वित्रसज्ञस्य चिकित्सोच्यते । ६-नल्वणोऽत्र चत्वारिंशत्प्रस्थप्रमाणो विवक्षितः ७-त्रिफलाया । ८-पथ्या सैन्धवं च सम गृहीत्वा जलेन पिष्टा मापोन्मिता गुटी कार्या स्पष्टमन्यत् । । में भरकर २ ३०५ चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छ.। काऽपि दृष्टचमत्कारो वर्षमात्रप्रयोगतः। श्वित्रिणामुपकाराय प्रयोगोऽत्र प्रकाशितः ॥४३॥ पीते परं तद्वदर्क पुनर्निष्काश्य वर्तयेत् । मात्राऽस्य कुडवोन्माना पथ्यमप्यल्पसैन्धवम् ॥ ४४ ॥ ३४ सच्छिद्रकाचमसृणितफरके भृत्वा शिरोरुहप्रस्थम् । तदुपरि विकीर्य तुत्थं तोलकमेकं विमुद्रय करकास्यम् ॥ ४५ ॥ पातालयन्त्रेयुक्त्या किमपि प्रच्यावित तैलम् । अहह विनिहन्ति नाम प्रलेपतः श्वित्रसितिमानम् ॥ ४६॥ ३५ चत्वारिंशद्दिनानि स्त्रीमूने ज्योतिष्मती प्लुता। तत्सैलं यन्त्रतः कृष्ट्वा लिम्पेच्छितोपरि द्रुतम् ॥ ४७ ॥ इति कुष्ठचिकित्सा। - अथ शीतपित्तचिकित्सितम् । १ शितिजीरशैरीजीरे पृथग्गद्याणसंमिते । प्रसृतेऽम्भसि निकाथ्य पादोनमवतारयेत् ॥१॥ प्रकाशित करता हूं। अर्क यदि पीते पीते निःशेष हो जाये तो पुन. उपरोक्त विधि से निकाल कर उपयोग करें। इस भर्क की मात्रा नित्य सोलह तोला भर है। अल्प सैंधव पथ्य है ॥ ४१-४४ ॥ एक करवे के भीतरी भाग में काच का घोल चढाकर उसे मुलायम बनाले । फिर, इसके तल भाग मे एक सूक्ष्म छिद्र कर दें। भव, इस करवे मे सिर के करीब चौसठ तोले बाल - केश विछाकर उनके ऊपर एक तोला तुत्य का चूर्ण फैलादें । करवे के मुख को कपरमिट्टी करदें। अब, १२८ तोले उपलो की अग्नि देकर, पातालयंत्र- विधि से युक्तिपूर्वक तैल टपका लें। अहो। इस तैल के प्रलेप से श्वेतवर्णता को प्राप्त श्वित्र नष्ट हो जाता है ॥ ४५-४६ ॥ । चालीस दिवस पयंत स्त्रीमूत्र में मालकांगनी भिगोकर रखदें। फिर इसमें से पातालयंत्र द्वारा तैल निकाल लेवें । इसका श्वित्र पर प्रलेप करने से वह शीघ्र शमित हो जाता है। ४७॥ - कुष्ठचिकित्सा समाप्त - - शीतपित्त चिकित्सा (कुल प्रयोग ३) श्वेतजीरा तथा शरीजीरा प्रत्येक छह माषा लेकर उनको ८ तोले जल में उकालें। १-करकस्यावस्तले स्वल्पं छिद्रं कार्य तैलच्यावनार्थम् । काचघोलेन च तदभ्यन्तरे प्रलेपो मसणः कारयितव्य । २-अग्मिरत्र द्विप्रस्थगोमयैर्देयः । ३-'मालकागनी' इति ख्याता। ४-पातालयन्त्रत.। ५-त्वगादिदुष्टिसाधाच्छीतपित्तम्। ६-शितिजीरं कृष्ण- जीरकम् । शरीजीर लामजकशरीजीरम् । होता हुआ सि० २० ar ३०८ मितभेपनमगिमारायां [ रोग- कृत्वा तिन्नो वटीस्तासामेकैकां निर्गिलेज्यहम् । लीयते स्नायुकः किं तु पक्षीयाद्विल्य दलम् ॥ ६॥ ६ घणिो वर्षमाधन्तवर्ज दग्ध्वा गिलेजलैः। त्रिभिरेव दिनैव॒मः सायुको बिलय प्रजेत् ।। ७ ॥ ७ घोलं गुटेन जीर्णन विनीय गुटिकीरानम् । त्रिसन्ध्यं निर्गिलेच सधः स्नायुकशान्तये ॥ ८ ॥ ८ जतुस्तोलफकापोतेशकृतः सगुडा गुडाः । सप्त सप्तदिनैरेव स्नायुकं स्यन्ति शमशः ॥ ९॥ ९ गरुडेविशेषस्य गराध्यपगतनलिकं विचूर्ण्य तम्यार्धम् । सगुडीकृत्य निगीण मायुकमपैरहोभिरपहरति ॥ १० ॥ १० दग्ध्वा तैलेऽग्निकं तेन छित्त्वा मायुं छदान् धर । पहें बवाऽष्टदिवसैर्मुञ्च तद्वंससिद्धये ॥ ११ ॥ ११ स्नायुकोपरि संयमा चन्द्रवाहीकर्चक्रिका । समूलमुन्मूलयति स्नायुकं नात्र संशयः॥ १२ ॥ करें। इस तरह तीन दिवस में ही स्नायुक विलीन हो जाता है, किंतु मायुक पर यिन्त्र- पत्र बाध देना चाहिये ॥ ५-६ ॥ मयूर - पिच्छ का भादि भौर मन्त का भाग निकार कर भवशिष्ट भाग को जलाकर भस्म बनालें । इस भस्म को तीन दिवस जल के साथ फांके । हम कहते हैं कि तीन दिवस मे ही मायुफ विलीन हो जायेगा ।। ७ ॥ रक्तयोल को गुठ में अच्छी तरह मिलाकर दिवस में तीन बार, प्रात , मध्यार तथा सास को, निगीर्ण करने से, सायुक शीघ्र शांत हो जाता है ॥ ८॥ रास, वन्यकपोत की विद्या तथा गुट प्रत्येक एक तोला लेकर इनकी गुढाकू बना, सात गुडक, प्रति दिवस, सात दिवस तक लेने से लायुक सपूर्णत मिट जाता है। पक्षावधि स्वण मरीधादि वज्र्य हैं॥९॥ नीलढांम नामक पक्षी के पक्षी को लेकर उसकी नसें निकाल ले फिर उसका चूरा करके उसमें से अर्ध भाग चूरे को गुट में मिलाकर निगीर्ण कर जायें। इस प्रयोग से कुछ ही दिवसों में मायुक दूर हो जाता है ॥ १०॥ भल्लातक को तैल में जाकर, उसकी भस को सायुक पर मल देवें तथा उसपर नागरवेल के पत्तों को पट्टी से बाध देवें । आठ दिवस पीछे पट्टी खोलें । इससे सायुक नष्ट हो जाता है ॥ १५॥ हिंगु तथा हिंगुनिर्मित टिकिया नायुक पर बाध दें। यह नायुक का समूल नाश कर देती है वारत्रयमदन्तस्पर्श गिलेदिति । ३-'याजरी' इति ख्यातधान्य विशेपचूर्णाजया माषा इति योजनीयम् । जया इत्यष्टादश । ४-अष्टादश मापा इत्यर्थ । ५-द्वादश मापा । ६-आकाश- वल्लीतन्तूनाम् । १-मयूरस्य । २-कपोतच वन्योऽभिप्रेत । ३-गुडकसंख्येयम् । ४-नन्तीत्यर्थ । अत्र लवणमरिचादिकं सर्वथा हेयं पक्षावधि । ५-'नील डांस' इति ख्यातस्य पक्षिण । ६-भल्लातकम् । ७-नागवल्लीच्छदानित्यर्थ । ८-कर्पूरहिचक्रिका ।
चतुर्थो गुच्छ । चिकित्सितम्] १२ कल्कमिपीकानुज समतैक्रशृतं पटेन वैनीत । सप्तदिवसप्रयोगात् प्रणश्यति मायुकस्तन्तुः ॥ १३ ॥ - इति स्नायुकचिकित्सितम् - अथ क्षुद्ररोगचिकित्सा। १ विंशतिवर्पोऽपि यतिः कूष्माण्डस्वरससंस्कृतश्मश्रुः । ललितपलितकलिततया लज्जयतितरामशीतिवर्षीयम् ॥ १॥ २ चूर्णं धात्रीचूर्ण सजलमयसि सीसकेन घृष्ट्वाऽलम् । तल्लेपतो लसन्ति श्यामाः केशा रुबुच्छदच्छन्नाः ॥ २॥ ३ केनापि मह्यमुपदिष्यमिदं रहस्यं कृत्वा कदाऽपि सकृदेव मयाऽनुभूतम्। सिन्दूरचूर्णविहितो बहल प्रकेपः केशान् करोत्यलिनिभान् वटपत्रबधः३ ४ एला गन्धशटी मांसी मुस्ता कृष्णागुरुनखम् । धात्रीफलानि शैकेयं कार्षिकाणि पृथक् पृथक् ॥ ४॥ इसमें शंका नहीं ॥ १२॥ चार तोला भर तुलिया थोर के कल्क को, दहि में चतुर्थांश जल मिला कर निर्मित की गयी छाछ में उकाल लेवें। फिर, इसको स्नायुक पर पट्टी से बांध दें। सात दिवस तक इस प्रयोग से मायुक- तन्तु नष्ट हो जाता है। इस कल्क को दिन में एक बार बदल लेना चाहिये ॥ १३ ॥ सायुक चिकित्सा समाप्त - क्षुद्ररोग चिकित्सा (कुल प्रयोग २५)- घीस वर्षीय युवा यति के दाढी-मूंछ के कृष्ण - वर्ण केश भी, कूष्मांड-स्वरस से साफ किये जाने पर इतने सफेद-पलित हो जाते हैं कि अस्सी-वर्षीय वृद्ध के बाल भी उसके सामने कुछ माल नहीं ॥१॥ सुधाचूर्ण तथा हरडे के चूर्ण को, लोह खरल में जल के साथ, सीसे के भत्थे से यथेच्छ मर्दित करें। फिर, इसका केशों पर लेप करके उनको एरंरपत्र से माच्छादित कर कपडे से बांध दें। इससे केश श्याम हो जाते है ॥२॥ सिंदूर चूर्ण का केशोपर गाठ प्रलेप करके उनको वट-पत्रों से बाध देवें। इससे केश अमर जैसे कृष्ण-वर्ण हो जाते हैं। यह रहस्य - पूर्ण प्रयोग मुझे किसी ने भी बताया है गौर इसको केवल एक यार, कमी भपने ही ऊपर भजमाकर, मैंने अनुभव भी किया है ॥ ३ ॥ इलायची, कपूरकाचरी, मोथा, कृष्ण - भगुरु, नखला, १-तुलियास्नुहीज पलप्रमाणम् । २-तक्रमनिजलं धन प्राह्यम् । ३-स्नायुकस्फोटो- परि अहोरात्रं एकवार कल्क परिवर्तनीय । अत्र भोज्यविषये परिहारो नास्तीति । ४-कम- प्राप्तक्षुद्ररोगचिकित्सितमभिधीयते। ५-तत्रादी पाषण्डिजटिलर्लोकवचनार्थ क्रियमाण आयु प्रकर्षप्रत्यायकप्रकारोऽयम् । ६-सुधाचूर्णम् । ७-धन । ८-'कपूरकचरी' इति प्रसिद्धा। प्रत्यक्ष ३१० सिद्धपजमणिमालायां [शुरोग- तरुणी पैत्रिका सेव्यं द्विद्विकर्याणि कल्पयेत् । श्रीखण्ड शिंशपाखण्डं प्रत्येक पलसंसितम् ॥ ५ ॥ इत्येभिर्वासितं तेलमष्टाहं प्रस्थमानतः। घटे संभृत्य सच्छिद्रशरावेण विमुद्रयेत् ॥ ६॥ गुरूपदिएपातालयन्त्रयोगेन पातयेत् । तैलं मनोहरामोदं धूपेल केश्यमुच्यते ॥ ७ ॥ निष्कैकमत्र कपूरं क्षिपेदामोदवृद्धये । आमतैलनिरोधार्थ गुडापेक्षाऽपि वर्तते ॥ ८॥ ५ सिद्धार्यवातावचापटूनां व्यद्गस्य विध्वंसविधौ पटूनाम् । लेपः कृतीनां जलतो वटीनां सौन्दर्यदानायितो नटीनाम् ॥ ९ ॥ ६ दुग्धेन सद्योजेनुपा प्रलेपो विनिर्मितो मूलकारणानाम् । छायां मुखस्थां हरते मुखं स्यात् प्रभाभृतं शारदशीतरश्मेः ॥ १० ॥ ७ आर्द्राकृतानि गजदन्तरजाकँटोलधात्रीफलान्यमरवल्लरिकारसेन । तैले पचेत्तिलभवे परिमर्दनेन श्मश्रूणि तस्य सुदृशामपि विस्फुरन्ति ११ आंवला तथा शिलाजीत प्रत्येक एक एक तोला, गुलाव, पनडी और उशीर प्रत्येक दो तोला, चंदन, शिंशपाकाष्ट प्रत्येक चार तोला- इन द्रव्यो को चौसठ तोला तैल में डालकर आठ दिवस पर्यंत इसी तरह रहने द । अब, इनको एक घट में भरकर घटमुख को, छिद्रयुक्त शराब से ढक, मुद्रित कर दे । गुरूक्तविधि अनुसार, इसका पातालयंत्र द्वारा तैल टपका लें। मनोहारी सुगध से युक्त यह केश्य तेल 'धूपेल' कहलाता है । कच्चा तैल ही छिद्रमे से बाहर न निकल जाये इस आग्रह से, छिद्र को भावरित करने के लिये गुड की भी अपेक्षा रहती है । तैलमे सुगध बढाने के लिये, एक तोला कपूर डाल देना चाहिये ॥ ४-८॥ पीत-सर्षप, बादाम, वचा तथा सैंधव इनको जल में पीसकर बटियां बाधलें। इसके प्रलेप से व्यङ्ग नष्ट हो जाते है। सौंदर्य मे वृद्धि करने के कारण यह वटियां नटियो को भी प्रिय है ॥ ९॥ धारोष्ण- दूध के साथ मूली के बीजो को पीसकर लेप करने से मुह-गव-छाया-मुंहासे दूर होती है तथा मुख शरद् - चन्द्र के समान कांतिमय हो जाता है ॥ १० ॥ हाथीदांत का चूर्ण, कटोल तथा आंवला इनके चूर्ण को समरवेल के रस में भिगोकर, तिलतैल मे उकाल लेवें । इस तेल को चिबुक आदि पर मसलें १-मरुस्थलजा ‘पनडी' इति ख्याता गन्धौषधिः । २-गुर्जरप्रचरिता सज्ञेयम् । ३-जलत कृतानां वटीना लेप इति सवन्धः । ४-प्रिय इत्यर्थ । ५-धारोष्णेन । ६-मूलक- वीजानाम् । ७-'कटोल' इति नाम्नैव प्रसिद्ध केशोपयोगी द्रव्यविशेष । ८-स्त्रीणामपि किमुत पुरुषाणामित्यर्थ । । ।
चतुर्थी गुच्छ.। ९ चिकित्सितम्] ३११ ८ कटुना चूतसंधानतैलेन परिलेपितम् । इन्द्रलुप्त शमं याति केशा रोहन्ति कृत्स्नशः ॥ १२ ॥ निम्बुसंधानतैलेन रगपत्रीरजोजुपा। लेपयेत् कोथविक्केदपिडिकापीडितं शिरः ॥ १३ ॥ १० वप्रप्रसादमुर्दारलाक्षाकार्पासभूतयः । प्रत्येकमेकगद्याणाः कम्पिल्लं भस्म केशजम् ॥ १४ ॥ वेल्लजान्याक्षिकाणि स्युस्तुत्थकं मापपञ्चकम् । दग्धं पूगीफलं तिस्रो दग्धाः पीतवराटिकाः ॥ १५ ॥ चतुःपञ्चाङ्गुलौरभ्रकम्बलस्य विभूतिका । सर्वमेकत्र संचूर्ण्य पटपूतं विधाय च ॥ १६ ॥ चतुर्गुणेन हविपा शतधौतेन योजयेत् । एप सिद्धो मलहरः शीर्षकोथप्रपाकजित् ॥ १७ ॥ ११ एकं सुधाश्मखण्डं वलिं पलं ध्याढके जलस्य पचेत् । लिम्पेदलंपिकात तेन शिरोऽर्धावशिष्टेन ॥ १८ ॥ १२ मौक्तिकर्तन्दुलचूर्ण चिञ्चाजललोलितं लित्वा । भजतो व्यजनसदागतिमरुपिका ग्रीष्मजाः प्रणश्यन्ति ।। १९ ।। इस तरह करने से सुनयनाओं के भी दाही उग आती हैं फिर पुरुषो की तो बात ही क्या? ॥ ११ ॥ आम्र-सधान के सर्पपतैल में थोढा तिलतैल भी मिलाटें। फिर इसका लेप करने से, इन्द्रलुप्त शमन हो जाता है तथा वहां केश उत्पन्न हो आते है ॥१२॥ मेहदी को निंबू सधान के तैल में पीसकर उसका लेप खोरी अथवा स्रावयुक्त फुन्सियों से पीडित मस्तक पर करना चाहिये ॥ १३ ॥ सफेदा, मुर्दार, लाख, रुई इन प्रत्येक की छह छह मापा भस्म, कवीला, केश- भस्म, तथा मरिच प्रत्येक एक एक तोला, तुत्थ पाच मापा, जलायी हुई (दग्ध) सुपारी तथा पीत वराटिका प्रत्येक तीन तीन नग, चार या पाच अंगुल लंबे - चकमा- नामक कवल की भस्म-इनको एकत्र लेकर, सूक्ष्म वस्त्रपूत चूर्ण बनाले । इस चूर्ण मे चतुर्गुण घृत मिलाकर, पानी से शत वार प्रक्षालित करलें । इस विधि से सिद्ध यह मलहर' शीर्षजन्य कोथ तथा प्रपाक का शमन कर देता है ॥ १४-१७ ॥ कली का एक टांठ्या (चूर्णोपल नग एक) तथा गंधक चार तोला-इनको ५१२ तोला जल में उकाल लेवें । अर्धावशेष रहने पर, उतार कर इसका प्रलेप अरुपिका से पीडित मस्तक पर करें ॥१८॥ ज्वार को इमली के जल में पीसकर लेप करने से, ग्रीष्म- जन्य मलाई शमन हो जाती है । लेप करके सतत पंखे की हवा खानी चाहिये ॥१९॥ १-अत्र तिलतैलमपि किंचिन्मेलनीयम् । २-मदयन्ती 'मेहदी' इति ख्याता । ३-वप्रस्य सीसकस्य प्रसाद , स च लोके 'सफेदा' इति नाना ख्यात । ४-मरिचानि । ५-औरभ्रकम्बले लोके 'चक्मा' इति प्रसिद्धं मालपुरादिग्रामेषु प्रायो भवति, तब [शुरोग- ३१२ सिद्ध पजमणिमालायां १३ समरिचवातामैला पटेन खलु येन गाल्यते गला । तेन पटेन शरीरप्रोञ्छनमपहन्ति लूकदोपौर्तिम् ॥ २० ॥ १४ साधारणपिडिफाः परं तासामुपरि धृतेन । प्रणश्यन्ति शवगिकासंसृष्टेन घृतेन ॥ २१ ॥ १५ तक्रेण मसृणं पिटेरधिखल्वं शिरोरुहै। लेपश्चिमननिर्दिष्टो वहिदग्धे प्रशस्यते ॥ २२ ॥ १६ स्वर्जिकाचूर्णयोर्लेपान्मशका यान्ति संक्षयम् । शिरस्थास्तु ज्वलत्पर्णनलिकापरिवर्तनात् ॥ २३ ॥ १७ कण्टकविद्धं स्थानं किमपि खनित्वा शलाकया शनक। तत्र क्षिप्तमिपीकामुक्क्षीरं कण्टकं समुन्नयति ॥ २४ ॥ १८ भृष्टैः सदम्लिकावीजै लघृष्टैः प्रलेपितम् । अधो न भ्रंशते जातु गुदचक्र प्रवेशितम् ॥ २५ ॥ १९ क्षारेण युक्तं द्विपलोन्मितेन प्रस्थद्वयं धेनुजलं घटस्थम् । संमुन्य धर्म त्रिदिनं प्रतीक्षेद्धन्त्यष्टलेप्या धुवमुग्रंकच्छुम् ॥ २६॥ जिस वस्त्र से, मरिच, बादाम, इलायची सहित भंगा को घोटकर उसकी ठंडाई छानते है उस वस्त्रद्वारा शरीर को पोंछने से लू जन्य न्यथा शमित हो जाती है। जिस वस्त्र से ठंडाई छानने मे भाती है, उस वस्त्रखंड का पारिभाषिक नाम 'सफाई है। उपरोक्त प्रयोग अनुभवसिद्ध है ॥ २०॥ मुरदासींगी को घृत मे घिसकर लगाने से शरीर की साधारण फुसियो में आराम मिलता है ॥ २१ ॥ केशो को, खरल में, तक के साथ खूब मर्दन करके, उनको वह्निदग्ध भाग पर लगाने से लाभ होता है। यह सिद्धप्रयोग 'चिमन' ने बताया है ॥ २२ ॥ सनीखार तथा सुधाचूर्ण का प्रलेप करने से मस्से नष्ट हो जाते है। कागजघटित भूगली को प्रज्वलित करके मस्तकपर फिराने से तत्रस्थ मस्से मिट जाते है ॥ २३ ॥ शरीर के जिस भाग में कांटा घुस गया हो, उस स्थान को शलाका से थोडा कुदेर कर, तुलिया थोर का दूध लगादे । इससे कांटा बाहर निकल जाता है ॥ २४ ॥ इमली के बीजों को भूनकर जल के साथ पीस लें। इसका लेप करके गुदाचक्र को अन्दर चलादें । इस तरह करने से गुदनि.सरण नहीं होता ॥ २५॥ १२८ तोला गोमूत्र को, आठ तोला सजीखार के साथ एक घट में भरकर उसके मुख को मुद्रित करके तीन दिवस पर्यंत सूर्य-ताप में रखदें। इस द्रव चतुरडलं पञ्चाङ्गुलं वा दग्ध्वा भस्म कार्यम् । ६-मौक्तिकतन्दुलं 'जुवार' इति प्रसिद्धो धान्यविशेष । ७-क्षुद्रपिडिका 'अलाइ' इति प्रसिद्धा । १-भगा "भज्ञा गजा मातुलानी मादिनी विजया जया" इति निघण्टु । २-प्रचण्ड- ग्रीष्मोष्णवात्या लूशब्देन लोकैर्लप्यते । ३-कागदघटिता नलिका। ४-मनागित्यर्थ । ५-गुदभ्रमचिकित्सेयम् । ६-लेपस्तु द्वित्रिदिनावधि कार्य । ७-खर्जिकाक्षारेण । ८-गोमूत्रम् । ९-वृपणकच्छम् ।
चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छ.। ३१३ २० कर्पूरगन्धपाषाणपटीरैः परिकल्पितः । लेपो वृषणकण्डूतिखण्डने खलु पण्डितः ॥ २७ ॥ २१ गुग्गुलोर्गन्धसौभाग्यक्षारमित्रस्य वर्तिका । निहन्ति लेपविधिना कच्छुदद्रु निरन्तराम् ॥ २८॥ २२ दुरालभाधरानिम्बौ वसुसागरमाषकौ । आकृत्य जले सायं रात्रावावृत्य विन्यसेत् ॥ २९ ॥ कल्कं तयोः पिवेत् प्रातर्दुग्धेन पटपावितम् । चिरन्तनाऽप्यलं कच्छूः शाम्यत्येव न संशयः ॥ ३० ॥ २३ शाकशाणे Gटावल्लं शतमल्लमतल्लकम् । तैलेऽतस्याः शृतं लेपात् पृष्ठविस्फोटघस्मरम् ॥ ३१ ॥ २४ सावुजपिण्डीकणपुरलोहितजतुवलयशकलानि । मसृणीकृत्य विलेपः कक्षाग्रन्थीन् विलोपयति ॥ ३२॥ के भाठ लेप करने से वृषणगत उग्र कण्डू शमित हो जाता है ॥ २६ ॥ कपूर, गधक, धीयामाटा तथा चदन इनके चूर्ण का लेप वृपण के दाह युक्त कण्डू को खंडित कर देता है ॥ २७ ॥ गंधक, तेलिया सुहागा तथा सज्जीखार इनमें गंधक मिलाकर, वर्तिकायें बनालें । इस वर्ति का निरतर लेप करते रहने से खुजली और दाद दोनों नष्ट हो जाते हैं । उपरोक्त योग में अमुक वैद्य कत्था भी मिलाते है ॥ २८ ॥ जवासा और चिरायता क्रमश• माठ तथा चार माषा लेकर साझ को जल मे भिगोकर रखदे। प्रात इसके कल्क को छानकर दूध के साथ पीयें। इससे जीर्ण खुजली भी नि.सदेह नष्ट हो जाती है ॥ २९ ॥ अठारह वाल भर शुद्ध मल्ल को ४५ माषा राल में मिलाकर अतसी के तेल में पकावें । फिर, इसका लेप करने से पीठ-गत-विस्फोट-अदीठ शात हो जाता है ॥३०॥ साबुदाना, गंधक तथा लाख की चूडियों के टुकडे इनके बारीक चूर्ण का लेप कांख की ग्रंथियों का विलोप कर देता है ॥ ३१ ॥ प्रस्तुत श्लोक में साबुन-निर्माण- विधि बताई गयी है.. जलप्रक्षेप से विगलित होते हुये सुधा-खंडों में उसी समय उनसे द्विगुणित उत्तम प्रकार की खार डाल देवें। इस द्रव-मिश्रण को तीन दिवस सूर्य की कडी धूप में रहने दें। तत्पश्चात् इस द्रव को कई बार वस्त्र से छानें । वस्त्रपूत इस तैजसजल को, फिर उकाले । उकलते हुये जब यह घट्ट बनने लगे तब इसमें अर्धमात्रा प्रमाण में १-सदाहकण्डूतौ कार्योऽयं लेपः। २-सौभाग्यं तेलियोपपदं ग्राह्यम् । केचित् कत्थमप्यत्र क्षिपन्ति । ३-यवासभूनिम्बौ । ४-वस्त्रादिना पिधाय । ५-पञ्चदशशाणे । ६-अष्टादशवलप्रमाणम् । ७-क्षुमाया । ८-पृष्ठविस्फोट 'अदीठ' इति लोकल्यात् । ९-लोके सावुनाम्ना प्रसिद्धा। १०-लोहितेति वलयविशेषणम् । जतुवलयानि च 'चूडी' इति प्रसिद्धानि ।
३१६ मिन्हभेषजमणिमालाया [मुगरोग- ४ कण्ठग्रन्थिच्छल्लकदाहमुखासु मुखपीडासु । द्विक्षीरराजवृक्षकाथेन कुरुष्व गण्डपान् ॥ ८॥ ५ रसनाश्वयथौ ससितो लुलायकन्याविशो रसः पेयः । कण्ठस्य समन्तादुपनाहोऽपि तथैव कर्तव्यः॥९॥ ६ रालक्षौद्रगुडांस्तैले पक्त्वा मलहरः कृतः । जिहादरणविस्फोटपूयप्रभृतिपु श्रुतः ॥१०॥ ७ घृताश्मंगैरिकक्षोदो मुखपाकार्तिघस्मरः । किं पुनर्यदि युज्येत त्रुटिप्रभृतिभिः सखे!॥ ११ ॥ ८ मुखदन्तवेष्टपाकप्रमेहपित्तास्रदाहादीन् । एलागैरिकगौरीपापाणरजः सवंशजं जयति ॥ १२॥ ९ भृष्टतुत्थखदिरत्रुटिकृष्णादग्धलोहतलपर्पटिकानाम् । सारणं कफसमीरसमुत्थं हन्ति दन्तरसनागलपाकम् ॥ १३ ॥ १० गोत्रीगर्भचिरोपितकोकिलतष्टवणं कुरु द्विगुणम् । अवचारय तचूर्ण तूर्ण छल्लप्रशान्त्यर्थम् ॥ १४ ॥ उडकर लगे हुये कणो को एकत्रित करलें। फिर इन कणों को वारीक पीसकर २५६ तोला जल मे उकाल लेवें । अर्धावशेष रहनेपर जल को उतार उससे गद्दप लेवें। इससे मुख, ताल तथा गले मे पडे हुये छिद्र, प्रथिवेदना एवं परिपाक शमन होते हैं ॥४-७॥ अंथि, छाले तथा दाहप्रमुख मुख तथा कठ के विकारो में दूध तथा जल से सिद्ध भमल- के काथ से गंडूप करें ॥ ८॥ जिता के शोथ मे, तथा पित्तोलपण कठरोग में भी, महिपी-वत्सा के गोवर को पानी में घोलकर तथा उसमें शक्कर मिलाकर पीवें, एवं उसी का उपनाह कंठ के चारों ओर लगावें ॥५॥ राल, शहद तथा गुढ को तैल में पकाकर सिद्ध किया गया 'मलहर उपजिहा, स्फोट, पूय भादि में उपकारक है ॥ १०॥ धीयाभाटा तथा गैरिक इनका चूर्ण मुख पाकजन्य वेदना को शमन करता है। इलायची भादि के साथ यदि इसका उपयोग किया जाये तो हे मित्र ! फिर कहना ही क्या ? ॥ ११ ॥ इलायची, गैरिक तथा घीयाभाटा इनका एकत्र चूर्ण मुख भौर मसूढों के पाक को तथा सदाह प्रमेह, रक्तपित्त आदि को उनके वंशजोंसहित अर्थात् तज्जन्य विकारों को पराभूत कर देता है ॥ १२॥ फुलाया हुभा तुत्य, खदिर, इलायची, पिप्पली तथा जले हुये लोह-तल की पर्पटी इनके चूर्णद्वारा सारण करने से, दांत, जिह्वा तथा कण्ठ के कफ वात-जन्य पाक नष्ट हो जाते हैं ॥ १३ ॥ पृथ्वी के गर्भ में चिरकाल तक गाढकर रखे हुये कोयले. १-दुग्धं जलं च । २-पित्तोल्बणे कण्ठरोगेऽपि ।३-महिपीवत्सापुरीषस्य । ४-खरमा- भावे जल लिप्त्वा विमथ्य कल्पनीय । ५-शनैरित्युपदेश । ६-घृताश्मा 'धाईभाठा' इति नाम्ना प्रसिद्ध । ७-गौरीपाषाणो घृताश्मा । ८-गोत्रा पृथ्वी तद्भे चिरोषितानि कोकिलानि । तास चिकित्सितम्] चतुर्थों गुच्छः। ११ चतुर्गुणाम्बरन्यस्तचतुरर्कदलान्तरे । अङ्गारवर्णमश्मानं धृत्वा वनीत पोहलीम् ॥ १५ ॥ स्वेदं तया प्रकुर्वीत कपोलफलकोपरि। दुस्तराऽपि शमं याति दंष्ट्रार्तिरनिलोल्वणा ॥ १६ ॥ १२ गरलोकारकरभतुत्थाफूकाम्रगन्धिकाः । मलनाद्विनियच्छन्ति दंष्ट्रामयमुदित्वरम् ॥ १७ ॥ १३ द्रवीभूते स्फटीखण्डे फेनमर्धमहेः क्षिपेत् । तद्रवस्य क्रमाच्छोपे जायमानेऽवतारयेत् ॥ १८॥ पादांशं तीक्ष्णकृष्णाग्निचूर्ण तत्र समावपेत् । अनेन मलनान्मधु दंष्ट्रार्तिः शान्तिमृच्छति ॥ १९ ॥ १४ स्वर्जीस्फटीसुधापूनवसागरतुत्थसौरवाहीकम् । तूलपिहितमुत मलितं रन्ध्रभृतं वा निहन्ति दंष्ट्रीर्तिम् ॥ २० ॥ १५ नवसादरगर्भो वा स्फटिकागर्भोऽथवा पिचुस्तौलः। दंष्ट्राधास्थः स्थगयति लालानावेण तद्रुजं जवतः ॥ २१ ॥ तथा इनमे द्विगुणित टंकण, इनके एकत्र चूर्ण को मुंह मे मलने से तत्गत छाले शीघ्र शांत हो जाते है ॥ १४ ॥ एक वस्त्रखड की चार तह करके उसमें, एक के ऊपर एक के क्रम से, भाकडे के चार पत्ते रखदें। भव, इन पत्तों मे अङ्गारवत् परितप्त - पत्थर के टुकडे को रखकर पोटली बांध, कपोल - फलक पर स्वेदन करें। इससे दष्ट्रा की वात- जन्य दु.साध्य वेदना शात हो जाती है ॥ १५-१६ ॥ शृगी- विष, मकलकरा, तुत्य, अफीम तथा भांवाहलदी इनके चूर्ण को मलने से दंष्ट्रा - जन्य वेदना शीघ्र ही दूर हो जाती है ॥ १७ ॥ भग्नि-योग से द्रवित - स्फटिका मे, इससे अर्ध-मात्रा प्रमाण में, अफीम डाल देवें । फिर, फ्रमश. द्रव के शुष्क हो जाने पर इन्हें उतारलें। इन दोनों से चतुर्थांश मरिच, पिप्पली तथा चित्रक लेकर चूर्ण बमालें । इस चूर्ण को उपरोक्त मिश्रण में मिलाकर दंष्ट्रापर मसलें । इससे दंष्ठा की वेदना शीघ्र शात होती है ॥१८-१९॥ सनीखार, स्फटी, कलिका, अफीम, नवसादर, तुत्थ सौषीर तथा हींग इनके चूर्ण को कपास में लपेटकर, अथवा इस चूर्ण की, जल-पिष्ट छोटी सी गुटि को दंष्ट्रारंध्र में रखने से, अथवा इस चूर्ण को मलने से दंष्ट्रा की वेदना शमित हो जाती है । गुटि को अथवा तूल- पिहित चूर्ण को दष्ट्रारध्र मे रखकर सिक्य से मुद्रित करदें। यदि लाला- स्राव हो तो उसे मुंहसे बाहर थूकते रहें ॥ २० ॥ नवसादर के चूर्ण को अथवा स्फटीचूर्ण को, कपास के फोहे में लपेटकर, दंष्ट्रा के १-ारलं शृशिकविषम् । २-आम्रगन्धिहरिद्रा। ३-अग्नियोगादिति शेष. । ४-पीघ्रम् । ५-सुधा कलिका । ६ बाल्हीकमित्युपलक्षणं, तेन ग्रन्थिकाकल्लककण्टकारी- फलविडगादीनामपि ग्रहणम् । ७-जलेन गुटीं कृत्वा दन्तच्छिद्रे दत्त्वा तदुपरि विक्थेन मुद्रा रचयित्वा गुटीप्रभावालालास्रावो भवेत्तं निष्ठीवेदिति । ८-दंष्ट्राजन्तूनपि ।
[मुसरोग- ३१८ सिद्धभेपजमणिमालाया १६ इशदीफलजो मजा दंष्ट्रयोरन्तरे धृतः । निहन्ति परमां पीडां ताटकामिव राघवः ।। २२ ॥ १७ रुचिरमरिचरचितं रजो मसृणवसनपुटपाति । शनकैः परिमलनौदलं दंष्ट्रागतगदधाति ॥ २३ ॥ १८ लोकपिष्टी सकर्पूरा व्यत्ययेन विधर्पिता। दंष्ट्राति खण्डयत्याशु दंष्ट्रेव चणकादिकम् ॥ २४ ॥ १९ पर्णे चूर्ण सादरं चापि किंचिद्दत्त्वा वीटीमेकवनां विदध्यात् । तामाघ्राय प्रौढदंष्ट्राशिरोऽर्तिः सद्यः स्वास्थ्य को न विन्दत्यमन्दम् ॥२५ २० मस्तगीपूगकत्थानि शाणिकानि पृथक् पृथक् । दलैश्चतुर्भिः संपिष्य ताम्बूल्याः पाकपिरैः ॥ २६ ॥ गुटिकाचणकोन्माना विदधीत विधानवित् । तो हन्युदन्तवेटस्थाश्छूलशोथादिकान् गदान् ॥ २७ ॥ २१ पूगखदिरवैदेहिमरिचोद्भवभूतिभिः । घर्पणादसनादन्तवेटजा रुक् प्रशाम्यति ॥ २८ ॥ २२ लवणं कुडवैः षड्भिर्भल्ली तु कुडवोन्मिता। युक्त्या न्यस्य द्वयं स्थाल्यां मुद्रयित्वा दहेदहो॥ २९ ॥ नीचे रखकर, लालास्राब करने से, तत्-गत वेदना शीघ्र शात हो जाती है ॥२१॥ दंष्ट्रा -रध्र - गत इगुदीफल की मजा, दष्टा की परम पीडा का उसी तरह संहार कर देती है जिस तरह राम ने ताटका का कर दिया था ॥ २२ ॥ मरिच के वस्त्रपूत चूर्ण को धीरे धीरे मलने से दंष्ट्रागत-वेदना का शमन होता है ॥ २३ ॥ कपूरसहित शुण्टी चूर्ण का घर्षण, दंष्ट्रा की पीडा को उसी तरह पीस डालता है जिस तरह दंष्ट्रा चने को ॥२४॥ पलाशपत्र मे नवसादर का चूर्ण रखकर, उसकी, एक मोर से खुले मुख वाली, वीटिक बनालें । फिर उसे सूंघे । इस तरह करने से दष्टना तथा मस्तक की उग्र वेदना मे किसे अत्यत शाति नहीं मिलती ? ॥ २५ ॥ रूमीमस्तगी, सुपारी तथा कत्था प्रत्येक तीन तीन भाषा लेकर चूर्ण बनालें। फिर, तावूल के परिपक्क चार पत्तो के साथ इसे पीसकर चने प्रमाण गुटियां बाधलें। यह दतवेष्ट - गत शूल तथा शोथ भादि को नष्टकर देती है २६-२५ सुपारी, खैरसार, पिप्पली और मरिच इनको जलाकर राख करले, इस राख के घर्षण से रसना एवं मसूढो की वेदना दूर होती है ॥ २८ ॥ लवण ९६ तोला, मिलाव सोलह तोला लेवें । प्रथम, एक थाली मे लवण फैलाकर, उस पर भिलावे के टुकड़े बिछादे । इस थाली को मुद्रित करके, सोलह सेर गोवरी की आंच का पुट देवें १-'हिगोटा' इति प्रसिद्धस्य फलमज्जा। २-परिमर्दनात् । ३-शुण्ठीचूर्णम् ४-पालाशपलाशे । ५-मुखे धृता सन्त्यः । ६-पिप्पली । ७-मितमिति शेषः ८-भल्लातकम् । ९-दशप्रस्थोन्मितैश्छगणकैर्दहेदिति ।
चिकित्सितम्] चतुर्थो गुग्छ। स्वाङ्गगीता विभूतिः सा दातव्या दन्तमार्जने । निरुध्यतेऽसृजः स्त्रावो दृढताऽपि समेधते ॥ ३० ॥ २३ सार्धत्रिमापा स्फटिकां स्फुटीकृता सप्तैव मापा लवणस्य सार्धकाः । वृक्षाम्लमक्षं सपयोधिगुजं रक्तं रदानां मलनाद्रजो हरेत् ॥ ३१ ॥ २५ त्र्यक्ष कालिगमजानमष्टाहं चर्वयन्नरः। मुच्यते दन्तनिर्यत्तनिर्यद्रुधिरनिर्झरैः ॥ ३२ ॥ २५ घटं सरन्ध्र तलपार्श्वभागयोन्युजं निदध्यादधितोयभाजनम् । प्रतप्त:धृततैलसिंहिकाँहिङ्ग्वादिधूमं क्रिमिदन्तवान् पिबेत् ॥ ३३ ॥ २६ नखम्पचोप्मसंस्पर्शः काथैः काश्मीरकल्पितैः । गण्डूपा दन्तसंरम्भशूलदौर्गन्ध्यदस्यवः ॥ ३४ ॥ २७ जटामांस्या विद्धतां रजसा दन्तघर्षणम् । मुखे वैशद्यसौगन्धमुखाः स्युर्गणशो गुणाः ॥ ३५ ॥ स्वांगशीतल होने पर, इसकी भस्म से दत-मजन करें। यह रक्त-साव का निरोध करता तथा दातो को मजबूत बनाता है ॥ २९-३० ॥ फुलाई हुई रक्त-स्फटी ३३ मापा तथा सेका हुभा लवण ७३ मापा, वृक्षाम्ल १ तोला, सीमाकभस १३ तोला- इनके चूर्ण को मलने से, दत-गत रक्त-स्राव वद होता है ॥ ३१ ॥ बहेडा की तीन तोला मजाचूर्ण को प्रतिदिन, एक सप्ताहपयंत, मलने से, दंतगत स्वत प्रवृत्त रक्तसाव बंद हो जाता है ।। ३२ ।। एक घट लेवें जिसके तल तथा पार्श्वभाग मे छिद्र हो । एक दूसरा घट लेवे, जिसमें करीब एक आढक जल भरदे । पार्श्व-तल - छिद्रयुक्त-घट को सजल घट पर भौधा रखदें। अब, एक प्रतप्त कढछी मे तैल, कण्टकारी- फल, हींग आदि औषधीय द्रव्य डालकर उसे उपरोक्त घट के पार्श्वछिद्र में से, भीतर चलादें । 'कृमिदत रोग से पीडित व्यक्ति, तलछिद्र में से निकलते हुये उपरोक्त द्रव्यों के धूम का पान करे । छिद्रपर मुख लगाकर पान करने से, दत - गत - कृमि, अधःस्थित जलपूर्ण घट में गिरे हुये दीख पडेंगे। अर्श -गत झिमियो में भी यह धूम - पान लाभ देता है ॥ ३३ ॥ दांतो को भाकात करनेवाले शूल, दोर्गन्ध्य आदि को केसर क्वाथ के कवोप्ण-गडूप, दूर कर देते हैं (हर लेते हैं)॥ ३४ ॥ जटामासी के चूर्ण को दांतोपर मलने से, स्वच्छता, सुगध मादि प्रमुख-गुणगणो से मुख सुशोभित हो जाता है ॥ ३५ ॥ १-स्फटिका चारुणवर्णा । २-लवणं शाकम्भरीसमुत्पन्नम् । तदपि भृष्टं ग्राह्यम् । ३-द्वीपान्तरीयतिन्तिडीकं सीमाकमिति नाम्ना प्रसिद्धम् । ४-रक्तिचतुष्टयसहितमक्षमिति योजना । ५-विभीतकमज्जानम् । त्र्यक्षमित्येकदिनमात्रा । ६-तलपार्श्वयो. सरन्ध्र घटमिति योजना। ७-कण्टकारीफलम् । आदिशब्दादेतादृशान्यन्यान्यपि वोद्धव्यानि । चेदर्श.सु क्रिमयस्तदा तत्राप्युपयोजनीयमेतत् । ८-काश्मीरं कुङ्कुमम् । ।
३२० सिहभेपनमणिमालाया [मुखरोग- २८ कूपतलचिरतरोपितमार्तिकशकलानि तुल्यवकुलानि । मसृणीकृतैरमीभिर्दन्ताः प्रभवन्ति वज्रसमुदन्ताः ॥ ३६॥ २९ भिपुटाकत्थर्वकुलफलधूलिः शनकैर्विधर्पिता नित्यम् । छुरिकेचे कलमकलशी चलदन्तापत्तिमुद्धरति ॥ ३७ ॥ ३० इह हन्त दन्तमूलक्षयचलदन्तेपु दन्तेषु। बकुलरजोऽपि ददन्ते विदितमिदं ते वृथाऽत्र विवदन्ते ॥ ३८ ॥ ३१ आटरूपरसैः क्षौद्रमाणिमन्थविमर्दितैः। घर्षयेद्दनश्रेणी वाढभावचिवृद्धये ॥ ३९ ॥ ३२ यवभस्मसीसककृते रजोभिरनवरतमभिमलनात् । लोहचणकचयचर्वणचण्डोदन्ताश्चलन्ति न च दन्ताः ॥ ४० ॥ 'सीसासाथे भस्म सारा जयोनी धूटी सीसीकाचानीमां भरोनी । आ मिस्सीनां ग्राहको छै घणाजी चावी नाखे लोहना जे चणाजी' । चिरकाल तक कूप मे पडे हुये मृत्पात्र के टुकडे तथा वकुल फल दोनों को समभाग लेकर सूक्ष्मचूर्ण बनालें । इस चूर्ण को मलने से दात वज्र की सीमा को प्राप्त कर लेते हैं ॥ ३६॥ मकुलफल, इससे चतुर्थांश कत्था, तथा कत्थे से अर्ध भाग इलायची- इनके चूर्ण द्वारा, लित्य शनै शनै, घर्षण से, छुरिका के घर्पण से कलम के अग्रभागकी तरह, चल- दंत रोग तरास दिया जाता है। चाकू से कलम के भग्रभाग को धीरे धीरे घिसने से जिस तरह एक नुकीलापन उद्धरित निर्मित - होता है, उसी तरह उपरोक्त चूर्ण को दातों पर निस्य शनै शन. मलने से बलदंतरोग उद्धरित-नष्ट हो जाता है। उद्धरित का अर्थ निर्माण करना नर्थात् भाकृति देना तथा निकालकर दूर करना अर्थात् नष्ट करना दोनों ही है ॥३७ ॥ दंत के, दंतमूल-क्षय करने वाले चल -दंत विकार में बकुल चूर्ण दिया जाता है । महो। यह तुझे विदित है तो फिर, यह वृथा विवाद क्यो ? ॥ ३८ ॥ सैंधव तथा शहद में परसे का रस मिलाकर घर्षण करने से दंतपक्ति दृढ होती है ॥३९॥ यवमस तथा सीसे की भस्म दोनो को मिलाकर निरंतर मर्दन करने से लोह के प्रचंड चणक - चयका चर्वण करने पर भी दंत चलित नहीं होते, यह प्रयोग पित्तरक्तनन्य दंत- विकार में ही करना चाहिये। कफवातजन्य दंत विकार में अभिवृद्धि करने के कारण वहा इसका प्रयोग निषिद्ध है। अग्रिम गुजराती -पध इसी श्लोक का अनुवाद मात्र है। गुर्जरदेश के होने के कारण स्व भट्टजी का इस भाषा पर पर्याप्त अधिकार था॥४०॥ अग्नि से फुलायी हुई रक्तस्फटी, बवूल के फल का सुखाया हुआ पिच्छिल - द्रव 'अका- १-बकुलफलेभ्यः कथं चतुर्थाश, त्रुटिश्च कत्था(शेति विवेचनीयम् । २-छुरिका कलमनिरवधिनिभृतां कलशीमुद्धरतीति चित्रमपि दर्शितमनयोपमया । ३-माणिमन्यः सैन्धवम् । ४-भयं योग पित्तरकजदन्तरोगेऽवचार्यों न कफवातदन्तरोगे, वर्धकत्वात् । ५-पूर्वोक्त एव योगो गुर्जरभाषया निबध्य प्रदर्शितः ।
A स्युः। are चिकित्सितम्] चतुर्थी गुच्छः । ३३ अग्नियोगविकचारुणस्फटी किकिरातफलपिच्छिलद्रवः । दाडिमीकुसुममामलं फेलं दन्तदयंजननं विमर्दनात् ॥ ४२ ॥ ३४ मजिष्ठाकत्थकासीसं रूमनिर्याससङ्गतम् । प्रत्येकमेकभाग स्यात्तुत्थं पादोंनभौगिकम् ॥ ४३ ॥ फलेभ्यो मञ्जुर्वेभ्यो ग्राह्य भागचतुष्टयम् । सर्वमेकत्र संक्षुण्णं प्रशस्तं दन्तमञ्जनम् ॥४४॥ ३५ पूगभसितमस्तङ्गीमनुफलानां पृथक तमाषाः अरुणस्फटिकातुत्थौ शिखिफुल्लौ राममापौ स्तः ॥ ४५ ॥ कत्थोपणं गमापं पेष्यमदः सर्वमेकत्र । चूर्णेनानेन नृणां चलिता दन्ता भवन्ति पविकल्पाः ॥ ४६॥ ३६ दाडिमीवल्ककुसुममञ्जिष्ठातिन्तिडीफलम् । घातकीरूमनिर्यासशमीग्रन्थिसकुण्डकैम् ॥ ४७ ॥ कोसीसं रडवरतं भद्रेला कुन्दुरुस्तथा । मनि गन्धंशटिका पृथग्गद्याणमात्रकाः॥ ४८ ॥ किया', दाडिम के पुष्प तथा भावला-इनके चूर्णद्वारा मर्दन करने से दांत मजबूत होते हैं ।। ४१ ॥ मंजिष्ठा, कत्था, कासील, रूमीमस्तगी प्रत्येक एक एक भाग, तुत्य आधा भाग, मायाफल चार भाग इन सबका एकत्र वस्त्रपूत चूर्ण दंतमजन रूप से प्रशस्त है ॥४२-४३ ॥ सुपारी भस, रूमीमस्तगी, मायाफल प्रत्येक छह छह माषा, अग्निपर फुलायी गयी रक्तस्फटी तथा तुत्थ प्रत्येक तीन तीन मापा, कत्था तथा पिप्पली प्रत्येक तीन तीन भाषा इन सवको एकत्र पीसकर चूर्ण बनालें । इस चूर्ण से हिलते दांत भी वज्रतुल्य दृढ हो जाते हैं ॥४४-४५॥ दाडिम की कलिया, लविंग, मंजिष्ठा, वृक्षाम्ल के फल, धाय के फूल, असली रूमीमस्तगी, शमी, पिप्पलीमूल, शोभांजनफल (नो रंगारयों के उपयोग में आता है - और जो शिवी से भिन्न होता है) हीरा कासीस, रङ्गवरत, बडी इलायची, कुन्दरु, मांजूफल भौर कपूर काचरी प्रत्येक छह छह माषा, जवाहरडे, फुलाया हुआ तुत्य और शीतल मरिच प्रत्येक तीन तीन माषा, वज्रदती एक तोला, फूलायी हुई १-बम्बूलफलपिच्छिलद्रव , स च शुष्को ग्राह्य , यस्य च यवनमते 'अकाकिया इति प्रसिद्धि । २-धात्रीफलम् । ३-अर्धभागं वा । ४-मायाफलेभ्यः। ५-षण्माषाः। ६-वहि- भृष्टौ । ७-पृथविमाषौ । ८-पृथक्त्रिमाषम् । ९-वज्रसमा इत्यर्थ । १०-दाडिमकलिका । ११-रुमनिर्यासो 'मस्तंगी' इति प्रसिद्ध. । स च प्रशस्तो ग्राह्य । १२-अनेनैव नाना प्रसिद्धं रङ्गकारोपयोगिशोभाजनफलम् । तच्च शिम्बीव्यतिरिक्त भवति। १३-चातुकासीस 'हीरा- कसीस' इति प्रसिद्धम् । १४-अनेनैव नाम्ना प्रसिद्ध रक्तवर्ण द्रव्य भवति । १५-माया- फलानि। १६-लोके 'कपूरकाचरी' इति प्रसिद्धा, सा च यद्यपि गद्याणमितोका तथाऽपि शणिकैव गृह्यते। सि० २१ । 4 [मुखरोग- सिन्दभेपजमणिमालायां खर्वा हरीतकी भ्रष्टतुत्थकं शीतलोपणम् । पृथक् शाणप्रमाणाः स्युर्वत्रंदन्ती पिचून्मिता ॥ ४९ ॥ व्याकोशस्फटिका मज्जा चिञ्चाफलसमुद्भवः। घृताश्मा क्रमुकं चेति पृथग्द्वादशधान्यकाः ॥ ५० ॥ लक्ष्णमेपां रजो दन्तदायकारि विधर्पणात् । मायाफलकमुकयोः कोकिलान्यत्र योजयेत् ॥ ५१ ॥ ३७ मांसी मुस्ता स्फटी तुत्थमाकलं वाकुलं फलम् । पृथग्गद्याणमानानि जरणं पूगजं फलम् ।। ५२ ॥ कासीसं रडवरतं निर्यासः किङ्किरातजः । दाडिमीवल्कलगिरमनीवनदन्तिकाः ॥ ५३ ॥ प्रत्येकशस्त्रिमापाणि शाणिकं माझुजं फलम् । पञ्चभिस्तुलिता मापैरत्र स्याञ्चोकचुन्निका ॥ ५४ ॥ मस्ती खर्वकायस्था सारंजं मसृणं रजः। पृथक् वस्वेकमापाणि पटुकत्थे पिचून्मिते ॥ ५५ ॥ सर्वाण्येकत्र संचूर्ण्य तेन घर्षयतां सदा । चला अपि रदाः पुंसामचलाः स्युरसंशयम् ॥ ५६ ॥ - इति मुखरोगचिकित्सा Co- . स्फटी, इमली के फल की मजा, धीयामाटा तथा सुपारी प्रत्येक एक तोला इनके सूक्ष्म 'चूर्ण द्वारा घर्षण करने से दात दृढ होते है । इस प्रयोग मे माजूफल तथा सुपारी को पृथक् पृथक् जला उनके कोयलो की भस्म बनाकर उपयोग में लें। उपरोक्त योग में कपूरकाचरी छह माषा प्रमाण में लेने को कहा गया है तथापि उसे तीन माषा भर ही ग्रहण करें॥ ४६-५० ॥ जटामांसी, मुस्ता, भृष्टस्फटी, तुत्थ, अकलकरा और बकुलफल, प्रत्येक छद छह माषा; जीरा, सुपारी, कसीस, रगवरत, बबूल का गूद, दाडिम की कलियां, गिलेअरमनी (एक प्रकार की प्रसिद्ध मिट्टीविशेष) और वज्रदती प्रत्येक तीन तीन भाषा; माजूफल तीन माषा, चोकचूना पांच माषा, मस्तंगी, जवाहरडे और लोहचूर्ण प्रत्येक अठारह माषा, लवण और कत्था प्रत्येक एक तोला इन सबको एकत्र पीसकर सूक्ष्म चूर्ण बनाले । इस चूर्ण को नियमित लगाते रहने से चलित दांत भी नि:संदेह स्थिर हो जाते है । ५०-५५ ॥ - मुखरोग चिकित्सा समाप्त - । १-अनेनैव नाम्ना ख्याता। २-द्वादश माषका । ३-भृष्टा । ४-'गिले अरमनी' इति नाम्ना प्रसिद्धा काचिन्मृतं । ५-लोहजम् । ६-अष्टादशमाषप्रमाणानि । - . अथ कर्णरोगचिकित्सितम् । प्रतिक्षणं कणद्धण्टाशसभेरीमृदङ्गकः । कपालपाणिराम्नातो नाम्ना कर्णामयो मया ॥१॥ १ अवोविकारक्षतये भिपग्भि 'वृथा कहैहे नुकसे हजारां'। ससूलपूयश्रुतिभाजिकणे 'देना जरासा रस गुल्हजारा' ॥२॥ २ सक्षौद्रोपणकृष्णेन निम्वपल्लवपाथसा। कोणेन पूरणं ब्रूमः कर्णशूलनिवर्हणम् ॥ ३ ॥ ३ अस्त्यानस्य कवोष्णस्य क्षौद्रस्य द्विनिविर्घषः। कर्णे निपतिता युक्त्या शूलार्ति नन्ति निश्चितम् ॥ ४॥ ४ अद्भिर्घष्ट्वा वचाखण्डं निम्बूकाद्भिर्द्रवीकृतम् । मनागुष्णीकृतं कर्णे भृतं शूलहरं परम् ॥ ५ ॥ ५ ताम्वूलवीटिकापीकगण्डूपं श्रवणे किरेत् । निश्चितं तेन तत्रत्यशूलार्तिर्मड्ड नश्यति ॥ ६ ॥ ६ पुरलशुनकारवीणां धूमो यन्त्रेण योजितः कर्णे । शूलं हरति समूलं किंतु दुकूलं शयीत संतत्य ॥ ७ ॥ - कर्णरोगचिकित्सा (कुल प्रयोग १५)- हाथ में मुंड को धारण किये हुये तथा प्रतिक्षण घंटा, शंख, भेरी एवं मृदंग की ध्वनि करनेवाले विकार को मैं 'कर्णामय' नामसे जानता आया हूं ॥१॥ कर्ण - रोग के शमनार्थ वैद्यो ने व्यर्थ में ही हजारों नुसखे लिख मारे ।।। क्योंकि हजारे- पुष्प के रस की कुछ ही बूदें कर्णगत शूल को तथा पूयनाव को नष्ट कर देती है ॥ २ ॥ निंब की कोपलों के स्वरस में शहदसहित काली मरिच पीस कर कवोप्ण करके कान में डालने से शूल निवृत्त हो जाता है ॥ ३ ॥ अग्निपर शहद को कुछ पतला बनाकर उसके दो तीन कवोप्ण बिंदुओं को युक्तिपूर्वक कान में डालने से तत्- गत शूल वेदना निश्चित नष्ट हो जाती है ॥ ४ ॥ वचा के टुकडे को पानी में पीसकर फिर, उसमे निवू रस मिलाकर पतला बनालें । इस द्रव को कुछ गरम करके कान में भरदें। यह परम शूलहर प्रयोग है ॥ ५ ॥ तांबूल की पीक को कर्ण में डालने से, उसकी वेदना शीघ्र शमित हो जाती है ॥ ६ ॥ गधक, लहसुन तथा अजमोदा इनकी धूम को नाडीयंत्रद्वारा कर्ण में लेने से, समूल नष्ट हो जाता है। कितु, धूम सेवन के तुरन्त पीछे, वस्त्र को आपाद मस्तक १-अथ मुखरोगचिकित्सानन्तर कर्णरोगचिकित्सारम्भः, तत्रादौ तत्वरूपवर्णनम् । २-चित्रकाव्योदाहरणम् ।, ३-बिन्दव। ४-नाडीयन्त्रेण । - - -- [कर्णरोग- ३२४ सिद्धभेषजमणिमालायां ७ श्रोत्रशूलहरं रक्तकाकणन्तीशृतं घृतम् । घृतं विडालपदकं फाकणन्त्योऽपि षोडश ॥ ८ ॥ तैलं शनैर्विपक्क चतुर्गुणे शालमर्कटस्यरसे। अपहरति कर्णशूलं बालमुकुन्देने मह्यमुपदिष्टम् ॥ ९ ॥ ९ धक्षाम्बुकल्कीकृतजीरमापं सरक्तिसिन्दूरमुमोत्थतैलम् । ध्यक्षं प्रपक्वं श्रुतिशूलचेयंदबूशिरकोथहरं प्रयोगात् ॥ १० ॥ १० मयूरपादकल्केन साधितस्तैलतल्लजः। अधिकर्ण प्रणयनात् पूयस्तावनिरोधनः ॥ ११ ॥ ११ कुक्कुटाण्डत्वचचूर्ण प्रतिसार्य कथंचन । पूरयेन्निम्वुकरसैः पूतिपूयती श्रुती ॥ १२ ॥ १२ सौभाग्यकम्पिल्लहरीतकीनां हरीतकीवारिविमर्दितानाम् । श्रवोवणस्रावजिदाज्यघृष्टा गुटी समापूरणलेपनाभ्याम् ॥ १३ ॥ १३ मुहूर्त निहितः प्लोतो नवसागरचूर्णयोः । दोषं विरेच्य सहसा दत्ते श्रवणलाघवम् ॥ १४ ॥ ओढकर सो जाना चाहिये ॥ ७ ॥ रक्त-गुंजा से सिद्ध किया गया घृत कर्णशूल को मिटाता है। यहां, घृत एक तोला तथा रक्तगुंजा सोलह तोला लेनी चाहिये तथा घी को, अन्य द्रवपदार्थ मिलाये बिना, केवल गुंजा में ही सिद्ध करना चाहिये ॥८॥ मूली के चतुर्गुण - स्वरस में तैल को धीरे धीरे उकालकर पकावें । यह तैल कर्णशूल को मिटा देता है। यह प्रयोग मुझे कामवन - निवासी वैद्य बालमुकुन्द ने बताया है ॥ ९॥ एक माषा भर श्वेत जीरा तथा एक गुजाभर सिदूर इन दोनों को दो तोला पानी से तीन घटे तक खरल करके कल्क बनालें। इस कल्क को मतसी के दो तोलाभर तेल में पकालें। माश्योतन, प्रलेप भादि विधि से प्रयुक्त यह तैल कर्ण- शूल, चेप्य, दद् तथा शिरोगत कोथ को दूर कर देता है ॥ १०॥ मयूर -पग के कल्क से सिद्ध-तैल-श्रेष्ठ को कान में डालने से पूयस्राव बद हो जाता है । मयूर-पग को गोमूत्र में पीसकर कल्क बना लेना चाहिये ॥ ११॥ कुक्कुटांड - त्वचा के चूर्ण को कान में भुरकाकर उसमें ऊपर से निंबूरस भरदें। इससे कर्णगत दुगंधमय पूयस्राव मिट जाता है ॥ १२ ॥ टंकण, कपीला तथा हरडे इनको हरडे के क्वाथ से अच्छी तरह पीसलें । तदनन्तर, इनकी गुटी बना उसको घृत में घिसकर, लेप करने से अथवा भरने से, कर्णगत व्रणस्राव का शमन होता है ॥१३॥ नवसादर तथा सुधा-चूर्ण इनके द्रव १-मत्र विनैव द्रवं घृतस्य पाकः करणीय । २-मूलकखरसे। ३-कामवनवा- सिना वैयेन। ४-शुक्लजीरकमाषं यक्षाम्बुना खल्वे यामं कल्कीकृत्य सर्व तैले निक्षिपेत् । ५-ससिन्दूरगुजमतसीतैलमित्यर्थ । ६-एतन्नाम्नैव प्रसिद्धो विसर्पणशीलो व्याधिविशेष । ७-आश्चोतनलेपान्यतररूपात् । ८-मयूरस्य पक्षिणश्चरणकल्केन । गोमूत्रमप्यत्र क्षेप्यम् । ९-पूतिपूर्व स्रवत इति विग्रहवाक्यम् । १०-हरीतकीवारि च क्वथनेन निष्पाद्यम् । ।
३२५ चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छ.। १४-१५ शिखिपादभवोऽधिश्रुति फूत्कारेण प्रवेशितः क्षोदः। निरुणद्धितरां तरसा पूयन्नावं पयोधिफेन इव ॥१५॥ इति कर्णरोगचिकित्सितम् - अथ नासारोगचिकित्सा। १ माषास्त्रयो मधुकमेपजयोः पडेला ध्यक्षा सिता पिचुमिताः समितातुपाः स्युः। एभिःशनैर्विरचितो रुचिरः कषायो नैस्ते निपातयति शीर्षकफ विपाच्य ॥१॥ २ पिष्टा धत्तूरबीजानि कुष्ठतोयैर्दिनाष्टकम् । गुमाशिसंमिता वट्यो ग्राहिण्यः पीनसापहाः ॥२॥ ३ नासानिय॑थने वाढं संनिरुद्ध बलासतः। कारवीपोट्टली जिनेन्मनागुष्णीकृतां कृती ॥३॥ ४ सुजातजातीफलपुष्पविश्वाकस्तूरिकाभिर्युगरक्तिकाभिः । प्रकल्पिता पोहलिका हिनस्ति नाता प्रतिश्यायभवां शिरोतिम् ॥ ४॥ से सिक्त- फौहे को, एक मुहूर्तभर कर्ण मे रखने , सहसा दोषविरेचन पूर्वक श्रवण- शक्ति सचेत हो उठती है ॥ १४ ॥ मयूर घरण के चूर्ण को, भथवा समुद्रफेन के चूर्ण को, कान में फूत्कारद्वारा चला देने से, पूयस्राव सहसा उसी तरह निरुद्ध हो जाता है जिस तरह पवन फूत्कार से समुद्रफेन ॥ १५ ॥ कर्णरोग चिकित्सा समाप्त- - नासारोग चिकित्सा (कुल प्रयोग ६)- मधूक तथा शुण्ठी प्रत्येक तीन मापा, इलायची नग ६, मिश्री दो तोला, तुष दो तोला, इनका एकत्र रुचिकर कषाय निर्माण करलें । इसका नस्य शीर्षगत कफ को पकाकर बाहर निकाल देता है ॥ १ ॥ भाठ दिवसपर्यत, कृष्ण धत्तूरे के शुद्ध बीजों को कूठ के पानी से (कपाय से) खरल करके १ गुजा प्रमाण वटियां बांधलें । ये वटिया ग्राही तथा पीनसरोग को मिटानेवाली होती है ॥२॥ नासिका -रध्रमें कफ के अत्यत रुद्ध हो जाने पर, कुशल रोगी को, अजमोदा की पोटली, कुछ गरम करके, सुंघानी चाहिये ॥ ३ ॥ भच्छे वजनदार जायफल, लविंग, सूठ, कस्तूरी प्रत्येक दो गुंजा इनको एकत्र एक पोटली मे बाधकर सूघने से प्रतिश्यायजन्य शिरोवेदना नष्ट १-उपमया द्वितीयो योगः प्रदर्शित । २-सग्रहानुसारेण कर्णरोगानन्तर घ्राणरोग- चिकित्सारम्भ , तत्रादौ प्रतिश्यायप्रतिषेध । ३-नासाविवरे । ४-कृष्णधत्तूरवीजानि, तान्यपि पूर्वोतविधिशुद्धानि। ५-" छिद्रं निर्व्यथन रोकम्" इत्यभिधानम् । ६-प्रत्येक द्विगुजाभि.।
३२६ सिद्धभेपनमणिमाकायां [नेमरोग- ५ छिकिकाकट्फलारब्धं नस्यं छियाप्रवर्तनम् । कट्रफलं छिकिकाचूर्णादल्पमेव विनिक्षिपेत् ॥ ५ ॥ ६ प्रज्वाल्य गोपुरीप' निर्वाप्य पयोभिरर्कसंभूतः। विरचय्य वस्त्रपूतं नस्यं छिका. प्रवर्तयति ॥ ६॥ - इति नासारोगचिकित्मितम् - अथ नेत्ररोगचिकित्सा। तूणीरपाशहस्तो निविडतमः स्तोमलब्धदृष्टिगतिः । चणकविकृतिविद्वपी विपिपु चक्षुरामयः स्फुरतु ॥ १॥ १ तूलप्लोतं जलाई जलभृतनवमृत्कुम्भपार्श्व प्रदत्तं तस्मादुत्पाट्य कृत्वा गुडजललुलितं तत्र भूयोऽपि दद्यात् । दर्वीकुक्षौ कदुष्णीकृतमनल शिखायोगतो चैद्यराट् त पीडाशान्त्यै निध्यादुपरि नयनयोस्तीवसंरम्भमाजोः ॥२॥ २ पादाङ्गुष्ठद्वितयं विवेष्ट्य रुबुतैलतूलतस्तदनु । मदयन्तीदलकल्कं वनीत दृढं हगामयी यामम् ॥ ३ ॥ हो जाती है ॥ ४ ॥ नकळीकनी तथा कट्फल से प्रयुक्त किया गया नस्य, छींक है । इस योग में कटूफल- चूर्ण, नकछींकनी से कुछ भल्प मात्रा मे ही लें ॥५॥ गाय की शुष्क गोवरी को जलाकर तथा भाकडे दूध से बुझा, वसपूत करके, नस्य लेने से, छींक की प्रवृत्ति होती है ॥ ६ ॥ नासारोग चिकित्सा समाप्त- लाता -नेत्ररोग चिकित्सा (कुल प्रयोग ३४) निविड़ अंधकार में भी देखनेवाला, हाथ में तूणीर तथा पाश धारण किये हुये, चणकविकृति का सेवन करनेवालों से विद्वेष रखने वाला 'चक्षु रोग' हमसे विद्वेष करनेवालों को ही दर्शन दे ('स्फरतु' का अर्थ नष्ट करनेवाला भी होता है)॥१॥ जलपूर्ण मिट्टी के नूतन घट के पार्थ मे जला-कपास के प्लोत को लगाकर रखदें। कुछ समय पीछे उसे वहा से हटाकर, गुड के जल में लथपथ करके, उसी घट पर पुन. रखदें। तत्पश्चात् चमचे के भीतर उस प्लोत को रखकर मग्नि से थोडा गरम करलें। अव इस प्लोत को, तीव्र वेदनासे पीडित चक्षुरोगी की शांति के लिये, उसके, नेत्रों पर कुशल-वैद्य स्ख देवे ॥ २ ॥ नेत्ररोगी के पैर के दोनों अंगूठो को, एरढ तैल से सिक १-छिकिका 'नकछीकनी' इति लोकप्रसिद्धा काचिदौषधि । २-गव्यं शुष्कवनो- पलम् । ३-इन्द्रियाधिष्ठानेषु पारिशेष्यानासासनिहितत्वाच्च नासारोगानन्तरं नेत्रगतरोगाणां चिकित्साऽभिधीयते । तत्रादौ तत्वरूपवर्णनम् । ४-कृत्स्ननेत्ररोगाणां प्रायोनिदानभूतत्वा- दभिष्यन्दस्यादौ साधनम् । ५-पट्टबन्धनेनेति शेष ।
- .. चिकित्सितम्] तुर्थो गुच्छ.। ३ अङ्गारे संफुल्लं लवगमेकं विचूर्णितं खल्वे । भृतमधिशार्करबुद्बुदमक्ष्णोराभ्योतयापटनद्धम् ॥ ४ ॥ ४ खाखसं कोलकलितं मापैका क्षुद्रचेतकी । गुञ्जोन्माना स्फटी चेति सर्वैरेकन चूर्णितैः ॥५॥ बद्धां पोट्टलिकामाद्री भ्रामयेल्लोचनोपरि । शूलसंरम्भविक्लेदलौहित्यानि विनाशयेत् ॥ ६॥ ५ वल्लवलक्षस्फटिकामप्सु समावाप्य मुष्टिमानासु । तद्विन्दवो हरन्ते हठेन दुःखानि चक्षुपोः क्षिप्ताः ॥ ७ ॥ ६ पचेद्रवीकृत्य सितामतल्लिकां समाननिम्बूकरसैः पयोभिः । पयःक्षये तत्पृषतः सुशीतलाः क्षिप्ता शोर्टग्वलमारभन्ते ॥ ८॥ ७ पृथगष्टादश भागाः स्फुटितस्फटिकासितासिताअनतः । स्फुटतुत्थात् सार्धेको निम्व्यम्बुकृता गतिजिटिका ॥२॥ ८ क्लेदकालुष्यलौहित्यविकारपरिशान्तये । एकमेव खलु क्षौद्रं नेत्रयोर्द्विस्त्रिरञ्जयेत् ॥ १० ॥ ९ रसे प्रस्थाधतुलिते मदयन्त्या निशोपिते । रसाञ्जनस्य कुडवं कृत्वा पित्तलपात्रके ॥११॥ फौहे से लपेट उस पर मेंहदी कल्क को चुपडकर, वस्त्र की पट्टी से मजबूत बाध देवें । इसको एक प्रहर तक रहने दे ॥३॥ अंगारपर एक लविग फुलाकर उसे खरल करले। इस चूर्ण को एक पतासे में भरकर, तथा पतासे को आईपट मे लपेटकर, उससे नेत्रों पर माश्चयोतन करें ॥ ४॥ पोस्त के ढोडे १ तोला, जवाहरडे एक माषा, स्फटी एक गुंजा इनका एकत्र चूर्ण बनालें। इस चूर्ण को पोटली में वाधकर तथा गुलाबजल से सिक्त करके आखों पर फेरें। इससे नेत्रगत शूल, केद, रतास भादि दूर हो जाते है ॥५-६ ॥ एक वालभर श्वेतस्फटी को चार तोले भर पानी से भिगो दें। इस द्रव के चिन्दुओंको भांख मे डालने से उसकी वेदना दूर हो जाती है ।। ७ ।। उत्तम मिश्री के चूर्ण को, समभाग निबूरस तथा जल मे मिलाकर पकाये। जब जलाश नि शेप हो जाये तव, स्वागशीतल होनेपर, उसके विन्दुओ को नेत्र मे टपकादें। इससे दृष्टि तीक्ष्ण हो होती है ॥ ८॥ भृष्ट - स्फटी, मिश्री तथा सफेद सुरमा प्रत्येक अठारहभाग, भृष्टतुत्थ १३ भाग इनको एकत्र लेकर निंबूरस में पीसकर वटिका बनालें । इस वटिका को, कान्तलोहपात्रमें जल से घिसकर नेत्रो मे भाजें । इससे पीडा का शमन हो जाता है ॥ ९ ॥ एक मात्र शहद को दो तीन बार आजने से नेत्रगत क्लेद, मल, लालिमा आदि विकार शमन हो जाते है ॥ १०॥ मेंहदी के ३२ तोला स्सम, २५६ तोला रसांजन को १-तरुणीपुष्पारााम् । २-मुष्टि. पलम् । ३-पृषतो विन्दवः। ४-सिता सितोपला, सिताञ्जनं श्वेताजनं 'सुफेद सुरमा' इति लोकख्यातम् । ५-भाग इत्यावर्तनी- यम् । ६-गुटिका च कान्तलौहे जले घृष्ट्वाऽञ्जनीया।
३२८ सिद्धर्भपजमणिमालायां [नेमरोग- वासरं न्युप्तढब्बूकनिम्बदण्डेनं घर्पयेत् । एपा रसक्रिया हन्ति नेत्रयोदुःखमञ्जनात् ॥ १२ ॥ १० रसासनं स्फटी फुल्ला सिता चेति त्रिकं पृथक् । कार्पिकं सर्पफेनस्य मापाः पञ्चाथ तुत्थकम् ॥ १३ ॥ सार्धद्विमापकं भृष्टं विधानमधुनोच्यते । रसाञ्जनं सिताफूक द्रवीकृत्य जलैः पृथक् ॥ १४ ॥ अयःपात्रे समावाप्य स्फटी तुत्थं च निक्षिपेत् । हसन्तीस्थं पचेन्मन्दं लोहदण्डेन धर्पयेत् ॥ १५ ॥ अर्धावशिष्टमुत्तार्य पुनर्यामं विधर्पयेत् । एषा रसक्रिया सद्यो नयनाति नियच्छति ॥१६॥ ११ शुष्काशुष्कं शकृद्गर्ते गर्दभस्य प्रदीपय । न्युजं भाण्डं तदुपरि गर्भच्छिद्रं समावप ॥ १७ ॥ छिद्रोपरि पुनर्युजं कांस्यपानं पिधापय । यः शकृद्धूमजः कश्चित् स्वेदः स्यात् कांस्यपात्रगः ॥ १८ ॥ तुल्यं तत्र घृतं धौतमेकविंशतिधा क्षिप । निम्बदण्डेन ढब्बूकचुम्बितानेण मर्दय ॥ १९ ॥ रातभर भिगोकर रखटें । फिर इनको, एक पित्तल के पात्र में डालकर, निंब-शासा के, तान-मुद्रा जटित अग्रभाग से, एक दिवसपर्यंत खूब घर्पण करें। इस 'रसझिया' के अंजन से नेत्रपीडा का भंजन हो जाता है ॥ ११-१२ ॥ रसांजन, भृष्ट - स्फटी तथा मिश्री प्रत्येक एक एक तोला, अफीम पांच माषा, भृष्ट तुत्य २३ मापा, इन औषधीय द्रव्यो से, निम्नविधिपूर्वक, सिद्ध प्रयोग निर्माण करलें । रसांजन, मिश्री तथा मफीम को अलग अलग जलमें घोलकर एक रस बनालें । इस रस को लोहपात्र में डालकर उममें स्फुटी तथा तुत्थचूर्ण मिला देवें । भव, इस लोहपात्र को एक अंगीठीपर रखकर, मंदाग्नि से, तत्-गत रस को पकावें तथा लोह-दड से द्रव को हिलाते रहें । अर्धरस शेप रहने पर उतारले तथा एक प्रहर तक पुन लोहदंड से इस द्रव को, निरतर घोटते रहें। यह 'रसक्रिया' नेत्रवेदना को शीघ्र शामित कर देती है ॥ १३-१६ ॥ एक गर्त में गदहे की लीद डाल देवें । लीद का अर्धभाग शुष्क तथा अर्धभाग आर्द्र होना चाहिये । भव, इस लीद को प्रज्वलित करदें । इसी गर्त के ऊपर तलछिद्र- वाले एक घट को औंधा ढकदे। घटगत छिद्र के ऊपर एक कांस्यपात्र औंधा रखदे इस कास्यपान के तेलभाग में, धूमसे उत्पन्न कुछ स्वेदकण जमा होगे । इन स्वेदकणों में, इनसे समानभाग २१ वार धौत - घृत मिलादें। भव, घृतसहित इन स्वेदकणो को, १-बहुव्रीहिगर्भितर्मधारय । २-फुल्लम् । ३-अधं सर्वथा शुष्कमधू चामिति है , द्वयं मेलयित्वा प्रज्वाल्यम् । , १ चिकित्सितम्] चतुर्थी गुच्छ । इमां रसक्रियां विद्धि प्राप्तामादित्यरामतः । दृक्पक्ष्मकोपलौहित्यकण्डक्लेदेषु वर्तय ॥२०॥ १२ आफूकपूगस्फटिकामलेपो निम्बूकनीरैरसकृत्प्रणीतः । संरम्भमुत्सार्य सशोणभावमहाय शं लोचनयोर्विधत्ते ॥ २१ ॥ १३ विकसितशोणस्फटिकां विमद्य निम्बूकसंवरैर्विहिता। मसृणशलाका शमयति शनकैापारिता दृशोर्दुःखम् ॥ २२ ॥ १४ भस्म दक्षिणगोकण्टभवं सार्धद्विमापकम् । तीक्ष्णानि सार्धमापाणि सैन्धवं साभिमाषकम् ॥ २३ ॥ वलक्षजलं चात्र स्यादष्टादशमापकम् । यहं विमर्च खल्वान्तरजयेदुःखितेक्षणः ॥२४॥ १५ चतुर्दशैव गद्याणान् पीतपथ्योत्थवल्कतः । कृष्णामरिचतो द्वौ द्वौ गद्याणी पुनराहर ॥ २५ ॥ धात्रीरसशरावेण विमर्य कुरु वर्तिकाः। अजस्त्रमय दृशोः प्रसूनतिमिरार्तिषु ॥ २६ ॥ नियशाखा के तानमुद्राजटित - अग्रभाग से, मर्दन करें। यह 'रसक्रिया' मुझे मादित्य- राम से प्राप्त हुई है। इसका प्रयोग पक्ष्मकोप, रताश, खुजली, क्लेद आदि नेत्र के विविध विकारो में करना चाहिये ।। १७-२० ॥ अफीम, सुपारी तथा स्फटी इनको निंबूरस में घोलकर एकरस बनालें। इस रसके कतिपय विदु, सहसा, बलात् नेत्रो में टपकादें । यह तत्-गत लालिमा को हटाकर गांतिप्रदान करता है । इस योग में स्फटी को, अफीम तथा सुपारीसे, कुछ न्यून मात्रा में लेवें ॥ २१ ॥ भृष्ट -रक्त- स्फटी को निंबूरस में दो दिन तक खूब खरल करें। इसको एक कोमल शलाका से नेत्रों में भांजिये। यह नेत्र-गत साव, कण्डु, फूला आदि से उत्पन्न वेदना को दूर कर देती है । (अथवा, उपरोक्त स्फटी को निंबूरस में खरल करके उसकी शलाका निर्माण करें। इस शलाका को नेत्र में धीरे से भाजें)॥२२॥ दक्षिणदेवाके गोखरू २३ मापा लेकर उनकी भस बनालें । पूर्वदेशोद्भव काली मरिच ११ मापा, सैंधव ११ माषा तथा श्वेताजन भठारह माषा-इनके सूक्ष्म चूर्ण को उपरोक्त भस्म में मिलाकर तीन दिन तक खूब खरल करें। इसका अंजन नेत्रपीडा को दूर करता है ॥ २३-२४ ॥ पीली हरडे की छाल ८४ माषा, पिप्पली तथा मरिच प्रत्येक यारह १-पक्ष्मकोपस्य लक्षण च “पक्ष्माशयगता दोपास्तीक्ष्णाग्राणि खराणि च । निर्वर्त- यन्ति पक्ष्माणि तैर्जुष्टं चाक्षि दूयते । उत्पाटितै पुन शान्ति पक्ष्मभिश्चोपजायते । वाता- तपानलद्वेषी पक्ष्मकोप स उच्यते॥” इति शालाक्यनिगदित द्रष्टव्यम् । २-अत्र स्फटिका आफूकयूगापेक्षया किश्चिदल्पा ग्राह्या, खजुभयात् । ३-व्यहमिति शेष । ४-स्रावकण्डू- पुष्पादिजनितम् । ५-पूर्वदेशोद्वानि मरिचानि। ६-वेताजनम् । - ३३० सिदभेषमणिमालायां [मेरोग- १६ न्युक्तं पञ्चदशाहानि निम्बमूले स्वयुक्तितः । स्रोतोञ्जनं जनाः शुद्धं विलोचनरुजापहम् ॥ २७ ॥ -१७ निम्बे किंच कदल्यां पाथम्येकवर्षमप्युपितम् । कृष्णानस्य शकलं शलाकया दन्ति ग्याधीन ॥२८॥ १८ नागं पात्रगतं चतुर्गुणबलिप्रक्षेपसंस्कारितं दग्ध्वा काष्ठकशानुना स्थलपयोजन्माम्युमिमदयेन् । सिद्धोऽसौ मसृणीकृतो रसबरः प्रातशोरसितो धत्ते दुर्धरदृष्टिदोपपरिपच्छार्दूलविक्रीडितम् ॥ २९ ॥ १९ पोडशगुणां सिताया नवजातीकुनुमनालिकां पिष्ठा । तत्करकजवर्तिरुपसि विवर्तिता भवति चक्षुण्या ॥ ३० ॥ २० चपैलस्तुशिलः पृपत्कपलिकाच मालतीकलिकाः। मसृणीकृतसिदमसनमान्ध्यमपि निहन्ति नित्यमुपयोगात् ॥ ३१ ॥ २१ नवसादरमुहाय्य प्रपिप्य ढकन प्रहरम् । दत्तं शलाकया दृशि हन्ति शनैरान्ध्यमपि नियतम् ॥ ३२ ॥ मापा इनको एकत्र लेकर, भारले के बत्तीस गोला रम में परल फरक यति बनालें। फूला, तिमिर मादि से उत्पन्न पीठा में इस वर्तिका नित्य अंतन करे ॥ २५-२६ ॥ कालेसुरमे को, निववृक्ष के मूल में युक्तिपूर्वक गाटकर, पढरह दिवस पर्यत रहने दें। यह नेत्रवेदना को मिटा देता है ॥ २७ ॥ निब - कोपलों के रस में तथा कदली-रममें काले सुरभे के टुकडे को, क्रमशः एक एक वर्ष तक रहने दें। फिर, इसको निकाल कर तीन दिवस तक खरल करके सीसे की शलाका से आजें । यह नेत्र व्याधियों को दूर कर देता है ॥ २८ ॥ एक पात्रस्थित नसद को, उसमें उससे, चतुर्गुण गंधक मिलाकर, काष्ठानि से जला डालें। इस तरह शुद्ध किये गये नसद को गुलाव-जल से खरल में खूब घोटें । घोटकर मुलायम बनाये गये इस सिन्द - रसश्रेष्ट को प्रात: नेत्रो में लांजने से, दृष्टिगत तीव्र - विकार -समूहरूपी शार्दूलविक्रीढन शांत हो जाता है । (इस उंद का नाम भी 'शार्दूल-विक्रीडित' है। छंद में, छंद के नाम को यथा- अर्थ विटाना, कवि की प्रौढ - काव्यकुशलता का निर्देश करता है) ॥ २९ ॥ मिश्री में, उससे सोलह गुने अधिक, नूतन जातिपुप्प के डण्ठल मिलाकर, खूब बारीक पीसकर, वर्ति बनालें। प्रात - -काल इसको लगायें । यह वर्ति चक्षुप्य हे ॥ ३० ॥ पारद एक तोला, मालतीपुप्प की -कलियां वीस तोला- इनको बारीक मुलायम पीसकर अंजन बनालें। इसके नित्य उप- योग से अंधापना भी दूर होता है ॥ ३१ ॥ डमरुयंत्र मे नवसादर को उडालें । फिर, १-कृष्णाजन 'काला सुरमा' इति प्रसिद्धम् । २-निदिनं खल्वयित्वा यशदशला- कया अजितम् । ३-तरुणीसुमार्के । ४-पारद.। ५-तुर्योऽश पलाद्यस्यति व्यधिकरण- बहुव्रीहि पलचतुर्थाश इत्यर्थ । ६-पञ्चपलिका । ७-डमर्वादिना । * - चिकित्सितम्] चतुर्थी गुच्छः। २२ त्रिचतुःपञ्चवर्षीया शर्करा मसृणीकृता। चक्षुपोरञ्जनादान्ध्यं जित्वा ज्योतिः प्रयच्छति ॥ ३३ ॥ २३ मसृणं माक्षिकरंजः किंचिन्माक्षिकसाक्षिकम् । द्वित्रिवेलं दृशोर्दत्तं विकाराणां निकृन्तनम् ॥ ३४॥ २४ ताम्रादक्षं पटोर्गन्धात् पञ्च प्रत्येकमक्षकान् । द्विनिम्बुनीरं संभृत्य काचकूपे पिधाय च ॥ ३५ ॥ मासं संस्थाप्य धर्मान्तस्ततः सूक्ष्म प्रपेपयेत् । मेषीक्षीरसरमिंग्धदृशोरञ्जनमाचरेत् ॥ ३६ ॥ लिहन पलघृतं प्रातस्तीक्ष्णतेलगुडाम्लमुक् । आन्ध्याद्विमुच्यते पथ्याभ्यासी कतिपयैर्दिनैः ॥ ३ ॥ २५ सापामार्गरसे कांस्ये ज्वालयेत् खण्डमैन्दवम् । असद्वर्तयेद्युक्त्या यावत्तस्य क्षयो भवेत् ॥ ३८ ॥ पात्रस्थं रस किटं तदयेन्मसृणीकृतम् । हन्यादप्यान्ध्यमभ्यासात् का पुनईग्रुजां कथा ॥ ३९ ॥ एक प्रहर, इसको ताम्र मुद्रासे घिसें । इसको शलाकाद्वारा सांस से मांजने से, नेत्रगत अन्य विकारों सहित धीरे धीरे अंधापना भी नि सदेह दूर हो जाता है ॥ ३२ ॥ तीन चार मथवा पाच वर्ष पुरातन मिश्री के धारीक चूर्ण को भाजने से मांध्य दूर होता तथा ज्योति प्राप्त होती है ॥ ३३ ॥ थोडा शहद स्वर्णमाक्षिक के सूक्ष्म मुलायम चूर्ण को, दो तीन पार भाजने से दृष्टिविकार दूर हो जाते हैं ॥ ३४ ॥ तान एक तोला, लवण तथा गधक प्रत्येक पाच तोला, तथा दो निंबू का रस- इन सबको काचकूपी में भरकर उसके मुख को बढ करदें। एक मासपर्यंत उसे सूर्यताप में रहने दें। फिर, निकालकर, इन सभी द्रव्यो को सूक्ष्म पीस लेवें । अब, मेड के दूध की मलाई को, प्रथम, पांच दिवसपर्यंत नित्य भांखो पर बांधें । फिर, छठे दिवस से उपरोक्त अंजन लगाना प्रारभ करे। प्रयोगकाल से, प्रात., चार तोलाभर ताना गो-घृत चाट लेना चाहिये, तथा तीक्ष्ण पदार्थ तैल, गुड, प्रभृति त्याग देना चाहिये। इस तरह पथ्यपूर्वक रहने से कुछही दिवसो से, मध्यसे मुक्ति मिल जाती है ॥३५-३७॥ चार या पांच तोले भर अपामार्ग-स्वरस को, कांस्यपात्र मे भरकर, उसमें एक तोला कपूरखंड प्रज्वलित करके डाल देवें। इसी कर्पूरखंड को, पात्र मे से पुन निकालकर, पुन जला- कर डाल दें। इस तरह पुन. पुन: जलाकर डालते रहने से, कर्पूरखंड नि शेष हो जायेगा, अब, पात्रस्थ किट को निकालकर वारीक पीस लें। इसको भाजने से, मांध्य भी जब दूर हो सकता है, तब नेत्र के अन्य विकारो की तो कथा ही क्या ? ॥ ३८-३९ ।। १-वर्णमाक्षिकचूर्णम् । २-मेषीक्षीरसतानिकावन्धनमञ्जनात् पूर्वमेव पञ्चाहं कार्यम् । ३-चतुस्तोलके पञ्चतोलके वाऽपामार्गस्वरसे कर्पूरखण्डं तोलकमितम् । मिलाकर ।
4 mhd मिनभेपनमणिमालाया निरोग- २६ सौभाग्यं सादरः सौरः स्फटिका सैन्धवोत्तमम् । एपां पातालयन्त्रोत्थं सत्त्वं शुमानिरान्तनम् ॥ २० ॥ २७ हेमक्षीरीपयो घृष्टं कांस्यपाने शनः शनैः । अजितं चक्षुपोर्मनु नवं कृन्तति पुष्पकम् ॥ ४ ॥ २८ मृगपित्ते न्यस्य कणा घुतभृतकऽधिभृमि निदधीत । मासान्ते ताः पिष्टा शान्तितरां पटलमसनतः ॥ ४२ ॥ २९ पुनर्नवाया रजसो गृहीत्वा नभ्यं पुनः पावकमनतो नुः। निःसंशयं सप्तभिरेव धन्नैः प्रयाति शाकुटीच्य बाऽस्तम् ॥ ४३ ॥ ३० मुष्टिं कलिसिकायो जीर्णन गुटेन साधु सन्नीय । वटिका सप्त विधेया भूशूलं राष्ट्रियस्मरं हरति ॥ १४ ॥ ३१ अबत्यसाबुजक्षारपिण्डी घृष्ट्वाऽञ्जयेन्मनाक । विनाशयति नक्तान्ध्यं त्रिभिरेव दिनरहो ॥ ५५ ॥ ३२ चूर्ण तामाखवं लक्ष्णपिष्ट वस्त्रेण गालितम् । नेत्रयोरजनाद्धन्ति नक्तान्ध्य कतिभिर्दिनैः ॥ १६ ॥ ३३ सदैव दन्तपवनभक्षणं वामदंष्ट्रया। हन्ति हंहो दृशोर्दुःखं संशयश्चेत् परीक्ष्यताम् ॥ ४७ ॥ सौभाग्य, नवसादर, कलमी सोरा, स्फटिका तथा काच जाति का उत्तम सेंधा, इनका पातालयंत्रद्वारा निकाला गया सत्त्व मास के फूले को काट देता है ॥ ४० ॥ स्वर्णक्षीरी के दूध को कास्यपात्र में धीरे धीरे सूब धिमें। इस दूध को मास में भाजने से, नूतन फूला कट जाता है ॥ ४१ ॥ मृगपित्त में पिप्पली मिलाकर घृतपूर्ण करने में भरकर, भू-गर्भ में गाढ देवें। एक मास पीछे इसको निकालकर, पीसकर अंजन करें। यह 'नेत्र-पटल' को शीघ्र दूर कर देता है ॥ ४२ ॥ पुनर्नवा-मूलत्वक के चूर्ण का नस्य लेकर, फिर ऊपर से हलवे का भोजन करनेवाले मनुष्य के शस-प्रदेश तथा झुकुटी की वेदना सात दिवस में ही मस्त हो जाती है ॥ १३ ॥ एकमुष्टि भर (एकपल) कलौंजी को पुराणे गुड में भच्छी तरह मिलाकर सात वटिकायें बनालें। यह वटिकायें, दृष्टि को क्षीण करने वाले श्रुकुटीशूल का शमन करती है ॥ ४४ ॥ सानुन के क्षार- पिण्डी को घिसकर मत्यल्पमात्रा में मांजने से, महो! तीन दिन में ही नकान्भ्य नए हो जाता है ॥ ४५ ॥ तमाखूपत्र के वस्त्रपूत सूक्ष्म मुलायम चूर्ण को पास में गांजने से कुछ ही दिनो में नतान्ध्य मिट जाता है ॥ ४६॥ महो! वाम-दंदापर नित्य प्रति दंत-पवन (दांतुन) करने से नेत्रपीडा का शमन हो जाता है। यदि इसमें शका हो तो परीक्षा करके देख लीजिये ॥ ४७ ॥ १-काचभासुरे सैन्धवलवणम् । २-'फूला' इति प्रसिद्धम् । ३-नरस्य । ४-"चलो दिनाहनी वा तु" इति कोष । ५-लोके 'कलोजी' इति ख्याताया । ६-तमासोरिदं तामाखवम् ।
चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छ । ३३३ ३४ मौजे गुणं परिभ्राम्य सप्तधा मस्तकोपरि । क्षिप्त्वा चतुष्पथे सायं गृह्णीयाल्लोकलवित्तम् ॥ ४८ ।। प्रान्तवेष्टिततृलं तं कृत्वा तैलनिमजितम् । न्युजं धृत्वा शिशौ दुःस्थेशि पश्यति दीपयेत् ॥ १९ ॥ रुधिरेण सहैवाक्ष्णोस्तेन तैलस्य विन्दवः। पतन्ति सचटत्कारं भाजने भृतपाथसि ॥ ५० ॥ त्रिभिरेव दिनैरेवं प्रणश्यति दृशोरसृक् । तन्त्रे किं त्वत्र योषिद्भिरुद्दिष्टः सावरो मनुः ॥ ५१ ॥ इति नेत्ररोगचिकित्सा। अथ शिरोरोगचिकित्सितम् । १ नवसादरभृतगर्भ सितोपलावुद्बुदं निगीर्यानु । मिपिगोधूमसितानां भुञ्जीत शिरोगदेऽपूपान् ॥ १॥ मूज को बटकर रस्सी बनाले । इस रस्मी को मस्तक के ऊपर चारो तरफ घुमा- कर प्रात काल में ही चौराहे पर रखदे । इस तरह, मार्ग पर भावागमन करने वाले मनुप्यो से उल्लंधित इस रस्सी को साझ के समय उठा लावें । भव, इस रस्सी के एक छोर पर कापूस लपेटकर उसे तैल में भिगोकर सिक करलें । रस्सी के दूसरे छोर को हाथ में लेकर कापूस वाला छोर नीचे लटका दें। इस तैल-सिक्त कपासवाले छोर को, अपनी पीडित भासो से इसको देखते हुये बालक के भागे, प्रज्वलित कर दें। नीचे एक, जलपूर्ण थाली रख दे। इस जल पूर्ण थाली में चट चट ध्वनि करते हुये तैल-विंदु, सामने बैठे हुये बालक के नेत्र-गत दूपित - रुधिर के साथ ही, गिरने लगेंगे। (साक्षात् रुधिरबिंदु तो नहीं गिरते किंतु तैलबिंदुलो के गिरने के साथ क्रमश नेत्रगत रुधिराक्तता अवश्य अल्प होती रहती है।) इस तरह तीन दिवस पयंत करने से नेत्रगत रुधिर-दोष मिट जाता है। इस 'तत्र' का उपदेश महिलाओं ने 'सावर' मनु को दिया था ॥ ४८-५१ ॥ - नेत्ररोग चिकित्सा समाप्त - शिरोरोग चिकित्सा (कुल प्रयोग १७)- शीर्ष-विकार में, मिश्री के पताशे मे नवसादर चूर्ण भरकर निगीर्ण करके उसके ऊपर, सौंफ तथा मिश्रीमिश्रित गेहू के भाटे से निर्मित मालपूये का भोजन करें ॥१॥ १-अधुना लोकदृष्टमुपायमभिदधति श्रीगुरव । २-अभिष्यन्ननेत्रे । ३-न त्वत्र तादात्विक साक्षावधिरपतनं कितु कृते यस्मिंस्तन्त्रे क्रमेण नेत्रलौहित्यमपयाति । ४-ऊर्ध्वा- जरोगेषु शिरोरोगस्यैव पारिशेष्यात्तचिकित्सारम्भ ।
. सिमेपनमणिमालगाया [गेग- २ सितोपलाघुसृणयोलिनिः किंचिदियोष्णयोः । असतेऽनन्तवाताति कुवमत्स्यीय मश्रियाम ॥२॥ ३ छदनरस निव? राजकोशातकीनों तवकतलविपश्चारगोधूमः । रचितसुचितसर्पिः शर्करोटासि लनु भृकुटिभिदमनन्तं लम्भयेद्वानमन्तम् ॥ ३ ॥ ४ मजानो हविपि दगालम्य किंचित्संभ्रष्टा. पुनमपिनासे निताया। पीयूषादपि रुचिमहतां दधाना मस्ति सपदि विशिष्य परयन्ति । ५ प्रत्यग्रकटफलरजो भृतनारिकेल दुग्धाढक कथननो नय पिणभावम | पिष्ठा वृत्ते तलितमुतवलक्षखण्डं वातामकुमस भज मूर्यनक्षु ॥५॥ ६ जातीदलफलदरदोन्चटायपाधातकी'नुमाफकम् । सितकरवीरसुमाद्भिर्विमर्थ गुटकीहंत शिरोनिहरम ॥ ६ ॥ मिश्री तथा केसर को पीसकर, उसका मनर पर करोष्ण र, जीपवेदना को (भनन्त - यात-पीटा को) उसी तरह ग्रसित कर लेता है जिस गरट लिसरली माती को ('अनन्तपात' दोपत्रय - प्रकोपजन्य, गीविकार निशेप है। इस रोग में नीनों दोप प्रकुपित होकर मन्या में पीडा उत्पन्न करते हुये चक्षु, मोह तथा शाम प्रदेश में अपनी स्थिति कर लेते हैं। परिणामत., गण्ठस्थल में नीव वेदना होने लगती है। हनु स्तंभित हो जाती है तथा विविधप्रकार के नेत्ररोग उत्पन्न होते हैं)॥०॥ तुरई-पत्तों के म्बरस से गेहूं के भाटे को बांधकर उसकी याटियां बना तरे पर सेकलें। फिर, इन वाटियो को चूरकर उसमें घी और शपर मिला उसके रूद्ध बांधलें । इनका सेवन करने से भ्रुकुटि का भेदन करने वाले 'मनन्तपात' का मन्त हो जाता है ॥ ३ ॥ स्वरबूजे की मज्जा को घी से थोडी भूनकर, शर्करा की चासनी में डाल देवें । अमृत से भी अधिक अद्भुतरुचि उत्पन्न करने वाला यह रसायन मस्तिष्क का शीव हण करता है ॥ ४ ॥ नारियल के २.६ तोरा दूध को, ताजा कट्फलचूर्ण सहित खूब उकालकर, मारे जैसा पिंड बनालें । फिर इसको घी में भूनकर, मिश्री मिला, वादाम, केसर आदि डालकर, गीर्पवेदना में सेवन करें ॥५॥ जावित्री, जायफल, हिंगुल, उटिंगण के वीज, गांगेलकी-त्या (गगेरन), धाय के फूल लविंग, अफीम इन भीषधीय गुन्यों को, श्वेतकरवीर-पुष्परस में घोटकर, गुटी यनालें। १-धुसूणं कुङ्कुमम् । २-अनन्तवातलक्षण च सुश्रुतोत्तरे यथा-"दोषास्तु दुष्टत्रय एव मा सपीब्य घाटापु रुजां सुतीवाम् । कुर्वन्ति साक्षिवशवदेशे स्थितिं करोत्याशु विशेषतस्तु । गण्डस्य पार्श्वयु करोति क्म्पं हनुग्रह लोचनांश्च रोगान् । अनन्तवातं तमुदा- हरन्ति दोषत्रयोत्थं शिरसो विकारम् ॥” इति । ३-'गिलगिल तोन्यू' इति ख्यातानाम् । ४-अनन्तवातनामक रोगम् । ५-'ख—जा' इति प्रसिद्धस्य । ६-तन्तुलीरूपे । ७-उन्चटा 1. चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छः। ३३५. ७ एलेयवीकाद्विपटुप्रपूर्ण निम्बूकखण्डं परिपाच्य युक्त्या। संचूपयन्मुद्गतपित्ततप्तशिर-कपालः सुखमेति सद्यः॥७॥ ८ 'लेना दोस्त वदाम पोस्तफलके दानां चिरोंजी तिली राई ओ पिसता खरी वजनमें एकैक पैसाभरी । छै मापे पुनि लोहवान कुचिला पोंनेजु तोलासही घीमांही करि लूपरी मगजके दर्दीकु काफी फही' ॥ ८ ॥ ९ प्रलेपो राजशणिकास्वरसैरुपयोजितः। विध्वंसयति दुःसाध्यामपि मस्तकवेदनाम् ॥९॥ १० शुण्ठीलवङ्गकपूरैः सममर्जुनचन्दनम् । शिरोर्तिघस्सरो लेपः कृत्रिमेण हिमेन वै ॥ १०॥ यह शीपंवेदना को मिटा देती है । इस गुटी को, रात्रि के समय, शकर - निर्मित सीरे में लपेट कर लेनी चाहिये । इसको लेकर ऊपर से सीरे के ४५ कवल खाने चाहिये । प्रयोग- काल में भम्ल पदार्थ वज्र्य हैं ॥६॥ एलिया, वीकामाली और दोनो नमक (सामुद्र तथा सैंधव) इनको निंबू के एक टुकडे में भरदें। फिर, इस नींबू-खडको युक्तिपूर्वक अग्नि के उपर पकाकर उसके रस को चूसें । इसके द्वारा पित्त से परितप्त मस्तक तथा कपाल को शीघ्र शाति मिलती है ॥ ७ ॥ हे मित्र । बादाम, पोस्त के दाने, चिरोंजी, तिली, राई तथा पिस्ता प्रत्येक एक एक पैसाभर, लोबान छह मापा तथा कुचला नौ मापा इन सवको लेकर इनकी घी में लेपरी बना मस्तक पर लगाये । शीर्ष वेदना में यह प्रयोग पर्याप्त है ॥ ८॥ रायसणी के (रायसींगणी गुर्जर नाम है। यह पीतपुष्प- वाली एक सिद्ध औपधि है। इसके पत्ते ठीक इमली के पत्तो से मिलते जुलते होते हैं। यह औषधि बहुधा घर की दीवारो पर अथवा बाडपर उग भाती है।) पत्र-स्वरस का प्रलेप मस्तक की दृष्टि - विध्वंसनी-वेदना को, दु साध्य हो तो भी, मिटा देता है। यह प्रयोग शिशिर में ही दो तीन बार करना चाहिये अधिक नहीं ॥ ९ ॥ सूंठ, लौंग, कपूर, अर्जुनत्वक् तथा श्वेत चंदन-इनका बरफ से शीतल 'उटींगण' इति ख्याता, तस्या वीजान्यत्र ग्राह्याणि, झषा गारुकीत्वक, धातकीम 'धाय- फूल' इति ख्यातम् । ८-इदं च शार्करपावकग्रासे निशि सेवनीयम् । तदुपरिष्टाच्च चतु पञ्च- पावकग्रासान् भक्षयेत् । अम्लादिकं च वर्जयेत् । १-बीका ‘वीकामाली' इति ख्याता। द्विपटुशब्देन सामुद्रसैन्धवे ग्राह्ये। २-रेक-- द्वारा शं प्राप्नोति । एतत्पित्तज्वरेऽपि देयम् । ३-नव माषा इत्यर्थ । ४-उपनाहस्य लौकि- कसज्ञेयम् । ५-रायसणी, रायसींगणी' इति गुर्जरे ख्याता पीतशबलपुष्पा काचिद्वाटी- रोहिणी सिद्धौषधिर्भवति, यस्याः पत्राणि चिम्चापत्रसपत्नानि भवन्ति । ६-शिशिर एव 'द्वित्रिवार कल्पित । ७-दृष्टिविध्वसिनीमिति शेष । ७-दृष्टिविध्वसिनीमिति शेष । ८-श्वेतचन्दनम् । ८-श्वेतचन्दनम् । ९-'वरफ इति प्रसिद्धेन ।। न सिद्धभेपजमणिमालायां [शिरोरोग- ११ नवसादरपानीयप्लुतप्लोतावृतं शिरः । व्यथया त्यज्यते सद्यो नपुंसक इव स्त्रिया ॥ ११ ॥ १२ त्रिपुटे भद्रत्रिपुटा कर्पूरमिति प्रकल्पितो लेपः । दुस्तरशिरोर्तितापक्षपणे क्षिप्रं समद्यदवलेपः ॥ १२ ॥ १३ संभृष्टहरिमन्थानां पोट्टेली साधु जिव्रताम् । शिरापीडाप्रभृतयः कफोत्था व्यापदः कुतः ॥ १३ ॥ -१४ कूपे निक्षिप्तमष्टाहं त्रिफलाक्षोदपोट्टलम् । तेन पक्त्वा दृढ सर्पिः कर्पटेन पवित्रयेत् ॥१४॥ लेपनस्याजनैः शस्तं शिरोनासाक्षिरुक्षु तत् । तत्कल्कजं पुनः किटं म्रक्षयेद्दारुणादिपु ॥ १५ ॥ २५ अतितिक्ततुम्वगर्भेश्छायाशुष्कैविंचूर्णितैर्नस्यम् । विनिहन्ति शिरोविकृतश्लेष्मस्रवदूषिताक्षिदुःखानि ॥ १६ ॥ “किया गया लेप, शिरोवेदना को मिटाता है ॥ १०॥ नवसादरके पानी में भीगे हुये वस्त्रखंड से मस्तक को भावृत रखने वाले की व्यथा उसको उसी तरह त्याग देती है, जिस तरह नपुसक को सुंदरी ॥ ११ ॥ दो छोटी इलायची, एक बडी इलायची-इनको एक माषाभर कपूर के साथ पीसकर, लेप करने से, दुसाध्य शिरो- वेदना, तथा ताप का अवलेप शीघ्र ही शमित होजाता है। (यहां छिलके सहित इलायची का उपयोग करना चाहिये केवल दानों का नहीं) ॥ १२ ॥ चनों को भूनने के समनंतर ही पोटली में शीघ्र भरकर, जोर से संघने वाले को सिर की पीडा आदि तथा कफजन्य (शीर्ष की) भापद कहां ? ॥ ३३ ॥ त्रिफलाचूर्ण की पोटली को कूप में आठ दिवसपयंत जलमग्न रहने दे। फिर, इस त्रिफला से धृत सिद्ध करके उसको छानले। यह घृत क्रमश - मस्तक, नाक तथा नेत्र के लेप, नस्य तथा अंजन में प्रशस्त है। वस्नगत किट्ट का उपयोग शरीर के केशोत्पत्ति-स्थानगत विकारो में हितावह है। केशोत्पत्ति भागपर इस किट्ट का मर्दन करना चाहिये ।। १४-१५॥ अत्यंत तिक्त तुंबी के भीतर का गूदा निकाल उसे छायाशुष्क बनालें। फिर, इसके चूर्ण का नस्य लेवें। इससे मस्तकगत दूपित कफ का स्त्राव तथा भाखका दुखावा आदि दूर हो जाते हैं। यहा नस्य लेने के तुरंत पीछे, तुल्य-घृत-शर्करा-निर्मित ? १-द्वे सूक्ष्मैले, एका भद्रला, माषमान कपूर पिष्ट्वा, हिम एव लेपोऽवचार्य । एलांना फलानि ग्राह्याणि न तु केवलं तद्वीजान्येवेति रहस्यम् । २-भर्जनान्तरमेव पोट्टली कार्या, विलम्बे गुणहानिरिति भाव । ३-तेन त्रिफलाक्षोदेनेत्यर्थ । त्रिफलात सर्पिश्चतुर्गुण- मादेयम् । ४-केशभूमिभवरोगविशेषेषु। ५-अत्र नस्यसमनन्तरमेव तुल्यघृताधिकशर्कर पावकं भक्षयेत् ।
৩ # चिकित्सितम्] चतुथों गुच्छ.। १६ कणाश्चतस्रो मदनं तथैकं फेनं द्विगुरुं फणिनो विचूर्ण्य । संभयं ताभ्यां मसृणीकृतं स्यान्नस्य महामस्तकयातनासु ॥ १७ ॥ १७ मरिचं दरदं विश्वा चपला छिकका मिपिः । पत्रं सेव्य मिदं नस्यं सेव्यं शीर्याक्षिरोगिणाम् ॥ १८ ॥ - इति गिरोरोगचिकित्सा १७ ॥ . . M . , अथासुग्दरचिकित्सितम् । १ उच्चा हस्तप्रमाणेन त्रिचतुःपञ्चशाखिका । खरदीर्घदला मृद्वी प्रायः पर्वतभूमिजा ॥१॥ निम्नगर्भ मनानीलं लिएपञ्चाङ्गवर्तुलम् । पञ्चास्रोच्छूनकिक्षल्कं यस्याः पुष्पमगन्धकम् ॥२॥ ओपधिः सा विदेहोक्ता नाम्ना प्रदग्दारिणी। परंपरोपदेशेन मयाऽग्यज्ञायि यत्नतः॥३॥ हलवे का भोजन करना चाहि ॥ १६ ॥ पिप्पली नग ४, मदनफल नग १ तथा अफीम दो गुजा, इनके चूर्ण को ताम्रपान से भूनले । फिर, सूक्ष्म पीसकर, मस्तकंगत उग्र विकारो मे-सूर्यावर्त आदि मे-इसका नस्य लेवें। इसके प्रयोगकाल मे, पथ्यरूप से, चासनीयुक्त मधुर दूध का पान तथा गोधूम की फुल्लिकाओं का सेवन अवश्य करना चाहिये ॥१७॥ मस्तक तथा नेत्रविकारों से ग्रस्त मनुष्यो को, मरिच, हिगुल, सूठ, पिप्पली, नकछीकनी, सौफ, तमालपत्र तथा उशीर के चूर्ण का नस्य लेना चाहिये ॥ १८ ॥ -शिरोरोग चिकित्सा समाप्त - - असृग्दरचिकित्सा (कुल प्रयोग १२)- 'प्रटरदारिणी' इस नाम से विदेह प्रोक्त सुप्रसिद्ध एक औषधि है । इस औषधि के विषय में, मैं अपनी कुलपरंपरा से, बहुत सुनता आया हू तथा प्रयत्नपूर्वक मैंने स्वयं इसकी प्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त की है। यह औषधि एक हाथ ऊंची तथा तीन, चार अथवा पाच शाखाओ से युक्त होती है। इसके पत्ते दीर्घ खुरदरे होते है । स्वय कोमल होती है। प्राय. पर्वतीयभूमि मे उगती है । इसका पुष्प मध्य मे निन्न, कुछ नीले वर्ण १-फणिन फेनमिति योजना। २-सूर्यावर्तप्रभृतिषु । पथ्यमत्र जलवलितन्तुलीमधुरं दुग्धं, फुल्लिकापि च । ३-तमालपत्र 'पत्रज' इति प्रसिद्धम् । ४-उशीरम् । ५-सामा- न्यत स्त्रीपुंसदेहभवान् रोगानभिधायेदानी स्त्रीदेहमानमाविन काश्चिद्रोगविशेषानभि- दधति । तत्र पूर्व प्रदररोगचिकित्सा । तत्रापि प्रथमं कस्याश्चिन्महौषध्या प्रदरदारिणीति कल्पितनामधेयाया. स्वरूपप्रदर्शनपुर सर प्रयोग प्रदश्यते चतुर्भिः पद्यैरुचेत्यादिकै ॥ सि० १२ . सिन्दभेषजमणिमालायां [अथासग्दर- दलं प्रदरदारिण्याः सकत्थं परिपेपयेत् । मापप्रमाणा वटिका प्रदराति नियच्छति ॥४॥ २ गद्याणद्वितयं ब्रह्मदण्डीपञ्चाङ्गमिष्यते । गद्याणमात्रमेवान रसाअनमिह ध्रुवम् ॥ ५ ॥ गद्याणपतुलिता सितेत्येकत्र कल्कयेत् । पलद्वयेन पयसा विप्लाव्य शुचिवस्त्रतः ॥६॥ पिबेदुःसाध्यविविधप्रैदरार्ता नितम्बिनी। शीते शृतं तथा ग्रीष्मे गीतमेव प्रयोजयेत् ॥७॥ ३ ऐडैः पयोभिललितानि पीत्वा कणान्वितान्याखुशकृद्रजांसि । योनिस्रवद्रौधिरपूरदिग्धगृहाङ्गपाऽथैति सुखं मृगाक्षी॥ ८ ॥ ४ प्राचीनचिकणविभाण्डतलस्य यद्वा चूर्णीकृतानि शकलान्यरुणेटिकायाः। पीतानि पएिकजलैः सह सुन्दरीभिः शोणप्रभं प्रदरमुग्रदरं हरन्ति ॥९॥ ५ प्रत्नेटिकारसश्चेत् सितोपलासौरसाक्षिकः पीतः। किमु तर्हि सुन्दरीणां समुदीर्णदरं दरं न दारयति ॥ १० ॥ का, गोलाकार, परस्पर जुडे हुये पाच विभागवाला, केसर के पांच उभरे हुये रेशों से युक्त, गंधरहित होता है । इस प्रदरदारिणी के एक पत्ते को दो तीन रत्तिभर कत्थे में पीसकर एक माषा प्रमाण वटिका बनाले । इसके सेवन से प्रदरजन्य वेदना दूर होती है ॥१-४॥ ब्रह्मदंडी (तिलकुटा) का पंचांग बारह मापा, रसांजन छह माषा तथा मिश्री ३६ माषा इनको एकत्र दश तोला जल से घोलकर वस्त्रपूत करलें। अनेक वर्ण के दु साध्य प्रदर से पीडित महिला इसका पान करे। शीतत्ररतु मे गरम करके तथा ग्रीष्मऋतु मे शीतल ही इसका उपयोग करना चाहिये ॥ ५-७ ॥ दो रत्ति पिप्पली एवं मूषक की शुष्क लीडी के चूर्ण को मेपीदूध में मिलाकर पीने से योनि मे से झरते हुये रुधिर पूर से सिक्त घरके भांगनवाली मृगनयनी सुखसे रह सकती है। मृषक की लीडी दो तीन गुंजाभर ही लेनी चाहिये । इसी लीडी के चूर्ण को मलाई के साथ लेने से प्रमेह मे भी लाभ होता है ॥८॥ प्राचीन चिकने घट के तल की ठीकरियो का अथवा अतीव पुरानी लाल ईंट के खडका चूर्ण इनमें से किसी एक के ४ रत्ती चूर्ण को षष्टिक चांवल के ४ तोला धोवन के साथ लेने से युवतियोंका उग्र- रक्तप्रदर शांत हो जाता है ॥ ९ ॥ पुराणी ईंट के चूर्ण को निरंतर जलकी भावना देते १-ब्रह्मदण्डी लोके 'तिलकुटा' इति नाम्ना प्रसिद्धा। तस्या पञ्चाङ्गानि पत्रपुष्पमूला- दीनि। २- जलेन । ३-नानावर्णप्रदरपीडिता। ४-मेपीभवै । ५-आध्मानभयाद् द्वित्रि- गुञ्जाधिकानि नाददीत । दुग्धसतानिकालीढानि प्रमेहं नन्तीत्यपि बोध्यम् । ६-इष्टिकाऽपि प्राचीनवादेया। ७-पष्टिकतन्दुलभावितैर्जलै । ८-पष्टिकजलै सह चिकणभाण्डखण्डानि सुन्दरीमि. पीतानीत्यन्वयः । ९-प्रत्नेष्टिकाचूर्णस्य चिर जलभावनया रसो निष्पाद्यः । .
x चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छ । स्थापयेदहृदयपालार्थ ब्राह्मणान्मुदा। सत्येवं चमनैरस्याः शुद्धिः स्याद्गर्भारणम् ॥ ३ ॥ दुग्धमैन्धोघृतं किचित् पथ्यं केवलमाहरेत् । संकल्पं कारयेत् सिही भोजविण्ये द्विजानिति ॥ ४ ॥ २ वृद्धदारुकमक्षांशं शनां पेटिनो जटाम् । संकाथ्य स्त्री पिवेदहां हित्वा त्रयमृतावृता ॥५॥ सत्येवं लभतेऽपत्य मकसंवत्सरान्तरे। किं तु प्राक् तुन्थकणिकां खादेत् संयाबवेष्टिताम् ॥ ६॥ ३ यक्षाणि वेणुपर्वाणि शुकपुष्पा पलोन्मिना । गुडेन मधुरः काय. प्रवर्तयति वै रंजः ॥७॥ ४ पलाशवीजसितयोः सोमसागरभागयोः। रजांसि द्वित्रिमापाणि योनिदाहे जलर्गिलेत् ॥ ८ ॥ ५ समितारेवंतीक्षोदलेपः कोष्ण. प्रशस्यते । इटिकास्वेदितो योनिकण्डूग्रन्थिपु वर्मसु ॥९॥ स्तोत्र' के पारायणार्थ आठ ब्राह्मणो को बिठा देना चाहिये । इस वटी के सेवन से उस युवति को कुछ देर बाद वमन तथा विरेचन होगा। इस तरह गर्भ-सपादन- योग्य कोटशुद्धि हो जायेगी। उस दिन शर्करा रहित केवल दूध, भात तथा घी का भोजन पथ्य- रूप से करे, तथा 'गर्भ - धारण रूपी कार्यसिद्धि होने पर मै ब्राह्मणो को भोजन दूगी ऐसा सकल्प भी साथ में करना चाहिये ॥१-४॥ वृन्ददारुक एक तोला तथा पर्कटी नामक पिप्पल-वृक्ष की जटाइन दोनो के एकत्र काय को, नत्तु के तीन दिवस छोडकर, प्रतिदिन नियमित पीने से, युवती को एक वर्प उपरांत सतान प्राप्ति होती है। कितु संतानोत्पत्ति- योग्यता कारक उक्त क्वाथ पान के पूर्व, तुत्यकणिका को मीठी थुली मे, अथवा सीरे में मिलाकर खानी चाहिये । इस थुली मे एक तोलाभर वेणु के पर्वका चूर्ण भी मिलाना चाहिये । तुत्थ-कणिका केवल एक चांवल - भर ही मिलानी चाहिये, क्योकि इससे गर्भा शय का शोधन हो जाता है ॥५-६॥ वांसके पर्व दो तोला, सोया चार तोला, इनका गुड से मधुर काथ रज प्रवृत्ति करता है। जिस स्त्री को ऋतु में भी भार्तव न भाता हो उसी को यह प्रयोग करना चाहिये ॥ ७ ॥ पलाश के वीज तथा मिश्री क्रमश एक भाग तथा चार भाग लेकर चूर्ण बनालें । इस चूर्ण को, योनि - दाह मे, जल के साथ दो या तीन माषा मात्रा से फाफना चाहिये ॥ ८॥ गेहू का आटा तथा रेवंदचीनी के चूर्ण' १-आदित्यहृदयाख्यस्तोत्रविशेषस्य पाठाय । २-विरेचनमप्यस्माद्गवति । ३-भक्तम् । ४-शर्करारहितमित्यर्थः । ५-जटायुक्तस्य पिप्पलविशेषस्य । ६-सयाव. पावक , केचिच्च. द्वितीयगुच्छप्रतिपादितखरूपा मिष्टयुटिकामाहु । तुत्थकणिका च तन्दुलाधिका न गिल- नीया । भन्न वेणुपण्यिपि तोलमप्रमाणानि प्रक्षेप्याणीति रहस्यम् । इति ख्यात शतपुष्पाभेद । ८-यस्या ऋतावप्यार्तवं न स्रवति तस्यै देयोऽयं योग.।, १-रेवती रेवतचीनी' इति ख्याता ॥ J , ७-सूवा' [बालरोग- - सिद्धभेपजमणिमालायां १७ भुवनेन रंजो ललना कलयति या काकवल्लरीफलजम् । अनुभूय वमनरेकावपचादकरं जहाति सा गर्भम् ॥ २४ ॥ - इति स्त्रीरोगचिकित्सितम् - अथ बालरोगचिकित्सितम् । १ उदरापदनुत्पत्त्यै कुरङ्गकणिकां किरेत् कनकसूच्या। सद्योभवस्य नाभावालस्य मुदस्य बालस्य ॥ १ ॥ २ व्यतिक्रान्तैकशरदं शिशुमाश्वास्य नीरुजम् । स्कन्धाद्धः सुधापाणिः समुल्लिख्य शलाकया ॥२॥ दत्त्वा सुजातविस्फोटच्छल्लकं वारिपेपितम् । “सर्वथा वर्जयेत् स्त्रीणामशुद्धानां गतागतम् ॥ ३॥ ज्वरपूर्वस्ततः स्फोटो जायते सौम्यदर्शनः । तस्मिन् पतति संशुष्य निर्दिशेच्छीतलार्चनम् ॥ ४ ॥ जल-सह फाकी लेने से, निन्दित-गर्भ त्रवित हो जाता है । इस चूर्ण से तीन वमन पूर्वक विरेचन होता है । इस चूर्ण की मात्रा तीन छह माषा से अधिक नहीं है ॥२४॥ - स्त्रीरोग चिकित्सा समाप्त- वालरोग चिकित्सा (कुल प्रयोग ३२)- सद्योजात शिशु की नाल काटते समय आलस्य को निरस्त करके (मर्थात् तत्काल ही),उसके नाभि-प्रदेश में, उदर विकार की अनुत्पत्ति के लिये, स्वर्णसूचिकाद्वारा कस्तुरी के कण विकीर्ण करने चाहिये ॥ १ ॥ टीका लगाने का स्वानुमत प्रकार: बालक जन एक वर्ष का हो जाये, तब यदि वह स्वस्थ हो तो, भाश्वासन देते हुये कुशल वैद्य उसके स्कधप्रदेश से नीचे भुजा को स्वर्णशलाका से गोदकर एक वर्तुलाकार विस्फोट बनाकर उसे, पहिले से सुरक्षित 'शुष्क मसूरीका स्फोट त्वक् चूर्ण' को पानी में पीस- कर, मल देवे । ऐसे समय, शिशु के शयनकक्ष मे, ऋतुमती, मनात अत एव अशुद्ध स्त्रियो के आवागमन को सर्वथा रोक देना चाहिये । तदनन्तर, प्राय. २-३ दिनमें शिशु के भुनागत उत्कीर्ण-प्रदेश पर ज्वरपूर्वक एक सौम्य आकृति का स्फोट उत्पन्न होगा। यह विस्फोट कुछ शमित होकर जब सूख जाये, तब 'शीतला' की अर्चना करनी चाहिये। इस तरह करने से, बालक को कभी शीतला रोग नहीं होगा। और कदाच् हो भी जाये 4-गद्याणाधिक न देयम् । अस्य विशेषव्याख्यान न स्फुटीक्रियते भ्रूणहत्याप्रसङ्गात् । अभिधानं चास्य गर्भिण्या एतादृशतीक्ष्णवस्तुभ्यो रक्षणार्थम् । २-पूर्वाधिकारे गर्भोत्पा- दोपाय प्रदार्शतो गर्भस्यैव च बहिनि सुतस्य 'बाल' इति सज्ञा, “स जातो बाल उच्यते" इत्यादिवचनात्, अतस्तद्रोगाधिकारस्य वक्तुमौचित्यमेवेति । ३-कस्तीकणिकामित्यर्थ ।। ४-द्वीपान्तरीयवैद्यक्तिरसर्लोकप्रचारितस्य दृष्टफलत्वाच्च खानुमतस्योपायस्य प्रदर्शनमेतत् । ५, कृतयोग्य इत्यर्थ ॥ । -- चतुर्थों गुच्छः । चिकित्सितम्] ३४५ एवं कृते विधौ भूयः शीतला नैव संभवेत् । यदि जातु भवेत् कापि तदा स्याद्विरलोदया ॥५॥ ३ यूकां विपोथ्य नखतस्तदत्रलिप्तनखधावनाम्बु मनाक् । अविचारयन् ददीत प्रेक्ष्य कृती शीतलाविकृतिम् ॥ ६॥ ४ जलैः सपथ्यं विपनारिकेलं विघृष्य दद्यात् खलु शीतमेव । प्रदुप्परक्तक्रिमिशोणभावविस्फोटपीडाशमनं शिशुभ्यः ॥ ७ ॥ ५ मिषितन्मूलजन्तुघ्नकृतमालमृकण्डजाः । हरीतक्यौ वचासीरयवानीतरुणीसुमम् ॥ ८ ॥ पलाशवीजमृद्धीकाहबुपागुडटङ्कणम् । सौवर्चलप्रतीवापा बालानां जन्मधुण्टिका ॥ ९ ॥ ६ संचूर्ण्य सर्पिपि शनैः परिभर्य जाती- मायाफलानि कवलग्रहसंमितानि । दृष्टीन्दुतिन्दुकसिताशवलानि दुग्धैः दद्यात् पेंगे वलचमत्कृतये शिशुभ्यः ॥ १० ॥ ७ सौवर्चलप्रचारं जलमुष्णं कृष्णकोकिलादलजम् । चान्ति मुहुरुद्भाव्य श्लेष्माणं हन्ति बालानाम् ॥ ११ ॥ तो वह भरपवेग वाला ही होगा ॥ २-५ ॥ शीतला की विकृति को देखते ही, कुशल वैद्य, जूं को नख से मसलकर, तत्-रक्त- लिप्त-नख के धावन का थोडा पानी, बिना शंका किये, शिशु को पिला देवे ॥ ६ ॥ वजनदार हरडे तथा जहरी खोपरे (दरियाई नारियल) को जल मे घिसकर, बालको को (युवाओ को भी) शीतल ही सेवन कराने से दूपितरक्त, क्रिमि, रक्तचाटे, विस्फोट तथा पीडा आदि का शमन होता है ॥ ७ ॥ सौंफ, सौंफके मूल, वायविडग, अमलतास, सनाय, छोटी-बडी हरडे, वचा, अंजीर, अजमोदा, गुलाब पुष्प, पलाशवीज, मुनक्का, उन्नाब, गुद और टंकण इनमें सौवर्चल ऊपर से और मिलादें। बालको के विकार शमन के लिये यह 'जन्म- धुण्टिका' है ॥ ८-९ ॥ एक ' कर्प' प्रमाण में जायफल तथा माजूफल लेकर, उनका एकत्र चूर्ण बनालें । इस चूर्ण को धीरे धीरे धी मे भूनें । इस चूर्ण को, बारह तोले- भर मिश्री चूर्ण से मधुर करलें, फिर एक मासा की मात्रा मे दूध के साथ प्रात.काल, बालको को, बल वृद्धि के लिये, देवें ॥१०॥ कालीकोइल के (एक चम्मच भर) पत्र- स्वरस मे थोटा (दो रत्तिभर) कालानमक मिलाकर उसको कवोष्ण सेवन कराने से, बालकों का, पुन पुन बमनपूर्वक, कफ नष्ट हो जाता है ॥ ११॥ कफप्रधान खांसी यदि १-पथ्या हरीतकी, सा च गुर्वी ग्राह्या। २-लोके जहरीखोपराभिधम् । ३-उप- लक्षणमिदं, तेन महद्भयोऽपि देयम् । ४-द्विवचमेन बृहत्स्वल्पमेदाद्विविधहरीतकीग्रहणम् । ५-गुलाबपुष्पम् । ६-हवुषाशब्देनात्र लोके 'उन्नार' इति लोकप्रसिद्धस्य बदरविशेषस्य प्रहणम् । ७-योगस्यास्य लोके 'जन्मघुण्टी' इति संज्ञा । ८-जातीफ्लानि मायाफलानि च ।
M सिद्धर्भपजमणिमालायां [बालरोग- ८ वलासोल्लासितः कालो वालानाकुलयेद्यदि । रसोनसंभवं भस्म दीयतां कासघस्मरम् ॥ १२॥ ९ सेहुण्डदण्डमुत्कीर्य तीक्ष्णं न्यस्य विधाय च । यह संस्थाप्य तदनु तस्य कोकिलमाचरेत् ॥ १३ ॥ वल्लोन्मानं रजस्तस्य सितया शिशुकासजित् । अनुपेयं पयः शीतं योगोऽयं दुर्लभः परम् ॥ १४ ॥ १० उत्फुल्लिकासमुद्रेके किमन्यैरौपधैरिह । एकैव रोचना धात्रीक्षीरैर्घष्ट्वा प्रदीयताम् ॥ १५ ॥ ११ ध्वस्तोदरश्वसनकासविपद्गणानि पिष्ट्वा लवङ्गतुलसीदलटकणानि । संपाययेत् कफकृतज्वरकपणानि वालान् प्रदर्य वरकाञ्चनकङ्कणानि ॥ १६ ॥ १२ स्फुटसौभाग्यस्फटिकारजोभिराक्तं स्तनं पयोमृदितैः। अतिकासक्लेशवते धात्री वालाय वत वितरेत् ॥ १७ ॥ चालकों को बैचेन कर देती हो तो लहसुन को जलाकर उसकी भस्म ३ रत्ती दीजिये। यह खांसी को मिटा देती है ॥ १२ ॥ स्नुही -काडको उत्कीर्ण करके उसमे मरिच के दाने रख पूर्ववत् बंद करदे । इन मरिच दानो की इसी तरह तीन दिवस पर्यंत रहने दें। फिर निकालकर, जला करके इनके कोयले बनालें। इनकी इस भस्म को एक वालभर मिश्री के साथ देवें । यह बालकों की खासी मिटा देती है । इसके ऊपर गीतल दूध पिलाना चाहिये । यह योग परम दुर्लभ अतएव सद्य फलदायी हे ॥१३-१४॥ वालकों के उत्फुल्लिका विकार की तीव्रता में अन्य औषधियोसे क्या प्रयोजन केवल एक ही गोरोचना को माता के दूध में घिसकर पिला दीजिये ॥ १५॥ उदरविकार, श्वास, कास आदि विपद् -समूह को ध्वस्त करनेवाले, तथा कफ-जन्य-ज्वर को जर्नरित कर देनेवाले लविंग, तुलसीपन्न तथा टंकण के चूर्ण को पानी में मिलाकर, वालको को स्वर्णककण दिखाते हुये (अर्थात् उनका ध्यान बदलते हुए) पिला दीजिये ॥ १६ ॥ तेलिया- टंकण तथा स्फटी दोनों को फुलाकर चूर्ण बनालें । एक तण्डुलमान इस चूर्ण को माता दूध में घिसकर, उसका प्रलेप माता के स्तनो पर कर दें। फिर लेप के शुष्क होने पर, भावा अपने इन स्तनों को, कास से अत्यंत पीडित वालक को पिलाये ॥ १७ ॥ ९-द्वादशकर्षमितसितासहितानि । १०-प्रात । ११-कृष्णकोकिला 'कालीकोइल' इति ख्याता वल्ली, तस्या पत्रज सरसम् । सैव विष्णुकान्ताशब्देनाभिधीयते इति केचित् । १-मरिचम् । २-उत्फुल्लिका द्वितीयगुच्छाभिहितलक्षणो रोगविशेषः । ३-वरका- चनकळणानि प्रदर्येति लोभनप्रक्रिया। ४-अग्निफुट कलादोपयोगि टणं, फुल्ला श्वेत- स्फटिका, तयो रजोभिराक्तं लिप्तम्। ५-धात्रीदुग्धमूदितैः । मात्रा तन्दुलमाना। के चकित्सितम्] चतुर्थी गुच्छ । ३४७ १३ उष्णच्छगणभस्मान्तर्युप्तपीतार्कपत्रजः। उत्फुल्लिकाकफध्वंसी रसो माक्षिकसाक्षिकः ॥ १८ ॥ १४ घृष्ट्वा मदनबीजानि पयोभिलवणोत्तरैः। कोणीकृत्य कफोद्रेके वमनार्थ प्रयोजयेत् ॥ १९ ॥ १५ दन्तीबीजदलाढ्यं मापं नारायणस्य चूर्णस्य । तुलितं सलिलैरुष्णरुत्फुल्ली हन्ति वान्तिरेकाभ्याम् ॥ २० ॥ १६ हिलजातीफलजातिपत्रिकागोरोचनाभिर्जयपालक समम् । विभाव्य निम्बूकरसैः कृता गुटीरीत्कुल्लिके वालगदे गदैन्ति २१ १७ पुररसवविशालाफलगर्भवटी पटीयसीं दद्यात् । द्वित्रिपवित्रैरुष्णैर्गोमूत्रैः फुल्लिकाभेदे ॥ २२ ॥ १८ टकणलवणकणोपणवन्द्याककुष्ठहिमुसंवलितः । शमयति दर्भ भ्राष्ट्रस्विन्नपीकास्नुहीस्वरसः॥ २३ ॥ १९ पुटस्विन्नस्नुहीकाण्डस्वरसो रसशाणिकः । गौरीकाष्ठकस्तूरीपटुगर्भोऽस्ति दर्भभित् ॥ २४ ॥ २० आर्द्रकजैः करणीया नीरैर्नेपालमरिचयोर्गुटिका । कफतन्तुजालगर्भ दर्भमदभ्रं भिनत्ति वालानाम् ॥ २५ ॥ कंडों की गरम गरम राख में भाकडे के पीत - पत्र को स्विन्न करके रस निकाल लेवें । फिर, २-३ विन्दुमात्र इस रस मे थोढा शहद मिलाकर पिलाने से बालक की उत्फुल्लिका तथा कफ नष्ट हो जाते है ।। १८॥ लवणोदक से मदन फल के बीजो को घिसकर, कवोप्ण करके, कफाधिक्य में, वमनार्थ प्रयोग करें ॥१९॥ शुद्ध दन्ती-बीज के एक दल को एक मापाभर नारायण चूर्ण मे मिलाकर, कवोष्ण करके लेने से, वमन तथा विरेचन पूर्वक, उत्फुल्लिका नष्ट हो जाती है ॥२०॥ हिंगुल, जायफल, जावित्री तथा गोरोचन एवं इन सबके एकत्र वजन के समान शुद्ध जयपाल, इनको निवू- रस की सात भावना देकर खरल करलें । इनकी सर्पप समान गुटियां, उत्फुल्लिका नामक बाल-रोग में वैद्यों द्वारा प्रशंसित हैं ॥२१॥ विशाला- फल (इन्द्रवारुणी) के गूदे को, गंधक पारद की कजली मे मिलाकर खरल करके वटिका बांधलें । उत्फुल्लिका विकार में प्रभाववाली इस वटी को दो तीन बार वस्त्रपूत - उष्ण - गोमूत्र के साथ दीजिये ॥ २२ ॥ भट्टी मे स्विन्न करके तुलिया थोर मे से निकाले गये स्वरस में टकण, लवण, पिप्पली, मरिच, गोरोचन, उसारे रेवन तथा हींग मिलाकर, खरल करके उपयोग में लें । इससे उत्फुल्लिका रोग शमित होता है ॥२३॥ संपुट में खिन्न करके स्नुही-कांड से निकाले गये अठारह माषा रस में, गोरोचन, कंकुष्ठ, कस्तूरी तथा सैंधव इनके चूर्ण को खरल करलें। यह उत्फुल्लिका को नष्ट करता है ॥२४॥ शुद्ध नेपाल(जयपाल) तथा मरिच को माईक रस मे खरल करके गुटिकाये बनालें । ये १-सर्वप्रायुर्वेदे प्रसिद्धस्य। २-वैद्या इत्याक्षिप्यते। ३-वन्द्या गोरोचना। ४-उत्फुल्लि- काया सज्ञान्तरमिदम् । ५-पटशाणप्रमाण.॥ ६-गोरोचना। ७-नेपाल दन्तीबीजम् । . - सिद्धभेपजमणिमालायां [वालरोग-- ३४८ २१ क्षारः सौभाग्यसुभगो वासापामार्गचञ्चजः। विपाशिवासखो घृष्टः कोप्णो दर्भगदापहः ॥२६॥ २२ एलटकणवाहीकसौवर्चलचला रिजः । वृन्ताकवारिणा लेपो ध्रुवमाध्मानधूननः ॥ २७ ॥ २३ अधिजठरमर्धचंद्रच्छवयो दाहाः प्रतप्तया सूच्या । २४ हर्यक्षमांसधूपाः प्रदीपनीराजनाश्च दर्भदर्पघ्नाः ।। २८ ॥ २५ निष्कुलीकृत्य संशुष्कः पक्वगर्जरतल्लजः । ससितावुद्बुदः पीतो बालातीसारनाशनः ॥२९॥ २६ दूर्वेक्षुपर्णविलसद्धिमविन्दुपृक्त- प्लोताञ्चलेन शनकैरवचारितानि । नश्यन्ति वालवदनान्तविसृत्त्वराणि छल्लान्यपि च्छविभिऋक्षविजित्वराणि ॥ ३०॥ २७ हृतवृन्तं वृन्ताकं सूत्रस्यूतं बधान शिशुकण्ठे । उत्फुल्लिकादिवहुविधदुःसाध्यमहोपसर्गशान्त्यर्थम् ॥ ३१ ॥ २८ कन्याप्रत्यावर्तिताधरगसपादकुउवमापरजः। पयसा विनीय घटितः सार्धद्वयवेष्टनः फणी तिलहक् ॥ ३२॥ बालकों की कफ के तन्तुजाल से युक्त उग्र उत्फुल्लिका को विशीर्ण कर देती हैं ॥२५ यवक्षार, भृष्ट टंकण, अतिविषा तथा हरडे इनके चूर्ण और अरडूसा, अपामार्ग तथा एरड पत्र के क्षार को इनके ही एकत्र स्वरस में खरल करके कवोष्ण सेवन कराने से, दर्भरोग नष्ट होता है ॥ २६ ॥ एलुआ, टंकण, हींग, सौवर्चल तथा एरडमूल इनके चूर्ण को, वृन्ताक तथा विशाला-फल इन दोनो के रस में पीसकर पेट पर लेप करे। यह लेप माध्मान को नि सदेह हिला देता है ॥२७॥ प्रतप्त सूचीद्वारा जठर के नीचे अर्धचद्राकार प्रदाहो से, रीछ के शुष्कमास की धूप देने से, तथा प्रदीप के नीराजन से, उत्फुल्लिका का दर्प नष्ट हो जाता है ॥२८॥ पकी हुई उत्तम गाजर को सुखाकर उसका चूर्ण करले। इस चूर्ण को पानी में पीसकर, उसमे पतासे मिलाकर पिलावें । यह पेय वालातिसार को नष्ट कर देता है ॥२९॥ दूर्वा, ईख, मुंजतृण, काश आदि के पत्तों पर सुशोभित भोस विदुओ से सिक्त वस्त्रखड के छोर को शनै शनै. फेरने से, वालक के मुख मे सर्वत्र फैले हुये, तारिका-गुच्छो की शोभा को हरनेवाले, चमकीले श्वेताभ छलक चांटे - नष्ट हो, जाते हैं ॥३०॥ डीटिया निकालकर गन (वृन्ताक) को सून मे पिरो बालक के गले से बाध देवें। इससे उत्फुल्लिका आदि बहुत से दुःसाध्य महान् -अनिष्ट शांत हो जाते हैं ॥३१॥ उदद के सवा सोलह तोलाभर आटे से पूर्ण पात्र को किसी कन्या के चारों १-विपाऽतिविषा, शिवा हरीतकी । २-चलाररैरण्ड.। ३-विशालाफलवार्यपि प्रक्षेप्यम् । ४-हक्ष सिंह '। ५-'जलेन घृष्ट्वा' इति शेष.। ६-अधुना किचिद्देवव्य- पाश्रय कर्मोपदिश्यते ।, ७-विपरीतभ्रमितम् । :-कुवेन । J * चिकित्सितम्] चतुर्थो गुच्छः। ३५१ ६ कपिशाखुमारसागरदन्तीबीजानि निम्बुपिष्टानि । लिप्त्वा दंशमुखोपरि वृश्चिकविद्धः सुखं शेते ॥५॥ ७ दत्तं दंशमुखोपरि सलिलेन मनाग्विघृष्य कतकफलम् । कृतजीवितसंशयमपि विषशूकविषं विशिष्य चूपयति ॥ ६ ॥ ८ कटुशकरकन्दीकृतलेपो वृश्चिकविषं निहन्तितराम् । करुणाशंकरगुरुणा करुणावरुणालयेन कथितं मे ॥ ७ ॥ ९ दक्षे वृश्चिकदशश्चेद्वामे कर्णे द्रुतं भर । वामेऽङ्गे यदि तदंशो दक्षे सलवणं जलम् ॥ ८ ॥ १० सोमस्वर्णक्षीरीमूलं संनीय मोदका गुडतः । कुकुरदंष्ट्रागरलं हरन्ति पथ्याशिमिख्यहं गीर्णाः ॥९॥ ११ हेमाद्वामूलहेमानि प्रायस्थमरिचान्यहो। शरावतपीतानि घ्नन्त्यलकविपं भृशम् ॥ १० ॥ दूर हो जाती है ॥४॥ पीतवर्ण-शत-मल्ल(सखिया), नवसादर तथा नेपाल - बीज इनको निवू रसमें खरल करलें । देशमुख पर इसका लेप करके फिर अंगार-ताप से सेक करें। इससे वृश्चिक-दष्ट व्यक्ति सुखपूर्वक सोता है ॥५॥ कतक - फलको जलमे थोडा घिसकर दंशमुख पर रख दे। यह जीवन को सशय मे डाल देनेवाले शूक - विप को चूस लेता है ॥ ६॥ कटु-शकरकन्दी का लेप वृश्चिक-विष को नष्ट कर देता है। इस प्रयोग को मुझे करुणा के सागर गुरु करणाशंकर ने बताया है। कडवी शकरकदी स्वनाम प्रसिद्ध कोटर छिदवाली एक शाक जातीय द्रव्य है। यह भाकृति मे सामान्य शकरकदी से मिलती जुलती है । इसको छाया-शुष्क कर के उपयोग मे लेवें ॥ ७॥ शरीर का वाम भाग यदि वृश्चिकदश से दष्ट हुवा हो तो दाहिने कान मे, और यदि दक्षिण भाग दष्ट हुआ हो तो वामकर्ण मे, शीघ्र ही सजल-ल्वण भर देना चाहिये ॥८॥ बावची तथा स्वर्णक्षीरी-मूल एक एक माषा भर लेवें । इनके, गुड मिलाकर, मोदक बनालें। यह एक मात्रा है। पथ्य मे रहते हुये तीन दिवस पर्यंत एक एक मात्रा लेने से श्वान-दंष्ट्रा-जन्य विप उतर जाता है ॥ ९ ॥ स्वर्णक्षीरी-मूल ग्यारह अथवा बारह १-कपिशाखुमार• पीतशतमल्ल । २-नास्ति प्रायोऽत्र निम्बुकापेक्षा। ३-लेपा- नन्तरमहारताप इति शेष । ४-"कडी शकर क्न्दी" इति प्रसिद्धा सकोटरच्छिदा भवति । साच छायाशुष्का ग्राह्या । ५-सोमः लोके "चापची" इति ख्यात. 1 उभाभ्या पृथक् माषो ग्राह्य । इयमेकदिनमात्रा । ६-हेमाह्वामूल्स्य स्वर्णक्षीरमूलस्य हेमानि मापका: । प्रायश्चैकादशधा द्वादश माषका ग्राह्या । ७-सप्तमरिचानि। ८-पादोनप्रस्थ- तक्रपीतानि वा। दंशदिनमारभ्य पञ्च दिनानि यावत्पानम् । ९-कोकुरं विषम् । पथ्यं तैलाम्लादिवर्ज किच द्विमासपर्यन्तं कटाहसिद्धानमपि वर्जयेत् । अनेनैव योगेन्ना मनविरे चनद्वारा विषमशेष नि सरिष्यति । - [विष- ३५२ सिद्धभेषजमणिमालायां १२ हरिद्वनितभित्तानि रूप्यमानि पेपयेत् । गोगुणं गुडमुन्मिथ्य चतस्त्रः कल्पयेवटीः ॥ ११ ॥ गिलेत्रिसंध्यमेकैकां श्वदष्टः शीतसंवरैः । क्षरन्ति जन्तवो सूत्रे यावत्तावदयं विधिः ॥ १२ ॥ १३ नासानिर्यासमेलनादशोपरि पुनः पुनः। द्रुणादिनैककीटानां विषं वतरति द्रुतम् ॥ १३ ॥ १४ सहस्रपुष्पवृक्षस्य पत्रकल्कविधर्पणात् । वरंटीदंशदाहार्तिर्दुःसाध्यापि प्रणश्यति ॥ १४ ॥ १५ लूतां हन्ति घुणोत्कीर्णवेणुरेणुप्रगुण्डनम् । प्रतिष्ठामिव लोकस्य विटगोष्ठीनिपेवणम् ॥ १५ ॥ १६ कवलः कोष्णकरस्य प्रत्यहं नूतनो धृतः । सिंहदंष्ट्राविषं हन्ति जाग्रतां नात्र संशयः ॥ १६ ॥ माषा तथा सात मरिच इनके चूर्ण को बत्तीस तोला तक के साथ पीने से श्वान का उन विप भी शांत हो जाता है । दश दिवस से लेकर पांच दिवस तक यह पेय लेना चाहिये। तैल अम्लादि अपथ्य है, दो मासपर्यंत कटाहसिद्ध द्रव्य वर्ण्य है। इसके प्रयोग से वमन विरेचनद्वारा सपूर्ण विप वाहर निकल भाता है ॥१०॥ हरी बनात के टुकडे बारह माषा लेकर तिगुने गुड मे मिलाकर चार वटिकायें बना लें। फिर, दिवस के तीनो सधिकाल मे एक एक वाटिका को पानी के साथ, श्वान दष्ट व्यक्ति निगल जाये । जब तक मृत्र- द्वारा जन्तुओ का निकलना वद न हो जाये तब तक यह प्रयोग चालू रखना चाहिये। दसवें श्लोक के अनुवाद मे उल्लिखित पथ्य का पालन करना चाहिये ॥ ११-१२ ॥ नासिका-मल (श्लेष्म) को दष्ट-स्थान पर पुनः पुन. मलने से वृश्चिकादि विविध क्षुद्र कीटों का विष शीघ्र उतर जाता है, दूर हो जाता है ॥ १३ ॥ गुल हजारा वृक्ष के पन्न कल्क को दष्ट स्थान पर मलने से मक्षिका, भ्रमरी आदि के दश से उत्पन्न दाह का दु साध्य दुख भी दूर हो जाता है ॥ १४ ॥ घुण लग जाने के कारण बांस मे से खिरी हुई धूलि को दशपर घिसने से लता-विष, भडवो की सगति करने से लोक प्रतिष्ठे की तरह, नष्ट हो जाता है ॥ १५॥ स्विन्न चांवल के प्रतिदिन नूतन कपोष्ण कवल को लगाने से तथा जागते रहने से सिह-दष्ट्रा का विष नष्ट हो जाता Baharat १-"हीवनात" इति ख्याताया खण्डानि । २-द्वादश माषाणि । ३-त्रिगुणम् । ४-अत्रापि पथ्य पूर्वोत्तमेव । ५-नासानिर्यासो नासामल लष्मरूप । ६-वृश्चिकादि- पिविधा -रविरोपाणाम् । -भागुरिमतेनागालोप । ८-'हजारा' नि ज्यातस्य । ९-वरटी मक्षिका भ्रमरी वा। १०-कत्रोष्णभक्तस्य । free चिकित्सितम्] चतुर्यो गुच्छः। ३५३ १७ शुण्ठ्यञ्जिताम्बुसंघृष्टा धत्तूरमदहारिणी । १८ वृन्ताकपर्णनियूहस्तद्वदेव समर्थितः ॥ १७ ॥ १९ अतिमानं फणिफेने भुक्ते शस्ता वमिः शिलया। २० कि च शुकवीजपुझं फणिफेनं मृत्तिकीकुरुते ॥ १८ ॥ २१ अष्टांशसूर्यचरणत्वचि नल्वणेऽपा- मावर्तनेन खलु तस्थुपि पादोपे। सन्तानिका तरति या विमुष्टिकानि प्रक्षिप्य तत्र वटिका फणिफेनमुक्त्यै ॥ १९ ॥ २२ दुर्वाकुरघटितवटी शनकैः संचयं पीतरसा। भगामदभगाय प्रकल्प्यते चान्तिमुद्भाव्य ॥२०॥ शुण्ठी को पानी मे घिसकर अंजन करने से धत्तूर -मद दूर होता है। वृन्ताकपत्र काथ के अजन से भी यही लाभ होता है ।। १७ ॥ मतिमात्रा में अफीम खा जानेवाले को मन शिला द्वारा वमन कराना प्रशस्त है । अथवा सूवा के बीज भीम को मिट्टी तुल्य बना देते है ।। १८ ॥ एक मण पानी मे- उससे भाठवा भाग अर्क-मूल डालकर खूब उकालें। चतुधांश जल शेष रहने पर उतारकर छानले । जब क्वाथ स्वाग शीतल हो जाये तब उसपर जमी हुई थर को निकाल उसमें शुद्ध कुचले का थोढामा चूर्ण मिला अच्छी तरह सरल करके वटिकायें बनालें । इनके सेवन से अफीम खाने की आदत से मुक्ति मिल जाती है ॥ १९ ॥ दूर्वा के अंकुरों को पीस कर वटी बनाले । इस वटीका धीरे धीरे चबाकर, रस पीये, इससे वान्तिपूर्वक भांग का नशा दूर हो जाता है ॥ २० ॥ १-वृन्ताकपत्रक्वाथ । २-मन शिलया । ३-'सुवा' इति ख्यातस्य शतपुष्पा- मेदस्य बीजपुलम् । ४-यस्य फणिफेनमौचित्यं गमितं तस्य तत्त्यागोपायोऽयम् । मुनि- नाप्युक्तं "उचितादहिताद् धीमान् क्रमशो विरमेन्नर । हित क्रमेण सेवेत क्रमश्चात्रोपदि- श्यते ॥ प्रक्षेपापचये ताभ्यां क्रम पादाशिको भवेत् । एकान्तरं ततश्चोर्ध्व यन्तर त्र्यन्तर तया" इति । अष्टाशा सूर्यचरणस्यार्कमूलस्य त्वग्वल्कल यस्मिन्निति नल्वणविशेषणम् । ५-कयनेन । ६-'कुचिला' इति प्रसिद्धानि। किं चास्मिस्तत्रे विषमुष्टिकशब्देन सर्वत्र 'कुचिला' इति ख्यातस्यैव ग्रहणमिति सकेत । ७-स्पष्टमिदम् । यशश्छटा मे परित. प्रसप॑त् तृप्येद्धनं वीक्ष्य धनं मनो मे । एव सखे । वाञ्छसि तत् प्रयच्छ स्वच्छन्दत कम्चि- दपि प्रयोगम् ॥ यः प्राचा भिपजां विवेद महितास्तिस्रोपि ता सहिता साहित्यं च सधर्मशास्त्रमभित स्वच्छन्दवाक् छन्दसि ॥ लक्ष्मीरामसुधी स एष भिषगाचार्यप्रतिष्ठा वहन् श्रीभैषज्यमणिस्रजो विवृतवान् गुच्छ चतुर्थ परम् ॥ . सि. २३ - सिहभेपजमणिमालाया [पारदादि- ३ रजनीहिङ्गुलगी प्रज्वाल्य स्थालिकापुटे पटवर्तिम् । निकालयेद्विधिनः सूतेन्द्रं सर्वयोगाहम् ॥ ५ ॥ ४ उपरिन्युजशरावे घटे तलोत्कीर्णजालविशदनिले । वेष्टितचतुर्गुणपट प्रदीप्य ददं गृहाण रसमच्छम् ॥ ६॥ अथ पारदशोधनम् । पारदं दरदाकृष्टं संपूज्य शुभवासरे । गुणाधान प्रकुर्वीत विधानं तस्य वक्ष्यते ॥ ७ ॥ का ठीकरा ढकदें। इस प्रकार शुद्ध पारद को निकालकर, अम्लादि द्रव्यो से खरल करके इसका औषधादि निर्माण मे उपयोग करें ॥ ४ ॥ हरिद्रा तथा हिगुल को वस्त्रपट्टियो मे अच्छी तरह लपेटकर, एक पात्र मे रख प्रज्वलित करदे । फिर, इसमे से विधिपूर्वक पारद निकाल लेवे । यह पारद सभी प्रयोगो मे उपयोगी हे ॥५॥ हिगुल को चार- तह वाले वस्त्रखड मे लपेट लेवे । अब, हिगुल - गर्मित इस वस्त्र बड के गोलक को अग्नि लगाकर एक मिट्टी के घट मे स्थापित कर देवें। घट के तल-भाग में, हवा अच्छी तरह प्रवेश कर सके, इसलिये बहुत से छोटे छोटे छिद्र पहिले से ही करदे तथा इसी घट के मुख-भाग पर एक सकोरा औंधा ढक देवें । इस घट के अन्दर भग्नि-प्रज्वलित- वस्त्र-गोलक मे से, सकोरे के भीतरी तल - भाग मे उडकर एकत्रित हुये शुद्ध- पारद को सावधानी पूर्वक निकाल लें ॥ ६ ॥ पारद-शोधन (शास्त्रो मे पारद के अठारहविध सस्कारों का उल्लेख मिलता है। इनमे से प्रथम आठ सस्कारों द्वारा अर्थात् स्वेदन, मर्दन, मूर्छन, उत्थापन, पातन, बोधन, नियमन तथा दीपनद्वारा पारदगत आठ प्रकार के दोपो का अर्थात् नाग, वग, अग्नि, मल, चपल, विप, गिरि एव असहाग्नि दोपो का परिहार किया जाता है। इन सस्कारों को प्राप्त-पारद अजरामरत्वरूप देहसिद्धि देता है। अनुवासन, जारण, ग्रास, चारण, गर्भद्रुति, वायगुति, रजन, सारण, क्रामण, और वेधन-रूप अवशिष्ट दस-सस्कारो से १-पूर्वोक्तविध्यन्यतमेन विद्यावरडमर्वादियन्त्रद्वारा वा हिगुलत पृयकृतम्। तथा च रसशास्त्रे-“विद्यावराख्ययन्त्रस्थादाकद्रावमर्दितात् । समाकृष्टा रसो योऽसो हिड्डुलाकृष्ट उच्यते" ॥ अत्र विद्या वरयन्त्र इत्युपलक्षणम् । विद्यावरयन्त्रम्वरूप च-"यन्त्र विद्याधर ज्ञेय स्थालीद्वितयसपुटात्" इत्यादिर्वोध्यम् । २-"अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोर- तरेभ्य । सर्वेभ्य सर्वमर्वेभ्यो नमस्ते रुद्ररूपेभ्यः” इति मन्त्रेण पूजनं, रसानुशारसभैर- वजापश्च, ततो वटुककुमारिकाभोजनमिति कृत्वेत्यर्थ । अन्यत्राप्युक्त--"मन्त्रयन्त्ररस- पादुकाञ्जन स्वर्णनागभुवनादिसिद्धय । तं श्रयन्ति पुरुषं महेश्वरो येन दिव्यतपसा हि तोषित ॥" इति। ३-दरदाकृष्टस्य मलापकर्षण नास्ति शुद्धत्वादिति तदुपेक्ष्य गुणाधान- मित्यभिधानम् । M 'शोधनम् ] पनमो गुच्छ । शुन्द्र पारद म्वर्णरूपी लोह - सिद्धि अर्पण करता है । दोलायंत्र मे, क्षार एवं अम्लद्रव्यों से पारद का उत्वथन 'स्वेदन' कहलाता है। यह पारदगत मलको शिथिल कर देता है। मोपधीय चूर्ण एव रसोहारा सरल मे, मर्दक से, पारद को घोटना 'मर्दन' कहाता है । इसके द्वारा पारद बहिर्मल से मुक्त हो जाता है। मर्दन सस्कारोक्त औषधीय द्रव्यो से पारद को 'नष्ट-पिष्ट' बनाना 'मूर्छन' सस्कार है। इससे पारद के बहि- विपादि दोप की निवृत्ति अवश्य होती है तथापि पारद मे नष्ट -पिष्टत्व रूप मूर्छा- च्यापत्ति मा जाती है। पारद की इस मुर्भावस्था को हटाकर उसको पूर्वावस्था में लाने के लिये, उसे पुनः सचेतन करने के लिये, कांजिका क्षादि अम्ल द्रव्यो से पारद का प्रक्षालन 'उत्यापन' सस्कार कहलाता है। तदनन्तर, ऊर्ध्व, अध. तथा तिर्यक् पातन द्वारा पारद का 'पातन' सस्कार किया जाता है। इस तरह के विविध पातनद्वारा अपने कृत्रिम (योगिक) दोपो से मुक्त पारद कदर्थित तथा निर्वार्य बन जाता है। पारद की इस पंढत्वानिवृत्ति के लिये आचरित सस्कार 'योधन' कहलाता है। षोडश- वर्षीया अरुग्ण-युवति के मार्तव भादि में पारद को निमन करके तीन दिवसपर्यंत भूगर्भ में रहने देने से पारद का वोधनसंस्कार सपादित किया जाता है - मनेन सूतरा- जोऽय पण्ढभाव विमुंचति' । योधनसस्कार से प्रबलवीर्यमपन्न पारद प्रदीप्त हो उठता है। अत उसे वश में करने के लिये, उसकी चपरत्व निवृत्ति के लिये, साक्षी, मम्लिका, झंगराज, धत्तूरा मादि शास्त्रोक्त औषधीय द्रव्यों के रस से एक दिन पर्यंत स्वेदन करने से पारद स्थिरता को प्राप्त हो जाता है। पारद का यह 'नियमन' सस्कार है। इस तरह नियमित पारद भग्निसह बन जाता है । भग्नितप्त होने पर भी उडता नहीं, तथा निर्धूम रहता है । 'नियामतो न प्रयाति तथा धूमगति प्रिये" तदनन्तर, धातु-पापाण-मूलादि द्रव्यो से परिपूर्ण घट के मध्य में स्थापित पारद का, तीन दिवस पयंत स्वेदनहारा, दीपन' जाता है। दीपन-सस्कार से पारद में तीव्रत्व, वेगकारित्व, व्यापकत्व, बुभुक्षितत्व तथा निर्मलत्व गुणो की उत्पत्ति होती है। दीपित पारद को, जंभीरादि के रस से पूर्ण मृत्पात्र में स्थापित करके - एक दिनभर धूप में रसकर अनुवासन' सस्कार निप्पन्न किया जाता है। इस तरह अनुवासनान्त नव सस्कारों से सपन्न रस-राज पारद वह्नि-सम-प्रभाव से उद्दीप्त हो उठता है। तदनन्तर, पारद का 'जारण' संस्कार करना चाहिये । अर्ध्व-पातन- यत्रादिद्वारा पातन के विना तथा वस्त्रादि से गाल नविना, अभ्रक - स्वर्णादि के भक्षणोपरांत भी पारद की स्व-स्वरूप में भवस्थिति ‘जारणा' कहलाती है। 'जारणा हि नाम पातनगालनव्यति- रेवण घनहेमादिग्रासपूर्वक पूर्वावस्थाप्रतिपन्नत्वम्' अर्थात् जारण-सस्कार से रहित भी पारद स्वर्णादि का भक्षण करता है, कितु वस्त्र भादि से परिगालनद्वारा स्वर्ण तथा पारद पृथक् किये जा सकते है। इसी तरह, कजली-गत पारद मापातत गधक में विलीन सा हो जाता है कितु, यंत्रद्वारा वह पृथक् निकाला जा सकता है। तदुपरांत, उपरोक्त दोनो अवस्थामो मे पारद का वजन भी बढ़ जाता है, किंतु जारण-सस्कार- सस्कार किया . ३५८ मिरमे {भारदाद- निपत्रिका मृगग्युरी भाग मेपनिका । भृायजा गिनिशिगा फायमानी मारिया ॥ ८ ॥ अहः सेतुण्डभनु। दुधी मणिया। धामार्गयो बला शिलं शुनं नानिमूली ॥ ९ ॥ प्राप्त - पारद कभीगा दोने पर भषणा गरी पान में अता है, न गान पासनमारा गया - गांति में एयर in EEP, rig फालीगत अथवा खादि-भुग-रित-पारर ग.mir पर भी, पूर्गमम्यापग-बग्वरूप में ही रहता है। इस सरकार मार भारत समन्त्रित होता है। इस गरद से पिर शिये गये पान, गोपीकरण' बाधीत रसायन-सेपन योग्य - परिगदेव मे गुणा पति, अधिकारी ग 'घनहेमादिजी गन्य होगीकरणानामे ग्गिा भगतधिकार । प्रस्तुतप्रकरण में पारद के जागणापधि सरकारों की रिपमा मानों का माधार लेकर न.ययनात्मक च्याम्पा कर देगा, या17, rail विधान को क्रियात्मक रूप में प्रत्यक्ष करके, प्रयशीहा उसी की, मी, मौदिर स्वरूप में, अपने अनुभव का पुट लगाकर प्रस्तुत करने में, भाभा में अभिवृद्धि होती है । भोर इसी में उस पान को प्रस्तुत करने यानी मला समझता है। भात्मशान मे सामान करने वाले, मापूर के व्यापारागार्य, वेदव्यास से कदापि न्यून नही । आयुर्वेद विज्ञान शारिधि ग. श्री नही - नागा- र्जुनादि रस वैज्ञानिको फी समकक्षा के उदट निशान थे। पाशा, नीम-7 में सर्व प्रथम यही एक ऐसा रस-निया-वैज्ञानिक रहा, जिमने स-सान विषय में अपना यह परिचय दिया 'सूते गंधकारणायधिzता येन लिया ने करा.')। हिंगुल में से निकाले गये पारद की पूगा परके उसमें गुणाधान करना चाहिये । जिसकी विधि इस तरह है। (हिंगुल में से निकाग गया पारद शुद्ध होता है । मत. उसके मलापकर्षण की भावश्यकता नहीं रहनी) ॥ ७ ॥ तिपत्ति, मृगनुरी, भम्लकोणिका, मेपटगी, भागरा, मयूरशिपा, काफमानी, गवारपाठा, माकडा, स्नुही, धत्तुरा, दूधी, मण्डकपणी, कोशातकी, पला, सदनना, लशुन, चित्रक, मूली, कचनार, शतावरी, निंब, मनमोदा, भजवायन, खुरामानी मज- वाइन, त्रिकटु, त्रिफला, लाजवंती, मछेली, कण्टकारी तथा सम्रवर्ग (भारत, समीर, निबू, वीजपूर, चांगेरी, चगकाम्ल, इमली, कोल, दाडिम, अपष्ठा, पक्षाम्ल, नारंगी, रसपत्रिका, करमर्द मादि) इन सभी औषधीय द्रव्यों के रस से पारद का नीन- दिवस-पर्यंत दोलायन से स्वेदन करके फिर, तीन दिवस पयंत उसका मर्दन करें। फिर, मतसी, मालकांगनी, दंतीबीज, भिलावा, राई, कालाजीरा तथा भजमोदा इन १-'तिपत्ती' इति ख्याता । २-अम्ललोणिका । ३-मयूरपिाखानामौषधि प्रायः पर्वतभूमौ प्ररोहति । ४-मालोमेद । - शुभ दिवस में . - , शोधनम्] पञ्चमो गुच्छः। ३५९ काञ्चनारो वरी निम्वोऽजमोदा कारवीद्वयम् । त्रिकटु त्रिफला लज्जा मत्स्याक्षी कण्टकारिका ॥१०॥ अम्लवर्गो रसैरेषां स्वेदयेन्मर्दयेत् व्यहम् । उमा ज्योतिप्मती दन्तीवीजभल्लातराजिकाः ॥ ११ ॥ कारवी दीप्यकं चेति तैले प्रत्येकशः पचेत् । गोमूत्रे हिगुपयसि कालिके तैजसे द्रवे ॥ १२ ॥ सूतं निवध्य दोलीयां मासं मासं पृथक् पचेत् । विपैरुपविपैः शस्तं मर्दनं तप्तखल्वके ॥ १३ ॥ प्रत्येक के तैल से पारद को तीन तीन दिवस पर्यंत पकावें। फिर, तीन-तह वाले वस्त्र में भूर्जपत्र रखकर, उसमे पारद स्थापित करके पोटली बाध लें, इस पोटली को दोलायंत्र में लटका कर, तदन्तर्गत पारद को, गोमूत्र मे, हींग के पानी में, काजिका में तथा तेजो जल में पृथक् पृथक् एक एक मासपर्यंत पकावें । फिर, विषों तथा उप- विपोंद्वारा तप्त-खल्व में, सातदिवस तक पारद का मर्दन करें। विषोद्वारा मर्दन से पारद में, पक्षच्छेदपूर्वक वह्नि तथा मुख उत्पन्न होते है। तदनन्तर, तेजोजल से क्षालन तथा उत्कथनद्वारा पारद का प्रतिस्वेदन मर्दन कर लें । तेजोजल का निर्माण छहों प्रकार के लवण तथा आठों प्रकार के क्षार से किया जाता है। इन लवणो तथा क्षारों को एकत्र लेकर उनको लघुपुट (वाराह, कौकुट मादि) की मांच मे फूक दे। कपिलवर्ण की भूमि के जल को क्षारजल कहते हैं । इस क्षार जल को, प्रथम थोडा, उकाल लेवे, जब पक कर गरम हो जाये तब उसमें उपरोक्त लवण तथा क्षार भस्म मिलाकर तीन दिन धूप में रखदें । पात्र तल में, जव भस्म बैठ जाये तव ऊपर का स्वच्छ जल नितार लेवें। इस तरह, अनेकवार नितारने ले, अंत में स्वच्छ, धन-द्रव्यरहित तैजस जल को ग्रहण १-यवानी पारसीकयवानीति द्वयम् । २-नमस्कारी लोके लज्जालुरिति लप्यते । ३-मछेछीति प्रसिद्धा । अत्रानुक्तामपि प्रसारिणी प्रक्षिपन्ति वैद्या । ४-"अम्लवेतसजम्बी- निम्बूकवीजपूरकम् । चाङ्गेरी चणकाम्ल च अम्लीका कोलदाडिमम् ॥ अम्बष्ठा तिन्तिडीकं च नारङ्ग रसपत्रिका। करम तथा चान्यदम्लवर्ग प्रकीर्तित ॥” इति रसशास्त्रोक्तः । ५-दोलायन्त्रेणेति शेप । ६-अतसी। ७-मालकागुनीति ख्याता। ८-इतीत्येषाम् । ९-त्र्यहमिति पूर्वोक्तमत्रापि योजनीयम् । १०-"निवद्धमौपधै. सूतं भूर्जे तत्रिगुणाम्वरे। रसपोटलिका काष्ठे दृढं वष्ट्वा गुणेन हि ॥ संधानपूर्णकुम्भान्त खावलम्वनसस्थिताम् । अधस्ताज्वालयेदनि तत्तदुक्तक्रमेण हि ॥ दोलायत्रमिदं प्रोक्तं स्वेदनाख्य तदेव हि ॥" इत्युक्तस्वरूपायाम् । ११-अम्लवर्गेण सहेति शेष । विषाण्युपविषाणि तन्त्रान्तरे प्रोक्तानि । यथा-"शृङ्गिक कालकूटं च वत्सनाभं सकृत्रिमम् । पित्तं च विषवर्गोऽयं प्रवर परि- कीर्तित ॥” इति । तया "लागली विषमुष्टिश्च करवीर जपा तया । तिलक. कनकोऽश्च वर्गो ह्युपविषात्मक ॥” इति । एभि. सह मर्दनाद्धि जायते पारदस्य वहि पक्षच्छेदो मुख च, यथोक्तं-"विषोपविषकैमर्य प्रत्येक दिनसप्तकम् । तेनास्य जायते वह्नि पक्षच्छेदो मुख ३६० सिहभेषजमणिमालाया [पारदादि- तेजोऽद्भिः क्षालनोत्क्वाथौ प्रतिवेदनमर्दनम् ॥ लेवणक्षारवर्ग प्राक कनीयसि पुटे पचेत् ॥ १४ ॥ तोणे क्षारसलिले क्षित्वा धर्म व्यहं न्यसेत् । परिस्राव्य बहून् वारान् गृह्णीयात्तैजसं द्रवम् ॥ १५ ॥ प्रतिसंस्कारममुना पारदोत्कथनं स्मृतम् । सृष्ट्यम्वुजप्रभृतिषु विनिमज्याधिपात्रकम् ॥ १६ ॥ सप्ताहं पूरयेद्गर्ते राजहस्तप्रमाणतः। क्षिप्त्वाऽम्लैः सैन्धवशिलागर्ते नियमनं चरेत् ॥ १७ ॥ मातुलुङ्गरसे न्यस्य धर्मान्तरनुवासयेत् । वालुकाकूर्मकुधरगर्भाद्यन्यतमे दृढे । यन्त्रे दरांशगरलं षड्गुणं जारयेद्वलिम् ॥ १८ ॥ करके काचकूपी मे भर दें। इस तेजस् - दवद्वारा पारद का प्रति संस्कार, 'उत्कथन' कहलाता है। तदनन्तर, षोडश वर्षीया अरुग्ण युवति के आर्तव आदि से युक्त-घट में पारद को स्थापित करके, उसे तीस-अंगुल गहरे भू-गर्त में, एक सप्ताह पयंत गाड कर रख दें। पारद का यह 'बोधन' सस्कार कहलाता है । फिर, सैंधव-शिलागत में पारद को पधराकर, भम्लवर्गोक्त औषधीय द्रव्य-रसों से पारद का नियमन' सस्कार सपादित करना चाहिये। सदनन्तर, मातुलुग-रस में पारद को डालकर, सूर्य-ताप में स्थापित करके उसका 'अनुवासन' सस्कार करलें। अब, इस तरह सुसंस्कृत पारद को वालुका, कच्छप, भूधर अथवा गर्भ आदि किसी एक यंत्र मे स्थापित करें। फिर, पारद से पडण अधिक, अत्यल्प मात्रा मे गरल-मिश्रित गंधक को लेवें-इस गंधक को, उप- रोक्त पारद मे, थोडी थोडी मात्रा से प्रक्षिप्त करते हुये, जारित करें ॥ ८-१८ ॥ तथा ॥” इति । तप्तखल्वलक्षणं च स्मरणीयम् । यथा-"अजाशकृत्तुषानि च भूगर्भ त्रितयं क्षिपेत् । तस्योपरि स्थितं खल्व तप्तखल्वमिति स्मृतम् ॥” इति । तथाऽन्यत्र-“लौहो नवाजुल खल्वो निम्नत्वे च षडङ्गुल । मर्दकोऽष्टाङ्गुलश्चैव तप्तखल्वाभिधो ह्ययम् ॥ कृत्वा खल्वाकृति चुल्हीमझारै परिपूरिताम् । तस्या निवेशितं खल्व पार्श्व भस्त्रिकया धमेत् ॥” इति । १-समनन्तरमेवाभिधीयमानविधानाभि । २-"लवणानि षडुच्यन्ते सामुद्रं सैन्धवं विडम् । सौवर्चल रोमकं च चुल्हिकालवण तथा ॥क्षारत्रयं समाख्यातं यवजस्वर्जिटङ्कणम् । पलाशमुष्ककक्षारो यवक्षार सुवर्चिका ॥ तिलनालोद्भव क्षार सप्रोक्तं क्षारपञ्चकम् ॥ इत्यादि तन्त्रान्तरोक्तम् । ३-वाराहकौकुटाद्यन्यतमे। ४-कपिलवर्णभूमिभवं जलं तादृशं भवति । यदुक्तं चरके-“श्वेते कषाय भवति पाण्डुरे स्यात्तु तिक्तकम् । कपिले क्षारससृष्ट- मूषरे लवणान्वितम् ॥ कटु पर्वतविस्रावे मधुर कृष्णमृत्तिके । एतत्साद्गुण्यमाख्यातं महीस्थस्य जलस्य हि ॥” इति । ५-सस्कारस्यास्य बोधनमिति सज्ञा शास्त्रे । सृष्टयम्बुज चार्तवमिति सक्त । ६-विश्वामित्रकपालकाचकूप्याद्यन्यतमपात्रे । ७-"वोधनाल्लब्धवीर्यस्य चपल- त्वनिवृत्तये । क्रियते पारदे स्वेद प्रोक्तं नियमनं हि तत्" इत्युक्तरूपम् । -अनुवासन- मिदम् । ५-विहितपूर्वोकविधानस्य पारदस्य यथा गन्धकजारणं विधेय तदर्शयन्ति-वालु- ।
शोधनम्] पञ्चमो गुच्छ.। सद्भाण्डे धूलिग चषकमतिभृतं गन्धचूर्णैर्निदध्यात् । स्फीता लौही त्रिपादी तदुपरि चपकालङ्कतां न्यस्य विद्वान् । तत्र प्रक्षिप्य सूतं त्रिगुणमथ मृदाऽऽयोज्य भाण्डे पिधानं दत्ते वह्नौ पिधानात् पतितमिति रसे जारयेद्गन्धधूमम् ॥ १९ ॥ तेजोद्भिर्वक्ष्यमाणाभिः क्वथनं प्रतिजारणम् । उपादानानि तासां तु क्षाराः सर्वे पटूनि च ॥ २० ॥ प्रस्तुतश्लोक मे गर्भ-यंत्रद्वारा पारद की गन्धक- धूम से, जारण-विधि प्रदर्शित की गयी है। यह स-गन्ध-सन्तधूम मूर्च्छना का प्रकार है इस प्रक्रिया को परम सावधानतया संपादित करें। एक विशाल-घट लेकर उसमे, उसके मध्यभाग से कुछ ऊपर तक, धूलि भरदे । इस धूलि -गर्भ घट के भीतर एक चषक स्थापित करें-चषक को आमुख गधक - चूर्ण से लबालब भरदें। इस चषक के ऊपर एक ऊची लोहमयी त्रिपादी तथा त्रिपादी पर, गंधक से त्रिगुणित पारद-पूर्ण चषक स्थापित करें। अब, घट के मुख को एक ढक्कन से बध करके चारो ओर कपडमिट्टी करदें। घट के नीचे अग्नि-प्रज्वलित करें। ढक्कन के मुख से टकरा कर, पारदपर पतित गंधकीय धूमद्वारा 'जारण' संस्कार सपादित करलें ॥ १९ ॥ जिन तैजस् जलों से पारद का क्वथन तथा प्रतिजारण करने में भाता है, उनके केल्यादि । पद्धणगन्धकजीर्णस्य रसराजस्य रोगमात्रहन्तृत्वमुपजायते "षड्गुणे गन्धके जीणे रसो भवति रोगहा। अवश्यमित्युवाचेद देवी श्रीभैरव स्वयम्" इत्युक्ते । वालुकायन्त्र- स्वस्पं च यथा-"भाण्डे वितस्तिगम्भीरे मध्ये निहितकूपिके । कूपिकाकण्ठपर्यन्तं वालुका- भिश्च परिते ॥ भेषजं कूपिकासस्थ वहिना यत्र पच्यते । वालुकायन्त्रमेतद्धि यन्त्रं तत्र बुधैः स्मृतम्"। तथा कच्छपयन्त्रलक्षणमपि यया-“जलपूर्णपात्रमध्ये दत्त्वा वै खपरै सुविस्ती- र्णम् । तदुपरि विडमध्यगत स्थाप्य सूत- कृत कोध्याम् ॥ लघुलोहक्टोरिकया कृतपट- मृत्सधिलेपयाऽऽच्छाद्य । पूर्णतरैर्घटखपरमध्येऽझारैश्च खदिरकोलमयै ॥ स्वेदनतो मर्दनत कच्छपयन्त्रस्थितो रसो जरति”। तथैव च भूधराह्वयं यन्त्रमुक्तं-"वालुकागूढसर्वाङ्गी गर्ने मूपा रसान्विताम् । दीप्तोत्पलैः सवृणुयाद्यन्वं तद्भूधराह्वयम्" इति । गर्भयन्त्रखरूपं च समनन्तरं स्वयमेवोच्यमानम् । आदिशब्दादिष्टिकायन्त्रादि बोध्यम् । यदुक्तमन्यत्र-" विधाय वर्तुल गर्त मलमत्र निधाय च । विनिधायेष्टिका तत्र मध्यगर्तवतीं शुभाम् ॥ गर्तस्य परितः कुर्यात् पालिकामगुलोच्छ्रयाम् । गर्ते सूतं विनिक्षिप्य गर्तास्य वदनं क्षिपेत् ॥ निक्षिपेद्गन्धक तत्र मल्लेनास्यं निरुध्य च । मल्लपालिकयोर्मध्यं मृदा सम्यडिस्थ्य च ॥ वनोत्पलै पुट देयं कपोताख्यं न चाधिकम् ॥ इष्टिकायन्त्रमेतत्स्याद्गन्धकं तेन जारयेत्" इत्यादि । गरलप्रक्षेप- श्चात्र सम्यक्तया गन्धकजारणार्थ गुणाधानार्थ च । षड्गुणबलिश्च क्रमेण देयो न त्वेकदेव, समें समं बलिं दत्त्वा षट्कृत्वो जारयेदित्यर्थ । १-कटोरीमित्यनान्तरम् । तथा च रसरत्नसमुच्चये "चषकं च कटोरी च वाटिका खारिका तथा । कचोली ग्राहिका चेति नामान्येकार्थकानि हि”। २-तेजोपाम् ।
- सिद्धभेषजमणिमालायां [पारदादि- किंचिद्विदाह्य संगाल्य प्रत्येकं सत्त्वमुद्धरेत् । सुधाखण्डानि पादोनं स्वर्जिकासत्त्वमुत्तमम् ॥ २१ ॥ ततोऽर्धमर्कजं सत्त्वं तदर्धान्यपराण्यपि । सत्त्वजातमतिक्षारे कृपक्षीरेऽभिगालयेत् ॥ २२ ॥ अप्टाहमातपे धृत्वा तीक्ष्णतां तत्र साधयेत् । तेजोजलं शनैर्नीत्वा पुनस्तत्र जलं क्षिपेत् ॥ २३ ॥ न्यस्यातपे पुनरपि द्रवं पूर्ववदुद्धरेत् । द्वित्रिवारमिति प्राज्ञः कृत्वा तद्वकसं त्यजेत् ॥ २४ ॥ तेजोजलं तदेकध्यं विस्त्राव्य पटतोऽसकृत् । मुक्ताच्छं काचगं रक्षेत् सौरसागरसिद्धये ॥ २५ ॥ कलमं सौरमादाय यथाविधि विशोधितम् । तेजोजलैः पचेतावद्यावह्निक्षम भवेत् ॥ २६ ॥ निर्माण की सविस्तर विधि प्रस्तुत श्लोकों से बताई जाती है। तेजस् जलों का निर्माण सभी प्रकार के क्षार तथा लवणों के सत्वों से किया जाता है । (लवण छह प्रकार के कहे गये है -सामुद्र, सैंधव, विड, सौवर्चल, रोमक तथा पांशुज, क्षार पाठ प्रकार के कहे गये है -स्नुही, पलाश, अपामार्ग, चिचा, अर्क, तिलनाल, स्वर्जिका तथा यवक्षार । सभी प्रकार के क्षारों से टकण का भी ग्रहण किया जाना चाहिये।) प्रथम, प्रत्येक क्षार को तथा प्रत्येक लवण को किचित् गरम करके वस्त्रपूत करलें । फिर, सत्व निर्माणविधि से प्रत्येक में से अलग अलग सत्व निकाल लेवें । भव, एक भाग सुधाखड, इससे एक चतुर्थाश उत्तम सर्जिकाक्षार का सत्व, इससे अर्धमात्रा में भर्कक्षार का सत्व तथा इससे अर्ध मात्रा में, उपरोक्त विधि से निर्मित लवण और क्षार के सत्वों को लेवें। इस सत्व-समूह को कूपजल से छानकर आठ दिवसपर्यंत कडी धूप में रहने दें। तदनन्तर, अत्यत सावधानी से, पात्र जरा भी हिलने न पाये इस तरह से, धीरे धीरे ऊपर से तैजस्-जल को नितारलें। इस नितरे हुये तेजोजल में पुन कूपजल मिलाकर पुनः आठ दिन तक धूप में रखदें। नवमे दिन, पात्र हिलने न पाये इस तरह, पूर्ववत् , ऊपर का द्रव-भाग नितारलें । इस तरह दो तीन वार करके, द्वभाग को निकालकर, तल-लग्न किह को अलग फैंक दें। अब, इस तरह प्राप्त-तेजो जल को कई वार वस्त्रपूत करें। परिणामत , मोती के समान स्वच्छ एव उज्ज्वल तथा वह्निक्षमत्व सिद्धि से युक्त इस तेजोजल को, काच की शीशी में भरकर सुरक्षित रख देवें ॥२०-२५ ॥ कलमी सोरे को वह्नि-क्षम बनाने की विधि-उत्तम जाति के कलमी सोरे का यथाविधि शोधन करके, उसे तेजो-जल में, वह्निक्षम न बन जाये तब तक उकालते ही १-सुधाखण्डापेक्षयेत्यर्थ । २-पूर्वोक्तविधिविहितानि लवणक्षारसत्त्वानि । ३-"नीरक्षीराम्बु शम्वरम्" इत्यभिधानम् । ४-निष्कम्पमित्यर्थ । ५-चहिक्षमत्वरूपा हि तत्सिद्धि । ६-सौरविशेषणमिदं, तस्य चोत्कृष्टजातेरिय संज्ञा । ७-पूर्वोकै । ।
पञ्चमो गुच्छ.। रहें । इस शोधनम्] ३६३ कृप्यां निधाय ते सिद्धं मुखं कूप्याः पिधाय च गते हयशवदर्भ निधीत त्रिमासकम् ॥ २७ ॥ सागरं विंशतिगुणसुधाक्षोदान्तरस्थितम् । दहेदिभपुटे सिद्धं निर्माल्य स्रावयेत् पटात् ॥ २८ ॥ तं पक्त्वा धनतां नीतं पुटेल्लघुपुटे पुनः। ततो निर्गाल्य निस्राव्य स्वच्छतामुपलम्भयेत् ॥ २९ ॥ तं पाकात् किञ्चिदाश्यानं पचेत्तेजोजलोच्चयैः। चाङ्गेरीजम्भजरसैः पुनरावर्त्य शोषयेत् ॥ ३० ॥ कूप्यां संभृत्य संमुन्य स्थापयेद्भुवि सौरवत् ॥ ३१॥ सौरं यवानीविर्जयासमन्वयात् कृपीटयोनिक्षमतां प्रलम्भयेत् । तदन्तरावापितमग्निदानतः सिद्ध भवेद्धिङ्गुलमल्लतालकम् ॥ ३२ ॥ विधि से सिद्ध इस दव को काच कूपी में भर, उसके मुख को दृढतया मुद्रित करके, मश्व की लीद से पूर्ण भूगर्त में- तीन मास पर्यत गाडकर रख देवें ॥२६-२७॥ सागर अर्थात् चुल्हिका लवण (नौसादर) को वह्निक्षम करने की विधिः-सागर को उससे बीस गुणित सुधा-चूर्ण में दवाकर गज - पुटकी भाच मे फूक दे। तदुपरात, इसको पानी में घोलकर वस्त्र - पूत करके, पुन वस्त्र में से टपकालें। इस दव को अग्नियोग से पकाकर-घट्ट बनालें तथा पुन एक लघु पुट देवें । इसे पुन. पानी में मिलाकर वस्त्र से छानलें। फिर, पात्र में रखकर, ऊपर के द्रवभाग को नितारले । इस तरह पुन पुनः नितारकर केवल स्वच्छ भाग ग्रहण करें। इस स्वच्छ द्रव को पुन. पकावें, किचित् धन होनेपर, तेजो जल-राशि- मिलाकर इसे पुन उकाले । तत्पश्चात् , इस दव के पुन. घन होनेपर, इसमें चागेरी तथा जमीर का रस डालकर, इनका रस निःशेप न हो जाये तब तक, इसे उकालते रहें। अंतमे, कूपीमे भरकर, मुख को मुद्रित करके, सोरे की तरह, तीन मास पर्यंत, अश्व-लीदसे पूर्ण भूगर्भ मे स्थापित करके, रहने दें ॥ २८-३१ ॥ सोरे को वह्नि-क्षम बनाने का दूसरा-प्रकार तथा उसका उपयोग -भाग तथा अजवायन के सम्बन्ध से सोरा वह्नि-क्षम बन जाता है। इस प्रकार के वह्निक्षम-सोरक में भावापित किये गये (अर्थात् अन्दर दबाये गये) हिगुल, मल्ल तथा हरिताल, अग्नि- १-सौरसिद्धिमभिधाय सागरस्यापि स्वच्छताविधानपूर्वक सिद्धिविधिरभिधीयते, -सागरं चुरिहकालवणम् । २-जलेनेति शेष । ३-ईषद्धनीभूतमिति यावत् । “पथश्चाश्यान- कर्दमान्" इति रघुवंशे। ४-जम्भो जम्बीर । ५-प्रकारान्तरेणापि सौरस्य वहिक्षमत्वं तथा तादृशस्य कुत्रोपयोग इत्यभिधीयते। ६-“भङ्गा गजा मातुलानी मादिनी विजया जया" इति निघण्टु । ७-कृपीटस्य जलस्य योनि कारणं वहिरित्यर्थ । "वायोरग्निरने- राप." इति श्रुते ।
सिद्ध पजमणिमालायां [पारदादि- भगायवानीपिहितः प्रदीपितः सौरो वृहद्भानुसहो भविष्यति । गूढं तदन्तर्दरदालमल्लकं चुल्यग्निना सेत्स्यति नोडुयियते ३३ ॥ अथ रसयोगा:- १ अम्ल रसशतमग्लो विमर्दितौ पातयेच्छतं वारान् । एप प्रशमयति रसो बलासपवमानसंरम्भम् ॥ ३४ ॥ २ छिकायां संशशि रसं पिष्टायां द्विगुणगन्धतेजोद्भिः। निक्षिप्य चतुर्यामं कुप्यां पत्वाऽऽढीत रसभस्म ॥ ३५ ॥ ३ रसरसबिधू नवाक्षी सार्धपु चतुःसुवर्णवलिमल्लौ। कृप्यां यहं परिपचेत् पवनकफौ हन्ति मल्लसिन्दूरः ॥ ३६ ॥ ४ रसभागा रसतः पुनरेकैकस्तालमल्लगन्धकतः। कृप्यां द्यहं परिपचेत् पवनक.फौ हन्ति तालसिन्दूरः ॥ ३७ ॥ ५ त्रिपलँश्चपलो गन्धः पलार्धः कजली द्वयोः। कृपयां भृत्वाऽऽलमानार्धमुपर्याकीर्य कम्पयेत् ॥ ३८ ॥ विमुद्य वालुकायन्ने पचेद् द्वादशयामकम् । जायते रससिन्दूरः सिन्दूरसदृशच्छविः ॥ ३९ ॥ योग से सिद्ध हो जाते है ॥ ३२ ॥ सोरे को भांग तथा अजवायन के भीतर रखकर, क्रमवृद्ध अग्नि से प्रज्वलित करें, वह वह्नि-क्षम बन जायेगा। चूल्हे की सतत मांच देनेपर भी यह सोरा कदापि नहीं उडेगा, इतना ही नहीं इस सोरे के भीतर रखे गये-हिगुल, हरिताल तथा मल्ल सिद्ध भी हो जायेंगे ॥ ३३ ॥ रस योग.-(कुल प्रयोग ८३)-निंबू, जभीर, बीजपूर मादि के अम्ल-रसों में अच्छी तरह खरल करके, पारद तथा शतमल्ल का शत वार ऊर्ध्वपातन करलें। यह 'रस' कफ तथा वात के वेग को प्रशमित कर देता है ॥ ३४ ॥ द्विगुणित गंधक तथा तेजोजल से पीसी गई नक्छीकनी में समान भाग पारद मिला, काच कूपी में भरकर, बारह - घंटे बालुका यत्रद्वारा पकावें । इस 'रस-भस्म' को उपयोग में लें ॥३५॥ पारद तथा- रसक पूर प्रत्येक नौ तोला, गधक ६३ तोला तथा शतमल्ल ४३ तोला इनको एकत्र, दो दिवस पर्यंत, काचकूपी में, क्रमवृद्ध मग्नि-द्वारा पकावें । यह 'मल. सिंदूर' वात-कफ को नष्ट कर देता है ॥३६॥ पारद छह भाग तथा हरिताल, मल्ल और गधक प्रत्येक एक एक भाग-इनको एकत्र पीस कूपी में भरकर दो दिन तक पकावे । यह 'ताल-सिंदूर' वात तथा कफ को दूर करता है ॥३७॥ पारद बारह तोला तथा गंधक दो तोला, इनकी कजली बनाकर कूपी में भरदे। फिर, उपर से दो तोला १-जम्बीरनिम्बूकवीजपूरादिभि । २-ऊर्ध्वपातनयन्त्रेण । ३-समानायाम् । ४ चालुकायन्त्रेणेति शेप । ५-पारदरसवपूरौ । ६--अध्यर्धपञ्चकर्षो वलिः, सार्धचतु कर्षः शतमल्ल इति । ७-पड्भागाः । ८-पारद. । ९-हरितालम् ।
। शोधनम् ] पञ्चमो गुच्छ । अमुष्य नित्यमभ्यासाच्छ्रेयः संपद्यते ध्रुवम् । चीण्या विशालया यामं घृष्ट्वाऽम्लैः क्षालयेद्रसम् ॥ ४० ॥ कूपी काचमयीं मृदम्परहढा चूर्णचतुर्मुष्टिभि- भृत्वा हिङ्गुलजैः समावप यथादेशं हसन्त्यां सखे । ज्वाला यहि विनिःसरेद्वदनतः कृप्यास्तदा वारिणा नाली प्रोक्ष्य ततो गृहाण सहसा चन्द्रोदयं नालिकम् ॥ ४१ ॥ सुवर्णगर्भता नक्तमुदञ्चच्चाकचक्यता। भासुरारुणवर्णत्वं प्रत्यग्रोदितचन्द्रवत् ॥ ४२ ॥ तलस्थता मनोजत्वं मार्दवं गुणशालिता। न यत्र सप्तलिङ्गानि तं न चन्द्रोदयं वदेत् ॥ ४३ ॥ हरिताल चूर्ण भुरका कूपी को अच्छी तरह हिला लेवें। अब, कृपी मुख को मुद्रित करके, वालुकायन में रखकर ३६ घण्टे तक पकावे । सिदूर के समान रक्ताभ 'रस- सिदूर' सिद्ध हो जायेगा । इस रस के नियमित सेवन से, नि सदेह आरोग्य रूप सुख की प्राप्ति होती है। यहा पारद को, प्रथम इन्द्रवारुणी फल-रस तथा शक्कर-चूर्ण से तीन प्रहर तक सरल करके अम्ल रसो से प्रक्षालित करें। इस तरह शोधित पारद का उपरोक्त रस-सिंदूर में उपयोग करे ॥ ३८-४० ॥ हिंगुल के वीस तोला चूर्ण को, एक काचकूपी में भरकर, उसके चारों ओर दृढ कपडमिट्टी करलें । इस कूपी को प्रज्वलित-अंगीठी पर रख देवें । कूपी के मुख से से जव ज्वाला निकलने लगे, तब उसकी नालीपर पानी छिटकदें तथा शीघ्र ही नलिका- लन्न 'चन्द्रोदय' को निकाल ले। इस तरह, उपरोक्त विधि से बनाया गया चद्रोदय, वस्तुत चद्रोदय' नहीं है, तथापि अमुक वचक -वैद्य इस तरह सरल - विधि से तथा- कथित चंद्रोदय बना लेते है। इस प्रकार से निर्मित चद्रोदय का, अनुभवी-सद्वैद्य कदापि उपयोग न करें । वचक -वैद्यों से सावधान करने के लिये ही यह प्रयोग यहां लिखा गया है ॥४१॥ विधिपूर्वक सिद्ध किये गये चद्रोदय के लक्षग यहा दिये जाते है। निम्न लिखित सातों लक्षणो से रहित चद्रोदय को कदापि शुद्ध न समझे । १-जिसके गर्भ में स्वर्ण हो, २-जो रात्रि में प्रकाश युक्त रहे, ३-जो नपोदित चद्रमा के समान चकचकित अरुण - वर्ण वाला हो, ४-जिसमे तलस्थता हो, ५-जो मनोरम, ६-मृदु तथा ७-गुण १-पूर्वोक्तरससिन्दूरकरणाय पारदशोधनप्रक्रियेयम् । सिता चात्र चीणीशब्दार्थः । विशालाया फलरसो गृह्यते। २-वञ्च फवैद्यविधीयमानचन्द्रोदयप्रकारोऽयमत्यन्तावधान- पूर्वकप्रवृत्त्यर्थ भिषा प्राकाश्य नीत । ३-"काचायोमृद्वराटाना कूपिका चषकानि च" इत्यतो गृह्यमाणानां मृदादिकूपीनां व्युदासार्थ काचशब्दोपन्यासः । तत्राप्यरुणपिञ्जरसि- तान्यतमकाचघटिताम् । ४-व्यावहारिकविंशतितोलकमितैः । ५-अङ्गारधानिकायाम् ।
सिद्धभेषजमणिमालायां [पारदादि- ७ रसबलिरविरजतकनकमुक्तातालप्रवाललोहाभ्रम् । बद्धा पेटे विपक्का वैलितैले हेमगर्भपोट्टलिका ॥ ४४ ॥ ८ एको मुक्ताफलजरजसः कुकुमं च त्रिभाग जातीजातीफलमृगभुवां द्वौ विभागौ पृथक् स्तः । हेनो मुक्तावमलवलिः पारदोऽपि त्रिभागः सारे मद्यः क्षयकसनकफान् हन्ति खल्लीरसोऽयम् ॥४५॥ ९ स्थालीसंपुटनिर्गतो दरदतः सूतो भवेत् संस्कृतः सप्ताहं नवसादरेण सहितैर्मायूरपाटीरसैः। आनं तस्य वलिः समो मृदु तयोस्तुल्यं दलं काञ्चनं मुक्तायोऽभ्रकवज्रभस्म विमलं कर्पप्रमाणं पृथक् ॥ ४६॥ खल्वे तत् सकल विमर्च मसृणं कृत्वाऽग्निना द्रावित रम्भापत्रपुटे निधाय झटिति प्रोत्पीडयेहस्त्रतः। सिद्धः काञ्चनपर्पटीरसवरः कृष्णासखः सेवितो दाडिम्याः स्वरसेन हन्ति हटतो मन्दाग्निमूलामयान् ॥ ४७ ॥ युक्त हो-वही सिद्ध चंद्रोदय है । तलस्थता-गुण तभी आ सकेगा जब सु-सस्कृत एवं षड्गुण जारित, अत एव वति-क्षमता को प्राप्त पारदद्वारा ही चन्द्रोदय सिद्ध किया गया हो । चंद्रोदय मे स्वर्ण -गर्भता तभी सभवित है जब उसमे तल्स्थता हो, मत पूर्वोक्त विधि से यदि पारद को, प्रथम बुभुक्षित न बना लिया हो, तो तल भाग मे स्वर्ण की कृष्णवर्ण भस शेष रह जायेगी। स्वर्ण ऊपर उठकर नहीं चढेगा ॥ ४२-४३ ॥ पारद, गंधक, ताम्र, रजत, स्वर्ण, मुक्ता, हरिताल, प्रवाल, लोह तथा पत्रक इनको एकत्र कौशेयादि वस्त्र से पोटली मे बाधलें। फिर इसको द्रव-भूत गंधक द्वारा अग्नियोग से पकावें । इस विधि से 'हेमगर्भ पोहलिका' निर्माण करें ॥ ४४ ॥ मुक्का- भस तथा स्वर्ण-भस १-१ भाग, जावित्री, जायफल तथा कस्तूरी २-२ भाग; केसर, शुद्ध-गधक तथा पारद ३-३ भाग, इनको एकत्र लेकर दूध मे से निकाले गये नव- नीत में खरल करलें। यह 'खल्ली-रस' क्षय-कास तथा कफ को नष्ट कर देता है ॥ ४५ ॥ हिगुल मे से, स्थाली - सपुटद्वारा निकाले गये पारद को, एक सप्ताह पर्यंत, मयूरशिखा के स्वरससहित नवसादर से खरल करलें, इस विधि से वह शुद्ध हो जाता ६-यथाविधिविहितस्य चन्द्रोदयस्य लक्षणं द्वाभ्याम् । तत्प्रक्रिया च प्रसिद्धत्वादुपेक्षिता । -पूर्वोक्तषड्गुणगन्धजारणान्तविधया वहिक्षमत्वमुपलम्भितेन पारदेन क्रियमाणस्यैव चन्द्रोदयस्य तलस्थत्व सभवति । अथवा रसेन्द्रचिन्तामण्युक्तद्वितीयवालुकायन्त्रेणापि । तलस्थत्वेनैव च सुवर्णगर्भताऽपि भवितु शक्या नान्यया, सुवर्णस्योट्टयनासभवादित्यभिप्राया। १-कौशेयादिवस्त्रे। २-गन्धकचूर्णेऽमियोगाद्रुते त्यनवनीते । ५-मयूरशिखारसै । ६-एवं संस्कृतस्य दरदाकृष्टसूतस्य । । ३-मृगभू. कस्तूरी । ४-दुग्धो- पञ्चमो गुच्छा ३६७ - शोधनम्] १० पलमितपरिमाणे निर्मलीवीजकल्के धृतममलसुवर्ण मुद्रयित्वा द्विमाषम् । अथ सुरभिशकृद्भिः पाचयेत्तनिवारं चलखिलकार्य योजयेत् सिद्धमेतत् ॥४८॥ अथान्ययोगाः- ११ दहेदपामार्गजकल्कगर्भितां गर्तेऽप्रकृत्वो दशगोमयोत्पलैः। आकल्लकल्केऽपि तथैव राजती मुद्रामय रूप्यरसो महागुणः ॥४९॥ १२ तापं तापं रवेः खण्डं मरुशाखिप्रसूनजे। रसे निर्वापयेत् पञ्चशतकृत्वः समाहितः ॥५०॥ तद्वकसजकल्कस्थं द्विसिंगजपुटैः पुटेत् । तद्भसँ धवलप्रख्यं बलं धत्ते घृताशिनाम् ॥ ५१ ॥ है। इस तरह सशोधित पारद चार तोला तथा समभाग गधक, इनको लेकर कजली निर्माण करें। फिर, क्जली-तुल्य-प्रमाण में सोने के बरक तथा मुक्ता भस्म, लोह- भस्म, अभ्रक भस्म और हीरक भस्म प्रत्येक १-१ तोला लेकर कजली मे मिला, खरल में मर्दित करके खूब मुलायम बनाले। फिर, अग्नियोग से इस मिश्रण को पिघला, कदली- दलपर फैलाकर ऊपर दूसरा कदली पत्र रख शीघ्र ही वस्त्र से खूब दबादें । इस विधि से सिद्ध यह रसश्रेष्ठ 'कांचन-पर्पटी' कहलाता है। दाडिम-रस के भनुपान पूर्धक, पिप्पली चूर्ण में मिलाकर, इसका सेवन करने से, मंदाग्नि-जन्य विकार शीघ्र नष्ट हो जाते है ॥ ४६-४७ ॥ क्तक- बीजों के चार तोलाभर कल्क में दो माषाभर शुद्ध स्वर्ण रखकर शराव-सपुटित करके गोवरी की आच के तीन कपोत पुट देवें । बल देने वाले इस सिद्ध वर्ण का सभी भवस्थाओं मे-भौषधादि. कायों में उपयोग करें ॥४८॥ - अन्य प्रयोग-(कुल-प्रयोग-८३) अपामार्ग के २० तोले कल्क में, जयपुरीय झाडशाही रुपये को रखदें। फिर, एक गर्त में, दश गोमय उपलो की अग्निद्वारा दस बार पकावें । पुन इसी तरह सकल- करे के करक में रखकर दस वार, उपरोक्त - विधि से, पुट देवें। यह 'रूप-रस' महान् गुण दर्शाता है ॥ ४९ ॥ एक ताम्र मुद्रा को अग्नि में तपाकर, पांच सो वार, करीर- पुष्प के स्वरस में बुझावें। इस बुझावे वाले स्वरस में, करीर-पुष्प के बुक्स को (उपरोक्त स्वरस निकाल लेने पर भवशिष्ट बुक्कस-मुक्की को) मिलाकर कल्क बनालें। अब, इस कल्क मे उपरोक्त ताम्र मुद्रा स्थापित करके, उसे दो या तीन गजपुट की मांच मे फूक देवें। श्वेत-वर्ण की इस भस्म को एक चावल-भर मात्रा में लेने से १-कतकबीजकल्के। २-रूप्यक जयपुरीयं, तस्यैव प्रशस्तत्वात् । ३-ताम्री मुद्रा- मित्यर्थ । ४-करीरपुष्पखरसे। ५-मरुशाखिपुष्पबकसे निर्वापणावशिष्ट रस निक्षिप्य कल्क- येदिति । ६-विकल्पोऽयम् । ७-तन्दुलाधिकं न देयम् । K सिद्धभेपजमणिमालायां [पारदादि- १३ प्रस्थैकगण्डीररसे क्षवस्य निर्वाप्य ढकमनेकवारम् । तद्वकसान्तश्छगणोत्तमा या पचेत दिक्प्रस्थसमुद्धताभ्याम् ॥५२॥ एप प्रयोगोऽद्भुतशक्तिधारी मुमूर्पतां प्राणगत्तेः प्रणेता। प्रत्यर्पि सारस्वतशम्भुदत्तविद्यार्थिना पञ्चनदालयेन ॥ ५३ ॥ १४ पिष्वा यनाङ्गैदुग्धेन पृथगक्षावयोरसौ। सपुटे न्यस्य संमुन्य सप्तप्रस्थोपलैः पुटेत् ॥ ५ ॥ त्रिभिः पुटैर्भवेद्भस्म पक्कदाडिमसंनिभम् । भक्षयेत्तन्दुलमितं पीतताम्बूलयोगतः ॥ ५५ ॥ त्रिभिर्दिनैर्भवेत् कामी यदि पश्येत् स्त्रियं न हि । रक्तपित्तं जयेत् सिंहशार्करेण निपेवितम् ॥ ५६ ॥ १५ करकं न्यस्य हसन्त्यां तत्र च यसदं द्रवीकृत्य । तदुपरि तदर्धमानं त्रिः किर चिरयन् पुनर्नवामूलम् ॥ ५७ ॥ तदनु तदर्धं तत्र त्रिः क्षिप पूर्वमिव शृङ्गविषम् । सिद्धमिति यसदभसितं वल्लमितं वा ततो मनागूनम् ॥ ५८ ॥ तथा पथ्य मे घृत सेवन से बल मे वृद्धि होती है ॥ ५०-५१ ॥ राई के चौसठ तोला भर गण्डीर-स्वरस मे, एक ताम्र मुद्रा को तपा तपा कर, भनेको-(शतवार) वुझावे दे। फिर, इस मुद्रा को निप्पीडित - गण्डीर-बुक्स से स्थापित करके, ५-५ सेर की दो पाथियो मे रखकर २५६ तोला शुष्क उपलो की अग्नि से फूक दे। यह प्रयोग अद्भुत शक्ति देता है। यहा तक कि मरणासन्न व्यक्ति के प्राणों की भी यह रक्षा करता है। मेरे ही छात्र, पजाब- निवासी शभुदत्त सारस्वत ने यह प्रयोग मुझे बताया ॥ ५२-५३ ॥ लोह - भस्म तथा पारद प्रत्येक एक एक तोला लेकर दोनो को उढुवर के दूध मे खूब घोटले । फिर, शराव - सपुट मे रखकर कपडमिही करके, ४४८ तोला उपलो मे फूक दे । इस तरह तीन ही पुटो मे पक्क दाडिम - फल के समान वर्णवाली “उत्तम भस्म बन जायेगी। इसकी एक चावल - भर मात्रा को तांबूल के साथ लेने से तीन दिवस मे ही, स्त्री की ओर दृष्टि न करने पर भी काम स्वत उत्पन्न होने लगता है । इसेही, रक्त- पित्त की शान्ति के लिए 'मटरूपक (भरडूसा) शार्कर' के साथ, सेवन करना चाहिये ॥ ५४-५६ ॥ अगीठी पर एक करवे (मृत्पात्र) मे यशद को पिघला लेवें। यशद से अर्ध मात्रा मे पुनर्नवा मूल के चूर्ण को, कुछ देर ठहर ठहर कर, तीन वार, द्रवित यशद पर प्रक्षिप्त करदे । तदनन्तर, अर्ध-मात्रा भर शृगी विष के चूर्ण को भी, इसी तरह डाल देवें । इस विधि से यशद - भस्म सिद्ध हो जायेगी। इस भस को एक वाल-मात्रा मे अथवा इससे कुछ न्यूनमात्रा मे-तावूल के साथ १-राजिकाया प्रस्थगण्डीरस्य 'गादल' इति प्रसिद्धस्य रसे। २-गोमयरचितशुष्केन दिक्प्रस्थमितेन छगणद्वयेनेति । ३-पञ्चनद 'पजाब' इति प्रसिद्धो भारतभाग । ४-औदु- म्बरदुग्धेन । ५-शरावयोरिति शेष । ६-आटरूषकशार्करेणेत्यर्थ । ७-त्रिकृत्वेत्यर्थः । है शोधनम् ] पञ्चमो गुच्छ । दलगं निपेव्य तदुपरि कवलय गुडपावकं सरोद्दीप्त्यै । रससेवनमर्यादा दिनानि नव तैलवर्जितं पथ्यम् ॥ ५९ ॥ १६ भागैकैमहिफेनस्य नागभागचतुष्टयम् । घर्पणान्निम्वकाप्ठेन मन्दवह्निप्रदानतः ॥ ६०॥ नागभूतिर्भवेद्भव्या मनाक पीतहरित्प्रभा। शस्ता मेहादिरोगेपु वीर्यदाळकरी मता ॥ ६१ ॥ १७ तालं ज्योतिष्मतीतैले मजयित्वा मुहुर्मुहुः। द्रुतनागोपरि प्राज्ञः क्षिप्रं विष्वेग्विवर्तयेत् ॥ १२ ॥ सर्वतैलक्षये जाते तत्तालं प्राप्तसंस्कृति । विशालाफलगर्भस्थ विभिश्छगणकैः पुटेत् ॥ ६३ ॥ एवं शतपुटैस्तालं सिद्धिमालम्बते पराम् । सार्धप्रस्थं वे तैलं नाग तालं विहाम्रकम् ॥ १४ ॥ १८ शाणाः शिलातो दश तालतोऽपि ते खण्डात् खरामा दधि साम्लमाढकम् । लेकर, उसपर गुढ - निर्मित सीरे का भोजन करे। यह भस्म तीव्र विरेचनपूर्वक कामोद्दीपन करती है। यह अनुभव सिद्ध है। इस रस के सेवन की अवधि नव दिवस तक ही है । तैलवर्जित पथ्य है ॥ ५७-५९ ॥ एक भाग अफीम तथा चार भाग सीसा लेवे । सीसे को एक मिट्टी की कडाही मे पिघला ले-फिर, उसमे शनै शनै अल्पाल्प- मात्रा से अफीम-चूर्ण का प्रक्षेप करते हुये, निब - काष्ट से उसे रगडते रहें। इस प्रकार मदाग्निद्वारा, किञ्चित् पीत - हरित-प्रभा से युक्त उत्तम नागभस सिद्ध हो जायेगी। प्रमेहादि रोगो मे यह प्रशस्त है, तथा वीर्य को गाढा करती है ॥ ६०-६१ ॥ हरताल को ज्योतिष्मती के तैल में पुनः पुन बुझाकर, इस तैल लिप्त हरताल को चीमटे से पकड कर से पिघले हुये सीसे पर चारो तरफ से तपावें । तैल के सपूर्ण जल जाने पर हरिताल का सस्कार हो जाता है। इस तरह शोधित हरताल को, इन्द्रवारुणी-फल के गूदे मे रखकर तीन उपलो का पुट देवें । इस तरह शतपुट देनेपर ताल परम सिद्धि को प्राप्त होता है। उपरोक्तविधि से तैल तथा नाग प्रत्येक ९६ तोला लेवें तथा ताल चार अथवा दो तोलाभर लेवे ॥६२-६४॥ मन शिला तथा हरताल प्रत्येक तीस-माघा, शक्कर ९० माषा, किचित् खटासयुक्त दही २५६ तोला-इन सब को एकत्र पात्र में भर १-ताम्बूलपत्रसहितम् । २-इदं यसदभस्म महान्तं विरेकमुद्भाव्य स्मरोद्दीपनं करो- तीत्यनुभव । ३-खर्परस्थे द्राविते निम्बकाष्ठेन घृष्यमाणे सीसके शनै शनैरहिफेनप्रक्षेप- परम्परा कार्या । ४-हरितालम् । ५-सदशादियन्त्रेण गृहीत्वेति शेष । ६-नागमपि सार्वप्रथमेव । ७-पल पलार्ध वा। ८-मन शिलाया दशशाणा इत्यर्थ । ९-त्रिंशच्छाणा इत्यर्थः । १०-ईपदम्लम् । सि० २४ । - सिन्दभेपजमणिमालाया [पारदादि- ३७२ सर्व संमद्य सप्ताह काकणन्तीसमा वटी । गीर्णा' दुग्धानुपानेन पाण्ड्यशोथविवन्धनुत् ॥ ७६ ॥ २६ पञ्चाशदन्दोत्तरमप्यखण्डितां सखे ! समस्तेन्द्रियशक्तिमीहसे । अशुद्धमेवोन्दुरमारमद्धि रे तिल तिल द्वादशवत्सरावधि ॥ ७ ॥ २७ मल्लाहिफेनदरदं चटपयसाऽऽपिग्य निर्मिता वठ्यः । सवृतसितदुग्धगीः संग्राहिण्यः सरा वितीर्णवलाः ॥ ७८ ॥ २८ जातीफलं जातिपत्रीं सर्पफेनं लवङ्गकम् । तोलं तोलं पृथकृत्वा सर्वमेकत्र कल्कयेत् ॥ ७९ ॥ कल्कान्तः कल्कतुलितं न्युक्त्वा हिमुलखण्डकम् । कल्कस्य गोलकं बढा वस्त्रग्रन्थी शिखायुजि ॥ ८० ॥ तैलान्तरागलं ग्रन्थि मज्जयित्वा शरावके । दीपयज्वालयेन्मूर्ध्नि वासरानेकविंशतिम् ॥ ८१ ॥ चार तोला, इन सबको एकत्र एक सप्ताह तक खूब खरल करके गुजा भर गुटिकायें बनालें । दुग्धानुपान - पूर्वक एक वटी को प्रात निगल जायें। इसकी सेवनावधि पंदरह दिवस तक है। यह नपुसकता, शोथ तथा विबन्ध को दूर करती हे ॥ ७५ ॥ हे मित्र ! पचास वर्ष की वय के उपरात भी, यदि तुम भरनी इन्द्रिय समूह की संपूर्ण शक्ति को अखडित रखना चाहते हो, तो पथ्य-रूपसे धृतप्रचुर भोजन करते हुये, बारह वर्ष अरे । एक एक तिल-जितनी मात्रा मे अशुद्ध मल्लका ही सेवन करते रहो ॥ ७६-७७ ॥ मल्ल, अफीम तथा हिगुल को वट-दुग्ध में घोटकर मूग-तुल्य गुटिकायें बनाले । मिश्री तथा घृतयुक्त दूध के साथ सेवन करने से यह बल देती है । बद्ध मल का नि सरण करती है । मिन्न - मल को रोकती है अर्थात् भतिसार में लाभ देनी है। इस गुटी का यह भचिन्त्य-प्रभाव है ॥ ७० ॥ जायफल, जावित्री, अफीम तथा लविंग प्रत्येक १-१ तोला लेकर इनका एकत्र कल्क बनाले । इस कल्क में तुल्य वजन जितना हिंगुल का खड रखदे तथा कल्क का गोला बनालें । इस गोलक को वन-पोटली में बाधलें -तथा पोटली के दोनों सिरो को एकत्र उमेठकर वर्तिकाकार बनालें । भव, इस पोटली को भामुख (अर्थात् पोटली की ग्रंथि तक), तैलपूर्ण शराव मे रखकर, पोटली के वर्तिकाकार सिरे को दीपक की तरह प्रज्वलित कर दें। इस तरह इक्कीस दिवस पयंत पुन पुन तैल डालकर इसको प्रदीप्त-स्थिति में रहने दें। तदनन्तर, कल्क-गोलक में से सिद्ध हिगुल-खद को निकाल लेवें। इस हिगुल-खड को पुन धत्तूरे के शुद्ध किये गये वीजों के कल्क में रखदें। भव, इस हिगुल-खट-गर्भित करक-गोलक को भोभल १-प्रातरिति शेष । सेवनमर्यादा पञ्चदश दिनानि। २-शतमल्लम् । घृताशिना चात्र भवितव्यम् । ३-मुद्गप्रमाणा । ४-भिनवर्चसा सग्राहिण्यो, बद्धवर्चसा सरा, इति विषयभेदान्नात्र विरोध , प्रभावस्याचिन्त्यत्वाच्च सर्व संघटते इति । ५-आफूकम् । ६-वस्त्र- प्रान्तयोर्वर्तनेन शिखा कार्या । ७-निखा गलादधोवर्तिनि तैले पुनरन्यत्तैलं प्रक्षेप्यम् । तक, - - शोधनम् ] पञ्चमो गुच्छ । ३७३ कल्कगोलात्ततः कृष्टा सिद्धं हिड्डुलखण्डकम् । शुद्धधत्तूरवीजानां करकं कृत्वा तदन्तरे ॥ ८२ ॥ निधाय कोष्णभसितैस्त्रिवारमवकूलयेत् । कुश्माम्बरकस्तूरीकाञ्चनानि यथाक्रमम् ॥ ८३॥ द्वात्रिंशदष्टपट्सप्तवल्लानि परिचूर्णयेत् । नागवल्लीदलरसैविभाव्य वटिकाः कृताः ॥ ८४ ॥ वलासवातमन्दाग्निप्रमेहमथनक्षमाः। यथोचितानुपानेन प्रयोज्या भिषगुत्तमैः ॥ ८५ ॥ २९ चिन्नक्षीरैमहिष्या वटपेयसि पुनाफेनेन पिष्टं धृत्वा स्वाद्वीफलान्तर्द्विगुणितदरदं युक्ष्व गोधूमलोप्त्रीम् । गव्याज्ये साधु पक्त्वा मसृणय दरदं नागवल्लीपयोभि- गुंजामखं तदीयां निशि गिल गुलिकां चेच्चिरं रन्तुमिच्छा ॥ ८६ ॥ ३० विघटे पलाण्डुजरसे पक्तव्यं दोलया पलं दरदम् । अष्टाहमुषितमवनौ गुजैक कामकारिपर्णेन ॥ ८७ ॥ (चूल्हे की गरम राख) से भाच्छादित करदें, इस तरह गरम-राख से तीन बार आच्छादित करें। भन्त मे, कल्क में से हिगुल-खंड को निकाल लेवें। अब केसर, अंबर, कस्तूरी तथा स्वर्ण-पत्र को क्रमश. बत्तीस, भाठ, छ तथा सात वालभर प्रमाण में लेकर इनका सूक्ष्म चूर्ण बनालें । भव, इस चूर्णसहित हिगुल को एकत्र खरल मे, नागरवेल के पत्र-स्वरस की भावना देकर खूब मर्दन करके वटिकायें बांधले। यह टिकायें मदाग्नि, कफ, वात तथा प्रमेह का मथन कर देती हैं। श्रेष्ठ वैद्यो को यथोचित अनुपानपूर्वक इसका प्रयोग करना चाहिये ॥ ७४-८५ ॥ एक तोला हिंगुल को, भैंस के १२८ तोला दूध में, दोलायंत्र-द्वारा, स्विन्न करलें । दोला को इस तरह लटकाना चाहिये कि जिससे दूध के उफान का फेन भी उसे स्पर्श न कर सके । अर्थात् दुग्धोद्भूत-बाप्पद्वारा ही हिगुल का स्वेदन करें। जब- तक दूध घट्ट न हो जाये तब तक स्वेदन करते रहें । फिर, वट के एक तोला भर दूध में छह मापा मफीम घोलकर, इस द्रव - मिश्रण से, स्विन्न हिंगुल को खरल मे खूब मर्दित कर लें । इस तरह मर्दित हिंगुल को, छुहारे मे भर देवें- तथा इसके चारो ओर गेहूं के भाटे की टपरी चुपडकर, गाय के सोलह तोला घी में भच्छी तरह पकावें । तदनन्तर, नागरवेल पत्र खरस में इसको खूब वारीक घोटकर, एक गुजाभर मात्रा से चिररमणार्थ-रात्रि के समय लेवें ॥८६॥ चार तोला हिंगुल को, प्याज के तीन द्रोण रस में, दोलायंत्र द्वारा-पकावें । तदुपरांत, इसे भाठ दिन तक भू-गर्त में गाड दें। १- भोभल' इति प्रसिद्ध । २-आच्छादयेत् । ३-काञ्चनस्य सूक्ष्मतरदलानि, ग्राह्याणि । ४-दोलायन्त्रेण स्वेद । दोला च तथा लम्बनीया यथोत्तिष्ठद्धि फेनैरपि दोलास्पर्शो न भवेत् । दुग्धस्य सान्द्रतावधिस्वेद । दुग्ध च प्रस्थद्वयम् । ५-तोलकमिते [वाजीररण- - - ३७४ सिन्दभेपजमणिमालाया ३१ जातीफलस्य फणिफेनभृतोदरस्य लिप्तस्य सत्पुटमृदा परिपाचितस्य । एलाकुरगसुमकुङ्गामहिमुलाढ्या रेतो रुणद्धि गुटिका पयसा निपीता ॥ ३२ आकल्लजातीफलजौतिकैलाकस्तूरिकाकुङ्कमहिङ्गलानाम् । पटे पटुः पोट्टलिकां प्रणीय निक्षिप्य दुग्धे विपचेद्धसन्त्या ॥ ८९ ॥ ज्ञात्वाऽर्धशेपं ससितं पयस्तन्निष्काश्य तां पोट्टलिकां पिवेद्यः । भवन्ति भोगाय न तस्य शक्ताः प्रचण्डकामा. शतशोऽपि रामा.॥२०॥ ३३ भङ्गाबीजलवगहिङ्गुलविपाकल्लत्रिकसश्वजि- जातीसालिमजातिकाफलमिपेर्मापाः स्युरो पृथक् । पिष्ठा स्थाप्य च नारिकेरजठरे संसाध्य दुग्धाढ के खण्डे पश्चगुणे क्षिपेत् पलमिता वट्यो महापुष्टिदा. ॥ ९१ ॥ ३४ निमजितानि त्रिदिनं घृतान्तः खण्डानि वै शम्बरङ्गजानि । दिक्प्रंस्थकै. काननगोमयानां दुग्धीजकल्के पच साधु पोढा ॥ २२ ॥ नागरवेल -पत्र में एक गुजा मात्रा से सेवन करें ॥ ८७ ॥ जायफल के भीतर अफीम भरकर कपडमिट्टी करके उसे अच्छी तरह पकालें । तदुपरात, इलायची, कस्तूरी, लौंग, केसर तथा हिगुल-इनको एकत्र जायफल -तुल्य - वजन मे लेकर, उपरोक्त सिद्ध जायफल के साथ खरल मे घोट ले। दूध के साथ इस गुटी को लेने से वीर्य - स्तभित होता है ॥ ८८ ॥ भकलकरा, जायफल, जावित्री, इलायची, कस्तूरी, केसर तथा हिगुल-इनको एकत्र एक पोटली मे अच्छी तरह बांधकर तथा इसे दूध में रसकर, अंगीठि ऊपर पकावें। जब दूध आधा रह जाये तब उसमे से पोटली निकाल लेवें। मिश्री मिलाकर इस दूध को पीने वाले की भोग-शक्ति के लिये, काम-वेगसे पीडित शत युवतिया भी, पर्याप्त नहीं हैं ॥ ८९-९० ॥ भाग के बीज, लोग, हिगुल, शूगीविष, अकलकरा, त्रिकटु, करवीर, जावित्री, सालिम, जायफल तथा सौंफ प्रत्येक आठ तोला लेकर -इनका वस्त्रपूत सूक्ष्म चूर्ण बना कर, नारियेल की गुलिका के भीतर भर देवे । फिर, २५६ तोला दूध मे इसे पकाकर सिद्ध करलें । अब, इस नारियेल को, पाच गुणा मिश्री मिलाकर, पीसलें, तथा चार तोला वजन की वटिकायें बाधले । यह वटिया महापुष्टि अर्पण करती हैं ॥ ९१ ॥ धृत में तीन दिवस पर्यत डुबोकर रखे गये सोलह तोला शम्बर-शृग के टुकडो को, दूधी के चौसठ तोला कल्क में रखकर, छह सो चालीस (अथवा तीन सो वीस) तोला वन्य- बटदुग्धे पण्माषेणाहिफेनेन सह तोलकमि हिडलं पिष्ट स्वाद्वीफलान्तर्ध वा तदुपरि गोधूम- लोजी युझवेति योजना। ६-कुडवमिते। ७-द्रोणत्रयमिते । १-एलादिसभारो जातीफलसमो ग्राह्यः । अत्र कुरङ्गशब्देन कस्तूरी, सुमशब्देन च लवङ्ग ग्राह्यम् । २-जातिका जातिपत्री। ३-विषं शृङ्गीकम् । ४-अश्वजित् करवीर । जाती जातिपत्री। ५-कुडवमितानि । ६-शम्बरो विकटबहुविपाण शरदि शृङ्गत्यागी कश्चिन्मृगविशेष । ७-सौश्रुतै , तेन चरकानुमतपञ्चप्रस्थैरेवेति । ८-प्रस्थमिते ।
- प्रकरणम् ] पञ्चमो गुच्छ.। ३७५ ततः स्नुहीसूर्यपयालु देहि पुटं द्विपेन्द्राभिधमेकमेव । सिद्ध सितं भस्म भजस्व मापं प्रभूतदुग्धं यदि पातुमिच्छा ॥ ९३ ॥ ३५ वम्बूललम्बिकण्टकगृहगतकीटं विदाह्य घृतकर्के । तद्भस्म तन्दुलमितं संतानिकया तनोत्यतनुमतनुम् ॥ ९४ ॥ ३६ स्वाहीफँलान्यधिपयो त्रुडितान्यनस्थी- न्यन्त क्षुराणि पच सर्पिषि लोप्त्रिगानि । सक्षौद्रभाण्डनिहितानि खनाधिचुल्हि- भूदृग्दिनान्यनुपयांसि भजस्व पुष्टयै ॥ ९५ ॥ ३७ छोहाराफलमजा विभज्य पयसा पिचून्मितः पीतः । पुग्णाति वपुपि वीर्य किं च क्लिन्नात्यतीसारम् ॥ ९६ ॥ ३८ भावितात् स्वरसैः सप्तवारं गोक्षुरकात् पलम् । वर्याकल्लकभैषज्यमुशलीतः पृथक् पलम् ॥ ९७ ॥ गोवरी की मांच से छह वार अच्छी तरह पकावें। फिर स्नुही तथा आकडे के दूध में रख कर एक गजपुट से फूक दें। इससे शम्बर सींगों की श्वेतभस्म सिद्ध हो जायेगी। यदि, अधिक प्रमाण में दूध पीकर उसे पचा जाने की इच्छा हो तो इस भस्म को एक माषा प्रमाण में नागरवेल पत्र के साथ लेवें ॥ ९२-९३ ॥ बबूल के काटो पर निर्मित- कोपगत कीट को, घृत स्निग्ध एव लाक्षा तथा विष से लिप्त, छोटे से मुलायम करवे में रखकर, करीब २३ प्रस्थ कडों की अग्नि से जला देवें । एक चांवल - भर इस भस्म को दूध की मलाई के साथ लेने से प्रवलकामोत्तेजना होती हे ॥९॥ गुठली रहित छुहारों को दूध मे भिगो देवें । 'फिर, उनमे तालमखाने के वीज भरकर - तथा इनको, चारों ओर से गोधूम आटे की लूपरी से प्रलिप्त करके, घी मे पकावें । तदुपरांत, इन छुहारों को, इनसे चतुर्गुणशहद पूर्ण- पात्र मे निमग्न करदें । भव, इस पान को, चूल्हे में गत खोदकर गाड देवें । इस तरह करने से, इस पात्र को नित्य प्रति चूल्हे की क्षग्नि का ताप लगता रहेगा। इस पात्र को एक वीस दिवस पर्यंत इसी तरह गर्त मे रहने दें। तदुपरात, पात्र को निकाल कर, एक एक छुहारे को दूध के साथ, चबाकर पीजायें। इससे पुष्टि मिलती है ॥ ९५ ॥ छुहारे के फल की मजा को दूध में मसलकर, दो तोला मात्रा में पीने से, शरीर में वीर्य की वृद्धि होती है तथा अतिसार मिटता है। इसी छुहारे को जल मे मसलकर लेने से विवंध दूर होता है ॥ ९६ ॥ चार तोला गोखरू को, उसी के स्वरस की सात १-गजपुटम् । २-नागवल्लीदलादिनेति शेष । ३-अध्यर्धसेटकद्वयमितश्छगगकै रिति । ४-घृतस्निग्धे लाक्षाविषलिप्ते स्वल्पमृद्भाण्डे । ५-दुग्धोत्थया। ६-बहुलं काम- मित्यर्थ । ७-'छोहारा' इति प्रसिद्धानि । ८-क्षुर कोकिलाक्ष. 'तालमखाना' इति लोकप्रसिद्ध । ९-खाद्वीफलापेक्षया क्षौद्रं चतुर्गुणम् । १०-तयाकरणेन प्रतिदिन ताप- सभव । ११-एकविंशतिदिनानि । १२-पुष्टिकामो दुग्धेन, विवन्धकामो जलेनति विभाग । १३-वरी शतावरी, भैषज्यं शुण्ठी। । १ सिद्धभेपजमणिमालाया [वाजीकरण- माषाः पद कुश्मात् खण्डं सर्वतुल्यं समीरितम् । पयसैतद्रजा पीतं पुष्टिदं भवति ध्रुवम् ॥ १८ ॥ ३९ उच्चटामूलचूर्णानि पीत्वा दुग्धैः सितासखैः । जीर्णप्रायोऽपि भवति समुद्दीपितर्पकः ॥ ९९ ॥ ४० शाणौ नवाकल्लकवानरीजो गुजाः सिताः शाणमिता विचूर्ण्य । प्रस्थे पयस्यर्धशते प्रपाच्य योऽश्नाति योपासुस नैति तृप्तिम् ॥१००॥ ४१ शुण्ठीशाल्मलिनिर्यासौ गद्याणावस्थिरहला। आकारकरभश्चोभावर्धगद्याणको पृथक् ॥ १०१॥ लोहवाणं द्विगद्याणमष्टगद्याणकास्तिलाः । चपला चाधिगद्याणा सर्वतुल्या सितोपला ॥ १०२ ॥ चूर्णमुत्तमरामाण्यं बलवीर्यकृदुत्तमम् । पराऽस्य कार्षिकी मात्रा ह्यनुपानं सितापयः ॥ १०३ ॥ ४२ विश्वशाल्मलिनिर्यासलोहवाणजनू रंजः । सशर्करं पयः पीतं धातुपुष्टिकरं परम् ॥ १०४ ॥ भावनायें देवें। फिर शतावरी, अकलकरा, सूठ तथा मुशली प्रत्येक चार तोला तथा केसर छह माषा लेकर, गोखरूसहित इनका एकत्र सूक्ष्म कपडछान चूर्ण बनालें । तदुपरांत, इस चूर्ण मे चूर्णसमान वजन में मिश्रीचूर्ण मिलाकर, दूध के साथ सेवन करने से निश्चय पुष्टि मिलती है ॥ ९७-९८ ॥ उटींगण मूल के चूर्ण को मिश्रीमिश्रित दूध के साथ पीकर, वृद्धन्व को प्राप्त भी, काम-भाव से उद्दीप्त हो उठता है ॥१९॥ नूतन - अकलकरा तथा कौंच प्रत्येक तीन तीन मापा तथा श्वेतगुंजा तीन मापा इनको लेकर सूक्ष्म चूर्ण बनालें । इस चूर्ण को चौसठ तोला दूध में पकावें । अर्धावशेष रहने पर, दूध को उतार, उसमे शक्कर मिलाकर पीनेवाला अतृप्त की तरह रमणियो से रमण करता है ॥ १०० ॥ सूठ तथा शाल्मलिनिर्यास- प्रत्येक छह मापा, मेंदालकडी तथा अकलकरा प्रत्येक तीन माषा, लोहबाण बारह माषा, तिल अडतालीस माषा, पिप्पली चौवीस मापा तथा इन सभी द्रव्यों से समान-भाग में मिश्री, इनका एकत्र सूक्ष्म चूर्ण करले । बल तथा वीर्य की वृद्धि करने वाला यह 'उत्तम चूर्ण' उत्तमराम से प्राप्त होने के कारण 'उत्तम-राम' नाम से प्रसिद्ध है। इसकी उत्तम-मात्रा एक तोला है, तथा अनुपान है, मिश्री-मिश्रित -मधुर- दूध ॥१०१-१०३॥ सूठ, शाल्मलि निर्यास तथा लोहबाण से निर्मित चूर्ण को, शर्करा-मिश्रित दूध के साथ पीने से १- उटींगण' इति प्रसिद्धस्य मूलचूर्णानि दुग्धं कोणं चेदेतचूर्णक्षेपेनोत्फणतीति । २-"कन्दर्पो दर्पकोऽनझ.” इति कोश । ३-श्वेतवर्णा गुजा इति स्वन्ध । ४-'मैदा- लकडी' इति ख्याता। ५-आकल्लकम् ‘अकरकरा' इति ख्यातम् । ६-अनेनैव नाम्ना प्रसिद्ध धूपोफ्योगि सुगन्धि द्रव्यम् । ७-पिप्पली। ८-चूर्णम् ॥ I पञ्चमो गुच्छ । प्रकरणम् ] ३७७ ४३ समं शाल्मलिनियासैलाहवाणं सितोत्तरम् । नकं पयोनुपानेन द्विवल्लं तुष्टिपुष्टिदम् ॥ १०५ ॥ ४४ कपदोपपदं लोहवाणं द्वादशतोलकम् । जातीफललवालं प्रत्येकं वार्धितोलकम् ॥ १०६॥ काचकोशभृताव्यकोशात्तैलं समुद्धरेत् । तत्तलाकशरीदत्तवीजाई पर्णतल्लजम् ॥ १०७ ॥ त्रिसन्ध्यमुपयुक्षीत व्यहमेव गतस्मरः । पथ्यं गोधूमदुग्धाज्यशर्कराप्रभृति स्मृतम् ॥ १०८ ॥ कार्यमत्र गुरुप्रोक्तमधोभुवनयन्त्रकम् । आलकस्याज्यदुग्धाभ्यां त्रिवारं शुद्धिरिप्यते ॥ १०९ ॥ ४५ तैलाक्तप्रत्नपादत्रैर्दनोऽमंत्रं प्रपूरयेत् । तन्मुखे चीनचपकं न्युजं संयोज्य मृत्पटैः ॥ ११०॥ पश्चात् पातालविधिना गृहीयात्तैलमुत्तमम् । ततैलमर्दनाद्भगो ध्वजभद्गस्य जायते ॥ १११॥ धातुओ की परम- पुष्टि होती है ॥ १०४॥ शाल्मलि निर्यास में समान-भाग लोह- बान मिलाकर, इनके चूर्ण का दो वाल मात्रा में मिश्रीयुक्त दूध के अनुपान पूर्वक सेवन, पुष्टि तथा तुष्टि देता है ॥ १०५॥ कोडिया-लोहवान वारह तोला, जायफल, लौंग तथा हरिताल प्रत्येक चार तोला-इनको एकत्र काचकूपी मे भरकर, पाताल-यंत्रद्वारा तैल निकाल लें। इस तेल से सिक्त-सींकद्वारा एक के अंक से अंक्ति नागरवेल का पान खायें (अर्थात् तैल सिक एक सींक - भर मात्रा से पान के साथ लेवें)। इस तरह दिवस में तीन बार लेवें। तीन दिवस- पयंत, इसके सेवन से ही, काम का आविर्भाव होता है। प्रयोग- काल में गोधूम, घृत, दूध, शक्कर भादि पथ्य है। इस तेल को गुरु-प्रोक्त, अधोभुवन (पाताल - यत्र ) द्वारा निकालें । इसयोग में हरिताल को, प्रथम, घृत तथा दूध द्वारा तीन वार शुद्ध करके, फिर उपयोग मे लेना चाहिये ॥ १०६-१०९ ॥ तैल मे सिक्त पुराणी जूतियों को, दहि-मथन भांड में, भर देवें । फिर, भांड मुखपर चीनी कटोरी मआँधी ढककर सधि को कपड-मिट्टी करदें । अब, पाताल-यंत्र-विधिद्वारा इसमें से उत्तम तैल टपकालें। इस तैल के मर्दन से ध्वज-भग-भन्न हो जाता है । धूपैल-तैल- निर्माण-प्रसग मे उपवर्णित पाताल-यंत्र-विधि ही यहां उपयोग में लेवें । अर्थात् तैल ह १-षडक्तिकम् । त्रिगुञ्जो वल्ल उच्यते" इत्युक्ते । २-'कोडिया लोहवाण' इति प्रसिद्धम् । ३-आलं हरितालम् । ४-चतुस्तोलकमित्यर्थ । ५-द्रव्यसमूहात् । .६-तत्तैलमन्ना या शरीपीका तया दत्तो लिखितो बीजाङ्क एकाको यस्मिस्तत्तथाभूतम् । ७-नागवल्लीदलम् । ८-पुराणोपानदि । ९-दधिमन्थनभाण्डमित्यर्थ ।
सिद्धभेपजमणिमालायां [वाजीकरण- यन्त्रन्यासो विपर्यस्तः कार्यों धूपेलयन्त्रवत् । कोकिलैश्छगणैर्वह्निः पृथक पाण्डवसेटकैः ॥ ११२ ॥ तथाऽत्र कौशलं कार्य यथा तैलस्य न क्षयः। तैलाक्तीकृत्य पादत्राण्यतिप्रनानि कारयेत् ॥ ११३ ॥ ४६ "भङ्गा सेर दुरस्त पावे चरकेगोभा द्विमासे भरी आफू सर्व मिलाय तेल कचिया तोला तहां छ कहा। पीछे तैल पतालयन्त्रविधितें सीसीविपे खींचके कीजे मर्दन मर्दकी फिरसही तेजी जगे क्यों नहीं" ॥ ११४ ॥ ४७ वातामजस्नेहपिचौ मृगोत्थाकाश्मीरजातीफलजातिपत्रिकाः। एकैकशो वल्लसिताः प्रणीय विमर्थ यामं विदधीत कृप्याम् ।। ११५ ॥ ततः प्रलिम्पेच्छनकैरुपस्थ खादेत् पर्दाकुव्रततिच्छदेन नश्येच्छथत्वं करकर्मजातं तृतीयमुच्चै रचयेत् पुमर्थम् ॥ ११६ ॥ ४८ पातालयन्त्रपतितं तैलं वानरविभवम् । भशयन्म्रक्षयन् मापं भवेद्भूयो युवा नरः ॥ ११७ ॥ निकालते समय, भाडमुख - भाग (अर्थात् चीनी-कटोरी वाला भाग) नीचे - तथा जूतियोवाला भाग ऊपर रखना चाहिये। उपरोक्त विधि मे, करीव ३२० तोला कोयलो की तथा इतने ही वजनभर कडो की भाच देनी चाहिये । तैल को सावधानीपूर्वक इस तरह निकाले, जिससे तैल यथामात्रा में नष्ट हुये विना, निकल सके। यहा, जूतियों को • पहिले ही से तैलसिक्त करके रख देनी चाहिये जिससे समय बीतने पर वह पुरानी भी हो जायेंगी ॥ ११०-११३ ॥ धोकर साफ की गयी भाग एक सेर, बट-शुग पावभर, अफीम दो माषा- इनको एकत्र लेकर, छह तोला कचिया तैल में निमग्न करदें । फिर, पाताल-यंत्र विधि से, शीशी में तैल निकाल लें। इसके मर्दन से ध्वज- होता है तथा नवयौवन सुलभ 'ताजगी' जागृत हो उठती है ॥ ११४ ॥ बादाम के एक तोलाभर तैल में, कस्तूरी, केसर, जायफल तथा जावित्री प्रत्येक एक वाल भर मिला, एक दिन तक खरल करलें। फिर, शीशी मे भरकर, सावधान- तया धीरे धीरे उपस्थपर इसका प्रलेप करें तथा पान मे एक रत्ति मात्रा से सेवन भी करें। यह हस्तमैथुनोद्भूत शिथिलता को मिटाता तथा मनुष्य के तीसरे अर्थ (काम) का प्रचुर मात्रा मे सपादन करता है ॥ ११५-११६ ॥ वानर-पुरीष में से पाताल-यत्रद्वारा तैल-टपका लें। इसके लेप तथा भक्षण से मनुष्य नवयौवन प्राप्त १-यथा चीनचपकमधस्ताद्धृतपादनभाण्डं चोपरिष्टाद्भवेत्तया कार्यम् । धूपेलतैल च क्षुद्ररोगठितम् । २-पञ्चप्रस्थमानै । ३-प्रस्थमितेत्यर्थ । ४-चौतेति यावत् । ५-कुडव- मितानि । ६४-वटशुङ्गानि । ७-षट् । ८-वातामस्नेहकर्षे । ९-कस्तूरी। १०-रकि- -प्रमाणमिति शेषः । ११-कामाभिधानम् । १२-उपस्थ इति शेषः । H । - . -- पञ्चमो गुच्छ । प्रकरणम् ] ३७९ ४९ निष्पीकृष्णगर्दभवृपणरुधिरया जलौकया पक्वम् । तैलं करनिधुवनकृतशेफ शैथिल्यहारि निर्दिष्टम् ॥ ११८ ॥ ५० दक्षाण्डेसारवडवापीयूपार्द्र पटं निबध्नाति । भूभृद्भिरहोभिरहो पुरुपः पौरुपमवाप्नोति ॥ ११९ ॥ ५१ द्यहात् स्खलनशीलेन केनापि यवनेन मे। ऋक्ष कौकुरं शेफ. शेफोदाढ्य समीरितम् ॥ १२० ॥ ५२ त्रिर्मजितं रविपयसि कर्पटमभिपिच्य सर्पिपा किमपि । प्रज्वाल्य पातयेत् सपिलिम्पेत लिङ्गदााय ।। १२१ ॥ ५३ शिलापृष्ठे पिष्ट्वा पलतुलितमाकारकरभं वटीः कुर्यात् पश्चाच्छतधवलवार्ताकजरलैः। तया लिङ्गं लिप्त्वा सह मदिरया योऽभिरमयेत् स्त्रियं सा सर्वस्वं वितरति च तस्मै स्पृहयति ॥ १२२ ॥ ५४ साकल्लकै रघसै. प्रसूतीलङ्ग विलासी निशि मर्दयित्वा । भुते प्रियां यः स्खलितेऽपि शुक्रे न शिश्नशैथिल्यमुरीकरोति ॥ १२३॥ करता है ॥ ११७ ॥ तरुण तथा उन्मत्त कृष्णवर्ण - गर्दभ के वृपण-गत रुधिर का पान करवा कर जलौका को तैल मे पकावें। इस तेल की मालिग से, हस्तमैथुन से उत्पन्न शिथिलता दूर होती है ॥ ११८॥ दक्षपक्षी के अढे के भीतरी द्रव से तथा प्रथम प्रसूता अश्वी (घोडी) के प्रथम ही प्रथम दोहे गये दूध से, वस्त्र को आई कर उपस्थ- पर बाधने से, सात दिवस मे ही पुरुष, पौरुष को प्राप्त करता है ॥११९॥ निम्न प्रयोग मुझे एक पगु-यवन ने बताया है। रीछ तथा श्वान के उपस्थ से सिद्ध जल का लेप करने से मनुष्य का लिग दृढ होता है। रीछ के उपस्थ मे मोगरे के इत्र को मिलाकर, उसका लेप करके सभोग करने से स्त्रियो को परम आह्वाद प्राप्त होता है। श्वान के शेफ -जल का प्रलेप, स्तंभन के साथ, लिंगवृद्धि करता है ॥ १२० ॥ एक वस्त्र -खड को आकडे के दूध मे तीन दिवस तक भिगोकर रखढे। फिर, इसको घी से थोडा सिक्त करलें । भव, इस वस्त्र को जलाकर धी टपकालें । उपस्थ की दृढता के लिये इस घी का प्रलेप करे ॥ १२१ ॥ एक शिलापर चार तोला अकलकर को वार्ताक-रस में पीसकर वटी बनालें । फिर, इसे मदिरा मे घिसकर लेप करके रमण करने से, परम भासक्ति- 'पूर्वक युवति उसको अपना सर्वस्व अर्पण कर देती है ॥१२२॥ अकलकरे को नरगिस- पुष्प-रस से पीसलें । अब, रात्रि को इसका लेप करके, विलासी पुरुष स्त्री से सभोरा - १-कृष्णवर्णो गर्दभो मत्तस्तरुणश्च गवेषणीय - २-दक्षाण्डवस्तथा सूताया वड- वाया प्रथमदुग्धं पीयूषस्ताभ्यामाईम् । ३-सप्तभि । ४-खजेन । ५-अत्रायं विशेष । अअशेफस केनाप्यत्तरेण सह लेप । गुणश्च स्त्रीणा महानानन्दोदय । श्वशेफसो जलेन लेप, तेन स्तम्भनं वृद्धिश्च । ६-स्पष्टमिदम् । ७-नरघस नाना प्रसिद्धस्य वृक्षविशेषस्य पुष्पैः ।
। सिदभेषजमणिमालायां [वाजीकरण- ५५ प्रातः पर्युषितमुखो दारुसितां किमपि संचय॑ । तल्लालया प्रलेपाक्षायेत ध्वजसमुच्छ्रायः ॥ १२४ ॥ ५६ बहुपौत्पयसः प्रसृतौ फणिफेनपलं तथैव वातामम् । संपिष्य कृता वटिका बन्धं वीर्यस्य विदधाति ॥ १२५ ॥ ५७ आकल्लं कुङ्कुमं जातीफलं प्रत्येकमाक्षिकम् । त्रि वितं वटक्षीरै रजो भङ्गाविशेषजम् ॥ १२६ ॥ पञ्चकार्षिकमेकत्र समस्तं साधु चूर्णयेत् । संविभाव्य वटक्षीरैर्वटीः कुर्याचणोपमाः ॥ १२७ ॥ सायं सेवेत वटिकामनुपानं घनं पयः। तरुणस्तरुणीं गच्छेद्रेतोरोधसमुद्धतः ॥ १२८ ॥ ५८ फेनं व्यालस्य कर्ष नववटविटप कोरयित्वा तदन्ता रुन्ध्याद्यनेन पक्षे गतवति च तमुद्धत्य माषप्रमाणम् । प्रत्येकं कुङ्कुमैलाविधुंहरिणमदात् त्रीणि जातीफलानि स्वर्ण शाणं गुटीयं द्विचणकतुलिता वीर्यरोधं विधत्ते ॥ १२९ ॥ ५९ प्रत्येकं विरचय्य माषतुलिताञ्जातीभकुम्भोद्गल- दानाकल्लककुङ्कुमत्रुटिकणावर्येणगन्धाहिजान् । करे। इससे शुक्र-स्खलन होने पर भी शिश्न में शैथिल्यनहीं भायेगा ॥१२३॥ प्रात, बासी मुख ही थोडी दालचीनी चबाकर तजन्य लाला से, उपस्थ को लिप्त करें। इससे ध्वज ऊंचा होता है ॥ १२४ ॥ वटदुग्ध सोलह तोला, पोस्त तथा बादाम-प्रत्येक चार तोला लेकर - एकत्र पीसकर वटी बनालें । यह वीर्य का स्तभन करती है ॥ १२५ ॥ अकलकरा, केसर तथा जायफल प्रत्येक एक तोला, इनको वटदुग्ध की तीन भावनायें दें । श्याम-पत्र- गाजेका चूर्ण पाच तोला लेवें । अब, इन सबका एकत्र सूक्ष्म - चूर्ण बना, पुन वटक्षीर में खरल करके, चने-समान वटिया बांधलें । गाढे दूध के अनुपानपूर्वक, सांझ को, एक वटी का सेवन करें। फिर दो तीन घंटे पीछे युवक, शुक्रस्तंभन सुलभ अभिमान से, युवति के साथ क्रीडा करे ॥ १२६-१२८ ॥ नूतन वटवृक्ष के स्तभ को एक जगह से काटकर, उसके भीतर एक तोला अफीम युक्तिपूर्वक रखदे, फिर, काटकर निकाले गये वट के पड को, उस पर यथावत् बिठा दे। एक पक्ष पीछे, अफीम निकाल लेवें। भब केसर, इलायची, कपूर तथा कस्तूरी प्रत्येक एक माषा, तथा जायफल तीन नग, सोने के बरक या भस्म तीन माषा-इनको एकत्र उपरोक्त अफीम के साथ घोटकर दो-चणक तुल्य गुटियां बांधले। ये शुक्र का निरोध करती है ॥ १२९ ॥ गज-गड-स्खलित मद-जल, जावित्री, अकलकरा, १- दालचिनी', इति ख्याताम्। २-वटदुग्धस्य । ३-सास्त्रससज्ञम् । ४-लोके गाजा. शब्दवाच्य, तच्च श्यामपत्र ग्राह्यम् । ५-द्वित्रिघटिकानन्तर गच्छेत्। ६-सर्पफेनम् । ७-विवु वर्पूरम् । हरिणमद कस्तूरी । ८-जगण्डस्थलगलित मदजलम् । ९-अहिजम् भाफूकम् । . - पञ्चमो गुच्छः। प्रकरणम् ३८१ कार्याः पञ्चदशैव रम्यगुटिका एकां पिवेत्तासु यः सक्षीरां प्रहरत्रयं रमयते रेतोऽतिरोधाद्वधूः ॥ १३० ॥ ६० कद्दूकुमाराशनवाहनाङ्कवतलविद्वेपिगुरोः पदस्य । तैल मनाक् पादतले प्रघृष्टं कामाहवे दैत्यगुरुं रुणद्वि ॥ १३१ ।। ६१ मायाफैलानि स्वरसेन जम्बूसंवर्तिकानां परिपिष्य वद्वाः। रुन्धन्ति वध्यो हरिमन्यमाना रेतोभगप्रस्रवणातिसारान् ॥ १३२॥ ६२ धत्तूरवीजविर्षमुष्टिकगन्धसूत- जातीफलानि सलिलेन पृदाकुवल्याः । पिष्ट्वा विशिष्य मसृणं गुटिकीकृतानि रुन्धन्ति धातुमधिमन्मथकेलि यूनाम् ॥ १३३ ॥ ६३ बीजेपु वास्तूकमवेषु सत्तु क्षौद्रेण सत्यामपि यष्टिकायाम् । पुनः प्रकाम किमहो यतन्ते चिरप्रयोगार्थममी युवानः ॥ १३४ ॥ केसर, इलायची, पिप्पली, शतावरी, कस्तूरी तथा अफीम प्रत्येक एक माषा लेवें । इनको एकत्र पीसकर, पटरह सुदर वटिकायें बनाले । इनमें से एक वटी को दूध के साथ निगीर्ण करें। शुक के अत्यत निरोध के कारण, वधू-सह तीन प्रहर तक रति क्रीडा की जा सकती है ॥ १३० ॥ कद्रु-कुमार अर्थात् सर्प, सर्प का भगन- भोजन करने वाला मयूर, मयूर है वाहन जिसका अर्थात् कार्तिकेय, कार्विक्रेय के अंस-स्कध-प्रदेश का भूषण अर्थात् बाण (वाण-असुर), बाणासुर का विद्वेषो अर्थात् विष्णु, विष्णु का पद अर्थात् वियद् अर्थात् अंवर, अर्थात् अंबर नामक सुगधित - द्रव्य में से निष्कासित तैल को पादतल पर थोडा मलकर-रति-संग्राम करने से - अर्थात् काम-युद्ध मे (काम तथा बाणासुर युद्ध मे) जिस तरह शुक्राचार्य गतिरुद्ध हो गये थे उसी तरह दैत्य - गुरु अर्थात् शुक्र का निरोध होता है ॥ १३१ ॥ जामुन के नूतन पत्तों के स्वरस मे, मांजूफल को पीसकर, चणे तुल्य गोलियां चाधलें । ये शुक्र, योनिस्राव तथा भतिसार को रोकती है ॥ १३२ ॥ धत्तूरे के बीज, शुद्ध कुचला, गंधक, पारद तथा जायफल, इनको नागरवेल के पत्र-स्वरस में खरल करके सूक्ष्म तथा मुलायम बनालें । इसकी गुटिकायें मन्मथ-क्रीडा- रत युवको के शुक्र को रोकती है ॥ ३३ ॥ नव, वास्तूक के बीजों का तथा मधु-सहित मधुयष्टि का अस्तित्व है-तो फिर, ये युवक, विलव से प्राप्य-प्रयोगो के लिये, अहो । व्यर्थ में १-विष्णो । २-अम्वरस्येयर्थ । 'वियद्विष्णुपद वाऽपि" इति कोश । तन्नाम्न सुगन्धिद्रव्यस्येति फलितोऽर्थ । ३-शुक्रम् । ४-माजूफल' इति प्रसिद्धानि । ५-जम्बू- नवदलानाम् । ६-विषमुष्टिक 'कुचिला' इति प्रसिद्धम् । तच्च शुद्धमादेयम् । ७-स्वर- सेन । ८-गुञ्जाप्रमाणानि । - ३८२ सिद्ध पजमणिमालायां [वाजीकरण- ६४ कारवीवंटकैर्गव्यं घृतं पक्त्वा समुद्धरेत् । तद्धृतं मान्द्यमाहत्य कन्दर्पमपि वोधयेत् ॥ १३५ ॥ ६५ वटीविदारीकपिकच्छुगोक्षुरैविधाय सादघृतेन भो जनाः !। सदैव योऽनाति मृपा न वर्णये तटीयवीर्येण जिता नभोजनाः ॥१३॥ ६६ वटशुङ्गभङ्गसग विभातमारभ्य वासरं कथितम् । सायं पिव सह सितया तृतीयपुरुपार्थसिद्धये दुग्धम् ॥ १३७ ॥ ६७ क्षौद्रेण सममानेन पलाण्डुरसतिन्दुकम् । पिवतां पञ्चदर्शभिदिनदैन्यं न दृश्यते ॥ १३८ ॥ ६८ पलाण्डुक्षोदसंभिन्नैर्मुद्गद्विगुणतन्दुलैः। प्रकल्पिता विना नीरं कशरा कृशपूजिता ॥ १३९ ।। ६९ वहुलालस्यवशंवद ! चिकलयिपसि चेञ्चमत्कारम् । गिल तिन्दुकतूंशां स्फटी क्षपां च गुडपावकेन सह ॥ १४० ॥ ही क्यों भटक रहे है-प्रयत्न कर रहे है ? ॥ १३४ ॥ अजवायन से निर्मित वटको से गाय के घी को सिद्ध करलें । मधु-सह यह घृत जटरानल के साथ साथ कामानल को भी उहीप्त करता है ॥१३५॥ विदारीकद, कौंच तथा गोखरू-इनको एक्त्र पीसकर वटियां बनालें । वटियो के वजनतुल्य उनमे घी तथा शहद मिला देवे । इन वटियो का नित्य सेवन करनेवाला अपने वीर्य से देवोपर भी विजय प्राप्त कर लेता है-मेरा यह कथन असत्य नहीं है ॥ १३६ ॥ वटशुग तथा भाग को एकत्र, सुबह से लेकर दिनभर, उकालते रहें। फिर, सांझ को, मिश्रीमधुर दूध के साथ इसके सेवन से तीसरे पुरुषार्थ- काम-की सिद्धि होती है ॥ १३७ ॥ एक तोला पलाण्टु स्वरस को समभाग शहद अथवा घृत मे मिलाकर, एक पक्ष अथवा मास पर्यंत सेवन करनेवाले का दैन्य अदृश्य हो जाता है ॥ १३८ ॥ मूंग से द्विगुणित चावल लेकर, दोनो को मिला लेवें । अब, एक तपेली में, प्रथम प्याज के कचूमर को फैलाकर उसपर मूगसहित चावल की तह जमादे। इस तरह, इस तह के ऊपर, पुन प्याज के कचूमर की तह फैलादे । इस तरह एक के ऊपर एक तह जमाते जाये । तपेली का मुख थाली से ढकदें। नीचे से मन्दाग्नि दे। इस तरह जल के बिना ही खिचडी सिद्ध हो जायेगी। ऊपर से हींग, लौंग, आदू, लवण, हरिद्रा आदि के प्रक्षेप सहित घृत भी मिला देवें। इस तरह निर्मित कशरा (खिचडी) कृशता को दूर कर देती है। यहां प्याज के कचूमर को खीचडी से डेढ गुणा अधिक लेवे ॥ १३९ ॥ अत्यंत आलस्य के वशीभूत हे मानव ! यदि आपको चमत्कार देखने की इच्छा हो तो स्फटी तथा हरिद्रा प्रत्येक तीन माषा लेकर चूर्ण बनाले, तथा इसका गुड के सीरे के साथ सेवन करें ॥ १४० ॥ १-पूर्वोक्तविधिविहितैर्यवानिकावटकै । २-यावता वटीभावस्तावत्प्रमाणमत्र क्षौद्र- घृतम् । तच्च परस्परमतुल्य शम्। ३-देवा । ४-प्रभातमारभ्य सर्वदिन क्वथितम् । ५-कामोद्दीप्त्यै । ६-घृतेनेति पाठान्तरम् । ७-पलाण्डस्वरसम् । ८-त्रिंशद्दिनरिति पर।
। प्रकरणम् ] पञ्चमो गुच्छ । ३८३. ७० भल्लातेपु शनैः शनैरधिघृतं पक्केषु मन्दाग्निना रुन्ध्यादुल्मकतो घृतं कियदपि प्रज्वाल्य युक्त्या शिखाम् । पूतं तत्तिलनालिकेरशकलैर्भुक्तं सितासंगतं वातं हन्ति वलं ददाति मदनं प्रोद्बोधयत्यन्वहम् ॥ १४१ ॥ ७१ भल्लातगर्भगुलिकातिलनालिकेर- वातामंचारुलमुकूलककन्दरालम् । दुग्धैः प्रपिण्य घृतभर्जितमुप्तखंण्ड- द्रावं निषेव्य सुरते वनिता भरालम् ॥ १४२ ॥ ७२ भल्लाकिसखं सखे ! क्वथनतो गव्यं पवित्रं पयः सान्द्रीकृत्य सिताद्ने क्षिप पुनः स्थाल्यां द्रुतं ढालय । चन्द्रेलातिलनारिकेलशकलान्याकीर्य तस्योपरि स्फीता स्वीकुरु मात्रया कतलिकां चेदृष्यतामीहसे ॥ १४३ ।। भिलावो को उनसे द्विगुणित घृत मे मंदाग्नि से, धीरे धीरे पकावें । जब भिलावे पक जायें तब जलते हुये अगारो द्वारा अवशिष्ट धी को प्रज्वलित करदे । इस तरह घी के कुछ अंश को जलाकर, ऊपर उठती हुई अग्नि-शिखा को, पात्रादिद्वारा ढककर युक्तिपूर्वक शात करदे । भव, इस घृत को वस्त्र में से छानकर, मिश्री से मिला सेवन करें-साथ में तिल तथा नारियल के छोटे छोटे टुक्डोको मिलाकर खाये। यह प्रयोग वायु को दूर करता तथा वल देता है तथा प्रतिदिन कामभाव को उद्दीप्त करतारहता है ।। १४१॥ भिलावे की मींगी, तिल, नारियल, बादाम, प्रियालमज्जा, पिस्ता तथा अखरोट, इनको दूध मे घोटकर घी मे भूनले । फिर, मिश्री की चासनी मे मिला देवें । यह रसायन रति प्रसग से अनेकों वनितामों के लिये पर्याप्त है ॥ १४२ ॥ यत्रद्वारा भिलावे का अर्क निकाल लेवें । इस अर्क को गाय के पवित्र - दूध मे उकालें । जब दूध घट्ट हो जाये, तब उसमे मिश्री की तितारी चासनी मिलाकर, शीघ्र ही थाली मे जमादे-ढालदें । इसके ऊपर कपूर, तिल तथा नारियेल का भुक्का भुरका देवे । यदि वृप्यत्व चाहते हो तो यथामात्रा से इसकी एक स्वच्छ चकत्ती का नियमित सेवन करें ॥ १४३ ॥ काष्टा । ९-पलाण्डुक्षोद कृशरोपादानाध्यक्गुणस्तेन सभिन्नैरिति उपर्युपरि पटलत्वेन विन्यस्तै । हिगुलवशाखण्डलवणहरिद्राक्षेप उपरिष्टात् घृतप्रक्षेपश्च ततो मुद्राकल्पनेति । १०-कर्षचतुर्थाशाम् । १-अष्टगुणे घृते। २-ज्वलदङ्गारत । कियदपि घृत प्रज्वाल्य युक्त्या पिवानादि- रूपया शिखा रुन्ध्यादित्यन्वय । ३-प्रतिदिनम् । ४-चारल• प्रियालमज्जा। मुकुलको दन्तीवीजसदृश 'पिस्ता' इति ख्यात । कन्दरालोऽक्षोट. लोके 'अखरोट' इति ख्यात औत्तरापथिक । ५-घृतभर्जित सितातन्तुल्या समेल्य निषेवणीयम् । ६-भल्लाताना यन्त्रद्वारा निष्कासितो योऽर्कस्तद्युक्तमित्यर्थ । ७-त्रिचतुस्तन्तूदमाया सितातन्तुल्याम् । ८-आखादयेत्यर्थ.।
- [वाजीकरण- सिद्धभेपजमणिमालायां ३८४ ७३ भजयित्वा घृतप्रस्थे वरीस्वरससाधिते । तुल्यां स्वार्धपर्यःपिण्डां शुद्धगोधूम मुजिकाम् ॥ १४॥ द्विग्रस्थखण्डतन्तुल्यां शीतायां च क्षिपेद्धि ताम् । ततो यथायथं वैद्यश्चूर्णानीमानि दापयेत् ॥ १४५ ॥ जातीफलं जातिपत्री व्योप पुष्पं त्वचं दलम् । प्रत्येक कोलमात्राणि सालिमं सुसली वरीम् ॥ १४६ ॥ पृथग्द्वितोलमानानि त्रिपुंटा च त्रितोलका। कुङ्कुमं शाणिक मापं कस्तूर्यम्वरचन्द्रतः ॥ १४७ ॥ वातादं नारिकेरं च मुकूलं च पृथक् पलम् । वङ्गप्रवालहेमाभ्रं पृथक् गद्याणसंमितम् ॥ १४८ ॥ सर्व संमेल्य तन्तुल्यां ढालयेद्रौप्यभाजने । इत्येष साधितः पाकः स्वर्णपणैरलड्डतः ॥ १४९ ॥ एनं प्राश्य पुरा कृष्णः स्त्रीसहस्राण्यरीरमत् । याढकोऽत्र रसो वर्यास्तन्तुल्यां दाडिमीरसः ॥ १५० ॥ एवं तुरगगधाया मुशल्याः शालिमस्य वा। चोपचिन्या विदार्या वा पाको गोक्षुरकस्य वा ॥ १५१ ॥ शतावरी स्वरस मे चौसठ तोला घी सिद्ध करके, उसमे चौसठ तोला गेहूं की सूजी तथा बत्तीस तोला मावा भूनले । अब, १२८ तोला शक्कर की तितारी चासनी बनाले। चासनी के शीतल होनेपर, उसमे उपरोक्त द्रव्य डाल देवें । तदुपरांत, जाती- फल, जावित्री, त्रिकटु, लोग, तज तथा तालपत्र प्रत्येक एक एक तोला सालिममिश्री, मुसली तथा शतावरी प्रत्येक दो तोला, छोटी इलायची तीन तोला; केसर तीन माषा; कस्तूरी, अंबर तथा कपूर प्रत्येक एक माषा, बादाम, नारियेल तथा पिस्ता प्रत्येक चार तोला, वगभस्म, प्रवालभस्म, स्वर्णभस्म तथा अभ्रकभस्म प्रत्येक छह माषा - इन सभी औषधीय द्रव्यों का यथावत् प्रक्षेप करके, चामनी मे अच्छी तरह मिला एक चांदी की थाली से ढाल दे। इस तरह सिद्ध किये गये पाक को स्वर्गपत्रों से अलंकृत कर देवें । उपरोक्त पाक मे, शतावरी का रस ५१२ तोला लेवें तथा चासनी को दाडिमरस से सिद्ध करें। अतीतयुग मे, इस पाक का सेवन करके श्रीकृष्ण ने एक सहस्र युवतियो के साथ रमण करने की शक्ति प्राप्त की थी। इसी विधि से, अस- गंध, मुशली, सालिम, चोपचीनी, विदारीकद अथवा गोखरू मादि का पाक बना लेना चाहिये ॥ १४४-१५१ ॥ १-पय पिण्डमग्निसयोगात् पिण्डाकार पय इयर्थ । २-'सूजी' इति ख्यातं गोधूमः चूर्णम् । ३-लवङ्गम् । ४-तालपत्रम् । ५-द्राविडी । ६-पृथगिति शेष । ७-एषां निरुत्थं निश्चन्द्रं च भस्म ग्राह्यम् । ८-घृतसाधने । ९-दाडिमत्रीजरस । १०-अश्वगन्धायाः।
प्रकरणम् ] पञ्चमो गुच्छ.। ७४ उद्वेगानि सुजातानि वपेत् प्रस्थप्रमाणतः। जलार्द्रगौरमृत्स्नायामिन्दुदृग्दिवसावधि ॥ १५२ ॥ जलैः प्रक्षाल्य तदनु सकृद्धिर्भावयेत् क्रमात् । द्वित्रिप्रस्थप्रमाणाभ्यां रसाभ्यां लुङ्गजम्भयोः ॥ १५३ ॥ भावनैका स्नुहीक्षीरकः सप्रस्थवारिभिः । एकादशै ततो द्विद्विप्रस्थैनिम्बूकजै रसैः ॥ १५४ ॥ विभावनाभिराभिः स्युरुच्छूनानि मृदून्यपि । तदा तानि सितापङ्के तरुणीकेतकार्कजे ॥ १५५ ॥ चन्द्रकुङ्कुमसौरभ्ये सैलारजसि मजयेत् । त्रि.१ सितैलापलं चन्द्रो चल्लः शाणं च कुङ्कुमम् ॥ १५६ ॥ सिद्धेष्वेकैकमासाद्य सितापकपरिप्लुतम् । को न विन्दति तत्ववस्तुष्टिं पुष्टिं रुचिं वलम् ॥ १५७ ॥ चौसठ तोला अच्छी सुपारियां लेकर, जलाई श्वेत मिट्टी मे, इक्कीस दिवसपर्यंत, गाडकर, रहने दे। तदुपरात, इनको निकाल, पानी से धोकर साफ कर लें। फिर, इनको, मातुलुग के दो प्रस्थ रस की एक भावना तथा जभीरी निंबू के तीन प्रस्थ - रस की दो भावनाये देवें। स्नुही के एक तोला दूध को एक प्रस्थ जल मे अच्छी तरह घोलकर, उसकी भी एक भावना देवें। फिर, निबू के दो दो प्रस्थ रस से ग्यारह भावनाये देवे। इन भावनामो से पूगी- फल फूल जायेंगे तथा कोमल हो जायेंगे। अब, इनको केतकी के मर्क से प्रक्षालित करले। गुलाब तथा केतकी पुष्प के अर्क में मिश्री मिलाकर चासनी बनायें, चासनी मे बरास, केसर तथा इलायची चूर्ण का प्रक्षेप करके, सुगधित बनालें। अब, इस चासनी में, उपरोक्त, पूगीफल निमग्न कर देवें । इस तरह सिद्ध किये गये पूगीफलो मे से, चासनी द्रव से परिप्लुत एक नग लेकर, सेवन करने से, किस तत्त्वज्ञ को तुष्टि, पुष्टि रुचि तथा बल की प्राप्ति नहीं होगी? उपरोक्त चासनी - निर्माण मे, तीन-प्रस्थ मिश्री चूर्ण लेना चाहिये तथा प्रक्षेप द्रव्यों १-पूगफलानि । २-प्रशस्तानि लोके 'श्रीवर्धिनी', 'छालिया' इति च प्रसिद्धानि । ३-एकविंशतिदिनावधि । ४-अक्षारैरिति शेष । ५-द्विप्रस्थेन लुङ्गरसेनैका भावना, त्रिप्रस्थेन जम्भरसेन च द्वे भावने इति क्रम । ६-प्रस्थाम्भोलुलितै स्नुहीक्षीररित्यर्थ । ७-भावना इति शेष । ८-प्रतिभावना विप्रस्थैरिति वीप्सार्थ । ९-केतकार्केण प्रक्षा- लितानि । १०-सितातन्तुल्या द्रवस्थाने तरुणीकेतकयोरके आदेय इति तात्पर्यार्थः । ११-अनन्तरोक्तद्रव्याणा मानकयनम् । तत्रोद्वेगमानतस्त्रिगुणा त्रिप्रस्था सिता ग्राह्या। १२-'भीमसेनी कर्पूर' इति लोकप्रसिद्ध । १३-बल्ल इत्युपलक्षणं, तेन पञ्चगुजातोऽधि- कक्षेपो न कार्य इति बोध्यम् । -- सि० २५ - ॥ ३८६ सिन्दभेपजमणिमालायां [वाजीकरण- ७५ मधुराग्लं सामिसितं सकुखुमं दुग्धसङ्गि दधि पूतम् । आम्रनिशारससुरभिणि घटे निभृतमनुकरोति चूतरसम् ॥ १५८ ॥ ७६ गजराणि सुजातानि दर्श नीरे निगजयेत् । सभस्मनि ततस्तोये स्वेदयन्मार्दवावधि ॥ १५९ ॥ निष्कुलीकृत्य शकलान्यस्थिवर्ज प्रकल्पयेत् । तलयेद्धृत एकस्मिन् यथा नश्येन्न मार्दवम् ॥ १६० ॥ द्विखण्डे लोठयेत् किंवा खण्डपङ्के निमजयेत् । सैलामुकूलवातामः पाकः स्याद्गार्जरोऽद्भुतः ॥ १६१ ॥ वल्यो वृष्यः परं स्वादू राजाहः किंच नाशयेत् । दाहप्रमेहपित्तास्रपिपासाप्रदरादिकान् ॥ १२ ॥ ७७ क्लीवाजमुण्डगर्भ द्रम्मकलार्धाहतोप्मसंस्कारम् । संसाध्य घृतशरावं मन्दोणं पिव समस्तमेव शनैः॥ १६३ ॥ मे परास, अधिक से अधिक पांच गुजा कम से कम एक वाल, इलायची चार तोला तथा केसर तीन माषा लेवें ॥ १५२-१५७ ॥ किचित् खटासयुक्त मधुर दही मे थोडा दूध तथा दही से अर्धमात्रा में मिश्री- चूर्ण एवं यथामात्रा मे केशर मिलाकर वस्त्र मे से छान लेवें। अब, इसको भांवाहलदी के रस से प्रक्षालित भतएव तत्सुलभ सौरभ से उद्वासित एक मिट्टी के कोरे पात्र में भर दें। यह आन-रस का यथार्थ - अनुकरण करता है ॥ १५८ ॥ दश-प्रस्थ उत्तम जाति की गाजर को, प्रक्षालित करके, पानी मे वाफ ले। फिर, इसमे से अस्थियों को निकाल कर टुकडे करके छूद लेवें । अव, इस छूदे को, एक प्रस्थ -भर घृत में, इस तरह भूनें जिससे इसकी मृदुता नष्ट न हो जाये। फिर, इसी छढे को मिश्री के चूर्ण मे अच्छी तरह सानले अथवा, मिश्रीचूर्ण की केशर रजित चासनी मे निमग्न करदें। ऊपर से इलायची, बादाम तथा पिस्ताचूर्ण का प्रक्षेप करे। यह अद्भुत 'गार्जर-पाक' परम सुस्वादु, बलकारक तथा वृष्य एव राजपुरुषोपभोग्य है । विशेषत यह दाह, प्रमेह, रक्तपित्त, प्यास, प्रदर आदि विकारो को नष्ट कर देता है ॥३५९-१६२॥ क्लीव बकरे के मुंड-गर्भ का सोलह तोला घी में शोरवा सिद्ध करलें । फिर थोडा गरम मसाला (दो पैसो के मूल्य से जितना मिले उतना) उसमे भुरका कर, कवोष्ण होने पर, धीरे धीरे इस शोरवे को पीजाये। इस तरह सेवन करने से, - १-आम्ररसानुकारप्रकार । २-आम्रनिशा 'आमीहलदी' इति प्रसिद्धा। तदृष्ट- जलक्षालित इत्यर्थ । ३-दशप्रस्थोन्मितानि। ४-एकप्रस्थमिते घृते । ५-द्विगुणितखण्डे । ६-कुमसस्कृते सिताप । ७-अर्धाणकक्रीतमुष्मकम् । उष्मकशब्देन 'गरम मसाला इति लोकप्रसिद्ध द्रव्यजातम् । - प्रकरणम् ] पनमो गुच्छः । ३८७ दवण्डरक्तमण्डलखण्डनताण्डवमखण्डमारभते । पथ्यं कृशरा सघृता ससैन्धवा पोलिका वाऽपि ॥ १६४ ॥ रसकर्पूरशवाश्मक्षोदसखीभिः प्रलिम्प वपुरद्भिः। योगेनानेन परं पथ्याशी मण्डलं प्रयुक्तेन ॥ १६५ ॥ यावजीवं जन्तुः स्त्रीराजीति वाजीव । प्रयतेत पिपाचयितुं किं तु व्यायामतः सर्पिः ॥ १६६ ॥ ७८ मरिचैः सचमत्कारमुत्स्विन्नं कोलेज पलम् । दक्षाण्डत्रुटिवाताममुकूलदधिपिण्डकैः ॥ १६७ ।। मौक्तिकाम्बरकस्तूरीस्वर्ण विद्रुमकुकुमैः । कल्कीकृत्य घृतं दत्त्वा पाणिभ्यां बहु मर्दयेत् ॥ १६८ ॥ वटिकाश्चास्य शनकैस्तलिता. प्राज्यसर्पिपि । अत्यच्छकाबुलोत्पन्नदाडिमीशाकरे क्षिपेत् ॥ १६९ ॥ काञ्चनच्छदसौरभ्यनिक्षेपकृतसंस्क्रियाः। सेवेत वटिकाः सायं पयोऽनु ससितं पिबेत् ॥ १७० ॥ शरीरगत प्रचड दाह तथा रक्तमडल को खंडित कर देनेवाले अखंद- तांडवनृत्य का प्रारभ हो जाता है। गोधूम की पोलिका, ससैधव - घृतसिक्त खीचडी पथ्य है । • शरीरपर रसकर्पूर तथा मुरदासींगी के चूर्ण से भावित जल का लेप करना चाहिये। इस प्रयोग को, परम पथ्यपूर्वक चालीस दिवस तक करने से, मनुष्य जीवन पर्यंत स्त्रीसमूह से मश्व की तरह रमण करने की सामर्थ्य प्राप्त करता है । इस प्रयोगकाल में व्यायाम मादि द्वारा घी को पचाने का प्रयत्न अवश्य करना चाहिये ॥ १६३-१६६॥ चार तोला वाराह - मास को मरिचचूर्ण से, स्विन्न करलें । (मरिचचूर्ण डालने से मास अच्छी तरह पक जाता है ।) इस स्विन्न मांस मे दक्ष - कुक्कुट पक्षी के अंडे, इलायची, बादाम, पिस्ता, जलनिष्कासित दही का पिण्ड, मुक्ताभस्म, अंबर, कस्तूरी, स्वर्णभस्म, प्रवालभस्म तथा केसर मादि यथोचित मात्रा में मिलाकर, कल्क बनालें । फिर घी डाल कर इस कल्क को हाथ से खूब मसल लेवें । भव, इनकी वटिकायें बना, प्रचुर घी में अच्छी तरह तलकर काबुली दाडिमस्वरस में सिद्ध की गयी चासनी में डाल देवें। इसमें, ऊपर से सौरभार्थ इलायची- चूर्ण का प्रक्षेप करके, स्वर्णपत्र भी मिला देवें । सायंकाल को, मिश्रीयुक्त मधुर-दूध के अनुपानपूर्वक इन वटिकामों का सेवन करें। इससे मनुष्य भश्व की तरह प्रबल काम वेगपूर्वक, प्रमदा समूह को, रतिरस से तृप्त १-दवो दवथु । २-शवाश्मा 'मुरदासीग' इति ख्यात । ३-चत्वारिंश- दिनावधि । ४-वाराहमासम् । ५-दक्षाण्ड कुकुटाण्डम् । एतै सर्वेयथोचित कल्पित- प्रमाणे । ६-वर्णस्य भस्म, तदभावे स्वर्णपत्राणि । ७-दाडिमीरसकृते सितापके इत्यर्थः । ८-सौरभ्यमेलादिकम् ।
३८८ [वाजीरण- सिहभेपजमणिमालायां वाजीव प्रमदाराजीस्तर्पयेदर्जितस्मरः। शतावरीरसे क्षीरगर्भ संसाधयेद्धृतम् ॥ १७१ ॥ वटिकातलने तत् स्यादुपयोगि महागुणम् । मापपर्णभृताया गोर्दुग्धं दधि घृतं स्मृतम् ॥ १७२ ॥ ७९ दक्षाण्डसारभावितमसंकृत्तिलसा नजं चूर्णम् । खाधिदिनानि निपीतं मदिरामुष्टया स्मरं प्रबोधयति ॥ १७३ ॥ ८० कृत्तपुच्छाधिवक्रान्त सण्डं सर्पिपि पाचितम् । श्रीमदुत्थाश्छदाः शुष्काचूर्ण कुर्यात् समद्वयम् ॥ १७४ ।। गिलेद्धारोप्णपयसा तचूर्ण तुल्यशर्करम् । पुष्ट्यै कोलोन्मिता मात्रा भोजने सैन्यव मनाक् ॥ १७५ ॥ ८१ विपाच्य पादांशवटाकुरच्छटं पलद्वयं मांसमजस्य गोघृते । त्वपत्रपुष्पोषणजीरसैन्धवैश्चमत्कृतं भुंक्ष्व मनोजवृद्धये ॥ १७६ ॥ ८२ अर्के वक्ष्ये शुभोदर्क पुंसां पुंस्त्वविवर्धनम् । कुश्माम्बरकस्तूरीजातीजातीफलानि भोः॥ १७ ॥ कर देता है। उपरोक्त योग मे, घृत को, दूध में मिलाकर, शतावरी के रस से सिद्ध करना चाहिये । वटिकामो के तलने मे भी, परम गुणकारी इसी सिद्ध-धृत का उपयोग करे तथा यहा मापपर्ण से (वन उडद के पत्ते साकर) परिपुष्ट बनी हुयी गाय का ही घी, दूध तथा दही ग्रहण करें ॥ १६७-१७२ ॥ पंचाग सहित भांगरे का चूर्ण तथा तिल इनको एकत्र लेकर, सात दिवसपयंत, कुक्कुट के अंडे के भीतरी द्रव से भावना देवें । चालीस दिवस तक, चार तोला मदिरा के साथ, इसका सेवन करे। इससे काम प्रदीप्त होता हे ॥ १७३ ॥ सांडा के मुख, पूंछ तथा पैररहित, भवशिष्ट भाग को घी मे भूनले । सिरू- वृक्ष के शुष्कः पत्तो का चूर्ण बनावें । इन दोनो को समान भाग मे लेकर, दोनो के वजन-तुल्य, इनमे. शर्करा मिलाकर, धारोष्ण दूध के साथ पीजायें । इसकी मात्रा एक तोलाभर है । भोजन मे, सैन्धव अल्प मात्रा से ही ले। यह प्रयोग पुष्टिकारक है ॥ १७४-१७५ ॥ बकरे के आठ तोला मास मे, वट के दो तोला भर शुभ-चूर्ण को मिलाकर, गाय के घी में पकावें। फिर, इसमें तज, तेजपात, लौंग, मिर्च, जीरा तथा सैंधव यथोचित मात्रा मे प्रक्षिप्त करके, कामोद्दीप्ति- चमत्कार के लिये सेवन करें ॥ १७६ ॥ पुरुषो के पुंस्त्व में अभिवृद्धि करने वाले, उनके भावी कल्याण के लिये, भब १-पूर्वोक्तयोगस्य परिभाषारूपोऽय सार्ध श्लोकः । २-बुक्कुटाण्डगर्भद्रवेण भावि- तम् । ३-सप्तवासरानित्युपदेशः । ४-साङ्गपञ्चाङ्गसहितो भृङ्गो मार्कवः। ५-मुष्टिः पलम् । ६-सांडा' इति लोकप्रसिद्धम् । ७-'सिरु' इति लोकप्रसिद्धस्योपवनभूपण- भूतस्य तरुविशेषस्य पत्राणि । ८-द्विकर्षोंन्मितवटशुङ्गसहितम् ।
प्रकरणम्] पञ्चमो गुच्छ । ३८९ लवगाकल्लमल्लैलास्त्वक् श्वेतकरवीरजी। सारलः स्फीतनिर्यासः शसोऽपि शुभलक्षणः ॥ १७८ ॥ शूझिकं चञ्चुजो मजा मजा हरिणभूभृतः । नालं किमुचितं नालं कोलघण्टिकमत्स्ययोः ॥ १७९ ॥ द्रव्याणीमानि मानेन मापिकाणि प्रकल्पयेत् । उगीरं नूतनं शुष्कं कुडवं तनु कर्तयेत् ॥ १८० ॥ तत् सर्वं गर्भयत्रान्तर्विरचय्य यथाक्रेमम् । निष्कासयेदनम्भोऽर्कमैलसेन कृशानुना ॥ १८१ ॥ भाण्डे त्रिपादिका तत्र चषकं विपुलोदरम् । भाण्डास्ये सपयः पात्रं गर्भयन्त्रमिति स्मृतम् ॥ १८२ ॥ ८३ पादोनमाढकं मांसात् सेवामरुदगर्जरात् । तोलकानि त्रयस्त्रिंशत् पृथगक्षं द्विजीरतः ॥ १८३ ॥ मैं, एक अर्क' का प्रयोग बताता हूं। केसर, अंबर, कस्तूरी, जावित्री, जायफल, लौंग, अकलकरा, मल्ल, इलायची, श्वेतकरवीर की मूल- त्वक् , सरल - निर्यास, कोडिया लोह- वान, शुभ-चिह्नोवाला श्वेत शंख, शंगीविष, एरड फल की मज्जा, सिह की मज्जा तथा कोल और घटिक सज्ञक मत्स्यो का मेहन, इस अंतिम द्रव्य का ग्रहण अनुचित नहीं मानना चाहिये, इन प्रत्येक को एक एक मापा भर लेकर, जौकुट करले । भब, सोलह तोलाभर नूतन किंतु शुष्क उशीर लेकर, कैंची से काटकर, सूक्ष्म टुकडे बनालें। फिर, एक पात्र मे, प्रथम उशीर के इन सूक्ष्म तृणो को बिछा दे। फिर, इन पर काष्ठौषधि द्रव्य, इस पर सुगंधित द्रव्य तथा सब से ऊपर मास-मजा भादि द्रव्य यथाक्रम फैला दें। भव, जल के योग विना, गर्भ-यंत्रद्वारा, मंदाग्नि से, इनका अर्क निकाल लेवें। उपरोक्त भाण्ड में, प्रथम एक छोटी सी तिपाई रखदें। इस तिपाई पर एक गहरे पैंदे वाली विशाल कटोरी रखकर, भाडमुख को जलपूर्ण पान से ढक देवें । यह गर्भ-यंत्र कहलाता है ॥ १७७-१८२ ।। मजा अथवा वाराहमांस १९२ तोला, सेव, अमरूद और गाजर इन प्रत्येक १-मल्ल शतमल्ल । २-करवीरमूलजेति सप्रदाय । ३-स्फीतविशेषणात् कपर्दो- पपदोऽयोबाण 'कोडिआ लोहवाण' इति प्रसिद्ध । ४-एरण्डफलज । ५-सिंहस्य । ६-अलमुचित न किम् ? अर्थादुचितमेवेति । ७--मेहनम् । ८-घण्टिक्मत्स्यो 'घरीआर' इति ख्यातो मत्स्य विशेष । ९-यवस्थूलानि कारयेदित्यर्थ । १०-कर्तर्येति शेष' । ११-गर्भयन्त्रं समनन्तरमेव वक्ष्यमाणस्वरूपम् । १२-अत्रायं क्रम -भाण्डे कर्तितमुशीर प्रसार्य, तदुपरि काष्ठौपधं, ततोऽप्युपरि सौरभद्रव्यं, ततश्च मांसमिति । १३-मन्देन । १४-त्रिपादिका परित औषधसभार । १५-आजाच्छौकराद्वा । १६-सेवामरुदौ स्वनाम प्रसिद्धौ फलविशेपौ, गर्जर च क्न्दविशेषम् । १७-पृथगिति पूर्वोत्तर सर्वत्र सबध्यते । १८-यद्यपि जीरद्वय कथितं तथाऽपि कृष्णजीरमेव नवमाषोन्मित क्षेप्यमिति रहस्यम् ।
- ३९० सिद्धभेषजमणिमालायां [वाजीकरण- एकस्तु कुक्कुटः प्रौढः सर्वमेकत्र संनयेत् । ततो निष्कासयेदर्कमेन भो गर्भयन्त्रतः ॥ १८४ ॥ त्रिजातकप्रतीवापं दाडिमीशार्करोत्तरम् । पलमस्योपयुञ्जीत द्विसन्ध्यं मण्डलावधि ॥ १८५ ॥ अर्क एष परं रुच्यो वृष्यः संतानवर्धनः । ग्रहणीदोषयक्ष्मनो रक्तपित्तप्रसाधनः ॥ १८६ ॥ अन्येऽपि बहवः सन्ति योगा गुरुमुखोद्गताः । ते विस्तरभयात् सर्वे मया नात्र प्रकाशिताः ॥ १८७ ॥ सुंधाकुम्भं हस्ते दधदमरतार्थ सुमनसां रहस्यं जिहाग्रे गदहरमथर्वोपनिषदाम् । मणि श्रीवत्साङ्के हृदि जलनिधेर्योऽजनि पुरा विनिघ्नन् विघ्नं वः सुखयतु स धन्वन्तरिविभुः ॥ १८८ ॥ का तेतीस तोला गूदा, श्वेत तथा कृष्णजीरक प्रत्येक एक तोला (यद्यपि यहां दोनो प्रकार के जीरक-ग्रहण करने का विधान बताया है, तथापि केवल नौ माषा भर कृष्ण-जीरक ही लेना उपयुक्त होगा) तथा एक प्रौढ कुकुट -इन सबको एकत्र लेकर, गर्भ-यंत्र द्वारा अर्क निकाल लेवें । फिर, इस भर्क का, निजात-चूर्ण से युक्त 'दाडिमी-शार्कर' के साथ सुबह तथा सांझ को दो बार नित्य चार-तोला मात्रा मे, पैंतालीस दिवस पर्यंत प्रयोग करें। यह अर्क अत्यंत रुचिकर, वृष्य तथा संत- तियों की अभिवृद्धि करनेवाला, ग्रहणीविकार तथा यक्ष्मा का सहारक एव रक्त-पित्त का प्रसाधक कहा गया है। ग्रहणी विकार यदि हो तो उपरोक्त योग में, विजात का प्रक्षेप न करें ॥ १८३-१८६ ॥ गुरुमुख से उपदिष्ट और भी, अनेकों प्रयोग मैं जानता हूं, कितु उन सभी प्रयोगों को मैं विस्तारभय से, यहां प्रकाशित नहीं करूंगा ॥ १८७ ॥ इस तरह विस्तारभय से, श्रीगुरु इस 'माला' का यहां उपसंहार करते है- हितार्थी देवो के, भमि-कलश धारे उदधि से- मथर्वन् छंदों के प्रथम-भगदंकार-प्रकटे सुहाये श्रीवत्साकित-हृदय पै कौस्तुभ-मणी- मिटा के वितों को, सुखद विभु धन्वन्तरि बनें ॥ १८ ॥ १-ग्रहण्या प्रतीवापो वर्ण्य इति । २-व्यासभीरवो गुरवो मालामुपसहरन्ति । ३-चरममजलमिदम् । - प्रकरणम्] पनमो गुच्छः। श्रीमढुण्ढारदेशे हसितसुरपुरी प्राशसङ्घः समेता गुप्ता श्रीमाधवेन स्फुरति जयपुरी काऽपि यत्र स्थितेन । श्रीकृष्णाख्येन वैद्यागमनिगमविदा विद्वदापद्विपत्त्यै यत्नात् सङ्गुम्फितेयं ललतु वुधगले सिद्धभैषज्यमाला ॥ १८९॥ येनाशिक्षि स जीवनाथगुरुतः काव्यप्रकाशाशय- श्छन्दश्चन्दनंदासतः सगणितं वैद्यागमस्ताततः । सूते गन्धकजारणावधि कृता येन क्रिया नैकशः सोऽहं नैकनवीनकाव्यकृदिह श्रीकृष्णशर्मा कविः ॥ १९०॥ श्रीकृष्णकल्पितामेतां श्रीकृष्णः कृतिमुत्तमाम् । खलारब्धपरीवादाव्याव्याजतो विभुः ॥ १९१ ॥ त्रिपञ्चनवचन्द्राब्दे फाल्गुनस्य सिते दले। भैषज्यमणिमालाऽसौ परिपूर्णाऽभवत् खलु ॥ १९२ ॥ श्रीमद् दुण्ढारदेश में, स्वर्ग का उपहास करने वाली, प्रखर-परितों की निवास- भूमि, श्रीमाधव - भूपति से परिपालित सुप्रसिद्ध जयपुरी नामक नगरी है। इसी नगरी के निवासी, वैद्य - शास्त्र के परम-ज्ञाता श्रीकृष्ण ने, विद्वानों की विपदा को दूर करने वाली इस 'सिद्ध -भैषज्य -मणि-माला' को यत्न- पूर्वक गूंथा है । यह पंडितो के कठप्रदेश की शोभा में अभिवृद्धि करे ॥ १८९ ॥ अनेकों नूतन काव्यो का रचयिता मैं वही सुप्रसिद्ध श्रीकृष्णशर्मा महाकवि हूं जिसने श्रीजीवनाथ गुरु से स-रहस्य काव्य प्रकाश का, श्रीचंदनदास से गणितसहित छन्द शास्त्र का तथा अपने ही पूज्य पिता से मायुर्वेद विज्ञान का अध्ययन किया एवं जिसने पारद में गन्धक-नारण-पर्यंत सस्कारो से सबंध रखनेवाली प्रात्यक्षिक- क्रियाओं को अनेक प्रकार से सपादित करी ॥ १९० ॥ भगवान् श्रीकृष्ण अनुग्रह - पूर्वक, श्रीकृष्ण-विरचित इस उत्तम-ग्रंथ की, दुष्टजनों के अपवाद से रक्षा करें ॥ १९१ ॥ संवत् १९५३ फाल्गुन-शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को यह 'सिद्ध -भैपज्य -मणि- माला' परिपूर्ण हुई ॥ १९२ ॥ १-अस्मदीक्षागुरूणां सज्ञेयम् । एते सिद्धप्रयोगा प्रथितगुणगणा योगतो ध्वस्तरोगा. प्राप्तास्तत्तद्गुरुभ्य पुरुतरकरुणाचारुचर्याचरुभ्य । श्रीकृष्णाख्यैर्दिगन्तप्रसमरसुयशोराशिभि- ाधिताना-वैद्याना चेष्टसिद्ध्यै बुववरगुरुभिर्गुम्फिता सस्फुरन्ति ॥१॥ वैद्यानामुपकारिणी गुरुनियोगनिन्नेन । टिप्पणिका रचिता मया पूर्णा चाविघ्नेन ॥ २ ॥ आसीद्दादुमहर्षिदर्शित- पथे सजातदीक्षाक्रमश्छन्द.गास्त्रविचक्षण' सुभिषजामग्रेसरश्चन्दनः । तेनायं परिलालितो निजसुतप्रेम्णाऽऽप्तविद्योदयो लक्ष्मीरामशिशु सदैव विदुषा भूयात् कृपाभाजनम् ॥ ३ ॥ यथोपदेशं विहितां यथास्थान निवेशिताम् । कृति मदीया सप्रेक्ष्य श्रीकृष्ण सप्रसीदतु ॥४॥ यः प्राचा भिषजा विवेद महितास्तिस्रोऽपि ता संहिता साहित्यं च सधर्मशास्त्रमभित.
३९२ सिद्धभेषजमणिमालायां वाजीकरण- श्रीलालुरामात्मजकुन्दनाधो लेमे जनि कृष्णकवेहि तम्य । भैषज्यरत्ननजि सगुणायां पूर्णोऽभवत् पञ्चमगुच्छ प.पः ॥ १३ ॥ इति राजवैद्यमहाकविश्रीकृष्णराममविरचितायां सिद्धभैपज्यमणिमालायां पञ्चमो गुच्छः। श्रीललुरामजी के मात्मज श्रीकुन्दनरामजी के पुत्र, उदार-चरित्र श्रीकृष्ण - कवि - विरचित सद् - गुण - युक्त भपज्य - रत्न माला का यह पंचम-गुच्छ मपूर्ण दुबा ॥ १९३ ॥ वैद्यराज महाकवि श्रीकृष्णराम भट्ट विरचित मिद-भपज्य मणि मालाका पंचम- गुच्छ सपूर्ण। अनुवाद - सपूर्ति मझल-लोक- भासीन्महाकवि साक्षाद्धन्वन्तरिरिवापरः । ज्ञानप्रदीप श्रीकृष्णो गुर्जरो भूमिनिर्जर ॥ चत्वारस्तनुजा जातास्तत्सुतात् श्रीकलाधरात् । तृतीयस्तेप्वहं श्रीमद्दोकारप्रभुनामा २ सोऽहमावाल्यतो वालकविश्च बालवाग्भट । इति नानाभिधानस्तु सर्वतो विधुतोऽभवम् ३ स-रहस्यायुपो वेदकाव्यशास्त्रकलादिभिः । मा देवानिव चाऽपुप्यत् स्वक्लाभि क्लाधर. ४ श्रीमदुर्गाप्रसादाच तच्छिप्यात् बुधतलजात । बाल्य एवाविद साझ ससाख्य ज्योतिष प्रयीम् ॥ ५ ॥ भाग्लवाङ्मयसर्वोच्चपदारुत.कृपास्पदम् । सोऽह कृतार्थो मालाया कृतार्थ. पितुराज्ञया ६ भिषक्पते. कृष्णकवेः सुतस्य कलाधरस्येच कलाधरेण । कृता कृतार्थेन सुतेन पूर्णा मणिनगेषा स्फुटितप्रकाशा ।। ७ ॥ मालामनूनामिह वैजयन्त्यास्तामेव कृष्णाय पुन सभक्या। वैश्वानराख्याय निवेदयामि सपूर्णपूर्णो यदनुग्रहेण ॥ ८ ॥ --हिंदी-अनुवाद सपूर्ण- - BE ॥ समाप्तेयं सिद्धभेषजमणिमाला ॥ - खच्छन्दवाक् छन्दसि । लक्ष्मीरामसुधी स एष भिषगाचार्यप्रशस्ति वहन् श्रीभैपज्यमणिस्रजो विवृतवान् गुच्छं पर पञ्चमम् ॥ ५ ॥ इति आयुर्वेदाचार्य-श्रीलक्ष्मीरामस्वामिविरचितायो सिद्धभेषजमणिमाला- टिप्पण्या पञ्चमो गुच्छ । १-गुजरात प्रात के निकट डाकोर-क्षेत्र में विराजमान भगवान श्रीरणछोडरायजी। २-स्व पू पिता श्रीकलाधरजी को 'चरक-सहिता' अनुलोम विलोम गति से कंठाग्र थी। थी। चित्रकला एव वीणादिवादन मे परम निष्णात थे। आपकी स्मरणशक्ति अद्भुत ३-स्वनामधन्य महामहोपाध्याय स्व श्रीदुर्गाप्रसादजी । ४-परमपूज्य स्व. श्रीचंद्रशेखरजी प्रश्नवर-वेद और व्याकरणके अप्रतिम- विद्वान ।
चरकोक्त पंचाशत् -महाकषायाः
श्लोकयिता-'कविरत्न' र. कलाकर भट्ट
मुनिप्रोक्तकषायाणां हरिदत्तनियोगतः।
छन्दोवन्धप्रयोगोऽयं सुखस्मृत्यै कृतो नवः।
जीवकर्पभको-मेदे-काकोल्यौ-मधुकं - सहे।
जीवन्ती जीवनीयानि दशेमानि जयन्त्यहो। ॥१॥
भारद्वाजी-पयस्येक्षुवाजिगधे च दुग्धिका ।
काकोल्यौ वृहणीयोऽयं सवाट्याक्षीरिणीवला. ॥२॥
चिरविल्वो-वचा तिक्ता-चित्रकातिविपा-निशा.।
लेखनीयो गणो मुस्ता-कुष्ठं-हैमवतीवचा ॥ ३ ॥
स्वर्णक्षीरी-त्रिवृत्-वह्निमुखी-चित्रार्क -चित्रकाः।
करज. कटुकरण्डौ भेदनीयानि शंखिनी ॥ ४ ॥
कटू फलं - फलिनी-पिच्छा- समगा- पृश्निपर्णिका ।
सलोध्राऽम्बठकी-यष्टी सधानो धातकी-मधु ॥ ५ ॥
मरिच-नागर-चुनं यवानीचव्यचित्रकम् ।
कणातन्मूलभल्लातरामठं दीपनो गण. ॥ ६ ॥
इति षट्क कषायवर्ग ।
रोहिणी-ऋषभी-ऋष्यप्रोक्ता चातिरसा स्थिरा।
पयस्यैन्यश्वगंधेति गणो बल्यो बलाद्वयम् ॥ ७ ॥
मंजिष्ठा मधुकं तुंगं चन्दनोशीरपद्मकम् ।
क्षीरकाकोलिकाऽनन्ता गणो वयो लता सिता ॥ ८॥
हंसपादी विदारी च सारिवा कटूफल कणा ।
यष्टी द्राक्षेक्षुमूलानि कण्ठ्यानि बृहतीयुगम् ॥ ९॥
रुचक लकुचं कोलमानमाम्रातक गणम् ।
हृद्यं सवदराऽविग्नचुक्रवृक्षाम्लदाडिमम् ॥ १० ॥
इति चतुष्क कषायवर्गः ।
शुण्ठीमुस्तापटोलाऽग्निचव्योष्णावेल्लजानि च ।
तृप्तिन्नानि दशेमानि वचा-मू-रसायनी ॥ ११ ॥
विपावचानिशायासबिल्वाऽग्निवत्सकानि च ।
अर्शीतानि दशेमानि शुण्ठी चव्यं - हरीतकी ॥ १२ ॥
गायत्री शारदाऽविनदावी भल्लातकाऽभया.।
कुष्ठना. कृमिजिजातीप्रवालाऽमलकार्वधाः ॥ १३ ॥
३९४
सिदमेषजमणिमालायां
दा-सर्पपशम्याककुटजोगीरचंदनम् ।
कप्तोऽयं गणो निंबयष्टीघनकरजकम् ॥ १४ ॥
वृपाऽखुपर्णी निर्गुण्डी गण्डीराऽक्षीवक्त्रुकम् ।
गणः कृमिन्न किणिही कृमिनोषणगोक्षुरम् ॥ १५ ॥
श्लेष्मातकशिरीपैला- श्यामा-शेफालिका-निशा ।
गणो विपतो मंजिष्टा राम्राफतकचदनम् ॥ १६ ॥
इति पटक कपासवर्गः।
दर्भावालिकेषणा गुन्द्रस्य कुशकाशयो ।
पष्टिकेत्कटवीराणा मूलानि स्तन्यवृदये ॥ १७ ॥
दारुपाठाऽमृता मूर्वा कलिगोपधसारिवाः ।
किरातकटुका तिक्ता स्तन्यशुद्धिकरो गणः ॥ १८ ॥
कुलिंगो जटिला मेदा जीवकभकी वरी।
काकोल्यो सूर्पपण्यों च वर्गो वीर्यकरो मत ॥ १९ ॥
अब्धिफेनेक्षुकाण्डेक्षुकुष्टैलबालुकेक्षुरै ।
कदंबवसुकोशीरैः शुक्र शुध्येत् सकट्फलै ॥ २० ॥
इति चतुष्क. कपायवर्गः ।
काकोल्यो जीवको द्राक्षा मधुकं मधुपर्णिका ।
स्नेहोपगास्तु जीवन्ती स्थिरा मेदा विदारिका ॥ २१ ॥
अर्क कुलत्य एरडो यवो माप पुनर्नवा ।
वर्ग स्वेदोपग. शिग्रुर्वृश्चीरो बदरस्तिल. ॥ २२ ॥
नीपापामार्गविम्व्यकं विदुलं मधुकं मधु ।
काचनौ शणपुष्पी च गणोऽय वमनोपग. ॥ २३ ॥
रेकोपगो गणो द्राक्षापध्याक्षा. सपरूपकम् ।
धात्रीबदरकर्कधुकोलकाश्मर्यपीलुकम् ॥ २४ ॥
शतपुप्पा त्रिवृद्विल्ववचावत्सकसर्पपम् ।
पिप्पलीमधुकं कुष्ट फलमास्थापनोपगम् ॥ २५ ॥
शताह्वा गोक्षुरो दारु फलं विल्वं पुनर्नवे।
श्योनाकोऽरणिको राना गणोऽनुवासनोपगः ॥ २६ ॥
क्षवक शिखरी पण्याविडगोषणसर्पपा ।
श्वेतायुगं कणाशिनु शिरोरेकोपगो गण. ॥ २७ ॥
जम्बाम्रदलमल्लाजायवाम्लकोलदाडिमम् ।
पष्टिकोशीररुचक छर्दिनिग्रहणोपगम् ॥ २८ ॥
चरकोक्त पचाशत्-महाकपाया.
घनचंदनशुण्ख्यबु पटोलीपर्पटाऽमृता'
किरातकच्छुराछन्नास्तृष्णा निग्रहणो गणः ॥ २९ ॥
द्विवृहत्यभयायासशटीशंगीकणाऽमृता. ।
पौष्कर कोलमज्जा च हिक्कानिग्रहणे हिताः ॥ ३० ॥
इति त्रिकः कपायवर्ग।
पद्मापद्माद्रजोऽनन्ता-समंगा-लोध्रटिण्टुकाः ।
प्रियंग्वाम्रास्थिधातक्य. पिच्छा विग्रहणो गण. ॥ ३१ ॥
पयस्याभृष्टमृद्यासध्याह्नशलकिपिच्छिलाः ।
विविरेककरो जंवू यष्टी नीलोत्पलं तिलः ॥ ३२ ॥
जम्वाम्राऽश्मन्तकाऽश्वत्थभल्लातककपीतनम् ।
न्यग्रोध. खदिर. प्लक्षो मूत्र गृह्णात्युदुम्बर. ॥ ३३ ॥
कहार-धातकी-गुन्द्रा-यष्टी-नलिनकरवैः ।
पद्मोत्पलशतश्वेतैमूत्रं याति विरागताम् ॥ ३४ ॥
वशिरो वसुको वन्दा गुन्द्रा गोकण्टकेत्कटम् ।
मूत्रस्य भेदको दर्भकुशकाशाश्मभेदकाः ॥ ३५ ॥
इति पंचक. कषायवर्गः।
पथ्यातामलकी शृङ्गी कछुरामलकोकणाः ।
कास निलंति वृश्चीर क्षुद्रा द्राक्षा पुनर्नवा. ॥ ३६ ॥
सुरसाऽगुरुचडैलातामलक्यम्लवेतसा.।
श्वासं हरन्ति जीवन्ती शटी बाह्रीकपोप्करम् ॥ ३७ ॥
पाटलाऽरणिकाश्मर्यबिल्वं क्षुद्रे स्थिरे नटः ।
शोथस्योन्मूलने शुलं दशमूल सगोक्षुरम् ॥ ३८ ॥
मंजिष्ठा सारिवाऽम्बष्ठा द्राक्षा पीलु परूपकम् ।
साऽमृता त्रिफला चाय गणो जीर्णयति ज्वरम् ॥ ३९ ॥
यवपष्टिकखजूर प्रियालेक्षुपरूपकम् ।
गण. श्रमन्न स- द्राक्षाफल्गुबदरदाडिमम् ॥ ४० ॥
इति पंचकः कषायवर्ग ।
चदनोशीरकाश्मर्यहीबेरमधुकोत्पलम् ।
दाहापहाः स्मृता. लाजा शर्करासारिवाऽमृताः ॥ ११ ॥
भूतीकपिप्पलीन्याघ्री वाचाविश्वाऽरणिनता ।
शमयन्त्यचिरात् शीतं श्योनाकाऽगुरुधान्यका ॥ ४२ ॥
१६ सिद्धभेषजमणिमालाया खदिरोवदरश्चार कदिरी तिन्दुकोऽसनः । सप्तपर्णोऽश्वकर्णश्च पार्थश्चोढर्ददारक. ॥ १३ ॥ काकोली चदन सेव्यं मपर्णिण्या निदिग्धिक । वर्धमानमधूकलाश्चागमपिमर्दका ॥ ४४ ॥ कृष्णाजगधागण्डीरचव्यचित्रकदीप्यकम् । शूलस्योन्मूलनं शुण्ठीकणातन्मूलजीरकम् ॥ ४५ ॥ इति पंचक कपायवर्ग । मृद्कपाल सिता पिच्छा फलिनी मधुकं मधु । रुधिरस्थापकं लोध्रलाजारुधिरगरिकम् ॥ ४६ ॥ शिरीपो वंजुलोऽशोक शैलेलबालुक्ट्रफलम् । वेदनामोचको मोच कटवस्तुगपद्मके ॥ १७ ॥ गुग्गुलो रोहिणी ब्राह्मी हिगुकैडर्यचौरका । सज्ञादा कदिरोऽशोको गोलोमी जटिला वचा ॥ १८ ॥ शतवीर्या प्रिया दूर्वाऽरिष्टाऽमोघाऽन्यथा शिवा । गर्भमास्थापयेदेन्द्री वाट्यपुप्पी सरस्वती ॥ ४९ ॥ मंडूकपर्णी जीवन्ती रानापथ्याऽमृता स्थिरा । वर्षाभू श्रेयसी धात्री वयस. श्रेयसि स्मृता ॥ ५० ॥ इति पचक कपायवर्ग ।
4 . ہ م ہ * ۰۰۰ و • |•| }.} marmolel و 1 و 0 و 4 و 0 سم ۰ ۰ ۰ ۰ ادود مدت و مساک مورد احمر ««««« ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰۰ | «مع و ۱۰۰ ۰{ ه ه ه ه ه وه • امام ده و » مو ۰- و ماسه سی اه اه اه اه ااااااااااااااااااااا و | | . • |• | 이이이이이에이에이에이에 و و و و ««} - { ه و परिशिष्ट १ प्रस्तारजापकं यन्त्रम् । (तृतीय गुन्छ के ५८ वें श्लोक को देख) و ۵ و و و ہ ہ و اس ام اس اس ام اس اس ام اس اس ام اس ام اس اس | اس ام اس اس ام اس ام اس ام اس اس .ام دادند و دست دوم و . . ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ « دارد و در مو اه | ܘ | ܘ | ܘ | ܘ .هل ۰۰۰۰ اهم و و و و و .. ۰ ۰ ۰ } : « « ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ « « ۰۱۰ -|- -|- وه هه ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ ۰ معاملات ماهایا اور ایال21 ***** परिशिष्ट १ (तृतीय गुच्छ के ६० वे श्लोक की टिप्पणी तथा मेरु-यंत्र) १-'एकरसादि षड्सपर्यन्त स्वस्वप्रतारे कियन्तः सर्वरसभेदा, क्रियन्त पञ्चचतु- रादिरसमेदाः, कति च रसाभावभेदा , कियति वा प्रस्तारसख्या' इति प्रश्न मेरुणा प्रत्युत्तर देयम् । तत्र प्रथममेकरसे कोष्ठकद्वयं, द्विरसे कोष्ठकत्रयम्, इति प्रतिरसमेकैककोष्टकवृद्धया मेरे निर्माय सर्वत्र वाद्यन्त्यकोष्ठयोरेकामदयेत् । पश्चादुपरितनकोप्टद्वयाङ्क शृङ्खलावन्ध- न्यायेनैकीकृत्यावशिष्टकोष्ठकान्यपि पूरयेत् । एवं पूरितेपु कोष्ठेषु एक्रसप्रस्तारे भादौ एक- रसमेदः, तदन्ते च रसाभावभेद , इति सकेत । द्विरसप्रस्तारे त्वादौ सर्वरसमेद , मध्ये चैकरसभेदौ, अन्ये च रसाभावः । त्रिरसप्रस्तारे आदौ सर्वरसमेद , ततो द्विरसमेदा, तदने चैकरसभेदा , अन्ते रसाभावः । चतूरसे चादौ सर्वरसमेदः, ततस्त्रिरसा , ततो द्विरसाः, तत एकरसमेदाः, अन्ते रसाभाव । पञ्चरसेऽप्यादौ सर्वरस , ततश्चतूरसा , बिरसाः, द्विरसा , ततश्चैकरसभेदा यथाक्रम, पश्चिमे च रसाभाव । षड्सप्रस्तारे आदी सर्वरसभेद , तत. पञ्चरसभेदा , ततश्चतूरसभेदाः, ततस्त्रिरसभेदा , ततो द्विरसभेदाः, तत एकरसभेदा, अन्ते रसाभाव इति विभावनीयम् । अत्रायोगेम सख्याका भवन्तीति च अङ्कपूरणप्रकारस्फुटीकरणाथै यन्त्रन्यास मेरुयंत्र-१ १ १. १ १ ! १६ १/२ १/२१ १/५/१५ 1१३|३|१| १/४/१०/२० 110६४ १४६४१ १/३/६/१०/१५] १/५/१०/१०/५/१ १६१५/२०१५/६१ १/६/१५२०/१५६/१ओं|१११११११ १ अत्र तृतीये यन्त्रेऽधस्तादुष्ट्रगत्याऽङ्कद्वयसकलनामिति दिक् । विस्तरभयादधिकं न प्रपच्चितम् । अथ केवलषड्सप्रस्तारे सकलरसादिमेदज्ञानार्थमेकावलीमेरोर्दण्डमेर्वपरनाम्नः करण- सूत्रमत्रोच्यते । यथा-"सैकरसमितैकाङ्कानूर्धि स्थान् क्रमात् क्षिपोर्बोर्ध्वम् । मुञ्चान्य- मुपान्यादवतर पुनरारोह तद्वदवतर रे ॥ एव पुन पुनः कुरु यावदमीष्ट भवेत् सिद्धम् । सकलरसात् पूर्वस्मात् पञ्चचतुल्यादिरसमेदा ॥
परिशिष्ट १ ३९९ अस्यार्थ -एकेनाधिकेन सहितान् रससख्यानेकासानूर्वाध स्थितान् कुर्यात् , न तु नष्टोद्दिष्टवद्धताक्षरक्रमेणेति भाव । यथा १ तत एकद्वित्र्यादिक्रमेणोपर्युपर्यके क्षिपेत् । १ १ १ १ १ प्रथममेक द्वितीयाङ्कन सयोज्य द्वितीयस्थाने यक कुर्यात् । तृतीयाकन संयोज्य तृतीयस्थाने त्र्यंक, चतुर्थेन संयोज्य चतुर्थस्थाने चतुरङ्क कुर्यादिति, एवमुत्तरोत्तर वर्तव्यं; कि तूपान्त्य- मकमन्याङ्कन न मेलयेदित्यर्थ । प्रथमावृत्तौ इयमा १ कृति सिद्धा । द्वित्तीययोजनायां च ६ ४ ३ २ १ सर्वोपरितनाध.स्थ स्यान्त्यत्वमिति क्रमेणाधोऽध स्थितानां तत्तद्योजनाया सर्वेपामन्यत्वं ज्ञेयम् । द्वितीयावृत्तौ कृतायामित्थ १ १५ सिध्यति । एव पुन पुन कृते मेर्वाकृति सिद्धा भवति । सा चैतादृशी १ १० ६ રે ६ १५ २० १५ ६ १ ४०० परिशिष्ट १ (तृतीय गुच्छ के ६२ वे श्लोक की टिप्पणी तथा पताका यंत्र) १-पताकासूत्रम् । पताकाप्रयोजन च मेरौ पडूमप्रस्तारस्यैको भेट सर्वरस , पट पञ्चरसा , पञ्चदश चतूरसा , विंशतिस्त्रिरसा , पञ्चदश द्विरसा , पडेकरसा, एको रम- भावात्मकोऽस्ति । तत्र चतु पष्टिभेदभिन्ने पड्सग्रस्तारे कतमस्थले सर्वरसमेद कतमस्थले च पश्चरसात्मका कतमस्थले चतूरसात्मका इत्यादिप्रश्न पताकयोत्तर दातव्यमिति गुरुमुसा- दवगतम् । भरणप्रकारश्चत्थं-तत्र मेरौ यावती रसायकसख्या भविष्यति तावन्येव कोष्टकानि पताकाया लेखनीयानीति युक्त्या सिध्यति । अयोद्दिष्टाक क्रमादधोध स्थितर्दण्डभरणं विधाय सर्वाध स्थिताके ऊर्ध्वस्थितानद्वान् क्रमेण हृत्वा शिष्टमङ्क लिखेत् । कि च पूर्व- लिखितमकं न कुत्रापि लिखेत् । इदमुक्तं भवति-आदौ तावत् यत्सख्यरसाना पताका चिकीर्षिता तत्संख्या उद्दिष्टवदुत्तरोत्तर द्विगुणिता असा दण्डे स्थाप्या , पश्चान्मेप्रस्ताराक- संख्यया पताकाकोष्ठा वर्धनीया , तत क्रमात् प्रान्तस्थिताक्षेपूपरिप्यान् सर्वानात् हरेन् । हृत्वा हृत्वाऽवशिष्टमवशिष्टमङ्घ क्रमात् पुर स्थित कोष्टकेपु लिखेत् । पूर्व कुत्रापि लिखितमई शेपक्रमेण पुनरायान्तमपि तत्संख्याहू नै स्थापयेत् । यया पडूसपताकायामेकद्विचतुरटयो- इशद्वात्रिंशचतु पष्टयखैरुद्दिष्टरूपैर्दण्डं रचयित्वा प्रान्तस्थिते चतु पटयके द्वात्रिंशद्धरणाच्छिटा अपि द्वात्रिंशत् , ते च लिसिता एवेति न पुनर्लिख्यन्ते । पुन पोडाहरणादवशिष्टचत्वा- रिंशदको द्वात्रिंशदग्रस्थिते कोष्ठ के लिखेत् । ततप्तस्मिन्नेवाष्टाहरणात् शिष्ट पट्पञ्चाशद- कोऽष्टचत्वारिंशदाकोठके लिखेन् । ततश्चनुर्हरणात् शिष्ट पठ्यक , तदने पुनर्व्यवहरणात् द्विषष्टि , तदने एफहरगात् त्रिषष्टिस्तस्याप्यो लेख्या, एवमेकपनि सिद्धा भवति । ततश्च प्रान्ताङ्का द्वात्रिंशदग्रपङ्गिस्या सर्व एव मन्तव्या., तेषु क्रमादूर्वादहरण सर्वेषु कर्नव्यम् । यया-द्वात्रिंशदके पोडशहरणात् शिष्टा पोडश पूर्वस्थित वान स्थाप्यन्ते, ततोऽष्टाहरणेन शिष्टश्चतुर्विंशत्यक षोडशाङ्ककोष्टकाग्रस्थितकोष्ठमालाया प्रयमकोष्ठ के लिखितुं योग्य , ततश्चतु- हरणादष्टाविंशति तदग्रकोष्ठके, ततो द्विहरणात्रिंशदक तदने, तन एकहरणाटेकत्रिंशन्, तत्पु- रस्तात् पुनरष्टचत्वारिंशदके पोडशहर गादवशिष्टो द्वात्रिंगदक आगच्छन्नपि पूर्वलिखितत्वादु- पेक्ष्यते, ततोऽष्टाङ्कहरणाच्चत्वारिंशत् , एकत्रिंशदग्रकोष्ठे स्थाप्य । एव क्रमेण चतुर्हरणाच्चतु- श्चत्वारिंशत् , द्विहरणात् षट्चत्वारिंशत् , एफहरणात्सप्तवत्वारिंशदनाग्रकोष्ठेयु लेख्या ,तत पट्पञ्चाशदादिप्रान्ताङ्के हरण शटाका लेख्या , तत तृतीयपङ्किरचनाय द्वितीयपङ्किस्याः सर्वे प्रान्ताङ्का , ततस्तेष्वपि तथैव कर्नव्यम् । एव पुन पुन. कृते पताका सिद्धा भवति । ६/११ ५/६/२३/५/९/१७३३ ४/१५४ ६/७/१०/११/१३/१०/१९/२१/२५/३४/३५/३०४१४९ ૨૨૦૧૮ ]૧૨/૧૧/૨૦૨૨૨૩૨૬૨૭૨૪૨૬૨૮ર|૪૨૪૩૪૬૦૩૭ २१५/१६ २४२८३०३१४०४४/४६/४७/५२/५४५५/५८/५९/६१ १/६/३२४८/५६/६०६२/६३ 6 ०.१६४ मेदा साध, परिशिष्ट १ (तृतीय गुच्छ के ६२ वे श्लोक की टिप्पणी पताका यंत्र) प्रकारान्तरेणापि पताका पूर्यते । स प्रकारश्चैवमवधार्य-आदावुद्दिष्टाकान् क्रमेण पतया- कार लिखेत् , तत आद्यपरायोग कृत्वा पताकाकोष्ठकेषु यथाक्रमं लिखेदिति । आद्याकाश्च पूरयितव्यपढ़े. प्रधानाकस्य पश्चात् स्थिता अवगन्तव्या । मेहत्त प्रस्तारसंख्यया पताकादा वर्धयितव्यास्तदुत्तरमागच्छन्तोऽप्यका न लेख्या एवेति तावतैव पतिपूर्ति करणीया । किंच भेदावादूर्ध्वतना असा अप्यागच्छन्तोन लेख्याः, तद्नेदेषु तत्सख्याभावात् पूर्वाङ्कितमङ्कमपि न लिखेच्चेति सप्रदायः । यथा-षड्रसपताकाभरणे पूर्वं यथाक्रममुद्दिष्टाका एकादिद्वात्रिंश- दन्ता. स्थाप्या ,तत एकाङ्कस्य पूर्वाहासंभवाद्वितीयाङ्कमारभ्य पशिरचना, तत्राद्या एका एच, तस्य परे द्वितीयादय , ते चाव्यवहितानतिक्रमेण सकल्य्य कोठेपु समय॑न्ते, तथा चैकेन द्वाया मिलित्वा व्यको द्वितीयाबाध स्थाप्य , तत एकेन चतुर्भिमिलित्वा पञ्चाङ्क- ख्यकाध , तत एकनाष्टभि सह योगान्नवाई पञ्चाबाधः तत एवेन षोडशभि सप्तदश नवा- तत एकद्वात्रिंशद्योगात् त्रयस्त्रिंश सप्तदशाध स्थाप्या., तत पतिपूर्ति । अथ चतुर- वस्याधस्तथैवाका रेख्या , तत्र द्वारयां चतुर्भिमिलित्वा पट् चतुरस्याध , द्वाभ्यामष्टाभिश्च दश, तदध द्वाभ्या पोडशभिरष्टादश, दशाध द्वाभ्या द्वात्रिंशता च चतुस्त्रिंशत्तदव तत पूर्वस्थितेनैव ज्यइन पोडशभिरेकोनविंशतिस्तदध , त्र्यवेन द्वात्रिंशता पञ्चत्रिंशत्तदध , तत- स्यकाध स्थितपञ्चाङ्ग्रेनाद्यभूतेन चतुर्भिमिलित्वा आगच्छन्नवाङ्क पूर्वलिखितत्वान्न लिख्यते, पञ्चभिरष्टाभिस्त्रयोदश पञ्चत्रिंशदध ,पञ्चभि. षोडशभिरेकविंशतिस्तदध , पञ्चभिर्द्वात्रिंशता सप्त- त्रिंशत् , ततो नवभिश्चतुर्भिस्त्रयोदश पूर्वमागता अतोन लिख्यन्ते। तथा नवभिरष्टाभि सप्तद- शापि तथैव । नवभि पोडशभि पञ्चविंशति सप्तत्रिंशदध., नवभित्रिंशतैकचत्वारिशत्तदध सप्तदशभिश्चतुर्भिरेकविंशतिः पूर्वमागता । सप्तदशभिरष्टाभि. पञ्चविंशतिरपि तथैव, सप्तदश षोडश योगात् त्रयस्त्रिंशदपि पूर्व लिखिता । सप्तदशभित्रिंशता चोनपञ्चाशदेकचत्वारिंश- दध , तत प्रस्तारसख्यासमाप्ते पतिरपि समाप्यैव । एवमेव सर्वा पताका पूरणीया। सर्वाग्रे च रसाभावस्पश्चतु षष्टयक पश्चाल्लेख्य.। एतत्प्रकारदर्शकं पद्यमपि रचितम् । यथा- "अङ्कानुद्दिष्टवद्दत्त्वा योगेनाद्यपराइयो । पताका कुरु किच प्रारसिद्धमई परित्यजेत् ॥” इति पताकाग्रन्थः। यत्रद्वयेऽपि मेरुणोक्त सर्वरसमेद एक प्रथम एवेति पताकयोत्तर पञ्चरसमेदा द्वितीय- पकिसख्याका. षटू, चतुरसमेदा. पञ्चदश, चतुरकाधःस्थपशिदर्शितसंख्या इत्यादि । अन्येऽपि बहवः प्रकारा तथा सूचीमर्कट्याद्यप्रत्ययान्तराण्यपि विस्तरभयादरुचिप्रवर्तकत्वाच्च नेह प्रदान्ते । , पताका यंत्र-२ १/२/४/८/१६/३२/६४ ३६/१२/२४/४८, ५/१०/२०/४०/५६ ९/१८३६/२८/६० RRRRBIREng ३३/ ७/२२/५२/६३ 7/११३०३० १९/२६४६ therlht १३/५०/५० २१/१५३१ ३७/२३/४७/ २५/३/५५/ ४१२७/५९/ SIFIMIHIFI mis सि० २६ ४०२ परिशिष्ट १ (तृतीय गुच्छ के ९८ वें श्लोक की टिप्पणी) तदपि रसिकानां दृष्टिपयमवतारयामि । अयालौकिकप्राकृतव्याकृति व्याचिल्यासुरे- तदारम्भे प्रत्यूहव्यपोहाय स्वेष्टदेवतानमोरूपं माल संव्यवहाराय सज्ञासूत्रं च समं समु- पन्यस्यति-श्रीमृड इत्यादि । मङ्गले 'प्रणम्यते' इत्याक्षिप्यते। प्रकृते च श्रीप्रमृतयो यादृच्छिका सज्ञा अर्थापन्हवसिद्धिमात्रफलका , ईकारादयः सुसोचारणार्थत्वादविवक्षिताः; श्रीप्रभृतय सज्ञिनो वेति । क्रमप्राप्ततया सज्ञिन. सज्ञा वा सूत्रयति-कखगाघौ चच्छजझा टाठाडाढाणतो सबदौ । धनपाफो वभमायो रोल. ग प सहोक्षश्री । सज्ञाखिव सशिष्य- प्यकारादय पूर्ववद विवक्षिता ववयोरैक्यम् । कादीनां संज्ञात्वमपि । वर्गसख्यासूत्रमाह- 'चत्वारो वर्गा' ! वर्गा वक्ष्यमाणास्ते चत्वार एव न तु पञ्चेति सूत्रारम्भ वर्गसज्ञासूत्रम् । शृभृकृट्टनर' वर्गा इत्यनुवर्तते। तेषा च यथासख्यं सज्ञासज्ञित्वम् । ऋकारो वर्णाष्टक- ग्रहणार्थ । भवतश्चात्र श्लोको-श्री कं ब्रवीति मडपा खगघान्यया भोः। ढश्चमेण खटगाश्छजझास्तथा भो । झष्टं ब्रवीति पकराष्ठडढान् यथा भो. । फोणं क्रमेण णशधास्तथ- दास्तया भो । धो भेन कि च नपफो कथिता सतच्छैाधेन जेन खलु भोऽपि मयौ यदाभ्याम् । घोर नल क्ष इह शसति शं तु च पं च स लह वदति ह क्षमिवाह ठः श्रीम् ॥ २ ॥ स्वरक्रमस्तु लोकादवगन्तव्य । इत्याह-'लोकात् स्वरक्रमस्य च सिद्धि.'। अत्रानुक्ता योगा योगवाहिनो लोकात् प्रत्येतव्या इति चार्थ । 'पर प्रकृतिभेद ' नामधात्वो. रेव भेदो यथा धेथज्वादय , नतु सुतिवादिप्रत्ययानाम् । 'सयोगे प्रथमविकृति ' । यथा- 'स्व' इति, वक्तव्ये 'न्व' इति, 'व' इति वक्तव्ये 'स्व' इति । शेषप्रक्रिया तु व्याक- रणान्तरात्' पाणिनीयसारस्वतान्यतरस्मात् । उदाहरणमप्यस्य यथा-देवं नमामि नित्यं सिन्दूरगोभिगण्डमिभवदनम् । यस्य भजनमात्रादपि रिपव सहारमायान्ति ॥ एतस्मिन् पये वाच्ये लेख्ये वा प्रोक्तन्यायेन-'घेथं सयामि सिण्यं विन्धूपक्षोजिडङ्कमिजथधसम् । मस्य धभलखाप्रादधि ढिधसो नहाढमामान्ति ॥ इति सिद्धं भवति । भत्रोदाहरणे पूर्वार्धे पूर्व- प्रकार , उत्तरार्धे द्वितीयप्रकार सदर्शि ।
प्रथमः प्रकारः ब कर च्छो य क F । क M वाचका G Pra । 15 lo ० irale द्वितीयः प्रकार: अ म वाचका. 10 10 परिशिष्ट २ का + क च्छो भ कर और 19 क lrele तृतीयः प्रकार Nee-devraharateheleview . १/३२ ८/९१०/११/१२/१३/१४/१५/१६/१७/१८/१९/२०२१/- m 9 श्लोकाक्षराणि | क्रमाक्ष श्री डमी उखदो गो झषा का रिफणी शव. भ | सि ता च्छो य ज य दो ध ना क्षध वली ह ४०३ शुद्धिपत्र लोक स. हिंदी अनु.पंकि ८ - ६ ९ मशुद्ध पृष्ठ प्रमार्जिनी पटोलपत्रं पित्तन ओर एवमेते। श्लेष्मपदार्थ १० रसायिनी १२ एवमामलकेऽपि... १३ नीचेसे ३ ९ टिप्पणी - शुद्ध प्रमार्जनी पित्तनं और एवमेते लेप्मलपदार्थ रसायनी एवमामलकेऽपि - कर्यार्धमान इनके पाण्ड, कफ, - १० टिप्पणी १८ - १९ - इसके पाण्डु... फूल अमेध्य, अवृष्य फुफ्फुस, त्वचाका विषायति १६ २५ १५ ५ मेध्य, घ्य २४ -- फुफ्फुस-कलाशोय २४ १७ ४२ १०७ सारम्य ४४ टिप्पणी जलमेन इवे ४५ ५० ९ हिंगूद्राविड ६ गुणोंसे युक्त, ६३ नीचेसे ५ पयोभिरार्दा समीर वचाका विषादयति सौरभ्य जलमे हवे हिंगूप्रावित गुणो से युक्त, देव- राज से भी प्रार्थित पयोभिरार्दा समीरे करने में विजेता वीर एवं पित्तकारक है। रूक्षस्तथा .. ६४ १९२ २४१ ७४ नष्ट करने मे... ७४ ४ विजेता वीर... - ७६ २४७ - - रुक्षस्तथा लघु मूत्रकृच्छ्र, रुचि पाल्व वातपित्त ८१ लघु तथा रोचक पथरी और ८४ नीचेसे १ नीचेसे १ नीचेसे १ नीचेसे ५ नीचेसेट मूत्रकृच्छ्र, अरुचि पाल्वल ८८ कफ-पित्त ८८ - ९० - - ९० - ९ ६ शुद्धिपत्र ४०५ अशुद्ध पृष्ठ श्लोक स. हिंदी अनु.पंक्ति मुखरोग नीचेसे १ मुखरोग, विषविकार गी ८९ २९६ गुर्वी चलाल २९८ बलास कि २९८ कं ११ मृतधातु अर्थात् मृत- मृतधातु... - शुक्रकीटाणुओंको सहा ३०० सदा दोष, दोष, शोष, स्क्ष, मानस-रोगों में प्रशस्त, अर्क ९३ अर्क अर्थात् ताम्र सभालकर ९३ सभालकर तल मे से अर्क अर्थात् ताम्र... सिकता नामक... १० सिकता नामक मूत्र- शर्करा... द्विगुणमिति टिप्पणी द्विगुणामिति (नोसादर) • ९३ नीचेसे २ नोसादर) प्रवाहिका तथा प्रतिश्यायको मिटानेवाला... द्वितीयोऽगमद्वितीय.९४ अ. श्लो पं. द्वितीयोऽगमदद्वितीय। श्रीसिंहावतारस्य टिप्पणी श्रीनृसिंहावतारस्य १०५ १० धूमसे मनोक्ष १५४ ४१ मनोज्ञ सत्यभामा १५५ नीचेसे ४ रुक्मिणी साथ १५६ १६१ नीचेसे ४ फुलके सुभ्रष्टक १६६ सुभृष्ट खरल करके १६७ ६ खरल करके एक एक रत्तिकी पात्रस्तिथा १७१ पात्रस्थिता १७७ पृष्ठ के २७ वें श्लोकानुवाद को इस तरह पढ़ें-अफीम दो रत्ति, खदिर सार चार रत्ति तथा सूठ आठ रत्ति और तीन इलायची इनकी तीन मात्रा बना चांवल के धोवन सह सेवन करनेसे अतिसार शमन हो जाता है। केसर नागकेसर - नाप और.. २ स्थान में . ।
सिद्धभेषजमणिमालाया लोक स. उनकी - ४ भशुद्ध पृष्ठ हिंदी अनु पक्ति शुन्द्र रवमूल १९ ३३ रविमूल सीसेको १९९ १० कासीमको १९९ १३ उसकी अर्थात् सिरे की... २०५ पृष्ठ गत छठे लोकके अनुवादमें दोनों माक्षिक ('स्वर्ण माक्षिक तथा स्प्यमाक्षिक) की जगह 'द्विगुणितमधु' पढ़ें। निध्याल्य २१२ निधायाल्प क्षपणानिरुभवन्ति २१२ २० क्षपणानि भवन्ति पस्तर २१९ प्रतर लिहिता २२० २३ लिहता कोष्टाशुद्धि २२२ कोटशुद्धि २३४ वे पृष्ट की चतुर्थ पंक्ति को इस तरह पढें-सर्पर (विस खपरा नामक पुनर्नवा भेद ) के... वें पृष्ठ की चतुर्थ पंक्ति में समोरा आँधा ढकदें इससे आगे इतना और पढ-"तदनन्तर, चार तोला सेंधव में एक तोला कतीरा गूद मिला जलसे पीस चीनीपात्र के चारों ओर सधि लेप करके सुखाले । फिर, इनको तीन प्रहरतक तेल के दीपक की मंद मद मयूरपिच्छ २४१ ११ मयूरपिच्छ चंद्रिका के मध्य भाग की... घृतमें थोडे... २४४ १ घृतमें भूने गये शुद्ध कुचले का किचित् चूर्ण... पार्श्वशूल २४५ रुद्वात्रशूल मूंज २६२ नीचेसे २ मूंजकी सींकें, ववूल, २६३ ववूलकी फली, यकृदोदर २६४ यकृदुदर कलजिका २६५ १८ कजलिका २६७ २८ भेदी चावलों २७० चौलाई स्नुही-क्षीरसे २७१ स्नुही स्वरस से गोरख मुंढी का फल २७१ गोरखमुंडी चार तोला. सैंधव दो तोला... २७२ .. - - १ नीचेसे ५ भेदि अंप मुख्याः फलं २ मुण्ड्या पलं १ ur नीचेसे ४ । w - ५० - घी, शकर से शुद्धिपत्र मशुद्ध पृह श्लोक सं. हिंदी अनु.पंक्ति कषाय को ४५ दिवस २७२ कपाय को ४ या ५ दिवस चधि २७२ चच नसम्पजो ३ नखम्पचो... शिलारस २७३ शिलारस तथा सिंदूर... निवू २८२ ३ नीम रससिंदूर २८३ रसकपूर - शाल्मल २९० शाल्मले गंधाविरोजा २९१ गंधाविरोजा, राल सफेद सुरमे २९३ एक तोला सफेद सुरमे २९३ पृष्ठ पर ८ वी प का वाक्य इस तरह पढे-'फिर, ६४० वन्य-गोवरी में फूंकदे। इसी तरह दो तोला दधिमंड से खरल करके पुन दस सेर गोवरी में फूंकदें। इस भस्म में से एक गुजाभर मात्रा को नवनीत के साथ चाट जायें। दूध, युक्त भात .. रागेको २९३ १२ सीसेको पिस्तालीस २९७ ३ चौपन ..तृण प्रज्वलित रहें २९९ १ उसपर तृण प्रज्वलित होने लगें ૨ ૦ ૨ किंचित् रक निकालले एरड अरडूसा पनिंबू १० नीम श्वेतजीरा ३०५ कृष्णजीरा ३०९ आमले कपूरकाचरी... ३०९ अ पं कपूरकाचरी, जटामांसी, शिलाजीत ३१० शिलापुष्प (छरीला) ३११ वे पृष्ठ-गत 'इस चूर्ण में' इस नवमी पं को इस तरह पढ़ें इस चूर्ण में इससे चतुर्गुण शत- धौत घृत मिलादें। .. गंधक, ३१३ ३ गूगल, गंधक साबुदाना, गंधक ३१३ १० साबुन, कणगूगली, ३१३ वें पृष्ठ पर हिंदी अनुवादके २९ अक के आगे ३० और लिखलें। ३० की जगह ३१ तथा ३१ की नगह ३२ करलें।... - . रक निकाल लें - ३०२ - - अ पं - - १ सिद्धर्भपजमणिमालायां अशुद्ध लोक स. हिदी मनु पंक्ति शुद्ध १ जलको उतार . २ -- सौगन्धमुखा -- विकरा विकार ३१६ जलको उतार वन्नपूत करके पलाशपत्र मे... ३१८ पलाशपत्र में चूना तया कालिङ्ग ३१९ कलिंद ३१९ सौगन्ध्यमुसा वृक्षाम्ल १ तोला, ३१९ ३५ वृक्षाम्ल (सीमाक) सीमाकभस्म १३ तो १ तोला ४ रत्ति- दन्तदर्य ४२ दन्तदाऱ्या चूर्ण को ३२४ ११ चूर्णको अथवा समुद्र- - फेन चूर्णको २५६ तोला रसांजन ३२७ अप १६ तोला रसाजन को ३३० वे पृष्ठ गत २९ वें श्लोकके हिंदी अनुवाद में जसद की जगह सीसा पढ़ें। तीव-विकारसमूहरूप ३३० तीव-विकार-समूह का. इस तत्र का ३३३ अ.प इस तंत्रमें, सावर मनु (मत्र) का उपदेश महि- लाओंमें दिया है। ३३५ २ ४ या ५ स्थानगत ११ स्थानगत दारुणक आदि. ३९२ डाकोरप्रभु वालवारभट शिशुवाग्भट. - . १ - डोकार प्रभु
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