Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Surya Siddhant
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" (२) गणिताध्यायका अनुवर्ती है । कोई अपने गुरुसे पायेहुए दो एक अंगरेनी “फार्म- का भापान्तर हस्तगत करकेही गुरुदास्याभिमान ज्योतिषीका पद पानेकी इच्छा करताहै, कोई विनाही अयनांश तत्त्वके जाने हुए, इच्छानुसार चलनबोले 'किसी पाश्चमदेशके ज्योतिषीका अनुकरण करताहै । उपरोक्त समस्त महाशयगणही इस मूल प्रन्यको पढकर अपने २ गुरु और भास्करराादके परमगुरु श्रीसूर्यसिद्धान्तके लेखक ऋपिजीके चरणोंमें प्रतिष्ठा प्राप्त कर अन्तर्दाहको निवारण करें। The humble translator didicates his worthless attempt to the benefactor of the Sunshrit knowing population of India i e. Khemaraj Shrikrishnadas Proprietor of the S V.S. Press--Bomlay. P.B. PRASADA. समर्पण। भारतवर्षके गौरवस्तम्भ वैश्यवंशावतंस परमादार देवज्ञापा उद्धारक श्रीमान् सेठ-खेमराज श्रीरुष्णदासजी गुप्त महोदयेषु । श्रीमान् ! श्रीमान्ने संस्कृत भाषाका उद्धार करके भारतवासियोंका परमोपकार किया है । आपके समान धर्मरक्षक, दानशील, व आर्य ऋपियोंके बनाये प्राचीन शास्त्रोंका विस्तार करनेवाला और कोई नहीं है। प्राचीन ऋपि मुनिजनोंके बनाये शास्त्रीय ग्रंथोंमें "सूर्यसिद्धान्त" नामक ज्योतिष ग्रन्थका आदर मान सव देशोंमें है । इसमें कोई सन्देह नहीं कि, ज्योति शास्त्र प्रधान शास्त्र है। इस शास्त्रके रक्षित और विस्तारित होनेसे संसारका मंगल होना जानकर श्रीमानके उत्साहसे उत्साहित हो अनेक यत्न और बहुत परिश्रम करके "सर्यसि- द्धान्त " ग्रंथका अनुवाद साधुमापामें किया । श्रीमान् जानतेही हैं कि, गणितशास्त्र सर्व साधारणके लिये कितना कठिन है । इस अनुपादको पायकर ज्योतिर्वितु पाण्ड तोंका विशेष उपकार होगा । विशेषता यह है कि, जो उदाहरण मैंने दिये हैं उनका आलमन करके इस जटिल शास्त्रके भीतर प्रवेश करना बहुत कठिन न होगा। मर्म शास्त्र रक्षाकत्ती श्रीमानके करकमटमें यह मनुवादित ग्रन्य अर्पण करके मैं आशा परताहूँ कि इसको प्रकाशित करके आप सारे भारतवर्ष प्रचारित करदेंगे विना धनवान् लोगोंकी सहायताके भारतवर्ष में कोई महान्कार्य नहीं होता । यह विचार कर इस थको प्रचार होनेकी कामनासे भवदीय महायशस्वी नामके साथ इसको संयुक्त कराई । भवदीय अनुपही- बलदेवप्रसाद मिश्र मोहल्ला दोनदापुरा, मुरादारबाद (पश्चिमोत्तर) सूर्यसिद्धान्तको भूमिका। गणित-ज्योतिपमें सूर्यसिद्धान्तका नाम अत्यन्त विख्यात है। भारतवर्ष के अधिक पंचांग इसी ग्रंथसे बनते हैं, और इसीके अनुसार हमारे सारे व्यवहार हुआ करते हैं। इस कारण प्रत्येक विद्वान्को ऐसे ग्रंथके देखनेकी इच्छाका होना कुछ बसम्भव नहीं पहुतसे मनुष्य कहा करते हैं कि सूर्यसिद्धान्त यहांतक कठिन है कि, इसका पढना पढाना अधिकारसे बाहर पाँव रखना है । गणितशास्त्रमें साधारण अधिकारके साथ २ क्रमशः प्रवेश करना कुछ कटिन बात नहीं है । निःसन्देह अंकपात बहुत करने पड़ते हैं सो वहभी दुरारीह नहीं है। नये पढनेवालोंके लिये तो संज्ञाज्ञानही वास्तवमें कठिन है । उदाहरणके साथ ग्रंथका पढना बहुतही लाभकारी है। जहां दो एक विषय आगये, बस फिर और विषयोंका समझमें आना कुछ कठिन नहीं रहता । पश्चात् करण ग्रंथोंकी स्वयंही निर्देश करदी जा सकेगी और मूलमें पूर्णाधिकार होजायगा। अब यही निवेदन है कि जो पहली पहल कठिन समझपडे, तो थाप इसका पढना छोडें नहीं, वरन् वरावर देखे जाय । जहां कहीं कठिन ज्ञात हो वहीं पर दो चार वार दृष्टि डालजाओ, अवश्य सरलता. पूर्वक जान जाइयेगा। यदि पहले करणअन्य पढलिये जाँय तो सुभीता है। गणनाके समयमें साधारणता विकलाके नीचे सूक्ष्माङ्कका प्रयोजन नहीं है. और बहुत से विपयोंमें तिसको छोडदेनसे भी कुछ हानि लाम नहीं । गवर्नमेंटके अनुग्रहसे, स्वदेश वासियोंके अनुगगसे, धनी व धर्मात्मा पुरुषोंकी मार्थिक सहायतासे प्रतिप सहस्रों विद्यार्थों लोग अंकशास्त्रमें प्रवीण होते हैं । आ. शा की जाती है कि इनमेंसे अनेक विद्यार्थी लोग निजदेशकी अंक विद्या और ज्योति. पविद्यापर ध्यान देंगे इस ग्रन्थमें १४ अध्याय हैं। इनके मध्य- ९ मध्याय-अन्याय, कामास, गुगात, दिनसंरत्या, हरीण, माणादि ग्रहोंक। मध्य, मन्दोच और शीघ्र, देशान्तर परमविक्षेपादि हैं। २ अध्यायमें-ग्रहगतिका कारण, गतिप्रकार, ज्यानिर्णय, क्रांति और केन्द्रसाधन मुन और कोटीसे परिधि करके फलादि निर्णय ' ग्रहस्पष्ट, भुजांतर संस्कार, स्पष्ट गति, स्पष्टीक्षेप, अहोरात्रमान, चर, तिथि, नक्षत्र, योग, करण हैं। ३ अध्यायमें-पूर्व पश्चिम रेखा निर्णय, अयनांश, विपुवा, लम्बज्या, नत्यानयन, अग्राकोणशङ्ख, निरक्ष राशिमान, लग्न, दशम हैं। ४ अध्यायमें-स्पष्ट, चंद्र, छाया और सूर्यका मान, ग्रास, स्थिायई, फोटे, बल- नांश है। - - ६) सूर्यसिदान्तकी-मृमिका। ५ अध्यायमें-चन्द्रलम्मन, अवनति (सूर्यग्रहण ) है। ६ अध्याय-पारेलेखाधिकार है। ७ अध्यायमें-ग्रहयुत्यधिकार, अक्ष-दृकर्म अयन-दृकर्म, ग्रहविम्ब । प्रदर्शन ८ अध्यायमें-नक्षनग्रह युत्यधिकार, नक्षत्रोंके स्थान है। १. अध्यायमें-उदयास्ताधिकार, कार निर्णय, कालांश हैं। १० अध्यायमें-शृंगोन्नति, चन्द्रोदय । ११ अध्यायमें-पाताधिकार, व्यतिपात, कालनिर्णय, गण्डक, भसन्धिः । सूर्यसिद्धांतकी-भृमिका । १२ अध्यायमें-अध्यात्मविद्या, कक्षास्थिति, मेरु, भद्राश्व, यमकोटी, लंका, केतु मालवनक्षनकी पृथ्वीमे दूरी है । १३ अध्यायमें-गोल और यंत्रादि बनाना है। १४ अध्यायम-कालनिर्णय हे । त्रिज्या( Ratlus ) धनु (Aae), ज्या ( Sine ), कोटी (Cosine) कर्ण (Hy, Potenuse ) आदि कई एक त्रिकोण मिति के शब्दोंका व्यवहार निरन्तर हुआ है इस फारण इनको पहलेहोसे जान रखना चाहिये । लम्व विपुषच्छाया आदि अपने २ देशके अक्षाशसे निर्णीत हाते हैं । विक्षेप (Latitude) क्रान्ति (Drelinator) स्फुट आदिग्रहोंके अवस्थिति करके हैं । मध्य, मन्दोच, शीघ्र, परिधि आदि स्पष्टादि लाने के प्रकरण है। गशिचन्द्रका जो बिन्दु मध्यरेखाके परे स्थित हो, सो दशम और उदयगत लग्न है, विप्रश्नाध्यायमे किस प्रकारसे दिक् और कालका निर्णय करना चाहिये, और पश्चात् यंत्राध्याय यंत्रके बनाने की रीतिको दिखाय मानमन्दिरके बनाने का उपदेश दिया है। मूमिकाको समाप्त करनेसे पहले सर्वोपमोपमेय, गुणिजनमंडलीमंडन पाखण्डमत खण्डन, श्रीमान् पं०मालाप्रसाद मिश्र व श्रीमान् श्रीविमलामसाद सिद्धान्तसरस्वनी- जीको वारम्वार धन्यगद दियाजाता है, क्योंकि उपरोक्त महाशयोंके द्वारा इस ग्रंथके अनुबादमें बडी महायता मिली है, पाठार्थियोंके लामार्थ इस पुस्तको योग्य व उचित उदाहरणभी दिये हैं। अलमातविस्तरेण । मुखानंदामिश्रात्मज- संवत् १९५२ विक्रमी। बलदेवप्रसाद मिश्र, चैनष्ण २ रविवार पश्चिमोत्तर मोहल्ला दीनदारपुरा मुगराबाद.
- .... .... .... .... २-२ अक्षज्ञानम् .... .... .... .... ... ११-१९ अथ चंद्रग्रहणंतत्रसूर्यचंद्राविंव- .... .... .... .... ॥ श्रीः ॥ • अथ सूर्यसिद्धांतस्थविषयानुक्रमणिका । मंगलाचरणम् . १-१ दिग्देशकालप्रश्नाः दिग्ज्ञानम ६५-१ ज्योतिपज्ञानप्राप्त्यर्थमयासुरतपो- छायाज्ञानम् ७४-१३ वर्णनं वरमाप्तिश्च अक्षात्पलमानयनम् ७५-१६ सूर्याशपुरुपोत्पत्तिपूर्वकंमयेनस- ७८-२२ भुजसाधनम् , हमवादवर्णनम् स्वदेशोदयादिज्ञानम् ९०-४३ कालभेदनिरूपणम् ९४-४९ कालसाधनम् युगमानंसंधिसंध्याशमानंच ९-१५ मन्वन्तरमानम्... इतित्रिप्रश्नाधिकारः ३. कल्पमानम् स्फुटीकरणम् परार्धकालमानम् ११-२२ ग्रहणद्वयसंभूतिज्ञानम् ग्रहादिस्पष्टकरणार्थवर्षगणानयनम१२-२३ पातसाधनम् १००-८ ग्रहाणांगतिनिरूपणम् १३-२५ बिंबप्रयोजनम् मगणस्वरूपम् १४-२७ ग्रासानयनम् १०१-१० अहर्गणसाधनम् २१-४५ मध्यग्रहणस्पर्शमोक्षकालज्ञानम् १०३-१६ भगणादिनहानयनम् २५-५३ निमीलनोन्मीलनकालज्ञानम् १०४ -१७ संवत्सरानयनम् २६-५५ सूर्यग्रहणेविशेषः १०५-१९ ..मध्यमग्रहानयनम् २७-५६ ग्रासानयनेअनेकभेदाः १०५-२० रेखादेशाः ३०-६२ विवानामंगुलीवरणम् १०७-२४ वारप्रवृत्तिकालज्ञानम् ३२-६६ इति चद्ग्रहणाधिकारः४ अद्दस्यतात्कालिककरणम् ३३-६७ चन्द्रग्रहणात्सूर्यग्रहणसाधनेयोनि- ति मध्यमाधिकारः १. शेपस्तमाह. १०९-१ अयग्रहस्पष्टाधिकारः ३५-१ नतिसाधनम् ११५.-१० ग्रहाणाज्यासंस्कार ४१-१५ इति पचमोध्याय. ५. ग्रहाणांमंदकंद्रसंस्कारः ४८-३४ सूर्यचन्द्रग्रहणयोः परिलेखा- ग्रहाणां शीघ्रकेंद्रसंस्कारः ५०-४० धिकारः १२२-१' ग्रहाणां नतिसाधनम् ५२-४५ इति च्छेदकाऽध्यायः ६. दिनमानरात्रिमानज्ञानम् ५९-५८ अययुतिभेदानरूपणम् १३२.१ ग्रहाणोनक्षनानयनम् ६२-६४ अथवर्मनिरूपणम् १३४-७ योगानयनम् ६३-६५ विवक्लानयनम् १३२-१३ ६३-६६ युद्धसमागमनिरूपणम् १४३-१८ करणानयनम् ६४-६७ शतग्रहयुश्यधिकारः ७. इतिस्पधाधिकारः २. नक्षत्ररकतानंशरज्ञानंच अथतिप्रश्नाधिकार ६५-१ योगताराज्ञानम् .... .... .... .... .... ...” .... ... .... .... .... .... .... .... तिथ्यानयनम् .... .... ...
... .... aan .... .... .... .... .... ... .... .... .... .... .... ... .... (८) अनुकमाणका । इति नक्षत्रग्रहज्युत्यधिकारः ८. देवासुरयोदिनरात्रिनिर्णय:..- २०१-४५ अयोदयास्ताधिकारः १५५-१ गोलस्थितिवर्णनम् २०८-६३ पंचताराणांपश्चिमास्तपूर्वोदयौ १५६-२ कक्षानिरूपणम् २१३-७५ चंद्रवुधशुक्राणांपूर्वास्तपश्चिमो. आकाशकक्षाब्रह्मांडांतर्गताब्रह्मां- दयौ १५६-३ डकक्षायानामांतरंबृहवामिमान- इटकालांशानयनम् १५७-४ सूचकम २१८-२० गुर्वादीनांकालांशाः १५८.६ इति भूगोलाऽध्यायः १२. कालांशमाननास्तोदयोगतैष्य. अथज्योतिषोपन्निरूपणम् २२९.-२ त्वज्ञानम् १५९.९ तत्रगोलबंधनविधिः २२०-३ नक्षत्रागामस्तोदयज्ञानम् १६०-१२ अनेकविधयंत्राणांसाधनानि २२७.-१९ इति नवमाधिकारः ९. उपानपत्फलश्रुतिः २३१-२५ चंद्रस्यास्तोदय,गोन्नातेनिर्णयः१६३-१ इति त्रयादशोऽध्यायः १३. चंद्रेशृंगोन्नतिपरिलेखः १६९.१० मानाध्यायः इति पाताध्यायः १० २७३-२ तत्रवाईस्पत्यमानम्? २३२-२ फ्रांनिसाम्यानयनम् १७७-९ सौरमानम् २ २३२-३ सरपातकालज्ञानम् १७९-१३ चांदमानम् ३ २३५.-१२ पंचांगस्थव्यतिपातज्ञानम् १८३-२० पित्मानम् ४ २३६-१४ गंडांतस्वरूपादिकम १८३-२१ नाक्षत्रमानम्५.... २३७०.१५ अकौशपुरुपवाक्योपसंहारः....१८४०-२३ सावनमानम् २३८..१८ इरिसंहाराऽध्यायः ११. (दिव्यमानम् ७.... २३९-२० भूगोलज्ञानार्थमय सुरमनः १८५-१ प्राजापत्यमानम् ८ २३९-२१ अकाशपुरुपोक्तिः १८९-१२/ब्राह्ममानम् ९ २३९-२१ जगदुत्पत्तिक्रमः १९०.१२ ग्रंयोपसंहारपूर्वकफलश्रुति. सर्यएक्सर्वात्मा.... १९१-१५ कथनम् १० २४२-२२० महाभूतोत्पत्तिः १९३-२३ इति चतुर्दशेऽध्यायः १४. पंचतारोत्पत्ति १९४-२४ अहर्गणानयनोदाहरणम् २४४.० राशिनक्षत्रोत्पत्तिः १९४-२५ मध्यानयनोदाहरणम् रचितपदार्थानांस्थानानि १९५-.२७ देशान्तरानयने उदाहरणम् । २४४.०० श्रीमागवतोक्ताबह्मांडगोलम् १९५-२८ मंदोघानयने उदाहरणम् २४५-०. अदभूगोलादिकानामाकाशप- पातमध्यानयनमू २४५... रिभ्रमणम्... १९६-३० रविस्फुटानयनम् २४५-० सप्तपाताल: १९७.३३ शनिस्फुटानयनम् मेरुस्थितिः १९७०-३४ ग्रहगतिः भूगोलेसमुद्रावस्थानम् १९८-३६ चंद्रग्रहणम् २५३.४७ भूगोलेयमालयकोटिलंकरोमककुरु मुजज्या वर्णनम् २५५.७४ १९९-३८ प्रश्नावलि २५०... इत्यनुनमाणका समाप्ता। .... .... .... .... .... .... .... .... .... ... .... -- .... .... .... .... ... ... .... .... ..00 EHAEE.. श्रीगणेशाय नमः। अथ श्रीसूर्यसिद्धान्तः। मुढार्थप्रकाशटीका-आपाटीकात्यां सहितः । Seao प्रथमोऽध्यायः। यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा। तवेदाङ्गशास्त्राणां गणितं मूद्धनि स्थितम् ॥ यस्मृत्याभीष्टकार्यस्य निर्विघ्नां सिद्धिमेष्यति । नरस्तं बुद्धिदं वदे वक्रतुण्डं शिवो- भवम् ॥ १॥ पितरौ गोजिबल्लालो जयतोऽम्बाशिवात्मको । याभ्यां पञ्च सुता जाता ज्योति संसारहेतवः ॥ २ ॥ सार्वभौमजहांगीरविश्वासास्पदमापणम् । यस्य तं भ्रातर कृष्णबुधं वंदे जगद्गुरुम् ॥ ३ ॥ नानानन्यान्समालोच्य सूर्यसिद्धांतटिप्पणम् । करोमि रंगनाथोऽहं तद्गूढार्थप्रकाशकम् ॥ ४ ॥ अथ ग्रहादिचरितनिज्ञासन्मुनीस्तत्प्रश्नकारकान्प्रति स्वविदितं यथार्थतत्त्वं सूर्याशा- रुपमयासुरसंवादं वक्तुकामः कश्चिदपिः प्रथममारम्भणीयतत्कथनानविनसमात्यथै कृन जलप्रणाममंगलं शिष्यशिक्षायै निवनाति- अचिन्त्याव्यक्तरूपाय निर्गुणाय गुणात्मने । समस्तजगदाधारमूर्तये ब्रह्मणे नमः ॥१॥ ब्रह्मणे बृहत्त्वादपरिच्छिन्नत्वाज्जगद्व्यापकायेश्वराय “तस्माद्दा एतस्मादात्मन आकाश: ययुद्धिविशेषेण मत्तस्त्वमुत्कृष्ट स्वत्तोऽहमपकृष्ट इत्यादिरूपेण नतोऽस्मीत्यर्थः । ननु व्यापकत्वेनाकाशस्यैव सिद्धिरत आह- समस्तजगदाधारमृतंय इति । समस्तस्य स्था. वरजंगमात्मकस्य जगत उत्पत्तिस्थितिविनाशक्त आधाराश्रयभूता ब्रह्मविष्णुशिवरूपा मूर्तयः स्वरूपाणि यस्य तस्मै ब्रह्मविष्णुशिवात्मकायेत्यर्थः । आकाशस्य तदात्मक- त्वामान सिद्धिाति भावः । नन्वंतादृशस्य स्वरूपध्यानं कर्तुं समुचितमित्यत आह । बचिन्त्याव्यक्तरूपायेति । अचिन्त्यश्वासावच्यत्तरूपस्तस्मै । अचिन्यों ध्यानाविषयः। यत्र हेतुरव्यक्तरूपः । न व्यक्तं प्रवदं रूपं स्वरूपं यस्य तथा च स्वरूपध्याना- सम्मवान्नमस्कार एवं समुचित इति भावः । नन्वव्यक्तरूपः कथमित्यत आह । निर्गुणा इति । निर्गता गुणाः सत्त्वरजस्तमारूपा यस्मात्तस्मै गुणातीतायेत्यर्थः । तथा " (२) सूर्यसिद्धान्त:- [प्रथमोऽ- च गुणात्मकस्य व्यक्तरूपत्वेनायं तदभावादव्यक्तरूप इति भावः । नन्वेवमस्यारूपत्व- मेव फलितं नाव्यक्तरूपित्वमित्यत आह । गुणात्मन इति । गुणा नित्यज्ञानसुखादय आत्मगुणा आत्मस्वरूपं यस्य तस्मे नित्यज्ञानसुखाय । “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" इति श्रुतरित्यर्थः तयाचास्य रूपित्वमसिद्धमिति भावः । साक्षानिर्गुणाय परम्परया गुणात्मने । कथमन्यथा जगत्करीत्वं सम्माति । "प्रकृति स्वामवष्टम्य विटजामि पुनः पुनः। भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशः प्रकृतेर्वशात् ।।" इति भगवदुक्तरित्यन्ये ॥१॥ मा०टी०-अचिन्त्य (विचार न मानेके योग्य ), मव्यक्तरूपी, निर्गुण, गुणात्मा सम- जगदाधारमति ब्रह्मको प्रणाम है ॥ १ ॥ अथ स्वोक्तस्य स्वकाल्पतत्वशङ्कावारणाय तत्संवादोपक्रमं विवक्षुः प्रथमं मयासुरेण बपस्तप्तमिति श्लोकाभ्यामाह- अल्पावशिष्टे तु कृते मयनामा महासुरः॥रहस्यं परमं पुण्यं जि- ज्ञासुर्ज्ञानमुत्तमम् ॥ २॥ वेदाङ्गमयमखिलं ज्योतिषां गति- कारणम् ॥ आराधयन्विवस्वन्तं तपस्तेपे सुदुश्चरम् ॥ ३ ॥ मयेति नाम यस्यासौ मयाख्यो महादेत्यः कश्चित् । तपोऽभिमतदेवतामोतिकरजप- होमध्यानादिना स्वशरीरादिल्लेशनियमरूपं तपे कृतवान् । दैत्यानां तपश्चरणं पुराणेषु प्रति- पदं मुप्रसिद्धम् । ननु तत्र तपा तपश्चरणस्य देवताविशेषमभिमतमुद्दिश्य प्रसिद्धरनेन कं देवमुद्दिश्य तपस्तप्तमित्यत आह । आराधयन्निति । विवस्वन्तं सविटमंडलाधिष्ठातारं नारायण सवयन् । ननु दैत्यारिमेनं स्वशडं ज्ञात्वाप्ययं कथं स्वाभिमतसिद्धयर्थमार- राध । नहि स्वशत्रुतः स्वहितसिद्धिरन्यथा शत्रुत्वव्याघात इत्यतस्तपोविशेषणमाइ- सुदुश्वामिति । मुतरां दुःखैरत्यन्तल्लेशैश्चरितुं क शक्यमित्यर्थः । तथाच भक्तजन- कवत्सलनया तादृशतपश्चरणसुप्रसन्नो दैत्यानामप्यभिमतं पूरयतीति पुराणेषु शतश: भासद्धम् । अतस्तत्प्रतीत्याराधयन्निति भावः । ननु पुराणेषु दैत्यानां तपश्चरणोक्ति- प्रसंगे कचिदप्यस्यानुक्तेस्तत्तपश्चरणं कथं प्रमाणं ज्ञेयमित्यंत आह-अल्पावशिष्ट इति । कृने कृताख्ये युगवाणे तुकारात्सन्व्यासन्ध्यांश सहित इत्यर्थः । तेन सन्न्यासध्या- शतमेतचलनरूमाभिमतकृतचरणेन ग्रन्थान्तरोक्तरेवलकृत इति पर्यवसन्नम् । अल्प- कालेन सन्ध्यांशान्तर्गतेन शेपिते । समाप्स्यासन्नाभिमतकृतयुगे मयासुरेण तपस्तप्त. धमत्यर्थः । तथाच साम्प्रतमेव मयासुरण स्पस्तसमिति सर्वजनावगतप्रत्यक्षप्रमाणसिद्धं नागमारण माण्यमपेक्षन इति भावः । ननु मयासुरेण किमथै तपस्तप्तं नहि प्रयोजन- मनुद्दिश्च गन्दोऽपि प्रान्त इत्यतो मयासुगोशंपणमाह-निजामुरिति । ज्ञायतेऽनंनोत ये गमद पटादरम् ।
ध्यायः १] संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतः । - ज्ञानं शास्त्रं ज्ञातुमिच्छुः । तयाच शास्त्रज्ञाननिमित्तं तेन तपस्तप्तमिति मावः । कि तच्छास्त्रमित्यतो ज्ञानविशेषणमाह-ज्योतिपामिति । प्रवहवायुस्थानां ग्रहनक्षत्राणां गतिकारणम् । ये गत्यर्यास्ते ज्ञानार्या इति गतेः संस्थानचलनमानादिज्ञानस्य कारणं प्रतिपादकं ज्योति शास्त्रं जिज्ञासुरिति फलितम् । ननु ज्योति शास्त्रज्ञानार्थमयमा- यासो न युक्तस्तस्य सर्वविज्ञेयत्वेनादुरूहत्वादित्यत आह-अखिलमिति । समर्प ज्योतिःशाखमित्यर्थः । तयाचीणां मानुपत्वेनभ्यो मम ज्ञानमखिलं यथार्थ वा न भविष्यतीति दैत्यबुद्धया मत्वा निःशेपज्योतिःशास्त्रस्य दुरूहस्य विदिततत्त्वं मग- चंतमप्रतारकं सर्वज्ञ महागुरुं सेवयामासेति भावः । ननु तस्यासुरस्य ज्योतिःशास्त्रम- वृत्तिर्न युक्ता फलाभावादित्यत आह-वेदांगमिति । वेदस्यांगम् । तथाचांगिनो यत्फलं' तदेवांगस्येति मोक्षरूपफलसद्भावादत्र प्रवृत्तिर्युक्तेति भावः । अतएव पुण्यजनकं पुरा- णन्यायेत्यादिचतुर्दशविद्यांतर्गतत्वात् । नन्विदं वेदांगं कुत इत्यत आह-परमामति । "कालोऽयं भगवान्विष्णुरनन्तः परमेश्वरः । तदेत्ता पूज्यते सम्यक्पूज्यः, कोऽन्यस्ततो मतः ॥” इत्युक्तः कालप्रतिपादकत्वेनोत्कृष्टमतो वेदांगम् । एतेन पुराणादीनां 'निरास इति भावः । ननु व्याकरणादीनां पण्णां वेदांगत्वादस्मिन्नेव प्रवृत्तिः कथमित्यत आह-अश्यामिति । पण्णां वेदाङ्गानां मध्ये श्रेष्ठम् । कुत इत्यत आह-उत्तममिति । मुल्यांग नेत्रमित्यर्थः। तथाच नेत्ररहितस्याकिञ्चित्करत्वादिदं ज्योति शास्त्रं वेदांगेपुश्रेष्ठ- मिति भावः । ननु तथाप्येतस्य ज्ञानार्थमेतावानायासो न युक्त इत्यत आह । रहस्य- विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम गोपाय मा शेवधिष्टेऽहमस्मि । असूयकाया- नृजवेऽयताय न मा ब्रूया वीर्यवती तथा स्याम्" इति श्रुत्युक्तगोप्यामित्यर्थः । तथा- चास्य शास्त्रस्यादेयत्वेन निश्चितत्वादनेन तत्प्राप्त्यर्थमेतावानप्यायासः कृत इति मावः ॥२॥३॥ मा० टी०-सत्ययुग कुछेक (मंश) शेष रहते हुए, मयनामक महामसुरने परमपु- ज्यरहस्य वेदांगों में श्रेष्ठ समस्त ज्योतिषों (ग्रहनक्षत्रों) की गतिका कारणरूप उत्तमज्ञानको प्राप्त करने के लिये जिज्ञासु हो भतिकठोर तप करके सूर्यको माराधना कीथी ॥ २ ॥ ३ ॥ ततस्तुष्टोऽको मयायेदं दत्तवानित्याह- तोपितस्तपसा तेन प्रीतस्तस्मै वर्थिने । ग्रहाणां चरितं प्रादान्मयाय सविता स्वयम् ॥ ४॥ स्वयं स्वतः प्रीतः सुखरूपः । यद्वा शोभनोऽयं प्रत्यक्षः प्रीतः सन्तुष्टोऽपि सन्द सविता सवित्रमण्डलमध्यवर्ती तेन सुदुश्चरेण तपसाराधनेन तोपितः । अत्यन्तं सन्तुष्टः तस्मे अमुराय मयनाने वरार्थिने वरं स्वाभिमतं ज्योति शास्त्रमर्थयते ज्ञातुमिच्छाति तस्मै मिति । " ।
- } सूमिद्धान्त:- [प्रयमोऽ- ज्योतिःशास्त्रजिज्ञासवे ग्रहाणां प्रबहवायुस्थग्रहतागणां चरितं 'ज्ञानं प्रादात् । प्रकर्षण माकल्येन यथार्थतत्त्वेनादाद्दत्तवान् ॥ ४ ॥ मा० टी०-उतके पसे संतुट हुए स्वय मूर्यमगवान्ने प्रसन्न हो वरके चाहने. पाळे मय मसुरको ग्रहाका चरित्र दिया । ४ ॥ नन्वय सूर्यः स्वकार्याथै शरणागतमपि स्वशत्रु प्रति कथमिदमुक्तवानित्यतो मयं अति साक्षात्सूर्येणोक्तस्य वचनस्यानुवादार्थमुवतः प्रथमं तत्संगतिप्रदर्शकमेतदाहे- श्रीसूर्य उवाच । विदितस्ते मया भावस्तोपिलस्तपसा ह्यहम् ॥ दयां कालाश्रयं ज्ञानं ग्रहाणां चरितं महत् ॥५॥ श्रीसूर्य उवाचेति । तेजःसमूहैदीप्यमानाऽको मयासुरं प्रत्यवददित्यर्थः । अन्यथा चतुर्थपञ्चमश्लोकयोः संगत्यनुपपत्तेः । किमुवाचेत्यतस्तद्वचनमनुवदति । हे मयासुर ते तव मावो मनोरथो ज्योतिःशास्त्रजिज्ञासारूपः मया सूर्येण विदितस्त्वदकथितोऽपि स्वतो ज्ञातः । ततः किं न ह्येतावता मम तत्सिद्धिरत 'आह-अहमिति । ते इत्यस्या- चेस्ते तुभ्यं ज्ञानं शास्त्रं वालाश्रयं कालपधानम् । प्रहाणां प्रवहवायुस्थानां महदप- रमेयं चरितं माहात्म्यम् । ग्रहस्थितिचलनादिप्रतिपादकज्योतिःशास्त्रमिति फलि- वार्थः । अहं सूर्यमण्डलस्थः दद्यां दास्यामि । ननु मां दैत्यं प्रतीदं वाक्यं प्रतारक मविष्यतीत्यतः स्वविशेषणमप्रतारणपूर्वकतत्कयनहेतुभूतमाह-तोपित इति । हि यत- स्तपसा त्वत्कृताराधनेनात्यन्तसन्तुष्टोऽतो दद्यामित्यर्थः । तथा च त्वत्कर्मवश्येन मया जातिवरमुपेक्ष्यानुकम्पितमहादवत्त्वममतार्योऽनुकम्पित इति मावः॥५॥ मा० टी-सूर्यभगवान्ने कहा, मैंने तुम्हारे अभिप्रायको नाना, तपसे सतुष्ट मी हुमा हूँ, काल (समय) के आश्रित हुए ग्रहोंके चरेत्रका ज्ञान तुमको दूंगा ॥५॥ ननु सूर्यस्य सदा जाज्वल्यमानतया तत्सन्निधौ श्राणकालपर्यन्तं मयःस्थातुं कथं शक्त क्थं वानरतभ्रमस्य तस्य मयसंवादाथै भ्रमगविच्छेदः सम्भवति । अतो दानासम्मवात् कथं दद्यामित्युक्तस्तद्वचनान्तरमनुवदति- नमे तेजःसदः कश्चिदाख्यातुं नास्ति मे क्षणः॥ मदंशः पुरुषोऽयं ते निःशेष कथयिष्यति॥६॥ हेमय ते तुभ्यमयमप्रस्थः पुरुषो निःशेपं सम्पूर्ण ज्योतिःशास्त्रं कथयिष्यति । नवयं तप्यं न वदिष्यतीत्यत आह-मदंश इाते । मम सूर्यस्यांशः सम्बन्धी मदुत्पन्न इत्यर्थः । तथा च मदनुकम्पितं त्वां प्रत्ययं तथ्यमेव वदिष्यतीति भावः । एतेनाई भक्तजनवत्सलतया अध्यायः १] संस्कृतटोका-भापारीकासमेतः । स्वांशद्वारा दास्यामीत्ययों दद्यामिति पूर्वपद्योक्तस्य प्रकटीकृतः । ननु त्वयैव वक्तव्य- मित्यत आह-नेति । कश्चिदपि जीवो मे सूर्यमण्डलस्थस्य तेजःसहस्तेजोधारको न। सथा च बहुकालं मत्समीपे स्थातुमशक्तस्त्वं कथं मत्तः श्रोष्यसीति भावः । ननु सत- पासामय॑नाहं त्वत्समीपे वहुकाल स्थातुं शक्तस्त्वत्तः ओष्यामीत्यत आह-आख्या- तुमिति । मे सूर्यमण्डलस्थस्य प्रवहवायुनानवरतं भ्रममाणस्य स्वशक्त्या कदाप्यस्थि- रस्य कथयितुं क्षणः कालो नास्ति । भ्रमणावसानासम्भवेनैकत्र स्थित्यसंभवात् । तथा च स्थिरस्य तव बहुकालं मत्संगासम्भवान्मत्तः श्रवणमसम्मावि । नहि त्वमपि मत्स्था नमधिष्ठातुं शक्तो येन मत्तः श्रवणं तव सम्भवति । ईश्वरनियोगाभावादिति भावः॥६॥ मा० टी०-मेरे तेजको कोई नहीं सह सकता और हमको समयभी नहीं है। हमारा 'मंशरूप यह पुरुष तुमसे विशपतासहित कहेगा ॥६॥ मय सूर्यवचनानुवादमुपसंहरन्सूर्याशपुरुषमयासुरसंवादोपक्रममाह- इत्युक्त्वान्तर्दधे देवः समादिश्यांशमात्मनः ॥ सं पुमान्मयमाहेदं प्रणतं प्राञ्जलिस्थितम् ।। ७ ।। देवः सूर्यमण्डलस्थः इति पूर्वोक्तमुक्त्वा कथयित्वा आत्मनः स्वस्यांशमग्रस्थमंशपुरुष समादिश्य त्वं मयं प्रति सकलं ग्रहमाहात्म्यं कथयेत्याज्ञाप्य 'विनाज्ञां स मयं प्रति कयं कययेत् समुच्यार्थश्चकागेऽनुसन्धेयः । अन्तर्दधे अन्तर्धानं सूर्याशपुरुपमयने- त्रागोचरतां प्राप्तवान् । प्रकृतमाह । स इति । सूर्याज्ञप्तः सूर्याशपुरुषो मयासुरं मतीदें वक्ष्यमाणमवदत् । ननु नाइटो वदेदित्युक्तेर्मया पृष्टोऽयं कथं मयं मत्यवददित्यतो मय- विशेषणदयमाह-प्रणतं प्राक्षालेस्थितमिति । प्रकण भक्तिश्रद्धातिशयेन नतं ननं स्वर- मस्कारकारकम् । प्रकृष्टो मानमवेष्टाद्योतको योऽञ्जलिः कराप्रयोः सम्पुटीकरणं तत्र चित्तैकाग्र्येणावस्थितम् । एतनावनतशिरकामम्पुटसंयोगः कायिकनमस्कार इति सष्टमुक्तम् । तथा च स्वाभि नहं त्वां नतोऽस्मि मामनुगृहाणेदें कथयेत्युक्तिद्योतकन- मस्कारोक्तेर्मयपृष्टोऽयं मयं प्रत्यवददिति भावः ॥ ७ ॥ मा० टी०-सूर्यभगवान् ५६ कह अपने अशोयको अज्ञा देकर मन्नान हुए। और भषाम करते हाथ जोडकर सहुए मयसे सूर्याशारुपने कहा ॥ ७ ॥ अथ प्रतिज्ञाततत्संवादानुवादे मयं प्रति ज्ञानं वक्तुकामः सूर्याशपुरुषः सावधानतया मदुक्तं शृणु त्वमित्याह- शृणुष्वकमना पूर्व यदुक्तं ज्ञानमुत्तमम् ॥ युगेयुगे महर्षीणां स्वयमेव विवस्वता ॥ ८॥ हे मय एकस्मिन्नेव मनो यस्यासौ । अन्यविषयेभ्यो मनः समाहत्य मदुक्ते मनो ददानस्त्वं तज्ज्योतिःशास्त्रं शृणुष्व । श्रोनद्वागत्ममनः संयोगेन प्रत्यक्ष कुपित्यर्थः । ननु . . ।
- सूर्यसिद्धान्तः- [प्रथमोऽ- त्वं स्वकल्पितं वदिष्यसीत्यतस्तच्छब्दसम्बन्धमाह-पूर्वमित्यादि । यदुत्तमं नेत्ररूपं ज्ञानं शास्त्रं ज्योति शास्त्रभित्यर्थः । बहुकालांतरेण पूर्वकाले कदेत्यत आह-युगेयुग इति । प्रतिमहायुगे महामुनीनां तान्प्रतीति तात्पर्यार्थः । सूर्येण स्वयमद्वारकेण माझा-- दित्यर्थः । एवकारो यथा त्वां प्रत्यहं द्वारं साक्षान् कथनासंभवात् तथा तान्प्रन्यहमन्यो वा द्वारमित्यस्य वारणार्थः । तेषां स्वतप्र:समाजवशीकृतेश्वराणां तत्प्रसादाधिगताप्रति- हतेच्छानां सूर्यमण्डलाधिष्टानसम्भवात् । उक्तमुपदिष्टम् । तथा च सूर्योक्तं त्वां प्रति कथ्यते न स्वकल्पितमिति भावः ॥ ८॥ भा० टी०-युग २ में महर्षियोंसे मापही सूर्यभगवान् जो उत्तम ज्ञान कहा करते हैं, तिसको एकचित्त होकर श्रवण करो ॥ ८॥ ननु प्रतियुगं सूर्योक्तस्यैक्याभावात्त्वया किंयुगौयं शास्त्रमुपदिश्यते । अन्यथैक्दो रूपा युगेयुग इत्यस्पानुपपत्तरित्यत आह- शास्त्रमाद्यं तदेवेदै यत्पूर्व प्राह भास्करः॥ युगानां परिवर्तन कालभेदोऽत्र केवटम् ॥ ९ ॥ इदं मया तुभ्यं वक्ष्यमाणं ज्योति शास्त्रं तत्वोक्तम् । । एवकारात्सूर्योक्ताभ नत्वेन त्वां प्रत्यनुवादो न कचित्स्वक्ल्पनान्तरेणेत्यर्थः । आद्यं प्राकाले सूर्येणोक्तम् । नन्वासनयुगीयसूर्योक्तस्यापि पृर्वकालोत्तयाद्यत्वसंभव इत्यतस्तत्पदापेक्षितमाद्यपद विवरणरूपमाह-यदिति । शास्त्रं सूर्यः पूर्व प्रथमं यस्मात्पूर्वमनुक्तमित्यर्थः । प्राह प्रकर्षण विस्तरेण मुनीन् प्रत्युत्तवान् । तथाच प्रथमातिरेके कारणाभावात् प्रथम- स्य विस्तृतत्वाचानन्तरोक्तं पूर्वोक्ते गतार्थतया संक्षिप्तमुपेक्ष्य प्रथमयुगीयशास्त्रमुपदिश्य- त इति भावः । ननु नहनन्तरयुगीयशास्त्राणां सूर्योक्तानां वैयर्थ्यप्रसङ्ग इत्यत आह- युगानामिति । महायुगानां परिवर्तन पुनःपुनरावृत्यात सूर्योक्तशास्त्रेषु केवलं स्वमि- नामावस्तन्मात्रमित्यर्थः । कालभेदः कालकृतमन्तरम् । पूर्वशास्त्रकालादनन्तरशास्त्र- कालो भिन्न इत्येषु शास्त्रेषु भेदो न शास्त्रोक्तरीतिभेद इत्यर्थः । तथाच कालवशेन ग्रह- चारे किश्चिद्वैलक्षप्यं भवतीति युगान्तरे तत्तदनन्तरं ग्रहचारेषु प्रसाध्य तत्कालस्थित- लोकव्यवहाराथै शास्त्रान्तरमिव कृपालुरुक्तवानिति नानन्तरशास्त्राणं वैयर्यम् । एवश्व मया, वर्तमानयुगौयसूर्योक्त शाससिद्धग्रहचारसंगीकृत्याद्य सूर्योक्तशास्त्रसिद्ध ग्रहचारं च प्रयोजनामावादुपेक्ष्य तदुक्तमेव त्वां प्रत्युपदिश्यत इति भावः । एवच युगमध्येऽप्यवान्तरकाले ग्रहचारेवन्तरदर्शने तत्काले तदनन्तरं प्रसाध्य ग्रंथास्त- कालवर्तमानाभियुक्ताः कुर्वन्ति । तदिदमन्तरं पूर्वग्रंथे वीजमित्यामनन्ति । पूर्व- ग्रंथानां लुप्तत्वात्सपिंसंवादोऽपीदानी न दृश्यत इति । तदप्रसिद्धिरागमप्रामाण्यांच नाशंक्या ॥९॥ * केवल इति वा पाठः।
व्यायः १) संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः । मा० टी० -पहले भारकर ( सूर्य) ने जो वहाथा वही आदि शस्त्र है, वेवल युग पद- नेके हेतु करके कालभेद हुआ है, सोही इस समय पाहताहूं ॥ ९ ॥ अय कालमेद इत्यनेनोपस्थितं कालं प्रथमं निरूपयिपुस्तावत्कालं विभजते- लोकानामंतकृत्कालः कालोऽन्यः कलनात्मकः॥ स द्विधा स्थूलसूक्ष्मत्वान्मूर्तश्चामूर्त उच्यते ॥ १० ॥ कालो द्विधा तत्रैका कालोऽखण्डदण्डायमानः शास्त्रान्तरप्रमाणसिद्धः । लोकाना जोवानामुपलक्षणादचेतनानामपि अन्तकृविनाशकः । यद्यपि कालस्तेपामुत्पत्तिस्थि- तिकारकस्तथापि विनाशस्थानन्तत्वात्कालत्वप्रतिपादनाय चान्तकृादित्युक्तम् । अन्त- कृदित्यनेनैवोत्पत्तिस्थितिकृदित्युक्तमन्यथा नाशासम्भवात् । अतएव “कालः सृजति भूतानि कालः संहरति प्रजाः " इत्याद्यक्तं ग्रन्थान्तरे । अन्यो द्वितीयः कालः खण्ड- कालः । कलनात्मको ज्ञानविपयस्वरूपः । ज्ञातुं शक्य इत्यर्थः । स द्वितीयः कलनात्म- कः कालोऽपि विधा भेदद्वयात्मकः । तदाह-स्थूलसूक्ष्मत्वादिति । महत्त्वाणुत्वान्याम् । मूर्तः इयत्तावच्छिन्नपरिमाणः । अमूर्तस्तदिन्नः कालतत्त्वविद्भिः कथ्यते । चकारी हेतु- क्रमेण मूर्त्तामृतंक्रमार्थकः । तेन महान्मूतः कालोऽणुरमूर्तः काल इत्यर्थः ॥ १०॥ मा० टी०-एक काल लोकोंका भन्तकारी मर्यात अनादि है। दूसरा कारू कलनात्मक अर्थात् ज्ञानयोग्य है । खण्डकाक रथूल व सूक्ष्मफे भेदरे, मूर्त मौर अमूर्त है ॥ १० ॥ अथोक्तभेदद्वयं स्वरूपेण प्रदर्शयन्प्रथमभेदं प्रतिपिपादयिपुस्तदवान्तरभेदेषु भेद- द्वयमाह- प्राणादिः कथितो मूर्तस्युट्यायोऽमूर्तसंज्ञकः ॥ पभिः प्राणविनाडी स्यात्तत्पश्या नाडिका स्मृता ॥११॥ प्राणः स्वस्थसुखासीनस्य श्वासोच्छ्वासान्तर्वर्ती कालो दशगुर्वक्षरोधार्यमाण आदि- यस्यैतादृशः पाणानन्तर्गतो मूर्तः काल उक्तः । त्रुटिराधा यस्यैतादृशः काल एकमाणा न्तर्गतत्रुटितत्परादिकोऽमृतसंज्ञः । अथामूर्तस्य मूर्तादिभृतस्य व्यवहारायोग्यत्वेन :. प्रधानतयानन्तरोद्दिष्टस्य भेदप्रतिपादनमुपेक्ष्य मूर्त्तकालस्य व्यवहारयोग्यत्वेन प्रधान- तथा मयमोद्दिष्टमेदान्विवक्षुः प्रथमं पलघट्यावाह-पभिरिति । षट्प्रमाणैरसुभिः पानी- यपलं भवति पलानां पटचा घटिकोक्ता कालतत्त्वज्ञैः ॥११॥ मा०1०-माणादि मूर्तकाल है, ट्यादिकी ममूर्त संज्ञा है । ६ प्रापकी एक विनाही (पल) और ६० पनकी एक नाडी (दण्ड) होती है ॥ ११ ॥ अथ दिनमासावाह- नाडीपटया तु नाशवमहोरात्रं प्रकीर्तितम् ॥ ताशता भवेन्मासः सावनोऽकोदयस्तथा ॥ १२॥ १ उच्यत इति पाठान्तरम् ।
(८) सूर्यसिद्धान्तः- [प्रथमोऽ- घटीनां पष्टयाहोरात्रं नाक्षत्रमुक्तम् । तुकारादहोरात्रस्य नाक्षत्रत्वोक्योकपटयां अपि नाक्षत्रत्वमुक्तम् । एतत्पष्टिघटीमिर्मचक्रपरिवर्चनात् नाक्षत्रदिनानां त्रिशत्संख्यया. मासो नाक्षत्रः । मासानामनेकत्वेन सावनमासस्वरूपमाह-सावन इति । तथा त्रिंशद- होरात्रैः सूर्गेदयसम्बंधस्तवधिकैः । सूर्योदयादिसूर्योदयान्तकालरूपकाहारोवमान मापितैरित्ययः। सावनो मासः ॥ १२ ॥ मा० टी०-६० नाडौकी नाक्षत्रिक महोरात्र (दिनरात), ३० · महोरात्रका एक मास (महीना) होता है,सूर्योदय से लेकर फिर सूर्य के उदय होनेतक सावनदिन होता है ॥ १२॥ अथ चान्द्रसौरमासनिरूपणपूर्वकं वर्षवदिव्यं दिनमाइ- ऐन्दवस्तिथिभिस्तद्वत्संकान्त्या सौर उच्यते ॥ मासीदशभिर्वर्ष दिव्यं तदहरुच्यते ॥ १३॥ तत्रिंशता तिथिभिश्चान्द्रो मासस्तत्र दर्शान्तावाधकः पूर्णिमान्तावधिकच शास्त्रे मुख्यतया प्रतिपादितः। अत्र शाखे तु दर्शान्तावाधिक एवं मुख्यः । इष्टतिथ्यवाधेि- कस्तु मातो गौणः । सक्रान्त्या सक्रान्त्यवाधिकेन कालेन सौरो मासो मासः कथ्यते । सकान्तिस्तु सूर्यमण्डलकेन्द्रस्य राश्यादिप्रदेशसंचरणकालः । द्वाद- शभिर्मसिपम् । यन्मानेन मासास्तन्मानेन वर्ष ज्ञेयम् । तद्वर्ष सौरमासस्यासन्न- त्वात्सौरम् । अहः अहोरात्रः । दिव्यं दिविभवम् । सौरव देवानामहोरात्रमानं मानतत्वज्ञैः कथ्यत इत्यर्थः ॥ १३ ॥ मा० टी०-चान्द्रमास तिथियाँकरके और सौरमास राशिसंक्रमणके द्वारा निश्चित होता है। २२ मासका एक वर्ष है यही देवताओंका एक दिन है ॥ १३ ॥ ननु देवानां यथाहोरात्रमुक्तं तथा दैत्यानामहोरात्रं कथं नोक्तमित्यतस्तदुत्तरं पद न्देवासुरयोर्वपमाह- सुरासुराणामन्योऽन्यमहोरात्रं विपर्ययात् ॥ तत्पष्टिः पङ्गुणा दिव्यं वर्षमामुरमेव.॥१४॥ देवदैत्यानां बहुत्वादहुवचनम् । अन्योन्यं परस्परम् ।, विपर्ययात् व्यत्यासात् अहोरात्रम् । अयमर्थः । देवानां यद्दिनं तदसुराणां रात्रिः। देवानां या रानिस्त- दुसराणां दिनम् । दैत्यानां यद्दिनं तद्देवानां रात्रिः । दैत्यानां या रात्रिस्तद्देवानां दिन- मिति । तथाच देवदैत्ययोर्दिनराश्योरेव व्यत्यासानेदो न मानेनति तयोरहोरात्रस्यै- क्याद्देवाहोरात्रमानकयनेनैव दैत्याहोरात्रमानमुक्तमिति भावः । युगकयनाथै दिव्य- व परिभाषया मुगममाप विशेषद्योतनाथै प्रकारान्तरेणाह-तत्पष्टिरीते । दिव्या- होरात्रषष्टिः। देव रूपा वर्षभिः पष्टिगुणिता दिव्यमामुरं दैत्यसम्बन्धि । चः ध्यायः १ संस्कृतयाका-मापाटीकासमेतः । समुच्ये । तेन द्वयोरित्यर्थः । वर्षम् । एक्कारस्तयोर्दिनराज्योर्मेंदन वर्षमेदः स्यादिति मन्दशानिवारणार्थम् ॥ १४ ॥ मा०टी०-सुर व मसुरोश दिन रात्रिका विपर्यय मर्यात जव एकवा दिन होताह सो मरेकी रात्रि होती है ३६० दिव्य अहोरात्रसे देवासुरका एक वर्ष होता है ॥ १४ ॥ अथ कल्पमानं विवक्षुः प्रथम युगमानमन्यदपि श्लोकाभ्यामाह- तद्वादशसहस्राणि चतुर्युगमुदाहृतम् ॥ सूर्याब्दसंख्यया दिविसागरेरयुताहतेः ॥ १५ ॥ सन्ध्यासन्ध्यांशसहितं विज्ञेयं तचतुर्युगम् ॥ कृतादीनां व्यवस्थेयं धर्मपादव्यवस्थया ॥ १६ ॥ तेपां दिव्यवाणां द्वादशसहस्राणि चतुर्युगम् । चतुर्णी युगानां कृतवेताद्वापरक ल्याख्यानां समाहारो योगस्तदात्मकं महायुगमित्यर्थः । एतद्द्योतनाथ चतुरित्यु- क्तिरन्यथा युगमित्युक्त्या तद्वैयर्थ्यापत्तेः । मानामिझेरुक्तम् । अथ सौरमानेन तत्व- ख्यां विशेष चाह-सूर्यान्दसंख्ययोत । तद्देवासुरमानेनोक्तं चतुर्युगं द्वादशसहस्रवर्गा- त्मकं महायुगं सन्ध्यासन्न्यांशसहिंसम् । युगचरणस्याद्यन्तयोः क्रमेण प्रत्येकं सन्ध्या- सन्ध्यांशाभ्यां युक्तं स देवसन्ध्यासन्ध्यांशावन्तर्गतौ न पृथग्यौतादृशम् । सौरवर्ष- प्रमाणेन द्वित्रिसागरैः ‘अङ्गानां वामतो गतिः' इत्यनेन द्वात्रिंशदधिकैश्चतुःशतमितैः अयुतेन दशसहस्रेण गुणितैः । खचतुष्कद्वात्रिंशञ्चतुर्भिः पारमितं ज्ञेयमित्यर्थः । अथ चतुर्युगान्तर्गतयुगांत्रीणां विशेपतो मानाश्रवणात्सम स्यादश्चतत्वादितिन्यायेन प्रत्येक महायुगचतुर्थीशो मानमिति चतुर्युगमित्येन फलितं निषेधति-कृतादीनामिति । कृतत्रेताद्वापरकलियुगानाम् । धर्मपादव्यवस्थपा धर्मचरणानां स्थित्या । इयं वक्ष्यमाणा व्यवस्थास्थितिया न तु समकालप्रमाणस्थितिः । अयमर्थः । कृतयु- गे चतुश्चरणो धर्म इति तस्य मानमधिकम् । ततस्त्रेतायां धर्मस्य त्रिपादयत्वात्तदनुरो- धेन प्रेतामानं न्यूनम् । एवं द्वापरकल्योधर्मस्य क्रमेण व्येकवरणवत्त्वात् कृतत्रेतामा- नाभ्यां क्रमेणोक्तानुरोधान्न्यूनमानम् । नतु समं मानमिति ॥ १५ ॥ १६ ॥ मा० टी०-दिव्य मानके १२००० हजार वर्षका एक चौकडी-युग होताहै । सूर्याग्दकी सख्या ४३२०००० वर्ष है ॥ १५ ॥ सन्ध्या मोर सन्ध्यांशके साथ नो चतुर्युग है तिसमें यमंपादके अनुसार फूतादि युगमानवी व्यवस्थिति है ॥ १६ ॥ अथ सर्वधर्मवरणयोगेन दशमितेन महायुगं भवति ताई स्वस्वधर्मचरणैः किमि- त्यनुपातेन पूर्वोक्तफलितेन कृतादियुगानां मानज्ञानं सविशेपमाह- .
(१०) सूर्यसिद्धान्तः- [मयमोड- ८०० युगस्य दशमो भागश्चतुस्त्रियोकसगुणः ॥ क्रमात्कृतयुगादाना पष्ठांशः सन्ध्ययो स्वकः ॥ १७॥ प्रागुक्तदिव्यपदादशसहस्रमितस्य युगस्य दशमो भागो दशांश इत्यर्थः । चतुर्दा क्रमेण चतुस्त्रिद्वयकणितः । गुणकमात्कृतयुगादीनां कृतत्रेताद्वापरकाल- युगानां मानं स्यादति शेपः । ननु मनुग्रन्थ कृतादिमानं दिव्यवर्पप्रमाणेन ४०००। ३०००।२००० । १००० । अब तु तन्मानं तदर्पप्रमाणेन ४८०० ॥ ३६०० । २४०० । १२०० । इति विरोध इत्यत आह । पष्ठ इति । स्वः स्वसम्व- न्धी पष्ठो विभागः सन्ध्ययोराद्यन्तसन्ध्ययोरेक्यकाल इति शेपः । तथा च मदुक्त- मानानि ४८०० । ३६००। २४०० । १२०० । एपां पड़ ६०० । ४०० । २०० । एते स्वस्वयुगानामाद्यन्तयोः संध्ययोोगा इत्येपामधै सन्धि- कालः । प्रत्येकमाद्यन्तयोः सन्धिकालः ४०० । ३०० । २००। १०० । अनेन प्रत्येकं मदुक्तमानं न्यूनीकृतं ग्रन्थान्तरोक्तं केवल मानं भवति न स्वसन्धिभ्यां सहि- तम् । यथा कृतादिसन्धिः ४०० कृतमानं ४००० कृतान्तसन्धिः ४०० त्रेतादिसन्धि- ३०० । त्रेतामानम् ३००० त्रेतान्तसन्धिः ३०० दापरादिसन्धिः २०० द्वापरमानं २००० द्वापरान्तसन्धिः २०० क्ल्यादिसन्धिः १०० कलिमानम् १०००. कल्यन्त- सन्धिः १०० । एवं च स्वसन्धिभ्यां सहितं मयोक्तं स्वसम्बन्धात्सन्व्ययोस्तदन्तर्गत- त्वाचति न विरोध इति भावः ॥ १७ ॥ मा० टी०-चतुयुर्गके दशम भागको ४, ३, २ और एकसे गुणा करके कृतादिका युग- मान होता है । स्वीय पष्ठांश भागही संध्या है ॥ १७ ॥ अथ कल्पमानार्थ मनुमानं तत्सन्धिमानं चाह- युगानां सप्ततिः सैका मन्वन्तरमिहोच्यते ॥ कृताब्दसंख्या तस्यान्ते सन्धिःप्रोलो जलप्लवः ॥१८॥ युगानां सैकासप्तोतरेकसप्ततिर्महायुगौमत्यर्थः । इह मूतकाले मन्वन्तर मन्वारम्भ- वत्समप्तिकालयोरन्तरकालमानमित्यर्थः । मूर्तकालमानभेदाभिज्ञैः कथ्यते । तस्य मनोरन्ते विरामे जाते सति कृताब्दस-या मदुक्तकृतयुगवर्पमिति सन्धिः कालविद्भिः प्रकर्षेण द्वितीयमन्वारम्भपयैतं भूतभाविमन्वोरन्तिमादिसन्धिरूपैककालेन कथितः । तत्स्वरूपमाह-जलप्लव इति जलपूर्णा सक्ला पृथ्वी तस्मिल्लोकसंहारकाले मवात ॥ १८॥ मा० टी०-एकहत्तर युगका एक मन्वन्तर होता है। तिसके मन्तमें कृतयगमानस्यक सन्धिमान है । उसी समय जाप्लव (वाट ) होताहै ॥ १८ ॥ .
व्यायः ?] संस्कृतटीका-मापाटाकासमतः । अय कल्पप्रमाणं सावर्शपमाह- Vससन्धयस्ते मनवः कल्पे ज्ञेयाश्चतुर्दश॥ कृतप्रमाणः कल्पादौ सन्धिः पञ्चदशः स्मृतः ॥ १९॥ ते एकसप्ततियुगरूपा मनवः स्यायंभुवाद्याः ससन्धयः स्वस्वसन्धिसहिताश्चतुर्दशसं- रख्याकः कल्पकाले ज्ञातव्याः । स्वसन्धियुक्तचतुर्दशमनुभिः कल्पः स्यादित्यर्थः । ननु ग्रन्थान्तरे कल्पमानं युगसहस्रं त्वया तु युगमानमेकसप्ततिगुणं मनुमानम् ३०१६७ २०००० कृताब्द १७२८००० युक्तससन्धिमनुमानम् । ३०८४४८००० । इदं चतुर्दशगुणं कल्पममाणं कृतोनं युगसहस्रमित्यताह-कृतप्रमाण इति । कल्पादौ प्रथममन्वारम्भ कृतयुगवमितो मनोश्चतुर्दशत्वेऽप्याद्यः पञ्चदशका स न्धिः कालरुक्तः । तथाच कृतवपीनन्तरं पथममन्वारम्भ इति तदर्पयोजनेनाविरोध इति भावः ।। १९ ।। मा० टी०-वल्यमें सन्धिके साथ १४ मनु होते हैं । परपकी आदिमें कृतयुगप्रमा- णकी एक सन्धि मर्यात् कल्पमें १४ मनु मोर पंद्रह सन्धियां होती हैं॥ १९ ॥ अथ ब्रह्मणो दिनरात्र्योः प्रमाणमाह- - इत्थं युगसहस्रेण भूतसंहारकारकः ॥ कल्पो ब्राह्ममहः प्रोक्तं शर्वरी तस्य तावती ॥२०॥ इत्थं पूर्वोक्तप्रकारसिद्धेन युगसहस्रेण भूतसंहारकारको ब्राह्मलयात्मकः कल्पकालो ब्राझं ब्रह्मणः सम्बन्ध्यहो दिनं काल रुक्तम् । तस्य ब्रह्मणस्तावती दिनपरिमिता श- बैरी रात्रिः कल्पवयं तदहोरात्रीमति फलितार्थः ॥२०॥ मा० टी०-इस प्रकारसे सहस्र युगका मतसंहारकारी यल्प होता है। यही ब्रह्माका एक दिन और ऐसेही उसकी रानि है ॥ २० ॥ अथ ब्रह्मण आयुःप्रमाणमतीतवयाप्रमाणं चार- ~ परमायुः शतं तस्य तयाहोरात्रसंख्यया ।। आयुपोऽर्द्धमितं तस्य शेपकल्पोऽयमादिमः ॥२१॥ परमपरं शृणु पूर्वोक्तं त्वया श्रुतमपरं च वक्ष्यमाणं शृणु त्वम् । यहा परमेति दैत्यप- रार्थकं सम्बोधनम् । त्वं तस्य ब्रह्मणस्तथा पूर्वोक्तयाहोरात्रमित्याक्ल्पद्वयरूपया शतं शतवर्षपरिमितमायुः शरीरधारणकालं जानीहि । एतदुक्तं भवति । 'अहोरात्रमानात्पूर्व- परिभाषया मासमानं तस्मात्पूर्वोतपीरभाषया मासमानं तस्मात्पूर्वोक्तपरिभाषया ब्रह्मणो वर्षमानमेतच्छतसङ्ख्यया ब्रमायुरिति । नतु ययाश्रुतार्थेन कल्पशतद्वयमायुः की-- दीनामाप दिनसङ्ख्ययायुपोऽनुक्तेः सुतरां ब्रह्मणः शतदिनात्मकायुपोऽसम्भवात् । . .
((१२)
समिद्धान्तः-
[प्रवमा-
" निजेनैव तु मानेन आयुर्वपशतं स्मृतम्" इति विष्णुपुराणोक्तश्च । एतेन परमायु
गिन निरस्तम् । ब्रह्मणोऽनियतायुदायामम्भवात् । तस्य ब्रह्मण आयुः शतवपरूप
मस्यादै पञ्चाशदर्पपरिमितमितं गतम् । अयं वर्तमान आदिमः प्रथमः शेपकल्पः
शंपायुदयस्य ब्रह्मदिवस उत्तगर्दस्य प्रथमादेवमो वर्तमान इति फलि-
तार्थः ॥२१॥
भा० टो-ब्रह्म महोरात्रकी सर पासे ब्रह्माकी परमाय शत वर्ष है। गतपल्पमें
तिनकी माधी आयु पीतगई। यह क्ल्स द्वितीयाईका पहला दिन है ॥ २१ ॥
अथ वर्तमानेऽस्मिन्दिवसेऽप्येतद्गतमित्याह-
कल्पादस्माच मनवः पड्व्यतीताः ससन्धयः ॥
वैवस्वतस्य च मनायुंगानां विधनो गतः ॥ २२ ॥
अस्माद्वर्तमानात्कल्पाद्ब्रह्मदिवसात् पटसंख्याका मनव एकसप्ततियुगरूपाः सस-
न्धयः सप्तभिः सन्विभिः कृतयुगप्रमाणैः सहिता व्यतीता गताः । चकार आयुपोऽ
धमितमिति प्रागुक्तेन समुचयार्थकः । वर्तमानस्य सप्तमस्य मनोवैवस्वताख्यस्य युगानां
विधनत्रयाणां घनः स्थानत्रयस्थिततुल्यानां धातः सप्तविंशतिसइंख्यात्मको गतः ।
सप्तविंशति युगानि गतानीत्यर्थः । चः समुच्चये ॥ २२ ॥
भा० टी०-फल्पके आदिसे लेकर वैवस्वत मनुके पहले सन्धि सहित ६ मनु पीते हैं ।
और इस वैवस्वत मनुकेभी २७ या पीतचुके हैं ॥ २२ ॥
अथ वर्तमानयुगस्यापि गतमेवादेवि पदन्नमितकालेऽप्रतो वर्षगणः कार्य इत्याह-
अष्टाविंशाधुगादरमायातमेतत्कृतं युगम् ॥
अतः कालं प्रसंख्याय संख्यामेकत्र पिण्डयत् ॥२३॥
अष्टाविंशतितमादर्तमानान्महायुगादेतदल्पकालेन पूर्वकाले साम्पतं स्थितं कृतं युग
गतम् । यतः कृतयुगान्तानन्तरममिर्मतकाले कालं वात्मक प्रसंख्याय गणयित्वा
संख्यां पञ्चस्थानस्थितां भिन्नामेककस्थाने पिण्डयेत्सङ्कलनविषयां कुर्यात् । सर्वेषां
गतानां योगं कुर्यादित्यर्थः ॥ २३ ॥
मा० टी०-यह मठाईस युगका कृतयुग बीता है। इस कारण कालको सस्या करके
एक स्थानमें गतवर्ष स्थिर करो ॥ २३ ।
अथ कल्पादितो ग्रहादिभवनियोजनकालं ग्रहगतिप्रारम्भरूपमाह-
-प्रदर्शदेवदैत्यादि सृजतोऽस्य चराचरम् ।।
कृताद्विवेदा दिव्याब्दाः शतम्रो वेघमो गताः ॥२४॥
ध्यायः १] संस्कृतटीका-भापाटीकाममेतः । (१३) अस्य वर्तमानस्य ब्रह्मणो ग्रहनक्षत्रदेवदैत्यमानवराक्षसभूपर्वतवृक्षादिकचराचरं जंग- मस्थावरात्मकं जगत्सृजतः सृजतीति सृजन् तस्य जगन्निर्मायकस्य शतसव्यागुणि- ताश्चतुःसप्तत्यधिकचतुःशतसख्या दिव्यान्दा गताः एभिर्दिन्यवहसृष्टयादिप्रवहवा- युनियोजनान्तं कर्म ब्रह्मणा कृतमिति फलितार्यः ॥ २४ ॥ मा० टी०-कल्पके भारम्भसे दिव्यमानके ४७१०० वर्ष बीतने पर ग्रह, नक्षव, देव, देत्यादि चराचरकी सृष्टि हुई है ॥ २४ ॥ अथ ग्रहपूर्वगत्युत्पत्ती कारणमाह- पश्चाद्वजन्तोऽतिजवानक्षत्रैः सततं ग्रहाः ॥ जीयमानास्तु लम्बन्ते तुल्यमेव स्वमागंगाः ॥२६॥ पश्चादनन्तरं पुनरावृत्त्या पश्चात् पश्चिमदिगभिमुखं नक्षत्रेस्तारकादिभिः सह ग्रहाः सूर्यादयोऽतिजवात् प्रवहवायुसत्वरगतिवशात्सततं निरन्तरं व्रजन्तो गच्छन्तः स्वमार्गगाः स्वकक्षावृत्तस्था जीयमाना नक्षत्रैः पराजिता नक्षत्राणामग्रे गमनात् । अतएव लज्जयेर' गुरुभूता इति तात्पर्यार्थः । तुल्यं समम् । एवकारादधिकन्यूनव्यवच्छेदः । लम्बन्ते स्वस्थानात्पूर्वस्मिल्लम्वायमाना भवन्ति । यथा लजितः पश्चाद्भवति नाये। तुका- राधोऽधाकक्षाक्रमानुरोधेन शन्यादिग्रहाणां चन्द्रान्तानां गुरुतापचयः शनिरविगुरु- भूतस्तस्मात् किंचिन्यूनो गुरुस्तस्मादपि भौम इत्यादि ययोत्तरम् । यस्य कक्षा महती तस्य गुरुत्वाधिक्यं यस्य लम्बी तस्य तदनुरोधेन गुरुताल्पत्वमिति । एतदुक्तं भवति । ब्रह्मणा प्रबहवायौ नक्षत्राधिष्ठितो मूर्तो गोलः स्थापितस्तदन्तर्गताः स्वस्वाकाशगोल स्थाः शन्यादयो नक्षत्राधिष्ठितमूर्तगोलस्थक्रान्तिवृत्तस्थरेवतीयोगतारासन्नरूपमेपादिप्र- देशसमसूत्रस्थाः स्थापिताः । क्रान्तिवृत्तं तु मेपतुलस्थाने विषुववृत्तलग्नसम्पातान् त्रिभान्तरितक्रान्तिवृत्तप्रदेशी स्वासन्नाविपुववृत्तप्रदेशाभ्यां चतुर्विशत्यंशान्तरेण दक्षि- णोत्तरी मकरकर्कादिरूपी तदेव द्वादशराश्यात्मकं वृत्तं ग्रहचारभूतम् । विषुववृत्तं तु ध्रुवमध्यस्थं निरक्षदेशोपरिंगम् । तत्र प्रवहवायुना स्वाघातेन मृतों नक्षत्रगोलो नाक्षत्रपष्टिघटीभिः परिवर्तते । तदन्तर्गतवायुभिस्तदाघातेन वा ग्रहा भ्रमन्त्यपि नक्षत्रगोलस्थितक्रान्तिवृत्तीयमेपादिपदेशेन समं न गच्छन्ति वायूनां स्वल्पत्वात्तदाधा- तस्याप्यल्पत्वाद्विम्बानां गुरुत्वाच्च । अतस्तत्स्थानाद्ग्रहाणां लम्बनं दृश्यते । अत एवं नक्षत्रोदयकाले तेपां द्वितीयदिने नोदयः किन्तु ग्रहो लम्बितप्रदेशेन वायुना तदनन्तर- मूर्ध्वमागच्छतीत्यनन्तरमुदयः। लम्बनं तु शन्यादीनां कक्षानुरोधेत गुरुत्वाहायर्ना तद्घातानां वा कक्षानुरोधेन वल्पत्वानु यद्यपि वायोधुवानुरोधेन सत्त्वानग्रहावलम्बन विपुत्ते भवितुमुचितं न क्रान्तिवृत्ते । तथाच वक्ष्यमाणकान्त्यनुपपत्तिः क्रानि तस्थद्वादशराशिभोगेन वक्ष्यमाणानां भगणानामनुपपत्तिश्च । तथापि वायुनावलम्बितो . (१४) सूर्यसिद्धान्त:- [ प्रथमोऽ- अहो विधुवन्मार्गगोऽपि तद्विपुवप्रदेशासनकान्तिवृत्तप्रदेशेन ग्रहाकाशगोलएव स्वसमसू- घेणाकृष्यत इति नागुपपत्तिः अत एव स्वमार्गगा इति क्रान्तिवृत्तानुसतस्वाका- गोलस्थकक्षा मार्गगता इत्यर्थकमुक्तमिति संक्षेपः ॥ २५ ॥ मा० टी०-सदा अतिशीघ्र चलनेवाले नक्षत्र से, पीछे चलते हुए ग्रह पराजित होकर अपने नाडीमें तुल्यभावसे विलम्ब करते हैं ॥ २५ ॥ अथात एव ग्रहाणां लोक प्रारगतित्वं सिद्धमित्यतआह- प्राग्गतित्वमतस्तेषां भगणेः प्रत्यहं गतिः ॥ परिणाहवशाद्भिन्ना तदशाद्भानि भुञ्जते ॥ २६ ॥ अतोऽवलम्बनादेव तेषां ग्रहाणां प्राग्गतित्व प्राच्यां दिशि गतिय॒पां ते प्राग्गतयस्त भावः प्राग्गातत्वं सिद्धम् । लम्बनस्वरूपैव ग्रहाणां पूर्वगतिरुत्पन्नालोकैः कारणानभिज्ञैः प्रत्यक्षावगततया तच्छक्तिजनिता कल्पितेत्यर्थः।सा कियतीत्यत आह-भगणैरिति । वक्ष्यमाणभगणैः प्रत्यहं प्रतिदिनं गतिः माग्गमनरूपा भगणानां गत्युत्पन्नत्वाद्भगण- सम्बन्धिवक्ष्यमाणदिनैः सूयसावनग्रहभगणा लभ्यन्ते तदैकेन दिनेन केत्यनुपाता- ज्ज्ञेया । ननु ग्रहभगणानां तुल्यत्वामावात्प्रतिदिनं ग्रहगतिर्भिन्नात पूर्वलंवनरूपा प्रहगतिरयुक्तोक्ता ग्रहलम्बनस्याभिन्नत्वादित्यत आह-परिणाहवशादिति । परि- णाहः कक्षापारधिस्तदशातदनुरोधादियं ग्रहगतिमिन्ना तुल्या । अयमभिमायः । ग्रहाणां लम्बनं तुल्यप्रदेशे न परन्तु स्वस्वकक्षायां तत्प्रदेशे तुल्ये या कलास्ता गति- फलास्तास्तु महति कक्षावृत्तेऽल्पा लघुकक्षावृत्ते वयः । सर्वकक्षापरिधीनां कलाति- नत्वात् । भगणास्तु गतिषशादेव यस्यकक्षावृत्तं महत्तस्याल्पायस्य च लघुकक्षावृत्तं तस्य ववस्तदुत्पन्ना गतिरपि तथेति विरोधः । नन्वेकरूपगात विहाय भिन्नरूपा गतिः कयमङ्गीकृतेत्यत आह-तदशादिति । भिन्नगतिवशाभानिराशोन्नक्षत्राणि भुञ्जते ग्रहा भुजन्तीत्यर्थः । तथाच ग्रहराश्यादिमोगज्ञानार्थमियमेव गतिरुपयुक्ता नैकरूपति २६॥ मा० ०-भिन्न कक्षासे उत्पन्न हुए मगमके हेतु प्रतिदिनकी गति पृएक्ता होती है, लसी कारणसे राशिमोग कालादिकी विभिन्नता होती है ॥ २६॥ अथ ममोगे विशेष वदन्वक्ष्यमाणमगणस्वरूपमाह- शीघ्रगस्तान्यथाल्पन कालेन महताल्पगः॥ तेपातु परिवर्तन पोष्णान्ते भगणः स्मृतः॥२७॥ जथशल्द पूर्वोक्तविशेपसुचकः । शीघ्रगतिग्रहस्तानि मान्यल्पेन कालेन न मुनत्य ल्पगतिग्रहो बहुकालेन मुनक्ति तुल्यराश्यादिमोगो मन्दशीघ्रगतिग्रयोस्तुल्यकालेन न भानीति विशेपार्थः । तेपां राशीनां परिवर्तन भ्रमणेन । तुकाराद्रहादिगतिमोगजान- भाव:
ध्यायः १] संस्कृतटीका-मापाटीकासमतः। वेन भगणः प्राज्ञैरुक्तः । क्रांतिवृत्ते द्वादशराशीनां सत्त्वात्तदोगेन चक्रमोगसमाप्तर्य- स्थानमारभ्य चलितो ग्रहः पुनस्तत्स्थानमायाति स चक्रभोगः । परिवर्तसंज्ञोऽपि दादशराशिमोगाद्भगण इत्यर्थः । ननु क्रान्तिवृत्ते सर्वपदेशेभ्यः परिवर्ततम्भपाद- त्रका परिवादिभूतः प्रदेश इत्यताह-पोष्णान्त इति । सृष्ट्यादौ ब्रह्मणा कान्तिवृत्ते खेतीयोगतारासन्नप्रदेशे सर्वग्रहाणां निवेशितत्वात्तदवधितो ग्रहचलनाच । पौष्ण- स्य खेतीयोगताराया अन्ते निकटे प्रदेशे तथाच खेतीयोगतारासन्नानिमस्थानमेवाद्य- न्तावधिभूतामति भावः ॥ २७ ॥ मा० टी०-शीघ्र चलनेवाले या थोडे समयमै, और थोडे चलनेवाले अधिक समयमें गमन करते हैं। रेवती के संतमें फिर लेट आनेसे भगण होता है ॥ २७ ॥ ननु परिवर्तस्य भगणतंज्ञात्वयुक्ता त्र्यादिराशीनामपि भगणत्वादित्यतः परिमापाक- थनच्छलेन भगणस्वरूपमाह- / विकलानां कलापट्या तत्पष्टया भाग उच्यते ॥ तत्रिंशता भवेद्राशि गणो द्वादशैवते ॥२८॥ यया मूर्तकाले प्राणकाल आदिभूतस्तथा क्षेत्रपरिभापायां विकलाः सूक्ष्मादिभूता- स्तासां षष्टयैका कला कलानां पष्टया भोगोंऽशः क्षेत्रपरिमापाभिज्ञैः। कथ्यते भागांत्र- शता राशिः स्यात् । ते राशयः सकला द्वादश । एक्कारस्त्रिचतुरादीनां निरा- सार्थः । तथाच साकल्यै गणपदप्रयोगाद्भगणस्य भोगेऽपि भगणव्यवहाराच पूर्वोत्तर युक्तमिति भावः ॥२८॥ मा० टी०-६० विक्लाकी एक कला, और ६० क्लाका एक भाग होता है। ३० माग (भश) की एक राशि और १२ राशिका एक भगणहोता है ॥ २८ ॥ अथ भगणान्विचक्षुःप्रथमं सूर्यबुधशुक्राणां भौमगुरुशनिशीघ्रोचानां चमगणानाह- युगे सूर्यज्ञशुक्राणां खचतुष्करदार्णवाः ।। कुजागुिरुशीघ्राणां भगणाः पूर्वयायिनाम् ॥ २९ ॥ महायुगे सूर्यबुधशुक्राणां खानां चतुष्कमेकस्यानादिप्सहस्रस्थानान्तचतुःस्यानस्थि- तानि शून्यानि ततोऽयुतादिमयुतस्थानपर्यन्तं दंतसमुद्रास्तथा च युगसौरवर्षाणि खाभ्र- खानीदरामवेदमितानि भगणा द्वादशराशिभोगात्मकपरिवर्त्तानां संख्या भवतीति शेषः। भौमशनिबृहस्पतीनां यानि शीघ्राणि शीघ्रोचानि तेपामेतन्मिता मगणाः । चकार: समुचयार्थकोऽनुसन्धेयः । अत्र कक्षाक्रमेण चारक्रमेण वा गुरोः खलमध्यगता मर तीति न तथोद्देशः । स्वतंत्रस्य नियोगानईत्वाद्वा । नन्वाकाश एषां विम्वामावादवल- म्वनासम्भवेन गत्यभावात् कथं भगणा उक्ता इत्यत बाह-पूर्वयायिनामिति । पूर्व- ܚ . सूर्यसिद्धान्तः- [ प्रथमो- गामिनाम् । तथा च तेषामदृश्यरूपाणां.पूर्वगतिसद्भावाद्भगणातौ न, क्षतिः । एषां स्वरूपादिनिर्णयस्तु स्पष्टाधिकारे प्रतिपादयिष्यते ।। २९ ।। माल्टी०-युगमें सूर्य बुधव शुक्रके मध्य भौर मंगल, शनि व वृहस्पतिके मध्य शीघ्र पूर्व को घटनेवाले मगण ४३२००००हैं ॥ २९ ॥ अथ चन्द्रमामयों गणानाइ- इन्दो रसानिवित्रीषु सप्तभूधरमार्गणाः ॥ दखत्र्यष्टरसाङ्काशिलोचनानि कुजस्य तु ॥ ३० ॥ पूर्वश्लोकोक्तमगणा इत्यत्रानिमश्लोकेष्वप्यन्वेति । भूधराः सप्त न तु पर्वतस्प धरामि- धानत्वादेकसप्ततिः । मार्गणाः शरास्तथा च चन्द्रस्य मगणाः पडमिदेवपञ्चसप्तसप्तपश मिताः । भौमस्य तुकारादाकाशस्थविम्बात्मकस्यति पुनरुक्तिभ्रमवारणार्थ दन्ताष्टपढ़- काकृतिमिताः ॥ ३० ॥ माटी-चन्द्रमा ५७७५३३३६, मंगल २२९६८३२ मयण हैं। अथ बुधशीघ्रोधगुमिगणानाह- बुघशीघ्रस्य शून्यर्तुखादिव्यङ्कनगेन्दवः ॥ बृहस्पतेः सदास्रक्षिवेदपह्नयस्तथा ॥ ३१ ॥ युधशीघ्रोधस्यादृश्यरूपस्य पूर्वगते गणाः पष्टिसप्ततिव्यंकात्यष्टिमिताः । वृहस्पते स्तथा विम्बात्मकस्यति पुनरुक्तिभ्रमवारणाय नखद्विवेदपड्राममिताः ॥ ३१ ॥ माटो०-बुधशीघके १७९३७०६०, वृहस्पति के ३६४२२० भगम हैं ॥ ३१ ॥ अथ शुक्रशीघ्रोच्चशन्योर्मगणानाइ- सितशविस्य पट्सप्तत्रियमाश्विख घराः ॥ शनेर्भुजङ्गपटपञ्चरसवेदनिशाकराः ॥ ३२ ॥ शुकशोयोगस्यादृश्यरूपस्य पूर्वगतेभंगणाः षट्सप्तत्रिदिदिखसप्तमिताः । एतेन सूधरा इत्यस्यैकसप्ततिरेकादशवार्थों निरस्तः । शनोवम्बात्मक्स्याप्टपदपश्चरसेन्द्र- मिता:॥३२॥ मा टो०-शुक्र शीघ्रके ७०२२३७६; शनिके १४६५६८ मगण है ।। ३२ ॥ अथ चन्द्रस्योचपातयोभंगणानाह- चन्द्रोच्चस्यानिशून्याग्धिवसुसपोर्णवा युगे॥ वामं पातस्य वस्वनियमाश्विशिखिदेखकाः ॥३३॥ चन्द्रमन्दोबस्य पूर्वगतेरदृश्यरूपस्य मगणा महायुगे रामनखाष्टाष्टवेदमिताः । पात- स्य चन्द्रराब्दस्य संनिहितत्वाप पातस्यादृश्यरूपर र वामं पश्चिमगत्या बारागि : (१७ ध्यायः१] संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतः ।। मोगात्मकपरिवर्तरूपभगंणा महायुगे अटरामाकृतिरामद्विमिताः । अत्र युगग्रहणं वक्ष्य माणग्रहोषपातभगणसम्बन्धिकल्पकालवारणार्थम् । ग्रहोचपातमगणास्तु युगेयुगे नो- पन्ना इत्यस्मिन्युगसम्बन्धिप्रसंगेनोक्ता मन्दोचपांतस्वरूपादिनिर्णयस्तु स्पष्टाधि- कारे व्यक्तो भविष्याते ॥ ३३ ॥ मा०टी०-चंद्रोच्चके ४८८२०३, चंद्रपातके बाई ओर २३२२३८ भगण है ॥ ३३ir अथ युगे नाक्षत्रदिवसांस्तत्स्वरूपारगमाय ग्रहसावन दिनस्वरूपं स्वसंख्याज्ञानहेतु- कंचाइ- भानामष्टाशिवस्वनिविद्विद्वयष्टशरेन्दवः ॥ भोदया भगणैः स्वैः स्वैरूनाः स्वस्वोदया युगे ॥३॥ मानां नक्षत्राणां स्वतो गत्यभावेऽपि प्रवहवायुना परिभ्रमणात्तत्सख्यातुल्या मग- णाः स्वदिनतुल्याः। अतएवात्र वाममिति पूर्वोक्तस्य युक्तोऽन्वयः । अष्टट्यष्टनगाग्निजा- विगजदिनमिताः । ननु ग्रहाणामपि प्रवहवायुना परिभ्रमणनोदयसद्भावात्तेषां दिवसा: 'कथं ज्ञेया इत्यत आह-भोदया इति । उदयो यस्मिन्नहान स्वाद्यन्तावाध रूप इति व्युत्पत्त्योदयशब्देन दिनम् । तथा च भोदया नाक्षत्रदिवसा एत उक्ताः स्वैः स्यैः स्व- कीयैः स्वकीय गणैः प्रामुक्तैर्जिताः सन्तः स्वस्वोदया निजनिजसावनदिवसा युगे- भवन्ति । युग इत्येननाभीष्टकाले नाक्षत्रदिवसा ग्रहगतभोगादिना भगणादिनोना ग्रहसा- वनदिवसा अभीष्टा भवन्ति । परंतु राशीपञ्चगुणितानंशादिकं दशगुणितं कृत्वा घट्या- दिस्थाने हीने कार्यमन्यथा विजातीयत्वादन्तरानुपपत्तेरिति सूचितम् । अनोपपत्तिः । यदि ग्रहाणां प्राग्गमनावलम्बनं न स्यात्तहि ग्रहोदयनक्षत्रोदययोरकेहेतुत्वान्नाक्षसावन- दिवसयोरभेदः स्यात् । अतो ग्रहाणां लम्बनेन नाक्षत्रदिवसेभ्यः सावनदिवसानामन्तरि- वरवादवलम्बनजभगणान्तरेण युगे नाक्षत्रदिवसेभ्यो ग्रहसावनदिवसा न्यूना भवन्ति । मवहेण भगणतुल्यपश्चिमग्रहतुल्यानामकरणादित्युपपन्नम् । मोदया इत्यादि । अनेनर मगणसावनयोगो ताक्षत्रदिवसा इत्यप्यर्थसिद्धम् ॥ ३४ ॥ भा०टी०-नक्षत्रोंके १५८२२३७८२८ भगण हैं नक्षत्रोंक भगणमैते ग्रहोंके मगण घटाने पुग अपने २ उदयी संख्या निकल आगी ॥ ३४ ॥ अय वक्ष्यमाणचान्द्रदिवसाधिमासयोः संख्याज्ञानहेतुकं स्वरूपमाह- भवन्ति शशिनी मासाः सूर्येन्दुभगंणातरम् ॥ रविमासेनितास्ते तु शेपाः स्युरधिमासंकाः ॥ ३५ ॥ सूर्यचन्द्रमगणयोरन्तरं चन्द्रस्य मासा भवन्ति ते चान्द्रमासा रापासोनिता। अन प्रथमं तुकारान्वयाहादशगुणितरविभगणरूपवक्ष्यमाणाकमासैमानेता सना शेका । - २ (२८) सूर्यसिद्धान्त:- [मयमोऽ- अशिष्टा ये चान्द्रमासास्तेऽधिमासा एव भवन्ति नान्ये । अनेन चान्द्रत्वमाधिमा- सानां स्पष्टीकृतम् । अनोपपत्तिः । त्रिंशात्तथ्यात्मकस्य रवीन्दुयुतिकालरूपद न्तिावघेश्चान्द्रमासस्य द्वादशराशिमितेन सूर्यन्वन्तरेणेव सिद्धिः । कथमन्यवा दशान्ते जातस्य मन्दशीघयोः सूर्यन्दोर्योगस्य पुनर्देशान्ते संभवः । द्वादशराश्यन्तर वे भगणान्तरमतो भगणान्तरेण चान्द्रो मासः सिद्धः। सौरमासापेक्षया यदन्तरेण चान्द्रमासानामाधिकत्वं त एवाधिमासा इति स्वरूपमेव वक्ष्यमाणोपयोगात्परिभाषितम् ॥ भाटी-चद्रमा और सूर्य का मगगानार चान्द्रमास है। चन्द्रमाससे रविमास घट नेपा मधिमास होजाताहे ॥ ३५॥ अय वक्ष्यमाणावमसूर्यसावनयोः स्वरूपमाह- सावनाहानि चान्द्रेभ्यो धुभ्यः प्रोज्झ्य तिथिक्षयाः ॥ उदयादुयं भानोभूमिप्तावनवासराः ॥ ३६॥ चान्द्रेभ्यो युभ्यो वक्ष्यमाणचान्द्रदिवसेभ्यः सकाशादित्यर्थः । साबनाहानि सावनदिनानि प्रोज्झ्य त्यक्त्वावशेयं तिथिक्षयाः। तिथिपु चान्द्रदिनेषु सारनदिना. नामरशेपतुल्यः क्षयो न्यूनत्वम् । यदा तिथिशब्देन सारनो दिवसस्तस्य चान्द्रदि- चसात्क्षय इति स्वरूामेव वक्ष्यमाणोपयोगात्पारभापितम् । ननु भोदया भगणे- मेरेत्यादिना पूर्व मर्वेषां मावनदिवसा उक्ता इत्यत्र कस्य ग्राह्या इत्यतः सूर्यसावनस्वरूप कथनच्छलेनोत्तरमाह-उदयादिति । सूर्यस्योदयकालमारभ्याव्यवाहततदुदयकालप- कालः स एको दिवसः । इति ये दिवमास्ते भूमिसावनवामराः । भूदि- बसा उदयस्य भूसम्बन्धेनावगमात् । सावनदिवसाश्चेत्यर्थः । तथाच निरुपपदसा- बनभूमिशब्दाभ्यां सूर्यस्य वामरा एव नान्येषां सोपपदत्वाभावादेति भावः ॥ ३६ ॥ भा. टो-चन्द्रदिनसे सतन दिन दूर कानेपा तिथिक्षय होना है। सूर्य के एक उदय इसरे उद्यतक एक भौग या सौर दिन होता है ॥ ३६ ॥ वे कियन्त इत्यतस्तत्प्रमाणं चान्द्रोदनपमाणं चाह- सुबष्टादिरूपांफससानिपियाधुगो।। चान्द्राः सायखखव्योमखानिखर्तुनिशाकराः॥३७॥ जष्टाश्विगजसप्तभूगोनगसप्तपञ्चभूमिता युगे सूर्यसावनदिवसाः। भान्द्रदिवसा युगवि- पप इत्यर्थः। अशीतिशून्यचतुष्कत्रिपपा एते त्रिंशदत्ताश्चान्द्रमासा उक्तमायाः। अनेनेच चान्द्रविनानामुपपत्तिः सूर्यचन्थ्योभंगणयोरन्तररूपचान्द्रमासास्त्रिंशद्वीणता इति स्पष्टीकृताः॥ ३७॥ भा० य०-गमें १५७७९५७८२८ सौरदिने और १६०३००००८० तिथि (चान्द्र न)ह ॥ १७ ॥ र्यन्तं यः L + ध्यायः १.] संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतः। S अथाधिमासावमयो संख्यामाह- पाहिबिहुताशाङ्कतिथयश्चाधिमासकाः॥ तिथिक्षया यमार्थाधियष्टव्योमशराश्विनः ॥ ३८ ॥ अधिमाप्तकाः प्रागुक्तस्वरूपाश्चकारायुगे पडदेवरामगोशरेन्दुमितास्तिथिक्षया दिन- क्षया अवमानीत्ययः । अर्थाः पञ्च । एवं द्विशराकृत्यष्टखतत्वानि ॥ ३८॥ भा. टी-युगमें मधिमास १५९३३३६ भौर तिथिक्षय २९०८२२५२ हैं ॥ ३८॥ ननु सूर्यमासानुक्तेराधिमाससंख्या कथं ज्ञातेत्यतो विमाससंख्यास्वरूपेण कहां- वाह- खचतुष्कसमुद्राष्टकुपञ्चरविमासकाः ।। भवन्ति भोदया भानुभगणरूनिता कहाः ॥ ३९ ॥ सूर्यमासा द्वादशगुणितरविभगणानुरूपाः शून्यखाभ्रस्ववेदधृतिशमिताः । ननु 'सावन दिवससंख्या प्रायुक्ता कयमवगतेत्याह-भवन्तीति । भोदया नाक्षत्र- दिवसाः प्रायुक्ताः सूर्यभगणैः प्रागुक्तैर्जिताः सन्तः बहा भूवासरा भवन्ति मोदय 'इत्यादिमायुक्तेः ॥ ३९ ॥ मा०टी०-युगमें रविमास ५१८४२००० है । नक्षत्र भगगते सूर्यभगण घगदेनेपर फुदिन (सौरदिन) की गिनती होताहै ॥ ३९ ॥ ननु सूर्यादिमन्दोचभौमादिपातानां युगे भगणानुत्पत्तेः कल्पयगणकयनमवश्य कमतस्तत्पत्त्यां प्रागुक्ता एते भगणादयः कल्प एवं कथं नोक्ता इत्यत आह- अधिमासोनरात्र्यक्षचान्द्रसायनवासराः ॥ एते सहस्राणिताः कल्पे स्युभंगणादयः॥ १० ॥ एते प्रामुक्ता भगणादयो भगणा आदिर्यपां ते भगणादयः । अधिमासोनराज्यक्षचा- न्द्रतावनवासराः । अधिमासाः पड्वहीत्यादितिथिक्षया इत्या नरात्रयोऽवमानि । कान्द्रसपनानां प्रात्यो कासरसम्बन्धः । लादेवसामानामित्यादि । चान्द्रदिवसाश्चान्द्रा खाटेत्यादि । सावनदिवसा वसुयष्टाद्रीत्यादि । अत्र सौ- 'रमासा आप खचतुष्कत्यादि ग्राह्याः । सहस्रगुणिताः कल्ये भगणादय उक्ता भवन्ति युगसहस्रस्य कल्पत्वात् । तथा च लाघवार्थ युगयुक्ता इति भावः ॥ ४० ॥ मा० टी०-एक युगके भघिमास, तिथिक्षय, पान्द्रसावनदिन मादिसवको १.०० से गुणा करने पर एक करके भगणादि होते हैं ॥ १० ॥ अथ श्लोकाभ्यां रविचंद्रसूर्यादिप्रहाणां मन्दोचमगणान्वदन्पातभगणान्प्रतिजानीते-- प्राग्गते सूर्यमन्दस्य कल्पे सप्ताष्टवह्नयः ।। . कोजस्य वेदुखयमा बौघस्याष्टतुर्वह्नयः ॥ ४१ ॥ --- (२०) सूर्यमिद्धान्त:- [प्रथमोऽ- खखरध्राणि जैवस्य शोकस्यार्थगुणेषवः ॥ गोऽग्नयः शनिमन्दस्य पातानामध वामतः॥ ४२ ॥ प्राग्गवेः कल्प इत्यनयोः शनिमन्दान्तं प्रत्येकं सम्बन्धः । पूर्वगतः सूर्यमन्दोवस्प कल्पे सप्लाष्टराममिताः शनिपातस्य भगणा इति वक्ष्यमाणस्य भगणा इति पदमत्र प्रत्ये- कान्वेति । कोजस्य कुजसम्बन्धिनः सूर्यमन्दस्पेत्यस्यैकदेशो मन्दस्येति मन्दोच्चस्ये- त्यर्पकमत्रान्वेति । तथा च भौममन्दोघस्य चतुरधिकं शतद्वयम् । वौधस्य बुधमन्दो शस्याष्टपत्रिमिताः । जैवस्य गुरुसम्बन्धिनः । अन शनिमन्दस्येति वक्ष्यमाणस्यैक देशो मन्दस्येति मन्दोच्चस्येत्यर्थकमन्वेत्येकवृत्तस्थत्वात् । यद्वाद्यन्तयोर्मन्दस्येत्युक्त्यैव मध्यस्थानामन्वयः सूपपन्न इति । तथा च गुरुमन्दोचस्य नवशतं शोकस्य शुकमन्दो- वस्य पञ्चत्रिंशदधिकपश्चशतं शनिमन्दोच्चस्यैकोनचत्वारिंशत् । अथानन्तरं पातानां मौमादिपातानां वामतः पश्चिमगत्या भगणा उच्यन्त इति शेपः ॥ ४१॥४२॥ मा० टी०-एक कल्पमें मदसूर्यके ३८७, मगरके २०४ बुधके ३६८, बृहस्पतिके ९०० शुक्रके ५३५ मोर शनिके ३९ भगण पाई भरेको चलते हैं ॥ ४१ ॥ १२ ॥ ताल्लोकाभ्यामाह- मनुस्रास्तु कोजस्य बोधस्याप्टाटसागराः॥ कृताद्रिचन्द्रा जेवस्य निखाङ्काश्च भुगोस्तथा ॥४३॥ शनिपातस्प-भगणाः कल्पे यमरसतवः॥ भगणाः पूर्वमेवान प्रोक्तांश्चन्द्रोच्चपातयोः ॥१४॥ कुजसम्बन्धिनः । तुकारात्पातस्य भौमपातस्य कल्पे भगणाश्चतुर्दशाधिकं शतद्वयम । बोधस्य बुधसम्बन्धिनः शनिपातस्येत्यस्यैकदेशः पातस्येत्यनान्वेति । बुधपातस्य दादशोना पञ्चशती । जैवस्य गुरुपातस्य चतुःसप्तत्यधिकं शतम् । भृगोः शुक्रस्य तथा सम्बन्धिनश्चकारात्पातस्य शुरूपातस्येत्यर्थः । यधिका नवशती। शनिपातस्य द्विरस प्रहका मगणाः कल्पे भवन्ति । नन्वस्मिन् प्रसंगे चंद्रस्योचपातयोगणाः कथं नोक्ता इति मन्दाशवापाकरणाय परोक्तं स्मारयति । भगणा इति । चंद्रोद्यपातयोश्चन्द्रस्य मन्दोषपातयोर्मगणा अगास्मिन्नधिकारे पूर्व ग्रहयुगमगणकथने एक्कारो विस्मरणनि- रासार्थकः । मोक्ताचन्द्रोयस्येत्यादिश्लोकेनोक्ताः ॥ ४३ ॥४४॥ मा०टी०-एक वल्पमें मग २१४, सुपके १८८, वृहस्पतिक १७४, शुक्र ९०३, शनिके ६६२ पातके चाहि मोर घलनेपाळे मगम हे पाही चमके पात कहे ॥४३४४॥ अयामिमतकाले ग्रहगतमोगानयनं विवक्षस्तदुपजीव्याहर्गणसाधनाथै प्रवृत्तग्रहं चार बालादतान्दज्ञानोपजीव्यं कृतयुपान्तीयगताब्दज्ञानं श्लोकत्रयणाहa भ्यायः १.] संस्कृतटीका-भापाटीकासमतः । (२१) पण्मनूनां तु सम्पिण्डय काल तत्सन्धिभिः सह ।। कल्पादिसन्धिना सार्दै वैवस्वतमनोस्तथा ॥ १५ ॥ युगानां विपनं यातं तथा कृतयुगं विदम् ॥ प्रोग्य सृऐस्ततः कालं पूर्वोक्तं दिव्यसंख्यया ॥४६॥ सूर्यान्दसंख्यया ज्ञेया कृतस्यान्ते गता अमी ॥ खचतुष्कयमाद्यनिशररन्ध्रनिशाकराः ॥ १७ ॥ पण्मनूनां कालं सौखपत्मिकं तत्सन्धिभिः पण्मनूनां कृतयुगप्रमाणैः पभिः संधिभिः सह सार्द्ध कल्पादिसन्धिना कृतप्रमाणः कल्पादावित्यनेन कल्पप्रारम्भसम्वद्धकृतयुग- मितसन्धिना सादै सार्थ सम्पिण्डकृित्य । तुकारादायुपोऽर्धमितं तस्येत्यस्य निरासः । वैवस्वतमनोर्वर्तमानसप्तमवैवस्वतारख्यस्य मनोर्युगानां निधनं यातं युगसप्तविंशोतंगतां तथैकीकृत्येदमष्टाविंशतियुगान्तर्गतं तुकारात्साम्पतं स्थितं कृतयुगं तथा गतत्वेनेकी- कृत्य ततः सिद्धानात्सृष्टेः काले सृष्टिकरणार्य यः कालो वात्मकस्तं दिव्यसंख्यया दिव्यमानेन पूर्वोक्तं कृताद्रियेदा दिव्याब्दाः शतना इत्यनेनोक्तम् । सूर्याब्दसंख्यया सौरवर्षमानेन पष्टयधिकशत नयगुणितं कृत्वेति तात्पर्यार्थः । एतेन प्रागुक्तकीकरणं सौर वर्षप्रमाणेन दिव्यवर्पप्रमाणेनेति व्यक्तीकृतम् । मोज्य न्यूनीकृत्य । चः समुच्चयाथोंऽनु- सन्धेयः । अमी अवशिष्टाब्दाः खाभ्रखाम्रद्विसप्तत्रिशरातिधूतयः कृतयुगचरणस्यावसाने गता अतीता ज्ञातव्याः । ननु कल्पादस्माच मनव इत्यादिपूर्वोक्तमम्पिण्डितकालोक्त्ये- दं पण्मनूनामित्यादि पुनरुक्तमाभाति । नच पूर्व ब्रह्मगतवयाप्रमाणज्ञानार्थमिदानी च अहसाधनार्थम् । अन्यथा गतब्रह्मवयाप्रमाणाद्रहसाथनापत्तोति वाच्यम् । ब्रह्मगत- वयाप्रमाणादेव ग्रहसाधनस्य युक्तत्वादिष्टापत्तेः। अन्यथा ग्रहचक्रादेब्रह्मोत्पत्तितस्तद वसानपर्यंत सत्त्वाहह्मादिनाधिककाले गताब्दज्ञानाभावाद्ग्रहसाधनानुपपत्तिरित चेन्न इत्थं युगसहस्रण भूतसंहारकारकः कल्प इत्यनेन ब्रह्मदिनान्ते ग्रहचकादिनाशोक्तस्त दिनादौ ग्रहचकोत्पत्तेश्च ब्रह्मादिवस एवं तदादिगताब्दा ग्रहचारोपजीव्या न ब्रह्मगतायु: प्रमाणाब्दाः ग्रहासत्त्वे ग्रहसाधनापत्तेः । अतः पुनर्गताब्दाग्रहचारोपजील्या ब्रह्मदिवसे साधिताः । परन्तु ब्रह्मदिनादितो ग्रहचारप्रवृत्तिकालपर्यंत यः सृष्टिविलाम्वतकालस्त- दूना ब्रह्मदिनादिगताब्दाः सृष्टिगतान्दा ग्रहसाधनोपजीव्या इति तथोक्तम् । अन्यया सृष्टयन्तर्गतकाले ग्रहचारासत्वे तत्साधनापत्तेः सृष्टिकालकथनानुपपत्तेश्चेति दिक् । यथा दिव्याब्दस्य सौरवर्षाणि ३६० । द्वादशसहस्रगुणितानि महायुगम् ४३२०००० इमेकसप्ततिगुणं मानुनमम् ३०६७२०००० इदं पइगुणितं पृण्मनुमानम् १८४० (२२) सूर्यासद्धान्तः- [ प्रथमोऽ- ३२०००० इदं स्वसन्धिभिः कृतयुगप्रमाणः सप्तभिरभिः १२०९६००० युगम् २८५२४१६००० एतत्सप्तविंगतियुग ११६६४०००० सहितम् १९६९०५६००० कृतयुग १७२८००० युक्तं जातानि कल्पगतवर्षाणि १९७०७८४००० । सृष्टि- दिव्यान्दैः ४७४०० । खपडग्निगुणितेरोभिः १७०६४००० । हीनं सृष्टिगताब्दा ग्रहचारोपजीव्याः कृतयुगान्ते खचतुष्केत्यायुपपन्नाः १९५३७२०००० ॥ ४५ ॥ - ॥ ४६॥ ४७ ॥ भा० टी०-सन्धिके सहित यःमनुरा समय वल्पकी आदि सन्धि, बीते हुए सताईस शुगका प्रमाण मोर कृतयुगमान जोडके उसमेसे पल्पारम्भसे लेकर सृष्टिकालत के सौर वर्ष ( २४ श्लोक) की सस्या घटानेसे सृष्टिके मोते हुए वर्ष निकल भावेंगे । सो १९५३ ७२०००० वर्ष है।॥ ४५ ॥ ४६॥ ४७ ॥ तथाभीष्टकालेऽहगणसाधनं ततो दिनमामाब्दपप्रतिज्ञा वामरेश्वरज्ञानं च श्लोक- चतुष्टयेनाह- अत ऊर्ध्वममी युक्ता गतकालान्दसंख्यया ॥ मासीकृता युता मासमधुशुक्लादिमिर्गतः ॥ १८ ॥ पृथक्स्थास्तेऽधिमातघ्नाः सूर्यमासविभाजिताः ॥ लब्धाधिमासकर्युक्ता दिनीकृत्य दिनान्विताः ॥ १९॥ विष्ठास्तिथिक्षयाभ्यस्ताश्चान्द्रवासरभाजिताः ॥ लब्धोनराविरहिता लङ्कायामाधरात्रिकः॥५०॥ सावनो रागणः सूर्यादिनमासान्दपारततः॥ सप्तभिः क्षयित्तः शेषः सूर्यायो वासरेश्वरः।। ५१ . अतः कुनयुगान्तादूर्वसुर्यनम्बरमित्यर्थः । अभीष्टकाले यो शनालस्तस्य शौर- वसदस्ययामी कृतयुगान्तीयसृष्टयब्दाः, खचतुष्पेत्यादिपूर्वोक्ता युक्ता अभीष्टकाले सौरगताब्दा भवति । एते मासीकृता द्वादशगुणिता इत्यर्थः । अभीष्टकाले मधुशुल्ला- दिमिश्चत्रशुक्लाधवधिभूतर्गतर्मानैर्युताः । अत्र गतमासांतर्गतोऽधिमासश्चेन्न आयस्तस्यो- त्तरमासाइयत्वेन तदन्तर्गतत्वात् तन्मासस्य पष्टिदिनात्मावाच । ते सिद्धाः पृथक्स्था युगाधिमासाणेता युगसूर्यमासभक्त प्राप्ताधिमासनिरौः सिदा युक्ताः । अत्र यदा स्पष्टोधमासः पतित आनयनेन लब्धस्तदानयनमाताधिमासैः सैकैर्युक्ताः । यदा च स्पष्टोऽधिमासो न पतित आनयने प्राप्तस्तदानयनप्राप्ताधिमासनिरर्युक्ताः । अन्य- ध्यायः १.] संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः। (२३ याभीष्टकालसाधिताहर्गणस्प विंशदिनान्तरितत्वापत्तेरिति ध्येयम् । एते सिद्धा दिनी- कृत्य त्रिंशता संगुण्येत्यर्थः । दिनान्विता वर्तमानमासस्य शुलमतिपदादिगततिथि मिर्युक्ता इत्यर्थः । एते द्विष्ठाः स्थानद्वये स्थाप्या एकत्र युगारमैर्गुणिता युगवान्द्राद- नैर्भक्ताश्च मासावनिरौरपरत्र हीनाः सन्तो लादेशेऽर्धरावकालिका सावनोहर्गणाः स्यात् । ततः साधिताहर्गणात्सकाशात्सर्यात्सूर्यमारभ्य दिनमासाब्दपा बारेम्वरमासे- श्वरवश्वरा भवन्ति । तत्र वासरेश्वरज्ञानमाह-सप्तभिरिति । अयमहर्गणः सप्तमिन क्षयितो भक्त्वा शेपितः कार्यः । स शेपोऽवशिष्टः सूर्यायः सूर्यवारादिको वासरेश्वरो वारस्वामी गतो भवति । तदानमो वर्तमानो वारेश इत्यर्थसिद्धम् । अनोपपत्तिः । सौर वर्षाणां मासकरणे सृष्टयावधिमासांतकालसम्बन्धिसावयवसौरमासा अव्यवस्तिपूर्वप- तिताधिमासान्तकालादिस्वाभीष्टचैत्रायन्तकालसम्बंधिसावयश्चान्द्रमासाः स्तयोयोगथैः- बादौ द्वादशयणिती सौरवाणि जातानि कुत इतिचेच्छृणु । द्वादशगुणितसौरवाणि सौरवपादौ सौरमासा इति तु निर्विवादम् ।.ते स्वानीताधिमास: सावधैर्युतान्यांदा- सावययाः सौपादौ । एतेऽयवहीताश्चैत्रादौ निरवयवाश्चान्द्रमासाः भवयवस्य चेत्रा- दिसौरवान्तरकालरूपाधिशेपत्यात् । ते निरग्राधिमासोनाश्चैत्रादावधिमासो न चान्द्रा द्वादशगुणितसौरवर्षरूपा उत्तयोगतरूपाः सिद्धाः । कथमन्यथा निरग्राधिमासयोजने- नैषां चैत्रादौ चान्द्रमासमानत्वसम्भवः । एते स्वामीटमासादिकालसिद्धयर्थ चैत्र शुक्लादि- गत्मासयुक्ताः । एतेन द्वादशगुणितसौरवपमितसौरमासानां चैत्रादिगतचान्द्रमासा- कथं चोजिता एकजातिवाभावादिति दृपणांगीकारो निरस्तः । उक्तरीत्या तर चान्द्र- मासानामपि सच्चादेकजातीयत्वेन योगसम्भवात् । नहि पूर्वयोगोऽस्माभिः कृतो येन विजातीययोगो दूषणं तस्य द्वादशगुणितसौरवर्परूपत्वेन स्वतः सिद्धत्वात् अथैफ निरग्राधिमासा योज्या इति सृष्टवादिपूर्वपतिताधिमासान्तकालाबाधि ये सौरमासा: सावयपास्तेभ्यो युगसौरमासयुगाधिमासास्तदैभिः सौरमास' क इत्यनुपातेन निरग्राधिमासाश्चान्द्रा भवन्ति सोरेग्यः साधितत्वात् । अथाभीष्टका लेऽधिमासाश्य ज्ञानाथै युगचान्द्रमासयुगाधिमांसास्तदा पूर्वपतिताधिमासान्तकालाभीष्टमासाद्यन्तर- स्थितचान्द्रमासैः सावयैवैरोभिः क इत्यनुपातेनाधिमासाभावात् तदवयका सोर आयाति चान्द्रात्साधितत्वात् । परन्तवयवायरिनोरेकजातित्वासिद्धिरतस्तत्सम्पाद- नार्थमधिमासाक्यपस्योक्तसौरस्य युगसौरमासेयुगचान्द्रमासास्तदोक्तसौराधिमासाययवेन किमित्यनुपातेन युगचान्द्रमासा गुणो युगसौरमासाहर इति तुल्याँगुणहरयायुगचान्द्र मासयो शादिष्टचान्द्रमासानां युगाधिमासागुणो युगसौरमासाहर इवि फल मधिमासावयवश्रांद्रः । अथ तादृशेष्टसौरचांद्रमासयोः पृथगतानादधिमासतदक्यवयो- ज्ञानमशक्यमप्येवो हरश्चगुणकी विभिन्नावित्यादिरीत्यष्टतादृशसौरचांद्रमामयोगिक
(२४)
सूर्यसिद्धान्तः-.
[प्रथमोऽ-
एचायं ज्ञातो युगाधिमासगुणितो युगसूर्यमासमक्तः फलमधिमासाः । शेपाचदवयवोड
हर्गणानयनेऽनुपयुक्तः । तत्र केवलाधिमासानामेव न्यूनत्वेन तेपामेव योजनावश्यकत्वाता
अयं सृष्ट्यादित इष्टमासादिपर्यंत चांद्रमासगणः सिद्धः । वहवस्तु द्वादशगुणितसौर-
वरूपसौरमासानां सौरवोदितोऽभीएकालपर्यन्तं सौरमासानामज्ञानाज्ज्ञातचैत्रादिगत-
चान्द्रमासा एव योजिताः परमिष्टसौरमासेष्वधिमासशेपमधिकं तघाधिमासानयनेऽधि-
शेपत्यागेन केवलाधिमासयोजने निरन्तरं भवति अधिमासानयनं च चान्द्रमिष्टसौर-
भासत्वेनेवाधिशेषाधिकष्टसौरमासानामंगीकारादित्याहुः । तच्चिन्त्यम् । केवलेष्टसौरमा-
सानीताधिमासानां निरग्राणामधिशेषाधिकसौरेष्टमासेपु योजनेनैव निरन्तरितत्वसिद्धेः ।
अन्यथाधिशेपगुणितयुगाधिमासेभ्यो युगामासभक्ताप्तफलेनाधिशेषमविकमायातीति
परमासनाधिशेपस्याधिकत्वे भवद्रीत्यनुपातानयनेनैकाधिकमासलब्ध्या योजितेन चान्द्र-
• मासगण एकाधिकः स्यादिति । अथाभीष्टमासादिसिद्धचान्द्रमासाश्चान्द्रदिनकरणार्य
त्रिंशद्वणिता अभीष्टदिने तत्सिद्धयर्थ शुक्लादिगततिथयोऽत्र योजिता अभीष्टतिथ्यादी
चान्द्राहर्गणः । युगवान्द्रदिनैयुगावमानितदानेन किमित्यनुपातागतावमैः साश्यवहाँना-
श्वान्द्राहर्गणस्तिथ्यन्ते सावनोऽहर्गणोयमकोटिदेशे सूर्योदयकाले ग्रहचारस्य प्रवृत्ते-
स्तदादितो निरवयवाहर्गणसिद्धयर्थ तिथ्यन्ततत्कालयोरेन्तरममावयवरूपं योज्यमतः
पूर्वमेवारमावयवोऽनुपयुक्तोऽत्र न गृहीतोऽतश्चान्द्राहर्गणः सानीतावमैर्निर नोऽहर्गणः ।
सासनो निरवयवो यमकोर्टदशपिसूर्योदयकाले तत्र तद्देशस्याप्रसिद्धतया प्रसिद्धलङ्का-
दशादरावस्य तदूपस्योक्तिः कृता । सृष्टयादावर्कवारसद्भावात् तदाया दिनमासव-
घाः । ग्रहागां सप्तसत्यत्वात् सप्ततष्टोऽहर्गणः शेपं गतवारः ॥ ४८ ॥ ४९ ॥
५० ॥५१॥
म. ट-कृतयुग बीतेहुए वाँकी संख्यामें उपर कही हुई संख्या मिलाय, मास करके
मधु शुछ दि विगत मासकी संख्यायो मिल ॥ १८ ॥ और जगह उक्तमास संख्यांगे
अधिमाससे गुणका, सूर्यमाससे भागार मास संख्याके साथ मिलाय दिन करके पीते
हुए दिनोंके साथ मिलाये ॥ ४२ ॥ अन्यत्र दनसंख्याको ति थक्षयद्वारा गुणकरके, मंद-
से भगवरे, फिर
दिया पटानेपा लोक दशत्रिक महंगण हो ।
गणरे दिनमा पति निकलता है । महर्गणको ७ से भागकरके शेप रविले गणित
करनेपर दिनका मधिपति (स्वामी) होगा ॥ ११ ॥
अय प्रतिज्ञातयोर्मासवर्षपयोरानयनमाह.
मासान्ददिनसंख्याप्तं द्विविघ्नं रूपसंयुतम् ॥
प्रप्तोद्धृतावशेषो तु विज्ञयो मासवर्षपौ ॥ १२ ॥
ध्यायः १.] संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः।
अहर्गणाविष्ठादेकत्र मासादनानां संख्यया त्रिंशता भक्तादाप्तं फलम् । अपरत्र
वर्षदिनानां संख्यया पष्टयधिकशतत्रयेण भक्तादाप्तं फलम् । शेषयोरनुपयोगात्त्यागः ।
क्रमेण फलद्वयं द्वाभ्यां त्रिभिर्गुणितमुभयत्रैकसंख्यायुक्तं सप्तभागहारेण भक्तात्फल-
त्यागेनावशिष्टौ क्रमेण मासस्वामिवर्षस्वामिनी ज्ञातव्यौ । तुकारादयुत्क्रमेण वारेश्वरगणना
तत्क्रमेणानयोगणना परमत्र वर्तमानेत्यर्थः । अत्रोपपत्तिः, सृष्टयादित्रिंशदहोरात्राणा-
मेका सौरसावनमानस्तस्य सूर्योऽधिपतिर्मासादिदिनेकस्याधिपतित्वात् । एवं द्वितीय-
मासादी भौमस्य दिनाधिपतित्वाद्भौमो द्वितीयमासेश्वर इति प्रतिमासं मासेश्वरयोरन्तरं
दयम् । त्रिंशदिनानां सप्ततष्टतया व्यवशेषात् ।। एवं पट्यधिकशतत्रयाहोरात्राणामेक
सौरसावनवपं तस्याधिपोऽक । वर्षादिदिनेऽकस्याधिपतित्वात् । एवं द्वितीयसावनवादी
बुधस्य दिनाधिपतित्वावुधो द्वितीयवर्षेश्वर इति प्रतिवर्षे वर्षेश्वरयोरन्तरं त्रयं पश्यधि
कशतत्रयदिनानां सप्ततष्टतया व्यवशेषात् । तथा च वर्तमानकाल तद्गणनया कियन्तो
माता गताः । कियति च वर्षाणि गतानीति ज्ञानार्थमहर्गणस्त्रिंशद्क्तः फलं गतमासाः ।
पष्टयधिकशतत्रयभक्तः फलं गतवर्षाणि । एकमासे द्वौ वारौ तदा गतमासैः क इति
गतमासवारा वर्तमानार्थ सैकाः । एवमेकवर्षे त्रयो वारास्तदा गतः क इति गतवर्ष-
-वारा वर्तमानार्थ सैका वाराणां सप्तसंख्यत्वात् सप्ततौ शेषौ सूर्यादिको मासवर्षे-
श्वरी ॥५२॥
भा० टी०-महर्गणको मास (३०) और वर्ष (३६० ) दिनसख्यासे भागकर के २ और
तौनसे गुणा करके तिस गुणित फल में एक मिलाये । 'फा हिस रुख्याने ७ का माग देनेपर
शपांक रविसे गणित करनेपर मासेश्वर भार वषेश्वर होगा ॥ १२ ॥
अथ ग्रहानयनमाह-
यथा स्वभगणाभ्यस्तो दिनराशिः कुवासरः ॥
विभाजितो मध्यगत्या भगणादिग्रहो भवेत् ॥ ५३॥
दिनराशिरहर्गणो यथा स्वभगणाग्यस्तो यत्कालिकनिजोक्तभगणैर्गुणितो युगभग-
गैः कल्पभगणैत्यर्थः । तथा कुवासरस्तात्कालिकसावनदिनैर्युगसावनैः कल्पसाब-
नैवेति यथायोग्यामेत्यर्थः । मतः फलं यस्य ग्रहस्प भगणा गुणनार्थ गृहीताः सग्रहो
भगणादि गणराशिभागकलाधिकलात्मकभोगात्मकः । मध्यगत्या मध्यगतिमानेन न
प्रतिदिनविलक्षणस्फुटगातिप्रमाणनाग्रे तत्ममाणेन ग्रहमोगज्ञानस्योक्तेः । मध्यमो ग्रहः
स्पादित्यर्थः । अनोपपचिः । युगादिसापर्युगादिभगणास्तदेकेन दिनेन कति प्राप्त
मध्यमगतिस्तत एकन दिनेनेयं गतिस्तदेष्टाहणेन केति रूपयोस्तुल्यत्वेन विकाराज-
नकत्वाच नाशादुपपन्नमानयनम् । यद्यपि युगादिसायनेयुगादिभगणास्तदेष्टाइगणेन
किमित्येकानुपातेनानयनमुपपन्नं लाघवानथापि मध्यगत्येत्यस्य प्रदर्शनार्थमनुपातयं
गुरुभूतमपि प्रदार्शतम् ॥ ५३॥
(२६)
सूर्यसिद्धान्त:-
[प्रथमो:-
भा० टी-अपने २ भगण करके दिनराशिको (महगण) गुणकरके कुदिनसे भाग
परनेपर ग्रहकी मध्यगतिसे उत्पन्न हुए भगणादि मध्य रंगे ॥ ५३ ।।
अथामु प्रकारमुचपातयोरानयनायातिदिशति-
एवं स्वशीघ्रमन्दोचा ये प्रोक्ताः पूर्वयायिनः ॥
विलोमगतयः पातास्तचक्रादिशोधिताः ॥५४॥
ये पूर्वयायिनः पूर्वदिग्गतयः स्वशीघ्रमन्दोचाः स्वेषां ग्रहाणां शीनोचमन्दोचा ग्रह-
बहुत्वेन शीघ्रोधमन्दोचयोर्वहुत्वाद्रहुवचनम् । मोक्ताः पूर्व भगणोच्या कथितास्तेऽप्येवं
ग्रहानयनरीत्या साध्याः । ननु पूर्वयायिन एवं साध्यास्तहि पश्चिमगतयः पाताः क्य
साध्या इत्यत आह-विलोमगतय इति । पश्चिमगतयः पाता अपि तदद्रहानयनरीत्यान
चंद्रोचपातो ग्रहानयनवयुगक्ल्पभगणसावनाम्यां सिद्धी भक्तोऽन्येपामुचपाती तु क्ल्प-
सावनदिनहरेणेति ध्येयम् । ननु तर्हि पूर्वपश्चिमगत्योः को विशेष आनयन इत्यत
आह-चमादिति । आगता राश्यादिपाता द्वादशराशिभ्यः शोव्याः पाता भवन्ति ।
एतावाने विशेप इति भावः । अनोपपत्तिः । पूर्वयायिनो मेपपमिथुनादिक्रमण
गच्छन्ति पश्चिमगतयस्तु मेपमीनकुम्मेत्याद्युत्क्रमेण गच्छन्ति । तनोत्क्रमगणनाया
लोकेऽनभ्यासादाशिकमेण तज्ज्ञानार्थ द्वादशराशिभ्यः शोधिताः । पूर्वगतिपक्तिस्था
भवन्ति ॥ ५४॥
भावटी-ऐसे ही अपने २ पहले चलनेवाले शीघ्रमन्वोच्चादि मध्य निर्णय होजायगा परन्तु
समस्तपात विलोम गमन करनेवाले भर्याद विपरीत मार्ग में चलानेषले , तिस कारणसे
मध्यराश्यादि १२ राशिसे अवग करनेपर मध्य होजायगा ॥ ५ ॥
एथ संवत्सरानयनमाह-
द्वादशना गुरोर्याताभगणा वर्तमानकः॥
राशिभिः सहिताः शुद्धाः पष्टया स्युर्विजयादयः॥ ५५॥
अहगणानांतस्य मगणादिकस्य वृहस्पतेयाता गता भगणा उपरिस्था द्वादशगणिता
वर्तमानकैस्मिन्नधिष्ठितः स वर्तमानस्तत्सहितरकेयुक्तरित्यर्थः । राशिभिर्गणितागत-
राशिभिर्यद्राशौ तिष्ठति तस्य मेपादिसंख्ययेति फलितार्थः । युताः पट्याशुद्धा भागा-
वशेषिताः फलं भागादिक चानुपयोगात्याज्यम् । विजयादयः संवत्सरा वर्तमानसहिता
भवन्ति । अनोपपत्तिः "मध्यगत्या भभोगेन गुरोगौरववत्सराः" इति लघुवसिधसि-
द्धान्तोक्तगुरुमध्नमराशिभोगकाल एकः संवत्सर इति सृष्टयाद्यानीतभगणादिगुरोः
सम्पूर्णराशिज्ञानाय भगणा द्वादशगुणा वर्तमानराशिसंख्यायुताः पष्टितष्टाः शेष
विजयादिकः संवत्सरो वर्तमानो भवति । संवत्सराणां पष्टिसंख्यनात् । सृष्ट्यादी
विजयसंवत्सरसावाच ॥५५॥
मा० (ध्यायः १.] संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः । (२७) टी०-वृहस्पतिके भगणको १२ से गुणकरके शशिक साथ मिलाय ६० से भाग करनेपर भागफल विजयादि संवत्सर होगा || ५५॥ अथोक्तमुपसंहरल्लाघवेन ग्रहानयनमाह- विस्तरेणेतदुदितं संक्षेपाट्यावहारिकम् ॥ मध्यमानयनं कार्य ग्रहाणामिष्टतो युगात् ॥५६॥ एतत् पण्मनूनां तु सम्पिण्डयेत्यादिविस्तरेण गणितक्रियाबाहुल्येनोदितमुक्तं व्याव- हारिक लोकव्यवहारोपयुक्तमिदं ग्रहानयनं संक्षेपादल्पगणितप्रयासाज्ञेयम् । तदाह-मध्य- मानयनामिति । ग्रहाणां मध्यमानयनं मध्यमानेन गणितामष्टतो वर्तमानात्ताख्या- गान्महायुगस्य चरणास्त्रेतायुगादितो गताब्दैरल्पभूतैरेवोक्तरीत्याहर्गणमानीयोक्तरत्या मध्यग्रहाः कार्या इत्यर्थः ॥५६॥ मा०४०-यह समस्त विस्तारसे कहा कार्यके संक्षेपसे भी नेताकी मादिसे नहाँके मीचमें लाना उचित है ॥ ५६ ॥ ननु सृष्टयादितो ग्रहचारप्रवृत्तेस्तदादित आनीतस्य ग्रहस्य वास्तवत्वेन तत्तुल्योऽय ग्रहः कथमवगत इत्यत आह- अस्मिन्कृतयुगस्यान्ते सर्वे मध्यगता ग्रहाः ।। विना तु पातमन्दोच्चान्पादौ तुल्यतामिताः ॥१७॥ अस्मिन्निदानीन्तने कृतयुगस्यावसानसमये सर्वे सप्तग्रहाः सूर्यादयो मध्यगता मध्य- मा मेपादौ मेपादिप्रदेशे तुल्यतां समानतां गणिता गतराश्यादिभोगनेताः प्राप्ताः । पात- मन्दोघान्विना । पातमन्दोच्चास्तु न तुल्या न वा मेपादौ । तथा च ग्रहाणां शीघ्रो- चानां च भगणपूर्तित्वात्रेतादिसमयावगतगतकालादागतराश्यादयः सृष्टयादिगतकाला- वगतराश्यादिभिस्तुल्या भगणानां च प्रयोजनाभावादिति भावः ॥ ५७ ॥ भी०टी०-इस कृतयुग मन्तमें पात और मन्द व उच्चके सिवाय समात ग्रह मध्य मेष- के प्रथममें थे ॥ २७॥ अथोचपातयोविशेषमाह- मकरादौ शशाङ्कोचं तत्पातस्तु तुलादिगः ॥ निरंशत्वं गताश्चान्ये नोक्तास्ते मन्दचारिणः ॥२८॥ चन्द्रस्य मन्दोंञ्चं तदानी मकरादावस्ति तत्पातश्चन्द्रपातस्तुलादिस्थोऽस्ति । तुकाराद- तस्तयोस्त्रेतादित आनयनं नवपज्ञाशियोजनविशेपेण मुंगममित्यर्थः । नन्वेवमन्येपामपि यद्राश्यादिस्थत्वं तत्कथनेन तेपामप्यानयनं सुगमं भविष्यतीत्यत आह । निरंशत्वमिति । अन्येऽवशिष्टा मन्दोच्चपाता ये मन्दचारिणोऽल्पगतय उक्ताः पूर्व भगणोक्त्या का 21 1 ०।७। . (२८) सूर्यसिद्धांत:- [ प्रथमोऽ- चकारादस्मिन् कृतयुगान्त निरंशत्वमंशाभावतां न प्राप्ताः । तथाच तेषां राश्यादिक ‘थने गौरवं मन्दगतित्वादकदानीताः सहस्रवर्पपर्यंतमुपयुक्ता भवतीति निरंतर तत्साधना- वश्यकतामावात्तेपामानयनं त्रेतादिगतान्देश्य उपेक्षितमिति भावः । यदि च तत आ. नीयन्ते तदा स्वस्वक्षेपयुक्ताः कार्याः । क्षेपास्तु .रविमन्दोचं राश्यादिक २८ । १२ । भौमस्य ३ । ३ । १४ । २४ । वुधस्य ५॥४॥ ४॥ ४८ गुरोः । ९1010 1 शुक्रस्य ११ । १३ । २१ । ०। शनेः ४।२०। १३ । १२ । भौमपातस्य ९ । ११ । २० । १२ । बुधस्य ८ । ११ । १६ । ४८ । गुरोः ८८ ५६ । २४ । शुक्रस्य ४।१७। २५ । ४८ । शनिपातस्य ४ । २०११३ । १२। एवमिष्टकालादपि ग्रहाः साध्याः स्वस्वक्षेपयोजनपूर्वम् ।। ५८ ॥ भा० टी०-उच्च चन्द्रमा मकाका और चंद्रमाका पात तुलाकी मादिमें था मन्द चलनेवाल मंदोच्चादिक अशादिभी थे इस कारण नहीं कहे गये ॥ १८ ॥ अथ ग्रहाणां देशान्तरफलानयनाथै भूपरिधिं स्वोपजीव्यभूव्यासक थनपूर्वकमाह- योजनानि शतान्यष्टो भूकर्णो द्विगुणानि तु ॥ तर्गतो दशगणात्पदं भूपरिधिर्भवेत् ॥२९॥ अष्टौ शतानि द्विगुणानि पोडशशतं योजनानि भूकों भुवो भूगोलस्य कर्णो वृत्त- परिधिमध्यभागसूत्रं परिष्यमितचापस्य ज्यारूपं द्विगुण इत्यनेन शतान्यष्टौ केंद्रा त्पाधिपर्यंत मृजुरत्रस्य मानमिति सूचितम् । कक्षाव्यासाईस्य कर्णव्यवहारपदस्पापि भूकर्णव्यवहारः तुकारात्पुराणविरुद्धोऽपि प्रत्यक्षसहकृतागमप्रमाणसिद्धः । अस्मा- र परिधिज्ञानमाह । तदर्गत इति । मृव्यासवर्गानुल्ययोधीतरूपाद्दशगुणान्मूलम् । क- स्थायं समद्वियात इति तन्मूलं तत्प्रकारश्च ग्रन्यांतरे प्रसिद्धः भूपरिधिः स्यात् । अत्रो- पपत्तिः । गजाग्निवेदराममित ३४३८ त्रिज्यायाः कक्षाव्यासाईत्वादिगुणत्रिज्याप- व्यासे चक्रकलातुल्यः परिधिः २१६०० तदेष्टव्यासे क इति गुण २१६०० हरौ ६८५६ हरेणापवर्तितो हरस्याने रूपं गुणस्थाने साष्टावयवयुतात्रयस्तथा च व्यासोऽनेन गुणितः परिधर्मवति । तत्रभगवता गुणस्यैकस्थानकरणार्य वर्गः कृतः ९ । ५२ । ५२॥ अत्र स्वल्पान्तराद्दशगृहीताः वर्गण वगै गुणवेदित्युक्तत्वाढ्यासवर्गों ददाणितस्त- न्मूलं व्यासो मूलरूपगुणगुणितः सिदो मति । यद्यपि वर्गस्थाने दशग्रहणेन स्थूल- मिदमानयनं तयापि परमकारुणिकेन भगवता लोकानुग्रहाय गणितलाघवायांगीकृतम् । -यस्तुतो भगवता वेदमंगलविश्वरूपमितव्यासस्य११३८४ । परिधिणिता गतः प्रत्यक्षण मदोश्चके 101२८।१म.३३ १४:२४ । १४ । ४१ ४८३.९ || १३।२१.४.२.३।१पात म"३.111८1१६.४८ ५ ॥ ॥५६॥२४॥10॥३५४४८४ | २०३२ सयुग समाने थे।
ध्यायः १.] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतः । • (२९), खखखरसराममितः ३६००० अत्र पूर्वोत्तरीत्यापवर्तने गुणाः ३ १९ । ४४ । पादोन दशावयवयुतत्रयमस्य वर्गो दशप्रायः ९ । ५९ । ५९ । इत्युपपन्नमुक्तम् ॥ ५९॥ मा० टी० भूवर्ण १६०० योजन है । तिसके वर्गको १० से गुणा परके पद अर्थात मूल निकाल लेनेसे भूपारीधि होती है ।। ५९॥ , स्फुटपरिध्यानयनं देशान्तरफलानयनं तत्संस्कारं च श्लोकाभ्यामाह- लम्बज्यानस्त्रिजीवाप्तः स्फुटो भूपरिधिः स्वकः ॥ तेन देशांतराभ्यस्ता ग्रह क्तिर्विभाजिता ॥६॥ कलादितत्फलं प्राच्यां ग्रहेभ्यः परिशोधयेत् ॥ रेखा प्रतीची संस्थाने प्रक्षिपेत्स्युः स्वदेशजाः ॥६१॥ दादशपलभयोगयोगमूलमक्षकर्णः । अनेन द्वादशगुणिता त्रिज्यामक्ता फलं लंब- ज्या । अनया गुणितो भूपरिधिस्त्रिज्यया. गजामिवेदराममितया भक्तः फलं स्वकः स्वदेशसम्बन्धी स्पष्टो 'भूपारीधः स्यात् । ग्रहस्य गतिर्देशान्तराभ्यस्ता स्वरेखादे- शस्वदेशयोरन्तरयोजनानि देशान्तरपदवाच्यानि तैर्गुणिता तेन स्पष्टेन भूपरिधिना भक्ता फलं कलादिकं तत्फलं प्राच्या स्वरेखादेशात्स्वदेशस्य पूर्वदिग्भागस्थितत्वे .. ग्रहेभ्यः कलादिस्याने परिशोधयेदर्जयेद्धीनं कुर्यादित्यर्थः । रेखामतीचीसंस्थाने स्वरेखा- देशात्पश्चिमदिग्भागस्थिते स्वदेशे ग्रहेभ्यः कलादिस्थाने प्रक्षिपेद्योजयेत्कुर्यात् । गणक इति शेषः । ते सिद्धा ग्रहाः स्वदेशजाः स्वदेशीया भवन्ति । पूर्वमहगणस्य लंकादेशीय- त्वेन , तदुत्पन्नग्रहाणां लंकादेशीयत्वात् । अत्रोपपत्तिः । यद्यपि भूमेः कन्दु- काकारत्वेन सर्वत्राभिन्नः परिधिरिति स्फुटपरिध्यसम्भवस्तथापि निरक्षदेशस्य मध्यत्वकल्पनेनोक्तो भूपरिधिस्तद्देशानामेवं तदन्यत्र .. तदनुरोधेन वृत्तानां लघुत्वसम्भवेनोत्तरोत्तरं न्यूनपरिधिः स्वदेशे स्फुटसंज्ञः । एवं नवत्यक्षांशे मेरुस्थाने वडवास्थाने च परिध्यभावः । निरक्षदेशे परम उक्तः परिधिरतो यत्राक्षांशा नवति- परमास्तत्र लम्बांशाभावः । यतोऽक्षांशामावस्तत्र लम्बांशाः परमा नवतिः । लम्बांशा- क्षांशी तु वक्ष्यमाणस्वरूपी । तथाच लम्बांशहासानुरोधेन परिधेरपि हास इति पर- मलम्बांशेर्नयतिमितैरुक्तो भूपरिधिस्तदा स्वदेशीयलम्बांदीः क इत्यनुपात उपपन्नोऽपि वृत्ताश्रितांशेभ्योऽनुपातानामसम्भवेन सर्वैरुपेक्षितत्वाच ज्यानुपातस्य सर्वैरङ्गीकृतत्वा- त्ममाणस्थाने प्रमाणांशज्या परमातिज्या । इच्छास्थाने इच्छांशानां ज्यालम्बज्येति युक्तमुक्तमुपपन्नं स्पष्टपरिध्यानयनम् । देशान्तरोपपत्तिस्तु लड्डादेशीयो ग्रहः स्वदेशतः समसूत्रेण यो दक्षिणोत्तरयोनिरक्षदेश आसन्नस्तत्र कार्यः । तदर्थ लङ्कादेशस्वानर- क्षदेशयोरन्तरयोजनज्ञानमावश्यकम् । एतत्वस्मादृशामशक्यमिति परिध्यपचयात्त- दन्तरतापचितं लड्डोत्तरदक्षिणसूत्रस्थस्वरेखादेशस्वदेशयोरन्तरं स्वपरिधिस्थं गणनया ।
सूर्यासदान्तः- [प्रथमोऽ- सातमस्मात्स्वपरिधिनेदमन्तरं योजनात्मकं तदोक्तपरिधिना किमित्यनुपातेन लडास्व- निरक्षेदशयोरन्तरमुक्तपरिधिस्थं ज्ञातम् । ततोऽदियदयान्तरकालेनार्को भूपरिधि क्रामात तत्र ग्रहाः स्वां स्वां गात कलात्मिकामातकामन्यत उक्तपरिधिना ग्रहगतिकला- स्तदा प्राकसिद्धलङ्कास्वनिरसदेशान्तरपोजनः केत्यनुपातेनोक्तपरियोर्गुणहरयोस्तुल्य- सेन नाशात्स्वरेखादेशस्वदेशयोरन्तरयोजनानि ग्रहगतिगुणितानि स्वपरिधिभक्तानि फलं ग्रहस्यान्तरकलाः । यद्यपि स्वपरिधिना गतिकलास्तदा स्वरेखादेशस्वदेशयोरन्तरयो- जनैः केत्येकानुपातेनैव देशान्तरफलमुपपन्नं भवति तथापि निरखदेशपदार्थसम्बन्धा- भावादिदमुपपन्नं फलं निरक्षदेशीयं कथमित्याग्रहनिरतातिमन्दस्य वोधार्थ गुरुभूतमप्य- नुपातद्वयमुक्तम् । तद्धनर्णोपपत्तिस्तु लङ्कादेशात्स्वनिरक्षदेशस्य पूर्वभावस्थितत्वे लड्दा देशाद्धराधास्वनिरक्षदेशादरात्रमर्वाग्भवति । तदुदयकालात्प्रवृहानिलवेगेन पूर्वभाग पूर्व- मेवोदयात् । अतोऽग्रिमकालीनग्रहस्य पूर्वकालिकलासिद्धयर्थं तत्फलं न्यून कार्यम् । एवं निरक्षदेशस्य लक्षातः पश्चिमस्थत्वे लोदयानन्तरोदयसद्भावालङ्कारामांदग्रिम- कालेऽर्द्धरात्रमतः पूर्वकालिकग्रहस्याग्रिमकालिकत्वसिद्धयर्थं तत्फलं योज्यम् । चक- शोधितपातस्यायं संस्कारो विपरीत इति ज्ञेयम् । स्वनिरक्षेदेशस्य लक्षातः पूर्वापर- भागस्थत्वं स्वरेखादेशात्स्वदेशस्य पूर्वापरभागस्थस्यानुरोधेनेति स्वनिरक्षदेशस्वदेशयो- योम्योत्तरेक्यादर्द्धरावयोरभिन्नत्वात्स्वदेशार्धरात्रेऽपि स्वनिरक्षदेशार्द्धरात्रकालिका एव अहा अविकृता इति सर्वमुक्तमुपपन्नम् ॥ ६०॥६१ ॥ मा० टी०-पृथ्षीकी परिधिको अपने देशको सम्मज्यासे गुणकरके पिपासे भागकरनेपर स्फुर भूपरिधि होती है । (ज्यादिको दूसरे अध्यापमें देखना चाहिये ) देशातार द्वारा अहक्ति गणेकरके स्फुट भू-परिधिले भाग करने पर जो फलादि फल हो, वह अपने देशते पर्वमें दो तो ग्रहसे घटाव । पश्चिममें हो तो मिला ।। ६० ।। ६१ ॥ अथ रेखास्वरूपं तद्देशांश्च कांश्चिदाहा राक्षमालयदेवोकशैलयोर्मध्यसूत्रगाः॥ रोहीतकमवन्ती च यथा सन्निहितं सरः ॥ ६२ ॥ राक्षसालयं लङ्का देवानां गृहरूपः पर्वतो मेरुरनयोर्मध्ये ऋजुसूत्रं तत्र स्थिता देशा रेखाख्या लङ्कादक्षिणसूत्रस्थास्त्वनुपयुक्तास्तत्र मनुष्यागोचरत्वादिति नोक्ताः । ज्ञा- नार्थमुदाहरति । रोहीतकमिति । यथा रोहीतक नगरमवन्त्युजयिनी सन्निहित सरः कुरुक्षेत्रम् । चकारस्तथेत्यव्ययपरः । तथान्यानि परस्परं सन्निहिततया ज्ञेयानि ॥ ६२॥ मा० टी०-राक्षसालय भौर देवीक पर्वतकै मध्यमें जो सूत्र रोहीतक, भान्ती और फुरु- क्षेत्रादि स्थानके निफट दिया गया है। वहीं मध्य रेखा है ॥ १२ ॥ दैनिकमहमुक्तिकलादिर. ५९१ च ७९० ॥ ३० । म ३३।२६३शी २४ ५३३ पृ. ४॥ ५९ शु शी ९५1८श २।४ च-र. ६४१ रा. वक्र ३ । भूपरिधि ५० । ६. पोजन है।
ध्यायः १.] संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः । (३१) ननु येन स्वस्थानं रेखापुरात्पूर्वतोपरन वा कियद्योजनान्तरेणास्तीति न ज्ञायते तेन देशान्तरफलादिक कथं कार्यमित्यतः श्लोकत्रयणाह- अंतीत्योन्मीलनादिन्दोः पश्चात्तद्गणितागतात् ॥ यदा भवेत्तता प्राच्या स्वस्थान मध्यतो भवेत् ॥ ६३ ॥ अप्राप्य च भवेत्पश्चादेवं वापि न मीलनात् ॥ तयोरन्तरनाडीभिईन्याभूपरिधि स्फुटम् ।। ६४ ॥ पटया विभज्य लब्धेत्तु योजनः प्रागथापरैः॥ स्वदेशपरिपिज्ञेयः कुर्यादेशान्तरं हितैः ॥ १५ ॥ चन्द्रस्य सर्वग्रहणान्तर्गतोन्मीलनकालादिना, देशान्तरं गणितागताचन्द्रग्रह- णोक्तमकारगणितज्ञानात् । अतीत्य तत्कालस्यातिक्रमणं कृत्वा पश्चादनन्तरका- ले मन्दयोधार्थमिदम् । अन्यथातीत्य पश्चादित्यनयोरेकतरस्य वैयर्थ्यापत्तेः तचन्द्रबिम्बस्योन्मीलनं यदा यदीत्यर्थः । स्यात्तदा तहत्यिर्थः । स्वाभिमतस्था- नं मध्यतो मध्यरेखादेशात्पूर्वदिशि भवेत्तिष्ठतीत्यर्थः । पश्चात्तदित्यत्र हकासिद्ध- मिति पाठे तु प्रत्यक्षमुन्मीलनमित्यर्थः । अप्राप्य तदतिक्रमणमकृत्वा पूर्वकाल एव । चकाराचन्द्रोन्मीलनं यदि स्यात्तर्हि मध्यरेखातः स्वस्थानमित्यर्थः । प. श्वात् पश्चिमदिग्भागे भवेत्तिष्ठतीत्यर्थः। ननु चन्द्रस्य स्पर्शमोक्षसम्मीलनोन्मीलनकाले- पून्मीलनकाल एव कथं गृहीत इत्यत आह-एवमिति । वा प्रकारान्तरेण निमीलना- चन्द्रसम्मीलनकालात् । एवं चन्द्रग्रहणाधिकारोक्तगणितप्रकारज्ञानादनन्तरकाले सम्मी- लनं याद तर्हि मध्यरेखादेशात्स्वस्थानं पूर्वदिग्मागे तिष्ठति पूर्वकाले सम्मीलनं यदि तर्हि मध्यरेखादेशात्स्वस्थानं पश्चिमदिरमागे तिष्ठतीत्यर्थः । अपिशब्दो निश्चयार्थे । गेनोन्मीलनसम्मीलनकालयोर्भिन्नरीतियुदासः । तथा' चोन्मीलनग्रहणमुपलक्षणार्थ तत्रापि स्पर्शमोक्षयोग्रहणायन्तरूपयोरनिश्चयत्वसम्भावनयोक्तिमुपेक्ष्य ग्रहणमध्यस्थयोः सम्मीलनोन्मीलनयोनिश्चयत्वेनोक्तिः कृतेति भावः । अथ देशान्तरयोजनपुरःसरं देशान्तरफलं सिद्धमित्याह-तयोरिति । प्रत्यक्षोन्मीलनकालगणितागतोन्मीलनकालयोः सम्मीलनकालयोस्तादृशयोन्तिरघटीभिभूपरिधिस्पष्टं स्वदेशभूपगिधै लंबज्यान इत्या- द्यवगतं हन्यागुणयेत् । तादृशं गुणितस्पष्टपरिधिं पष्टया भक्त्वा लन्धैः प्राप्सर्योजनैः पूर्वभागयोजनः । अथायवा परैः पश्चिमविभागस्थितैयोजनैः स्वदेशपरिधिः स्वदेशस्य परिधिरवाधिः स्वदेशस्थानमण्डलरूपस्तुकारादेखादेदान्तरित इत्यर्थः । शेयो गणकेने- 1 अतीयोन्मीलनादिन्दोई भासद्ध गाणतागताद । इति वा पाठ (३२) सूर्यसिद्धान्त- [प्रथमोऽ- तिशेषः । स्वरेखावदेशयोरन्तरयोजनानि फलामेति फलितार्थः। तैरन्तरयोजनेर्देशान्तरं तेन देशान्तराभ्यस्तेत्यादिमागुक्तमकारण ग्रहाणां देशान्तरफलं कलात्मकं कुर्याद्गणक इति शेषः। हिकारांत्तत्संस्कारोप्यभिन्नप्रकारत्वादभिन्न इत्यर्थः । अत्रोपपत्तिः । विना देशान्तरसंस्कार ग्रहगणितं स्वरेखादेशीयं भवति । अतो गणितसाधितोन्मीलनसम्मी- लनादिकालाः स्वरेखादेशे सिद्धचंति । स्वदेशे पूर्वविभागस्थे प्रथम स्वस्य सूर्योदया- दिकालास्तदन्तर रेखाया इति चन्द्रग्रहणस्य सर्वदेशे युगपत्सम्भवात् । गणितागत- कालादेखादेशस्थादनन्तरं स्पर्शादिकालो भवति । एवं स्वदेशे पश्चिमविभागस्थे प्रथम रेखादेशेऽर्योदयादिकालास्तदनन्तरं स्वदेश इति रेवास्थगणितांगतस्पर्शादिकालाइटचा- त्मकात्पूर्वमेव स्पशादिकालो भवति । अतः सम्यगुपपन्नमतीत्येत्यादिसा श्लोकोक्तम् । स्वदेशरेखादेशसर्योदयाचवधिकघश्यात्मककालयोरन्तरं देशान्तरघटिकाः सिद्धाः सूर्यो- दयद्रयान्तरकालेनार्को भूपरिधैि कामतीति पष्टिसावनघटीमिर्भूपरिधियोजनानि स्वदे- शीयानि तदा तत्कालान्तररूपदेशान्तरघटीभिः कानीत्यनुपातेन स्वरेखादेशस्वदेशयो- रन्तरयोजनानि । ज्ञातेभ्यः एभ्यः पूर्वदिशैव देशान्तरं भवति । सूर्यग्रहणस्य सर्वदेशे युगपदसम्भवात्तदुन्मीलनकालादिनोक्तादिशा नैतज्ज्ञानमित्यनुरुक्तेरिति ध्येयम् ॥१३॥ ०६४ ॥६५॥ भाटी०-गणितमें पडेहुए चन्द्रग्रहणके पीछे जिस स्थानमें ग्रहण निक्लताहो वही स्थान मध्यरेखासे पूर्व दिशामें मोर भागे होनेपर पश्चिममें जानना चाहिये । प्रत्यक्ष और गणि तसे माये हुए काल के मनर दण्ड स्वभारिधिसे गुणकरके ६० से भाग करनेपर देशा- न्तर योजन प्राप्त होजायगे । तिनसे अपने देशकी भूपरिधि और देशांतरादि निर्णय घरना उचित है ।। ६३ ।। ६४ ॥६५॥ अथ वारप्रवृत्तिकालज्ञानमाह- वारप्रवृत्तिः प्राग्देशे क्षपाऽद्धेभ्याधिके भवेत् । तद्देशान्तरनाडीभिः पश्चादूने विनिर्दिशेत् ॥६६॥ रेखातः पूर्वभागस्थितस्वाभिमतदेने तद्देशान्तरनाडीभिः पूर्वप्रकारज्ञातदशान्तरना डीभिरभ्यधिवेऽर्धरात्रे युक्ताईरात्रसमयेऽर्धरावादनन्तरं देशान्तरघटीकाल इत्यर्थः। वार- प्रवृत्तिर्वारस्यादिभूतः कालः स्यात् । रेखातः पश्चिमभागस्थदेशे पूर्वप्रकारज्ञातदेशान्तर- घटीमिरूनेऽर्धरार्धरात्रात् पूर्वमेव देशान्तरघटीकाले वारमहति विनिर्दिशेदणकः कथ येत् । अत्रोपपत्तिः । यमकोटिसूर्योदयकालो लङ्कारानसमयरूपो ग्रहचारप्रवृत्तिरूपः सदेशे कदोते रेखावः पूर्यापरभागयो। स्वार्धरात्रकालादनन्तरं पूर्वक्रमेण तदईरानं देशान्तरघटीमिर्मवति । स्वनिरगदेशस्वदेशार्धरात्रयोयुगपत्संभवात् । अत उपपन्न ध्यायः १] संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतः । (३३) वारप्रवृत्तिरित्यादि । नन्वेतत्कालज्ञानं किमर्थमुक्तं प्रयोजनाभावादिति चेन्न । अहगणो. त्पन्नग्रहस्य तात्कालिकत्वात् तत्कालज्ञानेन स्वाधरात्रसमयस्य तत्कालस्य च यदन्तरं तेन तात्कालिकस्य ग्रहस्य चालने कृते सति स्वार्धरात्रसमये ग्रहः पूर्वसाधित एवं ‘भवतीति मन्दमत्ययस्यैव प्रयोजनत्वात् तत्कालज्ञानेन ग्रहस्य देशांतरसंस्काराकरणमिति लाघवाच । अतएव समनन्तरमेव ग्रहस्येष्टकालिकत्वसिद्धयथै चालनोक्तिः सङ्गच्छते । एतेन तत्ततोऽर्धरात्रात्क्षपाध निरक्षराव्यर्धे पञ्चदशघटिकात्मककाल उत्तरगोलेकोंदया. घरघटीमिताग्रिमकाले दक्षिणगोलेऽर्कोदयाचरघटीमितपूर्वकाल इति फलितम् । पूर्व- पश्चिमदेशयोर्देशान्तरघटीभिरधिकोने काले क्रमेण वारप्रवृत्तिरिति व्याख्यानं लङ्कासू- योदयकालरूपवारप्रवृत्तियोधकमपास्तम् । तच्छब्दस्य पूर्वपरामर्शकत्वार्धरात्रादित्यस्या- नुपपत्तेः पञ्चदशघटिकाकालस्य क्षपाईशब्देनासिद्धेश्च । श्रीभगवताहर्गणस्य लढाया- मार्द्धरात्रिक इत्यनेन लङ्कार्धरात्रकालिकत्वोक्तेः स्वदेशे तत्कालरूपवारप्रवृत्तिकालज्ञान- स्योक्तस्य सङ्गत्यनुपपत्तेः । व्यवहारोग्यलकासूर्योदयकालवारप्रवृत्तरत्र सङ्गत्यभा- वाच ॥६६॥ माल्टी-देशांतर घडीके अनुसार पूर्वदेशके मध्य मध्यरात्र में मिलानेसे और पश्चिम देशमै घटानेसे वार आदि निकल रिंगे ॥६६ ।।, अथ ग्रहस्य तात्कालिककरणमाह- इटनाडीगुणा भुक्तिः पश्या भक्ता,कलादिकम् । गते शोध्यं युतं गम्य कृत्वा तात्कालिको भवेत् ॥ ६७ ॥ यत्कालिको ग्रहस्तत्कालात्पूर्वमपरत्राभष्टिकाले या इष्टघट्यस्ताभिणिता ग्रहमध्य- गतिः पष्ट्या भक्ता फलं कलादिकं गते गताभीष्टकाले पूर्वकालेऽभीष्टे सतीत्यर्थः । शोध्यं ग्रहे हीनं गम्येऽग्रिमाभीष्टकाले सति ग्रहे युतं कृत्वा गणकेन विधाय तात्कालिक खाभीष्टसामयिको ग्रहो भवेत् । गणकेन ज्ञातो भवेत् । अत्रोपपत्तिः। पष्टिसावनघटीभिः गतिक्लास्तदाभीष्टगतैष्यघटीभिः का इत्यनुपातेनावगतकलात्मकवालनेन ग्रहः क्रमेण युतोनस्तात्कालिको ग्रहो भवति । चक्रशोधितपातस्य विपरतिामति ज्ञेयम् । चालित स्पष्टग्रहापेक्षया चालितमध्यग्रहः स्पष्टः कृतश्चेत्सूक्ष्म इति सूचनार्थमत्र ग्रहचालन- मुक्तम् ॥ ६७ ॥ भा०टी०-मुक्तिको इष्ट नोडोसे गुण करके, ६० से भागकरके फल जाननेपर योग और गत होनेपर वियोग (अलग) करनेपर तिस कालका ग्रह होगा ॥ ६७ ॥ अथ चन्द्रस्य परमविक्षेपमानमाह- भचक्रलिप्ताशीत्वंशपरमं दक्षिणोत्तरम् ॥ विक्षिप्यते स्वपातेन स्वक्रान्त्यन्तादनुष्णगुः ॥ ६८॥ मध्यरात्रसे अभीष्टदण्डकी अलगताका नाम इष्ट नाडी है। अभीष्ट दण्ड रे होनेसे दृष्टदण्ड निकरता है ३
(३४)
सूर्यसिद्धान्त:-
[द्वितीयोऽ-
अनुष्णगुश्चन्द्रः स्वक्रान्त्यन्ताद्विपुववृत्तानुकारेणावलम्वितश्चन्द्रः स्वासनकान्तिवृत्त-
प्रदेशेनाकृष्यते तथा तत्स्थानात् स्वभोगामितरेवत्यासन्नाधरधिकाभीष्टस्थानभूतक्रान्ति-
वृत्तप्रदेशादपि स्वपातेन चन्द्रपातेन दक्षिणोत्तरं दक्षिणस्यामुत्तरस्यां वा तत्सूत्रेण विशि-
प्यते त्यज्यते स्वभोगस्थानक्रान्तिवृत्तप्रदेशे चन्द्रविय स्थातुं पातेन न दीयते ततोऽपि
चन्द्रविवं स्थलान्तरे दक्षिणोत्तरसूत्रेण किश्चिदन्तरेण त्यज्यत इत्यर्थः । एतेन सूर्यस्य
पाताभावात्स्वभोगस्थानीयक्रान्तिवृत्तप्रदेशे विवं भवति न विक्षिप्तमित्यनुष्णगुरित्य-
नेनापि सूचितम् । परमविक्षेपणं दाक्षिणोत्तरमित्यस्य विशेषणान्याह-भचक्रोति । द्वादश-
राशिकलानां पट्शताधिकैकविंशतिसहस्रमितानामेपाम् २१६०० अशीतिमागः स्वस-
सयमकलामितः परमं यस्य तद्दक्षिणोत्तरमित्यर्थः । चन्द्रस्य परमो विक्षेपः स्वममित
इति फलितम् । केचिदत्र सूर्यस्य शराभावात्तत्यक्षानो भचक्रस्य पञ्चमकक्षात्वात् ततोऽ.
पिचन्द्रकक्षाया अष्टमत्वात तत्र दक्षिणोत्तरस्पदिग्द्वये चन्द्रस्य विक्षेपणात गंचाष्टद्धि-
घातरूपाशीत्यंशो भचकालिप्तानां परमचन्द्रविक्षेप इत्युपपत्तिमाहुः ।। ६८ ।।
मा० टी०-चन्द्रमाको पातसे भचक्र कला सख्या अस्सी माग, क्रान्तिसे उत्तर या पक्षिण-
में परम विक्षेप होता है । ६८ ॥
बथैवं भौमादयोऽपि स्वपातैविक्षिप्यन्त इत्येपामाप परमविक्षेपानाह-
तन्नवांशं द्विगुणितं जीवस्त्रिगुणितं कुजः ॥
बुधशुकार्कजा पातैर्विक्षिप्यन्ते चतुर्गुणम् ॥ ६९ ।।
तनवांशं तस्य चन्द्रपरमविक्षेपस्य नवभागं त्रिशतं द्विग्राणतं पटिकलामितं परमण
वदंतरेणेत्यर्थः । पातेन गुरुदक्षिणोत्तरयोः क्रमेण विक्षिप्यते । भौमः पातेन निगुणि-
तं त्रिंश नवतिकलाामतपरमांतरेण विक्षिप्यते चतुर्गुणं त्रिंशतं विंशत्यधिकशतकला-
मितपरमांतरण बुधशुकशनैश्चराः स्वस्वपातैः प्रत्येकं विक्षिप्यन्ते स्वभोगकान्तिवृत्तप्रदे-
शायज्यन्ते । केचिदत्रापि त्रयस्त्रिंशत्कला बिधाचंद्रान्नवांशद्विगुणेन सत्र्यंशकलास-
सकस्य गुरुविम्बस्य तद्रूप विक्षेपणं युक्तमस्माद्भौमस्याधास्थत्वात् त्रिगुणं परमविक्षेपण-
मस्मादपि बुधशुक्रयोलघुपृथुबिम्बयोरेधास्थत्वाचतुर्गुणं परमविक्षेपणं तुल्यं नाल्पाधि-
कमेवं शनेरुचकक्षास्थत्वेऽपि मन्दत्वाबूदुधशुक्रविक्षेपणतुल्यं परमविक्षेपणं युक्तमित्युप,
पत्तिमाहु ॥ ६९ ॥
माल्टी-तिसके नवाशसे दूना वृहस्पति, तिगुना मंगल, और चौगुने बंध शुक्ल व शनि
पासकर शिक्षित होते हैं ॥ ६९ ।।
नन्वेपामत्र कथने का सङ्गतिरित्यतः पूर्वोक्तमुपसंहरन्नाह-
एवं त्रिचनन्ध्राकरसार्काि दशाहताः ॥
चन्द्रादीनां क्रमादुक्का मध्यविक्षेपलिक्षिकाः ॥७॥
ध्यायः २.]
संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतः ।
एवं पूर्वश्लोकाभ्यां विधनः सप्तविंशतिरंध्राणि नव द्वादश पटू द्वादश द्वादशैते दशगु-
णिताः क्रमादुक्ताईक्रमाचंद्रादानां बारक्रमाचंद्रभीमबुंधगुरुशुक्रशनीनां विक्षेपकला भध्या .
अग्रे परमशरकलानामनियतत्वेनोक्तेः कथिताः । तथा च मध्यत्वेनपामत्र प्रसंगसंगत्या
कयनमिति भावः ॥७॥
भा० टी०-ऐसेमा २७, ९,१२६, १२, १२ के १० से गुण करके क्रमानुसार चन्द्रा-
दिमें विक्षेपकला होंगी ॥ ७० ॥
अथ पूर्वापरग्रंथयोरसंगतिनिवारणायाधिकारसमाप्ति फाकियाह-
इति सूर्यसिद्धान्ते मध्यमाधिकारः॥५॥
मयं प्रति सूर्याशपुरुपेण सूर्योक्तस्यैव कथनादेतदुक्तस्यापि सूर्यसिद्धान्तत्वम् । तत्र
मध्यममानेन गणितमधिक्रियते यस्मिन्नेतादृशो ग्रंथैकदेशः परिपूर्तिमाप्त इत्यर्थः ।।
रंगनाथेन रचिते सूर्यसिद्धान्तटिप्पणे॥ मध्याधिकारः पूर्णोऽयं तद्गूढार्थप्रकाशके।। इति
श्रीसक्लगणकसार्वभौमवल्लालदेवज्ञात्मजरंगनाथगणकावरचिते गूढार्थप्रकाशके मध्यमा-
धिकारः पूर्णः ॥ १॥
इति मथमाध्यायः समाप्तः ॥१॥
द्वितीयोऽध्यायः।
अथ स्पष्माधिकारो व्याख्यायते
तत्र ग्रहाणां मध्यमातिरिक्तस्पष्टक्रियायां
कारणमाद-
अदृश्यरूपाः कालस्य मूर्तयो भगणाश्रिताः॥
शीघ्रमन्दोच्चपाताख्या ग्रहाणां गतिहेतवः ॥ १॥
शीघ्रोचमन्दोचपातसंज्ञकाः पूर्वोक्तपदार्थजीवविशेषाः सूर्यादिग्रहाणां गतिकारण-
भूताः सन्ति । ननु कालेनैव ग्रहचलनं भवतीति कालो गतिहेर्नेत इत्यत आह-
कालस्यति । पूर्वप्रतिपादितकालस्य स्वरूपाणि तथा चैषां कालमूर्त्तित्वेन ग्रहगतिहे-
तुत्वे न सम्भवतीति भावः । ननु कालस्य घट्यादिमूर्त्तित्वादेषां तदात्मकत्वाभावात्कथ
कालमातत्वमित्यत आइ-भगणाश्रिता इति । भगोलस्थकान्तिवृत्तानुसृतग्रहगोलस्य.
क्रान्तिवृत्तप्रदेशाश्रिता राश्यात्मका इत्यर्थः । तथा च ग्रहराश्यादिभोगानां कालवशे-
नैवोत्पन्नत्वात् तदात्मकानां कालमूर्त्तित्वामिति भावः । ननु दृश्यन्ते कुतो नेत्यत आह-
अदृश्यरूपा इति । वायवीयशरीरा अव्यक्तरूपत्वादप्रत्यक्षा इति भावः एवं च ग्रहा-
णामुच्चादिसगावात्स्पष्टकियोत्पन्नति तात्पर्यम् ॥१॥
मा० टी०-शघ्रमन्दोच्चपात इत्यादि महरयरूपी, भगणाश्रित एककालकी मूर्ति मौर
ग्रहाँको गतिके हेतु हैं ॥ १ ॥
- । सूर्यसिद्धान्त:- [ दितीयोs- अथानयोल्यपातयोमध्योचयोर्गतिहेतुत्वं प्रानपादयति-- तदातरश्मिभिर्बद्धास्तेः सव्येतरपाणिभिः ॥ प्राक्पश्चादपकृष्यन्ते यथासन्नं स्वादिङ्मुखम् ॥ २ ॥ तेपामुच्चसंजकजीवानां वायुरूपा ये रश्मया रज्जवस्ताभिर्वद्धाविम्बात्मकग्रहास्तैरुच- संजकनविः सव्यवामहस्तैरुचवहुत्वेन हस्तनाहुल्याद्रहुवचनं हस्ताभ्यामित्यर्थः । स्वदिङ्मुखं साभिमुखं यथासन्नं ग्रहविम्यं भवति तथा प्राक्पश्चात् पूर्वपश्चिममार्गा- ज्यामित्यर्थः । अपकृप्यन्ते आकर्नान्ते । अयमभिप्रायः । भचकगोलस्थकान्ति- वृत्तानुसृतग्रहाकाशगोलान्तर्गतक्रान्तिवृत्ते कक्षारूप स्वस्थादेशे ग्रहोगपातास्तिष्ठन्ति । तत्र बिम्बव्यासोनकक्षाकारसूत्रं प्रबहाय्यतिरिक्तवायुरूपं खतो गतिस्वस्थ ने कम्प- मानं ग्रहविम्बव्यासे पूर्वापरे प्रोतमुचनीवहस्तद्वयान्तर्गतमस्ति । अथ ग्रहावम्बमु. वस्थानापूर्वस्मिन्वशत्या गच्छदापि वायहस्तास्थितसूत्रणाचस्थानात्पूर्वरूपेण ग्रह- स्थानात्पाश्चिमरूपण वृहत्सूत्रावयवात्मन स्वस्थानात्पश्चात् स्वाभिमुखमपकृष्यते निर- न्तरमुञ्चदेवतैः स्वगत्तया यावत् पडभान्तरं तयोः । अनन्तरं तन्मार्गणाकर्षणस- म्भवापूर्वस्मिन् गच्छद्रहविम्ब सव्यहस्तस्थितमुत्रेणावस्थानात् पश्चिमरूपेण ग्रहस्था- ना पूर्णरूपेण बृहसूत्रावयवात्मकेन स्वस्थानात्पूर्वस्मिन् स्वाभिमुखमाकृष्यते स्वात्त्या निरन्तरं यावदन्तगभावस्तयोगति ॥ २ ॥ भ० टी०-वह वायु (अदृश्य ) किरणों करके बाएं और दाहिने हाथमैं बैंच कर सन्मुख पूर्व या पीछे अपने स्थानसे ग्रहांवो ले जाते हैं ॥२॥ अयातएवैकरूपां पूर्वाधिकारावगतां गतिं त्यक्त्वा प्रत्यहं विलक्षणां गात प्राता महा इत्यन आह- प्रवहाख्यो मरुत्तांगस्तु स्वोच्चाभिमुखमीरयेत् ॥ पूर्वापरापकृष्ठास्ते गति यांति पृथाविधाम् ॥३॥ प्रहाख्यः प्रवहसंज्ञको मरुद्वायुः पाश्चमाभिमुखभ्रमस्तान्ग्रहान् तुकारादुच्चानि सोचा- मिमुखं स्वस्य प्रवहभ्रमेणेनाचं भावप्रधाननिर्देशादुयता यस्यां दिशि तत्स्योचं पूर्व- दिक्पूर्वभाग एव ग्रहाणां प्रवहभ्रमेणेशगमनदर्शनात् । तत्सम्मुसं पूर्वादेशोत्ति तात्प- यिः । ईरयेत् पश्चिमाभिमुखभ्रमणसिद्धप्रागुक्तग्रहावलम्बनरूपेण चालयतीत्यर्थः । यतः कारणाने ग्रहाः पूर्वापरापकृष्टा उचदेवतैः पूर्वपश्चिमदिशोराकृष्टाः पृथग्विधा प्रथमावर्गक्रूपभिन्नमकारावगतां प्रतिक्षणविलक्षणां गाते गमनक्रियां यान्ति प्रामु यन्ति । अवलम्बनाकर्षणाभ्यां प्रतिदिनं ग्रहाणां गतेरन्याशत्वं तदनुसारेण ग्रह- चरज्ञा युक्तमिति ग्रहाणां स्पटालियोपनो भावः । यहा। ननु वायुरज्जुभिः कथं
ध्यायः २]
संस्कृतीका-भापाटीकाममेतः ।
ग्रहाणामाकर्पणं सम्भवति तद्-जूनां विरलतया धनीभूतत्वाभावनाकपणामौम्यत्यादि-
त्यत आह । प्रवहात्य इति । उच्चदेवताहस्तद्वयस्थितकक्षाकारसूत्रं वायुः प्रबहवायु-
सम्बन्धात्मवहसंज्ञो न पश्चिमाभिमुखभ्रमप्रवहात्मकस्तान्ग्रहान्स्योचाभिमुखं सोचदवता-
स्थानसम्भुखमीरयेत् मेरयति चालयाते ! तुकारादुनस्थानात् पूर्वस्मिन्ग्रहे वायुः पाश्च-
मगत्या ग्रहं चालयति पश्चिमस्थे वायुः पृर्वगत्या ग्रहं चालयतीत्यर्थः । तथा च कक्षा.
कारसूत्रं तदा तदा तथा तथा भ्रमतीति दैवतैराकृष्यत इत्युपचारादुच्यत इति भावः
अतएव ग्रहाणां स्पष्टायोत्पन्नेत्याह-पूर्वापरापकृष्टा इति । उच्चदेवतः पूर्वापरदिश-
योरपकृष्टा ग्रहाः पृथाविधी मल्यमातिरिक्तप्रकारां गतिं गमनक्रियां यान्ति । अतो न
केवलं मध्याक्रियया निर्वाहः ।। ३ ॥
भा. टी-प्रवह नामक वयु ग्रहको पनी उची २ दिशामा लेनाता है । इस प्रकार
पूर्व पश्चिम दिशा में खींचकर पृ गतिको प्राप्त करता है ॥ ३ ॥
अथ प्राक्पश्चादपकृष्यन्न इयुचं विशदयति-
ग्रहात्माग्भगणाईस्थः प्राङ्मुखं कपति ग्रहम् ॥
उच्चसंज्ञोऽपरादित्यस्तद्वत्पश्चान्मुखं ग्रहम् ॥ ४॥
ग्रहस्थानात्पूर्वभागस्थरागपटकास्थित उच्चसत्रो जीवो ग्रहविम्ब पूदिगभिमुखं स्वा-
भिमुखं कर्पत्याकर्पति । आरियो ग्रहस्थानात्पश्चिमभागस्यराशिपट्रकस्थित उचसंज्ञो
जीव इत्यर्थः ।.ग्रहबिम्ब पश्चान्मुख पश्चिमदिगभिमुखं स्वाभिमुखं तवदाकर्पतीत्यर्थः ४॥
मा० टी०-पूर्व आधे भगणमे स्थित उच्चग्रहको पूर्वमें और दूसरे अमें स्थित ग्रहको
पाश्चममें खेंचता है।॥ ४॥
अथ पूर्वोक्तसिद्धं फलितमाह-
स्वोच्चापकृष्टा भगणैःप्रामुखं यान्ति यहाः ॥
तत्तेषु धनमित्युक्तमृणं पश्चान्मुखेषु तु ॥६॥
स्वोच्च जीवाकर्षिता ग्रहः पूर्वाभिमुखं भगणैराशिमिर्भगोलस्थकान्तिवृत्तानुसृतस्वा-
काशगोलान्तर्गतकान्तिवृत्ते द्वादशराश्यन्तिके यद्राशिविभागैरित्यर्थः । यद्यत्संख्यामितं
गच्छन्ति तत्तत्संख्यामिनं भ ादिकं फलरूपं तेषु पूर्वावगतग्रहराश्यादिभोगेषु धनं
योज्यम् । पश्चान्मुखेपु, पश्चिपाकतिग्रहपूर्वावगतराश्यादिभोगेषु तुकाराद्यसंख्यामितं
लरूपं पश्चिमतो गच्छन्ति तदित्यर्थः । ऋणं हीनमिति । एतत्पूर्वः कथितम् ॥ ५॥
भा० टी०-अपने उच्चसे खेचकर जब ग्रह पूर्वदिशामें जातेहैं। तय तिसमें धन विपरीत
पश्चिम दिशा में जाय तो माण होता है ॥ ५ ॥
अथ पातानां ग्रहविक्षेपरूपगतिहेतुत्वं प्रतिपादयति-
दक्षिणोत्तस्तोऽप्येव पातो राहुः स्वरहंसा ।।
विक्षिपत्येष विक्षेपं चन्द्रादीनामपक्रमात् ॥ ६ ॥
(३८) सूर्यसिद्धान्त:- [द्वितीयोऽ- चन्द्रादीनां विरविग्रहाणामपक्रमात् क्रान्तिवृत्तस्यस्पष्टग्रहमोगस्थानादक्षिणोत्तरतो दक्षिणस्यामुत्तरस्यां वा दिमि । अपिशन्नः पूर्वापगभ्यां समुथयार्यकः । एप गणि- तागतः पातः पातराश्यादिभोगस्थानम् । अत्राप्यपिगन्दा उच्चन समुच्चयार्थकोऽन्वेति । एवमुचेन पूर्वापरयाः फलान्तरं भवति तथेत्यर्थः । विशेष विक्षेपणं स्वरंहसात्मवेगेन विक्षिपति करोति । विशिष्टयाचकानां पदानां विशेषणाचकपदसमवधाने विशेष्यमा आर्थत्वात् । चन्द्रादीन्विक्षिपतीति तात्पर्यायः । ननूचेन स्वाधिष्ठितजीवद्वारा ग्रहाकर्षण क्रियते तथा पातेनाचेतनत्वादेगामावेन ग्रहविक्षेपणं कर्तुमक्यमित्यत आह-राहुरिति । पातस्थानाधिष्ठात्री देवता राहुजीवविशेषश्चन्द्रपातस्तु दैत्यविशेषो राहुः । रहति त्यजाते ग्रहामिति राहुरिति व्युत्पत्तेः ॥ ६ ॥ मा०६०-अपने यलसे पातामा राहु, यहाँका दक्षिण व उत्तरदिशा में विक्षिप्त परता है। क्रान्तकृत चन्द्रादिक निक्षेपको निक्षेप कहते हैं ॥६॥ अमृतशिदयति- उत्तराभिमुखं पातो विक्षिपत्यपराद्धंगः ॥ X ग्रहं प्राग्भगणार्द्धस्थो याम्यायामपकपति ॥७॥ अपरागो ग्रहस्थानात्पश्चिमविभागास्थतभगणार्धात्मक राशिपट्कस्थितो राहुम्रह- विम्बं स्वराश्यादिमोगस्थानीयप्रदेशादुत्तरदिगभिमुखं विशिपति विक्षेपान्तरेण त्यजति । प्रारमगणार्धस्थः ग्रहस्थाना पूर्वविमागस्थितराशिषट्रकमध्यस्थितो दक्षिणस्यां दिश्यप- कति विक्षिपति ॥७॥ भा०टी०-पश्चिमके माधे भगणमें गये हुए पात नको उत्तराभिमुखमै मोर पूर्वके माथे मगण में स्थित ग्रोको दक्षिण दिशामें संचता है ।। ७ अथ बुधशुक्रयाोवेशेषमाह- बुधभार्गवयोः शीघ्रात्तद्वत्पातो यदा स्थितः॥ तच्छीमाकर्षणात्तौ तु विक्षिप्येते ययोक्तवत् ॥८॥ बुधशुक्रयोः शीघ्रोच्चाजात्यभिप्रायेणेकवचनम् । बुधशुक्रयोः पातो जात्यभिप्रा- यणक्यचनम् । तद्वत्पराधपूर्वार्धभगणार्धमध्ये यदा यत्काले स्थितस्तुकारात यत्काले पाताभ्यामित्यर्थः । तो बुधशुको यथोक्तवत्पूर्वार्धपरार्धक्रमेण दक्षिणोत्तरयोविक्षिप्येते विशेषान्तरेण त्यज्ये- ते। तनुशात्तागवस्थितपातौ सम्बन्धामावावुधशुक्रौ दक्षिणोत्तरयोः कथं त्यजतो न्यथा वैयाधिकरण्येनातिप्रसङ्गापरित्यताकारणमाह-तच्छीमाकर्पणादितेि । बुधशु- अयोगीघोचे तयोराकर्षणाम्यां जात्यभिप्रायेणेकवचनम् । तथा च तदुच्चाभ्यां तागव- स्थितपाती तदुश्चजीवी दक्षिणोत्तरयोस्स्यजत इति पूर्वोक्तरीत्या न्यायासैद्धमत्तस्तदुच- ." ................
ध्यायः २.] संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतः। सूत्रबद्धत्वावुधशुक्रयोस्तथा विक्षेपणं न्यायसिद्धमेति भावः । ननु भौमगुरुशनीना- मेयं कथं नोक्तमनयो कथमेतदुक्तं सर्वपामेकरीतिकयनस्य समुचितत्वात् । किञ्च गुरुभीमानीनामुञ्चदवेताः स्वस्वकक्षास्था इति फलमुपपन्नं भवति बुधशुरुयोरुचदेव- वतयोः कक्षतो दक्षिणोत्तरयोः स्थितत्वेन पूर्वोक्तरीत्या फलानुपपत्तिविलक्षणमवहवायु- सूत्रस्थदेवतासम्बद्धस्य स्पष्ट पारध्याकारत्वेन कक्षाकारत्वाभावात् । विना कक्षाकारतां फलोत्पादनस्य ब्रह्मणोऽप्यशक्यत्वाच । न च विलक्षणप्रवहवायुसूत्रं देवतासम्बद्धं ग्रहा. काशगोले कक्षाकारत्वाभावेऽपि कक्षातुल्य स्थानांतर इति फलोत्पत्तिर्याम्योत्तरान्तर- सत्त्वेऽपि कल्पनयेति वाच्यम् । उच्चदेवतास्थानस्य कक्षातो दक्षिणत्वे तत्पड्मान्तरम. देशस्योत्तरत्वावश्यसम्भावनोगबुधशुक्रयारकदिग्विक्षेपतुल्यत्वनियमानुपपत्तेः। तत्कय- मिदं सङ्गत भगवदुक्तमिति चेत् । अत्रोच्यते । स्वरुच्या सङ्गतार्थमङ्गीकृत्य तड्पणो. द्वादनेन भगवदुपालम्भनकर्तृ रसनाच्छेदस्तत्तत्वार्थप्रकाशेनावश्यं करणीयः । तथाहि वशीघ्रोचाबुधशुक्रयोर्यदन्तरं राश्यात्मकं तद्वत्पातस्येनान्तरेण युक्तः पूर्वातीतपात इत्यर्थः । यथा बुधशुक्रयोरपरपूर्वार्धक्रमेण स्थितोऽवस्थितः तुकरात्तथेत्यर्थः । ती- घार्पणात्ताशपाताभ्यां शीघ्रयगेनाकर्षणं तस्मात्पातस्थानाधिष्ठातृदेवताभ्यां स्वहस्त- स्थितग्रहसंबद्धवापुसूत्रस्यातिवेगाकर्षणरचनादित्यर्थः । तो बुधशुकाबुक्तवदुत्तरद- क्षिणक्रमेण विक्षिप्यते । अब पातशब्देन चक्रशोधितपातो वोध्यः ।। अन्यथा ग्रहो शीघ्रोचरूपकेन्द्रयोजनस्योपपत्तिसिद्धत्वेन शीघोचोनग्नहरु केन्द्रयो जनोक्त्यनुपपत्तः । तया । च सर्वग्रहसाधारणं विक्षेपकयनं पातभददार्थ बुधशुक्रगोः पृथगुक्तम् । नद्यन्यस्मिन्पक्ष उशयोविक्षेपणं प्रतीयते येन प्रागुक्त सर्वविलोपाशंकनं शंकनीयम् । पातभेदोक्तिकारणं च “ये चात्रपातभगणाः कथिता जभग्योन्ते शीघकेन्द्रमगणैरधिका यतः स्युः । स्वल्पाः मुखार्यमुदिताश्चलकेन्द्रयुक्ती पाती तयोः पठितचक्रमा विधेयौ ॥” इति भास्कराचार्योक्तमिति दिक् ॥ ८॥ भान्टी-बुध और शुक्रर मात, शीघसे पहली की हुई शतिकरके स्थित होनेपर शीघर- फ.पण हेतुमे पहलेकी समान विक्षिप्त होता है ॥ ८ ॥ स्पादेतत्परमुघदेवतयोरविशेषात्सूर्यचन्द्रयोः समं फलं कुतो न भवतीत्यत आह- महत्त्वान्मण्डलस्यार्कः स्वल्पमेवापकृष्यते ॥ मण्डलाल्पतया चन्द्रस्ततो वह्वपकृप्यते ॥ ९ ॥ सूर्यो मण्डलस्य विवस्य महत्वाद्दुरुत्ववचात्स्वल्पमितरग्रहापेक्षयाल्पं परमफलम् एवकारो निर्धारणेऽपकृप्यते उपजीवेनापकृप्यते । चंद्रो मण्डलाल्पतया विम्बस्य लघु. त्वेन ततः सूर्यफलाद्रहाधकं परमफलमुच्चजीवनाकृप्यते ॥९॥ मा० टी०-सूर्यमंडल अधिक भारी होने से कम खिंचता है, चंद्रमा सस्प होनेसे मषिक साँचा जाता है ॥ ९॥ न
(४०)
सूर्यसिद्धान्त:-
[ द्विनीयो-
अथातएव भौमादीनामल्पमूविवादाभ्यां फलाधिकत्वं सम्भवतीत्याह-
भोमादयोऽल्पमूर्तित्वाच्छीघ्रमन्दोच्चसन्चकः ॥
देवरपकृष्यते सुदूरमतिवेगिताः ॥ १० ॥
भौमादयः पञ्चमहा अल्पमृतित्वालधुतरविंवत्वाच्छीघ्रमंदोचसञ्जकैः शीघ्रोचमंदोच-
संज्ञेवतैः सुदरमत्यंतं वदपकृष्यते । अतएवातिदोगता अत्यंतवेग संजातो येषां ते वि-
घलघुत्वेनोवद्रयार्पणेन च बहुपरमफला इत्यर्थः । ननु सूर्यचंद्रयोः कक्षाकारविलक्षण-
प्रबहवायुचलनेन फलोत्पादनं युक्तं भौमादीनां तु प्रत्येकमुच्चद्रयसद्भावाद्वायुरश्म्याकर्ष-
णासम्भवेन कक्षाकारमवहविलक्षणवायुचलनेन फलोत्पादनार्थमंगीकृतं कथं सम्भवति ।
उच्चद्वयस्थानस्यैकत्वाभावान्नह्येकमेव वायुमण्डलं युगपारेरुद्धगत्योराश्रमं स्वतो भवितु-
महतीति चेन्न भौमादीनां शीघ्रमंदोचदेवतायेन तत्सूत्रमार्गेण ग्रहविम्बाकर्पणस्यैव
शक्त्यारचनात् । न वायुमण्डलवलनकल्पनं सूर्यचंद्रयोरप्येवमेवांगीकारे वाधकामा
वि। वायुमण्डलकल्पनं तु तदातरश्मीत्युक्त्वानुपपत्त्या नातिप्रयोजनम्। तदातरश्मिाम
डा इत्यस्य पश्चिमभ्रमात्मकमवहनायो स्वस्थाकाशगोले समसूत्रसम्बन्धेन स्थिती
इति ग्रहस्थितिस्वरूपोक्त्यासमर्थनात् । नाहि तदन हेतुगर्भ येनानुपपत्तिः शंकनीया ।
उचदेवताकल्पनेनाकाशस्थग्रहाणां तथातयां स्वशक्त्या तदाकर्षणात्फलद्वयसंस्कार-
कफलोत्पादनं संगच्छते । अतएव सूत्रं ग्रहविवप्रोतकक्षाकारामेति कल्पनमपि
निरस्तम् । उच्चद्वयात्तल्यकर्षणेन विरुद्धकपणेन यः सूत्रमण्डलमंगापत्तीरति ॥ १० ॥
मा० टी०-मंगल मादि छोटी मूर्तिबाले होनेके कारण से शीघ्रमन्दोच्च देवताओंकरके दूर
खिचे जाते और अति शीघ्र चलते हैं ॥ १० ॥
अथैतदुपसंहराति-
अतो धनणे सुमहत्तेपां गतिवशाद्भवेत् ।।
आकृष्यमाणास्तवं व्योनि यान्त्यनिलाहताः ॥१२॥
अतः पूर्वोक्तसुदराकर्षणप्रतिपादनात्तेपां भौमादीनां गतिषशादाकर्षणोत्पन्नचल-
नक्शात्सुमहदत्यधिकं फलं धनर्णं स्वाचापकृष्टेत्यादिना भवति । नन्वारूपणोत्पनचल-
नं कथं न प्रत्यक्षामित्यत आह-आकृष्यमाणा इति । तैरुचपातदैवतेखेमुक्तमकारेणा-
कृष्यमाणा आकर्षिता एते भौमादयो व्योन्नि स्वस्वाकाशगोलेनिलाहताः पश्चिमाभिमु-
खानवरनमवहवाय्वाधाता यान्ति गच्छन्ति । तथाचावलम्बनोत्पन्नपूर्वगतिर्ययानमत्य-
क्षा तथा पूर्वगतिविकृत्यात्मकमेतदाकर्षणचलनमानयतं प्रबहवायुभ्रमणप्रावल्यादप्रत्य-
क्षमिति भावः ॥११॥
'भा० टी०-इस चालकै वशते उनका धन और प्रण भरपन्त भधिक होता है । इस प्रकार
आकाशमार्गम खिंचते हुए होकर पवनो सहारेसे चलते हैं ॥ ११ ॥
घ्यायः २]
संस्कृतटोका-भापाटीकासमेतः ।
(४१)
अथवं गातकारणसञ्चयैहाणां भौमादीनां फलिते का गतिरष्टभेदात्मिकत्याह-
वकानुषका कुटिला मन्दा मन्दतरा समा॥
तथा शीघ्रतरा शीघ्रा ग्रहाणामष्टधा गतिः ॥ १२ ॥
भौमादिग्रहाणां विरविचंद्राणामष्टप्रकारों गतिः फलिता । तत्र वक्रेत्यादिसमेत्य-
न्तं पटूप्रकारा गतिः शीघ्रतरा शीति गतिद्वयम् । तथा समुच्चये । आसां स्वरूपज्ञा-
नमने स्फुटम् ॥ १२ ॥
भा० टी०-चक्र, अनुवक कुटिळ, मन्द, मदन्तर, सम, शीघ्र, शीघतर यह आठ प्रकारकी
गीत है ॥ १२॥
अथनामदधा गति भेदद्वयेन कोडयति-
तत्रातिशीघ्रा शीघ्राख्या मन्दा मन्दतरा समा॥
ऋग्वीति पञ्चधा ज्ञेया या वका सानुवनगा ॥ १३ ॥
तत्राष्टविधगतिष्वतिशीघेत्यादिसमेत्यन्ता इत्येवं पञ्चधा गतिः, । ऋज्वी मार्गों.
गतिया या गतिः सानुवरगानुवनगमनेन सह वर्तमाना पूर्वश्लोकेऽनुवक्रगतेक्रकुटिल-
मामध्यामिधानादुभयथासन्नत्वाञ्च वक्रानुवक कुटिलेति गतिर्वका ज्ञेया तथा च ग्रहाणां
गी वक्रेति गतिद्वयम् ॥ १३ ॥
माष्टी-तिनमें मतिशीघ्र, शीघ्र, मन्द, मन्दतर और सम पद पांच सीधी गति है,
कुटिल, वक्र मार मनुवक यह तीन पक्रगति है ॥ १३॥
अथ ग्रहाणां स्पष्टकियां प्रतिजानीते-
तत्तदतिवशान्नित्यं यथा दृक्तुल्यता ग्रहाः।।
प्रयांति तत्प्रवक्ष्यामि स्फुटीकरणमादरात् ॥ १४ ॥
नित्यं प्रत्यहं तत्तद्गतिवशात्तास्ता गतय एकास्मन्दिने शीघ्रा परदिनेऽतिशीघ्रत्यादि.
ना यस्मिन्दिने या गतिस्तत्सम्बन्धानुरोधादित्यर्थः । ग्रहाः सूर्यादयो यथा येन
प्रकारेण क्तुल्यता वैधितग्रहसमतां गच्छन्ति तत्तादृश स्फुटीकरणं स्पष्ट कियागणि-
तप्रकारमादरादत्यन्ताभिनिवेशादेतेनासंगतत्वनिरासः। प्रवक्ष्यामि सूक्ष्मत्वेन कथ-
यामि ॥ १४ ॥
भान्टो०-इन गतियों के वश होकर ग्रह सदा दृक्नुल्यता प्राप्त करते हैं। इस समय पही
स्पष्टीकरण मादरसहित कहूंगा ॥ १४ ॥
अथ तत्र प्रथमं ज्यासाधनाथ ज्यापिण्डान्वितस्तदानयनं श्लोकाभ्यामाह-
राशिलिप्ताष्टमो भागः प्रथमं ज्यामुच्यते ॥
तत्तद्विभक्तलधोनमिश्रितं तद्वितीयकम् ॥ १५ ॥
(४२) सूयासद्धान्तः- [द्वितीयो- आद्यनवं कमात्पिण्डान्भक्त्वा लब्धोनसंयुताः ॥ खण्डकाः स्युश्चतुर्विंशज्ज्यापिण्डाः क्रमादमी ॥ १६ ॥ एकराशेकलानामधादशशतानामष्टमोऽशस्तत्त्वाशिमितः प्रथममायं धं संपूर्ण जीवाईपिण्डका कथ्यते तदभिज्ञैः । ततः प्रथमज्यार्धात्तेन प्रथमज्याधे- न भक्ताल्लब्धेन हीनमन्यस्याप्रसंगात्मथमज्यामनेन युक्तं तत्पथमज्याधैं द्वितीयकं ज्या भाति । द्विगुणप्रथममेकोनम् । तृतीयादीनामानयनार्थमुक्तमका- रमातेदिशति-आयेनोते । प्रथमज्याधीपण्डेन । एवमुक्तरीत्या क्रमात्सिद्ध- पिण्डान्भक्त्वा लब्धैरूनमाद्यं खण्डमनेन युताः खण्डका असिद्धा व्यवहितसि- ज्यापिण्डा आसझपिण्डा भवन्ति । यथा प्रथमखण्डं २२५ प्रथममक्तं फलं १ द्वितीयखण्डं ४४९ प्रथमभक्तं फलं द्वयम् २ अर्धाधिकावयवस्यैकाधिात्वे. न ग्रहस्य साम्प्रदायिकत्वात् । फलैक्योनं प्रथमम् २२२ अनेन द्वितीयखण्डो ४४९ युतस्तृतीयम् ६७१ एवमिदं प्रथमरवण्डभक्तं फलम् ३ अनेन पूर्वफलैक्यं ३ युतं जातं ६ सर्वफलैक्यमनेन प्रथम खण्डं हीनम् २१९ अनेन तृतीयं ६७१ युतं चतु- र्थम् ८९० एवमिदं प्रथमखण्डमक्तं फलं ४ पूर्वलब्धैक्योनमथमखण्डरूपं २१९ ज्या- न्तररूपखण्डकमनेन ४ हीनम् २१५ अनेन चतुर्थ युतं पञ्चमम् ११०५ एवम- ग्रेऽपि । चथोक्तरीत्या संख्यखण्डानां सम्भवाखण्डनियममाह-स्युरिति । एवं चतुर्विशत्संख्याका ज्यापिण्डाः कार्या न तदधिकाः । अत्र । एकविंशाच विंशाच पष्ठात्पञ्चदशादपि ॥ सप्तमावादशात्सप्तदशान्ना|त्तरं मतम् ॥ इति ब्रह्मसिद्धान्तोक्तस्थलेर्धाधिकावयवस्यकाधिकत्वेन न ग्रह इति ध्येयम् । ग- णितस्याविकृतत्वात्सिद्धाः ग्डाः कथं नोक्ता इत्यत आह । दिति । अभी सिद्धाः पिण्डाः क्रमात्समनन्तरमेवोच्यन्ते । अत्रोपपत्तिः ।, समायां भूमौ वृत्तं भग- णकलांकितं तिर्यगूर्ध्वाधरण्यासमितरेखाभ्यां चतुर्भाग कार्य तत्रोवरेखासक्तपीरधिमदे- शादुभयत्र समविभागं विगणय्य तदअयोद्धं सूत्रं वृत्ते द्विगुणविभागामतसम्पूर्ण- चापस्य सम्पूर्णज्या । अत्र गणितऊवरेखातोऽर्धज्याया एव प्रयोजनात्तदर्धचापस्य तदर्धमर्धज्या । एवं वृत्तचतुर्थांश उर्वरेखातोऽभीयाशानां चापाकाराणामर्धज्या अभीष्टा गण्याः । तत्रभगवता स्वेच्छया वृत्तचतुर्थाशे त्रिराशिमिते चतुर्विशज्ज्याः कल्पितास्तज्ज्ञानं तु वृत्ते चमकलानामंकितत्वात्तत्पौराधिव्यासाध त्रिशिज्यान्तिमा । भनन्दामिमितपरिधी खवाणसूर्यमितो व्यासस्तदा चकलापरिधी क इत्यनुपातेन व्यासानयनम् । यथा चक्रालाः २१६०० खबाणसूर्यगुणा: २७०००००० भन- न्दानि ३९२७ भक्ता व्यासः ६८७६ एतदर्धमन्तिमाज्या ३४३८ अथ वृते चापज्ययोविवेके तयोरतुल्यत्वमपि भगवता कोऽपि वृत्तभागः समोऽस्त्यन्यथामल- ध्यायः २] संस्कृतटीका-भाषादीकासमेतः । " कादौ सर्पपाद्यवस्थानं न स्यादिति मत्वा तद्गागस्य ज्या तत्तुल्यैवेति । " वृत्तस्य पण्णवत्यंशो दण्डवदृश्यते तु सः ॥ इति शाकल्योक्तः । प्रथमज्याचक्रकलाबाद- शांशरूपैकराजिकलानामष्टभागस्तत्त्वाश्चिमितः । एतन्मितमेव प्रथमचापत एत- दन्तरेणाभीष्टाज्याश्चतुर्विशत् । अर्थ चतुर्विंशतिजीवानां यथोत्तरमुपचयात्तदन्तर- रूपखंडानां यथोत्तरमपचयस्य वृत्तेज्यांकनेन प्रत्यक्षवाज्यान्तररूपरवंडानामन्तरे यंयोत्तरमुपचितामति द्वाविंशतित्रयोविंशतिचतुर्विंशतिज्यानामन्तरयोरन्तरमिदं परमं खंडान्तरं सूक्ष्मज्योत्पत्तिप्रकारेणावगतम् १५ । १६ । ४८ । अथ त्रिज्ययेदं, खंडकान्तरं तदा प्रथमज्यया किमित्यनुपातेन फलप्रमाणयोः फलेनापवर्त्य प्रमाण- स्थाने तत्त्वाश्विनोऽनेन भक्ताः प्रथमज्याफलं पूर्वद्वितीयखंडयोरन्तरम् । अनेन पूर्वखंड होनं द्वितीय खंडं भवति । तत्र पूर्वखंडं प्रथमज्यातुल्यमेव । द्वितीयखंड प्रथम- ज्यायां युतं द्वितीयज्या । एवमस्यास्तत्त्वाश्विभागलब्धं द्वितीयतृतीयखण्डकयोरन्तरम- नेन द्वितीयखण्डमूनं तृतीयखण्डमित्यनेन द्वितायज्यायुता तृतीयज्या । एवं चतुर्या- याः । तत्र पूर्वमर्धाभ्यधिकग्रहणेनोत्तरत्राधिकान्तरपातसम्भावनया क्वचित् कचिदर्धाः भ्यधिकावयवस्यैकाधिकत्वेनाग्रह इत्युपपन्नं श्लोकद्धयम् ॥ १५ ॥ १६ ॥ भा०टा० राशिकलाका (१८८०) मष्टमभाग प्रथम ज्याई है । तिमको तिसकरके भाग करके, भाग फलहीन करके पूर्वके साथ मिलानेसे दूसरा ज्या है ॥ १५ ॥ विगत- पिण्डोको क्रमशः आदि २२५ से भागलब्ध एकत्र कर २२५ से अलग कर तिरुको पूर्व सण्डमें मिलानेसे खण्ड होंगे। इस प्रकार निम्नलिखित २४ ज्याई पिण्ड नियत होंगे ॥ १६॥ अर्थताः सिद्धाः श्लोकपट्केन कथयतुत्क्रमज्यापिण्डज्ञानमाह- तत्त्वाश्विनोऽकाब्धिकृता रूपभूमिधरतवः ॥ खांकाशे पंचशून्येशा वाणरूपगुणेन्दवः ॥ १७ ॥ शून्यलोचनपश्चकाछिद्ररूपमुनीन्दवः ।। वियचन्द्रातिधृतयो गुणरंध्राम्बराश्विनः ।। १८ ॥ मुनिपड्यमनेवाणि चन्द्राग्रिकृतदरकाः ॥ पञ्चाएविषयाशााण कुलविनगाश्विनः ॥ १९ ॥ रन्ध्रपञ्चाष्टकयमा वस्वयंकयमास्तथा। कृताशून्यज्वलना नगादिशशिवह्रयः ॥ २० ॥ पंटूपञ्चलोचनगुणाश्चन्द्रनेत्राशिवह्नयः ।। यमादिवह्निज्वलना रन्ध्रशून्यार्णवामयः ॥ २३ ॥ .
सूयोसद्धान्त:-
[हितीयोs-
रूपानिसागरगुणा वस्वामिकृतवह्नयः ॥
प्रोड्योत्क्रमेण व्याहार्धादुत्क्रमज्यापिण्डकाः ॥ २२ ॥
तथा समुच्चये । एतानुक्तान्क्रमज्यापिण्डान् । उत्कमेणोपान्त्यपिण्डादिप्रथमाप
ण्डान्तं प्रत्येकं व्यासार्धात्रिज्यारूपपरमपिण्डात्प्रोझ्य न्यूनीकृत्य क्रमेणोत्क्रमज्यार्ध-
पिण्डा भवन्ति । यथा त्रयोविंशतितमं ज्यार्धमुक्त रूपाग्निसागरगुणा इति वस्वग्निक
तवद्य इति चरमपिण्डादून सप्रथम उत्क्रमज्यापिंडः । एवं द्वाविंशतितमं चरमाच्छुद्ध-
द्वितीय उत्क्रमज्यापिण्डः । एवमग्रेऽपीति चतुर्विशदुत्क्रमज्यापिंडाः । अत्रोपपत्तिः ।
ज्याचापयोर्वाणरूपमन्तरमुत्क्रमज्या । यद्यपि पूर्वार्द्रज्यावदाणस्यार्ध न सम्भवतीत्यु
क्रमज्यापिण्डा इति वक्तमुचित नोत्क्रमज्यापिण्डा इति । तथापि भगवनानुगतपरि-
मापार्थ चापबाह्यशरानाभावेनोकमज्यायाः पूर्णशरांशत्वादुत्क्रमज्यामि-युक्तम् । अथ
वृत्तचतुर्थाशे सर्वज्याङ्कनेन यदंशानां ज्यात्रिज्यातो हीना तत्कोटचंशानामुत्क्रमज्येति
स्पुटं दृश्यते अत उक्तज्यार्धक्रमणोलमज्याज्ञानार्थ व्युत्क्रमेण त्रिज्या शुद्धा उक्त
पिंडा उत्क्रमज्यापिण्डा इत्युपपन्न प्रोझयेत्यादि ॥ १७ ॥ १८ ॥ १९ ॥ २० ॥
॥२१ ॥ २२ ॥
अथ श्लोकपञ्चकेनोत्नमज्यापिंडान्पूर्वोत्तसिद्धानिवनाति-
मुनयो रन्ध्रयमला रसपटका मुनीश्वराः ।।
ब्यटका रूपपड्दनाः सागरार्थहुताशनाः ॥ २३ ॥
खत्वेदा नवाद्यर्था विनगाव्यर्थकुञ्जराः॥
नगाम्बरवियच्चन्द्रा रूपभूधरशङ्कराः ॥२४॥
शरार्णवहुताशेका भुजङ्गाशिदवः ॥
नवरूपमदीधेका गजेकांकनिशाकराः ॥२५॥
गणाश्विरूपनेत्राणि पावकामिगुणाश्विनः ।
वस्वर्णवार्थयमलास्तुरङ्ग नगाश्विनः ॥ २६ ॥
नवाएनबनेत्राणि पावकेकयमानयः ।।
मजानिसागरगुणा उत्क्रमज्यापिण्डकाः ॥ २७ ॥
एत उत्तमज्यापिण्डाः पूर्वसिद्धा निबद्धा महीधः पर्वतो भुजज्याभावे कोटयुत्म-
ज्यायाः परमत्वाचन्यज्योना त्रिज्या परमोत्क्रमज्यापिण्डस्त्रियाया उभयत्र परमत्वेना-
सिद्धमन्त्यपिण्डत्वं वेति ध्येयम् ॥ २३ ॥ २४ ॥ २५ ॥ २६ ॥ २७ ॥
२ ३ ध्यायः २] संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः । (४५) ध्यासंख्या ज्यापिण्ड उत्तम ज्यासंख्या ज्यापिण्ड क्रम ज्यासंख्या न्यापिण्ड उत्क्रमः २२५ ९ १७ ३०८४ १९९८ ૨ ४४१ २२ २०९३ ७१० ३१७७ २१२३ ६७१ ६६ ११ २२६७ ८५३ ३२५६ २३३३ १२ २४३१ १००७ २० ३३२१ २५४८ २५८५ ११७१ २१ ३३७२ २७६७ ६ १३१५ २६१ १४ २७२८ १३४५ ३४०९ २९८९ ३४३१ ३२१३ २७१९ ४६० १६ २९५८ १७१९ २४ ३४३८ ३४३८ अथ प्रसंगात्परमक्रान्तिज्यां वदन्क्रांत्यानयनमाह- परमापक्रमज्या तु सप्तरन्ध्रगुणेन्दवः ॥ तद्गुणाज्या त्रिजीवाप्ता तच्चापं कान्तिरुच्यते ॥ २८ ॥ ब्यूनं चतुर्दशशतं १३९७ परमक्रांतिज्या तुकारामतुर्विंशत्यंशानां वक्ष्यमाणज्यान- यनप्रकारसिद्धत्यर्थः । अभीष्टाज्या परमक्रान्तिज्यया गुणिता त्रिज्यामक्ता फलस्य व- क्ष्यमाणप्रकारेण धनुः क्रांतिः कलात्मिका तत्त्वज्ञः कथ्यते । अत्रोपपत्तिः । विपुष त्तात्क्रांतिवृत्तमागस्य याम्योत्तरस्यान्तरं ध्रुवाभिमुखवृत्ताकारसूत्रे क्रान्तिः । तत्र साय- नमेपतुलादिस्थाने तयोरन्तराभावात् । कर्कमकरादी तयोः परमान्तरत्वादभीष्टमुजज्या- वशात्क्रान्तिरुपपन्नेति त्रिज्या तुल्यभुजज्यया परमकांतिज्या तदेष्टभुजज्यया केत्य नुपातेन फलं ध्रुवाभिमुखसूत्रे तदन्तररूपार्धचापस्यार्धज्याविषुववृत्तोर्ध्वाधरमध्यसूत्रा- त्तचापं तदन्तरकलात्मिका क्रान्तिः ॥ २८ ॥ मा० टी०-परमापक्रमज्या १३९७ इसको इसकी ज्यासे गुणकरके त्रिज्या ( ३४३८)से भाग करनेपर क्रान्तिज्या होगी। इसको धनु करनेसे क्रान्ति होगी ।। २८ ॥ अय फलानयनाथ केंद्रपदाटुजकाोटज्ये काय इत्याह- ग्रहं संशोध्य मन्दोच्चात्तथा शीघ्रादिशोध्य च ॥ श केन्द्रपदं तस्माद्धजज्याकोटिरेव च ॥ २९ ॥ ग्रह राश्यादिकं मन्दोचात्मागानीतस्वकीयराश्यादिकमन्दोचमोगात् संशो- ध्योनीकृत्य शीघ्रात्मागानीतराश्यादिशीघ्रोचात् । चः समुच्चये। ऊनीकृत्य शेपं राश्या- त्मकं तथोचसम्बन्धेन केन्द्रं मन्दोचाद्धीनो ग्रहो मन्दकेन्द्रम् । शीघ्रोच्चाद्धीनो ग्रहः शीघ्रकेन्द्रं भवतीत्यर्थः । तस्मात्केन्द्रात्पदं राशिवयात्मकं विपमं समं पदं ज्ञेयम् । , एकादि प्यासस्याके प्रमसे अपरमया ५१,१८२, २७३, ३६२, ४४९, ५३१, ६१८, ६९, ७७६, ८५०, ९२, ९८८, ३०५०, १७, १६९, १२१०, १२५३, १२९१, १३२३, १३४१,' ११०, १३८८,३३९५, १३९७ ॥
मा० सूर्यसिद्धान्तः- [द्वितीयोऽ- निगश्यन्तर्गतं चेत्मथमं विपमं पदम् । ततः पड्राश्यन्तर्गतं चेत् ज्यून केन्द्रं द्विती- यं समं पदम् । ततो नवराश्यन्तर्गतं चेत्पडूनं तृतीयं विपमं पदम् । ततो नवो. नं चतुर्थ पदं सममित्यथः । तस्मात्पदाइजस्य ज्याकोटिः कोटा चः समुचये । पवकारादेकाहयं साध्यमित्यर्थः । अत्रोपपत्तिः । उच्चस्थानाभिमुखमुखदेव- तैहाणामाकर्षणोक्तरुचाग्रहः कियदन्तरेणति ज्ञानार्थमुच्चहीनो ग्रहः केन्द्रमुच्चग्रह- णवशात्तदाख्यम् । तत्र भगवता स्वेच्छया ग्रहादुचं यदन्तरेण तत्केन्द्रं कृतम् । उभयथा भुजकोटयोस्तुल्यत्वात् । द्वादशराश्यङ्किने वृत्त उचास्थानाचतुर्विभागा- त्मक एकैको भागो राशिवयात्मकः पदसंज्ञः । अथोषस्थानावहः कस्मिन्पदेश्स्ती- ति शून्यत्रिपुण्णवोनं केन्द्रं कृतं ज्यानां पदान्तर्गतत्वात् । ग्रहाधिष्टितपदादजज्या- कोटिज्ययोजानम् ॥ २९ ॥ टी-भन्दोच्चसे ग्रहमध्य वियोग करनेपर अयवा शीघसे ग्रहमध्य हीन करनेपर केन्द्र होता है । भगणके जिस पादमें पेन्द्र है, तिससे मुजण्या सौर कोटिज्या स्थिर होती है ॥ २९ ॥ ननु पदे अहस्य राशिविभागात्मकेनैकवाहुजकोटिज्ययोरतुल्ययाः साधनं कय- मित्यत आह- गताद्धजज्याविपमे गम्यात्कोटिः पदे भवेत् ॥ युग्मे तु गम्यादाहुल्यात्कोटिज्या तु गताद्भवेत् ॥ ३०॥ विषमे पदे गताद्ग्रहस्य पदादितो यद्गतं राशिविभागात्मकं प्राग्ज्ञातं तस्मादि. त्यर्थः । भुजज्या स्पात् । गम्यागतोनं त्रिमं ग्रहात्पदान्तावधिकमेण्यम् । तस्मात्कोर्टि: कोटिज्या स्यात् । युग्मे समे तुकारात्पद एष्यागुजज्यागतात्कोटिज्या स्यात् । तुका- रो विशेपयोतकः । एकस्मादेवोक्तरीत्या द्वयं साधितमित्यर्थः। अत्रोपपत्तिः । विपमपदेग्रहोचोर्ध्वाधररेखान्तरानुसारेण फलमुत्पद्यते ततो वृत्तान्तस्तदन्तरमर्धज्या भुजरूपा तदर्धचापं तदंतरांशा वृत्तभागस्था गताः । अाधररेखामत्स्यसम्पन्नतिर्य ग्रेवाग्रहयोरन्तरसूत्रमर्धज्यापदान्तः कोटिज्याभुजोत्क्रमज्योनव्यासारखारूपको- टितुल्यत्वात् । तदर्धचापं मुजाशोनं निभामति गम्यात्कोटग्या । रामपदे ग्रहो/- धररेखान्तरं तिर्यगधज्याभुजज्येति तदर्धे चापं यदेष्यं तिर्यग्रेवाप्रहान्तरं तिर्यगर्धज्या- कोटितुल्यत्वात्कोटिम्तचापं पदगतमित्युपपन्नं गतादित्यादि ॥ ३० ॥ भाण्टी-विषम पदम गतसे भुजन्या भोर गम्यसे वोटिज्या होती है। युग्मपदमें गम्पस भुजज्या और गतसै कोटिज्या होती है ॥ ३० ॥ अथाभीष्टफालानां ज्यासाधनं श्लोकान्यामाह- लिप्तास्तत्त्वयमेर्भक्ता लब्धं ज्यापिण्डकं गतम् ॥ गतगम्यान्तराभ्यस्तं विभजेत्तत्त्वलोचनः॥३१॥ " .
अध्यायः २] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतः । तदवाप्तफलंयोज्यं ज्यापिण्डे गततज्ञके। स्यात्क्रमज्याविधिरयमुत्नमज्यास्वपि स्मृतः ॥ ३२ ॥ यस्य राश्यात्मकस्य पदान्तर्गतस्य ज्या कर्तुमिष्टा तस्य कलाः कार्याः । तत्त्वा- श्विमिभक्ता लब्धं चतुर्विंशज्ज्यापिण्डेषु पूर्वोक्तेषु लब्धसंख्याकः पिण्डो गतो भव- ति तदानमपिण्ड एष्यः पूर्वं तु स्वरूपोक्त्यर्थं पिण्डानां ज्याधैत्युक्तिरिदानी तु तेपामे- वार्धत्यागेन ज्यापिण्डत्वोक्तिः । अर्धग्रहणे गणितक्रियायां व्याकुलतापतेः । न- तु पूर्वपिण्डादिगुणागणितक्रियायां ग्राह्या इत्याशयेनाधीनुक्तिगौरवात् । भागेऽ- वशिष्टं तद्गतैष्यपिण्डयोरन्तरेण गुणितं तत्त्वाश्विभिर्भजेत् तस्मात्माप्तं यत्कलादि कं फलं तदते ज्यापिंडे युक्तं कार्यम् । उत्क्रमज्याभीष्टांशकलानामर्धज्यारूपा क्रम- ज्या भवति । अयमुक्तः प्रकार उत्क्रमज्यापिंडेपु कथितः । अभीपांशकला नामुत्क्रमज्यापिण्डेरुक्तविधिनोत्क्रमच्या स्यादित्यथः । अत्रोपपत्तिः । तत्त्वाश्विकला- भिरेका ज्या तदाभीष्टकलाभिः केत्यनुपातेन गतज्या ततस्तत्त्वाश्विक्लाामिर्गताग्रिमज्या न्तरं लग्यते तदा शेपकलाभिः केत्यनुपातागतलब्धन युक्ताभीष्टज्या ॥ ३१ ॥ ३२॥ भा० ० ३न्द्रपेद क्लाको २२५ से भाग करनेपर जो प्राप्त हो तिसके परिमाणसे ज्यापिण्ड गत हुए हैं गत और गम्य ज्यापिण्डके अन्तरकी बचीहुई क्लासे गुणकरके २२५ से भाग करे ॥ ३१ ॥ भागफल, गतज्यापिण्डमें मिलावे । इस प्रकारसे क्रमज्या और उत्क्रमज्याका विधान होताहै । उत्क्रमज्याके स्थानमें उत्क्रमस्खण्ड ज्या ग्रहण करनी चहिये ॥ ३२॥ अथ ज्यातो धनुरानयनममाह- ज्यां प्रोज्झ्य शेषे तत्वाश्विहतं तद्विवरोद्धृतम् । सङ्ख्या तत्त्वाश्विसंवगै संयोज्य धनुरुच्यते ॥ ३३ ॥ यस्य धनुः कर्तुमिष्टं तस्मिन्नशुद्धपूर्व ज्यापिण्डं न्यूनीकृत्य शेपं पञ्चाकृतिगुणं तदि- चरोद्धृतं योः शुद्धाशुद्धापण्डयोरन्तरेण भक्तं फलं शुद्धज्या यतमा ततमसख्या तत्वाश्वनोः संवर्ग घाते संयोज्य सिद्धं धनुः कथ्यते । अत्रोपपत्तिः । ज्या यतमा शुद्धयति ततमा याश्चापकलास्ततमसङ्ख्यागुणिततत्त्वाश्विनः । ज्यान्तरेण तत्त्वाश्वि- कला स्तदा शेपज्यया केत्यनुपातागतफलयुता इति वैपरीत्येन सुगमतरा ॥ ३३ ॥ भा० टी०-इष्टज्यासे निकटतम न्यून ज्यापिण्डको मग करके शेषको २२५ से गुणकरके निकटतम न्यूनज्या और पल्लोज्याके अन्तरसे भाग करे । इस भाग फलो २२५ गणित ग्राम फोहुई ज्यापिण्डको संख्यामें मिलानेसे धनुकला निस्ल भावेगी ॥ ३३ ॥ केन्दराःयादि. ३ राशिका न्यन होनेसे समपा, तदुपरान्त. ६ राशिव
(४८)
सूर्यासद्धान्तः-
[दितीयोऽ-
अथ प्रहाणां मन्दपरिध्यंशान्विवक्षुः प्रथम सूर्यचन्द्रयोराह-
खेमन्दपरिध्यंशा मनवः शीतगारदाः ॥
युग्मान्ते विपमान्ते च नखलितोनितास्तयोः ॥ ३४ ॥
सूर्यस्य परमाकर्पणोत्पन्नपरमपूर्वापरगमनरूपपरममन्दफलांशानां ज्यापरमफलज्या-
तत्तुल्यव्यासानोत्पन्नवृत्ते कक्षावृत्तास्थतांशप्रमाणेन येऽशास्ते मन्दपारध्यंशाः केन्द्र-
युग्मपदान्ते नीचोचसमेऽर्के चतुर्दश चन्द्रस्य तत्र ते द्वात्रिंशत् । केन्द्रविषमपदान्ते
नीचोचाभ्यां त्रिभान्तरिते चकारादुक्ता मन्दपारध्यंशा विंशतिकलोनाः सन्तः सूर्यच.
न्द्रयोर्मन्दपारध्यंशा भवन्ति ॥ ३४ ॥
मा० टी०-युग्मपादके अन्तमें सूर्यकी मन्दपरिधि १४ मंश, चन्द्रमाकी ३२ अंश. दिपम
पादान्तमें २० कला कम हैं (अर्थात् र १३ १४ च ३११४.)॥ ३४ ॥
अथ भौमादीनामाह-
युग्मान्तेऽर्थाद्रयः खामी सुराः सूर्या नवार्णवाः ।।
ओजे व्यगा वसुयमा रुदा रुदा गजाब्धयः॥ ३५ ॥
भौमस्य पञ्चसप्ततिः । बुधस्य त्रिंशत् । गुरोस्खयस्त्रिंशत् । शुक्रस्य द्वादश । शने-
रकोनपंचाशात् पूर्वोक्तमन्दपरिध्यंशा इति वक्ष्यमाणकुनादीनामिति चात्रान्वेति । एते
युग्मपदान्ते । ओजे विपमपदान्ते भामस्य द्विसप्ततिः बुधस्याष्टाविंशतिः । गुरोरका-
दश । शुक्रस्यैकादश । शनेरष्टचत्वारिंशत् ॥ ३५ ॥
भा. टी-युग्मके अन्त मन्दपरिधि अंशमैं मं, ७५ ७ ३०, ३३. शु १२,
४९, | विषमान्त में मं ७२, बु. २८, वृ. ११, शु. ११,श ४८ ॥ ३५ ॥
अथ भौमादीनां गुग्मपदान्तेशैध्यपरिघ्यशानाह-
कुजादीनामतः शैघ्यायुग्मान्तेऽर्थाग्निदरकाः।
गुणाग्निचन्द्राः खनगा द्विरसाक्षीणि गोऽग्नयः ॥ ३६॥
भौमहीनासतो मन्दपरिध्यंशकशतानन्तरं झोयाः शीघपएंध्यंशा गुरमताले नौ-
मस्य पंचाशदाधकं शतद्वयम् । वुधस्य त्रयखिंशदाधकं शतम् । गुरोः सप्ततिः ।
शुक्रस्य द्विपष्टयधिकं शतद्वयम् । शनेरेकोनचत्वारिंशत् ।। ३६ ॥
मा० टो-युग्मके भन्तमें शीघ्र पारीधै अंश मं. २३५, ७. १३३, पृ.७२, शु. २६२
श. ३९॥ ३६॥
अथैनेपां विपमपदान्ते शैध्यपरिध्यंशानाह-
ओजान्त द्वित्रियमला द्विविश्वे यमपर्वताः ॥
खर्तुस्रा वियद्वेदाः शीघ्रकर्माण कीर्तिताः ॥ ३७॥
ध्याय:२] संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतः। (४९) विषमपदान्ते शीघ्रकर्माण शीघ्रफलसाधनार्थ परिधय उक्ताः । एते शीघ्रपारंधयः कुजादीनामिति पूर्वोक्तमत्रान्वेति । भोमस्य दन्ताश्विनाः । बुधस्य दन्तेन्दवः । गुरो- दिसप्ततिः । शुक्रस्य पष्टयधिकं शतद्वयम् । शनेश्चत्वारिंशत् । अत्र कीर्तिता इत्यने- न युग्ममान्ते फलाभावादेव परिधयः कथं सम्भवन्ति । अतो विषमपदान्ते परमफलस्य । सत्त्वात्तत्रैव युक्ताः परिधयः शनिमन्दशीघ्रपरिष्योः क्रमेणाधिकन्यूनत्वं च संज्ञाव्या- घातादयुक्तमित्यादिना वाङ्कनीयमागमप्रामाण्यात् " श्रुतिर्यत्रप्रमाणं स्याद्यक्तिः का तत्र नारद” इति ब्रह्मसिद्धान्तोक्तश्चेति सूचितम् ॥ ३७॥ मा०टी-विपमके अंत में शीघ्रपाधि अंश मं.२३२, बु.१३२, बृ.७२, शु.२६०, श ४० ३७॥ अथाभीष्टकेन्द्रसम्बन्धेन परिधिभागानयनमाह- ओजयुग्मान्तरगुणा भुजज्या त्रिज्ययोद्धृता ॥ युग्मवृत्ते धनण स्थादोजादूनाधिक स्फुटम् ॥ ३८॥ भुजज्या यत्परिधिः स्फुटीक मिष्यते तत्केन्द्रस्य मन्दशीघ्रान्तरस्य भुजज्योजयु- ग्मान्तरगुणा विपमसमपदान्तीयकेन्द्रीयपरिध्योरन्तरेण गुणिता त्रिज्यया भक्ता फलं युग्मवृत्त केन्द्रयुग्मपदान्तीयपरिधौ । ओजात्केन्द्रीयविषमपदान्तीयपरिधः सकाशादूना- धिके क्रमेण धनर्ण होने युक्तमधिके हीनं स्फुटं परिधिमानं स्यात् । अत्रोपपत्तिः । युग्मपदान्तीयस्थात् परिधेर्विपमपदान्तीयपरिधिर्यावता न्यूनाधिकस्तदन्तरं विषमपद- वाजज्ययोपचितमतत्रिज्यातुल्यभुजज्ययेदमन्तरं तदेष्टभुजज्यया किमिति फलं युग्म- परिधौ । ओजपरिधेन्यूनत्वे ऋणमधिकत्वे धनमिति । विषमपदपरिधेरधिकन्यूनयुग्म- परिधावेवर्णधनं कृतमित्युपपन्नम् ।। ३८ ।। भा०टी० विपम और युग्मपरिधिके अन्तरसे भुजज्याको गुणकरके त्रिज्यासे भाग कर- नैपर जो प्राप्त हो, सम्पफरूपाराधे धन का होन करनेपर स्फुर परिधि होगी विषमान्तसे युग्मान्त अधिक होनेपर रब्यफलहीन मन्यया योग करे ॥ ३८१ अथ भुजकोटिफलानयनं मंदफलानयनं चाह- तद्गुणे भुजकोटिज्ये भगणांशविभाजिते । तद्भुजज्याफलधनुर्मान्दं लिप्तादिकं फलम् ॥ ३९ ॥ भुजकोटिज्ये मन्दशीघ्रान्तरसंबन्धेन केन्द्रभुजकोटिज्ये तद्गुणे स्वीयंस्फुटपरिधिना गुणिते भगणांशः पष्टयधिकशतत्रयेण भक्ते मुजफलकोटिफले भवतः । मन्दकद्र - जज्योत्पन्नफलस्य धनु कलादिकं मांदं फलं भवति । अनोपपीत्तः । कक्षास्थावस्थान- स्थितदेवतया स्वहस्तास्थतसूत्रपोतं ग्रहविवं स्वाभिमुखाकर्षणेन कक्षास्थमध्यग्रहस्था- नात्परमफलज्यांतरितस्थान आकर्षणसूत्रमार्गरूपतिर्यकर्णमार्गेणाकर्ण्यते । तेन मध्य- ग्रहस्थानीयकक्षाप्रदेशांत्यफलज्याव्यासार्धेनोत्पन्नवृत्ते मगणांशकित भूमध्यग्रहस्पने- सूर्यसिद्धान्त:- [द्वितीयोऽ- खासक्ततद्वत्तप्रदेशरूपोचस्थानाकेन्द्रान्तरेण कक्षाविपरीतमार्गेण तद्वत्तपरिधी ग्रहो भवति । तस्मिन्नीचोगवृत्त ऊर्ध्वरेखाग्रहयोस्तिर्यगन्तरसूत्रमर्धज्याकार परमफलज्यानुरु- द्धं भुजफलं तस्मिन्नेव वृत्ते व्यासमिततिर्यग्रेखाग्रहयोरन्तरमूर्ध्वाधरमर्धज्याकार परमफ- लज्यानुरुद्ध कोटिफलम् । एते तत्र कक्षास्थभुजज्याकोटिज्यावदुजकोटिरूपे इतेि कक्षा- स्थमगणांशप्रमाणेते भुजज्याकोटिज्यारूपे भुजकोटी तदा कक्षास्थभागममाणानुरुद्ध- भागुक्तनीचोचपरिधिभागः केत्यनुपातेन फलवृत्तस्यत्वादुनकोटिफले । तत्र नीचोच- परिधिवृत्तस्थग्रहमध्यसूत्रं कर्णरूपं कक्षावृत्ते यत्र लग्नं तत्र स्पष्टो ग्रहमोगः । नीच वृत्तमध्यस्पष्टग्रहभोगस्थानयोः । कक्षावृत्ते यदंतरांशमानं तत्फलं तदर्धज्यातिर्यक्सूत्रं मध्यग्रहस्थोर्ध्वाधररेखारूपमध्यसूत्रात्स्पप्टग्रहमोगस्थानासक्तं फलं ज्या । कर्णाग्रे भुज- फलं तदा त्रिज्याने किमित्येतदनुपातावगतास्वाश्चापं फलम् । तत्र मन्दफलज्या भुजफ. लरूपा कर्णानुपातोपेक्षया भगवतांगीकृता । मन्दकर्णस्य त्रिज्यासन्नत्वेन स्वल्पान्तरेण त्रिज्यातुल्यत्वेनांगीकारात् । तचाप मन्दफलमित्युपपन्नं सर्वमुक्तं बोधार्थ छेधक- न्यासश्च यथा ॥ ३९ ।। मा० टी-रफुट परिधिको भुज भोर कोटिज्यासे गुणकरको ३६० से भाग परनेपर मुज मौर केट फल होगा । सुजज्याका धनुनिर्णय होजारेपर कामादि मान्फल होगा ॥ ३९ ॥ अथ शीघ्रफलं श्लोकत्रयेणाह- शेध्यं कोटिफलं केन्द्रे मकरादौ धनं स्मृतम् ॥ संशोध्यं तु विजीवायां कीदो कोटिज फलम् ॥ ४० ॥ तदाहुफलवक्यान्मूलं कर्णश्चलाभिधः ।। त्रिज्याभ्यस्तंभुजफलं चलकर्णविभाजितम् ॥४१॥ लब्धरय चापं लिप्तादिफलं शैध्यमिदं स्मृतम् ॥ एतदाये कुजादीनां चतुर्थे चैव कर्मणि ॥ ४२ ॥ शीघसम्बन्धिकोटिफलं मकरादिपड्भे शीघ्रमेन्द्र त्रिज्यायां योज्यमुक्तम् । कर्का- दिपइभे...८१) शीघ्रमेन्द्रे कोट्युत्पन्नं फलं त्रिज्यायां होनं कार्यम् ! तुर्विशेपे । तेन मन्दवर्मण्येतक्रियानिरासः । कोटिफलसंस्कृतत्रिज्याभुजफल्योगयोयोगान्मूलं शीघ्र- सक्षः कर्णः । भुजफलं त्रिज्यया गुण्यं शोधकर्णन मक्तं फलस्य धनुःकलादि। इदं सिद्ध शीघ्रसम्बन्धिफले कथितम् । भौमादीनामेताप्लीघ्रफलमाये प्रथमे कमणि चतुर्थे कर्मणि । चा समुच्ये । कार्यगे चकाराहितीयतृतीयकर्मणोर्नेत्यर्थः । अर्थात्तत्र मन्द- फलं संस्कार्यमिति सिद्धम् । अत्रोपपत्तिः । मन्दस्पष्टभोगस्यानीयकक्षावृत्तप्रदेशादह- विम्बं शीग्रोधस्थानस्थिततदेवतया सहस्तस्थितसूत्रेण स्वाभिमुखं शीघ्रान्त्यफलज्या- न्तरेणाकर्ण्यते । तेन मन्दसष्टस्थानाच्छीघान्त्यफलज्यया वृत्ते भांशासिते शीघ्रनी.
"ध्यायः २.] संस्कृतटीका-मापार्टीकासमेतः। (५१) चोचसझे पूर्वरीत्या शीघ्रोच्चस्थानाच्छीघ्रकेन्द्रान्तरेण कक्षामार्गवैपरीत्येन ग्रहबिम्ब यवति । तत्र पूर्ववत्कोटिफलभुजफले कोटिभुजौ कक्षास्थतिर्यरेखातः शीघ्रनीचोचवृत्त- तिर्यग्व्यासरेखात्रिज्यान्तरेणेति त्रिज्याकोटिफलयोगो मकरादौ । कर्कादौ कोटिफलोन- त्रिज्याशीघ्रनीचोचपरिधिस्थग्रहवांतिर्यग्रेखयोरंतररज्जुसूत्ररूपा कोटिः । कोटिमूलम- ध्ययोरन्तरं कक्षा तिर्यग्रेखान्तर्गतं भुजफलनुल्यं भुजो ग्रहभूमध्यस्थसूत्रं तिर्यकर्णः । कोटिभुजफलयोर्वर्गयोगमूलं ततः कक्षायां कर्णसूत्रं यत्र लनं तत्र स्पष्टो ग्रहभोगः कक्षामध्यसूत्राद्रहसक्तास्पष्टभोगस्थानपर्यन्तमर्धज्याकारं सूत्रं शोधफलज्याशीघ्रक- ग्रे भुजफलं तदा त्रिज्याने किमित्यनुपातज्ञाता । अस्याश्चापं मन्दस्पष्टस्पष्टग्रहमोग- स्थानयोरन्तररूपं शीघ्रफलम् । अथ नीचोचवृत्तमध्यज्ञानाय मन्दस्पष्टज्ञानमावश्यकम् । ततः शीघ्रफलसंस्कारण स्परज्ञानम् । तत्र स्फुटसाधितमन्दफलसंस्कृतमध्यग्रहो मन्दस्फुटः सूक्ष्म इति पूर्व मध्यग्रहस्यासन्नस्फुटत्वसिद्धयर्थै फलयोः संस्कार आवश्य- कस्तत्रापि प्रथमं मन्दफलं. शीघ्रफलसंस्कृतान्मध्यग्रहसाधितमन्दफलापेक्षया सूक्ष्म- मिति मथमं शीघ्रफलसंस्कृतमध्यग्रहान्मन्दफलं शीघ्रफलसंस्कृतमध्यग्रहे संस्कार्य स्फुटासन्नो भवति ॥ ४० ।। ४१ ।। ४२ ।। मा० टी०-शीघ्र कोटिफल मरादि ६ राशिमें त्रिज्या योग और दिमें वियोग करना होता है इस संख्याकै वर्ग, शेध्य भुजफलवर्ग योग करके मूल निकालनेसे शीघ्र- कर्ण होगा शघ्र भुजफलको त्रिज्यासे गुणकरके शीघ्रकर्णद्वारा माग करने पर जो रब्ध हो तत्परिमाणानुसार धनुनिर्णय करनेपर शीघ्रफल होगा । यह शीघ्रफल भौमादिके प्रथम और 'चतुर्थ सरकारमें प्रयोजनीय है ॥ ४० ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ मनु सूर्यन्तोः शीघ्रफलाभावात्कथं स्पष्टत्वं भवतीत्यतस्तदुत्तरं वदन्नैतदाये कुजा-- दीनामित्यर्थ स्फुटयति- आन्दं कर्मकमर्केन्दो मादीनामोच्यते ॥ शेट्रय मान्दै पुनन्दि शैघ्यं चत्वार्यनुक्रमात् ॥ १३ ॥ सूर्यचन्द्रपोन्दिं कर्मक तथा चानयोः शीत्रफलाभावात्केवलेन मन्दफलेनैव स्पष्ट- स्वम् । एकमित्यनेन सकृन्मान्दं फलं साध्यं मध्यग्रहेणैव मन्दनीचोच्चमण्डलमध्यज्ञानान कर्मान्तरापेक्षेत्युपपत्तिः स्पष्टा । अथानन्तरं भौमादीनामुच्यते । मागुक्तं स्फुटतया कथ्यते । तदाह शैत्र्यमिति । प्रथमतो मध्यग्रहात्साधितशीघ्रफलं मध्यग्रहे संस्कार्य- मस्मान्मन्दफलमस्यैव संस्कार्यमस्मात्पुनदितीयवार मन्दफलं साधितं मध्यग्रहे संस्कार मन्दः स्पष्टो भवति । अस्मादपि गीत्रफलं साधितमस्यैव संस्कार्यमेवमनुकमाचार कर्माणि भवन्तीति मागुक्ततात्पर्यम् ॥ ४३ ।। भा० टी०-सूर्य और चंद्रमाया मान्यकर्म एक संस्कार है भौमादिक्ष FPRISE मीन्य, और पिछला घ्य क्रमशः यह चार संस्कार हैं ॥४३॥ १ शौनकलके सापनकालमै शीद और शोमपरिधि आदिकामबहार सूर्यसिद्धान्तः- [ द्वितीयो- अथानापि विशेषमाह- मध्ये शीघ्रफलस्याधै मान्दमफलं तथा ॥ मध्यग्रहे मन्दफलं सकलं शेध्यमेवच ॥ ४॥ मध्यग्रहे स्वसाधितशीघ्रफलस्याध संस्कार्यम् । अस्मात्साधितं मन्दसम्बन्ध्यर्ध- फलं साधितमन्दफलस्यामित्यर्थः । तथा यस्मात्साधितं तस्यैव संस्कार्यम् । शीघ्र- फलार्धसंस्कृते संस्कार्यमिति फलितार्थः । अस्मात् साधित मन्दफलं सम्पूर्ण मध्यग्रहे संस्कार्य मन्दस्पष्टो भवति । अस्मात्साधितं शीघ्रफलं संपूर्णम् । चः समुच्चये। तेन मन्दस्पष्टे संस्कार्यम् । एवकारादुक्तरीत्या सिद्धो ग्रहः स्पष्टो नान्यथेति । अत्रोपपत्तिः। मन्दफलं स्फुटसाधितं वास्तव स्फुटस्तु मन्दफलसापेक्ष इत्यनोऽन्याश्रयात्सूक्ष्ममन्दफल- साधनशक्यमपि भगवता तदासन्नसाधनार्थमर्धस्फुटादेव मन्दपलं साधितं मध्यग्रह- साधितमन्तफलापेक्षया सूक्ष्मम् । अर्धस्फुटस्तु फलं दयार्धसंस्कृतो मध्यग्रहः । अत्रापि मन्दफलस्पार्ध शीघ्रफलार्धसंस्कृतात्किञ्चित्सूक्ष्मत्वार्थ साधितमित्युपपन्नं मध्ये शीघ्रफलस्येत्यादि ॥ ४४॥ भटी-ग्रहमध्यमें शीघ्रफलका असरकार करे (ससारका भर्द्ध मिलाना या अलग भरना है-४५ श्लोरके अनुसार ) शेघ्याई सस्कृत मध्यानुसार, मन्दफलाई-फिर शेध्याई- संस्कृत मध्यमें सस्कार करनेसे शीमाई-मन्वार्द्ध-सस्कृत मध्य होगा शीमाई मन्दाई संस्कृत मध्यानमारसे फिर दूसरा मन्दफल निर्णय करे । मन्दफल ग्रहमध्यमे सस्कार करे। यह शेष-मन्दफल-संस्कृप्त-मध्यानुसारसे शीघ्रफल साधन करके शेष-मन्द-फल-सस्कृ. नमें सस्वार करनेपर स्फुट होगा ॥ ४४ ॥ ननु फलयोः संस्कारः कथं कार्य इत्यत आह- अजादिकेन्द्रे सर्वेषां शेतं मन्देि च कर्मणि ॥ धनं ग्रहाणां लिप्तादि तुलादावृणमेव च ॥४५॥ सर्वां ग्रहाणां शैले कर्मणि मान्दे कर्मणि । चकारः समुचये । क्लात्मकं फलं मेवा दिपड्मान्तर्गतकेन्द्रे युतं कार्य हुलादिपड्भान्तर्गतकेन्द्रे होनं कार्यम् । चकारो व्यव स्थार्थकः । एवकारः फलयोरानयनप्रकारभेदेऽपि धनर्णरीतिभेदव्यवच्छेदार्यकः । मनोपपत्तिः । पूर्वाकर्षणे ग्रहस्य फलं धनं पश्चादाकर्षण ऋणमिति प्रागुक्तम् । तत्र ग्रहादुरपर्यंत केंद्रे गृहीते पूर्वाकर्षणे मेपादिद्रं भवति पश्चादाकर्षणे तुलादि । केंद्र मातीति तथोक्तमुपपन्नम् ॥ ४५ ॥ मा०-भेषादिकेन्द्र में ग्रहोंके शीघ्र और मन्द सरकार योग और तुलादिकेन्द्रमें फल यला ) वियोग करनी चाहिये ॥ ४५ ॥ A , ध्यायः २.] संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतः। अथ ग्रहाणां भुजांतरफलमाह- अर्कबाहुफलाम्पत्ता ग्रहमुक्तिविभाजिता ॥ भचक्रकलिकाभिस्तु लिताः कार्याग्रहेऽकंवत् ॥ ४६॥ स्पष्टा सूर्यादिग्रहगतिः सूर्यस्त्र भुजफलेन मंदफलेन कलात्मकेन गुणिता द्वादश राशिकलाभिः पटूशतयुतेकविंशतिसहस्रमिताभिर्भता प्राप्तफलकला ग्रहे सूर्यादि- ग्रहेकवत् सूर्यमंदफलधनर्णशादित्यर्थः । कार्याः तुकारादन] संस्कायी। अनोपपत्तिः । अहर्गणस्यैकरूपमध्यममानेन सत्त्वात्तदुत्पन्नग्रहाणां मध्यममानेन यद- र्धरावं तात्कालिकत्वं सिद्धम् । मध्यममानार्द्धरात्रे तु मध्यमसूर्यमितकान्तिवृत्तमदेशोऽधो- याम्योत्तरवृत्ते भवति । अस्मात्कालात्रपटाद्धरात्रं स्पष्टसूर्यमितकान्तिवृत्तप्रदेशाधो याम्योत्तरवृत्तसंयोगरूपं मन्दफलधनर्णक्रमेणानन्तरपूर्वकाले भवति । अतो मन्दफल- कलाभोगसम्बन्धिकालेन ग्रहोऽनन्तरपूर्वकालयाश्चाल्पः स्पष्टाईरानसमये भवति । एते- नानेन कर्मणा स्फुटार्धरात्र ालीनग्रहाः क्रियन्ते । सूर्यश्च स्फुटार्द्धरात्रकालीन एवातः सूर्यस्य नायं संस्कार इति पर्वतोक्तं निरस्तम् । सूर्यव्यतिरिक्तग्रहामध्यार्धरात्रे सूर्यस्तु स्फुटार्धरात्र इत्यत्राहर्गणोत्सन्नत्वेन सर्वेषामेककालिकत्वसिद्धहेत्वभावादिति । तत्र मन्द फलकलानां कालस्त्वेकराशिफलाभिः सायनस्पष्टार्काक्रान्तराश्युदयासवो लभ्यन्ते तदा मन्दफलकलाभिः इत्यनुपांतन ततोऽहोरात्रासुभिर्गतिकलास्तदा फलकलासुभिः का इति मन्दफलकलाग्रहे धनर्णमफलवशादन] कार्या इति सिद्धम् । तत्रापि भगवता लोकानुकम्पया स्वल्पान्तोग न क्षत्रदिने ग्रहगतिभोगमङ्गीकृत्य चक्रकलापरिवर्तात्मक नाक्षबाहोरात्रेण गतिकलास्तदा सूर्यमन्दफलकलाभ्रमणेन का इत्येकानुपाताल्लायवादा. नीताश्चालनकला इत्युपपन्न ॥४६॥ माटी०-सूर्य भुजमान्ध-पछन ग्रह-मुक्तिको गुणकरके २१६०० द्वारा भाग परके एब्धकलादि ग्रहोम संस्कार क ना चाहिये । अर्थात् सूर्य स्फुटबालमें मुजफल मिलानेसे मिलाने मार सलग (घटाने ) पर देनेपर वियोग करना पाये ॥ ४६ ।। अथ स्पष्टगति विवतुश्चन्द्रस्य प्रथम विशेषमाह- स्वमन्दभुक्तिसंशुक्षा मध्यभुक्तिनिशापतेः ॥ दोान्तररादिकं कृत्वा भुक्तावृणधनं भवेत् ॥ ४७॥ ग्रहगतिसाधने वक्ष्यमाणे गतिफलं ग्रहगतेः साधितं तथा चन्द्रगतः चन्द्रगतिफलं न साध्य किन्तु चन्द्रस्य मध्यमगतिः स्वस्य चन्द्रस्व मन्दं मंदो तस्य दिनगत्या हीना कायां तादृशगतेः सकाशाद्दोज्यातरादिकं दोज्यौवरमादिभूतं यस्यैतादृशं गतिफलं वक्ष्यमाणमकारे दोोतर्गुणा भुक्तिरित्यादी दोज्यौनरादेव गतिफलोत्पत्तेः । सिदं कृत्वा चंद्रमध्यमगतावृणधनं वक्ष्यमाणरीत्या भवति । अत्रोपपत्तिः । वक्ष्यमाणं गतिफलं भनमालिकाभिः सलिसा शायर्यादात या पारः।
(५४) सूर्यामद्धान्तः- [ द्वितीयोऽ- केंद्रगत्योपपन्नमित्यनेन सूर्यादिग्रहाणां विचंद्राणां मंदोचगतेरत्यल्पत्वात्स्वगत्यैव गति- फलमुक्तम् । तत्र चंद्रस्य तथा माधने वईतरपातात्तस्य मंदोगत्यूनस्वगतिरूपकेंद्रगतेः फलं साधितं गतिफलं यद्तेः साध्यं तद्तावेव संस्कार्यमिति वक्ष्यमाणरीतिव्युदासाय चंद्रभुक्तावित्युक्तमन्यया केंद्रगतरेव स्फुटत्वं स्यान्न चन्द्रगतरिति ॥ ४७ ॥ भा टो०-चंद्रभक्ति-तिसकी मन्दोच्चमुक्ति मलग करके (नीचे कहे अनुसार) दोन्या- तरसाधन करफे मध्यगतिसे योग पा वियोग करनेपर स्पष्टगति होती है ॥ १७ ॥ अथ ग्रहाणां मंदस्पष्टगतिवासनासूचनपूर्वगतिफलानयनपूर्विका श्लोकाभ्यामाह- ग्रहभुक्तेः फलं कार्य ग्रहवन्मन्दकर्माण ॥ दोव्न्तरगुणा भुक्तिस्तत्त्वनेत्रोद्धृता पुनः ॥४८॥ स्वमन्दपरिधिक्षुण्णा भगणांशोद्धृता कलाः ॥ कर्कादो तु धनं तत्र मकरादावृणं स्मृतम् ॥ १९ ॥ मंदकर्माण गतिमंदफलक्रियानिमित्तमित्यर्थः । ग्रहबद्ग्रहमंदफलानयनरीत्या परि- धिगुणनभगणांशभजनाप्तचापामत्यात्मिकया ग्रहगतेः सकाशात्फलं ग्रहमंदगतिफल साध्यम् । यथा ग्रहमंदफलं केंद्रभुजग्यातः साधित तथेदं गतिफलं ग्रहगते साध्यमि- त्यर्थः । तथाहि ग्रहमंदफलांतरस्यैकदिनान्तरीयस्य ग्रहगतिमंदफलत्वाद्भुजज्ययोरेकदि. नांतरयोरंतरात्फलं मन्दगतिफलं पर्यवसितं तत्र केंद्रयोरंतरस्य केंद्रगतित्वात् । तज्ज्य- योरतरं तत्त्वाश्विप्रमाणेनोक्तज्यापिण्डांतरं गतिकलापरिणामितं भवति । तदेवाह'। दोज्यतिरगुणोते । ग्रहमध्यगतिः केंद्रगतिरूपा । उच्चगतेरत्यल्पत्वात् । दोऱ्यांतरगुणा भुजज्यानयनावसरे यज्ज्यापिण्डांतरं तेन गुणितर पञ्चाकृतिभिर्भक्ता पुनरनंतरमित्यर्थः। अहमदपरिधिना स्फुटेन गुणिता पष्टियुतशतत्रयेण भक्ता फलं गतिमन्दफलकलाः । यद्याप गतिज्यातः फलज्यानयनं कृत्वा तचापं गतिफलं समुचितम् । तथापि ग्रहगते. स्तत्त्वाश्विभ्यो न्यूनत्वाज्याचापयोस्तुल्यत्वेन तदनुक्तावक्षतिः। चंद्रस्य तु स्वल्पांतरात्त- करणमुपेक्षितम् । मंदस्पष्टगतिसिद्धयर्थ मध्यगतो फलसंस्कारमाह-कदाविति । तत्र ग्रहमध्यगतौ पूर्वानीतफलं कांदिपडभांतर्गतकेंद्रे धनं मकरादिपइमांतरगतकेंद्र ऋणमुक्तम् । तुकारान्मंदस्पष्टगतिः सिद्धा भवतीत्यर्थः । अत्रोपपत्तिः । ऋणफलोप- चये पूर्वफलादनिमालमाधिक हीनमिति फलांतरं गतावृणम् । ऋणफलापचये पूर्वफ- लादनिमफलं न्यून हीनमिति फलांतरं गतो धनम् । धनफलेपचये पूर्वफलादानमफल- मधिकं युतमिति फलांतरं गतो धनम् । ऋणफलापचयस्तु ममगदितः प्रावित्रिभे । धनफलोपचयस्तु तुलादितः प्राक्त्रिम इति कर्कादिकेंद्रे गतिफलं धनम् । फलापचये १ दोग्यन्तिर अर्थात भुजज्यान्तर । केन्द्रग्या साधनकारके समय ३१ शेषम जिसको गत और गम्य म्यापिण्डका अन्तर कहा गया है।
घ्यायः २ संस्कृतटीका-भापाटीकासमेत (५५) पूर्वफलादनिमं फलं न्यून हीनमिति फलांतरं गतावृणम् । धनफलापचयस्तु कर्कादितः प्राक् निभऋणफलोपेचयस्तु मेपादितः पावित्रम इति मकरादिकेन्द्रे गतिफलमृणं सिद्धम् ॥ ४८ ॥ ४९ ॥ भा० टी-शेष मन्द संस्कारकै स्थानमें दोषान्तरको मुक्तिद्वारा गुण करके २२५ से भाग करे । भागफलको मान्यस्फुट परिधिसे गुणकरके ३६० द्वारा भाग करनेपर कलादिफल होता है। कर्कटादिकेन्द्र भुक्तिमें धन भौर मारादिवेन्द्र में पियोग करनेपर मन्दगति होगा ॥ ४८ ]४९ ॥ अथ श्लोकाभ्यां स्पष्टगतिसाधनमाह- मंदस्फुटीकृतां भुक्तिं प्रोज्झ्य शीघ्रोच्चभुक्तितः ॥ तच्छेषं विवरणाथ हन्याविज्यान्त्यकर्णयोः ॥५०॥ चलकर्णहतं भुक्तो को बिज्याधिक धनम् ॥ ऋणमूनेऽधिक प्रोज्य शेपं वक्रगतिर्भवेत् ॥ ५॥ मन्दस्पष्टां गातें प्राक्सिद्धां शीघ्रोधगतेः पातयित्वा तत्रावशिष्टं त्रिज्यान्त्यकर्णयो- खिराशिज्याद्वितीयशीघ्रकर्णयोर्ग्रन्थान्तरैकवाक्यतार्थ त्रिज्याशब्देन द्वितीयशीघ्रफलको- टिज्याप्रायति ध्येयम् । अन्तरेण गुणयेत् । तत्र यत् सिदं तच्छीघ्रकर्णेन द्वितीयेन भक्तं फलं मन्दस्पष्टगती द्वितीयशीमकर्ण त्रिज्याधिके गृहीतफलकोटिज्यातोऽधिक सति होने च सति धनमृणं क्रमेण कार्य स्पष्टगतिः स्यात् । ननु यदा मन्दस्पष्टगतितो गतिशीघ्रफलमाधिकं तदा मन्दस्पष्टगती फलमूनं न स्यादिति तत्र स्पष्टगतिज्ञानं कथम् । न चैतदसम्भव इति वाच्यम् । नीचासन्ने ग्रहे फलकोटिज्याशधिकर्णान्तराच्यधिक स्य न्यूनत्वात्फलस्यावश्यं मन्दस्पष्टगत्यधिवत्वसम्भवादित्यत आह । अधिक इति । मन्दस्पष्टगतिः । अधिक फले पातायत्वा शेपं वक्रगतिर्विपरीतगतिः । पश्चिमगतिः स्यात् तथा च न क्षतिः । अत्रोपपत्तिः । “फलांशखाकान्तरशिञ्जिनीयो द्रावेन्द्रमुक्ति श्रुतिहदिशोच्या । स्वशीघ्रभुक्तेः स्फुदखेटभुक्तिः शेपं च पक्रारिपरीतशुद्धौ ।। इति सिद्धांतशिरोमणो वृद्धवसिष्ठसिद्धान्तोक्तेः सूक्ष्मप्रकारस्तस्योपपत्तिस्तु तट्टीकायां व्यक्ता तत्र द्राक्केंद्रभुत्त्यर्थं प्रयमार्धमुक्तम् । इयं गतिः फलकोटिज्यया गुण्या कर्णभक्ता फलं स्वशीघोयातेः शोध्यम् । तत्र प्रयममेव समच्छेदपूर्वकशोधनार्य शीघ्रोयगतेः कर्णी गुणः । तत्रापि शीघ्रोच्चगतेः केंद्रग्रहगतियोगरूपत्वाखण्डद्वयं केन्द्रगतावेच फलं होनं कृतामित्ति कर्णगुणितकेंद्रगातिफलकोटिज्यागुणितकेंद्रगत्योांतरं तत्रापि गुणितयोरेत- रेऽन्तरे वा गुणिते ममत्वाल्लाघवाच फलकोटिज्याकर्णीतरेण केन्द्रगतिशृणिता कर्णमक्ते. ते तच्छेपमित्यादि हतमित्यंतमुपपन्नम् । अथ फलकोटिज्यातुल्यकर्णे मुख्यमकारण गतेमदस्पष्टगातितुल्यतया सिदत्वात् । फलाभावः कर्णस्य न्यूनत्वे फलस्य शाकेंद्र- " (५६) सूर्यसिद्धान्त:- [ द्वितीयोऽ- गत्यधिकत्वात् तदूने शीघ्रोच्चगती शीघ्रकेंदगतिनाशादधिकस्य गतिफलरूपस्य मंदस्प- प्रगती हीनत्वं पर्यवसन्नम् । कर्णस्याधिकत्वे पूर्वप्रकारफलस्य शीघ्रवेन्द्रगतितो न्यून- स्वात् तदूने शीघ्रोच्चगतो यन्न्यूनं तदधिका मन्दस्पष्टगतिः स्पष्टगतिरिति पर्यवसन्नम् । तदत्र शीघोच्चगतिस्थाने शीघ्रकेंद्रगतिग्रहणेन फलं गतिफलमेवोत्पन्नं तं मंदस्पष्टगतो फलकोटिज्यातः कर्णस्याधिकन्यूनत्वक्रमेण धनमृणमित्युपपन्नं कर्ण इत्याद्यूनं इत्यन्तम् । ऋणफलस्य मन्दस्पष्टगतितोऽधिकत्वे विपरीतशोधनाच्छेषं पश्चिमगतिखे स्पष्टेति सर्व- मनवद्यम् ॥ ५० ॥५१॥ भा० ६०-मन्द सतगति शीघ्र भुसे अलग करके बिध्या मार दूसरे शोधकर्णके जन्त- रसे गुण करे । गुफ्फळ को दूसरे शीघ्रकर्णसे भाग, करनेपर समयफळ भन्द. स्पष्ट भुक्तिम। दूसरा शंघकर्ण विष्यासे अधिक होनेपर योग और नहीं तो वियोग करनेसे स्मगति होगी । विये गफळ ऋण होनेसे वक्रगति होती है ॥ ५० ॥ ११ ॥ अथ चक्रगत्युपपत्तिमाह- दूरस्थिताः स्वशीघोचादहः शिथिलराश्मिाभिः ॥ सव्येतराकृटतनुर्भवेद्वक्रगतिस्तदा ॥ १२ ॥ स्वशीयोचाहूरस्थितस्विभाधिकान्तरितो ग्रहो भौमादिकः शिथिलरश्मिभिः शीघ्रो चदेवताहस्तस्थितग्रहविम्वप्रोतरज्जुभिः सव्येतराकृष्टतनुर्देवतायाः सव्यतरे वाम- भागेतरे आकर्षिता तनुः शरीरं विम्वरूपं यस्यासौ यदा तदा वक्रगतिः स्यात् । अयं भावः । त्रिभादूनान्तरितो ग्रहो वृत्ताकारसूत्रराशिथिलैवनैर्यथामपितुं शक्यते तथा त्रिभाधिकान्तरितो ग्रहो देवतैर्वृत्ताकारसूत्रः शिथिलैराकर्षितुं न शक्यतेऽतोऽल्पधनर्ण- फलस्थाने ग्रहो वक्री भाति । आफर्पणोत्कर्षाभावेन वृत्तमार्गे वस्तुनो नीचगामित्वम- भवादिति ॥५२॥ मा० टी०-अपने शीघ्रोच्चसे दूर रहकर ग्रह शिथळरश्मिसे अर्थात् सल्पपलसे दाहिने और पाये खिंचते हैं, तिससे पक्रगति होती है । ५२ ॥ अथ यत्तेंद्रांसोए गोलणं मदसम्मानितुल्यं भरत लाल कसरंसमानास्तदन- मागांश्च विना गतिसाधनमकार ग्रहवक्रनदन्तज्ञानार्थे श्लोकाभ्यामाह- कृततुचन्द्रदेन्द्रेः शून्यन्येकैर्गुणाष्टिभिः ॥ शररुदेश्चतुर्थेषु केन्द्रशि सुतादयः ॥ ५३॥ भवन्ति वाकिणस्तेस्तु स्वः स्वेश्चकाद्विशोधितः ।। अवशिष्टांशतुल्यः स्वैः केन्द्ररुझान्त वक्रताम् ॥५४॥ . निग्या स्थानमें दूसरी शोन-फल कोटिन्या ग्रहन करनेश रंगनायत्री सम्माते है ।
ध्यायः २) संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतः । (५७) भौमाया ग्रहाश्चतुर्थकर्मसु केन्द्रांशः शीघ्रकेन्द्रोशः कृततचन्द्ररित्यायुक्तरूपैः क्रमेण वक्रिणो भवन्ति । स्वकीयैः स्वकीयस्तैः केन्द्रांशैरुक्ततुल्यैश्चक्राबादशराशिभागेभ्यः पष्टि- युतशतवयेभ्यो विशोधितहीनेरवशेपसमानः स्वकीयैश्चतुर्थकेन्द्रोशैः। तुकारः क्रमाथें । भीमादयो यस्त्वं त्यजन्ति । परिवत वारद्वयं भुजतुल्यत्वेन नीचासन्ने मन्दस्पष्टगति- तुल्यगतिफलस्य सम्भवादिति ॥ ५३ ॥ ५४॥ भा००-शेपशीघ्रवेन्द्र मं. १६४, बु. १४४, बृ. १३०, शु. १६३ और शनि ११५ अंश होनेपर पक्रगति प्रारम्भ होती है ॥ ५३ ॥ शेषशीचकेन्द्र (चक्रसे उपर रहे अंक शोधन करनेपर अर्थात् ) म. १९६, बु. २१६, वृ. २३०, शु. १९७, श. २५५ मंश होनेपर पक्रको स्याग करता है ॥ ५४॥ अथ वक्रान्तभागानामतुल्यत्वे कारणान्तरमप्याह- महत्त्वाच्छीघपरिधेः सप्तमे भृगुभूसुतो ॥ अष्टमे जीवशशिजी नवमे तु शनैश्वरः ॥ ५५॥ शोधकेन्द्रस्य सप्तमे राशौ शुक्रभौमौ वक्रत्वं त्यजतः । अष्टमे राशी गुरुबुधौ पक्रत्य- जनाहीं । अत्र शुक्रगुर्वोः पूर्वोदेश इतरापेक्षयाभ्याहितत्वज्ञापकः । नवमे राशौ शनिव- ऋत्वं त्यजति । तुरेवार्थ । तेन शनिखे तत्र वक्रत्वं त्यजति नान्ये । अत्र कारणमाह । महत्त्वादिति । अन्येषां शीघ्रपरिधेः प्रागुक्तस्य महत्वाच्छनिशीघ्रपरिधेराधिकत्वात् । तथा च परिष्यधिकत्वेन पूर्वमेव वक्रत्यजनमत एव भौमशुक्रयोवुधगुरुभ्यां प्रथमोद्देशः । शनेस्तु मुतरां बुधगुर्योः शनितः पूर्वाद्देशः भृगुभूसुतौ जीवशशिजावित्यत्र परिध्यधि- कत्वेन शुक्रगुर्वे: प्रथमं केवलमुद्देशो न भागानामल्पत्वक्रम इति भावः । ननु परिष्यधिः- कत्वे पूर्वपूर्वराशौ वक्रत्पजने कोपपत्तिाति चेतणु । शून्यगतिसम्बद्धशीघ्रकाफ- लांशखाङ्कान्तरेत्यादेषिलोमविधिना शीघोज्ञगतेः फलकोटिज्यास्याः फलज्यास्यास्त्रिज्या-. भ्यस्त भुजफलं चलकर्णविभाजितमित्यस्य विलोमविधिना भुजफलमस्मात तद्गुणे भुनकोटिज्ये भगणांशविभाजिते इत्यस्य विलोमप्रकारेण मुजांशज्ञानार्थं भौमादीनां भुजज्या उत्तरोत्तरमधिकार शीघ्रपरिधिभ्यो यथोत्तरमपचयवयो हरेभ्यो लब्धत्वादा- राधिकन्यूनत्वाम्यां फलयोन्यूनाधिकत्वनिश्चयात् । तासां चापानि भुजभागा यथोत्तर- माधिका वक्रारमे तदन्ते च तुल्या अत एव तृतीयपदे वक्रान्तत्वाइजभागाः पच्युता “यथोत्तरमधिकं शीघ्रकेन्द्र नेपां चक्रान्ते भवति । वक्रारम्भस्य द्वितीयपंद सम्भवाइज- भागहीनाः पाशयस्तेषां वक्रारम्भे यथापचितं केन्द्र भवति । ततूक्तरीत्या भौमशु- कयोः पटराश बुधगुः पञ्चमराशौ शनेश्चतुर्थराशाविति ज्ञेयम् । इदं भगवता चिना चक्रशोधनमापाततः । शीघ्रकेन्द्रराशिज्ञानादकान्तज्ञानं लोकानुकम्पार्थमनातिप्रयोजन मुक्तमिति ध्येयम् ।। ५५ ॥ .
(५८) सूर्यसिद्धान्त:- [ द्वितीयोऽ- भा० टी०-शघ्रिपरिधिका अधिकार हानस शुक्र भौर मंगल केन्द्रकी सातवीं राशिमही और बृहस्पति बुध अष्टममें और शनि नवम राशिम कमका त्याग करता है ॥ ५५ ॥ अथ चन्द्रादिग्रहाणां विक्षेपसाधनं श्लोकाभ्यामाह- कुजार्किगुरुपातानां ग्रहवच्छनिज फलम् ॥ वाम तृतायकं मान्दं बुधभार्गवयोः फलम् ॥५६॥ स्वपातोनाद्राजीवा शीघ्राद्धृगुजसौग्ययोः ॥ विक्षेपनान्त्यकर्णाप्ता विक्षेपत्रिज्यया विधोः ॥ ५७ ॥ भौमशनिगुरूणां ये पाता मध्याधिकारावगतास्तेपां शीघ्रज फलं स्वग्रहसम्बन्धि. श्चतुर्थर्मस्थशीघ्रफलं पूर्वसिद्धं ग्रहवद्हे यथासंस्कृतं तथा सस्कार्यम् । ग्रहशीघ्रफलं ग्रहे चेयुतं तदा तत्पाते तदेव फलं याज्यं चेद्धीनं तदा हीनं कार्यमित्यर्थः । बुधशु. क्रयोस्तृतीयकं तृतीयकर्मसम्बन्धि मान्दं फलं तत्पातयोविपरीतं संस्कार्यं बुधशुक्रयो- मन्दफलं धनमृणं चेत्तत्पातयोस्तदेव फलमृणधनं क्रमेण कार्यमित्यर्थः । अनुक्तत्वा- चन्द्रस्य यथागत एव पातो ज्ञेयः । स्पष्टग्रहात्स्सस्य फलसंस्कृतो यः पातस्तेन होनाडु- जज्या । बुधशुक्रयोविंशपमाह-शीघ्रादिति । शुक्रबुधयोः शीघ्रोचात्पातेन होनाड- जज्या न पातो न वुधशुक्राभ्यां भुजज्या। विशेषस्य सामान्यवाधकत्वात् । अर्थात्पूर्वोक्तं चन्द्रभीमगुरुशनीनां सिद्धम् । मध्याधिकारोक्तस्वमध्यमविक्षेपकलाभिर्गुण्या चतुर्थकमणि यः शीघ्रकर्णस्तेन भक्ता फलं ग्रहाणां विक्षेपकलाः स्फुटा भवन्ति । ननु चन्द्रस्य शीघ्र- कर्णासम्भवात्तत्पातोनतद्धजज्या खभगुणिता केन भाग्येत्यत आह-त्रिज्ययोत । चन्द्रस्य विक्षेपसाधने तादृशी भुजज्या त्रिज्यया भाज्येत्यर्थः । अत्रोपपत्तिः । यथा 'विपुवत्तारक्रान्तिवृत्तयाम्योत्तरभागौ यदन्तरेण याम्योत्तरसूत्रे सा सुवाभिमुखी क्रान्तिस्तथा क्रान्तिवृत्ताद्विक्षेपवृत्तभागी यदन्तरेण याम्योत्तरसूत्रे स विक्षेपः कदम्बाभिमुखः । तथा हि । विक्षेपवृत्तानि ग्रहाविबाधिष्ठितानि सूर्यव्यतिरि- रुग्रहाणां पण्णां स्वस्वगोले मिचानि सूर्यस्य नित्यं क्रांतिवृत्तम्थत्वमेव, नानि शान्ति- वृत्ते स्वस्वगत्या मोतान्येव गच्छन्ति । तत्र विक्षेपक्रान्तिवृत्तसम्पाते पातस्थाने तत्- पड्भान्सपदेशे च स्थिते ग्रहविम्बे वृत्तप्रदेशैक्यादन्तराभावेन ग्रहविक्षेपाभावः । यथा तस्मादहविम्यं गच्छति तथा ग्रहविम्बकान्तिवृत्तस्थाचिह्नयोर्याम्यमुत्तरं वान्तरं क्रांति: वृत्तादहस्य भवति तदेव विक्षेपसझम् । स च पातानिमान्तरे ग्रहे मध्याधिकारोक्तः । अन्तगले पातस्थानादहचिह्न क्रान्तिवृत्ते यदन्तरेण तदन्तरं राश्याद्यात्मकं पातोनग्रह- रूपं तदुनज्ययानुपातः । त्रिज्याभुजज्यया परमविक्षेपस्तदेष्टया भुजव्यया क इति एवं चन्द्रस्यैव त्रिज्याव्यामार्धगोले परमशरस्य गणितागतपातस्य च लक्षितत्वात् । - ध्यायः २.] संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः । (५९) अन्येपांतु परमशराः शीघ्रोचदेवताकृष्टमहविम्वाधिष्ठितकल्पितवृचे शीघ्रकर्णव्यासाः लक्षिताः । कथमन्यथा शीघ्रफलसंस्कारेण ग्रहस्य स्पष्टत्वं युक्तम् । ग्रहविम्वस्य तस्य- वे तत्पातस्यापि तत्स्थत्वं युक्तम् । ग्रहसिम्याधिष्ठितवृत्ते ग्रहभोगगस्य मन्दस्पष्टत्वेन गणितागतपातान्मन्दस्पष्टाच्छरसाधनमुपपन्नम् । तदुक्तं सिद्धान्तशिरोमणी मन्द- स्फुटो द्राक्प्रतिमण्डले हि ग्रहो भ्रमत्यत्र च तस्य पातः । पातेन युक्ताद्गणितागतेन मन्दस्फुटारले चरतः शरोऽस्मात् ॥” इति । तत्र स्पष्टाच्छरसाधनार्थ शीघ्रफलं पाते संस्कृतं शीघ्रफलव्यस्तसंस्कृतस्पष्टग्रहस्य मन्दस्पष्टत्वायथोक्तसंस्कृतपाताने स्पष्टरहे पातानमन्दस्फुटग्रहस्य सिद्ध । अय बुधशुरूपातभगणी वास्तवो नोक्तौ । तौ तु शीन केंद्रमगणाधिको अतो गणितागतपातयोमध्यग्रहोनशीघ्रोचरूपशनिद्रयुतयोदश: राशिशुद्धयोः पातत्वम् । तत्र पूर्वपातस्य द्वादशशुद्धत्वाच्छीकेंद्रं चक्रशुद्धं योज्यम् । अतो लाघवाद्गणितागतपातस्य शीनाशोनमध्यग्रहरूपं केंद्रं योज्यम् । अयं पातो मन्द- स्पष्टे मन्दफलसंस्कृतमध्यरूपे हीन इति ग्रहयोर्मध्ययो शायथागतमन्दफलसंस्कृत शीघ्रोचं पातोनमिति सिद्धम् । तत्रापि मन्दफलं पाते व्यस्तं कृत्वा तदूनं शीग्रोथं कृतं संस्कृतपातपंक्तयां संस्कृतपातयोर्युक्तत्वात् । मौतदानीतावक्षेपः कर्णव्यासार्ध- वृत्तेन विज्यावृत्ते स्फुटग्रहस्थानः अतः कर्णाग्रेऽयं पूर्वानुपातानीतविक्षेपस्तदा त्रिज्या- ग्रेक इत्यनुपातेन त्रिज्यागुणः कर्णो हरः पूर्व त्रिज्याहर इति त्रिज्ययो शाटुनज्यापर मविक्षेपगुणिता शीघ्रकर्णभक्तेति सर्वमुक्तमुपपन्नम् ॥५६॥ ५७ ॥ मा०टी०-मंगल शनि और वृहस्पतिके चतुर्थ संस्कारगत शीत्रफल पहले ग्रहमै जिपप्र. कार संस्कृत हुए हैं । वेसेही इन फलोंको फिर इनहीके पातोंसे संस्कारित करे । बुध और शुक्रके कलमें तीसरा मान्दाफल जिप्त भावसे सस्कारको प्राप्त हुमा है, तिसके विपरीतभावले उक्तफल तिनके पातमि संस्कार करे । अर्थात् मान्दाफल ग्रहमें योग करना हो तो वियोग करे, और वियोग करना हो तो योग करे । चन्द्र, मगर, शनि और बृहस्पतिके स्थानमें स्फरसे उसके स्पटपात अलग करके शुक्र और बुधके स्थानमें शीघ्रो स्फुटपात हीन करके भुजज्या स्थिर करे । भुजज्याको परमविशेप ( १ अध्याय ७० श्लोक ) से गुणकरके शेष शोधकर्ण के अनुसार भाग करने पर विक्षेप-पट होगा। चद्रमाके पक्षमें विज्यास भाग घर- नेपाही विक्षेप-स्पष्ट होजायगा ॥५६॥५७ ॥ अथ दिनरात्रिमानज्ञानार्थ चरानयनं पिवशुः प्रथमं तदुपयुक्तां स्पष्टकांतिमाह- विक्षेपापक्रमकत्ले क्रान्तिर्विक्षेपसंयुता ॥ दिग्भेदे वियुतास्पष्टा भास्करस्य यथागता ॥ ५८॥ यस्य ग्रहस्य स्पटकातिरभीष्टा तस्य ग्रहस्यायनांशसंस्कृतस्य भुगज्यातः परमाप- क्रमज्येत्यादिना क्रांतिरयनांशसंस्कृतग्रहगोलदिन ज्ञेया । तस्य विशेषोप पूर्वोक्तमका- [द्वितीयोऽ- सूर्यसिद्धांत:- रेण पातोनगोलदिका ज्ञेयः । गोलस्तु मेपादिपट मुत्तरस्तुलादिपर्ट्स दक्षिणः । अथ शरकांत्योरेकदिक्त्येन क्रांतिः कलाद्या कलात्मकविशेपेण युता तयोदिगन्यत्वे क्रांति- विक्षेपेण वियुतांतरिताशेपदिका स्पष्टा क्रांतिः स्यात् । ननु सूर्यस्य विक्षेपाभावात्कथं स्पष्टा क्रांतिज्ञेयत्यत आह-भास्करस्येति । सूर्यस्य यथागता पूर्वागता क्रांतिरेर स्पष्टा क्रांतिः । अत्रोपपत्तिः। विषुववृतादहविम्बकेन्द्रपर्यन्तं याम्यमुत्तरं वान्तरं स्पष्टक्रां तिरिति तयोरेकदिक्त्वे तद्योगतुल्यमन्तरं भिन्नदिक्त्वे तदन्तरमितमन्तरमिति । अत्र शरस्य क्रांतिसंस्कारयोग्यत्वसम्पादिका क्रिया लोकश्रमभयात्स्वल्पान्तरत्वाञ्चोपेक्षिता भगक्ता कृपावता । अन्यथा शरस्य ध्रुवाभिमुखत्वं भगवदुक्तमायनकर्मकयमव्याहतं स्यादित्यलम् ॥ ५८॥ भा० टी-ग्रहका विक्षेप और क्रान्ति एक दिशामें गते हों तो मध्य क्रान्तिमें विक्षेप मिछानसे और भलग किसी दिशामें हो तो वियोग करनेसे पटनति होगी । सूर्य की मध्य क्रान्तिही स्पष्ट क्रान्ति है || ५८ ]] अथ दिनरात्रिमानज्ञानार्थमहोरात्रासन्साधयति- ग्रहोदयप्राणहता खखाटैकोद्धृता गतिः ।। चक्रासवो लब्धयुताः स्वाहोरावासवः स्मृताः॥ ५९॥ ग्रहस्य येऽयनांशसंस्कृतराशेर्वक्ष्यमाणनिरक्षोदयासवस्तपुणिता । निजस्फुटगतिः कलाघाटादशशतभक्ता फलेन युताश्चक्रासवः पष्टिघाटकानामसवः पट्शतयुतेकविंशति सहस्रमिताः स्वस्वग्रहस्याहोरात्रासकः कालतत्त्वज्ञैः कथिताः । अत्रोपपत्तिः । ग्रहः पूर्व गत्या लम्वितः प्रवहण गतिभोगकालेन भचकपरिवर्तानन्तरमुदत्यतो भचक्रपरिवर्तकालः पष्टिघटिकासु मितो ग्रहगतिकलासम्बद्धास्वात्मककालेनाधिको महाहोरात्रमस्वात्मकं नाक्षत्रप्रमाणेन भवति । तत्रैकराशिकलाभिग्रहसम्बद्धराश्युदयप्राणास्तदा गतिकलाभिः के इत्यनुपातेन मत्पसव इत्युपपन्नं ग्रहोदयेत्यादि । अनेनैव श्लोकेन प्रहाणामुदपान्तर कर्मास्तत्युिक्तं भगवता । तथाहि । अनुपातानीनमध्यग्रहाणां नियताहोरात्रमानान्तर- काले सिद्धत्वान्न मध्यरात्रकाले ग्रहाणां सिद्धिः। रविमध्यगत्यसूनां प्रतिराशौ भिन्न त्वेन मध्यमसूर्याहोराबमानस्य नियतत्वाभावादतस्त्रैराशिकायगतग्रहा अनियतमध्याका- होरात्रमानान्तरेणाधरात्रे यत्संस्कारेण भवन्ति तदेवोदयान्तरं तत्साधनं भगवता स्वल्पा- न्तरत्वादुपेक्षितम् । कथमन्यथा गतिकलासूनां समत्वमुपेक्ष्य गतिकलानामसवो भगव- दुक्ताः संगच्छन्ते । उदयान्तरस्य गतिकलासु भेदोत्पन्नत्वात् ॥ ५९ ॥ मेदि छ राशि उत्तर दिश की और तुलादि ६ राशि दक्षिण दिशा में हैं।
ध्यायः २.] संस्कुतटीका-भापाटीकासमेतः । मा० टी०-सायन ग्रह जिस राशिम हो उस स्पट राशिकी प्राणसंख्या तिसकी स्पष्ट गतिसे गुणकरके, १८०० से भाग करनेपर फर दैनिक प्राणसंख्या मर्यात् २१६०० ग्रहका स्पष्टा- होरात्रमान होगा ॥ ५९॥ अथ चरोपयुक्तां क्रांतिज्या ज्यां चाह- कान्तेः क्रमोत्क्रमज्ये हे कृत्वा तत्रोत्क्रमज्यया ॥ होना विज्या दिनव्यासदलं तदक्षिणोत्तरम् ॥ ६ ॥ स्पष्टकान्तेः क्रमोत्क्रमज्ये क्रमज्योत्क्रमज्ये हे अपि प्रसाध्य तत्र तन्मध्ये क्रान्युत्क्रमा ज्यया 'त्रिज्याहीना दिनव्यासदलमहोरात्रवृत्तस्य व्यासार्ध शुज्येत्यर्थः । तद्दिनव्यासार्धं दक्षिणोत्तरं दक्षिणगोल उत्तरगोले च स्यात् । फ्रान्तेगोलपेऽपि सत्त्वात् । अपरा क्रान्ति ज्यैव । अत्रोपपत्तिः । शान्त्यंशानां क्रमज्याक्रान्तिज्याभुजो विपुववृत्तानुकाराण्यहोरात्र कृतान्युभयगोले तदुभयतस्तव्यासाध यज्याकोटित्रिज्या कर्ण इति गोले प्रत्यक्षम् । त्रिज्यावृत्त उन्मडले याम्योत्तरवृत्ते वा प्रत्यक्षम् । तत्र भुजकर्णयोर्वर्गान्तरपदं कोटि- रिति क्रान्तिज्यावर्गोना त्रिज्यावीन्मूलं युज्या । तत्रापि भुजोत्नमज्यया होना त्रिज्या द्युकोटिकमज्या स्यादिति वृत्ते प्रत्यक्षदर्शनात्कान्त्युत्क्रमग्ययोना त्रिज्या ज्या स्था- दिति लाघवेन वर्गमूलनिरासेनोक्तं भगवता कान्तेरित्यादि ॥ ६० भा०टी०-क्रांतिसे कमज्या और उत्क्रमज्या निश्चय करे । विज्यासे उत्क्रमच्या घटाने पर तिम दिनका व्यास उत्तर और दक्षिणके अनुसार नियत होताहै ॥ ६ ॥ अप चरानयनपूर्वकदिनरात्रिमानसाधनं श्लोकत्रयेणाह- क्रान्तिज्या विषुवद्भावी क्षितिज्या द्वादशोद्धता ॥ त्रिज्या गुणाहोरानाधकर्णाप्ता चरजासवः ॥६॥ तत्कार्मुकमुदक्कान्तौ धनहानी पृथविस्थते॥ स्वाहोरात्रचतुर्भागे दिनगत्रिदले स्मृते ॥ ६२ ॥ याम्यकान्तो विपर्यस्ते द्विगुणे तु दिनक्षपे ॥ विक्षेपयुक्तोनितया कान्त्या भानामपि स्वके ॥ ६३ ॥ क्रांतिज्या विषुवदिनीयमध्याह्ने द्वादशांगुलशकोश्छायया गुण्या द्वादशभक्ता फल कुज्या स्यात् । सा। त्रिज्यया गुणिताहोरात्रार्धकर्णाप्ताहोरात्रवृत्तस्यार्धकर्णन व्यास दलेन शुज्यया भक्ताफलं चरजाज्या चरज्येत्यर्थः । अस्याश्चरज्याया धनुरसवश्वरासवों भवन्ति । स्वाहोरात्रचतुभांगे स्वस्य चरसम्बन्धिनो ग्रहस्य प्रायुक्ताहोरात्रासवस्तेषां चतुर्थाशे पृथविस्थते स्थानद्वपस्थे उत्तर क्रांती सत्यां चरासू धनहानी युतहीनो कार्यो (६२) सूर्यसिद्धान्तः- [द्वितीयोऽ- तो क्रमेण दिनरामिदले दिनार्धराव्यधैं कालविद्भिरक्त । दक्षिणक्रान्ती सत्यां विपर्यस्ते दिनरात्रिदले यत्र हीनं तदिनार्धं यत्र युतं तद्राध्यमित्यर्थः । तुकाराते दिनराभ्यः द्विगुणे दिनक्षपे दिनमानरात्रिमाने ग्रहस्य स्तः । उक्तरीत्या नक्षत्राणामपि दिनरात्रिमाने साध्ये इत्याह-विक्षेपेत्यादि । नक्षत्रवाणामानातया क्रान्त्याः नक्षत्रविक्षेपेणैकामिन्ना- दिक्क्रमेण युक्तयान्तरितयोक्तपकारण सिद्धया स्वके नक्षत्रदिनरात्रिमाने साध्ये इत्यर्थः । अत्रोपपत्तिः । द्वादशांगुलशंकुः कोटिः पलभाभुजोऽक्षकर्णः कर्णः फ्रान्तिज्या कोटिः कुज्या भुजोऽग्राकर्ण इत्यक्षक्षेत्रव्यं प्रसिद्धम्। तत्र द्वादशकोटी पलभाभुजः क्रान्तिज्या- कोटी को भुज इत्यनुपातेन कुज्या । तत्स्वरूपं तु निरक्षदेशक्षिीतजस्वदेशक्षितिजान्तरा- लस्थिताहोरात्रवृत्तप्रदेशस्य |ज्याप्रमाणेन ज्येति त्रिज्याप्रमाणेन तज्ज्याचरज्येति युज्या प्रमाणेन कुज्या त्रिज्या प्रमाणेन केत्यनुपातेन । चरज्या तनुश्चरासबोहोरात्रवृत्त- खंडप्रदेशे निरक्षस्वक्षितिजान्तराल उत्तरगोले स्वाक्षेतिजस्य निरक्षक्षितिजादधःस्थत्वा निरक्षक्षितिजयाम्योत्तरत्तान्तरालेऽहोरात्रावृत्तचतुर्थाशत्वादहोरामासु,चतुर्थाशे चरासको युता दिनाधं हीना राज्य दक्षिणगोले स्वक्षितिजस्य निरक्षक्षितिजादूर्ध्वस्थत्वादीना दिनार्ध युता राव्यर्धमित्युपपन्नं सर्व क्रान्तिज्येत्यादि ॥ ६१ ॥ १२ ॥ ६३ ।। भाटी कतिज्या विपुच्चायासे गुणकरके १२ से भाग वरनेपर क्षितिज्या होगी। क्षितिज्याको नियासे गुणकरके दिनके व्याससे भागकरके धनु नियत करनेपर चर माण- संस्पा होगी ॥६१॥ अहोरात्र के चौथे भागको दो स्थानों में रखार कहाहुना चर प्राण एकमें मिलाये और दूसरेसे घटाः । उत्तर क्रांति होनेपर यो फल दिनार्द्ध और वियोगपाल राय- ईमान होगा ॥ ६२ ॥ परंतु दक्षिणकातिमें उल्टा लत् विपोगफल दिना मोर योगफल राध्य होता है। इनको दूना परनेसे दिनादिमान होता है। इस प्रकार नक्षत्रों के विक्षेपसे कातिका निर्णय कर के दिनादिमान निीत होताहे ॥ ६३ ॥ अथ महस्य नक्षत्रानयनमाह- भभोगोऽएशतालिप्ताः साश्विशैलास्तथा तिथे । ग्रहलिता मभोगाप्ता भानि भुक्त्या दिनादिकम् ॥ ६॥ अष्टशतमिताः कला नक्षनभोगः । प्रसङ्गात्तिाधभोगमाह-खाधिवौला इति । तिथे. विशत्यधिकसप्तशतामेताः पलास्तथा भोग इत्यर्थः । यस्प ग्रहस्य नक्षत्रज्ञानामिष्टं तस्व महस्य राशपसिंशाण्या अंशा योग्यास्ते पष्टिगुणिता कला पोया इनि परि- मापया मला नक्षनभोगभक्ताः फलं महस्य गतनक्षत्राणे शेपं वर्तमाननक्षत्र गतफलास्तरमासस्य गतादेनायानपनमाह-सुस्त्यति । भहस्य फलनिकया माया शेपदिनादिकं गतं भागहरणेन साध्य शेषोनादोगाहातकलामागे- ध्यायः२] संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतः । नैष्यदिनादिकं साध्यम् । अत्रोपपत्तिः । भचकभोगेन सप्तविंशतिनक्षपाण्यश्चिन्या- दोनि ग्रहो मुनक्त्यतः सप्तविंशतिनक्षत्राणां चकालाः पदशतयुतकविंशतिसहस्रमिता मोगस्य संदेकनक्षत्रस्य क इत्यनुपातेनाष्टशतकलामोगः। एवं तिथेश्चान्द्रमासत्रिशद- शत्वाचान्द्रमासस्य सूर्यचन्द्रान्तरकमगणसिद्धत्वाध । त्रिंशत्तिथीनां चमकलामोगस्त- देकतिथेः क इत्यनुपातेन विंशत्यधिकसप्तशतकलाभोगः । अथाष्टशतकलाभिरेक नक्षत्रं तदा ग्रहकलाभिः किमित्यनुपातेन फलमश्चिन्यादीनि ग्रहभुक्तानि शेषकलाग्रहाधिष्ठि- तनक्षनस्य गतं भभोगादीनं तस्येष्यमाभ्यां ग्रहगत्येक दिनं तदाभीष्टकलाभि किम- त्यनुपातेन तस्य गतेष्यदिवसाधं भवति । एवं चन्द्रादिननक्षत्रं ज्ञेयम् ॥ ६४ ॥ मा० टी०-नक्षत्र मोग ८०० पला, तिषिभोग ७२० करा है। ग्रहकलाको ( स्पष्ट राश्यादि) ८०० से भाग करके डेब्य संरया, गत नक्षत्र भोर भषशेषको स्पष्ट गतिसे भाग करनेपर भोग निीत होता है ॥ ६४ ॥ अथ प्रसंगायोगानयनमाह- खीन्दुयोगलिप्ताभ्यो योगा भभोगभाजिताः ॥ गता गम्याश्च पष्टिना भुक्तियोगातनाडिकाः ।। ६५ ।। सूर्यचन्द्रयोगस्य राश्यादिकस्य पारभापया याः कलास्ताभ्यो योगा विष्फभादयो भभोगमानिता भभोगेन पूर्वोक्तेन विभक्ता भवन्ति । एकैकयोगस्य भभोगमितो भोगः स प्रत्येक ताभ्योऽपनीय यन्गितीः शुद्धाग्तन्मिता योगा गताः । यस्य भोगो न शुध्य- ति स क्तमान इत्ययः । कलाममोगभक्ता नता योगास्तदाग्रिमो वर्तमान इति तात्प- यम् । तस्य शेपं गतं भोगात्पतितमेष्यं ताभ्यां घाटिकायानयनमाह-गता इति । गता एष्याः। चः समुचये । कलाः पष्टिगुणिताः कार्यास्ताभ्यो भुक्तियोगाप्तनाडिका रविचन्द्रकलात्मकगत्योोंगेन भजनालब्धा घटिका गतैष्या भवति । अत्रोपपत्तिः । सूर्यचन्द्रयोगामितस्य ग्रहस्य नक्षत्राणि विष्कम्भादिसंज्ञानि योगोत्पन्नत्वाद्योगा अतस्त- दानयनं पूर्वोक्तवत् । अत एष सूर्यचन्द्रगतियोगतुल्यतद्गत्या पष्टिसावनघटिकास्तदा गतेष्यकलाभिः का इत्यनुपातेन गतष्यवाटिकानयनं युक्तमुक्तम् ॥ ६५ ॥ मा० टो-सूपे मोर चन्द्रमाका स्फुट मिलाय कला काके ८०० से भाग करनेपर लयफल गया होगा । अपशिटगन मोर ८०० से वियोग करनेपर गम्य होता है तिमको ६० से गुण काक भुक्तियोगद्वारा भ ग करने पर गत और गम्य दण्ड होंगे ॥ ६५ ॥ अथ प्रमगातिथ्यानयनमाह- अर्कोनचन्द्रलिप्ताभ्यस्तिथयो भोगभाजिताः ॥ गता गम्याश्च पष्टिना नाड्यो भुत्त्यंतरोद्धताः ॥ ६६ ॥ - (६४? सूर्यसिद्धान्त:- [दितीयोऽ- पूर्वार्धव्याख्यानं पूर्वश्लोकपूर्वार्धरीत्या ज्ञेयमुत्तरार्धे स्पष्टम् । अत्रोपपत्तिः। तिथि-' मोगकलाभिरका तिथिस्तदा सूर्योनचन्द्रकलाभिः का इत्यनुपातेन फलं गततिथयो वर्तमानतियर्गतष्ये शेपशेपोनमोगकले ताभ्यां गत्यन्तरकलाभिरनुपातेन गतष्यध- टिकाः पूर्ववत् ॥ ६६ ॥ भा०/०-चन्द्रमासे सूर्यको वियोगकरके तियिभोग (७२०) से भाग करनेपर लन्धगत तिथि होती है । अपशिष्ट और ७२० से भवशिष्ट वियोग करने पर गत और गम्य होते हैं। तिनको ६० से गुणकरके चन्द्रावि-भुक्त्यन्तरसे भाग करनेपर गत मोर गम्य दण्ड अथ पञ्चांगावशिष्टं करणानयनं विवक्षुस्तावस्थिरकरणान्याह- ध्रुवाणि शकुनि गं तृतीयं तु चतुष्पदम् ॥ किंस्तुघ्नं तु चतुर्दश्याः कृष्णायाश्चापरार्धतः॥६७॥ कृष्णपक्षीयायाश्चतुर्दश्यास्तिथेदितीयार्धाद्वितीयार्धमारभ्येत्यर्थः । चकार एवार्थे । सेनान्यतिथेरतत्तिथिपूर्वार्धस्य च निरासः स्थिराणि करणानि । तान्याह-शकुनिरिति । चतुरविस्तृतीयमानेन शकुनिनागयोः क्रमेणाद्वितीयत्वं सूचितम् । तुकारात्क्रमेण तिथ्यर्धेषु भवन्ति । किंस्तुघ्नं चतुर्थम । तुरन्तावधियोतकः तेनोक्तातिरिक्तं स्थिरकरणं नास्तीवि सूचितम् ।। ६७ ।। भा०टी०-शकुनि, नाग, चतुष्पद और किस्तुघ्न यह चार घंव करण हैं । कृष्णा चतुर्दशीके शेषाईसे क्रमशः भोग करते हैं।। ६७ ॥ अथ चरकरणान्याह- बवादीनि ततः सप्त चराख्यकरणानि च ॥ मासेऽष्टकृत्व एकैकं करणानां प्रवर्तते ॥६८॥ ततः स्थिरकरणपूर्त्यनन्तरं बवादीनि चरसंज्ञककरणानि सप्तभद्रान्तानि शुक्लमतिप- द्वितीयाद्धतश्चतुश्यैतं भवन्तीति चार्थः। ननु पञ्चम्यादितः कानि करणानि भवन्तीत्य. त आह-मास इति । चरकरणानां यवादीनां सप्तानां मध्ये एकैकमेकमेकं करणं मा- से स्थिरकरणकालोनितत्रिंशत्तिथ्यात्मकमासे स्वल्पान्तरान्मासग्रहणम् । अष्टकृत्वोऽष्टवारं प्रवर्तते प्रकरण तिष्ठति भवतीत्यर्थः । तथाच पंचम्याद्यर्धादेतानि करणानि पुनःपुनः परिभ्रमन्ति । कृष्णचतुर्दश्याद्यार्धपर्यतामिति भावः ॥ ६८॥ मा० टो-वादि सात चर करण क्रमानुसार एक चौरमासमें आठवार घूमते ॥ ६८ ॥ ननु स्थिरकरणोक्तावपरार्धत इत्युक्त्या तेषां चतुणी तिथ्यधभोगेन शुलपातपाय- धेपर्यंत क्रमणावस्थानं युक्तं चरकरणानां तु केवलोत्या तदनन्तरं कृष्णचतुर्दश्यायार्ध-
अध्यायः २.] संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतः ।
पर्यंतमेक एव परिभ्रमोऽस्त्वित्यतस्तदुत्तरं कथयन्नन्यदप्याह-
तिथ्यर्द्धभोगं सर्वेषां करणानां प्रकल्पयेत् ॥
एपा स्फुटगतिः प्रोक्ता सूर्यादीनां खचारिणाम् ॥ ६९ ॥
सप्तानां चरकरणानां प्रत्येकं तिथ्यन्तश्चासौ भोगश्च तं तिथ्यर्धकालमितावस्थान
प्रकल्पयेत् । एकत्र निर्णीतः, शास्त्रार्थोऽपरत्र भवतीतिन्यायात् करणत्वेनेपामप्यव-
स्थानं तत्तुल्यं कुर्यादित्यर्थः । अतएव तिथ्यधैं करणं स्मृतमित्युक्त्या चान्द्रमासे
त्रिंशत्तिथ्यात्मक पष्टिकरणानां सन्निवेशाचरकरणानामेव परिभ्रमणे प्रतिमासमनियत-
तिथिभोगकं करणं भवतीति तदारणकप्रतिमासनियततिथिभोगककरणकसिद्धयर्थ
चरकरणानामष्टवारंपरिभ्रमणोत्तरमवशिष्टतिथ्योश्चतुर्वर्धषु स्थिरकरणान्युक्तानीति तात्प.
यम् । तत्रापि कृष्णचतुर्दश्यपरार्धतस्तत्कल्पनं तदिच्छानियामकं स्वतन्त्रेच्छस्य नियो-
गानहत्वात् । अथानिमग्रन्थासंगतित्वनिरासार्थमुक्ताधिकारमुपसंहरति-एपेति । हे मय
सूर्यादीनां सप्तग्रहाणामेपा दृश्येत्यादिकल्पयदित्यन्तं या वार्ता सा स्फुटगतिः स्पष्टगतिः
स्पष्टक्रिया ज्ञानसम्पादिका प्रोक्ता तुभ्यं मयोक्ता । एतेन स्पष्टाधिकारः परिपूर्तिमाप्त
इति सूचितम् ।। ६९ ॥
भा० टी०-उरण माधी तिथिको भोगते हैं। इस प्रकार सूर्यादिग्रडकि स्फुटगती
कहीगई ॥ ६९॥
रंगनाथेन रचिते सूर्यसिद्धान्तटिप्पणे ॥
स्पष्टाधिकारः पूर्णोऽयं तद्गूढार्थप्रकाशके ॥
इति श्रीसकलगणकसार्वभौमवल्लालदेवज्ञात्मजरंगनाथगणकविरचिते
गूढार्थप्रकाशके स्पष्टाधिकारः संपूर्णः ॥२॥
इति द्वितीयोऽध्यायः ॥ २॥
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अथ तृतीयोऽध्यायः।
अथ त्रिप्रश्नाधिकारो व्याख्यायते । तत्र विना प्रश्नं गुरोस्तत्प्रतिपादनेच्छानुदया.
दिना च तदिच्छां छात्राणां तज्ज्ञानासम्भवात्रयाणां दिग्देशकालानां प्रश्ना इति विप
नव्युत्पत्तेस्तदिग्ज्ञानं श्लोकचतुष्टयेनाह-
शिलातलेऽम्बुसंशुद्ध वज्रलेपेऽपि वा समे॥
तत्र शंकंगुलेरिटः समं मण्डलमालिखेत् ॥१॥
तन्मध्ये स्थापयेच्छंकुं कल्पना द्वादशांगुलम् ॥
तच्छायागं स्पृशेयत्र वृत्ते पूर्वापरार्धयोः॥२॥
(६६) सूर्यसिदान्तः- [तृतीयोऽ- तत्र विंदू विधायोभो वृत्ते पूर्वापराभिषो । तन्मध्ये तिमिना रेखा कन्या दक्षिणोत्तरा ॥३॥ याम्योत्तरदिशोमध्ये तिमिना पूर्वपश्चिमा ।। दिङ्मध्यमत्स्यैः संसाध्या विदिशस्तदेव हि ॥४॥ तत्र दिक्साधनोपक्रमे प्रयममम्बुसंशुद्ध जलवत्समीकृते शिलापदेशे । अपिया अथवा तदभावेऽन्यत्र वज्रलेपे चत्वरादी घुण्टनादिना समस्थाने कृते. शंगुलैः पाडस्थांगुलविमागमानगृहीतरभीष्टसङ्ख्याकांगुलैः व्यासापरूपैर्वृत्तमवक्रमालिखेत । सर्वतः केन्द्रादृत्तपरिधिरेखातुल्या स्यात्तथेत्यर्थः । ततस्तन्मध्ये तस्य केन्द्ररूपमध्ये कल्प- नया द्वादशसंख्याकांगुलानि तुल्यानि यस्मिस्तं द्वादशविभागांकितमित्यर्थः । शंकुं समतलमस्तकपरिधिकाष्ठदनं स्थापयेत् । ततः पूर्वापरायोर्दिनस्य प्रथमद्वितीयभाग: योस्तच्छायाग्रं स्थापितशंकोंश्छायान्तमदेशो मण्डलपरिधी यस्मिन्विभागे स्पृशेत् । दिनस्य प्रथमविभागेऽनुक्षणं छायाह्रासादृत्ते यत्र प्रविशति दिनस्यापरार्दै छायानुक्षण- देर्वृत्तं यत्र निर्गच्छतीत्यर्थः । तत्र निर्गमनमवेशस्थानयोरुमो दो विन्दू पूर्वापरसंज्ञी अमेण वृत्ते परिधिरेखायां कृत्वा तन्मध्ये पूर्वापरविन्दन्तरमध्ये तिमिना मत्स्येन रेखा कार्या सा दक्षिणोत्तररेखा भवति । मत्स्यस्तु विन्द्वन्तरालसूत्रमितेन व्यासान विन्दु- उपकेन्द्रकल्पनेन वृत्तद्वयं निष्पाद्य घृत्तद्वयसंयोगाभ्यां वृत्तव्यपरिधिविभागाभ्यामन्तर्गतं मत्स्याकार स्थानं भवति । तत्रैकः संयोगो मुखं वाह्यवृत्तभागसम्माजनेनापरसंयोगस्तु पुच्छमितरवृत्तभागद्वयं सम्मार्जनेन । मुखपुच्छावध्य॒ज्जी रेखा दक्षिणोत्तररेखा । तत्र विन्दोः सव्यं रेखाग्रं दक्षिणा दिक् । पश्चिमविन्दोः सव्यं रेखाग्रमुत्तरा दिक् । अन• न्तर पूर्ववृत्तं मत्स्यश्च सम्माननीयः । शंकुरपि तत्स्थानानिष्कास्य इति केवला दक्षि- जोत्तररेखा स्थितेति तात्पर्यम् । दक्षिणोत्तरदिशोमध्यस्थाने तिमिना दक्षिणोत्तरखा- मितेन व्यासान दक्षिणोत्तरस्थानाभ्यां पूर्ववत्प्रत्येकं वृत्तं विधाय पूर्ववत्सिदेन मत्स्ये- नेत्यर्थः । पूर्वपश्चिमा रेखा कार्या । तत्र पूर्वविन्दोरासनं रेखाग्रं पूर्व पश्चिमपिन्दोरासन्न रेखा पश्चिमेति मत्स्यसंमार्जनेन केवला पूर्वापररेखा सिद्धा । अथ रेखासंयोगस्थाना. दिसाधनोपकमोक्तं पूर्ववृत्तमुलिखेत्तदृत्तपरिधौ यत्र रेखा लग्ना तत्र दिगिति तद्वत्त- मध्यस्य दिकचतुष्टयं वृत्ते सिद्धम् । तदत् । यथा दक्षिणोत्तराभ्यां पूर्वापरा साधिता तत्प्रकारेणेत्यर्थः । एवकारोऽन्यप्रकारनिरासार्थकः । हि निश्चयेन । विदिशकण दिशो दिशा पूर्वादिसिद्धदिशां ये मध्यमत्स्या अव्यवहितदिग्दयान्तरोत्पन्नाः । व्ययस्तैः संसाध्याः सम्यक्प्रकारेण साध्याः रेखवृत्तसंयोगस्थत्वेन ज्ञेयाः । अत्रोप- पाचः । क्षितिजपूर्वापरवृत्तसंयोगौ पूर्वापरविभागस्थी पूर्वापरदिशे तत्र पूर्वापरविभाग- ध्यायः ३.] संस्कृतटीका-मापाटोकासमेतः । (६७) ज्ञानं सूर्योदयास्ताभ्यां तत्र क्षितिजे पूर्वापरवृत्तं कुत्र लगामाते ज्ञानं तु विषुववृत्तका- न्तिवृत्तसम्पातस्थसूर्यस्योदयास्तस्थलज्ञानन विषुववृत्तस्य पूर्वापरक्षितिजवृत्तसम्पातयों: सम्बद्धत्वात् । अथान्यास्मन्दिने सूर्यस्योदयास्तावनांशान्तरेण याम्योत्तरे भवत इति । सूर्योदयास्तस्थानाभ्यामनांशान्तरेणोत्तरयाम्ये पूर्वापरस्थानं भवतीति क्षितिजस्य मह- त्त्वाइरत्वाच तद्दानेन पूर्वापरज्ञानमशक्यमतस्तत्सत्रेण स्वाभीष्टमदेशे तज्ज्ञानार्थममीष्टस- मस्थलेक्षितिजानुकार वृत्तं कृतम् । तत्रापि सूर्योदयास्तसमसूत्रणस्थलज्ञानस्य दुःशक- त्वाच्छायार्थ शंकुः स्थाप्यः । तथापि सूर्योदये छायानन्त्यावृत्तपरिधौ तदनस्पशी- भावः । परन्तु यथायथा सूर्य उर्वं भवति तथातथा छायाहासाधन छाया वृत्तपरिधी यदा प्रविशति तत्स्थानात्तात्कालिको वक्ष्यमाणभुजो व्यस्तोऽर्धज्याकारण देयस्तदु- कमज्यात्र परिधिप्रदेशे लगते तत्र शंकुस्थानस्य पश्चिमा । छायाग्रस्य पूर्वापरसूत्रा- इजान्तरेण याम्योत्तरपतनात्सूर्यापरदिशि छायापतनाच्च । एवं दिनापराः सूया यथा यथाधःसञ्चरति तथातथा छ यावृद्धः शंकुच्छाया वृत्तपरिधौ यत्र यदा निर्गच्छति तात्कालिको वक्ष्यमाणभुजो व्यस्तोऽर्धज्याकारण तत्स्थानाइयस्तदुत्क्रमज्या यत्र परि- धिप्रदेशे लगति तत्र शंकुस्थ तस्य पूर्वा । तत्सूत्र पूर्वापरसूत्रम् इदं शोरुपलक्षण- त्वेन ज्ञातं तथा छायोपलक्षणेनापि प्रदेशस्य पूर्वापरसूत्रज्ञानम् । तथाहि । छाया विशति तत्रापरा छायानं निर्गच्छति तत्र पूर्वा । तत्रापि प्रवेशनिर्गमयोरेकेकालत्वास- म्भवायत्कालिका प्रवेशस्तत्काले छायायाः पश्चिमत्वं तत्र वस्तुभूतं तत्काले निर्गमनस्य पूर्ववासम्भवः । एवं निर्गमकाले निर्गमस्थानस्य पूर्वत्वं वस्तुभूतं तत्काले निर्गमनस्य पश्चिमत्वासम्भवः । एककालिकसिद्धयर्थमुभयोरकेतरं चित्रं वाल्यं तात्कालिकमुजयो- रन्तरेण तत्र पूर्वचिद्रं भुजान्तरांगुलैरयनदिशि चाल्यम् । पश्चिमचिह्न वा व्यस्तायन- दिशि चाल्यम् । तत्सूत्रं सूत्रमध्यदेशस्य पूर्वापरसूत्रम् । एतन्मध्ये स्थापितशतो- श्छायाग्रप्रवेशनिर्गमचिनाभ्यां यथोक्तरीत्या भुजदानेन सिद्धपूर्वापरसूत्रेणाभिन्नत्वात् । तदुक्तं सिद्धान्तशिरोमणी-"तत्कालामपनीवयोस्तु विवराद्भकर्णमित्याहताल्लम्बज्याप्त- मितांगुलैरयनदिश्यन्द्री स्फुटा चालिता" इति । तदेतद्भगवता लोकानुकम्पया स्व- ल्पान्तरत्वादेकतराबिन्दुचालनं नोक्तं सुखाथै किञ्चित्स्थूलावेव निर्गममवेशविन्दुपूर्वापरा | मिधावुक्तौ । एवञ्चाभीष्टं स्थानं प्रवेशनिर्गमसूत्रमध्ये यथा भवति तथानेन प्रकारण मण्डलकेन्द्रशस्थापनादिनामष्टिप्रदेशे पूर्वापदिशे साध्ये इति । तन्मध्ये दक्षिणो- तररेखाबिन्दुद्दयोत्पन्नमध्यमत्स्परेखेवेति । याम्योत्तरमध्ये पूर्वापरारेखाबादमध्य- मत्स्येनेति याम्योत्तरादिशोरत्याद सम्यगुक्तम् । ननु पूर्वापराबिंदुम्यां मत्स्पेन या दक्षिणोत्तरेखा तदग्राभ्यां मत्स्येन रेखा पूर्वापरविन्दुस्पृष्टेवेति पूर्व तस्या एक बिन्दन्त- रत्यने सिद्धत्वात्पुनः साधनं व्यर्थम् अन्यया दक्षिणोचररेखाया अभ्यसंगतत्वापत्तरिति (६८) सूर्यसिद्धांत:- [तृतीयोऽ- चैत्सत्यम् । दक्षिणोत्तररेखाशुद्धचर्यमेव पूर्वापरविन्दुस्पृष्टरेसायाः पुनः साधनामति केचित् । वस्तुतस्तु दक्षिणात्तरपूर्वापर सूत्रसम्पातरूपाभीष्टस्यानाकेन्द्राप्रामुक्तवृत्तस्य वक्ष्यमाणोपयोगित्वेनावश्यकत्वात्तस्य च पूर्वापरविन्दन्तरसूत्राधिकव्याससूत्रत्वाद्वि- न्छन्तरेखाया मूलाग्रयोर्वधनीया सा तत्र वृत्ते पूर्वापररेखा भवति । तस्या बिन्दोरुपर्य- धश्च वकत्वं कदाचित्स्यादतः प्रथममेव पूर्णरेखासियर्य बिन्दन्तरसिद्धमत्स्यमुख- पुच्छगतरेखाया विन्द्वन्तराधिकत्वेन तदुत्पन्नमत्स्यरेखाया ऋज्याः मुतरामाधकत्वेन पुनः पूर्वापररेखासाधनं युक्ततरमिति तत्त्वम् । एवमेवाव्यवहित दिग्दयान्तरोत्पन्न- लधुमत्स्यैश्चतुर्भिः सूत्रैर्वृत्ते कोणदिशः । तादेदमभीस्थानकेन्द्रमण्डले दिगष्टकं सिद्धम् ॥ १ ॥२॥ ३ ॥ ४ ॥ मा० टी०-जलकी समान इक्सार शिलापर भयवा . समक्षेत्रमें 'इष्ट भगुलके परि. माणका सममण्डल (वृत्त) बैचे । तिसमें १२ भगुलके परिमाणका शंर स्थापन करे तिसकी उपयाके अग्रभाग वृत्तको पूर्व याअपराह्नमें जिस स्थानपर स्पर्श परे तहाँ दो पूर्वी- पर संज्ञा बिन्दु विधान करे । तिमि से जिनमें दक्षिण व उत्तरकी रेखाको खेंचें । दक्षिणी तरके दो दिन्दुओंको केन्द्रकरके व्यासार्डके परिमाणसे वृत्तमंकित श्रनेपर तिमि होगा । तिसंसे पूर्व पश्चिम रेखा बनती है । दिक् मध्य मत्स्यसे शानादि दियो निर्णय करना पहिये ॥ १ ॥२॥ ३ ॥४॥ अथ दिक्सूत्रसम्पातरूपाभीष्टस्थानात्तात्कालिकच्छायाग्रस्थानमाह- चतुरस्र बहिः कुर्यात्सूत्रैमध्याद्विनिर्गतः ॥ भुजसूत्रांगुलस्तत्र दत्तैरिष्टप्रभा स्मृता ॥५॥ मध्यादभीटस्थानाद्दिनेखासम्पातरूपाद्विनिर्गतीनःसृतैरष्टदिनेखारूपैः। बहिदिक्सन- सम्पातकेन्द्रवृत्तागहिः । अनैनव वृत्तकरणं पूर्वमनूक्तं घोतितम् । अन्यथा वहि- रित्यस्यानुपपत्तेः पूर्ववृत्तग्रहणे तु दिनेखासम्पातस्य मध्यत्वानुपपत्तेः । चतुरस्र कोण- साधिकसूत्रकर्णद्वयतुल्यं समचतुर्भुज कुर्यात् । तथा च तद्दर्शनम् । तर चतुरसे भुजसूनांगुलैर्वक्ष्यमाणभुजमितसूत्रस्यांगुलनिर्गमप्रवेशकालेिकर्दत्तः पूर्वापरसूत्रादर्घज्या' वदीयमानस्तत्र वृत्ते यस्मिन्प्रदेशे भुजाग्रं तत्पदंश इष्टप्रभानिर्गभप्रवेशान्यतरकालिक- छायानमुक्तम् । प्रतीतिस्तु दिवसुत्रसम्पातस्थशंकुना ज्ञेया । अत्रोपपत्तिः । वक्ष्यमा णमुजस्य छायानपूर्वापरसूत्रान्तरत्वेन प्रतिपादितत्वादिष्टछायानमुक्तदिशाज्ञानं सम्यक् । चतुरस्रकरणं वक्ष्यमाणानासाधकमाच्यपररेखानुकाररेखाया वृत्तान्तस्तदहिर्वा ऋजुत्वास यमिति ॥५॥ दो वृत्तके छदमें उत्पन्न मरय कार स्थानका नाम तिमि है ।
ध्यायः ३.] संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतः। . भा०टी०-छायाके परिमाण वृत्त खंचकर पूर्व पश्चिमकी रेखासे वृत्त के बाहर एक- सम चतुष्कोण कल्पित परे । वृत्तमें, छायाके अनुसार मुजे । पूर्वमं या पश्चिममें उत्त- रमें या दक्षिणमें संचार भयो सहित केंद्र संयोग करनेसे इष्ट छायाकी दिक्का निर्णय होजायगा॥५॥ अथ पूर्वापररेखायाः संज्ञान्तरमाह- प्राक्पश्चिमाश्रिता रेखा प्रोच्यते सममण्डलम् ॥ उन्मण्डलं च विषुवन्मण्डलं परिकयिते ॥ ६॥ माक्पाश्चिमाश्रिता पूर्वपश्चिमसम्बद्धा साधिता रेखा समवृत्तमुच्यते । सैव रेखोन्म- पडलं विपुवन्मण्डलम् । चः समुच्चये । उभयसञकं कथ्यते । अत्रोपपत्तिः। क्षिति- जपूर्वापरवृत्तसंयोगी पूर्वापरे तत्सूत्र पूर्वापरसूत्रीमाते । पूर्वापरवृत्तस्य भूमावूर्वाधरानु- कारिवृत्तत्वेनादर्शनारेखाकारतयैव दर्शनाश पूर्वापरवृत्तमपि तत्सूत्रम् । पूर्वापावृत्तस्य सममण्डलत्वेनाभिधानात्तदेखासम्मण्डलसोक्ता । अथ स्वनिरक्षदेशक्षितिजवृत्तस्थो- मण्डलारस्यस्य तत्संयोगयोः । संलग्नत्वात्तन्मध्यसूत्रत्वेन पूर्वापरसूत्रस्यापि सत्त्वात्पू. पासूत्रमुन्मण्डलसनम् । एतेनान्यदेशक्षितिजसज्ञया सदेशक्षितिजसंज्ञा सुतरां सिद्धति पूर्वीपरसूत्रस्य क्षितिनवृत्तसज्ञा योतिता । पूर्वापरस्थानयोः क्षितिजवृत्तस्य संलगत्वादुल्लिखितवृक्षस्य क्षितिजानुकारित्वाच । एवं निरक्षदेशपूर्वापरवृत्तं विषुवन्म- ण्डलाख्यं पूर्वापरस्थानयोः । संलग्नमिति तन्मध्यसूत्रत्वेनापि पूर्वापरसुत्रस्य सिद्धत्वात् त्पूर्वापरस्त्र विषुवमण्डलसंज्ञ क्रांतिवृत्तस्य दृग्वृत्तस्य चलत्वात्कादाचित्यत्वेन पूर्वा- परस्थानसंलग्नत्वात्तत्संज्ञानोक्तेति ध्येयम् ॥ ६ ॥ भा. टी.-सममण्डल, उन्मंडक, या विपुमण्डल पूर्व व पश्चिमकी माश्रित रेखा है ॥ ६ ॥ अथामाज्ञानमाह- रेखा प्राच्यपरा साम्या विषुवद्भागातथा ।। इटच्छाया विपुातोमध्यमग्राभिधीयते ॥ ७ ॥ तस्मिंश्चतुरस्र पूर्वापररेखात उत्तरभागे विपुत्रदानगाक्षमाग्रप्रदेशस्थाक्षभांगुलान्तरिते- त्यर्थः । प्राच्यपरारेखा पूर्वापररेखानुकारा रेखा तथा सर्वतस्तुल्यान्तरेण यथेष्टन्छाया- रेखा भुनान्तरेण तयाक्षमान्तरण कार्या । अनन्तरमिष्टच्छायाविषुववोरिच्छायापरे खयोरित्यर्थः । मध्यं चतुरसेऽगुलात्मकमन्तरालं मर्वतस्तुल्यम् । अमा कर्णवृत्तामो- च्यते । तत्रोपपतिः। भुजस्य कर्णवृत्तामा पलमासंस्कारेणान उक्तत्पादक्षिणगोठे शमसासारादुरलाके परिमागको भुज कहते है।
7 (७०) सूर्यसिद्धान्त:-. [तृतीयोऽ- पलमाधिकोत्तरभुजसद्भावेन पलभानो मुजोऽयेति प्राच्य परसूत्रादुत्तरभागेऽक्षमाग्नरेखा भुजमध्ये भवतीति द्वयोरेखयोरन्तरमग्रापलभोन जरूपा । एवमुत्तरगोल उत्तरभुजस्य पलभाल्पत्वाडजोनपलभाति पलमाररेखा प्राच्यपरसूत्रादुत्तरभागस्था मुजरेखातोऽ' प्यमान्तरेणोत्तरदिशीति छयोरखयोरन्तरभुजोनपलंभारूपं कर्णवृत्तामा । एवं दक्षिण- भुजस्य पलभोनाग्रात्वात्पलमायुतो भुजोऽग्रेति प्राच्यपरसूत्राटुजाग्रपलभानरेखायोः क्रमेण याम्योत्तरत्वाचयोरन्तरालपलभाभुजक्यरूपम प्रापलमायाः शंकुतलानुक- लपत्वात्सदान्तरत्वं छायासम्बन्धायुक्तम् । गोले शंकतलस्य दक्षिणत्वाद्हापर- दिशि च्छायासनावाच । अतएव प्राध्यतरसूत्रादृक्षिणभागे दक्षिणं भुजबशादक्षमा अरेखांकल्पना उक्तानुत्पत्त्या सम्यगुत्तरभागे पूर्वीपरसूत्रादिति विपुवामगेत्यत्र व्या- ख्यातम् ॥७॥ ' भाटी-पिपुषच्छायाके परिमाणमें पूर्वपश्चिम रेखासे दूर एक सम रेखा साधन करे। विषुवनेखासे इछाया रेखाके अन्तरको अग्रा कहते हैं ॥७॥ अथ प्रसंगाज्ज्ञातच्छायातः कर्णज्ञानं तच्छदिं चाह- शंकुच्छायाकृतियुतेर्मूलं कर्णोऽस्य वर्गतः ॥ प्रोज्य शंकुकृति मूलं छायाशंकुर्विपर्ययात् ॥ ८॥ दादांगुलशंकुच्छायोगयोगात्पदं छायाकर्णः स्यात् । अथास्य शुद्धिरूपं छाया- साधनमाह-अस्यति । छायाकर्णस्य वर्गाच्छंकुवगै चतुश्चत्वारिंशदधिकं शतं विशाध्य मूलं छाया। प्रकारान्तरेण छायाकर्णशुद्धिमाह-शंकुरिति । विपर्याच्छायासाधनवैपरी- त्याच्छायाकर्णवर्गाच्छायावगै विशोध्य मूलामित्यर्थः । शंकुादशांगुलमितः स्यात् । यत्रोपपत्तिः । द्वादशांगुलशक कोटिरक्षमाभुजस्तत्कृत्योर्योगपदं कर्ण इत्यक्षकर्णः । कर्ण इत्याद्यक्षक्षेत्रायुक्तरीत्योपपन्नम् । ननु दिक्साधनोत्तरमिष्टप्रभायाकर्णसाधनं भग- वता सर्वज्ञेन किमर्थमुक्तमग्रेऽग्रादीनां स्वतंत्रतयोक्तत्वात् । नच विना गणितश्रममनाशा- नार्थमिदं युक्तमुक्तमिति वाच्यम् । वक्ष्यमाणभुजज्ञानस्याग्रोपजीव्यत्वेन तस्याश्च मुजो. मजीव्यत्वेनान्योन्याश्रयात् । गणितशातापायाः पुनः साधनस्य व्यर्थत्वाच । नच भुज सूत्रांगुलदत्तीरत्यनेनेष्टन्छायावृत्तं ज्ञातमिाते न कित्येतदुत्तया दिवसत्रसम्पातस्थर्शको वृत्तपरिधौ छायावृत्तज्ञानात्तत्पूर्वापरस्त्रांतरे भुजसद्भावादिना गणितं. मुजोऽपिज्ञात इति नान्योन्याश्रय इति वाच्यम् । तथापि भूगवतः सर्वज्ञस्य निष्प्रयोजनत्वोक्तरतु वितत्वात् । विनामयोजनं मन्दोक्तरप्यभावाच । नहि दिक्साधनेऽग्राभुजादिकमावश्यक येन तदुक्तियुक्ता । किंचं कर्णसाधनस्य गणितोक्त्या वक्ष्यमाणकर्णसाधनतुल्यत्वेनात्र कथनमनुचितम् । नहि दिक्साधनाथै भाकर्णमित्याहतादिति सिद्धान्तशिरोमण्यु .
ध्यायः ३.] संस्कृतटीका मापाटीकासमेतः। (७१) क्तिवत्र छायाकर्ण उपयुक्तो येन तदुक्तियुक्तेति चतुरस्रमित्यादिलोकचतुष्टयमन्यन्स मन्दबुद्धिनाक्षिप्तं न भगवतोक्तमिति चेन्मैवम् । भुजसाधनोपजीव्यायाया एतदुक्तप्रकारे सिद्धी दिशासम्यसिद्ध। इति दिक्साधनशुद्धयर्थमनासाधनम् । प्रकारान्तरेणापि वक्ष्यमाणत्रिज्यावृत्तीयाग्रया त्रिज्या लभ्यते तदानयागतया केत्यनुपातेन साधितकर्णासं- वादेन शुदयवगमार्थ कर्णसाधन चोक्तम् । अनयाग्रया कर्णस्तदा त्रिज्या वृत्तीयाप्रया क इति फलस्य त्रिज्या तुल्यस्यानयनार्थ वा कर्णसाधनमिति केचित् । वस्तुतस्तु मण्ड- ले छायाप्रवेशनिर्गमस्थानस्थितपूर्वापरविन्द्रोः प्रत्येकं रेखेति रेखाद्वयसर्वतरतुल्यान्तर कार्य तेनान्तरेणान्यतरो बिन्दुश्चाल्पस्ता पूर्वापरविन्दु तनेखामध्यस्थानस्य पूर्वापर- रेखेति । तत्रोभयविन्दुरेखयोरन्तरांगुलमानं स्वल्पत्यादयितुमशश्यमतः प्रत्येको प्राच्यपररेखे प्रकल्प्य तन्मध्यकेन्द्रात्पूर्ववृत्तं प्रत्येकमिति वृत्तद्वयं कुर्यात् । तत्र स्वस्ववृत्ते स्वस्व प्राच्यपररेखास्पृष्टा कार्या ताभ्यां वस्वकालिको भुजौ स्वस्ववृत्ते देयौ तदने छायाग्ररेखे स्वस्ववृत्ते कार्य स्वस्वमाच्यपरस्त्रात्स्वस्ववृत्त उत्तरभागेऽक्षभांगुलान्तरेण्ट रेखे कार्ये ततः स्वस्ववृत्ते स्वस्वतदेखयोरन्तरं स्वस्ववृत्त उभयकालिककर्णवृत्ताने बहुत्वेना गणयितुं शक्ये तदन्तरं पूर्वविन्दोर्याम्योत्तरमन्तरं कर्णवृत्तानासाधनकथनेनानीतं भुजा- न्तरस्य बिन्द्वन्तरत्वात्तस्य चाग्रान्तरत्वेन फलितत्वात् । विपुवदिने गोलभेदे तु भुजा. न्तरमप्रायोग इति विन्द्रोर्याम्योत्तरमग्रायोग इति । तेनोक्तरीत्या विन्दुश्चाल्यस्त- सूत्रं पूर्वापरसूत्रं स्फुटमित्याशयेन भगवताना निरूपिता तस्याः शुद्ध्यर्थ कर्णोऽपि साधित इति तत्त्वम् ॥८॥ भा० टी०-शंकुच्छायावर्ग और शंकुर्ग मिलाकर मूल करनेसे छायाकर्ण होता है। कर्म घर्गसे शंकुवर्ग दोन करके मूल करनेसे छाया मोर तिसके विपरीत अर्यात कर्म छाया वर्गहीन करनेपा शंकवर्ग होगा ॥ ८॥ . अथ पूर्वाधिकार कान्ताद्यानयनमुक्तं तत्पूर्वाधिमासावगतमहात्केवलान्न साध्यामति श्लोकाभ्यामाह- त्रिंशत्कृत्यो युगे भानां चक्रं प्राक्परिलम्बते । तद्गुणाभूदिनर्भक्ता युगणावयाप्यते ॥ ९॥ तदोस्त्रिना दशाप्तांशा विज्ञेया अयनाभिधाः ॥ तत्संस्कृतागृहाकान्तिच्छाया चरदलादिकम् ।। १० ॥ मानां चक्रं राशीनां वृत्तं क्रांतिवृत्तं स्वस्वविक्षेपमितशलाकामपाते नक्षत्रगणयुक्तमि- त्यर्थः । युगे महायुगे माक्पूर्व विभागे विंशत्कृत्याशसंख्याका कृतिविंशतिः पटूशः (७२) सूर्यासद्धान्तः- [ तृतीयोऽ- तमित्यर्थः । परिलम्वते ध्वाधारमगोलस्थानात्तवारमरलम्बते । अत्र परिलम्बत इत्यनेन भचक्रपूर्णभ्रमणाभाव उक्तोऽन्यया अहभगणप्रसंगेन मध्याधिकार एवैतदुक्तं स्यात् । तथाच तद्वारमवलम्वनोक्त्या परावत्यं यथास्थितं भवतीत्यागतं तनापि स्वस्थानात्तथैव पश्चिमतोऽप्पपलम्बत इति सूचितम् । एवञ्च भचक्र पश्चिमत ईश्वरे च्छ्या प्रथमतः कतिचिन्द्रागेश्वलति ततः परावृत्त्य यथास्थितं भवति ततोऽपि तद्भाग' क्रमेण पूर्वतश्चलति ततोऽपि परावर्त्य यथास्थितमित्येको विलक्षणो भगणः । तेन भागित्युपलक्षणम् । पश्चिमावलम्वनानुक्तिस्तु संवादकाले तदभावात् अत्र त्रिंशत्कृत्वे ति पाठः प्रामादिकः । “युगे पशतकृत्वो हि भचक्र प्राग्विलम्वते" इति सोमसि- द्धान्तविरोधात् । तत्पश्चाचलितं चक्रमिति ब्रह्मप्तिद्धान्तोक्तेश्च । अहर्गणातगुणात्पदृश नगुणितादिनैर्युगीयसूर्यसावनदिनभक्तायत्फलं भगणादिकं प्राप्यते तस्य भगण- बागेन राश्यादिस्य भुजः कार्यस्तस्मादृशाप्तांगा दशभिर्भजनेनातभागाखिणिता जयनसंज्ञका ज्ञेयाः । भुजांशास्त्रिगुणिता दशभक्ताः फलमयनांशा इति तात्पर्यायः । नत्संस्कृतात्तैरयनांश चक्रपूर्वापरचलनवशाधतहीनाद्गहात्पूर्वापरमवक्रचलनावगमस्त्वय- नमहस्य पइमानन्तर्गतांतरगतत्वक्रमेण क्रान्तिच्छायाचरदलादिकं साध्यम् । न केवला- द्विशेषोक्तेः । छाया वक्ष्यमाणा चरदलं चरं पर्वाधिकारोक्तम् । आदिशब्दादयनवलन- मायनदृधर्म संगृह्यते । यद्यपि तत्संस्कृताग्रहात्कान्तिरित्येव वक्तव्यमन्येषामन तदुप- जीवत्वाग्रहणं व्यर्थ नथापि क्रांतिरित्युक्त्या केवलक्रांतिज्ञानाथै तसंस्कृतग्रहालांतिः साध्या । पदार्थातरोपजीव्यायाः क्रांतः साधनं तु केवलादित्यस्य वारणार्थ क्रांतिमात्रं तत्संस्कृतात्साध्यमिति सूचकच्छायाधरदलादिकथनम् । अत्रोपपत्तिः । ईश्वरेच्छया का वृत्तं स्वमार्ग पश्चिमतः सप्तविंशत्यंशैः क्रमोपचितैश्चलितंततः परावृत्य स्वस्थान मागत्य तत्स्थानात् । पूर्वतः सप्तविंशत्यशैश्चलितम् । तथा च सृष्टयादिभूतक्रांतिविषुववृत्तिसम्पा ताश्रितक्रान्तिवृत्तप्रदेशी रेवत्यासन्नः प्रागानीतग्रहभोगावधिरूपः सस्थानात्पूर्वभपरत्र वा क्रांतिवृत्तमार्गे गतः । विषुववृत्ते तु तद्भागस्य पश्चिमभागः पूर्वभागो वा गतः सम्पाते तत्तयोर्याम्योत्तरांतराभावात्कान्त्यभावः । पूर्वसम्पातमदेशे तु तयोर्याम्योत्तरान्तरत्वा- क्रांतिरुत्पन्ना । अतोयथास्थितग्रहमोगात्कातिरसंगतेति सम्पातावधिकग्रहमोगात्क्रांति- युक्ता । तत्र सम्पातावधिक्यहमोगज्ञानाथै पूर्वसम्पातावधिकः पूर्वाधिकारोक्तो ग्रहमोगो वर्तमानसम्पातपूर्वमम्पाताश्रितक्रांतिवृत्तप्रदेशयोत्तरभागेरयनांशाख्यैः पूर्वतम्पातम- देशस्य पूर्वपश्चिमावस्थानक्रमेण युतहीनो भाति । क्रान्युपजीव्यपदार्था अपि वर्त- मानसम्पातादुत्पन्ना इति तत्साधनमपि तत्संस्कृतमहात् । अथायनांशज्ञानं छ पानभगणेभ्यः पूर्वानुपातरीत्याहर्गणाग्रहमोगो भगणादिकस्तत्र गतभग- गमितं परपूर्वमचकावलम्बनं गतम् । पर्तमानं त्वारम्भे पश्चिमावलम्पनादाशिप .
.
ध्यायः ३.] संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतः।
(७३)
टूफान्तर्गते राश्यादिके पश्चिमावलम्वनमनन्तर्गते पूर्वावलम्वनम् । तत्रापि त्रिभान्तर्ग-
सानन्तर्गतत्वक्रमेण चलनं परावर्तन चेति भुनः साधितस्ततो नक्त्यशैः सप्तविंशतिभा-
गास्तदा भुजारीः क इत्यनुपातेन गुणहरी नवभिरपवर्त्य भुजांशास्त्रिगुणिता दशभक्ता
इति सर्वमुपपन्नम् ॥ ९ ॥ १० ॥
भा०टी०-भचक्र महायुगौ ६०० वार पूर्वदिशामें परिलम्बमान होता है। उस संख्याको
दिनगणते गुणकरके भदिन संख्याले भाग करनेपर बन्य संख्या भगणादि होंगे। (भगण
छोडकर ) राश्यादि भुज (जैसा पहले कह भाये हैं) करे । भुजको तीनसे गुणकरके और
घशसे भाग करनेर मयन होगा । ग्रहमें अयन संस्कार करके क्रान्तिज्यापर मादि निर्ण
य करे । दोनों विषुवमें यह सरलतासे दृग्गोचर होताहै ॥ ९ ॥ १० ॥
अयोक्तस्यान्तरस्य प्रत्यक्षसिद्धत्वमिति सार्द्धश्लोकेनाह-
स्फुटं दृक्तुल्यतां गच्छेदयने विषुवद्रये ।।
प्राक्चक्र चलित होने छायात्किरणागते ।।
अन्तरांशेरथावृत्तपश्चाच्छेपेस्तथाधिके ।। 19॥
अयने दक्षिणोत्तरायणसन्धी विपुवदये गोलसन्धी चलितं चक्रं दृक्तुल्यतां दृष्टिगो-
चरतां स्फुटमनायासं गच्छेत् । तत्र प्रत्यक्षतस्तन्मितमन्तरं दृश्यत इत्यर्थः। तथाच
सृष्टयादिकाले रेवतीयोगतारासन्नावधि मेपतुलाद्योः कर्कमकराद्योर्विपुवायनप्रवृत्तरिदान,
वन्यत्र तत्स्वरूपे प्रत्यक्षे इति क्रान्तिवृत्तं चलितमन्यथा तदनुपपत्तरिति भावः । ननु
पूर्वतोऽपरत्र वा चलितमिति कथं ज्ञेयमित्यत आह-प्रागिति । छायार्कादिने सूर्य-
स्यायनदिक्परावर्तनमुदये प्राच्यपरसूत्रस्थत्वं वा तस्मिन्दिनेऽन्यस्मिन्दिने वा मध्याह-
छायातो वक्ष्यमाणप्रकारेण सूर्यः साध्यस्तस्मादित्यर्थः । करणागते मायुक्तमकारेणा-
मोतः स्पष्टः सूर्यस्तस्मिन्नित्यर्थः । न्यूने सति । अन्तरांशः सूर्ययोरन्तराशैश्चकं क्रांति
वृत्तं माक्पूर्वस्मिंश्चलितमिति ज्ञेयम् । अथ यद्यधिक सति शेपैः सूर्ययोरन्तरांशैश्चक-
मावृत्त्य परिवृत्त्य पश्चात्पश्चिमाभिमुखं तथा चलितमिति ज्ञेयम् । अत्रोपपत्तिः।
छायातो यक्ष्यमाणप्रकारेण सूर्या वर्तमानसम्पातागणितागतस्तु खेतीयोगतारासन्ना-
द्यावधितोऽतस्तयोरन्तरमयनांशास्तत्र क्रान्तिवृत्तस्य पूर्वचलने गणितागतार्काच्छाया-
ोऽधिको भवति । पश्चिमचलने तु न्यूनो भवतीति सम्यगुपपन्नम् ॥ ११ ॥
भा० टी०-छायागत मर्फसे गणितागत न्यून होनेपर चक्र पूर्वचारी है ।, अधिक होनेपर
पश्चातगामी अर्थात् पीछे चलनेवाला है । मन्तरांश परिमारमें क्रान्तिवृत्त चलता है ॥ ११॥
अथ चरायुपजीव्यां पलभामाह-
एवं विषुवति च्छाया स्वदेशे या दिनार्धजा ॥
दक्षिणोत्तररेखायां सा तत्र विषुवत्प्रभा ॥ १२॥
. (७४) सूर्यसिद्धान्त:- -[ हतीयो:- स्वाभीष्टदेश एवं विपुवती चलितविपुवद्दिनसम्बद्धा खत्यासन्नस्याप्युपचाराद्विषुव- संज्ञा तव्यावर्तकमेवमिति । दिनार्धना माध्यानिकी या यन्मिता द्वादशांगुलदकोश्छाया दक्षिणोत्तररेखायां निरक्षोत्तरदक्षिणदेशक्रमेणोत्तरस्यां दक्षिणस्यां प्रभायाः दक्षिणोत्तर रेखास्तत्वं विना मध्याह्नसम्भवात्सा , तन्मिता तत्र तस्मिन्नभीष्टदेशे विषुवत्पभाक्षमा मवति । एतेन द्वादशांगुलशंकुः कोटि: पलभासुजस्तकृत्योर्योगपदं कर्ण इत्यक्षकर्णः । कर्णइत्यक्षक्षेत्रं वक्ष्यमाणोपयुक्तं प्रदर्शितम् । तदा सूर्यस्य विपुववृत्तस्थत्वादिषुवत्प्रभेति संज्ञोक्ता ॥ १२ ॥ भा० टी०-इस प्रकारसे विपुदिनके मध्याह्नकी छ'या दक्षिणोत्तर रेखामें दिखाई देती है। सेही तहाकी विधुवच्छगया है। १२ ।। अथ लम्बाक्षयोरानयनमाह- शंकुच्छायाहते त्रिज्ये विषुवत्कर्णभाजिते ॥ लम्बाशज्ये तयोश्चापे लम्बाको दक्षिणी सदा ॥ १३ ॥ त्रिज्ये द्विस्थानस्थे शंकुच्छायाहते एकत्र द्वादशगुणितापरत्र प्रागुक्तया विषुवत्कर्ण- भाजितोभयत्राक्षकर्णेन भक्ता फले क्रमेण लम्बज्याक्षज्ये तयोर्ययोर्धनुपी क्रमेण लम्बा- क्षौ सदोभयगोले दक्षिणदिक्स्थौ भवतः । अत्रोपपत्तिः । याम्योत्तरवृत्ते निरक्षस्वदेश- पूर्वापरवृत्तयोर्यदन्तरं तदक्षः। याम्योत्तरवृत्ते दक्षिणक्षितिजपदेशादिपुववृत्तस्य यदन्तर तल्लम्यः । उभावूध्वंगोले स्यपूर्वापरवृत्ताइक्षिणी तज्ज्ये अक्षलम्बज्ये भुजकोटी त्रिज्या कर्ण इत्यक्षक्षेत्रादक्षकर्णकर्ण द्वादशपलभे कोटिभुजी बदा त्रिज्या कणे कावित्यनुपा- साभ्यां लम्बाक्षज्ये तदनुपी लम्बाक्षावित्युपपन्नम् ॥ १३ ॥ भ' टो:-पिपुत्र दिनके शंकु (१२) और मायाको निया ( ३४१८) ने भलग गुणः फरके कर्णसे भाग करनेपर क्रमानुसार लम्बया और मक्षज्या होगी तिसमा धनु करनेसे कंप भोर मक्ष होगा ॥ १३ ॥ अथ मध्याह्नच्छायातोऽक्षानयनं श्लोकाभ्यामाह- मध्यच्छायाभुजस्तेन गुणिता त्रिभमौर्विका ॥ स्वकर्णाप्ता धनुलिप्ता नतास्ता दक्षिणे भुजे ॥ १४ ॥ उत्तराश्चोत्तरे याम्यास्ताः सूर्यक्रांतिलिप्तिकाः ॥ दिग्भेदे मिश्रिताः साम्ये विश्लिष्टाश्चाक्षलिप्तिकाः ॥ १५॥ अभीष्टदिने माध्यागिकी छाया भुजसंज्ञा ज्ञेया। तेन भुजेन त्रिज्यागुणिता मध्या.
. ध्यायः३.] संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः। इच्छायाकर्णेन भक्ता फलस्य धनुकला नतानतसज्ञास्ता नतकलादक्षिणे भुने मध्या-- हृच्छायारूपमुजे प्राच्यपरसूत्रमध्यादक्षिणदिक्स्थे सति । उत्तरदिका उत्तरे भुजे दक्षिणाः । चो विपयव्यवस्थार्थकः । ता नतकलाः सूर्यक्रांतिकलाः प्रागुक्ताः । दिग्मे- दे स्वदिशोभिन्नत्वे मिश्रिताः संयुक्ताः साम्येऽभिन्नदिक्त्वे विश्लिष्टा अन्तरिताः । चो विषयव्यवस्थार्यकः । अक्षकला भवन्ति । अत्रानावश्यकभुजसञ्जया भगवतोपपत्ति- रुक्ता । तया हि द्वादशांगुलशङ्कुकोटी मध्याहच्छायाकणे वा मध्यच्छायाभुजस्तथा सस्वस्तिकान्मध्याह्नकाले सूर्यस्य याम्योत्तरवृत्ते यदन्तरेण नतत्वं ता नतकलास्तज्ज्या- नताशज्यामध्याह्नोन्नतांशव्यारूपशको त्रिज्याकणे वा भुज इाते मध्यानच्छायाकर्णे कर्ण मध्याह्नच्छायाभुजस्तदा त्रिज्याकणे को भुन इत्यनुपातेन नतज्या तद्धनुस्त्र कला: त्मकत्वान्नतकलास्ता अहसंबद्धा इति छायादिदिग्विपरीतदिकाः । अथ क्रान्त्यांशाक्षा- शयोरेकदिक्त्वे योगेन नताशा इति दक्षिणानतकलादक्षिणक्रान्तिकलाभिहींना अक्षांशा भवन्ति । शान्त्यशाक्षांशयोभिन्नदिक्त्वेऽन्तरेण नताशा यदि दक्षिणास्तदा कान्स्यूना: क्षांशस्य नतत्वादुत्तरकान्तियुता अक्षांशाः । यदि तूत्तरास्तदाक्षोनकान्तेनेतत्वान्नतो- त्तरक्रान्तिरक्ष इति सम्यगुपपन्नम् । केचिर्तु भुजग्रहणादमीष्टकाले प्रात्यपरसूत्राच्छा याग्रं यदन्तरेण याम्यमुत्तरं वा भुजस्तं स्वल्पान्तरान्मध्यच्छायां प्राप्य तस्याः कर्ण चानीयोक्तदिशानतालमास्ता अभीष्टक्रान्तिसंस्कृता अक्षांशा भवन्तीत्याहुः ॥१६॥१५॥ मा० टी०-मध्यकी छायाही गुज है। तिसको विज्यासे गुणकरके छायाकप भाग करके धन निर्णय करनेपर नति होगी। छाया दाक्षणमें हो तो उत्तर नति और उत्तर होनेसे दक्षिण नति होती है । यह अलग दिशाम हो तो सूर्पक्रान्तिमें पोग करने से स्वीय मक्ष होगा । सम दिशाम होनेसे पियोग करना चाहिये ॥ १४ ॥ १५ ॥ अथाक्षात्पलमानयनमाह- ताभ्योऽक्षज्या च तद्गै प्रोज्य त्रिज्याकृतेः पदम् ।। लम्बज्यागुणाक्षज्या विधुवनाथ लम्बया ।। १६ ॥ ताभ्योजकलाभ्योऽझज्या भवति । चः समुथये । मक्षज्यावर्ग विज्यावर्गात्त्यक्त्वा शेषान्मूलं लम्बज्या । अनन्तरमक्षज्या द्वादशगुणा लम्बया लम्बच्यया गुणनस्य मजनसम्बन्धादतत्यर्थसिद्धम् । अक्षमा स्यात् । अत्रोपपत्तिः । अक्षकलानां चार- ज्यातस्यात्रिज्या कणं भुजत्वानदोनात्रिज्यावर्गान्मूलं लम्बज्याकोटिः । तयाक्षज्या मुजस्तदा द्वादशकोटी को भुन इत्यनुपातेन पिपुषच्छायेति ॥ १६ ॥ भा. टो-मक्षज्यावर्गविण्यावर्गसे भटग करके अन्त में से सम्बया होता है द्वादश लम्पन्यासे माग करने पर विपना होती है ॥ १६॥ गणित मक्षज्या, .. (७६) सूर्यसिद्धान्तः- [तृतीयोऽ- अथाशज्ञाने नतमागेभ्यः क्रान्तिद्वारा सूर्यसाधनं सार्धधोकाभ्यामाह- स्वाक्षार्कनतभागानां दिक्साम्येऽन्तरमन्यथा ॥ १७॥ दिग्भेदेऽपक्रमः शेपस्तस्य ज्यात्रिज्यया हता ॥ परमापक्रमज्याता चापं मेपादिगो रविः॥१८॥ कोदो प्रोग्य चक्रार्धात्तलादो भार्घसंयुतात् ।। मृगादो प्रोज्य भगणान्मध्याह्नः स्फुटोऽभवेत् ॥१९॥ स्वदेशाक्षांशेष्टदिनीयमध्यावसूर्यनतांशयो गानां बहुत्वात्वहुवचनम् । एकदिक्त्वे- न्तरमन्यदिक्त्वेऽन्यथा योगः कार्यः । शेष उक्तसंस्कारसिद्धोऽङ्कः क्रान्तिः स्यात् । तस्यापक्रमस्य ज्यात्रिज्यया गुण्या परमकान्तिज्यया मागुक्तया भक्ता फलस्य धनुर्भा- गादिकं मेपादिगो मेपादिराशित्रितयान्तर्गतोऽर्कः स्यात् । कदिनये.चक्रार्धात्पड़ा- शित आगतार्क त्यक्त्वा शेपं मध्याह्नकाले स्फुटोऽर्क: स्यात् । तुलादिनितये पडूभयुतादा. गतार्कात्स्फुटोऽर्को ज्ञेयः । आगतोऽर्कः पड्भयुतः स्फुटोऽर्कः । स्यादित्यर्थः । मकरा- दित्रयेऽके द्वादशराशिभ्य आगता त्यक्त्वा शेपमयनांशसंस्कृतः स्फुटोकः स्यात् । करणागतज्ञानार्थ व्यस्तायनांशसंस्कृत इत्यर्थसिद्धम् । पूर्व तत्संस्कृतमहात्क्रान्तिः साध्येत्यर्थस्योक्तेः । अत्रोपपत्तिः । एकदिशि क्रान्त्यक्षयोगान्नतं दक्षिणमतोऽशोनं क्रान्तिदक्षिणा । भिन्नदिशि फ्रान्त्यूनाक्षोनतं दक्षिणमनेनाक्षो हीनः क्रान्तिरुत्तरा । अक्षोनक्रान्तिनतं तूत्तरमतोऽक्षयुनं क्रान्तिरुत्तरा । अस्या' ज्याकान्तिरर्क ? ज्या । परमक्रान्तिज्याया त्रिज्याभुजः स्यात्तदानया केतीष्टा । सायनार्कभुजज्या तद्धनुः साय- नार्कभुजः । भुजस्य चतुर्षु पदेषु तुल्यत्वात्प्रथमपदे मेषादेवये सूर्यस्यैव भुजत्वाद्भुज एवं सूर्यः । कर्कादिनये द्वितीयपदे पडूभादूभस्यार्कस्य भुजत्वाट्ठजोनपडूभमः । एवं तृतीयपदतुलादिनये पइभेन हीनास्य भुजत्वात्पड्युतो भुजोमः । चतुर्थपदे मकरादिनये सूर्योनभगणस्य भुजवाहनोनभगणोऽर्क इति सबै परीत्यात्सुगम- तरम् ॥ १७ ॥ १८॥ १९ ॥ मा० टी०-निजदेशक मक्ष मौर सूर्यनतांश एक दिशामें हो तो अन्तर करनेसे अन्य दिशामें योग करनेसे भपक्रम होगा। इस अपक्रमकी ज्या विज्यासे गुणकरके परमापक- मज्या (१३९७) से भाग करके ज्या करनेसे भेपादिमें सायन रवि स्पष्ट होगा । कटादिम चका (६ राशि) से वियोग करनेपर, तुळादि ६ राशिमें योग करनेसे मोर मकररादिम २२ राशि वियोग परनेपर (सायन ) रविस्पष्ट होगा ॥ १७ ॥ १८ ॥ १९ ॥ अथागतस्फुटसूर्यस्य करणागतस्फुदतुल्यत्वज्ञानमागतस्फुटमूर्यान्मध्यमयफरणा- 'गतमध्यमातुरूपत्वेन विशेष वक्तुं श्लोकार्थेनाह-
ध्यायः ३.] संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः ।
तन्मान्दमसकृद्धामं फलं मध्यो दिवाकरः ।।
तस्मादागतस्फुटसूर्यान्मान्दुफलं मन्दफलमसकृदनेकवारं वामं व्यस्त संस्कृत
स्फुटसूर्येऽहर्गणानीतः स्फुटसूर्यः स्यात् । अयमर्थः । स्फुटसूर्यमध्यम प्रकल्प्य पूर्व-
मन्दोचात्मागुक्तरीत्या मन्दफलं धेनमृणमानीय स्फुटमूर्यऋणं धनं काय मध्यमसूर्यः।
अस्मादपि मन्दफलं स्पष्टसूर्य व्यस्त संस्कृतं मध्यमोऽस्मादपि मन्दफलं स्पष्टे व्यस्त
मध्यस्तं मध्यमार्क इति यावदविशेषस्तावदसकृत्साध्योऽको मध्योऽहर्गणानीतो भव:
वीति । तथाच मध्यमार्कीत्स्फुटार्कमाधन एकवार मन्दफलसंस्कारः स्फुटार्कान्मध्या-
केसाधने त्यनेक्वारं मन्दफलव्यस्तसंस्कार इति विशेपोऽभिहितः । अत्रोपपत्तिः ।
मध्यमसूर्यादानीतमन्दफलेन संस्कृतो मध्यः स्फुटोऽर्को भवति । वा तेनैव मन्दफलेन
व्यस्तं संस्कृतो मध्यो भवति । अत्र स्फुटार्कान्मध्यार्कसाधने मध्यमज्ञानासम्भवात्त-
दानीतमन्दफलज्ञानमशक्यं अतः स्फुटसूर्य मध्यम प्रकल्प्यानीतमन्दफलेनाभिमतास-
नेन स्पष्टोको व्यस्त संस्कृतो मध्यमासन्नः। अस्मादपि मन्दफलमभिमवासन्नमपि
पूर्वस्मात्सूक्ष्मामति यावद्विशेषे मध्यार्कसाधितं मन्दफलं भवतीति निरवद्यं सर्वमुक्तम्।।
भा० टी०-निरयण रवि स्पष्टसे मान्द्यफळ निर्णयकरके विपरीतभावसे असकृत् संस्कार
करनेसे रमिमध्य लाभ होगा । अर्यात् रविस्पष्टको रविमध्यकी समान गिनकर मन्दोच्च
संस्कारादिके द्वारा मान्दफल प्राप्त होकर विपरीत संस्कार करनेसे सूर्यकी स्थूल होगा तिसको
मध्य ज्ञानकरके मान्द फळ फिर पहीहुई रीति से रविस्पष्टमें विपरीत भावकरके संस्कार करे।
अथ मध्याने छ.यकर्णयोरानयनं विवक्षुः प्रथमं तात्कालिकनतांशज्ञानं कथयस्तटु
कोटिज्ये कार्य इत्याह-
स्वाक्षार्कापक्रमयुतिर्दिक्साम्येऽन्तरमन्यथा ॥
शेपे नतांशाः सूर्यस्य तदाहुन्या च कोटिजा ॥ २० ॥
दिक्साम्य एकदिक्त्वे स्वदेगाक्षांशमध्याह्नकालियसूर्यकांत्वंशयोोगः । अन्यथा
अत उक्तादेवदिक्त्वौद्धपरीत्येभिन्नदिक्त्वादित्यर्थः । अक्षांशक्रांत्यंशयोरंतर कार्य शेपं
संस्कारोत्पन्नं सूर्यस्य मध्याह्ने नतांशास्तपां नतांशानां भुजरूपाणां ज्या कोटिज्या
तदंशा नवतिशुद्धाः कोटिस्तत उत्पन्ना ज्या । चः समुच्ये साध्या । अोपपत्तिः ।
याम्पोत्तरवृत्ने मूर्यस्य मध्याह्ने स्वस्वस्तिकादनन्तरं नतांगा पिपुववृत्तपर्यंतमक्षांशाः।
विपुवदत्तसूर्ययोरन्तरं क्रांत्यंशाः । अतो दक्षिणकान्तो कान्यक्षयोगो
नताशा उत्तरकान्तो क्रान्त्यूनाक्षोऽसोनकान्ति; दक्षिणोत्तरनतांशास्तेषां ज्याग्भ्यां
मुजस्तकोटिज्यामहाशंकुः कोविज्याकर्ण इति च्छायाक्षेत्रे तदंशानां भुजः
त्वात् ॥ २० ॥
भा. ये-निजदेशो मांश और सूरति एक दिशा में हो तो योग, मोर विपरीतम
अन्तर करनेसे शपभाध्याहिक सूर्पमानताश हैं तिमी भुजज्या मोर कोटिन्या करे ॥२०॥
मा० . (७८) सूर्यसिद्धान्त:- [तृतीयोऽ- अथ च्छायाकर्णयोरानयनमाह- शकुमानांगुलाम्पस्ते भुजत्रिज्ये यथाक्रमम् ।। कोटिज्यया विभज्याते छायाकर्णावहर्दले ॥ २१ ॥ भुजत्रिज्ये नतांशज्या त्रिज्ये इत्यर्थः । शङ्कोः प्रमाणांगुलानि द्वादश तेगुणिते कार्ये । उभयत्र कोटिज्यया नतांशोननक्यंशानां ज्ययेत्यर्थः । भक्त्वा लब्धे द्वे यथा- क्रमं भुजग्या त्रिज्यास्थानीयफलकमेण मध्याह्ने छाया तत्क! भवतः । अत्रोपपत्तिः । बादशांगुलशकुः कोटिरिष्टच्छायाभुजस्तकृत्योयोगपदं कर्ण इति च्छायाकर्णः कर्ण इतिच्छायाक्षेत्रे ! महाशंकुकोटी दिग्ज्यात्रिज्ये भुजकी तदा द्वादशांगुलशंकुकोटौ कावित्यनुपातेन मध्याह्नकाले छाया तत्कर्णौ भवतः । साधकयोस्तात्कालिकत्वादि- त्युपपन्नम् ॥२१॥ टी-शरमानांगुलि ( १२) से भुजग्या (नाशको ) मोर त्रिज्याको अलग- मला गुपकरके कोदिज्यासे विभक्त करनेपर छाया और कर्ण होंगे ॥ २२ ॥ मथ भुजसाधनं विवक्षुः मथममनां कर्णाग्रआनयति- क्रांतिज्या विषुवत्कर्णगुणाता शंकुजीवया ॥ तर्कायास्वष्टकर्णनी मध्यकर्णोद्धृता स्वका ॥ २२ ॥ सूर्यक्रान्तिग्या अक्षकर्णगुणिता शंकुजीवया शंकुदशांगुलस्तद्पाज्या तयेत्यर्थः दादशाभरिति फलितम् । भक्ताफलं सूर्यस्याग्रा ! उपलक्षणाद्हस्यापि इयमग्रास्वा- मिमतकालिकच्छाया कर्णन गुणिता मध्यकर्णाट्टता कर्णस्य व्यासस्य मध्यमर्धाम- ति मध्यकर्णो व्यामा त्रिज्या तयेत्यर्थः । पूर्वापरप्रथमचरमजयन्यसमानमध्यमध्यम- वीराश्चेति सूत्रेण मध्यपदस्य पूर्वनिपातः । भक्ताफल स्वका स्वकर्णाग्रा स्यात् । अत्री- पपत्तिः । क्रांतिज्योन्मण्डले कोटिरक्षितिजे कर्णः कुज्याभुन इत्यक्षक्षेत्रे दादशकोटाव- सकर्णः कर्णस्तदा कान्तिज्याकोदो का कर्ण इत्यनुपातेनाया । त्रिज्यावृत्त इयं कर्ण- वृत्ते केत्यनुपातेन कर्णवृत्ताग्रेत्युपपन्नम् ।। २२ ।। मा० टी०-क्रान्तिग्याको मक्षार्णसे गुणहरके शंकु (१२)से भाग करनेपर सूर्यापा देता है । अग्राको इष्ट देवसीय फर्णमे गुगकरके विध्यास भाग करने पर स्वकर्मामा होगी। २२॥ अथ भुजानयनलेोकाभ्यामाह- विपुवद्भायुताकागा याम्ये स्यादुत्तरोभुनः ।। विषुवृत्यां विशोध्योदग्गोले स्यावाहुरुत्तरः ॥ २३ ॥ विपर्ययाद्धजो याम्यो भवेत्माच्यपरान्तरे ।। माध्याह्निको मनो नित्यं छाया माध्यानिकी स्मृता ।। २४ ॥
ध्यायः ३]
संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतः । (७९)
सांना सूर्यस्याभीष्टकालिककर्णाग्रा याम्ये दक्षिणगोले विषुवद्भायुताक्षच्छायया
युक्तोत्तरदको भुजः स्यात् । उत्तरगोले विषुवत्यां पलभायां कर्णानां विशोध्य न्यूनी-
कृत्य शेपमुत्तरादिको भुजः स्यात् । ननु कर्णाया पलभायां यदा न शुद्धयति तदा
कथं भुजः साध्य इत्यत आह-विपर्ययादिति । अक्षमा कर्णानायां विशोध्य शे
दक्षिणो भुजः स्यात् । ननु भुजस्य याम्यत्वमुत्तरत्वं वा कस्मादित्यत आह-प्राच्यप-
रान्तर इति । पूर्वापरस्त्रादन्तरालप्रदेशे याम्य उत्तरो वा भुजः स्यादित्यर्थः । ननु
तथापि द्वितीयावधेनुक्तत्वाइन्तरस्याप्रसिद्धेः पूर्वापरसूत्रात्कस्यान्तरं भुज इत्याशङ्काया
उत्तरं मध्याह्नच्छायास्वरूपकथनच्छलेनाह-माध्याहिक इति । मध्याह्नकालिको भुजः
सदा माध्याह्निकी मध्याकालिकी छायोक्ता । तथा च छायाग्नं प्राच्यपरसूत्राधाम्यमु-
चरं वा यदन्तरण स मुज इति व्यक्तीकृतम् । अत्रोपपत्तिः । शङ्कुमुलं प्राच्यपरसू-
प्राद्याम्यमुत्तरं वा यदन्तरेण स याम्योत्तगे भुजो ग्रहस्य । शङस्तु 'ग्रहादवलम्बसूत्र
क्षितिजसमसूत्रावधेि तत्रायं भुजः शंकुतलाग्योः संस्कारजः । शंकुतलं तु स्वाहोरात्र-
वृत्तस्थितोदयास्तमूत्राच्छडुमूलं यदंतरेण तद्दक्षिणम् । अग्रानुपूर्वापरसूत्रादुदयास्तसूत्रा-
पच्यन्तरमुत्तरदक्षिणगोलकमेणोत्तरदक्षिणा । तत्र ग्रहापरदिशि पड्भान्तरेऽस्माट्यस्त-
मिति शङ्कतलमुत्तरमग्रापि व्यस्तदिकति तत्संस्कारो भुजो गोले प्रत्यक्षः । स महा-
शोरिति महाशकोरयं तदा द्वादशाङ्गुलशङ्कोः क इत्यनुपातेन भुजः पूर्वापरसूत्राच्छाया-
प्रावधि । तत्र शङ्कुतलाग्रे द्वादशाङ्गुलशङ्कोः साधिते तत्संस्कारेण भुजः स एव । तत्रा-
प्यमात्पूर्व साधिता शङ्कतलं तु द्वादशाङ्गुलशको पलभा महाशङ्कः कोटः शङ्कत्तलं
मुजो हतिः कर्ण इत्यक्षक्षेत्रे द्वादशकोटौ पलभाभुजस्तदा महाशङ्कुकोटौ को भुज इत्य-
नुपातन शङ्कुतलमानीय महाशकोरियं द्वादशाङ्गुलशङ्कोः किमित्यनुपाते गुणहरयोस्तु-
ल्यत्वान्नाशेन पलमाया एवावशिष्टत्वात् । सा तृत्तरादक्षिणगोलेऽनाया उत्तरत्वादेकदि-
क्वेन पलभारयोर्योग उत्तरो भुजः । उत्तरगोलेऽग्राया दक्षिणत्वेन भिन्नदिक्त्वात्पल
माप्रयोरन्तरं भुजस्तत्र पलमायाः शेपमुत्तरो मुजोऽयायाः शेपं दक्षिणो भुजः । मध्याह्न
छायायामुजरूपत्वान्मध्याह्नकालिको भुजो मध्याह्नच्छायेति सबै युक्तम् ॥ २३ ॥२४॥
मा० टी०-दक्षिणगोळमें विपुवदासे स्त्रकर्षायाका योग मोर उत्तरमें विषुवद्भावे दियो
ग करने पर उत्तर भुज होता है । २३ ॥ विपुत्रदा वियोग मसम्भव, होनेपर स्वकर्णा
ग्रासे पियोग करनेपर दक्षिणभुन होता है । मध्याह्न नकी मध्याहच्छाया कहते हैं ॥ २४ ॥
मय याभ्योत्तरवृत्तस्थच्छायाकर्णमुक्त्वा पूर्वापरवृत्तस्यच्छायावणे प्रकारद्वयेनाह
लम्बाक्षजीवे विपुवच्छायाद्वादशसंगुणे ॥
क्रान्तिज्याप्ते तु तो करें सममण्डलगे खो ॥ २५ ॥
(८०) सूर्यसिद्धान्तः- [तृतीयोऽ- लम्बज्याक्षज्ये क्रमेणाक्षमादादशाभ्यां गुणिते उभयत्र क्रान्तिज्यया भक्त तुकारा- कले समवृत्तस्थेऽक तो टग्योग्यच्छायासम्बद्धौ की भवत उभयत्र छायाकर्णः स्यात् । अनोपपत्तिः । स्वमस्तकोपरि पूर्वापरानुकारेण यदृत्तं तत्सममण्डलसंज्ञम् । तत्रस्थस्य च्छायाकर्णानयनम् । पलभाभुजेलकर्णः कर्णस्तदा क्रान्तिज्या भुजे का कर्ण इति समशः क्रान्तिज्याभुजे समशङ्कः क्रान्तिज्याभुजे समशङ्ककुज्योनतदृत्योः प्रमेण कर्ण- कोटत्वात । अस्मात् शङ्खमानांगुलाभ्यस्ते इत्यादिना त्रिज्या द्वादशगुणितानेन भक्ता तत्र 'छेद लवं च परिवर्त्य हरस्य शेपः कार्योन भागहरणे गुणनाविधिश्च' इत्युक्ते । पलभया त्रिगुण्याफ्रान्तिज्याक्षकर्णाभ्यां भक्ता । तत्र त्रिज्या 'दादशगुणिताक्षकर्णभ- का लम्बज्यैव सिद्धातो लम्घज्यापलभागणिताकान्तिपाभक्ताफलं समवृत्तगतच्छा. याकर्णः । अथात्रैव पलभाभुजे द्वादशकोटिरक्षज्या भुजे का कोरिति लम्बज्यान- हणे पलभयोस्तुलात्वान्नाशादक्षज्यादादशगुणाकान्तिज्याभक्तालयाकर्णः सममण्डर गतः कान्तिज्यायाः सदायं कर्णः सिद्धयेन्नाहि सर्वदा समवृत्तगतो ग्रह इति समवृत्तगता अहस्यैव कर्णः साध्यो नान्यदेति सूचनायै सममण्डलगे खावित्युक्तम् ॥ २५ ॥ मा० टी०-(विमण्डलस्थ होने पर उम्बयाको विपुषच्छायासे गुण अयवा अक्षज्याके द्वादशद्वारा गुणकरके क्रान्तिज्यासे भाग करनेपर वर्ण होगा ॥ २५॥ ननु ग्रहाधिष्ठिताहोरात्रपूर्वापरवृत्तसम्पातादवलम्वरूपसमशदोर्गोले प्रत्यक्षसिद्धस्य साधनाथ समवृत्तस्थत्वाभावेऽपि च्छायाकर्णः साध्यः । सममण्डलगे रखावित्युक्तिस्तु स्वाधिष्ठिताहोरात्रवृत्तपरा न त्वन्यदा न साध्योऽन्यथा लक्षत्वेन प्रकारस्यातिप्रसङ्गा प्रत्तेः । नहि प्रकारे तद्दयावर्तकं विशेषणं प्रसिद्धं येन नातिप्रसंगः । परन्तु यदा समम- ण्डलेऽशांशाधिककान्त्या ग्रहाधिष्ठितधुरात्रवृत्तानामसम्बन्धस्तदा गोले समशङ्कारदर्श नात्तत्र कथं तत्साधनमनिवारितमित्यतः सममण्डलगे रखावित्यस्य पूर्वोक्त एवार्थ इत्य. भिप्रायं सममण्डलकर्णानयनप्रकारान्तरकयनच्छलेनाह- सौम्याशोना यदा क्रान्तिः स्यात्तदा युदलथवः॥ विषुवच्छाययाभ्यस्तः कर्णो मध्याग्रयोद्धृतः ॥२६॥ यदोत्तराकान्तिरक्षादल्पा स्यात्तदा धुदलश्रवः समवृत्तस्यायकांतिसाधितम- ध्यानकर्णः । नतु मध्याह्नकालेकः। अक्षमया गाणतो मध्याग्रया गृहीतम- ध्यानकर्णानया भक्तः फलं सममण्डलगतग्रहावम्बस्य च्छायाकर्णः स्यात् । अन सोम्यत्यनेन दक्षिणकान्तौ तदसाधनं सममण्डलगतग्रहविम्बस्यादर्शनादिति स्फुर मुक्तम् । अन्यथाक्षाल्पकान्तो दक्षिणगोले समशङ्कोः प्रत्यक्षत्वात्तन्निवारणा- नुपपत्तेः । अनोपपत्तिः । सममण्डलमवेशकालिकमध्यानच्छायाकर्णादवस्तुभूता + ध्यायः ३.] संस्कृतीका-मापाटीकासभेतः ।, (८१) 'कर्णेन हादशांगुलशंकुस्तदा त्रिज्याकर्णन के इति मध्यशंकुस्तात्कालिकः । द्वादश- कोटावक्षमाभुजस्तदा महाशंकुकोटौ क इति शंकुतलम् । द्वादशयो शात्पलभात्रिज्या- घातो मध्यकर्णभक्त इति । अनेन भुजेन मध्यशंकुस्तदायाभुजेन क इति समशंकुद- शामामध्यकर्णघातो मध्यकर्णपलभाग्यां भक्तोऽग्राभुजे समशंकुतद्धत्योः कोटिकर्णत्वात् । अस्मात्पूर्वमकारेण च्छायाकर्णानयने द्धादशयो शान्मध्यकर्णपलभात्रिज्याघातोऽग्राम- ध्यकर्णाभ्यां भक्त इति तुल्ययोर्मध्यकर्णमितगुणहरयो शावरणेन सिद्धम् । स्वतन्त्रे- च्छस्य नियोक्तमशक्यत्वात् । तत्रापि भाज्यहरौ त्रिज्ययापवर्त्य हरस्थाने मध्यकर्ण- गुणिताया त्रिज्याभक्तेति मध्यकर्णाग्रा सिद्धा अतो मध्यानयोहत इत्युक्तम् । भाज्य- .. स्थाने तु मध्यकर्णपलभाषात इति दक्षिणगोले ग्रहादर्शनान्न साधितः । उत्तरगोलेऽ. पि क्रांतिरक्षाधिका तदा सममण्डलप्रवेशासम्भवान्न साधितः सममण्डलावध्यक्षांशत्वात्। अल्पकांती तत्सम्भवात्साधितः । नासिद्धं गोले गणितसाध्यं मानाभावादित्युपपर्न सौम्येत्यादि । भास्कराचार्येस्तु -"मार्तण्डः सममण्डलं प्रविशति स्वल्पेऽपमे स्वात्प- लादृश्यो ह्युत्तरगोल एव स विशन् साध्या तदेवास्य मा । अप्राप्तेऽपि समाख्यमण्डल- मिने यः शंकुरुत्पद्यते नूनं सोऽपि परानुपातविधये नैवं क्वचिदृश्यति ॥” इत्यनेन तत्रापि साधितः ॥ २६ ॥ भा०टी०-जय क्रान्ति मक्षसे कम होवे,तध विपुपच्छाया गुणित मध्याह्न कर्णको मध्याना- से भाग करनेपर पहला कहा हुमा कर्ण होगा ॥ २६ ॥ अथ स्वाभिमतकर्णन स्वस्वकाले भुजार्थ कर्णवृत्ताग्रा साध्यति 'सूचनार्थ कर्णाग्र मुक्तप्रकारेण पुनरपि मध्यकर्ण इति प्रागुक्तस्य स्फुटीकरणाथै चाह- स्वक्रान्तिज्या त्रिजीवानी लम्बज्याप्ताग्रमौर्विका ॥ स्वेटकहता भक्तात्रिज्ययायांमुलादिका ॥ २७ ॥ स्वाभिमतकालिकांतिज्या त्रिज्यया गुणिता लम्बज्यया भक्ता फलमग्राज्यारूपा। लम्बज्याकोटौ त्रिज्याकर्णः क्रांतिज्याकोटौ का कर्ण इत्यग्रेत्युपपत्तिः।' उत्तराद्ध पुन- रुक्तव्याख्यातप्रायम् । यदि तु पूक्तिकर्णवृत्तापानयनश्लोके' शंकुजीतयेत्यस्य शंकोः कोटिरूपत्वात्पूर्व साधितनतांशभुजकोटिज्ययेत्यर्थो मध्यकर्ण इत्यस्य च तात्कालिक मध्यानच्छायायाः कर्णस्तदा न पुनरुक्तम् । परन्त्वर्काग्रेत्यस्य तात्कालिकमध्यादकालि. ककर्णाग्रार्थः स्वक्त्यस्य च स्वाभीष्टमालिककर्णाग्रार्थो बोध्यः । एतदुपपत्तिस्तु द्वाद- शकोटापक्षकर्णः कर्णस्तदाक्रांतिज्याकोटो कः कर्ण इति स्वकालिकाना । विज्यावृत्त इयं तदा तात्कालिकमध्याकालिकच्छायाकर्णेन नतांशकोटिज्यामक्तद्वादशात्रिज्यापा- तात्मकेने केति द्वादशत्रिज्याशतोगुणहरत्वेन तुल्ययोन शादःकर्णगुणितक्रान्तिया वात्कालेिकमध्याह्ननतांशोटिज्यया भक्तति । तात्कालिकमध्याह्नच्छायाकर्णेनेयं ur (८२) सूर्यसिद्धांत:- [तृतीयोऽ- कीया तदा स्वाभीष्टकालिकच्छायाकर्णेन केति स्वकालिकाकांग्रेत्युपपन्ना। सूयाधि- ष्ठिताहोरात्रवृत्तयाम्योत्तरवृत्तोर्चसम्पातस्तात्कालिकमध्या,परानुपाताय बोध्यम् २७॥ माः टी-वक्रांतिज्या विज्यासे गुणकरके लम्बयासे भाग करनेपर मना होगी को उसके इष्टकर्णसे गुणकरके त्रिज्याने भागकरनेपर संगुलादिक होंगे ॥ २७ ॥ अय कोणच्छायाकर्णसाधनाथ कोणशंकुरज्ये श्लोकपञ्चकनाह- त्रिज्यावर्गार्वतोऽग्रज्या वर्गोनाद्वादशाहतात् ॥ पुनदशनिघ्नांच लभ्यते यत्फलं बुधैः ॥२८॥ शंकुवंगाधसंयुक्तविषुवर्गभाजितात् ॥ तदेव करणी नाम तां पृथक्स्थापयेदुधः ॥२९॥ अनी विषुवच्छायाग्रज्यया गुणिता तथा ॥ भक्ता फलाख्यं तवर्गसंयुक्तकरणीपदम् ॥ ३० ॥ फलेन हीनसंयुक्तं दक्षिणोत्तरगोलयोः ॥ याम्ययोर्विदिशोः शंकुरेवं याम्योत्तरे खौ॥ ३१ ॥ परिभ्रमति शंकोस्तु शंकुरुत्तरयोस्तु सः॥ तत्रिज्यावर्गविश्लेपान्मूलं दृग्ज्याभिधीयते ॥ ३२ ॥ पूर्वप्रकारानीतैस्तात्कालिकाग्रज्याया नतु कर्णानायाः पूर्वकर्णस्यैवासिद्धेः । वर्गण होना त्रिज्या वर्गाीद्दादशगुणात्पुनहितीयवारं द्वादशगुणात् । चः, समुचये । तेन दादशगुणितस्य द्विधा स्थापननिरासाचतुश्चत्वारिंशदधिकशतगुणितादित्यर्थः । पृथगू गंणकोक्तिस्तु गुणनसुखार्थम् । शंकोर्टादशांगुलात्मक्स्य वर्गान द्विसप्तत्या युक्तेन पलमावर्गण भाजितादधैणितकभिर्यत्संख्यामितं फलं प्राप्यते तत्संख्यामितं वर- यणानाम सज्ञया करणी । ता करणी वुधो गणकः पृथगेका स्थाने स्थापयेत् । ततो दादशगुणितापलभानज्यया पूर्वगृहीतया गणिता तथा द्विसप्ततियुतेन पलमावर्गेण भक्ता- सन्धं फलसंज्ञं तस्य फलस्य वर्गेण युतायाः करण्या मूलं दक्षिणोत्तरगोलयोः रमेण. फलेनोनयुतम् । एवमुक्तमकारेण सिद्धः कुशवोर्गणितकर्तुः सकाशाद्दक्षिणोत्तरे सूर्य, परिभ्रमात सति तुकारः क्रमा' क्रमेण याम्ययोरुचरयोविदिशोरामेयनैऋत्योरीगानी घायव्योः कोणयोरित्यर्थः । द्वितीयतुकारः पूर्वापरदिने विभागामार्थकत्वेन विदिः शोरित्यनान्चति । तेन दिनपूर्वाधं आग्नेयैशान्योदक्षिणोत्तर मेण दिनापरार्धे नैत्यवा:, यम्पादक्षिणोत्तरक्रमणोते फालतार्थः । स कोणसज्ञः शंदु: स्यात् । कोणशंकुत्रिज्य- ध्याय: ३.] संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः । योर्वर्गान्तरान्मूलं दृग्ज्योच्यते । अत्रोपपत्ति/जेकवर्णमध्यमाहरणेन । तत्र “यावत्तावत् कल्प्यमव्यक्तराशेर्मानं तस्मिन् कुर्वतोद्दिष्टमेवा तुल्यौ पक्षौ साधनीयौ प्रयत्नात्त्यक्त्वाक्षिप्ता वापि संगुण्य भक्त्वा ॥” इत्युक्तेः । समौ पक्षी साध्यौ तदर्थ कोणशंकुमानम् । या १ द्वादशकोटी पलमा भुजः शंकुकोटी को भुज इति? कोणशंकुतलम् । या. प. । अग्रया युतं दक्षिगगोले भुजः । या. प. अ.३' । उत्तरगोलेऽग्रयान्तरितं भुजस्त- त्र समवृत्तादुत्तरं शंकृतलोनाया भुजः । या. प.' : अ. १३ । समदृत्तादक्षिणेऽयोन शंकुतलं भुजः । या. प. १ अ.०३ । कोणस्य दक्षिणोत्तरपूर्वापरसूत्रमध्यत्वाङजतु- ल्यसमचतुरस्र कर्णः स्वस्वस्तिकात कोणस्यसूर्यनतांशानां ज्यादृग्ज्येति भुजवर्गा दिगुणो दृग्ज्यावर्गा दक्षिणगोले । याव. प. २. या. प. अ. २४ अब। ४ उत्तर- गोले । याव. पव. १ था. प. अ. २४ अव ३४४ अयं कोणशंकुः । या १ वर्गयाव- १ द्दीनत्रिज्यावर्गरूपदृग्ज्यावर्गयावत्रब १ सम इति पक्षौ समच्छेदीकृत्य च्छेदगमे पक्षयोः शोधनाथै न्यासः । याव. पव. १ या. प. य.२४ अव १४४ । दक्षिणगोले याव.७२ या. त्रिव. ७२ याव. पर. १ या. प. अ. २४. अव १४४१ या.७२ या. त्रिव. ७२ अथ "एकाव्यक्तं शोधयेदन्यपक्षादूपाण्यन्यस्येतरस्माच्च पक्षात् " इत्युक्तेनाव्यक्त- पक्षेऽव्यक्तवर्गस्थाने दिसप्ततिपलभावर्गयोगो यावत्तावद्वर्गगुणोन्यक्तस्थाने पलभाया चतुर्विंशतिघातो यावत्तावगुणो दक्षिणगोले धनमुत्तरगोले ऋणम् । रूपपक्षे तु चतुश्च- स्वारिंशदधिकशतगुणितेनाग्रावर्गेण हीनो द्विसप्ततिगुणखिज्यावर्गस्तत्र दिसप्ततिगुण- खिज्यावर्गश्चतुश्चत्वारिंशदधिकशतगृणितेन त्रिज्यावर्गार्धन न तुल्यत्वात्तुल्यगुणला- चवाय तथैव वृतः । तत्राप्येकदेव गुणनायै विज्यावर्गार्थमनावर्गेण हीनं चतुश्चत्वारि- शदधिकशतगुणामिति सिद्धम् । सार्धराशिज्याधिकाग्रायां तु त्रिज्यावर्गाधन हीनोऽया- चाश्चतुश्चत्वारिंशदधिकशतगुण ऋणम् । “. अव्यक्तंवर्गादि यदावशेपं पक्षी तदेष्टेन निहत्य किञ्चित् । क्षेप्यं तयोर्येन पदप्रदः स्यादव्यक्तपक्षोऽस्य पदेन भूयः । व्यक्तस्य 'पक्षस्य समक्रियेवमव्यक्तमानं खलु लभ्यते तत् ॥” इत्युक्तः पक्षयोर्मूलार्थमव्यक्तव- गोकनापवर्तः कार्यः । वर्गोफस्तु द्विसप्ततियुतः पलभावर्गस्तेनापवर्तितेऽन्यकपक्षे प्रथ- मस्थाने यावत्तावदर्गः सिद्धः। द्वितीयस्थाने द्विमितगुणकस्य पृथकरणाशी विषुव- च्छायाग्रज्यया गुणिता तथा भक्ता फलास्यमित्युक्त्या फलं द्विगुणं यावत्तावद्गुणं दक्षिणोत्तरगोलक्रमेण धनमृणम् । रूपपक्षेऽपवजिते करण्यारयंतादशिष्यातोऽयाया- मूनाधिकायां धनमृणम् । ततोऽपि मूलार्थपक्षयोल्यतांकास्पफलस्य वर्गों योजितः । उत्तरगोले है - (८४) सूर्यसिद्धान्त:- वाय तत्राव्यक्तपक्षयोजनपूर्वकमूलग्रहणे प्रथमस्थाने यावत्तावत् । दिवीचस्थाने फलं दक्षिणी- चरगोलयोर्धनमृणम् । यथा । या १ फ १ या १ फ। उत्तरगोलेऽव्यक्तस्यर्णत्व था ; फ १ । उभयथा मध्याव्यक्तनाशसम्भवात् । रूपपक्षे तु फलग्रहणे तदर्गसंयुक्त करणीपदमिति सार्धराशिज्यानधिकायायामधिकायां तु करण्यूनस्य फलवर्गस्य मूलम् । तथा च त्रिज्यागार्धतोप्रज्यावर्गानादेत्यत्र साधराशिज्याधितापायामु- कानुपपत्तावपि । “यत्र कचिच्छुद्धिविधी यदेह शोध्यं न शुद्धविपरीतशुद्धया । विधि- स्तदा प्रोक्तवदेव किन्तु योगे वियोगः मुधिया विधेयः ।।" इति भास्करोक्तरीत्यान. ज्यावानादित्यवाग्रावर्गणावर्गाद्वा हीनादित्यर्थद्वयेन क्रमेण न्यूनाधिकानासम्बन्धेन ना न क्षतिरिति ध्येयम् । अथ पुनः समशोधनार्थम्- पक्षयोन्यासः। दक्षिणगोले या१फ११ करण्यूनफलवर्गपदस्य फलतो न्यूनत्वाद श्या० प१ तत्यक्षयोरपि न्यासः । याफ११ अत्रैकाव्यक्तीमत्यादिना । “शेषाव्यक्तेनोदरेप- त्या०प०९ शेपव्यक्तं मान जायतेऽव्यक्तराशेः" इत्यनेन च प्रथमस्थाने पदं फलेन हीनमित्युपप- नम् । द्वितीयस्थाने पदेन हीन फलामेत्य॒णकोणशंकुर्भगवताय नोक्तः । मणस्य स्थितिविपरीतत्वात् । न ाध्वंगोले स्थितिविपरीतमधोगोलेअदृश्यमपि दृश्यते येन तत्क- थनमावश्यकम् । नाप्यधोगोले दृश्यत्वात् तत्कथनापत्तिः ऊर्ध्वगोलस्थस्य च्छायासा- धक्त्वेन साधनात् तत्र च्छायासंभवादेवाप्रयोजकत्वात् । उत्तरगोले तु यारफ११चा याप या? फप्रथमस्थाने फलेन युतं पदमुपपन्नम् । द्वितीयस्थाने फलेनोनं पदमित्गृण- त्या०पः सानोक्तः । छायानुपयुक्तत्त्वात् । करण्यनफलवर्गपदस्य फटतो न्यूनत्वात् तत्पक्षयो- रपि न्यासः । यारफ.११ वा यारफअत्र प्रथमस्थाने पदेन युक्तं फलं कोण- त्याच प.१७ त्या०प१९ शंकुरुपपन्नः । द्वितीयस्थाने पदेन होनं फलं कोणशंकुरिति तद्दयमुपपन्नम् । मन्दिर्द उतोर्ध्वगोले दिनार्थ एव कोणशंकुद्धयं दृश्यत्वाद्भगवता कयमुपेक्षितामेति चेन्न । तत्र विज्यावर्धित इत्यत्र व्यस्तशोधनात्फलेन हनिसंयुक्तं पदमित्यनाप्युत्तरगोल एवं होनसंयुक्तमित्यस्यावृत्त्या फलं पदेन होनसंयुक्तमित्यर्थसिद्धर्भगवता तइयत्यानु- पेक्षितत्वात् । समवृत्तादक्षिणस्थत्वे कोणशंकुदिने पूर्वापरार्धक्रमेणामेय्यां नयां बोत्तरत्थत्वेनशान्यां वायव्यां वा भवतीते सर्वमुपपनम् । अत्र वीजत्रियोपपादकत त्राणामुपपत्तिर्विस्तरमीत्या नोक्ता ! सा त्वग्रजकृष्णदेवज्ञगुरुचरणरचितायां भास्करीय- बीजदीकायां सम्यगुक्तावर्धयति । शंकुं: कोटिखिज्याकर्णस्ववर्गान्तरपदं गूज्या ग्: ३ ध्यायः ३. संस्कृतटीका-भाषाटीकासम्तः। तनतांशानां ज्यति तत्रिज्यावर्गविशेषान्मूले दृग्रज्येत्युपपन्नम् ॥ २८ ॥ २९ ॥ ॥३०॥३१॥३२॥ भा० टी०-त्रिज्यावर्गाईसे (५९०९९२९ ) तात्कालिक अग्रज्यावर्ग वियोगकरके १४४ से गुणकरके नो फललाभ होगा तिसको शवाई (७२) संयुक्त विषुषच्छाया वर्गसे भाग- करनेपर करणी होगी । तिसको अलगकर रखना चाहिये ॥ २८ ॥ २९ ॥ हादशगुणित विषुवच्छाया अग्रज्यासे गुणकरके पहले कहेहुये शंकुवर्गाई (७२) संयुक्त विषुवच्छायाव- से भाग करनेपर फल होगा। इसका वर्ग भोर करणी योगकरके मूलकरनेसे नो हो तिससे दक्षिणगोलमें फलहीन और उत्तरगोलमें फल योग करनेपर कोणशंकु होगा । सूर्य दक्षिणम हो, कोणशंक दक्षिणके दो कोनोंमें मोर उत्तरमें होनेपर उत्तरके दो कोणों में होगा ॥३०॥ ॥ ३१ ॥ ३२॥ अथैतच्छायाच्छायाकर्णवारानयनमाह- स्वशंकुना विभज्याप्ते हवित्रज्ये द्वादशाहते ॥ छायाक! तु कोणेषु यथास्वं देशकालयोः ।। ३३ ।। कोणीयराज्यात्रिज्ये दादागुणे राज्यासम्वन्धिकोणशंकुना भक्त्वा लम्धे गुज्या- त्रिज्याक्रमेण च्छायाच्छायाक! स्तः । तुकारादेव कोणेषु चतुर्पु देशकालयोः । यथा स्वस्वमनतिक्रम्यति यथास्वं यथादेशं यथाकालं छायाच्छायाकौँ साध्यो।अयमयः। कचिदेशे चतुर्पु कोणेषु कधिच कोणद्वये क्वचिच दिनार्ध एव कोणदय इत्यादिदेशका. लानुरोधेन यथायोग्यामिति । अत्रोपपत्तिः । प्रागुक्ता स्पष्टा च ॥ ३३ ॥ भा टी०-तिसकावर्ग और विज्यावर्गका अन्तर मूलकरनेसे हग्ज्या होगी। हादशगुणिता ज्या मोर द्वादशगुणितत्रिज्या (४१२५६ ) कोण शंकुसे भाग करनेपर इष्टस्यानमें यथासमयमें छाया और कर्ण होगा ॥ ३३ ॥ अथ दिकप्रदेशसम्वन्धेन च्छायाकयुक्त्वा कालसंवधेन सार्धश्लोकाभ्यामाह- দিবাস্তু অন্য ভিলিন अन्त्या नतोकमज्योना स्वाहोरात्राधसंगुणा ॥ त्रिज्याभक्ता भवेच्छेदो लम्बज्यानोऽथ भाजितः ॥ ३४ ॥ त्रिभज्यया भवेच्छंकुस्तद्गै परिशोधयेत् ।। विज्यावर्गात्पदं ज्या छायाकौतु पूर्ववत् ॥ ३५ ॥ उत्तरगोले चरोत्पन्नया ज्यया चरज्यत्यर्थः । पूर्वचरानयने चरज्यायाश्चरज्योते सज्ञोक्तः । युक्ता. त्रिज्यान्त्या स्यात् याम्यगोले तया चरज्ययोना विज्चान्त्ता स्यात् । नतोत्नमज्योना सूर्योदयादिनगतघटयोदिनशेपघट्यो: दिनान्तर्गता उल:
(८६)
सूर्यासद्धान्त:-
[तृतीयोऽ-
तसज्ञास्ताभिरूनं दिनार्धे नतकालो घट्यात्मकस्तस्यामुभ्यो लिप्तास्तत्त्वयरित्यादि
विधिना मुनयो रंध्रयमला इत्याद्युक्तोत्क्रमज्यापिण्डैज्योतकमज्या । पञ्चदशघट्यधिकनते
तु पञ्चदशघटातून नतस्य क्रमज्यारखण्डैः क्रमज्या तया युक्ता त्रिज्योत्क्रमज्या भवति ।
तया होनेत्यर्थः । स्वाहोरात्रार्धसंगुणा । गृहीतचरज्यासम्बन्ध्यहोरात्रवृत्तव्यांसाः
धुज्या तया गुणिता त्रिज्यया भक्ता फलं छेदसञः स्यात् । अयानन्तरं छेदो लम्ब.
ज्यया गुणितस्त्रिज्यया भाज्यः फलमिष्टकाले शंकः स्यात् । तस्य शबोर्वत्रिज्या-
वर्गाच्छोधयेत् । शेषस्य मूलं गुज्या । आभ्यां छायाको तु पूर्ववत् पूर्वोक्तरीत्या
मवतः । अत्र च्छायाकर्णो त्विति कोणच्छाया कर्णसाधनश्लोकान्तर्भागस्य ग्रहणा-
तल्लोकोक्तरीत्याभीष्टशंकुगूज्याभ्यां छायाको साध्यावित्युक्तम् । अत्रोपपत्तिः ।
याम्योत्तरवृत्तो भागग्रहाधिष्ठितारात्रवृत्तसम्पातात् क्षितिजारात्रवृत्तसम्पातद्वयबद्धो
दयास्तसूत्रक्षितिजसम्बद्धयाम्योत्तरवृत्तसूत्रसम्पातपर्यन्तमहोरात्रवृत्ते सूत्रं त्रिज्यानुरु-
दमन्या सा तूत्तरगोले चरज्यायुता त्रिज्यादक्षिणगोले चरख्ययोना त्रिज्या । उन्मण्ड-
व्याम्योत्तरसूत्रावध्यहोरात्रवृत्तन्यासा त्रिज्यात्वात् । उन्मण्डलस्योत्तरदक्षिणक्रमेण
क्षितिजादूर्वाधास्यत्वेन तद्याम्योत्तरसूत्रयोर्मध्ये चरख्यात्वाच । ग्रहाहोरात्रवृत्ते याम्यो
चराहोरात्रवृत्तसम्पातादुभयत्र नतवटयन्तरेण स्थाने तत्सूत्रं नतकालस्थसम्पूर्णज्या ।
तन्मध्यादुर्ध्वसूत्रं शररूपं नतोत्नमज्या । तया हीनान्त्या ग्रहस्थानादहोरात्रवृत्त उद-
यास्तसूर्यपर्यन्तमृजुसूत्रं त्रिज्यानुरुद्धमिष्टान्त्या । ततुल्या याम्योत्तरोज़ व्याससूत्रा-
न्तर्गता सा गुज्या प्रमाणसाधितेष्टहतिः । युज्यागुणात्रिज्याः भक्ताफलं छेदः ।
अस्मात्रिज्याकर्णलम्बज्याकोटिस्तदेष्टहतिकणे काकोटिरित्यनुपातेनेष्टशंकुः । अस्माद्-
ग्ज्याच्छाया तस्कर्णी उक्तरीत्यासिद्धयन्तीत्युक्तमुपपन्नम् ॥ ३४ ॥ ३५ ॥
मा० टी०-उत्तर दिशामें सूर्य होनेपर नियासे चरज्याको योग और दक्षिण में रहनेसे
त्रिज्यासे चरज्याका वियोग करने पर मन्त्य होताह मध्याह्नसे इष्टमाल वियोग करके अंशा-
विन परिवर्तन करने नत होताहै, नतके अनुसार उत्क्रमज्या अन्तसे वियोग करके स्वाहो-
रात्राई ध्यासद्वारा गुणकरके त्रिज्या (३४३८) से भाग करनेपर छेद होता ।छेदको लम्ब
ज्यासे गुणकरके त्रिज्यासे माग करनेपर शंकु होगा। त्रिज्यावर्ग ( ११८१९८४४) से शंर
वर्ग(१४४) वियोगकरके मूसकरनेपर ज्या होताहै । इसकी छाया मार कर्ण पहले जैसे
होंगे ॥ ३४ ॥ ३५॥
अथ श्लोकत्रयेण च्छायाकर्णाभ्यां नतकालानयनमाह-
अभीष्टच्छाययाभ्यस्तात्रिज्या तत्कर्णभाजिता ॥
हग्या तद्वर्गसंशुद्धात्रिज्यावर्गाच यत्पदम् ॥ ३६ ॥
ध्यायः ३.] 'सस्कृतरीका-मापाटीकासमेतः । शंकुः सत्रिमजीवानः स्वलम्बज्याविभाजितः ॥ छेदः स विज्ययाभ्यस्तः स्वाहोरात्र्याईभाजितः ॥३७॥ उन्नतज्या तया हीना स्वान्त्या शेषस्य कामुकम् ॥ उत्क्रमज्याभिरेवं स्युःप्राक्पश्चार्धनतासवः ॥३८॥ अमीष्टकालिकच्छायया गुणिता त्रिज्यागृहीतच्छायायाश्छायाकर्णन भक्ता फलह- गूज्याया वर्गण होनाचिज्यावर्गायत्सइख्यामितं मूलम् । चकारो यत्तदोर्नित्यसम्ब- न्धात्तच्छब्दपरः । थभीष्टशंकुः । स इएशंकुस्त्रिज्यया गुणितः स्वदेशीयलम्बज्यया भक्तः फेलं छेदः । स च्छेदस्त्रिज्यया गुणितो गुज्यया भक्त उन्नतकालस्य ज्या विल क्षणा। यद्धनुरुन्नतकालो न भवति । तयानीतयोन्नतज्यया हीना स्वान्त्या स्वाड्या- सम्बद्धचरज्यायावगतान्त्या । अवशेपस्यौत्क्रमज्याभिर्मुनयो रंध्रयमला इत्यायुक्तोत. मज्यापिण्डैर्धनुः । अवशेपस्य विज्याधिकत्वे तु यदधिकं तस्य क्रमज्यापिण्डेर्धनुश्चतु:- पश्चाशद्युक्तमुत्वमधनुर्भवति । एवं प्रकारेण सिद्धादा दिनस्य पूर्वाधीपरार्धयोनतका- लासपो भवन्ति । अत्रोपपत्तिः पूर्वोक्तव्यत्यासात्सुगमा । तत्र च्छेदखिज्यापरिणत इष्टान्त्या तस्या ज्यात्वासम्भवः । अवध्युदयास्तत्सूत्रस्याहोरात्रवृत्तव्यासस्त्रत्वाभावा- दित्युन्नतज्याकारेण स्वल्पान्तरत्वेन दर्शनादुन्नतज्येत्युक्तम् । अत एव भास्कराचार्यः "इष्टान्त्यकामुन्नतकामौवातुल्या प्रकल्प्या” इत्याद्युक्तम् । तदनुरसुनामुन्नतकालवा- पत्त्या तया होनत्यादिमागस्य व्यर्थत्वापत्तेरित दिक ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ माटी०-इष्टच्छायाको विन्यासे गुणकरके तिसको कर्णद्वारा माग करनेपर हाज्या होताहै । विज्यानसे दृग्ज्यावर्ग पियोग करके मूक करनेसे शक होताह । शंको विन्यासे गुणकरके स्वीय लम्ज्यासे भाग करनेपर छेद होताहै । छेदको विज्यासे गुणकरके स्वाहोराबाईसे गाग करके स्वीय सन्त्यसे वियोग करनेपर शेष स्वतन्या होगी। तिस्से धनुकरे । उन्नतज्या उत्क्रमव्याकै परिमाणसे धनकरनेपर पूर्वापर नति प्राण सिद्ध होगा ॥ ३६॥ ३७॥ ३८॥ अथेटकाालेकाग्रया क्रान्तिज्याद्वारा सूर्यसाधनं सार्थश्लोकेनाइ- इटावानी तु लम्बज्या स्वकणीगुलभाजिता ॥ कान्तिच्या सा विजीवानी परमापक्रमोद्धृता ।। तचापं भादिकं क्षेत्रं पदेस्तत्र भवो रविः ॥ ३९ ॥ इटकालकाणाप्रप' गुणिता लम्बच्या । तुकारादप्रज्याया निरासः । तात्काल कच्छापायाः कौगुलसदस्याभिर्भक्ता फलं क्रान्तिज्या । सा क्रान्तिया त्रिज्यया (८८) सूर्पसिद्धान्तः- [तृतीयोऽ- - गुणितापरमकान्तिज्यया मक्ता फलस्य धनूराश्यादिकं क्षेत्रं स्थानं भुज इति यावत् । पैदेवतुमिश्विद्वज्ञातस्तत्र पदे भव उत्पन्नः । यथोक्तरीत्या कर्कादी प्रोज्झ्य चक्राधे त्यायुक्त्या सूर्यः स्यात् । अवोपपत्तिः । कर्णाग्रे कर्णाग्रा लभ्यते त्रिज्या केल्यग्रा । विज्याकणे लम्बज्याफोटिस्तदापाकणे काकोटिरित्यनुपातेन त्रिज्ययोस्तुल्ययोगुणहर- यो शादिष्टफर्णावागुणितलम्वज्याकर्णमक्ता कान्तिज्या । अस्यासूर्यानयनं प्रागे- वोक्तमिति पुनरुतत्वात्सुगमतरम् ॥ ३९ ॥ भा० टी०-स्टाग्रसे सम्मधारी गुण करके अपने पौगुलसे माग करनेपर रविक्रान्ति प्या होगी । तिसको त्रिज्यासे गुमकरके परमापक्रमज्यासे भाग क्रनेपर एब्धज्यासख्याके धनु निर्णय करनेसे (यह नाना हुआ रहनेसे कि चक्रके कोन पदमें है ) रविरा (सायन) स्फुट होता । ३९ ॥ अथ भाभ्रमणमाह- इप्टेऽह्नि मध्ये प्रापश्चाद्धृते वाहत्रयान्तरे । मत्स्यद्वयान्तरयुतस्त्रिस्पृकसूत्रेण भाभ्रमः॥ ४० ॥ अभिमते दिवसे पूर्वविभागे पश्चिमविभागे वाहुत्रयान्तरे पूर्वापरसूत्रामुजत्रयान्तरे स्थाने धृते । अयमर्थः। पूर्वापरसुनस्य मध्यस्थानाडुजांगुलान्तरेण चिह्नमेकं द्वितीयं पूर्वविभागे पूर्वापरसूत्रात्कालान्तरीयभुजागुलान्तरेण चित्तीयं पश्चिमविमागे पूर्वा परसूत्रोदितरकालान्तरीयभुजांगुलान्तरेण चिदम् । एवमेकस्मिन् दिवसे कालत्रये स्वमु. जान्तरेण पूर्वापरयूनाधिनत्रये कृते सतीति । मत्स्यदयान्तरयुतेरम्परहितचिदाभ्या प्रत्येक मत्स्यमुत्पाद्येति मत्स्यद्वयस्य प्रत्येकमुखपुच्छगतरूपमध्यसत्रयोः स्वमार्गानु- सारेण प्रसारितयोोगो यस्मिन् स्थाने तस्मादित्यर्थः । त्रिस्स्सूत्रे । चिनत्रयलग्न- गुल्यसूतमितितेन व्यासार्धेन भाभ्रमच्छायामार्गमण्डलं भवति । प्रथमान्तिमका- लान्तर्गतकालिकच्छायाग्रं तद्वृत्तपारधौ भवतीत्यर्थः । अनोपपत्तिः । प्राच्यपरसूना- हुजान्तरे छायाग्रामीत छायाग्रत्रयं ज्ञात्वा तत्स्पृष्टपरिधिवृत्तस्य मध्यज्ञानार्थमव्यव- हितचिवद्वयमत्स्याभ्यामन्यवहितचिनमध्यस्य दक्षिणोत्तरसूत्रे भवतः । तत्र वृत्तप- रिधिप्रवेशेभ्यः केन्द्रस्य तुल्यान्तरत्वेनाव्यवहितचिह्नमध्यस्थानस्यावश्यं परिधिसक्तः त्वात्तत्सममापि केन्द्रे लग्नं भवति । एवं प्रत्येकाव्यवहितचिह्नमध्यसूत्रयोर्योगस्तदृत्त केन्द्रं सिद्धम् । मध्यरेखाज्ञानार्थ मत्स्यद्वयं तत्केन्द्रावृत्तं भागनयस्पृग्भवतीति किं चिरम् । यद्यपि छायाग्रस्य सूर्यचलमानुरोधेन चलनात्तस्य तु वृत्ताकारासम्भपा. स्मतिक्षणमुरानवृत्तभेदात् । अन्यथा क्रान्तिभेदानुपपत्तेरित्येकवृचपारधी छापान- भ्रमण न सम्भवति । अतएव भास्कराचार्यः भत्रितयादाभ्रमणं न सत्' इत्युक्तम् । तथापि साधितभागाणामवश्यमेकवृचस्थत्वसम्भवात्तदन्तर्वर्तिना छायाग्राणा ध्यायः ३.] संस्कुतीका-मापारीकासमेतः । तत्परिधिस्थत्वं स्वल्पान्तरत्वादीकृत्य भगवता कृपालुना छायाप्रदर्शनं विनापि छाया- प्रस्थानज्ञानमन्यकालिकच्छायाप्रस्थानयोदर्शनेनामीष्टसमये मेवादिनाच्छादिते खौ राश्यादिसुर्यज्ञानोपजीव्यायाभुजादिज्ञानार्थमुक्तम् । बहुकालान्तरितभाग्रहणे स्थूलम् । अल्पान्तरिते किश्चित् सूक्ष्ममिति ध्येयम् ॥ ४० ॥ भा०टी०-इष्ट दिन मध्यमें भौर में व परमें तीन चिह्न करके मत्स्यद्वयगत रेसाके संयोगस्यानले तीन धिहॉको स्पर्श करके वृत्तकल्पना करनेसे छायाशेष, भ्रमणमार्ग निर्णीत होताहै । ( वास्तविक सूक्ष्मविचार करके छायाय दूसरे मार्गमें भ्रमण करता अथ कालज्ञानमुक्त्वा तदुपजीवकफलादेशाद्युपयुक्तलग्नज्ञानं विवक्षुस्तदुपयुक्त- स्वोदयज्ञानार्थ मेपादित्रयाणां लकोदयासुसाधनपूर्वकतन्निपंधनं श्लोकाभ्यामाह- विभयुकणार्धगुणाः स्वाहोरात्राधभाजिताः ॥ क्रमादेकद्वित्रिभज्यास्तचापानि पृथक् पृथक् ॥ ११ ॥ स्वाघोषः परिशोध्याथ मेपालकोदयासवः ॥ खागारयोगोऽगैकाः शरव्यंकहिमांशवः ॥ ४२ ॥ एकाद्वत्रिभज्याः एकराशिज्या द्विराशिज्या. त्रिराशिज्यात्रिराशिवज्यया गुण्या: क्रमात्स्वकान्तिज्यासम्बन्धिाज्याभिर्माज्याः। फलानां धषि भिन्नभिन्नस्थाने स्या- प्यानि । स्थानद्वये स्थाप्यानीत्यर्थः । अनन्तरं स्वाधोऽधः स्वादधोऽध एकराशिज्या- सम्बन्धिफलं ययास्थितं ततः प्रथमफलं द्वितीयफलाद्वितीयफलं तृतीयफलान्यूनीकृत्य पृथगनुक्तौ प्रयमफलं द्वितीयफलान्यूनं कृतं सहयोः फलयोमार्जनात् तृतीये शोध्यास- म्भरः । प्रयमस्य ज्ञानासम्भवश्चेति प्रथमद्वितीययोः पृथक स्थापनमावश्यकम् । अतएर न विधा पृथगित्युक्तम्। मेपात मेषमारभ्य राशिबयाणां लंकोदयासवो भवन्ति । प्रथम फलं मेपस्योदयासवः द्वितीयोनतृतीयफलं मिथुनस्योदयासव इत्यर्थः । नियतत्वात्तन्मान नमाह-सागाष्टय हाते । मेपमानं सप्ततियुतं पोडशशतं वृपमानं पञ्चोनमष्टादशशतम् । मिथुनमानं पञ्चत्रिंशदधिकमेकोनविंशतिशतमित्यर्थः । अत्रोपपत्तिः । सिद्धान्तशिरो- मणी "मेपादिजीवाः श्रुतयोञवृत्ते तमिले क्रान्तिगुणा मुजाः स्युः । तत्कोटयः स्वा- निशाख्यवृत्ते व्यासाचे परिणामितानाम् ।। चापपु.ताप्तामसवस्ततो ये तेऽधोविशुद्धा उदया निरक्षे ॥” इति । तस्वरूपोक्त्याविज्याकणे त्रिराशियज्यानोनिस्तदेकद्वित्रिरा- शिमार्गपु काइत्यनुपातेन कोटयो युज्याप्रमाणेनाहोरात्रवृत्ते तदासुकरणाथै त्रिज्या- प्रमाणेन साध्या इति ज्याममाणेनैतास्तदा त्रिज्याममाणेन का इत्यनुपातेन त्रिज्ययो- सूर्यसिद्धान्तः- [तृतीयो:- णहरयोस्तुल्यत्वेन नाशादेकादिराशिज्यात्रिराशियया गुण्याः स्वाज्यया भक्ता इत्यु- पपन्नाः। आसां धनेष्वेकादिराशीनामुदयासयस्तत्र प्रत्येकराश्युदयामुज्ञानाथ स्वाधोऽधः शोधनमित्युपपन्नं त्रिभाकर्णार्धगुणा इत्यादिलंकोदयासव इत्यन्तम् । अत्र लङ्कापदं निरक्षदेमपरं व्याख्येयम् । सर्वनिरक्षदेशे क्षेत्रसंस्थानस्योक्तस्य तुल्यत्वेनोक्तरीत्यान्यनि- रतदेशे तत्तिद्धी वाधकाभावात् । अन्यथा'स्वनिरक्षदेशे तत्साधनार्य ग्रहवद्देशान्तर- संस्कारकरणापत्तेः । निजोदयकराणार्थ स्वनिरक्षदेशीयानां चरसंस्कारस्प समनन्तरमे वोक्तत्वादिति दिक् । खागाष्टय इत्यादायुक्तप्रकारगणितकर्मेवोपपत्तिः ॥ ४१ ॥४२॥ भाटी-एक, दो मौर तीन राशिकी ज्याफो क्रमशः विराशिाज्या (१३८७) से गुण करके निज. २. राशिकी महोगवार्द्धज्यासे भाग करके धननिर्णयकरे । पहलेका द्विशिके प्रथमका वियोग भोर) त्रिराशिके फल द्विराशिफल हान करनेपर कलाम- पादिका लंबोदय प्राण होगा । प्राणसंख्या मेप १६७०, वृष १७९५, मिथुन १९३५ है ॥ ४१ ४२ ॥ अथैभ्यः स्वदेशोदयासन् श्लोकानाह- स्वदेशचरखण्डोना भवन्तीटोदयासवः ॥ १३ ॥ एते सिद्धाः । स्वकीयैर्देशसम्बन्धेन यान्युत्पन्नानि चरखण्डानि चरानयनप्रकारेणे- कादिराशीनां चराण्यानीयोक्तरीत्या स्वाधोऽधः शोधितानि मेपादिमिथुनान्तानां राशीनां चरखण्डानि भवति । तैरूनाः सन्त इष्टोदयासवश्चरखण्डसम्बन्धिदेश मेपादित्रयाणा- मुदयासको भवन्तीत्यर्थः । अत्रोपपत्तिः । “मैपादेमिथुनान्तो नाडीभिस्तिथिमिताभिरु- द्वत्ते '।' लगाते कुजे तदधास्ये प्रथमं ताभिश्चरोनाभिः ॥ इति भास्करोत्या प्रत्येकोदयासुज्ञानं प्रत्येकवरणति । प्रत्येकचरं तु चरखण्डमित्युपपन्नम् ॥ ४३ ॥ मा०टी०-इससे स्वदेशचरखंडपियोग करनेपर इटदेशका उदयप्राण होगा। पीछेसे क्रमानुसार लंबोदयमाणके साय पश्चात्से परखंडयोग करनेपर कर्कादिका उदयप्राण होगा ॥४३॥ अयावशिष्टराशीनामुदयानाह- व्यस्ताव्यस्तेयुताः वः स्वः कर्कटाचास्ततस्त्रयः॥ उत्कमेण पडेवेते भवन्तीपास्तुलादयः ॥१४॥ ततोऽनन्तरमते मेपादिलकोदयासको व्यस्ता मिथुनवृपमेपक्रमेण स्थापिताः स्वैः स्वैर्मपादिचरखण्डकैखिभिव्यस्तैरुदयक्रमेण स्थापितैर्युताः कर्कादयत्रयः कन्यान्ताः क्रमेण ज्ञातोदयामु माना भवन्ति । एवं पण्णामुक्त्वावशिष्टानामुदयामुज्ञानमाह- पर्फटाक्षः पुनरूम इति पाठान्तरम् । २ भवन्तीष्टोदयासर इति वा पाठः । " " ध्यायः ३.] संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतः । उत्कृमणोते । एत उक्तमेपादयः कन्यान्ताः प.ससयाका उत्क्रमेण कन्या. सिंहकांद्युत्क्रमेण । एक्कारो मेपवृपादिक्रमनिरासार्थकः । तुलादयः पाशय इष्टा- ज्ञातस्वदेशोदयासुमाना भवन्ति । तथाच कन्योदयस्तुलायाः । सिंहोदयो वृश्चिकस्य । कर्कोदयो धनुषः । मिथुनोदयो मकरस्य । वृपोदयः कुम्भस्य । मेषोदयो मौन-- स्येति सिद्धम् । अत्रोपपत्तिः । “कन्यान्तादनुपोऽन्तस्तिथिमितनाडीभिरुरलये। लगति कुजे चौर्बस्थे पश्चात्तामिश्चराहयामिः ॥ तद्रहितैः खहुताशैः कन्यान्तो वा झपान्तो वा । चरखण्डैरूनाढ्यास्तेन निरक्षोदयाः स्वदेशे स्युः॥ इति भास्क- रोक्त्या सुगमा ।। ४४ ॥ मा० टी०-मेपादि ६ राशिका उदयप्राण, पोछेसे तुलादिका उदयाण होगा ॥ ४४ ॥ अथाभीष्टकाले ऋणधनलग्नसाधनाथ गतभोग्यासूनाह- गतभोग्यासवः कार्या भास्करादिष्टकालिकात् ।। स्वोदयासुहता भुक्तभोग्या भक्ताः खवानिभिः ॥ ४५ ॥ इष्टकाले चालनेन सञ्जातात्सूर्याद्गतभोग्यासवः । गतासवो भोग्यासवश्च साध्याः । कथं साध्या इत्यत आह-स्वोदयासुहता इति । भुक्तभोग्याः सूर्याक्रान्तराशेयें मुक्त- भागाः । सूर्यस्य मागाद्यवयवात्मका एते त्रिंशतः शुद्धा भोग्यभागाः। सूर्याकान्तराशेः स्वदेशोदयासुमिर्गुणिताविंशता मक्ता गतासवो भोग्यासवः क्रमेण भवन्ति । अत्रो पपत्तिः । यस्मिन् काले लग्नं साध्यं तस्मिन्काले मूर्यः माध्योऽन्यथा तात्कालिकल' नासिदिन स्यात् । अथैतदर्थं सूर्याक्रान्तराशेर्भुक्तासवो भोग्यासवश्च साध्याः सूर्योदया. तत्कालपर्यन्तं पूर्वाग्रिमकालयोस्तद्राशेर्लग्नत्वात् । अनन्तरं च राश्युदयासुगणनया लग्नज्ञानस्य मुगकत्वाच । अतस्त्रिंशद्भागेरुदयासवस्तदा भुक्तभोग्यभागैः कइति मुक्त- भोग्यकालासवः अत्रोदयकालासूनां सम्पातावधि राशिग्रहणेनोत्पन्नत्वात्सूर्योध्यनां- शसंस्कृतो ग्राह्यः। अन्यथा सूर्याक्रान्तराशेरुक्तादयसम्बन्धामावादसंगततापतेः । अत एवं “युक्तायनांशादपमः प्रसाध्यः कालौ च खेटात् फल भुक्तभोग्यौ " इति भास्क- राचार्योक्तं संगच्छते । ननूक्तरीत्यौदयिकाौदेव भुक्तभोग्यासवः साध्याः सूर्योदया- तत्कालावधि तद्राशेर्लनत्वात् । नहीष्टकाले तद्राशिर्लग्नं येन तद्तभोग्यासवः साधवः । नापि तात्कालिकार्यात्सूर्योदयावधिकास्ते तात्कालिकास्य सूर्योदयकालिकत्वामावात् । तत्कयं भगवता सर्वज्ञेन भास्वरादिष्टकालिकादित्युक्तमिति चेत् । उच्यते । उदयानां नाक्षत्रत्वान्नक्षत्रघट्यो ग्राह्यास्तास्त्वसिद्धीः । सर्वत्र साधितघटीनां सावन- त्वात् । तासां नाक्षत्रीकरणमावश्यकमन्यथा तद्गणनानुपपत्तेः । तदर्थं ग्रहोदयप्राणह- ता इत्यायुक्त्या पष्टिसावनघटीपु गतिकलोत्पन्नासबोऽधिका. नाक्षत्रत्वाथै तदेष्टसावन- घटीपु कियधिकमित्यनुपातेनागतफलयुक्ताः सावनाः कार्याः तत्रागतफलस्व क्षेत्रा- (९२) सूर्यसिद्धान्तः। [ तृतीयो:- वयवोदयासभिरष्टादशशतकलास्तदागतासाभः का' इत्यनुपातसिद्धाष्टादशशतोदयास्वो गुणहरयोस्तुल्यत्वेन नाशादवशिष्टचालनस्वरूपः सूर्य योजितः । साबनास्त्वविकृता एव स्थिताः । तया चेष्टकालिकोको यत्काले 'लग्नं तत्कालात्पूर्वगृहीतसावनघट्यो नाक्षत्रा एव भवन्तीति मगवता सम्यगुक्तम् । मास्करादिष्टकालिकादिति । अनेनै- चाभिमायण भास्कराचारप्युक्तम् “लनामिष्टघाटका याद सावनास्तास्तात्कालिका- ककरणेन भवेयुरापः । आक्ष्योदया हि सदृशीभ्य इहापनेपास्तात्कालिकत्वमय न क्रियते यदाक्ष्यः ॥” इति ॥ ४५ ॥ भा० टी०-उदयमान करके तिसयालके (सायन ) विस्पष्ट गत मार मोग्य मंशादि पुरण करके ३० भोग्य करनेपर गत मार मोग्य मासब होगा ॥ ४५ ॥ अथामीटघाटकाभ्य ऋणधनलग्नसाधनं श्लोकाभ्यामाह- अभीष्टपटिकासुभ्यो भोग्यासुन् प्रविशोषयेत् ॥ तद्वत्तदेष्यलग्नासूनेवं यातांस्तथोकमात् ॥१६॥ शेपं चत्रिंशताभ्यस्तमशुद्धन विभाजितम् ।। मागहीनं च युक्त च तल्लनं क्षितिजे तदा ॥४७॥ यभीष्टकाले याः सूर्योदयघटिकास्तासामसुभ्यो भोग्यासून् शोधयेत् । तदनन्तरं तदेण्यलग्नासून् । सूर्याक्रान्तराशेरग्रिमराशय एष्यलग्नानि । तेपामुदयासूनपि तद कमेण शोधयेत् । एवमुक्तरीत्या शेपघटिकामुभ्यो यातान्मुक्तासून्भुक्तराश्युदयासूब्ध व्यस्तकमात्तथा शोधयेत् । यो राश्युदयो न शुद्धयति सोऽशुद्धस्ते. त्रिंशता गुणितं शेपे भक्तम् । चेदित्यनेन शेषाभावे क्रिया न कार्ग शून्यफलसिद्धोति सूचितम् । फलेन भागादिना भुक्तसम्बद्धन होनं चकारादशुद्धराशिसङ्ख्यामानं भोग्यसम्बद्ध भागादिफलेन युक्तं चकारादन्तिमशुद्धराशिसयामानं तदा गतराश्यादिमानसम्ब- न्धिसम्पातावधिकझानिवृत्तैकपदेशरूपं तदाभीष्टकाले क्षितिजेक्षितिजवृत्तपूविभागे लग्न समसूत्रसम्बन्धेन लग्नस्वरूपोक्त्याभीष्टकाले तल्लग्नं स्यादित्यर्थः । फलादेशाथै ग्रहाणां रेवतीयोगतारासन्नापंधितो ग्रहात् तत्पंक्तिस्थलग्नस्यापि फलादेशाथै तत एव समुचित ग्रहणमित्यागतलनसम्पातावधिकमयनांशैयस्तं संस्कुर्यादिति स्वतः सिद्धमिति नोक्तम् । नच पूर्वमेव सूर्यस्यायनांशसंस्कारानुक्त्या लममपि यथास्थितमित्ययनांशव्यस्तसंस्का- रोऽनुक्तः संगत इति वाच्यम्। स्थूलत्वाल्लनाथै सूर्येऽयनांशसंस्कारस्तस्यं तत्संस्कृतादः "हात् कान्तिच्छायापरदलादिकमित्यत्रादिपदसंगृहीतत्वाच । अब भगववायनांशव्यस्तसं. स्कारः फण्टेन नोक्त इति लनं सम्पातावधिकमेव फलादेशार्थे गृहीतम् । सूर्यस्य तु लमा पैमयनांशसंस्कारस्यावश्यकत्वात् । उदयानां सम्पातावधिपत्यादिति चेन्मैवम् । "माग - ध्यायः ३३ संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः। (९३) हीनंच युक्तं च तल्लग्नं क्षितिजे तदा" इत्यर्धस्यावृत्त्यानिमश्लोकादिस्थमाक्पश्चादित्यस्या- वृत्या च प्रापश्चासक्रचलने मागैरयनशिः क्रमेण हीनं युक्तं लग्नं स्यादित्यर्थं च मग- वतः कण्ठोक्तेः सिद्धत्वाच । अत्रोपपत्तिः । अभीष्टपटिकासुभ्यो भोग्यगतासुशोधने सूर्याक्रान्तराशिलग्न नेवि ज्ञातम् । सतोऽग्रिमपश्चादाश्युदयशोधने शुद्धो राशिर्लन्नं नेति ज्ञातम् । ततो यो राश्युदयो न शुध्यत्ति स एव राशिरमीष्टकालेक्षितिजे लग्न इति । तस्य को भागो लग्न इति ज्ञानार्यमशुद्धराश्युदयासुभित्रिंशदागास्तदा शेपासुभिः क इत्यनुपातेन भुक्तभोग्यक्रमेण लमराशे ग्यभुक्तभागादिकं सिद्धम् । तत्र भोग्य- भागास्त्रिंशतः शुद्धा गता मामा लग्नराशेर्भवन्तीत्यशुद्धा राशिसंख्यातो भोग्यभागा शुद्धा लग्नं भवति । भुक्तभागाश्च भुक्तराशिसंख्यायां युक्ता लग्नं भवति । अयनांशव्य- स्तसंस्कारो ग्रहपंक्तिस्थत्वार्थम् । अन्यथा फलादेशाथै ग्रहा अयनांशसंस्कृता ग्राह्या इति सबै निरवद्यम् ॥ ४६ ॥ ४७ ।। भा० टी०-स्वामीष्ट घटिकाके प्राणसे भोग्य वियोग करे । फिर क्रमानुसार पछि २ की राशिके प्राण जगतक वियोग होसके, करे शेषको ३० तीससे गुणा करके, शोध्यराशिका प्राणसंख्यासे माग परनेपर जो मशादि होंगे, सो गतराशिकी संस्थासे मिलानेपर (सायन) बन स्पष्ट होगी ॥ १६ ॥४७॥ अथ प्रसङ्गान्मध्यलग्नानयनं लग्नानयनविशेपसूचनार्थमाह- प्राक्पश्चान्नत्तनाडीभित्तत्माल्लंकोदयासुभिः ।। भानी क्षयधने कृत्वा मध्यलग्नं तदा भवेत् ॥१८॥ दिनान्तिर्गतदिनगतशेपहीनं दिनाध क्रमेण प्रायश्चिमं नतं राज्यर्धान्तर्गतरा- त्रिशेपगतयुतं दिनार्धं प्राक्पश्चिमनतं जातकपद्धती प्रसिद्धम् । नतघटिकामिस्तस्मा- चात्कालिकसूर्यात् । निरक्षदेशराश्युदयासुभिः पूर्वोक्तप्रकारेण सिद्धराशिभागादिक प्राकृपश्चिमनतक्रमेण सूर्य क्षयधने हीनयुते कृत्वा तदाभीष्टकाले मध्यलग्नं दशमलग्नं स्या- द। अयमभिप्रायः । प्रनते नतवट्यसुभ्यः सूर्याक्रान्तरागेनिरक्षोदयासुभिभुक्तासन्वि- शोध्य तत्पूर्वराशीनां निरक्षोदयारांश्च विशोध्य शेपं त्रिंशद्गुणमशुद्धनिरक्षोदयभक्तं फलेन भागादिना शोधितगृहसंख्यातुल्यराशिमिश्च व्यों हीनो मध्यलग्नम् । एवं पश्चि- मनतेन नतघट्यसुभ्यः सूर्याक्रान्तराशेनिरसोदयासुभिभोग्यासन् विशोध्य तदग्रिम राशीनां निरक्षोदया च विशोध्य शेपं त्रिंशद्गुणमशुद्धनिरक्षोदयभक्तं फलेन भागादिना शोधितग्रहसंरख्यातुल्यराशिमिश्च सूर्यो युतो मध्यलग्नम् । एवं भुक्तमोग्यासुभ्योऽल्पका- लेपोटासविंशवणिताः सूर्याक्रांतराश्युदयभक्ताः फलेन भागादिना हीनयुतोऽको मध्यलग्नं स्यात् । अनेन प्रकारेण लग्नमपि साव्यम् । अनोपपत्तिः । अयाम्योत्तर- वृत्ते यः कान्तिवृत्तपदेशो लग्नस्तन्मध्यलग्नम् । तत्साधनार्थमभीष्टकाल याम्योत्तरवृत्ताद . (९४) सूर्यसिद्धान्तः- [तृतीयः] धरानमुत्ते सूर्या यावता घटीविभागादिना नतः स नतकालः । प्राकपश्चिमकपालयोः माकपश्चिमसंज्ञः। अर्धरत्रिमारभ्य दिनापर्यंतं प्राकपालम् । 'दिनार्धमारभ्याऽर्धरात्रप- यत पश्चिमकपालम् । तत्र पाइनते सूर्यस्य याम्योत्तरवृत्तात्पूर्वस्यत्वेन सूर्यात्पूर्वराशि- माग एव याम्योत्तरवृत्तलग्न इति सूर्यादूनमृणलग्नरीत्या नतघाभिः साध्यम् । पश्चिम- नते तु सूर्यस्य याम्योत्तरवृत्तात्पश्चिमस्थत्वेन सूर्यानिमराशेमध्यलग्नत्वात्सर्यादाधिक्क्र- मलनरीत्या नतघटीभिः साध्यम् तत्रोवृत्तायाम्योत्तरवृत्तस्य पञ्चदशयटयन्तरेण नियत सत्त्वान्निरक्षोदयासुभिः साध्यमिति । शेपक्रियोपपत्तिस्त्वतिस्पष्टतरोत संक्षेपः॥४८॥ माटो०-इस प्रकार प्राकू पश्चान्नतनाढीसे मोर मोदयप्राणखण्ड लेकर रविस्फुटमैं मण, पन करनेसे मध्य वा दशम लग्न होगी ॥ १८ ॥ अथ कालसाधनमाह- भोग्यासूनूनकस्याथ भुक्तासूनधिकस्य च ॥ संपिंडयान्तरलपासूनेवं स्यात्कालसाधनम् ॥ १९॥ अयानन्तरं लग्नार्कयोर्मध्ये योऽत्यन्तमूनस्तस्य भोग्यासूनधिकस्य मुक्तासन् सम्पि- ण्डयैकीकृत्पांतरलग्नासून सूर्यलग्नमध्ये ये लग्नाशयस्तेपामुदयासून् । चासमुच्चये । ए- कीकृत्यैवमुक्तमकारेण कालस्य सिद्धिर्भवति । अत्रोपपत्तिः । ऊनादधिकमग्र एव भवती- त्यूनतुल्यलनस्य भोग्यकालोऽन्तरस्थराश्युदययुतोऽधिकतुल्यलग्नस्य भुक्तकालेन युत- स्तलमयोरन्तरवर्ती कालः सिद्धः स्यात् ।। ४९ ॥ भान्टी-लग्न और रवि पटके मध्य में न्यूनकी भीग मोर दूसरा मुक्त मोर इन दोनोंके मध्यमें स्थित राशियोंकी प्राणसंख्या इट्टी करनसे जो प्राणसंस्था होगी तिससे काल सिद्ध होगा। ४९॥ अथैवं लग्नाभ्यां साधितकालस्य दिनराभ्यन्तर्गतत्वज्ञानमाह- सूर्यादूने निशाशेषे लग्नेऽर्शदधिके दिवा ॥ अचकायुत्तादानोराधिकेऽस्तमयात्परम् ॥५०॥ सूर्यानिराश्यन्तर्गतत्वेन न्यूने लग्ने सति पूर्वप्रकारसिद्धः कालो रात्रिशेपे मवति । सूर्यात् पदभान्तर्गतत्वेनाधिके लग्ने पूर्वप्रकार सिद्धः कालो दिने स्यात् । पड्भायुतात्मू- दिधिके लग्ने लासपड्भसूर्याभ्यामानीतः पूर्वरीत्या कालोऽस्तमयान्सूर्यास्तका- लात्परमनन्तरं राजावित्यर्थः । एतेन रात्रीष्टकाले गते सपड्मसूर्यालग्नं साध्य- मिति सूचितम् । अत्रोपपत्तिः। सूर्योदये सूर्यतुल्यलग्नत्वात्सूयादूनाधिक लग्ने क्रमेण राविशेषे दिने च कालः स्यात् । एक्मस्तकाले सपड्भसूर्यस्य लग्ने रात्रावेव कालः सिंदोदित्यादि सुगमतरम् ॥ ५० ॥ , आपायः४. ] संस्कृतटोका-मापाटीकासमेतः । (९५) भान्टी [.-उग्रस्पट, सूर्यस्फुटसे कम होने पर रात्रिशेष और अधिक होनेपर दिशामें मोर ६ राशियुक सूर्यसे वन अधिक होनेपर सन्ध्याका पर होगा ॥ ५० ॥ अथानिमग्रन्थस्यासङ्गतित्वनिरासार्थमधिकारसमाप्ति पछिकयाह-दिग्देशकालानां प्रतिपादनामर्द परिपूर्तिमाप्तमित्यर्थः । दिशा साधनं 'शिलातल इत्यादिनियत तत्सम्बन्धेन । समकोणयाम्योत्तरशंकूनां साधनान्यपि दिगन्तर्गतान्यनियतानि । पलमालम्बाक्षादिसाधनं देशामरूपणं नियतम् । अनाचरादिसाधनमनियतम् । कालसाधनं तशाच्छायादिसाधनं च कालनिरूपणामेति विवेकः ॥ रङ्गनाथेन रचिते सूर्यसिद्धान्तटिप्पणे ॥ त्रिप्रश्नस्याधिकारोऽयं पूणों गूढप्रकाशके ॥ इति श्रीसकलगणकसार्वभौमबल्लालदेवज्ञात्मजरङ्गनायगणकविरचिते गूढार्थप्रकाशे त्रिमनाधिकारः पूर्णः ।। ॥ इति विप्रश्नाधिकारः॥ तीसरा अध्याय समाप्त । अथ चतुर्थोऽध्यायः। अथ चन्द्रग्रहणाधिकारो व्याख्यायते । तत्र प्रथम सूर्यचद्रयोविवयोजनानि तत्पु- रोकरणं च सार्धश्लोकेनाह- सार्धानि पटसहस्राणि योजनानि विवस्वतः॥ विष्कंभो मण्डलस्येन्दोः सहाशीत्या चतुःशतम् ॥ स्फुटस्वभुक्त्या गुणिती मध्यभुक्त्योद्धृतो स्फुटौ ॥१॥ पद्रसहस्राणि साधीनि सहनस्यार्धं पञ्चशतं तत्सहवर्तमानानि पञ्चपष्टिशतं यो- जनानि सूर्यस्य मण्डलस्य गोलरूपविवस्य विष्कमो व्यासः । चन्द्रस्य गोला- फारविम्बस्याशीत्या महाशीत्यधिकं चतुःशतं योजनानि । तौ व्यासी स्पष्टया निजगत्या गुणिती निजमध्यगत्या भक्ती स्फुटौ स्तः । बत्र गणिते व्यासस्पैव विम्यव्यवहारोऽभियुक्तानाम् । अनोपपत्तिः । त्रिज्यामितकणे मध्यमकक्षायां भ्र. मणात्तन यद्विम्नं व्यासात्मकं तन्मध्यमम् । तत्र स्वल्पान्तरेण मध्यगत्यङ्गीकारा- न्मध्यगत्येदं तदा स्फुटगत्या किमिति स्पष्टं विम्ब नीचे पृथूचेऽणुतरम् । गत्योः पर- माधिकन्यूनत्वात् ॥ १॥ मान्टी-सूर्यमण्डलका परिमाण ६५०० योजन और चंद्रमाका परिमाण ४४० चतुःपाती हात पाठान्तरम् ।
'सूर्यसिद्धान्त:- [चतुर्या:- योजना है। निज २ की तात्कालिक गतिले गुणकरके मध्यगति माग करनेपर स्फुट व्यास होगा ॥१॥ अथ सूर्यबिम्ब चन्द्रकक्षायां साधयंस्तयोः कलात्मकविम्वानयनं सार्ध- श्लोकेलाह- खेः स्वभगणाभ्यस्तः शशांकमगणोद्धतः ।। २॥ शशांककमायुणितो भाजितो वार्किकक्षया ॥ विष्कम्भश्चन्द्रकशायो तिथ्याप्तामानुलिप्तिकाः ॥३॥ सूर्यस्य विष्कमा प्रामुक्तस्पष्टो व्यासः स्वभगणैः। सुर्यभगणरुक्तीणतश्चन्द्रमगण- मक्तो पाथवा चन्द्रकक्षया वक्ष्यमाणया गणितः सूर्यकक्षया वक्ष्यमाणया मक्तचन्द्र कक्षायां चन्द्राधिष्ठिताकाशगोले सूर्यव्यासः स्पष्टो भवति । वचो व्यासयोजनसंख्या- पञ्चदशभक्ता सूर्यचन्द्रयोर्विवव्यासप्रमाणकला भवन्ति । अत्रोपपत्तिः । चक्र, कलाभिश्चन्द्रपक्षायोजनानि तदैककलया कानीति चन्द्रकक्षास्थितैकालायां पञ्च- दशयोजनानि । अतश्चन्द्रस्य स्वकक्षायां स्थितत्वात्स्पष्टचन्द्रर्विवव्यासयोज- नानि पञ्चदशमक्तानि चन्द्राविव्यासकला भवन्ति । एवं सूर्यकक्षायामेका कला सार्धशतदययोजनैरिते स्पष्टसूर्यव्यासस्तैर्मक्तो व्यासकला भवन्ति । तत्र सूर्यस्य लोकैरान्तराचन्द्राकाश इव दर्शनात्मत्यक्षतो विविक्तान्तरेण दर्शनाभावाच चन्द्र- कक्षाप्रमाणेन सूर्यविन्यासः सूर्यकक्षपायं तदा चन्द्रकाया क इत्यनुपातेन गाणता- र्थमवस्तुभूतः साधितः । नतु वस्तुतश्चन्द्रकक्षायां सूर्यमण्डलावस्थानं सूर्यग्रहणे - न्द्रस्य छादकत्वानुक्तिप्रसङ्गात् । अथ सूर्यस्पष्टव्यासश्चन्द्रभगणभक्तखकक्षारूपय. न्द्रकक्षया गुणितः सूर्यभगणमक्तस्वकक्षारूपसूर्यकक्षया भक्त इति स्वकसारूपगुणहर- योनांशात्सूर्यभगणगुणितश्चन्द्रभगणभक्त इति पूर्व कायोरखतेवयं प्रकारो मुख्यत्वात्म थममुक्तस्ततश्चन्द्रकशासिद्धसूविभव्यासः पञ्चदशमक्तः सविव्यासकलाः सिद्धा इत्युपपन्नमुक्तम् ॥ २ ॥ ३ ॥ भा. टी०-विस्पष्ट व्यासको गिभगणसे गुप्र करके चन्दमगणसे माग करनेपर भएका चन्द्रवक्षसे गुण करके, रविक्क्षासे मांग करनेपर चन्द्राषिष्ठित :माकाशगोलमें सूर्यन्यास निरूपित होगा मर्यात चंद्रमाकी कक्षामें सूर्यके व्यासका परमाण होगा । उस सूर्यव्यास मार चन्द्रग्यासमानको १५ से भाग करनेपा कलादिविम्बमान होगा। अघोपयुक्तां भूच्छायां श्लोकाभ्यां साधयति-- स्फुरेन्दुभुक्तिभृव्यासगुणिता मध्ययोद्धता ॥ लब्ध सूची महव्यिाप्तस्फुटार्कश्रवणान्तरम् ॥४॥ भाजितवार्ककक्षपा इति पाठान्तरम् ।
ध्यायः ४.] संस्कृतीका-मापाटीकासमेतः । मध्येन्दुव्यासगुणितं मध्यार्कच्यासभाजितम् ॥ विशोध्यलब्धं सूच्या तु तमोलिप्तास्तु पूर्ववत् ।। ५ ।। स्पष्टाचन्द्रस्य गतिभूव्यासेन गुणिता मध्यया चन्द्रगत्या भक्ता फलं सूचीसंज्ञ स्यात् । भूव्यासस्पष्टसूर्यविम्वव्यासयोरन्तरं मध्येन चन्द्रविम्वव्यासेनाशीत्याधिकचतु:- शतयोजनेन गुणितं मध्येन सूर्यविम्बव्यासेन पंचपष्टिशतयोजनेन मक्तं फलं सूच्या प्रासिद्धायां न्यूनीकृत्य तुकाराच्छेपं तमः । भूच्छायारूपं योजनात्मकं भाभावस्तम इति च्छायायास्तमस्त्वात् । अस्य कलात्मकं मानमाह-लिप्ता इति । त्वन्तस्य पूर्व- सम्बंधानुक्तेरुत्तरत्र सम्बन्धस्तुकारेण सुवोधः। अतएव पूर्ववाक्यसमाप्तिस्थं तमापद- मत्र नान्यति । पूर्ववत्तिथ्याप्तामानलिप्तिका इति पूर्वोक्तेन भूच्छायायाः कलाः कार्याः । अत्रोपपत्तिः । “भूव्यासहीनं रविविवमिदुकर्णाहतं भास्करकर्णभक्तम् ॥ भूविस्तृतिर्लन न्धफलेन हीना भवेत्कुमा विस्तृतिरिन्दुमार्ग ॥ " इति सिद्धान्तशिरोमणी सूक्ष्मप्रकार उक्तः । अस्योपपत्तिस्तट्टीकायां व्यक्ता । तत्र भूव्यासोनस्य रविविम्बस्य ४९०० स्वल्पान्तरांगीकारेण स्पष्टगतिभक्तमध्यगतिगुणितचन्द्रमध्ययोजनकर्णरूपस्पष्टेन्दुयो. जनको गुणः । तादृशसूर्यको हरः। तत्रैतत्खण्डस्य कलाकरणाथै त्रिज्यागुणश्चन्द्र- कर्णस्तादृशो हर इति चन्द्रस्पष्टमध्यगत्योस्तुल्यगणहरत्वेन नाशात् त्रिज्यामध्येन्दुयो. जनकर्णयोस्त्रियापवर्त्तनेन हरः पंचदश पृयगुक्तः । अग्रेऽवशिष्टी भूव्यासहीनमध्यार्क- पम्बयोजनानां रविस्पष्टगतिगुणहरौ । चन्द्रसूर्ययोर्मध्ययोजनकर्णावपि क्रमेण गुणहरौ । त्रि कर्णस्थाने लाघवात्तयोविम्बयोजनानि गृहीतानि । यद्यपि सूर्यचन्द्रयोर्मध्ययोज- नकर्णानुसारित्वाभावाद्विम्बयोजनग्रहणमनुचितम् । तथाप्यल्पान्तरांगीकारेण तददोषः । इन्दुव्यासान्यासयोर्भूगोलाध्यायोक्तकक्षा भूकर्णगुणिता महोमण्डलभाजिता तत्कर्ण इति । तत्काव्यासार्धत्वे तु मुतराम् । तत्रापि स्पष्टार्कविम्बयोजनग्रहणे मध्यार्कयो- जनविम्वं सूर्यस्पष्टमातिएणित सूर्यमध्यमतिभक्तामति सिद्धम् । नोकरील्या सूर्यस्पष्ट मध्यगती गुणहरौ भूव्यासमध्या-विम्बयोजनान्तरस्योत्पन्नौ न केवलं विम्बस्येति मूव्यारास्तादृशो महीव्यास इत्यनेन कयं सिद्ध इति वाच्यम् । मगवता स्वल्पान्तरण न्यासस्य यथास्थितस्यैवांगीकारात् । महीव्यासस्फुटार्फश्रवणान्तरमित्युक्त्या मध्य- J ध्यायः ४. संस्कृतटीका-माषादीकासमेतः। (९७) मध्येन्दुव्याप्तगुणितं मध्यार्कव्यासभाजितम् ॥ विशोध्यलब्धं सूच्या तु तमोलिप्तास्तु पूर्ववत् ॥५॥ स्पष्टाचन्द्रस्य गतिभूव्यासेन गुणिता मध्यया चन्द्रगत्या भक्ता फलं सूचीसंज्ञं स्यात् । भृव्यासस्पष्टसूर्यविम्यव्यासयोरन्तरं मध्येन चन्द्रबिम्वव्यासेनाशीत्याधिकचतु:- शतयोजनेन गुणितं मध्येन सूर्यविम्वव्यासेन पंचषष्टिशतयोजनेन भक्तं फलं सूच्यां माक्सिद्धायां न्यूनीकृत्य तुकाराच्छेपं तमः । भूच्छायारूपं योजनात्मकं भाभावस्तम इति च्छायायास्तमस्त्वात् । अस्य कलात्मकं मानमाह-लिप्ता इति । त्वन्तस्य पूर्व- सम्बंधानुक्तेरुत्तरत्र सम्बन्धस्तुकारेण सुवोधः । अतएव पूर्ववाक्यसमाप्तिस्थं तमापद- मन नान्येति । पूर्ववत्तिथ्याप्तामानलिप्तिका इति पूर्वोक्तेन भूच्छायायाः कलाः कार्याः । मत्रोपपत्तिः । "भूव्याराहीनं रविधियमिदुकर्णाहतं भास्करकर्णभक्तम् । भूविस्तृतिर्ल- ब्धफलेन हीना भवेत्कुमा विस्तृतिरिन्दुमार्गे ॥ " इति सिद्धान्तशिरोमणी सूक्ष्मप्रकार उक्तः । अस्योपपत्तिस्तट्टीकायां व्यक्ता । तत्र भूज्यासोनस्य रविविम्बस्य ४९०० स्वल्पान्तरांगीकारेण स्पष्टगतिभक्तमध्यगतिगुणितचन्द्रमध्ययोजनकर्णरूपस्पष्टन्दुयों- जनकों गुणः । तादृशसूर्यको हरः । तत्रैतत्खण्डस्य कलाकरणाथै त्रिज्यागुणश्चन्द्र- कर्णस्तादृशो हर इति चन्द्रस्पष्टमध्यगत्योस्तुल्यगुणहरत्वेन नाशात् त्रिज्यामध्येन्दुयो- जनकर्णयोस्त्रिज्यापवर्त्तनेन हरः पंचदश पृथगुक्तः । अग्रेऽवशिष्टी भून्यासहीनमध्यार्क- विम्बयोजनानां रविस्पष्टगतिगुणहरी ।चन्द्रसूर्ययोर्मध्ययोजनकर्णावपि क्रमेण गुणहरी। तत्र कर्णस्थाने लाघवात्तयोविम्बयोजनानि गृहीतानि । यद्यपि सूर्यचन्द्रयोमध्ययोज- नकर्णानुसारित्वाभावाद्विम्बयोजन ग्रहणमनुचितम् । तथाप्यल्पान्तरांगीकारेण तदोपः इन्दुव्यासाच्यासयोर्भूगोलाध्यायोक्तकक्षा भूकर्णगुणिता महीमण्डलभाजिता तत्कर्ण इति । तस्कक्षव्यासात्वे तु सुतराम् । तत्रापि स्पष्टार्कविम्बयोजनग्रहणे मध्यायो- जनविम्यं सूर्यस्पष्टगतिगुणित सूर्यमध्यगतिभक्तमिति सिद्धम् । नचोक्तरीत्या सूर्यस्पष्ट- मध्यगती गुणहरौ भूव्यासमध्या विम्बयोजनान्तरस्योत्पन्नौ न केवलं विम्वस्येति भूदयारास्तादृशो महीव्यास इत्यनेन कथं सिद्ध इति वाच्यम् । मगवता स्वल्पान्तरण महीव्यासस्य यथास्थितस्यैवांगीकारात् । महोव्यासस्फुटार्कश्रवणान्तरमित्युक्त्या मध्य- स्यस्फुटपदस्योभयत्रान्वयेनार्कवणसन्निधानेन च सूर्यबिम्बस्फुटरीत्यैव महीव्यासस्य स्फुटत्यमिद्देश्य । यनत्खण्डसिद्धफलं भूच्यासादीनं भूभायोजनानि । तत्र कलाक- रणाथै भूव्यामस्यापरसण्डस्य त्रिज्यागुणः स्पष्टचन्द्रगतिभक्तमध्यगतिगुणितचन्द्रमध्य- योजनकर्णिम्पसष्टयोजनको हरः । तत्र त्रिज्यामध्ययोजनको गुणहरी गुणेनाव- त्वं दरस्यान पञ्चदश चन्द्रस्पष्टमध्यगती गुणहराविति सूच्युक्तोपपन्ना । भूमायाः मुच्पनुकारत्वात्प्रथमतण्डं डिनीचरसण्डे हीनं भूभायोजनात्मिका सा पञ्चदशभक्ता- ३ ७ (९८) सूर्यसिद्धान्त:- [चतुर्थी:- फलादित्युक्तमुपपन्नम् । यदि तु भूल्यासहीनं रविविम्बमित्यादी मध्यविम्बानुक्तेः प्रथममेव स्पष्टार्कविम्बग्रहणं तदा महीव्यासस्य स्पष्टत्वाप्रसिद्ध्या महीव्यासस्फुयार्कच- वणान्तरमित्येव यथाश्नुतं सम्यक् । परन्तु तदा भूव्यासोनार्कविम्बस्य सूर्यमध्यस्पष्ट- गती दरगुणाववशिष्टी वाच्यविपि मगवता स्वल्पान्तरत्वादनुक्ती। न चानुपाते सूर्यचन्द्र- योर्मध्ययोजनकोवेव गृहीती न स्फुटाविति मध्यस्फुटगती हरगुणावनुत्पन्नी नोक्ता- विति वाच्यम् । चन्द्रस्पष्टयोजनकर्णस्वरूपग्रहणेनोत्पन्नसूच्या अनुक्तत्वापत्तेः । नच चन्द्रकर्णस्य मध्यत्वेन गृहीते वहन्तरमतः स्पष्टत्वेन तस्य ग्रहे सुच्युपपन्ना सूर्यकर्णस्य मध्यत्वेन गृहीतेत्यल्पान्तरमिति वाच्यम् । मध्यार्कविम्बयोजनग्रहणेन स्फुटार्कश्रवणा- नुपपत्तेः । नचोभयत्रागृहोते प्रत्येकमल्पान्तरमपि वदन्तरमत एकत्र सूर्यगातग्रहणमुचि. तमिति वाच्यम् । विनिगमनाविरहात् । पूर्व सूविम्बस्यैव सूर्पस्पष्टमध्यगतीगुणहरी न महीन्यासस्य भानप तूभयाोरीति स्थूलसूक्ष्मपिनिगमकेतुपान्त्ये सूर्यगतिग्रहणस्यौचि- त्याच्च । अथ महीव्यासस्य प्रयमखण्डस्य चन्द्रगतिग्रहणेन सूच्युक्तावेव द्वितीयखण्ड- स्य भूव्यासोनस्फुटरविनिम्बस्यात्सूिर्यगतिग्रहणं सूचितमिति न क्षतिरिति चेन्न । व्याल्यामसंगे सूर्यगतिग्रहणे मानाभावादुपपत्तरप्रसंगाच । अन्यथात्रापि चन्द्रगतिग्रह- णापत्तेरिति । एतेन चन्द्रमध्यगत्या भूव्यासस्तदा चन्द्रस्पष्टगत्या क इति भूव्यासरूपं खण्डं स्पष्ट सूचीसंज्ञ सुर्यविम्वप्रमाणेनापरं भूव्यासोनस्फुदरविविम्बखण्डं तदा चन: बिम्बप्रमाणेन किमिति स्पष्टं द्वितीयं खंड तयोः स्पष्टयोरन्तरं स्पष्टा भूमति सर्वमुप. पन्नमिति निरकम् । उक्तानुपाताभ्यां तयोः स्पष्टत्वसिद्धौ मानाभावात् । स्पष्टत्वस्या- प्रसंगाच । चन्द्रसूर्ययोर्मध्यविम्वानुपपत्तेश्च । यत्तु भूव्यासस्य स्पष्टत्वं सूचीरूपमनुपपद्य मानं हृदि ज्ञात्वा भूव्यास एव प्रथमखण्ड भूव्यासोनस्पष्टरविविम्बस्य मध्यकर्णानु- पाताम्यामल्पान्तरेणाप्रवर्तनान्मध्यबिम्बे गुणहराचुत्पाद्य द्वितीयखण्डमुभयोरंगुलीक- रणं चन्द्रमध्यकर्णेन त्रिज्यामिताः कलास्तदाभ्यां का इत्यनुपाते प्रमाण फलयोः फलार नन प्रमाणस्थानापन्नपञ्चदशहरेणेति तयोरन्तर भूमेत्युक्तं ज्ञानराजदेवः सिद्धान्त सुंदरे । "इनायती व्यासवियोगनिनं शशाङ्कविम्ब रविविम्बभक्तम् । फलोनभूव्याप्त- समा कुमास। शरेन्दुभक्ता कलिकादिका स्यात् ॥ इतिग्रन्येन ! अत्र सूर्यव्यास: स्फुटार्कविम्बयोजनात्मकोनमध्ययोजनात्मकः । चन्द्राविम्बे गुणहरौ मध्ययोजना.. मको न स्फुटबिम्बयोजनात्मको तट्टीकाकान्तामण्यभिमती उपजीव्य सूर्यसिद्धा- न्तविरोधात् । तदुक्तं तदुपपत्त्यापि तदसिद्धेश्च । अत्र यदापे नटोकावञ्चितामण्युक्तं मध्यमस्य भूमाविम्बस्यानयनं फलाविशेपेण मध्यकर्णावेव गुणहरौ प्रकलायोक्तवि- धिना गिद्धस्य मध्यविम्बस्य याद मध्यगत्यन्तरेणेदं स्फुटगत्यन्तरेण किमित्यनुपा- तेन स्फुटलं मूलकृदनुक्तमपि कार्यामिति तद्गत्यन्तरक्शेन भूभाया अनुत्पत्त्या न समः असम् । अन्यथा गतिवशेन साधितार्कचन्द्रविम्बवदत्यन्तरकलाभ्यो विकृताभ्य एवं " ध्यायः ४.] सस्कृतटाका-भापाटीकासमेतः । भूभायाः साधनापत्तेरिति । तदसत् । “स्फुटेन्दुभुक्ति व्यासगुणिता मध्ययोहता इति सूर्यसिद्धान्तोक्तयुक्तिसिद्धसुच्यनुक्स्या भूव्यासस्यैवाविकृतस्य ग्रहणादित्यलं 'परदोपगवेपणापल्लवितेन ॥ ४ ॥५॥ मा०टी०-चन्द्रस्पष्टगतिसे पृथीव्यासको (१६००) गुण करके चन्द्रमाकी दैनिकमुक्तिसे भाग करनेपर सूची होगी । महीन्यास (१६०० ) और सूर्यस्फुटव्यासके अन्ताको चन्द्र- मध्यव्यास (४८.) से गुण करके मध्यार्कव्यास (६५००) से भाग करनेपर जो प्राप्त होवे, तिसको सूचीसे वियोग करनेपर तमव्यासयोजन होंगे। पहलेकी अनुसार इसको १५ से भाग करनेपर कलादि होगी ॥ ४ ॥५॥ अथ ग्रहणद्वयसंभृतिमाह- भानोभीधैं महीच्छाया तत्तुल्येऽकसमेऽपि वा ॥ शशांकपाते ग्रहगं कियद्भागाधिकोनले ॥६॥ सूर्यात्सकाशात्पान्तरे भूच्छाया मूर्यापरदिक्त्वात् । तत्तुल्ये सपइभारुप च्छायाक्षेत्रादिना समे चन्द्रपाते । अपिवाथवा सूर्यतुल्ये चन्द्रपाते सूर्यचन्द्रयोः प्रत्ये- कं प्रहणम् । ननु समत्वाभावेऽपि ग्रहणमित्यत आह-कियद्भागेत्यादि । सपइमा- कोदोदा कतिपय गैराधिक उनेऽपि चन्द्रवाते ग्रहणम् । तथाच न क्षतिः । मागा- चन्द्रग्रहणे द्वादशनिश्चयार्थम् । सूर्यग्रहणे तु नतांशपडंशसंस्कारात्सप्तत्यापाततः । अत्रोपपत्तिः । सपइभाककवेलाकान्यतरतुल्ये चन्द्रपाते शराभावश्चन्द्रस्य तत्तुल्यत्वात् । तदा चन्द्रो भूच्छायायां भवतीति ग्रहणम् । एवं शरसत्त्वेऽपि मानक्यखण्डादल्प भूच्छायायां मण्डलेकदेशस्य सत्त्वेन ग्रहणम् । एवं शराभावे मानक्यखण्डान्यूनशरे च चन्द्रमण्डलं सूर्यमण्डलस्याच्छादकं भवति । परन्तु तत्र शरो नतिसंस्कृतोऽतः सम्यगुक्तमुपपन्नम् ॥ ६॥ मा० टी० - सूर्यसे ६ राशि दूरपर पृथिवीकी छाया स्थित है। चन्द्रपात छाया. या सूर्यकी परावर राशिमें स्थित हो ग्रहण होगा । थोडी कमताई अधिकाईममी ग्रहण ननु तत्कुत्र भवतीत्यतस्तयोर्ग्रहणयोः कालमाह- तुल्यो राश्यादिभिः स्याताममावास्यान्तकालिको । सूयेन्दुपौर्णमास्यन्ते भार्धे भागादिको समौ ॥७॥ अमावास्यान्तकालोत्पन्नौ सूर्यचन्द्रो राश्याद्यवयवैः समौ भवतः । पौर्णमास्यते मागादिको तुल्यौ सूर्यचन्द्री पदान्तरे स्वाताम् । तथाचामान्ते सूर्यचन्द्रयोरेकत्रो - धरान्तरेण सत्वात्सूर्यग्रहणम् । पौर्णमास्यन्ते चन्द्रभूभयोरकवावस्थानाचन्द्रग्रहणम् । एलेन पृश्लिोफे शशाङ्कमात इत्यत्र चन्द्रपातौ द्वौ न ग्राह्यविति सूचितम् । एतच्लो-.
(१००) सूर्यसिद्धान्त:- [चतुथो:- कस्य वैयोपत्तेः । अनोपपत्तिः । अमान्ते सूर्यचन्द्रयोः पूर्वापरान्तराभावेन योगा- चुल्यो सूर्यचन्द्र पूर्णिमान्ते भचमार्धान्तरत्वात्पड़ाश्यन्तरी भागादिसमाविति ॥७॥ मा० टो-ममावस्या के सान्तमकालमें सूर्यको राश्यादि पदमाकी तुल्य है । पूर्णिमाके में चन्द्रमा मार सूर्यमें ६ राशिका फरक (सन्नर)है ॥७॥ अथ पर्वान्ते सूर्यचन्द्रपातानां साधनमाह- गतैष्यपर्वनाडीनां स्वफलेनोनसंयुत्तौ ॥ समालिप्तौ भवेतां तो पातस्तात्कालिकोऽन्यथा ॥८॥ तो सूर्यचन्द्रौ गतेष्यपर्वनाडीनां यत्कालिको सूर्यचंद्रो तत्कालाइता एष्या वा दर्शान्तपूर्णिमान्तान्यतरघाटिकास्तासां स्वफलेन स्वगतिसम्बन्धेन यत्फलम् । नाडी गुणा भुक्तिः पथ्याभक्ता क्लादिकम् " इति मध्याधिकारोक्तनानीतम् । तेन गतेष्यक्रमेणोनयुतौ तत्र समक्लौस्तः। यद्यपि समांशाविति वक्तुं युक्तं तथाप्यन्य- तिथ्यतापसाधिती समक्लावति द्योतनाथै समकलावित्युक्तम् । पातः स्वग त्युत्पन्नफलेनान्यथागतैष्यक्रमेण युतोनस्तात्कालिक पर्वान्तकालिका स्यात् । अत्रो अपत्तिश्चालनलोकः । तत्र तिथ्यन्ते मागान्तरत्वन क्लादिसाम्यम् । पातस्य चक्रशोधितत्वेनेतरग्रहवैपरीत्यम् ॥८॥ भान्टी-मध्यरात्रिके स्पष्टराश्यादिमे पर्वतमाल मध्यरात्रि के पूर्व होने पर तारमालिक हीन नहीं तो योगकरने पर चन्दमा भोर सूर्यको समक्ला होगी पातसबध तिस कालका सस्कार उलटा परना पडता है ॥८॥ अथ मायुक्तानां विम्बानां प्रयोजनमाह- छादको भास्करस्येन्दुरधास्थो धनवद्भवेत् ॥ भूच्छायां प्राइमुखश्चन्द्रो विशत्यस्य भवेदसो ॥ ९॥ सूर्यमण्डलस्याच्छादकश्चन्द्रः स्यात् । नन्वाकाशे द्वयोः सत्त्वेन सूर्य एवं चन्द्र स्य च्छादकः कथं न स्यादित्यत आह-अधास्थ इति । वक्ष्यमाणकक्षाध्याये सूर्य- कक्षातोऽधारक्षास्थत्वाचन्द्रस्यैवाच्छादकत्वम् । 'नार्ध्वस्यछादको येन सूर्यश्चन्द्रस्य च्छादः। ननु विनैकनावस्थानं छादनं न भवत्यतआह-धनवदिति । यथाऽधास्थो मेघः सूर्यस्याच्छादको भवति तथा चन्द्रो भवतीत्यर्थः । प्राइ मुरवः पूर्वाभिमुसो गच्छंचन्द्रो भूच्छायां प्रति प्रविशति । अतः कारणादस्य चन्द्रस्यासी भूभाच्छादिका भवेत् । तथा च सूर्यग्रहणे सूर्यचन्द्रयिम्बको प्रयोजनं चन्द्रग्रहणे चन्द्रभूमाविम्बयः मयोजनमिति मावः । अनोपपत्तिः । चन्द्रो दर्शान्ते, सूर्यादधोभवतीति चन्द्रः सूर्यस्याच्छादकः । चुधशुक्रयोस्तु मण्डलाल्पत्वान्नाच्छादकत्वम् । चन्द्रस्याधोग्रहाभावात्पइभान्तरे भूम्या मतिबद्धाः सूर्यकिरणाश्चन्द्रगोले न पतन्ति । अतो निष्प्रभस्य चन्द्रस्य भृमायां प्रवेश इति चन्द्रस्य भूभाच्छादिका ॥९॥ .. .
* संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतः । 4567 (१.११ ध्याय ३.] मा० टी०-मेषको समान चंद्रमा नीचे आयकर सूर्यको टकलेता है । आगे चलताहुआ चंद्रमा पृथिविकी छायामें प्रवेशकरे तो ग्रहण होताहै ॥ ९ ॥ अथ ग्रासानयनमाह- तात्कालिकेन्दुविक्षेपं छाद्यच्छादकमानयोः ॥ योगार्धात्प्रोज्य यच्छेपे तावच्छन्नं तदुच्यते ॥ १० ॥ यश्छाद्यते स च्छाद्यः । सूर्यग्रहणे सूर्यश्चंद्रग्रहणे चन्द्रः। यश्छादयति स च्छादकः । सूर्यचन्द्रग्रहणयोः । क्रमेण चन्द्रभूभे । तयोः पूर्वानीतमानकलयोरक्यस्यार्धात्चात्का- लिकचन्द्रापूर्वोक्तमकारेण साधितं विक्षेपं कलादकं विशोध्य यदवशिष्टं तत्ममाणक छन्नं छादकेन च्छाद्यस्य यावान्मण्डलपदेश आच्छादितस्तावत्मदेशात्मक ग्रासरूप ग्रहणं तंत्वज्ञैः कथ्यते । गोपपत्तिः । छाद्यच्छादकमण्डलनेमियोगे ग्रहणाद्यन्तरूपे मण्डलकेन्द्रयोरन्तरं स्वविम्बखण्डयोगरूपम् । विम्बस्य व्यासमानात्मकत्वात् । तत्तु समत्वाल्लाघवाच योगार्धरूपं धृतम् । ततो यथा प्रवेशस्तथा ग्रासो भवतीति पन्ति डायच्छादकयोविक्षेपान्तरितत्वात्तदूने विक्षेपे मण्डलयोगस्तदन्तरमितः स एवं ग्रासः ॥ १०॥ भा० टी०-तिपालके चन-विशेषको छाद्य और छावकमानके योगाईसे वियोग करने पर जो बचता है तिसको छन्न कहते है ॥ १० ॥ अथ सम्पूर्णन्यूनग्रहण बानग्रहणाभावज्ञानं चाह- यद्राामधिके तम्मन्सकलं न्यूनमन्यथा ।। योगार्धादधिके न याद्रिशेपे ग्राससम्भवः ॥ ११ ॥ तस्मिञ्छन्नमानेऽधिके ग्राह्यमानाधिके यद्यस्मात्कारणादाह्यमानमस्ति । अतःकार: णात्मकलं सम्पूर्ण ग्रहणं भवात्त । अन्यथा ग्राह्यमानान्यूने ग्रासे न्यूनं ग्राह्यमानान्तर्गत अहणं स्यात् । मानक्यखण्डासिपेऽधिके सति ग्राससम्भवो ग्रहणं न स्यात् । अत्रो- पपत्तिः । ग्राह्यमानाधिके ग्रासे सम्पूर्णग्रहणं न्यूने न्यून मानक्यखण्डाधिक विक्षेपे मण्डलस्पर्शासम्भवाद्हणाभारः ॥ ११ ॥ भा: टी-जो ग्राह्य ग्रहविम्बसे छत्रमान मधिक हो तो संपूर्ण ग्रहण किया जायगा भन्यया होनेसे कम ग्रहण किया जायगा । योगाईसे विक्षेप अधिक होने पर ग्राससम्मा नहीं होता ॥ १९॥ अथ स्थित्यविमर्दा श्लोकाभ्यामाह- ग्राह्यग्राहकसंयोगवियोगो दलितो पृथक् ।। विक्षेपवर्गहीनाभ्यां तद्वर्गाभ्यामुभे पदे ॥ १२ ॥ मटिर सत्तमन्त्रमुच्यत इति या पाठः। २ ग्राझमागरिक इति पाटान्तरम् ।
(१०२) :. A सूर्यसिद्धान्तः- [चतुर्यों - पष्टया संगुण्य सूर्येन्द्रो(त्यन्तरविभाजिते । स्यातां स्थितिविमर्दाघे नाडिकादिफले तयोः ॥ १३ ॥ ग्राह्यग्राहकमानयोर्योगान्तरे अधिते पृथस्थानान्तरे स्थाप्ये । अग्रिमझियायां कदाचिदशुद्धत्वसंभवे पुनः क्रियार्यमेतयोरावश्यकत्वात् । तदर्गाभ्यां योगान्तरार्ध- योर्वर्गाश्यां विक्षेपवर्गेण वजिताभ्यामुभे हे मृले पष्टया गुणयित्वा सूर्यचन्द्रयोर्गत्यन्तर; कलामिक्ते तयोर्योगवियोगयोः स्थाने पश्यादिफले क्रमेण स्थित्य विमर्दार्धे भवतः। मनोपपत्तिः । ग्रहणारंभाद्रहणान्तपर्यन्तं यः कालः स स्थितिसंज्ञः। तस्य खण्ड एक ग्रहणारंभान्मध्यग्रहणपर्यन्तमपरं मध्यग्रहणाद्रहणान्तपर्यन्तम् । तत्र बिम्वनेमिस्पर्श काले मानक्यखण्डं कर्णः स्पर्शमोक्षकालिकशरो भुजः स्पर्शमोक्षान्यतरकालिकशरा- अमध्यकालिकशराप्रयोरन्तरं पूर्वापरं कोटिरिति तत्खण्डसाधकं क्षेत्रम् । एवं संपूर्णग्रहणे सम्मीलनोन्मीलनकालयोरन्तरकालो मर्दस्तत्र मध्यग्रहणात्सम्मीलनोन्मीलनकालावधि खण्डे तत्साधकं छाद्यच्छादकमण्डलकेंद्रयोरन्तरं मानार्धान्तरतुल्यं कर्णस्तात्कालिकशरो मुजः शराग्रयोरन्तरं विक्षेपवृत्ते पूर्वापरं कोटिरिति क्षेत्र । सम्मलिनं छायमण्डलस्या- च्छादनसमाप्तिः । उन्मीलनं तु छादकमण्डलादाच्छादित संपूर्णच्छायमण्डलस्य निः सरणारंभः । तत्र स्पर्शमोक्षसंमीलनोन्मीलनकालानामज्ञानान्मध्यकालिकविक्षेपग्रहणम् । भुजकर्णवर्गान्तरपदं कोटिरिति पूर्वश्लोकोक्तमुपपन्नम् । छाद्यच्छादकमण्डलकेंद्रयोः पूर्वीपरान्तराभावे मध्यग्रहणसंभवाच्छाद्यच्छादक्युतिर्गत्या तरकलाभिः पष्टिघटिकास्त- दानीतकोटिकलाभिः काइत्यनुपातेन स्थितिमर्दखण्डे । तत्र चन्द्रग्रहणे भूभागतेः सूर्य- गत्यनुरोधात्सूर्यगतिवमित्युपपन्नं द्वितीयश्लोकोक्तम् ॥ १२ ॥ १२ ॥ भान्टी-पृथक् ग्राह्य ग्राहकमान योगार्द्ध और वियोगार्द्ध वर्ग निर्णय करे। जिससे विक्षेप वर्गहीन घरके मूल निर्णय करे । उन दो मूलको ६० से गुण करके सूर्येन्दु स्पष्ट मुस्त्यन्तरसे माग परनेपर स्थूलस्थितार्द्ध मोर स्यूल विभेदधि दण्डादि होंगे ॥ १२ ॥ १३ ॥ अथ स्थित्यविमदर्धि असकृत्साध्ये इति श्लोकाभ्यामाह- स्थित्यर्धनाडिकाभ्यस्ता गतयः पष्टिमाजिताः ॥ लिप्तादिप्रग्रहे शोध्यं मोक्षे देयं पुनः पुनः ॥ १४ ॥ तद्विक्षेपः स्थितिदलं विमधि तथासकृत् ॥ संसाध्यमन्यथा पाते तल्लिप्तादिफलं स्वकम् ॥ १५॥ सूर्यचन्द्रपातानां गतयः स्थित्यर्धघटीभिगुणिताः पाट्या भत्ताः फलं क्लादिमाहे स्पस्थित्यर्धनिमित्त सूर्यचन्द्रयोहीनमोक्षेमोक्षस्थिायर्धनिमित्तं सूर्यचन्द्रयोदयं योज्यम् । चन्द्रपाते तल्लिप्तादिफलं स्थित्यर्धघटयानीतं कलादिपूर्वफलं स्वकं स्वगत्युत्पन्नमन्यथा ध्यायः ४.] संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः । ' (१०) विपरीतं प्रग्रहस्थित्यनिमित्तं योज्यं मोक्षस्थित्यर्धनिमित्तं हीनमित्यर्थः । तदिक्षे पै. स्तात्कालिकचन्द्रपाताभ्यामानीतशरकलाभिः । कलानां बहुत्वादिक्षेपैरिति बहुवचनम् । विक्षेपाभ्यामित्यर्थः । पुनः पुनः स्थितिदलं कार्यम् । अत्रक पुनःपदं स्पर्शस्थित्यर्थः सम्बद्धं द्वितीयं मोक्षस्थित्यर्धसम्बई पुनःपदम् । तेन स्पर्शस्थित्यर्धार्थसाधितचन्द्र- पाताभ्यामानीतशरेण मागुक्तमकारण स्पर्शस्थित्यध संसाध्यम् । मोक्षस्थित्यर्धार्थसाधि. तचन्द्रपाताभ्यामानीतशरेण पूर्वोक्तरीत्या मोक्षस्थित्यर्ध साध्यमित्यर्थः। तच्चोभयमस- कृद्धारंवार स्पर्शस्थित्य(नीतचालनेन मध्यकालिको चन्द्रपातावुक्तरीत्या प्रचात्य तच्छे रेण पूर्वोक्तरीत्या स्पशीस्थित्यर्धमस्मादप्युक्तरीत्या स्पर्शास्थित्यर्धमेवे यावदधिशेषः एवं मोक्षस्थित्यर्घातीतचालनेन मध्यकालिको चन्द्रपाता उक्तरीत्या प्रचाल्य तच्छरेण पूर्वोक्तरीत्या मोक्षस्थित्यर्धमस्मादप्युक्तरीत्या मोक्षस्थित्यमेवं यावदविशेष इत्यर्थः । ननु स्थित्यर्धविमर्धियोरकोमत्युक्तेः कथं विमर्धमसकृत्साध्यमिति नोक्तमित्यत आह-विम दर्धिमिति । तथा स्पर्शमोशस्थित्यर्धसाधनरीत्या सकृद्यावदविशेषस्तावस्पर्शमी मोक्ष मधं च संसाध्यम् । तथाहि स्थित्यर्धनाडिकाग्यस्ता इत्यत्र विमर्धनाडिका ग्रहा- स्पर्शमर्धिमोक्षमार्दै साध्ये । आग्यां प्रत्येकमसकृत्स्पर्शमर्धिमोक्षमदीर्ध स्फुरे स्तः । अनोपपत्तिः । प्रायुक्त क्षेत्र स्पर्शमोक्षसम्मीलनकालिकशरवशादिति तदज्ञानान्मध्या, लिनशरग्रहणेन स्थूलं स्थित्यर्ध मदधि चातो मध्यकालात्तदन्तरेण पूर्वाग्रिमकालिक- योस्तेपां सम्भवात्तत्कालचालितचन्द्रपाताभ्यां विक्षेपस्तात्कालिको भवति पर स्थूलः । स्थूलस्थित्यधीधानीतत्वात् । अतोऽस्मदानीतं स्थित्यादिपूर्वीपेक्षया सूक्ष्ममपि स्थूल- मित्यसत्सूक्ष्ममिति । तन सम्मीलनोन्मीलनकालयोराकाशस्पर्शमोक्षसम्भवास्पर्श मोक्षमार्धमिति ध्येयम् ॥ १४ ॥ १५ ॥ भा० टी०-स्थित्यर्ध दण्डसे सूर्य चन्द्र भौर राहुकी गति गुण करके ६० से भाग परने. पर जो कलादिहॉ, सौ ग्रह से स्पर्शहीन (पातस्थान में योग ) मोर मोक्षमें पद्मा स सूर्यमें योग और पातस्थान में वियोग करना होता है ॥ १४ ॥ तिससे तिसकालके विपद्वारा स्थित्यई और विमददि बारम्बार निर्णय करनेपर सूक्ष्म होताहै ॥ १५ ॥ अय मध्यग्रहणस्पर्शमोक्षकालानाह- स्फुटतिथ्यवसाने तु मध्यग्रहणमादिशेत् ।। स्थित्यर्धनाडिकाहीने ग्रासो मोक्षस्तु संयुते ॥ १६॥ स्पतिथ्यन्तकाले। तुकारात्तत्पूर्वापसालनिरासः । मध्यग्रहणमासोपचयसमाप्ति कपयेत् । मध्यग्रहणसम्बन्धेन मध्यसूर्यचन्द्रानीतमध्यतिथ्यन्ते तत्सम्भर इति करप चिद्भमस्तद्वारणार्थ स्फुरेति । स्थित्यर्धघटिवाभिरूने तिथ्यन्तकाले प्रासः स्पर्शः । - संयुते स्थित्यर्धघटीभिर्युते निथ्यन्तकाले मोक्षः । 'तुकारः स्पर्शमोक्षास्थि यर्धाभ्यां . (१०२) सूर्यसिद्धान्तः- [चतुर्यो:- पष्टया संगुण्य सूर्येन्द्रो(त्यन्तरविभाजिते ।। स्यातां स्थितिविमर्दा नाडिकादिफले तयोः ॥ १३ ॥ ग्राह्यग्राहकमानयोर्योगान्तरे अर्धिते पृथस्थानान्तरे स्थाप्ये । अग्रिमक्रियायां कदाचिदशुद्धवसंभवे पुनः क्रियार्थमेतयोरावश्यकत्वात् । तदर्गाभ्यां योगाभन्तरार्ध- योर्वर्गाभ्यां विक्षेपवर्गेण वजिताभ्यामुभे हे मूले पष्टया गुणयित्वा सूर्यचन्द्रयोगायन्तर: कलाभिर्मक्ते तयोर्योगवियोगयोः स्थाने पष्ट्यादिफले क्रमेण स्थित्यधै विमर्दार्धे भवतः। अनोपपत्तिः । ग्रहणारंभाद्रहणान्तपर्यन्तं यः कालः स स्थितिसंज्ञः। तस्य खण्ड एक ग्रहणारंभान्मध्यग्रहणपर्यन्तमपरं मध्यग्रहणाद्रहणान्तपर्यन्तम् । तत्र विम्वनेमिस्पर्श काले मानैक्यखण्डं कर्णः स्पर्शमोक्षकालिकरारो भुजः स्पर्शमोक्षान्यतरकालिकशरा- ग्रमध्यकालिकशराग्रयोरन्तरं पूर्वापरं कोटिरिति तत्खण्डसाधकं क्षेत्रम् । एवं संपूर्णमहणे सम्मीलनोन्मीलनकालयोरन्तरकालो · मर्दस्तन मध्यग्रहणात्सम्मीलनोन्मीलनकालावधि खण्डे तत्साधकं छाद्यच्छादकमण्डलकेंद्रयोरन्तरं मानार्धान्तरतुल्यं कर्णस्तात्कालिकशरो भुजः शराग्रयोरन्तरं विक्षेपवृत्ते पूर्वापरं कोटिरिति क्षेत्र । सम्मलिनं छाद्यमण्डलस्या- च्छादनसमाप्तिः । उन्मीलनं तु छादकमण्डलादाच्छादितसंपूर्णच्छाद्यमण्डलस्य निः *सरणारंभैः। तत्र स्पर्शमोक्षसंमीलनोन्मीलनकालानामज्ञानान्मध्यकालिकविक्षेपग्रहणम् । भुजकर्णवर्गान्तरपदं कोटिरिति पूर्वश्लोकोक्तमुपपन्नम् । छाद्यच्छादकमण्डलकेंद्रयोः पूर्वीपरान्तराभावे मध्यग्रहणसंभवाच्छाद्यच्छादक्युतिर्गत्यन्तरकलाभिः पष्टिघटिकास्त- दानीतकोटिक्लाभिः काइत्यनुपातेन स्थितिमर्दखण्डे । तत्र चन्द्रग्रहणे भूभागतेः सूर्य- गत्यनुरोधारसूर्यगतित्वमित्युपपन्नं द्वितीयश्लोकोक्तम् ॥ १२ ॥ १३ ॥ भाटी-पृथक् ग्राह्य ग्राहकमान योगार्द्ध और वियोगार्द्ध वर्ग निर्णयकरे। जिससे विक्षेप वर्ग हान परके मूल निर्णय करे । उन दो मूलको ६० से गुण करके सूर्येन्दु स्पष्ट भुक्त्यन्तरसे माग परनेपर स्थूलस्थिताई और स्थूल विमर्धि दण्डादि होंगे ॥ १२ ॥ १३ ॥ अथ स्थित्यविमदाधं असकृत्साध्ये इति श्लोकाभ्यामाह- स्थित्यर्धनाडिकाभ्यस्ता गतयः पष्टिभाजिताः ॥ लिप्तादिप्रग्रहे शोध्यं मोक्षे देयं पुनः पुनः ॥ १४ ॥ तद्विक्षेपैः स्थितिदलं विमधि तथासकृत् ॥ संसांध्यमन्यथा पाते तल्लिप्तादिफलं स्वकम् ॥ १५॥ सूर्यचन्द्रपातानां गतयः स्थित्यर्धघटीभिणिताः पट्या मत्ताः फलं क्लादिप्रग्रहे स्पर्शस्थित्यर्धनिमित्त सूर्यचन्द्रयोहीनमोक्षेमोक्षस्थायधनिमित्तं सूर्यचन्द्रयोदय योज्यम् । चन्द्रपाते तलिप्सादिफलं स्थित्यर्धघट्यानीवं कलादिपूर्वपलं स्वकं स्वगत्युत्पन्नमन्पया ध्यायः ४.] संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः।। (१०). विपरीतं प्रग्रहस्थित्यर्धनिमित्तं योज्यं मोक्षस्थित्यर्धनिमित्तं हीनमित्ययः । तदेशे पै. स्तात्कालिकचन्द्रपाताभ्यामानीतशरकलाभिः । कलानां बहुत्यादिक्षेपैरिति बहुवचनम् । विक्षेपास्यामित्यर्थः । पुनः पुनः स्थितिदलं कार्यम् । अत्रकै पुनःपदं स्पर्शस्यित्यय सम्बदं द्वितीयं मोक्षस्थित्यर्धसम्पदं पुनःपदम् । तेन स्पस्थित्यर्धार्थसाधितचन्द्र पाताभ्यामानीतशरेण प्रायुक्तप्रकारेण स्पर्शस्थित्यधै संसाध्यम् । मोक्षस्थित्यर्धार्यसाधि- तचन्द्रपानाभ्यामानीतशरेण पूर्वोक्तरीत्या मोक्षस्थित्यधै साध्यमित्यर्थः । तचोमयमस- कृदारंवार स्पर्शस्थित्यधीनीतचालनेन मध्यकालिको चन्द्रपातायुक्तरीत्या प्रचात्य तच्छ: रेण पूर्वोक्तरीत्या स्पर्शास्थित्यर्धमस्मादप्युक्तरीत्या स्पर्शास्थित्यर्धमेवे यापदविशेषः एवं मोक्षस्थित्यर्धानीतचालनेन मध्यकालिको चन्द्रपाता उक्तरीत्या मचाल्य तच्छरेण पूर्वक्तिरीत्या मोसस्थित्यर्धमस्मादप्युक्तरीत्या मोक्षस्थित्यमेवं यावदविशेष इत्यर्थः । ननु स्थित्यर्धविमदर्धियोरकांमत्युक्तेः कथं विमर्दामसकृत्साध्यमिाते नोक्तमित्यत आह-विम दीर्धमिति । तथा सर्शमोक्षस्थित्यर्धसाधनरीत्या सकृयावविशेषस्तावत्पर्शमा मोक्ष मदर्घि च संसाध्यम् । तथाहि स्थित्यर्धनाडिकाभ्यस्ता इत्यत्र चिमर्धिनाडिका ग्रहा- स्पर्शमदीगोक्षमदर्दी साध्ये । आग्या प्रत्येकमसकृत्स्पर्शमदीर्धमोक्षमदीर्घ स्फुटे स्तः । मनोपपत्तिः । मागुक्त क्षेत्र स्पर्शमोक्षसम्मीलनकालिक शरवशादिति तदज्ञानान्मध्या लिकशरमहणेन स्थूलं स्थित्यध मदांध चातो मध्यकालाचदन्तरेण पूर्वानिमकालिक योस्तेषां सम्भवात्तत्कालचालतचन्द्रपाताभ्यां विक्षेपस्तात्कालिको भवति पर स्थूलः । स्थूलस्थित्याद्यानीतत्वात् । अतोऽस्मदानीतं स्थित्यादिपूर्वापेक्षया सूक्ष्ममपि स्थूल- मित्यसकत्सूक्ष्ममिति । तत्र सम्मौलनोन्मीलनकालयोशकायस्पर्शमोक्षसम्भवान्स्पर्श मोक्षमर्दामिति ध्येयम् ॥ १४ ॥ १५ ॥ भा० टी०-स्थित्यर्ध दण्डसे सूर्य चन्द्र और राहुकी गति गुण करके ६० से भाग फरने. पर जो पलादिहों, सो ग्रहो स्पर्शहीन (पातस्थान में योग) और मोक्षमैं चंद्रमा . सूर्यमें योग मार पातस्यान में वियोग करना होता है ॥ १५ ॥ तिससे तिसकाटके विक्षेपद्वारा स्थिप और विमर्द्धि वारम्पार निर्णय करनेपर सूक्ष्म होताई ॥१५॥ षय मध्यग्रहणस्पर्शमोक्षकालानाह- स्फुरतिथ्यवसाने तु मध्यग्रहणमादिशेत ।। स्थित्यर्धनाडिकाहीने ग्रासो मोक्षस्तु संयुते ॥ १६॥ स्पष्टतिथ्यन्तकाले । तुकाराचपूर्वापरकालनिरासः। मध्यग्रहणांसोपचयसमाति कथयेत् । मध्यग्रहणसम्बन्धेन मध्यसूर्यचंन्द्रानीतमध्यतिथ्यन्ते तत्सम्भव इति कम्य. चिभमस्तद्वारणार्थ स्फुटेति । स्थित्यर्धघटिकाभिरूने तिथ्यन्तकाले प्रासः स्पर्शः। * संयुते स्थित्यर्धघटीभिर्युते तिथ्यन्तकाले मोक्षः । 'तुकारः स्पर्शमोक्षस्थित्यर्धाभ्यां [चतुर्थी- (१४) सूर्यसिद्धान्त:- स्पर्शमोक्षकालाविति विषयव्यवस्थार्थकः । अत्रोपपत्तिः। तिथ्यन्तकाले छाद्यच्छाद- कयोः पूर्वापरान्तराभावाद्योगे मण्डलस्पों यावान्भवति ततः पूर्वाग्निमकालयोन्यूँन पवातोऽत्र मध्यग्रहणकालः । केचित्तु । “पर्वान्तः किल साधितो भवलये सूर्यन्दुचिना- न्तरात्तस्मिन्विम्बसमागमो न हि यतश्चन्द्रः शराग्रे स्थितः । तस्मादायनदृष्टिसंस्कृत. विरोधानीततिथ्यन्तके विम्पैक्यं भवतीति किं न विहित पूर्वन विद्मो वयम् ॥” इत्य- नैनात्र मध्यग्रहणं खण्डयति । तन्न । पूर्वापरान्तराभावे योगसत्वेन कदम्बसूत्रस्थ- योर्याम्योत्तरान्तरस्यैव सत्त्वेन तत्र मध्यग्रहणस्योचितत्वात् । अन्यथा ध्रुवसत्रे समसूत्रे वा योगाभ्युपगमे विनिगमनाविरहापत्तेः । यथा गतग्रहयोः कदम्घसूत्रेणैव योगाभ्यु पगमात् । दृष्टिप्रत्ययार्थ दृक्कोक्तेः । ग्रहणद्वयस्य स्वत एव दृग्गोचरत्वात् । ग्रहदया दर्शनाचत्यादिसंक्षेपः । मध्यग्रहणकालात्पूर्व स्पर्शस्थित्यर्धघटौभिः स्पर्शः। अग्रिमकाले मोक्षस्थित्यर्धघटीभिर्मोक्षः । स्थित्यर्धयोस्तदन्तररूपत्वेन सिद्धेः ॥ १६ ॥ भाटी-स्पष्टतिपिके शेषमें मध्यग्रहण होता है । तिस से सूक्ष्म स्थित्यर्घ दण्डवियोग कर- नेपर ग्राप्त (स्पर्श) काल होताहै और योग करनेसे मोक्षकाल होता है । १६ ॥ अथ सम्पूर्णग्रहणे निमीलनोन्मीलनकालावप्याह- तद्रदेव विमर्धनाडिकाहीनसंयुते ॥ निमीलनोन्मीलनाख्ये भवेतां सकलग्रहे ॥ १७ ॥ संपूर्णग्रहणे तद्वत् । यथास्थित्य|नाधिके तिथ्यन्ते स्पर्शमोक्षौ तथेत्यर्थः । ३. कारातद्भिन्नौतिव्युदासः। स्पर्शविमदर्धेिमोक्षविमर्धिघटीभ्यां क्रमेणोनयुते तिथ्यते क्रमेण निमीलनोन्मीलनसझे स्याताम् । अत्रोपपत्तिः। मर्दार्धस्य मध्यकालाचदन्त- ररूपत्वेन तदूनाधिके तस्मिन्क्रमेण निमीलनोन्मलिने सम्पूर्णग्रहण एव भवतः ।। न्यून- अहणे तत्वरूपव्याघातात्तदभावः ॥ १७ ॥ भा टी.-सम्पूर्ण ग्रहणमें सूक्ष्म विमदद्धि घटिका मध्य प्राणसमयसे हीन और तिसमें योग करनेसे निमीलन उन्मीलन काल होगा ॥ १७ ॥ अथेष्टकाल इष्टग्रासज्ञानार्थ कोटिकलानयनमाह- इष्टनाडीविहीनेन स्थित्यर्धेनार्कचन्द्रयोः ॥ भुक्त्यन्तरं समाइन्यात्पश्याप्ताः कोटिलिप्तिकाः ॥१८॥ सूर्यचन्द्रयोर्गत्यन्तरं कलात्मकं ग्रहणारम्भाद्या इष्टघाटकाः स्पर्शस्थित्यर्धघट्यन धिकारताभिरूनेन स्पर्शस्थित्यर्धेन गुणयेत् अस्मात्पष्टिविभक्तमाशा कोटिकला भवन्ति । अत्रोपपत्तिः । इष्टकाले छायच्छादकमण्डलद्रयोरन्तर कर्णस्तकालशरो भुजस्तत्का. लशराममध्यकालिकशराप्रयोरन्तरं विक्षेपवृत्ते कोटिरिति क्षेत्रइष्टघटयूनस्पस्पित्य.
ध्यायः ४.]
संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः ।
धंघटिकानां कलाः कोटि सिदा । पूर्वस्पर्शकालिककोट्याः स्थित्यर्धघटिकानां सिद्ध-
स्वात् ॥ १८॥
भाटी-सूर्यचन्द्रकी गतातरकलाके द्वारा ग्रहणारम्भसे दण्डादिवियुक्त स्थायई गुण-
करके ६० से भागकरनेपर भागफल कोटि कला होगा ॥ १८ ॥
अथात्र सूर्यग्रहणे विशेपमाह-
भानोहे कोटिलिता मध्यस्थित्यर्धसंगुणाः ॥
स्फुटस्थित्यर्धसम्भक्ताः स्फुटाः कोटिकलाः स्मृताः ॥ १९॥
सूर्यस्य ग्रहणे उक्तमकारेण याः कोटिकलाः सूर्यग्रहणोक्तस्पष्टस्थित्यौ नीतामध्य-
'स्थित्यर्धन सूर्यग्रहणोक्तस्पष्टशरानीतस्थित्यर्धन संगुणिताः स्फुटस्थित्यर्धेन सूर्यग्रहणा-
धिकारोक्तेन भक्ता सत्यः स्पष्टा कोटिकलाः सूर्यग्रहणतत्वरुक्ताः । अत्रोपंपात्तः ।
सूर्यग्रहणे स्पर्शमोक्षान्यतरमध्यकालयोरन्तरस्य स्थित्यर्धत्वात्तस्य च स्पष्टशरोदूत'
स्थित्यर्धलम्वनान्तरेक्यसंस्कारमितत्वात्स्पष्टस्थित्यर्धानुरुद्धा उक्तरीत्या नीताः कोटि
कलाः । अपेक्षिताश्च स्पष्टशरोतस्थित्यानुरुद्धाः । एतत्कोटिसम्बद्धं क्षेत्रम् । स्थि-
त्यर्धक्षेत्रान्तर्गतत्वात् ।। स्पष्टस्थित्यर्धस्य सूक्तक्षेत्रोत्पन्नत्वाभावात् । अन्यथा स्पष्ट-
शरोद्गतस्थित्यर्धस्य लंबनान्तरक्यसंस्कारानुक्मिसङ्गः ।। अतः स्पष्टस्थित्यर्धेनैता-
मागताः कोटिकलास्तदा स्पष्टशरोद्गतक्षेत्रजमध्यमरूपस्थित्यर्धेन का इति स्फुटाः
कलाः सिद्धाः ॥ १९॥
भा०टी०-सूर्यग्रहण कौटिकला मध्यस्थित्यर्धद्वारा गुणकरके स्फुट स्थिस्यपद्वारा भागकर
स्नेपर स्फुट कोटिकला होगी ॥ १९ ॥
अयाम्य इटग्रासानयनमाह-
क्षेपो भुजस्तयोर्गयुतर्मुलं श्रवस्तु तत् ।।
मानपोगार्धतः प्रोज्य ग्रासस्तात्कालिको भवेत् ॥२०॥
क्षेपो विक्षेपो भुजः । कोटिभुजयोः कर्णसापेक्षत्वादाह-तयोरिति । कर्णस्तु तयोः
कोटिभुजयोर्वर्गयोगान्मूलं सिद्ध एव । तत्कर्णवर्गात्मकं मूलं ग्राह्यग्राहकमानक्यार्धाद्वि-
शोध्य शेष तात्कालिकः कल्पितेष्टकालसंबंधी ग्रासो वांतर्गतः स्यात् । अत्रोपपत्तिः ।
क्षेत्र पूर्व मातिपादितम् । स्पर्शकाले मानक्यखण्डस्य कर्णत्वात् क्षेत्रयोरुभयोर्मध्यकाला-
बधित्वादिष्टकणानं मानक्यखण्डमिष्टयास एव ॥ २० ॥
भान्टी-क्षप (भुन ) वर्ग और कोटीफलका वर्ग मिलाकर मूल ग्रहण कर-
से कर्ण होगा । चन्द्रसूर्यमान-योगादसे कवियोग करनेपर तात्कालिक प्राप्त
होगा।॥ २० ॥
(१०६) सूर्यासद्धान्तः। [चतुर्यो- अथ मध्यग्रहणानन्तरामष्टग्रासानयनमाह- मध्यग्रहणतश्चोमिष्टनाविंशोधयेत् ॥ स्थित्यर्धान्मोक्षिकाच्छेपं प्राग्वच्छेप तु मौक्षिके ॥ २१ ॥ मध्यग्रहणकालादूर्ध्वमनन्तरम् । चकारो ‘विशेषार्थकतुकारपरः । इष्टपटि . काः धर्म । मौक्षिकान्मोक्षकालसम्बद्धात् स्थित्यर्धात् । न स्पर्श विशोधयत् । गणक इति कर्ताक्षेपः । शेष कोटिलिप्तादिनासानयनान्तं गणितकर्मप्राग्वद्वक्त्य तर समाहन्यादित्युक्तमकारण कुर्यात् । मौक्षिके मोक्षस्थित्यर्धान्तर्गतेष्टकाले तु. विशेषे । ग्रासः शेषमुरितो ग्रासोवान्तरमासो भवति । पूर्ववद्गतः । अत्रोपप । पातादिमध्यग्रहणात्पूर्वामेष्टकालस्य ग्रहणारंभावधिकस्य स्पर्शस्थित्यध: सम्बद्धत्वादागतो पास उपचयात्मक । नावशिष्टः । अवशिष्टमण्डलस्य शु- द्धत्वेन ग्रस्तत्वासम्भवात् । एवं मध्यग्रहणानन्तरीमष्टकालस्य मोक्षस्थित्यर्धान्तर्ग- तत्वादुक्तरीत्यानीतो ग्रासोऽपचयात्मकः । न शुद्धविम्बदर्शनात्मकः । ग्रस्त. त्वाभावात् ॥ २१॥ भा०टी०-मध्यग्रहण के पीछे होनेपर.मौक्षिकस्थित्यर्द्धसे इष्टनाडी (मोक्षकाविमुक्त इष्ट दण्डादि)पियोग करके कोटिनिर्णय करे ॥ २१ ॥ अथाभीष्टग्रासादिष्टकालानयनं श्लोकाभ्यामाह- ग्राह्यग्राहकयोगार्धाच्छोध्याः स्वच्छन्नलिप्तिकाः ॥ तद्वर्गात्प्रोज्य तत्कालविशेपस्य कृति पदम् ॥ २२ ॥ कोटिलिप्ता खेः स्पष्टस्थित्यधैंनाहता हताः॥ मध्येन लिप्तस्तन्नाड्यः स्थितिवद्मासनाडिकाः ॥२३॥ छाद्यच्छादकमानैक्यखण्डादीष्टग्रासकलाः शोध्याः । शेपस्य वर्गादमीष्टयासका- लिकविक्षेपस्य वगै विशोध्या शेपस्य मूलं कोटिकलाः । सूर्यग्रहणे विशेपमाह-रवे- रिति । सूर्यस्य ग्रहण इतिशेषः । मानोर्ग्रह इति पूर्वमुक्तः । उक्तप्रकारेण याः क्लास्ता मध्यग्रहणकालस्पर्शमोक्षान्यतरकालयोरन्तररूपेण स्पष्टास्थित्यर्धन गुण्याः । स्पष्टश- रोत्पन्नस्थित्यर्धेन मध्यमेन भक्ताः फलं कोटिकला भवन्ति । स्थितिवत् स्थित्यर्धसा- धनरीत्या । “पट्या सद्गुण्य सूर्यन्दोभुक्तयन्तरविभाजिताः इत्युक्तेन तासां कोटि- कलानां घटिकायास्ता अभीष्टयाससम्बन्धिघटिकाः स्पर्शमोक्षान्यतस्थित्यधीन्तर्गताः अमेण मध्यग्रहणाच्छेपा गता वा भवन्ति । अत्रोपपत्तिः । पूर्वोक्तव्यत्यासात्सुगमतरा । परन्तु स्वाभीष्टयासकालिक्शरज्ञाने सूक्ष्मम् । तच्छगज्ञाने मध्यकालिक्शरग्रहणेन ध्याय ३.] संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः। (१०७) स्थूलम् । अतएव भास्वराचार्यः कालसाधने तत्कालयाणेन मुहुः स्फुट इत्युक्तामिति विशेषः ॥ २२ ॥ २३ ॥ भा० टी०-ग्राहा और ग्राहकके. योगाई से पीय भाम ( ग्रास ) कला पृथकवरे तिसक वर्गसे तितकालका विक्षेपवर्ग अलग करके मूछकरने कोटि होगी ॥ २२ ॥ परन्तु सूर्य ग्रहणमें कोटिकला स्पष्ट रियायईसे गुणावे मध्यस्थित्यर्द्धसे भागकरनेपर कोटि होगी। तिरु से स्थितिके द्धि होनेशी समान ग्रासनादीको स्थिर करना चाहिये ॥ २३ ॥ अथ वक्ष्यमाणग्रहणपरिलेखोपयुक्तवलनस्यानयनं श्लोकाभ्यामाह- नतज्याक्षज्ययाभ्यस्ता त्रिज्याप्ता तस्य कार्मुकम् ॥ चलनांशाः सौम्ययाम्याः पूर्वापरकपालयोः॥ २४ ॥ राशिवययुतानाशात्कान्त्यशैदिक्समैर्युताः ॥ भेदेऽन्तराज्ज्यावलना सप्तत्यंगुलभाजिताः ॥ २५ ॥ यत्कालिकं वलनं कर्तुमिष्टं तात्कालिक नतं चन्द्रग्रहणे चन्द्रस्य सूर्यग्रहणे सूर्यस्य साध्यम् । तद्यथा स्वोदयात्स्वास्ताद्गतशेपघटिकाः । स्वदिनार्धान्तर्गताः स्वदिनार्धा- दुनाः क्रमेण पूर्वापरनतघटिका भवन्ति । तन्नत नवतिगुण स्वादनार्धभक्तं नतांशास्तेषां ज्या नतज्येत्यर्थः । स्वदेशांक्षांशज्यया गुणिता निज्यया भक्ता फलस्य धनुः कलात्मकं पाष्ट्रिभक्तं पूर्वापरकपालयोः पूर्वापरनतयोः क्रमेणोत्तरदक्षिणावलनांशा भवन्ति । यत्का- लिक वलनं तात्कालिकादाह्याद्रोशित्रययुतात्सायनांशाये क्रान्त्यंशास्तदिक्तुल्ययुता स्तेपां ज्याभेदे भिन्नदिक्त्वेऽन्तरात्कान्त्यंशवलनांशयोरन्तराज्ज्यासप्तत्यंगुलभक्ता शेष: दिका । मंगुलात्मकत्वेन हरस्योदेशांगुलादिका वलना भवति । अत्रोपपत्तिः । समवृ- तपूर्वापरादिदिग्भ्यः क्रान्तिवृत्तपूर्वापरादिदिशो यावतान्तरेण पलिता उत्तरस्यां दाक्षि- णस्यां वा वलनांशाः । तदानयनाथै प्रथमतः समवृत्तानुरुद्धादग्भ्यो विषुववृत्तदिशो यावतान्तरेण वलिता दक्षिणोत्तरयोस्तदाक्षवलनम् । तथाहि । समप्रोतचलवृत्तं ग्रह- चिह्नस्थ समविषुवत्तयोर्यत्र लग्नं तत्पदेशान्नवत्यंशान्तरे स्वस्ववृत्ते माच्योरन्तरं वलन तत्तुल्यमेवेतरादिशामन्तरं पूर्वकपालस्यग्रहे समवृत्तप्राचीतो विपुववृत्तप्राच्या उत्तरत्या दुत्तरम् । पश्चिमकपालस्थे तु समवृत्तप्राचीतो विपुववृत्तप्राच्या दक्षिणत्वादक्षिणम् । तत्र क्षितिजस्थे आहे तदन्तरमक्षांशतुल्यम् । याम्योत्तरवृत्तस्थे ग्रहे तदन्तराभावः । अतत्रिज्यातुल्यया नतकालज्ययाक्षज्यातुल्याक्षवलनज्या तदेष्टनतज्यया केत्यनुपाता- गताक्षज्याया धनुराक्षवलनमुक्तमुपपन्नम् । द्वितीयं तु विषुवमृत्तदिग्भ्यः । क्रांतिवृत्तदिशो यावतान्तरेण वलिता दक्षिणोत्तरयोस्तदायनं वलनम् । तथाहि वप्रोतवृत्तं ग्रहचिह्नस्थं विषुववृत्ते यत्रासनं लगति तत्स्थानाचतुर्थीशान्तरे यत्स्थानं तद्विपुवत्प्राची । तस्या ग्रह- (१०८) सूर्यसिद्धान्त:- [ चतुर्थोऽ- बिहात् त्रिभान्तरितक्रान्तिवृत्तमाची यदन्तरण तदायनं वलनम् । तत्तल्यमेवेतरदिशाम- न्तरम् । उत्तरायणस्थे ग्रह उत्तरं दक्षिणायनस्थ ग्रहे दक्षिणम् । नत्वयनसंधावभावात्म: कम् । गोलसन्धौ परमक्रान्तितुल्यमतःसत्रिभक्रान्तितुल्यं सत्रिभग्रहगोलदिकामत्युपपन्ने राशिवययुतानाह्यात्कान्स्यशेरित । द्वयोर्वलनयोरकदिक्त्वे समवृत्तप्राचीत:- क्रान्ति- त्तप्राचीतद्योगरूपस्फुटवलनान्तरेण वलनदिारी भवति । भिन्नदिक्त्वे तु पलनान्तररू- पस्फुटवलनान्तरेण शेपदिशि भवति । तज्ज्यस्फुटवलनज्या त्रिज्यावृत्ते । अग्रे पारेलेख एकोनपञ्चाशन्मितव्यासार्द्धवृत्ते दानार्थ विज्यावृत्त इयं तदैकोनपञ्चाशन्मितं व्यासार्दै केत्यनुपाते प्रमाणेच्छयोरिच्छापवर्तनादरस्थान धोवयवत्यागात्सप्ततिः। अतो दिक्समै- र्युता इत्याद्युपपन्नम् ॥ २४ ॥ २५ ॥ मा० टी०-ग्रस्तकी नवी हुई ज्याको अक्षज्यासे गुणकरके त्रिज्यासे भागकरने पर जो ज्या होगी तिससे धनुकरनेपर पलनाश होगा नतके पूर्वीपरके अनुसारसे पलन उत्तर दक्षि- णमें स्थिर करना चाहिये ।। २४ ॥ तीन राशिवाले ग्रस्तग्रहस्फुटको निर्देश करे । घलनांश और उत्क्रान्ति एकदिशाम होनेसे योग, अन्यथा अन्तर करनेसे स्फुट वलन है । स्फुट बल- नज्या ७० से भागकरनेपर भागफल मंगुगदिक वलनग्रस्त ग्रहका होगा ॥ २५ ॥ अथ कलात्मकविम्वविक्षेपादीनामंगुलीकरणमाह- सोन्नतं दिनमध्यर्थं दिनार्धाप्तं फलेन तु॥ 'छिन्द्याद्विक्षेपमानानि तान्येषामंगुलानि तु ॥२६॥ दिनमानमध्यर्धमर्ध इत्यध्यधैं स्वार्धयुक्तमिल्यथः । अभीष्टकालिकोन्नतघटीभिः सहित दिनार्धन भक्तं फलेन । तुकारो यद्हणं तस्य दिनमानोन्नते ग्राह्य इत्यर्थकः । वि- क्षेपग्राह्यग्राहकविम्वमानानि । तानि पूर्वोक्तानि कलात्मकानि । ग्रासादिकमपि ध्येयम्। भजेत् । तुकारात्फलमेपां कलात्मकानामगुलानि भवन्ति । अत्रोपपत्तिः । उदयास्त- काले विम्बकिरणानां भूमिगोलावरुद्धत्वेनाल्पो स्थकिरणानां नयनप्रतिहननार्हत्वा- दिम्ब व्यक्तत्वान्महदासते । तत्रांगुलात्मकं विम्वकलात्रयात्मकैकांगुलप्रमाणेनाभवति । खमध्यस्थे ग्रहे तु पिम्वस्य सर्वकिरणावरुद्धत्वान्नयनप्रतिघाताच सूक्ष्म विम्वं भासते तत्रांगुलात्मकं विम्बं कलाचतुष्टयात्मकैकांगुलप्रमाणेन भवति । तत्रोदयास्तकाले शङ्को- रमावावमध्ये तस्य त्रिज्यातुल्यत्वात्रिज्यातुल्यशङ्काबुदयकालिकैकांगुलमानस्य कला त्रयस्यैकांगुलमुपचयो लभ्यते तदेष्टशदी कइत्यनुपातेनाभीष्टकाले फलं युक्तम् । त्रयः मेकांगुलस्य कलात्मकं मानं भवाते । अतएव मास्कराचार्यरुदयास्तकाले सार्द्धद्वयं कलांगुलमानमंगीकृत्य "त्रिज्योतस्तत्समयोत्यशंकुः सादियुक्तोऽङ्गुललिप्तिकार इत्युक्तम् । तत्र भगवता लोकानुकम्पया स्वल्पान्तरत्वाच मध्यानेऽपि कला- चतुष्टयात्मकमेकांमुलमंगीकृत्य दिनार्धतुल्यपरमोन्नतकाल एकापश्यस्तदेष्टोन्नतकाले के " इति स्फुटोक्त्यपेक्षया मध्यलग्नसम इति वक्रोक्तिः कृपालोभगवतो नोचितत्यानमग्र- लम्बनस्याभाव इति । “दर्शान्तलग्नं प्रथमं विधाय न लम्बन वित्रिभलग्नतुल्ये । सो तदुनेऽभ्याधिके च तत्स्यादेवं धनणे क्रमशश्च वेद्यम् ॥” इति भास्कराचार्यण स्फुट- अध्यायः५] संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतः । इत्यनुपातागतफलयुक्तं त्रयं कला एकांगुलमानमभीष्टकाले । तत्र दिनार्धभक्तोन्नतका- लस्य फलरूपत्वात्रयाणां समच्छेदतया योजने निगुणितं दिनाधैं सर्धिकगुणदिनमा नरूपमुन्नतकालयुक्तं दिनार्धभक्तामति सिद्धम् । तत एतत्कालाभिरेफांगुलं तदेष्टक- लाभिः किमित्यनुपातन कलात्मकानामगुलीकरणमुक्तमुपपन्नम् ॥ २६ ॥ भा०टी०-दिनमानमें निजके भर्द्ध और उन्नतघटिया योग करके दिनाईसे माग- करनेपर जो फल होगा, तिस्से पलादि विक्षेप पिम्बमान मादिको मागकरने से अंगुलादि होंगे ॥ २६ ॥ अथानिमग्रन्थस्यासङ्गतित्वनिरासार्थमधिकारसमाप्ति फकिमयाह-सष्टम् ।। रंगना थन रचिते सूर्यसिद्धान्ताटेप्पणे । चन्द्रग्रहाधिकारोऽयं पूर्णो गूढप्रकाशके ॥ इति श्रीसकलगणकसार्वभौमवल्लालदेवज्ञात्मजग्गनाथगणकविरचितेगूदार्थमकाशके चन्द्रन हंणाधिकारः पूर्णः ॥ इति चन्द्रग्रहणाधिकारः । चतुर्थोऽध्यायः समाप्तः । अथ पंचमोऽध्यायः। अथ सूर्यग्रहणाधिकारो व्याख्यायते । तत्र यत्पदार्थविशेषप्रयुक्तश्चन्द्रग्रहणाधि- कारातिरिक्तः सूर्यग्रहणाधिकारस्तद्विशेषयोरभावस्थानादेवोत्पत्तिनियमात्तयोरभावस्था- नकथनव्याजेन तयोरुदेशमाह- मध्यलयसमे भानो हरिजस्य न सम्भवः ।। अक्षोदङ्मध्यभकान्तिसाम्येनावनतेरपि ॥ १॥ सूर्य मावास्यान्तकालिके मध्यलग्नसमे सति दिनमध्यस्थान ऊर्ध्वयाम्योत्तरवृत्ते लग्नः क्रांतिवृत्तप्रदेशो मध्यलग्नं विप्रश्नाधिकारोक्तम् । ततुल्ये सति मध्याह्न इति फलितम् । हरिजस्य लम्बनस्य भूपृष्ठक्षितिजवशालम्वनोत्पत्तेलवनस्यापि क्षितिजाच- कहरिजशब्दनाभिधानात्सम्भव उत्पत्तिनं । तत्र लम्बनाभाव इत्यर्थः । अथ मध्या- न्यार्थतत्त्वविचारणयापि मध्याह्न तदभावानुपपत्तेः साम्प्रदायिकव्याख्यामनादृत्य तथा थी व्याख्यायते । लग्नयोरुदयक्षितिजास्तक्षितिजमदेशयोः संलग्नक्रांतिवृत्तप्रदेशयोम- ध्यम । ऊर्ध्वमध्यप्रदेशस्त्रिभोनलग्नमित्यर्थः । प्रयोगस्तु मध्याह्न इतिवत् । तत्तल्या
[पंचमोऽ-
सूर्यसिद्धान्त:-
मुत्तेश्च । नत्यभावस्थानमाह-अक्षेत्यादि । अक्षांशा उत्तरा ये मध्यभस्य मध्यलग्रस्य
क्रान्त्यंशाः । अब मध्यलमशब्देन दशमभावास्त्रिभोनलग्नं या ग्राह्यमुमयपक्षेऽप्यदोपः ।
भनयोस्तुल्यत्वेऽधनतेनतेः । अपिशब्दात्सम्भवो न । अभाव इत्यर्थः । नत्वपिशब्दा-
लम्बनस्यापि तयाभावः । उत्तरकान्त्यक्षयोस्तुल्यत्वे मध्यलग्नतुल्यायवाभावेऽपि तद-
मावापत्तेः । अत्रोपपत्तिः । अमावास्यान्तकाले समौ सूर्यचन्द्री । तत्र चन्द्रशरामावे
भूगर्भान्नीयमानं भूसूत्रमर्कस्थानावधि चन्द्रं स्पृशत्येवोत भूगर्भच्छादकत्वं चन्द्रस्य सूर्यस्य
छाद्यत्वं सम्भवति । तत्र मनुष्याणामसत्त्वाइपृष्ठे तेषां सत्त्वाच्च भूपृष्ठानीयमान-
-मर्कोपरि सूत्रं चन्द्रे न लगत्येव । किन्तु चन्द्राधिष्टानगोले चन्द्रचिनाज़ लगति ।
तत्र यदा चन्द्र आयाति तदा भूपृष्ठे सूर्यस्य चन्द्रश्छादको भवति । यदा तु खमध्ये
'सूर्यरतदा भूगर्भसूत्रं भूपृष्टसूत्रं च सूर्योपरिगमेकमेव चन्द्रे लगतीति भूपृष्ऽमान्त-
काले चन्द्रश्छादको भवति । अतएव भूगर्भपृष्टसूत्रान्तरं लंबनम् । भूपृष्ठसूत्रात्स्
ोपरिगामचन्द्राधिष्ठानाकाशगोले चन्द्रस्य शरसत्त्वे चन्द्रचिनस्य वा लम्बितत्वात् ।
अतएव भास्कराचार्यरुक्तम् 'दग्गर्भसूत्रयोरैक्यात्खमध्ये नास्ति लम्बनम् ।।' इति ।
अथ चन्द्राधिष्ठानगोले भूपृष्टसूत्रमर्कोपरिगतं चन्द्रचिदादूव चन्द्रग्वृत्चे यदशैलंगति
तलम्बन हम्वृत्ताकारकक्रांतिवृत्ते भवति । यया तु दृग्वृत्तादिन्नं क्रांतिवृत्तं तदा भूपृष्ठखत्रं
चन्द्राधिष्ठानगोले चन्द्रग्वृत्ते चन्द्रादूर्ध्वं यत्र लग्नं तत्र चन्द्रगोलस्थक्रांतिवृत्तयाम्योत्तर
रूपकदम्बप्रोतवृत्तमानीय चन्द्रगोलस्थक्रांतिवृत्ते यत्र लग्नं तचन्द्रचिह्नयोरन्तरं क्रांतिवू-
चै पूर्वापरं स्फुटलम्बनकलाः कोटिः। चन्द्रस्य क्रान्तिवृत्तानुसारेण गमनात्मोतवृत्ते
क्रांतिवृत्तदृग्वृत्तयोरन्तरं याम्योत्तरं 'कलात्मकं नतिर्भुजः । भूगर्भपृष्ठसूत्रान्तरं दृम्वृत्ते
कलात्मकं दृग्लम्पनं कर्णः । दृग्वृत्तस्य कदम्बप्रोतवृत्ताकारत्वे क्रान्तिवृत्ते तयोरन्तरा-
भावालम्बनाभावः । याम्योत्तरमन्तरं दृग्लम्बनं नतिरेवोत्पन्ना । दृग्वृत्ताकारक्रान्तिवृत्ते
तु हरलंबनमेव क्रांतिवृत्ते तयोरन्तरमिति लम्बनमुत्पन्नंनत्यभावश्च ! तथा च दृग्वृत्तस्य
कदम्बप्रोतवृत्ताकारत्वे त्रिभोनलग्नस्थानेऽर्को भवति । तद्वत्तस्य क्रान्तिवृत्तयाम्योत्तर-
त्वेनोदयास्तलग्नमध्यवर्तित्वेन लग्नस्थानात् त्रिभान्तरितत्वात् । नहि क्रान्तिवृत्तायाम्यो-
त्तरान्तरज्ञानार्थसमप्रोतवृत्तमङ्गीकार्यम् । येन दशमभावतुल्यॉर्फ लम्बनाभाव उपपनः
स्यात् । क्रान्तिवृत्तस्य गोलवृत्तत्वेन समप्रोतवृत्तस्य देशवृत्तत्वेन सम्बन्धाभावात् ।
अतएव भगवता सर्वज्ञेन नतिसाधनार्थमग्रे क्षेपः कदम्बमोतवृत्ते त्रिभो नलग्नस्यैर
साधितः । दृक्षेपाभावे त्रिभोनलग्नस्य खमध्यस्थत्वेन तदा तस्य दशमभावतुल्यत्वेन
दशमभाग्नतांशाभागट्टक्षेपाभावः । तदा विभोनलग्नस्य नतांशाभावश्च । नतांशाभार-
स्त्वक्षांश तुल्योत्तरक्रान्ती सुखार्थे स्थूलांगीकारे तु दशमभावस्यैव नतांशोन्नतज्ये क्षे-
पग्मती नतिलम्बनयोः साधनाथ समनन्तरमेव भगवतोक्ते तु वस्तुरूपे । आयासेन
क्षेपसाधनस्योक्तस्य वैयर्थ्यांपत्तेरिति सवै निरवयम् ॥ १ ॥
ध्याय: ५] संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः । मा० टी०-सूर्यस्फुट मध्यलग्न सम होनेसे टम्बनका सम्भव नहीं होता.! उत्तर-अक्षांश और दशमकी क्रान्तिसाम्यमें अवनतिकीभी सम्भावना नहीं है ॥ १॥ अयोद्दिष्टयोरमावस्थानातिरिक्तस्थाने सम्भवात्प्रतिपादन प्रतिजानीते- देशकालतिशेपेण ययावनतिसम्भवः ।। लम्बनस्यापि पूर्वान्यदिग्वशाच्च तथोच्यते ॥२॥ देशविशेषेण कालविशेपेणावनतिसम्भवो नतिकालोत्पत्तिर्गौलस्थित्या यथा भवति । लम्बनस्यापि समुच्चये त्रिमोनलग्नस्थानात् पूर्वापरदिगनुरोधात् चकारात्सम्भवो देशकालविशेपेण यया भवतीत्यर्थः। तथा तत्तुल्येन नतिलम्बने आनयनद्वारा मया कथ्यते ॥२॥ मा०टी०-देशकालके उपरोक्त न होने से जो सपनति होती है और मध्यरेखाके पूर्व या पश्चिम होने के पशसे जो लंपन होता है, सो इस समय कहता हूं ॥ २॥ तत्रोपयुक्तामुदयाभिधामाह- लग्ने पर्वान्तनाडीनां कुर्यात्स्वैरुदयासुभिः । तज्ज्यान्त्यापक्रमज्यानी लम्बज्याप्तोदयाभिधा ॥३॥ स्वैः स्वदेशीयैरुदयासुभी राश्युदयासुभिः पर्वघटिकानां लग्नं गणकः कुर्यात् । पर्वा- न्तकालिक लग्नं साध्यमित्यर्थः । यद्यपि' पूर्व लग्नसाधनं स्वोदयैरेवोक्तमिति स्वैरुद: यासुभिरिति व्यथै तथापि समनन्तरमेव दशमभावसाधनोत्या कस्यचिल्लनं व्यक्षोदय- खात्र साध्यमिति भ्रमस्य वारणाय पुनरुक्तिः । तस्य लग्नस्यायनांशसंस्कृतस्य ज्याभुजज्यापरमक्रान्तिज्यया गुण्या स्वदेशीयलम्वज्यया भक्ताफलमुदयसझं स्यात् । अत्रोपपत्तिः । लग्नक्रान्तिज्यासाधनार्थ लग्नभुजज्यायाः परमकान्तिज्यागुणस्त्रिज्या दरस्ततो लंपज्याकोटी त्रिज्याकर्णस्तदा लग्नकान्तिज्याकोटो का कर्ण इत्यनुपाते त्रिज्ययो शाल्लग्नमुजज्या परमकान्तिज्या गुणालम्बज्यया भक्ताफलं लग्नस्याग्रा । इयं भगवतो- दयसञोक्ता लग्नस्योदयसंज्ञत्वात् । उदयसम्बन्धायेत्युक्तमुपपन्नम् ।। ३ ।। माल्टी-स्वदेशीय उदयप्राणसे पर्वान्तकालकी (सायन) लग्न गिने ज्याको परमापक्रमज्या (१३१७) से गुणकरके स्वदेशीय कम्पज्यासे भाग करनेपर वदय होगा ॥ ३: अथोपयुक्तां मध्यज्यां सार्धश्लोकेनाह- तदा कोदयर्लग्नं मध्यसम्झं यथोदितम् ॥ तत्क्रान्त्यक्षांशसंयोगो दिक्साम्येऽन्तरमन्यथा ।। शेपं नताशास्तन्मौर्षी मध्यज्या साभिधीयते ॥४॥ तिसकी मुज .
(.११२) सूर्यसिद्धान्त:- [ पञ्चमो- तदा पन्तिकाले लङ्कोदयैर्यक्षदेशीयराश्युदयैर्यथोदितं पूर्वोक्तप्रकारेण जातकपद्ध- त्युक्तनतघटीमिर्धनमृणं यथायोग्यं मध्यसझं लग्नं दशमभावात्मकं साध्यम् । अन ल. मसम्बन्धेन स्वदेशराश्युदवासु ग्रहणशङ्कावारणाय लंकोदरित्युक्तम् । तस्य दशमभा- वस्यायनांशसंस्कृतस्य क्रान्ति स्वदेशाक्षांशाः । अनंगोर्योग एकदिक्त्वे कार्यः । अन्यथा भिन्नदिक्त्त्वेऽन्तरं तयोखे शेपं संस्कारजदिकानतांशास्तपां ज्या, कार्या सा मध्यलमनतांशज्या मध्यज्योच्यते तत्सम्बन्धात् । अवोपपत्तिः स्पष्टा ॥ ४ ॥ भाटी०-तदुपरान्त लोदयप्राणसे (सायन) मध्यलन (दशम) साधन करें । मध्य लग्नको क्रान्ति और अक्षांश एक ओर होनेते योग मोर अन्यथा वियोग करनेसे शेपनाश होता है, तिसकी ज्या करनेसे मध्यज्या होती है ॥ ४॥ अयाभ्यामुपयुक्तं दृक्षेप लम्बनोपयुक्तां दृग्गा च सार्धोकनाह- मध्योदयज्ययाभ्यस्ता त्रिज्याप्तावर्गितं फलम् ॥५॥ मध्यज्यावर्गविश्लिष्टं दृक्पा शेपतः पदम् ॥ तत्रिज्यावर्गविश्लेपान्मूलं शकुः सहग्गतिः॥६॥ पूर्वोक्तमध्यज्या पूर्वानीतोदयाभिधयोदयज्यया । अस्या ज्यारूपत्वाग्ज्ययेत्युक्तम्। गुणितात्रिज्यया भक्तफलं वर्गितं वर्गः मञ्जातो यस्य तत् । फलस्य वर्गः कार्य इत्यर्थः । मध्यज्यायावर्गे विश्लिष्टं हीनं वगितं फलं कार्यम् । शेपान्मूलं दृकक्षेपः स्यात् । दृक् पत्रिज्ययो? वर्गी तयोरन्तरान्मूलं शंकुः स आनीतः शंदिग्गतिसज्ञो भवति । नतु शंकुमात्रम् । अत्रोपपत्तिः । त्रिभोनलमस्य दृगूज्यानयनाथ क्षेत्रम् । मध्यलमह- ज्याकणस्त्रिभोनलग्रस्य याम्योत्तरवृत्तात् मागपरस्थितत्वेन तत्वस्वस्तिकान्तरस्थितता. दीयम्वृत्ते प्रदेशांशज्या कोटिः । मध्यलग्नत्रिमोनलशान्तरांशज्याक्रान्तिवृत्तस्थो भुजः। अत्र भुनानयनं चोदयलग्नस्थक्रांतिवृत्तप्रदेशः । माकस्वस्तिकात्तदग्रान्तरेणोत्तरदक्षिणो भवति एवमस्तलग्नप्रदेशः परस्वस्तिकाद्दक्षिणोत्तरः । तदनुरोधेन च त्रिभोनलप्रप्रदे. शक्रांतिवृत्तीययाम्योत्तरवृत्तरूपतग्वृत्तं क्षितिजे याम्योत्तरवृत्तक्षितिजसम्पातात्तदा- ग्रान्तरेण लग्नमवश्यं भवति । अतस्त्रिज्यातुल्यमध्यलग्नराज्यया लग्नाग्रातुल्यो भुजः स्तदाभीष्टतदृग्ज्यया कइत्यनुपातेन सफलमज्ञः । तदर्गोनान्मध्यलग्नहरज्यावर्गान्मूलं त्रिभोनलग्नस्य ज्या रक्क्षेपाख्या। एतद्वोनात् त्रिज्यावर्गान्मूलं त्रिभोनलग्नशंकुई गतिसम्ज्ञः । अप्रेदमवधेयम् । त्रिप्रश्नाधिकारोक्तप्रकारेण त्रिभोनलग्नस्य शंकुडगुज्ये दृग्गतिहक्षेपतुल्ये · न भवतः । किन्तु दृग्गतिकक्षेपाभ्यां क्रमेण न्यूनाधिके भवतः सर्वदा धूलोकर्मणानुभवात् । अत आनीतोऽयं दृक्क्षेपविमोनलनदृइमण्डल स्थितोऽपि न त्रिज्यानुरुधः । किन्तु फलवर्गोनत्रिज्यापर्गपदरूपविलक्षणवृत्तव्यासाई ममाणेन सिद्ध इति गम्यते । अतो गज्यायात्रिज्यानुरुद्धत्वेन त्रिज्यावृत्तपरिणतो F •ध्यायः ५.] संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः। (११३ दृक्षपत्रिभोनलनस्य डगूज्यास्फुटटक्क्षेपरूपा । अस्यास्तत्रिज्यावर्गत्यादिना दृग्गतिः स्फुटा त्रिभोनलग्नशंकुरूपा । एतदनुक्तिः स्वल्पान्तरत्वाद्गणितसुखार्थ कृपालुन कृता । त्रिप्रश्नक्रियागौरयामयैतन्मार्गान्तरं लाघवादुक्तमिति दिक ॥५॥ ६॥ भान्टी-मध्यज्याको पहली कही हुई उदयज्यासे गुण करके त्रिज्यासे भाग परके वर्ग करता हुमा मध्यज्यावर्गसे वियोग करके मूल करनेसे दृरक्षेप होगा, सुरक्षेपवर्ग भोर त्रिज्या वर्गका अन्तर शंकवर्ग है. तिसके मूलको गति रहते हैं ॥५॥६॥ अथ लाघवादृक्क्षेपदृग्गती गणितसुखार्थं श्लोकाधेनाह- नतांशबाहुकोटिज्ये स्फुटे हक्क्षेपाती। दशमभावनतांशानां भुजकोटचोर्नतांशतदूननवातिरूपयोरनयोज्ये क्रमेण दृक्- क्षेपदृग्गती अस्फुटे स्थूल । यदा स्फुटे प्रागुक्त हक्क्षेपहरगती विहाय गणितलाघव- ये दशमभावनतांशभुजकोटयोज्य तत्स्थानापन्ने ग्राह्ये । यत्तूदयज्याभाव नतांश- वाहुकोटिज्ये दृक्क्षेपदृग्गती स्फुटे इति' । तन्न । उक्तप्रकारेणैतत् सिद्धेस्तत्कथन- स्य व्यर्थत्वात् । अत्रापपत्तिः । त्रिभोनलग्नस्य दशमभावासन्नत्वेन दशमभावरय पाम्योत्तरवृत्तस्थत्वेन लाघवार्थ दशममावमेव त्रिभोनलग्नं प्रकल्प्य तन्नतांशज्यामध्य- ज्यारूपा विभोनलमटकक्षेपः । उन्नतज्याशंकुर्दग्गतिः । इदमतिस्थूलम् ॥ यैरतु भग- वतोक्तं मध्यलग्नं दशमभावपरतया व्याख्यातं तेषां मते एतदुक्तमिति सूक्ष्मम् । प्रया- ससाधितहक्क्षेपटगती प्रागुक्ते सूक्ष्मे अप्यतिस्थूले इति ध्येयम् । भास्कराचा यस्तु । "त्रिभोनलग्नस्य दिनार्धजाते नतोन्नतज्ये यदि वा सुखार्थम् " इति यदुक्तं तदस्मात्सूक्ष्ममिति ध्येयम् ॥ भाण्टी०-थूलपक्षमें दशम उनके नताशवी बाई और कोटिज्याको हकक्षेप मोर हग्गति समझा जाता है। अथ लम्पनोपयुक्तच्छेदकथनपूर्वकं लम्बनानयनं सार्दश्लोकेनाह- एकज्यावर्गतइछेदो लब्धं दृग्गतिजीवया ॥ ७ ॥ मध्यलपार्कविश्लेषज्याछेदेन विभाजिता ॥ खीन्दोर्लम्बनं ज्ञेयं प्रापश्चादटिकादिकम् ॥ ८॥ एकराशिज्याया वगादृग्गतिजीवया प्रायुक्तगत्या । दृगतेत्रिशंकुरूपत्वेन ज्यारू- पत्ताजीवयेति स्वरूपप्रतिपादनम् । भागहरणेन लब्धं छेदसंज्ञं स्यात् । अर्थ मध्यलग्नं त्रिभोनलमं दर्शान्तकालिक नतु दशमभावः तात्कालिका सूर्यः अनयोर- न्तरस्य त्रिभानथिक्स्य ज्याछेदेन प्राक्साधितेन भक्ता फलं घटिकादिकं माइपश्चास्त्रि ३ मारपश्चाद्घटिकादितदात या पठः। ८ [पञ्चमो- सूर्यसिद्धान्तः- भोनलनरूपमध्यलग्नस्थानात्पूर्वापरविभागयोः सूर्यचन्द्रयोस्तुल्यं लम्बनं ज्ञेयम् । अत्रो. पपत्तिः । “त्रिभोनलमार्कविशेषशिञ्जिनीकृता हता व्यासदलेन भाजिता । हतात्फला द्विनिमलग्नशं कुना त्रिजीवयाप्तं घटिकादिलम्बनम् ॥” इति सिद्धांतशिरोमणी सूक्ष्म लम्बनानयनमुक्तम् । तस्योपपत्तिस्तट्टीकायां सुप्रसिद्धा । मध्यलग्नस्य त्रिभोनपर- त्वेन व्याख्यानान्मध्यलग्नाविश्वपज्यात्रिभोनलमार्कविश्लेपशिञ्जिनौरूपा जाता। इयं चतुगुणा त्रिभोनलमशंकुरूपदृग्गत्या च गुण्या त्रिज्यावर्गेण भाज्येति लंबनानयन- प्रकारेण सिद्धम् । तत्र चतुस्त्रिज्यावर्गयोर्गुणहरयोर्गुणापवर्त्तनेन हरस्थाने एको रा- शिज्यावर्गः सिद्धः। अत्रापि दृग्गत्येकराशिज्यावर्गों गुणहरौ गुणेनापवर्त्यहरस्याने एकज्यावर्ग इत्यादिना छेद उपपन्नः । हरस्य च्छेदाभिधानात् । अतो मध्यलमा- त्यायुक्तमुपपन्नम् । लंवनघटीभिरुभयोश्चालनं वक्ष्यमाणगणित आवश्यकामीत मचनार्थ रवीन्दोवनमित्युक्तम् । अन्यथा दर्शान्तकाले सूर्यगतभूपृष्टसूत्राचन्द्र- कक्षायां चन्द्रचिदस्य तटीभिलवितत्वाइयोरुक्त्यनुपपानिः । त्रिभोनलनसमे लंबनाभावात्पूर्वापरविभागै सूर्य सति लंघनं भवतीति माक्पश्चादित्युक्तम् । अत्रेदम- वधेयम् । लम्बनानयने मध्यलग्नस्य त्रिभोनलग्नेत्यर्थे छेदः पूर्वसाधितसूक्ष्म- दृग्गत्या सूक्ष्मो नताशेत्यादिगृहीतस्थूलग्गत्या स्थूल इति । एवं मध्यलग्नत्यस्य दशमभावार्थ तु विपरीतमिति । एतेन मध्यलग्नत्यस्य दशमभावार्थः । तत्र प्रयाससा- धितसक्ष्मदृग्गत्या सूक्ष्मं लम्बनम् । नतांशेत्यायुक्तस्थूलग्गत्या स्थूललम्वनामति साम्प्रदायिकोक्तं निरस्तम् । युक्तपभावात् । नवात्र मध्यलग्नरूपदशमभावगृहेऽपि गो. लयुक्त्या प्रतिपादनस्य सत्त्वात्कथमादित्योक्तं मध्यलग्नमिति पदं सार्वजनीनदशमभाव प्रत्यायकं विभोनलग्नपरतया हठाव्याख्यातु युक्तम् “ नतांशवाहुकोटिज्ये स्फुटे टक्के पहरगती" इत्यत्र स्फुटे इत्यनेन भगवतस्तदाशयस्य व्यक्तीकृतत्वादिति वाच्यम् । तथापि गौरवसाधितक्षेपोक्तिर्भगवदाशयस्थितनिमोनलग्नग्रहणं व्यनक्ति । अन्य- था प्रयाससाधितहक्क्षेपस्य वैयर्थ्यापत्तरिति मुधियावलोक्यमित्यलं विस्तरेण ॥७॥॥८॥ मा० टी०-एकराशिम्पावर्गको दृग्गात (ज्या) द्वारा भाग करनेसे छेद होगा 1 मध्यलग मोर तिस कालका सूर्यका भन्तर फरके ज्या करे, तिसको छेदसे गाग करने पर मध्यनसे पूर्वापर विचार करके रविसे चंदमाके लम्बन दण्डाद स्थिर होंगे ॥ ७ ॥८॥ अथ मध्यग्रहणकालज्ञानार्थ तिथौ लम्बनसंस्कारं तदसकत्साध्यमिति चाह- मध्यलमाधिके भानातिथ्यन्तात्मविशोधयत् ।। घनमूनेऽसत्कर्म यावत्सर्वं स्थिरीभवेत् ॥९॥ .
ध्याय: ५.] संस्कृतीका-भाषारकासमतः । (११५) सूर्य मध्यलग्नं त्रिभोनलग्नं तस्मादधिके सति तिथ्यन्ताद्दशतिथ्यन्तकालादागतं लम्बनं शोधयेत् । सूर्ये त्रिभोनलग्नान्यूने साते तिथ्यन्तकाले लम्बनं धनं युतं कार्यम् । एवं कर्मगणितमसन्मुहुः कार्यम् । अयमर्थः । तिथ्यन्तकालिकः' सूर्या लम्बनघटीभिः क्रमेण पूर्वाग्रिमकाले चाल्पो लम्बनसंस्कृततिथ्यन्तेऽर्को भवति । तस्मा- लम्बनसंस्कृततिथ्यन्तकाले लग्नदशमभावी प्रसाध्य पूर्वोक्तरीत्या लम्बनं साध्यम् । इदमाप केवलतिथ्यन्ते संस्कार्योक्तरीत्या लम्बनं केवलं तिथ्यन्ते संस्कार्यम् । अस्मा- 'दपि लम्बनं तिथ्यन्ते संस्कार्यमित्यसकादिति । गणितावधिमाह-यावदिति । सबै -गाणत लम्बनादि यावद्यत्परिवर्तावधि स्थिरीभवेत् । अविलक्षणं यावदविशेष इत्यर्थः । यत्रोपपत्तिः । दर्शान्तकाले रविगतभूपृष्ठसूत्राचन्द्रस्याधोलम्वितत्वेन त्रिभोनलग्नादुने खौ क्रान्तिवृत्ते पूर्वापरान्तराभावनेकसूत्रस्थितत्वरूपतिर्दर्शान्तकालालम्बनकालेनाग्रे भवाते । शीधगचन्द्रस्य मनगरवितः पृष्ठे स्थितत्वात् । अधिके रखो चन्द्रस्य पुरः स्थितत्वेन दर्शान्तकालालम्बनकालेन पूर्व युतिर्भवति । अतो दर्शान्तकालो लम्बन संस्कृतो मध्यग्रहणकालः स्यात् । युतिकालस्य मध्यग्रहणकालत्वात् । परन्तु तावता लम्बनकालेन सूर्यस्यापि क्रन्तिवृत्ते चलनालम्बनसंस्कृतदर्शान्तकाले रविगतभूपृष्ठम- त्राचन्द्रस्य लम्वितत्वं स्यादेवेति मध्यग्रहणकालस्त्वसिद्धः । नहि सूर्यो धनलम्बन- अणलम्बने चन्द्रश्च लम्बनकाले स्थिरो येन तयोर्युतिः सङ्गता स्यात् । अतस्तादृश- कालात्पुनस्तात्कालिक लम्बनं प्रसाध्य दर्शान्ते पुनः संस्कार्यम् । मध्यकालः स्यात् । एवं तादृशलम्बनसंस्कृतदर्शान्तेऽपि तयोर्भूपृष्ठसूत्रस्थत्वाभावात्पुनलम्बनं साध्यम् । तत्संस्कृतो दर्शान्तो मध्यग्रह इत्यसकृावधिना यदालम्बनं पूर्वलम्बनतुल्यं सिध्यति तदावश्यं ताशलम्वनसंस्कृतदर्शान्तरूपमध्यग्रहणकाले भूपृष्ठसूत्रे तयोः सनिवेशः । यतस्तदा सूर्यगतभूपृष्ठसूत्रचन्द्रयोरन्तराभावेन पूर्वागतलम्बनतुल्यलम्बनस्य पुनः सिद्धेः । अन्यथा तुल्यलम्बनानुपपत्तेः । तस्मान्मध्यकालोऽसकृद्यावदविशेषः साध्य- इत्युपपन्नं मध्यलग्नेत्यादि ॥९॥ मा० टी०-मध्यलग्नसे सूर्य अधिक हो तो तिथ्यन्तसे काल-लम्बन अलग करे, नहीं हो अन्यथा योग करे । प्राप्त समयके ऊपर फिर लम्बन साधन करके तिथ्यन्तमें संस्कार करे। । जबतक स्थिर न हो तबतक ऐसाही करे ॥ ९ ॥ अथ नतिसाधनमाह- हक्क्षेपः शीततिग्मांशोमध्यभुत्तपन्तराहतः ॥ तिथिन्नस्त्रिज्यया भक्तो लब्धं सावनतिर्भवेत् ॥ १०॥ दृक्क्षेपः प्रागानीतः शीततिग्मांशोश्चन्द्रार्कयोमध्यगती कलात्मके तयोरन्तरेण गुणि तया त्रिज्यया भक्तः फलं सा देशकालविशेषाभ्यां या गोले सिद्धा भवाते सैवान गणिों (१९३) सूर्यसिद्धान्त:- •[पंचमोऽ- नतिर्भवेत् । अत्रोपपत्तिः । यदा क्रांतिवृत्तं दृगवृत्ताकारं तदा नत्यभाव इनि मागुतम् । तत्र त्रिभोनलनस्य,समध्यस्थत्वेन हरक्षेपाभावः। यत्र च षटचक्षाशास्तत्र देो त्रिभो. नलगस्य क्षितिजस्यत्वेन परमा नतिः । परमास्नु नतिकलाभूगर्भक्षितिजाइपृष्टक्षितिजस्य मृव्यासान्तिरेणोच्छ्रितत्वादतियोजनैर्गत्यन्तरक्ला लभ्यन्ते तदा भूम्यामार्धयोजन का इत्यनुपातेन तत्र मध्यगतियोजनानां भूव्यासार्धस्य च नियतत्वाव्यासाधेनापवर्तः कृतः । तेन मध्यगत्यन्तरकलानां स्वल्पान्तरेण पञ्चदशांशः परमा नतिकलाः । अत एव पष्टिपटिकानां पञ्चदशांशो घटिकाचतुष्टयं परमं लानं सिद्धम् । आभित्रिज्यातु- ल्यटक्क्षेपे सूर्यगतभूपृष्ठसूत्राचन्द्रस्य दक्षिणोत्तरेणावलम्सनं भवति । अतत्रिज्यातुल्य- हक्क्षपेण मध्यगत्यन्तरपञ्चदशांशो नतिस्तदेष्टटक्क्षेपेण कत्यनुपाते गत्यन्तरगुणो टक्क्षेपो हरघातेन पञ्चदशगुणितत्रिज्यात्मकेन भक्तो नतिकला इत्युपपन्नम् ॥ १० मा०टी०-हक्षेपो रविचन्द्रमध्यभुक्त्यन्तरसे गुण करके १५ एस्ति-त्रिज्यासे भाग करनेपर अवनति स्थिर होगी ॥ १० ॥ अथ प्रकारान्तराभ्यां नतिसाधनं लाघवादाह- इक्क्षेपारसप्ततिताद्भवेदावनतिः फलम् ॥ अथवा विज्यया भक्तात्सप्तसप्तकसङ्गुणात् ॥११॥ सप्तत्या भक्तादृपक्षेपात्फलं कलादिका नतिः प्रकारान्तरेण भवेत्। अथवा प्रकारान्तरेण सप्तसतकसंगुणात्सप्तानां सप्तकं सप्तवारमावृत्तिवर्ग एकोनपञ्चाशदित्यर्थः । तेन गुणिता द्ववक्षेपात्रिज्यया भक्तात्फलं कलादिका नतिः । अत्रोपपत्तिः । इक्क्षेपस्य गत्यन्तर- कलामित ७३ १ २७ गुणकपञ्चदशगुणितत्रिज्यामितहरी ५१५७० प्रथममकारे गत्यन्तः रापतितौ हरस्थाने सप्ततिः। द्वितीयमकारे पञ्चदशभिरपर्य गुणस्थाने स्वल्पान्तरा. देकानपञ्चाशद्धरस्थाने त्रिज्येत्युपपन्न ॥ ११ ॥ मा०टा०-अथवा दृपक्षेपको ७० से भाग करनेपर वही होगा, या १९ से गुण करवे त्रिज्या से भाग करनेपरभी होजायगा || २१ ॥ अथ नदिग्ज्ञानं स्पष्टविक्षेपं चाह- मध्यज्यादिग्वशात्सा च विज्ञेया दक्षिणोत्तरा ॥ सेंदविक्षेपदिक्साम्ये युक्ता विश्शेपितान्यथा ॥ १२ ॥ सावनतिर्मध्यज्याया दिगनुरोधादक्षिणोत्तरा मध्यज्या चेदक्षिणा तदा नतिरपि दक्षिणा चेदुत्तरा तदोत्तरा ज्ञेया । चः समुच्ये । तेन मध्यज्यानतांशदिवति । सा दक्षि गोत्तम नतिश्चन्द्रविक्षेपदिक्समत्वे । तयोरंकादक्त्वे इत्यर्थः । युक्ता विक्षेपण युतेत्यर्थः अन्यथा तयोमिन्नदिक्त्वे विक्षेपेणान्तरिताशेपदिशाविक्षेपसंस्कृता नतिः स्पष्टवकाररूपा - (११७) "ध्याय: ५.] संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः । स्यात् । अत्र चन्द्रविक्षेपो मध्यग्रहणकालिक इति ध्येयम् । अत्रोपपत्तिः नितांश दिकमध्यज्यावशाक्क्षेपस्योत्पन्नत्वाचदुत्पन्ननतेस्तविक्त्वं युक्तमेव । अथ रविगत्तभूपृ- । प्रसूत्राचन्द्राकाशगोले क्रान्तिवृत्तावधि याम्योतरांतरस्य नतित्वात्क्रांतिमण्टलाचंद्रवि- , म्वावधि विक्षेपत्वादविगतभूपृष्टसूत्राचंद्राविम्बावधि याम्योचरान्तरस्य सूर्यग्रहणोप- युक्तनतिसंस्कृतविक्षेपरूपस्पश्टविक्षेपत्वाइयोकेदिशि योगो भिन्नदिश्यन्तामित्यु- पन्नम् ॥ १२ ॥ भा० टी-मध्यन्यादिकके अनुसार माति दक्षिणोत्तरा होगी, दिनमाम्यम चन्द्रापले पके सहित योग नहीं तो विये ग करनेसे स्पष्ट विक्षेप होगा ॥ १२ ॥ अथ चन्द्रग्रहणाविकारोक्तमत्रातिदिशति- तया स्थितिविमदर्धिग्रासाद्यं तु यथोदितम् ॥ प्रमाणं वलनाभीयासादि हिमरहिमवत् ॥ १३ ॥ तया विक्षेपसंस्कृतया नया सष्टविक्षेपरूपयेत्यर्थः । स्थित्यर्धविमर्दानासा: आद्यशब्दास्पर्शमोक्षसम्मीलनोन्मीलनं यथोदितं चन्द्रग्रहणे यथोक्तं तथा । तुकार- स्तदतिरिक्तरीतिव्यवच्छेदार्य कारपरः । प्रमाणं मतमित्यर्थः । अवशिष्टमप्याह-बल- नेत्यादि । वलनाभीष्टग्रासः । अदिशब्दादिष्टग्रासादिष्टकालानयनम् । हिमरश्मियचन्द्र- ग्रहणोक्तरीत्या कार्यमित्यर्थः । अत्रोपपत्तिरविशेष एव ॥ १३ ॥ भाटी०-मानति सस्कृपसे रिश्त्य, विमा, ग्रासप्रमाण, वन मभीर ग्रा- सादि चद्रग्रहणकी समान गिरने चाहिये ॥ १३ ॥ अथ स्थित्यविमधिं च विशेपं श्लोकचतुष्टयेनाह- स्थित्योनाविकात्याम्मत्तिथ्यन्ताल्लम्बनं पुनः॥ ग्राप्तमोक्षोद्भवं साध्य तनाध्यहारजान्तरम् ॥ १४॥ माकपालेअधिक म याद्भवेत्प्राग्ग्रहणं यदि ।। मोक्षिकं लम्बन हीनं पश्वा तु विपर्ययः ॥ १५ ॥ तदा मोक्षस्थितिदले देयं प्रग्रहणे तथा । हरिजान्तरकं शोध्यं यत्रतत्स्याद्विपर्ययः ॥१६॥ एतदुक्तं कपालैक्ये तद्भेदे लम्बनकता ॥ से स्ने स्थितिदले योज्या विमर्थेिऽपि चोक्तमत् ॥१७॥ चन्द्रग्रहणाधिकारोक्तपकोरगासन्साधिन स्पशस्वित्वर्थ मोक्षास्थत्यवं चात पथी । मध्यप्रदणकालिकस्प शरादुक्तंगल्या स्यिययंत्रटिकालाभिलिप्याय- (१२८) सूर्यसिद्धान्तः- [ पंचमो लिका ग्रहाः । स्पर्शस्थित्यनिमित्तं पूर्व चाल्याः । मोक्षस्थित्यर्धनिमित्तमप्रे वा..' ल्याः । तत्कालयोः प्रत्येक नतिशरी प्रसाध्य स्पष्टशरः साध्यः । ततः प्रथमकालिक- स्पष्टशरात्स्थित्यर्थमनेन पूर्व तिथ्यन्तकालिकग्रहान्प्रचाल्योक्तरीत्या स्पष्टशरं प्रसाध्य स्थित्यधैं साध्यम् । एवमसकृत्स्यस्थित्यधम् । एवमेव द्वितीयकालिकस्पष्टशरा- स्थित्यर्धमनेनाग्रे तिथ्यन्तकालिकग्रहान्प्रचाल्योक्तरीत्या स्पष्टशर प्रसाध्य स्थित्यधैं सां ध्यम् । एवमसकृन्मोक्षस्थित्यर्धामति । अथाभ्यां स्पर्शमोक्षस्थित्यर्धाभ्यां क्रमे हीनयुता- दर्शान्तकालातु प्राग्वदुक्तरीत्या लम्बनं पुनरसकृद्धासमोक्षोद्भव' स्पर्शमोक्षकालिक कार्यम् । तथाहि । स्पर्शस्थित्यर्धहीनातिथ्यन्तात्तात्कालिकसूर्याल पदशमभावी प्रसाध्योक्तरीत्यास्मालम्बनं साध्यम् । तेन स्पर्शस्थित्यनितिथ्यन्तं संस्कृत्यास्माल्ल. म्बनमनेनापि स्पर्शस्थित्यानतिथ्यन्तं संस्कृत्यास्मालम्बनमेवमसकृत्स्पर्शकालिक लम्बनम् । एवमेव मोक्षस्थित्यर्धयुतात्तात्कालिकसूर्यालग्नदशमभावी. मसाध्योक्तरीत्या लम्बनं साध्यम् । तेन मोक्षस्थित्यर्धयुततिथ्यन्तं संस्कृत्यास्माटंबनमनेनापि मो- क्षस्थित्यर्धयुततिथ्यन्तं संस्कृत्यास्माल्लम्बनमेवमसकृन्मोशालिक लंबनमिति । प्राय पाले त्रिभोनलग्नापूर्वभागे त्रिभोनलग्नाधिके रखो मध्यान्मध्यकालिकात् । अग्रोक्तलम्ब- नस्य विभक्तिविपरिणामादन्येन लम्बनात्प्रग्रहणं । प्रग्रहण स्पर्शः । स्पर्शकालिकम् । अत्रापि लम्बनमित्यस्यान्वयः । लम्बनं चेदधिकं स्यात् । मौक्षिक मोक्षकालसम्बन्धि लंबनं न्यूनं स्यात् । पश्चाः त्रिभोनलनात्पश्चिमभागे त्रिभोनलनाद्धीने रवी । तुकार समुच्चयार्थकचकाग्परः । विपर्यय उक्तवैपरीत्यम् । मध्यकालिकलम्बनात्स्पर्शकालिक लम्बनं न्यूनं मोक्षकालिकं लम्बनमाधिकामित्यर्थः । तदा ताई तन्मध्यहरिजान्तरम् । तयोः स्पर्शमोक्षकालिक्लम्बनेन प्रत्येकमन्तरं मोक्षस्थित्यधं योज्यम् । प्राग्रहणे स्पर्श स्थित्यधैं तथा देयम् । मोक्षमध्यकालिकलम्बनयोरन्तरं मोक्षस्थित्यर्धे योज्यम् । स्पर्श मध्यकालिक्लम्बनयोरन्तरं स्पर्शस्थित्य योज्यमित्यर्थः । यत्र यस्मिन्काले विपर्यय उक्तवपरीत्यं प्राकपाले मध्यकालिक्लम्बनात्स्पर्शकालिकलम्वनं न्यून मोक्षकालिकलं. बनमधिकं पश्चिमकपाल तु मध्यकालिक लम्वनात्स्पर्शकालिक्लम्बनमधिकं मोक्षकालि कलम्बनं न्यूनं भवतीत्यर्थः। तत्रैतन्मोक्षस्पर्शमध्यकालिक हरिजान्तरक लम्बनान्तरं मोक्ष स्थित्यधैं मध्यमोक्षकालिकलम्बनयोरन्तरं स्पर्शस्थित्यर्धे मध्यस्पर्शकालिकलम्वनयोर- न्तरीमत्यर्थः। शोध्यं होनं कुर्यात् । एतल्लम्बनान्तर योज्यं शोध्यं वा कपालेक्ये द्वयोः स्पर्शमध्ययोर्मध्यमोक्षयोकपाले स्वस्वकालिकत्रिभोनलनात्स्वस्वकालिकसूर्य उभ- यत्राधिके न्यूनेवेत्यर्थः । उक्तं कायतम् । तदेदे तयोः शमध्ययोर्मध्यमोसयोश्च भेदे कपालभेदे दो कालिकत्रिमोनलग्नात्तात्कालिकसूर्यस्याधियये मध्यकालिकत्रिभोनलमा- ध्याय: ५.] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतः । त्तात्कालिकास्य न्यूनत्वे मध्यकालिकत्रिभोनलग्नात्तात्कालिकार्कस्याधेिकत्वे मोक्ष. कालिकत्रिभोनलग्नात्तात्कालिकास्य न्यूनत्व इत्यर्थः । लम्बनकता लम्बनैक्यम् । स्पर्शमध्ययों दे तात्कालिकलम्बनयोर्योगः । मध्यमोक्षयोमदात्तात्कालिकलम्बनयो. योग इत्यर्थः । सकीये स्वकीये स्थित्यई संयुक्ता कार्या । स्पर्शस्थित्यः स्पर्शम- ध्यकालिकलम्वनयोयोगो योज्यः । मोक्षस्थित्यः मोक्षमध्यकालिकलम्बनयोयोगो योज्य इत्ययः । स्पर्शस्थित्यधै मोक्षस्थित्यधं च स्फुट भवति । आभ्यां चन्द्रग्रहणाक्त दिशा मध्यग्रहणकालात्पूर्वमपरत्र क्रमेण स्पर्शमोक्षकालो स्त इत्यर्थसिद्धम्। अथोक्तरीत्या विमपि स्पष्टत्वमतिदिशति-विमर्दार्ध इति । स्पर्शमी मोक्षमदर्दीधै चन्द्रग्रहणा- धिकारोक्तरीत्या स्पष्टशरेण सकृत्साधिते उक्तवत् । स्थित्यर्धेनाधिकारप्राग्यत्तिथ्यतालं- वनं पुनः' इत्यायुक्तरीत्या स्थित्यर्धस्थाने मदर्धिग्रहणेन ग्रासमोक्षोद्भवमित्यत्र संमील. नोन्मीलनोद्भवमिति ग्रह्णन माग्ग्रहणमित्यत्र संमीलनग्रहणेन मौक्षिकमित्यत्रोन्मीलन- ग्रहणेन स्फुटे साध्ये । अपिः समुच्चये । चकारात्ताभ्यां सम्मीलनोन्मीलनकाली मध्य- ग्रहणकालात्पूर्ववत्साध्यापित्यर्थः । अनोपपत्तिः । स्थित्यधोनयुतो मध्यग्रहणकाल: स्पर्शमोक्षकालः । मध्यकालिकलन्यनमस्कारात् । स्पर्शमोक्षकालिकलम्बनसंस्कार- स्यापेक्षितत्वाच । नहि यः कालो लम्बनसंस्कृतः स्फुटः स त्वमिन्नकालिकलम्बनसं- स्कृतः स्फुटः स्यात्सम्बन्धाभावात् । पूर्वस्पर्शमोक्षकालयोरज्ञानात् तात्कालिकलम्बन ज्ञानाभावाच । अतो मध्यकालज्ञानार्थ यथा तिथ्यन्तादसकूलम्बनं प्रसाध्य तिथ्य- न्ते संस्कृत्य मध्यकालस्तथा स्पर्शमोक्षास्थित्यर्धहीनयुक्ततिथ्यन्तकालाभ्यां स्पर्शमोक्ष- तिथ्यन्तरूपाभ्यां प्रत्येकं लम्बनमसकृत्मसाध्य स्वस्वतिथ्यन्ते संस्कृत्य स्पर्शमोक्षकालो स्फुदो तन्मध्यकालयोरन्तरं स्फुट स्थित्यर्धम् । तत्रर्णलम्बनेन स्पर्शमध्यमोक्षोत्पत्ती यदा मध्यलम्बनादधिकं स्पर्शलम्बनं मोक्षलंघनं च न्यून तदा स्पर्शस्थित्य(नतिथ्यन्त- स्याधिकलम्वनोनितस्य स्पर्शकालत्वान्यूनलम्बनोनितस्य तिथ्यन्तस्य मध्यकालत्वा- तयोरन्तरे तिथेः समत्वेन नाशात्स्पर्शस्थित्यधैं स्पर्शकालिकलम्बनेन युतं मध्यकालिक लम्बनेन हीनमिति लम्वनयोरन्तरं तत्र धनं योज्यम् । एवं मोक्षास्थित्यर्धयुततिथ्य- न्तस्य न्यूनलम्बनोनितस्य मोक्षकालत्वान्मध्यमोक्षकालयोरन्तरे पूर्वरीत्या मध्यमो. क्षकालिकयोलम्बनयोरन्तरं धनं मोक्षस्थित्यर्धे योज्यम् । यदा तु मध्यलम्बनादीन:, पर्शलंबनं मोक्षलवनं चाधिकं तदा न्यूनलम्वनहीनस्य स्पर्शकालत्वादधिकं लंबनम् । होनस्य मध्यकालत्यादुत्तरीत्या तदन्तरे स्पर्शस्थित्यर्धे लंबनान्तरं होनम्। एवमधिकलं- वनहीनस्य मोक्षकालत्वान्मध्यमोक्षयोरन्तरे मोक्षस्थित्यधैं लंबनान्तरं होनम् । धनलं. बनेन स्पर्शमध्यमोक्षोत्पत्तौ तु यदा मध्यलेवनान्यून स्पर्शलंबनं मोक्षलंबनं चाधिक । तदा स्पर्शस्थित्य(नातिथ्यन्तस्य न्यूनलंबनाधिकस्य स्पर्शकालत्वादधिकलंबनाधिक (१२०, :: सूर्यासद्धान्त:-:.. [पकमा:- स्य तिथ्यन्तस्य मध्यकालत्वात्तयोरन्तरे लंबनान्तरं स्पर्शस्थित्यधैं योज्यम् । एवं मोक्षस्थित्यर्धयुता तिथ्यन्तस्याधिकलंबनाधिकस्य मोक्षकालत्वान्मध्यमाक्षयोरन्तरे लंब- नान्तरं मोक्षस्थित्यधैं पूर्वरीत्या योग्यम् । यदा तु मध्यलंचनादाधिक स्पर्शलंबनं मोक्षलं बनं च न्यून तदा अप्यधिकलंबनाधिकस्य स्पर्शकालत्वाद्धीनलंबनाधिकम्य मध्यकाल स्वात्तयोरन्तर उक्तरीत्या स्पर्शस्थत्य) लंबनान्तरं होनम् । एवं न्यूनलंबनाधिकस्य मोक्षकालस्वात्तन्मध्यकालान्तरे मोक्षस्थित्य लंबनान्तरं हीनामिति सिद्धम् । नन्वयं लंबनान्तरहीनपक्षो न संगतः। बाधात् । तयाहि । ऋणलंबनस्य प्रमेणापचयात्स्पर्श मध्यमोक्षकालानां यथोत्तरं सम्भवाञ्च मध्यकालिकलंबनात्स्पर्शमोक्षालालेकलंबनयोः क्रमेण न्यूनाधिकत्वमसिद्धम् । एवं धनलंबनस्य क्रमेणोपचयान्मध्यलंबनात् स्पर्शमोक्षकालिगलंबनयोः क्रमेणाधिकन्यूनत्वमसिद्धम । नहि कदाचिन्मध्य- कालास्पर्शमोक्षकालक्रमेणाग्रिमपूर्वकालयोः सम्भवतो येनोक्तं युक्तम् । वाधात् । तथा च लंबनान्तरं योज्यमित्यस्यैवोपपन्नत्वे महतैतावता प्रपंचेन । “हरिजान्तरकं शोध्यं यत्रतत्स्पाद्विपर्ययः" इति सर्वज्ञभगवदुक्तं कथं निर्वहतीति चेत् । मैवम् । लंबनसं- स्कृतस्पर्शमोक्षकालयोः स्फुटयोर्वस्तुभूतयोः सर्वदा मध्यकालात्क्रमेण. पूर्वोत्तरावश्य- भावित्वेऽपि लंबनासंस्कृतयोः स्थित्यधन युतातेथ्यन्तरूपस्पर्शमोक्षकालयोः पारि- भापिकत्वेनावास्तव्योः कदाविन्मध्यकालर्णधनलंबनाभ्यां स्पर्शस्थित्यर्धमोक्षस्थित्य- योः मेण न्यूनत्वे मध्यकालादानमपूर्वकालयोः क्रमेण संभवात्स्फुटो निर्वाहः । पर- नणलंबने धनलंबने च मध्यलंबनाक्रमेण मोक्षस्पर्शलंघनयोधिकत्वासंभवः । मध्य- कालात्पूर्शनिमकालयोर्मोक्षस्पर्शयोः पारिभापिकयोः क्रमेणासंभवात् । अतः साक्षा- कण्ठोक्तेरभावाद्विपर्यय इत्यनेन विपर्ययविशेषस्यैव विवक्षितत्वम् । पूर्व तु साधारण्या- च्छब्दस्य साधारण्येन व्याख्यानं कृतमित्यदोषः । ननु तथाप्यसकल्वनसाधने लंबन- स्य स्पष्टस्पर्शमोक्षकालाभ्यां सिद्धत्वेनर्णलंबनात्स्पर्शलंबनं न्यून भवत्येवः । धनलंबने मोक्षलंबनं न्यून न भवत्येव । मध्यकालादास्तवस्पर्शमोक्षकालयोः क्रमेणाग्रिमपूर्वका- लयोरसंभवनिर्णयात् । अन्यथा स्थिरलंबनासंभवात् । किश्वासलंबनसाधनेन यत्का- लास्थिरलंकन सिद्धं तत्कालस्य सूक्ष्मस्पर्शमोक्षकालत्वात्स्फुटस्थित्यर्वसाधनं व्यर्थम् । तस्य तज्ज्ञानार्थमेवावश्यकत्वात् । नय चन्द्रग्रहणरीत्या स्पर्शमोक्षकालयोर्ज्ञानार्थ स्फुटस्थित्याधोक्तिरिति वाच्यम् ।गौरवाद्यर्थत्वाद्वारेजांतरक शोध्यमित्यस्पानुपपत्ते शेते चेन्न । लंबनयोरसकृत्साधनस्यानंगीकारात् । सकृत्साधितलंबनस्य सांतरत्वेऽपि भगवता स्वल्पांतरणांगाकाराच । अतएव लंवन पुनरित्यत्र पुनरित्यस्य व्याख्यान मसकृादेति पूर्वमुक्तं न युक्तम् । किंतु मध्यकालार्थ लंबनस्य साधनात्स्पर्शमोक्षकालार्थः मपि द्वितीयवार लंबनं साध्यमिति व्याख्यानम् । पुनरिति वाक्यालंकरणं वा युक्ततर- मिति । अथ यदा स्थूलस्पर्शकाललेवने धनलम्वने च मध्यकालस्तदा पस्थि- अध्यायः ६. संस्कृतटीका-भापाटीमासमेतः । (१२१) त्यतिथ्यंतस्य लंबनहीनस्य स्पर्शकालत्वालंबनाधिकातिथेमध्यकालत्वात्तदन्तरे स्पर्शस्थित्यधैं तात्कालिकलंवनयोयोगेन युक्वमित्युक्तरीत्योपपद्यते। एवं यदा मध्यका- लणलंबने स्थूलमोक्षकालश्च धनलंबने तदा.लेवनहीनतिथ्यंतस्य मध्यकालत्वात्मोक्षस्थि त्यर्धयुततिथ्यंतस्य लवनाधिकस्य मोक्षकालत्वात्तदंतरे मोक्षस्थित्यधैं लंबनयोगयुक्तमि- त्युपपन्नम् । नचासकलंवनसाधनेन सूक्ष्मस्पर्शमोक्षयोः सिद्धी सकलंबनांगीकारेणोक्तरी तेः सांतरत्वात्कथं भगवतः सर्वज्ञस्यास्यां रीत्यांमभिनिवेश इति वाच्यम् । असकलं- बनसाधने प्रयासाधिक्यमयाद्भगवता' सर्वज्ञेन स्वल्पांतरांगीकारालाघवाच चंद्रग्रहणी- क्तरीत्यानुगमार्थ स्फुटस्थित्यर्धसाधनस्येवोक्तरिति दिक् । वस्तुतस्तु सूर्योदयात्र प्राक्स्पर्शोऽनंतर मध्यकालस्तदा मध्यलंबनात्स्पर्शलंबनं सत्रिमलग्नचतुर्थभावसाधितं कदाचिन्यून भवति । यत्र चोदयात्पूर्व मध्यः परतो मोक्षस्तत्र कदाचित्सत्रिभलग्नच- तुर्भावानीतमध्यकाललंबनात्मोक्षकाललंबनमधिकं भवति । यत्र चास्मात्पूर्व स्पर्शः परतो मध्यस्तदा मध्यकाललंबनाद्रात्रिसंबंधास्पर्शकाललंबनं कदाचिदधिकं भवति । यत्र चास्तात्पूर्व मध्यकालः परतो मोक्षस्तदापि मध्यकाललंबनान्मोक्षकाललंयनं रात्रि- संचाई न्यून न भवति । कदाचिदिति । प्रस्तोदयग्रस्तास्तयोः । कदाचिद्विपर्ययसंभ- वादरिजांतरकं शोध्यमित्यस्य नाप्रसिद्धिः । एतेन लंबनमसकृन्न साध्यं विपर्यय इति विपर्यय विशेप इति चोक्तं समाधान निरस्तमिति तत्त्वम् । विमर्दाघेऽप्युक्तरीतिस्तुल्येति सर्वमुपपन्नम् । भास्कराचार्यस्तु “तिथ्यन्ताद्गणितागतात् स्थितिदलेनोनाधिकालम्वनं तत्कालोत्थनतीषु संस्कृतिमवस्थित्यहीनाधिके । दर्शान्ते गणितागते धनमणं यदा विधायासकृज्ज्ञेयी प्रग्रहमोक्षसज्ञसमयावे मात्प्रस्फुटी ॥ तन्मध्यकालान्तरयो। समाने स्पष्टे भवेतां स्थितिवंडके च। दर्शान्ततो मर्ददलोनयुक्तात्सम्मीलनोन्मीलनकाल एवम् ॥” इत्यनेन भगवदुक्तादतिसूक्ष्ममुक्तामत्यलं पल्लवितेन ॥१४॥१५॥१६॥१७॥ मा तिव्यतमें स्थिपाईहीन सयोगकरके माकृत कर्मके द्वारा स्पर्श और मोक्ष- फालके लंवसाधन करे । मध्यलग्नके पूर्वमें रवि होनेपर स्पर्शकालीन लंबन, मध्यकालीनकी अपेक्षा और वह मोक्षकी अपेक्षा अधिक होगा। पश्चिम दिशामें होनेसे उलटा होता है। सिसकाल मध्यलमके पूर्व होनेसे मोक्षलंगन और मध्यलंबनके मन्तर मोक्षस्पित्यई योग और स्पर्शलवन और मध्यलंपन के अन्तर स्पस्थित्यर्द्ध योग, अन्यथा विपरीत करनेसे... स्पष्टस्थित्यई होगा । स्पर्श और मध्य या मध्य और मोक्ष यदि मोक्षरेखाक दोनों' और हों, वो लंबनयोग करना चाहिये मार स्थितिदलमें योग करना होगा। इस प्रकार विमर्दाई स्थिरकरे ॥ १४ ॥ १५ ॥ १६ ॥ १७ ॥ अथानिमग्रंथस्यासङ्गतित्वनिरासार्थमधिकारसमाप्ति कापिकयाह । झत सूर्य- अहणाधिकारः । इतिस्पष्टम् । रंगनाथेन रावते सूर्यसिद्धान्तटिप्पणे । सूर्यग्रहा-
,
(१२२)
सूर्यसिद्धान्तः-
[पटो-
धिकारोऽयं पूर्णा गृढमकाशके। इात श्रीसकलगणकसार्वभौमबल्लालदेवज्ञात्मजरंगनाथ-
गणकविरचिते गृढार्थप्रकाशके सूर्यग्रहणाधिकारः सम्पूर्णः ॥
इति पंचमोऽध्यायः समाप्तः।
पांचवा अध्याय समाप्त ॥
षष्ठोऽध्यायः।
अथ परिलेखाधिकारो व्याख्यायते । तत्र तं सप्रयोजनं प्रतिजानीते-
न च्छेद्यकमृते यस्माद्भेदा ग्रहणयोः स्फुटाः ॥
ज्ञायन्ते तत्प्रवक्ष्यामि च्छेद्यकज्ञानमुत्तमम् ॥ १ ॥
यस्मात्कारणाद्रहणयोश्चन्द्रसूर्यग्रहणयोः। द्विवचनेन ग्रहणत्वेन पूर्वाधिकारयोरे-
काधिकारत्वं निरस्तम् । भेदाः कस्यां दिशि स्पर्शमोक्षौ सम्मीलनोन्मीलने प्रस्तोऽशः
कियानित्यादिभेदाः । स्फुटा गोलस्थितिसिद्धा वास्तवाः । छेद्यकं गोलस्थितिमदर्शकः
कल्पितः प्रकारच्छेद्यकपदवाच्यस्तम् । ऋते विना । छेद्यकव्यतिरकेणेत्यर्थः। न ज्ञा-
यन्ते । तत्तस्मात्कारणात् । ग्रहणभेदज्ञानार्थमित्यर्थः। उत्तम सूक्ष्म तद्भेदज्ञानसाधकं
छेद्यकज्ञानम् । ज्ञायतेऽनेनोते ज्ञानं परिलेखसाधकान्यं सूर्याशपुरुपोऽहं प्रवक्ष्यामि
कथयामि ॥ १ ॥
भा०टी०-छैदकफे विना दोनों ग्रहोंकी स्पर्शमोक्षदिक या परिमाणभेद स्पष्ट नहीं होता
इससे इस समय छेदवज्ञान कहताहूं ॥ १॥
तत्र प्रथमं वलवृत्तं लिखेदित्याह--
सुसाधिताथामवनौ बिन्दुं कृत्वा ततो लिखेत् ।।
सप्तरगौगुलेनादौ मण्डलं वलनाश्रितम् ॥ २ ॥
आदौ प्रथम मुसाधितायां जलवत्समीकृतायामवनौ पृथिव्यामभीष्टस्थाने पिन्दं
वृत्तमध्यज्ञापकचित्रं कृत्वा ततश्विगात्सप्तवौगुलेनैकोनपञ्चाशदंगुलमितेन व्यासांर्धन
मण्डलं वृत्तं वलनाश्रितं प्रागुक्तस्फुटवलनमाश्रितं यत्र वलनाश्रयीभूतं वलनदानार्थ वृत्त
मित्यर्थः । लिखेद्रहणभेदज्ञानेच्छुर्गणक उल्लिखेत् । अत्रोफ्पत्तिः प्रागुक्ता ॥ २ ॥
मा० टी०-साधितसमतल भूमिमें विन्मुचिह्न करके ४२ मंगुली व्यासाई परिमित बल.
नाश्रयके लिये वृत्त रचना करे ॥ २ ॥
अथ द्वितीयतृतीयवृत्ते आह-
ग्राह्ययाहकयोगार्धसम्मितेन द्वितीयकम् ।।
मण्डलं तत्समासाख्यं ग्राह्यान तृतीयकम् ॥३॥
ध्यायः ६.] संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतः । (१२३
ग्राह्यग्राहकविम्बमानांगुलयोर्योगामितेनांगुलात्मकल्यासार्धन द्वितीयमेव द्वितीय
द्वितीयवृत्तं लिखेत् । तद्वृत्तं समाससझं योगोत्पन्नत्वात् । तृतीयकं वृत्तं ग्राह्यविम्बा-
गुलाधमितेन व्यासान लिखेत् । अत्रोपपत्तिः। ग्रहणे शरस्य मानक्यखण्डन्यून-
स्वादिक्षेपा मानक्यखण्डवृत्त इति । विक्षेपदानार्थ मानक्यरखण्डवृत्तलेखनम् । तत्परि-
धिकेन्द्रग्राहकान्यासार्धवृत्तेन ग्राहावृत्तेऽवश्यं योगात्समाससञम् । ग्राह्यवृत्तं तु ग्रहण
भेदज्ञानार्यमत्युपयुक्तं न हितद्वृत्तं विना तझेदज्ञानं संभवति ॥ ३ ॥
भा० टी०-ग्राह्यग्राहक बिम्बमानांगुलीका योगाईपरिमित व्यासार्द्ध लेकर द्वितीय वृत्त
(सभासवृत्त) और ग्राह्यग्रहमानार्द्ध लेकर तीसरा वृत्त बनाये ॥ ३ ॥
अथ तवृत्तेपु दिक्साधनातिदेशं स्पर्शमोक्षवलनदानार्थ स्पर्शमोक्षदिनियमं चाह-
याम्योत्तरामाच्यपरासाधनं पूर्ववदिशाम् ॥
प्रागिन्दोहणं पश्चान्मोशोऽर्कस्य विपर्ययात् ॥ ४ ॥
दिशामष्टदिशां मध्ये याम्योत्तरामाच्यपरासाधनं पूर्ववत् । 'शिलातलेऽम्बुसंशुद्ध'
इत्यादित्रिप्रश्नाधिकारोक्तरीत्या कार्यम् । तथाहि । द्वादशांगुलशङ्कोमध्यकेन्द्रस्थापित-
स्याद्यवृत्ते पूर्वाह्ने छायाप्रदेशोऽपराह्ने छायानिर्गमस्तचिह्नाभ्यां मत्स्यमुत्पाद्य रेखायाम्यो-
त्तरा सा वृत्तवाह्येऽधिका सम्मानीया । तदितरभागे वृत्तमध्यपूरणी या वृत्ते याम्यो
तरा रेखा भवति । तदअमत्स्यात्पूर्वापरारेखा सोभयतो वृत्तवाह्य सम्मानीया । सा
वृत्ते पूर्वापरा रेखा भवतीति । चन्द्रस्य पूर्वदिशि ग्रहणं ग्रहणारंभः स्पर्श इति यावत् ।
पश्चिमदिशि मोक्षो ग्रहणान्तः । अकस्य विपर्ययात्स्पर्शमुक्ती ज्ञेयम् । ग्रहणादिरूपस्पर्शः
पश्चिमायां ग्रहणान्तरूपमोक्षः प्राच्यामित्यर्थः । अत्रोपपत्तिः । वृत्ते दिक्साधनेन दिशः
सममण्डलीयाङ्किताः । एतचिनाद्वलनान्तरेण क्रान्तिवृत्तदिशां सत्त्वात् । तत्र स्पर्श-
मोक्षदिनियमाथै क्रांतिवृत्तमाच्यपरानुसारण चन्द्रसूर्ययोः स्पर्शमोक्षी निर्णयौ । ग्रह-
भोगस्य तद्वृत्तानुसारित्वात् । शीघ्रगचन्द्रः सूर्यपड्भान्तरितभूच्छायां सूर्यगत्यनुरुद्ध
गमनां प्रति पश्चादागत्य मेलनारम्भं करोत्यतश्चन्द्रविम्बस्य पूर्वभागे स्पर्शः । भूभा-
मतिक्रम्याग्रे चन्द्रो यदा गच्छति तदा चन्द्रस्य पश्चाद्भागे भूभावियोगोऽतः पश्चान्मोक्षः ।
सूर्य चन्द्रः पश्चादात्याच्छादयत्यतः सूर्यस्य पश्चिमभागे स्पर्शः पूर्वभागे मोक्ष
इति ॥ ४ ॥
मा० टी०- पूर्ववत् दक्षिण उत्तर पूर्व पश्चिम चारों दिशा में गई रेखाको साधन करे।
चन्द्रग्रहण पूर्वमें स्पर्श और पश्चिममैं मोक्ष होता है । परन्तु सूर्यग्रहणमें इससे विपरीत
होता है ॥ ४॥
अथ वलनवृत्ते चलनदानमाह-
ययादिशं प्राग्रहणं वलनं हिमदीधितेः॥
मौशिकं तु विपर्यस्तं विपरीतमिदं रखेः ॥५॥
(१२४)
सूर्यमिद्धान्त।
[पष्टो:-
चंद्रस्य ग्राह्यस्प स्पाशिक वलनं पूर्वाचायथादिशं दक्षिणं चेद्दक्षिणाभिमुखमुत्तर
चेदुत्तराभिमुखं पूर्वापरसूत्रादर्धज्यावदलनाश्रितवृत्ते देयम् । अतएव तवृत्तं वलनाधित-
सञ्जम ! मौक्षिक मोक्षकालिक तुकाराचन्द्रस्य वलनम् । विपर्यस्तं विपरीतं पश्चिम-
चिहात्पूर्वापासूत्रार्धज्यावद्दक्षिणं चेदुत्तरदिगभिमुखमुत्तरं चेद्दक्षिणदिगाभिमुख देय-
मित्यर्थः । सूर्यग्रहणे विशेषमाह । विपरीतमिति । सूर्यस्य ग्राह्यस्येदं स्पाशिकं मौक्षिक
पलनं विपरीतं व्यस्तम् । मौक्षिकं वलनं पूर्वचिदात्पूर्वापरस्त्रादर्धज्यावद्दक्षिणं चेदक्षि-
गदिगभिमुखमुत्तरं चेदुत्तरदिगभिमुरा सार्शिकं चलनं पश्चिमचिनात्पूर्वापरस्त्रार्ध
ज्याबद्दक्षिणं चेदुत्तरदिगाभिमुखमुत्तरं चेद्दक्षिणदिगाभिमुखं देयमित्यर्थः । अत्री-
पपत्तिः । चन्द्रस्य पूर्वभागे स्पर्श इति सममण्डलपूर्वचिनाद्वलनान्तरेण स्पर्श इति
तहत्ते यथाशं पार्शिक वलनं देयम् । पश्चिमोत्तराभिमुखस्य दक्षिणत्वादक्षिणाभिमुख-
स्पांत्तरत्वान्मौक्षिकं चलनं पश्चिमचिह्नाविपरीतं देयम् । सूर्यस्य तु पश्चिमभागे स्पर्शा-
पश्चिमचिह्नास्पार्शिकं वलनं व्यस्त देयम् । पूर्वभागे मोक्ष इति मौक्षिकं वलनं पूर्व-
चिह्नायथाशं देयमिति ॥५॥
भा० टी-वलनाश्रयवृत्तफे पूर्वभाग, चन्द्रग्रहण स्यम्म स्पर्श पलनादिकफ ननुहार
ज्यारूपमें पलनकी रचना परे । परन्तु मोक्षकालमें बहनदिशाको विपरीत दिशा वृत्तकै
पश्चिमाई में ज्याकी रचना करे । सूर्यगावणेमें इससे उस्या होगा ॥५॥
अथ द्वितीयवृत्ते स्पार्शिकमौक्षिकविक्षेपयोनिमाह-
पलनापानपेन्मध्य सूत्रं यद्यत्र संस्पृशेत् ।।
तत्समासे ततो देयो विक्षेपो ग्रासमाक्षिको ॥६॥
प्रथमवृत्ते यत्र स्पार्शिवलनाग्रं यत्र च मौक्षिकवलनानं ज्ञातं तस्माद्यत्प्रत्येक सत्रं
रेखामित्यर्थः । मध्यं वृत्तमध्यविन्दु केन्द्ररूपं प्रति नयेत । तदेवात्मकं' सूत्रं समासे
समासाख्याद्वितीयवृत्तपरिधौ यत्र यस्मिन्प्रदेशे संस्पृशत् स्पर्श कुर्यात्ततस्तत्सूत्रादप-
धिरूपात्समासवृत्तेऽर्धज्यावद्ययादिशं स्पाशिकमौक्षिको विशेपी यथायोग्यं देयो।
अवोपपीत्तः । रलनाप्रसूर्य मानक्यखण्डवृत्ते' यत्र लग्नं तत्रान्तिवृत्तमाच्यपरा वा
ततः सूर्याचन्द्रस्य विक्षेपान्तरेण सत्त्वात्समासवृत्ते वलनानसूत्रादिक्षेपो देयो. ग्राहक-
विम्यकेन्द्रनानार्थम् । पर सूर्यग्रहणे । चन्द्रग्रहणे तु चन्द्रस्य विक्षेपवृत्तत्त्वात्तदा नति-
यलनदानादवगतवलनामरेखामानक्यखण्डवृत्तं यत्र लग्नाचत्र क्रान्तिवृत्तानुसृतमाच्यप-
गविक्षेपमण्डले तत्स्थाने छायाचन्द्राच्छादकः सूया विक्षेपान्तरेण विक्षेपदिग्विपरीत
दिशि भवतीति चलनाप्रसवात्समासवृत्त_ज्यावच्छरो व्यस्तो देय इति सिद्धम् ॥ मत
एर विपरीता शशाङ्कस्पत्पन उक्तम् ॥ ६ ॥
मा० टोल-पलनायसे मध्यविन्दुतक सूत्र रचना करे । इस सूत्रने सभास-वृत्तको जापर
स्पर्श किया है उसी सूत्रके अपर समास · वृत्तमें पर्श और मोक्ष विपके परीमाणकी
ज्यानमाण करे ॥ ६॥
घ्यायः ६.] संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतः । अथ ग्राह्यवृत्ते स्पर्शमोक्षस्थानज्ञानमाह- विक्षेपायात्पुनः सूत्रं मध्यबिन्दुं प्रवेशयेत् ।। तबाह्यबिन्दुसंस्पाद्रिाक्षमोक्षो विनिर्दिशेत् ।। ॥ ७ ॥ विक्षेपानसमावृत्ते यत्र लग्नं तस्मात्सूत्रं रेखामित्यर्थः । अय रेखा सरला नायातीति शङ्कया प्रथमतोऽअधिद्वयान्तं सूत्रं धृत्वा तदनुसारेण रेखा कार्येति सूचनार्थ सूत्रोक्तिः सर्वत्रति ध्येयम् । पुनद्वितीययारं पूर्ववलनानादेखाया मध्यकेन्द्रारधिकायाः कृतत्वायर विक्षेपानादेखामित्यर्थः । वृत्तमध्यरूपकेन्द्रविन्दुं प्रति गणका प्रवेशयेत्प्रविष्टं कुर्या दित्यर्थः । तदेखाग्राह्यविम्बवृत्तपरिघ्योः संयोगादासमोक्षी स्पर्शमोक्षी'गणको विनि- दिशेत्कथयेत् । स्पार्शिकशरामसूत्रं ग्राह्यवृत्ते यत्र लग्नं तत्र स्पर्शः । मोक्षिकशरान- सूत्रं ग्राह्यवृत्ते यत्र लग्नं तत्र मोक्ष इत्यर्थः । अत्रोपपत्तिः । मानकखण्डवृत्ते यत्र ग्राहकोवम्बकेन्द्र तस्माद्ाहकाधन वृत्तं ग्राहकवृत्तं ग्राह्यवृत्ते यत्र लग्नं तत्र स्पर्शमौक्षी भवतः । तत्र वृत्ताकरणलाघवादाहककेन्द्रागाह्यकेन्द्रं यावत्सूत्रं मानक्यखण्डमितं ग्राह्यवृत्ते यत्र लग्नं तत्र परिव्योः स्पर्शमोक्षौ स्वस्वव्यासार्धयोगात् ॥ ७ ॥ भा०टी०-समासवृत्तवाले विक्षेपानसे मध्यविन्दुगत सूत्रमें जहाँपर ग्राह्यवृत्तको स्पर्श किया है, वहीं दोनों स्थान स्पर्श और मोक्षके स्थान हैं ॥ ७ ॥ अथ ग्रहणे विक्षेपस्य दिग्व्यवस्थां मध्यग्रहणज्ञानाथै मध्यकालिकवलेनदान च श्लोकाभ्यामाह- नित्यशोऽर्कस्य विक्षेपाः परिलेखे यथादिशम् ।। विपरीताः शशांकस्य तदशादथ मध्यमम् ॥ ८ ॥ वलनं प्राइमुखं देयं तद्विपकता यदि ॥ भेदे पश्चान्मुखं देयमिन्दो नोर्विपर्ययात् ॥ ९ ॥ अस्य ग्रहणे चन्द्रविक्षेपाः परिलेखे ग्रहणभेददर्शनप्रकारेण ययादिशं यथास्थित- दिशं नित्यशो नित्यं ज्ञेयाः । चन्द्रस्य ग्रहणे चन्द्रविक्षेपा विपरीता दक्षिणाश्चेदुत्तरा उत्तराश्चेदक्षिणा । एतदनुरोधेनैव स्पाशिकमौक्षिकविक्षेपी देयौ । न यथागतदिशा विति . ज्ञेयम् । अयानन्तरं तद्वशान्मध्यग्रहणकालिकविक्षेपदिशःसकाशात्सूर्यग्र- हणे मध्यग्रहणकालिकस्पष्टावक्षेपदिक्चिनाचन्द्रग्रहणे मध्यकालिकविक्षेपदिग्विपरीत- दिक्विनादित्ययः । यदि यहीत्यर्थः । तद्रिक्षेपैकता तबलनं विक्षेपो मध्यग्रह- णकालिकविक्षेपः । अनयोरकतेक्यं दिक्सम्बन्धेनेति शेषः । एकदिशीत्यर्थः। अत्र चन्द्रविक्षेपदिग्ययास्थितेव च विपरीतदिगति ध्येयम् । प्राङ्मुखं पूर्वाच. द्वितं मुखम् । वलनाश्रितवृत्तेर्धज्यावच्चन्द्रस्य मध्यम वलनं मध्यग्रहणकालिक
[पष्टोs-
-
(१२६)
सूर्यसिद्धांत:-
स्फुटं वलनं देयम् । भेदे वलनविक्षेपे दिशोभिन्नत्वे पश्चान्मुखम् । वलनाश्रित
वृत्तेऽर्धज्यावन्मध्यग्रहणकालिकं चन्द्रस्य वलनं पश्चिमचिह्नसम्मुखं देयम् । सूर्यग्रहणे
विशेषमाह-भानोरिति । सूर्यग्रहणे सूर्यस्य वलनं विपर्ययादुक्तवपरीत्यात् । एकदिशि
पश्चिमचिह्नसम्मुखं भिन्नादेशि पूर्वचिदसम्मुखं देयमित्यर्थः । फलितार्यस्तु चन्द्र-
ग्रहणे मध्यकालवलनदिकनकालविक्षेपयथागतदिशोदक्षिणत्वे. उत्तरचिबादलनाश्रित
वृत्तेऽर्धज्यावन्मध्यवलनं पूर्वचिनाभिमुखं देयम् । तयोरुत्तरत्वे दक्षिणचिह्नात्पूर्वाभि-
मुखं वलनं देयम् । यदि दक्षिणवलनमुत्तरविक्षेपस्तदा दक्षिणदिक्विार्धज्यावत्पश्चि-
मंचिह्नाभिमुखं वलनं देयम् । यद्यत्तरं वलनं दक्षिणविक्षेपस्तदा. वलनाश्रितवृत्तउत्तर-
चिनात्पश्चिमचिह्नामिमुखं वलनमर्धज्यावहेयम् । सूर्यग्रहणेतु द्वयोर्दक्षिणत्वे वलनाश्रि-
तवृत्ते दक्षिणचितात्पश्चिमचिह्नाभिमुखं वलनं देयम् । उत्तरत्वे उत्तरविद्रात्पाश्चमाभि-
मुखं दयम् । यदि दक्षिणं वलनमुत्तरविक्षेपस्तदोत्तरचिह्वात्पूर्वाभिमुखम् । यद्युत्तर
वलनं दक्षिणविक्षेपस्तदा दक्षिणचिह्नात्वाभिमुखं देयमिति । भास्कराचार्यस्त्वेतदुक्त-
फलितं लाघवेन दक्षिणोत्तरवलनं क्रमेण सव्यापसव्यं देयमित्युक्तम् । अत्रोपपत्तिः ।
प्रथमश्लोकोपपत्तिः स्पार्शिकमौक्षिकशरदानोपपत्तायुक्ता । ग्राह्यविम्वकेन्द्रादिक्षपान्त-
रेण ग्राहकविवकेन्द्रं भवति । शरस्य कदम्वाभिमुखत्वेन केन्द्रात्कदम्बाभिमुखशर
दानार्य कदम्बज्ञान वलनाश्रितवृत्तआवश्यकमतो वलनान्तरण स्वदिग्भ्यः क्रान्तिवृत्त-
दिशां सत्त्वादुत्तरदक्षिणदिग्भ्यां मध्यवलनान्तरेण क्रांतिवृत्तयाम्योत्तररूपकदवी दक्षि-
णोत्तरत इति पूर्वपश्चिमानुरोधेनैतदानं युक्ततरम् । यद्यपि चन्द्रग्रहणे शरस्य विपरी-
तदिक्त्वात्तच्छरदिग्ग्रहणेन सूर्यचन्द्रयोर्मध्यवलनदानमेकदिक्त्वे पश्चिमचिद्राभिमुख
भिन्नदिक्त्वे पूर्वाभिमुखमित्येकोक्तिलाघवम् । तथापि सर्यचन्द्रयोहणभेदादेकोक्तो मन्द-
'बुद्धीनां भ्रमसम्भवस्तद्वारणार्य पृथगिवोक्तिः कृता । स्वतन्त्रेच्छस्य नियोगान-
ईत्वाच ॥८॥९॥
माटी-सूर्यग्रहण भी ऐसाही करे कि उन दोनों मत्स्योंके मुखसे व पूछसे निकली हुई
दो रेखामाको फैलाकर जो चन्द्रविक्षेप यथायोग्य दिशामें होगा। चन्दग्रहणके लिये विप
रोत दिशामे ग्रहण करना चाहिये । मध्यग्रहणमेंभी विक्षेपका ऐसाही व्यवहार होता है ॥८॥
मध्य चन्द्रग्रहणम पठन और विज्ञप एक दिशामें हो तो वलनका पूर्वमुखमें होना और
दिशाभेद होनेसे पश्चिममुखमें होना कहा जायगा । विक्षेपकै अनुसार उत्तर या दक्षिणमें
होगा। परन्तु सूर्यग्रहणमें भदल बदल होजाताहै ॥ ८॥ ९ ॥
अथ मध्यग्रहणं श्लोकाभ्यां परिलेखे दर्शयति-
वलनामात्पुनः सून मध्यबिन्दुं प्रवेशयेत् ॥
मध्यसूत्रेण विक्षेपं वलनाभिमुखं नयेत् ॥ १० ॥
ध्याय: ६.] संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतः। (१२७ विक्षेपामालिखेदृत्तं ग्राहकाधेन तेन यत् ॥ ग्राह्मवृत्तं समाकान्तं तद्गस्तं तमसा भवत् ।। १ ।। चलनाग्रान्मध्यकालिक्वलनाग्रात्पूर्वश्लोकोक्तात्सूत्रं रेखां मध्यविन्दं वृत्तमध्यचिह्न प्रति पुनारान्तरं पूर्व साशिकमौक्षिकालनामाभ्यां सूत्ररचना तथैवेत्यर्थः । प्रवेश येत् गणकाः प्रतिष्ठां कुर्यात् । मध्यसूत्रणानेन मध्यकालिकविक्षेपं मध्यवलनानाभि- मुखं नयेत् । वृत्तमध्यविन्दोरित्यर्थसिद्धम् । तथाच वृत्तमध्यान्मध्यवलनाग्रसूत्रे विक्ष- पांगुलानि गणयित्वा तदने विक्षेपाने विद्धं कुर्यादित्यर्थः । अस्माद्विक्षेपाग्राहाहक- विम्वमानार्धन वृत्तं गणको रिखेत् । तेन वृत्तेन यद्यन्मितं ग्राह्यवृत्तं समासान्त व्याप्तम् । यद्भाह्यवृत्तविभागरूपं तमसान्धकाररूपेण च्छादन प्रस्तमाच्छादितं स्यात्त मितं विभाग मण्यादिना लिप्तं कुर्यादित्यर्थः । अत्रोपपतिः । वृत्ते मध्यसूत्र क्वाभि- मुखं तत्र ग्राह्य केन्द्राच्छरान्तरेण ग्राहककेन्द्र तस्माद्गाहकार्धेन वृत्तं ग्राहकविम्बवृत्त तेन ग्राह्यवृत्तं यावदाक्रान्तं तावन्मध्यकाले ग्रस्तमिति तद्भागस्य कृत्सत्वेनाकाशे दर्श- नात्तमसा ग्रस्तमित्युक्तम् ॥ १० ॥ ११ ॥ मा० टेक-वलनानसे मध्यविन्दुत का सूत्र करे । इस सूबमें मध्यविन्दुसे वनामिमुखमें विक्षेपका चिह्न (निशान ) करे ग्राहक्मानार्द्ध परिमित व्यासाईके साथ विक्षेपायके चारों मोर वृतकल्पना करनेसे जो वृत्त होगा वह वृत्त ग्राह्यवृत्तम जितना व्याप्तहो वहीं अन्धकारात है ]) १० ॥ ११ ॥ ननु पूर्वकपाले ग्रहणयोः सम्भवे सर्वमुक्तमुपपन्नम् । पश्चिमकपाले ग्रहणसम्भवे परिलेखोक्तं वैपरीत्येन भवति । तथाहि । यस्यां दिशि परिलेखे स्पर्शो मोक्षो वा परक- पाले तस्य पश्चिमाभिमुखत्वेन दर्शने दिग्वैपरीत्यं प्रत्यक्षमित्यत आह- छेद्यकं लिखताभूमौ फलके वा विपश्चिता ।। विपर्ययो दिशां कार्यः पूर्वापरकपालयोः ॥ १२॥ भूमौ फलके काष्टपट्टिकायामित्यर्थः । वा विकल्पे । भूमौ लिखितस्येतस्ततोनयना- सम्मवात्फलक इत्युक्तिः । छेद्यक मागुक्तं लिखता गणकेन विपश्चिता तत्त्वज्ञेन दिशां पूर्वादिदिशा पूर्वापरकपालयोर्चिपर्ययोर्व्यत्यासः कार्यः । यथा पूर्वकपाले सव्यक्रमण पूर्वादिलेखनं तथापरकपाले सव्यक्रमण पूर्वादिलेखनं न कार्यम् । किन्तु पश्चिमस्थाने पूर्वा पूर्वस्थाने पश्चिमा । उत्तरदक्षिणदिग्भागे क्रमेणोत्तरदक्षिणे लेख्ये इत्यर्थः । तेन पश्चिमकपाले ग्रहणसम्भवेऽपि परिलेखोक्तं सम्भवत्येवोत भावः । अत्रोपपत्तिः । दिग्वैपरीत्यं भवतीति पूर्वमेव पैपरीत्येन दिशालेखने परिलेखो यथा स्थितो भवतीत्यु क्तम् । भास्कराचार्यस्तु नैतदुक्तम् । परिलेखेनामुक्यां दिश्यमुक भवतीति ज्ञानस्यावश्यकत्वेन तस्य तत्रावाधात् । नहि यथास्यशे तथा दर्शनमपेक्षितम् । भूमी (१२८) सूर्यसिद्धान्तः- [ षष्ठो- फलके बाकाशादीनां वास्तवानामभावात् । अतएव किश्चिन्यूनसादृश्येनादृष्टान्तत्व- मिति ध्येयम् ॥ १२ ॥ भाटी-समनरभूमिन या फरको उदक लिसर पूर्यापर परशो वृत्तका (मशि) अदल बदल परे ।। १२॥ अथानादेश्यग्रहणमाह- स्वच्छत्वाद्वादशांशोऽपि ग्रस्तश्चन्द्रस्य दृश्यते ॥ लिप्तात्रयमपि ग्रस्तं तीक्ष्णत्वान विवस्वतः ॥१३॥ चन्द्रविबस्य द्वादशांशो ग्रस्त आच्छादितः । अपिशब्दोंदाच्छादनेन तजोहानतया दृश्यतासंभावनायामित्ययः । न दृश्यते । हेतुमाह-स्वच्छत्वादिति । तदतिरिक्तसंपूर्ण दृश्यभागस्य स्वच्छत्वाज्ज्योत्सावत्त्वात् । तथा च तज्ज्योत्स्नाधिक्येन प्रस्तोऽप्यल्पों- ऽश. स्वाकारेण न दृश्यते ज्योत्स्नावत्त्वेन दृरतया भासते । सूर्यस्य लिप्तात्रयं ग्रस्त- मपि न दृश्यते । अब हेतुमाह-तीक्ष्णत्वादिति । सूर्यस्य तेजस्तैक्ष्ण्यालोकनयनप्रति- घाताहत्याचेत्यर्थः । वृद्धवसिष्ठेन तु "प्रस्तं शशांक्स्य क्लाद्वयं चेत्कलात्रयं भानुमतो न लक्ष्यम् । तत्किश्चिदुनं शुदयास्तकाले लक्ष्यं यतस्तौ करगुल्कहीनी ॥" इत्युक्तम् । अत उदयास्तकाले उत्तमदृश्यं दृश्यमिति ध्येयम् ॥ १३ ॥ मा०टी०-घद्रमाकी स्वच्छताईके कारण द्वादशभागग्रहणभी दीख जाता । सूर्यविर जाकी तेजीके मारे तीन पलाया ग्रहणमी नहीं दिखाई देता ॥ १३ ॥ अथेष्टग्रासपीरलेखार्थ ग्राहक्मार्गज्ञानं श्लोकत्रयेणाह- स्वसज्ञितात्रयः कार्या विक्षेपाग्रेषु विन्दवः ॥ तत्र प्राइमध्ययोमध्ये तथा मौक्षिकमध्ययोः ॥१४॥ लिखेन्मत्स्यौ तयोर्मध्यान्सुखपुच्छविनिःसृतम् ॥ प्रसार्य सूत्राद्वितयं तयोर्यन युतिर्भवेत् ॥ १५ ॥ ते। सूत्रेण विलिखेच्चापं बिन्दुनयस्पृशा ॥ स पन्था ग्राहकस्योक्तो येनासौ सम्प्रयास्यति ॥ १६ ॥ विक्षेपानेषु पाशिकमोक्षिकमा पविक्षेपाणां पूर्व स्वस्वस्थाने स्पर्शमोक्षमध्यग्रहण- शानार्थ दत्तानामग्रिमभागेपु स्वसंशया सङ्केतिता बिन्दवस्त्रयः कार्याः स्पर्शशरामे स्प. शचिमाहितो पिन्दुर्गाक्षशराने मोक्षचिनांक्तिो बिन्दुमध्यशराने मध्यावहांवितो बिन्दु- तित प्रयो पिन्दयो गणकेत स्थाप्याः । तत्रोपस्थितपिन्दुत्रयमध्ये प्राइमध्ययोः स्पर्श समत पठाण (१२९) ध्यायः ६.j संस्कृतटीका भाषाटीकासमेतः । मध्यविन्दोर्मध्येऽन्तराले मौक्षिकमध्ययोस्तत्संज्ञयोविन्दोस्तथान्तराले प्रत्येक मत्स्यू लिखेदित्यन्यतरद्वये गणको मत्स्यौ लिखेत् । तयोर्मत्स्ययोर्मध्याद्गर्भान्मुखपुच्छाभ्यां विनिःसृतं निष्कासितं प्रत्येकं सूत्रमिति सूत्रद्वितयम् ।। प्रसार्याग्रेऽपि स्वमार्गेण निः- सायं तयोः स्वस्वमार्गप्रसारितसूत्रयोर्यत्र प्रदेशे युतियोगः स्यात्तत्र प्रदेशे। केंद्र प्रका- ल्प्य सूत्रेण विन्दुत्रयस्य स्पृशा प्रकल्पितकेंद्रविन्दुत्रयान्यतमतिरसूत्रेण व्यासार्ध- रूपेणेत्यर्थः । चापं वृत्तैकदेशरूप धनुर्विदुत्रयस्पृष्टं लिखेत् । गणकः कुर्यादित्यर्थः । स चापात्मको वृत्तैकदेशो ग्राहकस्य पंथा मार्गः कथितः । येन मार्गणासौ ग्राहकः स- म्पयास्पति ग्रास्यविच्छादनार्थं गमिष्यति ।, परिलेखस्य ग्रहणकालपूर्वकालावश्य- म्मावित्वात् । अत्रोपपत्तिः । इष्टेऽति मध्ये प्राक्पश्चादिति त्रिप्रश्नाधिकारांतर्गतश्लोको- पपत्तिः प्राक्प्रतिपादिता ॥ १४॥ १५ ॥ १६ ॥ भी टी०-स्पर्श मध्य भोर में क्षगतविक्षेपाग्रमें (शराग्रम) तीन चिह्नित पिन्दु लिखेरपर्श और मध्यबिंदुके द्वारा और मोक्ष व मध्यविन्दुके द्वारा दो मत्स्य मंकित विन्दुमें संयुत होंगे तिसको केंद्र करके पहले कहे हुए तीन पिन्दुशे व्रता हुआ एक घनुप बनाये । वह धनुही ग्राहकका मार्ग है। तिसको अवलन करके गमन करता है ॥ १४ ॥ २५ ॥ १६ ॥ अथेटपासपरिलेख श्लोकत्रयेणाह- ग्राह्यग्राहकयोगार्धात् प्रोज्येष्टयाप्तमागतम् ।। अवशिष्टांगुउसमा शलाको मध्यविन्दुतः ॥ १७ ॥ तयोर्मार्गोन्मुखो दद्याद्रासतः प्राग्ग्रहाश्रिताम् ॥ विमुञ्चतो मोक्षदिशि ग्राहकाध्यानमेव सा ॥१८॥ स्पृशेयत्र ततो वृत्तं ग्राहका(न संलिखेत् ॥ तेन ग्राह्याद्यदाक्रान्तं तत्तमो ग्रस्तमादिशेत ॥१९॥ मानक्यखण्डादिष्टकालिकाभीष्टयासमागतं चंद्रग्रहणाधिकारोक्तमकारावगंतं त्यक्त्वा अवशिष्टे यान्यंगुलानि तत्प्रमाणां शलाका यष्टिं मध्यबिंदुतो वृत्तत्रयमध्यकेंद्रबिंदोः रा- काशात्तयोः स्पर्शमोक्षविक्षेपारयोर्मार्गोन्मुखीसम्बद्धमार्गचापरेखाभिमुखी मार्गरेखासत दद्यात् । कथमित्यत आह । ग्रासत इति । मध्यग्रासतः माक्पूर्वकाले ग्रहाविना ग्रह- स्पर्शस्तच्छराग्रसंघन्धिमार्गचापरेखासक्तां शलाकाम् । विमुञ्चतो मुच्यमानान्तर्गताभी. ध्यासस्य शलाकाम् । मोक्षादाश । मोक्षविक्षेपानसंबंधिमार्गचापरेखायां सक्तां दद्यत् । सा शलका ग्राहकाध्वाजां ग्राहकमार्गचापरेखां. यत्र यस्मिन्भागे स्पृशेत्सलमा स्यात् । ततः स्थानात् । एक्कारस्तदतिरिक्तव्यवच्छेदार्थः । ग्राहकमानार्धेन व्यासार्धन वृत्त १ तदा इति पाठान्तरम् । ९ (१३०) सूर्यसिद्धान्तः- [पठा:- संलिखेत् । सम्यक्प्रकारेण कुर्यात् । तेन वृत्तेन ग्राह्याद्राह्यवृत्ताद्यन्मितमेकदेशरूपं वृत्तमाकान्तं व्याप्तम् । तत्तन्मितग्राह्यवृत्तांशं तमोग्रस्तं छादकाच्छादितमभीष्टकाल आदिशेत्कथयेत् । अत्रोपपत्तिः । इष्टग्रासोनं मानक्यखण्डं कर्णः । स तु ग्राह्यग्रा- हककेन्द्रान्तररूपः । अतोऽयं ग्राह्यकेन्द्रात्पूर्वज्ञातग्राहकमारवायां यत्र' लग्नस्तत्रामी- समये ग्राहककेन्द्रम् । तस्माद्राहकवृत्तेन ग्राह्यवृत्तं यदाकान्तं तत्काले ग्रास इति मुगमा ॥ १७ ॥ १८ ॥ १९ ॥ भान्टी-ग्राह्य और ग्राहकमानके योगाईसे दृष्टयास वियोग करके जो वर्षे त परि- माणमध्यविन्दुसे रेखा एसी मार्गके सामनेको चे! मध्यग्रहणके पूर्व होनेपर स्पर्शदिशामें मौर पर होनेपर मोक्षाभिमुख में रेखाको उतारले । रेखान्त विन्दुकेन्द्र करके ग्राहकमानाई अनुसार वृत्तरचना करे | वह वृत्त भोर माद्यवृत्त दोनों के अधिकृत अंशही तात्कालीन मा- वादित अंशहै ॥ १७ ॥ १८ ॥ १९ ॥ अथ श्लोकाभ्यां निमीलनपरिलेखमाह- मानांतराधन मितां शलाका ग्रासदिङ्मुखीम् ।। निमीलनाख्या दद्यात्सा तन्मार्गे यत्र संस्पृशेत् ॥ २० ।' ततो ग्राहकखण्डेन प्राम्यन्मण्डलमालिखेत् ॥ तबाह्यमण्डलयुतिर्यत्र तत्र निमीलनम् ॥ २१॥ ग्राह्यवाहकैबिम्बमानयोरन्तरस्याध तेन परिमितां शलाकां निमीलनसंज्ञां ग्रासदि- इमुखी स्पार्शिकशराबविभागाभिमुखी मध्यविन्दोः सकाशाद्द्यात् । सा निमीलनसंज्ञा शलाका तन्मार्ग स्पार्शिकग्राहकमार्ग चापरेखाकारं यस्मिन्प्रदेशे संलमा स्यात्तत्स्था- नादाहकमानार्धन माग्वन्मध्याभीष्टग्रासज्ञानाथै यथा तदृत्तं कृतं तथेत्यर्थः । वृत्तं कुर्यात् । तद्रायमण्डलयुतिलिखितवृत्तग्राह्यवृत्योः संयोगो यत्र यस्यां दिशि तत्र तस्यां दिशि निमीलनं ग्राह्याविम्बस्य निमजनं स्यात् । अत्रोपपत्तिः । सम्मीलनकाले ग्राह्यग्राहककेन्द्रान्तरं मानार्धान्तरमितकर्णः । अन्यथा तदनुपपत्तेः । स ग्राह्यके. न्द्रास्पर्शमार्ग यत्र लग्नस्तत्र ग्राहककेन्द्रम् तस्माद्राहकवृत्तं ग्राह्यमण्डलं यत्र स्पृशति तत्र निमीलनं स्पष्टम् ।। २० ॥ २१ ॥ भान्टी-ग्राग्राहकमानहयान्तरार्द्ध परिमित शलाका ग्रासदिशामें उस मार्गपर रयापन को और सिफ अग्रमागको केन्द्र करके ग्राहक मानके अनुसार मंडल लियनेसे जहांपर वह मण्डलको स्पर्श करे तिमी दिशामें निमीलन भारम्भ होगा ॥ २० ॥ २१ जयोनीलनपरिलेखमाह- एवमुन्मीलने मोक्षादिङ्मुखी सम्प्रसारयेत् ॥ विलिखेन्मण्डलं प्राग्यदुन्मीलनमथोक्तवत् ॥ २२ ॥ ।
. ध्यायः ६.] संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः । उन्मीलने उन्मीलनज्ञानार्थमित्यर्थः । एवं विवमानान्तरार्धमितां शलाकां मोक्ष- दिङ्मुखी मौक्षिकशराप्रविभागामिमुखी मध्यबिन्दोः सकाशात्संप्रसारयद्दद्यादित्यर्थः । प्राग्वत्संमीलनार्थ दत्तशलाकास्पार्शिकमार्गयोगस्थानाद्राहकार्धेन वृत्तं कृतं तथेत्यर्थः । मैक्षिकमार्गदत्तशलाकायोगस्थानाद्राहकवृत्तं कुर्यात् । अथानन्तरमुक्तबगाहकग्राह्य- वृत्तयोगो यस्यां तस्यां दिशोत्यर्थः । उन्मीलनं ग्राह्यबिम्बस्योन्मजनं स्यात् । अत्रो- पपत्तिः । उन्मीलनेऽपि ग्राह्यग्राहककेन्द्रान्तरं मानार्धान्तमितं कर्णः । परमपरमाक्षदि- शीति युक्तिस्तुल्या ॥ २२ ॥ मा०टी०-इस प्रकारसे मोक्षादेशाम शलाका स्थापन करके जहाँपर पूर्ववत् मण्डल स्पर्श करे सोही उन्मीलनदिक होगी ॥ २२ ॥ अथ ग्रहणे चन्द्रस्य वर्णानाह- अर्धादूने स धूम्रं स्यात्कृष्णमर्धाधिकं भवेत् ॥ विमुञ्चतः कृष्णतानं कपिलं सकलग्रहे ॥ २३ ॥ अर्धादर्धविम्बादूने न्यूने ग्रस्ते सति स धूनं नासीयबिम्बं धूम्रवर्ण स्यात् । अर्धा- धिकं ग्रस्तविम्वं कृष्णं स्यात् । विमुञ्चत प्रतदनन्तरं ग्रस्तमधिकमपि मुक्तयुन्मुखमिति मोक्षारंमोन्मुखस्य पादोनबिम्बाधिकग्रस्तस्यासम्पूर्णस्येत्यर्थः । कृष्णतानं श्यामरक्त- मिश्रवर्णः संपूर्णग्रहणे कापलं पिशङ्गवर्णवियं स्यात् । अत्र भूभायास्तेजोऽभावतया चन्द्राच्छादकत्वादेते वर्णाः संभवन्ति सूर्यस्य तु चन्द्रो जलगोलरूप आच्छादकः स दर्शान्तदिवसेऽस्मदृश्याध सदा कृष्ण एवोत कृष्ण एव सूर्यस्य प्रस्तोंऽशः सर्वदा । अतएवाविकृतत्वाद्भगवता वर्णो नोक्तः ॥ २३ ॥ भाटी०-चन्द्रग्रहण माघेसे कम हनेपर धूम्रवर्ण, अधिक होनेसे कृष्ण वर्ण है । पादौनाई होनेपर ताम्र, कृष्ण और संपूर्ण होनेसे कपिल रंगका होता है (सूर्यका प्रस्तांश सदा काले रंगका रहता है)।॥ २३ ॥ अयोक्तच्छेद्यकस्य गोप्यत्वमाह- रहस्यमेतद्देवानां न देयं यस्य कस्यचित् ।। सुपरीक्षितशिष्याय-देयं वत्सरवासिने ॥ २४ ॥ एतदहणच्छेद्य देवतानां गोप्यं वस्तु । यस्य कस्पचिद्यस्मैकस्मादपरीक्षिताय न देयम् । कस्मेचिद्देयमित्यर्थागतं विवृणोति-सुपरीक्षिताशष्यायति । सुपरीक्षित मित्या हेतुगर्भ विशेषणमाह-उत्सरवासिन इमि । वर्षपर्यन्तं तत्संगत्या तस्य तत्त्व तया ज्ञानं भवत्येवेति भावः ॥ २४ ॥ भा० टा०-यह तत्व देवताओंके लियेभी रहस्य है । जिस तिस को यह नहीं देना चाहि १ दातन्य ज्ञानमुतमम् इति पाठान्तरम् । - (१३२) सूर्यसिद्धान्त:- [ पष्टोऽ-- एक वर्पतक मली मोतिप्ते जिभकी परीक्षा खेली है, उस शिष्यवाही केवल यह बताना चाहिये ॥ २४ ॥ चथानिमग्रन्यस्यासंगतित्वनिरासार्थमधिकारसमाप्ति फफिकयाह-ग्रहणभेदज्ञापकपरि- लेखप्रतिपादनं परिपूतिमाप्तमित्यर्थः । इदं दशभेदग्रहगणितमित्युक्त्या गणितक्रिया भावाद्रहणाधिकारान्तर्गतं नाऽधिकारान्तरम् । अत एवाधिकार इत्युपेक्षाध्याय इत्युक्तम् ॥ रंगनाथेन रचिते सूर्यसिद्धान्तटिप्पणे ॥ छेयकं ग्रहणान्तं तु पूर्ण गृढम- काशके ॥ इति श्रीसकलगणकसार्वभौमबल्लालदेवजात्मजरङ्गनाथगणफविरचिते गृढार्थ-- मकाशके छेदकाध्यायः सम्पूर्णः॥ इतिच्छेदकाध्यायः॥ ठवा अध्याय समाप्त । अथ सप्तमोऽध्यायः। अथ युत्याभासग्रहणनिरूपणेन संस्मृततयारब्धो ग्रहयुत्यधिकारो व्यारल्यायते । तन युतिभेदानाह- ताराग्रहाणामन्योन्यं स्याता युद्धसमागमौ ।। समागमः शशांकन सूर्येणास्तमनं सह ॥ १ ॥ ताराग्रहाणां भौमादिपञ्चग्रहाणां परस्परं योगे युद्धसमागमौ वक्ष्यमाणलक्षणमिन्नी स्तः। चंद्रेण सह पञ्चतारान्यतमरय योगः समागमसंज्ञः। सूर्येण सह पंचताराणा- मन्यतमस्य चंद्रस्य वा योगस्तदस्तमनं पूर्णास्तङ्गतत्वम् । न त्वस्तमात्रम् । युत्यमावे भागपरकाले तस्य सत्चात् ॥१॥ भा. टी०-ग्रहाँको परस्पर योगका नाम युद्ध या समागम है । चंद्रमाके सहित प्रमाक योगका नाम समागम है । सूर्य के साथ योगका नाम मस्तमन है ॥ १॥ अथ युतेर्गतैष्यत्वं साधश्लोकेनाह-- शीघ्र मन्दाधिकेऽत्तीतः संयोगो भविनान्यथा ॥ द्वयोः प्राग्यायिनोरेवं पक्रिणोस्तु विपर्ययात् ॥. प्राग्यायिन्यधिकेऽत्तीतो पक्रिण्येष्यः समागमः ॥२॥ ययोहयोयोगोऽभिमतस्तयोर्गहयोर्मध्ये यः शीघ्रगतिम्रहस्तस्मिन्मन्दाधिके मन्दग- तिमहादधिके सति तयोः संयोगो युतिसंज्ञो गतः । पूर्व जात इत्यर्थः । अन्यथा मन्द- गतिग्रहे शीघ्रगतिग्रहादधिके सतीत्यर्थः । तयोर्योगो भविता एष्यः । एवमुक्तं गतेष्य- त्वम् । योर्ग्रहयोः प्राग्यायिनोः पूर्वगतिकयोभवति ।' वक्रिणोर्वकगतिग्रहयोर्विपर्ययादु- ध्यायः ७.] . संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतः । तवपरीत्यात् ! तुकारागतष्यो योगो भवति । शीघ्रगतिग्रहे मन्दगतिग्रहादधिक एघ्या संयोगो मन्दगतिग्रदे शीघ्रगतिग्रहाधिके गतः संयोग इत्यर्थः । अथैकस्य वकत्व माह-प्राग्यायिनीति । द्वयोमध्ये एकतरसिमन्वकिणि मति तदा वक्रगतिग्रहात्पूर्व गति- अहेऽधिके सति गतो योगः । यदा तु पूर्वगविग्रहादकगतिग्रहेऽधिक सति समागमो योग एष्यः स्यात् । अत्रोपपत्तिः । पूर्वगत्योहयोमध्ये शीघ्रगत्याधिकत्वेऽग्रे योगास, म्भवात्पूर्वयोगो जातः । मन्दगस्याधिकत्वे शीघ्रगस्य न्यूनत्वादने योगो भविष्यति । ‘वक्रिणोस्तु शीघ्रगत्याधिकत्वेऽग्रे तन्यूनत्वेन योगसम्भवादेष्यो योगो मन्दगस्याधि- कत्वे शीघ्रगस्योचरोत्तरं न्यूनत्वसम्भवेनाग्रे योगासंभवागतो योगः । अथ वक्रगति- महात्पूर्वगतिरहेऽधिक उत्तरोचरं योगासम्भवागतो योगः । पूर्वगतिग्रहाद्वक्रगतिरहे:- पिके वक्रगतिग्रहस्य न्यूनत्वेनाग्रे योगसम्भवादेष्यः संयोग इति ॥२॥ - भा० टी-शीघ्रगामी ग्रहस्पट मन्दगामीकी अपेक्षा अधिक होने पर समागम प्रतीत हो • गया है अन्यथा भाव्य होता है। दोनोंके वक्री होनेसे विपर्यय होता है एककी वक्रगति होनेसे सरलगगि ग्रहस्पट अधिक होनेपर योगगत और वऋगति ग्रहस्पष्ट अधिक होनेरो योग पीछे होगा ॥२॥ अथ युतिकाले तुल्यग्रहयोरानयनं युतिकालस्य गतैष्यदिनाद्यानयनं च सर्धिलोक- प्रयेणाह-- ग्रहांतरकालाः सत्वमुक्तिलिप्तासमाहताः ॥ ३ ॥ भक्त्युत्तरेण विभनेनुलोमविलोमयोः ॥ द्वयोकिण्यथैकस्मिन् भुक्तियोगेन भाजयेत् ॥ ४ ॥ लब्धं लिप्तादिक शोध्य गते देयं भविष्यति ॥ विपर्ययाक्रगत्योरेकस्मिस्तु धनत्ययौ ॥६॥ समलितो भवतां तो यहाँ भगणसंस्थितौ ।। विवरं तद्वदुद्धृत्य दिनादिफलमिष्यते ॥६॥ युतिसम्वन्धिनोहयोरमीककालिकयोरेन्तरस्य कलाः पृथक्स्वस्वगतिकलाभिर्गु- णिताः कर्मयोहयोरनुलोमविलोमयोगिगयोर्वक्रायोर्वेत्यर्थः स्फुटगत्यन्तरेण गणको मजेत् । । विशेपमाह-वकिणीत । अथानन्तरं द्वयोर्मध्ये एकतरे वक्रिणि सति ,तयो गतियोगेन भजेत् । फलं कलादि स्वं स्वं गते योगे सति ग्रहयोर्मार्गगयोः शोध्ये भविष्यति । एष्ये योगे सति तयोर्दयं योज्यम् । द्वयोर्वक्रगत्योः सं सं फलं विपर्य- पादुक्तवपरीत्यात्कार्यम् । गते योगे योज्यंम् । एण्ययोगे हीनमित्यर्थः । श्योर्मध्ये एकनो तुकाराक्रिणि सात तयोर्ग्रहयोर्वक्रमार्गगयोः स्वस्वकलात्मकंफलाड़ी धनम्यया (१३४) सूर्यसिद्धान्त:- [ससमोड- युतहीनौ कार्यो। यथाहि । गतयोगे" मार्गगग्रहे स्वफलं हीनं वक्रिणि अहे योज्यम् । एण्ययोगे वक्रय हे शोध्यम् । मार्गगनहे योज्यामिति । एवंकृते तो युतिसम्बन्धिनौ' ग्रही भगणसंस्थौ भगणे राश्यधिष्ठितचक्रे संस्थितियोस्तौ राश्याद्यात्मको समलिप्ती समक्लौ स्तः लिप्तापदस्य भगणावयवोपलक्षणत्वेन समौ स्त इत्यर्थः । अथ युति- कालज्ञानमाह-विवरामिति । अभीष्टकालिकयोयुतिसम्बन्धिनोहयोरन्तरं कलात्मक तत्समकलोपयुक्तफलज्ञानाथै यथा गतिणितमन्तरं गतिपोगेन गत्यन्तरेण मक्तं तथेत्यर्थः । तेन हरेण भक्त्वा फलं दिनादिकं गतेष्ययुतिक्शादभीष्टकलाहतैष्यमु- च्यते । तत्समये तद्युतिकाले तो ग्रही समौ स्त इत्यर्थः । अत्रोपपत्तिः । गत्यन्तरेण गतिकलास्तदा ग्रहान्तरकलाभिः का इति फले गतयुतौ ग्रहयोः शोध्ये । एष्ययुती योज्ये । द्वयोवक्रत्वे गत्यन्तरभक्तफले गतयुतौ ग्रहयोर्योज्ये । एष्ययुती शोध्ये । पक्राहस्थोत्तरोत्तरं न्यूनत्वात् । अथैको वक्री तदा तयोरन्तरं प्रत्यहं गतियोगेनोप चितम् । अतो गतियोगहरेणागतं फलं गतयोगे मार्गगग्रहे हीनं पूर्व तस्य न्यूनत्वात् वक्रग्रहे योज्यम् । पूर्व तस्याधिक्त्वात् । एष्ययोगमार्गगनहे योज्यम् उत्तरोत्तरमधि- करवात् । वऋग्रहे शोध्यम् तस्याग्रे न्यूनत्वात् । गतियोगेन गत्यन्तरेण वा दिनमकं लभ्यते तदान्तरकलाभिः किमित्यनुपातेन गतेष्यदिनाद्यम् ।।३।४ ॥५॥६॥ भा० टी-दो ग्रहके अन्तरपी कला परके अलग २ तिन २ की गतिसे गुणकरके दो नौके सरल या वक्री होनेपर गतियोगसे भाग करनेपर जो कलादिहो वह समागममें हो तो अहसे दोनोंका समगतिमें वियोग, और पक्रमे योग करे । मावी होनेसे वह स्पष्ट योग या वियोग परे । एकही वक्रगति हो तो गतम वक्र योग और गम्यम पियोग करना चाहिये तो दोनों ग्रहकी भगणस्थित समकला होगी, समय जाननाहो तो मन्तरक्लाको पूर्वोक्त हारकहार। भागकरनेसे जो दिनादि होंगे वही समक्लाकार से इस समयके भन्तर दिनादि है ॥ ३ ॥ ४ ॥५॥ ६ ॥ अथ धमर्थिमुपकरणानि साध्यानीत्याह- कृत्वा दिनक्षपामान तथा विक्षेपलिप्तिकाः ।। नतोन्नतं साधायित्वा स्वकालमयशात्तयोः ॥७॥ तयोः समयोहयोदिनक्षपामानं प्रत्येक दिनमानं रात्रिमानं मसाध्य विक्षेपकलाः ! त्या प्रमाध्येत्यर्थः । अत्र भगवता विक्षेपकलाः प्रसाध्येत्यस्य दिनरात्रिमानं प्रसाध्ये- स्पेतदनन्तरमुक्तैदिनरात्रिमानं स्पष्टक्रान्तिनचरेण साध्यम् । किन्तु समग्रहीयशरास- स्कृतकेवल शान्तिजचरेण साध्यमिति सचितम् । समग्रहयोः प्रत्येकं नतकालमुन्नत- कालं प्रसाध्य । अन समुच्चयाय तथेत्यन्वति । एतदर्थमेव दिनरात्रिमानं प्रसाध्येति पूर्वमुक्तम् ।। समनन्तरोक्तं, धर्मकार्यमिति वाक्यपः । ननु नतोन्नतं कथं सायं . . "
ध्यायः७]
संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः ।
अहोदयाज्ञानात्तदवधिकालमानज्ञानाभावात् । नहि ग्रहस्य दिनरात्रिगतकालज्ञानं विना-
पि कैवलदिनरात्रिमानाम्यां तत्सिद्विरत आह-स्वकालमवशादिति । यस्मिन्काले समी
ग्रही जातौ तात्कालिकलग्नं पूर्वोक्तप्रकारावगतं तद्वशात्तद्हणादित्यर्थः । स्वकारस-
मग्रहात्मत्येवमुन्नतनतकालौ साध्यावित्यर्थः । एतदुक्तं भवति । युतिकालिकलग्नमधिक
सम्झं प्रकल्प्य समग्रह न्यूनसझं प्रकल्प्य । “भोग्यासुन्नकस्याथ भुक्तासूनधिकस्य
च । सम्पीडयान्तरलपासून स्यात्कालसाधनम् ।। " इति त्रिपश्नाधिकारोत्तया ग्रहस्य
दिनगते रात्रिगतं प्रसाध्य दिने दिनगतशेपयो रात्रौ रात्रिगतशेपयोर्यदल्पं तदुन्नतम् ।
तेनोनं दिना राज्यधै वा ग्रहस्य नतम् । दिनक्षपामानं नतोन्नतमित्येकवचनेन सम-
ग्रहयोरमिन्नंदिनमानं रात्रिमानं नतमुन्नतं चेति सूचनादपि नोंदवलग्नलग्नाभ्याम-
न्तरकालः प्रत्येक मिन्नः साध्यः । नवास्पष्टकान्तिनचरेण दिनरात्रिमाने प्रत्येकं पूर्वमु-
दपलनस्यैवासिद्धेरिति स्फुटीकृतम् । अत्रोपपत्तिः । तात्कालिकार्कलग्नाभ्यां यथा
सूर्यस्योदयगतकालस्तथा तात्कालिकग्रहलग्नाभ्यां ग्रहोदयगतकालः सिद्धयति यद्यपि
सूर्यस्य क्रान्तिवृत्तस्थत्वात्सूर्यस्य युक्तः कालः । ग्रहस्य तु क्रान्तिवृत्तस्थत्वानिपमा-
दुक्तरीत्यागतकालस्य क्रांतिवृत्तस्थग्रहाचगीयत्वेऽपि ग्रहबिम्बीयत्वाभावादयुक्तत्वम् ।
अतएव वक्ष्यमाणकर्मसंस्कृतगृहादानीतकालो ग्रहविम्बीधस्तथापि यक्ष्यमाणकार्य
ग्रहचिहीयस्यैवापेक्षितत्वान्न क्षतिः ॥ ७ ॥
माल्टी-समकलाकालीन तिनका दिनरात्रिमान साधन करे। तिमी तात्कालिक शि-
पक्ला निर्णय करके ग्रहस्थानगत रूग्रसे नेतोन्नत साधन परे ॥ ७ ॥
अथाक्षकर्मतसंस्कारं च ग्रहस्य श्लोकाभ्यामाह-
विषुवच्छाययाभ्यस्ताद्विक्षेपाहादशोद्धृतात् ॥
फलं स्वनतनाडीनं स्वदिनाविभाजितम् ॥८॥
लब्धं प्राच्यामृणं सोम्यादिक्षेपात्पश्चिमे धनम् ॥
दक्षिणे प्राकपाले स्वं पश्चिमे तु तथा क्षयः ॥ ९॥
- सूर्यसिद्धान्तः- [सप्तमोऽ- योस्तुल्यत्वेन दृशर्मसाधनाथैः नतादिनमानयोस्तयोभिन्नत्वेन स्वपदं युक्तं प्रयुक्तम् । नतु स्पष्टक्रांतिनचरोत्पन्नदिनमानयोमैदानतभेदार स्वमित्युक्तम् । तत्साधनस्य वैय. धिकरण्येनाप्रसक्तेरिति ध्येयम् । उक्तरीत्योत्तरादिशेपालन्धतत्कलात्मक माच्यां प्रापर पाले ग्रहस्य हीनम् । पश्चिमकपाले योज्यम् । दक्षिण तथा विक्षेपे ।। तुकारात्तदुत्पन्नं फलं मापाले योज्यं पश्चिमकपाले हीनं कार्यम् ॥ ८॥९॥ भा०टी०-विक्षेपको विपुषच्छायासे गुणपरके १२ से माग करने पर जो हो तिसको खीय. नतदण्डसे गुणकरके स्त्रीदिना से भाग करनेपर मक्षक् कर्म होती है। उत्तर विक्षेप होनेसे मध्योदयके पूर्व में अक्षा ग्रहस्पष्टसे वियोग भौर परे योगं करना चाहिये । विक्षेप दक्षिणमें हो तो मध्योदयके पूर्वमें योग और पीछे पियोग करना पडता अथायनकर्माह- सचिभग्रहजकान्तिभागनाः क्षेपलिप्तिकाः । विकलाः स्वमृणं क्रान्तिक्षेपयोभिन्नतुल्पयोः ॥१०॥ विक्षेपकलाः पूर्वसाधिता राशिययुतग्रहोत्पन्नकांत्यशैर्युणिता' पिक्ला भवन्ति ताः अक्षधर्मसंस्कृतग्रहे विकलास्थाने क्रांतिक्षेपयोः सत्रिभग्रहस्य क्रांन्तिहस्य विक्षेपः। अनयोपिन्नतुल्ययोभिन्नैकदिकयोः सतोः क्रमेण स्वमणं कार्ये । यत्रोपपत्तिः । विक्षेप- इस्प महपिम्बोपरि ध्रुवप्रोतश्लथवृत्तं स्पृष्ट्वा कान्तिवृत्ते ग्रहासन्ने यत्र लगति तस्य ग्रहचिह्नस्यान्तरे याः क्रान्तिवृत्ते कलास्ता आयनरलास्तदानयनार्थ क्षेत्र ग्रहशरः कद- म्बाभिमुखः कर्णः । तत्सम्बारामवृत्तप्रदेशत्रुवप्रोतलयवृत्तसम्पातयोरन्तरे धुरान- वृत्ते भुजः । ध्रुवप्रोतवृत्ने स्पष्टशरो ग्रहबिम्बतत्संपातान्तरे कोटिः । अतस्त्रिज्याकर्णेऽ यनवलनज्याभुजस्तदा शरकणे कइत्यनुपातेन धुरात्रवृत्ते युज्याप्रमाणेन भुजकलाः । नतु ग्रहचितवृत्तसम्पातान्तरे क्रान्तिवृत्ते भुजकला क्रान्तिवृत्तस्य तिर्यक्त्वेन तादृश क्रान्तिवृत्तमदेशस्य तिर्यक्त्वाद्भुजत्वासम्भवात् ।। अयनवलनज्याभुजत्रिज्याको यष्टिः कोटिस्तान्तरपदरूपेति क्षेत्र गोले प्रत्यक्षम् । अतोऽनुपाते न क्षतिः । तत्र भगवता लोकानुकम्पया गणितसुखाथै दुरात्रवृत्तत्प भुजाला क्रान्तिवृत्तस्था अंगीकृता स्वल्पा- न्तरत्वात् । अतोऽयनवलनज्याशरफलाभिर्गुण्यात्रिज्यया भाज्येति प्राप्ते भगवतायनवल- नस्य सत्रिमप्रहक्रान्तिमागत्वेनांगीकारात्तगागा अष्टपत्ताशता गुणनीया ज्या भवति । यतः परमाश्चतुर्विशत्यंशा अष्टपञ्चाशता गुणिताः पंचोना परमकान्तिज्या जाता । इयं शरगुणानिस्यामक्तायनकलास्तत्र विकलात्मकालार्थ पटिगुण इति सत्रिभमह- कारितमाममुणितो प्रतिक्षेपोऽष्टपञ्चाशत्पाष्टिघातेन विशत्यूनेन पचत्रिशच्छतेन गुण्य निग्याभक इति सिदम् । अत्रापि लाघवाद्वणस्य त्रिज्यामितत्वेन स्वल्पान्तरत्वाद- . घ्यायः७] संस्कृतटका-भापारीकासपेतः। (१३७) ङ्गीकारागुणहरयो श इत्युपपन्नं सत्रिभेत्यादि विकला इत्यन्तम् । भास्कराचार्यैस्तु- "आयनं बलनमस्फुटपुणा संगुणं धुगुणमाजितं हनम् ॥ पूर्णपूर्णधृतिभिर्महाश्रितव्य- क्षमोदयहृदायनाः कलाः ॥ "इति सममस्मादुक्तम् । धनोपपतिस्तु मकरायुः तरायणे दक्षिणवादक्षिणकदम्योऽधः । उरध्रुवादुत्तरकदम्ब अर्ध्वम् । तत्र शरो यदा तृत्तरस्तदा ग्रहबिम्बस्योत्तरकदम्बोन्मुखत्वनो चरष्टवादुन्नतत्वात्क्रान्तिवृत्तस्य. ग्रहाचतात्का न्तिवृत्तध्रुवप्रोतश्चयवृत्तसम्पात आयनप्रहाचहरूपः क्रान्तिवृत्ते पश्चाद्भवत्यत मायनवि- कला स्पष्टग्रह ऋणं कृताश्चेदायनमहमोगो ज्ञातः स्यात् । एवं दक्षिणशरे महाविम्बस्य दक्षिणकदम्बोन्मुखत्वेन ध्रुवोन्नतत्वात्क्रान्तिवृत्ते ग्रहचिह्नादायनमहचिह्नमन एव भवतीति धनमायनविकलाः । कर्कादिदक्षिणायने तु दक्षिण वादक्षिणकदम्बऊर्ध्वमुत्तरध्रुवादुत्तर- कदम्बोऽधः । तत्र यदि ग्रहशरो दक्षिणस्तथा ग्रहबिम्बस्य दक्षिणध्रुवादुन्नतत्वात्का- न्तिवृत्ते ग्रहचिहादायनग्रहचिद्रं पश्चादत ऋणमायनम् । यद्युत्तरशरस्तदा ग्रहबिम्ब- स्योत्तरंवान्नतत्यानहचिट्ठादायनग्रहचिदमने क्रान्तिवृत्ते भवतीत्यायन धनामात गोल- स्थित्यायनशरदिगैक्य ऋणमयनशरदिग्मेदे धनमिति सिद्धम् ।। तत्र प्रदायनदिशः सत्रिभग्रहगोलदिक्तुल्यत्वात्साभग्रहकान्तिग्रहशरयोरेकदिक्ते ऋणं भिन्नदिक्त्वे धन- मित्युपपन्नम् । अथाक्षकर्मोपपत्तिः ।' भूगर्मक्षितिजयाम्योत्तरवृत्तसम्पातरूपसममोत. चलवृत्ते ग्रहबिम्बसक्ते क्रान्तिमण्डलस्य ग्रहासनो यत्र सम्पातस्तत्राक्षकलासं. स्कृतो ग्रहस्तस्यायनग्रहस्य चान्तरे क्रान्तिवृत्तमदेश आक्षकलास्ताः। क्षितिजस्थग्रह- बिम्बोपरमान्तरत्वात्परमा याम्योत्तरवृत्तस्थे अहेऽयनग्रहचिह्नमेवाक्षकलासंस्कृतग्रहाच भवतीति तदभावः । अतः क्षितिजस्थे ग्रहविम्बे चलवृत्तं याम्योत्तरक्षितिजसम्पात- प्रोतक्षितिजवृत्ताद्भिनं तत्र ग्रहविम्वसक्तं ध्रुवप्रोतचलवृत्तकान्तिवृत्तसम्पातोऽयनग्रह- चितरूपः क्षितिजस्थकान्तिवृत्तपदेशादूर्ध्वमधो वा याभिः कलाभिरन्तरितस्ता अक्ष- दृपलाः । आसां ज्ञानार्य तदन्तरमदेशीयारात्रवृत्तखण्डमदेशस्थासवोऽक्षजाः साधिताः । तथाहि । धुवदयप्रोतग्रहावम्बातचलतृत्ते विपुववृत्तमहाविम्बान्तरे स्फुटा कान्तिः । विषुववृत्तकान्तिवृत्तस्यायनग्रहचिदान्तरे मध्यमाकान्तिरयनग्रहस्यायनप्रहाच- अग्रहविम्वान्तरे स्फुदशरः । द्वयोः कान्त्योरेकदिक्त्वे स्फुटकान्तिरधिका । तत्रोत्तर- गोलेऽयनग्रहचिहक्षितिजाधः स्वधुरात्रवृत्ते क्रान्त्योश्चरान्तरासुभिभवति । यतोऽयन- ग्रहाचदारात्रवृतस्थोन्मण्डलक्षितिजान्तररूपचरा ग्रहविम्बीयचरस्याधिकत्वेन मध्यमच- रसम्बद्धाक्षतिजवृत्तप्रदेशाद्धवाभिमुखमत्रं ग्रहबिम्बीयचरसम्बद्धाराप्रवृत्तपदेशेषत्रलयं तक्षितिजान्तराले चरान्तरस्य सत्त्वेन स्पष्टशरचरान्तराभ्यां । कोटिभुजाभ्यामांयत- चतुरस्रक्षेत्रस्य वयात्रवृत्तद्वयमध्ये स्फुटदर्शनम् । एवं दक्षिणगोलेऽयनमहाविहस्वारा- वृत्ते क्षितिजादूयै क्रान्त्योश्चरान्तरासामारीव । कात्योमिन्नादिक्त्वे तु क्षितिजादय- (१३८) सूर्यसिद्धान्त:- [सप्तमो:- नग्रहचिटस्वाराजवृत्ते क्रांत्योश्चरतोस्तुल्यासुभिरध ऊर्ध्वम् । मध्यकांतियरात्रवृत्तमुन्म- ण्डलात्स्पष्टक्रांतिचरतुल्यांतरेण दक्षिणोत्तरगोलयोरंध उर्वमयनग्रहचिह्नस्य सत्वात् । क्षितिजाचरांतरेणोदृत्तस्य तत्त्वाचोते । भास्कराचार्यः "स्फुटास्फुटक्रांतिजयोश्ररार्थ- योः सामान्यदिक्त्वेऽन्तरयोगजासवः । पलोद्भवास्याभनभासदाम्" इति सूक्ष्ममाक्ष दृगसुज्ञानमुक्तम् । भगवता तु पूर्वोक्तरीत्या स्फुटास्फुटक्रांतिसंस्कारोत्पन्नस्फुटशररूप- क्रांतिखण्डस्य स्वल्पांतरेण यथागतशरतुल्यस्य चरमाक्षगसव इत्यंगीकृत्य द्वादशकोटौ पलभाभुजस्तदा विक्षेपरूपक्रांतिकोटौ क इत्यनुपाताद्विक्षेपज्याफलधनुषोस्त्यांगास्वल्पी तरेण कुज्याचरज्ययोरभिन्नत्वेनांगीकाराघरासव आक्षासव एता एव कलाधृताः स्वल्पां' तरत्वात् । क्षितिजातिरिक्तस्थग्रहबिम्बे त्वेताः कला अभीष्टनतकालपरिणता भवतीति विषुवच्छाययेत्यादिस्वदिनाधीवभाजितमित्यंतम् । अत्र ग्रहे आयनं दृधर्म संस्कार्य तस्माद्दिनरात्रिमानादिनतं साधयित्वाक्षरकर्म क्रियते तदा किञ्चित्सूक्ष्मामति सत्रिभ- ग्रहज्येत्यादिश्लोकः सप्तमो यत्पुस्तके तत्र वृक्तं स्वतः सिद्धम् । नतानुपाते स्वपदव्यर्थ प्रयोगशेकानवकाशश्च समग्रहयोरायनहधर्मसंस्कारेण मिन्नत्वसम्भवात्तोदिनमाननव- योरपि मिन्नत्वसिद्धीरत्यवधेयम् ।, धनोपपत्तिस्तु समप्रोतचलवृत्तं ग्रहविम्योपरिगं यत्र क्रांतिवृत्ते लगति स राश्यादिभोग आक्षटकर्मसंस्कृत इति प्रागुक्तम्। तत्र पूर्व- कपाले तस्माद्रहादायनग्रहचिह्नं क्रांतिवृत्त उत्तरशरेऽग्रिमभागे भवति दक्षिणशरे पश्चा- भवतीति क्रमेणर्णधनमुक्तम् । पश्चिमकपालेतूत्तरशरे पश्चादक्षिणशरेऽग्रिमभाग इति क्रमे णायनग्रहे धनणे फर्मइयसंस्कृतो ग्रहसिद्धो भवतीत्युपपन्नं सर्वम् ॥ १० ॥ भान्टी-विराशियुन ग्रहस्पष्ट के अनुसार लाये हुये कात्यंशपरक विक्षेपकलाको गुणा क- रनेसे अयनकमविक्ला होगी। पूक्ति क्रान्ति और विक्षेप भिन्नदिक्स्थ होनेपर ग्रहमें योग, भोर नहीं तो वियोग करे ॥ १० ॥ अथ प्रसंगाधर्मसंस्कारस्थलान्याह- नक्षत्रग्रहयोगेषु ग्रहास्तोदयसाधने ॥ शृंगोन्नतौ तु चन्द्रस्य कर्मादाविदं स्मृतम् ॥ ११॥ अत्र निमित्तसप्तमी । ग्रहनक्षत्राणां वहुत्वादहुवचनम् । नक्षत्रप्रहयोयुत्यर्थ नक्षत्र ग्रहयोरिदं यं कर्मस्मृतं प्रागुक्तम् आदी प्रथमं कार्यम् । ताभ्यामनन्तरं क्रिया का- येत्यर्थः । अत्र नक्षत्रभुवकाणामायनकर्मसंस्कृतानामेवोक्तत्वादायनं कर्म न कार्यामति ध्येयम् । ग्रहाणामस्तोदयौ नित्यास्तोदयौ सूर्यसान्निध्यजनितास्तोदयौ च । ग्रहाणा- मुपलक्षणत्वान्नक्षत्राणामपि । तयोः साधननिमित्तं ग्रहस्य नक्षत्रस्य वा देयम् । अत्राम- धर्मार्थ केवलं शरः साध्यः । नतु दिनमानरात्रिमाननतोन्नते साध्ये । क्षितिजसं. • अन्धेन दरमहरूपोदयास्तलग्नस्यावश्यकत्वेन क्षितिजातिरिक्तनतपरिणामस्थ व्यर्थत्वात् ।
ध्यायः ७.] संस्कृतटीका-मापाटोकासमेतः ।।
युती तु समप्रोतचलवृत्ते युगपद्दर्शनार्थं तत्परिणामस्यावश्यकत्वात् । शृंगोन्नतिनिमित्र
चंद्रस्य ! तुकारः समुच्चयार्थकचकारपरः । अत्रापि श्लोके पूर्वार्धाक्तमासकर्मसंस्का-
रामिति ध्येयम् ।। ११ ॥
भा० टी० नक्षत्रग्रहयोगर्भ ग्रहके उदयास्त निरूपणमें, चंद्रमाक्री गोन्नतिमें पहलेही
ऐसा कर्म मापन करे ॥ ११ ॥
अथ कर्मसंस्कृतग्रहयोऍतिकालं तात्कालिकतादिक्षेपाभ्यां प्रयोर्याम्योच
रान्तरं चाह-
तात्कालिको पुनः कार्यों विक्षेपौ च तयोस्ततः॥
दिक्तुल्ये त्वन्तरं भेदे योगः शिष्टं ग्रहान्तरम् ॥ १२ ॥
पुनर्दितीयवारं तादृशग्रहाभ्यां शीघ्र मन्दाधिकेऽतीत इत्यादिना युतर्गतष्यत्वं ज्ञात्वा
ग्रहान्तरकला इत्यादिना धर्मसंस्कृती समौ स्वयुतिसमये भवतः । विवरं तदा
त्येत्यादिना समस्पष्टग्रहकालाहकर्मसंस्कृतसमग्रहकालो युत्याख्यो ज्ञेपः । तस्मिन्
काले साधिती ती ग्रहो स्फुदायसमौ तात्कालिको मध्यस्पष्टादिक्रियया कार्यों । तयोः
साधितग्रहयोर्विक्षेपौ । चः समुच्चये । कार्यों एतौ ग्रहौ दृकर्मसंस्कृती समौ भवत
इति प्रतीतिः । नोचेत्तस्मादप्युक्तरीत्या मुहुः काले स्थिरं कृत्वा प्रतीतिर्द्रष्टव्या । ततः
सूक्ष्मयुतिसमये ग्रहयोषिक्षेपसाधनानन्तरम् । दिक्तुल्य एकदिक्त्वे तुकारादिक्षेपयो-
रन्तरं कार्यम् । भेदे भिन्नदिक्तत्व विक्षेपयोर्योगः । शिष्टं संस्कारोत्पन्नं ग्रहान्तरम् । युति
संबंधिनोहविम्बकेंद्रयोरन्तरालं याम्योत्तरं भवति । अत्रोपपत्तिः । कर्मसंस्कृत-
ग्रहयोः पूर्वापरान्तराभायः समप्रोतचलवृत्त इति तयोः समत्वम् । विक्षेपाने ग्रह-
विम्बकेन्द्रत्वादेकदिशि विक्षेपयोरन्तरं ग्रहविम्वकेन्द्रयोर्याम्योत्तरमन्तरं समप्रोतचलवृत्ते
भिन्नदिशि शरयोर्योग एव ग्रहावेम्वकेन्द्रयोर्याम्योत्तरमन्तरं तदृत्ते भास्कगचा-
पैस्तु एवं ल(ग्रहयुतिदिनैश्चालितो तो समौ स्तस्ताभ्यां सूर्यग्रहणपदियू सं.
स्कृतौ स्वस्वनत्या । तौ च स्पष्टौ तदनु विशिखौ पूर्ववत्संविधेयौ दिक्साम्ये या वि-
युतिरनयोः संयुतिभिन्नदिक्त्वे ॥" इत्यनेन सुक्ष्ममुक्तम् । भगवना कृपालना तदुपे-
क्षितम् । स्वल्पान्तरत्वात् ॥ १२ ॥
मा० .-तिससे फिर समकाला मार कालनिर्णय करे । और जवतक समका
स्थिर न होवे तबतक वारम्वार साधना करे, स्थिर हो जानेपर दोनों ग्रहोका विशेष
निर्णय करे। एक दिशाम होने से वियोग भौर मित्रपिशाम होने से योग करनेफ्र ग्रहान्तर
खिड होगा ॥ १२॥
अथ पञ्चताराणां पिम्वमानकलानयनं, श्लोकायामाह-
कुजार्किज्ञामरेज्याना त्रिंशदर्घावर्धित्ताः ।।
विष्कभाश्चन्द्रकशापा भृगोः पाष्टिरुदाहताः ॥ १३ ॥
[सप्तमोऽ- (१४०) सूर्यासद्धान्तः- विचतुष्कर्णयुतपाप्तास्ते विघ्नास्त्रिज्यया हताः ॥ स्फुटाः स्वकर्णास्तिथ्याता भवेयुनिलिप्तिकाः ॥ १४ ॥ निशदर्धावर्धितास्त्रिंशतोऽध पंचदश तदधै सार्धसततैरुत्तरोत्तरं युक्ताविंशन मेण भौमशानिधुधबृहस्पतीनां चन्द्रपक्षायां चन्द्राकाशगोले चन्द्रकक्षाप्रमाणेन स्वकक्षाममा नेत्यर्थः । विष्कम्भा विम्बव्यासायोजनात्मका उक्ताः । भौमस्य त्रिंशत् । शनेः सार्धसप्तत्रिंशत् । बुधस्य पञ्चचत्वारिंशत् । गुरोः सादिपञ्चाशत् ।। अनेनैव क्रमेण शुक्रस्य पष्टिः । भृगोः पष्टिरित्यनेनार्धाधैत्यस्य प्रत्येकमर्धयुक्ता इत्य| निरस्तः स्वा. मिमतार्थो व्यक्तीकृतश्च। ते उक्ता विष्कमा द्विगुणात्रिज्यया गुणितानिचतुष्कर्ण युक्त्याप्ताः। तृतीयकर्मणि चतुर्थरमाणे च यौ की मन्दकर्णशीघ्रको तयोोंगे न भक्ता इतिसांप्रदायिकव्याख्यानम् । नव्यास्तु तृतीयकमणि कर्णानुपातानुक्तेस्तृती. यकर्णस्य मन्दकर्णस्यामसिद्धरुपपत्तिविरोधाच्च पूर्वव्याख्यामुपेक्ष्य त्रिशब्देन त्रिज्याच तुष्कर्णश्चतुर्थकमणि शीघ्रकर्णस्तयोोंगेन भक्ता इत्यथै कुर्वन्ति । स्पष्टाः स्वकर्णाः स्वावेम्बव्यासा भवन्ति । पञ्चदशभक्ता विम्वमानक्ला भवेयुः। अवोपपत्तिः । स्वस्वकक्षायां स्थिताः पञ्चताराग्रहा दूरत्वाल्लोकैश्चन्द्राकाशस्थिता इव दृश्यन्ते । अत. स्तेपा वास्तवविश्वव्यासयोजनानि स्वयं ज्ञातानि यथा सूर्यविम्वव्यासयोजनान्युक्ता. नि चन्द्रग्रहणाधिकारे रवः स्वभगणाभ्यस्त इत्यादिना चन्द्रकक्षायां साधितानि तथा स्वभगणानुसारेणोक्तप्रकारेण चन्द्रकक्षायां साधितानि । तथा च शाकल्यसंहिताया- सु-"अन्तरुन्नतवृक्षाश्च वनप्रांते स्थिता इव । दूरत्वाचन्द्रकक्षायां दृश्यन्ते सक्ला ग्रहाः ॥ व्यर्धाटवर्धितीस्त्रिंशद्विष्कम्भाः शाखदृष्टतः ॥" इत्येतानि त्रिज्यातुल्यशी- प्रकर्ण उक्तानि । अतः शीघ्रकर्णेऽधिके न्यून विम्बग्रहस्योचासन्नतादल्पे तु नीचा. सन्नत्वादधिकं विम्बामतित्रिज्ययोक्तानि विम्वानि तदेष्टशीवकर्णेन कानीति व्यस्ता- नुपातेन युक्तमपि भगवतोपलब्धा त्रिज्यातोऽधिकन्यूनकर्णयोः क्रमेण व्यस्तानुपाता- गतादधिकं न्यूनं च विम्बं दृष्टमतः कर्ण एव त्रिज्याशीघ्रकर्णयोगामितः क्रमेण न्यूना धिको गृहीतः । अत्र च्छेदं लवं च परिवत्य हरस्येत्यादिना दिनास्त्रिज्यागुणिता विष्क- भांत्रिज्याशीप्रकर्णयोगमक्ता इत्युपपन्नम् ॥ "त्रिचतुष्कर्णयोगार्धे स्फुटकर्णोऽयमस्तके। त्रिज्यानाः स्फुटकर्णाप्ता विष्मम्भास्ते स्फुदाः स्मृताः ॥” इति शाकल्योक्तेश्च । अत एव विम्बस्य द्राङ्नीचोचमालस्थत्वेन शीघ्रकर्णस्यैव भूगर्भाद्विवे सम्बन्धान्मन्द- कर्णसम्बन्धस्त्वयुक्तः । नहि छेद्यके मन्दकर्णार्धाच्छीघ्रकीर्धे महाविम्बमस्तांति प्रति- पादितम् । येन मन्दप्रिकर्णयोर्योगाधै कर्णः सुपपन्नः । शीघ्रफलानयने तथाी- धारापत्तेः । भास्कराचार्यस्तु-व्यञोपवः सचरणा प्रतवास्त्रिभागयुक्ताद्रयो नव च सनिलवेषवश्च । स्युमध्यमास्तनुकलाः क्षितिजादिकानां त्रिज्या सुकविवरेण पृथ:
ध्यायः ७.] संस्कृतटीका-मापाटाकासमेतः । (१४१)
ग्विनिम्नाः ॥ विघ्न्यानि जान्त्यफलमौर्विकया विभक्ताः लब्धेर्न युक्तरहिताः क्रमशः
पृथक्स्थाः। ऊनाधिके त्रिभगुणाच्छ्यणे स्फुटाः स्युः ॥ इत्युपलब्ध्योक्तम् ।
भास्करानुवर्तिनस्तु त्रिचतुष्कर्णयुक्त्याप्ता इत्यस्य त्रिज्याशीघ्रफर्णयोयोगार्धन भक्ता
इत्यर्थं वदंति ॥ १३ ॥ १४ ॥
भा० टी०-चन्द्रकक्षामें मंगलके ३२, शान ३७ बुध ४५, बृहस्पति १२३ शुक्रके
६० पिन व्यास है। इन विम्बव्यासोको द्विगुणित विज्याने गुणवरके विज्या और
चतुर्थवर्मगत (स्पष्टानयनमें ) कर्णके योगफलसे भाग फरनेपर पर पिम्नव्यास होगा।
स्पष्टव्यासको १५ से भाग करनेपर क्लादिमान होगा ॥ १३ ॥ १४ ॥
अथ युतिसंवन्धिनौ ग्रहौ युतिसमये दर्शनीयावित्याह-
छायाभूमौ विपर्यस्ते स्वच्छायाग्रे तु दर्शयेत् ॥
ग्रहः स्वदर्पणान्तस्थः शंकय सम्प्रदृश्यते ॥ १५ ॥
छायाभूमौ छायादानाथ योग्यायां जलवत्समीकृनायां पृथिव्याम् । विपर्यस्ते
वैपरीत्येन दत्ते स्वच्छायाप्रे ग्रहच्छायाग्रस्थाने । तुकारोऽन्ययोगव्यवच्छेदार्थवकारपरः ।
स्वदर्पणान्तस्थः स्वस्य यो दर्पण आदर्शस्तत्र स्थापितस्तन्मध्यस्थितो, अहो ग्रहम-
तिबिम्बः स्यात् । तद्गणक शिष्याय दर्शयेत् । एतदुक्तं भवति । समभूमौ दिक्सा-
धनं कृत्वा , दिक्सम्पातस्थानाद्युतिकालिकच्छायांगुलानि पूर्वापरसूत्राटुजविपरीतदिशि
भुजान्तरेण ग्रहाधिष्ठितपूर्वापरे कपालादशि दत्त्वा तत्रादशः स्थाप्यस्वन प्रातविम्बं
ग्रहस्य दिक्संपातस्थो गणकः शिष्याय दर्शयादिति । अत्रोपपत्तिः। ग्रहविम्बादवल-
म्बसून महाशङ्कुरूपं यत्र मृमो पतति तत्र ग्रहबिम्बप्रतिबिम्बो भवति । तज्ज्ञानं
तु, समध्यावहावम्बपर्यन्तं नताशा आकाशे तथा भूमौ दिक्सम्पातस्थानान्महाशङ्क-
कोटी राज्याभुजस्तदा द्वादशाङ्गुलशडकोटी को भुज इत्यनुपातानीतच्छायामिता-
न्तरे ग्रहाधिष्ठितकपाले भवति । यथा दृकमम्पानस्थद्वादशांगुलशङ्कोरछाया ग्रहाधिष्ठि-
तकपाले भवति । तया ग्रहप्रतिविम्यस्थानस्थद्वादशांगुलशकोश्छायादिक्सम्पाते भवति
अतो दिकसम्पातस्थानाच्छाया ग्रहाधिष्ठितकपाले दत्ता तदने ग्रहमतिविम्वस्थानं ज्ञातं
मवतीत्युपपन्नं छायाभूमावित्यादि स्वदर्पणान्तस्थ इत्यन्तम् । अथ ग्रहाधिष्टितकपा-
लान्यकपाले छायासदावनियमावहाधिष्ठितकपाले कथं छायादानं युक्तं व्याघातादिति
मन्दाशवा स्वरसादाह-शङ्का इति ।। दिक्मम्पातस्थापितशटोरने मस्तक आकाशे
ग्रहो दृश्यने गणनति शेषः ॥ १५ ॥
भान्टी--परामा फरी हुई भूमिमें शंकु स्थापन करके दूसरी दिशामें ग्रही मासे
छायान निर्देश करे । छायाग्रमें दर्पणासनेप्से - दर्पणान्तरस्थितग्रह और शडका सममूवमें
दिखाई देगा ॥ १५॥
(१४२) { . सूर्यसिद्धान्तः- [सप्तमोऽ- ननु कथं दृश्यत इत्यतः प्रकृतग्रहयोयुतिसंवन्धिनोदर्शनप्रकारं सार्दशोकाम्या माह- पञ्चहस्तोच्छ्रितो शंकू यथा दिग्भ्रमसस्थितौ ॥ ग्रहान्तरेण विक्षिप्तावधो हस्तनिखातगो ॥ १६ ॥ आयाकर्गों ततो दद्याच्छायामाच्छंकुमूर्धगौ ॥ छायाकर्णाग्रसंयोगे संस्थितस्य प्रदर्शयेत् ॥ स्यशंकुमूर्धगो व्योनि ग्रहो कुल्यतामितौ ॥ १७ ॥ ग्रहयुतिसम्बधिनोहयोरायनदृचलाश्लोकपूर्वार्धक्ताशवालाभ्यां संस्कृतयोस्तुल्येऽ. ल्पान्तरेणासन्ने वोदयलग्ने स्तिः । पड्भयुतयोर्ग्रहयोरायनाक्षयालासंस्कृतयोस्तुल्ये स्वल्पान्तरेणासन्ने वास्तलग्ने भवतः । यस्मिन् काले, ग्रहो द्रष्टुमभिमती तात्कालिक- लग्नाद्रात्रौ यदयास्तलग्ने क्रमेण न्यूनाधिके यदि भवतस्तो सूर्यसान्निध्यजनितास्तामा- वे दर्शनयोग्यौ । तदा पञ्चदस्तोच्छितौ । चतुर्विंशत्यङ्गुलो हस्तः । एवं पश्चहस्तममा दीधी शङ्क काष्ठघटितसरलदण्डौ यथादिग्भ्रमसंस्थिती युतिकाले ग्रहयोर्यादर्श दिग्भ्रमणम् । ग्रही प्रवहभ्रमेण पूर्वकपाले पश्चिमकपाले वा यत्र संस्थितौ स्वाधिष्ठि. .तस्थानानहाधिष्ठितकपालदिशि स्थाप्यौ न ग्रहानाधिष्ठितकपालदिशि । ग्रहान्तरेण दि त्ये त्वन्तरं भेदे योग इत्यादिना ज्ञातयाम्योत्तरग्रहान्तरेण कलात्मकेन विक्षिप्तौ याम्योत्तरान्तरितौ स्थाप्यौ। अत्र सोन्नतमित्यादिना ग्रहविक्षेपावगुलात्मको कृत्वा दितुल्ये त्वन्तरमित्यादिना ग्रहान्तरं ज्ञेयम् । अधो भूमेरन्तः । हस्तनिखातगौ हस्त- वैधप्रमाणा या गर्ता तत्र स्थितौ भूम्यां शङ्कोर्हस्तमात्र रोपयित्वा भूमरूवशइकू चतु. हस्तप्रमाणदीर्घा स्यातामित्यर्थः । ततः शंकुमूलाभ्यां प्रत्येकं यच्छाया ग्रहानधिष्ठि- तकपालदिशि तस्मात्प्रत्येकमित्यर्थः । छायाक!' स्वकीयो शंकुमूर्धगो निजशंक्षय- रूपमस्तकप्रापिणौ गणको दद्यात् । एतदुक्तं भवति । युतिसमये लग्नं कृत्या लिकोदयलग्नेटलग्राभ्यां पूर्वपदन्तरकालो ग्रहोदयाद्गतकालः सावनः । एवं ग्रहयोर्यति. समये स्वदिनगताघ्रिप्रश्नाधिकारोक्तविधिना स्पष्टक्रान्त्या छाया साध्या । ततो यो ग्रहो दक्षिणोत्तरयोर्मध्ये यदिशि तच्छाया, सद्दिवस्था शङ्कोर्मूलागहानििष्टतकपालदिशि पूर्वापरसूत्राट जान्तरेण भुजदिशि देया । परमानीतच्छाया द्वादशाङ्गुलशङ्कोरति चतु. हस्तशंप्रमाणेन प्रसाध्य रेखा तन्मिता समशंकुमूलात्कार्या। रेखान छायाग्रे ज्ञापक चिह्न कार्यम् । तन कीलादिना सूत्रं बना शडूकासक्तं प्रसार्यमिति । छायाकन संयोगे छायाग्रं कर्णस्य मूलरूपमग्रं तयोः सम्पाते संस्थितस्य छायाग्रस्थानकृतगर्ता पविष्टशिष्यस्य गणको ग्रहावाकाशे स्वशकुमुर्धगो निजशक्यरूपमस्तकसमसूत्र: तात्का.
ध्यायः ७.] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतः। स्थितौ दल्यतां दृष्टिगोचरतामिती प्राप्तौ प्रदर्शयेत्सन्दर्शयेत् । अत्रोपपत्तिः । उच्चतया दर्शनार्थ पञ्चहस्तप्रमाणौ शङ्क् कृतौ । तत्रैकहस्तस्य भूमिगुप्तत्वं शड्कुदृढत्वाथै कृतम् । वहिः पुरुपममाणौ चतुर्मितहस्तावशिष्टौ शङ्को पुरुषपर्यायेणाभिधानाच । शंकुसूत्रस्य ग्रहबिम्बसक्तत्वायथा दिग्भ्रमसंस्थितावित्युक्तम् । शडक्वग्रसमसूत्रेण ग्रहबिम्बावस्था- ननियमानहान्तरेण याम्योत्तरान्तरितौ स्थापितौ। अत्र यद्यपि स्वस्वस्पष्टकान्त्यमां प्रसाध्य सतः कर्णानां प्रसाध्योक्तदिशा पलभासंस्कारण) स्वस्वभुज प्रसाध्य ताभ्याम् दि ल्ये त्वन्तरं भेदे योगः शिष्टं ग्रहान्तरम् " इत्युक्तरीत्या ग्रहान्तरं शडकोरन्तर युक्तम्। तथापि भगवता स्वल्पांतरेण गणितश्रमापनोपदार्थमाकाशस्थितदृष्टान्तरमेव धृतम्। शडकोश्छायानाच्छायाकर्णसूत्रं ग्रहविम्बदर्शनसूत्रमतः कर्णमूलदृशा पुरुपेण ग्रहबिम्ब द्रष्टव्यमेवोत दिक् ।। १६ ॥ १७ ॥ भाल्टी-पांच हायके परिमाणवाले यथादिक दो शंकु याम्योत्तर रेखामें भंगुलात्मक मन्त में स्थापन करके एक हायक परिमाणमें प्रोथित करे । छायाग्रासे शंकु जाग्रतक दो छायाकर्णनिर्णय करें । छायाकर्णाग्र रेखामें स्थित मनुष्यको ग्रहदर्शन करावे, वहमी शंके मागेमें ग्रह देखेंगा ॥ १६ ॥ १७ ॥ अथ श्लोकाभ्यां पश्चताराणां प्राक्प्रतिज्ञाती युद्धसमागमाषाह- उल्लेखं तारकास्पादिभेदः प्रकीर्यते ॥ १८ ॥ युद्धमंशुविमाख्यमंशयोगे परस्परम् ।। अंशादूनेऽपप्तव्याख्यं युद्धमेकोऽत्र चेदणुः ॥ समागमोऽशादधिके भवतश्चेदलान्वितौ ॥ १९ ॥ भौमादिपञ्चताराणां मध्ये द्वयोर्युती तारकास्पर्शादिम्बनेम्योः स्पर्शमात्रादुल्लेखसं- ज्ञं युद्धं वदति यतिभेदज्ञाः । इदं तु योर्मानैक्यखण्डतुल्ययाम्योत्तरान्तरे भेदे मण्डल- भेदे भेदो भेदसंज्ञो युद्धावान्तरभेदो युद्धभेदतत्त्वज्ञः कथ्यते । अयं भेदो मानैक्यखण्डा- दूने दयोर्याम्योत्तरान्तरे । अत्र भास्कराचार्यैस्तु “ मानक्यार्धायुचरविारेऽल्पे भवद्रोदयोगः कार्य सूर्यग्रहवदखिलं लम्बनायं स्फुदार्थम् । कल्प्योऽधास्थः सुधांशु स्तदुपरिंग इनो लंबमानाप्रसिद्धये किं त्वळदेव लग्नं ग्रहयुतिसमये काल्पताकांन्न साध्य म्॥ सप्रारमटयनेन ग्रहयुतिसमयः संस्कृतः प्रस्फुट स्गत् खेटौ तौ दृष्टियोग्यौ ग्रहयुतिस मये कार्यमे तदेव । याम्योदयस्थाचरविवरं भेदयागे स वाणो ज्ञेयः सूर्याद्भवति च यतः शीतगुः सा शराशा ॥ मंदाकान्तोऽनृजुरापे नदाधास्थितः स्यात्तदेन्या स्पर्शी मोसोऽपरादशि तदापरिलख्येऽवगम्यः॥” इति विशेपोऽभिहितः। भगवता तु सक्षमविम्ब- योराकाशे दूरतो विविक्तदर्शनासम्भवाधर्यप्रयासादुपेक्षितमिति ध्येयम् । युतावन्योन्य किरणयोगे सत्यंशुमाख्यं किरणसंवटनसंज्ञं युद्धं स्यात् । इयोर्याम्योत्तरान्तरें:
(१४४) + सूर्यासिदान्तः- [सप्तमोड- शात् पष्टिकलात्मकैकमागादूनेऽनधिके सत्यपसध्यसंज्ञं युद्ध मवति । यत्र विशेषमाइ- एक इति । अत्रापसध्ययुद्ध एको दयोरन्यतरोऽणुरणुविम्यश्चत्स्यातदाऽपसव्यं युद्ध व्यक्तं स्यादन्यथा त्वव्यक्तं युद्धं स्यात् । एषां चतुणी फलम् । “यपसव्ये विग्रह यासंग्राम रश्मिसंकुले । लेखनेऽमात्यपीडा स्याद्भेदने तु धनक्षयः ।। " इति मार्ग चीयोक्तं ज्ञेयम् । युद्धभेदानुक्त्वा समागममाह-समागम इति । द्वयोर्याम्योत्तरान्तरे पष्टि- कलात्मकैकभागादभ्यधिक सति समागमो योगो भवति । अत्रापि विशेषमाह । मवत इति । युतिविषयको ग्रहो बलान्विती बलेन । “रथानादिवलचिन्तात्र व्यर्था केनापि न स्मृता ॥ प्रश्नत्रयेऽथवाप्यस्मिन् स्यौल्यसाक्ष्म्यवले स्मृतम् ॥” इति ब्रह्म- सिद्धान्तवचनात् । स्थूलमण्डलतयान्वितौ युक्तौ स्थूलयिम्बी समावित्यर्थः । चेत्स्त- स्तदा समागमस्तयोर्व्यक्तः स्यात् । अन्यथा त्वव्यक्तः समागमः "दावपि मयूखयुक्ती विपुलौ स्निग्धौ समागमे भवतः । अवान्योऽन्यं प्रीतिविपरीतावात्मपक्षनौ ॥ युद्धं समागमो वा यद्यव्यक्तौ तु लक्षणैर्भवतः। भुवि भूभृतामाप तथा फलमव्यक्तं विनिर्दि- एम् ॥” इत्युक्तेः । “भेदोरेखांशुसम्मर्दा अपसव्यस्तथापरः । ततो योगो भवेदेपामे- कांशकसमापनात् ॥” इति काश्यपोक्तेश्च सर्व निवद्यम् ॥ १८ ॥ १९ ॥ भा०टी०-ताराओके परस्पर स्पर्शको उल्लेख कहते हैं, विश्वमेद होजाय तो भेद् युद्ध कहते हैं। परस्परकी किरण मिल जानेसे मंशुविमर्द नाम होता है। एक अंशका मनाधिक पार्थक्य हवि तो अपसव्य युद्ध होताहै, तिनमें एफ्तारा छोटा हो तो प्रकाश युद्ध होता है, ऐसा नहो भर्याद दोनों एक्से हों तो अप्रकाश युद्ध होताहै । एकाशमें अधिक पृयक्ता होने से दोनों ग्रहेकि पल्वान होनेपर समागम कहा जाता है ॥ १८ ॥ १९ ॥ अथ युद्धे पराजितस्य ग्रहस्य लक्षणमाह- अपसव्ये जितो युद्धो पिहितोऽणुरदीप्तिमान् ॥ रुक्षो विवी विध्वस्तो विजितो दक्षिणाश्रितः॥२०॥ द्वयोर्मध्ये यस्तदितरेण विध्वस्तो हतः स विजितः पराजितो ज्ञेयः । हतस्य लक्ष- णमाह-अपसव्य इति । अपसव्ये युद्धे योऽजितो जयलक्षणैर्विवाजतः । एतेनोल्लेखा दिनये संज्ञाफलं न पराजितस्या फलमिति सूचितम् । पिहित आच्छादितोऽव्यक्त इति यावत् । अणुरितरग्रहविम्बादल्पविम्वः । अदीप्तिमान् प्रभारहितः । रुसोऽस्निग्धः । विवर्णः वर्णन स्ववर्णेन स्वाभाविकेन दक्षिणाधित इतरमहापेक्षया दक्षिणादिशि स्थितः । “श्यामो वा व्यपगतरश्मिमण्डलो वा रुसो या व्यपगतरश्मिवान् कृशो वा ! आक्रान्तो विनिपातितः कृतापसव्यो विज्ञेयो हा इति स ग्रहो ग्रहण ॥” इति मार्गवीयक्तेः ॥२०॥ - . रहित इत्यर्थः ।
- ध्यायः ७.] संस्कृतटोका-भापाटोकासमेतः । (१४५) माटो ०-अपमन्य युहम थोटी प्रमावाला डाहुआ छोटे विम्बधाला ग्रहही हार जाता है। यह रूखा, विरूप और दक्षिणस्य होता है || .० ॥ अथ श्लोकाधन जयिनो ग्रहस्य लक्षणमाह- उदयस्थो दीप्तिमान स्थूलो जयी याम्येऽपि यो वली ॥२१॥ इतरग्रहापेक्षयोत्तादिस्थः' । दीप्तिमान् प्रभायुक्तः स्थूल, इतरग्रहविम्यापेक्ष या पृथुविन्धः । जयी जययुक्तः स्यात् । अयोत्तरदक्षिगदिक्स्थत्वक्रमेण 'जयपराज- यौन स्त इत्याह-याम्य इति । दक्षिणदिशि यो ग्रहो वली दीप्तमान् पृथुविम्यो, भव- ति स जयो। अपिशब्द उत्तरदिशा समुच्चयार्थकः । तथा च जयपराजयलक्षणयोंदिग्दा. नमनुपयुक्तामेति भावः ॥ २१ ॥ भाटी-दीतिमान् ग्रह उत्तर दिशा में स्थित, स्थूल दम्ब मर जयी होता है। दक्षिणमें रहारमो पली होनेसे जया होता है ॥ २५ ॥ अथ युद्धे विशेपमाह-- आसन्नावप्युभो दाता भवतश्चत्समागमः ॥ स्वल्पो द्वापि विध्वस्तो अवेतां कूटविग्रहः ॥ २२ ॥ उभी द्वौ । आसन्नाकभागान्तरगतान्तरिती । अपिशाहद्धलक्षणाकान्ती। दीप्तो प्रभायुक्तौ चेत्स्यातां तदा वलान्विताविति समागमलक्षणै देशसनावात्समाग- माख्यं युद्धम् । द्वावपि ग्रहै। वल्पी सूक्ष्मविम्मी विध्यस्तौ ।' द्वावणि पराजयलक्षणा- प्रान्तो स्यातां नदा क्रमण कूटवित्रसंज्ञको युद्धभेदो स्यानाम् ॥ २२ ॥ भार टी०-दोनाही ग्रह दीप्तिमान होकर निकट आजाय तो समागम देता है। जो दोनों ही समदीप्ति और विधात हो तो चूटविग्रह कहा जाता है ॥ २२ ॥ अयोत्सर्गतः शुरुस्य जयलक्षणाक्रान्तत्वम्स्तीति पदर समागमः शनितिमाक् प्रातज्ञानसमागम उक्तप्रवारमातदिशति- उदास्यो दाक्षिणस्यो वा भार्गवः प्रायोजयी । शशाङ्केनैवमेनेपां कुर्यात्संयोगतावनम् ॥ २३ ॥ इलाग्रहापेक्षयोदयस्थो दक्षिणदिस्थो वोभयदिशीत्यर्थः । शुक्रः प्राया उस- तो जयलक्षगाकान्तवा जी । पदाधिपराजयलक्षणाकान्ता मानीति तात्प- चायः । एतेषां भौमादिश्यतागणां' चन्द्रेण सह संगमायः बुदिसाधनमेषामु- करीत्या गणकः कुर्यान् । जन गिरिम् ॥ "अवनत्या पुटो यो विशेपः शीतगोयुती । इत्य कचित्पुरता दृश्यते न सर्वत्रोत शि िमत्वापेक्षितम् । अधि- फारस्यापूर्णछोरत्यापत्तेश्च । एतदुत्त्यान्ययोगे नतिसंस्कारनिषेधस्य स्ति- (१४६) सूर्यसिद्धान्त:- [अष्टमोऽ- स्पायुक्तत्वमिति तदनुक्ती सूर्यग्रहणोक्तरीत्या साधारण्येन सर्वत्र तदिदोपोतिरसि.. गिति ध्येयम् ॥ २३ ॥ भान्टी-उत्तरमें हो या दक्षिणमें हो बहुधा शुक्र जयही पाताहै। पूर्वनियमके द्वारा ग्रहोरे साथ चंद्रमावास्योगकाट निर्णयकर । २३ ॥ नन्पा ग्रहाणां दूरान्तरेण सदोषाधरान्तरसदानात्परस्परं योगासम्भवन कयं युतिः संगतेत्यत आह- भावाभावाप लोकानां कल्पनेयं प्रदर्शिता ।। स्वमागंगाः प्रयान्त्येते दूरमन्योन्यमाश्रिताः ॥२४ ।। एते ग्रहाः स्वमार्गगाः स्वस्वकक्षास्था अन्योन्यमाश्रिता युतिकाल ऊर्ध्वाधरान्तरा- भावेन संयुक्ताः सन्तः प्रयांति गच्छति । इति दूर दूरान्तरेण दर्शनादियं ग्रहयुतिक- ल्पनाकल्पनात्मिका वास्तवा प्रदर्शिता पूर्वोक्तयन्येन कथिता । नन्ववस्तुभूता किमर्थ- मुक्त यतःप्रयोजनमाह । भावाभावायेति । लोकानां भूस्थप्राणिनां भावः शुभफल्ममा-. वोऽशुभफलं तस्मै शुभाशुभफलादेशायावस्तुभृतापि युतिस्तेति भावः ।। २४ ॥ माटी-ग्रहगण परम्पर, दूरस्थित अपनी २ कक्षामें चरते हैं । इस दिखाई देने के कारण मनुष्य शुभाशुभ फल के लिये यस्यादि कहा जाता है ॥ २४ ॥ अथानिमग्रन्थस्पासंगतित्वनिरासार्थमधिकारसमाप्तिं फकिस्याह-स्पटम् । रंग. नाथेन रचिते ख्यसिद्धान्तटिप्पणे । ग्रहयुत्यधियारोऽयं पूर्णो गृहप्रकाशके ॥ इति श्रीसक्लगगसार्वभौमवल्लालदेवज्ञात्मजरंगनाथगणफरिरविते गूढार्थप्रकाशके प्रह युत्पधिकारः सम्पूर्णः। इति ग्रहयुत्यधिकारः। सातवां अध्याय समाप्त । अष्टमोऽध्यायः। अय प्रसंगारदारब्धो नक्षत्रग्रहयुत्यधिकारो व्याख्यायते । तत्र प्रथमं नक्षत्राणां वज्ञानमाह- प्रोच्यन्ते टिप्तिकाभानां स्वभोगोऽथ दशादतः ॥ भवन्त्यतीतधिष्ण्यानां भोगालिप्तायुता ध्रुवाः ॥ १॥ मानामश्विन्यादिनक्षत्राणामुत्तरापादाभिजिच्द्रवणधनिष्ठावर्जितानां लितिका मोग- संज्ञाः कलाः प्रोच्यन्ते समनन्तरमेव कथ्यन्ते । अथानन्तरं सभोगः स्वाभाटनक्षत्र- मोगः कलात्मको वक्ष्यमाणो दशभिगणितः कार्यः । तत्र स्वाभीष्टनक्षत्रगतनक्षत्राणाम- ध्यायः ८.] संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतः। (१४७ 'सिम्यादीनां भोगलिप्ताः । भभोगोऽष्टशतीलिप्ता इत्युक्ताष्टशतकलाः प्रत्येक युताः । आश्चिन्यायतीतनक्षत्रसङ्ख्यागुणितकलाष्टगतं युतामत्यर्थः । ध्रुवा नक्षत्राणां 'भवन्ति ॥ १॥ भा०टी०-नक्षत्रोंके स्वभोगको १० से गुणकरके गतनक्षत्रकी मोगकला (प्रस्पेककी ८०० करके ) योग करनेसे नक्षत्रोका ध्रुव होगा ॥ १॥ अथ प्रतिज्ञाता नक्षत्रभोगलिप्ता उत्तराषाढाभिजिवणधनिष्ठाव्यतिरिक्तानां तेषां युवकान्नक्षत्रशरांश्चाष्टश्लोकैराह- अष्टार्णवाः शुन्यकृताः पञ्चपष्टिनंगेपवः ॥ अष्टार्थी अब्धयाऽष्टांगा अङ्गागा मनवस्तथा ॥२॥ कृतेपको युगरसाः शून्यबागा वियद्साः ॥ खवेदाः सागरनगा गजागा सागरतवः ॥ ३ ॥ मनवोऽथ रसा वेदा वैश्वमाप्याभोगगम् ॥ आप्पस्यैवाभिनित्प्रान्ते वैश्यान्ते श्रवणस्थितिः ॥ ४ ॥ त्रिचतुःपादयोः सन्धो अविष्ठा श्रवणस्य तु ॥ स्वभोगतो वियनागाः परकृतिर्यमलाविनः ॥५॥ रंध्रादयः क्रमादेपां विक्षपाः स्वापदकमात् ॥ दिङ्मासविपयाः सौम्ये याभ्ये पञ्चदिशो नव ॥ ६ ॥ सौम्ये रसाः खं याम्ये गाः सौम्ये खास्त्रियोदश ।। दक्षिणे रुद्रयामलाः सप्तत्रिंशदथोत्तरे ॥७॥ याम्येऽध्यविककृता नवसाधशरेपवः ।। उत्तरस्यां तथा परिस्त्रिंशत्पत्रिंशदेव हि ॥ ८ ॥ दक्षिणे त्वर्धभागस्तु चतुर्विशतिरुतरे ।। भागाः पदविंशतिः खं च दनादीनां यथाक्रमम् ॥ ९ ॥ यधिन्यादिनक्षत्राणां क्रमानोगा एते । तत्राचियर अक्वारिंशत्कलाः मर. प्याश्चत्वारिंशत् । कृत्तिकायाः फलाः पचपादिः याः सपञ्चाशत्कला। मृगशिरसोऽष्टपञ्चाशत् । मादायाचवा। मामन इस्त्र गोऽन्ययोगौनय (१४८) सूर्यसिद्धांत:- [अष्टमोऽ-- चा पाठस्त्वयुक्तः । शाकल्यसंहिताविरोधात । एतेन सौरोक्तरुद्रभस्यांशात्यायोगा- ब्धयः कला इति नार्मदोक्तं दशकलोनपञ्चदशभागा मिथुने सर्वजनाभिमतववको दश- फलायुतत्रयोदशभागाः पर्वताभिमतधुवकश्च निरस्तः। पुनर्वसोरप्टसप्ततिः । पुष्यस्य पट्सप्ततिः । आश्लेपायाश्चतुर्दश । तयेति छन्दःपूरणार्थम् । मघायाश्चतुःपञ्चाशत् । पूर्वाफाल्गुन्याश्चतुःपष्टिः । उत्तराफाल्गुन्याः पञ्चाशत् । हस्तस्य पष्टिः । चित्रायाश्च- त्वारिंशत् । स्वात्याश्च चतुःसप्ततिः । विशाखाया अष्टसप्ततिः । अनुराधायाश्चतुःपहिः । ज्येष्ठायाश्चतुर्दश । अनन्तरं मूलस्य पट् । पूर्वापाढायाश्चत्वारः । उत्तरापाढाया ध्रुव- कमाह-वैश्वामिति । उत्तराषाढा योगतारानक्षत्रम् । आप्यार्धभोगगम् आप्यस्य पूर्वा- पादानक्षत्रस्याधभोगः । धनराशेविंशतिभागस्तत्रस्थितं ज्ञेयम् । अष्टी राशयो विश- तिभागा उत्तगपाडाया सुव इत्यर्थः । एतेन पूर्वापाडायोगतारायाः सकाशादुत्तरापा- हायोगताराविंशतिकलोनसप्तभागान्तारता। तेन पूर्वापाढाचवकोऽटराशयश्चतुर्दशभागा विशतिकलोनमप्तमागैर्युत उत्तरापाढाया. ध्रुवश्चत्वारिंशत्कलाधिकोक्त ध्रुव इति पर्व- तोक्तमपास्तम् । ब्रह्मसिद्धांतविरोधात् । अभिजिद्धवकमाह-आप्यस्येति । पूर्वपढाया अवसाने धनुराशेविंशतिकलोनसप्तविंशतिभागेऽभिजिद्योगतौरा ज्ञेया । चत्वारिंशत्क- लाधिकपाशतिभागाधिका अष्टौ राशयोऽभिजितो ध्रुव इत्यर्थः । एवकारोऽन्ययोग- व्यवच्छेदार्यः । ते संहितासम्मतं श्रवणपञ्चदशांशस्थानं विंशतिविकलायुतत्रयोदश- कलायुतश्चतुर्दशभागादिकनवराशयो 'निरस्तम् । श्रयणस्य ध्रुवक्माह-वैश्वान्त इति । उत्तरापाढाया अवसाने श्रवणयोगतारायाः स्थानं ज्ञेयम् । नवराशयो दश भागाः श्रयणवकाइत्यर्थः । धनिष्ठाया ध्रुवकमाह-त्रिचतुःपादयोरिति । श्रवणस्य तृती- यचतुर्थचरणयोः क्रमेणान्तादिसन्धी मकरराशेरिंशतिभागे. अविठाधनिष्ठा ज्ञेया । नवराशयो विंशतिभागा धनिष्ठाव इत्यर्थः । तुकारात्क्षेत्रान्तर्गतधनिष्ठास्थानं कुम्भस्य विंशतिकलोनसप्तभागानिरस्तम् । शतताराया भोगमाह-स्वभोगत :इति । धनिष्टा- मोगाकुंभस्य विंशतिक्लोनसप्तमागावधेरित्यर्थः । शन नाराया अशीतिभागः । अतः पाबद्धवा इति ज्ञापनार्थ स्वभोगत इत्युक्तम् । शततारायाः स्थान शततारकाधव इतिपर्यवसनम् । अपशिष्टनक्षत्राणां भीगानाह ! पदकातोरेति । पूर्वाभाद्रपदायाः पत्रिंशत्फलामोगः । उत्तराभाद्रादाया द्वाविंशतिः । पत्या एकोनाशीतिः । अथ ध्रुवकानयनं यथा । अश्विन्या भोगः । ४८ । दशगुणितः । ४८० । अतीतनक्षत्रा- मावादोगयोजनामावः । यतोऽश्विन्याः बलात्मको सुवः । ४८० । राश्यावस्तु । दा मरण्यामोगः । ४० । दशा हतः ।४००। अतीतनक्षनस्यैवत्वादष्टशतयुतो भरप्याः। परिभाषया राश्यायो धुवः । ०।२० । एवमाद्रीमोगः। ४ । दशहतः । ४० ।
ध्यायः ८.
सस्कृतीका-भापाटीकासमनः।
अतीतनक्षत्राणां पञ्चतया पञ्चगुणिताष्टशतेन । ४०००। चतुःसहस्रात्मकेल युतः
कलायो भुवः । ४०४० । राश्याधस्तु । २१७ १२०१ एवं पूर्वापाहाया दशयाण-
तो भोगः । ४० । एकोनविंशतिगुणिताष्टशतेन । १५२०० । युतः परिभाषया
राश्यायो वरः।८।१४ । शतताराया दशगुणितो भोगः । ८०० । त्रयोदेश-
तिगुणिताष्टशतेन । १८४०० । युतश्चतुर्विशतिगुणिताष्टशतरूपो। १९ । २०० ।
जातो ध्रुवो राश्याधः । १० १२० । पूर्वाभाद्रपदाया दशगुणितो भोगः । ३६० ।
चतुर्विशतिगुणिताष्टशतेन । १९२०० । युतो । १९५६० । जातो ध्रुवो राश्यायः ।
१०।२६ । उत्तरापाडामिजिच्छ्रपणधनिष्टानां स्वभोगस्थानात्पश्चास्थितत्वेनोक्तरी-
त्यसम्मवादिनरीत्या ध्रुवका उक्ताः स्वादिस्थानाद्योगतारा यदन्तरकलाभिस्थितास्ता
लाववादशापतिता भोगसंज्ञा उक्ताः। तथाच ब्रह्मसिद्धान्ते । “अष्टौ विंशतिरों
नगजानिय॑धखेपकः । विताः सत्रिभागारसास्यकाश्च पट्शतम् ॥ नवांशा नव-
सूर्याश्च वेदन्द्राः शरवाणभूः । खात्यष्टिः सधृतिर्गोऽतिधृतिविश्वासिनस्तथा ॥ वेदा-
फतिहग्यस्ता कब्धिहस्ता युगार्थहक् ॥ खोत्कृतिस्वंशहीनाश्वरसहस्ताः सह-
स्तिदृक् ॥ खगोऽश्विनः खदन्ताः पइदन्ताः शैलगुणामयः । मेपायव्यादिमध्यांशाः
पडशोनाः खपगुणाः ॥” इति । अथ नक्षत्राणां विक्षेपभागानाह-एपामिति ।
उक्तधुवकसम्बन्धिनामश्विन्यादनक्षत्राणां यथाक्रम क्रमादित्यर्थः । वात्स्वकीयाए-
क्रमाकान्त्यमाकान्तिवृत्तस्यध्रुवकस्थानादित्यर्थः । विक्षेपाविक्षेपमागा दक्षिणा उत्तरा
वा भवन्ति तत्रोत्तरदिश्याश्चिन्यादित्रयाणां दिङ्मासविषयाः क्रमेण दशद्वादशपञ्चेत्यर्थः।
दक्षिणदिशि रोहिण्यादित्रयाणां पञ्चदश नव उत्तरस्यां पुनर्वसोः प.भागाः । पुष्यस्त
खं विक्षेपाभावः । अत्र पञ्चमाक्षरस्य गुरुत्वेन छन्दोमङ्ग आपत्तान दोपः । दक्षिण
स्थामाश्लेपायाः सप्त । उत्तरस्यां मंधांदिवयाणां शून्यं द्वादश त्रयोदश । दक्षिणस्यां
हस्तचित्रयोकादश । अनन्तरं सात्या उत्तरादोश सप्तत्रिंशद । दक्षिणयां विशा
खादीनां पण्णां साधैं : त्रयं चत्वारः । नवसाईपञ्चपञ्च क्रमेण उत्तरदिशि तथा विशे-
पभागा अभिजितः पष्टिः । श्राणस्य त्रिंशत् । धनिरायाः पत्रिंशत् । एक्कारो न्यून
धिकव्यवच्छेदार्थः । चकारः पूरणार्थः । दक्षिणस्यां तुशास्तया । अर्धभागः शत-
तारायाः । तुतारस्तथा । उत्तरस्यां पूर्वाभाद्रादायाश्चतुर्विशतिः । तस्यामेव दिशि
भागा विक्षेपभागा उत्तराभाद्रपदाया माः पाईंशतिः । खेत्या विक्षेपामाः । चकारः
पूरणार्यः ॥ २ ॥ ३॥ ४ ॥५॥६॥७॥ ८ ॥९॥
मा०टी०सरे कसलकर न रोक तार्थ सरिणीको मांति लिखा गय
•२॥ ३ ॥४॥५॥६॥७॥८॥९॥
४ ३२३ . ७८ (१५०) सूर्यसिद्धान्त:- [अष्टमोऽ-- नक्षत्र स्मोग ध्रुव विक्षेपांश मधिनी ४८ ०१८ भरणी ०२० कृत्तिका २/७३० रोहिणी ।१९।३० मृगशिरा २३ भाद्री श७२० पुनवम् पुष्य ३११६ भाश्टेयर ३११९ ७६ मघा ५४ ४९ पूर्वाफल्गुनी ६१ ४।२४ १२३ उत्तराफल्गुनी हस्त ६० ६/२० ११६ पित्रा २६ स्वातो ६.११ ३७३ বিকাশ। ७१३ নাঘা ७.१४ ज्येष्ठा २४ ६ ,८१ पूर्वापाटा ८१४ उत्तराषदा पू-आमध्य ८२० समिजिन् पू-माशेष ६२६/४० प्रत्रणा ३ स शेप ९।१० धनिष्ठा श्रवनका विचतप्पदसन्धि ९।२० ३६३ शतभिषा २०२० १०२६ सत्तर भाद्रपक्ष ११४७ २६३ रेवती ७२ २१।२९।९. यथागस्त्यलन्धस्यविनमहृदयताराणा भूपरिक्षेपास्तदुपपत्ति लोकनयेणाह- अशीतिमागेर्याम्यायामगस्त्यो मिथुनान्तमः ।। विशे च मिथुनस्यांशे मृगव्याघो व्यवस्थितः ॥१०॥ विक्षपो दक्षिण भागः खावैः स्वादपरमात् ।। हुतभुग्ब्रह्मदयो वृपे द्वाविंशभागनौ ॥ ११॥ ४ पूर्व माद्रपद .
ध्यायः ८.] संस्कृतीका-भापाटोकासमेतः ।
अष्टाभिस्त्रिंशता चैव विक्षिप्तावुत्तरण तो॥
गोलं वध्वा परीक्षित विक्षेपं ध्रुवक स्फुटम् ।। १२ ॥
स्वकीयाकान्तिविभागस्थानाक्षिणस्यामशीत्यशैस्तारात्मकोऽगस्त्यो मिथुनान्तगः
कर्कादिमागे स्थितः । अगस्त्यनक्षत्रस्य राशित्रय ध्रुवकाः । दक्षिणविक्षेपोऽशीतिरि-
त्यर्थः । मृगव्याधो लुब्धको मिथुनराशेविंशतिभागे स्थितः । चकारः समुच्चये ।
लब्धकनक्षत्रस्य राशिद्वयं विंशतिभागा ध्रुक्क इत्यर्थः । दक्षिणस्यां चत्वारिंशता भागः
परिभितस्तस्य च क्रान्तिवृत्तस्थानादिक्षेपः । वृषराशी वहिब्रह्महदयौ द्वाविंशमागास्थिता
पनिब्रह्महृदयनक्षत्रयोविंशतिभागाधिकैकराशिध्रुवकः । तो पहिब्रह्महृदयौ । अष्टाभि-
विशता । चकारः ऋमायें । एक्कारो न्यूनाधिकव्यवच्छेदार्थः । उत्तरेणोत्तरस्यामि-
त्यर्थः । विक्षिप्तौ विक्षेपवन्ती। वह्नविक्षेपोऽष्टभाग उत्तरः । ब्रह्महृदयस्योत्तरो विक्षेप-
त्रिंगदित्यर्थः । नन्वेते ध्रुवा विक्षेपाश्च कालक्रमण नियत्ता अनियता घेत्यत आह-
गोलमिति । गोलं वक्ष्यमाणं वध्वा वंशशलाकादिभिर्निवध्य स्फुटं विक्षपं क्रांतिसं-
स्कारयोग्य टुवाभिमुखं ध्रुवकं स्फुटमायनकर्मसंस्कृतं परीक्षेत । स्वस्वकाले दृग्गोचर-
सिद्धमंगीकुरुत । तथा च 'क्रांतिसंस्कारयोग्यविक्षेपायनसंस्कृतववक्योरयनांशवशाद-
स्थिरत्वादपि मयेदानीन्तनसमयानुरोधेन लाघवार्थमायनदृधर्मसंस्कृता ध्रुवाः क्रांतिसं
स्कारयाग्यविक्षेपाच नियता उक्ताः । कालान्तरे गोलयन्त्रेण वेधसिद्धा ज्ञेयाः। नैत
इति भावः । गोलयन्त्रेण धातु गोलबन्धोक्तावधिना गोलयन्त्रं कार्यम् । तत्र खगो.
लस्योपारे भगालमाधारवृत्तस्योपरि विषुववृत्तम् । तत्र ययोक्तं क्रान्तिवृत्तं भगणांशा-
कित्तं च बया ध्वयाष्टिकीलयोः प्रोतमन्यचलं मवेधवलयम् । नच भरणांगाङ्कितं
कार्यम् । ततस्तदोलयन्त्रं सम्यग्धुराभिमुखयष्टिकं जलसमक्षितिजवलयं च यथा भवति
तथा स्थिरं कृत्या रात्रौ गोलमध्यच्छिद्रगतया दृष्टया रेवतीतारां क्लिोक्य मांतिवृत्ते
मीनान्ताइशफलान्तरितपश्चादागं रखतीतारायां निवेश्य मध्यगतयैव दृष्याश्चिन्यादेन-
क्षत्रस्य योगतारां विलोक्य तस्या उपोर तदेधवलयं निवेश्यम् । एवं कृते सति वेधल-
यस्य क्रांतिवृत्तस्य च यः सम्पातः स मीनान्तादग्रतो यावद्भिरंशेस्तावन्तस्तस्य नक्ष-
प्रस्य ध्रुपांशा ज्ञेयाः । वेधवलये तस्यैव सम्पातस्य योगतारायाश्च यावन्तोऽन्तरेऽशा-
स्तावन्तस्तस्य विक्षेपांशा दक्षिणा उत्तरा वा वेद्याः । अथ कदम्बमोतवेधवलयेन वेधे
तु सदा स्थिरा ध्रुवका आयनहकर्मासंस्कृताः । परन्तु कदम्बतारयोरभावादशक्यमिति
यथोक्तोधेनवायनहकर्म संस्कृता ध्रुवाः शराच धृवाभिमुखाः स्फुटा: सिद्धा भवन्तीति
दिक् ॥ १०॥ ११ ॥ १२ ॥
मा टो-अगस्त्यका १० विक्षेपांश ८०६। मृगव्याध व २ । २० वि ४०१६
भाग्न व ११ २२ वि० ८३ ब्रह्मादय ध्रुव १ .१२२ वि ३०३ । गोल बनानेमें स्पष्टविक्षेप
मोर समस्त ध्रुवोंकी परीक्षा करे ॥ १० ॥ ११ ॥ १२ ॥
(१५२) सूर्यसिद्धान्तः- अमा- अथ रोहिणीशक्टमेदमाह- वृषे सप्तदशे भागे यत्य याग्योऽशवयात् ।। विक्षेपोऽभ्यधिको भिन्द्याद्रोहिण्या शक्टं तु सः ॥ १३ ॥ वृपरागो सप्तदशेऽश यस्य ग्रहस्स भागदयाधिको विक्षेपो दक्षिणः स ग्रहो रोहि- ध्याः गयट दाक्यकारमनिवेद मिन्यात् । तन्मध्यगतो भवदित्यर्थः । तुकारा- दहविक्षेपो रोहिणीविक्षेपादरूप इति विशेषार्यकः । विज्ञपस्य दक्षिणस्व रोहिणविक्ष- पादधिकत्वे शकावहिदक्षिणभागे अरस्त्र स्थितत्वेन तद्दकत्वाभावात् ।यन शक- टामिनक्षत्रस्य धृव एक्राशिः सप्तदशांशाः । दक्षिणा दारो भागदयामिति वेधसिद्धा स्पष्टा युक्तिः ॥ १३ ॥ भाटी०-रोहिणीका शरटमेदकारी ग्रह वृपके १७ लशमें, और दो अंश दक्षिण विक्षपस्थित ॥ १३॥ अथ भग्रहयोगसाधनार्य योगसाधनरातिमाह- ग्रहवद्युनिशेभानां कुर्याकर्म पूर्वपत् ।। ग्रहमेलकवच्छेपं ग्रभुत्त्या दिनानि च ॥ ११ ॥ अहवयानशे ग्रहाणां यथा दिनरात्रिमाने आक्षटकर्मार्थ कृते तथा दिनमानरा- त्रिमाने माना नक्षनवराणामाक्षकमर्थि गणाः पुर्यात् । तदनन्तरं पूर्ववन्न- सननित्योदयास्नी साधयित्वाऽभीष्टकाले दिनगतशेपाभ्या नतं कृत्वा विपुरच्छाययाभ्य- स्तावित्यादिनत्यर्थः । कर्म कुर्यात् । अत्र नक्षनध्रुवसे पर्वतेनायनर्माप्यु- दाहरणे कृतम् तदयुक्तम् । तस्य धपके स्वतःमिहत्वात् । तदनन्तरं शेष नक्षत्रग्रह- युतिसाचन यहधातुल्यता रूप ग्रहमेलबद्रयोगमाधनरीत्या ग्रहानन्तरकला इत्या- टिना कार्यम् । ननु तत्र “ग्रहान्तम्पलाः स्वस्तभुक्तिलिप्सासमाहताः । भुक्त्यन्तरेण चिभनेत्" इन्युक्त क्षत्रस्य का ग तेाधे यत आह अहमुत्योति केवलया ग्रहगत्या नद- स्य फलं ग्रहध्रुवान्तररूपग्रह संस्कर्य ध्रुपसमा ग्रहो भवति । नक्षस्य पूगयभावाइधु- यो यथास्थित इत्यर्थः । तनुनयाप ग्रहनक्षत्रयुत्किार साधनं भुक्त्यन्तगसम्भवात्क) कार्यामति मन्दारात्यत माह-दिनानोति । अभीष्टसमयादिवमित्यादिना केव- लया ग्रहगन्या ग्रहनक्षनयुतिदिनानि साध्यानि । यः समुच्ये । नक्षनाणां गत्य- मापात् ॥ १४ ॥ माटो-मही समान नक्षत्रोंके दिवारात्रिमान नुयारी हार्भ साधन करे મોર समस्तग्रह युति समान यो। नरप-नरको स्थानमें प्रभुपिके ग्रहण करनेसे सब ठीक हो जाधगा।।१४।।
ध्यायः ८.] संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः । अचाभीष्टकालादहनक्षत्रयुतिकालस्य गतेष्यत्वमसम्भ्रमार्थ पुनराह- एष्यो हीने ग्रहे योगो ध्रुवकादधिके गतः ।। विपर्ययाकंगते आहे ज्ञेयः समागमः ॥ १५॥ नक्षत्रधुवादुक्तादह आयनकर्मसंस्कृतग्रह आक्षकर्मसंस्कृतनक्षत्रभूपकात् । फर्म- दयसंस्कृतग्रह इति विवेकार्यः । न्यूने सति योगो नक्षत्रग्रहयोगः स्वाभीष्टसमयानाषी । अधियो सति पूर्व जातः वक्रगते ग्रहे विपर्ययादुक्तपरीत्यात्समागमो नक्षत्रप्रहयोगो ज्ञेयः । हीने ग्रहे गतोऽधिके ग्रह पप्यो योगः। अत्रोपपतिनक्षत्रस्य गत्यभावेन सदा- स्थिरत्वाद्रहगमनेनैव योगसम्भवादिति सुगमतरा ॥ १५ ॥ भाटी०-नक्षत्र ध्रुवसे संस्कृत ग्रह-यून होनेसे योगपीछे होगा, अधिक होनसे पहले होगया है। वक्रगति ग्रहका यह समागम ावपरीत होता है ॥ १५ ॥ अयाश्विन्यादिनक्षत्रस्य बहुतारात्मकत्वात्कस्यास्ताराया एते टवका इत्यस्य योग- ताराया व किमित्युत्तरं मनसि धृत्वाऽश्विन्यादिनक्षत्राणां योगतारां विवः प्रथम- मेषां नक्षत्राणां योगतारामाह- फाल्गुन्योभाद्रपदयोस्तथैवापाढयोदयोः ॥ विशाखाश्विनितीम्यानां योगतारोत्तरा स्मृता ॥ १६ ॥ एपामुक्तनक्षत्राणां प्रत्येकं स्वतारासु योत्तरदिवस्था तारा सा योगतारा गोलत- त्व रक्ता ॥ १६ ॥ भाव है-दोनों फाल्गुनी, दोनों माद्रपद, और पूर्वापादा, उत्तराषादा, विशाखा, अश्विनी और मृगशिर, इनके उत्तर स्थित तारामको योगतारा कहते हैं ॥ १६ ॥ अयान्ययोरनयोगह- पश्चिमोत्तरतारा या द्वितीया पश्चिमे स्थिता.॥ हस्तस्य योगतारा सा श्रविष्ठायाश्च पश्चिमा, ।। १७ ।। हस्तनक्षत्रं पञ्चतारात्मकं हस्तपञ्चाङ्गुलिसन्निवेशाकारम् । तत्र नैत्रत्यदिगाश्रित- पश्चिमावास्थितताराया उत्तरदिगवस्थितताराया द्वितीया पूर्वोक्तातिरिक्ता पश्चिमे वाय- व्याश्रिते स्थिता सा हस्तस्य योगतारा ज्ञेया । उत्तरतारासन्ना पश्चिमाश्रिता तारा हस्तस्य योगतारेति फलितार्थः। धनिष्ठाया योगतारामाह-श्रविष्टाया इति । धनिष्टाया-. स्तारासु या पश्चिमदिवस्था सा तस्या योगतारा । चः समुचये ॥ १७ ।। मा० टो०-पंचतारात्मक हस्तनक्षत्रक पाश्चमोत्तर तारके पश्चिममें स्थित हुमा तारा हन्त- का योग तारादे मोर धनिष्ठाके पश्चिम स्थिततारा धनिष्ठाका योगतारा है ॥ १७॥ विपर्ययादमागता इति वा पाटः ।
सूर्यसिद्धान्तः-- [ अष्टम:- अथान्येपामेपामाह- ज्येष्ठाश्रवणमैत्राणां वार्हस्पत्यस्य मध्यमा । भरण्याग्नेयपित्र्याणां खत्याश्चैव दक्षिणा ॥ १८ ॥ ज्येष्ठाभरणानुराधानां पुष्यस्य चं, प्रत्येकं तारात्रयात्मकत्वान्मध्यतारा योगतारा स्यात् । भरणीकृत्तिकामवानां खेत्याः । चः समुच्चये । प्रत्येक स्वताराम या दक्षिण दिवस्था सा योगतारा ॥ १८ ॥ भा. -ज्येष्ठा, श्रवण, म सघा, और पुप्यका मध्यतारा, भरणी, कृत्तिका. मघा और रेवतीछे दक्षिणस्थित तारेही योगतारे हैं ॥ १८॥ अथान्येपामेपामवशिष्टानां चाह- रोहिण्यादित्यमूलाना प्राची सार्पस्य चैव हि ॥ यथा प्रत्यवशेषाणां स्थूला स्याद्योगतारका ॥ १९ ॥ गोहेणीपुनर्वसुभूलानामाश्लेषोयाश्च मत्येकं स्वतारा पूर्वदिक्स्था सैर योगतारेत्येव. घोरर्थः । प्रत्याशेषाणामअशिष्टनक्षत्राणामाचित्रास्वात्याभजिच्छतताराणां स्ववाराम याऽत्यन्तं स्थूला महती सा योगतारा स्यात् ॥ १९ ॥ भा० टी-हिणी, पुनर्व, मूल व श्लेपाके पूर्वस्थिततारे और बाकी नक्षत्रोंके स्यूल (समल) ताराही योगतारा है ॥ १९ ॥ अथ ब्रह्मसंज्ञकनक्षवावस्थानमाह- पूर्वस्या ब्रह्महृदयादेशकः पञ्चभिः स्थितः ।। प्रजापतिर्बुपान्तेऽसौ सौंग्येऽएत्रिंशदेशकः ॥ २० ॥ ब्रह्महृदयस्यानात्पूर्वभागे पञ्चभिरंशः प्रजापतिस्तारात्मको ब्रह्माक्रान्तिवृत्ते त्यितः। कुत्रेत्यत आह-वृपान्त इति । युपान्तनिकटे । एकरााशिः सप्तविंशत्यंशा अमानवक इत्यर्थः । अस्य विक्षेपमाह-मसाविति । ब्रह्मा उत्तरस्यामष्टत्रिंशद्भागैः स्थितः । अष्टनिशद्भागा अस्य विक्षेप इत्यर्थः ॥ २० ॥ भा. टी-प्रजापति ब्रह्मदयके ५ अंश पूर्वमें स्थित हैं। इसका ध्रुव वृपान्त भयो ११२७ भोर क्षेप ३1८३॥ २० ॥ अथापांवत्सापयोस्तारपोरवस्थानमाह- अपांवत्सस्तु चित्रायामुत्तरेऽशेस्तु पञ्चभिः ॥ बृहत् किञ्चिदत्तो भागेरापः पइभिस्तथोत्तरे ।। २१ ॥ 'चित्रायाः सकाशादपांपत्ससंक्षकस्तारात्मकः पञ्चभिर्मागरुत्तरस्यां स्थितः । मतकारचित्रावतुल्यबुवकार्थकः । द्वितीयतुकारश्चित्रादिक्षेपस्य दक्षिगमागट्यात्मक प्रथ
]
अध्यायः ९.
संस्कृतटोका-भाषाटीकासमेतः।
त्वादपांवत्सविक्षेप उत्तराभाग इति स्फुटार्थकः । अतोऽपांवत्सात् किञ्चिदल्पान्तरण
बृहत्स्थूलतारात्मक आपसंज्ञकः । तथापांवत्सात्पभिरशरुत्तरस्यां स्थिनश्चित्रावक
एवापस्य ध्रुवको विक्षेप उत्तरो नवांशा इत्यर्थः ॥ २१ ॥
मा० टी०-चित्राके ६ मंश उत्तरमें पवित्स मंगस्थित, मप तिसकी अपेक्षा कुछ बडा
है. सोमपसके ६ मश उत्तरमें स्थित हैं ॥ २१ ॥
अयाग्रिमग्रन्यस्यासंगतित्वनिरासार्थमाधिकारसमाप्ति फक्कियाह-सष्टम् । रंग-
नायेन रचिते सूर्यसिद्धान्तटिप्पणे । ग्रहःक्याधिकारोऽयं पूर्णी गूढमकाशके ॥ इति
श्रीसकलगणकसार्वमोमवल्लालदेवज्ञात्मजरंगनाथगणाविरचिते गूढार्थप्रकाशके नक्ष-
प्रग्रहयुत्यधिकाः संपूर्णः ॥
इति नक्षत्रग्रहयुत्याधिकारः ॥
आठवां अध्याय समाप्त ।
नवमोऽध्यायः।
अथोदयास्ताधिकारो व्याख्यायते । ननु सूर्यणास्तमनं सहति प्रागुक्तग्रहयुत्यधि-
कारानन्तरं नवग्रहयुत्यधिकारात्मागेयोदयास्ताधिकारो निरूपणीय इत्यतोऽत्र तसं.
गतिप्रदर्शनार्थमादी तदधिकार प्रतिजानीते-
अथोदयास्तमययोः परिज्ञानं प्रतीयते ।।
दिवाकरकराकान्तमूर्तीनामल्पतजसाम् ॥ १॥
अथ नक्षत्रग्रहयुत्याधिकारान्तरं सूर्यकिरणाभिभूता मूर्तिर्वियं येषां तेषां चन्द्रादेप-
इग्रहाणां नक्षत्राणां च । अत एवाल्पतेजसां न्यूनप्रमावतामुदयास्तमवयोः । अग्रिम-
काले सूर्यादधिकाप्सन्निहितसन्निहितत्यसम्भावनया क्रमेणोदयास्तयोः सूर्यान्निस्मृतस्य
यस्मिन्काले यदन्तरण प्रथमदर्शनं सम्भावितं स उदयः । सूर्याइरस्थितस्य यस्मिन्
८ काले यदन्तरेण प्रथमादर्शनं सम्भावित सोऽस्तः । अनेन नित्योदयास्तव्यवच्छेद-
स्तयोरित्यर्थः। परिज्ञानं सुक्ष्मज्ञानप्रकारः प्रकीर्त्यते । अतिसूक्ष्मत्वेन मयोच्यत
इत्यर्थः । तथाच ग्रहइत्युद्देशेऽस्तमनमुद्दिष्टमपि तस्य पूर्वमेव सूर्यासमत्व एष सम्म
चात्तद्विलक्षणतया ग्रहयुतिप्रसंगेनोक्तम् । नक्षत्रप्रहयुतिस्तु ग्रहयुतिवादवि तदनन्तर-
मुक्ता । अतः प्रतिवन्धकजिज्ञासापगमेवश्यवक्तव्यत्वादस्यावसरसंगतित्वात् । तत्सं-
गत्या नक्षत्रग्रहयुत्याधिकारानन्तरं प्रायद्दिष्टमस्तमनं तत्प्रसंगाददयश्च प्रतिपाद्यत इति
माव:॥१॥
सूर्यसिद्धान्त:- [ नवमोड- माटी०-मब उदयास्तपरिज्ञान कहा जाता है। अल्प (थोडे ) तेनाले ग्रह सूर्यका किरणसि माक्रान्त होकर मास्तमन होजाते हैं ।॥ १॥ तत्र प्रथम पञ्चताराणां पश्चिमास्तपूर्वोदयावाह- सूर्यादभ्यधिकाः पश्चादस्तं जीवकुजार्कजाः ।। ऊनाः प्रागुदयं यान्ति शुकज्ञो वक्रिणो तथा ॥२॥ वक्रमही शुक्रबुधौ तथा सूर्योदधिको पश्चिमास्तं गच्छत्तः सूर्यादल्पी पूर्वोदय भामुतः । शेष स्पष्टम् ॥ २॥ भा०टी०-सूर्य सटकी बनिस्बत ग्रहस्पट अधिक होने से बृहस्पति, मंगल और शनि पश्चिममें अस्त होते हैं । तिनके स्फुट सूर्यको अपेक्षा कम होने से पूर्व में उदय होते हैं । पनी शुक्र और बुधभी तैसाही है ।।२। अथ चंद्रवुधशुक्राणां पूर्वास्तपश्चिमोदयवाह- ऊना विवस्वतः प्राच्यामस्तं चन्द्रज्ञभार्गवाः॥ वजन्त्यभ्यधिकाः पश्चादुदयं शीघ्रयायिनः ॥३॥ शीघ्रयायिनः सूर्यगत्यधिकगतयः इत्यर्थः । एते बुधशुकारर्कगत्यल्पगती सूर्याद- लप पूर्वास्नमधिकौ च पश्चिमोदयं न प्राप्नुन इत्युक्तम् । शेपं स्पष्टम् । अत्रोपपत्तिः । रविशतितोऽल्पगतिग्रहोऽादूनश्चेत्याच्या दर्शनयोग्यो भवितुमर्हति । यतः सूर्यस्पाधि पत्वेन यागतित्वाचोत्तरोत्तरमधिकविप्रकर्षात्मवहवशेन न्यूनस्य, पूर्वमुदयादधिकस्यान- न्तरमुदयनियमाद्रहविम्बस्य प्राकू क्षितिजसंलग्नताकालानन्तरं । यावत्सूर्यस्य तादृशः फालस्तापत्पर्यन्तं विभक दर्शनसम्भवात् । एवं यदाल्पगतिः सूर्यादधिकस्तदा प्रब. हवशेनार्कस्य पूर्वमुदयादनन्तरमुदितग्रहस्य दर्शनासम्भवात्मवहवशेनादी न्यूनास्या- स्तसम्भवादनन्तरमधिक्यहस्यास्तसम्भवात्सूर्यास्तानन्तरं पश्चिममागे ग्रहदर्शनसम्भवे. प्यधिकगतिसूर्यस्य पृष्टस्यितत्वेनोत्तरोत्तरमधिकसन्निकर्पोत्पश्चिमायामदर्शनं सम्भवत्येव । ते तु भौमगुरुशनयः । वकत्वे न्यूनगतित्वावुधशुक्रौ चौते । अयार्कगतितोऽधिकगात. ग्रहः सूर्यादूनस्तदोक्तरीत्योत्तरोत्तरमधिकसनिकपत् पूर्वस्मिन्नदर्शनं याति यदा सूर्या- दधिकस्तोतरीत्योत्तरोत्तरमधिकविप्रकपात् पश्चिमायामुदयः । ते तु शीघ्राश्चन्द्रबुध- शुका इत्युपपन्नमुक्तम् ॥ ३ ॥ भा०टी०-चन्द, बुध और शुक्र यह शीघयाची तीन ग्रह सूर्यको अपेक्षा म स्थान स्थित हो तो पूर्व में अस्त और अधिक होने से पश्चिममें उदय होता है।॥ ३ ॥ मयामीरदिन आसने सूचोदयास्तकालिकी सूर्यटग्नही तत्कालक्षानार्थ कार्या- वित्याहina 11 शाय: ९.] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतः । सूर्यास्तकालिको पश्चात्याच्यागुत्यकालिको ।। दिवाचाग्रही कुहिकर्माय ग्रहस्य तु ॥ ४॥ पश्चात्पश्चिमास्तोदयसाधनेऽभीष्टदिने आसन्ने सूर्यग्रहो सूर्यास्तकालिकौ कुर्याद्गण- कः । पूर्वास्तोदयसाधने सूर्योदयकालिको कुर्यात् । दिनेऽभीष्टकाले कुर्यात् । चकारो विकल्पार्यकः । अनन्तरं ग्रहस्य धर्म । आयनाक्षटकर्म द्वयं कुर्यात् । तुकार आक्षकमिश्लोकपूक्तिमिति विशेपार्यकः । अत्रोपपत्तिः । पश्चादस्तोदयसाधने पश्चि- मायां तद्दर्शन मिति सूर्यास्तकालिको सूर्यग्रहाविष्टकालांशसाधनायें सूक्ष्मौ । पूर्वोदया- स्तसाधने पूर्वदिशि तदर्शन मिति सूर्योदयकालिको सूर्यग्रहाविष्टकालांशसाधनाथ सूक्ष्मावन्यकाले तु किश्चित्स्थूलावपि कृतौ धर्मसंस्कृतग्रहस्य सूर्यवत् क्षितिजसलग्न- तायोग्यत्वाकर्मसंस्कृतो ग्रहः कार्य इति ॥ ४॥ मा०टा०-पश्चिममें हो से सूर्यास्तकालका और पूर्वमें होनेसे सूर्योदयकालका प्रइ मोर सूर्यस्पष्ट निर्णय करना चाहिये । तदुपरान्त ग्रहका कर्म साधन करे ॥ ४ ॥ अयेष्टकालांशानयनमाह- ततो उनान्तरमाणाः कालांशाः पप्टिभाजिताः॥ प्रतीच्या पड्भयुतयोस्तदल्लपान्तरासवः ॥५॥ ततस्ताभ्यां सूर्यग्रहाभ्यां लग्नान्तरप्राणाः भोग्यासूनूनकस्यायेत्युक्तमकारेणा- न्तरकालासवः पष्टिभक्ता इष्टाः कालांशा भवन्ति । मागुदयास्तसाधने प्रतीच्या पश्चिमो दयास्तसाधने पड्भयुतयोः पट्टाशियुतयोः सूर्यदृग्ग्रहयोर्लग्नान्तरासवः । अन्तरासर- स्तद्वत् पष्टिभक्ता इष्टकालांशा भवन्तीत्यर्थः । अत्रोपपत्तिः । ग्ग्रहसूर्याभ्यामन्तरंकालो ग्रहत्य सूर्योदयकाले दिनगतं पूर्वोदयास्तनिमित्तमुपयुक्तम् । एवं पश्चिमोदयास्तनिमित्र र्यग्ग्रहाभ्यामस्तकालामुभिरन्तरकालः सूर्यास्तकाले ग्रहस्य दिनशेपकाल उपयुक्तः। तत्रास्तकालानामनुक्तेरुदयासुभिः साधनार्य मषड्भी सूर्यदृग्ग्रही कृतो स कालोस्वा- स्मकः । अहोरात्रामुभिश्चत्रकलातुल्यैश्चमांशा लभ्यन्ते तदेष्टासुभिः यइत्यनुपाने प्रमा. फलयोः फलापवर्तनेन हरस्थाने पष्टिः । अतोऽस्वात्मकान्तरकालः परिभक्त - कालांश इत्युपपन्नमुक्तम् । अत्रेदमवधेयम् । सूर्योदयकालिकाभ्यामर्फहमदागाणा- नोतेन दिनगतेन पूर्व चाल्यो दृग्ग्रहः । सूर्यास्तकालकाभ्यां सपमाभ्यामरममा भ्यामानौतेन दिनशेपेणाने चाल्यः सपइभो दृग्ग्रहः । क्रमेण ग्रहोदयास मा. श्चिमग्नहै। भवतः । ताभ्यां सूर्यसपड्मसूरियां च क्रमेण पूरी गाना मारय सूर्योदयास्तकाले क्रमेण दिनगतशेषौ नाक्षत्रो पष्टिभक्तो काम सयौ मोटा 7 पोलनान्तरमाणाः इति का पाठः।
सूर्यसिद्धान्त:- [ नवमोऽ-- लिकायामानतिकालेन पूर्ववचालिताम्यां प्राक्पश्चिमहन्ग्रहाभ्यां सूर्यमपड्मसूर्याश्या । चानांतकालो नाक्षत्रोऽपि सूक्ष्मासनः । सूर्योदयास्तसम्बन्धाभावात्तदुत्पन्नाः कालांशा अपि तथा । अथ सूर्योदयातकालिकाम्यामानीतेक्वारं कालात्कालांशाः स्थूला इष्टकालिकाम्यामानीतकारकालात्कालांशा अतिस्थूला उभयत्र काटस्य सावनत्वात् । नहि सापनपष्टिघटोभिश्वकपरिपूर्तियन सूक्ष्माः मियन्तीति ॥५॥ मा० टी०-प्रकास में सूर्य लार ग्रहके स्फुटसे लग्नान्तर प्राण निर्णय करके ६० से भाग घरनेपर काशिरेगा । पश्चिमवार, ६ राशेपुक्त दो स्पट एनान्तर प्राणनिर्णय करे॥५॥ अथ ये कालांशरुदयोऽस्तो वा भत्ति तान् विवसुः प्रथमं गुरुशानिभौमानां काला शानाह- एकादशामरज्यस्य तिथिसंख्यार्कजस्य च ॥ अस्तांशा भूमिपुत्रस्य दश सप्ताधिकास्ततः ॥६॥ वत इष्टकालांशापगमानन्तरमस्तांशाः । अत्तो परेशैभवाते तेंऽशा अस्तोपलक्ष- गादुदयांशा ज्ञेयाः । अमरेज्यस्य गुरोरेकादश कालांशाः । गने पंचद- शसंख्याः कालांदाः । चः समुश्य । भौमस्य सप्ताधिका दश सप्तदश कालांशा इत्यर्थः ॥६॥ भा० टी-वृहस्पति ११ शनि १५ मगल २७, यही तिनके समाश ( कालोश) अथ शुक्रस्पाह- पश्चादस्तमयोऽष्टाभिरुदयः प्राइमहत्तया ॥ प्रागस्तमुदयः पश्चादल्पत्वाद्दशभिभृगोः ॥ ७ ॥ शुक्रस्य महत्तया वक्रत्वेन नीचासन्नत्वात्स्थूलविम्बतया पश्चिमायामस्तोऽधाः का- लांशैः माच्यामुदयश्च तैः । नाधिकैः । प्राचां शुक्रस्याल्पत्यादणुविम्वत्वादशभिः कालांशैरस्तं गणकः कुर्यात् । नाल्पैः । पाश्चमायानुदयस्तस्याविम्वस्य दशमिः कालांशैरव ज्ञेयः ॥ ७ ॥ भा. टी.-स्थूलताक हेतुसे शुक्रा पश्चादरत्त ८ पालाश में होता और प्रयोदय होता है। दिन प्रागरत भोर पश्चाइयमें विपके छटे होनस १० भश लेने पड़ते है ॥ ७॥ अथ बुधस्याह- एवं वुधो द्वादशभिश्चतुर्दशभिरेशकः ।। की शीघ्रगतिश्चात्किरोत्यस्तमयोदयो ॥ ८ ॥ कशीघगरि म इति वा भवान्ताम् । प ध्याय:९.] संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः । वकी शीघ्रगतिः । चः समुचये । बुधः सूर्यादादशभिश्चतुर्दशभिश्व कालांशेरस्तो- दयौ । पर्व शुकरीत्या करोति । पश्चादस्तं प्रागुदयं च द्वादशमिः कालांशेर्महाबिम्ब- तया बुधः करोति । मागस्तं पश्चादयं च चतुर्दशामिः कालांऔरणविम्बत्वाचुध करो- तीत्यर्थः ॥ ८॥ मा० टी०-६स प्रकारसे बुध पक्री होनपर सूर्यसे १२ अंश और शीघ्रगति होनेपर १४ काश इपास लाभ करता हे ॥ ८॥ अथ प्रोक्तेष्टकालांशाभ्यामस्तस्योदयस्य वा गतेप्यत्वज्ञानमाह- एभ्योऽधिकः कालभागेश्या न्यूनैरदर्शनाः ॥ सवान्ति लोके खचरा भानुभाग्रस्तमूर्तयः ॥ ९ ॥ एभ्य एकादशामरेज्यस्येति श्लोकत्रयोक्तेभ्योऽधिकारिष्टकालांशदृश्या दर्शनयोग्या अभीष्टकाले ग्रदा भवन्ति । तथा चास्तसाधने दृश्यत्वे अस्त एण्यः । उदयसाधने दृश्यत्व उदया गत इति भावः । अल्परिष्टकालांशेर्पहा लोके भूलोके यदर्शना न वियते दर्शन दृष्टिगोचरता येपां ते । अदृश्या अभीष्टकाले भवन्ति । नवदृश्याः कुतो मवन्तीत्यत आह-भानुभाग्रस्तमूर्तय इति । सूर्यासन्नत्वेन सूर्यकिरणदीप्त्या प्रस्ता अभिभूता सूर्यकिरणप्रीतहतलोकनयनाविपया मूतिविम्बस्वरूपं येषां त इत्यर्थः । तया चास्तसाधन अदृश्यत्वेऽस्तो गतः । उदयसाधनेऽदृश्यत्व उदय एष्य इति भावः । अत एव “उक्तभ्य ऊनाभ्याधिका यदीष्टाः खेटोठयो गम्यगनस्तदा स्यात् । अतोऽ- न्यथा चास्तमयोऽभगम्यः" इति भास्कराचार्योक्तं संगच्छते । अत्रोपपाः । उक्त- कालांशे यत्काले ग्रही सावितो तत्काल एव ग्रहस्योदयोऽस्तो वाहतः । उत्तरलं शानां सूर्यसानिध्यजनितान्तमहादर्शने हेतुत्वप्रतिपादनात् । तथा कालांशा रहे म्योऽल्पास्तदा ग्रहस्यास्तंगतत्वमेवेत्युदयसाधनइष्टकालांशा उम्पोऽल्पास्वदेशयता- दो ग्रहस्योदयः । यदीष्टकालांशा उत्तेभ्योऽधिपारतदेष्टवालाइबरयोदया जाना एवमस्तसाधन इष्टकालांशा अधिकास्तदेष्टकालादले प्रहारतः। पदीलांशान्ता स्तदेष्टकालात्पूर्व ग्रहास्तो जात इत्युपपन्नमुक्तम् ॥ ९ ॥ मा० टी-सूर्य उत्तर यह हुए कालाशी अपेक्षा भाग स्थित होकर दम्प होता है, काम होनेपर जब सूर्यके तेजसे विम्य निजता है सरोगेश मा दिसाईनों देते ९॥ अयोदयास्तयोगतेप्यादिनाद्यानयनमाह- तत्कालांशान्तरकला भुक्त्यन्तराविभाषिता ।। दिनादितत्फलं उन्धभुजियांगेन लिया || (१६०) सूर्यसिद्धान्त:-. [ नवमो- उक्तेष्टकालांगयोरन्तरस्य कलाः सूर्यग्रहयोर्गत्योः कलात्मकान्तरेण भक्ताः । दिना- दिवमुदयास्तयोः फलनुदयास्तचर्गितैष्यदिनायं भवतीत्यर्थः । वक्रगतिग्रहस्य विशेष- माह । लब्धमिति । वक्रिणो वक्रग्रहस्य भुक्तियोगेन सूर्यग्रहयोः कलात्मगतियोगेन मक्ताः फलं गतैष्यदिनाचं ज्ञेयम् । अत्रोपपत्तिः । सूर्यग्रहयोगत्यन्तरकलाभिरेक दिन तदेष्टमोक्तकलाशयोरन्तरकलाभिः किमित्यनुपातेनोदयास्तयोरभीष्टकालाद्गतैयादिनाद्य- बगमः । वक्रग्रहे तु सूर्यग्रहयोर्गतियोगेन प्रत्यहमन्तरवृद्धगतियोगादनुपात उपपन्न इत्युपपन्नमुक्तम् ॥ १० ॥ भा० ₹०-अपने २ कालांशमे इष्टकालांश अलग करके क्ला बनाय भुक्त्यन्तरसे मागक- रनेपर दिनादि फल होंगे वक्री हनेपर मुक्तियोग ग्रहण करना चाहिये ॥ १० ॥ अथ ग्रहगति कलयोः क्रांतिवृत्तस्यत्वाकालांशान्तरस्याहोरात्रवृत्तस्थत्वाचानुपातः प्रमाणेच्छयोजात्वनायुक्त इति मनसि धृत्वा तयोरेकेजातत्वसम्पादनाथै ग्रहगत्योरि- च्छाजातीयत्वं वदस्तदन्तरणानुपातस्तु युक्त एवेत्याह- तल्लनासुहते भुक्ती अष्टादशशतोद्धृते ।। स्यातां कालगती ताभ्यां दिनादिगतगम्ययोः ॥ १३॥ . मुत्ती रविग्रयोर्गती फ्लात्मके तलग्नासुहते कालसाधना ग्रहस्य यो राश्युदयो गृहीतस्तेनात्यात्मकोदयेन गुणित अष्टादशशतेन भक्ते फले सूर्यग्रहयोः कालांशवत्काल गती साताम् । ताभ्यां गतिभ्यां गतगम्ययोरुदपास्तोदिनादिपूर्वोक्तमकारेण साध्यम् । नतु पूरोक्तप्रकारेण ययास्थितगतिभ्यां स्थूलत्मपत्तेः । अत्रोपपत्तिः । एक्राशिकलाभौ रायुदासास्तदा गतिकलाभिः कइत्यनुपातेनाहोरानते गत्यसवः कलानमा इत्युपपन्नमुक्तम् ॥ ११ ॥ भान्टी-दो गुक्तियों को उम उग्नप्राणमे गुष्करके १८०० से माग करने पर काल गाते होगी। नियम ( १० श्लोरोक्त) गत और गम्यदिनादिनिर्णय करे ॥ ११ ॥ अथ नक्षत्राणां सूर्यसान्निध्यपशादस्मोदयज्ञानाथै कालांशान् विवाः प्रथममे पामाह- स्वात्यगस्त्यमृगव्यायचित्राज्येष्ठाः पुनर्वसुः ॥ अभिजिद्ब्रह्महृदयं त्रयोदशभिरंशः ॥ १२ ॥ मृगव्याधो लुब्धः। प्रयोदशामः कालांशेदृश्यानि नक्षमाणि भवन्ति । शेष स्परम् ।। १२ ॥ मा० टी०-पानी, अगस्त्य, मृगव्याम, चित्रा, ज्येष्ठा, पुनस, मभिजित, ब्रह्महदष इनका बारश १३ अश॥ १२ ॥ , ध्यायः ९. संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः। (१६१) अथान्येपामेपामाह- इस्तश्रवणफाल्गुन्यः श्रविष्ठारोहिणीमघाः ।। चतुर्दशांशकईश्या विशाखाश्विनिदैवतम् ॥ १३ ॥ फाल्गुनी पूर्वोत्तराफाल्गुनीद्वयम् । अश्वितिदेवतमश्विनीकुमारो देवतं स्वामी यस्ये- त्यश्विनीनक्षत्रम् । दृश्या उपलक्षणाददृश्या अपि । लिंगपरिणामश्च यथायोग्य बोध्या। शेपं स्पडम् ॥ १३ ॥ मा० टी०-हस्त, श्रवण, उत्तराफाल्गुनी, पूर्वाफाल्गुनी, धनिष्ठा, रोहिपी, मधा, विशाला और मश्विनी, इनका कालांश १४ अंश हैं ॥ १३ ॥ अथान्येपामेपामाह- कृत्तिकामैत्रमूलानि सा रौदर्शमेव च ।। दृश्यन्ते पञ्चदशभिरापानाद्वितयं तथा ॥ १४ ॥ कृत्तिकानुराधामृलनक्षत्राणि पञ्चदशभिः कालांशैदृश्यन्ते । उपलक्षणान्न दृश्य- न्तेऽपि । एवकारो न्यूनाधिकव्यवच्छेदार्थः । आश्लेपार्दा । चः समुच्चये । आपाढा- द्वितयं पूर्वोत्तरापाढाद्वयं तथा पञ्चदशकालांशैदृश्यन्त इत्यर्थः ॥ १४ ॥ भा०टा०-कृत्तिका, अनुराधा, मूल, आश्लेषा, आदी, और पूर्वाषाढ व उत्तराषाढ इनके २५ मशहैं ॥ १४ ॥ अथान्येपामवशिष्टानां चाह- भरणीतिष्यतौम्यानि सौम्यात्रिःसप्तकाशकैः ।। शेपाणि सप्तदशभिर्दश्याश्याने भानि तु ॥ १५॥ तिष्यः पुष्यः सोमदैवतं मृगशिरोनक्षत्रमेतानि नक्षत्राणि सौक्ष्यादणुविम्बत्वाच त्रिसप्तकांशकैरकविंशतिकालांशैश्यादृश्यानि । उदितान्यस्तंगतानि च भान्ती- त्यर्थः । शेपाणि पूर्वाधिकारोक्तनक्षत्रेपूक्तातिरिक्तानि शततारा पूर्वोत्तराभाद्रपदारेवती- संज्ञान । वहिब्रह्मापांवत्सापसज्ञानि च सप्तदशमिः कालांशैदृश्यादृश्यानि भवन्ति । तुकारो दृश्यादृश्यानीत्यत्र समुच्चयार्थकः ॥ १५ ॥ मा०टी०-भरणा, पुष्य, और मृगशिरा इनरे सूःम होनेसे २१ अशमें, व और सप नक्षत्र १७ अंशमें दिखाई देते हैं ॥ १५ ॥ अथ दिनाद्यानयनार्थमिच्छाया एव प्रमाणजातीयकरणत्वमाह- अष्टादशशताभ्यस्ता दृश्यांशाः स्वोदयामभिः ॥ विभज्य लब्धाः क्षेत्रांशास्तईश्यादृश्यताथवा ॥ १६॥ श्यांशाः कालांशा अष्टादशशतगुणितास्तान्स्योदयासुभिर्गहराश्युदयाभिभवत्वा लन्धाः क्षेत्रांशाः कान्तिवृत्तस्थांशास्तैरंशैश्यादृश्यता । उदयास्ती प्रकारान्तरेणी सूर्यसिद्धान्तः- [नवमः- तर्गत्या ज्ञेयो । कलांशाभ्यां क्षेत्रांशावानीय तदन्तस्कला यथास्थितगत्योरंतरण योगेन वा भक्ताः फलमुदयासायोगतप्यदिनाचं पूर्वागतमेव स्यादित्यर्थः । यत्रो- पपात्तः । राश्युदयासुभिरेकराशिकलास्तदा कालांशकलातुल्यामुभिः का इति क्रांति पृचे कालास्ताः पप्टिभक्ता अंशा इति पूर्वमेवेच्छास्थाने कलांशा एव धृता लाघवात् । इत्युक्तमुपपन्नम् ॥१६॥ भा० टी०-कालोशको १८०० से गुणकरके लग्नमाणसे भागकरनेपर क्रांतिवृत्तका क्षेत्रांश लोता है । तिससे उदयास्तनिर्णय करे ॥ १६ ॥ ननु ग्रहाणाममुकदिश्यस्तोऽमुरदिश्युदय इत्युक्तम् । तथा नक्षत्राणां नोक्तम् । सत्यभावाद्वियोगयोगासम्भवेन गतैष्यदिनाद्यानयनासम्भवश्चेत्यत आह- प्रागेपामुदयः पश्चादस्तो कर्मपूर्ववत् ॥ गतेप्यदिवसप्राप्तिर्भानुभुत्त्या सदैव हि ॥ १७ ॥ एपी नक्षत्राणां प्राच्यामुदयः प्रतीच्यामस्तो गत्यमावादल्पगतिग्रहवत् । एपां नक्षत्राणां दृक्षिकर्म पूर्ववत्पूर्वप्रकारेण कार्यम् । परन्तु श्लोकपूर्वाधीक्त- मिति ध्येयम् । सदा नित्यम् । एवकारात्कदाचिदप्यन्यथा नेत्यर्थः । हि निश्च- येन । रविगत्या गतप्यदिवसानां लब्धिः स्यात् । नक्षत्रगत्यसम्भवात् । योगे ग्रहगतिरत् ॥ १७ ॥ मा०४ - नक्षत्रों का उदय पूर्वदिशा में और मस्त पश्चिममें होता है। पूर्व नुसार मक्षह- समस्कार करक सदा रविगत (१० श्लोमें) से दिवसानिर्णय करे।। १७ ॥ मथ कतिपयानां नक्षत्राणां सूर्यसान्निध्यवशादस्तो नास्तीत्याह- अभिजिद्ब्रह्महहयं स्वातीवैष्णयवासवाः ।। आबुध्यमुदस्थत्वान्न लुप्यन्तेऽर्करश्मिभिः ॥ १८ ॥ अभिजित् । ब्रह्महत्यम् । अनेनैकदेशस्य ब्रह्मगोऽपि ग्रहणम् । स्वातीषणघ. निष्ठाः । आहेर्युन्यमुत्तगभाद्रपदा । एतानि नक्षत्राण्युत्तरदिक्स्थत्वादुत्तरावक्षेपा- बंधायारित्यर्थः । सूर्यकिरणैन लुप्यन्ते । अस्तं न यांतीत्यर्थः । अत्रोपपत्तिः। “य. स्योदयाकोदधिकोऽस्तभानुः प्रजायते सौम्यशरातिदयात् । तिग्मांशुमानिध्यवशेन नास धिप्प्यस्य तग्यास्तमयः कथञ्चित् ॥” इति भास्कराचायोक्ता । परमिदमुक्त. मष्टाक्षमायाम् । अन्यथा पूर्वाभाद्रपदाया अपि तथात्वापत्तरित दिक् ॥ १८ ॥ भा० टी-आमाजा ब्राहृदय, सातो, श्रम, धनिष्ठा, उत्ताभद्रपदा, यह मधिक उत्त. रमें स्थिति होने के कारण सूर्यकिरणसे कमा लुप्त नहीं हो । १८ ॥ - - अध्यायः १०.] संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः। अथानिमग्रन्यस्यासङ्गतित्वनिरासार्थमाधिकारसमाप्ति फछिकयाह-नक्षत्रग्रहयोर स्तोदयनिरूपणात्सांधारण्येनोदयास्ताधिकार इत्युक्तम् । रंगनाथेन रचिते सूर्यसिद्धान्त- टिप्पणे । उदयास्ताधिकारो पूणी गृहप्रकाशके ॥ इति श्रीसकलगणफसार्वमीमपल्ला- लदैवज्ञात्मजरंगनाथगणकविरचिते गृढार्यप्रकाशके उदयास्ताधिकारः पूर्णः ॥ १९ ॥ इत्युदयास्ताधिकारः ।। नवम अध्याय समाप्त । दशमोऽध्यायः। अय भौमादीनां सूर्यसान्निध्योदयास्तासन्ने दीप्त्या सकलविम्वदर्शनं तथा चन्द्रस्य खोदयास्तकाले सकलविम्वदर्शनं शुक्लन्वेन न भवति । किन्तु बिम्बैकदेश एव शुक्ल- त्वेन न दृश्यत इति भौमादिविसदृशत्वं चन्द्रस्य कुत इत्याशड्डायाः। पूर्वाधिकारे समु. पस्थितेस्तदुत्तरभूतभंगोन्नमनाधिकारोऽवश्यमुपस्थित आरब्धो व्याख्यायते । तत्र शृङ्गोन्नतेरुदमकालात्पूर्वकालेस्तकालानन्तरकाले चासन्नातिपयदिरसेपु दर्शनात्पूर्वा- धिकारे चन्द्रस्य कालांशानुक्त्या तदुद्यास्तानुक्तेश्च प्रथममुपस्थितचन्द्रोदयास्तयोः साधनमतिदिशति-- उदयास्तविधिः प्राग्वत्कर्तव्यः शीतगोरपि ॥ भागीदशभिः पश्चादृश्यः प्राग्यात्यदृश्यताम् ॥ १ ॥ चन्द्रस्य अपिशब्दः पूर्वाधिकारोक्तैर्ग्रहनक्षत्रैः समुच्चयार्थकः । उदयास्तविधिरुद यास्तयोः साधनप्रकारः प्राग्वत्पूर्वाधिकारोक्तरीत्या गणकेन कार्यः। ननु कालांशानां पूर्वमनुक्तेः कथं तत्सिद्विः । अत माह-भागैरिति । द्वादशभिरं शैश्चंद्रः पश्चिमायां दृश्य उदितो भवति । प्राच्यामदृश्यतामस्तं पाप्नोति । अत्र पश्चात्मागिति पुनरुक्तमपि पर घुधशुकयोः साहचर्येण चन्द्रोदयास्तदिगुक्त्या तत्साहचर्येण चन्द्रस्य पश्चिमास्तपूर्वो- दयां वर्तते इति कस्यचिन्मन्दबुद्धिर्भमस्य वारणायेति ध्येयम् ॥ १ ॥ मा० टी०-चन्द्रमाकाभी पहले यही रीति के अनुसार उदयास्तसाधन वरना चाहिये १२ मंश दूर होनेमे पश्चिममें दिखाताह और पूर्वमें १२ मश होनेपर सदृश्य होता है ॥१॥ अथोदयास्तमसङ्गेन स्मृत्योश्चन्द्रनित्यास्त्रोदययोः साधनं विवक्षुः प्रथम श्लोकत्रये- णेन्दोनित्यास्तसाधनमाह-- रवीन्द्राः पद्युतयोः प्राग्वलनान्तरातवः ।। एकराशी रवीन्द्रोश्च कार्या विवरलिप्तिकाः॥२॥ तनाडिकाहते भुक्ती रवीन्द्रोः पष्टिभाजिते ॥
1 (१६४) सूर्यासद्धान्तः- [ दशमोऽ- तत्फलान्वितयोभूयः कर्त्तव्या विवरासवः ॥३॥ एवं यावस्थिरीभूता खान्दोरन्तरातवः॥ वैः प्राणरस्तमेतीन्दुः शुक्लेऽस्तिमयात्परम् ॥ ४॥ शुक्ले शुक्लपक्षाभीष्टदिने सूर्यास्तकाले स्पष्टौ सूर्यचन्द्रौ साध्यौ । चन्द्रस्य दृधर्म. यं संस्कार्यम् । तत्राक्षकर्म श्लोकपूर्वार्धोक्तमेव । तयोः सूर्यचंद्रयोः पट्टाशियुतयो- लग्नान्तरासबोऽन्तरकालासवः प्राग्वद्रोग्यासनूनकस्येत्यादिना साध्याः। तो सपड्भा- केचन्द्राकराशावभिन्नराशी चेत्स्तस्तदा सपडभयोस्तयोः सूर्यचन्द्रयोरन्तरकलाः कार्याः चकारो विषयव्यवस्थार्थकः । तयोग्मुक्लयोटिकाभिरसवः पष्टयधिकशतत्रयेण माज्याः । वटिकाः कला उदयामुगुणिता एकगशिकलाभिर्मक्ता असवस्ते पश्यधिक- गतत्रयण भाज्याः । घटिकाः । आभिः सूर्यन्दोर्गतीरलात्मके गुण्ये पष्टिमक्ते तत्फ-, लान्वितयोः स्वस्वफलयुक्तयोः सपडभसूर्य चन्द्रयोर्भूयः पुनर्विवरासवोऽन्तरमाणाः पूर्व- रीत्या कर्तव्याः । एवं तद्घटिकाभिः सूर्यास्तकालिको सपड्भसूर्यकर्मसंस्कृतचन्द्रौ प्रचाल्य तयोविवरासव इति यावस्थिरीभूता अभिन्नास्तावत्साध्याः । तैरभिन्नैरमुमिः सूर्यास्तादनन्तरं चन्द्रोऽस्तं प्रामोति । अत्रोपपत्तिः । सूर्यास्तकाले सपडमार्को लग्नं दृवर्मसंस्कृतश्चन्द्रः पड्भयुतश्चन्द्रास्तकाले लग्नम् । परन्तु सूर्यास्तकालिकं न स्वास्त- कालिकम् । पश्चिमदृग्ग्रहः सूर्यास्तकालिक इति तत्त्वम् । तदन्तरासवः सावनाश्यन्द्रस्य सूक्ष्मा दिनशेषाः । परन्तु परिभाषया नाक्षत्रज्ञानमम्भवान्नाक्षत्राः' साध्या इति चन्द्र- स्ताभिश्चास्यः स्वास्तकाले सपड़ो लग्नमस्मात्सूर्यास्तकालिकसपहसूर्याचान्तरासबो नाक्षत्राः सुक्ष्मा अपि भगवतैकरीतिप्रदर्शनार्थ भिन्न कालिकाभ्यां सूर्यचन्द्राभ्यां कथं सूक्ष्मसमयसिद्धिरिति मन्दाशङ्कापनोदाथै च मपड्भः सूर्योऽपि साधितश्चन्द्रास्त- काले । तान्यामन्तरासको नाक्षत्रा अपि सूर्यास्तकालिकलमा ग्रहादसूक्ष्मा इत्यसकृत्सू- क्ष्मा इत्युक्तमुपपन्नम् । वस्तुतस्तु सावनाभ्युपगमे “रदीन्दोः पइभयुतयोः प्राबल. प्रान्तरासवः । तैः प्राणैरस्तमेतीन्दुः शुलेकस्तिमनात्परम् ॥ इत्येक एव सूर्यसि- द्धांत श्लोकः । श्लोकमध्य एकराशावित्यादिखीन्द्वोरित्यन्तरासव इत्यन्तं श्लोक्वयं केनचिन्मन्दमतिना ममयोऽसकृदेव साध्य इति शिष्यधीवृद्धिदतन्त्रोक्तं सुबुद्धिमन्ये- नायुक्तमपि युक्तियुक्तं मत्वा निक्षिप्तम् । कथमन्यथा भगवतः सर्वज्ञस्य शुद्धसावनघ- टीज्ञानानन्तरमसकृत्साधनोक्तिः सङ्गच्छते । किंच 'एवराशी खीन्दोश्च कार्या विव- रलिप्तिकाः' इत्यर्धस्य त्रिप्रश्नाधिकारे भोग्यासुनूनकस्येत्यादिशोकाभिपेक्षितत्वेनावान- पेक्षिवत्वम् । प्राग्वल्लग्नान्तरासव इत्यनेनैवात्र तत्सिद्धोरेति । अथ नाक्षत्राभ्युपगमे तु चन्द्रस्य सापनघटीमिश्चालनं स्वास्तकालिकसिद्ध्यर्थमावश्यक नतु सूर्यस्य प्रयोजना- . ध्यायः १०.] संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः। (१६५) भावात् । नहि चन्द्रास्तकालसाधितसपइभसूर्यः सूर्यास्तकालिकं लग्नं येन सूर्यचालनं युक्तम् । अपिच एक्स्य चन्द्रस्य चालनेन पुनरेकवारेणैव सूक्ष्मनाक्षत्रकालसिद्धी द्वयोश्चालनोत्त्या नाक्षत्रास्यासकृतियानयनमतवं गौरवं सर्वज्ञेन कथमुक्तम् । असक साधनेन सूक्ष्मनाक्षत्रसिद्धी युक्त्यभावश्च । अत एव "ज्ञातुं यदाभाभिमता ग्रहस्य तत्कालवेटोदयलग्नलग्ने । साध्येनयोरन्तरनाडिकायास्ताः सावनाः स्युर्युगना ग्रहस्य ॥" इति भास्कगचार्योक्तं सङ्गच्छत इति तत्त्वम् ॥ २ ॥ ३ ॥ ४ ॥ मा० टी० -गुळपक्षमें सन्ध्याकालको कर्मसंस्कृत चन्द्रमें और मूर्यमें ६ राशि मिलाकर पूर्वानुसार लगान्तर प्राणस्थिर करे । सूर्यास्तके पीछे उक्त-प्राणसंख्यक कालके गत होनेपर चंद्रमा मस्त होगा ॥२॥ रविस्मटमें ६ राशि मिल कर चन्द्रसे सन्तरप्रमाणको निर्णय करे। यही सूर्यास्तके पीछे कृष्णपक्षमें ६ चन्द्रोदयका काल है ॥ ३॥ एकदिशामें होनेपर मूर्य भौर चन्द्रमाकी क्रान्तिज्या मनन्तर (दूर) करके मन्यया योग करे | प्रातफल सूर्यसे चंद्र माकी संस्थानदिकके अनुसार दक्षिण ओर एतरा संज्ञा होगी ॥ ४ ॥ अथोदयसाधनमाह- भगणार्धं रखेर्दत्त्वा कार्यास्तद्विवरासवः ॥ तैः प्राणः कृष्णपक्षे तु शीतांशुरुदयं व्रजेत् ॥५॥ कृष्णपक्षे भगणार्ध सपड़ाशीन सूर्यस्य दत्त्वा संयोज्य । तुकाराचन्द्रस्यादत्त्वे- त्यर्थः । तद्विवरासवस्तयोकर्मसंस्कृतचन्द्रसपभसूर्ययोरन्तरासवः । प्रागुक्तमकारण साध्याः । तैः साधितैरमुभिश्चन्द्रः सूर्यास्तानन्तरमुदयं गच्छेत् । अत्रोपपत्तिः । सूर्या- स्तकाले सपइमार्कस्य लग्नत्वात्सूर्य पाशियोजनमुदयसाधनार्थम् । प्राग्दृग्नदस्या- पेक्षितत्वाचन्द्रो दृकर्मसंस्कृतो यथास्थितो, न पदराशियुक्तः । तद्विवरासुभिश्चन्द्रस्य सूर्यास्तानन्तरमुदयः साधनस्तच्चालितचन्द्रात्सूर्यास्तकालिकसपडभाकांच विवरासको नाक्षत्रा इति । शृङ्गोन्नतिसाधनार्थ दृश्यकाले सूर्यचन्द्री साध्यापिति ज्ञापनार्थं चन्द्रस्य नित्योदयास्तावुक्तावन्येपा: ग्रहनक्षत्रादीनां प्रयोजनाभावादनुक्ती चंद्रोपलक्षणादुक्ती - या तत्र शुकृष्णपक्षविवेको नेति ध्येयम् ॥५॥ भा० टो-तिसकालकी म्बमत्स्यरेखागत-चन्द्रच्छाया कर्णको ऊपर कहेर फल्मे गुमा- करे । गुणनफळ दक्षिण होनेपर द्वादशगणित अक्षज्या योग और उत्तर. होनेपर दिन करना चाहिये ॥५॥ अथ प्रकृतं विवक्षुः प्रथमं तदुपयुक्तभुजकोटिकणात्मक क्षेत्र लोकत्रयगड- अर्केन्द्रोः कान्तिविश्लेपो दिकसाम्ये युतिरन्यया । तज्ज्येन्दुरकायनासो विज्ञेया दक्षिणोत्तरा ॥६. मध्याहेंदुप्रभाकर्णसंगुणा यदि सोत्तरा।
सूर्यसिद्धान्ता- [ दशमोऽ- तदानाक्षनीवायां शोध्या योज्या च दक्षिणा ॥ ७ ॥ शेलम्वज्यया भक्तं लब्धो वाहुः स्वदिङ्मुखः॥ कोटिः शंकुस्तयोर्वर्गयुतेमूलं श्रुतिभवेत् ॥ ८॥ सूर्यचन्द्रयोः स्पष्टवान्त्योदिगैक्येऽन्तरम् । अन्यया दिग्मेदे योगः अत्र क्रान्ति- शब्दः क्रांतिज्यापरो ज्ञेयः । उपपत्त्यविरोधात् । तज्या माचासौ ज्या च संस्कार सिद्धाङ्कमिता ज्येत्यर्थः । अर्काचन्द्रो यत्र चस्यां दिशि तदिका दक्षिणोत्तरावासी ज्या ज्ञेया । एकदिदिश रविज्ञान्तितश्चन्द्रकान्तेरधिकले सूर्याचन्द्रस्य क्रांन्तिदिवस्थ- स्वेन ज्यामान्तिदिक् । ऊनत्वात्क्रांतिदिग्विपरीतदिक्स्थत्वन क्रांतिभिन्नदिक् । भिन्न- दिशि चन्द्रकांतिदिग्ज्या ज्ञेयेत्यर्थः । सा ज्या मध्याहृन्दुमभाकर्णसंगुणा यत्काले चन्द्र शृंगोन्नत्यर्थ साधितस्तत्काले मध्याह्नच्छायाकर्णवच्छायाकर्णश्चन्द्रस्य साध्यः । सत्व. क्षांशचन्द्रस्पष्टकान्त्योरुत्तरदिाश वियोगो दक्षिणदिशि योगस्तदृननवत्यंशज्यया भक्ता द्वादशगुणितत्रिज्येति । उपपत्त्यनुरोधेन तु मध्याह्नपदं तत्कालपरम् । यत्काले चन्द्र स्तत्काले चन्द्रस्य गुगतं दिनशेष वा प्रसाध्य विनाधिकारविधिना शंकुं प्रताव्य च्छायाकर्णः साध्यः । अबोहोरात्रस्य मध्यं सूर्यास्तस्तत्कालिका चन्द्रस्य छाया- कर्णो वाऽयमेव भगवदभिमेतः । कथमन्यथा चन्द्रस्य शृंगोन्नती दृवर्मव्यसंस्कार: भूगोन्नती शशाङ्कस्येति मागुक्तः संगच्छते । दिनार्धातिरिक्तच्छाया साधनार्थमेव दृक- मणोरुपयोगादन्यत्र शृंगोन्नतिगणित उपयोगाभावात् । स्पष्टकान्त्यैव रसायाकर्ण- सिद्धः। यत्रापि श्लोकपूर्वाधाक्तमेवाक्षदृकर्मसंस्कार्यम् ।। तेन च्छायाकन गुणिते- त्यर्थः । सा तादृशी ज्या यद्युत्तरा तदा द्वादशयुणितायामक्षग्यायां शोध्यान्तरिता। तेन द्वादशगुणिताक्षज्याधिका तादृशी ज्या । तदापि विपरीतशोधने न क्षतिः । यदि दक्षिणा तदा तस्यामेव युक्ता कायी। चो व्यवस्थार्यकः । शेषे संस्कार स्वदेशल- म्वज्यया भक्तं फलं भुजः प्राप्तः । स्वदिङ्मुखः वशब्देन संस्कारस्तस्य दिक्तस्यां मुखमग्रं यस्यासौ । संस्कारादिक इत्यर्थः । भुजस्य कोटिकर्णसोपेक्षत्वात्तावाह-वोटि- रति । शंकुादशांगुलः कोटिः । तयोर्भुजकोटयोर्गयोर्योगात्पदं कर्णः स्पात् । अत्रो- पपतिः । “स्वागास्वशंकुतलयोः समभिन्नादिक्त्वे योगोन्तरं भवति दोरिनचन्द्रदोष्णोः । तुल्यांशयोविवरमन्यदिशोस्तु योगः स्पष्टो मुजो भवति चन्द्रभुजांश इन्दोः । शुद्ध भुजे रविमुजाविपरीतदिकः ॥” इति सूक्ष्मभुजसाधनं भास्कराचार्यण सिद्धान्तशिरोमणा. युक्तम् । तदुपपतिस्तु तट्टीकायां व्यक्ता । अनया रीत्या भुजसाधनाथ क्रांतिज्ययोरग्रे साध्ये । लम्बज्याकोटौ त्रिज्याकर्णस्तदाक्रांतिज्याकोटौ कः कर्ण इत्यनुपातेन । तत्स्व. रूपं तु प्रत्येकं सूर्यचन्द्रयोः सूर्यक्रांतिज्यात्रिज्यायणालम्बग्याभक्ताला ज्या त्रि??
ध्यायः १०] संस्कृतटीका-भाषाटांकासमेतः। चन्द्रस्पष्टकांतिज्यात्रिज्यागुणालबया भक्ताचं.क्रांज्या त्रि.१ अनयोः स्वं स्वः ताईचं काम लं. १ शंकुतलं संस्कार्यम् । तत्र शृंगोन्नत्यर्थं सूर्येण भगवता सूर्योदयास्तकालिकगणितस्यै- वाभ्युपगमात् । तत्र सूर्यशंकोरभावात्तच्छंकुतलाभावाच सूर्यानव सूर्यभुजः सिद्धः । चन्द्रस्य तु तदा शंकोः सद्भावाच्छंकुतलमुत्पद्यते तत्तु लम्बज्याकोटावक्षज्याभुजस्तदा शंकुकोटी को भुज इत्यनुपातेन तात्कालिकचन्द्रोन्नतोन्नतकालसाधितत्रिमश्नाधिका- रोक्तचन्द्रमहाशंकुगुणिताक्षज्यालम्बज्याभक्तति दक्षिणमेव शंकुतलस्वरूपमः अक्षज्या. चं. शं. १ (इदं चन्द्रदक्षिणापायां योज्यम् । चन्द्रस्य दक्षिणो भुजः । चन्द्रोत्तरानायां तु हीनचन्द्रस्योत्तरो भुजः । चन्द्रोत्तराप्रया हीनमिदं चन्द्रस्य दक्षिण मुजः । यथा दक्षिणो भुजः चिं.कां.ज्या त्रि.अक्षज्या.चं.शं. ११वा चं. कां. ज्या- त्रि. १ अक्षज्या शं १(उत्तरोभुजः चिंक्रांज्या त्र. १ अक्षज्याचं.शं. ??अर्य: लं? चन्द्रभुजः सूर्यायैकदिश्यंतरितो भिन्नदिशि युक्तः स्पष्टः शृंगोन्नत्युपयुक्तो भुजः । यथा सूर्यस्य दक्षिणगोले सू.कां.ज्य त्रि. १चं क्रांज्या.नि.१अक्षया. चं.श.११ सू. क्रां. ज्या. त्रि.१चं.कां.ज्या. त्रि. १अक्षज्या. चं.शं. ११ इदं भुज्यं स्पष्ट मुजो भवति चन्द्रभुजांश इत्युक्तेदक्षिणम् । सूर्यभुजस्य न्यूनत्वेन शोध्यात् । सूर्यभुग- स्याधिकत्वे तु सू.क्रां-ज्या त्रि.१चं.क्रां-ज्या त्रिअक्षज्या..श.१सू.कां.ज्या- नि.१चंक्रांज्या त्रि.१अक्षज्या वंशं ११ इदं भुजदयमुत्तरम् । इन्दोः शुद्ध भुजे रविड, लं १६ जाविपरीतदिक इत्युक्तेः । योगेतृत्तरो भुजः स.कां.ज्या त्रि.१ चं.कां.ज्या.वि.१.अक्ष- ज्या. च.शंसूर्योत्तरगोलेऽपि सक्रां-ज्या.वि.१च.कां.ज्या त्रिअक्षज्या,चं.शं लं१७ लं स-क्रां-ज्या त्रि.१चं कां ज्या-त्रि१अक्षज्या-चं शं? इदं सुजव्यं दक्षिणम्।अन्तरे तुम्- यमुनस्य न्यूनत्व उत्तरो मुजः स.कां.ज्यात्रि.१ मां-ज्या त्रि. १अक्षज्या चं.शं? लं ~ (२६८ सूर्यसिद्धान्त:- [ दशमोऽ-- सूर्यभुजस्याधिकत्वे तु सूर्यकां-ज्या नि १.च.का. ज्या त्रि.१ अक्षज्या. चं.शं.११ लं १ दक्षिणोऽयं भुजः । इन्दोः शुद्ध भुन इत्युक्तत्वात् । अब नबसु पक्षेषु प्रथमपक्ष सूर्य- चन्द्रकान्तज्ययोरेकादेशयोरन्तरं त्रिज्यागुणितं तत्सूर्यकान्तिसम्बद्धं चेत्तेनोनाक्षज्ये. न्दुशंकुधातो लम्वज्याभक्त इति । चंद्रशान्तिसम्बद्धं चेत्तेन युतस्तदृधातो लम्वघ्या- भक्त इति सिद्धम् । तत्राक्षांशानां दक्षिणत्वेनैकादाशे योगाथै चन्द्रशेपे दक्षिणत्वं सूर्य- शेषे उत्तरत्वं मिन्नदिशि वियोगाथै कल्पितम् । युक्तं चैतत् । सूर्यकान्त्यधिक्त्वे सूर्या- चान्द्रस्योत्तरत्वात् । भंगोन्नती चन्द्रस्येव प्राधान्याच । द्वितीयपक्षे क्रान्तिज्ययोमि- नादेशयोोंगेन तादृशेन तहातमूनं कृत्वा लम्ब यया मदित्यचापि योगस्पानs. न्तरार्थमुत्तरदिक्त्वं चन्द्रकान्तरुत्तरत्वेन दक्षिणस्यसूर्याचन्द्रस्य मुनरामुत्तरत्वाच । तृती. यपक्षे कान्तिज्ययोरेकदिशयोरन्तरे सूर्यसंघद्ध एव तादृशे तद्दध उन इति वियोगार्थ- मन्तग्स्योत्तरदिक्त्वम् । दयोदक्षिणगोलस्थत्वेऽप्यधिकसूर्याङ्यूनचन्द्रस्योत्तरत्वात् । चतुर्थपक्षे भिन्नदिशयोः क्रान्तिज्ययोर्योगे तादृशे तइध ऊन इति वियोगार्थ योगस्यों- त्तरदिक्त्वम् । चन्द्रस्योत्तरदिक्स्थत्वात । पञ्चमपक्षे तुं चतुर्थपक्षोक्तं तुल्यत्वात् । पष्ठ. पक्षे कान्तिज्ययोभिन्नदिशयोर्योगो दक्षिणस्तधे योगाथै चन्द्रस्य दक्षिणगोलस्थ- स्वात् । सप्तमपक्षे कान्तिज्ययोरेकदिशयोरन्तरं सूर्यसम्बद्धं तदा तदधे योज्यमित्य- न्तर दक्षिणम । योरुत्तरगोलस्यत्वेऽपि चन्द्रस्य न्यूनत्वेनार्काद्दक्षिणस्थत्वात् । अधि- पत्वे तूत्तरं तदधे होनमिति । अष्टमपक्षे क्रान्तिज्ययोरेकदिशयारेन्तरे चन्द्रसम्बद्ध उत्तरे तद्वध ऊनः । चन्द्रस्याधिकत्वेनोत्तरस्थत्वात् । अन्त्यपक्षे तु समदिशयोः क्रांति. ज्ययोरन्तरं मूर्यसम्बद्धं तद्वधे योज्यमिति दक्षिणम् । चन्द्रस्य न्यूनत्वेन दक्षिणस्य- त्वादित्युपपन्न प्रथमश्लोकोक्तम् । अत्र केनचित् क्रान्तिगब्देन चापात्मकतान्ती गृहीत्वा तत्संस्कारः कृतस्तस्य ज्या कार्यति व्याख्यातम् । तदुपपतिविरुद्धम् । नहि भुजता- धने चापा-ममतान्ती प्रयोजकन्वेनोपपन्ने । येन व्यारन्योक्ता युक्ता । नवा क्रांतिज्या- चोगवियागाभ्यां चापात्मकतान्तियोगवियोगयोये तुल्ये चेनोक्तं संगतं स्पाम् । अन्ययाक्षांशकान्त्यशसंस्कारांशज्यां विनापि क्रान्तिज्याक्षज्ययोः संस्कारेण नतांश- ज्यायाः सायनापत्तरिति दिक । अथायं भुजखिज्यावृत्त इति लाघातात्कालिके चन्द्र- छायाकर्णमितवृत्ते स्वेच्छया साधितविग्यानेऽयं भुजस्तदा चन्द्रच्छायाकर्णवृत्ते कइत्यनुपाते तन कान्तिज्ययोः संस्कारमितमाय खण्ड चन्द्रच्छायाकर्णगुणामीत सिद्धम् । विज्यामितपूर्वगुणस्येदानीन्तनात्रिज्यामितहरस्य तुल्यत्वेन यो शाम । ययापरपण्डं चन्द्रशइकक्षज्याघातात्मकं चन्द्रच्छायाकर्णगुणं विज्याभक्तं कार्यम् । तत्र विज्याद्दादशवातस्य चन्द्रशंकुमक्तस्य छायाकर्णत्वाच्छङ्कत्रिज्यामितयोर्गुणह- योः प्रत्यकें नामादक्षज्याद्वादशगुणत्यपरं खण्डं सिद्धम् । द्वयारकादाशे योगो मिन sunt
ध्यायः १०.] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत। (१६९)
दिश्यन्तरामिति संस्कारो लम्बज्याभक्तो मुजः संस्कारदिकः सिद्धः । शंकुः कोटि-
रिति चन्द्रच्छाया कर्णवृत्ते भुजसाधनात् । तद्वत्त कोटिरपि साध्या । सातु नियता
द्वादश । नियतकोटयर्यमेव मुजश्चन्द्रच्छायाकर्णवृत्ते साधितः सूर्योदयास्तयोः सूर्य-
शंकोरभावात्सूर्यगंकुसंस्काराभावः । तदितरकाल उक्तक्रियया न निर्वाहः । कोटि-
भुजयोगयोगान्मूलं कर्ण इत्युपपन्नं मध्यादेत्यादि श्लोकद्धयोक्तम् ॥ ६ ॥७॥८॥
मा० टी०-यह शेषलब्धफल लंबज्याप्ते भाग करनेपर स्वदिशसूचक बाहु होगा ।
घंटमाके शको कोर्टज्ञानकरके दोनका वायोग करके मूल करनेसे कर्ण
होगा ॥ ६ ॥ ७ ८ ॥
अथ शुक्लानयनमाह-
सूर्योनशीतगोलिताः शुक्कं नवशतोदृताः ॥
चन्द्रविम्बाङ्गुलाभ्यस्तहतं द्वादशभिः स्फुटम् ॥९॥
सूर्यानितचन्द्रस्य कला नवशतभक्ताः फलं शुक्लम् । तचन्द्रग्रहणाधिकारोक्तप्रका'
रेणागतचन्द्रविम्बाङ्गुलैगुणित हादशभिर्भक्तं फलं स्फुट शुक्लं स्यात् । अत्रोपपत्तिः ।
दर्शान्ते सूर्यचन्द्रयोरन्तराभावादस्मदृश्या) चन्द्रगोले सूर्याकरणप्रतिफलनामावाच्छौ.
फ्ल्याभावः । ततो यथायथार्काचन्द्रः पूर्वतोऽन्तरितस्तथातथा चन्द्रगोलास्मदृश्याधैं
चन्द्रपश्चिमभागकमेण शौक्ल्यवृद्धिः । एवं पाश्यन्तरे पौर्णमास्यन्ते चन्द्रगोलास्मह-
श्याधै सम्पूर्ण श्वेत भवति । इतः पड़ाशिकलाभिः खखाष्टादिग्भिादशाङ्गुलव्यास-
विम्ब श्वेतं तदेप्टेन सूर्योनचन्द्रकलागणेन किमित्यनुपाते प्रमाणफलयोः फलापवर्त
नेन प्रमाणस्थाने नवशतम् । अतः सूर्योनचन्द्रस्य कला नवशतभक्ताः शौक्लयमिदं
द्वादशांगुलव्यासप्रमाणेन सिद्धम् । अतो द्वादशांगुलप्रमाणेनेदं तदाभिमतचन्द्रविम्वां-
गुलव्यासप्रमाणेन किमित्यनुपातेनोक्तमुपपन्नम् । अनेन प्रकारेण विमान्तरे चन्द्रगो-
लास्मदृश्यार्धमधै श्वेतं भवतीति सिद्धम् । भास्कराचार्यस्तु “कक्षाचतुर्थस्तरणोहें
चन्द्रः कर्णान्तरे तिर्यगिनो यतोऽब्जात् । पादोनपट्काप्टलवान्तरेऽनो दलं नृश्यं दल-
मस्य शुरुम् ॥” इति शृंगोन्नतिवासनायामुक्तम् । अंगोन्नत्यधिकारे । “चन्द्रस्य यो-
जनमयश्रवणेन निनो व्यन्दुदोर्गुण इनश्रवणेन भक्तः। तत्कार्मुकेण सहितः खल्ल
शुक्लपक्ष कृष्णोऽमुना विरहितः शश भृद्विधेयः ॥” इति तदभिप्रेतश्वेतानयनोपयुक्त
श्चन्द्रः साधित इत्यलम् ॥९॥
भाटी-चंदमासे सूको अलग करके कला करता हुआ ९०० से माग वरनेपर शुक्ला
शोगा। चन्द्रषिम्यांगुलीसे गुणदरक १२ से माग करनेपर स्फूट शुरू होगा ॥९॥
अथ छोकचतुष्टयेन शृंगोन्नतिपरिलेखमाह-
दत्त्वार्कसज्ञितं बिन्दु ततो वाहुं स्वादिङ्मुखम् ।।
ततः पश्चान्मुखी कोटिंकण कोट्यग्रमध्यगम् ॥ १० ॥
[ददामोड- (१७०) सूस्यसिद्धान्तः- कोटिकणयुत्तद्विन्दोविम्ब तात्कालिकं लिखेत् ॥ कर्णसूत्रंण विकसिद्धि प्रथमं परिकल्पयेत् ।। 11॥ शुक्ल कर्णेन तादम्बयोगादन्तर्मुखं नयेत् ।। शुक्लापयाम्योत्तरयोर्मध्ये मत्स्यौ प्रसाधयेत् ॥ १२॥ तन्मध्यसूत्रसंयोगाद्विन्दुविस्पृग्लिरहनुः ॥ प्राविम्बं याहगेव स्यात्ताहक्तत्र दिने शशी ।। १३ ॥ समभूमावभारस्थाने दिक्साधनं कृत्वा पूर्वापरा दक्षिणोत्तरा च रेखा कार्या । तत्र दिक्सम्पातेऽसज्ञितमर्कसज्ञा सञ्जाता यस्येत्येतादृशमसन्झं विन्दु चिनं दत्वा कृ- वेत्यर्थः । ततो बिन्दोः सकाशाद्भुजं पूर्वसाधितं स्वादेमुसं स्वदिग दक्षिणोत्तग- न्यतरातदभिमुसं दत्त्वा मुजांगुलानि गणयित्वा चिद्रं कृत्वा ततो भुजायचिह्नात्पश्चान्मु- खीं पश्चिमदिक्समसूत्राभिमुखाग्रां कोर्ट द्वादशांगुलात्मिकां दत्त्वा कण पूर्वसाधित को- स्थामध्यगकोटवाचिह्न मध्यं सूर्यसचिह्न तयोगतं स्पृष्टम् । तदन्तगले कर्णागुला- नि दवेत्यर्थः । कोटिकार्णरेखासंयोग मध्यं प्रकल्प्य तात्कालिक सूर्यास्तोदयकालिर्फ चन्द्रस्य साधितं मण्डल लिरवेत् । तत्र लिखितचन्द्रोम्बे कर्णसूत्रेण कर्णरखया प्रथम- मादौ दिविसद्धि दिशानिप्पत्ति परिकल्पयेत् कुर्यात् । चन्द्रमण्डलं रणरेसायां यत्र लस वत्र चन्द्रवृत्ते पूर्वी । कर्णरेखा स्वमार्गेणाग्रे निःसार्य चन्द्रवृत्तपरिधी यत्र वर्णरेखाप- रभागे लग्ना तत्र पश्चिमा। तन्मास्याभ्यां रेखा दक्षिणोत्तराचन्द्रवृत्ते यत्र लमा तम दक्षि- णोत्तरति फलितार्थः । शुक्लं ताधितं कर्णेन कणरेखामार्गेण तद्विम्बयोगात्करस चन्द्रमण्डलपरिष्योः सम्पातादपूर्वात् । अन्तर्मुखं चन्द्रवृत्तकेन्द्राभिमु नयेत शुक्लायचिद्रं कुर्यात् । चन्द्र वृत्तान्तः कर्णरवायां पश्चिमचिनाच्छलांगुलानि गणयित्वा बुर्यदित्यर्थः । शुक्लाग्नयाम्योत्तरयोइन्द्रवृत्नान्तर्यत्र शुक्लागीचद्रं यत्र च चन्द्रवृत्तपरिधी दक्षिणांत्तरयोश्चित त्योरित्यर्थः । मध्येऽन्तराले मत्स्योप्रत्येकं साधयेत् । शुल्लाप्रदक्षिण- चिद्धाभ्यां मत्स्यशुशायरोजगवितात्या मत्स्यश्येति पूर्णोक्तरीत्या मत्स्वी पुर्यादित्यर्थः सन्मध्यमत्रसंयोगात् । तयोर्मत्स्ययोर्मध्यसूत्र मुखपुच्छस्पृग्गर्भवत्रं प्रत्यक तयोर्यत्र च. न्द्रमण्टलान्तस्तद्वहिर्वा कद्रशुक्लयस्य पश्चिमत्वे पूर्वभागे संयोगः । पूर्वत्वे पश्चिममागे संयोगः । स्वस्वमार्गेण प्रसारितयोस्तयोः सम्पातस्तस्मात्स्यानात् । बिन्दुनिस्पृक् शुक्लायविन्दुर्याम्योत्तस्यविन्दुरिति विन्दुरितयस्पशिधनुचपदेशात्मक रिवत् । सनसम्पार शुक्लाविन्दन्तरालगुल्व्यासाधेन सम्पातस्थानाद्धिन्दुत्रयस्पष्टवृत्तपरि- ध्येपदेशाम चन्द्रमण्डलान्तश्चापं कुर्यादित्यर्थः । प्राक्पूर्वकाले लिखितं चन्द्र वे- म्बम् । यहिक । लिखितचापच्छेदेन पाशं पश्चिमभागे भवति तादृशः। एवकारस्तदि- - व्यायः १०] संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः।' (१७१) ननिरासार्थकः । तस्मिन् दिने । शृंगोन्नतिगणिताश्रयीभूतसन्ध्यासमये चन्द्र आकाश- स्यो भवति । अत्रोपपत्तिः । भुजस्तु सूर्याचन्द्रे यावतान्तरेण तद्रूप इति सूर्यस्थान प्रकलाय तस्माद्यथादिग्भुजो देयस्तस्माच्छुलपक्षे पश्चिमदिरस्थस्य चन्द्रस्य शृंगो. नतिर्मवतीति सूर्यचन्द्रयोसमीपरान्तर कोर्दत्ता । सूर्यचन्द्रयोरन्तरं तियकर्ण इति कोटथप्रसूर्यविम्यान्तराले कणी दत्तः । कर्णदानं कोटेः सरलत्वसिद्धयर्थम् । वत्र कोटिकर्णयोगे चन्द्रावस्थानाचन्द्रवृत्तं तन्मध्यत्वेन लिखितम् । कर्णमार्गेण शुरुदर्शना- चन्द्रविम्वे कर्णसूत्रानुरुद्धा पूर्वापरा तदनुरुद्धा दक्षिणादरा च । शुक्लपक्षे चन्द्रपश्चिम- 'भागेऽर्काभिमुखत्वेन शौचात्पश्चिमस्थानात्वर्णरेखापा चन्द्रदृत्तान्तः श्वेतं दत्तम् । तत्र चन्द्रमण्डले याम्योचरचिह्नावधिकवृत्तकदेशरूपं धनुः शुक्लाप्रविन्दुस्पृष्टं चन्द्रा तिदर्शनार्थ कार्यम् । अतो विन्दुपयस्पृवृत्तस्य केन्द्रज्ञानाथ प्रागुक्तरीत्या विन्दुपये- भ्यो मत्स्यौ प्रसाध्य तत्सूत्रयुतिः केन्द्रमस्माधापं तयैव भवतीति चन्द्राकृतिः प्रत्यक्षा।। ॥ १०॥ ११ ॥१२॥१३॥ माटी०-मर्कसंज्ञा बिन्दु भक्ति करके अपनी दिश के अनुसार बाहुपरिमाणको रेखा सेंचे । रेखाले भनभागमें पश्चिम मुखगामी फोटोके परमाणस रेखा खेंच ! कोटिके मनसे मध्यविन्दुतकको रेखाही कर्ण होगी । जिस विन्दमें कोटि और कर्ष लगा है तिसके पार! मेर विम्बके अनुसार वृत्तखेच । कर्णसूत्र जिस दिश में हो, वह दिशाही पूर्व , समझ । जहा विम्प्रवृत्त और कर्णरेखाका संयोग है, उस स्थानते बिम्बमध्याभिमुखमै कर्णरेख के ऊपर शुलपरिमित दूरपर विस्थापन करे । वह बिन्दु और पिम्नोत्तर विन्दु और वह पिंदु और पिंक दक्षिण बिन्दुमध्यमें दो मत्स्य बनाकर तिनके मुख व पूछसे निकली हुई रेखाके संयोगमा कंटकरता हुमा त्रिविन्दु स्मृध रचना करे । पूर्वकालमें पन्दबि जैसाही उस दिन पैसाही चंद्रमा दिवा देगा ॥१०॥ ११ ॥ १२ ॥ १३ ॥ ननु यदर्षमयमुद्योगस्तस्याः शृङ्गोन्नतेतानं नोक्तमत आह- कोट्या दिसाधनात्तिर्यसूत्रान्ते शृङ्गमन्नतम् ॥ दर्शयेदुन्नतां कोटिं कृत्वा चन्द्रस्य सा कृतिः ॥ १४ ॥ कोटया कोटिरसया चन्द्रवृत्ते कर्णरेखावदिय साधनात्पारिलेसे शुक्लधनुपः कोटिम प्रभागात्मिकमुन्नतामुच्चों कृत्वा दृष्ट्वा । तिर्यसूत्रान्ते दक्षिणोत्तररसाया अन्ते अवसाने । उन्नतमु शृङ्गदर्शयेत् । सा परिलेखसिद्धा । आकृतिः' वल्पम् । चन्टम्प आकाशस्थचन्द्रस्य भवति परिलेससिद्धरूपमाकाशस्यचन्द्रमत्यक्षमि. त्यर्थः । अत्रोपपतिः । यया चन्द्रवृत्ते कर्णरेखया चन्द्रदिशस्तया कोटिरेसया- चन्द्रहत्ते सूर्यदिशस्तयोरन्तरं भुजचन्द्रवृत्तपरिणतः । अथ चन्द्रदक्षिणोत्चत्योधनुष्य- कोटयोः संलग्नत्वात्सूर्यदक्षिणोपराभ्यां कोटिरूपशृङ्गेण नतोन्नते मवक्ता मुजदिझं मूरयासद्धान्त:-- [ दामोऽध्यायः] शृङ्गं नतम् । तदितरदिकं शृङ्गमुन्नतम् । यतएव भास्कराचार्यरुक्तम् ‘स्यात्तुगशृंगं वलनान्यदिक्स्थम् ' इति ॥ १४ ॥ भा० टी० कोटीस दिवसाधन करके दक्षिणोत्तर तिर्यवसूत्रके शेषभागमें चन्द्रमाका उंचा आग दिखाने । सोही आकाशके चन्द्रमाका साकार है ॥ १४ ॥ ननु सूर्योनचन्द्रस्य पहभादिकत्व' उक्त कारण चन्द्रविम्वाभ्यधिक शुलमायाति तत्कथं युक्तं व्याघातादित्यतस्तदुत्तरं विशेष चाह--- कृष्णे पइभयुतं सूर्य विशोध्येन्दोस्तथासितम् ॥ दद्यादाम भुजं तत्र पश्चिम मण्डलं विधोः ॥ १५ ॥ कृष्णपक्षे पइराशिभिः सहितमकै चन्द्रादिशोध्य । तथा लिप्ता नवशतभक्ता इति पूर्वप्रकारेण असितं श्याममानेयम् । तथा च पूर्वोक्तं शुल्लानयनं शुक्लपक्ष एव चन्द्रशी क्ल्यवृद्विज्ञानार्थम् । कृष्णपक्षे तु शोषल्यहासात्कृष्णतावृद्धेः कृष्णानयनं युक्तं न शुक्लानयनम् । अतएव दर्शान्तमासस्य शुक्ल कृष्णो द्वौ पक्षाविति भावः । अथ कृष्ण- परिलेखार्थ पूर्वोक्ते विशेषमाह-दद्यादिति । तत्र कृष्णपरिलेखावपये वाम विपतिं भुज प्रायुक्तं दद्यात् । अर्कचितादुत्तरं भुज दक्षिणतो दक्षिण भुजमुत्तरतो गणको दद्यात् । चन्द्रस्य मण्डले पश्चिम दर्शयेत् । यया शुक्लपक्षे चन्द्रमण्डलस्व पश्चिमभागे शौक्लयं- तथा कृष्णपक्षे चन्द्रमण्डलस्य पश्चिममागे कृष्णाभिवृद्धिं दर्शयदित्यर्थः । अत्रोप पत्तिः । कृष्णपक्षारम्भे सूर्यचन्द्रयोः पाश्यन्तरम् । ततः पडराशिपर्यन्तं कृष्णाभि- वृद्धिः । अतः पइराशियुतसूर्येण वर्जितचन्द्रात्पूर्वप्रकारेण कृष्णानयनं युक्तम् । अथ शुक्लशृङ्गं यत्र नतं तत्र कृष्णभंगमुन्नतं यत्र चोन्नतं तत्र नतम् । अतः कृष्णपरिले- साथै भुजो विपरीतो देवः । तदपि कृष्णं पश्चिमभागादेवाभिवृद्धम् । अतः कणर सायां चन्द्रविम्वान्तः पाश्चमस्थानाद्देयम् । ततः प्राग्वत्कृष्णशृङ्गोन्नतिरिति ॥ १५॥ मा० टी०-कृष्णपक्ष चन्द्रस्पष्टसे ६ राशियुक्त सूर्य अलग करके शुक्लकी नाई असित निर्णय करे राहुकी दिशाशे बदलकर चन्द्रमण्डलको पश्चिम मोर भसित दिखावे ॥ १५ ॥ अथाग्रिमग्रन्थस्यासंतित्वनिरासार्थमधिकारसमाप्ति • फकियाह-चन्द्रोदयास्तयोः शृंगोन्नतिविषयत्वेनोक्तवादस्यामेवान्तर्भावो न स्वतन्त्राधिकारत्वमन्यथा ग्रहोदया- स्ताधिकारे तदुक्त्यापत्तेः । एतेन चन्द्रोदयास्तयोः पौर्णमास्यधिकारत्वं पर्वताक निर- स्तम् । तत्संज्ञायां प्रमाणाभावादन्यथामावास्याधिकारत्वस्यैव सुवचत्वापत्तोरिति ध्येयम् ॥ रंगनाथेन रचिते सूर्यसिद्धांताटप्पणे ॥ शृङ्गोन्नत्यधिकारोऽयं पूर्णो गृढम- काशके ।। इति श्रीसक्लगणकसार्वभौमवल्लालदेवज्ञात्मजरंगनाथगणकावरचिते गूदार्थ- प्रकाशके शृङ्गोनत्याधिकारः संपूर्णः ॥ १० ॥ इति शृङ्गोन्नत्यधिकारः॥ दशवां अध्याय समाप्त ।
अध्यायः ११.] संस्कृतटीका-भापाकासमेतः । (१७३) एकादशोऽध्यायः। अथ पाताध्यायो व्याख्यायते । तत्र भेदद्वयात्मकपातस्य सम्भवं विवक्षुः प्रथम वैधृतसंज्ञापातस्य सम्भवमाह- एकायनगतो स्यातां सूर्याचन्द्रमसौ यदा ॥ तद्युतो मण्डले कान्त्योस्तुल्यत्वे वैधृताभिधः ॥ १॥ सर्यचन्द्रौ। “सूर्याचन्द्रमसौ धाता ययापूर्वमकल्पयत्" इतिश्रुत्युक्तमयोगः । एका- यनगतौ । अभिन्नदक्षिणोत्तरान्यतरायनस्थौ भवतस्तत्र यदा यस्मिन् काले तद्युतौ सूर्यचन्द्रयो द्योोंगे मण्डले द्वादशराशिमिते सति तदा तयोः कान्त्योः समत्वे महा- पातरूपे.वैधृतसंज्ञः पातो भवति ॥ १ ॥ भा०टी-सूर्य और चन्द्रमा जब एक अयनमें होते हैं और दोनोंका स्पष्ट योग१२ राशिके. प्रमाजका होता है और क्रान्तिकी समता होती है, तब वेतिपात होता है ।। १ ।। अथ व्यतीपातसंज्ञपातस्य सम्भवमाह- वीपरीतायनगतो चन्द्रार्को कान्तिलिप्तिकाः ।। समास्तदा व्यतीपातो भगणाधै तयोर्युतौ ॥२॥ चन्द्रार्को विपरीतायनगतौ भिन्नायनस्थो भवतस्तत्र यदा तयोः सूर्यचन्द्रयो द्यो- योगे भगणार्धे राशिपटके सति तयोः क्रान्तिकलास्तुल्या भवन्ति तदा तस्मिन् काले व्यतीपातसंज्ञकः पातो भवति । अनोपपतिः । समक्रान्तिकालो महापातकालः । तत्र स्पष्टक्रान्त्योरतियैलक्षण्योपचयापचययोर्नियमाभावाच समकालो दुर्लक्ष्य इति मध्यमकान्त्योः समत्वकालात्पूर्वमपरत्र वा शरवशेन शरसंस्कृतक्रान्तिसमत्वं भवतीति निश्चित्यवस्तुभृततत्कालज्ञानार्थप्रथमं तदासन्नकालस्थमध्यमक्रांतितुल्यस्य ज्ञानमावश्यक तत्तु सूर्यचन्द्रयाः शांतिसमत्वं भुजतुल्यत्वे सम्भवति भुजात्पन्नत्वात् । भुजतमत्वं सूर्य- चन्द्रयोः पडराशिमितियोगे द्वादशराशिमितयोगे वा पाशिमितान्तरेऽन्तराभावे वा कुत एवमितिचेस्टणु । तवान्तराभा द्वयोस्तुल्यत्वेन मुनसाम्ये विवादाभावः । एवं पद- मान्तोऽपीतरयोर्विपमपदस्थयोः समपदस्थयोर्वा क्रमेण पदगतेप्ययोस्तुल्ययोजत्वामः त्यविवादः । पड्वादशाशियोगे तु तयोपिमसमपदस्थत्वात् क्रमेण तुल्यगतेप्यत्वेन भुजतुल्यत्वम् । रविगोलायनसन्धिस्थयोस्तु कांतिपरमभावत्व इति तत्रापि तदन्तरयो- गयोः पड़वादशराश्योर्ययायोग्यसत्त्वान्नांतिसाम्यं सहजत एव । अत एकायनस्ययो- मिनगोलस्थयो दशराशियोग एक्गोलायनस्थयोरेन्तरामावे क्रांतिसाम्यम् । एवं भिन्नायनस्थयोरेकगोलस्ययोः पइराशियोगे गोलमेदस्थयोः पड्राम्यन्तरे झांतिसाम्य- मिति युतापित्युपलक्षणादन्चर इत्यपि ज्ञयम् । नतु तपती मण्डले भगणाधैं तयोर्युता- (१७४) सूर्यसिद्धान्तः- [ एकादशोऽ-- वित्युक्तेन क्रमेण गोलभेदैक्ययोरन्तरनिरासार्थकोक्तिस्तत्रापि क्रांदिसाम्यत्वेनानिवार्य त्वात् । अत्रैकायनगताविति विपरीतायनगताविति च स्वरूपोक्तिरनावश्यकीति ध्येयम। वस्तुतस्तु सूर्यचन्द्रयोदशमिते योगेऽन्तरे वा वैधृताल्यक्रांतिसाम्यम् । पहाशिमिते तयोर्कोगेऽन्तरे वा व्यतीपाताख्यं शान्तिसाम्यमिति तात्पयोक्तिः । अत एवाने भा- करेन्दोरित्यायुक्तं युक्तमिति तत्त्वम् ॥ २॥ भाण्टी-विपरीत मयनमें गईईई चन्द्रमा भोर सूर्यकी क्रांतिवटा समान होनेपर और तिनका स्पष्ट योग ६ राशिके प्रमाणका होने पर व्यतीपात पात होता है ॥२॥ ननु क्रांत्योः साम्ये कथं पातो भवतीत्यत आह- तुल्यांशुजालसंपर्कात्तयोस्तु प्रवहावृतः ।। तहकूकोधभवो वहिलाकाभावाय जायते ॥३॥ तयोश्चन्द्रसूर्ययोः। तुकारात्कांतिसाम्यकालिकयोः तुल्यांशुजालसम्पत्सिमकिर- णानां जालं समूहस्तयोरन्योन्याभिमुखयोः सम्पर्कात् । एकीभावापन्नत्वात् । तादृक्- कोधमकः सूर्यचन्द्रयोरन्योन्याभिमुखयोक्कोधो विम्बकेन्द्रयोदयायोः क्रोधः पर- स्पराभिमुखेन दोश्याधिक्यं तदुत्पन्नोऽग्निः प्रवहावृतः प्रवहवायुप्रज्वलितः । लोकामा- वाय जनानामशुभफलाय जायते ॥३॥ भाव्टी-दोनावी विरणों मिलनेसे ग्रूप क्रोधसे उत्पन्न मग्नि प्रबह वायुद्वारा प्रज्वटित होकर मनुष्योंकी अशुभ फल देता है ॥ ३॥ अथार्य बनियंतीपाताख्यो वैधृताख्यो वेत्यत आह- विनाशयति पातोऽस्मिल्लोकानाममकृद्यतः ॥ व्यतीपातःप्रसिद्धोऽयं संज्ञाभेदेन वैधृतिः ॥४॥ अस्मिन्द्रातिसाम्यकाले । प्रसिद्धः पूर्वश्लोकोक्तस्वरूपः । पातो वद्धिः । यतः कार- णात् । असकृत्स्वसम्भवेन वारंवारम् । लोकानां विनाशयात नाशं संगति । अतः कारणादयं वदिव्यतीपात.संज्ञोऽयमेवाग्निः संज्ञाभेदेन नामान्तरेण वैधृतिसंज्ञः तथा चो- मयत्र पाताख्यो बहिर्भवतीति भावः ॥४॥ मा० ० क्रन्ति साम्यवार में सदा पत्यति (अग्नि) रोगांचा नाश करती है इस कारणे तिसको व्यतीपत पहते हैं। अयया वैधृति संज्ञा होती है ॥ ४ यथ तत्स्वरूपमाह- स कृष्णा दाणवपुलौंहिताझो महोदरः॥ सर्वानिष्टकरा रोद्री भूयाभूपःप्रजायते ॥५॥ स प्रतिसाम्पकालोत्पन्न उभयसंज्ञाः पातारख्याग्निपुरुषः कृष्णः श्यामः । दारुण- वपुः कटिनागर लोहिताक्षः भारत्त नेत्रः । महोदरः पृथूदरः । अतएव सानिधकारः ध्यायः ११.] संस्कृतटाका-मापाटीकासपेतः। (१७५) सर्वलोकानामशुभकारकः । रौद्रः क्षयकारकः । भूयोभूयोऽनेकवारम् । प्रजायते प्रत्येक ऋतिसाम्यकाला उत्पन्नो भवतीत्यर्थः॥५॥ मा० टी०-पत, कृष्ण वर्ण, वाठन शरीर, बाल नैव महोदर, सब लोगोंका अशुम पर- नेवाला, क्षयकारी और अनेकवार होता है ॥५॥ अथ स्पष्टकालज्ञानं विवाः प्रथमं तादृशयोः सूर्यचन्द्रयोः सायनांशयोः क्रांति- साध्ये इत्याह- भास्करेन्द्रोभचक्रान्तश्चाकाविधिसंस्थयोः ।। दृतुल्यसाधितांशादियुक्तयोः स्वावपक्रमो ॥६॥ सूर्यचन्द्रयोक्तुल्यसाधितांशादियुक्तयोः 'पाश्चक्र चलितं होने छायात्किरणाग- ते' इत्यादिना दृग्गोचरीभूनं साधितमंशादिकं तेन संस्कृतयोरित्यर्थः । पतेन पूर्वसाधा- रंणोक्तिरापि स्पष्टीकृता क्रांत्योः सायनोत्पन्नत्वात् । भचक्रांतमंचक्र द्वादशराशयस्त- न्मध्ये संस्थयोः स्थितयोः ययोयोगो द्वादशराशयस्तयोरित्यर्थः । चक्राविधि- संस्थयोः । चक्रा राशिपद्धं तवधि तदन्तः स्थितयोर्यय योगो राशिप तयोरित्यर्थः। सौ स्वकीयौ । अपक्रमो साध्यो । सूर्यस्य क्रांतिः साध्या चंद्रस्य विक्षेपसंस्कृता क्रांतिः साध्येत्यर्थः ॥ ६ ॥ भा. टी- दृल्प साधित अंशादि-संस्कृत (अयनांश-संस्कृत) चंद्र सूर्यका स्पष्ट योग निमममयमें १२ या ६ शशिके निकट होगा, तिस समयके अपक्रम (क्रान्ति) को निर्णय परमा चाये ॥ ६ ॥ अथ साधितकान्तिग्यां सकालास्पष्टपातकालस्य गतेप्यावं विशेष च श्लोका- भ्यामाह- अोजपदगस्येन्दोः क्रन्तिविपसंस्कृता ॥ यदि स्पादपिका भानोः कान्तः पातो गतस्तदा ॥ ७ ॥ जना चेत्त्यात्तदा भावी वाम युग्मपदत्य च ॥ पदान्यत्वं विधोः कान्तिर्विक्षपाचदिशुद्भयति ॥ ८॥ अथ सूर्यचन्द्रयोः कान्तिसाधनानन्ताम् । चद्रस्य विपमपदस्यस्य । विक्षेपसंस्थ:- ता क्रान्तिः । सटकान्तिरित्यर्थः । यदि चर्हि । सूर्यस्य विपमसमान्यतरपदस्यस्य साधितकान्तेः सकाशादधिका स्यात् । तदा त है। पातः स्पष्टकान्तिसाम्यात्मकः । पतः । सारितक्रान्तिकालात्पूर्वकाले जान इत्ययः । चर्हि । सूर्यकान्तर्विपमपद- स्थचन्द्रस्पष्टक्रान्तिदूंना माति तदा तर्हि सक्रान्तिसाम्यरूपपातः । मावी । साधितक्रान्तिकालादुत्तरकाले भवतीत्यर्थः । ननु विषमादे चन्द्रो न भवति तदा गौप्य- त्वज्ञान कथं स्यादताह-वामामाते । युग्नपदस्य । समपदस्यचन्द्रस्येत्ययः ।
(१७६)
सूर्यसिद्धान्तः-
[एकादशोऽ-
चकारात्स्पष्टकान्तिः सर्यकांतः सकाशादधिकोना वा स्यानहीत्यर्थः । वामम् । उक्त.
गतैष्यक्रमेण वैपरीत्यम् । एण्यगतत्वं पातस्य भवतीत्यर्थः । अथ चन्द्रस्य विशेपमाह !
पदान्यचमिीत । चन्द्रस्य स्पष्टक्रांतिक्रियायाम् । चेद्याह । चंद्रस्य विक्षेपसंस्कृत-
केवलक्रांतिर्विक्षेपादिन्नदिकाद्विशुध्यति होना मवति । क्रान्तिवर्जितविक्षेपरूपास्पष्ट-
क्रान्तियदि स्यात्तेदत्यर्थः । पदान्यत्वं राश्यादिचंद्राधिष्ठितपदमिन्नपदस्यत्वं चन्द्र-
म्य ज्ञेयम् । सायनराश्यादिना समपदस्थस्य चन्द्रस्य विपमपदस्थत्वम् । सायनश्यिा
दिना विषमपदस्थस्य चन्द्रस्य समपदस्थत्वं तत्पदसम्बंधात्स्पष्टौ कान्तियेत्यर्थः।
अत्रोपपत्तिः । विपमपदे क्रांतिरुपविता समपदेऽपचिता । अतः सूर्यकांतेपिमपद-
स्थेदुकान्तिराधिका तदाने सुतरामधिकत्वाद्रविक्रान्त्युपचयस्याल्पत्वाच न्यूनया रवि-
क्रान्त्या चंद्रकांतेः समत्वमाग्रमकाले न भवति । अतः पूर्वकाले चंद्रकांत!नत्वादवि-
क्रांत्यपचयस्यान्यत्त्वाच्च तत्क्रांतिसाम्पं जातमित्यनुमितम् । एवं समपदस्थे-
न्दुकांतिरूना तदाग्रे सूर्यकांतेयूंना तदाने सुतरां न्यूनत्वाचत्साम्याभावः । पूर्व त्वधि-
कत्वात्तत्समत्वं जातमिति ज्ञातम् । यदा तु सूर्यकांतर्विपमपदस्यदुक्रान्त्यधिकत्वेन
तत्कांतिसाध्यं भवति पूर्व तन्न्यूनत्वे तदभावात् । एवं.सूर्यक्रांतः समपदस्थदुकांतिर-
धिका तदाग्रे न्यूनत्वेन तत्साम्यं भवति । अतएव तत्तुल्यत्वे वर्तमान इति । अत्र चं-
द्रस्य विक्षेपवृत्तं विपुवढ़ने लग्नं यत्र तत्र स्पष्टकांतरभावाहोलसन्धिः । तस्मात् त्रिमां-
तरे विक्षेपवृत्तेऽयनसंधिः । स्पष्टकातिस्तदंतराल उपचितापचित्तायनसंधिस्थकांत्य-
नधिका । यदा चंद्रकांतिमध्यमा शरमिन्नदिका शरादल्पा तदा शराच्छाधनेन स्पष्ट-
कांतिमध्यमक्रांतिसम्बंधपदभिन्नपदंसंवधा भवति । अतः “पदान्यत्वं विधोः क्रांति-
विक्षेपाचद्विशुध्यति" इनि सम्पगुक्तम् । भास्कराचार्योक्तं च “चके चक्राधे च व्यय-
नांशेजस्य गोलसंधिः स्यात् । एवं त्रिभे च नवमेध्यनसंधिय॑यनतभागेऽस्य ॥ अय-
नांशोनितपाताहोः कोटिज्ये लघुज्यकोत्थेये । ते गुणसूर्यरश्वैगुणते भक्ते कृतैः सूर्यैः
अयनांशोनितपाते मृगकस्यादिस्यिते हि पगमः । कोटिफलयुतविहीन हुफलं
मक्तमाप्तांशैः । मेपादिस्थ गोलायनसंधी भास्करस्योनौ। तो चंद्रस्य स्यातां तुला-
दिपकस्थिते तु संयुक्तौ ॥ गोलस्यनसंध्यन्तं पदं विधोरत्र धीमना ज्ञेयम् । रखिगोल
पदस्पष्टस्पष्टाक्रांतिः स्वगोलदिपछाशेनः ॥” इाते पदज्ञानम् । अनेनैव प्रकारेण चंद्रस्प-
टक्रांतेः पदं ज्ञेयं विक्षेपवृत्तसम्बंधत्वात् । न साधारणपदज्ञानेन पटकांतः क्रां-
तिवृत्तसंबंधाभावान् अन्यथा पदज्ञानासम्भवापत्तेः । एतदगीकारे पदान्यत्वमित्याधध
व्यर्थमपि भगवता तदर्धनैतादृशं पदं ज्ञापितमन्यया तदनुत्तयापत्तरिति दिक् ॥७॥८॥
भाण्टी०-ओजपदमें स्थित चद्रमावी विक्षेप-संस्कृत कान्त रविक्राति से अधिक हामपर
पात गत मा है । अल्प होनेपर भारी है । युग्मपदमे तिससे विपरीत है। जो विक्षेपसे काति
मलग करनी हो चंटमा मोर पदको प्राप्त करता है ॥७॥८॥
ध्यायः १२४ संस्कृतटोका-मापाटीकासमेतः । (१७७) अथ गतेष्यकालानयनं विवक्षुः प्रथमं स्पष्टक्रांतिसाम्यानयनप्रकार श्लोकत्रयेणाह- शान्त्योज्य विज्यया भिन्ने परक्रान्तिज्ययोद्धते ।। तचापान्तरमधै वा योज्यं भाविनि शीतगो ॥ ९ ॥ शोध्यं चन्द्राद्गते पाते तत्सूर्यगतिताडितम् ॥ चन्द्रभुत्त्याहृतं भानौ लिप्तादि शशिवरफलम् ॥ १० ॥ तद्वच्छशशाङ्कपातस्य फलं देयं विपर्ययात् ॥ कमैतदसकृत्तावद्यावत्कान्ती समेतयोः ॥११॥ सूर्यचन्द्रयोः साधितांत्योयें कार्य ते त्रिज्यया गुणिते । परक्रांतिज्यया परंमा परमज्या तु सप्तरंध्रगुणेदवः इति पूक्तिपरमकांतिज्ययेत्यर्थः । मक्ते। तयोः फलयोधनुपी कार्य । चंद्रस्य यदा त्रिज्याधिकं फलं तदोक्तमकारेणाधनुषोऽ. संमवात्रिज्यया नवत्यंशास्तदेष्टज्यया कइत्यनुपातेन धनुः कार्यम् अथवा त्रिज्यातो यदधिकं तदुक्तक्रमधनुपा युक्ताश्चतुःपञ्चाशच्छतकला धनुः स्यादिति ध्येयम् ।। तयोरन्तरमर्धम् अन्तरार्धम् । वा विकल्पार्थकः । अथवा विपयव्यवस्थार्थकः । सातु यदान्तरमल्पं तदान्तरम् । यदा तु वदन्तरं तदान्तरार्धे ग्राह्यमिति । मावनि भविष्य- त्पात । चन्द्रे राश्यात्मके । तत्कलात्मकं युक्त कार्यम् । गते पाते सति । चन्द्रादीन कार्य चन्द्रः स्यात् । सूर्यसाधनमाह-तदिति । चन्द्रसम्वन्धिसंस्कृतफलम् । स्पष्टसूर्य- गत्या गुणितं स्पष्टचन्द्रगत्या भक्तं फलं कलादिकं चन्द्रवत् । चन्द्रयुतहीनक्रमेण सूर्य युतहीन कार्य सूर्यः स्यात् । चन्द्रपातसाधनमाह-तद्वदिति । चन्द्रपातस्य फैलं कला- दिकम् । तद्वत् । चन्द्रफलं पातगत्या गुणितं स्पष्टचन्द्रगल्या मक्तं विपर्ययात् व्यायां सात् । देयं संस्कार्यम् । चन्द्रयुतहीनक्रमेण चन्द्रपाते हीनयुत कार्यम् । चन्द्रपातः स्यात् । उक्तक्रियातिदेशमाह-कर्मेति । एतत् उक्तं कर्म गणितक्रियारूपम् । असन् अनेकवारम् । साधितसूर्यात् । सूर्यक्रान्ति प्रसाध्य साधितचन्द्रपाताभ्यां चन्द्रस्पष्टका- न्ति प्रसाध्य ताभ्यां क्रान्तिभ्यां क्रान्त्योज्य इत्यादिना चापान्तरं न वा तत्कान्ति- भ्यामवगतगौप्यपातलक्षणवशात् द्वितीयचन्द्रे होनयुतं तृतीयचन्द्रः स्यात् । आयसर्व चन्द्रगतिभ्यामवगतसूर्यपातफलं द्वितीयसूर्यपातयोर्ययोक्तं संस्कृतं तृतीयस्र्यपातौ । एभ्यः सूर्यचन्द्रपातेभ्यः सूर्यचन्द्रक्रांतिग्यां साधिताभ्यां चापान्तरं तद वा तृतीय- चन्द्रे तत्कान्यवगतगतष्यपातवशात्संस्कृतं चतुर्थचन्द्रः स्यात् । आधसूर्यचन्द्रगन्यय- गतवरलं संस्कृती तृतीयसूर्यपाती चतुर्थचपाती स्तः । एवमेभ्यः पंचमाश्चन्द्रसूर्य- पाता उक्तरीत्या साध्या इत्युत्तरोत्तरं मुहुः साध्या, इत्ययः । अवधिमाह तावादति । यावधवधि तपोः सूर्यचन्द्रयोः कान्ती स्पष्टकान्तिवल्ये स्तस्तावत्व प्रक्रिया कार्य: ।
46 (१७८) सूर्यसिद्धान्तः- [एकादशोऽ- त्ययः । अत्रोपपचिः। मध्यमक्रान्तिसाम्यरूपपातकालिक्स्पष्टक्रान्तिभ्यां स्पष्टक्रान्ति- साम्यरूपं वस्तुभूतपातकालो गतैष्यत्वन ज्ञातोऽपि विशेषतस्तत्कालज्ञानार्य सूर्यचन्द्रयोः नान्तीसमे स्पष्टे उपपन्ने कायें। तत्र मध्यपातकालागतेप्यपातवशादभीष्टकाले चन्द्र- सुर्यपातान्मसाध्य तयोः क्रान्ती साध्ये । एवं साधितकान्त्योर्यदेवातुल्यत्वं तदैव स्पष्ट- पातः । अथानियमात्मयमं पूर्वाग्रिमकाले चन्द्रसाधनाथै चन्द्रस्येप्टांशाहोना यो- ज्याश्चति नियता भागा उक्तमकारानीता एवेष्टाः कल्पिताः। तथाहि । सूर्यक्रान्ति- ज्यातः परक्रान्तिव्यया न्यूनया चतुर्दशशतमितया त्रिज्यातुल्या दाा तदेष्टक्रान्ति- ज्यायाः केन्यभाष्टदोायाश्चापं सापनसूर्यभुज एव । एवं चंद्रस्पष्टाकाान्तज्यातश्चापं सायनसूर्यभुजान्यूनमाधिकं भवति । क्रांतिसमत्वाभावात् । यद्यपि न्यूनचतुर्दशशता- विकस्पष्टका तरुक्तरीत्या भुजज्यायात्रिज्याधिकन्वेन चापाकरणमशक्यं तथापि त्रिज्याधिकस्य क्रमवापलिप्ताः खखान्धिवाणा धनुरुत्क्रमात्स्यात् " इति सिद्धान्त. शिरोमण्युक्तौ परीत्येत त्रिज्यातो यदधिकं तदुत्क्रमचापयुकाश्चतुःपञ्चाशच्छतकला इत्यनेन चापोत्पत्ती न क्षतिः । एतेन' चापासम्भवशाक्या सार्धाष्टविंशत्यंशानां ज्या- परमकान्तिज्योते । सायनसन्धिस्थस्पष्टक्रान्तिज्या चोते च निरस्तम् । ग्रन्थे ययोः परमकान्तिज्यात्वानुक्तेः ।' स्पष्टक्रान्तसाम्यानन्तरमप्युक्तर्गत्या कर्मान्तरानिधारणानु- पपत्तश्च । क्रान्त्योस्तुल्यत्वेऽपि हरभेदातापान्तरसदावन क्रियाकुण्ठनासम्भवात् । नह्यामकृस्कमणि स्वाभीष्टमिद्ध्यनन्तरं कर्मातरं सम्भवति । अप्रसिद्धः स्वरूपव्याघा- ताच । तचाप्योरन्तरमिगंशाश्चन्द्रस्य गतेष्यपातवशाधीनयुता अभीपचन्द्रो भवति । तदिगंशानां बहु वे बहुपरिवर्तरभीष्टसिद्धिरतोऽल्पपरिवर्तेरमा सिद्धयर्थं तदमिांगा इति । अथेने चन्द्रस्यष्टांशा इत्येभ्यश्चन्द्रगतिप्रमाणे ते तदा सूर्यपातगतिभ्यां क इत्य- पातेन तयोश्चन्द्रकालिकत्वसिद्धयर्यमिष्टांशा एते सूर्यस्प संस्कृनाश्चन्द्रवभीष्टसूर्यो भाति । पातस्य तु चक्रशुद्धत्वेन विपरीतत्वात्पातेष्टांशाः पातस्य व्यस्त संस्का; अमी. हपातो भवाने । एभ्यः सूर्यचन्द्रयोः स्पष्टकान्ती साध्ये । तयोरसमत्व उक्तरीत्या चन्द्र स्पेष्टांशा एतत्साधितचन्द्रे संस्कार्याः । न प्रथमचन्द्रे । तत्कान्तिजवाभावात् । अन्य- था समफन्त्यनन्तरमपि तयोरिष्टांशामावे प्रथमचन्द्रसूर्यपातानां तत्संस्कृतेऽप्यविकारा- सकायोदितीयपरिवर्तकान्तसमत्वेन कर्मान्तरसम्भवात् क्रियाकुण्ठनत्वानुपपत्तेः । अव्यवहितपूर्वग्रहयोजने वन्यकर्मण एवं सिद्धेः । कर्मान्तरासम्भवाच्च । सूर्यपातयो. रिष्टांगास्तु पूर्वचन्द्रसूर्यस्पष्टगतिभ्यामेव स्वल्पान्तरात्कार्याः । अव्यवहितपूर्वकाले स्पष्ट- गन्यज्ञानात् । एवमसकृत्करणेन क्रान्त्योः साम्यमुत्तरोत्तरपरिवान्तरे भवत्येवेत्युपपन्नं क्रान्त्योज्येत्यादिश्लोकत्रयम् ॥ ९ ॥ १० ॥ ११ ॥ म.०-दानश क्रान्तिज्यात्रिज्या गुणकरके परमकान्तिज्यासे माग कानेपा जो सध्या हा तिनक धनुका अन्तर तिस से भाषापात भवी होनेपर पेटमा योगरे। पातगत प्यायः ११.] संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतः। (१७९) होनेपर सो चन्द्रमासे वियोगकरे । उपर कहा हुमा फल सूर्यगतिसे भागकरके जो होगा तिसका चन्दमाकी नई सूर्यमें सस्सार करे सूर्यको रीतिके अनुसार पतस्पष्ट में विपरीत रूपसे सरकार करे । इस प्रकार सस्कार क्रान्निकी समता न होनेतक मसकृत् साधन वरे॥९॥१०॥ ११॥ अथ क्रान्तिसाम्यं पात इति स्पष्टं कथयस्तत्कालज्ञानार्थ साधितक्रान्तिसाम्यसम्ब- न्धिचन्द्रासन्नार्धानात्पातकालस्य गतगम्यत्वमाह- कान्त्योःसमते पातोऽथ प्रक्षिप्तांशोनिते विधौ ।। हीनेऽर्धराधिकायातो भावी तत्कालिकेऽधिके ।। १२ ॥ सूर्यचन्द्रयोः स्पष्टकान् यो साम्ये स्पष्टः पातः स्यात् । अथानन्तरम् । स्पष्टपात. सम्बन्धी साधितचन्द्रः पूर्गनुसन्धानेनापाततो यद्दिनीयो भवति तदासन्नाधरात्र- काल स्पष्टचन्द्रो मध्यस्पष्टाधिवरोक्तमकारेण साध्यः । तस्मादर्धरात्रकालिकाचन्द्रा- संक्षिप्तांशोनिते क्रान्तिचापान्तरण तदर्धेन वा युतोनिते चन्द्रे स्पटकान्तिसाम्यसम्ब- द्भसाधितचन्द्रे न्यूने सति तदर्धरात्रकालापातकारो गतः । तात्कालिके क्रातिसाम्य- कालिकमाधितचन्द्रर्धरात्रकालिकचन्द्रादधिके सति तदर्धरानकालात्पातकाल एष्य इत्यर्थः। अत्रोपपत्तिः । यद्यपि स्पष्टक्रान्तिसाम्यसम्बदचन्द्रमध्यक्रातसाम्यका- लिकचन्द्राभ्यां वक्ष्यमाणप्रकारेण पातकालस्य मध्यकातिसाम्यकालागतष्यघट्यादि- ज्ञानं भवतीति निक्टाधरात्रिकचन्द्रात्सत्साधनं पुनस्तद्गतेष्यकथनं च गोरवम् । मार्धरानिकस्पष्टचन्द्रसाधनक्रियाधिक्यात् । तथापि चन्द्रगनेरतिमहत्त्वेन मातिक्षणं गते- बहन्तरेणान्याशत्वाद्रहुकालान्तरे वहुकालान्तरितस्पटगत्यानीतधट्यान्मकस्यातिस्थू- लत्वादासनकाले खल्पान्तरायासन्नार्धनिकः स्पष्टचन्द्रो प्रयोक्तः स स्पष्टगतिकोऽ. वश्यमपतिः । अतस्तस्माचन्द्रात्स्पष्टक्रातिमाम्यसस्वदचन्द्रस्य न्यूनाधेिको क्रमेण तदर्धरामात्स्पष्टपातो गतेष्य इति सम्यगुक्तम् । अतएव “ समीपतिथ्यन्तसमीपचा- लन विधोस्तु तत्कालजयैव युज्यते " इति भास्कराचार्याक्तं संगच्छने ॥ १२ ॥ मा० टी० सूर्य और चन्द्रमाके क्रांतियोंगी समताही पात है प्रक्षिप्तांश संस्कृत चन्द्र मध्य- रात्रिक घन्टे हीन होनेपर मध्यराबमें पातगत मोर तिस कालंका चन्द्रमा अधिक होने से पातमावी होता है ॥ १२॥ अथ स्पष्टपातकालज्ञानमाह- स्थियिकृतारानेन्द्रोयोविवरलिप्तिकाः ॥ पष्टिनाश्चन्द्रभुत्त्याप्ताः पातकालस्य नाडिकाः ॥ १३ ॥ स्थिरीकृतार्धविन्दोः साक्रतिसाम्पसम्बदसाधिता सकृकिया नियतचन्द्रस्त- दासनाधाकिस्पश्चन्द्रः । वयोरुभयोः। अब इयोरिति पूर्वपदार्थव्यकिरणाय । ..
(२८०) न्यसिद्धान्त:- [ एकादशोऽ अन्येयकाचनप्रमादाद्याकुलतापतेः । अन्तरकलाः पष्टया गुणिता अर्धराविकचन्द्र- स्पष्टकलात्मकगत्या भक्ताः फलम् । पातकालस्यधिरावाद्गतष्यस्पष्टकांतिसाम्यस्य घाटेका भवति । अर्धरात्रागतष्यक्रमण फलघटीमिः पूर्वमुत्तरन सष्टक्रांतिसाम्यरूप- पातः स्यादित्यर्थः । अत्रोपपत्तिः । चंद्रस्पष्टगत्या पटिसावनघाटकास्तदा स्वाभीष्टा. धेरात्रकालिकान्तिसाम्यकालिकस्पष्टचन्द्रयोरंतरकलामिः काइत्युपपन्नमुक्तम् । साधेि. तसूर्यस्य प्राथामिकचन्द्रगतिग्रहणेन स्थूलत्वार्धरात्रिकस्पष्टसर्यादुक्तरीत्या पातकाला- नयनं स्थूलं नोक्तमिति ध्येयम् ॥ १३ ॥ भा० टी० क्रांतिसाम्यगत चन्द्रमा मोर मध्यरात्र चन्द्रमाकी अन्तरकला ६० से गुणक- के चन्दभक्तिद्वारा भागकरनेपर मध्यराबसे पातकालके स्पटका मन्तर होगा ॥ १३ ॥ अथ पातकालस्य स्थित्यर्धानयनमाह- खीन्दुमानयोगाध पश्या सद्गुण्य भाजपेत् ॥ तयोर्भत्यन्तरेणाप्तं स्थित्यद नाडिकादि तत् ॥ १४ ॥ सूर्यचन्द्रयोश्चन्द्रग्रहण धिकारोक्तमकारेण ये विम्बमानकले । स्वस्वगतिकलोत्पन्ने तयोरक्यस्या षष्ट्या गुणयित्वा सूर्यचन्द्रयोः कलात्मकस्पष्टगत्योरन्तरेण भजेव। यल्लब्धं तद्घटिकादिकं स्थित्यधै पातकालात्पूर्वमपरत्र च स्थित्यर्धकालपर्यन्तं पातस्या. वस्थानमित्यर्थः । अत्रोपपत्तिः । सूर्यचन्द्रविम्बकेन्द्रयोरेकडरात्रवृत्तस्थत्वे विपुवठ्ठवा. दुमयतम्तुल्यान्तरत्वे वा पातमध्यं केन्द्रसाम्याद्रिपुववृत्तात्क्रान्तिसत्रस्थो मण्डलपार. विप्रदेशो य आसन्नः स विम्वपृष्ठप्रान्तः । दूरस्थस्तु विम्बाग्रप्रांतः । याम्योत्तरगमने- न पातस्योक्तः । तत्र शीघ्रविम्बाग्रप्रान्तमन्दपृष्ठविम्बप्रान्तयोस्तथात्वे पातारम्मः । सूर्यविम्वाग्रप्रांतचन्द्रबिम्वपृष्ठप्रांतयोस्तयात्वे पातान्तः । अत आयंतकालाभ्यां क्रमेण पूर्वोत्तरकालयाश्चन्द्राविम्बांतर्गतप्रदेशानां केपामप्युक्तरूपस्थितित्वाभावेनः सूर्यचन्द्र- योस्तथाभावात्पाताभाव इत्यादिकालमारभ्यांतकालपर्यंत. सूर्यचन्द्रयोस्तथात्वात्पात. स्थितिः पातमध्यकाले क्रान्त्यन्तराभावः पाताधन्तकालयोनिक्यातुल्य क्रांत्यन्तरम्। तेन ततुल्यांतरस्यापचयकाल उपचयकालश्चाद्यतस्थित्यः । तत्र तत्कालानयनं. सूर्य- चन्द्रगत्यन्तरेण पष्टिघटिकास्तदा मानक्यखण्डकलाभिः का इत्यनुपातेनोक्तमुपपन्नम् । यद्यपि प्रमाणेच्छयोः समजावित्वामावादनुपातोऽसंगतः क्रांतर्दक्षिणोत्तरांतरस्योपचया- पचययोः सूर्यचन्द्रगुत्यन्तररय पूर्वापरांतरस्योपच्यापचयाभ्यामतिविलक्षणत्वात् । तथापे गणितलाघवार्थ मगवता स्वल्पांतरत्वेनानुपातो लोकानुषम्पयांगीकृत इत्य- दोपः। भास्कराचार्येस्तु-"मानक्याधै गुणितं स्पष्टघटोभिर्विभक्तमायन । लब्धघटीमि- मध्यादादिः मागप्रतश्च पातान्तः ॥ इति युक्तमुक्तम् । केचित्तु पष्टियटिका- भिर्महान्यचाल्य क्रांतिः स्पष्टा साध्या । मत्येकं ययोरतरं योगो वा गत्यन्तरमिति मरामिमवमाहुः ॥ १४ ॥ -4 प्यायः ११.] संस्काका-मापाटीकासमेतः । (१८१) मा० टो०-सूर्य और चन्द्रमाके मान योगाईको ६० से गुणकरके तिमके मुक्त्यन्तरसे भाग करनेपर स्थिस्यर्द्ध दण्ड होगा ॥ १४ ॥ भय पातस्यादिमध्यांतकालानाह- पातकाल स्फुटो मध्यः सोऽपि स्थित्यर्धवर्जितः !! तस्य सम्भवकालः स्यात्तत्संयुक्तोऽन्त्यसंज्ञितः ।। १२ ।। स्थिरीकृताधरात्रेत्यादिना स्पष्टः पातकालः क्रांतिसाम्यस्य काल आनीतो म. 'ध्यसञो ज्ञेयः । स मध्यकाल आनीतस्थित्यर्धन हीनस्तस्य पातस्य सम्भवकाल आरम्भकालः । अपिः समुच्ये । तत्संयुक्तः' स्थित्यर्धयुक्तो मध्यकालो 'ऽन्त्यसज्ञितः पातो भवति । पातस्यान्तकालो भवतीत्यर्थः । अत्रोपपत्तिश्चन्द्रग्रहण स्पर्शमोक्षवत्स्पष्टा । स्वरूपं तु प्राव्यक्तीकृतम् ॥ १५ ॥ भा०टी०-पातकालही मध्य है । तिससे स्थित्याई वियोग करनेपर पातका सम्भवकाल मौर स्थिरयर्द्ध योग करने अन्य काळ होता है । १५॥ अथैतज्ञानस्य प्रयोजन किमित्यतः पातरिथतिकालो मंगलकृत्ये निपिद इत्याह- आयन्तकालयामध्यः कालो ज्ञेयोऽतिदारुणः ।। प्रज्वलज्ज्वलनाकारः सर्वकर्मसु गर्हितः ॥ १६ ॥ पातस्यारम्भसमाप्तिसमयघोरन्तरालवर्ती समयः अत्यन्त कठिनः । संवैधु मंगल' कृत्येषु निन्दितो ज्ञेयः । गर्भ विशेषणमाह-प्रज्वलज्ज्वलनाकार इति। देदोप्या मानामिस्वरूपः । तथाच कृ मंगलकृत्यं मस्मावशेष स्यादिति मावः ॥ १६ ॥ भा. टी.-सम्भवकासे अन्यतक काल अतिदारुण है। सो देदीप्यमान मनिस्वरूप और समरत शुमकर्मों में निहित है ॥ १६ ॥ ननु पातस्य क्रांतिसाम्बोन समकालरूपत्वादागतमध्यकाल एव सूक्ष्मः शुमक मस निन्दितो न पातस्थित्यात्मकस्थलकालः क्रान्तिसाम्यामावादित्यत आह- एकायन यापदकेन्द्रोर्मण्डगत्तरम् । सम्भवस्तावदेवस्य सर्वकर्मविनाशकृत् ॥ १७ ॥ सूर्यचन्द्रयोमण्डलान्तरं प्रत्येक विम्बैकदेशरूपं यावद्यत्कालपर्यंतमेकायनगत तुल्य. मार्गस्थितं भवति । तावत्तत्कालपर्यतम् । एक्कारो न्यूनाधिकव्यवच्छेदार्थकः । अस्य पातस्य । सकलशुभकर्मणामाचरितानां नाशकारी । सम्मन उत्पात्तः । स्थितिगिते या यत् । न क्रान्तिसाम्यमात्र स्थितिरलक्ष्यत्वात् । तथा च विषुवट्टचादुभवत एकतो वा चंद्राकविम्वैकदेशयोः कयोरपि तुल्यान्तरेण यावदवस्यान केन्द्रावस्थानाभावेऽपि विम्ब- सम्बन्धात्पातस्थितिः ! अतएव "तावत्समत्वमेव क्रांत्योविवरं भवेद्यावन् । मानक्या- दूनं साम्याडिम्बैकदेशनकांत्योः ॥” इति भास्कराचार्याक्तं युक्ततरांमनि भावः।।१७ एककाठामतम् इति पाठान्तरम् ।
(१८२) मुसिद्धान्तः- [ ण्वादशी- माटी-जितनी देरतक सूर्य मौर चटमण्डलका कोई मश एवस्थान में हो तो सर्व कर्म विनाशकारी इस पातरा सम्मम हता है॥ १७ ॥ नन्वयं केवलं मंगलनाशको न शुभकारक इत्यत आह- नानदानजपथावतहोमादिकमभिः ।। प्राप्यते सुमहच्छ्यस्तत्कालज्ञनितस्तथा ॥ १८॥ वतं स्वाभिमतदेवताराधनम् । आदिपदाचमातरम । इत्यादि पुण्यरियाभिस्तत्का- लकृताभिः । सुतरामुत्कृष्टं कल्याण मनुष्यलभ्यते । तस्य पातस्य स्थित्यादिकालना- नात् । तथा समुच्चये । तेन महच्छेयः प्राप्यत इत्यर्थः । १८ ।। माल्टी-पातालको जानवर स्नान, दान, जप, श्राद्ध, व्रत होमादिकार्य करनेसे महान श्रेष्ठफक प्राप्त होता है।॥ १८॥ अथ पातविशेषमाह- रवीन्द्रोस्तुल्यता क्रान्त्योर्विषुवत्सन्निधौ यदा ॥ विर्भवेतिस्तदा पातः स्यादभावो विपर्षयत् ।। १९ ॥ यदा यस्मिन्काले विपुवन्निक्टे कान्त्यभाषामन्ने । अत्र चन्द्रस्य स्पष्टकात्यमावास- अत्वं ध्येयम् । सूर्यचन्द्रयोः कात्योः समता माति । तदा तस्मिस्तदासनकाले स्थूल- रूपे प्रात्यमावादुमयन द्विवैधृतव्यतीपातमेदवयात्मनः पानः । द्विः प्रत्येक विधा वार. दयं भवेत् । विपर्ययाद्वक्तव्यत्यासात् । चारायणसन्निधिनिक्टे तयोः क्रांत्योस्तुल्यत्व इत्यर्थः । अयातुल्यत्वं सूर्यकातितश्चन्द्रस्पष्टकतिन्यूनत्वमेव माधिकत्वमिति ध्येयम् । अमावः क्रातिसाम्यरूपपातस्य तस्मिन् स्थूलकीले विञ्चिन्मितेऽनुत्पत्तिः स्यात् । एतेन 'स्वायनसन्धविन्दोः कांतिस्तत्कालभास्करमतिः। उना यावती कात्योः साम्यं तयोर्ना- स्त ॥” इतिभास्कराचायक्ति संगच्छते । तत्साधनं तु प्रथमांगतापान्तरादिष्टांशा- आन्द्रे युता हीना इति प्रत्येक्मसकृत्कियया द्विधापतिकालस्यं जयम् ।। अत्रोपपत्तिः । व्यतीपाते विषुववृत्तादुमयस्तुरूपान्तरेण संपचंद्रपारपस्थितिकारोऽपि पतित्वम् । क्रांति साम्पादेव वैधृतेऽप्येकाहोरात्रवृत्तस्थत्वकाले पतित्वम् । एवमेव वियोगव्यतीपातवै- धृतयोरप्येकाहोरात्रवृत्तस्थत्वे विषुववृत्तादुमयतस्तुल्यान्तरास्थितो च, पातत्वम् । फ्रातिसाम्यादियुक्तगोलसिद्धं चन्द्रगोलसन्धिनिटे प्रत्यक्षम् । अमावोपपत्तिस्तु चन्द्रस्य स्वायनसन्धी तत्स्पष्टक्रांतितुल्य परमें विषुबदृत्ताक्षिणोत्तरं गमनं भवत्यस्मादने पृष्ठे वा विक्षेपरचेभ्रंमतश्चन्द्रस्य क्रांतिऍनैव सम्भवत्यतः स्वायनसन्धिस्थचन्द्रकालिक सर्यक्रांतिः स्वायनसंधिस्यचन्द्रस्पष्टकान्तेरधिमा तटेष्टचन्द्रकान्तेन्यूनत्वेनाधिकसयष्टका- न्या सनत्यानुत्पत्तिः । सर्यस्य चन्द्राल्पगमनत्वात् क्रांत्यपचयस्यापि चन्द्रकांत्यपच- कर्मम् दाउमा..
ध्यायः ११.] संस्कृतीका-मापाटीकासमेतः। (१८३) याल्पत्वसम्मवात् । सूर्यकांत्युपचये तु सुनरां तदसम्भवः । एवं तत्रत्यसूर्यक्रांतिन्यूना तदापचयाधिक्याचन्द्रस्पष्टकांतिस्तत्समा तदुत्तरपूर्वकाले सम्भवाते । सूर्यक्रांत्युपचये तु सुतराम् । तयाच द्वितीयरविगोलसन्ध्यासन्ने चंद्रपाते स्वायनसंन्यासन्ने सूर्य च तदसम्भरः कियंति चिदिनानीति यावत्तावदुक्तमन्यत्र सत्सम्भावना भवतीति गोलयु- त्या फलितम् । अथासम्भवलक्षणेऽपि क्रांत्यतरस्य मानक्यखण्डादल्पत्वे एकायनगतं यावदकेन्दोमण्डलांतरम्" इति पूर्वोक्तेन पातसम्भवः । तत्र पातमध्यं तास्मिन्नवे काले स्थित्यधै तु "वींदुमानयोगार्धम्" इत्युक्तरीत्या मानयोगामितिस्थाने क्रांत्यंतरमानैक्यखण्डयोरतरं गृहीत्या साध्यामिति ध्येयम् ॥ १९ ॥ टी-विपुत् निकटके चंद्रमा सूर्यको शान्तिको तुल्यता होनेपर दो पात दो बार होते हैं, नहीं तो दोनों वही अभाव होता है ॥ १९ ॥ अथ शुभकार्य महापातस्य निपिद्धत्वोक्तिप्रसंगात्पञ्चांगांतर्गतयोगांतर्गतव्यतीपात- " भा० स्येव ज्ञानमाह- शशांकार्कयुतेलिप्ता भभोगेन विभाजिताः ॥ लब्धं सप्तदशान्तोऽन्यो व्यतीपातस्तृतीयकः ॥ २०॥ अयनांशसंस्कृतयोश्चंद्रसूर्ययोर्योगस्व राश्यादेः कला अष्टशतेन भक्ताः फलं सप्तद शांतः । सप्तदशमध्ये पोडशानंतरं सप्तदशपर्यतमित्यर्थः । तदपि व्यतीपातः । अन्य एतदधिकारपूर्वोक्तातिरिक्तः। तृतीय एव तृतीयकः । सूर्यचंद्रयोगातराभ्यां व्यतीपातद्वै- विध्यात् । एवमुपलक्षणादुक्तरीत्या फलं पड्विंशत्यनंतर सतविंशतिस्तदा तृतीयों वैधृतिः । तत्तज्ञपातस्यापि योगांतराभ्यां वैविध्यादिति । अापपचिः । विष्कम्मा- दिय॑तीपातः सप्तदशो योग इति ॥२०॥ मा० टी०-चंद्रमा और सूर्यको क्ला मिलाकर ८०० से भाग करनेपर मागफल १५ भन्तम (निकट ) होनेपर व्यतीपात नामक तीसरा पात होता है ॥ २० ॥ अथ प्रसंगादेवनल्यानपिद्धे गण्डांतमसन्धी विवक्षस्तयोः स्वरूपज्ञानमाह- सान्द्रपोष्णधिष्ण्यानामन्त्याः पादा भसन्धयः ।। तदनभेजाद्यपादो गण्डान्तं नाम कीर्त्यते ॥ २१ ॥ आश्लेषाज्येष्ठतारेवतीनक्षत्राणामत्याश्चतुर्याश्चरणाः नक्षत्रसंघयो भवति । तदअमेपु सेपामालंपाज्येष्ठारेवतीनक्षत्राणामग्निमनाचेपु मघामूलाश्विनीनक्षत्रेष्वित्पर्यः । प्रथम- चरणो गण्डांत नाम प्रसिद्धमुच्यते । यद्यप्याशेपाज्येष्ठारेवानक्षत्राणामतिमं घटिका द्वयं मघामू भाम्धिनीनक्षत्राणामादिम घाटकाइयामिति चतलोतरघाटका गंडांतम् । एत. दतिरिक्ती नक्षसधिः पूर्वनक्षत्रांतरचटिकोत्तरनक्षत्रादिपवाटिकत्यंतरालपटिकादयं चंद्रमण्डलसंबंधन घटिकाः साईद्वयामति संहिताविरुद्ध तयापि सातस्य स्वतः (१८४) सूर्यसिद्धान्तः- [एकादशोऽ- प्रामाण्यान्न क्षतिः । अथवैकवाक्यताथपादशब्द: करनेत्रा दिवाहसंख्यावाचकः ! घटिका इत्यध्याहारश्च । तथा च दिसंख्यामिता अंत्यघाटका नक्षत्रसंधयः । प्रथमद्विघटिकामितः कालो गण्डांतमित्यर्थः । अत्रापि गण्डांतत्वादमधिकयन- मयुक्तं गण्डांतस्य तदंतरालरूपत्वाचथापि तत्कालस्य निषिद्धत्वोक्तितात्पर्या- विभागद्वयेनोक्तावपि तदंचरालकाला उत्तरोत्तर कालस्पातिनिपिद्धत्वसूचनान्न सातः ॥२१॥ मा० टी०-माश्लेषा, गेष्ठा, रेवतीकावीया परण मसान्ध मोर मश्विनी मघा और मूलक मादपाद गण्डन्त है ॥ २१ ॥ अर्थतदाधिकाराक्तानां तुल्यनिपिद्धत्वमाह- व्यतीपातत्रयं घोरं गण्डान्तत्रितयं तथा ॥ एतद्भसन्धित्रितयं सर्वकर्मसु वर्जयेत् ॥२२॥ व्यतीपातानां त्रयं योगरियोगात्मको क्रांतिसाम्यरूपी द्वौ व्यतीपाती । विपुवत्स. निधी क्रांतिसाम्यांतरेण व्यतीपातस्तयोरेवे भेदः । न पृथक् । पञ्चांगांतर्गतयोगान्तर्ग तव्यतीपातश्चति त्रयं स्पष्टम् । उपलक्ष गाद्वैधातित्रयमपि । योगवियोगात्मको क्रांति साम्यरूपी दो वैधृतिसन्हौ । विषुवत्सन्निधौ क्रांतिसाम्यंतरेण । वैधृतिसज्ञस्तु नयो- रंतर्गतः । न पृथक् । पञ्चांगांतर्गतयोगांतर्गतवैधृतियोगथोत स्पष्टं प्रयम् । कवितु व्यतीपातवैधृतिसझं व्यतीपातद्वयं संज्ञाभेदेन वैधृतिारेति पूर्वमुक्तेः पञ्चांगातर्गतयोगी- तर्गतव्यतापातश्चति व्यतीपातत्रयमिति यथाश्रुतमाहुः । घोरं दुष्ट गण्डांतत्रयम् । तथा घोर नक्षसन्धित्रयम् । एतत्पूर्वोक्तयोरम् । अतः कारणात्मर्वमांगल्यकर्मसु शुभेच्छरे तदुष्ट जवादित्यर्थः ॥ २२ ॥ भा० टी०-तीन, व्यतीपात तीन गण्डान्त, मोर तीन सन्धिगतकाल मतिदू पत है। संप व ममि त्यांग ॥ २२॥ अथाकौशपुरुषः शिष्टावशिष्टं स्ववाक्यमुपसंहरति- इत्येतत्परमं पुण्यं ज्योतिषां चरितं हितम् ।। रहस्यं महदाख्यातं किमन्योतुमिच्छति ॥ २३ ॥ हे मय तुभ्यमिाते । एवमेतत् । शृणुष्यैकमना इत्यादिसर्वकर्मसु वर्जयेदित्यंत ज्योतिषां ग्रहनक्षत्रादीना चरितं माहात्म्यं गणितादिज्ञानमिति यावत् हितामह लोके कीर्तिकरं । परम पुण्यं परत्र लोक उत्कृष्टं धम्यम् । अतएव महद्रहस्यम् । अति. गोप्यमाख्यातं मया कथितम् । अथ स्वोक्तं युक्त्यप्रतिपादित तस्य मनास निश्चित ताथै नागतमिति तद्धरोष्ठस्फुरणदर्शनादनुमितं चास्मै मत्संकोचेन स्वाशंकोद्घाटनाश- येतं प्रश्नमतक्षिावसाने मया युत्यापि वक्तव्यमित्याशयेनाह-किमिति । अतःपरं त्वमत्यदुत्तातिरिक्तं कि कतरन् श्रोतुं ज्ञातुमिच्छसि । तथा च मया तुभ्यं पूर्वमुक्तं -
अध्यायः १२.] संस्कृतटीका-मापाटीकासमंतः । (१८५)
तत्र यनयत्र तव संशयस्तत्रतत्र मत्सकोचमुपेक्ष्य मां प्रति प्रश्नस्त्वया कार्य: । तर
समाधानं कारष्यामीति भावः ॥ २३ ॥
मा० टी०-इस समय परमपवित्र ज्योतिष्क वर्गका महान जोर हितकर रहस्य का अब
झ्या श्रवण करना चाहते हो ।। २३ ।।
अयाग्रिमग्रन्यस्य प्रतिपादिताधिकारासंगतित्वपारद्वारायारब्धाधिकारसमाप्ति फार
कयाइ-इति स्पष्टम् । दशभेदं ग्रहगणितामति दशाधिकारात्मकप्रन्यपूर्वार्धे पाताधिकार-
समाप्त्यासमाप्तमिति तु पाताधिकारान्तस्थेनेत्येतत्परमं पुण्यमित्यादिश्लोकेनैव सूचि.
तम् । रंगनाथेन रचिते सूर्यसिद्धांताटप्पणे । पाताधिकारः पूर्णोऽयं तद्गृढा
थप्रकाशके ॥ सूर्यसिद्धांतगूढार्यप्रकाशकमिदं दलम् ।रंगनायकृतं दृष्ट्वा लभन्तां गणकाः
सुखम् ॥
इति श्रीसकलगणकसार्वभौमवल्लालदेवज्ञात्मजरंगनाथगणकविरचिते गूढार्थप्रकाशके
पूर्वखण्डं परिपूर्तिमगमत् ।
इति सूर्यसिद्धान्ते पाताधिकारः।
एकादश अध्याय समास ।
इति पूर्वखण्डम् ।
अथोत्तरखण्डे द्वादशोऽध्यायः।
महादेवं वस्तुण्डं वाणी सूर्य मणम्य च । कृष्णं गुरुं रङ्गनायो व्याख्याम्युचरख-
भडकम् ॥ अथमुनीन्प्रति सूर्यांशपुरुषवचनमनुवाद्यानन्तरं मयासुरेण सूर्याशपुरुषः
पृष्ट इत्याह-
अभाकोशसमुद्भूतं प्रणिपत्य कृताञ्जलिः ॥
भत्त्या परमयाभ्यर्च्य पप्रच्छेदं मयासुरः ॥ १॥
अथ सूर्याशपुरुपवचनश्रवणानन्तरं मयासुरो मयनामा श्रोता दैत्यः कृताञ्जलि:
रचितहस्ताग्राञ्जलिपुटः । मशिसमुदतं सूोशोत्पन्नं पुरुष स्वाध्यापकं गुरुं परमयो-
स्कृष्टया भक्क्या । आराध्यत्वेन ज्ञानरूपया । अभ्यर्य सम्पृज्य । प्रणिपत्य नमस्कृ-
त्य । समुधयार्थश्चकारोऽधानुसन्धेयः । इदं वक्ष्यमाणं पप्रच्छ पृष्टवान् ॥ १॥
मा० टी-इसके सपरांत मयासुरने सूर्य के मंशसे उत्पन्न हुए पुरुषको हाय नोड परमम-
किसहित प्रणाम करके या पूछा ॥१॥
अथ कि पप्रच्छेत्यतस्तत्मश्नानुवादे प्रथम तत्कृतं भूप्रश्नमाह-
भगवन् किम्प्रमाणा भूः किमाकारा किमाश्रया ।
किविभागा कथं चात्र तप्त पातालभूमयः ॥२॥
[ द्वादशोऽ-
यसिद्धान्त:-
हे भगवन् भूभूमिः किम्प्रमाणा स्यित्प्रमाणं यस्याः सा । किमाकारा कथमाकार
खरूपं यस्याः सा । किमाश्रया क आश्रयो यस्याः सा । विविमागा कयं विमागा
विभक्तांशा यस्याः सा ! यत्र मूम्यां पातालभूमयः पातालविभागरूपा आश्रयाः सप्त-
संख्याकाः कथं तिष्ठन्ति । चा समुच्चयार्थः । किमाकारत्यादी प्रत्येकमन्वेति । अय:
माभिप्रायः। योजनानि शतान्यष्टौ' इत्यादिनावगतभूमानं पञ्चाशकोटिविस्तीर्णति सर्व-
जनावगतभूमानान्निमिति त्वदुक्तभृमाने संशयात्मम्ममाणेति प्रश्नः । अन्यथा
पूर्व भूमानकथनात् । प्रश्नवैयपित्तेः उक्तश्रुतत्वापत्तश्च । एवं लम्घज्यान्न इत्या
दिना स्पष्टपरिष्यन्तरसम्मवात्सर्वजनावगलादर्शाकारतायां भूमौ तदसम्भवेन मवदभिः
मतत्वाकारस्तदातरिक्त इति किमाकाति प्रश्नः । एवं तेन देशान्तराभ्यस्तेत्यादिना -
हाणां मम्पभितो भ्रमणसूचनादाधारे शेपादौ तेपाममितो भ्रमणासम्भवेनाधारे संश-
यात्मिाश्रयोते प्रश्नः । निराधाराया अवस्थानासम्भवात्। एतेन सर्वजनावगतमूस्वरू-
पातिरिक्तभृस्वरूपेणोत्तरार्धप्रश्नावपि प्रमझादुक्तौ सङ्गताविति ॥२॥
भा-टी. हे भगवन् ! स पृथ्वी परमाण क्या है? झाकार कैसा है ? किसके आश्र-
यडे टिकी है? क्या २ विभाग । और किस प्रकार से इसमें संतपाताल और भूमि है ॥२॥
अय किमाश्रयेतिप्रश्नकारणे भृम्पमितो ग्रहभ्रमणे सूर्यस्योपलक्षणत्वेन प्रश्नावाह-
अहोराबव्यवस्थां च विदधाति कथं रविः ।।
कय पति वसुघा भुवनानि विभावयन् ॥ ३॥
सूर्यः । अहोरात्रव्यवस्यां दिनरायोविवेक कथं केन प्रकारेण विदधाति करोति ।
अयं मायः । आदर्शाकारभूम्यामध्ये मेरुस्तदमितो भूम्युपार प्रदक्षिणतया सूर्यभ्रमणेन
स्वदृश्यविभागे सूर्य दिन स्वादृश्यविमागे रात्रिरिति सर्वजनावगताद्भवभिप्रेतं सूर्य-
भ्रमणं भिन्नम् ताई त्वन्मते सूर्यो दिन रात्रि च व्यवधायकाव्यवधायको विना कप
फरोते । अन्ये ग्रहा अपि कथं स्वदिन खरात्रि चकुर्वति। सूर्योपलक्षणत्वादिति। अय
गूम्पमिमितो भ्रमणांगीकारे भूरेष व्यवधायिकेत्यहोरात्रव्यवस्था युक्तेबे यतः प्रश्नान्त'
रमाह-कार्यामति । सूर्यो भवनानि वक्ष्यमाणस्वरूपाणि विभावयन् प्रकाशयन् सन्व-
सुधा पृथ्वी कयं फेन प्रकारेण पति प्रदक्षिणतया भ्रमति । भूमोनराधारावस्थानास-
म्भवेन साधारत्वे भूम्यमितो ग्रहणभ्रमणमाधारे वाधितामितिभावः ॥ ३ ॥
माल्टो०-और सूर्यनारायण किस प्रशाले दिनरातको व्यवस्था पते हैं । मुधनगणमा
काश परफे पृथ्वीर फेसे पर्यटन करते हैं।"
प्रभावाह-
देवासुराणामन्योन्यमहोरात्रं विपर्ययात् ॥
किमयतत्कथं वा स्याद्रानो गणपूरणात् ॥४॥
ध्यायः १२.] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतः। (१८७) पृधि पूर्वार्ध व्याख्यातम् । किमय कोऽर्थोऽभिप्रायो यस्य तदित्यहोरानविशेष- णम् । देवासुरयोनि राविश्वामिन्ना कथं नोक्ता व्यत्यासे नियामकाभावादिति भावः । तद्देवासुरयोरहोरात्रं सूर्यस्य द्वादशराशिमोगादित्यर्थः । क्यं कुतः । वाकारः समुचये भवाते । उभयत्र नियामकाभावादुमयनं मम सन्देहः । दिनरात्र्योः सूर्यदर्शनादर्शन- नियामकत्वाद्यन सूर्य पण्मासावधेि देवाः पश्यति तनामुरा न पश्यति । यत्र देवाः पण्मासावधेि न पश्यन्ति तनासुराः पश्यंतीत्यह भगवता बोधनीय इति भावः ॥ ४॥ मा०टी० -देवता व मसुरोके दिनरात परस्पर विपरीत क्यों है ? और यह क्यों सूपकी १२ राशियोंके भ्रमणकी समान ॥४॥ अथ प्रश्नातरे पूर्वोक्तालोक्यस्य तात्पर्य प्रश्नं चाह- पियं मासेन भवति नाडीपश्या तु मानुपम् ॥ तदेव किल सर्वत्र नै भवेत्केन हेतुना ॥५॥ पितृणामिदमहोरात्रं मासेन वर्षाढधिकचाठमासेन केन हेतुनेत्यस्य प्रत्येक समन्व- यात् । केन कारणेन भवति । अन्यया प्रश्नानुपपत्तेः । सावनघटीपष्टया मानुषं मनु- ष्याणामहोरात्रं केन कारणेन भवतीत्यर्थः । न च यथा दिव्य तदहरुच्यते इत्युक्तं तथा पूर्वोक्ते पित्र्यमानुपाहोरात्रयोरनुक्तेः प्रश्नावसंगताविति वाच्यम् । 'दिव्यं तदहरु- च्यते' इत्यनेनैव पूर्वोक्तसावनाहारोनचान्द्रमासयोस्तदहोरावस धनात् । दिव्यमित्यन पितृणामनुक्तेः सूर्यसावनाहोरात्रस्य मानुपाहोरात्रचन तेषामपि प्रत्यक्षत्वाच परिशेपा. मासस्यैव पित्र्याहोरात्रत्वसिद्धेः । ननु तथापि प्रत्यक्षसिद्धमानुषाहोराने प्रश्नोऽनुपपन्न एवेत्यतस्तात्पर्यप्रश्नमाह-तदेवेति । तन्मानुपाहोरात्रम् । एवकारस्तदन्यनिरासार्थकः । सर्वन सर्वलोके किल निश्चयेन केन कारणेन न स्यात् । पितृदेवदैत्यानामप्रत्यक्षमहोरात्रं कथमंगीकृतम् । कयं च मानुषाहोरानं प्रत्यक्षसिद्धं तेषामर्पि नोक्तामत्यर्थः ॥५॥ भा०टी०-पिटादन एकमासका, और मनुष्योंका ६० घडीका दिन होता है, दिनरात सबके लिये एक्से क्यों नहीं होते ? दिन, सब्द, मास और होराके अधिपति एकप्रका- बके क्यों नहीं होते ॥ ५॥ अथाहणादेवगत दिनमासवर्षेश्वरेषु तत्प्रसंगादोरेश्वरे प्रश्नं पश्चाद्वजन्तोऽतिजवान' इत्या प्रश्नवयं चाह- दिनाब्दमासहोराणामधिपा न समाः कुतः ॥ कथ पयति भगणः स ग्रहोऽयं किमाश्रयः ॥६॥ दिनवर्षमासहोराणा स्वामिनोऽभिन्नाः कुतः फेस्मान भवति । यथा दिनाधिपतित्वं सर्यादीनां क्रमेण तथा प्रथमादिमासवर्पक्रमेण सूर्यादीना ब्रमेण मासोधिपत्वं यु: , (१८८) सूर्यासद्धान्तः- [द्वादशोऽ- 'क्तम् । आनयने युक्त्यमतिपादनादिति भावः । यद्यापे पूर्व होरेश्वरानयनं नोक्तमिति तत्मश्नोऽसंगतस्तथापि लोके प्रसिद्धतरो होरेश्वरस्त्वया किमथै नोक्त इति तत्मश्नता- • स्पर्यमिति ध्येयम् । युगणो नक्षत्रसमूइसग्रहो ग्रहसहितः कथं केन प्रकारेण पर्येति भ्रमति । नक्षत्राणि ग्रहाश्च केन प्रयुक्ताः सन्तो भूम्यमितो भ्रमन्तीत्यर्थः । अथैपा- मन्तारिक्षावस्थानोप प्रश्नमाह-अयमिति । सग्रहो मगणो दृशमानः किमाश्रयः क आधारो यस्येति । विनाधारमन्तरिक्षावस्थानं न सम्मवतीत्यर्थः ।। ६॥ मा०टी०-मगण विस प्रकारसे ग्रहादिके साथ प्रदक्षिणा करते हैं और उनका आश्रय क्या है ? ॥६॥ ननु कक्षा एवाधाराः पूर्वं तत्रैव स्वमार्गगा इत्युक्तरित्यतः कक्षाणां प्रश्नचतुष्ट यमाह- भूमेरुपर्युपyाः किमुत्सेधाः किमन्तराः ॥ ग्रहक्षकक्षाः किम्मात्राःस्थिताः केन क्रमेण ताः॥ ७॥ मृमः सकाशादूर्ध्वमुचाग्रहक्षकक्षाग्रहनक्षत्राणामाकाशे मार्गाः किमुत्सेधाः किया नुत्सेध उच्चता यासां ताः । भूमेः सकाशाद्रहनक्षत्रमार्गकक्षाः कियदन्तरेण संवी त्यर्थः । किमन्तराः कियदन्तरालं यासां ताः । उत्तरोत्तरमुचा अपि परस्परं तासा कियदन्तरालमित्यर्थः । किम्मात्राः किमात्मिकाः । किस्वरूपाः किंप्रमाणा वा । ता ग्रहनक्षत्रकक्षाः केन क्रमेणाधिष्ठिताः सन्ति । पूर्व कस्तदुचर के इत्यादिकमो न शात इत्यर्थः ॥७॥ मा०टी०-पृषियोसे ग्रहोंकी कक्षा कितनी ऊची है ? परस्परमें मन्तर कितना है ? परि- माम क्या है ? और वह किस प्रकारसे स्थित है? ॥७॥ अयानुभवप्रश्नं तत्प्रसंगात्सूर्यकिरणप्रचारप्रश्नं च पूर्वोक्तमानानां प्रश्नद्वयं चाइ- ग्रीष्मे तीव्रकरोभानुर्न हेमन्ते तथाविधः ।। कियती तत्करप्राप्तिानानि कति किंच तेः ॥ ८॥ ग्रीष्मौ सयों यया तीक्ष्णकिरण उष्णकिरणस्तथाविधस्तादृशो हेमन्ते न मव तीति किम् । सूर्यस्य किरणानां प्राप्तिर्गमनपद्धतिः कियती कियत्प्रमाणा । मानानि नाक्षत्रसावनचान्द्रसौरादीनि पृॉक्तानि कति फियति । उपक्रम एव संक्षेपण मानान्यु: तानीति तत्तत्त्वं सम्पड्न ज्ञातमित्यर्थः । तैर्मानैः किं प्रयोजनम् । चः समुचयार्थः । भत्येकमन्वेति ॥८॥ माटी०-ग्रीष्ममें सूर्य की किरण तीन्न होती है। और हेमन्तमें तैसी नहीं होती; तिनकी फरप्राप्तिमा नियम क्या है ? कितने प्रकारकै मान हैं ? मोर तिनका प्रयोजन क्या है? non
व्यायः १२.] मंस्कृतटीका-भापायीकासमेतः । (१८९)
अथास्य प्रभमुपसंहरति-
एतं मे संशयं छिन्धि भगवन भूतभावन ॥
अन्यो न त्वामृते छेत्ता विद्यते सर्वदर्शिवान ॥ ९॥
है भगवन् पड्गुणैश्वर्यसम्पन्न । सर्वबोधकेति तात्पर्यायः। भूतभावन भूतस्या.
तोतकालस्य भावना विचारो यस्य । भूतस्योपलक्षणादर्तमानभविष्यतोरपि कालज्ञोत
सिद्धोऽर्थः । त्वं मे मम । एतमुक्तं संशयम् । जात्यभिप्रायेणेकवचनम् । तेन मत्कृतान्
प्रश्नानित्यर्थः । छिधि छेदय । नन्वहमिदानीमेतदुक्त्यै वक्तुं न शक्नोम्यन्यस्मात्संशयान्
दूरीकुर्वित्यत आह-अन्य इति । त्वामृते विना । अन्यः सर्वदर्शिवान् सर्वदृष्टा । सर्वज्ञ
इत्यर्थः । छेत्ता संशयापनोदकः । न विद्यते नास्ति । तथा चैतावत्कालपर्यंतं यथोक्त
तथान्यदपि कृपया वक्तव्यमिति भावः ॥९॥
मा० टी०- हे भूतभावन भगवन् । मेरे यह समस्त सन्देह र कीजिये आपके सिवाय सर्व
दशी और संशयका छेदन करनेवाला कोईमी नहीं है ॥ ९॥
अथ मुनीन्मति मुनिर्मयासुरोक्तप्रश्नानुवादं कृत्वा सूर्यांशपुरुपो मयासुरं प्रति पुनर्वद
ति स्मेत्याह-
इति भक्त्योदितं श्रुत्वा मयोक्तं वाक्पमस्य हि ॥
रहस्यं परमध्यापं ततःप्राह पुनः स तम् ॥ १० ॥
स सूर्यांशपुरुषः । इति पूर्वोक्तम् भक्त्याराव्यज्ञानेन । उदितमुत्पन्नम् । मयेन
कथितं वचनं श्रुत्वाऽऽकर्ण्य । पुनदितीयवारं ततः पूर्वार्धोक्त्यनन्तरं तं मयासुरं पति पर
द्वितीयमध्यायं ग्रंथम् । ग्रन्थस्योत्तरखण्डमित्यर्थः । अस्य अन्यपूर्वखण्डस्य हि निश्च-
येन रहस्य गोप्यत्वेन तत्वमूतं माह । प्रकर्षणावददित्यर्थः ॥ १० ॥
मा०टी०-मक्तिमावसे कहे हुए मयके वचन सुनकर सूर्याश पुरुष फिर परमध्यायरहस्य
कहते हुए ॥१०॥
अथ सूर्याशपुरुषवचनानुवादे सूर्याशपुरुषो मयापुरं प्रति मदुक्तं सावधानतया
श्रोतव्यमित्याह--
शृणुष्वैकमना भूत्वा गुह्यमध्यात्मसज्ञितम् ।।
प्रवक्ष्याम्यतिभक्तानां नादेयं विद्यते मम ॥११॥
यतः कारणात् । अतिमत्तानामत्यन्तमदजनकारकाणां भवाशां मम सूर्यस्य पुरु-
पस्य । अदेयमदातव्यं वस्तु न विद्यते। अतः कारणादहं त्वां प्रति गुह्यं गोप्यमध्यात्म-
संज्ञितमध्यात्मज्ञानसझं यत्मवक्ष्यामि कथयिष्यामि तत्त्वमेकमना एकस्मिन्मदुक्ते
मनो विद्यते यस्यासी भूत्वा शृणुष्व श्रोत्रद्वारात्मनः संयोगेन प्रत्यक्ष कुवित्यर्थः॥११॥
(१९०)
सूर्यसिद्धान्तः-
[द्वादशोऽ-
मा०टी०-अच्छा तो गुप्त मध्यात्मतत्वको कहता हू तम एवान्तपित्त श्रवण करो।
शेती कोई वस्तु नहीं है जो हम भतिमक्तों को न देसक ॥ ११ ॥
गुह्यं वक्ष्यामीति यदुक्तं तदाह-
वासुदेवः परं ब्रह्म तन्मूर्तिः पुरुषः परः ॥
भव्यक्तो निर्गुणः शान्तः पञ्चविंशात्परोऽव्ययः ॥ १२ ॥
वसत्यस्मिञ्जगत्समस्तमसो वा जगति समस्ते वसतीति यसरुणि वासुः । देव.
नादासनादेवः । वासुश्चासो देवश्चेति वासुदेवः । तथाचोक्तम् "सर्वचासो समरतं च वस-
त्यति वे यतः । अतोऽसो वासुदेवाख्यो विद्वद्भिः परिगीयते ।।" इति । नतु वसुदेव-
स्थापत्यमिति विग्रहः । तस्य जगत्कारणतानिरूपणावसरेऽनुपयोगात् । अस्मत्पक्षे
पुनरुपादाने कार्यस्याधारतया कार्यवोपादानस्यानुस्यूततया वा स उपयुक्त एव तथा-
चोक्तं श्रुतो' ईशावास्यमिदं सर्वम्' इत्यादि । भागवते च । 'अजनि च यन्मयं तद-
विमुच्यामेय नृभवेत् ” इति । जीवानामपि ब्रह्मात्मस्तया तद्वारणाय परमिति सर्वो.
सममित्यर्थकम् । “यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । अतोऽस्मि लोके वेदे च
प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ ॥ इति स्मृतेः । तन्मूत्तस्तस्य वासुदेवस्य मृतिरंशः । इदं
विशेपण संवक्ष्यमाणस्य सङ्कर्षणस्य । चिन्मूर्तिरिति पाठस्तु प्रामादिकः । वासुदेवः
सङ्कर्षण इत्यस्माद्वासुदेवात्सङ्कर्पण इत्यस्यार्थस्य विवक्षितस्यामतीतेः। अव्यक्त इत्यती-
न्द्रिय इत्यर्थः । तथा च श्रुतिः। “न तं विदाय य इमा जजाना याष्माकमन्तरं बभूव ।
नोहारेण प्रावृता जल्प्या चासुल्प उक्थशासश्वरन्ति । न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न
चक्षुषा पश्यति कश्चनेनम्" इति । अव्यक्तत्वे हेतुनिर्गुण इति । शान्तः पडूमिरहि-
तत्वाव । पचषिशात्परः। पोडशविकृतयःसप्त प्रकृतिविकृतयो मूलप्रकृतिश्चोते चतुर्विग-
तितत्त्वानि पञ्चविंशस्तु जीवस्तस्मात्पर इत्यर्थः । पञ्चविंशात्मक इतिपाठे जगदात्मक
इति ॥ १२॥
माष्टोम्बासुदेव, परब्रह्मा त-मार्त परमपुरुष, भव्यक्त, निर्गुण, शन्त, मव्यय और
पच्चीसवां वस्तुओं पर है ॥ १२ ॥
शुद्धस्य ब्रह्मणो जगत्कारणत्वासम्मवादाह-
प्रकृत्यन्तर्गतो देवो वहिरन्तश्च सर्वगः ॥
सङ्कर्षणोऽयं सृष्ट्वादा तासु वीर्यमवासृजत् ॥ १३ ॥
प्रकृत्यन्तर्गतो मायोपाहतो बाहेरन्तश्च सर्वगो जगदुपादानत्वात् । एताने सर्वाणि
विशेषणानि सकर्षणस्य वासुदेवाशस्यापि वासुदेवात्मक्वावसानेन बोध्यान। वामुढे-
पाशात्मक सङ्कर्षणः प्रयमं जलानि निर्माय । तालप्सु वार्य शक्तिविशेषम् । अवार-
जविक्षेप ॥ १३ ॥
व्यायः १२] संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतः
(१९१)
माल्टी-जगतके उपादानरूपसे प्रकृतिके भन्तर्गत हैं। सपण यहि आर अन्तस्य व
सर्व गत हैं, या सृष्टी आदिके समय एकार्णवादिम मन पर्यो निक्षेप करते हैं ॥१३॥
वक किमत आह-
तदण्डमभवद्धमं सर्वत्र तमसा वृतम् ॥
तत्रानिरुद्धः प्रथमं व्यक्तीभूतः सनातनः ॥ १४ ॥
तत्तच्छक्तिमिलितं जलं हेभ सौवर्णमण्डं गोलाकार सर्वत्र बहिरन्तश्चान्धकारेणावृत
ममवत् । अन्धकारसहिताकाशे सुवर्णाण्डमजनात्ययः । तत्र सुवर्णाण्डे
मादावनिरुदः सनातनो नित्यो वासुदेवांशसंकर्षणोंशरूपत्वाट्यक्तीभूतोऽभिव्यक्तः ।
नतूपन्नः । सत्कार्यवाडाभ्युपगमात् । यया तिलभ्यस्तेलं सदेशमिव्यक्तं न तूप-
मम् ॥ १४॥
'भा० टी०-वह जल मन्धकारसे छाये हुए स्वर्गका मंहरूप बनगया । जिसमें प्रथम
सनानन भनिरुद्ध व्यक्तए । १४ ।।
अयास्यामिधान्तरागि लोकसुतानार्थमाह-
हिरण्यगी भगवानेप च्छन्दसि पठ्यते ॥
आदित्यो ह्यादिभूतत्वात्यसूत्या सूर्य उच्यते ॥ १५ ॥
एप संकर्षगांऽशोऽनिरुद्धभगवान् पड्गुणेश्वर्पतम्पन्नश्छन्दासे वेदे हिरण्यगर्भः सुवः
पाण्डमध्यरूपगमें स्थितत्मात्पठ्यत निरूप्यते । वेदेऽस्य हिरण्यगर्भ इति प्रसिद्धमा
धान्तमित्ययः । हि निश्चयनादित्यः प्रथममभिव्यक्तत्वादुच्यते । प्रसत्या अस्माज-
गोभिव्यक्तायायमनिरुदः सूर्य उच्यते । “हिरण्यगर्भः समर्तताने भूतस्य जातः
पतिरेके आसीत् " इति श्रुतिः ॥ १५ ॥
मा० टो-वेदमें इनको गिर्म रहते हैं, मादिम थे इसलिंपे आदित्य, भोर सृष्टिक
मर्य के कारण सूर्य कहते हैं ॥ १५ ॥
अस्य रूपं स्थिति चाह-
परं ज्योतिस्तमःपारे सूर्योऽयं सक्तिति च ॥
पति भुनान्येव भावयन्भूतभावनः ॥ १६ ॥
अपमानरुद्धः सूर्यनामकः सविता । इति नाम्ना । चा समुच्चये ! प्रसिद्धः ।
समपारेऽन्धकारस्य पिरामे परमुत्कृष्टं ज्योतिस्तेगोरूपम् । अन्धकारनाशक इति तात्प-
यायः । “आदित्यवर्ण तममस्तु पारे” इतिश्रुतिः । एप सविता भूतभावनः प्राण्यु-
सत्तिस्थितिसंहारकारको भुवनानि वासमाणानि भावयन्माशयन्पयाते । सुवर्माण्ड-
मध्ये सदा भ्रमति ॥ १६ ॥
(१९२) सूर्यसिद्धान्तः- [द्वादशोऽ- माल्टी-यह अनिरुद्धही परम ज्योतिष्मान् सविता है। अन्धकारस्थानको लापकर भूत- मावन सूर्यकिरणसे समस्त भुइनों में घूमते हैं ॥ १६ ॥ अथ परं ज्योतिरिति पाद विवृण्वन्नन्यदप्येतत्स्वरूपं श्लोकाभ्यामाह- प्रकाशात्मा तमोहन्ता महानित्येष विश्रुतः ॥ ऋचोऽस्य मण्डलं सामान्युत्रा भूर्तिर्यज॑पि च ॥ १७ ॥ त्रयीमयोऽयं भगवान्कालात्मा काटकृद्विभुः ॥ सर्वात्मा सर्वगः सूक्ष्मः सर्वमस्मिन्प्रतिष्टितम् ॥ १८॥ प्रकाशरूपोऽन्धकारनाशकोऽत एवैप अनिरुद्धाख्यः सूर्यो महान्महत्तत्त्वमिति । एवं विश्रुतो वेदपुराणादा निरुक्तोऽस्य निरुक्तस्य सूर्यस्य । ऋचः ऋग्वेदमन्त्रा मण्डलं सामानि सामवेदमंत्रा उस्राः किरणाः यजूंपि यजुर्वेदमंत्रा मूर्तिः स्वरूपम्।चा समुच्चये। अतएवायं निरुक्तो भगवान् पाड्गुण्यश्वर्यतम्पन्नः । त्रयीमयो वेदत्रयात्मकः । काल- रूपः कालस्य कारणम् । विभुर्जगदुत्पत्तिस्थितिनाशाय समर्थः । अतएव सर्वात्मा जगत्स्वरूपः सर्वगः सर्वत्र स्थितो व्यापकः सूक्ष्मोऽव्यापकमूर्चिधारी । अस्मिन्निरुक्त- सूर्ये सर्व जगत्मतिष्ठितम् । एतेन व्यापकाव्यापकत्वयोरत्राविरोधः ॥ १७ ॥१८॥ भा०टा०-प्रकाशरूप, तमोनाशक, मोर महान् शमसे सूर्य ख्यात है। ऋग्वेद इनका मण्डल, सामवेद किरण, और यजुर्वेद तिनकी मूर्ति हैं । वेदत्रयात्मक यह भगवान् कालारमा, कालकर्ता, मणिमादिगुणयुक्त, सर्वात्मा सर्वग, सूक्ष्म हैं और इनमेंही समस्त प्रतिष्ठित ॥ १७॥ १८॥ अथ पति भुवनान्येपेत्यधै विवृणोति- रथे विश्वमये चक्रं कृत्वा संवत्सरात्मकम् ॥ छन्दस्यिश्वाः सप्त युक्ताः पर्यटत्येपै सर्वदा ॥ १९॥ त्रिलोक्यात्मके रये संवत्सरात्मकं द्वादशमासात्मकं वर्षचक्र नियोज्य सप्तच्छन्दांसि गायत्र्युष्णिगनुष्टुम्बृहतीपंक्तित्रिष्टुन्जगत्योऽश्वाः युक्ताः संयोजिताः कृत्वा । छन्दांस्य- धारतत्र युक्तोते पाठे सप्ताश्वान् रथे नियोज्येत्यर्थः । सर्वदा नित्यमेषोऽनिरुद्धनामा पर्यटति भ्रमति ॥ १९ ।। मा०टी०-विश्वमय रथपर संवत्सर चक्र द्वारा दोको सात घोडे बनाकर यह सदा भ्रमण करते हैं।॥ १९॥ अयास्य स्वरूपं ब्रह्मण उत्पातं चाइ- विपादममृतं गुह्यं पादाऽयं प्रकटोऽभवत् ॥ सोऽहंकारं जगत्सृष्टये ब्रह्माणमसृजत्प्रभुः ॥ २० ॥ - १ पत्यावशी सदा ति पाठान्तरम् ।
ध्यायः १२.] संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः। अस्य वेदात्मनस्त्रिपादं चरणत्रयममृतं दिवि ज्ञेयम् । अत एव गुह्यमगम्यमिदम् । पादश्चतुर्थचरणः । अयं स्थावरजंगमात्मकजगदूपः प्रकटः प्रत्यक्षोऽभवत् । "त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुपः पादोस्येहाभवत्पुनः" इति श्रुतिरपि व्यक्ता । सोऽनिरुद्धनामा प्रमुरुत्पत्ति- समर्थः । अहंकारतत्त्वरूपं ब्रह्माणं पुरुष जगत्सृष्टय जगत्सर्जननिमित्तमसृजदुत्पादया- मास ॥ २० ॥ मा० टी०-अमृतकी समान उनके तीन पाद छिपे रहते हैं। चतुर्थपादमेंही प्रगट जगत् है । उस प्रभाने अहंकाररूप ब्रह्माको संसारकी सृष्टि के लिये उत्पन्न किया ॥ २० ॥ अथोत्पादितब्रह्मपुरुषं जगत्सर्जनाथै नियुज्य स्वयं भ्रमन्नवतिष्ठत इत्याह- तस्मे वेदान्वरान्दत्त्वा सर्वलोकपितामहम् ।। प्रतिष्ठाप्याण्डमध्येऽथ स्वयं पौत भावयन् ॥२१॥ अथ ब्रह्मोत्पादनानन्तरं स्वयमनिरुद्धनामा । तस्मै उत्पादितब्रह्मपुरुषाय । वरानु- त्कृष्टान्वेदान्दत्त्वा वेदोक्तमार्गेण सृष्टिसर्जनार्थ सर्वलोकानां पितामहरूपं तं ब्रह्माणं सुवर्णाण्डमध्ये प्रतिष्ठाप्य निधाय । चोऽत्रानुसन्धेयः । भावयवन्प्रकाशयन् सन्प- यति भ्रमति ॥ २१॥ मा० टी०-तिस ब्रह्मको सर्वोत्तम वेद देकर सलोकके पितामहरूपसे अण्डमें स्थापित करके स्वयप्रकाशित होकर भ्रमण करते हैं ॥ २१ ॥ अथ जातसृष्टीच्छो ब्रह्मा चन्द्रसूर्यावस्मत्प्रत्यक्षावुत्पादयामासेत्याह- अथ सृष्टयां मनश्चक्रे ब्रह्माहंकारमूर्तिभृत् ॥ मनसश्चन्द्रमा जज्ञे सूर्योऽक्षणोस्तेजसां निधिः ॥ २२ ॥ प्रथाधिकारप्राप्त्यनन्तरम् । अहवारतत्त्वमूर्तिधारको ब्रह्मा सृष्टयां मनोन्तःकरणं चके कति स्म । ब्रह्मणोऽहं सृष्टिं करोमीतीच्छा जातेत्यर्थः । अनन्तरं तस्य मनसः सकाशाचन्द्रमा जज्ञ उत्पन्नः । चन्द्रो भवत्विति मनसा चन्द्रो जात इत्यर्थः । अक्ष्णो नेत्राभ्यां सकाशात्तेजसां निधिराकरभूतः सूर्य उत्पन्नः । चक्षुरिन्द्रियस्य तैजस- त्विात ॥ २२ ॥ . भाटी-तिसके उपरान्त अहंकारमूर्तिधारी ब्रह्माने जब सृष्टिकरनेका मन किया तम मनसे चंद्रमा, मोर नेत्रों के तेजसे तेज निधानरूप सूर्य उत्पन्न हुए ॥ २२ ॥ अब महाभूतोत्पत्तिमाह- मनसः खं ततो वायुरनिरापो धरा क्रमात ॥ गुणेकवृद्धया पञ्चैव महाभूतानि जज्ञिरे ॥ २३ ॥ मनस आकाशो भवत्वितीच्छयात्मनः खमाकाशं तत आकाशाकमायथोचरंवायुर- (१९४) 'सूर्यसिद्धान्तः- [ द्वादशोऽ- मिर्जलं पृथिवी । “आकाशाद्वायुयोरगिरनेरापोऽन्यः पृथिवी" इति गुणकवृद्धया गुण स्यैकोपचयेन महाभूतानि पञ्चसङ्ख्याकानि । एवकारान्यूनाधिकव्यवच्छेदः । जज्ञिरे उत्पन्नानि । शब्दगुणसहितमाकाशं शब्दस्पर्शगुणद्वयसमेतो 'वायुः शब्दस्पर्शरूपा. त्मकगुणत्रयसमेतोऽग्निः शन्दस्पर्शरूपरसात्मकगुणचतुष्टयसमेतं जलं शब्दस्पर्शरूपर- सगन्धात्मकगुणपञ्चकसमेता पृथिवीति स्फुटार्थाः ॥ २३ ॥ मा०टी०-मनसे प्रथम शून्य, फिर पायु, अग्नि, जल और धरती, एकगुणकी वृद्धि के द्वारा पौध महाभूतको उत्पन्न करते हुए ॥ २३ ॥ अथ चन्द्रसूर्ययोः स्वरूपं वदन्पश्चताराणामुत्पत्तिमाह- अग्नीपोमो भानुचन्द्रौ ततस्त्वङ्गारकादयः।। तेजोभूखाम्बुवातेभ्यः क्रमशः पञ्च जज्ञिरे ॥ २४ ॥ सूर्यचन्द्रौ प्रागदितोत्पत्ती अग्निपोमौ सूर्योऽग्निस्वरूपस्तेजोगोलपश्चाक्षुपत्वात् । चन्द्र स्तु सोमस्वरूपः । मद्यस्य सामवाच्यत्वाजलगोलरूपः । अग्नीपोमाविति प्रयोगच्छान्द- सिकः । ततोऽनन्तरमंगारकादयो भौमादयः पञ्चताराग्रहास्तेजोभूखाम्बुवातेभ्यः क्रमा- दुत्पन्नाः । तुकारादुक्तभूतस्य भााधिक्यमन्यभूतानां च भागसाम्यमित्यर्थः । मंगल. स्तेजस उत्पन्नोऽत एवायमङ्गारक उच्यते । बुधो भूमितः । बृहस्पतिराकाशात् । शुको जलात् । शनिर्वायोः ॥ २४॥ मा०टी०-भग्निसे मस्वरूप, रवि, चन्द्र, माविम तदोपरान्त मगलादि ग्रहगण तेज, पृथी भााश जल वायुसे क्रमानुसार पांच सत्पन्न हुए ॥ २४ ॥ मथ राशीन्नक्षत्राणि चाह- पुनदिशधात्मानं व्यभजद्राशिसम्ज्ञकम् ॥ नक्षत्ररूपिणं भूयः सप्तविंशात्मकं वशी ॥२५॥ पुनरनन्तरमात्मानं द्वादशधा द्वादशस्थानेषु राशिसञ्जकं व्यभजत् । मनःकल्पितं वृत्तं दादशविमागं राशिवृत्तमकरोदित्यर्थः । यो द्वितीयवारमात्मानं नक्षत्ररूपिणं सप्त- निशात्मकं व्यभजत् । मनःकल्पितं तदेव वृत्तं सप्तविंशतिविभागं चाकरोदित्यर्थः ।। ननु न्यूनाधिकविभागाः कथं न कृता उक्तसङ्ख्यायां नियामकाभावादित्यत आह- मशीति । इच्छाविषयं वशं विद्यते यस्यति वशी स्वतन्त्रेच्छस्य नियोगानहत्वात् । खेच्छया सत्संख्याका विभागाः कृता इति भावः । सप्तविंशतिविभागव्यञ्जकानि नक्षत्राणि तारात्मकानि निमितानीत्यर्थसिद्धम् ॥ २५ ॥ मा०टी०-वशी ब्रह्माने फिर मनसे कल्पित वृत्तको १२ भागमें शशिरूपसे मौरफिर२७ भागमें नक्षत्ररूपसे विमाग विया ॥ २५ ॥ - . भतावदारकादयः इति का पाठः।
च्यायः १२.] संस्कृतटीका-मापारीकासमेतः। (१९५)
अथ चरावरं जगदकरोदित्याह-
ततश्चराचरं विश्वं निर्ममे देवपूर्वकम् ।
ऊर्ध्वमध्याघरेभ्योऽथ स्रोतोभ्यः प्रकृतीः सृजन ॥ २६ ॥
ततः स चक्रग्रहसर्जनानन्तरमूर्ध्वमध्याधरेभ्यः श्रेष्ठमध्याधमेभ्यः स्रोतोभ्यो व्यक्ति-
भ्यः प्रकृतीः सत्त्यरजस्तमोविभेदात्मकप्रकृतीः सृजन्निमार्यन् देवपूर्वकं देवमनुष्यासुरा-
दिक विश्वं जगचराचरं चेतनाचेतनात्मक निर्ममे कृतवान् ॥ २६ ॥
भा० टी०-तदोपरान्त श्रेष्ठ, अधम, अनुयायी, प्रकृति सृजन करके देव मानवादि चराचर
विश्वको निर्माण किया ॥ २६ ॥
अथ रचितपदार्थानामवस्थानं कृतवानित्याह-
गुणकर्मविभागेन सृष्ट्वा प्राग्वदनुक्रमात् ।।
विभाग कल्पयामास यथास्वं वेददर्शनात् ।। २७॥
गुणाः सत्त्वरजस्तमोरूपाः कर्म पूर्वनन्मार्जितं सदसत्कर्म । अनयोविभागेनकीकर-
णात्मकेन प्राग्वञ्चन्द्रसूर्यादिप्रामुक्तसृष्टिरित्यनुक्रमात्सृष्ट्वा देवमनुष्यासुरभूमिपर्वतादिक
चराचरसर्जनं कृत्वा वेददर्शनाद्वेदोक्तप्रकाराद्यथास्वं यथादेशं यथाकालं विभागमवस्था-
नविमागं कल्पयामास कृतवान् ॥ २७ ।।
मा० टी०-गुण और कर्मक विभागसे पूर्वक्रमरूपसे सृष्टिकरके वेदमें कही रीतिके मनु-
सार विभागादि किये ॥ २७ ॥
केषामित्यत आह-
ग्रहनक्षत्रताराणां भूमेविश्वस्य वा विभुः ॥
देवासुरमनुष्याणां सिद्धानां च यथाक्रमम् ।। २८ ।।
विभुनियोजनसमर्थो ब्रह्मा ग्रहनक्षत्रयोर्वेम्वानां पृथिव्यास्त्रैलोक्यस्य । वाकारः समु.
वये । आकाशेऽवस्थानं कृतवान् । तत्र ग्रहनक्षत्राणां यथाकालमनियतावस्थानम् ।
पृथिव्यास्तु नियतावस्थानम् । पृथिव्यां तु त्रैलोक्यस्य यथादेशमवस्थानम् । तत्र
यथाक्रमं यथायोग्यं देवासुरमनुष्याणां सिद्धानाम् । चः समुच्चये । अवस्थानं यथादेश
कृतवान् ॥ २८॥
भा. टी-अणिमादिगुणसम्पन्न ब्रह्माजीने ग्रह नक्षत्र तारामको, पृथ्वीको मौर विश्वको
तथा देवासुर सिद्धादिको तिन २ के वियोजित केंमसे स्थित कराया ॥ २८ ॥
ननु सर्वत्राकाशस्य सत्त्वाब्रह्माण्डमध्यस्थेन ब्रह्मणा ग्रहनक्षत्राणां भूमेश्वावस्थान
ब्रह्माण्डबहिराकाशे कृतमथवा ब्रह्माण्डान्तराकाशे कृतमित्यत आह-
ब्रह्माण्डमेतर्राषिरं तत्रेद भूर्भुवादिकम् ॥
कटाहद्वितयस्यैव सम्पुटं गोलकाकृतिः ॥ २९॥
( १९६) सूर्यसिद्धान्तः- [ द्वादशोऽ- एतत्मागुक्तं ब्रह्मणाधिष्टितं सुवर्णाण्डं मुपिरमरकाशात्मकं तनावकागे इदं जगत भूर्भुवःस्वर्गात्मक्मवस्थितं न वहिः । नन्वण्डमगोलाकारत्वेनान्तरावकाशात्मकत्वमस- म्भवतीत्यत आह-क्दाहद्वितयस्यति । कटाहोऽर्धगोलावर सावकाशं पातं तस्य छि- तयं द्वय सम तस्य । एवकारो न्यूनाधिक्याच्छेदकार्थः । सम्पुटमाभिमुख्येन मिलितं गोलकाकृतिगोलाकारः स्यात् । तथाच न क्षतिः ॥ २९ ॥ भा०टो-अवकाशयुक्त ब्रह्माण्डमें भर्भुवादि स्थित है। दो कटाहकेसम्पुट जातिशी समान गोलाकार है ॥ २९ ॥ अथ ब्रह्माण्डान्तःपरिधिं बर्टस्तदंतर्भग्रहादिक्माकाशे यथास्थानं परिभ्रमतीति श्लोकाभ्यामाह- ब्रह्माण्डमध्ये परिधिव्योमकक्षाभिधीयते ॥ तन्मध्ये भ्रमणं भानामधोऽधः क्रमशस्तथा ॥ ३० ॥ मन्दामरेज्यभूपुत्रसूर्यशुक्रन्दुजेन्दवः ।। परिमायघोऽवस्थाः सिद्धविद्याधरा घनाः॥३१॥ ब्रह्माण्टान्तः परिधिस्तुल्यवृत्तमानं व्योमकक्षा वक्ष्यमाणाकाशकलोच्यते । तन्मध्ये ब्रह्माण्डमन यातशे मानां नक्षत्राणा सर्वेषां सर्वतस्तुल्योवान्तरिताना भ्रमणं भ. वति । नया तुल्याङन्तरेणाधो नक्षत्रेभ्योऽयोऽध माच्छनिवृहस्पतिमीमार्कशुक- बुपचन्द्रा अरस्तात्परिभ्रमन्ति । सिद्धा विद्याधराश्चाधस्थाश्चन्द्रादधस्थिता अधोधः क्रमेणाकाशे स्थिताः । एपा प्रवहवायाश्वस्थानाभावाचन्द्रवन्न परिभ्रमः ॥ ३० ॥३१॥ भा०टी०-ब्रह्माण्ड में पारधिश न म व्योमरक्षा हे तिसमें नक्षत्रोंका भ्रमण है तिसके नोच समानुमार शनि, वृहस्पति, मगढ, शुक्र, सूर्य, बुध चन्द्रमा, भ्रमण करते हैं । तिसके नाचे सिद्ध विद्या पर मन, मोर रुपमे नीचे समस्त मेप स्थित है ॥ ३० ॥ ३१॥ अघ भूम्यवस्थानमाह- मध्ये समन्तादण्डस्य भूगोलो व्योनि तिष्ठति ॥ विभ्राणः परमां शक्तिब्रह्मणो धारणाधिकाम् ॥ ३२ ॥ अण्डस्य ब्रह्माण्डस्य समन्तात्सर्वप्रदेशान्मध्ये मध्यस्थाने केन्द्ररूप आकाशे भूगो. लस्तिष्ठति । नन्वाकाशे निराधारवस्तुनोऽवस्यानासम्भवकथमवस्थितो भूमिगोल इ. त्यतो भूगोलविशेषणमाह-विभ्राण इति । ब्रह्मणः परमां शक्ति धारणामि निरा. धारावस्थानरपा विभ्राणो धारयन् । तथा च न क्षतिः। एतेन भूः किमाकारा दिमा- अति प्रश्न्दरमुत्तरितम् ॥ ३२ ॥ नायो-मानी धारणारिमका परमाशक्तिके, वळसे मण्डके स प्रदेशके मध्यदेशमें योगरेर रियत है ।। ३२॥
ध्यायः १२.] संस्कृतटीका-मापाटीकासपेतः। (१९७) अथ कयंचात्र सप्तपातालभूमय इति प्रश्नस्योत्तरमाह- तदन्तरपुटाः सप्त नागासुरसमाश्रयाः ।। दिव्योपधिरसोपेता रम्याः पातालभूमयः ॥ ३३ ॥ तस्य भृगोलस्यान्तरपुटा मध्यस्थपुटा गुहारूपाः सप्तातलवितलसुतलादिकाः पाता. लभूमयः पातालप्रदेशा रम्या मनोहराः सन्ति । ननु भूगोले मनुष्यादिकमस्ति तथा तत्र के सन्तीत्यतस्ताविशेषणमाह-नागासुरसमाश्रया इति । वामुकिप्रमुखादयः सर्पा दैत्या एपामाश्रयभूताः । ननु तत्र सूर्यसञ्चाराभावात्तमोमयत्वेन तात्स्थतलोकानां व्यव- हारः कथं भवतीत्यतो द्वितीयं विशेषणमाह-दिव्यौपधिरसोपेता इति । दिव्या या औष. धयः स्वप्रकाशास्तासां रसैयुक्ताः । तया च तत्पकाशेन व्यवहारो भवति तदशेन तल्लोकानां जीवनं च भवतीति भावः ॥ ३३ ॥ भा० टी०-भूगोलके अन्तमें स्थित नागासुराश्रित पातालादि ७ भूमिय स्वप्रकाश वृक्षोंसे मुक्त और रमजाक हैं ॥ ३३ ॥ अथ भूगोलमुक्त्वा दक्षिणोत्तरभूव्यासाधिकप्रमाणमेरोरवस्थानमाह- अनेकरत्ननिचयो जाम्बूनदमयो गिरिः ।। भूगोलमध्यगो मेरुरुभयत्र विनिर्गतः ॥ ३४ ॥ भूगोलमध्यगतः पर्वतो मे च्याउनेकरत्ननिचयोऽनेकानि नानाविधानि माणिय- वज्रादीनि तेपो निचयः समूहा त्रासौ । जाम्बूनदमयो जाम्बूनदं । "जम्बूफलामल गलद्रसतः मवृत्ता जम्बूनदी रसता मृदभूत्सुवर्णम् । जाम्बूनदं हि तदतः सुरसिद्ध सइयाः शश्वत्पिवन्त्यमृतपारमनुभावाः ॥” इाते भास्कराचार्योक्तेश्च सुवर्ण तन्मयः स्वर्णवटित उभयत्र व्यासानमारतभूपृष्ठप्रदेशाभ्यां विनिर्गतो वहिः स्थितदण्डाकारस्व- माद्रिमध्यो अमोल मालमस्ति । अतएष वदित्यचर्थसंह इति लापायी ॥३४॥ भा०टी०-भूगोलके मध्यगा और समय मेरुसे निकली हुई जम्बूनदीसे शोभित विविध रत्नोंका पनाहुमा मेरु है ।। ३४ ॥ अथ मेरोवधि:प्रदेशयोवादयोऽसुराश्च वसन्तीत्याह- उपरिटास्थितास्तस्य सेन्द्रा देवा महर्पयः ।। अधस्तादसुरास्तविपन्तोऽन्योन्यमाश्रिताः ॥३५॥ उपरियास्थितास्तस्य सेन्द्रा इंद्रसहिता देवा इन्द्रादयो देवा महर्षयः। वः समुच्च- यार्थोऽनुसन्धेयः । स्थिताः । अधस्तान्मेरोरधःप्रदेश । असुरा दैत्याः । तद्वत् । यथो- प्रभागे देवास्तद्वदित्यर्थः । आश्रिता आस्थताः । ननु देवासुराश्यैकत्र कथं न स्थिता इत्यत आह-द्विषन्त इति । अन्योन्यं परस्परं द्वेपं कुर्वन्तः । तथा च देवासुग्योः पर-- (१९८) सूर्यसिद्धान्तः- [ दशमोऽ- स्पर वेपसदाबादेकवावस्थानासंभवेनोत्तमा देवास्तदृर्श्वभागे स्थिता महर्षयश्च दैत्यमी. तास्तत्रैव स्थितास्तदधोभागे तनिकृष्टा दैत्याः स्थिता इति भावः ॥ ३५ ॥ मा टोऊपर (उत्तरादिशा) में इन्द्रादि देवता और महर्षिगण स्थित हैं। नीचे (दक्षिणमें ) असुरोंका वास है । परस्पर विक्षेप होने के कारण दूसरी दिशामें आश्रय लिया है।॥ ३५॥ अथ भृगोले समुद्रावस्थानमाह- ततः समन्तात्पारिधिःक्रमेणायं महार्णवः ।। मेखलेव स्थितो घाच्या देवासुरविभागकृत ॥ ३६॥ दण्डाकारमेगेः सकाशादभितोऽयं प्रत्यक्षो महार्णवो महासमुद्रः क्रमेण निरन्तराल- क्रमेण परिधरूपो भूम्या मेखलेव काश्चीरूपो देवासुविमागत् देवदैत्ययोभूमिगोले विभागयोवधिरेखारूप इत्यर्थः । तेन समुद्रादुत्तर भूगोलस्याध जम्बूद्वीपं देवानां समुद्रा दक्षिणं समुद्रातिरिक्तं भूमिगोलस्याध पद्दीपषदसमुद्रोभयात्मकं दैल्यानामिति सि- दम् । मेरुदण्डानुरुद्धभूगोलमध्ये परिधिरूपो लवणसमुद्रोऽस्ति । उत्तरगोलाधै दास- णभूगोलार्धान्तगतसमुद्रस्य प्रान्तपरिधिस्पृष्टमिति मखलायाः कटयधास्थितत्वेन तात्पर्यार्थः ॥ ३६॥ भा०टी०-तिसमें महासमुद्र धेरैके आकारसे मेखलाकी सम न स्थित है। समुद्रने भूगोळ को देवारभमिम विभाग क्यिा है ॥ ३६ ॥ अथ ममुद्रोत्तरतटे परिधिरूपे जम्बूद्वीपारम्भे चतुर्विभागे चत्वारि नगराणि सन्तीत्याइ- समन्तान्मेरुमध्यान्तु तुल्पभागेषु तोयधेः।। द्वीपेषु दिक्षु पूर्वादि नगर्यो देवनिर्मिताः ॥ ३७॥ मेरुमध्याण्डाकारमेरोमध्यमदेशाहगोलगर्भात्मकादिति स्वर्यः । समन्ताभितो भूगोलपृष्टे तोयधेः परिधिरूपसमुद्रस्य तुल्पभागेपु समभागेपु टीपेषु जम्बूद्वीपारम्भेषु दिक्षु चतुर्विमागेषु चतुर्दिा पूर्वादिनगर्यो मेरोः पूर्वदक्षिणपश्चिमोत्तरादेक्कमेण तुःपुर्यो देवनिर्मिता देवैः कृताः सन्तीति शेषः । समुद्रोत्तरतटे जम्बूद्वीपस्यादि- मागरूपे तुल्यान्तरेण चत्वारि नगराणि भूगोलस्य कल्पितपूर्वादिदिशासु सन्तीति तात्पर्यार्थः ॥ ३७॥ भाटे-मेरुमध्यप्रदेशमें घेरारूप समुदशी पूर्णादि चारों दिशामि देवतामोंकी बनाई हुईचा पग ॥ ३७॥ अयामा नामानि द्वीपोत्थितस्य जम्बूद्वीपादिमागीस्थतवपाख्यपारिभापिकविभागे- पित्यर्थं च श्लोकत्रयेण विशदयति- - ध्यायः १२ ] संस्कृतीका-मापाकासमेतः । (१९९) भूवृत्तपादे पूर्वस्यां यमकोटीति विश्रुता ।। भद्राश्वव नगरी स्वर्णप्राकारतोरणा ॥ ३८ ॥ याम्यायां भारत वर्षे लंका तन्महापुरी ॥ पश्चिमे केतुमालाख्ये रोमकाख्या प्रकीर्तिता ॥३९॥ उदक्विन्दपुरी नाम कुरुवर्षे प्रकीर्तिता ॥ तस्यां सिद्धा महात्मानो निवसन्ति गतव्यथाः ॥ १० ॥ भूगोल उमयत्र दण्डाकारो मेरुयंत्र निर्गतस्तस्थानाभ्याम् । वृत्ताकारणोधि. रेण भूगोलस्य खण्डद्वयं पूर्वापरं तिर्यग्वृत्ताकारं सूत्रेणोवधिोभूमः खण्डद्वयं तेन भू. गोलेप प्राकाराश्चत्वारो भूम्यंशास्तत्रोप्रस्थपूर्ववप्रे भूम्यां यः समुद्रपरिधिस्तस्य च. तुर्थीशे भद्राश्वसंज्ञकवर्षे पूर्वस्मिन्नूर्वाधःशकलसन्धौ सुवर्णघटिताः प्रासादास्तो:- णानि च यस्यामेतादृशी पुरी यमकोटोति संजया विश्रुता विख्याता याम्यायामूर्व- शकलहयसंधी मेरुस्तस्यः दक्षिणत्वाद्गारतसञ्जवर्षे लंकासज्ञा महानगरी तद्वत स्वर्षाग्राकारतोरणा विश्रुतेत्यर्थः । पश्चिमे पश्चिमशकलाधास्थशकलसन्धी के तुमालसंज्ञ व रोमकसंज्ञा नगरी उक्ता । उदक् । अधाशकलव्यसन्धी कु. रुसज्ञकर्ष सिद्धपुरीनाम नगरी प्रोक्ता ! अस्याः पुर्याः सिद्धपुरीत्वमन्वर्याम पाह- तस्यामिति । सिद्धपुर्या सिद्धा योगाभ्यासका अस्मदादिभ्यो महानुत्कृष्ट आत्मा येषां ते गतव्यथा दुःवरहिता निरन्तरा वसन्ति ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ ४० ॥ भा०-भूवृत्तके चतुर्थी शसे पूर्वदेशमैं भद्राश्व वर्ष है, तिसमें यमकोटि पुरी है कहते है कि या सुवर्णकी मौत और तोरणों से वेष्टित है। दक्षिणदिशाम भारतवर्ष है; तिसके मध्यम लका महापुरी है। पश्चिमकै बीच केतुमाववर्ष में रोमक नगरी है। उत्तरमें गुरुवर्ष पुरीके बीच सिद्धपुरी स्थित है, तहाँ सिद्ध महात्मालोग सब कष्टोंसे छटे हुए वास करते ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ ४० अयोक्तानां चतुर्णा पुराणां परस्परमन्तरालमव्यवहितं मेरोरासामन्तरं चाह- भूवृत्तपादविवरास्ताश्चान्योन्यं प्रतिष्ठिताः ॥ ताभ्यश्चोत्तरगो मेरुस्तावानेव सुराश्रयः ॥ ४॥ ता उक्तनगर्योऽन्योन्यं परस्परं भृवृत्तपादविवरा भूगोलदृसपरिधिचतुर्थाशान्त- राला प्रतिष्ठिता सन्तीत्यर्थः । चकारः पूर्वोक्तेन समुचयार्थकः । ताभ्य उक्तधु- रीभ्यः सकाशादुत्तरदिक्स्थो मेरुः पूर्वोक्तः सुराश्रयः देवैरधिष्ठितस्तावान्भूपाधिचत्- ताभ्योत्तरतो मेरिति वा पाठः।
[द्वादशो- (२००) सूर्यसिद्धान्त:- थाशान्तरण स्थितः । एवकारो न्यूनाधिकव्यवच्छेदार्थः । चकारः श्लोकपूर्वार्धन समु. चयार्थः ॥४१॥ मा० टी० नमरिये भत्तके चतुर्थाशमें परस्परके मन्तरमें स्थित हैं । तिनसे तिनकी बार वर उत्तरदश वह मेरुपर्वत है जिसपर देवतालोग रहते हैं ॥ ११ ॥ अथ तेषां पुराणां निरक्षत्वमस्तीत्याह- तासामुपरिगो याति विषुवस्थो दिवाकरः ॥ न तासु विषुवच्छाया नाक्षस्योन्नतिरिष्यते ॥४२॥ तासामुक्तनगरीणां विषुवत्थो विपुववृत्तस्थो यहिने समरात्रिन्दिवं तहिने यन्मार्गे न भ्रमति तद्विषुववृत्तं तत्रस्थ इत्यर्थः । सूर्य उपरिगः सन्याति भ्रमात । अतः कारणा- तामु नगरीषु विपुवच्छायाक्षंभा न भवति तन्नगराणां विषुवदत्ताभिन्नपूर्वापरवृत्तसहा- वात् । तत्रस्थसूर्यमध्याह्न छायाभावोपलम्भात् । अतएव तेषु नगरेषु अक्षधुवस्योन्न- तिमुच्चताक्षांशरूपा नेष्यते नांगीक्रियते । अक्षांशाभावानिरक्षदेशत्वं तेपां सिद्धामिति भावः ॥४२॥ मा० टी०-विपुवास्थित सूर्य तिनसे उपरको गमन करते है । इस कारण तहापर न विषुप लाया है न भक्षोनात है ।। १२ ।। अथ मेरायुक्तपुरीषु च। क्रमेण लम्बांशाक्षांगाभावावुपपत्त्या प्रतिपादायपुस्तयोः प्रथमं ध्रुवस्थितिमाह- मेरोरुभयतो मध्ये ध्रुवतारे नभःस्थिते ।। निरक्षदेशसंस्थानामुभये क्षितिजाश्रये ॥ ४३ ॥ मेरोरुभ्यतो दक्षिणोत्तराप्रयोगकाशस्थिते ध्रुवतारे दक्षिणोत्तरे क्रमेण मध्य आका- शमध्ये भवतः । निरक्षदेशसंस्थानां प्रामुक्तनगरस्थितमनुष्याणामुभये दक्षिणोत्तरेधव- तारे क्षितिजाश्रये तदूगर्भक्षितिजवृत्तस्थे भवत इत्यर्थः ॥ ४३ ॥ भा० टी०-दोनों मेरुके मध्य आकाशमैं दक्षिण भार उत्तरमें दो, ध्रुवतारे स्थित हैं। निर क्षदेशमें स्थित होने के कारण दोनों क्षितिज रेखामें स्थित है ॥ १३ ॥ अथात एव तेष्वक्षांशाभावलम्यांशपरमत्वमिति वदन्मेरावक्षांशपरमत्वामेत्याह- अतो नासोच्छ्यस्तासुध्रुवयोः क्षितिजस्थयोः ॥ नवतिर्लम्बकाशास्तु मेरावक्षांशकास्तथा ॥१४॥ तासूक्तनगरीपु । अत उभये क्षितिजाश्रये इतिकारणात् । अक्षाच्छ्यो ध्रुवौच्यं न । तया च क्षितिजाधवाच्यमक्षांशा इति तदभावाचदभाव. इति भावः । तुका- रातनगरीषु ध्वयोः क्षितिजस्थयोः । सतोर्लम्यांशा नवतिः शून्याक्षांशोननवतेल- म्वांशत्वात् । खमध्या वयोः क्षितिजस्य लम्वांसस्वरूपत्वाच मेराक्षांशास्तथा ध्यायः १२.7 संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः । 4567 (२०१) नवतिः । भुवस्य परमोचत्वात् । यथा निरक्षदेशेक्षांशाभावालम्वांशाः परमास्त- था मेरावक्षांशपरमत्वाल्लम्बांशाभाव। इत्यसिद्धम् । एतेन " पुरान्तरं चोदिदमु- तरं स्यात्तदक्षविश्लेपलवैस्तदा किम् । चक्रांशकैरित्यनुपातयुक्त्या युक्तं निरुक्तं परि- धे प्रमाणम् ॥” इति भास्कराचार्योक्तं प्रथमप्रश्नस्योत्तरं सूचितम् । स्पष्टपरिधि- साधनं च काल्पकमध्यस्थानानुरोधेनापचीयमानं मेरावभावात्मकं नानुपपन्नमिति च सूचितम् ॥ ४४ ॥ भान्टी-तिसके लिये तहाँपर शौच्च्य नहीं है। दो भुव क्षितिज गोलमें स्थित है इस- कारण तहाके लम्बकांश ९० और मेरुके मक्षांश नउरे है।। ४४॥ अथाहोरात्रव्यवस्यां चेत्यादिप्रश्नोत्तरं विवक्षुर्देवासुरपोर्दिनारम्भं प्रथममाह- मेपादौ देवभागस्थे देवानां याति दर्शनम् ॥ असुराणां तुलादौ तु सूर्यस्तद्भागसंचरः॥ १५ ॥ जम्बूद्वीपलक्षणसमुद्रसन्धौ परिधिवृत्तं भूगोलमध्ये तत्समसूत्रेणाकाशे वृत्तं विपुषदत्तं तत्र क्रान्तिवृत्तं पड्भान्तरेण स्थानद्वये लग्नं तन्मेपतुलास्थानं प्रवहवायुना विपुववृत्त- मार्गे भ्रमति मेपस्थानात्कादिस्थान विषुवदृत्ताचतुर्विंशत्यंशान्त उत्तरतः । मकरा- दिस्थानं विपुववृत्ताचतुर्विंशत्यंशान्तरे दक्षिणतः । तत्स्वस्थाने मवहवायुना भ्रमात । एवं क्रांतिवृत्तमदेशाः स्वस्वस्थाने प्रवहवायुना भवन्ति । तत्र मेपादौ देवभागस्यो जम्बू- द्वीप देवासुरविभागकृदिति पूर्वोक्तः । तत्सम्बद्धा मेषादिकन्यांता राशय उत्तरगोलः । तत्रस्थः सूर्यो मेपादौ मेषादिप्रदेशे देवानां मेरोरुत्तराप्रवर्तिनां दर्शनं पण्मासानंतरप्रथ- मदर्शनं याति गच्छति । प्राप्नोतीत्यर्थः । विषुववृत्तस्य तात्मिातेजत्वात् । एवं दैत्यानां मेरोदक्षिणायवर्तिनामित्यमुराणामित्युक्तेनैवोक्तम् । तद्भागप्तश्चगे दैत्यभागे समुद्रादि- दक्षिणविभागस्थास्तुलादिमीनान्ता राशयो दाक्षिणगोलस्तत्र सञ्चरो गमनं यस्येत्येता- शसूर्यस्तुलादिनदेशे तुकाराददर्शनानन्तरं प्रथमदर्शनं प्रामोतीत्यर्थः । तेषामपि विपुव- दृत्ताक्षितिजत्वात् ॥ ४५ ॥ मा० टी०-सूर्यमेपादि देवभागमें स्थित होनेपर देवतामोंका दृश्य होता है। तुलादि ससुर मागमें स्थितो तो असुरोंका दृश्य होता है ॥ ४५ ॥ अथ मसाग्रीष्मे तीनकर इत्याद्य’क्तप्रश्नस्योचरमाह- अत्यासन्नतया तेन ग्रीष्मे तीत्रकरा खेः॥ । देवभागे सुराणां तु हेमन्ते मन्दतान्यथा ॥ १६॥ तेन । उत्तरदक्षिणगोलयोः सूर्यस्योत्तरदक्षिणसंचाररूपकारणेनेत्यर्थः । देवभागे जम्बूद्वीपे । अत्यासन्नतया सूर्यस्यात्यन्तनिकटस्थत्वेन प्रोमे ग्रीष्मर्ती सूर्यस्य तेजो- गोलकस्य किरणास्तीक्ष्णा अत्युष्णा असुराणां देवभाग इत्यस्यासन्नतया भाग इत्यस्य (२०२) सूय्यसिद्धान्त:- [द्वादशो- समन्वयादैत्यानां भागे समुद्रादिदक्षिणप्रदेशो हेमन्ते हेमन्तर्ती तुकारात्सूर्यस्यात्यु- ष्णाः किरणाः सूर्यस्यात्यासन्नत्वात् । अन्यथा सूर्यस्य दूरस्थत्वेन मन्दता किरणाना• मत्युष्णतामावः । देवभागे हेमन्तर्ती कराणां मन्दता । अतएव तत्र शीताधिक्यं दैत्य- भागे ग्रीष्मे कराणां मन्दता शीताधिक्यं च। तथाच । देवभागे दक्षिणगोले सूर्यस्य दूरस्थत्वमुत्तरगोले निकटस्थत्वं मध्यावनतांशानां क्रमणाधिकाल्पत्वादिति भावः ॥४६॥ मा० टी०-इसोकारण आपासनके वशसे देवभाग देवताओं के पक्षमें सूर्यको किरण तीव्र होती है। अन्यथा हेमन्तमें मन्दताको प्राप्त करती है ॥ ४६ ॥ अथ मेषादौ देवभागस्य इत्युक्तं देवासुराहोरात्रकथनव्याजेन विशदयति-- देवासुरा विषुवति क्षितिजस्थं दिवाकरम् ॥ पश्यन्त्यन्योन्यमेतेपो वामसव्ये दिनक्षपे ॥४७॥ विपुवति काले देवदैत्याः सूर्य क्षितिजस्थं पश्यन्ति । विषुववृत्तस्य तयोः स्वस्थाना गोलमध्यस्थत्वेन क्षितिजत्वात् । एतेषां देवदैत्यानामन्योन्यं परस्परं। ये वामसव्ये अपसव्यसव्ये ते क्रमण दिनक्षपे दिवसरात्री भवतः । अय भावः । देवानां भृमेरुत- रभागः स्वकीयत्वात्सव्यमतो दैत्यानामपसव्यं स्वकीयत्वाभावात् । एवं दैत्यानां भूमेक्ष- णभागः स्वकीयत्वात्सव्यं देवानां स्वकीयत्वाभावादपसव्यमतो दैत्यानां वामसव्यभागा- चुत्तरदक्षिणगोली देवानां क्रमेण दिनरात्री । देवानां वामसव्यभागी दक्षिणोत्तरगोलो दैत्यानां दिनरात्री । अन्यथान्योन्यं वामसव्ये इत्यनयोः संगतार्थानुपपत्तेः । अतएव पूर्व मेपादावित्याधुक्तामाते ॥ ४७ ॥ भा० टी०-विषुवदिनमें सूर्यको देवता और मसुर क्षितिजरेखामें देखते हैं। इस प्रकारसे उत्तर दक्षिण यशसे दिनरातका परस्पर उल्टा फेर होता है ।। ४७ ॥ अथ पूर्वश्लोकोत्तरार्धस्य सन्दिग्धत्वशङ्कया दिनपूर्वापरार्धक्यनच्छलेन तदर्थश्लोका- भ्यां विशदयति- मेपादावुदितः सूर्यवीराशीनुदगुत्तरम् ।। सञ्चरन्प्रागहमध्य पूरयेन्मेरुवासिताम् ॥ १८॥ कर्कादीन सञ्चरस्तवदह्नः पश्चार्धमेव सः॥ तुलादोवीन्मृगादीश्च तद्वदेव सुरद्विपाम् ॥ १९ ॥ मेषादी विषुववृत्तस्थक्रांतिवृत्तभागे रेपेत्यासन्नाटदितो दर्शनता प्राप्तः सूर्य उत्तरं ययोत्तरं क्रमेणेति यावत् । पोनराशीनुदगुत्तरभागस्यान्मेपपमिथुनान्सचरन्नतिक्रामन्स. मेरुस्थानां देवानां प्रागहमध्ये प्रथम दिनस्पार्धं पूरयेत्पूर्ण करोतीत्यर्थः । मिथुनान्ते ध्यायः १२.] संस्कृतटोका-भापाटोकासमेतः । (२०३) सूर्य मेरुस्थानां मध्याह्न स्यादिति फलितार्थः । कर्कादीखीन्ताशोन्कर्कसिंहकन्यास्त- इत्कमेणे यर्थः । आतेकामन्सन्स सूर्यो दिवसस्य पश्चाईमपरदलम् । एक्कारोऽन्ययो- गव्यवच्छेदार्थः । पूरयेत् । कन्यान्ते सूर्यमेरुस्थानां सूर्यास्तो भवतीति फलितार्थः । अथ दैत्यानामाह । तुलादीनिति । सुरधिपां मेरोदक्षिणाप्रवर्तिनां दैत्यानामित्यर्थः । तुलादीस्त्रीनराशीस्तुलावृश्चिकधनुराख्यान् राशीमग्कुम्भमीनांस्तद्वत्क्रमेणाविकामन् सूर्यः । चकारस्तुलामृगादिक्रमेण पूर्वापरार्धमित्यर्थकः । एवकार उक्ततिरिक्तव्यवच्छे. दार्थः । दिनं पूरयतीत्यर्थः । धनुरन्ते सूर्य दैत्यानां मध्यानं मीनान्ते सूर्य सूर्यास्तो मवतीति फलितायः ॥ ४८ ॥४९॥ भा० टी०-उत्तरमेस्वासियों के पक्ष में मेषादिमें सूर्य होनेपर सूर्योदय ३ राशितक क्रमसे उत्त- रको होताई तब मेरुमै रहनेवाले देशके दिनका पूर्वार्द्ध होताहे कर्कट आदि उत्तरराशियोंमें होने से पराई दिवा है । वैसेही तुलादि और मकरादिमें मसुरोंकी पूर्वपराई दिपाहे ॥४८॥४९॥ अथातो देवामुराणामिति प्रश्नस्योत्तरं सिद्धमित्याह- अतो दिनक्षपे.तेषामन्योन्यं हि विपर्ययात् ।। अहोरात्रप्रमाणं च भानो गणपूरणात् ॥ ५० ॥ अत उक्तकारणापा देवदैत्यानामन्योन्यं परस्परं हि निश्चयेन विपर्ययाद्यत्यासा- दिनरात्री स्त इति फलितम् । एतत्फलितार्यस्तु पूर्व वहुधोक्तः । अथ तत्कथं वा स्यात् । मानोर्मगणपूरणादिति प्रश्नस्याप्युत्तरं फलितमित्याह-अहोरात्रप्रमाणमिति । सूर्यस्य मेपादिद्वादशराशिभोगाद्देवदैत्यानामहोरात्रमानं भवति । चकारः पूर्वार्धन समु- शपार्थकस्तेन द्वयोः पूर्वोक्तमेकं कारणामति स्पष्टम् ॥ ५० ॥ मा० टी०-इसलिये परस्पर उनके दिनरात अदलबदलते हैं । सूर्यके भगणका पूरण कालही अहोरात्र है ॥ ५० ॥ अथ मेपादावुदित इत्यादिश्लोकद्वयस्य फलितार्थ तदुपपत्ति चाह-- दिनापामेतेपामयनान्ते विपर्ययात् ।। उपर्यात्मानमन्योन्यं कल्पयन्ति सुरासुराः ॥१०॥ एतेषां देवदैत्यानामयनान्तेऽयनसन्धौ विपर्ययाद्यत्यासादिनक्षपाधै दिनाधै राज्यध च भवति । यत्र देवानां मध्याह्न राज्यर्ध तत्र दैत्यानां क्रमेण राव्यर्धमध्याह्ने यत्र च. दैत्यानांमध्यादराव्यधैं तत्र देवानां क्रमेण राज्यर्धमध्याझे इति फलितार्थः । अत्र हेतु- माह-उपरीति । देवदैत्या मेरोरुत्तरदक्षिणाप्रवर्तिनोऽन्योन्यमात्मानं स्वमुपरिमाग उभागे कल्पयन्त्यंगीकुर्वन्ति । वस्तुतो भूमोलकत्वेन सर्वत्र तुल्यत्वानिरपेक्षोभं- घोमागयोरनुपपत्तेः । तथाच देवादैत्यापेक्षयोर्धस्थत्वं मन्यमाना दैत्यानधास्थानङ्गी- कुर्वन्ति । दैत्याश्च देवस्थानापेक्षयोर्ध्वस्थं मन्यमाना देवानधः कुर्वन्तीति तात्पर्यार्थः
(२०४)
सूर्यसिद्धान्तः-
[दादशोऽ-
'एवं च देवदैत्ययोविपरीतावस्यानादिनराज्योपरीत्यं युक्तमेवति भावः ॥५१॥
मा० टी-दिवाई भौर गयई याम्योत्तर भयनान्तमें होताहै। सुरासुरका विपरीत
मावसे हुमा करताहै । और वे अपने २ स्थानधे उपर समझते हैं ॥ १ ॥
अथ देवदैत्ययोराधोरीतिमन्यत्रापि सदृष्टान्तमतिदिशति-
अन्येऽपि समसूत्रस्था मन्यन्तेऽधः परस्परम् ॥
भद्रावकेतुमालस्था लङ्कासिद्धपुराश्रिताः ॥ २ ॥
अन्ये देवदैत्यभिन्ना भूगोलस्थाः । अपिशब्दो देवदैत्ययोः समुच्चयार्थकः । समसूत्र'
स्था भून्यासान्तीरता नराः परस्परमधो मन्यन्ते । तत्रोदाहरति । भद्राश्वकेतुमालस्या
इति । भद्राश्चकेतुमालशब्दी स्वस्थान्तर्गतयमकोटिरोमकनगरविशेषाभिधायको स्पष्ट
भृव्यासान्तरस्थत्वमंगीकरोतु यथाश्रुतं परस्परमधो 'मन्यन्ते तुर्यचरणस्तु व्यक्त
एवं ॥५२॥
मा० टी०-वैसेही समसूत्रवाले गण परस्परको नोचे समझते हैं { असे भद्राश्च और
तुमान मथा लंका और सिद्धपुरवासी समसूत्रपाले हैं। ५२ ॥
अथोक्तं काल्पनिकमेवोत द्रढयन्नाह-
सर्वत्रेव महीगोले स्वस्थानमुपरि स्थितम् ।।
मन्यन्ते खे यतो गोलस्तस्य क्वोय कवाप्यधः ॥५३॥
भूगोले सर्वत्र सर्वप्रदेशेषु मध्ये स्वस्थानं निजाधिष्टितस्थानमूर्ध्वस्थितं तदधिष्ठिता
मनुष्याः स्वाभिमानेनाङ्गीकुर्युः । अतः कारणागोले सर्व एवोर्ध्वस्थाः । अधास्थास्तु
न भवन्त्येव । स्वापेक्षयोर्वाधास्यत्वं न वस्तुत इति तत्त्वम् । अन्यथाधःस्थत्वेन
पतनशड्ढया भूगोले मनुष्याचवस्थानानुपपत्तेः । अत्र कारणमाह-ख इति । यतः
कारणात् खे ब्रह्माण्डाकाशमध्यभागे भूगोलोऽस्ति । तथाच भूगोलादभितस्तुल्यत्वाद्द-
गोले तत्त्वतयोध्योधोभागादेरसम्भव इति भावः । स्वाभिप्रायं स्पष्टयति-तस्येति ।
भूगोलस्थाकाशमध्यस्थस्य समन्तादाकाशे क कस्मिन् भागे उर्ध्वमूर्ध्वत्वम् । कस्मिन्
मागे । वा समुच्ये । अधोऽधस्त्वम् । अपिरूलत्वेन समुच्चयार्थकः । तथा च सम.
न्तादाकाशस्य तुल्यत्वेन भूमेरूधिोभागी निर्वचनीकर्तुमशक्यौ याभ्यामूर्ध्वाधोलो-
कानियताः स्युरिति भूमरूवाधोभागाद्यसम्भवादिति भावः ।। ५३ ॥
मा० से.-पृथ्वीके गोल होनेसे सर्वत्र अपने २ स्थानको उपर स्थितहुआ समझते हैं'
शून्य मध्यस्थित गोलभ नीचाही क्या है ? और उसमें उंचाईही कहो है ? ॥५३॥
नन्वियं भूः समादर्शाकारा प्रत्यक्षा कथं गोलाकारत्यत आह-
अल्पकायतया लोकाः स्वात्स्थानात्सर्वतो मुखम् ॥
पश्यन्ति वृत्तामप्येतां चक्राकारां पसुन्धराम् ॥५४॥
ध्यायः १२.] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतः । (२०५) जनाः स्वाधिष्ठितप्रदेशात् सर्वतः सर्वदिक्षु । अभिमुखं वृत्तां गोलाकारामेतां प्रत्यक्षा पृथ्वी चक्राकारां मण्डलाकारां समां पश्यन्ति । एवकारार्थेऽपिशब्दः । तेन भूमेर्वस्तुतो गोलाकारत्वेऽपि तदाकारेणादर्शने मुकुराकारतया दर्शनं च न विरुद्धम् । अत्र हेतुमाह-- अल्पकायतयति । वस्वशरीरत्वेनेत्यर्थः । तथाच महतीभस्तत्पृष्ठस्थस्य मनुष्यस्याति- हस्वस्याल्पदृष्टिप्रचारागोलाकारतया न भासते किन्तु सममण्डलतया भासते गोलवृत्त- शतांशस्य समत्वेन भानात् । अन्यथा प्रथमज्यायाश्चापसमत्वानुपपत्तिरिति मावः ॥ ५४ ॥ भा०टी०-छोटे शरीरवाले होनेसे लोग चारोंऔर इस पृथ्वीको गोलाकाररूपसे देखते अथ निरक्षादिदेशेषु मेरुव्यतिरिक्तान्यदेशेषु दिनराज्योमीनं विचक्षुमेरोरेग्रभागयो- निरक्षदेशेषु भचक्रभ्रमणमाह-- सव्यं भ्रमति देवानामपसव्यं सुरद्विषाम् ।। उपरियाद्भगोलोऽयं व्यक्षे पश्चान्मुखःसदा ॥ ५५ ॥ अयं प्रत्यक्षो भगोलो नक्षत्राधिष्ठितमूर्तगोलो देवानां मेरोरुत्तराप्रवर्तिनां सव्यम् । पूर्वादिक्रममार्गेणेत्यर्थः । भ्रमति भ्रमपरिवर्त कगेतीत्यर्थः। दैत्यानां मेरोदक्षिणाय- वर्तिनामपसव्यं पूर्वादिदिग्व्युत्क्रममार्गेण । पूर्वोत्तरपश्चिमदक्षिणक्रमेणेत्यर्थः । नक्षत्रा- धिष्ठितगोले भ्रमति । व्यक्षे निरक्षदेशेषु । जात्यभिप्रायेणैकवचनम् । उपरिष्टान्मस्त- को मध्यभागो भगोलः पश्चान्मुखः पश्चिमदिगभिमुखः सदा नित्यं परिभ्रमति । भगो- लस्य ध्रुवमध्यस्थत्वेन भ्रमणात् । तयोस्तत्र क्षितिजवृत्तस्थत्वाच ॥ ५५ ॥ भा०टी०-यह भूगोल देवताओंके निक्ट सव्यादिमें (दक्षिणसे वाममें) और भसुरों के निकट अपसव्यादिमें और निरक्षमनुष्योंके निकट मस्तको मध्यभागमें पश्चिम दिशाम भ्रमण करता है॥५५॥ अथ निरक्षे दिनराज्योर्मानं कथयन्नन्यत्रापि ततो न्यूनाधिक मानं भवतीत्या - अतस्तत्र दिन त्रिंशन्नाडिकं शर्वरी तथा ! हानिवृद्धी सदा वामं सुरासुरविभागयोः ।। ६६ ।। अतो निरक्षे मस्तको+मगोलो भ्रमतीति कारणात् तत्र निरक्षदेशे त्रिंशन्नाडिक त्रिंशद्धटीमितं दिनं स्यात् । शर्वरी रात्रिस्तथा त्रिंशद्धटीपरिमिता स्यात् । तत् शिति- जवृत्तस्य ध्रुवद्वयसंलमतया गोलमध्यस्थत्वादिनराज्योस्तुल्यत्वं युक्तमेवोते भावः । सुरासुरविभागयोर्जम्बूद्वीपसमुद्रादिदक्षिणदेशयोः सदा पिपुवाममणातिरिक्तकाले क्षय. वृद्धी दिनरात्र्योः प्रत्येकं वामं व्यस्तं यया स्यात् तथा ज्ञवम् । एतदुक्तं भवति । जम्बूद्वीपे दिनहासे रात्रिबृद्धिस्तदा दक्षिणदेशे दिनराज्योः क्रमेण पृद्धिहानी । जम्बू- [ द्वादशा-- (२०६) सूर्यसिद्धान्तः- दीपदिनवृद्धौ रात्रिहानिस्तदा दक्षिणदेशे दिनरात्र्यो क्रमेण हानिवृद्धी । एवं दक्षिणदेशे हानिवृद्धयोर्जम्बूद्वीपे वृद्धिहानी दिने रात्री वा ययायोग्यमिति । अत्रोपपत्तिः । तत् क्षितिजवृत्तस्य ध्रुवसम्बन्धभावेन गोलमध्यस्थत्वाभावादिनराग्योः सदा विपुवाहिनव्य- तिरिक्तेन तुल्यत्वं किन्तु न्यूनाधिकत्वमहोरात्रस्य पेष्टिघाटकात्मकत्वादिति ।। ५६ ॥ भा० टी०- निरक्षदेशमैं सदा तीस घडीका दिन और ३० होकी रात होती है । सरासर- विभागमें दिनरातके विपरीतरूपसे हानि वृद्धि होती है ॥ ५६।। अथैतत् श्लोकोत्तरार्दाथै श्लोकाभ्यां विशदयति- मेषादौ तु सदो वृद्धिरुदगुत्तरताधिका ॥ देवांशे च क्षपाहानिविपरीतं तथा सुरे ॥ १७ ॥ तुलादो युनिशामिं क्षयवृद्धी तयोरुभे॥ देशकान्तिवशान्नित्यं तद्विज्ञानं परोदितम् ॥ ५८ ॥ मेषादौ पड्भ उदगुत्तरगोले सूर्ये सति । उत्तरतोयथोत्तरं सदा यावदुत्तरगोले देवांशे नम्बूदीपेऽधिका यथोत्तरमधिका वृद्धिानरक्षदेशीयदिने तुकाराययोचरं सूर्यस्योत्तरगमने यथोत्तरं दिने वृद्धिः परमोसरगमनात् परावर्तते । यथोत्तरं न्यूनावृद्धिरित्यर्थः । क्षपा. हानी रात्रेरपचयः । चः समुच्चये । आसुरे ससुद्रादिदक्षिणभागे तथा दिनरात्र्योः क्षय वृद्धी विपरीतं व्यस्तम् । दिने हानी रात्रौ वृद्धिरित्यर्थः । तुलादौ षड्भे दक्षिणगोले सूर्ये सति तयोर्जम्बूद्वीपसमुद्रादिदक्षिणभागयोदिनराश्योरुभे दे क्षयवृद्धी उपचयापच- यौ वाम व्यस्तम् । अयमर्थः । जम्बूद्वीपे दिनरान्योरुत्तरगोलस्थवृद्धिक्षयक्रमेण क्षयवृ- दी स्तः । समुद्रादिदक्षिणभागे दिनराज्योर्वृद्धिक्षयौ स्त इति । ननु क्षयवृद्धयोः किय- मितत्वामित्यतः पूर्वोक्तं स्मारयति- देशक्रान्तिवशादिति । तद्विज्ञानं तयोः क्षयवृद्धयो ज्ञान संख्याज्ञानं नित्यं प्रत्यहं देशान्तिवशात् । देशपलभाक्रान्तिरेतदुभयानुरोधात्पु- रा पूर्वखण्डस्पष्टाधिकारे "क्रांतिज्या विपुवद्भानी क्षितिज्या द्वादशोहत्ता । त्रिज्यागुणा- झोरात्रार्धकर्णाप्ता चग्जासवः । तत्कार्मुकम्" इत्यनेन दिनराव्योरर्धमुक्तम् । तद्विगुणं दिनरात्र्योरित्यसिद्धम् । अत्रोपपत्तिः । निरक्षदेशे ध्रुवळ्यलग्नं क्षितिजवृत्तं तत उत्तर- भागे स्वस्थानक्षितिजं सभूगोलमध्यस्थमुत्तरध्रुवादधो दक्षिणध्रुवाचोचमित्यत उत्तर' गोले निरक्षाक्षितिजादधो दाक्षणगोल अयमिति पंचदशघटिका निरक्षदशदिनाध क्षिति- जान्तररूपचरेण गोलक्रमण युतहीनं दिनाधै राज्यधं च विपरीतम् । एवं दाक्षिणमागेड भीष्टदेशे क्षितिजमुत्तरवादुन्नतं दक्षिणध्रुवान्नतामाते निरक्षक्षितिजानिरक्षक्षितिजं गोल- क्रमेणोलीध इत्युत्तरभागाद्वयस्तम् ॥ ५७ ॥ ५८ ॥ मादी प्रत्यहम् इति वा पाठ !
ध्यायः १२. संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतः । (२०७) मा० टी०-सूर्यमेषादिमें (कर्वतक) संचरण करनेसे देवांशम क्रमानुसार दिनमान वृद्धि मार रात्रिमानकी हानि होती है, किन्तु माशिम विपरीत होता । तुलादिमें दिवानिशि मान भौर क्षय वृद्धि विपर्यय होता है । क्षय वृद्धि देशकी क्रान्तिके वशसे जैसा होता है नही सर्वोत्तम ज्ञान पूर्वमें ( २ मध्यायमें') कह आयाहूं ॥ १७॥५॥ अथोक्तस्यावधिदेशं. विवक्षुः प्रथमं तदुपयुक्तानि क्रान्त्यंशयोजनान्याह- भूवृत्तं क्रान्तिभागनं भगणांशविभाजितम् ॥ अवाप्तयोजनेरका व्यक्षाद्यात्युपरि स्थितः ॥ ५९॥ भूवृत्तं भूपरिधियोजनमानं प्रागुक्तमायक्रान्स्यशैगुणितं द्वादशराशिमागैः पष्टय- धिकशतत्रयमितैर्भक्तं लब्धयोजनैः कृत्वा सूर्य उपरि आकाशे स्थितो वर्तमानो दाक्षणत उत्तरतो वा याति गच्छति । क्रान्त्यभावे तु निरक्षदेशोपर्यव परिभ्रमति । अत्रोपप- त्तिः । निरक्षदेशान्मरोरुत्तरदक्षिणाग्राभिमुखं सूर्यः क्रान्त्यशैर्गच्छति । तद्योजनज्ञानं तु भगणांशैमर्वग्रदयनिरक्षदेशस्पृष्टभूपरिधियोजनानि तदा 'क्रान्त्यशैः कानीत्यनुपातेने- त्युपपन्नम् ॥ ५९॥ भा० टी०-भूवृत्तको (१० ५९) सूर्यक्रान्तिसे गुणकरके ३६० से भागकरनेपर जो योज. न संख्या होगी निरक्ष देशसे तितर्ने योजन दूर स्थित स्थानमें सूर्य मध्याह्नके समय मस्तक- पर होगा ॥ ५९॥ अथ दिनमानानयनगणितस्यावधिदेशज्ञानं श्लोकान्यामाह- परमापक्रमादेवं योजनानि विशोधयेत् । भूवृत्तपादाच्छेपाणि यानि स्युयोजनानि तेः॥ ६ ॥ अयनान्ते विलोमन देवासुरविभागयोः॥ नाडीपष्टया सकृदहानिशाप्यास्मिन सकृत्तथा ॥६१॥ परमकान्तिभागाचतुशिन्मितात् । एवं पूर्वोक्तरीत्या योजनानि जातानि । भूपरिघः पूर्वोक्तस्य चतुर्थांशात्परिवर्जयेत् । अवशिष्टानि यानि यत्संख्यामितानि योजनानि भवन्ति तैोजनदेवासुरावभागयोर्निरक्षदशादुनरदक्षिणप्रदेशयो- देशी तयोरि- त्यर्थः । अयनान्त उत्तरदाक्षिणायनसन्धौ कर्कादिस्थे सूर्य दक्षिणोत्तरायणसन्धौ मकरादिस्थे सूर्य विलोमेन व्यत्यासेन सकदेकवारं नाडीपष्टया घटीपष्टयाहर्दिनमानं भवति । अस्मिन्नेतादृशे देशे तस्मिन्नेवायनसन्ध्यासन्ने सकृदेकवार तथा पष्टिघटीमिता विलोमेन रात्रिभवति । अपिशब्दो दिनेन समुच्चयार्थः । एतदुक्तं भवति । कांदिस्थे सूर्य निरक्षदशादुत्तरतद्योजनान्तारतदेशे पष्टिघटीमितदिनं तदैव निरक्षदशादक्षिणतशेजना- न्तरितदेशे षष्टिघटीमिता रात्रिः। मकरादिस्थे सूर्य तादृशोत्तरमागे पटियटीमिता (२०८) सूर्यसिद्धान्तः- [द्वादशोऽ- रात्रिदक्षिणभागे तादृशे पष्टिमितं दिनामति । अत्रोपपत्तिः । परमक्रान्तियोजनानि भूवृत्तचतुर्थाशयोजनभ्यो हीनानि । निरक्षदेशात्तान्मतयोजनान्तरितो यो दक्षिणो- त्तरदेशस्तस्मान्मेरोदक्षिणोत्तराग्रं क्रमेण परमकान्तियोजनान्तरितम् । अतस्तत्र लं- वांशाश्चतुर्विंशतिः पलांशाश्च पदपष्टिाति । तद्देशे क्रांतिवृत्तानुकार क्षितिजमित्यय. नान्ते पञ्चदशघटीमितमहोरात्रवृत्तचतुर्भागखण्डं निरक्षतद्देशक्षितिजयोरेन्तरालरूपं चरमत उक्तरीत्या दिनाधै राज्यधैं वोक्तरीत्या यथायोग्यं त्रिंशत्तद्विगुण पाष्टिवटामितत- न्मानं गणितरीत्योपपन्नम् "युक्तं चैतत् । अयनान्ताहोरात्रवृत्तस्यैकस्य तक्षितिजप्रदे- श एकत्रैव मंलग्नत्वाद्विधा संलग्नत्वाभावात्मवहभ्रमितसूर्यपरिवर्तवृतिः पष्टियटौमिर्दर्शन मदर्शनं यथायोग्यं तद्गोलस्थित्या प्रत्यक्षसिद्धमेति ॥ ६० ॥ ६१ ॥ मा० टी०-सूर्यके परमापक्रमके अनुसार योजन, भूवृत्त योजन पादसे मठग करनेपर जो योजन रहते है निरक्ष देशसे तितने दूर मयनान्त दिनको देवासुर विभाग, विपरीतरूपसे दिनरात ६० घटीका होता है ॥ ६० ॥ ६ ॥ अथोक्तदिनरात्रिमानगणितं तदवधिदेशपर्यन्तं दक्षिणोत्तरभागयो न इत्याह- तदन्तरेऽपि पश्यन्ते क्षयवृद्धी अहर्निशोः ॥ परतो विपरीतोऽयं भगोलः परिवर्तते ॥ ६२॥ तदन्तरे निरक्षदेशोक्तावधिदेशयोरन्तरालदक्षिणोत्तरविभागदेशे पष्टयन्ते पष्टिघटी- मध्ये क्षयवृद्धी अपचयोपचयाधुक्तरीत्या दिनरान्योर्यथायोग्यं भवतः । परतोऽयधि- देशादाग्रिमदेशे दक्षिणोत्तरे दैत्यदेवस्थानानकटेऽयं प्रत्यक्षो भगोलो नक्षत्राधिष्ठितो मूर्तो गोलो विपरीतोऽवधिदेशान्तर्गतदेशसम्बन्धी गणितविरुद्धः परिवर्तते भ्रमति तत्रोक्तरीत्या दिनरायोवृद्धिक्षयो न भवत इत्यर्थः । त्रिज्याधिकाराचरानयनानुप- पत्तेः । चरस्वरूपासम्भवाच ।। ६२ ।। मा० टी०-दोनों दिशामें सप्त दूरताके मध्य ६० दरके मध्यमें दिन या रात घटता बढता है । तिपसे उपर दोनों स्थानमें विपरीत भावसे भूगोल पारिभ्रमण करता है ॥ १२ ॥ अथ विपरीतगोलस्थिति श्लोकाभ्यां मदर्शयति- उने भूवृत्तपादे तु द्विज्यापक्रमयोजनः ॥ धनुर्भृगस्थः सविता देवभागेन दृश्यते ॥ ६३ ॥ तथा च सुरभागे तु मिथुने कर्कटे स्थितः॥ नएच्छाया महीवृत्तपादे दर्शनमादिशेत् ॥ ६॥ उदराशिज्याया ये क्रान्त्यशास्तेपो योजना पूर्वागतर्भूपरिधिचतुर्थाशे होने हते सति । तुकारान्निरसंदेशाद्ययोजनांतरिते देशे देवभाग उत्तरमागे धनुर्मकरसाशस्यो कस्तद्देशवासिमिर्न दृश्यते । धनुर्मकरस्थेऽर्के तेषां रात्रिः सदा स्यादित्यर्थः । जगुर ।
4 " ध्यायः १२.] संस्कृतिटीका-मापाटीकासमतः । (२०११) भागे निरक्षदेशाद्दाक्षणप्रदेशे । चः समुच्चयार्थः । तुकारात्तद्योजनान्तरितप्रदेशे ; मिथुने कर्के कर्कराशौ स्थितोऽस्तया तद्देशवासिभिर्न दृश्यते । नष्टच्छाया महोवृत्तपारे । अमावं माता छाया भूच्छाया यत्र तादृशे भूपरिधिचतुर्थाशे सूर्यस्य दर्शनं सदा क्य- येत् । यत्र भृच्छायात्मिकरात्रिर्नास्ति तत्र दिनमित्यर्थः । तथा च निरक्षदेशातयो- जनान्तरितोत्तरप्रदेश कमिथुनस्थोऽको दृश्यते तद्योजनान्तरितदक्षिणप्रदेशे धनुर्म- करस्थोऽर्को दृश्यत इति फलितार्थः । अत एव व्यंशयुनवरसाः पलांगका यत्र, तत्र विपये कदाचन । दृश्यते न मकरोनकार्मुकं किश्च ककिमिथुनौ सदोदिनी ॥ इति भास्कराचार्योक्तं संगच्छते ॥ ६३ ॥ ६४ ॥ मा०टी०-द्विराशिके अपक्रमागत योजन भूवृत्तपादसे वियोग कानेपर जो योजन होता ह, तिनात दूर देवभागमें धनु वा मृगस्थित सूर्य भी दिखाई नही देता । मातुरभागमें सेही दूरस्यानसे मिथुनकर्क स्थित सूर्य कभी दिखता नहीं । जिस स्थानमें पृथ्वीकी छाया नहीं है तहाँपर सूर्यका दर्शन होता है ।। ६३ ॥ ६ ॥ यथान्यत्रापि विपरीतस्थिति श्लोकाभ्यां दर्शयति-- एकज्यापक्रमानीतैयोजनः परिवर्जितः॥ भूमिकक्षाचतुर्थाशे व्यक्षाच्छेपेस्तु योजनः ॥६५ ॥ धनुर्मुगालिकुम्भेषु संस्थितोऽको न दृश्यते ॥ देवभागेऽसुराणां तु वृषाये भचतुष्टये ॥ ६६ ॥ एकरात्रिज्यायाः कान्त्यशेभ्यो भूपरिधिचतुर्थाशे होने कृते सति निरक्षदेशादव- शिष्टर्योगनैः । तुकारादन्तरिते देशे देवभाग उत्तरभागे धनुर्मकरवृश्चिाभराशिः स्थितः सूर्यस्तद्देशवासिमिन दृश्यते । असुराणां दैत्यानां निरसदेशात्तद्योजनान्तरितद- क्षिणभागे नृपांदिके राशिचतुष्टये स्थितोऽकैस्तद्देशवासिभिर्न दृश्यते । तुकारादुत्तरभागे वृषादिचतुष्टयास्थितोऽस्तिद्देशवासिमिदृश्यते वृश्चिकादिचतुष्टयस्थितोर्को दक्षिणभागे तद्देशवासिभिदृश्यत इत्यर्थः । अतएव “ यत्र साइजिंगजवाजिसम्मितास्तत्र वृश्चि- कचतुष्टयं न च । दृश्यते च वृषभाचतुष्टयं सर्वदा समादेत हि लक्ष्यते ॥ इति (भास्कराचार्योकं च संगच्छते ॥ ६५ ॥ ६६ ।। मा०टी०-एक राशिके भपकमगत योनन भूवृत्तपादसे घटालेने पर जो योजन होता तिस पूरके स्थानसे देवभागमें वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भके स्थित सूर्य नही, दोस्वते । स्थित मसुरमागमै वृप दि चार राशिक सूर्य नहीं देखे जाते ॥ ६ ॥६६॥ अथ शून्यराशिकान्त्यानीतयोजनेभ्योऽवगतमेवप्रभागयोराप स्थितिवलक्षणयमाह- मेरी मेपादिचक्राधे देवाः पश्यन्ति भास्करम् ॥ सकृदेवोदितं तददसुराश्च तुलादिगम १,६७ ॥ ।
(२९०), सूर्यसिद्धान्तः- [दादशोऽ- मेराबुत्तरात्रावस्थिता देवा मेपादिचकाधे मेपादिगशिपदकेऽवस्थितमकै सकृदेकवा- रएँ । एक्कारादनेकवारनिरासनिश्चयः ।। उदितमदर्शनानन्तरं प्रथमदर्शन विपर्य निर- न्तरं पश्यन्ति । अमुरा मेरुदक्षिणाग्रस्था देयाः । या देवैः समुच्चयार्थः । तुलादि- राशिपट्कस्थं तद्वत् सकृद्वादेत निरंतरं पश्यन्ति ॥ ६७ ॥ मा० टी०-मेरुस्थित देतालोग मेषादिचकाईगत सूर्यको सदा देखते हैं और मसुरलोग तुलादिगत सूर्यको तसाही देखते हैं ॥६७ ॥ यथ निरक्षदेशादयनसन्धौ कियनियोजनैरूवमो भवति तदाह- भूमण्डलात्पञ्चदशे भागे देवेऽचवासुरे ॥ उपरिष्टाजत्यर्फः सौम्ययाम्यायनान्तगः ॥ ६८ ॥ देव उत्तरभागे। अथवासुरे दक्षिणभागे । निरसदेशापरिधः पंचदशे भागे तत्क- लयोजनांतरिते देशे क्रमेण सौम्ययाम्यायनान्तगउत्तरायणांतदक्षिणायनांतस्थितोऽक उपरिष्टादृर्ध्व व्रजति परिभ्रमति । यथा गोलसंधौ निरक्षदेशे तथात्र भागद्वय इति फलितार्थः । अत्रोपपत्तिः । अयनांतस्थे परमशांतिश्चनुर्विशत्यंशास्तद्योजनानि । भूवृत्तं क्रांतियागनं भगणांशविभाजितम् ' इत्यत्र चतुविशतिमितगुणभगणांशमितहरौ गुणे- नापवर्त्य हारस्थाने पंचदशति भूमंडलात्पंचदशे भाग इत्युक्तमुपपन्नम् ॥ ६८॥ मा० टी०-भूवृत्तके पंचदश भाग दूर उत्तर अयनमें देवभागमें मोर दक्षिणायनमें मसु- रस गमें सूर्य मस्तक ऊपर होकर भ्रमण करते हैं ॥ ६८॥ अथ निरक्षदेशापरिधिपञ्चदशभागपर्यन्तं सूर्यस्य दक्षिणोत्तरतो गमनमुफ्त्या तच्छायागमनं प्रतिपादयति- तदन्तरालयो छाया याम्योदवसम्भवत्यपि ॥ मेरोरभिमुखं याति परतः स्वविभागयोः ॥ ६९॥ वदन्तरालयोनिरक्षरेशात्पञ्चदशभागमध्यस्थितदक्षिणोत्तरदेशयोश्छाया द्वादशांगु- लशंकोमध्याह्नच्छायामाष्टकालिकच्छाया दा दक्षिणाप्रमुत्तराग्रं वा संभवति । एतदुक्तं भवति । निरक्षदेशात्पंचदशभागान्तरालोत्तरदेशे मध्याह्ननतांशानां दक्षिणत्वे छायाग्र- मुत्तरम् । नतांशानामुत्तरत्वे छाया दक्षिणम् । एवं निरक्षदेशात्पञ्चदशभागान्तगल- स्थितदक्षिणदेदो सूर्यस्योत्तरस्थत्वे छायाग्रं दक्षिणं दक्षिणस्यत्वे छायाप्रमुत्तमिति । परतः पञ्चदशभागान्तरालदेशे पविभागयोदक्षिणोत्तरविभागयोमगरभिमुखं मेयोः सम्मुखं क्रमेण दक्षिणाप्रमुत्तराये यथा स्यात्तयेत्यर्थः । छाया याति गच्छति । भवतीत्यर्थः आपशब्दः पूर्वाधीन समुच्यार्यकः ॥ ६९ ।। माटी-इन दोनों के मध्य स्थित स्थानमें छाया दक्षिण या उत्तरमें स्थित हौसकतो इतने जा अपने २ भागमें छाया मेरुले सामने पतित होता है ॥ ६९ ॥ - ध्यायः १२.] संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतः। (२११). अथ कथं पर्यति भुवनानि विभावयन्निति प्रश्नस्योत्तरं श्लोकान्यामाह- भद्राश्वोपरिंगः कुर्याद्धारते.तूदयं रविः॥ राज्य केतुमाले तु कुरावस्तमयं तदा ॥ ७० ॥ भारतादिपु वर्षेषु तददेव परिभ्रमन् ॥ मध्योदयार्धराव्यस्तकालात्कुर्यात्प्रदक्षिणम् !! ७१ ।। भद्राश्ववोपरिगतः सूर्यो भरतवर्षे स्वोदयं कुर्यात् । तुकारात् भद्राश्ववर्षे मध्याई कुर्यात् । तदा तस्मिन्काल केतुमालवर्पर्धरात्रं कुरो कुरुस्तमयं वास्तं कुर्यात् । तुकारादुक्तवर्पयोरन्तराले दिनस्य गतं शेष वा रात्रश्च तद्ययायोग्यं कुर्यादित्ययः । अतिस्थूलदेशग्रहणे ययाश्रुतमिदं भव्यं किञ्चित्सूक्ष्मदेशग्रहणे तु यमकोटिलङ्कारोमक- सिद्ध घराण्यन्तर्गतानि तच्छब्दवाच्यानि ज्ञेयानि । “लङ्कापुरेऽस्य यदोदयः स्यात्तदा दिनाधै यमकोटिपुर्याम् । अधस्तदा सिहपुरेऽस्तकालः स्याद्रोमके गत्रिपलं तदेव ॥" इतिभास्कराचार्याक्तभृगोल उक्तनगराणां भूपरिधिचतुर्थीशान्तरत्यात्संगच्छते । अथ मारतादिपु त्रिषु वर्षसज्ञेषु भारतकेतुमालफुरुवपंपु तन्द्राश्ववोपरिगवत् । एक्कारा- तन्यूनाधिकव्यवच्छेदः। परिभ्रमन्परिभ्रमेण स्वस्वाभिमतस्यानोपरि स्थिति कुर्वन् सूर्यः प्रदक्षिणं यथा स्यात्तथा सव्यक्रमेण स्वस्थानादिक्रमेणेति यावत् । उक्तवतुर्वपु मध्यो- दयाधराज्यस्तकालान्मध्याहोदयार्धराज्यस्तसज्ञान्कालान्कुर्यात । एतदुक्तं भवति । मारतवोपरिगतेऽ भारतकेतुमालकुरभद्राचार्षेषु क्रमेण मध्यावसूर्योदयाधरात्रास्ताः स्युः । केतुमालवोपरिगतकें केतुमालफुरुभद्रावभारतवपु क्रमेण मध्यागसूर्योदया- रात्रास्ताः । कुरुवोपरि गते कुरुभद्राश्वभारतकेतुमालवर्षेषु क्रमेण मध्याह्नसूर्योदया- र्धरात्रास्ता भवन्तीति ॥ ७० ॥७१ ॥ माल्टी-जिस समय भद्राधमैं मस्तकपर सूर्य होता है, तप भारतमें कोदयगत होता है, केतुमालमै राध्यद्ध (आधीरात) भौर कुरुवर्षे अस्त प्रायः होता है । भारतादिवर्षम वैसेही सूर्य भ्रमणके द्वारा मध्य, उदप, आधाशत, अस्तकाल आदिकरके प्रदक्षिण करते ॥ ७० ॥ ७१ ॥ ननु ग्रहाणां गतिसद्भावात्प्रतिदेशं याम्योत्तरयोग्रहगमन प्रतिक्षणं च विलक्षणं मासताम् । परंतु नक्षत्राणां गत्यभावात्प्रतिक्षणभ्रमेणैकवावस्थानाभावेऽपि प्रतिदेशमेक- रूपावस्थानं कुतो न । एवं धृवयोः परिभ्रमस्याप्यभावात्सदा सधैकरूपावस्थानदर्शना- पत्तिश्चेत्यत आह- ध्रुवोन्नतिर्भचकस्य नतिमरुं प्रयास्यतः ।। निरक्षाभिमुखं यातविपरीते नतोन्नते ।। ७२ ॥ .
(२१२) सूर्यसिद्धान्तः- [दादशोऽ- मेरु मेरोरुत्तराग्रं दक्षिणायंवा तदभिमुखं प्रयास्यतो गच्छनः पुरुषस्य धवोन्नतिः क्रमे णोचरदाक्षिणयोर्भुवयोरोच्च्यं भवति । भवस्य नक्षत्राधिष्टितगोलमध्यभागवृत्तस्य नतिः क्रमेण दक्षिणोत्तरयोर्नतत्वं भवति । निरक्षदेशाभिमुख गच्छतः पुरुपस्य नतोन्नते पूर्वोक्ते व्यस्ते भवतः । उत्तरमागस्थपुरुषस्य निरक्षाभिमुखं गच्छतः पूर्वोक्तस्थानापे- सयोत्तरध्रुवस्य नतत्वं पूर्वस्थानापेक्षया भचक्रस्योन्नतत्वम् । एवं दक्षिणभागस्यपुरुषस्य निरक्षाभिमुखं गच्छतः पूर्वस्थानापेक्षया दक्षिणवस्य नैतत्वं भचकस्योन्नतत्वमिति ७२ माल्टी-मेरुके सामने गमन करनेसे अमानुसार पग उन्नति भोर मचक्रको नति दिखाई देती है और निरक्षके सामने गमन करनेसे विपरीत दिखाई देता मर्याद धामी नति और मचक्रको उन्नति दिखाई देती है ।। ७२ :: अथ कुत एवमित्यतः 'कथ पयति भगणः सग्रहोऽयं किमाश्रयः' इति प्रश्नत्यो- चरं भवक्रभ्रमणवस्तुस्थितिमाह- भचकं ध्रुवयोर्बद्धमाशिप्तं प्रवहानिलः ॥ पर्यत्यजत्रं तन्नद्धा ग्रहकक्षा यथाक्रमम् ॥ ७३ ॥ भचक्र नक्षत्राधिष्ठितमूर्तगोलरूपं ध्रुवयोदीक्षणोत्तरस्थिरतारयोर्वदं ब्रह्मणा निवद्ध नियतवायुगतिना गोलाकारेण प्रतिवद्धं प्रवहानिलैः प्रवहवाय्वंशः स्वस्वस्थानस्थैक्षित स्वस्वस्थानाभिघातं माप्तं सदजस्रं निरन्तरं पर्येति । पश्चिमाभिमुखं भ्रमतीत्यर्थः । ननु नक्षत्रचक्र वायुना भ्रमति । ग्रहास्त्वधोऽधास्या सम्बन्धामावात्कथं भ्रमन्तीत्यत आह-तन्नद्रा इति । ग्रहाणां शन्यादीनां कक्षा मार्गा वावंशरूपा भवकान्तर्गता. काशस्था यथाक्रममधोऽधस्तन्नद्धा महाप्रवहवायुगोलस्थापितभचक्रे वायुस्त्रेण निवद्धाः अतो भचक्रेण सह भ्रमति । तत्रस्था ग्रहा अपि भ्रमन्तीति किं चित्रम् । तथा च प्रव. हवायुगोलमध्यस्थविषुववृत्तपूर्वापरनिरक्षदेश ध्रुवयोः क्षितिजस्यत्वादचक्रस्य मस्तको. पार भ्रमणाच मेर्वग्राभिमुखं प्रयातुर्धव उचो भवति । तत आसन्नत्वाचक नत मवाति । ततो दूरत्वादिति सवै युक्तम् ॥ ७३ ॥ मा० टी०-दो ध्रुवमे पाहुमा मचक्र प्रवहवायुसे माक्षित होकर सदा घूमता है और क्रमानुसार तिसमें बद्ध ग्रहकक्षा, मचक्र साथ चलती रहती है ॥ ७ ॥ अथ पित्र्यं मासेन भवतीति प्रश्नयोरुत्तरमाह- सकृदुद्तमन्दाध पश्यन्त्यक सुरासुराः ॥ il पितरः शशिंगा पक्ष स्वदिन च नरा भुवि ॥ ७४॥ यथा देवदैत्या एकवारमुदितं सूर्य सौरवधिपर्यन्तं पश्यन्ति । तयों पितरचन्द्रकि 'म्वगोलोस्थिताः । पक्ष पंचदशतिथिपर्यन्तं पश्यन्ति । नरा भूमौ स्वदिनपर्यन्तमर्फ पश्यन्यतः 'पित्र्यं मासन भवति नाडीपष्टया तु मानुपम् । इति सबै युक्तमतएव 11 ध्यायः १२] संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतः । (२१३) "वि मागे पितरो वमन्तः स्वाधः सुधादीधितिमामनन्ति । पञ्यान्त तेऽक निजमस्त- कोर्वेदः यतोऽस्माादलं तदेषाम् । भार्धान्तरत्वान्न विधोरधःस्थ तस्मानिशीयः खलु पौर्णमास्याम् । कृष्णे रविः पक्षदलेऽभ्युदेति शुक्लेऽस्तमेत्यर्थत एव सिद्धम् ॥ इतिभास्कराचार्यण विस्तायोक्तं संगच्छते ॥ ७४ ॥ भा०टी०- देवता और असुरलोग जैसे एकबार उदय हुए सूर्यको ६ मासपर्यन्त देखते हैं। पितृगण चन्द्रस्थित होनेका कारण पक्षभरतक और पृथ्वीके आदमी सारे दिन सूर्यको देखते हैं ।। ७४॥ अय प्रसंगादूर्वस्थस्याल्पभगणानामधः स्थस्याधिकमगणानां युक्त्या प्रतिपादनार्थ प्रथमं कक्षाया ऊर्वाधाक्रमेण महदल्पत्वं तत्रस्थभागानां महदल्पमदेशत्वं चाह- उपरिस्थस्य महती कक्षाल्पाधास्थितस्य च ॥ महत्या कक्षया भागा माहन्तोऽल्पास्तथाल्पया ॥ ७॥ अवस्थग्रहस्य कक्षा वायुवृत्तमार्गरूपा महती महापरिधिप्रमाणा । अधःस्थस्य ग्रहस्य कक्षाल्पाल्पपरिधिप्रमाणा।चो निश्चयार्थ । लघुकक्षाणां महाकक्षान्तर्गतत्वेन महाक- क्षाणां चान्तर्गतलघुकक्षात्वेनोर्वाधास्थयोर्महदल्पपरिषिके कक्षे । अन्यथोक्तस्वरूपा- नुपपत्तेः । एवं महति वृत्तपरिधौ द्वादशराशिमागानां समत्वेनाइने भागा एकैकमाग- प्रदेशा महत्या कक्षया कृत्वा महान्तो वहुस्थलात्मका लघुनि वृत्ते तदङ्कने तथा भागा अल्पया कक्षया कृत्वाल्पा अल्पस्थलात्मकाः प्रमेणैकैकमागप्रमाणमाधिकाल्पं न सम चक्रांशपूर्त्यनुपपतेरिति तात्पर्यम् ।। ७५ ॥ मा० टी-अपर स्थित कक्षा बडी है नीचे स्थित हुई कक्षा अल्प है, तिसकारणसे कक्षा गत वंश वृहद और मल्प होते हैं ॥५॥ अयोर्ध्वाधः क्रमेण ग्रहभगणभोगकालयोर्महदल्पत्वमाह- कालेनाल्पेन भगणं भुल्पभ्रमणाश्रितः ॥ ग्रहः कालेन महतामण्डले महति भ्रमन् ॥ ७६ ॥ अल्पभ्रमणाश्रितः । अल्पभ्रमणं परिधिमानं यस्याः साल्पभ्रमणाधास्थकता तत्स्थो ग्रहोऽल्पेन समयेन भगणं दाइशराश्यात्मकं मुक्तेऽतिक्रमते । महति मण्डले । कर्वस्थकक्षायामित्यर्थः । भ्रमनाच्छन्महता बहुना समयेन द्वादशराशोन्मुंके विक्ष्य- माणयोजनगतेरमिन्नत्वात् ॥ ७६ ॥ मा टी-अल्पकक्षाश्रित ग्रह अल्पकाळमें भगणको भोग करता है । भोर महत्कहा- स्थित ग्रह दीर्घकालमें भोग करता है ॥ ७६ ॥ अथात एवोर्ध्वाधः क्रमेण ग्रहयो गणास्तुल्यकालेल्पा बहवो भवन्तीति सोदाहर- यामाह- (२१४) सूर्यसिद्धान्तः- [ द्वादशोऽ- स्वल्पयातो वहन्मुक्त भगणान्छीतदीधितिः ॥ महत्या कश्या गच्छंस्ततः स्वल्पं शनैश्चरः ॥ ७७ ॥ स्वल्पप्रमाणया कक्षया । तुकारादतिक्रामचंद्रो वहुप्रमाणान्भगणान्वहुवारं द्वादश- राशीनित्यर्थः । भुक्ते । महाप्रमाणया कक्षया गच्छञ्छनिस्ततश्चन्द्रात्स्वल्पं भग- . णमल्पप्रमाणान्भगणान् । जात्यभिप्रायेणैकवचनम् । अल्पवारं द्वादशराशीन्भुक्ते । अतएव शनैश्चर इति ॥ ७७॥ भा० टी०-एक समयके मध्यमें स्वल्म कक्षागत चंद्रमा पहुतसे भगण भोगताहै; परन्तु शनिको कक्षाके महत्सवासे भगण मल्प होते हैं ।।७७ ॥ अथ 'दिनाब्दमासहोराणामधिपा न समाः कुतः' इति प्रश्नस्योत्तरे श्लोकाभ्यामाह- मंदादध क्रमेण स्युश्चतुर्था दिवसाधिपाः॥ वाधिपतयस्तद्वत्तृतीयाश्च प्रकीर्तिताः ॥ ७८॥ उर्वक्रमेण शशिनो माखानामधिपाः स्मृताः॥ होरेशाः सूर्यतनयादधोऽधःक्रमतस्तथा ॥ ७९ ॥ शनेः सकाशादधः कक्षाक्रमेण चतुर्थसङ्ख्याका ग्रहा दिनाधिपतयो वारेश्वरा भ- वन्ति । यथा शनिरविचन्द्रभीमबुधगुरुशुका इति तत्क्रमः । वर्षस्य षष्टयधिकशतत्रय- दिनात्मकस्य स्वामिनस्तदन्मन्दादधम्कमेण तृतीयसंख्याका ग्रहा उक्ताः । चः समुच्च- यार्थ । तलमश्च यथा शनिभौमशुक्रचन्द्रगुरुसूर्यवुधा इति । चन्द्रात्सकाशादूर्ध्वकक्षा- क्रमेण ग्रहा मासानां निगदिनात्मकानांस्वामिनः कथिताः । तत्कमश्च चन्द्रबुधशुक्ररवि मोमगुरुशनय इति । शनेः सकाशादधः क्रमशः । अधः क्रमेण होरेशा: 'होरोते लग्नं भगणस्य चाधम्' इति पञ्चदशभागारमकहोराणां दिने हादशरात्री द्वादशेत्यहोरात्रे चतु- विशतिहोराणामित्यर्थः । 'होरा सार्धा दिनाडिका' इति पष्टियटिकात्मकेऽहोराने । चतु- विशातहोराणामित्यन्ये । स्वामिनस्तथा मासेश्वरवदव्यरहिताः कथिताः तत्क्रमः शनिगुरुभौमरविशुबुधचन्द्रा इति । अत्र शनेः सर्वो_स्थत्वाचन्द्रस्य सर्वाधः स्थत्वात्ताभ्यामध उर्चक्रमा मेणोक्तामन्याहस्यावधित्वाभ्युपगमे विनिगमनाविरहा, पत्तेः । नतु शनेराद्यावधित्वेन सृष्ट्यादौ दिनवर्षहोराणां स्वामित्वं नवा चन्द्रस्याद्यावधि- त्वेन सृटचादी मासेदात्वं पूर्वखण्डोक्तानीततदीशैविरोधापचेः । अत्रोपपत्तिः । होरारू- पलमानां क्रान्तिवृत्तेयाक्रमेण मेपादीनां सम्भवादूर्वकक्षातोऽधानमेण होरेशत्वं युक्तम् । एवमहोराने चतुविशतिहोराः । सप्ततधास्त्रयोहोरेशा गताः । चतुर्थों होरेशो द्वितीयदिनप्रारम्भे स एव प्रथमहोरेशत्वाद्वितीयदिनेशः । एवमुत्तस्त्रापि । एवमेतद्वार अमेण सावनवर्षे त्रयो वाग इति पूर्ववर्षगादाग्रिमवशोधः वक्षाक्रमेण तृतीय उत्तरो-
ध्यायः १२.] संस्कृतटोका-मापाटोकासमेतः।
चरम् । एवं सावनमासे द्वौ वारी वारक्रमेण मासेश्वरस्याधिकाविति कक्षोलक्रमे वारक-
मेणैकांतरितत्वात्कक्षोवक्रमेण मासेश्वर उत्तरोत्तरमित्युपपन्नं मन्दादित्यादिश्लोकद-
यम् ॥ ७८ ॥ ७९ ॥
मा०टी०-शनिसे नीचेके वृत्तमें गयाहुआ क्रमशः चौथा ग्रह दिनका स्वामी और तीसरा
ग्रह वधिपती है ।। ७८ | चंढगासे क्रमानुसार ऊपर गयेहुए मासके स्वामी है। शाने
क्रमानुसार नीचेको गयेहए ग्रह होराधिपति हैं ।। (होरा-२दण्ड) ॥ ७९ ॥
अथ ग्रहक्षकक्षाः किमात्राः' इति प्रश्नस्योत्तरं विवाः प्रथमं नक्षत्राणां कक्षामानमाह--
भवेद्रकशा तिग्मांशोधगणं पष्टिताडितम् ।।
सर्वोपरिष्टाभ्रमति योजनेस्तैर्भमण्डलम् ॥ ८० ॥
सूयस्य भ्रमणं कक्षापरिधिमानं योजनात्मकम् 'खखार्थेकसुराणवाः' इति वक्ष्यमाणं
पष्टया गुणितं सन्नक्षत्राणां कक्षा नक्षत्राधिष्ठितगोलस्य मध्यवृत्तं स्यात् । तैनक्षत्रकक्षा-
मियोजन मण्डलं नक्षत्राधिष्ठितगोलमध्यवृत्तं सर्वोपरिष्ट्वाचन्द्रादिसप्तग्रहेभ्यः
उपरि दूर भमति भूगोलादभितः परिभ्रमात । अत्रोपपत्तिः । नक्षत्राणां गत्य-
मावाच्छनेरप्यत्यूच नक्षत्रमण्डलं तत्र सूर्यगत्या सूर्यकक्षा तदा नक्षत्रगत्यभावेऽप्येका-
लागतिकल्पनयानुपातान्यथानुपपत्तितया 'कल्प्यो हरो रूपमहारराशेः' इतीच्छाहासे
फलवृद्धयपेक्षितत्वाव्यस्तानुपातो लाववात्सूर्यगतिः पष्टिकलामिना च भगवता कृता ।
नक्षत्रगतेरमावाचेति पष्टिताडितमित्युपपन्नम् ॥ ८ ॥
मा०टी०-सूर्यकी कक्षाको ६० से गुणा करनेपर भाक्षा होती है । यह सबके अपर
भ्रमण करती है ।। ८०॥
अथ ग्रहकक्षाणां मानज्ञानार्थमाकाशकक्षामानम् । कियती तत्करप्राप्तिः' इति प्रश्न-
स्योत्तरमाह-
कल्पोक्तचन्द्रभगणा गुणिताः शशिभक्षया॥
आकाशकाक्षा सा ज्ञेया करव्याप्तितया खेः॥ ८१ ॥
कल्पोक्तचन्द्रभगणाः । “एने सहस्रगुणिताः कल्पे स्युभंगणादयः " इत्युक्त्या
युगचन्द्रभंगणाः सहस्त्रगुणिताः फल्पचन्द्रभगणा इत्यर्थः । चन्द्ररक्षया 'खत्रयाब्धि-
द्विदहना' इति वक्ष्यमाणया गुणिता सा तन्मिताकाशजक्षा परिधिरूपा ज्ञेया । धीम
तेतिशेपः । नन्वनन्ताकाशस्य कथं परिधिरित्यत आह-करव्यातििित । सूर्यस्य किर-
णप्रचारस्तथाकाशकक्षापरिमित इत्यर्थः । तथाच यद्देशावच्छेदेन सूर्यकिरणप्रचारस्त-
द्देशावछिन्नाकाशगोलस्य ब्रह्माण्डकटाहान्तर्गतस्य परिधिमानं सम्भवत्येवेति भावः ।
अत्रोपपत्तिः । तमनंतरमेव यद्गणभत्ता खकक्षा तस्य कक्षा स्यादित्युक्ते भगणक-
क्षाघात खकक्षा सिद्धा । अतश्चन्द्रभगणकक्षयोतिः खकक्षातुल्य एवेति दिक् ॥८॥
१८२९६ सूर्यसिद्धान्त:- द्विादशोऽ- टी-एक वल्पमें चन्द्रमाके भगण चद्ररक्षामे गुणा किये जाय तो माकाशरक्षा होती है, तितमी दूरतक सूर्यको किरणें व्याप्त है ॥ ८१ ॥ अथ ग्रहाणां कक्षानयन योजनगत्यानयनं चाह--- सेव यत्कल्पभगणेता तभ्रमणं भवेत् ॥ कुवासभिज्यात सर्वपां प्राग्गतिः स्मृता ।। ८२ ॥ साकाव्याप्तिरूपाकाशकक्षा यत्कल्पमगणेयस्य कल्पभगणेमक्ता फलं तस्य कक्षा भवेत् । एक्कारो निश्चयार्थे । सरक्षाकल्परविसावन काप्राप्तं फलं सर्वेपामुक्तमगण- सम्बन्धिना ग्रहादीनामझो दिवसस्य दिनसंम्बन्धिनीत्यर्थः । प्राग्गतिर्योजनात्मिका कथिता । अत्रोपपत्तिः । कल्पभगणकक्षाघातरूपाकाशकक्षा कल्पमगणमक्ता कक्षा -स्योदव । कले खकक्षामितयोजनानि ग्रहः कामतीति कल्परविसावनदिनराकाशकक्षा- मित योजनानि तदेकरविसावनदिनेन कानीत्यनुपातेन पूर्वगतियोजनात्मिका प्रत्यहं तुल्ये- न्युपपन्नम् ।। ८२ ॥ भा०टा०-उस कक्षाको ग्रहोके वल्ल मगगसे भाग कियाजाय तो स्वपक्षा होगी कक्षाको सुदिनसे भ ग कियाजाय तो सयकी प्रात्यहिक प्रागति होगी ।। ८२ ।। अथ योजनात्मकगतेः कलात्मकगति स्वीयामाह- भुक्तियोजनजा समस्या सेन्दोर्भमणसगुणा ॥ वकशाप्ता तु सा तस्य तिथ्याप्ता गतिलिप्तिकाः ।। ८३ ॥ गतियोजनोत्पन्ना या संख्या सा संख्या चन्द्रस्य भ्रमणसङ्गुणा कक्षया गुणि- ता स्वाक्षयाप्ताभिमतग्रहस्य कक्षया भक्ता सा फलरूपा तिथ्याप्ता पञ्चदशमक्ता । "शुकारान् फल तस्याभिमतग्रहस्य गतिकला भवन्ति । अत्रोपपत्तिः । कक्षायोजनैश्चक- फलास्तदा गतियोजनेः का इत्यनुपानेन गतिकलाः । तत्रापि 'चन्द्रकला पंचदशम- ताश्वककलाः' इति चक्रकलास्वरूप धृतमित्युपपनम् ॥ ८३ ॥ माटी-मुक्ति पोजन चन्द्र कक्षा गुणकरके समासे मागवरने पर गतिकला होगी।। ८३ यथ विमुत्सेधा इति प्रश्नस्योत्तरमाह- कक्षा भूकर्णगुणिता महीमण्डलभाजिता ॥ तत्कर्णा भूमिकोंना ग्रहाच्च्य स्वं दलीकृताः॥ ८॥ अहाणां योजनामिका कक्षा भूकणे प्रयोजनानि शतान्यष्टौ भूक! द्विगुणानीत्युक्तः भूव्यासन पोडशशतेन गुणिता भूपरिधिना तदवगतेन भक्ता फलं तस्याः कक्षायाः काव्यासा भवन्ति । एते भूव्यासेन होना अर्धिताः सन्तः स्वगृहीतव्याससम्बन्धि- महौच्च्यं ग्रहस्योचता भूमेः सकाशाद्भवति । अत्रोपपत्तिः । भूपरिधिना भूव्यासस्तदा . ध्यायः १२.J संस्कृवटीका-भापाटोकासमेतः । (२१७) कक्षायोजनैः क इत्यनुपातेन कक्षाध्यासास्तऽधिताः पक्षाव्यासा भूगर्भकक्षापार- धिप्रदेशान्तरालरूपं भूपृष्ठात् तदन्तरज्ञानाथै भूव्यासार्धन हीनं भूपृष्ठात् कक्षौच्च्यं तत्र कक्षाव्यासाभव्यासोना अर्धिताः कृताः । उभयथा समत्वात् । कक्षौच्च्यमेव ग्रहो- उच्य ग्रहस्य तत्राधिष्ठानादिति । एतेन सिद्धग्रहाच्च्यभ्यः परस्परान्तरगतज्ञानं मुग- ममिति । किमन्तरा इति प्रश्नस्योत्तरं स्वतःसिद्धमेवोत दिक् ॥ ८४ ॥ मा०टी-स्वरक्षाको भूकर्ण से गुणकरके भूवृत्तद्वारा भागकरनेपर स्वरक्षाकर्ण होगा तिससे भूकर्णको वियोग करके दोसे भाग करनेपर पृथ्वीसे दूरताका निर्णय हो जायगा || ८४॥ अथोर्चक्रमेण सिद्धाः कक्षा विवसुः प्रयमं चन्द्रस्य कक्षां बुधशीघ्रोचकक्षां चाह- खत्रयाधिदिदहनाः कक्षा तु हिमदीधितः ।। ज्ञशीघ्रस्याङ्कखदिविकृतशून्येन्दवस्ततः ॥ ८५ ।। चन्द्रस्य कक्षा सहसगुणितसिद्धरामाः । तुकारादागमप्रामाण्येनांगीकार्या। अन्य- थान्योन्याश्रयापत्तेस्ततश्चंद्रादूर्व बुधशीघ्रोधस्य कक्षा नखदन्तवेददिशः । यद्यपि वुधशीघ्रोचमाकाशे प्रत्यक्षं नेति तत्कक्षोक्तिरयुक्ता तथापि बुधशीघ्रोचभगणानीतक- क्षायां गत्यनुरोधेन चन्द्रोवंगायां बुधो भ्रमति पूर्व सूर्यकेन्दुजेन्दवः' इति क्रमोक्तेः । अन्यथा भगणैक्यादेककक्षायां रविवुधशुक्राणामवास्थिती मण्डलभंगापत्तेरिति सूच- नार्थमुक्ता ॥ ८५ ॥ मा०टी०-६० ३२६०००, वु. शी. बन्दसे १०४३२०९,.।। ८५ ॥ अथ शुक्रशीघ्रोचस्य कक्षा सूर्यबुधशुक्राणामभिन्नां कक्षा चाह- शुक्रशीघ्रस्य सप्तागिरसाब्धिरसपइयमाः ॥ ततोऽकवुधशुक्राणां खखाथैकसुराणवाः ॥ ८६ ॥ तय शुक्रशीघोच्चस्य कक्षाद्रिव्यंगवेदपतपक्षाः शुक्रावस्थानसूचनार्थमुक्ताः । ततस्तदूर्व सूर्यबुधशुक्राणां भगणेक्यादभिन्ना कक्षा खलपञ्चभूदेवाब्धयः । यद्यपि बुधशुक्रयोः सूर्याधस्थत्वात्केवलं सूर्यकोव वस्तुमुचिता तथापि कायैको भगणस्तदा कल्परविसावनदिनैः खकक्षामितयोजनानि तदाहणेन कानीत्यनुपातागतयोजनः क. इत्यनुपातेन सूर्यवुधशुक्राणामभिन्नत्वसिद्धयथै बुधशुक्रयोरप्युक्ता । अन्यया समत्वा' नुपपत्तरित ॥८६॥ भान्टी०-शु०-शी०बुशी से २६६४६३७ । सूर्य, बु, शु, मध्य ४३३१५०० ॥८॥ अथ भौमस्य कक्षां चन्द्रमंदोबस्य कक्षां चाह- कुजस्याप्यंकशून्याङ्कपझ्वदेकभुजंगमाः ॥ चन्द्रोचस्य कृताटाब्धिवसुदिन्पष्टवह्नयः ।। ८७ ॥
(२१८) सूर्यासद्धान्तः- द्विादशो०]य:-- मौमस्य । अपिशब्दात्सूर्याद कक्षा नवखनवपडिन्द्रसर्पाः । चंद्रमंदोबस्य कक्षा वेदाहिवेदसर्पपक्षरामनागरामाः । इयमप्याकाशे न दृश्या तथापि गतयोजनश्चन्द्रोचज्ञा- नायोक्ता ॥ ८७ ॥ भान्टी०-म ८-१४६९०९ । चन्द्रोच्च ३८%D,३२८=, १८४ ।। ८७ ॥ अथ गुरुराहोः कक्षे आह- कृततुमुनिपञ्चाद्रिगुणेन्दुविपया गुरोः ॥ स्वर्भानादतष्टिदिशेलार्यखकुलराः ॥ ८८॥ बृहस्पतेभीमाचंद्रोच्चादो कक्षा वेदाङ्गमुनिपञ्चस्वररामचंद्रशराः । राहोः । कक्षा वेदा- गगनयमसतपञ्चाशतियः । इयमदृश्याप राहोगतियोजन नार्यमुक्ता । अत्रापि पातस्य चक्रशुद्धत्वमवधेयम् ।। ८८ ॥ मा० टी-वृह ५१८, ३७५८, ७६ | राहु ८०, ५७२-१८६४ ॥ ८॥ अथ शनैः कक्षा नक्षत्राधिष्टितमूर्तगोलमध्यका चाह- पञ्चवाणाक्षिनागरसायर्काः शनेस्ततः॥ भाना रविखशून्यांकवसुरन्ध्रशराधिनः ॥ ८९॥ ततो वृहस्पते राहोर्वोय शनेः कक्षा पञ्चपञ्चद्यष्टपड्रससप्तार्काः । नक्षत्राणां गोल- मध्ये कक्षा शनेरुव द्वादशनवशताटनवतितत्त्वानि । यद्यपि भवेद्भकक्षा तीक्ष्णांशोभ्रं- मणं पष्टिताडितम् ' इत्यनेन भकक्षाया हादशांतरितत्वादयुक्तत्वं तथापि सैव यत्कल्प मगणीरत्यनेन सूर्यकक्षाया उक्त्या द्वादशाधोञयवस्य निवन्धने त्यागेऽपि भकक्षार्थ भगवता गृहीतत्वाददोपः। एतेनाधोपयवस्यार्धन्यूनत्वेन त्यागोऽर्धाग्यधिकत्वेनोर्ध्व- मेकाधिकप्रहणं कक्षानिवन्धेन कृतमिति सूचितम् ।। ८९ ॥ मा० टी-शनि १२७६६८ २२५ । भरक्षा २५९८९० ०१२ ॥ ८२।। ननु चंद्ररक्षाया आगमनप्रामाण्येनांगीकारे सर्वरक्षाणामागमप्रामाण्यापत्त्या 'सेव यत्कल्पभगणैर्भत्ता तभ्रमणं भवेत्' इति कक्षानयनं व्यर्यम् । अन्ययाक्शकक्षाज्ञाना- सम्भवापत्तरित्यत आकाशकौवागमप्रामाण्येनांगीकार्येति वसन्ततिलकयाह- सम्भोमसत्रयससागरपट्कनागव्योमाटशून्यपमरूपनगा- प्रचन्द्राः॥ ब्रह्माण्डसम्पुटपरिभ्रमणं समन्तादभ्यन्तरे दिन- करस्य करप्रसारः॥ ९ ॥ चेदाङ्गाष्टागीतिनसभूसप्तधृतयः प्रयुतगुणितायोजनानि पूर्वाधोक्तानि । ब्रह्माण्ड- सम्पुटपरिभ्रमणं ब्रह्माण्डगोलस्य पारधिः। कल्पभगणकक्षाहतित्वेनाकाशकक्षायाः पूर्व करमचारः इति याः पाठः ।
अध्यायः १३.] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतः । स्वरूपोक्तरिति न पोनरुक्त्यम् । अभ्यन्तरे ब्रह्मांडगोलान्तः सूर्यस्यामितः किरणानां प्रसारः सूर्यकिरणप्रचारदेशस्य परिधिस्तत्तुल्यः । एतेन ब्रह्मांडगोलान्तः परिधिन वाय इति सूचितम् ॥ ९॥ भा० टी--ब्रह्माण्डकी कक्षा १८७१२०८०८६४०००००० योजन इसके मध्यमें सूर्य की किरणोंका विस्तार है ।। ९० ॥ अयाग्रिमग्रन्थस्यासङ्गतित्वपरिहारार्थमध्यायसमाप्ति फक्कियाह- इति सूर्यसिद्धान्ते भूगोलाध्यायः ॥ १२ ॥ इति भिन्नच्छन्दता पारब्धप्रसंगः समाप्त इत्यर्थः। पूर्वरवंडे ग्रन्थैकदेशस्याधिका- रसज्ञा कृता । उत्तरखंडे ग्रन्थैकदेशस्याध्यायसंज्ञा भिन्नप्रसंगवशात्कृतेति ध्येयम् । रंगनायेन रविते सूर्यसिद्धांतटिप्पणे ॥ उत्तरार्ध समाप्तोऽयं भूगोलाध्यायसंज्ञकः ।। इति श्रीसकलगणकसाभीमबल्लालदेवज्ञात्मजरंगनायविरचिते गूढार्थमकाशके उत्तरखंडे भूगोलाध्यायः पूर्णः ॥ १२ ॥ द्वादश अध्याय समाप्त ॥ १२ ॥ त्रयोदशोऽध्यायः। अथ पुनर्मुनीन् श्रोतन्मति श्लोकाम्यामाह- अथ गुप्ते शुचा देशे लातः शुचिरलंकृतः ॥ सम्पूज्य भास्करं भत्त्या ग्रहान भान्यथ गुह्यकान ॥३॥ पारम्पयोपदेशेन ययाज्ञानं गुरोर्मुखात् ॥ आचार्यः शिष्यवाधार्य सवै प्रत्यक्षदर्शिवान् ॥२॥ अथशब्दो मङ्गलार्थः । विवीयोथशब्दः पूर्वोत्तानान्तर्यार्यकः । गुरो रहति शुचौ पवित्रे देशे स्थान आचार्यः सूर्याशपुरुषो मयासुराध्यापकः । स्नातः कृतस्नानः शुचिः शुद्धमनाः । अलइकृतो हस्तकर्णकण्ठादिभूपणभूषितः । निश्चिन्तत्वयोतकामिदं विशेषणम् । अन्यथा ग्रहादिव्यवहारादिव्याकुलतया मनस्यैर्यानुफ्पः । भास श्रीसूर्य खोपजीव्यं मक्त्याराव्यत्वेन ज्ञानरूपया सम्पूज्य नमस्कारस्तुतिपियं कृता महान् चन्द्रादिग्रहान् । सूर्यस्य पृथगुद्देशः प्राधान्यज्ञानार्थम् । मानि नामाणि राशीच गुह्यकान्यक्षादीन्द्रदेवताः सम्पूज्य । समुच्चयार्यकशोत्रानुसन्धेयः । गुरोः सर्वस्य मुखादिनारविन्दात् । पारम्पर्योपदेशेन सूयण मुनीवचुत मुनिभिः परिपुरुष प्रत्युक्तमिाते परम्परया कथनेन । वस्तुतस्तु शिष्यत्सायहोलादनार्थ ज्ञानेविगोय. त्वसवनमेतदुक्त्या कृतम् । कथमन्यथा पर्यातसमहरुपो मयानुरंभ.पारस्पनर -
.
(२२०)
सूर्यसिद्धान्त:-
[त्रयोशोऽ--
प्रति कथन उद्यतोऽकः स्वांशपुरुष प्राते कयनेऽनुद्यतः कुतः कारणाभाराच । यथा
स्वशक्त्या यादृशं ज्ञानं पूर्वोक्तमवगतं शिष्यवोधार्थ मयासुरस्याभ्रमज्ञानोत्पादनाय सबै
प्रागध्यायोक्तं प्रत्यक्षदर्शिवान् प्रत्यक्षं दर्शितवानित्यर्थः ॥ १॥ २ ॥
भान्टी०-गुप्त, पवित्रतायुक्त स्थानमें सजकर बैठा हुना प्रत्यक्षदर्शी आचार्य रवि, ग्रह
नक्षत्र मार गुह्यक लोगोंका पूजन करनक पाछ शिष्यपरम्पराकरके जो गुरुमुखसे सुनाथा
वह सब शिष्यको समझानेके लिये ॥१॥२ !!
कथं दर्शितवानिति मयासुरं प्रत्युक्तसूर्याशपुरुपवचनस्यानुवादे भूयोगपुरुषो मवासु
रं प्रति गोलबन्धोद्देशं तदुपक्रमं च श्लोकाभ्यामाह-
भृभगोलस्य रचनां कुर्यादाश्चर्यकारिणीम् ।।
अभीष्टं पृथिवीगोलं कारयित्वा तु दारवम् ॥ ३ ॥
दण्डं तन्मध्यगं मेरोरुभयत्र विनिर्गतम् ॥
आधारकक्षाद्वितयं कक्षा वैषुवती तथा ॥४॥
भगोलस्य भूगोलादभितः संस्थितस्य नक्षत्राधिष्ठितगोलस्य प्रागध्यायोक्तार्थस्य
ग्वनां स्थितिज्ञानार्थ दृष्टान्तात्मकगोलस्य निर्मितं मुधीगणको गोलशिल्पज्ञः कुर्यात् ।
ननु त्वदुक्तेन सर्व ज्ञानं भवतीति दृष्टान्तगोलनिवन्धनं व्ययमेवेत्यत आह । याश्चर्यका-
रिणीमिति । उक्तप्रतीत्युठूताटुतबुद्धिजनयित्रों तथाचोक्तेन स्वास्तिर्यग्भागयोली-
कारस्थानस्य तद्भागस्थभगोलमदेशस्य च भूमेनिराधारत्वादेश्च ज्ञानं मनसि सप्रतीतिक
न भवत्यतो दृष्टान्तगोले निश्चयसम्भवात्तन्निबन्धनमावश्यकमिति भावः। कथं रचनां
कुर्यादित्यत आह-अभीष्टमिति', 'भुको गोलमभीष्टं स्वेच्छाकल्पितपरिधि-
प्रमाणकं दारवं काठघटितं सच्छिद्रं कारयित्वा काष्ठशिल्पज्ञद्वारा कृत्वेत्यर्थः ।
मेरोरनुकल्परूपं दण्डकाष्ठं तन्मध्यगं तस्य कायटितभगोलस्य मध्ये च्छिद्रमध्ये शिथिल•
तथा स्थितम् । उभयत्र भूगोलस्थव्यासप्रमाणच्छिद्रस्यानाभ्यां वहिरित्यर्थः ।
विनिर्गतमेकानादन्यतराग्रावशिष्टदण्डप्रदेशतुल्यं निःसृतम् उभयाग्राभ्यां
तुल्यौ दण्डदिशौ यथा स्यावां तथा कुर्यादित्यर्थः । भगोलनिवन्धनार्थमाधारवृत्तर-
यमाह-आधारकक्षादितयमिति । भगोलनिबन्धनार्यमादावाश्रयाथै वृत्तयोटितय.
मूपिस्तिर्यगस्थानम्मेणैकमेकमेवे द्वयमित्यर्थः । भूगोलादुभयतस्तुल्यान्तरेण दो
पडप्रदेशयोः मोतमेकं वृत्तं कुर्यात् । तनुल्यं वृत्तमपरं तदर्धच्छेदेन दण्डमोतं कुयादिति सि-
दोऽर्थः । एतत्तदयव्यतिरेकेण भूगोलादमितो भगोलनिवन्धनानुपपत्तेः । भगोल-
निवन्धनारंभमाह-कक्षति । वैषुवती विपुवत्संवन्धिनी कक्षा वृत्तपरिधिविपुववृत्त-
मित्यर्थः । तथाधारवृत्तद्वयस्यार्धच्छेदेन भगोलमंध्यवृत्तानुकल्पेन गणकेन निव-
मित्यर्थः ॥ ३ ॥४॥
घ्यायः १३] संस्कृतदीका-मापाटीकासमेतः (२२१) मा० टी. -पाठका पना ममीट (इच्छित) पृथ्वीगोळ मागे करके माश्चर्यकारी भूगोल पना । उस गोलेके शेनों भोर निकला हुआ मेरुदण्ड, माधारकी दो कक्षा और विषुवको पक्षा बनाव ॥ ३ ॥ ४ ॥ अय मेपादिद्वादशराशीनामहोरात्रवृत्तनिवन्धनमन्यदपि शोकपंचकेनाह- भगोशाङ्गुले कार्या दलितस्तित्र एव ताः ।। स्वाहोरावार्धकर्णेश्च तत्प्रमाणानुमानतः॥५॥ क्रान्तिविक्षेपभागेश्च दलितर्दक्षिणोत्तरः ॥ स्वः स्वैरपक्रमस्तिस्रो मेपादीनामपक्रमात् ॥ ६ ॥ कशाः प्रकल्पयेत्ताश्च कादीनां विपर्ययात् ॥ तदत्तिवस्तुलादीनां मृगादीनां विलोमतः ॥७॥ याम्यगोलाश्रिताः कार्याः कशाधाराद्वयोरपि ॥ याम्योदम्गोडसंस्थानां भानामभिजितस्तथा ॥८॥ सप्तर्षीणामगस्त्यस्य ब्रह्मादीनां च कल्पयेत् ॥ मध्ये वेषुवत्ती कशा सर्वेपामेव संस्थिता ॥ ९ ॥ भागणगांगुलै द्वादशरागिभागः पट्यधिकशतत्रयपारमितांगुलैः द- लिनैः समविभागेन खण्डितैरहितैरित्यर्थः । ताः कक्षाः वंशशलाकावृत्तात्मिका- स्तिस्त्रः त्रिसहख्याकाः । एवकारात्तेदइने वृत्ते च न्यूनाधिकव्यवच्छेदः । शिल्पशेन गोलगणितज्ञेन कार्याः । एताः पूर्व वृत्राप्रमाणेन न कर्या इत्यभिप्राये- णाह-वाहोरात्रार्धकर्णगिति । स्वशब्देन मेपादित्रिकं तस्य प्रतिराश्यहोरात्रवृत्तस्यार्ध- कर्णी व्यासार्धं शुजाताभिरित्यर्थः । चकारात्कार्याः । स्वस्वाज्यामितेन व्यासोधन मेपादिप्रयाणां वृत्तवयं कुर्यादित्यर्थः। ननु स्पष्टाधिकारोक्ताहोरात्रार्धकर्णानयने युक्त्य. भावात्तवृत्तिनिर्माणं कुतः कार्यमित्यत आह-तत्प्रमाणानुमानत इति । विषुवत्कक्षाप्रमा- णानुमानादृत्तत्रयं कार्यम् । यथा विषुववृत्तं पूर्ववृत्तसमम् । तथा तदनुरोधेन मपान्त. वृत्तमल्पं तदनुरोधेन वृषान्तवृत्तमल्पं तदनुरोधेन मिथुनान्तमल्पमित्युत्तरोत्तरमल्पव्या- सार्धवृत्तम् । तत्त्वहोरात्रवृत्तमिाते गुज्याव्यासान वृत्तनिर्माण युक्तियुक्तं कान्तिज्या- वर्गोनात्रिज्यावर्गान्मूलस्वाहोरात्रवृत्तव्यासार्ध चादिति भावः । वृत्तत्रयं सिद्धं कृत्वा दृष्टा- न्तगोले निबध्नाति-कांतिविक्षेपमागैरिति । क्रान्तिवृत्तस्य विषुववृत्तप्रदेशाद्विक्षिप्तमदेशा औरंशः चकारादाधारवृत्तस्र्थदलित समविभागेन , खाण्डतिरादितः दक्षिणोत्तरैर्विषुवदत्त- क्रान्तिवृत्तप्रदेशयोदक्षिणोत्तरान्तरात्मकैरुक्तलक्षणः स्वकीयः स्वकीयैः स्वराशितम्ब- Hil IrFt.
(२२२)
सूर्यासद्धान्तः-
[ यत्रोदशोऽ--
द्वैरपक्रमैः स्पष्टाधिकारानीतफ्रान्त्यशैमपादीनां मेपादिरागित्रयान्तानां मेपान्तवृपान्त-
मिथुनान्तानामित्यर्थः। तिखस्त्रिसंख्याः प्रागनिर्मितावृतरूपाः कक्षाः । अपकमात्
अपशब्दस्योपसर्गत्वात्क्रमादित्यर्थः । प्रकल्पयेत् शिल्पज्ञगणको विषुववृत्तानुरोधेनाधा-
रवृत्तद्वय उत्तरतो निवन्धयेदित्यर्थः । कादीनामाह-ता इति । मेपादिकक्षानिवद्धाः
कर्कादीनां कर्कसिंहकन्यानामादिप्रदेशानां विपर्ययायत्यासात् । चकारः समुच्चये। तेने
प्रकल्पयोदित्यर्थः । मिथुनान्तवृत्तं कर्फीदेवपान्तवृत्तं सिंहादपान्तवृत्तं कन्यादगिति
फलितम् । तुलादीनामाहे-तदिति । तुलादीनां तुलाश्चिकधन्विनां तिस्रः । अन्या-
विसंख्याकाः कक्षास्तवदेकद्वित्रिराशिकान्त्यशैस्तुलान्तवृश्चिकान्तधनुरन्तानां याम्य-
गोलाश्रिताः । विषुववृत्तादक्षिणभाग आधारवृत्तदये निवद्धाः कार्याः । गणकेनेति
शेपः । मकरादीनामाह-मृगादीनामिति । विलोमत उत्तमातलादिसम्बद्धाः क्क्षा मक-
रादीनां भवन्ति । धनुरन्तवृत्तं मकरादेवृश्चिकान्तवृत्तं कुम्भादेस्तुलान्तवृत्तं मीनादेरिति
फलितम् । ताराणां कक्षानिवन्धनमाह-कक्षाधारादिति । भानामचिन्यादिसप्तविंशति-
नक्षत्रविम्बाना याम्योदग्गोलसंस्थानां विपुवढ्त्वादक्षिणोत्तरभागयोपयायोग्यमवस्थि-
तानां यन्नक्षत्रध्रुवकस्पष्टकान्तिरुत्तरा तन्नक्षत्राणामुत्तरभागावास्थतानां येषां स्पष्टकान्ति-
दक्षिणा तेषां दक्षिणभागावस्थितानामित्यर्थः। दयोदक्षिणोत्तरभागयोः । अपिशब्दो.
याम्योत्तरनक्षत्रक्रमेण व्यवस्थार्थकः । कक्षाधारात्कक्षाणामाधारवृत्तद्वयात्त्योरित्यर्थः ।
सप्तम्यर्थ पञ्चमी । कक्षाः स्वस्पष्टकान्तिज्योत्पत्राज्याव्यासार्धप्रमाणेन वृत्ताकाराः
प्रकल्पयेत् । शिल्पज्ञो निवन्धयेत् । अन्येपामप्याह-अभिजित इति । अभिजिनक्षत्र-
विम्बस्य सप्तविम्वानामगस्त्यनक्षत्रविम्वस्य ब्रह्मसंज्ञकतारागुक्तलुब्धकापांवत्सा-
दिनक्षत्रविम्बानां चकारोऽनुसन्धेयः । तथा कक्षा यथायोग्य प्रकल्पयोदत्यर्थः । निव-
न्धनप्रकारमुपसंहाति-मध्य इति । सर्वासामुक्तकक्षाणां मध्ये तुल्यमागेनाधारवृत्तम.
ध्यप्रदेशे । एवकारादन्ययोगव्यवच्छेदः । वैषुवती कक्षा विषुवसम्बन्धिनी वृत्तरूपा
संस्थितावस्थिता भवति । तथा शिल्पज्ञः कक्षां निवन्धयेदित्यर्थः । विपुवहृत्तात्स्वस्पष्ट
कान्त्यन्तरेण स्वाज्याव्यासाप्रमाणेनाहोरात्रवृत्तमाधारवृत्तयोनिबन्धयोदति निष्क-
प्टोऽथः ॥५॥६॥७॥८॥९॥
माटी०-स्वाहोराबार्द्धकर्णक परिमाणसे व्यासयुक्त तीन वृत्तोंको बनायर प्रत्येकौ ३६०
भाग भक्ति को । क्रातिविक्षपांश भक्ति दक्षिण उत्तररेखामें मेषादिक भपक्रम के अनुसार,
भपक्रमांशमें कहे हुए तीन वृत संयोग करे । वहीं विपरीतभाषसे कादिकी रक्षा है वैसेही
दक्षिणीदशामें तुकदिकी तीन पक्षा संयुक्त को । वही विलोमके अनुसार मकरादिको कक्षा
होगी उत्तर दक्षिण साभिजित् (अभिजित् के सहित) नक्षत्रोंको कक्षाएँ माधार कक्षाके
उपर सयुक्त है। इसी प्रकारसे सप्तर्षि, अगस्त्य, ब्रह्महदयादिकी कक्षा करे । सबके मध्य
भागमें पुवती कला स्थित रहेगी॥५॥६॥७॥ ८॥९॥
अध्यायः १३.] संस्कृतटीका-भापाटीकासमतः । (२२३) अथ गोले मेपादिराशिसन्निवेशं साधश्लोफेनाह- तदाधारयुतरूमयने विषुवव्यम् । विषुवत्स्थानतो भागः स्पष्टै गणसञ्चरात् ॥ क्षेत्राण्येवमजादीनां तिर्यग्ज्याभिः प्रकल्पयेत् ॥ १० ॥ तदाधारयुतेस्तद्विपुववृत्तमाधारमाधारवृत्त तयोयुतेः सम्पातादूर्ध्वमुपरि । थान्त- माहोरात्राधारवृत्तयोः सम्पातेऽयने दक्षिणोत्तरायणसंधिस्थाने भवतः । अबोर्ध्वपदस चारादाधारवृत्तमूधिरं ग्राह्यं न तिर्यगुन्मण्डलाकारम् । तेनैतत्फालतम् । विपुववृत्त- स्योर्वाधराधारवृत्तऊर्ध्वमधश्च मम्पातस्तत्रोद्मसम्पातान्मकराद्यहोरात्रवृत्तं चतुर्विशत्यं- शैस्तदाधारवृत्ते दाक्षणतो यत्र लग्नं तत्रोत्तरायणसान्धस्थानम् । एवमधः सम्पातात्क कांद्यहोरात्रवृत्तं चतुर्विशत्यस्तिदाधारवृत्त उत्तरतो यत्र लग्नं तत्र दक्षिणायनसन्धिस्था- नामति । अयनादिपुवस्य विपरीतस्थितत्त्वादृ_शब्दद्योतितविपरीताधाशब्दसम्बन्धा- द्विपुषयं भवति । तात्पार्थस्तु तिर्यगुन्मण्डलाकाराधारवृत्तविषुवद्धत्तसम्पाती पूर्वापरी क्रमेण मेपादितुलादिरूपी विपुवत्स्थाने भवत इति । अथ, राशिसाफल्यसान्निवेशमाह- विपुवत्स्यानत इति विषुवत्पदेशात्स्फुटै राशिसम्बन्धिमिस्त्रिंशन्मितैरंशैभंग- णसञ्चरात् राशिसाकल्यसनिवेशाचिर्यरज्याभिरक्तवृत्तानु कारातिरिक्तानुकारसूत्र- वृत्तप्रदेशः । अजादीनां, मेषादीनाम् । एवमयनविषुवकल्पनरीत्या तदन्तराले क्षेत्राणि स्थानानि मुधीगणकः प्रकल्पयेदयेत् । ययथा पूर्वदिवस्थाविपुवत्यानागोलवृत्तवा दशांशखण्डपदेशेन मेपान्ताहोरात्रवृत्ते पूर्वमागे यत्र स्थानं तत्र मेपान्तस्थानं तस्मात्तद न्तरेण वृपान्ताहोरात्रवृत्ते तदन्तरेण वृपान्तस्थानमस्मादयनसन्धिस्थानं तत्मदेशान्त. रेण मिथुनान्तस्थानमस्मात्पश्चिमभागे कान्ताहोराववृत्ते तदन्तरेण कन्तिस्थानम- स्मादपि सिंहान्ताहोरात्रवृत्ते तदन्तरेण सिंहान्तस्थानमस्मादपि तदन्तरेण पश्चिमविपु- वत्स्थानं कन्यान्तस्थानमस्मादपि पूर्वमागे तुलान्ताहोरात्रवृत्ते तदन्तरेण तुलान्तस्यान. मस्मादपि वृश्चिकान्ताहोरात्रवृत्ते तदन्तरेण वृश्चिकान्तस्थानमस्मादपि तदन्तरेणायन सन्धिस्थानं धनुरन्तस्थानमस्मात्कुम्भाद्यहोरात्रवृत्ते तदन्तरेण मकरान्तस्यानमस्मादर्षि मीनाद्यहोरात्रवृत्ते तदन्तरेण कुम्भान्तस्थानं मीनादिस्थानं च । अस्मादपि पूर्वविषुवे मानान्तस्थान मेपादिस्थानं च तदन्तरेणेति व्यकम् ॥ १० ॥ मा० टी०-विपुती मार माधारकक्षाके संयुत स्थानसे ऊपरकी ओर दो विपुत्र अंकित करे । तदुपरान्त विपुवतीसे राशिअन्तरमें मेपादि १२ क्षेत्र तिरछे मावसे निर्णय करे ॥ १०॥ ननु गोले वृत्ते द्वादशराशीनां सचादन्यथा चक्रकलानुपपत्तेरित्यत्रैकवृत्ताभावात् कथं राश्यङ्कन राशिविभागानुस्पत्तिश्च । अन्तरालभागस्याकाशात्मकत्वादित्यतो वृत्त- कथनच्छशेन पूक्तिं स्पष्टयन्सूर्यस्त वृत्ते भगणभोग करोतीत्याह- . (२२४) सूर्यासद्वान्तः-- [त्रयोदशी- अयनादयनं चैव कक्षा नियंतचापरा ॥ क्रान्तिसंज्ञा तया सूर्यः सदा पर्वति भासयन् ॥ ११ ॥ ययनस्थानमारभ्य परिवर्तनतदयनस्थानपर्यन्तम् । चकार आरम्भसमापयार्भिन्नायन स्थाननिरासार्थकः । अपग गोले आधारवृत्ततमा वृत्तरूपाकक्षा तथा राज्यदमागंण । एक्कारोऽन्यमार्गव्यवच्छेदार्थकः । तिर्यक उक्तवृत्तानुकारावलक्षणानुकाग क्रान्तिसं- ज्ञाक्रमणं क्रान्तिः । ग्रहगमनभोगज्ञानार्थ वृत्तं तत्संज्ञमुपकल्पितम् । अवनविषुबड्य- संसक्तं क्रान्तिवृत्तं द्वादशराम्याइतं गोले निबंधयदिति तात्पर्यार्थः। भासयन् भुवनानि प्रकाशयन् सन् स सूर्यः। एतेन चन्द्रादीनां निरासः। सदा निरन्तरं तया क्रान्तिसंजया कक्षया पर्येत्ति स्वशक्त्या गच्छन् मगणपरिपूर्तिभामं करोति । सूर्यगत्यनुरोधेन नियतं क्रान्तिवृत्तं कल्पितमिति भावः ॥ ११॥ मा० टी०-एक भयनसे दूसरे अयनमें गयीहुई तिरछी कक्षाको क्रांतिकक्षा कहतेह तिसके उपर सूर्य प्रकाशकरके भ्रमण करते हैं ॥ ११ ॥ ननु चन्द्रायाः कान्तिवृत्ते कुतो न गच्छन्तीत्यत आह- चन्द्राद्याश्च स्वतः पातरपमण्डलमाश्रितः॥ ततोऽप्रकृष्टा दृश्यन्ते विक्षेपान्तेष्वपक्रमात् ॥ १२॥ चन्द्रादयोऽकव्यतिरिक्ता ग्रहाः स्वकैः स्वीयैः पतिः पाताख्यदैवतैरपमण्डलं क्रान्ति- वृत्तमाश्रितैः स्वस्वभोगस्थानेधिष्ठितस्ततः क्रान्तिवृत्तान्तर्गतग्रहमोगस्थानादित्यर्थः । चकारद्विक्षेपान्तरेणापकृष्टा दक्षिण उत्तरतो वा कर्पिता भवन्ति । अतः कारणादपक- माक्रान्तिवृत्तान्तर्गतस्वभोगस्नानादित्यर्थः । दक्षिण उत्तरतो वा विक्षेपान्तेषु गणिता. गविक्षेपकलाग्रस्थानेषु भूस्यजनश्यन्ते । तथाच क्रान्तिवृतं यथा विपुवन्मण्डलेऽव- स्थितं तथा क्रान्तिहो पातस्थाने तत्पड्भान्तरस्थाने च लममुक्तं परमविक्षेपकलामि- स्तविमान्तरस्थानादूधिःक्रमेण दक्षिणोत्तरतो लग्नं च वृत्तं विक्षेपवृत्तं चंद्रादिगत्यनुरो- धेन स्वं स्वं भिन्नं कल्पितं तर गच्छंतीति भावः ॥ १२ ॥ भाटी-चन्द्रादि अपने पातसे सिंचकर और वृत्तको माश्रित करते हैं। वैसेही साकृष्टहो का अपने भपक्रम विक्षपान्तमें दिसाई देते हैं ॥ १२ ॥ अय त्रिप्रश्नाधिकारोक्तलग्नमध्यलग्नयोःस्वरूपमाह- उदयक्षितिजे लग्नमस्तं गच्छच्च तद्वशात् ॥ लंकोथैर्यथासिद्धं समध्योपरि मध्यमम् ॥ १३ ॥ उदयक्षितिजे क्षितिजवृत्तस्य पूर्वदिग्देश इत्यर्थः। लग्नं क्रान्तिवृत्तं यत्प्रदेशे प्रवहवा- युना संसक्तं तत् प्रदेशो मेपाचवधिमोगेनोदयलममुच्यत इत्यर्थः । प्रसंगादरलनरद -
ध्यायः १३.] संस्कृतटीका-भाषाटोकासमेतः ।
(२२५
रूपमाह-अस्तमिति । तदशादुदयलग्नानुरोधादस्तमस्तक्षिीतजं क्षितिजवृत्तस्य पश्चिमदि
कप्रदेशमित्यर्थः । क्रान्तिवृत्तं गच्छत् यत्प्रदेशेन प्रवहवायुना सल्लग्नं तत्पदेशो मेपाय-
वधिभोगेनास्तलग्नं समुच्यत इत्यर्थः । तथा च क्षितिजावं सदा क्रान्तिवृत्तस्य सद्भावा-
दुदयास्तलमयोः पड्राश्यन्तरं सिद्धं लहोदयैर्निरक्षदेशीयगश्युदयासुभिः । यथात्रिण.
इनाधिकारोक्तप्रकारेण तत्संख्यामितं सिद्धं निष्पन्नम् । मध्यमं मध्यलग्न तत्समध्योपरि
खस्य दृश्याकाशविभागस्य मध्यं मध्यगतदक्षिणोत्तरसूत्रवृत्तानुकारप्रदेशरूयं नतु खमर्य
मास्कराचार्याभिमतं स्वस्वस्तिकं तल्लग्नस्य कदाचित्वत्वन सदानुत्पत्तेः । तस्योपरिस्थित
क्रान्तिवृत्तं याम्योत्तरवृत्ते तत्प्रदेशेन लग्नं तत्पदेशो मेपाधवधिभोगेन मध्यलग्नमुच्यत
इति तात्पर्यायः ॥ १३ ॥
भा टो०-उदयक्षितिज वृत्तमें उसका अशडी लग है अस्तमें मस्त (सात) होता है।
ईंकोदयसे जो मध्यम सिद्ध होता है, वह अपनी मध्यरेखाके ऊपर है ॥ १३ ॥
अथ त्रिप्रश्नाधिकारोक्तान्त्यायाः स्वरूपं स्पष्टाधिकारोक्तचरज्यायाः स्वरूपं चाह-
मध्यक्षितिजयोर्मध्ये या ज्या सान्त्याभिधीयते ॥
ज्ञेया चरदलज्या च विषुवक्षितिजान्तरम् ॥ १४ ॥
या उत्तरगोले त्रिज्याचरज्यायुतिरूपा दक्षिणशोले चरज्योनत्रिज्यारूपा विप्रसा-
धिकारोक्ता । अन्त्या सा मध्यं याम्योत्तरवृत्तं क्षितिजं स्वाभिमतदेशक्षितिजवृत्तं तयो-
मंध्येऽन्तरालेऽहोरात्रवृत्तस्यैकदेशे ज्या । उदयास्तसूत्रयाम्योत्तरसूत्रसम्पातादहोरात्र-
याम्योत्तरवृत्तसम्पातावधेि सूत्ररूपा ज्या सूत्रानुकारा न तुज्या । अहोरात्रक्षितिजवृत्तस-
मातव्यबद्धोदयास्तसूत्रस्याहोरात्रवृत्तव्याससूत्रत्वाभावात् । अतएवोत्तरगोलंऽन्त्याः
त्रिज्याधिका संगच्छते आभिधीयते गोलज्ञैः कथ्यते । नन्वन्त्योपजीव्यचरज्यैव किंव-
रूपा यया तत्सिद्धिरित्यत आह-ज्ञेयोते । 'उन्मण्डलं च विषुवन्मण्डलं परिकायते'
इति विप्रश्नाधिकारोक्तेन दयोः शब्दयोरकार्यवाचकत्वात्तिर्यगाधारवृत्तानुकार स्थिर
निरक्षक्षितिजं वृत्तमुन्मण्डलं क्षितिजं स्वामिमतदेशक्षितिजवृत्तमनयोरन्तरम् । चकाये
विशेषार्थकस्तुकारपरस्तेन तदन्तरालस्थिताहोरात्रवृत्तकदेशस्यार्धज्यारूपमृजुसूत्रमन्त-
रविशेषात्मकम् । तथा च स्वनिरक्षदेशस्वदेशयोरुदयास्तसूत्रयोरन्तरमूधिरनिधि
फलितार्यः । चरदलच्या तदन्तरालस्थिताहोरात्रवृत्तैकदेशरूपचराख्यखण्डकस्य । न्द्र
दलमर्धम् । ज्या चरज्येत्यर्थः । गोलातव्या ॥ १४ ॥
मा० टी०-मध्य और क्षितिजके मध्यमें जो ज्या है वही मरय है।
किरक्षित
जक मन्तरको परदल ज्या करते हैं। १४ ॥
ननु पूर्वश्लोक्दयोक्तं क्षितिजस्याज्ञानाहुबोधमित्यतः शोकात शिवसरूपमाह-
कृत्वोपरि स्वकं स्थान मध्ये शितिनमण्डलम् ॥ १६॥
(२२६) सूर्यासद्धान्त:- [ प्रयोदशोऽ- भूगोले स्वकं स्वीयं स्थान भूप्रदेशकदेशरूपमुपार सर्वप्रदेशेभ्य ऊर्च कृत्या प्रक- ल्प्य मध्ये तादृशभूगोल अयोधःखण्डसन्धौ यदृत्तं तत्क्षितिजवृत्तं तदनुरोधेन दृष्टान्तगोले शिाते जवृत्तं स्थिर संयुक्त कार्यामात भावः ॥ १५ ॥ माटो०-माने ग्यानको सबसे उपर करके मध्यमें क्षितिजमण्डल स्थिर करे ॥ १५ ॥ अथैनं दृष्टान्तगोलं सिद्धं कृत्वास्य, स्वत एव पश्चिमभ्रमो यया भवति तथा प्रका- रमाह- वस्त्रच्छन्नं वाहिश्चापि लोकालोकेन वेटितम् ।। अमृतस्त्राययोगेन कालभ्रमणसाधनम् ॥ १६ ॥ वहिः । गोलोपरीत्यर्थः । गोलाकारेण वस्त्रेण च्छन्न छादित दृष्टान्तगोलम्। चका- राइस्रोपरि तत्तदृत्तानामङ्क कार्यम् । लोकालोकेन येष्टितं दृश्यादृश्यसन्धिस्थवृत्तेन क्षितिजाव्येन संसक्तम् । आपः समुच्चये । एतन क्षितिज वस्त्रच्छन्नं न कार्य किंतु चखोपरि क्षितिज गोलसंसक्तं केनापि प्रकारेण स्थिरं यथा भवति तथा कार्यामति तात्पर्यम् । अमृतस्रावयोगेनैतादृशं गोलं कृत्वा जलप्रवाहाधोपातेन कालभ्रमणसाधने पष्टिनाक्षत्रघटीभिदृष्टान्तगोलस्य भ्रमण यया भवति तथा साधनं कारणं कार्य स्वयं- बगोलयन्त्रं कार्यमित्यर्थः । एतदुक्तं भवति । दृष्टान्तगोलं वस्त्रच्छन्नं कृत्वा तदा- धारध्यने दक्षिणोत्तरभित्तिक्षिप्तनलिकयोः क्षेप्ये । यथा यष्टयग्रं ध्रुवाभिमुखं स्यात् ! वता यष्टयार्जुमार्गगतजलप्राहेण पूर्वाभिमुखेन नस्याधः पश्चादागे घात।ऽपि यथा स्था. तथा स्यादर्शनार्थमेव वस्खच्छन्नमुक्तम् । अन्यथा गोलवृत्तान्तरवकाशमार्गेण जलाधातद- निश्रमेण चमत्कारानुत्पत्तेः । आकाशाकारतासम्पादनार्थमपि वस्त्रच्छन्नमुक्तम् । इदं रखमा यथा भवति तथा चिकणवस्तुना मदनादिना लिप्तं कार्यम् । क्षितिजवृत्ताकारे- णाधोगोलो दृश्यो यथा स्यात्तथा पारखारूपा भित्तिः कार्या,। परन्तु दक्षिणाष्टि- भागस्तत्र शियिलो यथा भवति । अन्यथा भ्रमणानुपपत्तेः । पूर्वदिरस्थपरिवावि- -मागाद्वाहर्जलप्रवाहोऽदृश्यः कार्य इत्यादिस्वयुद्धचव ज्ञेयमिति ॥ १६ ॥ भाटा-क्षितिनके वाहिर पत्रस टक्कर वारसंघातप्त पारभ्रमण साधन को ॥ १६ ॥ अथ यदि जलप्रवाहस्तत्र न सम्भवति तदा कथं स्वयंवहो दृष्टान्तगोलो भवतीत्य- तस्तत्स्वयं रहार्यमुक्तं च गोप्यं कार्यमित्याह- तुङ्गवजिसमायुक्तं गोठयन्त्र प्रसाधयेत् ॥ गोप्यमेतत्प्रकाशोक्तं सर्वगम्यं भवेदिह ॥ १७ ॥ दृष्टान्तगोलकर यन्त्रं तुंगवीजप्समायुक्तं तुङ्गो महादेवस्तस्य वीज वीर्यम् पारद इत्यर्थः । तेन योजितं सत्प्रसाधयेत् । गणका शिल्पज्ञः । प्रकण यथा नाक्षत्रयष्टि यसमिोलभ्रमस्नथा पारदप्रयोगेण सिद्धं कुर्यादित्यर्थः । एतदुक्तं भवति । निबद्ध व्यायः १३.] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतः । (२२७) -गोलबहिर्भूतयष्टिमान्नयोर्यथेच्छा स्थानद्वये स्थानत्रये वा नेमि परिधिरूपामुत्कीर्य तां तालपत्रादिना विकणवस्तुलेपनाच्छाद्य तत्र छिदं कृत्वा तन्मार्गण पारदोऽर्ध- परिधौ पूणी देयः इतराद्रपरिधी जलं व देयं ततो मुद्रिताच्छद्रं कृत्वा यथ्यग्रे मिीत्त- स्थनलिकयोः क्षेप्ये यथा गोलोऽन्तरिक्षो भवति । ततः पारदजलाकर्पितयष्टिः स्वयं भ्रमीत । तदाश्रितो गोलश्च । एतत्पक्षे वस्त्रच्छन्नमाकाशाकारतासम्पादनार्थमेव चेत् क्रियत इति । नन्वियं स्वयंवहक्रिया व्यक्ता नोक्तेन्यत आह-गोप्यमिाते । एतत्स्वयंवह- करणं गोप्यमप्रकाश्यम् कुत इत्यत आह-प्रकाशोक्तामति । तिव्यक्ततयोक्तं स्वयंवह- करणमिह भूलोके सर्वगम्यं सर्वजनगम्यं भवेत् । तथाच सर्वज्ञेये वस्तुनि चमत्कारानुत्प- त्तेश्चमत्कृत्यंथ सर्वत्र न प्रकाश्यमित्याशयेन तत्करणं व्यक्तं नोक्तमिति भावः ॥१७॥ भा० टी०-परेके साथ गेलयंत्रको सिद्ध करे; यह अतिगोपनीय प्रकाश करके कहनेसे जाना जायगा ॥ १७॥ ननु त्वया गोप्यत्वेनोक्तं मया कथमवगन्तव्य मारशेरन्यैश्च कथमवगन्तव्यमित्यतः सार्यश्लोकेनाह- तस्माद्गुरूपदेशेन रचयेद्गोलमुत्तमम् ॥ युगेयुगे समुच्छिना रचनेयं विवस्वतः ।। प्रसादात्कस्यचिद्भूयः प्रादुर्भवति कामतः ॥ १८॥ तस्मात्स्वयंवहकरणस्य गोप्यत्वाद्गुरूपदेशेन परम्परापाप्तगुरोर्निजिकथनेन गोलं दृष्टान्तगोलमुत्तमं स्वयंवहात्मकं गणकः कुर्यात् । तथाच मया तुभ्यमुक्ता ग्रन्थे गोप्य- त्वेनातिव्यक्ता नोक्तेति भावः । अन्यैः कथं ज्ञेयमिदमित्यत आह-युग इत्यादि । विव- स्वतः सूर्यमंडलाधिष्ठातु वविशेपस्येयं पर्यवहरूपा रचना क्रिया युगेयुगे बहुकाल इत्यर्थः । समुच्छिन्ना लोके लुमा कस्यचिन्मादृशस्य प्रसादादनुग्रहाद्भूयः वारंवारमि- च्या प्रादुर्भवति व्यक्ता भवतीत्यर्थः । तथाच यथा मत्तस्त्वयावगतं तथान्यस्मान्मा- दृशादन्यैरवगन्तव्यम् कालस्य निरवधित्वामृष्टेरनादित्वाचोते भावः ॥ १८ ॥ भा० टी०-तिसके लिये गुरुके उपदेशते उतम गोलको दना । यह युग २ में उच्छिन्न होता है, परन्तु सूर्य के प्रसादसे किसीके लियेदी फिर प्रगट होता है ॥ १८ ॥ अयोक्तस्वयंवहक्रियारीत्या स्वयंवहगोलातिरिक्तान्यस्वयंवत्यंत्राणि कालज्ञानार्थ साध्यानि तत्साधनं रहास कार्यमिति चाह- कालसंसाधनार्थाय तथा यन्माणि सापयेत् ।। एकाकी योजयेद्रीज यन्त्रे विस्मयकारिणि ॥ १९ ।। तथा यथा स्वयंवहगोल्यन्त्रं साधितं तददित्यर्थः। कालसंसाधनार्थाय कालस्य दिन-- गतादेः सूक्ष्मज्ञाननिमित्तं यन्त्राणि स्वयंवदगोलातिरिक्तानि स्वयंवहतंत्राणि साधयेत् ।
(२२८) सूर्यसिद्धान्त:- [त्रयोदशोऽ-- गणकः शिल्पादिस्वकौशल्यन कारयेत् । यन्त्र कालसाधक विस्मयकारिण स्वयंवह- रूपतया लोकानामुत्पन्नाश्चर्यस्य कारणभूने वीजं स्वयंवहतासम्पादकं कारणमेकाकी एकव्यक्तिकोऽद्वितीयः सन्योजयेत् । शिल्पजतया स्वयमेव निष्पाइयेदित्यर्थः । अन्यया द्वितीयस्य तज्ज्ञानेन तन्मुखात्तयन्त्रहाईस्य लोकश्रवणगोचरतायां कदाचित्सम्भावि- तायां विस्मयानुत्पत्तेः ॥ १९ ॥ भान्टी०-कालसाधनके लिये यंत्रोंको बनाव; विस्मयकारी वीज भवेट'ही यंत्रमें मिला १९ अथैयां स्वयंवहयन्त्राणां दुर्घटत्वाच्छंचादियन्त्रैः कालज्ञानं ज्ञेयमित्याह- शंकुयाष्टिधनुश्चकेश्छायायन्त्रस्नेकपा ।। गुरूपदेशाद्विज्ञेयं कालज्ञानमतंद्रितः ॥ २० ॥ शङ्कयष्टिधनुश्चकः प्रसिद्धग्छायायन्यैश्छायासाधकयन्त्रैरनेकधा नानाविधग- णितमकोर्गुरूपदेशात्स्वाध्यापकस्य नियाजक्थनादतन्द्रितैरभ्रमः पुरुषः कालज्ञानं दिनगतादिज्ञानं विज्ञेयं सूक्ष्मत्वेनावगम्यम् । एतत्सर्वं सिद्धान्तशिरोमणी भास्कराचार्यः स्पष्टीकृतम् । तत्र शङ्कुस्वरूपम्-"समतलमस्तकपरिधिर्धमसिद्धो दन्तिदन्तजः शङ्खः । तच्छायातः प्रोक्तं ज्ञानं दिनेशकालानाम् ॥” इति । यष्टियन्त्रं च-"विज्याविष्का म्मार्थ वृत्तं कृत्वा दिगङ्कितं नत्र । दत्त्वागां प्राक्पश्चाद्यज्यावृत्तं च तन्मध्ये । तत्परि- धौ षष्टयत यष्टिर्नष्टद्युतिस्ततः केन्द्रे । त्रिज्यांगुला निधेया यष्ट्यप्रायान्तरं यावत् ।। यावत्या मौळ यद्वितीयवृत्ते धनुर्भवेत्तत्र । दिनगतशेपा नाड्या प्राक्पश्चात्स्युः क्रमे. णैवम् ॥” इति । चकयन्त्रन्तु-"चक्रं चत्रांशाई परिधौ श्लथवलादेकाधारम् । धात्रीत्रिम आधारात्कल्प्याभार्धेऽत्र खाध च ॥ तन्मध्ये सूक्ष्माक्षं शित्वाकाभिमुख. नेमिकं धायम् । भूमेरुन्नतभागास्तत्राक्षच्छायया भुक्ताः॥ तत्वाधीन्तश्चरता उन्नत- लवसंगुणं यदलम् । युदलोन्नतांशभक्तं नाइयः स्थूलाः परैः मोक्ताः ॥ " इति । धनु- र्यन्त्रं तु-दलीकृतं चक्रमुशन्ति चापम्' इति । अथ ग्रन्थविस्तरभयादेतेषां निरूपण- स्तिरो गणिवादिविचारचोपेक्षित इति मन्तव्यम् ॥ २० ॥ भाटो०-विना भ्रम'ला पुरुप गुस्के पदेशसे शंई, यष्टि, धन, चक्र, अनेक प्रकारक छायायेत्र पालको जाने ।। २० ॥ मथ घदीयंत्रादिभिश्चमत्कारियन्त्रैर्वा सर्वोपजीव्यं कालं सूक्ष्मं साधयदिति कालसा-. धनमुपसंहराति- तोययंत्रकपालाद्येमयूरनवानरः ॥ ससूत्ररेणुगर्भश्च सम्यकालं प्रसाधयेत् ॥२१॥ जलयन्नं च तत्कपाल च कपालाख्यं जलयंत्रं वक्ष्यमाणं तदाद्यं प्रथम ये तन्त्रलायन्त्रप्रभृतिभिः सापेभवटीयन्वैर्मयूनग्यानरैः 1 म्यूगस्य स्वयंवयन्त्र .
. ध्यायः १३.] संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतः । (२२९ निरपेक्ष नरयन्त्र शंकाख्यं छायायन्नं पूर्वादिष्टवानरयंत्र स्वयंवहं निरपेक्षमेतः समरे- रणुगर्भः सूत्रसहिता रेणवो वृलयो गर्भ मध्ये येषां तैः सूत्रप्रोता पष्टिसंख्याका मृदु- घटिकामयूरोदरस्थानमुखाइटिकान्तरेण स्वतएव निःसरन्तीति लोकमासेद्धया ताह- शैर्यन्त्ररित्यर्थः । यहा सूत्राकारेण रेणवः सिकतांशा गर्ने उदरे यस्यैतादृशं यन्त्र वालुकायन्त्र प्रसिद्धम् । तेन सहितैर्मयादियन्त्रैर्वालुकायन्त्रण चेति सिद्धार्थः । चकारस्तोययन्त्रकपालाद्यैरित्यनेकसमुच्चयार्थकः । कालं दिनगतादिरूपं सम्यक् सूक्ष्मं प्रसाधयेत् । प्रकपणे सूक्ष्मत्वेनातिसूक्ष्मत्वेनेत्यर्थः । जानीयादित्यथः ।। २१ ।। मा० टी०-कपाळादि जपत्र, मयूर, नर, वानराकार सूत्रयुन आदि रेण गर्भसे मीभांति करके साधन कर ॥२१॥ ननु मयूरादिस्वयंाहयन्त्राणि कथं साध्यानीत्यतस्तत्साधनप्रकारा वहवो दुर्गमाश्च सन्तीत्याह- पारदाराम्बुसूत्राणि शुल्बतैलजलानि च ॥ बीजानि पांसवस्तेषु प्रयोगास्तेपि दुर्लभाः ॥ २२ ॥ तेषु मयुगदियन्त्रंषु स्वयंवहार्यते प्रयोगाः प्राण योज्याः । प्रकर्षस्तु यावदमि- मतसिद्धेः । एते क इत्यत आह-पाग्दासम्वुसत्राणीति । पारदयुक्ता आराः । यथा च सिद्धान्तशिरोमणी "लघुकाष्ठनसमचके समपिराराः समान्तरा नेम्याम् । किंचिद्धका योज्या सुपिरस्यार्धे पृथक्तासाम् ॥ रसपूर्ण तच्चक्र व्याधाराक्षस्थितं स्वयं भ्रमात ॥ इति । अम्बु जलस्य प्रयोगः । सूत्राणि सूत्रसाधनप्रयोगः । शुल्वं शिल्पनेपुण्यम् । तेलजलानि तैलयुक्तजलस्य प्रयोगः । चकारात् तयोः पृथक्प्रयोगोऽपि । यथा च मिद्धान्तशिरोमणी "उत्कीर्य नेमिमथवा परितो' मदने- न संलग्नम् । तदुपरि ताललाद्यं कृत्वा सुपिरे रसं क्षिपेत्तावत् ॥ यावद्सकपा- क्षिप्त- जलं नान्यतो याति । पिहितच्छिद्रं तदतश्चक्र भ्रमति स्वयं जलाकृष्टम् ॥ ताम्रादि- मयस्यांकुगरूपनलस्याम्पुरणस्य । एकं कुण्डजलान्तद्वितीयमयं त्वयोमुखं च वहिः ।। युगपन्मुक्तं चेत्कं नलेन कुण्डाहिः पतति । नेम्यां वहा घाटकाश्चकं जलयन्त्रहत्तथा | धार्यम् ॥ नलकमच्युतसलिलं पतति चया तयटीमध्ये । भ्रमति ततस्तत्सततं पूर्ण- घटीभिः समाकृष्टम् ॥ चकच्युतं स्वमुदकं कुण्डे याति प्रणालिकया ।। बीजानि केवलं तुङ्गवीजप्रयोगः । पासवो धूल्दिप्रयोगास्तैर्युक्ताः प्रयोगाः । अपिशब्दात्मयोगेषु सुगमतरा इत्यर्थः। दुर्लमाः साधारणत्वेन मनुष्यैः कर्तुमा- क्या इत्यथः । अन्यथा प्रतिगृह स्वयंवदानां प्राचुर्यापत्तेः । इयं स्वयंवहविधासमुद्रा- न्तर्निवासिजनैः फिरंग्याख्यैः सम्यगम्यस्तोते कुहकविद्यावादत्र विस्तारानुयोग इति संक्षेपः ॥ २२॥ " (२३०) सूर्यसिद्वान्तः- [प्रयोदशो- भी०टी०-और सब पारेसे युक्त, जल, सूब, शिल्पकी निपुणता, तेलयुक्त जल, पारा, बालू सब यंत्रोंका प्रयोग करना अत्यन्त दुरीम है ॥ २२ ॥ अथ कपालाख्यं जलयन्त्रमाह- ताम्रपात्रमछिद्रे न्यस्तं कुण्डेऽमलाम्भसि ॥ पधिमजत्यहोरात्रे स्फुटं यन्त्र कपालकम् ।। २३ ।। यत्ताम्रघटितं पात्रमश्छिद्रमधोमागे छिद्रं यस्य तत् । अमलाम्भसि निर्मल जलं विद्यते यस्मिंस्तादृशे कुण्डे बृहदाण्डे न्यन्तं धारितं सदहोरात्रे नाभत्राहोरात्रे पष्टिः पष्टि- वारमेव न न्यूनाधिकं मजति । अछिद्रमाण जलागमनेन जलपूर्णतया निमग्न भपति । तत्कपालक कपालमेव कपालकं घटखण्डानां कपालपदवाच्यत्वादटाधस्तना- र्धाकार यन्त्रं घटीयन्त्र स्फुटं सूक्ष्म तदरनं नु“शुल्वस्य दिग्भिावहितं पलैर्यत्पडंगुलो च द्विगुणायतास्यम् । तदम्भसा पष्टिपलैः प्रपूर्व पात्रं घटाधप्रतिमं वटी स्यात् ॥ सव्यंशमापत्रयनिमिताया हेम्नः शलाका चतुरमुला स्यात् । विद्धं तया प्राक्तनमत्र पात्रं प्रपूर्यते नाडिकयाम्बुभिस्तत् ॥” इति व्यक्तम् । भगवता तु सूक्ष्ममुक्तम् ॥ २३ ॥ भान्टी-निर्मल जलभरे हुए उम्भमें (नाद) नीचे जिसमें छेद है ऐसा तविका पात्र रवरे, (वटोरा) यह कपालक यव दिनरातमें साठवार जलमें डूबेगा ॥ २३ ॥ अथ शङ्कयन्त्र दिवैव कालज्ञानार्थ नान्यदेत्याह- नस्यन्त्र तथा साधु दिवा च विमले खौ ॥ छायासंसाधनैः प्रोक्तं कालसाधनमुत्तमम् ॥ २४ ॥ विमले मेघादिव्यवधानरूपमलेन रहिते सूर्य एतद्रूपे दिने । चकार एवकारार्थस्ते. न साभ्रदिनव्यवच्छेदः । नरयन्त्रं द्वादशांगुलशङयन्त्र तथा घटीयन्त्रवत्कालसाधकं साधु सुक्ष्म रात्रौ नेत्यर्थसिद्धम् । ननु शदोश्छायासाधकत्वं न कालसाधकत्वं तेन तस्य कथं यन्त्रत्वं कालसाधकवस्तुनो यन्त्रत्वप्रतिपादनादित्यत आह-छायासंसाधन- रिति । इदं शङ्कुरूपनरयन्त्र छयायाः सम्यक्सूक्ष्मत्वेन साधनैरवगमैः कृत्वा काल- साधनं दिनगतादिकालस्य कारणमुत्तमम् । अन्ययन्त्रेभ्योऽस्मान्निरन्तरतयातिश्रेष्ठम् । नया घच्छायासाधकत्वेनैव च्छायाद्वाराशको कालसाधकत्वामति न यन्मत्वव्याघातः । अतएव साभ्रदिने रात्री चानुपयुक्तः । नरस्य च्छायायन्त्रोपलक्षणत्वात् यष्टिधनुश्चका- ण्यपि तथोत ध्येयम् ॥ २४ ॥ माष्टी:-दिनके समय जब निर्मळ सूर्य हो तर छायासंशोधनके लिये अत्युत्तम नरमंत्र (१२ भंगुल ) समयको साधनके लिये कहाई ॥२४॥ अथादित पतदन्तग्रन्यज्ञानस्यकालकथनेन विभक्तमाप खण्डद्वयं कोडयति-
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ध्यायः १३.] संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः
ग्रहनक्षत्रचरितं ज्ञात्वा गोलं च तत्वतः ॥
ग्रहलोकमवाप्नोति पर्यायेणात्मवान्नरः॥ २५॥
ग्रहनक्षत्राणां चरितं गणितविषयकं ज्ञानं ग्रन्थपूर्वखण्डरूपं गोलं भूगोलभगोलस्व.
रूपमतिपादकग्रन्थं ग्रन्थोत्तरार्धान्तर्गतम् । चकार: ममुञ्चये । तत्त्वतः वस्तु.
स्थितिसद्भावेन सार्वविभक्तिकस्तसिरित्येके । ज्ञात्वावगम्य नमः पुरुषः । ग्रहलोक
चन्द्रादिग्रहाणां लोकं तल्लोकाधिष्ठितस्थान ग्रहोपलक्षणानक्षत्राधिष्ठितस्थानमपीति
ध्ययम् । प्राप्नोति । ननु ग्रहलोकप्राप्त्या का पुरुषार्थ इत्यतो मोक्षरूपं पुरुपार्थफल-
माह । पर्यायेणेति । जन्मान्तरेण पुरुष आत्मवानात्मज्ञानी भवति । तथा चात्मज्ञाना-
न्मोक्षप्राप्तिरेवति भावः ॥ २५ ॥
भा० टी०-ग्रहनक्षत्रचरित और गोल इनको मलामातिसे जानवर मनुष्य ग्रहलोको
प्राप्त होकर अतमें आत्मवान् होता है ।। २५ ॥
अथानिमग्रन्थस्यासङ्गतिपरिहारायारब्धाध्यायसमाप्ति फकिमयाह-
• इति ज्योतिपोपनिपदध्यायः ॥ १३ ॥
इति यथा वेदे आत्मस्वरूपनिरूपणान्नारायणोपनिषदुच्यते तथा ज्योतिःशास्त्र
प्रदिपादितानां ग्रहनक्षत्राणामेतद्वन्धकदेशे स्वरूपादिनिरूपणाज्योतिशास्त्रसारं ज्योति
पो पनिपदुच्यते । तत्संज्ञोऽध्यायो ग्रन्थैकदेगः सम्पूर्ण इत्यर्थः ।
रनाथेन रचिते सूर्यसिद्धान्तटिप्पणे ।
ज्योतिपोपनिषत्सञोध्यायः पूर्णोपरार्धके ।
इति श्रीसकलगण कसार्वभौमवल्लालदेवज्ञात्मजरंगनाथगणकविरचिते गृढार्थप्रकाशके
उत्तरखण्डे ज्योतिपोपनिपदध्यायः पूर्णः ॥ १३ ॥
तेरहवां वध्याय समाप्त।
चतुर्दशोऽध्यायः।
अथ मानानि कति किञ्च तैरित्यवशिष्टप्रश्नस्योत्तरभृत आरब्धमानाध्यायोब्यास्या-
यते । तत्र प्रथमं मानानि कतीति प्रथममनस्योचरमाह-
ब्राझं दिव्यं तथा पित्र्यं प्राजापत्यं गुरोस्तथा ।
सोरं च सावनं चान्द्रमा: मानानि वै नव ॥१॥
(२३२)
सूर्यसिद्धान्तः-
[ चतुर्दशोऽ-
'तत्पष्टिः समृणादिव्य वर्षम् ' इत्यन्तं तत्रैव प्रतिपादितम् । तथा तृतीयमानं पित्र्य
पितणां मानं वक्ष्यमाणम् । प्राजापत्य मानं वक्ष्यमाणं चतुर्थम् । वृहस्पतेस्तयामानं
पञ्चमं समुदीरितम् । सौरं चकारात्पष्ठं मानम् । सावनं सप्तमं मानम् । चन्द्रमानमष्ट-
मम् । नाक्षत्र मानं नवमम् । एतान्यपि तत्रैवोक्तानि ॥१॥
भान्टी-ब्राह्म, देव, पिय, प्राजापत्य, वाईपरसौर, साउन, चान्द्र और नासत्र यह
नोमान है ॥ १॥
अथ किंचित्तरिति द्वितीयमनस्योत्तरं विवक्षुः प्रथम व्यवहारोपयुक्तमानानि
दर्शयति-
चतुर्भिर्व्यवहारोऽव सौरचान्द्रसंसावनः॥
बार्हस्पत्येन पश्यन्दं ज्ञेयं नान्यस्तु नित्यशः ॥२॥
अत्र मनुष्यलोके सौरचान्दनाक्षत्रसावनैश्चतुभिर्मान व्यवहार कर्मघटना । पष्टयन्द
अमवापिष्टिवप जात्यभिप्रायेणैकवचनम् । वार्हस्पत्येन बृहस्पतिमानेन वृहस्पति-
मध्यमराशिमोगात्मककालेन प्रत्येकं ज्ञेयम् । अन्येखशिष्टैाह्मदिव्यापित्र्यप्राजापत्यैः।
नित्यशः सदेत्ययः । व्याहारो नास्ति । तुकागत्कदाचिकत्वेन तैर्व्यवहारः ॥२॥
भान्ट-निमें चारा व्यवहार हुआ है। सोर, चान्द्र, नाक्षत्रिक और सावन, पश्यद
जानने लिए वार्हस्पत्यमान। जानना चहिये । शेप मानोंका नित्य प्रयोजन नहीं
होता ॥ २॥
अथ सौग्ण व्यवहार प्रदर्शयति-
सोरेण धुनिशोर्मानं पडशीतिमुखानि च ॥
अयनं विषुवञ्चैव संक्रान्तेः पुण्यकालता ॥३॥
अहोरात्रयोर्मानं सौरेण ज्ञेयम् । प्रात्यहिकसूर्यगानेभोगादहोगत्रं भवतीत्यर्थः । पड-
शीतिमुखाति वक्ष्यमाणानि । चः समुच्चय । तेन सौरमानेन ज्ञेयानि । अयन विषुवत् ।
चः समुच्ये । संक्रान्तः पुण्यकालता सूर्यविम्बकलासम्बद्धा सौरमानेन ॥ ३॥
मा० टी०-दिनरात्रिका परिमाण पडमेति मादि मथन, विपुषद संक्रान्ति मादि पुण्य-
कार, यह सब सोरमान निर्यात हति ॥ ३॥
पथ पडगोतिमुखमाह-
तुलादिपडशीत्यहां पडशीतिमुखं क्रमात् ।।
तञ्चतुष्टयमेव स्याद्विस्वभावेषु राशिषु ॥४॥
ध्यायः १४.] संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः। (२३३) तुलारम्भात्पडशीतिदिवसानां सौराणां पडशीतिमुखं भवति । तचतुष्टयं पडशीति मुखस्य चतुःसंख्यादिस्वभावेषु राशिषु चतुर्पु क्रमादेवं वक्ष्यमाणा भवति ॥ ४ ॥ मा० टी०-तुला मारम्भसे परस्पर सौर ८६ दिनमें पडशीति होता है । यह चार विध- भाव राशिमें स्थित हैं॥४॥ तदेवाह- षडिशे धनुयो भागे द्वाविंशे निमिपस्य च ॥ मिथुनाष्टादशे भागे कन्यायास्तु चतुर्दश ॥५॥ धनराशेः पड्विंशतितमेशे षडशीतिमुखं मीनराशेविंशतितमेऽशे पडशीतिमुखम् । चकारः समुच्चयार्थकः प्रत्येकमन्वेति । मिथुनराशेरष्टादशेऽशे पडशीनिमुखं कन्याया- श्रतुर्दशे भागे पडशीतिमुखम् । अतएव तुलादितः पडशोत्यंशो गणनया येषु -राशिपु भवीत ते गशयो द्विस्वभावाः पडशीतिमुखतज्ञा संक्रांतिप्रकरणे साहिति- कैरुक्ताः॥५॥ भा० टी०-प्रथम पडशीतिमुख धनुके २६ अशमै । दूसरा मीनके २२ अशमें, तीमरा मिथुनके १८ अंशमैं; चौथा कन्याके १४ अशम है ॥५॥ अथ पडशीत्यशगणनया चत्वारिषडशीतिमुखान्युक्त्वा भगणांशपूर्त्यर्थमवशि. धांशा पोडशातिपुण्या इत्याह- ततः शेपाणि कन्याया यान्यहानि तु पोडश ।। ऋतुभिस्तानि तुल्यानि पितृणां दत्तमक्षयम् ॥६॥ ततः कन्यादिचतुर्दशभागानन्तरं शेषाणि भगणमागेऽवशिष्टानि कन्याया यान्यहा- नि सौरभागसमानि पोडश तानि । तुकारात्पूर्वदिनासमानि क्रतुभिर्यज्ञैः समानि । अति पुण्यानीत्यर्थः । तत्र पितृणां दत्तं श्रादादिकृतमक्षयमनन्तफलदं भवति ॥६॥ मा० टी०-कन्याके पिछले १६ अश यज्ञकार्यके लिये पुण्यदायी हैं । इस समयमें पितृ. लोगों के लिये कियाहुमा दान मक्षय होता है । ६ ॥ अथ राश्यधिष्टितकान्तिवृत्ते चत्वारिस्थानानि पदसान्धस्थाने विपुरायनाभ्यां प्रसिद्धानीत्याह- भचक्रनाभौ विपुवविनयं समसूत्रगम् ।। अयनद्वितयं चैन चततः प्रथितास्तु ताः॥ ७॥ मचानाभी भगोलस्य ध्रुवदयाभ्यां तुल्यान्तरेण मध्यभागे विषुवद्वितीयं विपुवइयं समस्त्रगं परस्परं व्याससत्रान्तरितं ध्रुवमध्ये विषुवदत्तस्थानात्तद्वत्ते क्रान्तिवृत्तमागी यौ लगी तो क्रमेण पूर्वापरौ विपुवत्संज्ञौ मेपतुलाख्यो क्त्यर्थः । अयनदितयमयनद्वयं
(२३४)
चितुर्दशोऽ--
सूर्यसिद्धान्तः-
कळमकरादिरूपम् । चः समुच्चये। तेन समस्त्रगंता विपुवायनाख्याः क्रान्तिवृत्त
प्रदेशरूपा भृमयश्चतस्रश्चतुःसंख्याकाः प्रथिता गणितादी पदादित्वेन प्रसिद्धाः । एव.
कारादन्यराशीनां निरासः । तुकारात्तासां समसूत्रस्थत्वेऽपि विपुवायनत्वाभावात्पदादि-
त्वेनाप्रसिद्धिरित्यर्थः ॥७॥
भाटी नक्षत्रचक्रमे दो विपुत् पिन्दु समसूत्रग है और दो मभयनभी तैही हैं। यह
चारविन्दु सदा कहे जाते हैं ॥ ७ ॥
अथावशिष्टनामादिस्वरूपमन्यदप्याह-
तदन्तरेषु संक्रान्तिद्वितयं द्वितयं पुनः ।।
नैरन्तर्यात्तु संक्रान्तेयं विष्णुपदीद्वयम् ॥ ८॥
तदन्तरेषु विपुवायनान्तरालेषु । अन्तरालानां चतुःस्थाने सद्भावाद्वहुवचनम् ।।
संझान्तिद्वितयं पुनाराश्यादिभागे ग्रहाणामाक्रमण वारद्वयं भवति तदन्तराले राश्पादि-
भागौ द्वौ भवत इत्यर्थः । यथाहि भेपास्यविपुवकांस्यायनयोरन्तराले वृपमिथुनयो-
गदी । कर्कतुलयोरन्तराले सिंहकन्ययोरादी । तुलामकरयोरन्तराले वृश्चिकधनुपो-
रादी। मकरमेपयोरन्तराले कुंभमीनयोरादी इति एवं विषुवानन्तरं संक्रमणद्वयमन्तरमयनं
तदनन्तरं संक्रान्तिद्वयं तदनन्तरं विषुवमनन्तरं संक्रांतिद्वयमनन्तरमयनमित्यादिपौन:-
पुन्येन ज्ञेयमित्यर्थः । संक्रांतिद्वयमध्ये प्रथमसंक्रान्ती विशेष माह-नरन्तर्यादिति ।
निरन्तरतया सम्भूतायाः संक्रान्तः सकाशाद्विष्णुपदीद्वयं तदन्तराल इति त्वर्थः ।
अवगम्यं प्रथमसंक्रान्तिर्विष्णुपदतज्ञा तयोदयं तदभ्यन्तरे प्रत्येकं भवताति तात्प.
यर्थः । पडशीतिसझं द्वितीयसंक्रमणं पूर्वसूचितं तपोरपि द्वयं तदन्तराले भवतीति
ध्येयम् ॥८॥
भा०टी०-पटेहुए दो बिन्दुओंके मध्यमें दो सक्रान्ति होती है जो चार सक्रान्ति तिनके
पछ होता है तिनको विष्णुपदी कहते हैं। (भोरखा नाम पहशीति है) ॥ ८ ॥
अथापनदयमाह..
भानोर्मकरसंक्रान्ते पण्मासा उत्तरायणम् ॥
कांदेस्तु तथैव स्यात्षण्मासा दक्षिणायनम् ॥ ९ ॥
सूर्यस्य मकरसंक्रान्तेः सकाशात् पदसौरमामा उत्तरायणं भवति । कोदेः कर्क
मंकान्तेः सकाशात्तथा सूर्यभोगात् एवकारादन्यग्रहनिरासः । पण्मासाः । तुकारात्सौरा।।
दक्षिणायनं भवति ॥९॥
भाटी०- सूर्यके मकरसक्रमणके पछि ६ मास उत्तरायण है। कटिसक्रमणके पीछ।
६ मास दक्षिणायन है ॥ ९ ॥
ध्यायः १४.] संस्कृतटोका-मापाटोकासमेतः। (२३५) अथर्तुमासवाण्याह- द्विराशिनाथा ऋतवस्ततोऽपि शिशिरादयः॥ मेपादयो द्वादशैते मासास्तैरेव वत्सरः ॥ १० ॥ ततो मकरसंक्रान्तेः सकाशात् । अपिशब्द उत्तरायणावधिना समुच्चयार्थकः । द्विराशिनाथा राशिदयस्वामिका राशिझ्याभोगात्मका इत्यर्थः । शिशिरादयः शिशि- वसन्तग्रीष्मवशरद्धेमन्ता ऋतकः कालविभागविशेषा भवन्ति । एते सूर्यभोगविष- . यका मेपादयो राशयो द्वादशमासास्तैदशभिर्मासैः। एवकारान्यूनाधिकव्यवच्छेदः । वत्सरः सौरवपं भवति ।। १० ।। भा० टो-यह समय ( मकरसंक्रमण ) से शिशिरादि सब ऋतुमें द्विराशि करके भोग करता है ! मेपादि १२ मासमें एकवर्ष होताहै ॥ १० ॥ अथ प्रसङ्गात्संक्रान्तौ पुण्यकालानयनमाह- अर्कमानकलाः पश्या गुणिता भक्तिभाजिताः!! तदर्धनाड्यः संक्रांतरांक पुण्यं तथापरे ॥ ११॥ सूर्यस्य विम्वप्रमाणकलाः पश्या गुणिताः सूर्यगत्या भक्तास्तस्य फलस्यादै तत्सं. ख्याका घटिका इत्यर्थः । संक्रान्तेः सूर्यस्य राशिमवेशकालादित्यर्थः । अर्याच पूर्व पुण्यं स्नानादिधर्मकृत्ये पुण्यघटिकाः पुण्यवृद्धिकारिकाः । अपरे संक्रांत्युत्तरकाले तथा स्नानादिधर्मकृत्ये पुण्यवृद्धिदा इत्यर्थः । अत्रोपपनिः । सूर्यविम्बकेन्द्रस्य राश्यादी सचरणकालः सक्रमणकालस्तस्य सूक्ष्मत्वेन दुर्जेयत्वात्स्थूलकालः कोप्यभ्युपेयः स तु राश्यादी विम्बसञ्चरणरूपोऽङ्गीकृतो बिम्बसम्बन्धात् । अतः सूर्यगत्या पटिसावनव. टिकास्तदा सूर्य विम्बकलाभिः का इत्यनुपातानीता बिम्बघटिकाः संक्रान्तिकाला स्थूल: प्राइनेमिसञ्चरणकालात्पश्चिमनमिसञ्चरणकालपर्यत' तदर्धघटिकाव्यासाघटिका इति संक्रान्तिकालात्तामिः पूर्वमपरत्रकाले मागपरनेम्योः क्रमण संचरणात्पूर्वोत्तरकाले पुण्या इति ॥ ११॥ मा० टी०-सूर्यमानकला ६० से गुप करके मुक्ति से भाग करनेपर नो हो, तितका आधा- संक्रमणकालमै वियोग भऔर योग करनेसे जो दो समय होते हैं तिनका सन्ता मत्तिपुग्य. ‘वाई होता है ॥ ११ ॥ अथ सौरमुक्त्वाक्रममाप्तं चान्द्रमानमाह- अर्काद्विनिसृतः प्राची यद्यात्यहरहः शशी ॥ तच्चान्द्रमानमंशैस्तु ज्ञेया द्वादशभिस्तिथिः ॥१२॥ सूर्यात्समागमं त्यक्त्वा विनिर्गतः पृथग्भूतः संश्चन्द्रोऽहरहमान को मितं प्राची पूर्वी दिशं गच्छति तत्मतिदिने चान्द्रमानं वह भने -- सूरयसिद्धान्तः- [चतुर्दशोऽ- सौरदिनं स्याशेन यथा भवति तथैतमांगः कियागः पूर्ण चान्द्रं दिनं भवतीत्यत आह । अंशैगित । मागैस्तुकारात्सूर्यचन्द्रान्तरोत्पन्नस्तस्य तद्पत्वाद । द्वादशामिद्वाद शसंख्याकैस्तियिज्ञेया । एकं चान्द्रदिनं ज्ञेयमित्यर्थः । एतदुक्तं भवति । सूर्यचन्द्रयो गाचान्द्रदिनप्रवृतेः पुनयोंगे माससमाप्ते गणान्तरेण चान्द्रो मासस्त्रिंशचान्द्रदिनात्मकः । अतस्विंशदिन गणांशान्तरं तदेकेन किमिति । द्वादशभागैरके चान्द्रदिनम् । 'दर्श:सूर्य न्दुसङ्गमः ' इत्यभिधानाद्दाराधेकमासस्य त्रिंशत्तिथ्यात्मकत्वात्तिथिश्चान्द्रदिनरू पोति ॥ १२॥ भा० टी०-सूर्यसे निकल कर महरह चन्द्रमा पूर्वदिशामें जाता है। तिसके लिये सूर्यसे १२ मंशमें जानेको जितना समय लगता है, यह तिथि है ।। १२ । अथ चान्द्रव्यवहारमाह- तिथिः करणमुद्राहः क्षोरं सर्वक्रियास्तथा ॥ व्रतोपवासयात्राणां क्रियाचान्द्रेण गृह्यते ॥ १३॥ तिथिः प्रतिपदाद्या करणं ववादिकमुराहो विवाहः क्षौर चौलकर्म । एतदाद्याः सर्व किया व्रतवन्धाधुत्सवरूपा व्रतोपवासयात्राणां नियमोपवासगमनानां क्रिया करणम् । तथा समुच्यार्थकः । चान्द्रमानेन गृद्यते । बङ्गीक्रियते ॥ १३ ॥ भा० टी०-तिथि, करण, विवाह क्षीरादि समस्तकर्म, ना, उपवास, यात्रा सबही चान्द्र- मानमें ग्रहण किये जाते हैं । १३ ।।. अथ चान्द्रमासं प्रसङ्गापिठ्मानं चाह- त्रिंशता तिथिभिसप्तश्चान्द्रः पित्र्यमहः स्मृतम् ॥ निशा च मासपक्षान्तो तयोर्मध्ये विभागतः ॥ १४॥ त्रिंशता त्रिंगनिमस्तिपिभिश्चान्द्रो मासः पित्र्यं पितृसंवन्धि । अहर्दिनम् । निशा रात्रिः पितृसंबद्धा । चकारो व्यवस्थार्थकः। ते नोभयं नैकः प्रत्येकीकतु मिलितं स्मृत. मिति लिंगानुरोधेनोमयत्रान्वेति । तथा च चान्द्रो मासः । पिन्याहोरात्रामत्यर्थः । फलित: । मासपक्षान्ती मासान्तो दर्शान्तः पक्षान्तः पूर्णिमान्तः । एतावित्यर्थः । विभागतः क्रमेणेत्यर्थःतयोःपित्र्याहोरात्रयोमध्येऽर्धे भवतः। दर्शान्तः पितृणां मध्याह्नः। पूर्णिमान्तः पितृणां मध्यरात्र इत्यर्थः । अर्थात्कृष्णाष्टम्यध्ये दिनप्रारंभः । शुक्लाष्टम्यर्धे दिनान्त इति सिद्धम् ॥ १४ भा० टी०-३० तिथिमें चान्द्रमास वा पितृदिन और पक्षान्तमै निशा है इस प्रकार विमा- गर्भ एक मासा दिनरात होता है । १४ ।।
ध्यायः १४.]
संस्कृतटांका-भाषाटीकासमेतः ।
अथ क्रमप्राप्त नक्षत्रमानं प्रसंगान्याससंज्ञां चाह-
भचभ्रमणं नित्यं नाशवं दिनमुच्यते ॥
नक्षत्रनाना मासास्तु ज्ञेयाः पर्वान्तयोगतः ॥ १५॥
नित्यं प्रत्यहं भचक्रभ्रमणं नक्षत्रसमूहस्य प्रवहवायुकृतपरिभ्रमः । नाक्षत्र नक्षत्र-
सम्बन्धि दिनं मानः कथ्यते । नित्यमित्यनेन चन्द्रमोगनक्षत्रभोगी नाक्षत्रमित्या
स्य निरासः । भचक्रभ्रमणानुपपत्तेः । माससंज्ञा भहानक्षत्रनाम्नेति । पर्वान्तयोगता
पोन्तपूर्णिमान्तः । तस्य योगात्तत्सम्बन्धात । नक्षत्रसंजया माताः । तुकाराचान्द्रा
अवगम्याः पूर्णिमान्तस्थितचन्द्रनक्षत्रसंज्ञो मासो ज्ञेय इति तात्पर्यार्थः । यथाहि यह
शान्तावधिकश्चान्द्रो मासस्तदभ्यंतरस्थितपूर्णिमान्तस्थितचन्द्रनक्षत्रसंज्ञः । चित्रासम्ब-
न्धाचैत्रः । विशाखासम्बन्धादैशाखः । ज्येष्ठासम्बन्धाज्येष्टः । आपाढासम्बन्धा-
दापाढः । श्रवणसम्बन्धाच्छ्रवणः । भाद्रपदासम्बन्धाद्भाद्रपदः । अश्विनीसम्बन्धा.
दाश्विनः । कृत्तिकासम्बन्धात्कार्तिकः । मृगशीर्पसम्बन्धान्मार्गशीर्षः । पुष्यसम्बन्धा
त्पौपः । मघासबन्धान्मावः । फाल्गुनीसम्बन्धात्फाल्गुन इति ।। १५ ॥
भाल्टी-दैनिकभचक्रका भ्रमण करनाही नाक्षात्रिकदिन है । पूर्णिमान्ताधिष्ठित नक्षत्रके
नाम मासका नाम जानना चाहिये ॥ १५ ॥
ननु पूर्णिमान्ते तत्तन्नक्षत्राभावे कथं सत्संज्ञा मासानुचिते आह-
कार्तिक्यादिपु संयोगे कृत्तिकापि द्वयं द्रयम् ॥
अन्त्योपान्त्यो पञ्चमश्च विधा मासत्रयं स्मृतम् ॥ १६॥
नक्षत्रसंयोगार्थमिति निमित्तसप्तमी । कार्तिक्यादिषु कार्तिकमासादीनां पौणमामी-
वित्ययः। कृत्तिकादि इयंद्वयं नक्षत्रं कथितं कृत्तिकारोहिणीभ्यां कार्तिकः मृगाभ्यां
मार्गशीर्षः । पुनर्वमुपुष्याभ्यां पोषः। आश्लेपामधाभ्यां माधः । चित्रास्वातीभ्यां चैत्रः ।
विशाखानुराधान्यां वैशाखः । ज्येष्ठामूलाभ्यां ज्येष्टः । पूर्वोत्तरापाढाभ्यामापाहः ।
श्रवणधनिष्ठाभ्यां श्रावण इति फलितम् । अवशिष्टमांसानाह-अन्त्योपान्त्याविति ।
अत्र कार्तिकस्यादित्वेन ग्रहादन्त्य आश्वेनः । उपान्त्यो भाद्रपदः । एतौ मासी ।
पंचमः फाल्गुनः । चकारः समुच्चय इति । मासत्रयं विधा स्थानत्रय उत्तम् ।
रेवत्यश्विनीभरणीति नक्षत्रत्रयसम्पन्धादाग्दिनः । शततारापूर्वोचराभाद्रपदेति नक्ष-
अत्रयसम्बन्धादाद्रपदः । पूर्वोत्तराफाल्गुनीहस्तोते नक्षत्रत्रयसंवन्धात्काल्गुनं इवि
सिद्धम् ॥ १६ ॥
माटी-कातिरमासकी पूर्णिमासे दो दो नक्षत्रमें एक एक मासका नाम पर
माश्विन, माद, और फाल्गुन मास्वा नाम तीन नक्षत्रमिसिद्ध है ॥ १६ ॥
. (२३८) सूर्यसिद्धान्तः- [चतुर्दशोऽ-- अथ प्रसंगात्कातिकादिवृहस्पतिवाण्याह- वैशाखादिपु कृष्णे च योगः पञ्चदशे तिथों ॥ कार्तिकादीनि वर्षाणि गुरोरस्तोदयात्तथा ॥ १७ ।। यथा पौर्णमास्यां नक्षत्रसम्बन्धेन तत्संज्ञो मासो भवति । तथेति समुच्चयाकम् । बृहस्पतेः मूर्यसान्निध्यदूरत्वाभ्यामस्तादुदयाहा वैशाखादिषु द्वादशमु मासेषु कृष्ण- पक्षे पञ्चदशे तिथौ । अमायामित्यर्थः । चकारः पौर्णमासीसम्बन्धात्समुच्चयार्थकः । योगो दिननक्षत्रसम्बन्धः । कार्तिकादीनि द्वादशवर्षाणि भवन्ति । वैशाखकृष्णपक्ष. पञ्चदश्याममारूपायां वृहस्पतेरस्त उदये वा जाते सति तदापि बृहस्पतिवर्ष कृत्ति कादिनक्षत्रसम्पन्धात्कार्तिकसज्ञम् । पूर्व ज्येष्ठापाढश्रावणभाद्रपदाश्विनकातिकमार्ग- शीर्षपोपमाघफाल्गुनक्षेत्रामासु मृगपुण्यमघापूर्वा फाल्गुनीचित्राविंशासाज्येष्टापूर्वा- पाहश्रवणपूर्वाभाद्रपदाअश्विनीदिननक्षत्रसम्बन्धान्मार्गशीर्षादीनि भवन्ति । अत्रापि प्रोक्तनक्षत्रद्वयत्रयमम्वन्धः प्रागुक्तो वोव्यः । अनेनेत्युपलक्षणम् तेन यहिने बृहस्प- तेरुदयोऽस्तो वा तहिने यञ्चन्द्राधिष्टितनक्षत्र तत्सझं वार्हस्पत्यं वर्षे भरतीति तात्प- यम । संहिताग्रन्येऽस्तोदयवशाहपोक्तिः परमिदानीमुदयचर्पव्यवहारो गणकैर्गण्यते येनोदितेज्य इत्युक्तरिति ।। १७ ॥ भाटी०-जैसे वेशाखादिमें पूर्णिमाकी तिथिक नक्षत्रस मासका नाम होता हे तसे ही बृहस्पतिके अस्तोदयसमय कृष्णापचदशी तिथिक , नक्षत्रानुमार वर्षका नाम रोता है ॥ १७॥ अथ क्रमप्राप्तं मावनमाह- उदयादुदयं भानोः सावन तत्प्रकीर्तितम् ॥ सावनानि स्युरेतेन यज्ञकालविधिस्तु तैः ॥ १८॥ सूर्यस्योदयादुदयकालमारभ्याव्यवहितोदयकालपर्यन्तं यत्कालात्मकं तत्सावन मानहरुक्तम् । एतेनोदयद्यान्तरात्मककालस्य गणनया सावनानि वसुट्यष्टाद्रीत्या- दिना मध्याधिकारोक्तानि भवन्ति तव्यवहारमाह- यज्ञकालविधिरिते यज्ञस्य यः कालस्तस्य गणना तैः सानः । तुकारोऽन्यमाननिरासार्यविकार- परः ॥ १८॥ भा० टी०-एक सूर्योदपसे लेकर दूपरे सूर्योदय तक कालका नाम सावन है । इससे ही यज्ञमालकी विधिका निर्णय होना है ॥ १८॥ अथ व्यवहारान्तरमाह- सूतकादिपरिच्छेदो दिनमासाब्दपास्तथा ॥ मध्यमा यदभुक्तिस्तु सावनेनैव गृह्यते ॥ १९॥ - ध्यायः १४.] संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतः । (२३९) सूतकं जन्ममरणसम्बन्धि । आदिपदयाहां चिकित्सितचान्द्रायणादि तस्य परि- च्छेदो निर्णयः । दिनाधिपमासेश्वरवश्वराः । तथा समुच्चये प्रहाणां गतिमध्यमा । तुकारात्स्पष्टगतनिरासः तस्याः प्रतिक्षणं वैलक्षण्यादिनसम्बन्धस्थाभावात् । एतन स्पष्टगत्या स्पष्टग्रंहस्य चालनं निरस्तं स्थूलत्यादिति सचितम् । सावनमानेन एक्का- रादन्यमानानरासः । गृह्यते सुधीभिरंगीक्रियते । अत्र बहुवचनानुरोधेन गृह्यत इत्यत्र बहुवचनं ज्ञेयम् ॥ १९ ॥ मा० टी०-सूरकादि माशौच दिन, माप्त और अड़पति ग्रहको मध्यभुक्ति सावनके मनु- सार ग्रहण की जाती है ॥ १९ ॥ अथ दिव्यमानमाह- सुरासुराणामन्योन्यमहोरावं विपर्ययात् ॥ यत्प्रोक्तं तद्भवेदिव्यं भानो गणपूरणात् ॥ २० ॥ पूर्वार्धे पूर्व व्याख्यातम् । यदहोरात्र पूर्वार्धाक्तं सूर्यस्य भगणभोगपूर्नेः प्रोक्तं पूर्व मनेकधा निणीतं तदहोरात्रं दिव्यमानं स्यात् ।। २० ॥ भा० टी०-सुर असुरोंके परस्पर विपरीतभावसे दिनरात होता है सूर्य के भाणपूरणक कालदी दिव्य दिन है ॥ २० ॥ अथावशिष्टे प्राजापत्यब्राह्ममाने आह- मन्वन्तरव्यवस्था च प्राजापत्यमुदाहृतम् ।। न तब निशोभदोत्राह्मः कल्पः प्रकीर्तितम् ॥ २१ ॥ मन्वन्तरव्यवस्था मन्वन्तराबस्थितिः । युतानां सप्ततिः सैका ' इत्यादिना मध्या धिकारोक्तेति चार्थः । प्राजापत्यं मानं मान रुदाहृतमुक्तं मनूनां प्रजापतिपुत्रत्वात् । ननु देवपितृमानयोंदिनरात्रिभेदो यथोक्तस्तयास्मिन्माने दिनरात्रिभेदप्रातिपादन कथं नोक्त मित्यत आह-नति । तत्र प्राजापत्यमाने द्युनिशोदिनरान्योर्मेंदे विवेको गुरुसौरचन्द्र. मानवनास्ते । ब्रह्ममानमाह-बाह्म इति । कल्पो युगमहस्रात्मकः प्रागुक्तः । ब्रह्ममानं मानरुक्तम् । यद्यपि पूर्व पिन्यवाहस्पत्यमानयोरनुक्तेरव तयोर निरूपणमुक्तमन्येगा निरूपणं तु पूर्वोक्त्या पुनरुक्तं तथापि पूर्वगणितानुपर्जाव्य परिमापाकग्नावश्यक्तया गणितप्रवृत्यर्य नेपाममानत्वेने निरूपणादन तुविशेपकथनार्य मानत्वेन पुनस्तेषां निरू. पणं प्रश्नोत्तरत्नाक्षातकरमन्यथा मश्नानुपपत्तेरिति दिक ॥ २१ ॥ भाटी०-प्रजापति भादि मन्वन्ताको व्यवस्था पहले कही है। इसमें दिनरातका भेद नहीं पल्पही मामान है ।। २१ ॥
(२४०) सूर्यमिदान्तः- [ चतुर्दगोड- अथ स्वोक्तमुपसंहरति- एतत्ते परमाख्यात रहस्यं परमाद्भुतम् ।। ब्रह्मेतत्परमं पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम् ॥ २२ ॥ हे परम दैत्यश्रष्ट सूर्यभक्तत्वात् । ते तुभ्यमेतद्धनोक्तं परं द्वितीयायनमारबाट निराधाक्षतया सम्पूर्ण कार्यतम् । पूर्व सावशेपमुक्तं स्थितामेति वया पटनाः कृता. स्तदुत्तररूपद्वितीयकथनमिदं निःसंदिग्धमस्तीति तब संशया नोद्भवन्तीति भावः । ननु म प्रश्नं विना पूर्वमेवेदं क्थं नोक्तमित्यत आह-रहस्यमिति । कुत इत्यत आह-अटु- तमिति । आकाशस्थग्रहनक्षत्रादिस्थितिज्ञानसम्पादकत्वादाश्चर्यमित्यर्थः। तया च मत्पूर्वोक्तं येन सावधानतया श्रुतं तेनैव त्वदुत्ताः प्रउनमः क्तु शक्यास्तदुत्तरत्वेन द्विती- यं मदुक्तमिति त्वा परीक्ष्य त्वा प्रत्युक्तं रहस्यमिति भावः । नन्वन्यशास्त्राणां ज्ञानाद- ब्रह्मानन्दावाप्तिरस्मान्नेत्यत आह-ब्रह्मति । एतन्मदुक्तं ब्रह्म ब्रह्ममम तथा चान्य- शास्त्राणां ब्रह्मसमत्वाभावेऽपि तज्ज्ञानाद्ब्रह्मानन्दावाप्तिररमाद्ब्रह्मस्वरूपाब्रह्मानन्दावाप्ती चित्रमिति भावः । कुत इदं ब्रह्ममममित्यत आह-परामिति । उत्कृष्टम् । अत्र हेतु- भूतं विशेषणद्वयमाह । पुण्यं सर्वपापप्रणाशनामाते । पुण्यजनकं सर्वपापनाश- कम ॥२२॥ भा० टो-डे श्रेष्ठ । यह परम महत रहाय वहा । यह सर्वपापका नाश करनेवाला अति पवित्र है। वरन् ब्रह्मस्वरूप है ॥ २२ ॥ नन्यस्माद्ब्रह्मानन्दप्राप्तिरुक्ता पूर्व ग्रहलोक्प्राप्तिश्चोक्ता तत्रानयोः किं फलं भवती- त्यत आह-- दिव्यं चाग्रहाणां च दर्शितं ज्ञानमुत्तमम् ॥ विज्ञयाकादिलोकपु स्थान प्राप्नोति शाश्वतम् ॥ २३ ॥ आः नक्षत्रसंबन्धि ज्ञानं ग्रहाणा ज्ञानम् । चः समुच्चये। उत्तमं सर्वशास्त्रेभ्य उत्कृ- टम् । अत्र हेतुभूतं विशेषणं दिव्यं स्वर्गलोकोत्पन्नं दर्शितं मया तुभ्यमुपदिष्टं विज्ञाय ज्ञात्वाकादिलोकेषु सूर्यादिग्रहलोवेषु स्थानमाधिष्टानं प्रामोति शाश्वतं नित्यं ब्रह्मसायुः ज्यरूपं स्थानम् । पूर्वाधस्थद्वितीयचकारः समुच्चयायकोनाचति । तथाचोभयं फलं प्रमेण भवतीति भावः । यत्तु एतत्ते परमाख्यानमित्यादिश्लोरः कचित्पुस्तकेन्माद शोकात्पूर्वनास्ति किन्तु माननिरूपणान्तस्थदिव्यं चाक्षमित्यादेिश्लोकान्ते मानाध्यायस- माप्ति कृत्वाने “ यथा शिखा मयूराणां गगानां मणयो यथा । तदेदानशास्त्राणां गणितं मूर्धनि स्थितम् ॥ १॥ न देयं तत्कृतघ्नाय वैदेविप्लावराय च । अर्थलुब्धाय मूलय गड्गय पापिने ॥ २ ॥ एविधार पुत्रायाप्पद सद्दजाय २ । उत्तेन वेद ध्यायः १४.] संस्कृतदीका-मापाटीकासमेतः । (२४१) मार्गस्य समुच्छेदः कृतो भवेत् ॥ ३ ॥ व्रजेतामन्धनामित्रं गुरुशिष्यौ सुदारुणम् । ततः शान्ताय शुचये ब्राह्मणायैव दापयेत् ॥ ४॥ चक्रानुपातजो मध्यो मध्यवृत्तां. शजः स्फुटः । कालेन दृक्तमो न स्यात्ततो वीजकियोच्यते ॥५॥ राश्यादिरिन्दुर- अन्नो भक्तो नक्षत्रकक्षया । शेष नक्षत्रकक्षायास्त्यजेच्छेपकयोस्तयोः ॥ ६॥ यदल्प तद्भजेदानां कक्षया तिथिनिघ्नया । दीजं मागादिकं तत्स्यात्कारयेत्तदनं खौ ॥७॥ त्रिगुणं शोधयेदिन्दी जिननं भूमिजे क्षिपेत् । दृग्यमघ्नमृणं शोचे खरामध्न गुरा' वृणम् ॥ ८॥ ऋणं व्योमनवान्नं स्यादानवेज्यवलोचके ॥ धनं सप्ताहतं मन्दे परिधी- नामयोच्यते ॥९॥ युग्मान्तोक्तः परिधयो ये ते नित्यं परिस्फुटाः ॥ ओजास्तो. तास्तु ते ज्ञेयाः परवाजेन संस्कृताः ॥ १० ॥ वच्मि निवौंजकानोजपदान्ते वृत्तमांग कान् ॥ सूर्येन्दोमनको दन्ता धृतितत्त्वकलोनिताः ११ ॥ वाणती महीजस्य सौम्यस्याचलवाहवः ॥ वास्पतरष्टनेत्राणि व्योमशीतांशवो भूगोः ॥ १२ ॥ सूर्यर्तवोर्कपुत्रस्प चीजमेतेन कारयेत् ॥ चौज खारन्युट्टतं शोध्य परिष्यगेपु मास्वतः ॥ १३ इनास, योजयेदिन्दोः कुजस्याश्वहतं क्षिपेत् । विदश्चन्द्रहतं योग्यं सरेरिन्द्रहतं धनम् ॥ १४ ॥ धनं भृगो वान्निनं रविनं शोधये. छनेः ॥ एवं मान्दाः परिपंशाः स्फुटाः स्युर्वच्मि शीवकान् ॥ १५ ॥ भौम- स्याभ्रगुगाक्षीण बुधस्याब्धिगुणेन्दवः ॥ वाणाक्षा देवपूज्यस्य मार्गवस्येन्दु- पडयमाः ॥ १६ ॥ शनैश्चन्द्राब्धयः शीघ्राः मोजान्ते चीजवनिताः ॥ दिनं सं कुजभागेषु बाजे विनमृगं विदः ॥ १७ ॥ अन्त्पटिनं वनं सरेरिन्दुग्नं शोधये- कोः ॥ चन्द्रनगमार्कस्य स्युरेमिक्समा ग्रहाः ॥ १८ ॥ एतद्धीजं मया- ख्यातं प्रीत्या परमया तव ॥ गोपनीयमिदं नित्यं नोपदेश्यं यतस्ततः ॥ १९ ॥ परीक्षिताय शिष्याय गुरुभक्ताय साधये ॥ देयं विमाय नान्यस्मैप्रतिकंचुतकारिणे॥२०॥ पनि निशेगसिद्धान्तरहस्यं परमं स्फुटम् । यात्रापाणिप्रदादीनां कार्याणां गुभासादे- इत्यस्य कचित्पुस्तके लिखितस्य बीजोपनयनाध्यायस्वान्ते लिखि तो दृश्यते तत्त न समजतम् । उत्तरखण्डे ग्रहगणितानरूपणाभावाचान्नरूपणमत- निरूपणीयस्याध्यायस्यालेखनानौचित्यास्पष्टाधिकारे 'तदन्ते वास्य लेखनस्य युक्तता- किय 'मानानि कते सिंध तः इति प्रश्नाने प्रज्ञानापमान.लग्नोमू- सोत्तरसण्डेऽस्य लेखनमसंगतम् । अपिच उपदेशकाले पानामावादग्न्तरदही- नमनियतं कथमुपदिष्टमन्ययान्तर्भूतत्वेनैवोक्तः स्वादित्यादि विचारेण ऋषि- दृष्टेन पीनस्यार्पमूलकत्वज्ञापनायान्तेऽत्र वोनोपनपनाप्पायः प्रक्षिप्त इत्यामन्य न पाख्यात शते मन्तव्यत् ॥ २३ ॥ मा०1०-प्रह भौर नक्षत्र समन्वय दिल्य इतनमननो मने हातिर मवानके पर्याद छाकम नित्यस्थान मिटता है ॥ २३ ॥ दम् ।। २१ ॥
(२४३)
सूयसिद्धान्त
[चतुर्दशोऽ--
अथ मुनीन्प्रति कथितसम्वादस्योपसंहारमाह-
इत्युक्त्वा मयमामव्य सम्यक्तेनाभिपूजितः।।
दिवमाचकमेकांशः प्रविवेश स्वमण्डलम् ॥ २४ ॥
व्याशपुरुपो मयासुरमामन्त्र्य सम्यक्तत्त्वतो ग्रहादिचरितमुपदिश्य । इति । एत.
ते इत्यादिश्लोक्यमुक्त्वा कथयित्वा । समुथयार्थकश्चोऽनुसन्धेयः । दिवं स्वर्गमा
चामे । आक्रमणविषयं चके । ननु सूर्याशपुरुपस्य तदुपदेशे को वा पुरुषार्थ इत्य.
त आह-तनोत
मयामुरेणामिपूजितः । गन्धधुपादिनैवेद्यवस्खालंकरणा-
दिभिः पूजाविषयी कृतः । मयद्वारा मर्त्यलोके सिद्धिं सूर्यतुल्यत्वेन प्राप्त इति भावः ।
ननु स्वर्गेऽपि किं स्थानं गत इत्यत आह-प्रविशति । स्वमण्डलं सूर्यविम्बं विशति
स्माधिष्ठितवान् । अत्रापि समुच्चयार्थोऽनुसन्धेयश्चकारः ॥ २४ ॥
भा. टी-इस प्रकार मयको भली भाति उपदेश देने के ६ तोमसे पूजित होकर सूर्याश
पुरुष वर्गमें चटकर सूर्यमण्डलमें प्रवेश करते हुए ॥ २४ ॥
अय मयासुरावस्थां तात्कालिकीमाह-
मयोऽथ दिव्यं तज्ज्ञानं ज्ञात्वा साक्षाद्विवस्वतः ।।
कृतकृत्यमिवात्मानं मेने निघूतकल्मषम् ॥ २५ ॥
भग सूर्याशपुरुषाऽन्तर्धानानन्तरं मयामुरस्तज्ज्ञानं प्रदर्शस्थित्यादिज्ञानं पूर्वोक्तं
दिव्यं स्वर्गस्य सूर्यात्साक्षादनन्यद्वारेत्यर्थः । सूर्यांशपुरुषस्य सूर्याभिन्नत्वं तदुत्पन्नत्वा-
दत पय भेदेऽपि साक्षादुक्तं युक्तम् । ज्ञात्वात्मानं संनिधूतकल्मपं निवारितपाईं कृतकृत्य
सम्पादितकार्य मेने मन्यतेऽस्म ॥ २५ ॥
म.-मयभी साक्षात् सूर्यनारायणसे दिव्यज्ञान प्राप्त करके कृतार्थ हो कलुषशून्य हुमा
मेर ऐसाही मनमें समझने लगा ॥ २५ ॥
अथ तमिदं ज्ञानं कथं प्राप्तवानिति श्रोतमुनिभिः पृष्टो मुनिस्तान्प्रति तत्रत्या
ALIAभूतय ऋषयो मयं प्रत्येतज्ज्ञानं पृष्टवन्न इत्याह..
ज्ञात्वा तमृपयश्चाथ सूर्यलब्धवरं भयम् ।।
परिवबुरुपत्याथो ज्ञान पप्रच्छुरादुरात् ॥२३॥
अय मयासुरस्य ज्ञानप्राप्त्यनन्तमृपयः सूयीशपुरुपमयासुरसम्वादाश्रितभूमि-
प्रदेशामन्नभूमिदेशस्या अस्मत्प्रभृतयो मुनयस्तं कृतकृत्यं मयासुर सूर्यलब्धबर सूर्यो-
माप्तो वरो ज्ञानप्रसादो येनैतादृशं ज्ञात्या । उप समीप एत्यागत्य । चः समुच्चये। परिवन्नुः
वेष्टितवन्तः । अयो अनन्तरमादरादत्यन्तं सामिलापतया ते ज्ञानं ग्रहादिचरित
पप्रच्छुः पृष्टवन्तः ॥ २६ ॥
भारों-मपले सूर्यभगवानले पर पाया है ऐसा जानकर पुनियाने तिसके निपट माय
दरसाइत पछा या ॥२६॥
ध्यायः १४.] सस्कृतटीका-मापाटीकासमेतः। (२४३) अथ मयासुरः स्वज्ञानं तत्प्रश्नकारकानस्मत्प्रभृतीन्मुनीन्प्रति कथयामासेत्याह-- स तेभ्यः प्रददौ प्रीतो ग्रहाणां चरितं महत् ॥ अत्यद्भुततम लोके रहस्यं ब्रह्मप्तम्मितम् ॥ २७ ॥ मयासुरः प्रीतः सन्तुष्ट सन् तेभ्योऽस्मत्प्रभृतिभ्य ऋापेभ्यो ग्रहाणांस्थित्यादिज्ञान म- हदपरिमेयमत एव ब्रह्मसम्मितं ब्रह्मतुल्यं लोके भूलोकेऽत्यद्भुततममत्यन्तमाश्चर्यकार- के श्रेष्ठमत एवं प्रददौ प्रकर्षण निर्व्याजतया दत्तवान् कथयामातेत्ययः ॥ २७ ॥ मा०टी०-ग्रहोंको चरित्ररूपमत्यन्त अद्भुत ब्रह्मसम्मित रहस्य मेने प्रश्न होकर प्रपियोंको दियाया ॥ २७॥ अथ मानाध्यायसमाप्त्या सूर्यसिद्धान्तसमाप्ति क्स्यचित्माक्षिप्ताध्यायस्य निवारिका फक्कियाह- सूर्यसिद्धान्ते मानाध्यायः ॥ १४॥ रंगनाथन रविते सूर्यसिद्धान्तटिप्पणे । मानाध्यायोत्तरदले पूर्णी गृहप्रकाशके ।। भागीरथीतीरसंस्थे शम्भााराणसीपुरे । बल्लालगणको रुद्रजपासक्तोऽभरद्धः ॥१॥ तस्यात्मजाः पञ्च गुणाभिरामा ज्येष्ठः स रामः सकलागमज्ञः । येनोपपत्तिः स्वपिया नितान्तं प्रकाशितानन्तसुधाकरस्य ॥ २ ॥ ततः स कृष्णो जहंगीरसार्वभौमस्व सी. धिगतप्रतिष्ठितः ।। श्रीभास्करीयं निवृत्तं तु येन वीजं तथा श्रीपतिपद्धतिः सा ॥ ३॥ गोविन्दसज्ञस्तु ततस्तृतीयस्तस्यानुजोऽहं गुरुलव्धवियः ॥ विश्वेशाजनिविष्टचेताः काशीनिवासी सालाभिमान्यः ॥ ४ ॥ श्रीरंगनायोमुखोत्यशास्त्रे गृढप्रकाशामेध. टिप्पणं सः ॥ कृत्वा महादेवबुधाग्रजोथ विश्वेश्वरायार्पितवान्सुवृद्धये ॥ ५ ॥ शके तत्यतिथ्युन्मिते चैत्रमासे सित शम्भुतिथ्यां बुशेऽकादयान्मे । दलान्यादिना राचनाडीषु जाती मुनीशाकसिद्धान्तगृढमकाशी ॥ ६ ॥ गूढप्रकाशकं दृष्टा रंगनायभवं भुवि ।। मुनीश्वरस्य सहजं लभन्ता गणकाः सुखम् ॥७॥ इति श्रीपालगणकसार्वभोमवल्लालदैवज्ञात्मजांगनाथविरचितः। मुसिदान्तगृहार्य प्रकाशः सम्पूर्णः ॥ समासश्च सूर्यासद्धान्तः ॥ चतुर्दशअध्यायसमाप्त ॥ उत्तरखण्ड पूर्णहुआ। १ सिद्धान्तहस्यमते । फस्यन्दपिण्डात्रिसन्नाटय मागादिवीज पनामरेद्र । विन शनी वैदहत बुधोरे शिवितमि पारजितोपिशोध्यम् ॥ जातकावे-सवाणागारीमधे पण खपिन्दर्भिगुरावर काशित सीसते धन दिस्यते । रिपुस्तदीपश्ये शतहताश्वानरं ऋण कलियुगाब्दता नपनगोचरा:- मरा: सूर्यसिद्धान्तः समाप्तः। " (२) उदाहरणम् । उदाहरणम् । अहर्गणानयन (१२० ५१ श्लो०)। शाके १८१७ के प्रथमदिनका पहर्गण कृतयुगके शेपतक १९५३७२०००० नेता और द्वापरमान २१६०००० और फलियुगके चीतेहुए ४९९६ मिलानेसे १९५५८८४९९६ कल्पगताब्दवर्ष हुआ। इसको १२ से गुणा करनेपर २३४७०६१९९५२ मास हुए । इस संख्याका अधि. मास संख्या १५९३३३६ से गुणाकरनेपर ३७३९६५८३७१२८३९८७२ "हुए । इनको सौरमासकी संख्या ५१८४०००० से भाग करनेपर ७२१३८४७२६ हुए मागावशेष छोडे गये । यह संख्या माससंख्यामें मिलाकर २४१९२००४६६८ इस माससंख्याको ३० तीससे गुणाकरके मधुशुक्लाद तिथिसंख्या १८ मिलानेसे ७२५७६०१४००५८ दिन हुए । इस दिन संख्याको तिथि क्षय २५०८२२५२ से गुणा करनेपर १८२०३६९८७२४४९००५०६१६ हुए । इसको चान्द्र दिन १६०३००००८० से भाग करके भागावशेषको छोड देनेसे ११६५६०१८६०० ये लब्ध हुए यह सख्या दिनसंख्यासे घटानेपर ७१४४०४१२१४५८ शेप रही। शनिवार होनेसे ७१४४०४१२१४५९ अहर्गण हुआ। मध्यानयन । (१ अ०५३ श्लोक) महर्गणको सूर्यभगण ४३२०००० से गुणा करनेपर ३०८६२२५८०४७०२८८०००० पे हुए ! इस संख्याको सौरदिन १५७७९१७८२८ से भाग करनेपर लन्ध १९५५८८४९९५ भगण हुए। शेप १५७४६८९१४० को १२ से गुणकरके सौरदिनसे माग करनेपर,११ राशि हुई और अवशेषको ३० से गुण करके सौरदिनसे भाग करनेपर २९ अश हुए । वाकीकी फला विकलादि करके १५ कला ४८ विकला और ९ अनुकला हुई। शेप छोड दिये गऐ। भगण संख्याको छोड देनेसे रविमध्य ११ । २९ । १५ । ४८ । ९ हुया देशान्तरानयन (१ अ० ६० श्लो०)। भूकर्ण १६०० योजनके वर्गको १० से गुणाकरनेपर २५६००००० हुए ( इसका मूल निकालनेसे ५०६० योजन हुए । ५ अंगुल छायाके वर्ग करनेसे २५ और शंकुवर्ग १४४ मिलाकर मूल निकालनेसे १३ . हुए । यह छायाकण है विषुवदिनके शंकु १२ से त्रिज्या (३४३८ ) को गुणाकरनेसे ११२५६ हुए । इस संख्याको छायाकर्ण १३ से भाग करनेपर ३१७३ माग फल लम्दग्या हुई इसको योजन संख्या ५०६० से गुणाकरनेपर १६०५५३८० हुए । इसको त्रिज्या ३४३८ से भाग करनेपर स्फुट भूपरिधि ४६६९ योजन हुई किसी देशकी योगनसंख्या १५० है । सर्यको दैनिक मुक्ति कलासे गुणा करने पा८८:० हुए । इसको स्फुट भूपरिधिसे माग करनेपर १ । ५३ कलाविकला हुई।
उदाहरणम् । (२४२) यह विमध्यमें स्वदेशको पूर्वदिशामें होनेसे पियोग करनेप्से ११।२९।१३३५५।९ मन्दोघानयन । (१ अ०५४ श्लोव) कृतयुगके शेपमें शनिका मन्दोपानरूपण- फरना । १९५३७२०००० वर्ष संख्याको, शनिके मन्दोग कल्पभगण ३९ से गुणा भरनेपर ७६१९५०८०००० हुए । इसको कल्पमान ४३२००००००० से भाग करनेपर १७ मगग राश्यादि ७ १ १९ । ३५१.२४ हुई । गतिकी अला. ताके यशसे देशान्तरका संस्कार मध्यसाधन और चन्द्रमाके मन्दोध साधन विना निष्प्रयोजन है पातमध्यानयन । शाके १८१७ के बारम्भमें शनिकर पातानयन है। १९५५८८४९९६ वर्षको मगण ६६२ से गुणकरके ४३२००००००० से माग फरनेपर २९९।२१ । ३८ । १६ भगणादि शनिके पातमव्य हुए। रविस्फुदानयन । (२ अ० ४६ श्लो० ) रधिमन्दोच २ । १७ । १७ । २८ से रविमध्य ११ । २९ । १५१४८ अलग करनेसे २१८1१1 ४० मन्द फेन्द्र हुआ । केन्द्रविपमपादमें स्थित ( २ अ० ३४ श्लो०) हुमा । मत एप गतकेन्द्रदी भुज है। केन्द्रको कलाकरके २२५ से भाग करके २० भागालके अनु- सार ज्या करनेसे ३३२१ हुए । भानावशिष्टसे ज्यान्तर ५१ को गुणाकरके २२५ से माग करनेपर लब्ध ४१ कला हुआ । यह ज्या ३३२१ के साथ मिलनेसे ३३६२ मन्दभुजज्या हुई। सूर्यको दो गन्दपागध अन्तर २० कला है । इसको ज्या ३३६२ से गुणकरके त्रिज्या ३४३८ से भाग करनेपर १९ कला ३४ विकला हुआ। युग्म- मन्ती मन्दपरिधि १४ १ ० से १९ कला ३४ विकला अलग करदेनेसे १३१४०।२६ स्फुट परिधि हुई । इसको ज्यासे गुणकरके ३६० मे माग करनेपर २१७ १३६ अंशादि हुए । यही मन्दभुनज्याफल है । इसके धनुकरनेसे अंश २१७ । ३६ वही हुए । मन्दकेन्द्र मेपादिकेन्द्र होने के कारणा रविमध्यमें मिलानेसे १११२३ । २४! राश्यादि राव स्फुट हुमा । रविमुजमान्याल १२८ क्ला रविस्पष्ट मुक्तिसे गुणकरके २१६०० से भाग करनेपर २ विकला हुई । सो रविस्फुटमें मान्यालका योग होनेसे । योग करनेपर ११।२३।२६ मध्यरात्रिक भुज संस्कृत रवि स्फुट हुआ। शनिस्फुटसाधन । शनिमध्य ५।२९.६७।८ शनिशीघ्र ११ ॥ २९ ॥१५ ४२ से वियोग करनेपर शेप ६१०1८।३४ शो केन्द्र हुआ । केन्द्रविपमपादमें स्थित है। गतकला ८१ ३४ मुज इसको ज्या और कलादि ८ । ३४ । गम्यकला कोकिला विसको २२५ से माग करके मागरुलके अनुसार ज्यानिर्देश करके शेष ज्यान्तरसे. गुणाकरके २२५ से माग करनेपर लब्धम्या में संस्कार करनेसे ३४३७ । ४९ । फोटोज्या सं। मुनग्याको विम्यासे मागकरनेवर ९ विकग हुई। स्फुट शनि (२४६) मूर्यसिद्धान्त:- । - परिधिर्म संस्कार करनेसे ३९ । ०।९ अंशादि हुई । भुजज्याको शुद्ध स्फुट परि- धिसे गुणा करके ३६० से भागकरनेपर ५६ विकला शीघ्रभुजफल हुआ। कोटी- ज्याको स्फुटपरिधिसे गुणा करके ३६० भाग करनेपर कला विकलो ३७२। २२ । हुई । शीघ्रकेन्द्र कादिमें होनेसे त्रिज्या ३४३८ से फल ३७२ । २२ । अलग करनेपर ३०६५ । ३८ शीघ्रकोटीफल हुआ । शीघ्रकोटीफलको विकला करके वर्ग करनेपर ३३८३३१८७८४४ हुए । भुजज्याषिकलाको वर्ग करनेसे ३१३६ हुए शीघ्रकोटीफलवर्गके साथ भुजज्यावर्ग मिलाकर मूल निकालनेसे १८३९३८ विकला शीघ्रक्रर्ण हुआ। भुजफल ५६ विकलाको त्रिज्या, ३४३८ से गुणाकरके शीघ्रकर्णद्वारा भाग करनेपर ६३ विकला हुई। कला १ । ३ शनिका प्रयम शीघ्रफल हुआ (यही प्रथमसंस्कार है ) इसका अर्द्ध शनिमध्यमें शीघ्रकेन्द्र तुलादि होनेसे वियोग करनेपर ५।२९ । ६ । ३७ । शीघ्रफलार्द्धसंस्कृतमध्यशनि हुआ । शनि मन्दोच ७।२६ । ३७ । २४ से शीघ्रफलासंस्कृतमध्य वियोग करने पर १२७ ३० । ४७ प्रथममन्दकेन्द्र हुआ । कलाकरके २२५ से भाग करने पर १५ संख्या तुल्य ज्याग्रहण करके ज्यान्तर ११९ से भागशेप ७५ को गुणाकरके २२५ से मागकरके कला ४० । ४ हुई । यह ज्या २८५९ इममें मिलानेसे २८९९। ४ प्रथममन्द भुजज्या हुई । इस भुजज्याको युग्मायुग्म मन्दपरिधिके अन्तर १ अंशसे गुणकरके ३४३८ त्रिज्यासे भाग करनेपर कला ५० । ३६ हुई युग्मपरिधिके हीन करनेपर ४८ । ९ । २४ शुद्ध स्फुटपरिधि हुई भुजज्याको शुद्धस्फुट मन्दपरिधिसे गुणाकरके ३६० से भाग करनेपर कला ३८७ । ४९ हुई । इनके धनुकरनेसे ३८८। २८ मन्दफल हुआ ( यह दूसरा संस्कार है) यह प्रथममन्दफलाई शैघयार्द्ध संस्कृत मध्यशनिमें मेपादिकेन्द्रमें मिलानेसे ६ । २ । २० । ५१ शीघ्राई मन्दार्द्ध संस्कृत- मध्य शनि हुआ। फिर शनिमन्दोच्च ७ । २६ । ३७ । २४ से प्रथम मन्दफल संस्कृत मध्य ६।२।२०। ५१ वियोग करनेपर १ । २४ । १६ ३३ ये हुए इसकी फला करके २२५ से भाग करने पर भागफल १४ के अनुसार ज्या २७२८ और ज्या.... न्तर १३१ को अवशिष्ट १०६ से गुणाकरके २२५ मे भाग करके लब्ध ६१ । ४४ को ज्या २७२८ इसमें मिलानेसे २७८९ । ४४ द्वितीय मन्दमुजज्या हुई इसको ३४३८ त्रिज्यासे भाग करनेपर फल ४८ । ४१ होताहै । सो ४९ अंशसे होन कर नेसे ४८ । ११ । १९ द्वितीय शुद्ध मन्द परिधि हुई । द्वितीय मन्द जज्या २७८९ ॥ ४४ को इससे गुणाकरके ३६० से भाग करनेपर कला ३७३ । २६ इसके धनु कर: नेसे ३७४ । ५ दूसरा मन्दफल हुआ। (यही तीसरा संस्कार है) यह शनिमध्यमें उदाहरणम् । (२४७) ५।२०।७१८ में मेपादि केन्द्रहेतु योग करनेसे ६१५१२१ । १३ यह द्वितीय मन्दस्पष्ट शनि हुआ। शनिशीघ्र ११ । २९ । १५ । ४२ से मन्द स्पष्ट शनि ६ । ५।२१ । १३ हीन करनेसे शेष ५ ॥२३॥ ५४ १२९ शीघ्रकेन्द्र हुआ। इससे ३ राशिहीन करके कला बनाय २२५ से भाग करके भागफल २२ के अनुसार ज्या ३४०९ और ज्यान्तर २२ से अवशिष्ट ८४ । २९ का अनुपातद्वारा लब्ध ८ । १५ ग्रहणकरके ज्या ३४०९ में युक्त करनेसे ३४१७ । १५ हुए । युग्म पात होनेसे गत ज्या कोटोज्या हुई । गम्य ३ । ६।५ । २५ । भुजकी ज्या वनानेसे २६० १ २३ भुजज्या हुई । इसको त्रिज्याप्ते भाग फरने पर कला ६ । २१ हुई । शीघ्रपरिधिमें संस्कार करनेसे ३९ । ६ । २१ शुद्ध परिधि हुई । चतुर्थ शीघ्रभुजज्याको शुद्ध परिधिसे गुणकरके ३६० से माग करनेपर लब्ध ३९ । ३५ कला विकला चतुर्थ शीघ्रभुजफल हुआ। कोटीज्याको शुद्ध परिधिसे गुणकरके ३६० से भाग करनेपर ३७१ । १३ हुए। कादि केन्द्र होनेसे त्रिज्या ३४३८ से वियोग करनेपर ३०६६। ४७ चतुर्थ शीघ्रकोटी फल हुया । शीघ्रभुजफल वर्ग और शीघ्रकोटी फल वर्गके योग फलका मूल निकालनेसे ३०६८ कला शीघ्रकर्ण हुआ । शीघ्रभुज फलको त्रिज्यासे गुणकरके इस शीघ्रकर्णसे भाग करनेपर कलादि ४४ । २२ हुए, इसके धनु और कला ४४ । २२ शीघ्रफल हुआ (यही चौथा संस्कार है ) शनिमन्दस्सप्टमें मेपादि केन्द्र होनेसे युक्त करने पर ६॥ ६ ॥ ५ ॥ ३५ शनिस्फुट हुमा । ग्रहगति । (२ अ०४७-५३ श्लो.) सूर्यके मन्दसंस्कार, ५१ कला दोयतिर है । उसको रविमुक्ति मध्य ५९ 1८ से गुणाकरके २२५ से माग करने पर कला १३ । २४ विकला हुई । इसको शुद्ध स्फुट परािधे १३ । ४० । २६ से गुणाकरक ३६० से भाग करने पर ३० विकला हुई। यह मकरादि केन्द्रके वशस मध्यभुक्ति ५९ १ ८ से वियोग करने पर ५८ । ३८ सूर्यको स्पष्ट गति हुई। चन्द्रग्रहण । (४ अ० १७ आदिश्लो०) सूर्य व्यासयोजन ६५०० सूर्यको स्पष्ट गति ६० कलासे गुणा करके सूर्यको मध्य भुक्ति ५९ १ ८ से भाग करनेपर ६५९९ चोजन रविस्पष्ट व्यास हुआ। चन्द्र व्यास योजन ४८० को चन्द्र स्पष्टगति ८६० कलासे गुणाकरके चन्द्र- मध्य भुक्ति ७९० । ३८ से भाग करनेपर ५२२ योजन चन्द्रव्यास और १५ से भाग करनेपर ३५ कला चन्द्र स्पष्ट व्यास हुआ। महीव्यास १६०० को चन्द्र स्पष्टगति ८६० से गुणा करके चंद्र मध्य भुक्तिसे भाग करनेपर लन्ध १७४० सूची हुई । रवि स्पष्ट व्यास ६५९९ से मही व्यास १६०० अलग करके चन्द्रमध्य व्यास ४८० से गुणा- करके सूर्यमध्यव्यास ६५०० से माग करने पर ३६९ हुआ। इसको सूचीसे वियोग करनेपर १३७१ छायाव्यास और १५ से भाग करनेपर ९१ छायाच्यासकला हुआ। चन्द्रम्पष्ट ० । २०१९ से राहुस्फुट ० ११५१६ अलग करनेपर ०१५ । ३ हुआ। .
(२४८) सिद्धान्तः- इसकी भुजज्या ३०४ को परमविक्षेप २७० से गुणास्रके त्रिज्या ३४३८ से भाग कर नेपर १४ चन्द्र स्पष्ट विक्षेप हुआ । छाया व्यासकला ९१ भोर चंद्र व्यासकला ३५ एकत्र करके आधे करनेसे ६३ हुए। इसके वर्ग ३९६९ से चन्द्र विक्षेपवर्ग ५७६ अलग करके मूल निकालनेसे ५८ हुए । इसको ६० से गुणाकरके सूर्यचन्द्रमाके गत्यन्तर८०० से भाग करनेपर दण्ड ४।२२ हुई । यही मध्यस्थित्यई है । इस समयके चन्द्रस्फुट ० ॥ १९ ॥ ८ से राहुस्फुट अलग करदेनेपर ० ॥ ४॥२ हुआ इसकी भुजज्या २४२ है । इसको परमविक्षेप २७० से गुणाकरके ३४३८ त्रिज्यासे भाग फरनेपर १९ यह हुआ सो पग मान योगाई वर्गसे अलग करनेपर ३६०६ हुआ। इसके मूल ६० को ६० से गुणकरके गत्यंतरसे भाग करनेपर ४ । ३० स्फुट स्थित्यर्द हुआ । पूर्णिमाके अन्त. में वियोग और योग करनेसे स्पर्श यऔर मोक्ष स्थिर हुआ। चरानयन । वृपका चर निरूपण करना । (२०६१ श्लो॰) राशि अर्थात् ३६०० फलाको ज्या २९७८ है । इसको परम अपक्रम १३९७ से गुणा करके त्रिज्या ३४३८ से भाग परनेपर १२१५ क्रान्तिज्या हुई । १२१५ क्रान्तिब्याके अनुसार उत्तमज्याको ग्रहण करनेसे २२१ ये हुए । त्रिया ३४३८ से उत्तमज्या २२१ को अलग करनेपर ३२१७ दिन व्यास हुआ। क्रान्तिज्या १२१५ को विपुत्रच्छाया ५ से गुणकरके गुणन फलको १२ से भाग दे मागफलको त्रिज्या ३४३८ से गुणा करके ३२१७ दिन व्यास से भाग कानेपर ५३७ प्राण चर नियत हुआ । इससे मेपका चर प्राण अलग करनेपर पकी चर खण्डा होगी। लम्बन (५ १०८ श्लो०)५। १२ दशम लान । ३1८ रविस्पष्ट । दशम लमको क्रान्तिज्या ४३० और धनु ४३० कला । हुमा अक्षांश (अं० २२ १३०) से वियोगकरनेपर ९२० कला नत हुई । इसकी भुजव्या ९१० और कोटीज्या ३३१२ हुई। एक राशिके ज्या वर्ग २९२४९६१ कोटिज्यासे माग करनेपर ८९२ छेद हुए । दशम लग्न और रविस्पष्टान्तरित ज्या ३०९० को छेदसे भाग करने पर दण्फ ३ । २८ लम्बन होताहै । ९१० भुजज्याको ७० से भागकरने पर १३ नति होती है। मुजज्याखण्ड। पंश राशिज्या १ राशिज्या २ २राशिज्या ८७४६२ ८८२९५ ०९१०१ ५२९९२ ५४४६४ ०५२३४.
उदाहरणम् । (२४९) ४ ७ ०५९७६ ५५९१९ ८९८७९ ५ ०८७१६ ८७३५८ १०४५३ १२१८७ ६०१८२ ९२०५० ८ १३९१७ ६१५६६ ९२७१८ १५६४३ ६१९३२ १७३६५ ६४२७२ ११ १९०८२ ६५६०६ ९४५५२ १२ २०७९२ ६६९१३ ९५१०६ २२४९५ ६८२०० १४ २४१९२ ६९४६३ ९६१२६ १५ २५८८२ ७०७१२ १६ २७५६४ ७१९३४ ९७०३० ९७ ९७४३७ ३०९०२ ९७८२५ ३२५५७ ७५४७१ ९८१६३ ३४२०२ ७६६०४ ९८४८१ २१ ३५८३७ ७७७१५ २२ ३७४६१ ७८८०१ ९९०२७ २३ ७९०७३ ७९८६४ ९९२५५ ४०६७४ ८०९०२ ९९४५२ ४२२६५ ८१९१५ ९९६१९ ४३८३७ ८२९०४ ९९७५६ ८३८६७ ९९०६३ २८ ४६९४७ ८४८०५ २९ ४१४८१ ८५७१७ ५०००० .६६०३ उपरोक ज्याको ३४३७७४६७७ से गुणा करनेपर सिदान्तानुयायी प्या होगी पृथ्वी पासाद माइल विपुस्प है। बसेल २५ १९९०५ १००००० (२५०). सूर्यसिद्धांतः। प्रश्नावली। १ सिद्धान्तरहस्यके वनानेवालेने लिखा है, कि कालिके आदिमें७१४४०२२९६६२७ अहर्गणथे । उन्होंने १५१३ शाफेको आदिमें रविवारमध्यरात्रमें र० म० ११ । १७.५६१४१ ० मं ५।१६।५३१५२, चं० के ११।१९।४०।२६, मं० म ७।१० १३.९ वु० शी० ७।११।५५॥३३ ०६।२९।५०।४८, शु० शी०।२५३४०।२९० २८।१।६।०८।२६।३०। ४१ स्थिर करे हैं। २ मथुरानाथ दैवज्ञने लिखा है कि कलिके आदिमें चन्द्रोच २।१७।७।४८,मं०.४॥ ९।५८, धु०७।१०।१९, ०० ५।२१ शु० २।१९।३९ श०७।२६॥३७॥ ३ चंद्रगतिको १७ से गुण करके ४२० से भाग करनेपर चन्द्रमान होताहै ! इस मानको १० से गुण करके ३ से भाग करनेपर तिससे ६० गुणित रविगति से ८७३ घटाकर १११ भागलब्ध अंकहीन करनेसे राहुमान होगा। ४ शुक्रके १० अंश शीघ्रकेन्द्रमें बंशादि २ । १२ फल हुआ। ५ दिनचंद्रिकाके मतसे १५२१ शाकेमें मध्यरेखामें वारादि ४ । ४४ । ८।१३ समयके मध्य विषुवरेखामें सूर्यसंक्रमण है। ६ वाराहामहिरने जातकार्णवमें ९।७। २६ । ३४. आदि २४ रविका खण्डाकी है । और केंद्रानुपातमें खण्डा लेकर फलनिर्णय करनेको कहाँहै । इति । पुस्तक.मिलनेका ठिकाना- गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, खेमराज श्रीकृष्णदास, " लक्ष्मीवकटेश्वर स्टीम् प्रेस, | "श्रीपंकटेश्वर स्टीम् प्रेस, पल्याण-मुई. खेतवाडी-मुंबई qs7 जाहिरात। नाम. की.रु. आ. अयोध्याजातक-भाषाकासमेत आर्यप्रकाश-मापाटीकासमेतं । इसमें तेजी-मन्दी वस्तु देखनेका विचार मलीभाँति लिखागयाहै. पार्यमटीय-(ज्योतिषशास्त्र ) संस्कृतटीका भापाटीकासमेत १-० कर्णकुतूहल-सटीक तथा उदाहरणसहित । ब्रह्मपक्षीय शास्त्र ग्रन्थ .... .... .... ... फरणेन्दुशेखर-इसमें ख्यादि ग्रहोंकी सारणी भलीभांति गई है। तथा सिद्धान्तोक्त सब विषय संक्षेपसे इसमें आगये हैं. कीर्तिपञ्चाङ्ग-संवत् १९७८ का पं० महीधरशांकृत । हिमालयादि देशोंमें यही पंचाग प्रचलित है केशवीजातक-सान्चय सोदाहरण जगदीशत्रिपाठीकृत भापा- टीकासहित । इस ग्रन्थका गणित जन्मपत्रिका बनाने में अप्रूव है। ग्लेज वेतकीपञ्चाङ्ग-शके १८४३ का। इसमें पञ्चांगका गणित बहुत ठीक है और ग्रहण इत्यादिक वराबर मिलते हैं खेटकौतुक-भाषाटीकासमेत । इसमें नबाव वानखानने चमत्कारिक फलदेश यहाहै. गर्गमनोरमा-भाषाटीकासमेत ग्रहगोचर-मापाटीका छादकनिर्णय-ज्योतिाि सुधाकरदिदि संशोधित .... .... .... ... ... ०-२॥ पुस्तकें मिलनेका ठिकाना- गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, " लक्षमावेंकटेश्वर " छापखाना, कल्याण-मुंबई.