University Library,gurukul Kangri Vishwavidyalaya
Vartaman Paristhiti Aur Hamara Kartavya
Front matter
(कल्याण वर्ष २० अंक ११ से उद्ध त)
वर्तमान परिस्थिति
और
हमारा कर्तव्य
बिना मूल्य वितरित
प्रकाशक
-घासीराम शर्मा
फाटक सूरजभान, आगरा
कृपया इसे पढ़कर दूसरों को देदीजियेगा
हमारा कर्त्तव्य [ ले०-हनूमानप्रसाद पोद्दार ] मनुष्य की बड़ी महिमा है । शास्त्रकार मनुष्य-शरीर को बहुत दुर्लभ बतलाते हैं और कहते हैं कि देवता भी इस शरीर की इच्छा करते हैं, क्योंकि जीव-जीवन की पूर्ण परिणित, स्व-स्वरूप प्राप्ति या भगवत् - साक्षात्कार, इसी शरीर के साधनों से प्राप्त होता है। मानव-शरीर में श्राकर ही जीव यथायोग्य साधन करने पर जन्म-मृत्यु के चक्र से छूट कर कृतार्थ हो सकता है। मानव-शरीर की इसीलिए इतनी महिमा है कि उसमें भगवत्कृपा से वह विवेक मिलता है, जिससे नित्य-अनित्य और उपादेय-हेय दस्त की मीमांसा करके जीव नित्य तथा उपादेय का ग्रहण और अनित्य तथा हेय का परित्याग कर सकता है। परन्तु यदि मनुष्य का यही विवेक, मनुष्य की यही बुद्धि विपरीत- गामिनी हो जाय, भलाई को भूल कर बुराई में प्रवृत्ति हो जाय तो फिर बह मनुष्य को खू खार हिस्र जीव-जन्तु और पिशाच राक्षस से भी अधिक भयानक बना देती है और इसके परिणामस्वरूप जगत् में दुःखों की बाढ़ आ जाती है एवं फिर ऐसे असुर-मानव के लिए भीषण नरक-यन्त्रणा की व्यवस्था होती है । खेद है कि आज का मानव प्राणी इसी बुद्धि- विपर्यय के कारण हिस्र पशु और पिशाच से भी अधिक भयङ्कर बन गया है। इसीलिए वह विज्ञान का दुरुपयोग कर क्षणों में लाखों निर्दोष नर- नारी और चालकों को अणुबम की अाग में भंजकर गर्व से छाती फुलाता [ २ ] है, देश का देश को और जाति को जाति का शत्रु बनाकर एक-दूसरे का सून पीने के लिए बाध्य करता है, बूढ़े, रागी तथा बच्चों को तबाह करता है और शताब्दियों की साधना से सञ्चित कलाराशि को देखते ही देखते तल का ढेर बना डालता है ! धर्मप्राण भारतवर्ष में रहने वाला एक मानव-समुदाय तो आज इससे भी आगे बढ़ गया है, उसने तो अपना कायरतापूर्ण कालो करतूतों से अपने मुख पर इतनो ओर ऐसी कालिख पोत ली है-नृशंसता का इतना नंगा नाच किया है कि आज के सभ्य कहलानेवाले उपयुक्त नृशंस मानवों के सामने भी मुंह दिखाने में उसे शर्म पाना चाहिये । परन्तु बुद्धि इतनी विपरीत हो गया है कि आज बह इस नृशंसता को हो गोरव मान रहा है। लोगो मुसल्मान नेताओं की प्रेरणा से अथवा स्टेटममैन के कथनानुसार उनकी पूर्वयोजना के अनुसार कलकत्ते में ऐसे-ऐसे काण्ड हुए, जिन्हें पढ़-सुनकर राक्षस का हृदय भी दहल जाता है, शर्म भी शरमा जाती है और मानवता की श्रॉखें लजा मे सदा के लिए नोची हो जाती है। निर्दोष हिन्दु अबलाओं के स्तन काट लना, उनके हाथ पैर और स्तन काटकर सिर के बालों के सहारे उन्हें ऊंची जगह पेड़ों पर लटका देना, बच्चों को तीसरी-चौथी मंजिल से नीचे फैकना, छोटे-छोटे बच्चोंके शरीरको दरवाजोंसे लगाकर कीलों से ठोक देना, बच्चोंको जलते घरों में फेंकना, माता-पिताको घायल करके उनके सामने अबोध बालिकाओं पर बलात्कार करना, खुले आम सड़कों पर स्त्रियोंकी इज्जन बिगाड़ना, उनके गुप्तांगोंमें तलवार-लाठी घुसेड़ देना, पेट्रोल फेंककर घरोंमें - [ ३ ] आग लगा देना और स्त्री-पुरुष तथा बच्चोंको उनमें जला देना, पीछेसे आकर छुरा भोंक देना, लोगोंको घरोंसे खींचकर उनके जबड़े चूर-चूर कर देना, आंखें निकाल लेना, मुदोपर शस्त्र चला उनके शरीर को कूटना, घायलों के शरीर पर घाव करना, घरोंको तोड़कर सामान लूट लेना, घोड़ों तथा दुधार गायोंको मार डालना और हजारों नर-नारियों और बच्चोंको पंगु बना देना-इस प्रकारके जघन्य कुकृत्य, ऐसे लोमहर्षक पैशाचिक काण्ड करनेवाले मनुष्योंसे रक्तपिपासु पिशाच आर हिंस्र पशु तो सचमुच बहुत पीछे रह जाते हैं। यह गुंडई साधारण मुस्लिम गुण्डों तक ही सीमित नहीं रही धर्म के ठेकेदार बने हुए मुल्लाओं ने भी दंगे के अवसर पर जो किया है वह हिन्दुस्थान का शासन-सूत्र सँभालनेवालों के लिए विचारणीय है। एक अंग्रेज दर्शक का कथन है:- मैंने देखा कि दंगके पहले चार दिनतक मुसल्मान गुण्डों के अनेक दल, कैदीक रूपमें हिन्दुओं को पकड़-पकड़कर मस्जिद के मुल्लाके पास लाते । कैदी अत्यन्त करुणभावसे दया की भिक्षा मांगते पर मुल्ला प्रत्येकके लिए मृत्युदण्ड एवं भयानक यन्त्रणाका आदेश सुनाता । कलकत्ते में जिन सहृदय मुसल्मान और हिन्दू सज्जनों ने हिन्दू और मुसल्मान मुसल्मान परिवारों को शरण देकर बचाया उनकी तो प्रशंसा सभी को करनी पड़ेगी । भगवान सबको ऐसी सुबुद्धि दे।
[ ४ ] कलकत्ते के बाद प्रयाग, दिल्ली, नासिक, बम्बई, बड़ोदा, मुलतान, केटा ढाका ओर सूरत आदि में भी दंगा हो गया। और भी पता नहां, कितनी जगह होगा । बम्बई में छुरों-कटारों की सैकड़ों पेटियाँ बाहर से आई हुई पकड़ी गयीं । लखनऊ, इटारसो तथा प्रयाग में भी पकड़ी गयीं परन्तु बिना पकड़े ऐसा कितनो पेटियाँ डिलोवर हो गयी होंगी, इसे कौन जानता है । इधर बम्बई-कल कत्तै आदि में जो इतने अधिक कायरतपूर्ण छुरेबाजी के काण्ड हो रहे हैं, इससे यह सहज हो अनुपान लगाया जा सकता है कि निर्दोष प्राणियां के खून के प्यासे नेताओं ने भोली जनता को धर्म के नाम पर पागल कर उनमें बड़े व्याप फरूप से छुरे-कटार बटवाये हैं और अभी बँटवा रहे हैं । .ऐसे दंगों में हिन्दुही मरते हो सो बात नहीं है। मुसल्मान भी काफ़ी मरते हैं। यद्यपि मुसल्मान अाक्रमणकारी होने के कारण हिन्दुओं की साम्मत्तिक हानि अधिक होती है, उन्हें पैशाचिक नृशंसता का शिकार होना पड़ता है ओर पहले-पहल मृत्युसंख्या भी उन्हीं की अधिक होती है परन्तु जब हिन्दू अात्मरक्षा या कोई कोई प्रतिहिंसा को भावना से प्रेरित होकर प्रत्या- क्रमण करते हैं तब मुसल्मानों का संहार भी कम नहीं होता। सदियों मे एक देश में-अडोस-पड़ोस में रहने वाले, बल्कि अधिकांश के पूर्वज तो भारतीय हिन्दू ही थे। ऐसे मुसल्मान का हिन्दूओं के साथ ऐसा भयानक दुर्भाव होना देश का तथा दोनों महान् जातियों का भो, वस्ततः बहुत बड़ा दुर्भाग्य परन्तु नेताओं ने कफिरों को मार कर शहीद बनने की जो भ्रमात्मक भावना भर दो है, उसका तो यहीपरिणाम होगा। असल बात तो यह है कि जनता जनता की दुश्मन नहीं है, उनमें है [ ५ ] परस्पर शत्रुता उत्पन्न करने वाले तो नेता ही हैं । कलकत्ते में जिन गुण्डा ने लूट-मार मचाई, उनसे अधिक गुण्डे वे हैं जिन्होंने उनको ऐसा करने के लिए प्रेरणा की ओर इसकी व्यवस्था की। श्राज यदि मुस- ल्मानों में भी कोई गांधी-हृदय के रखने वाले मुसल्मान महानुभाव होते और वे मियाँ जिन्ना के पद पर आसीन होते तो देश में कितनी शान्ति फैली होतो । आज जहाँ घर-घर में मोर्चेबन्दी, लड़ने की गुप्त-प्रकट अायो- जना और अमानुषिक अत्याचारों की कल्पना हो रही है, वहाँ यदि शान्तिप्रिय साधु-स्वभाव नेताओं की सद्भावना तथा सदुपदेश से प्रेरित होकर दोनों जातियों की जनता परस्पर प्रेम से गले लगती, कंधे से कंधा भिड़ा कर खड़ी हुई होती, एक-दूसरे के दुःख में सहायता करती होती और सुख में परिवार के सदस्य की भाँति हिस्सा बँटाती रहती तो गष्ट्र की इस आत्म-हत्या का भयानक दृश्य जगत् के सामने कभी न आता। फिर अाज-जैसी अस्थाई अन्नकोलोन भारतीय सरकार नहीं बनती, पूरी स्वतन्त्रता मिलती और सब लोग पृथ्वी के समस्त राष्ट्रों के सामने सिर ऊँचा करके खड़े हो सकते। चालोस कोटि नर-नारियों की सम्मिलित शक्ति के सामने किसका साहस होता जो कोई अँगुली भी उठा सकता या ऐसी कौन-सी शक्ति रहती जो इन चालीस करोड़ कण्ठों की सम्मिलित आवाज़ का सम्मान न करती । पर दुर्दैववश भारत मोहित हो गया और अंग्रेजों की भेदनीति सफल हो गई ! इसी से भारतियों की बुद्धि में विपर्यय हुआ और ऐसे नृशंस नेता उत्पन्न हो गये जो अपनी नेतागीरी की रक्षा के लिए भीषण नर- संहार, अमानुषिक अत्याचार और चिरकालीन अशान्ति तथा असुख के बीजस्वरूप भेदभाव की भीषण वृद्धि । ६ ] . कराने के निन्दनीय कार्य में लग गये ! परिणाम तो हमारे सामने ही है ! अभी कुछ ही वर्षों पहले भारतीय हिन्दू-मुसल्मानों में बड़ा प्रेम था, उनमें परस्पर विश्वास था और वे भाई-भाई की भाँति एक-दूसरे के सुख- दुःख के साथी थे | पर आज इन नेताश्रो की बदौलत वह स्थिति नहीं रही । हिन्दुओं में अन्त्यज भाइयों के साथ स्पर्श और स्वान-पानादि म्यवहार में आज जैसी छूट है, है, वैसी पहले नहीं थी तथा प उस समय परसर बड़ा प्रेम था। सच्ची प्रात्मीयता थी। आज के अम्बेडकरी अन्त्यज भाइयों की तरह उस समय महात्मा गाँधीजी पर आक्रमण करने, नेताजी को चोट पहुँचाने तथा कांग्रेस को असफल बनाने की बात वे नहीं सोचते थे और न उच्च वर्ण के हिन्दू ही उन्हें पराया समझते थे। उनकी वही स्थिति थी जो एक ही शरीर के पैर जैसे उपयोगी अंग की है । राजनीतिक दलबंदियाँ भी इतनी नहीं थीं। नरम-गरम केवल दो दल माने जाते थे। पान तो कांग्रेस में ही कई दल हैं जो एक-दूसरे को गिराने तथा नीचा दिखाने के लिए प्रयत्नशील हैं। हाल के राजनीतिक दलों में एक कम्यू- निस्ट दल है जिसके सम्बन्ध में यह कहा गया है कि वह हिन्दू मुस्लिम दंगों में मुसल्मानों का साथ देकर हिन्दुओं के घरबार जलाने तथा लूटने में सहायता देता है। पता नहीं, यह बात कहाँ तक सत्य है । पर यदि सत्य है तो यह इस बात का सबूत है कि आज का राजनैतिक जगत बहुत गंदा हो गया है। सुना गया है कि युक्त प्रान्त में और बिहार में जमींदारी-प्रथा के नाश के लिए कांग्रेस सरकार जो प्रयत्न कर रही है, इससे स्वभाविक ही जमींदार क्षब्ध है और ऐसे अवसर पर कम्यूनिस्ट दल के लोग क्षुब्ध जमींदारों से मिलकर कुछ ऐसा कार्य करना चाहते [ . ] हैं जिससे कांग्रेस सरकार के शासन में विघ्न उपस्थित हो। इधर यह सिद्ध हो चुका है कि लीगी मुसल्मान राष्ट्रीय मुसल्मानों को सजा देने पर तुले हैं । सर शशात अहमद पर होने वाला अाक्रमण भोर लाहोर म्युनिसि- पलिटी में लीगियों द्वारा उसका समर्थन हो नहीं बल्कि ऐसे कार्यों के लिए प्रोत्साहन देना इसका जलन्त उदाहरण है । यद्यिप यह सत्य है कि राष्ट्रीय मुसल्मान पहले मुसल्मान हैं और पोछे राष्ट्रोय । यह मोलाना अबुल कलाम आज़ाद साहेब-जैसे महानुभावों के व्याख्यानों से स्पष्ट है तथापि लोग तो उनसे नाराज है ही। मजदूर-मालिकों का सम्बन्ध भी अब प्रेम तथा आत्मीयता का नहीं रहा, उसमें भी बाहरी व्यावहरिकता आ गया और परस्पर काफी तनातनी चल रही है। अभिप्राय यह कि अात्मीयता, प्रेम, सौहार्द, सहानुभूति, सोजन्य, पारस्परिक सहायता और संवा की भावना तो मानो दुनियाँ से उठती चली जा रही है। अधिकार और अर्थ की ओर ही प्रधान लक्ष्य रखने वाले नेताओं को चेष्टानों से जनता में इतना विष-विस्तर होगया है कि उसको ज्वाला से सभी जल रहे हैं और पता नहीं इससे भी अधिक पीड़ित ओर जर्जरित होकर जनता की कितनी दुर्दशा होगी! अभी तो यह सब उनति के नाम पर हो रहा पर जब इसका अन्तिम परिणाम सामने आवेगा, तब निस्सन्देह राष्ट्र का शरीर कॉप जायगा। इतना होने पर भी हिन्दू-संस्कृति अभी जीवित है, यही प्राशा का चिह्न है । भारत वर्ष सबसे पुराना देश है और यह सबसे पुरानी और महान् गौरवमयी सनातन हिन्दू-संस्कृति का आनन्द-निकेतन है। भारत- वर्ष और हिन्दू-जाति के पास यदि कोई अमूल्य और अमिट सम्पत्ति है [ ८ ] तो वह केवल उसकी अध्यात्म तथा धर्ममूलक सनातन संस्कृति ही है। इसी के बल पर भारत तथा भारत की प्रार्य हिन्दू-जाति शताब्दियों के भयानक-से-भयानक बाह्य पोर अभ्यन्तरिक-शारीरिक और नैतिक आक्रमण होने पर भी अभी तक जीवित है। जीवित ही नहीं, आज इस गयी-गुज़री स्थिति में भी वह अपना अमर सन्देश सुनाकर जलते हुए प्राणियों को सान्बना दे रही है कि 'घबरानो नहीं' । वर्णाश्रम तथा व्यक्तियों के विभिन्न धर्मों का विभाग करके समाज का संगठन करने वाली एवं सबको स्वधर्म में स्थिति रहकर ही जीवन-यापन करने की शिक्षा देने वाली; गो-ब्राह्मण असहाय, देश और धर्म की तथा पवित्र नारी-जाति की प्राततायियों के क्रूर हाथों से रक्षा करने के लिए सर्वस्व होम देने का आदेश करने वाली; परलोक अोर पुनर्जन्म में कर्मफल भोगने के सिद्धान्त को मानने वाली; धर्म और जाति के लिए सब को प्राणोत्सर्ग करने का मार्ग बतलाने वाली; नारी को पतिप्राणा होकर सतीत्व की रक्षा के लिए प्रारमदान करने तथा जलती आग में श्रानन्द से कूद पड़ने का महत्त्व बताने वाली; बालकोंको गुरु-माता-पिता तथा देश-धर्म की सेवा के लिए जीव समर्पण करने का कर्तव्य बताने वाली, प्राणीमात्र से प्रेम करने वाली; सर्वभूतों के हितमें ही अपना हित बताने वाली; प्राणीमात्र में परमात्मा को देखनेवाली; अपनी अात्मा से जीवमात्र की श्रात्माको, मानव और पशु की तो बात ही क्या, नरक के कीड़े-जैसे चेतन तथा वृक्ष-लतादि जैसे जड़-जीवो में भी सर्वथा अभिन्न समझनेवाली और राग-द्वेष का पूर्णतया त्याग करके भगवत्स्वरूप में साबुन्य प्राप्त करने को ही जीवन का एकमात्र मुख्य उद्देश्य बताने बाली पवित्रतम तथा सर्वाङ्गपूर्ण हिन्दू-सनातन संस्कृति जब तक जीवित [१] है, तब तक किसी को भय नहीं है । प्रायो-इससे शिक्षा ग्रहण करो, तदनुकूल जीवन बनाश्रो ओर अचल खुश-शान्ति को प्राप्त करो।' लौकिक जीवन में महान् अभ्युदय और पारमार्थिक जोवन में परमात्मा की प्राप्ति- दोनों का एक साथ सुन्दर साधन बतानेवाली यहो एक सनातन संस्कृति है। इधर अंग्रेजी शिक्षा तथा सभ्यता के प्रचार और प्रसार से बससे बड़ी हानि यही हुई कि भारतीय हिन्दू शिक्षित पुरुषों की अपनी संस्कृति से श्रद्धा हट गयी। जिस संस्कृति की महत्ता को लेकर ही हिन्दू जाति जगत् में सम्मानित थी और आज इस परन्त्रताकी दशामें भी सम्मानित है, उसकी श्रोरसे उदासीनता श्रा गयी । यहाँ तक कि पाश्चात्य गुरुत्रों की कुशिक्षाके परिणामस्वरूप अपनी पवित्र संस्कृति में दोष दिखायी देने लगे और उस की अवहेलना तथा विरोध करने-में-उसे मिटाकर उसकी जगह दंभ-दर्प- अभिमान, काम-क्रोध-लोभ, ममता-मोह-अज्ञान, दुराशा-दुष्टता-कुटिलता श्रोर अन्याय-अनृत-अत्याचार श्रादि दोषोंसे भरो, एक-दूसरेको धोखा देने, नोचा गिराने, ठगने और मारने में ही कर्तव्य की इतिश्री समझने वाली, केवल धन-मान अधिकार अदि इहलोकिक भोंगों की प्राप्ति और रक्षाको ही जीवन का परम तथा चरम उद्देश्य बतानेवालो प्रासुरो सभ्यताको प्रतिष्ठा में उन्हें गौरव का बोध होने लगा। ऋषिप्रणीत शास्त्र श्रोर परम्परागत सदाचार की शृंखला टूट गयी, मनमाना आचरण करने में बड़प्पन माना जाने लगा, मन और इन्द्रियों को गुलामी को व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के नाम पर ग्रहण कर लिया गया और सब ओर उच्छ खलता आ गई। युग को लहर यहां तक वही कि उसके प्रभाव से इस युग के बड़े.
[ १० ] बड़े महानुभावों को भी हिन्दू शास्त्रों में शैतानियत दिखाई देने लंगो बार उन्होंने भी बर्णाश्रम को शास्त्रीय पद्धतिका सक्रिय विराध किया । भारतीय हिन्दु सन्तान शास्त्रों की सर्वाङ्गपूर्ण व्यवहार-पद्धतिका अनुमरण न करके एकाङ्गी साधु-पद्धतिका अवलम्बन करने के कारण आततायी स्वभाव के लोगों का दुःसाहस ओर भी बढ़ गया । तथा मियाँ जिन्ना- जैसे लोगों ने इसे हिन्दुओं की कमजारा समझकर और भी जोरों में आपात करना प्रारंभ किया। महात्माजी ओर कांग्रेस जितना ही दबते मए, उतना हो लाभ से लोभ बढ़ने का नोति के अनुमार उनका दिमाग बढ़ता चला गया। पाकिस्तान का दूसरा स्वरूप प्रान्तों का विभाजन स्वीकार कर लिया गया! अस्थाई अन्तर्कालीन सरकार बनो, उसमें लोग शामिल नहीं हुई। परन्तु उसमें भो हिन्दुओं के प्रति अन्याय पार मुसल्मानों के साथ पक्षात किया गया । यह इसीसे सिद्ध है कि चोबास करोड़ हिन्दुओं को ओर से एक भो पृथक् प्रतिनिधि उसमें नहीं है । कांग्रेस के पाँच प्रतिनिधि हैं, जो अपने को हिन्दुओं का प्रतिनिधि नहीं मानकर राष्ट्र का प्रतिनिधि मानते हैं । सात करोड़ अन्त्यज भाइयों के एक प्रतिनिधि, सिखों, ईसाईयों तथा पारसियों के एक-एक प्रतिनिधि है, पर नौ करोड़ मुसल्मानों के पाँच प्रतिनिधि हैं । इतने पर भी मुस्लिम लीग के नेता इस सरकार को 'सवर्ण हिन्दुओं की सरकार' बतलाते हैं श्रोर इसे असफल करने के लिये हर प्रकार के वैध-अवैध, हिंसात्मक कार्य करने को तैयार हैं, जिसका ताजा सबूत 'डाइरेक्ट ऐक्शन' दिनके नाम पर होने वाला कलकत्ते का भयानक नरसंहार और अत्याचार है। इधर बम्बई और अन्य स्थानों में भी उसी के संस्करण प्रारम्भ हो गये हैं !
[ ११ ] प्रथम तो हिन्दूजाति स्वभाव से ही दयालु तथा शान्तिप्रिय है, उसमें करता अाती नहीं और पानी भी नहीं चाहिये, दूसरे कांग्रेस की नीति ने उसको बहुत कमजोर बना दिया है, तीसरे इधर उसमें अपनी संस्कृति के प्रति कुछ अश्चद्धा हो गई है और चौथे कृत्रिम गष्ट्रीयता के मोहने उसका वर्तव्यज्ञान हर लिया है । इसी का पल है कि आज ब्रिटिश भारत में और देशी राज्यों में उसकी संख्या सर्वाधिक होने पर भी उसकी संज्ञा 'साधारण' में है, वही अत्याचार की शिकार हो रही है तथा कहीं भी उसकी कोई सुनवाई नहीं होती । बल्कि पिटे और लुटे जाने पर भी उल्टे वही डाँटी जाती है और दोषी क्गर दी जाती है। एक पक्ष ललकार ललकार कर सीधी चुनौती दे रहा है और दूसरा पक्ष प्रेम के नाम पर किसी प्रलोभन की प्रतारणा से या कायरता से जुष- चाप बैठा हुश्रा अपने दुर्भाग्य के प्रकाश की बाट देख रहा रखना चाहिए कि सहनशीलता और कापुरुषता में, अथवा क्षमा-प्रेम ग्रा कायरता में बडा मागे अन्तर एक मियां साहब कहते हैं कि 'सोर शहरों को बरबाद- वारान कर दिया जायेगा और सड़के लाशों से पाट दी जायेगी। दूसरे खून की नदी बहाने की धमकी देते हैं, तीसरे नादिरशाह और चंगेजखां की याद दिलाते हैं. चौथे एक मुसल्मान के लिए मुस्लिमंतर मभी काफिरों का नाश करना धर्म बतलाते हैं और पांचवें पाकिस्तान या मांत के जंग में मुस्लिम छात्रा को सिर हथेली पर रख कर निकल पड़न की आज्ञा देते हैं तथा मुस्लिम स्त्रियों से घरों में बुर्के के भीतर से मदों को मर्द है - [ १२ ] बनाने का काम एव घरों के अंदर नौजवानों में पाकिस्तानी प्राण फूंकने का काम करने की आशा करत हैं। ऐसी अवस्था में क्या हिन्दू-जनता का हिन्दू नौजवानों का यह कर्त्तव्य नहीं हो जाता कि वे इन क्रूर आक्रमणों से असहाय प्राणियों को बचाने के लिये तथा अपनी मा-बहिनों की इज्जत बचाने के साथ ही आत्म- रक्षा के लिये भली भाँति तैयार हो जाय ? और क्या हिन्दू सती देवियों का यह कर्त्तव्य नहीं है कि वे भी अपने साथ शस्त्र रक्खें और उनके पवित्र मतीत्व पर कुदृष्टि डालने वाले को रणचण्डी-बनकर उसी क्षण उचित सबक सिखा दें ? आज हिन्दू-देवियों में वह सात्विक शक्ति तो नहीं रही कि जैसे बन में अकेली दमयन्ती पर कुदृष्टि डालने वाला व्याध दमयन्ती की तीक्ष्ण दृष्टि पड़ते ही भस्म हो गया था वैसे ही उनकी रष्टिमात्र से ही आततायी भस्म हो जाय। परन्तु पिछली शताब्दियों में जैसे राजपूत-रमणियों ने अपने पवित्र सती- धर्म की रक्षा के लिये प्राणोत्सर्ग किया था, वैसे ही अपनी तीक्ष्णधार कटार से आततायी को शिक्षा देकर माज भी हिन्द-देवियाँ अपने सतीत्व को बचा सकती हैं। और ऐसा करने में प्राणों की आहुति देकर धन्य हो सकती हैं। हमारी कायरता से आततायी का आततायीपन
[ १३ ]
बढ़ जाय और उसके फलस्वरूप उसको तथा सारे समाज
को नरक की आग में जलना पड़े, यह कदापि वाञ्छनीय
नहीं होना चाहिये।
सर्वोत्तम साधन तो अहिंसा है। अहिंसाकी इतनी प्रतिष्ठा हो जाव
कि फिर हमारे समीप आते ही हिंसक जन्त की भी हिंसावृत्ति मर जाय ।
पर ऐसी साधना श्राजशायद ही किसी की हो। ऐसी स्थिति में महात्माजी
के शब्दों में 'विवेकयुक्त हिंसा' से काम लेना जाहिये । हम
किसी पर अकारण आक्रमण न करें, किसी पर कदापि
जरा भी अत्याचार न करें, किसो के धन-जन अथवा
इजत-आवरू लूटने की कभी कल्पना न करें प्रतिहिंसा
तथा प्रतिशोध का भाव भी न रक्खें परन्तु धन-जन तथा
धर्म की रक्षा के लिये, माता-पत्नी और बहिन बेटी की
लाज बचाने के लिये, लूटने तथा आग लगाने को आये
हुए आततायी के क्रूर हाथों से बचने के लिए और
गरीब असहायको निर्भय करने के लिये तो सबको सदा-
सर्वदा सब प्रकार से वीरता के साथ खुले तौर पर भली-
भाँति प्रस्तुत रहना ही चाहिये । इसमें शास्त्र-दृष्टि से
जरा भी दोष नहीं है। वरन् इस प्रकार की विकट परिस्थिति
में यही कर्तव्य-धर्म है।
महात्मा गान्धीजी ने कहा है-
'इतना तो स्पष्ट ही है कि यदि लोग संभवतः
.
[ १४ ।
बीरोचित अहिंसा के प्रयोग के लिये तैयार नहीं हैं तो
उन्हें आत्मरक्षा के लिये बल प्रयोग करने को तैयार रहना
चाहिये पर उसमें छल-छम न हो, आत्मरक्षण सर्वथा विशुद्ध
और सरल हो, तथा कापुरुषता और क्रूरता को भी स्थान
न दिया जाय । इसीलिये उसे कभी गुप्त नहीं रक्खा जाय ।
पीछे से छुरा भोंकना और पकड़े जाने से बचने की चेष्टा
करना ऐसी ही बातें हैं। मैं जानता हूँ कि हम लोग
निहत्थे हैं और हथियार चलाना नहीं जानते । यह अच्छी
बात है या नहीं, इसपर परस्पर विरोधी रायें हो सकती
हैं, परन्तु इसे तो कोई अस्वीकार नहीं कर सकता कि
आत्मरक्षा के लिये मनुष्य को हथियार चलाने की शिक्षा
प्राप्त करना आवश्यक नहीं है । इसके लिये तो आवश्यकता
होती है मजबूत हाथों की और उससे भी मजबूत दिल की।
यह स्पष्ट है कि दूसरे को चोट पहुँचाना हिंसा है:
परन्तु मन-ही-मन दूसरे को चोट पहुँचाने का विचार
रखते हुए भी केवल डरपोकपन से अपनी या अपने पड़ोसी
की रक्षा के लिये तैयार न होना तो शायद उसमे भी
बुरी हिंसा है।'
कलकत्ते में बंगाल के लीगी मुसल्मानों ने हिन्दुओं से ललकार कर
-
कहा है-
'बङ्गाल • मुस्लिम लीग का राज है । अगर तुम्हें जिंदा
[ १५ ] है- रहना है तो हम मुसलमानों का गुलाम बनकर जीना पड़ेगा । पहले जमाने में जब इस सूबे के मालिक मुसल्मान थे, तब हमारी खुशी और इनायत के हासिल करने के लिए तुम अपनी मां-बेटी और बहिनों का सिंगार कर दरबारों में पेश करते थे। अब २५० वर्षों के बाद फिर बंगाल में मुस्लिम राष कायम हो गया। अगर तुम जिन्दा रहना चाहते हो तो उसी तरह हमारे साथ पेश आओ, नहीं तो, हम खून की नदियां बहा देंगे । एक-एक हिन्दू का नामोनिशान मिटा दंगे।' बंगाल के कुछ एम. एल• ए० मुसलमान ने कहा 'हिन्दू देवियां-हिन्दू महिलाएं वेश्याएं हैं, उनके साथ उसी तरह पेश आना चाहिए।' 'आपको (मुसल्मानों को) चाहिए कि उनकी (हिंदुओं की) दुकानें लूट ले या प्रत्येक उपाय से उसे बन्द कर दें ।' 'हम हिन्दुओं को मार डाल ।' ऐसा कहा ही नहीं जा रहा है, बंगाल में वस्तुतः ऐसा किया भी जा रहा है । मुसल्मान गुण्डों के द्वारा दूकानें लूटी जाती हैं और गाँवों में आग लगायी जाती है । हिन्दु व्यापारी जिंदा जलाये जा रहे हैं । लोगों को जबरदस्ती मुसल्मान बनाया जा रहा है । और पिता, पति तथा भाई के हाथों से-दिन दहाड़े हिन्दू-बहू-बेटियों को जबरदस्ती छीन लिया जाता है और उनपर अमानुषिक अत्याचार किये जाते हैं । बङ्गाल के गाँवों में मुसलमानों का यही एक काम हो गया है कि [ १६ ] जिस किसी प्रकार से हिन्दू-देवियों का सतीत्व नष्ट किया जाय । मतलब यह कि बंगाल मैं हिन्दुओं का जान-माल और इजत-श्राबरू सभी कुछ मुसल्मान गुण्डों के हाथों में है ! नोपाखाली में तो कांग्रेस दफ्तर तक जला दिया गया। एक कांग्रेस कार्यकर्ता को मार डाला गया । चटगाँव, ढाका मैमनसिंह श्रादि जिलों में लगातार ही ऐसे भयानक अत्याचार हो रहे हैं ! बंगाल में मुसल्मानों की संख्या हिन्दुत्रों से कुछ ही अधिक है, वहाँ यह स्थिति है । फिर पञ्जाब, सीमा प्रान्त और सिन्ध के उन स्थानों में, जहाँ मुसल्मानों की संख्या बहुत अधिक है-वहाँ पता. नहीं, इन गुण्डों के द्वारा कैसे २ अत्याचार होते होंगे या होसकते हैं !! इस स्थित में जिन प्रान्तों में हिन्दू-संख्या अधिक है, उन हिन्दुओं में यदि हिन्दू मा-बहिन और बहू-बेटियों पर होनेवाले इस पैशाचिक, कायिक, वाचिक और मानसिक अत्याचार के कारण पागलपन आ जाय ओर उनमें भी ऐसी ही जघन्य पाप-भावना जाग्रत् हो जाय,-जो हिन्दुओं में नहीं होनी चाहिये और जिसकी सम्भावना भी नहीं है तो मुसलमानोंके लिये भी कम विपत्ति की बात नहीं हो सकती । परन्तु मुसल्मान तो हिन्दुओं की इस क्षमारूपी कायाता का लाभ उठाकर यह निश्चय कर चुके हैं कि इस हिन्दू कायर है । मुसल्मानी प्रान्तों में हम जो चाहें सो करें हिन्दू-प्रान्तों में हिन्दू हमाग कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते और न कांग्रसे सरकार ही हमारा बाल बाँका कर सकती है ! बात भी कुछ ऐसो हो है । मुसल्मानों के प्रमानुषी अत्याचारों को रोकने का प्रस्ततः कोई भी ठोस उपाय अभी तक नहीं हो रहा है।
[ १७ ] मैं केन्द्रिय सरकार से विनयपूर्वक प्रार्थना करता हूँ कि वह इन नृशंस अत्याचारों की ओर पूरा ध्यान दे। मेरा विश्वास है कि पंडित जवाहरलालजी नेहरू-सरीखे निर्भीक पुरुष तथा उनकी सरकार इस प्रकार के पैशाचिक अत्याचारोंको-जो पहले से प्रायोजित है और आज भी जिनका समर्थन किया जा रहा है तथा अन्यान्य स्थानों में भी वैसे हो करने का प्रायोजन एवं सूत्रपात हो रहा है, कदापि नहीं सह सकेंगें ओर अपनी पूरी शक्ति लगाकर इन्हें असम्भव कर देंगे। अन्यथा, न तो न्यायकी रक्षा होगी, न प्रजा सुख-शान्ति से रह सकेगी और न शासन दण्ड का ही चलना संभव होगा। मेरी प्रान्तीय कांग्रेस सरकारों से भी विनम्र प्रार्थना है कि बड़ी साब- धानो के साथ पूरा बल लगाकर ऐसे अत्याचारी की जड़ काट दें। नहों तो, यदि यह प्रवाह यों ही चलता रहा और परिस्थिति बेकाबू हो गयी तो पीछे शान्ति स्थापन करने में बड़ो कठिनता होगी। लोगी मुसलमानों का गुण्डईसे कितना प्रेम होगया है इसका एक ताजा सबूत है-उस दिन नागपुर असेम्बली में जब 'गुण्डा कानून' स्वीकृत हुश्रा तब उसके विरोध में लीगी सदस्य उठकर असेम्बली-भवन. चले गये। अभी उस दिन एक मुसल्मान सज्जन ने यह स्पष्ट कहा कि 'इस बातको हम बातको हम मानते हैं कि मानते हैं कि हिन्दू कायर हैं और मुसल्मान गुर्डे हैं पर अराजकता के समय गुण्डे ही सफल होते हैं।' केन्द्रीय तथा प्रान्तीय सरकारों को चाहिए कि गुण्डई के इस प्रवाह से बाहर
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[ १८ ]
को कड़ाई से रोक दें और हिन्दुओं को भी धर्मरक्षार्थ प्रागों का मोह बोड
कर इस गुण्डेपन से बचने के लिए विशेष रूप से मतकं सब प्रकार मे
प्रस्तत हो जाना चाहिये।
पर्चमान समय में कम-से-कम निमलिखित कार्य करने की
तो अत्यन्त आवश्यकता है-
१-नगरों और गांवों के प्रत्येक मुहल्ले में सुव्यवस्थित 'रचा-
दल' का निर्माण करना ।
प्रात्मरक्षा के लिए जनता में विश्वास उत्पच करना ।
-अपने में इतना बल बढ़ाना कि जिसे देखकर दूसरों के
मन में कभी किसी प्रकार का अत्याचार करने का साहस
ही न हो।
१-घायलों तथा बीमारों की सेवा के लिए मुहल्ले-मुहल्ले और
घर-घर में 'फर्स्ट एड' (शीघ्र उपचार) की व्यवस्था करना।
प्रसंग आने पर मेवा शुश्रूषा का प्रबन्ध करना । राशन मे
बचाकर कुछ अन्न का घरों में संग्रह करना ।
५-घायलों, बीमारों तथा अत्याचार पीड़ित परिवारों तथा
व्यक्तियों की सहायता के लिए धन एकत्र करना और
समय पर उसका सदुपयोग करना ।
-स्त्रियों को आत्मरक्षा के योग्य साधन प्रदान करना और
. उनमें, वीरांगनाओं के स्वभाव की स्फूर्ति हो, ऐसा उपदेश
देना तथा साहस भरना ।
[ १९ ]
बचों को सदा सुरक्षित रखना ।
८-पापस के मतभेदों तथा वैर-विरोष को
मलाकर
माततायी
का सामना करने के लिये संगठित रूप से वीरता के साथ
तैयार रहना।
६-अफवाहें न फैलने देना, न अफवाहों पर विश्वास करना
परन्तु सदा चौकन्ना भी अवश्य रहना ।
-बेड़-छाड़ न हो, और मामूली छेड़-छाड़ में बात न पढ़ने
पावे, इसके लिये सतर्कता तथा बुद्धिमत्ता से काम लेना।
११-हिन्दू-मुसल्मानों में तथा अन्यान्य परस्पर-विरोधी लोगों में
प्रेम,सद्भाव तथा विश्वास उत्पन्न हो इसके लिये सदा सन्चे
दिल से एक दूसरे की सेवा तथा सहायता करना ।
१२-हिन्दू-मुसल्मान कोई भी शरण में आ जाय, उसको
ईमानदारी के साथ आततायी के हाथों से बचाना, परन्तु
होम करते हाथ न जल जाय, इसके लिये पूरा सापपान
भी रहना।
यहाँ जगत में जो कुछ होगा सो सब भगवान् की ही सीखा हो
रही है और हो भी रही है भगवान में हो। यह रहस्य बिस की समझ में
प्रागया है वह तो दूसरे ही गन्य मे पहुँच गया है और वह बिस स्तर में
होता है, उससे इस दुनिया का कोई सास सम्बन्ध मी नहीं होता, । तमाम
इस दुनिया के स्तर में उतरने पर व्यवहार के क्षेत्र में उस पुरुष पर भी
कुछ दायित्व पा जाता है और उसका भी कुछ कर्तव्य हो जाता है एवं
[ २० ] नै उसे राग-द्वेष रहित चित्त ने चतर नट (actor ) की भाँति अपने हिस्से का अभिनय भी करना पड़ता है। अातताया आततायोपन का नाश करना भी लकोसंग्रह का एक महत्त्वपूर्ण अंग है ये सब लोकिक उपाय हैं और व्यवहार में अपने-अपने अधिकार के अनुसार इनको काम में लाने की अत्यन्त आवश्यकता है। जो लोग इन उपायों से काम नहीं लेने उन्हें प्रायः विफलता हो प्राप्त हाती है और अंत में गहरा पश्चात्ताप करना पड़ता इतना होने पर भी असली उपाय तो दूसरा ही है, और वह है 'भगवत्प्रीत्यर्थ देवाराधन अथवा भगवदाश्रय- पूर्वक भगवदाराधन ।' ऐसे अवसरों पर जगह-जगह धार्मिक अनुष्ठान, शास्त्रीय मन्त्रपुरश्चरण, वैदिक तथा तान्त्रिक प्रयोग, चण्डी गणेश की सबिधि उपासना, तथा वैदिक और पौराणिक यज्ञ-याग होने चाहिये । इनसे प्रकृति के मूल में परिवर्तन होगा और लोगों की बुद्धि में सात्विकता आवेगी। साथ ही अपनी-अपनी स्थिति के अनुसार विश्वशान्ति तथा धर्माभ्युदय की कामना से अयमा केवल भगवत्प्रीत्यर्थ साविक दान, श्रीमद्भागवत-श्री मद्भगवद्गीता तथा श्रीरामचरितमानसके पारायण और अखण्ड हरि-कीर्तन होने चाहिये । सच्चे हृदय से सबको सद्बुद्धि की प्राप्ति तथा सबके कल्याण के लिए भगवान् से प्रार्थना करनी चाहिए।
[ २१ ]
यह याद रखना चाहिए कि हिन्दू मुसल्मान, पारसी
ईसाई सभी एक ही भगवान् के स्वरूप, अंश या सन्तान
हैं । सभी में आत्मारूप से एक ही भगवान् विराजमान
हैं । एक के अमंगल में दूसरे का अमंगल और एक के
मंगल में दूसरे का मंगल निहित है। अतएव ऐसी सद्भा-
वना और प्रार्थना करनी चाहिए कि भगवान् सबका
कल्याण करें। सब को सन्मति और सद्गति प्रदान करें।
जगत् में सर्वत्र सुख-शान्ति का प्रसार और विस्तार हो ।
सभी सुखी हौं, सभी तन-मन से निरोग हों, सभी सदा
मंगलों का साक्षात्कार करें और दुःख का भाग किसी
को भी न मिले।
सर्वे भवन्तु सुखिनः सव सन्तु निरामयाः।
सेंव भद्राणि पश्यन्तु मा काश्चिदुःखभाग्भवेत् ॥
समाप्त
G.M.P.Agra.