Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Sirjan

Tej Singh Jodha · 2011/03

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शिक्षक दिवस
1981
सरतण
सम्पादक तेजसिंजोधा

शिक्षा विभाग राजस्थान
के लिए
चिन्मय प्रकाशन
पौड़ा रास्ता, जयपुर 302003

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शिक्षा विभाग राजस्थान, बीकानेर
शिक्षक दिवस के अवसर पर
शिक्षा विभाग राजस्थान
के लिए
प्रकाशक : विन्मय प्रकाशन, चौड़ा रास्ता, जयपुर-302003
मुद्रक : जयपुर मान प्रिन्टर्स, चौडा रास्ता, जयपुर-302003
प्रावरण : पारस मंसाली
सन् : 1981
मूल्य
:9-60
SIRJAN (Rajasthani Vividha) Edited by : Tej Singh Jodha
Price:960

आमुख. राजस्थान के शिक्षक साहित्यकारों की साहित्यिक रचनाओं को पुस्तका- कार प्रकाशित करके आज के दिन पाठकों के हाथों में सौंपते हुए मुझे अत्यन्त * खुशी है 'खुशी इस बात की भी है मुझे, कि हमारा प्रध्यापक-वर्ग. स्वाध्याय और चिंतन की राहों पर है, तथा साहित्य के सृजन एवं संवर्धन में साधक की भांति तत्परता से लगा है। यही नहीं साहित्य की गतिशील पारा के साथ नित नये सृजन के प्रतिमान भी स्थापित कर रहा है वह-वस्तु, शिल्प एवं अभिव्यक्ति के स्तरों पर। जिस तरह से अतीत में शिक्षक साहित्यकारों ने साहित्य को श्रीवृद्धि में योगदान किया था, चाहे काव्य-शास्त्र के सिद्धान्तों की रचना का कम हो या साहित्यालोचन के मानदण्ड निर्धारण की जरूरत, उस काल के प्राचार्यों व शिक्षकों ने उक्त विषयों में अपने गहन वैज्ञानिक 'चिन्तन की छाप अंकित की थी तथा काव्य, नाट्य, निबन्ध, गल्प प्रादि विधानों में कालजयी कृतियां दी थीं, वैसे ही संतोष के साथ महज इतना तो स्वीकार किया जा सकता है कि राज्य के हमारे ये शिक्षक-साहित्यकार एक सर्कल्प के साथ साहित्य सृजन से संपृक्त हैं । रही बात शाश्वत मूल्य के साहित्य की-तो इसका मूल्यांकन करने वाले हम कौन है, भाने वाली पीढ़ियों को देखना है वह सब । शिक्षा विभाग ने सन् : 1967 मे शिक्षक दिवस प्रकाशन योजना'.' प्रचारित करके शिक्षकों से साहित्य साधना में तत्पर रहने का जो प्राग्रह किया था, वह विंगत 15 वर्षों से अनवरत-अवाध चल रहा है। विभाग की इस योजना को न सिर्फ स्तरीय पत्र-पत्रिकामों में प्रशंसा हुई है अपितु अन्य

राज्यों ने भी सराहना की है तथा उन्होंने अपने यहां भी ऐसे प्रयास प्रारम्भ
इस वर्ष के पांच प्रकाशन हैं :-
(1) अंधेरों का हिसाब (कविता) संपा: सर्वेश्वर दयाल सक्सेना,
(2) अपने से परे (कहानी) संपा : मन्नू भंडारी,
(3) वंदेमातरम् (निबंध) संपा : विकीराय,
(4) एक दुनिया बच्चो को (बाल साहित्य) : संपा : पुष्पा भारती,
(5) सिरजरण
(राजस्थानी) संपा': तेज सिंघ जोधा
प्रस्तुत संकलन के रचनाकारों को मेरी बधाई तथा सशस्वी संपादक
श्री तेज सिंघ जोधा के प्रति मेरा प्राभार, कि उन्होंने प्रतिरिक्त श्रम करके,
शिक्षकों की ढेर सारी रचनामों को देखा-परखा तथा उसमें से श्रेष्ठ व
संभावनायुक्त को संकलन में स्थान दिया। साथ ही प्रकाशकों का भी मैं
प्राभारी हूँ जिन्होंने तत्परता से ये पुस्तके यथासमय प्रकाशित करके हमें
सहयोग दिया।
शिक्षक दिवस, 1981
-~अशोक कुमार पाण्डे
निदेशक
प्राथ. एवं माध्य. शिक्षा
राजस्थान, बीकानेर

बतळावण इए बार सिक्षा विभाग री सालीणी राजस्थांनी पोथी र सपादन रो प्रोसर म्हन मिळियो, पर इण मिस आप सगळा राजस्थांनी रा अध्यापक लिखारा नै भेकठ बतळावा रौ मौको। आप में मू केई तिसारा ने म्है पेला सूई जाणू। राजस्थांनी पत्र-पत्रिकाया रौ संपादन करतां पाप में सू केई लिसारां री रचनावां रे प्रामी-सामी होवा री जोग-संजोग म्हनै पैला ई केई वार मिळियो। म्है इण बात'ने मानू', अर म्है ईकाई राजस्थांनी साहित र काम में लागोड़ो अंकक प्रादमी इण यात नै माछी तरिया माने, के पाप अध्यापक लिखारा, राजस्थांनी न केई भात सूफळिया । जे गिणती रै हिंसाब सूई देखां, तो आपने टाळियां पछ राजस्थांनी मे की न काई बचे, लिखारा ई कठ, फगत प्रांगळियां मा गिणा जितराक ई नांव रैय जावै। पर साहितिक मानता र नपारणे ई आप किणी सू घाट कोनी उतरौ। केन्द्रीय साहित अकादमी सू'लगार राजस्थान साहित अकादमी ताई रा सगळा पुरस्कारा मे सदा प्रापरी उछळपांती रखें । करतां नी करतां प्राज री घड़ी आप लोगो में पांच-सातेक नाव ती; पकायत ई अड़ा, जिकां री साहितिक रठ-पैठ पर मानता में किणी भात रो रोळी-दावी कोनी । जे राजस्थानी साहितकारांरी पैली पांत रा नाव गिरणावरणा हो, तो वां अन्नाराम सुदामा, नरसिंघ राजपुरोहित; कल्याणसिंघ राजावत पर सोबर दइया इत्याद रा नाव तो पल 'चोट ई लिया जाय सके, जिका के पाप लोगा मे सू है। . ग इण सगळी बात री प्ररथ प्री, के पाज री चिळियां आप अध्यापक- लिखारा राजस्थानी.री सावठी पूजी हो, अर राजस्थानी प्राप सूघणी प्रास- उम्मीद रारी । इस शांच रौ मरम मेक जगी माप मापरं जीव में जवन सूलाडां-कोटा संभाळ'र राती । प्राई साल शिक्षा विभाग माप लोगां री रचनांवा रोपौधी-स्प का। उरण पोथी-रूप ने भाप ई देखता-करता होस्यो । कितरी मादी तो छपाई पर बितरी नामी सिणगार सालोसान पौधी रो! मेकर तो देस्याई जीव धाप । यार मू बुलायोड़ा संपादक फेर न्यारा। प्राप मुद ई मानायो के विभाग तो सुद कानी गू किणों वात रो घाटौ रास प्राय यांनी, रचनावांस तो लावै काटा गू, व तो प्रापई भेजसो, जैड़ी होमी । लारला तीन-च्यार बरसां री पोथ्यां माप देसी व्होला। मेक सास ढाळ री करसता वा में साग । यी लेखक इण वात ने जाणगा के भाई साल पारी कथाया ई पसी, की कवितावां री अंदाज कर लीधी, की लिखारा ने रेखा-चितरांम रौ सळ लागी, बचियोड़ी विधावा री बांट-चूट ई. सगळा प्राप भापरं भनाग्याना करली । अव संपादक कन करवा ने ₹ई काई गौ? वो तो परवरा ई व्हेगी । मापरं नचायो ई नाचसी। क्यू के न्यारी न्यारी विधावा र पेट प्रेक सास किसम री मोनोपोली पर वाट-चूट तो पंलाई व्हेगी, सो वां वा विधावां में तो पापरी भेजियोड़ी रचनावा ई छपसी, भलाई उगणीस भेगो भर भलाई इक्कीस । पर जद चपणी इण भांत पलाई ते व्हेगी, तो इक्कीस भेजवा री लाचारी ई कुरणसी ? मां पोपियां री प्रेकरसता कीकर तूट, पर श्रे पोथियां रीतरी रायती व्हैय'रई नौं रेय जावै, इणरौ जतन विभाग ने ई करणौ पड़सी, पर प्रापन ई । क्यू के खतरौ तौ पोळ-दोळ है, पर उपरी सखाव म्हन . साफ-साफ होवे। पापा सगळां मे ई स्थितिसीलता की अंगी भावं, भर आपां जड़ होवतां जेज कोनी करां। विभाग ने तो म्हैं यो सुझाव देस्यू के वी संपादक ने प्रन बगत माय नी चेतायर काफी दिनां पली सूई साथ लेय लेवे, लिखारा ने ई उण नांव रौ पती पंखां सूई पटक देव, अर पछ संपादक जिण भात इण काम मै करवौ चावै, उण में संपादक री पूरी सहयोग राखे । दूनी भासावां मे तो न्हो नी व्ही. राजस्थांनी जैडी भासा में तो इण भांत काम सुयां ई ज्यादा प्ररथाऊ नतीजा प्राय सके । इण मू विभाग री परेशानी तो जरूर बढ़सी, .

पण पूरी प्रक्रिया में साय होयां संपादक न ई काम करवा रौ पाणंद प्रासी, लेसका रो मनोवळ ई बधसी, पर इण सिक्षक दिवरा योजना री पोथी रौ पई सालोसाल सवायो म्हैतो जासी। लिखारा सू, सासकर वो लिखोरां सूजिका अध्यापक है, अर राजस्थांनी रा मानीता साहितकार बाजे, या अरदाम करस्यू, बै किरणी बम या लापरवाही री- वजह सू इण योजना री पौथियां में छपणी फगत श्रेक औपचारिक सो काम नी मान, अर, आपरौ नवै सूनवी अर बढिया सू बढ़िया सिरजण आई साल पा पोथिया नै सू। जदई ओ पोथियां री "सास बढ़सी, घर प्राम,जैड़ा मानीता लिखारा रे विभाग में होवण रौ फायदी विभाग नै, पर विभाग रा दूजा नवा लिखारा न मिळसी। इण वार जिकी रचनावां म्हार वान रांपादन सारू पाई, वा मे मू जरूर की रचनावां चरचा-जड़ी लांग, अर म्है अवस कर वाई रंचनावा री चरचा अठ करस्यू। सस्पोत में कथावा नै लो। सवाई सिंघ सेखावत री 'कूपळ' इण पोथी री प्राची कथा है। उण नै कथावा र पेट इण वार री उपलब्धि कैय संका। जोध-जवांन म्हैती करसै री.बेटी ने जद ब्यांवती गाय री सार-संभाळ' करणी पड़ जावं, तो गाय रे, व्यांदणं री या पूरी घटणा कः भविस री संकेत' देवंती थकी जाण उणी रै मावीमाव घटै। उरण कंवारी कन्या री मनगत माथै प्रावता भात-भोत रा रंग, अर वठी व्यावण मत प्रायोड़ी गाय री पीड़ रा. भावळियां भरता. दरसाव, कथा में कमेकसा होयोड़ा लखावै । कभा-विकास रै.साथ-साथ पाठक उण लड़की नै लुगाई वणतां देखें, अर कथा' निवडतां-निवड़ता जच्चा होवरण रौ सपनी उण लड़की री कूख मे कुळमुळावण' लागे । प्रर उण, लड़को रौ मेन व्है, जाणं अबार ई जाय र मान पूछ- "मावड़ी धू, म्हनै कद परणाशी ?" अर इण भांत औचक ई वा कथा उण लड़की रे मा वणवा सूजुड़ियं थक परणीजया र कोड पर लाग में लुक'र निबड़ जावक ठावो असर छोडती थकी। दूजी भली कथावों में सॉवर' दइया री 'सजा' भर मुरलीधर मरमा 'विमल' री मायड़ मन' रोनाव प्रागी । 'मजा' री कथा अध्यापका रे जीवण' ने ले'र चाले । प्रमोसन होयां जद किरणों अध्यापक ने नगर छोडेर गोड़िया. गावां मे जावणी पड़ जाव, तो कोकर वो प्रमोसन उपर वास्तै सजा होय जावे, इगरी वखाण प्रा कथा करें। पर अलावा अध्यापक र जीवण में कितरी निरासा, कितरौ फालतूपणी पर कितरी कम उम्मीदा रंगी, प्रां सब :- रौ दलियो-दवियो जिकर ई इण पाखी कथा में सांचरियोड़ो लागे । 'मायड़- मन' कथा इण मध-मैप सांच ने दरसाव, के मायड़ रो मन तो सेवट मायड रौई मन है । कितरौई क्यूनों व्हीउपर हार्था वेट रौ नुकसारण तो हरगिज ई कोनी हौवें । इण कथा मे वही बेटी मान कूट'र घर बार काढ़, देव। सरूपोत में तो दूजा घर वाळो रे साथ-साथ मां रे मन में ई रीस होव, के बेटे ने सजा मिलणी चाहिजे, पण सेवट वेट ₹ सिलाफ अदालत पर पुलिस री कारवाई करती वा तक जावे। बाकी सगळी वातां न तो कथाकार माछी तरियां विगताय दो, पण जे मारे मन में प्रायोड़ इए औचक बदळाव में ई की खटकंदार तरीके सू तातो, तो कथा री खबसूरती बघ जावती । प्रो वदळाव कथा में हकनाक पर अकारण सो अयोड़ो लाग, जद के प्री ई कथा रौ मरम हो। नरसिंघ राजपुरोहित क्यू के राजस्थांनी रा पुराणा पर टाळका कथाकार है, सो वै आपरी 'चोळा' कथा नै निभाय तो परीळोधी, परा कथा नै वारी टाळकी कथा नी कय सको। . कथावा रे प? निबंध अर रेखा-चितरामा रो जिकर करस्यू। प्रिलोक गोयल से लोग के कैवला' प्रापन हास्य पर व्यंग री आछौ निबंध लागसी । मास्टर रामसरूप जी में हैडमास्टर होयां पर्छ काई काई. बीती, इणरी मर्जदार जिकर आप पढ़स्यो । पापड़-पांवई 'लोग के कैवला रो डर'। सावचेती री कागलो कदै हैडमास्टर जी मैं बड़'र वोले, ती कदै हैडमास्टरणी जी में । दूजा निबंधों में अमोलकचन्द जांगिड री 'डर' निबंध ई मापन पसंद मासी, सासकर भासा रे तालकै । रेसा-चितरामा रे सोग रामनिवास सोनी रो'पोकर गरू री वाता' पर दिलीपसिंघ चौहाण से 'डूगरींग जी वांका' पाठक नै मन लगायौ राखवा रोखासी सामान देसी। प्रय कवितावा रो चरचा सौ । म्हारं कर्न पूगी सामग्री मे गद्य-विधाया करता कवितावा ई वैसी हो। इण मू यंदाज म्यिो के अध्यापक-लिसारा में कविता लिसवा रो भरसी पणो । ठेट दहा गूसगार गीत, गजल पर जिणनं नवी कविता कवं, उण तकात री, सब मांतरी रचनावां म्हार सांमी आई । की कवी प्रयस ई.ध्यान खींचे । भगवतीलाल व्यास, स्यामसुंदर भारती, रघुनन्दन त्रिवेदी, भागीरथ सिंघ, भाग्य, सिव मृदुल, कल्याणसिंघ राजावत पर रामेस्वर दयाल थीमाळी रा नाय प्रेड़ा कवियों में लेवां जैड़ा। इणवार म्हें रेडियो रूपक र प्रांट ई भेक कविता नाटक दियो--कल्याण सिंघ राजावत ..'नुगरौ होग्यो नेह': अवसई मो नाटक प्रापन दाय पासी। दूजी की विधावां ने इणवार, रचनावां प्राधी नी लाग्या म्हैं टाळ दी। क.उपन्यास ई आयो हो, रामनिवास सरमा रौ 'माझळ', अर हो ई प्राछो, पण पेजां से सांकड़ेलो जांण उणन छोड देवणी पड़ियो। इण वात रो ध्यान ई म्है राख्यो के बेसी सूबेसी लिसारा इण में छप । इण वास्तै जिका लिखारा-री ग्रेक सूबेसी विधांवा में रचनावां आई, यांन ई रचनावां पाछी होता यकां ई घणकराक कई विधा र सीग लिया। प्रा तो व्ही पोथी पेटै रचनावां री चरचा। अब म्हैं की दूजी बातां री चरचा ई भापर सांमी करस्यू। . 'सब पैला तो भासा री चरचा। प्राप-म्हे राजस्थांनी रा लिखारा तो हैईगा। राजस्थांनी में बकायदा लिखरणों सरू कर ई दियौ । अब म्हैं आपने कैऊ के पापा भासा सौखणी सरू करदां । बोत चाल री राजस्थांनी सू प्रापां री धाको घणा दिन कोनी धिकसी । जे लेखक होवण री लांबी हर रासस्यां, तो आपांन भासा सीखवा रा दूजा मारग ई सोधणा पड़सी । मान लीधी के प्रापनि स्कूलां पर कॉलेजां में कायदै मू राजस्थांनी सीखवा रो मौको कोनी,मिळियौ, पण यो प्रोळावी कितराक दिन लेस्या, पर तेसक होयां लेवण ई कुणं देसी ? अंडी मोळावी लेता भूडा नी लागस्या ?.सेसक होवण री तो प्रापां विचारी हो, प्रो तो मापारी गोदम है के भासा नै कठ-कठे स्वपरायां पर सीखो, दूजां ने इण सू कांई तल्ली-मल्ली? को मारग म्हने सूझ, आपने ई सूझता होसी। आं बरसों में राजस्थानी रौ जुनौ साहित सासो धपियो, लोक साहित ई निरो मुडागै आयो, मो-दोळ केई ,लिसारा ई राजस्थानी लिरो, अर वारी पोथ्यां ई सालोसाल छप, ग्रेकर सी तो आपां ध्यान देवां तो राजस्थांनी में छपियोड़ी पोथ्यां रौई घाटो कोनी । वान - ई बांध लेस्या, तो घणो की निस्तार व्है जासी । पापां री भासा में उरळाई पर समझदारी आसी। । आप तो अध्यापक हो, खुदई इण वात माछी तरियां जाणो के भासा तो सीखियां सूआवै, पर उगन थोड़ी-धरणी कमावणी ई पड़े । जिए भांत करसो सेत कमावं, उणी भांत लिखारी भासा कमावै । भासा ई लिखार री से सूमोटी पूजी व्है, पर आप जाणो के पोछी पूजी धरणीनं मार न्हावं, प्रोधी पूंजी सूकुरणसा वौपार व्है ? 'इण वास्तै म्है प्रापन इतरौ ई काहसू पर बार-बार कहसू.के.प्रेक वळा ती च्यार मेर सू भासा न जुटानो, भात-भांत सू सोतो, भेळी करो पर कमावौ। भासा सीखियां अर कमायां बिना कटई ढोई नी है, मापां लेखक होवण रौ विरथाई बोझ धीसांला। यूवरस गांळवा में की सार" कोनी। भासा रै पर्छ प्रेक दूजी वात । जे प्रापां राजस्थानी रा लेखक हां, के राजस्थांनी रा लेखक होवण री मन मे विचार रासां, तो इण वांत ने नीका-नीकां समझ ला, के राजस्थान रे तालक जिण किणी भासा में जितरी की जाणवा ने मिळ; यो सब पापा र काम रौ है। राजस्थान से मिनस, राजस्थान री समाज, राजस्थान से इतिहास, राजस्थान री भूगोल, राजस्थान री संस्थती अर राजस्थान से जीवण, क ई चीज पापा री.प्रांस मू ट्यूटी नी चाहिजे । जितरा-जितरा . पापां पा मगळी चीजां सूजुडस्या, उतरी-उतरौ ई मापां री लिखाई में गाढ़ भार्या जागी, पर आपां प्रावण पाळं वरसां मांछी तरियां पापरस्यां । भाराा निवळी चीज नी है, किणी मास कौम, समाज, इतिहास, भूगोण, पर गस्ती में उणरी जहां है, पर या गवगू पाद-पाणी लिया । या पन | मा स्कूला-कॉलेजों में जितरी राजस्थान याच सियो, उतरी ई पूरगा नी है, नी पट्टिया-डिया जितरी दीरी, उण गू.ग्रापां गे काम पाये।

मेर सावते. राजस्थान ने जाणवा-चीहवा, पर उगागू जुया री “गाड़ी मेपळ पापा ने 'करणी पसी । यो राजम्यान हाय-यगू होगा ई पापा री कलम में पाए प्रासी। म्हें जाणूमो जड़ा छोटी-छोटा गांवड़ियों में पाप विराजो, धठ पोधियां भर पपिकायों से घणी पूग नीं है । पण तो ईमापन वा ताई पूगरणी पदमी। - कीकर पूगगो, प्राधी माप जाणी, याकी पूगियां बिना सराय नी है, ने राक हो, तो मलाई किरणों ने पूछ लीजी। राजस्थांनी री पोथ्यां भर पपिकाव तो मापने सासती बांधणी पाहिज ई, दूजी भामाया र साहित में ई माज री वेळा कौड़ी काई लिसीज, गरी जाणकारोई मापन वरोवर रेघणी चाहिजे । नीतर पढ़ाई रे दिनां स्कूलो- कॉलेना री पठेती पोथ्या में जिको साहित पड़ियो होमी, बीई प्रापरी पूठ में काम करसी पर प्राप.उग्णी श्री बंधोकड़ी में बंधियोड़ा रस्यौ। पर पठेती- पोथ्या में तो भाप मुद ई नाणी, प्रापरी ऊमर ढढ़ियां पर्छ ई साहित पूर्ण । पछेती ई पछतां को बातां फेर कहस्यू। । इण वगत राजस्थांनी भासा रा जितरा काम है, वे राजस्थानी में सिरजण राई काम है। वां ने इणी भांत समझणा चाहिजे । इण बगत गजस्थांनी रो जितरी भांत भात री बेगार प्रापां करस्यां, उतरौ ई पापा से • राजस्यांनी सू":"जुड़ाव बधसी, पापां राजस्यांनी सूअकजीव होस्या, अर . आपों में सिरजण री बेसी सूबेसी खिमता प्रासी । इण वर्गत राजस्थांनी रै प्रचार-प्रसार पर उणरी संवैधानिक मानता धुरापुर रा सगळा काम, सिरजण रा, ई काम है। प्रां. सगळी मोरचा मार्य संभिया ई पापा सू सिरजण पार. पड़सी। प्राठी तरियां जाणली के इण वंगत राजस्थांनी में सिरजणाक लिखाई रौ काम, अकेली काम नी है, वो मां सब कामा सू जुड़ियो थको है। आप जट कट ई हो, राजस्थांनी ₹ वास्तै अंक सावती सावचेती पर संकळप अंगेजली।

प्राप जठं रेषी, उपर प्रोळ-दोळ लोक साहित रो तो घाटो कोनी, उणन ई भेळी करो, सोमवायायां, लोकगीत, लोक यिरावारा, मोसाणा, भर दूजो ई फितरी कांई ? इणर्मापरी भासा ने संस्कार मिळसी पर संवेदना नै धार । दण मारग निकळस्यो तो मती मते जांच पड़िया जासी के मैन प्रापरं पास-पास ई जोड़-जुड़ाव पर जाणवा ने कितरी कांई पहियो ? अब राजस्यांनी मे लिसणी सरू कर ई दियौ, तो होळ होळं राजस्थांनी लेखक होवरण रा सगळा जोसम भर जहरतां समझली। पर अंत पंत म्हें म्हारी वात निवेड़ता पाई कामना करस्मू के सिक्षा विभाग री इणसालीरणी पोथी योजना में राजस्थानी नै मेक सूबेसी पोथियां री पांती मिळं, जिण यूके ज्यादा ज्यादा मध्यापक-लिखारा नं राजस्थांनी में लिखया पर छपवा रो मौको हाम पावै । भर मा कामना ई. म्हारी रेसी के इण योजना री पोथियां निंदराईज नी, प्रापरी धार बरोबर बायोड़ी राख, पर राजस्थानी साहित री दुनियां में ई मोरी मेक ठावकी पिछाण कायम हो । सव अध्यापक-लिखारा नै तौ चाहिजे ई के मां सू लाड-कोडा जुड़े। तज सिंचाई जलते दीप भवन, जालोरी गेट, जोधपुर विगत कया 1 5 मायड़-मन पोळाऊ सजा 13 20 छोरौ बिगड़गो : सवाई सिंघ रोखावन : मुरलीधर मरमा 'विमल' : नरसिंघ राजपुरोहित : सांवर दइया : उदयवीर सरमा : कमला वरमा : भीखालाल व्यास : जनकराज पारीक : ईस्वर सिंघ कुळहरि जेवड़ी, 28 20 38 43 45 सुपती मेक बोतल री कमी छोटी कथावां. रेखा-चितरॉम. पोकर गरू री बाता. डूंगरीग जी वांका गंगो मन रीचंगी जीवण-परिच संत कवि गोमदा 'निबंध रूड़ो राजस्थान 'राजिय रा दूहा' में हास्य मन व्यंग :.रामनिवास सोनी : दिलीप मिंध चौहाण रूपसिंध राठौड़ 47 50 54 रामनिवास सोनी 57 मूळदान देपावत 61 67 : चन्द्रदान चारण : अमोलक चन्द जांगिड़ . : त्रिलोक गोयल 72 75% : कल्याण सिंघ. राजावत 797 लोग के कंवला रेडियो-रूपक नुगरी होग्यौ नेह कविता-गीत-गजल रूख पर आदमी खास जरूरत मेळ-मिळापः भगवती लाल व्यास' अनाराम सुदामा धनंजय वरमा 85 87 90 93 96 -98 101 + 103 105 : सिथ मृदुल .107 109 : अरजुन 'अरविंद' दो गजल तसवीर पर फेर किता दिन : स्याम सुन्दर भारती पापां मिनस हो : रघुनंदन त्रिवेदी भूख पर बांदरी : मगर चन्द्र दवे सपना री तिरस वुझ्या पलाई : इन्दर प्राउवा हार मत हिम्मत रे पर चौघड़िया : लक्ष्मण सिंघ रसवंत जिनगांणी : कल्याण सिंघ राजावत 'मावटी होम्यो पर पूछ म्हन, मत हे सखी! की तो बोल म्हारा बीरा : वासु प्राचार्य म्हारे गांव में, दरद-दिसा- घर पर आज तक जिया : भागीरथ सिंघ भाग्य . पाखर री उबाल : रामेस्वर दयाल श्रीमाळी किराया को मकान छ : बल्लम महाजन, देसडली म्हारी : अरजुन सिंघ सेखावत फकीरी : स्याम श्रीपत : कुदन सिंघ 'सजल' वात : कमर मेवाड़ी विरासत : करणीदान वारहरु जिनगी रास कियां प्राच : कैलास मनहर, : फतहलाल गूजर मूचापड़ो : मोड सिष बल्ला 'मृगेन्द्र' वादळी माज वरसती जा : पुसराज मुणोत , दो कवितावां : फेसव 'पथिक' चौबोली : सिवराज दंगाणी 'माळी रो हसियारी. : गिरधारी सिंघ राजावत : रमेस मयंक हिबई रा गीत : दीपनन्द मुथार : सांवत राम 'कासरिया' यार-गीत : रामनिरंजन सरमा 'टिमाऊ' : जगदीस चन्द्रगरमा मोतीगणिया : महावीर जोशी 111 115, 117 119 121 123 125 फागणी दूहा '127 कुरा मान 129 130. 131 133 135 137 138 139 140 142 144 145 146 147 कंपळ सवाई सिंघ सेखावत "मे बाई सुण जीयां इं खुर प्राय जावै, म्हर्न बोल दीजे"-बापू कहो, पर मापरी गुड़गुड़ी लेय' र पोळी कानी टुरग्यो । दासां मेकर पोळी सू निकळता बापू पीठ तकी, पछ उडती-सी निजरां गाय कानी झांक'र धम्म देती सी पीढ़ माय वैठगी। घणी देर सू ऊभा ऊभा वीं री टांगा दूसरण लागी ही। गाय बुरी तरां छटपटावं । कदै बैठे। कदै ऊठ। वी नै चैन नी पड़े। वा बरावर ठाण में चक्कर काट । डगमग कांपती टागां सू लड़खड़ा'र बैठण जुगत करे, पण तद ई दरद रौ तीखौ हिलोरी वी ने बुरी भांत तड़फड़ाय जावै । पर वा फेरू ठाण में चक्कर लगावा लाग जावे । गाय भेक ठौड़ टिक नीं पा ही । पीड़ स्यात बेसी ई होवण लागगी ही। दाखां फेरू प्रेकर गाय कानी देख्यो । गाय ठाण में पसर'र बैठी ही। गौर सू देख्या ईयां लाग जांण वी र हूंकणी लाग री व्है । ऊपर-नीचे होवती पेट । हळवै-हळवं धूजतो सारो डील | प्रांख्यां झांकती तीखी पीड़। चाणचक गाय पागल पगां जोर देय'र ऊठरण री जुगत करी। पण लारला पग संभळ कोनी सक्या । वीरो डील घूज'र धड़ाम सूभीत में जायर वाज्यो-'डiss' दाखा बैगी सी लपक'र गाय रे नई गई। ठा नी गाय रे साचौसांच ई लागी ही। बायो पसवाड़ो तेज रगड़क सू छुलगी । लाल खून रिमा हो । रगड़क सू छुल्या पसवाड़ा ने देखतां पाण दाखा गुमसुम-सी ऊभी रंगी। मन कियां-किया ई होवण लागो, तो वा पाठी प्राय'र पीढ़े माथ बैठगी। कूपळ/l पोळी सूवार दोय आदमी बतळावं हा। वांरी बतळावरण बापू री गुड़गुड़ी रे स्हार डूब-उतरावै ही। पोळी कानी कान लगार दाखां घणी जुगत करी के दूजो आदमी कुण है, अर बात किणर वावत है। पण साफ की नी पल्लं पडियौ । “हुवे कोई""म्हनै कांई" वा हार'र मन में कह्यो। गाय अव ताई ठाण में चक्कर लगावै ही। वीन पल-घड़ी रो ई चैन नी । सारी ठाण गाय रा खुरां सूखूदीज'र प्रोपरी-नोपरी लागे हो। "मां व्हैती तो वी ने क्यू बैठरणी पड़ती। मां मतई से की संभाळ लेती।"- दाखां प्रापर मन मे विचार कर-"मां व्हैती तो वा खुलै खाळां कैय देती के देख मावड़ी और क्यूई कराय सके, पण प्रापरणा सूो तरसाव नी देख्यो जावै । निजरां फेर गाय कानी गई । गाय सूनी-सूनी पर निढाल-सी बैठी ही । वा घणी उदास निजर आ ही । डील री रूपाळी छितरी-छितरी, पर रंग काळी-स्याह पड़गो हो । "देख थू ग्राज घास री टाळ कर दे। गाय आज ढीली ढीली लागे है । स्यात आज ई ब्यावे"-मां ने घास तांई जाती देख'र वापू कह्यौ हो । पण वा किरण री मान । फेरू ई नी ठरी। दाखां रै मन मा तांई रीस रो प्रेक हिलकोरी ऊल्यो-"जे बाज नी जाती, तो काई विगड़ जाती।" गाय ठांण र वीचू बीच ऊभी होय'र लारल पगा झुकी। थोड़ी-सो पोठो करियो । पण पोठी तळं पड़े इण सूपला ई वा तड़फ'र दूजी कान चलीगी । वी री लारली टागा गोवर सूसंडगी ही । खिरणेक ढव'र गाय ठाण ने सूघ्यो, पछ मेक चक्कर लगा'र फटाक देती री वैठगी। मूडो धरती मार्थ टेकर वा जोर-जोर सू सांसां छोड़ । प्रांख्यां दरद सू फाटी पड़े।, लारल हिस्स में प्रेक घोळी-धोळी फूकलौ-सो चिळक्यों। दाखा जोर सूबापू ने हेलो पाड़ बाळी ही के गाय झप देती री ऊभी होय'र भींत कानी चलीगी। गाय री तळमछ पर निमळी हालत देख'र वीरी प्रांख्या में प्रांसू पायगा । ठा नी क्यूवों ने ईयां लाग जाणं श्री से फ्यू गाय रे नी होयर वी र प्रापर होवती है। धग धग धूजती देही पर इतरी पीड । क जीव रै जलम सूमायड़ इतरी दुखी होवे । च्च च्च च्च च्च दुनिया सांच ई कवे के वाझड़ी काई जाएं जाप रो पीड़। वी र चेत ख्याल आयो, लुगायां र ई जद टावर होवतो म्हेला वई इतरी ई दुस पावती होसी । पर हां पारां जकै दिन कैव ही के इस मातर ई ब्याव हो । वी री प्रास्यां प्रतीत डोलगो। पर री तो बात है। मूंदरपरा रा धन जी चौधरी माया हा । वी र ई ब्याव रो जिकर हो। वा उसार री भीतरी /शिरजग पोट होय'र से क्यू. सुरणं ही । बापू चौधरी री बात मान ली ही। बीयाँ हांकारी तो मां ई भर दियो, पण वा को, और सै क्यू तो ठीक है, पण म्हें छोरो म्हारी प्रांख्यां सूदेखवी चाऊं । म्हारी चांद सी बेटी तांई छैल गवरू जवान होवणी चाहिजे । दाखा लाजा मरती भाग'र कोर्ट में बड़गी। गुलावी सरम ओढ्यां वा ठानी कर्ता देर काच में प्रापरी मूडौ देखती री। 'डाss' दाखो रे भेक झटको सो लाग्यो। धरती माथे पड़ी गाय पगा रा फटकारा मारती 'डा-डा' कर ही। "बापू"--जोर सू हेलो मार्यो । गाय बुरी कार छटपटावै ही। बापू लपकार भीतर पायो। हाथ री गुड़गुडी अकानी गेर बी गाय रौ पेट सहळावा लागौ। गाय इव ई पग पीट-पीटर जोर-जोर सू'डां-डा' कर ही। गाय री हालत देख'र दाखां री प्रख्या प्रांसू प्रायगा। चाणचका वीं नै ख्याल पायो प्रो""""तो व्याव र पछ वी री प्रापरी प्रा ई हालत होसी । वा अकरसी जोर सू कांपगी। यू लाग्यौ जाणे प्रबार ई रोवरण लाग जासी । 'नी"नी""बापू थू म्हारो तो ब्याव मत करज ।" हे भगवान म्हु तो मर ई जाऊली।' गाय धरती मार्थ पसरी पड़ी ही। लाबी जीभ बार निकळया ही। नकतो. झाग चिलकै हा । अांख्यां फाटो-फाटी सी लागे । सारो डील थर-थर काप हो। खुर वार आयगा हा । वाप हायां सूपकड़'र खीचण री जुगत कर हो । गाय प्रेकर जोर सूराभी । ऊठण री कोसिस करी, पण थोड़ी सी ऊठ'र हेर्ट जाय पड़ी। दाखों हाथों सू आपरी आंख्या मोंचली। "हे भगवान म्है तो मर जाऊंली, पण ब्याव नी कराऊं।" बापू उतावळी होय'र खुर खींच हो। गाय रो डील मुरद री भांत अवस सो पङयौ हो। प्रांख्यां री काली टिकड़ी वार निकळ वाळी सी लागे हो। लारलो हिस्सौ जोर मूहालै हो । गाय अकर फेरू राभी-'डांऽऽ' । आगल ई पल खून पर जेर सूलिथड़ियौ अक लोथड़ो धरती माथै प्राय पड़ियो। दाखा घिरणा भाव सूपच्च देती री थक'र दूज कानी चलीगी। गाय खड़ी होय'र तेजी सूहूंकारा भरती खून पर जेर सूसंडी वी लोय ने चाटबा लागगी । बापू घणी देर वी री सफाई सी करतो रह्यो । फेर हाथां ₹ माटी रगडती कवण लाग्यौ--"वाई देख कांई है, जा पाणी ल्याव । टोगट मा नै तेल देरणी है।" वो रे मूडै अक संतोख भरी मुळक हो । दिन चढ़ा-चढतां टोगड यो खड़ी होवरण री कोसिस करवा लाग्यो । श्रा न्यारी बात के वो जद-कद जा भी पड़े। पण फेलं ऊठ। छाळा भरै। ।

भक्ख ऊजळी रंग । सोणा ऊजळा खिरगोस रा चिया जिसी। छोटा-छोटा बुगले री पांख-सा कानड़ा। प्यारो मूडौ। काळी टिकड़ी सी नैनी-नैनी प्राख्या। वो घणो फूठरो लागे । गाय हरख-हरखर वीं रो डोल चाट । हुंकारा भरै । मुळकती प्रांख्यां पर पुळकत मन दाखां मेथी बाजरी रांध । दाखां री प्रख्या फेक नवी निराळी चितरांम ऊग्यो। वीरै सासर रौ मांगरणी। नीमडी री छीयां । पीढ़ माथ बैठर वा प्रेक सोवणे टाबर रा लाड-कोड करें। दाखां मुळक'र गाय कानी देख्यो। गाय इब ई टोड़ गया ने चाट ही। अर टोगड यो प्रापरी थूथरणी नै गाय रा थरणां में रगड़े हो। दाखो रे रूंग-रूंग भेक मीठी मुळक रंगरेळ कर चाणचकी वी रै मन में भाई के वा मां ने जायर पूछ, के मावड़ी थू म्हारो ब्याव कद करसी? 4/सिरजए मायड-मन Dमुरलीधर सरमा 'विमल' भाग सूमापां ने वकील तो नामी मिल्यो है । प्राज भदीतवार नै ई उरणरं मठ काई भीड़ ही ! मापारी केस तो हैई काई, बीर हाथ पङ या खूनी तकात बरी व्है जावं। म्ह नै तो मा बतानो के मापारी सुलटारौ कद ताई करवा देसी ? आज दस दिन तो व्है ग्या, प्रोम भाई र मठ कित्ताक दिन टिक्या रसा? हमैं घणी ढील ना समझो ! दोयेक दिना मे इं निवेड़ी हो जासी । ......"अाज थार बयानां री बात चाली जरणा कवण ठूको-~-"प्रान्टी जी ने कोर्ट में जावणो पङयो, जणां म्हें साव निकांम ! उवारा वयान तो म्हूं अस्पताळ में ई करवाय देतूं। रेई ससी र बयानां री, ब म्हूं गांधी नगर जाने करवा लेतूं ।"....... वकील माटो है तो हुंसियार ! मापा तो कदैई सपन में ई सोची को ही नी! वण कह्यो-"हूं थान थार मोभी पूत सूं थार गुजार लायक महीनी भोर बंधवा देसू ।"""""""वो मैन्टीनेन्स रो दावी मोरू' स्यार कर रेयो है। वकील भी काम भी कर देवं, तो पापांरा हाथ किसा कांटों में जावे ! रमेसियो तो सदा लियो ई लियौ है, मापां माय भूल सू कदैई नुवो टक्कौई सरच्यो हुवै तो बतायो ! मां रान्डी-रोवरणां में कांई पङयो है ! मुहूं तो वस पा जाणं के मापां बेगासाक परां जा पड़ा तो ठीक रखें। भो काम तो काले पीर ताई व्हीयौ समझी। रमेसिय माथे कोर्ट री मोर तूं मार-पीट रो रोक लाग्यो पछ गाजे-बाज सूं पर मे जावो भलाई, कुण ना देव है ।"वकील तो उण मापं सार सापां बैठ्यो है......भाईयां मायम्मन/5 मे राड़ री रीत तो चालती पाई है, पण यो कुजीव मांदी मायड़ माथ वेलाग हाय कीकर उठाया !" रक्षा जी की सोचती-विचारती सीचड़ी रो माखरी चमची मूड में मेलता कटोरदान नै बैड माथे ई अक कानी मेल देव । नवीनजी कटोरदांन नै प्रापरं झोळ मे मेलता के वै-लो हमें चालू देखाण साढी आठ व्हेगी। या जमदूतणी हणे या नै हाका कर सी-टेम व्हैगी है, टुरो परा, जनानी बाई कह्यौ ? नवीन जी इलमारी में सूं यूनी-अंन्जाइम री गोळी काढर देवता थकां फेरू के वण लाग-थोड़ीक ताळ नै यो पोळी के पसूल लेवणो ना भूल जाया, काले री ई नागा व्हेगी ही। ...""नीद नी प्रावै ती कम्पोज ले लिया। वहीर होवण तूं पैला वै प्रेकर फेरू पूछ-सिंभया ने अक्टर साब पाया होसी, खास की को कह्यो नी ! छुट्टो रौ पूथ्यो जणा कह्यो; उतावळ ना करी पासळयां री सोजी की कम हुयां छुट्टी मतेई दे देसां । नवीन जी रे टुर वहीर हुया पर्छ, रक्षा जी तकियां रे सार लेट सा जावे । बेटे रमेस वावत विचारता-बिचारता मन ई मन के वण टूक-माज जड़ी जमानी स्याई कदई आयो हुसी। पीस रे कारण मिनखां में अंडी हिड़काव बापर्यो है के वस नाता रिस्ता तो सँग धुप्योडा सा दीस है । पईसौ ई तो मा है, पईसौ ई वैन है, पईसौ ई धरणी है पर पईसौ ई लुगाई है । पईस रै कारणं वेटौ मां रा हाडका खळकाय न्हाख्या। खून पाणी है ग्यो ! पेट नै पेट रै लाता मारता लाज को प्राई नी । देख्यौ मजौ, मां घर रे घर में को घुस सके नी पुलिस घुसासी जणा धुससी ! बाप बेटे सूं कचेड़ी री मारफत खरची वसूलसी । पण उपाय काई । पाछी रम्मत पाली रे रमेस, कट मूंडो दिखावरण जोगी को राखी नी! कठीने ढकू अर काठीन उधाड़ ! गळती यारी कोनी लाडी, म्हूं जामण होय र यन नी जाण सकी। डाक्टर साब तो उणीज टेम कह्यी बताय है-"पुलिस मे रिपोर्ट किये देता हूं कम से कम पन्द्रह दिनों की जेल तो हो ही जायेगी।" गध जड़ी मार खायां पछई म्हा मे अक्कल को आई नी! राम जाएं कीकर म्हार मूड मे सू निकळ ग्यौ जाण दो डाक्टर साब मां-बेटे रे मामले में पुलिस पंचायती करती मूडी लागसी । तू थारी सी करण में जेज को लगाई नी ! उणीज दिन ससी पर मुकेस जरूरी सामान लेवण ने गया जणा केय 'दियो-जो को लेजावणी हुवं ! 6/सिरजण जिको बस प्रवार ही ले जाय, पाइन्दा पग धर्यो तो म्हा सूं बेसी भूडो और कोई नी हुवलौ। सामी वैड पाळी नै दवाई लेवता देख रक्षा जी न ई कैप्सूल लेवण रौ ध्यान प्राय जावं । वारे मन में आवे के कोई बान ई कैप्सूल देय देव, पर बांन हिलणी-हुळणों नी पड़े ! पण देव कुण ? वै प्रापरी पासळ या री पीड़ झेलता होळ-होळ ऊर दवाई ले लेवे। वार्ड र वडा कानी घूमती वारी निजर पारवती र खाली बंड माथै प्राय ने ढव जावं-लांण ने महीने सूं ऊपर रैवरणौ पङयौ । म्हनै तौ घणी सारी ही वीरो। म्हारै अपेन्डिक्स रौ अपरेसन हुयौ जणा, म्हनेई महीनो सवा महीनो अस्पताळ में ईज काढणी पल्यौ हो। बी यखत म्हा कन हर टेम कोई न कोई बण्यो रेवती। बडोड़ा भाई जी, भाभी, सुधा, कुम्मी प्राद तार मिलतां पाण फटोफट चल्या आया । अब कई जग हंसाई आळं काड रा समचार देवतांई भूडा लागता। मुकेस वस अजीत ने तार दियो। अजीत को पायौ नी ! आयो च्यार मोळया रौ कागद "जीजी म्हूं प्राय नै काई करू ला। रमेस ने इयांन ई घणो पिछतावी हो रैयौ है । उरण रे कागद तूं म्हनै लागै बौ डफोळ कठई प्रात्म-हत्या नी कर लेवे । तू उण नै छिमा कर दी जे!" अब लाडी म्हूं थारी फाक्या मे प्रावण पाळी नई हूं। थे मामी भागजा गैली केई और नै बगाया ! माफी मागण माळा डोळ वीजा ई हुया कर है। आज बी बात नै दिन दस है ग्या, रमेसियो ग्रेकर ई आयनै मूडो दिखायौ हुवै तो! मुकेस तो लाई सोची ही के तार मिलतां समचे मामोसा दौङ या प्रासी । वे रमेस भाई जी ने की समझासी । रमेस माथै वीरो पूरी अधिकार है । रमेस बी कन रंय नै वी. एस. सी. करी पर बीरी मरजी मुजब रमेस रौ ब्याव ई वीर भायल तिवाड़ी री बेटी सूं हुयौ । वो आवतौ तौ रमा की तो सरम करती। राम कर उकील री मैणत फळ जावै पर दोयेक दिनां में ई घरी जा पड़ा तो ठीक रवै ! अोम र ई तो लाई रे तंगी है। पण दो हरामी मान सैज मे तो स्यात ई घर में बडण देसी ! कोर्ट कानी सूं वी मार्थ रोक लाग्या पछ ई वी प्रापरी सी कयरां बिना को रेसी नी! मजो तो जद भाव के उप ₹ की अड़गो लगावताई पुलिस उण ने पकड़ ले जावै । हूं तो काले उकील भायङमन/7 । सगळी वातां चोसी तरियां बता देसू । लातोरा देय वाता की मान्या करनी! माप माप री करणी, भर पार उतरणी। वी बसत भेक नसं माय ने वार्ड री टयूब साईटां बुझा देव । बीच री गाटर मार्थ भेक लोटियो घसती दीस । सोवरण रीटेम हुई जाण ने रक्षाजी धाई सू सोवरण री गरज सारू भेक कम्पोज टिका लेवें। माघ पूरा घंटी बीत्या पर्छ ई वान नीद रो पड़-गोज नेह-मडास ई को दोर्ग नो! बार दिल में उस दिन रे काड री पटणा समूह होवण लागे। घी दिन दिनू गरी साढ़ीफ सात बजी ही। मुकेग चाय- नास्ती कर प्रापरं घंध माथं जायण नं वहीर हुयौ ई हो । म्हूं भोर में बैठी चाय पीव ही । रमा भर रमेस ई प्रापर कंगरं मे टावरा गागं नास्ती कर हा। ससी प्रापर कमर मे अजू न दूध पावं ही, बस जणा ई रमा रा सबद सुणीग्या- मारी दूव नै पिरसू सू पाणी को लाग्यो है नी। मो काम म्हार जिम्मै हो, जणा दूव मे बैठताई फाई जी सोरी होवती ! भय तो जा'र ऊभण रोजी ई को फर नी, काटा सा चुभे । मा वात सुणतांई रमेस सीधी मुकेस र कमर प्राग जाय ने कह्यो-से घंधा छोडर पला दूध में पाणी दे । ससी जेठ ने कोई जबाव देवती ! इयां मपसरत में बोलण रीना ई को हो नी ! वा बोली-योली छोरी नै गोदी में थपैड़ती रवै। उरण रे केरू कह्या म्हन के वणी पडे-ग्रंजूरै सोया मतेई दे देसी, तू क्यों हाका कर है। अंजू ने प्रवार सुवागणी कोई जरूरी कोनी, जको टावर रात भर सोयो बी प्रवं सो सी ई किया ?....."उठ प्रवार री पवार म्हारे सामी। "कामचोर कठई री। पर तो थार इसी उतावळ काई है। नळ पायां पर्छ दस इग्यारा ताई पावतो रवै। तूवीच मे ना बोल, तूई ईनै माथे चढा राखी है।..."वोल उट हैक नी ? छोरी नै रोवती देखर बा उठती-उठती पाछी वैठ जावं। वो फेरू कवरण ढूक-मम्मी देख इन वस कदम उठा दियं नई जणा थारी खर नई है। बात सुण'र म्हन ई ताव प्राय जावं~जा प्रवार को उठ नी छोरी ₹ सोया मतई ऊठ जासी। बस म्हारो इत्ती के वरणौ हुवे के वो प्राव देख न ताव म्हनै गधे ज्यू ठरकावण लागे । म्हारै मूडै सूं बस इत्तौई निकळ-सायर वेटा धापर 8/सिरजए कूट ले, कूटण में पाछ ना राख माज मौकोई भलो है, थारा पापा ई दिल्ली सूं काल ताई आसी । बो म्हन की नी कर ससी ने केव-मम्मी रो भलो चाव है तो अवई ऊठ जा। बा लाण छोरी नै पटक'र बार निकळ जावै । बीर जावतांई बोकव रमा, खिड़की दरवाजे बन्द कर दे और इस छोकरी को भी बाहर डाल दे। रमा आपरं धणी री आग्या रौ पालण बड़े चाव सू करें । म्हारी फेरू जम' र ठुकाई हुवै ! म्है कद चेते चूक होवू अर कीकर अस्पताल में भावं, म्हने की ठा नई पड़े। बाद में ससी कह्यौ--म्हूं तो वारं आय नै पाड़ोस में सू वानै फोन कर दूं। वारै साग चौक मे जावू जणा थे ऊधा पङ या दीसौ। थार मूड में तूं खून निकळतो देख'र बै ई धवराय जावै । बै थान उठा'र बस गाडी में न्हांखताई हुवे पर अट अस्पताळ में लिया । हूं ई अंजू ने लिया बारे सागई अठ प्राय जावू । परवार में राड़ रो मोटो कारण बणं सासू-वऊ रौ नी बणणौ । पण म्हूं तो सरू सूई इण वात रो ध्यान राख्यो । सात बरस पैला रम आई जद सूई हूं तो बरण नै बेटी सूं बेसी मानरण लाग ग्यी ही। सुधा अर कुम्मी गरमी री छुटट्या मे प्रावती जणा कह्या करती~रमा तू है तकदीर री सिकन्दर, देख म्है वैनां दोय दिना खातर आवा पण मम्मी म्हा सूवेसी ध्यान थारी राखे । रमा ई हंसती-हंसती कह्या करती-जीजी थे अठ कोई हमेसा तो रवी कोनी, मम्मी ने तो बस म्हने ई खुवावरण पावण री आदत पड़ री है। सरू-सरू में रमेस रौ मैडीकल स्टोर खूब चाल्यो, पण दोय साल बाद ई जाणं उणन कीकर घाटो लाग्यो अर उपनै बन्द कर देवणी पड यौ। पाछौ सरू करण मे पाच वरस लाग्या । उण टेम मुकेस रौ घंधी खूब चाल हो । ट्रान्सपोर्ट कम्पनी में काम तो करतोई हो साझे में प्रेक बस ई चाल ही। वो प्रापर भाई रो घणो ध्यान राखतो । बौ रमेस ने कदैई मैसूस नी होवण दियो के वो ठालो है । उरण देम ई रमेस नै हाबुसिंग बोर्ड री मकान अलाट हुयो । मुकेस बी बखत सू च्यार सौ री किस्त हर महीने आज तांई भरती प्राय रैयौ है । मैडवान्स रा दस हजार ई मुकेस रा पापा ई भर्या हा । रमेस रौती बस कागदां में नाम ई है। जद ताई मुकेस रो ब्याव नी हुयो बौ भाई-भोजाई रो लाईसर बण्यो रयो । वै दोन्यू म्हारो ई घणो ध्यान रासता । रमा वैठी नै पाणी पावती, मागह मन/9 - म्हारी जवान रामचे काम करती। पर मां लारला दिनां में म्हूं अगरणी तो वा आथूणी म्हू उतरादी तो वा दिखणादी। मुकेस र व्याव पर्छ म्हूं तो सगळी जिम्मेदारी रमा माय न्हांख नै निरवाळी व्हेगी। बस म्हा सू पाईज गळती व्है ई । रमा री हीमत बघती गई । धीरे-धीरे वा ससी माथ हुकम चलावण लागी। मुकेस मस्त जीव वो इयाकली वाता कानी कान को देवतो नी । कदई ध्यान पाई जावतो तो वो ससी ने ई डाट पिलावतो - समी ग्रौ के भाभी तो रसोई में है पर तू अठं सेठाणी बरणी रेडियो सुण रैई है। भाभी अवेरा-सवेरा कर है भर दूं बैठी पोथी वा है। रमा माटी इया तो हाथ को हलावती नी, पण रमेम पर मुकेस सामी को न की करए रौ दिखावी अवसई करती । म्हारी घर मैं चौबीस घंटा रो रंवणी । म्हासू प्रै चाल वाज्या सैन को हुया करती नी ! म्हा खातर तो दोन्यू बवा सरीसी । म्हातूं कदैई-कदई की कईज जावती । रमा नै प्रापरी हायर सकिन्डरी रोई घणो गुमान ! ससी अम. मे. होवता सादी-सल्ला । रमा फैसन मे मरी जाय । लोग के वै छोटोड़ी बऊ से पगफेरी सुभ को रैयो नी । ई मे पगफेरै रो काई दोस । पाछी माड़ी रौठा तो भेळा रयां पड़े वा अकली ही जणा कांई भीता सूं भचेड़ा लेवती। ससी रे प्रावताई तो वा से कोतक करण लाग गी। सरू-सरू में काम रो वंटवारी हुयो । काम रे बंटवार सू संतोस नी हुयो पछे सारणी-पीगो जुदौ-जुदी होवण लागौ। म्हां दोन्यां नै मुकेस सागे कर दिया । दोय चूला हुयां पर्छ ई बरामदौ, वेठक अर लान पाद रो काम तो बारी-बारी सर करणी पड़ती। इत्ती की हुयां पछ ई बान संतोस को हुयो नी । संतोस हुवै कीकर बां दोन्यां री डाढ़ तो मकान माथै ही। मकान खातर म्हारा हाडका भांग न्हांख्या । दोय दांत पर दोय पासळया तोड़ दी। जिको भाई, भाई विना जीमती कोनी, भाई रै पैन्ट बरगवाया पैला पैन्ट को पैरतो नी, भाभी री जवान समचै फरमाइसा पूरी करतो, बी री लुगाई साग अंडो व्यौहार कियो अर. घर न हड़पण खातर म्हा सिगळा ने घर सूवार कर दिया। रमेसिया अवै तू याद राखे, मुकेस थने बगसण पाळी नई है । भाई- भोजाई रौ वो घणो लिहाज कर लियौ । बौ काल ई कैव हो-मम्मी कर तू म्हारी हाथ उठनावण दे, वीरा हाड-पांसका अंक नी कर दूतो। थारा तो 10/सिरजण यो दोय दांत ई तोङया है हूं वरण री वतीसी नई तोड़ी तो असल बाप री नई। मुकेस तो लाई पलां ई मकान ढूढ हो । यी नै ई मकान सू जावक में ई मोह कोनी, पण वेटा पर्व थन प्रो मकान सोर सास मिलण पाळी नई है। मुकेस रा पापा उकील तो जोर रो कर्यो है, जवर पाइन्ट काढ़ यो है-दै सबूत के थारो घंधोई उन्द हो जरा लायौ कट सूकिस्ता रा रिपिया । अागती-पाखती रा लोग तो हणेई उण माथ थू-थू कर है । नकटा रे नाक कटी करावा हाथ और वढी । जान्वेजा रे जंजाळा में ग्रासी रात बीत जावे। दिनूग री सात बजी सीक मुकेस चाय लिग्राय । चाय पीया पर्छ ई विचार वारी लारो को छोड़नी । घारौ चिन्तण और ऊंडी होती जावं । वे ऊपर उठता सोचरण लाग होई जकी तो होई पण अब कोर्ट की नक्की काम कर सकसीक नी, का में भाई- भाई इयांई ताजिन्दगी पईस मूकुटीजता, सरीर सू छीजता पर भूड सू भरीजता रसी? कोट-कचंङ्या रो काम है आसाम्या ने लूटणी । खर पर वैगै न्याव रा तो दरसण ई अदीठ हुयोड़ा लागे है। इग्यारं बजी सीक नवीन जी सारणी लिपावै। रक्षा जी रे जीमती वेळा वै कोट र मसल ने ले बैठे। बै सुरणी-नणसुरणी करता थोडौ घणो जीम लेवे। वारह बजता बजतां वकील पर मुकेस ई प्राय जावै । अवतांई पूछ- काकीसा अव किया है थारी तवीमत -ठीक है। -उण दिन थे रमेस ने इसौ काई क य दियो के उणगै हाथ था माथे उठ ग्यो ? वड़ो वेसरम है, बेईमान कठईरौ।-थेई किसीक वात करो हो उकील साब, कदई वेट रो हाथ भी उट्यो है मा माय । उरण टेम कोई भूत बड़ग्यो हुवेला उण मे । बात सुरण'र वकील मुळकरण लाग, फेरू कैवं म्हे वी भूत र ई तो मिरच्या री घूणी देवरण रौ सरतन कर रया हा ताकी वो अोठी नी वावड़े। -ौ रोग थारे बस रो कोनी । थार कामां सू भूत भाग पर पलीत पैदा हुवै । कोरटां रो काम है, लड़ती मिनक्यां न वानर पाळी ताकड़ी बतार कोरी अंगूठी दिखाय देवणी । रक्षा जी री बात सुण र संग जरणा अक दूसर रो मूडो जोवण लागे। बै थोड़ी ताळ मुकेस सामी देखता केवण लाग-बेटा जीवरण मे पईसी ई सो की नई है। पई से सूअाग है, इज्जत-पावरू पर सुख-स्यान्ती। ऑन होम्या । मायड़-मना li पईसो पायो तो किरण भरथ रौ। हुई जकी ने भाई गई कर! अव ताई पईस'री गिनार नी करी तो अब म्हार मामले नै लेर मन नै पोचौ ना कर । ""मी मकान ई राड़ री जड़ है तो प्रागौ वाळ ई मकान में। दूजो मकान लेवरए रो मतो तो थारो पलाईज हो । मुकेस की कवै इज सूपैला नवीन जी कवण दूक मुकेस री मम्मी प्राज थाने अर्कदम पो हो कोई ग्यौ । वकील साव सो काम पक्की कर लियौ मापां काल ताई आपणे घरां जा पूग सा। पण थांरा बयानां विनां में ई काई करसी ।""थोरा इयोकला विचारां सूमापणा कोर्ट कारवाई में लागोड़ा डोढ़-दो हजार ई डूब जासी पर घर में ई को जा सकसा नी । घूड़िया लार इसे घर रे । म्है तो वो मकान में अब पग ई को घरू नी। थान मोह है घर रौ, तो थे इमाई जावो भलाई। थान मेकला नै तो वो राजी-राजी राख लेसी। बण रौ कांटी तो म्हूं हूं। म्हें मुकेस कनै रेय लेसू। जे पी ई ना दे देसी तो और कठई ठिकाणी ढू लेसू। इत्तो कंवता-कंवतां बारौ गळी भरीज जावै। मुकेस स्टूल माथ सू उठ'र आपरी मां कन बंड माथं जा बैठे। मां रौ हाथ प्रापर हाथां मे लेवतो कैव-मम्मी तू बेराजी ना हो। म्हन तो रीस इण बात री है के बो थन बिना मतलब कोजी तरिया कूटी क्यू। म्हैं तो इण रौ बदळी लेवणो चावू हूं। आ फालतू री फजीती है, बेटा । मा तो टावर नै जलम देवताई वरण री लाता खावणी सरू कर देव । लातां खा-खार ई वण ने पाळ । अव उण ने जेळ हुया हूं किसी बड़ी बाज जासू। वो म्हा खातर जीवतोई मर्यं समान है, अब तूई म्हने जीवती ने ई मरी समान बणावणी चावै जणा थे बाप-बेटा करौ भलाई थारै मन री। वकील ने बात बिगड़ती लागे । वो वात बणावण री गरज सू के व. काकीसा थांरी केस सोलिड है । मुहूं थाने मकान माथ अधिकार करवा देसू, खरची ई बंधवा देसू', पण इया भावुकता मे वैया पार किया पड़सी । वेईमान ने बैईमानी रो दड तो मिलगौ ई चाई । -थे बात तो खरी क य रैया हो, पण थे थांरी छाती माथै हाथ मेल'र मा तो बताओ के आज ताई थे कित्ताक बेईमाना नै दंड दिरायो। दंड तो बापड़ावं ईमानदार भोग, जिका थारी जेबां नी भर सके । रक्षा जी री इण बात रो पड़त्तर वकील ने सोध्यां नी मिल । बो कदैई मुकेस कानी जो तो कदैई नवीन जी कांनी। मुकेस मगन मन सू मापरी मम्मी रे माथे पर हाथ फेरती रखें। 12/सिरजण वोळाऊ नरसिंघ राजपुरोहित वखत रौ वायरी अपरबळी । खाडां री ठौड़ घोरा पर धोरां री ठौड़ खाडा परंपरा सू हैता पाया । जिका ठोड़-ठाया कोई वखत जगत चावा हा, वांरी आज कोई नांव ई नी जाणं, पर ज्यांरो संसार में कोई नांव निसारण ई नी हो, वे आज जगत रा सिरमौड़ बण्या बैठा। पण इणरै साग प्रा बात ई साची के जिका मिनख इण संसार में की सरावण जोग काम कर ग्या वै अखियातां में अमर व्हग्या । काळ रा कराळ हाथ वांरी नामवरी ने नी मेट सक्या। वखत री वायरी वारं जसरी पगडांडिया ने नी विखेर सक्यो । राजस्थान में जाळौर जिले री जसवंतपुरौ गांव कोई जमाना में लोयाणागढ़ रै नाम सूखंडां-परखंडा में चावी रह यौड़ो । मारवाड़ राज री मा दिखणादी कांकड़ पर पाडावळ परबत रोआथूणी छेवाड़ी। परबत री उरण ढाळ गुजरात पर इण ढाळ मारवाड़ । मारवाड़ पर गुजरात रा राजपंथ मार्थ लोयाणौगढ़ श्रेक ठावी ठौड़ । आज ई मारवाड़ रा मिनख भजनां में गाव-डावी डांडी जावे द्वारक, जीवणी लोयाणागढ़ रै राज प्रोजी ! ........ कोई वखत लोयारणा री स्वतंत्र राजगादी रह योड़ी। जिरण मार्थ कई अनड़वीर तपिया । उण वखत वारा धाका पड़ता। पण होळ -होळ लोयाणागढ़ रो राज विखरण लाग्यो भर छेवट मारवाड़ रा राज में लोयाणी फगत प्रेक जागीर रौ गांव बरण'र रैयग्यो । कैवत है के डाकी मूमा भर डर भागा । सो लोयाणागढ़ रो राज विखर तांई इण इलाका मे भीला रो उत्पात वधग्यो । इलाको इज इण भांत रो। च्यारू मेर डीगा-डीगा परवत । माय जाडी झाड़ी मायोड़ी। धवळे वोळाऊ/13 दिन रा कोई ताळी देय र न्हाट जावं, तो ई पतो लागे। रीछ, वघेरा पर चीतरा अठं निसंक विचरं । सूरां री ती डारां री डारा फिर। इस डरावण इलाक में भील धागडा (गिरोह) बणाय' र लूट ससोट करण लाग्या । मारवाड सू गुजरात जावण वाळो राजपंथ प्रठी म्हैयर बै। ऊंठां री कतारी पर विराजारों री बाळदा इण मारग इज चालं । भोला यांने लूटणी सरू करी। धागडा रा धागडा तीर कवाण लियां मौको देख अरडायर पडता अर माल-मत्ता सोस'र भावर भेळा व्है जाता च्यार मेर हाहाकार मचग्यो । पण कोई दाद फरियाद नी। राज भीला नै दवावए री खासी कोसिस करी, परण की ताळ नी लागी। लोयाणा र च्यारमेर भीला रौ उतपात बघतो ई गयो। छतां पण संसार रा कांम कद रुकिया ? जरूरत माफक विराज वै पार चालू रह्यो मर मिनसां री प्रावा-जावी ई बंद नी व्हियो । पण इतरी वात जरूर व्हैगी के वखत जरूरत माफक इण मारग वटाऊड़ा पापरं साग वोळाऊ (मारग-रक्षक) राखणा सरु किया। की इसा हिम्मतवर मिनख जिका लुटेरां सूभिड़ण रो होसली राखता, वै वटाऊड़ा साग वोळाऊ रे रूप में प्रावण-जावरण लाग्या । लोयाणा गढ सू की प्रांतर प्रेक गांवड़ो प्रायोड़ी-बडगांव । उ ऊकजी पड़िहारियो नांव रौ अक रजपूत र वै। साधारण घर-धरणी प्रादमी। पण छाती रो वजर अर हिम्मत रौ हेडाऊ । काम पड़यां प्रेकलो मैकड़ा सू भिड़ण रौ हौसलो राख । प्रेक-दोवार काम पडया कोई भाई-सैण ऊकजी ने इप मारग साथै लेग्या पर सामनी व्हिया उरणां भोला ने पग पाछा दिराय दिया। होळ -होळ भील ऊकजी रौ नाव ओळखरण लाग्या अर ऊकजी पण इण मारग वोळाऊ र रूप में प्रावरण-जावरण लाग्यो । ऊकजी अकलो पर भील मोकळा पण मरणियो क ई भूडो व्है । इण कारण दोन्यू पख प्रापसरी में मनोमन समझग्या । जिण वटाऊ र साग ककजी वोळाऊ व्है तो, भील उणरी नाम नी लेवता । उपर लारै धूड़ ई वाळता। इणीज भांत विना कारण ऊकजी पण भीता ने नी छेड़तो। परण थोड़ाक दिनां पछे संजोग इसी वण्यो के भीला साग ऊकजी री भिडंत व्हेगी कारण मामूली। पण कई वार तिरणा y भारत यण जावं । बातड़ी यू बरणी के बड़गाव रौ ग्रेक वागियो पर लोयाण परण्यौड़ी। मुंवो व्याव व्हियोड़ो, सौ सासर मांडो चूरण नै आयो। उण जमान रा रिवाज माफक जवांई सासर पावतो जद मोकळा लाड-कोड म्हैता । जंवाई लुगाइयां 14/सिरजए ने गीता रे बदळे नाळे र घर टाबर-टींगरां ने पोती (मेवी-मिसरी) बांटतौ । इण वास्त सुभाविक बात ही के जिण घर नुवौ जवाई सासर प्रावती, उट गाव रा. मोकळा टाबर भेळा है जाता। पण वाणिया रा इण जवाई में भीड़ भाड़ की कम पसंद ही। सास कर भीला इत्याद रा काळा-कडीपा छोरां ने देखर उरण नै घणी घिन मावती। उरण बखत लोयाणा में भीलां री मोकळी आबादी। गाव रैबार वारी न्यारी वस्ती । तेजी नांव रौ अंक भील उणारी मुखियो । पुगतो आदमी । जमानौ देख्योड़ो, पुरांणी पापी । तेजारी भीलड़ी मोटयार गाळ ई मरगी। नाती करावण खातर तेजा रै भाई गिनायतां मोकळा ऊंट-घेटा मेळिया पण तेजो मान्यो कोनीं। धीरे प्रौळाद में फगत अंक वेटी, जिकी घर जवांई राख'र परणायौड़ी। बेटी पर जवाई तेजा रे भेळा ई रैवं । आठ दस बरस रोक दोहितो, जिगरौ तेजो प्रण ती लाड राखे तेजा री जवांई भीलो र धागड़े भेळी लूट-खसोट रो धंधौ करै । भीला में उण वखत तेजा री आछौ मान-तान । न्यात-पांत मे उणरौ नांखियो लूण पड़े। भोलारा आतंक रै कारण सगळी चोसळो तेजा सूडरै । उरणनै पोहडौ देवरण री कोई हिम्मत नहीं राखे । प्रेक दिन तेजा री लाडको दोहितो बस्ती रा टावरा भेळी उण वाणिया रा जवांई कने पोती लेवण गयो जवांई उण नै प्रेक दो थप्पड़ां पर धक्का देय काढ़ दियो । टाबर नै घणी रीस प्राई। तेजा भील री लाडको दोहितो ठेरियो। वो मूडी लाल चुट्ट कियां कूकतो थको प्रापर नानै कनै पूगी। उणदिन ई भीला रौ धागडी लूट खसोट कर र धरा प्रायोडौ । तेजा री गुड़ाळ में दारू री मेहफल जमी थकी। प्याला री डोडी मनवारां चाल । तेजा री जवाई मेहफल रौ माझी बण्यौड़ी। से बीच बैठौ । तेजी डाढी र बुकानी दियां होको गुडगुड़ावती माचार मार्थ जमियो । जितर तो छोरी वाहि पाहि करतो ठेट मेहफल में पूगी । काई दियो म्हार डीकर रे ? किंण कूटियो थने ? तेजी हळफळतौ थको मांचे सूं उठती बोल्यो। छोरी तेजा रे खोळा में पड र जोर जोर सूडाढण लाग्यो । उरण वी ने बुचकारियो तो वो हूचक भरीजग्यो। नीठ छानौ राख्यो। सगळी बात सुगर तेजार झाळी-माळ लागगी। वोळाऊ/15 वाणिया रीमा हिम्मत के म्हारा दोहिता ने कूट? तेजो कड़कड़ियां भींचतो वोल्यो-चीर र खाजाऊंबापड़ा ने ! छोरा रै गाल मार्य प्रांगळियां रा निसाण मंड्या देख र उपरी बाप रीस में बावळी सौ व्हेग्यौ । की दारू रो नसो पर की पीठबळ रौ मद । वो माथा पर सू पोतियो नीचौ पटकतो वोल्यो-इण वांरिणया ₹ जवांई रो माथी नी वाद नाखू, जितर पोतियो वांघरणी तीन भागां तलाक । मेहफल मे सरपाटी छायग्यो । रंग में भंग पड़ग्यो । वात उडती उडती वांगिया रे घरांपूगी तो कूकारोळी मचग्यो। कैवत है के गोयरै री मौत मावे जद भीला रे झंप चढ़े । सागरण वाई यात वणी । त्तिरणा सू भारत व्हेग्यो । लोयाणा री काकड़ पर भीला सू दुसमरणी। जाणे समंदर मे रेवणी अर मगरमच्छ सूर । भर मगरमच्छ ई कोई साधारण नी । बाको फाई'र मिनस नै पाखौ रोपाखौ गिट जाव, तो पत्ती ई नी लाग इसौ। भीलां रे सुभाव पर सौर-तरीका सू सगळाई वाकन । भील भाई कोई बात पकड़े नी, अर पकड़े तो छोडनी । मा कौम ई इण भांत री। वारिगया रे जवाई रो तो काळजी फड़का चढग्यो। उणन मौत सुभट निजर आवण लागी । सेहज सेहज में किसीक गळती व्हेगी। भवे लोयाणा में रे वो खतरा सूखाली नी हो । वडगाव पूगां तो फेर ववान व्है सके । पण बड़गांव तो सौ जोजन व्हैग्यो। उठाताई पूगणो किया ? भोला हेरी पकड़ यौड़ो । वै मारग में हथीका त्यार । भाखर मे टुकड़ा कर'र नांख देव तो पछ गिरजड़ा ई धाप । उण बरस मारवाड़ में भयंकर दुकाळ । मेह रो छांट ई नी पड़ी। पाखं मारवाड मे कठई फळी ई नी फाटी। पण मारवाड़ सूलगते गुजरात रे इलाके थरादरी में उण बरस जमानी चोखो। इण कारण गुजरात सू अनाज री कतारा लद'र लोयाणा रै मारग मारवाड़ मे प्रावै । ऊकजी उण कतारां साग वोळाऊ रे रूप में प्रायवी-जायवो करै। उरणदिन अंक कतार सार्ग ऊकजी लोयाण प्रायो। बांणिया रे जवाई उणन बजार में अपूठी जावतो दीठो । उण लार सू हेलो कियो ऊकजी काकीसा! ऊकजी काकोसा ! ऊकजी पाछळ फोरी, जितरै वो हळफळतो थको नड़ो जाय पूगौ। मोकळा दिनां सू लोयाणा में रोडीज्योड़ी पर दुस सू भरीज्योडौ होवण सूऊकजो जिसा आपरं गाव रा भरोसाबंद प्रादमी ने देखा'र बांणिया नै रोज पायग्यो । प्रांख्या जळजळी भर कंठ गळगळी म्हैग्यो। ऊकजी ने की बात 16/सिरजण समझ में नी आई । वान बड़गांव छोड़ यां मोकळा दिन हैग्या हा। सोच्यो लार कोई कुठांणो तो नी व्हग्यो ? वै उणन लेयर अकांत में गया। पूछ्यौ-- कोई बात है ? गांव में तो से पारणंद मंगल है ? -हां गांव में तो सं राजी खुसी है । यो प्राख्यां पूछतो बोल्यौ-पण" --पण कांई, वात व्है जिकी कैव क्यूनी? कहा बिना कोई ठा पड़े। अर बारिणय प्रापर दोरप री बात घरामूळ सू मांड'र सुणाय दी। पात सुरए'र ऊकजी ई विचार में पड़ग्यो। थोड़ी ताळ ठर'र होळ होळ बोल्यो-कांम तो धाप'र ऊंधी ई व्ह्यिौ। म्हूं तेजा पर उणरा जवांई नै गाण । महा आंटीला प्रादमी। पण कुमत प्रावै जद किसी कैय'र आवै । इणमें थारौ ई कसूर कोनी भाया । ऊकजी काकौसा म्हन किया ई कर र वड़गांव वळतो कर दो। जीवू जितरं थारौ अहसान नीं भूलूं । वांणिय ऊकजी रा पग पकड़ लिया । अरे रे ! यू काई कर गला! ऊकजी उणरा हाथ पकड़ती बोल्यो । पै भील म्हारा टुकड़ा कर'र कागला नै चुगाय देला । थे चावी जिको ई म्हूं देवण न त्यार । पण भेकर थे म्हनै बड़गाव रा झाड़का दिखाय दो। ऊकजी ने करूणा पायगी। गांव रौ छोकरौ। हाथा सूमोटो कियो बापड़ा रै हाथारी मेंहदी ई मगसी कोनी पड़ी पर भीलां रै हाथ बिना मौत मारियो जासी । काई ठा इणरा हाडका कठ बिखर सी"....."इणने तो बचावणी ई पड़सी । ऊकजी मन में पक्की तेवड़ली । देवण-लेवण री उपरी बात याद कर'र ऊकजी ठीमर सुर में बोल्यो- देवण-लेवण री ५ बात छोड दे भाया । थने साथ लेय'र गयां के तो माथी देवणी पडला अर के माथी लेवणौ पड़ेला । ५ माथै रो मोल चुकाय सकती है तो बोल ! वांगियो चमगूगौ वणग्यो, कांई पडू तर देवती। -खैर थू अब दूजी चिंता छोड़-ऊकजी को-सूधारी परिणयाणी जगदंब सहाय करसी । काले दिनूगै थार चढ़ण खातर कोई सांतरी परण यार राख । म्हूं थार सागै घोड़ा माथै चालू ला । वाणिया ने तो जाण नुवो जमारौ मिळयो । सगळी रात अांख्यां में काढ़ की। दिनूगै अंक घोड़ा माथ वौई ऊकजी रे साग रवान व्हियौ । बड़गांव रौ मारग तेजा भील रा झुपा रे प्रागै कर वैवै । तेजा रे फळसा आगे पूगा तो ऊकजी घोड़ा नै छिनक दावियो पर हाको कियो वोळाऊ/17 तेजी घर है रे? हुए रा! गुडाळ में पायाज प्राईकुरण है ई ? ~ो तो म्हूं ऊको पड़िहारियो । बड़गांव वाळा गंगिया ने पुणावण ने जाऊं। था वाळा जवाई ने समझाय दीज के लारे नी प्रावै। मामूली बात खातर इतरी प्रांट नी बांधणी । पर जे इण उपरांत ई नी माने तो कय दोर्ज के धागडी लेय'र लार ग्राव । असल कसूवल पोतियो बंधाय'र भेजूला । पाछौ की पडूत्तर नी मिळयौ । बाणिया साग ऊकजी रे नावण री सुरपुर भीला री वस्ती में रात नै ई व्हेगी ही। तेजारौ जवाई हुमरड़ाई करण लाग्यौ तौ भीलां उणन वरजियो। पण यो मान्यो कोनी। बोल्यो-कोई साग नी चाली तो मगळाई पडी घंह में । जावती बखत वो वकार नै गयो है सो म्हने तो जावणी ई पड़ेला । तेजी बोल्यो-पांवणा मान जा । सगळाई ना देव तो प्रणताई मत कर । पछै ई पछतावौ रवैला। -पछतावो किण वात री? मरणो मेकणवार है। भर इसी ऊकजी कांई वाघ है ? जे असल भीलण रा चूंघिया है, तो ऊकजी पर वाणिय दोन्या ने मार'र पाणी पीला। तेजारी छोरी रोवती थकी बोली~बावो ना देवं वो काम मत करी। थान सूधा माता री सौगन है । थारी बाबो कायर है-वो रीस मे संबोळ व्हियोड़ी बोल्यो-भर में सगळा भीलड हीजड़ा है । म्हन किर्ण ई वरजियो तो माथी वाढ हूँला । अर वो तलवार री खापटो हाथ में लेयर उघाई माथै साव अकलो रवान व्हेग्यो । सगळा उणरी रीस न जाणता । इसा अडियल भादमी ने कुण वरजै । सै भाठा रो मूरत व्है ज्यू ऊभा । किण ई चूकारी ई नी कियो । वौ पवन रे वेग भाखर रे ऊपरवाई व्हैयर बड़गांव रे मारग जाय पाडी फिर्यो । लोयाणा सू की प्रोतर इण मारग भेक सांकड़ी घाटी प्राव । वो सागडो मौको देख'र ग्रेक टणका गड़ा रोल छिप'र बैठग्यो । होळ होळ मूरज ऊपर चढ़ण लाग्यो । घाटी में जीवा जूण री चळवळ सरू व्ही । भील री प्रांख्या पर कान अरजुण री चिड़ी र ज्यू मारग कांनी लाग्यौड़ा। इतरेक तो अळगै मूघाटी में घोड़ां रा पौड़ सुणीज्या। वो सावचेत न्है'र बैठग्यो पर तलवार हाथ में काठी पकड़ली । होल होळे दोन्यू असवार तर-तर नैड़ा आवण लाग्या। घोडा टपटप करता प्रापरोळ में वैवं हा पर असवार पाप-प्रापर विचारा में मगन । ऊकजी रौ घोडी गड़े र अन सनमुख आयौ के मौको 18/सिरजण ताकर भील फुरती सूवार प्रायो अर दोन्यू हायां में तलवार झाल'र लारै सूवार कियो । वार भरपूर बैठो पर माथी आधी कटग्यो । वो दूजी बार वाणिया पर करणी चावतो पण इणरै पै'लीज गरणाट करतो ऊकजी रौ घोड़ो पाठो फिरयो । विजळी रे पळाका ज्यू भक्ख करती भवानी म्यांन रे वार निकळी पर प्रेक झाटका में ई भील रा दो ढोल व्हैग्या। पा सगळी रामत प्रांख फरुकै जितरी जेज मे व्हेगी। घोड़े मू डिगतां डिगतां ऊकजी घाटी र पेलळ बड़गांव रा मारग माधे धूड़ रौ गैतूळ उडतो देख्यौ तौ उणरी पातमा नै संतोख व्हियो। भाखर में आज ई उण ठौड़ थड़कलो वण्योड़ो। ऊकजी भोमिया रै रूप में पूजीज। बोळाऊ19 सजा Dसांवर दइया अठं आयां गिरधारी ने सौ की अराखावरणी-अणखावणो सो लागतो । लागतो के बगत री रफतार साव धीमी है । सोमवार पर्छ सनीवार पाव जिते लसावै के जाणं जुग बीतग्यौ है । भाख फाटतां ई दिन सरू हुय जावै अर सिंझ्या कित्ती दोरी पड़े, बोई जाण । कमर सू स्कूल, स्कूल सूपाछौ कमरो। स्टोव सूमगजमारी । काची- पाकी पर माटी-बांडी रोट्यां । भालू कान्दा री सदाबहार साग । जीभ्यां पर्छ इग्नं -बिन्नं सुड़िया रगड़ता पीपळ रै गर्दै ताई पूगणौ । वठ 'चर-भर' रो मजमी। सिझ्या ने मोटर प्राव जित्तं बठे ई उवास्यां खावणी । इणी विच्च भेक-दो कप चाय । फेर थाक्योड़े मन सूपाछौ कमरै री भीतां में कैद हुवरणौ । दिनूग री बच्योड़ी रोट्या खावणी । फेर नींद नी मा जित पसवाड़ा फोरणा । का सत्तार र छोड्योड़े बीड़ी रं घूर्व में प्रमूझते जीव नै लियां पड्यो रैवरणो। प्रमोसन रो कित्ती उडीफ ही गिरधारी नै ! जदतांई लिस्ट भाउट कोनी हुई हो, तदताई यो केई-केई सुपना देखतौ । वीने भापर रगत री रफतार की. की वध्योड़ी लयावती। बीन प्रोतकात लखायो के जे वो ठेसण जायर वेटिंग मसीन माथै ऊभर साल चरिय र रक्यां पर्छ दस पइसां माळो सिक्को न्हाप'र मापरी वजन लेव, तो तारने दिनां लियोड वजन मूकाध किलो बत्ती ई हुवैला ! मां ई विचारां विच्छ प्रमोसन लिस्ट पाउट हुयगी। वीरी पोस्टिग गाव री संकण्डरी स्कूल मे हुई। स्कूल सूरिलीव हयां पर्छ गांव जावरण पाळी मोटर रीमती-पतो करण साग्यो। 20/सिरजए बस स्टैण्ड जाय' र 'पूछ-ताछ' पाळी बारी में मूण्डी घाल'र बिण गाव रो नांव बतायो पर मोटर री वगत पूछ्यो। बीरी बात सुण र बो प्रादमी मछां में मुळक्यो। कन्नं बैठ्य आदमी सूनजर मिलायी। दोनों री आख्यां च्यार हुई पर वै मुळकर जोर सूहस्या। फेर वो पादमी बोल्यो-ई गाव कानी 'रोडवेज' कोनी जावे । मेक प्राइवेट बसड़ी जाया करें"। -बा कठं जाव? --ध्यान कोनी ! मा सुरण र गिरधारी नै लखायो जांण किरणी भाठौ उठायर बीर सामें बगायो हुदै । साइकिल माय वैठर पैडल मारती धगत यौ मोचण लाग्यो के में सुगन पाछा हुया। मोटर कठे सू जावै, प्राई ठा कोनी ! पैली तो मोटर जावै बा जागा सोघौ, पर गांव पूग्यां पछै जे कठई स्कूल सोधणी पड़ी तो? घूमतां-धूमतां सिंझ्या ताई वीन मोटर रवाना हुवर्ण रौ ठिकाणी पर बी स्कूल र दो-तीन मास्टरां बाबत ई की जाणकारी मिलगी। वैवी रई सैर रा वासी हा। पूछताछ कर र प्रेक जणे रे घर रौ पतो लगायो । बढ़ ठा पड़ी के वो सनीवार ने प्रावै, अर दीतवार नै पाछौ जावै । गिरधारी सोच्यो के रविवार नै बीर साथै जावणी ई ठीक रवैला। सनीवार ने गिरधारी जद सत्तार रै घर पुग्यौ तौ बीरा बडोड़ा भाई-सा ऊमा हा । वा कयो-मास्टर जी, सतार तो ढाई-तीन बजी ताई पूग्या करें। मा सुण र गिरधारी पाछौ टुरग्यो। पाचेक बजी पुग्यौ तौ सत्तार घरो लाग्यो । सतार सूपुराणी संघ पिंछांण निकळगी । कमर में बैठ्यां पर्छ बीने लखायो के किरणी वीज री वास पा रैयी है । जाणे कठई कन्नई मोडको मर्योड़ो हुदै । बास तर-तर वधती लखायी । बी सूरयोज्यो कोनी । विण होळे सी'क पूछ्यो-थारे कमरे में प्रा बास क्या री प्राव है ? कठई कोई ऊंदरियो- फू दरियो तो मर्योडौ नी है? सत्तार री की-की गैळीजती प्रांख्यां मे भभको-सो उठ्यो । बौ घड़ीक की सोच'र बी मार्च माथल तकिये हेठ सूअक धौलौ पूर काढ'र पछती माथै फेक दियो। गिरधारी री नजर सूबच नी सक्यो के पूर गीलो हो पर बा गिध बोर मांय सू पावती ही। सत्तार बीड़ी री फूक खैच'र बोल्यो-देख भायला, म्हैं श्रेकर तो मोटर सूउतर'र धरां प्रावताई गंठी बीड़ ""अर फेर मौको लाधै जणा"" बीड़ी रौ घूवी गिरधारी रै मूण्डै आग पसरग्यो अरगंठी वीडण री मरथ ई समझग्यो। अरथ समझ में आवताई बी मुळक्यो । बौ बोल्यो-चालो, थोड़ी ताळ वारं धूम प्रावां । सजा/21 --चाय रौ प्रेक दोर हुय जावै । पर्छई पाला । -प्रो दौर बार ई करसां । वीरो जी की की मिचळावण लाग्यो हो। मर्योड़े मीढक री गिध बीरी नास्यां में भरीज्योडी हो । सतार काछ सुजावतो वोल्यो-जियां थारी मरजी। गिरधारी गांव जावण खातर तैयारी कर लीन्ही । मेक पीप में सातेक किलो पाटो, हठड़ी मे मिरच-मसाला, प्रेक डव्य में तेल अर दूज में घी, कोथळी में घर री कोड़ी बड यां, मेक ठूम में प्रालू, कांदा अर मिरचां""फेर तवी, वेलण, चकलो. स्टोव, घासलेट रो पीपी"दरी, चादरी.."वो अंक-अक चीज गिण-गिण र सामान बाघण लाग्यो। स्सी सामान बंध'र तैयार हुयो जणा तीन नग हुयग्या। सवा तीन वजी घर मूनिकळ यो पर साढ़ी तीन ताई गोळ वाग कनै पूग्यो। वठ वस लाग्योड़ी ही। गिरधारी प्रापरी पीपी पर दूजो सामान मोटर रे ऊपर रखवाय दियो। खुद मांय जायर बैठग्यो । मोटर में साढी पाच फुटो आदमी ई सावळ ऊभी कोनी रेय सके, वो तो पांच फुट दस इंच लम्बी हो। मोटर मे अक्कानी जनानी सवाऱ्या सातर सीटा ही। वी माथै पाच- सातेक लुगाया बैठी ही । सामै सीट माथ कई थेला अर अंगोछा पड़ या हा । अंक जागा साफो मेल्योडो हो। गिरधारी समझग्यो के अं लोग आपो आपरी सीट रोक'र नीचे खुली हवा मे ऊभा हुवैला का पर्छ सौदै सुलफ सातर कनं ई गयौडा हुवैला । पूणी च्यार वजी सत्तार प्रायो। पजामौ अर बुसट । मूण्डे में बीड़ी। प्रख्यां मे सागी गळ । गिरधारी रे मन में पायी के पूलू क्यों भाइड़ा, पावती वगत ती गंठो पकायत बीड्यो हुवैला । सत्तार बी रै कनै प्राय'र बोल्यो-म्हारी जागा रोकी का नई ? -भेळा हुयर बैठ जास""। --या तो खैर करसां ई"। सत्तार वोल्यो। च्यार बजगी, पण मोटर हाल दुरी कोनी । सवा च्यार बजगी। सत्तार ने पूछ्यौ तौ वो बोल्यो-मोटर मरीज्यां पर्छ रवाना हुसी। - हाल भरीजणी बाकी है कांई ? मोटर मे खचाखच भीड़ पर धू मूअमूझ्योर्ड गिरधारी कयो। -हाल तो इत्ता-रा-इत्ता लोग और बैठसी ! ---प्रां सवार्यो माथै ? --ना, मां रै कन बैठसी"मर केई बैठसी मोटर र ऊपर । आ सुण'र गिरधारी अमूझ्योड़ी हुवता थकाई मुळक्यो । बीन मुम्बई री डब्बल डेकर बसां याद आयगी । यांन प्रांसू सरखावण लाग्यो वौ । प्रोपन 22/सिरजण प्रेयर डबल डेकर ! मेक विचार वी रे मगज में उपज्यो,अर इण नवे सबद री मौलिक सूझ सूबी रो छाती ववड़ी हुयगी ! -ड्राइवर साव पधारग्या दीक्षा सत्तार बोल्यो। गिरधारी बैठी ने देखण लाग्यो। 'मेक मुडदल-सो दिमो चिन्बों बैट्योड़ा। मूछां जरूर भरवी ही। माता रागरा वण । आँख मक ही, पण या सरव लाइट रो काम काढ़ जड़ी ! दूजोड़ी ने तो जाणं किणी अंगूठे सू' दाव दी हुवै-पाली माटी र गोळे में ! मोटर री होरन वाजण लाग्यो दो-च्यार मिनख माय और धमग्या । कोई ऊपर चढ़ग्या तावड़े में 'प्रोपन एयर डब्बल डेकर' रौ मजी लेवण ने ! मोटर दुरी, जिते साड़ी च्यार बजण लागी। थोड़ी ताळ पर्छ मोटर में धक्कम-पेल-सी हुवण लागी । प्रारणिय मैसै सो क यादमी गळं में चमडै रौ बटुवौ लटकायां, मूण्डै में पान चिगळती प्राव हो पर भाड़ो वसूल कर हो। गिरधारी पर सत्तार ई प्रापरी भाड़ो चुकायो। क्यों, सोरा तो हो नी माड़ साब ! रापया कनै वैवती पीक नै बुसट री वांव सूपूछतो वो बोल्यो। थारी मोटर में दोराई क्यों री? सत्तार बोल्यो जाण फस्ट क्लास प्रेयर कण्डीसड डब्ब मे आराम सू सिगरेट पीवतो मुसाफिर बोल्यो हुवे ! गिरधारी मांय री माय मुसळीजतौ हौ । ऊधी सूधी गाळ या काढ़ती हो। थोड़ी ताळ पछ गिरधारी सत्तार रे कान मे कैयौ--गुरू! ई वस में बैठ'र भाड़ो देवणी तो साव बेकायदै री बात है। औ ढंग ढाळी देखता तो जिको प्रापरै गाव जीवतो पूग जावं वी ने फूल माळावां पैरा'र आखं गाव में घुमावणी चाईज! -परवाह ना कर, थारौ केस ई खाडो कोनी हुवै ! मोटर चाल्या जावै ही। बीच-बीच में आवतै ठेसणां माथै मोटर ढबती पर नुवी सवार्या लियां जावती । सिंझ्या पूणीक पाठ बजी मोटर गाव पूगगी। मोटर सूहे उतर्या पछ गिरधारी री प्रांख्या प्राडा तिरवाळा-सा पायग्या। विण उबासी ली। अठी-उठी देखण लाग्यो । -पली सामान उतार लेवां, पछ कड़क चाय पीसां । सत्तार बोल्यो- पण प्रा ती बता कै माळावां पर'र गाव मे घूमसी ? जीवतो पूगग्यो है लाडी ? पर दोनू हसण लाग्या । सजा/23 थोडीक ताळ में च्यार-पांचेक मास्टर भेळा हुयग्या । वातां में ठा पड़ी कै सिझ्या पड्या पर्छ पीपल र गर्दै माथै प्राय र अलोग बैठ जावै पर मोटर ने उडीकै । मोटर पाव जणा थोडीक ताळतांई बठं चल पल पर बात-बंतळ रंवं । पछै म्हाराज प्रापरी चाय रो दुकान बढ़ार घरां जावं परा। मास्टर पर दूजा लोग गुद्दी कुचरता, उबास्या खावता, वीड़ी पीवता का जरदै री पीक थूकता, खुडिमा रगड़ता आप प्रापरी कायका कानी टुर जावै। मांचा मार्थ पड्या पसवाड़ा फोरता घांसता-खंखारता भाख फाटण ने उडीकता रै ! गिरधारी री प्राख साढ़ी पाच यज्यां खुली। विण प्रापरी पाख्या मसळी अर प्राभे कानी देख्यो । आम में तारा गूगळा पड़ग्या हा। रोजीना री आदत मुजव विण दांतण कर्यो पर फेर मेक लोटौ पाणी पो'र निमटण सारू टुरग्यौ । विण सत्तार ने पूछ्यौ तौ बी पाख्यां मसळ'र गीड बिछावण र अक खुरण माथै मसळतो बोल्यो-तू निमटीया भायला । म्हें तो सिंझ्या ने जाया करू। विण गिरधारी ने बताय दियो के पली तो नाक री डाडी जाबो कर्य अर फेर डावै कानी मुड जाये। गिरधारी निमट'र आयो जित्तं ताई सत्तार मांच-माथे बैठ्यो बीड़ी पीवै हो । कांई टेम हुयग्यो ? सत्तार प्रापरी घड़ी में चाबी भरतां पूछ्यो- म्हारली घड़ी तो रात नै वन्द हुयगी बेटी ! —साढ़ी छव ! गिरधारी कयौ पर न्हावण खातर वाल्टी भरण लाग्यो। सत्तार ऊठ'र स्टोव मे पम्प मारण लाग्यो । बिण टोपिय में पांणी घाल'र स्टोव माथे मेल दियो । गिरधारी न्हायौ जितं चाय तैयार हुयगी। चाय पो र दोनू तैयार हुवण लाग्या। सत्तार 'ड्राईक्लीन' कर'र जूता पैऱ्या । वो वोल्यो-प्रावो चाला ! गाव रे प्रेक छेड़े स्कूल वण्योडी हो । स्कूल में कोकरिया ऊग्योड़ा हा। चौफेर काटा री वाड । स्कूल र लार देखा तो च्यारू मेर घोरा ई धोरा । स्कूल दो सिफ्ट मे लागती। दिनूगं सात मू साढ़ी वारं तांई पली मिफ्ट । जिण में छठी दसवी ताई रा छोरा प्राया करता । फेर साढ़ी बार मूपांच तांई पली मूपांचवी ताई रा छोरा । स्कूल री हालत देखण जोगी ही। नवमी-दसवी में सात-सात छोरा । पूरी मिफ्ट में मित्तरेक छोरा नीठ हा । गिरधारी न लपावतो के अटै यगत अजगर दाई पसोड़ो पट्यौ है । भेक प्रेक दिन हफ्त दाई वीतती लसावतो। 24/सिरजण अठ बगत कट किया कोनी ? बौ केई दफ सोचती। दिनूगै ऊठी भर चाय पीर स्कूल जावौ। साढ़ी वारै बजी छुट्या । डेढ़-दो ताई रोट्या सेकौ । खाय'र मांचे माथै प्राडा हुय जावो । पछै च्यारेक बज्यां चाय पी'र बार निकळो। वां सागी' ज च्यार पाच मास्टरा कनै जाय आवौ का पर्छ संग भेळा हुय'र कठई बैठ जावौ। पीपल रै गट्ट माथ जावी परा । बठ 'चर-भर' खेलते लोगों ने देखौ का पछै दो-दो जणा खुद ई 'चर-भर' मांड र रमण नै बैठ जावौ। सरू में तो बीनै 'चर-भर' देखण में की रस आया करती। वो लोगां री वाता सुणतो-हे लै'""या चाली । अब खोल उकरास। -उकरास देवू, क्यूहियो फूट्योड़ी है कांई ? --डोफा ! उकरास दे ना दिये । लारै फाडी पड़ी है । -क र देय'र देख तो सरी । मूतिया बंद नी कर देवू तो नाव फोर दिय । वांरी वातां सुण-सुण र गिरधारी नै मजो प्रावतौ । थोड़े दिना पछ वो खुद इ 'चर-भर' खेल'र बगत काटण लाग्यो । पण तो ई बीन लखावतो कै वगत कट नी रयो है । वो वी सोसाइटी में खुद नै मिसफिट मैसूस करतो ! -लै प्राव, चाला""। गिरधारी कयो । सत्तार उथळी दियो-इत्ती कांई खथावळ है । कमरे में जायर ई काई करसां बटै जाय'र माचे मार्थ ई तो पड़णौ है । मोटर देख'र चालसां। -कोई प्रावण पाळी तो है कोनी। गिरधारी बोल्यो। --कोई नी प्रावो भलाई । मोटर तो पासी'ज! ई वगत ई ती गाव में थोडी चल-पल निग आव। अर ग्रापां ई बगत कमर में जाय'र मरीजों दाई पड़ जावा ! हss ! बीड़ी सिळगा'र फेर वोल्यो-इंया उफत्यां पर उदास हुयां काम कोनी चाल ! --मन नी लाग रयो है। --सरू-सरू मे इंयां ई हुया कर। पर्छ औ ई बातां प्राची लागण लाग! थोड़ी ताळ पर्छ सत्तार बोल्यो-ले देख, बठी नै देख । बौ बजरंग पावै पर बों रे साथ कैलास ई है। अंई मोटर री रोनक देखरण खातर पाय रैया है। पर तू कैवं कमर में चाला। गिरधारी बठीन देखण लाग्यो । व बठ प्राय'र गर्दै माथ बैठग्या पर मोटर ने उडीकरण लाग्या । कैलास चाय रौ कयो । पछ गिरधारी ने पूछण लाग्यो-~-क्यू, गांव में मन लाग्यो का नई ? सजा/25 करण लाग्यो- -पंछी उदास है ! सत्तार बोल्यौ । -सर पाळां ने गांव में कम ई प्रावई ! बजरंग बोल्यो--सैर रा जीव ती संर मे ई राजी रवै! --पण सर में रैवरण रौ पट्टो थोड़ी लिखवायोड़ी है ! -प्रमोसन हुवै जणा तो प्रेकर वारं भेज ई है। ---प्रमोसन क्यों रो औ तो पनिसमेंट है ! -और नी तो काई ? सत्तार वोल्यौ-घर छूटे पर विना मतलब ई दो चूल्हा हुय जावं । दोलडा खरचा हुवे । -घाटी तो साफ दीख ई है। अब देख ले, गिरधारी प्रमोसन लेयर प्रायौ है । केवण ने तो दो इनक्रीमेण्ट रौ फायदी हुयौ, पण असल में तो सवा सौ, डेढ़ सौ रो धाटौ हुयी है । फेर बीड़ी री धूपो छोड'र सुलासी -सव सूपली तौ पचास रुपिया हाउस रेंट मिलती, बौ बन्द हुयौ। अटै गाव मे ई चाळीस रुपिया कमरी भाड़ो देवो । गया नी निब्ब रुपिया तो पूरा ! पर्छ आर्य सनिवार सैर जावो जरणा हरेक दफै पन्दर रुपिया वै गया। महीने में साठ तो अ गया। फेर अठरवां जणा सावण-खरच पर चाय वीडी रा जित्ता गिणी, व औरू गिरण लो। अब जोड़ो। अर फेर हां, बठे घर पाळा रे खरच में तो रत्ती भर ई फरक कोनी पावे। पौ खरची न्यारी बंध जावै । चाय पीवी परा। औ सरचा तो इंया ई लाग वो करसी! कैलास बोल्यो-ल गरु, पी परौ ! गिरधारी चाय पीवती-पीवती सोचती रयो के सौदी तो घाट रो रयो । प्रमोसन नी हुवती तो ई ठीक हो । चाय पी र संग आपो पाप री गिलासां धोय'र धर दीनी । मोटर आयी पर थोड़ी ताळ री चल पल पछ लोग खिंडण लाग्या। गिरधारी पर सत्तार ई कमर में पाया। रोटी करा कांई ? गिरधारी पूछ्यौ । कित्ती रोट्यां पड़ी है ? पांचेक फलका पड्या है ? क बाटकी साग है। थोड़ा मुजिया पड्या हा नी ? हां, है नी। फेर वळण दै । कुण माथा फोड़ी करला । बियां कोई खास भूरा तो पाथ कोनी! हां, दो फलका नीठ भासी। दो यजी तो जीम्या ई हा। हाल तो मागलो ई हजम कोनी हुयो । 26/सिरजण

भालू कांदा रौ साग पर मुजियां सू रोटी खाय र दोनू मांचे मार्थ
बंठग्या । ट्रांजिस्टर रा संल डाउन हुयोड़ा हुवरण रै कारण वो घरं घर्र करतो
हो । आवाज साफ नी प्राव ही ।
प्रवक सनीवार नै सर चालसां नी ?
हां, सनिवार ने जरूर चालसां! सतार री अावाज मे हरख हबोळा
मार हो।
प्राज काई वार है ?
मंगळवार है !
हाल मंगळवार ई वीत्यौ है ? हाल तो सनीवार पाडा निरा दिन
पड्या है । बुध, विस्पत, सुकर पर सगी "हे राम |
वै दोनू बत्ती बुझाय'र सूयग्या। पण नीन्द कोसों दूर न्हाटगी।
पसवाड़ा फोरत गिरधारी न पडी घड़ी औई लखावती के ये दिन अर बी ग्रेड
पाछौ हो, जद दोनू वगत घरा वणी-वरणायी ताजी रोटी मिल जाया करती
हो । अर इण भांत सनीवार ने उडीकरणो कोनी पड़ती ।
घी ने लम्बी उवासी आयी। अंधार में की-की सुणीजतो लखायो-
प्रमोसन क्या रो"ौ तौ पनिसमेंट है, पनिसमेंट ! असल वैठा हा आराम
सूघर में । उठायपर टेक दिया वार !
गिरधारी पसवाडो फोर'र सूवरण री कोसिस करण लाग्यो, पण
अंधार में वै ग्रावाजा तर-तर तेज हुयां गयी ।
सजा/27

छोरो विगड़गी उदयवीर सरमा खुल्ली चोखी सोवणी दिन हो । सोळी पून को चाल री ही ना । गणेसाराम प्रापरी रिस्तेदारी में जा'र भापर गांव कानी बावडर्यो हो । मारग में सोवण दिन नै देसर विचार आयो "टावरिय भूमिळ चालां । देखा किमोक ठाठियो वाघ राख्यो है ? घणीवार चिठ्ठियां मे मिलए बुला चुक्यौ । आज मौकी है । वी नं छुट्टी में घर आया धरणा दिन हुया । ब्याव करया पर्छ प्रायौ ई कोनी । टावर तो सुपातर है, कहै में है । चोसो कमावै है । स्याणी समझदार है । फेर इवी उमर ई कितणी ? जवान वणतो टावर है । धीर्या-धी- टेम पा'र और उन्नती करमी, ऊँचो-बड़ी होसी। चोसा पीसा कमासी । मेरै तौ चारुवा मे सू यो छोटकियौ ई घणी चातर पर सीळ सुमाव रौ निकळ सी।" इयांल के विचारां रै वेग सू गणेसाराम री छाती फूलगी पर बीरी प्रेम धारा छोरै सूमिळण न चाल पड़ी। घड़ीक चाल्यौ, रामगढ़ आगौ । गणेसाराम कनै प्रापरै छोरै री पूरी ठिकाणी-पतो को हो नी । पण बेरी ही सरकारी कुवाटरा में रवै है । बस नम्बर याद कोनी । वूझती-वूझतो कुवाटरों में प्रा लियो । कुवाटरो मे मार घणी भगा दौड़ करणी पड़ी। कोई आवै "इन्न" बतावै, कोई प्राव "बिन्न" बता । अंक जणो बतागो, दस कुवाटर छोड'र आग मेक सड़क प्रावंगी, सहक सूचाल'र श्रेक हाथी मड्योड़ी कुवाटर पावंगी, वीनै वायो छोड'र मागे सीधा चल्या जायो, पाचवी कुवाटर बिना रौ ई है । और आगे पूछ लियो" गणेसाराम री चोखी गोडा तुड़ाई हुवे । कुवाटर को लाधनी । फेर अक जणी मिल्यो, बी बतायो, "थे ऊळा आगा । इए तरफ तौ से बैंक अर अल. आई. सी. में काम करगिया रव है । थारो छोरी किरण म्होकमें में काम कर है ?" 28/सिरजरा गणेसाराम आखतो सो हो र बोल्यो "म्होकमो तो मेरै ठीक सावळ याद कोनी, पण बो तैसील में काम कर है । वी रौ नाम चतरसिंघ है।" बतारिणयो बोल्यो "थे इण सड़क सडक चल्या जावी, जठं या सड़क खतम हुवै, बट सूदाय हाथ कानी मुड़ज्यायो, आग चाल'र अक बड़ रौ बिरछ पासी, बिण सूबाया चाल'र सौ-श्रेक कदम थे चालस्यौ जणा तैसील हाळारी कोलोनी आसी । बढ़ थे पूछ लियो । थानै ठायौ ठिकाणी मिळ जासी । गणेसाराम पग तुड़ाई करती फिर, पण छोरै रौ कुवाटर को लाधनी। जितणौ जोर दस कोस चाल र कुवाटरां नड़े प्रावण में को पायौ नी, बितणो जोर कुवाटर-कुवाटर छाणन मे आयो । पण तौई श्रेढ़ी मिल्यो कठे ? दिनरा पाठ सूबारा बजण में आई, इब प्रायोड़ी बिना मिल्यां कियां जावै ? सांप- छछूदर री गत हुयगी। पीरू कुवाटरा में पग तुड़ाई कर लागौ । चालतो-चालतो रेवन्यू कुवाटरां मे पायौ । पूछताछ करी । मेक जणी प्रापर कुवाटर सांमी ऊभी हो। तैसील में काम करती। वो चतरसिंघ ने चौकस जाणतो । सो वो गणेसाराम ने आपरै कुवाटर में लेगी। स्वागत सतकार में चाय प्याई । निरणावासी गणेसाराम रै पेट में क्यूपड़ यो । जी में जी आयो । हिम्मत बंधी । थ्यावस आयो । चाय पीता-पीता बतळाया, "चतरसिंघ जी पैली इणी कुवाटर में रैवता । इब 2 छोड़'र सहर मे चल्या गया । बठे बान क्यू बडो पर सज्योड़ो मकान मिळगौ। अठ मूदो कोस दूर पड़सी तांग में चल्या जायौ । हैं थाने पूरी पतो दे देस्यू। फोड़ा कोनी पडसी । 'सिंघजी' आदमी घणा लूठा है । मस्त घणा। पीस कानी कोनी देखें । गोठ-घूघरी रा तो भोत प्रेमी । घूमणं रा घणा सौकोन । कद-कद सभा सोसाइटी में 'पकाळियौ खाण-पाण' ई कर लागा। थारा बै कांई लाग?" "बेटो" इव वात बदळतो वो बोल्यो, "मेरो मतलब यो नी है के वै बिगड़गा या कोई कूलत है। घणा स्याणां है । लण पर है। म्हारा बै संकदी है। फुलखरण तो वारेनेड़े ई को पावै नी । भौत घणा मनती है । खटके पीमा कमा- णिया है । कोई री सेवा-सहायता करणियां ई है, कराणिया कोनी । वं संरा प्यारा "सिंघजी है।" वेट री बडाई सुप'र गणेसाराम री छाती फूलगी। छोर सूमिलण ताई पग तुड़ाई करतो गणेसाराम बी ₹ बतायडे ठिकाण मुजव प्रौरू चाल पड़ यो, पण इत्री ठायची कट ? दोरी तीन कोस लठरी जात निकळी, पण गरणेसाराम चालगियो मादमी हो । के भाव ही ? पूछती-पूछतो इवकै ठायचंसिर मा लियो । 1 छोरो विगड़गौ/29 मकान सामी मार देखें तो छोरं रो नाम अंक काठ री पाटी पर लिख्योड़ो टंगर्यो हो । गणेसाराम ने थोड़ा धरणा नोव बांचरणा प्रावहा । वो मकान में चल्यो गयो। सोवणी याग बगीचो देख्यो । मन हर्यो हुपगी। प्राखर किसान री छोरी है। हरियाळी सू प्यार होवणी ई चाहिजे । वी हरियाळी में दो च्यार मुड्डा-कुरसी पड़ी ही । बीच में टेबल रखी ही । पण सुनसान कीने पूर्छ ! दुरज कानी गयो तो लिस्योड़ी ही "बुलाने के लिए घंटी वजावो" इब गणेसाराम ने वेरौ कोनी के घंटी कियां वजसी! पण वो बटंग ने छेड दियो । छेड़ता ई मायने टरताट उपड़यौ । घंटी ग्रापी माप वाजगी। थोड़ी देर में दरवाजा खुल्यो । देख तो मेक फररी-फूटरी, दो चोटला करयां. टरबू. मरकू करती अंक जवान सी लुगाई अघ जड़िया कुवांडा में सू सावळ दीखी। मांय सू तन रा पळका पटकण हाळी लाइलून री मार्ड पल्लै री साड़ी वाध्या ही, जिण मे सूअक बिलांदियो कब्जी भळक हो । मेक हाथ में कांच री विदरंगी चूड़ियां दूज में चूड़ियां री जघां घड़ी ही। मुखई रा मन भावणा अंग भांत भात र रंगां रे साज सू सज्योड़ा हा । इयां लागे हो जाएं या कठई जावरण नै सज्योड़ी हो । पगल्या धरती पर उभारणा ई टिका हा । इसौ सरूप जिंदगी में नेड़े सूपली बार देख'र गणेसाराम हैक वक हुयगी । बोल को उपड़े नी । बिसवासई को होयो नी के म मेरै छोर र पर्यो खड्यौ हूं। मैम हुयगी, कट जूता नी पड़ग्या । या घंटी काई बजगी, नाटक रो पड़दो सो ई खुलगो यो कांई जादू है ? या सांपरत चीज है । मन, माथ पर मुखड़े मे तो उथळ पुथळ हुवे, पण जीभ को चाल नी । इतणे में बा देवी बोल पड़ी "थे कुण ने पूछो हो" इव गणेसाराम री वारी ही बोलण री वोलणौ पड़ यो, "चतरसिंघ अठ ई रे है कांई ?" "हां, पण बै तो बारे गयोड़ा है।" गणेसाराम सुण राखी ही के दीतवार नै से नौकर धरै ई रह्या कर है, दपतर को जावनी, बोल्यो, “आज तो दीतवार है वारं क्यूकर गया ?" "प्रेक भायल र अठं दावत है, वीं में गया है। मैं ई बट ईजावण त्यार होरी हूं। मन्नं कपड़ा परण में क्यू देर लागगी। चपली चल्या गया । मैं इब जा री हूं। बोली कोई काम हो काई ?" "फेर पासी कद" "रात रे बारा घेक बजे तक । पैली दावत में जाणो है, फेर प्रेक सहेली र मन्नं जाणो है। पीछे सिनेमा देखरण रो प्रोग्राम है। रात री ओक बज ज्यासी। थे काल मिळ सको हो दस बजे पली पली।" । 30/सिरजरण गणेसाराम को सोच सक्यो नी के इब कोई करणी चाहिजे? ठरै तो कटे ठरे ? वो तो या ई को पूछ सक्यौनी के थे कुरण हो । चतर्य री के नागो हो ? सूरज सांमी प्रास्यां हुया ज्यू पळको लागै अर थोडी देर तक क्यूई नी दीख बियांन ई गणेसाराम री प्रांख्यां सांमी तिरमिरा प्रावं लागा । वो तो धवरागो वोल को उपड़े नीं। सहर री इसी लुगाई नै कद देखण रौ काम जिंदगी में ई को पड्यो हो नी । बोलणी-बतळावरणौ तौ दूर रह्यो गरणेसाराम संग-वैग हुयौ सद्यो । विनं घड़ी रा सुइया ज्यू ज्यू "चन चल आगे चल चल" करता बढ़ता जाऱ्या हा त्यू त्यूमन जावण री तावळ करै हो। गणेसाराम ने गूगौ सो खड़यो देख'र बा झाळ खा'र "ठीक है काल मिलियौ" कैवती किंवाड़ जड़ लिया। इव गणेसाराम अक लो बार ऊभौ। क्यूं थ्यावस पायौ । चित में चेत आयो । घर रैबार निकळ'र प्रापर गांव रो गैलो पकड़ लियो। गणेसाराम र घरै पूच्या फेर दो दिन पाछ चतरसिंघ से कागद प्रायो । लिखी “काका तू मिलण आयौ पण म घरै को मिळ सक्यौनीं । माफी चावू।" वांच'र गणेसाराम रे पकायत जंचगी के बो कुवाटर मेरै छोरै री ई हो पण सोचे "वा छोरी कुण हो ? बी री बींदणी सी तौ को लागै ही ना। व्याव हुयां पाछ इबी अठं तो बी नै ल्याया ही कोनी। वीं रा तो पळका पड़े हा । मेम री बच्ची हो री ही । के चतर री बीदणी या हो सके है कांई ? ल्हाज सरम तो बी र ने. ई को लागी नीं। व्याव में तो इसी के, क्यूई को जाण हो ना। पापरियों को सम्है हो ना, लूगडती पड़ पड़ जावै ही। पण छोर नै सहर री फैसन खागी। या के हुई ? इब कांई हो? छोरी बिगड़गी।" सोचती-सोचतो बौ खेत काम धंधे में लागगी, पण मन मे इयांलक भावा री उथळ पुथळ हुवती रई । छोरी विगड़गौ/31

जेवड़ी
कमला वरमा
डाक्टर साब ₹ ई बंगले में ऊपरली कमरी सौ रुपिया किराय में
मिळग्यौ । वंगले मे लाग्योड़ी हरियाळी, दूर तक जावतो साफ सुथरी सड़क,
नीम, पीपळ अर बड़ अं भारी भारी दरखत...."स्याम नै सुरग रौ पगो-
थियो ई मिळग्यो ।स्याम री पादत घर सूचार भटकरण री, यार भायलां में
मन रमावण री जरा सीक ई नई । स्याम नै चाईजै कान्त, हवादार कमरो.
जिक सूबार दीख, पाख्या नै तिरपती देवरण वाळी चीज्यां ।
डाक्टर सावरी पत्नी निरमळा देवी री बोली में ई कित्तो मिठास है।
ई ममताळ सभाव नै देख'र तो स्याम निरमळा देवी में मां दुरगा री छवि
देखी। हाथ जोड़ आभार प्रकट करियौ पर विनम्र संबदों में स्पस्ट ई करियो
के बी प्रापरी तरफ सूबगल री प्राब बिगाईला नई ।
-~~-स्कूल में कई कई पढ़ाया करी?
-~-संगीत सिखाया करूं।
-~लड़यां री स्कूल में हो ?
- हां जी।
-ट्युसन ई करी?
-संगीत रा ट्यूसन मिळे ई कठे ?
--म्हें दिरवा देसू। खनले बंगलां में संगीत सीखण वाळी टाबरटोळी
घणी निकळ जासी।
-ना जी, म्है समरथ कोनी । म्हनै वगत ई। कोनी"म्हैं स्टेज पर
गाया करू', अभ्यास करण नै टेम चाईज
-जण तो थांरी संगीत मंडळी अट रोजीनां जमला कई ?
,
32/सिरजण

मापने कोई तकलीफ नई हुवैला । म्हें अकलो वैठणियो जीव हूं कमरो बन्द कर अकलो ई अभ्यास करू......."यू म्है लेखक ई हूं, कविता, कहाणी लिख्या करूं..."ई सातर न्यारी निरवाळी सी क आदत्यां है । आपने किरणी भांत तंग नंई करूंला। वा 55 वा, सोने में सुहागो मिलग्यो । म्हन तो सगीत रौ घणोई सौक है। अक र संगीत स्कूल में सरगम्यां धरगम्या म्हे ई सीखी, पण डाक्टर साबरी गिरस्ती संभाळरण में पार पड़ी कोनी......"मांय मायं अमूझती प्रेक दो बार लेख पर कहाण्यां म्है ई लिखी 'म्हन तो थे मन पसन्द साथी मिलग्या......"कित्तीक किताब्यां छपगी है ? -किताब तो छपी कोनी पत्रिकावां में थोड़ी घणी जगा मिळ जावै । थोडी बातचीत में ई स्याम समझग्यो के वो ई परिवार सू गरिमामय सम्बन्ध वरणा सकसी । निरमळा देवी सूवीरी चेतना में प्रेक ऊरजा ई प्रा सकसी निरमळा देवी आम घरेलू औरत सी ई नंई है, माधुनिकता री अटपटी चादर प्रोढ्योड़ी ई नई दीखे....."ई औरत रे रुख मे ई अक अलग प्रदाज है...""प्रेक विचित्र चीज है । चाळीस पैताळीस साल री निरमळा देवी में उमर सारू प्रौढ़ता नंई है, अक ठराव होवणौ चाईज बो ई नई लागे । जद डाक्टर साब बोल्या-- देखो जी, थारी भाभीजी ने संगीत पर साहित्य रो रसास्वादन करावणों मत मूल्या, प्रांनै कलाकारां सूबेसीज लगाव है। निरमळा देवी चिमक'र बोली-कलाकार री कदर म्हें ईजाणूं, नीरस डाक्टर कला री नाड़ कई समझे ? कोई अरगजाणं यादमी परसाद देव, घोबा भर भर...""अजूवी लागे कनी ? स्याम ई सोचती के निरमळा देवी इत्ती खातिरदारी, सम्मान पर सनेह कई मकसद सू करै ? केई दिन जिद राखी के स्याम डाक्टर साब री रसोई में ई जीमला घणी टाळमटोळ अर बहाना लगाया, पण निरमळा देवी मान ई नंई। दुपहर में स्कूल सूआ थाळ तैयार। सिंझ्या रा डाक्टर साय अस्पताळ जावं मर नास्ती तयार । रात रा दस वजी फेर भोजन री मनवार । आसिर डाक्टर साब री मौजूदगी में स्याम हाय जोड़'र प्रापरी बात स्पस्ट कर दी-म्हें गांव सूदूर घणौ सीक अकलो रयौड़ी हूं। पढ़ती जरण सूई म्हन रोटी वरणावरण री पादत है । चटणी, रोटी पर सीपड़ी सावरण . जेवड़ी/33 री आदत है, म्हें इग्री मनवार पचावरण में धरणी दोराई महसूस करू भोजन खातर माफी चाऊं। निरमळा देवी मान तो गई पण दूसरे तीसरे सिंझ्या री बगत कई न कंई तस्तरी में राखर लियावती पर जिद कर'र सामें खणावती । कई कई अन्दाज लगावती रेवती स्याम । निरमळा देवी रा दोनू लड़का हॉस्टल मे वारै पढे....."वीं अभाव नै पूरी करती हुवैला, संगीत प्रर साहित्य र लगाव री डोर नै कसण खातर ई खातिरदारी सू गांठ पक्की करगो चावती हुवैला। निरमळा देवी री वातचीत में खुल'र हिस्सी लेवणी चावतो, पण निरमळा देवी बीन अजूबी औरत लागण लाग जाती अर वो सनेह री जागा संकोच अनुभव करण लाग जावतो। -पत्नी कित्तीक पढ़ेडी है ? -चौथी-पांचवीं -जगइज साग राखरणी चावी कोनी, -आ बात कोनी, म्हें अकल-खोरियो जीव हूं । वा भर-पूरे परिवार में रमियोड़ी। दो छोटा छोरा है । गाव में दादी वडिया खन विलमीज, बांन अठ क्यों अळसाऊं। - ठीक है । श्रादमी ने इसोई हुवणी चाईजै । अ डाक्टर साव है नी, म्हारो साथ कदै ई नी दियो। म्हनै दसवीं पढा'र मा-बाप और लार करी ही, जद तक अं पढ़ या, आर मा-वाप री गुलामी करी, अब आपरी गुलामी करवा रया है । प्रारं खातर म्है संगीत स्कूल बिचाळ छोडी इन्टर रा फारम दो वार भर्या, यूई गया । इत्ती हाजरी भरू पण म्हारै हर काम में गलती काढ़सी। यू हर काम निरमळा देवी मन मरजी सूई करती, पण डाक्टर सायरी दो च्यार बुराई रोजीना करती। -अाप म्हारौ हारमोनियम कई दिन राख लोनी, लिखियोड़ी स्वरलिपि रै सहारै थोडी अभ्यास करौ....."मन में चन पासी। निरमळा देवी हारमोनियम ले'र राजी हुया। सप्ताह बाद ई पण उतफग्या। म्हन अब किसौ क्लव मे गायण रौ न्योती मिळं है. स्याम जी, पाप तौ वस म्हनै लेखिका वणवा दो, -आप लिख्या करो, वणसी जिसी मदद जरूर कर सू। वा चिडी जिकी फुदक र प्रांगण मूसीधी छत पर चढणी चाव, निरमळा देवी ई इणी प्रकृति री लागी । दूज दिन स्याम स्कूल जावरण खातर 34/सिरजए नीचे उतर्यो । 'निरमळा देवी चार-पांच कागज पकड़ा दिया-स्कूल में टेम काढ़ र देख लिया। रात सासी देर जाग'र कहाणी लिखी हूं। संझ्या नै डाक्टर साब र ड्यूटी जावतां ई ऊपर आर ऊतावळी सी पूछण लागगी-क्यू किसी क है, म्हाणी कहाणी"किं दम है ? -थोडं सुधार री जरूरत है। तो चटपट सुधार कर'र छपवादो। -~-आप खुद इन दो-च्यार बार पढ़ौ समझो के कट कमी है। - लाडी म्हन इत्तौ टेम कठं? पा तकलीफ थे ई करो। जिने म्है दूसरी कहाणी त्यार कर राख सू। रात ने स्याम बी कहाणी सूखासी माथा फोड़ी करी। सवेरै निरमळा देवी ने देर बोल्यो-अव ग्राप ई ने 'फेअर' करलो। -~-यारी स्कूल रे बाबू सू टाइप करवाय लामो । --चीं ₹ खनै काम घरपी । वो तो नई कर सकला । भोळा जीव ही थे तौ! म्हा खनै सू सैम्पल में प्रायोड़ी प्रेक-दो टॉनिक री सीस्या ले जाया, और ई कोई दवा धवा चईजै तो ढूंड दिया, टेम निकळ प्रासी घट देगी। -~~वो इण तर रो प्रादमी कोनी, लानौ म्हें म्हारै हाथ सूलिख देसू। कहाणी, जिकी रौ रूपरग वीं रौ खुद रो ई हो, लिखती बगत स्याम सोचती रयो मा आफत बार बार आई तो? साचांणी मा आफत रूदीन बणगी। चाय, कॉफी पर मिठाई री मनवार रे साथ निरमळा देवी वतंगळ रा झूझळा ई झूझळा पटक जावती । स्याम रै खातर कमरै रो कान्त, बगीचे री हरियाळी, खिड़की सूझांकतो असमानी अाभौ "मैं सब गूगा बरणग्या । ना तो प्रां दिनां बो कोई धुन बाध सक्यो पर लिखणी तो दूर, रचना रा पगलिया ई नई बण्या। दुपार क बजी स्कूल सूआर, सवेरै री वण्योड़ी खीचड़ी खावतो पर दो-तीन घटा नीद लेवतो, सिंझ्या रा दो-तीन घंटा निरमळा देवी रे वतंगळ ने भेलती झेलतो घर सूनिकळतौ घूमघाम र घरै पावती । घणी वार डाक्टर साब रात नै देरी सूपावता। निरमळा देवी बी बगत स्याम नै नीचे बुलवा लेती, आपरी सहेल्या सूमिलवाती, केई किस्सा सुणावती फेर लेखिका बन री त्यारी में चहक चहकर नवा नवा प्रसंग छेड़ती। जेवड़ी/35 -रचना भेजी जिकरी जवाब हाल तई नंई मायो । पत्र लिख र पूछ देखा। बारै गयोई मिनस रे कागद री उहीक हुच ज्यू ई निरमळा देवी मापरी रचना निरण री उडीक रासी । ई वीच स्याम निरमळा देवी सूउफतीज ग्यो। हाल तो दो ढाई मईना हुया ई घर मायां । अणूती मनवार, अणूतो हेत स्याम रं जी रो जंजाळ वणग्यो, पण वार सूपूरी तर सुभाविक वणवा र प्रयास में रेवती। रचना वापस भाई देख, निरमळा देवी संपादक ने कोसती रयो । सय जगां जाण पंचांग चाईज भई । लेखक लोग तो हाथोहाथ रचना स्वीकृत करवार प्राव । अबकी थे म्हारे साथ ग्राकासवाणी चालो। -म्हार तो बठे कोई जाण पंचाण कोनी । -म्हने ती जाग जासी । डाक्टर साब कोई प्राजांण मादमी कोनी । थे बस साथै पालो परा। स्याम बी बगत कई जवाब नई दे सक्यो। निरमळा देवी कित्ती बार पूछ चुकी, कद चालसा पाकासाशी ! स्याम टाळमटोळ कर जावतो। आखिर स्याम ने साफ जवाब देवणी पड़ियो-म्हैं प्रापरं सार्थं नई जा सकूला। ~~-म्हें श्रेक इज्जतदार औरत हूं, म्हारं साथ कई मंतराज है ? काल रात नै ई तौ मा इज्जतदार मौरत दारूरी बोतल लें र वीरे कमरे में आई ही-लेखक लोग दारू पोया करे है। थे सरमाळ प्रादमी हो, म्हांसू मांग लिया करो। स्याम भेक टक देखती रयो बोतल नै फेर निरमळा देवी न-असल लेखिका तो आप हो । प्रापन इंरी दरकार है। सातिर राखौ। म्हें नई पीऊं। ~म्हारे डाक्टरां समाज में तो चाल ई है। क्लब जावां जणं थोड़ी तो चाखणी पड़े । थे पा राखौ फेर जरूरत पड़े जद मांग लिया। निरमळा देवी बोतल राखर जावरण न हुई। -ग्रा उठार ले जावी। स्याम मवराटा चढ़ा'र बोल्यो। बी रो मन हुयो दो-तीन लात्यां मार र कमर बार काढदू', माथे ना वोतल फोड़ हूँ। --खन राखण में कई मैतराज है ? -आप उठा'र पाछी ले जाबो । अवार रा अधार"ई घड़ी। 36/सिरजण निरमळा देवी श्रेक निसरमी हंसी हंसर बोली-ले जासू लाडी इत्ता लाल पीळा क्यू हो वो ! निरमळा देवी रे साथ जावरणौ तौ दूर, दो मिनट बात करणौ ई अब तो दोरौ है। --म्है दूजी ठौड़ मकान ले लियो, अ लौ प्रापर किरायै रा रूपिया, बस म्हैं जाऊं हूं। स्याम सोच लियौ हो के ई कमरे ने छोडण में है लाभ है। मेकर स्कूल में ई जा'र टिक जावां, फेर दूजी ठोड़ देखता रसां । -ना555, कठई जांण री जरूरत कोनी । म्हें तकलीफ घणी देकं ? ..."वा अब कई नई कैऊला थे कमरे में बैठौ। लिखो पढ़ी बगत मिळ तो बतळा लिया नई तो कोइ दोराई कोनी । निरमळा देवी री आंख्या पाणी सू भरोजगी-~-इयां मोह लगा'र जाया कर कंई ? स्याम कमरै री खिड़की खन सू बार देखती रैयौ~असमांनी आभने, दूर जावती सड़क ने बिना कोई अरथ रै। तो इयां कर पा रचना पाकासवारणी में लिफाफे में घातर भेज दी। थोड़ा दिन बाद फोन सू पूछ लेसो""लौ चाखो तो"आगरा सूपायोड़ी दाळमोठ है" स्पाम ने चुप देख निरमळा देवी तस्तरी राख'र नीचे चली गई। स्याम रोजी हुयो तस्तरी उठा'र खिड़की सूबार फेंक दूं। पण स्याम चुपचाप मार्च पर बैठ ग्यो । बीरे सरीर पर अंक जेवड़ी सीबंधगी। जेवरपी/37 सुपनी Oभीखालाल व्यास आज रामू भाग फाटी रा ऊठगी ! यूतौ वा नितरोज बंगी अठ जावे, पण पर्छ जठा तांई दिन नी चढे वा घट्टी फेरती रवै। गळी ₹ मिनखा रौ पीसणी करे- पाठ प्रांन मारगी। नित रो वा दोय माणा पीस देव । पण माज वा कठनं घट्टी खन नी गई। रामू ऊठ'र झाडू काढ यो, बरतनो रे हाथ फेर्यो पर प्राय'र वारोख खने बैठगी। प्राज सात वजियो री गाड़ी सूं उगरी वेटो मोवन भावण- हाळो हो । उपरी काले कागद आयो हो, जिरणमे उरण माज जरूर प्रावण रौ कहो हो। रामूरै मोवन काग्रेक वेटौ हो, जिगर प्रासर उणे आपरै रंडापै रा अटारै वरस काढ़ या हा। वाळपणे ई उपरी वीद उपर सोळा माय तीन महीना रो टावर छोड़'र रामसरण व्हैग्यो हो। रामू री दुनिया सूनी व्हेगी ही। उण वापड़ी सुख रौ चांदणी कदै ई को देख्यो नी, खावण-पीवण भर पैरण-प्रोढरण सूपैली उणरौ सिन्दूर उजड़गो हो। दिन आयो पर रात गई --पर आज उरणरी चेटो ई पठार बरस री म्हैग्यो....रांमू ई इण अठार वरसां में डोकरी व्हेगी ही....प्राज उगरी बेटी नौकरी लाग्यां पर्छ घरै प्राय रह्यो हो । रामू रे हिय मांय उछाव बढ़ रह्यो हो....उणर आचला माय सिंदूरी कीडियो चालण लागी । वा सोचण लागी। उरणारी पारया प्रागै दसेक बरसा पैली रो चितराम फिरग्यौ । मोवन उणटम तोजी किलास में पढ़ती हो। दोपार रा वो घरै आयो तो उपरी मा मूखी सोगरौ मिरच मूलगाय'र खावती ही। मोवन प्री देख्यौ तौ अचू मै रेग्यो । हालांकि मोवन इण बात न जाणतो हो के वै गरीब 38/सिरजण है पण रामू उणन कदेई दुःखी नी कियो हो । खुद भूखी रेवती पण उपने चोखो सरावती-पीरावती-परावती-प्रोढ़ावती । मोवन बोल्यौ--ो काई मा ! थू इसौ सूखौ सोगरी क्यू खावै ? -~-यूईवेटा, औ कालको पड़ियो हो, वार फेंकरण सूकाई फायदौ । यूं तो इसकूल जावै, मैणत कर, जिणा धन तो ऊनी खरावू तो ठीक र वै। म्हार काई काम करणी पड़े ! यूई पाखी दिन बैठी रैबू, पछ सरीर खिड़क ने किसी मालाणी मे बेचणौ है । केय ने वा फीकी हंसी हसती पाणी रै घट साथै कवी गळा सू नीचे उतार दियो । -नी मा ! म्हैं थन इसौ नी खावण देवू'ला । कैय'र उण मा रा हाथ मांय सूटुकड़ो उठाय'र बारं फेंक दियो । रोमू उणन कीकर कैवती के पापां गरीब हां, आपां रै भाग में इसी ई लिख्योड़ी है । औ ई धणी मुसकल सू मजूरी कर'र लावू हू । उण अंक सुपनौ संजोयौ हो। मोवनियौ मोटो व्हैला, पढ़-लिख'र नौकरी करैला, तिणखा लावला जद उणरै किणी बात री कमी नी रैवला । वाता करता दिन जावला परा। दसवी पास कर'र मोवनियो जिण दिन घरै आयौ हो, वा घणी राजी व्ही । मोवन उणन कह्यो-मा, मीठी मूडौ नी करावै। पर उण प्रापर पल्ल बध्योड़ी पाठानी उणन देय दीनी ही। उरण रात रामू सफा भूखी सूती ही, उपरी हियो इण्यात री गवाही देव। गाड़ी की सीटी सुरण र उपरी तन्द्रा टूटी । वा सोचरण लागी हमे मोवन गाड़ी मांय सू उतरग्यौ व्हैला। हमें रवाने व्हैग्यों व्हैला । उपरी गाड़ी माथै जावरण री घणी मंछा ही, पण उणर खनै पैरण जोग कोई ढग रौ गाभौ ई नी हो । उण सोच्यो बड़ा फाटौड़ा गाभा मे वा जावला तो मिनख उरणनै ई देखला, पेंट-सूट पेर्योड़ो मोवन अर खनै फाटौड़ा गाभा पेर्योड़ी वा, मिनख तो हंसला ई, मोवन ने ई सरम आवला । वां गळी रै छ माथे मीट राख्यां बैठी ही। थोडीक ताळ में मोवन प्रावती दिखियो । रामू आग बघ'र उरणरै वाथ घाली, लाड़ दियो अर उरगरी थे'तो पापर हाथ में पकड़'र नैना टाबर री गळाई उपरी प्रांगळी पकड़ र घर लायो। उपरी नौकरी री सारी वातां बूझी-किरण तरै रौ गांव है, कितरी पर किणरी वस्ती है, मकान रो काई सुभीती है, पाणी कितरो नड़ी है, पर सुपनौ/39 ठा नी कितरी वानां वा उपने बूझती, मोक्न र जवाव रे मुताबिक उपरी प्रख्यां आग उग गांव रो खाको यरगतो रह्यो। उरण मोवन वास्तै चाय पर खांड़ ई लायन राख्या हा । मोवन नौकरी कर--नौकरी करण हाळां ने चाय पीवणी पड़े। मोटा मिनखां रा नखरा मोटा-नसा मोटा-पादता मोटी । ये पांन साव, वायां चोहै पर सिगरेटां पीवै । चूल्हा मार्थ देगची चाढ़'र चाय चणाई अर वाटकी भर मोवन ने सूपी । मोवन कह्यौ थूकोनी पीव ? -ना रै भाई ! म्हारे पी नै कठे जावणी । सांमियों र कडा सुवाद । जीम-जूठ'र बैठा तो रांगू बुझ्यो-थन महिना ऊपर टम व्हैग्यो है नीं। -~हां मा सवा महीनो व्हैग्यो । अक महीना री तिणसा रा साढ़ी तीन सौ रिपिया ई मिळग्या । रांमू ने ठानी क्यू नं'चे व्हियो । साढ़ी तीन सौ रो नाम उपर हिय में ठंडक रौ व्हाली दियो । बा थोडी ताळ चुप रंगी। –पण मा साराई खरच व्हेगा। रामू रे कान मे ऊन ऊन तेल री गळाई मोवन से प्रेक-अक सबद पड़ियो। -खरच व्हेगा, इतरा-सारा पईसा, रामू नै ठानी क्यू लाग्यो के उण पईसां माथे थोड़ी-घणी उपरी ई हक हो । हा मा, गाभा घणा मूघा है। दोय जोड़यां करायी, जिएमैं सगळाई निठग्या पर वाकी रा दूजी चीजों माथै..." मोवन बात टाळी । रांमू रौ हियो बैठरण लाग्यो । उण उरण सूआग की नी बुझ्यौ । सूर्व सू साझ व्हेगी पण ठा नी क्यू रामू रौ जीव उदास ई रह्यो । वा दिन भर घड़ती-भांगती रही। उणने लाग्यो के उणरा सुपना संजोवरण सूप'ली इज बिखरण लाग्या है । वा दिन भर सोचती रही के उपरी पासा रौ तांतणो टूटण लाग्यौ है । उणने याद अायो- मोवन कह्यौ हो-थू सोच मती करजे मां, हमें थोड़ा दिनां सू म्हें नोकरी माथु लाग जावूला तो पर्छ बस ! देखजे थार वास्त जोरदार औरणी अर घाघरौ लावूला, थनै पर्छ किरणी तर री तकलीफ नी र वला । यू म्हारी नौकरी तो लागण दे! मनमाय राजी होवती थोड़ी सिक मुळकती वा कैवती-म्हारे हमैं काई चाहिज बेटा ! पण पै'ली तिरणखा मिळ ला जर पाडोसयों ने मिठाई जरूर बांटांला, दोय-च्यार वांमरणो न ई जीमावाला अर दूजी तिएखा 40/सिरजरा मिळनाई प्रापां रणूजे जावाला-वाया रे पगं । पर या प्राण्यां मीच लेवती, जांण या साचारणी रणूज पूगगी म्है । -यन कितरी तिणसा मिळे ला! थोड़ी ताळ पर्छ वा वूझती। -कम सू कम तीन सौ..."" । मोवन कंवती। -तीन सौ......."वा ग्रांगळिया माथै गिणती-ग्रेक सो......."दीय सौ..."तीन सौ......."उणन लागतो जाणं उरी आगलियां मांय तीन सौ तांई गिरगण री सामरथ कोनी । इतरी तिणक्षा"..."अर वां कंवती- -तीन सौ ती पणा व्है" "दोय सौ सायां ई को सूट नी......"अर लारला सौ...... सौ-सौ भेळा कर सू। थोड़ी-घणी गणी-गाठी ई घड़ावणी पड़सी....."ब्याव करसां जद वीदणी नै चढ़ावण ने ई चाहिजेला"नितर गिनात सोचला के बापड़ी रे नैनप पड़गी ही सौ गणा-गांठा बेचने रंडापो काढ़यो है...... 1 अर वा विचारा मांय खो जावती । मोहन उपर आगे बीद वरण जावतो नुवां गाभा, मोजड़ी, मार्य साफी-तुर्रा....""तुरिया...."अर उरगर होठां माथे प्रा जावतो- लचकै लाड़ा थारी मोजड़ी रै, झळक केसरिया री जान, नगरी रे लोक पूछियो रे, किसी रायवर परण वान जाय... पर दूज पळ उणरी आंख्यां प्रागै नुवी बींदणी आ जावती, घूघटा मे गोठिलो व्हियोड़ी, सरभोजती-उपर पग लागण प्रागै प्रावती पर उगरा हाथ पगां माथै पूग जावता । --यूई काई सोचण लागी मां, बस आपां दोय जिणा इजर- वांला 'खावांला-पीवाला पर मौज करांला....'मोवन उपरा विचार तोड़ती। रामू मुळकरण तागती। बा सोचती-मोवन 'ब्याव' में समझ लागग्यो है। सुवै री गाड़ी सूमोवन नै पाछौ जावणी हो । रामू बैगी ऊठ'र उपर वास्तै रोटी बणाई-पर उरगर साथै घाल दी । त्यार होय'र मोवन वहीर व्हियौ, तो रामू ई उणनं थोड़ी-ताळ पोंछावरण नै साथै चाली। बार ठंडी हवा चालरी ही। रामू रे फाटौड़ी औरणी प्रोढ्यौडी ही, अंक जगे तो खूब मोटौ बागी व्हियौड़ी हो। सुपनौ/41 इगर टेंको सेय सेयती। मोवन यामै कांनी मांगळी कर कहो। रामू री मास्यां मळमळी हेगी। नीचला होठ में दांत मूजोर सू दयाय पर मागू रोक्पा । नीची पुरण किया इज बोली-लेय लेवू ला, बेटा, परै जाप'र सेय लेयूसा। रोज को लेयण री सोचू पण टेम ई को मिळं नीं ।' पागे उरण मूनों वोलिग्यो, गळी भरीजग्यो हो । भळभळी प्रास्यां उग मोवन फानी देख्यो मोवन मापर युगट्ट से कॉलर ठीक करती हो। ........ 42/शिरगण अंक वोतल री कमी जनक राज पारीक कक्षा छठी रै विद्यारथी डालचन्द नाक में दम कर राख्यौ हौ। पाँच दिन ऊं हिन्दी रो किताव नी लाईरियो, जदी पूछौ, काल-परसू री बहानौ । किताब नी व्हेयां ऊं वो घर रौ काम ई नी कर पाती। रीस मे म्है वणीरा कानडा पकड़ नै ऊभौ करतां थका कियौ “किताब लेय नै क्यूनी प्रावै ? काले कोई जांच र वास्तै पायग्यौ तौ म्हूं कई जवाब दूंगा ?" रीस में चार-पाच बेत वणीर हाथ पं जमायी अर कियो, “वोल, किताव क्यू नी लावै ?" गिड़गिड़ाती डालचन्द बोल्यो “बापू लाईन नी देव" हैं वणी र डेस्क पर ऊं कितावां उठाय नै छेटी फेंकता थकां पूछ्यौ, “या भूगोल री किताव किस्तर लाई दी दी? या गणित री किस्तर लाई दी दी ?" "मू खुद लायो हो, खाली बोतला बेच नै" डालचन्द डसुका भरती वोल्यो, म्हें पूछयो, “तो हिन्दी री क्यू नी लावै ?" "ओक वोतल रो कमी रयगी है" डालचन्द लाचारी ऊं कियो । "प्रेक बोतल री कमी ?" म्ह पूछ्यौ । बापू रे कमरा ऊं खाली बोतला कठी करलू वणांन बेच नै कितावा लाऊ । हाल तलक तीन बोतला हीज व्ही-ग्रंक रीप्या अस्सी पीसां री। प्रेक काल और खाली व्है जायगा तो हिन्दी रो किताव ले पाऊंगा," म्हनै धक्को सो लाग्यो अर मायन ई मायने दुःख हियो, पन्दरा रीप्यां रो प्रेक बोतल जदी बापू पी जावं, तो वेटा ने साठ पइसा कितावां रा मले । मेक बोतल,री कमी/43 साठ रीप्यारी दारू पीवंगा तो वेटा ने दो रीप्या चाळीस पइसा मिलेगा, यान छठी री कितावा रा पूरा तीन सेट जदी वापू पी जावेगा, तो विचारा बेटा ने अंक हिन्दी री किताब मलंगा-जो भी पांच दिन री मार-पिटाई केई । म्हें सोच्यो भने दुखी मन ऊं, वणी री दोई फेंकी थकी कितावां उठाय नै डालचंद र हाथों में देवा लाग्यौ-येक कसूर वार री तर, धूजता थका हाथा ऊं 44/सिरजण छोटी कथावां 1 ईस्वर सिंघ कुळहरि राई रा भाव रात ई गया प्रेकर प्रेक चोर सेठ री हेली में घुस्यो। घर में सेठ-सेठाणी दोई जणां सूता हा । चोर ने घर में देख र सेठ ने क तरकीब सझी । सेठ बोल्यो- सेठाणी वा राई पाळी बोरी कठे धरी है ? सेठाणी बोली वरिण्ड में धरी है। क्यू? काई बात है ? कयां पूछ्यौ ? सेठ पङत्तर दीन्ही-तन काई मालुम ? राई रा भाव बहोत ऊंचा चढ़ग्या है। सोने सूई मूधी होयग्यी है । या कैयर दोनू चुपचाप सोयग्या । उणरी वातां सुरप'र चोर सोची प्रापण तो राई ई ले चालो । बी राई री बोरी ले' र भीर हुयग्यो । सुबह चोर बाजार में राई रा भाव पूछतो फिरें। जद उरण सेठरी दुकान पर राई रा भाव पूछ्या तो सेठ पत्तर दीन्ही-राई रा भाव रात ई गया । चोर समझग्यो पर बहोत सरमिन्दो हुयर चलता वण्यो। सेठाणी माळी ऊंट अक सेठांणी ऊंट पर चढ़'र धूमणे वास्तं निकली। ऊंट रो धणी सेठांणी ने समझा दीन्ही के ऊंट र बैठते बखत सावचेत रेवं, पड नी जावे। ऊंट बैठत वखत आपरा प्रागला गोडा ढाळ या तो सेठांणी सावचेत हुयग्यो पर पाछ ढीली हो'र बैठी रई। पण जद ऊंट लार सूबठवा लाग्यौ तौ सेठांणी झट लार गुडगी। ऊंट माळी वोल्यो सेठाणी जी कोई बात हुयी? सेठांणी बोली-हूं ने कांई पतौ थारौ ऊंट दोबर बैठे है ! छोटी कथावां/45 नट विद्या प्राज्या जट बिद्या नी प्राव क जाट पर नट में तकरार हुयग्यी। नट बोल्यो तन म्हारी विद्या नी आ सके । जाट बोल्यो तेरी विद्या मे कांई है? अभ्यास रौ काम है । पण म्हारी विद्या तन नी पा सके । दोन्यां मे होड हुयग्यो । जाट बोल्यो तीन महीनां रौ टेम दे । तेरी सगळी विद्या सीख जाऊंलो । पण तूनी सीख सकलौ । जाट तीन महीना में नट री सारी विद्यावां रो अभ्यास कर लिन्हों । इण रे साथ-साथ जाट प्रापर खेत में अंक वेल के लिपटती मतीरी ने प्रेक खाली घङ मे मेल दीन्हीं । मतीरी घङ में बढ़ती-बढती घणी बडौ मतीरौ बणग्यी। तीन महीना पाछे दोन्यू मिल्या। जाट नट नै उणरा करतब दिखा दीन्हां । पाछ जाट प्रापर घर्ड में मतीरी दिखातां थका बोल्यो-यो मतीरो म्हूं घडं में धाल दोन्ही अर अव तू इणनै विना घडो फोर्ड निकाळ दें। बिचारी नट सोच मे पडग्यौ अर घरणी कोसिस करी पण मतीरौ नी निकळयो । हार'र वोल्यो-नट विद्या भाज्या पण जट बिद्या नी प्रावै । ठाकर सेठ सूप्रांक भरावं है ओकर अंक सेठ साथ में आपरी बहीं ले' र अक ठाकर रे घर उगाई वास्तै गयो । बी बखत ठाकर रै घर लड़कै रै ब्यावरी त्यारी होी ही। ठाकर सेठ ने घणी समझावणी दीन्हीकै पाप की दिनां और ठम जानी। थारा रिपिया पूगा देस्यां । पण सेठ नी मान्यो। ठाकर सेठ ने कह्यौ निकाळी थारी बही पर दूजी तरफ ढोल बजावणिया नै कह दीन्ही-क बजावो जोर- जोर सू। ठाकर कही के सेठ-भर पाक । सेठ बोल्यो रिपिया दियां बिना प्राक नी भरीजै । इण वात पर ठाकर सेठ ने तडातड पीट बा लाग्यो । ढोल री आवाज में दूजां ने की नी सुण्यो । विचारों सेठ प्राक भर पाछी गयौ परी। थोडा दिनां पा सेठ श्रेक गांव रै वीच होकर जायर्यो हो । बठ अंक घर में ढोल बाजऱ्या हा। वी रै साथी पूछ्यौ सेठ जी प्रै ढोल किरणं वात रा वाजै है ? सेट पड त्तर दीन्ही-कोई दाकर सेठ सूअांक भराव है। 46/सिरजण पोकर गरूरी बातां रामनिवास सोनी पोकर गरू हा छोटा सा गोळमटोल आदमी । मस्त, बेफिकर । लांबी चोटी । रंग गोरो चिट्टी । लिलाड़ माथै तिरपुंड भसमी रौ। जठे कानी जावं, लोग राजी हूवता बतळाय-"पोकर गरू जे शंकर री।" उणारी मघरी मघरी बोली सुणतांई गळी-गवाड़ री लुगायां, टावर-टूबर, मोट्यार संग भेळा हूय जावे । हथाळी मांय खनी री संख उड़ावता पोकर गरू घणा खीखी हांसता। योलता तो दांत रै झरोख सू थूक उछळतो, पण फेरई लोग उगाने घणा चावता। गोपीनाथजी र मिन्दर री मोटी तिवारिया मांय गरू रौ अखाड़ी ही जठ गरमी री दोफारी काटता, भांग-बूटी छाणता अर मारग बैवणिया ने श्रासीरवाद लुटावता । मिन्दर री आरती री वेळा पोकर गरू जोर जोर सू झालर टंकोरी वजावता, सिलोक बोलता भर भजन-भाव करता। कस्बै रा लोग बाग उणांन जोतस रा फळादेस पूछता । वै घरम ग्यान ई सुणावता । कदै पंचांग री पुराणी पोथी सूघड़ी पुल मुहरत निकाळता, टेवौ बणावता अर लोगां ने भजन ई सुणावता । उणां ने जोतस री पूरी जाणकारी नी ही तोई कस्बै रा लोग घणकरा आपरा गिरह गोचर उणांन ई दिखावता क्यूक उणारी बात सांगोपांग सोळा याना मिल जावती। पोकर गरू चमत्कारी पुरुष हा । इण कस्व रा मोटा पिंडत जोतसी उरणाने पाखंडी समझता । पण वे इणरी रती भर परवा नी करता । उणा रौ घर मिन्दर रै पागती हो, वेटा-पोता लुगाई संग बात रा ठाठ-बाट हा, पण गह रो मन तो मिन्दर में घग्गी लागतो। जजमानां रा नूता, सीधा, लावणा परसादी मिन्दर रौ भोग किणी बांत री कमी नी सतावती । सस्ती वाड़ा रे पोकर गहरी बातां/47 "पोकर गरू, उण जमाने में महीनों में अठाइस दिन पोकर गरू प्राप र जजमाना र अठ चकाचक माल मलीदा उड़ावता पर जठीन निकळता अावाज प्रावती- जे संकर री।" गरू मुळकता उण दिनां सिराध पस्य चालं हा । तीन टेम भांग पीणो पर तर माल चावरणौ गरू रो नित रो काम । यूती पोकर गरू चिलम तमाखू सूपचास कोस दूर रैवता, पण किणी अखाड़ां री मंडली जद मिन्दर कानी प्राय जावती तो वै धपाधप गांजा सुतफा रा दम लगा'र चादी वणाय न्हांसता। उण बगत नेणा रा राता डोरां न साकसात महादेव सरीखा ग्रोपता। ग्रेकर भाग र गेघट नसां मांय प्रापर पोते नै सांप बैठा'र गळी मुहल्ले पूछता फिरया क म्हारो पोतो गमग्यो, लाघी कोनी, कोई घतानी। लोग सोचता क प्राज पोकर गरू मार्थ भांग रौनसी घणो है । जद घर पाछा पाया तो दरवाजे सू पोता रो मायौ टकरायो । वाळक रोवण लाग्यो तो गरू बोल्या-"अरे म्हनै ठा कोनी क थू म्हार माथ पं सवार है, म्हूं देख्यो क यू कठेई गमग्यो । अंक सेठ उणां कनै परदेस जावरण री मुहरत पूश्वा प्रायो। उरणारी बूढली मा वेमार । गरू तो सफा नदग्या, पण सेठ वैद डाक्टर री सलाह सू वहीर हूयग्यौ । पाथै सू डोकरी पार पडी। सेठ माथी कूटतो, रोवती कळपती प्रायौ। उसी दिन सूबौ पोकर गरू रौ पक्को भगत वरणग्यो । पोकर गरू ने नींद रा सपना मांय महादेव रा दरसण घणीवार हूवता। वै भगवान सू बात पूछता अर उणारा वचन फळ जावता। पूरा गिरस्ती होवता थका गरू पोलिया पुरुस हा । घणा लोग उणानं छेडता पण वै कदैई नाराज नी हुया, हँसता ई रैवता। पोकर गरू रोज मीठो भोजन जीमता अर मीठो ई बोलता। उणार कबीला में प्रेकर श्रेक काची मौत हूयगी । जीमण रो जद बुलावौ पायो तो वापर दोनू पोता नै सिखाय भेज्यो क बेटा म्हारे बिना मत जीमज्यो; रोबा लाग जाई ज्यो ।ठीक मा ई बात हुई । दोनू पोता जीमती वेळा रोवणे लाग्या क दादाजी विना कोनी जीमा । सेवट लोग पोकर गरू ने बुलाया तो गरू कयो क ग्रे छोरा म्हार विना कदेई नी जीमै । जद लोग जबरदस्ती गरू ने सागै जिमाया। पोकर गरू तो बस आई वात चावता हा । एतौ पोकर गुरू री प्रेक-ग्रेक बात लाख-लाख रिपियां री है, पण दो किस्सा अड़ा है जिप उरणारी साख घणी बघीज। पैलड़ी वार तो वै आपरै राजाजी रे हाथां सूं इनाम इकरार सारटीफिकट लियौ अर प्रापरै गुजार वास्तै दस रिपिया महीनां रो परवांनो ताजिनगांनी लिखाय लियो । व दरवार रा गरू बराकर 48/सिरजण उरणाने परचो दियौ पर चमत्कार दिसायो। वे जोतस रै टिप्पै सूअड़ी बात मिलाय देवता क बड़ा-बड़ा पिंडत राज-जोतसी ई उणा सूचकरावता । उरणारी लुगाई उपासू घणी नाराज रेवती। क्यूक वे तो भाग पीवता पर मौज करता। गरू प्रवै 70-75 बरस का हूयग्या तो लुगाई पूछती क थे कद मरस्यो। पोकर गरू जवाब देवता क देख जद थरै ब्याव हुवैलो, बाजा बाजेला उण वगत म्है मर जावाला। धूम्हारी बात नै पक्की समझजे । दो च्यार बरसा पर्छ पोकर गरूर भतीजे रो व्याव मंडियौ । बारात री निकासी री तैयारी, बाजा वाजण लागिया। लुगाई गीत गावण नै घरै वार निकली तो पोकर गरू कयौ-देख, प्राज चोखो मुहरत है, आज ई मरण रो पक्को विचार है, जोतस मिलायेड़ी है। जद पोकर गरू सारा कपडा उतार दिया, भापर हाथां सूगोवर गंगाजळ री चोपो लगायौ अर सांसा ऊपर चढ़ा'र प्रांगण मांय लेटग्या । लुगाई नै कयो, देख थू निकासी में जाये तो जा, पाखरी मुलाकात करले। धूपाछी प्रासी, जद पोकर गरू कोनी मिळ ला । लुगाई गाळियां काढ़ती-काढती गीतां साग चलीगी। लार सूपोकर गरू प्रेकला पर रा दरवाजा बंद कर प्रापरी सांसां ने ऊपर चढ़ा'र छोड़ दी। सूवटी उड़ग्यो, पीजरी साली पड़ यौ। जद उणांरी लुगाई पाछी आई तो गळी माय हाको फूटग्यो; रोवणा-पीटणा सुरु होयग्या । पोकर गरू री मौत हालताई कस्बै रा लोगां रै वास्तै घणी चमत्कार री चीज है। पोकर गरु री बातां/49 डूगरींग जी वांका - दिलीप सिंघ चौहारण यूं तो जलम रा नाम सब राई प्राधा ह, पण ज्यूं ज्यूं टावर मोटो ह, त्यूं-त्यूं नाम छोटो व्हैवा सलूक सब ठौड़ा है। डूंगरीग जी बांका रे नाम रौ इतिहास टंटोळा तौ जलमतां ई स तो ई 'डूंगरसिंघ' हा, पछ घर मे लाड सूं डूंगी' 'डूंगली' पाद वरिणया, अर ना' ता-भागता हिया, तो 'डूंगा' नै ‘डूंगला' री प्रोपमा सूजाणीजवा लागा। जद मोटियार ह्विया तो डूंगरीग जी वरणग्या, पर 'यांका' से खिताव तो अब गांव मे लोगां प्रणा रा करमा भूदीदी। वात असी है के जद ई 'डूगला' वरिणया. वरण कमर में ई चोरी री चस्सो लागग्यो। दिन तो लोगां री नै रात प्रणा री ही। लोगां रै रात पड़ती नै प्रणां रे दिन ऊगती। लोग सूता नी के ई करणी साठा रै खेत र अपविच करड़ करड़ सांठा करडावता। जद ताई चूयां रौ ढगलौ प्रणां रै दाड़ी रं न्ही अड़ जातो, डूगरोग वठा सून्ही हटतो। रात में कपास का खेतां मे सू कपास चोर'र दिन में वारिणया नै बेच नै पिंडखजूर गटकावता। पाकी अरण्ड काकड़िया दिन में तो गोड़ रै ऊपर नजर पावती ने रात मे डूगरीग जी रे पेट में कुरड़ कुरड़ करती । या ई दसा होळा, उमिया ने मक्या, काकड़ा री ई ही। पण भेकर जद ये रात रा अंधेरा में प्रेक आंबा पर गूगणा (केरी) खावा चढ़ या तो गूगणा तोडतां डाळी बड़ीको मार दीधौ नै डूंगरीग जी धड़ाम मूमऊड़ा रै फूल री नाई जमी पर आ पड़ या, न गोडां में मू पग वांको ह्रियो । खोडाखोड़ घणा दोरा घरै प्रा'र खूब लूण रा सेक अर मऊडा री लपरी रा पाटा बाध्या, पण पग थोड़ी सो वांको रंग्यो, सो रई ग्यो। बैं 50/सिरजए वणीज दिनां सू थोड़ा लंगड़ाता-लंगड़ाता चालवा लागा, तो लोगां अपां ने 'याका' रौ खिताव दियो। अव डूगरीग जी रो नाम व्है ग्यो 'डूंगरोग जी बांका। यूं तो धूणी पर बैठ'रडूगरीग जी सीख री मोटी-मोटी डोंग मारता, पण चोरी रा मामला में वरणां रो मन डोल जाती। वणां रे डीग हांकती वगत कोई मनचलो वरणां री चोरी री यात री कड़वी घूट देतो, ती वै करसण जी रे मासरण रौ दिरसटात देर वीन पी जाता, पण चोरी रौ सौक नौ बूढ़ा व्हीग्या, तो ई न्ही छोड्यो । डूगरीग जी बांका चोर हा, पण कद पकड़ या जाता तो लच्छा ज्यू नरम व्है जाता ने कंवता-माफी चाऊंसा, गलती व्हेगी। हत्यारौ मायलो पापी डोलग्यो । अाज केई थाणे अठ हाय न्ही घालूला। प्रण भात वणा र चरितर में चोरी तो ही, पर सरजोरी न्ही ही। प्रेकर रात में पाड़ोस वाळा रे घर सांमै ऊभी करी सागठियों पर वणा री काळी नजर पड़ी तो रोज रात नै दो दो डूगरीग जी बाका र घर जावा लागी । सागठिया वाळा ने भम पड़ यो के ई दिन-दिन कम क्यू है री है ? वणी रात में चौकसी राखी । माघी रात मे डूगरीग जी बांका पापणा खादा पर दोई सागठियां मेल र खोड़ा-खोड़ा अण मस्ती सूजा , जारण व्ही तो वणा रै भाई रीज है। पार्छ सूखट जाय ने सागठियां पकड़ी तो डूंगरीग जी बांका वांका व्है र वरण र पगां पड़ग्या ने कैवा लागा--"प्रणी धौळी दाढी री लाज थारै हाथ है, व्हैणों थी जो तो व्ही ग्यौ। अवै माफी चाऊं । आज केड़े थारी क ई सागठी डगज्या, तो म्हने पूछजे। थारी दस सागठियां म्हारै घर और पड़ी है वै ई म्हें लाय दूकता थका दसई सागठियां लार सूप दी ने पिंड छुड़ायो । अकर जेठ री कड़कहती दोपारी मे वै म्हार कुमा पर पाया ने थोड़ीक दाए तो अठी-वठी री वाता करी नै बोल्या--भाया चड़स होकणी है रे, पण लाव टूटगी, अव कांई करां ? थोड़ी'क देर ढव'र पाछा झट सू वोल्या-देखा कळूक कबाड़ा, कैवतां ई ऊठया नै म्हारा हॉक्या थका खेत रे अधबीच में गया पर ढेकला दूर कर फटाक सू लाव निकाळी। खांदा पर घर डूगरींग जी वांका तो व्होजा, व्हीजा। न मालम करणी र कुमा सूरात में ऊठा नै ले माया हा, डूगरींग जी बांका र चोरी जस्यौ ई क चसको जीमण जीमवा रो अपूठो हो । आस पास जात-बिरात में जीमणवार रौ तौ पावतो तो प्रेक ? डूंगरोग जी बांका/51 दिन पैली सूई वै सारण सून्हाता-पोता ने प्रापरी तीनू टाबरां ने ई संपडा'र त्यार करता । जीमण रे दिन परभात सूभूखा रेता नै दुपरी ढळतां ई प्रापणी स्टूडी पर जीन कस नै तीनू टावरां ने ऊपर बिठाय लगाम नै थाम'र आगे-आगे डूगरीग जी बांका घोळी पाग, वगल में पेसकवज ने गिरियां ताई धोती पैर'र खटूक खटूक चालता नै पाछ पाछ वरणां री टटूड़ी तड़पड़ तड़पड चालती। मोटी बात तो या ही के गाम रा सगळा मिनख सांझ नै जीमबा जाता ने ई जीम र सामं गेला में मलता। जीमती वगत टाबरां ने डरपाय डरपाय जबरन सूदूंस-ठूस ने जीमावता। खुद ई इतरौ ठूसता के घर आ'र रात नै पेट पर ठण्डा पांणी रौ लोटो रख'र 'मां प्राइ'मांदा ढांढा ज्यू टसकता। डू गरीग जी बांका रा सब गुरण वरणा रे मन भावता भगवान दीघा, पण श्रेक आदत पर वरणां ने खुद ने ई नफरत ही। वे रात ने गहरी नींद में वैलता थका जे जे चोरियां करता, सब रात नै कह देता । प्रेक दिन री बात है डूगरीग जी बांका ने पर-गाम रात रणी पड़- ग्यो । वे जीमण र सिलसिला में ई गया यका हा, पर अळगी होवण सूरात रेवणी पड़ग्यो । रात नै गामरा दूसरा जरणा रे बीच में वै सूता थका हा । गहरी नीद प्रावतां ई बांका तो गुपत पोथ्या खोलवा लागा-"वरण ढाळिया में कोठी री गली में......"s 5 सांवळ......"पड़ी है वा चना भोपा री है। करणी नै कवी मती।" वठं अक टाबर सुण र्यो हो, वण परभाती सगरी पोल खोलदी, जो वा सांवळ पाछी देणी पड़ी, चोरी 'प्राउट' व्यिां वाद वै माय न्ही राखता। वरणा पूरी ऊमर छोटी-मोटी चोरियां कीधी, पण भगवान अंक दिन कोप्यो जस्यो कदी न्ही कोप्यो। वरणां री ननकियो टाबर गाय-मसा री प्रोड ₹ नीच होळा सेक र्यो ने बांका पापणी घर पर त्यार कराई कुरसी पर दोई पगां पर वांदरा री नाई वैठा हा । दोई हाथ री कूणियां गोडा पर दीधी थकी नै हाथ मूंगाल पकड़ या थका । ऊंडी प्रास्यां न लावी दाढी, माया पर गमछौ बाध्यौ थको । होळा मिफजा तो सावां री वाट नाळ र्या । वादी री घपडको जोर सूव्हियो तो मोड पर पड़ी धाम-फूस पाग पकड़ लो धी। डूंगरोग जी बांका मठीन कठीन भाग्या ने कई ठा ही पड़ी के पर्व काई करें, वरणा जोर-जोर सूवार लगाई-"दौड़ ज्यो रे । दौड़ ज्यो वामदी लागी गी है भो 555।" मुगतां ई पास-पड़ोस रा लोग-बाग पाणी रा चुकल्या से- ले'र दौडता थका माया । मोड पर पाणी छांटवा लागा तोई माग पर कन्ट- गेल नही रहे सपयो । अवै जलती प्रोड में लोगां री चुराई थकी चीनां दहाक 52/सिरजए माड़वा लागी। भमण, ताकळा, फावड़ा, कुदाळिया, कुल्हाड़ा ने सेती रै काम री कई चीजा मेक ग्रेक करर नीचे पड़वा लागी। डूंगरींग जी वांका तो बांदरी धरण नै पाछा पापणी कुरसी पर बैठ गया । ज्यू चीजां पड़े ज्यू लोक प्राग वुझावणो तो भूल ग्या नै चीजां अोळ- सवा लागा। कोई कैव-"अरे यो भमण तो म्हारी।" तो दूजी के वै-"यो फावड़ो तो म्हारो। जतरै तीजो बोल्यो-"घणा दिना सूढ र्यो म्हारी कुल्हाड़ी कठ है ? यौ तौ यो र्यो ।" तावड़ तोड़ मे सब जणा आप प्रापरी गुमी चीजां भाळवा लागा। जद करणी अकई चीज ने दो दो आदमी पापणी बतावता झगड़वा लागा तो डूगरीग जी बाका पापणी कुरसी पर सूई हाथ लांवी कर'र बोल्या-"अरे हाको करी मती नै चीजां पाप पाप री ओळख ओळख नै लीजो । क दूज री चीज मती ले लीजो । जगरी व्है वौई लोगो अस्या हा म्हारे गाम रा डूगरीग जी बाका । हूंगरीग जी बाका/53 गंगौ मन रौ चंगो रूपसिंघ राठौड़ नांव तो गंगाराम पण कैवरण नै सँग गंगोई कैवं । भोत पुराणी लगोटियो यार है म्हारौ। जिस्यौ पवीत नाम बिस्योई बीरो काम । दूध मू धुल्योड़ी सफेद झक है बोरी प्रातमा । कठ कोई दाग नी। गांव री निपज जयां खेडा ई बता देव । जिसू मिळसी मुळकतो ई मिळसी। चाळीसेक री उमर गंगा-जमना सिर रा केस, मोटी-मोटी हिरण सी यांख्या। रंग गोरो, सीदी-सादी चाल-डाल, झुकड़ी नजरां, ठंडी मीट। साढे छः फुट रो पूरी पछौ जवान । मुंह पर वाकोड़ी मूछ्या री रमझोळ । स्यान- सकळ रौ भौत फूटरो। धरती पग मेलतो मस्ती वाले तो धरती सरमा मर । खान-पान री बडो सौदी-सादी। मन मू भोळो-ढाळो। सांच्याई चौंरी राम रूखाळी । कोई गरच गुमेज नी । नर-खाळिया री चिरणाई रौ प्रेक नवर रौ कारीगर । बयां तो बठे धूढळी ने पापड़ बेलता बोळा बरस होग्या । टावर थकोई ई हेलै लागियो हो । राजस्थान नहर र संग नामी गरांमी ठेकादारा रो मुंह लागतौ । कमाऊ पूत । प्यारो क्यू लाग नी । जमान री म्हैर काम प्यारी चाम रो के प्यारो । सुभाव सू भोत ठंडी । कद-कदाम ई गरम होतो कोनी देख्यो । दूजी चापं वोरी किल्लाई नुकसांग क्यू नी करद्या, पर मेरी बेली गूगों सांड मुंह ई नी खोले । तू-मैं र चक्कर में ई नी पड़े। दूजा लोग उकसायणियां जे बेटे ऊंट पर चढ़ावरण री कोसिस करें तो वो क-"तेली रे बलद ने गौड़ाई सूकोई काम । मिनस नै मापर काम मू वास्तो राखणी बाई । लडाई-झगड़ो कांई चोसो हुवं । ये तो गये घरां रा काम ही।" । 54/सिरजण पराये दुःख में पडण हाळी है । दूजां री पीड़-मोड़ी में संगां साग रवरिणयों । बात धरणां दिनां रो नौं । लारलं मापातकाल री है। गौरमिन्ट म्हांसूनसबन्दी रा दो केस माग्या । हूं सोच में । काई करूं। के सिर-पग तोडू। कटऊ केस ल्याऊ । यार दिनूग पली पायौ । मुळकर धीम सी बोल्यो-"काई बात है मास्टरजी ? कयानाकळ-वाकळ होऱ्या हो?" हूं पडूत्तर देतां कैयौ-“यार ! की बात ने बात से नाम । साथी संगलियां ने कैवता सरम सी आवै।" "गंगौ मन री बात जाणतो सो बोल्यो-"थारै मन री हूं जांणी। वा नसबंदी हाळी तो बात होसी । थे की फिकर ना करो। म्हे चार थार साग चालस्यां । अक भाठ सूदो सिकार-म्हारी भलो हुज्यासी थारी काम ।" म्हांन मावी तरिया याद है वो बी दिन अंक इस्य डाकदर र पल्ल पड्यो निकै नै हूं कंबू क मिनख वी के जीने पसु सुदा करण री बेरौ नी । बिचारी प्रापर टावरां रै भाग सू जियो । हूं काळी-मूडी होवरण सूबच्यो । डाकदरां कानी सू तो बारा वजगी हो । भौत दिना ताई फौड़ा भोग्या । गलो ई जमाने में इत्तो गूगो क कदैई बात रौ पाछो उथलो नी देवें । वा बात के-कुवा थारी मा मरगी । के मरगी। जीव क जीव । इस्या मिनखा री ई जमाने मे जिवारी दोरी। बेजुबाना नै गळी रा गडका ई नी धूसे । गैलड़ें दिनां री बात है । गाव में रैवण नै मकान ₹ नाव पर अंक खुलड़ी ही, जिकी नै ई बडे भाई मुंह फोर पाप घरा भेळी कर ली। लोगा समाचार पुगायो तो छत्तरगढ़ सू प्रायो। पाच-दस दिन गाव मे सबसू मिळ-जुळ'र पाछौ गयौ । किन्है र सूवै ई नी कही । लोगा खेत री सीव तोड़ नाखी । पंण बदै सास ई कोनी काढ्यौ । भगवान जाणं मेरी बदौ कुणस खंदेरी माटीसू' घड़ियोड़ी है। वात अर करार रौ बड़ो सांचौ है । कदैई बात रा बारा पाना नों होवण दे । जिको ई काम हाथ में ले ले बीन टेम माथे पूरी करें। आपर साथ रंवणिया मजदूरा नै फोड़ा नी घाल । रळ-मिळ' र काम करें । भाईडा री लुगाई इसी के बारा मुट्ठी तीन लप्प । पूरी दातार । घणी दयाळ । दातार रै धन कठ । भाइडौ खून-पसीनौ अंक कर'र महीने भर तेली रे बळद ज्यू पांणी में पिल । मइना री पाखरी दिन प्रावता न पावता भाई भूरा लेखा पूरा । पण करम कमाई रो इस्यो मैळ के काम प्राग सूमागे मिळती रेवै । नी तो गरीबी मे आटौ गीलो होता कित्तीक देर लागे । “घड़े गैल ठीकरी मा गैल डीकरी ।" टाबर-टीकर ई भोळा-डाळा । गंगी मन रोचंगी/55 वेलीड़ी घणी संतोखी जीव । “सदा दिवाळी संत र प्रांडू पौर त्यौहार" हाळी वात वी पर साम्परत लागू हुवै । "लूखी-सूखी खायक ठंडो पाणी पी" में सदा सूअटूट विसवास । कदैई झूठा हांफळा मार । जिस्यो फाट्यो- पुराणी मिळज्या गळं मे पालतं । कोई नाज-नखरी नी राखे । छत्तरगढ़ खने केई दिनां मूअक जमीन रे टुकड़े में खेती कर । भूदान हाळा बतायो हो । घणां दिनां भागा-दौड़ी करी । दुःख ई ठायो । पाखर में छत्तरगढ मे ई गोडा गाड़ दिया । डेरा लगा दिया। पनरा क दिना पेली कागद प्रायो के जमीन उपर नाम व्हेगी है । सपनो साचो होग्यौ है । साढ़े वारा बिग्गा जमीन मिळगी। होती क्यू नी । साचं राच राम | गंगै रो मन बड़ी चंगी। पुरखा री कयी वात कदै झूठी हुई के-“मन चंगा तो कठौती में गंगा ।" गंगै री जमीन में राजस्थान री गंगा-राजस्थान-नहरकळ कल करती वैवै। गरीबड़ां रा दु:सड़ा दूर करती। गंगौ प्रापर सेत री टीवड़ी मार्थ वट्यो सुख रा सपना लेवे । पग पसार-सुख री नीद सोवै । 56/सिरजण संत कवि गोमदा रामनिवास सोनी राजस्थान री वीर प्रसूता धरती री कूख सूजट अगागिणत सूर- सांवत सम री कसौटी माथै प्रापरी जसगाथा री अमिट रेख छोडी पर इतयास रा उजळा पानां नै सोना रा भाखरां सू जगामग करिया, उणी धरती री पावन गोद सूघणकरा संत, कवि अर विचारक उपज्या, जका प्रापरी इमरत वाणी री गंगा सू असवाई-पसवाड़े तो काई दूर-दिसावरां बनखंडां तांणी समूची छेत्तर सोंच र नै हरियो-भरियो करियो । इणी संत परम्परावां में संत कवि गोमदा (गोविन्दराम जी) रौ नाव घणे आदर-हरख ₹साग लियो जावै । हिन्दी साहित री वीज रूप सूदोय धारावां मानीज- सगुण मारगी पर निरगुण मारगी। संत गोमदा निरगुण धारा रा उपासक हा । उरणारी जलम राजस्थान र नागौर जिला मांय कस्बै लाडण में सं. 1750 वि० में मेक साधारण सुनार र धरै हुयो। वाळपणे सूई संत रौ मन भजन, सत्संगत पर ध्यान मांय पणो लागतो। उणार घरै कळाकारी रा नामी गैरणा घड़ीजता, पण गोविन्दराम जी पीतळ रा बरतन घड़ता थका तत री पिछांग करी परमापरी जिनगांनी काटी। नीति पर सिरागार रा सिरमौर कवि बिहारी जिण ढंग सू"अन्योक्तियाँ" लिखी, उरणीज ढंग सू संत रा कथियोड़ा दूहा अजूताई जनता जनारदन री जबान माथै निरत करें। खोट मिनख नै पीतळ री उपमा देवता थका संत गोमदा इण तर फटकार लगाव- बीस वार बानी कियो प्राघो दीन्यो खोय । कोरी पीतळ गोमदा कंचन किण विध होय । संत कवि गोमदा/57 नागौर जिला रै माय रामसनेही संप्रदाय री सबसूमोटी गादी रेण गांव मांय थरपीजी जठ समरथ गरू महाराज दरियावजी नामी पोचवान साधु हा । संत गोमदा रा वै गरू भाई हा । प्रा वात रेण र पुराण दस्तावेजा माय मिळे क्यूक संत री घणकरी जीवण सासा "दरियाव मंडळ धाम" र अटै भगती, ध्यान पर साधना मांय वतीत हुई । उणारी मन संसार री मोय, माया, अर तिसनां मांय कम लागतो। उणारा पिताजी इण वास्तं सतरा बरस री उमर में उणारी व्याव मांड दियो । संत गोमदा तेईस बरस ताई गिरस्ती रा जंजाळ भोगिया । उणार दो बेटा ई पैदा हुया, जिणार बाद पाखी उमर ताणी व सीळ वरत पाळियो। संसारी वासना, जाळ-जंजाळ सूपल्लो छुड़ा'र उणारौ घणकरौ टेम ध्यान, भगती माय लागतो। हिन्दू, मुसळमान, जैनी सभी जातियां रा लोग सत्संगत मांय सामिल हूवता। इण वास्तै लोग उणाने “साद महाराज" र नाव मू बतळावण लागा। उणारी मुळमंतर केवी -"राम निरंजन सब दुःख भंजरण" अरथात निराकार ब्रह्म (राम) ई दुख मेटणे वाळी है । संत गोमदा रा गरू प्रेमदास जी महाराज कैवीज जिणार वार मे खुद संत लिख- प्रेम सिपाही रामरा तत वांधी तरवार । कंचन कामनी छोड़कै मुजरा है दरवार । संत गोविन्दराम जी स्वाभिमानी, निडर पर सच्चा पौंचवान गिरस्ती साधु हा । उणारी समाध छतरी लाडणू र मावलियां वाडी मुहल्ला मे अजू ताई खड़ी है, जिणा ऊपर संगमरमर रौ अंक सिलालेख सं. 1835 वि० माह बद 5 रौ सत री निरवाण तिथि री याद दिरावै । उणा रै पागती उरणार पिताजी रो समाध चबूतरौ है । सत से करीब 200 बरसा पैली रौ पुराणौ हस्त चित्तर हाल ताई उरणार परवार रे लोगारे पास मौजूद है, जिरण सू संत री सादगी, ननतो अर तपोनिस्ठता रौ दिग्दरसण भली भात हूय सके । संत सादा जीवण उच्च विचार रा पाळणिया हा । सादौ भोजन करता पर मास भखरण नै घणी खोटी बतावता आप यू फरमाव- जीव मार जीवर करै खातां कर वखाए । परतख दी से गोमदा थाळी माय मसांग ॥ संत कवीर री तर सू सच्चा साधु री पिछाण आप यू फरमाव- भेड़ भेख सब अंक है रहै गांव र गौर । कदै न देख्यौ गोमदा सौ सिंघा रो टौर ॥ - 58/सिरजण दूगा रा पूत रमावणियों माथे प्राप यू चोट कर--- पूत खिलायां पारका कारज सर न कोय । घर में बसती गोमदा भाप जण्यां सूहोय ॥ इण रे अलावा नीति रा मोकळा दूहा अजूतांणी जनता री जबांन माथै निरत करें- पड़ियां झस लेवे नहीं मुवा नै चाले साथ । दीया पाछ गोमदा दोरा या हाथ ॥ खैर बुरी है खलक की मेल भऱ्या सव मंड। खरी मजूरी गोमदा खता नहीं नव खंड ॥ ग्यांन गरीवी गुरू धरम नरम वचन निरदोस । ऐतामत छोड़ी गोमदा सरदा, सीळ, संतोस । अंक कहावत र मुजब नगरी रो राजा संत सूनाराज हूय उणानं जेळखाना रे मांय न्हाक दिया। सुपना रै माय राजा नै परचो हुयो । उणा संत माफी मांगी पर पाछौ उरणाने पादर रे साथ प्रापर घर पोचायो। संत गोमदा उच्चकोट रा कवि हा । उणारा हस्त लिखित ग्रंथ अजूताई हिन्दी, गुजराती, पंजाबी, उरदू, फारसी पाद भासावा माय मिले । उणारा ग्रन्था माय "ध्यान तिलक" अर 'भूलरणा" मुख्य है, “गुरू पचीसी" मांस आपरे गुरू री महिमा रौ वरणन मिल । संत गोविन्दराम जी रा दो खास चेता हा-मोहनलाल पर चितानंद दोनू नामी विद्वान अर भणियोड़ा हा । उणारा था मांय "निरगुण स्तुति" "शब्द प्रभाती" 'उक्ति अनूप", "वेद विचार" पर "करणा पचीसी" प्रमुख है । मोहनलालजी संत री बदना इतर सूकर- मोहन को सतगुरु मिल्या चिलकाएं के घाट । ताळा कूची डाळके खोल जड़े कपाट । निरगुण संत साहित री सोध करणिया साधका रो ध्यान जद कदैई इण संत री तरफ हूसी तद नई नई संभावनावा अर हकीकता रो पतौ लागसी । संत गोमदा (गोविन्दराम जी) री कथेड़ी वाणी बानगी रूप माय इण छोटे से लेख मांय दिवी जाव- सकल कला परवीन कहा जस कीरत गावै । अन्तर्गति मन लीन ताहि कहा दरद सुनावै ॥ सबके सिरजनहार सकल के पोपण भर्ता । पूरन अधिक प्रगाथ. सृष्टि कर्ता के कर्ता ॥ संत कवि गोमदा/59

अमर आदि अंतकरण और कौन सरभर करें।
'गोविन्द' प्रेम परताप से राम रजासिर पर धरै ।।
(निर्गुण स्तुति से)
श्रवणा सुन रामनाम रसना रटै रामनाम
हिरदै हित रामनाम राम लौ लगाई है।
मनको मन रामनाम चित को चित रामनाम
रामनाम सू ही सूती प्रात्मा जगाई है ।।
सुख को सुख रामनाम रस को रंस रामनाम
रामनाम लेता रामनाम रिध पाई है ।
"गोविन्द" गलकाय भये राम रस सागर में
राम बिना रहिवो नहीं राम की दुहाई है ।
अड़ा दुरलभ सत प्रात्मा जुगां री लांबी छोड़ ₹ बाद ई कठई कई
उत्पन्न हुवे, जका संग घरमा री सौरभ गाथा संजोवतां मेक निराकार
अजन्मा ईस्वर री उपासना में आपरै तपजीवण री जोत निखार, जिणार
पावन चरणां मांय संग घरमा रा लोग सरधा भाव सूबंदण कर भर सीस
झुकावै।
60/सिरजप

रूड़ो राजस्थान मूळ दान देपावत मरुधर री मैहमा, कीरत पर बडाई रौ बखाण आखरां में वाधीजण जोग नी है । मरुधर रा किसाई खूणां-खचूणां में जावो बठरा मिनख-मानवी, वारी बोली-चाली पर पैरेस रोही री छिब, दाव-जिनावर पर बैंरा तळाव प्रापरै मन माथै गहरी छाप मांड दै। आथूणां राजस्थान में निकळ जावी जठरी निराळी झांकी आप अदीठी नीं कर सको । ऊजळा धोरा जुगा-जुगां सूइण बात री साख भर के अठरा रवरिणयां रो मन म्हारी तर ऊजळी पर निकळंक रैयौ है । अठरा मिनख घणमोही हुवे । दाव-डांगर भी रूणी वितार कोसां री भां भांग ज्यावं । मोह री धणी कोई बात भेकर बीकानेर रा राजा रायसिंघ जी दिखणाद में गयोड़ा हा, जठं फोग देख बीर बायां घाल धरणा विराजी हुवा तू से देसी रूखड़ी, म्हे परदेसी लोग । म्हांनै अकबर तेड़िया, तूकिम पायौ फोग ।। फोग अठरा रूरू में रमियोड़ी है । ऊनाळ रीढळती मांझळ रात प्रा धोरां माथे चांदणी अठखेल्या कर निछरावळ करै अर कतारिय री पणिहारी री टेर समां बांध दै। पीवण रा पाणी री कमी मोकळी रवै, पीवण रा पाणी रा सांसा पड़े। सगळा देई- देवता आपरा देवरा तळाब री पाळां माथै जमायां विराज। प्राधी ढळतांई कुमा तेइजण लागज्या अर 'पायौ आयो' रा लकारा सुणीजै। लोग 'प्रायो प्रायौं करता तिसवारी काढ्दै । कुप्रा साठीका जिएमें पाणी रो तोड़ी । कैवा चाल प्रहरा लोगां री अकल ई साठीका रा पाणी जिती ऊँडी व्है, प्रोछापणी रूडी राजस्थान/61 - मारवाड । + मैड़ोई नी प्राव । दिन में लू रा लपरका चाल, देह रा मूळा वरण जावं पण थाने खेजडा री वैम री छिया तळ ढेरियो कातता मिनस उघाड़ा बैठा लाघसी पाणी विना दरखत करें, पछ छियां कारी तो छियां रं सारं ई कुरण है। जिण मुंय पनग पीवरगा, कर कंटाला ख। पाकै फोगे छांहड़ी, हूंछा भाज भूख ।। पण लखदाद है पा रखां ने जका साथ नी छोड़े। इण मौसम में ई प्रापरी रसाळ, खोखा, ढालू, जाळोटिया, नीबोळी देव । बळनी तावडिया में लाय मे सेजड़ा ऊभा सांगरियां, सोसा लुटावं अर छाळी, लरड़ी चरावता टावरों ने भाडो देव । इण तिसवारी लुवां, सैखांड करती मांधी, भळियां में ऊभा रोहीडा खिल पर फूल गुलाल विखेर, पण कांई कर- में, प्रेकन भाजे रिड्ड । ऊचाळी के म घरसरणी, के फाका के तिड्ड ।। घिन है अठरा जाया-जलम्यां नै जका खुद महाकाळ बण्या काळ री कांई परवा करै । वड़ रै लार ऊभा मेवाड़िया तबीठ में खीर सबोई भर अलगोजी वजावै । राईका साठ्यां लार टररहे टररहे करता खाँध रखी घाल्यां फिर । लोग प्रापरी भूरा मुरट री रोटी, बरड़क वाटी भर बा वीजां री रोटी; फोगल से रायती, डोवी, गुजनी जीमजीम मिट'र काळ री कमर भांग नाखे । अठरा लोग प्रापरी तिस दूध पी'र बुझावै । दूध में रधैि अर घी में अलोवै । लोगां रे मन चित मे ई पागूच रो विता नी ब्यापै! बैठा कोट्डया में जाजम ढाल्योडी अमल गाळे, रंग रा दूहा पढ़े पर मनवारा री झड़ी लागती रे । पसवाई ढोली बैठा माढराग में गीत सुणाव-प्रो डी, कुरजां, वायरियो काचबियो जिण सू वाळू रौ रवी रवी सजीव हुय जावे । काठा दोवटी रा धोतिया पर अंगरखी पर्या; कानां में मोकळी मुरक्या, काळी ऊन रो कंदोळी जिणमे मादलिया वांध्योड़ा; रंग-बिरंगा साफा-मोलिया, चूदडी, केसरिया कसूमन वांध्योड़ा अठरा मिनख घणा भला लागे । छेवटी ढाळयां, नेवर पर्योड़ा, मोरखा वेळचा मूलडालूब, गोरवद लटकायां नाचणारे टोळा रा करहा नवावता मुकलावै जावत मोट्यार रे मोद रो काई पार । रुणझुण करती बैहली मे नोची निजरां बैठी, मेंहदी लगायोड़ी नाजू, काळजा री कोर, हिवड़ा री हार बीनणी रे मन रा भाव कुण पढ़ सके ? डोकऱ्या मोठड़ा रा कुड़ता घाघरा पर्यो, सणक-खणक विलिया बजावती घरवार रा काम दौड़ दौड कर। टावर ऊंचा ऊंचा धोतियां बांध्या हाथा-पगां में चांदी रा कड़ा पर्या, माथै चोटी चुगली जका मांही माळिया 62/सिरजए थ्यां हाथां कंवाड़की लियां लूकटाळी छांगे। लुगायां चूदड़ी, पोमची, लेरियो मोढयां, साड़ियो, लहगो, कळीदार धाघरो पर्यो, बोरियो, रखड़ी, लड़ा, सांकळी, सुरलिया पता, तिमणियो. कन्दोळी, कड़ला प्रावळा, टणका, जीव, नेवर, साट परयां; हायां मे विलिया, सांचा, तड्डा, गोखरू, हथफूल पर्यो भापर घर री काम काज बुहारो झाड़ी, पीसरणी-पोवणी, दूवरणी- दिलोवरणी, सिंझारी करे। तर तर रा जीमण कढ़ी खीच, रोटी-रावड़ी, कर-सागरियां, फोफळिया-वेलरा, काचरां-गोटका रौ साग भर ऐढ़े टॉम सुगनीक लापसी अर वड़ियों रो साग कर। डोकरियां लासी प्रोढ़यां दीपार बैठी चरखी कात पर प्राथण-दिनूग वीनरिणयां रै काम री बखत पोतापोती रमाव, फिर ह्यायां करें। डोकरा ऊनाळ रा बैठा मांचा विणं, देरिया काते, खीप रा डोरिया काढ भर परायां गूंथे; सियाळं रा कांबळ, वरड़ी. पटू, खेसली मोड़यां धूणी र खनै तमाखू री गट्टी मेल्यां, होका भरे, गल्ला करै भर मजा करें। ऊनाळे रो सास तिवार पाखातीज प्रावै जद सुगनी पागलै जमाना रा सुगन विचारं। वळती लूवां री वेग जेठ महीन प्रापरीभर जवानी में वैवै पण प्रसाद पाया उरणरं प्रत नंडी व्है जद ग्राम में वादळ दीस । को लूवां कित जावसो, पावस पर पड़ताह । हिंय नवोढा नार रै, वाळम बीछड़तोह । पर लूवां प्रापरा डेरा बिरहण र काळजे जा नांखे । मेह री माया सावरा भादवं धरती माथै बिखेरीज । ऊपरल री पास बंछ । तेज री टेर में वीज्योड़ी भादवे में काकडिया मतीरा, सिट्टा रै रूप फळापै । 'आई आई ए मा ए म्हारी सावणिया री तीज' गावती तीजणियां हीडै गै तिणिया सूलू ब्योड़ी, सतरगी चूनड़ियां प्रौढ़या, भीजतै चीर घणी भली लागे। तीज रै दिन पीहर में नहीं रंवरण री पीड़ सासर बैठी र साल अर परनाळा पाणी पड़त, बीज री झळाबोळ में मैड़ी में दिय रे चांनणे बैठी बिरहण रौ भन घणो पाकळ बाकळ हुवै- जे ढोला तूंन प्रावियो, सावणिया री तीज । चमक मरली मारवी, देख खिवंता बीज ।। इण धोरां री धरती में सावरण मनभावण अलायदी है। सियाळं खाटू भली, ऊन्हाळं अजमेर । नागारगो नित रो भलो, सावरण बीकानेर।। बीकानेर री थळी राजस्थान री नामी टुकड़ी है । ॐठ मिठाई अस्तरी, सोनी गहणौ साह । पांच चीज पृथवी सिर, वाह विकारणा वाह ।। रूडो राजस्थानी - जळ ऊँडा थळ ऊजळा नारी नवळे बेस । पुरुख पटाधर नीपजे, अइहो मुरधर देस ।। इण धोरां री धरती माथै रामसा पीर, पाबूजी, गोगोजी, तेजोजी, जांभोजी, करणीजी, राणी सतीजी अवतरिया। इण वीरभोम में भारी मड उवराव, रणबंका राठौड़, जयजंगळधर बादसाह आपरी वीरता गीतड़ां अर भीतडा मे अमर कीनी इणारी सीख पर समझावरण रैई है- इला न देणी प्रापरी, हालरिय हुलराय । पूत सिखावै पालणे, मरण बडाई माय ॥ अठरा बिना माथै तरवार वायरिणयां न रेकार री गाळ, अर मांच में मरण री मैरणी लागे। सूर न पूछे टीपरणो, सुगन न देखें सूर । मरणा नू मंगळ गिरण, समर चढे मुख नूर ।। घर जाता जातां धरम, नर मर जाता कट्ट । टायरिया रमता फिर्या, उण घर में रजवट्ट । रणवीर पृथ्वीराज चवहांण, राणा प्रताप, वीर दुरगादास, अमरसिंघ जयमल फत्ता सू लेर डूगजी जवारजी, लोटियौ जाट, बारठ केसरीसिंघ, प्रतापसिंघ, परमवीर पोसिय, सैतानसिंघ, कवैसरी, सूरजमल मोसण, पाद दुरसं, बारठ ईसरदास राठौड़ पृथीराज; ख्यातकारा कविराजा स्यामलदास, मुंहतानणसी, सिंढायच दयालदास इण रजवट्ट ने अमर कोनी । इण सदा सुरंग मरुधर मे रूप री गवर मरवण पर मूमल आपरा कूकू पगल्या धर्या । होले-भरवण, मूमल मैन्द्र अर वाघ-भारमली ₹ हेत रा गीत गाईज। इण धोरां री धरती साथै सेज पांणी, हरियाळी जट कोयला टाका कर पर भाखरां री धरती ई है । ढूंढाड़ रा लोगां रा ठट्ठा करीज । गाजर मेवी कोस खड़, पुरखज पून उघाड़ । ऊँध मोझर इसतरी, अइहो घर ढूंढाड़ ॥ पण आबू रो छिव देखरण जोग है- टहूके टहूके केतकी, झरणं मूजळ जाय । आबू री दिव देखतां, और न आवे दाय॥ अगूर्ण राजस्थान रौ सिरमौड़ उदपुर है। भीलारी धरती से भाठो बरगणोई सौभाग री बात है-- 64/सिरजए भाठा तू सम्भागियो, पीछोळा. री रग । गुल लजा पाणी भरै, ऊपर दे दे पग्ग ।। फूलां री कामड़ी जड़ी ललनावां अठ जलम- उदियापुर री कोमणी, गोखां काढ़े गात । मन तो देवां रा डिग, मिनखां कितीक बात ॥ साधी है- उर चबड़ी कड़ पातळ, झीणी पासळियांह । के हर भजिया मिळ, के हेमाळं गळियांह ।। थर चित्तौड़ रौ तौ भाठौ-भाठौ देव पर घर घर धाम है । अठारी माटी तिलक लगावण जोग है । धिन है इगरी गोद नै जका अस्सी घावा रै धणी राणं सांग गीय कळे जो चील्ह उर, कंका अंत बिलाय । तो भी सौ धक कंतरी, मूछां भौंह मिलाय ।। परताप जैड़ा सूरमा जननी तूं ऐड़ा जण, जैहडा रांग प्रताप । अकबर सूती औझक, जांण सिरांग साप ।। अकबर पथर अनेक, केइ भूपत मेळा किया। हाथ न लागौ हेक, पारस रांण प्रतापसी ।। भामासाह जड़ा साहूकार, पन्ना जैड़ी धाय, महाराज चतरसिंघ जी मीरा जड़ा भगत, पदमणी जैड़ी बहू पर चेटक जैड़ा अणदागल घोड़ा रमाया। लीला मो पहली पड़े, कीध उतावळ काय । वाल्हा कंवळां पाळियौ, पडतो भूफ पोचाय ।। चितौड़ रा पाणी री कोई बराबरी नीं कर सके । मरण-तिवार अठ मनाईज, जौहर अठारी व्रत है। किला री काळी पड़ योड़ी भीता, पछीतां जुगां जुगां सू यो इतिहास खोल्यां खड़ी है। इण इतिहास पर संस्कृति री राथापोथी व संभाळता थकां राजस्थान हणा री सदी में जो पसवाड़ी फेर्यो है, वीनं क्रोड-क्रोड़ रंग है । जठे प्रेक मेह अंक मेह करता पीढ़ यां पूरी व्हेगी, बठं राजस्थान नहर रै छाळा मारत पाणी में काग डूबै । जठे लोग हळ. माथै हाथ नी देवता बठे री जमी देस रा धान निपजावरिया में आगेड़ी है । विजळी रा कुवा, बंधा पर कारखाना री मुकळायत सूअठारी किसान/प्रर मजूर घणो मस्त है । गांव-गांव पर ढाणी- रूडो राजस्थान/65 ढांणी में स्कूलां, सफाखानां, बिजली, पाणी पर सड़कों रो घणो सुख है। मेळो डवोळा, वार तिवार, ऐढे टाभ अठरा बसेवानां में जो हेतप्रेम है, अंजस री बात है। इण सड़ राजस्थान री वखांण करतां कोई धाप नी पावै । अठरी धरती माथै अवतरण नै देवता तरसे पर मन डिगाव जको अठरा जाया- जलम्या प्रापर भाग माथे इतराव, गुभेज कर, उगरी वडी भाग है। 66/सिरजए

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आवाज न सुगर कंजूसा र मन मे घणी पीड़ हो जकी भौत दिना ताई मिट कोनी- लो घड़ता ज लुहार, मन सुभई दे-दे भण । सू मां रे उर सार, रहे घणा दिन राजिया ॥ सीता रा पति भगवान राम सब कुछ जाणं है। उणां सू कोई बात री लुका-छिपी मत करो। जे लुका-छिपी करस्यो तो सीतळा माता र गत होसी। सीतळा माता नै धरती पर चढण खातर भगवान राम गधे दियो- "सीतापति सय जाण, कांइ अतबी न करो। मह सीतळा मल्हाण, रासभ दीनो राजिया ॥ वा ठाकरां पर कीन हंसी कोनी प्राव जका खुद तो बेखबर रखें अर प्रापर कन मूरख मिनखा नै राख । प्रारी हालत तो बी प्रांध जिसी है जब नै पत्तो ई कोनी के वो कठीने जावै है । प्राग रस्तो सीधो है के गैरी खाडी है। प्रा ने भगवान भळे ई बचाल्यो नी तो बचणा मुस्कल है- सुध-हीणा सरदार, मत-हीणा राखे मिनख । अस प्राधी असवार, राम रूखाळी राजिया ।। लोग कैव-अब औरतां रो राज पाग्यो। राणी विक्टोरिया ने देखल्यो चाय घर में देखल्यो । मरद लुगाई र लार लार चाल । के जमानो प्रायो है । पण प्रा कथा कोई आज री नुवी कथा कोनी। तीन तिलोकी रो नाथ किसन भगवान राधाजी सूडरतो उणां रे पगा पड़े। पर्छ दूजा मिनखां से तो कैवणी ई काई । दुनिया में इमो कुण है जको प्रापरी लुगाई सू कोनी डरै । वो तो प्रेम सूहाथ जोड़ या बियं रो सेवा में त्यार रवै- हित कर जोड़े हाथ, कामरण सून डर कवण । नमै त्रिलोकीनाथ, राधा आगळ राजिया ॥ अव तो डाक्टर लोग ई तमोखू पीण रा नुकसारण बतावण लागग्या, पण पैली ग्रां ने कुण रोकतो। जागां-जागां हुक्को पीणिया रो जमघट दीखतौ । समझाणे मू मानता कोनी । तमाखू पीण सू दमै री बीमारी हो । बुढाप में सारी रात खांसता सांसता बीते । नीद प्राव नों। कफ थूकता नरक सो गन्दो वरणा लेवे । मर्या पर्छ ई हुक्को पीणिया सुख कोनी पावै । प्राग भगवान रै दरवार में भी उणां पर मार पड़सी। होका पीवणहार, जासी नरको जीवतां । पाई पडसी मार, राम कचेड़ी राजिया ।। यूकता घर 68/सिरजए 'राजिय रा दूहा' यू तो नीति प्रधान है पण इये में व्यंग्य तो पैई पै. पर है । जको मिनख जिसी संगत में रहसी विसी वाता ई सीखसी । अोछ आदम्यां रे बीच में रैणियो महापुरसां रा गुण कठेऊ सीखें । टोटोड़ या री टोळी मे रैता थकां राजहंस री सी बोल-चाल री रीत-भात कोनी आ सके- प्राव नहीं इलोळ, बोलण चालण री विविध । टीटोड यां री टोळ, राजहंस री राजिया ॥ लड़ाई में जीत रौ असली कारण फौज कोनी। असली कारण तौ बादर मुखिया है। प्रधान चीर हो तो व. सू बर्ड किले नै ई मामूली सेना जीत लेव । लंका जिस विकट किल ने साधारण रीछ पर बांदरा जीत लियो क्यू के बारा मालक रामचन्द्र जी लूठा वीर हा- कारण कटक न कीध, सरवरा चाही जै सुपह । लंक विकट गढ लीध, रीछ वानरा राजिया । प्रादमी देखरण में चाय फूटरो मत होबो पण गुणी होणौ चाईजै । गुणी रो ई प्रादर होवे । देखरण में फूटरी पण गुण वाय रौ मिनख के काम रौ ? कस्तूरी रंग री काळी होवे पर देखण में कोजी लाग पण आपरै गुणा रे कारण मैंघी विक पर काट पर तोळा मासां मूतोलीजै । सक्कर देखरण मे घरणी फूटरी दीस पण उरण में कस्तूरी जिसा गुण कोनी। इमै वास्तै वा भाटा सूतोली जै- काळी भोत करूप, कसतूरी कांट तुलं । सक्कर बडी सरूप, रोड़ा तूलै राजिया ॥ जठे लोगों में समझ कोनी होवे बढ़ चीज रौ गुण-दोस ई कोनी पिछारणीजे । सारी चीजा टकै सेर । गुड अर खळ दोनू के भाव । इसी अन्धेर नगरी सूतौ जंगल में रणौ आछो है-- खळ-गुळ अएकूताह, भेक भाव कर पादरै । ते नगरी हूंतोह, रोही प्राछी, राजिया ॥ नासमझ पादमी दूजां रो नुकसारण करें। समझदार मिनख रो इंस्यू क्यूबीगड़े कोनी । पण प्रा बात समझदार नै दोरी लागें। गधौ दूजां री बाड़ी मे बड़'र बठ खूद खूद'र खावं । हरेक मा ई सोच के बाड़ी पापा रीकोनी. पापा क्यू चिन्ता करां । पण समझदार प्रादमी रे मन में प्रा वात खटकती रैच के देखो गयो वाड़ी रौ नास कर र्यो है- सूद गधेड़ो साय, पलां री बाड़ी परे । भा मगजुगती प्राय, रड़के चित में राजिया ॥ राजिय रा दूहा में हास्य मनं व्यंग्य/69 काम करपियो गरी प्रादमी तो प्रापर गेले मस्ती चालतो रखें। जे कोई प्रोछी मिनस उण ने देख'र रोळा कर, रोकगो चावं तो आ बात फिजूल सी लागे । हाथी र लार घणां ही गडका फिजूल में मुस, पण हाथी उणा री परवाह कोनो करें- गहभरियो गजराज, मदछकियो चाल मते । कूकरिया बेकाज, रोय मुसै क्यों राजिया ॥ कोई संगीत री जाणीकार मूरख कन जा'र प्रापरी कळा दिखावं, तो यू लाग के "भैस रै ग्रागे वीण बजाई, भैस रही पगुराय ।" घणं जंगल मे जाय'र जे कोई जोर सू रोवै, तो उरण री सुरणाई कुण करसी। मूरख र सामने प्रापरा गुण दिखाणां जंगळ में रोरण र समान है- "गुणी सपत सुर गाय कियो किसब मूरख कनै । जार रूनी जाय, रोही में नर, राजिया ।। आदमी पेट खातर के कोनी करे ? 'बुभुक्षितः किम् न करोति पापम् ?' भूख मरतो प्रापर फरज न भूलज्या। लुगाई टाबरा ने बेच दे । और तो और चाय जको पाप करण नै त्यार हो ज्यादै । ई सूआ बात साफ है के दुनिया में रोटी मिनख री पैली जरूरत है-- जग में दीठी जोय, हेक प्रकट विवहार म्हे। काम न मोटौ कोय, रोटी मोटी राजिया ।। डूगर पर जळती प्राग नै सगळा देख पण आपरै पगां कनै लाग्योड़ी लाय ने कोई कोनी देखे । दूजा रा तो छोटा छोटा दोस ई लोगा ने घणा मोटा दीस पण खुदरा मोटा मोटा प्रौगुणां कानी उणारी निजर ई कोनी जावै । प्रा दुनिया री अनोखी रीत है- डूंगर जळती लाय, जो सारो ही जगत । प्राजळती निज पाय, रती न सूझे राजिया ।। भायला सूमसखरी माछी कोनी । मजाक करण सू कई वार तो दोस्ती टूट ज्यावै । दूध में खटाई नाखणे सू वो दही वरण ज्यावै । दही बण्यां पर्छ उण रो रूप, गुण, सुवाद सोक्यू बदळ ज्यावं। दोस्ती रै दूध में ई जे मसखरी री खटाई पड़ ज्यावं, तो फेर पली हाळी भायली चारो कोनी र । इयै वास्त दोस्त सूमजाक नही करणी- तुरत बिगाई ताह, पर गुण स्वाद सरूप नै । मितराई पय माह, रिगळ खटाई राजिया ।। 70/सिरजण भादमी ने लागती बात कदई नहीं कणी 1 चुभती बात इसी लागे के जिन्दगी भर वुण रो घाव कोनी भरे। तरवार री लाग्यां जे घाव हो ज्यावं तो दवाई लगा'र पट्टी बांधणे सूथोड़े दिनां में घाव भरज्यावे, पण धुमती वात सू काळज में जको चोट लाग बिर्यन ठीक करण सारू रत्तीभर ई कोई दवा-दारू कोनी। इयं वास्तै मादमी हमेसा सोच समझ'र बोलणी चाइज । प्रा नहीं के मूह में पाई ज्यूई काढ़ दी। कंवत है के मादमी कुचाला इतो जल्दी कोनी मर जितो जल्दी कुवोल्यां मरे। बात घाव बड़ो गैरो होवे है: "पाटा पीड़ उपाय, तन लागां तरवारियां। बहे जीभ रा पाव, रती न मोखद राजिया। सम वही वळवान है । कदैई माछा दिन तो कदेई भाड़ा दिन । कदेई महल माळिया तो कदेई टूट्योड़ी झूपड़ी। कदैई-छप्पन भोजन तो कदैई दाणां रोई सांसो । विधाता री ई लीला नै कोई नही जांण सके । काल ताणी जकां ने भात प्राछो कोनी लागतो, पद-रस व्यन्जन ई सुवाद कोनी लागतो, व सम र फेर सूअाज रोट्यां रे टुकड़ां खातर रोवै है- भाव नहीं ज भात, लागं बिजरण विडावणा। रीरावं दिन रात, रोट्यां कारण राजिया ।। असल में किरपाराम जी री वाणी में हास्य तो कम है पर व्यंग्य भौत है, जको उणां रे नीति र दूहां ने सूसं उपदेस री संज्ञा मूबचार कंत्र काव्य री श्रेणी में ले ज्यावं ।

डर अमोलक चन्द जांगिड़ । - डरतो हर हर करतौ मिनख लगै री जात सीधौ होजावे । हळाडोव हो जाव पसेव सू। अर थर थर धूजण लाग जावै डर सू। प्राकडो-खेजड़ो'ई भूत वरण जावै । वी रा ठाडा वीचार अचक-वचक हो'र इयांला भाग जिया गधे रे सिर सू सीग । वी रौ सगळी व्यक्तित्व'ई रुळ-खुळ जावे; अनाण-सैनाण ई समरथी रे सांमी नी टिक पावं; काळजी आपरी जगां छोड़ देव-इंयालो होहै डर-भौ। डर अंयाली कोजी अबखाई होहै के मिनख नै जेजलो कर गेरै । वी ₹ जीवण रे बोझै ने इस्यौ सूकावं के लाध नी डांड, फळ री वात'ई मूड मे क्यूघालो । विचार मिनख रौ जीवणो हरांम हुजावै । सास निकड़े कोनी बाकी क्यू बचै कोनी । स्यात् कदै सांस निकड़ ई जावै तौ की अचम्भो नी । जिनगानी भगवान री दीयोड़ी लूठी चीज है । ई नै जे मिनख डर-भी सूपर राखणी सीख जावं तो इंसू देसी सुख कठे नी ला ! चोसा- चोखा सत-मातमा पाहीज सीख देग्या क जीवणे रो रहस खोज्यां मिळसी अवस पण मिळसी सुख रै नेड़े रवासूअर डर-भौ रे रावरण नै जीवण- रेख सूपरै राखणे सू। डर तो जैर रो अंडो जोहड़ है जिम मेकस्यां प्रादमी खळखोटी ले ले तो वो वावळं ज्यू रड़बडतो फिर। जे बी दूज मिनस रे बटको भर लेवे ती बोई घिरनी-चक्कर खा जावे। सो डर रो तो सांमी छाती मुकावलो करें जणा सावळ पासौ पड़े। क्यूक डर ग्रेक कूडी कळपना है जिन मिनस काळी कामळ ज्यू प्राप प्रोढल है। मोहीज मिनख रौ घणी मूरखापण है पर प्रेक बावळी भूल है। । 72/सिरजण डर ने भगावा में वीजां मिनखां री जुरत कोनी। बै कांई माडा पा सके है ! भगवान बौं ने साथ देव खुद प्रापरौ साथ आपने देव । प्रातमा नै वळवान बणाई राखणी भर दिरड़ सकळप सू काम लेवरणौ ई भो सूमुगत होवरण री रामवाण प्रौखद है । जणा पाछै सुख-सोमती सूदिन तोड़ या जा सके है । डर रौ असर न्यारी'ई हुवै है। वो निराकार हुता थकां पौड़ा-पोडा पर साकार दीखे । राई रौ डूगर बण जावै अर झूठ से सांच हुजाव; छाऊ- मांऊ लुक र पार्छ सगळं सरणाट कर; निवळी हुता थकां बळवांन दीख । बौ संका खिडावे, मन रै भचीड़ा मारै अर चानणं री जगां अधारौ चावै । बौ आदमी रो अब्बल दरजै रौ दुसमी होहै । वीं पर जीत रौ डको कोई बजर री छाती धाली'ई बजा सके है। वठे कायर काळजरी विसात काई ! दिनां रै फेर सूवीखो आ पड़े। कसट रौ कळायण उमटावै । चाणचकै की अहोणी नी हुजावं रौ विचार काळजे नै चालणी बेज कर- गेरै । मन मणूतै भय सूधूजण लाग जावै। जणा प्रादमी परिस्थितिया रो दास होवे है ई, अर थाकेले सू हार मान बैठे। फेर आपरै भाग नै कूड़ी गाळयां भांडे । विचारौ भाग काई करें। आप कमाया कामगा दई न दीजे दोस । प्रा मिनख री मजबूरी है । मन र हार हार है मन र जीते जीत । आतमबळ सू मिनख री सगळी जीत हुवै । सवसू पेली मिनख आप पर भरोसो राखे पर भगवान पर अटूट आस्था। सबक्या सूगजव रौ है आप रे बळ रौ भरोसौ। ई र बिना फतै मिळे कोनी । दूजी भगवान पर भरोसौ राखण सू सगळा कारज सर पर खोयोडौ पातमवळ पाछौ पाजावै । प्रातमबळ सूं धीरज प्राव अर धीरज मिनस रो पक्को भायली ही है। धीरज ग्रावणी पोखी है पण पायां पाछै जीवण जीवणी खरी अर मन ऊजळो हुजाव है । फेर की लाट सा'ब रो डर कोनी-धीरे धीरे ठाकरां धीरे सब कुछ होय । प्रापा नै प्रापर्ण सूतै बळ न जगावो चाही जिसू आधी जीत तो घर री दैळ यां मांय त्यार है; फेर बार फतै पावणी घणी दौरी कोनी । भरोसी विजय रौ मूळ मत्र है। डर-भो मौत सू"ई बेजा। क्यूक मिनख तो अकबर'ई मारं पण डर तो बावड़-बावड़ घेटुओं मोस । पण कद-कद मौत रो भय मिनस में अणूतौ बळ भेळो कर मेले। कुतै २ हमल सूकूण में दव्योडी बिल्ली में अथाह ताकत पाजावं अर बा कुत नै फेफेड़ मेरै । चीन रौ मानो कव–'दुसमन नै तीन नाका सूधेरणौ चाहीजे । मेक खूणौ वीरै भागवा सातर खुलो छोड़ देवरणो, सो आसानी सूभाग जावं नी तो चारुखानी सू फंसेड़ी दुसमण घणो सतरनाक साबत हुवे ।' मरणिय नै मारणियो कुण ! डर/73 डर अमोलक चन्द जांगिड़ डरतो हर हर करतौ मिनख लगैरी जात सीधौ होजावे । हळाडोय हो जावै पसेव सू। अर थर थर धूजण लाग जावं डर सू। प्राकडो-खेजड़ो'ई भूत वण जावं । वी रा ठाडा वीचार अचक-वचक हो'र इयांला भागे जिया गधं रे सिर सूसीग । वीं रौ सगळी व्यक्तित्व'ई रुळ-खुळ जावं; अनारण-सैनांण ई समरथी रे सांमी नी टिक पाव; काळजी प्रापरी जगां छोड़ देवे-इंयालो होहै डर-भौ। डर अंयाली कोजी अवखाई होहै के मिनख नै जेजलो कर गेरें । वी ₹ जीवण रै बोझै ने इस्यो सूकाव के लाध नी डांड, फळ री बात'ई मूड मे क्यू घालौ । विचार मिनख रौ जीवणौ हरांम हुजावै । सांस निकड़े कोनी बाकी क्यू चचे कोनी । स्याद कदै सास निकड़ ई जावे तो की अचम्भौ नी । जिनगांनी भगवान री दीयोड़ी लूठी चीज है । ई नै जे मिनख डर-भी तूं परै राखणौ सीख जावं तो इंसू वेसी सुख कठं नी लाघ । चोखा- चोखा सत-मातमा पाहीज सीख देग्या क जीवण रौ रहस खोज्यां मिळसी अवस पण मिळसी सुरा रै नेड़े रैवासू पर डर-भौ रे रावण ने जीवण• रेख परै राखण सू। डर तो जैर रौ अंडी जोहड़ है जिमें कस्या आदमी खळखोटो ले लेवे तो बो बावळ ज्यू रडबड़तो फिर । जे बो दूज मिनख र बटको भर लेवे तो बोई घिरनी-चक्कर खा जावै । सो डर रौ तौ सांमी छाती मुकाबलो करें जरणा सावळ पासी पड़े । क्यू क डर प्रेक कूडी कळपना है जिन मिनख काळी कामळ ज्यूं आप प्रोढ़त है। ग्रोहीज मिनख रो घणो मूरखापण है अर प्रेक वावळी भूत है । - 72/सिरजण सके है। डर नं भगाया में वीजां मिनखां री जुरत कोनी । कांई भाडा मा सके है ! भगवान बी ने साय देव खुद प्रापरी साथ मापने देव । प्रातमा नै बळवान बणाई रासणी भर दिरड़ सकळप सूकांम लेवणौ ई भो सूमुगत होवण री रामबाण मौखद है । जरणा पाई सुस-सोमती सूदिन तोड़ या जा हर रो असर न्यारी'ई हुवे है। वो निराकार हुता थकां पौड़ा-पोडा पर साकार दीखे । राई रो डूंगर बण जावै पर झूठ रो सांच हुजावे; घाऊं- मांऊ लुक र पार्छ सगळं सरणाट कर; निवळी हुता थकां वळवांन दोखे । बी संका खिंडावै, मन रै भचीड़ा मार पर चानण री जगां अंधारो पावै । वो प्रादमी रो अब्बल दरजे रो दुसमी होहै । वी पर जीत रो डंको कोई बजर री छाती वालो'ई बजा सके है। वठे कायर काळजरी विसात काई ! दिनां रै फेर सू वीसी आ पड़े । कसट रौ कळायण उमटावै । चाणचक की अणहोगी नी हुजावं रो विचार काळजे नै चालणी बेज कर- गेरै। मन मणूतै भय सूधूजण लाग जावै । जणा पादमी परिस्थितिया रो दास होव है ई, अर थाकेले सू हार मान बैठे। फेर प्रापरै भाग ने कूड़ी गाळयां भांट । विचारौ भाग काई करें। आप कमाया कामरणा दई न दीजे दोस । मा मिनस री मजबूरी है । मन र हार हार है मन र जीते जीत । प्रातमबळ सू मिनख री सगळी जीत हुवै। सबसू पैली मिनख आप पर भरोसो राख पर भगवान पर अटूट आस्था। सबक्या सूगजब रौ है आप रे बळ रौ भरोसौ। ई रे बिना फत मिळे कोनी । दूजो-भगवान पर भरोसौ राखण सू सगळा कारज सर पर खोयोड़ो प्रातमवळ पाछौ पाजावै । प्रातमबळ सू धीरज पावं अर धीरज मिनस रौ पक्को भायली ही है। धीरज पावणो प्रोखो है पण आयां पाछ जीवण जीवणी खरी पर मन ऊजळो हुजाव है । फेर की लाट सा'व रो डर कोनी-धीरे धीरे ठाकरा धीरे सब कुछ होय । आपां ने प्रापणं सूत वळ ने जगावणौ चाहीज जिसू प्राधी जीत तो घर री दैळ या मांय त्यार है; फेर वार फत पावणी घणी दौरी कोनी । भरोसौ विजय रौ मूळ मत्र है। डर-भो मौत सूई वेजा। क्यूंक मिनख तो अकबर'ई मार पण डर तो वावड़-बावड़ घेटुमो मोस। पण कद-कदै मौत रो भय मिनख में अणूतौ बळ भेळो कर मेले । कुतै र हमले सूकूण में दच्योड़ी बिल्ली मे अथाह ताकत भाजावै अर वा कुनै न फफेड गरे । चीन रौ माग्रो कव-~'दुसमन नै तीन नाका सूधेरणौ चाहीजे । भेक खूणौ वीर भागवा खातर खुलो छोड़ देवरणो, सो आसानी मूभाग जावै नी तौ चांरूखानी सू फंसेड़ो दुसमण घणो सतरनाक साबत हुदै ।' मरणिय नै मारणियो कुण ! • डर/73 सो डर सू डरण री जुरत फोनी। वीसूफफत दो दो हाथ करणं री जुरत है। 1 डरणी मिनस रो निवळापन है। स्वामी विवेकानन्द कया करता के डर कर पर निवळी होकर जीणो'ई महापाप है । नेपोलियन धड़ कर बोलती क जिन हारणे रो भय है वो जरूर हारसी। डर री भावना आणं रे साथ मिनख रो मन सफळता री प्रासा छोड़ देव पर हार रो हार गळं घाल लेवे । अंयां काम नी चले, डर रखने गयां डर भागे। फेर निगम कुण है ? निरम वो है जिरो अंतस दूध धोयो है, जो दिन नै दिन अर रात नै रात नी समझ भलो करण में । दुखियां रो दुख दूर करण मे लाग्यो रवै अर डर सू सहज मुगती दिरावे; की नै नी सताव अर बदळे री भावना सू काम नी कर । जिरे हिरदै में दया, छिमा माद हिलोरा लेवे पर तपसी रो जीवण जीवै । जिरी मन गुलाब सो मुळके पर सुवारथ सूकोसा दूर रैवै । जया-जया मिनख ईरखा, लोभ पर सुवारथ सू पळगी होती जावली तयां-तयां वो पातमा पर बिज करती जावली पर 'सत्य शिवं सुदरम्' र परकोट मे निघड़क विचरैली । निरभै रवणी हिरदै मे अणूती प्राणद देव । परमातमा रौ अंस जीव घणी हरख कर, जिसू जागरण रौ संस फूके। पण मो'-माया रौ भरमायेड़ी मिनख तावळी सो सत्ता-गरब सू हटै कोनी । ई ससारी रा भौतिक सुख- सुभीती वी री नस-नस में रम जावै पर वी री भीतरली साति नै उड़ा देवे। असल मे मिनख मन नै मोह सू मुगती दिला'र'ई ऊंचौ उठ'र जीणो सीख सके है। क्यू के सुख-भोग रै जाळ में फस्यां पाई प्रादमी डर सू आजाद नी हु सके । वी र गरब रौ कादी लाग जावै । धन-संपत हुवर्ण सू बौ राज-पाट सू डरबोकर, मांन होण पर अपमान सूडर, राज कर तो दुसमण सूडर, जोवन रौ जोर बुढ़ाप सूडर पर काया मौत सूडर। कैवणे रो प्ररथ औ है क डर मिनख नै चारूमेर सूघेर राख्यौ है । वीं सू पिंड छुड़ाणो मिनख री भीतर री ताकत पर निरभर कर है, जे बो अपणे आप ने बस में राखै । फेर डर में बड़ यां डर भागे । सो मिनख रौ मंगल ई बात में'ई है क वो सब क्या में निरम रवे पर भगवान मे प्रास्था राखे । 74/सिरजण लोग के कवेला 0 त्रिलोक गोयल घटना दुरघटना मा हुई क रामसरूप जी मास्टर सू हैडमास्टर होगा। कीयां होगा ? प्रा बात पडदै री है, पडदा मे ई रहवा द्यो, पण होगा जो तो होई गाक ? गळा में पट्टी तो पडई गौक ? डांड, पटेलाई पर थाणेदारी रौ मजो अमलाण्या जस्यो खटमीठो हुवै है, चटसारा ले लेर वै ई ऊरी सवाद लेबा लाग्या, मालम तो पो फाट्यां पडसी क ? नवी मीयां अल्ला अल्ला पुकार । इव हैडमास्टर साब री मन री मिनकी नै सुपना ई आवे तो स्कूली मूसां रा । कागदी योजनावां पर थोथा उपदेसा सूई जे सो क्यूं हो जाती हवै तो रोवणौ ई क्या रौ? असल वात पा है क प्रै जतराई ‘टर' है क, अ लारला तीस-पैंतीस वरसां सू निरथक ई 'टर टर' कर है, जे 'कर कर' रो पाठ पढ़ लेवता तो प्रो मुलक आज कठं रो कठे पूग जावतो। रामसरूप जो हैड हा पण हा तो 'टर' क ? आपरा मास्टरी जीवण मे जीयां बखत बितायो वीमे कोसीस कर्या ई घणो बदळाव प्राणी सहज सरल नी हौ, पाका घड़ा पै माटी कतरीक टिकती? म्हार कहणे रो पो मतबल नी है कब कोई खोटा मास्टर हा, प्राज रा घणकरा पेट भरू जीव जीयां होवे है, बीयां ई वै ई हा। हां प्रा कह सकौ होक पोथा पुराणां मे बतायोडा प्रादरस गरू जसी गरिमां व्या में नी ही, हरेक सू असी पासा राखवी ई बैल ने दूणो जस्यौ ई है, आदरस चाद सा चिमकणा भर ऊंचा हुवे है, कोई बिरला रे ई हाथ भावे, जे रामसरूप जी रे हाथ न प्रासक्या तो ब्यांरी के दोस ? मिनख तो आखिर मिनख ई है क ? बौ मन नै कतरोक लोग के कैवला/75 चुस्त लागे। बस में राख ? क्यू राखे ? जीवती पिराणी भाठा रौ कीयां हुवै ? देवता कोकर वरण? हैडमास्टर जी रा संस्कारां रा रूस में बीज तो गावा रौ न फळ सहरा रा, कदैई कदैई दो चार फूल विलायती ई लाग जाता हा । ई रूखड 4 बठ्यौ अंक काळ कागलौ बराबर आ कांव कांव का करती हो क लोग काई कैला ? 'दुनियां काई कहसी?' कागला री आ कुवारण व्याने केई खोटा चोखा कामा सू रोक देती, केरी आ टेम कुटेम री टोका टोकी ब्यारी सुतन्तरता पंचाधक रा सड़ाका सी ही । घर तो हैडमाट साब धोती ई पैरता हा पण स्कूल जाती टेम पायचा टांकर ऊंप ई पतलून ठांस लेवता, ब्यान अवखी तो घणी ही तागती, पण कागल री सावचेती नै कीकर नकारता क छोरा टिगल्यां उडासी, मास्टर्या वाता बरणासी क ढीली धोती रा हैडमास्टर सूतौ चपहासी जट ती ट्यांने याद है ब्यारी तीन पीढी ती रा बडका मे मोजा जूता आज ती कोई नी पहा । अाजादी पगां री जळम सिद्ध अधिकार हो । विदेसी बेवसी सू जे कदेई देसी पगरखी मे बन्दी हो पो ई पडतो तो ऊ काळ कोठरी ब्यारा चरण केवळ रो जीव अभूझती, वासता । हैडमास्टर ई समै रौ पावन्द नी होसी, तो दुनियां कोई कहसी ? ऊभा गास्या लेता रामसरूप जी राबडी री लार डवत रोटी निगळ'र झट चपलां अटका'र स्कूल ने वीर हुया, गैला मे ब्यारो छोरो कान र ट्रांजिस्टर लगाया किरकिट री कमेन्ट्री सुणतां इंजन ज्यू फक-फक धुआं उगळती पार्यो हो, बौ पूठ पिछाडी हाथ कर ॐ के पैलाई में ऊरी कान पकडर लबडधक्या"..."सूअर गेला में सिगरेट फूकता तनै लाज सरम नी पावै, लोग दुनिया के कहसी क हैडमास्टर रै छोरा रा लक्षण देखो, अ दूजा रा टावरां नै के सुधारला? सुपातर वेटो वापरी कमजोर नस पकड़ी, बात नै पलटी देर बोल्यो-“पैट पै चपला? राम राम श्री कस्यो पहराण, देखण हाळा भला आदमी के कहसी? ल्यो में म्हारा बूट पहरल्यो दोरा सोरा पाई जानी, चपलां म्हनै दयो !" मूल मुद्दो तो हवा में उडगो'र भोळा-ढाला हैडमास्टर जी चंट चालाक छोरा रा मोजा जूता कीया जीया ठांस ठूसर, पगां री मुरनो बणावता स्कूल पूग्या । गाळ या'र घी री नाल्यां । टावरपणा सूई छुट्टा सेल्या खाया हा, व्यारी हर मद् वाक्य फाटी फूहड गाळ यारा किरिया करम पर भलंकारा मूलद्यो फद्यौ होतो। साफ सूघा हिवडा सूनीसरी में प्रोरिजनल सुद्ध गाळ यां, गाळ यांनी ही मनुस्मृति रा स्लोक हो, यारी अभिव्यक्ति री मौलि- 76/सिरजण कता, स्वाभाविकता ने सरलता ई हो । सबदकोस रा संकुचित अरथां मुंवा सुनेरी सबदा रा अमोलक भावां रौ की लेणी देणौ नी हो पण इव कर के ? हैडमास्टर होता ई पग पग पं कागलौ कुरळाव-छोरां पं के असर पड़सी? बीयां रामसरूप जी आ पाछीतरां सूजाणे हा के घाट घाट रा पाणी पीयोडा छोरा गाळ यां रा मामला में गरूजी रा गरूजी हुवे है पण वै कागलै रा हुकम सूजीभ रै लगाम लगार फूक फूकर बोलता, मांय ई मांय घुटता, सावधानी बरततां बरतताई जे कदैकारण भूलचूक हो जाती तौ भन ई मन कान पकडर ऊठ वैठ लगाता, व्यान अयां लागतो जाण काल रो रामसरूप दूजो हो भर प्राज रो दूजो। श्रा अतिसयोक्ति नी वास्तविकता है क कड़क सू' कड़क हैडमास्टर री हैडमास्टर घरहाळी ई हुवे है। लाण हैडमास्टरणी साव रामजी री गाय ही, पण पुरबला पुण्य सू हैडमास्टर होता ही रामसरूप जी ऊंन मूल्याणी समझादी क “इव तू मास्टरणी नी, हैडमास्टरणी होगी है तनै स्टेण्डर्ड सू रेणी पड़ेलो, गंवारू पर जूना पुराणा सगळा ढंगढाळा बदळना पड़सी" । बीयां हैडमास्टरणी चावं कक्को कोडीडी ई न जाणती ही, पण पीर सासर दोन्यू ई ठोड या पक्की पाटी पहलां ई पढ्योडी ही क जे दुनिया ने प्रांगळी उठावा रो मौको न देवै वो कदई ठोकर न खावै, इब हैडमास्टर जी रे वारनिंग देवा पै कौढ में खाज होगी. सुरखाव रा पर ई नीसरगा, घाघरा तूगडी मुसमुसार मटकामें मिलीजगा न साड़ी पेटीकोट खूट्यां पै टंकगा, हां प्रा बात दूजी है क ऊन ऊध पल्लारी साडी पहरवी परलोक जातां ती नी पायी जो नी हीज आयो । अक सू दो भला, आप डूबता पांडिया न लेडूच्या जगमान । खोडली कागलो दोन्यां रै ई माथ बैठ वैठर का.....""को कर्याई करतो । जे हैडमास्टर जी कोई काम जग हसाई रौ करता तो कागलो हैडमास्टरणी में बड बड बोलतो, जे हैडमास्टरणी अस्यो कोई काम करती तो कागलो हैडमास्टर जी में बड जाती, ईतरां तिसळता तिसळता दोन्यू अंक दूजा ने संभाळता-कदैई दोन्यू संभळ जाता कदैई दोन्यू घडाम । अजंता में 'लव इन सिमला' चाल री ही, रामसरूप जी बोल्या मान दीतयार री छुट्टी है, चालो पिक्चर ई देख्यांवा, हैडमास्टरणी रौ कागलो तुरत व करी हैडमास्टर होर लव अव रा सलीमा देखो कोई स्कूल रा टावर मां बाप साग मिलगा तो के कहसी? पापां तो मैजेस्टिक में नानी बाई रो मायरी देखबा चालस्या" । गया। इन्टरवल में वारं पाया तो ठेला हाळा कने फूल्या फूल्या पाणी रा पतासा देसर हैडमास्टरनी रौ मन चाल्यो, मन लोग के कविता/71 तो हैडमास्टर जी रो ई चाल्यो, पण खुद मनीत प चाल तो दूजा ने की कर वरज ? हैदमास्टरणी न कहो “जे पतासां पीतां कोई देस लियौ तौ तहक लोग बाग मा ई महसी क मै वे ई हैडमास्टर है नी जो सड़कों पं कमा कमा दूना चाट ? नी वाया नी, ठाला काम रो प्रसी जोसम पुरण उठावै ? भाप तो पायली री मूफळ यां ले चालस्यां जो अंधारा में बैठ्या मुड़कुड़ाता रहस्यां"। मास्टर हा जदांती तो छोरी रो ब्याव तीस पैंतीस मे निवट जातो, पण हैडमास्टर होर जै पचास साठ हजार न लगाये तो लोग माजना में धूळ नी नाससी ? मास्टरी में पर हैडमास्टरी में नीट सो पल्ली री प्रांतरों पर बोझ जमाना भर रौ! सरकार, छोरा, जनता पर मास्टर चार विगढेल सांडा Vबापडी प्रेकलो हैडमास्टर कीकर वाथयां पड़े। जण जण रा मन रासतो वैस्या रहगी बांझ । सो दो सौ री ट्यूसनां तो देड़ में गई जो गई, दो चार मठी ऊठी रा पार्ट टाइम काम करर की हाथ सरच काढ़ लेता हा, वा और मारी गई । हैडमास्टर होता ई कागली की वेसी ई पगला गौ, हीडक्या कुत्तारी जीया फू...'कर्या ई करतो। थोडा दिना में ई रामसरूप जी डील मे प्राधा रहगा, बैंक बैलेंस निल । कदा कदा ये प्रेकता में प्रापू पाप सू सुवाल करता म्हन पा वाटी खातां यूजी क्यू माई ?' पडू तर ई खुदई देता के बूर रा लाडू खाय जो पिछताय पर न खाय जो पिछताय । अंक वर काठाई काया होर झु भळा र रीससार वै ई कागला रा कण्ठ पकड लिया “नासपोट्या तू म्हने कठी री नी छोड्यो, इव म्हें म्हार ताई नी दुनिया र तांई होगी, सुख सू खाणी- पीणो मोगो-जागणी मोक्यू हराम होगी, राममार्यो मुरादाबादी लोट्यौ ई अस्यो गुड़करणो न होसी । अस्यी किरकिरी, बरणावटी, पर थैमजा जिन- गांरणी रौ के करू?" भिंचा भिंचा गळा सूकागलो प्ररडायों "करमहीण कण्ठ तो छोड, लोग के कहसी?" जीयां राजारामचन्दरजी रे हाथ लगातो ई सिव धनुस मापू प्राप ई टूट गो बीया ई 'के कहसी ?' रा तकिया कलाम रौ राम बाण छोडता ई कागला रो कण्ठ छूटगी। कागभुसुण्ड जी खंखार अर मा कहतां उड़न छु होगा क "भाया लोग दुनिया रे डर सू अादरसां री गळी सडी रामनामी चादर नै पीढ़ी दर पीढ़ी प्रोढरिणया रूढळ्या बूढळ यां लोगां री आ ई दुरदसा हुवे है. सोच समझ'र हिवड़े सूअपणाया ठोस पादरस ई उजाम कर सके है।" 78/सिरजए

नुगरौ होग्यौ नेह
कल्याण सिंह राजावत
वाचक -मन उजळ तन उजळी, और उजळी नांव ।
वाचिका-ऊभी प्रेम पगोतिय, प्रेम कर्यो सर नांव ॥
वाचक -पोह रो महीनो सी धरणी, ऊपर प्रोळा मेह ।
तर तर गीला कापड़ा, थर थर घूज देह ॥
वाचिका-काळा काळा बादला, भिड़ बरस घनघोर ।
धणी झबूक बीजळी, रण दिवस मठ पोर ।।
वाचक -बरड़ा बीहड़ डूगरा, ग्वाळां री इक गांव ।
चारण अमरौ धीवड़ी, बट चरावै दांव ।।
वाचिका-बरसां ऊपर साठ र, अमरौ बूढी जान ।
कजळ बरणी ऊजळी, बेटी जोध जुवांन ।।
[बरसात व्हरी है, बादळ गरज रैया है पर
मांझळ रात में घोड़े रा पोड़ सुनीज]
वाचक --दड़बड़ घोड़ी दौड़, थमियो अमरा री थळी ।
परवत लंध्या पौड़, थर थर घूज थाकियो ।
धाचिका -टूट जिण बिष डाळ, घोड़े सूनीचे गिर्यो ।
मुरछित है मूछाळ, पोर बन्दर रो पाटवी ।।
वाचक --सट पट मुण झट पट उठ्यौ, द्वार बटाऊ जाण ।
लथ पय देख्यो मानवी, उडता दीख्या प्राण ।
वाविका -वळ सूबूढो डील हो, मन सूही वळवांन ।
निसर्च हुयो वचावरणी, घर माया रौ प्राण ॥
नुगरौ होग्यो नेह/79

वाचक वाचक -अमरौ हे लो देय नै, वेटी ली बुलवाय । दोन्यू ल्याया मायन, गूदड़ दिया प्रौढ़ाय ।। अमरौ -राली, गूदड़ सौड़, प्रोढ़ायां नी तन तपै । तन नै तन मूजोड़, जीव बचे जद ऊजळी ॥ -~-बाप कहै वेटी सुरण, अरण होणी सी वात । मेह बरस वीजळ खिवं, सियाळ अघरात ।। अमरौ - प्राज कहूं सुण ऊजळी, मूघा है मिजमांन । प्रारी जान बचावरणी, प्राणां की मत पाए । वाचिका -अखन कवारी ऊजळी, पंथी मरद अजाण । की कर तन परपण कर, विन पोथी परवाण।। दोय परकमा देय ने, साखी रख भगवान । मन में मान्यो देवता, तन री मैटी तान ।। समवेत --गिरस्थी घरम निराळी प्रो इमरत री घूट और प्रो विस रौ प्यालो मंदी, चवरी, गीत, मांडणा, राखी रंग रूसालो मंगता, फिरता. संत, सूरमा, सां री साख संभाळी तीज, त्युहार, व्याव, मायरा, फागण घूमर घालौ पीढी पीढ़ी पीत्तर पूजी, अगली पीढ़ी पाळी घण मोला मिजमान वटाऊ पंथी कदै न टाळी सुख सूराखौ सदा सदा ही, वरसां लग बरसाळो वाचक -सोळा बरसां ऊजळी, तन जोवण रै ताव । सूती साग सामने, बांहा रे पसराव ।। वाचिका –पोह म्हीने पोळां पिटयो, जडग्यो सारो डील । जमग्यो मे हो जेठवी, सांसा रंगी ढील ॥ -किरणां उगत भाण री, ज्यूहिम ने पिघळाय । ताती छाती ऊजळी, मेहा नं गरमाय ॥ जाग हुई जद जेठवी, देखी सुवरण वेल । लिपटी लाय लगायरी, ज्यूवाती में तेल ।। जेठवी -रामजी करी कांई माया? कठ-कटं सू कठं चाल नै चाल कठ पाया ॥ साग कुरण हा, कुण कुण म्हे हा, सगळा ही भरमाया । सिघा तणी सिकार खेलता, खुद ही तो चित पाया ।। वाचक 80/सिरजरण - वाचक -~~-जान बची तो मन जुड़े, रूप रास री डोर । पली नरणा पारधी, चित अव होग्यो चोर ।। वाचिका -प्रीत हुई अर प्रण हुया, रैवां ब्याव रचार । पेची बांध पधारस्यां, सज रैजे सिणगार ।। वाचक -मेहा कुळ रो जेठवौ, पोरबद रा राज । चारण कुळ री ऊजळी, वधिया प्रीत रिवाज ।। वाचिका -बाथा बध बाचा बंध, जोड़ी पिछड़ जीव । नंणा बंध इसड़ा ढळे, समदर छोडी सीव ।। वाचक --मेही महला पूगियो, मन रहियो वन माय । जोवरण जुलम जणावियो, छीजै तन री छांय । वाचिका --जद जद पुरवाई बहै, हुवै पुरवली बात । मन री घोड़ी जा यमै, झड़ लागी बरसात ।। वाचक -दिस दिस ही ऊजळ दिस, जद बीजळ झपकाय । झिरमिर झिरमिरजे झरे, प्रांसूड़ा अघताय ।। ऊजळी --कोल वचन कितरा किया, पायौ नी मन मीत। अजमाव है ऊजळी, परदेसी री प्रीत ।। धोरै चढ देखें धरा, राह राजवी रोज । फीकी सी फिरती फिर, खोद मंडिया खोज ।। कजली -प्राव जेठवा पाव । तन मन सारी थारो है रे, कीकर कर्यो दुराव ।। तू कैव तो फूला हारा, मन हद करू' वणाव । तू कंवं तौ चीर काळजौ देवू थने दिखाय । तन रौ ताप घणू ताप है, तू ना घणू तपाव । छोटी सी जिनगांरणी है र, ज्यादा नही खटाव ।। म्हांनै कोकर भूल्यौ भोळ श्रेकर दरसाव । जेठवी पीड़ा प्रीत पिछांण, पीडा सा पाछी फिर । प्रीत रीत परवाण, पास्यू कर ऊजळी ।। लोक लाज नै लोप, भूल राज रा भाव नै । तन पै झेलु तोप, आस्यू कर ऊजळी ।। तू म्हारै तन जीव, सांसा रो सिणगार तू। नेह नगर रो नीव, प्रास्यू अकर उजळी ॥ नुगरो होम्यो नेह/81 - राजा वाचक ---लिप भेज रानदेशड़ा, रादा उजळी नांव । चक चक सारं भोपळ, राममें सारी गांव । राजा सुणी राणी सुणी, सुरगली सारा लोग । राज कंवर रे होयगो, रूप रास रो रोग ।। -सुरण, राजरीत, प्रीत रीत नहीं पालपणी चित नी चढाणी मीत, गीत है छदाम रो। निजरां सू बंघरणी ना हिवड़े सू हारणो विधणो है प्रेकवार छतरी को धारण रो॥ परजा पर राज कर, राज री रूखाल कर राज री संभाळ कर, राज है भो राम रो॥ समझ नही रे तू, समझ नहीं रे तू समझ नहीं रे क्यू सार थारै काम गै।। राणी -बेटा थार व्याव रौ, म्हानं कोड घण्ह । फूलां तोली ल्याव सूजाणे जग-जह ॥ जाणं जगह-जगह, ठाठ मू जान चढला । रथ बल्यां मे होड, गजव रा ढोल बजला॥ छोरी मूमन छोड़, निभसी नेह निठाव रो। मावड़ ₹ मन मोद, बेटा थार व्याव रौ। -राजपूत पर चारणी, वीर भैण री जोड़। ब्याव कदै नी हो सके, इसड़ी नाती तोड़ ॥ मोसा देसी मान खौ, पापी कहसी लोग । नीत अनीत कहावसी, बधसी सगळे रोग ।। धन दै चाहे मोकळी, देय भलाई राज ।। रजपूती तूं राखल, राख बाप री ताज ।। समवेत -जेठवी मन रे मांय जळे । लोक लाज पर राज काज में किरण विध प्रीत पळं । कदै धरम री धुजा धुजावं, कदै'क भरम छळ ॥ मन तो रेग्यो काची माटी भय री धुंद गळं । जेठवी मन रे भाय जळ। जेठयो -लिखदी सादी बात, नहीं मैं परण सकूला। थारी म्हारी जात, मंगपण कदै न हो सके। राजा 82/शिग्जा तूले प्राधौ राज, भाण बरणी राजस करी । करल बीच समाज, ब्याव जात र साथ में । समवेत -पढ़ियो परवाणो ऊजळी, घर चक्कर खावै- पढियो परवाणौ ॥ जलम होयग्यौ जहर मोतड़ी क्यूनी प्राव- पढियौ परवाणी ।। अरगजाण्यां सूप्रीत करी तो जान गमाणी होसी । काया लाग्यो दाग, भाग में लिखियोड़ी कुण धोसी । पढियो परवारणी। ऊजळी -जेठवा जुलम कर्यो रे, अधूरी सपनो तोड़ यो जेठवा जुलम को रै। वधती तोड़ी बेल और तूं मनड़ी मोड़ यौ जेठवा जुलम कर्यो रे । जै बचना में झूठी हो तो सांच कही क्यूकोनी ? मरदां री वाणी ही कूडी, हुवै जणा प्रण होनी। जेठवा जुलम कर्यो रे। कजळी -थार नेणा थाह, नेह ही नेह निरखियो । प्रय मत प्रयताय, जळ जाऊली जेठवा ॥ नारी रौनर नाह, माय रेयां ही सांतरी। पुरुसां कर परवाह, लजा मती र जेठवा ।। माळ पणे रा वोल, भूल पर विसराय दे। जोयण री रमझोळ, झेलू किण विध जेठवा ।। जलमें प्रेकर जीव, मेकर परण धरण हुवे । प्रीत पियालो पीव जोवू किण विध जेठवा ।। अपणाऊ मपधात, जात मुलादे जेठवा । जात पात री बात, निवळा ही तो नित करें । राग भलाई राज, पन नी चायू रे धणी। माज्या भेकर भाज. पण रस्यूमा धारली ।। राग पाट पर जात, जावं पिर नी रह गः । जोवरण रीना जात. गयो गयो तो वो गयो । यात मानलं बात, यातनं मत विमगई। नहीं पाहिज मात. जलम ही जहर बेटवा ।। . --

नाचिका -लिखता ही वा खुद लिसी, तिल्लां मे नी तेल।
चाल वट ही चारणी, मिल मीत रौ मेळ ।।
वाचक -भूख मिटी तिरसा मिटी, नैणा नांही नीद ।
प्राकळ वाकळ ऊजळी, चिरळावै चौंधीज ।।
वाचक -भूखी तिरसी ऊजळी, गढ़ कोटां री चेळ ।
वैठी बैगी बावळी, जेठा थारी जेळ ॥
ऊजळी -ग्रेकर दरस दिखाय, इतरौ कांईं ग्रातरौ ।
भीड़ मती मुलाय, अभी द्वार ऊजळी ।।
जीवण रौ नी जोग, अकलड़ी नी जी सकू।
भाग लिस्यो नी भोग, प्रोभळ होसी ऊजळी ।।
अकर मुखडो देख नै, समझा समदर सार ।
जीवण राखी जेठवा, ऊजळ जासी पार ।।
तन सोप्यौ तकदीर सू, मन सोप्यो मनवार ।
प्रेमी वणग्यो पारधी, अव क्यू करां अंवार ।।
वाचक -झाक झरोखै जेठवौ, कह्यो ऊजळी भाण ।
राज रकम तू लेयल, पाछी भूल पिछाण ॥
ऊजली -काया थारी काचळी, राखी बांध नाय ।
कंत कहीज्यौ जेठवा, बहिन कहावै नाय ।
राख राज धन धाम तू, राख भलाई राप ।
जावै थारी ऊजळी, समै राखसी सास ।।
याचिका --इतरी कह के उजळी, समदर सौंपी देह ।
लहरा लाज बचायली, नुगरी होग्यो नेह ।।
84,गिरजए

रूख अर आदमी
मगवतो लाल व्यास
रूख बढी क्यू हैं ?
सब रितवा रा सेल-घमोड़ा झेल
यो मायौ ऊंची कियां सड़ी क्यू है ?
रूस री ई जात है, न्यात है
नाव है, कुळ है, गोत है
फेर ई संसार मे यो छडो क्यू हैं ?
यौ सवाल म्हैं सुद ने केई वार
पूथ्यो है-
'भादमी छोटी y है
पर हंस बड़ी क्यूं है ?'
जात-न्यात कुळ पर गोत
भादमी र ई होय
याप-दादा रो परप्यो प्रेक
रूडो रूपाळी नांव लिया
प्रादमी सारी ऊमर रोये
रूसरी तरयो स्यात पाई
म्ही ते भरणपोत्या, पणजारा
गेलारथी में माप पर
सोगय . भादमी री जड़
सुरग मे म्हिया करें
हंग पर पारमी/85

पण रुख री जड़ तौ
जमी में ई ऊंडी, अर घणी ऊंडी होवे
जमी मे जड़ री वे'तार
पर जमी पे रूख रौ संसार
रूख कदई सुरगवासी होवा री
कलपना न्ही कर
कणी मोड़े रूख मार्थ
सोक सभावां न्ही मंडे
पर नी कोई स्मारक वरण ।
रूख खड़ी है मस्तमौल
जोगी ज्यू फकीर ज्यू
लोहै री लकीर ज्यू
लोग रूख ₹ कानी बैठ'र
कतरी ई तर री बातां करें
रूख सब सुर्ण
पण पड़तर न्हीं देवं
इण रौ यो प्ररथ नी के
रूस रै भासा नी होवं
पए रूस भासण न्ही देवं
जितरी छायां उण कन है
रात-दिन वाटती र
कोई भाठी मार तो
थांण में रपट ईनी लिसा रस
गुट न्ही बगाय रस
यो निरगुट-निरगुण
अपर्ण पाप में माचीई
पुण्याई रौ घड़ी है
हंस प्रादमी मू
कितरी बडी है ?
86/मिरज

खास जरूरत
अन्नाराम सुदामा
कार्ड बोर्ड र टुकड़ों में फिट हुयोड़ी,
झूल हो सामने,
मानचित्र भारत रौ।
याळक केई,
टुकड़ा काढता फिट करता
सीख समझे हा,
पण वात वात में उलझ पड़ या;
टळ टोळी मूदो
सीच टुकड़ो मेक मेक मानचित्र सू
राता कर नैण,
रीस मे निकळ पड़या।
बोल्या,
"भो डब्बी मैं रासौ सगळी पारी
रचस्यो म्हे
मेक मेक टुक? सू
मानचित्र नधो न्यारी
पार मूघणौ फूठरी-
पणी भलेरो।"
पही गुरु न सा जियांई
गूंग्या सुर. 'धूमौ पाहा',
गाग जस्रत/87

प्रास्था भागती ठरी मुड़ग्या, हेल सागै पग रूस्योडा। गुरू बुचकाऱ्या समझाया "वाळका, ग्रेक अंक टुकडी काढ जिया निकळग्या थे, ठीक वियाई थारा सगळा साथी रूस रूस टुकडी टुकड़ी काढ चित्र मू टुर पडसी तो खाडे वार्ड मानचित्र में दीखसी खालेड घरगखरी लारै जुवा रसी, अर प्रेकला थे टुऱ्या किया, श्री मानचित्र सगळा री पूजी- सगळा रौ साथी। वाळक ई तो हा विकळाक चित्र नै देख बात समझग्या, दोनूटुकडा फिट किया चित्र मे चुपचाप जिया ई मानचित्र पाछौ मुळक्यो, चमक उठी वत्तीसी सगळं चरां पर संतोस विखरग्यो । आज बाळक वरणग्या बाप, तो मन मे नई पासा जागी, के जुड़ जुड़ टुकड़ा अंक प्राण में आभा धरा कोर पर मानचित्र री और चमकसी पण लाग, कात्यो हुवै कपाम 88/सिरजण

सराई खोचड़ी दांता चढ़सी ।
आज पद पइस रा पड गड़ा,
डाफर चाल भाई भतीजावादी
तो रूस रूस जणौ जणी
बांध बांध डोळां पर गधारी पाटी
खीच धिंगाण प्रान्तां रा टुकड़ा
भूल पूर्णता रौ पाठ पुराणो
उथळं जुगां पुरांरणी सागरण गळती,
पण कादं पर किलो रचरण री
या प्रांधी ममता
सत्तारी सरतां मे दाव मानखौ
मानचित्र रौ उणियारी
कुरण जाणे कियां राखसी?
हुसी मो मानचित्र जे
टुकड़ा टुकडा में खंडित
तो मोटी चिता
धरती पर साबत कुरण बचसी ?
समाधान है
के भूली भटकी पीढ़ी न दिस देवरण
चाईज
न काचळी बदळ.
न प्रणगिरण मौसमी कमटीड़ा,
जरूरत है
के उठ, माजाद चित्र री पूर्णता सूप्रेरित,
भाई चार र नुवै छितिज पर
कोई मणदागी गुरू प्राभा
सास उस्त 89

मेळ-मिलाप
- धनंजय वरमा
कसूरवार सरीसौ-
जिमीन मे निज़र गडायां!
/विजळी रौ ग्रेक खम्बी,
गरी चिन्ता में घुळन लागर्यो हो ।
नीच कोरपाण धरती-
बी पर, भूख री भरती-
सास टूटवा, मरती-मरती।
दळी सा, लीर-लीर पूरिया ओढ या,
पाळ आई,
पाळ बाधणे री सोच !
चिथडा मे चुघेडो, टूट बंध्यो-
'डंडुकळी' सौ अंक हाथ,
सुन्न बापरती काया नै, गरमांस पूगाण बास्त,
चाणचक, गोजिय पासी चुब्बी भार!
अंक अधबुझेड़ी बीड़ी,
नीतर के ऊपर भा जाये।
ठंड री ठिरती ठारी स्यू,
गरीवी हाळी घियारी स्यू,
ह-रकरणाव, घिग्गी बंध जावै ।
90/सिरजरण

. दंताळी जिसा चौड़ा-चौड़ा दांत, "खुण-खुणिय" ज्यू खुणक उठे। मन मारके, अंक तूळी सिलगाव, तूळी सिलग, पर पून रे फलरके साग- सीक पर सिमटेडी, झीणी-झीणो, वादळ बरणी, हळको भूरी डोरो, ऊंची-ऊंची ऊपर ने कंट, अर जड़ा-मूळ सूखू जावै । आखरी बंचेड़ी तूळी नै, बड़े जावतं स्यू, मांगळियां रौ पालणी वणा के, सिलगावै । सिलगतां ई, छोटी-मोटी आंगळियां र बीच- टसकती बीड़ी रौ मुह, तमतमा ऊ ! सास सागं सहारेड़ी, अकसतो, उळझती, गै'रौ धुपी, की नाक सूछणक, को कंठा मे उतरके, समूची काया ने झवाझोरे । सं-से खरड़-सरड़ सांसी, जीत जी ने फांसी ! प्रांता में अटकायेडी- छोट-थक री गटकायेडो- चूंटियं रो चिकणास, रासार बण, पिंपळे हे मोम ज्यूखिर जावं । पतळ लांब तार री- तैरती सी लाळ, की हेट, बाकी समूची पूरियां पर झूलके रहजावे । पड़ी है, कुण ध्यान देवं. अंधेरे में की ने मूझ है ? चानण में ईमघगेले न, सुस-दुसरी पुरा बुझे है ? वों के वास्तै दुनियां मोनी. मेलमिला191 । दुनियां वास्तै वो कोनी ! जी दिन मर जासी वी दिन- श्री अळसीड ने, के तो कोई बाळ देसी, के कोई गाड देसी। क्यू के, कचर ने कुदरत ई खपा सके है ! अर, प्रो ई जगती रो, सब सूमोटौ 'मेळ-मिलाप' है। 92/सिरजण तसवीर स्याम सुंदर मारती निरखौ परखौ ने पोळखी किण री है पा तसवीर है सके- के नेण किणीं दिन मिरगली रै नैणां री गळाई मोवरणा घणाप्रचपळा इमरत रा प्याला हा पण माज तो- दो ठिंडा है : माळा है म्है सर्क- के में हाय किणी दिन पोयण वरगा रूपाळा मुगमल जिमा मुलायम रैया म्है पण माज तो- प्रायठरण है : पाळा है के म पग किणी दिन मायहरी गोदी तस्वीर/93 फूलां री सेजा हा पण अाज तो- उरभाणा है : पाळा है व्हे सर्क- के प्रो पेट किणी दिन लाम्बी डकारा लेवतो धापियोड़ी धणी रैयो है पण आज ती- पाळं में प्राळा है तो- पावी देखो निरखौ परखो नि अोळखी के किण री है ा तसवीर पर सोचौ- कियां बिगड़ी या तसवीर कुरण बिगाडी प्रा तसवीर नै समझौ- के जठा तक छाती रै पुड़ियां हेट भट्टी धुके है थां लाय लगा सको होर नै- श्रेक चिपगारी धणी व्है; विजप यथार्थ D 94/गिरजण

फेर किता दिन
स्याम सुंदर भारती
झूठी झांसी फेर किता दिन
रूळपट रासौ फेर किता दिन
म्हैल हवा रा नै वातां रौ
चट चौमासी फेर किता दिन
भोळी भाळी जनता ने
औ
मीठी घासौ फेर किता दिन।
किणवेळा की हो जावरण रौ
मन में सांसो फेर किता दिन
भूख गरीवी पर विपदा रौ
इण घर वासौ फेर किता दिन
सगळा ने देता रैवौला1
कूड़ दिलासौ फेर किता दिन
जाबाद
इण प्रागणिय राजनीत गै
खेल तमासौ फेर किता दिन
फेर किता दिन/95

आपां मिनख हां
रघुनन्दन द्विवेदी
म्हें पर थू
चाय रा कप कोनी
मेज माथै सूपडा
पर टूट जावां,
आपा मिनस हा
जठां तक
नसा मे उफणतो खून है
हाथा मे वळ है
पर मन में
प्रयाग
अणमाप विसवास रौ
वळतो दीवी है,
आपां पड़ाला
गुड़ाला
मरांला
टूटांला
पण मिटाला को'नी
इण अन्यावर
बायर री झपट सू
.
96गिरजए

इण प्रोछी
अनीत पर कपट सू,
पापां लड़ांला
अर घड़ाला
अक नुवै मारणस रौ दीवौ
जिको-
झू पड़ियां में
नुवो उजास भरला
भर भनीत रौ अंधारौ
इण घरती सू
मळगी करला।
30-21
प्रापां मिारा हो.97

भूख अर बांदरी ॥ मगर चन्द्र दवे मा भूख ! कित्ती निठुर है मा इण मिनखादेही र कंकाळ मांय कठई न कठई है...! पण कठ....? निजर पावै....? पण हां, श्रा है जरूर" पकावट"" नीतर- प्रो आदम वेटो कूड़ बोलतो? चोरी करतो....? डाका डाळतो."? आपरा कायदा, मानतावां रै माथै धार पाळी कटारी फेरण सारू ताकड़ो वैवतो....? या भूख ! याद आयो- आपां ने वांदरी.बरणाय 98/सिरजण गळा में लोकण री सांकळ न्हांख (लोकण री साकळ!) बेसक".. नीतर कठई बंदरिया पेट भरियां पर्छ भागनी जाय क्यू के हाल तो मदारी भूखी है. उणरा छोरा-छापरा ई भूखा है..! मदारी सांकळ खींचर कैव- "इण बाई रे पग लाग मां'जी रा पग दाब बाबूजी ने सलाम कर बा' साब ने जरामजी री..." मदारी बांदरी ने पूछ- “यू सलाम क्यू कर..?" बांदरी जमी ऊपर माडी पड़'र खुदरी पतळी पेट बतावै- "इण र खातर!" मदारी उरणनं कैव- "तो मांग बाई सा'ब कना सू दियो मंदाता भूखी बांदरी नै लुक्को-सुक्को..." बांदरी उरिणयार मार्थ गरीबी दरसाय हाय पसार कोई दियालु""माई री लाल दो-च्यार रोटी रा टुकड़ा फेंक देव बांदरी वां टुकड़ा न उठार मूड रे मांय न्हाख- भूख पर बांदरी/99

हण पापी पेट न भरण साह
के इण गूपलाई
मदारी विजळी रे उनमांन
झपट र सोस लेवं टुकड़ा
पर न्हांस देव झोळी में
(कारण-हाल तो मदारी भूसी है।
उरा घोरा-छापराई भूसा है
पण यांदरी री भूस""?)
फेर पायौ दूजो घर"
"बाई सा'ब रे पग लाग
सा'य ने सलाम कर
बा'साव ने रामजी री..."
100/सिरजए ..

सपनां री तिरस वुइयां पेलाई
1 इन्दर प्राउवा
सपनां री तिरस बुझ्यां पला ई
नीदडली री सांस निसरगी !
दो मुळकांण
उधारी देता,
सांसड्ली
गुम्मेज कर ही
जीवरण मारग प्रीत बांटता
गैली कितरी जेज
कर ही
नहीं
मालण हार गूथती रहगी
अर फूला री बास निसरगी !!
लजाई हिय-बजारा
प्रीतडली मोल बताता
सोने-चांदी रे बाटो
जीवण-मोती तोल कराता
मन रौ मोल अंकीजण पली
तन री घर सू ल्हास निसरगी !
हिय-तीरथा
किता जातरू
बिन चिरणामत पाछा टूळिया
प्रीत-पतासा मन
रे मिदर
माटी रे मटका में गलिया
सपनां री तिरस बुझ्या पैलाई/101

मिन्दर रा
पट सुलियां पली
दरसरण री से प्यास निसरगी !
तन-पूजण मन-समझाव में
गली घणी उंवार करें ही
हेत-प्रीत रा गीत सुगण
तू मौड़ी मनवार
विध-विध गीत रचावण माळी
हिये मायली फांस निसरगी !
कर ही
102/सिरजण

हार मत हिम्मत रे
- लक्ष्मण सिंघ रसवत
आता
जीवण री हर राख, हार मत हिम्मत रे
बिख पळ पोडा जीव, जिणां री कीमत रे
रात अंधारी घोर, মিলন গাৰ
बीजळ चिमक जोर, मनां डर प्राव
कळायण धोवला दिन-रात, मानवी डर मत रे
जीवण री हर राख, हार मत हिम्मत रे
सूरज तेवर तप, जीव बिलखाव
तन रा पोचा, सावड़िये तिड़ जावं
तपसी मांएस मोल, तापसी तिरपत रे
जीवए री हर राख, हार मत हिम्मत रे
प्रांधी
धूळ-वथूळ, मुलक नी मावं
मांख मीच मत मिनख मान मर जावे
पलट मूम मजूम छोड मत सतपय रे
जीवण री हर राख, हार मत हिम्मत रे
सीयाळे
सोगना सावं
पण परभाती धुवर धरा पर लाव
प्रणगिए मोती मोल मानसा गिण मत रे
जीवण री हर रास, हार मत हिम्मत रे
हार मत हिम्मत २/103

समदर छोळा-छोळ घणो डरपाव पिरथी परळ पलट पांवणी प्राव छोड पुराणी पाळ, पाप रा परवत रे जीवण री हर गख, हार मत हिम्मत रे । चौड़िया [1] जिदगी प्रावण-जावरण हेत हित हंस बतळावण है बेल पर फाळ फळ यां पाई- जिदगी छिण मुरझावरण है। [2 ] मौत री साझ घुवै घुट ज्याय चालती वाळद ज्यू लुट ज्याय चाक चौपाळ सांस री प्रास- मौत निरमाण देय मिट ज्याय । [3] प्रास रे पास नहीं उड जाय कठे नैण में नेह घणो रळकाय कट गिरवर गाढी रात सरवर पलका मे- गैरा मे नैण, रैण किण भांत कट 104/मिरजए

जिनगांणी
कल्याण सिंघ राजावत
समरथ व्है समझां तो ऊमर ई ऊमर है।
नाचा तो जिनगाणी धूमर ई घूमर है।
काटा तो सस्तर है
सी'ल्यां तो प्रस्तर है
पी'ल्यां तौ समदर है
करत्यां तो कमतर है
इणरा रूप अणूता है
अजहूं अगता है
प्रोढा तो जिनगांणी चूनर ई चूनर है ।'
प्राभं री पाणी है
धरती री धाणी है
किण री तो जारणी है
किरण री प्रगजागी है
सुरता सार प्रदीठी है
झळती भाळ मंगीठी है
थाकां तो जिनगांणी डूंगर ई डूंगर है ।
जोबन रा झाला है
मद भरिया प्याला है
समझा तो इमरत है
अगसमझ्या हाला है
जिनगारपी/105

इण रा नए नसीला है
इण रा वैरण रसीला है
निरखा तो जिनगांणी मूमल ई मूमल है
पायल झणकारां है
गीतां गणकारां है
काजळ री कोरा है
मैदी रतनारा है
मा तौ कारण-कनोरा है
पा तो बान-बनोरा है
प'रां तो जिनगांणी झूमर ई झूमर है
नाचा तो जिनगांणी घूमर ई घूमर है ।
LJ
सिरज

मावटी होग्यो
सिव मृदुल
झड़े है फूल वागां मां, हर्यो है सुख परवत को।
कदै गरमी कदै बरखा, अजब है खेल कुदरत को ।
जठां सूरात मह अमरत, सरद का चाँद सूबरस्यो।
लगी चौपाल पं घूणी, तप्या बूढा हियो हरस्यो।
रजाई मह पुस्या सगळा, सबां के प्रावटी होग्यो।
अस्यो तो सी पड़े पोटां, अस्या मह मावटी होग्यो ।
जमी लागे मुळकती सी, जठा सू रेलण्या होई ।
घरा को रूप नत निखर, जठा सूसाख नै बोई ।।
हर्या है खेत फसला सू, कर मोट्यार रखवाळी ।
रख है तार खेतां १, कन नत कामळी काळी ।।
चली है सासर जमनी, जंवाई हावटी होग्यो।
अस्यौ तो सी पड़े पोटा, अस्या महमावटी होग्यौ ।।
कठे तो ढोल को ढमको, कठीन तान बाजां की।
बंदोरा बींदण्या सार्व, बंदोरी बोंद-राजा की ॥
कठीन गीत मह वनड़ी, बना पर मायरो गूज ।
बरातां चढ़ गयी तोरण, पगां नै दूध घो, पूजै ।।
घणा के पड़ गया फेरा, घणा के न्यावटी होग्यो ।
अस्यौ तो सी पड़े पोटां, अस्या मह मावटी होग्यो ।।
मावटो होग्यौ/107

परूस माज पंतग मह, सहा मोट्यार लासीणां ।
सजी सी गोरड यां जीम, जणां का घूघटा झीणां ।
हुवला चूर सब धक्क्यां, हिया मह है हरख ऊंडी।
जळे बी सूपणो मीठो, हुयो है चांद सो मूडौ।।
पह सब टूट लाडू पं, पणां को गावटी होग्यो ।
मस्यौ तौ सी पड़े पोटा, मस्या महमावटी होग्यो ।
पूछ म्हने मत हे सखी
मुळक कंचन कामणी, मोढया हर्यो दल ।
जाणे धरती ऊपर, सिल्यों कवळ रो फूल ।।
पीळा गेंदा बाग मंह, पीळी सिरसू सेत ।
मंहदी पीळा हाथ है, पीळी तन-मन हेत ॥
देख कटी कटि प्रोज उर, अतरी मत मोमाव ।
गळसी रळसी यो बरफ, कर कर भारी पाव।।
सळ क्यू साड़ी मह घणा, विखर्या सा क्यू बाळ ।
पूछ म्हन सखी, कहसी राता गाल ।।
108/सिरजण

की तो बोल-म्हारा वीरा
O वासुप्राचार्य
क्यू लाग नी ठा
की तन हुवे, तो वता
प्राजकाल जारी
भखावटै भखावट
सूरज फूतका-फूतका हुयी ऊग
पर सिंझ्या रो सिंझ्या
लीयां-ली- हुय'र डूब
काळजे हईड तो उपर्ड
पण प्ररथ की तिसर?
फेर वै राव
तिरण लाग रैया
प्रकास में गीघ
फेर वां रै लाम्बै परां मू
नतीजसी कोई लोइन्दौ ?
फेर हाथ, पग, सीनो
पर हुलियो वतीज सी?
की तो फूट-म्हारा भायला
दन्ताळी-सूर पाछी क्यू
फाड़न लाग रया है जमीन
की तो बोल-म्हरा बोरा/109

पर मयू
कारिन्दर फरापारी
मांन्यां मूरोतां में
पसारौ फर रैया है?
की तने हा हु तो बता
के पार भर म्हार
माग पर सार
को हुययौ है. मी, पार्दर्ज
तू ई म्हारे दई
की तो भीत सूभचीड़ा सा
की तो समझ
की तो समझा
की तो बोळ-म्हारा बीरा
क' फेर तू
उहावती र सी हाहा
गिणती रंसी पाडा
या के पोर........
या भळ फेर......
LU
सिरजण/110

म्हारे गाँव में
D भागीरथ सिंह भाग्य
छोटो सी है गांव, गुवाड़ी गळियां नडी नडी
टूटी फूटी छान झूपड़ी पोळी ना मेड़ी
पंचायत रा कर फैसला अमली और गंजेड़ी
सौ सौ चूसा खा'र बिलाई चढ़गी हर रो पड़ी
घाईत्यां लूट ली दूकान म्हार गांव में
पंचा री काट ली जुबान म्हार गांव में
सुगनी काकी बात वणाव बोल माडी-टेढ़ी
धीस्यो बाबो रोज पराय खेतां कार्ट पेडी
बूढी दादी री ले भाग्यो कुण रामार्यो गेडी
मझ सरया में पधां उभारणा फाटी म्हारी प्रेडी
छला चवाव है पान म्हार गांव में
बीड़यां री खुलगी दूकान म्हारे गांव मे
पात बतंगड़ बणता बता मळियां गठियां फैली
काल रूपली री चूनर ही जघां जघां मं मली
मरिणयारी ₹ घर लार है फूट्योड़ी हेली
कानूड री बातों में मुळगी भणजाण भकेली
लुच्चा रे लाग री है तांन म्हार गांव में।
डोळ यो र चिपऱ्या है कान म्हारे गांव मे
म्हार गांव में/111

परस्यू रात गुवाड़ी में पाबूजी री फड़ रोपी
सारगी पर नाच देस कर टोर बांधती गोपी
प्रोल-यांन सन कर है देकर माडी टोपी
अब तो खुस होम्या हां रुपियो लेज्या प्यारी भोपी
कर दियो रुपिये रो दांन म्हार गांव में
राख लियौ मैफिल रौ मान म्हारै गांव में
मनवारा में, बौळी पाग्या करता थोड़ी-थोड़ी
नसी हुयो जद कुबदां सूझी कर ली छाती चौड़ी
ठाकर सा ठरक सू बोल्या पार्छ मूछ मरोड़ी
जुगली छोरी आज रावळं सूधर जाय मोड़ी
ठाडे रो डोको है डॉग म्हार गांव में
हीण री फाड़ लीनी लांग म्हारे गांव में
जुनी सोदो खेल करण रो नसो प्रणतो लाग्यो
अम्बर मांही देख बादळी टैण सावती खायो
दो की बीदी दो को चौको दो को दडी लगाग्यो
घर हाळी रो गणो लती बेच बाच कर खाग्यो
गिरवी जुवार्यो री स्यांन म्हार गांव में
लूट सोस खावं जुजमान म्हार गांव में ।
11मिरजए

दरद-दिसावर (दूहा)
Oभागीरथ सिंह भाग्य
लोग न जाणं कायदा, ना जाण अपरणेस ।
रांम भला ई मौत दै, मत दीजे परदेस ।।
भांत भांत री बात है, बात बात दूभांत ।
परदसति लोगड़ा, हुयू हाथी रा दति।।
सुस्ता ले मन पावणा, गांव प्रीत री पाळ ।
मिनख पण रे नांव पर, सहर सूगली गाळ ॥
सहर डूंगरी दूर री, दीखे धणी सरूप ।
सहर बस्यां बेरो पड़े, किण रौ कंड़ो रूप ॥
खाणो पीणी बैठणी, घड़ी नहीं बिसराम ।।
बोजावै परदेस में, जिरण रो रूस राम ॥
मजन रीत परदेस री, भेक सांच सौ झूठ ।
हस बतळावं सामन, घात कर परपूर ॥
लेग्या तो हा गांव कंचन देही राज।
पाछी ल्याया सहर सूखांसी, कब्जी, खाज ।।
लोग चौकसी राखता, खुद बांका सिरदार ।
बाकड़ला परदेस मे, वरणग्या चौकीदार ।
गळे मसीनो में सदा, गांवा रीस मोज ।
परदेसा में गांगली, घर रौ राजा भोज ॥
दरद-दिसावर (दूहा)/113

गजल कागलां री कांव मांही माज तक जिया) हीजड़ा रे गांव मांही पाज तक जिया माळिया री बात छोड़ भूपड़ी कट- प्राकड़ा री छांव माही आज तक जिया डोळिया पै गाळियां ही गाळियां मंडी सूगला सा नांव मांही माज तक जिया रोग ठावी लागज्या तो चाव सू मरां खुरचती सी पांव मांही आज तक जिया जीत तो सै पीढ़ियां रे नांव मांड दी हारता सा डाव मांही प्राज तक जिया। 114/सिरजए

आखर रौ उवाळ
अरजुन 'अरविन्द
घरती माथै पसोड़ो
हद काळो काळ ।
अंबर रो मुळकंती
रूप नी सुवावे,
भूख रा भाग लड़े
चन कियां भाव,
1
मौसम रा मूडा में
मणमाती गाळ
चारू मेर भून रा
बैवता
सरगाटा,
प्रीत यावळी रा
बोल घणा खाटा,
धुप्प अंधियारी
ऊंच है साळ ।
नेण रा डबडोळा
सुपा रा भूत,
वर्या रा बोलणा
बोले है पूत,
मासर रो उयाळ/115

रीत रौ समदर
कुरण वाधे पाळ?
पोथ्यां में सीख रा
उजाळा मुळकाव,
चांदी रा टूका पै
सब नाच, गाव,
रगत नै तताव कितणू
पाखर रौ उवाळ ?
116/सिरजरण

गजल
। रामेस्वरदयाल श्रीमाळी
किरण मद छकी रै मोह री मनवार है गज़ल ?
किए गोरड़ी रे रूप रो सिणगार है गजल ?
नट जावणो ने नेह नणा निरखती रैणो।
आ प्रापर जिसी ई गुनागार है
गजल ।
हिमळास इसो, हेत प्रौ, हामळ छिपी-छिपी ।
हंस-हँस हमेस मुकरणं री वार है गजल ।
औ रूप रौ रतन जतन घणो अंवेरियो ।
पल प्रेक फकत दरस री दातार है गजल ।
हिय में उमंग-रंग बिखरियो ज्यू होगळ ।
जो पाप प्रावो, तीज रो तवार है गजल ।
दीख्या कदै न थे कदै प्रदीठ नी रह्या ।
इण दीठ बार प्रापर उणियार है गजल ।
सुख री घड़ी सस्ती कठे
प्रापर सिर ताज दौस, मायली मस्ती कठे?
जको सपना नै सजा देव, इसी वस्ती कठे ?
राज रे पास सूकै दौलत सूदो मांगळ मिळे
पल पड़े जितरी. इती सुख री घड़ी सस्ती कठे ?
गजल/117

प्राज कर लो बेदखल म्हांन ने काल देख लो
म्हारी बेदखली कठ नै प्रापरी हस्ती कठे ?
टूट जावा म्हे भल, नामून नम काढ़ा नहीं
तन भल चीथीज जावे, हौसला-पस्ती कठ ?
प्रांगण जो प्रापर पाया, फकत इण कारण
प्रो सरीरी गस्त देव, प्रातमा गस्ती कठे?
118/सिरजण

किराया को मकान छ
वल्लम महाजन
प्रजी ई सरीर को कोई छ
किराया को मकान छ
आज न तो काल, खाली करणौ ई छ ईम कांई को गरब छ
काल ई मकान मालिक को कागद नायो छो
ऊंन हिचकी माळ मांडी छ
क् मकान जो थोक पास छ ऊंई खूब बरतजो
कोई बात की कसर मत करजो, कोई सूमत डरजो
॥पण ईन प्रापणो ई समझबा की गलती मत करजो
परायो जारण कोई पूछ तो कहता रीजो-
कि मजी कांई छ किराया को मकान छ
माज न तो काल खाली करपोई छ....
पौर मकान मालिक न मागे मांडी छ
अगर थान म्हारा मकान की
खूब सफाई संभाल राखी ती
प्रब की बार थाई न ऊपरलो उजासदार चौवारी दुंगो
पर थान मकान में गंदगी राखी तो
अबकी बार थाई नीचलो अंधेरी भंडार दूंगी।
किराया को मकान छ/119

ई वास्तै थां सूकहवं छ महाजन
कहता रही चौवीस कलाक भजन
पर ऊ सू सदा डरता रो, ऊंई सुमरता रो
पर कोई पूछ तो कहता रौ कि
प्रजी कांई छ किराया को मकान छ
पाज न तो काल खाली करणोई छ....
120/सिरजण

देसडलो म्हारी
अरजुन सिंघ सेखावत
मामी जाण
कबूतरी रंग
गोळ राठौड़ी सोगाळी
प्राटाळी पोतियो बांध्यौ
देस म्हारी
उदास उदास
हरू-फरू ऊभौ
ठौड़-ठोड़ सू
फाटी अंगरखी
बादळयां री
लीरालीर
सांवळा डील माथ
पटक रीही
लटक री ही
जाण
बानरवाळ लटकती है
देवरा
जिण रै मांयकर झांकै हो
काळजी मायड़-भोम रो
कठई-कठई
देसडली म्हारी/121

रंग-बिरंगी लाग्योड़ी कारियां
माळीपानां ज्यूलाग ही
मूरत-सी सूरत र
मायड़भोम ₹
उफणत हिवड़े री
उबळतं अंतस री
कळकळतं काळजरी पौड़ री
बाफ निसर ही
जिन नै थे कवता रवी
ऊमस है, गरमी है
पेट में प्रांटा देती
बात-बात में प्रांटा खाती
माटै रा घाटा सेतो
देसडली म्हारो।
122सिरजण

फकीरी
स्याम श्रीपत
प्रवल अलमस्ती रौ अवतार
सरस वेदां ध्रुतियां रौ सार
मातमा
रौ असली माणंद
अनोखी प्रणहद री झणकार
मिटावै स्वारथ
माया मोह
जगत
री चितावा दे झाड़
फकीरी पोपण ज्यू निरळेप
खड़ी भवसागर रै मझधार
प्रकारथ जिरा रे प्रागळ भरप
राजसी ठाठ भोग मद-पान
जगत ने समझ धूळ समान
फकीरी कवि कबीर री ज्यांन
--
-
फकीरी मुगती रो परसाद
रगां री रगताळ झपकार
पातमा रो भसीम सू मेळ
फकीरी 'मेड़तणों से प्यार
फकीरी/123

गरीबी घरती रो अभिसाप
फकीरी सुरपुर रो वरदान
गरीवी प्रांसूड़ा धार
फकीरी अंस-बंस रौ ग्यांन
फकीरी जोग अमीरी भोग
गरीबी रोग जगत री मार
(फकीरी महा प्रलय रे बीच
भवसागर करणी पार ।
नाव
124/सिरजण

।
फागणी दूहा ५
Oकुंदन सिंघ 'सजल'
कोयल बोले बाग में कामण बोल गेह ।
फागरिगयौ बरसा रह्यो घर घर आकर नेह ॥
जोबन गंधावण लग्यो, घर, प्रांगण, पथ, द्वार ।
छुवन मीत री देयगी, मन नै पंख हजार ॥
कठे उड र्यो रंग तो, कठ बाज ऱ्या चंग ।
पीठ ठोक यो सव जगां, सबकी खड़यो प्रनंग ॥
फागण किलक्यो गांव में, मुळक्या सब रा होठ ।
चाव कोनी में नयण,
अब धूघट री प्रोट ॥
खेता, बागां, घाटियां में प्रामां री छांव ।
फागण मायो मायगी याद मापरी गांव ॥
प्रमराई री गंध मे, भीज्या दिन पर रात ।
बिन थार मनयो रच, फागण किरण र साथ ।।
विधी दूब
री बाग में सेज और थे पास ।
मुसकिल है अब मन, नयन, मधरा पर विसवास ॥
फागणी दूहा/125

पंग
मावो प्रामगो, फागण प्रपरी द्वार।
गेल-गेा में संप रही पोळी बंदगवार ॥
सोरम पार प री, चिराग पारू मेर।
मंपरां ग्पू पारी गली, तर मग्या रिमोर ॥
पीठो तन, पीटी पुनर, पीला पीला गेन ।
रविता लिगमा नं 'मन', कर र्मा है सरेरा ।।

बात
D कमर मेवाड़ी
इण बगत ने बदळनी पड़सी
वैदिन लदम्या
जद लोग
हवाई घोड़ा मार्थ
सवारी गांठता हा
कद तलक
मिमियावता रचला लोग
बाळता रवला
प्रापण सरीर रो रगत
भर कद तलक
जोवता रैवेला मूण्डो
यां डकरल गंडका रो
मा बात सगळां ने
भेक दिन समझणी पड़सी
के मुट्ठी भर लोग
हगारां-लाखों लोगों ने
यात/127

का ताई मूरण मरणारसा रसा
दग यास्त
फगत जरूरी है
जबात न समझती
के यगरा ने रिण तर
परळ यो जाम सके।

विरासत
- करणीदान बारहठ
देस ने कांई दे र्या हो,
विरासत में, म्हारा माईत !
चोरी, डकैती, फरेब, झूठ
भ्रस्टाचार, पापाचार, चापलूसी, चमचागिरी?
म्हे ईगळेड़ी संस्कृती री
सोधन कठं तक कर लेस्यां म्हारा बीरा !
पतौ नी, ई सत्यानासी र ट रा बीज
कुण फॅकग्यो म्हारी धरती पर;
कित्ती ई करल्यो बार-बार फाड़ करयो पर
कस्सी ऊं खोदण पर
सुहागो लगाणं पर
भी बीज दिन दूणो बध यो है
पर म्हारली पावती फसल उगण ऊ रंगी।
विरासत/129

जिनगी रास कियां आवे
गलास मनहर
सुपनां में ई मौत ई दीस, जिनगी रास कियो पावै
छाती में तो राध भरी है, नीका सांस किया मा
भावी खांसी दम ई उपड़ी
भाठा फोड़ा पेट भरा
कोई धणी न घोरी म्हारो
कीकर जीवां कियां मरां
बिजळी घणी दूर म्हारे सू, घरां उजास किया पावै
सुपनां में ईमौत ई दोस जिनगी रास कियां प्राव
फाट्योड़ा गाभां मे धापू
जोबन ढकती मांय लुकी
रामूड़ी भूखो ई सोयो
मा-बापां री कमर भुको
टावरपरण
बूढ़ा होग्या व हिवळास कियां मावं
सुपना में ई मौत ई दीस जिनगी रास कियां पाये।
M
सिरजण/130

कुण माने
फतहलाल गूजर
बात सांची है
पण कुण मान
जांण'रई सब
प्राप-मापरी ताण
समझदारी रीसरटीफिकट
लटका'र फिर
कितरी ई दांग ! जीवतो ई मरूं
ऊपर मादर्स यो के मास्टर हो
बिना मतलब कोई नी गांठ
मफसर तो कोई
मंगूठा छाप पंच ई डांट
मांधा कानून भर वोळा अफसर
पांगली जनता पर गूगा नौकर
थांबांच्या कानीं बांच्यो ?
बरस विकलांग है
पोछपियोड़ी
अखबारांपांन पनि
दफतर में फायला फाटगी
रहा-सहा पानड़ा
उदायां घाटगी
बाबू बदळीज ग्या
कुण मान/131

सार री सससी दगी यसीसा रा पर यणग्या म्हारा गून-पसीना फमायोरा पाया गू यगा रा टावर भराग्या कोरट रा कानून नित नया सोन पेरा. तेरा गया सांपा रा झूठा, पर झूठा रा गांचा गुग्गर पं.सतो पर पाया पाया नतीजी निल मोरट मर गया रा परपारी तीन हजार तेरह से वित घोर यणाय साहकार ने पासान कीपोपण न्याती भर गोती जिल्द पढ़योड़ी पोपी जाण्या हा मापरणा 4 काटवा बैठा ज्ञानी तिलपटा शान घाटवा बैठा वणारा प्रेमसागर रा पाना फाटी ग्या वांचे तो काई पर नाचे तो कांई मागणी वांकी सांग नयो है राई रो भाव रात्यूई गयो है मन ने मारी बैठा हा यांने रा छाने बात सांची, पण कुण मान । n 132/शिरजए

{ वापड़ो
- मोड़ सिंघ बल्ला मगेन्द्र'
(मारी कोई मौकात
मापन केह सकू
के पाप माने
ठग रिया हो
नस नस लोही
|माकरण वरिपने
वणिक जी
पी र्या हो।
प्रापरी कलम
खाता पाना पनीने
माणी गरदन 4
छरी ज्यू चाल
मारी घरी-गिरस्थीरा
सगळा माथा
करज खाता रा मोळ यों में
फस्योंहा लटक्योड़ा है
मूबापही मासांमी
मां को पेट
माप सेठ
मूकोई कह सकू मापन
मूबापड़ो/133

देस रो करसी हूं
हुकम रौगुलाम
भराप्रो जठे हामी
करू-हां
कराम्रो तो करूं-ना
प्रापरी हो ना
मारी हो ना
आपरा भला में
मारी भली
वोट पड़े तो
होट पड़े तो
|पंचाती जाजम हो
के तैसीलदार, हाकम हो
मार तो मोटी पेट
प्राप सेठ
मूकाई केह सकू प्रापन ।
134/सिरजण

वादळी आज वरसती जा
पुखराज मुरगोत
बादळी प्राज बरसती जा
खेतां री माटी रो कण कण
थासू कर पुकार
बरस बादळी म्हांन कर दे
माटी सूरतनार
सोना रो संसार बणा
थू पाज सरसती जा
बादळी माज बरसती जा
गरज गरज नै अरे बावळी
क्यू छाती नै फार्ड
गरज वा नी बरस इणन
ऊभी करसौ ताई
गरज तरज ने छोड़ बादळी
प्राज मुळकती जा
वादळी माज बरसती जा
बादळी पाज बरसती जा/135

सूख्या सरवर रूस,
जानवर भूखा तिरखा पड़िया
लू-लपटां री झोर झपट मे
कितरा टावर गुड़िया
जीवण री थू जोत जळा दे
आज हुळसती जा
बादळी प्राज बरसती जा।
136/सिरजए

दो कवितावां केसव "पथिक" मौत दिन मांय भाठा फोडूं पर, रात मांय तारा गिणू, दिन री भूख रात मांय ई सतावै, पण- मा पापी मौत न तो रांत मांय प्रावै न दिन मांय प्राद। रिस्तो धरती मे धन तो घणो परण पाणी री तौड़ी है, जणी सूपठ गरीबी पर अमीरी री जुग-जुग सूं जोड़ी है। दो कवितावां/137

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माळी री हुंसीयारी
। गिरधारी सिंह राजावत
हरिया बाग में
गुणां री कंवळी कळियां
पर सोवणां पोषां सागे'ई
मौरा रा झाड़-झंखाड़ ई
प्रवस उगे।
मा तो
माळी री हुंसियारी है'क
झाड़-झंखाड
भर घास-फूस ने
बधा रोप्रोसर नी देर
पौधा नै
बड़ी जुगत सूपाळ-पोस'र
मोटा करै।
जी सू
बाग सौवणी'र
मन भावणी वरण ज्याव।
माळी री हुंसियारी/139

कारज
रमेस मयंक
मापां
सगळा साथीडा
प्रेक-दूजे रो
उणियारी देखर
गुलाब री भांति खिला
मनड़ा री बातां करां
बातां ई बातों में
रात बीत जासी
परभात ई पासी
माग्री
किरणी भजन ने गाल्यां
मापां लार-लार चाला
फेर
दिन ऊगसी
चालणी सूझसी
मारग ती घणी है
पण
हिम्मत कोनी हारणो है
ढबवा मे कोनी सार
चालण नै हुवो त्यार
माग्री
140/सिरजण

सूता मिनखां ने जगा ल्यां भापां लार-लारं चालां चरकल्यां ची-चीं करती उड़ जावं टाबर मदरसा रे मारग मार्थ निजर माव कारखाना में कम संभाळला करसाए सेत रूखाळला जठ-जठ चालाला नुवां मारग वर्णला मापरणी हिम्मत र पाण देस माग बघला प्रामी नुवां-नुवां सिरजण रा सपना सजाल्यां मापां-लार-लार चालां बीज अकारथ कोनी जासी मगत री फसला तिरंगा री मान बघासी इण रा जसन जुगां-जुगां तांई सगळा मिनख गासी पानी सुकारथ सू मिनखा जूण रो मोल चुकाल्यां पापां लार-लार चालां कारज/141.

हिवड़े रा गीत दीपचन्द सुथार तूटगी म्हार गीतां री कड़ियां जी नै म्ह/घणं हरख सू छीया-तावड़े र दास माथ पल पल र पागं सू पिरोई ही। ढब्बू ज्यू फूल रिया है हेत रांखणिया/पण म्हारी- पगां हेठे सू खिसक जमी रयी है। सुरण रियो हूं- च्यार दिनां री जिनगांणी है फर/क्यू अंडी बैवार करें ? फूलां मांय मैक भरी है मंदी माय सिणगार भरियो है कारण सगळा जाण मौको पड़/जद- दूजां ने समझाव खुद नी मपणावै। बिचार माव- क्यूपोरां मार्थ म्हैल चुरणावं? 142/सिरजण

गयूं विरया में धूक उछाः ।
कीकर बाता सूसमझाऊं
मोल समरी बतळाऊं।
मैरगत कदयी बिरया नी जावं
दिन दूणी-
सरस/मक
हांडी बण जावे
भूल्या-भटक्यां री
हिमत बंध जावं
हैं तो/हिवड़े रा गीत सुणाऊं।
थे जीवण रौ/सिणगार करो।
हिवड़े रा गीत/143

हेलो
Dसांवत राम 'फासरिणया'
मलां में रवरिणया वेली,
नीचं झांक रै
मखमलिया गिदरां री जीवण,
इण सूपाक रे।
तपं तावड़े, रात्यू न्हाट,
खोद दडांन, साळा पार्ट,
चुवं पसीनी, रेती घाट,
ढोरां जड़ी जीवण कार्ट,
राख कारण ₹
फाटा गाभा, गोडां ताणी,
नहीं मिळं पीवणने पाणी,
तूटी टपरी सिरकी ताणी,
रुठ्यो राम, राज नी जाणी,
दोरी पेट
थे लूटी ही रात्यूबांन,
पए में थाने मायत मान,
देवं अंगूठो खाली पनि,
तोई भरोसो कोनी थान,
लेवी सासरे
144/सिरजरा

बाळगीत
Oराम निरंजन 'ठिमा'
वीर मोम रे बाळकां नै मायड़ कर पुकार
तड़कर भारत रा बेटां पे हो सिरजणहार
म्हारी बहको राणाजी हो कदैन पीठ दिखाई
बांरो भमर्यो हर्षे घास री हंस-हंस रोटी लाई
बोली बारी कार
वीर भोम रे बाळकां नै मायड़ कर पुकार
वीर भोम री इज्जत खातर बळगी रजपूताण्या
छाती चौड़ी करने गावां बोर जसरी बाण्यो
ही वीर प्रसूता नार
वीर भोम रे बाळका ने मायड़ कर पुकार
भामासा हो मिनख ळखीणो धनड़ी सेना में बंटवायो
जलमभोम री सेवा करने पायो किताप रावामी
मा समरी सीखो रोसार
गर-भोम रे बाळका मै मायर कर पुकार
इके रे भारत रा पेटो ही शिरजगार
पालगीत/145

कागा
] जगदीस चन्द्र सरमा
कागा बोले कांव-कांव,
रोटी खावं गांव-गांव,
पाणी पीवै ठांव-ठांव।
उडता जावं झूम-झूम,
ऊंचाई नै चूम-चूम,
पाछा पावं घूम-घूम
लाडू जीमै चूर-चूर,
गणता जावै बूर-बूर,
देख सबने घूर-धूर।
1461सिरजण

मोती-मणिया ।
महावीर जोसी
--
-
वो ई सांचौ मानवी, वो ई सांची मर्द ।
पर पीड़ा ने बांटल, हँस न झेल दर्द ॥
सेंध लगावं रात में, दिन रा परादार
वै घर नै कुण सांमल, मुखिया बंटाधार ।।
हंसा नै बासी नहीं, कर कागला सौर ।
के होसी वै देस रो, वण्या रूखाळा चोर ।।
वोली वोले प्रोपरी, पैर विराणू भेस ।
कर्द न ऊंची हो सके, वा मिनखां रो देस ।।
करतब सूमोड़ कर, मांगे जो अधिकार ।
वां मिनखा र देस रो, कदै न व्है उद्धार ।।
चोळी धाऱ्या सूकदै, बण न कागा हंस ।
दूध परोसी नाग नै, पण मारगो दंस ।।
हाकिम हुवे न बावळी, चाकरनी हुसियार ।
जोबन कदं न सूगलो, जरठा रद सिणगार ॥
सांच कही झूठी कही, न्याव-नाड़ ने मोस ।
तुलसी बाबा के गयो, ठाडे को नी दोस ॥
मोती मणिया/147

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लेखकां रा ठिकाणा प्रमोलकचंद जांगिड़ अन्नाराम सुदामा ईस्वर सिंघ कुळहरि उदयवीर सरमा कमला घरमा : प्र.अ. रा. उ. प्रा. वि., बिसाऊ, झुंझनू अरजुन सिंघ सेखावत : प्र.अ., रा. उ. प्रा. वि., फालना, पाती अरजुन 'अरविंद : काली पल्टन रोड़, टोंक : मु. पो. उदयरामसर, बीकानेर इन्दर पाउवा : मु. पो. पाउवा, पाती : प्र.अ., रा. मा. वि., ढोढण, सीकर : प्र.अ., रा. मा. वि., गांगियारार, मुझनू : प्रयाग कुटीर, नई लाइन, गंगासहर, बीकानेर कल्याण सिंघ राजावत : 53, सिल्प कॉलोनी झोटवाड़ा, जयपुर कुंदन सिघ 'सजल' : अध्यापक, रा. मा. वि., रायपुर, पाटन, सीकर कमर मेवाड़ी : चांदपोळ, कांकरोली, उदयपुर : मु. पो. फेफाना, गंगानगर : स्वामी मौहल्लो, मनोहरपुर, जमपुर : कचहरी, कपासन, चित्तौड़गढ़ गिरधारी सिंघ राजावत : मु. पो. कोलिया, नागौर चन्द्रदान चारण : नवयुग ग्रन्थ कुटीर के पीछे, कोटगेट, बीकानेर जनकराज पारीक : प्रधानाध्यापक, ज्ञानज्योति उच्च माध्यमिक विद्यालय, श्री करनपुर, गंगानगर : प्र.अ., रा. मा. वि., पछमता, उदयपुर : रा. उ. प्रा. वि. न. 1, मेड़ता सिटी, नागौर : नगरपालिका के सामने, बीकानेर डॉ. नरसिंघ राजपुरोहित : मु. पो. सांडप, बाड़मेर करणीदान बारहठ कैलास मनहर केसव पथिक जगदीस चंद्र सरमा दीपचंद सुयार धनंजय वरमा मूलदान देपावत रघुनन्दन प्रियेदी पुखराज मुणोत : रा. मा. वि., तखतगढ़, पाली फतहलाल गूजर : जाटगली, कांकरोली, उदयपुर मगरचंद्र दवे : रा. मा. वि., हरजी, जालोर मोडसिघ वल्ला मगेन्द्र' : रा. मा. वि., थड़ा वाया धमोतर, चित्तौड़गढ़ मुरलीधर सरमा विमत' : प्रधा. रा. मा. वि., नरसिंहपुरा-माझ्वास, गंगानगर : सादुल उ. मा. वि., बीकानेर महावीर जोसी : रा. उ. प्रा. वि., मोही, मुझनू भगवतीलाल व्यास : लोकमान्य तिलक टी. टी. कॉलज, डबोक, उदयपुर भीखालाल व्यास : रा. उ. मा. वि., सिवाना, बाड़मेर भागीरथसिंघ भाग्य : मु. पो. बगड़, झुंझनू दिलीप सिंघ चौहाण : उ. मा. वि., साकरोदा-गिर्वा, उदयपुर रमेस मयंक : रा. मा. वि., बस्सी, चित्तौड़गढ़ : शारीरिक शिक्षा महाविद्यालय, जोधपुर रामनिवास सोनी : काळी जी का चौक, लाडणू, नागौर रामेस्वरदयाल श्रीमाली : प्र.अ., रा. मा. वि , जवाली, पाली रामनिरंजन सरमा "ठिमाऊ' : साबू मा. वि, पिलारणी, झुंझनू रूप सिंघ राठौड़ मो. पो. वास घासीराम, वाया |-अलसीसर, झुंझनू लक्ष्मण सिंघ रसवंत : अध्यापक, रा. उ. प्रा. वि., भैरूदा, नागौर : वाहेती चौक, बीकानेर बल्लभ महाजन : रा. शि. प्र. वि., नान्तामहल, कोटा स्यामधीपत प्र.अ., रा. उ. मा. वि., समदड़ी, बाड़मेर : अध्यापक, फतहसागर, जोधपुर सवाई सिंघ सेखावत : उ. मा. वि, उदयपुरवाटी, झुंझनू सिवराज छगाणी : सादुल पुस्करणा हायर सैकण्डरी स्कूल, बीकानेर : अध्यापक, रा. उ. मा. वि., चित्तौड़गढ सांवर दइया : जेल रोड़, बीकानेर सांवतराम कासणिया : अध्यापक, रा. उ. प्रा. विद्यालय नं. 1, मेड़ता सिटी, नागौर त्रिलोक गोयल : अग्रसेन नगर, अजमेर वासु प्राचार्य . स्यामसुन्दर भारती सिव मृदुल शिक्षक दिवस प्रकाशन [ सम्पूर्ण सूची] 1967 : 1. प्रस्तुति (कविता), 2, प्रस्थिति (कहानी), 3. परिक्षेप (विविधा), 4. सालिक ए गोहर (उर्दू), 5. दार को दावत (उर्दू) 1968 : 6. कैसे भूलू (संस्मरण), 7. सन्निवेश (विविधा), 8. बागवां (उर्दू) 1969 : 9 प्रस्तुति-2 (कविता), 10. बिम्ब-विम्ब चांदनी (गीत), 11. प्रस्थिति-2 (कहानी), 12. अमर चूनड़ी (राजस्थानी कहानी), 13. पदि गांधी शिक्षक होते (निबन्ध), 14. गांधी-दर्शन और शिक्षा 15. सन्निवेश- यो (विविधा) 1970 : 16. सूखा गांव (गीत), 17. खिड़को (कहानी). 18. कैसे भूलू-दो (संस्मरण), 19. सन्निवेश-तीन (विविधा) 1971 : 20. प्रस्तुति-3 (कविता), 21. प्रस्थिति-3 (कहानी), 22. सन्निवेश-4 (विविधा) 1972 : 23. प्रस्तुति-4 (कविता), 24. प्रस्थिति-4 (कहानी), 25. सन्निवेश-5 (विविधा), 26. माळा (राजस्थानी) 1673 : 27 धूप के पंखेरू (कविता), 28. खिलखिलाता गुलमोहर (कहानी), 29. रेजगारी का रोजगार (एकांकी), 30. मस्तित्व की खोज (विविधा), 31. जूनां बेली : नुवां वेली (राजस्थानी विविधा) 1974 : 32. रोशनी बांट दो (कविता) सं० रामदेव प्राचार्य, 33. अपने प्रास-पास (कहानी), सं० मणि मधुकर, 34, रग रग बहुरङ्ग (एकांकी) मं० डॉ. गजानन्द. 35. प्रांधी पर प्रास्था व भगवान महावीर (दो राजस्थानी उपन्यास) सं. यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र' 36. पारराड़ी (राज, विविधा) सं. वेद व्यास 1975 : 37. अपने से बाहर अपने में (कविता) सं. मंगल सक्सेना, 38. एक पोर अन्तरिक्ष (कहानी) सं. डॉ. नवलकिशोर 39. संभाळ (राजस्थानी कहानी) सं. विजयदान देथा, 40. स्वर्ग-भ्रष्ट (उपन्यास) ले. भगवती प्रसाद व्यास, सं. डॉ. रामदरश मिश्र, 41. विविधा सं. डॉ. राजेन्द्र शर्मा 1976 : 42. इस बार (कविता) सं . नन्द चतुर्वेदी, 43. संकल्प स्वरों के (कविता) सं. हरीश भादानी, 44. बरगद की छाया (कहानी) से. डॉ. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय 45. चेहरों के बीच (कहानी व नाटक) सं. योगेन्द्र किसलय, 46. माध्यम (विविधा) सं. विश्वनाथ सचदेव 1977 : 47. सृजन के प्रायाम (निबन्ध) सं. डॉ. देवी प्रसाद गुप्त, 48. क्यों (कहानी व लघु उपन्यास) म. श्रवण कुमार, 49. चेते रा नितराम (राजस्थानी विविधा) सं. डॉ. नारायण सिंह भाटी 50. समय के संदर्भ (कविता) सं. जुगमन्दिर तायल, 51. रङ्ग वितान (नाटक) सं. सुधा राजहंस । 1978 : 52. अंधेरे के नाम सन्धि पत्र नहीं (कहानी संकलन) सं. हिमांशु जोशी, 53. लखाण (राजस्थानी विविधा) सं. रावत सारस्वत, 54. रचेगा संगीत (कविता संकलन) सं. नन्दकिशोर प्राचार्य, 55: शो गांव (उपन्यास) ले. मुकारव खान भाजाद, सं. डॉ. आदर्श सक्सेना, 56. अभिव्यक्ति को तलाश (निबन्ध) सं. डॉ. रामगोपाल गोयल 1979 : 57. एक कदम प्रागे (कहानी संकलन) सं. ममता कालिया, 58. लगभग जीयन (कविता संकलन) म. लीलाधर जगूड़ी, 59. जीयन यात्रा का कोलाज/नं. ? (हिन्दी विविधा) सं. डॉ. जगदीश जोशी, 60. कोरणी कलम री (राजस्थानी विविधा) मं. अन्नाराम सुदामा, 61. यह किताय यच्चों की (बाल साहित्य) सं. डॉ. हरिकृष्ण देवसरे 1980 : 62. पानी की लकीर (कविता संकलन) सं. ममृता प्रीतम, 63. प्रयास (कहानी संकलन) स. शिवानी, 64. मंजूषा (हिन्दी विविधा) सं. डॉ. राकेश जैन, 65.तस रामासर (राजस्थानी विविधा) सं. डॉ. सिंह राजपुरोहित, 66. सिसते रहें गुताय (बाल साहित्य) सं. जयप्रकाश भारती 1981 : 67. अपने से परे (कहानी मंकलन) सं. मन्नू भंडारी, 68 मधेरों का हिसाय (कयिता गंकलन) सं. सर्वेश्वर दयाल सक्मेना, 69. यन्देमातरम् (हिन्दी विविधा) मं. डॉ. विवेकी राय, 70. एक दुनिया यानों को (धास माहित्य) म. पुष्पा भारती, 71. सिरमण (राजस्थानी विश्यिा) में. सेट सिप जौपा।

शिक्षक दिवस प्रकाशन 1981 समीक्षकों की नजर में राजस्थान शिक्षा विभाग द्वारा शिक्षक दिवस प्रकाशन योजना के अन्तर्गत राज्य के सृजनशील शिक्षक साहित्यकारों की चार कृतियां 1980 वर्ष की सार्थक उपलब्धियां है । नवभारत टाइम्स संग्रह में सभी कविताएं. कविता की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, यद्यपि कुछ कविताओं को पढकर कविता जैसा कुछ नहीं लगता किन्तु कलात्मक प्रयास को नकारा भी नहीं जा सकता। -नवभारत टाइम्स 'प्रयास' कहानी लेखकों का उत्तम प्रयास है तथा शिवानी का सम्पादन वक्तव्य नव लेखकों को गुरु-प्रेरणा का प्रयास है। ---नवभारत टाइम्स 'मंजूपा' में संकलित अधिकांश रचनाएं एक अोर शिक्षकों की जीवन- पीड़ा तथा घुटन प्रस्तुत करती है तो दूसरी पोर सामाजिक मूल्यों में उनकी निष्ठा और शिक्षाथियो के गिरते स्तर के प्रति चिन्ता तथा जागरूक उत्तर- दायित्व उभारती है। नवभारत टाइम्स सकलन में एक तरफ तो ऐमी रचनाए हैं जिनसे बच्चो को चरित्र निर्माण की प्रेरणा मिलेगी तो दूसरी तरफ ऐसी रचनाएं भी है जिनसे उनका स्वस्थ मनोरंजन भी होगा। -~-समाज कल्याण, दिल्ली रचनामो की विषय वस्तु परपरागत होते हुए भी बालको के मानसिक विकास में सहायक हो सकती है। सभी रचनाओं में विशेषकर कहानियो मे अनुभव की उप्णता विद्यमान है । संकलन निश्चय ही नन्हे-मुन्ने पाठकों के लिए उपयोगी है। -समाज कल्याण, दिल्ली संग्रह की अधिकतर कविताएं जिन्दगी के फोटो हैं। इनमे किसी प्रकार के छद्म प्रादर्श की प्रस्तावना नहीं है । -समाज कल्याण, दिल्ली 153 इस सग्रह की अधिकांश कविताएं एक ऐसे मादमी की छटपटाहट को व्यक्त करने का प्रयास है जो निरन्तर अपरिचित एवं अमानवीय होते जा रहे परिवेश से पूर्णतया संपृक्त है । इस संपृक्ति के कारण ही राजस्थान के ये सृजनशील अध्यापक भपने मासपास के परिचित सन्दर्भ को सर्जनात्मक मायाम प्रदान कर पाये हैं। -समाज कल्याण, दिल्ली जिस तरह संग्रह की रचनात्रों की संवेदना जिन्दगी से निष्पन्न है, उसी तरह इनकी संरचना भी। कविताओं की संरचना में कोई जटिलता नहीं है। लगभग सभी कवितामों में एक अनगढ़ता मौजूद है। यह मनगढ़ता ही इन कविताओं को विशिष्ट बनाती है । -समाज कल्याण, दिल्ली राजस्थान के शिक्षा विभाग ने विगत कुछ वर्षों से शिक्षक दिवस पर राज्य के शिक्षक साहित्यकारों की रचनाएं पुस्तक रूप में छापने की एक स्वस्थ परम्परा प्रारम्भ को है । इस योजना से अनेक सृजनशील साहित्यकारों को साहित्यक क्षेत्र में अपना स्थान बनाने के लिए भी प्रेरणा तथा प्रोत्साहन मिला है। ~दैनिक हिन्दुस्तान 'पानी की लकीर' कुल मिला कर एक अच्छा संकलन है और उसमें सम्मिलित कवियों की क्षमता का परिचायक है। --दैनिक हिन्दुस्तान 'अंतस रा पाखर' में प्रारम्भ से अन्त तक राजस्थानी को ही छटा मिलती है। -दैनिक हिन्दुस्तान आज भी समाज मे अध्यापक से ही प्रादर्श जीवन की अपेक्षा की जाती है, अतः इन कहानियों में से अधिकांश का स्वर मादर्श पौर सुधारवादी रहा है तो इसे अस्वाभाविक नहीं माना जा सकता। -प्रकर, दिस.,80 जयप्रकाश भारती ने अध्यापकों की इस अनमोल भेंट को सम्पादित कर बच्चों के सामने प्रस्तुत किया है, सम्पादक का कहना है कि जब-जब बच्चे इसे पढ़ेगे मनोरंजन होने के साथ उनको कहीं कोई रोशनी की लकीर भी दिखाई देगी। -दैनिक हिन्दुस्तान सरकारी महकमों ने इतना निराश किया है कि जब हम राजस्थान के शिक्षा विभाग के प्रकाशनो पर नजर डालते हैं तो एक बारगी आश्चर्य में ही डूब जाते है। -दैनिक राजस्थान पत्रिका संकलन की अधिकांश कविताएँ जैसा कि कहा-जीवन की विसंगतियों, दैनिक जीवन की आपाधापी और उधेड़बुनो को व्यक्त करती हैं । इनमें ज्यादातर प्रलाप लगती हैं, कविता कम । -इतवारी पत्रिका 154

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तेजसिंघ जोधा ७ जुलाई १९५० को नागौर दिन में रणा- सोसर गांव में उन्म। समकालीन राजन्यानो कचिद्रा के महत्वपूर्ण कवि। मन् ७१ में 'राजस्थानी का सम्पादन, जो गजन्यानो कविता की मन धारा में परिवतन का कारण बनी। हिन्दी की सन्ध प्रनिष्ठ माहित्यिक पत्रिकाओं यया मालोचना' और 'सहर' प्रारिमें इनकी राजस्थानी कविताओं का प्रकागन और चर्चा। 'परम्परा शोध पत्रिका के फायपर्व काप- पालोचना विगेशक हेमांगी' का सम्पादन। 'दीट एवं आमतीनौत में सम्पादक भी। वर्तमान में 'मारसको मामिय का संपादन, जो प्रमार मंन्या की दृष्टि से राजापानी की पहली बड़ी पत्रिका है। रोजगार के गिनगिल में प्राथमिड मिणामय के अध्यापन, फौजको नौकरी और राजम्यान पनिका और निकाल दीर' सम्पादकीय विभागों में भटक लेने के बाद पिने छ से मोहता महाविद्यालय गाहपुर (यूल) में हिन्दी प्रवाशा

Sirjan

Author
Tej Singh Jodha
Title
Sirjan
File name
Sirjan
Text
OCR done
Citation
1980
Published
2011/03
Publisher
Chinmay Prakashan Jaipur
Language
Sanskrit
Pages
176
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551354
Barcode
4990010032103.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
jIQEXGPaD9B
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