Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Niruktam Vol-ii
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। निरुक्तम् श्रीगणेशाय नमः॥ तचं किमप्यखिलभेदमुपेतमेकं, ध्यात्वा करोमि विवृति विशदा निरुक्तं । काण्डेन दैवत इमां सुतरां निरीक्ष्य ज्ञानाय, सा भवतु मन्दजनस्य शीघ्रम् ।। अथ निरुक्तोत्तरपटकप्रारम्भ ।। तत्र सप्तमाध्यायस्य प्रथमः खण्ड ॥ तृतीय देवत काण्डम् ॥ । उपोद्घात । अथातो दैवतम् । अथ = ऐकपदिक के अनन्तर, अत - नघण्टुक तथा नेगम नामक , कापडद्वय के अनन्तर दैवतम् = देवत नामक तृतीय काण्ड का आरम्भ होता है । अर्थात मूलग्रन्य निषण्टु है । उसके तीन काण्द हैं। नघण्टुक, नैगम और दैवत । नैगम को ऐकपदिक भी कहते हैं। उसके भाप्य का नाम निरुक्त है। दो काण्ड का भाष्य समाप्त हुआ। अव तृतीयकण्ड के भाष्य का प्रारम्भ होता है। देवत का लक्षण-- तधानि नामानि प्राधान्यस्तुतीनां देवतानां तदेवतमित्याचक्षते । प्राधान्यस्तुतीनाम् प्रधानता से स्तुति वाले, 'देवतानाम् = अग्नि से लेकर देवपत्नी पर्यत देवताओ के, यानि नामानि = जो नाम तत् - वह, दैवतम् - देवत कार्ड है, इति = यह भाचार्य लोग, आचक्षते - कहते हैं । अर्थात जिन नामो मे प्रधानरूप से देवताओं का निरूपण है उनका समूह देवत कहलाता है। इस प्रकरण मे यह निरूढा सज्ञा समझनी चाहिये । सैपा देवतोपपरीक्षा। सा = जो प्रथमाध्याय के अन्त म महा था कि, तद् उपरिष्टाद् ध्याख्यास्याम उसो आगे व्याख्यान करेंगे, एषा = वहो यह, देवता उपपरीक्षा = देवता पदार्थ की विचार पूवर परीक्षा का प्रारम्भ होता है । अर्थाद इस वाण्ड मे देवताओं का वर्णन होगी। प्रकरण प्रतिपाद्य मन्त्रदेवतालक्षण- यत्काम ऋषिर्यस्या देवतायामार्थपत्यमिच्छन् स्तुतिं प्रयुङ्क्ते तद्दवतः स मिन्त्रो भवति जिस अर्ष की कामना वाला ऋपि, यस्याम् देवतापाम् = जिस देवता म, भापत्यम् = अपने स्वामित्व को, इन्छन् = इच्छा करता हुआं, स्तुतिम् प्रपंहत . स्तुति का प्रयोग 2 - । है यत्काम अपि - . ओर, (१२०४) निरुक्त सप्तमाध्यायस्य दितीयः खण्डः । करता है, तद्देवतः = उस देवता वाला, सः मन्त्रः = वह मन्त्र, भवति = होता है। अर्थात् किसी मन्त्र में कोई कामना ले कर कोई ऋपि जिस देवता का प्रधान अर्थ चाहता हुआ स्तुति करता है उसी देवता का यह मन्त्र होता है। जिस किसी मन्त्र में देवता जानना हो उस मन्त्र में इसी लक्ष्ण से देवता जानना चाहिये। देवता की स्तुति स्थानभूत ऋचाके भेद- तास्त्रिविधा ऋचः। जिनमें कहा हुआ देवता का लक्षण अछी तरह घट जाता है, ताः ऋचः - वे ऋचाएँ, त्रिविधा : तीन प्रकार की होती हैं। जैसे- परोक्षकृताः प्रत्यक्षकृता: आध्यात्मिक्यश्च । इति निरुक्त सप्तमाध्यायस्य प्रथमः खण्डः ।। ७-१ ॥ परोक्षकृताः, = परोक्षकृत कही गई, प्रत्यक्षकृताः = प्रत्यक्षकृत कही गई, च = आध्यात्मिक्यः = आध्यात्मिकी कही गई। जो परोक्ष रूपसे किसी अर्थका प्रकाश करती हैं वे परोक्ष कृत, जो प्रत्यक्षरूप से किसी अर्थका प्रकाश करती हैं वे प्रत्यक्षकृत और जो जीवात्मा या परमात्मा रूप अर्थ का प्रकाश करती हैं वे ऋचायें आध्यात्मिकी कहीं जाती हैं। परोक्षकृता ऋचा का लक्षण- तत्र परोक्षकवाः सर्वाभिर्नामविभक्तिभिर्युज्यन्ते प्रथमपुरुपैश्वारख्यातस्य । तत्र = उन तीनों में, परोक्षकृताः - परोक्षकृत ऋचाएं वे हैं, जिन में देवतापद, सर्वाभिः नाम विभक्तिभिः = प्रथमा से सप्तमी तक सब नाम विभक्तियोसे, च = और, आख्यातस्य प्रथमपुरुषः आख्यात अर्थात् तिडन्त के प्रथम पुरुषों से, युज्यन्ते = युक्त हैं। यास्क सातों विभक्तियों में क्रमशः उदाहरण देते हैं । उन में प्रथमा में जैसे- अथ निरुक्त सप्तमाध्यायस्य द्वितीयः खण्डः ।। " इन्द्रो दिव इन्द्र ईशे पृथिव्या" इन्द्रः - इन्द्र, दिवः = द्यु लोक का, ईशे - शासन करता है, इन्द्रः = इन्द्र, पृथिव्याः पृथिवी लोक का, ईशे = शासन करता है । सम्पूर्ण मन्त्र- इन्द्रो' दिव इन्द्र ईशे पृथिव्या इन्द्रो अपामिन्द्र इत्पर्वतानाम् । इन्द्रो वृधामिन्द्र इन्मेघिराणामिन्द्रः क्षेमे योगे हव्य इन्द्रः ॥
D निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य द्वितीयः खण्ड। (१९०५) इस मन्त्र का विश्वामित्र का पुत्र रेणु ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और इन्द्र देवता है । मन्त्रार्थ- इन्द्रः = इन्द्र, दिवः = द्युलोक का, ईशे = शासन करता है । इन्द्रः = इन्द्र, पृथिव्याः = पृथिवी लोक का, ईशे - शासन करता है। इन्द्रः = इन्द्र, अपाम् = जलों का, ईशे = शासन करता है । इन्द्रः = इन्द्र, पर्वतानाम् मेघों का भी, ईशे = शासन करता है । इन्द्रः = इन्द्र, वृधाम् = वृद्धों का भी, ईशे = शामन करता है । इन्द्रः - इन्द्र, मेधिराणाम् = मेघावि विद्वानों का भी, ईशे = शासन करता है । इन्द्रः = इन्द्र, क्षेमे = प्राप्त धन के परिपालन मे और, योगे = अप्राप्त धन के लाभ मे, हव्यः = आह्वान करनेवाला है । यह उदाहरण ऋचा परोक्षकृत है क्योकि प्रथमा विभक्ति तथा प्रथम पुरुप आख्यात से युक्त है । 'इन्द्र' यह प्रथमा विभक्ति और 'ईशे' यह प्रथमपुरष का एकवचन आख्यात से युक्त है । ' ईप्टे' होना था किन्तु छान्दमत्वात् तकार का लोप हुआ है । इसी से परोक्षकृत है। द्वितीया में जैसे- "इन्द्रमिाथिनो' बृहत् " गाथिनः = साम के गान करनेवालो ने, इन्द्रम् इत् = इन्द्रा की हो, बृहद - बृहत साम से स्तुति की है । सम्पूर्ण मन्त्र- इन्द्रमिदाथिनो वृहदिन्द्रमभिरणिः । इन्द्रं पाणीरनुपत ॥ ऋ. सं. १-१-१३-१ ॥ इस मन्त्र का मधुच्छन्दा ऋषि, गायत्री छन्द और इन्द्र देवता है । मन्त्रापं-गापिनः - साम के गान करने वाले उदाताओं ने, वृहत् बृहत्साम से, इन्द्रम् इत् = इन्द्र की हो, अनूपत = स्तुति को है। अकिणः अचन हेतु ऋग्वेदमन्त्र युक्त होताओं ने, अमिः ऋग्वेद के मन्त्रों से, इन्द्रम् इद - इन्द्र की ही, अनूषत स्तुति की है। अवशिष्ट अध्वर्यगण ने, वाणी: - यजुर्वेद के मात्रो से, इन्दम् इत् - इन्द्र की हो, मनषुत = स्तुति को है। यह अचापरोक्षकृत है क्योंकि 'इन्द्रम् द्वितीया विभक्ति और 'अनूषत' प्रथम पुरुष बहुवचम आख्यात से युक्त है। 'प्रस्तुतौ नरव, लुइ. व्यरयप से मारमनेपद, और न को मद् आदेश । तृतीया में जैसे- 'इन्द्रेणते वृत्सवो वेविषाणार" जो पहले उच्च गति पाले, वेविषाणाः - युद्ध के लिये मंगत हुए बसुर थे, एते - ये सब, इन्द्रेण = इन्द्र के द्वारा, वृस्सपः - विदीर्ण होते हुए। सम्पूर्ण मन्त्र- इन्द्रेणेते तत्संबो वेविपाणा आपो न सृष्टा अंधवन्त नीची': । दुर्मित्रासः प्रकळविन्मिमाना जहुर्विश्वानि भोजना सुदासे' ।। इ. गं. ५-२-११-१५ ।। - D .
- D -- (१२०६) निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य द्वितीयः खण्डः । इस मन्त्र का वसिष्ठ ऋपि, - त्रिष्टुप् छन्द और इन्द्र, देवता है। मन्त्रार्थ-जो पहले उच्च गति वाले, वेविषाणाः = युद्ध के लिये सगत हुए असुर थे, एते = वे सब, इन्द्रेण = इन्द्र के द्वारा, तृत्सव. = विदीर्ण होते हुए, दुमित्रासः = दुष्ट मित्र, प्रकलवित = वणिक के समान तथा, आपः न = जल के समान, सृष्टाः = विलीन तथा, मिमाना. = वाध्यमान होते हुए, नीची: नीचे की ओर, अघपन्त - भाग गये । तब इन्द्र ने, विश्वानिभोजना, = सारी योग्य वस्तुएँ, सुदासे = सुदास नामक राजा को, जहुः - दे दी थी। परोक्ष कृत मन्त्र इस मे 'इन्द्रेण' यह तृतीया विभक्ति है और 'जहुः' यह प्रथम पुरुप बहुवचन है । चतुर्थी मे जैसे- " इन्द्राय साम गायत हे उद्गाताओ!, इन्द्राय - इन्द्र के लिये, साम - साम करे, गायत = गाओ। सम्पूर्ण मन्त्र- इन्द्राय साम' गायत विप्राय वृहते बृहत् । धर्मकृते विपश्चित पनस्यवे' ॥ ऋ स. ६-७-१-१ ॥ - इस मन्त्र का नृमेधा कपि, उष्णिक छन्द्र और. इन्द्र देवता है,। मन्त्रार्थ-हे उदातोओ ! आप लोग, विप्राय = मेघावी, वृहते - विशाल, धर्मकृते = शुभ कर्म कर्ता, 'विपश्चिते = विद्वान् और, पनस्यवे, - स्तोत्राभिलापी, इन्द्राय = इन्द्र के लिये, वृहत् साम = वृहत्साम नामक स्तोत्र का, गायत = गान करो। इस मे ' इन्द्राय' चतुर्थी विभक्ति और ‘गायत' यह प्रथम पुरप आख्यात है। पश्चमी मे जैसे- "नेन्द्रादृते पवते धाम किञ्चन " इन्द्राव ते''सोम इन्द्र को छोडकर, किश्चन धाम = किसी दूसरे देवता को, न पढ़ते नही जाता है । सम्पूर्ण मन्त्र- सूर्यस्येव रश्मयो प्रावयित्नवों मत्सरास:: प्रसुपः साकारते । तन्तुं ततं परि सीस आशवो नेन्द्राहते पवते धाम किञ्चन !! प्रा. सं. ७-२-२२-६ ॥ इस मन्त्र का अङ्गिरा के पुत्र हिरण्यस्तूप ऋपि, जगतो छ द और पवमान सोम देवता है। मार्य-सूर्यम्य = मूर्य या, मर्य' इव' मियों के समान, दायित्नवः = सर्वत्र बहने वाले, मत्सरास. मदार, प्रमुप = शत्रुघातक, मान: = ग्रह नामक पात्र और चमसो में व्याप्त, है निरुक्त सप्तमाध्यायस्य द्वितीयः खण्डः । (१२९७) सर्गास बनाये जाने वाले सोम, तन्तुम् = सूत्र से बने, ततम् = विस्तृत वस्रो के, साकम् = साथ, परि ईरते = चारो ओर जाते हैं । वे सोम, इन्द्रात् ऋते = इन्द्र को छोडकर किञ्चन धाम = अन्य किसी देवता को लक्ष्य करके, न पवने = नही जाते हैं, किन्तु केवल इन्द्रधाम के प्रति ही जाते हैं। इस मे इन्द्रात् पञ्चमी विभक्ति और 'पवते' यह प्रथम पुरुष आख्यात हे । पष्ठी मे जैसे-- " इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्रबोचम्" ". इन्द्रस्य नु = इन्द्र के, वीर्याणि = पराक्रम को; प्रवोचम् = कहता हू । सम्पूर्ण मन्त्र- इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्र वोचं यानि' चकारं प्रथमानि वजी। अहन्नहिमन्वपस्ततर्द प्र वक्षणा आभिनत्यवतानाम् ॥ ऋ स १-२-३६-१ ।। इस मन्त्र का आङ्गिरस हिरण्यस्तूप ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और इन्द्र देवता है।। मन्त्रार्थ-वनी वचधारी इन्द्र ने, प्रथमानि = पहले, यानि = जो, वीर्याणि = पराक्रम का कार्य, चकार = किया पा इन्द्रस्य = इन्द्र,के, तस्य = उसी, वीर्याणि = कार्य का हम, नु - शीघ्र वर्णन करते हैं। इन्द्राने, अहिम् = मेघ का, अहन वध किया था, अनु = उसके पाश्चात् उन्हो ने, अपः ततर्द जल वृष्टि की थी. और फिर उन्हो ने, पर्वतानाम् = पर्वतो की, वक्षणा; = नदियों का मार्ग, अभिनव - भिन्न किया था। इस मे 'इन्द्रस्य' यह षष्ठी और अभिनन्, यह.प्रथम, पुरुष आख्यात है ।। सप्तमी मे जैसे- इन्द्रे-कामा, अयंसत" इति। कामाः ,ऐहिक पारलौकिक, सभी कामयमान पदार्थ, इन्द्र, इद्र में, अयसत = उपनिबद्ध हैं। सभी काम इन्द्र के आश्रित हैं। यह मान कहा का है पता नहीं। दुर्गाचायने सम्पूर्ण, मन्त्र इस प्रकार दिया है- इन्द्रे कामा भयंसत दिव्यास: पार्धिता उतात्यमूपु गृणता नरः ।। इस. मन्त्र का ऋपि अन्वेषणीय है। गायत्री छन्द और इन्द्र-देवता है!! मन्त्रार्य- हे सतोतामो! दिव्यास. = पारलौकिक दिव्य पदार्थ, उत - मोर, पार्थिवाः = ऐहलौकिक अदिव्य पापिय पदार्प, इन्द्रे, इन्द्र मे, अयसत सम्बद्ध हैं, अत, मरहे मनुष्यो तुम लोग, स्यम् उसी मी, सुप्रणत = भली प्रकार स्तुति करो। इस मे, 'इन्द्रे' यह सफामी और 'गृणता प्रथमपुरुप आल्याद है । मत परोक्षकृत है। " " - और, त्वम् %3D (१२००) निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य द्वितीयः खण्डः । इस प्रकार परोक्षकृत मन्त्र का लक्षण कह कर अब प्रतिज्ञानुसार प्रत्यक्षकृत मन्त्र का लक्षण कहते है- अथ प्रत्यक्षकृता मध्यमपुरुपयोगास्त्वमिति चैतेन सर्वनाम्ना । अथ = उस के पश्चात् कहीं कही, मध्यमपुरुषयोगाः मध्यमपुरुप से युक्त, च = इति एतेन सर्वनाम्ना युक्ताः त्वम् इस सर्वनाम से युक्त जो मन्त्र हैं वे, प्रत्यक्षकृताः = प्रत्यक्षकृत कहे जाते हैं। प्रत्यक्षकृत मन्त्र का प्रथम उदाहरण-- त्वमिन्द्र बलादधि" इन्द्र = हे इन्द्र!, स्वम् तुम. बलात् = बल से, अधि = अधिजात हो। सम्पूर्ण मन्त्र- त्वमिन्द्र वलादधि सहसो जात ओजसः । वं वृषन्वृषेदसि ॥ क सं. ८-४-११-२ ॥ इस मन्त्र का इन्द्र-माता ऋपि, गायत्री छन्द और इन्द्र देवता है। मन्त्रार्थ---इन्द्र = हे इन्द्र !, त्वम् = तुमने, सहसः बलात् = बल वीर्य और तेज से, अघि जातः = जन्म ग्रहण किया है। वृत्रादि-- वध करने से तुम बल तथा तेज से प्रस्यात हो और तुम, ओजस: - धैर्य से उत्पन्न हुए हो । वृषन् - हे अभिलाप की वृष्टि करने वाले इन्द्र !, त्वम् = तुम, वृषा इद असि = कामनाओं की वृष्टि करने वाले हो। इस मन्त्र मे 'त्वम् ' यह पद और 'अधिनायसे' यह मध्यमपुरुप को क्रिया दोनों का देवता के लिये योग हैं । अतः यह मन्त्र प्रत्यक्षकृत है । प्रत्यक्षकृत मन्त्र का द्वितीय उदाहरण- "विने मृधो जहि" , इन्द्र - हे इन्द्र !, नः मृधः = हमारे साथ युद्ध करने वाले शत्रुओं का, यि जहि = वध करो। सम्पूर्ण मन्त्र- वि ने इन्द्र मृधो जहि नीचा यच्छ पृतन्यतः । यो अस्याँ अभिदासत्यधरं गमया तमः ॥ ऋ सं. ८-८-१०-४ ।। इस मन्त्र का भरद्वाज-पुत्र शास ऋपि, अनुष्टुप् छन्द और इन्द्र देवता है। मन्त्रापं- इन्द्र = है इन्द्र, नः मृधः = हमारे साथ युद्ध करनेवाले शत्रुओं का, वि जहि = वध करो। पृतन्यता = सेना मे युद्धार्थी विपक्षियों को, नीचा यच्छ = नीचा दिखाओ मर्याद होनबल करो ।
निरुक्त सप्तमाध्यायस्य द्वितीयः खण्डः । (१२०९) . r " . ३ यः = जो- अस्मान् = हमें, अभिदासति = दु.ख देता है उसको, अधरम् तमः = निकृष्ट अन्धकार में, गमय = डाल दो। इस मन्त्र में 'जहि' इस मध्यमपुरुप का 'अध्याहृत' 'त्वम्' पद के साम योग है । अतः यह मन्त्र प्रत्यक्षकृत है । 'गमया' में छान्दसत्वात् दीर्घ हुआ है । स्तोता के प्रत्यक्षकृत या परोक्षकृत होने से मन्त्र प्रत्यक्षकृत या परोक्षकृत नही होता, किन्तु मन्त्र के प्रत्यक्षकृत या परोक्षकृत होने से होता है । इस वात के स्पष्टीकरण के लिये कहते हैं- अथापि प्रत्यक्षकृताः स्तोतारो भवन्ति परोक्षकृतानि स्तोतव्यानि । अथ अपि = और भी कुछ विशेष ज्ञातव्य है कि, कही कही, स्तोतारः = स्तुति करनेवाले स्तोतृगण, प्रत्यक्षकृताः = त्वम् आदि पद से कहे जाने के कारण प्रत्यक्ष कृत अर्थात् प्रत्यक्ष, भवन्ति । होते हैं और, स्तोतव्यानि = स्तोतव्य वस्तुएँ (देवता), परोक्षकृतानि = परोक्षकृत । जैसे- ' " मा चिदन्यद्वि शेसत" " का अभि प्र गायत" "उप प्रेत कुशिकाश्चतयच्चम् हे स्तोतायो ! आप लोग, अन्यत् चित् = दूसरे किसी देवता की मा विशंसत = स्तुति न करें। कण्वा: - हे कण्ववंश वाले आप लोग, अभिप्रगायत = देवों की स्तुति करो। कुशिकाः = हे कुशिको! आप लोग, उप प्र इत - गच्छत = जानिये और, चेतयध्यम् = चेतिये । यहां प्रथम मन्त्र मे 'यूयम् विशंसत' इन पदों से स्तोता प्रत्यक्ष और देवता बोधक पद न होने से स्तोतव्य देवता परोक्ष है। द्वितीय मन्त्र में भी 'कण्वा' और 'अभिप्रगायत' इन पदों से स्तोता प्रत्यक्ष और देवता धोधक पद न होने से स्तोतय्य देवता परोक्ष है और तृतीय मन्त्र में 'कुशिकाः' 'उप प्र इत' और 'चेतयध्वम्' इन पदों के प्रयोग से स्तोता प्रत्यक्ष और देवता वोधक पद के प्रयोग न होने से स्तोतव्य देवता परोक्ष है। पहला सम्पूर्ण मन्त्र- मा चिदन्यद्वि शंसत सखायो मा रिपन्यत । इन्द्रमित्स्तोता वृषणं सा सुते मुहुरुक्था च शंसत ॥ क. सं. ५-७-१०-१५ इस मन्त्र का प्रगाथ ऋषि, वृहती छन्द और इन्द्र देवता है। मन्त्रार्थ-सखायः = हे सखा स्तोताओ!, अन्यत् मा चिद विरासत = इन्द्र के सिवाय दूसरे की स्तुति नहीं करना, मा रिषण्वत हिसित न होना, सुते = सोमाभिपव होने पर, सचा - एकत्र हो कर, वृषणम् अभीष्टयपी, इन्द्रम् इद - इन्द्र की ही, स्तोत = स्तुति करो, च = शल का, शंसत = उच्चारण करना । दूसरा सम्पूर्ण मन्त्र- क्रीळं वः शङ्ख मारुतमनर्वाणं रथेशुभम् । कण्वा अभि प्र गावत ॥ ऋ सं. १-३-१२-१ ।। मोर, मुहुः = बार वार, उक्या - सक्ष्य - - अध (१२१०) निषक्त सप्तमाध्यायस्य द्वितीया खण्डा । इस मन्त्र का कण्व ऋपि, गायत्री छन्द और मरुद्देवता है। मन्त्रार्थ कण्वा = है कण्वं- गोत्रोत्पन्न ऋषिगण !, वः = आप लोग, क्रीळम् = क्रीडाशील, अनर्वाणम् = शवरहित, शधः = बलवान्, रथेशुभम् = अपने रथ पर सुशोभित, मारूतम् = मरुतो को उद्देश्य करके, अभि प्र गायत्ते गाओ। तीसरा सम्पूर्ण मन्त्र-- उप प्रेत कुशिकाश्चेतयध्वमश्वं राये प्रमुञ्चता सुदासः । राजा वृत्रं जवनत्प्रागपागुदगा यजाते वर आ पृथिव्याः ॥ क्र. सं. ३-३-२१-२॥ इस मन्त्र का विश्वामित्र प्रापि, त्रिष्टुप् छन्द और इन्द्र देवता है। मन्त्रार्थ कुशिका. - हे कुशिरगोमोत्पन्नपुत्रो ! तुम लोग, उप प्रेस - अघ के समीप · जाओ और उसको (भव की), चेतयध्वम् - उत्तेजित करो। राये - धन के लिये, सुदास' - सुदास नामक राजा फे, अश्वम् को, प्रमुञ्चत = छोड दो। राजा - देवताओ के स्वागी राजा इन्द्र ने, अत्रम् - विघ्नकारक वृत्र का, प्रागपागुदक - पूर्व, पश्चिम और उत्तर देश मे, जङ्घनत् = बघ किया है। अथ = अत एव सुदास राजा, पृथिव्या. - पृथिवो के, वरे = उत्तर देवयजन स्थान मे, आ यजाते - यज्ञ करें। प्रकरण के प्रारम्भ मे तीन प्रकार को चायें कही गई हैं। परोक्षकृत, प्रत्यक्षकृत और आध्यात्मियी । उन परोक्षत तथा प्रत्यक्षत ऋचाओ के लक्षण बता कर अब आध्यात्मिकी ऋचा का लक्षण बताते हैं- अयाध्यात्मिक्य उत्तमपुरुपयोगाअहमिति चतेन सर्वनाम्ना । उत्तमपुरुपयोगा. : जो ऋचा पुरुष के साथ युक्त हों ये, आध्यात्मिक्यः आध्यात्मिकी कही जाती हैं। क्योकि, वे आत्मविषयक स्तुतिपरय, च = और, अहम् इति एतेन सर्वनाम्ना : 'अहम्' इस मर्वनाम से युक्त होती हैं। माप यह है कि जिन अचानो में देवता के लिये उत्तम पुरुष को क्रिया और 'अहम् ' (अस्मद् ) यह सर्वनाम पद हो वे आध्यात्मिको ऋचाएँ होती हैं। इस में देवता और ऋपि एक ही होता है। ययतदिन्द्रो चकुण्ठो लरसूक्तं वागाम्भृणीयमिति । यथा - जैमे, इन्द्र वैकुण्ठ - इन्द्र वैकुण्ठ मूक्त, र वमूक्तम् - लवमूक्त और, वागाम्भृणीयम् - वागाम्भृणीय सूक्त, इति = ये हैं। प्रथम उदाहरण- अहं भुवं वमुनः पूर्व्यस्यतिरहं धनानि सं जयामि शव॑तः । मां हवन्ते पितरं न जन्तवोऽहं दाशुषे वि भजामि भोजनम् ॥ स -1-५-१॥ उत्तम स्वामी, निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य द्वितीयः खण्डः । (१२११) इस मन्त्र का इन्द्र ऋषि, जगती छन्द और इन्द्र ही देवता है । मन्त्रार्थ-इन्द्र कहता हैं कि, अहम् मै ही, वसुन = धन का पूर्य = मुख्य, पति. भुवम् हूँ। शश्वतः - शनुमओ के बहुत, धनानि = धनो का, सम् जयामि = जीतने वाला, अहम् - मैं ही हू । जन्तव = प्राणी अर्थात् यजमान लोग, माम् = मुझे ही, हवन्ते = बुलाते हैं। पितरम् न = जैसे पुत्र पिता को धन देते हैं वैसे ही, अहम् = मैं भी, दाशुपे - हविता पजमान को, भाजनम् = अन्न, विभजामि = देता हूँ। इस ऋचा मे 'अहम्' इस सर्वनाम के साथ 'जयामि' भजामि आदि का प्रयोग है। अत यह ऋचा आध्यात्मिकी है। इन्द्र ही इन्द्र को कहता है, अर्थात् आत्मप्रशसा करता है अत इन्द्र हो ऋषि और इन्द्र ही देवता भी है। द्वितीय उदाहरण- इति वा इति में मनो गामन्च सनुयामिति । कुवित्सोमस्यापामिति ॥ ऋस ८-६-२६-१ ।। इम मन्त्र का लवरूपापन्न इन्द्र ऋषि, गायत्री छन्द और इन्द्र ही देवता है । मयार्य-इन्द्र कहता है कि, इति वै = यह निश्चय है कि,' इति = इस प्रकार, मे मन मेरा मन है अर्थात् इस प्रकार मेरी इच्छा है कि गाम् च अश्वम् - गो- और अश्व आदि का, सनुयाम् = दान करू । स्तोताओ को दू । इति = "इस कारण कि, मैं ने 'इन का दिया हुआ, कृवित् = बहुत वार, सोमस्य अपाम् = सोम का पान किया है। इस मन्त्र मे, 'मे'-इस सर्वनाम के साथ 'सनुगम् ' इस उत्तम पुरुष का प्रयोग है । अत यह मन्त्र आध्यात्मिक है। इन्द्र ही इन्द्र से कहता है। आत्मप्रसाशा करता है। इन्द्र का ही वर्णन है। इसी लिये इन्द्र ही मपि और देवता दोनो है । तृतीय उदाहरण- अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत. विश्वदेवैः । अहं मित्रावरुणोभा विभ>हमिन्द्राग्नी अहमचिनोभो ॥ इति निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य द्वितीय सण्ड. ॥ ७-२ ।। का स ८-७-११-१॥ इस मन्त्र का अम्भृण मपि की पुनो वाक् परिष्टुप् छन्द और परमात्मा देवता है । मन्त्रार्ष-महपि सम्भृण ती पुसी वाग्देवी ब्रह्मभाव को प्राप्न होती हुई कहती है कि, अहम् रुद्रेभि वसुभि. = रुद्रो और वमुमो के साथ, चरामि - विचरण वरतो हूँ । यहम् = मै ही, आदित्य उत विश्वदेव आदित्यो और सर्व देवो के साय, चरामि विचरण करती है। अहम् = मै ही, मित्रावरणा उभा मित्र और वरुण दोनो को, विमि = धारण करती है। अहम् = मैं ही, - इन्द्र और अग्नि, उमा : दोनो को भो, विमि = धारण दरती हू । अहम् = में हो, अश्विनाउभा = अश्विद्वय जो भी शिर्भाम धारा करती है। इम क्या में भी 'अहम् ' इस सर्वनाम के साथ 'चरामि' तथा 'विमि' इस उत्तम पुरुष का प्रयोग है। अत यह ऋचा भो आध्यात्मिकी है। वाग्देवी आत्मप्रशमा परती है। अपना यणन आप करती है । अत एव यही ऋपि और यही इस चा का देवता भी है। इसी लिये यह सवा आध्यात्मिसे कही जाती है। मैं ही, - - । - (१२१२) निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य तृतीयः खण्डः । अथ निरुक्ते मप्तमाध्यायस्य तृतीयः खण्डः । परोक्षकृताः प्रत्यक्षकृताश्च मन्त्रा भूयिष्ठाः । अल्पश आध्यात्मिका: । परोक्षकृताः - परोक्षकृत, च = और, प्रत्यक्षाकृता = प्रत्यक्षकृत, मन्त्राः = वेद में मन्त्रो, भूयिष्ठाः = बहुत हैं। परन्तु आध्यात्मिका: आध्यात्मिक मन्य, अल्पश: : वहुत थोडे हैं। भाव यह है कि, वेदो में पदार्थज्ञान परोक्ष रूप तथा प्रत्यक्षरूप में तो अधिक पाये जाते हैं, किन्तु आध्यात्मिक रूप में अर्थात् महम्भाव में बहुत थोड़े हैं। परोक्षकृत प्रत्यक्षकृत और आध्यात्मिक मन्त्रो के लक्षण प्रतिपादन कर अब लक्षणहीन मन्त्रों के प्रतिपाद्य विषय बताते हैं- अथापि स्तुतिरेव भवति । नाशीर्वादः । अथ अपि = और किसी किसी मन्त्रो मे, स्तुतिः एव = स्तुति ही, भवति = होती है, आशीर्वादः न - आशीर्वाद नहीं = अप्राप्त वस्तु की प्रार्थना = कामना नही । उदाहरण- 'इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्रवोचम्" इति यथैतस्मिन् सूक्ते । इन्द्रस्य नु = इन्द्र के वीर्याणि - पराक्रम को, प्रवोचम् = कहता हूँ। सम्पूर्ण मन्त्र की व्याख्या इसी अध्याय के द्वितीय खण्ड मे fiया गया है। इस मन्त्रमें इन्द्र की स्तुति ही की गई है। किसी को आशीर्वाद नही दिया गया है। अथापि आशीरेव न स्तुतिः । अथ अपि = और किसी किसी मन्त्रों में इस से विपरीत, माशीः एव = आशीर्वाद ही होता है । स्तुतिः न = स्तुति नहीं, जैसे- सुचक्षा अहमक्षीम्यां भूयासम् , सुवर्चामुखेन, सुश्रुत् कर्णाभ्यां भूयासम्" इति । तदेतद्डुलमाध्वर्यवे याज्ञेषु च मन्त्रेषु । यह मन्त्र किस शाखा का है यह ज्ञात नही । अर्थ इस प्रकार है-अहम् = मै, अक्षोभ्याम् = सुन्दर दर्शनशक्ति वाला, भूयारम् - हो जाऊ । मुसेन = मुख से, सुवर्चाः सुन्दर तेजवाला, भूयासम् = हो जाऊ और कर्णाम्याम् = कानो से, सुश्रुत् = सुन्दर श्रवणशक्तिवाला, भूयासम् = हो जाऊँ । इस मन्त्र में अपने लिये आशीर्वाद ही है। स्तुति नही । इति सद एतत् = सो यह, बहुलम् = बहुत करके, आध्वयंवे = यजुर्वेद में, च = और, याज्ञेषु मन्त्रेप यज्ञ सम्बन्धी मन्त्रों में हैं। अथापि शपथाभिशापौ। और कही, पपाभिशापो - गपय तथा अभिशाप होता है । जैसे- नेत्रों से, सुचक्षाः 3 इस प्रकार अथ अपि - निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य तृतीयः खण्डः । (१२१३) अद्या मुंरीय यदि यातुधानो अस्मि यदि वायुस्ततप पूपस्य । अधा स वीरैर्दशभिर्व यूया यो मा मोघं यातुधानेत्याहं ॥ ऋ सं. ५-७-७-५ ॥ इस मन्त्र का वसिष्ठ ऋषि, विष्टुप् छन्द और इन्द्र और सोम दोनो देवता है । मन्त्रार्थ-महर्षि वसिष्ठ कहते हैं कि, यदि = यदि मैं, यातुधान = राक्षस, अस्मि = हूँ, वा = अथवा, यदि यदि मैं राक्षस हो कर, पुरुपस्य पुरुष को, मायु ततप = आयु नष्ट करता हू. अघ - तो मैं, अद्य = आज ही अर्थात् अभी ही, मुरोय = मर जाऊ । यह कथन शपथ है । अथवा, मा = माम् = मुझे जो, मोघम् = वृथा, यातुधान. = राक्षस, इति = ऐसा कह कर, आह = सम्वोधन करता है, स - वह, दशभिः वीरः = दश वीर पुत्रो के साथ अर्थात् सारा परिवार के साथ वि यूया वियुक्त हो जायें । नष्ट हो जायें । यह कथन अभिशाप है । इस प्रकार यह मन्त्र पूर्वार्धसे शपथ और उत्तरार्ध से अभिशाप कथन करता है । अथापि कस्यचिद्भावस्थाचिख्यासा । अथ अपि = और भी मन्त्रो मे कहो, कस्यचित् भावस्य - किमो अर्थ के, आचिख्यासा कहने को इच्छा होती है। जैसे- न मृत्युरासीद्मृतं न तर्हि "" तम आसीत्तमसा गूढमग्रे तहि = सृष्टि उत्पत्ति से पूर्व, मृत्युः = यमराज, न आसीव = नहीं था। अमृतम् = अमृत नामक प्राणियों की स्थिति भी, न मासीव = नही थी। अग्रे = सृष्टि उत्पत्ति से पूर्व प्रलयदशा मे भूतभौतिक सम्पूर्ण जगत, तम - रात्रि के अन्धकार के समान, तमसा गूळहम ० माया रूपी अन्ध- कारसे ढका हुआ, आसीत् = था। इन दोनों मन्त्रों में इन के प्रतिपाद्य विषय परमात्मा को कहने की इच्छा है। प्रथम सम्पूर्ण मन्त्र- न मृत्युरांसादमृतं न तर्हि न राण्या अह आसीत्प्रकेतः । आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किं चनास ॥ क म. ८-६-६-२ ॥ इस मन्त्र का प्रजापति ऋषि, ग्रिष्टुप् छन्द और परमात्मा देवता है । मन्नार्थ-तहि = तब अर्थात् सृष्टि उत्पत्ति से पूर्व, मृत्यु = यमराज, न आसीद = नहीं था। अमृतम् = अमृत नामक प्राणियो का अषस्थान भी, न आसीद - नहीं था। राध्या - रात्रिका, च प्रकेत प्रज्ञान, न आसीत् = नही था। तत् एकम् = वह सरल वेदान्त प्रसिद्ध एक ग्रह्म प परमात्मा ही, स्वधया = स्वभावत , अवातम् वायु के विना, आनोद - प्राण धारण के समान “ " और, अह दिन का 5 - :
(१२१४) निरुक्त सप्तमाध्यायस्य तृतीयः खण्डः । चेप्टा कर रहा था। तस्मात् = पूर्वोक्त माया सहित ब्रह्म से, परः - उत्कृष्ट; - अन्यत् किञ्चन : दूसरा कुच्छ, न आस . नहीं था। द्वितीय सम्पूर्ण मन्त्र- तम आसीत्तमंसा गृळहमनेऽप्रतं संलिलं सर्वमा इदम् । तुच्छ्येनाभ्वापिहितं यदासीत्तपंसस्तन्महिनाजायतकम् ॥ क सं. ८-७-१७-३ ।। इस मन्त्र या पूर्ववत् प्रजापति ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और परमात्मा देवता है । मन्त्रार्थ- अग्रे = सृष्टि-उत्पत्ति से पूर्व प्रलयदशा मे भूतभौतिक सम्पूर्ण जगत्, तमः = रात्रि के अन्धकार के समान, तमसा = मायारूपी अन्धकार से, गूळहम् = ढका हुआ, आमीत - था। इदम् सर्वम् - यह दृश्यमान सम्पूर्ण जगत, अप्रवेतम् = अप्रजायमान अर्थात अज्ञात और, मलिलम् = जलमय, माः- आसीद = था। आभु तुच्छन = तुच्छ के समान सत् असद से विलक्षण भावरूप अज्ञान से, अपिहितम् = आच्छादित, यत् भागीत् = जो था, तत् एकम् = यही एक तत्त्व, तपस' महिना तपस्या के प्रभाव से, अजायत = उत्पन्न हुआ। अथापि परिदेवना कस्माचिद्भावात् । अथ अपि = 'और भी. मारमाणिद्भावात् = किसी कारण से मन्त्रो मे, परिदेवना = विलाप भी होता है। जैसे- " मुदेवो अद्य प्रपतेदनाय " " न विजानामि यदि वेदमस्मि मुदेवः - मुन्दर देव प्रिया उद्या विमुक्त होकर, अद्य = आज ही, प्रपतेत् = गिरे और ऐगा गिरे रि, अनावृत् - फिर न लौटे। इम में पुरुग्या वो परिदेवना है। न विजानामि = में यह मारण ब्रह्म हू और उग ग्रह्म या सायं जगत है। यहा भाय पुतः पग्देिकना प्रपम सम्पूर्ण मन्म- सुदेवो अद्य प्रपतेदनांकृत्परावतं परमां गन्तवा ।। अधा शयीत निर्मातेरुपस्थेऽधनं वृका रभसासो अद्युः ।। " %3D बिलाप है।
2 निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य तृतीय खण्डः । (१२१५) ऐसा गिरे कि, अनावृद - फिर न लौटे। परमाम् परावतम् = दूर से दूर देश को, गन्तवे - जाने के लिये महाप्रस्थानगमन करे। अध = अथवा दूसरे स्थान मे जाने में असमर्थ होता हुआ, निईने पाप देवता के, उपस्थे = गोद मे, शयीत सो जाय । अध = अथवा, एनम् = इस को, रभसास. = शीघ्रता से, वृका. = जगली कुत्ते, अद्यु - खा जायें। द्वितीय सम्पूर्ण मन्त्र- न वि जानामि यदिवेदमस्मि निण्यः संनद्धो मनसा चरामि । यदा मागंन्प्रथमजा ऋतस्यादिद्वाचो अश्नुवे भागमस्याः ॥ ऋस २-३-२१-३७॥ इस मन्त्र का दीर्घतमा ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और विश्वेदेवा देवता है। मन्त्रार्थ--यद् इव इदम् अस्मि = मैं यह हू कि, नही, न विजानामि = यह नहीं जानना, क्योकि, निण्य = मै मूढचित्त हूँ। मनसा सनद्ध = मनसे सनद्ध हू अर्थात् अच्छी तरह आवद्ध होकर विक्षिप्तचित्त रहता है । यदा - और जिस समय, प्रथमजा मागन् = ज्ञान का प्रथम उन्मेष होता हैं, आदित् - उसी समय, ऋतस्य 3 सत्य स्वरूप ब्रह्म का अथवा, अस्या वाच. = इस एकात्म प्रतिपादक उपनिषद वाणी का भागम् - भजनीय शब्द ब्रह्म से व्याप्त परब्रह्मपद को, मनुवे - प्राप्त होता है । इस मन्त्र के पूर्वाद मे ज्ञाना भाव एव मढता आदि के कारण परिदेवना है। अथापि निन्दाप्रशंसे - भवतः । अथ अपि = और भी, निन्दाप्रशसे - मन्त्रो मे कही निन्दा और कहीं प्रशसा, भवता = होती हैं। जैसे- " केवलायो भवति केवलादी" भोजस्वेदं पुस्करिणीव वेश्म"। केवलादि = अकेले खानेवाला, केवलाघ. = केवल पापी, भत्रति होता है। भोजस्य = दाता के लिये, पुष्परिणी इव पुष्करणों के समान पवित्र इदम् वेश्म = यह पृहादि होता है । प्रथम मन्त्र मे मदाता को निन्दा और द्वितीय मन्त्र मे दाता की प्रशसा है। प्रथम मन्त्र सम्पूर्ण- मोघमन्नं विन्दते अप्रचेताः सत्यं ब्रवीमि वध इत्स तस्य । नार्यमणं पुण्यति नो सखायं केवलाघो भवति केवलादी ॥ यस स 6-६-२२-६ ।। इस मन्त्र का आङ्गिरस भिक्षु अपि, त्रिष्टुप् छन्द और दान देवता है । मन्त्रार्य--प्रदाता की निन्दा-अप्रचेता जिस का मन उदार नहीं है, म = वह, मोघम् = व्यर्ष, अन्नम् - यन, विन्दते - - (१२१६) निरक्त सप्तमाघ्यायस्य तृतीयः खण्डः । लाभ करता है । यह मै, सत्यम् ब्रवीमि = सत्य कहता हूँ । केवल व्यर्थ ही नही किन्तु, तस्य - उस पुरुष का, सः वध इति = यह अन्न वध ही है। अर्थात् उसका भोजन उसकी मृत्यु के समान है । अर्यमणम् = जो अर्यमा आदि सब देवों को, न पुष्यति = हवि के द्वारा पोषण नहीं करता है और जो, सखायम् न पुष्पति = मित्रवर्ग अभ्यागत अतिथि आदि को अन्न द्वारा पोषण नहीं करता है, केवलादी = वह अकेला खानेवाला, केवलाघः = केवल पाप भक्षण करने वाला, भवति - होता है । द्वितीय मन्त्र सम्पूर्ण- भोजायाश्व सं मृजन्त्याशुं भोजायास्ते कन्या ३ शुभमाना । भोजस्येदं पुष्करिणीव वेश्म परिष्कृतं देवमाने चित्रम् ॥ ऋ. सं. ८-६-४-१० ।। इस मन्त्र का आङ्गिरस दिव्य ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और यजमान देवता है । मन्त्रार्थ भोजाय दाता के लिये, परिचारकगण, आशु अश्वम् - शीघ्रगामी अश्व, समृजन्ति = अलकृत करते हैं । भोजाय = दाता के लिये, शुम्भमाना कन्या - सुन्दर स्त्री, आस्ते = उपस्थित रहती है भोजस्य = दाता के लिये, पुष्करिणी इव = पुष्करणी के समान निर्मल और, परिष्कृतम् - अलकृत देवमानेव - देवभवन के समान, चित्रम् - मनोहर, वेश्म = गृह होते हैं। इस मन्त्र में इस प्रकार दान दाता की प्रशंसा है। एवमक्षसूक्ते द्यूतनिन्दा च कृषिप्रशंसा च । एवम् - इसी प्रकार, अक्षसूक्त = अक्ष सूक्त मे, धूतनिन्दा च : द्यूत को निन्दा, च = और, कृषिप्रशसा = कृषि की प्रशसा हुई है । इनका उदाहरण यास्काचार्यने नही दिया है । अत. दिया जाता है- जाया तप्यते कितवस्य हीना माता पुत्रस्य चरतः क्व खित् । ऋणावा विभ्यद्धनमिच्छमानोऽन्येपामस्तमुप नक्तमेति ॥ ऋ. स. ७-८-५-१० ।। • इस मन्त्र का क्वप ऋपि, बिष्टुप् छन्द और द्यूतकार देवता है। मन्त्रार्य-फस्वित चरतः कितवस्य = एक और तो कही मारे मारे फिरते हुए जुआरी की, जाया बो, हीना = दीन हीन अवस्था को प्राप्त होती हुई, तप्यते - सतप्त होती रहती है और दूसरी ओर, माता - माता, पुत्रस्य = अपने जुआरी पुत्र की दुरवस्था को देख कर, तप्यते - संतप्त रहती है। रणावा - फिर वह ऋणी जुआरी, धनम इच्छमानः " धन की इच्छा करता हुआ, अन्येषाम् = दूसरो के, अस्तम् - घरो मे, नक्तम् - रात्रि के समय, विभ्यद - रता हुआ, उपएति = चोरी करने के लिये जाता है। इस मन्त्र मे द्यूत निन्दा है। कृषिप्रशंश- जुगारी को तत्र जाया निरुक्त सप्तमाध्यायस्य चतुर्षः खण्डः । (१२१७) अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित्कृषस्य वित्ते रमस्व बहु मन्यमानः । तत्र गावः कितव तत्रं जाया तन्मे वि चष्टे सवितायमर्यः ॥ ऋ सं. ७-८-५-१३॥ इस मन्त्र का भी कवय ऋषि, त्रिष्टुम् छन्द और कृषि देवता है। मधार्थ-ऋपि कहते हैं कितव = है जुआ खेलनेवाले जुबारी । बहु मन्यमानः = मेरी थोडी वात को वहत मानने अर्थात मेरे बचन पर विश्वास करते हुए, तुम, अक्षः मा दीव्यः = जुआ मत खेलो। कृषिम् इत् = खेती को ही, कृपस्व = विलेखन करो, कृषि कार्य को ही करो। वित्त रमम्ब = कृपि में प्राप्त जो धन उसी मे रमण करो, उसी से सन्तुष्ट रहो । तत्र गायः । कृषि करने से अनेक गायें प्राप्त होती हैं। और कृषि करने से वो प्राप्त होती है। तत् - इस धर्म-रहस्य को, मविता सर्वप्राणियो के उत्तादक, अयम् अयं = इस अर्थ को लोक वेद प्रसिद्ध ईश्वर ने, विचाटे = वना है। इस प्रकार इस मन्त्र में कृषिप्रशंसा है। एवमुञ्चाउचरभिप्रायैषीणां मन्त्रघण्टयो भवन्ति । इति निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य तृतीयः खण्डः ।। ७-१ ॥ एवम् - इस प्रकार, मन्त्र के विषय मे उच्चावचैः अभिप्राय - भिन्न भिन्न अभिप्राय से, ऋपीमाम् = ऋषियो की मन्त्र हष्टयः = मन्त्रदृष्टिया, भवन्ति = होती हैं। अर्थात् आर्पज्ञान के प्रभाव से (योग ज्ञान प्रभाव से) ऋपियों को पूर्वकल्प के वेद मन्त्रो के आकार तथा अर्थ का प्रत्यक्ष ज्ञान भिन्न भिन्न प्रकार से होते है। इस कथन से यास्क यह कह रहे हैं कि, ऋषिगण मन्त्र के द्रप्टा होते हैं, कर्ता नहीं । कर्ता तो परमेश्वर ही हैं। अय निरुत सप्तमाध्यायस्य चतुर्थः खण्डः । तोऽनादिप्टदेवता मन्त्रास्तेषु देवतोपपरीक्षा । तद् ये = जर्जा, अनादिष्टदेवता. - अनुक्त देवताक, मन्त्राः = मन्त्र है, तेपु = उनमे, देवता उपपरीक्षा - देवता का निर्णय करते हैं- भाव यह है कि, मन्त्र के देवता भग्नि इन्द्र आदि देव विशेष हो होते हैं ऐसा नहीं। क्योकि, किसी मन्त्र का निन्दा देवता और किसी मन्त्र का धूत देवता आदि भी देवता होते हैं। जा देव नहीं हैं । अतः देवता का अपं देव नही किन्तु विषय है । जिस मन्त्र का जो विषय होता है वही उस का देवता होता है। अत एव विषय रूप देवता का ज्ञान होने पर ही मन्त्र का अर्थ किया जा सकता है। मन्त्रों मे देवता ज्ञान के लिये 'यत्काम अपिः' इत्यादि लक्षण बताया गया है। जिन मन्त्रो मे यथोक्त लक्षण स्पष्ट प्रतीत होते हैं उन मे लक्षण मे देवता का ज्ञान प्राप्त करके मन्त्र का अपं किया जा सकता है। परन्तु जिन मन्त्रों में लक्षण के अभाव से तथा देवता अनुक्त होने देवता का ज्ञान न होने पाता है वहा क्या करना? इस का विचार यहा से प्रारम्भ होता है- अथ - (१२१८) निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य चतुर्थः खण्डः । यदेवतः स यज्ञो वा यज्ञाझं वा, तद्देवता. भवन्ति । वा = अथवा, यद् देवतः जिस देवता का, स: - वह, यज्ञः = यज्ञ हो, वा = अथवा, यज्ञानम् = जिस देवता का वह यज्ञान हो, तद् देवताः - उस देवता के वे मन्त्र, भवन्ति - होते हैं । अग्निहोत्र, दर्शपौर्णमास, ज्योतिष्ट्रोम आदि यज्ञ और यज्ञ के साधन जो द्रव्यादि वे यज्ञाङ्ग कहलाता हैं । जिम मन्त्र में जिस यज्ञ का या यज्ञाङ्ग का वर्णन प्रतीत हो उस मन्त्र का वही देवता समझना चाहिये । जैसे प्रातः सवन में जो विनियुक्त होता है वह अग्नि देवताक, माध्यन्दिन सवन में जो विनियक्त होता है वह इन्द्र देवताक और तृतीय सवन अर्थात् मार्यमवन में जो विनियुक्त होता है यह आदित्य देवताक मन्त्र है ऐसा ममझना चाहिये । अथान्यत्र यज्ञात्प्राजापत्या इति याज्ञिकाः । और, यज्ञात अन्यत्र = यज्ञ से भिन्न स्थल में, प्राजापत्याः = प्रजापति देवताक मन्त्र होते हैं, इति = यह, याज्ञिकाः = याज्ञिक लोग मानते हैं । अर्थात् जहां किसी यज्ञ या यज्ञान का स्पष्ट रूप से परिज्ञान न हो यहां वे मन्त्र प्रजापति देवताक हैं यह याज्ञिक लोक कहते हैं। क्योंकि 'अनिरुक्तो हि प्रज्ञापतिः' अर्थात् जिस मन्त्र में देवता अनुक्त हो उसका प्रजापति देवता होता है यह मान लेना चाहिये यह नियम है। नाराशंसा इति नरुक्ताः। जिस मन्त्र में देवता का उल्लेख न हो उस मन्त्र का देवता, नाराशंसा: = नाराशंस है, इति = यह, नक्ताः = निरुक्तशास्त्र के जानने वाले आचार्य लोग कहते हैं। नाराशंस के विषय में आचार्यो का भिन्न भिन्न मत हैं । कारथ नामक आचार्य के मत में नाराशंस' का अर्थ यज्ञ है और शाकपूणि नामक आचार्य के मत में अनि । अपि वा सा कामदेवता स्यात् । अपि वा = अथवा, सा जिस मे किसी देवता का उल्लेख न हो वह ऋचा, कामदेवता = ऐच्छिक देवताका, स्यात् = है । अपनी इच्छा के अनुसार उस ऋचा के देवता की कल्पना कर लेनी चाहिये। क्योंकि, किसी देवता विशेष का नाम न होने से देवता का समूह उसका देवता है । प्रायो देवता वा। वा = अथवा, प्रायः देवता = प्रायो देवता उस ऋचा का ममझना चाहिये । भाव यह है कि प्रायः फहते हैं अधिकार को और अधिकार कहते हैं प्रकरण की। जिस देवता के प्रकरण में अनादिष्ट देवताक ऋचा का पाठ हो उसका वही देवता होता है। प्रारणानुसार देवता की कल्पना करनी चाहिये। अथवा 'प्रायो बहुरम्' इस अमर कोप के कथनानुसार 'प्रायः' का अर्थ बहुल अर्थात बहुत होता है। ऐसी स्थिति में प्रायोदेवता का अर्थ होगा बहुत देवताक अर्थात् जिस ऋचा में देवता का उल्लेख न हो उस के बहुत देवता होने हैं । इस में हेतु देते हैं- - - - 5 - निहत सप्तमाध्यायस्य चतुर्थः खण्डः । (१२१९) अस्ति ह्याचारो बहुलं लोके, देवदेवत्यम् , अतिथिदेवत्यम्, पितृदेवत्यम् । " हि = क्योंकि, ' लोके - लोक में, बहलम् - बहुत प्रकार का, आचारः = आचार (रीत), मस्ति'-' हैं । जैसे देवदेवत्यम् देवदेवताक, अतिथिदेवत्यम् - अतिथि देवताक और, पितृदेवत्यम् = पितृदेवताक । अर्थात् यह वस्तु देव देवता के लिये है, यह वस्तु अतिथि देवता के लिये है और यह वस्तु पितृदेवता के लिये है । इस से यह सिद्ध हुआ कि, जिस मन्त्र में देवता- बोधक पद न हो उस अनादिष्ट देयताक मन्त्र के देवं अतिथि, पितृ मादि बहुत देवता हैं। अपने इप्ट के अनुसार मन्त्र का अर्थ कर लेना चाहिये । याज्ञदैवतो मन्त्र इति । 'विष्णुर्व यज्ञः' इस श्रुति के कथनानुसार यज्ञ का अर्थ विष्णु है । और नरुक्तों के मत मैं विष्णु का अर्थ आदित्य होता है । यज्ञ देवताक अर्थात् आदित्य देवताक मन्त्र याज्ञ कहा जाता है एवं अग्निवे सर्वा देवता' इस श्रुति के कथनानुसार देवता शब्द का अर्थ अग्नि होता है। देवता देवताक अर्थात् अग्निदेवताक मन्त्र देवत कहा जाता है । मन्त्रः = जिस मन्त्र में देवता का लिन स्पष्ट प्रतीत न होता हो वह मन्त्र, याज्ञ देवतः = आदित्य देवताक अथवा अग्निदेवताक है, इति । ऐसा रामझना चाहिये। अपि सदेवता देवतावस्तूयन्ते, यथाऽवप्रभृतीन्यौपधिपर्यन्तानि । अधाप्यष्टौ द्वन्द्वानि । सन मन्येतागन्तूनिवार्थान्देवतानाम् , प्रत्यक्षदृश्यमेतद् भवति । 'अपि हि' इतना अंश प्रश्नार्थ है । अर्थात प्रश्न होता है कि, कहीं कहीं मन्त्रों में, अ देवता- जो देवता नहीं हैं वे भी, देवतावत् = देवताओं के समान, स्तूयन्ते = स्तुति किये जाते हैं। यथा - जैसे, अश्वप्रभृतीनि मोपधिपर्यन्तानि = अश्व से लेकर औषधि तक। ये सब देवता नहीं हैं तो भी देवता के समान स्तुत होते हैं । अथ अपि = और भी, अप्टो - आठ, द्वन्द्वानि = द्वन्द्व (जोड़े) हैं। आठ द्वन्द्व ये हैं-१ उलुखलमुसले, २-हविर्धाने, ३-द्यावापृथिवी, ४-विपाट्छुद्रो, ५-आरनी, ६. सुनासीरी, ७-देवीजोप्ट्री, ८-देवीउर्जाहती। सः- यह (शिष्य) न मन्येत = नहीं मानेगाकि, आगन्नून । अर्षांत - अश्व आदि आगन्तुक पदार्थ को, देवतानाम इव देवता के समान स्तुति की जाती है। अर्थात् इस बात को कोई मानने के लिये तैयार नहीं है कि, देवताओं के अश्व आदि देवता के समान स्तुति किये जाते हैं वह योग्य ही है । क्योकि, अश्व आदि में पूर्वोक्त 'यकाम ऋषिः' इत्यादि देवता- लक्षाण घटते नहीं हैं। एतद यह, प्रत्यक्षादृश्यम् - प्रत्यक्ष ही देसने योग्य, मति - है। मर्याद यह प्रत्यक्ष सिद्ध है कि, मनुष्यों के अश्व आदि देवता नहीं हैं तो देवताओं के अप आदि देयता करो न । . होंगे? उत्तर-महामाग्याद् देवताया एक आत्मा यड्या स्तूयते । देवतायाः - देवताओं के, महाभाग्यात् महाभाग्य अति अलौकिक - दिप सामय होने मे एक: आमा - एक बारमा, बहुधा = बहुत प्रभार से, सूपते - स्तुति दिया जाता है। नाप यह - (१२२०) निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य चतुर्थः सण्डः । है कि, देवताओं में महान् ऐश्वर्य रहता है। जिसके प्रभाव से वे कभी द्युत रूप आदि हो जाते हैं। अतः जैसे इन्द्रादि देवता हैं वैसे ही अश्व द्युत आदि भी देवता हो हैं। क्योंकि, इन्द्रादि देवता ही अपने ऐश्वर्य के प्रभाव से, अभ्वादि रूप हो जाते हैं । अतः अश्व द्युत आदि भो देवता हो सकते हैं यह सिद्ध हुआ। इस में हेतु देते हैं- एकस्यात्मनोऽन्ये देवाः प्रत्यङ्गानि भवन्ति । एकस्य आत्मनः = एक ही आत्मा के, अन्ये देवाः - अन्य सव देव, प्रत्यङ्गानि = प्रत्यङ्ग, भवन्ति = होते है । भाव यह है कि, अङ्ग अङ्गी का अभेद होने से जैसे शरीर रूप अङ्गी से हस्त- पादादि अङ्ग भिन्न नही वैसे ही देवता रूप अङ्गी से अश्व तथा श्रूत आदि अङ्ग भिन्न नहीं, किन्तु ये सब भी देवता ही हैं। अथवा एकस्य आत्मन = एक परमेश्वर रूप आत्मा के, अन्ये देवाः - अन्य इन्द्र, अग्नि, आदित्य, अश्व, द्यूत आदि सभी देव, प्रत्यङ्गानि : प्रत्यङ्ग, भवन्ति = होते हैं। अर्थात् ईश्वर रूप देवता के, अग्नि अश्व आदि अङ्ग होने से अग्नि अश्वादि भो देवता हैं । अतः ये भी देवता रूप स्तुति किये जाते हैं। परमारमा अङ्गो इन्द्र आदित्य अनि आदि अङ्ग ओर अश्व द्यत आदि प्रत्यङ्ग समझना चाहिये । इसी को और स्पष्ट करते हैं- अपि च सचानां प्रकृति भूममिक्रपयः स्तुवन्तीत्याहुः । अपि च = और भी देखिये-सत्वानाम् = अश्व आदि प्राणी तथा द्यूत आदि अप्राणी द्रव्यों के, प्रकृतिभूमभिः = प्रकृति बहुत्व से, अपयः = ऋपिगण, स्तुवन्ति = स्तुति करते हैं, इति = यह, आहुः = आचार्य लोग कहते हैं। अर्थात् सकल पदार्थ का कारण परमात्मा रूप देवता है। कार्यकारण का अभेद होता है। अतः प्रकृतिरूप परमात्मा की इन्द्र अग्नि अश्व द्यूत आदि रूप से वेदों में ऋपिंगण स्तुति करते हैं । देवता रूप परमात्मा के कार्य होने से अश्व धूतादि भी देवता हैं । प्रकृतिसार्वनाम्न्याच्च । और, प्रकृति सार्वनाम्याच्च = प्रकृति महानात्मा परमात्मा की सर्वनामता से' अर्थात् सब नाम परमात्मा के ही होने से वेदों में ऋषिगण अश्व द्यूतादि तत् तत् नामों से परमात्मा की ही स्तुति करते हैं और परमात्मा देवता हैं । अतः अश्व द्यूतादि भी देवता के ही नाम है। प्रश्न होता है कि, सभी नाम जव परमात्मा के ही हैं तब मनुष्यो मे और देवताओं में भेद पया? इसका उत्तर देते हैं- इतरेतरजन्मानो भवन्ति, इतरेतरप्रकृतयः । देवता, इतरेतरजन्मानः = इतरेतरजन्मा भवन्ति = होते हैं । अर्थात् परस्पर से देवताओं का जन्म होता है और, इतरेतरप्रकृति अर्थात् आपस में एक दूसरे का कारण, भवन्ति = होते हैं। यही उन मे ऐश्वयं है। मनुष्यो भै यह ऐश्वयं नही। अतः ये देवता नहीं। इतना मनुष्यों में और देवताओं में भेद हैं।
निरुक्त सप्तमाध्यायस्य पञ्चमः खण्डः । (१२२१) कर्मजन्मानः। देवता, कर्मजन्मानः = कर्मजन्मा होते हैं । अर्थात् देवता के बिना कोई कर्म न होने से मनुष्योंकों कर्म कराने के लिये देवताओंका जन्म होता है। उदाहरणार्थ-देवतोद्देशेन द्रव्यत्याग कर्म कहा जाता है। देवता न हो तो किस को उद्देश्य करके कर्म क्रिया जायगा? । स 1 अश्वः आत्मजन्मानः। देवता, आत्मजन्मानः = आत्मजन्मा होते हैं । अर्थात् अपने से ही अप उत्पन्न होते हैं । इनका उत्पन्न करने वाला कोई नहीं। देवता महाभाग्य = महा ऐश्वर्य हैं । अत: इनका जन्म इनके संकल्प से होता है। आत्मैवैपां रथो भवति । आत्मा अधः । आत्मा आयुधम् । आत्मेपवः । आत्मा सर्व देवस्य देवस्य । इति निरुक्त सप्तमाध्यायस्य चतुर्थः खण्डः ।। ७-४ ।। एषाम् इन देवताओं का, आत्मा एव = आत्मा हो, रथः = रथ है । आत्मा = आत्मा हो, घोड़ा है। आत्मा = मात्मा ही, आयुधम् = आयुध = अब है। आत्मा = आत्मा ही; इपवः = वाण हैं । आत्मा = मात्मा हो, देवस्य = देवका, सर्वम् = सब कुछ है । ' देवस्य देवस्य' यह द्विरुक्ति खण्ड समाप्ति का सूचक है। अथ निरुक्त सप्तमाध्यायस्य पञ्चमः खण्डः। तिस एव देवता इति नैरुक्ताः । अग्निः पृथिवीस्थानो वायुर्वेन्द्रो वा अन्तरिक्षस्थानः सूर्यो गुस्थानः। तिम्रः एव = तीन हो, देवता: = देवता हैं, इति = यह, नरुक्ताः = निरुक्त शास्रके जानने वाले आचार्य लोग कहते हैं । अग्निः = अग्नि, पृथिवीस्थानः = पृथिवीस्थान अर्थात् पृथिवी पर रहनेवाला देवता है । वायुः वा इन्द्रः वा = वायु अथवा इन्द्र, अन्तरिक्षस्थानः अन्तरिक्षस्थान अर्थात् अन्तरिक्ष में रहनेवाले दो देवता हैं और, सूर्यः सूर्य, युस्थानः - धुस्थान अर्थात् घुस्थान = धुलोक में रहनेवाला देवता हैं। इस प्रकार तीन ही देवता हैं । प्रश्न होता है कि, जव पूर्वोक्त अग्नि आदि तीन ही देवता हैं तो जातवेदा वैश्वानर आदि देवताओ के बहुत नाम जो सुने जाते हैं सो कैसे ? इसका उत्तर देते हैं- तासां महाभाग्यादेककस्या अपि बहूनि नामधेयानि भवन्ति । . तासाम् उन देवताओं के, महाभाग्यात् = महद् ऐचर्य होने से, एककस्य अपि = एक एक देवता के भी, बहूनि नामधेयानि = बहुत नाम, भवन्ति = होते हैं । - (१२२२) निश्क्ते सप्तमाध्यायस्य पश्चम. खण्डा । अपि वा कर्मपृथक्त्वात् । वा = अथवा, कर्मपृथक्त्वात् = पृथक् पृथक् कर्म (क्रिया) होने से, अपि = भी, एक एक देवता के बहुत नाम हो जाते है । यथा होताऽध्वर्युब्रह्मोद्गाता इत्यपि एकस्य सतः । जैसे, होताध्वर्युवझदाता = होता, अध्ययु, ब्रह्मा, और उदाता, इति ये सव नाम, एकस्य सता अपि = एक होते हुए भी अनेक नाम है। अर्थात् जैसे एक ही ब्राह्मण के होतृकर्म करते समय होता, अध्वर्युकर्म करते समय अध्वर्य, ब्रह्मा के कर्म करते समय ब्रह्मा और उद्भातृकर्म करते समय उदाता नाम हो जाते है वैसे ही देवता भी जिस जिस समय जो जो कर्म करते हैं उस उस समय उस उस नाम से प्रसिद्ध होते है। इस लिये यथोक्त तीन ही देवता के बहुत नाम हो जाते है। अपना नैरक्त मत दिखाकर याज्ञिक मत दिखाते है- यथा- - ३ अपि वा पृथगेव स्युः। पृथग्धि स्तुतयो भवन्ति । अपि वा = अथवा, पृथक एव पृथक् पृथक् ही, स्युः = हो। हि क्योकि, पृथक पृथक् पृथक्, स्तुतय = स्तुतिएं, भवन्ति = है। अर्थात् न एक और न तीन देवता है, किन्तु मन्त्रो मे जितने देवता के नाम आते है उतने ही अलग अलग देवता हो सकते हैं। क्योकि, स्तुतिएँ पृथक् पृथक हैं वैसे ही नाम भी पृथक् पृथक् है । तथाभिधानानि । जैसे स्तुतिएँ पृथक् पृथक है, तथा - वैसे ही, अभिधानानि = देवताओ के नाम भी पृथक पृथर हैं। अर्थात् जैसे स्तुति के भेद से स्तुत्य का भेद है वैसे अभिधान (नाम) के भेद से अभिधेय + ( नामी) का भी भेद हो सकता है । अत वेदमन्त्रो मे जितने देवता के नाम हैं उतने ही देवता भी हैं। एक या तीन ही नहीं। यथो एतत्-कर्मपृथक्त्वादिति १ । बहवोऽपि विभज्य कर्माणि कुर्युः । यथो एतत् = और जो यह कहा गया है कि, फर्मपृथक्त्वाव = पृथक् पृथक कर्म होने से एक एक देवता के बहुत नाम हो जाते है। वस्तुत देवता तीन ही हैं ? सो समीन नहीं। क्योकि, घहर अपि - बहुत लोग भी एक ही कार्य को, विभज्य विभाग वरके (वाटकर), अलग अलग, कर्माणि कर्म, कुर्य = कर सकते हैं। भाव यह है कि एक ही देवता अलग अलग कार्य करने से अनेक नामवाले हो जाते है यह मानना ठीक नहीं। पयोकि, देवता अनेक हैं। अपना अपना कार्य आप सब करते हैं। यह मानने पर जब काम चल सकता है तव तीन ही या एक ही देवता मानना नियुक्तिक है। - निरुक्त सप्तमाध्यायस्य पप्ठः खण्डः । (१२२३) यदि यह कहैं कि, देवताओ को नाना मानने पर उन मे एकत्व व्यवहार जो होता हैं । सो कैसे? । इसका उत्तर देते हैं- तत्र सस्थानकत्वं संभोगैकत्वञ्चोपेक्षितव्यम् । तत्र - उस मे अर्थात् देवताओ के नाना पक्ष में, सस्थानकत्वम् - स्थान को एकता, च = और, संभोगक्त्वम् = सभोग की एक्ता (खानपान की एक्ता), उपेक्षितव्यम् = समझना चाहिये । जैसे 'इस बात को सारी पृथिवी कहती है, इस बात को सारो पृथिवी पर रहने वाले अनेक मे एकत्व व्यवहार गौण है वैसे ही अनेक देवताओ मे कही कही एकत्व व्यवहार होना भी गौण है। वस्तुतः देवता नाना हैं। एक या तीन ही नहीं। इसी को उदाहरण द्वारा स्पष्ट करते हैं- . यथा : देव हैं। 2 यथा पृथिव्यां मनुष्याः पशवो देवा इति स्थानैकत्वञ्च संभोगैकत्वञ्च दृश्यते । जैसे, पृथिव्याम् = पृथिवी पर, मनुष्याः - मनुष्य, पशव. = पशु, देवा इति = इन सब का, स्थानकत्वम् च = एक स्थान, च = और, सभोगैकत्वम् = एक सभोग, दृश्यते - देखा जाता है। इसी लिये इन अनेक मे एकत्व व्यवहार गौण होता है वैसे हो अनेक देवताक्षो मे एकत्व व्यवहार गौण है । वस्तुत. देवता अनेक हैं। एक या तीन ही नहीं । अन्य उदाहरण- यथा पृथिव्या:पर्जन्येन च वावादित्याम्यांच संभोगः। अग्निना चेतरस्य लोकस्य । यथा - जैसे, पृथिव्याः - पृथिवी को, पर्जन्य अर्थात् मध्यम देव इन्द्र से और, वावादित्याभ्यां वायु तथा आदित्य से, सभोग. = सभोग है, च = और, इतरस्य लोकस्य दूमरे म तरिक्ष लोक को, अग्निना = अग्नि से, सभोग. = सभोग है। अथवा मेघ द्वारा पृथिवी का भोग वायु और मादित्य के साथ और अन्तरिक्ष लोक का अग्नि के साथ सभोग देखा जाता है। दोनो, पक्षो मे सर्मान दृष्टान्त-- तत्रैतरराष्ट्रमिव । इति निरुक्त सप्तमाध्यायस्य पञ्चम, खण्डे ॥ ७.५ ".. सत्र - उन एक के अनेक नाम मानने वालों में और मनेक के अनेक नाम मानने वालो मे, एतत् - यह, नरराष्ट्रम् इव - नर के समान और राष्ट्र के समान समझना चाहिये । अर्थात् जैसे, 'राष्ट्रम्' यहा अभेद और ' नरा' पहा भेद वैसे ही पृथिव्याम्' यहा अभेदं और 'जातवेदा 'वैश्वानर ' यहा भेद। ऐसा ही आगे समझना चाहिये । 'आत्मा' यहा.अभेद और : 'लोक्निः' पहा भेद । भाव यह है कि, एक हो अर्थ में विवक्षाधीन एक तथा अनेक समझा जाता है। एक मानने वालों के.मत मे, एक मुख्य और अनेक गौण । ए अनेक मानने वालो के मन में भनेक मुरुप और एक गोण समझना चाहिये। मप निश्क्ते सप्तमाध्यायस्य पष्ठः सण्ड । - , . लोका - अथ - - (१२२४) निरुक्त सप्तमाध्यायस्य पप्ठः खण्डः । अथाकारचिन्तनं देवतानाम् । देवताओ के एक्त्व अनेकत्व विषयक विचार की समाप्ति के अनन्तर (वाद), देवतानाम् = देवताओ के, माकारचिन्तनम् = आकार विषयक विचार का प्रारम्भ होता है। पुरुपविधाः स्युरित्येकम् । पुरुपविधा पुरुष के समान, देवता, स्यु = होगे। अर्थात् देवताओ का आकार मनुष्यो के आकार के समान है इति = यह एकम् = एक मत है। करचरणादि विग्रह वाले देवता होते हैं यह किसी का मत है । इस मे हेतु देते हैं- चेतनारद्धि स्तुतयो भवन्ति । हि क्योकि, चेतनावत् - चेतनावालो की जैसी, स्तुतय स्तुतिएँ, भवन्ति = होती हैं। इस लिये पुरुष के समान आकारवाले देवता होते है। तथाभिधानानि । जैसे पुरविधता मे स्तुति हेतु है, तथा वैसे ही, अभिधानानि = सवाद सूक्तो मे परस्पर का नाम ले कर शब्द उच्चारण भी हेतु है । अर्थात् यदि पुरुष के आकार के समान देवताओ के आकार. न हो तो सवाद सूक्तो मे परस्पर का सवाद देखने में आता है सो नही आना चाहिये और आता तो है । अत मनुष्य के आकार के समान देवताओ के भी आकार होते हैं यह निश्चय होता है । दूसरा हेतु देते हैं- अथापि पौरुषविधिकरः संस्तूयन्ते । अथ अपि और दूसरा भी हेतु है कि, पौरपविधिक अङ्गै - पुरुषो के जैसे अङ्गो से, सस्तूयन्ते स्तुति किये जाते हैं। यदि देवताओ के पुरुष के आकार के समान आकार न हो तो पुरुप के अङ्गो के समान अङ्गो से स्तुति कैसे किये जा कसते है। अत देवता पुरुषाकार होते हैं यह सिद्ध हुमा । स्तुति जैसे- "प्रपात इन्द्र स्थविरस्य बाह" " वाहू " " यत्संगृम्णा मघवन्काशिरित इन्द्र - है इन्द्र ! हम, स्थविरस्य ते - वृद्ध तुम्हारे, ऋष्या - दर्शनीय, वाहू - बाहुओ के रूपर, आश्रित हैं। प्रथम सम्पूर्ण मन्त्र- उरुं नौ लोकमनु' नेपि विद्वान्वज्योतिरभयं स्वस्ति । ऋष्व त इन्द्र स्थविरस्य वाहू उप स्थेयाम शरणा वृहन्ता ॥ ऋस ४-७-३१-८॥
- निरुक्त सप्तमाध्यायस्य पष्ठः खण्डः । (१२२५) इस मन्त्र का गर्ग ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और इन्द्र देवता है । मन्त्रार्थ-इन्द्र = है इन्द्र ! तुम, 'विद्वान् = विद्वान् हो । नः = हमे, उरुम् = विस्तीण, लोकम् = लोक मे, अनुनेपि = ले जाना । और स्ववंद = सुखमय, अभयम् = भय रहित, ज्योतिः - आलोक में, स्वस्ति = कुशल पूर्वक, अनु नेपि = ले जाना । स्थविरस्य ते = सव से प्राचीन अर्थात् वृद्ध तुम्हारे, ऋप्वा = दर्शनीय, वृहन्तार महान, बाहू = वाहुओं के ऊपर, शरणा = रक्षा के लिये हम, उप स्थेयाम = आश्रित हैं। इस मन्त्र में पुरुष के समान वाहु अङ्ग वाले इन्द्र की स्तुति है । अतः देवता पुरुषाकार होते हैं। द्वितीय सम्पूर्ण मन्त्र- उताभये पुरुहूत अवौभिरेको' दृळहमवदो वृत्राहा सन् । इमे चिदिन्द्र रोदसी अपारे यत्संगृथ्णा मंधवन्काशिरित्ते ॥ सं. ३-२-१-५॥ . %3D इस मन्त्र का विश्वामित्र ऋप, त्रिष्टुप् छन्द और इन्द्र देवता है । मन्त्रार्थ - इन्द्र : तुम बहुत लोगों के द्वारा, पुरुहूत आहूत और, अवोभि. - वीर्ययुक्त हो। एकः सन् = अकेले ही तुमने, वृत्रहा = वृत्र का वध करके, अभये यद्वाक्यम् = देवो को-जो अभय वाक्य उसको-अवदः - प्रदान किया था वह, हळहम् सत्य है। मघवन् = हे इन्द्र ! तुम, अपारे चित् इमे रोदसी = अपार द्यावापृथिवी को, यत्संगृम्णा = जो संयोजित करते हो, ते = वह तुम्हारी महिमा, काशिः इत् = प्रकाशित अर्थात् प्रख्यात ही है। इस मन्त्र मे मनुष्य के आकार समान इन्द्र की स्तुति है। अतः मनुष्य के आकार के समान आकार वाले देवता होते हैं यह प्रतीत होता है अथापि पौरुपेयविधिकैव्यसंयोगैः । 'देवता मनुष्यकार होते हैं ' इस में तीसरा हेतु देते हैं-अथ अपि = और भी, पौरपेयविधिक:- पुरुषों के समान, द्रव्यो के समान, द्रव्यसंयोग: = द्रव्यो के संयोगो से देवतायो की सुति बहुत हैं । जैसे- आ द्वाम्यां हरिम्यामिन्द्र याहि ” “ कल्याणीऑया सुरणं गृहे ते" है इन्द्र ! तुम, द्वाभ्याम् हरिभ्याम् = दो हरि नाम अश्वों के द्वारा, आयाहि = आओ। इन्द्र = हे इन्द्र !, ते गृहे = तुम्हारे घर में, कल्याणो जाया = मङ्गलकारिणो को और, सुरणम् । सुन्दर गोत आदि की ध्वनि है । प्रथम सम्पूर्ण मन्व- आ द्वाभ्यां हरिभ्याभिन्द्र याह्या चतुभिरा पाई हुँधमानः । अष्टाभिर्दशभिः सोमपेयमयं सुतः सुमख मा मृधंस्कः ॥ कसं. २-६-२१-४॥
(१२२६) निरुत सप्तमाध्यायस्य पष्ठः खण्डः । इस मन्त्र का गृत्स्यद प्रापि, त्रिष्टुप् छन्द और इन्द्र देवता है। मन्त्रार्थ-इन्द्र = हे इन्द्र !, आहूयमान = बुलाये जाने पर तुम, द्वाभ्याम्, चनुभि , पति, अष्टाभि , दशभिः = दो, चार, छ', आठ अथवा दश, हरिभ्याम् = हरि नामक अश्वो के द्वारा, सोमपेयम् = सोमपान के लिये, आयाहि आओ । सुमख = हे शोभन यज्ञ वाले इन्द्र !, अयम् = यह, सुत. = अभिपूत सोम, तुम्हारे लिये प्रस्तुत है, इस को, सृव मा क. - नाश न करो। द्वितीय सम्पूर्ण मन्त्र- अपाः सोममस्तमिन्द्र प्र या हि कल्याणीर्जाया सुरणं गृहे ते । यत्रा रथस्य बृहतो निधानं' विमोचनं वाजिनो दक्षिणावत् ॥ क स. ३-३-१९-६ ॥ इस मन्त्र का विश्वामित्र ऋप, त्रिष्टुप् छन्द औप इन्द्र देवता है। मयार्थ-इन्द्र = है इन्द्र ! यही ठहर कर, सोमम् अपा. - सोमपान करो और सोमपान करके, अस्तम् प्रयाहि = अपने घर जाओ। ते गृहे = तुम्हारे घर मे, कल्याणी जाया = मङ्गलकारिणी शची नामक खो और, दक्षिणावद - सप्रयोजन, सुरणम् = सुन्दर गीत आदि की ध्वनि है। यत्र बृहत जिस महद गृह मे, विधानम् = रथ की बडी शाला है । यहा जा कर, वाजिन, विमोचनम् = रथ से अश्वो को छोडो। यथोक्त दोनो मन्त्रो मे पुरुप के द्रव्यो के समान द्रव्यो के सयोग से इन्द्र की स्तुति है। सिद्ध है कि देवताओ के आकार मनुष्य सदृश है। चतुर्थ हैतु- अथापि पौरुपविधिकैः कर्मभिः । अथ अपि = और भी, पौरपविधिक = पुरप के सदृश, कर्मभि कर्मों से देवताभो की स्तुति है। जैसे- अद्धीन्द्र पित्रं च प्रस्थितस्य" आश्रुत्कर्णश्रुधी हवम् । रथस्य से यह “ " इति निरुक्त सप्तमाध्यायस्य पष्ठ खण्ड ।। ७-६ ।। तुम, प्रस्थितस्य - प्रस्तुत पुरोडाश को, अद्धि - भक्षण करो, च = ओर अभिपुत सोम को, पिव = पान करो। आश्रुत्कर्ण - हे सर्व तरफ सुनने योग्य कानवाले इन्द्र ! तुम, हवम् = हमारे आह्वान वो, ध्रुधी - सुनो। इन दोनो मन्त्रो मे खाना पोना तथा सुनना आदि कर्म पुरुप के सदृश देवताओ के देखे जाते हैं। मत देवता पुरुषाकार हैं यह 'प्रतीत होता है। प्रथम सम्पूर्ण मन्त्र- इदं हविर्मघवन् तुभ्यं रातं प्रति सम्राळहणानो गृभाय । तुभ्यं सुतो मघवन् तुभ्यं पक्को द्धीन्द्र पिवं च प्रस्थितस्य ॥ + स ८-६-२१-७ ॥ - । इदम् हवि. . मिवक्त सप्तमायायस्य सप्तमा सण्डः । ((१२२७) इस मन्त्र का स्थूलपुत्र अग्नि ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और इन्द्र देवता हैं। मन्नार्थ---सम्राट मघवन् = हे सम्राट तथा घनी इन्द्र', तुभ्यम् = तुम्हारे लिये रातम् - हमारे द्वारा दिया हुआ - यह हव्य द्रव्य, अहणान क्रोध न करते हुए, प्रतिगृभाय = ग्रहण करो। मघवन् : है इन्द्र!, तुभ्यम् - तुम्हारे लिये सोम, सुतः = आभिषुत है और, तुभ्यम् - तुम्हारे लिये पुरोडाश, पिक: = परिपक है। इन्द्र हे इन्द्र! उसको तुम, अद्धि = भक्षण करो। प्रस्थितस्य - तुम्हारे लिये प्रस्थापित सोम का, पिब = पान करो। द्वितीय सम्पूर्ण मन्त्र- आश्रुत्कर्ण श्रुधी हवं नूचिंधिष्व मे गिरः । इन्द्र स्तोममिमं मम कृष्वा युजश्चिदन्तरम् ॥ ऋ सं. १-१-२०-९ ॥ %D इस मन्त्र का मधुच्छन्दा ऋषि, अनुष्टुप् छन्द और इन्द्र देवता है । मन्त्रार्थ-आधुत्कर्ण इन्द्र = हे सर्व तरफ सुनने योग्य कर्ण वाले इन्द्र! तुम हमारे, हवम् = आह्वान को, नक्षिप्रम् शोघ्र, श्रुधि सुनो। मे = हमारी, गिर. चित् = स्तुति रूप वाणी को, दधिष्व = चित्त में धारण करो। मम = हमारे, इमम् स्तोमम् = इस स्तोत्र को और हमारे, युजश्चित् = मित्र के स्तोत्र को, अन्तरम् = पास, कृप्व - रखो। - अथ निरुक्त सप्तमाध्यायस्य सप्तम. खण्डः । 7 A अपुरुषविधाः स्युरित्यपरम् । अन्य मत अपुरुषविधाः = पुरुषो से भिन्न प्रकार के आकारवाले देवता, स्युः - होते हैं, इति = यह, अपरम् = दूसरा मत है । अर्थात् मनुष्यो के आकार के समान आकार वाले देवता नही हैं किन्तु मनुष्य के आकार से भिन्न आकारवाले देवता होते हैं । इस मे हेतु देते हैं- अपि तु 3 । D 7 अपि तु यदृश्यते अपुरुषविधं तत् । तद्यथा-अनिर्वायुरादित्यः पृथिवी चन्द्रमा इति । पयोकि, यदृश्यते जो कुछ देखा जाता है, तत् = वह, अपुरुषविधम् = अपुस्प के समान है। तद् यथा - वह जैसे-अग्निः = अग्नि, वायु. वायु, आदित्य. - मादित्य, पृथिवी पृथिवि, चन्द्रमा - चन्द्रमा, इति = यह । भाव यह है कि अग्नि आदि का अङ्गारादि साकार प्रत्यक्ष दृष्ट है । उन को पुस्पाकार मानने पर दृष्ट हानि होगी। अतः अग्नि आदि देवता अपुरुषविध हैं। इसी प्रकार अदृष्ट इन्द्रादि भी अपुरुपविष ही हैं। जैसे सभी मनुष्य तुल्य होने पर कोई भावारी मोर कोई आकार विना का नही होता है। वैसे हो सभी देवता तुल्य होने पर इन्द्रादि याकारी और अग्नि आदि आकार विना का नहीं हो सकता है किन्तु अग्नि आदि पो अनाकारी देखने से इन्द्रादि भी मनाकारी होगें यही कहना समुचित है । अत अपुरपविध देवता हैं।
. - 1 (१२२८) निरुक्त सप्तमाध्यायस्य सप्तमः खण्डा। यथो एतत् - "चेतनावद्धद्धिस्तुतयो भवन्ति" इति - अचेतनान्यप्येवंस्तूयन्ते, यथाक्षप्रभृतीन्योपषिपर्यन्तानि । यथो एतत् = और जो यह कहा कि, चेतनावद्धद्धि , चेतनावानो की, स्तुतयः = स्तुतिएँ, भवन्ति = होती हैं, इति = यह, अचेतनानि अपि = अचेतन भी, एवम् = वैसे ही, स्तूयन्ते = स्तुति किये जाते है यथा - जैसे, अक्षप्रभृतीनि = अक्ष अर्यात् पासा ले कर, ओषधिपर्यन्तानि = ओषधि पर्यत । भाव यह है कि, याज्ञिको ने यह जो कहा कि चेतनावानो की स्तुति होती है, अचेतन की नहीं। अत स्तुति देखे जाने से देवता चेतन ही होना चाहिये, अचेतन नहीं। इसका उत्तर यह है कि, यह नियम नही कि, चेतन की ही स्तुति होती है, किन्तु अचेन अक्ष ओषधि आदि को भी स्तुतिऐं देखी जाती हैं तो यह कैसे कह सकते हैं कि देखता सब चेतन ही होते हैं । यथोएतत्-" पौरुपविधिकरङ्गः संस्तुयन्ते" इति, अचेतनेष्यप्येतद्भवति-" अभिनन्दन्ति हरितेभिरासभिः" इपिग्रावस्तुतिः । यथो एतत् = और जो यह कहा कि, 'पौरुपविधिकरङ्ग सस्तूयते = पुरुषो के समान अङ्गो से स्तुति किये जाते है, इति यह, यह हेतु भी समर्थ नही क्योकि, अचेतनेषु अपि अचेतनो मे यह, भवति = है। जैसे-'हरितेभि आसाभि = हरेहरे मुखो से पाषाण, अभिनन्दति बुलाते हैं,' इति = यह, ग्रावस्तुति = ग्राव अर्थात् पापाण को स्तुति है, जो चेतन नहीं है । भाव यह है कि, 'स्तुति केवल चेतन की ही होती है' यह नियम नही, किन्तु अचेतन (जड) ग्रावण आदि की भी स्तुति देखी गई है तो यह कैसे कह सकते है कि चेतन को ही स्तुति होती है और देवतागो की स्तुति देखी जाती है, अत देवता चेतन ही होते है ' । सम्पूर्ण मन्त्र- एते वदन्ति शतवत्सहस्रवनि क्रन्दन्ति हरितेभिरासभिः । विष्वी ग्रावाणः सुकृतः सुकृत्यया होतुश्चित्पूर्वे हविरद्यमाशत र स ८-४-२९-२ ॥ इस मन्त्र का अर्बुद ऋषि, जगती छन्द और ग्रायाण !(प्रस्तर) देवता है। मन्त्रार्थ-एते ये ग्रावाण, शतवत्सहस्रवत् = सो वा सहस्र व्यक्तियो के समान, 'पदन्ति वोलते हैं अर्थात् पद परते हैं। हरितेभि आसभि ये सोमससर्ग से हरितवर्ण मुसो से, अभिनन्दन्ति = सोमपान के लिये देवो को बुलाते हैं। सुकृत ग्रावाण : शोभनार्मा ये पत्यर, विष्ली - यज्ञ यो पाकर, होतु'- देवो को आह्वान करने वाले अग्नि थे, पूर्वेचित् = पर्व ही, अद्यम् हवि = भक्षणीय हवि को, आशत - पाते हैं। अथो एतत्-" पौरपविधिकद्रव्यसंयोगेः" इति, एतदपि तादृशमेव "सुसं रथं युपुजे सिन्धुश्विनम्" इति नदी स्तुतिः । भी, एनव , 4 %3D विरुक्त सप्तमाध्यायस्य सप्तमः खण्डः । (१२२९) अथो एतद - और जो' यह कहा कि, "पौरुषविधिकद्रव्यसंयोगः - पुरुषों के द्रव्यों के समान, द्रव्यसंयोगः = द्रव्गों के संयोगों से देवताओं की स्तुति है। अतः देवता पुरुषाकृति हैं । इति = यह, एतत् अपि = यह हेतु भी, तादृशम् एव वंसा ही दुर्वल है। जैसे-'सिन्धुः = सिन्धु नदी ने, सुखम् लोकसुखकर, अश्विनम् रथम् = अश्वयुक्त रथ को, युयुजे = जोड़ा था' इति - यह, नेदी- स्तुति - नदी की स्तुति है । सम्पूर्ण मन्त्र- सुखं रथं' युयुजे सिन्धुरश्विन तेन वाजं सनिषदस्मिन्नाजौ। महान ह्यस्य महिमा पनस्यतेऽदव्धस्य स्वय॑शसो विरप्शिनः ॥ ऋ. सं.८-३-७-९॥ D इस मन्त्र का प्रियमेघ-पुत्र सिधुक्षित ऋपि, जगती छन्द और नदी देवता है। मन्त्रा- सिन्धु देवता, सुखम् = सुखकर और, अश्विनम् = अश्व वाले, रथम् = रथ को, युयुजे = जोतता है। •= उस रथ से वह. वाजम् = अन्न, सनिपत् = दे। अस्मिन् माजी - इस संग्राम में अथवा यश में, यस्य = इस सिन्धुरथ की. महान् महिमा महामहिमा, पनस्यते = गाई जाती है। हि पयोंकि, सिधु का रथ, अदव्यस्य स्वयशसः विरप्शिन: अहिंसित कीतिकर और महान् है। इस मन्त्र में नदी को स्तुति है जो मनुष्याकार नहीं । अत. अपुरुपविध देवता है। पुरूपविध नहीं। • अथो एतत्-'पौरुपविधिकः कर्मभिः' इति, एतदपि तादृशमेव-" हेतुवित्पूर्व इपिर- मागत"। इति ग्रावस्तुतिरेव । • अयो एतत् = और जो यह कहा कि, पौरुपविधिकः कर्मभिः = पुरुषों के समान कर्मों से, देवताओं की स्तुति है। अत: देवता पुरुपाकार हैं. इति = यह, एतदपि = यह भी, तादृशम् एव र पैसा ही असमर्थ हैं। क्योकि, “हेतुम्चिद', इति = यह मन्त्र, ग्रावस्तुतिः एव = परयर की स्तुति हैं । इस मन्त्र की व्याख्या समीप मे ही कर माये हैं। भाय यह है कि, यदि स्तुति केवल चेतन को हो होती हो तो स्तुति देसने से देवता पुम्पाकार हैं यह कह सकते थे। सो तो है, नहीं, किन्तु प्रस्तर माहिं जड को भी स्तुति देखी जाती है । अतः देवता पुस्पाकार नहीं। अपि वा उमय विधाः स्युः। अपि या = अपया, उभयविधा: = दोनों प्रकार के देवता, स्युः = हैं । अर्थात् दोनों प्रकार के प्रमाण प्राप्त होने से पुरषाकार और अपुरुषावार दोनों प्रकार के देवता होते हैं। अपि या पुरुषविधानामेव सतों कर्मात्मान एते स्युः। अपि पा : अपना, पुरषधियानाम् एव सताम् = पुरुषापार रहने वाले . हो, एते . कर्मात्मानः - मरूप, पुः - हों। भार यह है कि, पुरपश्षि और अपुरपपिप, में दोनों ही -- 1 1 1 . %3D यथो एतत् (१२२८) निरुक्त सप्तमाध्यायस्य सप्तमा खण्टा । यथो एतत् - "चेतनावद्धद्धिस्तुतयो भवन्ति" इति --- अचेतनान्यप्येवंस्तूयन्ते, यथाक्षप्रभृतीन्योपधिपर्यन्तानि । यथो एतत् = और जो यह कहा कि, चेतनावद्धद्धि = चेतनावानो की, स्तुतय. = स्तुतिएँ, भवन्ति = होती है, इति = यह, अचेतनानि अपि अचेतन भी, एवम् = वैसे ही, स्तूयन्ते - स्तुति किये जाते हैं, यथा = जैसे, अक्षप्रभृतीनि = अक्ष अर्यात् पासा ले कर, ओपधिपर्यन्तानि = ओषधि पर्यत । भाव यह है कि, याज्ञिको ने यह जो कहा कि चेतनावानो की स्तुति होती है, अचेतन को नही । अत स्तुति देखे जाने से देवता चेतन ही होना चाहिये, अचेतन नही। इस का उत्तर यह है कि, यह नियम नहीं कि, चेतन की ही स्तुति होती है, किन्तु अचेन अक्ष ओपधि आदि को भी स्तुतिऐं देखी जाती हैं तो यह कैसे कह सकते हैं कि देखता सब चेतन ही होते हैं। यथोएतत्-" पौरुषविधिकरङ्गैः संस्तृयन्ते " इति, अचेतनेष्वप्येतद्भवति-" अभिनन्दन्ति हरितेभिरासभिः" इविग्रावस्तुतिः । और जो यह कहा कि, 'पौरुपविधिकरङ्ग सस्तूयते = पुरुषो के समान अङ्गो से स्तुति किये जाते है, इति = यह, यह हेतु भी समर्थ नही क्योकि, अचेतनेषु अपि = अचेतनो मे भी, एनव - यह, भवति = है । जैसे-'हरितेभि आसाभि = हरेहरे मुखो से पाषाण, अभिनन्दति बुलाते हैं,' इति = यह, ग्रावस्तुति = ग्राव अर्थात् पापाण को स्तुति है, जो चेतन नहीं है भाव यह है कि, 'स्तुति केवल चेतन की ही होती है' यह नियम नही, किन्तु अचेतन (जह) ग्रावण आदि की भी स्तुति देखी गई है तो यह कैसे कह सकते है कि चेतन की ही स्तुति होती है और देवतामो की स्तुति देखी जाती है, अत देवता चेतन ही होते है ? । सम्पूर्ण मन्त्र- एते वदन्ति शतवत्सहस्रवदभि क्रन्दन्ति हरितेभिरासभिः । विष्ट्वी ग्रावाणः सुकृतः सुकृत्यया होर्तुश्चित्पूर्वे हविरद्यमाशत म स ८-४-२९-२ ॥ इस मन्त्र का अर्बुद पि, जगती छन्द और ग्रायाण !(प्रस्तर) देवता है। मन्त्रार्थ-एते ये ग्रावाण, शतवत्सहस्रवत् = सौ वा सहन व्यक्तियो के समान, ' वदन्ति वोलते हैं अर्थात पद करते हैं। हरितेभि आसभि = ये सोमससगं से हरितवर्ण मुखो से, अभिनन्दन्ति सोमपान के लिये देवो को बुलाते हैं । सुकृत ग्रावाण - शोभनकर्मा ये पत्थर, विष्ट्री पाकर, होतुः देवों को आह्वान करने वाले अग्नि के, पूर्वेचित् पर्व हो, यद्यम् हवि = भक्षणीय हवि को, आशत = पाते हैं। अथो एतत्-" पौरुपविधियसंयोगेः" इति, एतदपि तादृशमेव "सुसं रथं युयुजे सिन्धुरश्विनम्" इति नदी स्तुतिः । . - - यज्ञ %3D निरुक्त सप्तमाध्यायस्य सप्तमः खण्डः । (१२२९) अथो एतत् = और जो यह कहा कि, "पौरुपविधिकैद्रव्यसंयोगः - पुरुषो के द्रव्यों के समान, द्रव्यसयोग. = द्रगो के सयोगो से देवताओ की स्तुति है। अतः देवता पुरुषाकृति हैं । इति यह, एतत्अपि = यह हेतु भी, तादृशम् एव = वैसा ही दुर्वल है। जैसे-'सिन्धुः - सिन्धु नदी ने, सुखम् = लोक सुखकर, अश्विनम् रथम् = अश्वयुक्त रथ को, युयुजे = जोड़ा था' इति = यह, नदी- स्तुति = नदी की स्तुति है । सम्पूर्ण मन्त्र- सुखं रथं युयुजे सिन्धुरश्विन तेन वाजं सनिषदस्मिन्नाजौ । महान ह्यस्य महिमा पनस्यतेऽदव्धस्य स्वयंशसो विरप्शिनः ॥ ऋ. स. ८-३-७-९॥ इस मन्त्र का प्रियमेघ पुत्र सिन्घुक्षित् ऋषि, जगती छन्द और नदी देवता है। मन्त्रा- सिन्धु देवता, सुखम् = सुखकर और, अश्विनम् = अश्व वाले, रथम् = रथ को, युयुजे = जोतता है। तेन = उस रथ से वह वाजम् = अन्न, सनिषत् = दे। अस्मिन् आजी - इस सग्राम मे अथवा यज्ञ मे, यस्य = इस सिन्धुरथ की. महान महिमा = महामहिमा, पनस्यते = गाई जाती है। हि पोकि, सिन्धु का रथ, अदम्यस्य स्वयशसः विरप्शिनः अहिंसित कोतिकर और महान् है। इस मन्त्र मे नदी की स्तुति है जो मनुष्याकार नहीं । अत. अपुरुषविध देवता है । पुरूपविध नहीं । । अथो एतद्-'पौरुपविधिकैः कर्मभिः' इति, एतदपि तादृशमेव-" हेतु चित्पूर्व हविरध- माशत " । इति ग्रावस्तुतिरेव । और जो यह कहा कि, पौरुपविधिक कर्मभिः = पुरुषो के समान कर्मों से, देवताओ की स्तुति है । अतः देवता पुरुषाकार हैं. इति = यह, एतदपि - यह भी, तादृशम् एव = वैसा हो असमर्थ हैं । क्योकि, 'हेतुश्चित', इति = यह मन्त्र, ग्रावस्तुति. एव = पत्थर की स्तुति हैं । इस मन्त्र की व्यास्या समीप मे ही कर आये हैं । भाय यह है कि, यदि स्तुति केवल चेतन की हो होती हो तो स्तुति देखने से देवता पुपातार हैं यह कह सकते थे। सो तो है नहीं, किन्तु प्रस्तर मादि जड की भी स्तुति देखी जाती है । अतः देवता पुस्पाकार नहीं । अपि वा उमय विधाः स्युः। अपि या = अथवा, उभयविधा: = दोनों प्रकार के देवता, स्युः = हैं । अर्थात् दोनों प्रकार के प्रमाण प्राप्त होने से पुरुषाकार और अपुरुषाकार दोनो प्रकार के देवता होते हैं । अपि या पुरुषविधानामेन सिता कर्मात्मान एते स्युः । अपि पा = अथवा, पुरुषविधानाम् एव सताम् = पुरुषापार रहने वाले के हो, एते - ये, कारमानः = कर्मरूप, स्युः - हो। . भाव यह हैं कि, पुरुषविध और अपुरुषविध ये दोनो ही 'अथो एतत् m- (१२३०) निवक्त सप्तमाध्यायस्याप्टमः खण्डा । स्वरूपो वाले देवता हैं। क्योकि, दोनों प्रकार के देवताओ का वर्णन पाया जाता है। परमात्मा, इन्द्र तथा मनुष्यो से सम्बन्ध रखनेवाले देवता पुरुपविध और अश्वादि पशु, द्यूत, पूथिवी तथा चन्द्रमा आदि से सम्बन्ध रखने वाले देवता अपुरपविध हैं। यथा यज्ञो यजमानस्य । जैसे, यजमानस्य = यजमान का, यज्ञ - यज्ञ । भाव यह है कि, यजमान के दो रूप होते हैं। एक पुरुष और दूसरा यज्ञ। क्योकि, वर्तमान शरीर से कर्म का अनुष्ठान करता है और कर्म से प्राप्त गरीर से स्वर्ग जाता हैं । शरीर पुरूपविध और यज्ञ अपुरुपविध । यथा एप चाख्यानसमयः। इति निरुक्ते सप्तमाभ्यायस्य सप्तम खण्ड: ।। ७-७ ॥ और, एपः = यहो, अ स्यानसमय = पथा में प्रवीणो का पक्ष (मत) है । स्पष्टीकरण- प्रथम पक्ष पुष्पाकार, द्वितीय पक्ष पुरपायार, तृतीय पक्ष कर्म के लिये उभयाकार और चतुर्थ पक्ष सदा उभयाफार देवता होते हैं। इन में सृतीय और चतुथं दोनों पक्ष अच्छे हैं । इन दोनो मे भेद फेवल इतना ही है कि, तृतीय पक्ष मे जब देवता चाहता है तव पुरुषावार हो जाता है। और जव नहीं चाहता है तब अपुरपाकार ही रहता है। और चतुर्य पक्ष मे अधिष्ठाता के रूप में देवता सदा पुरपाकार हो रहता है। इन में तृतीय पक्ष नैरक्तों या और चतुपं आस्यान पक्ष है। भारत में पाख्यान -पृथियों ने बी के मायार (स्प) से अपने ऊपर से भार उतारने के लिये ब्रह्माजी से प्रार्थना की। अग्निने ग्राह्मण के रूप से श्रीकृष्ण और अर्जुन से साफ्टव वन मांगा और पुरुष तथा मग्नि के रूप से पाण्डव यन का दाह किया। देवता महाभाग्य होते हैं। समय समय पर जैसा चाहें वैसा रूप धारण करते हैं। अप निएक्त सप्तमा पापस्याप्टमः सर. । तिस एव देवता इत्युक्त पुरस्तात् । तासां भक्तिमाहचर्य प्याख्यास्यामः | तिषः एम - तीन ही, देवता. - देवता हैं, इति + यह, पुरस्तात् - पहले, उक्तम् - यहा गया है। तासाम् - उन तीनो देवतालो के, साहचर्यम् = भक्ति अर्यात भाग घोर साहवयं बाद साथ रहने को, व्यारपास्याम. = ध्याच्या करेंगे। अर्याद जो जो उन का भाग है और उनके साप रहते हैं उन पो पर्वारा प्रारम्भ यहां से होता है। अर्थतान्यग्निमक्तीनी । अप महा से, एतानि - दे सक, अग्निमतान मग्नि पे नाग है। नी पनि श्री अपनी वस्तु है। इन से मग्नि या नित्य सम्बाय है। न्यादि।
, नाते सप्तमाध्यापस्याप्टमः खण्डः । (११२३१) अयं लोकः, प्रातः सवनम् , वसन्तः, गायत्री, विवृत्स्तोमः, रथन्तरं साम । अयम् = यह, लोकः - पृथिवी लोक है। प्रातः सवनम् = प्रात.सवन, वसन्तः = वसन्त ऋतु, गायत्री = गायत्री छन्द, त्रिवृत्स्तोमः = त्रिवत् नामक स्तोम, रयन्तरम् साम = रथन्तर नामक साम । ये च देवगणाः समाम्नाता: प्रथम स्थाने । च - और, ये - जो, देवगणाः = देवगण, प्रथमे स्थाने = प्रथम स्थान में, (नि. अ. ५, ख. १-२-३) समान्माता: - गिनाए हैं। उन के नाम- अनायी-पृथिवी-इला-इति स्त्रियः । अग्नायी, पृथिवी और इला, ये अग्नि की स्त्रियें हैं। अथास्य कर्म - वहनश्च हविपाम् , आवाहनश्च देवतानाम् , यश्च किश्चिद् दार्षिविपयिकमग्निकर्मैव तत् । अथ = अब, अस्य = इस अग्नि का, कर्म-हविषाम् = हषियों का, वहनम् = वहन करना अर्थात् देवताओ के पास पहुचना, च = और, देवतानाम् = देवताओ का, आवाहनम् आवाहन करना अर्थात् 'बुलाना। च = और यत् किश्चित् = जो कुछ, दाष्टिविपयिम् = दृष्टि विषयक वह, अग्निकर्म एव अग्नि का ही कर्म है। - पदार्थ है, तद अथास्य संस्ताविका देवाः । इन्द्रः सोमो वरुणः पर्जन्य ऋतवः । अथ - अय, अस्य =' इस' अग्नि के, संस्ताविकाः देवा. = सस्तविक देवता हैं। अर्थात् जिन के साथ इस अग्नि की स्तुति होती है वे देवता हैं । जैसे-इन्द्र इद्र, सोमः = सोम, वरुणः= वरुण, पर्जन्यः - पर्जन्य और, ऋतवः - ऋतुएँ। इन इन्द्रादि के साथ अग्नि की स्तुति होती है। अतः इन्द्रादि अग्नि के संस्ताविक देवता कहे जाते हैं। इन्द्र के साथ सस्तव-उदाहरण- अम. इन्द्रश्च दाशुषो दुरोणे सुतावतो यज्ञमिहोपं यातम् । ... अमर्धन्ता सोमपेयाय देवा ॥ क सं. ३-१-२५-४ ।। 1 - t 4 इस मन्त्र का विश्वामित्र ऋषि, विराऽनुष्टुप् छन्द और अग्नि और इन्द्र दोनो देवता हैं। मन्त्राथं आने = हे इग्नि देव ! तुम, च = और, इन्द्रः = इन्द्र दोनो, देवा = देवता, अमघन्ता यज्ञ की हिंसा न करते हुए, सुतंवतः = सोम अभिपवकर्ता, दाशुषः - हविता, यजमान के, इह दुरोणे - इस गृह, यज्ञम् - यज्ञ को लक्ष्य करके, सोमपेयाय : सोमपानके लिये, उप यातम् = आमो। सोम के साथ सस्तवोदाहरण- D D (१२३२) निरुक्ते सप्तमाध्यायस्याप्टमा खण्ड: । अग्नीषोमाविमं सु म शृणुतं वृषणा हव॑म् । प्रति सूक्तानि हर्यत भवतं दाशुषे मयः ॥ क स. १-६-२८-१ ॥ इस मन्त्र का गोतम ऋपि अनुष्टुप् छन्द और अग्नि तथा सोम देवता है। मन्त्रार्थ-वृषणा अग्नीषोमो = हे अभीष्टवर्षी अग्नि और सोम !, मे इमम् हवम् = मेरे इस आह्वान को, सुशृणुतम् ध्यान देकर सुनो। सूक्तानि प्रतिहर्यतम् = स्तुति ग्रहण करो। दाशुषेमय = भवतम् - हव्यदाता को सुखप्रदान करो। वरुण के साथ मस्तवोदाहरण- त्वं नो अग्ने वरुणस्य विद्वान्देवस्य हेळोऽव यासिसीष्ठाः । यजिष्ठो वहितमः शोशुचानो विश्वा द्वेषांसि प्र मुमुग्ध्यस्मात् ॥ ऋ स. ३-४-१२-४ ॥ इस मन्त्र या वामदेव ऋपि, त्रिष्टुप छन्द और वरुण देवता है। मन्त्रार्थ-अग्ने = हे अग्निदेव ! तुम, विद्वान् = सम्पूर्ण पुरपार्थ के साधनो को जानते हो। त्वम् = तुम, न. - हमारे प्रति, वरुणस्य देवस्य - वरुण देव के, हेल मोघ वा अव यासिसीप्ठा अपनोदन करो। तुम सब वो अपेक्षा अधिप, यजिष्ठः = याज्ञिक, वह्नितम = हविर्वाही और, शोशुचानः = अतिशय दीप्तिमान हो । तुम, अस्मत् = हम लोगो को, विश्वाद्वेषासि सर्व प्रकार के पापो से, प्रमुमुग्धि विशेषरूप से मुक्त करो । पर्जन्य के साथ सस्तव उदाहपण- अग्नीपर्जन्याववतं धियं मेऽस्मिन्हवे' सुहवा सुष्टुतिं नः। इळामन्यो जनयद्गर्भमन्य प्रजावतीरिष आ धत्तमस्ये ॥ स. ४-८-१६-१६ ॥ इस मन्त्र का भारद्वाज ऋपि, त्रिष्टुप छन्द और अग्नि एवं पर्जन्य देवता हैं। मन्त्रार्थ- अग्निपर्जन्यो - हे अग्नि और पजन्य ', मे = हमारे, घियम् = यज्ञ-कार्य को, अवतम् - रक्षा करो। सुहवा - है अनापास बाह्वान के योग्य !, अस्मिन् हवे = इस यज्ञ मे, न न हमारे, सुष्टुतिम् : स्तोत्र को सुनो । अन्य. - तुम मे से एक जो पजन्य है वह, इळाम् = अन्न, जनयत् = उत्पन्न करता है। अन्य = दूसरा जो अग्नि है वह, गर्भम् - गर्भ, जनयद उत्पन्न करता है। इस लिये तुम, अस्मे = हमे, प्रजावतो = सन्तति के साप, इप. = अन्न, आपत्तम् - अवस्था पन फरो अर्थात् अन्न दो। माओ के साथ सस्तव उदाहरण- अग्ने देवाँ इहा वह सादया योनिषु त्रिपु । परि भूप पिर्व ऋतुना ॥ ऋ सं.१-१-२८-४ ।। = . निरुक्त सप्तमाध्यायस्य नवम. खण्ड' । (१२३३) इस मन्त्र का मेघातिथि ऋपि, गायत्री छन्द और आग्न एव ऋतु देवता है । मन्त्रार्थ-अग्ने * हे अग्निदेव ! , देवान् = देवो को, इह - यहा, आवह = बुलाओ और उन्हे त्रिपुयोनिपु = प्रात सवन, मध्याह्न सवन और सायसवन नामक तीनो यज्ञ स्थानो मे, सादय - बैठायो । परिभूष. उन्हे अलकृत करो। और तुम, ऋतुना = ऋतु के साथ, पिब = सोमपान करो। आग्रावैष्णवं च हविः। आग्नावैष्णवम् च = मग्नि और विष्णु को सयुक्त, हवि = हबि देते हैं । जैसे- अग्नाविष्णू सजोषसे मा वर्धन्तु वां गिरः । युम्नेर्वाजेभिरागतम् ॥ IFITT इस, मन्त्र का, नामदेव ऋपि, गायत्री छन्द और अग्नि तथा विष्णु देवता है। मन्त्रार्थ-अग्ना. विष्णू = हे अग्नि और विष्णु , सजोषसा = समान प्रीति के साथ, वाम् = कर्म स्वरूप तुम दोनो, हमारी इन स्तुतियो को, वर्धयन्तु = वढावें। वृद्धि होने के बाद, द्युम्न वाजेभि - दिव्य अन्न के साथ, आगतम् = हमारे यहा आओ। इस मन्त्र मे अग्नि और विष्णु इन दोनो देवताओ को साथ हवि तो देखी जाती है- इमा गिर नत्यसंस्तविकी दाशतयीषु विद्यते । तु = किन्पु दाशतयीपु - दश मण्डल ऋग्वेद मे, सस्तविकी ऋक् साथ स्तुति की रुचा, न विद्यते = कही मही है। अर्थात् अग्निदेव विष्णु के साथ हवि का भोजन तो करते हैं परन्तु किसी ऋचा मे एक साथ स्तुति नहीं देखी जाती है। अथाप्यानापौणं हविन तु संस्तवः । अथ अपि = और भो, माग्नापोष्णम् = अग्नि और पूपा का, हवि सस्तव = सस्तन, न = नहीं । तत्रतां निभक्तस्तुतिमृचमुदाहरन्ति । हावि है । तु % किन्तु, -- तत्र इति निरुक्त सप्तमाध्यायस्याप्टम खण्ड ॥ ७-८ ।। वहा, एताम् = एक यह. विभक्तस्तुतिम् ऋचम् = अलग स्तुति की, ऋचा, उदाहरन्ति उताहरण देते हैं- था निरुक्त सप्तमाध्यायस्य नवम बण्ड ।
, .. (१२३४) निफ्ते सप्तमाध्यायस्य नवमः खण्डः । पूषा स्वेतश्च्यावयतु प्र विद्वान टपशुर्भुव॑नस्य गोपाः । स त्वैतेभ्य परि ददपितृभ्योऽग्निर्देवेभ्यः सुविदत्रियेभ्याः ॥ ऋ सं. ७-६-२३-३ ॥ इस मन्त्र का यमपुत्र देवश्रवा ऋषि त्रिष्टुप् छन्द और पूषा नामक आदित्य देवता है। मन्त्रार्थ-हे मृत महष्य ! विद्वान् = ज्ञानी, अनष्ट पशुः = अविनष्टपशु, भुवनस्य गोपाः = संसार के रक्षक, पूषा = पूषा नामक अदित्य देव, त्वा - सुम्हें. इतः = इस मनुष्य लोक से, उत्तम लोक में, प्रच्यावयतु = ले जाये । सः = वह पूषा देव, त्वा - तुम्हे, एतेभ्यः पितृभ्यः = इन पितरों के लिये, परिददत् = दे देवें । अग्निः अग्निदेव, सुविदत्रियेभ्यः - धन वाले, देवेभ्यः - देवताओं के लिये, पितृलोक से भी तुझे देवलोक में पहुंचा दें। पास्क मन्त्रार्थ करते हैं- पूपा त्वेतः प्रच्यावयतु विद्वाननप्टपशुर्भुवनस्य गोपा हत्येप हि सर्वेषां भूतानां गोपाविताऽऽदित्यः। सत्वैतेभ्यः परिददपितृभ्य इति सांशयिकस्तृतीयः पादः । हे मृत मनुष्य !, पूपा = आदित्य, त्वा = तुम्हें, इतः = इस मनुष्य लोकसे, उत्तम लोक में प्रच्यावयतु = ले जाये, विद्वान् - वह पूपा ज्ञानी है। अनप्टपशुः = अविनष्टपणु है, और, भुवनस्य गोपाः संसार के रक्षक है। हि = क्योकि, इति एष आदित्यः = यह आदित्य, सर्वेषां भूतानाम् = सर्व प्राणियों के, गोपायिता = रक्षक है । स: = वह, स्वा = तुम्हे, एलेभ्यः पितृभ्यः = इन पितरों के लिये, परिददत् = दे देवें । इति = यह, तृतीयः पादः = मन्त्र के तीसरा पाद, सांशयिकः संशय - युक्त हैं। - 2 हुआ है, इति पूपा पुरस्तात् । पूषा - पूपा यह, पुरस्तात् = पहले 'पूपा त्वेत: प्रच्यावयतु ' इस वाक्य में मा चुका है । तस्यान्वादेश इत्येकम् । तस्य - इस में उसीका अन्वादेशः अन्वादेश अर्थात् बाद में दूसरी बार सः शब्द से प्रयोग = यह, एवम् = एक मत है। अग्निपरिष्टात्तस्य प्रकीर्तना-इत्यपरम् । अग्निः अग्नि यह, उपरिष्टात् = बाद में अर्थात् चतुर्थ पाद में, प्रकोतंना कथित हुआ है, इति = यह, अपरम् = दूसरा मत है। भाव यह है कि, मन्त्र में 'स: पद पाया है वह पूर्व भाया हुआ पूपा का परामर्थक हैं यह एक मत है और दूसरा यह है कि, उत्तर में 'अग्नि' पद भाया है उसी का परामर्थक 'स' पद है। चतुर्थ पाद की व्याख्या करने के लिये पुनः उल्लेख करते हैं- - । - निरुक्त सप्तमाध्यायस्य दशम, खण्डः । (१२३५) अग्नि - . ITA अग्निर्देवेभ्यः सुवित्रियेभ्यः। अग्निदेव, सुविदत्रियेम्य = धन देने वाले, देवेभ्य = देवों के लिये। प्राचा मे आये हुऐ पदो की व्याख्या करते हैं- "सुरिदत्रं धनं भवति । विन्दतेवकोपसर्गात् । दधातेर्वा स्याद् द्वियुपसर्गात् ।। इति निरूक्ते सप्तमाध्यास्य नवम खण्ड ॥ ७-९ ।। सुविदत्रम् = सुविदत्र, धनम् भवति - धन होता है। अर्थात् सुविदत्र शब्द का अर्थ घन है । एकोपसर्गाद वा = एक 'सु' उपसर्ग से अर्याद 'सु' उपसर्ग पूर्वक, विन्दते = विद् धातु से सुविदा' शब्द बना है। अर्थात 'मुखेन विन्दति इति सुविदत्रम् धनम् ' इस विग्रह में सु उपसर्ग पूर्वत्र ‘विठ्ठलाभे' घातु से 'अभिनज्ञियजिवधिपतिभ्योऽनन्' इस उणादि सूत्र से वाहुलकात् अत्रन् (अत्र ) प्रत्यय होने पर सुविदत्र शब्द बना है। धन का नाम है । क्योकि, धन सुख से या सुख के लिये प्राप्त होता है। वा = अथवा, द्वियुपसर्गात् = दो 'सु' 'वि' उपसर्ग से अर्थात् सु और वि दो उपसर्ग पूर्वक 'दा' धातु से 'सुविदा' शब्द बना है। अर्थात् 'सुखेन विशेषेण दीयते इति सुविदत्रम् धनम्' इस विग्रह मे सु वि पूर्वक ' उदाा दाने' धातु से, पूर्वोक्त उणादि सूत्र से अत्रन् प्रत्यय, सुविदा अत्र, आ लोप, सुविदत्र । सुविदत्रम् येषाम् अस्ति इति सुविदत्रिया तेम्य सुविदत्रि. येम्य इस विग्रह मे सुविदत्र शब्द से मत्वर्थीय घ प्रत्यय, इय् आदेश होने पर 'सुविदत्रिय' शब्द बना है । घनी का नाम है । 'सुविदनियेभ्य ' यह चतुर्थी बहुवचन का रूप है । अथ निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य दशम खण्ड । अथैतानीन्द्रभक्तीनि। अग्नि की भक्ति के कथन के वाद अव, एतानि = ये, इन्द्रभक्तोनि = इन्द्र की भक्ति का (भाग का) कथन किया जाता है- अन्तरिक्षलोकः, माध्यन्दिनं सवनम् , ग्रीष्मा, विष्टुप्, पञ्चदशस्तोमः, वृहत्साम । ये च देवगणाः समाम्नाता मध्यमे स्थाने याच स्त्रियः । । ९ अन्तरिक्षलोक अन्तरिक्षलोक, माध्यन्दिन सवनम् = माध्यन्दिन सवन, ग्रीष्म ग्रीष्म अनु, त्रिष्टुप् छन्द, पश्चदशस्तोम - पञ्चदश स्तोत्र, वृहरसाम बृहत्साम, च = और, ये = जो, देवगणा देवगण, मध्यमेस्थाने = मध्यम स्थान मे, समान्नाता = समाम्नान किये गये हैं, च = और, या = जो, खिय = आदविआदि लिये हैं वे सब इन्द्र के भाग हैं। अर्थात् इतनी इन्द्र की अपनी वस्तु हैं। इन से इन्द्र का नित्य सम्बन्ध है । इत्यादि । अथ =3 :
ये (१२३६) निरुक्त सप्तमाध्यायस्य दशमः खण्डः । यथास्य कर्म-रसानुप्रदानम् , घुत्रवधा, याच काच बलकृतिरिन्द्रकमैव तत् । अथ - इस के पश्चात् , अस्य = इस इन्द्र का, कर्म-रसानुप्रदानम् = जल वरना, वृत्रवधः वृत्र का वध, या च का च = और जो कुछ, बलकृतिः = बलकर्म, तत् = वह सब, इन्द्रकर्म एवं इन्द्र का ही कर्म है। अथास संस्तविका देवाः। अग्निः सोमो परुणः पूपा बृहस्पतिर्ब्रह्मणस्पतिः पर्वतः कुत्सो विष्णुर्वायुः । अथ = इस के पश्चात् , अस्य - इस इन्द्र के, संस्तविकाः देवाः संस्तविक देव (जिन के साथ ये स्तुति किये जाते हैं) ये हैं-अग्निः = अग्नि, सोमः = सोग, वरुणः = वरुण, पूषा = पूषा आदित्य, वृहस्पतिः = बृहस्पति, ब्रह्मणस्पतिः = ब्रह्मणस्पति, पर्वतः = पर्वत. कुत्सः = कुल्स विष्णुः विष्णु और, वायुः = वायु । ये सब इन (इन्द्र)के सस्तविक देव हैं। इन के साथ स्तुति किये जाते हैं। अग्नि के साथ इसका संस्तव उदाहरण जैसे- इन्द्राग्नी रोचना दिवः परि वाजेषु भूपथः । तद्वां चेति प्र वीर्यम् ॥ ऋ सं. ३-१-१२-९ ।। इस मन का विश्वामित्र ऋषि, गायत्री छन्द और इन्द्र तथा अग्नि देवता है । मन्त्रा-इन्द्राग्नी हे इन्द्र देव ! और हे अग्नि देव ! तुम, दिवः रोचना स्वर्ग के प्रकाशक हो। अतः तुम, वाजेषु संग्राम मे सर्वत्र, परिभूपथ - परिभूपित होओ। वाम् = तुम्हारी, वीर्यम् = सामर्थ्य, तत् युद्ध विजय को, प्रति = भलीभांति विदित्त करती है। इस ऋना में अग्नि के साथ इन्द्र की स्तुति की गई है। सोम के साथ इसका संस्तव-उदाहरण- इन्द्रासोमा तपतं रक्ष उब्जतं न्यर्पयतं वृषणा तमोवृधः । परा शृणीतमचितो न्योंयत हतं नुदेथां नि शिंशीतमत्रिणःः॥ म सं. ५-७-५-१॥ इस मन्त्र का वसिष्ठ ऋषि, जगती छन्द और इन्द्र तथा सोम देवता है। मन्त्रार्य-द्रा सोमा - हे इन्द्र ! और है सोम ! तुम, रक्षः = राक्षसों को, तपतम् = तपाओ - दु.स दो। उब्जतम् = मारो। वृषणा = हे अभीष्टवर्षक!, तमोवृधः अन्धकार में चढे हुए राक्षसों को, ज्यर्पयतम् = नीचे कर दो। अचितः - ज्ञान हीन राक्षसो को, पराराणीतम् - विमुस करके हिलित - निरुक्त संप्तमाध्यायस्य दशमः खण्डः । (१२३७) करी। न्योपतम् - जला दो। हतम् = मार फेंको । नुदेथाम् - हमारे यहां से दूर कर दो। अत्रिणः = भक्षक राक्षसो को, निशिशीतम् = जर्जर करके फेंक दो। इस मन्त्र मै सोम के साथ इन्द्र की स्तुति है। वरुण के साथ इसका संस्तव-उदाहरण- इन्द्रविरुणा युवमध्वराय नो विशे जाय महि शर्म यच्छतम् । दीर्घप्रयज्युमति यो वनुष्यति वयं जयेम पृतनासु दुढयः ॥ ऋ सं. ५-६-२-१॥ जो शन, दोघं प्रयज्युम् इस मन्त्र का वसिष्ठ ऋपि, जगती छन्द और इन्द्र एव वरुण देवता है। मन्त्रार्थ-इन्द्रावरुणा - हे इन्द्र ! और हे वरुण!, युवम् = तुम, न: हमारे, विशे जनाय = परिचारक जन को, अध्वराय = यज्ञ के लिये, महि शर्म = महागृह अथवा महासुख, यच्छतम् = दो और, य = = दीघकाल तक यज्ञ कर्ता यजमान को, अति वनुष्यति = मारता है, पृतनासु - युद्ध मे, वयम् = हम उप्ती, दुढयं. = दुर्बुद्धि शत्रु को, जयेम जीतेंगे। इस ऋचा में वरुण के साथ इन्द्र की स्तुति है। पूपा के साथ इसका सस्तवोदाहरण- इन्द्रा नु पूषणां वयं सख्यायं स्वस्तये । हुवेम वाजसातये ॥ ऋ स. ४-८-२३-१॥ इस मन्त्र का भरद्वाज ऋपि, गायत्री छन्द और इन्द्र तथा पूपा दोनो देवता हैं। मन्त्रार्थ- इन्द्रा पूपणा = हे इन्द्र ! और हे पूपन् !, नु - आज, ययम् - हम, स्वस्तये = अपने क्ल्याण के लिये, सख्याय - तुम्हारी मित्रता के लिये और, वाजसातये = अन्न प्राप्ति के लिये, हुवेम = तुम्हें बुलाते हैं। इस ऋचा मे पूपा के साथ इन्द्र को स्तुति है । बृहस्पति के साथ इन्द्र को स्तुति- इदं वांमास्य हवि प्रियमिन्द्रावृहस्पती । उक्थं मर्दश्च शस्यते ॥ म सं ३-७-२५-१ ॥ .इस मन्त्र का बामदेव ऋपि, गायत्री छन्द मौर इन्द्र तथा बृहस्पति देवता है । मन्त्रार्य- इन्द्रावृहस्पती = है इन्द्र ! और हे वृहस्पते ! , वाम् : तुम दोनों के, आस्ये = मुख मे हम, इदम् प्रियम् हविः - इस प्रिय सोम रूप हयि का, प्रक्षिपामि - प्रक्षेप करते हैं। उक्यम् = उक्य अर्थात् (१२३८) निरुक्त सप्तमाघ्यायस्य दशमः खण्डः । शस्त्र, च = और, मदः = मदजनक सोम रस, शस्यते = प्रदान करते है। इस मन्त्र में बृहस्पति के साथ इन्द्र की स्तुति है। ब्रह्मणस्पति नामक देव के साथ इन्द्र की स्तुति- विश्वं सत्यं मघवाना युवोरिदार्पश्चन प्र मिनन्ति व्रतं वाम् । अच्छेन्द्राब्रह्मणस्पती हविर्नोऽन्नं युजेव वाजिना जिगातम् ॥ ऋ सं. २-७-३-१२ ।। हव्य के, इस मन्त्र का गृत्समद ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और इन्द्र तथा ब्रह्मणस्पति देवता है। मन्त्रार्थ- इन्द्राग्रह्मणस्पती = हे इन्द्व ! और हे ब्रह्मणस्पते ! तुम, मधवाना = धनवान् हो । विश्वम् सत्यम् - सारा सत्य, युवोरिद - तुम्हारा ही है । वाम् = तुम्हारे, व्रतम् = व्रत को, आपः = जल, न प्र मिनन्ति नहीं मार सकता। युजा = रथ मे जुते हुए, वाजिना = अश्व, अन्नम् इव अपने खाद्य पास आदि के अभिमुख हो कर जेसे दौडते है वैसे ही तुम भी, नः = हमारे, हविः अच्छ = अभिमुख हो कर, जिगातम् = दौड़ो। इस मन्त्र मे ब्रह्मणस्पति के साथ इन्द्र का संस्तव है । पर्वत के साथ इन्द्र का संस्तवोदाहरण- इन्द्रोपर्वता वृहता रथेन वामीरिप आ वहतं सुवीराः । वीत हव्यान्यध्वरेणुं देवा वर्धयां गीर्भिरिळया मदन्ता ॥ 1 क्र सं. ३-३-१६-१॥ वृहता रथेन इस मन्त्र के विश्वामित्र ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और इन्द्र तथा पर्वत देवता है। मन्त्रार्थ-इन्द्रा पर्वता = हे इन्द्र ! और हे पर्वत !, महान् रथ पर, वामी = वननीय अर्थात् मनोहर, सुवीरा सुन्दरः पुत्रादि से युक्त, इपः = अन्न, मावहतम् = लाओ। देवा = हे द्योतमान देय !, अध्वरेषु = हमारे यज्ञों में तुम दोनो, हव्यानि = हव्यो का वीतम् = भक्षण करो। इळया = हमारे दिये हुए हवि से, मदन्ता = प्रसन्न होते हुए तुम दोनों, गोभिः = हमारे स्तुति रूप वचनों से वयाम् - वदित होओ। इस ऋचा मे पर्वत के साथ इन्द्र का सस्तव है। कुरा के साथ इन्द्र का संस्तव जैसे-- इन्द्राकुत्सा वहमाना रथेना वामत्या अपि कर्णे' वहन्तु । निः पीमद्भ्यो धर्मथो निः पधान्मघोनों हृदो वरथस्तमांसि ॥ मा. सं. ४-१-३१-९।।
- निरुक्त सप्तमाध्यायस्य दशमः खण्डः । (१२३९) इस मन्त्र का अत्रि के पुत्र अवस्यु ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और इन्द्र तथा कुत्स देवता है। मन्त्रार्थ–इन्द्राकुत्सा - हे इन्द्र ! और है कुत्स !, रथेन एक रथ पर आरूढ वाम %3D तुम दोनो को, अत्या: = अश्वगण, वर्ण अपि यजमानो के निकट, आवहन्तु = आनयन करे। तुम दोनों ने, सीम् = उस शुष्णासुर राक्षस को, सघस्थात् = उसके आवासभूत, अभ्य. = जल से, नि: धमथः = दुर किया था। तुम दोनो ने, मधोनः = धनवान् यजमानो के, हृद. = हृदय से, तमासि = अज्ञान रूप अन्धकार को, नि. वरथः - निवारण किया था, दूर किया था। इस मन्त्र में कुत्स के साथ इन्द्र का संस्तव है। विष्णु के साथ इन्द्र का संस्तव, जैसे- इन्द्रांविष्णू इंहिता शम्बरस्य नव पुरों नवतिं च श्नथिष्टम् । शतं वर्चिनः सहस्रं च साकं हथो अप्रत्यसुरस्य वीरान् ॥ %D सौ और हजार, - ऋ. सं. ५-६-२४-५ ।। 1। इस मन्त्र के : वसिष्ठ ऋपि, त्रिष्टुप् छद और इन्द्र तथा विष्णु देवता है। मन्त्रार्थ- इन्द्राविष्णू = हे इन्द्र ! और हे विष्णो ! तुमने, शम्बरस्य = शम्बर नाम के असुर की हिता. 'दृढीकृत, नव नवतिम् = निनान्वे (९९), पुरः = पुरियो को, नथिष्टम् = नष्ट किया था। च = .और, तुमने, वचिन: असुरस्य = वचि नाम के असुर के, शतम् च सहस्रम् अप्रति - प्रतिद्वन्द्वी, वीरान् = वीरो को, साकम् एक साथ ही, हथः = नष्ट किया था। इस मन्त्र में विष्णु के साथ इन्द्र संस्तव है। ":, वायु के साथ इन्द्र का सस्तव- इन्द्रवायू इमे ,सुता उप प्रयोभिरा गतम् । इन्दवो वामुशन्ति हि ॥ स १-१-३-४ ॥ इस मन्त्र के मधुच्छन्दा ऋपि, गायत्री छन्द और इन्द्र तथा वायु ये दोनों देवता हैं । मन्त्रार्थ- इन्द्रवायू = हे। इन्द्र ! और हे वायो! तुम्हारे लिये, इमे, : ये सोम, सुताः- अभिपुत हैं । तुम दोनो, प्रयोभिः हमे धन देने योग्य अन्न के साथ, उप आगतम् - आओ। हि = क्योकि, इन्दवः = ये सोम, वाम् = तुम दोनो का, उरान्ति अभिलाप करते हैं। इस प्रचा में वायु के साथ इन्द्र का संस्तव है। अथापिमित्रो वरुणेन संस्तूयते । अथ अपि - और भी, मित्रः - मित्रनामक देयता, घरुणेन संस्तूयते = स्तुति किया जाता है। जैसे- - %3D D - वरुण नामक देवता के साप, (१२४०) निरुक्त सप्तमाध्यायस्य दशमः खण्डः । आ नो मित्रावरुणा धृतैगव्यूंतिमुक्षतम् । मध्वा रजांसि सुक्रतू ॥ ऋ सं. ३-४-११-१६ ।। इस मन्त्र का विश्वामित्र ऋपि, गायत्री छन्द और मित्रावरुण देवता है। मन्त्रार्थ-सुऋतू मित्रावरुणा - हे शोभन वर्मकारी मित्र और वरण !, नः = हम लोगो के, गव्यूतिम् = गोष्ठ को, धृते. = दूध से, आ उक्षतम् = पूर्ण करो। रजामि = हम लोगो के आवासस्थानों को, मध्वा - मधुर रस से, आ उक्षतम् - पूर्ण करो। इस मन्त्र मे वरुश के साथ मित्र को स्तुति की गई है। पूष्णा रुद्रेण च सोमः। पूणा च रद्रेण = पूपा और रुद्र के साथ, सोमः = सोम वी, संस्तूयते = स्तुति की जाती है । उनमे पूपा के साथ जैसे- सोमांपूषणा जनंना रयीणां जनना दिवो जनना पृथिव्याः । जातौ विश्वस्य भुवनस्य गोपौ देवा अकृन्वन्नमृतस्य नाभिम् ॥ ऋ सं. २-८-६-१॥ इस मन्त्र का गृत्समद ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द है और सोम तथा पूषा अर्थात् चन्द्र तथा सूर्य देवता है । मन्त्रार्थ-सोमा पूपणा = हे सोम | और हे पूषन् ! तुम, रयीणाम्-सर्व धन के, जनना = उत्पन्न करने वाले, दियः = धुलोक के, जनना = उत्पन्न करने वाले और, पृथिव्याः = पृथिवी लोक के, जनना = उत्पन्न करने वाले हो। जातो - उत्पन्न होते ही, विश्वस्य भुवनस्य = समस्त चतुर्दश भुवनो के, गोपी = रक्षक हुए हो। देवाः = देवो ने तुम्हे अमृतस्य अमरता का, नाभिम् हेतु. अकृन्वन् = बनाया है। इस मन्त्र मे पूषा के साथ सोम की स्तुति है। रुद्र के साथ सोम की स्तुति जैसे- सोमा॑रुद्रा युवमेतान्यस्मे विश्वा तनू' भेषजानि धत्तम् । अब स्यतं मुञ्चतं यन्नो अस्ति तनुर्पु पद्धं कृतमेनो' अस्मत् ॥ स सं. ५-१-१८-३ ॥ - इस मन्त्र का भरद्वाज ऋषि, बिष्टुप् छन्द और सोम तथा रुद्र देवता है । मन्त्रार्थ-सोमारुद्रा हे सोमऔर हे रुद्र!, युयम् - तुम दोनो, अस्मे = हमारे, तनूषु पारीर मे, एतानि - ये सबै प्रसिद्धविधा = समस्त, भैपजानि औषधो को, यत्तम् - धारण करो। य = और, न:- हमारे, सनूपु - शरीर मे, मृतम् = हमारा किया हुआ, यद = जो, एनः = पाप, पद्धम् - नियत, मस्ति है।
निरक्त सप्तमाघ्यायस्यकादशः खण्डः । (१२४१) उस को अव स्यतम् = शिथिल करो और उस से मुझे, मुञ्चतम् = मुक्त करो। इस मन्त्र में रुद्र के साथ सोम की स्तुति की गई है । अग्निना च पूपा । और, अग्निना = अग्नि के साथ, पूषा = पूपा की स्तुति की जाती है। मध्यम स्थान और द्युस्थान के साथ संस्तव है। इस लिये प्रार्थिव के प्रतिषेध होने से व्याख्याकारो ने ऋचा उदाहरण नहीं दिया है। पातेन च पर्जन्यः । इति निरुक्ते सप्तमाध्याथस्य दशम' खण्ड ॥ ७-१० ॥ च = और, वातेन = वात के साथ, पर्जन्य = पर्जन्य को स्तुति की जाती है। जैसे- पारो' दिव ऋभवः सुहस्तां वातापर्जन्या महिपस्य तन्यतोः । आप ओषधीः प्र तिरन्तु नो गिरो भगों रातिर्वाजिनो यन्तु मे हव॑म् ॥ ऋ स ८-२-१३-१०।। नः इस मन्त्र का वसुकर्ण ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और विश्वदेव देवता है। मन्त्रार्थ-दिव परि. = धुलोक के धारण करने वाले, ऋभव : ऋभुगण, सुहस्ता = सुन्दर हाय वाले हैं । वातापर्जन्या = वायु और प्रर्जन्य, महिपस्य तन्यती महान् शब्द करने वाले हैं। आप. ओपधी - जल और वनस्पति, हमारे, गिरः = स्तुति को, प्र तिरन्तु = वढावें । राति = धनदाता, वाजिन - अन्नदाता, भगः = सभजनीय अर्यमा देव, मे = मेरे, हवम् = आह्वान को सुन कर यज्ञ मे, यन्तु = आवें। इस मन्त्र में वायु के साथ मेघ की स्तुति है । अथ निरुक्ते सप्तमाध्यायस्यैकादशः खण्डः । अर्थतान्यादित्यभक्तीनि। अथ - इन्द्र की भक्ति (भाग) के कथन के अन्तर, एतानि, ये, आदित्यभक्तोनि = आदित्य की भक्ति का कथन किया जाता है। जैसे- असौ लोकस्तृतीयसानं वर्षा जगती सप्तदशः स्तोमोवरूपं साम। ये च देवगणाः समाम्नाता उचमे स्थाने । याच स्त्रियः ।। असो 3 वह, लोक = धुलोक, तृतीय सवनम् = तीसरा मायगवन, वर्षा = वर्षा ऋतु, जगती जगती छन्द, सप्तदशः स्तोम. = सप्तदश स्तोम, वरूपम् साम = वैरूप साम, च और, ये ० Pentioner टित . - (१२४२) निरुक्त सप्तमाध्यायस्यैकादा. खण्डः । जो, देवगणाः = देवगण, उत्तमे स्थाने = उत्तम स्थान में, समाम्नाता: ='समाम्नान (कथन) किये गये हैं, च- और, या. = जो, विपः = उपा सूर्या आदि, खिये । ये सब आदित्य सम्बन्धी होने से उसकी भक्ति हैं। अथास्य कर्म-रसादानं रश्मिभिश्व रसधारणम् , यञ्च किश्चित्प्रवाहितमादित्यकर्मैव तद । अथ = अब, अस्य = इस आदित्य के कर्म-रसादानम् = रस का आदान (ग्रहण करना) । और, रश्मिभिः = रमिओ से (किरणो से), रसधारणम् = रसधारण' करमा, च = और, यत् = जो, किश्चित् = कुछ, प्राह्नितम् = गुप्त रहस्य, तत् = वह सब, आदित्यकर्म एव आदित्य का ही कर्म है। चन्द्रमसा वायुना संवत्सरेण-इति संस्तवः । चन्द्रमसा = चन्द्रमा से, वायुना - वायु से. सवत्सरेण - सवत्सर से, इति = इन सबसे, संस्तवः = संस्तव अर्थात् स्तुति है । अर्थात् मन्त्रो मे चन्द्र, वायु और सवासर के साथ आदित्य की स्तुति है। उनमे प्रथम चन्द्रमा के साथ आदित्य का संस्तव जैसे- पूर्वापरं चरतो माययतों शिशू क्रीळन्ती परि यातो अध्वरम् ॥ : विश्वान्यन्यो भुवनाभिचष्टं ऋतूंरन्यो विदायते पुनः ॥ * स ८-३-२३-१८ इस मन्त्र का सूर्या प्रापि, जगती छन्द और चन्द्रमा तथा आदित्य देवता है । मन्त्रार्थ --- एतौशिशू = ये आदित्य और चन्द्रमा रूप दोनो शिशु, मायया = अपनी शक्ति से, पूर्वापरम् पूर्व और पश्चिम मे, चरत विचरण करते है। कोळन्तौ = ये घोडा करते हुए, 'अध्वरम् परियातः = यज्ञ में जाते हैं। इन मे से, एक आदित्य, ऋतून = वसन्तादि ऋतु-विधान करते हुए, विश्वानि भुवनानि = समस्त भुवनों को, अभिवष्टे = देखते हैं, प्रकाश करते हैं और दुरारे चन्द्रमा, पातून = वसन्तादि ऋतुओ की व्यवस्था करते हुए, विदधत तिथि मास पक्ष आदि का विधान करते हुए, पुन = वार वार, जायते = जन्म लेते रहते हैं। उदय अस्त होते रहते हैं। यद्यपि उदय और बात दोनो के होने से दोनों जन्म लेते रहते हैं तथापि आदित्य के वृतिहास न होने से इसका जन्म नहीं कहा गया है और चन्द्रमा के वृद्धिहास होने से इसका जन्म कहा गया है। इस ऋचा मे चन्द्रमा के साथ आदित्य का संस्तव है । वायु के साथ बादित्य का रास्तव- सप्तऽऋषयः प्रतिहिताः शरीरे सप्त रक्षन्ति समप्रमादम् । सप्तापः स्वय॑तो लोकमीयुस्त– जगतोऽखप्नजीसत्रसदौचदेवौं ॥ य. वा स. ३४-५५ ।। - । अन्य अन्य:- - . निरुक्त सप्तमाध्यायस्थकादशः खण्डः । (१२४३) इस मन्त्र का कण्व ऋषि, वहती छन्द और ब्रह्मणस्पति देवता है । मन्त्रार्य-सप्त ऋषयः श्रोत्र, स्वक, चक्षु, रसना, घ्राण, मन और बुद्धि ये सात ऋषि, शरीरे = शरीर में, प्रतिहिता व्यवस्थित रूप से रहते हैं। सप्त ये सातों, सदम् - निरन्तर, अप्रमादम् = प्रमाद रहित, रक्षन्ति शरीर की रक्षा करते हैं । आपः = शरीर में व्यापनशील, सप्त - ये सातों, स्वपतः सोते हुए मनुष्य के, लोके = हृदयाकाश में स्थित जीवात्मा को, ईयुः = प्राप्त होते हैं। तत्र = उक्त पियों की लोकगमन अवस्था में अर्थात् सुषुप्ति अवस्था में, अस्वपप्नजो = निद्रा को न प्राप्त होने वाले, सत्रसदी - शरीर क्रिया रूप यज्ञ में स्थित, देवी - ये दोनों देव अर्थात् प्राणरूप से वायु देव और अपान रूप से आदित्य देव, जागृतः जागते रहते हैं । इस मन्त्र में वायु के साथ आदित्य की स्तुति है । संवत्सर के साथ आदित्य का संस्तव- पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृति दिव आहुः परे अर्धे पुरीपिणंम् । अथेमे अन्य उपरे - विचक्षणंसप्तचक्रे पळर आहुर्पितम् ॥ का सं. २-३-१५-१२ ॥ । इस मान का दीर्घतमा ऋपि, जगती छन्द और संवत्सर तथा आदित्य देवता है । मन्त्रार्थ-- पञ्चपादम् = हेमन्त और शिशिर को एक समझ कर पाञ्च ऋतु रूप पैरों से युक्त, और, द्वादशाकृतिम् = वारह महीना रूप, आकृति से युक्त, पितरम् = सर्व को प्रसन्न करने वाला सम्वत्सर के साथ आदित्य जिस समय, दिवः परे अर्धे - धुलोक के पूर्वाद्धं में रहती हैं। उस समय उसको कोई कोई, पुरीपीणम् = पुरीपी या जलदाता, माहुः - कहते हैं । अथ इमे अन्य और कोई दूसरे वेदवारी लोग, पळरे छः ऋतु रूपो अरों और, सप्तचके = सात रश्मि रूपी चक्रों से युक्त सम्वत्सर के साय, 'विचक्षणम् = विविधदर्शन आदित्य को, अपितम् - मर्पित, माहुः = कहते है । जब कि, वह, उपरे । अन्तरिक्ष में होता है। भाव यह है कि, कोई सम्वत्सर को आदित्याधीन और कोई मादित्य को सम्वत्सराधीन कहते हैं। इस प्रकार संवत्सर के साथ आदिश्य की स्तुति इस मन्त्र में है । एतेष्वेव स्थानव्यूहेपु-ऋतुच्छन्दस्तोमपृष्ठस्य भक्तिशेपमनुकल्पपीत । एतेषु एव = इन्ही, स्थानव्यूहेषु = पृथिवी अन्तरिक्ष आदि स्थान के विभागों में, ऋतुच्छन्द. स्तोमपृष्ठस्य = ऋतु, छन्द, स्तोम, और पृष्ठ अर्थाद साम का, भक्तिशेषम् - भक्तिशेप अर्थाद - भागोष, अनुकल्पयोत = कल्पना कर लेनी चाहिये । जैसे- शरद्-अनुष्टुप्-एकविंशस्तोमो-वैराज साम, इति पृथिव्यायतनानि । शरद् - शरद् मातु, अनुष्टुप् = अनुष्टुप् छन्द, एकविसस्तोमः = इक्कीस वार का स्तोम और, घराजम् साम - वैराजनामक साम, इति - ये, पृथिव्यायतनानि पृथियो स्थानिक अग्नि के भक्ति - भाग हैं। अतः इन का पृथिवी आयतन = आश्रय है ।
- . (१२४४) निरुते सप्तमाध्यायस्य द्वादशः खेण्डा । हेमन्तः पङ्क्तित्रिणवस्तोमः शाकरं साम, इति अन्तरिक्षायतनानि । हेमन्तः - हेमन्त ऋतु. पङ्क्तिः पडित छन्द, त्रिणवस्तोमः सत्ताईश (३+९) वार का स्तोम, शाक्वरम् साम = शाकर नामक साम, इति = ये, अन्तरिक्षायतनानि = अन्तरिक्ष स्थानिक इन्द्र के भाग हैं । अतः इन का अन्तरिक्ष आयतन = आश्रय है । शिशिरः-अतिच्छन्दस्-त्रयस्त्रिंशस्तोमा-रैवतं साम, इति शुभक्तीनि । इति निरक्त सप्तमाध्यायस्यकादशः खण्डः ॥ ७-११ ॥ शिशिर. = शिशिर ऋतु, अतिच्छन्द. = अतिच्छन्दा छन्द, प्रयस्त्रिंशस्तोमः = तैतीस वार का प्रयस्त्रिंश स्तोम, और रैवतम् साम = रैवत नामक सीम, इति = ये, द्युभक्तोनि = धुलोक स्पानि आदित्य के भाग है । अतः इनका धुलोक आयतन = आश्रय है । लोक तथा सवनों का विभाग तो पूर्व किया गया था । परन्तु ऋतु, छन्द, स्तोम और साम का विभाग वाकी था । इनका भी विभाग यहा दिखाया गया है । किन्तु छन्दो के बहुत अधिक होने से उनका विभाग करने पर भी पूर्ण नहीं हुआ। इस लिये शेप बचे हुए छन्दों का विभाग भी इसी प्रकार कर लेना चाहिये । गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप्, वृहती पक्ति, त्रिष्टुप्, जगदी ये सात छन्द हैं । तिजगती, शकरी, अतिशधरी, अप्टि, अत्यप्टि, धृति, अतिवृति, ये सात अतिच्छन्द है। और कृति, प्रकृति, आकृति, विकृति, सकृति, अभिकृति, उत्कृति ये सात विच्छन्द है । इन में से उणिक, बृहतो और विच्छन्द वाकी रह गये हैं । जिनका विभाग यास्त्र ने नहीं किया है । ऋग्वेद के प्रातिशाख्य में बृहती और विच्छन्दो को वायु देवता के भागी और उष्णिक को आदित्य के भागी वहा है । रेक प्रातिशास्य के यह प्रकरण छन्दों के ज्ञान के लिये अत्युत्तम है । अथ निरुक्त सप्तमाध्यायस्य द्वादशः खण्डः । P . - मन्त्रा मननात् । 'सर्वमेतन्म-त्राश्रयम्' अर्थात् यह सब मन्त्र के अधीन है यह कहा गया है। इस पर प्रश्न होता है कि, मन्त्र क्यो? अर्थात् किस अर्थ को लेकर वेद वाक्य मन्त्र कहे जाते हैं ?। ईसका उत्तर देते हैं-मननात् मनन से, मन्त्रा. = वेद वाक्य मन्त्र कहे जाते हैं। क्योकि, मन्त्र के द्वारा अध्यारम अघिदेव अधिभूत तथा अधियज्ञ आदि के मनन करने वाले मनन करते हैं। मन्त्रों में मन्यन्ते ज्ञायन्ते सर्व पदार्थाः यः ते मन्त्राः' इस विग्रह मे ‘मत्रि गुप्तपरिभाषणे' धातु से ' अकर्तरि च कारके संज्ञायाम्' इस सूत्र से घञ् (अ) प्रत्यय होने पर मन्त्र शब्द बना है । वेद वाक्य का नाम है। क्योंकि, वेदवाक्यो मे रहम्ययूक्त गुप्त पदार्थो का वर्णन है । प्ट्रन् प्रत्यय करने पर मन्त्र शब्द यनता है। मन्त्र छन्दोमय होते हैं। अतः प्रश्न होता है कि, 'छन्दः कस्मात् ' अर्थात् छन्दस् क्यों ? । उत्तर देते हैं- - . - मन शाने' से भी -- .
निहते सप्तमाध्यायस्य द्वादशः खण्डः । छन्दांसि छादनात् । छादनात् - छादन से अर्थात् ढाकने से, छन्दांसि = वेदादि पद्य छन्द कहे जाते हैं। 'यदेभिरात्मानमाच्छादयन् देवाः मृत्योविभ्यतः, तच्छन्दसाछन्दस्त्वम्' अर्थात् मृत्यु से डरते हुए देवताओं ने इन छन्दों से अपने को ढाका था, यही इन छन्दों का छन्दपना है। यह इस ब्राह्मण वाक्य से जाना जाता है । 'चन्दते आह्लादं कुरुते इति छन्दः इस विग्रह मे 'चदि आह्लादने' धातु से 'सर्वधातुभ्य असुन' इस उणादि सूत्र से मसुन् (अस्) प्रत्यय, चन्द् अस्, 'चन्देश्व छ:' इस उणादि सूत्र से च को छ होने पर छन्दस् शब्द बना है। वैदिक मन्त्र तया लौकिक श्लोक दोनों का नाम है। क्योकि, ये दोनो आह्लाद प्रदान करते हैं । अथवा 'छन्दयति संवरण करोति इति छन्दः इस विग्रह में, 'छदि संवरणे' धातु से पूर्ववत् असुन् प्रत्यय करने पर भी छन्दस् शब्द वनता है । , स्तोमः स्तवनात् । , -- स्तवनात स्तवन से, स्तोमः स्तोम कहा जाता है। 'स्तौति इति स्तोमः' इस विग्रह में प्टुम् स्तुतौ' धातु से उणादि परिकल्पित मन् (य) प्रत्यय और गुण होने पर स्तोम शब्द बना है । स्तोमः स्तवनात् ' यह वाक्य प्रक्षिप्त प्रतीत होता है। क्योकि, किसी व्याख्याकार ने इसकी व्याख्या नहीं की है । ऋक् शब्द का निर्वचन नि. अ. १ ख. ७ मे 'ऋगर्चनी' इस वाक्य से किया गया है। अतः यजुस् शन्द का निर्वचन करते हैं- यजुर्यजतेः। यजतेः = यज धातु से, यजु पजुस् शब्द बना है। अर्थात 'इज्यतेऽनेनेति यजुः' इस विग्रह मे 'यजदेवपूजामंतिकरणदानेपु' धातु से 'अतिपृवपियजितनि...' इत्यादि उणादि सूत्र से करण में उस् प्रत्यय होने पर यजुस् शब्द बना है। यजुर्वेद का नाम है । क्योंकि, यजुर्वेद से विशेष करके यजन किया जाता है। साम संमितमृचा। मा = जो ऋचा के साथ, मंमितम् - समान परिमाण वाला हो वह, साम= साम = सामवेद कहा जाता है। अर्थात् जितनी अचा होती हैं उतना ही परिमाण वाला साम होता है। ऋक् के पर माम रख कर गान किया जाता है। अत एव सामवेद मे प्रायः ऋग्वेद के ही मन्त्र है। 'सम्' मोर 'मान' के स्थान मे निपातन से साम आदेश हुआ है। अस्पते । या = अथवा, अस्पतेः = क्षेपणार्थ अस धातु से साम शब्द बना है। अर्थात 'मस्यते क्षिप्यते इति साम' इस विग्रह मे 'असु क्षेपणे' धातु से उणादि या पृषोदरादित्वाद मन् प्रत्यय और अस् को सा आदेश होने से सामन् शब्द बना है। सामवेद का नाम है । क्योकि, साम ऋचा में फेंका जाता है। अपवा 'मस्यतेवा ' के यान मे 'स्यता' ऐसा पाठ है। इस पक्ष में स्थिति नियते इति - यह, नैदानाः (१२४६) निरुक्त सप्तमाध्यायस्य द्वादशः खण्डः | साम' इस विग्रह मे ‘पोन्तकर्मणि' धातु से 'सर्वधातुभ्यो मनिन् ' इस उणादि सूत्र से भनिन् (मन्) प्रत्थय होने से सामन् शब्द बना है। सामवेद का नाम है। सामवेद उपासना पर है और वह ज्ञान कम उपासना इन तीनों में अन्तिम है। संहिता पाठ, पद पाठ और साम पाठ इन तीनों में अन्तिम साम है। ऋचा समं मेन इति नैदानाः । प्रजापति ने, ऋचा समम् = साम को ऋचा के समान, मेने = माना है, इति - मन्त्रो के निदान के जानने वाले ऋपि लोग कहते है। अथवा नैदाना: = निदान नामक ग्रन्थविशेष के जानने वाले ऋपि लोगों ने, साम को, ऋचा समम् - ऋचा के समान, मेने = माना है, इति = इस कारण सामवेद साम कहा जाता है। जो समान माना गया हो वह साम कहा जाता है । शङ्का होती है कि वेदो में प्राथम्य ऋक् का है। उस का (कक शब्द का) निर्वचन प्रथम होना चाहिये था । सो तो दूर रहा, उस का निर्वचन तक यास्क ने नहीं किया। इस मे क्या कारण?। उत्तर-निरुक्त अध्याय प्रथम खण्ड सप्तम मे 'ऋगर्चनो' शब्द से अच् शब्द का निर्वचन किया गया है। अतः पुनरुक्ति समझ कर यहा उस का पुनः निर्वचन नहीं किया गया है। ऋच्यते स्तूयते अनया इति ऋक्' इस विग्रह मे 'ऋच स्तुतो' धातु से 'किप्' सर्वापहारी लोप होने पर ऋच् शब्द बना है । ऋग्वेद का नाम है। क्योकि, ऋचा द्वारा देवताओ की स्तुति की जाती है । वहा इस प्रकार निर्वचन किया गया है। 'छन्दासि छादनात् ' यह पूर्व कहा गया है और छन्द गायत्री आदि हैं । अतः गायत्री शब्द का निर्वचन सर्व प्रथम करते हैं- गायत्री गायत्तेः स्तुतिकर्मणः । स्तुतिकर्मणः = स्तुत्यर्थक, गायतेः = गै धातु से, गायत्री - गायत्री शन्द बना है । 'मर्याद * गीयन्ते रतूयते देवा: अनया इति गायत्री' इस विग्रह में 'गै शब्दे' धातु से औणादिक अधिन (अत्रि) प्रत्यय, गं अनि, छान्दसत्वात् आत्वाभाव, 'एचोऽयवामावः' इस सूत्र से आय् आदेश, गायत्रि, 'कृदिकाराक्तिनः' इस गणवत्तिक से डीप् (ई) प्रत्यय, 'यस्येतिच' इस सूप से इवप का लोप होने पर गायत्री शब्द बना है। छन्द का नाम है। क्योंकि इस से देवता की स्तुति की जाती है अथवा 'गायतीति गायन्' इस विग्रह में 'गै शन्दे' धातु से लट्, शतृ (अव), आय आदेश, गायत् । गायन्तं वागते इति गायत्री' इस विग्रह मे गायत् शब्द पूर्वक 'ग्रह पालने' घातु से 'आतोऽनुपसर्गेकः' इस सूत्र से फ (अ) प्रत्यय गायद ना अ, 'आतो लोप इटिच' इस सून्न से आलोप, पृपोदरादित्वाद लोप, गायत्र, 'पिगौरादिभ्यश्च' इस सूत्र से गौरादित्वात् डीप् (ई) प्रत्यय, अलोप होने पर गायत्री शब्द बना है । मन्त्र का नाम है । क्योकि, यह जप करनेवाले की रक्षा करता है । त्रिगमना वा विपरीता । घा - अथवा, निगमना प्राक् यजुः साम इन तीनो में गमन करने वाली होने से, विपरीता 'वि-गायत्' के विपरीत (उलटा) 'गाय वि' होती हुई गायत्री कही जाती है । यह छन्द माइ - . : R उत्स्नाता - - निरुक्त सप्तमाध्यायस्य द्वादशः खण्डं । (१२४७) अक्षरो के तीन पाद वाला होता है। अर्थात् 'निपु ऋग्यजु सामसु गमन पादशो यस्या सा-गायत्री' इस विग्रह मे त्रिशब्द पूर्वक गम् धातु से गायनी शब्द बना है। वि गम्, विपरीत-गम् नि, पृषोदरादित्वात् गायत्री। गायतो मुसादुदपतत्-इति च ब्राह्मणम् । गायत. = गान करते हुए ब्रह्मा के, मुखात् = मुख से, उदपतत् = सर्व से प्रथम यह छन्द उड कर गिरा अर्थात् परमात्मा के मुख से निकला इस कारण से इस का नाम गायनी पडा, इति च = यह, ब्राह्मणम् = ब्राह्मण वाक्य कहता है । अर्थात् 'गायत मुखात् उदपतत् इति गायत्री' इस विग्रह मे गै घातु का शतृ प्रत्ययान्त गायत् और उत् पूर्वक 'पतल पतने' धातु से उणादि रक् (र) प्रत्यय होने से गायन और गौरादि डीप (ई) प्रत्यय, यस्पेतिच लोप होने पर गायत्री शब्द बना है। छन्द का नाम है। क्योकि, गायत्री छन्द सर्व प्रथम ब्रह्मा के मुख से उच्चरित हुआ है। इस रीति से तीन प्रकार से गायत्री शब्द की निष्पत्ति होती है । उष्णिक शब्द का निर्वचन- उष्णिग्-उत्स्नाता भवति । गायत्री के अक्षरो से चार अक्षर अधिक से उद्वेष्टित (लिपटी हुई) के समान, भवति = होती है इस लिये इस को उष्णिक = उष्णिक् छन्द कहते हैं। अर्थात् 'उद उस्कृ'ट स्नाति अनया इति उष्णिक्' इस विग्रह मे उत् पूर्वक 'प्णा शोचे' घातु से उणादि इजि (इज्) प्रत्यय, उत् स्ना इज् पृषोदरादित्वात् उत् के तकार को और स्ना के आकार का लोर, उन्न् इज्, उस्निज्, 'पूर्वपदाद' इस सूत्र से पत्व, 'रपाभ्याम्' इस सूत्र णत्व होने पर उरिणज् शब्द वना है। छन्द का नाम है। इस से उत्कृष्ट पवित्रता की प्राप्ति होती है । स्निह्यतेर्वा स्यात् कान्तिकर्मणः । वा = अथवा, कान्तिकर्मण = कान्ति अर्थक, स्निहते = स्निह् धातु से, स्यात् = उष्णिक शब्द बन सकता है। अर्थात 'उ उत्कृष्टम् अधिक स्निह्यते इति उष्णिक्' इस विग्रह में धातूनामर्नेकार्थस्वात् उद पूर्वक कान्त्यर्थक णिह प्रीतोधातु से पृषोदरादित्वात् किप् प्रत्यय, सर्वापहारी लोप, सकार लोप, पूर्ववत् पत्त्व णत्व होने पर उष्णिक शब्द बना है। छन्द विशेष का नाम है । क्योकि, यह छन्द देवताओ को अधिक प्रिय है। उष्णीषिणी-वा-इत्यौपमिकम् । वा = अथवा, यह उष्णोषिणी इव = पाही वाली जैसी होती है। इस से उष्णिक कही जाती है । इति = यह, ओपमिकम् - औपमिक नाम है अर्थात् उपमा के साथ नाम है। इस में गायत्री से चार अक्षर अधिक दिखाई देते हैं । इसी से यह उष्णिक कहीं जाती है। भाव यह है कि, वेद मे पूर्वोक्त इकोस छन्द हैं। उन मे प्रथम के सात छन्द मुख्य हैं। गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप्, बृहतो, पक्ति, निष्टुप् और जगती। इन मे प्रथमा गायत्री है। यह .
(१२४८) निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य द्वादशः खण्डः । त्रिपदा और चतुप्पदा दो प्रकार की मानी जाती है। जव त्रिपदामानी जाती है तब आठ बाठ अक्षर के तीन पाद इरा मे हैं और जब अन्य छन्दो के समान चतुष्पदा मानी जाती है तब छ छ. अक्षर के चार गाद इस मे है। इप्त प्रभार गायत्री चोवीस अक्षर वाली है। इस से आगे के छन्दो के पादो मे एका एक अक्षर यी वृद्धि होती है । उष्णिक सप्ताक्षरपदा, अनुष्टुप् अष्टाक्षरपदा, बृहती नवाक्षरपदा, पडि दशाक्षरपदा, त्रिष्टुप् एकादशाक्षरपदा, और जगती द्वादशाक्षरपदा होती है। उन मे उरिणक् के चारो पादो मे गायत्री से एक एक अक्षर अधिक होने से चार अक्षर से उष्णिक (पगडी के) समान वेष्टित होने से यह उष्णिक कहो जाती है। गायत्री उष्णिक आदि सभी छन्द स्त्रीलिङ्ग पविता के विशेपण होने से वीलिङ्ग हैं। जिसकी उपमा दी गई है तद्वाचक उणीप शब्द वा निर्वचन करते है- उष्णीपं स्नायतेः। स्नायते = रना धातु से, उष्णीपम् = उणीप शब्द वना है। अर्थात् 'उत् = अधिक स्नायते इति उष्णीपम्' इस विग्रह मे उत् पूर्वक 'ष्णा शौचे' धातु से कर्म मे ईपक् प्रत्यय, पत्व, णत्व होने पर उणीप शब्द बना है। पगडी का नाम है। क्योंकि, पगडी घोई हुई शुद्ध होती है। पकुभ् शब्द का निर्वचन- काप् - ककुभिनी - भवति । 'यपुभ' यह भी एक छन्द का नाम है । यह उष्णिक आदि छन्दो का भेद है । अतः उष्णिक के प्रसग से इस का भी निर्वचन किया गया है। यवुभ् = व कुम् छन्द वाली कविता, ककुभिनी इव - थूही वारी जैसी, भवति = होनी है। इस लिथे इरा को क भ व हते है । अर्थात् पूर्वोक्त सप्ताक्षरपदा उणिक् के मध्य भाग मे जर्गती का बारह अक्षरों का पाद मध्य मे गिरा हुआ सा रहता है। इस से वह मध्य मे स्यूल हो जाने से थूही बाली सी प्रतीत होती है। यह ककुभ नाम भी थूही की उपमा से बना है । अत. औपमिक है। ककुद के कारण उष्ट्र के जैसा वूवडा या नीचे झुका हुआ। कपू-युजश्च कुजतेर्या उब्जतेर्वा । कम्युज च - वयुभ और युन्ज ये दोनो पद, कुजतेः वा = कुज धातु से, वा = अथवा, ०जते = उ7 धातु से, वना है। (एक वा शब्द वाक्यालङ्गार मे है)। 'योजति - कुटिलीभवति : वोभवति इति यदुप् युजन" इस विग्रह मे धातूनामनेकाथत्वाद कौटिल्यार्थक 'कुजु स्तेयकरपे' धातु से पृषोदरादित्वात कि , द्वित्वादि हो कर पुज् बुज्, पुयुज , व कुभ् । अथवा उब्ज उम्म उज, कुभ यकु । कुज् कुब्ज उब्ज । बीच में 'धुन'च' यह पाठ अप्रासगिक होने से प्रक्षिप्त प्रतीत होता है । इन शब्दो की सिदि मे बहुत लिष्ट कल्पना है। इस से तो छठी मान लेना ही अच्छा पा । अनुष्टुभ् शब्द का निर्वचन- अनुष्टुबनुटोभनात् । अनुष्टोभनाद - वाम जाने से अर्थात् रुक जाने से, अमुष्टुप इस मे प्रमाण- अनुष्टुप् छ.६ वहा जाता है। 4 - - - - 17 1 निरुक्त सप्तमाध्यायस्य द्वादश खण्डः | (१२४९) गायत्रीमेव त्रिपदां सती चतुर्थेन पदेनानुष्टोभतीतिच ब्राह्मणम् । गायत्रीम् एव गायत्री को ही, त्रिपाम् सतीम् - तीन पाद वाली होती हुई चतुर्थेन पादेन = चौथे पाद से, अनुष्टोभनि = थाभ लेती है अर्थात् ठहग लेती है इति च = यह भी, ब्राह्मणम् = ब्राह्मण वचन इस मे प्रमाण है । अनु = पश्चात् स्तोमति इति अनुष्टुर' इस विग्रह में अनुपूर्वक रोधनावंक 'स्तुभ' पातुं से वर्तरि विम् सर्वापहारी लोण होने पर अनुष्टुप शब्द बना है । भाव यह है कि, गायत्री छन्द चौवीस अक्षगे को होता है । और अनुष्टुप् छन्द बत्तीम अक्षरों का होता है । दोनो के पाद आठ आठ अक्षरो के होते है। गायत्री के तीन ही पाद होने से चौबीस अक्षरो को और अनुष्टुप् के चार पद होने से बत्तीस अक्षरो की है। इस गणना के अनुसार तीसरे पाद पर गायत्री छन्द गिर जाता है । भि जाता है । अटक जाता है और अनुष्टुप छन्द उसमे चौथा पाद पूरा कर मानो उसे थाम लेता है । इमी से वह अनुष्टुप (रोकने वाला) कहलाता है । यह ब्राह्मण वचन कहता है । पडक्षरा गायत्री, राप्ताक्षर उरिणा और अष्टाक्षरा अतुष्टुप यह सिद्ध हुआ । बृहती शब्द का निर्वचन- वृहती-परिवर्हणात् । । परिवहणात् = परिवहण अर्थात् वृद्धि होने से, बृह्ती = वृहती छदै कहा जाता है। अनुष्टुप के पाद आठ अक्षर के होते हैं । उसके आगे वृहती का क्रम आता है। अत इस प्रत्येक पाद में अनुष्टुप् से एका अक्षर अधिक होते हैं नवाक्षरपदा वृहती । अनुष्टुर से इस के चारो पादो मे चार अक्षर बढ जाने से यह छन्द बृहती वहा जाता है । अनुष्टुप् बत्तीस अक्षर का और यह छत्तीस अक्षर का होता है ! वढने से बृहती कहा जाता है । 'वर्हति इति बृहती' इस विग्रह मे 'वृह वृद्धौ' धातु से, लट्, 'वर्तमाने पृषद् बृहत् ' इत्यादि उणादि सूत्र के निपातन से शत (अव), वृहत्, 'उगितश्व' इस सूत्र से ही होने पर बृहती शब्द बना है । पईक्ति शब्द वा निवचन- पङ्क्तिः पञ्चपदा । पञ्चपदा : पांच पादवाली, पङ्क्ति पक्ति कही जाती है । क्योकि, इस के चारो पाद दश दश अक्षरो के होते हैं । सव मिला वर चालीस अक्षर होते हैं । उन मे अष्टाक्षरपाद अनुष्टुप के पांच पाद बन जाते हैं । इसी से यह पवदा हो पर पक्ति हो गई है। 'पञ्च पदानि परिमाणम् अस्य इति पक्ति ' इम विग्रह म पश्चन् शब्द से तद्धित डति प्रत्यय (अति), टे' इस सूत्र से टिलोप, पञ्च् अति, 'चो कु.' इस सूत्र से कुत्व होने पर पति शब्द बना है। छ दविशेष का नाम है । क्योकि, पति छ द मे अनुष्टुप् के पाच पाद वा परिमाण चालीस अक्षर होते हैं। इस मे आठ पचे चालीस और अनुष्टुप् मे आठ चोक बत्तीस अक्षर होते हैं । विष्टुप शब्द का निर्वचन- त्रिष्टुप् स्तोमत्युत्तरपदा । स्तोभति उत्तरपदा - जिस का उत्तर पद स्तुत्यर्थक स्तुभ (धातु) हो वह, निष्टुप् = त्रिष्टुप् छन्द कहा जाता है। अर्थात् प्रथम पद नि और द्वितीय पद स्तुम् पातु हो वह विष्टुप छ.६ पहा जाता है।
(१२५०) निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य प्रयोदश. खण्डः । पूर्व पदार्थ में सन्देह करते हुए प्रश्न करते है- का तु त्रिता स्यात् । तु = किन्तु त्रिष्टुप् शब्द में पूर्वपद जो त्रि है उसमें, त्रिता त्रित्व, का स्याव = क्या होगा? । अर्थात् त्रिष्टुर शब्द में जो पूर्वपद त्रि है उसका अर्थ क्या है ? । पूर्व वाक्य से उत्तर पदार्थ का निर्णय और इस वाक्य से पूर्वपदार्थ का निर्णय विषयक प्रश्न है । उतर- 1 तीर्णतम छन्दः। of croots at T-ती वा- छन्दः = यह त्रिष्टुम् अन्द, तीर्णतमम् = स्तुततम है । अर्थात् गायली आदि छन्दों की अपेक्षा यह त्रिष्टुप् छन्द अधिक अक्षर वाला एवं तेज है, इस छन्द से अधिक स्तुति है । वेदों में अन्य छन्दों की अपेक्षा इपकी सख्या अधिक है। त्रिवृद्धजस्तस्यस्तोभतीति वा। अथवा, त्रिवृत = तीन धार वाला, वय. = वज्र नामक आयुध होता है, तस्य = उस को, स्तोमति = स्तोभन (स्तुति) करता है, इस कारण त्रिष्टुप् कहा जाता है। अर्थात 'विवृत वचम् स्तोमति स्तौति अनया इति त्रिप्दुप्' इस विग्रह मे त्रि शब्द पूर्वक स्तुत्यर्थक स्तुम् धातु से किस च' इस सूत्र से वित्रम् प्रत्यय, सर्वापहारी लोप, पत्व, प्टुत्व होने पर त्रिष्टुप् शब्द बना है। छन्द का नाम है। क्योकि, शर, शृङ्ग और शल्य नामक तीन पार वाला बच की यह स्तुति करता है। यत् त्रिरस्तोभत्-तत् निष्दुभस्त्रिष्टुप्त्वम्-इति विज्ञायते । इति निरुक्त सप्तमाध्यायस्य द्वादशः खण्डः ॥ ७-१२ ।। यत् जिसने, त्रिः = तीन बार, अस्तोभत् = स्तुति की है, तत् = पह, त्रिष्टुमः = त्रिष्टुम् का, त्रिष्टुप्त्वम् त्रिष्टुभ् पना अर्थात विशेषता है । इति = यह, इस ब्राह्मण वाक्य से, विज्ञायते । जाना जाता है । ऋपियो ने त्रिष्टुप् छन्द से तीन घार वाले बच की तीन बार स्तुति को, है इसी लिये इस छन्द का नाम त्रिष्टुप् पड़ा है। इस प्रकार त्रिष्टुम् के पूर्व पद वि शब्द का अर्थ हुआ। अथ निरुक्त सप्तमाघ्यायस्य त्रयोदशः सण्डः । जगती दाद का निर्वचन- । c जगती-गवतमं छन्दः । गततमम् सब से अधिक दूर तक गया हुआ जो छन्दः = छन्द वह, जगती = जगतो छ कहा जाता है । यह मन्य सब छन्दो से अ त वा छन्द है। इस से पर छन्द नहीं है चिन्नु अतिच्छन्द है। - + . - T" " निरुक्त सप्तमाध्यापस्य त्रयोदशः खण्डः । (१२५१) जलचरगतिर्वा । वा = अथवा, जलचरगति जलचरगति वाला होने से यह छन्द जगती छन्द कहलाता है। 'जले चरति इति जलचरः इस विनर मे ' चरगतिभक्षणयो,' धातु से 'चरेष्ट ' इस सूत्र से ट (अ) प्रत्यय होने पर जलचर शब्द बना है। जलोमि अर्थात् जल के तरङ्ग का नाम है । 'जलचरस्य गतिरिव गतिर्यस्या. सा जगती' इस विग्रह मे जलचर और गति शब्दो का 'अनेकमन्यपदार्थे ' इस सूत्र से बहुव्रीहि समास, सुप् लुक , जलचरगति, पृपोदरादित्वात् 'लचर'का लोप, जगति, बह्वदिम्यश्च' इस सूत्र से हीषु (ई), 'यस्येतिच' इस सूत्र से इकार लोप होने पर 'जगती' शब्द बना है। छन्द का नाम है । यह छन्द ४८ अक्षरो का होता है। जल्गल्यमानोऽसृजदितिच ब्राह्मणम् । प्रजापति (ब्रह्मा)ने, जल्गल्यमान : सृष्टि करने की इच्छा न होने से ग्लानि मानते हुए इसे, असृजत् = सृजा है, इति च = यह भी, ब्राह्मणम् = ब्राह्मण वचन है। 'जल्गल्यमानः' यह 'ग्लै हर्षलये' धातु का रूप है । जिसका अर्थ क्षीणहर्ष होता है । यद्यपि ' असृजत् ' का अर्थ सृजा है होता है तथापि यहा देखा है' यह अर्थ समझना चाहिये । क्योकि, छन्द नित्य होते हैं। इसकी सृष्टि नहीं होती है । अनादि है। विराज शब्द का निर्वचन- विराट-चिराजनाद्वा-विराधनाद्वा-विप्रापणाद् वा । विराजनात् = विशेष शोभायमान होने से, वा = अथवा, विराधनाव = वैकल्य होने से, वा - अथवा, विश्रापणा - बढने से, विराट् = विराट छन्द कहा जाता है। इसी अर्थ को स्वय स्पष्ट करते हैं- 10x3xnon soxy विराजनात्संपूर्णाक्षरा । 'विराजनाद = विराजन 'अर्थात् विशेष शोभन होने से, सम्पूर्णाक्षरा = सम्पूर्ण अक्षर वाली विराट् है । 'वि-विशेपेण राजते इति विराट् ' इस विग्रह मे विपूर्वक 'राज दीप्तो' धातु से, 'क्विा च इस सूत्र से विवप् (०) प्रत्यव होने से, विराज् शब्द वना है। पत्व, जस्त्व, चर्व विराट्. विराधनात् ऊनाक्षरा। विराधनात् = विराधन अर्थात् विकल होने से, ऊनाक्षरा = अल्प अक्षर घाली विराट् है। 'वि-विशेषेण राध्यति इति विराट्' इत विग्रह मे विपूर्वक वैकल्याथं राघ धातु से पूर्ववत् कि, सपिहारी लोप, छान्दसत्वाद वर्णविपर्यय होने से ५ को ड, चर्व होने पर विराट् बना है। विप्रापणात् अधिकाक्षरा। विप्रापणाद = विप्रापण अर्थाद बटने से, अधिकाक्षरा अधिक अक्षर वाली विराट् है। 'वि-विशेषेण प्र-प्रकर्षे आप्नोति इति विराट्' इस विग्रह मे विप्र पूर्वक 'आफू व्याप्तौ' धातु से पूर्ववत .
- - - (१२५२) निरुक्त सप्तमाध्यायस्य प्रयोदशा लण्ड । किम् (०), विप्र आप् , पृपोदरादित्वात् वर्णविपर्यय होने से विराज् , पत्व, जस्त्व, चत्वं होने से विराट् बना है। इस प्रकार राज् , राध और आप इन तीन घातुओ से विराट् शब्द बना है। पिपीलिकमध्या इत्यौपमिकम् । पिपीलिकम या = विराट का पिपीलिकमध्या, इति = यह नाम, औपमिकम् - उपमा से है । उपमा की दृष्टि से इसे पिपीलिकमध्या (जिस के बीच में अक्षर उसी प्रकार कम हों जिस प्रकार चोटी का बिचलाभाग) कहते है। पिपीलिका पेलतेगेतिकर्मणः । गतिकर्मणः = गत्यर्थक, पेलतेः = पेल घातु से, पिपीलिका - पिपीलिका शब्द बना है। अर्थात् 'पेल्यते = वेल्यते = पुनः पुन. गम्यते इति पिपीलिका' इस विग्रह में, अपि पूर्वक 'पेल गती' धातु से 'अकर्तरि च कारके सज्ञायाम्' इस सूत्र से धन (अ) प्रत्यय, 'वष्टि भागुरिरलोपम्' इस नियम के अनुसार भागुरि के मत मे अपि के अकार का लोप, पि पेल् अ, पृपोदरादित्वाद उपधा को ईत्व, पिपील अ, पिपील, टाप, पिपीला, स्वार्थ मे कन् (क) प्रत्यय, पिपीलाक, 'केहणः' इस सूत्र से हस्व, पिपीलक टाप, पिपीलका, प्रत्ययस्थात्कादपूर्वस्यात इदाप्यसुप इस सूत्र से इत्व होने पर पिपीलिका शब्द बना है। चीटी का नाम है । क्योकि, चीटी रात्रिदिन सतत गमन करती रहती है । देवता भेद- इतीमा देवता अनुक्लान्ता । इति = इस प्रकार, इमा देवताः = अग्नि, जातवेदा, वैश्वानर आदि देवता, अनुक्लान्ताः संक्षेप से निर्णीत हुए। सूक्तभाजो हविर्भाजः। पे यथोक्त देवता, सूक्तभाजः = सूक्तभाक् (सूक्तसम्बन्धी ) और, हविर्भाजः = हविर्भाक (हवि के साथ सम्बन्ध रखने वाले ) हैं। अभाजश्व भूयिष्ठाः। और, भूयिष्ठा. = अधिक पर, ऋग्भाज. = अचा को भजने वाले अग्भाक् हैं। काश्विनिपातभाजः। काश्चित • और कोई, निपातभाजः = निपातभाक् हैं जो निपातों के साथ सम्बन्ध रखते हैं। देवता - परिगणन- अथोताभिधानः संयुज्य हविश्वोदयति । और कही कही, अभिधानः = उन देवताओं के नाम से, संयुज्य = संयुक्त कारके, हवियोदयति = हवि प्रदान करते हैं। जैसे- अप उत - - निरुक्त सप्तमाध्यायस्य त्रयोदशा खण्डा । (१२५३) इन्द्रायं पुत्रों । इन्द्राय वृत्रतुरे। इन्द्रायांहोमुचे, इति । वृत्रघ्ने वृत्र को मारने वाले, इन्द्राय = इन्द्र के लिये । वृत्रतुरे वृत्र को भगाने वाले, इन्द्राय = इन्द्र के लिये । होमुचे = पाप को छुड़ाने वाले, इन्द्राय = इन्द्र के लिये । (एकादशकपालं निर्वपेद) ग्यारह कपालों में पकाये हुए पुरोडाश को देवे। इति = इस प्रकार। यहां इन्द्र के नाम से संयुक्त करके हवि देते हैं। तान्यप्येके समामनन्ति । एके - कोई कोई आचार्य, तानि अपि - उन को भी, समामनन्ति - समाम्नान करते है अर्थात् देवताओं के इन्द्र आदि प्रधान नामों के समान उनके विशेषण वन, वृत्रतुर और अंहोमूच् आदि शब्दों को भी निघण्टु में सग्रह कर पढते हैं । भूयांसि तु समानानात् । तु = किन्तु यह ठीक नहीं। क्योंकि, समाम्नानात् = उन सब को मिला कर पढ़ने से, भूयांसि - बहुत नाम हो जावेंगे। यत्तु संविज्ञानभूतं स्यात् प्राधान्यस्तुति, तत्समामने । यद तु जो (नाम) तो, सविज्ञानभूतम स्यात् = रूढ हो गया है और, प्राधान्यस्तुति जिंस के द्वारा मुख्य रूप से स्तुति की जाती है, तत् = मैं उसी का ही, समामने = निघण्टु में पाठ समझता हूं । अर्थात् में देवताओं के रूढ नामों का ही निघण्टु में पाठ समझता हूं। उनके विशेषण वाचक नामों का नहीं। यहां एक ही देवता के अनेक नाम होने से देवता भनेक नहीं किन्तु एक ही है' यह कहा गया। अथोत कर्ममिर्मपिर्देवताः स्तौति । 'पुत्रहा पुरन्दर' इति । तान्यप्येक समामनन्ति । भूयासि तु समानानात् । 5. 'अय उत - और कहीं कहीं, ऋषिः = प्रापि, कर्मभिः = कमों से, देवताः - देवताओं की, स्तौति = स्तुति करते हैं। जैसे-वृत्रहा = वृत्र को मारने वाला, पुरन्दरः = पुर नामक देस्य को मारने वाला, इति - इत्यादि, एके - कोई कोई भाचार्य, तानि अपि - उनको भो, समामनन्ति पाते हैं। तु - किन्तु सो समीचीन नहीं। क्योंकि, समाम्नानाद = उन सब को पढ़ने से, भूयांसि बहुत नाम हो जायेंगे। यहां एक ही देवता भनेक कर्म करने से देवता अनेक नहीं किन्तु एक है यह पहा गया । भाव यह है कि, इस वपन से यास्क यह कहना पाहते हैं कि, नाम से या प्रिया से जिनको लोग देवता रूप मानते हैं उनको इस दंवत काण्ड में देवता नहीं मानेंगे । किन्तु जो देवता रूप में निर्णात है उन्ही अग्नि, इन्द्र तथा आदिरय मादि को हम देवता मानेंगे । इम में सहष्टान्त । 7 HA D ... indication (१२५४) निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य चतुर्दशा खण्ड: ! व्यञ्जनमात्रं तु तत्तस्याभिधानस्य भवति । यथा ब्राह्मणाय बुभुक्षितायौदन देहि, स्नातायानुलेपनम् , पिपासिते पानीयमिति । इति निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य प्रयोदशः खण्डः ॥ ७-१३ ।। तत् तु = वह तो, तस्य अभिधानस्य - उस प्रधान नाम का, जलनमानम् विशेषण मात्र भवति - होता है । यथा = जैसे, बुभुक्षिताय ब्राह्मणाय = भूखे ब्राह्मण के लिये, मोदनम् देहि भात दो। स्नाताय = स्नान किये हुए के लिये, अनुलेपनम् देहि - चन्दन आदि अनुलेपन दो और पिपासिते प्यासे के लिये, पानीयम् देहि = जल दो, इति = इत्यादि। यहां 'ब्राह्मण' इस प्रधान नाम के साथ बुभुक्षित आदि नाम विशेषण मात्र हैं। ब्राह्मण एक है। अनेक नहीं। वैसे ही इन्द्र' इस प्रधान नाम के 'वृत्रहा' 'पुरन्दर' आदि नाम विशेषणमात्र है। इन्द्र एक ही है। अनेक नहीं। अथ निघण्टौपञ्चमोऽध्यायः । अग्निः । जातवेदाः । वैश्वानर इति त्रीणि पदानि ॥ १ ॥ अग्निः %3D अथ निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य चतुर्दशः खण्डः । अथातोऽनुक्रमिष्यामः। अथ - अब, अतः = यहा से, अनुक्रमिष्यामः = निघण्टु के दैवतकाण्ड की क्रमशः व्याख्या करेंगे। अग्निः पृथिवीस्थानः। तं प्रथमं व्याख्यास्यामः । अग्निः अग्नि देवता, पृथिवीस्थान. = पृथिवीस्थान है, अर्थात् अग्नि का स्थान पृथिवी है । तम् = उस को, प्रथमम् पहले, व्याख्यास्याम. = व्याख्यान करेंगे। भाव यह है कि, निरुक्त मत में तीन ही देवता है। अग्नि वायु और आदित्य । एव तीन ही लोक हैं । पृथिवी अन्तरिक्ष और यु। अग्नि का स्थान पृथिवी । वायु का स्थान अन्तरिक्ष और आदित्य का स्थान द्युलोक है । कर्म, विना अन्य लोको मे जाना असम्भव है और पृथिवी कर्मभूमि है । अन्य की अपेक्षा पास में एवं गणना में प्रथम है। विना किसी कारणविशेष के प्रथम का उलङ्घन करना न्याय नहीं। अतः पृथिवीस्थान अग्नि का प्रथम व्याख्यान करेगे यह मास्क कहते हैं। अनेक प्रकार से अग्निका निर्वचन करते हुए प्रश्न फरते हैं- अग्निः कस्मात् ।। अग्नि कस्माद अग्नि क्यो ? अर्थात् अग्नि को अग्नि क्यो कहते हैं। अथवा किस धातु से कौन प्रत्यय करने पर अग्नि शब्द बना है ? । विग्रह करके उत्तर देते हैं- - - - - . सन्नममान: - निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य चतुर्दशः खण्डः । (१२५५) अग्रणीभवति-अग्रं यज्ञेषु प्रणीयते । अग्रणी: = थह अग्निदेव अग्रणी, भवति होता है। सर्व कर्मों में अपने को आगे ले जात है । सर्वत्र सर्व का ऐसा उपकार करता है जिस से अग्रणी बन जावे। अग्निदेव, यज्ञेषु - यज्ञों में, अग्रम् = आगे, प्रणीयते - ले जाया जाता है। इस लिये अग्रणी से अग्नि बन गया है। अर्थाद 'मग्रं नयति इति अग्निः' इस विग्रह मे अगं उपपद 'णी प्रापणे' धातु से 'स्विप् च' इस सूत्र से कर्तरि क्विप, सर्वापहारी लोप, अग्र नी, अग्र शब्द में के रेफ अकारका पृपोदरादित्वात् लोप नी को हस्व' होने पर अग्नि शब्द बना है। अङ्गं नयति सन्नममानः। यह नमन करता हुमा अर्थात् झूकता हुआ ही, अङ्गम् = अङ्ग को, नयति • ले जाता है । सव को अपना अङ्ग बना (अपना सहायक बना) लेता है। अपने दाहक होते हुए जिस किसी पदार्थ पर पड़ता है उम को भी तपा कर दाहक प्रकाशक वना लेता है। यही इसका अङ्ग (पिछलगू) बनाना है । ' अर्थात् अङ्ग नयती इति अग्निः' इस विग्रह में अङ्ग पूर्वक 'णीन प्रापणे' धातु से पूर्ववत् क्विप् , अङ्ग नी, डकार अकार लोप और नी को हस्व होने पर अग्नि शब्द बना है। अनोपनो भवतीति स्थौलाष्ठीविः । अक्नोपनः - यह अक्नोपन अर्थात रक्ष एवं शुष्क करने वाला भवति = होता है, इसी से अग्नि कहा जाता है, इति = यह, स्थौलाप्ठीविः = स्थूलाष्ठीवि नामक आचार्य कहते हैं । मक्नोपन का अर्थ क्या है ? इस प्रश्न का उत्तर देते हैं- न क्रोपयति न स्नेहयति । न क्नोपयति नही भिंगाते अर्थात्, न स्नेहयति स्निग्ध नहीं करते हैं। न कोपमति का पर्याय 'न स्नेहयति' है । न वनोपयति न स्नेहयति इति अग्निः' इस विग्रह में नम् पूर्वक स्नेहाक 'नूयी शब्दे उन्देच' धातु से ‘हेतुमतिच' इस सूत्र से णिच् (इ) प्रत्यप, अफ्नम् इ, 'मतिहीन्ली रोक्नूयी' इत्यादि मूत्र से पुक् (प्) आगम, अपनूय ५ इ, ऊकार, यकार और पकार का लोप ककार को गकार होने पर अग्नि शब्द बना है। स्नेहरहित रूक्ष करने वाला अर्थ है। अग्नि जिस में लगता है उस को जलाकर रूक्ष कर देता है।. - त्रिभ्य आख्यातेम्यो जायत इति शाकणिः । 'त्रिभ्यः आस्मातेभ्यः तीन आस्मातों (तिडन्त क्रियापदों) से, अग्नि पान्द, जायते - उत्तम होता है, इति = यह, शाकपूणि. = शाकपूणि नामक आचार्य कहने हैं। अर्याद तीन तिमन्त पदके अपं जो तीन क्रिया वे अग्नि शब्द मे प्रतीत होती हैं ।
निरुक्त सप्तमाध्यायस्य पञ्चदश। खण्डा । वा इताव-अक्काद् दग्धाद्वा-नीतात् । इत्ताद गत्यर्थक इण् धातु से, अक्तात् = प्रकाशनार्थक अञ्जु धातु से, अथवा, दग्धात्म भस्मीकरणार्थक दह धातु से, और, नीतात् = प्रापणार्थक णो धातु से अग्नि शब्द बना है। क्योकि, इन तीनों के अर्थ अग्नि शब्द मे प्रतीत होते है। स खल्वेतेरकारमादत्ते, गकारमनक्र्वा दहते, नीः परः । इति निरुक्त सप्तमाध्यायस्य चतुर्दशः खण्डः ॥ ७-१४ ।। सः खलु = वह शाकपूणि, ऐतेः = इण् के इ से, भकारम् = अकार को, आदत्ते = लेता है, अनक्त: वा दहतेः वा - अङ्ग् से अथवा दह से, गकारम् = गकार को, आदत्ते - लेता है और, नी धातु पर है । इसका हस्व नि है। अर्थात् शाकपूणि आचार्य तीन धातु लेते हैं-इ, अक्ष या दह, नी। इ से अ, अङ्ग् या दह से ग्, नी से नि, अ ग् नि । सम्मित-अग्नि शब्द बना है। इस से यह निष्पन्न हुआ कि, जो एति = गार्हपत्य अग्नि कुण्ड में से आहननीय कुण्ड में जाता है, अनक्ति = जो रूपादि को प्रकाश करता है या तृण काप्ठादि को भस्म करता है और जो नयति देवताओं के लिये हवि प्राप्त करता है ले जा कर देता है वह अग्नि कहा जाता है । तस्यैपा भवति । नीः परः - इति निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य चतुर्दशः खण्डः ।। ७-१४ ।। तस्य - उक्त अर्थक अग्नि शब्द का एषा = यह अग्निम ऋचा, भवति = उदाहरण है- अथ निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य पञ्चदशः खण्डः ।। अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ॥ ऋ सं. १-१-१-१ ।। इस मन्त्र का विश्वामित्र के पुत्र मधुच्छन्दा ऋपि, गायत्री छन्द और अग्नि देवता है। मन्त्रार्य-यज्ञस्य पुरोहितम् - यज्ञ के पुरोहित, देवम् = दीप्तिमान्, होतारम् = देवों को बुलाने वाले ऋत्विजम् = ऋस्विक, रत्नधातमम् = रत्नधारी, अग्निम् = अग्नि की मै, ईळे = स्तुति करता हूं। यास्क स्वयं इसका भाष्य करते हैं- wiede अग्निमीळेऽग्नि याचामि, ईळिरध्येपणाकर्मा, पूजाफर्मावा पुरोहितो व्याख्यातः । यज्ञश्च । देवो दानाद्वा-दीपनाद्वा-द्योतनाद्वा-युस्थानो भवतीति वा । यो देवः सा देवता । होतारं हातारम् , जुहोतेहतित्पौर्णवाभः, रत्नधातम रमणीयानां धनानां दावृतमम् ।
- निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य पोडशा खण्डः । (१२५७) अग्निम् ईळे अग्निम् याचामि = अग्नि से मांगता हूं। ईळि: = ईळ् पातु, अध्येपणाकर्मा : अध्येपणा = आराधना अर्थक धातु है। वा = अथवा, पूजा कर्मा - पूजार्थक धातु है। पुरोहित पुरोहित शब्द की, व्याख्यातः = व्याख्या हो चुकी है। 'पुरोहितः पुर एनं दधति' इस वाक्य से (नि. २-१२) । च = और, यज्ञः = यज्ञ शब्द को भी, व्याख्यातः = घ्याख्या हो चुकी है। यज्ञः कस्मात् ? । प्रख्यातं यजतिकर्मा' इस वाक्य से (नि. ३-१७)। दानाद् वा देवः - हुदाबू धातु से देव शब्द बना है। अर्थात् ' ददाति ऐश्वर्यमिति देवः' इम विग्रह में ड्डदान् दाने घातु से उणादि व प्रत्यय, पृषोदरादित्वात् एकार होने पर देव शब्द बना है। वा = अथवा, दीपनात जलाने से, देवः = देव कहा जाता है.! दीप्यते इप्ति देवः' इस विग्रह में 'दीपी दीप्तौ' धातु से पचायच्, पृपोदरादित्वात् दो को एकार और प को व, होने पर देव शब्द बना है। वा = अथवा, द्योतनात् = द्योतन (प्रकाश) करने से, देवः = देव शब्द बना है। द्योतते इति देवः' इस विग्रह में 'द्युत दीप्तौ' धातु से पृषोदरादित्वात् एकार वकार हो कर देव शब्द बना है। वा = अथवा, गुस्थाने = धुस्थान अर्थात् धुलोक में, भवति = रहता है, इति = इस लिये, देवः = देव कहा जाता है। यः = जो, देवः देव होता है, सा = वहीं, देवता = देवता कहलाता है। ह्वातारम् = आह्वान करने वाले को, होताराम् = होता कहते हैं। जुहोतेः = हु धातु से, होता = होतृ शब्द बना है, इति = यह, और्णवाभः = और्णवाभ नामक आचार्य कहते हैं । अर्थाद 'जुहोति इति होता' इस विग्रह में 'हु दानादनयोः' धातु से 'ण्वुल्तृचौ' इस सूत्र से कर्ता में तृच् (तृ) प्रत्यय, हुन्, 'सार्वधातुका- पधातुकयोः' इस सूत्र से गुण होने पर होतृ शब्द बना है। 'होता' यह अनङ होने पर प्रथमा एक वचन का रूप है। रमणीयानाम् धनानाम् = रमणीय धनो के, दातृतमम् = अतिपाय दाता को, रत्नधातमम् = रत्नपातम कहते हैं । रत्नं दधातीति रत्नधा, अतिशयेन रत्नधा इति रत्नधतमः तम् । इस विग्रह मे रलपूर्वक धा धातु से क्विप् (०) और तमप् होने पर रत्नधातम शन्द बना है । तस्यैपाऽपरा भवति । इति निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य पञ्चदशः खण्डः ॥ ७-१५ ॥ तस्य = उस अग्नि शब्द का, एपा अपरा = यह दूसरी ऋचा उदाहरण, भवति = है-- अथ निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य पोडशः खण्डः । अग्निः पूर्वेभित्रपिभिरीड्यो नूतनैरुत । स देवाँ एह वक्षति ॥ ऋ सं. १-१-१-२ ।। इस मन्त्र का मधुच्छन्दा ऋषि, गायत्री छन्द और अग्नि देवता है । मन्त्रार्थ-अग्निः = अग्नि, पूर्वेभिः - प्राचीन, उत - और, नूतनैः = नवीन, ऋषिभिः = अपियों के द्वारा, ईध्यः = स्तत्य है। सः । वह अग्नि, देवान् = देवो को, इह = यहा, आवक्षति = लेआयें। इस का यास्क भाच्य- (१२५०) निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य सप्तदशः तण्डः । अग्नियः पूर्व पिभिरीडितव्यो वन्दितव्योऽस्याभिश्व नवतरैः स देवानिहातहत्विति । यः मग्निः = जो अग्नि, पूर्वः ऋषिभिः = प्राचीन ऋषियों के द्वारा, च = और, अस्माभिः नवतरैः = हम नूतनों के द्वारा, ईडितव्यः - वन्दितव्यः = स्तुत्य है, स = वह, देवान् = देवों को, इह = यहां यज्ञ में, मावहतु = ले आवें, इति = इत्यर्थः । इस प्रकार पूर्वोक्त दोनों ऋचाओं से अग्नि शब्द से पार्थिव ज्योति कह कर अन मध्यम तथा उत्तम ज्योति भो अग्नि शब्द से लिया जाता है यह कहते हैं- सन मन्येतायमेवामिरिति । अप्येते उत्तरे ज्योतिपी अग्री उच्यते ततो नु मध्यमः। इति निरुक्त सप्तमाध्यायस्य पोडश. खण्ड, ।। ७-१६ ।। . % 3D वह (कोई शिष्य), न मन्येत यह न मान ले कि, अयम् एव अग्निः इति = केवल यही पर्थिव अग्नि अग्नि कहलाता है। बल्कि, एते उत्तरे ज्योतिषी अपि ये आरके बिजली और सूर्य रूप दोनों ज्योति भी, अग्नी उच्यते = अग्नि कहलाते है। तत नु = तो यह अग्रिम ऋचा, मध्यमा - मध्यम अग्नि विजली की है- अथ निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य सप्तदशः खण्डः । .. - अभि प्रवन्त समैनेव योषाः कल्याण्य: स्मयमानासो अग्निम् । धृतस्य धाराः समिधो' नसन्त ता जुषाणो हर्यति जातवेदाः ॥ कसं ३-६-११-d॥ इस मन्त्र का नामदेव ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और धृत तथा अग्नि आदि देवता हैं। मन्त्रार्थ- कल्याण्य: कल्याणी, स्मयमानासः हास्यवदना, योपाः = स्त्री, समनाइव = जैसे एक चित्त हो कर, अभिप्रवन्त = पति के प्रति गमन करती है वैसे हो, धृतस्य धारा. = धृत धारा, धृत समान जल धारा, अग्निम् = अग्नि के प्रति गमन करती है। समिधः = वह सम्यक् रूप से दीप्तिप्रद हो कर, नसन्त - सर्वत्र व्याप्त होती है। जातवेदाः जातवेदा मध्यमस्थान वैद्युत अग्नि, जुपाणः प्रियमाण होता हुआ, ताः उसी धारा की, हर्यति = कामना करते हैं। इस मन्त्र मे जातवेदा शन्द मध्यमस्थान वैधुत अग्नि वाचक । इस से सिद्ध है कि, अग्नि केवल पृथिवी स्थान ही नही किन्तु मध्यमस्थान भी है। उक्त मन्द्रका यास्क भाप्य- अभिनमन्त समनस इन योपाः। समननाद्वा संमाननाडा। कल्याण्यः समयमानासो अग्निमित्यौपमिकम् । धृतस्य धारा उदकस्य धारा । समिधोनसन्त । नसतिराप्नोतिकर्मा वा नमविकर्मा वा । वा जुषाणोईयति जातवेदाः । हर्यति प्रेप्साकर्मा, विहर्यतीति ।
%3D TI , हास्यवदना बीके . निक्षते सप्तमाध्यायस्य सप्तदशः खण्ड । (१२५९) अभिप्रवन्त = अभिनमन्त - पति के प्रति आसक्त होती हुई, समना इवे = समनस इव एक चित जैसा, योषा स्त्री। समननाव वा = समनन से समना शब्द बना है। अर्थात् 'सम्यक अनिति इति समना' इस विग्रह मे सम् पूर्वक 'अन प्राणने' धातु से पचाद्यच् और टाप होने से समना शब्द बना है। 'वा = अथवा, समाननात् = सम्यक् मानन से समना शब्द बना है। अर्थात् 'सम्यक् मनुते इति समना' इस विग्रह मे सम् पूर्वक ' मनु अवोधने' धातु से पूर्ववत् अच् प्रत्यय और टाप् होने पर समना शब्द बना है । कल्याण्य - कल्याणी, समयमानास = समान घृत धारा, मग्निम् = अग्नि को प्राप्त होती है। इति मोपमिकम् यह उपमाजन्य अर्थ है । घृतस्य धारा = उदकस्य धारा = जल की धारा अग्नि के प्रति गमन करती है। समिधो नसन्त = प्राप्त या नमन करती हुई । नसति = नस धातु, आप्नोतिकर्मा = व्याप्ति अर्थक है, वा = अथवा, नमतिकर्मा = नमन अर्थक है । अर्थात् 'नसन्ति इति नसन्त ' इस विग्रह में व्याप्त्यक या नमनार्थक नैरक्त नस धातु से लट्, शतृ (अव) प्रत्यय होने से 'नसन्त' रूम बना है। व्याप्त होती हुई या नमन करती हुई अर्थ है । जातवेदा = मध्यम स्थान विद्युत रूप अग्नि, जुषाण प्रियमाण होता हुआ, तट = उसी धारा की, हर्यति = कामना करते हैं विहार करते हैं। हयति = हर् धातु, प्रेप्साकर्मा = इच्छा अर्थक नेरक्त धातु है । वियति इति = विहार अर्थात् कामना करते हैं यह अर्थ है । 'उत्तम ज्योति सूर्य भी अग्नि कहलाता है' इस मे मन्य उदाहरण देते हैं- समुद्रादुर्मिर्मधुमाँ उदार " समुद्रात = समुद्र से, मधुमान मधुमय, अमि = तरग, उदारत् - प्रगट हुई। सम्पूर्ण मन्त्र- समुद्रादूमिर्मधुमाँ उदारदुपांशुना सममृतत्त्वमनिट् । -घतस्य नाम गुह्यं यदास्ति जिह्वा देवानाममृतस्य नाभिः ॥ ऋ स ३-८-१०-१ ।। } इस मन्त्र का वामदेव ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और सूर्य देवता है। मन्त्रार्थ-समुद्रात् = ऊमि = आत्मप्रकाश से सर्व का आच्छादक, मधुमान् = उदक्वान् आदित्य उदारत उदय होता है । अशुना = हिमाशु चन्द्रमा से, अमृतत्वम् = अमृतभाव, उप सम् पानट् = प्राप्त होता है । घृतस्य - घृत का, यत् = जो, गुह्यम् = गोपनीय, नाम = नाम है, तद = वह, देवानाम् जिह्वा = जिह्वा (जीभ) है और वही, अमृतस्य = अमृत की, नाभि = वन्धक नामि है । इम मन्त्र में मधुमान् का अर्थ है सूर्य । अत सूर्यात्मक उत्तम ज्योतिरूप अग्नि द्युस्थान है । इत्यादित्ययुक्तं मन्यन्ते, 'समुद्राद्धथेपोऽद्भय उदेति' इति ब्राह्मणम् । इति इस मन्त्र मे, आदित्यम् उक्तम् = आदित्य पो उक्त मन्य ते - मानते हैं । हि क्योंकि, एष = यह आदित्य ज्योति रूप अग्नि, समुद्रात् अद्भय समुद्र के जल से, उदेति " समुद्र से, %3D = देवों की, . - उदय (१२६०) निरुक्त सप्तमाध्यायस्याप्टादशः खण्डः । होता है, इति - यह, ब्राह्मणम् = ब्राह्मण वाक्य है । समुद्र से पार्थिव अग्नि के उदय होने का सम्भव नहीं। अत: यहा अग्नि आदित्य ही है। अथापि ब्राह्मणं भवति, “अग्निः सर्वा देवता" इति अय अपि = और भी, ब्राह्मणम् = ब्राह्मण, भवति = है-अग्निः सर्वा देवता - अर्थात अग्नि सब देवता है, इति = यह । सभी देवता जव अग्नि है तब आदित्य है। अतः सूर्य ज्योति रूप अग्नि युलोक मे भी है यह सिद्ध हुमा । तस्योचरा भूयसे निर्वधनाय । तस्य - 3 इति निरुक्ते सप्तमाध्यायस्थ सप्तदशः खण्डः ।। ७-१७ ।। उक्त ब्राह्मण वाक्य के, उत्तराः = आगे की, भूयसै = बहुत सो ऋवायें, निर्वचनाय निवंचन के लिये है। उनका अर्थ अग्रिम मचा में स्पष्ट रूप से वर्णन किया हुआ है। अथ निरुक्त सप्तमाध्यायस्याष्टादशः खण्डः । इन्द्रं' मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् । एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्ानमाहुः ॥ ऋ सं. २-३-२२-४६ ॥ इस मन्त्र का दीर्घतमा ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और सूर्य देवता है । मन्त्रार्थ-मेघावी लोग इस आदित्य को, इन्द्रम् - इन्द्र, मित्रम् - मित्र, वरुणम् = वरुण और, अग्निम् = अग्नि, आहुः । यही करते हैं । अथो = और यह गएड, दिव्यः = स्वर्गीय, सुपर्णः सुन्दर पक्ष वाले मोर, गरत्मान् : सुन्दर गमन वाला पक्षी है । स. = वह गरुड भी आदित्य ही है। वह आदित्य, एकम् सद - एक है तो भी, विप्राः देवतातत्वज्ञ ऋपि लोग उसे, बहुधा - अनेया, वदन्ति = वृष्टयादि के कारण आदित्य ज्योति रूप अग्नि को, यमम् = नियन्ता, मातरिश्वानम् = मातरिश्वा वायु. आहुः = कहते हैं। यास्क स्वयं इस मन्त्र का भाष्य करते हैं- इसमेवाग्नि महान्तमात्मानमेकमात्मानं बहुधा मेधाविनो यदन्तीन्द्र मित्रं वरुणमन्नि दिव्यं च गरुत्मन्तम् । दिव्यो दिविजो, गरुत्मान् गरणवान् । गुर्वात्मा महात्मेति बा। इमम् एच - इसी, महान्तम् आत्मानम् अग्निम् = महान् आत्मा अग्नि को, एकम् मात्मानम् एक आत्मा वाले, अग्नि को, नेपायिनः = मेधावी विद्वान् लोग, बहुधा = अनेक प्रकारसे, वन्ति = कहते हैं-इन्द्रम् : इन्द्र, मित्रम् = मित्र, वरुणम् = वक्ष्ण, अग्निम् - अग्नि, च : कहते हैं। उसी और, %3D - निरक्त सप्तमाध्यायस्यकोनविंशी खण्डः । (१२६१) दिव्यम् गरुत्मन्तम् - दिव्य गरुत्मान् । दिव्यः = दिविजः = स्वर्ग में उत्पन्न । गरत्मान गरणवान् स्तुति से युक्त । गुरु आत्मा = गुरु आत्मा वाला, वा = या, महात्मा = महात्मा, इति = इत्यादि । यस्तु सूक्तं भजते यस्मै हविनिरूप्यतेऽयमेव सोऽमिः । यः तु = जो तो, सूक्तम् भजते सूक्त को भजता है अर्थात् सूक्तों में जिसको प्राधान्यतया स्तुति होती है और, यस्मै = जिसके लिये, हविः = हवि का, निरूप्यते मिपि होता है, स: . वह, अग्निः = अग्नि, अयम् एव = यही पार्थिव अग्नि है। निपातमेवैते उत्तरेज्योतिषी अनेन नामधेयेन भनेते । D इति निरुते सातमाध्यायस्याप्टादशः खण्डः ॥ ७-१८ ॥ एते = ये, उत्तरे = ऊपर के, ज्योतिषी = मध्यम उत्तम दो ज्योति, अनेन नामधेयेन अग्नि नाम से, निपातम् एव = निपात को हो, भजेते - भजते हैं अर्थात् उन मे यह अग्नि नाम गोण रूप से ही आता है। पार्थिव ज्योति मे अग्नि नाम मुख्य रूप से और विद्युत् तथा सूर्य ज्योति में अग्नि नाम गौण रूप से आता है। Pr अथ निरुक्ते सप्तमाऽध्यायस्यकोनविंशः खण्डः । जातवेदाः कस्मात् १ जातानि वेद । प्रश्न-स्मात् = किस कारण से अग्नि, जातवेदाः - जात वेदा कहा जाता है ? । उत्तर- जातानि वेद - उत्पन्नमात्र सर्व प्राणी को जानता है इस कारण अग्नि जातवेदा कहा जाता है । अर्थात् 'जातानि वेद जानाति इति जातवेदाः' इस. विग्रह मे जात उपपद 'विद ज्ञाने' धातु से 'सर्वधातुभ्योऽसुन्' इम उणादि सूत्र से कर्ता मे असुन् ( अस् ) प्रत्यय और लघूपध गुण होने पर जातवेदस् शब्द बना है। अग्नि का नाम है । क्योकि, अग्नि लोकपाल होने से सर्व को जानता है । जातानि वैनं विदुः । घा = अथवा, जातानि = जात अर्थात उत्पन्न जो प्राणी वे सब, एनम् = इसे, विदुः - जानते हैं। ' जातः प्राणिभिः असो विद्यते ज्ञायते इति जातवेदा.' इस विग्रह में पूर्ववत् जात पूर्वक 'विद ज्ञाने' धातु से 'सर्वधातुभ्योऽसुन्' इस उणादि सूत्र से कर्म में असुन (अस् ) प्रत्यय और लघूपधगुण होने पर 'जातवेदस्' शब्द वना है। अग्नि ऐसा प्रसिद्ध है कि इस को जातमात्र सभी प्राणी जानते हैं । जाते जाते विद्यत इति वा । वा अथवा, जाते जाते = जात जात में = उत्पन्न मात्र समी प्राणो में, विद्यते = विद्यमान = इस लिये अग्नि जातवेदा कहा जाता है । 'जाते जाते सर्वस्मिन् भूत जाते विद्यते इति (१२६२) निक्त सप्तमाध्यायस्यकोनविंशा खण्डः । जातवेदाः' इस विग्रह में जात उपपद 'विद सत्तायाम् ' धातु से पूर्ववत् असुन् प्रत्यय और गुण होने पर जातवेदस् शब्द बना है। अग्नि का नाम है। क्योकि, ऐसा कोई उत्पन्न पदार्थ नहीं है जहां मग्नि न हो। जातवित्तो वा जातधनः । वा = अथवा, जातवित्तः जातधन: = प्राप्त हुआ है हवि रूप धन जिस को यह जातवैदा कहा जाता है । इस पक्ष में जातं वित्तं धन यस्य स जातवेदाः' इस विग्रह में जात शब्द और वित शब्द का वहुव्रीहि समास होने पर जातवित्त, और वित्त शब्द के स्थान में पृपोदरादित्वात् वेदस् आदेश होने पर जातवेदस् शब्द बना है । अग्नि का नाम है । क्योकि, अग्नि को हवि रूप धन प्राप्त है । जातविद्यो चा जातप्रज्ञाना । वा = अथवा, जातविद्यः - जातप्रज्ञान. = उत्पन्न होते ही (अध्ययन के विना ही) प्राप्त हुई है विद्या जिस को वह जातवेदा कहा जाता है | अग्नि को अध्ययन के बाद विद्या नहीं प्राप्त हुई है। किन्तु सादा से वह जातप्रज्ञान है। इस पक्ष मे भी जात पूर्वक 'विद ज्ञाने' पातु से असुन प्रत्यय होने पर जातवेदस् शब्द बना है । "यत्तज्जातः पशूनविन्दतेति तज्जातवेदसो जातवेदस्त्वम्" इति ब्राह्मणम् । यत् तव - जो वह, जात. = उत्पन्न होता हुआ ही, पशून् = पशुओ को, अविदित = प्राप्त हुआ, इति = यह, तत् = उस, जातवेदस् का, जातवेदस्त्वम् = जातवेदस् पना है । इति = यह, प्राह्मणम् - ब्राह्मण वचन है । 'जातः सन् पशून अविन्दत इति जातवेदाः' इस विग्रह में जात उपपद 'पिल लाभे' धातु से असुन प्रत्यय और गुण होने पर जातवेदस् शब्द बना है । तस्मात् सर्वानृतून पशवोऽग्रिममिसर्पन्ति " इति च । तस्मात् = इस से, सन् ऋतून = सर्व ऋनुओ में, पशवः = पशुओ, अग्निम् समीप, अभिसन्ति = जाते हैं, इति च = यह भी ब्राह्मण वचन है । तस्यैपा भवति । तस्य = उस जातवेदस् की स्तुति उदाहरण, एषा = यह अग्रिम प्रचा, भवति = है- इति निरक्त सप्तमाघ्यायस्यकोनविंशः खण्डः ॥ ७-१९ ।। जातवेदसे सुनवाम सोम॑मरातीयतो नि दहाति वेद । स नः पर्पदति दुर्गाणि विश्वा नावेब सिन्धु दुरितात्यग्निः ॥ मा. सं. १-७-७.५॥ " - भग्नि के %D - घन, - निरुक्त सप्तमाध्यायस्य विशा खण्ड: । (१२६३) इस अवा का अङ्गिरा के पुत्र कुत्म अपि, त्रिष्टुप् छन्द और अग्नि देवता है । मन्त्रार्थ- जातवेदसे हम अग्नि के लिये, सोमम् = सोम का, सुनवाम = अभिपव करते है । स अग्नि, अरातीयत जो हमारे प्रति शत्रु के समान आचरण करते हैं उन शत्रुओ का, वेद निदहाति = दहन करें । स. = वह अग्नि, नावा इव सिन्धुम् = नाव से नदी के समान अर्थात् जैसे नौका से नदी पार की जानी है वैसे ही वह अग्नि, न. - हमे, विश्वा दुर्गाणि सारे दुखो से, अति पर्पद - पार करा दें। अग्नि. = वह अग्नि हमे, दुरिता = पापो से, अति पारयतु = पार करा दें। इस ऋचा से जातवेदा = अग्नि की स्तुति की गई है। इसका भाप्य--- [जातवेदस इति-जातवेदस्यां चैवं जातवेदसेऽर्चाय सुनवाम सोममिति प्रसगयाभिपनाम सोमं राजानममृतमरातीयतो यज्ञार्थमनिस्मोनिदहाति निश्चयेन दहति भस्मीकरोति । सोमो दददित्यर्थः । स नः पर्षदति दुर्गाणि विश्वानि दुर्गमाणि स्थानि नावेव सिन्धुं सिन्धु नावा नदी जल दुर्गा महाकूला तारयति दुरितान्यग्निरिति दुरितानि तारयति ।] अध्याय के अन्त मे खण्ड सूत्र है । उस मे उल्लेख न होने से प्रकोप्ठगत 'जातवेदसे' इत्यादि मन्त्र और उसका भाष्य प्रक्षिप्त समझना चाहिये । भाष्य सुगम है । इस लिये इसकी व्याख्या नहीं की गई है। अथ निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य विश. खण्ड. । - - हमारे, इदम् प्र नूनं जातवेदसमश्वं हिनोत वाजिनम् । इदंनो वहिरासदे ॥ स ८-८-४७ १ ।। strum इस मन्त्र का अग्नि-पुत्र श्येन ऋषि, गायत्री छन्द और ज्ञानी अग्नि ही देवता है । मन्त्राथं-- हे ऋत्विक् गण | आप सब, अश्वम् = चतुर्दिग्व्यापी, वाजिनम् = अन्नवान, जातवेदसम् जातवेदा अग्नि को, नूनम् = अवश्य, प्रहिनोत = प्रज्वलित वरो जिम से वह, न = बहिः = इस कुशासन पर, आस = आकर बैठें। इस मन्त्र मे जातवेदा अग्नि को स्तुति है। इसका भाष्य- प्रहिणुत जातवेदसं कर्मभिः समश्नुवानमपिपोपमार्थे स्यात् अचमिव जातवेदसमितीदं नो पहिरासीदलिति । जातवेदसम् = जातवेदा अग्नि को, कर्ममि. = अपने कयों से, प्रहिणत = प्रेरित अर्थाद प्रज्वलित करो । समनुवान् = जो सर्व व्यापक है। अपिया अथवा, उपमा = उपमा के अपं मे, स्यादन है-अश्वम् इव = अश्व के समान, जातवेदसम् - जाकवेदा अग्नि को, नो - हमारे इति इदम् बहिः- इस कुशासन पर, मासीदतु = बैठे, इति = इत्यर्थः । .
(१२६४) निरुक्त सप्तमाध्यायस्य विंशः खण्डः । तदेतदेकमेव जातवेदस्यं गायत्रं तचं दशतयीपु विद्यते । तत् एतत् = वह यह, दशतयोपु = ऋग्वेद के दश मण्डलो में, जातवेदस्यम् = जातवेदा अग्नि सम्बन्धी, तृचम् = तीन पाद वालो और, गायत्रम् = गायत्री छन्द वाली, एकम् एव = एक हो ऋचा, विद्यते - है । यत्तु किश्चिदाग्नेयं तज्जातवेदसानां स्थाने युज्यते । यत् तु = जो तो, किश्चित् = कुछ, = आग्नेयम् = अग्नि सम्वन्धी ऋचा हैं, तद् = वहा जातवेदसानाम् = जातवेदा अग्नि के, स्थाने = स्थान मे, युज्यते = शान द्वारा विनुयुक्त होता है । क्योकि, जातवेदा अग्नि का ही नाम है। सन मन्येतायमेवाग्निरित्यप्यते उत्तरे ज्योतिपी जातवेदसी उच्यते । ततो नु मध्यमः। वह ( कोई शिष्य ), इति न मन्येत यह न मान ले कि, अयम् एव अग्निः इति : केवल यही जातवेदा अग्नि कहलाता है। किन्तु, एते उत्तरे ज्योतिषी अपि - ये ऊपर के विजली और आदित्य रूप दोनो ज्योति भो, जातवेदसी = जातवेदा अग्नि, उच्यते = कहलाते हैं। तत. नुन इसी प्रकार, मध्यमः = अन्तरिक्षस्थान बिजलो रूप जातवेदा अग्नि भी अग्नि शब्द से कहा जाता है- अभि प्रवन्त समनेव योपाः" तत्पुरस्ताद् व्याख्यातम् । समना योषा: इव + समान मन वाली खियो के समान, अभिप्रवन्त = गमन करती है। तत यह ऋचा, पुरस्तात् + थोड़े दूर पूर्व, व्यारयातम् = व्यारयात हुई है अर्थात् इसकी व्याख्या ऊपर हो चुकी है। अथासाचादित्यः । " उदुत्यं जातवेदसम् " तदुपरिटाद् व्याख्यास्यामः । और, असी आदित्य. = उस आदित्य का वाचक जातवेदस शब्द, 'उदुत्यं जातवेदसम् ( उस जातवेदस को ऊपर ) इस म.प्र में प्रयुक्त है। तत् इस मन्त्र की, उपरिष्टाद - भागे, ध्याख्यास्यामः = व्याख्या करेगे (१२- १५)। यस्तु सूक्तं भजते यस्मै हविनिरुप्यतेऽयमेव सोऽग्निर्जातवेदाः। निपातमेवैते उघरे ज्योतिषी एतेन नामधेयेन भजेते । भप %2 इति निदक्ते सप्तमाध्यायस्प विश खण्ड, ॥ ७-२० ।। यः तु - जो तो, सूक्तम् - सूक्त को, भजते - मानता है (पासा है ) और, यस्म - जिस के लिये, हवि = हवि का, निरप्यते - निर्वाप होता है, सः : वह, अयम् एव : मग्निः = पापिय अग्नि जातवेदा है । एते उत्तरे ज्यातिषी - ये कार के दोनो मध्यम उत्तम ज्योतिः यही, जातवेदाः %3D . . निरुक्त सप्तमाध्यायस्य द्वाविंशः खण्डः । (१२६५) पुख, एतेन नामधेयेन = इस नाम से, निपातम् एव गौण ही अर्थात् कभी कभी ही, भजेते भजते हैं, पाते हैं। अथ निरुरु सप्तमाध्यायस्यकविंशः खण्डः । अग्निपद और जातवेदस् पदका निर्वचन करके अब क्रमप्राप्त वैश्वानर पद का निर्वचन करते हैं। वैश्वानर कस्मात् ? विश्वानरान्नयति । प्रश्न-कस्माम् = किस कारण अग्नि, वैश्वानरः वैश्वानर कहलाता है। उत्तर-विश्वान न रान् = सर्वनरों को (मनुष्यों को), नयति - नयन करता है अर्थात् इस लोक से परलोक को ले जाता है इस लिये अग्नि वैश्वानर कहलाता है । " विश्वान् नरान् नरति = नयति इति विश्वानरः, विश्वानर एव इति वैश्वानरः अग्निः" इस विग्रह में विश्व उपपद 'न नये' धातु से 'कर्मण्यण' इस सूय से अण् (अ) प्रत्यय, 'उपपदमति' इस सूत्र से समास, सुब्लर, 'नरे संज्ञायाम् ' इस सूम से विश्व के अकार को दोष और 'प्रज्ञादिभ्यश्न' इस सूत्र से स्वार्थ में अण् (अ) प्रत्यय आदि अच् वृद्धि होने पर वैश्वानर शब्द बना है। अग्नि का नाम है। क्योंकि, अग्नि सर्व को ले जाता है। अथवा 'विश्वान नयति इति विधानरः विश्वनर एव वैश्वानरः' इस विग्रह में विश्व उपपद ‘णोन प्रापणे' धातु से, अच् गुण, नय को नर । शेप सब पूर्ववत् । विश्व एनं नरा नयन्तीति वा । वा = अथवा, विश्वे नराः = सर्व नर, एनम् - इसको, नयन्ति = ले जाते हैं, इति = इस कारण से अग्नि वैश्वानर कहलाता है । अर्थात् 'विश्वेनराः एनं नयन्ति इति विश्वानरः, विश्वानर एव वैश्वानरः' इस विग्रह में नी-अच्, नय-नर, शेयंपूर्ववत् । अपि वा विश्वानर एव स्यात्-प्रत्युतः सर्वाणि भूतानि । तस्य वैश्वानरः । अपिवा = अथवा, विश्वानरः एव स्यात् विश्वानर ही वैश्वानर हो क्योकि, सर्वाणि भूतानि सर्व प्राणियों में, प्रत्युतः = यह अन्तर्गत अर्थात् व्याप्त है । अर्थात विश्वान अरति इति विश्वानरः' इस विग्रह में विश्व उपपद 'ऋ गतौ' घातु से पचाद्यच्. गुण, विश्वान् अर, छान्दसत्वात् उपपद विभक्ति द्वितीया का अलुक होने से विश्वानर, 'तस्य = विश्वानस्य अपत्यं वैश्वानरः' इस विग्रह में अपस्य अर्थ में मण, आदि अव् वृद्धि होने पर वैश्वानर शब्द बना है। अग्नि का नाम है। क्योंकि, अग्नि सर्व प्राणियों में अन्तर्गत है । तस्यैषा भवति । इति निरुत सप्तमाध्यायस्यविशः खण्डः ।। ७-२१ ॥ तस्य = उस वैश्वानर को, एपा = यह ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य द्वाविंशः खण्डः । .
(१२६६) निकत सप्तमाध्यायस्य प्रयोविंशः खण्डः । वैश्वानस्य सुमतौ स्याम राजा हि के भुवनानामभिश्रीः । इतो जातो विश्वमिदं वि चष्टे वैश्वानरो यतते सूर्येण ॥ क. सं. १-७-६-१ ॥ इस मन्त्र का कुत्स ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और वैश्वानर अग्नि देवता है । मन्त्रार्थ-वैश्वानरस्य : हम वैश्वानर अग्नि के, सुमतौ = अनुग्रह में, स्याम = रहे । हि कम् - क्योंकि, वह वैश्वानर, भुवनानाम् = सारे भुवनों का, अभिश्री = अभि श्रयणीय (सेवनीय ), राजा = स्वामी है । 'वैश्वानरः = वैश्वानर अग्नि ने, इतः - इन दो काष्ठो से उत्पन्न हो कर, इदम् - इस जगह को, विचप्टे = देखा और, सूर्येण = सूर्य के साथ, यतते = एकत्र गमन किया । इसका मास्क भाष्य- इतो जातः सर्वमिदममिविपश्यति वैधान संपतते सूर्येण । राजा य: सर्वेषां भूतानामभिश्रयणीयस्तस्य चयं चैश्वानरस्य कल्याण्यां मतो सामेति । इत' जातः = इस दो अरणि रूप ससार से उत्पन्न हो कर यह वैश्वानर, इदम् सर्वम् - इस सम्पूर्ण विश्व को, अमिपश्यति - देखता है। वैश्वानर = वैश्वानर अग्नि, सूर्येण = सूर्य के साथ, संयतते चलता है। य: - जो वैश्वानर, सर्वेपाम् भूतानाम् = सभो प्राणीयो के, राजा = और अभिधयणीयः बाथय है। तस्य वैश्वानरस्य उस वैश्वानर अग्नि की, कल्यण्याम् मतो - कल्याण करने वाली इच्छा मे, वयम् = हम, स्याम = रहे। इति = इत्यर्थः । प्रश्न-तत्कः 'वैश्वानरः । सत् = तो वह, वैश्वानर वैश्वानर, क. = कौन है ? उत्तर-मध्यमः इति आचार्याः । चर्पकर्मणा हि एनं स्तौति । इति निरुक्त सप्तमाध्यायस्य द्वाविश सण्ड ॥ ७-२२ ॥ मध्यमः = मध्यम ज्योति = मध्यम-स्थान या अग्नि वैश्वानर है, इति = यह कोई, आचार्याः आचार्य कहते हैं । हि = क्योकि, वर्षमणा = वृष्टि कम से मपि, एनम् = इस को, स्तौति स्तुति करते है- अथ निरक्ते सप्तमाध्यायस्य प्रयोविशः खण्ड । प्र नू महिलं पभस्य वोचं यं पुरखो वृत्रहणं सचन्ते । वैश्वानरो दस्युमग्निर्जघन्वाँ अधूंनोत्काष्टा अब शम्बरं भेत् ॥ म. सं १-४-२५-६ ॥ स्वामी - - निरुक्त सप्तमाध्यायस्य त्रयोविशा खण्डः । (१२६७) इस मन्त्र का गौतम के पुत्र नोषा ऋपि, त्रिष्टुप् छ द ओर अनि देवता है । मन्त्राथं-- पूरव मनुष्य, यम् वृत्रहणम् = जिन मेघभेदनकारी वैश्वानर अर्थात् मध्यमस्थान विद्युत् रूप अग्नि की वर्षा के लिये सचन्ते - अर्चना करते हैं उन्ही, वृषभस्य = जलवर्षी वैश्वानर का, महित्वम् = माहात्म्म मैं नु = शीघ्र, प्रवोचम् = वोलता हूँ। वैश्वानर अस्ति वैश्वानर = राक्षसरूप शव को, जघन्वान् = हनन किया है और, काष्ठा = वर्षाका जल, अधूनोत् = नीचे गिराया है एव, शम्वरम् = शम्वर नामक जल निरोधक मेघ का, अवभेद भेदन किया है । इस ऋचा मे वैश्वानर शब्द का अर्थ माचार्य सम्मत मध्यमस्थान विद्युत अग्नि है। अग्नि ने, दस्युम् इसका भाष्य-- प्रवीमि तन्महित्वं महाभाग्यं वृपमस्य वर्पितुरपां यं पूसा पूरयितव्या मनुष्याः घृत्रहण मेघहनं सचन्ते सेबन्ते वर्षकामाः। दस्युर्दस्यतेः क्षयार्थादुपदस्यन्त्यस्मिन् रसा, उपदासयति कर्माणि, तमग्निर्वैश्वानरोमनवाधूनोदपः काष्ठा अमिनच्छम्परं मेघम् । । - - अपाम् वपितु = जल वर्षा करने वाले वृपभस्य = वृषभ की, तत् = उस, महित्वम् = महाभाग्यम् । । महात्म्यरूप प्रधानता का मैं, प्रवीमि = वर्णन करूगा, वर्षकामा' = वर्षा की कामना वाले, पूरव पूरयितव्या = मनुष्या मनुष्य, यम् = जिस, वृत्रहणम् = मेघहनम् = मेघनाशक की, सचन्ते सेवन्ते = सेवा करते हैं। क्षयार्थात् = क्षय अर्थक, दस्यते: - 'दसु उपक्षये.' धातु से उणादि युच् (यु) प्रत्यय होने पर, दस्यु दस्यु शब्द व्रता है। ज्योकि अस्मिन् - इस मे, रसा = रस, उपद्रस्यन्ति = नष्ट हो जाते है। एव, यह अपने ममाव से, फर्माणि = सर्व कार्यों को, उपदासयति = नष्ट कर देता है। तम् = से, वैश्वानर अग्नि - वैश्वानर विद्युत् अस्ति ते, तन्न मारते हुए, काष्ठा - अप = जल को अवाधूनोत् = हिलाया और, शम्बरम् = मेघम् = मेघ को, अभिनत - फाड़ दिया। इस प्रकार किसी नैरक्त आचार्य के मत से वैश्वानर का अर्थ मध्यमस्थान विद्युत् अग्नि किया गया। अब दूसरा मत दिखाते हैं- अथासावादित्य इति पूरे याज्ञिकाः । अथ = अथवा, असो = वह वैश्वानर, आदित्य मादित्य है अर्थात् वैश्वानर का अथ धुलोकस्थ सूर्य है, इति = यह पूर्व याज्ञिका - प्राचीन याज्ञि लोग कहते हैं। नोट-पूर्व याज्ञिक वे कहलाते हैं जिन्हो ने विधि, मन्त्र और अर्थवाद आदि वेद के सब भागो से यज्ञ का यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर सदनुसार उसका अनुष्ठान किया हो। उन्ही का मत है कि वैश्वानर का अर्थ मादित्य है इस की पुष्टि मे वे हेतु देते हैं- १५९ f %D . D - (१२६८) निरुक्त सप्तमाध्यायस्य प्रयोविशा सण्डा । एपां लोकानां रोहेण सवनानां रोह आम्नातः । एषाम् लोकानाम् = इन पृथिवीलोक अन्तरिक्षलोक और धुलोको के, रोहेण = आरोहण से सवनानाम् = प्रास.सवन मध्यन्दिनसवन और तृतीयसवन अर्थात् सायसयनो का, रोहः - आरोहण, आम्नात = पढा है। अर्थात् यज्ञ कर्ता प्रात सवन, माध्यन्दिनसवन और तृतीयसवन से क्रमश. पृथिवीलोक, अन्तरिक्षलोक और धुलोर को प्राप्त होता है। यह पूर्व कहा गया है। रोहात्प्रत्यवरोहश्विकीर्पितस्तामनुकृति होताऽऽग्निमारुते शखे वैश्वानरीयेण सूक्तेन प्रतिपद्यते । रोहात् प्रति आरोहण से विपरीत, अवरोह = अवरोह, चिकीर्पित अभिप्रेत है। अर्थात उक्त तीनो सवनो से धुलोक पर आरुढ यज्ञकर्ता का द्युलोक से नीचे उतरना अभिप्रेत है। ताम् अनुकृतिम् = उस उतार के अनुकरण (क्रम) को, होता = यज्ञकर्ता होता, अग्निमारते शस्त्रे अग्नि और मरुत् स्तोत्र मे, वैश्वानरीयेण मूक्तन = वैश्वानरीय सूक्त से, प्रतिपद्यते = प्रारम्भ करता है । सोऽपि न स्तोत्रियमाद्रियेताग्नेयो हि भवति । स अपि यह भी, स्तोत्रियम् न अद्रियेत स्तोनिय आग्नेय स्तोत्र का आदर नहीं करता क्योंकि, वह, आग्नेय अग्नि का, भवति = है। ततः आगच्छति मध्यमस्थाना देवता रुद्रं च मरुतश्च । वहा से यह, प्रत्यारोह मे वैश्वानरीय सूक्त से अनुकरण के आरम्भ करने से, मध्यम- स्थाना देवता = मध्यमस्थान के देवता, रुद्रम् च मरुतश्च = रुद्र और मरगण पर, आगच्छति = आता है। ततोऽग्निमिइस्थानमत्रव स्तोत्रिय शंसति । तत - वहा से, इहस्थानम् अग्निम् = यहा पृथिवी स्थान अग्नि पर, आगच्छति = आता है। अत्र एव = यही वह, स्तोत्रियम् - स्तोत्र पा, शसति = पाठ करता है। इस प्रकार पृथ्वी लोक से अन्तरिक्ष लोक, अन्तरिक्ष लोक से धुलोर जाना आरोह और द्युलोव से अन्तरिक्ष लोय, अन्तरिक्ष लोष से पृथ्वी लोक आना प्रत्यारोह कहा जाता है। अथापि वैश्वानरीयो द्वादशकपालो भवति । एतस हि द्वादशविघं कर्म । अथापि ब्राह्मणं भवति-"असौ या आदित्योऽग्निवैश्वानरः" इति । अथ मपि और भी, वैश्वानरीय = वैश्वानर को पुरोडाश द्वादशवपाल याला, भवति = होता है। हि - क्योनि, एतस्य : वाये हैं अर्थात् वैश्वनर देवता के लिये हवि बारह कपालों में पाई जाती है। अथ अपि = इस इसवे, द्वादशविषम् = बारह प्रकार के, कर्म, अतिरिक्त, ग्राह्मणम् = ब्राह्माण वाक्य भी, भवति - है, असो व आदिरय वैश्वानररा - अग्नि वंश्वानर है। इति = इम ब्राह्मग प्रमाण से वैश्वानर शब्द आदित्य वाचक है तत बारह वपालों वह आदित्य ही, अग्नि - ४ निरुक्तं सप्तमाध्यायस्य प्रयोविंशः खण्डः । (१२६९) अथापि निवित् सौर्यवैश्वानरी भवति । अथ अपि = और भी, निवित् = निवित् नामक स्तुति भी सौर्यवैश्वानरी = सूर्य रूप वैश्वानर वाली, भवति = है। अर्थात् वैश्वानर को सूर्य प्रगट करने वाली स्तुति है। वहां यह पद है- आ यो द्या भात्या पृथिवीमिति । (निवित् ८) यः = जो वैश्वानर द्याम् = धुलोक आभाति = प्रकाशित करता है और, पृथिवीम् - पृथिवी लोक को, बाभाति - प्रकाशित करता है, इति = इत्ययः । आदित्य के विना अन्य कोई द्यावापृथिवी दोनों लोकों को प्रकाशित नहीं कर शव ता है। अतः वैश्वानर का अर्थ आदित्य है । इसी लिये कहा है- एप हि द्यावापृथिव्यावामासयति । (वा. सं. ३३-९२) एषः हि = यही वैश्वानर, पावापृथिव्या = द्युलोक और पृथिवी लोक को, आभासयति = प्रकाशित करता है। अथापि छान्दोमिकं सूक्तं सौर्यवैश्वानरं भवति । अथ अपि - और भो, छान्दोमिकम् सूक्तम् छान्दोमिक सूक्त, सौर्य वैश्वानरम् - सूर्यरूप वैश्वानरके लिये, भवति = है । जैसे-- "दिवि पृष्ठो अरोचत" (य. वा. सं. ३३-९२) मर्याद द्युलोक में स्थित वैश्वानर प्रकाशित करता है। एप हि "दिवि पृष्टो अरोचत" इति । एपः हि = यही 'वानर, दिवि - धुलोक में, पृष्टः - स्पृष्टा अवस्थित होता हुआ, अरोचत: प्रकाश करता है। पूर्वोक्त मन्त्र का ही यह अर्थ है । भाव यह है कि, द्युलोक को सूर्य ही प्रकाश करता है। मस: विश्वानर का अर्थ सूर्य ही है, अन्य नहीं । अथापि हविष्यान्तीयं सूक्तं सौर्यश्वानरं भवति । भय अपि - और भी, हविध्यान्तीयम् सूक्तम् = ऋग्वेद के हविप्यान्तीय सूक्त भी, सौर्यवैश्वानरम् - पूर्वरूपी वैश्वानर का ही, भवति - है । जैसे- हविष्पान्तमजरं स्वर्विदि दिविस्पृश्याहृतं जुष्टमन्नौ । तस्य भर्मणे भुवनाय देवा धर्मणे कं स्वधयां पप्रयन्त ॥ म. सं. ८-४-१०-१॥ - (१२७०) निरत सप्तमाध्यायस्य प्रयोविश! खण्डौ । इस मन्त्र का मूर्द्धन्वान् ऋषि, बिष्टुप् छन्द और सूर्य तथा वैश्वानर गुणक अग्नि देवता है । मन्त्रार्थ-पान्तम् = पीने योग्य, अजरम् - जरा रहित, जुष्टम् = देवो के प्रिय, हविः जो सोम रूप हवि है वह, स्वविदि = सूर्य के जानने वाला और, दिविरपृशि = धुलोर स्पर्शी, अग्नी = अग्नि मे, हुतम् = आहूत किया गया है । तस्य = उस हवि के, भुवनाय = उत्पन्न करने के लिये भर्मणे: परिपूरण करनेके लिये और, धर्मणे - धारण करने के लिये, देवाः देवतागण, कम् = सर्व सुख कर अग्नि को, स्वधया हव्य अन्न से अपप्रथन्त = प्रस्यात अर्थात् वद्धित करते हैं । यह मन्त्र सूर्य वैश्वानर का प्रतिपादक है । अत. वैश्वानर का अर्थ सूर्य अर्थात् आदित्य है यह सिद्ध हुमा । यह सूक्त का प्रथम मन्त्र है । इस के आदि मे 'हविष्यान्तम् ' यह पद है। इसी लिये इस सूक्त को हविप्पान्तीय सूक्त कहते है । इस मे सब मिलाकर १९ मन्त्र है। इसके १२वां मन्त्र में वैश्वानर पद है । जिस का अर्थ सूर्य है । जैसे- विश्वस्मा अग्निं भुवनाय देवा वैश्वानरं केतुमहामकृन्वन् । आ यस्ततानोपसो विभातीरपो ऊर्णोति तमो अर्चिषा यन् ॥ ऋ सं. ८-४-१०-१२ ॥ इस मन्त्र का मूर्धवान् कपि, त्रिष्टुप् छन्द और सूर्य तथा वैश्वानर गुणक अन्नि देवता है । मन्त्रार्थ-देवा. = इन्द्रादि देवोने, विश्वस्मै भुवनाय = सर्व भुवनो के हित के लिये, वैश्वानरम् अग्निम् - वैश्वानर गुणक अग्नि को, अह्नाम् केतुम् = दिन को पतावा अर्थात् दिवस का कर्ता, अकृन्वन् माना है। यः = जो वैश्वानर अग्नि, विभाती: विशिष्ट दीप्ति वाले, उपसः = प्रभात को, माततान = विस्तृत करते हैं और, यन् = जाते हुए, अचिपा = उ.पनी ज्वाला से, तमः - अन्धकार को, अपो कर्णोति - विनष्ट करते हैं। इस मन्त्र में वैश्वानर को दियस का कर्ता कहा गया है। पार्थिव अग्नि तथा मध्यम अग्नि विजली दिवस का कर्ता नहीं बन सकता है। किन्तु आदित्य हो दिवस का वर्ता बन सकता है । अत. वैश्वानर का अर्थ आदित्य ही है यह सिद्ध हुमा । इस प्रकार वैश्वानर का अर्थ आचार्य के मत से मध्यम ज्योति विजली और पूर्व याज्ञिक के मत से आदित्य कर के अव सिद्धान्त मत दिखाते हैं- अयमेवानिवैश्वानर इति शाकपूणिः । अयम् एव अग्नि. - यही पार्थिव अग्नि, वैश्वानरः = वैश्वानर है, इति यह, शाकपूणिः पायपूणि नामक आचार्य कहते हैं । अर्थात् शावपूणि नामक नैरक्ताचार्य के मत से यही पाधि अग्नि वैश्वानर शब्द का अर्थ है । न मध्यम ज्योति और न आदित्य । विश्वानरावेते उत्तरे ज्योतिपी। वैश्वानरोऽयं यचाम्यां जायते ।, एते उत्तरे ज्योतिषी = ये उत्तर के मध्यम ज्योति विजली और उत्तम ज्योति आदिश्य, 'विश्वानरी = विश्वानरें कहलाते हैं, वैश्वानर नहीं और, यत् = जो, ताभ्याम् = उक्त दोनो ज्योतियो से %3D - .. निरुक्त सप्तमाध्यायस्य प्रयोविंशः खण्डः । (१२७१) अर्थात् मध्यम उत्तम ज्योतियों से, ,जायते = उत्पन्न होता है, अयम् = यह पाथिय अग्नि, वैश्वानरः = वैश्वानर कहलाता है । 'विश्वानरयोः (मध्यमोत्तमज्योतिपोः) अपत्यम् इति वैश्वानर: पापियोऽग्निः' इस विग्रह में षष्ठयन्त विश्वानर शब्द से अपत्य अर्थ में 'तस्यापत्यम्' इस सुत्र से अम् (अ) प्रत्यय, विभक्ति लुक, आदि अच् वृद्धि परयेति च लोप होने पर वैश्वानर शब्द बना है। पार्थिव अग्नि का नाम है । क्योंकि, ऊपर के दोनों ज्योतियों से इसको उत्तयत्ति हुई है। प्रश्न-कथन्वयमेताम्यां जायत इति । अयम् यह पार्थिव, अग्नि, एताभ्याम् इन विद्युत् और आदित्य से, कथम् नु - कसे, जायते - उत्पन्न होता हैं ? । प्रथम विद्युत् से पार्थिव अग्नि की उत्पत्ति बताते हैं- यत्र वैद्युतः शरणमभिहन्ति, यावदनुपातो भवति, मध्यमधमैव तावद्भवति,-उदकैन्धनः- शरीरोपशमनः । उपादीयमान एवार्य संपात उदकोपशमनः शरीरदीप्तिः । - - . । यत्र = जहां, वैद्युतः = विद्युत् रूप अग्नि, शरणम् = किसी काप्ठ वा जल आदि आश्रम में, अभिहन्ति - गिरता है और यायत् = जवतक, अनुपातः भवति = अनुरात्त अदि किसी से गृहीत नहीं होता है, तावत् = तबतक, मध्यमघर्मा एव भवति = मध्यम धर्मा ही रहता है - विद्युत् स्वभाव ही रहता है, उदकेन्धनः = जल से जलता है, शरीरोपशमनः = पार्थिव तृणकाप्ठादि से बूझ जाता है । उपादीयमानः एव = जब कोई उसको ग्रहण कर लेते है तव लेने के साथ तुरन्त ही, अयम् - यह, उदकोपशमनः = जल से शमनभाव और, शरोरदीप्तिः = तृणकाष्ठादि से प्रदीप्ति. भाव को, संपद्यते = प्राप्त होता है । जल से वूझने और तृणकाष्ठादि से जलने लगता है । इस प्रकार विद्युत् अग्नि से पार्थिव अग्नि उत्पन्न होता है । अथादित्यात् । अथ = अय, भादिरपाद - आदित्य से पार्थिव अग्नि की उत्पत्ति बताते हैं- उदीचि प्रथम समावृत्त आदित्ये कंसं वा मणि या परिमृज्य प्रतिस्वरे या शुष्कगोमयमसंस्पर्शयन् धारयति तत्प्रदीप्यते । सोऽयमेव संपद्यते । उदीपि - उत्तर दिशा में जव, आहिरे - मूर्य, प्रथम समावृत्ते = पहले पहल आता नव फोई पुष्प, कसं या मगिम्या सा या सूर्यकान्त मणि को, परिमृग्य - साफ करफे, प्रतिस्वरे प्रय धूप में उसके किरणों के सामने. पत्र मुप्पगोमयम् - जहा मूगे गोयर हो उस स्थान में, अगर यहॉयन - उस से बिना पराये, पारयति = पारण कराता है, प्रदीयते मलता है । सः अयम् एवं aभी यह मग्नि, संपते = उत्पन्न होता है।
(१२७२) निरुक्त सप्तमाध्यायस्य प्रयोविंशः खण्डः । गमन = आधान अथाप्याह-" वैश्वानरोयतते सूर्येण" अथ अपि आह वहा भी है-वैश्वानरः वैश्वानर, सूर्येण = सूर्य के साथ, यतते करता है। बहुत समीप मे ही इस मन्त्र की व्याख्या की गई है। यहां यह समझना है कि, वैश्वानर का अर्थ यदि आदित्य होता तो अपने से आप कोई मिलता नहीं किन्तु एक दूसरे से मिलता है। और इस मन्त्र मे कहा गया है कि, वैश्वानर सूर्य के साथ मिल कर गमन करता है। अतः वैश्वानर सूर्य से भिन्न है और वह पार्थिव अग्नि है। इसी को स्पष्ट करते हैं- नच पुनरात्मनाऽऽत्मा संयतते । अन्येनैवान्यः संयतते । पुन और फिर, आत्मना = अपने से, आत्मा = आप, कोई, नच संयतते = मिलता नहीं किन्तु, अन्येन एव अन्य = अन्य से ही अन्य, सयतते = मिलता है। इत इममादधाति । इत. = इस सूखे गोबर से उत्पन्न, इमम् = इस वैश्वानर अग्नि को, आदधाति करता है । वैश्वानर का अर्थ आदित्य या विद्युत ज्योति होता तो उसका आधान होना अशक्य है । पार्थिव अग्नि का ही आधान होना शक्य है। अतः वैश्वानर का अर्थ पार्थिव अग्नि है विद्युत् था आदित्य नहीं। अमुतोऽमुप्य रश्मयः प्रादुर्भवन्ति । इतोऽस्यार्चिपः तयोर्भासोः सङ्गमं दृष्ट्वैवमवक्ष्यन् । अमुतः = उस आदित्य मण्डल से, अमुप्य = उस आदित्य की, रश्मयः = रमिये, प्रादुर्भवन्ति प्रगट होती हैं । इत. = इस पार्थिव अग्नि से, नस्य इस की, आचिषः = अचिं अर्थात ज्वालायें प्रगट होती हैं। तयो. भासो. = उन दोनो प्रयाशो वा, सङ्गमम् = सयोग, दृष्ट्वा = देख कर, ऋपिने, एवम् = ऐसा, अवयव कहा होगा कि-वैश्वानरो यतते सूर्वेण" अर्थात् आदित्य और पर्थिव अग्नि इन दोनो के समान प्रकाश को देख कर वेद ने इस प्रकार कहा है कि वे वानर सूर्य के साथ गमन करता है। दूसरी युक्ति देसे हैं- अथ यान्येतान्यत्ति मियानि सूक्तानि भागानि वा सावित्राणि वा सौर्याणि वा पौणानि पा वैष्णवानि वा वैश्वदेवानि या त दैश्वानरीयाः प्रबादा अभविष्यन् । आदित्यकर्मणाचन- मस्तोप्यन् इति । उदैपीत्यस्तमेपीति विपर्येपीति । और यह एक दूसरी बात है कि, यदि सूर्य वैश्वानर होता तो, यानि एतानि = जो पे, भौतमिवानि उत्तमलोप के देवतायो की स्तुति के लिये, सूक्तानी = सूक्त हैं-भागानि बा: भग के, सावित्राणि वा सविता के, सौर्याणि वा = सूर्य के, पौणानि वा = पूषा के प्णवामि वा" . D अप: . 5 . इत्यादि । च- : निरुक्त सप्तमाध्यायस्य प्रयोविधा खण्डः । (१२७३) विष्णु के, वैश्वदेवानि वा = अथवा विश्व देवो के, जितने सूक्त होते है, तेषु = उन में, वैश्वानरीयाः वैश्वानर के, प्रवादाः = प्रवाद (बातें) अभविष्यन् = अवश्य रहते हैं। अर्थाद उक्त भग सविता आदिका विशेषण वैश्वानर शब्द अवश्य होता है, जैसे हे भग वैश्वानर ! हे सवितः वानर ! और आदित्यकर्मणा - आदित्य कर्म से एनम् = इस वैश्वानर को, मस्तीप्यन् - स्तुति' करते हैं, इति = इत्यादि । उदपि इति = तूं उदय होता है इस प्रकार और, अस्तम् एपि इति = तूं मस्त होता है इस प्रकार, दिपर्वपि इति तूं उलटा फिरता है, इत्यादि । वस्तुत: ये दोनों बातें नहीं है। क्योंकि, न उत्तम लोक के देवताओं के सुक्तों में वैश्वानर के प्रवाद हैं और न आदित्य कर्म से वैश्वानर की स्तुति ही है । अतः सूर्य वैश्वानर नहीं है । 'अभविष्यन्' और 'अस्तोप्यन् ' ये दोनों क्रियापद हेतुहेतुमद्भाय में है। अतः इस का अर्थ यह होता है कि, यदि भग और सविता आदि का प्रवाद उक्त सूक्तों में होता एवं आदित्य कर्म से वश्वानर की स्तुति होती तो व यानर का अर्थ आदित्य आदि होता, सो तो है नहीं। अतः वैश्वानर सूर्य नहीं किन्तु पार्थिव अग्नि है । 'वैश्वानर पार्थिव अग्नि है' इस में अन्य युक्ति- आग्रेयेष्वेव हि सूक्तेषु वैश्वानरीया। प्रवादा भवन्ति । याग्नेयेषु एव हि सूक्तेषु - प्रत्युत अग्नि के सूक्तों में हो, वैश्वानरीयाः - वैवानर को, प्रवादा। - प्रवाद, भवन्ति : हैं। जैसे- मूर्धानं दिवो अरति पृथिव्या वैश्वानरस्त आ जातमग्निम् । कवि सम्राजमतिथिं जनानामासन्ना पात्रं जनयन्त देवाः ॥ म सं. ४-५-९-१ ।। - "और, पात्रम् D इस मन्त्र का भरद्वाज ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और वैश्वानर अग्नि देवता है। मन्यायं-दिवः पूर्धानम् = द्युलोक के शिरोभूत, पृथिव्या: अरतिम् = भूमि में गमन करने वाले, सो आ जातम् . यज्ञ के लिये उत्पन्न, कविम् शान सम्पन्न, समाजम् - भालीभांति से राजमान, जनानाम् अतिपिम् । पजमानों के अतिथि स्वरूप, आसन् = मुख स्वरूप (अग्नि रूप मुख से हो देवगण भोजन करने हैं) - रक्षा विधायक, वैश्वानरम् घग्यानर अग्नि को, देवा: - देवों ने, बाजनयन्त - उत्पान किया है। यह अग्नि सूक्त का प्रथम मन्त्र है। इस में वैश्वानर का प्रवाद है। अतः बवानर का अर्थ पापिय अग्नि है यह सिद्ध हुमा । अग्निकर्मणा चैनं रतीतीति-बहसीति पचसीति दहसीति । और, अग्निकर्मणा - अग्नि कर्म से, एनम् = इस पैशानर की, स्तोति - स्तुति करता है, जैसे- वहमि है यानर ! तूं हवि को पहन करता है, इति - यह, पपमि - पचनीय दस्यों को तूं पाता है, इति - यह, हसि - दग्ध करने योग्य तृण याप्टादि यो त सय करता है. इति च - .(१२७४) निरुक्त सप्तमाध्यायस्य चतुर्विशः खण्डः । भाव यह है कि, यदि धैश्वानर का अर्थ आदित्य होता तो आदित्य कर्म से इस की स्तुति होती । प्रत्युत पार्थिव अग्नि कर्म से इस की स्तुति देखी जाती है। अतः पार्थिव अग्नि वैश्वानर का अर्थ है यह स्थिर हुआ । प्रथम किसी आचार्यने कहा था कि, वैश्वानर का अर्थ मध्यम ज्योति विद्युत् है । और युक्ति दी थी कि, 'वर्षकर्मणा छन स्तौति' । अर्थात् वर्षकर्म से वैश्वानर की स्तुति देखी जाती है और वर्षा मध्यमलोक अन्तरिक्ष से होती है । अत: वैश्वानर का अर्थ मध्यम ज्योति विद्युत् है । उस का खण्डन करते है- यथो एतद्वर्षकर्मणाहनं स्तौतीति-अस्मिन्नप्येतदुपपद्यते । यथो एतत् = और जो यह कहा कि, वर्षकर्मणा = वर्षकर्म से, एनम् = इस वैश्वानर की, स्तौति = स्तुति मन्त्र करता है । अतः वैश्वानर का अर्थ विद्युत् है ? सो समीचीन नहीं । क्योति, अस्मिन् अपि = इस पार्थिव अग्नि मे भी, एतत् = यह वर्षकर्म, उपपद्यते = उपपन्न होता है । जैसे- समानमेतदुद्कमुच्चैत्यव चाहभिः । 'भूमि पर्जन्या जिन्वन्ति दिवं जिन्वन्त्यग्रयः ॥ क्र. सं. २-३-२४-५१ ॥ इस मन्त्र का दीर्घतमा ऋषि, अनुष्टुप् छन्द और अग्नि देवता है । मन्त्रार्थ- एतद उदकम् - और यह जल, महभिः समानम् = दिन के समान है । उच्चा एति = कभी ऊंचा उठता है च कभी, अव एति = नीचे गिरता है । पर्जन्याः - मेघ, भूमिम् = पृथिवी को, जिन्वन्ति करते है । अग्नयः = अग्नि, दिवम् धु लोक को, जिन्वन्ति = प्रसन्न करते हैं। इस मन्त्र मे यह वहा गया है कि, पर्जन्य पृथिवी पर और अग्नि द्युलोक पिर वर्षा करता है पर्जन्य जल वर्षा करता है और अग्नि आहुति वर्षा करता है। अत: वर्षा रूप कर्म करना जैसे पर्जन्य-उपलक्षित विद्युत् ना कार है वैसे ही अग्नि का भी। अत एव वर्ष कम से स्तुति जैसे विद्युत मे उपपन्न है वैसे ही अग्नि में भी। अतः वरूप कार्य को देखने से वैश्वानर का अर्थ जो मध्यमस्थान विद्युत् कहा गया है सो समुचित नहीं। क्योकि, वरूप कार्य तो अग्नि भी करता है। अतः वैश्वानर असं अग्नि है। सा निगदव्याख्याता। इति निरुक्त सप्तमाध्यायस्य त्रयोविंदाः खण्डः ।। ७ । २३ ।। सा = यह ऋचा, निमदव्याख्याता = निगद - शब्दमात्र से ही, ध्यारशता = न्यारूपात है। इसपी व्याख्या करने की अपेक्षा नहीं है। क्योकि, सुगम है। इस से बिना परिश्रम से उक्त अर्थ स्पष्ट हो जाता है। अथ निरुक्त सप्तमाध्यायस्य चतुर्विधः सण्डः । D प्रसन्न निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य चतुर्विशः खण्डः । (१२७५) यह एक दूसरा भी मन्त्र है । जिस में अग्नि और मादित्य को वर्ष कर्म से स्तुति देखी जाती है । इस से यह नियम नहीं कि, मध्यमस्थ विद्युत् ही वर्षा करता है। जैसे- कृष्णं नियानं हर॑यः सुपर्णा अपो वसांना दिवमुत्पतन्ति । त आववृत्रन्त्सदनादृतस्यादिघृतेन पृथिवी व्युद्यते ॥ ऋ. सं २-३-२२-४७॥ 37 इस मन्त्र का दीर्घतमा ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और अग्नि देवता है। मन्त्रार्थ-कृष्णम् = कृष्णवर्ण (काला), नियानम् = नियम से गमन करने वाले मेघ को, हरयः = जल हरण करने पाली, सुपर्णाः = शोमन पतन रश्मियां, अपः वसानाः = जल पूर्ण करती हुई, दिवम् = द्युलोकस्य मादित्य को लक्ष्य करके, उत्पतन्ति = ऊपर को जाती हैं। ते = वे रश्मियां, ऋतस्य सदनाद उदकस्थान आदित्य मण्डल से, आववृत्रम् = नीचे आती हैं। आदित् = जिस समय नीचे आती हैं उसी समय, घृतेन = जल से, पृथिवी - भूमि, व्युद्यते विविध प्रकार से आद्र हो जाती है अर्यात रमियां पृथिवी को भिगोय देती हैं। आदित्य अपनी रश्मि द्वारा वर्षा करके पृथिवी को याद करते हैं। इस से यह सिद्ध हुआ कि, वर्ष फर्म विद्युत् का ही नहीं अपितु आदिस्य का भी है। उक्त मन्त्र का भाष्य- .0 %D - . कृष्ण निरयणं रात्रिरादित्यस्य, हरयः सुपर्णा हरणा आदित्यरश्मयः ते यदाऽमुतोश्चि: पर्यावर्तन्ते सहस्थानादुदकस्यादित्वात् । अथ घृतेनोदकेन पृथिवी न्युयते । कृष्णम् - कृष्णवर्ण, नियानम् = निरयणम् = नियम से गमन करने वाले, आदित्यस्य । सूर्य की, रात्रिः = मेषरूप रात्रि, हरयः हरणाः जल हरण करने वाली, सुपर्णा = शोमन - सुन्दर पांखपाली आदित्यर मयः = सूर्य की रश्मियाँ, ते = वे, यदा - जब, अमुतः उदकस्य सहस्थानाद मादित्याद उस उदक के निवास स्थान मादित्य के पास से, भाववृत्रम् = अर्वाचः पर्यावर्तन्ते - नीचे लोट आती है, अप - सब, धतेन - उदकेन = जल से, पृथिवी भूमि, व्युद्यते = आद्र हो जाती है। इस मन्त्र में वर्षकम के कर्ता मादित्य या प्रकरण से अग्नि बताया गया है। जो मध्यम विद्युत् अग्नि से भिन्न है । अतः वर्षकम से वैश्वानर की स्तुति की गयी है। इस लिये व वानर का मर्ष मध्यमस्पान विद्युत अग्नि है यह कहना समुचित नही ।। फलतः वैश्वानर का अयं पापिय अग्नि ही है। मन्त्र में पत सन्द आया है। मतः निगम प्रसक्त होने से इस मा (घत जादा) भी नियंपन करते हैं- which covers hiatre (१२७६) निरुक्ते सप्तमाध्यायस्या चतुषिश खण्डः । घृतमित्युदकनाम, जिघर्तेः सिञ्चतिकर्मणः । घृतम् इति = घृत यह, उदकनाम = जल या नाम है और, सिञ्चतिकर्मणः सेवन अर्थक, जिधर्तेः = धृ धातु से बना है । अर्थात् ' जिघति इति घृतम् उदकम्' इस विग्रह में 'धृ क्षरणदीप्त्योः' धातु से 'गत्यर्थाकर्मक' इत्यादि सूत्र से कर्ता अर्थ मे क्त (त) प्रत्यय, कित्त्वात् गुणाभाव होने पर 'धृत' शब्द बना है । जल का नाम है। क्योकि, जल पृथिवी को आई करता है। उक्त अर्थ में ब्राह्मण वाक्य प्रमाण देते हैं- अथापि ब्रामणं भवति । "अग्निर्या इतो घृष्टिं समीरयति, धामच्छद् दिवि भूत्वा वर्षति । मरुतः सृष्टां वृष्टिं नयन्ति"। अथ अपि = और भी, ब्राह्मणम् = ब्राह्मण वाक्य, भवति है। अर्थात् ब्राह्मण में भी कहा है-अग्निः वा = अग्नि, इतः = यहा से, वृष्टिम् = वृष्टि को, समीरयति = प्रेरयति = भेजता है। यह वृष्टि, दिविधामच्छत् = आकाशमे स्थान को आच्छादित कर, भूत्वा = मादित्य हो कर, पपंति : - परसती है। मरुतः = मरुद्गण, सृप्टाम् छोडी हुई, वृष्टिम् - वृष्टि को, नयन्ति जाते हैं। इसी अर्थ में दूसरा भी प्राह्मण प्रमाण देते हैं- "यदासावादित्योन्याश्मिः पर्यावर्ततेऽथ वपति" इति ।। यदा = जब, असौ = वह, आदित्यः यादित्य, न्यक रश्मिः = नीचे रश्मि वाला होता हुआ, पर्यावर्तते = अग्नि के प्रति लोटता है, अथ = तब, वर्षति = बरसता है। अर्थात् तब वर्षा होती है। इस प्रकार वर्ष कर्म सब के लिये समान है । तो मध्यम ज्योति के वैश्वानर होने में कोई हेतु नहीं। यथो एतद्रोहात्मत्यवरोहविकीर्पित इति । आम्नायवचनादेतद्भवति । अथो एतत् = और जो यह कहा कि, रोहात्प्रत्यवशेहः = आरोह के अनुसार प्रत्यवरोह, चिकोपितः = इप्ट है, इति = इत्यादि, एतत् = यह तो, आम्नायवचनात् = अर्घयादरूप वेद वचन से, भवति = होता है । अर्थात् तृतीय सवन मे जो वैश्वानर के सूक्त से रान का प्रारम्भ होता है वह विधि वाक्य के अधीन किया जाता है। लोको यो आरोहणप्रत्यारोहण अर्थवादमात्र है। पायिव भग्नि को ही वैश्वानर मानने में कोई विरोध नहीं। क्योकि, इतने से वैश्वानर आदित्य नहीं हो सकता है। ourg ouer . , यथो एतद्वैश्वानरीयो द्वादशकपालो भवतीति, अनिर्वचनं कपालानि भवन्ति । यथो एतद = और जो यह कहा कि, वैश्वानरीयः = वैश्वानर का, द्वादशकपालः - बारह कपालों का पुरोडाश, भवति = होता है, इति = इत्यादि। यह मो वैधानर या अर्थ आदित्य होने में कारण नहीं हो सकता है। क्योंकि, क्पालानि कपाल, अनिर्वचनम् - निर्वचन के साधन नहीं, भवन्ति = होते हैं। -- निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य चतुविंशः खण्डः । (१२७७) अस्ति हि सौर्य एककपाला पञ्चकपालश्च । हि = क्योंकि, ' सौर्यः = सूर्य के, एककपाल: = एककपाल, च = और, पश्चकपाल: = पांच कपाल भी, अस्ति = है। भाव यह है कि, यदि आदित्य के कपालों की द्वादश संख्या नियत होती तो वैश्वानर के द्वादश कपाल कहने से उस का (वैश्वानर का ) अर्थ आदित्य ही होता। सो नियम नहीं क्योंकि, आदित्य के एक कपाल भी होता है और पञ्चकपाल भी । अतः हेतु व्यभिचारी होने से 'वैश्वानर आदित्य है' यह इस से नही सिद्ध हो सकता है। एवं द्वादशकपाल यदि आदित्य ही होता तो 'वैश्वानरो द्वादशकपालः' कहने से वैश्वानर आदित्य ही होता, सो तो है नहीं अतः वैश्वानर आदित्य नहीं। किन्तु पार्थिव अग्नि है । यथो एतद् ब्राह्मणं भवतीति, बहुभक्तिवादीनि हि ब्राह्मणानि भवन्ति । " पृथिवी वैश्वानर संवत्सरो वैश्वानरो ब्राह्मणो वैश्वानर इति । यथो एतद = और जो यह कहा कि ब्राह्मणम् = ब्राह्मण वाक्य आदित्य को वैश्वानर कहने वाला, भवति है, इति इत्यादि । यह भो समीचीन नहीं, क्योंकि, ब्राह्मणानि = ब्राह्मण वाक्य, बहुभक्तिवादीनि = बहुत से विभागों का वर्णन करने वाले, भवन्ति = होते हैं । अर्थात् विशेषण रूप से बहुत पदार्थो को वैश्वानर कहते हैं। जैसे-पृथ्वी वैश्वानरः पृथिवी वैश्वानर है, सवत्सरः वैश्वानरः संवत्सर वैश्वानर है और ब्राह्मणः वैश्वानरः = ब्राह्मण वैश्वानर है + इति = इत्यादि यहां पर जैसे पृथिवी, संवत्सर और ब्राह्मण के विशेषण होने से गौणरूप से वैश्वानर शब्द इन अर्थों में प्रयुक्त हुआ है वैसे ही ब्राह्मण वाक्य में आदित्य के विशेषण होने से गौण रूप से विश्वानर शब्द आदित्य अर्थ में प्रउक्त हुआ है। अतः वैवानर आदित्य नहीं किन्तु पार्थिव अग्नि वैश्वानर है । अथो एतद्-निवित्सौर्यवैश्वानरी भवतीति, तस्यैव सा भवति-यो विड्म्यो मानुपीम्यो दीदेदिति । एप हि विड्म्यो मानुपीभ्यो दीप्यते । अयो एतत् = और जो यह कहा कि, निवित्सौर्यवैश्वानरी - स्तुति वाक्य सूर्य वैश्वानर की, भवति - 'है, इति = इत्यादि । यह भी समुचित नहीं, क्योंकि, सा - वह स्तुति रूप निविद वाक्य, इसी पार्थिव अग्नि की, भवति = है। यदि उस प्रकरण के आद्यन्त पर्यालोचन से प्रतीत होता है कि, यह निवित् सौर्यवैश्वानरी नहीं किन्तु पार्थिव अग्नि वैश्वनरी है। जैसे-यः । जो,, मानुपीभ्यः विम्यः मनुष्य जाति के लिये, दोदेव प्रकाशित होता है, एपः हि = वही पार्थिव अग्नि, मानुपीम्यः विड्भ्य: मनुष्य जाति से, दीप्यते - प्रज्वलित होता है। अपदि अरणिनिमंन्यन से उत्पन्न हुआ है । पार्थिव अग्नि मनुष्य जाति से उत्वग्न होता है। आदित्य नहीं। अतः वैधानर निविद में वैश्वानर का अर्थ पार्थिव अग्नि है । मादित्य नहीं। यथो -एतत्- -छान्दोमिकं सूक्तं सौर्यवैधानरं भवतीति । अस्यवतद्भवति "जमदग्निमि- राहत" इति । तस्य एवं D %3D %3D (१२७८) निरुक्त सप्तमाध्यायस्य पञ्चविंश खण्डः । यथो एतत् = और जो यह कहा कि, छान्दोमिकम् सूक्तम् = छान्दोमिक सूक्त (बाज० सं. का ३३-९२), सौर्यवैश्वानरम् = सूर्यरूपी वैश्वानर का, भवति = है, इति इत्यादि । यह कथन भी ठीक नही, क्योंकि, तत् = यह सूक्त भी, अस्य एव = इसी पार्थिव अग्नि का, भवति = है । जैसे-जमदग्निभिः = जमदग्नि इसी अग्नि में, आहुतः = आहुति देते हैं । जमदग्नयः प्रजमिताग्नयो वा प्रज्वलितामयो वा तैरभिहुतो भवति । प्रजमिताग्नयः वा = बहुत अग्नि वाले, वा = अथवा, प्रज्वलिताग्नयः जिन का अग्नि प्रज्वलित रहता है वे, जमदग्नयः = जमदग्नि कहलाते है । अथो एतत्-हविष्पान्तीयं सूक्तं सौर्यवैश्वानरं भवतीति । अस्यैव तद्भवति । इति निरुक्त सप्तमाध्यायस्य चतुर्विशः खण्डः ।। ७-२४ ।। अथो एतत् = और जो यह कहा कि, हविप्पान्तीयम् सूक्तम् = हविप्पान्तीय सूक्त (ऋ. सं. १०-८८-४), सौर्यवैश्वानरम् = सूर्य वैश्वानर का, भवति = है' इति = इत्यादि । तव = वह भी अस्य एव = इसी पार्थिव अग्नि का, भवति = है । जैसे- अथ निरुक्त सप्तमाध्यायस्य पञ्चविंशः खण्डः । हविष्पान्तमजरस्वर्विदि दिविस्पृश्याहुतं जुष्टमग्नौ । तस्य चर्मणे भुवनाय देवा धर्मणे कंस्वधयां पप्रथन्त ॥ मा. सं. ८-४-१०-१० ॥ 1. relished पीने योग्य, जरारहित, स्वविदि - इस मन्त्र की व्याख्या पूर्वपक्ष के समय सूर्य परक की गई है। यास्क भाष्य- हविर्यत्पानीयमजरं सूर्यविदि दिवि स्पृश्यमिहुतं जुष्टमनौ, तस्य भरणाय च भवनाय च धारणाय चैतेभ्यः सर्वेभ्यः कर्मभ्य इममनिमन्नेनापप्रयन्तेति । यत् हविः - जो हवि, वान्तम् पानीयम् अजरम् सूर्य के जानने वाले, दिवि स्मृशि = शुलोक को स्पर्श करने वाले, जुप्टम् देवताओं के प्रिय अग्नी हुतम् = अग्नि में आहूत, किया गया है, तस्य = उस हवि के, भर्मणे भरणाय च - परिपूर्ण करने के लिये, भुवनाय च = भवनाय = उत्पन्न करने के लिये, च = और, धर्मणे च = धारणाय च = धारण करने के लिये, एतेभ्यः सर्वेभ्यः कर्मभ्यः इन सब कर्मों के लिये, इमम् अग्निम् = इस पृथिवीस्थान अग्नि को, स्वधया = अन्नेन = हव्य रूप अन्न से, अपप्रथन्त = बढाया। इस प्रकार का इस मन्त्र का अर्थ देखने से प्रतीत होता है कि, यह सूक्त पार्थिव अग्नि का है। आदित्य का नहीं। अतः वैश्वानर वार्थिव अग्नि है । आदित्य नही यह सिद्ध हुआ। = निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य पड्विंशः खण्डः । (१२७९) अथाप्याह । अथ अपि इति निरुक्त सप्तमाघ्यायस्य पञ्चविंशः खण्डः ॥ ७-२५ ॥ = इस के अतिरिक्त और भी, आह - कहा है- अथ निरुक्तं सप्तमाध्यायस्य पड्विंशः खण्डः । अपामुपस्थे महिषा अगृभ्णत विशो राजानमुप॑ तस्थुर्ऋग्मियम् । आ दूतो अग्निमंभरद्विवस्वतो वैश्वानरं मातरिश्वा परावतः ॥ ऋ. सं. ४-५-१०-४ ।। इस मन्त्र का भरद्वाज ऋषि, जगती छन्द और वैश्वानर अग्नि देवता है । मन्त्रार्थ- महिपाः = महान् मरुतों ने, अपाम् उपस्थे = अन्तरिक्ष के मध्य में विद्युत् रूप से वर्तमान वै वानर अग्नि को, मगृभ्णत = ग्रहण अर्थात् धारण किया था और, विशः - प्रजाओने, ऋग्मियम् = पूजनीय, राजानम् = राजा अर्थात् स्वामी कह कर इन की, उपतस्युः = स्तुति की थी । दूतः = वेगवान् या देवों के दूत, मातरिश्वा - वायु ने, परावतः = दूरदेशस्थित, विवस्वत. = आदित्य मण्डल से, वैश्वानरम् अग्निम् = इस वैश्वानर नामक अग्नि को, या अभरत् = इस लोक में लाये हैं। इस मन्त्र में वैश्वानर शब्द पार्थिव अग्नि अर्थ में प्रयुक्त है । अतः वैश्वानर पार्थिव अग्नि है । आदित्य नहीं । इस मन्त्र का भाष्य- . अपामुपस्थ उपस्थाने महत्त्वन्तरिक्षलोक आसीनामहान्त इति वा, अगृहत माध्यमिका देवगणा विश इव राजानमुपतस्थुग्मियमुग्मन्तमिति वा, अर्चनीयमिति वा, पूजनीयमिति वाऽहरा दूतो देवानां विवस्वत आदित्यात् । विवस्वान् विवासनवान । प्रेरितवतः परागता- द्वास्याग्नर्वैश्वानरस्य मातरिश्वानमाहवरिमाह । मातरिथा वायुतिर्यन्तरिक्षेश्वसिति, मातर्या- . वनितीति वा । अपाम् उपस्थे = उपस्थाने महति अन्तरिक्षलोके - बल के रहने के स्थान बड़े बाकारा देवा में, महिषा: = आसीना: = बैठे हुए, इति वा - अपवा, महान्तः - बड़े, माध्यमिका: देवगणाः = मध्यम लोक के देवताओं ने, अम्गत - अगृलत = उसको ग्रहण - धारण किया था। इति वा = अथवा, ऋग्मियम् अग्मन्तम् = ऋचाओं से स्तुति वाले, वा = अथवा अर्चनीयम् - अर्चनीय, वा = अथवा, पूजनीयम् - पूज्य, उसको, विशः राजानम् इव = प्रजा जैसे राजा का, उपतस्थः (सरकार) करती है वैसे ही। यम् = जिस अग्नि को, देवानाम् दूतः = देवों के दूत वायु ने, विवस्वतः = अादित्यात् = आदित्य मण्डल से, बाहर - इस लोक में लाये हैं। विवस्वाद -पस्थान - (१२८०) निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य सप्तविंशः खण्डः । विवासनवान् = अन्धकार को दूर करने वाला, परावतः = प्रेरितवत. = प्रेरित हुऐ, वा = अथवा, परागतात = दूर गये हुए, अस्य अग्ने वैश्वानरस्य इस वैश्वानर अग्नि को, मातरिश्वानम् मा हरिम् = मातरिश्वा लाने वाला, आह = कहा गया है। मातरिश्वा वायु मातरिश्वा वायु को कहते है। क्योकि, मातरि = अन्तरिक्षे = अन्तरिक्ष मे, श्वसिति = साँस लेता है, वा - अथवा, मातरि = अन्तरिक्ष मे, आशु - शीघ्र, अमिति = चलता है, इति = इत्यर्थः। अर्थनमेताभ्यां सर्वाणि स्थानान्यभ्यापादं स्तौति । इति निरुक्त सप्तमाध्यायस्य पड्विंश खण्ड ।। ७-२६ ।। अथ = अव, एनम् = इस अग्नि की, एताभ्याम् = इन दोनो ऋचाओ के द्वारा, सर्वाणि स्थानानि = सभी स्थानो को, ले ले कर, स्तौति = स्तुति करता है- अथ निरुक्त सप्तमाध्यायस्य सप्तविंश खण्ड । मूर्धा वो भवति नक्तमग्निस्तनः सूर्यो जायते प्रातरुद्यन् । मायामू तु यज्ञियांनामेतामपो यत्तूर्णिश्चरति प्रजानन् । ऋ स ८-४-११-६॥ - = ज्ञात होता अप. चरति - इस मन्त्र का मूधन्वान् ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और अग्नि तथा सूर्य देवता है । मन्नार्थ-अग्नि वैश्वानर अग्नि, नक्तम् = रात्रि मे, भुव प्राणिमात्र या मूर्धा = मस्तक स्वरूप, भवति = होता है। ततः = रात्रि बीत जाने के पश्चात्, प्रात = प्रत काल, उद्यन उदित होता हुआ, सूर्य सूर्य रूप से, जायते = उत्पन्न होता है अर्थात् यही वैश्वानर अग्नि दिन मे सूर्य हो जाता है। उस अग्नि को विद्वान् लोग, मायाम् ॐ = प्रज्ञा ही मानते हैं । यत् = जो अग्नि, प्रजानन् हुआ, तर्णिः = शीघ्रातिशीघ्र, अन्तरिक्ष मे, चरति विचरण करते हैं अथवा, अप. कर्मानुष्ठान करते है। इस मन्त्र का भाप्प- मूर्धा मूर्तमस्मिन्धीयते, मूर्धायः सर्वेषां भूतानां भवति नतमग्निः । ततः सूर्यो जायते प्रातरुद्यन् स एव प्रज्ञां त्वेतां मन्यन्ते यज्ञियानां देवानां यज्ञसंपादिनाम् । अपोयत्कर्म चरति प्रजानन् सर्वाणि स्थानानि अनुसंचरते । त्वरमाणः । अस्मिन् = जिसमे, मूर्तम् = शरीर, धीयते = धारण किया जाय वह, मूर्पा = मूर्धा (मस्तक) पहा जाता है । अर्थात् ' मूर्तम् अस्मिन् धीयते इति मूर्धा' इस विग्रह मे मूतं शब्द उपपद 'डधान धारणपोषणयो, धातु से उणाणि कनिन् (अन् ) प्रत्यय, 'आती लोप इटिच' इस सूत्र से आलोप, भून घ अन्, आषत्वात् मूर्त के त या लोप होने पर मूर्धन शब्द बना है। मस्तक मा नाम है। जैसे शिर के वियोग होने पर प्राणी मर जाता है वैसे ही अग्नि के यियोग होने पर भी प्राणी मर जो अग्नि, लोग, एताम् - , निरुक्त सप्तमाध्यायस्याष्टाविंशः स्वण्डा । (१२८१) जाता है। इस लिये अग्नि को मूर्धा अर्थात् मस्तक कहा गया है । यः अग्नि: नक्तम् रात्रि में, सर्वेषाम् भूतानाम् = सभी प्राणियों के, मूर्धा भवति मस्तक होता है। ततः - रात्रि के वीत जाने के बाद, प्रातः = प्रभात में, उद्यन् = उदित होता हुआ, स एव = वही, सूर्यः जायते - सूर्य रूप से उत्पन्न होता है । अर्थात् वहीं पार्थिव वैश्वानर अग्नि दिन मे सूर्य हो जाता है। विद्वान् इसे, यज्ञसंपादिनाम् = यज्ञ सम्पन्न करने वाले, यज्ञियानाम् = पजिय, देवानाम् : देवताओं की, प्रज्ञाम् = बुद्धि, मन्यन्ते = मानते हैं । यत् = जो, प्रजानन् = ज्ञायमान होता हुआ, अपः = कर्म = कर्मानुष्ठान, चरति २ करता है। त्वरमाणः = शीघ्रता से वह, सर्वाणि स्थानानि : सभी स्थानों में, अनुसंचरते = संचार करता है, जाता है । तस्योचरा भूयसे निर्वचनाय । इति निरक्ते सप्तमाध्यायस्य सप्तविंशः खण्डः ॥ ७-२७ ।। तस्य = उस स्थानत्रय सम्बन्धी अग्नि का, भूयसे = अधिक स्पष्ट, निर्वचनाय - निर्वचन के लिये, उत्तरा = आगे को ऋचा है- अथ निरक्त सप्तमाघ्यायस्याप्टाविंशः खण्डः । स्तोमैन हि दिवि देवासो' अग्निमजीजनन्छक्तिभी रादसिताम् । तमू अवम्वन्त्रेधा भुवे कं स ओषधीः पचति विश्वरूपाः ॥ ऋ. सं. ८-४-११-१०॥ इस मन्त्र का मूर्धन्वान् ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और अग्नि तथा सूर्य देवता है । मन्त्रार्थ- देवासः = देवों ने, शक्तिभिः = अपनी शक्ति से, रोदसिप्राम् = द्यावापृथिवी को परिपूर्ण करने वाले, अग्निम् = अग्नि को, दिवि : धुलोक में, स्तोमैन हि = केवल स्तुति के द्वारा ही, अजीजनन उत्पन्न किया। तम् = उसी, कम् = सुखावह अग्नि को उन्हो ने, धा भुवे = पृथिवी अन्तरिक्ष और द्यु इस प्रकार तीन भाव, अकृन्वन - कर दिया। सः वह अग्नि पृथिवी पर रहते हुए, विश्वरूपाः = सर्व प्रकार के वीहि यद आदि, भोपपीः = ओषधियों को, पचति = पकाता है । अर्थाद एक अग्नि का तीन रूप है-पार्थिव अग्नि, विद्युत और आदित्य । इस मन्त्र का भाप्य- स्तोमेन हि यं दिवि देवा अभिमजनयन्छक्तिमिः कर्मभिः द्यावापृथिव्योः पूरणं तमकुर्वस्त्रेधाभावाय पृथिव्यायामन्तरिक्षे दिचीति शाकपूणिः । यम् अग्निम् = जिस अग्नि को, स्तोमेन - स्तुति से, दिवि = द्युलोर में, देवाः = देवताओं ने, अजनयन - उत्पन्न किया। शक्तिभिः = कर्मभिः = कर्मों के द्वारा, धावापृघिट्योः = द्युलोक और (१२८२) निरुक्त सप्तमाध्यायस्थकोनविंशः खण्डा । पृथिवीलोक को, पूरणम् तम् = पूर्ण करने वाले उस अग्नि को, त्रेधाभावाय तीन प्रकार से रहने के लिये, अकुर्वन् = बनाया, पृथिव्याम् = पृथिवी में, अन्तरिक्ष अन्तरिक्ष में और, दिवि = द्युलोक में, इति यह, शाकपूणिः = शाकपूणि नामक आचार्य कहते है। इस प्रकार यास्क ने शाकपूणि के वचन को प्रमाण देते हुए एक ही अग्नि का तीन स्वरूप बताया-अग्नि विद्युत और मादित्य । इस कथन में ब्राह्मण वचन प्रमाण देते है- ॥ - यदस्य दिवि तृतीयं यदसावादित्यः" इति ब्राह्मणम् । यत् = जो, अस्य = इस अग्नि का, दिवि = धुलोक में, तृतीयम् = तीसरा रूप है, तत् असो वही, आदित्यः आदित्य है। तदग्नीकृत्य स्तौति । तत् = वह तृतीय आदित्य नामक ज्योति को, अग्नीकृत्य = अग्नीकरण करके अर्थात् अग्निरूप से इस हविप्पान्त सूक्त में मन्त्रद्रष्टा ऋपि, स्तौति स्तुति करते हैं। अथैनमेतया पुनरादित्यीकृत्य स्तौति । इति निरुक्त सप्तमाध्यायस्याप्टाविंशः खण्डः ॥ ७-२८ ।। अथ = अव, एनम् = इस अग्नि की, एतया = इस ऋचा के द्वारा, पुनः = फिर, आदित्यीकृत्य आदित्यीकरण करके अर्थात् आदित्य रूप से, उक्त सूक्त में, स्तौति = मन्त्रदृक् प्रापि स्तुति करते हैं । अथ निरुक्त सप्तमाघ्यायस्थकोनत्रिशः खण्डः । यदेदेनमर्दधुर्यज्ञियासो दिवि देवाः सूर्यमादितेयम् । यदा चरिष्णू मिथुनावभूतामादित्प्रापश्यन्भुवनानि विश्वा ॥ ऋ. सं. ८-४-१२-११ ।। इस मन्त्र का मूघन्वान् ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और अग्नि सूर्य देवता है। मन्त्रार्थ-पशियांसा देवाः = यज्ञयोग्य देवों ने, यदेत् - जिस समय, एनम् = इन अग्नि और, आदितेयम् सूर्यम् अदिति-पुत्र सूर्य को, दिवि = द्युलोक में, अदधुः = स्थापित किया और, यदा - जिस समय दोनों अग्नि और सूर्य, मिथुनौ भूताम् = युग्मरूप हो कर, चरिष्णू = विचरण करने लगे, आदित उसी समय, विश्वा भूवनानि = सभी प्राणी उन्हें, प्रापश्यन् = देख सके । 5 ये इस मन्त्र का यास्क भाष्य- 1 - और, यदा - . आ शैकुरित्संधमादं शखायो नक्षन्त यज्ञ क इदं वि वोचत् ॥ निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य निशा खण्ड।। (१२८३) यदैनमदधुर्यज्ञियाः सर्वे दिवि देवाः सूर्यमादित्तेयमदितेः पुत्रं यदा चरिष्णू मिथुनौ प्रादुरभूतां सर्वदा सहचारिणाधुपाश्चादित्यश्च । मिथुनौ कस्मात् ? मिनोतिः श्रपतिकर्मा, धु इति नाम करणस्थकारो नपतिः परो बनिर्ग, समाश्रिवाबन्योन्यं नयवो, वनुतो वा, मनुष्यमिपुनावप्येतस्मादेव मे धन्तावन्योन्यं वनुत इति वा । यदा - 'जिस समय, यज्ञियाः सर्वे देवा. यज्ञ योग्य सर्व देवो ने, एनम् - इस भग्नि और आदितेयम् अदिति पुत्रम् सूर्यम् = अदिति-पुत्र सूर्य को, दिवि = द्युलोक में, बदषः = स्थापित किया जिस समय, उपासादिरयश्च = उपा और सूर्य दोनों, मिथुनी प्रादुभूताम् = सर्वदा सहचारिणी - संयुक्त हो कर, चरिष्णू = विचरण करने लगे। प्र*न:स्मात् = किस धातु से कौन भरपय करने से, मिथुनी = मिथुन शब्द बना है ? उत्तर-श्रयति कर्मा = सेवा अर्थक, मिनोतिः मि धातु है, थु इति = थु यह, या - अयवा, थकारः = थ यह, नामकरण = सज्ञार्थ का प्रत्यय है, नतिः = नी धातु. वा = अथवा, वनिः = वन् घातु, परः = पर है । अर्थात् 'मिनुतः नयतः इति मिथुनौ' इस विग्रह मे धातूनामनेकार्थत्वात् सेवार्थक 'डुमिन् प्रक्षेपणे' धातु से उगादि य प्रत्यय और 'सीम प्रापणे' धातु से पचायच् (अ) गुण, अयादेश, मिथुनय, पृषोदरादित्वात् य लोप होने पर मिथुन शब्द बना है । अथवा "मिनुतः वनतः इति मिथुनी' इस विग्रह में उक्त मि घातु से उणादि या प्रत्यय और 'वन कान्तिकर्मा (निधं (२-६-८) धातु अच प्रत्यय, मि पवन पृषोदरादित्वात् दकार को सप्रसारण उकार 'संप्रसारणाच' इस सूत्र से अकार का पूर्व रूप मिय उन, अलोप, मिथ् उन, संयुक्त होने पर मिथुन शब्द बना है । समश्रतो = भली भांति माश्रित होते हुए, अन्योन्यम् = परस्पर एक दूसरे को, नयतः ले चलते हैं, वा = अथवा, समाश्रिती = अच्छी तरह अश्रित होते हुए, अन्योन्यम् = परस्पर एक दूसरे को, वनुतः = भोगते हैं । चाहते हैं। मनुष्यमिथुनो अपि - मनुष्य का मिथुन (श्री पुरुष का जोडा) भी, एतस्मात्..एव = इसी पूर्वोक्त धातु से ही वना है । क्योकि, ये भी, अन्योन्यम् = एक दूसरे मेथन्ती = "मिले हुए होते हैं, अथवा, वनुतः = चाहते है । इति = इत्यर्थः । अथैनमेवयाग्नीकृत्य स्तौति । इति निरुक्ते सप्तमाघ्यायस्यैकोनत्रिंशः खण्डः ॥ ७-२९ ।। अथ = इस के अनन्तर, एनम् = इस वैश्वानर की, एतया - इस अग्निम ऋया से, अग्नीकृत्य - अग्नीकरण करके अर्थात् अग्नि रूप से, स्तौति = मन्त्र स्तुति करता है। जैसे- अथ, निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य त्रिंशः खण्ड । यत्रा वदेते अवर, परंश्च यज्ञन्योः कतरो नौ वि वेद वा . म. सं. ८-४-१३-१७ ॥ ०८ -- (१२८४) निएक्त सप्तमाध्यायस्यकत्रिशा खण्डः । इस मन्त्र का भी मूर्धन्वान ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और अग्नि तथा सूर्य देवता है। मन्त्रार्थ-- यत्र = जिस समय, अवरः = छोटा पार्थिव अग्नि, परश्च = और बडा मध्यम अग्नि, ये दोनों परस्पर, वदेते = विवाद करते हैं कि, नो यज्ञन्योः = हम दोनों में से यज्ञ को, कतरः = कौन, विवेद - जानता है, उस समय, सखायाः इत् = मित्र ऋत्विक गण ही, आशेकुः = यज्ञ कर सकते हैं । जो, सधमादम् = साथ साथ प्रसन्नता देने वाले, यज्ञम् नक्षन्त = यज्ञ को सम्पन्न करते हैं और नही तो, कः इदम् वियोचत् = कौन इसे बतला सकता है। इस ऋचा से वैश्वानर की अग्नि रूप से स्तुति की गई है। अतः वैश्वानर का अर्थ अग्नि है। आदित्य नहीं । - इस मन्त्र का यास्क भाष्य- यत्र- = जानता है। उन यज्ञ सम्पादन पत्र विवदेते दैव्यो होतारी-अयं चाग्निरसौ च मध्यमः फतरो नौ यज्ञे भयो वेदेति आशन्कुवन्ति सत्सहमदनं समानख्याना ऋत्यि जस्तेपां यः समश्नुवानानां को न इदं विवक्ष्यतीति । जिस समय, अयम् च अग्निः और = यह पृथियो स्थान अग्नि, असौच मध्यमः = मध्यम स्थान अग्नि दोनों, दैव्यो होतारी देवी होता, विवदेते = विवाद करते हैं कि, नौ - हम दोनो के बीच, यज्ञे - यज्ञ के विषय में, कतर: - फोन, भूयः = अधिक, वेद समानख्यानाः' - समान ख्याति वाले, ऋत्विजः = ऋत्विक् लोग ही, अशक्नुवन्ति = इस का निर्णय कर सकते हैं कि, सत्सहमदनम् = समान आनन्द देने वाले, तेपाम् समनुवानानाम् करने वालो मे, यः = जो, नः हमारे में, इदम् - यह निर्णय, कः कोन, विवक्ष्यति = करेगा। तस्योत्तरा भूयसे निर्वचनाय । इति निरुक्त सप्तमाध्यायस्य विश: खण्डः ॥ ७-३० ॥ तस्य = यथोक्त अर्थ के, भूयसे - अधिक, निर्वचनाय निर्वचन के लिये, उत्तरा - भागे की ऋचा है- अप निरुते सप्तमाध्यायस्यैव निशः खण्डः । यावन्मात्रमुषसो न प्रतीकं सुपर्योश्वसते मातरिश्वः । तावद्धत्युष यज्ञमायन् ब्राह्मणो होतुरखरो निषीदन् ॥ क सं. ८-४-१५-१९ ॥ इस मन्त्र का भी मूर्धन्वान् ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और अग्नि तथा सूर्य देवता है । मन्त्रार्थ-प्रकृत वैश्वानर विषय मे जो प्रश्न उसका निर्णय यह ऋचा करती है-मातरिश्वः = हे मातरिश्चन् ! धायो ! पावरमात्रम् - जब तक, सुपण्यः = सुपतना रात्रियां, उपसः प्रतीकम् = उपा के मुख का, बसते आच्छादित फर रखती हैं, तावत् - तब तप, प्राह्मणः : होता, अवरः - %D छोटा वैश्वानर पार्थिव - , निक्त सप्तमायावस्यकत्रिंशः खण्डः । (१२८५) अग्नि, यज्ञम् आयन् = यज्ञ के पास आकर, निपीदन् = वैठते हैं। उप दधाति = होतृ कर्म को अपनी बुद्धि में धारण करते हैं । यज्ञ के पास आना और कर्म का धारण करना अग्नि का काम है। अतः वैश्वानर का अर्थ अग्नि है, आदित्य नहीं । इस मन्त्रका यास्क भाप्य- यावन्मात्रमुपसः प्रत्यक्तं भवति प्रतिदर्शनमितिवाऽस्त्युपमानस्य संप्रत्यर्थे प्रयोगः। इहेब निधेहीति यथा । सुपण्यः सुपतना एता रात्रयो वसते । मातरिश्वज्योतिर्वर्णस्य तावदुपदधाति यज्ञमागच्छन् ब्राह्मणो होता, अस्याने)तुरवसे निपीदन् । यावन्मात्रम् - जब तक, उपसः = उपा का, प्रत्यक्तम् - मुख, वा - अथवा, प्रतिदर्शनम् प्रकाश रूप दर्शन, भवति = होता है, यहा, उपमानस्य - उपमान वाचक का, प्रयोगः = प्रयोग, संप्रत्यर्थे = संप्रति अर्थाद इस समय के अर्थ मे, अस्ति - हुआ है । यथा = जैसे, इह इव निधेहि = ठीक यही रखो, इति - इस प्रकार सुपण्यः सुपतना - सुन्दर रीति से गिरने वाली, एताः = ये,, रात्रयः = रात्रियों, वसते आच्छादित किये हुए हैं। मातरिश्वन = हे मातरिश्वत् । हे वायो !, वर्णस्य = वर्ण की, ज्योतिः = ज्योति महती है । तावत् = तब तक, यज्ञम् = यज्ञ मे, आगच्छन् : आता हुआ, अस्य अग्ने: होतुः = इस अग्नि रूपी होता के, निपीदन = नीचे बैठा हुआ, अवर: - छोटा, ब्राह्मणः होता = ब्राह्मण रूपी होता इसे, उपदधाति - धारण करता है। पूर्वोक्त ग्रन्थ सन्दर्भसे यह सिद्ध किया गया कि, वैश्वानर का अर्थ पार्थिव अग्नि है। मध्यमस्थान विद्युत् नही एवं उत्तमस्थान आदित्य भी नहीं। अब इसी विषय को शङ्कासमाधान पूर्वक दृढ करते हैं- शहा-होत्जपस्त्वननिर्वैश्वानरीयो भवति । तु = किन्तु, होतृजपः - होता का जप रूप मात्र, अनग्निः = अग्नि से भिन्न, वैश्वानरीयः वैश्वानर का, भवति - है। जैसे- "देय सवितरेतत्वा घृणमि होत्राय सह पित्रा वैश्वनरेण" इति । देय सवितः = हे देव ! हे सवितः!, एतम् त्वा अग्निम् = इस तुझ अग्नि को, वैश्वानरेण पिका राह वैश्वानर पिता के साथ, होगाय - होम के लिये, यजन करने वाले, वृणते - ग्रहण करते हैं। इति = इस प्रकार इस मन्त्र मे वैश्वानर को अग्नि का पिता कहा है। इममेवानि सवितारमाह-सर्वस्य प्रसवितारम् । इमम् एव अग्निम् - इस उक्त मन्त्र मे इस पार्थिव अग्नि को ही ऋषि, सवितारम् = सविता, - सब का उत्पन्न करने वाला है। - कहता है जो सर्वस्य प्रसवितारम् मध्यमं वोत्तम वा पितरम् । अथवा, उत्तमम् उत्तम ज्योति आदित्य को, मध्यम पितरम = इस अग्नि का पिता कहता है । इस प्रकार यहां वैश्वानर को अग्नि का पिar कहा है। 3 आह - - मध्यम ज्योति विधुद को, या - 1 . यः- । अतः 1 (१९८६) निरुक्ते सप्तमाध्यायस्यकत्रिशः खण्डः । पिता और पुत्र एक नहीं हो सकते हैं। दोनो एक दूसरे से भिन्न ही होते है। विद्युत् और आदित्य से अग्नि की उत्पत्ति कही है। अत. मध्यम और उत्तम को अग्नि का पिता कहा है। अग्नि का पिता वैश्वानर और सूर्य कहा है। इसी लिये वैश्वानर का अर्थ आदित्य है, पाथिय अग्नि नही? । इस शङ्का का समाधान- यस्तु सूक्तं भजते यस्मै हविर्निरुप्यतेऽयमेव सोऽग्निश्वानरः । 'तु' शब्द पूर्वपक्ष की व्यावृत्ति करता है जो पूर्वपक्षी ने कहा सो समीचीन नही । क्योकि, जो, सूक्तम् = सूक्त को, भजते = भजता है, सूक्त पाता है, यस्मै = और जिस के लिये, हवि निरुप्यते = हवि का निर्वाप होता है = जिसे हवि मिलता है, स = वह, अयम् एव = यही, अग्नि पार्थिव अग्नि, वैश्वानरः = वैश्वानर है। इस सूक्त और हवि को पार्थिव अग्नि पाता है वैश्वानर का अर्थ पार्थिव अग्नि है। निपातमेवैते उत्तरे ज्योतिपी एतेन नामधेयेन भजेते भजेते । इति श्रीमद्यारकमुनिप्रणीते निरक्तशास्त्रे देवतकाण्डे सप्तमाध्यायस्यकत्रिश. खण्डोऽध्यायश्च समाप्त: ।। ७-३१ ।। एते उत्तरे ज्योतिषी = ये ऊपर के अन्तरिक्षस्थानीय विद्युत् और धुलोकस्थानीय आदित्य ज्योतिपदार्थ, एतेन नामधेयेन = इस वैश्वानर नाम से निपातम् एव = औपचारिक ( गौण ) रूप से हो, भजेते = भजते है अर्थात् वैश्वानर के वे दोनो विशेषण है। अत. अप्रधान हैं, प्रधान नहीं । और अग्नि प्रधान है । अप्रघान नहीं । अत एव वैश्वानर का अर्थ पार्थिव अग्नि है। आदित्य तथा विद्युत् नही। यह सिद्ध हुआ। इति श्रीस्वामिब्रह्मलीनमुनिप्रणोतनिरुक्तध्याख्याया सप्तमाध्यायस्य विशः खण्डः ॥ ७-३१ ।। । समाप्तश्च सप्तमोऽध्यायः । - 1 ५ - निरक्त के सप्तम अध्याय का सण्ड सूत्र- अधातोदेवतमिन्द्रोदिध परोक्षमतास्तोतिनपयदेवताथाकारचिन्तनम पुरुष विधास्तिन पय देवता इयुकं पूपातोऽथतामीग्दभती यथैतान्यादित्यभक्तीनिमन्त्रीमननाजगती गततममयो- सानुफ्रमिष्यामोऽग्निमीलेऽग्निः पूर्वमिरमिव तेन्द्रमित्र जातघेदा. फस्मात्पननवजातवेदसं घेण्यानरः करमावानरस्थप्रभूमहित्य कृष्णनिया हविष्यान्तमपामुपस्थैमूडो पस्तोमैयदे देनयत्रायदेनेयायन्मा- प्रयतेयोपन्मानमेंकत्रिंशत् ॥ ३१ .
it श्रीगणेशाय नमः । निरुक्तम् अथाष्टमोऽध्यायः । तत्र प्रथमः खण्डः । निघण्टुः ।। द्रविणोदाः १ । इध्मः २ । तन्नपात् ३ । नराशंसः ४ । ईळ: ५ । बहिः ६ । द्वारः ७ । उपा सानक्ता ८ । दैव्याहोतारा ९ । तिम्रो देवीः १० । स्रष्टा ११ । वनस्पतिः १२ । स्वाहाकृतयः १३ । इति त्रयोदश पदानि । द्रविणोदाः-१ । अथ निरक्तेऽप्टमाध्यायस्य प्रथमः खण्डः। 'द्रविणोदाः कस्मात् '१ धनं द्रविणमुच्यते,'' यदेनदभिद्रवन्ति । 'पलं वा द्रविण यदेनेनामिदन्ति । तस्य दाता द्रविणोदाः । तस्यैषा भवति । इति निरुक्तेऽस्टमाध्यायस्य प्रथमः खण्डः ।।८-१॥ प्रश्न-कस्माद = किस धातु से कौन, प्रत्यय करने पर, द्रविणोदाः = द्रविणोदसू शब्द..बना है ? । उत्तर-धनम् = धन, द्रविणम् = द्रविण, उच्यते = कहा जाता है । यत् = क्योकि, एगव इस की ओर, के अर्थी सभी लोग, अभिद्रवन्ति = दौड़ते हैं । "अभिद्रवन्ति एनम् इति द्रविणम् इस विग्रह में दुगतो' धातु से 'दुदक्षिभ्यामिनन' इस उणादि सूत्र से कमणि इन = 'प्रत्यय, गुण, अघादेश और णत्व होने पर द्रविण शब्द बना है। धन का नाम है। बयोकि, धिनको तरफ समी दौड़ते हैं 11 वा = अथवा, बलम् = बल, द्रविणम् = द्रविण, उच्यते - महा जाता है, यत् - क्योकि, एनेन इस से सयुक्त हो कर · शक्षको को, अभिवन्ति : अभिनव करते हैं - भगा। देते हैं। अर्याद - "अभिद्रवन्ति अनेन इति विषम्" इस विगह में पूर्ववत दु धातु से इस उणादि सूत्र से करण में इनन् प्रत्यय, गुण, अवादेव, और परव होने पर प्रविण शन्द बना है। बस का नाम है । क्योकि, वल से शत्रुओं के पीछे दौड़ा जाता है, अभिभा किया जाता है मारा जाता है । इस प्रकार विण शब्द बना कर-तस्य = उस द्रविण (पन) का, पाता, देने वाला, अथवा उस द्रविण (बल) का दाता = देने वाला द्रविणोदाः = प्रविणोदर धम पाल का देने वाला पापित अग्नि कहा जाता है। अर्थात् "द्रविणं ददाति तिवा" . न स (इन) (१२८८) निरक्तऽष्टमाध्यायस्य द्वितीयः खण्डः । इस विग्रह में द्रविण उपपद 'डुदामदाने' धातु से 'सर्व धातुभ्योऽसुन्' इस उणादि सूत्र से असुन् (अस्) प्रत्यय, वाहुलकाव आलोप, द्रविण दस्, पृपोदरादित्वात् सकार उपजन (आगम), द्रविण स् दस्, सकार को रुत्व, उत्व, गुण होने पर 'द्रविणोदस्' शब्द बना है। 'द्रविणोदाः' यह प्रथमा एक वचन का रूप है । तस्य = उस द्रविणोदस् शब्द को, एषा = यह आगे की ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्तेऽप्टमाध्यायस्य द्वितीयः खण्डः। - " य. - द्रविणोदा द्रविणेसा ग्रावहस्तासो अध्वरे । यज्ञेषु देवीलते ॥ इ. स. १-१-२९-७ ।। इस मन्त्र का मेघातिथि ऋपि, गायत्री छन्द और अग्नि देवता है । मन्त्रार्थ-अध्वरे यज्ञेषु प्रकृति तथा विकृतिरूप ज्योतिप्टोम याग मे, द्रविणसः = धनाभिलापी या बलाभिलापी ऋत्विक लोग, ग्रावहरतासः - सोम कूटने के पत्थर को हाथ मे ले कर, द्रविणोदाः देवम् = धनप्रद तथा बलप्रद अग्निदेव की ईलते = स्तुति करते हैं । यास्क इस मन्त्र का भाष्य करते हैं- द्रविणोदा यस्तम् । द्रविणस इति-द्रविणसादिन इति वा, द्रविणसानिन इति वा, द्रविणसरतस्मात्पिपत्विति वा । यज्ञेषु देवमीलते । याचन्ति-स्तुवन्ति-वर्धयन्ति-पूजयन्तीति वा । जो, द्रविणोदाः - धन या बल को देने वाला, तम् = उस अग्निदेव की। द्वाविणसः इति - 'द्रविणस' इस का अर्थ द्रविणसानिनः इति या - द्रविणसानिन. इति वा = धन की तरफ जाने वाले अथवा धन को भजने वाले (पाने वाले अथवा द्राविणोदा अग्नि, द्राविणसः पाने वाले जो द्रविणस् सोम है, तस्मात् = उस मे से अपने अश को लेकर, पिवतु यशेष यशो मे ऋत्विया लोग, अग्निम् अग्नि से, ईलते = याचन्ति = घनवलादि फलपी याचना करते हैं, रतुवन्ति = अग्नि की स्तुति करते हैं, वर्धयन्ति अग्निको समिधा भाग्य आदि से बढाते हैं, वा = अथवा, पूजयन्ति - पूजा करते हैं। इस प्रकार एक 'ईळते'का चार अर्थ है। इप भाष्य को देखने से प्रतीत होता है कि, भाष्यकार ने मन्त्र की दो प्रकार से व्याध्या पी है। एक-'यः द्राविणोदाः तम् ईळते' अर्थात् जो द्रविणोदस अग्नि देवता है उसकी ऋत्विक लोग स्तुति करते हैं। यहां यत् सत् वा अध्याहार करके मन्त्र का अर्थ किया गया है। पयोकि, "ईळसे' यह क्रियापद प्रथम पुरुष, यहुवचनान्त है। जिसका कर्ता 'द्रविणसः' प्रथमा बहुवचनान्त है । और चाहिये या द्वितीयान्त । सो है नहीं। माता यत् सत् का मध्याहार करके 'तम्' का कर्म बनाया गया है। 'द्रविणोदा तस्तम्' इति । दूसरो प्यारया मे ' पियति' इस क्रियापद का मध्याहार और 'प्रविणसः'इस को प्रथमात नहीं, किन्तु पञ्चम्यन्त माना है। 'विणोदस् 'को ज्यो का त्यो प्रथमा एयधनान्त हो रहम, दिया है द्राविण के - पान करें। - - निष्टमाध्यापस्य द्वितीयः खः । (१२८९) और अर्थ किया है कि-'द्रविणोदाः द्रविणसः तस्मात् पिवतु' अर्थात् द्रविणोदस् - अग्निदेवता, दविणस् = सोम, तस्मात् = उस में से अपना अंश को लेकर, पिवतु - पान करें। दविणोदर पाब्द में देवतात्व का विचार करते हैं- तत्को द्रविणोदाः। तत् = वह, कः = कोन, द्रविणोदा: - द्रविणोदस् है' । अर्थात् द्रविणोदस् किस का नाम - है? | उत्तर- इन्द्र इति कौटुकिः । स चलधनयोठितमस्तस्य च सर्ग बलकृतिः । इन्द्रः - द्रविणोदस इन्द्र है, इति = यह, फोटुकि = क्रोप्टुकि नामक आचार्य कहते हैं, पयोंकि, सः = वह (इन्द्रः), यलधनयो - बल और पन का, दातृतमः = अतिशय दान करने वाला और, तस्य - उसी इन्द्र का, सर्वा - सव, बलकृतिः = बल का कार्य है। भाव यह है कि, प्रविण शब्द का अर्थ बल और धन किया गया है और वल तया धन के देने वाले को द्रविणोदस् कहते हैं यह भी पूर्व कहा गया है। धन और वल वा देनेवाला इन्द्र ही है। अतः इन्द्र का नाम द्रविणोदस् है। - उत्पन्न हुआ। इस अर्थ में प्रमाण देते हैं- "ओजसो जातमुतमन्य एनम्" इति चाह । में एनम् = इस इन्द्रदेव पो, ओजस: - पिसी अतिमहान् वल से, मातम् मन्ये = मानता हूं, च = और, इति • यह माह = मन्यद्रष्टा कहते हैं या वेदमन्त्र कहता है। सम्पूर्ण मन्त्र- अश्वोदियायति यदुन्त्योजसो जातमुत मन्य एनम् । मन्योरियाय हम्र्येषु तस्थौ यतः प्रजन इन्द्रो अस्य वेद ॥ का सं.८-३-४-१०॥ इस मन्त्र का शक्तिपुत्र गोरियोति शपि, त्रिष्टुप् छन्द बोर मस्त देवता है । मवायं-इन्द्र यो सामथ्र्य को देस पर कोई महत्ता है कि, यत् - यदि इन्द्र, मवाद - आदित्य से, इयापा - बल से, बातम् - रसम, माये - मानता हा है, उत्तम उत्सम हुआ है। इसी लिये, हाय - शत्रुओं को यही से यह प्रम - सतहमा है - जानता है।ग मात्र में . तथापि, में, एनम् - इस को, ओनसः है। यषवा मह, मन्योः - कोप से, इसाप अटालिरामों के कपर वह सस्पी = राहा रहता है । यतः - और शm - इसमी जो समय है इसरो, द • दही स्वय, वेर . + (१२९०) निरुक्तेऽष्टमाध्यायस्य द्वितीयः खण्ड:.1: इन्द्र शब्द है। जिसका अर्थ बहुत बलवान है और द्रविण शब्द का अर्थ बल -है। अतः प्रविणोदस (द्रविणोदाः) शब्द का अर्थ वल देने वाला इ.द्र है यह सिद्ध हुआ। द्रविणोदस का अर्थ इन्द्र है इस में दूसरा हेतु देते हैं- अथाप्यग्नि- द्रविणोदसमाह। अथ अपि - और भी वेद मन्त्र, द्रविणोदसम् - द्रविणोदस्, अग्निम् = अग्नि को, माह = कहता है। अतः द्रविणोदस् का अपं अग्नि है। एप पुनरेतस्माज्जायते । एप पुनः = और यह इन्द्र, एतस्मात् + इस इन्द्र से, जायते - उत्पन्न होता है। अर्थात जिसका अपत्य द्रविणोदस् अग्नि है वही द्रविणोदा इन्द्र है यह सिद्ध हुआ। क्योकि- "यो अश्मनोरन्तरग्निं जजान" इत्यपि निगमो भवति । यः जिस इन्द्र ने, अमनो = दो मेघो के, अन्तः - भीतर, अग्निम् = अग्नि को, जजान = उत्पन्न किया है। इति अपि = यह भी, निगमः = वेदमात्र, भवति - है। सम्पूर्ण मन्त्र- यो हत्वाहिमरिणात्सप्त सिन्धून्यो गा उदाजदपधा घलस्य । यो अर्थमनोरन्तरग्निं जजान संवृक्समत्सु स जनास इन्द्रः ॥ म. स. २-६-७-३ ॥ इस मन्त्र का गृत्समद ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और इन्द्र देवता है। मन्त्रार्य--एक समय की बात है कि, देवासुर संग्राम मे से इन्द्र से मद कपि का रूप धारण कर स्वचला गया, असुरोंने गृत्समद को पूर्व रूप वाला देखा और उसी को इन्द्र समझ कर मारने के लिये प्रारम्भ किया । सव गृत्समद कहने लगे कि, है अमुरी!, य; - जिन्हों ने यहिम् = मेप का, हत्वा : विनाश करके, सप्त सिधून = सात नदियों को, अरिणाद प्रवाहित किया था, य: - जिन्होने, बलस्य = यल नामक असुर द्वारा, अपया - रोगी हुई, गाः- उद्धार किया था, यः- अ मनोः - दोनों मेघों के, अन्तः - और जो, समत्सु = संग्रामों में, संवृक् - साधुओं का नाश करनेवाला, भवति : है। योचमें, अग्निम् = वैद्युत् अग्नि को, जजान = उत्पन्न दिया धोध में अग्नि को उत्पन्न किया था । द्रविणोदः - अग्नि दविणोदर न्द्र से उत्पन्न हुआ है । सः - पह, इन्द्रः = इन्द्र है. मैं नहीं । इस मन्ध मे गृत्समद ऋषि कहते कि, इन्द्रने दोनों मेषों के अतः विगोदस इन्द्र है यह सिद्ध हुआ ! इन्द्र के द्रविणोदम् होने में दूसरा भी हेतु देते हैं- गायो का, उद आजद जिन्हों ने, = अर्थ अपि - , -- 2 निरुक्तेऽस्टमाध्यायस्य द्वितीयः खण्डः । (१२९१) " अथाप्यतयाजेषु द्राविणोदसाः प्रवादा भवन्ति । तेपां पुनः पात्रस्येन्द्रपानमिति भवति ।" और यह दूसरा हेतु इन्द्र के द्रविणोदस् होने मे है कि-मनुयाजेषु = जिन से अतुओं का यजन होता है उन ऋतुयाज मन्त्रो मे, द्राविणोदसा - द्राविणोदस अर्थात् द्रविणोदस् शब्दवाले, प्रवादा = वचन, भवन्ति - है पुन तेपाम् = और उन मन्त्रो का जो पात्र होता है उस, पात्रस्य = पात्र को, इन्द्रपानम् = इन्द्रपान, इति = यह समाख्या, भवति = है, यदि द्रविणोदस् इन्द्र न होता तो उस पात्र का नाम इन्द्रपान न होता । अत द्रविणोदस इन्द्र है यह सिद्ध हुआ। ऋतुर्याज मन्त्र जैसे- अपाद्धोत्रादुत पोत्रादमत्तोत नेष्ट्रादजुषत प्रयो हितम् । तुरीयं पात्रममृक्तममयं द्रविणोदाः पिवतु द्राविणोदसः ॥ ऋ स २-८-१-४ ॥ इस मन्त्र का गृत्समद ऋषि, जगती छन्द और द्रविणोदा देवता है । मन्त्रायं-द्रविणोदा, जिन्हो ने, होत्राद = होता के यज्ञ मे सोम का, अपात् = पान किया था, उत - और जो, पोत्राद पितों के यज्ञ मे, असक्त - सोम पान करके हृप्ट हुए हैं, उग = और जिन्होंने, नष्ट्रात् = नेप्टा के यश मे, हितम् - प्रदत्त, प्रय : देवो के अन्न रूप सोम, अजुषत = पान किया है वह द्राविणोदस. हविरूप द्रव्य प्रदाता ऋत्विजो के लिये हित है। द्रविणोदा एतादृश द्रविणोदस, असृक्तम् . यथोचित, अमत्यम् = मरण रहित, तुरीयम् पायम् - चतुर्थ पात्र में स्थित सोम का, पिवतु = पान करें। इस ऋषा मे चतुर्थ पान जो इन्द्रपान पात्र कहा जाता है उस को द्रविणोदस् कहा गया है । मत द्रविणोदस् इ द्र सिद्ध होता है । इन्द्र के द्रविणोदा होने मे दूसरा हेतु देते हैं- अथाप्येनं सोमपानेन स्तौति । जय अपि और भी, द्रविणोदा इन्द्र का नाम है. इस मे अन्य हेतु है कि, एनम् = इस इन्द्र की, सोमपानेन = सोम पान के द्वारा, मंतु यागो मै ही, स्तौति मन्त्र स्तुति करता है- मन्दख होत्रादनु जोपमन्धसोऽध्वर्यवः स पूर्णां वष्टयासिचम् । तस्मा एतं भरत तद्वशो ददिर्होत्रात्सोमं द्रविणोदः पिव ऋतुभिः॥ ऋ स २-८-१-१॥ इस मन्त्र का भी गृत्समद कपि, जगती छन्द और द्रविणोदा देवता है । मन्त्रापं-द्रविणोद धनदासा देव !, होत्रात् - होतृतक याग में, अन्धस = देवो ये अन्न रूप सोमपान रो, १६२ - - - .
तस्मै प्रदान करो। (१२९२) निरुक्तऽष्टमाध्यायस्यः द्वितीयः खण्डः । अनुजोपम् । प्रसन्न हो सर, मन्दस्व = हष्टपुष्ट बनो। अध्वयंवः = हे अध्वर्युगण !; स वह द्रविणोदा, पूर्णाम् आसिचम् = सम्पूर्ण सिध्यमान . आहूति को, वष्टि : चाहते हैं। - उस 'द्रविणोदा अग्नि के लिये, एनम् । इस सोम को, भरत तद्वशः = तत्काम अर्थात् सोमाभिलाषी द्रविणोदा, ददिः = आप लोगों अभीष्ट फल, के दाता, भवति = हैं। द्रविणोदः = हे द्रविणोदा!, होत्रात् = होता के यज्ञ ऋतुभि = ऋतुओं के साथ, सोमम् पिव = सोम पान करो। भाव यह है कि, वेद में जहाँ जहाँ सोमपान की स्तुति पाई जाती हैं वहाँ वहाँ इन्द्र हो देवता देखा जाता है। इस मन्त्र में सोम्पान की स्तुति है और देवता द्रविणोदा है । अतः द्रविणोदा का अर्थ इन्द्र ही होना चाहिये । 'इस लिये द्रविणोदस् इन्द्र है यह सिद्ध हुमा । - अथाप्याह-" द्रविणोदाः पियतु द्राविणोदसः॥ इति ।।... 1: ' 'अथ अपि = और भी यह दूसरा हेतु इन्द्र के द्रविणोदस् होने में, आह = मन्त्र कहता है- द्राविणदसः = जिस द्रविणोदस् का पुत्र अग्नि है वह, द्रविणोदाः = द्रविणोदस् इन्द्र, पिवतु सोमपान करें। [सम्पूर्ण मन्त्र की व्याख्या थोड़े ही दूर पर की गई है] इस ना मे 'अग्नि के उत्पन्न फरने वाला द्रविणोदा सोमपान करें यह कहा गया है । और अग्नि के उत्पन्न करने वाला इन्द्र है। अतः द्रविणोदस का अर्थ इन्द्र है। कोप्टुकि आचार्य के अभिमत पूर्वपक्ष के हेतु सय समाप्त हो गये हैं । अब शाप पूणि आचार्य के अभिगत उत्तर पक्ष के हेतु कहे जाते हैं। जैसे- - अयमेवामिविणोदा इति शाकपूणिः । अयम् एव 3 यही, अग्निः = पार्थिव अग्नि, द्रविणोदाः = द्रविणोदा है, इति = यह, शाकपूणिः शाकपूणि नामक आचार्य कहते हैं। और हेतु देते हैं- आमेयेष्वेव हि सूक्तेषु द्राविणोदसा: प्रवादा भवन्ति । हि - क्योकि, आग्नेयेषु एव सूक्तेषु = अग्निदेवताक मूक्तों में ही, द्राविणोदसा : द्रविणोदस् शब्द सम्यन्धी, प्रशादा: = प्रवाद अर्थात् स्तुतियां, भवन्ति = हैं। अर्थात् वेदो में द्रविणोदस् पशब्द अग्नि के विशेषण देखा जाता है। अतः द्रविणोदस् यही अग्नि है, इद्र नही। जगे- "देवा अग्नि धारयन्द्रविणोदाम् " इत्यपि निगमो भवति । देवाः = देवताओ ने, द्रविणोदाम् = हविग्प द्रव्यो के देने वाले, अग्निम् = अग्नि को, धारयन पारण किया | इति अपि यह भी, निगम. = वेदमन्त्र, भवति = है । इम मन्त्र में 'दविणोदाम्' पद अग्निवाचार है । अतः द्रविणोदस यही अग्नि है यह पक्ष स्थिर हुआ। सम्पूर्ण मात्र- D निकतेऽष्टमाध्यायस्य द्वितीय. खण्डा । (१९९३) स प्रलथा सहसा जायमानः सद्यः काव्यानि वळवत्त विश्वा । आपश्च मित्रं धिषणां च साधन्देवा अग्निं धारयन्द्रविणोदाम् ॥ ऋ स.१-७-३-१ ।। में = घारण T] 2 H कुत्स ऋापि, त्रिष्टुप् छन्द और अग्नि देवता है। मन्त्रार्थ-सहसा वलेन जायमानः . वल या काप्ठघर्षण से उत्पन्न, स: = वह अग्नि, सद्य = उसी समय अर्थात् जिस समय उत्पन्न हुआ उसो समय, प्रलया = पुरातन के समान, बट = सत्य ही, विश्वा = सारे, काव्यानि मेघवियों के धर्म को, अघत्त = धारण करता है। विद्वानो के सब काम करने लग जाता है। मापः च धिपणा = जल और माध्यमिका वाक् (शब्द) उस विद्युत् रूप अग्नि को, मित्रम् = मित्र, साधन = वना लेते हैं। द्रविणोदाम् = उस घेनदातां; अग्निम् = अग्नि को, देवा = देवो ने घारयन किया था । अर्थात् ऋत्विजो ने गार्हपत्यादिरूप से और देवो ने दूत रूप से नियुक्त किया था। इस प्रकार इस ऋचा मे द्रविणोदा शब्द अग्नि का विशेषणं है। अतः इस का अर्थ अग्नि है, इन्द्र नहीं यह सिद्ध हुआ। कौष्टिक के पक्ष के हेतुओ का प्रमश. खण्डन करते हैं- यथो एतत् - सबलधनयोर्दातृतम इति । सर्वासु देवतास्वैश्वयं वर्तते । यथा उ एतत् = और जो क्रोप्टिक ने यह कहा कि वह इन्द्र, धनवलयोः = धन और बल का, दातृतमः अतिशय दाता है, इस लिये द्रविणोदी इन्द्रं ही हो सकता है, इति - इत्यादि। सो समीचीन नहीं, क्योकि, सर्वासु देवतासु = सभी देवताओ मे, ऐश्वर्यम् = धन और बल को देना रूप ऐश्वर्य, वर्तते = रहता है। भाव यह है कि, यदि धन और बल को देना रूम ऐश्वर्य केवल इन्द्र में ही हो तब तो इन्द्र को ही द्रविणोदस् होने मे यह हेतु हो सकता है। सो तो है नहीं। 'क्योकि, यह शक्ति सभी देवताओ में है। अत अग्नि भी धनबल के दाता होने से अग्नि ही द्रविणोदस् है।"महामाग्याद् देवतायाः' अर्थात् सभी देवता महा ऐश्वयं वाले होते हैं यह पूर्व कहा गया है "ओजसो जातमुत मन्य एनम्" इति चोहति । अयमप्यग्निरोजसा पलेन मध्यमानो जायते तस्मादेन माह-सहसस्पुत्रं सहसः सूनुं सहसो यहुम् । पया उ एतद - भऔर जो यह यहा कि, एनम् = इस इन्द्र को मे, मोजसः : + बल से, जातम् - उत्पन्न हुआ, मन्ये मानता हूँ, च = और, इति - यह मन्त्र, माह बहता है, इति = इत्यादि। यह कहना भी ठीक नहीं, क्योकि, अयम् अपि अग्नि. - यह भी अग्नि, भोजसा वलेन - वल से, मध्यमाने. . मथा जाता हुमा, जायते * उत्पन्न होता है, तस्मात्) इस कारण से, पि, एनम् • इस अग्नि को सहसः पुत्रम् - सहस' अर्थात् बल का पुत्र सहसः सनुम् = सहस का सूनु अर्थात् पुत्र और, सहस. यहम् - सहस का यहु. आहे - कहता है । यहुः परपम् । निपं. २-२-११॥ प्रमशः तीनों के मात्र उदाहरण- यथो एतत् - । किसी महान् . .
- - - . -- । 1 - " (१२९४) निरुक्तऽप्टमाध्यायस्यद्वितीयः खण्डः । दुन्नः सर्पिरासुतिः प्रत्नो होता वरेण्यः' : सहसस्पुत्रो अद्भतः ॥ ऋ सं. २-५-२८-६ ॥ । समिधा इस गन्ध का गृत्समद् ऋपि, गायत्री छन्द और अग्नि देवता है। मन्त्रार्थ-द्रन्नः रूप द्रु जिन का अन्न है, सपिरासुतिः = जिन के धृत सिक्त होता है, प्रत्नः = जो पुरातन है, होता जो होमनिप्पादक है, वरेण्यः - जो वरणीय है, सहसः पुत्रः जो वल के पुत्र हैं और अद्भुतः जो आश्चर्य स्वरूप है, ऐसे महानुभाव अग्नि मेरे पर अनुग्रह करें। इस ऋचा मे अग्नि को बल का पुत्र कहा है। वं ह यद्यविष्ठ्य सहसः सूनवाहुत । ऋतावा यज्ञियो भुवः ॥ ऋ. सं ६-५-२४-३ ॥ इस मन्त्र का आङ्गिरा के पुत्र विरूप ऋपि, गायत्री छन्द और अग्नि देवता है । मन्त्रार्थ- यविष्ठय = हेतरुणतम !, सहसः सूनो = हे बल के पुत्र!, आहुत = हे आहुत अग्ने !; त्वम् = तुम, यत् = जब, तावा = सत्यवाले और, यज्ञिय. यज्ञवाले, भुवः = होओगो तब हमारे वरणीय धनो को देवो के पास भेजना। इस ऋचा मे अग्नि को बल का सूनु (पुत्र) कहा है। अग्ने वाजस्य गोमत ईशानः सहसो यहो। अस्मे घेहि जातवेदो महि श्रवः । ऋ सं. १-५-२७-४ ।। इस मन्त्रका Lगोतम ऋपि, उष्णिक छन्द और अग्नि देवता है। मन्त्रार्थ सहसः यहो, हे बल का पुत्र !, अग्ने - हे अग्ने !, तुम, गोमतः प्रभूत गो-युक्त, वाजस्य = अन्न.के,- ईशानः- 'स्वामी हो । जातवेदः = हे सर्वभूतज्ञ ! तुम, अस्मे = हमे, यहि . वहुत, श्रवः = इस'चा में अग्नि को बल का यहु (अपत्य ) कहा है। भाव यह है कि, कोप्टिकि ने " मोज सो जातम्" इत्यादि मन्त्र को प्रमाण देते हुए यह कहा था कि, इन्द्र -द्रविण अर्थात् बल का पुत्र है । अतः द्रविणोदस् इन्द्र है। इसका खण्डन करते हुए एवं यथोक्त तीन मन्त्रो को प्रमाण देते हुए शाकपूणि (सिद्धान्ती), ने यह कहा कि, इन्द्र को द्रविणोदस होने मे यह हेतु समीचीन नहीं । क्योकि, अग्नि भी बलका पुत्र, सूनु (पुत्र), और यह (अपत्य) है । मत हेतु व्यभिचारी होने से यह इन्द्र को द्रविणोदस् सिद्ध नहीं कर सकता है । अत एव अग्नि हीद्रविणोदा है यह सिद्ध हुआ। यथो एतत्-अग्निं द्राविणोदसमाहेति । ऋत्विजोत्र द्रविणोदस उच्यन्ते, हविषो दावारस्ते अनं जनयन्ति । T म धन, धेहि - दो। - - -- है निरक्तऽस्टमाध्यायस्य द्वितीय. खण्डः। (१२९५) यथो एतत् = सौर जो यह कहा कि, वेद मन्त्र, अग्निम् = अग्नि को, द्राविणोदसम् द्रविणोदस् का पुत्र, बाह - कहता है, इति = इत्यादि । यह भी समुचित नही। क्योंकि, यह हेतु भी इन्द्र को द्रविणोदम् सिद्ध करने में समर्थ नहीं है क्योकि, अत्र = यही, ऋत्विज. - प्रशस्विगण, द्रविणोदसः - अग्नि के हविता, उच्यन्ते कहे जाते हैं । क्योकि, ते = वे ऋत्विग्गण हविप हव्य द्रव्यो के, दातारः - दता, च- = इस अग्नि को, जनयन्ति = उत्पन्न करते हैं। इस मे प्रमाण देते हैं- और, एनम् - . . "मपीणां पुत्रो अधिराज एषः" (य. बा. सं. ५-४) इत्यपि निगमो भवति । एप. = यह अग्निदेव, अधिराज. अधिक दीप्तिवाला और, ऋषीणाम् = ऋत्विम् रूप ऋपियो का, पुष = पुत्र है । इति अपि = यह भी, निगम. = वेदमन्त्र प्रमाण, भवति = है । यथो एतत्-तेषां पुनः पात्रस्येन्द्रमानमिति भरतीति । भक्तिमात्रं तद्भवति-यथा वायव्यानीति सर्वेषां सोमपात्राणाम् । ययो एतत् = और जो यह पहाकि, तेषाम् पुन = उन ऋतुयाजो के, पारस्य ='पात्र का नाम, = इन्द्रमान है, इति = इत्यादि । यह पन भी इन्द्र के द्रविणोदस होने में हेतु नहीं हो सकता है। क्योषिः, तत् = वह, भक्तिमात्रम् = भक्तिमात्र, भवति है। अर्थात् गुण के कारण इन्द्रपानम् = 'इन्द्रपान' यह पात्र को समाख्या (ससा) है। यथा - जैसे-सर्वेपाम् सोमपात्राणाम् सभी सोमपात्रो का, वायव्यानि इति - वायव्य यह नाम है। अर्थात् सोम के पात्र भिन्न भिन्न देवताओ के होते हैं तो भी उन सब का नाम वायव्य होता है। इस से वे सब वायु देवता के नहीं हो जाते हैं। क्योकि, यह गुण के कारण समास्या है । अत. 'द्रविणोदस्' पदवाले मन्त्र में 'इन्द्रपानम् ' यह पात्र का नाम होने से इन्द्र द्रविणोदस नहीं हो सकता है। इन्द्रमानम् भवति %D - यथो एतत् - एनं सोमपानेन स्तोतीति । ययो एतत् = और जो यह कहा कि, एनम् = इस इन्द्र को, सोमानेन • सोमान से, स्वोति = स्तुति करता है, इति = इत्यादि । यह भी समुषित नहीं, क्योरि- अस्मिनप्येतदुप पयते । अस्मिम् अपि • इस अग्नि में भी, एतद • यह, उपपसते - उपपन होता है। अर्ष में- " सोमं पिय मन्दसानो गंगनिमिः" इत्यपि निगमो मयति । रति मपि = मह भी, निगम. निगम, भवति - है । सम्पूर्ण मत्र- (१२९६) निरक्तऽष्टमाध्यायस्य तृतीय खण्ड । अग्ने मरुद्भिः शुभयनिकभिःसोम पिव मन्दसानो गणधिभिः । पावकेभिर्विश्वमिन्वेभिरायुभिर्वैश्वानर प्रदिवाकेतुनासजूः ॥ -- कस. ४-३-२६-८ ॥ F - - इस मन्त्र का प्यावाश्व ऋपि, जगती छन्द और अग्नि तथा मरुद्गण देवता है । मन्त्रार्थ- अग्ने वैश्वानर = हे वैश्वानर अग्निदेव ।, प्रदिवा - पुरातन, केतुना = ज्यालापुञ्ज, सजू सहित तुम, शुभद्भि = शोभमान, प्राकभि. - पूजनीय, गणनिभि = गणभाव का आश्रय, बरने वाले, पावकेभि = पवित्रता विधायक, विश्वमिन्वेमि = विश्व को प्रीतिदायक और, आयुभि = दोघंजोवी, मभि मरुतो के साय, मन्दमान = प्रसन्न होता हुआ, सोमम् पिव सोम पान करो। यह मन्त्र सोमपान से, अग्नि की स्तुति करता है । भाव यह है कि, जैसे ' मन्दस्य होनात्' इत्यादि मन्त्र सोमपान से इन्द्र की स्तुति करता है वैसे ही यह मन्त्र भी सोमपान से अग्नि की भी स्तुति करता है । अतः, यह हेतु' भी इन्द्र को द्रविणोदर सिद्ध नही कर सकता है । इसी, लिये अग्नि हो द्रविणोदस है यह सिद्ध हुआ। यथो एतत्-" द्रविणोदाः पिबतु द्राविणोदसः" इति । अस्यैव तद्भवति ॥ इति निस्तेऽप्टमाध्यायस्य द्वितीय. खण्ड ॥ ८-२ ॥ । यो एतत् - और जो यह कहा कि, द्रविणोदस. जिस द्रविणोदस का पुत्र अग्नि है यह, प्रविणोदा द्रविणोदस् इ.द्र, पिवतु = सोमपान परे, इति = इत्यादि । यह भी हेतु इन्द्र के विणोदस होने में समर्थ नहीं है। क्योगि, अस्य एय - इरा अग्नि वा भी, तत् = सोमपानभागित्व, भवति = है । जैसे--- अय निरुत्तेऽष्टामाध्यायस्य सृतीय खण्ड । मेय॑न्तु ते वहयो येभिरीयसेऽरिपण्यन्वीळयस्या वनस्पते । आयूयो धृष्णो अभिगूर्यात्वं नेष्ट्रात्सोम द्रविणोदः पिवं ऋतुभिः ।। - m । H - क स २-८-१-३ ॥ इस मन्त्र का गृत्समद इपि, जगती छन्द और द्रविणोदा देवता है । मन्त्रायं-द्रविणोद = है द्रविणोदा अग्निदेव ! तुम पेभि - जिन वाहनों से, ईपसे' जाते हो, 'ते वह्नया में वे रपया का • वह्न' करने वाले, मेद्यन्तु - तुप्त हो । बनस्पते = हे वनस्पतिदेव ! तुम, अरपण्यन - किसी की हिसा न करते हुए बोलयस्व = होओ। पुरणो में है क , त्वम् ='तुम, 'नेप्टात् = नेष्टा के • आपर, अभिगूपं - ऊपर उठ कर, अतुभि = ऋतुओं के साथ, सोमम् पिय: सोमपान करो। इस मन्त्र में वनस्पते ' यह सम्बोपन है भार 'द्रविणोद.' यह भी सम्बोधन है। यज्ञ में, आयूय r . । ..III " - निष्क्तेमाध्यायस्य तृतीयः खण्डः'। ((१२९०) धोनी समानाधिकरण है। "वनस्पते ' विशेष्य है और 'द्रविणोदः' विशेषण ! वनस्पति निःसन्देह अग्नि है। अतः 'दविणौदस् भी अग्नि ही है, इन्द्र नहीं।'' इस मन्त्र का भाष्य---- . मेघन्तु ते बसयो वोढारो यर्यास्वरिष्यन् रढीमवापूयधृष्णो । अभिगूर्य वं नेष्ट्रीयाद्धिष्ण्यात् । धिष्ण्यो धिषण्यो धिषणाभावः । धिपणा वाग्धिपर्दधात्यथें । धीमादिनीति वा । धीसादिनीति या । वनस्पत इत्येनमाहैप हि वनानां पाता वा पालयिता वा। वनं वनोतेः । पियर्तुभिः कालः । FREE TEETTTT: ।। ki rr: PIT इति निरुक्तेष्टमाध्यायस्य तृतीय खण्ड.। 6-11- ते = वे, वह्नया = बौढारः - अश्वादि वाहन, मेद्यन्तु : तृप्त हों, जैः : जिन से, अरिष्यन् । किसी से भी न मारा जाता हुआ, पासि = गमन करते हो, वीलयस्व = दृढीभव = दृढ होओ, मायूय = भाकर, घृष्णो = हे घर्षक!, शत्रुओं को धमकाने वाले, अभिगूयं = ऊपर ऊठ कर, त्वम् = तुम, नेष्ट्रीयात् धिष्ण्यात् F नेष्टा के यज्ञ में ।, धृष्णो घिगो - धिपण्यो - धिषणा भाव. . धुर्पक भाव । घिषणा - वाक् - वाणी को कहते हैं। दधाति अर्थ = धारणार्य, धिः - घि धातू से घिपणां शब्द बना है। अर्थात घिष्यति दधाति धारयति इति घिषणा वाक् ' इस विग्रह मे घातूनामनेकार्थत्वात् धारणर्थिक धिप शन्दे' धातु से "धिषिप् च संज्ञायाम्' इस उपादि सूत्र से यु (यु) प्रत्ययाः युवोरनाको' इस सूत्र से यु को अन मादेश, कित्त्वात् गुणामाव,, धिपत, टापू. शत्व, होने पर धिपणा शब्द बना है। वाणी का नाम है । क्योकि, वाणी अर्थ को धारण करती है। अथवा, घीसादिनी = बुद्धि में बैठने वाली है, इति - इस कारण वाणो घिपणा यही जाती है । अर्थात् "घियां सिदति इति धिषणा' इम विग्रह मे घी 'पूर्वक 'पद्लु' विशरणगत्यव. सादने' धातु से युई (यु) अन, घोसदन, पत्व, टाप् घोपदना, पोदरादित्वात् धिपणा । वा = अथवा, घीसानिनी - घोसानिनी है, इति = इस कारण धिषणा कही जाती है । अर्थात् धियां सनति भिजते इति धिषणा' इस विग्रह मे घी पूर्वक पण संभक्तों धातु से पचादि अंच (ब), 'घोसना टॉप, और पत्व होने से घिषणा शब्द बना है। वाणी का नाम है। कोक, वाणी बुद्धि को 'भजती है। " 11 वनस्पते इति वनस्पते यह वनस्पति शब्द का सम्बोधन वा रूम है। एनम् ,इम द्रविणोदरा कहता है । इस से द्रविणोदम् अग्नि है । हि-क्योकि, एप: यह अग्नि, वनानाम् वनोका, पाता = रक्षण करने वाला है। वा = अथवा, पालयिता - पालन करने वाला है। और 'पाल धातु दो हैं । किन्तु अर्थ एक ही है। अग्नि वन अर्थाद वृक्षादिकों के भीतर रहता हुआ भी और जलाने को समर्थ होता हुआ भी उन्हें जलाता नहीं। इसीसे उनका पालक है। वनोत: वन धातु से, वनम् ' वनशब्द' बना है। अर्थात् 'वन्यते संमज्यते इति वनम् ' इस “विग्रह में 'धन ' 'संभक्ती धातु से "सि'संज्ञाया पाप्रायेण ' इस सूत्र से वर्म मे घ (अ) प्रत्यय होने पर वन. शब्द बना है। 'पाति रक्षति इति पति: ' इस विग्रह में 'पा रक्षणे' धातु से 'पातेतिः' इस उणादि सूब से दति वा८ TI T । 3 T TET - 5 को, माह - D . - - (१९९८) निरुत्ते ऽष्टमाध्यायस्य चतुर्थः खण्डः । (अति) प्रत्यय, डिस्याद टिलोप होने पर पति शब्द बना है। 'बनानां पतिः इति वनस्पतिः' इस घिग्रह मे षष्ठी समास और पारस्करादित्वात्सुट् भागम होने पर वनस्पति शब्द बना है । प्रस्तुभिः = काल: - तु अर्थात् कालों के सहित, पिव - पान करो। !' अथ निरंक्तेऽष्टमाध्यायस्य चतुर्थः खण्डः ।। 4 अथात आप्रियः। 'अथ' अधिकारार्थ, 'मता' आगन्तर्यार्थ है । निघण्टु पञ्चम अध्याय एवं निरुक्त अष्टम अध्याय प्रारम्भ में देवता बोधक १३ १६ आये है । उन में 'द्रविणोदाः प्रथम है द्वितीय पद 'इम' से ले फर 'स्वाहाकृतय.' १६ तक १२ पद आफ्री सूत्रमें पढे होने आप्री कहलाते हैं। तथाच अतः 'द्रविणोदा:' पद के निर्वचन के अनन्तर, आप्रियः - आप्री पदो के निर्वचन पा, मथ - यहाँ से प्रारम्भ होता है। आप्रियः कस्मात् । आप्नोतेः प्रीणातेर्वा । प्रश्न-कस्मात् किस धातु से कौन प्रत्यय करने पर आप्रियः = आणी पद बना है ? उत्तर-आप्नोतेः = आप्ल घातु से, वा = अथवा, प्रोणाते: = प्रोत्र धातु से आप्री शब्द बना है । आप्री नाम मन्त्र विशेषों का है और उन मन्त्रो से सम्बन्ध होने के कारण देवताओ को भी आप्री कहते हैं । मन्त्र पक्ष में निर्वचन-'आप्नुवन्ति इति नाप्रियः' इस विग्रह में ' 'मा व्याप्तौ' धातु से कर्ता में उणादि रोड (री) प्रत्यय होने पर 'आपी' शब्द बना है । 'माप्रियः' यह जस् का रूप है । मन्त्र विशेषो का नाम है । क्योकि, वे लोक को व्यापन करते हैं। और जब मन्त्र के सम्बन्ध से देयता वाचक आणी शब्द है तब 'आप्यन्तै इति आप्रियः' इस विग्रह में इसी आप् धातु से यही रोष्ट् प्रत्यय कर्म मे करने से आप्री शब्द बना है । देवता का नाम है। क्योकि, देवता व्याप्त होते हैं। अषया 'थाप्रीणन्ति इति आप्रियः' इस विग्रह में आङ् पूर्वक 'प्रीन तणे कान्तो च' पार से "पिप् च ' इस सूत्र से, कर्ता मे किप् प्रत्यय, सर्वापहारी लोप होने पर आप्रो शब्द बना है। 'आप्रियः' यह जस् का रूप है । मात्र विशेषो का नाम है । पयोंकि, वे हवियों के द्वारा देवताओं फो तृप्त करते हैं । और जब देवताओं का नाम है तब आप्रीयन्ते इति आप्रियः' इस विग्रह में उसी धातु से वही फिप् प्रत्यय कर्म मे समझना चाहिये । इसी को दिखाते हैं- - " आप्रीमिराप्रीणाति" इति च ब्राह्मणम् ।। आप्रीमिः = आणी नामक मन्त्रों से होता आदि ऋत्विम् उन्हें, मानोपाति - सृप्त करते हैं, इति च = यह, ग्राह्मणम् ब्राह्मण वचन उक्त अर्थ में प्रमाण है। अर्थात् यास्क कहते हैं कि, मैं ने जो भाषी शब्द वा अपं किया है वही अर्थ यह ग्राह्मण वाक्य भी करता है। ।
निशक्तेऽष्टमाध्यायस्य पञ्चमः खण्डः । (१२९९) इध्मः ॥ २ ॥ इध्यते समिध्यते इति इध्म अग्नि इस विग्रह में 'नि इन्धी दीप्तो' धातु से उणादि परिकल्पित मक् (म) प्रत्यय, 'अनिदिता हल उपधाया विति' इस सूत्र से न लोर होने पर इध्म शब्द बना है। अग्नि का नाम है। क्योकि अग्नि दीप्तिमान होता है। ", भाष्यकार इसका निर्वचन करते हैं- तासमिध्मः प्रथमगामी भवति । इध्मः समिन्धनात् । तासाम् - उन बारह आप्री देवताओ मे, प्रथमगामी : पहले माने वाला, इध्म = इध्म अर्थात् इन्धन देवता, भवति - है। समिन्धनात् = समि-धन से - जलाने से, इध्म = अग्नि इध्म कहा जाता है। तस्यैपा भवति । इति निरुतेऽष्टमाध्यायस्य चतुर्थ खण्ड ॥ ८-४ ।। तस्य = उस की, एषा = यह ऋचा, भवति है- . अथ निरक्तऽष्टमाध्यायस्य पञ्चम खण्ड । समिद्धो अद्य मनुषो दुरोणे देवो देवान्यजसि जातवेदः । आ च वह मित्रमहश्चिकित्वान्त्वं दूतः कविरंसि प्रचेताः ॥ ऋस ८-६-८-१॥ इस मन्त्र का भार्गव जमदग्नि ऋषि, त्रिष्टुप् छद और आधी देवता है। यह दशा मण्डलका ११० वा सूक्त का प्रथम मन्त्र है। इस सूक्त का नाम आप्री सूक्त है । अत इन मन्त्रो के देवता भी मात्री कहलाते हैं । मन्त्रार्थ-जातवेद हे जातप्रज्ञ अग्ने, देव तुम अपने तेज से दीप्यमान होने से देव हो । मानुष तुम यज्ञ करने वाले मनुष्य के, दुरोणे = घर मे होने वाले, मद्य = आज इस यज्ञ मे, समिद - सम्यक् प्रज्वलित होता हुआ, देवान् • इन्द्रादि देवो की, यजसि - हवि द्वारा पूजा करते हो। मित्रमह = तुम मित्र स्वरूप स्तोताओ से पूजित हो । चिकित्वान् = तुम स्तोताओ की स्तुति को जानने वाले हो। तुम हमारे यज्ञ मे देवो को, आवह = ले आओ। क्योकि, स्वम् = तुम, कवित = का तप्रज्ञ हो प्रचेता = उत्तम बुद्धि वाले हो। च - और, दूत देवो के दूत हो। इस मन्त्र मे ' समिद्ध' यह पद है, जो 'बि इन्धी दीप्तौ' धातु से बना है और प्रकृत इध्म ' भी मि इन्धी दोप्तो' धातु से ही बना है। अत यह मन्त्र 'इध्म का उदाहरण है ऐसा समझना चाहिये । अर्थात् ' सम्यक् इध्यते दीप्यते इति समिद्ध अग्नि ' इस विग्रह मे छान्दावाद (१३००) निरुक्तऽष्टमाध्यापस्य पष्ठा खण्डा वर्तमान में तथा फर्म में क्त (त) प्रत्यय, श्वोदितो निष्ठायाम्' इस सूत्र से इट् निषेध, सम् इन्धु स, 'अनिदिसाम्' इस सूत्र से न लोप 'झपस्तथो|धः' इस सूत्र से त को ध, 'झला जश् झशि' इस सूत्र से घ को न होने पर समिद्ध' शब्द बना है । - . इस मन्त्रका भाष्य- - समिद्धो अद्य मनुष्यस्य गृहे देवो देघान् यजसि जातवेद आ च वह मित्रमहश्चि कित्वाँश्चेतनावाँस्त्वं दूतः कविरसि प्रचेताः प्रवृद्धचेता। जातवेदः = हे जातप्रज्ञ अग्ने !, त्वम् = तुम, देवः देव, मित्रमहः 3 मित्र स्वरूप स्तोतामों देवों के दूत, से पूजित, चिकित्वान् = चेतनावान् = स्तोताओं की स्तुति को जानने वाले, दूतः कविः - क्रान्तदर्शी, प्रचेताः = प्रवृद्धचेताः = उत्तम बुद्धि वाले, असि = हो। अद्य = आज, मनुष्यस्य गृहे ८ यज्ञ करने वाले यजमान रूप मनुष्य के गृह मे, समिद्धः प्रज्वलित होता हुआ, देवान् - देवों की, यजसि = पूजा करो, च = और उनको यज्ञ में, आवह = ले आओ। इध्म शब्द का अर्थ-निर्णय- यज्ञेष्म इति कात्थक्यः। कास्थक्यः = कत्थक का पुत्र कात्थक्य नामक आचार्य, इति = यह कहते हैं कि, इध्म शब्द का अर्थ, यज्ञेध्मः = यज्ञ का इन्धन समिधा = यज्ञ-काष्ठ है। दूसरा मत दिखाते हैं- अग्निरिति शाकपूणिः। इति निरुक्तेऽष्टमाध्यायस्य पञ्चमः खण्डः ॥ ८-५ ॥ शाकपूणि! = शाकपूणि नामक आचार्य, इति = यह कहते हैं कि, इध्म शब्द का अर्थ, अग्निः अग्नि है । यही निरुक्त सिद्धान्त मत है। अर्थात् इध्म का अर्थ अग्नि है यह सिद्धान्त है। अब निरुक्तेऽष्टमाध्यायस्य,पष्ठः खण्डः । उनूनपात् । ३ । 'न पातयति पतति वा पिता अनेन इति नपात् अपत्यम्' इस विग्रह में नम पूर्वक प्रयन्त 'पल्लुपतने' धातु से फिर च' इस सूत्र से फिप् प्रत्यय, सर्वापहारी लोप, 'बहुलमन्यत्रापिशाहन्दसोः' इस वात्तिक से णिलोप, 'नमाप्नपात्' इत्यादि सूत्र से नन का प्रकृतिमाव (न लोपामाव ) होने पर 'नपात्' शब्द बना है । अपत्य का नाम है । क्योंकि, इस से पूर्वजों का स्वर्ग से पतन नहीं होता है। यहां पौत्र रूप अात्य का ग्रहण है। 'तन्वन्ति अस्यां आदि भोगाः इति तनूः गौः' इस विग्रह में 'तनु विस्तारे' धातु से 'कृषिचमितनि...' इत्यादि उणादि मूत्र से प्रत्यय होने पर तनू -- .
- 'तन्या निरुक्तऽप्टमाध्यायस्य पष्ठ खण्डौ । (१३०१) शब्द बना है। गाय का नाम है। क्योकि, गाय से दूध और दूध से धृत उत्पन्न होता है। 'तन्वा नपात् इति तनूनपाव ' इम विग्रह मे पष्ठी तत्पुरुष समास होने पर तनूनपात् शब्द बना है। गौ का तृतीय अपत्य आज्य का नाम है । अथवा 'तन्वन्ति अन्तरिक्षे विस्तारप्राप्नुवन्ति इति तन्व आप इस विग्रह में पूर्ववत् यथोक्त उणादि सून से ऊ प्रत्यय होने से तन शब्द बना है। जल का नाम है। नपात् इति तनूनपात्' इस विग्रह मे पष्ठी समास होने पर तनूनपात् शब्द बना है। जल का तृतीय अपत्य अग्नि है । अत अग्नि का नाम तनूनपाद है। क्योकि, जल से ओषधिवनस्पति और ओरधि वनस्पति रूप काष्ठ से अग्नि उत्पन्न होता है । अत जलका तीसरा अपत्य पौत्र अग्नि है। यही सिद्धान्त अर्थ है अर्थात् तनूनपात् का अर्थ अग्नि है । यास्क निर्वचन करते हुए प्रथम कात्थक्य का मत दिखाते हैं- तनूनपादाज्यमिति कात्थक्यः । तनूनपात् आज्यम् = नतूनपाद का अर्थ माज्य = धृत है, इति = यह, कात्थक्य = कत्थक का पुत्र, कात्यक्य नामक आचार्य कहते हैं ओर कहते है कि- पपादित्यननन्तराया:प्रजाया नामधेय निर्णततमा भवति । गौरत्र तनूरुच्यते । तता अस्यां भोगाः। तस्याः पयो जायते । पयसा आज्यं जायते । अपत्य प्रजा को कहते हैं। वह दो प्रकार के होते हैं। एक अनन्तरापत्य और दूसरा अनन-तरापत्य । अनन्तरापत्य पुत्र को कहते हैं और अनन-तरापत्य पौत्र को। नपा का अर्थ अननन्तरापत्य अर्थात् पौत्र है। इसी को कहते हैं-नपात् इति = नपाद यह, अननन्तराया प्रजाया - अननन्तर प्रजा अर्थात् पौत्र का, नामपेयम् = नाम है। क्योकि, वह, निणततगा - अतिशय नीचे नत = झुका हुआ, भवति = होता है। प्रथम पुत्र पिता से नत होता है और उससे भी अधिक नत पौत्र होता है । प्रथम पिता, द्वितीय पुत्र और तृतीय पौत्र नपाद् अर्थात् नाती कहा जाता है। यहा, तनू = गाय, उच्यते = कही जाती है । क्योकि, मस्याम् = इस मे, भोगा = दूध दही आदि भोग, तता = बहुत विस्तृत होते हैं। तस्या उस से, पय. = टुग्ध (दूध), जायते = उत्पन होता है और, पयस दुग्ध से, आज्यम् = आज्य अदि घृत, जायते = उत्पन्न होता है । इस प्रकार पिता के स्थान में गाय, पुत्र के स्थान मे दूध और पौत्र के स्थान मे आज्य समझना चाहिये । प्रयम गाय, द्वितीय दूध और तृतीय माज्य है। यह कात्यक्य ऋपि का मत है। सिद्धान्त कहते हैं- अपिरिति शाकपूणिः । अग्नि इति = तनूनपाद अग्नि है, इति - यह, शाकपूणि • शाकपूणि नामक आचार्य कहते हैं और यही सिद्धान्त है। इस में युक्ति देते हैं- आपोत्र तन्व उच्यन्ते, तता अन्तरिक्षे । भत्र - यहा, तम्व . तमू आप = जल, उच्यन्ते - कहे जाते हैं। क्योंकि, वे, अन्तरिक्ष भतरिक्ष मे, तता. - विस्तृत अर्याद फैले हुए होते हैं । तनू, गौ 1 - (१३०२) निरुक्तेऽष्टमाध्यायस्या षष्ठः खण्डः । ताम्य ओपधिवनस्पतय जायन्ते, ओषधिवनस्पतिभ्य एप जायते । ताभ्यः = उन जल से, ओपधिवनस्पतय. = ओपधि, वनस्पतिएँ, जाय ते = उत्पन्न होती है और, ओपधिवनस्पतिभ्यः = ओषधि वनस्पतियो से, एपः = यह अग्नि, जायते = उत्पन्न होता है । इस से यह सिद्ध हुआ कि, अग्नि जल का पौत्र स्थानिक है। पिता के स्थान में जल, पुत्र के स्थान में ओषधिवनस्पति और पौत्र के स्थान में अग्नि समझना चाहिये । प्रथम जल, द्वितीय ओपध्यादि और तृतीय अग्नि, तनूनपात नाती है। तस्यैपा भवति । तस्य = उस तनूनपात् अग्नि की, एपा = यह ऋचा प्राधान्य स्तुति, भवति = है-- तनपात्पथ ऋतस्य यानान्मध्वा समञ्जन्त्स्वदया सुजिह्व । मन्मानि धीभिरुत यज्ञमृन्धन् देवत्रा च कृणुह्यध्वरं नः ॥ म. सं. ८-६-८-२ ॥ इस मन्त्र का भार्गव जमदग्नि ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और आप्री देवता है । मन्त्रार्थ-तनूनपाद - हे तनूनपात् अग्ने ! और सुजिह्व = हे शोभनज्वाल अग्निदेव ! , ऋतस्य पानान् = यज्ञगमन के जो, हवि मादि मार्ग हैं उन्हे, मध्या = मधु से मिश्रित करके एवं, समझन् = सुन्दर प्रकाश करते हुए उसफा, स्वदय = स्वाद लो। मन्मानि = हमारे अभिप्रेत मननीय स्तोत्रों को, उत - और, यज्ञम् - यज्ञ को, धीभिः = 'बुद्धि से, अन्धन् = समृद्ध करते हुए, न: - हमारे, अध्वरम् देवत्रा = देवभोग्य, कृणुहि = कर दो। इस ऋचा मे तनूनपाद अग्नि है । जो जल का पौत्र समान है । 4 पथः- - यज्ञ को, इस का यास्क भाष्य- - यज्ञ-गमन के जो, - तन्नपात् पथ ऋतस्य यानान् यज्ञस्य यानान् मधुना समञ्जन् स्वदय कल्याणजित ! मननानि च नो धीभिर्यज्ञं च समर्धय देवान् नो यज्ञं गमय । संनूनपात् - हे तनूनपाद अग्निदेव !, ऋतस्य यानान् = यज्ञस्य यानान् पथः = हाव आदि मार्ग हैं उनको, मधुना समान् = मधु मिधित करते हुए, सुजिह्व = यल्याणजिह्व हे शोभनज्वाल अग्निदेव !, स्वदय - स्वाद लो । च = और, नः = हमारे, मन्मानि - मननानि = मननीय स्तोत्रों को, च = = यज्ञ को, घोभिः = बुद्धि से, समर्धय = समृद्ध करो, देवान् = देवों को, नः = - यज्ञ मे, गमय + गमन करामो । यज्ञ में लाओ। ४ - नराशंसा मिरास मतभेद से या का या अग्नि का नाम है। प्रथम [पक्ष में 'नराः ऋत्विजा यस्मिन् मझे मासोना उपषिष्टा. सन्ति स्तुवन्ति इति नराशंसः यशः' इस विग्रह में नर और मासीन शम्म और, यज्ञम् हमारे, यज्ञम् नियतऽस्टमाध्यायस्य सप्तमः खण्डः । . , ।' . . पूर्वक शंसु स्तुती' धातुं से 'हलच"इस सूत्र से अधिकरण में धन (अ), प्रत्यय, पृपोदरादित्वात् आसीन का लोपानर शंश, अन्येपामपि दृश्यते' इस सूत्र से र के अकार को दीर्घ होने पर नराशंस शब्द बना है। यज्ञ का नाम है । क्योकि, यज्ञ में बैठ कर ऋत्विक् लोग स्तुति करते है। द्वितीय पक्ष में नरः प्राविग्भिः शंस्यते प्रशस्य स्तूयते इति नराशंस: अग्नि' इस विग्रह में उक्त धातु से और उक्त सूत्र से ही कर्म में घन वेत्यय, और नर को दीर्घ होने पर नराशंस शब्द बना है। अग्नि का नाम है। क्योंकि, अग्नि ऋत्विजों से स्तुत होता है । यास्कमुनि इस का निर्वचन करते है नराशंसो यज्ञ इति कात्थक्यः । नरा ,अस्मिन्नासीनाः शंसन्ति । नराशंसः : नरशंश, यज्ञः २.यज्ञ है । अर्थात् नराशंस का अर्थ यज्ञ है, इति = यह, कात्याय. = कात्यक्य नामक नाचार्य कहते है। क्योंकि, नराः = ऋत्विक् लोग, अस्मिन् = जिस में, आसोना: वैठ कर स्तुति करते हैं । अतः यज्ञ का नाम नराशंस है यह कात्यक्य मुनि कहते हैं । अधिकरणे धम् । अग्निरिति शाकपूणिः । नरैः प्रशस्यो भवति । नराशंस, अग्निः = अग्नि 'है । अर्थात् नराशस का अर्थ अग्नि है, इति = यह, शाकपूणिः = शाकपूणि नामक आचार्य कहते है । क्योकि वह नरः = ऋत्विजो के द्वारा, प्रशस्यः = स्तुत्य, भवति - होता है। कर्मणि धम् । 'तस्यैषा भवति । इति निरुक्तेऽष्टाध्यायस्य षष्ठः खण्डः ॥ ८-६ ।। तस्य = पूर्वोक्त अग्नि अर्थक नराशंस शब्द का, एपा - यह अग्रिम ऋचा उदाहरण, भवति = है- अथ निक्क्ते:प्टमाध्यायस्य सप्तमः खण्डः । नराशंसस्य महिमानमेपामुप॑ स्तोपाम यजतस्य यज्ञैः । ये सुक्रतवः शुचयो धियंधा- स्वदन्ति देवा उभयांनि हव्या ॥ Prii HiE IT.स., ५-२-१-२ ।। इस मन्त्र का वसिष्ठ ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द.और अग्नि देवता है । मन्त्रार्थये जो, सुक्रतः सुकर्मा, शुचयः शुचि और, पिया! - कर्मों के धारक, देवाः = देवगण, अभयानि - दोनों सीमिक और हविःसस्थादि, हव्या - हव्य का, स्वदन्ति = भक्षण करते हैं। एपाम् - उन के बीच हम, यौः - स्तोत्र के द्वारा, यजतस्य = यजनीय और, मराशंसस्य - नराशस नामक अग्नि को, महिमानम्'- महिमा को, वपस्तोपाम = स्तुति करते हैं । इस ऋचा में मरादास का अर्थ भग्नि है। इस मन्त्र का पारक-भास्य- . vi । 1 2 - तन्त्र उक्त (१३०४) निरक्तअष्टमाध्यायस्याटमः खण्डः । नराशंसस्य महिमानमेपामुपस्तुमो यझियस्य यज्ञैर्येसुकर्माणः शुचयो धियं धारयितार: स्वदयन्तु देवा उभयानि हबीपि सोमं चेतराणि चेति वा, तान्त्राणि चावापिकानि चेति वा । यज्ञ: यज्ञियस्य स्तोत्र के द्वारा यजनीय, नराशंसस्य नराशंस नामक अग्नि की, एषाम् : उन के बीच, उपरतुमः = हम स्तुति करते है। ये = जो, सुकर्माणः = सुकर्मा, शुचयः = शुचि, घियम् धारयितार. = कर्मों के धारक, देवाः = देवगण हैं वे, उभयानि = दोनो, हवीषि सोमम् = हवि मोर सोम का, वा = अथवा, इतराणि = अन्य पुरोडाशादि का, च = और, तान्प्राणि प्रयाजाज्य आदि का, वा = अथवा, आवापिकानि = प्रधान हवि आदि का, स्वदयन्तु = भक्षण करें। ५ - ईळः। ईडयते रतूयते इति ईळ, अग्निः' इस विग्रह मे 'ईड स्तुती' धातु से ‘अकर्तरि च कारक संज्ञायाम् ' इस सूत्र से कर्म मे पत्र 1(अ) प्रत्यय, 'डलयोरभेदः' इस नियम के अनुसार ड को ळ होने पर ईळ शब्द बना है। अग्नि का नाम है। क्योकि, अग्नि ऋत्विजादि द्वारा स्तुत होता है। अथवा 'इध्यते दीप्यते इति ईळ. अग्निः' इस विग्रह मे 'जि इन्धी दीप्तौ' धातु से 'मकर्तरि च कारके सज्ञायाम्' इस सूत्र से कर्म मे घन प्रत्यय, इन्ध अ, पृपोदरादित्वाव न लोप, इकार को दीर्घ और धार को ळकार होने पर 'ई' शब्द बना है। अग्नि का नाम है। क्योंकि, अग्नि दीपता है। इसी को कहते हैं- ईळ ईट्टः स्तुतिकर्मण इन्धतेर्वा । रतुतिकर्मणः = स्तुत्यर्थक, ईट्टः + 'ईड स्तुती' धातु से, या = अथवा, इ.धते. = 'मि इन्धी दीप्तो' पातु से, ईळ. = ईळ शब्द बना है। तस्यैपा भवति । इति निरुक्तऽष्टमाभ्यायस्य सप्तमः खण्डः ॥ ८-७ ।। सस्य = उस अग्नि अर्थका ईळ' शब्द का, एपा यह ऋचा उदाहरण, भवति - है- मथ निरुतेऽष्टमाध्यायस्याष्टमः खण्ड IT आजुबान ईड्यो वन्द्यश्चा याह्यमे वसुभिः सजोषाः । वं देवानामसि यह होता स एनान्यक्षीपितो यजीयान् ॥ क. सं. ८-६-४-३ । . इस मन्त्र का भागय नमदग्नि ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और आप्री अग्नि घेवता है । ममा-- माने - हे अग्निदेव ! तुम, आनुह्वान: - देवो के बुलाने वाले, ईरपः प्रापंनीय, वन्य - वृन्दनीय त्वम् . निरुक्तेऽष्टमाध्यायस्याष्टमः खन्हा।। (१३०५) वसुभिः = वसुओं के साथ, सजोषाः = प्रसन्न होते हुए हमारे यज्ञ में, आ याहि = आओ । यह = हे महान पुरुष !, तुम, देवानाम् होता = देवो को बुलाने वाले, असि = हो । यजीयान् = अतिशय यज्ञ करने वाले हो । स = वह तुम, इपितः = हम से प्रापित इन सब देवो के लिये, यक्षि - या करो । इसामन्त्र मे 'ईडयः' यह 'ईड स्तुती' धातु का रूप है। अग्नि का विशेषण है और 'ई' भी 'ईड स्तुती धातु से बना है और अग्नि का नाम है । अतः यह मन्त्र ईळ का उदाहरण है। इस का भाष्यrri, आहूयमान ईळितव्यो वन्दितव्यश्चायाह्यग्ने बसुभिः सह . जोपणस्त्वं देवानामसि यह होता । यह इति महतो नामधेयम् । यातश्च हुतश्च भवति । स एनान् यक्षीपितो यजीयान् । । इपितः प्रेपित इति वा, अधीष्ट इति वा, यजीयान् यष्ट्रतरा । हा- अम्ने = हे अग्निदेव ! तुम, आजुह्वानः आह्रयमानः = बुलाया जाता , हुआ, ईडध ईळितव्य.''प्रार्थना करने योग्य, च = और, वाद्यः = पन्दितव्यः - वन्दना स्तुति करने योग्य हो । वसुभिः सह, वसु नामक देवताओं के साथ, सजोपाः = जोपणः = प्रसन्न होते हुए हमारे यज्ञ मे, आयाहि = आओ। यह = हे महान् पुरुष !, त्वम् = तुम, देवानाम् होता = देवो के बुलाने वाले हो । यह्व इति = यह यह, महत. • बड़े का, नामयम् - नाम है । क्योकि, वह, यातच - सर्व स्थानो में गया हुआ और, हुतश्च = बुलाया हुआ, भवति होता है। स. = वह तुम, इपित. से प्रार्थित, यजीमान् = अतिशय यज्ञ करने वाले हो । अतः, एनान् = इन देवताओ के लिये, यक्षि - यज्ञ करो । इपितः प्रेपितः = प्रेरणा किया हुआ, इति वा = अथवा, अघीष्ट इति वा- सरकार पूर्वक प्रेरित, यजीयान् = यष्ट्रवर. ० बहुत यज्ञ करने वाला होता है । बहिः। 'बृह्यते छिद्यते इति बहिः कुशः' इस विग्रह मे घातूनामनेकार्थत्वात् छदनाक 'बृहि वृद्धौ' 'धातु से' :हेर्नलोपश्च' इस उणादि सूत्र से कर्म में इसि ( इस् ): प्रत्यय । और नलोप, वृह इस, लघुघ रपर गुण होने पर 'बहिस्' शब्द बना है। यज्ञाङ्गानुश का नाम है । योकि, कुश काटा जाता है । यह यज्ञ पक्ष का निर्वचन है। अग्नि पक्ष मे 'वृहति वर्धते इति यहि. अग्नि' इस विग्रह मे वृहि वृद्धी' पातु से 'वृहेर्नेलोपश्च' इस उणादि सूत्र से कर्ता मे इसि प्रत्यय, ने लोप और रपर लघुपप गुण होने पर वहिस् शब्द बना है। अग्नि का नाम है। क्योंकि, अग्नि पदार्थों को बढाता है। अथवा 'बृह्यते इति बहिः अग्निः' इस विग्रह में 'वृहि वृद्धो' धातु से पूर्ववत फर्म मे इसि प्रत्यप, नलोप और गुण होने पर वहिस् शब्द बना है। अग्नि का नाम है। क्योंकि अग्नि स्वय प्रज्वलित हो कर बढता है, फैलता है। इसी को भाष्यकार कहते हैं- चर्हिः परिवहणात् । परिवहंणात = बढने से, वहिः = बहि कहा जाता है। बुरा और अग्नि दोनो बढते है । अत दोनो बहिस कहे जाने हैं। - . - ! T 11 २ { स स 4-1-6-1॥ . और अदिति के लिये, स्योनम् = मुखवारी (१३०६) निरक्तऽष्टमाध्यायस्य नवमः खण्डः । तस्यैषा भवति । इति निरुक्तेऽष्टमाघ्यायस्याप्टम. खण्ड । ८-८ ॥ तस्य = उस बहिस् शब्द की, एषा - यह अग्रिमकाचा उदाहरण, भवति हैं- अथ निरुक्तऽष्टमाध्यायस्य नवम खण्ड । प्राचीनं बर्हिः प्रदिशा पृथिव्या वस्तोरस्या वृज्यते अग्रे अहाम् । व्यु प्रथते वितरं वरीयो देवेभ्यो अदितये' स्यानम् ॥.. इस पत्र का भार्गव जमदग्नि ऋपि त्रिष्टुप् छन्द और अग्नि देवता है । मन्त्रार्थ-बहि पज्ञाग्नि, प्राचीनम् = गृह की पूर्व दिशा मे, प्रदिशा = वेद विधि के अनुसार, अस्या पृथिव्या यस्तो - इस पृथिवी के निवास के लिये, अह्नाम् अग्ने - पूर्वाह्न मे, वृज्यते - स्थापित किया जाता है । वरीय पितरम् विप्रथते यह यज्ञाग्नि और अधिक विस्तृत हो कर सर्वत्र' प्रख्यात होता है। देवेभ्य अदितये स्योनम् = तब वह देवो के लिये और अदिति के लिये सुखकर होता है। इस मन्त्र मे यहिंस शब्द अग्नि वाचक है। यह मन्त्र अग्नि देवताव है। अत अग्नि परक अर्थ करना ही समुचित है। निरुक्त मत मे तीन ही देवता हैं । अग्नि इन्द्र और आदित्य । उन मे अग्नि का प्रकरण चल रहा है। इस से अग्नि परक हो अर्थ करना ठोक है। इस अध्याय मे तेरह पद हैं। सब अग्नि वाचक हैं । इस से भी इस मन्त्र का अग्नि परक अर्थ धरना उचित है । व्याख्यापारी ने जो कुशपरक व्याख्या की है सो विचारणीय है। इस मन्त्र का निरुक्तभाष्य- प्राचीन यहि प्रदिशा पृथिव्याः वसनायास्याः प्रयुज्यते । अंग्रे अहां पर्हिः पूर्वाह त विप्रथते । वितरं विकीर्णतरमिति वा विस्तीर्णतरमिति । वरीयो-वरतरम्-उरुतर था । देवेभ्यश्चादितये च स्योनम् ।। प्राचीनम् = गृह की पूर्व दिशा मे, यहि = यज्ञाग्नि, प्रदिशा : वेदविधि के अनुसार, 'मस्या पृथिव्या वसनाय - इस पृथिवी के निवास के लिये, भल्लामा अग्रे = पूर्वाह्न में, प्रवृज्यो'- स्थापित दिया जाता है अर्थात्, सद् बहि = वह यज्ञाग्नि, पूर्वाह्न - दिन के पूर्व माग में, विप्रपते और अधिक विस्तृत हो कर सर्वत्र प्ररयात होता है । वितरम् - विवोर्णतरम् - बिखरा हुआ, इति - यह अथवा, विस्तीर्णतरम् = फैला हुया, इति = यह अर्थ है। वरीय. वरतरम् ज्योतियो से अति श्रेष्ठ अग्नि, वा = अथवा, उत्तरम् = महत्तर : सब से बडा अग्नि । देवेम्यान अदितपे च - यगमान या इतर देवो वे रिये, च = होता है। IT -- - -अन्य घातु से निरुक्तऽष्टमाध्यायस्य नवमा सण्ड । (१३०७) स्योनमिति सुखनाम । सतेरवसन्त्येतत् । सेवितव्यं भवतीति वा । स्योनम् इति = स्योन यह, सुखनाम् = सुख का नाम है। स्पतेः = 'पोऽन्तकमणि' स्योन शब्द बना है। एतत् = इस सुख को पापी लोग पापकर्म के द्वारा, अवस्यन्ति - नाश करते हैं, वा = अथवा, सेवितव्यम् = स्योन - सुख सेवन करने योग्य, भवति = होता है, इति = इत्यर्थः। अर्थात् 'स्यन्ति अवस्यन्ति नाशयन्ति दुष्कमिणः इति स्योनम्' इस विग्रह मे 'पोडन्तकर्मणि' धातु से 'सिवेप्टेयुट च' इस उणादि सूत्र से वाहुलकात् केवल न प्रत्यय, सा न, टि को यु आदेश, स्यु न, गुण होने पर 'स्योन' शब्द बना है। सुख का नाम है। क्योकि, पापी लोग पाप कर्मों के द्वारा सुख को नाश कर देते हैं । अथवा 'सिव्यते इति स्योन: सुखम्' इस विग्रह मे घातूनामनेकार्थत्वात सेवन अर्थ मे 'पिवु तन्तुसन्ताने' धातु से, सिवैप्टेयूँद च' इस उणादि सूत्र से, कर्म मै बाहुलकाद केवल न प्रत्यय, सिद् न, जल, सि ऊ न, अन्तरङ्गस्वाद यण, स्यू न, गुण होने पर 'स्योन' शब्द बना है । सुख का नाम है। क्योंकि, सुख सव के द्वारा सेवन करने योग्य है। 'द्वार' शब्द रेफान्त है। 'द्वारा' यह जस का रूप है। कात्यक्यमुनि के मत मे द्वार का अर्थ यज्ञ तथा यज्ञगृह का द्वार है। सिद्धान्त मत मे द्वार का अर्थ यज्ञाग्नि है । यास्क इसका निर्वचन करते हैं- . द्वारो- जयतेर्वा द्रवतेर्वा वारयतेर्वा । जवते. जु धातु से. द्रवतेः - दु धातु से, वा = अथवा, वारयते - ण्यन्त व धातु से, द्वारः = द्वार शब्द बना है। अर्थात् 'जवन्ति गच्छन्ति इति द्वार.' इस विग्रह में गरयर्यक सोत्र 'जु' धातु से मारक (आर् ) प्रत्यय, अकार को दकार, दु आर्, यण होने पर 'द्वार' वर्ना है। अग्नि का नाम है। क्योंकि, अग्नि गाहंपत्य कुण्ड से दक्षिण कूण्ड में और दक्षिण कुण्ड से आहेवनीय कुण्ड मे गमन करता है । अत एव गार्हपत्याग्नि दक्षिणाग्नि और आहवनीयाग्नि आदि के भेद से बहुत हैं। इसी लिये द्वार का 'द्वारः' यह बहुवचनान्त रूप है। अथवा 'द्रवन्ति गच्छन्ति इति द्वारः' इस विग्रह मे 'द्रुगतो' धातु से पूर्ववत् आरक् ( आर् ) प्रत्यय, र लोप और यण होने पर द्वार शब्द बना है। अग्नि का नाम है। अग्नि बहुत जगे गमन करने से बहुत है । अत. द्वारः यह बहुवचनान्त है। अथवा, वारयन्ति इति द्वार. इस विग्रह मे णिजन्त । दरणे' 'अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते' इस सूत्र से विध् (0) प्रत्यय, णिलोप, वार्, दुट् (द) आगम होने पर द्वार शब्द बना है। अग्नि का नाम है। क्योंकि, अग्नि को ज्वाला में सबको धारण करती हैं। तासामेपा भवति । इति निरुक्तेऽप्टमाध्यायस्य नघम. खण्डः ॥ ८-९ ।। तासाम् = उन द्वार की एपा = यह अग्रिम ऋचा उदाहरण, भवति = है- १६४ 'वृन धातु से JA (१३०८) निरुक्तऽष्टमाध्यायस्य दशमः खण्डः । अथ निरुक्तऽष्टमाध्यायस्य दशमः खण्डः ॥ व्यर्चस्वतीरुर्विया वि श्रेयन्तां पतिभ्यो न जनयः शुभमानाः । देवीरो बृहतीविश्वमिन्वा देवेभ्यो भवत सुप्रायणाः ॥ r म. सं. ८-६-६-५॥ - द्वारः 'द्वार इस मन्त्र का भार्गव जमदग्नि ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और आपी अग्नि देवता है। मन्त्रापं- जैसे, शुम्भमानाः = शोभायमान, जनयः : जाया = स्त्रियाँ, उविया = उरु रूप से, पतिभ्यः । अपने पति के लिये, विश्रयन्ति = अपने शरीर को प्रगट करती हैं, खोल देती है। वैसे ही, व्यवस्वती - अग्नि देवता रूप द्वाराभिमानिनी देवियों, विधयन्ताम् अपने शरीर को प्रगट करें अर्थात् विस्तृत रूप से खुल जाय। वृहतीः = हे वृहती!, विश्वमिन्याः - है विश्व को प्रसन्न करने वाली !, देवीः = हे अग्निदेवता रूप द्वाराभिमानिनी देवियो! आप लोग, देवेम्पः = देवों के लिये, सुप्रायणाः- खुलकर सुविस्तृत, भवत = हो जाओ। इस मन्त्र में । शन्द का यज्ञगृह-द्वाराभिमानिनी अग्नि देवता अर्थ है। इस मन्त्र का कारथक्यमत से निरुक्त भाष्य- व्यश्चनवत्य उरुत्वेन विश्रयन्तां पतिभ्य इव जाया ऊरू मैथुने धर्मे शुशोभिषमाणा बरतममङ्गमूरुदेव्यो द्वारो बृहत्यो विश्वमिन्वाः विश्वमाभिरेति । यज्ञे-गृहद्वार इति कात्थक्यः। व्यचस्वतीः = व्यवनवत्यः - अनेक प्रकार आने जाने से युक्त, यज्ञगृहद्वार, उविया = उरुत्वेन - महत्वेन = विस्तार से, विधयन्ताम् = खुल जावें । जनयः न = जायाः इव = स्त्रियो के जैसे अर्थात जैसे स्त्रियां, पसिम्पः = पतियों के लिये, शुम्भमानाः शुशोभिषमाणाः - शोभायमान होती हुई, मथुने धर्मे = मैथुन कर्म के समय, बरतम् अङ्गम् ऊरू - श्रेष्ठ अङ्ग जाधो को, विश्रयन्ति = फैला देती हैं । द्वारा देव्यः = है द्वावियो ! तुम, देवताओं के लिये, बहतीः = वृहत्यः = वढी वडी, विश्वमिन्वाः विश्वम्अभि एति = सब ससार के आने जाने मोग्य हो जाओ। यज्ञ = गृहद्वारे = द्वार यज्ञ गृहके दरवाजे हैं। इति 3 यह, कास्थरयः = कात्यक्यमुनि कहते हैं। अग्निरिति शाकपूणिः । द्वार द्वार का अर्थ, अग्निः अग्नि देवता है, इति साचार्य मानते हैं। अग्नि पक्ष मे मन्त्रार्य किया गया है। = यह, पाव पूणिः = शाकणि नामक ८ उपासानता। उपासानक्ता-उपा और रात्रि । अर्थात् उपासानता का अपं उप काल और रति है। यास्क निवेचन करते हैं- उपासानता = , . . -- निकतटमाध्यायस्यैकादशः खण्डः । (१३०९) उपासानक्ता-उपाश्च नक्ता च । उपा व्याख्याता। नक्तति रात्रिनाम | अनक्ति भूतान्यवश्यायेन । अपि वा-अनक्ताऽव्यक्तवर्णा । 'उपासानक्ता' यह एक पद है। इस का विग्रह करते है--उपाश्च नक्ता च - उपाश्च नक्ताचेति उपासानता = उपा और नक्ता । द्वन्द्व समास । उपा व्याख्याता = उपा की व्याख्या हो चुकी है (नि. २-१८) उपा कस्मात् ? उच्छतीतिसत्याः । अर्थात् 'उच्छतीति उपाः इस विग्रह में 'उच्छी विवासे' धातु से 'सर्वधातुभ्योऽसुत्' इस उणादि सूत्र से असुन (अस्) प्रत्यय और पृपोदरादित्वात् छकार को पकार होने पर 'उषस्' शब्द बना है । अथवा, 'वष्टि इति उपाः इस विग्रह में 'वश कान्तौ' धातु से असुन्, बाहुलकात् कित्, 'अहिज्या' इत्यादि सूत्र से संप्रसारण, पूर्वरूप, उश् अस्, शकार को पृषोदरादित्वात् पकार होने पर उपस् शब्द बना है । 'अनक्ति इति नक्ता' इस विग्रह में 'अजू व्यक्तिम्रक्षणकान्तिगतिथु' धातु से औणादिक सूत्र से कर्ता में तन् प्रत्यय, 'अनिदितां हल' इत्यादि सूत्र से उपधा नलोप, 'चोः कुः' इस सूत्र से कुत्व और टाप, एवं पृषोदरादित्वात् धातु को नुट् मागम, न अक्ता, नक्ता शब्द बना है । नक्ता इति रात्रिनाम नक्ता यह रात्रि का नाम है । उपस् और नक्ता का द्वन्द्व समास, 'उपासोपसः' इस सूत्र से उपस् शब्द को उपासा आदेश होने पर उपासानक्ता शब्द बना है। उपा और रात्रि अर्थ है। उपासानक्ता 3 अन्धकार को दूर करनेवाली । अवश्यायेन - तुपार (हिम) अर्थात् ओस से, भूतानि = सर्व प्राणियों को, अनक्ति - गीले कर देती है । अतः रात्रि नक्ता कही जाती है । अपि वा = अथवा, अनक्ता अध्यक्तवर्णा रात्रि अव्यक्तवर्ण (रंग) वाली होती है। अन्धकार के कारण उस में कोई वर्ण (रूप) प्रतीत नहीं होता है । इस पक्ष में 'उपासानक्ता' शब्द मे 'नक्का' नही किन्तु अनक्ता शब्द है 'न मक्ता न व्यक्ता इति अनक्ता'' इस विग्रह में नञ और अक्ता का नत्र समास, 'नलोपोनकाः' इस सूत्र से नञ् के नकार का लोप, अ अक्ता, 'तस्मान्नुडचि' इस सत्र से नुद् आगम होने पर अनक्ता शब्द बना है । रात्रि का नाम है। क्योकि दिन में जैसे सब . पदार्थ अभिव्यक्त रूप से प्रतीत होते हैं वैसे रात्रि में नही । उपस् और अनक्ता का द्वन्द्व समास भोर उपस् को उपासा आदेश एवं सवर्ण दीर्घ होने पर 'उपासानक्ता' शब्द बना है । तपोरेपा, भवति । इति निहतेऽष्टमाध्यायस्य दशमः खण्डः । ८-१० ॥ योः = उपासानक्ता शम्दो की, एपा - यह अग्रिम प्रचा, भवति - उदाहरण है-. अथ निरुक्तऽष्टमाध्यायस्यैकादशः खण्डः। .' आ सुष्वयन्ती यजते उपाके, उपासानका सदतां नि योनौ । दिव्ये योषणे बृहती सुरुक्में अधि श्रियं' शुक्रपिशं दर्धाने । श्र. सं. ८-६-१-६ - अनक्ता - - .
- यज्ञ . (१३१०) निहत्ते ऽपटमाध्यायस्यकादशः खण्डः । इस मन्त्र का भार्गव जमदग्नि देवता, त्रिष्टुप् छन्द और आप्री अग्नि देवता है। मन्त्रार्थ- सुप्वयन्ती = परस्पर दोनों मुसकाती हुई (विहसती हुई या प्राणियों को सुलाती हुई, यजते कराने वाली, उपाके = परस्पर प्रशंसा करने योग्य या एक पर एक चढ़ी हुई, दिव्ये = धुलोक उत्पन्न या प्रकाशित होने वाली, योपणे - खोरूमिणो या परस्पर मिली हुई, बृहती = बहुत बड़ी, सुरुक्मे = सुन्दर प्रकाश वाली, शुक्रपिशम् = शुक्ल कान्ति (गौरवां), श्रियम् = शोभाको, अधिदधाने- अपने ऊपर धारण करती हुई, उपासानक्ता = उपा और रात्रि अभिमानिनी देवियां, योनी यज्ञस्थान में, नि आसदताम् = बैठे। इस चा में 'उपासानक्ता' शब्द आया है । अतः उसका यह उदाहरण है। अग्नि पक्ष में उपादीप्ति अर्थ कर लेना चाहिये । इसका यास्क भाप्य- सेष्मीयमाणे इति वा सुष्वापयन्त्याविति वा । आसीदतामिति वा न्यासीदतामिति वा । यज्ञिये, उपक्रान्ते, दिव्ये, योपणे, वृहत्यौ-महत्यौ, सुरुक्मे-सुरोचने । अधि-दधाने, शुक्रपेशसं श्रियम् ।। सुप्वयन्ती - सेप्मीयमाणे = परस्पर दोनों हास्य करती हुई, इति वा = यह अर्थ है, अथवा, सुष्वपयन्त्यो = लोगों को शयन कराती हुई, इति वा = यह अयं है। निसदताम् = भासीदताम् । न्यासीदताम् = वैठे, इति वा = यह अर्थ है। यजते = यज्ञिये - यज्ञ कराने वाली। उपाके - उपफ्रान्ते - परस्पर प्रशसा करने योग्य या एक पर चढी हुई। दिव्ये = द्युलोक उत्पन्न या चमकने वाली । योपणे = श्री रूपिणी या परस्पर मिली हुई। वृहती = वृहत्यो = गहत्यो बहुत बड़ी। सुरुक्मे सुरोचने = शोभन प्रकाश वाली । अधि-दधाने अपने ऊपर धारण करती हुई । शुभपिशम् = शुत्रपेशसम् = शुक्लकान्ति = गौरवर्णा । श्रियम् = शोभा को । मन्त्रस्थः शुक्र शब्द का निर्वचन करते हैं- शुक्र शोचतेज़लतिकर्मणः । ज्यलतिकर्मणः - प्रकाशार्थक, शोचते. = 'शुच दीप्तौ' (निघं १-६७-६) घातु से, गुरम् । शुक्र शब्द बना है। अर्थात् 'शोचति प्रकाशयति इति शुत्रम्' इस विग्रह मे 'शुभ दीप्तो' इस नघण्टुक पातु से 'ऋग्ने-द्राग्रह' इत्यादि उणादि मूत्र के निपातन से, रन् (र) प्रत्यय, चकार को ककार, और गुणाभाव होने पर शुक्र शब्द बना है। पेश-मका निर्वचन- -- पेश इति रूपनाम । पिरातेर्विपिशितं भवति । पेशः इति - पेशस् यह, रूपनाम = रूप का नाम है। क्योंकि, यह, पिंशतः = 'पिश अवयवे' धातु से 'पेश' शब्द बना है। यह, विपिशतम् - विपिशित, भवति - होता है। अर्थात् जिस द्रव्य मे रूप रहता है उसे व्याप्त कर भासता है। पिशति इति पेशः' इस विग्रह में पिश अवयये' पातु से 'सर्थधातुभ्योऽमुन्' इस उणादि सूत्र से असुन् (अस्) प्रत्यय, लघूपध गुण होने पर पेठसू पद बना है।
. . निरुक्तेऽष्टमाध्यायस्य द्वादशः खण्डः । (१३११) ९ - दैव्याहोतारा । देव्यो का दैव्या वना है। अग्नि और मध्यम ज्योति अर्थ हैं । एव होतारो का होतारा वना है। होम निष्पादक अर्थ है। अर्थात् "दिव्यति इति देवः' इस विग्रह मे क्रीडाद्यर्थक दिव धातु से पचाद्यच् और लघूपध गुण होने से 'देव' शब्द बना है। 'देवेषु भवो देव्यो, देवी एव दैव्यो वा' इस विग्रह मे देव शब्द से 'देवाद्यज्ञानी' इस वात्तिक से या (य) प्रत्यय तद्धित, यादि अच् वृद्धि और ' यस्येतिच' इस सून से अलोप होने पर देव्य शब्द बना है। 'दैव्य औ' इस अवस्था मे 'सुपा सुलुक' इत्यादि सूत्र से प्रथमा द्विवचन मो के स्थान मे आ आदेश और दीर्घ होने पर देव्या. पद बना हैं । अग्नि और मध्यम ज्योति अर्थ हैं। क्योकि, ये दोनो देव हैं। 'जुहुतः इति होतारौ' इस विग्रह में 'हुदानादनयोः' धातु से 'ण्वुलतृचौ' इस सूत्र से तृच् (४) प्रत्यय और गुण होने पर होतृ शब्द बना है। होत ओ, 'उरण रपरः' इस सूत्र के सहकार से, 'ऋतोडिमर्वनामस्थानयो.' इस सूत्र से रपर गुण, होतर औ, 'अप्तन् तृव्' इत्यादि सूत्र से उपधा दोघ, होतार् औ, 'सुरा सुलक्' इत्यादि सूत्र से प्रयमा द्विवचन औ के स्थान में आ आदेश होने पर होतारा' पद वना है । होम निष्पादक अर्थ है । 'देव्या' और 'होतारा' दोनो सयुक्त होने पर 'दैव्याहोतारा' बना है। यास्क इसका निर्वचन करते हैं- दैव्याहोतारा । दैव्यो होतारौ । अयं चाग्नि रसौ च मध्यमः । देव्याहोतारा = देव्यौ होता = दो देव और दो होता । अयम् च अग्निः = यह पृथिवी का पार्थिव अग्नि और, असौ च मध्यमः = वह मध्यम लोक अन्तरिक्ष का विद्युत् रूप अग्नि । तयोरेपा भवति । इति निरुक्तेऽप्टमाध्यायस्प एकादश: खण्ड. 1 ८-११ ।। तयोः उनकी अर्थात् दैव्या और होतारा को, एपा - यह अग्रिम ऋचा, भवति उदाहरण है- अथ निरुक्तऽष्टमाध्यायस्य द्वादश. खण्डः ॥ देव्या होतारा प्रथमा सुवाचा मिमांना यज्ञं मनुषो यजध्यै । प्रचोदयन्ता विदथेषु कारू प्राचीन ज्योतिः प्रदिशा दिशन्ता । फ्र सं. ८-६-९-७॥ । इस: मन्त्र का भार्गव जमदग्नि ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और आप्री अग्नि देवता है । मन्नार्थ- दयाहोतारा - देवो मे होने वाले होता या स्वय देव स्वरूप होता अग्नि और यिद्युत् (वायु), प्रथमाः = मनुष्य होता को अपेक्षा प्रथमा हैं । सुवाचा- ये दोनो सुन्दर वाणी बोलने वाले हैं। मनुषः = यजमान रूप मनुष्य के, यजध्ये = यज्ञ के लिये, यशम् मिमाना - यज्ञ का निर्माण करने C . 11 -- । M (१३१२) निरुक्तऽप्टमाध्यायस्य द्वादशः खण्डः । वाले हैं । विदथेषु कारू प्रचोदयन्ता = यज्ञो में प्रेरणा करने वाले है। प्राचीनम् ज्योतिः = पूर्व दिशा मे होनेवाली आहवनीय अग्नि रूप ज्योति को, प्रदिशा = वेद मे बताई हुई दिशा के अनुसार, दिशन्ता = ' यज्ञ करना चाहिये' इस प्रकार की आज्ञा करने वाले हैं । इस मन्त्र मे पार्थिव अग्नि और मध्यम ज्योति अग्नि वाचक दैव्याहोतारा शब्द है । अतः इस का यह मन्त्र निगम उदाहरण समझना चाहिये। इस मन्त्र का यास्कभाष्य- D - दैव्यौ होतारौ प्रथमौ सुवाचौ निर्मिमानौ यज्ञं मनुष्यस्य मनुष्यस्य यजनाय प्रचोदयमानौ, यज्ञेषु कर्तारौ । पूर्वस्यां दिशि यष्टव्यमिति प्रदिशन्तौ । दैव्याहोतारा - दैव्यो होतारी देवताओ मे होने वाले होता अथवा देवता रूप होता अग्नि और विद्युत्, प्रथमा = प्रथमो = मनुष्य होता की अपेक्षा प्रथम हैं । सुवाचा ये दोनों सुवाची सुन्दर वाणी वाले हैं । यज्ञम् = यज्ञ का, मिमाना = निर्मिमानौ = निर्माण करने वाले हैं । मनुष. मनुष्यस्य मनुष्यस्य प्रत्येक मनुष्य को, यजध्य = यजनाय = यज्ञ के लिये, प्रचोदयन्ता - प्रचोदयमानो = प्रेरणा करने वाले हैं । विदथेषु = यज्ञेषु = यज्ञो मे, कारू - वर्तारी हैं । प्राचीनम् पूर्वस्यां दिशि पूर्व दिशा में होने वाले, ज्योतिः = आहवनीय अग्नि रूप ज्योति को, यप्टव्यम् इति 'यज्ञ करना चाहिये' इस प्रकार, दिशन्ता = प्रदिशन्तो - आज्ञा करने वाले हैं। %3D करने वाले - तिस्रो देवीः । 'तिस्रो देवी यह प्रथमा के अर्थ मे द्वितीया है। तिस्रः देव्यः = तीन देवियां हैं-भारती इला और सरस्वती । इसी को कहते हैं- तिम्रो देवी = तिस्र देव्यः = तीन देवियां है । इला देवी-पृथिवी रथान अग्नि । सरस्वती देवी, मध्यम स्थान विद्युत ज्योति । भारती देवी - दुस्थान आदित्य ज्योति । इस प्रकार इला सरस्वती और भारती ये तीनो अग्नि का ही नाम हैं। ' इसति इति इळा'. इस विग्रह मे 'इल स्वप्नप्रेक्षणयोः' धातु से ' इगु पधशा...' इस मूत्र से फर्ता मे क प्रत्यय (अ), 'अजायतप्टाप्' इस सूत्र से टाप् (मा) प्रत्यय और दीर्घ होने पर 'इळा' पाद बना है। ईला देवी पायव अग्नि है। 'सरण सरः' इस विग्रह मे 'सृ गतौ' धातु से 'सर्वधातुम्योऽसुन्' इस उपादि मूत्र से मसुन् (अस्) प्रत्यय, और गुण होने पर 'सरस्' शब्द बना है। 'सरासि सन्ति मस्याम् इति सरस्वती' इस विग्रह मे सरस् पद से 'तदस्यास्यस्मिन्नति मतुप्' इस मूत्र से मतुप् प्रत्यय (मत) सरस्मत, 'मादुपधायाश्चमतोर्वोऽयवादिन्यः' इस सूत्र से मतुप के यकार को यथार, सरस्पद 'उगितच ' इस सूत्र से डोप (ई) प्रत्यय होने पर सरस्वती चन्द बना है। सरस्वती देवी मध्यम ज्योति विद्युत् का नाम है। - - निस्क्तेऽष्टमाध्यायस्य त्रयोदशा खण्डः । - -- - । -- । विति धारणं पोपणं च करोति इति भरतः आदित्यः' इस विग्रह में 'डुम् धारण पोषणयोः' धातु से 'भृमृशि....' इत्यादि उगादि सूत्र से कर्ता में अतच् (मत) प्रत्यय और रपर गुण होने पर भरत शब्द बना है। आदिश्य का नाम है। क्योंकि, आदित्य सब का भरणपोषण करता है। भरतस्य इयं भारती इस विग्रह में भरत शब्द से 'उत्सादिभ्योऽन' इस सूत्र से इदम् अर्थ में अञ् (२) प्रत्यय तद्धितेष्वचामादेः' इस सूत्र से आदि अच् वृद्धिं, भारत," टिड्ढाणा' इत्यादि सूत्र से डीप (ई) प्रत्यय, 'यस्येतिच' इस सूत्र से अलोप होने पर भारती शब्द बना है। भारती देवी आदित्य ज्योति का नाम हैं। तासामेषा भवति । इति निरुक्तेऽप्टमाध्यायस्य द्वादशः खण्डः ।। ८-१२ ।' तासाम् = उन तीनों देवियों का, एपा = यह अग्रिम ऋचा, भवति - उदाहरण है- अथ निस्तेऽष्टमाध्यायस्य त्रयोदशः खण्डः ॥ आ नो यज्ञ भारती तुयमेखिळा मनुष्वदिह चेतयन्ती । तिस्रों देवीर्वहिरेदं स्योनं सरस्वती स्वयंसः सदन्तु ॥ मा. सं. ८-६-९-८॥ इस मन्त्र का भार्गव जमदग्नि ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और आप्री अग्नि देवता है। मन्त्रार्थ- = आदित्यज्योति अर्थात् धुलोक की देवी, नः = - यज्ञ में, तूयम् = शीघ्र, आ एतु = मावे। इळा - पृथिवीलोक की इला देवी, मनुष्यत् मनुष्य के समान अर्थात् मनुष्य जैसे निमन्तृत हो कर भोजन करने आता है वैसे ही, चेतयन्ती चेतती हुई, इह = हमारे इस यज्ञ मे, आ एतु - आवे। सरस्वती - मध्यम लोककी सरस्वती देवी, आ एतु = आवे । स्वपसः कर्म वाली, तिस्रः देवी. = तीनों देवियें, स्योनम् सुखपूर्वक, । इदम् पहिः = इस कुशासन पर भासदन्तु : वैठे। इस ऋचा में क्रमशः तीनों देवियो के वाचक तीनों भारती इला और सरस्वती शब्द हैं । अतः यह ऋचा तीनों के उदाहरण है । यास्क भाष्य- एतु नो यज्ञं भारती क्षिप्रम् , भरत आदित्यस्तस्य भा। इळा च मनुष्यवदिह चेतयमाना । तिस्रो देव्यो पहिरिदं सुखं सरस्वती च सुकमणि आसीदन्तु ॥ भारती - भारती देवी, नः = हमारे, यज्ञम् = यज्ञ में, क्षिप्रम् = शोध, एतु = आवे । भरतः - भरत, मादित्यः = 'आदित्य है अर्थात् भरत का अर्थ सूर्य है । तस्य भाः = उसका जो प्रकाश वह भारती कहलाता है । च = और, इळा - पार्थिव अग्नि ज्योति, मनुष्यवद समान, चेतयमाना = चेतती हुई, इह = यहां हमारे यज्ञ में, आवे ! च = एवं, सरस्वती ज्योति सरस्वती देवी हमारे यज्ञ में आवे । सुकर्माणः = उत्तम कर्म वाली, तिन देव्यः = ययोक्त तीनों देविया, सुखम् - सुस पूर्वक, इदम् बहिः = इस कुशासन पर, आसीदन्तु = वैठें। יזן - T भारती हमारे, यज्ञम् = उत्तम निमन्तृत मनुष्य के 3 मध्यम " (१३१४) निरुक्तऽष्टमाध्यायस्य चतुर्दश. खण्डा । ११ - त्वष्टा । विष्टा = शीन व्याप्त होने वाला वायु अथवा अग्नि । यास्क स्वय इसका निर्वचन करते हैं- स्वष्टा तूर्णमश्नुत इति नैरुताः । विपेर्वा स्याद् दीप्तिकर्मणस्त्वक्षतेर्वा सात्करोति कर्मणः । वायु अथवा अग्नि त्वष्टा तूर्णम् - शीघ्र, अश्नुते = व्याप्त करता है इस लिये, त्वष्टा = कहा जाता है, इति = यह, नरुक्ता = निरुक्त शास्त्र के आचार्य लोग मानते है । अर्थात् 'पूर्णम् मनुते व्याप्नोति इति त्वष्टा वायुरग्निर्वा' इस विग्रह मे क्षिप्र वाची तूर्ण शब्द उपपद 'अशू व्याप्ती सघासेच' धातु से 'पृपोदरादीनि यथोपदिष्टम् ' इस सूत्र के निपातन से तृन् (तृ) प्रत्यय, 'ण' या लोप, तू अश् । यण स्वश् सृ परय प्टुत्व होने पर त्वष्ट शब्द बना है। 'त्वष्टा' प्रथमा एकवचन का रूप है । मतभेद से वायु तथा अग्नि का नाम है । क्योकि, ये दोनो व्यापनशील हैं । वा. प्रथया। दीप्तिकर्मण - दीप्ति अर्षक, स्विप = स्विम् धातु से, त्वष्टा स्यात् = त्वष्टा रूप बना हो । अर्थात् ' स्वैपति दीप्यते इति त्वदा वायुरग्निा' इस विग्रह में विष दीप्तौ' धातु से तृ इस सूत्र से तृन् (४) प्रत्यय, विप् त, पृषोदरादित्वात् उपधा इवार को अवार, स्वप् त, प्दुत्व होने पर स्पष्ट शब्द बना है। घायु तथा अग्नि का नाम है। विद्युत् रूप से यायु भी प्रकाशन है । अग्नि तो प्रकाशक है ही। वा = अथवा, करोति कर्मण परोति अर्थक (जियासामा यवाची), स्वक्षते - स्वक्ष धातु से, त्वष्टा स्यात् = त्वष्टा शब्द शायद बना हो। अर्थात् 'स्वक्षणोति करोति इति वटा' इस विग्रह मे पातूनामनेकार्थत्वात् 'स्वतनूपरणे' धातु से पूर्ववत् हुन् प्रत्यय, क लोप, त्या तृ ष्टुत्व होने पर स्वष्ट शब्द बना है। त्वष्टा प्रथमा एक्कचन वा रूप है। वायु या अगि का नाम है। क्योंकि, ये दोनो ही दियाशील है। . तस्यैपा भनति । इति निरत टमाध्यायस्य योदश घण्ड || ८-१३ ॥ तस्य - उस त्वष्ट पद पा, एषा = यह निम्नरिखित ऋचा उदाहरण मन्त्र, भवति = है-~- अप निरक्तप्टमाध्यायस्य चतुर्दश राण्ड । य इमे यापृथिवी जनित्री रुपैरपिंशगुवनानि विश्वा । तमय होतरिपितो यजीयान् देवं त्वष्टारमिह यक्षि विद्वान् ॥ ऋ स ८-६-१-१॥ इस मन्त्र रा भार्गव जमदग्नि ऋषि, त्रिष्टुप् छद और आपी अग्नि देवता है । मन्त्रापर य - जिस त्यष्टा देव ने, जनित्री = समरत जग यो उत्पश परने बारी, इमे - इन, चावापृथिवी- - निशक्तऽष्टमाध्यायस्य पञ्चदशः खण्डः । पावापृथिवी को और विश्वाभुवनानि = समस्त भुवनो को, रूप अपिंथत् = नाना प्रकारों से उत्पन्न किया था। होत = हे होत , यजीयान् = बडे यज्ञ करने वाले, विद्वान् = जानने वाले, इपित - हम से प्रार्षित तुम, इह- इस यज्ञ में, अद्य = आज, तम् त्वष्टारम् देवम् - उस त्वष्टा देव को, यक्षि = स्तुति तथा हवि द्वारा यज्ञ करो। इस मन्त्र मे त्वष्ट शब्द है। अत उसका यह उदाहरण है। अभिमुख होती हुई। इस मन्त्र का यास्क भास्य- य इमे यावापृथिव्यौ जनयिच्यौ रूपैरकरोद् भुवनानि च सर्वाणि तमय होतरिपितो यजीयान् देवं त्वष्टारमिह यज विद्वान् । य - जिस त्वष्टा देव ने, इमे = इन, जनयित्र्यो = सारे जगद को जनने घाली, धावापृथिव्यो = धु और पृथिवी को, एव, सर्वाणि भुवनानि : सब भुवनों को, अकरोत् = किया था। होत - हे होता', यजीयान् = अतिशय यज्ञ करने वाले विद्वान् - जानने वाले, इपिता - हम से प्रार्थित तुम, तम् खप्टारम् देवम् = उस त्वष्टा देव को, अद्य = माज, इह = इस यश मे, यज - यजन करो। स्वष्टा कौन है ? इस का विचार करते हैं- माध्यमिकस्त्वष्टेवाहुर्मध्यमे च स्थाने समाम्नातः | स्वष्टा - यह त्वष्टा देव, माध्यमिक - मध्यम लोक का है, इतिक यह कोई आचार्य कहते हैं। क्योकि, मध्यमे च स्थाने - मध्यम स्थान मे यह, समाम्नात = समाम्नात है = पठित है। अर्थात् स्वष्टा का अर्थ मध्यमस्थान वायु है। सिद्धान्त कहते हैं- अग्निरिति शाकपूणिः । त्वष्टा का अर्थ, अग्नि, = पार्थिव अग्नि है, इति = यह, शावपूणि = शाकपूणि नामव निरुताचार्य कहते है। तस्यैपाऽपरा भवति । इति निरुक्तेऽष्टमाध्यायस्य चतुदश खण्डः ।। ८-१४ ।। तस्य = उस रवष्ट पद का, एपा = पह, अपरा = दूसरी ऋचा, भवति - है। अथ निरुक्तऽष्टमाध्यायस्य पञ्चदश खण्ड । आविष्टयो' वर्धते चारुरासु जिह्मानामूर्ध्वः स्वयंशा उपस्थे । उभे त्वष्टुर्विभ्यतु जाय॑मानात्प्रतीची सिंह प्रति जोपयते ॥ स १-७-१-५॥ - - नियत ऽष्टमाध्यायस्य पञ्चदशा पण्डा | इस मन्त्र का आङ्गिरस कुत्स ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और अग्नि देवता है । मन्त्रायं-आविष्टया प्रकाश का विस्तार करने वाला, चारु' = चलने वाला, जिहानाम् = टेढे काष्ठो के, मध्यः - ऊपर जलने वाला, उपस्थे = नपस्थान अर्थात् स्तुति मे, स्वयश = अपनी कीति को धारण करने वाला, मासु = इन क्रियामओ मे त्वष्टा नामक अग्नि, वर्धते - बढता है ।' उभे = दोनो द्यावापृथिवी, जायमामात् : उत्पन्न होते हुए ही, त्वष्टु = स्वप्टा अर्थात् अग्नि देव से, विभ्यसु! = डरी। भयभीत हुई। प्रतीची = इस के प्रति अभिमुख गई हुई, सिंहम् प्रति सहन के प्रति अर्थात सहने को, जोपयेते सेवा करती हैं। इस मन्त्र मे त्वष्ट शब्द अग्नि-वाचक है । अग्नि है, वायु नही यह सिद्ध हुआ । - मतः त्वष्टा . A यास्क भाष्य- आविरावेदनात् तस्यो वर्धते चारुरासु । चारुः चरते। आयेदनाव = आवेदन करने से अर्थात् ज्ञान देने से, आविः = अग्नि आवि (प्रकाश करने याला) कहा जाता है। तत्य उस से त्य प्रत्यय, पत्व, प्दुत्व, होने पर माविष्टय शब्द बना है। आसु = इन क्रियामो मे, चार = चलने वाला अग्नि, वर्धते ८ वढता है । अर्थात् 'आवेत्ति इति भावि.' इस विग्रह मे आपूर्वक 'विद ज्ञाने' धातु से किप् (०) प्रत्यय और पृषोदरादित्वात दकार को स होने पर माविस् शब्द बना है। प्रकाश का नाम है। क्योकि, प्रकाश आवेदन करता है, ज्ञान मे सहायक होता है। आविस् अव्यय है। मावि. भवः इति आविष्टय.' इस विग्रह मे आयिस् शन्द से 'अव्ययत् स्यप्' इस सूत्र से त्यप् (त्य ) तदित, आविस् स्य, 'हस्वात्तादौतद्धिते' इस सूत्र से सकार को पकार, ष्टुत्व होने पर आविष्टध' शब्द बना है। अथवा 'आविस्तनोति इति आविष्टय ' इस विग्रह में आविस् पूर्वक 'तनु विस्तारे' धातु से पृषोदरादि मे निपातन से डध ( य ) प्रत्यय, टि लोप, आविस् त्य, पूर्ववत् निपातन से ही पत्व प्दुस्व होने पर आविष्टघ शब्द बना है। प्रकाश का विस्तार करने वाला अर्थ है। चरते. - घर धातु से, चारु = चारु पाब्द बना है। अर्थात 'चरतीति चारु इस विग्रह मे गत्यर्थक पातु से 'सनिजनिचरिचटिभ्यो अण्' इस उणादि सूत्र से गुण (उ) प्रत्यय और उपधा वृद्धि होने पर चार शब्द बना है। चलने वाला अर्थ है। जिह्म जिहीतेः। ऊर्ध्व उच्छितो भवति । स्वयशा आत्मयशाः । उपस्थ उपस्थाने । 'उमे त्वष्टुर्विभ्यतुर्जायमानात् प्रतीची सिंह प्रति जोपयेते'। जिहीते बोहाट् पातु से, जिह्मम् - जिह्म शब्द बना है। अर्थात् 'जिहीते कुटिलं गच्छति इति जिह्यम्' इस विग्रह में 'ओहाङ् गतो' पातु से जहाने सन्वदालोपच' इस उणादि सूत्र से मन् (म) प्रत्यय, सन्वद्भाव, द्वित्व, अभ्यासकार्य, और आलोप होने पर ब्रिह्म शब्द बना है। अग्नि का नाम है। क्योकि, दाह्य काष्ठादि के टेढे होने से अग्नि भी टेढा होता है। उच्छित भवति = जो ऊंचा होता है वह, ऊर्वम् = गर्व कहा जाता है। उन लध्वं धीयते सेव्यते इति ऊवंम्' इस विग्रह मे उत् पूर्वक 'विन सेवायाम्' धातु से उणादि वन (व ) प्रत्यय, उद पनि व, पृषोदरादित्वात् ए इ का लोप, उत र व, वर्णव्यत्यय, उरत व, उ को दोघं और व को होने पर ऊर्ध्व शब्द बना है। ऊंचा अर्थ है । अर्थात् जो सबसे बडी सेवा परे वह ऊर्य कहा जाता .
निरुक्तऽष्टमाध्यायस्य पोडशः खण्डः । (१३१७) है। स्वयशा = आत्मयशाः = अपने यश वाला, उपस्थे = उपस्थाने - स्तुति मे। उभे = दोनो द्यावापृथिवी, जायमानात् = उत्पन्न होते ही, स्वष्टु अग्नि से, विभ्यतुः = डर गई कि, कही वह भस्म न कर डाले, प्रतीची - सिंहम् प्रति = सहन करने को। मन्म मे 'उभे' पद पाया है। उसका अनेक प्रकार से व्याख्यान करते है- - द्यावापृथिव्यामिति वा, अहोरात्रे इति वा, अरणी इति वा, प्रत्यक्ते। सिंह सहन प्रत्यासेवेते। इति निहतेऽष्टमाध्यायस्य पञ्चदशः खण्डः ।। ८-१५ ॥ उभे का अर्थ दो, द्यावापृथिव्यो = धुलोक और पृथिवी लोक, इति = यह, वा = अथवा, अहोहाने = दिन और रात्रि, इति - यह, वा = अथवा, अरणी = अघर भरणि (काष्ठ) और उत्तर अरणि, इति = यह अर्थ है। ये तीनो समूह अग्नि के बढते हुए देख कर डरते हैं कि कहीं जिला न डाले, इस लिये, प्रतीची = प्रत्येक्ते ये अग्नि से प्रत्यक्त दूर रहते हैं। सिंहम्प्रति सहनम् - सहने को। मासेवेते = उस अग्नि को सेवा करते हैं। 'जोपयेते' मे स्वार्ष में णि सिमझना चाहिये ।। १२ - . ग - वनस्पतिः । - वनस्पतिः = वनस्पति का अर्थ गार्हपत्याग्नि है । वनो का जो पालन करे यह वनस्पति पहा नाता है । मग्नि समर्थ होता हुआ भी एय वृक्षादि वनो के भीतर रहता हुमा भी उन्हें जलाता नहीं। अतः यह वनो वा पालन करने वावा वनस्पति कहा जाता है । ' यन्यन्ते सेप्यन्ते इति वनानि इस विग्रह में 'वन सभक्तो' धातु से, 'पसि सज्ञायां घः प्रायेण' इस सूत्र से घ (म) प्रत्यय होने पर 'वन शम्द बना है। वृक्षादि यम का नाम है । “पाति रक्षति इति पतिः' इस विग्रह में 'पा रक्षणे' धातु से 'पातेईतिः' इस उणादि मूत्र से इति प्रत्यय (अति), हित्वा टिलोप होने पर 'पति' शरद बना है। 'बनानां पत्तिः इति बनस्पति.' इस विग्रह मे पष्ठी समा और पारस्कदादिरावाद मुद (स) मागम होने पर 'वनस्पति' शब्द बना है। . . मय निस्तेऽस्टमाध्यायस्य पोदशः खण्डः । 1 1 FREETर सपा निषेचन करते है- न .. वनस्पतियारयातः । मनस्पतिः वनस्पति पद व्याख्यातः - म्यारशन है अर्थात् अप्टम अध्याय पुतीय में 'एप हि धनाना पाता या पातपिता वारयादि पति से वनस्पति पद को पास्या हो, पुगी है।
(१३१८) निरुक्तेऽस्टमाध्यायस्य सप्तदशः खण्डः । तस्येपा भवति । इति निरुक्तऽष्टमाध्यायस्य षोडशः खण्डः ।। ८-१६ ।। तस्य = उस वनस्पति शब्द का, एपा यह, अग्रिम ऋचा उदाहरण मन्त्र, भवति = है- अथ निरुक्तऽष्टमाध्यायस्य सप्तदशः खण्डः । उपाव॑सृज त्वन्या समञ्जन् देवानां पार्थ' ऋतुथा हवींषि । वनस्पतिः शमिता देवो अग्निः स्वदन्तु हव्यं मधुंना घृतेन ॥ म सं. ८-६-९-१० ॥ इस मन्त्र का भार्गव जमदग्नि ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और आप्री अग्नि देवता है । मन्त्रार्थ- 'हे वनस्पति यूप! वा हे अग्निदेव ! तुम, देवानाम् = देवताओ के, पाथः = अन्न को और, हवीपि हयिओ को, ऋतुथा = ऋतु ऋतु मे = प्रत्येक ऋतु मे ( समय समय पर ), त्मन्या = आस्मा से, समलम् = सस्कार विशेष से प्रगट करता हुआ, उपावसृज बनाओ । वनस्पतिः वनस्पति, शमिता देवः शमिता नामक देव विशेष और अग्निः = अग्नि देव, ये तीनो देवता, मधुना = मधु से और, धृतेन - घृत से, हव्यम् हवि को, स्वदन्तु = स्वादु बनावे । इस मन्त्र मे वनस्पति का मत भेद से दो अर्थ हैं। यूप और अग्नि ।' F D इस ऋचा का यास्क भाष्य- - - अग्नि, इति मधु और घृत से, ।" उपावसजात्मनात्मानं समझन्देवानामृतावृतीहवींपि काले काले । वनस्पतिः शमिता देवो अग्निरित्येते त्रयः स्वदन्तु हव्यं मधुना च घृतेन च । हे देव ! तू, आस्मानम् - अपने से आप को समधन् संस्कार विशेष से प्रगट करता हुमा. देवानाम् - देवो के, हवीपि हष्य अन्न को, तो ऋतौ = काले काले • समय समय पर, उपावसृज - बना । वनस्पतिः = वनस्पति, शमिता देव. - शमिता देव और, अग्निः एते त्रयः - ये तीनो मिल कर, हव्यम् = हव्य को, मधुना घ घृतेन च - स्वदन्तु - स्वादु बनायें । तत् को वनस्पतिः । यथोक्त मन्त्र मे, वनस्पतिः - वनस्पति, कः = कौन है ? । अर्थात् धनस्पति शम्म किस देवता का ग्रहण है ? इसका विचार यहां किया जाता है । यूप इति कास्थषयः । यूपः = यूप (यज्ञस्तम्भ), इति + यह, कारपक्यः = कास्थक्य मामक आचार्य कहते हैं । ' अर्थात् 'कात्यय कहते हैं कि, वनस्पति या अर्थ यूप है । क्योकि, वमस्पति जो वृक्ष उस की शाखा सपना हुमा यूप होता है । अतः पूप वनस्पति है । इस अपं में प्रमाणे देते हैं- त - है निक्तेऽष्टमाध्यायस्याप्टादशः खण्डः । (१३१९) तस्यैपाऽपरा भवति । इति निरुक्तेऽष्टमाध्यायस्य सप्तदशः खण्ड. । ८-१७ ॥ तस्य - यूपार्थक वनस्पति शंब्द का, एषा अपरा = यह दूसरी ऋचा, भवति = उदाहरण है- अथ निरुक्तेऽष्टमाध्यायस्याप्टादशः खण्डः ।। अञ्जन्ति त्वामध्वरे देवयन्तो वनस्पते मधुंना दैव्येन । यदूर्ध्वस्तिष्ठा द्रविणेह धत्तायद्वा क्षयो' मातुरस्या उपस्थे । कसं ३-१-३-१ ॥ 5 इस मन्त्र का विश्वामित्र ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और यूर देवता है। मन्त्राप-वनस्पते है घनस्पतिदेव ! (हे यूप!), अध्वरे - यज्ञ में, देवयन्तः देवो के अभिलापी अध्वर्यु लोग, देध्येन मधुना = देव सम्बन्धी मधु = धृत से, रवाम् = तुम को, अञ्जन्ति - सिंचन करते हैं। यत् - जो तुम चाहे, ऊर्ध्वस्तिष्ठाः - उन्नतभाव से रहो, यद्वा = अथवा, मातुरस्या. = मातृस्वरूप पृथिवी को, उपरथे - गोद मे, क्षयः = शयन करो अर्थात् चाहे तुम उच्च स्थान पर खड़े रहो वा जमीन पर रहो, इह - यहां, दक्षिणा धन,, पत्ताद - घरो हमे धन दो। इस मात्र मे,समञ्जन यूप अर्थ मे का प्रयोग है ।.अतः वनस्पति का अर्थ यूप है। बनस्पनि राम - इस मन्त्रका यास्क भाष्य- - अञ्जन्ति त्वामध्वरे देवान्कामपमाना वनस्पते मधुना दव्येन च धृतेत च यद्ध स्थास्पसि, द्रविणानि च नो दास्यसि, यद्वा ते कृतः क्षयो मातुस्या उपस्थे उपस्थाने । वनस्पते = हे यूप!, स्वाम् = तुझे, अध्वरे देवान् कामयमानाः = यज्ञ में देवताओ को यजन करने की इच्छा करते हुए ऋत्विक तथा यजमान लोग, देव्यैन = देवसम्बन्धी, मघुना - घृतेन = धृत से, अञ्जन्ति - चुपड़ते हैं। यद = जो = चाहे तुम, मध्यः = कार, स्यावास रहो, यद्वा = अयया, अस्याः 'मातुः उपस्थे : उपरथाने = इस पृथिवी माता के गोद में, क्षयः स्थास्यसि पृतः - पयन करते रहो, चाहे जहाँ रहो, न:- हमें, द्रविणानि दास्यसि - धन दो। अग्निरिति शारुणिः। अग्निः । वनस्पति शमद का अपं अग्नि है, इति = यह, चारपूणिः - पारपूणि आचार्य रहते हैं। सस्पपाडपरा भवति । इति निहतेष्टमाध्यायस्पाप्टादशः सण्डः ।। ८-१८ ।। 1 (१३२०) निरुक्तेऽप्टमाध्यायस्यैकोनविंशः खण्डः । तस्य = अग्नि अर्थक, घनस्पति शब्द की, एपा = वह, अपरा = अन्य ( तीसरी) ऋवा, भवति = उदाहरण है- अथ निरुक्तेऽष्टमाध्यायस्यकोनविंशः खण्डः । देवेभ्यो' वनस्पते हवींषि हिरण्यवर्ण प्रदिवस्ते अर्थम् । प्रदक्षिणिशनया नियूय॑ ऋतस्य॑ वक्षिपथिभी रजिष्टः ॥ इस मन्त्र का वसिष्ठ ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और अग्नि देवता है। मन्त्रार्थ-वनस्पते - हे अग्ने ! तथा, हिरण्यवर्ण = हे ज्वलित 1, हवीपि = हवियो को, रशनद्या रसनया ( शसयोर्यत्ययः) जिह्वा से, नियूय = वाँध कर, प्रदक्षिणित = दक्षिण मार्ग से, रजिष्ठं = बहुत सीधे, प्रतस्य पथिभिः - यज्ञ मार्ग से, देवेभ्य. = देवो के लिये, वक्षि वहन कर % लेजा। प्रदिवः = पुराने, ते = तुम्भारे, अर्थम् = अर्थ को हम कहते है। इस मन्त्र मे हविर्वहन सयोग से वनस्पति शब्द का अग्नि अर्थ है । क्योकि, हविर्वहन अग्नि ही करता है। यूप नहीं । - - -- इस मन्त्र का यास्क भाष्य- देवेभ्यो वनस्पते वीपि हिरण्यपर्ण ऋतपर्णापि वोपमार्थस्याद्धिरण्यवर्णपणेति प्रदिवस्ते अर्थ पुराणस्तेसोऽर्थोऽयंते प्रमो यज्ञस्य वह पथिभी रजिष्टैर्ऋजुतमै रजस्वलतमैरितिवा । इस मन्त्र का यास्क भाप्य--- " यनस्यते रशनया वियूय" सुरूपतमया " वयुनानि विद्वान् " प्रज्ञानानि प्रजानन् । वह देवान् यज्ञे दातुहवींपि । प्रचूहि च दातारममृतेपु-देवेषु । वनस्यते - हे भग्ने !, सुरूपतमया रशनया = बहुत सुरूप रस्सी से, वियूय = हवि को बांध फर, वयुनानि विद्वान् = प्रज्ञानानि प्रजानन् = अपने अधिकारयुक्त बुद्धियो को जानता हुआ । दातुः। धाता यजमान के, हबीपि = हवियो को, यशे = यज्ञ मे, देवान् =, देवो के प्रति, यह - बहन फरो- लेजा। च = = दाता को, अमृतेषु - देवेषु = देवसामो मे, प्रयूहि = कहो कि, उस यजमान ने ये हवि दिये हैं। 'वनस्पति का अर्थ यूप है' यह कात्यषय का मत है और 'अग्नि है' यह शारपूणि या मत स्वीकार्य है। क्योकि, यही सिद्धान्त है । अग्नि इन्द्र और मादित्य ये तीन ही देवता हैं । जन मै अग्नि या प्रकरण चल रहा है। 'मनस्पति का अर्थ अग्नि है। इसकी पुष्टि मे पास्क ने दो मात्र उद्धृत किये हैं-एक 'देवेभ्यो वनस्यते हवीपि' और दूसरा 'वनस्यते रशनया नियूप। दोनो मन्त्र पहा फे हैं यह अन्धेपणीय है । प्रसहिता में कुछ मिलता जुलता पाठ है, परन्तु सम्पूर्ण भानुपूर्वी नहीं है। और, दातारम् .
निरुत इष्टमाध्यायस्य विश' खण्डा । (१३२१) १३ - स्वाहाकृतयः। 'स्वाहाकृतय ' यह देवता बोधक पद है। इसं का निर्वचन करते हैं- स्वाहेत्येतत् सु आहेति बा, '' स्वा वाग आहेति वा, स्वं प्राहेति वा, खाहुतं हविर्यु . होतीति वा। क %3D वनस्पते = है वनस्पति (वाष्ठ) रूप अग्निदेव । तथा, हिरण्यपर्ण - ऋतपर्ण = है यज्ञरूप वृक्ष के पत्र रूप अग्ने 1, अपिवा = अथा, उपमा स्यात् - हिरण्यपण पद उमा अर्थ में हो सकता है, जैसे-हिरण्यवर्ण पर्ण - हे सुवर्ण रग के पत्र वाले = ज्वलित अग्निदेव । तुम, देवेभ्य देवो के लिये, हवीपि = हवियो का, वक्षि = वह = वहन करो । ले जाओ । प्रदिव ते अर्थम् पुरण ते स अर्थ वह तुम्हारा अर्थ पुराना है यम् ते प्रबूम जिसको तुम्हारे लिये हम कहते हैं । रजिष्ठं = ऋतम बडे सुरूप एव अधिकार से रहित, ऋतस्य पथिभि यज्ञ के मार्ग से हवि को ले जाओ । इति = इत्यर्थ । तस्यैपाऽपराभवति । इति निरुक्तेऽष्टमाध्यापस्यमोनविंश खण्ड ॥८-१९ ॥ तस्य - अग्नि अर्थक वनस्पति शब्द की, एषा - यह, अपरा = अन्य (चौथी) मावा, भवति उदाहरण है-- अथ निरुक्तेऽष्टमाध्यायस्य विंशः खण्ड । वनस्पते रशनया नियूयं पिष्टतमया वयुनानि विद्वान् । वहा देवत्रा दिधिषो हवींषि प्रचं दातारममृतेषु वोचः ॥ इस मन्त्र का वसिष्ठ ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और वनस्पति रूप अग्नि देवता है। मन्त्रार्य- वनस्पते = हे वनस्पतिरूप अग्निदेव 1, पिष्टतमया = बहुत सुरूप, रशनया = रस्सी से, हबीपि हवियो को, नियूय = बाँध कर, वयुनानि अपने अधिकार युक्त प्रज्ञानो को, विद्वान = जानता हुमा दिघिपो देने वाले यजमान के हवियो को, देवता = देवताओ के प्रति, वह = वहन कर = ले जा, = दाता को यज्ञ मे, अमृतेषु = देवताओ मे, प्रवोच - कहो कि, उम यजमान ने ये हवि दिये हैं । इस मन्त्र मे वनस्पति का अर्थ अग्नि है । स्वाहा इति एतव - स्वाहाकृति इस समस्त पद मे जो 'स्वाहा' यह पद है वह, सु माह शोभन कहता है - अच्छा वहता है, इति = इस प्रकार दो पदो के योग से, वा = अथवा, स्या वाग आह अपनी वाणी कहती है, इति - इस प्रकार तीन पदो के सक्षेप से, वा = अथवा, स्वम् प्र आह् = अपने को कहता है इति = इस प्रकार तीन पदो के सक्षेप से, वा = अपवा, स्वा हुतम् हवि जुहोति = सुन्दर होम करने योग्य हवि को होम करता है, इति = इस प्रकार, उक्त समस्त वाक्य का सक्षेप शब्द है। - T D और, दातारम् . - .
- (१३२२) निरुक्तऽष्टमाध्यायस्यैव विंशः खण्डः । (१) 'सु : सुष्छु, आह = प्रवीति इति स्याहा' इस विग्रह में 'यूचा व्यक्तायां वचि' धातु से वाहुलकात् कर्ता में पञ् (अ) प्रत्यय 'ब्रुवः पञ्चानामादित माहो मुरः' इस सूत्र से छन्दसत्वाद पून के परे रहते भी बू के स्थान में बाह आदेश, सु के उकार को 'इको यणधि' इस सूत्र से वकार सुप् के स्थान मे 'सुपां सुलुक्' इत्यादि सूत्र से आ आदेश और दीर्घ होने पर 'स्वाहा' शब्द बना है। जो वाणी सत्य प्रिय और हितकर वचन का उच्चारण करतो हो उसे स्वाहा कहते हैं । (२) 'स्वा वाक् आह इति स्वाहा' अर्थात् 'स्वा = आत्मीया वाक् - सत्यवचनं आह = प्रवीति इति स्वाहा' इस विग्रह में स्वा शब्द पूर्वक पूर्ववत व धातु से पत्र को बाइ आदेश, स्था माह, दोघं, स्वाह, सुर् को बा और दीर्घ होने पर 'स्वाहा' शब्द बना है। जो वाणी अपने हृदयस्थ सत्यवचन का ही उच्चारण करे उसे 'स्वाहा' कहते हैं। (३) 'स्वं प्राह इति स्वाहा' अर्थात् 'स्वं पदार्थ प्राह प्रवधीति अनेन इति स्वाहा, इस विग्रह में स्व पूर्वक ब्रून धातु से पूर्ववत् धा आह सु = आ और दीर्घ होने पर स्वाहा' शब्द यना है। जो अपने पदार्थ को ही अपना कहे और दूसरे के पदार्थ को अपना न कहे उस वाणो को 'स्वाहा' कहते हैं। (४) वा = अथवा ' स्वाहुतं हविर्जुहोति इति स्वाहा' अर्थात् 'सु आहुतं हविः जुहोति अनेन इति स्वाहा इस विग्रह में सु आङ् पूर्वक 'हु दानादनयोः' धातु से उणादि परि कल्पित ड प्रत्यय (अ), डिवाद टिलोप और शेष सब वायं पूर्ववत होने पर स्वाहा शब्द बना है। सामग्री आदि को भली प्रकार स्वच्छ करके विधिपूर्वक जिस वाणी रूप शब्द का उच्चारण करके होम किया जाय उसे 'स्वाहा' कहते हैं। 'स्याहा करणं स्याहाकृतिः' इस विग्रह में स्वाहा पूर्वक 'डुकृन करणे' धातु से 'निया क्तिन् ' इस सूत्र से भाव मे क्तिन् (ति) प्रत्यय होने पर स्वाहाकृति शब्द बना है। ‘स्वाहाकृतयः' यह प्रथमा बहुवचन का रूप है। छान्दरा प्रयोग है। अग्नि का नाम है। तासामेपा भवति । इति निरुक्तेऽष्टमाध्यायस्य विंशः खण्डः । ८-२० । तासाम् - उन स्वाहाति को, एपा = यह ऋचा, भवति उदाहरण है- अथ निरुक्तेऽष्टमाध्यायस्य विशः खण्डः । सद्यो जातो व्यमिमीत यज्ञमग्निर्देवानायमवत्पुरोगाः। अस्य होतुंः प्रदिश्यतस्य वाचि.स्वाहांकृतं हविरंदन्तु देवाः ॥ . 1 ऋ. सं. ८-६-१०-११॥ इस मन्त्र का भार्गव जमदग्नि ऋपि, त्रिष्टुप छन्द और नापी अग्नि देवता है। मन्त्रा--- सद्यः जातः = प्रगट होते ही, अग्निः = अग्नि देव ने, यज्ञम् = यज्ञ का, व्यमिमीत - निर्माण किया निरुक्तऽप्टमाध्यायस्य द्वाविंशः खण्डः । 2 मातस्य और वे, देवानाम् = देवो के पुरोगा: : अग्रगामी, अभवत् हुए । प्रदिशि : पश्चिम दिशा की ओर, माहवनीय रूप से प्राप्स, अस्य होतुः = इस अग्नि रूप होता फे, वाचि'- वाग् मात्रय मुख मे, स्वाहाकृतम् - स्वाहा वाणी ,अदि शब्द का उच्चारण करके जो, हविः = आग्यादि होम्य द्रव्य दिया जाता है उस का, देवा: - सभी देवगण, अदन्तु - भक्षण करें। इस मन्त्र का यास्क भाष्य- In । -- । सद्यो -जायमानो निरमिमीत यज्ञमनिर्देवानामभवत्परोगाभी, 'अस्य होतः दिश्यूतस्य', वाच्यास्ये 'स्वाहाकृत हविरदन्तु देवाः' । अग्निः = अग्नि ने, सद्यः जात. तत्काल उत्पन्न होता हुआ ही. यज्ञम् निरमिमीत - यस का निर्माण किया और, देवानाम् पुरोगामी अभवत् = वे देवो के अग्रगामी हुए। प्रदिशि - पश्चिम दिशा की ओर, ऋतस्य = आहवनीयरूप से प्राप्त, अस्य होतुः - इस अग्नि रूप होता के, वाचि आस्ये = वाणी के आश्रय मुख में, देवाः = सभी देवगण, स्वाहाकृतम् हविः = स्वाहारूप वाणी का उच्चारण कर के जो होम दिया जाता है। उसका, अदन्तु = भक्षण करें। इतीमा आप्री देवतां अनुक्रान्ता अथ किंदेवता प्रयाजानुयाजाः । इति - इस प्रकार,' इमा. = ये, आप्री देवता आप्री देवता, अनुक्रान्ताः - अनुकान्त (समाप्त) हुए । अर्थात् इध्म से लेकर स्वाहाकृति तक द्वादश (१२) आप्री देवता कहे जाते हैं। उन का विचार समाप्त हुआ। अथ - अब (यहा से), प्रयाजानुयाजा - प्रयाज और अनुयाज, कि देवताः = कि देवताक हैं ? इस का विचार किया जाता है। भाव यह है कि, ज्योतिष्टोम याग सोम याग कहा जाता है । वह अङ्गी है और उस के पांच प्रयाज और पांच अनुयाज अङ्ग हैं। इन दोनो के अनुष्ठान विना ज्योतिष्टोम के अनुष्ठान से परमापूर्व (अदृष्ट विशेष) की उत्पत्ति नहीं होती है और उसके विना स्वर्ग नहीं होता है। इसी लिये प्रपाज अनुयाज अङ्ग और ज्योतिष्टोम अङ्गो कहा जाता है । इन दोनो के देवता के जाने विना इन का ध्यान पूर्वक अनुष्ठान अशक्य है । अतः इस का विचार यहा किया जाता है कि, इन का देवता कौन है? । आमेया इत्येके। इति निरुक्तेऽष्टमाध्यायस्यकविशः खण्ड. ।।८-२१ ।। प्रयाज और अनुयाज, आग्नेयाः = अग्नि देवताक हैं अर्थात् प्रयाज और अनुयाज के देवता अग्नि हैं, इति = यह, एके = कोई एक आचार्य कहते हैं और इसका अग्रिम ऋचा से प्रतिपादन करते हैं, अथ निरुक्ताप्दमाध्यायस्य द्वाविंशः खण्डः । - - अग्निदेवताक होने मे प्रमाण है । इस ब्राह्मण वचन से भी यह सिद्ध हुआ कि, प्रयाज अनुयाज (१३२४) निरुतेऽप्टमाध्यायस्य द्वाविंशः खण्डः। " प्रयाजान्म अनुयाजाँश्च केवलानू स्वन्तं हवियों दत्त भागम् । धृतं चापां पुरुषं चौषधीनामग्नेश्वं दीर्घमायुरस्तु देवाः ॥ म. सं. ८-१-११-८॥ इस मन्त्र का मग्नि प्रापि, त्रिष्टुप् छन्द और देवगण देवता हैं। मन्त्रार्थ-एक समय की बात है कि, वषट्कार हविवेहन से भयभीत होकर अग्नि देवताओं में से निकलकर जल में छिप गया । उसको खोजते हुए सभी देव वहां आये। मछलियों ने बता दिया। देवताओं ने अग्नि को प्राप्त कर हविर्वहन के लिये प्रार्थना की। उस समय के इनका सम्पाद इन दो मन्त्रों में है । अनि कहता है-देवाः = हे देवो!, प्रयाजान् = प्रयाज = प्रयाज होम के भाग, अनुपाजान = अनुयाज अनुयाज होम के भाग, हविषः ऊर्जस्वन्तम् भागम् = हवि के सार भाग, अपाम् धृतम् च - और जल के सार भाग घृत, औषधीनाम् पुरुषम् च = और गोपधियों के सार पुरुष, ये सर्व भाग, केवलान् - कैवल, मे में मुझे, दत्त - दो। इसके उत्तर में देवताओं ने उसे दूसरी प्राचा से वरदान दिया- तवं प्रयाजा अनुयाजाश्च केवल ऊर्जवन्तो हविषः सन्तु भागाः। ताने यज्ञोश्यमस्तु सर्वस्तुभ्यं नमन्तां प्रदिशश्चतस्रः ॥ म सं. ८-१-११-१॥ • इस मन्त्र का देवगण ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और अग्नि देवता है । मन्त्रार्थ-देवगण अग्नि को उत्तर देते हैं-अग्ने = हे अग्निदेव ! प्रयोजाः अनुयाजा च = प्रयाज : प्रमाज होम के भाग और अनुयाज = अनुपाज होम के भाग, हविषः ऊर्जस्वन्तः भागा. = हवि के सार भाग, केयले तव सन्तु = केवल तुम्हारा हो हो । अग्ने = हे अग्नि देव ! अयम् सर्वः यज्ञः = यह सवं यज्ञ, रुप भास्तु - तुम्हारा ही हो । चतन्त्र. प्रदिशः = चारो दिशायें, तुभ्यम् नमन्ताम् = तुम्हे ही नमन करें। यहाँ से चलो और हविर्वहन करो। इस कथा प्रसंग रूप मन्त्र से यह सिद्ध हुआ कि, प्रयाज अनुपात के देवता अग्नि है। इस अर्थ में भाष्यकार ब्राह्मणवचन प्रमाण देते हैं- "आग्नेया वै प्रयाजा आग्नेया अनुयाजाः" इति च ब्राह्मणम् । आग्नेया। वे + अग्नि देवताक ही, प्रयाजाः = प्रयाज हैं और, आग्नेयाः वं ही, अनुयाजाः = अनुयाज भी हैं, इति व = यह, ग्राह्मणम् - प्राण वाक्य प्रयाज धनुयाज को के देवता अग्नि है। इस प्रकार एक मत दिखा कर दूसरा मत दिखाते हैं- - T अग्नि देवताक 5 - % 3D निरुक्तेऽष्टमाध्यायस्य द्वाविंशः खण्डी । ११३२५) छन्दोदेवता इत्यपरम् । " छन्दांसि प्रयाजाश्छन्दांस्यनुप्रयाजाः" इति च ब्राह्मणम् । छन्दो देवता: = प्रयाज अनुयाज के छन्द देवता है, इति = यह, अपरम् = दूसरा किसी आचार्य का मत है । क्योकि, प्रयाजाः अनुयाजाः प्रयाज और अनुयाज, छन्दांसि छन्द देवताक है इति च = यह, ब्राह्मणम् ब्राह्मण वचन है । अर्थात् इस ब्राह्मण वाक्य से प्रतीत होता है कि, प्रयाज अनुयाज का छन्दों देवता है । तीसरा मत- प्रतुदेवता इत्यपरम् । " प्रतवो वै प्रयाजाः ऋतवोऽनुयाजाः" इति च ब्राह्मणम् । ऋतुदेवताः = प्रयाज अनुयाज के अतु देवता हैं, इति = यह, अपरम् - अपर अर्थात तीसरा किसी आचार्य का मत है। क्योकि, ऋतवः वै ऋतु ही, प्रयाजा: = प्रयाज हैं और, ऋतकः - ऋतु ही, अनुयाजाः = अनुयाज हैं, इति च = यह, ब्राह्मणम् = ब्राह्मण पचन है ।, अर्थात इस ब्राह्मण घचन से ज्ञात होता है कि, प्रयाज अनुयाज के देवता ऋतु हैं । चौथा मत- माणदेवता इत्यपरम् । "प्राणा वै प्रयाजा प्राणा अनुयाजाः" इति च ब्राह्मणम् । प्राणदेवता: - प्रयाज अनुयाज के प्राण देवता हैं, इति अपरम् = यह अपर अर्थात् चतुथं मत है। क्योकि, प्राणाः वै : प्राण ही, प्रयाजाः = प्रयाज हैं और, प्राणाः = प्राण ही, अनुयाजाः- यह, ब्राह्मणम् = ब्राह्मण वचन है । इस ब्राह्मण वचन से प्रतीत होता है कि, प्रयाज अनुपाज के देवता प्राण हैं। पांवों मत-- आत्मदेवता इत्यपरम् । आत्मा वै प्रयाजा आत्मा वा अनुयाजाः" इति च ब्राह्मणम् । मात्मदेवताः = प्रयाज अनुयार्ग के आत्मा देवता हैं, इति च = यह, अपरम् = अपर अर्थात किसी पांचवां आचार्य का मत है। क्योकि, आत्मा वै = आत्मा ही, प्रयाजाः-प्रयाज और, आत्मा = मात्मा ही, अनुयाजाः = अनुयाज हैं, इति च = यह, ब्राह्मणम् - ब्राह्मण वचन है । प्रश्न होता है कि, जब इतने मत हैं तो क्या निश्चय किया जाय?। उत्तर- अनुपाज हैं, इति च = - " 1 आग्रेया इति तु स्थितिः ।, तु शब्द पूर्व पक्ष की व्यावृत्ति करता है। माग्नेयाः - प्रयाज और अनुगज आग्नेय हैं अर्थात मग्नि देवताक हैं, इति यह, स्थितिः = स्थिति अति अचल सिसान्त है। प्रश्न-तो फिर 'छन्दोदेवता' इत्यादि की क्या गति? | उत्तर- -
1
सा
।
-
(१३२६)
निरुक्तंऽष्टमाध्यायस्य द्वाविंशः'पण्डः ।
भक्तिमात्रमितरत् ।'
इतरत् = दूसरे 'छन्दोदेवता' इत्यादि सव, भक्तिमात्रम् = गौणमात्र है। कहा भी है-
'बहुभक्तिवादीनि हि ब्राह्मणानि भवन्ति' अर्थात् ब्राह्मण वाक्य प्राय गौण अर्थ का ही प्रतिपादक
हुआ करते हैं।
पुन: प्रश्न करते हैं-
किमर्थं पुनरिदमुच्यते ।
किमर्षम् = किस लिये, पुन: - फिर, इदम् = यह, उच्यते = कहा जाता है । अर्थात् प्रयाज
अनुयाज सम्बन्धी देवता विचार का क्या प्रयोजन है ? ।
उत्तर देते हैं-
" यस्य देवतायै हविगृहीतं स्यात् तां मनसा ध्यायेत् वपद् करिष्यन्" इति ह विज्ञायते ।
यस्य देवताय = जिस देवता के लिये, हविः गृहीतम् स्यात् = हवि ग्रहण किया हुआ हो,
वपटकरिष्यन् = वषट्कार करने वाले ऋत्विक् लोग वपट्कार करते हुए, ताम्
मनसा = मन से, ध्यायेत् = ध्यान करें, इति है - यह इस ब्राह्मण रो, विज्ञायते
भाव यह है कि, कर्म करते समय देवता का ध्यान करना चाहिये यह ब्राह्मण वचन कहता है।
अन्यथा अपूर्व की उत्पत्ति नहीं होगी। और अपूर्व की उत्पत्ति न होने पर स्वर्गादि फल की प्राप्ति
न होगी। अतः कर्म फाल मे देवता का ध्यान अवश्य करना चाहिये। तभी अपूर्व की उत्पत्ति
होगी। अपूर्व पूण्य और अदृष्ट पर्याय शब्द है। इस विचार से यह निश्चय हुआ कि, प्रपान
अनुयाज का देवता अग्नि है । अतः इन के अनुष्ठान काल में अग्नि का ही ध्यान किया जायगा।
उस देवता का.
= जाना जाता है।
-
तान्येतान्येकादशाप्रीमुक्तानि ।
तानि एतानि - वे ये, एकादश ग्यारह, भात्रीसूक्तानि - आप्री सूक्त है जो समाप्त हुआ।
भय जो इन मे कुछ विशेष है उस को कहते हैं-
तेषां वासिष्ठम्, आत्रेयम्, वाध्यश्वम्, गार्समदमिति नाराशंसन्ति । मेधावियम् ।
देर्धतमसम् , पंपिकम् , इत्युभयवन्ति । अतोन्यानि तनूनपात्वन्ति तन्नपात्वन्ति ।
इति निरुत्तोऽन्टमाघ्यायस्य द्वाविंशः खण्डः ॥ ८-२२ ।।
इति श्रीयारमुनिप्रणीते नितमारप्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
निरुतेऽष्टमाध्यायस्य द्वाविंशः खण्डः । (१३२७) तेषाम् = उन मे, वासिष्ठम् = वसिष्ठेन दृष्टम् = वसिष्ठ का, आत्रेयम् = अत्रिणा दृष्टम् । अत्रि का, वाध्यश्वम् = वाध्यश्वेन दृष्टम् = वाघ्यश्व का, गासंमदम् - गृत्समदेन दृष्टम् = गृत्समद का, इति = ये चार सूक्त, नाराशसवन्ति = नाराशस वाले हैं। मंघातिथम् = मेघातिथिना दृष्टम् मेधातिथि का, दैर्घतमसम् = दीर्घतमसा दृष्टम् = दीर्घतमा का, प्रपिकम् = प्रैप ग्रन्थ का, इति = पे तीन सूक्त, उभयवन्ति = उभयवान = नराशस और तनूनपात दोनो देवताक हैं। अत अन्यानि . इन से अन्य जो चार सूक्त शेष है वे, तनूनपातवन्ति = तनूनपाद देवता वाले हैं। 'तनूनपात्वन्ति' इस अन्तिम पद की द्विरुक्ति (अभ्यास) अध्याय समाप्ति का सूचक है। अन्तिम पद को दो बार पढना वैदिक सम्प्रदाय है । इति श्रीस्वामिब्रह्मलीनमुनिप्रणीतनिरुक्तदेवनागरीव्याख्याया अष्टमोऽध्याय ॥८॥ F - , निरुक्त के अप्टम अध्याय का खण्ड सूत्र- ट्रेषिणोदा कस्याद् द्रविणोदायिणोदसोमेघन्तुतेप्यातमाप्रिय समियो अद्य तनपानरा. शंसस्याजुहान प्राचीन यहिव्यचस्वतीरासुष्वयन्ती देव्याहोतारानीय झंय । इसे माविष्टमौवनस्पति रुपावसमाञ्जन्तित्वादेषेभ्यो घनस्पतेरशनयानियूयसद्योगातः प्रयाजान्मेद्वाविंशतिः । १७ १८ २० ૨ २१ 1 ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।
-- - ट - - इस विग्रह मे 'अपू व्याप्तो' धातु से 'अपिलटि' श्रीगणेशाय नमः । निरुक्तम् . अथ नवमोऽध्यायः।" तत्र प्रथमः खण्डः । निघण्टु :- अश्वः १ । शकुनिः २ । मण्डूकाः ३ । अक्षा! ४ । ग्राणिः ५। नाराशंसः ६ । रथः ७ । दुन्दुभिः ८ । इपुधिः ९ । हस्तन्नः १० । अभीशवः ११ । धनुः १२ । ज्या १३ । इपुः १४ । अश्वांजनी १५ । उलूसलम् १६ । पमः १७ । द्रुघणः १८ । पितुः १९ १, नया २० । आपः २१ । ओषधयः २२ । रात्रिः २३ । अरण्यानी २४ । श्रद्धा २५ । पृथिवी २६ । अप्या २७ । अग्नायी २८ । उलूसलमुसले २९। हविर्धाने ३० । यावापृथिवी ३१ । विपाछुतुद्री ३२ । आती ३३ । शुनासीरौ ३४ । देवीजोप्ट्री ३५ । देवीऊर्जाहुती ३६ । इति पत्रिंशत्पदानि । अथ निरुक्त नवमाध्यायस्य प्रथम अथ यानि पृथिव्यायतनानि सचानि स्तुति लभन्ते तान्यतोऽनुक्रमिप्यामः । अथ - त्रयोदश आप्रीगण शब्दो के व्याख्यान के अनन्तर, यानि = जो, पृथिव्यायतनानि पृथिवी आयय वाले अर्थात् पृथिवी पर रहने वाले, सवानि = द्रव्य, स्तुतिम् लभन्ते = स्तुति को प्राप्त होते है. तानि - उन को, अत - निघण्टु पठित ३६ पदो की पम पम से ध्याख्या करेंगे। पूर्वोक्त त्रयोदश आनी दो से महा पाने यहाँ से, अनुक्रमिष्याम. = अनुक्रमण करेगे । अर्थात् पूर्वोक्त वाले अश्व आदि ३६ शरद विलक्षण हैं। अत एव इन को पृथक किया गया है। केवल ये ही नहीं किन्तु अन्य सर्पलाङ्गल युसुम्भक आदि शाददो पा भी इन्ही में अन्तर्भाव है। क्योकि, ये भी पृथिवी मात्रय देवता है। अधः। 'अनुते मागं व्याप्नोति इति अश्व हरयादि उगादि सूत्र से फन् ( 4 ) प्रत्यय होने पर बना है। अथवा अन्नति १ खण्डा । १ निरुक्तं नवमाध्यायस्य द्वितीयः खण्डः । (१३२९) बहुभोजनं करोति, इति भव:' इस विग्रह मे 'अश भोजने' धातु से पूर्वोक्त सूत्र से ही बाहुलकाव कम् प्रत्यय होने पर अश्व शब्द बना है। यद्यपि भोजन सभी प्राणी करते हैं तथापि 'अपमा वायुमक्षन्यायेन असति बोधके सर्व वाक्य सावधारणं भवति' इस नियम के अनुमार अश्व अतिशय परक है अर्थात् जैसे धन्वान् कहने से अतिशय घन्वान् समझा जाता है वैसे ही अश्व कहने से भतिशय भोजन करने वाला समझा जाता है । भाष्य- 'तेपामश्वा-प्रथमागामी भवति । तेषाम् - पृथिवी आयतन छत्तीस पदो में, अश्व = अश्वरद, प्रथमागामी - प्रथम आनेवाला मुख्य, भवति - है। अत इस की व्याख्या सबसे पहले की जाती है। अथ निरुक्ते नवमाध्यायस्य द्वितीय, खण्ड । , T 1 अवो व्याख्यातः। = अश्व शन्द, व्याख्यात व्याख्यात है। अर्थात अश्व शब्द की व्याख्या नि. २-२७ मे Fr अश्व की गई है। - AIF. तस्यैपा भवति। इति निरुक्त' नवमाध्यायस्य प्रथम खण्ड. ॥ ९ - १ ॥ तस्य = उस अश्व पद की, एपा - अग्रिम नाचा उदाहरण, भवति - है- अप निरुक्ते नवमाध्यायस्य द्वितीय खण्ड ॥ अश्वो वोल्हा सुखं रथं हसनामुपमन्त्रिणः । शेपो रोमण्वन्तो भेदौ वारिन्मण्डूक इच्छतीन्द्रायेन्दो परि सव ॥ स ७-५-२५-४ इस मन्त्र का आङ्गिरस शिशु ऋपि, पक्ति छन्द और पवमान सोम देवता है। माना। घोडा, वोळ्हा = लक्ष्य देव की ओर जाता हुआ, मुसम् रपम् - वस्यागार रपी, इच्छति इच्छा करता है। उपमन्त्रिण - मर्म सचिप दरवारी लोग, हसनाम् = हास-परिहास को इच्छन्ति - इच्छा करते हैं। शेष = पुरुष-इन्द्रिय, रोमन्यन्तो - शेम वाला, भेदो - भेद मी, इच्छति - 'इच्छा करता है।' मण्डूक - मेर, बारित - जल की, इति = इच्छा करता है। वैसे ही मैं सोमपारण की इच्छा परता हूँ। दस रिगे, इन्दो - है सोम ! तुम, इन्द्राय - इन्द्र लिये, परिसर = क्षरित होमो।। . । - अश्व - 1 -- इस मन्त्रयामाप्प- -- " । - निरुक्ते नवमाध्यायस्य तृतीय. खण्ड । अश्वो बोळ्हा सुसं वोळ्हा रथं वोळ्हा । सुखमितिकल्याणनाम । कल्याणं पुण्यं सुहित भवति । (सुहितं गम्यतीति वा, हसता वा, पाता वा, पालयिता वा, शेपमिच्छतीति, वारि वारयति, मानो व्याख्यातः) घोडा, सुखम् वोळ्हा = सुख से वहन करने वाला है, रथम् वोळ्हा = रथ का वहन करने वाला है । सुखम् इति = सुख यह, कल्याणनाम = कल्याण का नाम है । कल्याणम् - पुण्यम् । सुहितम् = अनुकूल वेदनीय सुन्दर हित, भवति - होता है। प्रकोष्ठगत भाष्य असम्बद्ध प्रतीत होता है। क्याकि, मानो। यह देवता नहीं है और इस को व्याख्या भी यास्क ने पूर्व कही, किया नही हैं। इस लिये इसकी उपेक्षा की गई है। तस्यैया भवति । इति निरुक्ते नवमाध्यायस्य द्वितीय खण्ड ।। ९-२ ।। तस्य = उसकी, एषा = यह मचा, भवति = है- अथ निरुक्ते नवमाध्यायस्य तृतीयः खण्ड । मा नो मित्रो वरुणो अर्यमायुरिन्द्र ऋभुक्षा मरुतः परि ख्यन् । यद्वाजिनो देवजातस्य सते: प्रवक्ष्यामों' विदथे वीर्याणि ॥ ऋस २-३-७-१॥ इस मन्त्र का दीर्घतमा ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और अश्वदेवता है । मन्त्रार्थ-अश्व की स्तुति करने के लिये प्रवृत्त, न = हम लोगो की मित्र मित्र, वरुण - वरुण अर्यमा = अर्यमा, भायु आयु, इद्र = इद्र, ऋभुक्षा = ऋभुक्षा और, मरुत - मरुद्गण, मा परि स्यन् = परिख्यान अति निन्दा न करें। -श्योकि, हम सब, देवजातस्य - देशे से उत्पन्न, अप्ते : व्यापन (गमन) पोल, वाजिन = अश्व के, वीर्याणि = वीरकर्मों को, विदथे - यज्ञ मे, प्रवक्ष्याम = कहेगे। अश्व पद का निर्वचन चल रहा है । इस मन्त्र मे अश्वपद नहीं है सपापि अश्व का पर्याय वाजिन शब्द है । इसी लिये यास्कने इस मन्त्र को उद्धृत किया है। F - Jइस मन्त्र का भाष्य- -- r यद्वाजिनो देवर्जातस्य सप्तः सरणस्य प्रवक्ष्यामो यज्ञे विदथे वीर्याणि मा नस्त्वं मित्रश्च वरणवार्यमा चायुश्च वायुरयन इन्द्रचोरुक्षयण ऋभूणां राजेति वा मस्तव परिख्यन् । पद पयोकि, हम लोग, देव तस्य - देवों से उत्पन, सप्ते = सरणस्य - गमनशील, वाजिन अव के, वीर्याणि = पराक्रम को, विदधे यज्ञमे, प्रवक्ष्याम कहेंगे। त्वम् = तू मित्रश्च = मित्र, वरुणच - वरुण, अपमाच = अयंमा, आयु च = वायु - - 2 :
निरुत्ते नवमाध्यायस्य तृतीयः खण्डा । (१३३१) 'अयनः = चलने वाला वायु, इन्द्रश्च - इन्द्र, ऋभुक्षा - उरुक्षयणः = अन्त में रहने वाला ऋभुक्षा, 'इति वा = अथवा, प्रभूणाम् राजा = देवताओं के राजा ऋमुक्षः, मरुत च = मरुद्देवता, नः - लोगों को, मा परियन = रोकें नहीं। हमारी निन्दा न करें। अर्थात् यथोक्त देवगण अपनो नही किन्तु अश्व की स्तुति करते देख कर हमारी निन्दा न करे। वायु के वकार का छान्दसत्वात् लोप होने पर आयु रह गया है। अतः आयु का वायु अर्थ किया गया है । २- शकुनिः। 'शकुनि' पक्षी को कहते हैं। शकृनि शब्द का निर्वचन अनेक प्रकार से करते हैं- शकुनिः शक्रोत्युन्नेतुमात्मानम्, शक्रोति नदितुमिति वा, शक्नोति वकितुमिति वा, सर्वतः शङ्करोऽस्त्विति वा, शक्नोतेर्वा । आत्मानमुन्नेतुमुध्वं नेतु शक्नोतीति शकुनिः पक्षी इस विग्रह में 'शक्ल शक्ती' पातु से कि च' इस सूत्र से किप् प्रत्यय, सर्वापहारी लोप होने पर 'शक' शब्द बना है और शक् पूर्वक उद् उपसर्ग पूर्वक 'गोन प्रापणे घातु से 'वेनो डिच्च' इस उणादि सूत्र से बाहुलकात् इन् (इ) प्रत्यय डित, डित्त्वाव टिलोप, शक् उद नइ, पृयोदरारित्वात् ककार को जरत्वाभाव और तकार लोप होने पर 'शकुनि' शब्द बना है। पक्षी का नाम है। क्योंकि, पक्षी अपने को ऊपर आकाश में उड़ा सकता है। वा = अपवा, नदितुम् शक्नोति = जो अव्यक्त शब्द कर सके वह, उकुनिः = शकुनि कहा जाता है। अर्थात् 'नदितु शक्नोतोति शकुनिः पक्षी' इस विग्रह में उक्त शक् धातु से कि , सपिहारी लोप होने पर शक शब्द बना है और शक् उपपद उद् पूर्वक ‘णद अव्यक्ते शब्दे ' धातु से पूर्ववत् इन् प्रत्यय, टिलोप, दकार लोप जश्त्वाभाव होने पर शकुनि शब्द बना है। पक्षी का नाम है । क्योंकि, वह अव्यक्त शब्द करता है। वा = अथवा, तकितुम् शक्नोतीति = गमन कर सकता है इस लिये, शकुनिः = शकुनि कहा जाता है। अर्थात् 'तकितुं शक्नोतीति शकुनिः पक्षी' इस विग्रर में पूर्ववद शक उपपद उद् पूर्वक धातुनामनेकार्थत्वात् गत्यर्षक 'तक हसने' वा निघण्टु पठित गत्यथं तक धातु से इन् प्रत्यय, टिलोप, दुलोप, जश्त्वाभाव और धातु के तकार को नकार होने पर शकुनि शब्द बना है । पक्षो का नाम है । क्योकि, पक्षी गमन कर सकता है। सर्वतः सर्व तरफ से, शङ्करः = सुखफर, अस्तु = हो, इति अभिप्राय से, शकुनिः - शकुनि शब्द वना है। ‘सर्व तरफ से यह हमारे लिये सुखकर हो' इस अभिप्राय से शकुनि शब्द बना है। इस पदा में 'शम् सुसं करोतु इति शकुनि' इस विग्रह में सुख वाचक शम् उपपद, 'ड्डा करणे' धातु से पृषोदरादिस्वाद वा उगादि परिकलिय हुनि (वनि) प्रत्यय, डित्त्वात् टिलोप, शम् के मकार का लोप होने पर शकुनि शब्द बना है । पक्षी का नाम है। क्योंकि, पक्षी को जो मनुष्य पालता है वह इस इच्छा से कि, यह मेरे सुख का हेतु होगा। १६७ A वा = अथवा, वा - । (१३३२) निरुक्ते नवमाध्यायस्य चतुर्थः खण्डः । अथवा, शफ्नोतेः- 'शल्ल शक्तो' धातु से, हो, शकुनिः = शकुनि शब्द बना है । अर्थात् उद् णीव तथा तक आदि अन्य उपसर्ग तथा धातुओं के विना ही केवल शक् धातु से ही शकुनि शब्द बना है। 'शक्नोतीति शकुनिः पक्षी' इस विग्रह में 'शल्ल शक्ती' धातु से 'शकेरुनिः' इस उणादि सूत्र से 'उनि' प्रत्यय होने पर शकुनि शब्द बना है । 'पक्षी का नाम है। इस पक्ष में पूर्व कथित सभी अर्थ केवल शक् धातु में ही अन्तर्भावित समझना चाहिये । तस्यैया भवति । इति निरुक्ते नवमाध्यायस्य तृतीयः खण्डः ॥ ९ - ३ ।। तस्य = उस शकुनि शब्द की, एषा - यह अव्यवहित उत्तर की ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्ते नवमाध्यायस्य चतुर्थः सण्डः । कनिक्रदज्जनुषं प्रब्रुवाण इयति वाचमरितेव नाव॑म् । सुमङ्गलश्च शकुने भवासि मा त्वा का चिदभिभा विश्व्या विदत् ॥ र सं. २-८-११-१॥ इस मन्त्र का गात्समद ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और कपिञ्जल रूपी इन्द्र देवता है। मन्त्रार्थ- कनिक्रदत् = पुनः पुनः शब्दापमान, जनुषम् = जनियामान अर्थात् भविष्य अर्थ का, प्रब्रुवाण: सूचन करने वाला कपिञ्जल नामक पक्षी, अरितेव = कर्णधार (केवट ) के समान अर्थात् जसे कर्णधार अपनी, नावम् = मौकाको, इयति = परिचलित करता है वैसे ही तुम, वाचम् = अपनी वाणी को प्रेरित करते हो। शकुने = हे कपिजल नामक पक्षिन् ! तुम, सुमङ्गलध = सुन्दर मङ्गल सूचक, भवासि = होओ। विश्व्याः = विश्व की ओर से, काचिद = किसी प्रकार को, अभिभाः 3 पराजय, स्वा = तुम को, मा विदव = न प्राप्त हो। इस मन्त्र में 'शकुने' पद कपिजल नामक पक्षो वाचक है। अतः इसका यह उदाहरण ऋचा है । इस मन्त्र का भाष्य- न्यनन्दीजन्म प्रचुवाणो यथास्य शब्दस्तथा नामेरयति वाचम् , ईरयिते च नावम् । सुमनश्वशकुने भव कल्याणमङ्गलः । कपिजल नामक सौन पक्षी, जन्म = अपने जन्म = खानदान को, प्रबुवाणः = कहता हुमा, न्यक्रन्दीत वार वार बोलता है। यथा अस्य शब्द. = जैसा इसका शब्द है, तथा नाम वाचम्, वैसा ही वाणी को, ईरयति - चलाता है। नावम् ईरयिता इव = नौका को चलाने वाला मलाह के समान । शकुने = हे सौन पक्षिन् ! तुम, सुमङ्गलन = कल्याण मङ्गलः = सुन्दर मंगल वाचक, भव = होमो। मन्त्र में आया हुआ मङ्गल शब्द का निर्वचन करते हैं- - :
वा 3D D . है और ममट् निरुक्तं नवमाध्यायस्य चतुर्थः खण्डः । (१३३३) मङ्गलं गिरतेर्गुणात्यर्थे, गिरत्यनानिति वा । गृणात्यर्थे = स्तुति अर्थक, गिरते. 'गृ शब्दे' धातु से, मङ्गलम् = मङ्गल शब्द बना है, अथवा, अनर्थान् = अनर्थों को, गिरति गिल जाता है, इति = इस अर्थ मे, मङ्गलम् मङ्गल शब्द बना है। जिस से स्तुति किया जाय वा जो अनर्थों को नाश करे उसको मङ्गल कहते हैं । अर्थात् 'गृणाति स्तौति इति मङ्गलम्' इस विग्रह मे गृ शब्दे' घातु से पचाधच् ग अ, रसर गुण, गर, 'अचि विभाषा' इस सूत्र से रेफ को लत्व, गल, पृपोदरादित्वात् निपातन से ममट् (मम्) आगम, मम् गल, अनुस्वार परसवर्ण होने पर मङ्गल शब्द बना है। स्तुति का नाम है। अथवा, गिरति अनन् भक्षयति इति मङ्गलम्' इस विग्रह में पूर्ववत् पचाद्यच्, गुण, लत्व, आगम्, अनुस्वार परसवण होने पर मङ्गल शब्द वना है । कल्याण का नाम है। क्योकि, यह उत्पन्न होते ही दु ख का नाथ और सुख की प्राप्ति करता है। धातुओ के भेद से अयं का भद है । साघनिका समान है। अथवा- मगलमङ्गवत् । अङ्गवत् = जो अङ्ग वाला हो वह, मङ्गलम् = मङ्गल कहा जाता है । अर्थात् मङ्गल पूजन को कहते हैं और वह दघि मधु अक्षत आदि साधनो से सम्पन होता है। अत इन साधन रूप अन वाला होने से पूजन मङ्गल कहा जाता है । 'अङ्गानि अस्य अस्मिन् वा सन्ति इति मङ्गलम् ' इस विग्रह मे अन्दसत्वात् अङ्ग शब्द से मत्वर्थीय र प्रत्यय, 'र' को 'ल' वणव्यत्यय, बङ्गल और मकार उपजन होने पर मङ्गल शब्द बना है। मज्जयति पापकमिति नैरुक्ताः । पापकम् पाप को, मज्जयति = डूबा देता है इस लिये, मङ्गलम् = मङ्गल कहा जाता है, इति =, यह नरुक्ता. निरुक्त शास्त्र के आचार्य लोग मानते हैं । मङ्गल उत्पन्न होते ही मङ्गल करने वाले पुरुष के सर्व विघ्नो (पापो) को नाश कर देता है। अर्थात् 'मज्जयति नाशयति पापकम् विघ्नम् इति भङ्गलम्' इस विग्रह मे ण्यन्त दुमस्जो शुद्धौ' धातु से पृषोदरादित्वात् गलच (गल) प्रत्यय, णिलोप, धातु के अन्त्य जकार और उपान्त्य सकार के स्थान में मकार मादेश, मम् मल, मकार को अनुस्वार परसवर्ण होने पर मङ्गल शब्द बना है। जो विघ्न का नाश करता है। मां गच्छत्विति वा। वा = अथवा, माम् गच्छतु [मुझे यह प्राप्त हो,] इस वाक्य से मङ्गली पुरुप यह चाहता है कि, 'माम् गच्छतु' इस अर्थ मे तैयार माम् पद पूर्वक 'गम्लगतो' धातु से, भाशा अपं में पृषोदरादित्याद डलच् (अल) प्रत्यय, माम् गम् अल, हित्त्वाद दिलोर, माम् ग् अल, माम् को हस्व, मम् ग मल, अनुस्वार परसवर्ण होने पर, मङ्गल शब्द बना है। क्योंकि, मङ्गल की प्राप्ति को दली पुरुष चाहता है। अव अवशिष्ट चतुर्थपाद की व्याख्या करते हैं- D (१३३४) निरुक्ते नवमाध्यायस्य पश्चमा खण्डौ । मा च त्वा काचिदमिभूतिः सर्वतो विदत् । विश्व्याः = सर्वतः = विश्व की ओर से, काचित् = किसी प्रकार की, अभिभाः = अभिभूति! तिरस्कार, त्वा = तुमको, मा विदत् = न प्राप्त हो। इस मन्त्र में शकुनि शब्द कपिजल सौन नामक पक्षी वाचक है इस अर्थ मे जो श्रुति है उस का अवतरण करते हैं- गृत्समदमम्युत्थितं कपिजलोऽभिववाशे तदभिवादिन्येपर्भवति । इति निरुक्ते नवमाध्यायस्य चतुर्थः खण्डः ।। ९-४ ।। किसी शुभ कार्य को करने के लिये, उभ्युस्थितम् = उद्यत हुए, गृत्समदम् = गृत्समद ' नामक ऋषि को, कपिञ्जल: कपिजल नामक सौन पक्षी ने, अभिववाशे = फलसिद्धि सूचक सम्मुख शब्द किया। तदभिवादिनी = उसी अर्थ को कहने वाली, एपा = यह, ऋक् = ऋचा, भवति = है-- अथ निरुक्त नवमाध्यायस्य पश्चम. खण्ड: । "भद्रं वद दक्षिणतो भद्रमुत्तरतो वंद । भद्रं पुरस्तान्नो वद भद्रं पश्चात्कपिञ्जल” इति । पता नही कि, यह मन्त्र कहां का है। कपिजल = हे कपिजल ! तू, नः = दक्षिणतः = दाहिनी तरफ से, भद्रम् = कल्याणप्रद शुभ वचन, वद = बोल । उत्तरतः = बाई तरफ से, भद्रम् - कल्याणप्रद शुभ वचन, वद = बोल । पुरस्तात् = सम्मुख तरफ से, भद्रम् - फ्ल्याणप्रद शुभ वचन, पद : बोल और पश्चात् = पृष्ठ (पीठ) तरफ से, भद्रम् = कल्याणप्रद शुभ वचन, वद - बोल । सा निगदव्याख्याता । सा इति वह यह ऋचा, निगदप्याख्याता कथित व्याख्याक है । अर्थाद सरल होने से अपने पशब्दो से ही अपने अर्थ को कह रही है। अतः इसको व्याख्या करने की आवश्यकता नही । गृत्समदो गृत्समदनः । गृत्स इति मेधाविनाम, गृणातेः स्तुतिकर्मणः । गृत्समदनः = गृत्समदन, गृत्समदः गृत्समद कहा जाता है। गृत्सः इति मेधाविनाम = मेघावी अर्थात् अर्ष धारण करने वाली बुद्धिवाले का नाम हैं। स्तुतिकर्मणः = स्तुत्यर्षक गृणातेः 'ग' धातु से बना है । जो गृत्स = स्तुति करने से मद हर्ष को प्राप्त होता हो वह 'गृत्समद' कहा जाता है । अर्थात् 'गृणाति इति गृत्सः स्तुति.' इस विग्रह मे 'गृ शादे धातु से पृषोदरादित्वात् सक् (स) प्रत्यय, प्वादिस्वात् धातु को हस्व, 'हस्वस्य पिति कृति तुक इस सूत्र से पित्त्वाभावेऽपि छान्दसत्वात् तुक (त) आगम होने पर गृहस शब्द बना है और 'गृत्सेन हमारे लिये, - - 1 गृत्स यह D 3 मदन - , - - मदन्तेः - निरुक्ते नवमाध्यायस्य पंश्चमी खण्डः । (१३३५) मादयते इति गृत्समद.' इस विग्रह में गृहस पूर्वक 'मद तृप्तियोगे' धातु से अच् प्रत्यय, णिलोप, हस्व होने पर गृत्समद शब्द बना है। जो स्तुति से हर्षालु तथा मेघावी हो वह गृत्समद कहा जाता है। ऋषि का नाम है। ३ मण्डूकाः। मण्डूक मेढक का नाम है । इसका निर्वचन यास्क स्वयं करते हैं- मण्डूकाः मञ्जूकाः मञ्जनात् , मदतेर्वा मोदतिकर्मणो मन्दतेर्वा तृप्तिकर्मणः । मण्डूकाः = मण्डूक, मञ्जूकाः मञ्जूक कहे जाते हैं। मञ्जनात् = मञ्जन करने से - जल में डूबने से मेढक जल में मग्न रहता है । अतः इसको मण्डूक कहते हैं । अर्थात् ' मञ्जन्ति इति मण्डूकाः' इस विग्रह में 'टुमस्जो शुद्धौ' धातु से 'शालिमण्डिभ्यामुकण्' इस उणादि सूत्र से वाहुलकाद ऊकण् (उक) प्रत्यय, मस्ज् ऊक, पृषोदरादित्वात् जकार को उकार और सकार को णकार होने पर मण्डूक शब्द बना है। मेढक का नाम है। क्योयि, मेढक जल में सदा मज्जन करता है। मोदतिकर्मणः मोदति (हर्ष) अर्थक, मदतेः नरुक्त मद घातु से, वा = अथवा, तृप्तिकर्मणः = पृप्ति अर्थक, मदि धातु से मण्डूक शब्द बना है । अर्थात् 'मदन्ति मोदन्ते इति मण्डूकाः' इस विग्रह में हर्थिक नरुक्त मद धातु से 'शलिमण्डिभ्यामूकण' इस उणादि सूत्र से बाहुलकात् मद घातु से भी ककण (ऊक) प्रत्यय, मद् उक, पृषोदरादित्वात् नुम णत्व, दकार को उकार होने पर मण्डूक शब्द वना है। मेढक का नाम है । क्योकि, वे सदा ही मोदयुक्त रहते हैं । अथवा 'मन्दन्ते इति मण्डूकाः' इस विग्रह में 'मदि तृप्ति मोदमद स्वप्न कान्तिगतिपु' धातु से उक्त उणादि सूत्र से वाहूलकात् ऊकण प्रत्यय, मन्द ऊक, दको ड और न कोण होने पर मण्डूक शब्द बना है। मेढक का ही नाम है। क्योकि, वे सदा ही तृप्त रहते हैं । मण्डयतेरितिवयाकरणाः। मण्डयतेः - चुरादि मडि धातु से मण्डूक शब्द बना है, इति = यह, वैयाकरणा: - वैयाकरण लोग मानते हैं । अर्थात् 'मण्डयन्ति इति मण्डूकाः' इस विग्रह में 'महिभूषायाम्' धातु से पूर्वोक्त उणादि सूत्र से वाहुवकाव ऊकण् प्रत्यय, णि लोप होने पर मण्डूक शब्द बना है । 'मण्डूका' यह प्रथमा बहुवचनान्त है । मेढक का नाम है। क्योकि, ये जल को भूपित करते हैं । मण्ड-एपामोक इति वा। वा = अथवा, मण्डे - जल में, एपाम् = इन का, मोकः = निवास होता है, इति लिये वे मण्डूक कहे जाते हैं । अर्थात् 'मन्दन्ते हृष्यन्ति स्नानपानापिनः जनाः अस्मिन् इति मण्ड: उदकम्' इस विग्रह मे उक्त मदि धातु से 'गेहेक:' इस सूत्र वाहुलकाद क (अ) प्रत्यय और पृपोदरादित्वात् दकार को कार एवं 'नकार को णकार होने पर मण्ड शब्द बना है। जल का नाम है। क्योकि, जल में स्नानपानाद्यर्थी जन स्नान पानादि करते समय अत्यन्त हर्ष को प्रप्त होते हैं। 'उच्यति समवंति अस्मिन् इति ओकः गृहम्' इस विग्रह में परस्मैपदी 'उच समवाये' पा से 'इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः' इस सूत्र से क (अ) प्रत्यय, उच् अ, 'ओकउ चः के' इस सूत्र के नियासन से . = इस .
(१३३४) निरुक्ते नवमाध्यायस्य पदमी खण्डौ । मा च त्वा काचिदमिभूतिः सर्वतो विदत् । विश्व्याः = सर्वतः = विश्व की ओर से, काचित् = किसी प्रकार की, अभिभाः = अभिभूति तिरस्कार, स्वा = तुमको, मा विदत् - न प्राप्त हो। इस मन्त्र में शकुनि शब्द कपिञ्जल सोन नामक पक्षी वाचक है इस अर्थ मे जो श्रुति है उस का अवतरण करते हैं- गृत्समदमम्युत्थितं कपिञ्जलोऽभिववाशे तदभिवादिन्येपर्भवति । इति निरुक्ते नवमाध्यायस्य चतुर्थः खण्डः ।। ९-४ ॥ किसी शुभ कार्य को करने के लिये, उभ्युस्थितम् = उद्यत हुए, गृत्समदम् ऋषि को, कपिजलः = कपिजल नामक सोन पक्षी ने, अभिववाशे फलसिद्धि सूचक सम्मुख शब्द किया । तदभिवादिनी उसी अर्थ को कहने वाली, एषा = यह, ऋक् = ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्ते नवमाध्यायस्य पञ्चम. खण्डः । “भद्रं वद दक्षिणतो भदमुत्तरतो वंद । भद्रं पुरस्तान्नो वद भद्रं पश्चात्कपिञ्जल" इति । गृत्समद' नामक हमारे लिये, बोल । सा इति - पता नहीं कि, यह मन्त्र कहां का है। कपिजल = हे कपिजल ! तू, नः = दक्षिणतः = दाहिनी तरफ से, भद्रम् = कल्याणप्रद शुभ वचन, वद = वोल । उत्तरत: - बाई तरफ से, भद्रम् - कल्याणप्रद शुभ वचन, वद = बोल । पुरस्तात् = सम्मुख तरफ से, भद्रम् = कल्याणप्रद शुभ वचन, यद - बोल और पश्चात् = पृष्ठ (पीठ) तरफ से, भद्रम् - वल्याणप्रद शुभ वचन, वद - सा निगदव्याख्याता । वह यह ऋचा, निगदम्याख्याता कथित व्याख्याक है । अर्थात् सरल होने से अपने शब्दो से ही अपने अर्थ को कह रही है। अतः इसकी व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं । गृत्समदो गृत्समदनः । गृत्स इति मेधाविनाम, गृणातः स्तुतिकर्मणः । गृत्समदनः = गृत्समदन, गृत्समदः = गृत्समद कहा जाता है। गृत्सः इति = गृत्स पहा मेधाविनाम = मेघावी अर्थात् अर्थ धारण करने वाली वुद्धिवाले का नाम है । स्तुतिकर्मणः = स्तुत्यर्षक गृणाते: 'गृ' धातु से बना है । जो गृत्स = स्तुति करने से मद = मदन = हर्ष को प्राप्त होता हो वह 'गृत्समद' कहा जाता है । अर्थात् 'गृणाति इति गृत्सः स्तुतिः' इस विग्रह मे । शादे' धातु से पृषोदरादित्वात् सक् (स) प्रत्यय, प्वादिस्वात् पातु को हस्व, 'हस्वस्य पिति कृति तुक इस सूत्र से पित्त्याभावेऽपि छान्दसत्वात् तुक् (द) आगम होने पर गृरस शब्द बना है और 'गृत्सेन %3D - mr मदन्तेः । निरुक्त नवमाध्यायस्य पवमी खण्डः । (१३३५) मादयते इति गृत्समद ' इस विग्रह में गृत्स पूर्वक 'मद तृप्तियोगे' धातु से अच् प्रत्यय, णिलोप, हस्व होने पर गृत्समद शब्द बना है। जो स्तुति से हलु तथा मेघावी हो वह गृत्समद कहा जाता है। ऋपि का नाम है। मण्डूकाः। मण्डूक मेढक का नाम है। इसका निर्वचन यास्क स्वय करते हैं- मण्डूकाः मञ्जूकाः मञ्जनात्, मदतेर्वा मोदतिकर्मणो मन्दत्तेर्वा तृप्तिकर्मणः । मण्डूकाः = मण्डूक, मञ्जूकाः मञ्जूक कहे जाते हैं । मञ्जनाद - मजन करने से = जल मे डूबने से मेढक जल मे मग्न रहता है । अतः इसको मण्डूक कहते है। अर्थात् ' मञ्जन्ति इति मण्डूकाः' इस विग्रह मे 'टुमस्जो शुद्धी' घातु से 'शलिमण्डिभ्यामुकम्' इस उणादि सूत्र से बाहुलकाव ऊकण् (उक) प्रत्यय, मज् ऊक, पृषोदगदित्वात् जकार को उकार और सकार को णकार होने पर मण्डूक शब्द बना है। मेढक का नाम है। क्योंयि, मेढक जल में सदा मज्जन करता है। मोदतिकर्मणः - मोदति (हर्ष) अर्थक, मदतेः नरुक्त मद धातु से, वा = अथवा, तृप्तिकर्मणः - तृप्ति अर्थक, मदि धातु से मण्डूक शब्द बना है। अर्थात् 'मदन्ति मोदन्ते इति मण्डूका: इस विग्रह में हर्थिक नरुक्त मद धातु से 'शलिमण्डिम्यामूकण्' इस उणादि सून से बाहुलकात् मद घातु से भी ऊकण् (ऊक) प्रत्यय, मद् उक, पृपोदरादित्वात् नुम णत्व, दकार को उकार हाने पर मण्डूक शन्द वना है । मेढक का नाम है । क्योकि, वे सदा ही मोदयुक्त रहते हैं । अथवा 'मन्दन्ते इति मण्डूका' इस विग्रह मे 'मदि तृप्ति मोदमद स्वप्न कान्तिगतिपु' धातु से उक्त उणादि सूत्र से वाहुलकाद ऊकण् प्रत्यय, मन्द् ऊक, दको ड और न कोण होने पर मण्डूक शब्द बना है। मेढक का ही नाम है। क्योकि, वे सदा हो तृप्त रहते हैं । मण्डयतेरितिवयाकरणाः । मण्डयते: - चुरादि मडि धातु से मण्डूक शब्द बना है, इति = मह, वैयाकरणाः = वैयाकरण लोग मानते हैं। अर्थात् 'मण्डयन्ति इति मण्डूकाः' इस विग्रह में 'मडिभूपायाम्' धातु से पूर्वोक्त उणादि सूत्र से वाहुक्काव ऊकण प्रत्यय, णि लोप होने पर मण्डूक शब्द बना है। 'मण्डूकार' मह प्रपमा बहुवचनान्त है । मेढक का नाम है। क्योकि, ये जल को भूपित करते हैं । मण्ड एपामोक इति वा। अथवा,, मण्डे - जल मे, एपाम् इन का, मोकः = निवास होता है, इति लिये वे मण्डूक कहे जाते हैं। अर्थात् 'मन्दन्ते हृष्यन्ति स्नानपानापिनः जनाः अस्मिन् इति मण्ड: उदकम् ' इस विग्रह मे उक्त मदि धातु से 'गेहेकः' इस सूत्र से वाहुलकाद क (अ) प्रत्यय और पृपोदरादित्यात् दकार को हकार एवं नकार को गकार होने पर मण्ड शब्द बना है। जल का नाम है। क्योकि, जल में स्नानपानाद्यर्थी जन स्नान पानादि करते समय यत्यन्त हर्ष को प्रप्त होते हैं। 'उध्यति समवैति अस्मिन् इति ओक: गृहम् ' इस विग्रह में परस्मैपदी 'उच समवाये' धातु ' इगुपयज्ञाप्रीकिरः कः' इस सूत्र से क (अ) प्रत्यय, उच् अ, 'ओकउ चः के' इस सूत्र के नियासन से . . वा = .
निरुक्ते नवमाध्यायस्य पाठ खण्डः । गुण और कुत्व होने पर 'ओक' शब्द अदन्त बना है। निवास स्थान गृह का नाम है। क्योकि, गृह मे सब कोई एक दूसरे के साथ मिल जुल कर रहते है। 'मण्डे उदके भोक निवासस्थानम् गृहम् येषाम् ते मण्डूका इस विग्रह मे 'अनेकमन्यपदार्थे' इस सूत्र से बहुव्रीहि समास, सुप् लुक्, मण्ड ओक, वृद्धि, मण्डौक, पृषोदरादित्वात् औ को ऊ होने पर मण्डूक शब्द बना है। मेढक का नाम है । क्योकि इसका जल मे ही निवास स्थान (गृह) होता है। ओक शब्द अदन्त और ओकस् शब्द सान्त भी हैं। दोनो गृह वाचक हैं। उन मे बोक्स् शब्द असुन प्रत्ययान्त है। वह यहा नही है। यास्क मण्ड शब्द का निर्वचन करते हैं- मदे या मण्ड मण्डो मदेर्वा मुदे । मद तृप्तियोगे' धातु से, वा = अथवा, मुदे वा - 'मुद ससर्गे' धातु से, = मण्ड शब्द बना है। अर्थात् 'मादयन्ते तृप्ति प्राप्नुवन्ति स्नानपानापिन अस्मिन इति मण्ड उदकम् ' इस विग्रह मे मद घातु से 'गेहेक इस सूत्र से फ (अ) प्रत्यय पृषोदरादित्वात् नुम और दकार को डकार होने पर मण्ड शब्द बना है। एवं मोदयन्ति अस्मिन् इति मण्ड उदकम् इस विग्रह मे 'मुदससर्गे' धातु से 'इगुपधज्ञाप्रीकिर व इस सूत्र से क (म) प्रत्यय, पृषोदरा. दित्वात् उ को अ, णवार उपजन और दवार को डकार होने पर मण्ड शब्द बना है। जल का नाम है। क्योकि, जल मे स्नानादि करके सब कोई आनन्द को प्राप्त होते हैं। तेपामेपा भवति । इति निरुक्तं नवमाध्यायस्य पश्नम सण्ड । ९-५ । तेषाम् = उन मण्डूको की, एपा = यह कचा, प्राधान्यस्तुतिस्पा, भवति = है- अथ निरुक्त नयमाघ्यायस्य पष्ठ खण्ड । संवत्सरं शशयाना ब्राह्मणा व्रतचारिणः । वाचं पर्जन्यजिन्यिता प्र मण्ड्का अत्रादिपुः ॥ मस ५-७-३-१।। इस मन्त्र का परिष्ठ प्रपि, मनुष्टुप् छन्द और मण्डूव देवता है । मन्त्रा-एक समय की बात है पि, वसिष्ठ पि ने वर्षा की कामना से पर्जन्य (मेघ) की स्तुति की। मण्डूको ने उनका अनुमोदन मिया। अनुमोदन करते मण्डूरी को देस वर घसिप्ठ उन की स्तुति करते हैं--प्रतचारिण. एक वर्ष का प्रत करने वाले, ग्राह्मणा स्तुति करने वाले प्राहाणा के समान, मवत्सरम् वर्ष पर्यन्त, शण्याना- विल में सोये हुए रह कर, मण्डूवा - मटूवगण ( (मेहरगम), निरुक्त नवमाध्यायस्य सप्तमः खण्ड।। पर्जन्यजिन्वताम् = पर्जन्य मेघ के लिये प्रसन्नताकारक, वाचम् = वाणी, प्र अवादिषुः = वोलते हैं । इस मन्त्र में मण्डूक शब्द है और मण्डूक को प्रधानस्तुति है । अतः यह उन का उदाहरण मन्त्र है। इस मन्त्र का भाष्य- संवत्सरं शिष्याना ब्राह्मणा व्रतचारिणो ब्रुवाणाः । अपियोपमार्थे स्यात् । ब्राह्मणा इव व्रतचारिण इति । बाचं पर्जन्यप्रीतां प्रावादिपुर्मण्डकाः । संवत्सरम् = एक वर्ष पर्यन्त, शिष्यानाः = न बोलने से सोये हुए के समान, व्रतचारिणः ब्राह्मणाः = मौन आदि व्रत का आचरण करने वाले ब्राह्मण लोग, ब्रुवाणा: = बोलते हैं। अपिवा = मथवा, उपमार्थे = उपमा के अर्थ में, स्यात् = हो सकता है, जैसे--प्रतचारिणः प्राह्मणाः इव - वर्षभर व्रत करने वाले ब्राह्मणो के सदृश, मण्डूकाः = मेढकगण, पर्जन्यप्रीताम् = मेघ के लिये प्रसन्नताकारक, पाचम् = वाणी, = प्रवादिपुः = बोलते हैं । अर्थात् जैसे ब्राह्मण वंटुक उपाकरण संस्कार करके वकाल में पवित्री तथा मेखला आदि धारण कर नियत काल वैदिक वाणी बोलते हैं वैसे ही ये मण्डूकगण एक वर्ष तक विल में रह कर वेद समान बोली बोल रहे हैं । इस प्रकार इस मन्त्र में मण्डूकों की स्तुति है । अतः यह मन्त्र मण्डूक को प्रधान स्तुतिम उदाहरण मन्त्र है। मन्त्र की अवतरणिका- वसिष्ठो वर्ष कामः पर्जन्यं तुष्टाव, तं मण्डूका अन्यमोदन्त । स मण्डूकाननुमोद- मानान्दृष्ट्वा तुष्टाव, तदभिवादिन्येपर्भवति- इति निरुक्ते नवमाध्यायस्य पष्ठः खण्डः । ६-६॥ वसिष्ठः घसिप्ठ मुनि ने, वर्षकामः = वर्षा की कामना से, पर्जन्यम् - मेघ की, तुष्टाव - स्तुति की, मण्डूकाः = मण्डूकों ने, तम् = उसका, अन्वमोदन्त = अनुमोदन किया। सः = उस ऋपि ने, अनुमोदमानान् = अनुमोदन करते हुए, मण्डूकान् = मण्डूको को, दृष्ट्वा तुष्टाव = स्तुति की। तद् अभिवादिनी = उसको कहने वाली एषा ऋक् = यह अग्रिम भाषा, भवति मथ निरक्त नवमाध्यायस्य सप्तमः खण्डः । उप प्रबंद मण्डूकि वर्ष मा वद तादुरि । मध्ये हृदस्य प्लवखं विगृह्यं चतुरः पदः ॥ ( मन्त्रोऽन्वेषणीयः) मन्त्रार्प-मण्डकि - है मेढको ! तुम, मा - मेरे, उपप्रपद = पास आकर बोलो। वारि हे तरने के स्वभाव वालो!, वर्षम् वद - वर्ष पर्यन्त बोलो। हदस्य मध्ये - यागाध जल के बीच मे, पतुरः पदः = चारों परों को, दिगृत्य = फैला फर, प्लस्य - तरते तेरते कार यात्रो। देख कर, - इति सा - - इस लिये भी ये, . (१३३८) निरुक्ते नवमाध्यायस्याष्टमः खण्डः । इति सा निगदव्याख्याता। वह यह ऋचा, निगदव्याख्याता = पाठमात्र से सुगम होने से व्याख्यात है। इस की व्याख्या करने को आवश्यकता नहीं, मेढकों के बोलने से वसिष्ठ को हर्प इस लिये, हुआ कि, एक तो उन का अनुमोदन किया और दूसरा मेढको के बोलने से उनको खातरी हुई कि, निस्ट भविष्य मे वर्षा अवश्य होगी। ४ अक्षा: । जुआ खेलने के पासा को अक्ष कहते हैं । ' अक्षा:' यह प्रथमा बहुवचनान्त है। कहीं 'अक्ष इस प्रकार एकवचनान्त प्रयोग भी मिलता है। इसका निर्वचन भाष्यकार करते है- अक्षा अश्नुक्त एनानिति वाऽभ्यश्नुक्त एभिरिति वा । जुआरी लोग, एनान् = इनको, अनुक्ते = अशन अर्थात् व्यापन करते हैं, इति = इस लिये ये, अक्षाः = अक्ष = पासा कहे जाते हैं, वा = अथवा, एभिः = इस के द्वारा जारी लोग, एक दूसरे से, धन को, अम्मनुवते - अशन करते है अर्थात् ले लेते हैं। इति अक्षा: = अक्ष कहे जाते हैं । 'अनुवते व्याप्नुवन्ति एनान् इति अक्षा: इस विग्रह में 'मशू व्याप्ती संधाते च' धातु से 'अशेर्देवने ' इस उणादि सूत्र से कर्ता में स प्रत्यय, 'वश्वभ्रस्ज' इत्यादि सूत्र से शकार को पकार, 'पढोः कः सि' इस सूत्र से पकार को ककार, 'आदेशप्रत्यययोः' इस सूत्र से सकार को पकार, कपसंयोग क्षः होने पर भक्ष शब्द बना है । पासा का नाम है। क्योकि, खेलने वाले जुआरी लोग हाथों से इसे व्याप्त करते हैं। अथवा, 'अभ्य नुवते धनं गृह्णन्ति एभिः इति अक्षाः' इस विग्रह में पूर्वोक्त उणादि सूत्र से करण मे स प्रत्यय, पत्व, कत्व, पत्व पूर्ववत् होने पर अक्ष शब्द बना है। पासा का ही नाम है। क्योकि, इस के द्वारा जुआरो लोग एक दूमरे का धन ले लेते हैं। तेपामेया भवति। इति निरुक्ते नवमाध्यायस्य सप्तमः खण्डः । ९-७ ।। तेषाम् - उन अक्षो को, एपा यह अग्रिम ऋषा, स्तुतिरूप, भवति - अथ निरुक्त नवमाध्यायस्याष्टमः खण्डः । प्रावेपा मां वृहतो मादयन्ति प्रवातेजा इरिणे वतानाः । सोमस्येव मौजवतस्य भक्षो विभीदको जारांविर्मह्यमच्छान् ॥ ऋ सं. ७-८-३-१ ।। इस मन्त्र का कवप ऋषि, निष्टुप् छन्द और अक्ष देवता है । मन्त्रार्थ-एते अक्षाः = ये सब पासे, प्रावेपाः = बहुत कांपने वाले वृहतः = बड़े वृक्ष के हैं । अर्थात् किमो बहुत कांपने वाले वृक्ष से : । । निरुक्त नषमाध्यायस्याष्टमः खण्डः । (१३३९) बने है। प्रवातेजाः = बहुत वायु के वा जल के स्थान मे वा काल में उत्पन्न हुए हैं। इरिणे धर्वताना 'हरिण में उत्पन्न हुए हैं अर्याद जहा पुत्र पौत्र आदि तक ऋण नहीं जाता है किन्तु अपने तक ही रहता है ऐसे स्थान में उत्पन्न हुए हैं। मौजवतस्य - मुजवान नामक पर्वत पर उत्पन्न हुए हैं। सोमस्य भक्षः इव %3D सोमके भक्षण के समान, मा = मुझे, मादयन्ति = हर्षप्रदान करते हैं। और जो, विभीदक. - कोष्ठका भेदन करने वाला, जागृवि. = जाग्रण करने वाला है। एवं, मह्यम् . मेरे लिये, अच्छान् = इनकी प्रशंसा करता है । इस प्रकार इस मन्म मे अक्ष की स्तुति है। इस मन्त्र का मास्क भाष्य- प्रवेपिणो मा महतो विभीदकस्य फलानि मादयन्ति प्रपातेजाः प्रवणेजाः । ये सब जुआ के पासे, प्रवेपाः - प्रवेपिण = बहुत कापने वाले, वृहत्ता महत - बडे पक्ष हैं। विभीदकः = विभीदकस्य कोप्ठ का भेदन करने वाले वृक्ष के, य, फलानि • फल है। भवातेजाः = प्रवणेजाः = बहुत वायु के वा जल के स्थान मे वा फाल मे उत्पन्न हुए हैं और, मा. मुझे, मादन्ति - हर्पित करते हैं। इरणे वर्तमाना: । हरणं निर्मणम् , ऋणातेरपाणं भवति । अपरता अस्मादोपधय इति या। सोमस्येव मौजवतस्य मक्षः । मौजवतो पूजवति जातः । मूजवान् पर्वतो मुजवान् । हरणे = जहा पुत्र पौत्र आदि तक ऋण नही जाता है किन्तु अपने तक हो रहता है ऐसे स्थान में अक्ष, वर्वृतानाः - वर्तमानाः = वर्तमान हैं - उत्पन्न हुए हैं। निर्मणम् = प्राण रहित, हरणम् = इरण कहा जाता है। अर्थात् जुआ मे हारने से जो ऋण (कर्ज) होता है वह हारने वाले के पुत्र पौत्र आदि तक नहीं जाता है। किन्तु उस पुरुष तथा उसी स्थान में रहता है। ऋणातेः = ऋ धातु से, ऋण शब्द बना है । ' अर्यते इति अणम्' इस विग्रह में 'ऋ गतो' पातु से 'निष्ठा' इस सूत्र से क्त (त) प्रत्यय, मत, प्रणमाघमण्ये' इस सूत्र के निपातन से त योग, होने पर ऋण शन्द बना है। कर्ज का नाम है। इरण : निण, अपाणं भवति = अपगत ऋण होता है। या = अथवा, अपरताः । गई हुई. ओषधयः - ओषधिया होती हैं, अस्माव इति = यह अर्थ हरण शब्द का है। अर्थात ऊपर भूमि का नाम इरण है ! क्योकि, ऊपर भूमि में थुछ उपजता नहीं है। मौजवतस्य सोमस्य भक्षः इव मुजवान नामक पर्वत पर उत्पन्न सोम के भक्षण समान । मूजवति = मूजवान में, जात. : जो उत्पन्न हुआ हो वह, मौजवत = मौजवत यहा जाता है । मूजवान् = मूज वाला, पर्वतः पर्वत, मुन्जवान् = मुजवान् कहा जाता है। मुजः विमुच्यत इपीकया । इपीका इपगतिकर्मणः । इयमपीतरेपीतस्मादेव । इपीकया इपीका तुल (सींक) से जो, विमुच्यते कहा जाता है। कुश नाम का हण में से एक एव इपीका (पह) निकाली जाती है । यत. एक एक से मुक्त होने से मुज कहा जाता है। गतिरमण = गत्यपंक, पते शब्द बना है। 'इप्यति इति इपीका' इस विग्रह में 'इप गतौ' धातु से उणादि का प्रय, मुक्त होता है यह, मुजः - मृञ - इप धातु से, पोका: = पोका -- - 1 . (१३४०) निहते नवमाध्यायस्याष्टम खण्ड । और टाप होने पर इपीका शब्द बना है। इयम् अपि = यह भी जो, इतरा = दूसरी हल की इषा, इपीका = इषोका है वह भी, एतस्मात् एव = इसी इष धातु और ईकक प्रत्यय से बना है ऐसा समझना चाहिये । क्योकि, वह भी हल से निर्गत होती है। विभीदको विमेदनात् । जागृविर्जागरणात् । मह्यमच्छदतू । प्रशंसत्येनान्प्रथमयां । निन्दत्युत्तराभिः । ऋपेरक्षपरियूनस्यैतदार्प वेदयन्ते । विभेदनात् = कोष्ठ वा मित्रो मे भेद उत्पन्न करने से विभीदक = अक्ष (पासा) विभीदक कहा जाता है। 'विभिद्यते इति विभीदक अक्ष इस विग्रह मे विपूर्वक 'भिदिर् विदारणे' धातु ण्वुल्तृवी' इस सूत्र से कर्मणि ण्वुल (बु) प्रत्यय, 'युयोरनाको' इस सूत्र से यु को अक मादेश और वाहुलकाव उपधा ईत्य होने पर विभीदक शब्द बना है। जागरणाव - जागरण करने से अक्ष, जागृषि कहा जाता है। जागति जागरयति इति जागृषि अक्ष इस विग्रह मे अन्न वित ण्यर्थक 'जागृ निद्राक्षये' धातु से ‘जशस्तृजागृम्प क्विन्' इस उणादि सूत्र से क्विन् प्रत्यय, ककार नकार को इसज्ञा लोप, वि मे इकार अनुनासिक न होने से इसज्ञा का अभाव, कित्त्वात् गुणाभाव होने पर 'जागृवि' शब्द बना है। प्रायः जुआ रात्रि को खेला जाता है। अत मक्ष जागरण कराने वाला है । अथवा जुआ खेलने में जो हार जाता है वह शोक से और जो जीत जाता है वह हर्ष से जागता रहता है। मह्यम् = मेरे लिये, अच्छान् = अच्छदत् - अवगुण को ढाकता है अर्थात् प्रशसा करता है। इसी को कहते हैं-प्रथमया = ऋचा के पूर्वाधं से, एनान् इन अक्षो की, प्रशसति प्रशसा करता है और, उत्तराभि ऋचा के उत्तरार्ध से एनान् अक्षो की, निन्दति = नि दा करता है। अक्षपरियूनस्य = अक्षपरिवून नामक, प्रापे मपिका, एसत् - यह आर्षम् - आर्ष है यह वेदयते कहते हैं । अर्थात् इस मन्त्र का कवप ऋपि है यह कहा गया है। उसी को अक्षपरिवून भी कहते । क्योकि परिदेवन विलाप को कहते हैं। उसको जो करे उसको परिधन रहते हैं। और अक्ष का पुत्र है । अत इस को अक्षपरिघुन कहते हैं । ग्रावाणः। 11 ग्रावन शिला अर्थात् पत्थर का नाम है। इसका निर्वचन करते हैं- ग्रावाणो इन्तेर्वा, गृणातेर्वा, गृहातेर्वा । - हन् पातु से वा = अथवा, गृणाते = गृ धातु से, वा = अथवा, गृह्णाते ग्रह धातु से, ग्रावाण - ग्रावन् शब्द बना है। अर्थात् 'त्ति इति प्रावाण,' इस विग्रह मे 'हन हिंसागत्यो पातु से 'अन्मेभ्योऽपि दृश्यन्ते' इस सूत्र से कनिप् (वन्) प्रत्यय पृषोदरादीनि पयोपदिष्टम् ' इस सूम से हन् पातु के स्थान मे 'मा' आदेश होने पर ग्रामन् शब्द बना है। शिला का नाम है। क्योकि, शिला से हनन किया जाता है। शिला लगने पर हिंसा होती है। अथवा 'गृणन्ति शब्द ' दुर्वन्ति इति ग्रावाण ' इस विग्रह में 'गू शदे' धातु से कनिप् प्रत्यय और धातु को प्रा आदेश होने पर ग्रावन् शब्द बना है। शिला का नाम है। पयोकि, शिला शरद करता है। अथवा 'गृह्यते इति ग्रावाण ' इस विग्रह म ग्रह उपादाने' धातु से पूर्ववद पनिप् प्रत्यय और %3D D - नियक्त नवमाध्यायस्य नमः खण्डः । ग्रह घातु को ग्रा आदेश होने पर ग्रावन् शब्द बना है। शिला का नाम है। क्योकि शिला पत्थर कूटने आदि क्रिया के लिये ग्रहण किया जाता है । 'ग्रावाण.' यह ग्रावन् शब्द का जस् का रूप है। तेपामेया भवति । इति निरुक्ते नवमाध्यायस्याप्टमः खण्डः ।। ९-८ ।। तेषाम् - उन ग्रावों की स्तुति को, एषा = यह ऋवा, भवति = है- अथ निरक्त नवमाध्यायस्य नवमः खण्डः। प्रेते वंदन्तु प्र वयं वदाम ग्राभ्यो वाचे वदता वद्भयः । यद्रयः पर्वताः साकमाशवः श्लोकं घोषं भरथेन्द्राय सोमिनः ॥ क सं. ८-४-२९-१॥ इस मन्त्र का अर्बुद ऋषि, जगती छन्द और सोमभिषव सम्बन्धी प्रावणि देवता है। मन्त्रा-एते - ये ग्रावास प्रस्तर सब, प्रवदन्तु - अभिषव शब्द करें । वयम् - हम यजमान लोग, वैदद्भयः = अभिपव शब्द करने वाले, ग्रावभ्यः = पत्थरो की, वाचम् प्रवदाम = स्तुति करते हैं। है ऋत्विगर्जन ! तुम लोग भी, वदतं - स्तुति करो। अद्रय - आदरणीय दृढ, माशव. = सोमाभिपव के लिये शीघ्रकारो, सोमिनः । सोमवाले, पर्वता. - प्रेस्तर, इन्द्राय - इन्द्र के लिये, साकम् = एक सार्थ, "लोकम् घोषम् भरथ = स्तोतव्य अभिपंव शब्द फरें। अर्थाद सब कोई मिल कर इन्द्र की स्तुति फेरों । इसे मन्त्र मे ग्रान् शन्द शिला वाचक है । इस मन्त्र का भाष्य--- प्रवदन्त्येते, प्रवदाम वयम् , ग्रावम्यो वाचं वदत वदद्भयोः यदद्या पर्वता अदरणीयाः सह सोममाशवः क्षिप्रकारिणः । एते = ये प्रस्तार सब, प्रवदन्तु = स्तुति करें। वयम् प्रपदाम, - हम यजमान सव स्तुति करते हैं । यद् अदद्भय : यद् बद्रया बादरणीय अभिपव शब्द करने वाले, पर्वताः अदरणीयाः आदरणीय दृढ, सोमम् सह = सोम के साथ, आशव. = क्षिप्रकारिणः = सोमाभिषष के लिये शोध कार्य करने वाले, ग्रावम्य. = पत्थरो की । श्लोकः शृणोतेः। योपो धुभ्यतेः। लोकः : मन्त्रगत लोक शब्द, शुणोतेः श्रु श्रवणे धातु से बना है। अर्थात् 'श्रूयते प्रशस्यो इति श्लोकः' इस विग्रह मे 'धू श्रवणे' धातु से 'इणभोक' इत्यादि उणादि सूत्र से वाहुलका कनि (क) प्रत्यय, श्रु क, गुण श्रोक, कपिलादित्वाव र को ल होने पर श्लोक शब्द बना है कविता का नाम है। क्योकि, कपिता प्रशसनीय होती है । घोषः = मन्त्रगत भोप शम्द, धुप्यते. - D न (१३४२) निरुक्ते नवमाध्यायस्य दर्शमा खण्डः । घुपिर धातु से बना है। अर्थात् 'घुप्यते शब्द्यते इति घोषः' इस विग्रह में शब्दार्थक घुपिरं धातु से 'हलश्च' इस सूत्र से कर्म मे घन (अ) प्रत्यय और उपधा गुण होने पर घोप शब्द बना है। शब्द अर्थ है । क्योकि, सोम फूटते समय ग्रावाण से शब्द उत्पन्न होता है । सोमिनो यूयं स्थेति वा सोमिनो गृहेष्विति वा । यूयम् तुम्, सोमिनः = सोम वाले, स्थ हो, इति वा = यह अर्थ है अथवा, यूयम् - तुम, सोमिनः सोम वाले यजमान के, गृहेषु = घरो मे रहते हो, इति वा = यह अर्थ है। प्रथम पक्ष में 'सोमिनः' को प्रथमा बहुवचनान्त और द्वितीय पक्ष में पष्ठी वहुवचनान्त मान कर दो अर्थ किया गया है। नाराशंसः। मनुष्यप्रशंसापरफमन्त्र नाराशंस कहा जाता है। एवं उस सूक्त के (म, १, सूक्त .१२६) देवता भी नाराशस कहा जाता है । 'नरन्ति पूरुषान् उत्तमा गति नयन्ति इति नरा: मनुष्या: ' इस विग्रह में 'नू नये' धातु से पचाद्यच्, और रपर गुण होने पर 'नर' शब्द बना है। मनुष्य का नाम है । पयोकि, मनुष्य अपने पूर्वजो को तर्पण आदि द्वारा स्वर्गादि उत्तम लोक को पहुंचाता है । 'नरान्शंसति इति नराशसः मन्त्रः' इस विग्रह मे नर उपपद 'शंसु स्तुती' धातु से 'कर्मण्यण' इस सूत्र से अण् प्रत्यय, उपपद समास, 'अन्येषामपि दृश्यते' इस सूत्र से पूर्व पद को दीर्घ होने पर नराशस' शब्द बना है । अथवा 'नराः प्रशस्यन्ते येन स नराशसः मन्त्रा' इस विग्रह मे पूर्वपद, अण, समास पूर्वपद दोघं होने पर 'नराशंस' शब्द बना है 'नराशंस एव नाराशंसः' इस विग्रह में नराशंस पाब्द से 'प्रज्ञादिभ्यश्च' इस सूत्र से स्वार्थ मे अण् (अ) प्रत्यय, आदि अच् वृद्धि होने पर नाराशस शब्द बना है । मन्त्र विशेष का नाम है । क्योकि, मन्त्र द्वारा नर अर्थात राजविशेष की स्तुति की जाती है। भाष्यकार इसी को कहते हैं- येन नरा: प्रशस्यन्ते स नाराशंसो मन्त्रा। जिस से, नरा: - मनुप्य, प्रशस्यन्ते - स्तुति किये जाते हैं, सः मन्त्रः ='वह मन्त्र विशेष, नारायसः - नाराशंस कहा जाता है । क्योंकि, उस मन्त्र से नरों की प्रशंसा की जाती है। . -- - . . तस्यैसा भवति । f इति निरुक्ते नवमाध्यायस्य नवमः खण्डः। ९-९ ।। तस्य • उस नाराशंस को, एपा = यह अप्रिम ऋचा, भवति है- - + भ अथ निरुते नवमाध्यायस्य दशमः खण्डः।
-- . निरुक्ते, नवमाध्यायस्य दशमः खण्डः । (१३४६) अमन्दान्त्सोमान्त्र भरे मनीषा सिन्धावधि क्षियतो भाव्यस्य । यो में सहस्रममिमीत सवानतृतॊ राजा श्रव इच्छमानः ॥ ऋ सं. २-१-११३॥ इस मन्त्र का कक्षीवान् ऋषि,' त्रिष्टुप् छन्द और भावयव्य देवता है । मन्त्राथ–महपि कसीवान कहते हैं कि, अहम् मैं, तस्य - उस, सिन्धो = सिन्धु देश मे का सिन्धु तौर पर, क्षियत = वसने वाले, भाव्यस्य - भावयव्य राजा को, मनीपा = बुद्धि से, अमन्दान् = वहत, स्तोमान = स्तुति, प्रभरे- करता हूँ। या जिस राजा ने, अतूतः विना घबराहट के, श्रव. इच्छमानः - अखण्ड, कीतिको इच्छा करते हुए, मे = मेरे, सहस्रम् = हजार, सवान् = यज्ञो को, अमिमीत = सिद्ध किया है। इस मन्त्र से भावयव्य राजा रुप नर को प्रशसा की गई है। अत. यह मन्त्र नाराशस कहलाता है। , D इस..मन्त्र का यास्क भाध्य- + अभन्दान् स्तोमानवालिशाननल्पान्वा । पालो बलबी भर्तव्यो भवति । अम्बारमा अलं भवतीति वा । अम्बास्मैवलं भवतीति वा । पलो वा प्रतिपेधव्यवहितः । प्रमरे मनीपया मनस ईपया स्तुत्या प्रज्ञया वा सिधा वधि निनसतो भावयन्यस्य राज्ञो यो मे सहवं निरमिमीत सवानतूतॊ राजाऽतूर्ण इति वाऽत्वरमाण इति वा प्रशंसामिच्छमानः । 7 नि 1 इति निरुक्तानवमाध्यायस्प दशमः खण्डः। ७-१० ॥ -- - , अमन्दान् = अबालिशान - अनल्पान् वा = जो मूों के योग्य नही ऐसे वा बहुतघनीभूत ऐसे, स्तोमान - स्तोम अर्थात् स्तुतियो को। बलवर्ती = माता के बल में रहने वाला, अत एक, भर्तव्यः - पालन करने योग्य जो, भवति - होता है वह, बाल. = वाल कहा जाता है । अर्थात् 'बलति इति बाला इस विग्रह मे ‘बल प्राणने' धातु से ' 'ज्वलतिकसन्तेभ्यो नः इस सूत्र से ग (अ) प्रत्यय, उपधावृद्धि होने पर बाल शब्द बना है। बालक का नाम है। क्योकि यह किसी प्रकार प्राण का धारण करता है। इसी लिये वह मर्तव्य है। माता आदि द्वारा भरणपोषण करने योग्य है। वा- अपवा, अम्बा - माता, अस्मै = इस (बालक) के लिये, अलम् पर्याप्त रूप से यश में, भवति = होती है, इति = इस से, वा = अथवा, अभ्या माता, अस्मै - इस के लिये, बलम् - यल, मयति - होवो है, इति - इस लिये यह बाल कहा जाता है। वा-अया, बल:- बल इस मे, प्रतिपेष ध्यवहित. प्रतिषेध व्यवहित है अर्थात् नही है। इस लिये वाल हा जाता है । अपात 'मम्या असम् अस्म स माल.' इस विग्रह में अम्बा और अलम्मा समास: पृषादरादिरवाद अम्मा के अम् का और अलम के म.सा लाप, का अल, सवण दीपं होन पर 'वाल' पद बना है, मौर, 'अम्वा बलम् अस्म इति बाल.' इस विग्रह में पूर्ववत् अम्बा और या समारा, अम्बा के सम्मा लोप मौर बसफे व वा झोप होने पर बाल पद बना है । एव 'न बल यस्य इति बाल.' इस विग्रह में म मा मौर बल मा बहुप्रीहि समास, नपारमा झोप, मबस, भसार यो विपर्यय से य के आगे कर के दो .
E D सिन्धु देश में 1 (१३४४) निरुक्ते नवमाध्यायस्यैकादशः खः । करने पर बाल शब्द बना है। यही बल का प्रतिपेघ बाल कहा जाता है। मनीपया मनसः ईपया स्तुरया प्रज्ञया वा - स्तोत्र से वा बुद्धि से, प्रभरे = स्तुति करता हूँ। - सिन्धो अघि वा सिन्धु नदी के तट पर, निवसत: निवास करने वाले, भावयव्यस्य - भावयव्य नामक, राज्ञः%D राजा को, यः = जो, मे मेरे, सहस्रम् सवान् = हजार यज्ञो को, अतूर्तः = विना घबराहट के, निरमिमीत = निर्माण किया है। राजा = उक्त राजा, प्रशसाम् इच्छमानः = अटूट कीत्ति की इच्छा करते हुए, अतूर्णः - विना घबराहट के, इति वा = यह अर्थ है अथवा, अरवरमाणः = विना वेग के, इति पा - यह अर्थ है। स्था । रथ नाम वाहन विशेष का है। इस का विवरण स्वय भाष्यकार करते हैं- अथ निरुक्ते नवमाध्यायस्यैकादश: खण्ड । यज्ञसंयोगाद् राजा स्तुति लमेत | राजसंयोगाद् युद्धोपकरणानि । तेषां रथा प्रथमगामी भवति । पूर्व प्रकृत मन्त्र में कक्षीवान् ऋषि ने, यह वहा कि, भावयव्य राजा ने हज़ार यज्ञ का निर्माण किया। इस लिये मैं उसकी स्तुति करता हूँ। अतः, यज्ञसयोगात = यज्ञ के सयोग से, राजा राजा, स्तुतिम् - स्तुति को, लभेत = प्राप्त हो और, राजसयोगाद में राजा के संयोग से युद्धोपकरणानि - युद्ध के उपकरण (साधन) रथादि हैं। तेषाम् = उन साधनो मे, रपः = रप, प्रथमगामी - प्रथम चलने वाला, भवति = है । अदि युद्ध के सपनों में 'रथ मुख्य है। क्योकि अन्य साधनो को रथ मे भर कर ले जाते हैं । प्रकृत, रथ शब्द का निर्वचन करते हैं- रथो रहतेर्गसिक्मणः। स्थिरतर्वा स्थाविपरीतस्य । रममाणोऽस्मिस्तिष्ठतीति था। रपतेर्वा, रस्तेर्वा । गतिकर्मणः गत्ययंका, रहते. रहि' पातु से, रथ. - रप शब्द बना है। अदि रहति गति अनेन इति रथ.' इस विग्रह मे 'रहि गती' धातु से 'हनिपि' इत्यादि उणादि सूत्र से पाहलकात् ५५ (प) प्रत्यय, पृपादरादित्वात् नकार और हकार का लोप होने पर रप दाद पना है। था - अपवा, विपरीतस्य - उलटा, स्थिरतेः - नरत स्थिर का, रथः = रय रूप, स्याव हो सकता है । अर्थात् स्थिरति अस्मिन् इति रप., इस विग्रह मे नरुक्त स्थिर घातु से 'पसिसमायो पः प्रायेण' इस सूत्र से घ (अ) प्रत्यय स्थिर म, पोरादित्यात वर्णविपर्यय, स्थिर या विपरीत रस्थि, सकार पार लोप होने पर, रए म, रप शब्द बना है। अनादि पी अपेक्षा रप में स्थिर से बैठ'सरता है। (H 22 - निरुक्त नवमाध्यायस्य द्वादशः खण्डः! (१३४५) वा = अथवा, अस्मिन् = जिस में, रममाणः = खेलते हुए माराम से, तिष्ठति ='वैठता है, प्रति इस अर्थ में, रथः = रय शब्द बना है। अर्थात् ' रमने इति रममाण ' म विग्रह में 'रमु कोडामा' धातु से लट्, पान, मुआगम, होने पर रममाण शब्द बना है। तिष्ठति इति स्यः' इस विह में ष्ठा गतिनिवृत्ती धातु से 'सुपिस्थः' इस सूत्र से क (ब) प्रत्यय, और आ लोप होने पर 'रम' शब्द बना है। दोनो का समास, पृषोदरादित्वात् रममाण के ममाण का और स्य के सकार का लोप होने पर रथ शब्द बना है। इस प्रकार दो धातुओ से रथ शब्द वना है । वा = अथवा, रपतेः = रप धातु से, रयः = शब्द देना है। अर्थात् 'रपति व्यक्त शब्द करोति इति रथः' इस विग्रह में 'रप व्यक्ताया बचि' धातु से, 'हनिकुपि...' इत्यादि उणादि सूत्र से सन् (५) प्रत्यय और पृषोदरादित्वात् पकार लोप होने पर रथ शब्द बना है। रप का नाम है। क्योकि, रथ जब चलता है तब स्पष्ट शब्द होता है। अथवा, रसते. - इस धातु रथ. = रथ शब्द बना है। अर्थात् 'रसति शब्दं करोति इति रयः इस विग्रह में : रस शब्दे' धातु से पूर्ववत् क्थन् प्रत्यय, सकार लोप होने पर. रथ शन्द बना है । रथ का ही नाम है। क्योकि, रथ शब्द करता है। तस्यैपा भवति । इति निरुक्ते नवमाध्यायस्यकादशः खण्डः ॥ ९.११ ।। तस्य - उस पथ की एपा - यह अग्रिम ऋचा, भवति अथ निरुक्ते नवमाध्यायस्य द्वादशः खण्डः ।। वनस्पते वाड्यो हि भूया अस्मत्सखा प्रतरंणः सुवीरः । गोभिः संनद्धो असि वीळयस्वास्थाता ते जयतु जेत्वानि ॥ प्रा. सं ४-७-३४-२६॥ इस मन्त्र का भरद्वाज के पुत्र गर्ग ऋषि. त्रिष्टुप् छद और रय देवता है । मन्त्रार्ययनस्पते - हे बनस्पति निर्मित रय तुम, वो = दृढ अङ्ग वाला, भूया: = हो जाओ। अस्मरसपा- तुम हमारे मित्र, भूयाः - हो जायो । प्रसरण. = बढाने वाले, सुवोरः - सुन्दर शूरवीर पुत्रादि से युक्त, भूपाः हो जाओ । क्योंकि, तुम, गोमि. = गोचर्मसे, सनद - बंधे हुर, असि - हो। मता, पोलयस्य - अपने को या. हमे सुदृढ करो। ते = तुम्हारे हार, थास्थाता-बैठे हुए रपी, मेवानि जीतने योग्य पातुओ को, जयतु - जीते। इस मन्त्र से रप की स्तुति की गई है। इसका भाष्य- वनस्पते बालो हि मास्मत्ससा प्रकरणः सुगीरः कल्याणशीरः। गोमिः सन्नदो असि चीम्यस्वेवि संस्तम्भव । आस्थाता ते जपतु तव्यानि । - .
(१३४६) निरुक्ते नवमाध्यायस्य प्रयोदश. खण्डः । यनस्पते = है। वनस्पति निर्मित रथ | तुम, दृढाङ्गो भव - दृढ, अवयव वाला हो जाओ। भस्मसखा = तुम हमारे मित्र होओ। प्रतरण = बढ़ाने वाला, सुवीर = । याणवीर शोभन पुत्र पौत्रादिसे युक्त हो जाओ। क्योकि, तुम, गोभि सन्नद्ध असि = गोचर्म से बंधे हुए हो । घोलयस्व इति सम्तम्भयस्व = अपने को वा हमे सुदृढ बनाओ। ते = तुम्हारे ऊपर, आस्थाता - बैठे हुए रथी, जेतव्यानि = जोतने योग्य शत्रुओ को, जयतु = जोते । ८ - दुन्दुभिः । दुन्दुभि वाद्यविशेष भेरि का नाम है । भाष्यकार इस का निवंचन करते हैं- 1 - D = वृक्ष कटा दुन्दुभिरिति शब्दानुकरणम् , द्रुमो भिन्न इति या, दुन्दुभ्यतेर्वा स्थाच्छन्दकर्मणः । दुदुभि इति = दु:दुभि यह, शब्दानुकरणम् शब्द का अनुकरण है। अर्थात् 'द्रुम् द्रुम् भि- द्रम द्रुम् मि' इस प्रकार का भेरि के आवाज का अनुकरण है । दुन्दुभि भेरि नगारा पर्याय शब्द है। जब इस को वजाया जाता है तब इस में से 'द्रुमुद्रम् भि-द्रुम्दुम् भि', ऐसा शब्द उत्पन्न होता है । इसी पर से इसका नाम 'दुन्दुभि' पड गया है। दोनो द्रुम् शब्दो के र् और म् का लोप एव न का उपजन होने पर दुन्दुभि शब्द बना है। वा = अथवा, दुन्दुभि शब्द का, द्रुमोभिन्न हुआ है, इति = यह अर्थ है। अर्थात् 'दम' और 'भिन्न' इन दो पदो का बना हुआ एक 'दुन्दुभि' पद है । पृषोदरादित्वात् द्रुम के स्थान में दुन्दु और भिन्न के स्थान मे मि आदेश होने पर दुन्दुभि शब्द बना है। दुन्दुभि द्रुम का अवयव लकडे का बना हुआ और चमसे मढा हुआ होता है । वाम अथवा, शब्द कर्मण = शब्दार्थक नरुक्त, दि प, दुन्दुभ्यते = दुन्दुम् धातु से दुन्दुभि शब्द, स्याव- बना हो । अर्थात् 'दुन्दुभ्यति शब्द फरोति इति दुन्दुभि भेरि' इस विग्रह मे शब्दार्थक दिवादि परस्मैपदी नरुक्त दुन्दुम् धातु से 'सर्वघातुभ्य इन्' इस उणादि सूत्र से इन् (६) प्रत्यय होने पर दुन्दुभि शब्द बना है । नगारा का नाम है । क्योकि नगारा शब्द करता है। iN तस्यैपा भवति । इति निरुक्ते नवमाध्यायस्य द्वादश खण्डः ॥ ९-१२ ।। तस्य = उस दु:दुभि की, एपा यह अग्रिम ऋचा, भवति = है- PN 1 अथ निरुक्ते नवमाध्यायस्य प्रयोदश खण्ड । उप श्वासय पृथिवीमुत यां पुरुत्रा ते मनुतां विष्टितं जगत् । स दुन्दुभे सजूरिन्द्रेण देवैर्दूराद्दवीयो अप सेध शत्रून् ॥ मा सं. ४-6-३५-२९ ॥
निरुक्त नवमाध्यायस्य चतुर्दशः खण्डः । (१३४७) इस मन्त्र का भरद्वाज के पुत्र गर्ग ऋपि, भिष्टुप् छन्द और दुन्दुभि देवता है । मन्त्राप- दुन्दुभे - हे युद्धदुन्दुभि! तुम अपने जयघोष रूप शब्द से, पृथिवीम् - पृथिवी, उत - और, द्याम् - धुलोक को, उपवासय - परिपूर्ण करो। विस्थितम् - विशेष रूप से स्थिति, जगत् = स्थावर जङ्गम रूप समस्त जगत्, ते = तुम्हारे शब्द को, पुस्था = बहुत प्रकार से, मनुताम् = सुनें ऐसा शब्द यह तुम, इन्द्रेण देवः = इन्द्र और अन्य देशे के, सजू = साथ मिल कर, शयून: हमारे शत्रुओ को, दूरादवीयः = दूर से दूर, अपसेघ - फेंक दो। इस मन्त्र मे दुन्दुभि को स्तुति है। पहो इस का देवता है। करो। स:- - 1इस कामाप्य- 1 उपचासय, पृथिवीमुप दिवं च बहुधा ते घोपं मन्यतां विष्ठितं स्थावरं जगमं च यत्स दुन्दुमे। सहजोपण इन्द्रेण च देवश्च दूरादुरतरमपसेघ शत्रून् । दुन्दुभ = है युद्धदुन्दुभि ! तुम अपने जयघोष रूप शन्द से, पृथिवीम् उप दिवम् च - पृथिवी और धुलोक को, उपश्चासय = परिपूर्ण कर दो । विष्ठितम् - विशेष रूप से स्थित, यत्- जो, स्थावरम् जङ्गमम् च = स्थावर और जङ्गम रूप समस्त जगत वह, बहुधा ते पोपम मन्यताम् • बहुत प्रकार से तुम्हारे शब्द को सुनें ऐसा शब्द करो। सः - वह तुम, इन्द्रेण च देवः प इन्द्र और बन्यं देवों के, सहजोषण' - साप, शत्रून् = हमारे शओं को, दूराव दूरतरम् = दूर से भी और अधिक दूर, अपसेघ = फेंक दो। ९-इषुधिः। 'इथुधि' यह तूणोर का नाम है । जिस को भाषा भी कहते हैं । इस में वाण रखे जाते हैं । इसी को कहते हैं- . इपुधि कहा इपुधिरिपूणां निधानम् । इपूणाम् = वाणो का, निधानम् निधि, अर्थात् वाण रखने का दोश, इषिः बासा है। अर्थात् ' इषवः कापा. धीयन्ते स्थाप्यन्ते अस्मिन् इति इपुषिः तूणीरः' इस विग्रह में इपु उपपद 'हुधा पारणपोषणयोः' पातु से 'कर्मण्यधिकरणे च' इस सूत्र से अधिकरण में कि (इ) प्रत्यय, 'बातो लोप इटिच' इस सूत्र से पा के मा लोप होने पर 'इपुपि' गद बना है तूगीर पा नाम है। क्योंकि इस में वाण रमे जाते हैं। तस्यैषा भाति । इति नियते नवमाध्यायस्य त्रयोदशः एण्डः।८-१३॥ तस्य = उस इपुघि सम्मकी, एपा - यह अग्रिम रुपा, भवति = है- अपरित गरमायायस्य धनुदंशः राण्यः ।
(१३४८) निरक्ते नवमाध्यायस्य चतुर्दशः खण्डः । बह्वीनां पिता पहुरस्य पुत्रश्चिश्चा कृणोति समनावगत्यं । इपुधिः संकाः पृतनाश्च सर्वाः पृष्ठे निनदो जयति प्रसूतः ॥ क्र. सं. ५-१-१९-५ ॥ इस मन्त्र का भरद्वाज के पुत्र पायु ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और इषुधि देवता है। मन्त्रार्थ-इषुधि की स्तुति-इपुधिः = यह इषुधि तूणीर, बहीनाम् = बहुत इषु (वाणों) का, 'पिता = पालन के, हेतु होने से पिता है। क्योकि, अम्य = इप इपुधि के, पुत्रः = इषु रूप पुत्र, बहुः = बहुत हैं । चिश्चा = 'चिश्चा' इस प्रकार का शब्द, कृणोति = करता है । अर्थात जब इसमें से वाण निकाला जाता है तब यह 'चिचा' इस प्रकार का शब्द करता है । पृष्ठे पिनद्धः यह धन्वी राजा के पीठ में बँदा हुआ, समना अवगत्य = युद्ध को प्राप्त हो कर, प्रसूतः बाणों का प्रसव करता हुआ एवं, संका = साथ में शब्द करता हुआ, सर्वाः पृतना: = सारी सेना को, जयति = जीत लेता है। इस प्रकार इस मन्त्र मे इपुधि = तूणीर की स्तुति है। D इपका भाष्य- - बहूनां पिता बहुस्य पुत्र इपूनभिप्रेत्य । प्रस्मयत इवापाप्रियमाणः । शब्दानुकरणं वा । सङ्काः सचतेः । संपूर्वाहाकिरतेः । 'पृष्ठे पिनद्धो जयति प्रसूतः' इति व्याख्यावम् । बहूनाम् पिता - यह इषुधि बहुत वाणों का पिता है । इषून अभिप्रेत्य = इपुओं के अभिप्रायसे, अस्य = इस इपुधि के, वहुः पुत्रः वहुत पुत्र हैं। अयाप्रियमाणः = उघाड़ा जाता हुआ, प्रस्मयते इध - मुसकाते हो ऐसा लगता है। वा = अथवा, शब्दानुकरणम् = 'चिश्चा' इस प्रकार पान्द का अनुकरण है । अर्थात् जब उघाड़ा जाता है तब यह 'चिचा' ऐसा शब्द करता है। सचते! - सप धातु से, सङ्काः = सङ्का शब्द बना है। अर्थात् 'सचती इति सहा' इस विग्रह में 'पच समवाये' धातु से बाहुलकात् अङ्क प्रत्यय और टिलोप होने पर संग्राम वाचक सङ्क, शब्द बना है। 'सकार' यह जस्का रूप है । वा = अथवा, सिंपूर्वात् किरतेः = सम् उपसर्ग पूर्वक 'क विक्षेपे' पातु से 'अन्येष्यामि दृश्यते' इस सूत्र से ड प्रत्यय, टिलोर होने पर संग्राम वावर सट्टा शब्द बना है। ठे पिनद्धः धन्वी राजा के पीठ मे बंधा हुआ इषुधि, प्रसूतः - वाणों का प्रसव करता हुआ सारी से ना को, जयति = जीतता है । इति : इस प्रकार, व्याख्यातम् निगदव्याख्यात है। १० - हस्तनः । हाथ की रक्षा के लिये कलाई में बांधने का पट्टी को हस्तघ्न कहते है। जो तांत से बंधा हुमा होता है । जिम को संस्कृत मे कलापोपपट्टक. उर्दू मे दस्ताना और हिन्दी में गोधा कहते हैं। घनुप की डोरी और पुख अर्थात् बाण के मूल प्रदेश में बंधी हुई डोरी ये दोनों तांत की बनी हुई होती हैं। उन से यह पट्टा तारित होता रहता है। हस्त शब्द का अर्थ लक्षणा से हाय के प्रदेश कलाई है। जिस को प्रकोष्ठ भी कहते हैं। उस मे बंधा हुया पट्टा हस्तघ्न कहा जाता है। इस का निर्वचन करते हैं- %D 2 - निवक्ते नवमाध्यायस्य पञ्चदशः खण्डः । (१९४९) हस्तमो दस्ते हन्यते । हस्ते - हाथ मे (क्लाई मे), हन्यते = हत होना है इस से, हस्तघ्न हस्तघ्न कहा जाता है । अर्थात् हाथ मे बँधा हुआ धनुप की ज्या रूप तात से हत वा ताडित होता है इस से कलाई का पट्टा हस्तघ्न कहा जाता है। 'हस्ते अवस्थित ज्यया हन्यते ताड्यत्ते असो हस्तघ्न इस विग्रह में हस्त उपपद ‘हन हिंसागत्यो' धातु से 'पाथे कविधनाम् ' इस वात्तिक से क (अ) प्रत्यय, हस्त हन भ, गमहनजनखनघसा लोप वित्यनडि ' इस सूत्र से उपधा अकार लोप, 'हो हन्तेणिन्नेषु' इस सूत्र से हकार को कुत्व धकार होने पर हस्तघ्न शब्द बना है। हस्त प्रकोष्ठ में बंधा हुआ पट्टा का नाम है। क्योकि, वह ज्या वा पुल से हत होता है। तस्यैपा भवति। इति निरुक्ते नवमाध्यायस्य चतुर्दश खण्ड । ९-१४॥ तस्य = उस हस्तघ्न की, एपा = यह अग्रिम ऋवा, भवतिर है- अथ निरुक्ते नवमाध्यायस्य पश्चदश सण्ड । H अहिरिख भोगैः पर्येति वाहुं ज्यायो हेति परिवाधमानः । हस्तनो विश्वा वयुनानि विद्वान्पुमान्पुमांसं परि पातु विश्वतः ।। मस ५-१-२१-१४ ।। इस मन्त्र का पायु अपि, त्रिष्टुप 'छन्द और हस्तघ्न देवता है। मन्यायं-इस मन्त्र मे प्रकोष्ठ (मणिबन्ध ) मे बंधा हुआ हस्तघ्न को स्तुति है। हस्तघ्न. - ज्या के आघात से हाय को बचाने के लिये बघा हुआ चर्म के पट्टा, ज्याया - ज्या के, हेतिम = आघात वा, परिवाघमान - निवारण करता हमा, अहिी इच = सर्प के समान, भोग - सर्प शरीर के द्वारा, याहुम् = प्रकोष्ठ अर्थात् मणिवन्ध को, पति = परिवेष्टित करता है। विश्वा = सारे, वयुनानि = ज्ञातव्य विषयो को, विद्वान् म जानता है और, पुमान् - पौरुषशाली होकर, पुमासम् = धनुर्धारी. पुरुष की, विश्वता - चारो ओर से, परिपातु - रक्षा करता है। इस मन्त्रका भाष्य- अहिरिख मोगः परिवेष्टपति पाई ज्यांया बघाद परित्रायमाणो हस्तमः सर्वाणि प्रज्ञानानि प्रजानन् । पहि इव - सर्प के समान, भोग सपं परीर के द्वारा, पाहम् प्रकोष्ठ को, परियष्यति परिवेष्टित करता है। ज्यापा = उपा के, वयाद - आधान से, परिणायमाग - राम मरता हमा, %3D T %DC (१३५०) निरुक्ते नवमाध्यायस्थ पोडशा खण्डा । हस्तघ्नः मणिबन्ध में बंधा हुआ चर्मपट्टा, सर्वाणि सारे, प्रज्ञानानि = ज्ञातव्य विषयो को, प्रजानन् = जानता है। मन्त्रगत 'पुम्स्' शब्द का निर्वचन करते हैं- पुमान् पुरुमना भवति, पुंसते; पुमान् पुरुष स्त्री को अपेक्षा, पुरुमना - बड़ा मन वाला, भवति = होता है। वा = अथवा, पुसतेः = पुस धातु से पुम्स् शब्द बना है। जिसका सु का रूप पुमान है । अर्थाद- 'पुरु बहु मनो यस्य सः पुमान्' इस विग्रह मे पुरु और मनस् का बहुव्रीहि समास, पुरु मनस्, पृपोदरादित्वात् रु और अस् का लोप, पुमन्, नान्तोपधा दीर्घ होने पर पुमान् रूप बना है । वा = अथवा, 'पुसयति अभिवर्धते इति पुमान् ' इस विग्रह मे 'पुस अभिवधने' धातु से 'किप च' इस सूत्र से किए प्रत्यय, सर्वापहारी लोप होने पर पुम्स् शब्द बना है । 'पुसोऽसुड्' इस सूत्र से असुङ् आदेश, पुमस्, छान्दसत्वात् नुम, पुमन्स् सान्त महत.' इस सूत्र से दोघं, पुमान्स्, और सयोगान्त लोप होने पर 'पुमान् ' रूप बना है। यद्यपि व्याकरण शास्त्र में 'पुन पवने' धातु से 'पूषोडुम्सुन्' इस उणादि सूत्र से वा 'पातेईम्सुन्' इस उणादि सूत्र से डम्सुन् (उम्स्) प्रत्यय, टिलोप, पुम्स, पुसोऽसुद्ध' इस सूत्र से असुडू आदेश, पुमस्, नुम्, पुमन्स्, दीर्घ, पुमान्स्, संयोगान्त लोप होने पर पुमान् रूप बनता है तथापि यास्फ मत मे अर्थ मे भेद है । व्याकरण मत मे पवित्र करने वाला वा रक्षा करने वाला और यास्क मत मे बडा मन वाला वा बढाने वाला अर्थ है । . अभीशवः । सभीशु आदित्यरश्मि और अश्वरश्मि (रस्सी) इन दोनों का नाम है।' इसका ध्याख्यान रश्मि के नामो मे हो चुका है । इसी को कहते है- अभीशवो व्याख्याताः । अमीशवः = अभीशु शब्द, व्याख्याताः = व्यास्यात है। अर्थात् रमि. के नामों मे इसका व्याख्यान हो चुका है । भभि व्याप्नुवन्ति जगदश्वग्रोवा वा इति अभीषयः इस विग्रह में अभि पूर्वक 'अशू व्याप्ती' धातु से 'भृ मृशीतचरित्सरितनिधनिमिमस्जिभ्यः उ.' इस उणादि सूत्र से बाहुधबाद उ प्रत्यय और धातु अवयव अकार को इकार एवं दीर्घ होने पर 'अभीशु' शब्द बना है। 'अभीशयः' यह प्रथमा बहुवचन का रूप है । जो आदित्य रश्मि और अश्वरम दोनो का नाम है। क्योफि, आदित्य रश्मि जगत् मे और अश्वरश्मि अश्वग्रीवा मे व्याप्त होती है।। आदित्य रमि अयं मे उदाहरण अन्वेषणीय है। तेपामेषा भवति । इति निरुक्ते नवमाध्यायस्य पञ्चदशः खण्ड. । ९-१५ ॥ तेषाम् - उन अभीशु शब्द वी, एपा = यह अग्रिम ऋचा, मवति - है- अय निरुक्त नवमाध्यायस्य पोडशः खण्डः।
निरुक्तं नवमाध्यायस्प षोडशः खण्डः । (१३५१) रथे तिष्ठन्नयति वाजिनः पुरो यत्रंयत्र कामयते सुपारथिः अभीशूनां महिमानं पनायत मनः पश्चादरें यच्छन्ति रश्मयः ऋ. सं. ५-१-१९-६ ॥ इस मन्त्र का भरद्वाज के पुत्र पायु ऋषि, जगती छन्द और .सारथि और रश्मि देवता हैं। मन्त्रार्थ--सुपारथिः = सुशिक्षित सारथि, रथे = रथ पर, तिष्ठन् = बैठा-बैठा, पुरः = आगे, वाजिनः अश्वों को, यत्र यत्र:- जिधर जिघर ले जाने के लिये, कामयते - इच्छा करता है उधर उधर ही, नयति = ले जाता है। जिस रथ में, र मयः अश्वों को ग्रोवा में लगी हुई रशना (रस्सी), पश्चात् = रथ के पृष्ठभाग में विद्यमान अश्वों को, मनः - सारथि के मन के अनुकूल, अनुयच्छन्ति: ले जाती है। हे सज्जनगण ! आप लोग उन, अभीशूनाम् = रशनाओं की, महिमानम् = महिमाओं की; पनायत स्तुति करें। इस मन्त्र में अभीशु शब्द अश्वरशना वाचक है। इस का यास्क भाष्य- . रथे तिष्ठनयति बाजिनः पुरस्तात्सतो यत्र यत्र कामयते सुपारथिः, कल्याण सारथिः । अभीशूनां- महिमानं पूजयामि । मनः पश्चात्सन्तोऽनुयच्छन्ति रश्मयः । सुपारथिः कल्याणसारथिः - सुशिक्षित सारथि, रथे तिष्ठन् : रथ पर बैठा, पुस्वास्सतः वाजिनः = आगे अश्वों को, यत्र यत्र कामयते = निघर जिधर ले जाने के लिये इच्छा करता है उधर उघर हो, नयति ले जाता है। अभीशूनाम् = रशनामों की, महिमानम् = महिमानों की, पनायत - पूजयामि 23 पूजा करता हूँ। मयः = अश्वों की ग्रीवा में लगी हुई रचना (रस्सी), मनः पचाद सन्त = मन के पीछे पीछे होती हुई, अनुयच्छन्ति = ले जाती हैं। । । - धनुः। . ।। १२ 'धनुः'. यह धनुप् का नाम है । धन्वन्ति अपनयन्ति नन्ति वा इपयः अस्मात् इति धनुः, इस विग्रह में गत्यर्थक वा निरुक्त मत में वधार्थक घवि धातु से 'अतिपृवपियजि' इत्यादि उणादि सूत्र से बाहुलकार उसि (उस्) प्रत्यय, पृषोदरादित्वात् व को न होने पर धनुस् धन्द बना है । धनुस् का नाम है। क्योंकि, धनुषु लक्ष की ओर गमन करता है. एवं लक्ष का वध भी करता है। इसी को कहते हैं- धनुर्धन्वतेर्गतिकर्मणो क्धकर्मणो वा। धन्वन्त्यस्मादिपवः । गतिकर्मणः = गत्यक, वा अथवा, वधकर्मणः = यघार्थक, पन्वतैः - पवि पातु से, धनुः अनुप् पम्द बना है। इपयः = बाग, अस्माद : इस पर रस कर पलाने से, धन्वन्ति = म की तरफ गमन करते हैं वा शत्रुषों का वध करते हैं।
(१३५२) निरुक्ते नवमाध्यायस्य सप्तदशः खण्डः । तस्यैपा भवति । इति निरुक्त नवमाध्यायस्य पोडश. खण्ड. । ९-१६ ॥ तस्य = उस धनुप् का, एषा = यह अग्रिम ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्ते नवमाध्यायस्य सप्तदशः खण्ड. 1 . धन्वना गा धन्वनाजि जयेम धन्वना तीवः समदों जयेम । धनुः शत्रोरपकामं कृणोति धन्वना सर्वाःप्रदिशो जयेम ॥ क स ५-१-१९-२॥ इस मन्त्र का भरद्वाज के पुत्र पायु ऋपि, त्रिष्टुप्, छन्द और धनुर्देवता है। मन्त्रार्थ-हम, घनुषु के द्वारा शनूओ की, गा = गायो को, जयेम = जीतेगे। हम, धन्वना = धनुप् के द्वारा, आजिम् = सनाम को, जयेम = जीतेंगे। हम, धन्वना = धनुष द्वारा, तीवाः = उद्धत, समदः = मदोन्मत्त, शत्रुसेना को, जयेम = जीतेंगे। धनु - यह हमारा धनुष्, शत्रो. - शत्रु को, अपकामम् = दुराशाओ को नष्ट, कृणोति = करे। हम, धन्वना = धनुष के द्वारा, सर्वाः प्रदिशः = समस्त दिशाओ मे स्थित शत्रुओ को, जयेम = जीतेंगे। इस मन्त्र का धनुष देवता है । अत. यह मन्त्र' धनुष की स्तुति करता है । इस लिये धन्वन और जयति की आवृत्ति आदरार्थ है घन्वना = 1 1 इसका, यास्क भाष्प- + %3D - समद - इति सा निगदव्याख्याता । समदा-समदो वाचा, संमदो वा मदतेः। इति सा = यह ऋचा, निगदव्याख्याता = अपने उच्चारण से ही व्याख्यात है। सम् उपसर्ग पूर्वक, अत्तः = अद अक्षणे धातु से समद समद् शब्द बना है। अर्थात 'सम्यक् अत्ति इति समद्' इस विग्रह मे सम् पूर्वक 'अद मक्षणे' धातु से विवप् ( ० ) प्रत्यय होने पर समद्' शब्द बना है । 'समदः' यह जसन्त है। वा = अथवा, सम् पूर्वक, मदतेः = मद घातु से, समदः - शब्द बना है।, सम् मद् - समद् । म् लोप । ज्या ज्या धनुर्गुण प्रत्यञ्चा अर्थात् धनुष की डोरी ( तात ) को कहते हैं। भाष्यकार निर्वचन करते हैं- ज्या-जयतेर्वा, जिनाते;, प्रजावयतीपूनिति वा । । जयते. वा - जय अर्थ मे जि धातु से, वा = अथवा, जिनातेः = वय की हानि भयं मे ज्या धातु से, वा = अथवा, इपून = वाणो को, प्रजावपति प्रजवन = फेंकती है, इति " प 4 - इस लिये, . निरुक्ते नवमाध्यायस्याप्टादशा खग्हः । (१३५३) ज्या = ज्या कही जाती है । अर्थात् 'जयति विजयं कारयति इति ज्या' इस विग्रह में अन्तर्भावित व्यर्थक 'जिजये' धातु से 'अघ्न्यादयश्न' इस उणादि सूत्र के निपातन से यक् (य) प्रत्यय और जि धातु के इकार का लोप और टाप होने पर ज्या शब्द बना है । धनुष की प्रत्पश्चा का नाम है ! क्योंकि यह अपने वल से जय प्राप्त कराती है । अथवा 'जिनाति वयहोनि कारयति इति ज्या' इस विग्रह में 'ज्या वयोहानौ' धातु से 'किप च' इस मूत्र से किप् प्रत्यय, सर्वापहारी लोप होने पर ज्या शब्द वना है । प्रत्यञ्चा का ही नाम है। क्योंकि उसके द्वारा प्रतियोदावों के वयस् की हानि होती है। वा अथवा, 'जवति इपून् प्रजावयति इति ज्या' इस विग्रह में सौत्र ण्यन्त 'जुगतो' धातु से किए (6), णिलोप, जु, जावि, जाव, पृषोदरादित्वाद, आव् को या मादेश होने पर ज्या शब्द बना है । धनुप् को प्रत्यञ्चा का ही नाम है । क्योंकि, वह वाण को - - फेंकती है। 'तस्या एपा भवति । इति निरुक्त नवमाध्यायस्य सप्तदशः खण्डः । ९-१७ ।। तस्याः = उस ज्या की, एपा = यह अग्रिम चा; भवति = है- अथ निरुक्त नवमाध्यायस्याष्टादशः खण्डः । वक्ष्यन्तीवेदा गंनीगन्ति कणं' प्रियं सखायं परिपखजाना । योव शिर्के वितताधि धन्वळ्या इयं समंने पारयन्ती ॥ . सं. ५-१-१९-३ ।। इस मन्त्र का भरद्वाज पुत्र पायु ऋषि, विष्टुप् छन्द और ज्या देवता है। मन्त्रापं-इयम् - यह, ज्या = धनुप् को प्रत्यञ्चा, समने = संग्राम में, धन्वन् अधि = धनुष के ऊपर, वितता - विस्तृत होतो हुई एवं, पारयन्ती = शत्रुओं के पार ले जाती हुई, प्रियम् वक्ष्यन्ती इव जैसे प्रिपकर वाक्य कह न रही हो वैसे ही धन्द करती हुई धनुर्धारी राजा, कर्णम् = कर्णप्रदेश में, भागनीगन्ति माती है । इत् ' यह पाद पूरक है । योपा ससायम् इव, जैसे तो प्रियपति का आलिङ्गन करके बात करतो है वैसे ही यह ज्या भो, परिपस्वजाना = वाण का आलिङ्गन करके शिक्त - घोकार शब्द करती है। - . पास्क भाष्य- वक्ष्यन्तीवागच्छति कर्ण प्रियमिव ससा यमि' परिप्वजमाना योपेव शिक्के शन्दं करोति वितताधिधनुपि ज्या इयं समने पारयन्ती पारं नयन्ती । योषा ससापम् इव = श्री प्रियपति के समान अर्थात् नो जैसे पुरुष को बालिगन करती है से हो, अपिधनुपि वितता - पनुप के ऊपर विस्तृत, इयम् ग्या- यह प्रया, इषुम् परिषजमाता- (१३५४) निरुक्त नवमाध्यायस्यकोनविंश. खण्डः । वाण को आलिङ्गन करती हुई, कर्णम् = कान मे, प्रियम् इव = प्रिय वाक्य के समान, : वक्ष्यन्ती कहेगी आगच्छति = आती है और, शिक्ते - शब्दं करोति - शब्द करती है। समने संग्राम मे, पारयन्तो = पार नयन्ती = शत्रुओ के पार ले जाती हुई। इति पूर्वान्वय । समान, । . - । - 1 । - . -र इषु वाण का नाम है । भाष्यकार इसका निर्वचन करते हैं- इपुरीपतेर्गतिकर्मणो वधकर्मणो वा । गतिकर्मणः = गत्यर्थक, वा = अथवा, वधकर्मण. वधार्थक, ईपते. = ईप धातु से, इपुः इषु शब्द बना है। अर्थात् 'ईपति शत्रून् गच्छति हन्ति वा इति इपुः' इस विग्रह मे ' ईप गतिहिंसादर्शनेपु' धातु से 'ईषे विच्च' इस उणादि सूत्र उप्रन्यय और चकार से उपधा हस्व होने पर 'इषु' शब्द बना है। वाण का नाम है। क्योकि, बाण शत्रुओ पर जा गिरता है एव शत्रुओ का वध करता है। तस्यैषा भवति । इति निरुक्ते नवमाध्यायस्याप्टादश. खण्ड । ९-१८ ।। तस्य = उस इषु को, एषा = यह अग्रिम मचा, भवति - अथ निरुक्ते नवमाध्यायस्यैकोनविंश खण्ड । सुपर्ण वस्ते मृगो अस्या दन्तो गोभिः संनद्धा पतति प्रसूता । यत्रा नरः सं च वि च द्रवन्ति तत्रास्मभ्यमिषवः शर्म यंसन् ॥ ऋ सं ५-१-२०-११॥ इस मन्त्र का भरद्वाज-पुत्र पायु ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और इयु देवता है। मयार्थ-यह ऋचा इपु की स्तुति करती है। सुपर्णम् वस्ते - वाण शोमन पङ्य धारण करता है । अस्या दाँत, मृग. = मृगशृङ्ग है । गोभि सनद्धा = यह गाय के अवयव तांत से अच्छी तरह बद्ध है। प्रसूता पतति = यह प्रेरित हो कर शत्रुओ पर गिरता है। यत्र - जहाँ (युद्ध मे), नर - नेता लोग (योषा लोग), स च = साथ वा, विच = पृथक रूप में, द्रवन्ति: विचरते हैं, तत्र- यहाँ, इपव. - वाण, अस्मभ्यम् = हमे, शर्म - सुख, यसन् = देवें। %D इस का, D भाप्य- सुपर्ण वस्त इति वाजानभिप्रेत्य । मृगमयोऽस्यादन्तो, मृगयते! गोमिः- संनद्धा पतति प्रसूता' इति व्याख्यातम् । यत्र नराः संवन्ति च विद्रवन्ति च तत्रास्मभ्यमिपवः शर्म यच्छन्तु शरणं संग्रामेषु ।
निरुक्त नवमाध्यायस्यकोनविश: खण्ड।। न 'सुपर्ण वस्ते' इति = 'सुपर्णम् वस्ते' यह जो मन्त्र में कहा गया है वह, पाजानभिप्रेस्य वाजों के अभिप्राय से कहा गया है । अर्थात वाण में जो पंख बंधा हुमा होता है वह वाज पक्षी का होना चाहिये । अस्याः = इस का, दन्तः = दांत, मृगमयः = मृग के अस्थि (हडी) का बना हुना है, वा = अथवा, मृगयतेः = 'मृग अन्वेषणे' धातु से मृग शब्द बना है। अतः इस का अर्थ लक्ष्य का अन्वेषण करने वाला होता है । भाव यह है कि, वाण का दांत - अग्रभाग मृग की हड्डी का बना हुया होता है । इस लिये वह मृगमय कहा जाता है और वह शत्रु रूप लक्ष्य का अन्वेषण कर उस का वेधन करता है । जैसे मन्त्र बोल कर यज्ञादि कर्म किये जाते हैं-वैसे ही सिद्ध किये हुए मन्त्र बोल कर वाण चलाया जाता है। जो कार्य अणुशक्ति नहीं कर सकती है वह मन्त्रशक्ति के प्रभाव से वाण करता है । इस में विशेषता यह है कि, अणुशक्ति निरपराधी प्राणियों का भी नाश करता है और वाण अन्वेषण कर कर केवल अपराधी का ही नाश करता है। आज मात्र-सिद्धि करनेवाला कोई क्षत्रियकुमार न रहने से यह कार्य देखने में नहीं माता है । आज भी अधूवायु आदि का प्रयोग किसी शक्ति से होता है। 'गोभिः संनदा पति प्रसूता' इति - यह वाक्य, व्यारयातम् - व्याख्यात है । अर्थात इसकी व्याख्या निरुक्त द्वितीय अध्याय पझम खण्ड "गोभिः सन्नदा पतति प्रसूता' इति इपुस्तुती' इस वाक्य से की जा चुकी है । यत्र - जिस युद्ध में, नरा! - योदा लोग, संद्रवन्ति च = साथ वा, विद्रवन्ति च = पृथक् रूप में विचरण करते हैं, तत्र = वहाँ, अस्मभ्यम् - हमें, इषवः = वाग, मंग्रामेष - युदों में, शर्म = शरणम् = सुख, यच्छन्तु = देवें । अवाजनी। 'अश्वाजनी' चाबुक को कहते हैं। अश्व पाद का निर्वचन इस अध्याय के प्रारम्भ में सर्व प्रथम किया गया है। अज्यन्ते अश्वाः क्षिप्याते प्रेयन्ते अनया इति 'अजनी ' इस विग्रह में 'अज गतिक्षेपणयोः' पातु से 'ल्युट च ' इस सूत्र से ल्युट् (यु) प्रत्यय, 'युवोरनाको' इस सूत्र से यु को मन, अजन, 'टिड्डाणा ' इत्यादि सूत्र डीप (ई), 'यस्येति च' इस मूत्र से अ लोप होने पर अजनी पाना बना है, 'अश्वस्य अजनो इति अश्वाजनी' इस विग्रह में अश्व का और अजनो का पप्ठीतत्पुरुष समास, प्रातिपदिक संज्ञा, सुप् लक् और सवर्ण दोघं होने पर अश्वाजनो चन्द बना है। यह प्रत्यक्षवृत्ति होने से इसका निर्वचन न कर इसके पर्याय वाची यशा गन्द का निवंचन करते है- अश्वाजनी कशेत्याहुः । कशा - प्रकाशयतिमयमश्वाय । कृश्यतेर्वा अणूमावाद । अश्वाजनम् = अश्वाजनी को, कसा इति = कशा अर्थात् चाव, आहुः = कहते हैं । मवाय : अश्व के लिये, भयम् = भय, प्राशयति = प्रराा करती है, वा = अपवा, पृपतेः से अमावाद : सूक्ष्म होने से, यशापमा शब्द बना है। शा (पायुक) बहुत पतली होती है। मति कासते अश्वाय भयं प्राशयति इति कशा' इस विग्रह में अन्तर्भावितव्यर्थक माग दौती' पातु से पपाचच, कार म, छान्दस हस्य और टाप, एवं दीपं होने पर क्या नाद यना है। - - पृग धातु - (१३५६) निरुक्ते नवमाध्यायस्य विंशा स्वपडा । चाबुक का नाम है । क्योंकि, चावुक घोड़ा को भय दिखाता है। दिखाना प्रकाश करना है। अथवा कृश्यति तनूभावंप्राप्नोति इति कशा' इस विग्रह में ' कृश तनूकरणे' धातु से पचाद्यच्, गुण, कर्श. अ, पृपोदरादित्वात् र् लोप टाप, दीर्घ होने पर कशा शब्द बना है। चाबुक का ही नाम है। यह चर्म का तनूभाव = अणूभाव = सूक्ष्म = बहुत पतला होता है। चाबुक वो व शा कहते हैं यह कहा गया। अब वाक् को भी क्शा-पहते हैं वह कहते हैं- वाक्-पुनः प्रकाशयत्यर्थान् । पुनः और, वाक् = वाणी भी, कशा = कशा कही जाती है। क्योंकि, यह भी, अर्थाद: अर्थो को, प्रकाशयति = प्रकाश करती है। व्युत्पत्ति दोनों अर्थों में समान है । खशया । क्रोशतेर्वा । अथवा, खशया = मुखाकाश में सोने वाली होने से वाक् खशया होतो हुई कशा हो जाती है। अर्थात् 'ये शते इति खशया' इस विग्रह में आकाश वाचक ख शब्द पूर्वक ‘शी स्वप्ने' धातु से पचाद्यच् , गुण, अयादेश, टाप, सराया, पृषोदरादित्वात् य लोप और वर्णविपर्यय स को क होने पर कशा शब्द बना है। वाणी का नाम है। क्योकि, वाणी ख = मुखाकाश में सोती है । था - अथवा, प्रशतेः = अश धातु से कशा शब्द बना है। अर्थात् 'क्रोशति शब्दं करोति इति कसा वाक्' इम विग्रह में धातूनामनेकार्थत्वात् सामान्य शब्दार्थ 'कुश आह्वाने रोदने च' पातु से पृपोदरादित्वात् अच् प्रत्यय, कु को क आदेश और टाप होने पर वंशा शब्द बना है । वाणी का नाम है । क्योकि, वाणी शब्द करती है। जैसे कसा = चायुक = कोड़े से चोट लगती है से ही ममंवेधक वाणी से भी चोट लगती है। अतः वाणी भी कशा कही जाती है। अश्वकशाया एपा भवति । इति निरुक्त नवमाध्यायस्यैकोनविंशः खण्डः ॥ ९-१९ ।। पाशा के दो अपं हुए । पावुक और वाफ् । ग में, अश्वर शाया = अश्वशा की, एपr. यह अग्रिम रचा, भवति = है- अय निरक्त नवमाध्यायस्य विश. गण्डः । आ जइन्ति सान्वेंपां जघना उप जिप्तते । अश्वांजनि प्रचेतसोऽश्वान्समतुं चोदय ॥ ऋ मं. ५-१-२१-१३ ॥ इस मन्त्र का भरद्वाज-पुत्र पायु ऋषि, अनुष्टुप् छन्द और प्रतोद देवता है । मन्त्रार्थ- अयाजनि - हे कशे ! ( चाबुक ! ), तुम्हारे द्वारा, प्रचेतसः = प्रकृष्ट मानी मारप लोग. एपाम् ।
निरुक्तं नवमाध्यायस्य विशः खण्ड।। (१३५७) जघनों पर, इन अश्वों के, सानु = उन्नत प्रदेशों पर, आजवन्ति = मारते है, और, जघनान् उपजिघ्नते = मारते हैं। वहीं तुम, समत्सु - संग्रामों में, अश्वान - घोड़ों को, चोदय = प्रेरित करो। इस मन्त्र का भाष्य-- । = सरणानि " - आमन्ति सानून्येषां सरणानि सक्थीनि । सक्थिः सचतेः। आसक्तोऽस्मिन्कायः । जघनानि चोपघ्नन्ति । जघनं जपन्यते। अश्वाजनि प्रचेतसः प्रवृद्धचेतसोऽश्वान्तसमत्सु समरेपु संग्रामेषु चोदय । एपाम् । = इन अश्वों के, सानु - सानूनि सक्योनि = उन्नत देशों पर, आघ्नन्ति = मारते हैं। सचतेः = पच धातु से, सक्यिः = सक्यि शब्द बना है अर्थात् 'सचते इति सवियः' इस विग्रह में 'पच सेवने' धातु से 'असिसलिम्यांविथन् ' इस उगादि सूत्र से कियन ( थि ) प्रत्यय, सच् थि, 'चो.कुः' इस सूत्र से कुस्त्र होने पर सक्थि शब्द बना है । उन्नत प्रदेश का नाम है। अस्मिन् = इस ( सविथ ) में, काय: - सारा शरीर, आसक्तः = आश्रित होता है । जघनानि च - और जघन प्रदेशों पर, उपघ्नन्ति मारते है । जधनम् जङ्घन्यते = अश्व के शरीर का जघन भाग बहुत करके चावुक से ताडा जाता है । अश्वाजनि - हे कशे ! तुगसे, प्रचेतसः - प्रवृद्ध नेतसः - विशेष ज्ञानी सारपि लोग, समासु : समरेषु = संग्रामेषु = योखों में, 'अश्वान् = घोड़ों को, चोदय = प्रेरित करो। उल्लूखलम् । 'उलूखल' कखल को कहते हैं । भाष्यकार इस का निर्वचन करते हैं- उलूखलमुरुकरं वोर्ध्वखं वा, उक्कर वा, "उरु मे कुर्वित्यप्रवीचदुलूखलमभवत् " उरुकरं - चैतदुलूखलमित्याचक्षते परोक्षेणेति च माझगम् । उलूखलम् - उरुकरम् = बहुत अन्न को करनेवाला होता है, वा, अयवा, ऊर्वखम् = ऊपर को छैदवाला होता है, वा = अथवा, उवर्करम् = ऊक शब्द करने वाला होता है, इस लिये उलूखल कहा जाता है । उत्पत्ति काल में उसने, मे उरु कुरु = 'मेरा छिद्र बहुत बड़ा करो' इति - यह अब्रवीत = कहा, तद् - इस कारण से, उलखलम् - उनूखल, अभवत् = हो गया। च = और, एतत् ८ यह, ऊरुकरम् = प्रत्यक्ष रूप से उरु कर (बहुत करने वाला) और, परोक्षेण - परोक्ष रूप से, उसूखलम् = उलूखल, इति भाचक्षते - यह कहते हैं ' इति च = यहा ग्राह्मणम् = ब्राह्मण वचन है। अर्थात् 'उरुकर का उलूखल हो गया है ' इस कथन में उक्त ग्राह्मण वचन प्रमाण है। अर्थात् 'उह बहुमन्नं करोति इति उरुकरम् उलूखलम्' इस विग्रह मैं उरु उपपद 'हुकृक्ष करणे' धातु से पचाद्यच्, रपरगुण, उरुकर, और पोदरादित्वात् वर्णव्यत्यय रु को लू, क को स, तपा र को ल होने पर अलखल पशब्द बना है। ऊखल का नाम है । क्योकि, उलूसल बहुत मन का संस्कार करता है।
- (१३५८) निरुक्ते नवमाध्यायस्य द्वाविशा खण्डः | 'उर्ध्वम् उपरिभागे खम् खातम् आकाशम् यस्य तव उलूखलम्' इस विग्रह में ऊर्ध्व और ख शब्दों का समास और पृषोदरादित्वात् ऊर्ध्व को उलू एवं ख को खल आदेश होने पर उलूखल शब्द बना है। ऊखल का नाम है। क्योंकि, ऊखल का उपरिभाग मुख खात छिद्र होता है। 'ऊ अन्नं तद् करोति इति उलूखलम्' इस विग्रह में ऊज् उपपद् कृ धातु से अच, पर गुण ऊ कर, पृषोदरादित्वात् “ को लू, ऊ को हस्व, क को ख और र को ल होने पर उलूखल शब्द बना है। ऊखल का नाम है । क्योकि, ऊखल अन्न को तुप निकालकर साफ करता है। तस्येपा भवति । इति निरुक्ते नवमाध्यायस्म विशः खण्डः ।। ९-२० ॥ तस्य = उस उलूखल शब्द की, एपा = यह अग्निम ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्ते नवमाध्यायस्यकविंशः सण्डः । यच्चिद्धि त्वं गृहेगूह उठूखलक युज्यते । इह युमर्त्तमं वद् जयतामिव दुन्दुभिः ॥ क्र. सं. १-२-२५-५ ॥ इस मन्त्र का शुनःशेप ऋषि, अनुष्टुप् छन्द और उलूखल देवता है । मन्त्रापं-उलूखलक - है ऊखल !, यचिद्धि यद्यपि तू. गृहे गृहे = पर घर में, यज्यसे - अन्न के संस्कार के लिये रहता है तथापि, त्वम् - तू, ह - इस हमारे यज्ञ मे, जयताम् = जय प्राप्त करने वालों के, दुन्दुभिः इयर नगारे के समान, धुमत्तमम् = अतिशय गम्भोर शब्द, वद - वोल, कर। - इति सा निगदव्याख्याता । इति निरक्ते नवमाध्यायस्यकविंशः खण्डः ॥ ९-२१ ।। इति सा- यह ऋचा, निगदव्याख्याता - उच्चारण से ही ध्यास्यात है। प्यास्या करने को आवश्यकता नहीं। अप निएक्ते नवमाध्यायस्य द्वाविंशः समः। - धुपमः । वृषभ सांड़ को कहते हैं । भाप्यवार इस का निर्वचन करते हैं- पभः प्रजा वर्पतीति वा, अति वृहति रेत इति वा, सद् यूपकर्मणा, वर्पणापमः । प्रजाम् = सन्तान को, वपति = वरसता है. इति = इस लिये, वा = अथवा, रतः = वीर्य को सेचन मे अति वृति = अतिशय उद्यत रहता है, इति - इस लिये, वद् = वही, पकर्मणा = धूप .
. निस्क्ते नवमाध्यायस्य त्रयोविंशः खण्डः । (१३५९) (बैल) के कर्म वाला, वर्षपात् = वर्षण कम से, वृपभ. = साँढ वृषम कहलाता है । अर्थात् 'वर्षति प्रजामुत्पादयति इति वृषभ.' इस विग्रह मे 'वृषु सेचने' धातु से, 'ऋपिपिम्या स्ति' इस उगादि सूत्र से अभच् ( अभ) प्रत्यय, कित्त्वाद गुणाभाव होने पर वृषभ शब्द बना है। बैल का नाम है। क्योकि, बैल प्रजा को बरसता है। अथवा 'अति वृहति योनी रेत: सेक्तुम् आस्मानम् उपच्छति इति उपभः' इस विग्रह मे 'वृह उद्यमने' धातु से उक्त उणादि मूत्र से अभच् प्रत्यय और पृषोदरादित्वाद ह को प होने पर वृषभ शब्द बना है। तस्यैषा भवति । इति निरुक्ते नवमाध्यायस्य द्वाविशः खण्ड, ।। ९-२२ ।। तस्य = उस वृपभ की, एपा - यह अग्निम ऋचा, भवति = है- अथ निरक्त नवमाध्यापस्य प्रयोविंशः खण्ड. । न्यक्रन्दयन्नुपयन्तं एनममहयन् वृषभं मध्यं आजैः । तेन सूभर्वं शतवत्सहस्रं गवां मुद्गलः प्रधने' जिगाय ।। अ मं. ८-५-२०-५॥ इस मन्त्र का मुगल ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द ओ मुद्र वा इन्द्र देवता है। मन्त्रार्थ-मुगल अधि वहते हैं, उपयन्तः = मनुष्यो ने पास जा कर, एनम् - इस वृपम को, न्यक्रन्दयन = गर्जना कराया, जिस से स डर के मारे भाग जाय और, आजेः मध्ये = युद्ध के बीच, पमम् = वैल से, अमेयन् - मुत्र त्याग कराया एवं, सूभवम् - शोभन आहार करवाया तेन - उस से मुगल: ने (मैं ), शतवत् गवाम् सहस्रम् = सैक्डों सहस्रो गायो को, प्रघने = संग्राम मे, जिगाय : जीता। यह मन्त्र वृपम को स्तुति करता है। इस मन्त्र का मास्क भाप्प- 'न्यक्रन्दनुपपन्त एनमितिव्याख्यातम् । अमेहयन्यूपमें मध्य आजेराजयनस्याजवस्येति वा। तेन तं सुमन राजानम् । भर्वतिरविकर्मा । यद्वा सूम सहवं गवां मुगलः प्रधने जिगाय । प्रपन इति संग्रामनाम | प्रकीर्णान्यस्मिन्धनानि भवन्ति । 'न्यत्रन्दनुस्यन्त एनम् ' इति यह स्पष्ट होने से, ध्यायातम् - स्वयमेव ध्यानपान है। बाजे: मध्ये = संग्राम के बीच, पमम् - बल से, अमेपन = मूत्र त्याग करते हुए। वाजयनस्य - बाजवस्य इति या - संपाय विजय दिलाने वाला था पतिवाला। तेन = इससे, तम् मूमयम् उस मोमन आहार वाले, राजानम् - राजाको। मातिः = मयं पातु, अतिरमा = महापाक निधन्दु परित । उगी मे मूभर बाद बना है। यहा = अपवा. मूमर्थम् - होमन भाग परने निरुक्ते नवमाध्यायस्य चतुर्विशः खण्डः । वाली, सहस्रम् = हजारो, गवाम् = गायो को, मुद्गलः = मुद्गल ने ( मैं ने ), प्रधने - संग्राम में, जिगाय = जीता, प्रधन इति = प्रधन यह सग्रामनाम = युद्धका नाम है । अस्मिन् इस में (युद्ध मे ) प्रकीर्णानि वहुत प्रकार के, धनानि = धन, भवन्ति = होते है। - - १८ - द्रुघणः। द्रुघण गदा को कहते है । इमका निर्वचन करते हैं। द्रुघणः द्रुममयो धनः। द्रुममयः = काष्ठ का बना हुआ, घन = यन्त्र विशेष, द्रुघणः = द्रुघण कहलाता है । जिस को गदा कहते है । द्रु शब्द द्रुम (वृक्ष) पर्याय है। द्रोविवार. द्रुमय इस विग्रह मे द्रु शब्द से 'तस्यविकार ' इस सूत्र से विकार अर्थ में मयट (मय) प्रत्यय, होने पर द्रुम्य शब्द बना है। 'हन्ति इति धन इस विग्रह काठिन्य अर्थ में 'हन हिंसागत्योः' धातु से 'मूतो घनः' सूत्र के निपातन से अप् (अ) प्रत्यय और घन आदेश होने पर धन शब्द बना है। दुमय और धन का 'द्रुमयधासी घनश्चेति द्रुघण.' इस विग्रह में कर्मधारय समास, पृपोदरादित्यात मयट का लोप और णत्व होने पर द्रुघण शब्द बना है। गदा ना नाम है। पयोकि गदा काष्ठ निर्मित पाठिन्य पदार्थ है और शत्रु को मारता है। द्रुमय के स्थान मे दुममय लिखा है यह पचिद नित्य समान होने से अस्वपद विग्रह किया गया है। अवेतिहासमाचक्षते । अत्र = इस विषय मे अर्थात् उस दुषण के सम्बन्ध मे, इतिहासम् = पूर्ववृत्तरूप इतिहास, आचक्षते = कहते हैं- मुद्गलो भाHश्व प्रापिपभं च द्रुघणं च युफ्त्वा संग्रामे व्यवहत्याजि जिगाय । मुद्गलः भायंश्व. ऋपिः = भृम्यश्व के पुत्र मुगल ऋषि ने, उपभम् च दुषणम् च = यैल को और दूषण (मुद्गर) को शक्ट में, युक्त्वा जोड पर, सग्रामे मग्राम में, व्यवहत्य = युद्ध कर थे, आजिम् = युद्ध को, जिगाय जिता । अर्थात गाडी मे एक बैल था। दूसरा न रहने के कारण उसमे स्थान पर गदा को ही जोड़ कर मुद्गल अपि युद्ध में गये और विजय प्राप्त पर पर लाये। इस प्रमार धूप पा वाम गदा से लिया। यह गदा की स्तुसि है। सदमिवादिन्येपर्भवति । इति निरुक्त नवमाध्यायस्य प्रयोविंश ग्वाटः ॥ ९-२३ ।। सद अभिवादिनी = उसी यथोक्त इतिहास वो कहने वाले, एषा का - यह अग्रिम प्रचा भवति है- भप निरुते नवमाध्यायस्य चतुविशु मण्डः ।
निरुक्ते नवमाध्क्षयस्य चतुर्विशः खण्डः । इमं तं पश्य वृषभस्य युझं काष्ठाया मध्ये द्रघणं शानम् । येन जिगायं शतवत्सहस्रं गवां मुद्गलः पृतनान्येषु ॥ ऋ सं. ८-५-२१-९ ॥ इम मन्त्र का मुद्गल ऋथि, त्रिष्टुप् छन्द और द्रुषण नामक मुद्गर वा इन्द्र देवता है । मन्त्रार्थ- युद्ध के समाप्त होने पर ही जब कि, वृषभ के साथ गाड़ी में जुता हुआ ही द्रुघण (मुद्गर ) पा) किसी ने मुद्गल ऋपि से पूछा कि, तुमने किम की सहायता से राजा को जोता? मुद्गल ने दुषण की तरफ हाथ करके कहा कि, मित्र !, तम् इमम् = उस इम, काष्ठाया: मध्ये = गाड़ी के बीच में, हन्तव्य शत्रुओं को मार कर सूख पूर्वक, शयानम् = सोया हुआ, वृषभस्य युञ्जम् = वृपम के साथ शकट में जुता हुआ, द्रुपणम् = मद्गर (गदा) को, पश्य = देखो, येन = जिस द्रुषण के साथ, अर्थात् द्रुघण की सहायता से, शतवत् गवाम् सहस्रम् सैकड़ों हजार गायो को, पृतनाज्येषु - संग्रामों में, जिगाग = जीता है । इस मन्त्र का पास्क भाष्य- इमं तं पश्य पृपभस्य सहयुजम् । काष्ठाया मध्ये द्रुघणं शयानम् । येन निगाय शतवत्सहसं गवां मुद्गलः पृतनाज्येषु । वृषभस्य सहयजम् = बैल के साथ गाड़ी में जुता हुआ, इमम् तम् = उस इस दुषण को, देखो। पाठायाः मध्ये = शकट के मध्य में, शयानम् = सोया हुआ, द्रुघणम् - मुद्गर को। येन = जिस से, गुद्गलः = मद्गल ऋषि ने ( मैं ने ), पृतनास्येषु = संग्रामों मे, पातबस्सहलंगवाम - सैकड़ो हजार गायो को, जिगाय - जीता है। पम्य - - पृतनाज्यमिति संग्रामनाम । पृतनानामजनाढा, जयनाहा । पृतनाज्यम् इति = पृतनाज्य यह, संग्रामनाम - सग्राम का नाम है। पृतनानाम् - सेनाओं के, अजनात् = गमन करने से, वा = अथवा, जयनात = जय करने से। अर्यात संग्राम में सेना गमन करती है पा विजय प्राप्त करती है। अतः संग्राग पृतनाग्य पहा जाना है। अर्थात् 'पृतना: सैनिकजनाः अनन्ति गछन्ति यस्मिन इति पृतनाज्यम् ' इस विग्रह में पृतना उपाद 'अगतिमेपणयोः' पातु से 'मन्याय व ' इस उणादि गूत्र रो यक ( प ) प्रत्यप और पवणं दोघं होने पर 'पृतना' सद बना है। मंग्राम का नाम है। क्योंकि, गग्राम में सैनिक लोग गमन करते हैं । अपवा 'पृतना: जयन्ति यतिम सत् पृतनामयम्' इग विग्रह मे पूर्ववत् पृता उपद 'जिज' पातु से यम् परयय, पृतना जिप, पृषोदरारिवाद यार सोप होने पर पृतनाप कार बना है। मप्राम का नाम है। इयोंकि, संग्राम में रोनाओं का विजप रिया जाता है। मुदगल गान मा निनन वग्ते हैं- - (१३६२) निरुक्ते नवमाध्यायस्य चतुर्विशः खण्डः । मुद्गलो मुगवान् , मुद्गगिलो वा, मदन गिलतीति वा, मदगिलो वा,"मुदगिलो वा । मुद्वान् = मुंगवाला, मुद्गल: = मुद्गल कहा जाता है। अर्थात् , 'मुद्गः - अन्नविशेषः अस्यास्मिन् अस्ति इति मुद्गलः' इस विग्रह में मुद्ग शब्द से मत्वर्थीय लच् ( ल ) प्रत्यय होने पर मुद्गल शब्द बना है। मुग वाला अर्थ है। वा = अथवा, मुद्गगिल: मुद्गलः = मुंगों को गिलने वाला मुद्गल कहा जाता है । अर्थात् 'मद्गं गिलति इति मुद्गलः' इस विग्रह में मुद्ग उपपद 'गृ निगरणे' धातु से ड प्रत्यय, टि लोप, मुद्गग् अ, पृषोदरादित्वात् ग् को ल होने पर मुद्गल शब्द बना है। मुद्ग भक्षण करने वाला अर्थ है। सात्विक अन्नभोजी। वा = अथवा, 'मदनं गिलति इति - काम को गिलता है इस लिये मुद्गल कहा जाता है । अर्थात् ' मदनं कामं गिलति वशीकरोति इति मुद्गला' इस विग्रह में मदन उपपद ‘ग निगरणे धातु से पचाद्यच्, रपर गुण मदनगर, पृषोदरादित्वात् मुद्गल शब्द बना है। काम को गिल जाने वाला अर्थात् जितेन्द्रिय अर्थ है। . वा वा = अथवा, मदङ्गिला = मद को गिलने वाला । अर्थात् 'मदं गिलति इति मुद्गलः' इस विग्रह में मद उपपद ‘ग निगरणे' धातु से अच् प्रत्यय, रपर गुण, मद गर, पृषोदरादित्वात् मदगर - मुद्गल बना है। निरभिमान शान्त अर्थ है। अथवा, मुदगिलः = हर्ष को गिलने वाला मुद्गल कहा जाता है। अर्थात् 'मुदं हप गिलति इति मुद्गलः' इस विग्रह में मुद उपपद 'गृ निगरणे' धातु से अच् प्रत्यय, रपर गुण, मुदगर, पृषोदरादित्वात् मुद्गल शब्द बना है। हपं रहित - निवृत्त सर्व इन्द्रिय विषय मुद्गल कहा जाता है। भृम्यश्व के पुत्र भार्यश्व मुद्गल है' यह पूर्व यहा गया है। सिहावलोकनन्याय से उस का निर्वचन करते हैं- भार्यश्वः भृम्यश्वस्य पुत्रः । भृम्यश्वः भृमयोऽस्याश्चाः । अश्वमरणाद्व । भृम्यश्वस्य - भृम्यश्व के, पुत्रः = पुत्र मुद्गल ऋषि, भाम्य॑श्वः भाम्यश्व कहलाते हैं । अस्य मश्वा = इस के पोड़े सब, भृमयः अनवस्थायी अर्थात् वहुन चञ्चल हैं इस लिये यह. भृम्यश्वः भृम्पन्न कहा जाता है। वा = अथवा, अश्वभरणात् = अश्वो के भरण पोषण करने से, भृम्यवः भृम्यश्व कहा जाता है। अर्थात् अश्वों के भरण पोषण करने से भृम्यश्व और भृत्यश्व के पुत्र होने से मुद्गल भाग्यश्व कहलाते है। भ्रियन्ते इति भृमयः' इस विग्रह में 'भृन पारणपोषणयोः पातु में उणादि मि प्रत्यय होने से भूमि दान्द बना है, चन्द्धल अर्थ है । 'भृमयः अश्वा अस्य इति भृम्यश्व इस विग्रह मे भृमि और अश्व का वहुव्रीहि समास, भृम्यश्वस्य अपत्यम् इति भार्यवः' इस विग्रह में भृम्यश्व शब्द से 'तस्यापत्यम्' इस सूत्र से तद्धित अप (म) प्रत्यय 'तद्धितेप्वचामादेः' इस सूत्र से आदि अच् वृद्धि होने पर भार्यश्व शब्द बना है।
हिते नवमाध्यायस्य पश्चविंशः खण्डः। - , - - . पितुः । 'पितु' यह अन्न का नाम है। इसका निर्वचन करते हैं- पितुरित्यन्ननाम । पातेर्वा, पिवतेर्वा, प्यायतेर्वा । पितुः इति = पितु यह, अग्ननाम - अन्न का नाम है। पातेः वा = 'पा रक्षणे' धातु से, वा- अथवा, पिवतेः = 'पा पाने' धातु से, वा = अथवा, प्यायते: 'ओप्यायी वृद्धी' घातु से 'पितु' शब्द बना है। अर्थात् 'पाति प्राणान् रक्षति इति पितु: इस विग्रह में 'पा रक्षणे' धातु से 'कमिमनिजनि' इत्यादि उणादि सूत्र से वाहुलकार तु प्रत्यय और पृषोदरादित्वात् धातु को इकारा. न्तादेश होने पर पितु शब्द बना है। अन्न का नाम है। क्योंकि, अन्न प्राणों की रक्षा करता है। अथवा "पिवति इति पितुः' इस विग्रह में 'पा पाने' धातु से उक्त उणादि सूत्र से वाहुलकात् तु प्रत्यय और पृषोदरादित्वात् धातु को अन्तादेश इकार होने पर 'पितु' शब्द बना है। पेय पदार्थ का नाम है । दुग्ध जलादि भी अन्न ही हैं। क्योंकि, अद्यते यत् तत् अन्नम्' जो खाया जाय वह सब अन्न कहे जाते हैं । अथवा, 'प्यायते शरीरवृद्धि करोति इति पितुः अन्नम्' इस विग्रह में मोप्यायी वृद्धौ' धातु से उक्त उणादि सूत्र से वाहुलकात् तु प्रत्यय और पृषोदरादित्वात् धातु को पि आदेश होने पर पितु' शब्द बना है। अन्न का ही नाम है। क्योंकि, अम शरीर की वृद्धि करता है। तस्यैपा भवति । इति निरुक्ते नवमाध्यायस्य चतुर्विशः खण्डः ।। ९-२४ ।। पितु शब्द की, एषा = यह अग्निम ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्त नवमाध्यायस्य पञ्चविंशः खण्डः । पितुं नु स्तोपं महो धर्माणं तविपीम् । यस्य त्रितो व्योजसा वृत्रं विपर्वमर्दयत् ॥ ऋ सं. २-५-६-१ ।। इस मन्त्र का अगस्त्य ऋपि, अनुष्टुप्गर्भ उप्टिक् छन्द और पितु ( अन्न ) देवता है। मन्त्रायं-अगस्त्य ऋषि कहते हैं-मैं, नु - क्षिप्रकारी (शोघ्रकारो), महः = महान धर्माण सर्व के धारक, तविषीम् - वलात्मक,-पितुम् - पालक 'अन्न देव को, स्तापम् स्तुति करता हूँ। जिस अन्न की, ओजसा - सामथ्य से, नित: = विस्तीर्ण इन्द्र ने, वृत्रम् वृक्षासुर को और उस को, विपवंम् - सन्धियों को, मर्दयत् = काट डाला था। अर्थात् उसका वध किया था। इस मन्त्र में पितु शन्द अन वाचक है। । तस्य यस्य इत-मन्त्र का भाप्य- १७१ . - - (१३६४) निरुक्ते नवमाध्यायस्य पड्डिशः खण्डा । तं पितुं स्तौमि महतो धारयितारं बलस्य । तविपीति बलनाम । तवतेर्वा वृद्धिकर्मणः । यस्य त्रित ओजसा बलेन, त्रितस्त्रिस्थान इन्द्रो वृत्रं विपर्वाणं व्यर्दयति । महतः - महान, बलस्य - बल के, धारयितारम् = धारण करने वाला, तम् पितुम् = उस अन्न की मैं, स्तौमि स्तुति करता हूँ। तविषी इति' = तविषो यह, बलनाम = बल का नाम है। वा = अथवा, वृद्धिकर्मण - वृद्धयर्थक, तवतेः । तु धातु से तविपी रूप बना है। क्योंकि वह सब वस्तुओं से बड़ा है। अर्थात् 'तूयते इति तविपो' इस विग्रह में वृद्धयर्थक सौत्र तु धातु से उणादि कल्पित टिपच् ( इप) प्रत्यय, तु इप, गुण, अवादेश, तविष, टित्त्वाद डोप, अलोप होने पर. तविषी शब्द बना है । यस्य = जिस अन्न की, ओजसा = बलेन = सामथ्र्य से, त्रितः = विस्तीर्ण, त्रितः विस्थान = तीन लोको के स्वामी, इन्द्रः = इन्द्र ने, वृत्रम् = वृत्र को और, विपणम् = उसको सन्धियों को तोड़ कर, व्यर्दयति = उसका वध किया था। - %D - । नद्यः - - २० -नद्यः। 'नदन्ति इति नद्यः' इस विग्रह में ‘णद अव्यक्ते शन्दे' धातु से पचाद्यच् । वहाँ ? ( नद' ऐसा टिव पढा है। अतः टित्त्वात् डोप होने पर नदी शब्द बना है। 'नद्यः' यह जस् का रूप है । नदी का ही नाम है। क्योकि, वह अव्यक्त शब्द करती है। भाष्यकार कहते हैं- नयो व्याख्याताः। नदियां, व्याख्याताः = व्याख्यात हैं। अर्थात् नदी शब्द को व्याख्या नदीनामो मे 'नदना भवन्ति शब्दवस्यः' इत्यादि पक्तियों से हो चुकी है। यहां प्रसगतः लिखी गई हैं । तासामेपा भवति । इति निरुक्ते नवमाध्यायस्य पञ्चविंशः खण्डः । ९ - २५ ॥ तासाम् = उन नदियों की, एपा = यह अग्रिम ऋचा, भवति - है- अथ निरुक्ते नवमाध्यायस्य पइिंशः खण्डः । इमं में गङ्गे यमुने सरखति शुतुद्रि स्तोम' सचता , परुष्पया। - असिक्न्या मरुधे वितस्तया कीये शृणुह्या सुपोर्मया ॥ म. सं. ८-३-७-५ ॥ 1 इस मन्त्र का प्रियमेघ के पुत्र सिन्धुक्षित ऋषि, जगतो छन्द और 'नदी देवता है। मन्त्रायं इस मन्त्र मे नदियो की स्तुति है । गङ्गे = हे गङ्गा!, यमुने = हे यमुना!, सरस्वति = हे सरस्वती !, शुतुद्रि - हे शुतुद्री ! तुम सब मिल कर, मे = मेरे, इमम् स्तोमम् = इस स्तोत्र का आस्वत: .
'निरुक्ते नवमाध्यायस्य पदिशा खण्डा । सेवन करो और, मरुधे = हे मरुधा तथा, आर्जीकीमे = हे आर्जीकीया ! तुम दोनों, पहटण्या = परुष्णी के साथ, असिकन्या = असिकनी के साथ, वितस्तया - वितस्ताके साथ और, सुपोमया सुपोमा के साथ मेरे स्तोत्रों को ध्यान देकर, आश्रृणुहि - सुनो। ! - इस का भाष्य- अप. गमन - इमं में गङ्गे ! 'यमुने ! सरस्वति ! शुद्रि ! पैरुष्णि ! स्तोममासेष्वम् , असिन्क्या च संह --मरुधे । वितस्तयां चार्जीकीये.. आश्रृणुहि सुपोमया चेति समस्वार्थः । गों = हे गङ्गा!, यमुने - है यमुना !, सरस्वति - हे सरस्वती !, शुतुद्रि = है शुतुद्री !, पुरुष्णि = हे पुरुष्णी! मरुधे = हे मरुया!, आर्जीकीये = हे आजीको! तुम सब मिल कर, असिन्क्या च सह - असिक्नी के साथ, च = और, वितस्तयां च वितस्ता के सायं, च = और, सुपमयाच सुपोमा के साथ, मे - मेरे, इमम् स्तोमम् = इस स्तोत्रों का, बासेध्वम् = सेवन करो और ध्यान से सुनो, इति = यह, समस्तार्यः = सम्मिलित अर्थ है । इन नदियों के वर्तमान नाम-शुतुद्री - सतलज । परप्णी - रावी। असिक्नी -चिनाव। वितस्ता जेलम | सुपोमा = सोहान । आर्जीकीया प्यार । इस प्रकार इस मन्त्र में नदियां नव (९) आई हैं। मरुधा सब नदियों को कहते हैं। यहा स्वतन्त्र नदी नहीं हैं। "अथैकपदनिरुक्तम् - गङ्गा 'गमनात् । अब, एकपदनिरुक्तम् = एक एक पदका निर्वचन किया जाता है-गमनाद करने से, गङ्गा गङ्गा कही जाती है । अथवा प्राणियों को स्वर्ग लोक में गमन कराने से गङ्गा कहलाती है । अर्थात् गच्छति हिमालयात सागरं व्रजति इति गङ्गा' इस विग्रह में 'ग गतो' धातु से गर्नु गम्ययोः' इस उणादि सूत्र से गन् (ग) प्रत्यय, गम् के मकार को अनुस्वार परसवर्ण, टाप और दीर्घ होने पर गङ्गा पान्दं वना, है । अथवा, गमयति प्राणिनः स्वर्गम् इति गङ्गा' इस विग्रह में भगत पित प्यर्थक ‘गम गती' पातु से उक्त उपादि मूत्र से गन् प्रत्यय, अनुस्वार परसवर्ण और राप् होने पर गला शब्द बना है। गला नदी का नाम है। मयोंकि, गङ्गा हिमालय से सागर की ओर जाती है एवं प्राणियों को स्वर्ग से जाती है इस लिये यह नदी गङ्गा कहलाती है ॥१॥ यमुना-प्रयुक्ती गच्छतीति वा प्रवियुतं गच्यतीति वा । प्रयुक्ती - अपने को गङ्गा के साथ मिश्रण करतो हुई, गन्धति - जाती है, इति लिये, या अपदा, प्रवियुतम् - अपने तरङ्गों से स्तिमित स्पिर हुई जैसे, गच्छति - पसतो है, इति = इस लिये, यमुना वह नी यमुना कही जाती है । अर्थात् 'योति मारमानं पढ़या यह मियोकरोति इति यमुना' इस विग्रह में 'यु मिश्रणामिययोः' धातु से . 'त्युद च इस मूत्र से याहसकाव कर्ता में स्पुट (पु) प्रत्यप, अन पादेश गुण पवादेश, पवन, टाप, सवना, पोदरादिस्वाद व को मु होने पर यमुना शम्द बना है। यमुना नदी का नाम है । बोकि, यह पिर जमी मालूम पड़ती हुई अपने को गहा में मिला देतो है ॥२॥ -
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(१३६६)
निरुक्त नवमाध्यायस्य पद्दिशः खण्डा |
सरस्वती-सर इत्युदकनाम, सर्ते:, तद्वती।
'सरण सरः उदकम् ' इस विग्रह मे 'सृ गतौ' घातु से, 'सर्वधातुभ्योऽसुन्' इस उणादि सूत्र से
असुन् (अस्) प्रत्यय, रपर गुण होने पर सरस् शब्द बना है। उदक (जल) का नाम है। इसी को
कहते हैं-सर इत्युदकनाम = सरस् यह जल का नाम है, सते. = सृ धातु से बना है। तद्वती :
उस जल वाली जो हो- वह, सरस्वती = सरस्वती नदी कहलाती है। अर्थात 'सरोऽस्यास्मिन्नस्ति
इति 'सरस्वती' इस 'विग्रह में उक्त सरस् शब्द से मतुप्, मतुप् के मकार को वकार और डीप
होने पर सरस्वती शब्द बना है। सरस्वती नदी का नाम है। क्योकि, वह गमनाल जल वाली है।
नदीनामो मे विस्तार से इस का निर्वचन किया गया है ।। ३ ।।
7
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शुतुद्री-शुद्राविणी-क्षिपदाविण्या-शु तुन्नेर-द्रवतीति वा ।
“शुतुद्रो = शुद्राविणी - क्षिप्रद्राविणी = शीघ्र गमन करने के स्वभाव वाली, या
अथवा
शु = क्षिप, तुम्ना इव = किसी से वेधी हुई को जैसी, द्रवति = गमन करती है (बहती है ),
इति - इस लिये, शुतुद्री = शुतुद्री कही जाती है। शु यह क्षिप्रनामो में (निघ० २-१५-१५)
पढा है। इसका शीघ्र अर्थ है। 'शु क्षिप्र द्रवति तच्छीला इति शुतुद्री' इस विग्रह मे शु उपपद
'द्रु गती' धातु से 'सुष्यजातोणिनिस्ताच्छील्ये' इस सूत्र से णिनि ( इन ) प्रत्यय, शु द्रु इन्, वृद्धि,
आव आदेश, शु द्राविन्, पृपोदरादित्वात् द्राविन के स्थान मे तुद्रा आदेश, शुतुद्रा, डीप् ( ई ),
'यस्येति च' इस सूत्र से अकार लोप होने पर शुतुद्री शब्द बना है। नदी विशेष का नाम है ।
क्योंकि, वह नदी शीघ्र गमन करने के स्वभाव वाली है। अथवा 'शु आशु क्षिप्रम् तन्ना इव के
नचित् विद्धा इव द्रवति इति शुतुद्री' इस विग्रह मे शु उपपद 'तुद व्यथने' धातु से, क्विप् च'
सूत्र से किप् प्रत्यय, सर्वापहारी लोप, शु तुद्. पृषोदरादिस्वाद दकार लोप, शुतु. शुतु उपपद '
गतौ धातु से डट् प्रत्यय (अ), शुतुद्रुअ, डित्त्वात् टि लोप, शुतुद्र, टित्वात् , डीप् (ई),
'यस्येति च'
इस सूत्र से अकार लोप होने पर शुतुद्री शब्द बना है। नदी का नाम है । क्योकि,
वह नदी किसी से वेधन को हुई की जैसी गमन करती है ॥ ४ ॥
इरावती परुष्णीत्याहुः।
इरावती = जो लोक में इरावती नाम से प्रसिद्ध है उसको मन्त्रद्रष्टा ऋपि लोग इस मन्त्र मे,
पहप्णी = पुरुष्णो नदी, इति = यह, आहु. = कहते है। अर्थात् इरावती का दूसरा वैदिक नाम
-
-
"
पणी है।
7
पर्ववती- भास्वती । कुटिलगामिनी ।
यह, पर्यवती = प्रन्थि वाली और भास्वती - दैदीप्यमान है एव, कुटिल गामिनी - टेढी
चलने वाली है । अर्थात् 'परुप पर्व कौटिल्य अस्यास्ति इति परुणी' इस विग्रह मे परुण शम्द से
मत्वर्थीय न प्रत्यय, णत्व, गौरादित्वात् ही होने पर परप्णी शब्द बना है। इरावती नदी का
नाम है। क्योकि वह टेढी चलती है ॥ ५ ॥
। - उसका निपेष निरुक्त नवमाध्यायस्य पाँडशा अण्डा । असिनी = अनुक्ला - असिवा । सितमिति वर्णनाम । तत्प्रतिपेघोऽसितम् । अशुल्ला असिता = जो काली हो वह. असिस्नी - असिक्नी कही जाती है। क्योकि, सितम् इति = सित यह, वर्णनाम = सफेद वर्ण (रंग) का नाम है । तत्प्रतिषेधः विपरीत, असितम् = असित ( काला) कहा जाता है। अतः कृष्णोदका नदी मसिक्नी कही जाती है। अर्थात 'सिता = शाला, न सिता असिता कृष्णा, पृषोदरादित्वात् असिता के द को पन और टाप् के स्थान मे डोप होने पर असिवनी शब्द बना है। नदी विशेष का नाम है। क्योकि, उसका जल श्याम होता है ।। ६ ।। मरुद्धा सर्वा नद्यो मरुत एना वर्धयन्ति । सर्वा: नद्यः - सभी नदियों, मरुघाः = माधा कही जाती हैं। यह साधारणतया सब नदियो का विशेषण है । जैसे हे मरुधे गङ्गे' हे मरदृधे यमुने ! इत्यादि। क्योकि, मरुतः : पवन, एना: %D इन्हे, वर्षयन्ति = वृष्टि द्वारा वढाते हैं । अर्थात् 'मरुत. वर्षयन्ति इति मरदृधा' इस विग्रह मे मरुत् उपपद 'धु वृद्धौ' पातु से इगुपध लक्षण के प्रत्यय और टाप होने पर मरुधा शब्द बना है। सभी नदियों का विशेषण है। क्योंकि, सभी नदियां वायु से फैलाई जाती हैं । वितस्ता - अघिदग्धा, विवृधा, महाकूला । अविदग्धा वह अविदग्ध है इस लिये, वितस्ता = वितस्ता कही जाती है। अन्य नदियो के समान यह जली नही अतः यह वितस्ता कही जाती है। सुना जाता है कि, वैदेहक नामक एक अग्नि है। उस ने अन्य सब नदियो को जला दिया था। इस को नहीं जलाया था। अता यह अविदग्धा वितस्ता कहलाती है। यह कथा सामिधेनी वाहाण में है। अतासि इति तस्तः, तस्वैन विगता इति वितस्ता - यविदग्धा' इस विग्रह मे दग्पार्यक 'तसु उपक्षये' धातु से क्त (व) प्रत्यय, छान्दसत्वात् इडभाव, वि और तस्त का गति समास, वितस्ता थविदग्धा । अथवा विवृषा विस्तीर्णा = बहुत बड़ी, अत एव, महाफूला = बड़े बड़े तट पाली होने से यह, वितस्ता वितस्ता कही जाती है। अर्थात् जो स्वयं बडी हो और जिसके बड़े बड़े तट हो वह विसस्ता नदी कहलाती है ॥ ७॥ आज कीयां विपाडित्याहुः। आर्जीकीयाम् = आ कोया नदी को, विपाट् इति - विपाट् नदी यह, बाहुः - कहते हैं। लोक मे जिसको पिपाशा नदी कहते हैं । मर्याद विपाशा के दो नाम हैं। अजीकोया मौर विपाद । ऋाजीप्रभवा वा। वा- अथवा, कजीप्रभवा ऋजीक नामक पर्वत से निकली है इस लिये इस को मार्जीकोमा कहते हैं । अर्थात् 'ऋजीयात एतनामपर्वतात् प्रभवति इति बार्जीका'जीक घन्द है 'प्रमावति' 2 ध भ - . - वा - . (१३६८) निरुक्ते नवमाध्यायस्य षड्विशः खण्ड । इस सूत्र से अण् (अ) प्रत्यय तद्धित 'तद्धितेष्वचामादे ' इस सूत्र से आदि अच् वृद्धि नौद टाप् होने पर आर्जीका शब्द बना है। आर्जीवा एव आर्जीकोया' इस विग्रह मे आर्जीका शब्द से 'गहादिभ्यश्च' इस सूत्र से स्वार्थ मे छ प्रत्यय, छ को ईय् और टाप् होने पर आर्जीकीया शब्द बना है । नदी का नाम है। क्योकि, यह नदी नजीक नामक पर्वत से उत्पन्न हुई है। मजुगामिनी वा। अथवा, ऋजुगामिनी - सीधा गमन करने वाली है। अत यह नदी आर्जीकीया कहलाती है। ऋजु पूर्वक गम् धातु से णिनि प्रत्यय, वृद्धि, डीप होने पर ऋजुगामिनी = ऋजुगामिनी होती हुई पृषोदरादित्वात् आर्जीकीया बना है। विपाट् ! विपाटनाद्वा, विपाशनाद्वा, विप्रापणाद्वा । विपाटनात् वा = विपाटन अर्थात् पृथिवी भेदन करने से, वा = अथवा, विपाशनाद = पाश का विमोचन करने से वा = अथवा, विप्रापणात् = विशेष वेग से गमन करने से, विपाट् = यह नदी विपाट् कहलाती है । अर्थात् 'विपाटयति अतिवेगाव भूमिम् भेदयति इति विपाट्' इस विग्रह मे विपूर्वक णिजन्त 'पट भेदने' धातु से कर्तरि किप् (०), 'णेरनिटि' इस सूत्र से णिलोप होने पर विपाट -बना है । अथवा 'विपाशयति पाशविमोचन करोति इति विपाट्' इस विग्रह मे विपूर्वक ण्यन्त 'पश बन्धने' घातु से विप् (०), णि लोप, विपाश् व्रश्चादि पत्थे, जस्त्व और 'चत्वं' होने पर विपाट् शब्द बना है। नदी विशेष का नाम है। क्योकि, इस ने वसिष्ठ ऋपि के फासी को जल के वेग से तोड दिया था। इसी को कहते हैं- पाशा अस्या 'व्यपाश्यन्त वसिष्ठस्य मुर्पतस्तस्माद् विपाडुच्यते । मुमूर्पत पुत्र शोक से मरने की इच्छा वाले, वसिष्ठस्य वसिष्ठ ऋपि के, पाशा : फासिया, अस्याम् - इस नदी मे, व्यापाश्यन्त - टूट गई थी, तस्मात् - इसी से, यह नदी, विपाइ। उच्यते - विपाट कही जाती है। इस विषय मे कथा है कि, विश्वामित्र ने वसिष्ठ के सौ पुत्रो को मार डाला था। पुत्र-मरण के शोक से अपने को पासो से बांध कर वसिष्ठ ऋषि इस नदी में मरने के लिये गये थे। उनकी ये सव फासिया जल से टूट गई । उसी समय से इस का नाम - - In -- विपाट् पंडा -- = था। उरुञ्जिरा का -- 1 पूर्वमासीदुरुञ्जिरा । पूर्वम् = इस से पहले इस का नाम, उरुचिरा' उरुखिरा, आसीद अर्य बहुजला है ॥ ८॥ सुपोमा-सिन्धुः। यदेनामभिप्रसुवन्ति नयः । सिन्धुः स्यन्दनात् । सिन्धु = सिन्धु नदी, सुषोमा = सुपोमा कहलाती है। यद् = क्योकि, नद्य = अन्य सब नदियां, एनाम् = इसे, अभिप्रसुवन्ति = अभिप्रसघ अर्थाद सगम करती हैं। स्यन्दनाव = बहने से यह सिन्धुः सिन्धु नदी कहलाती है । क्योकि, यह नदो अन्य की अपेक्षा अधिक वेग से बहती है ।।९॥
निरुक्ते नवमाध्यायस्य सप्तविंशः सण्डा । (१३६९) नद्य ' के पश्चात् 'आप का क्रम आता है- 7 %D - - 7 - - आपः। आपः - जल । इसका निर्वचन करते हैं-- 1. 'आप' आप्नोते। आप्नोते आप् धातु से, आप 'आप' यह रूप बना है। 'आप्नोति सर्वम् आप्यम् इति आप.' इस विग्रह मे 'आत, व्याप्तो' धातु से 'आप्नोतेर्हेस्वश्च' इस उणादि सूत्र से किप् ( ) प्रत्यय और हस्व होने पर 'अप्' शब्द बना है। जल का नाम है। नित्य वहवचनान्त है। 'अप्तृनच्' इत्यादि सूत्र से दोघं होने पर आप रूप बना है। तासामेपा भवति । इति निरुक्ते नवमाध्यायस्य पडिश खण्ड । तासाम् = उन जलो की, एषा', यह अग्रिम ऋचा, भवति = है, अथ निरुक्ते नवमाध्यायस्य सप्तविंश. खण्ड. 1. आपो हि ठा मयोभुवस्ता ऊर्जे दधातनः । महे। रणाय चक्षसे ॥ स ७-६-५-१॥ इस मन्त्र का अम्बरीपराजा के पुत्र, सिन्धुद्वीप ऋपि, गायत्री छन्द और भाप (जल) देवता है। मन्यार्थ-आपः है जल I, हि = क्योकि, तुम, मयोभुवः = सुख का आधार, स्थ = हो । ता = वह तुम, न - हमे, ऊर्जे = अन्न के लिये, दधातन = धारण करो, 'हमे अन प्राप्ति के योग्य वनाओ, हमे अन्न दो। हमे, महे = महान्, रणाय = रमणीय, चक्षसे = ज्ञान के लिये, दधातन : धारण करो, हमे ज्ञान के योग्य बनाओ, हमे ज्ञान दो। इस मन्त्रका यास्क भाष्य- आपो हि स्था सुसभुवस्ता नोऽन्नाय धच ! महते च-नो रणाय रमणीयाय, च दर्शनाय । हे जल I, हि = क्योकि, तुम, सुखभुव = सुख का नाधार, स्था = हो। ता. = वह तुम, नः 3 हमे, अन्नाय - अन्न के लिये,-चत्त धारण करो, अप्तादाच और, म महते रणाय - रमणीयाय = महारमणीय, दर्शनाय जान के लिये, घत्त : धारण करो, ज्ञान दो। २२ ओपधयः। ओपघय - मोपधिया । इस का निर्वचन करते हैं- याप - , क S - . - - . (१३७०) निश्क्ते नवमाध्यायस्याप्टाविंशः खण्डः । ओषधय ओपद्धयन्तीति वा, ओपत्येना धयन्तीति वा, दोपं धयन्तीति वा । मोषद् धयन्ति - क्षय आदि रोगों को दग्ध (भस्म) करती हुई पान करती हैं। नाश करती हैं, इति = इस लिये, वा = अथवा, ओपति = शरीर के किसी अङ्ग को दग्ध (रोग से पीडित) होने पर, प्राणी द्वारा, एनाः = ये, धयन्ति = पान की जाती हैं, इति = इस लिये, वा = अथवा, दोषम् = वात पीत कफ के वैषम्य से उत्पन्न रोग रूप दोष को शमन करने के लिये प्राणी जिसको, धयन्ति =पान करते हैं, इति = इस लिये, मोषधयः = ओपधी कही जाती हैं । ओपति इति ओषद्' इस विग्रह में 'उप दाहे' धातु से, लट्, उसके स्थान में शतृ ( अत् ), लघूपध गुण होने पर ओषद् शब्द बना है । ‘ओपद् घवन्ति पिबन्ति नाशयन्ति इति ओषधयः इस विग्रह मे ओषद् उपपद 'धेट पाने' (घा) घातु से कर्मण्यधिकरणे च' इस सूत्र से कर्ता में कि (इ) प्रत्यय, 'आतो लोप इटि च' इस सूत्र से आ लोप और पृषोदरादित्वात् घोषद् के दकार का लोप होने पर 'ओषधि' शब्द बना है। ओषधि का ही नाम है। क्योंकि, ओषधियां जलाते हुए रोगों को पी जातो है, नाश करती है। अथवा, 'ओपति कस्मिंश्चित उदरादौ क्लिश्यमाने सति प्रणिनः दाहोपशमनाय एनाः पयन्ति पिबन्ति इति ओषधयः' इस विग्रह में ओषद् उपपद उक्त 'घेट पाने' घातु से 'कर्मण्यधिकरणे प' सूत्र से कर्म में कि प्रत्यय, मा लोप, दकार लोप होने पर ओपधि शब्द बना है । ओषधि का ही नाम है। क्योंकि, दाहक व्याधियों शमन करने के लिये प्राणी इन को पीते हैं। अपवा 'दोषं धयन्ति इति ओषधयः' इस विग्रह में दोष शब्द उपपद घेट् धातु से कतरि कि प्रत्यय, मा लोप, दोष घि, पृपोदरादित्वात् दोप के दकार का लोप होने पर ओषधि, शब्द बना है। भोषधि का ही नाम है। क्योंकि, वातादिकृत शरीर में उत्पन्न दोप को ये पी जाती हैं। ये दोषों को नाश करती हैं इस लिये ओषधि कही जाती हैं। ओषधयः' यह प्रथमा बहुवचन का रूप है। तासामेपा भवति । इति निरुक्ते नवमाध्यायस्य सप्तविंशः खण्डः ॥ ९-२७ ॥ तासाम् = उन ओधियो की, एपा यह अग्रिम ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्ते नवमाध्यायस्याष्टाविंशः खण्डः। या ओषधीः पूर्वी जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा । मने नु वभ्रूणामहं शतं धामानि सप्त च ॥ ऋ. सं. ८-५-८-१ ।। इस मन्त्र का अथर्वा के पुत्र भिषक् ऋपि, अनुष्टुप् छन्द और ओषधि देवता है । मन्त्रा जो, पूर्वाः = पुरातन, ओषधीः ओषधियां, त्रियुगम् = सत्य, त्रेता मोर द्वापर युगों में, तीनों युगों से पूर्व, देवेभ्यः देवों से, जाताः = उत्पन्न हुई हैं। वे सब, वभ्रूणाम् " या:- पुरा e निरुक्ते नवमाध्यायस्थकोनत्रिशा खडा । (१३७१) पिङ्गलवर्णा सोमादि ओपधियाँ, शतम् सप्त च धामानि = एक सौ सात स्थानों में विद्यमान हैं। अहम् = मैं, नु = ऐसा, मन = मानता हूँ। इस का भाष्य- या ओषधयः पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रीणि युगानिपुरा । मन्ये नु तभ्रूणामहं वध्रुवर्णानां हरणानो भरणानामिति वा । 'शतं धामानि सप्त च । धामानि त्रयाणि भवन्ति स्थानि- नामानि जन्मानीति, जन्मान्यत्राभिषतानि । सप्तशतं पुरुषस्य यर्मणां तेष्वेना दधातीति वा । याः = जो, पूर्वाः = पुरातन, ओषधयः = ओषधियाँ, श्रोणि युगानिपुरा = तीनों युगों से 'पहले, देवेभ्यः = देवों से, जाता: = उत्पन्न हुई हैं। तद् = उन, बभ्रणाम् बभ्रुवर्णानाम् = कपिल वर्ण वालो, हरणानाम् = क्षुधा हरण करने वालो, वा = अथवा, भरणानाम् - प्राणियों के भरणपोषण करने वाली हैं, नु = ऐसा, अहम् = मैं, मन्ये - मानता हूँ। क्योंकि, वे औषधियाँ, शतम् सप्त ध घामानि = एक सौ सात स्थानों में विद्यमान हैं। घामानि प्रयाणि भवन्ति = धाम तीन होते हैं स्थानि नामानि जन्मानि इति = स्थान नाम और जन्म। उन में से, मत्र = यहां, जम्मानि अभिप्रेतानि = जन्म अभिप्रेत है । अर्थात् औषधियों को एक सौ सात जातियों को मानता हूँ। या- अथवा, पुरुषस्य पुरुष के, सप्तशतम् = एक सौ सात, मर्मणाम् = मर्म स्थान हैं, तेषु = उन्ही में, एनाः = ये नोपधियां, दधाति प्राणियो को पारण पोषण करती हैं। इति = इत्यर्थः। पुरुष के शरीर में एक सौ मर्म स्थान हैं। उन सब को धारण करने वाली ओपधियों ही हैं। अतः इस पक्ष में धाम का अर्थ स्थान घट जाता है। %3D रात्रिः। २३ रात्रि रात को कहते हैं। भाष्यकार कहते हैं- रात्रिाख्यावा। राषिः = रात्रि, व्याख्याता - व्याख्यात है। अर्थात् इसकी व्याख्या राविनामनिर्वचन के प्रारम्भ में कर दी गई है। वही देखना चाहिये । तथा एपा भवति । इति निरुक्त नवमाध्यायस्याष्टाविंशः खण्डः । ९-२८ ॥ तस्याः = उस रात्रि की, एपा - यह अग्रिम ऋचा, भवति - अय निरुक्ते नवमाध्यायस्यकोनत्रियः सण्ड: १०२ 1 (१३७२) निरुक्त नवमाध्यायस्थकोनविंशः खण्डः । आ रात्रि ! पार्थिवं रजः पितुरप्रायिधामभिः । दिवः सदासि बृहती वितिष्ठस आ त्वेषं वर्तते तमः ॥ अथ. १९-४७-१॥ प - इस मन्त्र का कुशिक वा रात्रि ऋषि है । मन्त्रार्थ-रात्रि = हे रात्रि, (डोषन्त नदी हस्वत्व), तुमने, पार्थिवम्, रज = पृथिवी लोक को, आमप्रायि = पूर्ण किया है। अन्धकार से व्याप्त किया है। पितुः धामभिः अप्रायि = मध्यम लोक के स्थानो के सहित अन्तरिक्ष लोक को भी अन्धकार से पूर दिया है। दिव सदासि आ अप्रायि = धुलोक के स्थानो को भी अन्धकार से आच्छादित किया है । तुम, बृहती = बड़ी होती हुई, वितिष्ठसे = दया कर के स्थित होती हो। स्वेपम् तम• आ वर्तते = अपार अन्धकार लौट आता है। अर्थात् तुम्हारा अन्धकार इतना अधिक है कि वह समस्त ससार को पूरण करके भी अवशेष रहता है और पार्थिव लोक मे पुन लौट आता है । ऐसे प्रभाव वाली तुम हमारे लिये कल्याण करो। इस मन्त्र का यास्क भाष्य- - आपू पुरस्त्वं रात्रि ! पार्थिवं रजः स्थानमध्यमस्य दिवः सदांसि बृहती महती वितिष्ठस आवर्तते त्वेपं तमो रजः । रात्रि = हे रात्रि!, त्वम् = तुमने, पार्थिवम् रज पृथिवी लोक शो आपूपुरा = पूर्ण किया है । मध्यमस्य = मध्यम लोक के, स्थान स्थानो के सहित अन्तरिक्ष लोक को भी पूर्ण किया है। दिव सदासि = द्युलोक के स्थानो को भी पूर्ण किया है। वृहतो = महती = तुम बडी होती हुई, वितिष्ठसे खडी रहती हो । स्वेषम् तम रज आवर्तते = तुम्हारा अपार अन्धकार पृथिवी पर लौट आता है। २४ अरण्यानी । अरण्य (वन) पालक अधिष्ठात्री देवता अरण्यानी । 'इन्द्रवरुणभव' इत्यादि पाणिनि सूत्र हिमारण्ययोमहत्त्वे' इस वात्तिक से कात्यायन महपिने अरण्यानी का अर्थ 'महद् अरण्यम् अरण्यानी (वडा वन) किया है । उस से महपि यास्क सहमत नहीं है। क्योकि, 'अरण्यानी' की ऋचा में अर्थ अरण्य अधिदेवता है । किमी ने अरण्यानी का अर्थ किया है। सो समीचीन नही, क्योकि, यह देवतकाण्ड चल रहा है। इसको भूलना नहीं चाहिये । यदि कहे कि, यास्क 'अरण्यस्य पत्नी अरण्यानी' विग्रह करते हैं । जिसका अर्थ जगली श्री होता है तो अधिदेवता अर्थ कैसे? | इस का उत्तर यह है कि, पत्नी का अर्थ पालयित्री है । श्री नही । अरण्य की अधिष्ठात्री देवता अरण्य का पालन करती है । अत: अरण्यानी का अर्थ वनदेवता ही है । 'अरण्यस्य पत्नी पालयित्री देवता इति अरण्यानी' इस विग्रह में अरण्य शब्द से 'इन्द्रवरुण' इत्यादि सूत्र से डोष (इ) प्रत्यय, आनुर (आन्) आगम और दीर्घ के . इस का 'जगली खी' 4 है। जो, ग्रामात् वा निरुक्त नवमाध्यायस्य त्रिशः खण्डः । (१३७३) होने पर अरण्यानी शब्द बना है । वन-देवी अर्थ है । क्योकि वनदेवी बन का पालन करती है । ईश्वर प्रत्येक पदार्थ मे अधिष्ठात्री देवता रूप से स्थित हो कर सब का पालन करते हैं। वही अधिष्ठात्री देवता कहलाते है । इत्यलम् । यास्क इसका निर्वचन करते हैं- अरण्यान्यरण्यस्य पत्नी । अरन्यमपाणं ग्रामात् । अरमणं भवतीति वा । अरण्यस्य = अरण्य की, पत्लो = पालन करने वाली अघिदेवी, अरण्यानी = अरण्यानी कहलाती = ग्राम से, अपाणंम् = अपगत (दूर) हो वह, अरण्यम् = अरण्य कहलाता है। अथवा, अरमणम् - ग्राम नगरादि की अपेक्षा अरमण अर्थात् असुन्दर, भवति = होता है, = इस लिये, अरण्यम् = अरण्य कहलाता है। 'ग्रामात् अप ऋणम् अपगतम् इति अपाणम् अरण्यम् ' इस विग्रह में 'ऋ गतौ' धातु से 'ऋणमाघमण्ये' इस सूत्र के निपातन से क्त (त) प्रत्यय, कित्त्वात् गुणाभाव, त को ण, अप ऋण, 'उपसर्गाहति घातौ' इस सूत्र से वृद्धि, रपर, अपाणं, पृषोदरादित्वात् अपाण के स्थान मे अरण्य आदेश हो कर अरण्य शब्द बना है। वन का नाम है । क्योकि, वन ग्रामनगरादि से दूर रहता है। अथवा 'न रम्यते अस्मिन् इति अरंमणम् अरण्यम्' इस विग्रह में नम् पूर्वक 'रमु कोडायाम्' धातु से 'ल्युट च' इस सूत्र से ल्युट् (यु) प्रत्यय, 'युवारनाको ' इस सूत्र से यु को अन आदेश, णत्व, ‘नलोपो नब. इस सूत्र से नन के नकार का लोप होने पर अरमण शब्द बना है। और पृषोदरादित्वात् अरमण के स्थान मे अरण्य आदेश होने पर अरण्य शब्द बना है। वन का नाम है। क्योकि, अरण्य मे किसी को रति नहीं होती है। किसी ने ऋ धातु से अन्यत् प्रत्यय करके और किसी ने अप पूर्वक रिण धातु से अघ्न्यादि यत् प्रत्यय करके अरण्य शब्द बनाया है। सो समीचीन नही। क्योकि, यास्क 'अपार्णमरण्यम्' तथा 'अरमणमरण्यम्' ऐसा विग्रह कर रहे हैं । अतः यथोक्त साघनिका ही निरुक्त अनुसारी है। तस्या एपा भवति । इति निहते नवमाध्यायस्यैकोनत्रिश. खण्ड. । ९-२९ ।। तस्याः - उस अरण्यानी की, एपा यह अग्रिम ऋचा, भवति - अथ निरूक्ते नवमाध्यायस्य त्रिश. खण्ड. । अरण्यान्यरण्यान्यसौ या प्रेव नश्यसि । कथा ग्रामं न पृच्छति न त्वा भीरिव विन्दती ३ ॥ कसं ८-८-४-१॥ इस मन्त्र का इस्मद-पुत्र देवमुनि पि, अनुष्टुप् छन्द और बरयानी देवता है। मन्त्रार्य- प्रापि वनदेवी से कहते हैं-अर यानि = है अरण्याभिमानिनी देवते !, या = जो, असो - तुम, इससे क्यों, न = तुम, पराचीव श्रद्धा। (१३७४) निरक्ते नवमाध्यायरयकत्रिशा खण्डः । इस समय, अरण्यानि = वन में, प्रनश्यसि = अदृश्य हो जाती हो, छिप जाती हो। तुम, कथा कथम् नही, ग्रामम् = ग्राम जाने के मार्ग को, पृच्छसि = पूछती हो, रवा भोः न विन्दति = तुम को वन में भय उत्पन्न नहीं होता है? इस मन्त्र मे अरण्यानी का अर्थ वनदेवी है । इस मन्त्र का पास्क भाष्य-- अरण्यानीत्येनामामन्त्रयते या सावरण्यानि वनानि पराचीव नश्यसि । कथं ग्रामं न पृच्छसि । न त्वा भीविन्दतीय । इतीवः परिभयाथै वा । भरण्यानि इति = 'अरण्यानि' इस पद से, एनाम् = इस वनदेवता को, ऋषि, आमन्त्रयते सम्बोधन करते हैं-अरण्यानि = वनानि हे वनदेवते ! या जो, असौ = दृश्यमान होती हुई. नहीं लौटती हुई के समान, नश्यसि - अदृश्य हो जाती हो, कथम् = क्यों, ग्रामम् - ग्राम जाने के मार्ग को किसी से, न पृच्छसि = नहीं पूछती हो । भीः इव = भय के जैसे, त्वा = तुझे, न विन्दति = नही प्राप्त होता है । वा = अथवा, इवः = इव पद, परिभयार्थे = थोड़े भय अर्थ में है । जरा भी तुझे भय प्रतीत नही होता? । अतः 'मुझे भी तुम निर्भय बनाओ' यह भाव है। २५ धर्म अर्थ काम और मोक्ष विषय मे जो अटल विश्वास वह श्रद्धा कहलाती है। जिसको दूसरे पाब्दो में आस्तिक बुद्धि कहते हैं। जो पुरुषगत अभिलाप विशेषरूप है । इस का निर्वचन करते हैं-- श्रद्धा श्रद्धानात् । प्रदानात् = सत्य के धारण करने से, श्रद्धा = अस्तिबुद्धि श्रद्धा कहलाती है। श्रद सत्य का नाम है। 'श्रत् सत्य धीयते अस्यामिति श्रद्धा' इस विग्रह मे, सत्य वाचक श्रत् उपपद 'दुधा धारणपोषणयोः' धातु से 'मातश्वोपसर्गे' इस सूत्र से अङ् (अ) प्रत्यय, श्रद्धा म, 'आतो लोप इटि च' इस सूत्र से आ लोप, थत् ध् अ, 'झला जश् झशि' इस सूत्र से द को द, श्रद्धा टाप, सवर्णदीर्घ होने पर श्रद्धा शब्द बना है। बुद्धि के अधिष्ठात्री देवता का नाम है। क्योकि, इस में सस्य का निश्चय किया जाता है। तस्या एपा भवति। इति निरुक्त नवमाध्यायस्य त्रिशः खण्डः ॥ ९-३० ॥ तस्याः - उस श्रद्धा की, एपा यह अप्रिम ऋचा से स्तुति, भवति - है- अप निरक्ते नवमाध्यायस्यकत्रिशः सण्डः । श्रद्धयाग्निः समिध्यते श्रद्धया हूयते हविः । श्रद्धां भर्गस्य मूर्धनि वचसा वेदयामसि ॥ क्र सं. ८-८-९-१ ।। .
निरुक्तं नवमाध्यायस्य द्वात्रिंशः खण्डा । (१३७५) इस मन्त्र का कामगोत्रीय श्रद्धा ऋषि, अनुष्टुप् छन्द और श्रमा देवता है । मन्त्रार्थ श्रद्धया = श्रद्धा के द्वारा, मग्निः = गार्हपत्याग्नि, समिध्यते = प्रज्वलित होते हैं और, श्रद्धया - श्रद्धा के द्वारा ही, हविः आहुति, हूयते दी जाती है। श्रद्धाम् = श्रद्धा को, भगस्य = घन और धर्म के, मूर्धनि स्तुति-वचन के द्वारा, आवेदयामसि = आवेदन करते हैं। प्रख्यात करते हैं । अर्थात् श्रद्धा ही धर्मादि चतुर्वर्ग का मस्तक है। श्रद्धा के बिना धर्मादिका लाभ होना असम्भव है। - मस्तक पर, वचसा - इसका भाग्य- 5 , श्रद्धयाग्निः : साधु समिध्यते, श्रद्धया हविः साधु हूयते । श्रद्धां भगस्य भागधेयस्य मूर्धनि प्रधानाङ्गे वचनेनावेदयायः । थदया = श्रद्धा के द्वारा, अग्निः = अग्नि, साधु - भलीभाँति, समिध्यते = दीपन किया जाता है। श्रद्धया = श्रद्धा के द्वारा ही, हवि. = माहुति, साधु = भली प्रकार, हूयते - होम किया जाता है। श्रद्धाम् = श्रद्धा कों, भगस्य = भागधेयस्य = धन और धर्म के, मूर्धनि = प्रधानाङ्गे - प्रधान अङ्ग मस्तक पर, वचनेन - स्तुति वचन के द्वारा, आयेदयामः आवेदन प्रसिद्ध करते हैं। २६ पृथिवी। 'पृथिवी' भूमि का नाम है । 'प्रथते इति पृथिवी' इस विग्रह मे 'प्रथ प्रख्याने' धातु से प्रथे: पिवन संप्रसारणंच' इस उणादि सूत्र से पिवन् (इव) प्रत्यय और सप्रसारण, पृथ् इव, पृथिव, पिगौरादिभ्यश्च' इस सूत्र से पित्त्वात होप (ई) 'यस्येतिच' इस सूत्र से अकार लोप होने पर 'पृथिवी' पाब्द् बना है। जो पश्चाशत्कोटि योजनविस्तीर्ण हो वह पृथिवी (भूमि) कही जाती है। भाष्यकार कहते हैं- पृथिवी व्याख्याता। पृथिवी व्याख्याता - पृथिवी शब्द व्याख्यात है अर्थात् पृथिवी शब्द को व्याख्या 'अथ य दर्शनेन पृषः' (नि. म. १, खं. ३) इत्यादि पंक्तियो से की जा चुकी है । तस्या एसा भवति । इति निरक्ते नवमाध्यायस्यकत्रिशः खण्डः ॥ ९-३१ ॥ तस्याः उस पृथिवी को, एपा - यह कग्रिम वा, भवति = है- अथ निरुक्त नघमाध्यायस्य द्वात्रिंशः सण्डः । स्योना पृथिवि भवानृक्षरा निवेशनी । यच्छा नः शर्म सप्रथः ॥ क्र. सं. १-२-६-१५ ।।
(१३७६) निरुक्ते नवमाध्यायस्य द्वात्रिंशः खण्डः । इस मन्त्र का मेधातिथि ऋषि, गायत्री छन्द और पृथिवी देवता है । मन्त्रार्थ-पृथिवि - है पृथिवी ! तुम, विस्तृत, अनृक्षरा = कण्टक रहित, निवेशनी = निवासभूता, भव = हो जाओ । नः = हमें, सप्रथः - विस्तारयुक्त यथेष्ट, शर्म = सुख, यच्छ = दो। इस का यास्क भाष्य- सुखा नः पृथिवि भवानृक्षरा निवेशन्यूक्षरः कण्टक, ऋच्छतेः। कण्टक: कन्तपो वा, कृन्तते; कण्टतेर्वा स्याद् गतिकर्मणः उद्गतवमो भवति । यच्छ नः शर्म यच्छन्तु शरणं सर्वतः पृथु । इस विग्रह में पृथिवि = हे पृथिवी तुम, न. = हमारे लिये, सुखा - सुख रूप, अनृक्षरा = कण्टकरहित, निवेशनी - निवासभूत, भव = होओ । ऋक्षरः कण्टक: = ऋक्षर फाण्टक को कहते हैं।, मच्छतेः = मच्छ धातु से ऋक्षर शब्द बना है। अर्थात 'अच्छति हन्ति इति ऋक्षरः कण्टकः' धातूनामनेकार्थत्वात हिंसार्थक 'प्रच्छगतीन्द्रियप्रलयमूत्तिभावेषु' धातु से उणादि कल्पित करच ( मर ) प्रत्यय, पृषोदरादित्वात् च्छ को क्ष् होने पर ऋक्षर शब्द बना है। कण्टक का नाम है। क्योकि, कण्टक ( काटा) लगने से हिंसा होती है। गतिकर्मो में काण्टति (निध. २-४-२०) पढा है । यहा हिंसा अर्थ है । 'कण्टति हिंसति इति कण्टकः इस विग्रह मे उक्त कण्ट् घातु से ण्वुल् (d) प्रत्यय, अक आदेश होने पर कण्टक शब्द बना है। कांटा का नाम है । क्योकि काटा हिसा करता है। वा = अथवा, कन्तपः कण्टकः = कन्तप को कण्टक कहते हैं। अर्थात् कन्तप होता हुआ कण्टक बना है । मै किसको तपाऊँ' ऐसा बहता हुआ जो उत्पन्न हुआ हो वह कन्तप = फण्टक कहा जाता है। अथवा, ‘क सुख तपति दहति इति कतपः कण्टकः' इस विग्रह में सुख वाचक कम् शब्द पूर्वक 'तप दाहे' घातु से पचाद्यच् (अ), णि लोप होने पर 'कन्तप' शब्द बना है। पृषोदरादित्वात् त और प को वीवपयय ट और क होने पर कण्टक शब्द वना है। फाटा का नाम है। क्योकि, कांटा सुख को दाह = नाश करता है। वा " अथवा, कुन्ततेः = कृती धातु से कण्टक शब्द बना है । अर्थात् 'कृन्तति छिनत्ति इति इस विग्रह मे ‘कृती छेदने' धातु से छा दस नुम् ‘ण्वस्तृचौ' इस सूत्र से वृक्त (यु) प्रत्यय, 'युवोरनाको' इस सूत्र से वु को अक आदेश, कृत्त अक, पृषोदरादित्वाद प्रकार को अकार मौर तकार को टकार, एव नकार को णत्व होने पर कण्टक शन्द बना है। कांटा का नाम है । क्योकि, कांटा लगने पर छेद हो जाता है। या - अथवा, गतिकर्मणः = गत्यर्थक, कण्टते: कषि धातु से, कण्टकः स्याद् शम्द शायद बना हो। क्योकि, वह, उद्गततमः वृक्ष से ऊपरको गया हुआ अर्थात् निकला हुआ होता है। अर्थात् 'कते अतिशयेन उद्गच्छति इति व प्टक: इस विग्रह में ककि गती' धातु से प्यूल, भक, कण्क अब, कतार को कार होने पर फण्टक शब्द बना है। बांटा का नाम है। क्योकि काटा वृक्ष से ऊपर निकला हुआ दिसाई देता है। कण्टक: =ण्टक .
निरुक्ते नवमाध्यायस्य त्रित्रिंशः खण्डः । (१३७७) नः हमें; सर्वतः पृथु = सर्व तरफ से विस्तारयुक्त, शर्म = शरणम् = सुख, यच्छ : यच्छन्तु = दो।' २७ अप्पा। अप्वा का अर्थ रोग का भय है। अर्थात् 'अपययति अपगमयति सुखं प्राणांश्च इति अवा इस विग्रह में अपपूर्वक अन्तर्भावित व्यर्थक 'वेन तन्नुसन्ताने' धातु से 'अन्येप्वपि दृश्यते सूत्र से ड (अ),प्रत्यय, अप वे अ, डित्त्वाव टिलोप, छान्दसत्वात अप के अन्य लोप और टाप् होने पर. अप्वा' शब्द बना है। व्याधि और भय का नाम है। क्योकि रोग और भय सुख तथा प्राण को भगा देता है। भाष्यकार कहते हैं- अप्पा व्याख्याता। अप्वा, - अप्वा शब्द, व्याख्याता = व्याख्यात है। अर्थात् इमको व्याख्या नैगम काण्ड में (षष्ठाध्याय में) हो चुकी है। पष्ठाध्याय में सव मिला कर १३२ पद हैं उनमें ४८ वा 'अप्वे' पद है। वहां 'अप्वा यदेनया विद्धोऽपवीयते' इत्यादि पति से इस की व्याख्या की गई है। - तस्या एपा भवति । 'इति निरुक्ते नवमाध्यायस्य द्वात्रिंशः खण्डः । ९-३२ ॥ तस्याः = उस अप्वा की, एपा = यह अग्निम ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्त नवमाध्यायस्य विधिशः खण्डः । अमीषां चित्तं प्रतिलोभयन्ती गृहाणाशान्यप्चे परेहि । अभि प्रेहि निर्दह हृत्सु शोकैरन्धेनामित्रास्तमसा सचन्ताम् ॥ म सं. ८-५-२३-१२॥ इस मन्त्र का इन्द्र-पुत्र अप्रतिरथ ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और अप्वा देवता है । मन्त्रार्ष-अप्वे - हे रोग तथा भय रूप पापाभिमानिनी देवता ! तुम, अमीपाम् - इन शत्रुओं के, चित्तम् - मन को, प्रतिलोमयन्ती = प्रलुब्ध करती हुई, अङ्गानि = उनके शिर आदि अवयवों को, गृहाण = स्वीकार करो। उनको रोग वा भयमुक्त करो । अभिप्रेहि = उन की ओर जाओ जा कर, हृत्सु = उन के हृदय में, शोकः = शोक के द्वारा, निर्दह - दाह उत्पन्न करो। उनके हृदय को जलाओ । अमित्रा:- हमारे शनु लोग, अन्धेन तमसा - अन्धतम में, सचन्ताम् पड़े। अन्धकारमयो रजनी में प्रवेश करें। इस ऋचा में 'अप्वा' शब्द रोग वा भय वाली है। %D इसका माध्य- (१३७८) निरुक्ते नवमाध्यायस्य चतुस्त्रिंशः खण्डः । अमीषां चित्तानि प्रज्ञानानि प्रतिलोभयमाना गृहाणाङ्गान्यप्वेपरेहि अभिप्रेहि । निर्दषां हृदयानि शोकैरन्धेनामित्रास्तमसा संसेव्यन्ताम् । अमीषाम् = इन शत्रुओं के, चित्तानि = प्रज्ञानानि = मन को, प्रतिलोभयमाना - लुब्ध करती हुई, अङ्गानि = उनके शिर आदि अङ्गो को, गृहाण = स्वीकार करो, उनको व्याधि वा भय से युक्त करो । अवे = हे रोग वा भय अभिमानिनी देवते ! तुम, परेहि = एक को मार के दूसरे के प्रति जाओ । अभिप्रेहि = उन की और जाओ और जा कर, एषाम् = उन के, हृदयानि = हृदयों को, शोकः = शोक के द्वारा, निर्दह = दग्ध करो । अमित्राः = हमारे शत्रु लोग, अन्धेन तमसा = बुद्धि संमोहरूप अन्धतम में, संसेव्यन्ताम् = पड़े । अघितम का सेवन करें अर्थाद अन्धकार में पड़ें। अनायी। २८ अग्नापी का अग्नि की पत्नी स्वाहा अर्थ है । यास्क इस का निर्वचन करते हैं- . . अग्नाप्यागेः पत्नी । अग्नेः = अग्नि की, पत्नी = स्वाहा नामक स्त्री, अग्नायी = अग्नायो कही जाती है । अर्थात् 'अग्नेः नो अग्नायो' इस विग्रह में वृपाकप्यग्निकुसितकुसिदानामुदात्तः' इस सूत्र से अग्नि शब्द को ऐकार आदेश और डीप् प्रत्यय, अग्ने ई, 'एचोऽयवायायः' इस सूत्र से आय आदेश होने पर 'अग्नायी' शब्द बना है । अग्नि की वी अर्थ है । अग्नि की तो स्वाहा कही जाती है । अतः अग्नायी का अर्थ स्वाहा है। तस्या एसा भवति । इति निरुक्ते नवमाध्यायस्य पित्रिशः खण्डः ॥ ९-३३ ।। तस्याः - उस अग्नायी की, एपा = यह अग्रिम चा, भवति = है- अथ निरुक्त नवमाध्यायस्य चतुविंशः सण्डः । इहेन्द्राणीमुप ह्वये वरुणानी स्वस्तये । अग्नायीं सोमपीतये ॥ ऋ. मं. १-२-६-१२ ।। इस मन्त्र का मेघातिथि अपि, गायत्री छन्द और इन्द्राणी, वरुणानी तथा अग्नायी ये तीन देवता हैं। मन्त्रार्य-इह = इस यमं मे, इन्द्राणोम् परनी को, अग्नायोम् = यग्नि की पत्नी को, सोमपीतये - सोमपारने लिये, स्वस्तये - अपने - इन्द्र की पत्नी को, वरुणानीम् - वणी कल्याण के लिये, उपह्वये = बुलाता हूं। इस मन्त्र में यग्नायी का वर्ष अग्नि-पत्नी है । यारक कहते हैं- निरुक्ते नवमाध्यायस्य पश्चत्रिशा खण्डः । (१३७९) इति सा निगदव्याख्याता । इति सा = यह ऋचा, निगदव्याख्याता = सुलभ होने से पाठ मात्र से व्यास्यात है। व्याख्या करने की मावश्यकता नही है। रथ अतः - , इति निरुक्ते नवमाध्यायस्य चतुर्विंशः खण्डः ॥९-३४ ॥ अथ निरुक्त नवमाध्यायस्य पश्चत्रिंशः खण्डः । अथातोऽष्टौ द्वन्द्वानि । यहां से, मष्टी - आठ, द्वन्द्वानि = द्वन्द्व पद हैं। अर्थात दो दो पदों का द्वन्द्व समास होने से एक एक पद के रूप में हैं । वे आठ द्वन्द्व ये हैं--उलुखलमुसले, हविनि, द्यावापृथियो, विपाट्छ्तुद्रयो, पानी, शुनासीरी, देवीजोष्ट्री और देवीऊर्जाहुती। इन में प्रथम 'उलूखलमुसले' पद है। २९ उलूखलमुसले। उलूखल उखल को और मुसल समाठ को कहते हैं। उलूखलं च मुसल च इति उलूखलमुसले' इस विग्रह में उलूखल शब्द और मुसल शब्द का 'चार्थे द्वन्द्वः' इस सूत्र से द्वन्द्व समास होने पर 'उलूखलमुसले' पद बना है। नपुंसक लिङ्ग में प्रथमा द्विवचन का रूप है । भाष्यकार कहते हैं- उलूखलं व्याख्यातम् । उलूखलम् = उलूखल, व्याख्यातम् = व्याख्यात है। अर्थाद इसी प्रकृत नवमा अध्याय मे १६वा शब्द उलूखल है। उसकी व्याख्या 'उरुकरम्' इत्यादि पंक्तिसे हो चुकी है। मुसलं मुहुसरम् । - बार बार चलने वाला, मुसलम् = मुसल कहा जाता है। अर्थात् 'मुहुः सरति वारं बार उरिक्षध्य उरिक्षप्य सरति गच्छति पतति' इति 'मुसलम्' इस विग्रह में मुहस् उपपद 'सृ गतो' धातु से पचाद्यच् प्रत्यय, गुण, पृषोदरादित्वात् मुहस् के हुस का लोप और र को ल होने पर मुसल शन्द बना है। समाठ अर्थाद समेला का नाम है। क्योकि, वह बार बार कार नीचे जाया माया करता है। इस का वारम्वार उद्यमन निपतन हुआ करता है। तयोरेपा मवति । इति निरुक्ते नवमाध्यायस्य पञ्चविशः खण्डः ॥ ९-३५ ।। तयोः = उन उलूखल और मुसल की, एषा = यह अग्रिम ऋचा, भवति - .
(१३८०) निरुक्ते नवमाध्यायस्य पत्रिंशः खण्डः । अथ निरुक्ते नवमाध्यायस्य पत्रिंशः खण्डः । आयजी वाजसातमा ता ह्युच्चा विजर्भूतः । हरीइवान्धांसि वसंता ॥ ऋ. सं. १-२-२५-७॥ इस मन्त्र का शुनःशेप ऋपि, गायत्री छन्द और उलूखल और मुसल दोनों देवता हैं। मन्त्रार्थ- ये उलूखल और मुसल दोनों, आयजी सर्व तरफ से यज्ञ के साधन तथा, वाजसातमा = अतिशय अन्नप्रद हैं भोर, अन्धांसि चना आदि साध अन्न को, वप्सता = साते हुए, हरी इव - दोनों अश्वों के समान अर्थात् इन्द्र के दोनों घोड़े जैसे हिनहिनाते है वैसे ही, ता हि = ये दोनों ही, उच्चा अर्थात् तुमुल ध्वनि से युक्त हो कर, विजर्भूतः = विशेष रूप से पुनः पुनः विहार करते हैं। = शब्द करते . इस मन्त्र का भाप्य- - चना आदि आयप्टव्ये अन्नानां संभक्ततमे ते धुचर्षिट्रियेते हरी इवान्नानि सुआने । ये उलूसल और मुसल दोनों, आयप्टट्ये सर्व ओर से, यश के साधन और, अनानाम् संभक्ततमे = अन्नों के भलीभांति सेवन करने वाले देने वाले हैं। ते हि = वे दोनों ही, उच्चः उच्च ध्यनि से युक्त होकर, विहियेते - निहार करते है। इस मे दृष्टान्त अनानि अप्न फे, मुखाने - साते हुए, हरी इव - इन्द्र के दो अश्वों के समान । अर्थात् जैसे इन्द्र के अश्व पना आदि भन्न साते हुए पाद करते हैं, वैसे ही उनूगल और मुसल भी शब्द करते हैं। इस मन्त्र में उलूगल और मुसल की स्तुति है। हविर्धाने । हयिनि दाकट अर्थात् वैलगादो को पढ़ते हैं। क्योंकि, इस में रखकर सोम त हयि यो पश में लाया जाता है । 'हयोपि सोमलतास्पहयद्रयाणि पीयन्ते निपीयन्ते ययोः इति हविनि इस विग्रह में हविप् उपपद पा पातु से 'करणाधिकरणयोध' इस मूत्र में अधिकरण में स्युट (यू) प्रत्यय, 'युयोरनाको ' इस सूत्र से यु के स्थान में बन वादेश, सवर्णदोषं और हथिम् के मार को रय होने पर हविर्धान दाद बना है। हाट का नाम है। योकि मोम प हवि यश में लाने . लिये पावट में रखा जाता है । 'हविर्घाने ' यह द्विवचन है। यह दो यिनि मन्द थे। 'चा द्वन्द्वः' इस मूत्र से द्वन्द्व समाम होने पर वम् पापामेकोष एक मिमनो' ग मूत्र मे एकप हा है। मतः आठ द्वन्दों में यह दूसरा इन्द्र मममना पाहिये । और जब एप इन्द्र समाग का बाप है तब इस में इन्द्र व्यवहार गोप मममना चाहिः । भाथ्यार इसका निर्वाचन परते हैं- हविनि हपिपां निधाने । हविषाम् = सोमरून हपियो के, निधाने = धारण करने वाले, इविन = हदिनि रह जाते हैं ।
निरुक्ते नवमाध्यायस्य सप्तत्रिशः खण्डः । (१३८१) तयोरेपा भवति । इति निरुक्त नवमाध्यायस्य पत्रिंशः खण्ड, १ ९-३६ ।। तयोः = उन हविर्धानो की, एपा = यह अग्रिम ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्त नवमाध्यायस्य सप्तत्रिंशः खण्डः । आ वांमुपस्थमगुहा देवाः सौदन्तु यज्ञियाः । इहाय सोमपीतये ॥ ऋ स २-८-१०-२१ ॥ इस मन्त्र का गृत्समद ऋपि, गायत्री छन्द और हविर्धान देवता है । मन्त्रार्थ-अद्रुहा = है द्रोह रहित हविर्घाने ?, वाम् = तुम दोनो के, उपस्थम् = समीप मे, यज्ञिया = यज्ञ के योग्य, देवाः देवगण, इह = इस यज्ञ मे, अद्य = आज, सोमपीतये सोम पान के लिये, मासीदन्तु बैठे । इस मन्त्र मे दोनो हविर्धान (शक्ट) की स्तुति है । इस मन्त्र का भाष्य- . आसीदन्तु वामुपस्थ उपस्थाने यशिया देवा यज्ञसंपादिन इहाय सोमपानाय । हे हविनि !, वाम् = तुम दोनो के, उपरथे = उपस्थाने = समीप, यज्ञिया - यज्ञसपादिन. = यज्ञ सपादन करने वाले, देवा = देवगण, इह - इस यज्ञ मे, अद्य = आज, सोमपानाय: - सोमपान करने के लिये, आसीदन्तु - बैठे। ३१ - द्यावापृथिवी द्यावापृथिवी = द्यावापृथिवी का धुलोक और पृथिवी लोक अर्थ है। 'दीप्यति धोतते इति द्यो.' इस विग्रह मे धुति अर्थक दिव घातु से उणादि परिकल्पित अथया 'दिवेडिवि.' इस भोज सूत्र से डिवि (इ) प्रत्यय, दिव इव, डित्त्वात् टि लोप होने पर, द् इव् , 'दिव' शब्द बना है। धुलोक का नाम है । एव 'प्रथते इति पृथिवी' इस विग्रह मे 'प्रथ प्रख्याने' घातु से, 'प्रथेः पियन सप्रसारण च' इस उणादि सूत्र से पिवन (इव) प्रत्यय और सप्रसारण प्र के र कोक होने पर पृथ् इव, पृथिव, 'पिगौरादिभ्यश्च' इस मूत्र से पित्त्वात् डीप् (ई), 'यस्येतिच' इस सूत्र से प्रकार लोप होने पर पृथिवी शब्द बना है। पृथिवीलोक का नाम है। 'योश्च पृथिवी च इति द्यावापृथिवी' इस विग्रह मे दिव शब्द और पृथिवी शब्द का 'चार्य द्वन्द्र इस सूत्र से द्वन्द्व समास, दिव् पृयिवी, 'दिवो द्यावा' इस मूत्र से दिव के स्थान में धावा आदेश, द्यावापृथिवी, प्रथमा के द्विवचन मी माने पर, द्यावापृथिवी औ, 'वा छन्दसि' इस सूत्र से पूर्वसवर्णदोघं होने पर 'द्यावापृथिवी' रूप बना है। द्युलोक और पृथिवीलोक अर्थ है। 'सर्वे विषय छन्दसि विकल्प्यन्ते' इस परिमापा से जहा पूर्वसवर्णदीर्घ नहीं होता है वहा ' द्यावापृथिव्यो' स्प बनता है। याफ कहते हैं- (१३८२) निरुक्ते नवमाध्यायस्याष्टात्रिंशा खण्डः । इनका व्याख्यान द्यावापृथिव्यौ व्याख्याते। द्यावापृथिव्यौ = धु और पृथिवी ये दोनों, व्याख्याते = व्याख्यात हैं अर्थात् पृथ्वी नामों में हो चुका है। वस्तुतस्तु जैसा चाहिये वैसा व्याख्यान न होने से यहां विस्तार से व्याख्यान कर दिया है। तयोरेपा भवति । इति निरुते नवमाध्यायस्य सप्तत्रिंशः खण्डः । ९-३७॥ तयोः - उन द्यावापृथिवी का, एपा = यह आगे की ऋचा, भवति - - अथ निरुक्ते नवमाध्यायस्याष्टात्रिशः खण्डः । द्यावा नः पृथिवी इमं सिध्रमद्य दिविस्पृशम् । यज्ञं देवेर्षु यच्छताम् ॥ . सं. २-८-१०-२०॥ इस मन्त्र का गृत्समद ऋषि, गायत्री छन्द और द्यावापृथिवी देवता है । मन्त्रार्थ-सिधम् = स्वर्गादि के साधक, दिवस्पृशम् धुलोक को स्पर्श करने वाले, द्यावा - धुलोक और पृथिवी पृथिवीलोक ये दोनो देवता हैं । ये दोनो देवतायें, नः = हमारे, इमम् यज्ञम् - इस यज्ञ को, अद्य: आज, देवेषु = देव समाज में, यच्छताम् = पहुंचा देवें । इस मन्त्र में द्यावापृथिवी की स्तुति है । । इस मन्त्र का भाप्य- . आज, देवेषु द्यावापृथिव्यौ न इमं साधनमय दिवस्पृशं यज्ञं देवेषु नियच्छतम् । साधनम् = स्वर्गादि के साधक, दियस्पृशम् = द्युलोक मो स्पर्श करने वाले, चायापृषियो द्यावापृथिवी ये दोनों देवतायें, नः = हमारे, इमम् यज्ञम् - इस यश को, अद्य - देय समाज में, नियच्छतम् = पहुँचा देवें । ३२ - विपाछुतुद्री। विपाट और गुतुद्री ये दोनों नदी याचक शब्द हैं । विपाटर्यात अतिवेगार भूमि भेदयति इति विपाट्' इस विग्रह में विपूर्वक णिजन्त सापहारी लोप, परमिट' इस मूत्र से मिलीप होने पर दिपाट नन्द बना है। 'शु = fe. 'पट भेदने' घातु से पतरि दिए, यति तच्छोला इति शुतुदी' इस विग्रह में मु उपपद गती' पान में 'मुष्यजातो विनितान्योन्ये. इस मूत्र से, निनि (इन् ) प्रत्यय सुदु इन्, वृद्धि, आव आदेश, गुदाविन, पृषोदरादिन्दार विशेष मा नाम है । क्योषि, वह नदी भी गमन करने के स्वभाव वाली है। विपाट च मुली E - - निरुक्तं नवमाध्यायस्यैकोनचत्वारितः खण्डा । (१३८३) च इति 'विपाटशुतुद्री' इस विग्रह में विपाट् और शुतुद्री का चार्थे द्वन्द्वः' इस सूत्र से द्वन्द्व समास 'शश्छोऽटि' इस सूत्र से विकल्प छत्व विपाट् छतुद्री औ, 'वा छन्दसि' इस सूत्र से पूर्वसर्वण दीर्ध होने पर 'विपाट्छुतुद्री' पद बना है। भाष्यकार कहते हैं- विपाछुतुद्यो व्याख्याते। विपाट्छन्द्रयों = विपाट् और शुतुद्री ये दोनों, व्याख्याते = व्याख्यात हैं। अदि इन दोनों का व्याख्यान पूर्व हो चुका है। इसी प्रकरण में 'विपाट् च विपाटनात्' इस पंक्ति से विपाद का और 'शुतुद्री शुद्राविगो' इस पंक्ति से, शुतुद्री का व्याख्यान किया गया है। तयोरेषा भवति । इति निरुक्ते नवमाध्यायस्याष्टात्रिंशः खण्डः ॥ ९-३८ ॥ तयोः - उन विपाट् और शुतुद्री को, ऐषा = यह आगे आने वाली ऋचा, भवति - है- अथ निरुक्ते नवमाध्यायस्यकोनचत्वारिंशः खण्डः । प्र पर्वतानामुशती उपस्थादश्वेइव विपिते हासमाने । गावेव शुभ्रे मातरा रिहाणे विपाट्छुतुद्री पय॑सा जवेते ॥ ऋ. सं. ३-२-१२-१॥ इस मन्त्र का विश्वामित्र ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और इन्द्र देवता है । मन्त्रार्थ--विपाद - विपाशा (व्यास) और, शुतुद्री = शुतुद्री (सतलज) नाम को दो नदियां, पर्वताम् = पर्वतों की, उपस्थात् = उत्सङ्ग = गोद से निकल कर, उशती = सागरसङ्गमामिलापिनी होती हुई, विपिते घोड़शाल से वियुक्त, अश्वे इव = दो घोड़ियो के समान, हासमाने = अन्योऽन्य वेग के द्वारा स्पर्धा करती हुई, गावेव = दो गायों के समान शुभ्रे = सुशोभित होकर, पयसा = दूध से संयुक्त, रिहाणे - बछडों को जिह्वा से चाटने की इच्छा वाली, मातरा - गाय माता के समान, प्रजवेठे = वेग से समुद्र की तरफ जाती हैं। इस चा से यथोक्त दोनों नदियों को स्तुति है। - . इस मन्त्र का भाप्य- पर्वतानामुपस्थादुपस्थानादुशन्त्यो कामयमाने अश्वे इव विमुक्त इति षा विपणे इति या हासमाने । हासति: स्पर्धायाम् । हर्रमाणे या गावाविव शुने शोमने मातरौ संरिहाणे विपाट्रातद्रयौ पयसा प्रजवेते । पर्वतानाम् = दो पर्वतों की, उपस्थात् - उपस्थानाद गोद से निकल कर, उशन्यो - कामयमाने - सागर के साथ मिलने की इच्छा वाली, वियुक्त अये इद इति वा - घोड़शाह से (१३८४) निरुक्ते नवमाध्यायस्य चत्वारिंश खण्डः । - - = छुटी हुई घोड़ियो के समान यह या, वा = अथवा, विपणे इति वा = शीघ्रता से एक दूसरी से मिलने की इच्छा वाली यह अर्थ, हासमाने = एक दूसरो से स्पर्धा करती हुई, वा = अथवा, हर्षमाणे = हर्प को प्राप्त होती हुई, गावो इव दो गायो के समान, शुभ्रे - शोभने सुशोभित, मातरी = दो गाय माता के समान, सरिहाणे = बछड़ो को जीभ से चाटने की इच्छा वाली, पयसा - दूध से पुक्त, गो माता के समान, विपाछुतुद्रयो विपाट् और शुतुद्री नामको दोनो नदियां, प्रजवेते = वेग से ससुद्र की तरफ जाती हैं । स्पर्धायाम् सपर्धा अर्थ मे, हासति. = नरुक्त हास धातु है । जिस से हासमाने वना है । अर्थात् 'हासति इति हासमाने' इम विग्रह मे स्पर्धा अर्थक नरुक्त हास धातु से लट्, शानच् होने पर हासमान रूप बना है। वा; अथवा हपं अर्थ मे नरुक्त हास धातु से लट् , शानाच होने पर हासमान रूप वना है। 'हासमाने' यह प्रथमा द्विवचन का रूप है। ३३ - आनी आरनी = घनुप्प्रान्ते = धनुष्कोटिये = धनुप् के सिरे । ऋछत गच्छतः इति मानी धनुष्कोट्यौ इस विग्रह मे ' गतिप्रापणयो धातु से 'वहिधिश्रुद्रुग्लाहात्वरिभ्यो नित्' इस उणादि सूत्र से वाहुलकात निव (नि) प्रत्यय, धातु को आर्तभाव, आलि, 'कृदिवारादक्तिनः' इस वातिक से होए (ई), ' यस्येतिच' इस सूत्र से इकार लोप होने पर आनी रूप बना है। धनुष्कोटी का नाम है । क्योकि, धनुष्कोटिये गमन करती है। अथवा 'ऋच्छत गमयतः इति आनी' इस विग्रह मे अन्तर्भावित ण्यर्थक उक्त ऋ घातु से पूर्ववत् रूप सिद्धि समझना चाहिये। आनी वाण को गमन कराती है । धनुष्कोटी धनुष के दोनो तरफ होती है। अतः दो है। आनी च आर्नी च अनयोरितरेतरयोग इति आनी इस विग्रह मे दोनो आनी शब्दो का 'चार्थे द्वन्द्वः' इस सूत्र से द्वन्द्व समास, आनी आत्ीं ओ, इस अवस्था मे ' सरूपाणामेकशेप एकविभक्तो' इस सूत्र से एकशेष, ‘वा छन्दसि ' इस सूत्र से पूर्वसवर्ण दीर्घ होने पर 'आर्नी' पद बना है। जब एक शेष द्वन्द्व का अपवाद है तब मार्नी मे द्वन्द्व व्यवहार भाक्त अर्थात् गौण समझना चाहिये । आचार्य निर्वचन करते हैं- , . वा = अथवा, , आनी-अर्तन्यौ वा, अरण्यौ या, अरिपण्यो वा । भर्तन्यो वा बाणो को चलाने वाली, आनी = आ(धनुष्कोटी) कही जाती है । वा: अथवा, अरण्यो = बाणो को गमन कराने वाली, आनी = बार्नी कही जाती है । अरिषण्यो - शत्रुओ को मारने वाली, आस्ती = आनी कही जाती है । तयोरेपा भवति । इति निरुक्ते नवमाध्यायस्यकोनचत्वारिंशः खण्डः । ९-३९ ।। तयोः = उन दोनो आलियो को, एषा = यह अग्रिम ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्ते नवमाध्यायस्य चत्वारिंशा सण्डा ।
निएक्ते नवमाध्यायस्य चत्वारिंश अण्डः । (१३८५) ते आचरन्ती समनेव योपा मातैवं पुत्रं विभृतामुपस्ये अप शत्रूविध्यतां संविदाने आर्नी इमे विस्फुरन्ती अमित्रान् ।। ऋ. सं. ५-१-१९-४ ।। इस मन्त्र का भरद्वाज-पुत्र पायु ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और आनी देवता है। मन्त्रार्थ-ते - वे दोनों धनुष्कोटियां, समना योषा इव समनस्क स्त्री की तरह, आचरन्ती - आचरण करती हुई, उपस्थे = शत्रु के ऊपर आक्रमण करते समय, माता पुत्रम् इव : माता जैसे पुत्र को धारण करती है वैसे ही राजा को, विभृताम् = धारण करें। इमे आर्ली - ये दोनों गमनशील घनुप्कोटियां, अमित्रान् शत्रून् = विरोधी शत्रुओं का, विस्फुरन्तो = वध करती हुई, अपविध्यताम् = वेधन कर डालें । यह मन्त्र आनी = धनुष्कोटियों की स्तुति करता है । इस का भाप्य- ते आचरन्त्यौ समनसाविच योपे मातेव पुत्रं विभृतामुपस्थ उपस्थानेऽपविध्यतां शत्रून् संविदाने आाविमे विनन्त्यावमित्रान् । ते = वे दोनों धनुष्कोटियाँ, समनसौ योपे इव = समनस्क स्त्री की तरह और, माता पुत्रम् इंव = माता पुत्र के समान अर्थात् माता जैसे पुत्र को धारण करती है वैसे ही, आचरन्त्यो = माचरण करती हुई, उपस्थे - उपस्थाने = शत्रु पर आक्रमण करते समय, राजा को, विभृताम् = धारण करें और, संविदाने = अपने कार्य को भलीभांति जानती हुई, इमे आल्यों = ये दोनों गमनशील अन्या, अमित्रान् शत्रुन् = विरोधी शत्रुओं को, अपविध्यताम् = विघ्नन्त्यो = मार डालें। ३४ - शुनासीरौ। शुन नाम वायु का और सोर नाम आदित्य का है । दोनों का द्वन्द्व समास होकर 'शुनासीरो' रूप बना है। इस का निर्वचन करते हैं- शुनासीरौ-शुनो वायुः शु एत्यन्तरिक्षे, सीर आदित्यः, सरणात् । शुनः वायुः - शुन वायु होता है। क्योंकि, शु = शीघ्र, अन्तरिक्षे = अन्तरिक्ष में, एति गमन करता है। अर्थात 'शु = शीघ्रम् नयति गच्छति इति शुन: वायुः' इस विग्रह में मोघ वाचक शु उपपद 'पी प्रापणे' धातु से 'अन्येप्वरि दृश्यते' इस सूत्र से ड (अ) प्रत्यय, हित्वात् टिलोप होने पर शुन शब्द बना है। वायु का नाम है। क्योंकि वायु अन्तरिक्ष में गोत्र गमन करता है। सीर: आदित्यः सोर आदित्य होता है। क्योंकि सरणात् = गमन करने से । 'सरति नित्यम् गच्छति इति सौरः आदित्यः' इस विग्रह में 'मृ गतो' धातु से उणादि परिकलित ईरन् (ईर) प्रत्यय, स ईर, पोदरादित्वात् टिलोप, होने पर सीर शब्द बना है। आदित्य का नाम है। क्योकि .
- (१३८६) निरुक्ते नवमाध्यायस्येकचत्वारिश खण्डः। आदित्य प्रतिदिन गमन करता है। 'शुनश्च सीरश्च अनयोः इतरेतर योगः इति शुनासीरी' इस विग्रह में शुन शब्द और सीर शब्द का चार्थे द्वन्द' इस सूत्र से द्वन्द्व समास, शुनसीर, 'देवता द्वन्द्वेच' इस सूत्र से पूर्व पद का आनङ् (आन् ), दीर्घ, नलोप, शुनासीर औ, वृद्धि होने पर 'शुनासीरी' पद बना है। वायु और आदित्य अर्थ है । तयोरेपा भवति । इति निरुक्ते नवमाध्यायस्य चत्वारिंशः खण्डः । ९-४० ॥ तयोः - उन शुनासोर अर्थात् वायु और आदित्य की, एपा = यह अग्निम ऋचा, भवति - है- - अथ निरुक्ते नवमाध्यायस्यकचत्वारिंशः खण्डः । शुनासीराविमां वाचं जुषेयां यद्दिवि चक्रथुः पयः । तेनेमामुप सिञ्चतम् ॥ ऋ. सं. ३-८-९-५ ।। इस ऋचा का वामदेव ऋषि, गायत्री छन्द और शुनासीर देवता हैं। मन्त्रार्थ--शुनासीरी हेशुन ! और हे सीर ! (हे वायो ! और हे आदित्य ! ) तुम दोनों हमारी, इमाम् वाचम् = इस स्तुति का, जुपेताम् = सेवन करो। तुम दोनों ने, दिवि = धुलोक में, यत् पयः = चक्रथुः = उत्पन्न किया है, तेन = उसी के द्वारा, इमाम् उ = इस पृथिवी का, सिञ्चतम् = सिञ्चन करो। इस मन्त्र में शुन और सीर की स्तुति है। जिस जल को, इति सा निगदव्याख्याता । वह यह प्रचा, निगदव्याख्याता - पाठमात्र से व्याख्यात है। सुलभ होने से इस की व्याख्या करने की मावश्यकता नहीं है। इति सा - ३४ - देवी जोप्ट्री देवी का अर्थ धुलोक और जोष्ट्री का अर्थ पृथिवी लोक (तदभिमानी देवता) है दोनों का इन्द्र समास हो कर समस्त पदादेवीजोष्ट्री है । पृथपाठ चिन्त्य है। क्योंकि, यह द्वन्द्व का प्रकरण चल रहा है । समस्त पद ही होना चाहिये 'दीव्यति इति देवी' इस विग्रह मे दियु पीडाविजिगीपाव्यवहारयुति स्तुतिमोदमदस्वप्न कान्तिगतिपु' धातु से पचायच्, उपधा गुण होने पर देव शब्द बना है। पचादि गण में 'देवट' ऐसा पाठ है। हलन्त्यम्' इस सूत्र से ट् की इसंज्ञा होने से 'देव' शब्द टिव है । टिड्ढाणा' इत्यादि सूत्र से टित्त्वात् डोप् (ई) प्रत्यय, 'यस्येति च "इस सूत्र से अकार लोप होने पर देवी शब्द बना है । धुलोक का नाम है। क्योंकि, युलोक में इस के सभी अर्थ घटते हैं । और 'जुपते तर्णयति इति जोष्ट्री' इस विग्रह में 'जुपी प्रीतिसेवनयोः' धातु से सबंधातुभ्यः प्टन इस उणादि सूत्र से प्टन (त्र) प्रत्यय, लघूपध गुण, पत्व, प्दुल, जोष्ट्र, पिद्रौरादिभ्यध' इस - - निरुक्त नवमाध्यायस्य द्वाचत्वारिकाः खण्डः । (१३८७) सूत्र से पित्त्वात् डो (ई) 'यस्येति च' इस सूत्र से अकार लोप होने पर 'जोप्ट्री' शब्द बना है। पृथिवीलोक का नाम है। क्योकि, यह सब को तृप्त कराता है। 'देवी च जोष्ट्री च अनयोः इतरेतर योगः इति देवीजोष्ट्री' देवीजोष्ट्रो ओ, इस अवस्था में 'वा छन्दसि' इस सूत्र से सवर्णदीर्घ होने पर 'देवीजोष्ट्री' पद बना है। द्यावापृथिवी अर्थ है । यास्क इस का मतभेद से अनेक अर्थ करते हैं- देवीजोप्ट्री-देव्यौ जोपयिन्यौ । द्यावापृथिव्याविति वा, अहोरात्रे इति वा, शस्य च समाचेति कात्थक्या । जोपयिन्यो = समस्त संसार को तृप्त करने वाली, देव्यो = देवियां । वा = अथवा, द्यावा. पृथिव्यो इति द्युलोक और पृथिवीलोक यह । वा = अथवा, अहोरात्रै = दिन और रात्रि यह। शस्यम् च समा च - व्रीहि - धान और संवत्सर, इति = यह, कास्थक्या - महर्षि कास्थक्य कहते हैं। तयोरेप: संप्रैपो भवति । इति निरुक्त नवमाध्यायस्यैकचत्वारिंशः खण्डः ॥ ९-४१ ।। तयोः = उन देवी और जोप्ट्री का, एप. = यह अग्निम, संप्रेपः = प्रेरणार्थक मन्त्र विशेप, भवति - है- अथ निरुक्त नवमाध्यायस्य द्वाचत्वारिंशः खण्डः । देवीजोष्ट्री वसुंधीतीययोरन्याद्या द्वेसिययवदन्यावे- क्षद्वसु वार्याणि यजमानाय वसुवने वसुधेयस्य वीतां यज । इस मन्त्र के मुद्रित पुस्तकों में पाठभेद बहुत देखे जाते हैं। दुर्गाचार्य ने जो भाष्यसंमत रखा है उसी का उपन्यास यहां किया गया है। इस मन्त्र का वरुण ऋपि, एकाधिकाति जगती छन्द और देवोजोप्ट्री देवता है। यज्ञ में ऋत्विक विशेष जिस मन्त्र से अन्य ऋत्विजों को ' अमुं यज अमु यज' इस प्रकार माज्ञा देता है वह मन्त्र पंपमन्त्र कहा जाता है । इसी प्रकार का यह मन्त्र है। अत. यह पेपमन्त्र कहा जाता है । मन्त्रार्थ-देवीजोप्ट्री = द्यावापृथिवी, वसुघोती - धनधान्यादि रूप वसुओं को धारण करनेवाली, ययोः जिन दोनों में से, अन्या = एक, अपाद्वैपांसि = पाप रूप दाशुओं को, यूयवत् - हम से अलग करती है अर्थात् नाश करती है और, अन्या = दूसरी देवी, मजमानाय यजमान के लिये एवं, वसुवने = धन के संयोग के लिये, वसुवार्याणि = वाञ्छनीय धनसंपत्तियों को, आवक्षद = लाती है। वे धोनों देवियां, वीताम् = इस पृपदाज्य को (घृत विशेष को) पीवें या कामना करें। हे ऋत्विजों ! आप लोग, यज = यजन को। यहां ' यज' यह संप (प्रेरणा) है। इस मन्त्रका भाष्य- (१३८८) निरुक्ते नवमाध्यायस्प द्वाचत्वारिंशः खण्डः । देवीजोष्ट्री - देव्यौ जोपयिन्यौ वसुधीती - वसुधान्यौ। ययोरन्याधानि देपास्य वयावयत्यावहत्यन्या वसूनि वननीयानि यजमानाय वसुवननाय च वसुंधानाय च वीतां पिवेतां कामयेतां वा यजेति संप्रैपः। जिन दोनो में से, : " देवीजोप्ट्री = देव्यो जोपयिथ्यौ = समस्त संसार को तृप्त करने वाली उक्त दोनों देवियां, वसुधीती = वसुधान्यो = धनधान्य तथा वसुओं को धारण करने वाली। ययोः अन्या = एक, अघानि = देपांसि = पाप रूप शत्रुओं को, अवयावयति = हम से अलग करती है नाश करती है और, अन्या = दूसरी देवी, यजमानाय = यजमान के लिये, च और, वसुवननाय च = धन के संयोग के लिये, च = वीताम् पिवेताम् = इस पृपदाज्य को पीवें, वा - अथवा, कामयेताम् = कामना करें। 'यज' इति संप्रेषः 'यज' यह संप्रैप अर्थात् प्रेरणा है । + ३६ - देवी ऊर्जाहुती । पूर्ववत् देवी का अर्थ द्युलोक और आदित्य ज्योति एवं ऊर्जाहुती का अर्थ पृथिवीलोक है । तदभिमानिनी देवता । दोनों का द्वन्द्व समास हो कर समस्त एक पद देवीऊर्जाहुती है। देवी शब्द की सिद्धि पूर्व शब्द में हो चुकी है। ऊर्ज, शब्द की सिद्धि भी अन्न नामों में इस प्रकार हुई है- ऊज्यते प्राण्यते जीव्यतेऽनेनेति ऊक अन्नम्' इस विग्रह में 'ऊ बलप्राणयोः' धातु से 'किप च इस सूत्र से वाहुलकाव करण में विप् प्रत्यय, सर्वापहारी लोप होने पर ऊर्ज शब्द बना है। रासस्य' इस सूत्र के नियम से संयोगान्त लोप का अभाव, अन्न का नाम है। क्योंकि, अन्न से प्राणी सव जोते हैं । 'ऊर्जा अनेन आहूयते इति ऊर्जाहुतिः' इस विग्रह में कर्ज ,उपपद 'म स्पर्धायां शब्दे च' घातु से 'क्तिच्क्ती च संज्ञायाम् ' इस सूत्र से क्तिच् (ति) प्रत्यय, 'वचिस्वपि इत्यादि सूत्र से संप्रसारण, पूर्वरूप, 'हलः' इस सूत्र से प्राप्त दीर्घ का पत्मय से अभाप होने पर ऊर्जाहुति' शब्द बना है। कृतिकारादक्तिनः' इस वात्तिक से डोप (ई) प्रत्यय, इकार लोग होने पर ऊर्जाहुती शब्द बना है। देवी च ऊर्जाहुती च इति देवोऊर्जाहुती' इस विग्रह में चाप द्वन्द्वः' इस मूत्र से द्वन्द्व समास होने पर 'देवी ऊर्जाहुती' पद वना है । निघण्टु का पाठ छान्दम है । यास्क इस का पूर्ववत् ही अर्थ करते हैं- देवी ऊर्जाहुती-देच्या ऊर्जावान्यौ । यावापृथिव्याविति वा, अहोरात्रे इति वा, शस्य च समा चेति कात्थक्यः । देवी ऊर्जाहुती देव्या ऊर्जावान्यौ = ऊर्जाहानी इस नाम से अन्न के लाने वाली दो देवियाँ वा = अथवा, धावापृथिव्यो इति = ध और पृथिवी यह, वा = अथवा, अहोराने इति = दिन और रात्रि यह, शस्यम् च समा च = प्रीहि धान और-संवत्सर, इति = यह, कात्थक्यः = कहते हैं । इस प्रकार देवीऊर्जाहुतो का द्यावापृथिवी, दिन रात्रि और धान मंवत्सर अर्थ हुए। महर्षि कात्यक्य निरुक्ते नवमाध्यापस्य यश्चत्वारिंश खण्डा । तयोरेपः संप्रेपो भवति । इति निरुक्ते नवमाध्यायस्य वाचत्वारिंशः खण्डः । ९-४२ ॥ तयोः = उन देवी और ऊर्जाहुती का, एपः = यह अग्रिम, संप्रेषः = प्रेरणा-मन्त्र, भवति = है-- अथ निरुक्त नवमाध्यायस्य त्रयश्चत्वारिंशः खण्डः ।। देवी ऊर्जाहुती इपमूर्जमन्याऽक्षुत्सन्धि सपीतिमन्या, न वैन पूर्व दर्यमानाः स्याम पुराणेन नवं तामूर्जमूर्जाहुती ऊर्जा यमाने अधातां वसुवने वसुधेयस्य वीतां यर्ज । यह य० वा० स० का मन्त्र है । इस के भी पाठभेद बहुत हैं। पता कहां का दिया जाय, समझना कठिन है । मन्त्रार्थ-देवी ऊर्जाहुती = अन्न के लानेवाली दो देवियां हैं । जो अन्नपूर्णा कही जाती हैं । अन्या - उन दोनो में से एक, इपम् = धान आदि अन्न को और, ऊर्जम् = धान आदि अन्न को सिंचने वाले रस अर्थात् दुग्ध आदि को, आवक्षद सम्मुख लाती है और, अन्या = दूसरी देवी, सन्धिम् = बन्धुओ के साथ सह भोजन को और, सपोतिम् = सहपान को, आवक्षत् = सम्मुख लातो है । जिस से हम, नवैन = नए घान्य से, पूर्वम् = पुराने धान्य को और, पुराणेन पुराने धान्य से, नवम् = नए धान्य को, दयमानाः = रक्षा करते हुए, स्याम = होवें। ताम् ऊजम् = उस अन्नादि को ऊर्जाहुती = ऊर्जाहानी देवियां, ऊर्जायमाने -बल करती हुई, अघाताम् = हमे देवें। वसुवने = धन के सभोग के लिये और, वसुधेयस्य - धन के सग्रह के लिये वे दोनों देवियां, वीताम् = पृषदाग्य नामक घी को पीवें अथवा कामना करें। हे होता! तू, यज = यजन कर । 'यज' यह संप्रैप अर्थात प्रेरणा है । %3D इस मन्त्र का यास्क भाष्य- देवी ऊर्जाहुती-देव्या ऊर्जाद्वान्यावन्नं च रसं चावहत्या वहत्यन्या सह जम्धिच सह पीतिं चान्या, नवेन पूर्व दयमानाः स्याम पुराणेन नवम् , ताजमर्जाहुती ऊर्जयमाने अधातां वसुवननाय प वसुधानाय च वीतां पिवेतां कामयेतां वा । यजेति संप्रेपो यजेति संप्रेपः॥ इति निरुक्ते नवमाध्यायस्य प्रयधत्वारिंशः खण्डः ॥ ९-४४ ।। न देवी ऊर्जाहुती = देव्याः ऊर्जाह्वान्यो = अन्न के लाने वाली दो देव्या हैं । अन्या - उन दोनों में से एक, अन्नं च रस च = अन्न और रस को, आह्वति = सम्मुख लाती है और, अन्या = दूसरी देवी, जग्धि च सह वन्धुओ के साथ सहभोजन को और, पोति च सह - सहपान को, आवहति = सम्मुख लाती है। जिस से हम, नवेन पूर्वम् = नए घान्य से पुराने धान्य को, और, पुराणेन नवम् - पुराने धान्य से नए धान्य को, दयमानाः = रक्षा करते हुए, स्याम = हो । ताम् ऊर्जेम् : उस अनादि को, ऊर्जाहुती = ऊर्जाहानी देवियां ऊर्जापमाने चल करती हुई अघाताम् - हमें (१३९०) निरुक्त नवमाध्यायस्य त्रयश्चत्वारिंश खण्डा । देखें । वसुवननाय च - धन के संभोग के लिये और, वसुधानाय च = धन के संग्रह के लिये ये दोनों देवियां, वीताम् - पिवेताम् = पृपदाज्य नामक घो को पीवें, वा = अथवा, कामयेताम् कामना करें। यज इति 'यज' यह, सपः - संपैप है। 'यजेति संप्रेप:' इस को द्विरुक्ति अध्याय समाप्ति का सूचक है। निरुक्त के नवम अध्याय का खण्डसूत्र- अथ यान्यश्वोयोल्हामानोमित्रः कनिक दन्नद्रवदर्सवत्सरमुपद्य दावेपामाप्रेतवेदत्यनन्दान्य शसयोगाद्वनस्तउपन्यासययद्वीनामहिरियमोगैरथेतिष्ठन्यन्यनागायश्यन्तीघेदासुपर्णवस्त आन्तिय- चिद्धित्वपमोन्यकन्दयनिमंतपितुन्धि आपो द्विष्ठा या ओपधीरारा यरण्याणिधद्धग्निस्योना- पीपांचित्तमि इन्द्राण्ययातोऽष्टावामज्याद्यौपानप्रपपनानंते आचरन्तीशुनासीरीदेयो जोष्ट्रीवेपीऊनाहुती निचत्वारिशत । इति निरुक्त नवमोऽध्यायः । ॐ शान्ति शान्तिः शान्तिः ।
श्रीगणेशाय नमः। - निरुक्तम् बय दशमोऽध्यायः तत्र प्रथम खण्ड निघण्टा- वायुः १। वरुणः २ वरुणः २। रुद्रः ३। इन्द्रः ४। पर्जन्यः ५। बृहस्पतिः ६ । ब्रह्मणस्पपतिः ७। क्षेत्रस्यपतिः ८ । वास्तोप्पतिः ९ । वाचस्पतिः १० । अपोन्नपात् ११ । यमः १२। मित्रः १३ । कः १४ । सरस्वान् १५ । विश्वकर्मा १६ | तायः १७ । मन्युः १८। दपिकाः १९ । सविता २० । त्वष्टा २१ । पातः २२ | अग्निः २३ । वेन २४ । असुनीतिः २५ । ऋतः २६ । इन्दुः २७ । प्रजापतिः २८ । अहिः २९ । अहिर्बुध्न्यः ३० । सुपर्णः ३१ । पुरूरवाः ३२ । इति द्वात्रिंशत् पदानि ।। अप निरुक्ते दशमाध्यायस्य प्रथम., खण्ड. अथातो मध्यस्थाना देवताः । निरत मत मे तीन ही देवता हैं। अग्नि वायु और सूर्य। उन में अग्नि पियी स्थान, वायु अन्तरिदास्थान और मूर्य युस्थान है। समाम्नाय के अनुनम से पृथिवीस्थान देवता वाषक पदो की उक्त प्रकार से कास्या की गई। अत' - उस के अनन्तर, मापस्थाना: देवता. - मध्यम- स्थान देवता वाचक वायु आदि पदो को व्याख्या या यहा से, अय - प्रारम्भ होता है। - तासां वायुः प्रथमगामी मरति । साताम् उस मे, वायुः , यामु, प्रथमगामी = सबसे प्रथम भाने वाला अर्थात् मुख्य देवा, भयसि-है। पापुमा निर्वचन करते है- - - (१३९२) निरुक्ते दशमाध्यायरय द्वितीयः खण्डः । वायुवतितेर्वा साद्गतिकर्मणः । एतेरिति स्थौलाष्ठिविरनर्थको वकारः। गतिकर्मणः ० गत्यर्थक, वाते: = वा धातु से, वा = अथवा, वेते: वी धातु से, वायुः = वायु शब्द, स्याद् - संभव है बना हो। एतेः - इण् धातु से वायु शब्द बना है, इति - यह स्थोलाष्ठिविः = स्थौलाष्ठिवि नामक आचार्य मानते हैं और कहते हैं कि, वायु शब्द में, वकारः - वकार का मागम, अनर्थकः अनर्थक है, अर्थात् उसका स्वतन्त्र कोई अर्थ नहीं। अर्थात् 'याति गच्छति इति वायुः' इस विग्रह में 'वा गतिगन्धनयो:' धातु से ' कुवापा...' इत्यादि उणादि सूत्र से, उण् (उ) प्रत्यय, वा उ, 'मातोयुक्....' इस सूत्र से युक् (य) आगम, होने पर 'वायु' शब्द वना है। वायु का ही नाम है । क्योकि, वायु गमन करता है। अथवा, 'वेति गच्छति इति वायुः' इस विग्रह मे 'वी गतिव्यप्ति प्रजनकान्त्यसनखदनेषु' धातु से बाहुलकात् उण, वी उ, वृद्धि, वै उ, आय आदेश होने पर 'वायु' शब्द बना है। अर्थ वही है । अथवा ' एति गच्छति इति वायुः' इस विग्रह में 'इण् गतौ' धातु से 'छन्दसीणः' इस उणाणि सूत्र से उण् प्रत्यय, इ उ, वृद्धि, ऐ उ, आय आदेश आयु, वकार भागम (उपजन) होने पर वायु शब्द बना है । अर्थ वही है । स्थुलाप्ठीव के अपत्य को स्थौलाप्ठीवि कहते है । अत इन । आदि वृद्धि । तस्यैपा भवति । इति निरुक्त दशमाध्याययस्य प्रथमः खण्डः ।१०-१॥ तस्य = उस वायु की, एषा यह अग्रिम ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्त दशमाध्यायस्य द्वितीयः खण्डः । वायवा याहि दर्शतेमे सोमा अस्कृताः । तेषी पाहि श्रुधी हवम् ॥ . सं. १-१-३-१ ॥ इस मन्त्र का विश्वामित्र के पुत्र मधुच्छन्दा ऋपि, गायत्री छन्द और वायु देवता है । मन्त्राय-दर्शन वायो = हे दर्शनीय वायुदेव ! तुम इस यज्ञ कर्म मे, आ याहि माओ। तुम्हारे लिये, इमे सोमाः - ये सोमरस, अरकृताः = अलंकृत अर्थात तैयार हैं । तेपाम् = तान = उन को, पाहि - पीयो या उन में से अपने भाग का पान को। उसको पीने के लिये, हवम् = हमारा आह्वान को, ध्रुधी = सुनो । इस मन्त्र मे वायु पाद से मध्यमस्थान देवता इन्द्र लिया गया है। इस का यास्क भाप्य- वायवा याहि दर्शनीयेमे सोमा अरंकृता अलंकृतास्तेषां पिच । भृणु में हानम् इति । कमन्य मध्यमादेवमवत्पत् । दर्शनीय वायो = हे दर्शनीय वायु देव ! तुम इस यज्ञ में, यायाहि आओ । तुम्हारे लिये, इमे सोमाः = ये सोमरस, अरंकृताः अलकृताः = अलंकृत अर्थात् तैयार हैं । तेषाम् - तान् : उनयो, । :
निरुक्त दशमाध्यायस्य तृतीया खण्डः । (१३९३) पाहि - पिव - पीयो । मे = हमारा, इति = इस, ह्वानम् = बाह्वान को, शृणु = सुनी। इस कची में वायु शब्द से मध्यमलोक का देवता इन्द्र ही लिया गया । अन्यथा, मध्यमादेवम् मध्यमदेव, अन्यम् = इन्द्र से अन्य, कम् = किस देव को ऋपि, अवक्ष्यद् - कहते ? । तस्यैपाऽपरा भवति । इति निरुक्ते दशमाध्यायस्य द्वितीयः खण्डः । १०-२॥ तस्य = उस इन्द्र वायु को, एषा - यह, अपरा - अग्रिम दूमरी, ऋचा, भवति = है-- अथ निरुक्त दशमाध्यायस्य तृतीयः खण्डः । आसत्राणासः शवसानमच्छेन्द्रं सुचक्रे रथ्यांसो अश्वाः । अभि श्रव ऋज्य॑न्तो वहेयुर्ने चिन्नु वायोरमृतं वि दस्येत् ।। ऋ. सं ४-७-९-३ ॥ इस मन्त्र का भरद्वाज ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और इन्द्र देवता है। मन्त्रार्थ-आसनगासः - चतुर्दिग् गमन करने वाले, रथ्यासः = रथ में युक्त, अश्वा: = अश्वगण, प्राज्यन्तः = सरलता पूर्वक गमन करते हुए, सुचक्रे शवसानम् = सुदृढचकरय पर अवस्थित, इन्द्रम् = इन्द्र को अभि अच्छ : हमारे अभिमुख लावें। ताकि, अमृतम् धवः - अमृतमय सोमरस रूप हवि, वायोः - पवन से, - जब तक, नुचित वि दस्येत् - नष्ट न हो अर्थात् शुष्क न हो उसके पहले ही इन्द्र उसे पी जायें। नु इम मन्त्र का भाष्य- आसस्वांसोऽभिवलायमानमिन्द्रं कल्याणचके रथे योगाय रथ्या अश्वा रथस्य वोढारः अज्यन्त अजुगामिनोऽन्नमभिवहेयुर्नवं च पुराणं च । अब इत्यन्ननाम, श्रूयत इति सतो वायोश्वास्य भक्षो यथा न विदस्येदितीन्द्रप्रधानेत्येके नघण्टुकं वायुकर्म । उभयप्रघानेत्यपरम् । आसमृवांस: नित्य ही हमारे यज्ञ में आने के लिये आसर्पण (गमन) करने वाले, अभिवलायमानम् = अपने यो अधिक बलवान मानते हुए. इन्द्रम् : इन्द्र को, कल्याणचक्रे रपे मुन्दर चक्र वाले रप में, योगाय - जुड़ने के लिये, रथ्याः बधा: = रपस्य वोहार: अश्वगण, ऋज्यन्त = ऋजुगामिनः : सोपे गमन करते हुए. नवम् च पुराणम् च अन्नम् = नया और पुराना हवि को, अभिवहेयुः - हमारे यज्ञ में लावे। श्रवः इति अन्ननाम : 'व' यह मन्त्र का नाम है। योकि वह, धूयते इति सतः - सर्वत्र गुना जाता है। 'धूयते इति श्रयाम विग्रह में 'श्रु श्रवणे' धातु से 'सर्व धातुभ्योऽमुन्' इस उणादि मूत्र से कर्म में बसुन् (अस्) प्रत्यय, गुण, अवादेश होने पर यवस् सन्द बना है। मान का नाम है। क्योंकि, वयंमान अन सर्व स्थानों में मुनाई देता है। अन्नदान मे यश होता है। सपा : वायु से, मस्य में इस सोम का, मशा = मक्ष = नाग, न पिदस्य • न रप में युक्त . जैसे, पायो: च- (१३९४) नियक्ते दशमाध्यायस्य चतुर्थः खण्डः । हो जाय, इति : इस कारण उस के प्रथम ही इन्द्र को यज्ञ में सोमपान के लिये ले आवें। इन्द्रप्रधाना - यह ऋचा इन्द्र प्रधान है। इस अवा में इन्द्र ही प्रधान देवता है, इति = यह, एके एक कोई आचार्य कहते हैं और, वायुकर्म = वायु अर्थ, नघण्टुकम् - नेघण्टुक नाम इन्द्र का विशेषण होने से गौण है । उभयप्रधाना = यह ऋवा इन्द्र और वायु उभयप्रधाना है। अर्थात् इस ऋषा के इन्द्र और वायु दोनों स्वतन्त्र देवता हैं, इति यह, अपरम् = दूसरा मत है। नरुक्त मत में तीन ही देवता है। अग्नि, वायु (इन्द्र) और आदित्य । अग्नि पृथिवीस्थान, वायु मध्यम स्थान (अन्तरिक्षस्थान) और आदित्य द्युस्थान हैं। इस मन्त्र में इन्द्र और वायु दोनों पठित हैं । अतः चार देवता न हो जायें इस के लिये वायु पद इन्द्र पद का विशेषण माना गया है। और जो लोग देवता भेद मानते हैं अर्थात् तीन से अधिक देवता मानते हैं। उन के मत में इस अचा के दो देवता हैं । इन्द्र और वायु । दोनों ही स्वतन्त्र हैं। कोई किसी का विशेषण नहीं । २ वरुणः । वरुण देवताविशेष का नाम है। 'वृणोति अन्तरिक्ष उदकम् आवृणोती इति वरुणः विग्रह में ‘वृश् वरणे' धातु से 'कृवृदारिम्य उनन् ' इस उणादि सूत्र से उनन् (उन) प्रत्यय, व को रपर गुण और णत्व होने पर वरुण शब्द बना है। वरुण देवता का नाम है । क्योंकि, वह अन्तरिक्ष में जल को आवृत्त करता है। इसी को कहते हैं- , T वरुणा-वृणोतीति सतः । वृणोति इति सतः = वृन इस धातु से, वरुणः = वरुण शब्द बना है। तस्यैपा भवति । इति निरुक्ते दशमाध्यायस्य तृतीयः खण्डः । १०-३ ।। तस्य = उस वरुण-की, एषा - यह अग्रिम ऋचा, भवति = है- अय निरुक्त दशमाध्यायस्य चतुर्थः खण्डः । नीचीनवारं वरुणः कवन्धं प्र. संसर्ज रोद॑सी अन्तरिक्षम् । तेन विश्वस्य भुवनस्य राजा यवं न वृष्टिर्युनत्ति भूमं ॥ ऋ. सं. ४-४-३०-३॥ । इस मन्त्र का अत्रि ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और वरुण देवता है । मन्त्रार्थ-वरुणः - वरुणदेव, मेघ के मुख को, नीचीनवारम् - नीचे कर के, कवन्धम् = जल की, प्रससर्ज = वर्षा करता है । रोदसी अन्तरिदाम् = द्यावापृथिवी और अन्तरिक्ष को, प्रससर्ज = सृजता है । तेन = इसी लिये वहा निरुक्त दशमाध्यायस्य पञ्चमः खण्डः । (१३९५) विश्वस्य भुवनस्य राजा = समान, भूम् - . सारे भुवनों का राजा है। वृष्टिः = वृष्टि, यवम् न - स्वल्प स्थल के सारी पृथिवी को, व्युनत्ति = प्लावित ( गीली ) करती है। इस ऋचा मे मध्यमस्थान वरुण को स्तुति है । अतः इसका देवता मध्यमस्थान वक्षण है। इस मन्त्र का भाष्य- नीचीनद्वारं वरुणः कबन्ध मेघम् । कवनमुदकं भवति । तदस्मिन्धीयते । उदकमपि कबन्धमुच्यते । पन्धिरनिभृतत्वे कमनिभृतं च । प्रसृजति द्यावापृथिव्यौचान्तरिक्षं च महत्त्वेन । तेन सर्वस्य भुवनस्य राजा यवमिव वृष्टिर्म्युनत्ति भूमिम् । वरुणः-- वरुणदेव, कबन्धम् = मेघम् - मेघ को, नीचीनद्वारम् अधोमुख करके वृष्टि करता है। कवाध का अर्थ मेघ है। क्योकि, कवनम् = कवन, उदकम् = जल, भवति = होता है। तद् - वह (जल), अस्मिन् = इस मेघ में, धीयते - निहित किया जाता है = रखा जाता है। इस लिये मेघ कहा जाता है। उदकम् अपि = जल भी, कवन्धम् = कवन्ध, उच्यते - कहा जाता है। क्योकि, बन्धिः = बन्ध पातु, मनिभृतत्वे = चालत अर्थ मे है, उस से बन्ध शब्द बना है और क शुख अर्थ में है, क शब्द का और बन्ध शब्द का समास होने पर कबन्ध शब्द बना है। जिस का अर्थ, कम् अनिभृतम् च = सुखरूप और चञ्चल - चपल रूप होता है। निभृत = स्थिर, अनिभृत - मस्थिर = चञ्चल । अर्थात् 'बध्नाति इति बन्धम्' इस विग्रह में 'वन्ध बन्धने' धातु से पचाद्यच होने से वन्ध बना है। 'कञ्च तद् बन्धञ्च इति कबन्धम्' इस विग्रह में क शब्द और बन्ध शब्द का 'विशेषणं विशेष्येण बहुलम्' इस सूत्र से फर्मधारय समास होने पर कवन्ध शब्द बना है। मेघ और जल दोनों का नाम है। क्योंकि, ये दोनों अनवस्थायी सुख रूप हैं। वरुण, महत्त्वेन = अपने महत्त्व से, द्यावापृथिव्यां च = धुलोक पृथिवीलोक, च = और, अन्तरिक्षम् अन्तरिक्षलोक को, प्रसृजति = उत्पन्न करता है । तेन = इस लिये, सर्वस्य भुवनस्य = समस्त भुवनों का वह, राजा = सम्राट् है। दृष्टिः = वरुण से उत्पन्न वर्षा, यवम् इव : स्वल्प स्थल के समान, भूमिम् - सारी पृथिवी को, व्युनत्ति = भिगोय देती है। तस्यैपाऽपरा भवति । इति निरक्त दशमाध्यायस्य चतुर्थः खण्डः। १०-४ ।। तस्य - उस वरुण की, एपा = यह, अपरा = दूसरी ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्ते दशमाध्यायस्य पञ्चमः खण्डः। तमू षु समना गिरा पितॄणां च मन्म॑भिः । नाभाकस्य प्रशस्तिभिर्यः सिन्धूनामुपोदये सप्तखंसा स मध्यमो नभन्तामन्य॒के समे ॥ . सं. ६-३-२६-२ ॥
(१३९६) निरुक्त दशमाध्यायस्य पश्चमी खण्डा । इस मन्त्र का नाभाफ ऋषि, महापङ्क्ति छन्द और वरुण देवता है। मन्त्रार्थ-अहम् = मैं, समना गिरा = समान वाणी से अर्थात् योग्य स्तुति के द्वारा, तम् ऊ = उसी वरुण की, सु = स्तुति करता हूँ। च = भौर, मन्मभिः मननीय स्तोत्रो के द्वारा, पितृणाम् - पितरो की स्तुति करता हूँ। प्रशस्तिभि. प्रशंसा के द्वारा, नाभाकस्य नाभाक नामक ऋषि की स्तुति करता हूँ। यः जो, सिन्धूनाम् = नदियों के, उप = पास, उदये = उद्गत है। उसकी, समे = सारे, अन्यके - शत्रुगण, नभन्ताम् - न होवें अर्थाद ये अपने सारे शत्रुओ को मारें। इस मन्त्र में वरुण को 'स मध्यमः' इस वाक्य से मध्यमस्थान देवता कहा है। - D इस ऋचा का यास्क भाष्य- .. गया। य:- उदये तं स्वभिष्टौमि समानया गिरा गीत्या स्तुत्या। पितॄणां च मननीयैः स्तोमैनाभाकस्प प्रशस्तिभिः । ऋपि भाको बभूव । यास्यन्दमानानामासामपामुपोदये, सप्तस्वसारमेनमाह वाग्मिा स मध्यम इति निरुच्यते, अथैप एव भवति माभूवन्नन्यके सर्वे ये नो द्विपन्ति दुधियः पापसंकल्पाः। अहम् = मैं, समानया = योग्य, गिरा = गीत्या = स्तुत्या = स्तुति के द्वारा, तम् वरुण की, स्वभिष्टोमि = स्तुति करता हूँ। च = और, मननीय = मननीय, स्तोमैः = स्तोत्रों के द्वारा, पितृणाम् - पितरो की स्तुति करता हूँ। प्रशस्तिभिः = प्रशसाओं के द्वारा, नाभाकस्य । नाभाक ऋषि की स्तुति करता हूँ। नाभाक. = नाभाफ नामक, ऋपिः = कोई ऋपि, वभूव जो, स्यन्दमानानाम् = वहने वाली, आसाम् अपाम् = इन नदियों के, उप = पास, उद्त है। लोग, एनम् = इस को, सप्तस्वसारम् = सात वहिन वाला, आह - माहुः कहते हैं। सः = वह वरुण, वाग्भि वाणी के द्वारा, मध्यम इति = मध्यम देवता ऐसा, निरुच्यते। कहा जाता है । अथ = इस के आगे, एपः एव = यही, भवति = होता है = रहें। सर्वे अन्यके सारे शत्रुगण, मा भूवन् = न रहें, ये = जो, दुधियः = दुर्बुद्धि, पापसंकल्पाः = पापसंकल्प वाले, हम से, द्विपन्ति = द्वेप करते हैं। ३ मध्यमस्थान देवविशेष का नाम रुद्र है। इस का निर्वचन करते हैं- रुद्रो रौतीति सतः । रोख्यमाणो द्रवतीति था। रोदयते । 'यदरुदचद्रुद्रस्य र द्रत्वम्' इति काठकम् । यदरोदीनद्रुद्रस्यरुद्रत्वम् इति हारिद्रविकम् । रीति इति सतः = रु शब्दे ' इस धातु से, स्द्रः = रुद्र शब्द बना है। अर्थात् 'रोति इति रुत्' इस विग्रह मे ' शब्दे' घातु से 'किप च' इस सूत्र से कर्ता में विप् प्रत्यय, सपिहारी लोप, हस्वस्य पिति कृति तुक्' इस सूत्र से तुक् (द ) आगम होने पर 'रुद्र' शब्द बना है। और 'रेत् सर राति अभिवर्षणेन उदकम् ददाति इति रुद्र. इस विग्रह मे रख उपपद 'रा दाने' - .
निरुक्ते दशमाध्यायस्य षष्ठः खण्डः । (१३९७) . धातु से योगविभाग से 'सुपि' इस सूध से क (अ) प्रत्यय, रुत् राम, ‘ातो लोप इटि च' इस सूत्र से आ लोप, छान्दस तकार को दकार होने पर 'रुद्र' शब्द वना है । देवविशेष ( मरुत ) का नाम है। क्योंकि, वह शब्द करता हुआ जल वर्षा करता है । वा = अथवा, रोख्यमाण:-वार वार वा अतिशय रो रो कर, द्रवति = चलता है, इति = इस लिये, रुद्रः = रुद्र कहा जाता है। मर्याद 'रोल्यमाणः मेघोदरस्थः शब्दं कुर्वाण: सन् द्रवति गच्छति इति रुद्रः' इस विग्रह में रोल्ममाण शब्द उपपद 'द्रु गतौ' धातु से बाहुलकात् ड प्रत्यय, डित्त्वात् टिलोप, और छान्दसत्वाद रोख्यमाण को रुभाव होने पर 'रुद्र' शब्द बना है। मेघस्थ देवविशेप का नाम है। क्योंकि, वह आकाश में रोते हुए चलता है। वा = अथवा, रोदयतेः = णिजन्त रुद् धातु से, रुद्रः = रुद्र शब्द वना है। अर्थात् 'रोदर्यात शत्रुकलत्राणि अश्रुविमोचनं कारयति इति रुद्रः इस विग्रह में ण्यन्त रुदिर् अश्रुविमोचने' धातु से 'रोदेणिलुक्च' इस उणादि सूत्र से रक् (र) प्रत्यय और णि लुक् होने पर 'रुद्र' शब्द बना है। देवविशेष का नाम है। क्योकि, वह शत्रुओं को मारकर उनकी खियों को रोदन कराता है । इस अर्थ में श्रुति प्रमाण देते हैं -यत् अरुदत् = जो रोया, तत् = वह, रुद्रस्य = रुद्र की, रुद्रत्वम् = रूद्रपना हैं, इति - यह, काठकम् = कठशाखा की श्रुति है। यत् = जो, अरोदीत् - रोया, तत् = वह, रद्रस्य - रुद्र की, रुद्रत्वम् = रुद्रपना है, इति = यह, हारिद्रविकम् हरिद्रव शाखा की श्रुति है। ये दोनों श्रुतियां 'रोने से रुद्र नाम पड़ा है' यह कह रही हैं। तस्यैपा भवति । . इति निरुक्त दशमाध्यायस्य पञ्चमः खण्डः । १०-५॥ तस्य = उस रूद्र की, एपा = यह आगे आने वाली ऋचा, भवति अथ निरूक्ते दशमाध्यायस्य पष्ठः खण्डः । स्थिरधन्वने गिरः क्षिप्रेपवे देवाय स्वधान्वें । अाळहाय सहमानाय वेधसे तिग्मायुधाय भरता शृणोतु नः ॥ ऋ सं. ५-४-१३-१॥ इस मन्त्र का वसिष्ठ ऋषि, जगती छन्द और रूद्र देवता है। मानार्थमहपि वसिष्ठ कहते हैं कि, है हमारे स्तोतृगण ! आप लोग, स्थिरधन्वने - दृढ घनुप वाले, क्षिप्रेपवे = शीघ्रगामी वाण पाले, स्पधान्वे : अन्न वाले, अपाळहाय = किसी के लिये भी अजेय, सहमानाय = सब के विजेता, तिग्मायुधाय = तीक्ष्ण अस्त्र शस्त्र वाले, वेघसे = विधाता, रूद्राय देवाय - रद्र देव के लिये, इमाः गिरः - ये स्तुतियां हैं, उनको, भरत = धारण करो। अर्थात् आप लोग रुद्र की स्तुति करो हमारी स्तुति, शृणोतु = सुनें। इस ऋचा मे मध्यमस्थान रद्र देव की स्तुति है। और वे, ना इस मन्त्र का यास्क भाप्य- अषाढाय = F D (१३९८) निरुक्ते दशमाध्यायस्य सप्तमः खण्डः । इमा रुद्राय दृढधन्वने गिरः क्षिप्रेपवेदेवायानतेपाढायान्यैः 16 सहमानाय विधान तिग्मायुधाय भरत शृणोतु नः॥ दृढधन्यने = दृढ धनुप वाले, क्षिप्रेपवे = शीघ्रगामी बाण वाले, बन्नवते = अन्न वाले, अन्यः किसी के लिये भो अजेय, सहमानाय = सब के विजेता, विधाने = विधाता, तिग्मायुधाय : तीक्ष्ण अत्र शव वाले, रुद्राय देवाय = रुद्र देव के लिये, इमाः गिरः ये स्तुतियां हैं। उनको, भरत = धारण करो । वह, नः = हमारी स्तुति को, शृणोतु = सुने । निगम प्रसक्त तिग्म शब्द का निर्वचन करते हैं- तिग्मं तेजतेरुत्साहकर्मणः । उत्साहकर्मणः = उत्साह अर्थक, तेजतेः = तिज धातु से, तिग्मम् = तिग्म शब्द बना है । अर्थात् 'तेजति उत्साहयति इति तिग्मम् तीक्ष्णम्' इस विग्रह में 'तिज निशाने' धातु से, 'युजि रुजि तिजां कुश्च' इस उणादि सूत्र से मक् (म) प्रत्यय और जकार को गकार कुत्व होने पर तिग्म शब्द बना है । तीक्ष्ण अर्थ है । आयुधमायोधनात् । आयोधनाद = आयोधन होने से अर्थात् उस से युद्ध किये जाने से, आयुधम् - आयुध कहा जाता है । अर्थात् 'आयुध्यते अनेन इति आयुधम् ' इस विग्रह में आंहपूर्वक 'पुध संप्रहारे' पातु से 'पार्थे कविधानम् ' इस वात्तिक से करण में क (अ) प्रत्यय होने पर आयुध शब्द बना है। मक शस्त्र का नाम है । क्योंकि, इन के द्वारा शत्रुओं पर प्रहार किया जाता है। तस्यैपाऽपरा भवति । इति निरुक्तेदशमाध्यायस्य पष्ठः खण्डः । १०-६ ।। तस्य = उस रुद्र की, एपा यह अग्निम, अपरा = दूसरी ऋचा, भवति अथ निरुक्ते दशमाध्यायस्य सप्तमः खण्डः । या ते दिद्युस्सृष्टा दिवस्परि मया चरति परि सा घृणक्तु नः। सहस्त्रं ते स्वपिवात भेपजा मा नस्तोकेषु तनयेषु रीरिपः ।। ३. सं. ५-४-१३-३ ॥ इस मन्त्र का भी वसिष्ठ ऋषि, जगती छन्द और रुद्र देवता है। मन्त्रायं-हे रुद्र !, दिवरपरि = अन्तरिक्ष से, अवसृष्टा छोड़ी गयी, या जो, ते - तुम्हारी, दिद्युत् = मायुध रूप विजली, मया - पृथिवी पर, चरति = विचरण करती है, सा - यह, नः = हमें, परिणत . - - निरुक्ते दशमाध्यायस्य सप्तमः खण्डः । (१३९९) छोड़ दें। स्वपिवात - हे स्वपिवात रुद्र!, ते = तुम्हारे पास, सहस्रम् = हजारों, भेषजाः औषधियां हैं। नः । हमारे, तोकेषु तनयेषु = पुत्रपोत्रादि की, मा रोरिपः = हिंसा न करना । इस ऋचा में मध्यमस्थान रुद्र देवता की स्तुति है। D इस मन्त्र का भाष्य- या - . या ते दिद्युदिवसृष्टादित्रस्परि-दिवोधि । दिद्युद्-द्यतेर्वा, द्युतेर्वा, द्योततेर्वा । जो, ते = तुम्हारी, दिद्युत् = विजली, दिवस्परि = दिवोधि : अन्तरिक्ष से, भवसृष्टा छोड़ी गयी । एक 'वा कार' वाक्यालद्वार में है। द्यतेः = 'दो अवखण्डने' धातु से, वा = अथवा, द्योतते: द्युतेः = 'धु अभिगमने' धातु से, वा = अथवा, द्योततेः = द्युत दीप्ती धातु से, विद्युत् दिद्युत शब्द बना है । अर्थात् 'धति शत्रुन अवखण्डति इति दिद्युत् ' इस विग्रह में 'दोऽइवखण्डने' धातु से किप् (०) प्रत्यय, पृषोदरादित्वात् द्वित्व, दा दा, इस के स्थान में दिधुद्भाव होने पर दिद्युत् शब्द बना है। आयुध का नाम है। क्योंकि, आयुध शत्रुओं का नाश करता है। अथवा 'द्योति प्राणिनः अभिगच्छति इति दिद्युत्' इस विग्रह में 'धु अभिगमने' धातु से पृषोदरादित्वाव किम् (०), द्वित्व, द्यु धु, अभ्यास को संप्रसारण, पूर्व रूप, दिद्यु, तुझ अगम होने पर, दिद्युत् शब्द बना है। आयुध का ही नाम है । क्योंकि, वह प्राणी के पास पहुंचता है। अथवा द्योतते प्रकाशते इति दिद्युत् ' इस विग्रह में 'द्युत दीप्तो' धातु से । 'धुतिगमिजुहोतीनांद्वे च इस सूत्र से किम् (०) प्रत्यय और द्वित्व, द्युत धुत, 'द्युतिस्वाप्योः सम्प्रसारणम्' इस सूत्र से अभ्यास को संप्रसारण, पूर्वरूप, दित द्युत्, हलादि शेष होने पर दिद्युत् शब्द बना है। बिजली आयुध का नाम है। क्योकि, वह प्रकाश करता है। क्ष्मया चरति-क्ष्मा पृथिवी तस्यां चरति । विक्ष्मापयन्ती चरतीति वा, परिपूणक्तु नः सा। सहसं ते स्वाप्तवचनमेपज्यानि । मानस्त्वं पुत्रेषु च पौत्रेषु च रीरिषः। तोकं तुद्यते । तनयं तनोते। धमया चरति = क्ष्मा पृथिवी तस्यां चरति = क्ष्मा पृथिवी का नाम है । उस में विचरण करती है। वा = अथवा, जो तुम्हारी रोगरूपी शक्ति है वह प्राणियों को, विमापयन्ती - नाश करती हुई, चरति विचरण करती है, इति इत्यर्थः सा = वह शक्ति, ना - हम को, परिवणक्त बचावें स्वाप्तवचन - हेस्वाप्तवचन रुद्र !, ते तुम्हारे, सहस्रम् = हजारो, भेषज्यानि = औषध है, ये हमारे लिये हों। त्वम् = तुम, न: - हमारे, पुत्रेषु च - पुत्रो में, च = और, तनयेषु = पौत्रों में, मा रीरिषः = रोप न करो। क्रोध न करो, तुद्यतेः = 'तुद व्यथने' धातु से, तोकम् = तोक शब्द बना है। तनोतेः धातु से, तनयम् = तनय शब्द बना है। 'तुद्यते व्यध्यते इति तोकम् अपत्यम्' इस विग्रह में, 'तुद व्यथने' धातु 'पुसि संज्ञायां घः प्रायेण' इस सूत्र से घ (अ) प्रत्यय तुद् म, उपपा गुण, तो अ, पृषोदरादित्वात् दकार को ककार होने पर तोक शब्द बना है पुत्र का नाम है । क्योकि, जब पिता-'यह कर, यह न कर' इस प्रकार शासन करता है तव पुत्र व्यथित होता है। तनोति वंशं विस्तारयति इति तनयम् अपत्यम्' इस विग्रह में 'सनु विस्तारे' धातु से 'लिमलितनिभ्यः कयन्' इस उगादि सूत्र से कयन् (अय) प्रत्यय होने पर तन् . 'तनु विस्तारे' (१४००) निवक्त दरामाध्यायस्याष्टमः खण्डा । अय, तनय शब्द बना है। पोय का नाम है। क्योकि, वह वंश का विस्तार करता है। यद्यपि तोक और तनय का एक ही अर्थ है तथापि एक वाक्य में दोनों का प्रयोग होने से तोक का पुत्र और तनय का पौत्र अर्थ किया गया है। अग्निरपि रुद्र उच्यते । कही कहीं मन्त्रों में, अग्निः अपि = अग्नि भी, रुद्रः = रुद्र, उच्यते कहा जाता है। तस्यैपा भवति । इति निरुक्ते दशमाध्यायस्य सप्तमः खण्डः । १०-७ ॥ तस्य = उस अग्नि रूप रुद्र का, एपा - यह अग्निम ऋचा, भवति = है- . अथ निरुक्ते दशमाध्यायस्याप्टमः खण्डः । जराधोध तद्विविड़ेि विशे विशे यज्ञियाय । स्तोम रुद्राय दृशीकम् ॥ ऋ. सं. १-२-२३-१० ।। है इस मन्त्र का शुनः शेप ऋपि, गायत्री छन्द और अग्नि देवता है। मन्त्रार्थ जराबोध स्तुति द्वारा बोधमान अग्नि देव !, विशे विशे = प्रत्येक यजमोन पर कृपा करके, यज्ञियाय - यज्ञानुष्ठान के लिये, तद = उस यज्ञ मे विविड्डि - प्रवेश करो । यजमान लोग, रुद्राय = उग्ररूप तुम अग्नि के लिये, दृशोकम् = रुचिकर, स्तोमम् = स्तोत्र करते हैं इस मन्त्र मे रुद्र शब्द का अर्थ उन अग्नि है । अतः रुद्र शब्द का अर्थ अग्नि भी है। - इसका भाज्य- जरा स्तुतिः । जरतेः स्तुतिकर्मणः । तां बोध । तया गोधयितरिति वा । तद्विविद्धि तत्कुरु । मनुष्यस्य मनुष्यस्य यजमानाय स्तोमं रुद्राय दर्शनीयम् । जरा स्तुतिः = जरा स्तुति कही जाती है। अर्थात् जरा शब्द का अर्थ यहां स्तुति है । स्तुतिकर्मणः = स्तुत्यर्थक, जरतेः = 'जष् वयोहानौ' धातु से जरा शब्द बना है। निघण्टु ४-१-५२ मे स्तुति अर्थ कहा है। 'जीयति स्तौति अनया इति जरा स्तुतिः' इस विग्रह में । 'पिद्भिदादिभ्योऽस् इस सूत्र से अङ् (अ) प्रत्यय, रपर गुणः और टाप होने पर जरा शब्द बना है। स्तुति का नाम उस को, बोध जानो। पा = अथवा, तया = उस से, बोधयितः - हे बोधायतः = हे बोधमान ! तव विविड्डि = तत् करु = उसको करो। विशे विशे = मनुष्यस्य मनुष्यस्य - मनुष्याय प्रत्येक यजमान के लिये कृपा करो। रुद्राय - अग्निदेव के लिये, दर्शनीयम् = रुचिकर, स्तोमम् - स्तोत्र है। है। ताम् - D यजमानाय - निरक्त दशमाध्यायस्याष्टमः खण्डा । (१४०१) . 1- . - धातु इन्द्र शब्द का अर्थ देवराज इन्द्र है। इस के अनेक निर्वचन करते हैं- इन्द्र इरां दृणातीति वा, इरां ददातीति वा, इरां दधातीति वा, इरां दारयत इति वा, इरां धारयत इति वा । इराम् = अन्न को, दृणाति = विदारण करता है, इति = इस लिये, इन्द्रः = इन्द्र कहा जाता है । अर्थात् 'इरां बीजभूतम् श्रीह्यादि अन्नं दृणाति विदारयति इति इन्द्रः' इस विग्रह में इरा उपपद 'दृ विदारणे' धातु से 'दृन्नेन्द्राप्र....' इत्यादि उणादि सूत्र के निपातन से रन् (र) प्रत्यय, इरा दूर, इरा का इन, दृ को द होने पर, इन् द् र, 'इन्द्र' शब्द बना है। देवराज इन्द्र का नाम है। क्योंकि, यह वर्षा से धान्यवीज को भिगो कर अङ्कर उत्पन्न करता हुआ उसे विदारण कर देता है = फाड़ देता है। इस पक्ष में इन्द्र शब्द परोक्षवृत्ति है। वा = अथवा, इरां - अन्नं, ददाति देता है, इति = इस लिये, इन्द्रः = इन्द्र कहा जाता है । अर्थात् 'इरा दराति इति इन्द्रः' इस विग्रह में, इरा उपपद 'डुदान दाने' से पूर्ववत् 'हन्द्राप्र' इत्यादि उणादि सूत्र के निपातन से रन् प्रत्यय इरा को इन और दा को दु होने पर इन दुर-इन्द्र शब्द बना है। इन्द्र का ही नाम है । क्योंकि वह वर्पा द्वारा अन्न उत्पन्न कर के सब को देता है। वा = अथवा, इराम् = अन्न को, दघाति - धारण करता है, इति - इस लिये, इन्द्रः - इन्द्र कहा जाता है। अर्थात् 'इरां दधाति - इति इन्द्रः' इस विग्रह में इरा उपपद 'डघाम् धारणपोषणयोः' घातु से पूर्वोक्त उणादि सूत्र के निपातन से इन् प्रत्यय इरा को इन और घा को ६ होने पर इन्द्र शब्द बना है । इन्द्र का नाम है । क्योंकि, इन्द्र अन्न को धारण करता है । वा - अथवा, इराम - अन्न को, दारयते - वर्षा जल द्वारा, वीज रूप अन्न को भिगो कर महर रूप से फाड़ देता है, इति = इस लिये, इन्द्रा = इन्द्र कहा जाता है । अर्थात 'इरां दारयते इति इन्द्रः' इस विग्रह में इरा उपपद णिजन्त 'दृ विदारणे' पातु से उक्त उणादि सूत्र के निपातन से रन् प्रत्यय, इरा को इन्, धातु को न होने पर इन्द्र शब्द बना है। इन्द्र का नाम है । क्योंकि, इन्द्र अन्न विदारण करता है । अथवा, इराम् = अन्न को, धारयते - धारण करता है. इति = इस लिये, इन्द्र:- इन्द्र कहा जाता है । अर्थात् 'इरा धारयते इति इन्द्रः' इस विग्रह मे इरा उपपद धृन्न धारणे' धातु से उक्त उणादि सूत्र से रन् प्रत्यय, इरा को इन बोर धातु को ६ होने पर इन्द्र चन्द बना है। इन्द्र का नाम है । क्योंकि, इन्द्र अन्न को धारण करता है इन्दवे द्रवतीति वा, इन्दौर मत इति वा । घा • अथवा, इन्दवे सोम के लिये, द्रवति = गमन करता है - जाता है, इति लिये, इन्द्रः = इन्द्र कहा जाता है अर्थाद: इन्दवे सोमपानाय द्रवति गच्छति इति इन्द्रः' इस विग्रह में, . .
E : D (१४०२) निरुक्त दशमाध्यायस्याष्टमा खण्डौ । इन्दु उपपद ' द्रु गतो' धातु से पूर्वोक्त उणादि सूत्र के निपातन से रन् प्रत्यय, इन्दु को इन धातु के ऊ का लोप, होने पर इन्द्र शब्द बना है । इन्द्र का नाम है। क्योंकि इन्द्र सोमपान करने के लिये यज्ञ में जाता है। वा = अथवा, अति प्रिय होने से, इन्दौ सोम में, रमते = रमण करता है, इति' इस लिये, इन्द्र कहा जाता है । अर्थात् 'इन्दी सोमे रमते क्रीडति इति इन्द्रः' इस विग्रह में इन्दु उपपद 'रमु कोडायाम्' धातु से किप् ( ० ) प्रत्यय, पृषोदरादित्वात् इन्दु के उ का और रम् के मका लोप होने पर इन्द्र शब्द बना है। इन्द्र का नाम है । क्योंकि, इन्द्र को सोम अतिप्रिय होने से वह उस में रमता रहता है। इन्धे भूतानीति वा । "तघदेनं प्राणैः समैन्धस्तदिन्द्रस्येन्द्रत्वम्" इति विज्ञायते । वा = अथवा, भूतानि = प्राणियों को, इन्धे - द्युतिमान अर्थात् कान्तिमान करता है, इति इस लिये, इन्द्रः = इन्द्र कहा जाता है । अर्थात् 'इन्धे भूतानि दीप्यते इति इन्द्रः' इस विग्रह में 'भि इन्धी दीप्तौ' धातु से 'जेन्द्रा' इत्यादि उणादि सूत्र के निपातन से रन् (र) प्रत्यप, और धकार को दकार होने पर इन्द्र शब्द बना है। इन्द्र का ही नाम है। क्योंकि, वह अन्न की उत्पत्ति के अधिदेवादि रूप में स्थित होता हुआ भोजन द्वारा प्राणियों को कान्तियुक्त करता है। तद् यद् वह जो, एनम् इसे, प्राणः = प्राणों के अधिदेवताओं ने, समोधन = दीपन किया है, तत् = वही, इन्द्रस्य = इन्द्र का, इन्द्रत्वम् इन्द्रपना है, इति = यह इस ब्राह्मणवाक्य से, विज्ञायते - जाना जाता है । अर्थात् सब को अन्न द्वारा कान्तियुक्त करना ही इन्द्र में इन्द्रपना है। इदं करणादित्याग्रायणः। इदम् करणात् = इदं करने से अर्थाद इस जगत् की उत्पत्ति करने से, इन्द्रः = इन्द्र कहा जाता है । इनि = यह, आग्रायणः = आग्रायण आचार्य कहते हैं । अर्थात् ' इदं करोति इति इदंकरः इन्द्रः' इस विग्रह में इदम् उपपद 'डुकृय करणे' धातु से पचाद्यच्, रपर गुण, इदंकर, पृषोदरादित्वात इदंकर के स्थान में इन्द्र आदेश होने पर इन्द्र शब्द बना है। इन्द्र का नाम है। क्योंकि, इन्द्र इस जगत को बनाता है। इस मत में इन्द्र का अर्थ ईश्वर है। क्योंकि, जगत् कर्ता ईश्वर है। इदंदर्शनादित्यौपमन्यवः। इदम् दर्शनाव = इदं दर्शन से अर्थात् इस जगत् को इस ने देखा है इस लिये, इन्द्रः - इन्द्र कहा जाता है, इति = यह, औपमन्यवः = औपमन्यव नामक आचार्य कहते हैं। अर्थात् 'इदभु अद्राक्षीत् इति इदंदर्शन इन्द्रः' इस विग्रह में इदम् अद्राक्षीद इति इदंदर्शन इन्द्रः' इस विग्रह में 'इदम् उपपद ‘दृशिर प्रेक्षणे' धातु से भूत में ल्युट्, यु को अन आदेश, उपधाको रपर गुण, इदंदर्शन, पृषोदरादित्वात् इन्द्र आदेश होने पर इन्द्र शब्द बना है। जगद्रप्टा ईश्वर का नाम हैं। क्योंकि, सर्व प्रथम ईश्वर ने जगत् को देखा है। इन्दतेर्या ऐश्वर्यकर्मणः । इन्दञ्छनृणां दारयिता बा, द्रावयिता वा, आदरपिता ५ यज्वनाम् ।
, - - निरुक्त दशमाध्यायस्य नवमः सण्डा । (१४०३) ऐश्वर्यकर्मणः - ऐश्वर्य अर्थक, इन्दतेः 'इदि परमैश्वर्ये' धातु से, इन्द्रः = इन्द्र शब्द बना है । मर्थात् 'इन्दति परमैश्वर्यं प्राप्नोति इति इन्द्रः' इस विग्रह में 'इदि परमैश्वर्ये' धातु से 'चेन्द्र' इत्यादि उणादि सूत्र के निपातन से रन् (२) प्रत्यय होने पर इन्द्र शब्द बना है । इन्द्र का नाम है। क्योंकि, इन्द्र निरतिशय ऐचर्य वाला है। वा = अथवा, इन्दन - ऐश्वर्ययुक्त होता हुआ, शत्रूणाम् - शत्रुओं का, दारयिता - विदारण करने वाला होने से, इन्द्रः = इन्द्र कहा जाता है । अर्थात् 'इन्दति इति इन्दन' इस विग्रह में 'इदि परमैश्वर्य' धातु से लट् शत होने पर इन्दत् सन्द बना है और 'दारयिता शत्रूणां विदारयिता इति इन्द्रः' इस विग्रह में ण्यन्त 'दृ विदारणे' धातु से हच् प्रत्यय इट्, गुण, अयादेश होने पर दारयित पाब्द बना है। इन्दन् चासो दारपिता च इति इन्दद् दारयिता' इस विग्रह मे इन्दत और दारयित का कर्मधारय समास होने पर इन्ददारयित शब्द बना है। इस समस्त के स्थान में पृषोदरादित्वात् इन्द्र आदेश होने पर इन्द्र शब्द बना है। इन्द्र का ही नाम है। क्योंकि, वह शत्रुओं को विदारण करता है। वा अथवा, द्रावयिता = शत्रुओं का द्रावण करने वाला पर्याद भगाने वाला होने से, इन्द्रः - इन्द्र कहा जाता है । अर्थात् 'द्राययति इति द्रावयिता' इस विग्रह मे ण्यन्त 'गु गती' घातु से सूच प्रत्यय, द्रावि तृ, गुण आय आदेश होने पर दावयितृ शब्द बना है। पूर्वोक्त पत प्रत्ययान्त इन्दत् का और दायित का कर्मधारय समास होने पर इन्दत् द्रावयित शब्द बना है। उस के स्थान में पृषोदरादित्वात् इन्द्र मादेश होने पर इन्द्र शब्द बना है। इन्द्र का ही नाम है । क्योकि, यह पत्रों को भगाता है। और, यज्वनाम् = यज्ञ करने वाले यज्वनों का, बादरयिता - भादर करने वाला होने से, इन्द्रः = इन्द्र कहा जाता है । अर्थात् 'आद्रियते इति इन्द्रः' इस विग्रह में आइ पूर्वक पन्त 'हद आदरे' धातु से हन् प्रत्यय, इट्, गुण, अयादेश होने पर आदरपितृ शब्द बना है। इन्दन 'चासौ आदरयिता च इति इन्दनादयिता' इस विग्रह में इन्दन का और आदरयित का फर्मधारय समास होने पर इन्दनादरयित शब्द बना है। उस के स्थान में पोदरादित्वार इन्द्र आदेश होने पर इन्द्र शब्द बना है। इन्द्र का ही नाम है । क्योंकि वह परम एश्वर्य वाला होता हुमा यग्यनों का आदर करता है। तस्यैषा भवति । इति निरुक्ते दशमाध्यायस्याप्टमः खण्डः १०-८॥ तस्प = उस इन्द्र को, एषा = यह अग्रिम स्तुति रूप भवा, भवति - है- अप निरुक्त दशमाध्यायस्य नवमः खण्डः। अर्दुरुत्समस्रजो वि खानि स्वमर्णवान्यद्वधानाँ अरम्णाः । महान्तमिन्द्र पर्वत वि यद्वः सृजो वि धारा अब दानवं ईन् । क्र.सं. ४-१-३२-१॥ १७६ (१४०४) निरुक्त दशमाध्यायस्य नवमः खण्डः । इस मन्त्र का आत्रेय गातु ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और इन्द्र देवता है। मन्त्रार्थ-इन्द्र = हे इन्द्र!, त्वम् = तुमने, उत्सम् = मेघ को, अदर्द = विदीर्ण किया है और, खानि = मेघस्थ जल के निर्गमन द्वार को, वि असृजः = विसृष्ट किया है अर्थात् बनाया है। यद्वधानान् = बाध्यमान, वर्णवान् = जल वाले मेघ को, अरम्णा: = उद्घाटित करके उस में से जल बरसाया है। यत् = जो तुमने, महान्तम् पर्वतम् = प्रभूत मेघ को, वि वः - खोल दिया है। धाराः = जलधारा को, विसृजः = विसृष्ट किया है। दानवम् = दनु के, पुत्र वृत्र का, अवहन = हनन किया है। इस ऋचा में इन्द्र की स्तुति है । इस मन्त्र का भाष्य- अदृणा उत्समुत्सउत्सरणाद्वोत्सदनाद्वोत्स्यन्दनाद्वो नत्तेर्वा, व्यसृजोऽस्य खानि, त्वमर्णवा- नर्णस्वतं एतान् माध्यमिकान् संस्त्यायान् पावध्यमानानरम्णाः। रम्णातिः संयमनकर्मा ! विसर्जनकर्मा वा। महान्तमिन्द्रपर्वतं मेघ यदव्यवृणोळसृजोऽस्य धाराः। अवहन्नेनं दान दानकर्माणम् । हे इन्द्र ! तुमने, उत्सम् = मेघ को, अहणाः = फाड़ा है। उत्सरणाद ऊर्ध्वगमन करने से, वा - अथवा, उत्सदनात् = ऊपर मे बैठे हुए के जैसा होने से, वा = अथवा, उत्स्यन्दनात् = ऊपर रहकर बहने से, या = अथवा, उनत्ते. = भिगोने से, उत्सः = मेघ उत्स कहा जाता है। अर्थाद 'उत्सरति अस्मात् उदयाम् इति उत्स: मेघः' इस विग्रह मे उन पूर्वक 'सृ गतो' धातु से वाहुलकाव ड (म) प्रत्यय और डित्त्वात् टि लोप होने पर उत्स शब्द बना है। मेघ का नाम है। क्योकि, मेघ ऊपर को गमन करता है। अथवा 'उत् अवं सीदति इति उत्सः मेघः' इस विग्रह मे उत् पूर्वक । 'पल्लू विशरणगस्यव- • सांदनेषु' धातु से बाहुलका ड (म) प्रत्यय और डित्त्वाव टि लोप होने पर उत्स शब्द बना है। मेघ का नाम है । क्योकि, मेंघ ऊपर बैठा हुआ सा प्रतीत होता है । 'उत्स्यन्दते इति उत्सः मेघः' इस विग्रह में उत्पूर्वक 'स्यन्दू प्रस्रवणे' धातु से वाहुलकात् ड (अ) प्रत्यय, डित्त्वात् टिलोप और य लोप होने पर उत्स शब्द बना है। मेघ का नाम है। क्योकि, मेघ ऊपर हो कर बहता है। अथवा 'उनत्ति फ्लेदयति इति उत्सः मेघः' इस विग्रह में, 'उन्दोल्लेदने' धातु से 'उन्दतेनंलोपन इस उणादि सूत्र से वाहुलकात् स प्रत्यय, न लोप और द को व होने पर उत्स शब्द बना है। मेघ का नाम है। क्योकि, मेघ ,जल के द्वारा सब को भिगो देता है। मस्य खानि = मेघ के जल निकलने के द्वार (छिद्र ) को, व्यसृजः %3D सरजन किया है खोल दिया है। त्वम् = तुमने, अर्णवान् = अर्णस्वतः = जल से भरा हुआ, वावध्यमानान् पावध्यमान, माध्यगिकान • माध्यमिक, एतान् सस्स्यायान - इन मेघ समूहों को, मरम्णाः- संयमन तथा विसर्जन किया है। 'अरम्णाः' इस पद में, संयमनकर्मा = संयमन अर्थक, रम्णातिः अथवा E D ग 2 निरुक्त दशमाध्यायस्य दशमः खण्डः। (१४०५) धातु है। वा = अथवा, विसर्जनकर्मा = विसर्जन अर्थक, रम्णातिः = रम धातु है । यद्यपि रम धातु लोक में क्रीडा अर्थ में है तथापि वेद में संयमन तथा विसर्जन अर्थ में समझना चाहिये । 'अरम्णा:' यह क्रिया पद है । लङ् लकार, मध्यम पुरुष, एक वचन का रूप है। व्यत्यय से भा प्रत्यय हुआ है। हे इन्द्र !, महान्तम् पर्वतम् - मेघम् = महान् मेघ को, यत् = जो तुमने. व्यवृणोः खोल दिया है। अस्य = इसकी, घाराः = जल धाराओं को, व्यसृजः = खोल दिया है। एनम् दानकर्माणम् = इस दान देने वाला दनु के पुत्र वृत्र का, अव हन - हनन किया है। तस्येपाऽपरा भवति । इति निरुक्त दशमाध्यायस्य नवमः खण्डः ॥१०-९॥ तस्य = उस इन्द्र का, एपा - यह, अपरा- दूसरी अचा, भवति = है-- अथ निरुक्त दशमाध्यायस्य दशमः खण्डः । यो जात एव प्रथमो मनखान्देवो दे॒वान्क्रतुंना पर्यभूषत् । यस्य शुष्माद्रोदसी अभ्यसेतां नृम्णस्य महा स जनास इन्द्रः ।। मा. सं.२-६-७-१॥ इस मन्त्र का गृत्समद ऋपि, विष्टुप् छन्द और इन्द्र देवता है। मन्त्रा-एक समय की बात है कि, यन्य के पाग में गृत्समद आदि ऋषि और इन्द्र आदि देवता सब एकतृत हुए । असुर लोगों ने इन्द्र के ऊपर आक्रमण किया। इन्द्र गृत्समद के रूप धारण कर वहां से चले 1 घर पेज्ञ के कार्य समाप्त होने पर पूजा ग्रहण कर गृत्समद ऋषि अपने घर जा रहे थे। असुरों ने उनको इन्द्र समझ कर मारने के लिये घेर लिया। तब गृत्समद कहते हैं-जनासः - जन! 'यः = जिन्हों ने, जात एव जन्मते ही, प्रथमः - सर्वदेवों में प्रधान होता हुआ, मनस्वान् मनस्वी पुरुपों में अग्रगण्य होता हुआ और, देवः = घोतमान होता हुआ, अतुना = पुत्रवध आदि वीर कर्म के द्वारा, देवान् = सारे देवों को, पर्यभूपद ० विभूषित किया था। यस्य - जिस के, शुष्मात् - शरीर-बल से, रोदसी - द्यावापृथिवी, अभ्यसेताम् = भयभीत हुई थी और जो, मला नुम्णस्य - महती सेना का नायक था। सः - बह, इन्द्रः - इन्द्र है । मैं नहीं। इस मन्त्र में देवराज इन्द्र की स्तुति है। , हे असुर - - इस मन्त्रका माध्य- -- यो जायमान एव प्रथमो मनस्वी देवो देवान् ऋतुनाकर्मणा पर्यभवन् पर्यगृहात पर्यरक्षन् । प्रत्यक्रामदिति वा । यस्य पलाइ यावापृथिव्या वप्पविभीतां नृम्णम्य महा पलस महान | स जनास इन्द्र इति ।
यः- 4 हे असुर जनो!, (१४०६) निरुक्ते दशमाध्यायस्य दशमा खण्डः । जिन्हों ने, जायमान एव, जन्म के साथ ही, प्रथमः = सर्व देवों में प्रधान हुआ, मनस्वी मनुष्यों में अग्रगण्य होता हुआ और, देवः द्योतमान होता हुआ, ऋतुना = कर्मणा = वृत्रवध आदि वीर कर्म के द्वारा, देवान् = देवों को, पर्यभवत् दवाया है, पर्यगृह्णात् = अधीन किया है पर्यरक्षत् रक्षण किया है। वा = अथवा, प्रत्यक्रामत् = अतिक्रमण (उलंघन) किया है । यस्य बलात् = जिसके वल से, द्यावापृथिव्यो अपि = धुलोक . और पृथिवीलोक भी, विभीताम् = भयभीत हुमा था । महत्त्वेन = अपने महत्व से, अह्ना नृम्णस्य = महती सेना का नायक था। जनासः = सः = वह, इन्द्रः = इन्द्र है । मैं इन्द्र नहीं हूँ। ब्राह्मण हूँ । इन्द्र के वरदान से इन्द्र के समान रूप को प्राप्त हुआ हूँ। पेटष्टार्थस्य प्रीतिर्भवत्याख्यानसंयुक्ता । दृष्टार्थस्य पेः = दृष्ट अर्थक गृत्समद ऋषि की, आख्यानसंयुक्ता = इतिहास संयुक्त, प्रीतिः । स्तुति, भवति है । अर्थात् जिसने इन्द्र देव की मैत्री का अनुभव किया है उस इन्द्र के सखा गृत्समद ऋषि की यह प्रीति = स्तुति माख्यान = इतिहास संयुक्त है । पर्जन्यः । पर्जन्य मेघ को कहते है । भाष्यकार इस का निर्वचन करते हैं- पर्जन्यस्तृपेराद्यन्तविपरीतस्य । तर्पयिताजन्यः । आयन्तविपरीतस्य - आदि और अन्त के अक्षरों को विपरीत, तृपे - तृप धातु से, पर्जन्या पर्जन्य शब्द बना है । तर्पयिता सर्व देशों को तृप्ति कराने वाला और, जन्यः = सर्व जन का हित हो वह, पर्जन्यः = पर्जन्य कहा जाता है । अर्थात् ' तर्पयति इति तृप्' इस विग्रह में अन्तर्भाविण्यर्थक 'तृप तृप्तौ' धातु से 'किप च' इस सूत्र से, किप् प्रत्यय, सर्वापहारी लोप होने पर ' तृप्' शब्द बना है । 'जनेभ्य हितः इति जन्यः इस विग्रह में जन शब्द से हित अपं में छान्दस यत् (य) प्रत्यय, 'यस्येति च' इस सूत्र से अ लोप होने पर 'जन्य' शब्द बना है। 'तृपू चासो जन्यश्च इति पर्जन्यः' इस विग्रह में कर्मधारय समास, होने पर तृप् जन्य, तृप को आयन्त विपर्यय पर्भाव होने पर पर्जन्य शब्द वता.है । मेघ का नाम है। क्योकि, मेघ वर्षा द्वारा सब देश को तृप्त करता है। पृथिवी को गीला और प्राणी को शान्त करता है। परो जेता वा, जनयिता वा, प्रार्जयिता वा रसानाम् । परः जेता - बड़ा जीतने वाला, वा = अथवा, जनयिता - उत्पन्न करने वाला, वा - अथवा, रसानाम् प्रार्जयिता - रसों का संग्रह करने वाला, पर्जन्यः पर्जन्य (मेघ) कहा जाता है । अर्थात् 'परम् उत्कृष्टं जयति इति पर्जन्यः मेघः' इस विग्रह में पर शब्द उपपद "जि जये धातु से 'अघ्नधादयश्च इस उपादि सूत्र के निपातन से यक् (य:) प्रत्यय, गि घातु को अन (अन् ) आदेश, पर जन् य, पर के र के म का लोप होने पर पर्जन्य शब्द बना है। मेघ का नाम है । क्योंकि, मेघ दुष्काल को जीतता है। . , । . - निरुक्त दशमाध्यापस्यकादशा खण्डा । (१४०७) अथवा 'परं जनयति इति पर्जन्यः मेघः' इस विग्रह में पर उपपद 'जनी प्रादुर्भावे' धातु से 'अघ्न्यादयश्च' इस उणादि सूत्र के निपातन से यक प्रत्यय और पर के र के अ का लोप होने पर पर्जन्य शब्द बना है। मेघ का नाम है। क्योकि, मेघ बरसने पर असंख्य जन्तु तथा वनस्पति मादि प्राणी उत्पन्न होते हैं। अथवा 'रसान जलानि प्रकर्षण अर्जते इति पर्जन्यः मेघः' इस विग्रह में प्र पूर्वक 'ऋजगति स्थानार्जनोपार्जनेषु' धातु से 'अघ्न्यादयश्च' इस उणादि सूत्र के निपातन से यक् (य) प्रत्यय, प्र कञ् य, गुण, प्र अर्ज य, प्र को पर् और अर्ज को जन् होने पर पर्जन्य शब्द बना है। मेघ का ताम है। क्योंकि, मेघ विशेष जलरूप रस का संग्रह करता है । तस्यैपा भवति। इति निरुक्त दशमाघ्यायस्य दशमः खण्डः ।। १०-१० ।। तस्य = उस मेघ की, एपा यह अनुपद पठित अचा, भवति = है-- अथ निरुक्त दशमाध्यायस्यैकादशः खण्ड । वि वृक्षान् हन्त्युत हन्ति रक्षसो विश्व विभाय भुवनं महावंधात् । उतानांगा ईपते वृष्ण्यांवतो यत्पर्जन्यः स्तनयन् हन्ति दुष्कृतः ॥ प्र. सं. ४-४-२७-२॥ . इस मन्त्र का अत्रि के 'अपरय भौम ऋषि, जगतो छन्द और पर्जन्य देवता है। मन्त्रा- पर्जन्यः मेध, वचपात के द्वारा, वृक्षान् = वृक्षो को, विहन्ति = विनाश करते हैं, उत = और, रक्षासः - राक्षसों को, विहन्ति = नष्ट करते हैं। महावघ्याव = महान् वध द्वारा, विश्वम् भुवनम् ॥ समग्र प्राणियों को, विभाय = भय प्रदर्शित करते हैं । मनगा: उत = निरपराधी लोग भी, वृष्ण्यावस:- घर्षण करने वाले पजन्य के निकट से, पिते = भाग जाते हैं। यत् = जो, स्तनयन = स्तनयित्नु सन्द करता हुआ, दुप्कृतः = दुष्कर्म करने वाले पापिषों का, हन्ति - संहार करता है वह भगवान पर्जन्य हमारे लिये वर्षा करें। इस मन्त्र में पर्जन्य को प्रापंना है। इस मन्त्र का भाष्य- विहन्ति वृक्षान्, विहन्ति च रक्षासि, सर्वाणि चास्माइत जातानि बिम्पति महारथान् । महान् हि अस यधः। मीतः पलायते पर्पकर्मवतो पपर्जन्यः सनयन् इन्ति दुफनः पापकतः। पन्यः वृक्षान् विन्ति = मेप अमनिपात के द्वारा वृक्षों को विनार करते हैं। सांसिप विन्ति - और राक्षसो हो भी नष्ट ररते हैं। प और, अरमार महास्यार - स महावम - E - - . (१४०८) निरुक्त दशमाध्यायस्य द्वादमा) खण्डः।। पर्जन्य से, सर्वाणि भूतजातानि = सभी प्राणीवर्ग, बिभ्यति = डरते हैं। हि क्योंकि, अस्य - इस का, महान् वधः = महान् वध है। यह जिस को मारता है वह फिर ऊठ कर खड़ा होने नहीं पाता है। वर्ष कर्मवतः = वर्षारूप कर्म करने वाले पर्जन्य से, भीतः = डरता हुआ पुरुष, पलायते भागता है। यत् = जो, पर्जन्यः मेघ, स्तनयन् = गर्जना करता हुआ, दुष्कृतः पाप कृतः - पापा कर्म करने वाले पापियों को, हन्ति = मारता है यह महानुभाव हमारे लिये बरषे । ६- बृहस्पतिः। वृहस्पति देवगुरु का नाम है। अर्थात् 'बर्द्धतेऽस्मिन् ऐश्वर्यादि, अथवा बर्द्धतेऽनेन समाश्रित! इति बृहत् महान्' इस विग्रह में ‘बृहि वृद्धौ' धातु से 'वर्तमाने पृषबृहन्महज्जगच्छतृवञ्च' इस उणादि सूत्र के निपातन से अति (अत्) प्रत्यय, वृन्ह में नुम् के नकार का लोप होने पर बृहत् शब्द बना है। महत् (बड़े) का नाम है। क्योंकि, महत् में ऐश्वर्य बढता है और महद पुरुष के आश्रित पुरुष भी बढता है। 'पिबति पानं करोति इति पाति रक्षति इति वा पतिः' इस विग्रह में बाहुलकात् 'पा पाने' धातु से अथवा 'पा रक्षणे' घातु से 'पातेडतिः' इस उणादि सूत्र से इति (अति) प्रत्यय, डित्त्वाद टिलोप होने पर पति शब्द बना है। पीने वाले का वा रक्षण करनेवाले का नाम है। क्योंकि, पति पान करता है और रक्षा भी करता है। 'बृहतां पतिः इति बृहस्पतिः' इस विग्रह में बृहत् शब्द का और पति शब्द का 'पष्ठी' इस सूत्र से पष्ठीतत्पुरुष समास, वृहद पति, 'तदृहतोः करपत्योश्चोरदेवत्योः सुट् तलोपन' इस बार्तिक से पति को सुट् (स्) आगम और बृहद् के तकार का लोप होने पर बृहस्पति चन्द बना है। देवताओ के गुरु का नाम है । क्योकि, वह पान भी करता है और आश्रितों को रक्षा भी करता है। भाष्यकार निर्वचन करते हैं- गृहस्पतिवृहतः पावा वा पालयिता वा । बृहतः = बड़ो वस्तु सोमादि का, पाता = पान करने वाला, वा = अथवा, वृहतः = विस्तृत जगत् का, पालयिता = पालन करने वाला, बृहस्पतिः = बृहस्पति कहलाता है। देयताओं के गुरु बृहस्पति देवताओं की सर्व प्रकार से रक्षा करते हैं । तस्यैपा भाति । इति निरुक्ते दशमाध्यायस्यवादशः खण्डः ॥ १०-११ ।। तस्प - उस वृहस्पति का, एपा यह अग्रिम ऋचा, भवति - है- अथ नियक्त दरामाध्यायस्य द्वादशः खण्डः । : - अनापिनद्धं मधु पर्यंपश्यन्मत्स्यं न दीन उदानि क्षियन्तम् । निष्टजभार चमसं न वृक्षावृहस्पतिविरवेणां विकृत्यं ॥ ऋ. म. ८-२-१७-८॥ - नियक्ति दशमाध्यायस्य द्वादशः खण्डः । (१४०९) D इस ऋचा का आङ्गिरस ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और बृहस्पति देवता है । मन्त्रार्थ-दीने = शुष्क, उदनि = उदक (जल) में, क्षियन्तम् = निवास करने वाले, मत्स्यम् न = व्याकुलमत्स्य (मछली)के समान, वृहस्पति वृहस्पति देवने, अश्ना = अश्मना पत्परों से व्याप्त शिला से, पिनद्धम् = ढका हुआ अर्थात् पर्वत के बीच में बद्ध, मधु • गाय रूप प्रिय अभीष्ट मधु को, पर्यपश्यत् = देखा और, वृक्षात् = वृक्ष से, चमसम् न = सोमपात्र चमस के समान अर्थात् जैसे बढई (बड़ही) वृक्ष से काट कर सोमपात्र चमस निकालता है, बनाता है वैसे ही, तत् - उस गोरूप मधु को, विरवेण = विविध प्रकार के शब्दों से, विकृत्य = पत्थरों को काट कर, निःजमार = पर्वत से बाहर निकाला । पक्षान्तर में बृहस्पति ने पर्वत में छिपा हुमा मेघ को देखा और उस को काट कर उसमें से जल को बाहर निकाला। इस मन्त्र का यास्क भाष्य- . - । स अशनवता मेघेनापिनद्धं मधु पर्यपश्यन्मत्स्यमिव दीन उदके निवसन्तं निर्जहार तञ्चमसमिव वृक्षात् । चमसः कस्मात् चमन्त्यस्मिन्निति । वृहस्पतिविरवेण शब्देन विकृत्य । भशनवता मेघेन = व्यापन वाले मेघ से, अपिनदं मधु = ढके हुए जल को, दोने - उदके शुष्क जल में. निवसन्तम् = निवास करने वाले, मत्स्यम् इव = व्याकुल मत्स्य के समान, पर्यप यन् देखा और, तत् = उस मधुरूप जल को, वृक्षात् = वृक्ष से, चमसम् इव - चमस के समान, निर्जहार = निकाला। प्रम-चमसः कस्मात् = चमस किस से बना है ? अर्याद किस धातु से कौन प्रत्यय करने पर चमस शब्द बना है ? | उत्तर-चमन्ति अस्मिन् इति चमसः इस विग्रह में 'चमुमदने' धातु से 'अत्यविचमि.? इत्यादि उणादि सूत्र से असच (अस) प्रत्यय होने पर चमस शब्द बना है। सोमपान करने के पात्र का नाम है। क्योंकि, वहाँ सोम पिया जाता है। वृहस्पतिः - वृहस्पति देव ने, विरवेण - शब्देन - शब्द से, विकृत्य = मेघ फो फाडकर (जल निकाला) । ब्रह्मणस्पतिः। अम वा ऋगादि वेदों को जो वृष्टि द्वारा पालन फरे उस माध्यमिक देव का नाम ब्रह्मणस्पति है। अर्थात् 'वहति वृद्धि करोति इति ब्रह्म' इस विग्रह में 'यह वृद्धौ' धातु से 'मन्येभ्योऽपिदृश्यन्ते' इस सूत्र से मनिन् ( मन ) प्रत्यय और पृषोदरादित्वाद घातु के प्रकार को र मादेश होने पर महान शब्द बना है। अन्न (वा वेद) का नाम है । क्योंकि, अन्न शरीर की वृद्धि करता है । एवं 'पाति रक्षति इति पतिः' इस विग्रह में 'पा रक्षणे' धातु से 'पाते तिः' इस उणादि सूत्र से इति (अति ) प्रत्यय, हित्वाद टि लोप होने पर पति शन्द बना है। रक्षण करने वाला 'ब्रह्मणः पतिः इति ग्रह्मणस्पतिः' इम विग्रह में ग्रान और पति का 'पष्ठो' इस सूत्र से पष्ठीतत्पुरुष समास और विसर्जनीयस्य सः इस सूत्र से पप्टो के विसर्ग को सकार आदेश, होने पर 'ब्रह्मणस्पति' बना है। माध्यमिक देव का नाम है। क्योंरि, यह अन्न और गादि वेदों को वर्षा द्वारा ओषधि निष्पादन परते हुए पालन करता है। वर्षा के अमाव में अन्न उत्पन्न नहीं हो सस्ते हैं एवं अन साये पिना ग्राह्मण लोग येद या उसारण नहीं कर सकते है। अतः माध्यमिक देव इन दोनों का पाला है। 11 ७ . . अर्थ है।
(१४१०) निरुक्ते दशमाघ्यायस्य प्रयोदशः खण्डः । -- T यास्क इसका निर्वचन करते हैं- ब्रह्मणस्पतिब्रह्मणः पाता वा पालयिता वा । ब्रह्मणः = अन्न वा ऋगादि वेदो का, पाता वा पालयिता वा = पालन करने वाला माध्यमिक देव ब्रह्मणस्पतिः = ब्रह्मणस्पति कहा जाता है। तस्यैपा भवति । इति निरुक्त दशमाघ्यायस्य द्वादश. खण्डः ।। १०-१२ ।। तस्य = उस ब्रह्मणस्पति की, एषा यह आगे को ऋचा, भवति अथ निरुक्त दशमाध्यायस्य त्रयोदशः खण्डः । अश्मास्यमवतं ब्रह्मणस्पतिर्मधुधारमभि यमोजसातॄणत् । तमेव विश्वे पपिरे स्वदृशो बहु साकं सिंसिचुरुत्समुद्रिणम् ॥ ऋ. सं२-७-१-४॥ इस मन्त्र का गृत्समद ऋषि, जगती छन्द और ब्रह्मणस्पति देवता है। मन्त्राघ-- ब्रह्मणस्पतिः = दृष्टि द्वारा अन्न तथा ऋगादि वेदो का पालन करने वाला माध्यमिक देव ने, अश्मास्यम् पत्थर के समान दृढतर मुस वाला, मधुधारम् = मधुर जल से पूर्ण, अवतम् = नीचे झुका हुमा, यम् = जिस मेघ का, ओजसा = बल से अभि अतृणम् - विदीर्ण किया था और, तम् एव = उसी मेघ का, विश्वे स्वदृश. = सभी आदित्य की रन्मियो ने, पपिरे - पान किया था । उत्सम् = सोचने वाले, उद्रिशम् = उदक वाले मेघ को, साग : साथ अर्थात उसी क्षण, बहु - पान किया था उस से सहस्रो गुण अधिक, सिसिचु. सिखन करती हैं। सूर्य की किरणे उष्ण काल मे जल को सोच लेती है और वर्षा काल मे उस से सहस्रो गुण अधिक बरसा देती हैं । इस मन्त्र मे माध्यमिक देवता की स्तुति हैं। इस का भाप्य- अशनवन्तमास्यन्दनवन्तमवातितं ब्रह्मणस्पतिमधुधारमभियमोजसा चलेनाम्यतणत् तमेर सर्वे पिवन्ति रश्मयः सूर्यदृशो यहनं सह सिञ्चन्त्युत्समुद्रिणमुदकवन्तम् । इति निरुक्त दशमाघ्यायस्य त्रयोदश. खण्डः ॥१०-१३ ।। ग्रह्मणस्पतिः = मध्यम लोक के देव ने, असनवन्तम् - आस्यन्दनवन्तम् त्रिया से व्यापन वाले, अवातितम् = नीचे की ओर पृथिवी पर गिरे हुए, मपुरपारम् = मधुर - जल की ध्यापन 4 तिरक्त दशमाध्यायस्य पश्चदशः खण्डः । + - जल को धारण करने वाले,' अभियम् = जिस मेघ को, ओजसा - बलेन = वल के द्वारा, अभ्यतृणत सम्मुख मारा था, तम् एप उसी, सर्वे = सव, रश्मयः - सूर्यदृशः - सूर्य की रश्मियों ने, पिबन्ति - पान किया था, और वर्षा काल मे, सह - उसी क्षण, सदिणम् - उदक बन्तम् - जल वाले, उत्सम् - मेघ को, सिञ्चन्ति = = सोच देती हैं। सूर्य की रश्मियां उष्ण काल में जल को खीच लेती हैं और वर्षा काल में पुनः अतिमधिक रूप में वरसा देती हैं। ८- क्षेत्रस्य पतिः। 'क्षेत्रस्य पतिः' इस शब्द के तोन अर्थ हैं। रुद्र अग्नि और स्वतन्त्र क्षेत्र के पति माध्यमिक दें । "क्षियति इति क्षेत्रम्' इस विग्रह में "fa निवागत्योः' धातु से 'गुत्वीपविचियमिमनि- तनिसदिक्षदिपचन् ' इस उणादि सूत्र से वाहुलकाव वन् प्रत्यय (घ) और गुण होने पर क्षेत्र' शब्द बना है । 'पाति रक्षति इति पतिः' इस विग्रह मे 'पा रक्षणे' धातु से 'पातेडेतिः' इस उणादि सून से इति (अति) प्रत्यय, डित्त्वाद टिलोप होने पर पति शब्द बना है। 'क्षेत्रस्य पतिः इति क्षेत्रस्य पतिः' इस विग्रह में 'षष्ठी' इस सूत्र से क्षेत्र और पति का पठीतत्पुरुष समास, छान्दसत्वात् डस् का अलुक और उस के स्थान मै स्य होने पर 'क्षेत्रस्य पतिः' शब्द बना है। माध्यमिक देव का नाम है। यास्क निर्वचन करते हैं- यथ निरुक्त दशमाध्यायस्य चतुर्दशः खण्डः । क्षेत्रस्य पतिः । क्षेत्र क्षियते निवासकर्मणस्तस्य पाता वा पालयिता वा। निवासकर्मणः = निवासार्थक, क्षियतेः क्षि धातु से पूर्वोक्त उणादि सूत्र से वाहुलकाव अन् (१) प्रत्यय और गुण होने पर, क्षेत्रम् - क्षेत्र शब्द बना है। निवासस्थान अयं है। तस्य = उसका (निवासस्थान का), पाता या पालयिता वा - पालन करने वाला माध्यमिक देव, क्षेत्रस्य पतिः क्षेत्रस्य पति कहा जाता है। तस्यपा भवति । इहि निरुक्ते दशमाध्यायस्य चतुर्दशः सण्ड. 11 १०-१४॥ तस्य- उस क्षेत्रस्य पति की, एपा में यह उपा, भवति = अथ निरक्त दशमाघ्यायस्य पनाश. सण्डः । क्षेत्रस्य पतिना वयं हितेनेव जयामसि । गामवं' पोपयित्वा स नो' मृलातीहशें। म्त गं. ३-८-१-१॥
- न: - 1 . - वह देव, नः - अर्थाद, बलेन - (१४१२) निरुक्त दशमाघ्यायस्य पोडशः खण्डः । इस मन्त्र का धामदेव ऋपि, अनुष्टुप छन्द और क्षेत्रस्य पति देवता है। मन्त्रार्य-वयम् हम यजमान लोग, सुहितेन = हितकारी, क्षेत्रस्य पतिना क्षेत्रपति देव के साथ, जयामसि = जय करेंगे। वह देव हम लोगोंको, गाम् अश्वम् च = गोओं और अश्वों की, पोषयित्नु = पुष्टि करने घाला होता हुआ गो अश्व' रूप धन को, मा हरतु = ले आवे और ला कर हमें देवे। सः = वह देव, हम लोगों को, इदृशे = इस के दातव्य धन को दे कर हमें, मृलाति = सुखी करें। इस मन्म में क्षेत्रपति देव की स्तुति है । इस का भाष्य- । क्षेत्रस्य पतिना वयं सुहितेनेव जयामो गामश्वं पुष्टिं पोपयित् चाहरेति । स नो मृळातीदृशे । बलेन वा धनेन वा । मृळतिर्दानकर्मा, पूजाका वा । वयम् हम यजमान लोग, क्षेत्रस्य पतिना क्षेत्रपतिदेव के साय, सुहितेन इव = अच्छा हितकारी मित्र के समान, जयामः = जीतेंगे। पोपयित पोषण करने वाला यह देव, गाम् अश्वम् पच गाय और अश्व की, पुष्टिम् पुष्टि करें और हमारे यहां, आहर लावें। सः - हम लोगों को, इदृशे = इस प्रकार के दातव्य घन को देकर हमें, मृळाति = सुखी करें। बल से, वा = या, धनेन = घन से सुखी करें। दानकर्मा = दान अर्थक धातुका रूप, मृतिः = मृळति है, वा = अथवा, पूजाकर्मा = पूजा अर्थक धातु का, मृतिः = मृलति रूप है । 'मूळ सुखने' घातु से मृलति रूप बना है। मृळाति में छान्दस दीर्घ है। तस्यैपाऽपरा भवति । इति निरुक्ते दरामाध्यायस्य पञ्चदशः खण्डः । १० । १५ ।। तस्य = उस क्षेत्रस्य पति की, एपा अपरा = यह दूसरी प्रचा, भवति = है-- अथ निरुक्त दशमाध्यायस्य पोटशः खण्डः । क्षेत्रस्य पते मधुमन्तमूर्मि धेनुरिव पयो' अस्मासु धुक्ष्व । मधुश्चुतं घृतमिव सुप्तमृतस्य॑ नः पतयो मृळयन्तु ॥ क्र. सं. ३-८-९-२॥ इस मन्त्र का भी वामदेव ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और क्षेत्रपति देवता है । मन्त्रायं-क्षेत्रस्यपते हे क्षेत्रपति देव !, घेनुः पयः इव = जिस प्रकार गाय दुग्ध दान करती है उसी प्रकार तुम, अरमार हमारे लिये, मधुमन्तम् - माधुर्ययुक्त, मघु चुतम् = माधुर्यनावी, घृतम् इव सुपूतम् समान सुन्दर निर्मल, अमिम् - प्रभूत जल, धुक्ष्य दुह वा दे वा वरस । ऋतस्य पतयः - जल के स्वामी क्षेत्रपति देव, नः = हमें, मृळयन्तु - रक्षा करें वा सत्कार करें। पति की स्तुति है। - - घृत इस मन्त्र में भी क्षेत्रस्य निरुक्त दशमाध्यायस्य पोडश खण्ड । (१४१३) । R F T 4 इम मन्त्र वा भाष्य- क्षेत्रस्य पते मधुमन्तमूमि धेनुरिस पयोऽस्मासुधुत्वैति । मधु चुतं धृतमेपोदकं सुपूत मृतस्य ना पातारो वा पालयितारो या मृळयन्तु । मृळयतिसादयाकर्मा पूजाका वा । क्षेत्रस्य पते हे क्षेत्रपति देव ', धेनु पय इव = गाय जिस प्रवार दूध दान करती है उसी प्रकार तुम, अस्मासु = हमारे लिये, मधुमन्तम् माधुर्ययुक्त, ऊर्मिम् = प्रभूत जल, धुक्ष्व = वरसाव । 'मधु चुतम् = माधुर्यस्रावो, घृतम् इव = घृत के समान, सुपूतम् = सुन्दर निमल, उदकम् - जल, बरसावो । तस्य - जल के, पातार वा - स्वामी वा, पालयितार वा = अधिष्ठाता क्षेत्रपतिदेव, हमे, 'मृळयन्तु = रक्षा कर वा सुख देवें । मृळयति - णिजन्त मूळ धातु उपदयावर्मा उपदया अर्थ मे, वा = अथवा, पूजाकर्मा = सरकार अर्थ मे है । पुनरुक्ति दोष पर विचार-- तयत्समान्यामृचि समानाभिव्याहार भवति तजामि भवतीत्येकं " मघुमन्तं मधुश्चुतम् इति यथा । वद यद = वहाँ । जो पद, समाभ्याम् ऋचि एक ऋचा में समानाभिव्याहारम् = एक ही 'अथं को कहने पाला, भवति = होता है, तद - वह पद, जामि = पुनरुक्ता भवति = होता है, इति - यह एक्म् = एन मत है, यथा - जैसे-मधुमन्तम् = माधुर्ययुक्त, मधु चुतम् = मधुसावी, 'इति = यह पद है। इस अवा में एक ही अर्थ के ये दोनो पद हैं। अत इस में पुनरुक्ति दोष है। यदेव समाने पादे समानाभिव्याहार भाति तजामि भवतीत्यपरम् । ." हिरण्यरूपा स हिरण्यसंहक्" इति यथा । यद् एव जो पद, समाने पादे = एक ही पाद मे, समानाभिव्याहारम् - एर हो अर्थ को कहने याला, भवति = होता है, तद = यह पद, जामि = पुनरुक्त भवति = होता है, इति - यह अपरम् - दूसरा मत है, यथा नैसे, हिरण्यरूप जो हिरण्यरूप होता है. छ. वह मवाय, हिरण्यस रक् - हिरण्य जैसा होता है, इति = यह वाक्य है। यथा कथा च विशेषोऽजामि भवतीत्यपरम् । "मटको इवोदकामण्डूको उदादिर" इति पथा। पेदा में, यथा कथा प = जिस किसी प्रकार से जो कुछ भी, विगेप - विशेप हो सर्वपा. भजामि . अपुनति, भपति = होती है। इति मह, अपरम् - तीरा सिदान्त मत है। पपा- असे, माया इन दवाव = मण्डूम जैसे बस से, मभूया उदात् इव = मगर उस से , रहि - यह याश्य है। 7 ।
. 'वसेस्तुव' (१४१४) निरुक्त दशमाध्यायस्य सप्तदश. खण्ड । भाव यह है कि, 'छन्दसि दृष्टानुविधिः' अर्थात् वेद मे जैसा देखा जाता हो वैसा ही शुद्ध मान लेना चाहिये । उन मे दोषदृष्टि नहीं करना चाहिये । इस अभियुक्त वाक्य से यह सिद्ध है कि, वेद सर्वथा निर्दोष है । इस मे पुनरुक्ति आदि कोई भी किसी प्रकार का दोष नही है। क्योकि वाक्य मे भ्रम प्रमाद आदि दोषयुक्त वक्ता प्रयुक्त ही दोष आता है। वेद-वाक्य का वक्ता भ्रम प्रमाद आदि सकल दोष रहित ईश्रर है । अत. वेद मे पुनरुक्ति आदि कोई भी दोष नहीं है। ईश्वर उच्चरित वैदिक वाक्य मे तथा माता पिता गुरु आदि हित चिन्तक पुरुष उच्चरित लौकिक वाक्य मे पुनरुक्ति दोष नही लगता है। क्योकि पुनरुक्ति दोष समझ कर दूसरी बार उपदेश न करें तो शिष्य पुत्रादि को बौध नही हो सकता है। इसी लिये भगवान् श्री शङ्कराचार्यने ईशावास्य उपनिषद् भाष्य में कहा है कि, 'न मन्त्राणा जामिता अस्ति' अर्थात् मन्त्र में आलस्य नहीं है। शिष्य को बोध होने के लिये एक ही अर्थ को बारबार वोध किया जाता है। वास्तोष्पतिः। वास्तु नाम अन्तरिक्ष का है। उसका पति रवामी माध्यमिक देव रुद्र का नाम वास्तोष्यति हैं । अर्थात् 'वसति अस्मिन् इति वास्तु अन्तरिक्षम्' इस विग्रह में 'वस निवासे' धातु से ' इस के अधिकार मे 'आगारेणिञ्च' इस उणादि सूत्र से अधिकरण मे तुन् (तु) प्रत्यय णित्, णित्वाव वृद्धि, होने पर वास्तु शब्द बना है। 'पाति रक्षति इति पतिः' इस विग्रह मे, 'पा रक्षणे' धातु से 'पाते तिः' इस सूत्र से इति (अति) प्रत्यय, डित्त्वात् टिलोप होने पर पति शब्द बना है। 'वास्तोः पतिः वास्तोष्पति. इस विग्रह मे वास्तु शब्द और पति शब्द का 'पप्ठी' इस सूत्र षष्ठीतत्पुरुष समास, छान्दसत्वात् षष्ठी का अलुक, 'षष्ठयाः पतिपुत्र' इत्यादि सूत्र से पष्ठी के विसर्ग को सकार आदेश और पत्व होने पर 'वास्तोप्पति' शब्द बना है। माध्यमिक देवता रुद्र का नाम है। क्योकि, वह अन्तरिक्ष का पालन करता है। यास्क इसका निर्वयन करते हैं- वास्तोप्पतिः बास्तुर्वसतेर्निवासकर्मणः । तस्य पाता वा पालयिता वा । निवासकर्मणः - निवासार्थक, वसते: - 'वस निवासे' धातु से, वास्तुः = वास्तु शब्द बना है और, तस्य - उसका, पाता = पालन करने वाला, वा = अथवा, पालयिता - अधिष्ठाता, यास्तोष्पति। वास्तोप्पति कहा जाता है। तस्यैपा भवति । इति निरुक्त दशमाध्यायस्य पोडशः खण्डः । १०-१६ ।। तस्य - उस वास्तोप्पति की, एपा = यह अग्रिम ऋचा भवति = है- भय निरुक्ते दशमाध्यायस्य सप्तदशा खण्ड । अमीवहा वास्तोप्पते विश्वा रूपाण्याविशन् । सखा सुशेव एधि नः ॥ ऋ. सं. ५-४-२२-१ ।। , से .
निरुक्त देशमाघ्यायस्य सप्तदश वण्डः । (१४१५) इस मन्य वा मिष्ठ ऋषि,,गायत्री छन्द बोर वास्तोप्पति देवता है । मन्त्रा-वास्तोपते हे वास्तोष्पति माध्यमिक रद्र देव ! तुम, अमीवहा = रोगनाशक हो । विश्वा = सर्व प्रकार के, रूपाणि = रूपो मे, आविशन् = प्रवेश करते हुए, नः- हमारे, सखा = सखा और, सुशेव, = सुखकर, एधि - बनो। इस मन्त्र में वास्तोष्पति देव की स्तुति की गई है। 1 इस का भाग्य- " - . अभ्यमनहा बास्तोष्पते । सर्वाणि रूपाण्याविशन् ससा नः सुसुसो भर । वास्तोपते - है वास्तोप्पति देव ! तुम, हमारे, अभ्यमनहा = रोगों का नाश करने वाला होमो सर्वाणि रूपाणि = सर्व रूपो मे, आविशन = प्रवेश करता हुआ, न - हमारा, ससा - मित्र और, सुसुस. = सुन्दर सुख देने वाला, भव = होओ। fire उक्त, मन्त्र मे ' शेव' शब्द आया है। उस का निर्वचन करते हैं- शेव इति सुसनाम । शिष्यतेर्वकारो नामकरणोऽन्तस्थान्तरोपलिङ्गी विभापितगुणः । शिवमित्यप्यस्य भवति । yf .शेवः इति = 'शेव' यह, सुखनाम - सुख का नाम है। शिष्यते नरुक्त दिवादि मुसार्थक 'शिष्' धातु से अथवा दिवादि आकृतिगण होने से दिवादि सुखाक 'विप्' धातु से, यकारो मामवरण. सज्ञाबोधक वकार प्रत्यय, वह, अन्तस्थान्तरोपलिङ्गी - धातु के अन्त में रहने वाला पकार पे भीतर गमन करने वाला = पकार फा लोप करने वाला और, विभापितगुग. - विक्ल्प से गुण करने वाला होता है। जिस से 'शेष' यह रूप बना है और, गुणाभाव पक्ष में, शिवम् = शिव इति थपि = यह भी, अस्य - इस का रूप, भवति = होता है। अर्थात् " शिष्यति सुख ददाति इति शेव." इस विग्रह मे सुसापक उक्त शिप् धातु से पृपोदरादित्वाद व प्रत्यप, धातु वे धन्यपकार लोप और विकल्प गुण होने पर 'सेव' गुणाभाव पक्ष में 'चिप' स्प बना है। "विश्वा रूपाणि माविशत् ' यह जो मन में कहा गया है। इस विषय में इस पा सामन्य दिसाते हैं--- पद्यद्रूपं कामयते तत्चद् देवता मवति । "रूपरूपं मघवा चोमीति" इत्यपि निगमो भवति । देववाः - देवता लोग, यद पद रूपम् - जिस जिस रूप को, सामपसे -सामना (या) परते हैं, सव वत् - वही यही, भवति हो जाते हैं। अत: पास्तोपति देव भी सलो में प्रवेश कर सकते हैं। देवता के ऐवयं स्यापक निगम दिसावे हैं- मपया प्रदेव, रूपम् रूपम् । सर्व प्रकार के रूप, योमीति - पुन पुन. या अतिशय से होता है, इति मार- यह भी, निगमः। येद मन्त्र प्रमाण, भवति - है। प्रति देवता रोग सर्थ प्रकार से पोय पाहे या पार कर सच्चे है।
- माया: - ऋतवान् हो कर - (१४१६) निरुक्त दशमाध्यायस्याप्टादशः खण्डे । सम्पूर्ण मन्त्रः रूपंरूपं मधा बोभवीति मायाः कृपवानस्तन्वंपरि स्वाम् । त्रिर्यद्दिवः परिमुहूर्तमागावैमन्त्रैर तुपा ऋतावा ॥ ऋ सं. ३-३-२०-८॥ इस मन्त्र का विश्वामित्र ऋपि, ग्रिष्टुप् छन्द और इन्द्र देवता है । मन्त्रार्थ-मघवा - धनवान इन्द्र, रूपम् रूपम् = जिस जिस रूप को कामना करते हैं उस रूप के, बोभवीति = हो जाते हैं। मायवी इन्द्र, स्वाम् तन्वम् परि = अपने शरीर से नानाविध शरीर का, कृण्वानः = निर्माण करते हुए, स्वैः मन्त्र अपने स्तुति रूप मन्त्रो से आहूत हाते हुए वे, ऋताया भी, अनृतुपा = अऋतु मे सोमपान करते हैं। इन्द्र, दिव परि = स्वर्ग लोक से मुहूर्तम् एक मुहूर्त मे, भिन्न भिन्न देश मे होने वाले यज्ञो के, मिः = तीनो सवनो में, भागाद = गमन करते हैं। आ जाते हैं। वाचस्पतिः। धाचस्पति वाणी के स्वामी का नाम है। जो प्राणरूप से इन्द्र है । अर्थात् ' उच्यते इति वाक इस विग्रह मे 'वच परिभापणे' धातु से, 'विधि' इत्यादि वार्तिक से कि' (०) प्रत्यय, दीर्घ और असम्प्रसारण होने पर वाच् शब्द बना है। वाणी का नाम है। क्योकि वाणी बोली जाती है। 'पाति रक्षति इति पति.' इस विग्रह मे 'पा रक्षणे' धातु से 'पातेडति.' इस उणादि सूत्र से इति (अति) प्रत्यय, डित्त्वात टि लोप होने पर पति शब्द बना है। 'वाच. पति इति वाचस्पतिः' इस विग्रह मे वाच् शब्द और पति शब्द का 'पप्ठो' इस सूत्र से पष्ठीतत्पुरुष समास, 'पष्ठधार पतिपुत्र' इत्यादि सूत्र से सत्व विधान सामर्थ्य से सुप् अलुक्, विसर्ग तथा सत्व होने पर थाचस्पति' शब्द बना है। वाणी का पति प्राणास्मना इन्द्र अर्य है। यास्क इसका निर्वचन करते हैं- वाचस्पतिः-पाच पाना वा पालयिता वा । पाचः - वाणी का, पाता = पालन करने वाला, वा = अथवा, पालयिता - पाणी का अधिष्ठाता, वाचस्पति. - वाचस्पति कहा जाता है। तस्येपा भवति । इति निरुते दशमाध्यायस्य सप्तदा खण्ड. । १०-१७ ॥ तस्य - उस वाचस्पति का, एपा यह अचा, भवति = है- अप निरक्त दशमाध्यायस्याष्टादश. सण्डः । पुनरेहिं वाचस्पते देवेन मनसा सह । षास्तोप्पते निरामय मय्येव तन्वमम ॥ अ. सं. १-१-२" . - निरक्त दशमाध्यायस्याष्टादश खण्ड । (१४१७) मन्त्राणं-वाचस्पते - हे वाणी के स्वामी वाचस्पति देव तुम, देवेन = सव इन्द्रिय वृत्तियो को प्रकाश करने वाले, मनसा सह : = मन के साथ पुन = फिर एक वार, एहि = आओ। और आकर, वास्तोष्पते - है अन्नधनपते ।, मय्येव - मुझ मे ही, निरामय = निरन्तर नियम से रमण करो। यास्क कहते हैं- इति सा निगदव्याख्याता । इति सा = यह ऋचा, निगदव्यारयाता = अपने पाठमात्र (उधारणमात्र) से ही व्याख्यात है। सुलम होने से व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं। ११ अपानपात् । अपानपात् मध्यमस्थान देवता का नाम है । इस पर यास्क कहते हैं- अपानपात् तनूनप्ता व्याख्यातः । नूनप्या = तनूनप्तृ शब्द से, अपानपात् = अपानपात् शब्द भी व्याख्यात हो चुका है । इस प्रकार का निर्वचन शब्द निर्वचन कहा जाता है । अर्थात् जैसे तनूनतृ शब्द का निर्वचन किया गया है वैसे ही अपानपात् शब्द का भी निवंचन कर लेना चाहिये । ऐमा जो निर्वचन वह पन्द निर्वचन कहा जाता है । तनूनपात का निर्वचन अष्टम अध्याय पष्ठ खण्ड मे किया गया है। वही देखना चाहिये । वहां जैसे प्रथम गाय, दूसरा दूध और तीसरा आज्य (घृत) है। अत गाय का पौत्र स्थानापन्न आज्य है वैसे ही यहाँ जल से आदित्य और आदित्य से मध्यमदेव उत्पन्न होता है । अत प्रथम जल, द्वितीय आदित्य और तृतीय मध्यम देव । अत मध्यमदेव जल का पौत्र है। यह धन्दकी व्याख्या है। अर्थ से यह मध्यम देव है। अर्थात्- 'न पातयति पतति या पिता अनेन इति नपात् अपत्यम्' इस विग्रह में नम उपपद व्यन्त 'पल्ले धातु से 'किच' इस सूत्र से किम् प्रत्यय, सर्वापारी लोप 'बहुलम वापि राज्ञाछन्दसो इस वात्तिक से मिलोप, 'नभ्रानपात्' इत्यादि सूत्र से नत्र का प्रकृतिभाव (नलोपाभाव) होने पर 'नपात्' शब्द बना है। अपत्य का नाम है। क्योकि, इस से पूर्वजोका स्वर्ग से पतन नहीं होता है । यहा पौत्र रुप अपत्य का ग्रहण है। 'अपानपाव इति अपान्नपात्' इस विग्रह में 'पष्ठो' इस सूत्र से षष्ठीतत्पुरुष समास, छान्दसत्वात् पष्ठी का मलुक मकार का अनुस्वार परसवर्ण होने पर अपान्नपात शन्द बना है । अप् = जल का पौत्र अर्थ है । प्रथम जल द्वितीय जल का पुत्र आदिस्य और तृतीय आदित्य का पुत्र एव जल का पौत्र मध्यमस्थान वेव । तस्यैपा मरति । इति निरुक्त दशमाध्यायस्याप्टादश खण्ड । १०-१८ ॥ तस्य = उस अपानपादकी, एषा = यह श्चा, भवति - है- पतने , - (१४१८) निरक्त दशमाध्यायस्यकोनविंशः खण्डः । 1 अथ निरुक्त दशमाध्यायस्यकोनविंशः खण्डः । यो अनिध्मो दीदयदप्स्वन्तयं विप्रास ईलते अध्वरेषु । अपां नपान्मधुमतीरपो दा याभिरिन्द्रो' वावृधे वीर्याय ॥ क. सं. ७-७-२४-४ ।। इस मन्त्र का ईळूष-पुत्र कवष ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और अपान्नपाद, देवता है। मन्त्रार्थ- यः - जो अपान्नपात् माध्यमिक देव, अप्स्वन्तः = जल के भीतर मेघस्थान में, अनिध्मः । काष्ठवजित होता हुआ भी, दीदयत् = प्रकाश करता है । विप्रासः = मेघावी ऋत्विक् लोग और यजमान लोग, अध्वरेषु = यज्ञों मे, यम् = जिस की, ईलते स्तुति करते हैं । अपाम् नपात् = हे जल का पौत्र माध्यमिक देव ! तुम, मधुमतीः = मधुर रस युक्त, अपः = वृष्टिरूप जल, दाः - हमे दो। याभिः जिन से, इन्द्रः = इन्द्र, वीर्याय = पराक्रम प्राप्त करने के लिये, ववृधै - बढें । अर्थात् ऐसा जल दो कि, जिस सोममिश्रित जल को पान करके इन्द्र वृत्रादिषघ करने में समर्थ बने । इस मन्त्र का यास्क भाष्य- योऽनिध्मोदीदयद्दीप्यसेऽभ्यन्तरमप्सु यं मेघाविनः स्तुवन्ति । यज्ञेषु सोऽपान्नपान्मधुमतीरपो देवभिपवाय । याभिरिन्द्रो वर्धते वीर्याय वीरकर्मणे जो तुम माध्यमिक देव, अनिध्मः - काष्ठ रहित होता हुआ भी, अप्सु अभ्यन्तरम् । जल के भीतर, दीदया - दीप्य से - प्रकाश करता है। यम् जिस की, मेधाविनः - मेगावी ऋत्विक और यजमान लोग यज्ञेषु = यज्ञों में, स्तुवन्ति स्तुति करते हैं। सः = यह, पानपाव माध्यमिक देव, अभिपयाय सोम निचोडने के लिये, मधुमतीः - मधुर रस युक्त, अपः . वृष्टिरूप जल, देहि - हमें दो। याभिः = जिन के द्वारा, इन्द्रः - इन्द्र, वीर्याय = वीरकर्मणे वृधादिवघ रूप वीर कर्म करने के लिये, वर्धते वृद्धि को प्राप्त होते हैं। D PC - - पातु से यमः 'यम माध्यमिक देव यमराज का नाम है। यास्क निर्वचन करते हैं- यभो यच्छतीति सतः । यच्छति इति सत: % 'यम उपरमे' इस धातु से, यमः - यम दाम बना है। अर्थात् "यच्छति उपरमयति जीवितात् सर्व भूतग्रामम् इति यमः' इस विग्रह मे, 'यम उपरमे', पचाद्यच होने पर यम शब्द बना है। माध्यमिक देव यमरान का नाम है। क्योकि, यमराज सर्व प्राणियो को जीवन से उपराम (निवृत्त) करता है। तस्येपा भाति । इति निरुक्ते दशमाध्यायस्यकोनविंशः सण्डः । १०-१९ ॥ तस्य = उस यम की, एपा यह अग्रिम ऋचा, भवति = है- - निरुक्त दशमाध्यायस्य विश खण्ड । (१४१९) अथ निरुक्त दशमाध्यायस्य विश खण्ड । परेयिवांसं प्रवतो महीरनु वहुभ्यः पन्थामनुपस्पशानम् । वैवस्वतं संगमनं जनानां यमं राजानं हविषा दुवस्य ॥ क्रस ७-६-१४-१ ॥ - इस मन्त्र का विवस्वत के पुत्र यम ऋपि, बिष्टुप् छन्द और यम देवता है । मन्त्रार्थ है पजमान', प्रयत ८ उत्तम कर्म करने वालो को मही = उत्तम भूमि मे, परेयियासम् = प्राप्त करने वाले, अनु = बाद, बहुम्य = बहुतो के लिये, पन्थाम् ७ मार्ग, अनुपस्पशानम् = दिखाने वाले, वैवस्वतम् सूर्य के पुत्र, जनानाम् सगमनम् = मनुष्यो के एक स्थान पर ले जाने का आश्रय, यमम् राजानम् = यमराजा की, हविषा हवि के द्वारा, दुवस्य = पूजा करो। भाष्य- परेयिबास पर्यागतवन्तं प्रात उतो निवत इत्यवतिर्गतिकर्मा बहुम्यः पन्धानमनुप- पाशयमानं, वैवस्वतं संगमनं जनाना यमं राजानं हविषा दुवस्यति । दुवस्वती रामोतिकर्मा । प्रवत - उत्तम कर्म उपासन करने वालो को, उद्वत = उत्तम यज्ञादि कर्म करने वालों को और, निवत नीच कर्म करने वालो को क्रमश उत्तरायण दक्षिणायन मार्ग द्वारा ब्रह्मलोक, स्वर्गलोर और नौच योनिरूप मही भूमियो मे, परेयिवासम् = पर्यागतवन्तम् = प्राप्त कराने वाले इति = इत्यर्थ । अवति - अव पातु गतिकर्मा = गत्यंया है। जिस से प्रवत् शब्द बना है। 'प्रकृष्ट अवति गच्छति इति प्रवद तान् प्रवत ' इस विग्रह में प्र पूर्वर अय् धातु से लट् शप (अ) प्रत्यय, छान्दसत्वात अव के अकार का लोप होने पर व् अत् प्रवत् द्वितीया बहुवचन में प्रवत रूप बना है। प्रवद शब्द तोना भूमियो का उपलक्षण है। इसी लिये याद ने प्रवत वा अर्थ 'प्रवत ' 'उद्वत ' और 'निवत ' किया है । 'प्रवत ' से ब्रह्म लोर, उद्वत ' से स्वर्ग लोर और निवत ' से नीचयोनि रूप लोक लिया गया है । यमराज उपासय योगिया को देवयान मार्ग से या लोक, पगियो को पितृपाण मार्ग से स्सा लो और नोच वमं करने वालों यो नीच योनि में ले जाने वाले हैं। बहुम्प पन्थानम् अनुपस्पाशयमानम् - सूर्य पुत्र, जनानां रागमनम् । मनुष्यों को एक स्थान पर ले जान का एप आश्रय, पमम् राजानम् - यमराज यो, हरिपा पुगेडाशादिवि द्वारा, दुवस्य पूजा करो। इस मन्त्र में, दुवस्यतो - दुवम् धातु, राघ्नोतिवर्मा - ससिद्धि यर्थ है। (कवादि)। यम शब्द का दूसरा अयं बताते हैं- अमिरपि यम उच्यते । तमेता मनोऽनुप्रवदन्ति । इति तिर माध्यायस्य विन गण्ड ।। १०-२०॥ १७८ 2 यम, उच्यते = (१४२०) निरुक्त दवामाध्यायस्यकविंशः खण्डः । अग्निः अपि अग्नि भी, यमः - कहा जाता है। तम् == उप यम अग्नि को, एताः ऋवः = ये ऋचायें, अनुप्रवदन्ति = अनुप्रवचन करती है = स्तुति करती हैं- अथ निरुक्ते दशमाध्यायस्यकविंशः खण्डः । सेनेव सृष्टामं दधात्यस्तुर्न दिद्युत्त्वेष प्रतीका ॥ ७ ॥ यमो ह जातो यमो जनित्वं जारः कनीनां पतिर्जनीनाम् ॥ ८॥ तं वरश्चराथा वयं वसत्यास्तं न गावो नक्षन्त इद्धम् ॥ ९ ॥ D इन मन्त्रों का पराशर ऋपि, द्विपदा विराट् छन्द और अग्नि देवता है । मन्त्रार्थ-सृष्टा : प्रेरित यह अग्नि, सेना इव = सेना के समान शत्रुओं को, अमम् = भय, दधाति = उत्पन्न करता है। अस्तुः = फेंकने वाले, दिद्युत् आयुध के, न = समान, त्वेषप्रतीका शत्रुओं के लिये भयप्रतीक अर्थात् भयरूप है । जातः - संसार में आज तक जो कुछ उत्पन्न हुआ और जनित्वम् उत्पन्न होने वाला है यह सब, यमः = अग्नि ही है। वह अग्नि, कनीनाम् = कन्याओं का, जारः = जरयिता अर्थात् कन्याभाव को मिटा कर भार्या माय लाने वाला है। वह अग्नि, जनोनाम् %3 जाया- भाव को प्राप्त स्त्रियों का, पतिः = पालन करने वाला है। तम् = उम, इद्धम् = प्रज्वलित अग्नि को, ययम् = हम लोग, चराथा - चलने वाले जगम पशुरुष आहुतियों से तथा, परत्याः = न चलने वाले ओषधरूप स्थावर आहुतियों से, न = जैसे, गावः = गायें अस्तम् = घर में प्राप्त होती है वैसे ही, नक्षन्ते प्राप्त करेंगे। D इन तीनों मन्त्रों का भाप्य- इति द्विपदाः। सेनेव सृष्टाभयं वा पलं वा, दधात्यस्तुरिव-दिद्युत्चपप्रतीका * भयप्रतीका, यलप्रतीका, यशःप्रतीका, महाप्रतीका, दीप्तप्रतीका था। " अथवा, भक्त को इति = उक्त तीनों ऋचायें, द्विपदा दो पादवाली विगट हैं । मृष्टा अग्नि, सेना इव - सेना के समान, शत्रुओं या, भयम् वा = भय, वा = वलम् - बल, दघाति = धारण करता है। अस्तुः दिद्युत् इव - फैरने वाले आयुध के समान, त्वेषप्रतीका भवप्रतीका - शत्रुओके लिये भयप्रतीक (भयस्प), भक्तों के लिये, बलत्रतीका चलप्रतीक, महाप्रतीका = महद्रूप, यश.प्रतीका = यशस्प, वा = अथवा, दीप्तप्रतीका है। यम नियमन करने से और 'अग्नि इन्द्र के साथ यमल उत्पन्न होने से यम कहे जाते हैं । दो बालक एक साथ उत्पण होवे उनको यम कहते हैं । इन्द्र और अग्नि सूर्य से एक साथ उत्पन्न हुए हैं । अतः मग्नि यम है यह पूर्व कहा गया है। उम में ब्राह्मण याक्य प्रमाण - प्राणप निरुक्त दशमाध्यायस्यैकविंशः खण्डः । (१४२१) 2 " यमो है जात इन्द्रेण सहसङ्गतः।" ह - पुरानो कथा है कि, इन्द्रेण सह = इन्द्र के साथ, सकसः मिल कर, यम: - अग्नि, उत्पन्न हुआ है। इस ब्राह्मण वचन से यह सिद्ध है कि, यम का अर्थ पार्थिव अग्नि है और वह इन्द्र के साथ ही उत्पन्न हुआ है। इसी अर्थ में ब्राह्मण वचन प्रमाण दे कर अव मन्त्र प्रमाण देते हैं- जातः - यमावि हे हे मातरा" इत्यपि निगमो भवति । इन्द्र और अग्नि ये दोनों सूर्य के पुत्र है । एक ही साथ उत्पन्न हुए हैं। इस लिये यम कहे जाते है। यमौ = एक पितृक एक जन्मी इन्द्र और अग्नि दनों भ्राता, उनमे से इह = एक इन्द्र अन्तरिक्ष लोक का और, इह - दूसरा अग्नि पृथिवी लोक का, मातरा = निर्माता हैं। इति अपि यह भी, निगमः = वेद मन्त्र उक्तार्थ मे प्रमाण, भवति. - है। सम्पूर्ण मन्त्र- वळित्था महिमा वामिन्द्राग्नी पनिष्ठ आ । समानो वां' जनिता भ्रातरा युवं यमाविहेहमातरा ॥ ऋ. सं. ४-८-२५-२॥ - इस मन्त्र का भरद्वाज ऋपि, वृहती छन्द और इन्द्र तथा अग्नि दोनो देवता हैं। मन्त्रार्थ- है इन्द्र ! और है अग्ने ! , वाम् = तुम लोगों का जो, महिमा = जन्म माहात्म्य, इत्था = इस प्रकार प्रतिपादित है वह, बट् = यथार्थ हो और पनिष्ठ आ = अनीव प्रशस्य ही है। वाम् = तुम दोनों का, समानः = एक ही, जनिता पिता है। अतः, युवम् = तुम दोनों, यमो = यमल = सहोत्पन्न, भ्रातरा = भ्राता हो । तुम दोनों में से एक जो इन्द्र है वह, इह - इस अन्तरिक्ष लोक का और, दूसरा जो अग्नि है यह, इह इस पृथिवी लोक का, मातरा = निर्माता है। द्वितीया द्विपदा का भाष्य- यम एव जातो यमो जनिष्यमाणो, जारः कनीनां-जरयिता कन्यानां पतिर्जनीनां पालयिता जायानां, तत्प्रधाना हि यज्ञसंयोगेन भवन्ति । संसार में जो कुछ उत्पन्न हुआ है वह सब, यमः एव = अग्नि ही है और जो कुछ, जनिष्यमाणः - उत्पन्न होने वाला है वह सब भी, यम एवं अग्नि ही है । कनीनाम् - कन्यानाम् %D कन्याओं का, जार: - जरयिता = कन्यात्व को मिटा कर भार्यात्व लाने वाला अग्नि है। जनीनाम् जायानाम् - जायात्व प्राप्त खियों का, पतिः - पालयिता = पालन करने वाला अग्नि है । हि- क्योकि, त्रियां विवाह के बाद, यज्ञसंयोगेन = यज्ञ के साथ संयोग के द्वारा, तत्प्रधानाः = अग्निप्रधाना - जात:- D । (१४२२) निरुक्त दशमाध्यायस्यैवविंश खण्ड । अग्नि के अधीन होती है। स्त्रियो को अग्नि के द्वारा पति के साथ यज्ञ करने का अधिकार प्राप्त होता है । विशेष रूप से स्त्रियाँ गृह मे अग्नि की रक्षा करने के लिये अग्नि की सेवा मे तत्पर रहती है । षो का जो कुछ सुकृत कम होता है सब अग्नि अधीन होता है। अत स्त्री का पति अग्नि है। श्री अग्निपरतन्त्र है। इसी अर्थ को प्रतिपादन करने वाली दूसरी ऋचा दिखाते है- तृतीयो अग्निष्टे पतिः" इत्यपि निगमो भवति । ते = तेरा, तृतीय = तोसरा, पति = पालक पति, अग्नि अग्नि है। इति अपि = यह भी, निगम मन्त्र, भवति - है । सम्पूर्ण मन्त्र- सोमः प्रथमो विविदे गन्धर्वो विविद उत्तरः । तृतीयो अग्निष्टे पतिस्तुरीयस्ते मनुष्यजाः ॥ ऋ स ८-३-२७-४० ।। D . उत्तर - इस मन्त्र का सूर्या ऋपि, अनुष्टुप् छन्द और सूर्या ही देवता भी है । मन्त्रार्थ विवाह काल मे भाशीर्वाद देते समय पिता कन्या से कहता है कि, हे कन्ये । उत्पन्न होते ही तुझे, प्रथम - सर्व प्रथम सोम सोमने, विवि = प्राप्त किया। अर्थात् पहला पति तेरा सोम हुआ । उसके आगे दूसरे, गन्धर्व गन्धर्व ने तुझे, विविदे - प्राप्त किया। अर्थात् दूमरा पति तेरा गन्धर्व हुआ। तृतीय = तीसरा, अग्नि = अग्नि, ते = तेरा, पति = पति हुआ और, तुरीय = चौथा, ते तेरा, पति - पति, मनुष्यजा = मनुष्यवशज हुआ। प्रथम के तीन सोम, ग-धव और अग्नि रक्षक रूप पति और अन्त के चौथा मनुष्यज जिस के साथ विवाह हुआ वह भर्ता रूप पति समझना चाहिये। इस विषय को समझे विना आज लोग व्यर्थ क्लह करते हैं। इस मन्त्र में कन्या का तीसरा रक्षक अग्नि कहा गया है । जो जार अर्थात् कथाभाव को जीर्ण करने वाला है। भाव यह है कि, अग्नि को साक्षी रख कर कन्या का विवाह होने के पश्चात् कन्या कन्या नहीं किन्तु भार्या हो जाती है । यही अग्नि का कन्याभाव को जीर्ण करना है । तृतीया द्विपदा ऋचा का भाष्य- तं वश्वराथा चरन्त्या पश्वाहुत्या वसत्या च निवसन्त्यौपधाहुत्याऽस्तं यथा गाव आप्नुवन्ति तथाप्नुयामेद्धं समिद्धं भोगः । तम् व = उस तुम अग्नि को हम, चराथा - चरन्त्या = चलने वाले जङ्गम, पवाहुत्या पणु रूप आहुति से, च = और, वसत्या = निवसन्त्या = औषधाहुत्या - न चलने वाले औषध रूप स्थावर माहुतियो से, यथा = जैसे, गावा - गायें, अस्तम् = घर मे, आप्नुवन्ति तथा = वैसे ही, भोगे = भोगो से, इदम् = समिद्धम् = प्रज्वलित अग्नि, आप्नुयाम् = प्राप्त करेंगे । = प्राप्त होती हैं, निरुक्त दशमाध्यायस्य द्वाविंशः खण्डः । (१४२३) १३ मित्रः । मित्र शब्द का माध्यमिक देव सूर्य अर्थ है। इस का निर्वचन यास्क करते हैं- मित्र:-प्रमीतेस्त्रायते । संमिन्वानो द्रवतीति वा । मेदयतेर्वा । प्रमोतेः = मरण से वर्षा द्वारा सर्व लोको को जो, त्रायते - पालन करे वह, मित्र.-मित्र अर्थात् सूर्य कहा जाता है। अर्थात् 'प्रकर्षण मीयते इति प्रमीतिः' इस विग्रह मे : पूर्वक मीन हिंसायाम्' धातु से 'स्त्रिया तिन् ' इस सूत्र से भाव मे क्तिन् (ति) प्रत्यय होने पर प्रमति शब्द बना है। मरण अर्थ है । 'प्रमीतेः मरणार त्रायते इति मित्रः' इस विग्रह में प्रमोति उपपद 'त्रै पालने' धातु से 'सुपि स्थः' इस सूत्र मे 'सपि' इस प्रकार योगविभाग करने से क (अ) प्रत्यय, प्रमीति वा अ, 'आतोलोप इटि च' इस सूत्र से आ लोप, प्रमीति त्र् अ, पृपोदरादित्वात् प्रमोति के स्थान मे मि आदेश होने पर 'मित्र' शब्द बना है। सूर्य का नाम है। क्योकि, सूर्य प्राणी को मरण से रक्षा करता है । अथवा वायु का नाम है। क्योकि, वायु माध्यमिक देवता है और प्राण रूप से सब की रक्षा करता है। वा = अपवा, संमिन्वानः = अच्छी तरह जल को फेंकते हुए, द्रवति अन्तरिक्षलोके गच्छति अन्तरिक्षलोक मे गमन करता है, इति = इस लिये, मित्र. - मित्र कहा जाता है । अर्थात् 'सम्यक मिन्वानः वृष्टि सतत प्रक्षिपन् अन्तरिक्षे द्रवति इति मित्रः' इस विग्रह मे सम् पूर्वक 'डुमिल प्रक्षेपने पातु से लट्, लट् के स्थान मे चानश् (आन), सम् मि नु आन, म् को अनुस्वार, उ को यण् वकार, समिन्धाना संमिन्वान उपपद 'द्रु गतो' धातु से ड (अ) प्रत्यय, डिस्वात् टि लोप, समिन्वान द्र, पृषोदरादित्वात् समिन्वान के स्थान मे मि आदेश और द्र के स्थान मे त्र आदेश होने पर मित्र पशब्द बना है। माध्यमिक देवता का नाम है। क्योकि वह भली भांति जल को फेंकते हुए आकाश में दौड़ता है। अथवा, मेदयतेः अन्तर्भावित व्यर्थक मिद घातु से, मित्रः - मित्र शब्द बना है। अर्थात् 'मेदते सर्व उदकेन स्नेहयति इति मित्रः' इस विग्रह मे जिमिदा स्नेहने' धातु से 'अमिचिमि मिदिशसिभ्यः वित्' इस उणादि सूत्र से अन् (१) प्रत्यय, कित्त्वात् गुणाभाव होने पर मित्र शब्द बना है। माध्यमिक देवता का नाम है । क्योकि वह जल वृष्टि के द्वारा सभी पदार्थ को स्निग्ध करता है। तस्यैपा भवति । D D D इति निरक्ते दशमाध्यायस्यकविंशः खण्डः ॥ १०-२१ ।। तस्य = उस मित्र की, एपा : यह अग्रिम् अवा, भवति = है- अथ निरक्त दामाध्यायस्य द्वाविंशः खण्डः ।
(१४२४) निरक्त दशमाध्यायस्य द्वाविस खण्डः । मित्रो जनान्यातयति ब्रुवाणो मित्रो दोधार पृथिवीमुत द्याम् । मित्रः कृष्टीरनिमिपाभि चष्टे मित्राय हव्यं धृतवज्जुहोत ॥ । म सं. ३-४-५-१ ॥ - = सब लोगो को D यात प्रति म इस मन्त्र का विश्वामित्र प्रापि, त्रिष्टुप् छ द और मिन देवता है। मन्त्रार्थ-ब्रुवाण. शब्द करते हुए वा स्तुत हाते हुए, मित्र माध्यमिक देवता मित्र, जनान् वृष्यादि कार्य मे प्रनित करते है। मिन मित्र देव ही, पृथिवीम् उत द्याम् पृथिवी लोक और धुलो को दाधार : धारण करते है ! fIT = मिन देव ही, गनिमिपा अनुग्रह दृष्टि से, वृष्टी व मवान् मनुष्यो की, अभिचष्टे = च । ओर से देखते हैं । मित्राय मिनदेव के लिये वृतदत् = धृनयुक्त, व्यम् पुगेडाद य जुहोत = प्रदान करो, होम परो। इम मन्य मे मित्र की स्तुति है। D D इस मन्त्र का यास्क भाष्य- 5 मित्रो जनान्यातयति, प्रमाणः शब्दं कुर्वन् मित्र एव धारयति पृथिवीं च दिवं च, मिनः कृष्टीरनिमिपन्नभिविपश्यतीति । मित्र मिन देव, प्रयुवाण = दाब्द कुवन् = शब्द करते हुए, जनान् = मनुष्यो को, यातर्यात कार्य में लगाते है । मित्र एव मित्र हो, पृथिवीम् च दिवम् च = पृथिवी लोक और धुलोक को, धारयति = धारण करते हैं। मिन मित्र हो, कृष्टी = पर्म वाले मनुष्यो को, अनिमिषन् = दया दृष्टि से, अभिविपश्यति चारो तरफ से देखते है। मात्रगत दृष्टि शब्द वा निर्वचन व रते है- कृष्टय इति मनुप्यनाम कर्मनन्तो भरन्ति, विकृष्टदेहा था। पृष्टि यर, मनुष्यनाम = मनुष्य पा नाम है । क्योपि, वे = वर्गवन्त पर्मपाले, भवन्ति होते हैं। = अथवा, विकृष्टदेहा देहवान होते हैं। पशु आदि अन्य प्राणी ससृप्ट देह वाले अर्थात् जुड़े हुए देह वाले होते हैं। अर्थात् 'अकापि इति कृष्टम् वर्म' इस विग्रह मे करणार्षय कृप विलेखने' धातु से 'निष्ठा' इस सूत्र से क्त (त) प्रत्यय, कित्वात् गुणाभव और प्टुत्व होने पर वृष्ट शब्द बना है। कर्म वा नाम है । 'वृष्टमस्यास्तीति वृष्टि.' इस विग्रह मे, 'मत्वयं मारातन्नो ' इस सून के 'लुगवारेवार, रेफा चेति वाच्यम्' इस वार्तिक से मत्वर्थीय इ प्रत्यय, 'यस्येति च' इस सूत्र से अकार लोप होने पर कृष्टि शब्द बना है ! 'कृष्टय.' यह जम् वा रूप है। कर्मवाले मनुष्य का नाम है । अथवा शुद्ध भी कृष् धातु विपूर्व के अयं मे है। उस से 'अकापि इति वृष्ट इस सूत्र से कर्म मे क्त ( त ) प्रत्यय और प्दुत्व होने पर 'कृप्ट' शब्द बना है। विविध वृष्ट कृप्टय. इति ឱរ इच्छानुसार फैलने वाले . - इम विग्रह मे 'निष्ठा निरुक्ते दशमाध्यायस्य प्रयोविंशः खण्डः । अर्थाद विस्तारित अङ्गवाला शरीर अर्थ है । 'कृष्टोऽस्यास्ति इति कृष्टिः' इस विग्रह में कृष्ट शब्द से पूर्ववत् मत्वर्थीय इ प्रत्यय होने पर कृष्टि शब्द बना है । 'कृष्टय ' जर का रूप है । मन्य में 'कृष्टी' यह शस् का रूप है । इधर उधर अङ्गों को फैला सके ऐसे शरीर वाला मनुष्य अर्थ है । मन्त्र के चौथे पाद का ध्यात्यान करते है- " मित्रार्य हव्यं धृतवज्जुहोत इति व्याख्यातम् । जुहोतिर्दानकर्मा । मित्राय = मित्र देव के, घृतवत् = धृतसंयुक्त, हव्यम् = हव्य द्रव्य का, जुगेन - होम करो। - यह. व्यास गतम् - व्याख्यात है अर्थात् इसकी व्याख्या पूर्व को जा चुकी है। जुहोतिः हु धातु, दान कर्मा दानार्थ है। अर्थात् 'हु दानादनयो इस धातु से लोह, ति, द्विस्व, अभ्यास कार्य, गुण, जुहोति, छान्दस ति को त आदेश होने पर 'जुहोत' रूप वना है। - %D कः । मध्यम देव प्रजापति का नाम क है । यास्क निर्वचन करते है-- इति कः . का कमनो वा क्रमणो वा । सुखो वा । कमन = कामियों के काम्य अर्थों में साधन, वा = अथपा, ऋमण = क्रमण में साधन, कः = क कहा जाता है। वा = अथवा, सुख = सुखस्वरूप, क = क कहा जाता है। 'कामयते इस विग्रह में 'कमु कान्ती' धातु से 'अन्येष्यपि दृश्यते' इस सून से ड (अ) प्रत्यय, डित्त्वात् टि लोप होने पर 'क' शब्द बना है। 'प्रजापतिरकामयत' इस श्रुति से प्रजाति बहुकाम वाला होने से प्रजापति का नाम 'क' है। अथवा 'कामति इति कः' इस विग्रह में 'क्रमु पादविक्षेपे' धातु से 'अन्ये दृश्यते' इस सूत्र से ड (अ) प्रत्यय, हित्त्यात् टि लोप और वाहलात क्रम् के रेफ का लोप होने पर क शब्द बना है । प्रजापति का नाम है । क्योकि, प्रजापति समस्त ससार मे सक्रमण करता है। अथवा, 'का' सुख का नाम है। 'कम् सुखम् अस्यास्ति इति कः प्रजापतिः' इम विग्रह में के शब्द से 'अशं आदिभ्योऽच ' इस सून से मत्वर्याग गच् प्रत्यय (अ), 'यस्येतिच' इस सूत्र मे अ लोप होने पर क शब्द बना है । प्रजापति का नाम है । क्योकि, प्रजापति सुम रूप है । तस्यैपा भवति । इति निरुक्ते दशमाध्यायस्य द्वाविंशः खण्डः ॥ १०-२२ ।। तस्य - उम कनामक प्रजापति को, एपा - यह अग्रिम चा, भवति । अथ निरुक्त समाध्यायस्य प्रयोविंशः सण्डः । . - (१४२६) निरुक्त दशमाध्यायस्य त्रयोविशः खण्ड। । हिरण्यगर्भः समवर्ततारें भूतस्य॑ जातः पतिरेक आसीत् । स दांधार पृथिवीं यामुतेमां कम दे॒वाय॑ हविषा विधेम ॥ क्र. सं. ८-७-३-१॥ इस मन्त्र का हिरण्यगर्भ ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और कनामक प्रजापति देवता हैं । मन्त्रार्थ अग्रे : संसार उत्पत्ति के प्रथम माया के अध्यक्ष परमात्मा से, हिरण्यगर्भः = हिरण्यगर्भ नामक प्रजापति मध्यम देव, समवर्तत = उत्पन्न हुए और, जातः = उत्पन्न होते हुए, एक. = अद्वितीय अधीश्वर होते हुए, भूतस्य भूत पद से उपलक्षित समस्त संसार का, पतिः = ईश्वर, आसीद - थे । केवल इतना ही नहीं किन्तु, सः = ये, इमाम् पृथिवीम् = इस पृथिवी लोक, उत = और, द्याम् = धुलोक को, दाधार = धारण किया, कस्मै = कनामक प्रजापति, देवाय = देव के लिये हम, हविषा - हवि के द्वारा, विधेय पूजा करेंगे। इस मन्ध में क का अर्थ प्रजापति है। किम् शब्द व्युत्पन्न अव्युत्पन्न के भेद से दो प्रकार का है। उन में जो अव्युत्पन्न हैं उसकी तो सर्वनाम संज्ञा क आदेश हो कर डे को स्म होने पर 'कस्मै' रूप बनता है और जो मन्त्र मे ध्युत्पन्न है उसकी सर्वनाम संज्ञा न होने पर भी व्यत्यय से डे को स्मै आदेश समझना चाहिये । यह सायण का कहना है। वस्तुत: मन्त्र मे 'करमै' रूप किम् सर्वनाम का नहीं किन्तु असर्वनाम क शब्द का है। इस की सर्वनाम सज्ञा नही है तो भी व्यत्यय से स्मै समझना चाहिये । वह किम् और वह क शब्द है। दोनो एक नही किन्तु दो है। मन्त्र का यास्क भाज्य- होने पर हिरण्यगों हिरण्यमयो गर्भो, हिरण्यमयो गर्भोऽस्येति वा । हिरण्यगर्भः = हिरण्यमयः गर्भ हिरण्यमय जो गर्म वह हिरण्यगर्म कहा जाता है । अर्थाद हिरण्यमयश्चासौगर्भश्च इति हिरण्यगर्भ.' इस विग्रह में हिरण्यमय शब्द वा और गर्भ शब्द का कर्मधारय समास और छान्दसत्वात् मयट का लोप हिरण्यगर्भ शब्द बना है। इसका अर्थ विज्ञानमयगर्भ है । वा = अथवा, हिरण्यमयः गर्भ. अस्य । हिरण्यमय गर्भ है जिसका दह, हिरण्यगर्भः = हिरण्यगर्भ कहा जाता है। अर्थात् 'हिरण्यमय; गर्भो यस्य इति हिरण्यगर्भः इस विग्रह मे हिरण्यमय शब्द वा और गर्भ शब्द का बहुव्रीहि समास और पूर्ववत् मयट का लोप होने पर हिरण्यगर्भ शब्द बना है । हिरण्यमय रूप जो गर्भ अथवा हिरण्यमय रूप गर्भ है जिसका। मन्त्र में आया हुमा गर्भ शब्द का निर्वचन करते हैं- गर्भो गृभेगुणात्पथें, गिरत्यनानिति वा | गृणाति अर्थ = गृणाति अर्थात् 'ग शब्दे' धातु के अर्थ मे, स्तुति अर्थ मे, गृभेः = नघण्टुक (३,१४,६) गृभ धातु से, गर्भ. = गर्भ शब्द बना है। अर्थात् 'गृभ्यते स्तूयते इति गर्भः' इस विग्रहमें .
निरुक्त दशमाध्यायस्य प्रयोविशः खण्डः । (१४२७) स्तुत्यर्थ नैघण्टुंक गृभ धातु से मुसि संज्ञायां यः प्रावण' इस सूत्र से कर्म में घ (अ) प्रत्यय, लधूपद रपर गुण होने पर गर्भ शब्द बना है । गर्भ स्तुत्य होता है। वा = अथवा, अनर्थान् = अनयों को, गिरति गिलति - नाशयति = नाश करता है, इति = इस कारण, गर्भः = गर्भ कहा जाता है । अर्थात् 'अनर्थान् गिरति नाशयति इति गर्भः' इस विग्रह में 'गृ निगरगे' धातु से 'अतिगृभ्यां भन्' इस सूत्र से कर्ता में भन (भ) प्रत्यय, प्यादि हस्व, लघूपध रपर गुण होने पर गर्भ शब्द बना है। प्रसंगवश त्री-गर्भ का विर्वचन करते हैं- . यदा हि यदा हि स्त्री गुणान् गृह्णाति, गुणावास्या गृह्यन्तेऽथ गर्मो भवति । - जब, स्त्री - स्त्री, गुणान् = पुरुष के गुणों को, गृह्णाति = ग्रहण करती है, च - और, पुरुष के द्वारा, अरयाः इस स्त्री के, गुणाः = गुण, गृह्यन्ते = ग्रहण किये जाते हैं, अप - तव, गर्भः = गर्भ, भवति = होता है। इस प्रकार परस्पर के गुण गृहीत होने पर गर्भ होता है। जव स्त्रो के रज, पुरुष के वीर्य के अस्थि, स्नायु और मज्जा इन तीन गुणों को ग्रहण करता है। एवं जय पुरुष के वीर्य, स्री के रज के त्वक, मांस और रुधिर इन तीन गुणों को ग्रहण करता है तब इन दोनों रज वीर्यो के मिलने से गर्भ रहता है। स्त्री पुरुषों के सद्गुणों के कारण से ही शरीर पाटकौशिक कहा जाता है । इस पक्ष में 'गृणाति इति गर्भः' इस विग्रह में 'ग्रह उपादाने' धातु से पृपोदरादित्वात् क (अ) प्रत्यय, ग्रह म, संप्रसारण, गृह म, लघूपध रपर गुण, गहूं अ, हकार को भकार होने पर गर्भ शब्द बना है । वो गर्भ का नाम है। क्योंकि वह पूर्वोक्त छ: (६) गुणों को ग्रहण करता है। समभवदग्रे भूतस्य जातःपतिरेको बभूव । स धारयति पृथिवीं च दिवं च, कस्मै देवाय हविपा विधेमेति व्याख्यातम् । विदधतिर्दानकर्मा । अग्रे - सृष्टि उत्पत्ति से प्रथम, हिरण्यगर्भ, समभवत् = उत्पन्न हुआ था और, जातः - उत्पन्न होता हुआ, एका अद्वितीय अधीश्वर होता हुआ, भूतस्य = राप्राणियों का, पतिः - स्वामी, बभूव वह, पृथिवीम् च दिवम् च = पृथिवीलोक और द्युलोक को, धारयति - धारण करता है। कस्मै - कनामका प्रजापति, देवाय = देव के लिये, हविषा = हवि के द्वारा, विधेम पूजा अर्चना करेंगे । इति इस प्रकार, व्याख्यातम् व्याख्या की गई है। विदपतिः था धातु यहां, दानकमा = दान अर्पक है। हविपा विधेम अर्थात हवि प्रदान करेंगे। १५ - सरस्वान् । निरुक्त अ.२ सं. २३ में वाणी के नाम ५७ हैं। उन में सरस्वती चन्द २२ वा है । जिस के अर्थ यास्क ने दो किये हैं। एक नदी और दूसरा देवता। वहां सरस्वती स्रोलिङ्ग है और यहा सरस्वान पुलिङ्ग । अर्थ दोनों का एक ही है। 'सरणंसरः' इग विग्रह में 'सृ गती' पातु से - था। स:- - के . - , (१४२०) निरुक्ते दशमाध्यायस्य चतुविशः खण्डः । 'सर्वधातुभ्योऽसुन्' इस उणादि सूत्र से असुन् ( अस् ) प्रत्यय, 'उरण रपरः' इस सूत्र सहकार से 'सावधातुकार्धधातुकयोः' इस सूत्र से रपर गुण होने पर 'सरस्' शब्द बना है । जल वा तडाग ( तलाव ) अर्थ है। क्योंकि, जल सर्वत्र फैला हुआ होता है और तडाग भी। 'सरः गद्यपद्यादि रूपेण प्रसरणमस्या अस्ति इति सरस्वान्' इस विग्रह में यद्यपि 'अस्मायामेघालजो विनिः' इस सूत्र से विनि प्रत्यय की प्राप्ति थी तथापि 'बहुलं छन्दसि' इस सूत्र से बाहुलकात् मतुप् प्रत्यय, सरस् मत्, 'मादुपधायाश्च मतोर्वोऽयवादिभ्यः' इस सूत्र से मतुप के मकार को वकार होने पर 'सरस्वत्' शब्द बना है। ' सरस्वान्' यह प्रथमा एक वचन का रूप है । मध्यम देव का नाम है। क्योकि, वह अन्तरिक्ष में सर्वत्र फैला हुआ होता है। यास्क कहते हैं- सरस्वान् व्याख्यातः। सरस्वान् = सरस्वान् शब्द, व्याख्यातः = व्याख्यात है। अर्थात् इस की व्याख्या नि. २-२३ में हो चुकी है। वहां सरस्वती स्रोलिङ्ग था और यहाँ सरस्वान पुल्लिङ्ग है। केवल इतना ही भेद है। अर्थ एक ही है। सरस् जल, तद्वान् माध्यमिक देव है। तस्यैषा भवति । इति निरुक्त दशमाध्यायस्य त्रयोविंशः खण्डः ॥ १०-२३ ।। अथ निरुक्त दशमाध्यायस्य चतुर्विशः खण्डः । तस्य = उस सरस्वान् की, एषा - यह अग्रिम ऋचा, भवति = है- ये ते सरख ऊर्मयो मधुमन्तो धृतश्चुतः । तभिर्नोऽविता भव ॥ ऋ सं. ५-६-२०-५॥ इस मन्त्र का वसिष्ठ ऋपि, गायत्री छन्द और सरस्वान् देवता है। मन्त्रार्थ-सरस्व है सरस्वन् मध्यम देव !, ते = तुम्हारे, ये जो, ऊर्मय. = जल सड़छ, मधुमन्तः घृत चुतः = वृष्टि जल देने वाले है, तेभि. = उन्ही के द्वारा, नः = भव = होओ। इस मन्त्र में सरस्वत् शब्द मध्यम देव पाचक है। भाष्यकार कहते है- = रसवान और, रक्षक, हमारा, अविता - इति सा निगद व्याख्याता । इति सा यह ऋचा, निगदव्याख्याता = पाठमात्र से व्याख्यात है। अर्थाद स्पष्ट है। व्याख्या की बावश्यकता नहीं है ।
निरुक्त दशमाघ्यायस्य पद्दिशः खण्डा1 (१४२९) इति निरुक्ते दशमाध्यायस्य चतुर्विशः खण्डः । १०-२४ ।। अथ निरुक्त दशमाध्यायस्य पञ्चविंशः खण्डः। J १६ - विश्वकर्मा। मध्यमस्थान वायुदेव का नाम विश्वकर्मा है । इसका निर्वचन करते है- विश्वकर्मा-सर्वस्य कर्ता। सर्वस्य = सत्र का, कर्ता = उत्पन्न करने वाला, विश्वकर्मा - विश्वकर्मा कहा जाता है। जो कृत करिष्यमाण और क्रियमाण अर्थात् भूत भविष्य और वर्तमान तीनों काल के सभी पदार्थो का कर्ता हो वह विश्वकर्मा (मध्यम देव ) कहा जाता है । सर्व चेष्टा आदित्यरूप है। आदित्यवृष्टि द्वारा सर्व का कर्ता है। अतः विश्वकर्मा मध्यम देव आदित्य है। अर्थात् 'करोति इति कर्मा, विश्वस्थ कर्मा इति विश्वकर्मा' इस विग्रह में 'डुकृञ् करणे' घातु से · अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते' इस सूत्र से कर्ता मे मनिन् ( मन्) प्रत्यय, 'उरण रपरः इस सूत्र के सहकार से ' सार्वधातुकार्य धातुकयोः' इस मूत्र से रपर गुण होने पर कर्मन् शब्द बना है। विश्व शब्द और कर्मन् शब्द का 'षष्ठी' इस सूत्र से पष्ठीतत्पुरुष समास होने पर विश्वकर्मन् शब्द बना है। विश्वकर्मा' यह प्रथमा एकवचन का रूप है। तस्यैपा भवति । इति निरुक्त दशमाध्यायस्य पञ्चविंशः खण्डः ।। १०-२५ ।। तस्य = उस विश्वकर्मा की, एपा - यह अग्रिम ऋवा, भवति = है- अथ निरुक्ते दशमाध्यायस्य पड्दिशः खण्डः । विश्वकर्मा विमंना आद्विहांया धाता विधाता परमोत संदृक् । तेपोमिष्टानि समिपा मंदन्ति यत्रो सप्तऋषीन् पर एकमाहुः ॥ ऋ. सं. ८-३-१७-२॥ इस मन्त्र का भुवनपुत्र विश्वकर्मा ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और विश्वकर्मा देवता है । मन्त्रा- के दो अर्थ हैं। अधिदेवत और अध्यात्म | देवता का वर्णन अधिदेवत और आत्मा का वर्णन अध्यात्म अर्थ कहा जाता है। उन में प्रथम अघिदेव अयं किया जाता है-विश्वकर्मा - विश्व के कर्ता यादित्य, विमनाः महान् मन वाला, विहाया: = पात्मरूप से व्याप्त = स्वयं महान, पाता = वृष्टयादि कर्ता, विधाता - जगकर्ता, परमासंदृक् = सर्व प्राणियों के सम्यक द्रष्टा। तेपाम् ज्योतियों के रश्मियों के, इप्टानि - प्रिय स्थानो को, मंडक् = सम्पक द्रष्टा है। जो विश्वकर्मा . (१४२०) निरुक्ते दशमाध्यायस्य चतुर्विशः खण्डः । 'सर्वधातुभ्योऽसुन्' इस उणादि सूत्र से असुन् ( अस्) प्रत्यय, 'उरण रपरः' इस सूत्र के सहकार से 'सार्वधातुकाधंधातुकयोः' इस सूत्र से रपर गुण होने पर 'सरस्' शब्द बना है । जल वा तडाग ( तलाव ) अर्थ है। क्योंकि, जल सर्वत्र फैला हुआ होता है और तडाग भी । सरा गद्यपद्यादि रूपेण प्रसरणमस्या अस्ति इति सरस्वान्' इस विग्रह में यद्यपि 'अस्मायामेधासजो विनिः' इस सूत्र से विनि प्रत्यय की प्राप्ति थी तथापि 'बहुलं छन्दसि' इस सूत्र से बाहुलकात् मतुप् प्रत्यय, सरस् मद, 'मादुपधायाश्च मतोर्वोऽयवादिभ्यः' इस सूत्र से मतुप के मकार को वकार होने पर 'सरस्वत्' शब्द बना है। 'सरस्वान्' यह प्रथमा एक वचन का रूप है। मध्यम देव का नाम है। क्योंकि, वह अन्तरिक्ष में सर्वत्र फैला हुआ होता है। यास्क कहते हैं- सरस्वान् व्याख्यातः। सरस्वान् = सरस्वान् पाब्द, व्याख्यातः = व्याख्यात है । अर्थात् इस की व्याख्या नि. २-२३ में हो चुकी है। वहां सरस्वती स्रोलिङ्ग था और यहाँ सरस्वान् पुल्लिङ्ग है । केवल इतना ही भेद है । अर्थ एक ही है। सरस् जल, तद्वान् माध्यमिक देव है। तस्यैषा भवति । इति निरुक्त दशमाध्यायस्य प्रयोविंशः खण्डः ॥ १०-२३ ।। अथ निरुक्त दशमाध्यायस्य चतुर्विशः खण्डः । तस्य = उस सरस्वान् की, एषा = यह अग्रिम ऋचा, भवति = है- ये ते सरख ऊर्मयो मधुमन्तो धृतश्चुतः । तेभिनोंऽविता भव ॥ ऋ. सं. ५-६-२०-५ ।। इस मन्त्र का पसिष्ठ ऋपि, गायत्री छन्द और सरस्वान देवता है । मन्त्रार्थ-सरस्वः । हे सरस्वन् मध्यम देव !, ते = तुम्हारे, ये = जो, ऊर्मय. = जल सङ्घ, मधुमन्तः = रसवान और, धृतश्चुतः = वृष्टि जल देने वाले है, तेभि. = उन्हीं के द्वारा, नः = हमारा, अविता रक्षक, होओ। इस मन्त्र में सरस्वत् शब्द मध्यम देव पाचक है। भाष्यकार कहते है- %D भव: इति सा निगद व्याख्याता । इति सा 3 यह अवा, निगदव्याख्याता = पाटमात्र से व्याख्यात है। अर्थात् स्पष्ट है । व्याख्या की आवश्यकता नहीं है।
निरुक्त दशमाघ्यायस्य पद्दिशः खण्डः । (१४२९) इति निरुक्त दशमाध्यायस्य चतुर्विश खण्ड । १०-२४ ।। अथ निरुक्त दशमाध्यायस्य पञ्चविंश. खण्डः। - . विश्वकर्मा। मध्यमस्थान वायुदेव का नाम विश्वकर्मा है । इसका निर्वचन करते है- विश्वकर्मा-सर्वस्य कर्ता। सर्वस्य - सब का, कर्ता = उत्पन्न करने वाला, विश्ववर्मा - विश्वकर्मा वहा जाता है। जो कृत करिष्यमाण और क्रियमाण अर्थाद भूत भविष्य और वर्तमान तीनो काल के सभी पदार्थो का कर्ता हो वह विश्वकर्मा (मध्यम देव ) कहा जाता है । सर्व चेप्टा आदित्यरूप है। आदिश्यवृष्टि द्वारा सर्व वा कर्ता है। अतः विश्वकर्मा मध्यम देव आदित्य है। अर्थात् 'करोति इति कर्मा, विश्वस्य कर्मा इति विश्वकर्मा' इस विग्रह मे 'डुकृञ् करणे' धातु से 'अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते' इस सूत्र से कर्ता में मनिन् ( मन् ) प्रत्यय, 'उरण रपर इस सूत्र के सहकार से ‘सार्वधातुका, घातुकयो.' इस गूत्र से रपर गुण होने पर कर्मन शब्द बना है। विश्व शब्द और कर्मन् शब्द का 'पी' इस सूत्र से षष्ठीतत्पुरुष समास होने पर विश्वकर्मन् शब्द बना है। 'विश्वाकर्मा' यह प्रथमा एक्वचन का रूप है। तस्यैपा भवति । इति निरुक्त दशमाध्यायस्य पञ्चविंश सण्डः ॥१०-२५॥ तस्य = उस विश्वकर्मा को, एपा यह अग्रिम ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्ते दशमाध्यायस्प पद्दिशः खण्डः । विश्वकर्मा विमंना आद्विहाया धाता विधाता परमोत संदृक् । तेपामिष्टानि समिपा मदन्ति यत्रो सप्तऋषीन् पर एकंमाहुः । स. ८-३-१७-२ ॥ % 3D इस मात्र या भुवनपुत्र विश्वास ऋपि, विटुप छन्द घोर विश्वार्मा देवता है। मात्रार्य-इस मन्त्र के दो अपं है। अधिदैवत और अध्यात्म । देवता का वर्णन अघिदवस बार बारमा का वर्णन अध्यात्म अपं कहा जाता है। उन में प्रथम अघिदेव यथं पिा जाता है-विसर्मा - विधवा मादिश्य, विमना. महान मन वारा, विहाया: = थारमरूप से व्याप्त - स्वय महाम, पाठा : वृष्टयादि पता, विधाता - जगरकर्ता, परमामटर : सर्व प्राणियों में सम्पर प्रष्टा । सेपाम ज्योतियों केमियो के, इष्टानि = प्रिय स्पानी को, मेहर - सम्पर इष्टा है। जो विशाम्प -- (१४३०) निरुक्त दशगाध्यायस्य पड्दिशः खण्डः । देवभाव को प्राप्त हुए है वे, इपा : सूक्ष्म जल के साथ, समदन्ति = आनन्द भोगते है । मन्त्रविद् अर्थात् देवतातत्त्वविद् महात्मा लोग, यत्र = जिस विश्वकर्मा आदित्य को, सप्तऋपीन् = सप्तऋषियों से, परा परे, एकम् = एक, आहुः = कहते है। इस प्रकार विश्वकर्मा का मादित्य देवरूप से वर्णन है। इस लिये यह अर्थ अधिदेव अर्थ कहा जाता है। अध्यात्म अर्थ-विश्वकर्मा सर्व का कर्ता परमात्मा, विमना. महान मन वाला 3 सर्व- विषयक ज्ञानवान्, विहायाः = स्वयं महान्, धाता = सर्वस्रष्टा, विधाता = जगत कर्ता, उत - और, परमासंदृक् = इन्द्रियों का उत्कृष्ट द्रप्टा, तेषाम् = उन भक्तों के, इप्टानि = अभिलपित पदार्थ को देनेवाला है। उसके भक्तजन उसके दिये हुए, इषा = अन्नादि वैभवों के साथ, समदन्ति - आनन्द भोगते है। यात्मतत्त्व के जानने वाले ज्ञानीजन, यत्र = जिस विश्वकर्मा परमात्मा को, सप्तऋषीन् = सर्व इन्द्रियों से, परः = परे और, एकम् - एक, आहुः = कहते हैं। मन्त्र का यह अर्थ आध्यात्म अर्थ कहा जाता है। % 3D मन्त्र का यास्क भाष्य- अति प्रिय, प्रान्तानि - विन्धकर्मा-विभूतमनाः व्याप्ता धाता च विधाता च परमश्च संद्रष्टा भूतानाम् । तेपामिष्टानि वा, कान्तानि वा, कान्तानि वा, गतानि वा, मतानि वा, नतानि वाऽद्भिः सह संमोदन्ते यत्रैवानि सप्तऋपीणानि ज्योतींपि, तेभ्यः पर आदित्यस्तान्येतस्मिन्नक भवन्तीत्यधिदैवतम् । विभूतमनाः अप्रतिहत-ज्ञान, व्याप्ता - सर्वत्र व्याप्त, पाता = वृष्टयादि कर्ता, च = और, विधाता = जगत्कर्ता, भूतानाम् = सर्वप्राणियो के, परमश्च संद्रप्टा = परमोत्तम संद्रष्टा, विश्वकर्मा - आदित्य है । तेषाम् = उन प्राणियों के. इष्टानि वा = प्रिय, कान्तानि वा = वा = उत्कृष्ट, गतानि वा = प्राप्त, मतानि वा = अभिमत, वा = अथवा, नतानि वा = प्रह्वीभूत, रयानो को देखता है । जो देवभाव को प्राप्त हुए हैं वे, अद्भिः सह = सूक्ष्म जल के साथ, संमोदन्ने - आनन्द भोगते हैं। यत्र = जिस आदित्य को, एतानि सप्तऋपीणानि ज्योतीपि ज्योतियां, तेभ्यः = उन से, परः आदित्यः = परे आदित्य हैं । तानि = ये सब ज्योतियां, एतस्मिन् : इस विश्वकर्मारूप आदित्य में, एकम् भवन्ति = एकीभाव को प्राप्त होते हैं। इति = यह अर्थ, अधिदैवतम् = अधिदेवत अथाध्यात्मम्-विश्वकर्मा विभूतमना व्याता धाता च विधाता च परमश्च संदर्शयिते- न्द्रियाणामेपामिष्टानि वा, कान्तानि वा, क्रान्तानि वा, गतानि वा, मतानि वा, नतानि चानेन सह संमोदन्ते, यत्रेमानि सप्तमपीणानीन्द्रियाणि, तेम्यः पर आत्मा, तान्येतस्मिन्नर्क भवन्तीत्यात्मगतिमाचष्टे । उक्त मन्त्र गत विश्वकर्मा का, अप - अव, अध्यात्मम् - अध्यात्म वयं किया जाता है- विभूतमनाः = अप्रतिहतशान, व्याप्ता = सर्वत्र व्याप्त, धाता = वृष्टयादि कर्ता, च, और, विधाता सप्तप्रापिस्प - अधिदेव है।
है। एपाम् निरुक्त दशमाध्यायस्य पड्दिशः खण्डा । (१४३१) जगकर्ता, इन्द्रियाणाम् = इन्द्रियो के, परमश्च सन्दशियिता = परमोतम संद्रष्टा, विश्वकर्मा - परमात्मा - उन प्राणियो के, इष्टानि वा, प्रिय, कान्तानि वा - अतिप्रिय, प्रातानि वा - उत्कृप्ट, गतानि वा = प्राप्त, मतानि वा . अभिमत, वा = अथवा, नतानि वा - प्रह्वीभूत, रथानो को देखता है। जो परमात्मा के भक्त हैं वे परमात्मा के दिये हुए, अन्नेन सह अनादि भोगों के साथ, संमोदन्ते - मानन्द भोगते है। यत्र = जिस विश्वकर्मा परमात्मा को, इमानि सप्न ऋषीणानि इन्द्रियाणि - ये सप्त इन्द्रियाँ है । तेभ्य. परः यात्मा = उन से परे मात्मा है । तानि एतस्मिन् एवम् भवन्ति = वे इन्द्रियाँ इस विश्वकर्मा परमात्मा मे एकोभाव को प्राप्त होती हैं। इति = इस प्रकार यह मन्य, आत्मगतिम् । = अध्यात्म अर्थ को, आचष्टे - वहता है। तत्रेतिहासमाचक्षते । तत्र = इस अध्यात्मपक्ष मे आत्मज्ञानी लोग, इतिहासम् = पूर्वघटित घटना स्प इतिहास आचक्षते - रहते है-- विश्वकर्मा ह भौवना सर्वमेधे सर्वाणि भूतानि जुवाञ्चकार स आत्मानमप्यन्ततो जुवाञ्चकार। 'ह' यह निपात पुराने मास्यान का सूचक है। एक समय की बात है कि, भौवन = भुक्न पा पुन, विश्वकर्मा - विश्वकर्मा ने, सर्वमेधे सर्वमेघ नामक याग मे, सर्वाणि भूतानि = सर्व भूतो को, जुहवाश्चवार - होम कर दिया, और, सः - वह, अन्तत, = अन्त मे, आत्मानम् अपि आत्मा को भी अर्थात् आप को भी, जुह्वाञ्चकार - होम कर दिया । तदभिवादिन्येपर्भवति-" य हुमा विश्वा भुवनानि मुदत्" इति । तद् अभिवादिनी = इस अयं को कहने वाली, एपा का - यह अग्रिम ऋचा, भवति - है यः = जिसने, इमा. विश्वा भुवनानि = इन सब भुवनो को = चतुदंश मुवनो को, मुखद - होम किया । सम्पूर्ण मन्त्र इस प्रकार है- य इमा विश्वा भुवनानि जुबपिहोतान्यसीदपिता नः । स आशिपा द्रविणमिच्छमानः प्रथमच्छदवरा आ विवेश ॥ मस ८-1-11-1॥ इरा मन्त्र या भुवन-पुत्र विधार्मा अपि, त्रिष्टुप् छद और विश्वार्मा देखा है। मन्त्रा-यः मपि. जो विश्वरा भुवन रे पुत्र कपि, होता - होमनिष्पार होता हमा, विश्वा भुवनानि = सर्वभुवनो को, जुद - होम करता हुमा अपांद प्रपम सर्य नगन हम परके, पवार, रिता वह जगद पिot, यशोद - पूर्ववद यह र । सः वह पि - - = अन्य छोटे तस्य - %3D (१४३२) निरुक्तं दर्शमाध्यायस्य सप्तविंशः खण्डः । आशिपा = सूक्तवाकादिरूप आशोर्वाद के द्वारा, द्रविणम् स्वर्गरूप धन की, इच्छमानः = कामना करता हुआ, प्रथमच्छत् = प्रथम सारे जगत् से अग्नि का आच्छादन करके, अवरान् छोटे प्राणियों के साथ स्वयं भी, आदिवेशः - हुत हो गये अग्नि में पैठ गये। तस्योत्तरा भूयसे निर्वचनाय । इति निरुक्ते दशमाघ्यायस्य पद्दिशः खण्डः ।। १०-२६ ।। इसका, भूयसे = बहुत, निर्वचनाय निर्वचन के लिये अर्थाद और अधिक स्पष्टी. करण करने के लिये, उत्तरा - अग्रिम प्रथा है- अथ निरक्त दशमाध्यायस्य सप्तविंशः सण्डः । विश्वकर्मन् हविषा वावृधानः स्वयं यजस्व पृथिवीमुत द्याम् । मुह्यंन्त्वन्ये अभितो जनास इहास्माकं मघवा सूरिरस्तु ॥ क्र. सं. ८-३-१६-६ ॥ इस मन्त्र का भी भुवन-पुत्र विश्वकर्मा ऋषि, त्रिष्टु छन्द और विश्वकर्मा देवता है मन्त्रार्थ-विश्वरमन् = हे विश्वकर्ता परमेश्वर !, हविषा हमारे दिये हुए हवि के द्वारा, यावृधानः : प्रवृद्ध तुम, स्वयम् = स्वयं, पृथिवीम् उत द्याम् - पृथिवीलोक और धुलोक का, यजस्व - पूजन करो। अन्ये जनासः = हम से अन्य जो यज्ञ नही करने वाले जन वा यशविरोधी जन हैं , मुह्यन्तु = मोहित अर्थात् मूछित हो। अभितः सर्व तरफ से, इह = इस यज्ञ मे, अस्मानम् - हमारे, मधवा - धनवान् विश्वकर्मा, सूरि! - स्वर्गादि फल का प्रेरक दाता, अस्तु = हों। इस मन्त्र का भाप्य- विश्वकर्मन् हविषा वर्धयमानः स्वयं यजस्व पृथिवी च दिवे च, मुद्यन्त्वन्ये अमिती जनाः सपत्नाः इहास्माकं मघा सरिरस्तु प्रज्ञाता। विश्वकर्मन् = हे विश्ववर्ता परमेश्वर ! तुम हमारे दिये हुए, हविषा = हरि के द्वारा, वर्धयमानः = प्रचूर होता हुआ, स्वयम् = स्वयं, पृथिवीम् = पृथिवीलोक, उत - और, दियम् पर पलोक पा, यजस्व = पूजन करो। अन्ये - हम से अन्य, सपनाः जनाः = त्रु जन, मुह्यन्तु । मूछित हों। अभितः सर्व तरफ से, इह = इस यत में, अस्माकम् = हमारे, मघवा = धनवाद विश्वकर्मा, सूरिः = स्वर्गादि फल का प्रेरक = दाता, और, प्रमाता - जानने वाला, अस्तु = हो । १७ - ताक्ष्यः। मध्यमरपान देवता का नाम तार्य है। इस का निर्वचन करते हैं- निरुक्त दशमाध्यायस्याष्टाविंशः खण्डः । (१४३३) नार्यस्त्वष्ट्रा व्याख्यातः । तीर्ण अन्तरिक्ष क्षियति । पूर्णमर्थ रक्षति । अश्नोता। ताक्ष्यः - ताक्ष्य शब्द, त्वष्ट्रा = त्वष्ट्र शब्द से, व्याख्यातः = व्याख्यात है। अर्थात् स्वष्ट शब्द के समान ही इस की व्याख्मा है। जैसे-तीर्णे - विस्तृत. अन्तरिक्षे = अन्तरिक्ष में जो, क्षिति निवास करे यह, ताश्यः = ताय कहा जाता है। तुर्णम् = शीघ्र उदक रूप, अर्थम् - अर्थ की जो, रक्षति - रक्षा करे वह, ताक्ष्यः ताक्ष्य कहा जाता है। वा = अथवा, मश्नोतेः = व्याप्ति अर्थक अश धातु से, तायः = ताय शब्द बना है। क्योंकि, वह व्यापन कर लेता है । 'तीर्णे सर्वतोगते अन्तरिक्ष अन्तरिक्षलोके क्षियति निवसति इति तायः' इस विग्रह में तीणं शब्द उपपद 'क्षि निवासगत्योः' धातु से 'अध्यादयश्च' इस उणादि सूत्र के निपातन से यक (4) प्रत्यय, तीर्ण क्षि य, तोर्ण को तार और क्षि के इकार का लोप होने पर तार्य शब्द बना है । मध्यम देव का नाम है। क्योंकि, वह विस्तृत अन्तरिक्ष में निवास करता है । अथवा 'तूर्णम् उदकरूपम् अर्थम् रक्षति पालयति इति ताक्ष्यः' इस विग्रह में पूर्ण उपपद 'रक्ष पालने धातु से पूर्ववत् 'अध्यादयश्च' इस उणादि सूत्र के निपातन से यक् प्रत्यय, तूर्ण रक्ष् य, तूर्ण को तार् और रक्ष के र का लोप होने पर तार्य शब्द बना है। मध्यम देव का नाम है। क्योंकि, वह उदक हा अर्थ की रक्षा करता है। अथवा 'तूर्णम् अनुते इति तायः' इस विग्रह में तूर्ण उपपद 'बशू व्याप्ती संघाते च धातु से 'अन्यादयश्च' इस उणादि सूत्र के निपातन से यक् प्रत्यय, तूणं अश् य, तूर्ण को तार और अश को क्ष होने पर तायः शन्द बना है। मध्यम देव का नाम है। क्योंकि, वह शोध जल को व्याप्त होता है। तस्यैपा भवति । इति निरुक्त दशमाध्यायस्य सप्तविंशः खण्डः ॥१०-२७ ।। तस्य = उस ताय की, एषा - यह मग्रिम ऋचा, भषति - है- अथ निहते दशमाध्यायस्याष्टाविंशः खण्डः । त्यमू पु वाजिन' देवर्जूतं सहावानं तरुतारं रथानाम् । अरिष्टनेमि पृतनाजमा स्वस्तये ताक्ष्यमिहा हुवेम ॥ क. सं. ८-८-३६-१॥ इस मन्त्र का साक्ष्य के पुत्र अरिष्टनेमि ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और ताक्ष्य देवता है। - उस प्रसिद्ध, वाजिनम् - अतिशय अन्न वाले, देवजूतम् - देवताओं से प्रेम रपने वाले, सहावानम् = बल वाले, रथानाम् तम्तारम् - शत्रुओं के रषों को जीतने वाले, अरिष्टनेमिम मन्त्रार्थ-त्यमु (१४३४) निरुक्त दशमाध्यायस्यैकोनविंशः खण्डः । अहिसित रथ वाले, पृतनाजम् = शत्रुओं को सेना को जीतने वाले, आशुम् = शीघ्र गमन करने वाले, तार्यम् = सुपर्ण अर्थात् गरुडरूप मध्यम देव ताक्ष्य को हम, इह - यहाँ अपने यज्ञ में, स्वस्तये - कल्याण के लिये, हुवेम = आह्वान करते है - बुलाते है। इस मन्त्र में ताक्ष्य का अर्थ मध्यम देव इस मन्त्र का यास्क भाप्य- - बल वाले, अहिंसित रथ वाले, तं भृशमन्नवन्तं, जूतिर्गतिः प्रीतिर्वा-देवजूतं देवगतं देवप्रीतं वा। सहस्वन्तं, तारयितारं रथानाम्, अरिष्टनेमिम्, पृतनाजितमा स्वस्तये तामिह हुयेमेति । कमन्यं मध्यमादेवमवक्ष्यत् । तम् = उस, भृशम् अन्नवन्तम् = अतिशय अन्न वाले। 'देवजूतम् ' में जो 'जूत' शब्द है उसके तीन अर्थ है-जूतिः = जुति, गति: = गति, पा = अथवा, प्रीतिः = प्रीति । अर्थात् जूतम् - गतम्, प्रोतम् । इन तीनों के साथ देय शब्द मिलने से देव जूनम्, देवगतम् और देवप्रीतम् । देवजूनम् = देवताओं की सेवा करने वाले, देवगतम् = देवताओं के साथ गमन करने वाले (जु गतो) देवप्रीतम् = देवताओं से प्रेम करने वाले । ( जुरो प्रीतिसेवनयो ) । सहस्वन्तम् रथानाम् तारयितारम् - शत्रुओं के रथों को जीतने वाले अरिष्टनेमिम् पृतनाजितम् पात्रुओं की सेना को जीतने वाले, आणुम् = शीघ्र गमन करने वाले, सायम् = सुपर्ण अर्थात् गगड रूप मध्यम देव तार्य को, हम, स्वस्तये अपने यल्याण के लिये, इह: यहाँ अपने यज्ञ में, हुयेम = युलाते हैं। इस प्रकार, मध्यम देवम् अन्यम् = मध्यम देव के अतिरिका कम् अवक्षत् = किस देव को कहता । अर्थात् किसी को नही। तस्यपाऽपरा भवति । इति निरुक्त दशमाध्यायस्याप्टा विसः राष्टः ।।१०-२८ ।। तस्य - उस ताक्ष्यं देव दी, एपा - यह अग्रिम, अपरा = दूमरी रचा, भवति = है- अय निरक्त दरामाध्यायस्योनभिशा गण्डः । सद्यभिद्यः शवसा पञ्च कृप्टीः सूर्यइव ज्योतिपापस्ततानं । सहस्रसाः शंतसा अंस्य रहिर्न स्मां वरन्ते युवतिं न शर्याम् ।। - ? म. गं. ८-८-१-३॥ इस मन्त्र का अरिष्टनेमि ऋषि, विदुर छन्द वीर ताश्य देवठा है। मन्त्रार्थ-ज्योतिषा तेज से सूर्य के समान अयां बाने तेत्र के द्वारा मूर्य, पत्र प्रप्टी: - पार प्रार के मनुष्यों के प्रति अर्थात् ब्राह्मण भत्रिय वंध्य पद और पांचवा निपाद के प्रनि वृष्टि उला निरुक्त दशमाध्यायस्यैकोनविंशः खण्डः । (१४३५) D विस्तार करते हैं वैसे ही, यः - जो तार्य गरुड, सद्यश्चित् = शीघ्र, शवसा = अपने वल के द्वारा, अपः = अमृत रूप जल का, ततान विस्तार किया है । अस्य = इस ताय (गरुड ) की, रहिः = गति, शतसा: = सैकडों और, सहस्रसाः हजारों धनसंपत्तियों के दात्री है। न = जैसे, धनुर पर, युवतिम् = जुटे हुए, शर्याम् = वाण की गति को कोई, न स्म वारन्ते = रोक नहीं सकता है वैसे ही ताक्ष्य की गति को रोक नहीं सकता है। इस मन्त्र का भाष्य- सद्योऽपि यः शवसा चलेन तनोत्यपः सूर्य इव ज्योतिपा पश्च मनुष्यजातानि, सहस्रसानिनी शतसा निन्यस्य सा गतिर्न स्मैनां वारयन्ति प्रयुवतिमिव शरमयीमिपुम् । ज्योतिषा सूर्यः इव = तेज से सूर्य के समान अर्थात् जैसे अपने तेज के द्वारा सूर्य वृष्टि जल का विस्तार करते हैं वैसे ही, पञ्च मनुष्यजातानि = पांच प्रकार के मनुष्यों के प्रति, सहस्रसानिनी शतसानिनी = हजारों सैंकड़ों धनादि सम्पतियों के दात्री है। अस्य - इस ताक्ष्यं की, सारहिः = वह गति, प्रयुवतिम् = धनुप पर जुटे हुए, शरमयीम् = शरमय, इपुम् इव = वाण के समान, एनाम् = इस गति को, कोई, न वारयन्ति = वारण नहीं कर सकता है। १८ - मन्युः। 'मन्यु' यह मध्यम देव विशेप का नाम है। इसका निवंचन करते है- मन्युर्मन्यते दीप्तिकर्मणः क्रोधकर्मणो वधकर्मणो था | मन्यन्त्यस्मादिपवः । दीप्तिकर्मणः - दीप्त्यर्थक, मन्यतेः = नरुक्त मन घातु से, मन्युः = मन्यु शब्द बना है । अर्थात् ' मन्यते प्रकाशयति इति मन्युः' इस विग्रह में दीप्ति अर्थक मन धातु से 'यजिमनिशुन्धि- दसिजनिभ्यो युच् ' इस उणादि सूत्र से युच् (यु) प्रत्यय और बाहुलकात अन आदेश का अभाव होने पर मन्यु शब्द बना है। वा = अथवा, क्रोधकर्मणः क्रोध अर्थक, मन्यतेः = नरुक्त मन धातु से, मन्युः = मन्यु शब्द बना है। अर्थात् 'मन्यते क्रुध्यते इति मन्युः' इस विग्रह में पूर्ववत् पुच् प्रत्यय और अन आदेश का अभाव होने पर, मन्युः = मन्यु शब्द बना है। वा अथवा, वधकर्मणः वधार्थक रक्त मन्यते: - मन धातु से मन्युः “ मन्यु शन्द बना है। अर्थात् 'मन्यते हिनस्ति इति मन्युः' इस विग्रह मे वधार्यक नरुक्त मन धातु पूर्ववत् युच प्रत्यय और अन आदेश का अभाव होने पर मन्यु शब्द बना है । मध्यम देव का नाम है । क्योंकि मध्यम देव प्रकाश करता है, क्रोध करता है और शत्रुओं का वध भी करता है। इसी को कहते हैं-अस्मात : इस से, पयः - बाण, मन्यन्ति = प्रकाशित होत हैं। जिस को श्रोध होता है वहीं वाण फेंकता है। ' मन्यन्त्यस्मादिपवा' इतना पाठ प्रक्षिप्त प्रतीत होता है । क्योंकि, अर्थ सङ्गति नहीं बैठती है । अत एव दुर्गाचार्यने इसकी व्याख्या नहीं की है । सायणने भी इस पाठ का उल्लेख नहीं किया है। : .
योधा गण, अभिप्रपन्नु - गों (१४३६) निरुक्ते दशमाध्यायस्य निशः खण्डः । पाणिनि धातु पाठ मे मन धातु दो हैं । मन ज्ञाने और मनु अवबोधने । प्रथम दिवादि और द्वितीय तनादि है । यास्कने ‘मन्यते' से दिवादि दिखाते हुए तीन अर्थ किये हैं। दीप्ति, क्रोध और वध । अतः मन धातु को स्वतन्त्र नरुक्त दिवादि मानना पड़ा है। दिवादि आकृतिगण है । साथ ही 'धातुनामनैकार्थः' इस नियम के अनुसार दि० मन धातु अनेकार्थ है ऐसा समझना चाहिये । तस्यैपा भवति । इति निरुक्त दशमाध्यायस्यैकोनविंशः खण्डः ॥ १०-१९ ॥ तस्य = उस मन्यु की, एषा = यह अग्रिम ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्ते दशमाध्यायस्य त्रिशः खण्ड: । त्वयां मन्यो सरर्थमारुजन्तो हर्षमाणासो धृपिता मरुत्वः । तिग्मेषव आयुधा संशिशाना अभि प्र यन्तु नरो' अग्निरूपाः ॥ इस मन्त्र का तपा पुत्र मन्यु ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और मन्यु देवता है। मन्त्रार्थ-महरवः मन्यो - हे वायुवाले मन्यु देव ! , स्वपा = तुम्हारे साथ, सरथम् = एक रथ पर चढ कर, आरजन्तः सर्व तरफ से शत्रुओ को पीड़ा पहुंचाते हुए, हर्षमाणास = तुम्हारे आश्रय से हर्ष को प्राप्त होते हए, घृषितः - घृप्ट - निडर होते हुए, तिम्मेषषः तीक्ष्णयाण वाले, अयुधाः = आयुधो को संशिशानाः = भलीभांति चलाते हुए, अग्निरूपाः = अग्नि के समान फर्मवाल, नरः = ये हमारे योपा, अभिप्रयन्तु = शत्रुओं के सम्मुस जावें । प्रकृत मन्त्र का माध्य- त्वया मन्यो स रथमारुह्य रुजन्तो हर्पमाणासोऽपिता मरुत्वः तिग्मेपर आयुधानि संशिश्यमाना अभिप्रयन्तु नरोऽनिरूपा अग्नि कर्माणः । सन्नद्धाः कवचिन इति वा । मायो - हे मायुदेव ! और मरवः = हे वायुवाले !, स्वया • तुम्हारे साथ, सरयम् 'आप' शत्रुओ को पीडा पहुंचाते हुए = हर्षमाणास: - पं को प्राप्त होते हुए, अपिताः = शत्रुओं से न दवे हुए, तिग्मेपकः = तीक्ष्ण बाग वाले, अयुधा. संशिगाना : संशिप्यमानाः - आयुधो को भलीभांति चलाने वाले, अग्निरूपा: - अग्निर्माणः - अग्नि ममान कमवाले, नरः पे हमारे योधा गण, अभिप्रयन्तु = शुओ के सम्मुम जावें । वा = से हुए, क्वचिनः पवचो को धारण रिये हुए, नरः = सम्मुख पावें । इति - इस्पर्य । ऋ. सं. ८-३-१९-१ ।। %3D - एक रप पर चढ़ कर, रुजन्तः = वयदा, सम्पदाः निरुक्ते दशमाध्यायस्यैकत्रिशा खण्ड।। (१४३७) १९-दधिकाः। दधिका शब्द के दो अर्थ हैं । एक अश्व और दूसरा मध्यमदेव । नन मे अश्व परक नियंचन होतियाध्याय के सत्ताइसयां खण्ड में कर चुके है । मध्यमदेव परक निवंचन यहा किया जाता है । 'धातीति दधत्' इस विग्रह में 'दुधान् धारणपोषणयोः' धातु से 'वर्तमाने लट्' इस सूत्र से लट् लकार, 'लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे' इस सूत्र से लट्. के स्थान मे शतृ (अद) प्रत्यय, शप्, 'लु, 'लो' इस सूत्र से द्विस्व, अभ्यास कार्य और ' नाभ्यस्ताच्छतुः' इस सूत्र से नुम् का निषेध होने पर दधद' शब्द बना है । जिस का अर्थ धारण करते हुए' होता है। 'दधद उदकं धारयत् कामति इति दधिया' इस विग्रह मे दधत् उपपद 'कमु पादविक्षेपे' धातु से 'जन सन खन क्रमोविट्' इस सूत्र से विट् (०) प्रत्यय, विड्बनोरनुनासिकस्मात्' इस सूत्र से मकार को आकार और सवर्ण दोघं, दधत् फ्रा, पृपोदरादित्वात् दधत् के तकार का लोप और इकारान्तादेश होने पर 'दपिका' शब्द बना है । मध्यमदेव का नाम है । क्योकि, वह जल को धारण करके , दोडता है। यास्क कहते हैं- दधिका व्याख्यातः । दधिका • दधिका शब्द, व्याख्यातः = व्याख्यात है । अर्थात् इस को व्याख्या नि. म. २६ २७ में की गई है । वहा तीन प्रकार के निर्वचन विस्तार से किया गया है। पाठकों को वही देखना चाहिये। तस्य - . तस्यया भवति । इति निरुक्त दशमाध्यायस्य त्रिंशः खण्डः ॥ १०-३० ॥ दधिया की, एपा - यह अग्रिम ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्ते दशमाघ्यायस्यकत्रिश. वण्ड. । आ दधिक्राः शव॑सा पञ्च कृष्टीः सूर्य' इव ज्योतिपापस्तंतान । सहस्रसाः शंतसा वाज्यर्वा' पृणकु मध्वा समिमा वासि ॥ ऋ. सं. ३-७-१२-१०॥ . अपः इव इस मन्त्र का वामदेव ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और दघिका देवता है । मन्त्रापंगेतिपा मूर्य. तेज से सूर्य जल के समान अर्याद जैसे सूर्य अपने तेज द्वारा जल को भाग्यरित करते हैं वैरो हो, दधित्राः - दवित्रादेव, या = बल के द्वारा, पाप्टो: - पधाष्टिो (, मनुष्य, असुर, राक्षस और पितृगण अथवा ग्राह्मण, क्षत्रिय, वैग्य मूर ये गार वर्ग और पपी निपाद), याततान : आच्छादित करते हैं। मनमा: - समठो और, सहरसा. - हजारों का (१४३८) निरुक्त दशमाध्यायस्म द्वात्रिंशः खण्डः । वाजी = वेगवान्, अर्श = अरण कुशल दधिकादेव, इमाः = इन स्तुति वाक्यों को, मध्वा = मधुर फल से, संघृणक्त = संयोजित करें। . इस मन्त्र का भाष्य- सैकडों, सहनसाः - आतनोति दधिक्राः शवसा बलेनापः सूर्य इव ज्योतिपा पञ्च मनुष्यजातानि सहस्रसाः शतसा बाजी चेजनवानरणवान् संपृणक्तु नो मधुनोदकेन वचनानीमानीति । ज्योतिपा = तेजसे, सूर्यः = सूर्य, अपः इव = जल के समान अर्थात् जिस प्रकार सूर्य अपने तेज द्वारा, जल को विस्तृत करते हैं उसी प्रकार, दधिका = दधिका मध्यम देव, शवसा = अपने वल द्वारा, पञ्च मनुष्यजातानि = पूर्वोक्त पांच प्रकार के मनुष्य समूहों को, आतनोति = विस्तृत करते हैं। शतसाः - हजारों प्रकार के फल दाता, बाजी - वेजनवान् = वेगवान, अर्वा - अरणवान् (गमनवान्) दधिकादेव, न: = हमारे, इमानि वचनानि = इन स्तुति वाक्यों यो, मधुना = मधुर, उदकेन = जलरूपी फल से, संपृणक्त = संयोजित करें। मन्त्र प्रसक्त मधु शब्द का निर्वचन करते हैं- मधु धमतेविपरीतस्य । धमते: = धम धातु का, विपरीतस्य उलटा रूप, मधु = मघु है । अर्थात 'घाम्यते मेघाव निकास्यते इति मधु जलम्' इस विग्रह में अन्तर्भावित व्यर्थक नघण्टुक (निघं० २-१४) गत्यर्थक घम् धातु से उणादि उप्रत्यय, धम् उ, वर्ण विपर्यय होने पर मथ् उ, मधु शब्द बना है। जिसका मन्त्र में मध्या' और भाष्य में 'मधुना' = 'उदयोग' पाठ है। जल का नाम है। क्योंकि जल मेघ से निकलता है। २० - सविता। सविता सर्वस्व प्रसविता प्रेरक मध्यमस्थान देव का नाम है । यास्क इस का निर्वचन करते हैं- सरिता सर्वस्य प्रसविता । सर्वस्य - सब का, प्रसविता उत्पन्न करने वाला मध्यम देव सविता - सवितृ देव कहा जाता है। अर्थात् सवति इति सविता' इस विग्रह में 'पु प्रसवैश्वर्ययोः' पातु से धुल्तृचों इस सूत्र से तृच् (४) प्रत्यय, सु तृ, इट् आगम गुण, अवादेश होने पर सवित शब्द बना है। अन्तरिक्ष में रहने वाले देवता का नाम है। क्योंकि, वह सब का प्रेरक है। तस्यैपा भवति । इति निरुते दशमाध्यायस्यैकनिशः खण्डः । १०-३१।। सस्य = उस सवितृ देव को, एपा - यह अग्निम ऋचा, भवति - है- अथ निरुते दशमाध्यायस्य द्वात्रिंशः खण्डः ।
निक्क्ते दशमाध्यायस्य द्वात्रिंशः खण्डः । (१४३९) सविता यन्त्रैः पृथिवीमरम्णादस्कम्भने संविता द्यामहत् । अश्वमिवाधुक्षझुनिमन्तरिक्षमतर्ते बद्धं सविता संमुद्रम् ॥ ऋ सं. ८-८-७-१ ।। इस मन्त्र का हिरण्यस्तुप के पुत्र अर्चत ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और सविता देवता है । मन्त्रार्थ-सविता = सर्व के प्रेरक मध्यमस्थान सविता देव ने, यन्त्रः = वृष्टिदान आदि यन्त्रों के द्वारा, पृथिवीम् = पृथिवी को, अरम्भणात् = सुख पूर्वक स्थापन किया । सविता = उसी सविता देवने, अस्कम्भने = विना अवलम्वन के; द्याम् - धुलोक को, अहत - ट प से बांध दिया। और, सविता = उसी सब्तिा देवने, अतूत - अत्वरयाण = अचल, अन्तरिक्षम् = आकाश में, समुद्रम् = समुद्र रूप, बद्धम् - बंधे हुए, अश्वम् इव घोड़े के समान, धुनिम् - मेघ को, अधुरा - कम्पाया अर्थात् झाड़ दिया । इस मन्त्र में सविता की स्तुति है । इस मन्त्र का माध्य- . सविता यन्त्रः पृथिवीमरमयदनारम्भणेऽन्तरिक्ष सविता द्यामहदश्वमिवाधुक्षद्धनिमन्तरिक्ष मेयं बद्धममूर्ते बद्धमतूर्णे इति वावरमाण इति वा, सविता समुन्दितारमिति । सविता - सविता देव ने, यन्त्रः = नियन्त्रण के द्वारा, पृथिवीम् = पृथिवी को, अनारम्भगे अमूर्त, अन्तरिक्ष - आकाश में, अरमयद = सुख पूर्वक स्थापन किया। सविता - सविता देव ने ही, याम् = धुलोक को, अहहद - दृढ रूप से बांध दिया। अन्तरिक्ष यद्धम् = अमूर्तपढम् = अपूर्णबद्धम् = अचल अन्तरिक्ष में बंधे हुए, धुनिम् = मेघम्, अश्वम् इव - अश्व के समान, अधुसद - दुहा = झाड़ दिया। वा = अथवा, अतूर्णे - अचल, या = अथवा, स्वरमाणे-शीघ्रताकरनेवाले, इति यह अर्थ है । सविता - समुन्दितारम् = भलीभांति गोला करने वाले मेघ । मन्त्र में समुद्रम् ' पद है। जिसका पर्याय 'समुन्दितारम्' है। क्योकि, समुनत्तिवर्षेण भुवन लेदयति इति समुद्रः तम् समुद्रम्' इस विग्रह में सम् पूर्वक 'उन्दी क्लेदने' धातु से 'स्फायितन्धि' इत्यादि उगादि सूत्र में रक् प्रत्यय, विस्वाद नलोप, होने पर समुद्र बना है । मैघ का नाम है ! क्योंकि, मेघ वृष्टि द्वारा समस्त भुवन को अई कर देता है । कमन्य मध्यमादेवम यस्यन् । मध्यमाद अन्यम् मध्यमदेव के अतिरिक्त मत्य, कम् देवम् = किस देव कों, अवश्यद । अदि मध्यमदेव के शिवाय ऐसा और यौन देव है जिमको स्तुति की पाठी मर्याद कोई नहीं। आदित्योऽपि सविता उम्पते । इति । मध्यम देव से मन्म, मादिश्यः अपि - मारिप भी, सविना सविना, नापते कहा नाता है। कहता?
तथाच = %D (१४४०) निरुक्ते दशमाध्यायस्य त्रयविश खण्डा । तथाच हैरण्यस्तूपे स्तुतोऽर्चन् हिरण्यस्तूप ऋपिरिदं सूक्तं प्रोगाच । जिस प्रकार सविता आदित्य है उस प्रकार, हैरण्यस्तूपे हैरण्यस्तूप सूक्त मे स्तुत स्तुति दिये गये, अर्चन् = पूजन करते हुए, हिरण्यस्तूप ऋषि = हिरण्यस्तूप अपि ने, इदम् सूक्तम् = इस सूक्त को प्रोवाच = कहा था। तदमिवादिन्येपर्भवति । इति निरुक्त दशमाध्यायस्य द्वात्रिंश खण्ड ॥ १०-१२ ॥ तद् अभिवानी = उसी अर्थ को कहने वाली, एपा ऋक् = यह अग्रिम ऋचा, भवति - है- अथ निरुक्ते दशमाध्यायस्य प्रयस्त्रिंश खण्डः ।। हिरण्यस्तूपः सवितर्यथा त्वागिरसो जुह्वे वाजे अस्मिन् । एवा त्वाचन्नवसे वन्दमानः सोमस्येवांशु प्रति जागराहम् ॥ कस ८-८-७-५ ।। %3D इस मन्त्र का हिरण्यस्तूप के पुत्र अचंद कपि, त्रिष्टुप छन्द और सविता देवता है । मन्त्रार्थ- सवित हे प्रेरक सवितृदेव आदित्य !, यथा - जिस प्रकार दूसरे कल्प के, आङ्गिरस = अङ्गिरा के पुत्र, हिरण्यस्तूप हिरण्यस्तूप ऋषि ने, त्वा = तुम को, अस्मिन् वाजे = इस हविरूप अप्न के तैयार होने पर, जुह्वे = आह्वान किया था, एवा एवम् - उसी प्रकार वे अहम् अर्चन = अनन् नामक हिरण्यस्तूप ऋपि मैं त्वा = तुम को, अवसे रक्षा के लिये, वन्दमान • वन्दना वरता हुआ, सोमस्य इव = सोम के समान, अशुम् प्रति = सोम रस के प्रति, जागर - जागता हूँ। अर्थाद यज्ञ पर्यन्त तुम्हारी उपासना करता हूँ। इस मन्त्र का भाष्य-- . -- हिरण्यस्तूपो हिरण्यमयस्तूपोऽस्येति वा । स्तूपः स्त्यापतेः संघातः । सवितर्यधात्वागिरसो जुद्धे चाजे अन्ने अस्मिन् , एवं त्यर्चनवनायवन्दमानः सोमस्ये वाशुप्रतिजागम्यहम् । हिरण्यस्तूप हिरण्यस्य स्तूप सुवर्ण का समूह, वा = अथवा, हिरण्यमय स्तूप अस्य - सुवर्ण का, स्तूप (कोतिस्तम्भ) है जिस का इति = वह हिरण्यस्तूप कहा जाता है। स्त्यायते स्त्यै पातु से, स्तूप - स्तूप शब्द बना है, सघात - सघात इसका अर्थ है। ‘स्यायति सघीभवति इति स्तूप वोतिस्तम्भ इस विग्रह मे 'स्त्य शब्द सघातयो' घातु से 'पानीविषिभ्य १' इस उणादि सूत्र से वाहुलकाव प प्रत्यय, या प, धातु को स्तूमाव और वित्त्वाद गुणभाव हाने पर स्तूप दाद बना है। सघात का नाम है । क्योकि, वह बहुत पदार्थों का समूह होता है।
निरुक्त दशमाध्यायस्य चतुर्विंशा खण्डः । सवित्तः - हे सवित. = हे आदित्य !, यथा - जैसे दूसरे पल्प के, आङ्गिरसः - अङ्गिरा के पुत्र ने, त्वा = तुम्हे. अस्मिन् वाजे अन्ने इस हवि रूप अन्न के तैयार होने पर, जुत माह्वान किया था, एवम् = वैसे ही, अर्चन् = अर्चन नामक ऋषि अर्थाद, अहम् = मैं, त्वा = तुम्हें, अवनाय - अपनी रक्षा के लिये, वन्दमानः = वन्दना करता हुआ, सोमस्य इव • मोम के समान, अंशुम् प्रति - सोमरस के प्रति, जागभि = जागता हूँ । अर्थात् यई पर्यन्त उपासना करता हूँ। - स्वप्टा - %3D २१ त्वष्टा। मध्यमस्थान देवता का नाम त्वष्टा है । अर्थात् 'तूर्णम् मनुते व्याप्नोति इति वटा मध्यम देवः' इस विग्रह में, क्षिप्र वाची तूर्ण शब्द उपपद ' अशू व्याप्ती सघाते च' धातु से 'पृपोदरादीनि यथोपदिष्टम् ' इस सूत्र के निपातन से तृन (४), 'ण' का लोप, तू अमातृ, यण, त्वश ह, परव, प्दुत्व होने पर 'त्वष्ट्र शब्द बना है। 'त्वष्टा' यह सु का रूप है । मध्यम देव का नाम है। क्योंकि, वह शीघ्र व्याप्त होने वाला है। यास्क कहते हैं- त्वष्टा व्याख्यातः। स्वष्ट्ट शब्द, व्याख्यात. व्यास्यात है। अर्थाद इसकी व्यारया इमी अध्याय तेरा खण्ड में हो चुकी है। वहा वायु वा अग्नि वाचक है और यहा तायं के समान मध्यमदेव वाचक है। इतना ही भेद है। तस्यपा भवति । इति निरुक्त दशमाध्यायस्य प्रयस्त्रिंश. सण्ड. १० - ३३ । तस्य = उस त्वष्टा की, एपा - यह अग्निम अचा, भवति = है- अथ निरक्ते दशमाध्यायस्य चतुधिश. खण्ड. । देवस्त्वष्टा सविता विश्वरूपः पुपोष प्रजाः पुरुधा जंजान । इमा च विश्वा भुवनान्यस्य महद्देवानांमसुरत्वमेकम् ॥
(१४४२) निरुक्त दशमाध्यायस्य पञ्चत्रिशा खण्डः । देवस्त्वष्टा सविता सर्वरूपः पोपयति प्रजा रसानुप्रदानेन बहुधाचेमा जनयति, इमानि च सर्वाणि भूतानि, उदकान्यस्य, महचास्मैदेवानामसुरत्वमेकं प्रज्ञा वचवाऽनवत्वं वाऽपि वाऽसुरिति प्रज्ञानामास्यत्यनर्थानस्ताथास्थामा असुरतमादिलुप्तम् । . = वढाता है। , स्वष्टा देवः यह त्वष्टा नामक देव, सविता = सर्व प्रेरक और, सर्वरूपः = सर्वरूप है । यह, रसानुप्रदानेन = जल के दान से, प्रजाः - सर्व प्रजामो को, पोपयति = पोषण करता है । और, बहुधा = बहुत प्रकार से, इमाः = इन प्रजाओ को, जनयति - वर्द्धयति इमानि सर्वाणि भूतानि - ये सब प्राणी, च = और, उदकानि = जल अस्य = इसके है। देवानाम् :- देवो मे यह त्वष्टा देव, महत् = महान्, एकम् = मुख्य है। देवानाम् = देवा मे इसका, असुरत्वम् - प्रावल्य, वा = अथवा, प्रज्ञावत्त्वम् = बुद्धिमत्ता, अपिवा = अथवा, अनवत्वम् = प्राणवत्ता है। असु पह, प्रज्ञानाम = प्रज्ञा अर्थात् तीक्ष्ण बुद्धि का नाम है क्योकि, अनर्थान् - यह बुद्धि अनर्थों को, अस्यति = असन करती है = दूर हटाती है । च = और, अस्याम् = इस (बुद्धि) मे, अर्थाः = सब अर्थ, अस्ता. = अस्त है । असुरत्वम् आदिलुप्तम् = असुर शब्द के आदि अक्षर का लोप होने पर अर्थात् अकार का लोप होने पर सुर शब्द बन जाता है । 'असु.' इति २२ वातः। मध्यमदेव वायु का नाम वात है। यास्क निर्वचन करते हैं- वाता-वातीति सतः । याति इति सतः - वाति इस अर्थ मे या धातु से तन् प्रत्यय होने पर, वातः = वात पारद बना है । अर्थात् 'वाति गच्छति इति यातः वायुः' इस विग्रह मे 'वा गतिगन्धनयो ' पातु से 'हसिमृग्रिण् वाऽमिदमिलूपूधुविभ्यस्तम्' इस उणादि सूत्र से या मयं मे तन (त) प्रत्यय 'वात' पाब्द बना है । वायु का नाम है । क्योकि, वायु गमन करता है । तस्येपा भवति । इति निरक्ते दशमाध्यायस्य चतुधिगः खण्ड. ।। १० ३४ ॥ तस्य = उस वात वी, एपा - यह आगे वी ऋचा, भवति = है-- अथ निरुक्त दशमाघ्यायस्य पक्षविश. खण्ड, 1 वात आ वातु मेपजे शंभु मयोभु ना हृदे । प्रण आयूपि तारिपत ॥ म सं. ८-८-४४-१ ।।
भावें । शम्भु निरुक्त दशमाध्यायस्य पत्रिंशः खण्डः । (१४४३) इस मन्त्र का उल्व वातायन पि, गायत्री छन्द और वायु देवता है। मन्त्रार्थ-वातः = माध्यमिक वायुदेव, नः हमारे लिये और, हृदे = हमारे हृदय के लिये, भेषजम् - जो जो पथ्य हो उनको, आ वातु = ले आवें। शंभु - रोग शमन करने वाला, मयोभु = सुख देने वाला वायुदेव, हमारी, आयुषि - आयु को, प्रतारिपत् - प्रवर्षयतु = बढावें । इस मन्त्र में वायु से प्रार्थना है। इस मन्त्र का भाष्य- वात आवातु भैपज्यानि शम्भु मयोभु च नोहृदयाय । प्रवर्धयतु च न आपुः । वातः - वायु देव, भैषज्यानि = जो जो हमारे लिये पथ्य हो उन सब को, भावातु = ले = रोग शमन करने वाला, च और, मयोभु - सुख देने वाला वायुदेव, नः । हमारे, हृदयाय - हृदय के लिये । च = मोर, नः = हमारी, आयु। आयु को, प्रवर्षयतु - वढावें। २३ - अग्निः। मध्यमस्थान विद्युत् रूप अग्नि का नाम अग्नि है। इसको व्याख्या निरक्त अध्याय ७ खण्ड १४ वहाँ में हो चुकी है। वां पृथिवी स्थान अग्नि और यहां मध्यमस्थान अग्नि अर्थ है । इसीको कहते हैं- अमिाख्यातः। अग्निः अग्नि शब्द, व्याख्यातः = व्याख्यात है। अर्थात् सप्तम अध्याय चतुर्दश ख के प्रारम्भ में ही इसकी व्याख्या हो चुकी है। वहां 'अगं नयति इति अग्निः' इस विग्रह में अग्र शब्द उपपद 'जीज प्रापणे' धातु से 'फिप्च इस सूत्र से फिप् प्रत्यय, सपिहारी लोप, मन नी, पृषोदरादित्वात् अग्र के रेफ तथा अकार का लोप ओर नी को हस्व होने पर अग्नि शब्द बना है। तस्यैषा भवति । इति निरुक्त दशमाध्यायस्य पञ्चविंशः खण्डः । १०-३५ ।। तस्य - मध्यम स्थान अग्नि को, एपा - यह अग्रिम ऋचा, भवति - है- अप निरुक्त दशमाध्यायस्य पदिनराः खण्डः । प्रति त्यं चारुमध्वरं गोपीयाय प्र हूयते । मरुद्भिरन आ गहि ॥ ऋ सं. १-१-३५-१ ॥ इस मन्त्र का मेधातिथि ऋषि, गायत्री छन्द और भग्नि और मरुद्रण देवता है। मात्रार्य- मग्ने - हे अग्निदेव ! स्पम् * उस, चापम् - सुन्दर, अध्वरम् प्रति . या के प्रति तुम, (१४४४) निरुक्त दशमाध्याय सप्तत्रिशा खण्डः । गोपीथाय - सोमपान के लिये, प्रायसे - बुलाये जाते हो। अतः, मरुद्भिः = मरुतों के साथ, आगहि = आओ। इस मन्त्र में अग्नि से प्रार्थना है । इस मन्त्र का भाध्य- साथ, आगच्छ -3 * अन्य देव को तं प्रति चारुमध्वरं सोमपानाय प्रायसे सोऽने मरुद्भिः सहागच्छेति कमन्य मध्यमादेवमवक्ष्यत् । तम् चारुम् अध्वरम् प्रति = उस सुन्दर यज्ञ के प्रति, सोमपानाय = सोमपान के लिये तुम, प्रहूयसे = बुलाये जाते हो, अग्ने = हे अग्नि देव | , स. = वह तुम, मरुद्भिः सह = मरुद् देवताओ माओ। इति = इस प्रकार, मध्यमात् = मध्यमदेव से, अन्यम् कम् = किस को, एवम् = ऐसा, प्रवक्ष्यत् = कहा जाय? अर्थात् मध्यम देव के अतिरिक्त अन्य किस देव को ऐसा कहा जाय ? अर्थात् किसी को नहीं। अता अग्नि शब्द से यहा मध्यम हो हैं, पार्थिव नहीं । तस्यैपाऽपरा भवति । इति निरक्त दशमाध्यायस्य पत्रिंशः खण्डः । १०-३६ ।। तस्य उस अग्नि को, एपा अपरा - यह दूसरी ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्त दशमाध्यायस्य सप्तत्रिशः खण्ड. । अभि त्वा पूर्वपीतये सृजामि' सोम्यं मधु । मरुद्भिरम आ गहि ॥ अ सं. १-१-३७-९ ॥ इस मन्त्र का मेधातिथि ऋपि, गायत्री छन्द और अग्नि तथा मरुद्गण देवता है । मन्त्रार्थ-अग्ने - हे अग्निदेव !, रवा - तुम को, पूर्वपीतये = प्रथम पान के लिये. अभिसृनामि वदामि = बहता हूँ कि, सोम्यम् - यह सोम. मधु = मधुर है। तुम, मरुद्भिः = मरुद देवो के साथ, आगहि भाओ। इस मात्र में भी सोमपान के लिये अग्नि से प्रार्थना है। इस मान का भाष्य-- अभिसृजामि त्या पूर्वपीतये पूर्वपानाप सोम्यं मधु सोममयं सोऽग्ने मरुङ्गिा सहागच्छेति । इति निरुक्त दशमाध्यायस्य सप्तत्रिंशः खण्डः । १०-३७ ।। अग्ने = हे अग्निदेव !, त्वा = तुम को, पूर्वपीतये पूर्वपानाय अभिसृजामि = अभिवदामि = कहता हूँ कि, सौम्यम् - सोममयम् - सोम रूप, मधु : यह, मधुर है। सः = वह तुम, मरुद्भिः सह = मक्तो के साथ, 'आगच्छ = आओ, इति = इत्यर्थः । -आगच्छ - प्रथमपान के लिये, E निरुक्त दशमाध्यायस्यैकोनचत्वारिंशः खण्डः । अथ निरते दशमांध्यायस्याष्टात्रिंशः खण्डः । २४ -वेन: । मध्यमस्थान देव विशेष का नाम वेन है। इसका निर्वचन यास्क करते हैं- वेनो वेनतेः कान्तिकर्मणः । कान्तिकर्मणः = कान्ति अर्थक, वेनतेः = वेन धातु से, वेनः = वेन शब्द बना है । अर्थात 'वेन्यते दीप्यते इति देन: मध्यमस्थानदेवः' इस विग्रह मे कान्त्यर्षक नघण्टुक वेन धातु से पचाद्यच् प्रत्यय होने पर 'वेन' शब्द बना है। मध्यमस्थान देवता का नाम है। क्योकि, यह सर्वलोककान्त होता है । तस्यैपा भवति । . इति निरुक्ते देशमाध्यायस्याष्टाविंशः खण्डः । १०-३८ ।। n तस्य = उस वेन की, एपा यह अग्रिम ऋचा, भवति - अथ निरुक्त दशमाध्यायस्यकोनचत्वारिंशः खण्डः । अयं वेनश्चोदयत्पृभिंगर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमाने । इममपां संगमे सूर्यस्य शिशुं न वि मतिभी' रिहन्ति ॥ क्र. सं. ८-७-७-१ ॥ इस मन्त्र का मार्गध वेन ऋपि, निष्टुप् छन्द और चेन देवता है । मन्त्रार्य-अयम् वेना - यह सर्वलोककान्त मध्यमदेव वेन, ज्योतिर्ज रायुः - ज्योति गर्म की जरायु के समान मिला हुआ है। रजस: विमाने संग्रह स्थान अन्तरिक्ष में बैठा हुआ, पृश्निगर्मा = आदिस्यगर्भरूप जल को पृथिवी के प्रति, चोदयद • चोदयति = प्रेरणा करता है । 'इमम् = इस वेनदेव को, अपाम् = जलों के, सूर्यस्य - सूर्य के, संगमे = मंगमन के स्थान अन्तरिक्ष में स्थित को, विप्राः शिशुम् न = चालक के समान, मतिभिः = स्तुति द्वाग, हिन्ति = लिहन्ति = चाटते हैं, वा, स्तुवन्ति स्तुति करते हैं वा, बर्द्धयन्ति = बढाते हैं या पूजयति - पूजा करते हैं = सराहते हैं। इस का भाष्य- अयं वेनवोदयत् पृश्निगर्भा प्राष्टवर्ण-गर्मा अप इति या ज्योतिर्जरायः-ज्योतिरस्य जरायुस्थानीयं भवति । जरायुर्जरया गर्भस्य, जरयायपत्त इति का। इसमपां च सङ्गमने पूर्यस्य च, शिशुमिव विप्रा मतिमी रिहन्ति-लिइन्ति-स्तुवन्ति-वर्षपन्ति-पूजयन्तीति वा। मेधावी ब्राह्मण, D %3D अयम् वेनः %D अस्य - मेघावी शायद बना (१४४६) निरुक्त दशमाघ्यायस्यकोनचत्वारिंशः खण्डी । यह वेनदेव, पृश्निगर्भाः = सूर्य के गर्भरूप से प्राप्त जलों को, इति वा = अथवा, प्राष्टवर्ण गर्भाः - प्रकृष्ट अर्थात् बहुत तेजवर्ण वाले सूर्य के गर्भभाव को प्राप्त जलों को, ज्योतिर्जरायुः अपनी ज्योति से जरायु के समान मिश्रित, अर्थात, इसकी, ज्योति: - ज्योति, जरायुस्थानीयम् - जरायु - गर्भ के आवरण के स्थानापन्न, भवति = होती है । गर्भस्य = गर्म की, जरया - जरा के साथ उत्पन्न होता है इस लिये उल्य ( वच्चादानी ), जरायुः = जरायु कहा जाता है। जैसे जैसे गर्भ बढ़ता जाता है। वैसे वैसे जरायु ( वच्चादानी ) भी बढता जाता है। वा = अथवा, जरया = जरा से, यूयते - मिश्रित होता है । इस लिये, जरायुः - उल्ब जरायु कहा जाता है। इमम् च सूर्यस्य च - इस वेन और सूर्य के, संगमने,- संगमन स्थान अन्तरिक्ष में स्थित को, शिशुम् इव = बालक के समान, विप्राः ग्राह्मण, मतिभिः = स्तुति द्वारा, रिहन्ति = लिहन्ति = आस्वादन करते हैं, स्तुवन्ति = स्तुति करते हैं, वयन्ति = बढाते है, वा = अथवा, पूजयन्ति = पूजते हैं, इति इत्यर्षः। मन्त्र मे माया हुआ शिशु शब्द का निर्वचन करते हैं- शिशुः शंसनीयो भवति । शिशीतेर्वा स्याद् दानकर्मणः । चिरलन्धो गर्भ इति । शिशुः - बालक, शंसनीयः - माता पिता आदि के द्वारा प्रशंसनीय, भवति = होता है । वा = अथवा, दानकर्मणः = दानार्थक, शिशीतेः = शी धातु से, शिशु शब्द, स्यात् हो। अर्थात् शी घातु से शिशु शब्द बना है। जैसे नया गर्भ धारण करने वालो त्रियों में कहा जाता है कि, इसने, गर्भ = गर्भ, चिरलब्धः = देर से प्राप्त किया है। अर्थात् 'शंस्यते पित्रादिना प्रशंस्यते इति शिशुः' इस विग्रह मे 'शंसु स्तुती' धातु से उणादि उप्रत्यय और पृपोदरादित्वाव शंस को शिश् आदेश होने पर 'शिशु' शब्द बना है। बालक का नाम है। क्योकि, बालक माता पिता आदि के द्वारा प्रशसित होता है। अथया 'शीयते पुरुपेण त्रिय गर्भतया धारणाय दीयते इति शिशुः' इस विग्रह में दानार्थक नरुक्त शी धातु से उणादि उ प्रत्यय और पृषोदरादित्वात् धातु को शिरा आदेश होने पर शिशु सम्म बना है । नव जात बालक का नाम है । क्योकि, वह पुरुष के द्वारा खी को गर्भ रूप से धारण करने के लिये दिया जाता है । अत एव नियों में यह सम्वाद प्रसिद्ध है-चिरलम्पो गर्भ इति' अर्थात् इसने बहुत देर से गर्म प्राप्त किया है । असुनीतिः । असुनीति मध्यमस्थान इन्द्र रूप वायु देवता का नाम है । इस का निर्वचन करते हैं- असुनीतिरसन् नयति । पायु, असून 3 प्राणो को मरण काल में अन्यत्र, नयति = ले जाता है इस लिये, असुनोति:- असुनोति वहा जाता है । अर्थात् 'असून इतरान प्राणान्, नयति = अन्यत्र प्रापयति इति अमुनीतिः इस विग्रह मै अमु शन्द उपपद 'पोण प्रापणे पातु से प्रत्यल्युटो बहुलम्' इस मूत्र से पर्ता में .
निष्क्ते दशमाध्यायस्य चत्वारिंशः खण्डः । (१४४७) तिन् (ति) प्रत्यय होने पर असुनीति' शब्द बना है । मध्यमदेवता प्राणवायु का नाम है। क्योंकि, यह मुख्यप्राग जब निकलने लगता है तब इन्द्रियादि गौण प्राण को साथ ले जाता है । तस्यैपा भवति । इति निरुक्त दशमाध्यायस्यकोनचत्वारिंशः खण्डः । १०-३९ ।। तस्य = उस मसुनीति देव की. एपा यह आगे को ऋचा, भवति - है- अथ निहते वशमाध्यायस्य चत्वारिंशः खण्डः । असुनीते मनो अस्मासु धारय जीवातवे सु प्र तिरा न आयुः । रारन्धि नः सूर्यस्य संदृशि घृतेन त्वं तन्वं वर्धयस्त्र ।। ऋ. सं. ७-८-१८-५॥ इस मन्त्र का श्रुतवन्धु ऋषि, विष्टुप् छन्द और असुनीति नामक प्राण देवता है। मन्त्रार्य- असुनीते = हे प्राणियों के प्राण को अधिनेत्रि देवि! (हे मध्यमस्थ वायुरूप प्राण देव ! ) तुम, अस्मासु = हम में, मनः = मन को, घारय = धारण करो। जीवातवे = हमारे बहुत काल तक जीने के लिये, सुप्रतिर = आयुष को बढाओ। न: - हम में, आयुः - आयुप, रारन्धि करो अर्थात् स्थापन करो। नः = हमें, सूर्यस्य = सूर्य के, संदृशि = दर्शन के लिये समर्थ वनाओ। स्वम् = तुम, हमारे दिये हुए, धृतेन = धृत से, तन्वम् = अपने शरीर को, वर्घयस्व बढ़ाओ। अथवा, इस मन्त्र में प्राणरूप मध्यम देव से प्राण की याचना की गई है । D सिद्ध इस मन्त्र का भाज्य- असुनीते मनः अस्मासु धारय, चिरंजीवनाय प्रवर्धय पन आयू रन्धय च नः सूर्यस्य सन्दर्शनाय ॥ असुनीते = हे असुनीते ! अस्मासु - हम में, मनः = मन को, घारय = धारण करो। अर्थात्, चिरंजीवनाय = बहुत काल तक जीने के लिये, प्रवर्घय = आयुष को बढ़ाओ। नः . हमारे में, अयुः = आयुप को, रन्धय - बढामो अर्थात् स्थापन करो। नः = हमें, सूर्यस्य = सूर्य के, सन्दर्शनाय = दर्शन के लिये समर्थ बनाओ। मन्त्र में 'रारधि पद है। जो यलुगन्त है। जिसका अपं यास्कने 'रत्यय' अर्याद निप्पादय किया है। जो णिजन्त 'रष हिंसासरादयोः' धातु के लोट् का स्प है। इसका दूसरा अर्थ बताते है-- रध्यातिशगमनेऽपिदृश्यते। रघ्यति = रघ धातु, वशगमने बपि = वागमन अर्थाद अधीन चलने अर्थ में भी, हत्यते देखा जाता है। जैसे- , - (१४४४) निरुक्त दशमाध्यायस्य चत्वारिंशः खण्डः । - D "मा रंधाम द्विपते सोमराजन्" इत्यपि निगमो भवति । सोमराजन् = हे सोमराजन् । हम, द्विपते - शत्रुओं के वश मे, मा रधाम = न होवे । इति अपि = यह भी, निगमः उदाहरण मन्त्र, भवति = है । सम्पूर्ण मन्त्र- देवीः पलुर्वीरुरु नः कृणोत विश्वे देवास इह वीरयध्वम् । मा हास्महि प्रजया मा तनूभिर्मा रधाम द्विपते सोम राजन् ॥ क सं. ८-७-१५-५॥ इस मन्त्र का आङ्गिरस विहव्य ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और विश्वदेव देवता है । मन्त्राय-पड़ उर्वी देवीः = छह देवियाँ अर्थात् द्यौ, पृथिवी, दिन, रात्रि, जल और ओषधि रूप छ. देवियां, न. - हमारी, उरु कृणोत = विस्तीर्ण श्री वृद्धि करें। विश्वे देवासः सर्व देवगण, इह = यहां, वीरयध्वम् ऐसा पराक्रम दिखवे कि, मा प्रजया तनूभिः हास्यहि हम सन्तान और शरीर से वियुक्त न होवें । अर्थात् हमारी और हमारी सन्तान की अकालमृत्यु न होने पावे । सोमराजन् = हे सोमराजन्, हम कभी, द्विपते = द्वेष करने वाले शो के, मा रधाम - वश मे न होवें। इस मन्त्र मे 'रधाम' यह 'रघ' धातु का रूप है । जिसका अर्प वशगमन है अब असुनीति मन्त्र के चतुषं पाद की व्याख्या करते हैं- - धृतेन त्वमात्मानं तन्वं वर्धयस्व । त्वम् = तुम, हमारे दिये हुए, घृतेन = पृत से, आत्मानम् तन्वम् - अपने शरीर को, वर्धयस्व - बढाओ। २६ मतः । अतः' यह मध्यमदेव मेघ या विजली का नाम है। 'ऋछति अन्तरिक्ष गच्छति इति का मध्यमदेवः मेघ.' इति विग्रह मे ' गतिप्रापणयोः' धातु से 'गत्याकमक' इत्यादि सूत्र से पार्ता में क्त (त) प्रत्यय होने पर का शब्द वना है। मेघ का नाम है। क्योकि, मेघ आकाश में गमन करता है । यास्क कहते हैं- . तो व्यख्यातः । ऋता = ऋत शब्द, व्याख्यात. = व्याख्यात है। अर्थाद इस यो व्यारया, उदर नार्मों में कतमित्युदन नाम-प्रत्यत भवति' इत्यादि पक्ति (नि. २-२५) से हो चुकी है। वहा इस का अर्थ जल और यहा मेप या विद्युत् है ।
निपते दशमाध्यायस्यकचत्वारिंशः खण्डः । (१४४९) तस्यैपा भवति । इति निरुक्तं दशमाच्यायस्य चत्वारिंशः खण्डः ।। १०-४० ॥ तस्य = उस ऋतदेव की, एषा = यह अग्रिम ऋचा, भवति : है- अथ निरुक्त दशमाध्यायस्यकचत्वारिंशः खण्डः । ऋतस्य हि शुरुधः सन्ति पूर्वीत्रतस्य॑ धीतिजिनानि हन्ति । ऋतस्य श्लोको' बधिरा ततर्द कर्णा' बुधानः शुचमान आयोः ॥ . ३-६-१०-४॥ इस मन्त्र का वामदेव ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और ऋत देवता है । मन्त्रार्थ तस्य हि शुरुषा पूर्वीः सन्ति मेघ का जल प्रथम सश्चित होता रहता है। तस्य घोतिः वृजिनानि हन्ति मेघ की वृष्टि-प्रज्ञा 'दुष्काल-तम का नाश करके पापों का भी नाश करती है । ऋतस्यबुधानः शुचमानः 'लोकः - तथा मेध की उच्च गर्जना देदीप्यमान होकर मनुष्यों के कर्तव्य का बोध कराती है । वघिरा आयोः = बहिरे मनुष्य के भी, कर्णा आततर्द - कानो को खोल देती है। इस मन्त्र में ऋत नामक मेघ देव की प्रशंसा है। इस मन्त्र का भाष्य-- ऋतस्य हि शुरुषः सन्ति पूर्वीप्रतस्य प्रज्ञावर्जनीयानि हन्ति । प्रस्तस्य श्लोको बधिरस्थापि कर्णा वाणक्ति बधिरो बद्धोत्रः। कर्णी बोधयन् दीप्यमानचायोरयनस्य मनुष्यस्य, ज्योतिषो वोदकस्य वा॥ ऋतस्य हि शुरुषा पूर्वीः सन्ति मेघ का जल प्रथम सञ्चित होता रहता है। तस्य प्रज्ञा वर्जनीयानि हन्ति - मेघ को वृष्टि प्रज्ञा दुष्काल तम का नाश करके पापो का भी नाश करती है। ऋतस्य लोको बधिरस्यापि की बातृणत्ति - मेघ की उच्च गर्जना देदीप्यमान हो कर मनुष्यों के कर्तव्य का बोध कराती है। बद्धोत्रः = बद्धकर्ण को, बधिरः - बधिर बहते हैं। मेघ को गर्भना, फणी = कान को, बोषयन् = वोष कराती हुई, च = और, दीप्यमानः = दीप्यमान होती हुई, भायोः = अयनस्य मनुष्यस्य = बहिरे मनुष्य के मी कानों को खोल देती है। वा = अथवा, ज्योतिपः - ज्योति का, वा = अथवा, उदकस्य - जल का। भाव यह है कि यहिरे भी उसके यश को जानते हैं ऐसा प्रतदेव हैं। २७-इन्दुः। इन्दु नाम चन्द्रमा का है। यास्क इसको सिदि बताते हैं- (१४५०) •निरुक्त दशमाघ्यायस्यद्वाचत्वारिंशा खण्डौ । %3D . -- इन्दुरिन्धेरुनत्तर्वा । इन्धेः = इन्ध धातु से, वा = अथवा, उनत्तेः उन्दी धातु से, इन्दुः = इन्दु शब्द बना है ! अर्थात् 'इन्धे दीप्यते इति इन्दुः चन्द्र. इस विग्रह में 'भि इन्धी दीप्तौ' धातु से 'भृमृशोतृचरित इत्यादि उणादि सूत्र से बाहुलकात् उ प्रत्यय, पृषोदरादित्वात् धकार को दकार होने पर इन्दु शब्द बना है । मध्यमदेव चन्द्रमा का नाम है । क्योकि, वह प्रकाश करता है । अथवा ' उनत्ति वर्षण लेदयति इति इन्दुः चन्द्रमा' इस विग्रह में ‘उन्दी क्लेदने' धातु से ' उन्देरिच्चादेः' इस उणादि सूत्र से उ प्रत्यय और पृषोदरादित्वात् धातु के उकार को इकार होने पर इन्दु शब्द बना है । मध्यमस्थान चन्द्र का नाम है । क्योंकि, वह वर्षा के द्वारा सब को भिजा देता है । तस्यैपा भवति । इति निरुक्त दशमाध्यायस्यैकचत्वादिशः खण्डः । १०-४१ ।। तस्य - उस इन्दु की, एपा यह आगे की ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्ते दशमाघ्यायस्यद्वाचत्वारिंशः खण्डः । प्रतद्वोचेयं भव्यायेन्दवे हव्यो न य इपवान्मन्म रेजति रक्षोहा मन्म रेजति। स्वयं सो अस्मदा निदो वधैरजेत दुर्मतिम् । अब सवेधशंसोऽवतरमव क्षुद्रमिव स्रवेत् ॥ ऋ सं २-१-१६-६ ॥ इस मन्त्र का दिवोदास के पुत्र परुच्छेद ऋपि, अतिवृति छन्द और इन्द्र देवता है । मन्त्रार्थ- भवनशील, इन्दवे = चन्द्र के लिये हम, तत् - उस वक्ष्यमाण स्तोत्र को, प्रवोचेयम् । पढते हैं । यः - जो चन्द्र, इपवान् = इच्छा करते हुए, मन्म = मननीय स्तोत्र का उद्देश करके, रेजति = आते है और जो चन्द्र, हव्यः न आह्वान करने योग्य इन्द्र के समान, रक्षोहा = यज्ञविघातक राक्षसों के मारने वाले हैं और, मन्म = उन के कम हननादिको, रेजति = नाश करते हैं। सः = वही चन्द्र, स्वयम् = स्वयं, अस्मत् = हमारे, निदः = निन्दा करने वाले, दुर्मतिम् = दुर्बुद्धि शत्रुओं को. वधैः हनन-उपाय शनों के द्वारा, आ अजेत् - नाश करे। अपशंसा = पाप को कह देने वाला चोर का, शूद्रम् इव, शूद्र जल के समान, अवतरम् अधोमुख हो कर, अवस्रवेत् = अधःपतन हो । इस मन्त्र में मध्यम देव चन्द्र (इन्दु) को रतुति है। भव्याय - इस मन्त्र का भाप्य- प्रब्रवीमि तनव्यायेन्दवे हवनाई इव इपवानन्नवान् कामवान् वा मननानि च नो रैजयति । रक्षोहा च बलेन रेजयति । वयं सो अम्मदर्भिनिन्दितादरम् वधैरजेत दुमंतिम् । अवस्रवेदघशंसः सतश्चावरंक्षुद्रमिवावस्रवेत् ।
परुच्छेप ऋपिः । पर्ववच्छेपः । परुपि परुपि शेपोऽस्येति वा । परुच्छेप नामक, ऋषि! - एक मन्त्र द्रष्टा ऋपि है। उसका, पर्यवे ग्रन्यिवाला शेप है जिसका । अदि दोपकृत सर्वाङ्गीणकाम के द्वारा सर्व अङ्गों पर स्पचं होता है । 'पर्ववत् पा इति परुच्छेपः' इस विग्रह में पर्व पद और शेर्प शन्द का 'उपमानानि सामान्यवंचनः' इस मूत्र से कर्मधारय समास, पर्व शेर पोदरादित्वाद पयं के स्थान में पस्व वादेच, पर टोप, 'चुवे, चवन प, परुच् दोप, 'छोटि' इस सूत्र से धकार को छकार होने पर पगच्छा शब्द बना है। ग्रन्धि निरक्त दशमाध्यायस्यद्वाचत्वारिंशा खण्ड।। भव्याय इन्दवे = भवनशील चन्द्र के लिये मैं, तत् = उस स्तोत्र को, प्रब्रवीमि = पढता हूँ। जो चन्द्र, हवनाई इव = आह्वान करने योग्य इन्द्र के समान, यः =जो चन्द्र, इषवान् = अन्नवान्- अन्नवाला, वा - अथवा, कामवान् = इच्छा वाला अर्थात् इच्छा करते हुए, नः = हमारे, मननानि मननीय स्तोत्र का उद्देश करके, रेजयति आते हैं। और जो चन्द्र, रक्षोहा = यज्ञ विघातक राक्षसों के, बलेन अपने वल से, रेजयति = मारने वाले हैं। सः = वह चन्द्र, स्वयम् = स्वयं, अस्मद् = हमारे, अभिनिन्दितारम् - निन्दा करने वाले, दुर्मतिम् = दुष्ट वुद्धि शत्रुओं को, वधैः = शत्रों के द्वारा, अजेत = नाश करे। अघशंसः = पाप को कह देने वाले का, अवस्रवेद - अधःपतन हो। च%3 और, सता - पतन होता हुआ, अवरम् = अधोमुख हो कर, क्षुद्रम् इव = क्षुद्र के समान, अवस्रवेत् = गिरे । प्रश्न-इस मन्त्र में रेजति और 'सवेत् ' का अभ्यास (दो दो बार पाठ ) क्योंकि किया गया है ? इसका उत्तर- अभ्यासे भूयांसमर्थ मन्यन्ते । मन्त्रों के अर्थ तत्त्व के जानने वाले आचार्य लोग, अभ्यासे = अभ्यास में अर्थात् एक एक पद को दो दो वार पढने में, भूयासम् अर्थम् वाहुल्य अर्थ, मन्यन्ते = मानते हैं। लोक में भी ऐसा प्रयोग देखा गया है- यथा-अहो दर्शनीया, अहो दर्शनीयेति । जैसे, अहो दर्शनीया = महो यह स्त्री इस वाक्य में 'अहो' पद आश्चर्य अर्थ में है। यथा = दर्शनीय है, अहो दर्शनीया = अहो यह मौ दर्शनीय है। यहाँ 'अहो दर्शनीया' का अभ्यास अर्थात् दो बार पाठ है । जिस से अर्थ वाहुल्य भासता है। वैसे ही मन्त्रों में भी समझना चाहिये । तत्परुच्छेपस्य शीलम् । - इस मन्त्र के द्रष्टा परच्छेप ऋषि का, पीलम् - स्वभाव है कि, अपने देवता की स्तुति में एक एक शब्द को दो दो बार बोलते हैं। जिस से वर्थवाहुल्य प्रतीत हो। केवल इन्ही का नहीं अपितु सभी मन्त्र द्रप्टा ऋषियों का यह स्वभाव समझना चाहिये । परच्छेपः अथवा, परपि पक्षपि यङ्गो की सन्धि मग्धि में पः । महान शेपः = लिङ्ग (मेड) है। वा = वाला पोप - शिन वाला। १०२ वह यह, परुच्छेपस्य (१४५२) निरुक्ते दशमाध्यायस्य अयश्चत्वारिंशः खण्डः । इतीमानि सप्तविंशतिर्देवतानामधेयान्यनुक्रान्तानि । इति : इस प्रकार, इमानि = ये (वायु से ले कर इन्दु तक) सप्तविंशतिः = सत्ताईस, देवतानामधेयानि = देवताओ के नाम, अनुक्रान्तानि कहे गये। सूक्तभाजि-हविर्भाजि । उन सत्ताईस देवताओं में से कितने तो, सूक्तभाजि = सूक्तभाक् और कितने, हविर्भाजि हविर्भाक हैं । जिनकी सूक्तों मे प्रधानता से स्तुति हो वे सूक्तभाक और जिनकी यज्ञ में हवि दी जाती हो वे हविर्भाक कहे जाते है । भाव यह है कि, इन सत्ताईस देवताओं में कोई सूक्तभाक है, हविर्भाक् नही और कोई सूक्तभाक् और हविर्भाक् दोनों हैं। इसी को दिखाते है- तेपामेतान्यहविर्भाजि - वेनोऽसुनीतिधत इन्दुः । तेषाम् = उन में ये चार देवता, अहविर्भाखि = हविर्भाक् नहीं हैं। केवल सूक्तभाक् हैं। जैसे-वेनः असुनीतिः प्रातः इन्दुः = वेन, असुनीति, ऋत और इन्दु इन चारों की सूक्तों में स्तुति-मात्र है और यज्ञ में इन्हे हवि नहीं दी जाती है। शेप तेईस देवता हवि और सूक्त दोनों के भागी हैं। २८ - प्रजापतिः । प्रजापति मध्यमस्थ देव का नाम हैं । इसका निर्वचन करते हैं- प्रजापतिः प्रजानां पाता वा पालयिता वा। प्रजानाम् प्रजाओं का, पाता वा पालयिता वा = पालन करने वाला, प्रजापतिः = प्रजापति कहा जाता है। अर्थात् 'प्रकर्षण जायन्ते इति प्रजाः' इस विग्रह में प्रपूर्वक 'जनी प्रादुर्भावे' धातुसे 'उपसर्गेच संज्ञायाम्' इस सूत्र से 'ड' प्रत्यय (ब), प्रजन् अ, डित्त्वाद टि लोप और टाप होने पर प्रजा शब्द बना है । सन्सान मोर रयत का नाम है। पाति रक्षति इति पतिः' इस विग्रह मे, 'पा रक्षणे' धातु से 'पातेर्डतिः' इस उणादि सूत्र से उति ( अति ) प्रत्यय, डित्वात् टिलोप होने पर पति दाद बना है। अथवा 'पालयति रक्षति इति पतिः' इस विग्रह में पाल रक्षणे' पातु से उक्त इति प्रत्यय, पृषोदरादित्वात् पाल को आदेश होने पर पति मन्द बना है। इस प्रकार पा' और 'पल' इन दो घातुओं से पति शब्द बना है। अयं एक ही है। 'प्रजानां पतिः इति प्रजापतिः मध्यमदेवः' इस विग्रह मे 'पष्ठी' इस मूत्र से पष्ठीसत्पुरुष समास होने पर प्रजापति द बना है। मध्यमदेव का नाम है । क्योकि, वह सब प्रजाओं का पालन करने वाला है । तस्यपा भवति । इति निरुक्ते दशमाध्यायस्यद्वाचत्वारिंशः सण्डः । १०-४२।। तस्य = उस प्रजापति का, एपा यह अग्रिम ऋचा, भवति = है- सप निरुक्त दशमाध्यायस्य प्रयनत्वारिंगः मण्डः । . - .
निषक्ते दशमांध्यायस्य अयश्चत्वारिंशः खण्डः । प्रजापते न खदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ता बभूव । यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम् ॥ ऋसं.८-७-४-१०॥ इस मन्त्र का प्रजापति के पुत्र हिरण्यगर्भ पि, त्रिष्टुप् छन्द और प्रजापति देवता है। मन्त्रार्थ-प्रजापते - हे प्रजापते !, त्वत् = तुम्हारे अतिरिक्त और कोई. याः एतानि विश्वा जातानि जो ये समस्त उत्पन्न वस्तु हैं, ताः - उनको, न परि बभूव - अधीन करके न रख सकता है। तुम्ही सबको अपने अधीन रख सकते हो। यकामाः - हम जिस फल के अभिलाप से, ते तुम्हारा, जुहुमः = हवन करते हैं, तत् = वह, नः : हमे, अस्तु - हो अर्थात् मिले। वयम् ' हम, रयीणाम् = बहुत धनों के, पतयः अधिपति, स्याम = होवे। इस मन्त्र में प्रजापति से धन के लिये प्रार्थना है। इस मन्त्र का भाष्य- प्रजापते न हि लदेतान्यन्यः सर्वाणि जावानि तानि परिषभूव । यत्कामास्ते जुमस्तन्नो अस्तु-वयं स्याम पतयो रवीणां इत्याशीः । प्रजापते = हे प्रजापते !, स्वद अन्यः - तुम से अन्य, यानि एतानि सर्वागि आतानि = जो ये सब उत्पन्न वस्तु हैं, तानि = उनको, न हि परिवधूव अधीन करके नहीं रख सकता है। किन्तु तुम्ही सबको अपने अधीन रख सकते हो। वयम् - हम, यकामा: = जिस फल की इच्छा से, ते - तुम्हारा, जुहुमः - हवन करते हैं, तद वह, नः - हमें, अस्तु - मिले। वयम् - हम, रयीणाम् = धनो के, पतपः - स्वामी, स्याम - होवें। इति - इस मन्त्र में यह, आशीः आशीर्वाद है। 'अप्राप्त प्रार्थनमाशीः' अर्थात् अप्राप्त वस्तु को प्रार्थना मशीर्वाद कही जाती है। . २९ - अहि। मध्यमस्थान देवता इन्द्र का नाम यहि है । यास्क कहते है-- अहियाख्यातः। बहिः - अहि शब्द, व्याख्यात: = प्यारयात है। अर्थात् इसकी स्थास्या पेप नामों में (नि. २०१७ अहिरवनात्' इत्यादि पंक्ति से हो चुकी है। वहाँ इसरा अर्थ मेप पा और यहां मध्यम देव इन्द्र है । अर्थात 'अलोति अन्तरिक्ष व्याप्नोति इति अहिः इन्द्रः' इस विग्रह में मह व्याप्तो' पातु से 'इन सबंधातुम्या' इस अनादि सत्र से इन (इ) प्रत्यय होने पर बहिन बना है। इन्द्र का नाम है । क्योकि इन्द्र सर्वत्र मान है। .
(१४५४) निरुक्त दशमाध्याय चतुश्चत्वारिंशः खण्डः । तस्यैपा भवति । इति निरुक्ते दशमाध्यायस्य प्रयश्चत्वारिंशः खण्डः। १०-४३ ॥ तस्य = उस अहि की, एपा = यह अग्निम ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्ते दशमाघ्यायस्य चतुश्चत्वारिंशः खण्डा । अब्जामुक्थैरहिँ गृणीषे वुध्ने नदीनां रजःसु पीदैन् । ऋ. सं. ५-३-२६-१६ ॥ इस मन्त्र का वसिष्ठ ऋषि, द्विपदा विराट् अर्धचं छन्द, अहि देवता है। मन्त्रार्थ हे स्तोतः : स्तुति करने वाला ऋत्विक् ! तुम, रजःसु सीदन् = जल में बैठे हुए, अब्जाम् = जल में उत्पन्न नदोनाम् बुध्ने = नदी स्थान अन्तरिक्ष में विद्यमान अहिम् = मेघ घातक इस मध्यम देव इन्द्र को. उक्थैः - स्तोत्र के द्वारा, गृणीपे स्तुति करते हो। इस मन्त्र का भाप्य- - अप्सुजमुक्थैरहिं गृणीपे युध्ने नदीनां रजःसु उदकेषु सीदन् । युघ्नमन्तरिक्षम् , पद्धा अस्मिन्धृता आप इति वा । इदमपीतरद् बुध्नमेतस्मादेव, बद्धा अस्मिन्धृताः प्राणा इति । अप्सुजम् = जल में उत्पन्न, वुघ्ने = अन्तरिक्ष में, नदीनाम् = नदके, रजःसु = उदकेषु जलों में, सीदन् वैठे हुए, अहिम् = मध्यम देव इन्द्र की, उक्थैः = स्तोत्रों से, गृणीपे = स्तुति करते हो। बुध्नम् अन्तरिक्षाम् = बुघ्न अन्तरिक्ष कहा जाता है। क्योंकि, यस्मिन् = इस में, आपः- जल, बद्धाः = बद्ध होते है, इति वा = अथवा, धृताः घरे हुए होते हैं । इदम् अपि = यह भी, इतरत् - दूसरा शरीर वाचक, बुघ्नम् = बुध्न शब्द, एतस्मात् एव = इसी धातु से बना है जिस से अन्तरिक्ष वाचक बुघ्न शब्द वना है । क्योंकि, अस्मिन् - इस परीर में, प्राणा: = प्राण, बद्धाः = बद हैं मर्थात, घृताः घरे हुए हैं। इति इत्यर्थः । अर्याद 'बघ वन्धने' पातु से 'बन्धेघियुधी च इस उणादि सूत्र से नक् (न) प्रत्यय और चकार से प्रकार को उकार होने पर बुघ्न शब्द बना है। अन्तरिक्ष का नाम है। क्योंकि, अन्तरिक्ष में जल बद्ध होते हैं । शरीर का भी वुघ्न नाम है । क्योंकि, इस का भी प्राण बद्ध होते हैं। अहिर्बुध्न्यः । जो अहि' शब्द का मध्यमदेव इन्द्र अर्थ है वही 'अहिबुध्न्य' शब्द का भी मध्यमदेव इन्द्र अर्थ है । नाम में भेद है अर्थ मे नहीं असमस्त पद है ! इसी को कहते हैं- योऽहिः स बुध्यः । चुघ्नमन्तरिक्षं तनिवासात् । जो, अहिः = अहि है, सः = वह, बुध्न्यः = वुघ्न्य है। वुघ्नम् अन्तरिक्षम् = बुध्न अन्तरिक्ष कहा जाता है, तनिवासाद = उस में निवास करने में बुध्न्य कहा जाता है। अदि- य निरुक्त दशमाघ्यायस्य पञ्चचत्वारिंशः खण्डः । - 'बुध्ने अन्तरिक्षे निवसति इति बुध्न्यः मध्यमदेवः' इस विग्रह में वुघ्न शब्द से 'छन्दसि च' इस सूत्र से यत् (य) प्रत्यय होने से 'बुध्य' शब्द बना है। अहि का अर्थ अन्तरिक्ष में व्याप्त और बुध्न्य का अर्थ अन्तरिक्ष में निवास करने वाला। अतः दोनों का अर्थ एक ही है। तस्यैपा भवति । इति निरक्ते दशमाघ्यायस्य चतुश्चत्वारिंशः खण्डः । १०-४४ ।। तस्य = उस अहिघ्य की, एषा = यह अग्रिम ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्ते दशमाध्यायस्य पञ्चचत्वारिंशः खण्डः । मा नोऽहिर्बुध्न्यो रिपे धान्मा यज्ञो अस्य निघतायोः । क्र. सं. ५-३-२६-१७ ॥ इस मन्त्र का यसिष्ठ ऋषि, द्विपदा विराट् अर्धचं छन्द और बहि देवता है। मन्त्रार्य- अहिर्बुध्न्यः - अहिर्बुध्न्य मध्यम देव इन्द्र, नः = हमें, रिपे - हिंसक के लिये, मा पात - न देखें। मस्य तायोः - इस यज्ञ काम यजमान का, यज्ञः = यज्ञ, मा निधन = नष्ट न हो। किन्तु सदा ही अविनाशी बना रहे । इस मन्त्र में अहिर्बुध्न्य मध्यम देव इन्द्र से प्रार्पना है। सायण महि और अहिर्बुध्न्य का अर्थ अग्नि किया है। इस मन्त्र का भाष्य-- यज्ञ = - मा च नोऽहिर्बुध्यो रेषणाय धान्मास्य यज्ञोखा च निघद् यज्ञकामस्य । अहिर्बुध्न्यः - व्याप्त तथा अन्तरिक्ष में रहने वाला मध्यम देव इन्द्र, न: - हमें, रेपगाय हिंसक के लिये, मा च धाद = न देखें। - और, अस्य यश कामस्य = यसकाम यजमान का, यनोखा = यज्ञस्थाली - मा सिप = नष्ट न हो। किन्तु सदा या होता ही रहे। ३१ सुपर्णः। सुपणं शोमन पतन मध्यम देव गरुड समान वायु का नाम है । यास्क कहते हैं- सुपों व्याख्यातः। सुपर्णः = सुपणं शम्द, व्याख्यातः = प्यास्यात है। अदि इस की व्याम्या रामनामों में (नि. ३-१२) 'सुप सुपतनाः' इत्यादि पंक्तियों से की गई है। यहाँ मूर्य की रश्मि और यही मध्यम देव वायु अर्य है। इतना भेद है। यदि 'सुष्छु पिपति पालनं करोति इति मुपः मध्यम देवः' इस विग्रह में मुपूर्वक ' पालनपूरणयो। पातु से 'पास्यस्मन्यतिम्मो नः' इस गादि सूत्र से न प्रायप, गुण और पव होने पर मुपगं शाद बना है। मध्यमस्पानी यापु देव का नाम है। क्योंकि, यह मध्यमदेव भेष को पासित कर वृष्टयादि द्वारा स रा पालन करता है।
17 , -- (१४५६) निरुक्त दशमाध्यायस्य पचत्वारिंशः खण्हा । तस्यपा भवति । इति निरुक्त दशमाध्यायस्य पश्चचत्वारिंशः खण्डः ॥१०-४५ ॥ तस्य = उस सुपर्ण की, एपा - यह आगे की ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्ते दशमाध्यायस्य पट्चत्वारिंशः खण्डः ॥ एकः सुपर्णः स समुद्रमा विवेश स इदं विश्वं भुवनं वि चष्टे । तं पाकेन मनसापश्यमन्तितस्तं माता रेळिह स उ रेळिह मातरम् ॥ ऋ. सं..८-६-१६-४ ॥ इस मन्त्र का सध्रि नामक वैरूप ऋषि, जगती छन्द और विश्वदेव देवता है। मन्त्रार्थ--एकः एक, सुपर्णः - सुपतन मध्यमस्थान वायु देव, समुद्रम् = अन्तरिक्ष में, आविवेश = आ बैठा है और बैठ कर, सः = वह, इदम् विश्वम् भुवनम् = सारे विश्व रूप भुवनों को, विचष्टे = देखता है । तम् ,उस देव को मैं ने, पाकेन मनसा = प्रशस्य मन के द्वारा, अपश्यम् = देखा। अन्तितः समीप में, माता = जल के निर्मात्री माध्यमिका वाक् उसका, रेलिह = आस्वादन करती है और, स,उ = बह वायुदेव भी, मातरम् = माध्यमिका वाक् का, रेळिह = आस्वादन करता है। इस मन्त्र का यास्क भाष्य- एका सुपर्णः स समुद्रमाविशति स इमानि सर्वाणि भूतान्यभिविपश्यति, तं पाकेन मनसाऽपश्यमन्तितः। इत्यूपर्दष्टार्थस्य प्रीतिर्भवत्याख्यानसंयुक्ता। तं माता रेडिट वागेपा- माध्यमिका स उ मातरं रेड्डि । एकः सुपर्णः = एक सुपतन मध्यम देव है, सः = वह, समुद्रम् अन्तरिक्ष मे, आविशति प्रवेश करता है = रहता है वह, इमानि सर्वाणि भूतानि = इन सब प्राणियों को, अभिविपश्यति = देखता है । में ने, तम् = उस को, पाकेन मनसा = प्रशस्य मन से, अन्तितः = समीप में, अपश्यम् = देखा । इति = इस प्रकार, दृष्टार्थस्य ऋषेः = मन्त्रदृष्टा ऋपि को, प्रीतिः भवति - प्रीति उत्पन्न हुई जो, आख्यासंयुक्ता - आख्यान के रूप में वर्णित है। तम्। - उस देव को, माता : माध्यमिका वाक्, रेहि = लेढि चाटती है। एपा = वह चाटने वाली, माध्यमिका वाक् = मध्यम देवता वाणी है और, सः उ = वह मध्यमदेव, मातरम् = माध्यमिका वाक् को, रेहि = लोहि चाटता है। दोनों मध्यम देव और देवी, अन्तरिक्ष रूप एक आश्रय होने से आपस में प्रैम करते हैं । ३२ - पुरूरवाः । इति द्वात्रिंशत्पदानि । पुरुरवस् बहुत शब्द करने वाला मध्यमदेव मेघ का नाम है। इसी को कहते हैं- -- , -- %D निरुक्त दशमाध्यायस्य सप्तचत्वारिंशः खण्डः । (१४५७) पुरूरवा:-बहुधा रोख्यते । बहुधा बहुत प्रकार रोख्यते = रोता है अर्थात् अतिशय मेघ गर्जना स्प शब्द करता है इस लिये मेघ पुरूरवाः पुरुरवस् कहा जाता है। अर्थात् 'पुरु - बहुधा रोख्यते - स्तनयति इति पुरूरवा: मेघः' इस विग्रह में पुरुउपपद 'रु शब्दे' धातु से 'सर्वधातुभ्योऽसुन्' इस उणादि सूत्र से असुन (अस्) प्रत्यय, गुण, अवादेश, पुरुरवस्, 'अन्येषामपि दृश्यते' इम सून से पूर्वपद को दोर्म होने पर 'पुरूरवस्' शब्द वना है । मेघ का नाम है । क्योंकि, मेघ बार वार गर्जना करता है। तस्यैषा भवति । इति निरुक्ते दशमाध्यायस्य पट्चत्वारिंशः खण्डः ॥ १० - ४६ ।। पुरूरवस् की, एषा - यह अग्रिम मचा, भवति - है- अथ निरुक्ते दशमाध्यायस्य सप्तचत्वारिंशः सण्डः । समस्मिञ्जायमान आसत मा उतमंवर्धन्नद्यः स्वार्ता । महे यत्वा पुरूरवोरणायावर्धयन् दस्युहत्याय देवाः ॥ म सं. ८-५-२-७॥ तस्य - - इस मन्त्र का उर्वशी ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द भौर पुरुरवा देवता है। मन्नार्थ-उर्वशी कहती है कि, अस्मिन् जायमाने - इस पुरुरवा के जन्म ग्रहण करने पर अर्थात् जिस समय पुरूरवा ने जन्म लिया उस समय, माः = देवपलियाँ भी उनको देखने के लिये आई, उत - और, ईम् = इस पुरूरवा को, स्वगृर्ता नद्यः = स्वयं अपने बल से गमन करने वाली नदियां ने भी, अवघंयन् : उनरी संवर्घना की। पुरूरवः हे पुरूरवा!; यद वाक्यालद्वारे। देवा: - देवोंने, त्वा - तुम्हें. दस्युह त्वाय = दस्यु को मारने को महेरणाय महान संग्राम में जाने के लिये, अवर्धयन् संवर्धना की है। इस सूक्त में पुरुरवा और उर्वशी का लम्बा मारूपान है। इस मन्त्र का यास्क माध्य- समासतास्मिआयमाने या गमनादापो-देवपल्यो वा। अपि चनमवर्धयन्नयः स्वगर्वाः स्वयं गामिन्यो महते च यचा पुरूरवो रणाय रमणीयाय संग्रामापावर्धयन् । दस्युहत्याय च देवा देवाः। इति निरत दशमाध्यायस्य सप्तयत्यारिणः सण्डः ॥१०-४७ ।। अस्मिन् जायमाने = इस पुस्रया के दृष्टिरूम में प्राप्त होने पर, प्रा. - गमनाय - गमन स्वमाय, आपः = पलो ने, सम् बारात - उमें पारो ओर से पेर लिया। या স, সাগৰ निरक्त दशमाध्यायस्य सप्तचत्वारिंशः खण्डः । जायमाने = इस पुरूरवा के जन्म लेने पर, ग्नाः = देव पल्यिा भी, सम् आसत = इस को देखने के लिये आई। अपि च = और, स्वगूर्ताः = स्वयं गामिन्यः = स्वयं अपने वल से गमन करने वाली, नवः - नदियो ने भी, एनम् = इसको, अवर्धयन् संवर्धना की। च = और पुरूरवः = हे पुरुरवा !, देवाः सर्व देवों ने, महते रणाय = रमणीयाय संग्रामाय के लिये, च 3 और, दस्युहत्याय = डाकुओ को मारने के लिये, त्वा = तुम्हे, अवर्घयन् = बढाया है। 'देवाः' इस पद का दो बार पाठ अध्याय समाप्ति का सूचक है। महान् संग्राम में जाने इति निरुक्तव्याख्यायां दशमाध्यायस्य सप्तचत्वारिंशः खण्डः । १०-४७ । निरुक्त के दशम अध्याय का खण्ड सूत्र 16 क्षत्रस्य ૨૫ अथातो मध्यस्थाना वार्यवायाह्यासस्नाणासो नीचीन पारम् तमुर्वि मारुद्राय यातेदिपुज्ज- राबोधादर्दसद्योजात पर विवृक्षानश्रापिनद्धमष्मास्यमवर्तक्षेत्रस्यपतिः क्षेत्रस्थपतिनो पतेऽभी व हायुनरेडियो अनिध्य: परेयिवांसंसेनेवसृष्टा मित्रो जनान्हि रण्यगर्भो ते सरस्यन्विश्व कर्मासर्षस्य विश्वकर्माविमना विश्वकर्मन् विपायपुसयश्चित्वया मन्ययादधिकाः सवितायग्नौ- हिरण्यस्तूपोरेपस्त्वष्टा पातं आपातुप्रतित्यमभित्याविनायेनतेश्ययनोऽसुनीत अतस्य दिपाय मजायतेजामुफ्थानोदिरेका सुपर्णः समस्मिन् सप्तचत्वारिंशत् । ४४ ४५ इति निरुक्त दशमोऽध्यायः समाप्तः ।। १० ।।
श्रीगणेशाय नमः । निरुक्तम् अर्थकादशोऽध्याया। तत्र प्रथमः खण्डः । निघण्डा श्येनः १। सोमः २। चन्द्रमाः ३ । मृत्युः ४ । विश्वानरः ५। धाता ६ । विधाता ७ । मरुतः ८। मुद्राः ९ । अमः १० । अङ्गिरसा ११ । पितरः १२ । अथर्वाणः १३ । भृगवः १४ । आप्त्याः १५ । अदितिः १६ । सरमा १७ । सरस्वती १८ । वाक् १९ । अनुमतिः २० । राका २१ । सिनीवाली २२ । कुहः २३ । यमी २४ । उर्वशी २५ । पृथिवी २६ । इन्द्राणी २७। गौरी २८। गौः २९ । धेनुः ३० । अन्या ३१ । पथ्या ३२ । स्वस्ति: ३३ । उपाः ३४ । इळा ३५। रोदसी ३६ । इति पत्रिंशत्पदानि ॥ १ - श्येनः । पयेन मध्यम देवता का नाम है। मध्यम देवता वायु है । जिसको इन्द्र भी पहते हैं। 'प्यायते दांसनीयं गच्छति इति श्यैन; वायुः' इस विग्रह मे 'श्यगतो' धातु से ' 'पारयाहुविष्य इनच् ' इस उणादि सूत्र से इनच् (इन ) प्रत्यय, श्या इन्, 'याणा इस सूत्र से गुण होने पर श्येन शब्द बना है । वायु का नाम है । क्योकि, वायु को गति बड़ी प्रशस्त होती है । पारस श्येनो व्याख्यातः स्पेनः - श्येन याद, ध्यास्यात! - पाल्पात है कवि इस को ध्याश्या अश्वनामों में 'न. चांसनीयं गच्छति' (नि. ४-२४) इत्यादि पक्ति से हो चुकी है । यहाँ इस का अर्थ प्रश्न या और पहा मध्यम देय है।
(१४६०) निरुक्त एकादशाध्यायस्य द्वितीयः खण्डः । तस्यैषा भवति । इति निरुक्त एकादशाध्यायस्य प्रथमः खण्डः । ११-१॥ तस्य = उस श्येन की, एपा == यह अग्रिम ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्ते एकादशाध्यायस्य द्वितीयः खण्डः । आदाय श्येनो अभरत्सोमं सहस्रं सवाँ अयुतं' च साकम् । अत्रा पुरधिरजहादरातीर्मदे 'सोमस्य मूरा अमूरः ॥ ऋ. ३-६-३५-७ ॥ इस मन्त्र का वामदेव अषि, त्रिष्टुप् छन्द और इन्द्र देवता है। मन्त्रार्थ-श्येन: सहस्रम् अयुतम् च = हजार और दशहजार संख्याक, सवान् साकम् = यज्ञों के साथ, सोमम् = सोम को, ले कर, अभएत् = पान कर लिया। मत्र = तत्र - उस सोम के लाये जाने पर, पुरन्धिः- बहुकर्म विशिष्ट, अपूरः = अमूढ अर्थात् प्राज्ञ इन्द्र ने, सोमस्य मदे = सोम सम्बन्धी हर्ष के उत्पन्न होने पर, मूराः भूढ, आराती: = शत्रुओ का, अजहाद = बध किया था। आदाय इस मन्त्र का भाष्य- + आदाय श्येनोऽहरत्सोमं सहस्रं सवान युतं च सह । सहस्रंसहस्रसाव्यमभिप्रेत्य, तत्रायुतं सोमभक्षाः, तत्सम्बन्धेनायुतं दक्षिणा इति चा । तत्र पुरन्धिरजहादमित्रान् । अदानानिति वा । मदे सोमस्य मूरा अमूरः । ऐन्द्रे च सूक्त सोमपानेन स्तुतस्तस्मादिन्द्रमन्यन्ते । श्येना = इन्द्र ने, सहस्रम् अयुतम् च = हजार और दशहजार संख्यक, सवान् सह = यज्ञों के साथ, सोमम् आदाय - सोम को ले कर, अहरत् = पान कर लिया। सहस्र साव्यम् अभिप्रेत्य हजारों यज्ञों के अभिप्राय से, सहस्रम् = सहस्रम् कहा गया है। अर्थात् हजार दश हजार ही नहीं किन्तु असंख्य । तत्र = उस सहन संवत्सर साध्य यज्ञ में, अयुतम् = दशहजार, सोमभक्षा: = सोम भक्षण करने वाले ऋत्विक होते हैं। वा = अथवा, तत्सम्बन्धेन - उन के सम्बन्ध से, अयुतम् हजार फी, दक्षिणाः = दक्षिणा होती है । अपरिभित संख्याक दक्षिणा होती हैं। तत्र = उस यज्ञ में, पुरधिः = इन्द्र ने, अमित्रान् शमों का, अजहात् = वध किया था। घा - अथवा, अदानान् = ने दान करने वाले शत्रुभों का वध किया था। सोमस्य = सोम पान के, मदे = हर्ष प्राप्त होने पर, अमूरः = अमूढ अर्थात् प्राज्ञ इन्द्र ने, मूरा: = मूढ शत्रुओं का वध किया था। च और, ऐन्द्रे सुक्त = इन्द्र के सूक्त में भी, सोमपानेन सोम के पान से, इसकी, स्तुतः = स्तुति हुई है, तस्मात् - इस से भी इसे, लोग, इन्द्रम् - इन्द्र, मन्यन्ते मानते हैं। २- सोमः । हिमालय या मौजवन पर्वत को वनस्पति विशेष का नाम 'सोम' है। इस का निर्वचन करते हैं- - दश + 'पुन अभिपवे' , - निरुक्त एकादशाध्यायस्य चतुर्थ खण्डः । ओषधिः सोमः । सुनोतेर्यदेनमभिपुण्वन्ति । ओषधि वनस्पति विशेष, सोम = सोम कहा जाता है। सुनोते धातु से बना है। यत् = जिस से, एनम् = इस को अभिपुण्वन्ति - निचोडते है। अर्थात् 'सूयते यो अभिपूयते इति सोम.' इस विग्रह मे 'पुन अभिषवे' धातु से 'अतिस्तुसुहु..' इत्यादि उणादि सूत्र से कर्म मे मन् (म) प्रत्यय, सुम, 'सार्वधातुकार्धधातुकयो इस सूत्र से गुण होने पर 'सोम' शब्द बना है। ओषधि विशेष का नाम है। क्योकि वह निचोडा जाता है। बहुलमस्य नैघण्टुकं वृत्तमाश्चर्यमिव प्राधान्येन । तस्य पावमानीपु निदर्शनायोदाहरिष्यामः । इति निरुक्त एकादशाध्यायस्य द्वितीय खण्ड । ११-२ ॥ अस्य = इस सोम का वेद मे, बहुलम् = बहुत करके, नघण्टुकम् घन्टुक, वृतम् - वृत्त है अर्थाद दूसरे की प्रधानता मे गौण स्तुति है । गौण प्रयोग है और कही कही, प्राधान्येन = प्रधान रूप से स्तुति भी मिलती है । जो, आश्चर्यम् इव = आश्चर्य जैसी है। तस्य = उस प्रधान का, पावमानीपु पवमान सोम देवता वाली ऋचामो मे, निदर्शनाय निदर्शन के रूप मे हम उदाहरिप्याम उदाहरण देंगे। जैसे- अथ निरुक्ते एकादशाध्यायस्य तृतीयः खण्ड । खादिष्ट्या मर्दिष्ट्या पर्वस्व सोम धारया । इन्द्राय पातवे सुतः ॥ स ६-७-१७-१ ॥ इस मन्न का मधुच्छन्दा कपि, गायत्री छन्द और सोम देवता है । मन्त्रार्थ-सोम = हे सोम', स्वादिष्ठया बहुत ही स्वादु, मदिष्ठया = बहुत ही हर्ष के देने वाली, धारया = धारा से, सुत - निचोडा हुआ तुम इन्द्राय = इन्द्र के, पातवे - पान के लिये, पवस्व = क्षरण कर, झर । इति सा निगदव्याख्याता । अथैपाऽपरामवति चन्द्रमसो वैतस्य वा। इति निरुक्ते एकादशाध्यायस्य तृतीयः खण्ड इति सा = वह पूर्वोक्त अचा, निगदव्यास्याता - उच्चारण से व्याख्यात है। सुगम है। यहा 'इन्द्र के लिये झर' ऐसा कहने से ही सोम की स्तुति परार्थ अर्थात् गौण जानी जाती है । अथ : और, एपा - यह अग्रिम ऋचा, अपरा = दूसरी, भवति है जो, चन्द्रम स. = चन्द्रमा की है, वा = अथवा, एतस्य = इस सोम की है । एक वाकार वाक्यालकार में है। अथ निरुक्ते एकादशाध्यायस्य चतुर्य खण्डः। सोमं मन्यते पपिवान् यत्सपिंपन्त्योपधिम् । सोमं यं ब्रह्माणो विदुर्न तस्याश्नाति कश्चन ॥ म ८-३-२०-३ ।। .
कश्चन 3 (१४६२) निक्क्ते एकादशाध्यायस्य चतुपा खण्ड।। इस ऋचा का सविता की पुत्री सूर्या ऋपि, अनुष्टुप् छन्द और सोम देवता है। मन्त्रार्थ- यत् = जो, सोमम् ओषधिम् = सोम ओषधि को, संपियन्ति = पीसते हैं और, पपिवान् = पीते हैं, तथा पीकर, मन्यते = मानते हैं कि, सोमम् पपिवान् = हमने सोम पान किया, वे सोम के पान करने वाले नहीं हैं और वह सोम भी सोम नहीं है। किन्तु, यम् सोमम् = जिस सोम को, ब्रह्माणो विदुः = ब्राह्मण लोग जानते हैं अर्थात् जिस को ब्राह्मण लोग विधिवत् यज्ञ में निचोड़ते हैं उसका पान करने वाला सोमपा और वह सोम सोम कहलाता है। और जो अपज्वान है उन में से, कोई, तस्य = उस को, न अनाति - पान नहीं कर सकता है। इस मन्त्र का भाप्य- " सोमं मन्यते पपिवान् यत्सपिंप त्योपधिम् " । इति वृथा सुतमसोममाह । “सोमं यं ब्रह्माणो विदुः" इति " न तस्याश्नाति कचन" अयज्वेत्यधियज्ञम् । यत् = जो, सोमम् ओषधिम् = सोम रूप ओषधि को, संपियन्ति = पीसते है और, पपिवान पीते हैं तथा पीकर, इति मन्यते = यह मानते हैं कि, हमने सोम पान किया वह, वृथा = व्यर्थ, असोमम् सुतम् = असोम को सोम, माह = कहता है। और, यम् सोमम् = जिस सोम को, ब्रह्माणः अधिकारी ब्राह्मण लोग विधिवत् निचोड़ पर 'यह सोम है' ऐसा, विदुः = जानते हैं वह सोम है और उसके पीने वाले सोमपा हैं। कश्चन अयज्वा = कोई अनधिकारी, न तस्य अनाति - उसका पान नहीं कर सकता है । इति = यह अर्थ अधियज्ञम् = अघियज्ञ है।' क्योकि, इस में यज्ञ की प्रशंसा है। अथाधिदैवतम् । " सोमं मन्यते पपिवान्वत्सपिंपन्त्योपधिम् " इति यजुः सुतसोममाह । " सोम य ब्रह्माणो विदुः" चन्द्रमसम् , " न तस्याश्नाति कयन" अदेव इति । अथ = अव, अधिदैवतम् = अघिदैवत अर्थ किया जाता है- यत् - जो, सोमम ओषधिम् = सोम रूप पिपि को, संपिंपन्ति = पीसते हैं और, पपियान पीते है तथा पी कर, मन्यते मानते हैं कि हमने सोम पान किया । इति - यह, यजुः - यजु, सुतसोमम् = सुत सोम, आह कहता है । यह सोम सोम नही और उसको पीने याला सोमपा नही है किन्तु यमसोमम् = जिस सोम को, ब्रह्माणः - ब्राह्मण लोग, चन्द्रमसम् = चन्द्रमां, विदुः । जानते हैं वह सोम सोम है । तस्य - उसको, कश्चन अदेवः = कोई अदेव अर्थात् जो देव नहीं है वह, न अनाति - भक्षण नहीं कर सकता है । इस पक्ष में चन्द्रमा देव की प्रशंसा है। अतः यह अर्थ आधिदैव है। भाव यह है कि ' सोमं मन्यते' इरा एक ही मन्त्र का पूर्वार्द्ध निन्दा परक और उत्तराखं स्तुति परक है । इसके दो अर्थ किये गये हैं-अधिया और अधिदेव । प्रथम अर्थ में यह कहा गया D D . निरुक्त एकादशाध्यायस्य पश्चमः खण्डः । (१४६३) है कि, जो अयज्वा है, यज्ञ नही करनेवाला है उस का निचोड़ा हुआ सोम सोम नहीं है और सोम के पान करनेवाला सोमपा नहीं है । यह अयज्ञ तथा अयज्वा की निन्दा है । और जो यज्वा यज्ञ में विधिवत् सोम निचोड़ता है । उस का निचोड़ा हुआ सोम सोम है और उस सोम का पान करनेवाला सोमपा है । यह यज्ञ तथा यज्वा की प्रशंसा है । इस प्रकार यज्ञ की प्रशंसा होने से यह अर्थ अघियज्ञ कहलाता है । द्वितीय अर्थ में यह कहा गया है कि जो यह कहता है कि, में सोमपा हूँ । सोम का पान किया है । सो समोचीत नहीं, क्योंकि, सोम का अर्थ चन्द्रमा है। उसका पान कोई अदेव अर्थात् जो देव नहीं है वह नही कर सकता है । यह अदेव को निन्दा है और जो देव है वही सोम का पान कर सकता है । यह देव की प्रशंसा है। इस प्रकार देव को प्रशंसा होने से यह अर्थ अघिदेव कहलाता है । अथैपाऽपरा भवति । चन्द्रमसो चैतस्य वा । इति निरुक्त एकादशाध्यायस्य चतुर्थः खण्डः । ११ - ४ ।। अथ = और, एपा - यह, अपरा = दूसरी ऋचा, भवति = है जो, चन्द्रमसः वा = चन्द्रमा है, वा = अथवा, एतस्य = इस सोम की है। अथ निरुक्त एकादशाध्यायस्य पञ्चमः खण्डः । यत्त्वा देव प्रपिवन्ति तत आ प्यायसे पुनः । वायुः सोमस्य रक्षिता समानां मास आकृतिः ॥ ऋ. सं. ८-३-२०-५ ।। तव तुम, पुनः इस ऋचा का सविता की पुत्री सूर्या ऋषि, अनुष्टुप् छन्द और सोम देवता है। मन्त्रार्थ- सोम के अर्थ दो हैं। एक ओषधि विशेष और दूसरा चन्द्रमा। उनमें बोपघि पक्ष में मन्त्र का यह अर्थ है-देव - है सोम देव !, यत - जब, त्वा = तुम्हें, ऋत्विक तथा यजमन लोग तीनों सवनों में (प्रातः सवन, मध्याह्न सवन और सायं सवन में), प्रपिबन्ति = पान करते हैं, ततः - फिर, आप्यायसे = वृद्धि को प्राप्त होते हो। वायुः = वायु, सोमस्य - तुम सोम का, रक्षिता = रक्षक है। वायु शेषिक है। वह तुम को सुखाता नहीं है। रक्षा करता है। मासः = मोम, समानाम - संवत्सरो की, माकृतिः - आकृति है । व्यवच्छेक है। चन्द्रमा पक्ष में- देव - हे चन्द्र देव !, यत् = जब, त्वा = तुम्हे, कृष्णपक्ष में सूर्य की रश्मियां, अपिबन्ति - पान कर जाती हैं, ततः - तव तुम, पुनः फिर शुक्लपक्ष में कलामो से, आप्यायसे = बढ़ जाते हो। वायुः = वायु, सोमस्य तुम चन्द्र का, रक्षिता == रक्षक है । वायु के साथ चन्द्र आकाश में चलता है और वायु कला की वृद्धि में सहायक है। अतः वायु चन्द्र का रक्षक है। मासः - चन्द्रमा द्वारा परिच्छेद को प्राप्त बारह मास, समानाम् संवत्सरों की, आकृतिः - आकृति है। बारह महीना यही वर्ष का आकार है। 5 --- निरुक्ते एकादशाध्यायस्य पैश्चमः खण्डः । भाव यह है कि, सोय रूप वनस्पति के सोलह पत्ते होते हैं। कृष्णपक्ष में प्रतिदिन उस के एक एक पत्ते गिरते रहते हैं। अमावस्या को उस का एक पत्र शेष रह जाता है। पुनः शुक्लपक्ष में 'प्रतिदिन उस के एक एक पत्ते उत्पन्न होते रहते हैं । पूर्णिमा के दिन वह पूर्ण सोलह पत्ता वाला हो जाता है। यही सोम ओपघि का पहचान है। इधर चन्द्रमा मैं सोलह कलाये होती हैं । कृष्णपक्ष में प्रतिदिन 'उसकी एक-एक कला क्षीण होती रहती है । अमावास्या को उस की एक कला शेष रह जाती है । पुनः शुक्लपक्ष में प्रतिदिन उस की एक एक कला वढतो रहती है। पूर्णिमा को वह पोडश कला सम्पन्न हो जाता है । इस दोनों पक्ष मिला कर एक मास होता है । और बारह मास का एक वर्ष होता है । इस प्रकार दोनों सोम वर्ष की आकृति हैं। इस का भाप्य- - " या देव प्रपिबन्ति तत आप्यायसे पुनः " इति नाराशंसानभिप्रेत्य । पूर्वपक्षापरपक्षाविति वा। देव = हे देव !, यत् जो, त्वा = तुम को, प्रपियन्ति = ऋत्विक आदि पीते हैं, ततः = इस से तुम, पुनः फिर, आप्यायसे बढते हो, इति यह व्याख्या, नाराशंसान् नाराशसो के, अभिप्रेत्य = अभिप्राय से है। इस में सोम को मनुष्य पीते हैं और यह बढता है। इस लिये मनुष्यों के सम्बन्ध से यह व्याख्या अघियज्ञ पक्ष का है। वा = अथवा, पूर्वपक्षी अपरपक्षौ इति = ये पूर्वपक्ष = शुक्लपक्ष और अपरपक्ष - कृष्णपक्ष हैं । हे देव चन्द्र !, यद - जब अपर पक्ष - कृष्णपक्ष आता है तब, स्वा = तुम को, रश्मियां, प्रपिवन्ति पीती हैं, ततः - इस से तुम, पुन: = फिर, पूर्वपक्ष = शुक्लपक्ष में, आप्ययसे = बढते हो। यह अधिदेव पक्ष की व्याख्या है। "वायुः सोमस्य रक्षिता"। वायुमस्य रक्षितारमाह । साहचर्याद् रसहरणाद् वा । वायुः = वायु, सोमस्य सोम का, रक्षिता = रक्षा करनेवाला है। मन्त्रद्रप्टा ऋषि, वायुम् - वायु को, अस्य = इस सोम की, रक्षितारम् - रक्षा करने वाला, आह = कहता है । साहचर्याद ओषधि रूप सोम तथा चन्द्र रूप सोम दोनो वायु के साथ रहने से, वा = अथवा, रसहरणात् * रस के हरण से घायु सोम का रक्षक है । मन्त्र का यह पाद दोनों पक्षमें समान है। समाना-संवत्सराणां मास आकृतिः सोमो रूपविशेषरोपधिश्चन्द्रमा वा । मास: = ओषधि रूप सोम और चन्द्र रूप सोम दोनो, समानाम् = सम्वत्सराणाम् वर्ष की, माकृतिः - माकृति हैं । क्योकि, सोमः ओषधिः या चन्द्रमा - ओपषि सप सोम और चन्द्र रूप सोम दोनों, रूपविशेषः अपने अपने रूप विशेष से अर्थात् अपने रूपों के भेद से, संवत्सरों का निर्माण करने वाले है । पूर्वोक्त प्रकार से सोमवेलो पत्तो के घटने वढने से और चन्द्र कला के घटने बढने से दोनों सम्वत्सर के निर्माता हैं। चन्द्रमाः । 'चन्द्रमस्' यह चन्द्र का नाम है । मध्यम देव है । इसका निर्वधन ऋपि करते हैं- ॥ T -- निरुक्त एकादशाध्यायस्य पश्चमः खण्ड! । 5 चन्द्रमाश्चायन्द्रमति । चन्द्रो माता । चान्द्रमानमस्येति वा । चायन् देखते हुए जो, द्रमति - चलता हो वह, चन्द्रमाः = चन्द्रमा कहलाता है । अर्थात् 'चायति इति चायन्' इस विग्रह में घातूनामनेकार्थत्वाइ दर्शनार्थक 'चाय पूजानिशामनयोः' धातु से लट्, शत, प्रथमा एक वचन में चायन् । और 'चायन् द्रमति पश्यन्गच्छति इति चन्द्रमाः विग्रह में चायन् उपपद. “इम गतो' धातु से 'सर्वधातुभ्योऽसुन्' इस उणादि सूत्र से असुन (अस्) प्रत्यय, चायन् द्रम् अस्, पृषोदरादित्वात् चायन् को चन् भाव { आदेश ) होने पर, चन्द्रम् अस्, चन्द्रमस् शब्द बना है । चन्द्रमा का नाम है। क्योंकि, चन्द्रमा ऊपर रह कर सर्वभूतों को देखता हुआ आकाश में गमन करता है। 17 . चन्द्रः = चन्द्र जो, भाता = निर्माता = कालमान का कर्ता वह, चन्द्रमाः - चन्द्रमा कहलाता है। अर्थात 'चन्द्रश्चासौ माता चेति चन्द्रमाः' इस विग्रह में चन्द्र शब्द उपपद 'माङ् माने शब्दे च' धातु से 'चान्द्रे मो डिव' इस उणादि सूत्र से असुन् ( अस् ) प्रत्यय, हित्त्वात् टिलोप होने पर, चन्द्र म् अस, चन्द्रमस शब्द बना है। चन्द्रमा का नाम है। क्योंकि, चन्द्रमा सब का निर्माता है। विशेष कर कालमान का वर्ता तो है ही। %3D वा = अथवा, अस्य - इस का, चान्द्रम् - चन्द्रसंबन्धी, मानम् - इस लिये, चन्द्रमाः = चन्द्रमा कहलाता है। अर्थात् 'चान्द्रम् मानम् यस्य इति चन्द्रमाः' इस विग्रह में पूर्ववत चान्द्र उपपद माङ् धातु से असुन् प्रत्यय, डित्त्वात् टिलोप, छान्दसत्वात् चान्द्र यो हस्व होने पर चन्द्रमस् शब्द बना है । चन्द्रमा का नाम है । क्योंकि, इस का चन्द्र शम्बन्धी मान है। इस प्रकार चन्द्रमस शब्द का तीन प्रकार से निर्वचन क्रिया है। प्रथम पक्ष में 'चाय' और 'द्रम्' इन दो धातु से चन्द्रमस् शब्द बना है। द्वितोय पक्ष में चन्द्र उपपद माङ् धातु से कर्मधारय समास होकर चन्द्रमस् शब्द बना है। और तृतीय पक्ष में कर्मधारय नहीं किन्तु बहुव्रीहि समास है। निर्वचन के प्रसङ्ग में आया हुआ चन्द्र शब्द का निर्वचन करते है- चन्द्रश्चन्दतेः कान्तिकर्मणः। चन्दनमित्यप्यस्य भवति । कान्तिकर्मणः = कान्त्यर्थक, चन्दतेः - चन्द धातु से, चन्द्रः = चन्द्र शब्द बना है। बर्याद .'चद्यते काम्यते इति चन्द्रः इस विग्रह में 'दि आह्लादे' धातु से, "फायितधि' इत्यादि उणादि सूत्र से रफ (२) प्रत्यय होने पर, चन्द् र, चन्द्र शब्द बना है। चन्द्रमा का नाम है। क्योंकि, यह नित्यकान्त होता है। चन्दनम् इति अपि = चन्दन यह पद भी, अस्य - इसी चदि धातु का बना हुआ, भवति - है। अर्थात् “चद्यतेकाम्यते इति चन्दनम् ' इस विग्रह में पदि माहादे धातु से 'ल्युट च' इस सूत्र से ल्युट (यु) प्रत्यय, 'पुवोरनाको' इस सूत्र से यु अन आदेश, चन्द मन, 'चन्दन' शब्द बना है। मलयज मलयागिरि चन्दन का नाम है। क्योंकि, वह भी कान्त ही होता है। अथवा- - (१४६६) निरुक्त एकादशाध्यायस्य पष्ठः खण्डः । चारु द्रमति चिरं द्रमति । चमेर्वा पूर्वम् । चारु ८ सुन्दर, द्रमति = द्रमण = गमन करता है इस लिये चन्द्र कहा जाता है । चिरम् चिर काल तक, द्रमति = द्रमण ( गमन) करता है इस लिये चन्द्र कहलाता है। वा = अथवा, - चम धातु, पूर्वम् - पूर्व और दम धातु उत्तर होने से चन्द्र शब्द बना है , चारुद्रम- चारन्द्र-चन्द्र । चिरद्रम्-चिरन्द्र-चन्द्र पृपोदरादित्वात् । चम् + द्रम् + 5 ~ चन्द्र । निर्वचन प्रसक्त चार शब्द का निर्वचन करते है- चारु - रुचोर्विपरीतस्य । रुचे: = रुच दीप्तौ' धातु के, विपरीतस्य मादिअन्त विपर्यय से बना हुआ, चार चार शब्द है । यह भी पृपोदरादित्वात् समझना चाहिये । तस्यैषा भवति । इति निरुक्त एकादशाध्यायस्य पञ्चमः खण्डः ॥ ११ - ५॥ तस्य = उस चन्द्रमा की, एपा - यह आगे आने वाली ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्ते एकादशाध्याययस्य पष्ठः खण्डः । नवो नवो भवति जायमानोऽही केतुरुपसमित्ययम् । भागं देवेभ्यो वि दधात्यायन् प्र चन्द्रास्तिरते दीर्घमायुः ॥ ऋ. सं. ८-३-२३-१९ ॥ इस मन्त्र का सूर्या ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और चन्द्रमा देवता है। मन्त्रार्थ-यह चन्द्रमा, जायमानः शुक्लपक्ष में प्रतिदिन जायमान अर्याद एक एक कला के आधिक्य से उत्पन्न होता हुआ नयः नवः = नया नया, भवति = होता है । तथा कृष्णपक्ष में प्रतिपदा आदि तिथियों में चन्द्र की कला के हासवृद्धि के अधीन होने से, अह्नाम् = दिनों के, केतुः = प्रज्ञापक (सूचक) चन्द्रमा, उपसाम् = उपायों के, अग्रम् = मागे, एति = चलता है। देवेन्यः - देवतामों को, भागम् : हविर्मा, विदधाति = विधान करता है = देता है इस प्रकार प्रतिदिन, आयन - आता हमा, चन्द्रमाः = चन्द्रमा देय, दीर्पम् आयुः तिरते = दीर्घ आयु प्रदान करता है = आयु की वृद्धि करता है। कोई मन्त्र के द्वितीयपाद का देवता आदित्य है ऐसा कहते हैं और इस का अर्थ आदिश्यपरक करते हैं-बह्नाम् दिवसों के, केतुः प्रज्ञापक आदित्य, उपसाम् = उपायों के, अग्रग = आगे, एति चलता है। इस मन्त्र का भाप्य- निरुक्त एकादशाध्यायस्य षष्ठः खण्डः । (१४६७) a "नयो नवो भवति जायमानः" इति पूर्वपक्षादिमभिप्रेत्य ! "अहां केतुरुपसमित्यग्रंम्" इत्यपरपक्षान्तमभिप्रत्य । यह चन्द्रमा, जायमाना = उत्पन्न होता हुमा, नव: नवः - नया नया, भवति - होता है, इति - यह, पूर्वपक्षादिम् = शुक्लपक्ष के उदय के, अभिप्रेत्य = अभिप्राय से कहा है । बह्नाम् दिवसों के, केतुः = प्रज्ञापक, उपसाम् = उपानों के, अग्रम् आगे, एति - चलता है, इति - यह, अपरपक्षान्तम् = कृष्णपक्ष के अस्त के अभिप्राय से कहा है। मन्त्र के द्वितीय पाद के विषय जो किसी का मत दिखाया गया है उसी को कहते हैं- आदित्यदेवतो द्वितीयः पाद इत्येके । आदित्यदेवत: - आदित्य देवता वाला, द्वितीय: पाद = मन्त्र का द्वितीय पाद है, इति - यह, एके = कोई बाचार्य कहते हैं। दिनों के सूचक आदित्य है । चन्द्रमा नहीं यह उन का कहना है । ४ सर्वमारक मध्यमदेव का नाम मृत्यु है । जिस को मध्यम प्राण और यमराज भी कहते हैं । वह अन्तिम श्वास काल में प्राणी को प्राण से वियोग कराता है। वही प्राणी को वर्तमान शरीर से वियोग करा कर भावो शरीर के साथ संयोग भी कराता है। भाष्यकार इस का निर्वचन करते हैं- मृत्युर्मास्यतीति सतः । मारयति इति सतः = अन्तर्भावित व्यर्थक मृङ् धातु से, मृत्युः - मृत्यु शब्द बना है। अर्थाद 'मारयति इति मृत्युः यमः मध्यमो देवः' इस विग्रह में अन्तर्भावित प्यर्थक 'मृ प्राणत्यागे' धातु से 'युजिमृङ्भ्यां युक्त्युको ' इस उणादि सूत्र से त्युक् (यु) प्रत्यप होने से मृत्यु शब्द बना है । यम का नाम है। क्योंकि, वह जब प्राणो को मारता है तव प्राणी मरता है। मृतं च्यारपतीति वा शतबलाक्षो मौद्गल्यः । वा = अथवा, मृतम् = मृत प्राणी को, च्यावयति अन्य किसी योनि में ले जाता है, इस लिये यम मृत्यु कहा जाता है, इति यह, मौहल्यः = मुद्गल के पुत्र, सतबलाक्षः = सतवलाक्ष नामक अपि कहते हैं । अर्थात 'मृतं च्यावयति इति मृत्युः' इस विग्रह में मृत शब्द उपपद पन्त 'ज्युद्ध गतो' पातु से 'अध्यादयः' इस उणादि सूत्र के निपातन से उ प्रत्यय, मृत घ्यावी उ, मृत के तकार के अकार का लोग और व्यावी को य् भाव होने पर, मृत् य उ, मृत्यु शब्द बना है। सर्वहर यम का नाम है। क्योंकि, वह अन्तकाल के समय प्राणो को वर्तमान शरीर से निकाल कर भावो शरीर में पहुँचा देता है।' - । . - 1 (१४६८) निरुक्ते एकादशाध्यायस्य सप्तमः खण्डः । शतबल शब्द बहुबलाईक है । 'शतवलानि बहुवलानि अक्षाणि इन्द्रियाणि यस्य स शतबलाक्षः' इस विग्रह में 'अनेकमन्यपदार्थे ' इस सूत्र से बहुव्रीहि समास होने पर शतबलाक्ष शन बना है। जिस को आँखों में बड़ा बल हो वह तत्त्वदर्शी शतबलाक्ष कहा जाता है । मुद्गलस्य अपत्यं मौद्गल्या' इस विग्रह में मुद्गल शब्द से 'गगादिम्यो यम्' इस सूत्र से अपत्य अर्थे यन् (य) प्रत्यय, आदि अच् वृद्धि, यस्येतिच लोप होने पर मौदल्य शब्द बना है। तस्यैपा भवति । इति निरुक्ते एकादशाध्यायस्य पष्ठः खण्डः ।। ११-६ ।। तस्य = उस मृत्यु का, एपा यह अग्रिम ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्त एकादशाध्यायस्य सप्तमः खण्डः । पर मृत्यो अनु परेहि पन्थां यस्ते स्त्र इतरो देवयानात् । चक्षुष्मते -शृण्वते ते ब्रवीमि मा नः प्र॒जां रीरिपो मोत वीरान् ॥ D क सं. ७-६-२७-१॥ दूसरा, स्वः = अपना मार्ग इस मन्त्र का यमपुत्र संकुसुक ऋषि, जगती छन्द और मृत्यु देवता है। मन्त्रार्थ--मृत्यो हे मृत्यु ! तुम हमें, परम् = सर्वोत्कृष्ट, अनपन्याम् = पितृयाण मार्ग को मोर, परेहि = ले चलो! यः = जो, ते = तुम्हारा, देवयानात् = देवयान मार्ग से, इतरः = है, चक्षुष्मते = देखने वाले और शृण्वते = सुनने वाले, ते तुम से में, ब्रवीमि • कहता हूँ कि, तुम, न: हमारी, प्रजाम् = सन्तानों को, मा रीरिषः जन्म मरण रूप मार्ग की ओर ले जा कर नष्ट न करो। उत - और, मा वीराद • हमारे वीर पुत्रादि पुरुषों को बुरे मार्ग से ले जा कर नष्ट न करो। इति सा निगदव्याख्याता । इति सा - 'परं मृत्यो अनु' यह कृपा, निगदव्याहाता = पाठ पात्र से पाख्यात है । सुलभ होने से इसका भाष्य नहीं किया जाता है। विश्वानरः। स्मरण रहे कि, निरुक्त मत में तीन हो देवता हैं। पृथिवीस्थान अग्नि, मध्यम अन्तरिक्ष स्थान वायु और घुस्थान आदित्य । अन्य सब देवों का इन्ही तीनों के अन्दर अन्तर्भाव है । अतः यहां विश्वानर का अर्थ इन्द्र है। जो मध्यम देव वायु के अन्दर आ जाने से यह भी मध्यम देव है। 'विश्वान नरति इति विश्वानरा इन्द्रः' इस विग्रह में विश्व उपपद " नये' धातु 'कर्मण्यम्' इस सूत्र से अण् (अ) प्रत्यय, 'उपपदमति' इस सूत्र से समास, सुटलुक, से निरुक्त एकादशाध्यायस्याष्टमः खण्डः । (१४६९) नरेसंज्ञायाम् ' इस सूत्र से विश्व के अकार को दीघं होने से विश्वानर शब्द बना है। इन्द्र का नाम है। क्योंकि, इन्द्र सव का नेता है। यास्क कहते हैं- विश्वानरो व्याख्यातः । विश्वानरः = विश्वानर शब्द, व्याख्यातः = व्याख्यात है । अर्थात् इसकी व्याख्या हो चुकी है (नि० ७-२१)। तस्यैपा भवति । इति निरुक्त एकादशाध्यायस्य सप्तमः खण्डः ॥ ११-७॥ तस्य = विश्वानर को, एपा = यह अग्रिम जवा, भवति मथ निरक्त एकादशाध्यायस्याष्टमः खण्डः । प्र वो महे मन्दमानायान्धसोऽर्चा विश्वानराय विश्वाभुवे'। इन्द्रस्य यस्य सुमखं सहो महि श्रवो नृम्णं च रोदसी सपर्यतः ॥ ऋ. सं. ८-१-९-१॥ इस ऋचा का वैकुण्ठ इन्द्र ऋषि, जगतो छन्द और वैकुण्ठ इन्द्र ही देवता मी है । मन्त्रार्थ- हे स्तोता!, बः = तुम, महे = महान्, अन्धसः - सोम से, मन्दमानाय = मोदमान, विश्वाभुवे : सर्व का भावयिता, विश्वानराय = सर्व के नेता इन्द्र की, प्रमर्च = : स्तुति करो। यस्य इन्द्रस्य = जिस इन्द्र के, सुमखम् = सुन्दर महनीय, सहः - बल, महि = महान, श्रवः = अन्न, च - और, नृष्णम् = सुख को, रोदसी द्युलोक तथा पृथिवी लोक सब, सपर्यतः - प्रशंसा करते हैं। इस मन्त्र का भाष्य- प्रार्चत यूयं स्तुति महते अन्धसोऽन्नस्थ दात्रे मन्दमानाय मोदमानाय स्तूयमानाय शब्दाय मानायेति वा विश्वानराय सर्व विभूतायेन्द्रस्य यस्य प्रीती सुमहदलं महन्ध श्रवणीय यशो नृम्णं च बलं नृनतं, यावापृथिव्यो का परिचरत इति । कमन्यं मध्यमा- देवमवक्ष्यत् । है स्तोता!, पूपम् - तुम, महते - महान्, अन्धसः = अन्यसः अन्नस्य - सोम रूप धन के, दाने = दाता, मन्दमानाय - मोदमानाय = हर्ष किये जाते हुए, स्तूपमानाय = स्तुति करते हुए, या • अथवा, मादायमानाय - शब्द करते हुए, सर्वम् विभूताय = सर्व का भावयिता, विश्वानराय : इन्द्र को, स्तुतिम् प्रार्चत - स्तुति पूजा करो। यस्य इन्द्रस्य - जिप्स इन्द्र की, प्रीती = प्रीति - प्रसन्नता मे, सुमहदलम् - सुन्दर महनीयं बल को, महद श्रवणीययश: - महान मुनने योग्य पर को, .
(१४७०) 'निरुक्ते एकादशाध्यायस्य नवमः खण्डः । च = और, नृम्णम् बलम् = मानुपिक बल को, नृन् नतम् = मनुष्यों के प्रति विशेषरूप से झुकी हुई, वः = तुम्हारी स्तुति को सव कोई, द्यावापृथिव्यौ = द्यावापृथिवी पर्यन्त, परिचरतः = सेवा पूर्वक सराहना करते हैं। इति = यह मन्त्र, मध्यमात् = मध्यमदेव इन्द्र से, अन्यम् = अन्य, कम् किस देव को, एवम् = इस प्रकार, अवक्ष्यत् = कहता? । अर्थात् किसी को नहीं । तस्यैपाऽपरा भवति । इति निरुक्ते एकादशाध्यायस्याष्टमः खण्डः । ११-८॥ तस्य = उस विश्वानर की, एपा = यह, अपरा - दूसरी ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्त एकादशाध्यायस्य नवमः खण्डः । उदु ज्योतिरमृतं विश्वज॑न्यं विश्वानरः सविता देवो अश्रेत् । ऋत्वा देवानामजनिष्ट चक्षुराविरंकर्भुवन विश्वमुषाः ॥ . सं. ५-५-२३-१॥ इस मन्त्र का वसिष्ठ ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और, पूर्वार्ध का विश्वानर तथा उत्तरार्ध का उषा देवता है । यास्क ने आधी ऋचा उद्धृत की है। सम्पूर्ण लिख कर मन्त्रार्थ किया जाता है--सविता- सर्व को कर्म में प्रेरणा करने वाले, विश्वानरः देवः = विश्वानर वायु रूप इन्द्र देव ने, विश्वजन्यम् सर्व जनों के लिये हित, अमृतम् ज्योतिः = अमर ज्योति को, उद् अश्रेत - ऊपर उठाया । उपा: = वह उपा, देवानाम् = देवो के अर्थात् दिव्य यजमानो के, ऋत्वा = याग के अनुष्ठान के लिये, चक्षुः = उपा-ज्योति रूप से, अजनिष्ट = प्रगट हुई। उपाः = वह उपा, विश्वम् भुवनम् । सम्पूर्ण चतुर्दश भुवनो को, आविरक: प्रकाशित करने वाली है। इस मन्त्र का भाप्य- - वायु रूप इन्द्र देव ने, उदशिश्रयज्जोतिमृतं सर्वजन्यं विश्वानरः सविता देव इति । सविता- सब को फर्म में प्रेरणा करने वाले, विश्वानरः देवः सर्वजन्यम् = सर्व जनों के लिये हित, अमृतम् ज्योतिः = अमर ज्योति को, उद् अशिश्रयद = अपर को उठायो। यह पूर्वाद्धआधी ऋचा का भाष्य है। यास्क ने इतना का उद्धरण किया है। पयोंकि, इतना ही का देवता विश्वानर है। धाता। धाता मध्यम देव ब्रह्मा का नाम है। क्योकि, वह सर्व का विघाता स्रष्टा है। 'दधाति सर्व सृजति इति घाता - विधाता मध्यमदेवः' इस विग्रह मे 'दुधात्र धारणपोषयोः' पातु वुल्तृचौ' इस सूत्र से तृच (१) प्रत्यय होने पर घातृ शब्द वना। मध्यम देव विधाता का नाम है। क्योकि, वह सब को सृजता है। इसी को कहते हैं- से (१४७१) निरक्त एकादशाध्यायस्य दशमः खण्डः । धाता सर्वस्य विधाता। सर्वस्य = सव का, विधाता = करने वाला, धाता = पाता कहलाता है। तस्यैषा भवति । इति निरुक्ते एकादशाध्यायस्य नवमः खण्डः ॥ ११-९ ।। तस्य - उस धात का, एपा यह अग्रिम मावा, भवति - है- अथ निरुक्त एकादशाध्यायस्य दशमः खण्डः ।। धाता ददातु दाशुषे प्राची जीवातुमक्षिकाम् । वयं देवस्य धीमहि सुमति सत्यधर्मणः ॥ अ. स. ७-१७ ॥ 'इस- मन्त्र का वामदेव ऋपि, अनुष्टुप् छन्द और घातृ देवता है । मन्त्रायं-पाता - धातृदेय, दाशुषे = हविर्दान करने वाले के लिये, प्राचीम् = बढी हुई, अक्षिकाम् = अक्षय अर्थाद कभी न खुटने वाली, जीवातुम् = जीविका को, ददातु = देखें। क्यम् - और हम उस, सत्य धर्माणः सत्य धर्म वाले, देवस्य = देव की, सुमतिम् = शुमबुद्धि को, धीमहि - धारण करें। इस ऋचा में शुभ बुद्धि के लिये घातृदेव से प्रार्थना है । अतः इस का देवता धातृदेव है। इस मन्त्र का भाष्य- धाता ददातु दाशुपे दत्तवते प्रवृद्धा जीविकामनुपक्षीणां वयं देवस धीमहि सुमति कल्याणी मति सत्यधर्मणः । . धाता - मध्यमस्थान धातृदेव, दाशुपे = दत्तवते - हवि दान करने वाले हम यजमानों के लिये, अनुक्षीणाम् = अक्षय, प्रवृद्धाम् - बढी हुई, जीविकाम् = जीविका को, ददातु - देवें और, वयम् - हम, सत्यघमणः सत्यधर्म वाले, 'देवस्य = घातृ देव को, सुमतिम् - कल्याणीम् मतिम् = शुभ बुद्धि को, धीमहि = धारण करें। ७-विधाता। मध्यमस्थानक देव विशेष का नाम -विधाता है । विसो टोकाकार ने विधाता का अर्थ यमराज किया है । सायण ने मो 'विधाना एतत्सक देव' यही यह घर छोड़ दिया है । अस्तु । विशेपेण दधाति इति विधाता'' इस विग्रह मे विपूर्वक 'डुबाश पारणपोषण:' पातु से पूर्वपद तृच् प्रत्यय होने पर विधात धन्द बना है । एतस्माक एक मध्यमस्थान देव है। धारक कहते हैं- D (१४७२) निरुक्त एकादशाध्यायस्यैकादशः खण्डः । विधाता-धात्रा व्याख्यातः । विधाता - विधातृ शब्द, धात्रा = घातृ शब्द से, व्याख्यातः = व्याख्यात है। अर्थात् धातु शब्द जैसे तृच् प्रत्ययान्त बना है वैसे ही विधातृ शब्द भी बना है। इस में केवल वि उपसर्ग अधिक है। तस्यैप निपातो भवति बहुदेवतायामृचि । तस्य = उस विधाता का, एषः = यह, बहुदेवतायाम् = बहुत देवताओं की, प्राचि = ऋचा में, निपातः निपात है। इति निरुते एकादशाध्यायस्य दशमः खण्डः ॥ ११-१० ।। अथ निरुक्ते एकादशाध्यायस्यकादश: खण्डः । सोमस्य राज्ञो वरुणस्य धर्माण बृहस्पतेरनुमत्या उ शर्मणि । तवाहमद्य मघवन्नुपस्तुतौ धातर्विधातः कलशाँ अभक्षयम् ॥ क्र. सं. ८-८-२५-३ ॥ इस मन्त्र का विश्वामित्र ऋषि, जगती छन्द और इन्द्रादि बहुत देवता हैं। मन्त्रा- मधवन = हे मघवन् इन्द्र !, राज्ञः सोमस्य यरुणस्य - राजा सोम और वरुण के, धर्मणि - धर्म में प्रवृत्त, पातः - हे घातृदेव !, वृहस्पतेः शमणि = वृहस्पति के आश्रय में स्थित और, विधातः । हे विधातृ देव !, अनुमत्याः शमणि = अनुमति के आश्रय में स्थित, अहम् = मैने, अद्य = माज, तुम्हारी, उपस्तुती = उपस्तुति में, कलशान् अमक्षयम् = सोम कलश का पान किया है । इस ऋचा के सोभ, वरुण, बृहस्पति, अनुमति, पाता और विधाता ये सब देवता हैं । अतः इस में प्रकृति विधाता भी मा गये हैं। तव : इस मन्त्र का भाष्य-- B यम्पनुशाठ मैंने, इत्येताभिर्देवताभिरभिप्रसता सोमकलशानमक्षयमिति । - इस प्रकार, एताभिः देवताभिः = इन देवताओं से, अभिप्रसूतः सोमकलशान - सोमकलों का, अमक्षयम् - भक्षण किया था। इति - इरयः। फलश: कस्मात् । कला अस्मिन शेरते मात्राः । प्रभ-कस्मात किस पातु से कौन प्रत्यय करने से, कलश: - बाला राम बना है। उत्तर-अस्मिन् = इस में (कलश में) सोम को, क्लाः = मात्रा: = कुछ मात्रायें, शेरते - सोम के निकाल लेने पर भी शेष बनी रहती हैं। इस लिये कलश कहा जाता है। अर्थात् 'कलाः मात्रा: 3 , - . . नियक्त एकादशाध्यायस्य त्रयोदशा खण्डः । (१४७१) शेरते अवशिष्यते इति कलश:' इस विग्रह में कला शब्द उपपद 'शोङ् स्वप्ने' धातु से उणादि ड (अ) प्रत्यय, हित्वात् टिलोप और पृषोदरादित्वाद, कला को हस्व होने पर कलश' शब्द बना है। सोमपात्र का नाम है। क्योंकि, सोमरस को उस में से निकाल लेने पर भी उस में कुछ शेष लगा रहता है। प्रसंग से कहते हैं- कलिश्च कलाच किरता-विकर्ण मात्राः । इति निरुक्त एकादशाध्यायस्य द्वादशः खण्डः । ११-१२ ।। कलिन कलाश्च = कलि शब्द और कला शब्द, दोनों, किरतेः = 'कृ विक्षेपे' धातु से बना है। विकीर्णमात्रा:- कला किसी समुदाय में विक्षिप्त मात्राः अर्थात् फैलो हुई जैसी होती है। अर्थात् 'किरति विक्षिपति इति कलिः' इस विग्रह में 'कृ विक्षेपे ' धातु से 'सर्वधातुभ्यः इन्' इस उगादि सूत्र से इन् (इ) प्रत्यय, इ, रपर गुण, कर् इ, करि, पृषोदरादित्वाद र को ल होने पर कलि शब्द बना है। एवं 'किरति विक्षिपति इति कला' इस विग्रह में उसी कृ धातु से पचाद्यच्, के अ, रपर गुण, कर् अ, कर, टाप, दीपं, करा, पृषीदरादित्वात् र् को ल होने पर कला शब्द बना है। कलि और कला दोनों विक्षेपक हैं। अय निरुक्त एकादशाध्यायस्य त्रयोदशः खण्डः । अथातो मध्यस्थाना देवगणाः । अतः. विघातृ पद के निर्वचन के पश्चात्, मध्यस्थाना: = मध्यस्थान, देवगणा: = देवगण वाचक 'मरुतः ' आदि पदों की व्याख्या का यहाँ से, अथ - प्रारम्भ होता है । भाव यह है कि, दशम अध्याय के प्रारम्भ में यह कहा गया है कि, 'अथातो मध्यस्थाना देवताः' और यहां अर्थात एकादशवां अध्याय के तेरहवां खण्ड के प्रारम्भ में यह कह रहे हैं कि, 'अथातो मध्यस्थाना देवगणाः' इस से आराततः देखने से पुनरुक्ति प्रतीत होती है। परन्तु विचार करने पर पुनरुक्ति नहीं। क्योंकि, दशम अध्याय और ग्यारहवें अध्याय के बारहवें खण्ड में मध्यस्थान के 'वायुः' से लेकर 'पुरुरवा:' पर्यन्त बत्तीस पद और ग्यारहवां का तेरहवा खण्ड: में श्येनः' से 'विधाता' : पर्यन्त सात पद कहे गये हैं। वे सब एक एक देवता वाचक हैं । अतः सब एकवचनात हैं। अब यहां से अदि ग्यारहवां अध्याय के तेरहवां खण्ड में 'मरुतः' से लेकर 'आप्त्याः' पर्यन्त आठ पद मध्यस्थान के देवगण वाचक हैं अर्थात् एक देव के वाचक नहीं किन्तु देवताओं के गण - समूह वाचक है। अतः सभी पद बहुवचनान्त हैं। इन पदों से देवताओं को जाति तथा अवान्तर जाती कही जाती है। इन्ही की सूचना देते हुए भाष्यकार कहते हैं-'अथातो मध्यस्थाना देवगणाः'। अर्थात् मध्यस्थान देव नहीं किन्तु देवगण के वाचक 'मरुतः' आदि पद का निर्वचन का यहां से प्रारम्भ होता है। तेषां मरुतः प्रथमागामिनो भवन्ति । तेषाम् - उन देवगणों में, मरुतः = मरुत्, प्रथमागामिनः प्रथमगामी - पहले आने वाले, देव, भवन्ति हैं। क्योंकि, वृष्टि कर्म में प्रथम कार्य यही करते हैं। मन्द देव सब मिला कर ४९ हैं । अतः ये देवगण हैं । इसी लिये वहुवचनान्त है। . ।
(१४७४) निरुक्त एकाददाध्यायस्य चतुर्दशः खण्डः । : ८- मरुतः। मरत नाम वायु का है। ये सब मिला कर ४९ हैं। अतः देवगणों में से भी एक देवगण है । इसी लिये 'मरुतः' यह बहुवचन है । यास्क इसका निर्वचन करते हैं- मरुतो मितराविणो मितरोचिनो वा, महद् द्रवन्तीति वा । मितराषिणः = मित - थोडा - मन्द मन्द शब्द करने वाले, वा अथवा, मितरोधिनः थोड़ा प्रकाश करने वाले, मरुतः = मरुत् कहे जाते हैं। कोई भाष्य के पाठ में अकार छेद करके 'अमितराविणः' कहते हैं। उनके मत में, अमितसविणः बहुत शब्द करने वाले, तथा, अमितरोचिनः = बहुत प्रकाश करने वाले, मरुतः = मरुद कहलाते हैं। वा - अथवा, महद् द्रवन्ति महद् द्रवण करते हैं - बड़ी दौड़ लगाते हैं, इति • इस लिये, मरुतः = वायु मस्त कहे जाते हैं। अर्थात् 'मितं रुवन्ति स्तनयन्ति इति मारुतः' इस विग्रह में मित शब्द उपपद र शब्दे' धातु से कि च' इस सूत्र से किप् प्रत्यय, सर्वापहारी लोर, 'हस्वस्य पिति कृति तुक्' इस सूत्र से तुक (व) आगम, मित रु त. पृषोदरादित्वाद मित को म भाव होने पर मरत' शब्द बना है। 'मरुतः' यह जस् का रूप है । "मितं रोचन्ते इति मरुतः' इस विग्रह में मित उपपद 'रुच दीप्तावभिप्रीतोच' घातु से 'किप च' इस सूत्र से किए प्रत्यय ( 0 ), पृषोदरादित्वात् मित को ममाव और च को द होने पर मस्त शब्द बना है। अथवा 'महद् द्रवन्ति इति मरुतः' इस विग्रह में महः उपपद 'द्रुगतो' पातु से किप ( ० ) महद् द्रु, पोदरादित्वाव महद् को मभाव ह को वर्ण व्यत्यय, मरुद, द् को र होने पर मरत् शब्द बना है। तेपामेपा भवति । इति निरक्त एकादशाध्यायस्य त्रयोदशः खण्डः ।। ११-१३ ।। तेषाम् = उन मरुतों को, एपा = यह अग्रिम ऋचा, भवति अथ निरुक्त एकादशाध्यायस्य चतुर्दशः सण्डः । आ विद्युन्मद्भिर्मरुतः स्वर्के रथेभिर्यात ऋष्टिमद्भिरश्वपर्णः । आ वठिया न इपा वयो न पंतता सुमायाः ॥ म सं. १-६-१४-१॥ इस मन्त्र का गोतम ऋपि, प्रस्तापटि एन्द और मात् देवता है। मन्त्रार्थ-मातः - हे भरद्देवो! तुम सब, विद्युन्मद्धिः - विशिष्ट प्राग वाले, स्वः - मुन्दर गमन वाले वा मुन्दर पूजन वाले का सुन्दर किरणो वाले, प्टिमन्दिः आयुषों वाले या दुप्पाल के माय मरने वाले, सत्वपर्णी - अश्वरूप वाहनों वाले वा वच गिराने वाले, रमिः - रयों के द्वारा वा मेघों के द्वारा, .
निरुक्त एकादशाध्यायस्य पश्चदशः खण्डा ! (१४७५) आयात = आओ । सुमाया: = सुन्दर कर्मों वाले वा सुन्दर बुद्धि वाले मरुद्देवो!, वपिप्ठया = वडे श्रेष्ठ, हमें देने योग्य, इपा = अन्न के साथ, वयः न - पक्षियों के समान, आपप्तन = आओ। इस ऋचा में मरुदेवताओं का आवाहन है। इस मन्त्र का भाष्य- ! D - विद्युन्मद्भिर्मरुतः स्वकैः स्त्रश्चनैरिति वा स्वनैरिति वा स्वर्चिभिरिति वा। स्थैरायात ऋष्टिमद्भिरश्वपर्णैरश्वपतनैः । वर्षिष्ठेन च नोऽन्नेन वय इवापतत । सुमायाः कल्याण कर्माणो वा कल्याणप्रज्ञा वा ।।। मरुतः = हे मरुद्देवो! तुम सब, विद्युन्मद्भिर्मरुतः = विशिष्ट प्रकाश वाले, स्वः स्वश्चनैः । सुन्दर गमन करने वाले, स्वर्चनैः = सुन्दर पूजन वाले, इति वा = अथवा, स्वचिंभिः = सुन्दर किरणो वाले, ऋष्टिमद्भिः = आयुधो वाले वा दुष्कालके नाश करने वाले, अश्वपर्णः = अश्व रूप वाहनोवाले वा, अश्वपतनः = वन गिरानेवाले, रथे। = रथो के द्वारा, आयात - आओ। च और, पिष्ठेन। वहुत श्रेष्ठ, नः = हमारे लिये, अन्नेन = अन्न के साथ, वयः इव = पक्षियो के समान, आपतत : आओ । सुमाया: = कल्याणकर्मणिः = सुन्दर कर्मों वाले, वा = अथवा, कल्याणप्रज्ञाः = सुन्दर प्रज्ञावाले है मरुद्गण! । ९ रुद्राः । रुद्र शब्द का निर्वचन दशम अध्याय के पञ्चम् खण्ड में कर आये हैं । वहाँ भी मध्यदेव अर्थ है और यहां भी । वहाँ एक वचनान्त और यहां बहुवचनान्त है । इतना ही विशेष है । वहा ३२ पदों मे रुद्र तीसरा पद है। इसी को कहते हैं- रुद्रा व्याख्यावा । रुद्राः = रुद्र शब्द, व्याख्याताः = व्याख्यात है । अर्थात् इसकी व्याख्या नि. म. १० खं. ५ मे हो चुकी है। तेपामेपा भवति । इति निरुक्ते एकादशाध्यायस्य चतुर्दशः खण्डः ।। ११-१४ ।। तेपाम् % उन रुद्रों की, एपा यह अग्रिम अचा, भवति - है- अय निरुक्ते एकादशाध्यायस्य पञ्चदशः खण्डः । आरुद्रास इन्द्रवन्तः सजोषसो हिरण्यरथाः सुविताय गन्तन । इयं वो अस्मत्प्रति हयते मतिस्तृष्णजे न दिव उत्सां उदन्य' । ऋ सं. ४-३-२१-१॥
(१४७६) निरुक्ते एकादशाध्यायस्य पञ्चदशः खण्डः । इस मन्त्र का "यावाश्व ऋपि, जगती छन्द और मरवणं देवता है । मन्त्रार्थ-रुद्रासः - रुद्रदेवो। तुम लोग, इन्द्रवन्तः सजोषस: इन्द्र के साथ समान प्रीति वाले होते हुए वा इन्द्र नाम ऐश्वर्य से युक्त होते हुए, हिरण्यरथाः सुवर्ण रथ वाले, सुविताय - सुन्दर कर्म के लिये, भागन्तन = यह, अस्मत् = हमारी, मतिः = स्तुति, वः प्रति = तुम्हारे पास, हर्यते = जाती है। अतः, उदन्यवे तृष्णजे = जल को इच्छा करने वाले गोतम के लिये, दिवः = धुलोक से, मेघ के समान तुम माओ । + आओ । इयम् %3D उत्सा: न D , इस मन्त्र का भाष्य- रुद्रा: = आगच्छत रुद्रा इन्द्रेण सह जोपणाः। सुविताय फर्मण इयं वो अस्मदपि प्रति कामयते मतिः। तृष्णज इव उत्सा उदन्यव इति । हे रुद्रदेवो! तुम लोग, इन्द्रेन सह = इन्द्र के साथ, जोषणा: = प्रीति युक्त होते हुए, आगच्छत = माओ । सुविताय कर्मणे = सुन्दर कर्म के लिये आओ । पूर्वान्वयी । इयम् अस्मद् मतिः = यह हमारी स्तुति, अपि = भी, वः प्रति = तुम्हारे पास जाने के लिये, कामयते कामना करती है। तुमको चाहती है। उदयवे तृष्णजे = जल की इच्छा करने वाले गोतम के लिये, उत्साः इव = मेघ के समान, आओ। इति इत्यर्थः। मन्त्रप्रसक्त कृष्ण और उदन्यु शब्दों का निवंचन करते हैं- दष्णक् - तृष्यते, उदन्युरुदन्यतेः । तृष्यतेः = सृप धातु से, सृष्णक् - तृष्णज् शब्द बना है। अर्थात् 'सृष्यति पिपासात इति तृष्णक' इस विग्रह में “जितृषा पिपासायाम् ' धातु से 'स्वपितृपोर्नजिङ्' इस सूत्र से नजिङ (नज्) प्रत्यय, पृष् नज, डित्त्वात् गुणाभाव, ‘रपाभ्यां नोणः समान पदे' इस सूत्र से नकार को गकार होने पर कृष्णज् पाब्द बना है । मन्त्र में हप्णजे यह चतुथ्यन्त पद है । उदन्यतेः - उदन्य वयच प्रत्ययान्त नाम घातु से, उदन्युः = उदन्यु राब्द बना है । अर्पाव 'आरमना उदकमिच्छति इति उदन्यति, उदन्यति इति उदन्युः' इस विग्रह में 'सुप यात्मनः ययच् इस सूत्र से उदक शब्द से क्यच् (य) प्रत्यय, उदक य, अपनायोदयघना...' इत्यादि सूत्र के निपातन से, उदन्य, 'क्याच्छन्दसि ' इस सूत्र से उ प्रत्यय होने पर उदन्यु शब्द बना है। उदक अर्थात् जल की इच्छा करनेवाला अयं है। - नम: । मध्यमस्थान देवताओं के बहुत गण हैं। जैसे मरुद्रण एक देवताओं का गण है वैसे ही ऋभुगण भी एक देवताओं का गण है । गण में बहुत देवता होने से 'क्रमवः' यह बहुवचन है । भु शब्द मेघावी नामों में पाया है। वहां एकवचन है और यहां बहुवचन इतना ही भेद है। इसका निवंषन भाष्यकार करते हैं- ऋभु कहे निरुक्ते एकादशाध्यायस्य पोडशः खण्डः । (१४७७) ऋभव उरु भान्तीति वा, ऋतेन भान्तीति वा, ऋतेन भवन्तीति वा । बहुत, भान्ति = चमकते हैं, इति = इस लिये, ऋभवः = ऋभु कहलाते है । वा- अथवा, तेन = सत्य से वा यज्ञ से, भान्ति चमकते है, इति = इस लिये, ऋभवः = जाते हैं। वा = अथवा, ऋतेन = सत्य से वा यज्ञ से, भवन्ति = होते हैं, इति = इस लिये, ऋभव: - ऋभु नाम से प्रसिद्ध है। अर्थात् 'उरु बहु भान्ति दीप्यन्ते इति ऋभवः' इस विग्रह में उरु शब्द उपपद 'मा दीप्ती' धातु से 'मृगय्वादयश्च' इति उणादि सूत्र के निपातन से कु (3) प्रत्यय, उरु भा उ, पूर्वपद उरु के आदि लोप, रु भा उ, र को संप्रसारण ऋ, ऋ उ भा उ, उ का पूर्वरूप, ऋ भा उ, भा के अन्त लोप, र म उ, ऋभु शब्द वना है । ऋभु बहुत होने से 'ऋमः यह बहुवचनान्त है। अथवा ऋतेन सत्येन यज्ञेन भान्ति दीप्यन्ते इति अभवः इस विग्रह मे त शब्द उपपद 'भा दीप्ती' धातु से पूर्ववत् मृगय्यादित्वात् कु प्रत्यय, ऋत भा उ, ऋत के त का और भा के मा का लोप होने पर, म भ उ, 'ऋभु' शब्द बना है। अथवा, 'ऋतेन सत्येन भवन्ति इति ऋभवः' इस विग्रह में पूर्ववत् ऋत शब्द उपपद भू सत्तायाम्' धातु से उक्त उणादि सूत्र के निपातन से कु प्रत्यय, ऋत भू उ, ऋ के त का और भू के ऊ का लोप, ऋ - उ, 'ऋभु' शब्द बना है। तेपामेपा भवति । इति निरुक्ते एकादशाध्यायस्य पञ्चदशः खण्डः । ११-१५ ॥ तेषाम् = उन ऋभुओं की, एषा = यह आगे की ऋचा, भवति अथ निरुक्ते एकादशाध्यायस्य पोडश: खण्डः । विष्टवी शर्मी तरणित्वेन वाघतो मर्तासः सन्तों अमृतत्वमानशुः । सौधन्वना ऋभवः सूरचक्षसः संवत्सरे समपृच्यन्त धीतिभिः ॥ क्र. सं. १-७-३०-४॥ इस मन्त्र का कुत्स ऋपि, जगती छन्द और भुगण देवता है । मन्त्राप-वापता = मेधावी ऋभुओं ने ऋत्विजों के साथ मिल कर, शमी = याग दान होम रूप कर्मानुष्ठान, तरणित्वेन - शीघ्रता से, विष्टी = करके, मर्तासः = मरणधर्मा मनुष्य, सन्तः-हो कर भी, अमृतत्वम् = अमरत्व, मानशुः = प्राप्त किया था और देवत्व को प्राप्त हो कर, सौधन्वनाः = सुधन्वा के पुत्र वे, कमवः = भुगण, सूरचक्षसः - सूर्य के समान दीप्तिमान् होकर, संवत्सरे संवरसर में होने वाले वसन्तादि कालिक अनुष्ठेय यज्ञों में, धीतिभिः - अग्निष्टोमादि कमों के साथ, समपृच्यन्त संयुक्त हुए, हविर्भाग के योग्य हुए, अर्थात् हस्य के अधिकारी हुए। इस अवा में प्रभुओं की स्तुति है । इस मन्त्र का भाप्य- D अथवा - - सवत्सर मे होने वाले आङ्गिरस - हुए थे। (१४७४) निरुक्त एकादशाध्यायस्य षोडशा खण्डः । कृत्वा कर्माणि क्षिप्रत्वेन बोहारो मेधाविनो वा मर्तासः सन्तोऽमृतत्वमानशिरे सौधन्वना ऋभवः सूरख्यानाः सूरप्रज्ञा वा संवत्सरे समपृच्यन्त धीतिभिः कर्मभिः । मेधाविनः वोहारः मेधावी वा यज्ञ वहन करने वाले ऋभुओ ने ऋत्विजो के साथ मिल कर, कर्माणि कर्म अनुष्ठान, क्षिप्रत्वेन = शोघ्रता से, कृत्वा 3 करके, मर्तास. सन्तः = मनुष्य होते हुए भी, अमृतत्वम् आनशिरे = अमरत्व प्राप्त किया था और देवत्व को प्राप्त हो कर, सौधन्वनाः- सुधन्वा के पुत्र वे, कभव = ऋभुगण, सूरख्याना. = मूर्य के समान दीप्तिमान होते हुए, वा- सूरप्रज्ञा सूर्य के समान बुद्धि वाले होते हुए, सवत्सरे यसन्तादि कालिक अनुष्ठेय यशो मे, धीतिभि. कर्मभि अग्निष्टोमादि कर्मों के साथ, समपृच्यन्त ' सयुक्त हुए। मन्न मे आया हुआ 'सौधन्वनाः' पद के अर्थ बताते हैं- प्रभु-विवा - वाज इति सुधन्वन आगिरसस्य त्रयः पुत्रा बभूवुः । प्रभु विम्वा वाज भु, विभ्वा और वाज, इति = थे, आङ्गिरसस्य सुधन्वन सुधन्धा के, य. पुत्राः - तीन पुत्र, वभूवु तेषां प्रथमोत्तमाम्यां बवनिगमा भवन्ति न मध्यमेन । तेपाम् = उन मे, प्रथमोत्तमाभ्याम् = प्रथम (ऋभु ) और उत्तम अर्थात् सीसरे ( वाज) वे, यहवत् = बहुतो के समान, निगमा' = मन्त्र, भवन्ति = हैं । अर्थात् इन दोनों के नाम मन्त्रो मे बहुवचनान्त आते है। किन्तु, न मध्यमेन = मध्यम (विम्वा ) के नहीं। विम्वा के नाम बहुवचनान्त नही पाते हैं। तदेतद् ऋभोच बहुवचनेन चमसस्य च संस्तवेन यहनि दशतयीपु सूक्तानि भवन्ति । तदेतत् = सो यह, अभोः च बहुवचनेन - प्रभु के बहुवचन के साथ, च = और, चमसस्य सस्तवन चमस के सस्तव के साथ अर्थात् एक साथ स्तुति के साथ, दात योपु ऋग्वेद मे, बहूनि सूक्तानि = बहुत सूक्त, भवन्ति = हैं । आदित्यरश्मयोऽप्युभव उच्यन्ते आदित्यर मय = आदित्य को रमिया, अपि = भी, अभव = अम, उच्यन्ते - यही जाती हैं- आगोमस्य यदसम्तना गृहे उद्येदमोनानुगच्छय" ऋभव. - हे ऋभुओ!, यद् = जब तक, आगोह्यस्य = सूर्य के, गृहे = मण्डल में, यस्तनाः- तुम सोते रो, तद् - तर तप, अद्य = बाज, दम् = इस जगत को, न मनु गरछप - नहीं करते हो । सम्पूर्ण मन्त्र- - दध मण्डल मनुसरण (१४७९) निरक्त एकादशाध्यायस्य पोडशा खण्डः । उद्वत्स्वस्मा अकृणोतना तृणं निवत्स्वपः स्वपस्यया नरः । अगोह्यस्य यदसंस्तना गृहे तद्येद भवो नानु गच्छथ ॥ ऋ सं. २-३-६-११ ।। इस हो । यद् - - उस मन्त्र का दीर्घतमा ऋषि, जगती छन्द और अभु देवता है । मन्त्रार्थ-ऋभव. - हे प्रभूत दीप्तिशाली आदित्य रमियो ! तुम, नरः = नेता हो । अस्म = इन प्राणियों के लिये, उद्वत्सु = ऊँचे स्थान पर, तृणम् = व्रीहियव आदि तृण, अकृणोतन = उत्पन्न करते हो । स्वपस्यया : तत्कर्म करने की इच्छा से, निवत्सु = नीचे के प्रदेशो मे, अपः = जल, अकृणोतन = उत्पन्न करते = जब तक तुम, अगोह्यस्य गृहे = सूर्य मण्डल मे सोते हो, तत् = तव तक, अद्य इदम् - आज यह, न अनुगच्छथ = नहीं करना किन्तु अपना कार्य सिद्ध करना । इस मन्त्र में प्रभु का अर्थ मादित्य की रश्मियां है । अगोह्य आदित्योऽगूहनीयः, तस्य यदस्वपथ गृहे यावत्तत्र भवथ न तावदिह मवयेति । अगोह्यः - अगोह्य, धादित्यः आदित्य होता है। क्योकि, वह, अगृहनीयः अगूहनीय होता है । मादित्य किसी के छिपाने से छिपता नही है । इस लिये वह अगोह्य कहा जाता है ! वस्य - उस मादित्य की रश्मियां, यद् - तव तक, अस्वपथ - सोती रहती हैं अर्थाद, तर गृहे मादित्य मण्डल में, यावत् = जब तक, भवय । होती हैं, तावत् - तव तक, इह - यहाँ पृथियो पर, न भवथ = नही होती हैं । इति = इत्यर्थः । अङ्गिरसः । अङ्गिरस् यह ऋपि का नाम है । वे मध्यस्थान हैं । क्योकि, ऋषियों के रहने का स्थान स्वर्ग है। स्वर्ग मध्यम लोक । भाष्यकार कहते हैं- अङ्गिरसो व्याख्याताः । अङ्गिरस: = मङ्गिरस, गण, व्याख्याता. = व्याख्यात हैं। अर्थात् इन की व्याख्या निर. अ. ३ सं. १७ मे हो चुकी है । 'मनयन्ते अविष्यन्ते इति मङ्गिरसः' इस विग्रह मे • अगि गती' धातु से 'इदितो नुम् धातोः' इस सून से नुम् मागम, बाहुलवाद प्रोणादिक रसुन् (इरस् ) प्रत्यय होने पर अरिस् शब्द बना है। अपि गण का नाम है। क्योंकि, ज्वाला के शान्त होने पर अङ्गार में से पियो ने मन्वेपणकर के अङ्गिरा को प्राप्त किया पा! यह ग्या अनुपद उद्धत है-"ते अङ्गिरसः सूनवस्तै अग्नः परिजशिरे" (क म. ८-२-१-५) इस मात्र में प्रसिद्ध है। तेपामेपा भवति । इति निरुक्त एमादधाम्यायस्म पोटगः सर११-१६ ॥ सेपाम् - उन अङ्गिराओं को, एपा पह अग्रिम अचा, भवति = है- .
-ऋपयः%3 (३४८०) निरुक्त एकादशाध्यायस्योष्टादशः खण्डः । अथ निरुक्त एकादशाध्यायस्य सप्तदशः खण्डः । विरूपास इदृषयस्त इदम्भीरवेपसः । ते अङ्गिरसः सुनवस्ते अग्नेः परि जज्ञिरे ॥ ऋ सं ८-२-१-५॥ इस मन्त्र का नाभानेदिष्ट ऋपि, अनुष्टुप् छन्द और आङ्गिरस देवता है । मन्त्रार्थ- कर्मद्रष्टा तथा मन्त्रद्रष्टा ऋषि लोग, विरूपास. इत् = नानारूप वाले हैं। ते इत् = वे ही अङ्गिरा लोग, गम्भीरवेपसः = गम्भीर कर्म वाले है । ते अङ्गिरसः = वे अङ्गिरा लोग, अग्नेः = अग्नि के, सूनवः = पुत्र है। ते = वे अङ्गिरा लोग, अग्ने: - अग्नि के, परि : चारो और, जशिरे - प्रादुर्भूत हुए हैं। इस मन्त्र मे अङ्गिराओंकी स्तुति है । इस मन्त्र का भाष्य- विरूपा अपयस्ते गम्भीर कर्मणो वा गम्भीरप्रज्ञा वा । ते अङ्गिरसः पुत्रास्ते अग्नेरधि जजिरे इत्यग्निजन्म । ते ऋषयः - वे अङ्गिरा ऋषिगण, विरुपा: - नाना रूप वाले, गम्भीरकर्माणः = गम्भीर कर्म वाले, वा = अथवा, गम्भीर प्रज्ञा: = गम्भीर बुद्धि वाले है। ते - वै, अङ्गिरसः = अङ्गिरागण, अग्ने = अग्नि के, पुत्राः = पुत्र है । ते = वे, अङ्गिरागण, अग्ने - अग्नि के, अधि जज्ञिरे = प्रादुर्भूत हुए हैं। इति - यह इन का, अग्निजन्म अग्नि जन्म है। अग्नि में से प्रगट हुए हैं इस लिये अग्नि जन्म कहे जाते हैं। १२ पितरः । यहां से देहत्याग करके स्वर्ग गये हुए पूर्वजों का नाम : पितरः' है। जो पितृदेव कहे जाते हैं। स्वर्ग मध्यम लोक है। अतः ये मध्यमस्थान देव कहे जाते है। देवभाव को प्राप्त स्वर्गस्य पितृदेव बहुत हैं । अत: 'पितरः' यह बहुवचनान्त है । भाष्यकार कहते हैं- पितरो व्याख्याताः । पितरः 3 पितृदेवो की, व्याख्याता = व्याख्या हो चुकी है। (नि. अ. ४, खं० २१)। वहां, पिता का नाम है और यहां पितरो का, इतना भेद है। पान्ति रक्षन्ति इति पितरः' इस विग्रह मे 'पा रक्षणे' धातु से 'नप्तनेष्टुत्वष्ट्ट होत पोतृ भ्रातृ मातृ पितृ दुहित' सूत्र के निपातन से सृच् (१) प्रत्यय और पा के आकार को इकार होने पर पितृ शब्द बना है । पितरः जस का रूप है । पितृदेवो का नाम है। क्योकि, वे रक्षण करते हैं। तेषामेपा भवति । इति निरुक्तं एकावाध्यायस्य सप्तदशः खण्डः । ११-१७ ॥ तेषाम् = उन पितरो की, एपा यह अग्रिम ऋषा, भवति - है- अप निरुक्त एकादशाध्यायस्याष्टादशा खण्डः। बीच मे से, इस उणादि = निरुक्त एकादशाध्यायस्याप्टादशः खण्डः । (१४८१) उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः । असुं य ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु ॥ मा म ७-६-१७-१।। %3S , . इस मन्त्र का यमपुत्र शंख ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और पितृदेव देवता है । मन्त्रार्थ-तीन प्रकार के पितृदेव होते हैं । उत्तम मध्यम और अधम । उन में जी विधिवत् श्रौतकर्मका अनुष्ठान कर के पितृदेवस्व को प्राप्त हुए हैं वे उत्तम और जो विधिवत् स्मार्त कर्ममात्र का अनुष्ठान कर के पिg. देवत्व को प्राप्त हुए हैं वे मध्यम एवं जो इन मे संस्कार विकल होते हैं वे अधम कहे जाते हैं । उन में, अवरे पितरः अधमश्रेणी के पितृदेव, परासः पितरः = उत्तम श्रेणी के पितृदेव और, मध्यमाः पितरः - मध्यम श्रेणी के पितृदेव, मव कोई उदीरताम् = उद ईरताम् = उत्तम हवि को प्राप्त करें। वे सब हमारे विषय में, सोम्यासः = सोम्य अर्थात् अनुग्रह परायण होवें। ये = जो, अवृकाः भेड़िया के समान वा, अवृकाः = अशत्रु मित्र के समान हमागे हिसान करते हुए, ऋतज्ञाः - हमारे से अनुष्ठित यज्ञ को जानते हुए, असुम् - हमारे प्राणों की रक्षा करने के लिये, ईयुः - यहां आये हैं, ते पितरः - वे सब पितृदेव, हवेषु = हमारे वुलाने पर, नः = हमारी, अयन्तु = रक्षा करें। इस मन्त्र में रक्षा के लिये पितृदेयों से प्रार्थना है । - C इस मन्त्र का भाप्य- 23 अपम उदीरतामवर उदीरतां पर उदीरतां मध्यमाः पितरः सोम्यासः सोमसंपादिनस्तेऽमुं ये प्राणमन्वीयुरपृका अनमित्रः सत्यज्ञा यनज्ञा वा ते न आगच्छन्तु पितरोहानेषु । ते सोम्यासः = सोमसंपादिन वे सोम के सम्पादन करने वाले, अबरे पितरः कोटिके पितृदेव, उदीरताम् = उत्तम हवि को प्राप्त करें। परे पितरः • उत्तम कोटि के पितृदेव, उदीरताम् = उत्तम हदि प्राप्त करें। मध्यमाः पितरः = मध्यम वोटि के पितृदेव, उदोरताम् = उत्तम हवि प्राप्त करें। अवृकाः - अनमित्राः अश, सत्यमाः - सत्य को जानने पाले, या ८ अथवा, यमज्ञाः = यज्ञ को जानने वाले, ये जो, असुम् = प्राणम् - प्राणों की रक्षा करने के लिये, अन्वीयुः - यहां आये हुए हैं, ते पितरः = ये पितृदेवों, नः हानेपु = हमारे बुलाने पर हमारी रक्षा करने के लिये, आगच्छन्तु = पायें । माध्यमिको यम इत्याहुः । तस्मान्माध्यमिकान् पितॄन् मन्यन्ते । माध्यमिकः मध्यम लोक का देव, यमः = यमराज है, इति = यह, याहः - नियत पास के जानने वाले नेरक्त लोग कहते हैं । तस्मात् = इस लिये वे लोग ( नंदक मोग) पितृ पितृदेवों को, माध्यमिका - माध्यमिक, मन्यन्ने • मानते है। भाष यह है कि, वोन लोक हैं। पयो लोरु, अन्तरिक्ष सोम और पुमोर। अन्तरिया सोक को मपतोर रहते हैं। मध्यलोक मे भवान्तर लोक भी यह हैं। जमे इन्द्र लोर, वृतरसति (१४८२) निरुक्ते एकादशाध्यायस्याष्टादशः खण्डः । लोक, चन्द्र लोक और पितृलोक आदि । इन्द्रलोक के इन्द्र, बृहस्पति लोक के बृहस्पति, चन्द्रलोक के चन्द्र और पितृलोक के यम राजा है। यमराज माध्यमिक पितृदेव कहलाते है। उनके लोक में जाकर पितृदेवत्य को प्राप्त पूर्व जो भी माध्यमिक पितृदेव कहलाते है। अतः पितृदेव के लोक में जाने से पूर्वज भी पितृदेव कहलाते है वा पितृदेवों के राजा होने से यमराज भी पितृदेव कहलाते है । 'पितरः' के बाद 'अथर्वाण:' का क्रम आता है। परन्तु 'अथर्वाणः' का जो उदाहरण मन्त्र आगे आने वाला है उसके चार देवता है। अङ्गिरा पितृ, भृगु और अथर्वा । अतः उक्त अङ्गिरस् पितृ और भृगु के निर्वचन हो गये है तो भी उनका स्मरण कराते हुए अथर्वन् का निर्वचन करते है- अङ्गिरसो व्याख्यातः। अङ्गिरसः = अङ्गिराओं की, व्याख्यातः = व्याख्या हो चुकी है। (नि. ३-१७) । पितरो व्याख्यातः। पितरः = पितरों को, व्याख्यातः - व्याख्या हो चुकी है। (नि. ४-२१)। भृगवो व्याख्याताः। भृगयः = भृगुओं की, व्याख्यातः = व्याख्या हो चुकी है (नि. ३-१७)। अब कम प्राप्त अथर्वाणः की व्याख्या करते हैं- १३ - अथर्वाण 'अथर्वाणः' यह मध्यस्थ पितृदेवो का नाम है । भाष्यकार इस का निर्वचन करते हैं- अथर्वाणोऽथर्वणवन्तः, थर्वतिश्चरतिकर्मा तत्प्रतिषेधः । अथर्वणवन्तः = अगति अर्थात् स्थिरस्वभाव वाले, अथर्वाणः = अपर्वा कहे जाते हैं। क्योकि, चरति कर्मा = गत्यर्थक, यवंतिः = नरुक्त थर्व धातु है । उस से थर्वन् शब्द बना है। तत्प्रतिपैधः - उसका निषेप अथर्वन है । अर्थात् 'थर्वन्ति इति थर्वाणः' इस विग्रह में गत्यर्थक नरुक्त पर्व धातु से 'फनिन् युषितक्षिराजि....' इत्यादि उणादि सूत्र से कनिन् (अन्) प्रत्यय होने पर पर्वन् शब्द बना है। न पर्वाणः इति अथर्वाणः' इस विग्रह में नम शन्द और पर्वन् शब्द का 'न' इस सूत्र से न तत्पुरुष समास 'न लोपो नजः' इस सूत्र से नम के नकार का लोप होने पर अपर्वन् पाद बना है । 'अथर्वाणः' यह प्रथमा बहुवचन का रूप है । जो गमन न करे किन्तु सदा स्थिर स्वभाव वाले हों वे अथर्वा कहे जाते हैं। तेपामेपा साधारणा भवति । इति निरुक्तं एकादशाध्यायस्याप्टादशः खण्डः । ११-१८ ॥ तेषाम् - उन अङ्गिरस: आदि चार देवताओ की, एपा = यह अग्रिम ऋचा, साधारणा साधारण, भवति - है । अर्थात् यङ्गिरसः पितरः भृगवः और अथर्वाणः इन पार देवताओं की एकही ऋचा है- निषक्त एकादेशाध्यायस्यकोनविंशः खण्डः । (१४८३) अथ निरुक्त एकादशाध्यायस्यकोनविंशः खण्डः । अङ्गिरसो नः पितरो नवग्वा अर्थर्वाणो भृगवः सोम्यासः । तेषां वयं सुमतौ यज्ञियानामपि' भद्रे सौमनसे स्याम ॥ क्र. सं. ७-६-१५-६॥ इस मन्त्र के विवस्वत के पुत्र यम ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और अङ्गिरा पितृ अथर्वा और भृगु ये चार देवता हैं । मन्त्रार्थ-अङ्गिरस: = अगिरा, अथर्वाणः = अथर्वा और, भृगवः - भृगु नामक देव, ना = हमारे, पितरा = पितृदेव हैं, नवग्वाः = नूतन गमन वाले हैं अर्थात् वे अभी अभी पधारे हैं । और वे, सोम्यासः के अधिकारी हैं । यज्ञियानाम् तेपाम् - यज्ञ के योग्य उन पितरो की, सुमतौ = अनुग्रह बुद्धि में, वयम् = हम्, स्याम = रहें । अपिच = और, हम उन की, सौमनसे भद्रे - प्रसन्नता के कारण कल्याण में, स्याम = रहे । इस मन्त्र में अङ्गिरा, अथर्वा, भृगु और पितृदेव' की स्तुति है । अतः चारों की यह साधारण ऋचा है । इस मन्त्र का भाष्य- - अङ्गिरसो नः पितरो नवगतयो नवनीतगतयोवाऽथर्वाणो भूगरः सौम्याः सोमसंपादिन- स्तेषां वयं सुमतौ कल्याण्यां मतौ यज्ञियानाम् अपिचेपां भद्रे मन्दनीये माजनवति वा कल्याणे मनसि स्यामेति । अङ्गिरसः = अङ्गिरामों, नः = हमारे, पितरः = पितृदेव हैं। नवगतयः - नवीन गति वाले हैं। वा = अथवा, नवनीतगतयः - मक्खन के समान कोमल गति वाले हैं। अथर्वाण. भृगवः = अथवा और भृगु, सौम्य = सोमसंपादिन: = सोम के संपादन' करने वाले हैं। तेषाम् पजियानाम् = उन यज्ञ के योग्य पितरों की, सुमतौ = कल्याण्यामो = अनुग्रह बुद्धि में, वयम् . हम, स्याम = होयें रहे। अपि च = और, यतियानाम् तेषाम् = यज्ञ के योग्य उनको, भद्रे भन्दनीये = कल्याण के योग्य, वा = अथवा, भाजनवति कल्याणे = यजमानों को अभीष्ट यों से सन्तुष्ट कराने वाले, मनसि स्याम - शुभ मन में रहे। इति = इत्यर्थः । माध्यमिको देवगण इति नैरुक्ताः । प्रभु अङ्गिरस् भृगु और अथर्या, माध्यमि: - मध्यम लोक के, देवगण. = स्वतन्त्र स्वतन्त्र देव समुह हैं, इति = यह, नरुक्ता. = निरुक्त शोख के जानने वाले आचार्य लोग मानते हैं। और पितर इत्याख्यानम् । पितरा ये सब पितर हैं, इति - इस प्रकार, आख्यानम् = आख्यान है। यदि ये देवगण नही किन्तु पितर है ऐसा इतिहास आदि में कहा है। ये (१४८४) निरुक्त एकादशाध्यायस्य विशा खण्डा । अथाप्यूपयः स्तूयन्ते। इति निरुक्त एकादशाध्यायस्यैकोनविंशः खण्डः । ११ - १९ ।। अथ अपि = और भी, ऋषयः = ऋषिगण, स्तूयन्ते = स्तुत होते हैं । अतः ये ऋषि हैं। इस प्रकार ऋभु आदि के विषय में तीन मत हैं। कोई कहते है ये देवगण हैं, कोई कहते हैं ये पितर हैं और कोई कहते है ये ऋषि है। इन में देवगण हैं यह मत सिद्धान्त हैं। क्योकि, यह नरुक्त मत है। अथ निरुक्ते एकादशाध्यायस्य विंशः खण्डः ।। सूर्यस्येव वक्षथो ज्योतिरेषां समुद्रस्यैव महिमा गंभीरः । वातस्येव प्रजवो नान्येन स्तोमो वसिष्ठा अन्वेतवे वः॥ ऋ. सं. ५-३-२३-८॥ इस मन्त्र का वसिष्ठ ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और वसिष्ठ ही देवता भी है। मन्त्रार्थ-एषाम् इन ऋषियों का, ज्योतिः = तेज, सूर्यस्य ज्योतिः इव सूर्य के तेज के समान होता है। एषाम् महिमा = इन पियों की महिमा, समुद्रस्य इव = समुद्र के समान, गभीरः गम्भीर होती है। एपाम् प्रजवः = इन का वेग अर्थात् बल, वातस्य इव = पवन के वेग के समान होता है । वसिष्ठाः हे वसिष्ठ पुत्रो!, वः = माप का स्तोमः स्तोत्र, अन्येन = अन्य किसी से, अन्वेतुम् = अनुगमन करने के योग्य, न = नही है। भाव यह है कि, जो कभु तथा अङ्गिरा आदि को मध्यमदेव मानते हैं उनका कहना था कि भु अङ्गिरा आदि देव है, ऋपि नही, क्योकि, इन की मन्त्रो में स्तुति है। और जिन की मन्त्रों में स्तुति होती है वह देव ही होता है अपि नही यह नियम है । इस का उत्तर यह दिया गया कि, यह नियम नही कि, जिनकी मन्त्रों में स्तुति होती है वे देव ही होते है किन्तु ऋषियों को भी मन्त्रो में स्तुति देखी जाती है । जैसे उक्त मन्त्र मे ऋषियों की भी स्तुति है । अतः भृगु आदि ऋषि हैं यह सिद्ध हुआ। १४ के मतभेद से तीन अर्थ हैं । मध्यदेव, पितर और ऋपि यह पूर्व कहा गया है और यह भी पास में ही कहा गया है कि 'भृगवो व्याख्याताः' अर्थात नि. तृ.अ. १७ खं. में 'अचिपि भृगुः सम्बभूव' इत्यादि पंक्ति से भृगु शब्द का निवंचन हो चुका है। 'भृज्जन्ति तपसा इति भृगयः' इस विग्रह में 'भ्रस्न पाके' घातु से 'प्रथिम्रदिभ्रस्जा संसारणं सलोपश्च' इस उणादि सूत्र से उप्रत्यय, संप्रसारण सलोप और न्यहक्कादीनार' सूत्र से कृरवेन जवार को गकार होने पर भृगु शब्द बना है । भृगवः यह प्रथमावहुवचन का स्प है। इस का उदाहरण मन्त्र पीछे पाम में ही 'अङ्गिरसो नः' इत्यादि दिया गया है। 2 अन्वेतवे - भृगवः ।
निरक्त एकादशाध्यायस्यकविंशः खण्डः । (१४८५) 'आप्त्याः आप्त्या। इन्द्र के सहचारी देवगण का नाम आप्त्य है । यह बहुवचनान्त है। निर्वचन करते हैं- आप्त्या आप्नोते। आप्नोतेः = आप् धातु से, आप्त्याः = आप्त्य शब्द बना है । अर्थात् 'बाप्नुवन्ति स्तुतिभिः स्तुत्यान् प्राप्नुवन्ति इति आप्त्याः' इस विग्रह में । 'बाल व्याप्तो' धातु से 'अध्नयादयश्व उणादि सूत्र के निपातन से यत्प्रत्यय और तुक् (१) आगम होने पर आप्त्य शब्द बना है । इन्द्र के सहचारी मध्यम देवगण का नाम है । तेपामेप निपातो भवत्यैन्द्रयामृचि । इति निरुक्ते एकादशाध्यायस्य विंशः खण्डः । ११-२० ।। तेषाम् = उन देवों का, ऐन्द्रयाम् ऋचि - इन्द्र देवता के ऋचा में, एपः निपात: प्रयोग, भवति - है। अथ निरुक्ते एकादशाध्यायस्यकविंशः खण्डः । स्तुषेय्यं पुरुवर्षसमृभ्वामिनतममाप्त्यमाप्त्यानाम् । आ दर्पते शव॑सा सप्त दानून् प्र साक्षते प्रतिमानानि भूरि' । अ. सं. ८-७-१-६॥ इस मन्त्र वा अथर्वणपुत्र वृहदिव ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और इन्द्र देवता है । मन्त्रायं-स्तुपेय्यम् - स्तुस्य, पुरुवपंसम् - नाना मूत्तियोवाला, ऋम्वम् = विलक्षण दिप्तियुक्त, इनतमम् अनुपम प्रभु (समर्थ) आफ्यानाम् = आप्त्य देवों में, आप्रयम् - श्रेष्ठ प्राप्तव्य, इन्द्र की में स्तुति करता हूँ। जो इन्द्र, शवसा = अपने बल से, सप्त दानून = सात दानवो का, आदर्षते - विनाश करने वाला और, प्रतिमानानि = असुरों के प्रतिरूप, भूरि = अन्य बहुत अमुरों को, प्रसासते = हराने वाला है । इस अचा में 'आप्पयानाम् ' इस पद का निपात अर्याद पाठ है। जो आप्त्य देवों का वाचक है। . इस मन्त्र का भाष्य- स्तोतव्यं बहुरूपमरुभूतमीधरतम मान्य मातल्पानामारणाति यः शवसा चलेन सप्त दातृनिति वा सप्त दानवानिति वा प्रसाक्षते प्रतिमानानि यहूनि । स्तोतव्यम् - स्तुति करने योग्य, बहुरूपम् उपभूतम् - बहुत स वाला, ईधरतमा प्रतिपय प्रभु, आप्तव्यानाम् = आप्रय मध्य देवो मे, आप्तव्यम् - येष्ठ मापय मध्यमदेव, इन्द्र को मैं स्तुति (१४८६) निरक्त एकादशाध्यायस्य द्वाविंशः खण्डौ । करता हूं। यः = जो इन्द्र, शवसा - वलेन - अपने वल से, सप्त दातॄन् = सात मेघों को, इति चा - अथवा, सप्त दानवान् = सात दानवों को, मारणाति = विदीर्ण करता है और, बहुनि प्रतिमानानि = उन के प्रतिरूप अन्य बहुत असुरों को, प्रसाक्षते = हराता है। साक्षतिरामोतिकर्मा । इति निरुत एकादशाध्यायस्यैकविश खण्डः ॥ ११-२१ ।। आप्नोति शर्मा = आप्नोति के समानार्थक अर्थात् व्याप्ति अर्थक, साक्षतिः - साक्ष धातु नरुक्त है। जिस का रूप मन्त्र में 'साक्षते' है । धातूनामनेकार्थत्वात् यहां परीभव अर्थ है । इन्द्र असुरों का परिभव करता है - हराता है। अथ निरुक्ते एकादशाध्यापस्य द्वाविंशः खण्डः । अथातो मध्यस्थानाः स्त्रियः । अथ = अव, अत:: यहां से. मध्यस्थानाः = मध्यस्थान, नियः = त्रियों की व्यारयाको जाती है। अर्थात् 'गरुतः ' से लेकर 'आप्त्याः ता मध्यस्थान देवता वाचक बहुवचनान्त आठ शब्दों को ध्यात्या करने के अनन्तर अब यहा से मध्यस्थान त्रीलिङ्ग देवता याचा अदिति आदि सान्दों की व्याख्या की जाती है। . तासामदितिः प्रथमा गामिनी भवति । इति निरक्त एकादशाध्यायस्य द्वाविंशः खण्डः । ११-२२ ।। तासाम् = उन में, अदितिः = अदिति, प्रथमागामिनी - प्रथम आने वाली, भवति - है। . के १६ - अदितिः । अदिति मध्यस्थान देवमाता का नाम है। दिति नाम असुर माता का और जो दिसि न हो वह अदिति कही जाती है । अर्थात "दीयो-क्षयति इति दितिः इस विग्रह में 'दोह क्षये' धातु 'प्रत्ययुटो बहलम्' इस मूत्र मे परित बहल से वार्ता में खियाइ क्ति' हम मूत्र से तिन (ति) प्रत्यय, पृषोदरादित्वात् दी को हुस्द होने पर दिति नन्द बना है। और मदितिः इति अदितिः इस विग्रह में 'ना' म मूत्र से ना तयुपप समारा एयं 'नलोगो नमः'इम मूत्री नन मकार का लोप होने पर अदिति ' शाद बना है। देव-माता का नाम है । क्योंकि, उस कमी दार नहीं होता है । भाप्पकार कहते हैं- अदितियाख्याता। अदितिः • अदिति, व्याख्याता = पाग्यात है। अर्थात् इमरी व्याम्या नि. अ. ४ में १६ में हो चुकी है।
निरुक्त एकादशाध्यायस्य प्रयोविंशा खण्डा । (१४४७) तस्या एपा भवति। इति निरूक्ते एकादशाध्यायस्य द्वाविंशः खण्ड.। ११-२२ ॥ तस्याः = उस अदिति की, एषा - यह अग्रिम ऋचा, भवति = हैं- अय निरुक्ते एकादशाध्यायस्य प्रयोविंशः खण्डः । दक्षस्य वादिते जन्मनि व्रते राजाना मित्रावरुणा विवाससि । अतूर्तपन्थाः पुरुरथो अर्यमा सप्तहोता विपुरूपेषु जन्मसु ॥ ऋ स. ८-२-६-५॥ इस मन्त्र का गय ऋषि, जगती छन्द और विश्वदेव देवता है। मन्त्रार्य-अदिते - हे अदिति देवी ! तू, दक्षस्य = आदित्य के, जन्मनि व्रते - उदय रूप प्रत मे, राजाना मित्रावरुणा = राजामिन वरुण देवो का, विवाससि - सेवन करती है । अर्यमा = वह-शत्रु रूप अन्धकार को नियमन करने वाला-सूर्य, विपुरूपेषु = नाना रूपो मे और, जन्मसु = कर्मों मे, सप्तहोता सात रसिम्यो का होम करनेवाला, प्रक्षेप - फेकने वाला है । अतूर्तपन्थाः = अत्वरमाण = वेग रहित है। पुरुरषः = बहुत गमन करने वाले र थवाला है । इस मन्त्र मे अदिति की स्तुति है । इस मन्त्र का भाव्य- दक्षस्य बादिते जन्मनि व्रते कर्मणि राजानौ मित्रावरुणो परिचरसि । विवासतिः परिचर्यायाम् । " इविष्मा आविवासति" इति । आशास्तेर्वा । अतूर्तपन्धा अत्वरमाण पन्था। बहुरथोऽर्यमाऽऽदित्योऽरीमियच्छति । सप्तहोता-सप्तास्म रश्मयो रसानमिसन्नामयन्ति । सप्तैनमृषयः स्तुवन्तीति वा । विपमरूपेषु जन्मसु फर्म सूदयेषु । यदिते = हे अदिति देवी! तुम, दक्षस्य = आदिस्य के, जन्मनि प्रते = कर्मणि = उदय प्रत रूप कर्म मे, राजानो मित्रावरुणो = राजा मित्र और वरुण की, परिचरसि - परिचर्या (सेवा) करती हो। विवासतिः विपूर्वक वास घातु, परिचर्यायाम् - परिचर्या (सेवा) अपं में है। जैसे- हविष्मा आदि वासति' अर्थात् है अग्नि देव !, हविष्मान हविपु वाला यजमान, आदिवासति = तुम्हारी सेवा करता है। अत. तुम भी उस की रक्षा करो। इस मन्म में माविधामति का अर्थ परिचर्या है। वा = अपवा, माशास्तेः - उक्त माधिदि से यह प्रतीत होता है कि, विवास धातु का अर्थ परिचर्या है । अतूर्तपन्या - मस्वरमागरन्याः वेग रहित मार्ग वाला आदित्य है । अर्यमा आदित्य - सूर्य, बहरप. - शोप्रगामीरप वाला, मरीन - शत्रुओं से, नियच्छति - नियमन करता है * वश करता है। यह आदित्य, सप्तहोना - गुप्तहोता है बाद, बस्मै , इस के लिये, सप्त रमिपा - सात मिया, रसानु - रसो को, मभिसमामम्ति माटो (१४८४) निरुक्ते एकादशाध्यायस्य प्रयोविंशः खण्डः । हैं । इस लिये आदित्य सप्तहोता कहा जाता है। वा = अथवा, सप्त ऋषयः = सप्त ऋपि गण, एनम् - इस की, स्तुवन्ति = स्तुति करते हैं, इति = इस लिये यह आदित्य सप्तहोता कहा जाता है । विषमरूपेषु = विषम रूपों में और, जन्मसु = कर्मसु = उदयेपु = जन्म अर्थात् उदयरूप कर्मों में आदित्य यथोक्त सर्व कार्यों को करता है। - आदित्यो दक्ष इत्याहुरादित्यमध्ये च स्तुतः । यथोक्त मन्त्र में आया हुआ, दक्षः = दक्ष शब्द, आदित्यः आदित्य वाचक है। दक्ष का अर्थ आदित्य है। इति यह देवतातत्त्व के जानने वाले विद्वान् लोग, आहुः = कहते हैं। च = क्योंकि, वह, आदित्यमध्ये = आदित्य के मध्य में, स्तुतः = स्तुति किया गया है। भाव यह है कि, देवता के निर्णय के लिये स्तुति ही प्रमाण है । जिस को स्तुति जिस देवता के मध्य में है वहां वही देवता है । दक्ष की स्तुति आदित्य के मध्य में है। अतः दक्ष आदित्य ही है। इस पर आक्षेप करते हैं- अदितिर्दाक्षायणी । “अदितेर्दक्षो 'अदितेर्दक्षो अजायत दक्षाद्वदितिः परि” इति च । तत्कथमुपपद्येत । अदितिः = अदिति, दाक्षायणी दक्ष की पुत्री है । अदिते: अदिति से, दक्षः - दक्ष, अजायत = उत्पन्न हुआ है, उ • और, दक्षात् = दक्ष से, अदितिः परि = अदिति उत्पन्न हुई है। इति च = यह भी कहा जाता है । अर्थात् दक्ष की पुत्री अदिति और अदिति का पुत्र दक्ष है यह भी कहा जाता है । तत् = सो, कथम् = कैसे, उपपद्येत = उपपन्न होगा? । परस्पर जन्य जनकभाव कहीं देखा नहीं गया है। उक्त आक्षेप का समाधाम- समानजन्मानौ स्याताम् इति । समान जन्मानी = समान जन्मा वा समनन्तर जन्मा, स्याताम् = हो सकता है। अर्थात् एक के पीछे एक का जन्म हो सकता है। इति = इस लिये ऐसा कहा गया है। इस से असन्तुष्ट देख कर दूसरा उत्तर देते हैं- अपि वा-देव धर्मणेतरेतरजन्मानौ स्यातामितरेतर प्रकृती। अपि वा = अपया, देवधर्मेण = देवधर्म से, वे दोनों ( अदिति और दक्ष ). इतरेतरजन्मानौ परस्पर जन्मा, अर्याद, इतरेतरप्रकृती - परस्पर कारण, स्याताम् - हो सकते हैं। बर्याद देवता महाभाग्य होते हैं । दक्ष महत् रूप से अदिति का पिता और पुत्र भी हो सकते हैं । जन्म कार्य और प्रकृति कारण समझना चाहिये । यदिति दक्ष को माता और पुत्र भी है एवं दक्ष अदिति का पिता और पुत्र भी है। देवता होने से कोई दोष नहीं। :
. निरुक्ते एकादशाध्यायस्य चतुर्विंश खण्डः । (१४८९) अग्निरप्य दितिरुच्यते । अग्नि. अपि = अग्नि भी, अदितिः = अदिति, उच्यते = कहा जाता है । अर्थात् जैसे अदिति का अर्थ देव माता तथा दाक्षायणी है वैसे ही अग्नि भी है। तस्यैपा भवति । इति निरुक्ते एकादशाध्यायस्य प्रयोविंश खण्ड ।। ११-२३ ।। अदिति का अग्नि अर्थ है इसकी, एषा - यह अग्रिम ऋचा, भवति : है- अथ निरुक्त एकादशाध्यायस्य चतुर्दिश खण्ड ।। यस्मै त्वं सुंद्रविणो ददाशोऽनागास्त्वमदिते सर्वताता । यं भद्रेण शवसा चोदयासि प्रजावता राधसा ते स्याम ॥ ऋस १-६-३२-१५ ।। तस्य . इस मन्त्र का आङ्गिरस कुत्स ऋपि जगती छन्द और अग्नि देवता है । मन्त्रार्थ-सुद्रविण अदिते = हे शोभन धन से युक्त अखण्डनीय अग्नि देव !, सर्वताता सर्व यज्ञो मे वर्तमान, यस्मै - जिस यजमान को, खम् तुम, अनागास्त्वम् - पापरहितता का, ददाश = प्रदान करते हो, पाप रहित करते हो और, यम् = जिस यजमान को, भद्रेण = कल्याण से एव, शवसा = वल से, चोदयासि = सयोजित करते हो । वह समृद्धशाली हो जाता है । हम भी तुम्हारे स्तोता हैं । अत हम भी, प्रजावता = पुत्र पौत्र आदि प्रजा से युक्त और, ते राधसा = तुम्हारे दिये हुए धन से युक्त होवें । इस अवा मे अदिति शब्द क्षय रहित अग्निवाचक है। अव. अग्नि भी अदिति कहा जाता है। इस मन्त्र का भाष्य:- - ।। यस्मै त्वं सुद्रविणो ददास्यनागस्त्वमनपराधत्वमदिते सर्वासु कर्मततिषु । आग आपूर्वाद् गमेरेन एतेः । किल्पिपं किल्मिदं सुकृतकर्मणोभयं, कीर्तिमस्य मिनचीति वा । यं भद्रेण शवसा बलेन चोदयसि प्रजानता च राधसा धनेन । ते क्यमिहस्पामेति । सुविण अदिते = हे सुन्दर धनवाला अग्निदेव I, खम् = तुम, सर्वासु कर्मततिपु - सर्व कर्मों मे यज्ञो मे, उपस्थित रहने वाले, यस्मै = जिस यजमान को, अनागस्वम् - अनपराघत्वम् = पाप रूप अपराध रहितत्व, ददासि = देते हो वह समृदशाली हो जाता है। बाइपूर्वाद गमे माहपूर्वक गम् पातु से, माग = आगस् शब्द बना है। अर्थात् 'आगच्यति वर्तारम् अपश्य पल रुपेण प्राप्नोति इति भाग पापम्' इस विग्रह मै आपूर्वक 'गम् गतौ' धातुसे 'सर्वधातुभ्योऽमुन्' 2 - - (१४९०) निरुत्ते एकादशाध्यायस्य पञ्चविंशः खण्डः । इस अणादि सूत्र से असुन् (अस्) प्रत्यय, वाहुलकात् डित, डित्त्वात् टिलोप, होने पर आगस् शब्द बना है। पाप का नाम है । क्योकि, पाप अवश्य कर्ता को फल देने के लिये प्राप्त होता है। आगस् नाम पाप का है । जसका पर्याय एनस् है । प्रसङ्गवश उसका भी निर्वचन करते हैं- 'एन एता' अर्थात्, एतेः = इण् धातुसे, एन. = एनस् शब्द बना है। 'ऐति अवश्यम् कर्तारम् आगच्छति इति एना पापम्' इस विग्रह मे 'इण गतौ' धातु इण मागसि' इस उणादि सूत्र से असुन् प्रत्यय और नुट् आगम, इन् मस्, गुण, ए न् अस्, एनस् शब्द बना है। एनस् के समान पर्याय प्रसक्त 'किल्विष' शब्द का निर्वचन करते हैं किल्बिषम् - किल्भिदम सुकृतकर्मणः भयम् = किल्विष (पाप) किल्भिद को कहते है। इस को, सुकृतकर्मण. (पुण्य ) से, भयम् = भय होता है। क्योकि 'धर्मेण पापमपनुदति' अर्थात धर्म से पाप दूर होता है। वा = अथवा, पाप, अस्य इसकी (कर्ताकी ), कोत्तिम् = कोत्ति का, भिनत्ति (नाश ) करता है। हे देव !, यम् = जिसको तुम, भद्रेण - कल्याण से और शवसा - वलेन संयोजित करते हो वह, प्रजावता - प्रजासे, च = और, राधसा - धनेन - धन से सम्पन्न होता है। इह = यहा, वयम् - हम भी, ते = तुम्हारा स्तोता हैं । हम भी पुत्र पौत्र आदि प्रजा तथा धन से सम्पन्न, स्याम = होवें। इति = इत्यर्थः । S सुकृतकर्म भदन = बल से, चोदयसि- १७-सरमा । मध्यलोक वासिनी देवो की कुतिया देवशुनो का अथवा माध्यमिका वाणी या नाम सरमा है। भाष्यकार कहते हैं- सरमा सरणात् । सरणाव = गमन करने से, सरमा = देवशुनी और माध्यमिका वाक् सरमा कही जाती है। ऐतिहासिक पक्ष से सरमा देवशुनी और नरुक्ता पक्ष से माध्यमिका वाम कही जाती है। अवि 'सरति गच्छति इति सरमा' इस विग्रह में 'मृ गती' धातु से 'कलिफोरमः' इस उणादि सून से चाहुलकात् अम् प्रत्यय, छन्दसत्वात् मकार की इसंज्ञा वा अभाव, रपर गुण और टाप होने पर सरमा शब्द बना है। देवशुनी और माध्यमिका पार पा नाम है। क्योंकि, ये दोनों सरण : गमन करती हैं। तस्था एपा भवति। इति निरुक्त एकादशाध्यायस्य चतुर्विशः खण्डः ॥ ११-२४ ।। तस्या. - सरमा को, एपा = यह अप्रिम मचा, भवति = है- अय निरुक्ते एकादशाध्यायस्य पवविधः खण्डः ।
निरुक्त एकादशाध्यायस्य पञ्चविंशा खण्ड।। (१४९१) किमिच्छन्ती' सरमा प्रेदमांनड् दूरे ह्यध्वा जमुरिः पराचंः । कास्मेहितिः का परितक्म्यासीत्कथं रसायो अतरः पयासि ॥ ऋ. सं. ८-६-५-१॥ इस मन्त्र का पणिगण ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और सरमा देवता है। इस सूक्त में बहुत मनोरखनप्रद कथा है । उस को सायण भाष्य में देखना चाहिये । मन्त्रार्थ-आती हुई सरमा नाम की देवशुनी (कुतिया) को देख कर पणिनाम के असुरगण कहते हैं-सरमा = सरणशोला देवशुनी तुम, किमिच्छन्ती - किस वस्तु की इच्छा करती हुई, इदम् - हमारे इस स्थान पर, प्र मानद - व्याप्त हुई हो - आई हो। हि - क्योंकि, अध्वा = यह मार्ग, परा: = प्राड्मुख अर्थाद आवृत्ति वर्जित (पीछे लौटने योग्य नहीं), जगुरिः = उद्भूर्ण अर्थात् बहुत प्रयल करने पर भी गमन करने योग्य नहीं और, दूरे = बहुत दूर है । अस्मेहितिः = हमारे पास तेरा अपेक्षित अर्थ, का = क्या रखा है? जिस के लिये तुम यहां आई हो?। का- किस प्रकार को, परितम्या = रात्रि, आसोद - थो?! अर्थात् कितनी रात्रि में तुम यहां आई हो?! अथवा, का = किस कारण तुम्हारा यहां परितम्या - आना, आसीद = हुआ है ? और, कथम् = किस प्रकार, रसायाः = शब्दायमान सो योजन विस्तीर्ण अन्तरिक्ष नदी के, पयांसि = जलों को तुम ने, अतरः - तरा है । पूरी कथा ऋ. सं. म. १० सू. १०८ (जो सरमा पणिसूक्त कहा जाता है) में देखना चाहिये। इस ऋचा में सरमा शब्द आया है। सरमा देवशुनी से असुर पणि पूछ रहा है। अतः यह ऋचा सरमा की है। किमिच्छन्ती सरमेदं प्रानट् दूरे ह्यध्वा जगुरिङ्गम्यतेः पराञ्चनैरचितः का ते अस्माखार्थहितिरासीद किं परितकनम् । परितक्भ्या रात्रिः परित एनां तपम्भ | तक्मेत्य॒णनाम तकत इति सतः। सतः । "कथं रसायो अतरः पांसि" इति । रसा नदी रसतेः शब्दकर्मणः । कथं रसानि तान्युदकानीति वा । देवों की कुतिया, किमिच्छन्ती किस वस्तु की इच्छा करती हुई, इदम् = हमारे इस स्थान पर, प्रानट् = प्राप्त हुई हो। हि = क्योंकि, अभ्या = यह मार्ग, दूरे = बहुत दूर है और, जगुरिः = उद्गुणं अर्थात् बहुत प्रयल करने पर भी आने में सुलभ नहीं है। जङ्गम्यते। यङ्गन्त गम धातु से, जगुरिः = जगुरि शब्द बना है। अदि 'पुनः पुनः अतिशयेन वा गच्छति प्राप्नोति इति जगुरिः' इस विग्रह में 'गम गतो' धातु से 'पातोरेकाचः' इत्यादि सूत्र से यम् (य) प्रत्यय, 'योऽचि च' इस सूत्र से यह का लुक, द्विस्वादि, अम्यास कार्य जगम्, पातु संशा, 'जसिसहोरिन्' इस उणादि सूत्र से बाहुलकाव रिन् (रि) प्रत्यय हिद, हित्वादरिलोप, जग जरि, जगुरि बना है। यह मार्ग, प्राशनः अचिता = प्राङ्मुख अर्याद गमन करने में दुकर है। १८७ सरमा - - .
(१४९२) निरुक्ते एकादशाध्यायस्य पञ्चविंशः खण्डः । अस्मासु = हमारे यहां, ते - तेरा, का - क्या, अर्थहितिः = स्वार्थ, आसीत् = था। किम् परितकनम् = परितकन क्या था अर्थात् कितनी रात्रि में तुम यहां आई हो?। परितम्या रात्रिः - परितक्म्या रात्रि कहलाती है। क्योंकि, परितः = दोनों तरफ (आगे पीछे), एनाम् - इस के, तवम = उष्ण दिन है। रात्रि के पहले भी दिन है और बाद भी। तक्म इति = तक्म यह, उष्णनाम = उष्ण का नाम है। तकते इति सतः = 'तकते' इस से बना हुआ होने से । परि पूर्वक 'तक हसने' धातु से उणादि कल्पित मक् (म्) प्रत्यय, परि तक म्, परितक्म, पृषोदरादित्वात् य का आगम और टाप होने पर परितम्या शब्द बना है। रात्रि का नाम है। जिस के दोनों ओर उष्ण दिन हो और वह स्वयं शीत (ठंढी) हो वह परितम्या रात्रि कही जाती है। रसायाः पयांसि जल को, कथम् किस प्रकार तुमने, अतरः = तरा। रसा नदी - रसा यह नदी है । अर्थात् रसा नदी का नाम है। क्योंकि, वह, शब्दकर्मणः = शब्दार्थक, रसते! = रस धातु से बना है। अर्थाद 'रसति शब्दं करोति इति रसा' इस विग्रह में 'रस शब्दे' धातु से पचाद्यच् और टाप होने पर एसा शब्द बना है। नदी का नाम है । क्योंकि, नदी शब्द करती है। वा = अथवा, रसा का अपं नदी नहीं किन्तु जल है। इस पक्ष में, तानि रसानि उदकानि = उन जलों को तुमने, कथम् किस प्रकार, अतरः = तरा। अन्तरिक्ष नदी के - । मन्यार्थ स्पष्ट करने के लिये कारण बताते हैं- - = आख्यान है। देवशुनीन्द्रेण प्रहिता । पणिभिरसुरैः समूद इत्याख्यानम् । इन्द्रेण इन्द्र ने, देवशुनी = देवों की कुतिया को, प्रहिता = भेजा। उसने, पणिभिः असुरः पणि नामक असुरों के साथ, समूदे = सम्वाद किया। इति = यह, आख्यानम् भाव यह कि, ऋग्वेद के १० वे मण्डल का १०० वा सूक्त सरमा-पणि सूक्त कहलाता है। इस में असुर पणियों और सरमा देवशुनी का सम्बाद है। और वह इस प्रकार है-पणि नामक असुरगण देवों की गायों को चुरा ले गये। और किसी दूर स्थान में उन्हें छिपा कर रख दिया। इन्द्र ने सरमा नाम की कुतिया को कहाकि, तूजा, गौओं का पता लगा कर आ कि वे कहां हैं । सरमा ने कहा कि, यदि मेरे बच्चों को उन गौओं का दूध दोगे तो मैं जाऊंगी। इन्द्र ने हाँ कहा ! तब सरमा नदी को पार करके उन असुरों के पास पहुंच गई और गायों का पता लगा कर आई एवं इन्द्र को उसने फह दिया। इन्द्र ने उन असुरों को दण्ड दिया और गायों को छीन लिया । - १८-सरस्वती। मध्यस्थान वाग्देवी का नाम सरस्वती है। यास्क कहते हैं- सरस्वती व्याख्याता । सरस्वती = सरस्वती, व्याख्याता = व्याख्यात है । अर्थात् नि. अ. २, खं. २३, ५७ वाईनामों में २२ या सरस्वती शब्द है । अ. १० सं. १३ में सरस्वान शन्द आया है। वहां भी इम की म्याश्या हुई है। पाठकों को वही देखना चाहिये।
निरुक्त एकादशाध्यायस्य पड्डिशः खण्डः । (१४९३) तस्या एषा भवति । इति निरुक्ते एकादशाध्यायस्य पञ्चविंशः खण्डः ।। ११-२५ ॥ तस्याः = उस सरस्वती की, एपा - यह अग्रिम ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्त एकादशाध्यायस्य पड्डिशः खण्डः । पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती । यज्ञं वष्टु धियावसुः ॥ स १-१-६-१० ॥ इस मन्त्र का मधुच्छन्दा ऋपि, गायत्री छन्द और सरस्वती देवता है । मन्त्रार्थ-पावका - पवित्र करने वालो, वाजेभि: वाजिनीवती = हविरूप अन्न से अन्न वाली, धियावसु धनवाली, सरस्वती - माध्यमिका सरस्वती देवी, न = हमारे, यज्ञम् = यज्ञ की, वष्टु करें, यज्ञ को चाहे । कर्मरूप -कामना इस मन्त्र का भाप्य- पावका नः सरस्वत्यन्नैरन्नवती यज्ञं वष्टु धिया वसुः, कर्मवसुः । पावका = पवित्र करने वाली, अन्नैः अन्नवती = अन्नो से अन्नवाली, घियावसुः = कर्मवसु. कर्मरूप धनवाली, सरस्वती = सरस्वती देवी, नः = हमारे, यज्ञम् = यज्ञ की, वष्टु = कामना करें हमारे यज्ञ को चाहे । अर्थात् हमारे यज्ञ मे पधारें। तस्या एपाऽपरा भवति । इति निरक्त एकादशाध्यायस्य पदिश खण्ड. ।। ११-२६ ।। तस्याः - उस सरस्वती की, एपा यह अग्रिम, अपरा = दूसरी ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्ते एकादशाध्यायस्य सप्तविंश खण्डः । महो अर्णः सरस्वती प्र चैतयति केतुना । धियो विश्वा वि राजति ॥ ऋ स १-१-६-१२ ॥ इस मात्र का भी मधुच्छन्दा ऋषि, गायत्री छन्द और सरस्वती देवता है। मन्त्रा-सरस्वती के दो रूप हैं। एक करचरणादि विग्रहवती देवता रूप और दूसरा नदी रूप । उन में पूर्व ऋचा से विग्रहवती का प्रतिपादन किया गया। अब इस ऋचा से नदी पा सरस्वती ने, बैतुना = प्रवाह निरुक्त एकादशाध्यायस्याप्टादशः खण्डा । रूप कर्म से, महो अर्णः = जलराशी को, प्रचेतयति = प्रगट किया है और इस के सिवाय अपने देवता रूप से, विश्वा धियः = समस्त ज्ञानों का भी, विराजति = विशेष रूप से प्रकाश किया है। इस ऋवा में दोनों रूपा सरस्वती की स्तुति है। - इस ऋचा का भाष्य- प्रज्ञया वेमानि च सर्वाणि = कर्मणा और, इमानि सर्वाणि महदर्णः सरस्वती प्रचेतयति प्रज्ञापयति केतुना कर्मणा प्रज्ञानान्यभि विराजति । सरस्वती = सरस्वती ने, केतुना प्रवाह रूप कर्म से, वा = अथवा, प्रज्ञया = ज्ञान से, महदर्णः = महान् जलराशी को, प्रचेतयति = प्रगट किया है। च = प्रज्ञानानि = इन सर्व ज्ञानों का भी, अभि विराजति = अधिक प्रकाश किया है। निरुक्त मत में सरस्वती का अर्थ वाग्देवता है। इस में युक्ति देते हैं- वागर्थेषु विधीयते । तस्मान्माध्यमिकां वाचं मन्यन्ते । वाग • याणी, अर्थेषु = अर्थो में, विधीयते = विधान की गई है और सरस्वती भी। तस्माद = इस लिये, माध्यमिकाम् वाचम् = मध्यलोक की देवता वाणी को. मन्यन्ते - नरुक्तलोग मानते हैं । अर्थात् सरस्वती देववाणी होने से मध्यम लोक की देवी है । वाक्। माध्यमिका देववाणी का नाम वाच् है । अर्थात् 'उच्यते अर्थः अनया इति वाक् ' इस विग्रह में 'वच परिभाषणे' धातु से 'किवचि' इत्यादि वात्तिक से कि प्रत्यय, सपिहारी लोप, दीर्घ, और सम्प्रसारण का अभाव होने पर वाच् शब्द बना है। मध्यस्थान देववाणी का नाम है । क्योंकि, वाणी से अर्थ कहा जाता है । भाष्यकार कहते हैं- वाग् व्याख्याता । वाग् = वाच् शब्द, व्याख्याता = व्याख्यात है। अर्थात् इस की व्याख्या (नि. अ. ५ खं. २३) में हो चुकी है। तस्या एपा भवति । इति निरुक्तं एकावशाघ्यायस्य सप्तविंशः खण्डः । ११-२७ ।। तस्याः ० उस वाग देवता की, एपा यह अग्रिम ऋचा, भवति = है- अप निश्क्ते एकादशाघ्यायस्याप्टादशः खण्डः । यद्वाग्वदन्त्यविचेतनानि राष्ट्री देवनी निपसादं मन्द्रा । चतस्र ऊर्ज दुदुहे पयासि के स्विदस्याः परमं जंगाम ॥ ऋ. सं. ६-७-५-१०॥
वाक् = वाणी : 5 स निरुक्त एकादशाध्यायस्ययकोनत्रिश: खण्डः । (१४९५) इस मन्त्र का भार्गव नेम ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और वाग्देवता है। मन्त्रार्थ-राष्ट्री दीप्ति रूप ऐश्वर्यशील और देवानाम् मन्द्रा = देवों को मानन्द देने वाली, यत् = जिस समय, अविचेतनानि = अज्ञानियों को ज्ञान देती हुई एवं, वदन्ती = ज्ञापन करती हुई, निषसाद - यज्ञ में बैठती है, उस समय, चतस्रः = चारो ओर के लिये, ऊर्जम् = अन्न और, पयांसि - जल का, दुदुहे = दोहन करती है । अस्याः = इस माध्यमिका वाग्देवी का जो, परमम् श्रेष्ठत्व है वह, कस्विद् जगाम = कहाँ गया? । अर्थात् कही नहीं। इस ऋचा मे वाग्देवी की स्तुति है। इस मन्त्र का भाप्य- यद्वावदन्त्य विचेतनान्यवि ज्ञातानि राष्ट्री देवानां निपसाद मन्द्रा मदना । चत स्रोऽनु दिश ऊज दुदुहे पयांसि । "क स्त्रिदस्याः परमं जगाम" इति । यत्पृथिवीं गच्छतीति वा यदादित्यरश्मयो हरन्तीति वा। राष्ट्री - दीप्तिरूप ऐश्वर्यशील, देवानाम् = देवो को, मन्द्रा = मदना : आनन्द देने वाली, वाक् = वाणी, यत् = जिस समय, अविचेतनानि = अविज्ञातानि = अज्ञानियों को ज्ञान देती हुई एवं, वदन्ति = ज्ञापन करती हुई, निषसाद यज्ञ में बैठती है उस समय, चतस्रः दिशः - चारो ओर के लिये, ऊर्जम् = अन्न और, पयांसि = जल का, अनुदुदुहे = दोहन करती है। अस्याः - इस माध्यमिका वाग्देवी का जो, परमम् - जलरूप श्रेष्ठत्व है वह, जो कस्विद् जगाम कहा गया? अर्थात कही नहीं। यह पृथिवीम् - जो पृथिवी मे, गच्छति - जाता है, इति वा = अथवा, यत् = जिस को, आदित्यर मयः = सूर्य को रश्मियां, हरन्ति - हर ले जाती हैं । फलतः वाग्देवी के अन्न और जल कभी नष्ट नहीं होते हैं। तस्या एपाऽपरा भवति । इति निरक्त एकादशाध्यायस्यरष्टाविंशः खण्डः ॥ ११-२८ ॥ तस्याः = उस वाग्देवी को, एषा - यह अग्रिम, अपरा - दूसरी ऋचा, भवति - अथ निरुक्त एकादशाध्यायस्यकोनविंशः खण्डः । देवीं वाचमजनयन्त देवास्तां विश्वरूपाः पशवा वदन्ति । सा नो मन्द्रपमूर्ज दुहांना धेनुर्वागस्मानुप सुष्टुतैतु ॥ क्र. सं. ६-७-५-११॥ इस मन्त्र का पूर्ववत् भार्गव नेम ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और वाग देवता है । मन्त्रायंदेवाः मध्यम लोक के देवताओने देवीम् = द्योतमान, वाचम् - जिस वाग्देवी को, अजनयन्त = उत्पन्न किया था, ताम् = उस, विश्वरूपाः = व्यक्ताव्यक्त सर्वरूपा वाणी को, पशवः - गो आदि पशु मी, पदन्ति = बोलते हैं। सा - वह नः- हमे मन्द्रा हपं देनेवासी, धेनुः घेनुख्या - वाग - निफक्त एकादशाध्यायस्यैकोनविंशः खण्डः । वाग्देवी, इषम् ऊर्जम् = अन्न और पयोधृतादि रस को, दुहाना = झरती हुई, सुष्टुता = सुन्दर स्तुति की गई, उप एतु = हमारे यहां आवें। इस मन्त्र में वाग्देवी की स्तुति है। इस मन्त्र का भाष्य- उत्पन्न किया था। - हमें, मदना %D = अन्न और रस को .झरती - , . देवीं वाचमजनयन्त देवास्तां सर्वरूपाः पशवो वदन्ति व्यक्तवाचश्चाव्यक्तवाचश्च । सो नोमदनाऽनं च रसं च दुहाना धेनुर्वागस्मानुपैतु सुष्टुता । देवाः = देवों ने, देवोम् = चोतमान, वाचम् = वाणी को, अजनयन्त = ताम् उस वाणी को, सर्वरूपाः पशवः = सर्व जाति के पशुगण, व्यक्तवाचः = व्यक्त वाणी, च = और, अव्यक्त वाचः = अव्यक्त वाणी को, वदन्ति = वोलते है। सा = वह, नः = हर्ष देनेवाली, धेनुः = धेनुरूपा, वाग् = वाणी, अन्नम् रसम् च दुहाना हुई, सुष्टुता = सुन्दर स्तुति की गई, अस्मान् = हमारे यहां, उपतु - भावें । २० अनुमतिः । २१ राका । अनुमति और राका ये दोनो देवों को त्रियों के नाम हैं । भाष्यकार निर्वचन करते हैं- अनुमतिराकेति देवपल्ल्याविति नैरुक्ताः पौर्णमास्याविति याज्ञिकाः । "या पूर्वा पौर्णमासी साऽनुमतिः, योत्तरा सा राका" (ऐ. वा. ७-२-१०) इति विज्ञायते । अनुमतिराका इति = अनुमति और राका ये दोनों, देवपत्न्यो = देवपत्नियें हैं, इति = मह, नरुक्ताः = निरुक्त शास्त्र के आचार्य लोग मानते हैं। पौर्णमास्यो - पौर्णमासी हैं, इति = यह, याज्ञिका:- याज्ञिक अर्थात् मीमासक लोग मानते हैं । इस में ब्राह्मण वाक्य प्रमाण देते हैं या = जो, पूर्वा पहली, पौर्णमासी = पौर्णमासी है, सा = वह, अनुमतिः = अनुमति है और, या= जो, उत्तरा पोर्णमासी है, सा = वह, राका = राका है, इति = यह विज्ञायते - ब्राह्मण वाक्य से जाना जाता है । भाव यह है कि, पूर्णिमा के दो भाग हैं । पहला और पिछला । उन में पहला भाग अनुमति और पिछला भाग सका है। अनुमतिरनुमननात् । अनुमननात् ८ अनुमनन से = ऋषि और देवताओ के 'यह पौर्णमासी है' ऐसा मानने से, अनुमतिः पौर्णमासी अनुमति' कहलाती है । अर्थात् 'अनुमन्यते इति अनुमतिः' इस विग्रह में अनु पूर्वक 'मन ज्ञाने' पातु से वाहुलकाद कर्ता में क्तिन् (ति) प्रत्यय, अनु मन् ति, अनुदात्तोपदेदा...' इत्यादि सूत्र से नकार लोप होने पर 'अनुमति' शब्द बना है । तस्या एपा मवति । इति निरुक्त एकादशाध्यायस्यकोनविंशः खण्डः । ११-२९ ।। तस्याः = उस अनुमति को, एषा = यह अग्रिम ऋचा, भवति = है- पिछली .
. इरा निरुक्त एकादशाध्यायस्यकत्रिंशः खण्डः । (१४९७) अथ निरुक्ते एकादशाध्यायस्य त्रिंशः खण्डः । अन्विदनुमते त्वं मन्यासै शं च नस्कृधि । ऋत्वे दक्षाय नो हिनु प्र ण आयूंपि तारिपः ॥ य. वा. सं. ३४-८॥ इस मन्त्र का याज्ञवल्क्य ऋषि, अनुष्टुप् छन्द और अनुगति देवता है। मन्त्रार्थ-अनुमते - हे चतुर्दशीयुक्त पूर्णिमा की अधिष्ठातृदेवि!, त्वम् = तुम, इत् - हो, अनुमन्यास = हमारे कथन को जानो, च = और, न: हमारा, शम् - कल्याण, कृषि = करो अर्थात् सुख दो और, ऋत्वे संकल्प के, दक्षाय - सिद्धि के लिये, न: हम को, हिनु = प्राप्त कराओ, तः हमारी. आयूपि आयुष्य को, प्रतारिपः = बढाओ । इस मन्त्र में अनुमति से स्तुति पूर्वक प्रार्थना है । राका रातेनिकर्मणः । दानकर्मणः = दानार्थक, रातेः = रा घातु से, राका - राका शब्द बना है। अर्थात 'राति हविः ददाति अस्मिन् इति राका' इस विग्रह मे 'रा दाने' धातु से 'कृदाधराचिकलिभ्यः का उणादि सूत्र से क प्रत्यय, बाहुल काद ककार की इत्संज्ञा का अभाव होने पर 'राका' शब्द वना है । तस्या एपा भवति । इति निरुते एकादशाध्यायस्य विश: खण्ड. ।। ११-३० ।। • तस्याः = उस राका की, एपा - यह अग्रिम कचा, भवति = है-- अथ निरुक्त एकादशाध्यायस्यकत्रिंशः खण्डः । राकामहं सुहवां' सुष्टुती हुंचे शृणोतु नः सुभगा वोधतु त्मना । सीव्यत्वपः सूच्याच्छिद्यमानया ददातु वीरंशतदायमुक्थ्यम् ॥ क्र. सं. २-७-१५-४॥ इस मन्त्र का गृत्समद ऋषि, जगती छन्द और राका देवता है। मानापं अपम् - में, सुहवाम् = सुन्दर आह्वागवाली, सुष्टुती = सुन्दर स्तुति पाली, राकाम् = संपूर्णचन्द्रा पौर्णमासी को, हुवे - बुलाता हूं । सुभगा = सुन्दर धनबालो, नः = हमारे आह्वान को, शणोतु - सुनें और सुन कर, त्मना = आत्मना = अपने आप से, बोपतु - जानें । अपः - सन्तान उत्पादन रूप कर्म को, सूच्या = सूचि स्थानीय, अच्छिद्यमानया = नया अविच्छिन्न, सीव्यतु - सीवें । वीरम् = पराक्रमी, पातदायम् - बहुत दान करनेवाला, उक्थ्यम् = प्रशंसनीय पुत्र, ददातु = देवें । इस मन्त्र में राका देवी की स्तुति है। इस ऋचा का भाष्य-- D , (१४९०) निक्क्ते एकादशाध्यायस्यकत्रिंशः खण्डः । राकामहं सुहानां सुष्टुत्वाहये, शृणोतु नः सुभगा योधत्वात्मना, अपः-प्रजननकर्म, सूच्याच्छिद्यमानया, सूची सीव्यतेः । ददातु वीरं शतदायमुफ्थ्यम् वक्तव्य प्रशंसम् । अयम् = मैं, सुहानाम् = सुन्दर आह्वान वाली, राकाम् = राका देवी को, सुष्टुत्या = सुन्दर स्तुति से, आह्वये - बुलाता हू। सुभगा = सुन्दर धन वाली राका, नः = हमारे आह्वान को, शृणोतु सुने और सुन कर, आत्मना = अपने आप से, वोधतु - जाने । अपः = प्रजनन कर्म = सन्तान उत्पादन रूप कर्म को, अच्छिद्यमानया अविच्छन्न, सूच्या = सूची से, सीव्यतु = सीवें । सीव्यतेः = पित् धातु से, सूची = सूची शब्द बना है । अर्थात् ' सीव्यति इति सूची' इस विग्रहमे- पिवु तन्तुसन्ताने धातु से 'सिवेष्टेरूच' इस उणादि सूत्र से चट् प्रत्यय (च), टि को ऊ भाव और टिरवाद डीप् होने पर 'सूची' शब्द बना है। राका हमैं, शतदायम् = बहुत दान करने वाला, उक्थ्यम् = वक्तव्यप्रशसेम् = प्रशसनीय, वीरम् - पराकमी पुत्र, ददातु - देवें । २२ -सिनीवाली । २३ - कुहूः। सिनीवाली और कुहू ये दोनो भी अनुमति और राका के समान देवों को सियों के नाम हैं। भाष्यकार इन का निवंचन करते हैं- सिनीवाली-कुहूरिति देवपल्याविति नरुक्ताः। अमावास्ये इति याज्ञिकाः । या पूर्वामावास्या सा सिनीवाली । योत्तरा सा कुहूः" इति विज्ञायते । सिनीवाली कुहूः इति = सिनीवाली और कुहू ये दोनो, देवपन्यो - देवपल्या हैं, इति = यह, नैरुताः निरुक्त शास्त्र के आचार्य लोग मानते हैं। अमावास्ये इति = अमावास्या हैं यह, याशिकाः याज्ञिक लोग मानते हैं । इस मे ग्राह्मण वाक्य प्रमाण देते हैं जो, पूर्वामावास्या = पहली अमावास्या है, सा - यह, सिनीवाली = सिनीवाली है और, या उत्तरा = जो पिछली अमावास्या है, सा 3 वह, कुहूः = कुहू है। इति उक्त ग्राहाण वाय से, विज्ञायते - जाना जाता है। भाव यह है कि, अमावास्या के दो भार को और पिछला। उन मे पहला भाग मिनीवाली " -या- - निरुक्त एकादशाध्यायस्य द्वात्रिंशः खण्डः । . . पातु से ' अकर्तरि च कारके संज्ञायाम्' इस सूत्र से घन् (अ) प्रत्यय, रपर वृद्धि, वार, पृषोदरा- दित्वात् र को ल होने पर 'वाल' शब्द बना है । पर्व ( उत्सव ) का नाम है। क्योकि, उत्सव में भोजन करने के लिये इतने लोग आते है कि, उन से दाता आवृत ( ढक) हो जाते हैं ! इस प्रकार 'सिन' शब्द और 'वाल' शब्द बन जाने के बाद, 'सिनम् अस्या अस्ति इति सिनी' इस विग्रह में सिन शब्द से मत्त्वर्थीय ई प्रत्यय अलोप होने पर 'सिनी' शब्द बना है। अन्न वाली अर्थ है । तस्मिन् = उस पर्व में, अन्नवती = जो बन्न वाली हो वह देवाङ्गना सिनीवाली कहलाती है। अर्थात् 'वाले सिनो इति सिनीवाली' इस विग्रह में ‘सहसुपा' इस सूत्र से समास, 'गजदन्तादिषु परम्' इस सूत्र से सिनी शब्द का पूर्व प्रयोग, सिनीवाल, गौरादि के आकृतिगण होने से 'पिगौरादिभ्यश्च' इस सून से डीप् (ई) प्रत्यय, अलोप होने पर 'सिनीवाली' शब्द बना है । पर्व में = उत्सव में अन्नवाली अर्थ है । देवताओं की खियाँ उत्सव के दिन अन्नवाली होती हैं। पर्व के दिन आये हुए सब को भोजन कराती हैं। अतः वे सिनीवाली कहलाती हैं। वा = अथवा, वालिनी = जो वालों वाली (केश वाली) हो वह सिनीवाली कहलाती है। वा = अथवा, वालेन इव - वाल के समान, अणुत्वात् = छोटा होने से, चन्द्रमाः = चन्द्र, अस्याम् इस में, सेवितव्यः = सेवनीय, भवति - होता है। जैसे चन्द्रमा अणु होने से सेवितव्य है वैसे ही वाल अणु होने से सेवितव्य है। 'वालेनैव सोव्यते इति सिनीवाली' इस विग्रह में पूर्ववत् समास और पूर्व निपात समझना चाहिये । तस्या एपा भवति । इति निरुक्त एकादशाध्यायस्यकत्रिशा खण्डः ॥ ११-३१ ।। तस्याः = उस सिनीवालो की, एपा = यह अग्निम ऋचा, भवति - है- अथ निरुक्ते एकादशाध्यायस्य द्वात्रिंशः खण्डः । सिनीवालि पृथुष्टुके या देवानामसि स्वसा । जुषस्व हुव्यमाहुतं प्रजा देवि दिदिड्डि नः ॥ ऋ सं. २-४-१५-६ ।। A इस मन्त्र का गृत्समद ऋषि, अनुष्टुप् छन्द और सिनीवालो देवता है । मन्त्रार्य-सिनीवालि- हे देवपत्नी रूप देवि ! वा हे यमावास्या अभिमानिनी देवि !, पृथष्टुके = हे मोटो जांघ वाली देवि!, या = जो तुम, देवानाम् = देवताओं की, स्वसा = स्वयं संचारिणो वा वहिन, अक्षि = हो, सो तुम. अहुतम् = अभिमुख हो कर अग्नि में प्रक्षिप्त, हव्यम् - हमारे हधि को, जुषस्व प्रेम से ग्रहण करो। और ग्रहण करके, नः = हमें, प्रजाम् - पुनादि सन्तान, दिदिदि दो। इस मम्म में सिनीवाली देवी से अर्थात माध्यमिका देवी से सन्तान के लिये प्रार्थना है। इस ऋचा का भाष्य- १०८ - बहुत दान करने वाला, (१४९०) निरुक्त एकादशाध्यायस्यकत्रिशः खण्डः । राकामहं सुहानां सुष्टुत्वाहये, शृणोतु नः सुभगा योधत्वात्मना, अपः-प्रजननकर्म, सूच्याच्छिद्यमानया, सूची सीव्यतेः । ददातु वीरं शतदायमुफ्थ्यम् वक्तव्य प्रशंसम् । अयम् = मैं, सुतानाम् - सुन्दर आह्वान वाली, राकाम् = राका देवी को, सुष्टुत्या - सुन्दर स्तुति से, आह्वये बुलाता हूं। सुभगा = सुन्दर धन वाली राका, न: = हमारे आह्वान को, शृणोतु सुनें और सुन कर, आत्मना = अपने आप से, बोधतु = जानें । अपः = प्रजनन कर्म = सन्तान उत्पादन स्प कर्म को, अच्छिद्यमानया - अविच्छन्न, सूच्या = सूची से, सीव्यतु सीवें। सीच्यतेः = षिव धातु से, सूची = सूची शब्द बना है । अर्थात् ' सीव्यति इति सूची' इस विग्रहमें- पिवु तन्तुसन्ताने धातु से 'सिवेटेरूच' इस उणादि सूत्र से चट् प्रत्यय (च), टिको 3 भाव और टिस्वात् डोप होने पर ' सूची' शब्द बना है। राका हमैं, शतदायम् उक्थ्यम् = वक्तव्यप्रशसेम् = प्रशसनीय, वीरम् = पराकमी पुत्र, ददातु = देवें । २२ - सिनीवाली । २३ - कुहूः। सिनीवाली और कुहू ये दोनो भी अनुमति और राका के समान देवों की खियों नाम हैं। भाष्यकार इन का निवेचन करते हैं- सिनीवाली-कुहूरिति देवपत्न्याविति नरुक्ताः। अमावास्ये इति याज्ञिकाः । "या पूर्वामावास्या सा सिनीवाली । योचरा सा कुहूः" इति विज्ञायते । सिनीवाली कुहूः इति = सिनीवाली और कुहू ये दोनो, देवपरन्यो - देवपत्न्या है, इति = यहा नरक्ताः = निरुक्त शास्त्र के आचार्य लोग मानते हैं । अमावास्ये इति = अमावास्या है यह, याशिवाः - याशिक लोग मानते हैं । इस मे ग्राहाण वाक्य प्रमाण देते है-या = जो, पूर्वामावास्या पहली अमावास्या है, सा = पह, सिनीवाली = सिनीवाली है और, या उत्तरा - जो पिछली अमावास्या है, सा- वह, कुहूः = पुहू है। इति + यह उक्त ब्राह्मण वारप से, विज्ञायते - जागा जाता है। भाव यह है कि, अमावास्या के दो भाग है । पहला और पिछला। उन में पहला भाग मिनीवाली और पिछला भाग पुहू है। सिनीली-सिनमन्नं भवति, मिनाति भूतानि । चालंपर्वणोते, वस्मिन्मनाती। पालिनी वा । वालेनेवास्थामणुत्वाचन्द्रमा सेवितव्यो भवतीति वा । "सिनीवालो' यह समस्त पद है। इस में दो है-मिन और दाल । उन में प्रपम प्राक सिन शन्द का निवंचन करते हैं-सिनम् बन्नम् भवति मिन अन्न होता है। क्योति, मन, सर प्रापियो को, मिनाति = बघता है। अर्थात् सिनाति बघ्नाति इति मिनम् अनम इस विग्रह में 'पिन बाधने' धातु से 'इम्मिखिदीप्यविन्योनद ' इस उगादि मूत्र में नव (न) भस्यय होने पर 'सिन' गन्द बना है। यान का नाम है। बदौरिमन गद प्राणियों को दांपठा है। अब याल पद श निर्वचन परते हैं--पर्ववृपोतेः - पर्व = रमय या वरणग्ने मे, याला बाल कहलाता है। ‘प्रियते सप्रिय दाता अस्मिन् इति वारम्' स विराह में 'जा, पर D - . - .
. निरुक्त एकादशाध्यायस्य द्वात्रिंशः खण्डः । (१४६९) धातु से 'भकर्तरि च कारके संज्ञायाम्' इस सूत्र से घम् (अ) प्रत्यय, रपर वृद्धि, वार, पृषोदरा- दित्वात् र को ल होने पर 'वाल' शब्द बना है। पर्व ( उत्सव ) का नाम है। क्योंकि, उत्सले में भोजन करने के लिये इतने लोग आते हैं कि, उन से दाता आवृत ( ढक ) हो जाते हैं। इस प्रकार 'सिन' शब्द और 'वाल' शब्द बन जाने के बाद, 'सिनम् अस्या अस्ति इति प्लिनी' इस विग्रह में सिन शब्द से मत्त्वर्षीय ई प्रत्यय अलोप होने पर 'सिनी' शब्द बना है। अन्न बाली अर्थ है । तस्मिन् = उस पर्व में, अभवती = जो अन्न बाली हो वह देवाङ्गना सिनीवाली कहलाती है। अर्थात् 'वाले सिनी इति सिनीवाली' इस विग्रह में ' सहसुपा' इस सूत्र से समास, 'राजदन्तादिषु परम् इस सूत्र से सिनी,शब्द का पूर्व प्रयोग, सिनीवाल, गौरादि के आकृतिगण होने से 'पिगौरादिम्याच' इस सूत्र से छोप् (ई) प्रत्यय, अलोप होने पर 'सिनीवाली' शब्द बना है। पर्व में - उत्सव में अन्नवाली अर्थ है। देवताओं की लिपा उत्सव के दिन अन्नवाली होती हैं। पर्व के दिन आये हुए सब को भोजन कराती हैं। अतः वे सिनीवाली कहलाती हैं। वा = अथवा, वालिनी = जो बालों वाली (केश वाली) हो वह सिनीवाली कहलाती है। वा = अथवा, वालेन इव = वाल के समान, अणुत्वाद = छोटा होने से, चन्द्रमाः = चन्द्र, अस्याम् इस में, सेवितव्यः - सेवनीय, भवति - होता है। जैसे चन्द्रमा अणु होने से सेवितव्य है वैसे ही वाल अणु होने से सेवितव्य है। ‘वालेनैव सीव्यते इति सिनीवाली' इस विग्रह में पूर्ववत् समास और पूर्व निपात समझना चाहिये । तस्या एपा भवति । इति निरुक्ते एकादशाध्यायस्यकत्रिशा खण्डः ।। ११-३१ ।। .तस्याः = उस सिनीवाली की, एषा - यह अग्निम ऋचा, भवति - है- अथ निरुक्ते एकादशाध्यायस्य द्वात्रिंशः खण्डः । सिनीवालि पृथुष्टुके या देवानामसि स्वसा । जुषस्व हव्यमाहृतं प्र॒जां देवि दिदिड्ढि नः ॥ ऋ. सं. २-४-१५-६ ।। D इस मन्त्र का गृत्समद ऋपि, अनुष्टुप् छन्द और सिनीवाली देवता है । मन्त्रार्य-सिनीवालिक हे देवपत्नी रूप देवि ! वा हे अमावास्या अभिमानिनो देवि !, पृथप्टुके = हे मोटी जांघ वाली देवि!, या - जो तुम, देवानाम् = देवताओं की, स्वसा स्वयं संचारिणो वा वहिन, अमि - हो, सो तुम. महतम् = अभिमुख हो कर अग्नि में प्रक्षिप्त, हव्यम् = हमारे इवि को, जुषस्व = प्रेम से ग्रहण करो। और ग्रहण करके, नः = हमें, प्रजाम् - पुत्रादि सन्तान, दिदिति - दो। इस मन्त्र में सिनीवाली देवी से अपति माध्यमिका देवी से सन्तान के लिये प्रार्थना है। इस ऋचा का भाष्य- १८ में इत्यादि स्वयं %3D . . (१५००) निरक्त एकादशाध्यायस्य द्वात्रिंशः खण्डा । सिनीवालि पृथुजघने स्तुकः स्त्यायते संघातः । पृथुकेशस्तुकै पृथुष्टुके वा। या त्वं देवानामसि स्वसा। स्वसासु असा स्वेषु सीदतीति वा । जुपस्व हव्यमदनं प्रजांच देवि दिश नः। सिनीवालि = हे सिनीवाली देवि ! । पृथुजघने = हे स्थूल जघने ! । स्तुकः = स्तुक शब्द, स्त्यायतेः = स्त्या घातु से बना है और, संघातः = संघात उसका अर्थ है । अर्थात् 'स्त्यायति इति रतुकः संघातः' इस विग्रह में 'स्त्यैप्टय शब्दसंघातयोः' पातु से उणादि परिकल्पित हुकक् (उ) प्रत्यय, स्त्या उक, डित्त्वात् टिलोप, स्त्य् उक, पृषोदरादित्वात् य लोप, स्त् उक, स्तुक शब्द बना है । संघात का नाम है । क्योंकि, जघन प्रदेश अधिक मांसादिका संघात है। वा = अथवा पृथुकेशंस्तुके = विस्तीर्ण केश के संघातवाली, पृथुष्टुके = पृथुष्टुका कही जाती है। इस पक्ष 'पृथु केश स्तुक' ये तीन पद हैं। उन केश शब्द का शाकपाथिवादित्वात् लोप, 'पूर्वपदाव' सूत्र पत्व और 'ष्टुनाष्टुः' इस सूत्र से ष्टुत्व होने पर पृथुष्टुका शब्द बना है। विस्तीर्ण केश समुहवाली देवपत्नी अर्थ है । या त्वम् - जो तुम, देवानाम् देवताओं की, स्वसा - संचारिणी वा वहिन, असि = हो । सु - सुन्दर धन को, असा = असन क्षेपण करती है इस लिये, स्यसा = स्वसा कही जाती है । 'सुप्ठु अस्यते क्षिप्यते इति स्वसा इस विग्रह में सुपूर्वक ' असू क्षेपणे' धातु से 'सुञ्यसेऽन् ' इस उणादि सूत्र से ऋन् (ऋ) प्रत्यय, सु अस् , यण् होने पर स्वस शब्द बना है । बहिन का नाम है । क्योंकि यह पितृ गृह से धन को अपने ससुरार को ले जाती है वा देवपत्नी यजमानो को सुख की तरफ ले जाती है । अतः वह स्वसा कही जाती है । अथवा, स्वेषु = अपने पित्रादि स्वजनों के यहा, सीदति - वैठती है, इति स्वसा = स्यसा कहलाती है । अर्थात् 'स्वेषु सीदति इति स्वसा' इस विग्रह में स्व उपपद 'पल्स विशरणगत्यवसादनेषु' धातु से उणादि कल्पित हुन (ऋ) प्रत्यय, स्व सद् ऋ, टित्यात टिलोप होने पर स्वस शब्द वना है । बहिन का नाम है । क्योंकि वह पित्रादि के अधीन रहती है । देवि हे देयि !, हव्यम् अदनम् = हमारे दिये हुए हव्यान्न को, जुपस्व = सेवन करो, च = और सेवन कर के, नः = - सन्तान, दिश - दो। कुहहतेः । काभूदिति या, क सती हूयत इति वा, काहुतं हवि!होतीति का गृहतेः = गुह धातु से, कुहूः = कुहू शब्द बना है। अर्थात् गृहति संवृणोति इति कुहूः देवपत्नी अमावास्या वा' इस विग्रह मे 'गुहू संवरणे' धातु से 'नृतिशृघ्योः कू:' इस उणादि सूत्र बाहुलकाव कू (क) प्रत्यय और पृषोदरादिस्यात् गकार को ककार होने पर युहू पाब्द बना है। देवपत्नी वा अमावास्या का नाम है। क्योकि, देवपत्नी गुह्य बातों को गुप्त रखती हैं और अमावास्या चन्द्रमा आदि सब पदार्थो को अन्धकार द्वारा ढाकती है। दोनों पक्ष में। अपवा, फ अभूद = कहां या, इति क अभूत्' इस विग्रह में के शब्द उपपद भू सत्तायाम्' धातु से 'नतिनध्योः कः' इस उणादि - इस अर्थ में 'कुहू' शब्द बना है। अर्पाव सूत्र से बाहुलकाव कू (क) प्रत्यय और पोदरादित्वात् छ और भूपों यह धादेश होने पर 'मुहू' शब्द बना है। देवपत्नी यौर अमावास्या का नाम है। देवपत्नी गम्भीर होते मे गुप्त बातों का वा - D इस लिये, . हमें, प्रजाम् घा - 32 - निफक्त एकादशाध्यायस्य अविशः खण्डः । सम्वरण करती है ( ढाकती है ) और अमावास्या चन्द्र को। अमावास्या के बाद जब चन्द्र दिखाई देता है तब लोग पूछते हैं-यह चन्द्र, के अभूत् - कहा था?। इस से अमावास्या कुहू कहीं जाती है । अमावास्या पक्ष में । वा = अथवा, क = कही, सती होती हुई, हूयते = आवाहन की जाती है, इति देवपत्नी 'कुहू' कही जाती है । भाव यह है कि, देवपत्नी अपने देवता रूप से अप्रत्यक्ष होने के कारण दिखाई नहीं देती है। अतः लोग कहते हैं-वह कहां है ? । परन्तु कही भी रहती हुई यज्ञ में आवाहन की जाती है। इसी से 'कुहू' कहलाती है । अर्थात् 'क सती हूयते इति फुहू' इस विग्रह में क्व उपपद 'हु दानादनयोः' धातु से उक्त उणादि सूत्र से वाहुलकात् कू प्रत्यय, क्व हु ऊ, पोदरादित्वात् का और हु को कुह् भाव होने पर 'कुहू ' शब्द बना है। देवपली का नाम है । देवपली पक्ष में। अथवा, नव कहा, आहुतम् - होम किये हुए, हविः - हवि को, जुहोति - ग्रहण करती है, इति = इस से, 'कुहू' कहलाती है। अर्थात् 'क्वाहुतं हविर्जुहोति' इस विग्रह में का उपपद 'हु द्रानादनयोः' धातु से पूर्ववत् कू प्रत्यय और क्व हु को युह भाव होने पर 'कुहू' दाब्द बना है। यह अर्थ भी देवपरनी पक्ष मे। - 2 . तस्या एपा भवति । इति निरुक्त एकादशाध्यायस्य द्वात्रिंशः खण्डः । ११-३२ ।। तस्याः = उस कृहू की, एषा = यह अग्रिम ऋचा, भवति - है- अथ निरुक्त एकादशाध्यायस्य त्रयस्त्रिंशः खण्डः ।। कुहूमहं सुवृतं विद्यनापंसमस्मिन्यज्ञ सुहवां जोहवीमि । सानो ददातु श्रवणं पितृणां तस्यैते' देवि हविषा विधेम । %E यह मन्त्र कहा का है पता नही। दुर्गाचार्य ने ए० वा. और अथर्वसं० का पता दिया है किन्तु उन मन्त्रों में पाठ भेद बहुत है । आनुपूर्वी मन्त्र नहीं है । इस मन्त्र का मपर्वा उपि, जगती छन्द और कुहू देवता है । मन्त्रायं-अहम् - मैं, सुवृतम् = सुकृतम् = सुन्दर कर्म वाली, सुहयाम् सुन्दर नावाहन चालो, कुहू कुहू देवी को, अस्मिन् यजे - इस यज्ञ में, जोहवीमि बुलाता हू । सा- वह, नो - हमें, पितृणाम् - पितरों के, श्रवणम् - धन और यश को, ददातु दे। देवि - है देवि!, तस्यते - ऐसे प्रभाव वालो तुझे हम, हविषा - हविः से, विधेम - परिचरम - सेवन करते हैं। हवि प्रदान करते हैं। - इस मन्त्रका भाष्य- . यमी । (१५०२) निरुक्त एकादशाध्यायस्य चतुविशः खण्डः । कुहूमहं सुकृतं विदित कर्माणमस्मिन् यज्ञे सुहानामाह्वये । सा नो ददातु श्रवणं पितॄणां, पित्र्यं धनमिति वा-पियं यश इति वा । तस्य ते देवि हविपा विधेम । इति व्याख्यातम् । अहम् = मैं, सुकृतम् - विदितकर्माणम् = विदित कर्मवाली, सुह्वानम् = सुन्दर आह्वानवाली, कुहूम् = कुहूदेवी को, अस्मिन् यज्ञे = इस यज्ञ में, आह्वये = आह्वान करता हूं, बुलाता हूं। सा = बह. नो = हमें, पितृणाम् = पितरों के, श्रवणम् = धन और यश को, ददातु = दे। पित्र्यम् धनम् पैतृकधन, इति वा = अथवा, पित्र्यम् यशः इति वा = पैतृक यश दे । देवि = हे देवि ! , तस्य ते = ऐसे प्रभावशाली तुझे, हम, हविषा = हवि द्वारा, विधेम - परिचरिया करते है। इति = यह मन्त्र, व्याख्यातम् - सुलभ होने से व्याख्यात प्रायः है । २४ माध्यमिका देवता यमराज की भगिनी (वहिन) का नाम यमी है । अर्थात् ' यच्छति उपरमयति इति यमी' इस विग्रह में 'यम उपरमे' धातु से 'इन्सर्वधातुभ्यः' इस उणादि सूत्र से इन् (इ) प्रत्यय होने पर यमि शब्द बना है और 'कृदिकारादक्तिनः' इस वार्तिक से डोप, इलोप होने पर यमी शब्द बना है। यास्क कहते हैं- यमी व्याख्याता । यमी = यमी, व्याख्याता - व्याख्यात है। अर्थात् नि. अ. १० ख. २० में यम शब्द का व्याख्यान हो चुका है। वहां पुल्लिङ्ग था और यहां बोलिङ्ग इतना ही भेद है । तस्था एपा भवति । इति निरूक्ते एकादशाध्यायस्य प्रयस्त्रिंशः खण्डः । ११-३३ ।। तस्याः = उस यमी को, एपा = यह अग्निम ऋचा, भवति - है- अथ निरुक्ते एकादशाध्यायस्य चतुर्विंशः खण्डः । अन्यमू षु त्वं यम्यन्य उ त्वां परि ष्वजाते लिवुजेव वृक्षम् तस्य वा स्वं मन इच्छा स वा तवाधा कृणुष्व संविदं सुभद्राम् ॥ क्र. सं. ७-६-८-१४ ॥ इस मन्त्र का वैवस्वद यम ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और यमी देवता हैं। मन्त्रार्थ-यामि । है यमि !, त्यम् = तू, लिवुजा वृक्षम् इव = लता वृक्ष के समान अर्थात जैसे लता (वेल) किसी पास वाले वृक्ष को आलिङ्गन करती है (लिपटती है ) वैसे ही, अन्यम् उ = किसी अन्य पुरुष को ही, सु = सुष्छु परिध्वज = मैथुन के अभिप्राय से आलिङ्गन कर । और, अन्य उ = ।
उसके, मन %3D निरुक्ते एकादशाध्यायस्य पञ्चत्रिशा खण्डा ! (१५०३) कोई अन्य पुरुष ही त्वाम् = तुम को भी, परिवजाते = आलिङ्गन करेगा। त्वम् = तू. तस्य = मन की, इच्छ = कामना कर । स = और वह पुरुष भो, तव मन - तुम्हारे मन की कामना करे। अध = उस के पश्चात् अर्थात् परस्पर की कामना होने के बाद उसके साथ, सुभद्राम् = इस लोक तथा परलोक दोनो लोको मे कल्याण देने वाली, सविदम् = चर्चा, कृणुष्व = कर । इस प्रकार यमराज ने उसके साथ सभोग की प्रार्थना करने वाली अपनी बहिन यमी को उपदेश दिया। स स १० वा मण्डल के १० वा सूक्त में यह कथा है । इस मन्त्र का भाष्य- अन्य = कर। अन्यमेव हि त्वं यम्यन्यस्त्वां परिष्वक्ष्यते लियुजेन वृक्षम् । तस्य वा त्वं मन इच्छ स वा तवाधानेन कुरुष्व संविदं सुमद्रां कल्याणभद्राम् । यमि - हे यमि , स्वम् = तू, अन्यम् एव हि = किसी अन्य पुरप को ही, और वह, - अन्य पुरुष भी, स्वाम् = तुम को ही, परिष्वक्ष्यते = आलिङ्गन करेगा। लिवुजा वृक्षम् इव = लता वृक्ष के समान । त्वम् तस्य मन इच्छ - तू उसके मन की इच्छा कर और, स वह, तव = तुम्हारे मन की कामना करे। अधानेन = उस के बाद, सुभद्राम् = कल्याणमद्राम् = कल्याण देने वाली, सविदम् = चर्चा को, कुरुष्व यमी यमं चकमे, वां प्रत्याचचक्ष इत्याख्यानम् । यमी यमी ने, यमम् - यम को, चकमे पतिभाव से चाहा । ताम् - उस को यमने, प्रत्याचचक्ष = प्रत्याख्यान किया = निषेध किया । इति - यह, आख्यानम् - आख्यान अर्याद इतिहास है। इति निरुक्त एकादशाध्यायस्य चतुविश खण्ड । ११-३४ ।। पथ निरुक्त एकादशाध्यायस्य पञ्चपिश खण्ड । २५ माध्यमिक देवता का नाम उर्वशी है । भाष्यकार कहते हैं- उर्वशी व्याख्याता । D उर्वशी । - (१५०४) निरुक्त एकादशाध्यायस्य पत्रिंशः खण्डः । (ई) प्रत्यय, इकार लोप होने पर 'उर्वशी' शब्द वना है। माध्यमिका देयता का नाम है। क्योंकि वह बहुत व्यापक होती है। अधिक वही देखना चाहिये । तस्या एपा भवति । इति निरक्त एकादशाध्यायस्य पश्चत्रिंशः खण्डः । ११-३५ ।। तस्याः = उस उर्वशी की, एपा यह अग्रिम प्रचा, भवति = है-- अथ निरुक्ते एकादशाघ्यायस्य पत्रिंशः खण्डः । विद्युन्न या पतन्ती दविद्योगन्ती मे अप्या काम्यांनि । जनिष्टो अपो नर्यः सुजातः प्रोर्वशी' तिरत दीर्घमायुः ॥ ऋ. सं.'८-५-२-१०॥ इस मन्त्र का पुरुरवा ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और उर्वशी देवता है। मन्त्रार्थ-या = जो, विद्युत् न = बिजली के समान, मेघ के भीतर, पतन्ती = पड़ती हुई, दविद्योत् = प्रकाश करती है। मे = मेरे लिये, काम्यानि = वाञ्छनीय, अप्या - जलों को, भरन्तो = हरन्ती = लाती हुई, अपः - जल से, नर्यः - मनुष्यों के लिये हित रूप, सुजातः = सुन्दर पुष, जनिप्टो - उत्पन्न करती है। उर्वशी वह माध्यमिक देवी, दीर्घम् मायुः । लाम्बी आयु, प्रतिरत = देती है। अर्थात् जल से अन्न उत्पन्न करके उसके द्वारा आयु बढाती है। इस ऋचा से उर्वशो (मध्यदेवी) की स्तुति की गई है। इस मन्त्र का भाष्य- - प्रकारा विद्युदिव या पतन्त्ययोतत हरन्ती अप्या काम्यान्युदकान्यन्तरिक्षलोकस्य । यदा नूनमयं जायेताद्भभोऽध्यप इति नर्यो मनुष्यो नृभ्यो हितो नरापत्यमिति वा। सुजातः सुजाततरोऽयोर्वशी प्रवर्धयते दीर्घमायुः । या = जो उर्वशी, विद्युत् इव = विजली के समान, पतन्ती = पड़ती हुई, अघोरात करती है। मे - मेरे लिये, अन्तरिक्षलोकस्य = अन्तरिक्ष लोक के, काम्यानि वाञ्छनीय, अप्या = उदकानि जलों को, हरन्ती = लाती हुई, यदा - जब, नूनम् निश्चय ही, अयम् - यह अद्भयः = अध्यपः = जलों से, नर्यः = मनुष्यः - नृभ्यः हित: = मनुष्यों के लिये हितरूप, इति वा = अथवा, नरापत्यम् = मनुष्य का पुत्र, जायेत = उत्पन्न होता है। सुजात: सुजाततरः - सुजात अदि अतिशय सुन्दर पुत्र उत्पन्न होता है । अथ = तब, उर्वशी = मध्यदेवी, दीर्घम् आयुः। मायु, प्रवर्धयले = बढाती है। अर्थाद उस पुत्र को आयु को दीर्घ कर देती है। २६ पृथिवी । माध्यमिका देवता का नाम पृथिवी है । 'प्रयते इति पृथिवी' इस विग्रह में 'प्रथ प्रत्याने' पातु से 'प्रयः पिवन सम्प्रसारणं च ' इस उणादि सूत्र से पिवद (इव) प्रत्यय, संप्रसारण, पृथ् इव, . लाबी निरुक्ते एकादशाध्यायस्य सप्तत्रिशः खण्डः । (१५०५) पृयिव, 'पिगौरादिम्यन्त्र' इस सूत्र से होय (ई) अलोप होने पर पृथिवी पन्द बना है। भाष्यकार कहते हैं- पृथिवी व्याख्याता । पृथिवी = पृथिवी, व्याख्याता - व्याख्यात है। अर्याद इस को व्याच्या नि. अ. २ सं. १२ अन्तरिक्ष नामों में की गई है। वहां अन्तरिक्ष वाचक और यहां माध्यमिका देवता वाचक है। इतना ही अन्तर है। तस्या एपा मवति । इति निरुक्त एकादशाध्यायस्य पत्रिंशः खण्डः ।। ११-३६ ।। तस्याः = इस पृथिवी को, एपा यह अग्रिम चा, भवति = है- मय निरुक्ते एकादशाध्यायस्य सप्तगिराः सन्तः । वळित्या पर्वतानां खिद्रं विभर्पि पृथिवि । प्र या भूमि प्रबत्वति महा जिनोपि महिनि ॥ स ४-४-२९-१।। इस मन्त्र का भौम अत्रि ऋपि, अनुष्टुप् छन्द और पृथिवी देवता है। मन्त्रायं-पृथिवि - हे प्रपनवति माध्यमिक देवते! तुम, इत्या इस प्रकार यहां वा अन्तरिक्ष में, वट - सत्यम् - सचमुच, पर्वतानाम् - मेघों के, खिदम् = छेदनम् - भेदनम् = छेदन करने वाले दल को, विपि धारण करती हो। महिनि = हे महति !, प्रवत्वति = हे प्रकर्षवति !, या = जो तुम, भूमिम् पृथिवी को, मला = महत्त्व के कारण, प्रजिनोपि = जिलाती हो। इस ऋचा का नाप्य- सत्यं त्वं पर्वतानां मेघानां खेदनं छेदन मेदनं वलममुत्र धारयसि पृथिवि प्रजिन्नासि या भूमि प्रवणाति महत्वेन, महतीचुदकरतीति वा । पृथिवि = है माध्यमिक देवते !, त्वम् - तुम, सत्यम् - सचमुच, पर्वतानाम् = मेपानाम् मैयों के. रोदनम् - छेदनम् - मेदनम् - छेदन करने वाले, वलम् = वल को. समुत्र वहां सन्तरिक्ष में, धारयसि = धारप करती हो । प्रवपदती - है प्रापंति ! वा = जो, तुम, भूमिम् - पृथिवी - महत्त्व के कारण, प्रजिन्यसि जिलाती हो । वा = अपवा, महति इति - महति मह. उदयति = बल वाली, महिनि - महति - महत्ववाली अथवा जल वालो । २७ इन्द्राणी । इन्द्र गदा निबंधक नि. ब. १. पं. ८ में पिया गया है। देवराज इन्द्र वर्ष है । उसी इन्द्र को पानी रा नाम मानी है । 'दस्य नो इन्द्राणी'म विदह में से पुयोग में वो, महत्त्वेन . (१५०६) निरुक्त एकादशाध्यायस्याष्टाविंशः खण्डः । इन्द्रवरुणभव....' इत्यादि सूत्र से डोप् प्रत्यय (ई) और आनुक् (आन्) आगम, एवं णत्व होने पर 'इन्द्राणो' शब्द बना है। माध्यमिका देवो अर्थ है। क्योंकि, वह इन्द्र की पत्नी है। . भाष्य- - इन्द्रणीन्द्रस्य पत्नी। इन्द्रस्य - इन्द्र की, पत्नी स्त्री, इन्द्राणी = इन्द्राणी बाहलाती है। कोई इन्द्राणी का अर्थ इन्द्र की पत्नी नहीं किन्तु स्वतन्त्र माध्यमिका देवता करते हैं। उनके मत में पत्नी शब्द का अर्थ भी नहीं किन्तु विभूति है। इन्द्र को पली अर्थात् इन्द्र की विभूति । स्वर्ग में जितने देव और देवियां रहती हैं वे सब इन्द्र की विभूतियाँ हैं । तस्या एपा भवति । इति निरुक्त एकादशाध्यायस्य सप्तविंशः खण्डः ।। ११-३७ ।। तस्याः = उस इन्द्राणो की, एगा यह आगे की, ऋचा, भवति - है- अथ निरुक्ते एकादशाध्यायस्याष्टात्रिशः खण्डः । इन्द्राणीमासु नारिषु सुभगामहमश्रवम् । नबस्या अपरं चन जरसा मरते पतिर्विश्वस्मादिन्द्र उतरः ॥ ऋ. सं. 6-४-२-११ ।। इस मन्त्र का इन्द्र ऋपि, पञ्चपदा पक्ति छन्द और इन्द्र हो देवता है। मन्त्रार्थ-इन्द्रराजा इन्द्राणी की स्तुति करते हैं--अहम् = मैने, मासु नारिषु - इन नारियों में, इन्द्राणीम् = इन्द्राणी को, सुभगाम् - अधिक सौभाग्यवती, अश्रवम् = सुना है। अस्याः पतिः = इस इन्द्राणी का पति इन्द्र (मैं) विश्वस्मात् - अन्य सब खियों के पति से, उत्तर: - अधिक श्रेष्ठ है। इन्द्रः - इन्द्र ( मै), अपरम् चन = अन्य प्राकृत पुरुषों के समान, जरसा - वृद्ध अवस्था से, मरते नहि = मरते नहीं है। इस मन्त्र का भाष्य-- इन्द्राणीमासु नारिषु सुभगामशृणवं न ह्यस्था अपरामपि समाम् । जरया नियवे पतिः। सर्वस्माय इन्द्र उत्तरस्तमेतद् ब्रूमः । आसु नारिषु = इन स्त्रियों में, इन्द्राणीम् = इन्द्राणी को, सुभगाम् = अधिक सौभाग्यवती, अशुणवम् = मुना है । अपराम् अपि समाम् = दूसरी स्त्रियों के पति के समान, अस्याः पतिः = इस का पति, जरया = जरा अवस्था के कारण, नहि म्रियते - मरता नहीं है। यः इन्द्र - जो इन्द्र, सर्वस्माद = सब से, उत्तरः = उत्कृष्ट है । तम् - उप इन्द को हम, एतत् = यह, बूमः = कहते हैं ।
निरुक्त एकादशाध्यायस्यकोनचवारिया खण्डः । (१५०७) तस्या एपाऽपरा भवति । इति निश्क्ते एकादशाध्यायस्याष्टारिंशः खण्डः । ११-३८ ।। तस्याः = उप्स इन्द्राणी की, एषा = यह, अपरा = दूसरी ऋचा, भवति = है- मथ निरुक्त एकादशाध्यायस्यकोनचत्वारिंशा खण्डः । नाहमिन्द्राणि रारण सख्युद्दपार्कपेनते । यस्येदमप्यं हविः प्रियं देवेषु गच्छति विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥ क्र.सं. ४-४-२-१२ ।। %D सस्युः वृपाकयो इस मन्त्र का भी ऋपि और देवता इन्द्र ही है। छन्दपञ्चपदापदिक्त। मन्त्रार्य-इन्द्राणि हे इन्द्राणि!, अहम् = मैं इन्द्र, सरव्युः वृपाकपेः = अपने मित्र वृषाकपि के, ऋते = विना, न ररण - नहीं रमता हूं। प्रसन्न नहीं रहता। अप्यम् । = जल से संस्कृत, प्रियम् = प्रीतिकारक, इदम् हविः = यह हवि, देवेषु = देवों में अन्य देवों को छोड़कर, यस्य = जिस इन्द्र के पास ही, गच्छति = जाता है। क्योंकि, इन्द्रः = इन्द्र, (मैं), सर्वस्मात् = अन्य सर्व देवों से, उत्तरः = श्रेष्ठ है। श्रेष्ठता रूप से इन्द्र का वर्णन होने से इसका इन्द्र ही देवता है। वृषाकपि नहीं। इस मन्त्र का भाष्य- नाहमिन्द्रागिरमे सख्युपाकपेत्रते यस्येदमप्यं हविरप्सु शृतमद्भिः संस्कृतमिति वा । प्रियं देवेषु निगच्छति । सर्वस्माद्य इन्द्र उत्तरस्तमेतद् ब्रूमः । इन्द्रागि = हे इन्द्रागि!, महम् = मैं, = अपने मित्र वृपाकपि, ऋते विना, न रेमे = रमता नहीं हूं। प्रसन्न नहीं रहता हूं। यस्य = जिसका, इदम् हविः = यह हवि, अप्सु शृतम् = जल में होने वाला, इति वा = अथवा, अद्भिः संस्कृतम् - जल से संस्कृत, देवेषु - देवों में, प्रियम = अत्यन्त प्रिय, इन्द्र के पास, निगच्छति = जाता है। क्योंकि, मः इन्द्रः - जो इन्द्र, सर्वस्मात् = अन्य सब देवों से, उत्तरः = उत्कृष्ट है = श्रेष्ठ है। तम् एतद् धूमः उस इन्द्र को हम यह कहते हैं। २८- माध्यमिका वाग्देवता का नाम गौरी है। भाष्यकार कहते हैं- गौरी रोचतेज़लतिकर्मणः । प्वलतिकर्मणः - दीप्त्यर्य, रोवते! = रुच पातु से, गोरी - गोरी एन्द बना है। पर्याद 'रोचते वाग्देवतात्वा स्वया दीप्त्या ज्वलति इति गौरी' इस विग्रह में 'रुच दीप्तामिप्रीती चं १०९ -गौरी । .
, अयम् अपि निरुक्त एकादशाध्यायस्य चत्वारिंशः खण्डः । धातु से 'ऋजेन्द्रा अवविप्र....' इत्यादि उणादि सत्र के निपातन से रन् (२) प्रत्यय रुच र, पृषोदरादित्वात् धातु को गौ आदेश होने पर गौर शब्द वना है। गौरत्व वर्णशिष्टा श्री गौरी' इस विग्रह मे 'पिगौरादिभ्यश्च' इस सूत्र से डीप् (ई) प्रत्यय, अलोप होने पर 'गौरी' शब्द बना है। माध्यमिका वाग्देवता का नाम है । क्योकि, वह दीप्तिवती है। अपमपीतरो गौरो वर्ण एतस्मादेव प्रशस्यो भवति । = यह भी, इतर = दूसरा, वर्णः = गौरवर्ण वाची गौर शब्द, एतस्मात् एवं इसी रुच घातु से बना है। क्योकि, वह, प्रशस्यो भवति प्रशसनीय होता है। तस्था एपा भवति । इति निरुक्ते एकादशाध्यायस्यैकोनचत्वारिंश खण्डः ॥ ११-३९ ।। तस्याः = उस गोरी की, एपा - यह अग्निम ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्त एकादशाध्यायस्य चत्वारिंश खण्ड। । गौरीमिमाय सलिलानि तक्षत्येकंपदी द्विपदी सा चतुष्पदी । अष्टापदी नवपदी बभूवुषी सहस्राक्षरा परमे व्योमन् ॥ ऋ. सं. २-३-२१-४१ ॥ इस मन्त्र का दीर्घतमा ऋपि, जगतो छन्द और गौरी देवता है । मन्त्रार्थ-सलिलानि तक्षती वृष्टि के जलो का सम्यक् सम्पादन वाली, सहस्राक्षरा = हजारो व्याप्तियो से युक्त, सा = = एकपाद से युक्त, द्विपदी दो पाद से युक्त, चतुष्पदी = चार पाद से युक्त, अष्टापदी = आठ पाद से युक्त, नवपदी नो पाद से युक्त, बभूवुपी = होती हुई, गोरोः = गरणशील माध्यमिका मेघ वाणी, परमे व्योमन् - उन्नत अन्तरिक्ष में, मिमाय = शब्द करती है। इस मन्त्र का भाप्य- गौरीनिर्मिमाय सलिलानि तक्षती कुर्वती । एकपदी-मध्यमेन । द्विपदी-मध्यमेन चादित्येन च । चतुष्पदी-दिग्भिरष्टापदी दिग्भिधावान्तरदिभिश्च । नवपदी-दिग्भिश्चावान्तरदिग्भि शादित्येन च । सहस्राक्षरा-बहूदका परमे व्यवने । सलिलानि तपती = फुर्वती - वृष्टि के बलो का सम्यक् सम्पादन करने वाली, गौरी: माध्यमिका देवता, निमिमाय = शन्द्र करती है। मध्यमेन एक्पदी = मध्यम के साथ एक पाद वाली हो कर । मध्यमेन आदित्येन = मध्यम आदित्य के साथ, द्विपदी = दो पाद वाली हो कर । दिमि चारो दिशामओ के साथ, चतुप्पदी = चार पाद वाली हो कर, दिग्मिः च - चारो दिशाओ और, - %3D वह, एकपदी %3D भ - , - , निरुक्त एकादपाध्यायस्यकचत्वारिंशः खण्डौ । (१५०९) अवान्तरदिग्भिः च - चारो अवान्तर दिशाओं के साथ, अष्टापदी = आठ पाद बाली हो कर, दिग्भिश्च अवान्तरदिग्भिश्च = चार दिशा और चार अवान्तर दिशा के साथ, च = और, आदित्यन च आदित्य के साथ, नवपदी = नो पाद वाली हो कर। सहस्राक्षरा = बहुदका - बहुत जल वाली हो कर । परमे व्यवने - अनन्त अन्तरिक्ष में, शब्द करती है। तस्या एपाऽपरा भवति । इति निरुक्ते एकादशाध्यायस्य चत्वारिंशः खण्डः ॥ ११-४० ।। तस्याः = उस गोरी की, एषा - यह, अपरा - दूसरी ऋचा, भवति - है- अथ निरुक्ते एकादशीध्यायस्यकेंचत्वारिंशः खण्डः । तस्याः समुद्री अधिं वि क्षरन्ति तेनं जीवन्ति प्रदिशश्चतस्रः । ततः क्षरत्यक्षरं तद्विश्वमुपं जीवति ॥ * सं. २-३-२२-४२॥ इस मन्त्र का दीर्घतमा ऋपि, प्रस्तार पति छन्द और प्रथमा, के वाग एवं द्वितीया के अपं देवता है । मन्त्रार्थ-तस्याः = उस गौरी के पास से, समुंद्रा: * सारे मेघ, अधि - अधिक जल, विक्षरन्ति = वर्षा करते हैं। तेन - उस जल से, प्रदिशश्चतस्रः = चारो दिशा प्रदिशाओं में बाधित प्राणी, जीवन्ति = जीते हैं। ततः - उस के पश्चाद, अक्षरम् = जले, सस्यादि को, धरति = उत्पन करता है। तव = उस सस्यादि से, विश्वम् = सारा संसार, उपजीवति = जीवन धारण करता है। इंस प्रकारं इस मन्त्र में गौरी की स्तुति है। इस मन्त्र का भाप्य- 'तस्याः समुद्रा अधि विक्षरन्ति' प्रवर्पन्ति मेघास्तेन जीवन्ति दिगाश्रयाणि भूतानि । ततः क्षरत्यक्षरमुदकं तत्सर्वाणि भूतान्युपजीवन्ति । तस्याः - उस गोरी के पास से, समुद्राः = मेरा: सारें मेष, अघि विक्षरन्ति = प्रवन्ति = वरसते हैं। तेन = उस जल से, दिगारयाणि भूतानि = सर्व दिशा यिदिशाओं आधित प्राणी, जीवन्ति = जीवन धारण करते हैं। ततः - उसके पश्चात, अक्षरम - उदकम् । जल सस्यादि को, दारति - उत्पन्न करता है। तत् उस सस्यादि से, सर्वाणि भूतानि - सय प्राणी, उपजीवन्ति - जीते हैं। २९ माध्यमिक देवता का नाम गो है। 'गच्यतीति गौः' इस विग्रह में 'गम गी' पातु से 'गोटोइस उणादि मूत्र से हो (ो) प्ररपय, हित्वाद टिलोर होने पर, ग मी, 'गो' र बना है। माध्यमिक देवता का नाम है। इसको कोई मेघशनी भी य है। पाक कहते हैं--- गौः। .
D (१५१०) निरुक्ते एकादशाध्यायस्य द्वाचत्वारिंशा खण्ठः । गोर्व्याख्याता। गो. गौः देवता, व्याख्याता = व्याख्यात है अर्थात गो शब्द की व्याख्या पृथिवी नामो मे सर्व प्रथम हो चुकी है। (निरु० अ० २ खं० ५)। तस्या एपा भवति । इति निरुक्ते एकादशाध्यायस्यैकचत्वारिंशः खण्डः ।। ११-४१ ।। तस्याः = उस गो की, एपा = यह अग्रिम ऋचा, भवति = है- अय निरुक्त एकादशाध्यायस्य द्वाचत्वारिंशः खण्डः । गौरमीमेदर्नु वत्सं मिपन्तं' मूर्धानं हिड्१कृणोन्मातवाउं । सृक्काणं धर्ममभि वावशाना मिमांति मायुं पयते पयोभिः ॥ स. २-३-१९-२८॥ इस मन्त्र का दीर्घतमा ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और विश्वदेव देवता है । इस मन्त्र मे गो शब्द थे दो अर्थ हैं। धेनु और माध्यमिका देवी। धेनु का वरस (बछडा) प्रसिद्ध है । देवी पक्ष मे दस आधिरय है। यरस दूध को सींचता है और आदित्य रसो यो। और सब समान है । मन्त्रार्ष- गौः - याग्देवतारूप घेनु, मिषन्तम् = नेत्र बंद रिये एव, यत्सम् - आदिश्य रूप पाडे यो, अनु : प्राप्त कर, अमोमेत् = 'हम्या' शब्द करती है। उस बछडे फे, मूर्धानम् = मस्ता, मात - पाटने के लिये, हिङ्कारोद = हिकार सन्द करती है। मृणम् = बछडे ये ओटो पर फेन दे पर, पर्मम - रसो के हरण करने वाले पछा, अमि - लक्ष्य कर, वावशाना - यामयमाना होती हुई मायुम् = हम्यारव (शन्द), मिमाति - करती है। इस मन्त्र का भाप्प- गौरवमीमेद्वत्सं मिपन्तं निमिपन्तमनिमिपन्तमादित्यमिति वा। मूर्धानमम्यामिद्धि करोन्मननाय । सफ्वाणं-सरणं, धर्म-दरणममिवावशाना मिमानि मायं प्रप्यापते पयोमिः । गौ - धेनु, मिषन्तम् निमिषन्तम् - अनिमिपन्तम् = नेत्र बद पिये या न पिये एव, वरसम् = बछडे को, अनु = प्राप्त पर, प्रमोमेद = 'हम्बा' म यरती है। या . अपवा, आदिरयम आदित्य को । मस्य = इस बछडे का, मूर्धानम् = मस्तन, मननाय- मनन वा स्मरण करने में लिये, अभिहिरो - हिंदगार पर परनी है। पर हरनम् = रमों को हरण करने वाले, मृगण सरणम् = गमनमोल बहेको, अभि अभिलपय = साय फरक, वावगाना - समयमान होती हई, मापुम् मिमाति = राम करती है। बछरे को, पयोभिः = दूध में, प्रप्यायो - दहावी है। दूसरे प्रकार से मन्त्र का सामान पर है- - निरुक्त एकादेशाध्यायस्य त्रयश्चत्वारिंशः खण्डः । मायुमिवादित्यमिति वा । वागेपा माध्यमिका, धर्मधुगिति याज्ञिकाः । वा = अथवा, नरुक्तो का कहना है कि, वत्स का अर्थ वछड़ा नहीं किन्तु, मायुम् इव = शब्द के समान सन्तत गमनशील, आदित्यम् = आदित्य को प्राप्त कर, इति - यह अर्थ है। और वाग एपा गौ का अर्थ वाग् यह गाय नहीं किन्तु, माध्यमिका- माध्यमिका देवता है। अर्थात् माध्यमिका देवता रूपी गाय आदित्य रूपी बछड़े को देख कर शब्द करती है। यह नरुक्त अर्थ है। और गौ वाग का अर्थ माध्यमिक देवता नहीं किन्तु, धर्मधुक् = दूध दुहाने वाली प्रसिद्ध गाय अर्थ है। जिस के दुग्ध धृतादि से यज्ञ सम्पन्न होता है यह, याज्ञिका. = याज्ञिक कर्मकाण्डी लोग कहते हैं । अर्थात् गो का अर्थ गाय और वत्स का अर्थ बछडा है। यह याज्ञिक लोग कहते हैं। इस प्रकार मतभेद से इस ऋचा के दो अर्थ हैं। ३० धेनुः । माध्यमिका देवता का नाम धेनु है । कोई माध्यमिका देवता का अर्थ मेघ करते हैं। जैसे गौ से दूध निकलता है उस को वत्स पीता है वैसे ही मेघ रूपी गौ से जलरूप दूध निकलता हैं उस को पृथिवीरूप वत्स पीता है। भाष्यकार निर्वचन करते हैं- घेनुर्धयते; घिनोतेर्वा । घयते घे घातु से, वा = अथवा, धिनोतेः = घि घातु से, धेनुः = धेनु शब्द बना है। अर्थात् 'घय्यते वत्से न पीयते इति धेनु.' इस विग्रह मे 'धेट पाने पातु से ' घेट इच्च' इस उणादि सूत्र से बाहुलकाव नु प्रत्यय और धातु को इकारान्तादेश, घि नु, एवं गुण होने पर घेनु पशब्द वना है । माध्यमिका देवता वा गाय अर्थ है । क्योकि, जल रूपी दूध वाली माध्यमिका देवता रूप गाय पृथिवी रूप वत्सा द्वारा पान की जाती है। अथवा 'घिनोति उदकेन पयसा वा तर्पयति इति धेनु. माध्यमिका देवता गोर्वा ' इस विग्रह मे नरुक्त स्वादि तर्पणापक घि' धातु से उणादि परिकल्पित नु प्रत्यय और गुण होने पर धेनु शब्द बना है। माध्यमिका देवता वा गाय अर्थ है । क्योकि उक्त देवता जल द्वारा और गाय दुघ द्वारा सब को तृप्त करती है। तस्या एपा भवति । इति निरुक्त एकादशाध्यायस्य द्वाचत्वारिंशः खण्ड. ।। ११-४२॥ तस्याः = उस धेनु को, एपा = यह अग्रिम मचा, भवति = है- अथ निरुक्त एकादशाध्यायस्य त्रयश्चत्वारिंशः खण्डः । उप ये सुदुधां धेनुमेतां सुहस्तो गोधुगुत दोहदेनाम् । श्रेष्ठं सर्व संविता साविपन्नोऽभीद्धो धर्मस्तदु पु प्र वोचम् ॥ ऋ सं. २-३-१९-२६ ॥
और, सुहस्त (१५१२) निरक्त एकादेशाध्यायस्य त्रयश्चत्वारिंशः खण्डः । इस मन्त्र का दीर्घतमा ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और विश्वदेव के अन्तर्गत घेतु देवता है। मात्रार्य- में होता, एताम् = इस, सुदुधाम् = सुन्दर दुहने वाली माध्यमिका देवता रुप, धेनुम् = धेनु को, उप हये = आह्वान करता हू = बुलाता हूँ। उत दोहन कुशल सुन्दर हाय वाला, गोधुक् = गोदुहने वाला अध्वर्यु, एनाम् = इस माध्यमिका देवता रूप धेनु को, दोहन दुहती है। अभिद प्रज्वलित, सविता - सब को उत्पन्न करने वाला, धर्म. - मध्यमदेव नं. - हमारे, श्रेष्ठंम् - प्रशसनीय, सवम् = सोम याग को, साविषद - जानें वा ग्रहण करें, तद । इस कारण से, सुप्रवोचम् = अच्छा कहता हूं। सुन्दर स्तुति से आह्वान करता है । इस मन्त्र में प्रयुक्त धेनु शब्द का अर्थ मेघाधिष्ठातृदेवता है । 35 इस मात्र का भाष्य- - योकिं, एप %3D - - अथवा, पय = उपवये सुदोहनां धेनुमेतां कल्पाणहस्तो गोधुगपिच दोग्ध्येना श्रेष्ठं सर्व सविता सुनोतु न इति । एप हि श्रेष्ठः सर्वेषां सवानां यदुदकम् । यद्वा पयो यजुष्मत् । अभीद्धो धर्मस्तं सुप्रवीमि । वागेपा माध्यमिका । धर्मधुगिति याज्ञिकाः ॥ मैं होता, एताम् सुदोहनाम् = इस सुन्दर दुहने वाली, धेनुम् धेनु को, उपह्वये = आह्वान करता हूँ । अपि च - और, कल्याण हस्तः = दोहन कुशल सुन्दर हाथ वाला, गोधुक = गोदुहने वाला अध्वर्यु, एनान् इस पेनु को, दौग्धि - दुहता है। सविता सब को उत्पन्न करने वाला मध्यमदेव, न = हमारे, पंष्ठम् - प्रशसनीय, सवम् = सोम पाग को, सुनोनु जानें । हि यही, सर्वेषाम् सवानाम् - सर्प सवो मै श्रेष्ठ 'धेष्ठ सव है, यद् - जो, उकम् जल है । यद्वा दूध, यजुष्मत् - यजुमंत्रो से सस्कार किया हुआ है। अभीद्व प्रज्वलित, धर्मः = मध्यमदेव है तम् = उसको, सुप्रब्रवीमि - अच्छा कहता हूँ । एषा पार = यह याणी, माध्यमिका = मध्यम लोक को है यह रक्त मत है। धर्मधुक : धर्मपुत्र, पेनु = यह, याज्ञिका - कर्मकाण्डी लोग कहते हैं। भाव यह है कि मन्त्रगत धेनु पद पर पर्थ मेधाधिष्ठातृ मध्यम देवता है यह नरुक्त लोग कहते हैं और गाय है यह याशिव लोग। अध्या। मेधाधिष्ठातृमाध्यमिका देवता तथा गो का नाम ब-या है। गोनामो मे (नि० म०३ प. ९ ) इसका निर्वचन हो चुका है। यहा इसका अर्थ गो और यहा माध्यमिका देवता है। अर्थात्--'हन्तु योग्या नमा, न नया इति यध्या अहन्तव्या माध्यमिरा देवता मेघवाय' इस विग्रह में ना. पूर्वक 'हन हिंसागत्यो' धातु से 'अन्यादयश्च स मादि सूत्र में निपातन से यद् (५) प्रत्यय, उपपा अकार लोप, हवार यो पार, नन के नकार का लोप, टाप् और सवर्ण दीर्घ होने पर 'अघ्न्या' पन्द बना है। माध्यमिमा वाग देवता का नाम है। क्योकि, यह भी गाय के समान सपा महातच्या होती है। भाप्यपार कहते हैं- अघ्न्या-अहन्तच्या भवति, अपनीति वा । अहातव्या = नही मारने योग्य, या = अपवा, स्पाची = पाप तथा दुर्भिक्ष को नाश पने पालो मध्य वाणी, अध्न्या = अन्या, भवति = होती है। मध्य वाणी तथा गाय दोनो देवता होने निरुक्त एकादशाध्यायस्य चतुश्चत्वारिंशः खण्डः । से महन्तव्य है । माध्यमिका देवता के वर्षने से दुर्भिक्ष नष्ट होता है और गोदेवता के दर्शन से पाप नष्ट होता है । गोदुग्धघृतादि से यज्ञादि पुण्यकर्म होते हैं और पुण्य से वृष्टि द्वारा अन्न उत्पन्न होने से दुर्भिक्ष का नाश होता है । तत्या एपा भवति। इति निरुक्ते एकादशाध्यायस्य अयश्चत्वारिंशः खण्डः । ११-४३ ।। तस्याः - उस अघ्न्या की, एपा = यह अग्रिम ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्ते एकादशाध्यायस्य चतुश्चत्वारिंशः खण्डः । सुयवसाद्भगवती हि भूया अर्थो वयं भगवन्तः स्याम । अद्धि तृणमध्न्ये विश्वदानी पिवं शुद्धमुंदकमाचरन्ती ॥ क स २-३-२१-४० ॥ इस मन्त्र का दीर्घतमा ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और विश्वदेव अन्तर्गत अध्या देवता है। मुन्नार्थ-अन्ये = हे अहिसये ! वा हे पापनाशिनो! देवि! तुम, सुयवसात् - सुयव - जल को अपने अधीन करके, भगवती = जलरूप धन वाली, भूयाः = हो जाओ। अयो = अथ = उस के अनन्तर, वयम् - हम यजमान भी, भगवन्तः = अधिक धन से विशेष धनवान्, स्याम - होवें । हे अघ्न्ये !, विश्वदानीम् = सदा, तृणम् - मेघरूपी तृण को, अदि = भक्षण करो - विदारण कगे। भाचरन्ती = अन्तरिक्ष मे सर्वत्र विचरती हुई, शुद्धम् उदकम् = निर्मल जल, पिब पीयो करो। गोपक्ष मे तो अर्थ स्पष्ट ही है। . - - पान इस मन्त्र का भाष्य- सुयवसादिनी भगवती हि भवाथैदानी वयं भगवन्तः स्पामाद्धि तृणमध्न्ये सर्वदा, पिन च शुद्धमुदकमाचरन्ती। मध्ये - हे अहिंस्य देवि! तुम, सुयवसादिनी - जल को अपने अधीन करके, भगवती जलरूप धन पाली, भव. हो जाओ। अप = इदानीम् = उस के बाद, ययम् - हम यजमान भी, भगवन्तः अधिक धनवान, स्पाम • होगे। हे अघ्न्ये !, सर्वदा = सदा, तृणा - मेघ स्पो तृण को, सद्धि = भाण परो, विदारण मरो। न और, आचरन्ती अन्तरिक्ष में विचरती हुई. शुद्धम् = निमंल, उदकम् = जल, पिच - पोयो-पान पगे। तस्या एपाऽपरा भवति । इति निक एकादशाध्यायस्य पतुभरवारिंशः राण्डः । ११-४४॥ तस्याः - उग भन्या को, एपा : यह, अपरा - दूगरी पा, भवति - है- :
- (१५१४) निरुक्ते एकादशाध्यायस्य पञ्चचत्वारिंशः खण्डा । अथ निरुक्ते एकादशाध्यायस्य पञ्चचत्वारिंशः खण्डः । हिङ्कृण्वती वसुपत्नी वसूनां वत्समिच्छन्ती मनसाभ्यागात् । दुहामश्विभ्यां पयो अघ्न्येयं वर्धतां महते सौभगाय ॥ ऋ. सं. २-३-१९-२७ ।। इस मन्त्र का दीर्घतमा ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और विश्वदेव अन्तर्गत अघ्न्या देवता है। मन्त्रार्थ-हिष्कृण्वती = बछड़े के प्रति हिकार शब्द करती हुई, वसूनाम् वसुपत्नी = धन का पालन करती हुई, मनसा = मन से, वत्सम् = आदित्य रूप वा मरुत् रूप बछड़े इच्छत्ती इच्छा करती हुई, अभ्यागात् = सम्मुख आती है। इयम् - यह, अघ्न्या = अहिंस्या मध्यमा वाक, अश्विभ्याम् अश्वियों के लिये, पयः = जल, दुहाम् = दुग्धाम् = प्रक्षरताम् = झरें। सा : वह मध्यमा वाक्, महते = बड़े, सौभाग्याय = सौभाग्य के लिये, वर्धताम् = वृद्धि को प्राप्त होवें । यह भाचा सुगम होने से कहते हैं-- इति सा निगदव्याख्याता । इति सा - सो यह ऋचा, निगदव्याख्याता = पाठ मात्र से व्याख्यात है। अर्थात् सुलभ होने से इसकी व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं। पथ्या। ३३ - स्वस्ति । अन्तरिक्ष में रहने वाली माध्यमिका देवता का नाम पथ्या है। अर्थात् 'पद्यते तत्स्थानिभिः गम्यते इति पन्थाः अन्तरिक्षम्' इस विग्रह में ‘पद गती' धातु से, 'पतस्थंच' इस सूत्र से वाहुलकात इनि (इन् ) प्रत्यय और यकारान्तादेश होने पर 'पथिन्' शब्द बना है। 'पथि भवा इति पच्या माध्यमिका देवता' इस विग्रह में पथिन शब्द से 'भव छन्दसि' इस सुत्र से भव अर्थ में तद्धित यद (य) प्रत्यय, पथिन् य, 'नस्तद्धिते' इस सूत्र से टिलोप, पण य, पथ्य, और 'अजाद्यतप्टा' इस सूत्र से टाप् (आ) एवं सवर्णदीर्घ होने पर पथ्या' शब्द बना है। अन्तरिक्ष में रहने वाली माध्यमिका देवी का नाम है। क्योंकि, वह अन्तरिक्ष में रहती है। स्वस्ति शब्द का निर्वचन भाष्यकार ने नि० अ० ३ खं० २१ में स्वस्तीत्यविनाशि नाम, अस्तिरभिपूजितः, सु अस्तीति' इत्यादि पंक्ति से किया है। अर्थात् स्वस्ति इति = स्वस्ति यहा अविनाशिनाम = अविनाशी = कल्याण का नाम है। अस्ति = मस्ति यह निपात सत्ता अर्ष का द्योतक और सु यह उपसर्ग, अभिपूजितः = अभिपूजित अर्थ का द्योतक है । अर्थात् सु अस्ति इति: 'सु अस्ति' इस अवस्था में 'इको यणचि' इस सूत्र से यण होने पर स्वस्ति' शब्द बना है। कल्याण वाचक अव्यय है। सुखी होता वा सुखी रहना स्वस्ति का अर्थ है। प्रकृत में स्वस्तिका अर्थ माध्यमिका मेघाधिष्ठातृ देवो है। क्योंकि, यह स्वयं सुखी है और भक्तों को सुखी करती है। भाष्यकार कहते हैं- ३२ . - .
नियक्ते एकादशाध्यायस्य षट्चत्वारिंशः खण्डा । पा स्वस्ति । पन्था अन्तरिक्षं तनिवासात् । पथ्या स्वस्ति = पथ्या और स्विस्ति ये दोनों एक ही माध्यमिका देवता के वाचक हैं। पन्थाः - पथिन् शब्द, अन्तरिक्षम् = अन्तरिक्ष वाचक है, तनिवासात - उस अन्तरिक्ष में, निवास करने से मध्य देवी पथ्या कही जाती है। नोट-इस निरुक्त को देखने से प्रतीत होता है कि- पथ्या और स्वस्ति ये दोनों एक ही देवता का नाम है। परन्तु निघण्टु मे दोनो देवता भिन्न भिन्न हैं। तसा एषा भवति । इति नि. एकादशाध्यायस्य पश्चचत्वरिशः खण्डः । ११ - ४५ ।। सस्याः = इस पथ्यास्वस्ति की, एषा - यह मग्निम ऋचा, भवति = है- अथ नि. एकादशाध्यायस्य पट्चत्वारिंशः खण्डः । खस्तिरािद्ध प्रपथे श्रेष्ठा रेवणखत्यभि या वाममेति । सा नो अमा सो अरणे नि पातु खावेशा भवतु देवगोपा ॥ क्र. सं. 4-२-५-१६॥ इस मन्त्र का प्लसि के पुत्र गय ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और पप्यास्वस्ति देवता है। मन्त्रार्थ-या - जो, पथ्यास्वस्ति मध्यदेवी, प्रपये = उत्तम मार्ग के लिये, स्वस्तिरिद - कल्याणकारिणी होती है घह, श्रेष्ठा - प्रशंसनीया, रेक्णस्वती - धन वाली वामम् = वननीय = वरणीय यज्ञ में, अभि एतु - मावें। सा- वह पथ्यास्वस्ति, अमा - घर में और सो = सा = वही पथ्यास्वस्ति, अरणे = अरप्य में, न:- हमारी, निपातु - रक्षा करें। देवगोपा - देवों से रक्षित वह पप्यास्वस्ति, हमारे यहा आकर, स्वावेशा = शोभन निवास वाली, भवतु = होवें । ३४-उपाः । उपस् शन्द का निर्वचन नि. म. २ सं. १८ में किया गया है। वहां उपर का अर्प उपःकाल और यहाँ माध्यमिका देवता है। कोई उपस् का अर्थ विद्युत् करते हैं। 'उच्छति तमः नाशयति इति उपा। मध्यदेवो' इस विग्रह में 'उच्छी विवासे' धातु से 'सर्वधातुभ्य असुन्' इस उगादि सूत्र से मसुम् (अस्) प्रत्यय, पृषोदरादित्वाद छकार को पकार 'निमित्तापाये नैमित्तिास्याप्यपाय:' नियम के अनुसार चकार को निवृत्ति होने पर उपस् अन्द बना है। अन्तरिया देवी का नाम है। पयोंकि, वह प्रकाशक होने से अन्धकार को दूर करती है। भाष्यकार स्मरण कराते हैं- (१५१६) निरुक्त एकादशाध्यायस्य सप्तचत्वारिंशः खण्डः । उपा. व्याख्याता । :-- उपा = उषा, व्याख्याता = व्याख्यात है अर्थात् इस की व्याख्या नि. अ. २ खं. २८ में की गई है। तस्था एपा भवति । इति निरुक्त एकादशाध्यायस्य षट्चत्वारिंशः खण्डः । ११-४६ ।। तस्याः - उस उपा की, एपा = यह, अग्रिम ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्ते एकादशाघ्यायस्य सप्तचत्वारिंशः खण्डः । . अपोषा अनसः सरत्सपिष्टादह विभ्युषी । नि यत्सी' शिश्नथवृषा ॥ ऋ. सं. ३-६-२१-१० ।। इस मन्त्र का घामदेव ऋषि, गायत्री छन्द और उपा देवता है। मन्त्रार्थ-वृपा = अभीष्टवर्षी इन्द्र ने, यत्' - जव, सीम् = उपा के शकर्ट (रथ) को, निशिभयत् = भग्न कर दिया था ( तोड़ दिया था) तब, उपाः = उषा देवता, विभ्युषी = इन्द्र से भयभीत होती हुई, संपिष्टाद अनसः - शकट के ऊपर से, अपसरद = नीचे गिर पड़ी थी। इस ऋचा में यद्यपि इन्द्र की स्तुति है तथापि . 'अपसरत् : क्रिया के कर्ता उपा है। अतः यह ऋचा उपाकी कही जाती है। यह सायणभाष्यानुसारी अर्थ है। यास्क मत से वृषा का अर्थ यायु और अनस् का मेघ रूपी शकट है । इस मन्त्र का भाष्य- अपसरदुषा अनसः संपिष्टान्मघात् विम्युपी । माध्यमिका देवो उपा, विम्युपी = इन्द्र से डरती हुई, संपिष्टाव - इन्द्र के द्वारा सञ्चूर्ण, मेघाव अनसः = मेघ रूपी शकट के ऊपर से, अपसरत् = नीचे उतर गई पी। निगमप्रसक्त अनस् शब्द का निर्वचन करते हैं- उपाए - अनः- ८ अन पातु से बनने से । अनो वायुः, अनितेः। मनस् शब्द का अर्ष, वायुः = वायु है। क्योकि, अनितेः 'अर्थात् 'अनति प्राणिवर्गः प्राणति अनेन इति अनः वायुः' इस विग्रह में 'मन प्राणने' पातु है सर्वधातुम्योऽसुन' इस उणादि सूत्र से असुन (अस्) प्रत्यय होने पर अनस् सन्द बना है। वायुका नाम है। क्योंकि, वायु के द्वारा सभी प्रणिवर्ग प्राण वाले होते हैं। इस पक्ष में मेघरूपी दाक्ट से नही किन्तु वायु रूपी राकट से मध्यदेवी उषा नीचे गिरी थी यह अर्थ समझना चाहिये । .
D D निक्ते एकादशाध्यायस्याप्टाचत्वारिंशः खण्डः । (१५१७) अपि वोपमाथै स्यादनस इव शकटादिव । अपि वा = अथवा, उपमार्थे: = उपमा के अर्थ मे अनस शब्द का प्रयोग, स्यात् = हो सकता है । जैसे, अनस: इव = शकटाद इव = शकट से जैसे पडती हो वैसे मेघ रूप वा वायु रूप शकट से उपा नीचे पड़ी ऐसा अर्थ समझना चाहिये । शकट अर्थ मे अनस् शब्द का निर्वचन करते हैं- अनः शकटमानद्धमम्मिश्चीवरम् । अनितेर्वा स्याज्जीवनकर्मणः, उपजीवन्त्येनत् । मनः शकटम् = अनस् का अर्थ शकट (गाडा) है । क्योकि, अस्मिन् = इस मे, चोवरम् रज्जु वल्कल तथा पखर आदि, मानद्धम् = बँधा हुआ होता है। वा = अथया, जीवनकर्मण' जीवनार्थक, अनिते. - अन धातु से, स्यात् = अनम् शन्द बना हो यह हो सकता है। पयोकि, एनत् = इस को जीयनार्थी, उपजीवन्ति = उपजीयन करते हैं । गाडी से जीविका चलाते हैं। मेघोऽप्यन एतस्मादेव । मेघः अपि = मेघ भी, अनः = अनस् कहाँ जाता है। इति = और, वह भी, एतस्माद एव = इसी जीवन के आधार होने से । मेघ वृष्टि द्वारा सब को जीवन दान करता है। यनिरशिश्नथद् घृपा वर्पिता मध्यमः । यद जव, वृषा - पिता अभीष्टवर्षी, मध्यमः = मध्यम देव इन्द्र ने, कट को, निरशिप्रयत् नष्ट कर दिया था। मन्त्र मे वृषा पद आया है। जो तृतीयान्त है। जिसका अर्थ इन्द्र किया गया है। और यहा यास्क वृषा का अर्थ 'वृपा वर्षिता मध्यमः इस वाक्य से मध्यम देवता वायु कर रहे हैं। इस से यह भ्रम न होना चाहिये कि, इन्द्र और वायु दो हैं। क्योकि, "निरुक्त मत में तीन ही देवता हैं। 'तिस्र एवं देवता इति नरुक्ताः' पृथिवीस्थान अग्नि, मध्यमस्थान वायु घोर घुस्पान मादित्य । उन में वायु और इन्द्र एक ही देवता के दो नाम हैं। तस्या एपाऽपरा भवति । इति निरुक्त एकादशाध्यायस्य सप्तचत्वारिंशः सण्डः ॥११-४७॥ तस्याः - उस उपा की, एषा =,यह अग्रिम, अपरा दूसरी अचा, भवति - है- अय निरुक्त एकादध्यायस्याप्टाचत्वारिया सण्डः। एतदस्या अनः शये सुसंपिष्टं विपाश्या । ससारं सी परावतः ॥ ऋ. स. ३-६-२१-११ ॥ - (१५१०) निरुक्त एकादशाध्यायस्याष्टाचत्वारिंशः खण्डः । इस मन्त्र का बामदेव ऋषि, गायत्री छन्द और आपा देवता है। मन्त्रार्थ-सुसंपिष्टम् इन्द्र के द्वारा विचूर्णित ( भग्न }, अस्याः = इस माध्यमिका देवो उपा के, एतद् अनः = यह शकट, विपाशि = विपाशा नदो के, आशये = तौर पर गिर पड़ा। शकट के टूट जाने पर, सीम् । उया देवी, परावतः - दूर देश में, ससार = अपसृत हो गई - दूर चली गई। . इस मन्त्र का भाष्य- एतदस्या अन आशेते सुसंपिष्टमितर दिव विपाशि-विमुक्तपाशि। ससारोपाः प्रेरितवता परागताहा। • एतद् यह, अस्याः - इस उषा का, अनः - मेघ रूप शकट, सुसंपिष्टम् = वायु से भली प्रकार चूर्ण किया हुआ, इसरत् इव = इतर शकट के समान, विपाशि- विमुक्त पाशि - मुक्त बन्धन हो कर, आशेते = भूमि पर पड़े हुए को देख कर, उपाः = माध्यमिका रुपा देवी, प्रेरितवतः फेका हुमा, वा = अथवा, परागतात् = दूर से पड़ा हुआ शकट से उतर कर, ससार : भग गई। ३५ - इळा । माध्यमिका वाग् देवता का नाम 'इळा' है। 'ईडस्तुतो' धातु से इळा पाब्द बना है। अर्थात् 'ईडपते स्तुयते इति इळा मध्यमा वाक्' इस विग्रह में 'ईड स्तुतो' धातु से 'अकश्चि कारके संज्ञायाम् ' इस सून से घर (अ) प्रत्यय, पृषोदरादिस्यात् धातु के ईकार का हस्व, टाम्। सवणं दीर्घ, इष्टा, 'योधास्यस्वरयोमंध्यमेत्य संपद्यते स् उकारो कार' अर्थात दो स्वरों के मध्य मे डकार को कार होता है, इस प्रातिशास्य से टकार को कार होने पर पळा' शब्द धना है। माध्यमिका याक् का नाम है । क्योकि, इसकी स्तुति की जाती है। अथवा ' इत्यते प्रेयते शिष्यते उच्चारणकाले प्राणेन इति इला' इस विग्रह में 'इल प्रेरणे धातु से 'इगुपयशाप्रीकिरः कः' इस सून () प्रत्यय, कित्त्वाव गुणाभाय टाप, सवर्ण दोष और उक्त प्रातिशाख्य सूत्र से लकार को कार होने पर लान्द बना है। माध्यमिक, वाक् का नाम है। क्योकि, वह उच्चारण काल में प्राण के द्वारा नाभि के ऊपर की जाती है। भाध्यकार कहते हैं- . - इळा व्याख्याता । sळा - का यह, माल्याता = प्याख्यात है। अदि इस को ध्यास्या पानामों में तथा नि. म. ८ सं. ४ में 'ईल ई स्तुतिकर्मणः' इत्यादि पंक्ति से हो चुकी है। तस्या एसा मवति । इति निरुते एकादवाघ्यायस्याप्टाचत्वारिंशः सण्डः । ११.४८ ॥ तस्याः = उस इला की, एपा = यह अग्रिम ऋचा, भवति । है-- नियक्त एकादशाध्यायस्यैकोनमा खडा । (१५१९) अथ निरुते एकादशाध्यायस्यकोनपञ्चशः खण्डः । अभि न इळां यूथस्य माता स्मन्नदीभिर्वशी वा गृणातु । उर्वशी' वा वृहद्दिवा ऍणानाभ्यूर्वाना प्रभृथस्यायोः ॥ सिषक्त न ऊर्जव्य॑स्य पुष्टेः ॥ क. सं. ४-२-१६-१९ ।। इस मन्त्र का अत्रि ऋपि, शकरी छन्द और विश्वदेवों में इळा देवता है । मन्त्रार्थ-यूषस्य गोसंघ की, माता- निर्मात्री, इळा = इळा रूप माध्यमिका वाग्देवी, वा = अथवा, उर्वशी- उवंशी रूप माध्यमिका वाक्, नदीभिः गङ्गा यमुना मादि नदियों के साथ, नः = हम लोगों के प्रति, अभिपृणातु = अनुकूल हो। वा = अथवा, बृहद्दिवा = निरतिशय दीप्तिशालिनी, उर्वशी = उवंशी देवी, गृणाना - हमारे कर्मों की प्रशंसा करती हुई और. भायोः = यजमानों को, प्रभूषस्य - तेज के द्वारा, अम्युर्याना = आच्छादित करती हुई यज्ञ में उपस्थित हो और, पुष्टे: जव्यस्य = पोषक कर्जव्य राजा के देवसंघ, नः = हम लोगों का, सिषक्तु - सेवन करे। अपया उर्वशी हम छोगों का सेवन करे। इस मन्त्र का भाग्य- अमि गृणातु न दळा यूथस्य माता सर्वस्य माताऽस्मदमिनदीमिरवशी वा गृणातूर्वशी वा दिवा महद्दिवा गृणानाऽम्पूर्वाना प्रभृयस्य प्रभूतस्यायोरवनस्य मनुष्यस्य ज्योतिपो वोदकस्य वा सेवतां नोऽन्नस्य पुष्टेः । यूथस्य मावा = सर्वस्य माता - सब को माता वा निर्माण करने वाली, इळा - इळा देवी, हमारे प्रति, अभिगृणातु = अनुकूल हो। वा = अथवा, उवंशी = उवंशी देवी, नदीमिः . गङ्गा आदि नदियों के साथ, यस्मद् = हमारे प्रति, अभिवृणातु - अनुकूल हो । या = अपवा, हदिवा = महद्दिवा = निरतिशय दीप्ति वाली, उर्वशी = उर्वशी देवी, गृगाना - हमारे कर्मों की प्रमांसा करती हई, प्रभृपस्य - प्रभुतस्य मायोः मानस्य मनुष्यस्य गमनस्वमाय मनुष्य के समूह से, मम्यूग्वाना = अच्छादन करती हुई, ज्योतिषः वा उदकस्य वा योधि वा जल मे, पुष्टः अमत्य = पोषक अन्न के द्वारा, नः = हमारी, सेवताम् सेवा करें। अदि जल द्वारा अन्न उत्पन्न कर के हमारी रक्षा करें।
(१५२०) निरक्त एकादशाध्यायस्य पंचाशः खण्डः । रुद्र ई, पृषोदरादित्वात् रुद्र के स्थान में रोदस् आदेश होने पर रोदसी शब्द बना है । मध्यम देव की विभूति माध्यमिका देवता का नाम है । इसी को कहते हैं-- रोदसी-रुद्रस्य पत्नी । रुद्रस्य = रुद्र की, पत्नी भार्या, रोदसी = रोदसी कहलाती है । तस्या एपा भवति । इति निरक्ते एकादशाध्यायस्यैकोनपश्चाशः खण्डः । ११-४९ ।। तस्याः = उस रोदसी की, एषा = यह अग्रिम प्रचा, भवति = है- अय निरुक्त एकादशाध्यायस्य पश्चाशः खण्डः । रथं नु मारुतं वयं अवस्युमा हुवामहे । आ यस्मिन्तस्थो सुरणांनि विभ्रती सर्चा मरुत्सु रोदसी ॥ ऋ. सं. ४-३-२०-८॥ इस मन्त्र का श्यावाश्व ऋषि, जगती छन्द और मरुद्गण देवता है। मन्त्रार्थ-वयम् - हम आत्रेय लोग, मारुतम् = मरुद्गण के नस, श्रवस्युम् = अन्नपूर्ण, रथम् = रय का, नु : आज, आहुवामहे = आह्वान करते हैं । यस्मिन् = जिम रथ के ऊपर, सुरणानि = सुरमणीय जल को, विनती - पारण करती हुई, रोदसी रुद्र अर्थात् वायु की पत्नी माध्यमिका देवी, मरुत्सु सचा : मरुतों के साथ, आतस्थौ = अवस्थित हैं। इस मन्त्र में प्रयुक्त रोदसी पद का अर्थ माध्यमिका देवी है। इस मन्त्र का भाप्य- २ रथं क्षिप्रं मारुतं मेघ घयं श्रवणीयमावयामहेआयस्मिंस्तस्थौ सुरमणीयान्युदकानि विभ्रती सचा मरुद्भिः सह रोदसी रोदसी।' म - इति निरुक्ते एकादशाध्यायस्य पञ्चाशः खण्डः ॥ ११-५० ।। वयम् - हम आत्रेय लोग, श्रवणीयम् - श्रवण करने योग्य, क्षिप्रम् - शीघ्रगामी, मास्तम् मरुद्रण के, मेघम् रथम् = मेघ रूप रप का, आयामहै = आह्वान करते हैं। यस्मिन् - जिस रथ के ऊपर, सुरमणीयानि उदकानि विभ्रतो = सुरमणीय जल को धारण करती हुई, सचा मद्भिः सह मरतो के साथ, रोदसी = रुद्रपत्नी माध्यमिका देवी, मातस्थी = अवस्थित हैं। रोदसी का अभ्यास (दो बार पाठ ) अध्याय समाप्ति का सूचक है। -
निरुक्त एकादशाध्यायस्य पश्चाशः खण्डः ।
(१५२१)
इति निरुक्तव्याख्यायामेकादशाध्यायस्य पञ्चाशः खन्डः ॥ ११-५० ।।
निरुक्त के एकादशअध्याय का खण्ड सूत्र--
अयनो व्यापात आदायस्यादिष्ठयासोम मन्यते यत्वा देवनपोन परमत्योत्पमिया
प्रयीमहउदुज्योतितिाददातुं सोमस्या थातोमध्यस्थानादेगणा अविद्युन्मदिरारुद्रासोधिद्वीयो
विरूपासउदीरतामपरेरगिरसोनः सूर्यस्येयस्तुपैयमधातो मध्यस्थाना स्त्रियोदक्षस्य या यस्मत्व
किमिच्छन्ती पाचकानामेही अायद्वाग्यदन्ती देवी पारमाम्बदनुमते राका मसिनीवाली की
महमन्य मूपुर्यशीविधन्न बळित्येन्द्राणीनामिन्द्राणि गौरीर्भिमायतस्या समुद्रा गौरमीमेदूपये
यवसाद्धि रुपयतीस्वस्ति रिक्षयपोषा पसदस्या अभिनोरथनुमास्तमितिपञ्चशत् ।।
४३
४५
४१.४७
४८
४८ ५०
इति निरुक्त एकादशोऽध्याय, समाप्त ॥११॥
इति निरुक्त उत्तरपट्के पञ्चमोऽध्यायः समाप्त ॥ ५ ॥
श्रीगणेशाय नमः ।
निरुतम् ।
अथ द्वादशोऽध्यायः ।
तत्र प्रथमः खण्डः
निघण्टुा-
अश्विनौ' १ । उपाः २ । सूर्या ३ । धृपाकपायी ४ । सरण्य ५ । वो ६ ।
सविता ७ । भर्ग ८ । सूर्यः ९ । पुपा १० । विष्णुः ११ । विधानरः १२। वरुणः
१३ । केशी १४ । केशिनः १५ । धृषाकपिः १६ । यमा १७ । अजएकपाद १८ ।
पृथिवी १९ । समुद्रः २० । दृष्य २१ । अर्थर्वा २२ । मनुः २३ । आदित्याः २४ ।
सप्तरूपयः २५ । देवाः २६ । विश्वेदेवाः २७ । साध्याः २८ । वसवः २९ । वाजिनः ३० ।
देवपल्य: ३१ । इत्येकत्रिंशत्पदानि ।
इति निघन्टौ पञ्चमाध्यायः समाप्तः ।
अथातो गुस्थाना देवताः ।
अथ - मध्यस्थान देवताओं के निर्वचन के अनन्तर, अतः । यहाँ से, स्पानाः देवताः
घुस्थान के देवताओं का निवंचन किया जाता है।
तासामधिनी प्रथमागामिनौ भवतः ।
सासाम् - उन में, अश्विनी - दोनों अधिनीकुमार, प्रपमागामिनी-अपमागामी अर्थात् पहले
आने वाले, भवतः -
अधिनौ-पदव्य नुवावे सर्व रसेनान्यो, योतिपाध्यः ।
यद - जो, सर्वम् - सब को, व्य'नुवाडे र ध्यान करते हैं वे, अश्विनी - अधिन् ।
अन्यः - एक, रोन - जल से मौर, मन्य: - एक, ज्योतिपा
पोष्ठि अदि प्राय से, सरो
ध्यापन करता है। भाव यह है कि, अभिनीमार से हैं। एक मप्पापान और दूसरा पुस्पान ।
उन में जो मध्यापान है यह जल के द्वारा और पो पुरधान है यह द्वारा गर को मापन
%D
, - (१५२४) निरुक्ते द्वादशाध्यायस्य प्रथमः खण्डः । करता है । अर्थात् 'व्यनुवाते रसेन सर्व व्यानुतः इति, अश्विनी' इस विग्रह में : 'अशु व्याप्ती धातु से उणादि परिकल्पित विनि (विन्) प्रत्ययं होने से अश्विन शब्द बना है। अश्विनीकुमारों का नाम है । क्योंकि, वे पूर्वोक्त प्रकार से सम्पूर्ण जगत को व्यापन करते हैं। अश्वरश्विनावित्यौर्णनाभः। अश्वैः = अश्वों से, अश्विनौ = अश्विन् 'शब्द' बना है, इति = यह, और्णनाभः = और्णनाभ गामक आचार्य मानते है । अर्थात् 'अन्नवते अध्वानं आप्नुवन्ति इति अश्वाः' इस विग्रह में 'अशू व्याप्तौ' धातु से 'अशूषिलटि' इत्यादि उणादि सूत्र से कन् (व) प्रत्यय होने पर अश्व शब्द बना है। अथवा 'अनन्ति महाशनाः भवन्ति इति अश्वा: इस विग्रह में 'अश भोजने' धातु से पूर्वोक्त उगादि सूत्र से बाहुलकात् कन् ( 4 ) प्रत्यय होने पर अश्व शब्द बना है। वह बहुत खाता है। और · अश्वा: अनयोः सन्ति इति अश्विनी ' इस विग्रह में अश्व शब्द से 'अत इनिठनो' इस सूत्र से मत्वर्थीय इनि (इन् ) प्रत्यय, अलीप होने पर 'अश्विन' शब्द बना है। 'अम्धिनी' यह प्रथमा द्विवचनान्त है। अश्विनीकुमारो का नाम है । क्योंकि वे मश्व वाले हैं । यह ऐतिहासिक अर्थ है । तत्कायश्विनौ, द्यावापृथिव्यावित्येके । प्रश्न-तत् = वह, अश्विनी = अश्विन को = कौन हैं ? उत्तर-द्यावापृथिव्यौ = शुलोक और पृथिवी लोक है । अर्थात् अश्विनी का अर्थ धुलोक और पृथिवी लोक है, इति - यह, एके - एक कोई आचार्य मानते हैं। क्योंकि, धूलोक ज्योति से और पृथिवी लोक अन्न से व्यापन करते हैं अहोरात्रावित्येके । अश्विनी का अर्थ, अहोरात्री = अहोरात्र अर्थात् दिन और रात्रि है। इति = ऐसा, एके एक कोई आचार्य मानते हैं। दिन ज्योति से और रात्रि हिम से व्यापन करती है । सूर्याचन्द्रमसावित्येके । एके = कोई एक आचार्य, इति - यह कहते हैं कि, अश्विनी का अर्थ, सूर्याचन्द्रमसो = सूर्य और चन्द्रमा है । क्योंकि, सूर्य ज्योति से और चन्द्रमा रस से जगत् को व्यापन करते हैं। राजानी पुष्पकृतावित्यैतिहासिकार । अश्विनी का अर्थ, पुण्यकृती राजानौ : पुण्य कर्म के करने वाले राजा है, इठि पह, ऐतिहासिकाः = ऐतिहासिक लोग मानते हैं। माव यह है कि, 'अश्वः अश्विनी' इस वाक्य से यह कहा गया है कि, जो अश्व वाले होवे अश्विन कहलाते हैं । 'पुण्यकर्मा राजा लोग अश्व वाले होते हैं। अतः अश्विनी का अर्थ दो राजा है । षब अपना मत दिखाते हैं- तयोः काल ऊर्ध्वमर्धरात्रात्प्रकाशीमावस्यानु विष्टम्भपम् । अनुतमो भागो हि मध्यमः । ज्योतिर्भाग आदित्यः । D निरुक्त द्वादशाध्यायस्य द्वितीयः खण्डौ । D तयो = उन अश्विनो का, काल = काल, 'अर्धरात्रात् आधी रात से, ऊर्ध्वम् = पीछे, प्रकाशीमावस्य = प्रकाश से, अनुविष्टम्भयम् अनु - भेदन किया हुआ है । अर्थात् यद्यपि 'अश्विनी' शब्द सामान्य रूप से अहोरात्र के लिये प्रयुक्त होता है तथापि मुख्यतया वह शब्द अर्धरात्रि के पश्चात् से लेकर सूर्योदय पर्यात के अहोरात्र काल का नाम है। जिस के दो भाग हैं। अ-कार और प्रकाश । उन मे जो, तमो भाग = अन्धकार भाग है ' वह, मध्यम = मध्यदेव और जा, ज्योतिर्भाग प्रकाश भाग है वह, आदित्य आदित्यदेव है। भाव यह है कि अधरात्रि से सूर्योदय पर्यन्त काल का नाम अश्विन है। उस काल मे अन्धकार और प्रकाश दोनो मिश्रित हैं । इधर अश्विन भी दो हैं। एक अन्धकार का अधिष्ठाता मध्यदेव और दूसग प्रकाशकाल का अधिष्ठाता उत्तम = आदित्यदेव है। तयोरेपा भवति । इति निरुक्त द्वादशाध्यायस्य प्रथम खण्ड ।। १२-१ ।। तयो = उन मध्यम और उत्तम अश्विनो की, एपा यह अग्रिम ऋचा, भवति है- अथ निरुक्त द्वादशाध्यायस्य द्वितीय खण्ड । वसतिषु स्म चरथोऽसितौ पेवाविव । कदेदमश्विना युवमभिदेवाँ अंगच्छतम् ॥ D यह किसी शाखा का मन्त्र है। ऋषि को देवता के दर्शन की दृष्टि प्राप्त हुई। रात्रि वीतने पर दिन की सन्धि हुई । अपि सहसा अश्विन देवताओ को देख कर कहने लगे-मन्त्रार्थ-अश्विना = हे अश्विद्वय , युवम् = तुम दोनो, असितौ पेत्वो इव काले मेघो के समान, सातिपु - राश्रियी मै, चरथ स्म = विचरते हो। युवम् = तुम, इदम् : = इस यज्ञ मे कदा = कुव, देवान् = देवताओ को, अभ्यगच्छतम् = प्राप्त हुए। इस मन्त्र मे अहोरात्र के रात्रि-भाग मे अश्विनो का काल बतलाया गया है। इति सा निगदव्याख्याता । इति सा = यह ऋचा, निगदव्याख्याता - पाठमात्र से व्यास्यात है। अति सरल होने से इसकी व्याख्या की अपेक्षा नहीं है । तयोः समानकालयोः समानकर्मणोः संस्तुतप्राययोरसंत्तवेनेपोऽर्धों भवति । तयो = उन दोनो, समानकालयो = समान काल वालो, समानधर्मणो सस्तुतप्राययो = प्राय एक साथ स्तुति वालो अश्विनो की, असस्तये= कृपय पृयर, नुनि में, एषा = यह, अर्धच = आधी ऋचा, भवति - है- पासात्योऽन्य उच्यत उपः पुत्रप्तवान्य इति । = समान में बालों, अन्य:- %E (१५२६) निरुक्त द्वादशाध्यायस्य तृतीया खन्हा | दोनों अश्विनों में, तव - तुम्हारा एक मध्यम देव, वासात्यः = रात्रि का पुत्र और अन्यः - दूसरा एक, उपः पुत्रः = उपा का पुत्र सूर्य देव, उच्यते = कहा जाता है। तयोरेपाऽपरा भवति । इति निरुक्त द्वादशाध्यायस्य द्वितीयः खण्डः । १२-२॥ तयोः = उन दोनों अश्विनों की, एषा = यह अग्रिम, अपरा = दूसरी ऋचा, भवति अय निरुक्त द्वादशाध्यायस्य तृतीयः खण्डः । इहेहं जाता समवावशीतामरेपसा तन्वाई नामभिः स्वैः । जिष्णुर्वामन्यः सुमखस्य सूरिर्दिवो अन्यः सुभगः पुत्र ऊहे ।। ऋ. सं. २-४-२५-४ ।। इस मन्त्र का अगस्त्य ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और अश्विन देवता है। मन्त्रार्थ-हे अश्विद्वय ! तुम दोनों समवावशीताम् = संस्तूयेते = संस्तूयेथे = साथ में स्तुति किये जाते हो। तुम दोनों में से एक ने, - मध्यमस्थान अन्तरिक्ष में चन्द्र रूप से और दूसरे ने, इह - उत्तमस्थान धुलोक में आदित्य रूप से, जाता = जाती = एक साथ जन्म ग्रहण किया था। तन्वा = तुम्हारे शरीर सौन्दर्य के कारण और, स्वैः नामभिः = तुम्हारे नाम महिमा के कारण में वार वार तुम्हारी स्तुति करता हूँ। वाम् - युवयोः = तुम दोनों मे से, अन्यः = एक मध्यमस्थान अन्तरिक्ष के पुत्रस्थानीय, जिष्णुः जयशील चन्द्र, सुमखस्य शोभनयज्ञ का, सूरिः - प्रेरपिता होते हुए, अहे = जगव = धारण करते हो और, अन्यः = एक दूसरा, दिवः = उत्तमस्थान धुलोक के, पुत्रः पुत्रस्थानीय आदित्य, शुभगः = शोभन रश्मि रूप धन का, ऊहे = वहन करते हो। मन्त्र में मध्यम उत्तम दोनों अश्विनों की स्तुति है। D 2 का वहन इस प्रकार इस इस मन्त्र का भाष्य- यहां मध्यम लोक में और इह चेह च जातौ संस्तूयेते पापेनालिप्यमानया तन्वा नाममिश्च स्वैर्जिप्णुर्वामन्यः सुमहतो पलस्येरपिता मध्यमो, दिवो अन्यः सुभगः पुत्र ऊद्यते आदित्यः । हे अधिद्वय !, वाम् - तुम दोनों में से, अन्यः = एक, इह च = दूसरा, इह च - वहां उत्तम लोक में, जाती = उत्पन्न होते हुए, पापेन अलिप्यमानया = पाप से लिप्त न होने वाला, स्वैः तन्वा अपने शरीर से, च = और, नामभिः जिष्णुः - जयशील होते हुए, संस्तूयेते - संस्तूयेथे स्तुति किये जाते हो। अन्यः - एक, सुमहत:- सुमहान, बलस्य = बल का, हरयिता - प्रेरक, मध्यमः = मध्यम है और, अन्यः = दूसरा, दिवः धुलोक का, सुभगः = सुन्दर, पुत्रः पुत्र, आदित्यः = सूर्य, कह्यते = वहन किया जाता है । अर्थात् वायु के द्वारा चलाया जाता है। तयोरेपाऽपरा भवति । %3D नाम महिमा से, - - निरुक्त द्वादशाध्यायस्य पञ्चमः खण्डः । (१५२७) इति निरुक्ते द्वादशाध्यायस्य तृतीयः खण्डः ॥ १२-३ ।। तयोः = उन अश्विनों की, एषा = यह अग्निम, अपरा = दूसरी ऋचा, भवति = है-- अथ निरुक्त द्वादशाध्यायस्य चतुर्थः खण्डः । 'प्रा त गुंजा वि बोधयाश्विनावेह गच्छताम् । अस्य सोमस्य पीतये ॥ ऋ स १-२-४-१ ।। = : इस मन्त्र का मेघातिथि ऋपि, गायत्री छन्द और अश्विद्वय देवता है। मन्त्रार्य-हे होता! और हे अध्वर्यु ! आप लोग, प्रातयुजा = प्रात. सपन सम्बन्ध से युक्त अश्वि देवो को, वियोषय जगाओ। अश्विनी जगे हुए ये अश्वि देव, अस्य सोमस्य इस अभिपव सस्कार से युक्त सोम के, पोतये पान करने के लिये, इह = यहा हमारे यज्ञ मे, आगच्छताम् आवें - पधारें। इस मन्त्र का भाष्य-- प्रातर्योगिनो वियोधयाश्विना विहागच्छतामस्य सोमस्य पानाय । प्रातयोंगिनी = प्रात.सवन सम्बन्ध से युक्त, अश्विनी = अश्वि देवो को, विबोधय = जगाओ। जग कर वे दोनो, अस्य सोमस्य पानाय = इस सोम के पान करने के लिये, इह - यहाँ हमारे याग मे, आगच्छताम् = आवे पधारें। तयोरेपाऽपरा भवति । इति निरुक्ते द्वादशाध्यायस्य चतुर्थः खण्ड. ॥ १२-४ ॥ तयोः = उन अश्वि देवो की, एषा - यह अग्रिम, अपरा - दूसरी ऋचा, भवति - है- सथ निरुक्त द्वादशाध्यायस्य पञ्चमः खण्डा । प्रातर्यजध्वमश्विना हिनोत न सायमस्ति देवया अर्जुष्टम् । उतान्यो अस्मद्यजते वि चावः पूर्वं पूर्वो यजमानो वनीयान् ॥ का स. ४-४-२४-२ ॥ इस मन्त्र का अत्रि ऋपि, त्रिष्टुप छन्द और अश्विद्वय देवता है । मन्त्रार्थ हे हमारे पुरुषो!, प्रात: = प्रात काल में हो तुम लोग, अश्विना = अश्विनी = अश्विदेवो का, यजध्वम् - यजन पूजन करो। हिनोत = उन्हे हम प्रदान करो। क्योकि, सायम् = सायकालिक हत्य, देवया: = देवो के निकट जाने वाला, न अस्ति - नही होता है । अर्थात् देवगण उसे स्वीकार नहीं करते हैं। वह हव्य, अजष्टम् भवति = असेव्य हो जाता है, उत - मोर, अस्मत् मन्यः - हम से अन्य कोई सोम द्वारा उन का, यजते - यजन करता है एव हव्य द्वारा, विचाव = उन्हे तृप्त करता है। जो (१५२८) निरुक्त द्वादशाध्यायस्य पञ्चमः खण्डः । यजमान हम लोगों से और दूसरों से, पूर्वः पूर्वो = प्रथम प्रथम उन का यजन करता है वह, मनीयान् देवों का सम्भजनीय अर्थात् अभिमत होता है। D इस मन्त्र का भाष्य-- प्रातर्यजध्यमश्विनौ प्रहिणुत, न सायमस्ति देवेज्या अजुष्टमेतत् । अप्यन्यो अस्मद्यजते विचावः पूर्वः पूर्वो यजमानो वनीयान्वनयित्तमः । हे हमारे आत्मीयजन ! आप लोग, प्रातः = प्रातःकाल मे ही, अश्विनी अश्वि देवों का, यजध्वम् = पूजन करो। प्रहिणुत उन्हे हव्य प्रदान करो। क्योंकि, सायम् = सायंकालिक हव्य, देवेज्या देवों के निकट जाने वाला, न अस्ति = नही होता है । अर्थात् देवगण उसे स्वीकार नहीं करते हैं। क्योंकि, एतत् = यह हव्य, अजुष्टम् = असेव्य होता है । अस्मद् अन्यः अपि = हम से अन्य कोई भी, सोम द्वारा उनका, यजते = यजन करता है और हव्य द्वारा, विचायः = उन्हे हप्त करता है। यजमान: = जो यजमान हम लोगों से, पूर्वः पूर्वो = पूर्व पूर्व उनका यजन करता है वह, वनीयान् = वनयितृप्तमः = देवों का संभजनीय = अभिमत होता है। तयोः कालः सूर्योदय पर्यन्तः । तयोः = उन अश्विन देवों का, सूर्योदय पर्यन्तः = सूर्योदय पर्यन्त, कालः = काल है । उसके बाद याग काल आता है। तस्मिन्नन्या देवता ओप्यन्ते । तस्मिन् = उस काल में, अन्याः देवताः = अन्य देवता, ओप्यन्ते = आवाप किये जाते हैं। अर्थात् उषा, सूर्या, सरण्यु, त्वष्टा, सविता, और भग ये छः देवता भी उसी अश्विकाल के अन्तर्गत है। २ उपाः । सूर्य उदय से पूर्व को प्रभातवेला की अभिमानिनी देवता का नाम उपस् है । भाप्यकार इसका निर्वचन करते हैं- उपाः वष्टेः कान्तिकर्मणः । उच्छतेरितरा माध्यमिका । कान्तिकर्मण. = कान्ति अर्षक, बप्टे: - वश घातु से, उपाः = उपस् शब्द बना है। और जो, दूसरी, माध्यमिका माध्यमिका देवी वाचक उपम् शब्द है वह, उच्छतेः = उच्छी धातु से बना है। अर्थात 'वष्टि कमनोयाभवति इति उपाः घलोक देवी' इस विग्रह में 'यश काठी' धातु से उणादि परिकल्पित कसुन् (अस्) प्रत्यय, 'अहिज्यावयिष्यधिष्टि...' इत्यादि मूत्र सम्प्रसारण, पूर्वरूप और पोदरादित्वात् वर्णव्यत्यय शकार को पार होने पर 'उपस्' शब्द बना है। 'उषाः' यह प्रथमा एकवचन का रूप है । द्युस्थान देवता का नाम है। पर्योकि, वह बहुत कमनीय होता है । अथवा 'उच्छति तमः मेघ वा नाशयति मध्यलोक देवी' इस विग्रह में इतरा - से ।
निरुक्त द्वादशाध्यायस्य सप्तमः खण्डः । - 'उच्छी विवासे' धातु से 'सर्वधातुभ्य असुन्' इस उणादि सूत्र से असुन (अस्) प्रत्यय, पृषोदरादित्वाद छकार को पकार, चकार की निवृत्ति होने पर उपस् शब्द बना है । माध्यमिका देवता का नाम है। क्योंकि, वह उपा तम को नाश और मेघ को छिन्न भिन्न करती है। इस प्रकार जो वश धातु से उपस् शब्द बना है वह युस्थान देवता वाची और जो उच्छी धातु से उपस शब्द बना है वह मध्यस्थान देवता वाची है ऐमा विवेक कर लेना चाहिये। तस्या एषा भवति । इति निरुक्त द्वादशाध्यायस्य पनमः खण्डः । १२-५ ।। तस्याः = उस उपा को, एपा = यह अग्रिम ऋचा, भवति - है-- अथ निरुक्त द्वादशाध्यायस्य षष्ठः खण्डः । उपस्तच्चित्रमा भरास्मभ्यं वाजिनीवति । येन तोकं च तनयं च धामहे ॥ ऋ स. १-६-२६-१३ ।। इस मन्त्र का गोतम अपि, उगिक छन्द और उषा देवता है । मन्त्रार्थ-वाजिनीवति उपः = है अन्नवाली रपा देवो!, अस्मभ्यम् = चित्रम् = वाञ्छनीय, नत् = वह धन, आभर - लाओ प्रदान करो। येन = जिस धन से हम, तोकम् च तनयम् च = पुत्र ओर पौत्रादि परिवार वा, धामहे- धारण अर्थात् पालन पोषण करे। इस मन्त्र में उत्तमस्थान उपा देवी मे अन्न के लिये . प्रार्थना है। इस मन्त्र का भाष्य- . D ट A उपस्तचित्रं चायनीय महनीयं धनमाहरास्मभ्यमन्नवति येन पुत्रांव पौत्रांच दधीमहि । अन्नवति उपः हे अन्न वाली उपा देवी !, अस्मभ्यम् हमारे लिये, तद वह, चित्रम् चायनीयम् चाहने योग्य, महनीयम् - बहु मूल्य ( महंगा), धनम् = धन, आहर - लामो । येन - जिस धन से हम, पुत्रांच पौत्रांश्व पुष और पौत्र आदि का, दधीमहि = धारण पोषण करें। तस्याएपाऽपरा भवति । इति निरुक्ते द्वादशाघ्यायस्य पष्ठः खण्डः । १२-६ ।। तस्याः - उस उपा की, एपा यह अग्रिम, अपरा - दूसरी ऋचा, भवति = है- अप निरुक्त द्वादशाध्यायस्य सप्तमः खण्डः । एता उ त्या उपसः केतुमंत पूर्वे अर्धे रजसो भानुमंजते । निष्कृण्वाना आयुधानीव धृष्णवः प्रति गावोऽरुपीर्यन्ति मातरः ॥ क सं. १-६-२४-१॥
- 32 = - उज्वल ज्ञानरूप D (१५३०) निरुक्त द्वादशाध्यायस्य सप्तमः खण्ड। । इस मन्त्र का गोतम ऋपि, जगती छन्द और उपा देवता है। मन्त्रार्थ-'उ' पदपूरण मे त्याः = ताः = उस, एताः = इस, उपसः = उपा देवताओं ने, केतुम् = अन्धकाराच्छन्न समस्त जगत् का प्रकाश, अवृत्त किया। इस कारण वे, रजसः । अन्तरिक्ष के, पूर्व अर्धे पूर्व के अर्ध भाग में, भानुम् प्रकाश का अञ्जते व्यक्तीकरण करती हैं । घृष्णवः आयुधानि इव - योषा आयुधों के जैसा अर्थात् जैसे घर्षणशील योघा योग तलवार आदि आयुषों का संस्कार = परिमार्जन करते है वैसे ही उषा देवतायें, निष्कृण्वानाः = अपने प्रकाश से संसार का संस्कार करती हैं अर्थात् गावः = गमनशील, अरुषोः = दीप्तिमती, मातरः = माता उपा देवी, प्रतियन्ति = प्रतिदिन गमन करती हैं। प्रतिदिन सूर्य से प्रथम आती हैं। इस मन्त्र में उपा देवता की स्तुति है। भाष्यकार कहते हैं- एतास्ता उपसः केतुमकृपत प्रज्ञानम् । एकस्सा एव पूजनार्थे बहुवचनं स्यात् । एताः ता. उपसः = ये वे अर्थात् उन उषा देवताओं ने, प्रज्ञानम् केतुम् प्रकाश, अकृपत किया। उपस्काल आने पर सब जग जाते हैं। एकस्याः एव = उपा के एक होने पर भी सम्भव है, पूजनार्थे = पूजा के लिये, बहुवचनम् = 'उपसः' आदि बहुवचनम् बहुवचनान्त प्रयोग, स्यात् हो सकता है। अन्यथा एक अर्थ में बहुवचन प्रयोग कैसे उपपन्न हो सकता है ? । पूर्व अर्धे अन्तरिक्षलोकस्य समञ्जते भानुना । " निष्कृण्वाना आयुधानीव धृष्णा"- उपादेवी, अन्तरिक्षलोकस्य = अन्तरिक्ष लोक के, पूर्व अर्धे पूर्व के अर्थ भाग में, भानुना, प्रकाश से, समञ्जते = व्यक्तीकरण करती हैं। घृष्णवः = योघावो, आयुधानि इव = तलवार मादि आयुषों के जैसा अर्थात् योधा जैसे आयुधों का संस्कार करता है वैसे ही उपा, निष्कृण्वाना अपने प्रकाश से संसार का संस्कार करती है। निरित्येपः समित्येतस्य स्थाने । मन्त्रगत 'निष्कृण्वाना' इस पद में, 'निर्' इति एषः = निर् यह पद, 'सम्' इति एतस्य 'सम्' इस के, स्थाने = स्थान में है। जिससे इसका अर्थ 'संस्कुर्वाणा' संस्कार करनेवाला हो जाता है । संस्क्रियमाण आयुध और संस्क्रियमाण संसार । जैसा उपसर्ग व्यत्यय करने पर अर्थ उपपन्न होता है वैसा निगम उदाहरण देते हैं- "एमीदेपा निष्कृतं जारिणीव " इत्यपि निगमो भवति । = जार वाली व्यभिचारिणी घो की तरह एषाम् = इन जुआरियों के, निष्पतम् । संस्कृतम् - धुत स्थान पर, एमि इद भवति = है । अर्थात् जैसे इस मन्त्र के "निष्कृतम् पद में 'सम्' के स्थान में नि का प्रयोग है पला ही जाता हूँ। इति अपि - यह भी, निगमः = निगम, 9 . - + जारणी इव . S निरुक्त द्वादशाध्यायस्य सप्तमः खण्डः । (१५३१) वैसे ही प्रकृत 'एत उ त्याः' इस मन्त्र के 'निष्कृण्वाना' पद में 'सम्' के स्थान में 'नि' का प्रयोग समझना चाहिये । सम्पूर्ण मन्त्र- यदादीध्ये न दविषाण्येभिः परायद्योऽर्व हीये सखिभ्यः । न्युप्ताश्च वभ्रवो वाचमत एमीदेषां निष्कृतं जारिणीव ॥ प्र. सं. ७-८-४-५ ॥ इस मन्त्र का कवप ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और द्यूतकारी (जुबारी) देवता है । मन्त्राएं-यत्- जव मै, आदिध्ये = ध्यान अर्थात् संकल्प करता हूं कि, एभिः इन जुआरियो के साथ अव, न दविषाणि = जुआ नहीं खेलूंगा तव, परायद्भधः सखिख्यः = दुराचारी जुआरी मित्रों के पास से, अवहोये = हट जाता हूँ। परन्तु जव, वभ्रवः = बभ्रुवाणं (पीले रंग) के, न्युप्ताः = जुआरियों द्वारा फेंके हुए पाशे, वाचम कृत - शब्द करते हैं अर्थात जब जुआरी लोग कोलाहल करते हैं तब उक्त संकल्प को त्याग कर, एपाम् = इन पाशाओं के, निष्कृतम् = संस्कृतम् - संस्कार किया हुआ द्यूत स्थान पर, जारिणो इव = जार वाली (उपपति वाली) व्यभिचारिणी श्री की तरह अर्थाव जैसे व्यभिचारिणो श्री संकेत स्थान पर आती है वैसे ही, एमी इद् = चला ही जाता हूं। इस मात्र में द्यूत निन्दा है। प्रतियन्ति गावो गमनात्, अरुपीरारोचनान्मातरो मासो निर्मात्यः । उपा देवी, प्रतियन्ती - प्रतिदिन आती है । गमनात् = गमन करने से, गाव: - जाती है । अर्थात् 'गच्छन्ति इति गावः' इस विग्रह में ‘गल गतौ' धातु से, 'गमेडों वक्तव्यः उणादि सूत्र से डो (ओ) प्रत्यय, डित्त्वात् टिलोप होने से गो पशब्द बना है । उत्तम स्थान उपा का नाम है । क्योकि, वह प्रतिदिन, प्रतियन्ति = बातो है । आरोचनात् = आरोचन अर्थात चारो ओर प्रकाश करने से, अरुपीः = उपा अरुषी कहलाती है। भास: = प्रकाश की, निमठिया - निर्माण करने वाली होने से उपा, मातरः- माता कहलाती है। ३ सूर्या सूर्या शब्द की व्याख्या वाङ् नामों में हो चुकी है। वहां वाणी और धुस्थान देवता अर्थ है। इतना ही अन्तर है । 'सरति गच्छति इति सूर्या' इस विग्रह में 'सृ गतो' धातु से 'राजसूयसूर्य....' इत्यादि सूत्र के निपातन से क्यप् (य) प्रत्यय, स के कार को कर आदेश और टाप् (आ) एवं सवर्ण दीर्घ होने पर सूर्या शब्द बना है । उत्तम स्थान देवता का नाम है । अपदा : सरति गच्छति इति सूर्यः आदित्यः' इस विग्रह में 'सृ गतौ' धातु से पूर्वोक्त सूत्र के निपातन से क्यप् प्रत्यय और घातु के ऋ को कर होने पर सूर्य शब्द बना है। आदित्य का नाम है । 'सूर्यस्य को मूर्या' इम विग्रह में सूर्य शब्द से 'सूर्याद्देवतायां पाप वाच्या' इस पात्तिक से पुंयोग में पाप (आ) प्रत्यय १९२ गो वही .
- . क . (१५३२) निरुक्के द्वादशाध्यायस्याष्टमः खण्डः । और सवर्ण दीर्घ होने पर : सूर्याः, शब्द बना है। सूर्य की प्रभा रूप त्री का नाम है। सूर्य उदय से पूर्व सूर्य की मन्द प्रभा का नाम उपा है और सूर्य उदय के पश्चात् वही उषा रूप प्रभाजव प्रकर्ष रूप धारण करती है तब सूर्या कहलाती है । यास्क कहते हैं- सूर्या सूर्यस्य पत्नी, एषैवाऽभिसृष्टकालतमा । सूर्यस्य = सूर्य की, पत्नी भार्या स्त्री, सूर्या सूर्या' कही जाती है। एषा एव = यह उपा ही, अभिसृष्टकालतमा सूर्योदय काल के प्रति जाती हुई, सूर्या = सूर्या हो जाती है । अर्थात् जैसे जैसे सूर्य के उदय के प्रति अधिक गई हुई होती है वैसे वैसे यही सूर्या हो जाती है । स्मरण रहे कि, यह शुस्थान देवता का प्रकरण चल रहा है । सूर्य द्युस्थान है । उसकी पत्नी मूर्या भी द्युस्थान है । ये दोनों द्युलोक में साथ ही रहा करते हैं । जब गमन करते हैं तब भी साथ हो । सूर्य प्रसिद्ध रूप से और उस की पत्नी सूर्या प्रभा रूप से गमन करती है । सूर्योदय से पूर्व प्रभा मन्द रहती है । क्योकि उस समय सूर्य बहुत दूर पीछे रहता है । वही मन्द प्रभा उपा कही जाती है । सूर्योदय के बाद वही ज्या रूप प्रभा जब प्रचण्ड' रूप धारण करती है तब सूर्या कही जाती है । इस प्रकार एक ही प्रभा के दो नाम हैं । उपा और सूर्या । जैसे पुरुष के सदा साथ रहने से बी पुरुप को पत्नी कही जाती है। वैसे ही सूर्य के सदा साथ रहने से सूर्या सूर्य की पत्नी कही जाती है । यह वर्णन आलङ्कारिक समझना चाहिये । तथा एपा भवति । इति निरुक्त द्वादशाध्यायस्य सप्तमः खण्डः । १२-७ ।। तस्याः = उस सूर्या की, एपा = यह अग्रिम ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्त द्वादशाघ्यायस्याप्टमा खण्डः । सुकिंशुक शेल्मलि विश्वरूपं हिरण्यवर्ण सुवृत सुचक्रम् । आ रोह सूर्ये अमृतस्य लोकं स्योनं पत्ये वहतुं कृणुष्व ॥ क्र. सं. ८-३-२३-२० ॥ F - इस मन्त्र का सूर्या ऋपि, विष्टुप्. छन्द और आशिष् देवता है। मात्रा--सूर्य है थान देवी सूर्या ! तुम, अपने पतिगृह में जाते समय, सुकिशुकम् = शोभन पलाश पृदा और शाल्मालम् = शल्मलि ( सीवल) वृक्ष से निर्मित, विश्वरूपम् - नाना स्प, हिरण्यवर्णम् सुवृतम् = उत्तम, सुचत्रम् - सुन्दर चक्र वाले, रथ पर, आरोह - मारोहण करो = चढ़ो । अमृतस्य लोकम् - अमर स्थान में, यहम् = पहन अर्थात् विवाह को, पत्ये = पति के लिये, स्यानम् सुखकर, कृणव - कुरुत्व करो - बनाओ। इस मन्त्र में सूर्या को मापीर्वाद दिया गया है। सुवर्णवर्ण, इस मन्त्र का भाप्प- अथवा, उपमार्थ - निरुक्तं द्वादशाध्यायस्याष्टम खण्डौ । (१५३३) सुकाशनं शन्नमलं सर्वरूपम् । अपि वोपमार्थ स्यात् । सुकिंशुकमिव शल्मलिमिति । सुकाशनम् - शन्नमल निर्मल पलाश वृक्ष, शन्नमलम् = शल्मलि (सीमर ) वृक्ष, सर्वरूपम् नाना रूप वाला रथ । अपि वा - - उपमा अर्थ मे, स्यात् हो सकता है । जैसे-सुकिंशुकम् = सुन्दर लाल पुष्पो वाले, भल्मलिम् 'इव = शल्मलि वृक्ष के समान रथ । इति = इस प्रकार । इस मन्त्र मे माया हुमा किंशुक शब्द का निर्वचन करते है- किंशुकं-कंशतः प्रकाशयतिकर्मणः । प्रकाशयतिकर्मण = प्रकाशन अर्थक, ऋशते - नरुक्त क्रश धातु से, किंशुकम् - किंशुक शब्द बना है । अर्थात् 'ऋशति दीप्तिमद् भवति इति किंशुकम्' इस विग्रह मे नरुक्त दीप्त्यर्थक कश धातु से उणादि परिकल्पित उकञ् ( उक) प्रत्यय और पृषोदरादित्वात् धातु को किश् आदेश होने पर 'किशुक' शब्द बना है। रथ चमकदार होता है। शल्मलि शब्द का निर्वचन करते हैं- शल्मलिः - सुशरो भवति, शरवान्या । सुशर = सुन्दर हिंस्य, वा = अथवा, शरवान् = हिंसा वाला, शल्मलि शल्ममि सीवल होता है । कोमल होने से सुहिस्य और कण्टक वाला होने से चढने वाले को चूम जाता है। अर्थात 'श्रियते हिंस्यते इति शल्मलि इस विग्रह मे ‘श हिंसायाम्' धातु से कर्म मे उणादि परिकलित मलि प्रत्यय, रपर गुण, शर् मलि, और पृषोदरादित्वात् र को ल होने पर 'शल्मलि' शब्द बना है। सीमर का नाम है। क्योकि, वह कोमल होने से सुगमता से काटा जाता है । अथवा, 'शृणाति हिनस्ति इति शल्मलिा' इस विग्रह मे उसी श धातु से कर्ता मे उणादि मलि प्रत्यय, गुण और लत्व होने पर शल्मलि शब्द बना है। उसी सीवलं का नाम है। क्योकि वह कण्टक वाला होने से काटता है = हिंसा करता है । आरोह सूर्ये अमृतस्य लोकम् " उदकस्य सुसं पत्ये वहतुं कुरुष्व । सूर्य = हे सूर्या, अमृतस्य - उदकस्य - जल के, लोकम् = स्थान सूर्यमण्डल को, आरोह आरोहण कर = उस पर चढ जा। पत्ये : सूर्य रूप पति के लिये, सुखम् बहतुम् = सुख वहन, कुरुष्व = कर । सुख प्राप्त कर। इस अर्थ में कहीं का ब्राह्मण वचन प्रमाण देते है- "सविता सूर्या प्रायच्छत्सोमाय राज्ञे प्रजापतये वा" इति च ब्राह्मणम् । सविता - सविता भादित्य ने, सूर्याम् - सूर्या = ज्योत्स्ना वा उपा वो, सोमाय राजे - सोम राजा चन्द्रमा के लिये, वा = अयवा, प्रजापतये - प्रजापति के लिये, प्रायच्छद इति च- यह, ब्राह्मणम् = ब्राह्मण वचन है । यह प्रमाण नरुक्त अर्थ में समझना चाहिये। . “ - - - दिया।
: देवता के - - (१५३४) निरुक्त द्वादशाध्यायस्य नवमा खंण्डा । धूपाकपायी। वृपाकपायो भी पूर्वोक्त सूर्या का ही नाम है । इस का निर्वचन यास्क स्वयं करते हैं- वृपापायी - वृपाकपेः पत्नी । एपैवामिसृष्टकालतमा । वृषाकपेः = वृषाकपि आदित्य की जो, पत्नी षी विभूति वह, वृपाकपायो - वृषाकपायो कहलाती है। एपा एव = ये ही सूर्या, मभिसृष्टकालतमा - अतिशय निकट काल वाली होने से वृपारुपायी कहलाती है। यही सूर्या जब आदित्य के नदय काल के अधिक निकट में आ जाती है तब वृषाकपायो कहलाती है। इस प्रकार उपा, सूर्या और वृषाकपायी ये तीनों एक माम है । अर्थात् 'वृपापैः की वृषाकपायो ' इस विग्रह में वृषाकपि शब्द से पुंयोग में 'वृषाकप्य: ग्निकुसितकुसिदानामुदात्त:' इस सूत्र से ऐ आदेश और डीप (ई) प्रत्यय, वृषाकपई, 'एचोऽयवापाव' इस सूत्र से आय आदेश, वृषाकपाय ई, वृषाकपायी शब्द बना है। वृषाकपि आदित्य की पत्नी का नाम वृपाकपायो है। विभिन्न विद्वानों ने वृपाकपि का अर्थ भिन्न भिन्न प्रकार का किया है । सायण ने 'इन्द्रो वृषाकपिः अर्थात् इन्द्र का नाम वृषाकपि है यह कहा है। मट्टोजिदीक्षित ने सिद्धान्त कौमुदी में 'वृपाकप्यान्न इत्यादि सूत्र पर 'हरविष्णू वृषाकपी इत्यमरः' अर्थात् हर और विष्णु वृषाकपि कहे जाते हैं । यह अमर कोश कहता है। ऐसी स्थिति में वृषाकपायी श्रीगोरिति च' अर्थात् वृषाकपायो का अर्थ विष्णु को त्री श्री और हर को श्री गौरी हुआ-यह अर्थ किया है। महाभाष्य में 'वृपाकप्यग्नि' इत्यादि सूत्र का भाष्य नहीं मिलता है । लोग कहते हैं कि 'बकरी खा गई।' यह प्रकरण घुस्थान देवता का चल रहा है। इन्द्र मध्यमस्थान देवता है यह कहा गया है। 'हरविष्णू' का तो प्रकरण ही नहीं है । परिशेषाद वृषाकपि आदित्य और वृषाकपायी आदित्य पस्नी प्रभा ही लेना समुचित समझा गया है। तस्या एपा भवति। इति निरुक्त द्वादशाध्यायस्याप्टमः खण्डः । १२-८॥ तस्याः = उस वृषाकपापो को, एपा = यह अग्रिम ऋचा, भवति - है- अथ निरुक्त द्वादशाध्यायस्थ नवमः खण्डः। वृषांकपायि रेवति सुपुन आदु सुस्तुपे । घसंत्त इन्द्र उक्षणः प्रियं कांचित्करं हविर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥ ऋ.सं.८-४-३-१३॥ इप्त मन्त्र का इन्द्र कपि, पञ्चपदा पंक्ति छन्द और इन्द्र हो देवता भी है । मन्त्रार्थ- धुषाकपामि - हे वृषाकपि अर्थात् आदित्य को पानी वाकपायो देवी!, रेवति = हे पनवासी निरक्त द्वादेशाध्यायस्य नवमः खण्डः । (१५३५) देवी !, सुपुत्र = हे मध्यम देव रूप शोमन पुत्र वाली !, सुस्नुपे = हे मध्यम लोक की वाक् रूप ओस सुन्दर पुत्रवधू वाली, देवी!, ते = तुम्हारे, प्रियम् = प्रिय, काविस्करम् = सुखकर, उक्षणः = को, इन्द्रः = आदित्य, आदु - शीघ्र, वसत् - चाट जायं । क्योकि इन्द्रः - आदित्य, विश्वस्माद सर्व से, उत्तरः = श्रेष्ठ है। इस ऋचा का भाप्य- - उसको 2- धृपाकपायि रेखति सुपुत्र-मध्यमेन, सुस्नुपे माध्यमिकया बाचा । वृषाकपायि - हे वृषाकपायि !, रेवति हे रेवति !, मध्यमेन सुपुत्रे = हे मध्यम देव से सुन्दर पुत्र वाली !, माध्यमिकया वाचा सुस्नुषे = हे माध्यमिका वाणी से सुन्दर पुत्रवधू वाली। मन्त्र प्रसक्त स्नुषा शब्द को अनेक प्रकार से व्याख्या करते हैं-- स्नुपा साधु सादिनीति बा-साधु सानिनीति वा । सु-अपत्यं तत् सनोतीति वा । साधु सादिनी इति वा = सुन्दर कर्म मे बैठती है, अथवा, साधु सानिनी इति वा = शुभ सन्तान को भलीभांति भजती है, अथवा, सु-अपत्यम् - सु नाम अपत्य का है, तत् सन्तान भाव प्राप्त होती है, इति वा = इस लिये, स्नुपा - पुत्रवधू स्नुपा कही जाती है। सुष्ठु सीदति इति स्नुषा' इस विग्रह मे सु पूर्वक पद् धातु से ड(अ) प्रत्यय, डित्वात् टिलोप, सु स् अ, पृषोदगदित्वात् सु को स्नुभाव और पत्व एवं टापू होने पर स्नुपा शब्द बना है । पुत्रवधू का नाम है । क्योंकि वह अच्छे अर्थ में श्वसुर के सन्तान रूप अङ्गभाव को प्राप्त होती है । अथवा 'सु-साधु सनोति इति स्नुपा' इस विग्रह मे सुपूर्वक सन धातु से ड प्रत्यय, टिलोप, सु स् अ, सु को स्नुभाव, पत्व और टाप् होने पर स्नुपा शब्द बना है । पुत्रवधू का नाम है । क्योकि वह सन्तति को प्राप्त होती है । अथवा 'सु = अपत्य प्रसूयते इति स्नुषा' इस विग्रह में अपत्य वाचक सु शन्द उपपद प्रसवार्थक सू घातू से ड प्रत्यय, दिलीप, सु स् अ, सु को स्नुमाव, पत्व, टाप् होने पर स्नुषा पाद बना है । पुत्रवधू का नाम है । क्योकि वह श्वशुर के लिये सन्तान उत्पन्न करतो है । प्राश्नातु व इन्द्र उक्षण एतान्माध्यमिकान्संस्त्यायान् । आदित्य, ते = तुम्हारे, एतान् माध्यमिकान संस्त्यायान् उक्षण - ये माध्यमिक ओस समूह हो, प्राश्नातु प्राशन करें , चाट जायं । 7 उक्षण उच्छतेईद्धिकर्मणः । उक्षन्त्युदकेनेति वा । वृद्धिकर्मणः - उच्छ घातु से, उक्षण: - उक्षन् शन्द बना है, बा- अपवा, उदकेन = जल से, उक्षन्ति = सर्व ओपधियों को सेचन करते है। यतः ओस उस उदान- कहलाते हैं। अर्थात् 'उच्छन्ति ओषध्यादोन वर्धयन्ति इति उक्षणः नोहाराः' इस विग्रह मे वृद्धयर्षक उच्छी विवासे' धातु से, उणादि कल्पित कनिन (अन् ) प्रत्यय, पृपोदरादिस्वाद 1 वृद्धपर्यक, उच्छतेः म - (१५३६) निरक्त द्वादशाध्यायस्य: नवमः खण्डः । च्छ को क्ष होने पर उक्षन शब्द बना है । उक्षणः यह जस् का रूप है। ओस का नाम है । क्योकि वह ओषध्यादि को बढाता है। अथवा, 'उक्षन्ति ओपघ्यादीन् सिञ्चन्ति इति उक्षणः नीहाराः' इस विग्रह में ' उक्ष सेचने' धातु से उणादि कल्पित कनिन् (अन् ) प्रत्यय होने पर उक्षन शब्द बना है। मोस का नाम है । क्योकि, वह ओपध्यादि को जलसे सिञ्चन करता है। प्रियं कुरुष्व सुखाचयकरं हविः सुखकरं हविः । सुखाचयकरं हविः = सुखकर हंविः = सुखकर हवि को प्रियम = प्रिय, कुरुष्व = करो। सर्वस्माद्य इन्द्र उत्तरस्तमेतद् ब्रूम आदित्यम् । जो, इन्द्रः = इन्द्र, सर्वस्मात् = सब से, उत्तरः = श्रेष्ठ है इसी लिये, तम् = उसको हम, एतद् बमः = यह कहते हैं कि वह, आदित्यम् = आदित्य है। ५ - सरण्यः । सूर्यास्त के पश्चाभावी आदित्य प्रभा का नाम सरप्यू है। जो शुस्थाना देवता है। अर्थात् सूर्योदय से पूर्वकालिक आदित्य प्रभा का नाम उपा, सूर्योदय से पश्चाद्भावी आदित्य प्रभा का नाम सूर्या, सूर्य अस्त से पूर्वकालिक आदित्य प्रभा का नाम वृपाकपायी और सूर्य अस्त से लेकर अग्निम उपः काल से पूर्वकालिक आदित्य प्रभा का नाम सरण्यू है। इस प्रकार आदित्य की उपा सूर्या, वृपाकपायी, और सरण्यू ये चारो प्रभाये घुस्थान देवता है। जो सूर्य की विभूति होने से आदित्य पत्नी निरुक्त में कही गई हैं। इस विग्रह मे 'सृगती' धातु से 'पुसि संज्ञाया घः प्रायेण' इरा सूत्र से प (अ) प्रत्यय, रपर गुण होने पर सर शब्द बना है और सरेण सरणेन नयति इति सरन्यू: इस विग्रह में सर उपपद 'णी प्रापणे' पातु से उणादि परिकल्पित अक् (क) प्रत्यय, सर नी ऊ, 'एरनेकाचोऽसंयोगपूर्वस्य' इस सूत्र से यण् 'पूर्वपदासज्ञायामगः' इस सूत्र से णत्व होने पर 'सेरण्यू ' शब्द वना है। उत्तम स्थान देवता का नाम है। क्योंकि, वह गमन द्वारा आदित्य को प्राप्त होती है। इसी को भाष्यकार कहते हैं- . सरणसर: - - " सरण्यः सरणात् । सरणात् = सरण = गमन करने से, सरण्यः = उत्तमस्थान देवता ‘सरप्पू' कहलाती है। वही उपा मादित्य प्रभा जब सूर्य के प्रति अविभाग अर्याद अभेद से गई हुई होती है तब वह सरण से = गमन से सरण्यू कहलाती है। सूर्यास्त काल में सर्वत्र फैली हुई सूर्य प्रभा सूर्य में जाकर मिल जाती है। तस्या एपा भवति । . इति निरुक्तं द्वादशाध्यायस्य नवमः खण्डः । १२-९ ।। तस्याः = उस सरयू की, एषा - यह अग्रिम भवति - है- ऋचा, निरुक्त द्वादशाध्यायस्य दशमः खण्ड. । (१५३७) १ अथ निरुक्त द्वादशाध्यायस्य दशमः खण्डः । अपांगूहन्नमृता मर्येभ्यः कृत्री सवर्णामददुर्विवस्वते । उताश्विनावभरयत्तदासीदजहादु द्वा मिथुना सरण्यूः ॥ ऋस ७-६-२३-२ ।। , इस मन्त्र का यमपुत्र देवधवा ऋषि-त्रिष्टुप् छन्द और सरण्यू देवता है। मन्त्रार्थ- अमृताम् = अमर सरण्यू को माम्यः = मनुप्यो के पास, मनुष्यो की उत्सति के लिये, अपागूहन् छिपाया गया। सवर्णाम् = सरण्यू के समान एक स्रो का निर्माण, कुल्वी करके उसे, विवस्वते - विवस्वान् मादित्य को, अददु. = दिया गया। उत = और उस समय उस अश्वरूपिणी सरण्यू ने, अश्विना अभरत = अश्विद्वय का अपने गर्भ मे धारण किया। यत् बासीद = जो वह था, तव - उसको, सरण्यू = सरण्यू ने, द्वा मिथुना = दो यमज सन्तानो को, अजहात = त्याग किया अर्थाद उत्पन्न किया। यह ऐतिहासिक अथं है। नरुक्त अर्थ माष्यकार अनुपद मे ही करने वाले है । इस ऋचा मे सरण्यू शब्द आया है । इस लिये यह सरण्यू की ऋचा कही गई है। अप्यगृहन्नमृतांमर्येभ्यः । कृत्वी सवर्णामददुर्विवस्वते ऽप्यश्विनावभरवत्तदासीदजहाद् द्वौ मिथुनौ सरप्यूमध्यमं च माध्यमिकां च वाचमिति नरूक्ताः । यमंच यमींचे त्यतिहासिकाः । अमृताम् = अमर सरण्यू को, म]भ्य = मनुष्यो के पास, अपि अगहन = छिपाया गया। सवर्णाम् कृस्वी = सरप्यू एक शो का निर्माण करके उसे, विवस्वते = विवस्वान् आदित्य को, अददु दिया गया । अपि अश्विनौ = अश्विद्वय का, अभरत् = अपने गर्भ में उसने धारण किया । यत् तत् आसीत् = जो वह था उसे, सरप्यू = सरण्यू ने, द्वौ मिथुनौ = दो यमज सन्तानों को, अजहाद - उत्पन्न किया। मध्यमच = एक मध्यम ज्योति को और दूसरी माध्यमिकाम च वाचम् = मध्यमलोक की वाणी को। इति = इस अर्थ को, नैरुता नरक्त आचार्य लोग करते हैं। मध्यम और माध्यमिका नही किन्तु, यम च यमीच = यम और यमी, इति = यह, ऐतिहासिका ऐतिहासिक लोग कहते है। भाष्यकार कहते हैं- अत्रेतिहासमाचक्षते-त्वाप्ट्री सरण्य विवस्वत आदित्याद् यमौ मिथुनौ जनपाश्चकार सा सवर्णामन्यां प्रतिनिधायाश्वं रूपं कृत्वा प्रदुद्राव स विवस्वानादित्य अश्वमेव रूपं कला तामनुसृत्य संबभूव । ततोऽनिनौ जनाते । सवर्णायां मनुः । अत्र = इस मन्त्र मे, इतिहासम् = इस प्रकार का इतिहास, माचक्षते = कहते हैं--वाप्ट्री सरण्यू = स्वष्टा की पुत्री सरण्यू ने, विवस्वत आदित्वात् - विवस्वान् आदित्य से, यमो मिथनी पनयाञ्चकार = यमज = दो सन्तानो को उत्पन्न विये। मा - वह सरयू. सवम् अन्याम् = अपने समान दूसरी श्री को, प्रतिनिधाय - अपने स्थान पर प्रतिनिधि रूप से रख कर, अव म कृत्वा - घोड़ी का रूप बनाकर, प्रदुदाव = वहा से भगो । स विवस्वान् आदित्य. = वह विवस्वान् मादिस्य .
- (१५३४) निवक्त द्वादशाध्यायस्यैकादशः खण्डः । भी, अश्वम् एव रूपम् कृत्वा = घोड़े का ही रूप बना कर, ताम् अनुसृत्य = उस के पीछे चल कर, संवभूव = उस से मिला । ततः = उस से, अश्विनौ = दो अश्विन् देवता, जज्ञाते = उत्पन्न हुए। सवर्णायाम् = समान वर्णा में अर्थात् और जो सवर्णा स्त्री, जिसे सरण्यु अपना दूसरा रूप बना कर छोड़ गई थी, उस मे, मनुः = मनुः उत्पन्न हुआ। इसी को वैवस्वत मनु वहते हैं। क्योकि, वह विवस्वान् का पुत्र है। ६ त्वष्टा। धुस्थान देवता विशेष का नाम त्वष्टा है। जिस को पौराणिक लोग विश्वकर्मा कहते हैं । इसकी व्याख्या निरुक्त अध्याय ८ खण्ड १३ में अनेक प्रकार से एवं विस्तार से की गई है। वहां इसका अर्थ मतभेद से वायु वा अग्नि है और यहां विश्वकर्मा । भाष्यकार कहते हैं- तदभिवादिन्येपर्भवति । इति निरुक्त द्वादशाध्यायस्य दशमः खण्डः ॥ १२-१०॥ तद = इस अर्थ को, अभिवादिनी = कहने वाली, एषा ऋक् = यह अग्रिम ऋचा भवति = है- अथ निरुक्त द्वादशाध्यायस्यकादशः खण्डः । त्वष्टा दुहिने वहतुं कृणोतीतीदं विश्वं भुवनं समेति । यमस्य माता पर्युद्यमांना महो जाया विवस्वतो ननाश ॥ ऋ सं. ७-६-२३-१॥ इस मन्त्र का यमपुत्र देवश्रवा ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और सरण्यू देवता है। मन्त्रार्य-स्वष्टा - त्वष्टा नामक देव, दुहिने - अपनी दुहिता (कन्या) सरवू का, वहतुम् = विवाह, कृणोति करोति = कर रहे हैं, इति = इस उपलक्ष में, इदम् विश्वम् भुवनम् = यह सारा संसार, समेति सम्मिलित हुआ। पर्युह्यमाना = विवाहित होती हुई, यमस्य माता = यम यमो को माता सरप्यू. महः विवस्वतः - जो महान् विवस्वान को, जाया - खी थी वह, ननाश - वहां से अदृश्य हो गई। उत्तर कुरु को पली गई। इस मन्त्र में त्वष्टा पद आया है। अतः यह त्वष्टा की ऋचा फही जाती है। E इसका भाप्य- त्वष्टा दुहितुर्वहनं करोतीदं विश्वं भुवनं समेतीमानि च सर्वाणि भूतान्यमि समागच्छन्ति । यमस्य माता पर्युद्यमाना महतो जाया विवस्वतो ननाश । = स्वप्टा नामक देव, दुहितुः = अपनी दुहिता सरण्य का, वहनम् करोति विवाह कर रहे हैं। इति इस उपलक्ष में, इदम् विश्वम् भुवनम् ममेति = हमानि च सर्वाणि भूतानि स्वष्टा .
- निरुक्त द्वादशाध्यायस्य द्वादशा खण्डः । (१५३९) अभिसमागच्छन्ति ससार के सभी लोग सम्मिलित हुए। पर्युद्यमाना = विवाहित होती हुई, पमस्य माता = यम की माता सरयू जो, महत. विवस्वता - महान् विवस्वान् की, जाया - स्त्री थी बह, ननाश - वहा से अदृश्य हो गई। उत्तर कुरु को चली गई। यह अयं अन्तरिक्ष पक्ष में है। रात्रिरादित्यस्यादित्योदयेऽवीयते । इति निरुक्त द्वादशाध्यायस्यैकादशः खण्डः । १२-११ ।। रात्रिः - रात्रि अर्थात् उपा जो, आदित्यस्य = सूर्य को जाया = प्रभा है वह, आदित्योदये सूर्य के उदय होने पर, अन्तर्षीयते = अन्तर्धान हो जाती है। सूर्योदय होने पर राति सरप्यू रूप प्रभा नष्ट हो जाती है । इतिहास पक्ष मे सरयू त्वष्टा देव की पुत्री और विवस्वान् सूर्य देव को पत्नी है और निरुक्त पस मे सरण्यू स्वष्टा की पुत्री और मादित्य की पत्नी है। जो सूर्योदय होने पर छिप जाती है। और अर्थ समान है। अप निरुक्त द्वादशाध्यायस्य द्वादशः खण्डा। सविता। सविता उत्तमस्थान देवता आदित्य का नाम है। इसका निर्वचन नि. म १० ख ३१ में सविता सर्वस्य प्रसविता' इत्यादि वाक्य से किया गया है। अर्थात् 'सवति इति सविता' इस विग्रह मे '' प्रसवैश्वर्ययोः' धातु से 'वुलतृचौ' इस सूत्र से कर्ता में तृच (१) प्रत्यय, सुह, इडागम, गुण, अवादेश होने पर सवितृ शब्द बना है। आदित्य का नाम है। क्योति, वह सब को उत्पन्न करता है। इसीको स्मरण कराते हैं- सविता व्याख्याता। सविता = सवितृदेव, व्याख्यातः - व्याख्यात है अर्थाद इसकी व्याख्या नि म १० सं ३१ में हो चुकी है। वहाँ मध्यमस्थान देव और यहाँ उत्तमस्थान देव अर्थ है। तस्य कालो यदा धौरपहततमस्का कीर्ण रश्मिर्मवति । तस्य काल! = उस सविता का काल वह होता है, यदा - जिस समय, चो' - धुलोर, अपहततमस्का = अन्धकार रहित, कोणर िम. = कोणं वाला, भवति - होता है। अर्थात जिस काल मे भाकार देश में ही प्रकाश होता है । पृपिवी मे नही। क्योकि, उदय होते हुए सूर्य को कोणें प्रथम आकाश में जाती हैं। बस यही प्रकार रहता है। पिवी में नहीं। पृथिवी में अन्धकार ही रहता है। वह सविता का काल है। उस काल मे आदित्य सविता कहा जाता है। तस्येपा भवति । इति निहत द्वादशाध्यापस्य द्वारा सहा । १२-१२ ।। तस्य - उस सविता की, एषा - पह अप्रिम कवा, मति है- (१५४०) निरुक्त द्वादशाध्यायस्य प्रयोदशः खण्डः। अथ निरुक्त द्वादशाध्यायस्य त्रयोदशः खण्डः । विश्वा रूपाणि प्रति मुञ्चते कविः प्रासांवीद्रं द्विपदे चतुष्पदे । वि नार्कमख्यत्सविता वरेण्योऽनु, प्रयाणमुषसो, वि राजति ॥ का सं. ४-४-२४-२॥ इस मन्त्र का श्यावाश्व ऋषि, जगती छन्द और सविता देवता है। मन्त्रार्य-कपिः = मेघावी सविता देव, विश्वानि रूपाणि = स्वय सव रूपो को, प्रतिमुश्चते = धारण करते हैं । द्विपदे चतुष्पदे - दो पैर वाले मनुष्यादि और चार पैर वलि गो अश्व आदि पशु आदि के गमनादि विषयक, भद्रम् असावीत = कल्याण को जानते है । वरेण्यः - वरणीय, सविता = सर्व प्रेरक सविता देव, नाकम् । स्वर्ग को, वि अख्यत् = प्रकाश करते हैं अर्थात् यजमान के लिये स्वर्ग दिखाते हैं। ये, उपसः = 'उपा = उदित होने के, अनु = पश्चात्, विराजति = विराजते हैं । प्रकाशित होते हैं। इस मन्त्र में सविता की स्तुति है । इस लिये यह सविता को ऋचा कहलाती है । के, प्रयाणम् इस मन्त्र का भाष्य- " - -पल्याण सर्वाणि प्रज्ञानानि प्रतिमुञ्चते । मेधावी कविः क्रान्तदर्शनो भवति । कवते; । प्रसुवति भद्रं द्विपाद्भधश्च चतुष्पाद्यश्च, व्यचिख्यापयन्नाकं सविता वरणीयः प्रयाणमनूप सो विराजति । सविता देव, सर्वाणि प्रज्ञानानि = सर्वविषयक ज्ञान को, प्रतिमुञ्चते = छोडते हैं। क्योकि, के, मेघावी = कविः = क्रान्तदर्शन. = वडे बुद्धिमान और क्रान्तदर्शी, भवति = हैं। इस लिये कवि कहे जाते हैं । वा = अथवा, कवतेः = नैघण्टुक 'कथ' घातु से कवि शब्द बना है । अर्थात् 'कवति गच्छति इति कवि इस विग्रह मे नैषष्टुक गत्यर्थक कव धातु से उणादि कल्पित ई प्रत्यय होने से कवि शब्द बना है। सविता का नाम है। क्योकि, वह नित्य प्रति गमन करता है। द्विपाद्भयश्च = दो पर पाले मनुष्यो के लिये और चतुष्पादभ्यश्च = चार पैर वाले पशुमो के लिये, भद्रम् प्रसुवति उत्पन्न करते, कल्याण करते हैं। वरणीय. = वर्णनीय, सविता - सविता देव, नाकम् = स्वर्ग को, ध्यचिस्यापयन् = प्रकाश करते हैं । उपस. = उपा के, प्रयाणम् - उदय होने के, अनु - पश्चात थे, विराजति - प्रकाशित होते हैं। अन्य प्रमाण से सविता के काल का निर्णय करते हैं- 'अधोरामः सवित्रः' इति पशुसमाम्नाये विज्ञायते । पशुसमाम्नाये यजर्वेद (म० २४ मन्त्र २९, ५८, ५९) के वैदिक पशु प्रकरण में, "अघोरामः सवितः" अर्थात् अघोराम नामक पक्षी जिसको भाषा में कालची कहते हैं- सवित्र है। अर्थात् जैसे अधोराम नामक पक्षो नीचे (पाद प्रदेश ) काला और पर (देह प्रदेश ) सफेद होता है वैसे ही सविता भी उदय काल में नीचे ( थियो प्रदेश ) अन्धकार होने से काला और ऊपर (आकाश प्रदेश) प्रकाश होने से सफेद होता है। इति = पर विज्ञायते है। इस से सविता के काल का निर्णय होता है। अदि से अघोर . - - जाना जाता ती का बयोमान काला निरुक्त द्वादशाध्यायस्य त्रयोदश खण्ड 1 - और सर्व भाग सफेद होता है वैसे ही जिस काल मे सविता का अधोभाग काला और ऊवं भाग सफेद होता हो वह काल सविता का काल समझा चाहिये । प्रश्न-कस्मात् सामान्याद् इति । कस्मात् सामान्यात् = किस गुण के समानता से अघोराम नामक पक्षो को सवित्र कहा गया है। उत्तर - अधस्तात्तद्वलायां तमो भवति, एतस्मात् सामान्यात् । तद् वेलायाम् = उस समय = सूर्योदय काल में वहपक्षी अयस्ताद = नीचे, तम = काला, भवति = होता है। एतस्मात् - इस गुण की, सामान्यात् = समानता से अधोराम पक्षी को सवित्र कहा गया है। जैसे सविता उदय काल मे नीचे पृथिवी लोक मे काला और आकाश मे सफेद होता है वैसे ही अघोराम नामक पक्षी भी नीचे पैर मे काला और ऊपर देह मे सफेद होता है। इस लिये इस को सवित्र कहते हैं। इसी को स्पष्ट करते हैं- अधस्ताद्रामोऽधस्ताकृष्णः। अपस्तात् राम - अधस्ताद कृष्ण - नीचे का भाग काला होता है। प्रश्न-कस्मात् सामान्यात् । किस्मात् = किस गुण, सामान्याव - सामान्य से, अघोराम पद घटक राम शब्द का अर्थ कृष्ण (काला) किया गया है । 'अग्निं चित्वा न रामामुपेयात्' । रामा-रमणायोपेयते, न धर्माय, कृष्णजातीया। एतस्मात् सामान्यात् । अग्नि चित्वा - अग्नि चयन करके अर्थात् अग्नयाधान करके, रामाम् = कृष्णवर्णा शूद्रा से, न उपेयात् विवाह न करे। (यह किसी शाखा का मन्त्र है)। इस में 'रामा' शब्द का अर्थ कृष्ण (काला) देखा गया है। रामा - काला रगवाली शूद्रा नो से, रमणाय = रमण के लिये, रागत उपेयते = विवाह (सम्बन्ध) किया जाता है, न धर्माय : यज्ञादि धर्म कार्य करने के लिये नहीं क्योकि वह, कृष्ण जातीया = काली जाति की होती है। एतस्मात् सामान्याद सामान्य से (तुल्यता से) राम शब्द का अर्थ कृष्ण (काला) किया गया है। पक्षी और शूद्रा का काला गुण साम्य है। मन्य प्रमाण से सविता के काल का निणय करते हैं- 'ककवाकुः सावित्रः' इति पशुसमाम्नाये विज्ञायते । पशुसमाम्नाये - यजुर्वेद (म २४ मत्र ३५ मे) के पशुप्रकरण मे, “कृपवाकु सावित्र" अर्थात् कृकवाकु नामर पक्षी जिस को मुरणा कहते है यह सावित्र है । इति = यह, विज्ञायते जाना जाता है । इस मन्त्र में कुकवाकु (भुक्कुट) पक्षी को पाविन गया है। उत्तर- --- 5 इस गुण (१५४२) निरुक्त द्वादशाध्यायस्यः प्रयोदशः खण्ड! 1 से प्रश्न-कस्मात् सामान्यात् । कस्मात् सामान्यात् = किस गुण सामान्य से कृकवाकु को सावित्र कहा गया है ? । उत्तर-कालानुवादंपरीत्य । कालानुवादम् = काल के अनुवाद को, परीत्य = जान कर कृकवाकु को सावित्र कहा है। अर्थात् कुक्कुट प्रातःकाल जिस समय बोलता है वह सविता आदित्य का काल है। कुकुवाकु नामक पक्षी उस समय बोलता हुआ सवितृकाल का ही अनुवाद करता है। क्योंकि सविता के उदय काल और कुक्कुट (मुरगा) के बोलने का काल एक ही है। इसी लिये कृकवाकु को सावित्र उक्त श्रुति मे कहा गया है। कृकवाकु शब्द का निर्वचन करते हैं- कृकवाको पूर्व शब्दानुकरणम् बचेरुत्तरपदस् । कृकवाकोः कृकवाकु शब्द का, पूर्वम् = पूर्व भाग (कृक) शब्दानुकरणम् = शब्द का अनुकरण है अर्थात् वह कुक्कुट पक्षी 'कृक कृक' ऐमा वोलता है। उसी का अनुकरण 'कृक' शब्द है। जैसा वह बोलता है उसी शब्द को जनानेवाला है। और, उत्तरपदम् = 'कुकवाकु' के उत्तर पद (भाग) जो वाकु भाग है वह, वचेः = 'वच' धातु से बना है। अर्याद 'कृक इत्येवं वक्तीति कृकवाकु: कुक्कुटा इस विग्रह में कृक शब्द उपपद 'वच परिभाषणे' घातु से 'कृके वचः कश्च' इस उणादि सूत्र उण (उ) प्रत्यय, उपघा वृद्धि, और चकार को ककार होने पर 'कृकवाकु' शब्द बना है । मुरगा का नाम है। क्योंकि वह 'कृक मुक' ऐसा शब्द करता है। यहाँ शब्दानुकरण 'कृक' पद पूर्व और वच' धातु का बना हुमा 'वाकु' पद उत्तर है। मगा। अपने अपने कार्य में प्रवृत्त प्राणियों के द्वारा जो भजनीय सेवनीय हो उस आदित्य का नाम भग है । अर्थात् 'भज्यते सर्वप्राणिमिः सेव्यते इति भगः आदित्यः' इस विग्रह में 'भज सेवामाम्' धातु से 'सि संज्ञायां घः प्रायेण' इस सूत्र से प (8) प्रत्यय जोः कु घिण्यतोः' इस सूत्र से पुत्वेन जकार को गकार होने पर 'भग' शब्द बना है। आदित्य का नाम है। क्योकि, वह सर्वप्राणी द्वारा संभजनीय है। भाष्यकार कहते हैं- भगो व्याख्यातः । तस्य काला प्रागुत्सर्पणात् । खण्ट गोमत' इत्यादि पतियों नया मा है। वहाँ इस का अर्थ भगः - भग का, व्याख्यातः = व्यास्पान हो चुका है। अर्थाद अप्न नामो में निरुक्त अध्याय : अन्न और यहा आदित्य ज्योति है। इतना हो अन्तर है। तस्य - उस आदित्य का, काल:- काल, उत्सर्पणा - उत्सर्पण से अर्थात् ऊपर आकाश देश में गमन करने से, प्रा - पूर्व है। अदि उदय होने के बाद जब सूर्य गमन करता है उस के पूर्व का जो काल है वह भग का काल है। तत्कालिक आदित्य 'भग' कहा जाता है । जो ज्योति स्वरूप है। - . . - - निरुक्त द्वादशाध्यायस्य चतुर्दशः खण्डः । तस्यैषा भवति । इति निरुक्ते द्वादशाध्यायस्य त्रयोदशः खण्डः ॥ १२-१३ ।। तस्य = उस भग की, एषा = यह अग्रिम ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्त द्वादशाध्यायस्य चतुर्दशः खण्डः । प्रातर्जितं भगमुग्रं हुवेम वयं पुत्रमदितयों विधर्ता । आध्रश्चियं मन्यमानस्तुरश्चिद्राजा चियं भगं भक्षीत्याह ॥ क सं. ५-४-८-२॥ -प:- हैं उन्ही, भगम् - इस मन्त्र का वसिष्ठ ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और भग देवता है । मन्त्रार्थ जो भग देव, विधर्ता = ससार के धारक, जितम् = जयशील, उग्रम् - उग्र और, अदितेः पुत्रम् = अदिति के पुत्र - भग देव को, वयम् = हम, प्रातः = प्रातकाल, हवेम = बुलाते हैं । आध्रश्चित दरिद्र स्तोता, तुरश्चिद न्यायाधीश यमराज और, राजाचिद = प्राप्तधन राजा भी, यम् जिन मग देव को, मन्यमानः = स्तुति करते हुए 'भगम् भक्षि' 'मुझे भोग योग्य धन दो' इति आह - इस प्रकार की याचना करते हैं । इस मन्त्र का भाष्य- प्रातर्जितं भगमुग्रं हयेम वयं पुत्रमदितेयोंविधारयिता सर्वस्याघ्रश्चियं मन्यमान आढथालुर्दरिद्रस्तुरश्चित् । तुर इति यमनाम, तरतेर्वा, त्वरतेर्वा, त्वरया तूर्णगतिर्यमः । राजा चियं भगं भक्षीत्याह । जो भगदेव, सर्वस्य विधारयिता - सर्व ससार के धारक, जितम् = जयशील, उग्रभु उग्र और, अदितेः पुत्रम् = अदिति के पुत्र हैं। उन्ही, भगम् - भगदेव को, वयम् - हम, प्रातः - प्रातः काल, बयेम आदधालुः = धनाढय, राजाचित दरिद्रः = दरिद्र स्तोता, तुरश्चित = यमराज, यम् = जिन भगदेव को, मन्यमानः । स्तुति करते हुए, 'भगम् भक्षि' = 'मुझे भोग योग्य धन दो' इति - इस प्रकार की, आह याचना करते हैं। तुर इति - 'तुर' यह, यमनाम = यमराज का नाम है। तरते: बना है। वा = अथवा, त्वरतेः स्वर' धातु से बना है। वा अपवा, स्वरया - स्वरा. वेग = शीघ्र गति से, चलता है इस लिये यम 'तुर' कहा जाता है। क्योंकि, तूणंगतिः । शीघ्रगामी, यमः = यम होता है । अर्थात् 'तरति इति तुरः यमा' इस विग्रह में 'सवनतरणयोः' धातु से 'सि सज्ञाया प्रायेण' इस सूत्र से घ (अ) प्रत्यय, तु अ, पृषोदराविरवाद धातु को पर उत्व, द उर् अ, 'तुर' शब्द बना है। एव 'स्वरते इति तुरः यमः' इस विग्रह में। 'मिरवरा संभ्रमे ' पातु से पूर्ववत् प प्रत्यय और पृषोदरादित्वाद सप्रसारण, पूर्व रूप होने पर तुर' शब्द बना है । यम का नाम है। क्योकि, न्याय करने मे शोघ्रता के कारण पमराज स्वरित गति वाला है। य:- बुलाते हैं । क %= राजा, ह धातु से - - - , . - (१५४४) निरुक्त द्वादशाध्यायस्य चतुर्दशः खण्डा । अन्धो भग इत्याहुः । अनुत्सृष्टो न दृश्यते । भग: - भगदेव अनुदित मादित्य, अन्धः = अन्ध । अर्थात प्रकाश रहित है, इति = ऐसा विद्वान् लोग, आहुः = कहते हैं। क्योंकि, वह, अनुत्सृष्टः = अनुदित होने के कारण, न दृश्यते दिखाई नहीं देता है । उदय से पूर्वकाल में अज्ञात रहता है । 'भग देव अन्धा है' इस कथन में प्रमाण देते हैं- "प्राशित्रमस्याक्षिणी निर्जघान" इति च ब्राह्मणम् । সামি प्राशिव ने, अस्य = इस (भग ) की, अक्षिणी = आंखो को, निर्जघान - फोड दिया था, इति च = यह भी, ब्राह्मणम् = ब्राह्मण वाक्य भग देव को अन्धा होने मे प्रमाण है। प्राशिन देवता विशेष का नाम है। इसको ऐतिहासिक कथा इस प्रकार है-प्राशित्र अग्नि के, पुरोहाश में से ब्रह्मा का भाग निकाला जाता है और वह भक्षण से पूर्व ढंका हुआ रखा रहता है। उसे देखने का निषेध है। उसी को भगदेव ने देखा था। इस कारण प्राशिव ने भग देवता के नेत्र फोड देये पे। इसी से वह अन्धा है। इसी से आज भी याग में प्राशित्र भाग को लोग नहीं देखते हैं। उसको ढाक रखते हैं। यह कथा प्राशिव को स्तुति होने से अर्थवाद समझना चाहिये । अत एव "जनं भगो गच्छति" इति वा विज्ञायते । उनुदित भगदेव = आदित्य उदय होते हुए, जनम् लोक जन के प्रति, गच्छति - जाता है, इति यह इस लौकिक वाक्य से, विज्ञायते जाना जाता है। प्रतिदिन आदित्य उदप हो हो कर जनो के प्रति जाता है यह ज्ञात होता है कि- जनं गच्छति - आदित्य उदयेन । आदिश्या = आदित्य, उदयेन = प्रतिदिन उदय हो हो कर, जनम् - जनो के प्रति, गच्छति जाता है। ९- सूर्यः । धुलोक के प्रधान देवता का नाम सूर्य है। उदय काल से पूर्व कालिक आदित्य भग और उदय काल से उत्तर कालिक आदित्य सूर्य कहलाता है। फलतः उदय से पूर्व भग पा और उत्तर सूर्य का काल समझना चाहिये । सूर्य शब्द को निष्पत्ति इस प्रकार है-सरति गच्छतीति सूर्य इस विग्रह मै 'सृ गतो' धातु से 'राजसूयसूर्य....' इत्यादि सूत्र के निपातन से श्यप (य) प्रत्यय, धातु के ऋकार को ऊर् आदेश होने पर 'सूर्य' शब्द बना है। आदित्य का नाम है। क्योंकि, मादित्य माकाश में गमन करता है। यास्क निर्वचन करते हैं- सूर्यः सर्वेर्वा सुवते; स्वीर्यतेर्वा । सतः वा = 'सृ गतौ' धातु से अपवा, सुवतेः या = " 'पू प्रेरणे' धातु से अथवा, स्वीर्यते:-सु पूर्वक ईर गती' घातु से सूर्यः = सूर्य धन्द बना है। उन में अभी हो स धातु से सूर्य की भगः - D . ।
. 157 निवक्त द्वादशाध्यायस्य पश्चदशः खण्डा । (१५४५) सिद्धि की गई है। 'सुवति कर्मणि लोकं प्रेरयति इति सूर्यः' इस विग्रह मे । 'यू प्रेरणे' धातु से 'राजसूयसूर्य...' इत्यादि सूत्र के निपातन से क्यप् (य) प्रत्यय और धातु के ऊकार को ऊर आदेश होने पर सूर्य शब्द बना है। सूर्य का नाम है। क्योकि, सूर्योदय होने पर सब कोई अपने अपने कार्य में लग जाते है । एवं ' सुष्टु ईयंते वायुना प्रेयंते इति सूर्यः' इस विग्रह मे सुपूर्वक 'ईर. गतो' धातु से 'राजसूयसूर्य...' इत्यादि सूत्र के निपातन से कर्म में क्यम् (य) प्रत्यय, 'सु ईर् य, सु और ई का लोप होने पर सूर्य शब्द बना है। सूर्य का ही नाम है । क्योकि सूर्य अन्तरिक्ष मे वायु से प्रेरित हो कर गमन करता है। 'तस्यया भवति । इति निरुक्त द्वादशाध्यायस्य चतुर्दशः खण्डः । १२-१४ ॥ तस्य = उस सूर्य की, एषा - यह आगे की ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्त द्वादशाध्यायस्य पश्चदशः खण्डः। उदु त्वं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः । हशे विश्वाय सूर्यम् ॥ सं. १-४-७-१ ॥ इस मन्त्र का प्रस्कण्व ऋषि, गायत्री छन्द और सूर्य देवता है। मन्त्रापंकेतवः - सारे संसार के प्रकाशक सूर्य के अश्व, त्यम् = प्रसिद्ध, जातवेदसम् = सर्व उत्पन्न प्राणियो को जानने वाला वा जातप्रज्ञ वा जातधन, देवम् = द्योतमान, सूर्यम् = आदित्य को, विश्वाय = विश्वस्मै समस्त भुवनों को, दृशे = देखने के लिये. उद्वहन्ति = ऊपर ले जाते हैं। इस मन्त्र में सूर्य की स्तुति है। अतः यह मन्त्र सूर्य का है। इस मन्त्र का भाप्य- उद्वहन्ति तं जातवेदसं रश्मयः केतवः । सर्वेषां भूतानां दर्शनाप सूर्यमिति । कमन्यमादित्यादेवमरक्ष्यत् । केतवः निरप - सर्वप्रकाशक सूर्य के प्रश्न वा, र मय: - मूर्य की रश्मिा, जातवेदसम मानवान्, तम् सर्वप्रसिद्ध उस, सूर्यम् = सूर्य को, सर्वपाम् भूतानाम् दर्शनाय = सर्व प्राणियों को दर्शन के लिये, उदहन्ति = ऊपर ले जाती है। आदिश्यात् - धादित्य से, अन्यम् कम् - बन्य किस को, एवम् + इस प्रकार, अवक्ष्यत् = कहा जाता? अर्थाद किसी को नहीं। इस प्रकार हवा में सूर्य की स्तुति है। तस्यपाऽपरा मवति । इति निको द्वादशाभ्यायस्य पदग: सण्डः । १२-१५॥ तस्य - उस गूयं की, एपा - यह अभिम, अपरा - दूसरी या भवति है- 5 (१५४६) निवक्ते द्वादशाध्यायस्य.पोडशा खण्ड। । अथ निरुक्त द्वादशाध्यायस्य पोडशः खण्डः चित्रं देवानामुद्गादनीक चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः । आप्रा यावापृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ॥ क्र. सं. १-4-७-१॥ D इस मन्त्र का कुत्स ऋषि, विष्टुप् छन्द और सूर्य देवता है। मन्त्रार्थ-मित्रस्य वरुणस्य अग्नेः मित्र, वरुण और अग्ति के, चक्षुः = चक्षु स्वरूप, देवानाम् अनोकम् - दीव्य रश्मियों के तेजः पुञ्ज स्वरूप, चित्रम् = आश्चर्यकारक कार्य करनेवाले सूर्य देव, उदगाव - उदित हुए हैं। उदित होकर उन्हों ने, धावापृथिवी अन्तरिक्षम् = धुलोक, पृथिवी लोक और अन्तरिक्षलोक को, अपनी किरणों से, आ = सर्व और से परिपूर्ण किया है। क्योंकि, सूर्यः = सूर्यदेव, जगतस्तस्थुषश्च = जङ्गम और स्थावर दोनों की, आस्मा = आत्मा है। इस प्रकार इस मन्त्र में सूर्य की स्तुति की गई है। अत: यह मन्त्र सूर्य का है। आप्रा:- . इस मन्त्र का भाष्य- चायनीयान्देवानामुदगमदनीकं रुपानं मित्रस्य वरुणस्याग्नेश्च । अपूपुरद् यावापृथिव्यौ चान्तरिक्षं च महचेन तेन सूर्य आत्मा जङ्गमस्य च स्थावरस्य च । मित्रस्य = मित्र, वरुणस्य = वरुण और, अग्नेः = अग्नि के, रूपानम् = चक्षुस्वरूप, देवानाम् अनीकम् - दीव्यरश्मियों के तेजःपुखस्वरूप, चायनीयान् = आश्चर्यजनक सूर्य देव, उदगमत् = उदय को प्राप्त हुए हैं। और उदय हो कर, द्यावापृथिव्यौ च = युलोक पृथिवीलोक पौर, अन्तरिक्ष च. अन्तरिक्षलोक को, महत्त्वेन = अपनी महत्त्वपूर्ण किरणों से, अपूपुरत् = परिपूर्ण किया है । तेन - इसी से, सूर्यः = सूर्य देव, जङ्गमस्य स्थावरस्य च = जङ्गम और स्थावर आत्मक समस्त संसार की, मारमा - आत्मा है पूपा । अथ - और, पद आदित्य का नाम पूपा है। भाष्यकार स्वयं निर्वचन करते हैं--- अथ यद्रश्मिपोपं पुष्यति तत्पूपा भवति । जब यह आदित्य, रश्मिपोपम् = अपनी रश्मियो को, पुष्यति - पुष्ट करता है, तत् - तव यह, पूषा भवति - पूषा नामक देव, भवति - हो जाता है। यही आदित्य अनुदित अवस्था में भग उदित अवस्था में सूर्य और रश्मियों को पुष्ट करते समय पूषा कहा जाता है। अर्थात् 'पुष्यति रस्मीन विति इति पूषा आदिलः' इस विग्रह में "पुष पुष्टो' धातु से 'वन्नुसम्पूपन्.' इत्यादि उगादि सूत्र के निपातन से कनिन (अन्) प्रत्यय और उपधा दी होने पर 'पूपन्' शब्द बना है। आदिश्य का नाम है । क्योंकि, यह अपनी रम्मियों को पुष्ट करता है ।
निरक्त द्वादशाध्यायस्य सप्तदशः खण्डः । (१५४७) तस्यैपा भवति । इति निरुक्त द्वादशाध्यायस्य पोडशः खण्डः ॥ १२-१६ ॥ तस्य = उस पूपा की, एपा = यह अग्रिम अचा, भवति = है- अथ निरुक्ते द्वादशाध्यायस्य सप्तदशः खण्डः । शुक्र ते अन्यद्यजतं ते अन्यद्विपुरूपे अहंनी द्यौरिवासि । विश्वा हि माया अवसि स्वधावो भद्रा ते पूपनिह रातिरस्तु ॥ श. सं. ४-८-२४-१ ।। इस मन्त्र का भारद्वाज ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और पूषा देवता है । मन्या है पूषन् !, ते - तुम्हारा, अन्यत् = अन्य एक दिनात्मक रूप, शुक्रम् = शुक्ल वर्ण है बौर, अन्यत् - अन्य एक. ते तुम्हारा राश्यात्मक रूप, यजतम् = केवल यजनीय कृष्णवर्ण है। इस प्रकार, महनी रात्री स्वरूप तुम्हारे रूप, यिषुरूपे = विभिन्न प्रकार के हैं । द्यौः इव असि = तुम द्युलोक के समान आवर्तक हो । स्वधवः हे अन्नवाले ! और, पूषन् हे पूपन् !, हि = क्योकि, तुम = विश्वाः प्रज्ञाः = सब प्रकार के ज्ञान धारण करते हो। तुम, अवसि = रक्षा करते हो। ते - तुम्हारा, भद्रा - कल्याण वाही, रातिः दान, दह = इस यज्ञ मे प्रकाशित, अस्तु = हो । इस में पूपा को स्तुति है । अतः यह ऋचा पूपा की है। 32 - - - इस मन्त्र का भाप्य- - शुक्र ते अन्यल्लोहितं ते अन्यद्यजतं ते अन्ययज्ञियं ते अन्यद्विपमरूप ते अहनी कर्म, पौरिख चासि सर्वाणि प्रज्ञानान्यवस्यन्नवन् माजनवती ते पून्निहदचिरस्तु । हे पूपन् !, ते = तुम्हारा, अन्यत् - अन्य एक, शुभम् लोहितम् - दिनारमर मुहमधिन लोहित रूप और, अन्यत् यजतम् ते = अन्यत् यशियम् ते = अन्य एक तुम्हारा रापारमा पेवल यजनीय कृष्ण रूप है। अन्यत् = अभ्य एक, ते तुम्हारा, विषमरूपे - विषम, रूप है जो, बहनो, कर्म = दिन रात्रि के यम रूप है। घोः इव अप्सि • पुलोक के समान आच्छादर हो। सर्वाणि সনানি सर्व प्रकार के शान धारण करते हो। यवसि - रक्षा करते हो। अन्नन् - है बन्न पाले ! और, पूषन - हे पूषन् !, ते = तुम्हारा, भाजनपती = स्थापयाही, दति. = दान, ह यहां पश में, मस्तु = हो । तस्वैपापरा मवादि। इति निरुते दादाध्यायस्य राय: स१२-१७॥ तस्य - उस पूषा की, एपा यह मग्रिम, अपरा - दूपरोपा, भवति - .
(१५४८) निरुक्त द्वादशाध्यायस्याष्टादशः खण्डः । अथ निरुक्ते द्वादशाध्यायस्याष्टादशः खण्डः । पथस्प॑थः परिपति वचस्या कामेन कृतो अभ्यानळर्कम् । स नो रासच्छुरुधश्चन्द्राग्रा धियंधियं सीषधात प्र पूषा ॥ . ऋ सं ४-८-६-८॥ इस मन्त्र का भरद्वाज के पुत्र ऋजिश्वा ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और विश्वदेवगण देवता है । मन्त्रार्थ- पथस्पथः मार्ग मार्ग के अर्थात् सारे मार्ग के, परिपतिम् = अधिपति, अर्कम् = अर्चनीय = पूजनीय उपा देव के पास, कामेन = वाञ्छित फल के, कृतः = वश मे आ कर स्तोतागण, वचस्या = स्तुति के साथ, अम्यानट उपस्थित होवे = प्राप्त होवें और, सः पूषा = वह पूषा देव, नः = हमे, चन्द्राग्राः शुरुषः = सुवर्ण के सीग वाली गायें और धन, रासत = प्रदान करें = देवें । सः पूपा = वह पूषा देव, हमारे, घियम् घियम् = सारे कार्य को प्रसीपघाति = प्रसाधन करें - पूर्ण करें। . इस मन्त्र का भाष्य- पथः पथ: - धन, ददातु - पथस्पथोऽधिपतिं पचनेन कामेन कृतोऽम्यानडर्कमभ्यापन्नोऽर्कमिति वा स नो ददात चायनीयाग्राणि धनानि कर्म कर्म च नः प्रसाधयतु पूषेति । सारे मार्ग के, अधिपतिम् = अधिपति, अर्कम् = पूजनीय पूपा के पास, कामेन वाञ्छित फल के, कृतः = वश मे आ कर स्तोतृगण, वचनेन - स्तुति रूप वचन के साथ, अभ्यानट् - उपस्थित होवे। वा = अपवा, मर्कम् अभ्यापन्नः = पूजनीय पूषा की शरण मे प्राप्त होवें। सः- यह पूपादेव, नः = हमे, चायनीयाग्राणि = सोने के सीग वाली गाये और, धनानि देवें, च - और, पूषा : वह पूषा देव, कर्म कर्म = हमारे सर्व शुभ कर्मों को, प्रसाधयतु : सिद्ध करें। इति । विष्णुः । विष्णु नाम आदित्य का है। अर्थात् जब वही आदित्य मियो के द्वारा सर्वत्र व्याप्त होता तब विष्णु कहा जाता है। भाष्यकार स्वय इसका निर्वचन करते हैं- अथ पद्विपितो भवति तद्विष्णुर्भवति । विष्णुर्विशतेर्वा व्यश्नोतेर्वा | - जब वही सूर्य, विपित. - व्याप्त, भवति = होता है, तद = तक, विष्णुः = विष्ण, भवति = हो जाता है । अर्थात सूर्य ही विशेष अवस्था मे जा कर विष्णु हो जाता है । विशतेः = "विश प्रवेशने' धातु से, वा = अथवा, व्यानोतः विपूर्वक 'अगं व्याप्ती संपाते च ' धातु से, विष्णुः - विष्णु शब्द बना है। अर्थात् विशति तीन रश्मि द्वारा सर्वत्र प्रविति इति विष्णुः सूर्यः' इस विग्रह मे "विश प्रयेशने' धातु से 'उणादयो बहुलम्' इस सूत्र से बाहुलवाद नु प्रत्यय, विश नु, 'प्रश्नभ्रस्जसृज....' इत्यादि मूत्र से पत्व और 'रषाम्या णो नः' इस मूत्र से गव अथ- और, यद् । निक्त द्वादशाध्यायस्यकोनविंशः खण्डः । (१५४९) होने पर विष्णु शब्द बना है । सूर्य का नाम है । क्योंकि सूर्य अपनी तीन रश्मियों के द्वारा सर्वत्र प्रवेश करता है । अथवा 'व्यश्नुते सर्वत्र व्याप्तो भवति इति विष्णुः सूर्यः' इस विग्रह में विपूर्वक 'अशूव्याप्ती संघाते च' घातु से पूर्ववत् नु प्रत्यय, पत्व और णत्व होने पर विष्णु शब्द बना है । सूर्य का नाम है । क्योकि,, सूर्य व्यापक होने से सर्वत्र व्याप्त है । तस्यैपा भवति । इति निरुक्त द्वादशाध्यायस्याष्टादशः खण्डः ।। १२-१८ ॥ तस्य = उस विष्णु की, एषा यह अग्रिम ऋषा, भवति = है- अथ निरुक्त द्वादशाध्यायस्यकोनविंशः खण्डः ।। इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दंधे पदम् । समूळहमस्य पांसुरे ॥ ऋ. सं. १-२-७-१७ ॥ इस मन्त्र का मेधातिथि ऋपि, गायत्री छन्द और विष्णु देवता है । मन्त्रायं-इम मन्त्र के दो अर्थ है । एक ऐतिहासिक और दूसरा नरुक्त । उन में ऐतिहासिक अपं इस प्रकार है-विष्णु त्रिविक्रमावतारधारी विष्णु ने, अर्थात् वामनावतारधारी विष्णु ने, इदम् = इस जगत को, विचक्रमे = परिक्रमा की थी। उस समय उन्होने, विधा = तीन प्रकार से, परम् - अग्ने गैर, निदधे = रसे थे। उस समय, अस्य -- उन के, पांसुरे - धूलियुक्त पर से, समूळहम् = यह सम्पूर्ण जगत् छिप सा गया था। निरुक्तार्थ-विष्णुः = मादित्य देव, इदम् नाना विभाग से अवस्थित जगत् को, विचक्रमे = अधितिष्ठति = अधिष्ठितहोता है। अर्षाव दया कर स्थित होता है। विधा - तीन प्रकार से, पदम् : पर को, निदघे = रखता है। पृथिवी लोक में, अन्तरिक्षलोक में और द्युलोक में । अग्नि रूप से पृथिवी को, विद्युत् रूप से अन्तरिम को और सूर्य रूप से धुलोक को दवा कर स्थित है। अस्य = इन विष्णु देव के, पासुरे - अन्तरिक्ष में विद्युत रूप से, यह सम्पूर्ण जगत, समूळहम् = छिपा सा रहता है। विष्णु अग्नि विद्युत और सूर्यरूप सीन पादों से जगत् को नाप रहे हैं । इस इस मन्त्र का भाप्य- पदिदं किंच तद्विक्रमते विष्णुविधा निधन पदं धामावाय, पृथिव्यामन्तरिक्षे दिवीति शाफपूणिः । समारोहणे विष्णुपदे गयशिरसीत्पौर्णवामः । सम्मस्स पांगरे प्यापने न्तरिक्ष पदं न दृश्यते, अपिरोपमा स्याउ समूहमस्य पांगुन व पदं न पश्यत इति । विष्णः • शादिश्य देव, यद् इदम् पि : गंमार में जो कुछ पस्नु है. हत् पित्रमते मात्रमण करके स्थित है। वह, निषा तीन प्रसार से. परम् - र, नित राता है। पाभावाप • सोन प्रकार के होने के लिये । पृषिमाम् - पियो लोक में, मन्नान - उन महको - 3 : D उपमा पांसुल इव = धूलि से पन्ना:%D (१५५०) निरुक्त द्वादशाध्यायस्य विशः खण्डौ । अन्तरिक्षलोक में और, दिवि = धुलोक में रहने के लिये, इति = यह, शाकपूणिः = शकपूणि नामक आचार्य कहते हैं। समारोहणे = उदय काल में उदयाचल पर उदय होता हुआ, विष्णुपदे विष्णुपद माध्यन्दिन में, गयशिरसि = अन्तरिक्ष में एक पर रखता है, इति = यह, और्णवाभः और्णवाम नामक आचार्य कहते हैं । अर्थात् उदय काल में एक पैर उदय गिरि पर, मध्यन्दिन मे दूसरा पैर अन्तरिक्ष में और सायंकाल में तीसरा पर अस्ताचल पर विष्णु रखता है। समूहस्य सब प्राणियों की, पांसुरेप्यायने = वृद्धि के लिये, अन्तरिक्षे = अन्तरिक्ष में, पदम् = विष्णु का जो पद है वह गुप्त है, न दृश्यते = दिखाई नहीं देता है। अपिवा अथवा, उपमार्थे स्यात् अर्थ मे हो सकता है। अस्य = इस विष्णु का, पदम् पर, अन्तरिक्ष में ढका हुआ के समान, समुह्नम् = ढका हुआ है । अतः, न दृश्यते = दिखाई नहीं देता है । इति । निगमप्रसक्त पांसु शब्द का निर्वचन करते हैं- पांसवा-पादैः सूयन्त इति वा, पन्नाः शेरत इति वा, पिंसनीया भवन्तीति वा । इति निरुक्ते द्वादशाध्यायस्यैकोनविंशः खण्डः ।। १२-१९ ।। पादः = पैरों से, सूयन्ते = उत्पन्न होती हैं, इति वा = इस से, वा = अथवा, पतित होती हुई, शेरते = सो जाती हैं, इति वा - इस से, वा = अथवा, पिंसनीयाः = पिंसनीय अर्थात् ध्वसनीय, भवन्ति • होती हैं, इति वा = इस से, पासव: - पृथिवी में पैरों के आघात लगने से चूर्ण धूलिये पैदा होती हैं। वा उत्पन्न होकर पड़ी रहती । वा झटक देने योग्य होती हैं इस लिये पांसु धूलि कहलाती हैं। 'पादैः सूयन्ते इति पासवः' इस विग्रह में पाद शब्द उपपद 'पूङ् प्राणिप्रसवे' धातु से उणादि उ प्रत्यय और पृषोदरादित्वात् पाद सू को पांस भाव होने पर पांसु शब्द बना हैं । यह जस का रूप है। धूलि का नाम है। क्योंकि, वह आने जाने वाले के पैरों से घूर्ण होकर उत्पन्न होती है। अथवा, 'पनाः पतितः शेरते इति पासवः' इस विग्रह में पन शब्द उपपद 'शोङ् स्वप्ने धातु से उणादि उ प्रत्यय और पन्न शी को पृपोदरादित्वात् पास भाव होने पर पांसु शब्द बना है। पासवः' यह जस् का रूप है। धूलि का नाम है। क्योकि, धूलि पद दलित होकर पड़ी हुई होती है। अथवा “पिश्यन्ते इति पासवः' इस विग्रह में, 'पिशिअवयवे' धातु से उणादि उ प्रत्यय पिश् उ, पृषोदरादित्वात् पिश् को पांस भाव होने पर पांसु शब्द बना है। पासवः ' यह जस् का रूप है। धूलि का नाम है। क्योंकि धूलि आने जाने वाले लोगों के परों से पीसी जाती है । अथ निरुक्ते द्वादशाध्यायस्य विशा खण्डः । १२ - विश्वानरः। मध्याह्न उत्तर कालिक आदित्य का नाम विश्वानर है। इसका निर्वाचन निरुक्त अ०७ सं० २१ मे हो चुका है। वहा इसका अर्थ अग्नि और यहां स्थान देवता आदित्य है। इतना ही भेद है। इसी को भाप्यकार कहते हैं- धूलि कही जाती हैं। अर्थात् - पासवः . .
नित द्वादशाध्यायस्यकविंशा 1 खण्ड।। = इन्द्र देवताका विश्वानरो व्याख्यातः। विश्वानर - विश्वानर, व्याख्यात = व्याख्यात है। अर्थात् इसका निर्वचन नि० अ०७ स० २१ मे हो चुका है। तस्यैप निगमो भात्पन्द्रथामृचि । इति निरुक्ते द्वादशाध्यायस्य विश खण्ड । १२-२० ।। तस्य = उस विश्वानर का, एषा निगम = यह उदाहरण मन्त्र, ऐन्द्रयाम् ऋषि अचा मे भवति = है । अर्थात् अन्य देवताक ऋचा मे गौण रूप से इसका पाठ इस प्रकार है- अथ निरुक्त द्वादशात्र्यापस्यकविंश खण्ड । विश्वानरस्य वस्पतिमनानतस्य शव॑सः । एवैश्च चर्षणीनामूती हुवे रथानाम् ॥ क स ६-५-२-४ ॥ इस मन्त्र का अङ्गिरोगोत्रोत्पन्न प्रियमेघ ऋपि, यनुष्टुप् छन्द और इन्द्र देवता है। मन्त्रा मैं, अनानतस्य = अन्य के तेज से अनभिभूत, विश्वानरस्य - मादित्य के, पावस = महा बल के, पतिम् - रक्षक इद्र को, व तुम लोगो की, चर्षणीनाम् = सेनाओं के, एवं = गमन के साप और, रथानाम् कती = रयो के गमन के साथ, हुवे - आह्वान करता हूँ - बुलाता है। इस मन्त्र में विश्वानर गौण है क्याकि, इस का देवता इन्द्र है । अत यही मुख्य है। इस मन्त्रका भाष्प- मनानतस्य विश्वानरस्पानानतस्य शबसो महतो चलस्यवंश्च कामरयनै चर्षणीनां मनुष्याणामत्या च पथा रथानाम् । इन्द्रमस्मिन्यने हयामि । अनभिभूत प्रकाश, विश्वानरस्य आदित्य फे, शस - महर बलस्य- महावल के पालन, वर्षणीनाम् = मनुष्याणाम् : मनुष्यो के, एवं - पामी पायों के लिये, वा- अपवा, अयने - गमन (चलने फिरने ) के सिपे, रवानाम् - रयो के, मन्या = गमन के, पपा- मार्ग से, मस्मिन् यशे में इस या में, इदम् इद्र को, हयामि भाद्वान परता हूँ। गुलासा हूँ। वरुणः। वरण नाम स्थान देवता माथि रा है। इसका नियंपा नियत अध्याय १० मा ३ में हो पुरा है। यहां वरुणा अथ मध्यमस्या देवता और यहाँ उत्तम स्थान देवता है। इतना भेद 'लोति मिभि सर्य आपणोति इति या इस विरह में न परण पाा में 'गदादिम्म उनन् ' हम उगादि मन से उनन् (उन) प्राय १ को सर मुग और होने पर पर E no (१५५२) निरुक्त द्वादशाध्यायस्य द्वाविंशः खण्डा । बना है । आदित्य का नाम है। क्योंकि, आदित्य अपनी किरणों द्वारा सभी वस्तु को आच्छादन करता है। भाष्यकार करते हैं- वरुणो व्याख्यातः। वरुण: = वरुण, व्याख्यातः = व्याख्यात है । अर्थात् इस को व्याख्या नि. अ. १० खं. ३ में हो चुकी है। तस्यैपा भवति । इति निरुक्त द्वादशाध्यायस्यकविंशः खण्डः ।। १२-२१ ॥ तस्य = उस वरुण की, एषा यह अग्निम ऋचा, भवति = है.- अथ निरुक्त द्वादशाध्यायस्य द्वाविंशः खण्डः ॥ येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाँ अनु । त्वं वरुण पश्यसि ॥ ऋ. सं. १-४-८-६ ।। इस मन्त्र का प्रस्कण्व ऋषि, गायत्री छन्द और सूर्य देवता है। मनार्थ-पावक : सर्वशोधक आदित्य ! और, वरुण जिस हे अनिष्टनिवारक आदित्य !, त्वम् = तुम, मेन चक्षसा - दीप्ति द्वारा, जनान् = प्राणियो के, भुरण्यन्तम् = धारक पोषक बन कर, अनुपश्यसि देखते हो, वयम् तम् स्तुमः = (इतिशेषः) हम उसी की प्रार्थना करते हैं। इस ऋचा में वरुण का मर्थ आदित्य है। इस मन्त्र का भाष्य-- भुरण्युरिति क्षिप्रनाम । भुरण्युः शकुनि रिमध्यानं नयति स्वर्गस्य लोकस्यापि वोढा तत्संपाती भुरण्युः। भुरण्युः इति = : भुरण्यु' यह, क्षिप्रनाम शीघ्र का नाम है। भुरण्युः = भुरण्यु, शकुनिः । पक्षी होता है । क्योंकि, वह, भूरिम् = बहुत, अध्यानम् = मार्ग को, नर्यात = ले जाता है। बहुत शीघ्रता से चला जाता है। स्वर्गस्य लोकस्य अपि = स्वर्ग लोक को भी, वोढा - ले जाने वाला, तसंपाती = तत्सम्बन्धी, (अग्निः अपि ) अग्नि भी, भुरण्युः = भुरण्यु कहा जाता है । आकाक्षारहित मन्त्रार्थ के लिये कुछ पदो का मध्याहार करके व्याख्यान करते हैं- अनेन पावकख्यानेन भुरण्यन्तं जनाँ अनु। त्वं वरुण पश्यसि । 'तत्ते वयं स्तुमः' इति वाक्य शेषः। पावक = हे सर्वशोधक मादित्य !, वरुण = है अनिष्ट निवारक आदित्य !, त्वम् तुम, भनेन स्यानेन - इस दीप्ति के द्वारा, जनान् प्राणियों के, भुरण्यन्तम् = धारक पोषक बनकर, D F जगत् को . T .
D - - निक्त द्वादशाध्यायस्य त्रयोविंशः खण्डः । (१५५३) अनु पश्यसि = जगत् को देखते हो, तत् = इस लिये, ते तुम से, वयम् - हम बसो की, स्तुमः - प्रार्थना करते हैं। इति = इतने पदों का, वाक्यशेष अव्याहार कर लेना चाहिये। अपिवोत्तरस्याम् । इति निरुक्त द्वादशाघ्यायस्य द्वाविंशः खण्डः ॥ १२-२२ ।। अपि था - अथवा, उत्तरस्याम् = आगे आने वाली ऋचा में इस पूर्व ऋचा को मिला देने से पूर्वापर दोनों ऋचाओं का निराकास मन्त्रार्थ हो जाता है। तत्ते वय स्तुमः' इतने पदों का अध्याहार करने की आवश्यकता नहीं रहती है। अतः पूर्वोक्त और वक्ष्यमाण दोनों अचानों को एक साथ मिलाकर पढ़ते हैं- मथ निरुक्त द्वादशाध्यायस्य योविंशः खण्डः । येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जना अनु । त्वं वरुण पश्यसि ॥ अ. सं. १-४-८-६ ।। वि द्यापि रजस्पृथ्वहा मिमांनो अकाभिः । पश्यञ्जन्मानि सूर्य ॥ - सं. १-४-८-७ ।। मन्त्रार्य हे पावक ! , वरुण = हे वरुण!, मूर्य = हे सूर्य!, लम् - तुम, पेन जिस दीप्ति के द्वारा, जनान् = प्राणियों के, मुरणपन्तम् - घारक पोपर बन कर, अनुपश्मसि = जगत् को देखते हो उसी दीप्ति के द्वारा, अक्तमिः महा रात्रि के साथ दिवस का, मिमान: = निर्माण करते हुए एवं, जन्मानि प्राणियों का, पश्यन् = अवलोकन करते हुए, घाम् - धुलोक में और, पृथु - विस्तीर्ण, रजः : अन्तरिक्ष लोक में, ध्येपि = विविध प्रकार से भ्रमण फरते हो। इस प्रकार दोनों मन्त्रों को मिलाकर अयं करने पर 'तते वयं स्तुमः' इतने पदों का अप्याहार नहीं करना पड़ता है। पूर्वोक्त दोनों मन्नों में से अन्तिम मन्त्र का भाप्प- व्येपि यां रजश्व पृषु महान्तं लोकं अहानि च मिमानो अक्तुभी रात्रिमिः सह पश्यजन्मानि जातानि सूर्य। सूर्य = हे सूर्यदेव ! तुम, उक्तभिः = रात्रिभिः सह गधि के साप, महानि - दिन का, मिमानः = निर्माण करते हुए एवं, जन्मानि : जानानि = गर्य प्राणियों को, पयन् - देगते हए. विस्तोग, महान्तम् • महान् दाम् रजम लोकम् - गुप्तोर पोर यन्तरिम सो में, मेदि प्रमण करते हो। - पावक- चक्षसा - S .
. . निरुक्ते द्वादशाध्यायस्य चतुर्विशः खण्डः । जैसे 'येना पावक' इत्यादि ऋचा का 'विद्यामपि ' इत्यादि उत्तर ऋचा के साथ एक वाक्यता फर के अध्याहार के विना ही निराकांक्ष अर्थप्रतिपत्ति दिखाई गई वैसे ही 'प्रत्यङ् देवानाम्' इत्यादि पूर्व ऋचा के साथ इसकी एकवावयता कर के अध्याहार के विना ही निराकांक्ष अर्थप्रतिपत्ति दिखाते हैं- अपि वा पूर्वस्याम् । इति निरुक्त द्वादशाध्यायस्य अयोविंशः खण्डः । १२-२३ ॥ अपिवा = अथवा. पूर्वस्याम् = पूर्वोक्त वा में इस ऋचा को मिला देने से दोनों ऋचाओं का आकांक्षा रहित अर्थ हो जाता है । अध्याहार करने की आवश्यकता नहीं । जैसे- अथ निरुक्ते द्वादशाध्यायस्य चतुर्विशः खण्डः । येना पावक चक्षसा भरण्यन्तं जनाँ अनु । त्वं वरुण पश्यसि ॥ ऋ सं. १-४-८-६ ।। प्रत्यङ् देवानां विशः प्रत्यङ्देषि मानुषान् । प्रत्यविश्वं स्वदृशे ॥ क्र सं. १-४-८-५ ।। मन्त्रार्थ-पावक - हे पावक !, वरुण = हे वरुण !, सूर्य = हे सूर्य !, त्वम् = तुम, पेन जिस दीप्ति के द्वारा, जनान् = प्राणियों के, भरण्यन्तम् = धारक पोषक बन कर, अनुपश्यसि = जगत् को देखते हो उसी दीप्ति के द्वारा, देवानाम् विशः = मरुत् देवों के, प्रत्यह सामने, उदेषि = उदित हो । मानुपान् = मनुष्यों के, प्रत्यङ् = सामने, उदेषि - उदित हो एवं, विश्वम् स्वः = समस्त स्वर्ग लोक के, दृशे = दर्शन के लिये, प्रत्यङ् = सामने, उदेपि = उदित हो। इस प्रकार पूर्व मन्त्र के साथ मिला कर अर्थ करने पर भी अध्याहार करने की अपेक्षा नहीं रहती है । चक्षसा - S इस मन्त्र का भाष्य- : इदम् सर्वम् प्रत्यजिदं सर्वमुदेपि प्रत्यकिदं सर्वमभि विपश्यसीति । - इस समस्त जगत के, प्रत्यङ् = सामने, उदेपि = उदित हो । इदम् सर्वम् इस सर्व जगत को तुम, प्रत्यङ् = अभि सामने, अभि विपश्यसि = अमिमुख हो कर देखते हो। अपिवतस्यामेव । इति निरुते द्वादशाध्यायस्य चतुर्विशः खण्डः ॥ १२-२४ ॥ अपिवा = अथवा, एतस्याम् एव इसी ऋचा में अध्याहार किये बिना वा पूर्व ऋचाओं के साथ सम्बन्ध किये विना हो मन्त्र की निराकांश प्रतिपत्ति हो सकती है। जैसे- तथा उत्तर - निरुक्त द्वादशाध्यायस्य पञ्चविंशः खण्डः । (१५५५) T अथ निरक्त द्वादशाध्यायस्य पञ्चविशः खण्डः । येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाँ अनु । वं वरुण पश्यसि ॥ ऋ. सं. १-४-6-६ ॥ तेन नो जनानमि पश्यसि । मन्त्रार्थ-पावक - हे पावक ! और, वरुण - है वरुण !, स्वम् = तुम, येन चक्षसा = जिस दिप्ति के द्वारा, जनान् = अन्य प्राणियों के, भुरण्यन्तम् = घारक पोपक हो कर, अनुपश्यसि अभिपश्यसि - उन को देखते हो, तेन - उसी दीप्ति के द्वारा, ना - हम लोगों को भी, पश्यसि - - देखते हो। . इस प्रकार 'येना पावक' इस मन्त्र के व्याख्यान में चार पक्ष दिखाये गये हैं। एक स्तुति के लिये 'तत्ते वयं स्तुमः' इतने पदोंका अध्याहार, दूसरा उत्तर ऋचाके साथ इसका सम्बन्ध, तीसर। पूर्व ऋचा के साथ इसका सम्बन्ध और चौथा अध्याहार तथा सम्बन्ध के विना निराकाक्ष बोध । यद्यापि चौथा पक्ष में भी 'वेन नः जनान् अभि पश्यसि ' इतने पदों का सम्बन्ध करना पड़ा है तयापि यह अध्याहार नहीं किन्तु नाक्षेप है। क्योंकि, मन्त्र में 'येन' पद है उसका लेन' पद के साथ नित्य सम्बन्ध है। 'यत्तदोनित्य सम्बन्ध; ' (यत् और तत् का नित्य सम्बन्ध होता है) एवं यह स्तुतिका प्रकरण है। जो प्रार्थना रुप अपने प्रति आशीर्वाद है। 'तेन न: जनान् अभि पश्यसि' (इसी दृष्टि से हमें भी देखो) भाशीर्वाद बोधक इन पदों के विना प्रार्थना असिद्ध है । अतः 'येन विना यदनुपपन्नं तत्तेनाक्षिप्यते ' अर्थात् जिस के विना जो अनुपपन्न होता है उस से उसका आटोप होता है । इस नियम के अनुसार यहां उक्त पदों का आक्षेप है । अध्याहार नहीं । अतः पूर्व तीन पक्षों की अपेक्षा यह चतुषं पक्ष श्रेष्ठ है। जहां मन्त्रार्य करने में यथोक्त प्रकारको कठिनता पड़ती हो वहाँ इसी प्रकार किसी न किसी पद का आश्रय करके मन्त्रार्य करना चाहिये, यहां इस बात को उपदेश यास मुनिने दिया है। १४ मदिन के आदित्य का नाम केशी है। इसका निर्वचन भाष्यकार स्वयं करते हैं- केशी-केशा मयस्तैस्तद्वन् भवति । काशनाद्वा प्रकाशनाद्वा । केशाः रमयः = केश नाम रश्मियों काई । - उन से, सद्वान - केशवान होने से, देशी भवति कमी होता है । अर्याद वादिरप को रश्मियों का नाम केश है । और केश वाला (राम पासा) होने से आदित्य देशी कहलाता है। या । अपवा, शाशनाव = कागन से, प्रकाश करने से, 11 केशी।
। (१५५६) निरुक्ते द्वादशाध्यायस्य पड्दिशः खण्डः । वा - अथवा, प्रकाशनाव = विशेष प्रकाश करने से, केशी = आदित्य केशी कहा जाता है अर्थात् 'काशन्ते इति केशाः रश्मयः' इस विग्रह में 'काश दीप्तौ' धातु से 'भावे' इस सूत्र से धन (अ) प्रत्यय और पृषोदरीदित्वात् आ को एत्वं होने पर केश शब्द बना है। रश्मि का नाम है। क्योकि, रश्मियाँ प्रकाश करती हैं। केशाः रश्मयः सन्ति अस्य इति केशी आदित्यः' इस विग्रह में केश शब्द से 'अत इनिठंनो' इस सूत्र से मत्वर्थीय इनि ( इ ) प्रत्यय और अलोप होने पर केशिन् शब्द बना है। आदित्य का नाम है। क्योंकि, आदित्य केश अर्थात् रश्मि वाला है। यद्यपि काशन और प्रकाशन एक ही अर्थ है तथापि 'अपना प्रकाश करना काशन और दूसरे का प्रकाश करना प्रकाशन इस प्रकार किसी प्रकार अर्थ भेद समझ लेना चाहिये । तस्यैषा भवति । इति निरुक्ते द्वादशाध्यायस्य पञ्चविंशः खण्डः ।। १२-२५ ।। तस्य उस केशी की, एषा = यह अग्निम ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्त द्वादशाध्यायस्य षड्विशः खण्डः ।। केश्यग्निं केशी विषं केशी बिभर्ति रोदसी । केशी विश्वं स्वदृशे केशीदं ज्योतिरुच्यते ॥ क्र सं. ८-७-२४-१ ।। -- इस मन्त्र का जूति ऋषि, अनुष्टुप् छन्द और केशो नामक सूर्य देवता है। मन्त्रापं-केशी रश्मि युक्त सूर्य, अग्निम् = अग्नि को, विति = धारण करते हैं। केशी = रमि युक्त सूर्य, विषम् = जल को, बिति - धारण करते हैं। केशी = रश्मियुक्त सूर्य, रोदसी धावापृथिवी (धुलोक और पृथिवी लोक ) को, विर्भात = धारण करते है। केशी = रश्मियुक्त सूर्य, विश्वम् स्वः दृशे = व्याप्त समस्त संसार को प्राणियों के दर्शन के लिये प्रकाश करते हैं। इदम् ज्योतिः फेशी उच्यते = यही सूर्य रूप ज्योति केशी कहा जाता है। + इस मन्त्र का भाष्य- - केश्यनिं च विषं च, विषमित्युदकनीम, विणातेबिपूर्वस्य स्नातेः शुद्धयर्थस्य, विपूर्वस्य वा सचतेः । घारापृथिव्यौ च धारयति । केशीदं सर्वममि विपश्यति, केशीदं ज्योविरूच्यत इत्यादित्यमाह । केशी अग्निं च विपं च द्यावापृथिव्यो च धारयति - सूर्य अग्नि जलें और पावापृथिवी भो, पारण करते हैं। केशी इदं सर्व अभिविपश्यति = सूर्य इस व्याप्त समस्त संसार को प्रकाश करते हैं । केशी इदम् ज्योतिः उच्यते = यही सूर्य रूप ज्योति केशी कहा जाता है। इति आदिश्यम् आह = इस प्रकार यह मन्ध आदित्य को फेशी कह रहा है। विषम् इति उदकनाम - विष' यह जल का नाम है। शुद्धयर्थस्य = शुद्धयर्षक, विष्णति = विपूर्वस्य स्नाते: = विपूर्वक 'एमा' पातु से, निरुक्त द्वादशाध्यायस्य सप्तविशः खण्ड।। (१५५७) . विपम् विप शब्द बता है। अर्थाद 'वि = विशेषेण स्माति अनेन इवि विषम् जलम्' इस विग्रह मे 'ष्णा शोचे' घातु से 'अन्येष्वपि दृश्यते' इस सूत्र से ड प्रत्यय (अ), वि स्ना अ, पृषोदरादित्वात् ता का लोप और पत्व होने पर विष' शब्द वना है । जल का नाम है। क्योकि, जल विशेष करके सब को शुद्ध करता है। वा = अथवा, विपूर्वस्य = विपूर्वक, सचते = पच् घातु से विष शब्द बना है । अर्थात् 'विशेषेण सच्यते स्नानपानार्थिभि. सेव्यते इति विषम् जलम् इस विग्रह मे पिच सेचने सेवने च' धातु से उक्त सूत्र से ड प्रत्यय, वि सच अ, डिवाद टिलोप, और पत्व होने पर 'विष' शब्द बना है। जल का नाम है। क्योकि, स्नान पान आदि के बर्थी लोग जल का सेवन करते हैं। केशिनः। , केश शब्द के तीन अर्थ हैं। पूर्वोक्त रश्मि, धूम (धूवा) और रजःकण । केश वाला कैशिन् कहा जाता है । रश्मि रूप केश वाला सूर्य, धूम रूप केश वाला अग्नि और रजःकण रूप वेस वाला वायु है । अतः ये तीनों देवता केशिन कहे जाते हैं । अत एव इस 'केशिनः' पद के तीन अर्थ हुए अग्नि देवता, वायु देवता और पूर्वोक्त सूर्य देवता । भाष्यकार इसी को कहते हैं- अथाप्येते इतरे ज्योतिषी केशिनी उच्यते । और, एते इतरे ज्योतिपी- ये इतर ज्योतिय, अपि - भी, केशिनी - केशी, उच्येने : कही जाती हैं। धूमेनाग्निः। धूमेन - घूम से, अगितः - अग्नि । अथ - रजसा च मध्यमः। , और, रजसा = 'रजः कण से, मध्यमः - मध्यम स्थान देवता वायु । अवि धूम स्प केश मुक्त पृथिवीपान अग्नि देवता और रज.कण रूप केया युक्त अन्तरिदास्पान वायु देवता भी केशो कहे जाते हैं। उन मे अग्नि अमूर्त होने से घूम से, वायु रूप रहित होने से मार उरे हुए रजः कण से और सूर्य जल से जाने जाते हैं। । तेपामेपा साधारणी भवति । इति निरक्त द्वादशाध्यायस्य पहिया सण्डः ।। १२-२६ ।। सैपाम् - उन सूर्य अग्नि मोर वायु को, एपा = यह अग्रिम प्रपा, सापारणी अन् तीनो देवों को एप हो गया, भवति - मप निरक्त दादाभ्यापस्प सप्तविता सामा।
(१५५८) निरुक्त द्वादशाध्यायस्य सप्तविंशः खण्डौ । त्रयः केशिन ऋतुथा वि चक्षते संवत्सरे वपत एक एषाम् । विश्वमेको अभि चष्टे शचीभिर्धाजिरेकस्य ददृशे न रूपम् ।। म. सं. २-३-२२-४४।। इस मन्त्र का दीर्घतमा ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और तीन देवता हैं-अग्नि, वायु और आदित्य । मन्त्रार्थ-प्रयः = अग्नि, सूर्य और वायु ये तीनों केशी, ऋतुथा - प्रत्येक ऋतुओ में समय समय पर, विचक्षते = अनेक प्रकार से भूमि को देखते हैं। भूमि पर अनुग्रह-दृष्टि रखते हैं। कौन कौन किस किस प्रकार से ? इसको कहते हैं-तेषाम् एकः = उनमें से एक केशी अग्नि, संवत्सरे = वर्षभर, वपते - छेदन करते हैं अर्थाद दाह के द्वारा पृथिवीस्थ केशस्थानीय ओषधिवनस्पतियों को नापित के समान छेदन करते हैं। जलाते रहते हैं। एकः = एक दूसरी केशी आदित्य, शचीभिः = अपने प्रकाश पृष्टि धादि कर्मों के द्वारा वर्षभर, विश्वम् - सारे संसार को अभिचष्टे = सर्व तरफ से अनुग्रह-दृष्टि से देखते हैं। एकस्य = एक तीसरे केशो वायु को, ध्राजिः = गति तो, ददृशे : दिखलाई पड़ती है, परन्तु, न रूपम् = रूप दिखलाई नहीं पड़ता है। उड़ते हुए रजः कण तृणादि देखने से वायु का अनुमान होता है। परन्तु नीरूप होने से उसका प्रत्यक्ष नहीं होता है। इस ऋचा में तीनो केशी की स्तुति है। अतः यह तीनों की साधारण ऋचा है। इस मन्त्र का भाष्य- . - एक: अग्निः 'त्रयः फेशिन ऋतुथा विचक्षते' काले काले अमिविपश्यन्ति 'संवत्सरे चपत एक एपाम् ' इत्यग्निः पृथिवीं दहति सर्वमेकोऽभिविपश्यति कर्माभिरादित्यो गतिरेकस्य दृश्यते न रूपं मध्यमस्य । त्रयः केशिन: - अग्नि, आदित्य और वायु वे तीनों केशी, ऋतुथा काले काले = प्रत्येक ऋतुओं में समय पर, विचक्षते - अभिविपश्यन्ति = अनेक प्रकार से भूमि को देखते हैं। एषाम् उन में से अर्थात् तीन केशियों में से एक केशी जो अग्नि है वह, संवत्सरे = वर्षभर, पृथिवीम् पृथिवी का, थपते = दहति - छेदन करता है। अर्थात दाह के द्वारा पृथिवीस्थ फेशस्थानीय औषधिवनस्पतियों को नापित (नाई) के समान छेदन करता है । दग्ध करता है। एक आदित्यः एक केशी जो मादित्य है वह, कर्मभिः अपने प्रकार वृष्टि आदि कर्मों के द्वारा, वर्ष सर्वम् = समस्त ससार को, अभिपश्यति = सर्व ओर से दयादृष्टि से, देखता है। एकस्य एक जो वीसरा केशी मध्यमदेव वायु है, उसकी, गतिः दृश्यते - गति देखी जाती है, • रूप नहीं। धृषाकपिः। वृषाकपिः = अस्त अवस्थाक आदित्य का नाम वृपापि है। भाष्यकार इस का निर्वचन भर, मध्यस्य न रूपम् करते हैं- अथ- निरुक्त द्वादशाध्यापस्याष्टाविंशः खण्डः । अथ यद्रश्मिमिरमिप्रकम्पयन्नेति तद्वृषाकपिर्मवति वृषाकम्पनः । और, यद् = जव, आदित्य रश्मिभिः - अपनी रश्मियों से, भूतो को, अमिकम्पयन् कंपाता हुआ, एति = जाता है, तद् = तव, वही आदित्य वृषाकपि = वृपाकम्पना = वृषाकपि, भवति = हो जाता है । अतः सूर्यका नाम वृषाकपि है यह सिद्ध हुआ। क्योकि, 'वृपाकपि' शन्द में वृप'का अर्थ है बरसाना और 'कपि'का अर्थ है कंपाना । आदित्य अवश्याय अर्थात् ओसों को वरसाने वाला और भूतों को कंपाने वाला है। तस्यैपा भवति । इति निरुक्त द्वादशाध्यायस्य सप्तविंशः खण्डः । १२-२७ ॥ तस्प - उस वृषाकपि आदित्यको, एपा - यह अग्रिम प्रचा, भवति - है- अप निरुक्त द्वादशाध्यायस्याष्टाविंश खण्डः । पुनरेहिं वृषाकपे सुविता कल्पयांवहै । य एप स्वप्नंशनोऽस्तमेषि पथा पुनश्विस्मादिन्द्र उत्तरः ॥ ऋ. सं. 6-४-४-२१ ।। इस मन्त्र का इन्द्र अपि, पञ्चपदा पक्ति छन्द और वृषाकपि देवता है। मन्त्रायं-आ कर चले गये अर्थात उदय हो कर अस्त को प्राप्त वृपाकपि अवस्थाक आदित्य से इन्द्र कहते हैं- पुषायपे = हे वृषाकपि रूप आदित्य ! त्वम् = तुम, पुनः एहि - फिर आओ। तुम्हारे आने पर तुम्हारे लिये हम इन्द्र और इन्द्राणी, सुविता - उत्तमोत्तम कर्म, कल्पयावहै = करते हैं। यः स्वप्ननंशनः जो उदय कालिक मादिश्य अत एव स्वप्न नाशक मादित्य है वही तुम, अस्तम् अस्तकालिक वृषाकपि हो । अत: जिस मार्ग से तुम अस्त हुए हो। एप: पया = उसी मार्ग से, - फिर आओ । उत्तमोत्तम कर्म करने से, इन्द्रः = इन्द्र (में), विश्वरमाद देयो से, उत्तरः = उत्तम हूँ। श्रेष्ठ है । = 5 पुनः एपि - अन्य सर्व इस मन्त्र का भाष्य- पुनरेहि पृषकपे सुप्रसूतानि यः कर्माणि कल्पयावह । य एए स्वमनंगनः स्वमाभाशय- त्पादित्य उदयेन सोऽस्तमेति पया पुनः सर्वस्मादिन्द्र उचरस्वमेव ब्रूम आदित्यम् । पारुपे - हे वृषाकपि मादिश्य ! तुम, पुनः एहि - फिर बायो। गत दिवस के समान मात्र फिर उदित होमो। य: तुम्हारे लिये हम, मुअमूतानि कर्माणि उत्तम से उत्तम मं, बायापहे. करते हैं। यः एषः बादियः - जो यह आदित्य, उदयेन - उदय से, स्वजनंगनः = स्वप्नान् ব্যথা - स्वप्नों को नाच करते हैं। सः । ये ही, अस्वम् एठि - मस्त को प्राप्त होते हैं। को (१५ .) निरुक्त द्वादशाध्यायस्यैकोनविंशः खण्ड। । आदित्य है वे ही वृषाकपि हैं । पुन: पथा = जिस मार्ग से कल उद्य हुए थे उसी मार्ग से आज भी उदिस होमो। सर्वस्मात् = सब से, इन्द्रः उत्तरः - इन्द्र श्रेष्ठ है। इसी लिये, तम् = उस को, आदित्यम् । आदित्य, एतद् = यह. ब्रमः = कहते हैं। १७ - यमः। अस्तमयावस्थ ( अस्तंगत ) आदित्य का नाम यम है। भाष्यकार कहते है- यमो व्याख्यातः। यमः = यम, व्याख्यातः = व्याख्यात है। अर्थात् इस की व्याख्या निरक्त अ. १० ख. १९ में कर माये हैं । वहाँ मध्यम देव का और यहां अस्तंगत आदित्य का नाम है। अर्थात् 'यच्छति रश्मिभिः संगच्छते इति यमः आदित्यः' इस विग्रह में संगमनार्थक 'ग्रम उपरमे' धातु से पचाद्यच होने पर यम शब्द बना है । अस्तमय अवस्थाक सूर्य का नाम है। क्योकि सूर्य किरणो के साथ गमन करता है। तस्यैषा भवति । इति निरुक्त द्वादशाध्यायस्याष्टाविंशः खण्डः । १२-२८ ।। तस्य = उस यम रूप मादित्य की, एपा यह अग्निम ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्त द्वादशाध्यायस्यकोनत्रिंशः खण्डः । यस्मिन्वृक्षे सुपलाशे देवैः संपिवते यमः । अत्रो नो विश्यतिः पिता पुराणाँ अनु वेनति ॥. सं. ८-७-२३-१ ।। इस मन्त्र का यम गोत्रीय कुमार ऋपि, अनुष्टुप्. छन्द और यम देवता है । मन्त्राथं यस्मिन् सुपलाशे वृक्षे = जिस निर्मल दीप्ति वाला आदित्यमण्डल रूप वृक्ष में अथवा, पलाश वृक्ष समान प्रकाश वाला मादित्यमण्डल रूप वृक्ष में, देवः - दीप्ति युत किरणों के साथ, यमः - अस्त अवस्थाफ आदित्य, संपिवते - अस्त काल मे अस्त को प्राप्त होता हुआ एकीभाव को प्राप्त होता है । अर्थात् रश्मियों के साथ एक हो कर अस्त हो जाता है। धुलोक में पहुंच जाता है। अत्र : वहाँ आदित्य रूप वृक्ष में, नः = हमारा, पिता = पालक तथा, "विश्यति = प्रजाओं का पालक आदित्य देव, पुराणान् = पुराने अर्थात् हम से पहले के गये हुए उपासकों को, अनुवेनति संप्रीणयतु = कामयतु = प्रीतिपूर्वक रक्षा करने की इच्छा करे। यह व्याख्या नैरक्त पक्ष मे समझना चाहिये । ऐतिहासिक पक्ष में- सुपलाशे = सुन्दर पत्रों से सुशोभित, यस्मिन् वृक्षे = जिस वृक्ष पर, देवः - धुलोक के देवों के साथ, यमः - यमराज, संपियते = द्युलोक में अपने घर पा कर खाते पोते हैं। नः = हमारे, विश्पत्तिा : नरपति, पिता = पिता को इच्छा है कि, अत्र = त = सी यमराज के स्थान में, के तत्र - निरुक्त द्वादशाध्यायस्यकोनत्रिंशः खण्डः । पुराणात् = पुर्वजों का में भी, अनुवेनति = साथी वनू । भाव यह है कि नरुक्त पक्ष में यम का अपं आदित्य और ऐतिहासिक पक्ष मे यमराज है। इस मन्त्र का भाष्य-- D यस्मिन्वृक्षे सुपलाशे स्थाने वृतक्षये वापि वोपमार्थे सात् वृक्ष इव सुपलाश इति । वृक्षो वृश्वना । पलाशं पलाशनात् । देवैः सङ्गच्छते यमो रश्मिभिरादित्यस्तानः सर्वस्य पाता वा पालयिता वा पुराणाननु कामयेत । यस्मिन् सुपलाशे वृक्षे जिस सुन्दर पत्र वाला वृक्ष मे, वा = अथवा, वृतक्षये स्थाने पुण्यकृत् पुरुषों के निवास स्थान मे, अपिवा = अथवा, उपमा स्यात् - उपमा प्रषं में हो सकता है, जैसे-वृक्ष इव सुपलाशे इति = सुन्दर पत्र वाला वृक्ष के समान अपने सुख निवास में । वृश्चनाई अपनी गति से प्राणियों की आयु को छेदन (क्षीण) करने से, वृक्षः आदित्य वृक्ष कहा जाता है। अर्थात् 'वश्वति इति वृक्ष 'इस विग्रह मे 'ओव्रन्चू छेदने' धातु से 'स्नुवश्चिकृत्युषिभ्यः कित्' इस उणादि सूत्र से सक् (स) प्रत्यय, यश्च स, 'वचिस्वपियजादीनाकिति ' इस सूत्र से संप्रसारण पूर्वरूप, च् स, पृषोदरादित्वात् व चस्, शकार लोप, वच् स् 'प्रश्वभ्रस्ज' इत्यादि सूत्र से पत्व, वृप स, 'पढोः कः सि' इस सूत्र से पकार को ककार, 'आदेशप्रत्यययोः' इस सूत्र से पत्व, कप सयोगे क्षः होने पर वृक्ष शब्द बना है। आदित्य का नाम है। क्योकि, आदित्य अपनी गति से सब प्राणियो की आयु को काटता है। क्षीण करता है। पलाशनाद - पलायन से = खाये जाने से, पलाशम् = पलाश (पता) कहा जाता है । अर्थात् 'परा अश्यते पश्वादिभिः खाद्यते इति पलाशम् पर्णम्' इस विग्रह में परा पूर्वक 'अश भोजने' धातु से 'अकर्तरि च कारके संज्ञायाम् ' इस सूत्र से कर्म में घर (म) प्रत्यय परा अश् अ, उपधा वृद्धि, पर नाश् अ, सवर्ण दोघं, पराश, पृषोदरादित्वाद रेफ को लकार होने पर पलादा शब्द बना है। पता का नाम है। क्योकि, वह पशु आदि प्राणियों के द्वारा साया 'जोता है। यमः भादित्यः सूर्य, देवः रश्मिभिः = अपनी रश्मियो के साथ, सछते - मिल जाता है। तत्र यहा, नः सर्वस्य = हम सब का, पाता वा - पालन करने वाला, वा - अपवा, पालयिता = सर्व प्रजामो का रक्षक आदित्य * पुराणाद अनु - पुराने उपासको के बाद, कामयेत हमारी रक्षा करने को कामना करे । १८ - अज एकपात् । अस्त अवस्था को प्राप्त आदित्य का नाम 'मज एकपाद' है । 'मज एपाद' यह समस्त एकपद नहीं किन्तु दो पद पृषक है-अज और एकपा । 'अति गच्हति इति अजः आदिर:' इस विग्रह मै 'अजगतिपणयोः' पातु से पचायच्, अज् अ, 'बर्यपषोः' इस मूत्र से प्राप्त 'वो' आदेश का बाहुलात अभाव होने पर मज द बना है। आदिरया नाम है । बोंकि, मादिरय अन्तरिया में गमन करता है। 'एवेन पादेन पाति रसति इति एक्पाद' हम विग्रह में एक शाद और पार शम्म उपपद "पा राणे" पातु मे किए प इस सूत्रो for प्रत्यय, सपिहारी लोप, एक पाद पा, पृषोदरादित्वाव 'एक पाद पा इतने में स्पान में एसाद आदेश, 'मस्पामुपूर्वस्य' इस मूत्र से यहीहि समास न होने पर भी छान्दसरवाद %D - - - ब्रह्म का एक पाद आदित्य 3 (१५६२) निरुक्त द्वादशाध्यायस्यैकोनविंशः खण्डः । पाद के प्रकार का लोप होने पर 'एकपाद' शब्द बना है। आदित्य का नाम है। क्योंकि, आदित्य एक ही पाद से ज्योति रूप अंश विशेष से प्रविष्ट होकर सम्पूर्ण जगद की रक्षा करता है । 'अजश्वासो एकपाच इति अजएकपात्' इस विग्रह मे अज शब्द का और एकपात शब्द का कर्मधारय समास होने पर अजएकपात्' शब्द बना है। गमन करने वाला जो ज्योति रूप एक पाद से सर्वत्रविष्ट हो कर सब की रक्षा करने वाला आदित्य वह अजएकपाद कहा जाता है । इसी अर्थ को कहते हैं- अजएकपाद् अजन एका पादः। अजः = अजनः = गमन करने वाला, एकपात् - एकः पादः = कहा जाता है। आदिश्य ब्रह्म का एक पाद है इस को 'अग्निः पादो, वायुः पादः, आदित्यः पादो, विशः पादः" इत्यादि श्रुतियां कहती है । एकेन पादेन पातीति वा । वा = अथवा, एकेन पादेन अंश रूप एक पाद के द्वारा, पाति = सम्पूर्ण जगत की रक्षा करता है, और अजन - चलने वाला है इति इस लिये आदित्य अज एकपाद् कहा जाता है । एकेन पादेन पिबतीति वा। वा = अथवा, एकेन पादेन एक पाद से: ज्योति रूप एक अंश से सर्व रसों को पिबति पीता है : किरणों के द्वारा खींच लेता है और अजन = चलने वाला है, इति अज एकपात् आदित्य कहा जाता है । अर्थात् 'एकेन पादेन पिवति इति एकपाद्. इस विग्रह में एक शब्द उपपद :'पा पाने' धातु से 'किप च' इस सूत्र से कतरि किप्, 'सर्वापहारी लोप, "हस्वस्य पिति कृति तुक्" इस सूत्र से बाहुलकात् तुक् आगम होने से एकपत्' शब्द बना है । आदित्य का नाम है । क्योकि, वह एक अंश से सर्व रसों का पान करता है। रश्मि द्वारा सब रसों को खीच लेता है एकोऽस्य पाद इति वा। अस्य = इस आदित्य के, एकः पादः = एक पाद है और अजनः = चलने वाला है, इति इस लिये आदित्य अजएकपाद् कहा जाता है। एकः पादो यस्य सः एकपात्' इस विग्रह में एक पशब्द और पाद शब्द का बहुव्रीहि समास और आपत्वात् पाद के दकार के प्रकार का लोप होने पर एकपात् शब्द बना है। आदित्यरूप ब्रह्म जीव रूप एक पाद से सम्पूर्ण जगत में प्रविष्ट है । उक्तार्य में निगम प्रमाण देते हैं- "एक पादं नोखिदति" इत्यपि निगमो भवति । आदित्य, एकम् पादम् = एक पाद को, न उरिखदति = उठाता नहीं है। अर्थात् आदित्य का ब्रह्म जीव रूप एक पाद से जो समस्त संसार में प्रविष्ट है उस को उखाड़ता नहीं है। इति अपि- 'यह भी, निगमः वेद मन्त्र उक्तार्य में प्रमाण, भवति - है। - = इस लिये भी D %3D निरुक्त द्वादशाध्यायस्य त्रिशः खण्डः । सम्पूर्ण मन्त्र- एकं पादं नोत्विदति सलिलाद्धंस उच्चरन् । यदङ्ग स तमुरिखदेन्नैवाद्य न श्वः स्यान्न रात्री नाहःस्यान्न व्युच्छेत् कदाचन ।। अथवं सं. ११-४-२१ ॥ मन्त्रायं-हंसः = गतिशील आदित्य, सलिलाव - अन्तरिक्ष जल से उधर - उदय होता हुआ, एक पादम् = एक पाद को, न उत्खिदति = नही उठाता है । अङ्ग है अङ्ग है प्रिय !, यद् = यदि, स. - वह, तम् = उस एक पैर को, उरिखदेव = उठा ले, तो, न एक अद्यम श्वः स्यात् न आज हो न कल हो। न रात्रि न महः स्यात = न रानि हो न दिन ही हो। न व्युच्छेत् कादाचन = और न कभी उपा हो। इस से यह सिद्ध हुमा कि, आदित्य एक पैर से सम्पूर्ण जगत् में प्रविष्ट है। तस्यैप निपातो भवति पैचदेव्यामृचि । इति निरत द्वादशाध्यापस्यकोनविंशः खण्डः । १२-२९ ।। तस्य = उस अजएकपात् का, एषः = यह, वैश्वदेव्याम् ऋचि - विश्वदेवों को ऋचा में, निपातः = निक्षेप, भवति = है- अथ निरुक्त द्वादपाध्यायस्प त्रिशः खण्डः ।। पावीरवी तन्यतुरेकपादजो दिवो धर्ता सिन्धुरापः समुद्रियः । विश्वे देवासःशृणवन् वा सिमे सरस्वती सह धीभिः पुरन्ध्या ।। क. ८-२-११-१३ ॥ इस मन्त्र का वमुकपुत्र पसुकर्ण ऋपि, जगती छन्द और विश्वदेव देवता है। मन्त्रा- पावीरपी सन्यतुः = आयुषयाली स्तनयित्री माध्यमिको मपुरा पाक्, दिवः पर्ता अगएकपात् - पुलोक का पारक मस्त अवस्थाक के आदित्य, सिन्धुः समुद्रिय; आपः = firg आकाशीय जल, विश्वेदेवासः विश्वदेव और, पुररुध्या सरस्वती : अनेक कर्मों सपा गानों से युक्त सरस्वती देवी, मे यथासि आगवन् = मेरे वचन (स्तुति) यो सुनें। इस विश्वदेवों को अषा में पजएकपात का निपात है। पाये अमेला स्वतन्त्रदेयता न हो किन्तु भन्म देवों के बीच में पाठ हो रग पाठको निपात (प्रोप) कहते है।
(१५६४) निरुक्त द्वादशाध्यायस्य निशः खण्डा । - जो पवि, - कायम् - शरीर - इस सूत्र से पविः शल्यो भवति, यद्विपुनाति कायं, तद्वत्पवीरमायुधं, तद्वानिन्द्रः पवीरपान । पविः = पवि, शल्यः = शल्य, भवति, - होता है। जिसे लोक भाषामें फल कहते है अर्थात् जो लोहे का बना हुआ घारवाला बाण के अन में लगा हुआ होता है वह शल्य कहा जाता है। उसीका पर्याय पवि शब्द है । जिसको वज्र भी कहते हैं । यत् को, विपुनाति - विदारण कर देता है। शरीर में जिस जगह लगता है वहां फाड़ देता है। तत् वत् = उस पवि वाला जो, आयुधम् = आयुध (शस्त्र विशेष ) वह, पवीरम् = पवीर कहा जाता है। तद्वान् = उस पवीर नामक आयुध वाला, इन्द्रः = इन्द्रः, पवीरवान् = पवीरवान् कहा जाता है । अर्थात् 'विपुनाति कायम् विदारयति इति पविः' इस विग्रह में घातूनामनेकार्थवाद विदारणार्थक 'पून पवने' धातु से 'अच इ:' इस उणादि सूत्र से इ प्रत्यय गुण पो इ अवादेश होने पर पवि शब्द बना है। शल्य का नाम है। क्योंकि वह शरीर को फाड़ देता है। पविः अस्यास्मिन्नस्तीति पवीरम्' इस विग्रह में पवि शब्द से मत्वर्थीय र प्रत्यय और छान्दसत्वात् दीर्घ होने पर 'पवीर' शब्द बना है। पवि शल्य वाला आयुध विशेष का नाम है। और 'पवीरम अस्यास्मिन् अस्तीति पवीरवान्'. इस विग्रह में पवीर शब्द से भी 'तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप' इस सूत्र से मतुप् ( मत् ) प्रत्यय, पवीरमत्, “ मादुपधायाश्च मतोर्वोऽयवादिभ्यः मतुप् के मकार को वकार होने पर पवीरवत् शब्द वना है। 'पवीरवान' यह प्रथमा एकवचन का रूप है। इन्द्र का नाम है। क्योंकि वह पवार नामक आयुध वाला है। इस अर्थ में प्रमाण देते हैं- अतितस्थौ पवीरवान् " इत्यपि निगमो भवति । पवीरवान् पवीर नामक आयुध वाला इन्द्र शत्रुओं को दबा कर, अतितस्थौ - खड़ा हुआ है। इति अपि यह भी, निगमः = मन्त्र उक्तार्थ में प्रमाण, भवति है। सम्पूर्ण मन्त्र- यो जनान् महिपाँ इवातितस्यौ पवीरवान् । उतापवीरवान् युधा ॥ ऋ. स. ४-१-२४-३ ॥ इस मन्त्र का विप्रबन्धु ऋषि, गायत्री छन्द और इन्द्र देवता है । मन्त्रा-यः पवीरवान् उत अपवीरवान आयुध वाला हो वा आयुध वाला न हो, सिंहः महिषान् इव = सिंह भैसों के समान अर्थात् जैसे सिंह भैसो को मार गिराता है वैसे ही, जनान् = अपने विरोधो मात्र जनों को, युघा = युघ करके मार गिरता है। और मार कर, अतितस्थी = पड़ा रहता है । इस में पवीरवान् का अर्थ आयुधारी इन्द्र है। तद्देवता वाक् पावीरवी । पावीरवी च दिव्या वाक् । तन्यस्तुस्तनित्री वाचोऽन्यस्याः । अजधैकपादिवोधारयिता च सिन्धुश्चापश्च समुद्रियाच सर्वे च देवा: सरसती च सह पुरन्ध्या स्तुत्या प्रयुक्तानि धीभिः कर्ममिर्युक्तानि शृण्वन्तु वचनानीमानीति ।। D वह इन्द्र, D - नियक्त द्वादपाध्यायर करिशः खण्डः । तदेवता इन्द्रदेवताक, वाक् = माध्यमिका वाणी, पावीरवी = पावीरवी - आयुधवाली कहलाती है। अर्थात् 'पवीरवान देवता अस्य इति पावीरवी' इस विग्रह में पवीरवद शब्द से 'साऽस्प देवता' इस सूत्र से अण् (अ) प्रत्यय, पवीरवत् अ, 'सद्धितेप्वचामादेः' इस सूत्र से आदि अच वृद्धि, पावोरपत् अ, छान्दसत्वात् टि लोप, पावीरव् अ, पावोरव 'टिड्ढाणा ।।।' इत्यादि सूत्र से ही ( ई ) प्रत्यय, अलोप होने पर 'पावीरवी' शब्द बना है। माध्यमिका वाक् का नाम है । क्योंकि, उसका देवता पवीरवान् इन्द्र है। इसी को स्पष्ट करते हैं-दिव्या = द्युलोक की, वाक = वाणी, पावीरवी व = पावीरवी कहलाती है। अन्यस्याः वाचा = अन्य मनुष्य आदि प्राणी की वाणी को, तन्यतुः - तनिधी = विस्तार करनेवाली है। दिव: धारयिता अजश्चपात् - धुलोक का धारण करने वाला आदित्य, सिन्धुश्च - सिन्धु नद, मापश्च - जल, समुद्रियाश्च = समुद्र के जल, और, सर्वेदेवाः - सब देवता, च = एवं, सरस्वती = सरस्वती देवी, पुरन्ध्या - स्तुत्या - स्तुति से, प्रयुक्तानि - प्रेरित, धीभिः = कर्मभिः सह - कर्म के साथ, युक्तानि = युक्त, दमानि वचनानि = हमारे इन वचनो को, शृण्वन्तु सुनें। १९ - पृथिवी। धुलोक का नाम पृथिवी है। भाष्यकार कहते हैं- पृथिवी- व्याख्याता। पृथिवी - पृथिवी, व्याख्याता = व्याख्यात है । अर्थात् इस की व्याख्या निरुक्त अ. ११ खं ३७ पद २६में की गई है। वहां माध्यमिका देवता और यहां द्युलोक अर्थ है। इतना ही भेद है । अर्थात् 'प्रथते इति पृथिवी ? इस विग्रह में 'प्रथप्रख्याने' धातु से 'प्रथेः पिवन संप्रसारणं ध' इस उणादि से पिवन (इव) प्रत्यय, सप्रसारण, पृथ् इव, पृथिव, “पिद्दौरादिभ्यश्च' इस सूत्र से डीप (ई), अलोप होने पर पृथिवी शब्द बना है। धुलोक का नाम है। क्योंकि वह प्रख्यान किया हुआ होता है। तस्सा एप निपातो भवत्पैन्द्रामधामचि । इति निरक्त द्वादशाध्यायस्य विनः खण्डः ॥ १२-३०॥ तस्याः - उस पृथिवीका, .एषः = पह, ऐन्द्राग्नयाम् अचि - इन्द्राग्नी देवताक ऋचा में, निपातः = प्रक्षेप, भवति = है~. अप निरुक्ते द्वादशाध्यायस्यकत्रिशा खण्डः । यदिन्द्राग्नी परमस्यां पृथिव्यां मध्यमस्यांमवयस्यांमुत स्यः । अतः परि' धृपणावा हि यातमथा सामस्य पिवतं सुतस्य ॥ . सं.१-७-२७-१०।।
. निरुक्त द्वादशाध्यायस्या द्वानिया खण्डः । इस म. का कुत्स ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और इन्द्राग्नी देवता है। मन्त्रार्थ-इन्द्राग्नी = हे इन्द्र ! और हे अग्नि !, एवं, वृपणावा = हे अभीष्ट वरसाने वाले इन्द्राग्नी !, तुम लोग, यत् : यदि, परमस्याम् पृथिव्याम् - धुलोक रूप उच्च पृथिवी पर, मध्यमस्याम् पृथिव्याम् = अन्तरिक्ष रूप मध्य पृथिवी पर, उत : और, अवस्याम् पृथिव्याम् = भूलोक रूप पृथिवी पर, स्थः = अवस्थान करते हो - रहते हो, तो, अतः परि - उसके बाद उन सब स्थानों से, यातम् आओ। अथ %D और आकर, सुतस्य सोमस्य अभिषुत सोम को, पिवतम् - पोयो। सोम का पान करो। इस इन्द्राग्नी देवताक ऋचा में पृथिवीका निपात है। इति सा निगदव्याख्याता । यह उक्त प्रचा, निगदव्याख्याता = पाठमात्र से व्याख्यात है। सुगम है। अत: व्याख्या करने की आवश्यता नहीं। - S इति सा- - समुद्रा। उत्तमस्थान आदित्य का नाम समुद्र है । यास्क कहते है- समुद्रो व्याख्यातः । समुद्रः = समुद्र, व्याख्यातः = व्याख्यात है। अर्थात् इस की व्याख्या नि. अ. २ खं. २० में पांच प्रकार से की गई है। वही व्याख्या यहा भी समझना चाहिये । वहाँ सागर और अन्तरिक्ष दो अर्थ हैं और यहाँ मादिश्य । इतना ही भेद है। तस्यैप निपातो भवति पावमान्यामृचिः । इति निरुक्ते द्वादशाध्यायस्यकत्रिंशः खण्डः ॥ १२-३१ ।। तस्य = उस समुद्र का, एषः - यह, पावमान्याम् ऋचि - पवमान देवताफ ऋचा में, निपातः भवति = निपात है। पवमान देवताक ऋवा में समुद्र का भी पाठ है- अथ निरक्त द्वादशाध्यायस्य द्वात्रिंशः खण्डः । पवित्रवन्तः परि वार्चमासते पितपा प्रत्नो अभि रक्षति व्रतम् । महः समुद्रं वरुणस्तिरो दधे धीरा इच्छेकुर्धरुणेवारभम् ॥ ऋ. सं. ७-२-२९-३॥ F इस मन्त्र का पवित्र ऋषि, जगती छन्द और पवमान सोम देवता है। मन्त्रार्थ पवित्रवन्तः रश्मियों पाले मध्यम लोक के देवगण, वाचम् - मध्यम लोक की वाणी को, परि - चारो मोर से घेर पर, आसते = स्थित है। प्रश्न: - पुराना, पिता = पिता, वरुणः - मध्यम देव वरुण, एपाम: इनवा. व्रतम् - अधिकार युक्त कर्म की, अभिरक्षति - रक्षा करता है। महः - महान, वरुणः .
द्वादशाध्यायस्य प्रक्षिशा खण्डा । (१५६७) वरुण देव, समुद्रम् = आदित्य को मेघजाल से, तिरोदघे - आवृत कर देता है अर्थात् डाक देता है। तभी, धीराः = बुद्धिमान् लोग, घरुणेषु = जलो में कृषि कर्म वा यज्ञादि वैदिक कर्म को, आरभम् शेकुः = आरम्भ कर सकते हैं। इस पवमान सोम देवताक मन्त्र मे समुद्र का निपात (प्रक्षेप) है। जिसका अर्थ आदित्य है। इस मन्त्रका भाष्य- उसके पश्चाद, 3- पवित्रवन्तो रमिवन्तो माध्यमिका देवगणाः पर्यासन्ते माध्यमिका वाचम् । मध्यमः पितैषां प्रत्नः पुराणोऽभिरक्षति · व्रतं कर्म, महः समुद्रं वरुणस्तिरोतर्दधात्यथ धीराः शक्नुवन्ति धरुणेपूदकेषु कर्मण आरममारन्धुम् । पवित्रवन्तः रश्मिवन्त: माध्यमिकाः देवगणा. = रश्मिवाले मध्यम लोक के देवगण, माध्यमिकाम् वचम् - मध्यम लोक की वाणी को, पर्यासन्ते - सर्व तरफ से घेर कर स्थित हैं । प्रत्न: - पुराणः - पुराना, पिता पिता, मध्यमः = मध्यमदेव वरुण, एपाम् - इनका, प्रतम् कर्म - मधिकार युक्त कर्म की, अभिरक्षति = रक्षा करता है। मह' = महान, वरुणः = वरुणदेव, समुद्रम् = आदित्य को मेघ जाल से, तिर.. - अन्तर दधाति । ढाक देता है। मथ - घोरा. = बुद्धिमान् लोग, धरणेषु उदकेषु = जलो मे, कर्मणः = कर्म को, आरभम् = मारधुम् शक्नुवन्ति भारम्भ कर सकते हैं। अजएकपाद् व्याख्यातः । पृथिवी व्याख्याता । समुद्रो व्याख्यातः। तेपामेप निपातो भवत्यपरस्यां पहुदेवतायाभूचि । इति निरुक्ते द्वादशाध्यायस्य द्वात्रिंश. खण्डः । १२-३२ ।। भजएकपाद व्याख्यात = अजएकपाद् को व्याख्या हो चुकी है । पृथि व्याख्याता - पृथिवी को व्याख्या भी हो चुकी है। समुद्रः व्याख्यात समुद्र की व्याख्या भी हो चुकी है। तेषाम् उनका, एप. - यह, अपरस्याम् पहुदेवतायाम् ऋचि = दूसरी बहुदेवताक ऋचा मे, निपातः भवति - निपात है- अथ निरुक्त द्वादशाध्यायस्य त्रयस्त्रिशः खण्डः।। उत नोऽहिर्बुध्न्यः शृणोत्वज एकपात्पृथिवी संमुद्रः । विश्वे देवा ऋतावृधौ हुवानाः स्तुता मन्त्राः कविशस्ता अवन्तु ॥ ऋस ४-४-१०-१४ ॥ इस मन्त्र का ऋजिवा अपि, त्रिष्टुप् छन्द और नाना देवता है। माना--नव = मोर भो, अहिर्बुध्नमः = अहिर्बुघ्नप नामक देव, न.. हमारी स्तुति को, गुणोतु - सुनें । अभएकपाद - अजएकपाद, पृथिवी, समुद्र के समुद्र और, विश्वेदेवा - अन्य सब देव, ऋतावृधा = सत्य वा 4 में (१५६८) निरुक्त द्वादशाध्यायस्य प्रयस्त्रिंशः खाहः । बढाते हैं । मन्त्रा. हुवानाः = यजुर्मत्रों से आहूत, मन्त्राः स्तुता: = साम मन्त्रों से स्तुत, कविशस्ता : क्रान्तदर्शी एवं मेधावी पुरुषों से शन नामक मन्त्रों के द्वारा स्तुति किये गये देवगण, नः = हमारी, अवन्तु = रक्षा करें। इस बहुदेवताक ऋचा में यथोक्त अजएकपात् पृथिवी और समुद्र इन तीनों का निपात है। इस मन्त्र का भाष्य- : अपि च नोऽहिर्बुनयः शृणोत्वजश्चैकपात्पृथिवी च समुद्रश्च, सर्वे च देवाः सत्य वृधो वा यज्ञ वृधो वा हूयमाना मन्त्रैः स्तुता मन्त्राः, कविशस्ता अवन्तु मेधाविशस्ताः ॥ अपिच और भो, अहिर्बुध्न्यः = अहिर्बुध्न्य नामक देव, नः = हमारी स्तुति को, शृणोतु सुनें। च = और, अजः एकपात् = अजएकपात् देव, पृथिवी = पृथिवी, समुद्र = समुद्र सर्वच देवाः- और अन्य सब देव, सत्यवृधः वा यज्ञधः वा • सत्य वा - यज्ञ के बढाने वाले हैं। मन्त्रः हूयमानाः = यजुर्मन्त्रों से आहूत और, मन्त्राःस्तुता - साम मन्त्रों से स्तुत, कविशस्ताः - मेघाविशस्ताः मेधावो पुरुषों से शक नामक मन्त्रों के द्वारा स्तुति किये गये देवगण, नः अवन्तु : हमारी रक्षा करें। भाष्यकार इध्यड्। घुस्थान के प्रकरण में पाठ होने के कारण दध्या द्युस्थान आदित्यका नाम है इस का निर्वचन करते हैं- दध्य--प्रत्यक्तोध्यानमितिवा, प्रत्यक्तमस्मिन्ध्यानमिति वा । ध्यानम् = ध्यान के प्रति, प्रत्यक्तः = गया हुआ होता है, इति वा = इस कारण से अथवा ध्यानम् = ध्यान, अस्मिन् = इस में, प्रत्यक्तम् = गया हुआ होता है, इति वा = इस कारण से, दध्यङ् = आदित्य दध्यड् कहा जाता है। 'ध्यानं ज्ञान अञ्चति इति दध्यङ आदित्यः' इस विग्रह में यान शब्द उपपद ‘अञ्चु गतिपूजनयोः' पातु से 'ऋविग्दधृकाग्' इत्यादि सूत्र से, कर्तरि किन्, सर्वापहारी लोप, ध्यान अञ्च्, पृषोदरादित्वात् ध्यानका दधिभाव, दघि अञ्च्, इको याच इस सूत्र से यण, दध्यञ्च्, 'नाञ्चेः पूजायाम्' इस सूत्र से नलोप निपेघे संयोगान्त लोप, दध्यन 'विवन् प्रत्ययस्य कुः' इस सूत्र से कुत्वेन डकार होने पर 'दध्या' शब्द बना है । मादित्यका नाम है। क्योंकि, आदित्य प्राणिमात्र के कृरयाकृत्य का प्रकाशन करता है। अपवा 'ध्यानं प्रत्यक्तम् अस्मिन् इति दयह आदिस्य इस विग्रह में पूर्ववत् ध्यान शब्द उपपद मञ्चु धातु से पिवन, दधिभाव यण संयोगान्त लोप और कुत्व होने पर दध्य शब्द बना है। आदित्यका ही नाम है। क्योकि, आदित्य में लोकपाल होने से सर्वविषयक ज्ञान होता है। उक्त निरुक्त व क्य में ध्या का अर्थ ज्ञान ही है। दध्यङ्, अथर्वा और मनु इन तीनों का एक ही 'यामय' इत्यादि अग्रिम मन्त्र है। अथर्वा । अथर्वा आदित्य का नाम है। इस का निर्वाचन नि. अ. ११ खं. १८ पद १३ में हो चुका है। 'पर्वति इति था, न थर्वा इति अथर्वा' इस विग्रह में गत्यर्षक रक्त थवं धातु से . . - .
मनुः । निरुक्त द्वादशाध्यायस्य चतुर्विंशः खण्डा । (१५६९) 'कनिन् युवृषितक्षिराजि' इत्यादि उणादि सूत्र से कनिन् (अन्) प्रत्यय होने पर थर्वन् शन्द बना है। ना और थर्वन् का नत्र समास होने पर अथर्वन् शब्द बना है। आदित्य का नाम है। आदित्य अधिकारी देव है। यह अपने अधिकार से कभी भी धर्व - च्युत नहीं होता है। अतः अथर्वा कहा जाता है। भाष्यकार कहते हैं- अथर्वा व्याख्याता । अथर्वा = अथर्वन् शब्द, व्याख्यातः = व्याख्यात है। अर्थात् इस को व्याख्या नि. म. ११ खं. १८ में हो चुकी है। वही मध्यमदेव अर्थ है और यहां आदित्य । इतना ही अन्तर है। २३ आदित्य का नाम मनु है । भाष्यकार निर्वचन करते हैं- मनुमननात् । मननात् = मनन करने से = सब को जानने से आदित्य मनुः मनु कहा जाता है। अर्थाद 'मन्यते इति मनुः आदित्यः' इस विग्रह में 'मन ज्ञाने' धातु से ' शृस्वस्निहि त्रप्यासिसिहनिक्लिदि- बन्धिमनिम्यश्च' इस उणादि सूत्र से उ प्रत्यय होने पर 'मनु' शब्द बना है । आदित्य का नाम है। क्योंकि, वह सब को जानता है - प्रकाश करता है। तेपामेष निपातो भवत्यैन्द्रथामृचि । इति निरुक्त द्वादशाध्यायस्य त्रयधिश: खण्: । १२-३३ ।। तेषाम् - उन दध्यङ्ग अथर्वा और मनु का, एषः = यह, ऐन्द्रयाम् अचि = इन्द्र को ऋचा में, निपात. = निपात रूप से पाठ, भवति - है-- अथ निरुक्त द्वादशाध्यायस्य चतुर्विंशः खण्डः ।। यामथर्वा मनुष्पिता ध्यङ् धियमलत। तस्मिन्ब्रह्माणि पूर्वथेन्द्रउक्था समग्मतार्चन्ननु स्वराज्यम् ॥ क्र. सं. १-५-३१-१६ ॥ इस मन्त्र का गौतम ऋषि, पञ्चपदा पंक्ति छन्द और इन्द्र देवता है। मन्त्रार्ष-अप अथर्वारूप आदित्य पिता मनुष्यों का पिता, मनुः मनुरूप आदित्य और, दध्य दध्यम जिस, घियम् = कर्म को, अन्नत = करते हैं, तस्मिन् = उसके होने पर, इन्द्रे : इन्द्रदेव में, पूर्वपा = पूर्व के वसिष्ठादि ऋपियों के समान, ब्रह्माणि - अन्न योर, उत्था - उपय नामक मन्त्रात्मक पान, समग्मत = प्राप्त हों। जिस से परमेश्वर का, अचंन - पूजन करते हुए, - आदित्य, याम् - (१५७०) निरुक्त द्वादशाध्यायस्य पश्चविंशः खण्डा। स्वराज्यम् = अपने राज्य का, अनु = अनुष्ठान करे । शास्त्र की मर्यादा के अनुसार वर्तन करें। इस प्रकार इस इन्द्रदेवताक ऋचा मे दध्य, अथर्वा और मनु का निपात है । इस मन्त्रका भाष्य- - - अथ - धुस्थान के, यामथर्वा च मनुश्च पिता मानवानां दध्यङ् च धियमनिपत । तस्मिन्ब्रह्माणि कर्माणि पूर्वेन्द्र उक्थानि च सङ्गच्छन्तामर्चन्योनूपास्ते खराज्यम् । इति निरुक्त द्वादशाध्यायस्य चतुर्विंशः खण्डः ।। १२-३४ ।। अथर्वा च = अथर्वा मानवानाम् पिता मनुश्च = मनुष्यों का पिता मनु और, दध्यङ् च - दश्यह, याम् धियम् = जिस कर्म को, अनिषत करते हैं, तस्मिन् = उसके होने पर, ब्रह्माणि कर्माणि = वेदोक्त कर्म, च = और उक्थानि = उक्थ शत्र, पूर्वेन्द्र पूर्व इन्द्र के समान, सङ्गच्छन्ताम् = प्राप्त हों। जिस से परमात्मा का, अर्चन - अर्चन करते हुए, यः = जो इन्द्र, स्वराज्यम् अपने राज्य का, अनूपास्ते अनुष्ठान करे। अथ निरुक्ते द्वादशाध्यायस्य पश्चत्रिशः खण्ड ।। अथातो गुस्थाना देवगणाः । द्युस्थान देवताओं के निर्वचन के अनन्तर, अतः = यहाँ से, धुस्थानाः देवगणाः = देवसमूहों का निर्वचन किया जाता है । अर्थात् आरम्भ से लेकर यहां तक एक एक देवता का निर्वचन किया गया। इसी लिये वे सब एकावचनान्त थे। अब यहा मे जितने पद आने वाले हैं वे सब देवगण ( समूह ) वाचक आयेगे। अत एवं सब बहुवचनान्त आवेंगे। जैसे 'आदित्याः' यह पद बहुवचनान्त बायगा। वह एक आदित्य वाचक नहीं किन्तु मित्रादि आदिस्य का एक गण उसका वाचक मायगा। वैसे ही अन्य पदों को भी समझना चाहिये । तेपामादित्याः प्रथमागामिनो भवन्ति । तेषाम् - उन में, आदित्याः = आदित्य देवगण, प्रथमागामिनः भवन्ति = हैं। २४ - आदित्याः। आदित्य गण अर्थात् आदित्य समूह का नाम आदित्य है। भाष्यकार कहते हैं- आदित्या व्याख्याताः। आदित्याः = मादित्य, व्याख्याताः = व्याख्यात है । अर्थात् इसकी व्याख्या नि. अ. २ प. १३ में नीचे कर आये हैं । अर्थात् 'मादत्ते रसान् इति आदित्यः' इस विग्रह मे आइ पूर्वक 'हृदा दाने' पातु से उणादि अथवा नरुक्त डित्य (इत्य) प्रत्यय और हित्त्वात् टिलोप होने पर आदित्य शम्द बना है । सूर्यका नाम है । इस के अतिरिक्त और भी निर्वचन वहां किये हैं। वहीं देखना चाहिये । . - प्रथम आने वाले, नियत द्वादशाध्यायस्य पत्रिंशा खण्डा । (१५७१) तेषामेषा भवति । इति निरुक्त द्वादशाध्यायस्य पञ्चविंशः खण्डः ॥ १२-३५ ।। तेषाम् - उन आदिस्यों को, एषा • यह अप्रिम ऋचा, भवति - है- अप निरुक्त द्वादशाध्यायस्य पत्रिंशः खण्डः । इमा गिर आदित्येभ्यो घृतस्न सनाद्राजभ्यो जुह्वां जुहोमि । शृणोतुं मित्रो अर्यमा भगो' नस्तुविजातो वरुणो दक्षो अंशः ॥ ऋ. सं. २-६-६-१॥ इस मन्त्र का गृत्समद पुत्र कूर्म अपि, त्रिष्टुप् छन्द और आदित्य देवता है। मानार्थ- होता कहता है कि, मैं, राजभ्यः = बहुशोभमान, आदित्येभ्यः । आदित्य देवगण के लिये, घृतस्नू घृत को झरने वाली, इमाः गिरः = ये जो मन्त्र रूप पाणिये हैं उन से, सनात - बहुत काल तक, नह्वा = जुहु नामक पात्र से, जुहोमि - होम करता हूं। नः = हमारी स्तुति रूप वाणियो को, मित्रः = मित्र देव, अयंमा - अर्यमा देव, मगः - भगदेव, वरुणः - वरुण देव, दक्षः = दक्षदैव तुविजातः बहुरुपसे उत्पन्न विजात देव और, अंश: - अंशदेव, शृणोतु - सुर्ने। इस ऋचा में 'आदित्येभ्यः' यह बहृवचनान्त है। बता इसका अर्थ एक आदित्य नहीं किन्तु आदित्यगण है । जो मन्त्रोक्त मित्रादि हैं । मित्रादि सब अदिति के पुत्र होने से आदित्य कहे जाते हैं। इस मन्त्र का भाध्य- घृतस्नघृतप्रस्नाविन्यो घृतप्रस्नविण्यो धृतसानिन्यो घृतसारिण्य इति वा, आहुती रादित्येम्पश्चिरं जुहा जुहोमि, चिरं जीवनाय राजम्य इति वा, शृणोतु न इमा गिरो मित्रधार्यमाच भगथ बहुजातश्च धावा, दक्षो वरुणोंऽशव । धृतस्नूः - घृतप्रस्नाविन्यः - घुत को भरने वाली, घृतपस्तविण्यः - घृत को वहाने वाली, पृवसानिन्या - घृत को चलाने वाली, पतसारिण्यः- घृत को शाटने वाली पो, आहुती: आहुतियो को, आदित्येभ्यः = आदित्यो के लिये, चिरम् - बहुकाल पर्यन्त, जुह्वा - जुह नामक पात्र से, जुहोमि: होम करता हूँ। अथवा, घिरम् जीवनाय = बहुत काल तक जीने के लिये होम करता है। इति शोभमान आदित्यों के लिये होम करता हूं। मित्रश्न = मित्र, अर्थमा च. अर्यमा, भगश्च . मग, बहुजात पाया = बहुजात = बहुतरूप से उत्पन्न हुआ घाता, दक्षा - दक्ष, करुणा = वरुण, मंशश्च और अंश में सक, नः- हमारी, इमा: गिरा - इन स्तुतियों को, - अयवा, राजम्य: - पृणोतु - सुनें।
(१५७२) निरुक्त द्वादशाध्यायस्य-सप्तत्रिशा खण्डा । २५ + . - 1 अंशः - अंशुना:व्याख्यातः । अंशः अंश शब्द, अंशुना = अंशु शब्द से,- व्याख्यात! = व्याख्यात - है। अर्थात् इस को व्याख्या नि. अ. २ खं. ५ में हो चुकी है। सप्त ऋषयः। आदित्य की सात रश्मिगण का नाम सप्त ऋषि है। अथवा मन सहित छ: इन्द्रिय और सप्तम विद्या इन सात इन्द्रियगण का नाम सप्त ऋषि है । भाष्यकार कहते हैं- सप्त ऋपयो, व्याख्याताः । सप्त अषयः - सप्त ऋषि, व्याख्याता: = व्याख्यात हैं। अदि इन की व्याख्या नि. म. १० खं. २९ में कर आये हैं। उन में सप्तन् शब्द का नि. ४-२६ में 'सप्त सप्ता संख्या' इस पंक्ति से और ऋपि शब्द नि. २-११ में 'ऋषिर्दर्शनात् ' इस पंक्ति से निवंचन किया गया है। वहीं देखना चाहिये। । तेपामेपा भवति । इति निरुक्ते द्वादशोघ्यायस्याय पत्रिंशः खण्डः ॥ १२-३६ ।। तेषाम् = उन सप्त ऋषियों की, एषा में यह अग्रिम ऋचा, भवति - है- अथ निरुक्त द्वादशाध्यायस्य सप्तविंशः खण्डः । सप्तऋषयः प्रतिहिताः शरीरे सप्त रक्षन्ति समप्रमादम् । सप्तापः स्वप॑तो "लोकमीयुस्त जातो अस्वानजी सत्रसदौच देवौ ॥ !...ir य. वा. सं. ब. ३४, मं. ५५ ।। इस.मन्त्र का कण्व ऋषि, वृहती छन्द और ब्रह्मणस्पति देवता है। मानार्थ-इस मन्त्र के माप्यकार दो अर्थ करते हैं । अघिदेव और अध्याम अघिदेव पक्ष में सप्त पय:' का अर्थ आदित्य रमियां और अध्यात्म-सम में इन्द्रियों हैं। उनमें अघिदेव अर्थ:-सप्त अपयः = मादिश्य की सात रश्मियो, शरीरे आदित्य रूप शरीर में, प्रतिहिता एक एक करके निहित (रखी हुई) हैं। राप्त = थे ही सात ( न अधिक न कम ) सदम् = संवत्सर को, अप्रमादम् = प्रमाद न करते हुए अर्थात् अपने फर्म को न छोड़ते हुए, रक्षन्ति - रक्षा करती हैं और सप्त = सात ही, माप व्यापन स्वभाष रश्मि मे, स्वपतः : सोते हुए से, लोकम् = लोक को, युः - चली जाती है। = उस आदित्यमण्डल में, अस्वप्नजी = नहीं सोने वाले, सत्रादौ = यजमानों के सत्र में बैठने वाले, देवी - वायु और आदित्य दो देव, जागृतः = जागते रहते हैं। अध्यात्म अर्थ- F. . .
निरुक्त द्वादशाध्यायस्य सप्तत्रिश. खण्डा । न सप्तऋपयः - बाह्य आभ्यन्तर मिलकर छ इन्द्रिय और सातवी विद्या, शरीरे - प्राणियो के शरीर रूप आत्मा मे, प्रतिहिताः निहित (रखी हुई) हैं । सप्तं - वे ही सात, सदम् = शरीर को, अप्रमादम् = प्रमाद न करते हुए, रक्षन्ति रक्षा करती है। सप्त - सातो, आप - व्यापने वालो, स्वपत. - सोते हुए प्राणियो के, लोपाम् - अस्त हुए आत्मरूपी लोक को ईयु. = प्राप्त होती हैं। तन = वहाँ इस शरीर में, अस्वप्नजो = नहीं सोने वाले एक, सत्रसदी = ज्ञान और यज्ञ में बैठने वाले, देवी - प्राज्ञ जीवात्मा और तैजस प्राण वायु, जागृत. = जागते रहते हैं। इस मन्त्रका भाष्य- . सप्तऋषयः प्रतिहिताः शरीरे, रमप आदित्ये । -सप्तरक्षन्ति सदमप्रमादम् - संवत्सरम- प्रमायन्तः । सप्तापनास्त एवं स्वपतो लोकमस्तमितमादित्यं यन्त्यत्र जागृतो अस्वप्नजी सत्रसदौ च देवौ वाप्यादित्यावित्यधिदैवतम् । Br सप्तऋपय. = रश्मया = सात रश्मियां, शरीरे = आदित्ये - मादित्य में निहित हैं। सप्त - वे ही सात, सदम् = सवत्सरम् - सवत्सर को, अप्रमादम् - अप्रमाद्यन्त - प्रमाद न करते हुए। रक्षन्ति - रक्षा करती हैं। ते एव सम्त अपनाः = वे ही सात व्यापनशील रमियाँ , स्वपत = सोते हुए के जैसा, लोकम् - अस्तमितम् । आदित्यम् - अस्त को प्राप्त हुए आदित्य को, यन्ति प्राप्त होती हैं। अत्र - इस आदित्य मण्डल मे, अस्वप्नजी = नही सोने वाले, च = और, सत्रसदौ = यजमानो के सत्र में बैठने वाले, देवी - वाग्वादित्यो वायु और आदित्य देव, जागृत. = जागते रहते हैं। इति = यह. अधिदेवतम् । अघिदैवत- अर्थ है।। अर्थात् इस मे देवता विषयक . अर्थ है। अथाध्यात्मम्-सप्तरूपया प्रतिहिताः शरीरे । पडिन्द्रिपाणि विद्यासतमानि, आत्मनि । सप्त रक्षन्ति सदमप्रमादम् । शरीरमप्रमाद्यन्ति, ; सप्तापनानीमान्यैव स्वपतो लोकमस्तमित मात्मानं यन्त्यत्र जागृता अस्वमजी सबसदौ च देवौ प्राज्ञश्वात्मा तैजसत्यात्मगतिमाचष्टे । अय अध्यात्मम् - अघिदेव अथं करने के पश्चात अध्यात्म, अपं किया जाता है--सप्त ऋपयं. श्रोत्र, स्वक, चक्षु, रसना और घ्राण ये पाच वाह्य ज्ञान इन्द्रिय तथा मन और बुद्धि (विद्या ) ये दो आन्तर ज्ञान इन्द्रिप पे सब मिला कर सात सप्तऋषि है। वे, शरीरे - प्राणियों के शरीर रूप आत्मा मे, प्रतिहिता - निहित हैं। इसीको कहते हैं-पड् इन्द्रियागि छह इन्दियो, रिया सप्तमानि जो विद्या को लेकर सातवी हैं वे, आरमनि = शरीर म पारमा में हैं। सप्त = ये सात, सदम् - शरीर को, अप्रमादम् = प्रमाद न करते हुए. सावधानी से, रक्षन्ति रक्षा करती हैं । अर्थात, शरीरम् अप्रमाद्यन्ति - शरीर के प्रति प्रमाद नहीं करती है । सप्त = वे सात, मरतानि इमानि एव म्मापने वाली ये हो, स्वपतः सोते हुए प्राणियों के, लोम् - तमितम् आत्मानम् अस्त हुए आत्मा रूपी लोक वो, । यम्ति. = प्राप्त होती हैं। बत्र - महा परीर में, अस्वप्नलो - नही सोने वाले, च * एय, सन सदी यजमानो के ,मान, और यज्ञ में बैठने वाले, देवी - दोनो देव, प्राश मात्मा • प्राज्ञ पीवात्मा, च = और, मध * प्राण, जापृता. मागळे - (१५७४) निरक्त द्वारकाध्यायस्पाष्टात्रिशा खण्डौ । । रहते हैं । इति = यह मन्त्र, आत्मगतिम् = आत्म के रहने की स्थिति को, आचष्टे = कहता है । अर्थात् मात्म-अस्तित्व में प्रमाण है । तेषामेपाऽपरा भवति । इति निरुक्ते द्वादशाध्यायस्य सप्तत्रिशः खण्डः ॥ १२-३७ ।। तेषाम् - उन सप्तऋषियो की, एपा = यह, अपरा = दूसरी प्राचा, भवति = है- अथ निरुक्त द्वादशाध्यायस्याष्टात्रिंशः खण्डः । तिर्यग्विलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नो यस्मिन्यशो निहितं विश्वरूपम् । अत्रासंत ऋषयः सप्त साकं ये अस्य गोपा महतो बभूवुः ॥ अथ० सं० का० १० । सू०८। मं० ९ ॥ इस मन्त्र का कुत्स ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और आध्यात्म देवता है। मन्त्रार्थ-तियंग्बिलः रश्मियो के तिरछे छिद्रोयाला, पमस = उदक को भजनेवाला, ऊर्ध्वबुधः = ऊपर आकाश में बंधा हुआ, यस्मिन् = जिस में, यशः = सर्व प्रकार का यश और, विश्वरूपम् = सर्वरूप वा सर्व प्रकार का जल, निहितम् = रखा हुमा है, ये जो, अस्य महतः - इस महान जगत के, गोपाः - रक्षक, बभूवुः हैं, अत्र = इस मे (मादिस्य मण्डल मे ), साकम् = एक साथ, सप्त ऋषयः - सात रमिये, आसते = स्थित है उस आदित्य की, हम स्तुति करते हैं। यह सात किरणरूप अघिदेय अर्थ है। अध्यात्म अर्थ इस प्रकार है-तियंग्विल: - आदित्य मण्डल के समान यह शरीर है। जिस मे इन्द्रिय-गोलकरूप सात छिद्रवाला, चमसः = शिर है। जो, ऊबुघ्नः = ऊपर ही अवस्थित रहता है अथवा सम्पूर्ण शरीर का बन्धन है। यस्मिन् = जिस में, यश: - यश और, विश्वरूपम् सर्व विषयक ज्ञान, निहितम् - रखा हुआ है। ये = 'जो, अस्य = इस, महसः = महान शरीर का, गोपाः = रक्षक है। अत्र = इस शरीर मे, सप्तमपयः - उक्त सात इन्द्रिय रूप ऋपि, साकम् - एक साथ, आसते = रहते हैं। अधिदेव पक्ष में सप्तऋपि का अर्थ आदिश्य रश्मि और अध्यात्म पक्ष में सात इन्द्रिया हैं। S . इस मन्त्र का भाष्य- तिर्यम्पिलश्चमस ऊर्ध्वनन्धन ऊर्ध्वयोधनो वा यस्मिन् यशो निहितं सर्वरूपमत्रासत ऋपयः सप्त सहादित्यरश्मयो ये अस्य गोपा महतो बभूवुः । इत्यधिदैवतम् । तिम्बिलः = रमियो के तिरछे छिद्रो वाला, चमसः चमस अर्यात उदक वाला, कर्ण बन्धनः = पर आकाश मे बंधा हमा, वा = अथवा, मर्ववोधनः = अपर रह कर सब प्राणियो यो जगाने वाला, यस्मिन् - जिस मे, यशः = यश और, सर्वरूपम् - सर्वरूप या सर्व प्रकार या जल निहितम् - रखा है, मत्र - इस यादिस्य मण्डल मे, सप्त ऋषयः । सहादित्यरमयः - = सात ऋषि के - अप : वा- शरीर के - निरुक्त द्वादशाध्यायस्यकोनचत्वारिंशः खण्डः । (१५७५) सहित अर्थात् सात ऋषि रूप सात रश्मियां रहती हैं, ये - जो, बस्य महतः = इस महान् जगद के, गोपा: बभूवुः = रक्षक हैं । इति = यह अर्थ, अघिदैवतम् = अधिदैवत अर्थात् देवता परक है। यहां आदित्य रश्मि अधिदेव है। अधाध्यात्मम्-तिर्यग्निलचमस ऊर्ध्वबन्धन ऊर्ध्वोधनो वा यस्मिन्यशो निहितं सर्वरूपमत्रासत ऋषयः सप्त सहेन्द्रियाणि यान्यस्य गोप्तॄणि महतो बभूवुरित्यात्मगतिमाचष्टे । अधिदेव अर्थ करने के बाद, अध्यात्मम् = बात्मपरक अयं किया जाता है- तिग्विल: = आदित्य मण्डल के समान यह शरीर है। जिस में इन्द्रिय गोलक रूप सात छिद्र वाला, चमस: - शिर है। जो, ऊर्ववन्धनः ऊपर ही अवस्थित रहता है। सम्पूर्ण शरीर का बग्ध है। अथवा, अध्वंबोधनः उच्चं ज्ञान वाला है। यस्मिन् = जिस में, यशः सर्वरूपम् = सर्व प्रकार का यश ओर ज्ञान, निहितम् = रखा रहता है। अत्र = इस शरीर मे, सप्त , ऋषयः = पूर्वोक्त सात ऋषि, भासते = रहते हैं। यानि इन्द्रियाणि - जो सात इन्द्रियां हैं । जो, अस्य महता - इस महान गोप्तणि - रक्षक, बभूवुः हैं। इति = यह मन्त्र, आत्मगतिम् = आत्मस्थिति को, माचष्टे कहता है । यहा इन्द्रियाणि अध्यात्म हैं । २६ ~ देवाः। आदित्य की रश्मियो का नाम देव है । इस लिये बहुवचन है। क्योकि, रश्मियां बहुत हैं। दिव्य होने से देवगण हैं। गुस्थान आदित्य की रश्मियां हैं। इस लिये ये भी स्थान हैं। यास्क कहते हैं- देवा व्याख्यावाः। देवाः = देव, व्याख्याताः व्याख्यात हैं। अर्थात् -इस की व्याख्या नि. अ. ७ स. १५ में 'देवो, दानाद्वा, दीपनाद्वा, द्योतनाद्वा' इत्यादि पक्ति से कर आये हैं। 'ददाति ऐश्वर्यमिति देवः' इस विग्रह मे 'डदा दाने' धातु से उणादि व प्रत्यय, पृषोदरादित्वात् एकार होने पर देव शम्द बना है । अथवा 'दीप्यते इति देवः' इस विग्रह मे 'दोपी दीप्तो' धातु से पचायच्, पृषोदरादित्वात् दो को एकार और प को व होने पर देव शन्द बना है। 'योतते इति देवः' इस विग्रह मे 'द्युत दीप्तो' धातु मे पृषोदरादित्वात् एकार' वकार हो कर देव पन्द बना है। राम गण का नाम है। रमिया बहुत होने से वहुवचनान्त है। तेपामेषा भवति। इति निस्क्त द्वादशाप्यापस्याप्टानिशा सण्डः ।। १२-३८ ।। तेषाम् = 'सन रमिरूप देवो की, एपा = यह अप्रिम ऋचा, भपति - है- अय नियक्त द्वादशाध्यायस्यकोनचत्वारितः खण्डः । 2 - अथवा 1 निरुक्त द्वादशाध्यायस्य चत्वारिंशा वाडा । (१५७७) ar'ओमासश्चर्षणीधृतो विश्वे देवास आ गत । दाश्चासौ दाशुषः सुतम् ॥ ॐ स १-१-५-७ ॥ इस मन्त्र का मधुच्छन्दा ऋषि, गायत्री छन्द और विश्वेदेवा देवता है। मन्त्रार्थ-विश्वेदेवास 'हे विश्वदेवगण । तुम ओमास. = रक्षक हो। तुम, चर्पणीधृत मनुष्योनो धारणपोपण करने वाले हो। तुम, दाश्वास - कर्म फल देने वाले हो । तुम, दाशुषः - हव्यदाता यजमानों के, सुतम् अभिषुत सोम रस को पान करने के लिये, आगत - आवो। इस मन्त्र मे विश्वेदेवो, की स्तुति है । इस लिये यह मन्त्र उन्ही का कहा जाता है । इस मन्त्र का भाष्य-1 . अवितारो वा अवनीया वा मनुष्यधृतः सर्वे च देवा इहागच्छत दचवन्तो दत्तवतः 'सुतमिति । अविवार - रक्षा करने वाले, वा = अथवा, अवनीया तर्पण करने योग्य, मनुष्यधृत मनुष्यो को पोषण करने वाले, दत्तवन्त - कर्म के फल देने वाले, सर्व देवा - सभी देव, दत्तपत्त - हव्यदाता यजमानो के, सुतम् = अभिपुत (निचोड हुए) सोम रस पान करने के लिये, इह = यहाँ, आगच्छत - आवो। इति = यह हम चाहते हैं। 'विश्वे देवा सर्वे देवा ' यह यास्क मत है। शाकपूणि नामक आचार्य कहते हैं। सभी देव "विश्वे देवा ' नहीं किन्तु देविशेष का असाधारण नाम 'विश्वे देवा ' है । इम पर आवायं यास्क कुछ विचार-प्रारम्भ करते हैं- तदेवदेकमेव वैश्वदेवं गायत्रं हच दशवयीषु विद्यते । तत् एतत् = सो यह एकम् एव - एक ही, वैश्वदेवम् - विश्वदेवो का, गायत्रम् - गायत्री छन्द मे, तृचम् - तृच मर्याद तीन अचाओ का एक समूह, दर्शतयोः = मण्डलरूप दश अवयव याला दश मण्डलरूप ऋग्वेद मे, विद्यते = है । अर्थात् सम्पूर्ण ऋक् सहिता मे गायत्री छन्द मे इस सूचा के सिवाय विश्वदेवो का तृच वा सूक्त नहीं है । एक यही है। यतु किश्चिदहुदैवतं तद्वश्वदेवानां स्थाने युज्यते यदेव विश्वलिद्गमिति शाकपूणिः । यत्तु किश्चित् = जो कुछ मन्त्र मात्र, बहुदेवतम् - बहुदेववाओ का गायत्र छन्दो से युक्त हो, तद - वह वैश्वदेवानाम् = सब वैश्वदेव मन्त्री के, स्पाने - स्थान में, युज्यते = लगाया जाता है वा लगाना चाहिये, यदेव - जो, विश्वलिङ्गम् - विश्वाला है। इति शाकपूणि यह भाचार्य बहते हैं। अर्थात् देवताविशेष ही विश्वेदेवा' का अपं है। सामान्यतया सभी देव नहीं यह साफपूणि को प्रतिज्ञा है। यास्ताचार्य इस का लण्डन करते हैं- (१५७८) निरुक्त द्वादशाध्यायस्य चत्वारिंशः खण्डः । अनत्यन्तगतस्त्वेप उद्देशो भवति । बभ्ररेक इति दशद्विपदा अलिङ्गाः । इस वाक्य में 'तु' शब्द पूर्वपक्ष की व्यावृत्ति करता है। अर्थात् पूर्व पक्ष को तुच्छ सावित करता है। एषः = यह शाकपूणि आचार्य की, उद्देशः = प्रतिज्ञा, अन्त्यन्तगतः = अनेकात्तिक अर्थात् व्यभिचरित हेतु से युक्त है। यह अपने साध्य की सिद्धि नहीं कर सकता है। क्योंकि, बर्धरेफः' इति = बभ्ररेकः इत्यादि, दशद्विपदा = दश ऋचाओं वाले द्विपदा सूक्त में, किसी भी 'मन्न में, अलिङ्गाः = "विश्वेदेवाः' का लिङ्ग नहीं है । अर्थात् 'विश्वेदेवाः' शब्द पठित नहीं है। अत एव यह सूक्त विश्वदेव देवताक नहीं होना चाहिये और है तो सही । अतः यह नियम नहीं कि जहा जिसका लिङ्ग हो वही वह देवता होता है । भूतांशः काश्यप आश्विनमेकलिङ्गम् । :: , काश्यपः = कश्यप के पुत्र, भूतांश: = भूतांश नामक ऋषि ने, एकलिङ्गम् आश्विनम् = एक लिङ्ग आश्विन सूत्र को दर्शन किया है। अर्थात् जिस सूक्त को उक्त ऋषि ने देखा हे यह (१०-१०६) ११ ऋचा वाला है। परन्तु उन में एक ही अचा में अश्विन शब्द रूप लिङ्ग है। अन्य दश ऋचाओं में अश्विन शब्द रूप लिङ्ग नहीं । फिर भी वह सम्पूर्ण सूक्त अश्विदेवताक माना जाता है। पाकपूणि मतानुसार दश मन्त्र अश्विदेवताक नहीं माना जाना चाहिये क्योंकि उन में अश्विपद रूप लिङ्ग नहीं है। और भी देखिये- अभितप्टीयं सूक्तमेकलिङ्गम् । इसी प्रकार, अभितप्टीयम् सूक्तम् र संहिता के अभितष्टीय सूक्त मी (३-३८), एकलिङ्गम् - एक लिङ्ग वाला है। अर्थात् वह सूक्त भी दश प्राचा का है। परन्तु दशका ऋचा में इन्द्र पद रूप लिङ्ग है। अन्य ९ चा में नहीं, फिरभी वह सम्पूर्ण सूक्त इन्द्रदेवता माना जाता है । सो शाकपूणि के मतानुसार नहीं माना जाना चाहिये। क्योंकि, सभी ऋचा में इन्द्र पद रूप लिङ्ग नहीं है । अतः यह नियम नही कि जिस में जिस का लिङ्ग हो वही उस देवताक चा मानी जाती है । इस से यह सिद्ध हुआ कि, बहुदेवताक सब ऋचायें विश्वदेव के लिङ्गवाली नहीं हैं तो भी वे विश्वदेवताक हैं । इसी लिये "विश्वेदेवाः' का अर्थ 'सर्वे देवाः' है देवता विदोष नहीं । यह सिद्ध हुआ । साध्याः । नरुक्त पक्ष में साध्याः का अर्थ रश्मिया और ऐतिहासिक पक्ष में देवसमूह है । इस भी व्याख्या रश्मिनामों में हो चुकी है । अर्थात् 'साप्नुवन्ति स्वव्यापार रसाहरणादिक संसिदकुर्वन्ति इति साध्याः र मयः, इस विग्रह में 'राप साप सिद्धी धातु से 'हलोप्यंत्' इस सूत्र से बाहुलका कर्ता अर्थ में प्यत् (य) प्रत्यय होने पर साध्य न्द बना कर प्रथमा बहुवचन में 'साया' रूप बना है। रश्मियों का नाम है। क्योंकि, रमिया रसादि के सीपनाम्प कार्य करतो हैं । भाष्यकार इसका निर्षवन करते है- .
निरुक्त दादशाध्यायस्यैकचत्वारिसा! खण्डः । , साध्या देवा!, साधनात् । साधा '='सावन करने से, देवाः = दीव्य रमियां वा, देवता, साध्याः = साध्य कहे जाते हैं । अर्थात् जो कार्य अन्य से सिद्ध नही किया जाता वह इन से सिद्ध होता है । तेपामेपा भवति । इति निरुक्तद्वादशाध्यायस्य चत्वारिंशः खण्डः ।। १२-४०॥ 'तेषाम् - उन साध्य देवों की, एषा = यह अग्रिम ऋचा, भवति = है~ अथ निरुक्त द्वादशाध्यायस्येकचत्वारिंशः खण्डः ।। यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यास ते ह नाक महिमानः सचन्त यत्र 'पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥ ऋ सं. २-३-२३-५० ॥ इस, मन्त्र को 'दीर्घतमा'ऋपि त्रिष्टुप् छन्द और साध्या देवता है। मन्त्रार्थ-देवाः . यजमानों ने, 'यझेन - निर्मन्यन से प्रगट को हुई अग्नि के द्वारा, यज्ञम् - होम के साधन आहवनीय पूजा को। तानि = वे हो, प्रथमानि धर्माणि - प्रथम धर्म, सासन - थे। ते ह = उन, महिमान: - माहात्म्ययुक्त यजमानों ने, नाकम् = स्वर्ग, सचन्त = प्राप्त किया। यत्र - जिस स्वर्ग में, पूर्वे - मावोन, साध्याः = आदित्य रमियाँ, देवाः * दीप्तियुक्त होकर, सन्ति - विद्यमान हैं। अर्थात् स्वर्ग सदा रश्मियो के प्रकाश से प्रकाशित रहता है। इस मन्त्र में 'साध्या:' पद रश्मियों के वाचक है । Tr अग्नि की, अयजन्त इस मन्त्र का भाष्य--- M "यशेने पत्रमयजन्त देवाः" ! अग्निनाग्निमयजन्त देवाः ॥ देवाः - यजमानो ने, यज्ञेन = अग्नि के द्वारा, यजम + अग्नि को. अपजन्त = अर्थाद, देवाः यजमानों ने, अग्निना = अग्नि के द्वारा, अग्निम् = अग्नि की, अयजन्त - पूजा की। इस सर्प में बाह्मण वाक्य प्रमाण देते हैं- " अग्निः पशुरासीनमालभन्त तेनायजन्तेति च ब्राह्मणम् । तानि धर्माणि प्रथमान्यांमन् । ते ह ना महिमानः समसेवनाः। यत्र पूर्व साध्याः सन्ति देवाः साधनाः । गुस्थानो देवगण इति नरुक्ताः । पूर्व देवयुगमित्याख्यानम् । (तं. ब्राह्मण ५-७-२६) अग्निः अग्नि, पशुः = पुरोहाण रूप पशु. आसीत् "हा, तम् , उसको, देवताओंने, मालमन्त बालामन किया, और, तेन उस पशुसे, अयजन्त पजन किया, इति प. १९८ , (१५८०) निरुक्त वादशाध्यायस्य चत्वारिंशा सण्डः । यह, ब्राह्मणम् = ब्राह्मण वाक्य उक्तार्थ में प्रमाण है। तानि = वे, धर्माणि = कर्म, प्रथमानि = प्रथम (मुख्य), आसन् = हुए थे । ते ह = उन देवों ने, महिमानः महिमा से युक्त हो कर, नोकम् = स्वर्ग को, समसेवनाः सेवन किया। यत्र = जहां, पूर्वे = पूर्व कालिक, साध्याः साधनाः । साधनवाले, देवाः = देव, सन्ति = हैं अर्थात् थे । धुस्थानः देवगणः = साध्य नाम से रश्मि नामक धुस्थान देवगण हैं, इति यह, नरुक्ताः = नरुक्त आचार्य मानते हैं। पूर्वम् = सब से प्रथम, देवयुगम् देवयुग (सत्ययुग) है, अर्थात् प्रथम देवयुग के देवताओं का नाम 'साध्याः' है, इति यह, आख्यानम् = ऐतिहासिक आचार्य मानते हैं । इस प्रकार 'साध्याः' पद के दो अर्थ हुए । एक रश्मियों और दूसरा सत्ययुग के देव समूह । यद्यपि यास्क ने ' साध्याः' पद का अर्थ 'द्युस्थान देवगण' यही किया है । तथापि इस का अर्थ रश्मि ही करना समुचित जान पडता है । क्योंकि ऐतिहासिक पक्ष में प्रथम युग के देवसमूह अर्थ तभी भिन्न हो सकता है । %3D . - वसु कहलाते हैं। २९ वसवः । अग्नि, पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य, चो, चन्द्रमा और नक्षत्र, इन अष्ट वसुओं का नाम पसु है । ये आठ हैं इस लिये 'वसवः' यह बहुवचनान्त है । रश्मियों के नामों में इस का निर्वचन किया गया है । 'वसते आच्छादयन्ति इति वसवः' इस विग्रह में 'वस आच्छादने' धातु से, 'शस्वस्निहित्रप्यसिवसिहनिक्लिदिबन्धिमनिभ्यश्च' इस उणादि सूत्र से उ प्रत्यय होने पर 'सु' शब्द बना है । अष्ट्र वसु का नाम है । क्योंकि, ये अष्ट वसु पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्युस्थान में रह कर सर्य पदार्थों को आच्छादन करते हैं । इस लिये ये वसु कहलाते हैं । यास्क इसका निर्वचन करते हैं- वसवो यद्विवसते सर्वम् । यद जो, सर्वम् = सब कोः विवसते - माच्छादन करते हैं वे, वसवः - अर्थात् जो पृथिवी लोक, अन्तरिक्ष लोक और धुलोक में अवस्थित रह कर विभक्त सम्पूर्ण जगत् को ढाक लेते हैं वे वसु कहे जाते हैं। कोई देवता पृथिवीस्थान, कोई मध्यम स्थान और कोई उत्तम स्थान हैं। ये अष्ट वसु तो विस्थान है। तीनों स्थानों में रहकर सर्व पदायों को व्यापन कर लेते हैं। प्रश्न-ये त्रिस्थान कैसे हैं? उत्तर-अग्निर्वसुमिर्वासव इति समाख्या, तस्मात्पृथिवीस्थानाः । अग्निः अग्नि, वसुभिः = अप्ट वसुओं के साथ रहने से, वासवः = वासव है, इतिः समाख्या है, याजकों में यह कहावत प्रसिद्ध है, तस्मात् = इस से, पृथिवीस्थानः पृथवीस्थान हैं । भाव यह है कि, अग्नि पृथिवी स्थान देवता है। वसुओं के साप रहने से वासव कहलाता है। यदि वसुगण पृथिवीस्थान न होवें तो अग्नि का वसुओं के साथ होना असम्भव है। और साथ रहना कहा गया है। अतः अष्ट वसु भो पृथियो स्थान हैं । यह सिद्ध हुआ। - यह। : समाख्या - निरुक्त द्वादशाध्यायस्य द्वाचत्वारिंशः खण्डः । (१५८१) इन्द्रो वसुभिर्वा सव इति समाख्या, तस्मान्मध्यस्थानाः | इन्द्रः - इन्द्र, वसुभिः = वसुओं के साथ रहने से, वासवः - वासव है, इति = यह, समाख्या - समाख्या है, प्रसिद्धि है, तस्मात् - इस से, मध्यस्थानाः = अष्टवसु मध्यस्थान हैं। भाव यह है कि, इन्द्र मध्यस्थान देवता है। वसुओं के साथ रहने से वामव कहलाता है। यदि अष्ट वसु मध्यस्थ न होवें तो इन्द्र का वसुओं के साथ रहना नहीं बन सकता है और साथ रहना कहा गया है। अत: वसु मध्यस्थान भी हैं यह सिद्ध हुआ। बसव आदित्यरश्मयो विवसनात्तस्माद् धुस्थानाः । विवसनात - अन्धकार को दूर करने से, आदित्यरमयः = सूर्य की किरणे, वसवः = वसु कहलाती हैं, तस्मात् - इस कारण से, अप्ट वसु, धुस्थानाः - द्युस्थान हैं। भाव यह है कि, अष्ट वसुओं में आदित्य एक वसु है। आदित्यरश्मियाँ मादित्य रूप हैं और आदित्य घुस्थान है। इस प्रकार अष्ट वसु द्युस्थान हैं यह सिद्ध हुआ । तेयामेषा भवति । इति निरुक्त द्वादशाध्यायस्येकचत्वारिंशः खण्डः ॥ १२-४१॥ तेपाम् = उक्त वसुमो की, एषा यह अग्रिम ऋषा, भवति अय निरुक्त द्वादशाध्यायस्य द्वाचत्वारिंशः खण्डः । सुगावो' देवाः सुपर्था अकर्म य आजग्मुः सर्वनमिदं जुपाणाः । जक्षिवांसंश्च पपिवांसंश्च विश्वेऽस्मे धत्त वसवो वसूनि ॥ इसी प्रकार का आनुपूर्वी पाठ यास्क ने उद्धृत किया है। जो किसी शाखा का पाठ होना चाहिये । य. वा. सं. ८-१८ में कुछ मिलता जुलता पाठ है। उसी का पता कतिपय टीकाकारों ने दिया है। सो समोचीन नहीं। मन्त्र का पता न होने से ऋष्यादि का उपन्यास नहीं किया जाता है। यह मन्त्र वसुओ का है और इस में 'वसवः' ऐसा लिङ्ग भी है । अत: इस के वसुगण देवता हैं। मन्त्रार्थ-देवाः = हे देवो!, वः = तुम्हारे लिये, वयम् = हमने, सुगा - सुगम, सुपथा = सुन्दर मार्ग, भकर्म - कर दिया है। ये = जो तुम, जुषा गा. - हमारे साथ प्रीति करने वाले हो तो, इदम् = इस, सवनम् = यज्ञ मे, आजग्मुः = आओ । जक्षिवास = हवियो को भक्षण करते हुए और, पपिवास: - सोम को पान करते हुए, विश्वे - तुम सब, वसवः - वसुगण, अस्मे - हमारे लिये, वसूनि - सर्व प्रकार के धन को, पत्त- धारण करो । अदि हमे धन प्रदान करो। इस मन्त्र का भाष्य-- स्वागमनानि यो देवाः सुपथानि अर्म य आगच्छत सबनानीमानि जुपाणा:, खादितवन्ता पीतवन्तश्च सर्वेऽस्मासु धत्त वसवो वानि ।
%3D * - T - (१५४२) निरुक्त द्वादशाध्यायस्य त्रयश्चत्वारिंशः खण्डः । देवाः - हे देवो !, 4:= तुम्हारे लिये हमने, स्वागमनानि = सुन्दर आगमन योग्य, सुपथानि सुन्दर मार्ग, अकम = कर दिया है । ये जो तुम, जुपाणाः = हमारे साथ प्रीति करने वाले हो तो, इमानि सवनानि = इन यज्ञों मे, आगच्छत = आओ। सर्वे वसवः = तुम सब वसुगण, खादितवन्तः - हवि भक्षण करते हुए च = और, पीतवन्तः सोम पान करते हुए, अस्मासु - हमारे में, वसूनि = सर्व प्रकार के धन को, धत्त = धारण करो। हमें धन दो । तेपामेपाऽपरा भवति । इति निरुक्त द्वादशाध्यायस्य द्वाचत्वारिंशः खण्डः ।। १२-४२ ।। तेपाम् = उन वसुओ की, एपा = यह अग्रिम, अपरा - दूसरी ऋवा, भवति = है- अथ निरुक्त द्वादशाध्यायस्य त्रयश्चत्वारिंशः खण्डः । ज्मया अत्र वसवो रन्त देवा उरावन्तरिक्षे मर्जयन्त शुभ्राः । अर्वाक्पथ उरुजयः कृणुध्वं श्रोता दूतस्य॑ जग्युपो नो अस्य ॥ ऋ. सं. ५-४-६-३ ॥ इस मन्त्रका वरिष्ठ प्रापि, त्रिष्टुप् छन्द और 'विश्वेदेवाः' मे वसु देवता है। मन्त्रार्थ- पृथिवी पर रहने वाले, घसव. = वसु नामक, देवाः = देवगण, अत्र = यहा- अर्थाद इस यज्ञ में, रन्त = रमण करें। उरो अन्तरिक्षे = विस्तीर्ण अन्तरिक्ष लोक मे, 'शुभ्राः = शुम्रवर्ण विचरण करें। उरुनयः ।, बहुत = अतिशीघ्र गमन करने वाले वसुगण, पथः- अपने मार्ग को, अर्वा = हमारे अभिमुख, कुरुध्वम् = करें। जग्मुपः 'उन के प्रति गये हुए, नः = हमारे, अस्य दूतस्य = इस अग्नि रूप, दूत के आह्वान को, श्रोता = सुनें । ज्मया: - वसुगण, मर्जयन्त इस मन्त्र का भाष्य-- - ज्मया: - ज्मया अत्र वसवोऽरमन्त देवाः । ज्या पृथिवी तस्यां भवाः । उरौ चान्तरिक्ष मर्जयन्त गमयन्त शुभाः शोभमाना अर्वाच एनान् पथो बहुजवाः कुरुवं, शृणुत दूतस्य जग्मुपो नो अस्याग्नेः। पृथिवी पर रहने वाले, वसवः = वसुनामक, देवाः = देवगण, अत्र = इस यज्ञ में अरमन्त = रमण किये थे या करें। मा पृथिवी = ज्मा पृथिवी का नाम है, तस्याम् = उस मे, होने वाले अर्थात् पृथिवी मे नित्य रहने वाले वसुओ का नाम जमयाः' है। च = और, उरी - विस्तीर्ण, अन्तरिक्षे = अन्तरिक्ष लोक में, मजयन्त = गमयन्त = गमन करते ये वा करें। शुभ्राः = शोभमाना: - शोभायमान, बहुजवाः = बहुत गमन करने वाले वसुगण, एनान् पथः - अपने इन मागों को, अर्वाचः हमारे अभिमुख, कुरुध्वम् = करें। जग्मुपः उनके, प्रति गये हुए, ना - हमारे, दूतस्य = दूत, अस्प अग्नेः = इस अग्नि के आह्वान को, शृणुत = सुनें। भवा: - ३० - . निरुक्ते द्वादशाध्यायस्य चतुश्चत्वारिंशः खण्डा । (१५४३) वाजिनः। वाजिन् पाब्द का निर्वचन अश्वनामों मे (नि. २-२८) किया गया है। वहा एकवचन और यहां वहुवचन है। वहां अश्व का और यहां आदित्य-रश्मियो का नाम है । मतभेद से द्युस्थान देवता का भी नाम 'वाजिनः' है। 'वजनं वाज, वेगः' इस विग्रह मे 'वज गतो' धातु से 'भावे' इस सूत्र से ध (अ) प्रत्यय और उपधावृद्धि होने पर बाज शब्द बना है। वेग का नाम है। 'वाजोऽस्थास्ति इति वाजी' इस विग्रह मे वाज् शब्द से 'अत इनिठनी' इस सूत्र से तद्धित इनि (इन् ) प्रत्यय और अ लोप होने पर वाजिन शब्द बना है। 'वाजिनः' यह प्रथमा बहुवचन का रूप है। आदित्य रश्मि का नाम है। क्योकि रश्मियाँ बहुत और वेग वाली हैं। भाष्यकार कहते है- वाजिनो व्याख्याताः। वाजिनः वाजिन की, व्याख्याताः - व्याख्या हो चुकी है। तेपामेपा भवति । इति निरुक्त द्वादशाध्यायस्य त्रयश्चत्वारिंशः खण्डः ॥ १२-४३ ।। तेषाम् । = उन वाजिन् की, एषा - यह अग्रिम ऋचा, भवति - है- अथ निरुक्त द्वादशाध्यायस्य चतुश्चत्वारिंशः खण्ड. । शं नो भवन्तु वाजिनो हवेषु देवतांता मितवः स्वर्काः । जम्भयन्तोऽहिं वृकं रक्षांसि सनैम्यस्यद्युयवन्नमीवाः ॥ ऋ. सं. ५-४-५-७॥ इस ऋचा का वसिष्ठ ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और वाजीदेवता है । मन्त्रार्थ-देवताता = यज्ञ के, हवेषु = स्तुति रूप आह्वानो मे, वाजिनः = रश्मियां वा देवगण, नः = हमारे लिये, शम् = सुखकारी, भवन्तु = हो । मितद्रवः = जो सुन्दर मिल कर चलने वाले हैं, स्वर्काः = जो सुन्दर गमन करने वाले हैं जो वा सुन्दर पूजा करने वाले हैं जो वा सुन्दर कान्ति वाले हैं अमोवाः - और जो निरोग हैं वे, अहिम् = हमे मारने वाले को, वृकम् = चोर की और, रक्षांसि = राक्षसो को, जम्भयन्तः मारते हुए, अस्मद् - हम से, सनेमि = शोघ्र, युयवत् = अलग कर दे। इस मात्र में 'वाजिनः' रश्मि वा देववाचक है। इस मन्त्र का भाष्य- सुखा नो भवन्तु वाजिनो हानेषु देवतातौ यज्ञे मिनद्रवः सुमितद्वः स्वः स्वश्चना इति वा स्वर्चना इति वा स्वर्चिप इति वा, जम्भयन्तोऽहिं च वृकं च रक्षांसि च क्षिप्रमस्मयावयन्त्वमीवाः देवाश्वा इति वा । देवतातो - यज्ञे - यज्ञ के, ह्वानेषु = स्तुति रूप आह्वान में, वाजिनः * मादिस्य को मियो वा देवगण, नः = हमारे लिये, सुखाः सुखकारो, भवन्तु = होवें। मितद्रयः सुमितद्रवः - जो D जो देवों के जम्भयन्तः = - - एय शब्द का (१५८४) निरुते द्वादशाध्यायस्य पश्चचत्वारिंशः सण्डा । सुन्दर मिलकर चलने वाले हैं, स्वर्काः = स्वञ्चनाः - जो सुन्दर गमन करने वाले हैं, इति वा : अथवा, स्वर्चनाः = जो सुन्दर पूजा करने वाले हैं, इति वा = अथवा, स्वचिषः इति वा = जो सुन्दर क्रान्ति वाले हैं, अमीयाः और जो निरोग हैं, इति वा = अथवा, देवाश्वाः अश्व हैं वे, अहिं च = हमें मारने वाले, वृकम् = तस्कर, च = और, रक्षांसि = राक्षसों को, मारते हुए, क्षिप्रम् शीघ्र, अस्मद् = हमारे यहाँ से, यावयन्तु = अलग (दूर) कर दें। देवपल्यः। इत्येकत्रिंशत् पदानि ॥३१॥ अग्निद्रविणोदा अश्वो वायुः श्वनोऽश्विनौ पट् ॥ ६ ॥ इति निघण्टौ पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५॥ इति निघण्टुः समाप्तः। देवों की पत्नियों का नाम देवपत्नी है। देव बहुत हैं। अतः उनकी पत्नियों भी बहुत हैं। अत बहुवचनान्त 'देवपल्यः' है। देव निर्वचन इसी अध्याय के ३९वां खण्ड पर २६वां पद के निर्वचन में किया गया है । देवाः पतयो यासाम् ताः देवपल्यः' इस विग्रह मे देव उपपद 'पा रक्षणे' धातु से 'पातेतिः' इस उणादि मूत्र से डति प्रत्यय, डित्वात टि लोप, देवपति, पत्युयज्ञ संयोगे' इस सूत्र से नकार आदेश, देवगन, 'ऋन्नेभ्योडोप्' इस सूत्र से डोप (ई) प्रत्यय होने पर, देवपत्नी शब्द बना है। 'देवपल्य: प्रथमा बहुवचनान्त है भाष्यकार निर्वचन करते हैं- देवपत्न्यो-देवानां पल्यः। देवानाम् = देवताओं की, पल्यः = पलियां है इसलिये, देवपल्यः - देवपत्नियां वाहलाती है। देव उत्तमस्थान है। इस लिये देवपत्नियाँ भी उत्तमस्थान हैं। तासामेपा मवति । इति निरुक्त द्वादशाध्यायस्य चतुश्चत्वारिंशः खण्डः ।। १२०४४ ।। तासाम् = उन देवपत्तियों को, एषा = यह अग्रिम चा, भवति = है- अथ निरक्त द्वादशाध्यायस्यपञ्चचत्वारिंशः खण्डः । देवानां पत्नीरुशतीरवन्तु नः प्रावन्तु नस्तुजये वाजसातये । याः पार्थिवासो था अपामपि व्रते ता नो देवीः सुहवाः शर्म' यच्छत ॥ प्रा. सं. ४-२-२८-७ ॥ . इस मन्त्र का प्रतिक्षेत्र ऋषि, जगती छन्द और देवपत्निया देवता है। मन्त्रार्थ-देवानाम् इन्द्रादि देवों की, पत्नीः = पत्नियों, उशती: - हम लोगों के स्तोत्र तथा होम की कामना करती हुई, नः : हम लोगो की, अवन्तु = रक्षा करें। वे हम लोगों को इस प्रकार रक्षा करें कि, न:: हम लोगों को, तुजये - बलवान पुत्र उत्पन्न करने के लिये और, वाजसातये - प्रभूत धन लाम निरुक्तं द्वादशाध्यायस्य पटचत्वारिंशः खण्डः । 31 वे, सुहवा करने के लिये, प्रावन्तु = समर्थ बनावें । याः = जो, पार्थिवासः - पृथिवो पर निवास करती हैं और, या: - जो, अपाम् = अन्तरिक्ष में जवर्षण रूम, प्रो = कर्म में निरल सतो हैं, ता: वे, सुडवाः मुन्दर आह्वान योग्य, देवोः देवियां, नः = हम लोगों को, शर्म = कल्याण, यच्छन - प्रदान करें। इस मन्त्र का भाष्य- देवानां पल्य उशत्योऽवन्तु नः प्रावन्तु नोऽपत्यजननाय चान्नसंसननाय च । या! पार्थिासो या अपामपि कमणि व्रते ता नो देव्या सुहाः शर्म यच्छन्तु शरणम् ॥ देवानाम् = इन्द्रादि देवों को, पल्यः - परिनयां, उशत्य:- हमारे स्तोत्र तथा होम को कामना करती हुई, नः = हमारी, अवन्तु = रक्षा करें । नः = हमें, अपत्यजननाय - वलवान पत्रादि सन्तान उत्पन्न करने के लिये, च = और, अन्नसंसननाय = प्रभूत अन्न अर्थात धन लाभ करने के लिये, हमें, प्रावन्तु = समर्थ बना कर रक्षा करें। या: - जो, पार्थिवासः = पृथिवी पर निवास करती हैं और, या: - जो, अपाम् अपि कर्मणि व्रते = अन्तरिक्ष में जलवण आदि कार्य में निरत रहती हैं, ता = सुन्दर आह्वान योग्य, देव्यः = देवियां, नः = हमें, शर्म - शरणम् - शरण, यच्छन्तु = प्रदान करें। तासामेपाडारा भवति - इति निरुक्त द्वादशाध्यायस्य पञ्चचत्वारिंशः खण्डः ॥ १२-४५ ।। तासाम् - उन देवपत्नियों को एपा = यह अग्रिम, अपरा = दूसरी ऋचा, भवति = है- अथ निरुक्त द्वादशाध्यायस्य पट्चत्वारिंशः खण्डः ॥ उत मा व्यंन्तु देवपत्नारिन्द्राण्यग्नायश्विनी राट् । आ रोदसी वरुणानी शृंणोतु व्यन्तु देवाय ऋतुजनांना ३ ॥ • ऋ 'सं. ४-२-२८-८ ॥ इस मन्त्र का प्रतिक्षत्र ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और देवपलियां देवता हैं। मन्त्रार्य-उत = और देवपत्ती - देवपत्ती, ग्नाः . विगं, वपन्नु = हव्य भक्षण करें। राट = राजमान, इन्द्राणी 3 इन्द्रपत्नी. अग्नायी - अग्निपत्नी. अश्विनी = अश्विनीकुमार पत्नी, रोदमी = मंद पत्नी. कणानी वक्षण पत्नी, आदि प्रत्येक देवियों हमारी स्तुतियों को, आशृणोत्. = श्रवण करें। देवी: = देवियाँ, यन्तु - हम भक्षण करें और, या: = देवपत्तियों में जो,' = ऋतुओं को अधिष्ठात्री देवी, जनीनाम् = देवजाया हैं वे भी, स्तोत्र श्रवण और हव्य भमण करें। इस मन्त्र का माप्य- अपि मा व्यन्तु देवपत्न्य इन्द्राणीन्द्रस्य पन्यमायनेः पल्यश्विन्यश्विनोः पत्नी। राट् राजतेः, रोदसी रुद्रस्य पत्नी। वरुगानी च वरुणस्य, पत्नी व्यन्तु दिव्यः कामयन्तांय ऋतुः कालो जायानां या कालो जापानाम् ।
- (१५८६) निरुक्त द्वादशाध्यायस्य पटचत्वारिंशः खण्डा । इति श्रीमद्यास्कमुनिप्रणोत निरुक्तमान देवनकाण्डे • द्वादशाध्यायस्य पटचत्वारिंशः खण्ड: ।। १२-४६ ।। अपि = और. देवपल्यः = देवपली, ग्नाः = खियो, व्यन्तु हव्य भक्षण करें। इन्द्रस्य - इन्द्र को, पत्लो = खो. इन्द्राणी - इन्द्राणो, अग्नेः पत्नी = अग्नि की स्रो. अग्नायो - अग्नायो, अश्विनोः पत्नी = अश्विनों को स्रो, अश्विनी - अश्विनी, राट् = राजमान राजते: = राज धातु से, राट - राट् शब्द बना है, रुद्रम्य = पत्तो = रुद को खो. रोदमो - रोदसी, च = और. वरुणस्य पत्नी = वरुण की बो, वरुणानी = वरुणानी, आदिप्रत्येक, देव्या = देवियां हव्य की, कामयन्ताम = कामना करें। और देवपलियों में, य = जो, जायानाम छियों का, अतः कालः का काल है उसी में कामना करें अर्थात पत्नियों का भवन काल है उमी में भोजन करें। अथवा ऋतु काल ही घियां विषय कामना करें अन्य काल में नहीं। नोट-सर्वत्र 'रोदसी' द्यावापृथिवी वाचक खोलिन द्विवचनान्त पाया जाता है। परन्तु यहाँ एकवचनान्त अत एव रुद्रपत्तो वाचक ममझना चाहिये । क्योकि, भाष्यकार इसका अर्थ पत्नी' करते हैं और आथर्वण में प्रगृह्य संज्ञा नहीं की है। यदि द्विवचनान्त पद' होता तो 'ईदू देद्विवचनंप्रगृह्यम्' इस सूध से प्रगृह्य संज्ञा होनी थी। शुभमिति ।। एव प्रपूर्व विधात किल देवतस्य काण्डस्य तां गुरुपदाजयुगे समप्य । जानातु देवतवचोऽल्पयतिजनोऽपि श्री ब्रह्मलीनमुनिरेतदहं प्रयाचे ॥ इति श्रीमद्यास्कमुनिप्रणीतनिरुक्तशास्त्रत्स्य ब्रह्मलीनमुनिकृतदेवनागरीव्याख्या सम्पूर्णा । इति निरुक्तं द्वादशोऽध्यायः । इति निरुक्त उत्तरपरके पष्ठोऽध्यायः । इति निरुक्त उत्तराद्धः समाप्तः । अयं ग्रन्थः समाप्तः । निरुक्त के द्वादश अध्याय का खण्ड सूत्र- अधातोशुस्थानाधमातिपुस्मेहेहजातापानयुजापानयजध्वस्त शिप्रमेना उत्याः सुशिक वृषाकपारयणगृहस्त्वष्टादहिने सविनाविवारमानिप्रतिजितमदत्याधिशुकन्तेपर्यस्पथ र विष्णु विश्यानरोव्याख्यातो विध्यानस्ययेनापायकैनिनुष्कं याग्नि प्रयः केशिनः पुनरेवियस्मिन्वृक्षेपायीर- घीयदीन्द्राग्नीपवित्रयन्त उननोद्वियोमर्याधातोपुग्थानादेवगण मागिरः सप्तऋषपस्तिथ्यंग्वलो देवानाम्भ द्रोमालोयोन सुगाशेज्मया अवशनोभवन्तुदेवानां पत्नी स्तग्नाव्यन्त्यितिषटघरयारिंशत् ।। अशान्तिः शान्तिः शान्तिः yo 1 श्रीगणेशाय नमः। यः सर्वभूतेषु निगूढरूपश्चरन् सदात्मा विनिवृत्तकामः । तमेव तला; परिशिष्टकाण्ड-ज्याख्यां तनोम्पार्यभुवोचोमिः ॥ + -निरुक्तशास्त्रम् अथ परिशिष्टम् । त्रयोदशोऽध्यायः । तत्र प्रथमः खण्डः। अथ निरुक्त प्रयोदशाध्यायस्य प्रथमः खण्डः । अर्थमा अतिस्तुतय इत्याचक्षते । अप = निघण्टु के भाष्य निरुक्त के समाप्ति के अनन्तर, इमा: = जो आने वाली स्तुतियों हैं, उनको विद्वान लोग, अतिस्तुतयः , अतिस्तुतियां, “इति = यह, आचक्षते' = कहते हैं। क्योंकि इन में यह संज्ञा प्रसिद्ध है! अपिवा संप्रत्यय एव यामाहाभाग्याद् देवतायाः। अपिवा = अथवा, देवतायाः = देवताओं के, माहाभाग्यात् = महान् ऐश्वर्य के होने से संप्रत्ययः एव स्यात् = समान ज्ञान ही हो सकता है । अर्थात पूर्ण प्रतीति ही होती है । देवताओं में विषय में जितना अतिशय कहाँ जाप सब संगत है। :: सोऽग्निमेव प्रथममाहं । सा = वह देवस्तोता, प्रयमम् - सब से पहले, अग्निम् एव अग्निदेवता को ही, आह कहता है। जैसे- "त्वमग्ने द्युभिस्त्वाशुशुक्षणिः" माने = हे अग्निदेव!, त्वम् = तुम, धुभिः = यज्ञ दिन मैं और, त्वम् - तुम, आशुशुक्षणिक सर्वतः दीप्तिमान हो कर उत्पन्न होते हो। इस मन्त्र में सर्व प्रथम अग्नि देवता की अतिस्तुति की गई है । सम्पूर्ण पत्- स्वमग्ने युभिस्त्वमांशुशुक्षणिस्वमद्भयस्त्वमश्म॑नस्परि वं वनेभ्यस्त्वमोषधीभ्यस्त्वं नृणां नृपते जायसे शुचिः ॥ म. सं. २-५-१७-१।। इस मन्त्र का गृत्समद ऋषि, जगती छन्द और अग्नि देवता है । मन्त्रार्य-माने - है अग्निदेव ! और, नृणामतृपते = हे मनुष्यों के स्वामिन् !, स्वम् = तुम, युभिः - प दिन में, - (१५८६) निरुक्त प्रयोदशाध्यायस्य द्वितीया खण्डा । जायसे - उत्पन्न होते हो। स्वम् = तुम, आशुशुक्षणिः = सर्वतः दीप्तिमान् हो कर, जायसे = उत्पन्न होते हो । स्वम् = तुम, अद्भपः = जलों से बड़वानल के रूप में, जायसे = उत्पन्न होते हो। त्वम् = तुम, अमनः पाषाणं से, परिजायसे = उत्पन्न होते हो । त्वम् = तुम, वनेभ्यः = वृक्षादि समूह से दावानल के रूप में, जायसे = उत्पन्न होते हो । त्वम् = तुम, मोषधीभ्यः = ओषधियों से धैश्वानर के रूप में, जायसे = उत्पन्न होते हो और, स्वम् = तुम, शुचिः = पवित्र मादित्य रूप से, जायसे = उत्पन्न होते हो । इस चा में बहुत प्रकार से पृथिवी स्थान अग्नि की स्तुति होने से उस की अतिस्तुति है। यथैतस्मिन्सूक्त। यथा - जैसे, एतस्मिन् = इस पूर्वोक्त गृत्समद ऋषि से हष्ट अग्नि देवताक 'स्वमग्ने' इत्यादि १६ ऋचा वाले, सूक्ते = सूक्त में पृथिवी स्थान अग्नि का प्रतिपादन किया गया है । मध्यस्थान में जैसे- " नहि त्वदारे निमिपंचनेशे" इति घरुणस्य । त्वदारे तुम से अन्य को, निमिषश्चन = एक पल (निमेष) भी, नहि ईशे = आधिपत्य नहीं कर सकता है । इति - यह, वरुणस्य - मध्यस्थान वरुण देवता का प्रतिपादन किया गया है। सम्पूर्ण मन्त्र निम्नलिखित है- अपो सु म्यक्ष वरुण भियसं मत्सम्राकृतावोऽनु मा गृभाय । दामेव वत्साद्वि मुंमुग्ध्यहाँ नहि त्वदारे निमिर्पश्चनशै ॥ प्र. सं. २-७-१०-६ ॥ इस मन्त्र का गृत्समद पि, त्रिष्टुप् छन्द और वरुण देवता है । मन्त्रार्थ = वरुण = हे वरुणदेव ! मत - मेरे पास से, भियसम् = भय को, सु अप:म्यक्ष = भलीभांति दूर कर दो। सम्राट् - है सम्राट् ! ऋतारः = हे सत्यवान् !, मा - मुझ पर, अनुगृमाय = अनुग्रह करो। यरसाद दाम इव: बछड़े से रस्सी जैसा अर्थात् जैसे बछड़े से रस्सी को पृथक किया जाता है वैसे ही, मेहः - हम से पाप को, विमुमुग्यि - पृथक् कर दो। मुझे पाप से मुक्त करो। स्वदारे %D तुम से अन्य कोई, निमिषधन = एक निमेष (पल ) भो, नहि ईशे - आधिपत्य नहीं कर सकता है । इस वा से मध्यस्थान वरुण देवता की अतिस्तुति की गई है। इति प्रथमस्य प्रथमः खण्डः ।। १-१ ॥ अथ एपेन्द्रस्य । अथ प्रथमस्य द्वितीयः खण्डः। अथ - वरुण को अतिस्तुति के अनन्तर, एपा = यह अग्रिम ऋचा, इन्द्रस्य = मध्यमस्थान इन्द्र को अति स्तुति है- - - - स्वा . D प्रतिमा, स्युः S तुम को, निरक्त त्रयोदशाध्यायस्य तृतीया खण्डौ । (१५८६) ययाव इन्द्र ते शतं शतं भूमीरुत स्युः । न त्वां वचिन्त्सहस्र सूर्या अनु न जातमष्ट रोदसी ॥ #स. ६-५-९-५ ॥ इस मन्त्र का पुरुहन्मा ऋपि, वृहती छन्द और इन्द्र देवता है। मन्त्रार्थ--इन्द्र = हे इन्द्र!, 'वचिन् = हे वज्रघारिन् ! यत् - यदि, शतम् धावः सैकडों द्युलोक, उत - और, शतम् भूमोः सैक्डो पृथिवीलोक, ते = तुम्हारी प्रतिमा हो तो भी, तुमको, न = न पा सकते, सहस्रम् 'सूर्याः = हजारों सूर्य भी, त्वा = तुमको, ग : न पा सकते और जातम् - पूर्व उत्पन्न, रोदसी द्यावापृथिवी भी, त्वा = तुम को, न अन्वष्ट = न पा सकते। इस मन्त्र का भाष्य- यदि त इन्द्र शतं दिवः शतं भूमयः प्रतिमानानि स्युनत्वा वजिन् सहस्रमपि सूर्या न द्यावापृथिव्यावप्यनुवीतमिति । इन्द्र हे इन्द्र !, यदि = यदि, शतम् दिव. = सैकडो द्युलोक और, शतम् भूमया = सकडो भूमिलोक, ते - तुम्हारी, प्रतिमानानि = हो तोभी, स्वा नहीं पा सकते हैं । वचिन् = हे वज्रयारिन् !, सहस्रमपि = हजारो भी, सूर्याः = सूर्य क्यो न हो तो भी, त्वा न - तुम को प्रकाश नही कर सकते हैं । एवं, द्यावापृथियो अपि - द्युलोक तथा पृथिवी लोक भी, स्वा न = तुमको नही, अनुवीतम् = पा सकते हैं । इति = इत्यर्थः । इति प्रथमस्य द्वितीयः खण्डः ॥ १-२॥ अथ - एपाऽऽदित्यस्य । अथ प्रथमस्य तृतोय. खण्डः । अथ = इन्द्र की अतिस्तुति के पश्चाद, एपा • यह अग्रिम ऋचा, आदित्यस्य मादित्य को, अतिस्तुति है- यदुर्दश्चो वृपाकपे गृहमिन्द्राजगन्तन । कस्य पुल्वघो मृगः कर्मगअनयोफ्नो विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥ म स. ८-४-४-२२॥ इस मन्त्र का इन्द्राणी पि, पञ्चपदा पक्ति छन्द और मादित्य देवता है । मन्त्रायं-इन्द्राणी -कहती है कि, इन्द्र हे इन्द्र ! और, वृपाक्पे - हे वृषाकपे आदित्य ! तुम दोनो, उदभ्यः मसर मुख किये हुए मेरे गृह में, अजगन्तन = आमो । पुल्वधः = वह मोक्ता और, जनयोपनः = जन हपं दाता, स्यः वह, मृगः : मृग, फ - कहा और, कम् = किस देश मे भगन् - गया। इन्द्रः- इन्द्र, विश्वस्मात् = सर्व से, उत्तरः- श्रेष्ठ है। . D उत्तमस्थान - (१५९०) निरुक्ते त्रयोदशाध्यायस्य चतुर्थः खण्डः । इस मन्त्र का भाष्य- D . - - यदुदञ्चो धृपाकपे गृहमिन्द्रा जगमतकस्य पुल्वघो मृगः ।. व सबबादी । मृगो मागतिकर्मणः । कमगमद् देशं जनयोपनः । सर्वस्माद् य इन्द्र उत्तरस्तमेतद् घूम आदित्यम् । वृपाकपे - वृषाकपे आदित्य ! और, इन्द्र - हे इन्द्र ! तुम दोनो, उदञ्चन: - अपर मुख करते हुए, गृहम् = हमारे घर, आगो। स्यः = वह, पुल्वधः = बहुभोक्ता, मृगः मृग ( स्वरूप ), क = कहा, अजगमत = गया । अर्थात्, सः = वह, बह्वादी बहभोक्ता, क कहा गया । गतिकर्मणः = गत्यर्थक, माप्टेंः = मृज धातु से, मृगः = मृग शब्द बना है। अर्थात् ' माष्टि इति. मृगः' इस विग्रह मे धातूनामनेकार्थत्वात् गत्यर्थक 'मृजू शुद्धो' धातु से इगुपच लक्षण क (अ) प्रत्यय और कुत्व होने पर मृग शब्द बना है। जनयोपन = जनहर्षदाता, कम् देशम् अगमद किस देश को गया। गः इन्द्रः : जो इन्द्र, सर्वस्मात् = सब से, उत्तरः = श्रेष्ठ है। इसी लिये हम, तम् = उसको, एतद् = यह, मः = कहते हैं कि वह, आदित्यम् - आदित्य है। इति तृतीयः खण्डः । अथ - एपाऽऽदित्यर मीनाम् । अथ चतुर्थः खण्ड। आदित्य की अतिस्तुति दिखाने के अनन्तर, एषा यह अग्रिम प्रचा, मादित्य- र मीनाम् - मादित्य की रश्मियो को अतिस्तुति है- वि हि सोतोरस॒क्षत नेन्द्रं देवममंसत । यत्रामंदवृषाकपिर्यः पुष्टेषु मत्सखा विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥ म सं. ८-४-१-१॥ इस मन्त्र का भी पूर्ववद प्रप्यादि है। मन्यार्य-जब आदित्य ने अपनी रश्मियो को, सोतोः = प्रकाश द्वारा सर्व प्राणियो को ज्ञान देने के लिये, वि असृक्षत = उत्पन्न किया तय उन रमियों ने, इन्द्रम् = आदित्य को, देवम् = देव, न अमंसत = नहीं माना ।, किन्तु हम स्वयं स्वतन्त्र सब को प्रकाशित करती हैं ऐसा उन्होने अभिमान किया। तो भी, पुष्टेगु पुष्ट, यत्र = जिन रश्मियो मे, वृषाकपिः = आदित्य, अयः स्वामी, मत्मसा = सव का सखा हो कर, अमदद = हृष्ट है। इसी लिये, इन्द्रः = आदित्य, विश्वस्मात् = सर्व से, उत्तरः = श्रेष्ठ है । इस प्रकार इस ऋचा मे आदित्य रमियो की अतिस्तुति है। अथ - D 1 -- - मादिस्य से - इस मन्त्र का भाष्य- व्यसृक्षत हि प्रसाय, न घेन्द्रं देवमर्मसत, यत्रामदद् वृषाकपिर्य ईश्वरः पुष्टेषु पोपेषु, मत्सया मम ससा, मदनससा, ये नः सखायस्तः सहेति वा, सर्वस्माद् य इन्द्र उत्सरस्तमेतद् एम आदित्यम् ।
निरक्त त्रयोदशाध्यायस्य पञ्चमः खण्डः । = जब मादित्य ने अपनी रमियो को, प्रसवाय = सब को ज्ञान देने के लिये, व्यसृक्षत 'उत्पन्न किया तब उन रश्मियों ने, इन्द्रम् = आदित्य को, देवम् = देव, न अमंसत - नहीं माना। पुष्टेषु = पोपेषु = मादित्य से परिपुष्ट, यंत्र - जिन रश्मियों में, वृषाकपिः = आदित्य, अर्यः = ईश्वरः = स्वामी होता हुमा, मत्सखा = मम सखा = मेरा सखा वा सब का सखा वा = अथवा, मदनसखा = "हर्ष सखा, वा = अथवा, ये = जो रश्मियां, नः = हमारी, सखायः - मित्र हैं, तैः सह = उन के साथ। इसी लिये, सर्वस्मात् = सव से, य: इन्द्र. = जो आदित्य, उत्तरः = श्रेष्ठ है, तम् = उस * को, आदित्यम् = आदित्य है, एतद् = यह हम, ब्रूमः = कहते हैं । इति चतुर्थः खण्डः। अथैपाऽश्विनोः । अथ पञ्चमः खण्डः। अथ = अव, एषा = यह अग्निम अवा, अश्विनोः - अश्विनों की अतिस्तुति है- सृण्येव जरी तुर्फरीतू नैतोशेव तुर्फरी पर्फरीको । उदन्यजेव जेमना मदेरू ता में जरायवजरं' मरायु ॥ ऋ. स. ८-६-१-६॥ इस मन्त्र का कश्यप ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और अधि देवता है। मन्त्रार्य हे अश्विद्वप ! तुम, सृण्या इव - अङ्कश के समान, जभरो = भरता और, तुर्फरीतू = शत्रुओ के हन्ता हो। तुम, नतोशा इव - पवहन्ता राजपुत्र के समान, तुरो = दुष्टों को शोघ्र नष्ट करने वाले और उनको पर्फरीका = फाड़ने वाले हो । तुम, उदन्यजा इव = सामुद्र अथवा चान्द्रमस रत्न के समान, जेमना% 1 मन को जीतने वाले तथा, मदेरू - हपं प्रदान करने वाले हो । ता = वे तुम, मे = मेरे, मरायु - मरणयर्मा, जरायु - शरीर को, मजरम् = जरावस्था रहित अर्थात् जरामरण रहित अमर, कुक्तम् : करो। इस मन्त्र का भाष्य- मृण्येवेति द्विविधा सृणिर्भवति भर्ता च हन्ता च । तथा-अश्विनी चामि भारी। जरी भारावित्यर्थ स्तुर्फरीतू हन्तारौ । “नतोक्षेत्र तुरी परीकी" नितोशस्थापत्य नैवोश, नतोशे व तुरीतू क्षिप्रहन्तारौ । " उदन्यजेब जमना मदेरू" उदन्यवेत्युदकने इस रत्ने सामुद्रे चान्द्रमसे इति वा जैमने जपमाने "ता में जरावजरं मरा" एतन- राजपुजं शरीरं शरदमजीर्णम् ।।
वैसे ही, - (१५९२) निरुक्त प्रयोदशाध्यायस्य पेष्ठा खण्डौ । सृण्येवेति' इतना अश मूल का प्रतीक है । सृणि: = अङ्कश [ वा दात्री ] द्विविधा = दो प्रकार का, भवति = होता है। भर्ताःच हन्ता च = एक भर्ता और दूसरा हन्ता। तथा = अश्विनी च अभि = अश्विन भी, भारी = भर्ता है। जरी भर्तारी इत्यर्थः जभरी का भर्ता यह अर्थ है और, तुफरीतू हन्तारी इत्यर्थः - तुर्फरीतु का ह-ता यह अर्थ है। नैतोशे व = शत्रुहन्ता राजपुत्र के समान, तुर्फरी = दुष्टो को शीघ्र नष्ट करने वाले और उनको पर्फरीका = फाडने वाले हो। नितोशस्य अपत्यम् - नितोश की सन्तान, नैतोशम् = नैतोश कहा जाता है। नैतोशे व = नितोश राजा के पुत्र के समान, तुर्फ रीतू = क्षिप्रहन्तारौ = शीघ्र नष्ट करने वाले । 'उदन्यजेव जेमना मदेरू' इतना अश मन्त्र का प्रतीक है। उदन्यजेव = उदकजे इव मय, सामुद्रेच = सामुद्र, इति वा = अथवा, चान्द्रमसे - चान्द्रमस, रत्ने इव = रत्न के समान, जेमने = जयमाने = मन को जीतनेवाले हो । ता एतन् = वे, मे = मेरे, मरायु जरायु = जरायुजम् जरायु से जायमान, शरदम् शरीरम् = नाशप्रद शरीर को, अजरम् अजीर्णम् = अरामरण रहित अमर, कुरुतम् = करो । इति पञ्चम खण्ड. । अथ-एपा सोमस्य । = जल- = मरण धर्मा, %3D अथ पप्ठः खण्डः । . अथ = अब, एपा = यह अग्निम प्रचा, सोमस्य = सोम की अतिस्तुति है- तरत्स मन्दी धावति धारा सुतस्यान्धसः । तरत्स मन्दी धावति ॥ ऋ स. ७-१-१५-१ ।। इस मन्त्र का अवत्सार ऋपि, गायत्री छन्द और पवमान सोम देवता है। मानार्थ-य जो सुतस्य अभिपुत, अन्धसः • अदनीय (भक्षणीय) तथा मन्त्रपूत सोम की, धारा - धारा से स्तोत्र द्वारा देवो को, मन्दी = हपं प्रदान करता है, सः = वह, तरत् । तरति = सर्व पापो यो तर जाता है । पाप से मुक्त हो जाता है और, घावति = ऊवं गति को प्राप्त होता है । अत्यन्त आदरार्थ 'तरत्स मन्दी घावति' की पुनरुक्ति की गई है । इस ऋचा से सोम को अतिस्तुति की गई है । इस मन्त्र का भाष्य-- तरति स पापं सर्व मन्दी या स्तौति । धावति गच्छंत्यूर्धा गति "धारा सुतस्यान्धसः " धारयाऽभिपुतस्य सोमस्य मन्त्रपूतस्य वाचा स्तुतस्य ।। जो, मन्दी = देवो को स्तोत्र द्वारा हर्ष प्रदान करनेवाला, स्तौति = देवों की स्तुति करता है, स. वह, सर्वम् पापम् = सर्व पाप को, तरति = नर जाता है और, घावति सर्वाम् गतिम्, गच्छति उध्वं गति को प्राप्त होता हैं। धारा सुतस्यान्धसः - धारयाऽभिपुतस्य सोमस्य = निचोडा हुआ सोमरस की धारा से, सोम कैसा है ?, मन्त्रपूतस्य = वाचा स्तुतस्य वेद वाणी से स्तुत । यः - - निरक्त त्रयोदशाध्यायस्य सप्तमः खण्डः । (१५९३) - इति पष्ठः खण्डः।- अथ - एपा यज्ञस्य । अथ सप्तमः खण्डः। अथ = इस के बाद, एपा = यह अग्निम ऋचा, यज्ञस्य - यज्ञ की अतिस्तुति है- चत्वारि शृङ्गा त्रयों अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तांसो अस्य । त्रिर्धा बद्धो वृषभोरोरवीति महो देवो मत्ाँ आ विवेश ॥ ऋ. सं ३-८-१०-३ ।। इस मन्त्र का वामदेव ऋपि, त्रिष्टुप छन्द और अग्नि आदि देवता हैं। इस मन्त्र से यज्ञ को स्तुति को जाती है और अग्नि यज्ञारमा है । अत: यज्ञ को अतिस्तुति यह अग्नि को ही अतिम्तुति समझना चाहिये । मन्त्राथं-अस्य = इस यज्ञ आत्मा अग्नि के, चत्वारि शृङ्गा = प्राक् यजु साम् और अथर्व ये चार वेद चार सींग हैं। अस्य = इसके, वय - प्रात सवन मध्याह्नसवन और सायंसवन ये तीन सवन, पादाः - तीन पर हैं। इसके, द्वे शोर्षे = प्रायणीय नामक और उदयनीय नामकये दो सिर हैं । अस्य = इसके, सप्त - गायत्री, उपिणक, अनुष्टुप् बृहतो, पति, त्रिष्टुप् और जगती ये सात छन्द, हस्तासः = सात हाथ हैं । वृषभः।- सुख वर्ष यज्ञात्मा, त्रिधा = मन्या वाहाण और कल्प मूत्र रूप तीन प्रकारो से, बद्धः = बँधा हुआ, रोरवीति = रोता है - गर्जना करता है। महः देव: - यह यश रूप महान देव, माम् = मनुष्यों में, आविवेश = प्रविष्ट होता है । इस मन्त्र का भाष्य- P चत्वारि रङ्गेति वेदा वा एत'उक्ताः । त्रयो अस्य पादा इति सवनानि त्रीणि । द्व शी-प्रायणीयोदयनीये । सप्त हस्तासः सप्त छन्दांसि। त्रिधा पद्धस्त्रंधा पद्धो मन्त्र- ब्राह्मण-कल्पः। कृपभो रोरवीति । रोवणमस्य सवनक्रमेण । ऋग्मियजुभिः साममिः। यदेनमृग्भिः शंसन्ति, यजुर्मियजन्ति, सामभिः स्तुवन्ति । महोदेव इति-एप हि महान् देवो ययज्ञो मत्या आविवेशेति-एप हि मनुष्यानाविवेशति पजनाय | चस्वारि शृङ्गा इति = इतना अंश प्रतीक है। एते उक्ता: वेदा वा - ये उक्त ऋगादि चर वेद ही इस यज्ञारमा के चार सौग हैं। त्रयो अस्य पादा इति = यह प्रतीक है। अस्य - इस यज्ञारमा के, यो = त्रीणि = तीन, सवनानि = यथोक्त सवन, पादाः = पाद स्थानीय पार है। देसी प्रावणीय और उदयनीय ये दो सिर हैं। सप्त हस्तासः सप्त छन्दांसि गायत्री आदि सात छन्द ही इस के सात हाय है। विधा वद्ध - त्रेधा वदः मन्त्र ग्राहाण याः - मन्त्र संहिता, ब्राह्मण - ग्राह्मण, और कल्प पूत्र इन तीन प्रकार के अन्यों से यह या पारमा भए, वृषभः पामवर्षीवृषभ, रोरवीति - रोता है अर्थात न करता है। अस्प - इगपा, रोवणम् - रोना, सवनक्रमेण - प्रात. सवनादि कम से समझना चाहिये । प्रमः = ऋग्वेद से, यजुभिः - मनुदेव, - (१५९४) निरक्त प्रयोदशाध्यायस्पाष्टमः खण्ड।। सामभिः = सामवेद से । अर्थात् प्रातः सवन में ऋग्वेदका, मध्याह्न सवन में यजुर्वेद का और सायंसवन में सामवेद का उच्चारण रूपशब्द करना हो इस का रोना है। इसीगे कहते हैं- यत् = जो एनम् - इस यज्ञात्मा को, प्रात'सवन में, ऋग्मिः = ऋग्वेद के मन्त्र द्वारा, शमन्ति = शंसन करते हैं, यजुभिः = यजुर्वेद के मन्त्र द्वारा, यजन्ति = यजन करते हैं और, सामभिः = सामवेद के मन्त्र द्वारा, स्तुवन्ति= स्तवन करते हैं । महोदेव इति यद् यज्ञ - जो यह यज्ञ ये ही, महान् देवः = महान् देव है । मत्ान् आविवेश इति = एप हि यजनाये मनुष्यान आविवेषः यही यजन के लिये मनुष्यो में प्रवेश करता है । इस मन्त्र में यज्ञ की प्रतिस्तुति है । इति सप्तमः खण्डः । तस्योचरा भृयसे निर्वचनाय । एप' हि अथाष्टमः खण्डः । d तस्य = उस यज्ञात्मा अग्नि की, उतरा - अग्रिम ऋचा, भूयसे - अधिक, निर्वचनाय निर्वचन के लिये है- स्वयंन्तो नापक्षन्त आद्यां रोहन्ति रोदसी । यज्ञं ये विश्वतोधारं सुर्विद्वांसो वितेनिरे ॥ यजु. १७. ६८ ॥ % इस मन्त्र का विधृति, अनुष्टुप् छन्द और यज्ञात्मा अग्नि देवता है। मन्त्रार्य- जो. सुविद्वासः - विद्वान्, विश्वतोधारम् = सर्व तरफ से कामना फल रूप धारा के वर्षाने वाले, पशम् - यज का, वितेनिरे में अनुष्ठान करते हैं वे, स्वर्यन्त. = स्वर्ग - वो जाते हुए और, रोदसी द्यावापृथिवी को जाते हुए पुरुष, नापेश ते = विसो स्रोपुत्र धनादि की अपेक्षा नहीं करते हैं पितु धाम् - धुलोक रूपो स्वर्ग को, आरोहन्ति = आरोहण करते हैं। अर्थात् जो यज्ञ करते हैं ग्रह्मलोक प्राप्त करते हैं । यह यज्ञ को अतिस्तुति है । इस मन्त्र का भाष्य- स्वर्यन्त ईजाना वा नेक्षन्ते तेऽभमेव लोकं गतवन्तमीवन्तमिति । आयां रोहन्ति रोदसी । यज्ञं ये विश्वतोधार-सर्वतोधारम् । सुविद्वांसो वितेनिरे-इति ।। स्वतः जो स्वर्ग को (ब्रह्मलोक को) जाते हुए, वा अथवा, ईजाना:- पज्ञ को करते हुए पुरुष होते हैं, ते = वे, अमुम् एव लोकम् गतवन्तम् उसी इन्द्रादि लोक पो गये हुए पो था, इसन्तम् = देखनेवाले को, न ईशन्ते = नहीं देखते हैं किन्तु, रोदसी = जरामरणादि शोक को रोक्ने वाले, धाम् : द्युलोक अर्थात् ब्रह्मलोक को, बारोहन्ति - मारोहण करते हैं। वे कौन हैं ? इस - तिक्तत्रयोदशाध्यायस्य नवमः खण्डः । 5 उत्तर देते हैं-ये विद्वासः जो विद्वान, विश्वतोधारम् = सर्वतोपारम् = सर्व तरफ से सुख वर्षाने वाले, यज्ञम् वितेनिरे यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं अर्थात् कर्म और उपासना दोनो को एक साथ अनुष्ठान करते हैं। भाव यह है कि जो यज्ञ करते हैं वे ब्रह्मलोक जाते हैं। मुक्त हो जाते हैं। यह यज्ञ की अतिस्तुति है। इति अष्टमा खण्डः ! .अथैपा वाचः प्रवहितेन । अथ नवमः खण्डः। अथ इसके पश्चात्, एपा - यह अग्रिम अचा, पाच = वाग्देवता की प्रतिस्तुति है, जो, प्रवहिता इव = पहेली के समान अनभिध्यक्तिविषिष्ट कूट रूप है। चस्वारि वाक्परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः । गुहा त्रीणि निहिता नेग्यन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति । स २-३-२२-४५ ॥ इस मन्त्र का दीर्घतमा अषि, विष्टुप् छन्द और वाग्देवता है । मन्थार्थ-वाक् = वाचः - सम्पूर्ण वाणी के, पदानि = पद, चत्वारि - चार प्रकार से, परिमिता = परिमितानि परिमित हैं। अर्थात् लोक मे जो वाणी बोली जाती है वह चार प्रकार से विभक्त है। तानि = चन चारो को, मनीषिण मेधावी, ब्राह्मणा - वेदवित् ब्राह्मण लोक ही. विदुः - जानते हैं । दूसरे कोई अज्ञानी जन नहीं। उन चार" पदो मे, त्रीणि = जो तीन प्रकार के पद हैं वे, गुहा गुहायाम - धुद्धि रूपी गुफा मे, निहिता स्थापित हैं। न इङ्गति = ये चेप्टा नहीं करते हैं। अर्थ प्रकाश नही करते हैं। और जो, धाच = वाणो के, तुरीयम् = चतुर्थ पाद है उसको, मनुष्का शानी अज्ञानी सभी मनुष्य, वदन्ति = योलते हैं। स्पष्ट उच्चारण करये सब व्यवहार करते हैं। इस गात्र का भाष्य.-- याच:: चत्वारि वाचः परिमितानि पदानि वानि पिदुर्याक्षणा ये मेधाविनी, गुहापां त्रीणि निहितानि नार्थ वेदयन्ते । गुहा गृहतेः । तुरीयं त्वरते। . वाणी के, चत्वारि पदानि चार पद, परिमितानि - परिमित है । तानि - उन को, ये - जो, ब्राह्मणा मेधाविनः = ग्राह्मण मेधावी हैं ये ही, विदुः - जानते हैं, अन्य नहीं। उनमें, नोणि = तीन पद, गुहायाम - बुदि रूपी गुफा मे, निहितानि = रसे हुए हैं। अपम् न वेदयन्ते - बर्ष प्रा नही परते हैं। गृहते' गुह धातु से, गुहा - गुहा मन बना है। अपति 'गृहती इति गुहा' इस विग्रह में 'गुह सवरणे' धातु से 'गुपच भाप्रीकिर कः' इस सत्र से + (4) प्रत्यय, किरवाव गुणामार और टाप होने पर गुहा शब्द बना है । गुफा । नाम है। क्योंदि वह दास्ती . - 4 । निरुक्त प्रयोदशाध्यायस्प नवमा खण्डा है। एवं, स्वरतेः - स्वर धातु से, तुरीयम् - तुरीय शब्द' बना है । अर्थात् 'सरते शीघ्रतां. कुरुते इति •तुरोयम्' इस विग्रह मे जित्वरा संभ्रमे' धातु से पृषोदरादित्वात् तुरोय शब्द बना है। लोक मे • चतुर्णा पूरण तुरीयम्' इस विग्रह मे 'चतुर छयता' इत्यादि सूत्र से तुरीप शब्द सिद्ध हुआ है। चत्वारि पदानि' के मतभेद से सात अर्थ हैं उनको दिखाने के लिये भाष्यकार प्रश्न उाते हैं- कतमानि तानि चत्वारि पदानि ।। उक्त मन्त्र में जो वाणी के चार पद पहे हैं, तानि = वे, चत्वारि पदानि = चार पद, कतमानि --कौन कौन है.. उत्तर देते हैं- ॥ | Trifer ओंकारो महाव्याहृतयश्चेत्यार्पम् । " TIT ओकारः एक ओम्, च = और, महाव्याहृतयः = तीन महाव्याहृतियाँ भूर्भुवः स्वः = ये चार वाणी के पद हैं. इति - यह मापंम् - वेदवादी ऋषियों का मत है । नामाख्याते चोपसर्गनिपाताश्चेति चैयाकरणाः । नामाख्याते-नाम - सुबन्तपद, आख्यात - तिङन्तपद, च = और, उपसर्गनिपाता: = प्रादि उपसर्ग, च = और, स्वर् प्रातर् आदि निपात ये चार वाणी के पद हैं, इति - यह, वैयाकरणाः । वैयाकरण लोग कहते हैं । मन्त्रः, कल्पो ब्राह्मणं चतुर्थी व्यावहारिकीति यज्ञिकाः । मन्त्रः = मन्त्र, वल्पः = कल्प, ब्राह्मणम् = ब्राह्मण और, चतुर्थी = चौथो, व्यावहारिको व्यवहार साधक लौकिक वाक्य ये चार वाणी के पद हैं, इति : यह, यशिकाः = कर्मकाण्डी याशिक लोग कहते हैं । उनमें अनुष्ठेय अर्थ का प्रवाशक जो वेद का सहिता भाग है वह मन्त्र, वापसूत्रादि पल्प, मन्त्र के तात्पर्याय प्रकाशक जो वेदभाग यह ब्राह्मण और गाम् आनय' इत्यादि जो लौकिक वाक्य वह, व्यावहारिको वाणी वही जाती है । ये ही सर्वा वा नियमित है । तीन को ब्राह्मण और चतुर्थी का ज्ञानी मानी सब जानते हैं । ऋचो यपि सामानि चतुर्थी व्यावहारिकीति नरुताः । वः = ऋग वाक्य, यजूपि = यजुर्वाक्य, सामानि : = सामवाक्य और, चतुर्थी - चौथी, नावहारिक व्यवहारिक वाणी ये चार वाणी के पद हैं, इति = यह, नाता: - नक्त लोग करते हैं। { साणां वाक्, वयसाम् , क्षुद्रस्य सरीसृपस्य, चतुर्थी वाहारिकीत्येके । सर्याणाम् वाक् = सपा को याणी, वयसाम् वाक् = पक्षियो यो वापी, क्षुद्रस्य सिरीसृपक्ष्य वाय = शुद्ध जाति के खिसक पर चलने वाले जन्तुओं (रौंगने वाले) को वाणी (और, चतुर्षी - इन में प्रथम - । .
निरुक्त प्रयोदशाध्यायस्य दशमः खण्डः । D . । 5 - F व्यावहारिको - चौथी मनुष्यों की व्यवहारिक वाणी ये चार वाणी के पद हैं, इति : यह, एके ऐतिहासिक एक कोई अधिभूतविद् विद्वान् कहते हैं। पशुषु-तूणवेषु-मृगेप्वात्मनि चेत्यात्मप्रवादाः । पशुपु = ग्राम्य पशुओ मे, तूणवैपु = वाद्यो मे, मृगेषु - अरण्य पशुओ मे, च = और, मात्मनि = मास्मा मे अर्थात् मनुष्यो मे जो वाणी हैं वे वाणी के चार पद है, इति = यहे। आत्मप्रवादा = आत्मा को कहने वाले आचार्य लोग कहते हैं। अथापि ब्राह्मणं भवति । अथ = इस के बाद और, अपि - भी, ब्राह्मणम् = ब्राह्मण ग्रन्य, भवति - है- 1 सा वै वापसृष्टा चतुर्धा व्यभवदेवेव लोकेषु त्रीणि पशुपु तुरीयं या पृथिव्यां सानी “सा रथन्तरे। यान्तरिक्षे सा वायो सा वामदेव्ये । या दिवि सादित्ये सा वृहति सा स्तनयित्नावथ पशुपु । या वागत्यरिच्यत तां ब्राह्मणे दधु तस्माद् ब्राह्मणा उमेयीं वाचं वदन्ति या च देवानां याच मनुष्याणामिति । सृष्टा = परमेश्वर से उत्पन्न हुई, सा वाक् यह पूर्वोक्त वाणी, चितुर्धा - चार प्रकार से व्यभवत् = हो गई है, फैली हुई है । एषु एव लोकेषु - पृथिवी, अन्तरिक्ष और यू इन्हीं तीन लोको मे, त्रीणि * प्रथम को तीन प्रकार की वाणी है और, पशुपु तुरीयम् - मनुष्यों में चौथो व्यावहारिक वाणी है। चार में से पहली तीन वाणियें क्रमश. या पृथिव्याम् = जो वाणी पृथिवी में है, सा अग्नी = वह अग्नि मे है, सा रयन्तरे = वह रथन्तर साम में, या अन्तरिक्षे- जो वाणी अन्तरिक्ष मे है, सा वायो वह वायु मे, सा वामदेव्ये - वह वामदेव्य साम मे। या दिवि = जो वाणी धुलोक मे है, सा आदित्ये वह मादित्य मे, सा बृहति = वह वृहत्साम मे, स्तनयिली स्तनयिरनु रूप से निहित है, अथ - और जो चतुर्थ व्यावहारिक वाणो है वह, पशुपु : मनुष्यो मे रहती है। या वाक् = जो वाणी, अत्यरिच्यते = अधिक बढी हुई है, ताम् - उसको, ब्राह्मणे वेदवित् ब्राह्मणो मे, दधु स्थापित की गई है। तस्मात् = इसी से, ब्राह्मणाः = वेदज्ञ ब्राह्मण लोग, उभयोम् वाचम् - वैदिव तथा लौकिक दोनों प्रकार की वाणी, वदन्ति' बोलते हैं। या च देवानाम् ='जो देवों को और, मनुष्याणाम् = 'मनुष्यो को, वाचम् = वाणी है उन दोनों को बोलते हैं । वैदिक वाणी देवों की और लौकिक मनुष्यों को समझनो चाहिये । इति नवम. खण्ड । अथपाऽक्षरस्य । अप दशम खण्ड.।' वाग्देवता की प्रतिस्तुति के अनन्तर, एषा - यह ऋचा, अक्षरस्य - वा तदाच्य अक्षर ब्रह्म की अतिस्तुति है-- D S 1 मोकार मार को थप - (१५९८) निरुक्त प्रयोदशाध्यायस्य देशमः खण्डः । ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्यस्मिन्देवा अधि विश्वे' निषेदुः । यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति य, इत्तद्विदुस्त इमे समासते ॥ ऋ. सं. २-३-२१-३९ ।। - इस मन्त्र का दीर्घतमा ऋपि, त्रिष्टुप् छन्द और विश्वदेव अन्तर्गत अक्षर देवता है । मन्त्रार्थ-- ऋचः = ऋग्वेदादि से प्रतिपादित, यस्मिन् = जिस, परमे - सर्वोत्कृष्ट, व्योमन् = आकाशवत् सर्वत्र ध्यापक, अक्षरे = वाचक ओम् अक्षर के वाच्य विनाश रहित ब्रह्म में, विश्वे देवाः = सूर्यचन्द्रादि सर्व देव, अधिनिपेदुः = आपेय रूप से स्थित हैं, सत् = उस ब्रह्म को, यः = जो, न वेद = नहीं जानता है वह ऋवा = ऋगादि वेदों से, किम् करिष्यति = क्या करेगा ? अर्थात् उसका वेदाध्ययन सर्वथा निष्फल है । इस के विपरीत, ये जो, तव = उस ब्रह्म को, विदुः = 'जानते हैं, ते इमे इत - वे ही ये, समारते = ब्रह्म में मिलते हैं । एकीभाव को प्राप्त होते है। जन्मादि संसार बन्धन से मुक्त होते हैं । - इस मन्त्र का भाष्य- 7 ऋचः- ऋचो अक्षरे परमे व्यवने यस्मिन्देवा अधिनिषण्णाः सर्वे । यस्तम्न वेद किं स ऋचा फरिष्यति, य इत्तद्विदुस्त इमे समासत इति विदुप उपदिपति । कतमत्तदेतदक्षरमोमित्येपा यागिति शाकणि:-"प्रश्चाक्षरे परमे व्यवने घीयन्ते नानादेवतेषु च मन्त्रेष्वेवद्धवा एतदक्षरं यत्सर्वा त्रयीं विद्यां प्रति प्रति" इति च ब्राह्मणम् । इति निरक्ते प्रयोदशाध्यायस्य दशमः खण्डः । चा से प्रतिपाद्य, परमे = सर्वोत्कृष्ट, व्यवने = व्योमवद व्याप्त, अक्षरे - अक्षर ब्रह्म में, यस्मिन् = जिसमें, सर्वे देवाः = सूर्यादि. सर्व देव, अधिनिषण्णाः = भाषेय रूप से स्थित जो, तत् = उस परमात्म तत्त्व को, न वेद = नही जानता है, राः - वह पुरुप, ऋचा ऋगादि वेदों से, किं करिष्यति = क्या करेगा? । उसका अध्ययन व्यर्थ है। इस के विपरीत, य: इद सत् विदुः = जो उसको जानते हैं, ते इमे = वे हो, समासते = उस ग्रा में मिलते हैं । इति = यह वेद, विदुषः = विद्वानों को उपदेश करता है। विद्वानों को चाहिये कि वेद द्वारा ब्रह्म को जान कर परमपद प्राप्त करें। प्रश्न:-तत् एतद अक्षरम् कतमत् = वह यह अक्षर कौन है ! अदि मन्त्र गत अधार पर का क्या अर्थ है ! । उत्तर-ओम् इति एपा वाक् • 'ओम्' यह इस प्रकार की वाणी है वही अक्षर है। मर्याद अक्षर शब्द का अर्थ ओम् शब्द है, इति = यह, शाक पूणिः = पापूणि नामक भाचार्य कहते हैं और माहाण वाक्य प्रमाण देते हैं-ऋचश्च - चारो। वेद के चायें, परमे . सर्वोत्कृष्ट, व्यवने - माकाण्यत् सर्वत्र व्यापक, अक्षरे - ओम् अक्षर मे, धोयन्ते - रखे जाते हैं। .
निरुक्त त्रयोदशाध्यायस्यैकादशः खण्डः । है। यत् D - - . और, नानादेवतेषु मन्त्रेषु = अग्नि आदि नाना देवताक मन्त्रों में यही ओम् अक्षर रखा जाता है। एतद् हवा = यही, एतद् अक्षर - यह अक्षर है, यत् - जो, सर्वाम् त्रयीम् विद्याम् प्रति = सम्पूर्ण त्रयी विद्या के प्रति प्रतिनिधि है । इति ब्राह्मणम् च - यह ब्राह्मण वाक्य भी अक्षर के ओकार अर्थ करने मे प्रमाण है। क्योकि, 'ओम' प्रत्येक मन्त्र में संयुक्त रहता है । अथ निरुक्त प्रयोदशाध्यायस्यकादशः खण्डः ॥ १३-११ ॥ मादित्य इति पुत्र' शाकपूणेरेपर्भवति । यदेनमन्तिप्रत्यूचः सर्वाणि भूतानि । तस्य यदन्यन्म- न्त्रेभ्यस्तदक्षरं भवति । रश्मयोऽत्र देवा उच्यते य एतस्मिन्नधिनिपन्ना इत्यधिदैवतम् । शाकपूर्णः - शाकपूणि नामक आचार्य के, पुत्र:=पुत्र, मन्त्रगत 'ऋच.' पदका अर्थ, आदित्य.. मादित्य है, इति ऐसा कहता है उसी का (आदित्यका), एपा = यह, अक् - ऋचा, भवति यत. = क्योकि, सर्वाणि भूतानि = सभी प्राणी, एनम् इस आदित्य की, प्रत्यूच. " ऋतिनिधि रूप से, मर्चन्ति = पूजा करते हैं । अर्थात् सभी प्राणी ऋचा के द्वारा मादित्यका पूजा करते हैं । ययाअर्चन्ति सा अक्' इस विग्रह मे 'ऋच स्तुतो' धातु से 'विप्च' इस सूत्र से कि प्रत्यय, सपिहारी लोप होने पर 'ऋ' शब्द बना है। मन्त्र का नाम है। क्योकि मन्त्र बोल कर पूजा की जाती है । तस्य = उस आदित्यका, यद् - जो, मन्मेभ्यः अन्यत् = मन्त्रो से भिन्न सम्पूर्ण रूप है, तद् = वही, अक्षरम् भवति - अक्षर है। अत्र = इस पक्ष मे, रश्मयः = रश्मियां ही, देवाः- देव, उच्यन्ते कही जाती है। यः = जो एतस्मिन् = इस आदित्य मण्डन में, अधिनिपन्ना: - आधेय रूप से स्थित हैं । इति - यह मन्त्र का, अघिदैवतम् = अघिदेव अर्थ है । क्योंकि, 'ऋच. का अर्थ आदित्य और आदित्य देव है। यत. देवसम्बधी अर्थ होने से अधिदेव है। अथाध्यात्मम्-शरीरमत्र ऋगुच्यते यदे नेनार्चन्ति प्रत्यूचः सर्वाणीन्द्रियाणि, तस्स यदविनाशिधर्म तदक्षरं भवति । इन्द्रियाण्यत्र देवा उच्यन्ते यान्यस्मिन्नधिनिपण्णानी- त्यात्मवादाः। इति निरुते त्रयोदशाध्यायस्यैकादशः खण्डः ।। १३-११ ।। अधिदेव अर्थ करने के पश्चाद, अध्यात्मम् = अध्यात्म अयं इस प्रकार करते है-- अध्यात्म पक्ष मे, शरीरम् शरीर ही, ऋग् = ऋचा, उच्यते = कहा जाता है। अर्थात् मन्त्रगत च पद का अर्थ मनुध्य शरीर है। यत् = क्योकि, अनेन सक् रूप सरीर से, सर्वाणि इन्द्रियाणि = सभी इन्द्रियाँ, प्रत्यवः पूजनीय जीवात्मा को उद्देश करके, अचंन्ति = पूजन करती हैं अर्थात् विषयसुख प्रदान करती हैं। इस पक्ष में प्रचन्ति अर्चन्ति मनेन इति का शरीरम्' इस विग्रह मे 'इच स्तुतो' धातु से करण मे किप (0) होने पर ऋच् भन्द बना है । तस्य = उस शरीर सम्बन्धी, यत् = जो, अविनाशिधर्म - अविनाशी धर्म वाला चेतन आरमा है, तत् - वह, अक्षरम् = अक्षर नाश रहित, भवति - है। मत्र = इस पक्ष मे, इन्द्रियागि इन्द्रियो हो, देवाः - देव, उच्यन्ते कही जाती हैं। यानि - जो, अस्मिन् = इस शरीर मे, अपिनिषनानी - आधेय रूप से स्थित है। इति = यह, आत्मप्रवादा: = आत्मवादियो का पक्ष है। जीव आरमा भोर इन्द्रिया सब धरोर रूप मारमा में रहते हैं। इस लिये यह मध्यारम भर्य है। अथ .
- Pr- D , . - धुरा है वह, . (१६००) निवते त्रयोदशाध्यायस्य द्वादशः खण्डः । मन्त्रगत अक्षर पद का निर्वचन करते है- अथ निरुक्ते प्रयोदशाष्यायस्य द्वादश. खण्ड ॥ १३-१२ ।। अक्षरं न क्षरति नक्षीयते वाक्षरं भवति, वाचोऽक्ष इति वा । न क्षरति जो अन्यथा भाव में विकार को प्राप्त न हो वह, अक्षरम् = अक्षर कहलाता है। चेतन का नाश नहीं होता है । अत. चेतन अक्षर कहलाता है। न क्षरति इति अक्षरम्' इस विग्रह मे नम् उपपद विनाशार्थ 'क्षर सचलने' धातु से पचाद्य, नञ् के नकार का लोप होने पर अक्षर शब्द बना है। चेतन का नाम है। क्योकि चेतन का नाश नहीं होता है। वा = अथवा, न क्षीयते = जो विनष्ट न होता हो वह, अक्षरम् = अक्षर कहलाता है। 'न क्षीयते इति अक्षरम् इस विग्रह'मे पूर्ववत् नम् उपपद 'क्षि क्षये' घातु से उणादि डरन (अर ) प्रत्यय, शित्त्वात् टि लोप, नन के नकार का लोप होने पर 'अक्षर' शब्द बना है। चेतन का ही नाम है। क्योकि वह कभी विनष्ट नहीं होता है। वा = अथवा, वाचः - वाणी का जो, अक्षः = 'अक्षरम् = अक्षर कहा जाता है। जैसे रथ की गति का अवलम्ब रथ की, अक्ष (धुरा) होती है वैसे ही सम्पूर्ण वेदवाणी का अवलम्ब वाणी वा अक्ष (धुरा) ओम् शब्द है। अतः अक्षस्थानीय ओम् अक्षर का अर्थ है। 'अक्ष एव अक्षरम्' इस विग्रह मे अक्ष शब्द से मार्षत्वात् स्वार्थ मे र प्रत्यय तद्वित होने पर अक्षर शब्द बना है । ओम् अर्थ है । ओमित्येकाक्षम्। (गीता) । अक्षर शब्द के निर्वचन करने के बाद अब अक्ष शब्द का निवचन करते हैं- अक्षो यानस्याञ्जनात् । तत्प्रकृतीतरद्वर्तनसामान्यात् इति । रथ की धुरा को नित्य, अञ्जनात् = तैलादि से म्रक्षण (लेप) परने से यह, भक्षः = अक्षाकही जाती है। वर्तनसामान्यात् आवर्तन की समानता से, तत्प्रकृति स्वभाव वाला, इतरत् = यह अन्य अक्षर है। अर्थात् जिस प्रकार अक्ष मे रथ वा चक्र घुमता है उसी प्रकार ओकार शन्द मे सर्व वेद धुमते है। इति = इस प्रकार- अर्थ मन्त्रार्थचिन्ताव्यहोऽम्यूहोऽपिश्रुतितोऽपितर्कतः । अयम् = यह, मन्त्रार्थचिन्ताव्यूहः = मन्त्र के अर्थ का चिन्तासमूह मेरे से, अम्यूहः = ऊहापोह किया गया है । श्रुतित; अपि, - ब्राह्मण श्रुति के आधार से भी और, तपंत अपि = श्रुति अविरुद्ध सकं से भी मन्त्राथ किया गया है। अर्थात् निरक्तकार यास्कमुनि कहते हैं कि, इस निरक्तप्रन्थ में मैंने जो मात्रार्थ किया है वह अच्छी तरह महापोह करके मन्त्र के व्याख्यान स्वरुप प्राह्मण श्रुति के भाधार से एध श्रुति अविरुद्ध तर्क से निश्चय करके मन्त्राप किया है। इसी प्रकार सब को मन्त्रार्य । करना चाहिये। नतु पृथक्त्यैन मन्त्रा निर्वक्तव्याः । प्रकरणश एष तु निक्तव्याः। नया प्रत्यक्ष- मस्त्यनृपेरतपसो वा । पारोपर्यनित्सु खलु चेदितपु भृयोरिधः प्रशस्यो भवतीत्युक्तंपुरस्तात् । - - 'यानस्य - - अक्ष वे -- निरुक्त त्रयोदशाध्यायस्य त्रयोदश खण्डः। . । । ।। तु = किन्तु प्रकरण से, पृथक्त्वेन = पृयक, रूप से मन्त्रा = म-त्रका, न निर्वक्तव्या कभी निर्वचन नही करना चाहिये । तु = अपितु प्रकरणश एव = प्रकरणानुमार ही, निर्वक्तव्या = मन्त्र का निर्वचन करना चाहिये । हि = क्योकि, अनृपे - जो ऋषि नहीं हैं। घा = अथवा, बतपस = जो तपस्वी नहीं हैं, उनको मन्त्र के अर्थ का प्रत्यक्षम् - प्रत्यक्ष, नहि " अस्ति = नहीं है। अर्थात् ऋषि वा तपस्वी पुरुष के पिना सामान्य मनुष्य से मन्त्रार्थ का प्रत्यक्ष नही होता है। य : जो, पारोवर्यवित्सु = परोवर भावसे वेदितृपु - मन्त्रार्थ जानने वालो मे, भूयोवित् * बहुश्रुत है वही मन्त्रार्थ करने मे, प्रशस्य - प्रशसनीय, भवति = होता है। इति - यह पुरस्तात् = प्रथम ही, उक्तम् = कहा गया है। अर्थात् कौत्स मत खण्डन के प्रसग मे नि अ १ ख १६ मे "पारोववित्सु खलु वेदितृषु भूयोविद्य प्रशस्यो भवति" यही पक्ति आनुपूर्वी यहा भी है। इस से कहा गया है कि गुरूशिष्य परमरा से ही जानने वाले विद्वानो मे जो अधिक विद्वान् है वह प्रशस्य है। 11 इस विषय में एक प्राचीन इतिहास दिखाते हैं- 1 मनुष्या वा ऋपिपूत्क्रामत्सु देवान वन को न पिभविष्यतीति । तेम्य एत तर्कमृर्षि प्रायच्छन् मन्त्रार्थचिन्ताम्यहमभ्यू टम् , तस्माद्यदेव किश्चानूचानोऽभ्यूहत्याप तद् भवति । इति निरुक्त प्रयोदशाध्यायस्य द्वादश खण्ड । १३-१२ ॥ पूर्व काल मे पृथिवी पर से पषु उत्क्रामत्सु = मन्त्रार्य करने वाले ऋपियो के स्वर्ग पले जाने पर मनुष्या = मनुष्यगण, देवान् = देवो से अबवन् = वोले कि अब कौन, ऋषि = उपदेश करने वाला ऋषि भविष्यति इति = होगा? जो हमै वैद के 'यथा अर्थ दिखायगा? । तब उन देवो ने तेम्प - उन मनुष्यो को, एतम् तकम् ऋषिम् - इस तक रूप अपि को प्रायच्छन् : प्रदान किया, जो मन्त्रार्थ चिन्ताम्यूहम = मन्त्र के अर्थ के चितन विषयक ऊहापोहरूप है और जिसे उन ऋपि तथा देवो ने प्राप्त किया हुआ था । तस्मात् । इस लिये, यद् एव - जो कोई भी, अनूचान = वेदपाठी, तर्क की सहायता से, विश्न = जिम किसी तत्त्वज्ञान को, अभ्यूहति = तणा करता है तत् - वह तत्वज्ञान आपम -प्रमाविष्ट ही भवति - होता है । इस से यह सिद्ध हया कि मनमाना श्रुति विरुद्ध तर्क से वेदार्थ नही करना चाहिये । किन्तु ऋषि-प्रदिष्ट ध्रुत्यनुसार तर्क मे वेद मन्त्र का अर्थ निश्चय करना चाहिये । महर्षि यास्क कहते हैं कि यह मैं अपने मन से नही कह रहा है किन्तु इस बात को स्वय वैद कह रहा है। जैसे- अय निरुते त्रयोदशाध्यायस्य प्रयोदश खण्ड " हृदा तष्टेषु मनसो जवेषु यद्ब्राह्मणाः संयजन्तै सखायः । अन्नाह लं वि जहुवेद्याभिरोहब्रह्माणो वि चरन्त्यु त्वं ॥ 7 स ८-२-२४-८॥ न हमारा क- अम्यूहम .
= हृदय से, तष्टेषु : (१६०२) निरुक्त त्रयोदशाध्यायस्य त्रयोदशः खण्डः । इस मन्त्र का वृहस्पति ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और ब्रह्मज्ञान देवता है । मन्त्रार्थ-यद् = जिस समय, सखायः 3 अनेक समान ख्याति वाले, ब्राह्मणाः ब्राह्मण लोग, हृदा निश्चित, मनसः जवेपु = मनोगम्य वेदार्थ के गुण दोष परिक्षण के लिये, सयजन्ते = एकत्र होते हैं उस समय, अत्र = इस ब्राह्मणमंध में, त्यम् = किसी किसो पुरुष को कुछ ज्ञान नही होता है । कोई कोई, वेद्याभिः = वेदितव्य विद्या के द्वारा अह ओह ब्राह्मणाः = तर्क से वेदार्थ को निश्चय करने वाले ग्राह्मण लोग, उक्त अज्ञानियो को, वि जहुः = विशेष रूप से त्याग देते हैं और, विचरन्ति - विचरण करते हैं। इस ऋचा मै श्रुति अविरुद्ध सत्तक का महत्त्व बताया गया है। इसी तर्क के अनुसार वेद मन्त्र का अर्थ करना चाहिये। . इस मन्त्र का भाष्य- हृदा तष्टेषु मनसां प्रजवेषु यद्ब्राह्मणाः संयजन्ते समानख्याना ऋत्विजोत्राहत्वं विजहुर्वेयाभिदित च्याभिः प्रवृत्तिभिरोहवनमाण अहब्रह्माण ऊह एपां ब्रह्मति वा । यत् = 'जिस समय, समानख्यानाः = समान ज्ञानी, ऋत्विजः = ऋत्विक, ब्राह्मणाः = 'ब्राह्मण लोग, हृदा = हृदय से, तष्टेपु = निश्चित, मनसाप्रजवेषु = वेदार्थ के गुण दोष की परीक्षा के लिये, संयजन्ते एकत्र हुए थे, उस समय, अत्र = इस ब्राह्मण समूह मे, अह त्वम् = उस वेदार्थ चिन्तन में मूढ पुरुषों को वेद्यामिः वेदितव्याभिः प्रवृत्तिभिः - वेदितव्य मनोवृत्ति के कारण, विजहुा = छोड दिये थे। ओहवब्रह्माणः = ऊहब्रह्माण: वेदार्थ के विषय मे तक ब्राह्मण, वा = अथवा, एपाम् इन के, ब्रह्म = वेद, ऊह : ऊहापोह किया हुआ। इस कारण इस निशक्त शास्त्र को वेद ही समझना चाहिये। उपसंहार करते है- सेयं विद्या श्रुतिमतियुद्धिः। सा = वह, इयम् = यह इस निरुक्तशाल के विज्ञान से उत्पन्न हुईविद्या - वेदार्थ विज्ञान रूपा विद्या, श्रुतिमतियुद्धि. = श्रुति शब्द से, मति शब्द से और बुद्धि २८द निरक्शास्त्र में व्यवहृत होती है। क्योकि यह तकं विद्या श्रुतिमतिबुद्धि प्राप्त होती है । तस्यास्तपसा पारमीप्सितव्यम् । तपसा - तप के द्वारा, तस्याः = उस तवं विद्या का, पारम् - पार पाने की, ईप्सितव्यम् इच्छा करने योग्य है। अर्थात् वेदमन्त्र के अपं करने की शक्ति तप से प्राप्त होती है । तदिदमापुरिच्छता न निर्वक्तव्यम् । आयुः इच्छता %3D आयुष्य चाहने वाले अतपस्वी पुरुषों को, तत् = उस वैदिक शम्दो के निवंचन करने वाला, इदम् = इस निरुक्त शास्त्रपा, न निवक्तव्यम् = निर्वचन नही करना चाहिये। ।'
निरुक्त प्रयोदशाध्यायस्य त्रयोदशा खण्डः ।
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अन्यथा आयु क्षीण हो जाती है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण स्वामी श्री दयानन्द हैं। क्योकि
उनकी-नियोगादि अर्थ का अनर्थ करने से विष द्वारा-अकाल मृत्यु हुई थी।
तस्माच्छन्दासु शेपा उपेक्षितव्याः ।
तस्मात् = इस लिये, यथोक्त श्रुतिमतिबुद्धि तथा तप आदि सर्वसाधन सम्पन्न भी विद्वान्
हो तो भी अर्थ का अनर्थ न हो जाय इसके लिये, छद सु = शाखान्तर वेदो मे, शेषा मन्त्रशेष
सूक्तशेष आदि, उपेक्षितव्यम् = देखना चाहिये। अधिकृत शाखान्तर मे पाठ तथा अर्थ को देखकर
मन्त्राचं करना चाहिये।
फलकथन करते हैं-
अथागमो यां यां देवतां निराहतस्यास्तस्यास्ताद्राव्यमनुभरत्यनु भवति ।
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इति श्रीमद्यास्कमुनि प्रणीते निरूक्तशास्त्रे त्रयोदशोऽध्यायः ।। १३ ।।
अथ = उस के बाद यथार्थ अर्थ करने वाले विद्वान को, आगम = यह फल मिलता है कि,
याम् याम् देवताम् - जिस जिस देवता का वह, निराह - निर्वचन करता है, तस्या तस्याः - उस
उस देवता के, ताद्भाव्यम् = ऐश्वर्य फा, अनुभवति = अनुभव करता है, अनुभवति = अनुभव करता
'अनुमति' इस क्रियापदको द्विरुक्ति ग्रन्थ समाप्तिका सूचक है।
खण्ड सूत्रम्-
10
अयेमा 'यद्यायोय दुवचोििहसोतो मण्येतरस्तचत्वारिश गास्वर्यन्तयारियायचो मार
आदित्यात्य क्षन्तक्षरहिवासप्टेपुप्रयोदश ।
इति निरुक्तं त्रयोदशोऽध्यायः ।
इति निरुक्तपरिशिष्टे प्रथमोऽध्यायः ।
टीकामिमां भारतभूमिवाचा विधाय मृद्री परिशिष्टकाण्डे ।
श्रीब्रह्मलीनो मुनिरर्पयित्वा भूम्नः पदान्जेषु निधिमेति ॥
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(१९०४) निहते त्रयोदशाध्यायस्थ प्रयोदशः खण्डः । यद्यपि परिशिष्ट काण्ड के दो अध्याय हैं। तेरहवा और चौदहवा तथापि जान बुझ पर चौदहवा अध्याय की व्याख्या नहीं की जाती है। इस मे कारण यह है कि, इस के अनेक स्थलों पर पाठ बहुत अशुद्ध हैं । एव बहुत स्थल पर मप्रासगिक पाठ देखने में आता है। प्रयत्न पूर्वक निरीक्षण करने पर भी उस का कोई अभिप्राय ही नही निकलता है। इस के पाठ सुलझाना और सगति बैठाना अत्पन्न कठिन है। अत एव दुर्गाचार्य ने इस अध्याय का भाष्य नही किया है। मूल ही रहने दिया है। इसी लिये इस अध्याय की व्याख्या करना छोड दिया गया है। और जब व्याख्या ही नहीं की गई है तो उस अध्याय का उल्लेख करना अकिश्चित्कर (व्यर्य) जान कर छोड दि । गया है। ऐसी स्थिति मे निरुक्त की समाप्ति यही होती है ऐसा समझना चाहिये । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिा शुभं भूयात् ।
पाठकों से नम्र प्रार्थना । इस ग्रन्थ में मेरी अज्ञानता से, दृष्टि-दोष से और अक्षर-नियोजकों के प्रमाद से बहुत सी अशुद्धियाँ रह गई हैं। जिन का शुद्धि-पत्र बनाने से ग्रन्थ के आकार बढ़ जाने की सम्भावना है। क्योंकि, अशुद्धियाँ बहुत हैं । अतः पाठकों से नन प्रार्थना है कि, वे सुधार कर वाँचे और अशुद्धियों को व्यवस्थित रूप से लिख कर भेजने की कृपा करें। ताकि दूसरी आवृत्ति में सुधार दी जा सके । उपकार-स्मृति जिन महानुभावों ने इस ग्रन्थ के प्रकाशन में आर्थिक सहायता प्रदान की है उनको, हमारे संशोधक श्री अशर्फीदासजी आदि विद्यार्थियों को, अरुण प्रिन्टींग प्रेस के अध्यक्ष श्री डायामाई कालीदासजी मोदी को और अक्षर संयोजक माई श्री जयन्तीलालजी को आशीर्वाद पूर्वक धन्यवाद । वेदपुरुष सद्गुरु श्रीकबीर परमात्मा इन का सर्वप्रकार से कल्याण करें। मैं तो इन सब का चिर ऋणी अर्थात् आमारी रहूंगा ही।
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अथ निघण्टः ।
नघण्टुक काण्डः ।
1! , अथ निघण्टौ प्रथमोऽध्यायः ।,,
अथ निघण्टौ प्रथमाध्यायस्य प्रथमः खण्ड. ।
गौः|| ग्मा | मा.;-क्ष्मा, । क्षा । क्षमा । क्षोणीः। क्षितिः । अवनिः । उर्वी ।
पृथ्वी । मही । रिपः । अदितिः । इ । नितिः । भूः । भूमिः । पूषा । गातुः ।
गोप्रेत्येकविंशतिः पृथिवीनामधेयानि ।
इति निघण्टो प्रथमाध्यायस्य प्रथमः खण्डः । १-१॥.
अथ,निघण्टो,प्रथमाध्यायस्य द्वितीयः खण्डः ।
हेम । चन्द्रम् । रुक्मम् । अर्यः । हिरण्यम् । पेशः । कृशनम् । लोहम् ।
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कनकम् । काश्चनम् । भर्म । अमृतम् । मरुन् । दत्रम् । जातरूपमिति पञ्चदश
हिरण्यनामानि ॥
इति निघण्टो प्रथमाध्यायस्य द्वितीयः खण्ड 1,१-२ ॥
अथ' निघण्टो प्रथमाध्यायस्य ' तृतीयः खण्डः'।
| infअम्वरम् ) वियत् !) व्योम । महिः || घन् । अन्तरिक्षम्।। आकाशम् ।, आपः ।
पृथिवी । भूः । स्वयम्भूः । अनी । पुष्करम् । "सर्गरः । समुद्रः । अचरमिति
पोडशान्तरिक्षनामानि ।
इति निघण्टौ प्रथमाध्यायस्य तृतीयः खण्डः १-३ ॥
IT IT अप निषष्टी' प्रथमोध्यायस्य चतुर्षः सह
स्व: । पृश्निः । नाक | गौ: विष्टम् । नम इति पट साधारणानि
। इति निघण्टौ प्रथमाध्यायस्य सुधः सह । १-४॥
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(२)
निघण्टो प्रथमाध्यायस्य नवमः खण्डः ।
अथ निघण्टी प्रथमाध्यायस्य पञ्चमः खण्डः ।
खेदयः। किरणाः । गावः । रश्मयः । अभीशवः । दीधितयः । गर्भस्तयः । वनम् ।
उस्राः । वसवः । मरीचिपाः । मयूर्खाः । सप्त ऋपयः। साध्याः। सुपर्णा इति पञ्चदश रश्मिनामानि ॥
इति निघण्टो प्रथमाध्यायस्य पञ्चमः खण्डः । १-५ ॥
अथ निघण्टौ प्रथमाध्यायस्य पष्ठः खण्डः ।
आताः। आशाः । उपराः । आष्ठाः । काष्ठाः। व्योम। ककुभः। हरित इत्यष्टौ दिङ्नामानि ।।
इति निघण्टौ प्रथमाध्यायस्य पष्ठः खण्डः । १-६ ॥
अथ निघण्टो प्रथमाध्यायस्य सप्तमः खण्डः 1.
श्यावी' । क्षुपा । शर्वरी । अक्तः । ऊा। राम्या । यया । नया । दोर्पा । नक्ता ।
तमः। रजः। असिनी । पय॑स्वती। तमस्वती। घृताची'। शिरिणा । मोकी। शोकी। ऊधः।
पर्यः। हिमा । वस्वीति त्रयोविंशती रात्रिनामानि ।।
इति निघण्टौ प्रथमाध्यायस्य सप्तमः खण्डः । १-७ ॥
अथ निघण्टो प्रथमाध्यायस्याष्टमः खण्डः ।
विभावरी'। सुनरी । भास्वती । ओदती । चित्रामघा । अजनी । वाजिनी ।
वाजिनीवती 7 सुम्नावरी । अहना । द्योतना । श्वेत्या । अरुपी । सूनृता । नृतावती ।
नसूनृतावरीति पोडशोपोनामानि ॥
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इति निघण्टो प्रथमाध्यायस्याष्टमः खण्डः । १-८॥
मथ निघण्टो प्रथमाध्यायस्य नवमा खण्डः ।
वस्तोः । योः (पुः) । भानुः । वासरम् । स्वसंराणि । घंसः । धर्मः । घृणः ।
दिनम् । दिवा | 'दिवैदिवे । यविद्यवीति द्वादशाहर्नामानि ॥ .
इति निघण्टौ प्रथमाध्यायस्य नवमा खण्डः । १-९॥
निघण्टौ प्रथमाध्यायस्य द्वादश खण्ड । - अप निघण्टो प्रथमाध्यायस्य दशम खण्ड । अद्रिः । ग्रावो । गोत्रः । वलः । अन्नः । पुरुभोजाः । बलिशानः । अश्मा । पर्वत । गिरिः । वजः । चरुः । वराहः । शम्बरः । रोहिणः । रैवतः। फलिगः । उपरः। उपल । बमसः । अहिः । अनम् । बलाहकः । मेघः । इतिः । ओदनः । वृन्धि । त्रः। असुरः । कोश इति त्रिंशन्मेधनामानि ॥ इति निघण्टौ प्रथमाध्यायस्य दशम खण्ड ! १-१० ॥ अथ निघण्टो प्रथमाध्यायस्यकादश खण्ड । श्लोक । धारा । इळी । गौः । गौरी । गान्धर्वी । गभीरा | r गम्भीरा। मन्द्रा। मन्द्रार्जनी । वाशी। वाणी। वाणीची। याणः । पवि. । भारती। धमनिः । नाळीः । मेना। मेळिः। सूर्या । सरस्वती। निवित् । स्वाहा । बग्नुः। उपब्दिः। मायुः । काकुन् । जिह्वा । घोषः। खरः । शब्दः । सनः । ऋक् । होत्री । गी । गाा। गणः । धेना । माः । विपा । नना । कशा । धिषणा । नौः। अक्षरम् । मही। अदितिः । शची। वाक् ! अनुष्टुप् । धेनुः । बल्गुः । गदा 1 सरः । सुपर्णी । वेदुरेति सप्तपंचाशद्वाट्नामानि । - इति निघण्टौ प्रथमाध्यायस्यकादश खण्ड अथ निघण्टी प्रथमाध्यायस्य द्वादश खण्ड । अर्णः । क्षोः । क्षम। नमः। अभः। कन्यम् । सलिलम् । पा.। वनम् । धृतम् । मधु । पुरीपम् । पिप्पलम् । क्षीरम् । विपम् । रेतः । कशः । जन्म । युवूकम् । जुसम् । तुप्रा । घुर्द्धरम् । सुक्षेमं । घरुणम् । सिरां । अररिन्दानि । विस्मन्नन् । जामि । आयुधानि । सपः । अहिः । अपरम् । खोतः । इप्ति । रसा। उटकम् । प्रर्यः । सः ।
(४)
निघण्टौ प्रथमाध्यायस्य चतुर्दशः खण्डः ।।
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मेपजम् । सहः। शवः । यहः। ओजः । सुखम् । क्षत्रम् | आवयाः । शुभम् । यादुः। भूतम् ।
भूवनम् । भविष्यत् । आपः । महत् । व्योम । यशः। महः। सीकम् । “स्वतीकम् ।
सतीनम् । गहनम् । गमीरम् । गम्भरैम् । ईम। अनम् । हविः । सम्र । सदनम् । ऋतम् ।योनिः। तस्य
योनिः । सत्यम् । नीरम् । रयिः । सत् । पूर्णम् । सर्वम् । अक्षितम् । बर्हिः । नाम ।
सर्पिः । अपः । पवित्रम् । अमृतम् । इन्दुः । हेम । स्वः । सगीः । शम्बरम् । अवम् ।
वपुः । अर्बु । तोयम् । तूर्यम् । कृपीटम् । शुक्रम् । तेजः । स्वधा । वारि । जलम् ।
जलापम् । इदमिएकशतमुदकनामानि ।
} ! इति निघण्टो प्रथमाध्यायस्य द्वादशः खण्डः ॥ १.१२ ॥1
अथ निघण्टो प्रथमाध्यायस्य त्रयोदशः खण्डः।।।
• अवनयः । यथः । साः। सीराः । स्रोत्याः । एन्यः । धुनयः । रुजानाः । वृक्षणाः ।
खादो । अर्णाः। रोधचक्राः । हरितः । सरितः । अगुवः । नभन्वः । वधः । हिरण्यवर्णाः ।
रोहितः । समुतः । अर्णाः । सिन्धवः । युल्याः । वर्यः । उपः।, रोरत्यः । पार्वत्यः !
सचन्त्यः । ऊर्जस्वत्यः। पर्यस्वत्यः । तरस्वत्यः। सरस्वत्यः । हरस्वत्यः । रोधस्वत्यः ।
भास्वत्यः । अजिराः । मातरः । नय इति सप्तत्रिंशनदीनामानि ।
इति निघण्टो प्रथमाध्यायस्य त्रयोदशः खण्ड: 1१-१३ ।।:::
अप निघण्टौ प्रथमाध्यायस्य चतुर्दशः पण्डः ।
13 अत्यः । इयः । आ'1 वाजी । सप्तिः। बहिः । दधिक्राः। दंधिकाा । एतन्वा ।
एशा । पट । दोर्गहः । औचःश्रवसः । नाया। आशुः । नः। अपः । मान्यतः ।
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निघण्टो प्रथमाध्यायस्य सप्तदशा खण्डा ।
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अव्यथर्यः। श्येनासः ।' सुपर्ण पतझरी नरे। 'हार्याणाम् । हंसासर । अश्या
इति पड्विंशतिरश्चनामानि ॥
इति निघण्टौ प्रथमाध्यायस्य चतुर्दशः खण्डः ! १-१४ ।।
अथ निघण्टो प्रथमाध्यायस्य पञ्चदशः खण्ड. ।
हरी इन्द्रस्य । रोहितोऽमे। हरितं आदित्यस्य । रासंभावश्विनो। अजाः पूष्णः ।
पृषत्यो मरुताम् । अरूण्यो गाव' उपाम् । श्यावाः सवितुः । विश्वरूपा बृहस्पतेः। नियुतो
वायोरिति दश आदिष्टोपयोजनानि ।
इति निघण्टौ प्रथमाध्यायस्य पञ्चदशः खण्डः । १-१५ ।।
अथ निघण्टौ प्रथमाध्यायस्य षोडश. खण्डा ।
भ्राजते । प्राशते । प्राश्यति । दीदयति । शोचति । मन्दते । भन्दते । रोचते ।
ज्योतते । द्योतते । घुमदिति एकादश ज्वलतिकर्माणः ।
इति तिघण्टौ प्रथमाध्यायस्य पोडशः खण्डा । १-१६ ।।
अप निघण्टो प्रथमाध्यायस्य सप्तदशा खण्डः ।
जमत् । कल्मलीकिनम् । जञ्जणाभवन् । मल्मलाभवन् । अचिः । शोचिः । तपः ।
तेजः । हरः। पृणिः । शृङ्गाणि शृङ्गाणीत्येकादश ज्वलतो नामधेयानि ।
इति निघण्टो प्रथमाध्यापस्य सप्तदशः खण्ड । १-१७ ॥
इति निघण्टौ प्रथमोध्यायः।
गौहमाम्वरस्व खेदयमांता श्यावीविभावरीवस्वोरट्रि लोकोऽपोवनयोरयोहरी इन्द्रस्य
भ्राजते
जमदिति सप्तदश ।
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अथ निघण्टौ द्वितीयोऽध्यायः । -
अथ निघण्टो द्वितीयाध्यायस्य प्रथमः खण्डः।
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अपः । अनः । दसः । वेपः । धेपः । विष्टी । बृतम् । कर्बरम् । करुणम् । शर्म ।
क्रतुः । करणानि । करांसि । करिक्रत् । करंन्ती । चक्रत् । कर्वम् । को। कर्तवै । कृत्वी ।
धीः । शची। शमी । शिमी । शक्तिः । शिल्पमिति षड्विंशतिः कर्मनामानि ।
इति निघण्टौ द्वितीपाध्यायस्य प्रथमः खण्डः । २-१
मय निघण्टो द्वितीयाध्यायस्य द्वितीया खण्डः।
तुक् । तोकम् । तनयः। तोपर्म । तपम । शेपः। अनः । गयः। जाः । अपत्यम् ।
यहुः । सूनुः । नात् । प्रजा । वीजमिति पश्चदशापत्यनामानि ।
܀
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इति निघण्टौ द्वितीयाध्यायस्य द्वितीया खण्डः । २-२ ॥
अप निघण्टौ द्वितीयाध्यायस्य तृतीयः खण्डा ।
मनुष्योः । नरः। धवाः । जन्तवः । विशः । क्षितया । कृष्टया। चर्षणयः । नहुः ।
हरयः । मर्याः । माः । मर्ताः । प्रातः । तुर्दशाः । द्रुह्मवः । आयवः । यदवः । अनवः।
पूर्वः। जगतः । तस्थुषः । पञ्चजनाः । विवस्वन्तः । पृतना इति पञ्चविंशतिर्मनुष्यनामानि ।
इति निघण्टो द्वितीयाध्यायस्य तृतीया खण्ड। । २-३ ॥
अथ निघण्टौ द्वितीयाध्यायस्य चतुः खण्डः ।
आयती। च्याना । अमीशू । अप्नवाना । विनङ्गसौ । गमस्ती। करस्नौ । बाहू ।
अरिजौ। क्षिपस्ती । शबरी । मरित्रे इति द्वादश बाहुनामानि ।
इति निघण्टो द्वितीयाम्यायस्य चतुर्पः लणा । २-४ ।।
निषष्टी द्वितीयाध्यायस्याष्टमः खण्डः ।
अप निघण्टो द्वितीयाध्यायस्य पञ्चमः खण्डः ।
अनुवः । अण्व्य: । क्षिप । विशः । शया: । रशनाः । धीतयः । अथयो ।
विषः । कक्ष्याः । अवनयः । हरितः । खसारः । जामयः । सनामयः । योफ्राणि ।
योजनानि । धुरः । शाखाः । अभीशवः । दीपितयः । गभस्तय इति द्वाविंशतिरअलिनामानि ।।
इति निघण्टो द्वितीयाध्यायस्य पनमः खण्डः । २-५ ।।
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अथ निघण्टी द्वितीयाध्यायस्य पप्ठः खण्डः ।
वश्मि । उपमसि । वेति । वेति । वेसति । वाञ्छति । वष्टि । बनोति । जुपते ।
हर्यति । आचके । उशिक् । मन्यते । छन्त्सद् । चाकनत् । चकमानः । कति ।
कानिदिति अष्टादश कान्तिकर्माणः ।।
इति निघण्टौ द्वितीयाध्यायस्य षष्ठः खण्डः । २-६ ॥
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अथ निघण्टौ द्वितीयाध्यायस्य सप्तमः खण्डः ।
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अन्धः । वानः । पर्य: । प्रयः । पृक्षः पितुः । वयः । सिनम् । अव भु। धासि।
हरी । इळा । इर्थम् । ऊर्छ । रसर । स्वधा । अर्कः । क्षय । नमः । सतम् । नमः। आयुः।
सन्ता । ब्रह्म । वर्च। कीलालम् । यश इत्यष्टाविंशतिरमनामानि ॥
इति निघण्टौ द्वितीयाध्यायस्य सप्तमः खण्डः । २-७ ॥
अय निघण्टो द्वितीयाध्यायस्याष्टमः सण्डः ।
आश्यति । भवति । मस्ति । चेति । वेवेष्टि !• अविष्यन् । पप्सति । मसः ।
अधाम् । इरतीति दशाचिकर्माणः ।।
इति निघण्टौ द्वितीयाध्यायस्याष्टमः ! | २-४ ।।
4 ) निघण्टौ द्वितीयाध्यायस्य द्वादशा खण्डा। अथ निघण्टो द्वितीयाध्यायस्य नवमः खण्ड । 1: ओजः । पाजः । शवः । तरः । तवः । त्वक्षः । शर्द्धः।। माधः : 1. नृम्णम् । तविपी । शुष्मम् ।, शुष्णम् । दक्षः । वील | च्यात्नम् ।। शूपम् ।। सहा । यहः । वर्धः। वर्ग: । ।जनम् ।, वृक् । मन्मना । पौस्यानि । धर्णसिः- -द्रविणम् । स्थन्द्रासः । शम्बर- मित्यष्टाविंशतिर्बलनामानि ॥ । - इति निघण्टी द्वितीयाध्यायस्य नवमः खण्डः ॥ २-९ ॥ 7 अथ निघण्टो द्वितीयाध्यायस्य दशमः खण्डः । मघम् । रेक्णः । रिक्थम् । वेदः । वरिवः । श्वात्रम् । रत्नम् । रविः । क्षत्रम् । भगः । मीळहुम् । गर्यः । द्युम्नम् । इन्द्रियम् । वसु । रायः भोजनम् । तना । नुम्णम् । बन्धुः । मेधा । यशः । ब्रह्म । द्रविणम् । श्रवः । वृत्रम् । धृतमित्यष्टाविंशतिरेव धननामानि ।। । राधः इति निघण्टौ द्वितीयाध्यायस्य दशमः खण्डः । २-१० ॥ - अथ निघण्टो द्वितीयाध्यायस्येकादशः खः । अध्न्या । उस्रा । उस्रिया । अही । मही । अदीतिः । इळां । जगती । शफ्नरीति नव गोनामानि॥ इति निघण्टो द्वितीयाध्यायस्यकादशः खण्डः । २-११॥ । अप निघण्टो दितीयाध्यायस्य द्वादशः खण्डः । {" रेळते । हेळते । भामते । भृणीयते । भ्रीणाति । भ्रपति । दोधति । नुप्यति । कम्पते । भोजत इति दश क्रुध्यतिकर्माणः ॥ इति:निघण्टी द्वितीयाध्यायस्य द्वादशः खण्डः । २-१२ ।।
s ) म । 11 निघण्टौ द्वितीयाध्यायस्य चतुर्दशः खण्डः । अथ निघण्टो द्वितीयाध्यायस्य त्रयोदशः खण्डः । ? हेळ: । हरीहणिः । त्यज । भामः । एहः। तरः। तपुपी । जूर्णिः । मन्युः । व्यथिरित्येकादश क्रोधनामानि । इति निघण्टो द्वितीयाध्यायस्य त्रयोदशः खण्डः । २-१३ ।। I HERE निघण्टो द्वितीयाध्यायस्य चतुर्दश. खण्डः । वर्तते । अर्यते । लोटते । लोठते । स्यन्दते । कसति । सर्पति । स्यमति । सर्वति । संसते । अति । श्वोतति । सति । वेति । माष्टिं । भुरण्यति । शति । कालयति । पेलयति । कटति । पिस्यति । विस्यति । मिस्यति। प्रवते । प्लबते । च्यवते । कवते । गते । नर्वते । क्षोदति । नक्षति । सर्वति । म्यक्षति । सचति । मच्छति । तुरीयति । चतति । अतति . ! गाति । इय॑क्षति । सञ्चति । सरति । रहति । यतते ।। भ्रमतिमा ध्रजति ।। रजति । लजति । क्षियति । धर्मति । मिनाति । ऋण्वति ऋणोति । स्वरति । सिसति । विपिष्टि । योपिष्टि । रिणाति। रीयते । रेजति। दध्यति । दुनोति'। युध्यति । धन्यति । अरुपति । आर्यति । सीर्यते । तकति । दीर्यति । इति । ति ।। इति अति मर्दति । सर्पते । नसते । यति । इयंतिं । ईत इंजते । जयति । श्वाति । गन्ति-1..आगनीगन्ति । जङ्गन्ति । जिन्वति । जसंति । गर्मति। भ्रति । धाति । यति । वहते । रथयति । जेहते । पार्वति । सुम्पति । साति । पाति । याति । इति । द्राति । दुलति । एवति । जर्मति । जयति । वञ्चति । अनिति । पक्ते । हन्ति । सेति । अर्गन् । अर्जगन् । जिगाति । पतति । इति । द्रमति । द्रवति । वैति । इन्तात् । एति । जगायात् । अयुधुरिति द्वाविंशशतं गतिकर्माणः ॥ इति निघण्टो द्वितीयाध्यापस्य पतुदंशः सणः । २-१४ ।। - ।
। (१०) निघण्टौ द्वितीयाध्यायस्याष्टादशः खण्डः । अथ निघण्टी द्वितीयाऽध्यायस्य पश्चदश। खण्ड: नु । महूं । द्रुवत् । ओषम् । जीराः । जूर्णिः । शूर्ताः । शूधनासः । शीर्मम् । तृषु । तूर्यम् । तूर्णिः । अजिरम् । भुरण्युः । शु । आसु । प्राशुः । तूतुजिः । तृतजानः । तुज्यमानासः । अाः । साचीवित् । युगत् । ताजत् । तरणिः । वातरंहा इति पड्विंशतिः क्षिप्रनामानि ॥ इति निघाटो द्वितीयाध्यायस्य पञ्चदश खण्ड । २-१५ ।। अथ निघण्टो द्वितीयाऽध्यायस्य षोडश. खण्डः । ळित् । आसात् । अम्बरम् । तुर्वशे । अस्तमीके। आके। उपाके। अोके । अन्तमानाम् । अवमे । उपम इत्येकादशान्तिकनामानि । इति निघण्टौ द्वितीयाध्यायस्य षोडश. खण्डः । २-१६ ॥ अथ निघण्टौ द्वितीयाऽध्यायस्य सप्तदशः खण्डः । -रणः । विवाक् । विखादः । नदनुः । भरे । आक्रन्दे । आहवे । आजौ । पृतनाज्यम् । अभीके । समीके । ममसत्यम् । नेमधिता । सङ्काः । समितिः । समनम् । मीळ्हे । पृतनाः । स्पृधः । मृधः । पृत्सु । समत्सु । समयें । समरणे । समोहे । समिथे । संढे । सङ्गे । संयुगे । सङ्ग्थे । सङ्गमे । अत्रतूर्ये । पृक्षे । आणौ । शूर॑सातौ । बाज॑सातौ । समनीके । सले । खजे । पौंस्ये । महाधने । वाजे । अज्म । सर्भ । संयत् । संवत इति षट्चत्वारिंशत्सवामनामानि । इति निघाटो द्वितीयाध्यायस्य सप्तदश. खडा । २-१७ ॥ अथ निघण्टो द्वितीयाध्यायस्याष्टादा. खा. । इन्वति । नक्षति । आक्षाणः । आनट् । आप्ट। आपानः । अर्शत् । नर्शन् । आनथे । अनुत इति दश व्याप्तिकर्माणः । इति निघण्टो दिसीयाध्यापस्थाप्टादशा सण्डः । २-१८॥ - निघण्टो द्वितीयाध्यायस्य द्वाविंशा खण्ड। । (११) अथ निघण्टी-द्वितीयाऽध्यायस्यकोनविंशः खण्डः । दुनोति । नयति । घरति । पूर्वति । वृणक्ति । वृधति । कृति । कन्तति । श्वसिति । नमते । अर्दयति । स्तुणाति । स्नेहयति । यातयति । फुरति । स्फुलति । निर्मपन्तु । अतिरति । वियांतः । आतिरन् । तब्दि । आखण्डल । द्रूणाति । रमणाति । प्रणाति । शम्नाति । तृणैल्हि । ताहि । नितोशते । निर्हयति । मिनाति । मिनोति । धर्मतीति त्रयसिंशधकर्माणा॥ इति निघण्टो द्वितीयाऽयायस्यकोनविंशः खण्डः । २-१९ ।। अथ निघण्टो द्वितीयाऽध्यायस्य विशः खण्डः । दिद्युत् । नेमिः । हेतिः । नमः। पविः । सुकः । वृकः । वधः। व? अर्कः। कुत्सः। इलिशा तुः । तिमम् । मेनिः । स्वपितिः । सायकः । परशुरित्यष्टादश वजनामानि ॥ इति निघण्टो द्वितीयाध्यापस्य विशः खण्डः । २-२० ॥ मच दिघण्टो द्वितीयाध्यायस्कविधः खण्डः । इरज्यति । पत्यते । क्षयति । राजतीति चत्वार ऐश्वर्यकर्माणः ॥ इति निघण्टो द्वितीयाऽध्यायस्यकविंशः बण्डः । २-२१ ।। अप निघण्टो द्वितीयाध्यायस्य द्वाविद्यः खण्डः । राष्ट्री। अर्थः । नियुत्वान् । इन इन इति चत्वारीधरनामानि ।। इति निघण्टो द्वितीयाध्यायस्य वापिंधा खण्डः । २-२२ ।। इति निघण्टौ द्वितीयोऽध्यायः मपस्तु मनुष्या माययप्रयो बदम्याच भावपस्योगो मपमध्या कवे हेलो वर्तते नु लडिर पति दनौति दिद हमति राष्ट्री-इति माथिकित ।
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(१४)
निघण्टी तृतीयाऽध्यायस्य चतुर्दशा खण्डः ।
अथ निघण्टो तृतीयाऽध्यायस्य दशमः खण्डः ।
चट् । अत् । सत्रा । अद्धा । इत्था । ऋतमिति पट् सत्यनामानि ।
इति निघण्टौ तृतीयाऽध्यायस्य दशमा खण्ड. ३-१०॥
अप निघण्टौ तृतीयाऽध्यायस्यैकादश. खण्डः ।
चिक्यत् । चाकनत् । आचक्ष्म । चष्टे। विचष्टे । विचर्षणिः । विश्वचर्षणिः ।
अवचाकशदित्यप्टौ पश्यतिकर्माणः ॥
इति निघण्टौ तृतीयाऽध्यायस्यैकादश. खण्ड । ३-११ ॥
अथ निघण्टौ तृतीयाऽध्यायस्य द्वादश. खण्डा ।
हिकम् । नुकम् । सुकम् । आहिकम् । आकीम् । नकिः । माकिः । नकीम् ।
आकृतमिति नवोत्तराणि पदानि सर्वपदसमाम्नाये ।।
इति निघण्टो तृतीयाऽध्यायस्य द्वादश खण्ड । ३-१२ ।।
अथ निघण्टौ तृतीयाऽध्यायस्य त्रयोदशः खण्डः ।
दुदमिव । हुदं यथा । अग्निर्नये । चतुरंथिइर्दमानात् । ब्राह्मणा व्रतचारिणः । पृक्षस्य
नु ते पुरुहूत बयाः । जार आ भर्गम् । मेपो भृतोऽभि यन्नयः । तद्रूपः । तद्वर्णः । तद्वत ।
तथा इत्युपमाः ॥
इति निघण्टौ तृतीयाध्यायस्य त्रयोदश खण्ड. । ३-१३ ।।
अथ निघण्टौ तृतीयाऽध्यायस्य चतुर्दश खण्ड ।
अर्चति । गायति । रेभति । स्तोमैति । गूर्धयति । गृणाति । जरते । हर्यते । नदति ।
पृच्छति । रिहति । धर्मति । कृपायति । कृपण्यति । पनस्यति । पनायते । वल्गूयति। मन्दते ।
मन्दते । छन्दति । छदयते । शशमानः ! रखयति । रजयति । शसति । स्तोति ।
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निघण्टौ तृतीयाऽध्यायस्यशाष्टादा खण्डः ।
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योति । रौति । नौति । भनति । पणायति । पर्णते । सर्पति ] पक्षाः। महर्यति । वाजयति।
पूजयति । मन्यते । मदति । रसति । स्वरति । वेति । मन्द्रयते । जल्पतीति
"चतुश्चत्वारिंशदर्चतिकर्माण ॥
इति निघण्टौ तृतीयाऽध्यायस्य चतुर्दशः खण्ड । ३-१४ ।।
अथ निघण्टौ तृतीयाध्यायस्य पञ्चदश. खण्ड. ।
विः । विनः । गृत्स। धीरः । वनः । वेधाः । कण्वः । ऋभुः । नवेदाः । कविः ।
मनीपी । मन्धाता। विधाता। विपा। मनश्चित् । विपश्चित् । विपन्यवः। आकेनिपः । उशिजी
कीस्तासः। अद्वातयः। मतयः। मतुर्थाः। वाधत इति चतुर्विशतिर्मेधाविनामानि ।।
इति निघण्टौ तृतीयाऽध्यायस्य पञ्चदश. खण्ड. । ३-१५ ।।
अथ निघण्टो तृतीयाऽध्यायस्य षोडश खण्डः ।
रेमः । जरिता । कारुः । नदः । स्तामुः । कीरिः । गौः । सूरिः । नादः। छन्दः ।
स्तुप् । रुद्रः । कृपण्युरिति त्रयोदश स्तोतनामानि.
इति निघण्टो तृतीयाऽध्यायस्य पोडशः खण्डः । ३-१६ ॥
अथ निघण्टो तृतीयाऽध्यायस्य सप्तदशः खण्डः ।
यज्ञः । वेनः । अध्वर: । मेधः । विदः । नार्यः। सर्वनम् । होत्रा । दृष्टि । देवताता ।
मखः । विष्णुः । इन्दुः । प्रजापतिः। धर्म इति पश्चदश यज्ञनामानि.
इति निघाटी तृतीयाऽध्यायस्य सप्तदशः खण्डः । ३-१७ ।।
अथ निघण्टौ तृतीयाध्यायस्याष्टादशः खण्डः ।
भारताः । कुरवः । वायतः । वृक्तवहिपः । यतस्रुचः । मरुतः । समाधः ।
इत्यष्टाइविनामानि ॥
इति निघण्टो तृतीयाध्यायस्याष्टादशः खण्डा ! ३-१०॥
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निघण्टौ तृतीयाऽध्यायरय त्रयोविंशः खण्डः |
अथ निघण्टौ तृतीयाऽध्यायस्यैकोनविंशः खण्डः ।
ईमहे । यामि । मन्महे । दृद्धि । शन्धि । पूधि । मिमिति। मिमीहि । रिरिड्डि ।
रिरीहि । पीपरन् । यन्तारः। यन्धि । इपुध्यति । मदेमहि । मनामहे । मॉयत... इति
सप्तदश याश्चाकर्माणः ॥
।
इति निघण्टौ तृतीयाऽध्यायस्यकोनविंश खण्ड । ३-१९ ।।
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अथ निघण्टी तृतीयाध्यायस्य विश खण्ड ।
दाति । दाशति । दासति । राति । रासति । पृणक्षि। पृणाति । शिक्षति । तुञ्जति ।
मंहत इति दश दानकर्माणः ।।
इति निघण्टौ तृतीयाऽध्यायस्य विंशः खण्डः । ३-२० ॥
अथ निघण्टो तृतीयाऽध्यायस्यैकविंशः खण्डः ।
परिस्रव । पर्वस्त्र । अभ्यर्ष । आशिप इति चत्वारः अध्येपणाकर्माणः ।।
इति निघन्टौ तृतीयाऽध्यायस्यैफर्षिश. खण्ड
1३-२१ ॥
अथ निघण्टो तृतीयाऽध्यायस्य द्वाविंशः खण्डः ।
"' स्वपिति । सस्तीति द्वौ स्वपितिकर्माणौ ॥
इति निघण्टौ तृतीयाध्यायस्य द्वापिंश खण्डौ । ३-२२ ।।
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अथ निघण्टौ तृतीयाध्यायस्य त्रयोविंश. खण्डः ।
कूपः । कानुः । कर्तः । बवः। काटः । सातः । अवतः । क्रिविः । सदा ! उत्सः ।
ऋश्यदात् । कारोतरात् । वुशयः । केवट इति चतुर्दश कृपनामानि ॥
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इति निघण्टो दृतीयाध्यायस्य त्रयोविंशः खण्डः । ३-२३ ।।
(१७)
-
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निघण्टौ तृतीयाऽध्यापस्यकौनत्रियः खण्डः ।
अथ निघण्टौ तृतीयाध्यायस्य चतुर्विशः खण्डः ।
तुपुः । तका । रिम्बा। रिपुः। रिक्का। रिहायाः। तायुः । तस्करः । वनमुः।
हुरश्चित् । मुपीवान् । मलिम्लुचः । अघशंसः । वृक इति चतुर्दशैव स्तेननामानि ।।
इति निघण्टौ तृतीयाध्यायस्य चतुर्विशः खण्डः । ३-२४ ॥
अथ निघण्टी तृतीयाऽध्यायस्य पञ्चविंशः खण्डः ।
निण्यम् । सखः । सनुतः । हिरुक् । प्रतीच्यम् ।
अपीच्यमिति पेट
नितान्तहितनामधेयानि ।।
इति निघण्टौ तृतीयाऽध्यायस्य पञ्चविंशः खण्डः । ३-२५ ।।
अथ निघण्टौ तृतीयाऽध्यायस्य पदिशा खण्डः ।
आके । पराकै । पराचैः । आरे । परावत इति पञ्च दूरनामानि ।।
इति निघण्टौ तृतीयाऽध्यायस्य पड्डिशः खण्डः । ३-२६ ।।
अथ निघण्टो तृतीयाऽऽयायस्य सप्तविंशः खण्ड. ।
प्रत्नम् । प्रदिवः । प्रर्वयाः । सनेमि । पूर्व्यम् । अहायेति षट् पुराणनामानि ॥
इति निघण्टौ तृतीयाऽध्यायस्य सप्तविंशः खण्डः । ३-२७ ॥
अथ निधर्टी तृतीयाऽध्यायस्याप्टाविंशः खण्डः ।
नवम् । भूत्नम् । नूतनम् । नव्यम् । इदा । इदानीमिति पळेच नवनामानि ॥
इति निघण्टौ तृतीयाऽभ्यायस्याप्टाविंशः खण्डः । ३-२४ ॥
अथ निघण्टौ तृतीयाऽध्यायस्यकोनत्रिंशः खण्डः ।
प्रपित्वे । अमीकै । भ्रम् । अर्भकम् । तरः। सतः। त्वः। नेमःऋक्षाः। स्तृभिः ।
वनीमिः। उपजिहिका । ऊर्दरम् । कुदरम् । सम्मः । पिनाकम् । मेनो । ग्नाः। शेपः।
।
(१०) मिघण्टौ तृतीयाऽध्यायस्य त्रिंशः खण्डः । वैतसः । अया। एना । सिपंक्तु । सचते । भ्यसते। रेजते । इति पड्विशतिर्दिश उत्तराणि नामानि ॥ इति निघण्टौ तृतीयाध्यायस्यैकोनत्रिश खण्डः । ३-२९ ॥ अथ निघण्टौ तृतीयाऽध्यायस्य त्रिश खण्ड. । स्वधे । पुरन्धी । पिपणे । रोदसी। क्षोणी। अम्भसी। नर्भसी। रजसी। सदसी। सद्मनी । धृतवती । बहुले । गभीरे। गम्भीरे । ओण्यौ। चम्यौ । पाश्चौं। मही। उर्वी । पृथ्वी । अदिती । अही। दूरे अन्ते । अपारे अपारे इति चतुर्विशतिर्यावापृथिव्यौर्नामधेयानि । - इति निघण्टी तृतीयाऽध्यायस्य त्रिंशः खण्डः ॥ ३-३० ।। इति निघण्टौ तृतीयोऽध्यायः । उZहन्मरद्गय इरज्यति शिम्वाता निणिग् अप्रेमाकेतुवंट् चिक्द्धिकम् इदमिवाचंति विप्रोरेभो यज्ञो भरता ईमहेदाति परिसवस्वप्रिति कृपस्तृपनिण्यम् आ के प्रश्नप्नयम् प्रपिरवेस्वधे त्रिंशत् ।
अथ निघण्टौ नैगम काण्डः । [ऐफपदिककाण्डः ।] -- अथ निघण्टी चतुर्थोऽध्यायः । । जहा । निषा | शिताम | मेहना । दमूनाः । भूपः । इपिरेण । कुरुतन । जठरे । तितउ. शिप्रे । मया । मन्द । ईन्तिासः । कार्यमानः । लोधम् । शीरम् । विद्रधे। दुपदे। तुग्वनि । नसन्ते । नसन्त । आइनसः । अनसत् । इष्मिणः । वाहः । परितम्या । सुविते । दर्यते । नूचित् । नूर्च । दावने । अपारस्य । शिशीते । सुतुः । सुप्रायणाः । अायुव । व्यवनः । रजः । हरः । जुहुरे । व्यन्तः । क्राणाः । वाशी । विपुणः। जामिः । पिता। शृंयोः। अदितिः । एरिरे । जसुरिः । जरते । मन्दिने । गौ । गातुः । दसयः । तूताव । चर्यसे । वियुते । ऋधक् । अस्याः । अस्य । इति द्विषष्टिः पदानि ॥ । इति निघण्टी चतुर्थाध्यायस्य प्रथमः खण्डः । ४-१ ॥ - अथ निघण्टौ चतुर्थाध्यायस्य द्वितीयः खण्डः । । सस्निम् । वाहिष्ठः । दूतः । वावशानः । वार्यम् । अन्धः । असंश्चन्ती। धनुष्यति । तरुप्यति । भन्दाः । आहनः । नदः । सोमो अक्षाः । श्वात्रम् । ऊतिः । हासमाने । पमिः । ससम् । द्विता । ग्राः । वराहः । स्वसंराणि । शर्या । अः। पविः । वक्षः। धन्। सिनम् । इत्था । सा । चित् । आ । घुम्नम् । पवित्रम् । तोदः । स्वाः । शिपिविष्टः । विष्णुः । आणिः । पृथुनयां । अथर्युम् । काणुका ! अधिगुः । आपः । आपान्तमन्युः । श्मशा।
. (२०) निघण्टौ चतुर्थाध्यायस्य तृतीयः खण्डः । उर्वशी। वयुनम् । वाजपस्त्यम् । वार्जगन्ध्यम् । गध्यम् । गधिता। कौरयाणः । तौरयाणः । अहयाणः । हरयाणः । आरितः । बन्दी। निष्पपी। तूर्णाशम् । क्षुम्पम् । निचुम्पुणः । पदिम् । पादुः । वृकः । जोपवाकम् । कृत्ति । श्वनी । समस्य । कुटस्य । चर्षणिः। शर्मः। केपयः। तू तुमापे । अंसत्रम् । काकुर्दम् । वीरिटे। अच्छे । परि । ईम् । सीम् । एनम् । एनाम् । सृणिः । इति चतुरुत्तरमशीतिः पदानि ॥ इति निघण्टी चतुर्थाध्यायस्य द्वितीयः खण्डः । ४-२ !! अथ निघण्टी चतुर्थाध्यायस्य तृतीयः खण्डः । - । : आशुशुक्षणिः । आशाम्यः । काशिः । कुणारुम् । अलावणः । सललूकम् ।' कल्पयम् । विसईः । वीरुधः । नक्षदाभम् । अस्कंधोयुः । निशुम्भाः । बटुक्थम् । प्रदर।। ऋदूपे । पुलुकामः । असिन्वती । कपना । भाजीकः । सुजाना । जूर्णिः । ओमा । उपलप्रक्षिणी । उपसि । प्रकलवित् । अभ्यर्धयज्वा । ईझे । क्षोणस्य । अस्मै । पार्थः । सीमनि । सप्रथाः । विदानि । आर्यन्तः । आशीः | अजीगः । अमूरः। शशमानः। देवो देवाच्या कृपा | विजामातुः । ओमासः । सोमानम् । अनवायम् । किमीदिने । अमवान् । अमीषा। दुरितम् । अवां । अमतिः । श्रुष्टी । पुरैन्धिः । रुशत् । रिशादशः । सुदना । सुविः । आनुारू । तुर्वभिः । गिर्वणाः । अमर्ने मूते । अम्यक् । यादस्मिन् । जारयायि । अप्रिया । चना । पचता । शुरुधः । अमिनः । जन्तीः । अप्रतिष्कृतः । शाशदानः । सुमः । मुशिनः । से । विहाँः । अनः। राणा । स्तियांनाम् । स्तिपाः। जारु । जम्धम् । कृलिया ।
निघण्टी चतुर्याऽध्यायस्य तृतीयः खण्ड' । (२१) तुञ्जः। बर्हणां । ततनुष्टिम् । इलीविशः। कियेधाः। भूमिः । विष्पितः । तुरीपम् । रास्पिनः । ऋञ्जतिः । ऋजुनीती । प्रतद्वसू । हिनोत । चोकूयाण । चोकूयते । सुमत् । दिविष्टिषु । दूतः । जिन्वति । अमंत्रः । ऋचीपमः । अनर्शरातिम् । अनर्वा । असामि । गल्दया । जहवः । यॉरः । वेकनाटान् । अभिधेतन । अहुरः। मतः । वावाप्यम् । चाइन् । रर्यति । असंक्राम् । आधवः । अनवनवः । सदान्वे । शिरिम्घिटः । पराशरः । क्रिविदती । फरूलती। दनः। शराहः । इदंयुः । कीकटेषु । पुन्दः। धृन्दम् । किः । उल्बम् । प्रवीसमृवीसम् । इति द्वात्रिंशच्छतं पदानि ॥ इति निघण्टौ चतुऽध्यायस्य तृतीय खण्ड । ४-३ ।। इति निघण्टौ चतुर्थोऽध्यायः। T जहा सस्निमाशुशुमणिवीगि।
अथ-निघण्टौ दैवतकाण्डः । अथ निघण्टौ पञ्चमोऽध्यायः ।। अथ निघण्टो पञ्चमाऽध्यायस्य प्रथमा खण्डा । F- अमिः । जातवेदाः । वैश्वानर इति त्रीणि पदानि ॥ इति निघण्टो पञ्चमाऽध्यायस्य प्रथम. खण्ड। । ५-१ ।। अथ निघण्टो पश्चमाऽध्यायस्य द्वितीय खण्ड । द्रविणोदाः । इध्मः । तनूनपात् । नराशंसः । इळ: । बहिः । द्वारः । उपासानक्तां । देव्याहोतारा । तिम्रो देवीः । त्वष्टा । वनस्पतिः । स्वाहाकृतय इति त्रयोदश पदानि ॥ इति निघण्टो पनमाऽध्यायस्य द्वितीया खण्ड । ५-२ ।। अप निघण्टौ पचमाऽध्यापस्य तृतीय खण्ड । अश्वः। शकुनिः। मण्डकाः । अक्षाः । ग्रावाणः । नाराशंसः । रथः। दुन्दुमिः । इयुधिः । हस्तमः । अमीशवः । धनु। ज्या। ईपुः । अश्वार्जनी । उलूसलम् । पृषभः । द्रुघणः । पितुः । नद्यः। आपः । ओपघयः । रात्रिः। अरण्यानी। श्रद्धा । पृथिवी । अवा। अनायी। उलूखेलमुसले । हविर्धाने । यावापृथिवी । विपाट्छुतुद्री । आौ । शुनासीरी। देवीजोष्ट्री। देवी उर्जाहुती इति पत्रिंशत् पदानि ॥ । इति निघण्टौ पञ्चमाऽध्यायस्य तृतीय खण्ड । ५-३ ।। अप निघण्टो पक्षमाऽध्यायस्य चतुर्थ सण्ड । नापुर । वरणः । रुद्रः । इन्द्रः । पर्जन्यः । बृहस्पतिः । ब्रह्मणस्पति : । क्षेत्रस्य पतिः। वास्तोप्पतिः । वाचस्पतिः । अपां नपात् । यमः 1 मित्रः। का। मरखान् । विश्वकर्मा । ठाक्ष्यः ।
निघण्टो पञ्जमाऽध्यायस्य पळः खण्डः ।
(२३)
मन्युः । दधिकाः । सविता । स्रष्टा । वातः । अग्निः । वेनः । असुनीतिः । अतः । इन्दुः ।
प्रजापतिः । अहिः । अहिर्बुनयः । -सुपर्णः ।, पुरूरवा इति द्वात्रिंशत् पदानि ॥
इति निघण्टो पञ्चमाध्यायस्य चतुर्थः खण्डः । ५-४ ॥
।
अथ निघण्टौ पश्चमाऽध्यायस्य पञ्चमः खण्डः।
श्येनः । सोमः । चन्द्रमाः। मृत्युः। विश्वानरः । धाता । विधाता | मरुतः । रुद्राः।
भवः । अङ्गिरसः । पितरः । अर्थर्वाणः । भृगवः । आप्त्याः । अदितिः । सरां ।
सरस्वती । वाक् । अनुमतिः । राका । सिनीवाली । कुहः । यमी । उर्वशी । पृथिवी ।
इन्द्राणी । गौरी । गौः । धेनुः । अध्या । पथ्यो । स्वस्तिः । उपाः । इदा । रोदसी
इति पत्रिंशत् पदानि ॥
इति निघण्टो पञ्चमाऽध्यायस्य पश्चमः खण्डः । ५-५ ।।
अय निघण्टो पञ्चमाऽध्यायस्य षष्ठः खण्डः ।
अश्विनौ । उपाः । सूर्या । वृषाकपायी। सरण्यः । त्वष्टा । सविता । भर्गः । सूर्यः । पूपा ।
विष्णुः । विश्वानरः । वरुणः । केशी । केशिनः । पृषाकपिः । यमः । अन एकपाद । पृथिवी ।
समुदः । अर्वा 1 मनुः । घ्यङ् । आदित्याः । सप्त ऋषयः । देवाः । विश्वेदेवाः । साभ्याः ।
वसवः । वाजिनः । देवपल्यो देवपल्यः इत्येकत्रिंशत् पदानि ।।
इति निघण्टौ पञ्चमाऽध्यायस्य पष्ठः सण्डः । ५-६ ।।
अथ निघण्टौ पञ्चमोऽध्यायः ।
समाप्तश्च निघण्डग्रन्यः।
अग्निदविणोदा यवो वायु. येनोऽश्विनौषट् ।।
अथ निघण्टौ दैवतकाण्डः ।
अथ निघण्टौ पञ्चमोऽध्यायः ।।
अथ, निघण्टौ पञ्चमाऽध्यायस्य प्रथमः खण्डा ।'
अमित जातवेदाः । वैश्वानर इति त्रीणि पदानि ॥
H
• इति निघण्टो पञ्चमाऽध्यायस्य प्रथमः खण्डः । ५-१॥
अप निघण्टो पश्चमाऽध्यायस्प द्वितीयः खण्डः ।
द्रविणोदाः । इध्मः | तनूनपात् । नराशंसः । इळ: । बहिः । द्वार । उपासानता ।
व्याहोतारा । तिम्रो देवीः । त्वष्टा । वनस्पतिः । स्वाहाकृतय इति त्रयोदश पदानि ॥
"
इति निघण्टौ पञ्चमाऽध्यायस्य द्वितीयः खण्डः । ५-२ ।।
अथ निघण्टौ पश्चमाऽध्यायस्य तृतीयः खण्डः ।
अश्वः। शकुनिः। मण्डूकाः । अक्षाः। ग्रावाणः । नाराशंस: । रथः। दुन्दुमिः । इषुधिः ।
इस्तमा । अमीशवः । धर्नु। ज्या। ई।। अश्वार्जनी । उलूखंलम् । धूपमः । द्रुपणः । पितुः ।
नयः। आपः । ओषधयः । रात्रिः। अरण्यानी। श्रद्धा । पृथिवी। अयो। अमापी ।
उलूखलमुसले । हविर्थाने । यावापृथिवी । विपाछुतुद्री । आतौ । शुनासीरी। देवीजोष्ट्री।
देवी उर्जाहुती इति पत्रिंशत् पदानि ।।
इति निघण्टौ पञ्चमाऽध्यायस्य सृतीयः खण्डः । ५-३ ॥
अय निघण्टो पश्चमाऽध्यायस्य चतुर्थः खण्डः ।
बायुः । वरुणः । रुद्रः । इन्द्रः । पर्जन्यः । गृहस्पतिः । ब्रह्मणस्पति । क्षेत्रस्य पतिः।
वास्तोम्पतिः । वाचस्पतिः । अपां नपाद् । यमः । मित्रः। का। सरखान् । विश्वकर्मा । ताः।
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निघण्टौ पञ्चमाऽध्यायस्य षष्ठः खण्डः ।
(२३)
मन्युः । दधिक्राः । सविता । त्वष्टा । वातः । अग्निः। वेनः । असुनीतिः । अतः । इन्दुः ।
प्रजापतिः । अहिः । अहिर्बुध्धयः सुपर्णः । पुरूरवा इति द्वात्रिंशद पदानि ।।
इति निघण्टौ पत्रमाऽध्यायस्य चतुर्थः खण्डः । ५-४ ।।
अथ निघण्टौ पश्चमाऽध्यायस्य पञ्चमः खण्डः।
श्येनः । सोमः । चन्द्रमाः । मृत्युः। विश्वानरः । धाता । विधाता । मरुतः । रुद्राः ।
अभवः । अङ्गिरसः । पितरः । अर्थवणिः । भृगवः । आप्त्याः । अदितिः । सरमा ।
सरस्वती । वाक् । अनुमतिः । राका । सिनीवाली । कुहूः । यमी । उर्वशी । पृथिवी ।
इन्द्राणी । गौरी । गौः । धेनुः । अध्न्या । पथ्यो । स्वस्तिः । उषाः । इळा । रोदसी
इति पत्रिंशत् पदानि ॥
इति निघण्टो पश्चमाऽध्यायस्य पञ्चमः खण्डः । ५-५ ।।
अथ निघण्टौ पश्चमाऽध्यायस्य षष्ठः खण्डः ।
अश्विनौ । उपाः । सूर्या । वृषाकपायी। सरण्यः । त्वष्टा । सविता । भगः । सूर्यः । पूषा ।
विष्णुः । विश्वानरः। वरुणः । केशी । केशिनः । घृषाकपिः । यमः । अज एकपात् । पृथिवी ।
समुद्रः । अर्था । मनुः। ध्यङ्ः । आदित्याः । सम्म ऋषयः । देवाः । विश्वेदेवाः । साभ्याः ।
वसवः । वाजिनः । देवपत्न्यो देवपत्न्यः इत्येकत्रिंशत् पदानि ।
इति निघण्टौ पञ्चमाऽध्यायस्य षष्ठः खण्डः । ५-६ ।।
अथ निघण्टौ पञ्चमोऽध्यायः ।
समाप्तच निघण्टुग्रन्या ।
अग्निदंविणोदा अश्वो वायु. येनोऽश्विनीपट् ॥
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विविध – सूची- पत्रम निरुक्तोपलव्धनामकानामाचार्याणां नामानि । नामानि पृष्ठ संख्या । नामानि पृष्ठ संख्या ... ... .... ... १२१८ ११०३ .... ६७ .... .... मामायण औदुम्बरायण औपमन्यवः ओणवाभः कास्थक्यः क्रोष्टुकिः गार्य वायणिः आचार्य: एके ऐतिहासिषाः ५६ | याज्ञिका: १० नैदानाः २ कौत्सः ३४४ | नरुक्ताः १३०० गालवः १२८९ / चर्मशिरस् १८ तटिकि. १४ | शतवलाक्षः १२६६ | पाकपूणिः ४०९ | स्थौलाष्ठीविः... २०९ शाकटायनः .... ... ७२३ ८६६ .... .... .. .... .... .... Baad 14. 4... १४५ १३९२ १८ .... .... ... . इन मे से किसी एक आचार्य का नाम मन्त्रों में बहुत स्थल पर आया है, जो नियत-पाठ करने से ज्ञात होगा। ये सब आचार्य निरुक्तकार हैं । इस से यह सिद्ध है कि, महपि यास्क मुनि से पूर्व भी निरुक्त के पूर्वोक्त आचार्य और उनको बनाई हुई पुस्तकें थीं । जो इस समय अनुपलब्ध हैं। 1 निघण्टुपठितपाठक्रमेण नामसूची .. . at. .. .... ... -10 .... १४७ भिम १४८ हिरण्यम् .... .... .... .... .... ... ... .... .... .... .... .... .... .... ... .... ... ... १७५ ... .... ... .... .... १५३ / वियत् .... नाम पृष्ठ] नाम पृष्ठनाम पृष्ठ । अप पृथिवीनामधेयानि लोहम् १६४ पृश्निः कनकम् ... १६४ नाका १९१ गौः .... १३० काञ्चनम् १६४ / गौः १९२ समा १६४ | विष्ट जमा नमः क्षमा १४८ अमृतम् क्षा १४९ इति पट साधारणानि । मरुत १६५ क्षमा १४९ दत्त्रम् क्षोणिः १५० अप रमिनामानि जातरूपम् क्षितिः १५० खेदयः १९६ अवनिः १५१ इति हिरण्यनामानि । किरणा: १९६ उर्वी १५१ अथान्तरिक्षनामानि । गाव: पृथ्वी १५२ "मय. १९८ मही '१५३ | अम्वरम् अभीशवः रिपः १७५ गमस्तयः २०० अदितिः व्योम वनम् २०० १७६ उस्ताः २०१ निति. वसवः २०१ পত্তি २०२ মুদি १७७ मयूसा २०२ १७८ सप्त पयः २०३ पृथिवी १७८ गातुः साध्या. २०३ गोत्रा १७९ सुपर्णाः २०४ स्वयम्भूः इति पृपियोनामधेयानि इति मनामानि । अध्वा पुष्करम् १८. अप हिरण्पनामानि ।। अप दिन्नामानि सगरः १०० हेम ११. समुद्रा १८१ माता: पदम १६८ अध्वरम् १८. आता २१४ उपरा. इरपन्तरिक्षनामानि। ধন २१४ २१५ पेश: अप पद साधारणानि प्रधनम १८८मोम .... ... .... .... .... ... .... .... .... .... a.. .... १७७ मरीचिपा .... १५४ / बहि। १४२ घन्य १५५ १५६ / भाकाशम् १५६ / माप: १५७ १५८ भूः .... .... .... ... पूषा ... ... PAN A.. " . .... .... .... ... ... १७९ .... .... ... ... t. ... .... .-- .... .... .... . .40 .... .."
२) निघण्टुपठितपाठक्रमेण नामसूचि । पृष्ठ | नाम .... ... .... ... ..." .... .... ... ... .... ... .... ... ... .... ... .... ... .... ... ... ... .... ... .... ... ... नाम पृष्ठ | नाम पृष्ठ ककुभः २१५ सुम्नावरी २३३ अश्मा २५४ हरितः २१६ अहना २३३ ] पर्वतः २५५ द्योतना २५६ २३४] गिरिः इति दिडनामानि । श्वेत्या २३४ [ व्रजः २५६ अरुपी २३४ | चरुः २५७ अथ रात्रिनामानि सूनृता २३५] वराह २५८ श्यावी २१७ | सूनृतावती... २३६ शम्बरः २५८ क्षपा २१८ | सूनृतावरी... २३६ | रोहिणः २५९ शर्बरि २१८ रेवतः अत: २१९ इत्युपोनामानि फलिग २६० ऊया २१९ उपर। २४५ अथाह मानि राम्या २२० उपल: २४५ याम्या २२१ [बस्तोः २३८ चमस: २६१ पयस्वती २२१ । यो २३९ | अहिः २६१ तमस्वती २२१ | भानु. २४० अभ्रम् घृताची २२१ बाशरम् २४० | बलाहकः शिरिणा २२२ | स्वसराणि... २४१ मेघः मोकी २२२ [घ्रंस २४१ | इतिः शोकी २२२ | धर्म २४१मोदनः ऊधः २४१ / वृषन्धि पयः २२३ | दिनम् २४२| वृत्रा हिमा २२३ | दिवा २४३ | असुर वस्वी २२४ । दिवेदिवे धविद्यवि इति रात्रिनामानि । ૨૪ इति मेघनामानि ॥ इत्यहर्नामानि । अपोपोनामानि अप वाहनामानि । विभावरि... अथ मेघनामानि २२८ लोका सूनरी २२९ / अद्रिः २४९ घारा २७० भास्वती २२९ मावा २५० मोदती २३० | गोत्रः २५१ | गौः पित्रामधा... २३१ बलः अर्जुनी २३१ अनः वाजिनी २३२ | पुरुभोजा २५३ गभीरा वाजिनीवती २३२ | वलियानः... २५३] गम्मोरा'... २६२ २६२ २६२ .... ... ... ... २२३ | घृणः ... .... ... ... ... २६५ २६५ २४३] कोशः .... .... .... २६९ ... ... ... ... ... .... .64. २५२ गोरी २५३ | गान्धी .... ... २७१ ૨૭૨ २७२ २७२ ... ... ...
निघण्टुपठितपाठक्रमेण नामसूचि । (३) नाम पृष्ठ | नाम पृष्ठ | नाम पृष्ठ ... .... .... ... .... .... ... ..- ३०६ ३०७ ... ... ... .... .... .. .... ... .... ... ३०८ ३०८ ३०८ ३०९ ३०९ ... .... ... ... ३१० .... मन्द्रा मन्द्रजनी वाशी वाणी वाणीची वाणः पविः 'भारती घनिः नालीः मेना 'मेलि सू- सरस्वती निवित् स्वाहा वग्नुः उपब्दि मायुः काकुद जिह्वा घोषः स्वरः शब्द: ... .... ... .... ३१२ .... ... .... ... .. ३१२ ३१२ ३१२ ... ... २७२ | धिषणा २८९, जन्म २७३ नौः २९० / वृबूकम् २७४ | अक्षरम् २९०. बुसम् २७४ | मही २९०, तुग्रया २७५ | अदिति •२९१ | बुधुरम् २७५ | पची २९२, सुक्षेम २७६ / वाक २९२. घरुणम् २७६ | अनुष्टुप २९३ | सिरा २७७ | धेनु २९३ / अररिन्दानि २७७ वल्गुः २९४ | ध्वस्मन्यत् २७८ गल्दा २९४ | जामि २७८ सरा २९४ | आयुधानि २७९ सुर्णी २९५ | क्षपः २७९ / बेकुरा २९५ ) अहिः २८० अक्षरम् इति वाहनामानि । २०० स्रोतः २८१ तृप्तिः अथोदकनामानि । २८१ २८२ अण २९६ उदकम् २८२ | क्षोदः २९८ प्रयः २८३ क्षध २९८ २८४ नभः २९९ शवः २८४ | अम्भः २९९ | यहः २८४ | कबन्धम् ३०० ओजः २८५ शालिलम्. ३०० सुखम् २८५ | बाः क्षत्रम् २८६] वनम् ३०१ आवयाः .. २८६ | घृतम् ३०२ शुभम् २८७ मधु ३०२] यादुः २८७१ पुरीषम् ३०३ | भूतम् २८७ पिप्पलम् ३०३] मुवनम् २८८ क्षीरम् ३०४ | भविष्यद २८८/ विषम् ३०४] महद २८८ रेतः ३०५ | आपः २८९ कधः ३.५ | व्योम ... .... ... .... ३१३ ... ... . .... ... ... ... ३१५ .. ... .... .... .... होत्रा गीः ... .. .... गाया: ... ... 040 ... .... .. .... .... ३१८ ३१८ ११८ .... गणः धेना ८ग्ना. विपा नग्ना कमा ... .... .... ... .... ... .... ... ...
(४) निघण्टुपठितपाठक्रमेण नामसूचि । नाम :/नाम या: .... .... ... ... ... ... महः सीकम् स्वतीकम् सतोनम् गहनम् गभीरम् ३३४ वर्य ३३४ ].उ ... +001 ३५८ ... - मनम् ... ... .... .... .... ... ... ... .... .... पृष्ठ | नाम पृष्ठ पृष्ठ ३२० | अम्बु ३३४ | सिन्धवः ३२० तोयम् ३३४ | कुल्याः ३२० | तूयम् ३२० कृपीटम् ३५६ ३२१ | शुत्रम् ३३५ | हरावत्यः ३५७ ३२१ | तेजः ३३५ | पावत्य ३५७ ३२२ स्वधा ३३५..लवस्यः ३५७ ३२३ | वारि १३३५ | उर्जस्वन्त्यः ३२३ | जलम् ३३६ पयस्वत्यः ३५८ ३२४ जलापम् ३३६J तरस्वत्यः ३५८ ३२४ | इदम् ३३६ | हरस्वत्यः ३५८ ३२५ रोषस्वत्यः ३२५ इत्युदकनामानि । भास्यत्यः ३५९ ३२५ গলি: अप नदीनामानि मातरः ३५९ ३२६ अवनयः ३४६ नद्यः ३४६ इति नदीनामानि । ३२७ रवा: ३२७ सीरा: ३४७ भयास्वनामानि । ३२७ स्रोरयाः ३४८ ३२७ एण्यः ३४८ मत्या ३२८ | धुन्यः १४९ हपः ३२८ जाना: ३४९ अर्वा ३२९ धक्षणा: ३५० वाजी ३६७ ३२९ | स्वादो मः ३५० सप्तिः रोपपत्रा ८ ३५१] बलिः ३३० हरितः ३५२ दधिपाः ३३० सरितः ३५२ दधिवावा... १८ भवः ३५२ एतम्या नमन्वः १५३] (तपः ३१९ २५३ : ३३२ | हिरण्य वर्णः ३५३ दौगंहः ३३२ रोहिता १५४ औचः प्रथमः ३५४ हाय ३३३ [माः ३५५ बागु ... ३२६ | यह्वयः समः सदनम् ऋतुम् योनिः रतस्य योनि. सत्यम् नीरम् रविः सत् पूर्णम् सर्वम् अदितम् पहि मामः सर्पिः अपः पवित्रम् अमृतम् .... .... ... ... ... .... .... .... ... ... .... . ... ... .. ... ... ... ... ... ... .... ... ... हेमा - ... ... ... .... .... सः पाम्बरम् अभ्यम् 4.. .. ३३३ । ससुतः ... ...
निघण्टुपठितपाठनमेण नामसूची । पृष्ठ | नाम पृष्ठ ... ... ... ... ३७४ | धुमद ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ३८८ शमी ३०८ शक्तिः ... ... .... ... ... .. नाम पृष्ठ | नाम बुध्नः । ३७२ मन्दते ३८५ । करासि Yoo अरुषः ३७२ रोचते ३८५ करन्ती ४०० मांश्चत्व ३७३ / द्योतते ३८६ / करिश्त अव्यथय: .... ३७३ | ज्योतते ३८६ चक्र Yoo श्येनासः ३८६ / कर्वम् सुपर्णाः ३७४ कोः ४०१ पानाः इति ज्वलतिक्रमाणोधातवः । ३७४ कर्तव ४०२ नरः ३७५ अथ ज्वलतोनामधेयानि । कृत्वी ४०२ हार्याणाम् ३७५ धी: ४०२ हंसास: ३७६ / जमत ३८७ / शची ४०३ अश्वाः ३७६ / कल्मलीकिनम् ४०४ जलनाभवन ४०४ इत्यश्वनामानि । मल्मलामवन् ३८९ शिल्पम् अचिः अथादिष्टोपयोजनानि । ३८९ शोचिः ३८९ इति कर्मनाभानि । हरी इन्द्रस्य ३७७ तपः रोहितः ३७८ | तेजः ३९० अयापरयनामानि । हरित मादित्यस्य १३७८ हरः रासमो ३७९ | घृणिः ३९१ अजा: -३८० | शृङ्गाणि पत्य: ३०१ इति ज्वलतोनामधेयानि । तनयः गावः ३८१ तोक्म दयावा: ३८१ अथ कर्मनामानि । तवम ४२२ ३८२ शेपः ४२२ नियुतः ३८२ अपः अप्नः ३९४ गयः इत्यादिष्टोपयोजनानि । दंश जा: वेयः ३९५ ४२४ अपत्यम् अथ ज्वलतिकर्माणोधातवः । विष्टी भ्राजते ३०३] व्रतम् सूनुः ३८४ | कवरम् ४२५ ध्राश्यति ३८४] शवम ३९८ ४२६ दीदयति योति ३८५ करूणम् मन्दते इस्परपनामानि । .... ... ... ... .... ३९१ तोयम् .... .... .... .... ४२२ .... .... . .... ... विश्वरूपाः...}} ... .. .... .... ... ... ३९४ ... ... .... ... ४२३ . ३९६ पहः .... ... ... ४२४ ४२५ भ्राशते ३९७नपात Come ... .. ... ३९८/ बीजम् . ... ... ... ३८५ / करणानि ... ..
(६) निघण्टुपठितपाठक्रमेण नामसूची । पृष्ठ [नाम पृष्ठ । नाम . .... .... .... .... ... ... .... .... .... ४३३ | क्षिपस्ती ४३३ | शक्करी ४३४ | भरीत्रे .... .... .... ... .... ... .... .... .... ... .... .... ४३६ .... ... ... ... .... .... .... ... .... .... .... .... ४५३ | मन्यते .... ... .... पृष्ठ नाम अथ मनुष्यनामानि गभस्ती ४४६ अथ कान्तिकर्माणः । करस्नो ४४६ मनुष्या। ४२७ बाहू ४४७ वश्मि ४६० ४३२ भुरिजो ४४७ उमसि ४६१ घवा ४४७ वेति ४६१ जन्तवा ४४७ वेनति विशः ४४८ वेसति ४६२ क्षितयः ४३४ वाञ्छति ४६२ कृष्टयः ४३५ इति वाहुनामानि । वष्टि ४६३ चर्षणयः ४३५ वनोति नहुष अथाङ्गुलिनामानि । जुपते हरयः ४३६ हयति ४५२ ४३६ | अग्रुवः मर्याः आचके ४६४ अण्व्यः मत्याः ४५३ उशिक् ४६५ ४३७ विश माः ४६५ ४३८ क्षिप: वाता: ४५४ छन्त्सद शर्या ४३८ ४५४ तुवशाः चाकन ४६६ ४३९ रशनाः ४५५ द्रुह्यवा चकमान: ४६७ धीतयः आयवः कति ४४० अथया ४५६ पदवः कानिपद ४६८ ४४० विप मनव: कक्ष्या ४५७ इति कान्तिकर्माणा। पूरवा अवनयः ४४१ जगतः ४५७ ४५७ अथाननामानि । तस्युषः ४५७ पञ्चजनाः ४७० विवस्वन्तः जामयः अन्धः ४४२ ४५८ ४७० सनामयः ४४३ वाजः ४५८ पृतनाः शाखा ४५९ पया इति मनुष्यनामानि । योकत्राणि.... प्रया ४७१ योजनानि... अथ बाहुनामानि । ४५९ | पृक्षः ४७२ धुर मायती ४४४ ४.२ अभीशवः वयः च्यघाना ४५९ सिनम् ४७४ अभीशु गभस्तयः ४६० अव: अप्नवाना.... ४७४ क्षु विनङ्गसौः इत्यमुलिनामानि । धामि ४७५ .... .... ... .... ... ... .... .... .... .... ... .... .... .... .... ... ... ४४२ / हरिता ४४२] स्वसारः .... ... .... .... ... .... .... .... ... ... .... ... ... .... ४५९ / पितु! .... ... ४४५] दोधितयः १. ... ... .... ... ... .... .... - ...
निघण्टुपेठितपाठक्रमेण नामसूची । नाम पृष्ठ। नाम पृष्ठ नाम पृष्ठ .... ५०२ ४७५ ... ... ... ४९१ | रयिः ... ... ५०३ ५०४ ५०४ ५०४ ५०५ ५०६ ... ... ... ४७८ ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ५०६ ५०७ .. ... ... ... ... ... ५०८ ५०८ ५०८ ५०९ ५०९ ... ... ... ... ... .... ... ... ४७५ पाजः !.. ४८९ / वतिः इला शवः ४९०, श्वात्रम् इषम् ४७६ तरः ४९० रत्नम् ऊक ४७६ | तवः रस: ... ४७७ त्वक्षः ४९. | क्षत्रम् स्वघा ४७७ | शर्दः ४९१ भगः अर्कः बाधः ४९२ मीलहम ४७८ नृम्णम् ४९२ गयः नेमः ४७८ तविपी ४९३ | द्युम्नम् सम् ४७८ | शुष्मम् ४९३, इन्द्रियम् नमः ४७९ / शुष्णम् ४९४ | वसुः आयु ४७९ शूपम् ४९४ सून्ता ४८० दक्षः ४९५ | राषः ब्रह्म ४८० वीलु ४९५/ भोजनम् वचः ४८१ | न्योल्नम् ४९ तना कोलालम् ४८१ | सहः ४९६ / नृम्णम् यश: ४८२ [ यहः ४९६ | बन्धुः वधः इत्यननामानि । वर्ग: ४९६ | यश. अथ दशात्तिकर्माणः । वृजनम् ४९७ [ ब्रह्म वृक् ४९७ दक्षिणम् भावयति ४८३ मज्मना ४९७ थवः भर्वति ४९८ यत्रम् वस्ति ४९८ वृतम् बेति ४८४ द्रविणम् ४९८ देवेष्टि इति धननामानि । ४९९ भविष्यन् सम्बरम् ४९९ वसति अप गोनामानि । भसपः इति बसनामानि । ४८६ मप्नया बन्धाम् ४८७ उखा हरति ४८७ अप पननामानि । ৱি इति दशात्तिकर्माणा। नध्यम् रेरणः ५०१ मही अप पसनामानि । सिपम् ५०१ अदितिः ५०२ सा ४९६, मेघा ... ... ... ... ... .... .... .. ... ... ... .. ... .00. ... .... 04 ५१२ ५१२ ५१२ ४८३ पोस्यानि ४८४ वर्णसि ... ... .. ... ... .... ४८५ स्यन्द्रासः ... ... ... ... ४८५ ... ... ... ... ... ... ५००[मही . ४८८ देदः .
(८) निघण्टुपठितपाठक्रमेण नामसूची । पृष्ठ .... .... .... ... .... ... ५३७ .. .... ... ... ५३८ ५३८ ... ... ... ... .... ... ... ... .... ... : .... ... ... ५४० ५४० ५४० ५४१ ५४१ ५४१ .... ... .... ... ... ... ... नाम पृष्ठ नाम पृष्ठा नाम जगती अथ गतिकर्माण 1 सचति शकरी ऋच्छति वर्तते इति गोनामानि । ५२६ / तुरीयति अयते ५२६ | चतति लोटते ५२७ अतति अप ऋध्यतिकर्माणः । लोठते ५२७ गाति स्यन्दते रेलते ५२७ | इयक्षति ५१७/ कसति हेलते ५२७] सश्चति ५१७ | सर्पति ५२७ । सरति भामते ५१७ स्यमति ५२८, रंहति हणीयते ५१८ सति ५२८] यतते श्रीणाति ५१८/संसते ५२९| भ्रमप्ति भ्रपति ५१९ | अयति ५२९ जति दोषते ५१९ श्रोतति ५२९/ रजति वनुष्यति ५१९ ध्वंसति ५३ रूति कम्पते ,५२० वेनति ५३० क्षिति भोजते ५२० माष्टि ५३० धर्मात मुरम्पत्ति इति ध्यतिपर्माणः। ५३१ मिनाति यति ५३१ ऋण्यति कालपति ५३१ | ऋणोति अप कोधनामानि । पेलपति ५३२ स्वरति कण्टति ५३२ | सिसति ५२१] पिस्पति ५३२ | विपिप्टि ५२१ बिस्पति ५३२ योपिप्टि घृणिः ५२१ | मिस्पति ५३२ रिणाति ५२२ | प्रवते ५३३ | रीयते भामः ५२२ प्लवते ५३३ रेजहि ५२३ | पवते ५३३ यति रः ५२३ करते ५६३ दम्नोति सपा ५२३ गवते ५३४ युयति भूमिः ५२३] नवते ५३४ पन्धति मन्युः ५२४] सोदति ५६४] भापति प: ५२४] मक्षति ५३५ आति समति इति धनामानि । ५६५ मीपत्रे (रोयते) म्पठि ५६६ वसति ... ... ... ... ५४२ ... ... ५४३ ... .... ... ... .... ५४ ५४५ .... ... ... .... .... . ५४६ .... .... ... ... .... .... . ... ... ५४८ ...
निघण्टुपठितपाठक्रमेण नामसूची । नाम .... ... .... ... ... ... .... .... ... ... पृष्ठा नाम ५४८ जमति ५४९ । जवति ५४९ | पञ्चति ५५० अनिति ५५१ पवते ५५० हन्ति ५५० सेपति ५५१ | अगन ... .... दीपति ईषति फणति हनति अर्दति मदंति सर्सते नसते हयंति इयत्ति ... .... .... .... .... ... .... .... पृष्ठ नाम ५५८ | अजिरम् ५७२ ५५८! भुरण्युः ५७३ ५६० | आशु. ५६. प्राशुः ५६. तूतुजिः ५७५ ५६१ | तूतुजानः ५७५ ५६१ तुज्यमानासः ५७६ मन्त्राः ५७६ ५६२ साचीवित ५७६ धुगत् ५७७ ताजद ५७७ ५६४ तरणि ५७७ वातरहा. ५७८ इति क्षिप्रनामानि । ५६५ ५६५ अधान्तिकनामानि । .... .... ५५१ | अजगन् .... ... .... .... ...- .... .... ... ... - ५५१ / जगाति ५५२ पतति ५५२ इन्वति ५५३ | द्रमति ५५३ | द्रवति ५५३ वेति 4.. .... .... .... ... .... ... .... .... .... ... .... .... ५५३ | हन्तात् ५५४ | एति ५५४] जगायात् ५५४ | अयथः ५५४ इति गतिकर्माणः । .. .... ५७९ ५६६ .... .... .... ईखते नयति श्वात्रति गन्ति आगनीगन्ति जङ्गन्ति .... जिन्वन्ति जसति गमति प्रति घ्राति प्रयति वहते रपयंति बेहते प्वः कति क्षुम्पति .... 4. तळित् आसान अम्बरम् तुर्व अस्तमोके. ... .... ... ५८० ६८० ५०१ .... ५५५ अप क्षिप्रनामानि। .... .... .... ५६६ आके ... .... ... .. .. ... ५६८ अबकि ... .... M 0 .... ..40 .... ५५५ मा ५५६ द्रवद ५५६ ओपम् ५५६ | जीरा. ५५६ जूणिः ५५६ | शूर्ता ५५६ शूधनास ५५६ शोभम् ५६८ उपाके ५४२ ५८२ ५६८ अन्तमानाद ५४३ अवमे उपमे ५६९ इत्यान्तिकनामानि । ५७० भय सग्रामनामानि। Gos. .... ५८४ .4a0 प्साति F .. ... ... वाति याति इपति द्राति दूलति एजति ... ... .. ... ५५७ तूपम ५५७ | दणिः ५७१ ५७२ | विवाक् .00 14 (१०) निघण्टुपठितपाठक्रमेण नामसूची । माम पृष्ठ | नाम पृष्ठ | नाम ६२३ ... .... विखादः नदनुः ... .... ... भरे .... ... ... .... ... ... ... ... દર ... .... .... ... .... .... ... .... ... .... ... आक्रन्दे आहवे आजी पृतनाज्यम् अभीके समीके ममसत्यम् नेमधिता सङ्घ समिति समनम् मीलहे पृतना। स्पृधः मृधः पृत्सु समत्सु समय समरेण समोहे समिथे ... .... ... ..... ... पृष्ठ ५९१ | खल ६०७ [ श्वसिति ५९२ | खजे ६०७/ नमते ५९२] पौंस्ये ६०७ अर्दयति ५९३ | महाधने ६०७ / स्तृणाति ६२४ ५९३ | वाजे ६०८] स्नेहयति ६२४ ५९४| मज्म ६०९ | यातयति ६२४ ५९४ सम ६०९ / स्फुरति ५९५ सय ६०९ | स्फुलति ५९५ | संवतः ६१० | निवपन्तु ५९५ अवतिरति... ६२६ इति सग्रामनामानि । वियातः ६२७ अथ व्याप्तिकर्माणः । आतिरन् ६२७ तळित् ६२७ ५९७ | इन्वति ६१२ | आखण्डल ६२७ ५९८ नक्षति ६१२ द्रुणाति ૬૨૭ ५९८ आक्षाण: ६१२/ रम्णाति ६२८ ५९८ आनट् ६१२ | शृणाति ६२८ ५९९ | आष्ट ६१३ | शम्नाति ६२८ आपानः ६१३ | तृणेळहि ६२९ ६०० | अशत् ६१३ | साहि ६०० | नक्षत् ६१४| नितीशते ६०१ | मानशे ६१४ | निबहंयति.... ६०१ | अनुते .... ६१४ मिनाति ६०२ मिनोति ६०२ इति व्याप्तिकर्माणः । पमति ६०३ ६०३ अथ वधकर्माण।। इति वकर्माणः । ६०३ | दम्नोति ६०३ | नयति अप वचनामानि। ६०४ | ध्वरति ६२० | दिद्युत् ६०४ | पूर्वति ६२१ । नेमिः ६०४] वृणक्ति ६२११ हेतिः ६०५ | वृश्चति ६२२ नमः ६०६ | कृन्वति ६२२/ पवित ६०६ कृन्तति ... ... .... .... .... ... ... ... ... ६२९ .... ... .... .... ... ... .... ... .... ... ... .... सङ्गथे सङ्गमे वृत्रतूर्ये पूर्वे पाणी शूरसाती वाजसातो समनीके .... ... ... ... ... ... ... ३२२ । सृका (११) निघण्टुपठितपाठपमेण नामसूची । नाम पृष्ठ | नाम .... ... ... ... .. .... ... ... ... .... ... .... . .... .... .... ... .... ६६४ .... ... परशुः ... हस्वः ... ... पृष्ठा नाम पृष्ठ वृकः ६३६ | भूरि ६४८ तविपः वधः ६३६ शश्वत ६४९ महिप ६६१ वजः ६३७ विश्वम् ६४९ | अम्व: अर्कः ६३७ | परीणसा ६४९ | ऋभुक्षा कुत्सः ६३७ | ध्यानशिः ६४९ | उक्षा कुलिशः ६३७ | शतम् - ६५० विहायाः तुजः ६३८. सहस्रम् ६५० पह्वः तिग्मम् ६३८ | सलिलम् ६५१ नवक्षिय ६६४ मेनिः ६३९ / कुवित् ६५१ | विषक्षसे स्वधितिः ६३९ अम्भृणः सायक: ६३९ इति बहुनामानि । माहिनः ६४० गभीरः ८६५ अथ हस्वनामानि ककुहः इति वचनामानि । रभसः ६५२ वाघव अर्थश्वर्यकर्माणः । ६५३ विरप्शी ६६७ निघृष्वः ६५३ इरज्यति ६४१ अद्भुतम् मायुकः बहिष्ठः ६६८ ६६८ क्षति ६४२ कृघु राजति ६५४ इति महनामानि । दभ्रम् इत्यचयंकर्माणः । अर्मकः अप गृहनामानि अषेश्वरनामानि । क्षुल्लकः गयः अल्प: ६७० कृदरः राष्ट्री ६७० गतः इति हस्वनामानि । ६७० हय॑म् नियुत्वान् ६७१ अस्तम् अप मन्नामानि । पस्यम् इतीश्वरनामानि । ૬૭૨ ६५६ / दुरोणे महद ६७२ -६५८] नीळम् प्रघ्नः मथ बहुनामानि ६७३ ६५९ | दुर्या: ऋष्यः ६५९ । स्वसराणि... ६७३ उरु ६४७ वृहद अमा ६७३ "तुवि पुरु .... .... पत्यते ६४१ प्रतिष्ठा ६५४ वहिपत् ... .... ६४२ वम्रका .... .... । .... .... ... ... ... ... ... .... ... मयः .... ... ... .... ... ... ... ... ... .... ... ६४८ उसितः ६४८ तवसः ६६. [ दमे ... e- ...
निघण्टुपटितपाठक्रमेण नामसूची । नाम पृष्ठ | नाम पृष्ठ/नाम . 640 ... ... ... ... ७०० ... ... ... ... ६८६ | मझेमाः ६८७ अनेमाः ६८७ अनेद्यः ६८८] अनवध: ६८८ अनभिशस्ता ६८८ ६८९ ) सुनोथः ६८९ ] पाकः ... .... ... ७०१ ... .. .... ... ... ... ... केत: ... ... ... कृत्तिः ६९४ | सुरम्यम् अथ प्रशस्यनामानि । योनिः ६७४/ सुदिनम् ३८६ सम ६६५ | शूषम् शरणम् ६७५ | सुनम् ७०० वरूपम् ६७६ शम्मम् ७०० ६७६ [ भेषजम् छदिः ६७७ जलापम् ७०१ छाया ६७७ | स्योनम् ७०१ उवध्यः এম ६७७ | सुन्नम् ७०२ अज्म ६७८ | शेवम् ७०२ शिवम् वामः ६९० इति गृहनामानि । ७०२ शम् ६९० वयुनम् अथ परिचरणकर्माणः । कम् इति प्रशश्यनामानि । इरज्यति ६७९ इति सुखनामानि । अथ प्रशानामानि । विधेम .... ६७१ सपर्यति ६७९ अथ रूपनामानि । ७०३ नमस्यति ६८० ६९२ दुवस्यति पतिः ६९२ ऋघ्नोति वर्षः चित्तम् नादि ऋच्छति वपुः ७०५ अमतिः असुः :-1 सपति धीः ७०५ मासः विवासति शची: ७०६ माया ७०६ इति परिचरणकर्माणा । अप्न: ७०६ पिष्टम् अप सुखनामानि । पेशा अभिश्या कृशनम् इति प्रज्ञानामानि । शिम्बाला ६८३ प्सर: যারা ६९७ अथ सत्यनामानि। शातपन्ता ... ६८४ तानम् ६९८ शर्म ६८४ ७०८ अपम् ६९८) बट स्यूमकम् ७०९ ६९८ यत् वृधम् ३८५ मयः ३८५ इति पनामानि । भद्धा ७०४ ... ... ... निनिक .... चेत: ... .... .... ७०४ , ... ... ... मा ... ... ... ... ६९६) वयुनम् ... ... ६८४ | बर्जुनम् H. ... ... .4 ... ३८५ शिल्पम् .04. ... ... ... ...
निघण्टुपठितपाठक्रमेण नामसूची । (१३) ... Pol .... ..." .... .... .. ... ... .... H ... ७४४ / वाजयति ७४५ पूजयति ७४५ / मन्यते ७४५ मदति ७४६ / रसति ७४६ स्वरति ७४७ वेनति ७४७ / मन्द्रयते ... ... .. .... ... ..14 .... ... ... .... ... ... ... चष्टे ... .... ... .... .... .... .... . .... .... .... ... .... ... पृष्ठ | नाम पृष्ठ ] नाम पृष्ठ इस्था ७१० अपाचंति कर्माणः। पपृक्षाः शतम् महयति इति सरयनामानि । अति गायति ७५७ अथ पश्यतिकर्माणः। रेमति ७५७ स्तोमति ७५८ चिक्यद ७१२ | गूद्धयति ७५८ चाकनद ७१२ | पृणाति ७५८ मानक्षम ७१२/ जरते ७५९ ७१३ ) ह्वयते विचष्टे ७१३)नदति ७४७ जल्पति निचर्षणिः... ७१३ पृच्छति ७४० विश्वचर्षणिः इत्यर्चति कर्माणः । ७१४ रिहति ७४ अवचाकवत् ७१४ घमति ७४८ अप मेधादि नामानि 1 कृपायति ७४९ इति पश्यतिकर्माणः । कृपण्पति ७४९J विप्रा पास्यति ७४९ विप्रः अथ नवोतराणि पदानि। पनायते हिकम् वल्गूयति ७५०] धीरः नुकम् मन्दते ७५० देन: सुकम् ७५१ वेषा आहिकम् .७१७ छन्दति ७५१] कृण्वः ७६३ आकीम् छदयते ७५२ | काभुः नकिः ७५२ नवेदाः ७६४ माकिः ७५३ कविः नकीम् ७५३ मतीपिणः आकृतम् ७५३ मन्धाता स्तोति ७५३J विधाता इति नवोत्तराणि पदानि । योति ७५३ विपः रोति ७५४ मनश्चित अपोपमाः । नौति ७५४ विपावित् भनेति ७५४ विपन्यव! .... ७६७ इदमिय-इत्यादि तपा पणायति ७५५ माकेनियः... ७६८ पर्यन्तम् ७१९-७३९ पणते ७५५/ उशिजः ૭૬૮ इत्युपमाः। सपति ७५५ वीस्तासः... .... .ora .. .... ७४९ | पृस्सः .... .... ... .... .... ... ... 4 .... .... ७१६ | भन्दते .... +u. .fr ... ... .... ... .... .... .... ७१७ ७१८शशमानः ७१८ रखपति ७१८जरयति ७१९ | शंसति 000 4000 ... 104 .... .... .... ... ... .000 +++ Ron .to ...
(१४) निघण्टुपटितपाठक्रमेण नामसूची ! नाम पृष्ठ | नाम पृष्ठ | नाम पृष्ठ ... .... ... ... .... ... ... ... ... ... ... ... .... .. . ... .... ७९६ ७९७ ... ... .... ... ... .... ... ... .... ७७५ | देवयानः अदातयः ७७० मखः ७८२ | मेदमहि ७९३ मतयः ७७० विष्णुः ७८२ मनामेह ७९३ मतुथाः ७७१ | इन्दुः ७८२ | मायते ७९३ वाघतः ७७१ प्रजापतिः ७८२ धर्मः इति याञ्चा कर्माणः । ७८३ इति मेधावि नामानि । इति यज्ञनामानि । अथ दानकर्माणः। अथ स्तोतृ नामानि । दाति ७९४ अथ-ऋत्विङ् नामानि । रेभः दाशति ७९५ ७७२ ७९५ जरिता दासति ७७२ | भारतात ७०४ राति ७९५ कारु ७७२ | कुरवः ७८५ रासति ७९५ नदः ७७३ वाधत: ७८५ पृक्षि ७७३ | पृक्तबहिप स्तामुः ७८६ कीरिः ७०३ | यतमुच पृणाति ७८६ गौः शिक्षात् ७७४ मरुतः ७८६ ७९७ सूरिः तुति ७७४ सबाघः ७८७ मंहते ७९८ नादः ७८७ छन्दः ७७५ इति दानकर्माणः । इति ऋत्विह नामानि । ७७५ अपाध्येपणा कर्माणः । ७७५ अप याञ्चाकर्माणः। कृपण्युः ७७६ परिस्रब ७९८ ईमहे ७८ इति स्तोतु नामानि । पवस्व यामि अथ यज्ञनामानि। मन्महे ७९९ दद्धि ७८९ यज्ञः इत्यध्येपणा कर्माणः । शग्धि ७७८ ७९० वेनः ७७८ पूद्धि ७९० अथ स्वपिति कर्माणी। अध्वर: ७७८ मिमिटि ७९. मेष: ७७९ मिमोहि स्वपिति ७९० ८०० विदयः सस्ति रिरिट्टि नायः ७८० रिरीहि इति स्वपिति कर्मागो। सवनम् ७८० पीपरत् ७९२ होत्रा ७८० यन्तारः पप कूपनामानि । ७९२ इप्टिः ७८१ | पन्धि ७९२ | कूपः देवताता ७८१ | इषुघ्पति ७१३ | कातुः रुद्रा .... ... ... ६९९ ... ७८८ अभ्यर्ष ७८९ | आशिपः ... ... .... ... ... .... ... ... ... ... .. ....
निघण्टुपठितपाठक्रमेण नामसूची । नाम ... ... ... ... ... ... ... दभ्रमभकम ... .... ... ८०६] आके ८१७ | ऊदम्, कृदरम् ८०६ | पराके ... .... ८१८ | अया, एना ... पृष्ठ | नाम पृष्ठ/नाम पृष्ठ कर्तः ८०२ | सस्वा ८१४ इति नवनामानि । वतः ८०२] सनुतः ८१४ काट: ८०३ | हिरुक् ८१५ अप उत्तराणिनामानि । खातः ८०३ प्रतीच्यम् ८१५ अवतः ८०४ | अपीच्यम् .. प्रपित्वेऽमीके ८२५ क्रिविः ८०४ इति पनिर्णीसान्तहित नामधेयानि । तिरः, सतः ८२७ “८०५ उत्सः ८.५ स्वः, नेमः... ८२९ अथ दूरनामानि । ऋश्यदात ८३० ऋक्षाः, स्तृभिः 'कारोतरात् वनी, उपजिह्विका.... ८३२ ૮૨૪ कुशयः ८०६ पराचः ८१७ | रम्मः, पिनाकम् केवट: ८३५ ८१७ | मेना, ग्ना... ८३७ इति कूपनामानि । आरे ८१८ | शेपः, वितसः ८३८ परावतः अथ स्तेननामानि । रिवक्तु, सचते इति दूरनामानि । ८४२ भ्यसते, रेजते ८४३ ८०७ तवा '८०० अप पुराणनामानि । इति उत्तराणि नामानि । रिम्वा .४०८ रिपुः ८१९ अथ द्यावापृथिवी नामधेयानि । रिका ८०९ प्रदिवः रिहायाः ८०९ प्रवया: ८२० स्वधे ताः सनेमि ८२० | पुरन्धी ८०९ तस्करः ८२१. धिपणे ឱកពុះ ८२१ / रोदसी ८१० क्षोणी ८४७ इति पुराणनामानि । मुपीवान् ८११ ८.८ मम्मसी ८४८ 'मलिम्लुचः ८११ नमसी अप नवनामानि । अधशंस ८१२ रजसी ८४८ “वृक १८१२ | नवम् ८२१ सदसी ८४८ नूरनम् इति स्तेननामानि । नूतनम् ८२२ घृतवती ८४९ ८२३ | बहुले अपपनिर्णीतान्तहित नामधेयानि। नव्यम् ८२३ गभीरे ८५० निण्यम् ८१३ | इदानीम् ८२४ गम्भोरे ... ... ८०८/प्रनम् ... .... ८२० .. .... .. ... ... ... ... ८१०] पूर्व्यम् ८१० अह्लाय .... Gas. Gon. ... ... ... ...- ... ... ... .. .re ... ८२२ सधनी ...
निघण्टुपठितपाठयमेण नामसूची । नाम पृष्ठ | नाम ओण्यो चम्बो স্বী मही ... पृष्ठ | नाम पृष्ठ ८५२ | दूरे अन्ते.. ८५२ ८५२ अपारे ८५३ ८५२ ८५२ । इति द्यावापृथिवी नामधेयानि । ८५स | उर्वी ८५० | पृथ्वी ८५१ | अदिति ८५१ | अही ... निघण्टुपठितपाठक्रमेण पदसूची नाम पृष्ठ | नाम अथ द्विषष्टिः पदानि । अग्रसत् इष्मिणः ... ९२८ .... .... .... .... जहा ८५९ | वाहा .... ... ... .... ... ८६० | परिवम्या ८६३ | सुविते ८६७ [ दयते ८६९ | नूचित .... ९०२] गौ। ... .... .... ८७२ | नूच पृष्ठ नाम पृष्ठ ८९६ / अदिति। ९२७ ८९८ एरिरे ९०० | जसुरिः ९२८ ९०० जरते ९३१ ९०१ मन्दिने ९३२ ९३३ ९०४ | गातुः ९३४ ९०४] दंसयः ९३५ ९०६ तूताव ९३५ ९०६ / चयसे ९०८/ वियुते ९०९] मायक ९१० अस्याः ९११॥ अस्य ९१२ इति द्विपष्टिा पदानि । .... .... ... ... .... ... ... ... ... निघा शिताम मेहना दमूनाः मूपः इपिरेण कुरूतन जठरे तितउ शिने मध्या मन्दू ईमन्तिाम कायमान:.... लोघम् शीरम् विद्रघे ... ९३९ ९४० .... .... . .. ... .... ... ८७४ [दावने ८७६ | अकूपारस्य ८७६ | शिशीते ८७७ | सुतुकः 44१ | सुप्रायणाः... -८८२ | अप्रायुवः ८८३ च्यवनः ८८४ रजः ८८७ हरः ८८८| जुहुरे ८८९ ! व्यन्तः काणा: ८९० वाशी ८९३ | विषुण. ८९४ जामिः ८९४ | पिता ... ... .... ... .... ... ... .... ... ८९० .... ... .... . अय चतुरुतुरम पोति पदानि । ९१८ सस्निम् ९५३ ९२० वाहिष्ठ ९२० । दूता १२१ वावशानः ९२३ | वार्यम् २२४ । अन्या ९५८ १२५ । अस चरन्ती ९५४ ९५५ ९५६ ९५७ ... ... तुम्यान नसन्ते नसन्त माहनसः ... .... 00 ८९५ | दांयोः ....
निघण्टुपठितपाठप्रमेण पदसूची। ( १७) नाम पृष्ठ पृष्ठ नाम पृष्ठ | नाम ... ... .... .... ... .... ... .... .... .... .... .... ... .... ... .... .... .... ... वनुष्यति तहष्यति मन्दनाः आहनः नदः सोमोमक्षा: স্বাস্থ ऊतिः हासमाने पङ्गिः ससम् द्विता प्राः वराहा स्वसराणि शर्याः अर्कः पविः वक्षः धन्य सिनम इत्था सचा चित् आ धुम्नम् पवित्रम् तोद: विश्वा शिपिविष विष्णः अघृणिः पृथुजपा: अपर्युम् काणुका ९६१ / अध्रिगुः .. ९६३ ] आङ्गपः ९६४ | आपान्तमन्युः ९६५ श्मशा ९६६ | उर्वशी ९६७ | वयुनम् ९६९ वाजपस्त्यम् ९७० वाजगन्ध्यम् ९७१ | गध्यम् ९७२] गधिता ९७३ | कौरयाण: ९७४ | तौरयाण... ९७४ | महयाणा ९७५ हरयाण:... ९७९ | आरितः ९७९ | वन्दी ९८० निष्पपी ९८२ तूर्णाशम् .. ९८३ | खुम्पम् ९८३ | निचुम्पुणः ९८४ | पदिम् ९८५ पादुः ९८५ | वृकः ९८६ | जोषवाकम् ९८६ | कृतिः ९८७ | श्वघ्नी ९८८ | समम् ९९१ ] कुटस्य ९९२ | चपीणिः... ९९३ शम्ब' ९९३ | केपयः ९९६ ] तूतुमाकृपे ९९७ | अंसत्रम् - ९९८ ] काकुदम्.. .... १००२ | अच्छ १०५५ १००४ परि १०५५ १००५ / ईम् १००९ सीम् १०५५ १०१०। एनम् १०५५ १०१५ | एनाम् १०५५ १०१६ | सृणिः १०५५ १०१६ इति चतुरुत्तुरम शोति पदानि । १०१७ १०१० अथ दानिशच्छत पदानि । १०१८ १०१९ | आशुशुक्षणिः १०५९ १०२० आशाभ्यः १०६२ १०२० काशिः १०६३ १०२१ कुणारुम्.... १०६४ १०२२ | अलातृणः १०६५ १०२४ | सललूकम् १०६७ १०२५ | कल्पयम् १०६९ १०२६ | विनुहः १०२७ | धीरुधः १०७० १०२९ ] नक्षदाभम् १०७१ १०३१ | अस्कृघोयुः २०७२ १०३२ | निम्मा: १०७३ १०३७ | बृयदुक्यम् १०७४ १०३८ ऋदूदरः १०३९ | दुपे १०४० पुलुफामः १०४३ | असिग्वती १०७६ १०४३ | कपना! १०७७ १०४४ | भाऋजीकः १०७८ १०४५ हशाना: १०७९ १०७ | पूणिः १०४० १०४४| ओमना १००१ १०५० उपलपक्षिणी १०४२ १०५२] उपसि .... .... ... .... ... .... ... .... .... ... ... ... ... .... ... १०७४ १०७५ १९७६ D... ... ... .... ... ... ... ... .... .... ... ... .... ... .... ... ९९९ । बोरिटे (१८) निघण्टुपठितपाठक्रमेण पदसूची । नाम पृष्ठ नाम पृष्ठ । नाम पृष्ठ प्रकलविद अभ्यर्धयज्वा ... .... ११५९ १९६० ... ... . .... ... .... .... .... .... १९६४ ११६४ ... ... ११२३ | चोकूयमाणः ११२४ / चोकूयते ११२५ | सुमत ११२६ / दिविष्टपु ११२८ दूतः ११२८ जिन्वती.. ११३० अमत्रः ११३१ चीपमः ११३२ / अनरातिम् ११३३ अनर्वा असामि ११३४ गल्दया ११३५ / जल्हवः ११३८] बकुरः ११३८ बेकनाटान ममिधेतन १९६६ १९६७ १९६८ ... ... .... .... ... .... ... .... ... ... ... ११७१ १९७२ ११७४ .... ... .... ११४० / अंहर: १०८५ अम्यक १०८५ | याश्मिन् १०८६ जारयायि १०८७ | अग्रिया १०८८| चनः १०९९ पचता १०९३ | शुरुषः १०९४ | अमिनः १०९५ | जज्भतो.... १०९५ / अप्रतिधुतः १०९७ पाशदानः १०९८ | सुप्रः १०९९ सुशिप्र. ११०० रसु ११०१ | द्विवीं ११०२ अक्रः उराणः ११०५ स्तियानाम् ११०६ | स्तिपाः ११०६ | जयार ११०९ जरूयम् १११० | कुलिशः १९११ तुक्षः १११२ | चहणा १११२ | सतनुप्टिम् १९१३ / इलीविपस्य १११३ कियेधाः... १११६ | भूमिः १११७ विपितः... १९१८तुरोपम् १९१९ रास्पिन:.... १९१९ | ऋचति ११२० | अजुनौती ११२१ । प्रतहसू ११२२ । हिनोट ११७६ ११७८ ११७९ ... ... क्षोणस्य अस्मे पाथः सवीमनि सप्रथाः विदयानि धायन्त ... आशीः अजीगः अमूर शशमानः देवो देवाच्या कृपा विजामातुः मोमासः सोमानम् अनवायम् किमीदिने अमवान् . अमीवा दुरितम् अप्वे भमतिः ध्रुष्टी पुरग्धिः रुशव रिसादशः सुदरः सुविदनः.. मानुषक.. सुर्वणिः गिर्वगा। बसूर्तसूत ... ... .... ... ... ... .... ... ... ११८२ ११८३ १९८४ १९८४ ... ११४१ बतः ११४२ | वाताप्यम् २१४३ | पाकन ११४४ रपंयति ११४५ | असमाम् - आघत: ... ११४७ अनवनव.... ११४० सदावे ११४९ पिरिम्बिठः परापरा ११५० किविदंति कल्लती.. ११५२ ... .... ... ... १९८५ ११८५ .... ... ... ... .. ... १९९२ ... .... ..- शरारा ... ... ११५४ ११५५/ इदंपृः १.५६ कोरटेपु ... ... .. .... ... -- ११५७ कि: ...
निघण्टुपठितपाठक्रमेण पदसूची । माम पृष्ठ | नाम पृष्ठ नाम पृष्ठ .. .... ... .... .... १३४४/ वायुः .... .... ... .... .... ... .... .... ... .... .... .... .... ... .... .... .... .... .... .... .... उल्बम् ११९९ ग्रावाणा .... १३४० अथ द्वात्रिंशत्पदानि । ऋबोसम् ... १२०० नाराशंसः १३४२ १३९१ रथा इति द्वात्रिंशत्तं पदानि । वरुणः १३९४ दुन्दुभिः १३४६ इपुधिः १३९६ .... १३४० अथ त्रीणि पदानि । १४०१ हस्तनः १३४८ पर्जन्यः अभीशवा १४०६ अग्निा १२५४ वृहस्पतिः १४०८ जातवेदाः १२६१ १३५१ १४०९ ब्रह्मणस्पतिः ज्या वैश्वानर. १३५२ १२६५ क्षेत्रस्य पतिः १४११ १३५४ इति त्रीणि पदानि । अश्वाजनी वास्तोऽपतिः १४१४ १३५५ वाचस्पति उलूखलम् १३५७ अपानपात् १४१७ अथ त्रयोदश पदानि । वृपभः १३५८ यमः १४१८ १३६० द्रुधणः द्रविणोदाः १२८७ १४२३ इध्मः १२९९ पितुः १३६२ कः १४२५ नद्यः १६६४ | सरस्वान् १३०० तनूनपाद १४२६ नराशंसः आप: १३०२ १३६९ | विश्वकर्मा १४२९ ईळा १३६९ तायः १४३२ बहिः १३७१ | मन्युः १३०७ अरण्यानी १३७२ | दधिकाः उपासनक्ता १३०८ श्रद्धा १३७४ | सविता १४३८ दैव्याहोतारा १३११ | पृथिवी १३७५ त्वष्टा तिलो देवी १३१२ अप्वा १३७७ वात: १४४२ स्वष्टा १४४३ १३१४ भग्नायो मनस्पतिः १३१७ | उलूखलमुसले १४४५ स्वाहाकृतया १३२१ | हविर्घाने १३८० असुनीतिः १४४८ द्यावापृथिवी १३८१ इति त्रयोदश पदानि । १४४९ विपाट्तुद्रो प्रजापतिः १४५२ भय पत्रिंशत्पदानि। भास्नी १३८४ अहिः शुनासीरी १३८५ महिर्वघ्न्यः अधः १३२८ देवी जोप्ट्रो १४५५ पाकुनिः १३३१ | देवी ऊर्जाहुती १३८८ पुरुरवाः... १४५६ मण्डूका:... १३३५ अक्षा: १३३८ इति पत्रिंशत्पदानि । इति द्वात्रिसालदानि । ... .... ... .... १३०४ | मोषधयः १३०५/ रात्रिः .... .... .... .... .... .... ... .... .... .... ... .... .... ... .... १३७८ | अग्निः १३७९ | वेनः ... .... ... ... ... .... ... १३८१ इन्दुः ... ... .... १३८६ | सुपर्णः ... ... ... ... .... ... ....
(२०) निघण्टुपठितपाठक्रमेण पदसूची । .... ... .... ... .... .... ... .... १४६४ | गौः .... ... .... .. १४७१ | स्वास्ति ... .... .... .... .... १४७६ | रोदसी ... नाम पृष्ठ [ नाम पृष्ठ | नाम पृष्ठ अप. पत्रिंशत्पदानि । उर्वशी १५०३ विष्णुः १५४८ पृथिवी १५०४/ विश्वानरः १५५० श्येनः १४५२ इन्द्राणी १५०५] वरुणः १५५१ सोमः १४६० गौरी १५०७ केशी १५५५ चन्द्रमाः १५०९/-केशिन १५५७ मृत्युः १४६७ धेनुः १५५८ নিশান १५११ | वृषाकपिः १४६८ अन्या १५१२ | यम १५६० घात १४७० पथ्या १५१४ अज एकपात् १५६१ विधाता १५१४ | पृथिवी १५६५ मरुतः १४७४ उपाः १५१५ | समुद्रः १५६६ १४७५ इला १५१८ दध्यङ् १५६८ ऋभवः १५१९ / अथर्वा १५६८ अङ्गिरसः १४७९ १५६९ पितरः १४८० इति षट्त्रिंशत्सदानि । आदित्याः १५७० अपर्वाणः १४४२ अर्थकत्रिशस्पदानि । सप्त ऋपय' १५७२ भृगवः १४८४ देवाः १५५७ आप्श्या:.... १४८५ | अश्विनी.. १५२३ | विश्वेदेवा. १५७६ अदितिः. १४८६ | उपाः १५२४ साध्या: १५७८ सरमा १५३१ यसवः १५८० सरस्वती १४९२ - वृषाकपायो १५३४ । वाजिनः ... १५८३ पाक १५३६ | देवपल्यः १५८४ अनुमतिः १४९६ स्वष्टा १५३८ राका १४९६ | सविता १५३९ इत्येत्रिपदानि सिनीवाली १४९८ भगः १५४२ १४९८ ] सूर्य: इति निघण्टु समाप्तः। १५४४ यमी १५०२ | पूषा १५४६ । इति वियिधसूचीपत्र समाप्तम् । ... .... .... .... ... .... .... १४९० | सूर्या ... १४९४ | सरण्यू: ... ... ... .... .... .... .... .... .... ... .... "