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Divya Pranay Ki Deepshika

Dr. Harish · 2011/03

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दिव्य-प्रणय
की
दीपशिखा
[महीयसी मीरा के जीवन पर आधृत मौलिक खड-काव्य]
डॉ. हरीश
उप-प्राचाय, प्राचाय एव अध्यक्ष, हिदी विभाग
राजकीय स्वायत्तशासी महाविद्यालय
अजमेर
कृष्णा नदर्रा, अजमेर

[रचनाकार अथवा प्रकाशक की स्वीकृति के बिना इस काव्य का
कोई भी अश यहीं भी प्रकाशित नहीं दिया जायेगा।]
प्रकाशक कृष्णा ब्रदर्स
महात्मा गाधी मार्ग
अजमेर (राज.)
रचनाकार
प्रथम सस्करण मई १९९०
मूत्य ४०/- (चालीम रुपय)
मुद्रक
सतीशचद्र शुक्ल
वैदिक यत्रालय अजमर
आवरण शिल्प प्रकाश आर्टिस्ट
DIYTA-PRANAY KI DEEPBILIKA
.
AKHAND KAYYA
-By Dr HARISH

Y समर्पण x x शब्द का सामर्थ्य, तेरे इगितो का नाद प्रीति-मय आदेश तेरा,-'याद मे आबाद' भक्ति-नभ के सूय | करुणा के अमर अवतार दीन बधु । दयाद्र -दाता | दीन के दरबार ॥१॥ पूण-ब्रह्म । रसेश प्रभु तुम, भक्त-वत्सल त-भूप आदिनाथ, विराट् तुम ही, कृष्ण के प्रतिरूप हे पतित-पावन । तुम्हारी दीप्ति रस का राग प्रणय की मनुहार, कान्ता-भक्ति, अमर-सुहाग ।।२।। भक्ति-लो, माधुर्य का शृगार, जिनके साथ पद्म जलवत्, आप माधव, मुक्ति जिनके हाथ यह प्रणय की दिव्य-रेखा, प्रभु | करो स्वीकार हे दयाधन। शब्द दाता । दीन के प्राधार ॥३॥ x x x करुणावतार अन त-थी। दीनवधु | सदगुरु-समय श्री दाता भगवान के चरण-कमलो मे सादर श्रद्धा सहित- अकिंचन हरीश

रवरित
प्रीति के अवतार ! मन के मीत । जय के प्राण
हे मुरारी | यह तुम्हारी, बाँसुरी का दान
गति, प्रगति के रूप, मोहन | माधवी अनुराग
विश्व को दो कम का, अच्युत । अनत सुहाग ॥१॥
काम, क्रोध, विदग्ध-पीडा से भरे सगीत
माग हैं अवरुद्ध, माधव । मोह से अभिनीत
भक्त वत्सल । विभ्रमी जग के सभी अभियान
कहाँ मधूसदन | तुम्हारी मधुरिमा मुस्कान ॥२॥
विष बुझे हैं पात्र सारे, अह से आक्रान्त
फूक दो वह शख, भटका विश्व फिर हो शात
ज्यो दिया आलोक, विष अमृत बना उदगीथ
त्यो हटा दो मोह तामस, जागरण हो गीत ।।३।।
काव्य के प्रणयो । तुम्हारे प्यार की प्राशीप
सत्य, शिव, सुदर, बनें स्वर प्राण के हे ईश !
हे मुकुद । उदार । वाणी प्रणय-काव्य विशेष
मृजन पाये, कम का, दे विश्व को सन्देश ॥४॥
प्रार्थना के उपकरण लेकर दयानिधि | आज
पूर्णब्रह्म सिंगार मोहन शब्द-स्वर, रसाज
प्रणय की इस दीप्ति लौ को, शब्द दो गोविद ।
स्नेह-सर्जन, सिद्धि-समता,
को गिरा गोविद ॥५॥

प्राकिशन शव से ही मां से दिव्य-प्रणय की दीपशिखा मीर. - IN YAur or . परम श्रद्धेय पिताजी भीरा के कई पदो का श्रद्धा से पाठ करते थे और मैं, "श्रद्धावान लभत ज्ञानम्" सूत्र की असाधारण शक्ति से उत्प्रेरित होकर सभी कुछ चुपचाप सुनता गुनता रहा। प्रत्यत भाव प्रवणता से मिला ममतामयी मां का वह गीत-गुजन ही प्रस्तुत काव्य के मूल म है। मां की ममता और पिता की आशीष जिसे मिले, वह निश्चय ही भाग्यवान है और मेरे सौभाग्य ने ही इस काम्प को वाणी दी है, ऐसी मेरी मा यता है। इस सृजन के प्रेरक कुछ क्षण सत्य और भी है, जिनकी प्रक्षरता का प्राज भी श्रद्धा से स्मरण कर लेता हूँ। वे सृजन सयोग है-शैशव से ही चित्तौड यात्रा, मेडता-यात्रा तथा व दा-विपिन अज मे महीनो निवास । इही सम क्षणो या भाव-सचय इस रूप मे बिखर गया । पुण्य सलिला भागीरथी के तट (हरद्वार) पर इस काव्य के मगलोन्गीथ या समारभ हुमा फिर मीरा-मदिर चित्तौड और यमुना तट एव निधुवन म इसके कुछ अश उतरे और फिर सहसा ही लेखनी स्तब्ध हो गई। पूरे पांच वष यह कतृ त्व अपरिसमाप्त ही पडा रहा । एक दिन फिर किसी अज्ञात प्रेरणा से एक सग और लिख गया। इधर अनेक वर्षों से शोध पम में व्यस्त रहने से मीरा पर पढ़न को मिला और इतिहास का मीरा पर अनपेक्षित मौन देखकर रक्त उबला । कई शोध अनुसधातामो ने इस जीवन्त नारी को पल्पित-पार माना है। कुछ ने तो राजस्थान में उसका भस्तित्व ही अस्वीकार कर दिया और कुछ ने स्वीकार भी किया, तो भी इतिहास के सशक्त-मौन पी तह मे सब की पावाचें जैसे मूर्षित हो गई। शताब्दियो से राजस्थान की प्रात्मा बनवर बोलने वाली, त्याग भोर प्रेम को अक्षय-निधि, जिसका गीत-गुजन रामायण के पाठ की तरह देश के कोन कोने मे हाता रहा है, जिसके गीत झोपडी से सेपर पाकाशवाणी तर एक रस व्याप्त रहे ह, उही गीता पी निर्मात्री, निर्दीप, निष्क्लुप मीरा का शोघ बमियो द्वारा पिया उपहाग प्राण मे तीखा माक्रोश बनकर समा गया, इसलिये लिखने की प्यास मोर भी शोलो जसी भडरती चली गयी । एमा, प्रताप, दुर्गादाम, चित्तौड, पन्ना और मीरा के बिना राजस्थान की कल्पना नहीं की जा सरती। मेवाड की तो मीरा राजरानी ही रही है । शृगार और शम का सफल समवय करके, उस साधना को जीवन मे उतार कर उमने हमारे लिए प्राशा, जागृति, प्रीति और भक्ति के अनेक अवरुद्ध माग खोले है । मेवाड पा कण कण उसपी प्रणय-भक्ति और अराधना से सिक्त है । वह मेवाड पी जीवत, महिमामयी एव निधान-कलश भक्त थी, जिसके कारण मेवाड के भक्ति-स्वाभिमान के इतिहास म एक गौरवशाली पन्ना और जुडा । मेवाड के लिए ही नहीं, समस्त भारतवप के लिए मीरा को भुलाना अत्यन्त कठिन ही नहीं, निता त अमभव भी है। जम मेवाड म होने से दिन रात मेरा सवल्प मीरा की खाज म लगा रहा और खोज से भी अधिक चिता मीरा के अस्तित्व से हाती रही। अनेय तथ्य भी मिले । अनेक जन प्रचलित स्थाएं भी सुनी । मीरा की गई लखित प्रतियां भी देखने म आई, तो इस विश्वास को सहज ही बन मिला कि आलोचका के शस्त्र से प्रणय का यह दीप्ति-स्तम्भ टूट नहीं सकता। देवता की आराधना म समर्पित श्रद्धा का अजस्र-आधान कभी म्लान नहीं हो सफ्ता । मीरा अमर है, शाश्वत है मौर शरीर मे प्राणवायु की तरह जीव त होकर राजस्थान (मेवाड-मारवाड) और समस्त भारतीय संस्कृति म पानी मे नमक की भाति घुल गयी है । बस इसी ममता और सकल्प-बल से यह काव्य आगे बढता गया। सूय की रश्मिया अन त ह । मुझे जो मिल सको, व आपके समक्ष प्रस्तुत है। कुछ रश्मियो के दान मात्र से ज्योति के देवता की अविति भला कोई कमी हो सकती है ? या कृपा की कुछ भीख मैंने इस काव्य के लिए वदावन के वाक बिहारीजी एव राधा-रमण के विग्रहो से भी मागी थी। प्रभु की इच्छा समझ, भक्त शिरोमणि महिमामयी साधिका मीरा के साथ मेरी भाव-ममता सदैव जुडती चली गई और यह भावना प्रेरित भाख्यान, जैसा भी बन पडा, आपके हाथो मे है । इतिहास का सामाय सही सूत्र इसमे मिलेगा। कुछ पात्र जैसे पथिर और वृद्ध पथावाचक पुजारी काल्पनिक हैं । शिव के सस्कारो के कारण मैंने नास्तिपता की ओर भी ग्राख नहीं उठायी । भक्ति का आवेश-आक्रोश सदा स्वीकार करता रहा हूँ मत इस काव्य मे वह पुरातनता अनेक स्थलो में मुपर है साथ ही जन प्रचलित कुछ प्रिय प्रसगो से सहायता लेने का लोभ सवरण भी पठिनाई से कर पाया हूँ | कृति के छद-बोध और अलकरण का मुझे क्तई स्मरण नहीं। वह तो मापका दाय है । साहित्य-कर्मी तो अपनी बात कहने को विक्ल रहता है और वही मैंने क्यिा है ।

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-जैसी बात ही महती। निहारी की तरह वह सांग के भने पर ही भूलती। पद्मापर पौर घनान द यो गायियामो से भी हम उसकी कक्षा TT साम्य निर्धारित नही कर सकते । रत्नापर मी गोपियो पो भौति- "ऊधो यह गूधो सो संदेशो पाहि दोग्यो जाय अपये हमारे यहां न पूने यन युज हैं, विशुष, गुलाय, पचनार भौ' मारन पी हारन पे होनत, अंगारा ये पुज है, ऐसे पप्यो वाली बात भी मीरा पी प्रकृति को दहाती नहीं। उसका विरह तो दिव्य है । दूसरो यो जताने मोर सतप्त परने वाला नही । यह तो भक्ति माधुय या जीवात-विरह है । उम सरोवर में वह अकेली ही अवगाहन करती है। वह म्यय तो दहाती है पर दूसरो यो माधुय मोर शौति पांटती है- "अग अग व्याकुरा भई, मुख पिय-पिय पानी हो मतवेदन विरह पी, यह पीर न जानी हो मखी । म्हारी नीद नसानी हो।" उसका विरह तो प्रेमो माद और दिय का विरह है । वह शृगार और ऐहिय-विलाम का विरह न होकर भक्ति, मायुय या च दावनी-भाव का विरह है । उसमे ता पबीर की 'लाली मेरे लाल पी' या राता माता नाम का" जैसी दिव्यता और आत्म-तुष्टि है। उममे गलदभु उछल-कूद और अशाति न होकर अत मलिला भागीरथी मा पुण्यश्लोक प्रवाह-प्रमार है । इमलिए मैं मीरा को शृगार रस की क्वयित्री न मानार, भक्ति-माधुय सम्पन्न मधुर-रस को साधिका मानता हूँ। किमी भी भारतीय नायिका से यदि उसक विरह का साम्य हो सकना है, तो वह भूमिजा जगज्जननी सीता, चत य महा- प्रभु की विष्णुप्रिया कृष्ण की राधा और बुद्ध की यशोधरा, वम इही नायि- कामो को समता मे ही स्थापित पी जा सस्ती है । प्रणय भी पैसा ? साधा- रण लौकिक प्रणय नही दिव्य-प्रणय जिसमे कौमुदी की साद्रता और सुधा विद्यमान है। उसमे गोपी-भाव, काता-भाव और वृदावनो-भाव-माधुय है । मीरा ने प्रियतम के प्रीति भावावेश मे आकर जो अपने सृजन म अनेक 'पातियां" लिखी है, वे असाधारण हैं। उनमे प्राणा को छू लेने वाली प्रिय की तीव-उत्कटता का अनुराग है अनुभूति की परम-तीव्रता है एव लौषिक से अलौकिकत्व को स्पश करन वाली अद्भुत क्षमताएँ भरी पडी है । मीरा की यह पाती या पानियां राजस्थानी माहित्य मे ही नही, भारतीय साहित्य मे उ । अपनी सानी नही रखती और व साधिषा मी उटपटाहट और प्रेम के गभिन इद्रधनुपी-भावावेगो से निर्मित हैं । उसमे का ता-भाव या वदावनी-भाव या माधुय है और इसीलिए वह अप्रतिम है । मीरा को साधारण नायिकामो के लौविक स्तर पर स्थापित पर ऊपरी टटोल से सतुष्ट हो जाने वाले पालोचक मोरा के मम, प्राण-तत्व, सौंदय और सवेदना का आशिक भी नही परस पाते, ऐसी मेरी मा यता है। साधना के इस दुष्कर धराता पर चलने वाली इस दिव्य-प्रणयिनी को सामा यत फाव्य में बाधना मुझे कई स्थलो पर कठिन रागा है, पर त्वदीय वस्तु गोविंद" का सहज स्मरण करते करते ही मैं इस माग पर बढा हूँ। सफलता मेरा इष्ट नहीं, श्रम ही मेरा क्तव्य है, और मुझे इस "दिव्य-प्रणय की दीपशिखा" के सृजन पर सतोप है। हमारे यहां साधयो और सतो ने अपने लिए कुछ भी जानकारी नहीं दी है । अतर्साक्ष्य एव बहिर्साक्ष्य के सम्बध मे बहुत पम मामग्री उपलब्ध है। मीरा जैसी पवयित्री के लिए जानकारी 'मीरा की परची' मे मिलती है । परपी, परिचयी या पडची और परचिति इसी परची काव्य के रूप हैं और यही काय साक्ष्य रूप मे हमे ऐसे काव्या की जानकारी देते हैं, ऐसे काव्या मे 'मीरा पी परचो' काव्य प्रमुख है जिमसे मुझे सहायता मिली है। आभार ज्ञापन मधुर रस और माधुय-भक्ति के अध्ययन के लिये मैं वृदावन के विद्वद् मित्र प्रवर डॉ० श्रीशरण विहारी गोस्वामी, मादरणीय अग्रज श्रद्धेय प्रजवल्लभ शरण अधिकारी, अतुल कृष्ण गोस्वामी, पलिता चरणजी, जगदीशचद गोस्वामी तथा अपनी पत्नी डॉ० वरणा शर्मा वा विशेष प्राभारी हूँ, जिहाने मुझे इम अलोनिय नित्य-विहार रम मिद्धात को समझने में महायता भी है। चतय गौडीय सम्प्रदाय की दो उत्कृष्ट कृतिया उज्ज्वल तीलमणि और हरिभक्ति रसामृत सिधु से भी मैंन सहायता ली है फिर भी प्रणयिनी मे मधुर-रस या स्थून चित्रण ही प्रस्तुत हो सपा है । इस गूढ रहस्य वो समझना ही प्रत्य त कठिन है फिर प्रात्मसात कर काव्य के माध्यम से उसे लिखना तो पौर भी दुप्पर पाय है, तथापि एग प्रयास मापन रामक्ष है, विश्वास है, विद्वज्जन इसरी त्रुटियां सुधार लेंगे। पाव्य के वैशिष्टय के रूप म वृद्ध-वाचर ने याव्य के अतिम या सप्तम सग में उद्बोधन दिया है, जिसे दीप्ति दान नाम दिया गया है। उसगे भनेर म्पतिया यो माभेद भी हो माते हैं पर यह भी कुछ ऐसा है, जिसमे प्रांग बनाकर नहीं जाया जा साता। उसम मत्य युगमा मोर पटुत्व याचक पी अनुभूति पौर मेरी ममी पभिन्नति पा है।

काव्य या प्रारम्भिा अश मथुरा पो त्रैमासिक पत्रिका श्रीकृष्ण-सदेश में छापा गया तदथ मे उसके मम्पादप श्री हितशरण शर्मा या हार्दिक आभार प्रदशन करता हूँ। अपने अग्रज प्रादरणीय श्री देवदत्तजी शास्त्री (इलाहाबाद) पा भी हार्दिक धयवाद परता हूँ, जो इसे पूरा परने को सदैव बाध्य करते रहे। काव्य क शेप अश श्रीकृष्ण सदेश के अधिकारियो द्वारा प्रकाशित अश का सम्मानिए रोक लेने के कारण प्रागे ही छप सके, जिसका मुझे खेद है। प्राशा है पाठक मुझे एतदय क्षमा करेंगे । इसी काव्य का पटा पटा छोटा रूप प्रणयिनी' नाम से भी छपा, पर सम्पूण रूप अव दिव्य-प्रणय फी दीपशिखा के नाम में सामने पा रहा है । प्रयाग के प्रसिद्ध साहित्यकार श्रद्वय श्रीप्णदासजी (प्रव स्वर्गीय) की अहेतुकी कृपा का भी ऋणी हूँ, जिहे राजस्थान के नाम से ही पुलक हो जाता था । दासजी मे राजस्थान ा चप्पा चप्पा छानने पी तीव्र प्यास थी। चित्तोड पन्ना, जाप और मीरा उनकी ममता और करुणा वा मम-म्पश करते थे। उनमे उनकी श्रद्धा का प्राधान अक्षर था। मुझे श्रद्धेय दास बाबू का यह काव्य निखते समय प्रजन्न भाशीर्वाद मिला है, एतदथ उह श्रद्धा से शुभरामनाएँ ममपित, क्योति आज उसकी यश पाय हो शेष है । एक वरिष्ठ व्यक्तित्व और था, जिसका दुलार और वात्सल्य इस माव्य वे सृजन-मकल्प नी सशक्त प्रेरणा रही है । वह विदुपी थी-प्रयाग की पाटश नारी श्रीमती चद्राताजी। वे परम-बष्णव थी। तन मन और कम सभी से । उनका जीवन अनर्वाह्य ममान रहा । मैंने उहें 'मां' कहा और उससे भी अमाधारण उहे पाया। इस बाव्य का पूरा परने म उनकी प्रेरणा प्रत्य त महत्वपूर्ण रही । उनको घयवाद देना उनकी ममता या उपहास भरना होगा । अाज यह वाव्य प्रकाशित हो रहा है, परतु इसे देखने के लिये वै सशरीर अब इहलोरम नहीं हैं। कृति म जो कुछ भी श्रेष्ठ है वह सा विद्वानो की अनुक्पा तथा दाता प्रभु की महर वारण ही है पोर जितना अनगल है, वह मय मेरा है। शरीर के पिमी अग मे यदि कभी पोडा हो जाय, तो उसको निममता पूवर शाय-चिरित्सा परानी ही होती है । इमलिए जो पापो रूचे, उसे ग्रहण पर लोजिएगा। शेष जितना भी अग्राह्य है, वह निममता से त्याज्य है । मुझे मान है सुधी पाटा नीर-क्षीर-विवशी होता है। "दिव्य-प्रणय ती दीपशिखा माव्य पा ममपण परम पुष्य श्लोक मनन श्री सदगुरु ममय श्री दाता को दिया है। वे हमारे भाज ये साक्षात गोरखा-गिय एव रामकृष्ण परम इस है । दिव्य प्रणय यी दीपशिखा मीरा जमे ही राजपूत कुल मे जम लेकर प्रतौषि सत बनने तप यी दोनो परम्परामो से हमारे दाता प्रभु जुटे हैं। प्रत मैं अपनी श्रद्धा का यह सृजन-अध्य सव समय श्री दाता भगवान् श्रीनरणो में प्रस्तुत करने या साहस जुटा रहा है। मैं चिर हूँ। ये विराट एव पावन है । पदम अविनाशी पूण ब्रह्म सदगुरु समय । पतित-पावन हाने के नात मुझ जैसे दुष्ट प्रकृति के दाम का यह मक्षर अभियान महामना श्री दाता ने स्वीकार कर मुझे व मेरे पति के जम-जीवन बोधय-धय कर दिया है । वे ता करुणा के समुद्र है। नत सिर होकर यह सृजनाध्य पुप्पर-सत्सग १९८७ म मैंने उनके घरणम मलो मे रखने का साहस किया था। यह मेरे लिए गौरव की बात है कि दोनबधु श्री दाता ने मुझ प्रविचन का यह काव्य-समपण स्वीकार पर मेरे मनुष्य-जम मार मानव तन को साथ किया है, यह उन जैमे विराट आशुतोषी-अनुग्रह ही हूँ। उह एतदथ शरणागति के साथ अपने कोटि कोटि नमन ही अपित परता हूँ। मेरे भावाश-धर्मा गुरुवर हॉ० रामकुमार वर्मा ने इससे पहले १९६२ मे मेरे गीत सग्रह "धडकना ये बोल" की भूमिका लिखकर मुझे अशीशा था । यह अपर-वैभव उही या दिया प्रसाद है। दिव्य-प्रणय को दीपशिखा थी जीव तता और प्राण-तत्त्व उही का भनुग्रह है । उनका आशीर्वाद इसमे छपता, पर समय पर न प्राप्त हो सका अत उसे अगले सस्करण में दिया जायेगा । मैं गुरुवर डॉ० रामकुमार वर्मा के प्रारोग्य, दीघ-जीवन और सृजन- वचस्व की प्रभु से कामना करता हूँ और एतदय अपनी सादर प्रणति उह समर्पित करता हूँ। वृति को इस रूप में आपके समक्ष प्रस्तुत करने का सारा श्रेय सृष्णा- प्रदर्स के सस्थापक श्री जय कृष्ण अग्रवाल व उनके सहयर्मी भाई सिंगोदिया एव वैदिक मन्त्रालय के श्री सतीश शुक्ल का भी आभारी हैं, जिनके कारण "दिव्य-प्रणय की दीपशिखा' मापने हाथा में पहुँच सकी। आज के शैक्षिर' पाठ्यक्रम मे भी मीरा पर लिसे भाज्यान याव्यो का कही कोई स्थान नहीं है, यह प्रभाव भी मुझे सदैव बलता रहा है । शायद यह वाव्य शिक्षा जगत में अपने कुछ पाठप तैयार कर सके। मेरे देश मे महीयसी मीरा के कोटि कोटि भक्त है । उसके भनेकानेक पाठक हैं। उसके गीत हमे चाँद सूरज की तरह प्यारे है । मत यह दीपशिखा उन सबके लिये प्रस्तुत है । इसके साथ, वे जो भी करें। यदि विद्वानो, पाठको, विद्यार्थियो एवं शिक्षा सस्थाना से इस कृति को प्यार मिला, तो इस श्रद्धा-सृजन को साथक समझूगा। लीजिए अपनी कृति "दिव्य-प्रणय को दीपशिखा" स्वस्ति सहित स्वीकार कीजिए। -~-डॉ. हरीश --

क्रमा
प्राक्कथन
समपण
स्वस्ति
.
१
१२
प्रथम तरङ्ग-स्वप्न
द्वितीय तरङ्ग-उद्भव
तृतीय तरङ्ग-परिणय
चतुर्थ तरङ्ग-विषपान
पचम तरङ्ग–अक्षर-सुहाग
पष्ट तरङ्ग-पूर्ण-तद्रुप
सप्तम तरङ्ग-दीप्ति-दान
४२
७२
८१

रवान
7
,
?
?
अग्नि पथ पर चल रहे युग बीतते प्रज्ञात
स्वप्नवत् क्षण क्षण यहा पर कट रहे दिन रात
मोह तम, बढता सदा, प्राफर्पणो मे मीत
मिल न पाती शाति मन को, है गिरा गोतीत ॥१॥
दिवस बीने पर न मिल पायी हृदय की प्रीत
कौन बोला मन अजिर से, बन मधुर संगीत
क्यो विषम है विश्व के पथ प्राण के आधार
बढ रही है प्यास प्रतिपल, हो रहा मन भार ||२||
शून्य मे मुस्कान भरता कौन यो अनजान
स्वास हर आभाम में है, मोह का अनुदान
ज्यो संजोना प्याम का रूपक मधुर विश्वास,
त्यो विगत यह स्नेह होता, रुग्ण होती प्राश ॥३॥
वेदना की एक रेखा चचला मी जर
खीचती जाती उदासी के क्षितिज भरपूर
ठोकरें, समवेदना है धनीभूत अशात
मेघ सकुल, घिर गया नभ, हो गया उद्भात ॥४॥
ईश । कैसे मिल सकेगा प्राण को पाथेय ?
भटकता भाता हृदय, जीवन ना क्यो हेय?
क्या तुम्हारे प्रणय मे है मौरभी-विश्वास ?
क्या तुम्हारे नाम मे है दिव्य तीव-विलास? ।।५।।
रिक्त मन भयभीत दिग्व्यापी भरे भव जाल
काटते हैं विषम विपयी-माल के विध-व्याल
मारम-बोध पुकार मधुमय कब मिलेगी प्राण?
अन्धकार उदास जीवन हो रहा है म्नान ॥६॥

२ ? चल चुका हूँ दूर इतना, छोड जग की राह ढल चुका हूँ चांद जितना, अब न कोई चाह एक राही बढ रहा था, कटको मे शात कल्पना की मार, पथ मे भर रहा था प्रात ॥७॥ शैल से शिवालिनी ले स्नेह सलिला धार रश्मियाँ भरती शलभ मे चचला सा प्यार उलझनो मे डोलता था पथिक का विश्वास पर न जाने हो रहा क्यो, गति मधुर-आभास ८॥ प्रात्म-बोध अशान्त मन का है बडा उद्वेग चुभ रहा था व्यग-सा, मन मे अपार प्रवेग प्रणय का लोभी हृदय अब हो गया था क्लात नयन थे प्राकुल, जिया व्याकुल, अनत अशात ॥९॥ बुझ न पायेगी कभी क्या वेदना की ज्वाल खुल न पायेगा कभी क्या प्रथियो का जाल रोग, शोक विपण्ण मन को घेरते चुपचाप बढ रहे है, पल रहे है, पाप या सन्ताप ॥१०॥ क्या कभी सभय, मिलेगा मधुर रस साकार क्या कभी भी भूल पाऊँगा, हृदय का भार एक पूजा-गीत रोया, ले शलभ-सा प्यार एक पूजा-दीप खोया, मुक्ति का उपहार ।।११।। मृत्यु और विनाश भटके थे जहा अज्ञात प्रेम प्रणयन को विजय थी, शात था मन शात क्या उठेगा नाद ब्रह्मानद सा यो प्रात क्या बजेगी वेणु मनमोहन ! पुलक है गात ? ॥१२॥ मुस्कराता जा रहा है चांद मन का मीत विप रहा क्या वादलो मे प्रीत या सगीन ? एक दिन तो बज रहा था माधना का तार प्राज सोपा, शात गुजन, है यही मसार ॥१३॥ ? 7 पहाता पोला बनी थी गाधा पो पाग जागता हो भक्ति गा जैसे जमाता गग यो निरतर गति प्रगति मेमा गया पा पाग उस पपिक के सामने, यह भक्ति पा गघमारा ।।१४।। हपं से उन्मुक्त नयनो में पलो जनधार भक्तिराम मुक्ति है गा मा मोरल पार पप्ट की गहराया , मह उठा प्रतिमान शोन सप्टा पा, माया दुगं या अभिमान ॥१२|| सामने दावी पथिय ने दुा यी मुस्सा कर रही थी प्रीत के प्रण पा मपुर मादाा पान का गौरव उठाये गर्व मे या शीम विश्व का सम्राट ज्यो होता सभी का ई7110६|| चदिपा से होन, तामाधन पा परिवेश सो रहा था शिल्प उगवा, जागता स देश वीरता का प्राण, दृढना का हृदय गाकार सोय या सागर उठा, उत्साह मा अम्बार ॥१७॥ वन सा भूपर पडा है दुर्ग यह चित्तोड भक्ति पाकर पली, जिसकी वीरता को मोड दूर से राही लगाये था नयन वो कोर एक दीपक टिमटिमाता था वही उम और 1१11 यही यह चित्तौड, जिसमे तेज, निष्ठा, कम यही वह चित्तोड, चीरो पा रहा जो वर्म यही वह चित्तौट, माणित पा रहा जो गर्म यही यह चित्तौड, पीरो पा रहा जो धर्म ॥१९॥ क्या इसी मे चूरता वा हो चुका है नृत्य पया इसी मे भृत्य भी सब सिंह थे यह सत्य क्या इसी मे छद्म, धोखा, कुटनैतिक हास' क्या इमी मे हो चुके साये अनेरा रास १॥२०॥ ?

४ 7 ? 7 ? ? ? ? 7 क्या यही वह दुग, जिसमे प्राग ही थी साज क्या यही वह दुर्ग, जौहर का पहिनता ताज क्या यही वह दुर्ग, जिसमे प्रणय का मधुमास क्या यही वह दुग, जिसके वीर रस के सास ॥२१॥ याद है चित्तौड, तुमको वेदना के गीत ? याद है चित्तौड। तुम हो वीरता के मीत । याद है चित्तौड । तुम सिंगार के शृगार याद है चित्तौड | तुम हो प्यार के अभिसार ॥२२॥ है कहाँ चित्तोड | तेरी पद्मिनी का द्वार है कहाँ चित्तौड | जौहर का ज्वलित अगार है कहा चित्तौड | कु भा का विजय अभिमान ? है कहा चित्तौड । गोरा और बादल गान ॥२३॥ कहां है वह शोय का अवतार वोर प्रताप ? कहा है चेतक, कहाँ है, शक्ति का अभिशाप ? कहाँ है वह, स्वाभिमानी रग का परिवेश? कहा है जीवन्त वह, क्या हो गया सब शेप ? ॥२४॥ वह खडी देखो, विजय को माल पन्ना धाय विवश है वनवीर अत्याचार, कौन उपाय कहा वह ताण्डव नटेश्वर का निखरतारूप वहा छाया अमरता की है, कहा वह धूप ।॥२५॥ कहा है वैभव, कहा है ध्वस का अध्याय कहां वह भैरव, कहा वह चडिया का दाय बद क्यो है पाज वे ने कहाँ इतिहास? सिहरनें होती,जिहे कर स्मरण मृत्यु-विलाम ॥२६॥ कौन कहता, मर चुफा तेरा विराग, सुहाग? कौन कहता, अमिट हैं तेरी व्यथा के दाग पौन कहता, मो गये तेरे गरम वे साम? पौन पहता, मिट चुपी तेरी विजय की प्यास ॥२७॥ 7 ? ? 7 ५ तू यहा तो पाज जोषित है हमारा मार तू पटा तो है पहा यह चीर राजस्पात तू पहा तो वोर-भोग्या तीयं या सम्मान तू पहा तो घडी तेरी चोरना सी पान ॥२८॥ दिव्य है चित्तौड । तेरी यह प्रसात धूल दिव्य है चित्तौड । तेरा ताउ सुख पा शूस दिव्य है नितोह | तेरा नाम सिर या मोर दिव्य है चित्तोटा तेरा जाम-जीया-मोर ॥२९॥ धार हो प्रजन नाविम या शिथिल समार या कि मिल जाये उसे विश्याम का माधार या मिले हो तुम मुझे, ज्यो नाय पो पनवार हे प्रमर चित्तोड । सम्बल प्रणय के साकार ॥३०॥ यो तृतीय मुहूर्त वेला रात पी सुनसान गुनगुनाता पपिर सुनता दुगं भी अनजान लगा पहने है पथिक कर्मठ यनो प्रणवीर ज्यो पटा हूँ मैं, तुम्हे लो वोटना हूँ धीर ॥३१॥ अहाकाल प्रविष्ट होकर प्राप्त करलो प्रीत में सुनाऊँगा तुम्हे वह प्रणय का उद्गीथ मोह या उत्सग करना साधना का सार प्रान प्रण मा मान रखना अमरता है प्यार ||३२।। यह वही धरती, यहाँ पर मिटे अनगिन प्राण यह वही धरती, जहाँ स्फुलिंग उडे गतिमान वीरता के साथ ही शृगार का सहवास है विरोधो पर, पली है तृप्ति के सँग प्यास ||३३।। अतराल वितृष्ण कसा सुन पहा ध्वनि गीत? हो गया पाश्वस्त पाकर देवता से प्रीत रात्रि के नि शेष क्षण, वह हो रही थी म्लान झड रहे नक्षत्र झडते पात ज्या परमान ॥३४।।

६ 7 ? भीम चक्राकार थे, वे दुग के प्राचीर भारतीय विभूति, जिसका शिल्प प्राण अधीर लगा उठने गगनचुम्बी मन्दिरो से गीत भर रहा था प्राण मे, सिहरन विमुक्त-प्रतीत ॥३५॥ टिमटिमाता था शिखर पर, दीप एक ज्वलत जल रहा ज्यो प्राण मे, अतस प्रकाश अनत रात्रि भर जलती रही क्यो ज्योति यह निस्पद ? पथिक के पीडित हृदय मे उठ रहा था द्वद ॥३६॥ कौनसी वह प्रान करती प्रीति का सचार टूटने पाती नही लौ, स्नेह का ससार सघन तम सी रात का यह ज्योति-पुज उदार क्षितिज का शृ गार है या प्रणय का उद्गार ॥३७॥ दुग ! तूही बोल कैसा दिव्य पुण्य प्रकाश देखकर क्यो बढ रही सैलाब जैसी प्यास गगन-चुम्बी शिखर कैसा ज्योति का प्रतिमान ? कौन करता स्वगलोक-विहार सा आदान ॥३८॥ खूब उलझा, पर न पाया दीप का इतिहास डूबता था करुण मन वन प्रश्न का उल्लास कौन समझाता उसे वह प्रणय का उपहार जल रहा था खोजने वैसा मधुर सा प्यार ॥३९॥ लग्न की लौ जल रही थी, साध का ससार था प्रवाहित शील ज्यो, शवालिनी की धार अजिर था एका त, झिल्ली को वहा झनकार औ' सुनाई पड रही थी सिंह को हुकार ।।४।। सघन वन था, दुग-तापस भर हृदय में प्रान जल रहा था दीप तिल तिल बह रहा पवमान जागरण का भर रहा था गीत गति सदेश यह रहा था-'उठो तुमको कम करने शेप' ॥४१॥ 7

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ऊँधता था झूमता था दुग यश प्रापूय
जो कभी हिंदुत्व का था, प्रज्वलित सा सूय
और उसके थके चरणो को संभाल सँभाल
धो रही थी, प्यार ममता से सरित उत्ताल ॥४२॥
कौन सज्ञा दे उसे, वह पथिक था लाचार
जो बनी थी अर्घ्य उसका, औं गले का हार
नाम गभीरी, भरी थी प्राण मे पर पीड
क्योकि यवनी ने बनाया तट उसी का, नीड ।।४३।।
नगाकार विशाल मदिर ज्ञान के अवतार
जडे स्वर्णिम कलश, जिन पर रश्मियां साकार
नगर सोया, जो कभी था शोय के अनुरूप
जागता इतिहास उसका, राग-रग अनूप ।।४४।।
दीप की वह ज्योति सरिता प्राप्त करती शेप
ज्यो हृदय के देश मे हो अग्नि गीत प्रवेश
द्वन्द्व पूरित मन पथिक, थे द्वार उसके बाद
देख पाता तमस मे कैसे वहाँ स्वच्छन्द ? ॥४५।।
प्रेम की वह धूम-रेखा, सोरभित उल्लाम
किया अवगाहन पथिक ने कामना थी प्यास
वेदना, समवेदना, भटकन, निराशा, ज्वार
प्यार या अधिकार मन मे जीत थी या हार ।।४।।
द्वार थे या सात प्रहरी, ये सजग हर बार
ज्यो धरा पर घूमते हो, सप्तमपि साकार
या दिवाकर दुर्ग के ये अश्व सात प्रखड
सजग औ' कमठ सबल या फडकते भुजदड ॥४७॥
विकल धूमिल वेश मे आया, जहाँ था द्वार
लगा कहने-'क्या बतानोगे अमरताप्यार' ?
स्तभ देखें, दुर्ग की अट्टालिकाएँ भव्य
प्राण मे सौन्दर्य भर, सोचा यही गन्तव्य ॥४८॥

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भटक कर पाया, जहाँ था आज एक प्रतीक
प्रेम के आंसू, बनाए स्वर्ण की यह लीक
मोह की भटकन जगाती प्राण मे सन्यास
या छुडाती विश्व का सुख या बढाती प्यार ||४९।।
भूलता ही गया गही, सूक्ष्म क्या है स्थूल
नयन गाते रो रहे थे,
बरसते थे
भक्त जन थे मुदित मन, विखरे सभी के केश
बमो हे नंदलाल | मन मे, यह तुम्हारा देश 1१५०१
पथिक केवल कृष्ण का था, मक्त बेसुध, लीन
तरमता था प्रीति को, ज्या व्यास जल विन मीन
प्रीति प्रणयिनी पर अखडित, क्योकि थी वह भक्त
कृष्ण की, नंदलाल पर थी, जो बडी अनुरक्त ॥५१॥
मिल गया था साध्य, प्राणो मे उमडता त्याग
भक्ति की अवतार मीरा मे, जगा अनुराग
सामने देखा खडा था दीप्ति का ससार
एक मदिर, भ्रमर जिसके, भक्त गण गुजार ॥५२॥
दुर्ग पर थी अस्त व्यस्त पुकार पूजा गीत
प्रणयिनी मा मौन थी, पर थी पडी ही प्रीत
पूछने यो लगा पागल प्राण मै भर प्यास
क्या यही चित्तोड है, था यही मां का वास ॥५३॥
वही मो, जिसने उठाया था लगन का ज्वार
वही मां, जिसने मिटाया द्वैप का ससार
वहीं मां, जिसने मिटाई राजकुल की रीत
वहीं मां, बदनाम थी गोविंद की पा प्रीत? ॥५॥
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प्रीति में बदनाम कैसा भूलता ससार
प्रीति में परिणाम फ्मा, राग का अधिकार
प्रीति में दुख-दद, वसे मिले अत्याचार
प्रीति में क्या मिला मौका, घोर वारागार? ॥५५॥

९ प्रीति भी गोविंद की थी, विश्व जिसका राग ज्योति छूकर हाथ मे मा के पड़े थे दाग हाय! इस निमम जगत् का क्लेशमय व्यवहार भक्त का हो जाय, जीना भी जहाँ दुश्वार ? ॥५६॥ लोक में पालोक पाकर भूल कैसी भूल प्राण मे मधुमाम पाकर शूल कैसे शूल प्रीति में विश्वास पापर हार कमी हार? प्यार मे आराध्य के भी दर्द अत्याचार ||५७।। ? 7 सामने देखा पथिक ने दिव्य मदिर एक कृष्ण का मिलकर सभी थे कर रहे अभिषेक शुध्न वस्त्रावृत्त, मुख मण्डल करुण सी काति भव्य काया पर खडी वार्धक्य की वह शाति ॥५८।। था पुजारी मग्न, नयनो मे भरा था प्यार भीड भारी थी, भरी थी भक्ति की गुजार कई ऐसे थे कि जिनके चित्त थे अति म्लान कर रहे उपहास, उनका आगया अवसान ॥५९।। यह रहे कुछ 'यहां मीरा ने किया था प्यार' कह रहे कुछ-'मत चलो बदनाम है यह द्वार' एक बोला--'राजरानी ने किया क्यो नृत्य एक बोला-'हीन थी, अभिसार करती सत्य' ॥६०॥ सुन रहा था वह पथिव परवश बडा भयभीत भक्त बन आराध्य का उपहास करते मोत । नृत्य या अभिसार कैसा मुक्ति का था दान प्यार कैसा, हार कैसी, प्रीत का मधु पान ॥६१॥ सोच लो तुम भटक जाओगे हुए उद्भ्रान्त ज्यो भटकता पात झझा मे अपार प्रशान्त देश के मन मे भरी श्रद्धा महान् उदार गर्व-गौरव कर रहे लघु, क्या यही प्राभार' ॥६२॥ "

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कुछ उदार पुकारते भर प्राण मे रसधार
हाँ सुनामो गीत बाबा | प्रीत का साकार
पथिक प्रीति अधीर, सज्ञा हीन थे सर दोप
अब न थी मन मे कुटिलता, छद्म, छल, ग्रामोश ॥६३।।
चेतना मे उतर उसने सुनाया अभिप्रेत
हो गया मैं दूर, 'जय' का सुना स्वर समवेत
हा सुनायो 'दरस की प्यासो' मधुर संगीत
या सुनायो 'राम का वह रतन' गीत पुनीत ।।६४
स्वग्न डूवे प्राण म मचले विकल्प विकार
कह उठा 'क्या घणा करते यह अलौकिक प्यार'
है सभी के जीव परवश, खो चुके है राग
इसीलिए ही जल रही, मन मे विरह की आग ।।६।।
चादनी मे विप मिला तुम जान लोगे भीत।
तो समझलो मोह का पर्दा पडा अविनीत
प्राप्ति के पहले हृदय मे तप्ति का विश्वास
यदि नहीं मिलना, न बनते सृष्टि औ' आकाश ।।६६।।
भक्त बनकर भक्ति का यो जो करे उपहास
कुटिल, कामी, हीन उसका भटकता उल्लास
भक्त का जीवन बडा है, भक्ति पथ से प्यार
जीत लेता क्योकि वह, आराध्य का अधिकार ॥६७।।
मातृ मदिर में चढा अविवेक और विपाद
विरह-पूजा गीत सुन रोये हटा उन्माद
वह पुजारी स्नेह से कहने लगा--'तुम कौन ?
गा रहे समझा रहे, मा के तपी | तुम मौन ।।६।।
'कुटिल कामी हूँ उजाडे ह अनेक नीड
इसी से बाबा वढी है इस हृदय मे पीड
पाप का साकार ही प्रतिमान हूँ सम्भ्रा त
खूब भटया, पर न हो पाया दुखी मन शात' ॥६९।।
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दूर से प्राया, सुना इस द्वार प्रभु का वास भक्ति प्रौ' अनुराग मे डूबा यहाँ हर सास प्रीति का सरगम जहा बनता अटल आधार कृष्ण नौ' मां का जहाँ होता सदैव विहार ॥७॥ तुम सुना दो वह कथा, अमरत्व गान पुनीत तुम सुना दो, भक्तिमय करुणा भरा संगीत तुम बता दो, तन बडा उद्भ्रान्त है उद्भ्रान्त तुम बता दो, मन वडा ही पात और प्रशान्त ॥७१।। तुम सुना दो, प्रणयिनी की भक्ति का मधुमास तुम सुना दो, राजरानी का अमर सन्यास तुम दिखा दो, राह मन को, और लो बलिदान मुझे भीरा प्रोति, मन्दिर पर बडा अनिमान ॥७२॥ थी दिशाएँ दीप्त, सिंहासन सजा था एक और मदिर मे हुआ था, कृष्ण का अभिषेक दिव्य सा द्रष्टा सुनाता, पुण्य काव्य महान् पथिक बैठा सुन रहा, करता गया मघुपान ।।३।। नव प्रभात सजा रहा था रश्मियो का थाल चेतना का अध्य, वैभव से भरा पाडाल झूमते थे रसिक गण भर प्राण मे आभाम सिहर उठती कुमुदिनी ज्यो, चाँद से ले हाप ॥७४।।

द्वितीय तरङ्ग
ਤਸਰ
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नव किरण के सगप्रतिदिन चल रहा आख्यान
भक्त गण प्रमुदित, पथिक अब पा गया सधान
दिव्य वक्ता, वृद्ध ऋषि सा, तप पूत महान्
भक्त श्रोता कर रहे माँ का अमर गुणगान ।।१।।
शात था शृगार जीवन मे भरा उल्लास
बुझ रही थी किन युगो की, तीव्रतम वह प्यास
गीतकार सुना रहा था मेदपाठी गान
माधवी थे कुज, मुस्काते हरित उद्यान ।।२।।
तन रहे थे इन्द्र-धनुपी रग पुप्प वितान
कर रहे थे खग सरस क्लरव, विविध उपमान
गा रहे ये गीत किंवा कर विविध अभिसार
अप्सराएँ नाग, किन्नर भर हृदय मे प्यार ॥३॥
मेडता था राज्य, उनका राव दूदा नाम
भक्ति औ' सगीत के अवतार थे अभिराम
साधु-सेवा, न्याय-शासन, वीरता का वेष
प्राण में उत्सग, प्रण मे प्रजा पालन शेष ॥४॥
मन्दिरो मे साधना थी, मेडता शृगार
शस्य श्यामल था धरा का मागलिक ससार
रत्न वीरमदेव जैसे, राजवी थे वीर
रत्न का था ग्राम कुडकी, थे बडे गभीर ॥५॥
प्यार के साकार दर्शन, भक्ति के अवतार
रावराणा न्याय के प्रतिरूप भीमाचार
श्वेत थे मब केश, वे सौज यता की मूर्ति
प्रजा पालन, पुरन्दर ज्यो, कर रहे थे पूर्ति ॥६॥

- रत्नसिंह उदार, उनके पुत्र थे प्रणवीर वश था राठोड, सब नरसिंह थे रणधीर पाश सतति को भरी, मन मे बढी दिन रात पर न आया वीर के घर मे खुशी का प्रात ||७|| कृष्ण ! माधव भक्त वत्सल । मोह का यह जाल इस जगत की रीति है, में भी रहा हूं पाल हे मुकुन्द ! लुटा मुझे दो, रश्मि एक उदार जो उठा दे शान्त मन में, ज़िन्दगी का ज्वार ॥८॥ वर्ष बीते, एक दिन आई खुशी की रात शरद की पूनम, मधुर-सी चांदनी से स्नात राधिका अवतार ले, उतरी धरा पर प्रात कोल थी 'पूरब जनम को' पुलक मय था गात ।।९।। कौमुदी से भर उठे थे, झिलमिलाते ताल श्वेत-वसना नायिका के रश्मियो के जाल शारदी पूनम, किया गोविन्द ने था रास ब्रह्ममाया का हुआ था, मिलन-प्रेम-विलास ॥१०॥ सप्त रगो ने बसाया रास का ससार ग्राम कुडकी मे भरी, अनुराग को झकार 'रास पूनी जनमिया रो', राधिका अवतार प्राण में उत्सर्ग भर जग का हटाया भार ॥११॥ अमल कोमल बालिका थी ज्योति का प्रतिरूप मधुरता साकार, ज्योत्स्ना-गीत एक अनूप सान्द्र थी मुस्कान मन की, और विधि का राग झाकता था प्राण मे से, एक अमर-सुहाग ।।१२।। मेघ की सुपमा, छलकते ताल का प्राकार प्यार की कलिका, विभव, महिमा, प्रशान्त-पुकार लाज का मोती, गुलाबो प्रात का अनुराग एक भोलापन मिला था, रत्ल के थे भाग ॥१३॥ . -

नाम मीरा, थी कला प्रो' रश्मियो की माल
एक छोटा छन्द, प्राणो का नवल सा लाल
स्वप्न गीतो का अलौकिक था मधुर-आभार
साध का सरगम, अमर-सगीत का अवतार ॥१४॥
कापती कलिका, मधुर सुपमा, दृगो की काति
बालिका मीरा हृदय की, शवनमी थी शाति
क्या विदित या, यही मीरा प्रणय का अवतार
क्या विदित था, यही हर लेगी व्यथा का मार ॥१५॥
राजकुल का चाँद, माँ पे अक का शृगार
रूप का वैभव, चपल-प्राभा, धरा का हार
काव्य की शोभा, शरद की चाँदनी का गीत
नायिका राधा, अमर साहित्य की थी प्रीत ।।१६।।
करण, सजल अपार-महिमा वढ रही दिन रात
ज्यो मृणाल विशुद्ध जल से बढ चले सुस्नात
गौरवर्णी, प्रीत के नवनीत का सा गात
वह कला वढती गई यो वर्ष बीते सात ॥१७॥
राज महलो के अजिर का एक भोला फूल
झूमता खिलता किलकता रूप था अनुकूल
सात स्वर से ज्यो बना हो, गीत स्वर-साकार
सात वर्षों ने संजोया बालिका का प्यार ।।१८।।
एक ही सगीत था वह, सदन उससे दूर
शाति जिससे सद्य प्रसरित, भवन मे भरपूर
नगर मे भी दीप को इस ज्योति को मनुहार
बढ रही थी, काति, शोभा, श्री प्रशात, अपार ॥१९॥
मभी पुरवासी विकल थे, प्रीत का उत्साह
भर उठा था हृदय मे, थी देखने की चाह
बालिका या लोक देवी, स्नेह का अवतार
या नगर या प्राण, या वह कला को क्लिकार ॥२०॥

? रागिनी मन को, हृदय के भाव या विस्तार या कि सौरभ, कान्ति पा, उद्दाम वेग अपार या मजिर को ज्योति या प्रासाद या उत्तास पुलकता पावन परम या रूप का प्रभिलाप ॥२१॥ स्वण-पाटन से बना, शतदल पिला है माज ज्यो अलोकिा साज मे, लिपटी यधू की लाज या गगाही चमो माया शितिन या गात पा गया है या भवन हो, सपनमो यह प्रात ॥२२॥ वह दिशाम्रो सँग उठी, जागी रतन के साथ जन्म लेकर ज्योति मीरा घट रही दिन रात राव जो ये हर्ष से पागल, प्रभो । यह दान ज्यो दिया, त्यो हो जगाना प्राण में सम्मान ।।२३।। भक्त राणा के स्वरो की भक्ति से हो प्रीत यालिका थी देखती, प्रतिमान सुधड, पुनीत यही गिरधर है, यही गोपाल जग के ईश यही पालक है धरा के नाम है जगदीश ॥२४।। यही हैं बेटी । पुकारो है मधुर गोपाल । मैं तुम्हारी हूँ, तुम्हार चरण मे प्रतिपाल बालिया मीरा जगाती थी, वडा विश्वास राव दूदा झिलमिलाते, सरस रम अभिलाप ॥२५॥ भोर होते ही विद्याल हो वोलतो मृदुबोल उठो यावा चलो गिरधर, मधुर ध्वनि अनमोल यसो हे नदलाल हे गोपाल मन मे, पान तुम्हारी मेरी पुरानी जान है पहिचान ।।२६।। योतते थे दिवस ऐसे बढ रही थी काति वालिया थी या भवन की सुस्मिता विधाति रूप को रेखा, नयन की एक मीठी बात देख विग्रह विकल होती बालिका दिन रात ।।२७।। - १६ बालमन मे तीव्र सी निष्ठा सजा विश्वास दूबता जाता मधुर-मन भक्ति का प्राभास राजसी वैभव, अलौकिक साधनो के जाल, स्वर्ण की प्राभा, जगाते ये हृदय मे ज्वाल ॥२८॥ एक दिन सहसा उठा वह पीर का तूफान राजरानी का हुआ प्राणान्त, दुख का भान बालिका मीरा विहीना मातृ का आलोक रदन कर हारी थकी, मन वेदना भर शोक ॥२९॥ राजरानी रत्न के मन का मधुर ससार शील की देवी, हृदय की रागिनी साकार चल बसी, वह व्याधियो का हो गई श्रृङ्गार काल कवलित मा कहाँ पर कर चली अभिसार ॥३०॥ हो गया मतप्त मन, पाकर अमित आघात बीतती जाती दुखो की रात, होते प्रात राव दूदा ही बने थे, पितृ, माता साथ अब सुनाते थे वही, सब प्रीति प्रभु को बात ॥३१॥ रावजी से एक ही वह प्रश्न करती बाल मा कहा है, कहो वावा', पासुमो का जान रावजी विश्वास देते, पर न भूली बाल वप दस बीते न विसरी याद, माँ की साल ||३२।। हाय मा । तुम हो कहाँ, मैं हूँ दु खी, बस एक कष्ट, पीडा, वेदना, आघात प्राण अनेक रावजी कहते उमे यो-'रो न बेटी मोह यही है ससार नश्वर, यही उहापोह' ।।३३।। अमरता भी गर्व करती लिए मा का प्यार माँ प्रबल है, मां सबल है, माँ अमर अधिकार मातृ मृदुला है, खुला है, मा तुम्हारा द्वार माँ यहाँ लोकिक, अलौकिक, पर विषम ससार ||३४।।

- १७ मा मां तुम्हरा स्नेह ध्रुव सा, है अटल यह प्यार माँ । तुम्हारा स्नेह मधु-सा है धरा का हार मां । तुम्हारा स्नेह वसुधा का लिए है साज माँ। तुम्हारा स्नेह वत्सलता हृदय का ताज ॥३५।। मा । तुम्हारा प्यार चदा-सा, अमर सब काल माँ । तुम्हारा प्यार गगा-सा, यहाँ उत्ताल मां तुम्हारा प्यार है, ज्यो स्वग का मधुमास मां तुम्हारा प्यार है, ज्यो स्वर्ण-शिखर प्रकाश ॥३६॥ माँ। तुम्हारा अक, ज्यो शीतल नदी की गोद मा । तुम्हारा अश है, पीयूष पूण पयोद मां तुम्हारे अक मे है, यशोदा को काति ! तुम्हारे अक मे है, सौरभी-विधाति ।।३७।। माँ । तुम्हारे नयन मे, कैलाश का अभिसार मां । तुम्हारे नयन मे, अनुराग, राग-विहार मां । तुम्हारे नयन मे है, हास और विलास माँ। तुम्हारे नयन मे है, भक्ति का उल्लास ॥३८॥ मां । तुम्हारे प्राण मे है, जलधि का विस्तार मां । तुम्हारे प्राण में है, शील का ससार मां तुम्हारे प्राण में हैं, शिवि, दधीचि महान् मां । तुम्हारे प्राण मे हैं, मनु धरा के दान ॥३९।। मां । तुम्हारी एक चितवन, गीत की झकार मां तुम्हारी एक चितवन, मोक्ष वा उपहार मा । तुम्हारी एक चितवन, रास का ससार मौ । तुम्हारी एक चितवन, जीव ग्रहह उदार ॥४०॥ मां । तुम्ही ने ही जगाई, सृष्टि में यह प्याग मां । तुम्ही ने ही बनाई, दृष्टि जग में पारा मा । तुम्ही ने हो मिटाई, यानना अनुदार मा। तुम्ही ने ही बनाई, माह-लोना, हार ॥४१॥ - ।

मां तुम्ही हो प्राण मय, प्रासाद ज्योति अनूप मा ! तुम्ही हो पूर्ण केवल, अमल कोमल रूप माँ तुम्ही नवनीत, मन की प्रीत सुधि का गीत मां । तुम्ही सौरभ, तुम्ही नभ औ' जगत की रीत ।।४२।। मा । तुम्हारा वण मेघो मा, सजल है प्राण मां । तुम्हारा सत्य शिव सुन्दर स्वरूप महान् मा तुम्हारा प्राण, चिर नूतन स्वरूप विधान माँ तुम्हारे विष्णु, शिव, अज रूप है, अनुदान ।। ४३।। शाति दो हे माँ | करूं मै विश्व का कल्याण शाति दो हे माँ । करूं मै भक्ति, जग का प्राण नाति दो हे मा । बनें सब कम-योगी वीर श्राति दो हे माँ । अटल हो देश-सेवक धीर ॥४४॥ नित्य ही मा पर बनाती छद, मीरॉ बोल हृदय से गाती सुनाती गीत ये अनमोल और बाबा थे बताते कृष्ण को यह राग जग उठे है प्रभु ' हमारे भवन के ये भाग ।।४५॥ भक्त जन पाते मदा, ले कृष्ण का सगीत राव राणा ये कराते, भक्ति उन पर प्रीत और दो आखे मधुर से प्रणय का ससार देखती जाती सजाती प्रेम का उपहार ॥४६॥ ज्यो युगो से मिल न पाया हो कभी भी हास ज्यो युगो से मिल न पाये प्रीत का आभास ज्यो तडपते आसुप्रो पो दद का उपमान ज्यो न मिन पाये हृदय को जिन्दगी का गान ।।४७।। या न खिल पाये कभी कलिका कटीली डाल या न मिल पाये, मधुर गौरवमयी जयमाल या न बुझ पाये, घरा की कामना की ज्वाल या पठिन रोगी न पाये, स्वस्थ प्रोपधिपान ।।८।। - .

त्यो मिली थी प्रीति, मीग को हदय आलम्ब जल उठा था राग का वह, ज्योति दीपस्तभ चल पड़ा था बारला मन, राह एक अनत चल रहे जिस पर युगो से भक्ति पाने सत ।।४९।। उठ रहा था गान्त मन मे भक्ति का वह ज्वार बढ रहा था ज्यो नदी के वाढ का आकार बन रहे थे मोह के प्राचीर या गोपाल थे जगाते वालिका मे प्रीति के जजाल ।।५।। रावजी अज्ञात थे, पर भक्ति का यह बीज बन रहा था पुष्प-पादव, जिन्दगी से सीझ भक्ति की यह किरण, अब फैला रही थी हाथ चल रहा गोविन्द का अनुराग उसके साथ ।।५।। कृष्ण ही उत्सर, उन्ही के नाम का त्यौहार राज वैभव हार कर नत था, उसी के द्वार कृष्ण ही जीवन, वही तन मे, उन्ही के सास कृष्ण ही अग, कृष्ण ही जग, कृष्ण-मय-अधिवास ॥५२॥ कुमारी की किलक से प्रासाद के प्राचीर कभी डर जाते, पुलक से डोल उठता धीर सभी पुरवासी जगाये थे बडा विश्वास राजरानी की अमल दुहिता, धरा का हास ।।३।। महाश्वेता-सी जहा यह जायेगी वह प्रान्त धन्य होगा धन्य, गूजा, भवन हो उभ्रान्त युगो से अभिशप्त लोगो को मिलेगी शाति यूगो से धूमिल धरा को मिल सकेगी काति ॥५४॥ दास दासी, राज-वैभव, छलकता था प्यार राग-रगीनी, सभी अभिसार थे तैयार मेडता मे नाचता था, वैभवी- गार झूमते थे, राजपूती शान से दरबार ।।५५।।

। ? ? . सजग थे प्रहरी, वडो निष्ठा वडा सम्मान रत्न, होरक-जटित स्वणिम, भवन का विज्ञान सुख सभी हो इसलिए दुख पा न पाता पास हो न पाता ज्ञान, उसके रूप का आभास ।।५६ यलेश पीडा दीनता से युक्त वह ससार झूमता था बालिका के प्राण मे हर बार हे मधुर गोपाल | कब होगा यहाँ उद्धार यह अमर पीडा मिटेगी कय हृदय का भार ॥५७॥ 'तुम न मानोगे' करेगा प्राण तुमसे मान तुम न पानोगे, हरेगा कौन सकट पाण यह अलौकिक सुख मुझे है शूल, हे गोपात । युगो से जलने लगी है, इस हृदय मे ज्वाल' ॥५८॥ बढ रही थी यह क्ली, औ' बन रहे ग्राघात तोड लेगा कुसुम कोई, कब वढा कर हाथ खिल न पाया प्राण की, इस मधुरिमा का फूल हो न पाया ग्रीष्म शीतल, जि दगी का कून ॥५९।। वालिका ने एक दिन देखी सजी बारात पूछ बैठी- कहाँ वर, मेरा वताओ तात । हर्ष डूबे, अश्रु भीने, रावजी के बोल कृष्ण या गोपाल ही वर तुम्हारे अनमोल ।।६०॥ झूमता वैभव सजग और बोलते सवाद स्वप्न देखा, बालिका ने क्षितिज डूबा चाद सजाकर बारात तारो की गगन पर याज कृष्णा बन दूल्हा चले, सरगम सुनाते साज ॥६१॥ बढ रहे थे प्राण के साथी, मधुर-मुस्कान थो रूपहली रात, गाता फिर रहा पवमान रजत का ससार ज्योत्स्ना, बांटती थी प्रीत एक ब्रजवाला बनी दुल्हिन, मधुर संगीत ॥६२।।

7 - २१ दीप दो ये बढ रहे, जो एक होने पाम तार दो यो मिल रहे थे, प्राप्त कर उल्लास राग दो दो बढ रहे थे, प्रणय का मधुमास दो विहंग अब मुक्त होकर ले रहे थे साम ।।६।। प्ण संग परिणय हुअा, सम्पप्न य से प्राज प्रणयिनी मोरी, पडी भांवर, सजा पर साज झूमता था चांद पागल, मिल गया था मीत नयन मे गोपाल, मन मे प्रीत का था गीत ॥६४।। प्यास से व्याकुल रहा हो पथिक कोई एक कि मिल जाये उसे, जल का वहीं अभिषेक ज्यो वढाये हाथ भो' फिर टूट जाए पात्र म्वप्न टूटा वालिका का, कप वा गात्र ॥६॥ एक निश्चय एक प्राशा मे भर थे प्राण और दृढ होता गया, गोविन्द का परित्राण एक लौ 'लागी लगन हरि चरण में' अज्ञात एक प्रीति उदास मन को हो गई थी प्राप्त ॥६६।। 'स्वप्न मे परण्या मुरारी' दिव्य अचल सुहाग प्रणयिनी गिरधर मिले, ज्यो भोर अरुण पराग देवता! हे प्राण । प्रियतम हे अमर-अधिकार इस अकिंचन प्राण को है, श्रीचरण से प्यार ।।६७॥ रावजी ने सुना, बोले-'स्वप्न है जजाल स्वप्न मृगतृष्णा कुमारी, स्वप्न् है वह व्याल काट लेता जिन्दगी को, यह भयावह जाल या जला देता, हृदय को साल देता साल' ॥६८॥ सत्य तो यह स्वप्न होता, प्राण का आधार या कि रूपक मोह या, या चित्रमय ससार या कि नवजीवन धरा पर, पालता है सत्य या मिटाता हीनता, या इद्रधनुपी नृत्य ॥६९।।

२२ स्वप्न् ने मन मे जगायी थी, प्रणय को पीड मुग्धकारी गीत को ज्यो, हो मधुर सी मीड स्वप्न क्या था, बालिका का, था सहारा एक डूबता ही गया मन, खिंचती गई प्रण रेख ॥७॥ ज्यो शलभ काप्राण जीवन,ज्योति उसकाप्यार सिंह शावक को मिले या भक्ष्य का आधार गीत को ज्यो छद, मिल जाता अमन्द उदार अश्रु को गति, हीन को मति, पिको को मनुहार ।।७१॥ तमस कोज्यात्स्ना, धरा को शाति का उपहार स्नेह दीपक, मृत्यु को निर्वाण का अभिसार धैय साधक को, विकल को प्राश का आधार त्यो मिला अनुराग मीरा को मुरारी-प्यार ।।७२।। अब पहेली जिन्दगी को, सुख मिला था एक पा गया पाथेय, गति के प्यार-गीत अनेक बालिका मे फूल-सा, वढता गया -सोदय ज्यो उरेहा हो, हृदय ने, प्रणय का सौकय ।।७३।। ज्यो धरा के प्राण में अम्बर वसाता नेह सत्य मे सुन्दर, शिव मे, सत्य का वह मेह घायलो को हास मिल जाये, युगो की प्राश या कि इस छलिया जगत को, मृत्यु का उपहास ॥७४।। प्राप्त कर उस प्रीति का मबल, हृदय का हास आ गई वय-सन्धि पर, उस वालिका की प्यास चिन्ह यौवन के सुढर, छाये अशात अपार लगी बढने उस शिखा मे प्रणय की मनुहार ॥७॥ प्रीति की प्राभा सिमट आई दगो में वद विकसने या चटक्ने से, विक्ल रूप अमद लाज का शासन, मुकुर-मन, रूप का यह दान राग में रंगने लगी, उसकी मधुर मुस्कान ॥७६।। .

प ? रेसामो-रेया सजीली, नयन ज्यो उपा पे प्राण पर, मनुराग रूप उजैर नयन कोरक में भरा, सौन्दम या समार ज्यो अरुणिमा क्षितिज तट पर, फैलती सापार ७७॥ प्राण योमल, एका हलचल भर उठी मनात भावना छाया सदृग, ज्यो देह के है साथ उमडता यौवन प्रवाहित, ज्यो नदी की धार पूर्णिमा के चांद, ज्यो उफ्नाय पारावार ७८|| फोन प्रहरी बन गया था उस ददय का प्राज' छेडता है तार क्या मिलाकर साज राज महलो से निवलना लाज के प्रतिकूल मन | बता कसे मिलेंग अब पिया को फूल ॥७९॥ देखरर यह वाढ बढती, नित्य नूतन प्यास रोक्ते वाचा-न जानो, मन्दिरो के पास अव हुई तुम युवा बेटी । राजयुल को पान नष्ट होता और मिटता मानसी अभिमान ।।८।। शाति अव्यात करो, तुम साधना गृह ग्राज एक गिरधर है सभी प्रानो सजाग्रो साज़ 'पाश साधो के दरस की मती बरजो तात सघन तम के बिना कब होता प्रकाशित प्रात? ॥१॥ राव दूदा एर चिता से हुए प्राकान्त क्यो न भाता बातिका को राजकुल का प्रान्त बालिका अव बढ रही थी भक्ति पथ अवदात चाद नभ मे फैलता ज्या पूर्णिमा की रात ||२|| विदु पर पाका प्रभो ने सिंधु का ससार सिधु मे सोया हुआ है लहर का प्राकार लहर में खोया हुआ उत्सग का यह खेल खेल मे है जिदगो प्रो' मौत का यह मेन ॥८३|| 2 २४ क्षितिज सासोदय, मज़िल-सा अटल विश्वास भरा था मन मे, बढी थो अमरता की प्यास रुदन करती याद मे, उस साधिका का प्यार वाल विधु-सा बढ़ रहा था, पूर्णता का भार 11८४।। साध जगती प्राण मे होती रुपहली रात मन स्वय करने लगा था, अब स्वय से बात हो न सकता व्यक्त कुछ भी विरह का यह मान क्यो दिया गोविंद ने तव प्रीति का मधु दान अश्रु डूबा हो गया, अनुताप का यह गीत प्रार्थना करती सदा गोविद से पा प्रीत रस छलकता जो समर्पण मे, कहां वह प्राप्त अह क्या जाने उसे, यो कह रहे हैं प्राप्त ।।६।। जव लगाई प्रीत तुममे मान कैसा नाथ बढ चलूगी अतल जल मे भी, तुम्हारे साथ प्राण मे झझा भरूंगी, प्रीत मे विश्वास कौन-सा परिणय-मिलन, हो जाय सव-विनाश ।।७।। रूप मे धुलकर तुम्हारी कौमुदी का साथ त्यागना दुश्वार है, क्यो प्राण | पकडा हाथ कृष्ण 'हे माधव 'तुम्हारी प्रीति का मधुपान पीर तुम पोते परायी, बन हिमाशु महान ॥८॥ है वही स्मिति, जो करे जगमग हृदय के प्राण सजल अन्तस्तल बने जीव त, जो पापाण यदि न खिलता पूण खुलकर मानसो यह फूल तो न अधरो पर कभी मुस्कान उगती झूल ।।८९॥ अमरता के दूत माधव प्यास कैसी प्याम' जल रहे क्यो अधर मेरे, बस तुम्हारी माश इस तरह से साधिका क्ट रहै दिन रात ज्यो उजाला छिन्न करता है तमस के गात ॥९॥ । 1

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नगा पा लिगे, उस युग रायमा
मा गाधर गमो हात मग्न, मुरमा
प्रय भी पपिर पराा, साधिका माया ॥९॥

तृतीय तरङ्ग परिणय साधिका के प्राण में भरता गया आक्रोश और वनता ही गया, वह प्यार भीपण दोप म्लान होते गए मन के स्वप्न औ' शृगार रूठते ही गए प्राणो के मधुर अभिसार ।।१।। प्यास मे डूबी हृदय की रागिनी के छोर आश मे आँखें लगी रहती प्रभो को भोर रत्न के मन में उदासी के तने थे जाल वाध लेती ज्यो हृदय को उलझ मुक्कामाल ॥२॥ रात दिन कव बीत जाते हो रहे क्षण भार राजसी वैभव सभी ये, टूटते अधिकार लुट गया था रत्न का मगत मधुर ससार गिर पडे ये टूटकर संगीत के सब तार ॥३॥ विकलता थी, विवशता थी, शक्ति कण थे मौन सो गया व्याघात बन कर शूल-सा वह कौन ? राजरानी का हुआ था स्वग मग विहार शू य-सा लगने लगा अब राजसी, सिंगार ॥४॥ राग खोये खिन मन का अश्रुमय था गान सामने रहता सदा उसका मधुर प्रतिमान झॉकती थी एक चिता, रत्न के प्रा पास जी रहा था इस तरह, मन मे अटल विश्वाम ।।५।। और उसके साथ था क्तव्य का संदेश देवता का दीप तो जलना अभी है शेष आसुओ के साथ पहुंचे रावजी के पास ली चरण छू दग्ध मन ने, एक सुख की सांस ।।६।।

२७ मिल गया हो ज्ञान को ज्यो भक्ति का उल्लास रावजी ने पा लिया था, एक अमर प्रकाश प्राण मे प्रण के समीरण ने किया अधिवास कष्ट, पीडा, वेदना का अब न था आभास ॥७॥ मृत्यु, सुत । अमरत्व का ही दूसरा है नाम भूलता जग, यह नही 5 भग विधि का वाम हास है यह काल का, अभिनय, उदार, ललाम नाश या निर्माण नैगिक क्रिया का काम ।।८।। - रत्न हो निश्चित, लेकर सान्त्वना अनुराग बालिका से कह उठे-'जागे तुम्हारे भाग प्राण मे जब तक न भरती लग्न की मनुहार शील को तब तक न मिलता, प्राप्ति का शृङ्गार ॥९॥ डूबता ही गया यौवन भक्ति में तल्लीन भूलता ही गया मदिर-प्रमाद मन हो क्षीण भक्ति-पथ की थी विजय, शृङ्गार भूला राह कृष्ण से परिणय रचे, बस थी हृदय की चाह ।।१०।। राग ही बढता गया, अध्यात्म से कर प्रीत राग ही जगता गया, वैराग्य के गा गीत राव दूदा और बेटी भक्ति के अवतार झूमते थे कृष्ण के आकार मे साकार ॥११॥ पा गया था ज्वार, सागर मे अपार अशान्त रोकता फिर कौन, होने लगे मन उद्भात प्यास-पारावार बढता, ले अमर जब भूख तोड देती भव्य प्राचीरे हृदय की हूक |॥१२॥ नाम सकीतन मधुर नतन साधु मतो की पुजारिन हा गई मावार कपा श्रवण, विशुद्ध सेवा, मधुर भाव पुनीत प्रीति धम प्रणीत कर मन से उठा यह गीत ॥१३॥ पना प्राधार

भोग पाते कान्त-कृष्ण, सदा उसी के हाथ
अहर्निश मधुपान करते थे उसी के साथ
साध्य को रहना पडेगा भक्त के प्राधीन
क्योकि उसका शुभ्र जीवन भक्ति पथ आसीन ।।१४।।
साथ सोते, साथ उठते, राधिका के कृष्ण
साथ रोते, साथ हँसते, साधिका के कृष्ण
साथ खिलते, साथ मिलते, प्रीति-रग-रसेश
साथ लेते, साथ देते, भक्ति का सदेश ॥१५॥
बो दिया वैराग्य, साधक-कृषक ने हो शात
प्रीति की धरती, अमर सगीत जीवन कात
भक्ति का अकुर, प्रणय-फल की लगी थी आश
गीत औ' सगीत से साकार था सन्यास ।।१६।।
दूध जैसी चादनी मे एक नन्ही नाव,
स्वप्न मे पाती उसी के पास, बनकर भाव
थिरकते थे, झूमते थे, पाद, नूपुर, गान
किलकते, खिलते, मचलते, कृष्ण के प्रतिमान ॥१७॥
नित सुनहते भोर होते, प्राण मे उल्लास
शबनमी होती निशाएँ, बांसुरी की प्यास
खुले कु तल, ज्योति मुख, ज्यो चाँद तारे रास
धूप चम्पक सी सरस होती, सुधा मय सास ॥१८॥
रात भर दीपक जलाती, विरह के उपमान
कृष्ण लेते अर्ध्य, देते बाँसुरी का दान
मधुर, दूरागत, चिरतन, रागिनी के दूत
घेर लेते राधिका को, भाव मन अनुस्यूत ।।१९।।
बस यही क्रम चरण चिह्नो पर सदा अवदात
बढ़ रहा जीवन, तपी सा, था प्रफुल्लित गात
शुभ्र-वसना गूथती जाती सुमन की माल
प्रीति में डूबे हुए रतनार नयन-विशाल ॥२०॥

उमियो मे ज्यो बंधे हो, मोतियो के हार कुतलो मे या पले हो, कुसुम-गध-विहार तम-क्षितिज को पारकर,सब व्याधियो को भूल भक्ति के किंजरक का बनता गया उपकूल ।।२१।। साँझ पाती, प्रात मे आते थमिक हो क्लान्त गुजता था साधिका को प्रार्थना से प्रान्त और पल भर मे मभी अपनी व्यथा को मूल नृत्य, फीतन, राम करते, झूमते ज्यो फूल ।।२२।। भक्ति की पगठडियो से पुष्ट होकर धीर बन रहा था, शान गगा, राज-पथ गभीर साँझ जाती, प्रीत या सगीत करता राम प्रात होता, ज्योति पिरणो का सरस उल्लास ।।२३।। राय दूदा एक दिन बैठे हुए थे पास पौर मीरा गा रही-'गोविद यो है पास साधुमो को एक टोली भवन के सीमा त नाचने गाने लगी गुण, कृष्ण के फल-कात ।।२४।। फोन पाया है हमारे प्रीत के प्रावास पया सभी ये हैं हमारे कृष्ण प्रभु ये दास दोड पर बाया गए, सब नृत्य में तल्लीन गा रहे पे झूमफर सब भक्ति-गीत प्रवीण ॥२५॥ गृष्ण का प्रतिमान क्या था, पण थे साकार गिल उठे पे नेन, जिाता गगन पन-मायार प्रीति मौ' परतीती-भोगी दृष्टि, मोरा मौन महती बोली पतामो-'भरा मीरा मोन?' ॥२६॥ रावजी योले- 'पही येटो यनासो गीत हमी ने पाया मगाई है नपन में प्रीत सरय, पगती है. यही भोनी, हृदय को प्राय पप को गुनगाम्यनियन रही है मार ॥२७॥ 7 7

,
7
माधु सब नेतृत्व पाते, भक्त थे विश्वास
भक्ति ही जिनकी शिराम्रो की रही थी प्यास
दिव्य-पानन साधिका का देख, रोये सत
भक्ति औ' भगवान ही हैं सृष्टि-रूप अनत ।।२।।
देवि । देवि सुधा, तुम्हारा प्रीति गुण मवाद
गीत वह गोविन्द का कह दो करो कुछ याद
गीत हैं, नवनीत है या मधुर-रस के राग
श्रवण करते ही हृदय मे बोध उठता जाग ।।२९।।
गीत तो आते नही, बावा | मुझे, प्रज्ञान
खा रहा है प्राण को, यह मोह का व्यवधान
बन नहीं सकता हृदय का तार टूटा छद
कहां वे गोपाल प्रभु श्री' में कहा मति मद ॥३०॥
पात्र निंदा की यहा नारी, सभी को ज्ञात
इसलिए उपहास करते, है सभी दिन रात
दीन-मन फिर भी लगाये है उसी की प्राश
बस मिटें उस नाम पर, मेरे अकिंचन साँस ।।३।।
सुन रहे थे साधु सब उस यौवना को घेर
लगे कहने कृष्ण । कैसा हो रहा अधेर
साध्य तुम हो, भक्त फिर भी पा रहा दु ख नाथ
कर रहे प्रतिकूल, क्यो भोले हृदय के साथ ॥३२॥
नाचने गाने लगे, प्रभु के चरण को चूम
शात वह प्रतिमान हँसता, भक्ति-रस मे झूम
भक्त-नर्तन, यह प्रवतन, देखकर गोपाल
कर रहे थे ब्रह्म, माया का हृदय बेहाल ॥३३॥
मूर्ति को मचले प्रणयिनी के हृदय के भाव
कर उठी वह याचना, मन मे बहुत था चाव
चल पडे सब सन्त, कर प्रातिथ्य का जलपान
रो पड़ी मीरा न पाकर साध्य का प्रतिमान ॥३४॥

सात से तुलना नही, ब्रह्माड के महाराज
में अकिंचन दीन दासी, है नही सुख साज
रात भर रोई, न खाया अन्न का तक ग्रास
पूर्णिमा के चन्द्र को ज्यो घेरता ग्रहवास ।।३।।
भक्ति के अवतार का तब, हिल उठा साम्राज्य
भक्त को आघात पहुँचा, प्रेम था अविभाज्य
स्वप्न मे जाकर हिलाया साधु का विश्वास
हाथ ले प्रतिमान दौडे साधिका के पास ॥३६॥
मूर्ति लो है देवि । प्रभु का है यही आदेश
स्वप्न दे प्रभु ने मिटाया भ्रम नही है शेष
हम अकिंचन साधु, उनकी अचना मे भूल
कर गये, तो प्राण मे उठने लगे है शूल ॥३७।।
इस सुघड प्रतिमान पर मीरा तुम्हारा प्यार
भूल मेरी थी, तुम्हारी भक्ति का अधिकार
तुम्ही ने मुझको दिखाया, दिव्य दशन रूप
दे रहा अभिभूत होकर, भक्ति भूरि अनूप ।।३।।
राजकुल मे यदि रहेगी तो सुरक्षा साथ
भक्ति यश फैत तुम्हारा, विश्व मे दिन रात
पर तुम्हारे गीत, कीतन, भक्ति के आधीन
कह रहा हूँ सत्य है, गोविन्द भी तल्लीन ॥३९॥
हे प्रभो ! यह राजरानी भक्त बन साकार
विश्व का कल्याण करदे, शक्ति का अवतार
चांदनी विछ जाय इसके भक्ति पथ मे, गीत
गा उठे कण कण प्रणयिनी कृष्ण की यह प्रीत ॥४०॥
मूर्ति पाकर मग्न मीरां, हो गई उमत्त
कृष्ण के रंग में रंगो,
वह साधिका
अनुरक्त
श्रवण, कीतन, पाद-सेवन, भक्ति का उत्साह
गीत गाती, नृत्य करती प्रीति पथ की चाह ॥४॥

1
भाव ले दाम्पत्य, करती सुश्रुपा-याचार
पौर देती प्रीति से वह प्रणय की मनुहार
प्रालि ललिता तार से झकार देती साथ
कल्पना मे डूय करती थी पिया से वात ॥४२॥
रावजी ने सुनी उसके प्रणय की झकार
वयस का अनुमान कर, चिंतित हुए हरवार
पुत्र वीरम को बुलाकर लिखी पाती एक,
दूत को चित्तौड भेजा, राजपूती-रेख ।।४३।।
दूत लौटा खुशो का सवाद शुभ ले साथ
हर्प को पा सूचना, बोले प्रभो से वात
कृष्ण | हे माधव । तुम्हारी चेरि का यह पव
पान से पूरा निभाना, राजपूती-गव ।।४४।।
राज राणा, नाम था सग्राम सिह समान
वीर रस के ज्योति-पुज, उदार यश की खान
थे प्रबल प्रणवीर, गुण गम्भीर, नेत्र विशाल
प्रजा के पालक, महाशासक, जयी प्रतिपाल ।।८।।
वीरता और शौय के अवतार, जय के रूप
वीर रम साकार ज्यो हो युद्ध-वीर अनूप
राजपूती प्रान से मडित रहा वह वीर
और कुल अभिजात्य, रूप उदात्त, गुण
न्याय प्रिय चित्तौड औ' हिन्दुत्व का वह सूय
बैरियो का काल, वजता था विजय का तूय
कीर्ति का ध्रुव, सत्य का सेवी उदार अपार
युद्ध मे अजुन सदृश या भीष्म का अवतार ॥४७॥
भूल सकता क्या कभी, सग्राम का इतिहास?
आज भी चित्तोड को उसकी बनी है प्यास
नाम सांगा, कांपता सुन अरिदलो का जूथ
दूध था या मां धरा का, शोयं सिंह सपूत ॥४८॥
गम्भीर ॥४६॥

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सूर्यवशी रक्त था उनकी नसो का नूर,
प्राण जाये, पर बनन रक्षित रहे भरपूर
जो रखे दृढ धम को, रखता उसे करतार
शरण पागत को मिले बस अभय दान दुलार ॥४९॥
इला के रक्षक, कला के सूर्य से प्रतिपाल
धम के अभिधान या अभिमान के थे काल
और थे अन्याय पर यमराज कैसे क्रूर
सग जिनके शूरता जन्मी पली भरपूर ।।५।।
शूर सागा के कुवर थे भोजराज उदार
पितृवत् थे वीर कमठ, कला-कीति-कुमार
तय हुमा परिणय उन्ही से, राजपूती पान
बात सुनकर मेडता को मिल गया सम्मान ॥५१॥
हप का उद्धेग पाया, रावजी के द्वार
लग गया प्रासाद मे उल्लास का अम्बार
पर्व, उत्सव, गान, कीतन, मालिक उत्साह
नगर घर घर ने मनाये, स्नेह-भीनी चाह ॥५२॥
रावजी दौडे सुनाने साधिका को वात
हार लेकर नौलखा, ज्यो ज्योति का हो प्रात
यावरी मीरा विकल थो, नृत्य का उन्माद
छा गया था, भवन भर मे पूर्णिमा का चाँद ॥५३॥
और ललिता किन्नरी-सी वादिका बेहाल
छेडती थी तार, प्राणो के, प्रणय के जाल
सान्द्र स्वर का परस सम्मोहन लिए अनुराग
भर उठा प्रासाद मे, गोविद प्रीति-सुहाग ।।१४।।
साधिका स्वर मग्न थी, ले गीत एक पुनीत
और तब गोपाल उसके बन गए थे मीत
रावजी प्राचीर का अवलम्ब लेकर मौन
हार रख तन्मय हुए, मानद देता कौन ? १॥५५॥

गा रही थी भक्त मीरा-'शरण हूँ गोपाल ।
अब भुलाना मत कभी, गोविन्द प्रण प्रतिपाल ।'
रावजी के नेत्र उमीलित हुए हर बार
सहस स्रोतो से चली थी अश्रुजल की धार ।।५६।।
सामने गोपाल का स्मिति-रूप रेखा-जाल
बाधने उनको लगा, विस्मृति हुई उत्ताल
नयन के कोरक हुए, गोविन्द के आधीन
सांस ने सचार छोडा, कृष्ण मे तल्लीन ॥५७।।
सार बजता ही रहा ललिता सभी सुधि भूल
धली विग्रह पर चढाने समपण के फूल
साधिका ने सामने देखा खडे थे तात
देह सज्ञाहीन, अर्पित था प्रणव के, गात ।।५८॥
हाय बाबा । चीख मीरा की भवन मे व्याप्त
हो गई पचत्व को वह भक्त देही प्राप्त
साधिका के मेध नयनो मे भरी बरसात
अहर्निश गिरते रहे करुणाश्रु तब अवदात ।।५९।।
दर्द घुल धुलकर सभी बनते गये आघात
रश्मियाँ सयास की, लाता गया हर प्रात
राव दूदा के मरण के शोक मे बेहाल
मेडता के वीर वीरम फिर हुए प्रतिपाल ।।६।।
दुख यदि बँट जाय तो, बढते सुखो के पुज
लहलहाते शाति के सूखे हुए फिर कुज
शोक कम हो, साधिका का सोचकर दिनमान
तय किया परिणय, बढ़ा चित्तौड का सम्मान ।।६।।
मेडता के द्वार अब शहनाइयो के गान
गूजने सुनने लगे, प्रासाद के पाषाण
राजसी वैभव भरा धन धाय से भरपूर
मेडता अब पर रहा प्रातिथ्य, ज्यो रण शूर ॥६२॥

-- ? गध को उस धूम-रेखा ने सुना प्रस्ताव पीर से पीडित हुई, ले अश्रु-डबे भाव क्या यही प्रियतम तुम्हारी प्रोति का आदेश? यह दुबारा कौन सा परिणय बचा है शेष? ॥६३॥ म्लान मुख, सत्रस्त नयनो मे उदासी थाम लगी वह कहने प्रभो क्या भक्ति का परिणाम ? मन नहीं है पास, तन की निधि तुम्हारी प्रीत कौन सा रूपक यहां अब हो रहा अभिनीत ? ॥६४।। क्या यही तुमने बनाया सृष्टि सग विधान ? एक नारी के रहे दो पति, प्रणय-प्रतिमान ? हो चुका सब कुछ तुम्हारी चेरि का हे नाथ अब न होगा, मृत्यु तक परिणय किसी के साथ ॥६५॥ सात भाँवर पड चुकी, मेरी तुम्हारे साथ कौन-से सौभाग्य की अब शेष है यह बात धूम का जलना कभी सभव नहीं, प्रतिपाल डालते हो क्यो बतागो मोह का यह जाल ॥६६॥ पर न रुक पाया पिया की कामना का ज्वार और जग की रीति का रूपक हुमा त्योहार राजकुल चित्तौड का, प्राया सजा बारात भोज बन दूल्हा चढे, ले हप डूबा गात ।।६७॥ मेडता मे सात दिन दीपावली की धूप चाँदनी सगीत की, उत्सव हुए अनुरूप पर न छोडा साधिका ने कृष्ण का प्रतिमान मूर्तिवत् सहती गई, इस देह का अपमान ।।६।। अश्रुमुक्ता से सजाकर राव वीरम थाल कर चुके पूरी सभी उत्साह से जयमाल प्राण-प्रण-सत्कार देकर, वीर वोरम तात स्वर बधावो के उठे, नयनो भरी बरसात ॥६९।। ?

साथ दे धन धान्य को, फिर अश्रु-भीनी प्रीत कह सके बेटी निभाना राजकुल की रीत । और ले सागा चले, कुल की वधू, अनुराग कट गए सब ताप उनके जगमगाया भाग ||७०॥ साथ मे छाया-सदृश ललिता सखी ज्यो सास भक्ति का वह तार जैसे हो हृदय के पास मेडता हो पितृवत् बोला-'अचल अहिवात' चाद, सूरज गग, जमुना-सा रहे यह साथ ।।७१।। आज बेटी जा रही है छोडकर यह प्रान्त फूल से सौरभ उड, रह जाय पाटल शान्त कण्व से दूदा नही थे, पर तपी था देश जा रही दुहिता धरा की, भक्ति का सदेश ॥७२।। लिया चरणामृत सुधामय फिर समर्पा सीस मेडता के चतुभुज भगवान की आशीष कठ थे अवरद्ध, वाणी बन गए थे नैन भर गई छाती, मिले ममता सने कुछ सैन ।।७३॥ प्यार का मोती, पिता का छोडकर प्रासाद चल पडा कीमत चुकाने धर्म, कम प्रमाद आ रहा था जिन्दगी का स्वग-शशव याद राज्य-लक्ष्मी को हुआ, प्रभु प्रीति का उन्माद ॥७४।। रो रहा था नगर भर, जमे विदा के गीत ज्यो वरसते फूल नभ से, यह विरह की रीत साधिका तजकर किशोरी वयस का ग्रावास चल पड़ी सौरभ जगाने, दुग के रनिवास ॥७॥ मेडता से पुण्य चलकर, पा गया चित्तोड ज्यो प्रतीक्षा प्रीत मे हो, यह युगो की होड मुक्त हिरनी घिर गई, रनिवास क्या था जाल पुलवधू को लाज से निर्मित हुआ ससुराल ॥७६।।

३७
दास, दासी, राज-वैभव रग-शृग विशाल
धन धरा का,रूप प्रम्बर का, सजाकर थाल
आज फिर चितोड ने, कर ज्योति का शृगार
प्रात स्वागत गान गाये, हप पारावार ॥७७।।
दुग का कण कण हुअा ज्योतित, जगा रनिवास
क्योकि अब वीरत्व के संग भक्ति का उल्लास
भव्य भवनो मे ज. मणि रत्न रग-निधान
तूलिका जीवन्त लेकर कला का सधान ।।७।।
गगनचुम्बी मदिरो के स्वण-कलश-विहान
द्वार
रण पर सजे
भक्ति के प्राधान
राजपूतो पान, शासन में बंधे सब लोग
और थे चितौड मे, स्वर्णिम सभी सुख भोग ।।७९।।
राज-धभव मे घिरे, अब साधिका के गीत
स्वर्ण पिंजर ज्यो चिरैया, राजकुल की रीत
है सुखो प्रो' साधना मे युगयुगो से वर
ज्योति के हर क्षितिज मे, तप का बसा अन्धेर 1100
कष्ट की गहराइयो मे सुख भरे माभास
प्यास की परछाइयो मे तृप्ति का आवास
पम में ही जम जीता है सदा जलजात
कृष्ण-मेषो से संवरती तडित की बारात ।।१।।
प्रीति का हर सांस पाता है बहुत पापात
हर तपे दिन का विलय विधाति भीनी रात
अग्नि पो हर दिव्यता, कुदन बनाती रूप
हार के तम वे पटल, जोयित, विजयिनी धूप ।।२।।
मुसुराता प्रलय मे भी जिन्दगी का साज
मृत्यु का पतझर बना, निर्माण का ऋतुराज
सुधा पो मनुगामिनी है, हर गरल की प्यास
मुषो का पटप-दायन, बनता यही सन्यास ॥३॥

, साधिका को यो सभी कुछ प्राप्त थे सुप साज पर लदी थी भक्ति पर, रनिवास कुल की लाज इसलिए हर गीत उसका, रूप-रग उदास पान पाता राजकुल के भक्त कोई पास 11८४|| यो कुवरजी ने उसे, सोपे सभी गृह-काज स्वामिनी का ज्यो सभी पर एक छत्र सुराज पर पडी थी भक्ति पर, रजवट कुलो को लाग प्राण प्रिय के विरह मे, जलती हृदय की प्राग ||५|| रावजी के साथ उसकी देह का सम्बध घुल न पाया प्राण में, बनता गया था द्वाद पौर ललिता मौन थी, इगित प्रभो का मान स्वामिनी का सुख सभी, अर हुअा अतर्धान ॥८६॥ भोज ने बनवा दिया, प्रासाद के हो पास एक देवल कृष्ण का, जिससे मिले उल्लास कुवर जी का भी हटा मन, सुख हुमा वैराग्य दिख गया उनको बदलता नियति-निमित भाग्य 11८७|| राजगृह मे अब हुआ अविवेक पूण विवाद हो गया उसका सभी व्यवहार एक विषाद कुल-वधू कुल वोर देगी, नृत्य केवल चाह राज-महिषी के हृदय मे, हुआ अन्तहि ॥१८॥ जग-हँसाई कर रही है, बावरी यह वाम साधु-पूजा, नृत्य-कीतन, डूबता है नाम और अब महाराज तक, पहुँचा यही सवाद कुल-वधू को हो गया है, भक्ति का उमाद ।।८९।। जानते थे भोज, मीरा दूज-विधु सी पूत भक्ति, प्रभु की भक्ति, उसके प्राण से अनुस्यूत साधु-सेवा, प्रीति-पूजन, नृत्य, कोतन, गान सब यही स्वीकार था, प्रभु का हठी सम्मान ।।९०॥ .

. नाचती, गाती, पिया का सामने प्रतिमान साथ ललिता तार से, करतो मधुर स्वर-गान कुवर भी होकर प्रभावित वैठ जाते पास भक्ति के ससार के, अब हो गये थे दास ॥९१॥ राजगृह की रानियो मे अब हुमा विद्रोह जागता उनमे सदा था रूप का व्यामोह ननद ऊदा और ललिता, बस रही दो साथ सान्त्वना दे साधिका को, सदा करती बात ।।१२।। म्लान होते गए तन के सुख सभी शृ गार व्यग्य बाणो से बिंधा, मन और जीवन भार कुँवर जी अब व्याधियो से हो गये आक्रान्त काटने उनको लगा, अपना चतुर्दिक प्रान्त ।।९३॥ दूसरा परिणय करो सब ने सुझायी बात पर न सज पाई कभी, फिर भोज की बारात पीर उनकी साधिका को, अब हुई अनुभूत भर उठी मन मे व्यथा बोली बचन यो पूत ॥१४॥ प्रार्य । यह कैसी मनस्थिति हो रहा सताप ? मौन होकर देह-सुध, भूले हुए है आप हो गया अपराध मुझमे मैं दुखो की मूल स्वण-काया, रुग्ण-छाया हो गई प्रतिकूल ।।९।। कुवर बोले- 'देवि ! तुम हो साधिका निष्णात ज्योति के संग कीट का, जीना बडा व्याघात देह के गुण-धर्म है सव, पाप-पुण्य-विधान भोग काया के सभी तो, है यहा म्रियमाण ॥९६।। तुम बताओ साधना निद्वन्द्व तो अवदात चल रही कैसी तुम्हारी है सतत आघात अश्रु का सैलाब भरकर, दद के दो बोल कह न पाई, मूर्तिवत्, मीरा हृदय को खोल ।।९७।। 7 ४० यही है आदेश प्रभु का, कुछ नही अब शेप पा रहा वृदा विपिन से कृष्ण का सदेश श्री सभी गोपाल की, मेरे लिए है त्याज्य सूर्यकुल या चद्रकुल मेरे लिए अविभाज्य ।।९।। भेज दो वृदा-विपिन हे प्राय | मुझको प्राज भक्ति पथ पर चल पडी, यह राजकुल की लाज वीर सांगा से कुवर को मिल गया आदेश हो गयी तन्मय, पिया की प्राप्ति का उन्मेष ।।९९। मच गई वृदा-विपिन मे साधिका की धूम 'मेरे तो गिरधर गोपाल' गीत गूजा झूम भक्त गण के कठ से जय जय निनादित नाम साधिका मीरा अमर हो कृष्ण माधव | श्याम ||१०|| माधिका को देह पर, अव वस्त्र थे कापाय भक्ति का व्यक्तित्व तन पर, लद गया बन दाय हर अधर पर गूंजता था, प्रणयिनी वा गीत भक्त-गण उमत्त थे, पाकर प्रभो की प्रीत ॥१०॥ तृपित तन को मिल गया, ज्यो सरस प्रीतालम्ब पान करते साधु उसके, गीत या कादम्ब वीथिया व दा-विपिन की, पथ विछाती फूल चरण पार हो गयी थी, धन्य उनकी धूल ।।१०२।। कुवर तब आये बुलाने कहा-'राज्यादेश अब चलो चित्तौड'-सुनकर हुअाधूमिल वेश भक्ति पथ-पीयूष से, जो मुस्कराई बेल सूख कुछ क्षण मे गई, क्सा नियति का खेल ? ||१०३।। माथ लेकर चल पडे, वृदा-विपिन सुनसान ज्यो पलायन कर चले, इस देह से ये प्राण चन पडे साधू अनेको साधिका के साथ ज्यो चढी हो आज, देखो भक्ति को बारात ॥१०४।।

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चतुप तरङ्ग
विष-पान
-
?
लौट आई साधिका चित्तौड, मन मे क्लान्त
भर उठा था व्यग्य वर्षा से भवन का प्रान्त
जो मिला गोविद को, अपित किया तत्काल
भक्ति का पथ ज्ञान से भी हो गया विकराल ॥१॥
राज महिषी क्रुद्ध हो बोली-'लुटा दी लाज
सूयकुल को लग गया ग्रह कुटिल तेरे काज
मिट सकेगा क्या कभी यह, दाग कुल का राम
मिल सकेगा क्या पुन वीरत्व गौरव नाम ॥२॥
सब जगत हँसने लगा है, कुल-वधू पर ग्राज
और मीरा ने लुटादी कृष्ण पर सब लाज
हो गई थी अब उदामी, कुवरजी के साथ
भक्ति में लगने लगा मन, हो सघन, दिन रात ।।३।।
राज वैभव काटने उनको लगा ज्यो शूल
शब्द जैसे दश हो, लगने लगे प्रतिकूल
सब सुखो का शयन, कॉटो सा बना था अाज
ग्लानि भर मन मे उ होन, तज दिये मब काज ।।४।।
राजमाता ने कहा-'छोडो इमे हे वीर ।
रूप है पूरा कुलच्छन, वेया, वेपीर
नाचना, गाना सदा, प्रौ' साधुग्रो के बीच
मुस्कुरा कर बान करती है, सदा यह नीच ।।५।।
तीथ है प्रसिधार, गौरव अग्नि-पुड प्रवेश
राजपूती प्रान का, इममे नही लवलेग
भोज का तन पिंध गया था, शब्द शर-मघात
राज-रोगी हो गए घुनने लगे दिन गत ॥६॥

गिर पडे दु ख के अनेको नग विशालाकार
लीलते जाते धरा को, कष्ट-पारावार
शाप पी जाये हजारो, कोटि हो आघात
शब्द-शर की तीव्रता सब से भयकर बात ॥७॥
रूप सव धुलता गया, तन मे लगा था रोग
लवण सा गलने लगा तन का सभी सुख भोग
बे न बोले प्रणयिनी से, कटु कभी भी बोल
जानते थे भक्ति उसका, रत्न है अनमोल ॥६॥
एक दिन सरने सुना, लो हो गया सब शेष
कुवरजी की दिव्य-देही काल-कवलित वेश
ज्योति का अणु चल पडा था अग्नि पथ अज्ञात
मृत्तिका शाश्वत पडी थी, मृत्तिका के साथ ॥९॥
बुझ चुका था दीप, केवल छोडकर अब दाह
साधिवा के आँसुग्रो को मिल न पाई राह
शोक के आवेग का अम्बार भीमाकार
छा गया चित्तौड पर, वह विषम हाहाकार ।।१०।।
राजरानी ने दिए गिन गिन अनेको शाप
खा गया कुल को वधू के पाप का मताप
फूक डालो कर सती, इसको कुवर के साथ
अत हो जाये सभी, कुलटा बह की बात ।।११।।
सती होने की सुनी, जब राजकुल की रीत
गिर पड़ी ऊदा धरा पर, थी नयन में प्रीत
बतायो भाभी बताओ यह कहा का न्याय ।
राजमाता ने किया, कैसा विचित्र उपाय ।।१२।।
बिना मन के सती होना, पाप होता पाप
दौड कर महाराज के, चरणो पड़ी वह आप
हाय दाता! आपके साम्राज्य में अन्याय
राजमाता ने किया है, नैश-नाश उपाय ॥१३॥

? हे पिता । रक्षा परो, अन्याय या यह जान पत रयो दाता सुना यह नति-प्रणति तत्ताल शोफ डूचे महाराणा, अश्रु का उद्वेग चढाफर त्यौरी उठाई, हाथ में फिर तेग ॥१४॥ सिंह से गरजे महाराजा, यन थे लाल ज्वाल सी काया जली, वाणी हुई विकराल तुम वधूशृिगार परके, क्या चलो हो आज जा रही होने सती दाता। हमारी लाज ॥१५ शब्द ऊदा ये सुने, फिर रक्त खोला और अग्नि मे ज्यो घी पडे, वसा उठा था जोर राजमाता जप कर, भागी महल की ओर सूय के प्राधात से ज्या, कट तम की डोर ॥१६॥ उठो बेटी । महाराणा का हुग्रा प्रादेश भाव बिन यो सती होना पाप का परिवेश सखी ललिता और मीरा, अश्रुमय था गात चल पडी प्रासाद मे, ज्यो चरम पर परसात ॥१७॥ राजमाता हो गई थी, क्रुद्ध होकर शात ज्यो भभक कर बुझ चले,लो, मन रहा पाकात फिर उठे धहराय धन, ले युद्ध का आदेश सोकरी सांगा चले, हो वीर-रम-उन्मेष ॥१८॥ वीर बाबर, सिह सांगा, दहकता मग्राम रौद्र हो जूझे सभी, प्रणवीर प्रण के नाम पर न मिल पाई विजय, राणा हुए फिर शेष छा गया मेवाड पर दुख-द्वद्व भारी क्लेश ॥१९॥ वुझ गयो हिन्दुत्व की वह दीप्त-ज्योति महान् कुवर विक्रम को मिला पद, परपरित विधान इस तरह प्रासाद में अवसाद की यह पाग भडकती जाती सुलगती, त्रस्त था अनुराग ॥२०॥ ,

४५
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सभी ग्रह कोपे, पलायित, हो गया कल्याण
राजमाता के प्रतिशोध पूरित प्राण
वीर विक्रम को बुलाकर, मब बताई बात
लग गई चिन्ता उन्हे, भन पर पड़े प्राघात ॥२१॥
कह रहे है आज भी जनसाक्ष्य के उल्लेख
साधिका पर हुए अत्याचार और अनेक
विजयवर्गी एक वनिया, क्रूरता का
रूप
कुटिलता वश हुए उसके, शीघ्र विक्रम भूप ॥२२॥
व्याज पय का, पर गरल से भरा प्याला एक
भृत्य लेकर चला देने, साधिका की टेक
प्रणयिनी तन्मय, प्रभो के गीत का मन्धान
भोग दे गोवि द को, झट कर गई विषपान ॥२३॥
हलाल, अमृत हुआ, प्रभु ने लिया था भोग
साधिका के मिट गए, सब व्याधि-पूरित रोग
शैव-धर्मी वश था, चित्तौड का परिवार
शिव अमर कल्याण के स्वामी सदा अविकार ॥२४॥
विष पचाया प्रीति औं', पाशीप के वरदान
साधिका पर प्रीत थे, शिव ताण्डवी भगवान
नीलकठी हो गई थी, प्रणयिनी की भक्ति
भक्ति विषपायी हुई, द्विगुणित पिया अनुरक्ति ॥२५॥
विष अनेको है, जिन्ह कहते यहाँ दुष्कर्म
मानते है सब उहे, बस मोह, आपद्धर्म
जिन्दगी को शेष करने मे मभी सलग्न
काष्ट-घुन ज्यो खा रहे तन, पर सभी हैं मग्न ॥२६॥
विप बुझे है पात्र सारे, दर्प के रग भीन
रूप सम्मोहन सुधा, सब पी रहे तल्लीन
हो गया कादम्ब भी, अब नीर जैसा पेय
सभ्यता मे घुल गया है, किन्तु कितना हेय ॥२७॥

प्रणयिनी ने पो लिया था, हलाहल साकार राजमाता वीर विक्रम से मिला उपहार पी लिया उसको प्रभा ने, भक्त से ले भोग पा गई वह साध्य से, वरदान एक अमोघ ॥२८॥ मार सकता कौन, हो जिम पर प्रभो का प्यार नाश से निर्माण को मिलता अधिक अधिकार साधिका को भक्ति का वल था अनन्त अपार मुस्करा कर पी गई, उस गरल को सुकुमार ॥२९ पास ललिता दुखी होकर थी खडी चुपचाप मानकर विप-पान को, दुर्दा त भारी शाप प्रणयिनी के चरण कमलो पर गिरी सुधि भूल हो गये ये सांस भी, अब जिन्दगी को शूल ।।३०।। सो गई दोनो वही उस वेदि पर सिर टक, भक्ति ही थी पास मे, वस एक ज्योतित-रेख देखकर जीवित उसे, विक्रम हुए हैरान गरल पीकर सो गई यो, ज्यो क्यिा मधुपा7 ॥३१॥ विफल होता देखकर यह कूट विप का मत्र राजमाता ने सुझाया, दूसरा रात बीती, भोर गूजा, प्राथना का राग राजमाता मे जगी प्रतिशोध की फिर आग ॥३२।। एक डलिया मे सजाकर पुष्प अनगिन रग विप्र पहुंचा लिए पुप्पो मे विषाक्त भुजग कहा ब्राह्मण ने-'पठाये हैं तुम्हें ये फूल चढा अपने हाथ से, विधि को करो अनुकूल' ॥३३॥ प्रीति से मीरा बढी, लेकर प्रभो की पोर हो गए आवेश मे गीले नयन वे कोर दीखता है देवि ! मुझको छद्म इममे जात तुम न छूना टोकरी मे, हो भयानक व्याल ||३४|| पडयन ४७ भक्ति के उद्वेग मे, मोरा उठी तलाल और बोली-'अब मुझे क्या काल है क्या घ्याल देह है गोविंद की अर्पित उहे यह धूल मृत्तिका नश्वर मषी । अभिमान करना भूल' ॥३५।। तब उठी फुफकार डलिया से भयानक एक काल-अहि विकराल निक्ला, रवी प्रभु ने टैक टोकरी में हाथ थे और हाथ मे प्रतिमान कृष्ण का विग्रह बहुत, अनुपम स्वय उपमान ॥३६।। द्वार पर थे वीर विक्रम, राग लेपर हाथ हो गया विश्वाम, इसके सिद्धि कोई साथ इसलिए प्रतिशोध ने ली और करवट एका दान देती गई जीवन भक्ति, लक्ष्मण-रेय ॥३७॥ प्रीति-मग्ना सदा परती थी, प्रभो से वान बन गई यह भाव-लीला, फिर नया आघात सेविका ने वीर विक्रम से वही यह बात रात्रि-शय्या मे न जाने कौन रहता साथ ॥३८}} लाख खोजा पर न पाया, पुरुष का इतिहास पर न पाये वीर विक्रम, वात पर विश्वास बलुप हो जिनके हृदय मे, पुण्य उसे दूर तामसी थी वृनियाँ, विक्रम बने थे शूर ॥३९।। एक दिन हो क्रुद्ध उसने, कुछ बुलाये दूत श्री' कहा-'तुम राजकुल के मित्र वीर सपूत वाघ दोनो को, डुवादी पास मे है ताल नाज कुल की वोरदी, नारी चडी विरगल ॥४०॥ स्वप्न में प्रभु से प्रणयिनी कर रही थी बात कृष्ण का सम्बल, पुलक डूबा हुया था गात क्रूर दोना कक्ष मे कूदे, चले चुपचाप लग गया था अब उन्हे भी, काल का अभिशाप ।।४।। .

४८ , अर्द्ध निशि मे बाँध कर मुंह, चल पडे थे ताल नेश तम फैक कर, दोनो हुए खुशहाल पौ फटी, उठकर चले, विक्रम अजिर की ओर पर भवन के कृष्ण मन्दिर मे उठा अन्दोर ॥४२।। वृद्ध तापस मुस्करा कर, दे रहे वरदान और दोनो प्रिय-प्रणति मे, लीन थी अम्लान पा रही थी थाल पूजा का लिए अभिराम शक्ति मीरा और ललिता, कृष्ण का ले नाम ॥४३॥ हो गए हतदप विनम, सभी पौरुप भूल चतुर्दिक उनको लगे चुभने, शरो से शूल भूल थी पर दभ का, मन पर रहा अधिकार मति हुई कु ठित, पनित होती गई मनुहार ॥४४।। नित्य ही उनको लगा, कोई तपी साकार साधिका को बाटता, पाशीप का अम्बार प्राण मे बढता गया, अभिशप्त हो पाकोश हो रहे थे नित्य नूतन, प्रणयिनी के दोष ॥४५॥ नित्य मोग प्रार्थना के गुनगुनाती बोल प्राण प्रण से कर ममपण, मुक्त अन्तस् खोल चरण बढते जा रहे थे मुक्ति-पथ की ओर साध्य का सम्बन तपस्या, थी अजस्र कठोर ।।४६।। कृष्ण । यह कैसा तुम्हारी भक्ति का सदेश यूर कुठा, यातना कितनी बची है शेप धेय देती थी सखी, ललिता उसे हर वार शेप केवल साथ था गोविन्द वा प्राधार ॥४७॥ हो गए श्री-हीन चिश्म, भक्ति का था शाप कृत्य उनके हो गए मताप भीने पाप ग्राज भो मेवाड को, है याद अत्याचार वीर विनम ने पिए जो माधिरा के द्वार ॥४८|| कृष्ण मेघो मे भरा है तडित का उल्लास अचि मे ज्यो आग है, जीवन्त तन मे सांस पुष्प मे सौरभ, तरगो मे अपार-प्रवाह चरैवेति बनी हुई शैवालिनी को राह ॥४९॥ गीत मे ज्यो शब्द, स्वर, जीवन्त उसका रूप छाँह का बधन लिए, है चिलचिलाती धूप मृत्यु मे अमरत्व का है, पुण्य लीला-लास मोन को अनुरक्त करता एक उज्ज्वल हास १५०।। प्राण के सिर पर हुअा है, प्रीति का अभिषेक तमस के इतिहास मे है ज्योति के उल्लेख ह्रास ने उत्थान का, निर्मित किया आलोक सुन प्रभाती, राति अपना त्यागती निर्मोक ॥५॥ नाश मे निर्माण का है, एक अक्षर-हास प्यास मे डूबा हुआ है, प्रीति का उल्लास गरल ने पीयूष को, गौरव दिया मम्मान विरह ने कुदन किया, तब, राग को पहिचान ॥५२।। प्रस्तरा को ग्रहण करता, फैक कर मणि-मात त्याग रत्नो को उठाता, सीपियो का जाल भस्म को तन पर लगाता, छोड मलयज गध नाम को बदनाम करता, वह सदा मतिमद ॥५३॥ राजमाता प्रेरणा, विक्रम हुए थे तभ और अत्याचार के मोशे गए सब मन पर न हो पाया सफल, पडयत्र का ससार माधिका परती गई, स्वागत बना गलहार ॥५४॥ ये सभी दुष्कृत्य, पहुँची मेडता तक बात दूत आया एक, लेने साधिका को साथ पर न भेजा वीर विक्रम ने, समझ अपमान राजरानी के पटे, सब पुण्य के दिनमान ।।५।।

मौन था चित्तौड गिन-गिन कर सभी दुख क्लेश
लिख रहा गाथा सभी, प्राकान्त के सदेश
और ललिता ने कहा-'जीना यहाँ दुश्वार
स्वामिनी । अब चल पडे, श्राराध्य के ससार' ।।५६।।
प्रणयिनी ने सुनी अतस की यही आवाज
झनझना कर वज उठ थे, भक्ति रति के साज
भाव डूबी, सामने वाबा खडे रदास
लगे कहने-'यही अत्याचार का इतिहास' ||५७।।
चल पडो बेटी | विपिन-वृदा प्रभो की चाह
त्याग कर प्रासाद लो, वराग्य-भीनी राह
कह दिया मैने तुम्हे, प्रभु का यही सदेश
चल पडी मीरा, पिया का त्याग वीर प्रदेश ॥५८)।
छोडकर मेवाड पहुँची, वह पिता के द्वार
मेडता को मिल गया, फिर शक्ति का उपहार
मरुधरा के राव सँग सहमा उना था युद्ध,
त्याग कर ससार, मीरा चल पडी, ज्यो वुद्ध ।।५।।
लग रहा ससार उसको व्याधियो का मूल
नित्य वह प्रभु पर चढाती, वदना के फ्ल
पाच वर्षों बाद होकर विवश औ' निरुपाय
चल पडी वह मेडता से, भक्ति का ले दाय ।।६।।
अव अलकृत था हृदय, पाकर अमर-स यास
प्यास श्रौं' प्रिय रे विरह मे रँग गये विश्वास
भावना मे मुस्कराता कृष्ण का प्रतिमान
चेतना अनुराग के, रचतो कई मधु गान ।।६१॥
वस्त्र थे पापाय, ललिता माथ गातो गीत
'चलो मन गगा जमुन के तीर पर है प्रीत'
भक्ति-तमय प्राण लेकर, माधुग्रो के माय
पल पडी बन्दा-विपिन, यह भक्ति की बारात ||६||

- फूल से सौरभ उडा, अब शेष छूछी गध प्राण तज ज्यो देह वनती, मृतिका का वध मोन केवल शेष था, सब हास अन्तर्धान पुण्य रूठे, पाप का नर्तन हुआ सम्मान ॥६३।। दप प्रेरित-उमियाँ अब फक कर मणि-माल हो गई श्री हीन ज्यो, जय का बचे ककाल राजपथ का चांद था, अव राहु का खग्रास हो गया चित्तौड मे, गृह-युद्ध का अधिवास ।।६४।। - रोन कर वह पुण्य वेला, हो गई सब म्लान उत्सवो के बाद ज्यो, मगीत की स्वर-तान टिमटिमाता दीप थी, अब राजवशी शान चल पडी गृह-दाह की आंधी दुरन्त महान ।।६।। और वृन्दा के विपिन मे पर्व का उत्लास भक्ति की मन्दाकिनी का, ज्योति भीना हास गीत मीरा के हुए, हर अधर के शृङ्गार लाक मानस में रमे, हर कठ के गलहार ॥६६॥ हो गया श्री-हीन अब चित्तौड का रनिवास राजमाता रुग्ण होकर, ले रही निश्वास ग्लानि पारावार डूबे, वीर विक्रमराज कांपकर हिलने लगा, चित्तौड का वह ताज ॥६७।। भक्त के अपमान से उनको हुए सव क्लेश राजमाता को मिला कृत्तान्त का सदेश साधु सेवा, भक्ति के पथ, पर लगी थी रोक कष्ट की फिर लहर व्यापी, दुग भर मे शोक ॥६॥ ध्वस को झझा बढी, विक्रम हुए बदनाम छोड प्रब बैठे, सुरा वश, राज्य के सब काम आधि-व्याधि प्रकोप फैले, राज्य भर में नाश स्वार्थ मय दरबारियो की, छम पूरित पाश ॥६९।। .

५२
भक्ति के अभिशाप से होता गया यह हास
बढ गया दुर्दान्त, हाहाकार का उपहाम
उधर वृन्दा मे खिला था, प्रीति का मधु-मास
प्रणयिनी के गान मे जीवन्त था सन्यास ||७०।।
कथावाचक ने कहा-'बस आज का विश्राम
यही है, आगे पिया को भक्ति है उद्दाम
फफक कर रोया पथिक, सुनकर सभी आघात
वृद्ध वाचक ने धरा, सिर प्राथना का हाथ ॥७१।।

अक्षर-सुहाग
प्रणयिनी को प्राप्त कर, वृन्दा-निपिन परिवेश
भक्ति-भीना हो गया, महमह समस्त प्रदेश
माधना को मधुमती धारा बही उत्ताल
गीत गु जन से हुआ, वह अजिर मालामाल |१||
नित्य होने लगे 'उत्कट, प्रीति-पूजा-रास
भक्त-गण प्रमुदित हुए, पा ज्योति का प्रामास
भूल सुधि तन की सभी, रस पान करते शान्त
साधिका के गीत से मुरित हुमा वह प्रान्त ॥२॥
तिए मीरा प्रोति का सवल उजागर साथ
हो रही क्षण-क्षण वहाँ अनुराग की बरसात
ढल रहे थे प्राशु-वाणी मे, प्रणय के गीत
चादनी के फूल ज्यो, प्रिय को समर्पित प्रीति ॥२॥
हाथ इकतारा लिए गूजे मधुर मजीर
भुग्ध मदाकिनी हुई, लालित्य पूरित नीर
भक्त सब उमत्त थे, सुधि भूलकर दिन रात
मिल गई वृषभानुजा प्रज, ज्यो उपा जलजात (१४॥
अष्ट-प्रहरी साधना, प्रभु की निरतर चाह
भक्ति-पूजन, पाद सेवन राग, कीर्तन राह
कष्ट, अत्याचार से, पीडित रही जो देह,
भाव-बोधो से वही, पावन हुई पा नेह् ।।५।।
धन्य है वह प्रान्त, मीरा-सी जहा हो भक्त
धन्य है वह भक्ति-गा, साधना-अनुरक्त
धन्य है वह देश, जिस पर हो प्रभो अति प्रीत
धन्य है वह देश, जिसमे ध्वनित पूजा-गीत ॥६॥

चन्य वे सब भक्त-गण, विश्वास जिनके पास नाम अचन, प्रोति-कीतन का लिए उल्लास आज अन्तर्धान है, सब भक्ति का विश्वास सुख लुटा विज्ञान करता, भक्ति का उपहास ।।७।। अह से है यन्त्रचालित, जिन्दगी के काम दर्प से उदभ्रान्त हैं, सबके सुबह औ' शाम मन्दिरो मे बढ रहे है, छद्म, हास-विलास अब कहाँ विश्वास-तन्मय, भाव भीने रास ॥८॥ आस्थाएँ गलित होकर, रो रही चुपचाप मोह, सम्मोहन-दलित, सब किया, काय-कलाप और अव भगवान् भी, प्रतिवाद एक प्रतीक धम के टूटे चरण की, शेष केवल लीक ॥९॥ सत्य कोसो दूर है, जीवन्त गय अलीक रूप मे सव मागते है, प्यास-पूरित-भीख सो गया चेतन हमारा, इन्द्रियो की प्यास जागती हर क्षण, इसी से समय करता नाश ॥१०॥ ? कहां है वसा प्रणय औ' भक्ति का वह ज्वार कहाँ है सत्य, शिव प्रौ' नेह का अधिकार ? हो गया है प्यार अब, कुठा भरा उरलास कामना की तीव्र झझा का विमुक्त विलास ।।११।। अब नही मीरा बची, उस प्रीति का आधार इद्रियो की प्यास ही है, प्रेम का अभिसार छद्म, छल के माथ उठता, कामना का ज्वार आज का यह प्यार है, पाश्चात्य का उपहार ।।१।। एक प्रियतम से कदाचित् हो गया मतभेद दूसरा प्रस्तुत हुआ, ज्यो रक्त हो प्रस्वेद पुष्प कृत्रिम टोकती हैं, प्रियतमाएँ प्राज प्रोध उनकी कोष में है, प के प्रदाज ।।१३।।

-
आज का यह प्यार है उस साधना से हीन
शीघ्र होता, शीघ्र रोता, दोन, क्षीण, मलीन
हो रहा विक्रय चतुर्दिक, राज्यक्ष्मी रूप
वासना तन का समपण, मुक्त-मत्र अनूप ।।१४।।
नग्न होता जा रहा है नारियो का वेश
झाकते परिधान से, अभिचार के अवशेप
इगिता पर चल रहा, कादम्ब ही है प्यार
रूप की तह मे पडा मूर्थित सभी शृगार ॥१५॥
वासना का जाल, कैसा प्रेम का आदर्श
प्रीति मे अपण विना क्या प्रेम का उत्कर्ष
आज के विज्ञान युग का शुद्ध अभिनय प्रेम
नाम मौलिक, काम नूनन, प्रेम गर्वित-क्षेम ।।१६।।
प्रणयिनी वा प्रेम क्या था, आस्था साकार
उदधि ज्यो उत्ताल, मेघो की सरस जलधार
और वह भागीरथी सा पुण्य पावन प्रेम
प्राण अपण, साधना थी जिन्दगी का नेम ॥१७॥
रंग गया वृदा-विपिन, अब प्रणयिनी के रग
यम, नियम नौ' ध्यान धारण, हो गए पिय सग
कभी रूठी, कभी हारी सी, सुनाती गीत
मभी आंसू से रही सिंगारती सगीत ॥१८॥
कभी कहती~'सुनो ललिता पिय मिलन के काज
तुम सखी | मुझको सजा दो, जा रही हूँ आज
तीव्र भावावेश में डूबा हुआ था गात
झिलमिलाता दीप-मन, ज्यो विधु सुधा मे स्नात ।।१९।।
पृष्णमय मति, कृष्ण ही पति, कृष्ण ही कल्याण
कृष्ण ही थे प्याम, सुख की सांस, तन के बाण
घुन गया था माध्य मन मे, सलिल रग समान
रंग गया था प्रीति मे तन, पुलक मधुमय दान ॥२०॥

- भक्त चातक, स्वाति-पाशा, प्रीति का विश्वास तन-पपीहा बोल 'पिय पिय' मे मिलन उल्लास मन-भ्रमर नित खोजता था, दिव्य-सौरभ गान विरह सागर मग्न था, वह प्रेम का सधान ॥२१॥ वतिका सी देह, तिलतिल जल रही दिन रात प्रीति प्रभु की, भक्ति नेनो को सजल बरमात गान मुखरित प्रेम के, मन मे मधुर-अनुराग प्राप्ति केवल कामना भर, विप्रलभी आग ।।२२।। प्रेम जीवन वाटिका का, शुन सुन्दर फूल प्रेम है जीवन विटप का एक रसमय मूल प्रेम है परिपूण प्रभु का, एक पूजा-गोत प्रेम है आदश जीवन का, मधुर संगीत ॥२३॥ प्रेम है सन्यस्त जीवन का अकेला धम, प्रेम है समस्त प्राणो के उदय का मम प्रेम है अकुर, जगाता देह मे विश्वास प्रम है, परिपूण है सब, पान, प्रण के सास ॥२४।। प्रेम मे इम सृष्टि के निर्माण का इतिहास प्रेम मे है सत्य, शिव की, ज्योति के अधिवास प्रेम मे है कर्म का, सदेश-पूरित-राग प्रेम मे है दिव्य जीवन के, विरह की आग ॥२५।। प्रेम ने धोये, क्लुप और दप के सोपान प्रेम ने जीव तता का, दिया सब को दान प्रम ने मगल मयी बांटी मभी को शक्ति प्रेम ने दो रूप को, उज्ज्वत, अमित-अनुरक्ति ॥२६॥ प्रेम से तो डगमगाते नग पिशालाकार प्रेम में मुखरित यहाँ, जीवन-मयी-मनुहार प्रेम मै पाला मिनता, दिव्य होती दृष्टि प्रेम में जीयत होती, यह शरीरी यष्टि ॥२७।।

प्रेम है तो, सांस मे आशा अटल विश्वास प्रेम है तो, मुस्कुराते जिन्दगी के हास प्रेम है तो, प्राप्ति का सदेश उसके साथ प्रेम है तो, मृत्यु का बढता न कोई हाथ ॥२८॥ प्रेम मे होता, प्रणव का भूत अक्षर-गान प्रेम मे होता, प्रभो का सृजन कर्म-विधान प्रेम में होता, पथिक की मजिलो का हास प्रेम मे होता, मिलन की कान्ति का अधिवास ।।२९।। प्रेम भावन भाव्य का है, साध्य की मुस्कान प्रेम नन के धर्म का, निर्दोष पूजा-गान प्रेम-वेदी पर खिले है, साधना के फूल प्रेम सरिता ने बसाये, जिदगी के फूल ||३०॥ प्रणयिनी का प्रेम था, ज्यो नारदीया-भक्ति कठ मे अभिव्यक्ति की थी, शारदीया-शक्ति हाथ में वह ज्योति, अपण की लिए थी प्रीत सत्य की थी वह शिखा, औ' भक्ति प्रेरित गीत ॥३१॥ साधना वह थी स्वय, साकार उज्ज्वल पान तीर्थ थी प्रभु के प्रणय को, अनुपमा-उत्तान प्रेम के उस शोष पर सर्वस्व करके दान मुग्ध-बाला सी-नवेली, भक्ति का मधुपान ॥३२॥ भक्ति कैसी साधिका की थी, प्रश्न जैसी पूछ ली थी, उस पथिक ने बात मुग्ध-नयनो से पुजारी ने उठाकर हाथ प्रणयिनी को भक्ति | बोले मधुर-रस-सघात ॥३३॥ प्राण पापो साधना, लेकर चली वह बाल वासना से दूर कोसो, रसमयी उत्ताल नित्य लोला को विक्ल, वह रसमयी थी भक्ति भाव या दाम्पत्य का, गोविद से अनुरक्ति ॥३४॥ बतानो तात बहुत दुर्लभ है, मधुर-रस-साधना लो जान नित्य-लीला, नित्य-नूतन, प्रभु रसेश, महान रुक नहीं सकता निरन्तर, ब्रह्म प्रीति-विहार है परम उज्ज्वल अमल, रागात्म रस शृगार ॥३५।। कृष्ण, राधा, अष्ट सखियाँ, औं' सखा गण साथ, परम आहादक, परम रमणीय, मधु-रस-स्नात 'रसो वै स' रूप का, होता वहाँ अाभास इप्ट गुण से युक्त, रस शृगार का अधिवास ॥३६॥ परम वष्णव-जन इसे, भूमा कहें अभिधान भोग्य यह रस, रूप प्राकृत, औ' अलकृत जान यही भूमा है, सदा अमृत, सदा आनन्द नित्य विग्रह, रूप, छवि, सौन्दय सुख का कद ।।३७।। वेद से सवैद्य है, यह परम-फल सा शुद्ध श्रीश,श्री- गार, मधु-रस सा, सरस अति वुद्ध श्रीश-रस के नाम गुण तो है विभिन अनेक श्री, रमा, लक्ष्मी, प्रिया, राधा नवल अभिपेक |॥३८॥ ये सभी अभिधान हैं, इस अक के विन्यास मिल सभी सधात बनते, नित्य-वदित रास रस-पुरप श्री कृष्ण, यह दाम्पत्य नित्य अखड राधिका-मय, युग्म तन्मय, सत्य शिव ब्रह्म ड ॥३९।। पान करने योग्य है, आन द यह रूपत्व ध्यान करने योग्य है, रति-रूप, यह रस-तत्व भोग्य श्री', भोक्तत्व, दोनो तत्व उनमे जान युग्म मे रसिकत्व और रसत्व या अभिधान ॥४०॥ युगल राधा कृष्ण, सब के एक प्राणाधार सव सखी जा, प्रो' सखाजन के सवल ससार युग्म रूप रसत्य सबको, हो रहा अनुभूत वह परम धास्वाद्य, पाता भाव से अनुस्यूत ।।४१॥ .

कृष्ण भी राधा बिना रहते अपूर्ण रसेश शक्ति रुपा राधिका से, पूर्ण है सर्वेश राधिका अनुराधिनी, आह्लादिका वश-शक्ति युग्म से मिलकर बनी माधुर्य-मडित-भक्ति ॥४२।। कृष्ण यदि वाणी बने, तो राधिका है नौति कृष्ण है यदि बोध तो, राधा पबुद्ध-प्रतीति कृष्ण हैं यदि धर्म, तो राधा क्रिया का रूप अनन्याश्रित है युगल, सयोग, सत्य, अनूप ॥४३॥ प्रेम को है चरम सीमा, गोपियो की प्रीति राधिका है रस-शिरोमणि, मधुर र-रस-सगीत इस युगल मे व्रज-विपिन मे, कीडनीयक रास नित्य-लीला रूप में सम्पन्न करते हास ॥४४॥ लिंग का सव भेद, लीला मे नही है भक्त पुरुष नारी एक हैं, यह भाव कान्तासक्त पुरुष केवल कृष्ण हैं, सखियो सखा सब भक्त नित्य-लीला के प्रणय-माधुय में अनुरक्त ।।४५॥ इन्द्रियो के सव विषय, हो जायें अन्तर्धान एक हो रस भाव, भगवद् प्रीति का आधान मिल तभी सकता उन्ह, आनन्द पूर्णानन्त युग्म-सेवा से सभी, रस रूप पाते कन्त ॥४६।। नित्य यह दाम्पत्य, राधा कृष्ण का सुख-मूल प्रेम-लीला रसिक जन को, लब्ध है अनुकूल कृष्ण, राधा सर्वदा हैं, एक-तन अभिराम हरि-प्रिया की नित्य लीला, भक्त जन सुखधाम ||४७।। राधिका आह्लाद, औ' गोविंद है आनन्द शक्ति, सम्मोहन, शिव का रूप है निर्द्वन्द्व है यही साफेत लोला, यही अमृत-वृष्टि यही है गोपाल प्रभु की, रसमयी ससृष्टि ॥४८॥ -

भोग या सभोग से ऊपर सदा यह भाव
कामज्वर आरान्त मन का, है नही यह चाव
प्रीति से अर्पित करे, मन को सदा अनुरक्त
ध्यान, तन, मन, कृष्ण का, अहरह, वही है भक्त ॥४९।।
मधुर-रस के भक्त, राधा के चरण-अनुराग
और उनकी रूप की झांकी हृदय मे जाग
प्रेम-रस सौन्दर्य औ' लावण्य की यह सृष्टि
केलि प्रिय, माधुर्य राधा, रूप-अमृत वृष्टि ।।५।।
राधिका की भक्ति से, अनुरक्त होते कृष्ण
प्रियतमा का जानकर, प्रिय भक्त होते कृष्ण
परिष्वजन का प्यार, हाथो मै लिए वनमाल
भक्त को ताम्वूल तक, गोविद देते लाल ॥५१॥
भक्त राधा भाव से, अनुरक्त लीला-लास
मलय, कस्तूरी, कमल सी, रसमयी अभिलाष
कृष्ण, ब्रज के कृष्ण भी माधुर्य का आस्वाद
प्राप्त करते राधिका की बन सखी सुधि-नाद ॥५२॥
राधिका के रूप का माधुय, रस की खान
प्रीति चन्द्रानन समर्पित, कृष्ण का सम्मान
माधुरी मय रूप सम्मोहन, सुधा का सार
राधिका पालाद, सुख की प्रीति का अम्वार ॥५३॥
राधिका का हो अनुग्रह तभी सभव भक्ति
साधना-अनुरक्ति से, मिलती पिया को शक्ति
इसलिए माधुर्य का, हर भक्त राधा-रग
भाव लेता है सखी का, राधिका के सग ।।५४॥
वही पाता नित्य, लोला द्वार भक्त प्रवेश
राधिका की प्रीति-किरणो को मिले लवलेश
इसलिए हर भक्त की, पाराध्य राधा शक्ति
परम पावन, प्रेम लीला में वही अनुरक्ति ॥५५॥

पथिक ने पूछा-कहाँ है तात । लीलाधाम प्रणयिनी को भावलीला, क्या रही निष्काम? वृद्ध वाचक ने कहा-'माधुर्य का सद्भाव है गिरा गोतीत, मधुरा-भक्ति-रस के हाव' ।।५६।। कूल वृदा के विपिन से भक्त का हो प्रेम और हो निष्काम मन मे, श्याम-श्यामा-नेम वास हो व्रज मे निरन्तर, ध्यान, कीतन, नाम हो रसिक सत्सग, औ' आराधना ही काम ॥५७।। नयन में झांकी सदा हो श्यामा श्यामा रूप श्रवण से करता रहे, यश-गान मुक्त अनूप भाव कान्ता, मन सदा तल्लीन हो सुख-रास सब जुटाते ही रहे, लीला भवन के लास ।।५।। साधना की दिव्य-पूजा भक्त का ससार श्याम-श्यामा प्रीति-रस के, पूर्ण पारावार प्राड से लीला निरखता, मुग्ध रसिक-सुजान बन भगीरथ, पुण्य सलिला, भक्ति-गगा-स्नान ।।५९।। भाव सहचरि नित्य है, ब्रज नित्य है, प्रानन्द अहनिश हैं नित्य, वृन्दा नित्य हैं, सुख कद नित्य है शृगार, नित्य विहार, सुख का सार नित्य सखियो का सहज-सुख, भाव सुरत-विहार ।।६०॥ सब विविध मासक्तियो का रूप रस-पासक्ति सभी ललितादिक सखी तल्लीन, करती भक्ति ज्यो बंधा शिव जटा, गगा का सशक्त-प्रवाह नेम-पथ त्यो बांधती सखियां सभी उत्साह् ॥६॥ रूप-छवि के डूबती, मानद दृष्टि-सुख, सेवा, समर्पण गूथती गलहार एकटक द्ग, राधिका के पद-कमल निस्सय प्रोति-मद से तृप्त, लीला के प्रफुल्लित अक् ।। पारावार कमल-कोमल, दल पटल, शैय्या रचाकर भक्त श्याम-श्यामा, कुज भीने, रस सरस अनुरक्त गौर श्यामल अक, ऐसे लग रहे सुख-कद स्वण मे मणिनील मानो, सुरत सुख के वृद ॥६३॥ कुज-सेवा, रूप-छवि, प्रियतम-प्रिया के साथ देखने व्याकुल सदा रहते, सखा अवदात निरखने लीला स्वय भी भाग लेने नित्य मेघ-पुप्पो सा बरसता, रूप रस-श्रादित्य ॥६४।। गोप्य है माधुर्य रम ही, सब रमो का सार और रसना मौन है मधु, रस-रहस व्यापार श्याम-राधामय, पुलक, लीला-भवन के द्वार श्याम मय राधा, सदा आनद-रस संचार ।।६।। नृत्य श्यामा-श्याम रत, सखियां बजाती ताल गान करती राधिका, वर-वेणु मधुर-रसाल मेघ बरसाते पिया पर, मुस्करा कर फूल चांदनी बन कर बरसती, नेह भीती धूल ।।६६।। इस तरह वृदा-विपिन, यह नित्य लीला-लास अनवरत शाश्वत अमर, माधुर्य सुख का रास इस प्रणय की याचिका थी, राधिका दिन-रात भक्ति का उन्माद घिरता, मत्र-तन्मय गात ।।६७।। नीद नयनो मे नही लेती, कभी विश्राम जागरण पिय के लिए था, विरह मे सग्राम विप्रलम्भी ताप से थे, शून्य तन के अग सलिल ज्यो था स्वच्छ मन, शापित विदग्ध अनग ॥६८।। प्राण तिल-तिल जल रहे थे, प्रीति का था नेह जल रही थी लौ नयन को, देह एक विदेह लग्न मनसा का उदय ने, प्यास अन्तर्दाह सो गया था काम तन का, जागता उत्साह ।।६९।।

। . रूप कुन्दन ज्यो निखर कर, सो गया चुपचाप गूजता था साधना का दिव्य-मधुरालाप हर निमिष सुनने लगी, वह दूर की आवाज इगितो की टेर बढती, मेघ मे ज्यो गाज ॥७०।। बन्द दृग करती, खडे दिखते वही गोविन्द खोलती, अदृश्य हो जाते कही गोविन्द एक ही आवाज की, ऊष्मा लिए अनुराग प्रणय के उपचार जैसे, थे हृदय के दाग ॥७१।। सब गुलाबी दिव्य-आभा, कामना की गन्ध हास के शृगार थे, मुस्कान मे अब बन्द तप्त अधरो मे भरा, पिय पान रस का सार देह जलती, ज्यो दहकता हो रजत का तार ।।७२।। शोश पर जैसे पडा हो असित कच का भार भाव-रति की मूच्छना, बनती गई अभिसार नयन में हर क्षण मचलते, अश्रु-पूरित ज्वार गिर न पाते, स्तब्ध होते आंख के शृगार ।।७३।। मुस्कराती, भो सहसा, कभी उन्मन, मौन मेघ पट मे तडित जैसा दीखता वह कौन ? अजिर एकाकी खडा था, तरुण एक कदम्ब कुसुम सुरभित, व्याज से, बनकर मलय अवलम्ब ।।७४।। डबडबाते, ताल जैसे, हर निमिप दो नेत्र सजग था सयम अकेला, साधना के क्षेत्र प्रभु घुटते जा रहे थे, धूम्र मे ज्यो साम तन-तपन का रूप-रूपक, हो या प्रतिन्यास ।।७।। प्राण मे व्याकुल विपची सी, ध्वनित थी बीन स्वप्न से देती उलहने, फिर उसी क्षण दोन दीप हाथो ले कभी, पिय पथ बिद्याती नन सोपती सयास के, हाथो सभी सुख चन ।।७।। - ६४ श्वेत-वसना वन, कभी अभिसारती थी देह निरखती हर मेघ को, पिय-रग-व्याज सनेह जागती थी नेत्र तारक मे, विकल-सी रात भोर मे उन्मन-नयन, लखते सजल जलजात ॥७७।। भस्म वह श्रीखन्ड की, तन पर लगाती बाल पर विरह की प्राग का अनुपात था उत्ताल कठ पर आरूढ थी, रुद्राक्ष की वह माल भाल पर टीका विभव का, विरहिणी प्रान्डाल ॥७॥ अथु के प्रतिवध से, होते गए आरक्त नेत्र कोरक मे अमिट थी, साधना आसक्त कह रही हो शान्ति से, 'सन्तप्त मत कर काम माधिका हूँ, मैं नही शिव, काम बस धनश्याम ॥७९।। वाट पाई हूँ तुम्हारी सिद्धियाँ सव काम भीख मे पाया पिया का नाम, केवल नाम देख लोगे माधुरी गोविन्द की वह मूर्ति साथक हो जायगी ओ काम । तेरी पूर्ति ।।८०॥ लोकवेदन का पता कर, विप हलाहल पूत प्रेम ले अदृप्त तन, अब हो गया अवधूत हृदय प्रस्तर खड होकर, हो गया निष्प्राण कामना का वन मे होता कही है त्राण ॥८॥ लाज से वह कामना का, ज्वर, उदासी थाम कर नमन, मागी क्षमा की याचना उद्दाम इस तरह वह सत्य सयम के प्रणय की आग साधिका भरती गई, प्रभु प्रीति मांग-सुहाग ।।२।। भाव डूबो, प्रोति मग्ना, सोहनी ले हाथ बुहारा करती विपिन, व्रज वीथियां दिन रात दोडती अज मदिरो में भक्त गण को देश सिर चढानी रेणु भक्तो को, नयन में टेक ॥३॥ ?

कभी वह हरिदास ज्यो, स्वर में सुनाती बोल कभी निधुवन मे, कभी मधुवन, विरह कल्लोल कभी जाग्रत, स्वप्न-वत्, लगता खडे प्रिय पास फभी प्रिय लगते निठुर, मिथी पडे ज्यो फांस 11८४|| नेत्र व्याकुल थे दरस दिन,निमिप ज्यो हो कल्प प्रीति पिय की निधि कभी,लगती उसे हो स्वल्प कभी वह उमाद मे, गाती बजाती तार कभी शिशु सी फफकती, गाती कभी मल्हार ॥१५॥ सूइयां चुभती अनेको, रोम-रोम उदास कभी कहती-पिय चलो जमुना पुलिन है पास कभी वह जाती बिहारी के अजिर दरवार सीढियो पर नृत्य करती पुलकती हरबार ।।६।। एकटक हो देखती बांकी छटा का रूप किलकती, झुरती, मचलती चचला ज्यो धूप या व्यजन करती, कभी लेकर मलय का धूप कभी नयनो को बनाती, गिरा का प्रतिरूप ॥८७।। कभी सतो सग गाती, झूमती ज्यो गन्ध कभी वह नेतृत्व करके, गूंजती ज्यो छन्द कभी यमुना के पुलिन पर वेणु का सबोध मात्र चरणोदक ग्रहण, कर स्थय से प्रतिशोध ।।८।। कभी ललिता को जगाती-'रास देखो रास प्रो सखी । जागो, जगायो प्रीति का मधुमास प्रीति पथ में नीद कैसी जागरण का नाद नयन के वातायनो में, शून्य का सवाद ?' 1८९॥ कभी पिय से मानकर कहती-'सुनो हे मान निठुर हरि ने आज तक, मानो न मेरी बात भोर सझा हो गया था, मैं खडी चुपचाप द्वार तक खोला नही, कैसा मुझे है शाप ॥९॥ .

? नाथ मोन मे बीते कई युग, ओ जननि 1 दिन रात पूछती हो तुम बताऊँ क्या मिलन कुशलात ले कटारी कठ चीरू करूंगी अपघात शब्द सुन चोखी सखी, ज्यो हुअा उल्का-पात ।।९१|| यह कैसी विकलता अमित अत्याचार स्वामिनी को दो शरण, या शमन या सहार और ललिता भी फफक कर साधिका के, हार, गिर पडी, उन चरण कमलो, पत्र ज्यो पतझार ।।९२।। भर गई छाती पथिक की, सुन कथा की पीर छलकने उनसे लगा, स्नेहाद्रता का नीर वृद्ध वाचक की गिरा मे, हो गया अवरोध भक्ति के इस मोह पर था, ज्ञान का प्रतिवोध ।।९३॥ सुन रही सारी सभा, चुपचाप यह पाय्यान आंसूत्रो से सिक्त आँखे, यह मुधा का दान क्या हुआ आगे, कहो बाबा कथा का सार फिर चला प्राप्यान,भर करुणाद्र स्वर मे प्यार ॥९॥ लग रही थी सामने, मजिल बहुत है शेष गीत मे घुलता गया था, साधिया का वेप भोर होते भक्त जन, अनगिन खडे हो द्वार वोलते 'जय विजयिनी, जय की लिए गुजार ।।९।। ? शब्द अन्तर्नाद केवन शेष बचता झूम मच गई वृन्दा-विपिन मे मधुर-रस की धूम समय का इतिहास, लियता गया यह पाप्या। भक्त अधरो मे समाये, गीत गुजन गान ॥१६॥ मोति यो व्यापी विपिन मे, ज्यो फिरे पवमान प्राण में गहरी क्सक ने, चल रहे दिनमान एक दिन ललिता चली ग्रज की मुनाने वात स्वामिनी । है एवं साधय, ग्रज व विण्यात ।।७।।

६७ . व्याघ्र जैसी | ? - नाम मे डूबे हुए, गौडीय पथ के भक्त जीव-गोस्वामी यहा, प्रभु प्रीति मे आसक्त चलपडी मीरा, सुनाने दद, अपनी बात सूचना भेजी-'दरस को आ गई हूँ तात ॥९८॥ जीव वाले-नारियो का मिलन मुझसे दूर भक्ति-पथ की शत्रु नारी, कहा मीरा ने-'सुनी है आज अनुपम बात नारियो से क्या पलायन कर सकोगे तात ॥९९॥ आज तक तो जानती थी-'पुरुष ब्रज मे एक कृष्ण ही केवल अकेले, ब्रह्म के अभिषेक शेष जितने भक्त है, वे नारियो के रूप भक्त को यह दम्भ कसा, है बडा विद्रूप ॥१०॥ बात सुन यह जीव दौडे, अश्रु सिंचित गात भाव के उन्मेप में, करबद्ध अवनत माथ भक्ति के स्फुलिंग उडे, बोले किया है पाप हीनमति हूँ देवि । मुझको, दो कई अभिशाप ॥१०१।। 'जीव' मीरा का मिलन है, आज ब्रज को याद भक्त अनगिन गा रहे हैं यह सुखद संवाद हो गये आश्वस्त, पाकर मानसिक आघात भक्ति पथ मे भेद, केवल प्रज्ञता की बात ।।१०२।। जुड गया था एक पन्ना, दिव्यता मे पोर साधिका के सिर बंधा, प्रभु प्रीति प्रण का मोर इस तरह ब्रज में अकेली, भक्त वर वह एक कृष्ण का अभिधान, प्रण की बन गया था टेक ।।१०३।। साधिका मे एक दिन भभका विरह का ज्वार लक्ष्य ले पिय का मिलन, करती रही अभिसार भक्ति ज्वाला से तपी, पावन हुई अब देह प्राण मे विश्वास का, वरसा घुमड कर नेह ।।१०४।।

हो गई वह प्रात्मा, जैसा प्रणय का दीप विरह से सन्तप्त घायल, दीप्ति-मुक्ता-सीप रुग्णता ऐसी हुई, औषधि नही उपचार नाम ही गोविन्द का था, पथ्य-पथ-उद्धार ॥१०॥ प्राण का सब दर्द घुलकर बन गया था राग गूजती वागेश्वरी मे, या हृदय की आग और उसके स्वर-शरो ने वेध डाले अग विश्व की सब वेदना, उसको मिली थी सग ।।१०६॥ आज भी सदेश उसके कोटि-कोटि अनत गूजते है दद, स्वर को, ज्यो पुकार ज्वलत व्याप्त कण-कण आज भी वह ज्यो पवन सचार अमर है निष्णात पावन, साधिका का प्यार ।।१०७।। गीत मीरा के, सभी के कठ के शृगार दद मीठा दे गए, ज्यो सघन पारावार निधि हमारी बन गए है, दीप्ति के वे छन्द बन गए है श्रेष्ठतम, आदर्श मन्त्र-अमद ॥१०॥ नयन मे से हर निमिष, प्रभु की मधुर-तस्वीर हो सका है क्या कभी भी, म्लान सरिता-नीर? घायलो सी घूमती, रसना अमिट पिय नाम श्रुतिमधुर वह राग अवशाश्वत,अमर,अभिराम ।।१०९।। प्रेम के अमृत कणो से भोग कर, वह बिन्दु हो गया उत्ताल, रस का मुक्ति पूरित-सिधु प्रेम के उद्वेग को मिलता कहाँ विश्राम ? गति-प्रगति के दाह का, चिर जागरण अविराम ||११०।। जम लेकर एक दिन, वह मेघशिशु-सा प्रेम फैल फर क्ने लगा, सब विश्व-अम्बर-क्षेम साधना चिर जागरण की, कमल कोमल देह प्रणयिनी अब वावरी, होती गई तज गैह ॥११॥ , - - त्याग तो इस भोग से अत्यन्त होता दूर कष्ट अति की धार से, उसमे भरे भरपूर देख रटना पिय मिलन की, सखि हुई वेहाल चीखकर बोली-'न झोको तन, विरह की ज्वाल'॥११२।। साधिका बोली-'पिया की सेज शूलो बीच आँख के अम्लान-रस से, मैं रही हूँ सीच प्रीति की कलिका बनेगी, भक्ति पथ का फूल कर रही तन को पिया के चरण तल की धूल ॥११३॥ एक दिन बिछ जायगी, पिय-पथ पडेगो खेह और मगल-सृष्टि का, बरसा करेगा मेह बीच मे कोई न होगा, द्वैत जैसा मोह फिर न होगा सगिनी। प्रिय प्रीति प्राण-विछोह ।।११४॥ नाथ होगे, प्रात होगे, हाथ हागे कृष्ण रूप ज्यो रसराज, मेरे साथ हागे कृष्ण फिर चलेगी, नित्य-लीला की मधुर-वातास सत्य होगी, प्रीति, या होगी मरण की प्यास ॥११॥ साध्य की शय्या गगन मडल रहे अविराम सेज साधक को धरापर, मिलन का क्या काम और मीरा तोडने, इन दूरियो का मन हो गई, प्रिय नाम के शासन सहज-परतन्त्र ।।११६॥ निरत मीरा प्रेम की इस साधना मे नित्य यही है वह प्रेम, जिसका अलौलिक लालित्य प्राप्त कर उसको न बचती शेप कुछ समृद्धि है यही वह शक्ति, जो देती समपण-सिद्धि ॥११७॥ सुख वही, मिट जाय उसमे, यदि पथिक के प्राण अमरता को दीप्ति-रेखा, सतत करती त्राण प्रेम की यह जलन हो, जीवन अमर-विश्वास प्रेम की ऐसी तपन, अमरत्व का आभास ॥११॥ 7 मुक्ति वन परिचारिका, छाया सदृश है पास लक्ष्य को यह साधना, लाती अलौकिक हास बुद्धि के सनम कुटिलता का वहां क्या मान ? छिन्न करते भेद, प्रिय की साधना के गान ।।११९।। - वाह्य आकषण सभी इम अचना के द्वार नष्ट, खडित और सज्ञाहीन, ह हर बार प्रीति की इस राह पर चलना बहुत दुष्कार्य इसलिए यह पथ सभी का, है नही अभिसाय ।।१२०॥ साधना से सिद्धि मिलने का यही है मन भिन्न रूपो मे बिखरते इस प्रणय के तन साधिका की यह विकलता, मधुर-रस का सार यह हुआ, लौकिक-अलौकिक अमरता अधिकार ॥१२१॥ इस तरह यह प्रेम-प्रेमा भक्ति का आकार हो गया समरस सवल, अमरत्व पथ का द्वार भाव की तन्मय मनस्थिति, पागलो सा हास एक दिन उसको हुआ, प्रिय-दिव्यता का भास ॥१२२।। ज्योति-जीवन ने उठाकर सव्यसाची-हाथ, धर दिया सिर, साधिका का सत्य प्रेम-सनाथ अश्रु-गगा फफक कर, बहने लगी अविराम फिर हुए अदृश्य, उस आलोक सँग धनश्याम ।।१२३।। भाव के माकोश मे उसने सुने कुछ बोल भक्त के वश मे सदा हूँ, भक्ति है अनमोल ओ प्रिये । आनो तुम्हे पाकर हुअा मैं धन्य भक्त का अधिकार शाश्वत, प्रीत ससृति जय ॥१२४।। और देखी साधिका ने, मद वह मुस्कान पान को आभा संजोये, अलौकिक अम्लान उस वरद-कर ने भरा, फिर मांग मे सिन्दूर मेघ-पथ ज्यो विद्रुमो की, वीथि हो भरपूर ।।११।।

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गिर पडी भू पर, न सज्ञा शेष थी अब पास
प्रिय-परस प्रभु ने दिया, फिर लौट पाये सांस
धन्य थी पाकर, पिया के हाथ से अनुराग
सार्थक था जन्म जीवन, धन्य उसका भाग ॥१२६।।
बात विद्युत् सी, चढी यज कुज के सोपान
प्रणयिनी को मिल गई, प्रभु दरस की मुस्कान
धन्य था प्रज, साधिका पी, भक्ति पाकर धन्य
भक्ति-रस माधुर्य-मय था, वह अमर-पजन्य ।।१२७।।
पुलक-मय श्रोता सभी सुनकर मधुर-पाख्यान
वृद्ध वाचक ने कहा-'थी भक्त भमतावान
मिल गया था अब उसे, प्रभु दरस का अनुराग
देह में अब बस गया था, दिव्य अमर-सुहाग' ॥१२८।।
प्राण मधु-रस का मिला, श्रोता सभी थे प्रीत
गूजते थे अब अजिर मे भक्ति के सगीत
वृद्ध बोले-'अब बचा है शेष कुछ प्राय्यान
प्रणयिनी की द्वारिका की भक्ति का मधु गान' ||१२९।।
कल सुनाऊंगा, उसी लय प्रीति का, मधु-गीत
शेष
अन्तर्लीनता का, गान-मत्र-पुनीत
नमन कर श्रोता चले, अब शेष था एकात
भूक इकतारा पडा था, तार उसके शान्त ॥१३०।।

षष्ठ तरङ्ग
पूर्ण-तरूप
जुड गई थी फिर अजिर मे, रसिक जन की भीड
वृद्ध-वाचक ने बनाया, भक्ति तमय नीड
थे सभी श्रोता सजग बोले-~-'बताओ तात
शेष अन्तिम सग के आख्यान की सब बात ॥१॥
फूल ज्यो झरते गये वाचक गिरा से बोल
प्रणयिनी के दीप्ति-पथ की यह कथा अनमोल
विपिन-वृन्दा में खिले, जो साधना के फूल
फल सभी बनते गये उस रवि तनूजा-कूल ॥२॥
भक्त-गण लाखो दरस को, उमडते थे नित्य
साधिका पर मेध जैसे, घुमडते थे नित्य
मानते थे सब उसे, प्रभु का अलौकिक-दान
गूंजते थे अब चतुर्दिक, प्रणयिनी के मान ॥३॥
दरस पाकर धन्य थे सब, वावरी ज्यो बाल
नाचती थी झूमकर, गाती सुयश गोपाल
हाथ मे थामे विरह की यह अखण्डित्त डोर
दृष्टि वाणी हो गई थी, सांझ हो या भोर ॥४॥
नृत्य, कीर्तन और पूजा प्रीति-गोत-प्रसाद
भक्त जन को भीड ब्रज को आज भी है याद
वीतते थे इस तरह दिन रात, प्रभु के साथ
लग्न तन्मय, भक्त सब, झुरकर नवाते माथ ॥५॥
प्रीति-वेला, प्राण सहचर, कृष्ण पूण रसेश
साधिका श-काय, अपित साधना सर्वेश
नाम रसना पर सतत, गोविंद औ' घनश्याम
पुलक-मय था गात, प्रभु की प्रीति थी निप्याम ॥६॥

७३ उधर सब चित्तौड मे बनवीर से भयभीत, वीर विक्रम का हुअा वध, छद्म-पूरित जोत युद्ध की उस आग के गृह-दाह मे जीवन्त त्याग पन्ना का, अमर विप्यात, मृत्यु-वसन्त ॥७॥ युद्ध ने इस देश का इतिहाम डाला वेध अमर है गृह-दाह के लेखन, विवश निर्वेद युद्ध ऐसी आग, अत्याचार भीपण-क्रूर भस्म करती प्रीति को, ममता हृदय से दूर ।।८।। युद्ध के पन्ने समेटे, रक्तमय प्रतिशोध शेष होता युद्ध से, सब प्राणमय प्रतिबोध युद्ध की प्रांधी भयानक, उजड जाते नीड युद्ध हाहाकार स्वर मे, खीचता है मोड ।।९।। युद्ध के भय पास हैं, चित्तोड को सब याद युद्ध के शृङ्गार ने, सब कर दिया बर्वाद खण्डहरो मे शेप बचते, युद्ध मे प्रासाद युद्ध से होता यहा, रणशूर को उन्माद ।।१०।। युद्ध का अनुताप भीषण, युद्ध का सन्देश युद्ध के शोले, दहकते आग के उन्मेष युद्ध मे सब भस्म, ममता-मोह औ' अनुराग छोड जाता है हृदय पर मम-भेदी दाग ॥११॥ सुद्ध में है रोद्रता का दर्प-पूरित दाह युद्ध मे ग्रामोश, पोडा, कष्टदायक माह युद्ध ने समस्त कर डाली, हृदय की शान्ति युद्ध से है दूर कोसो, प्राणमय-विश्राति ॥१२॥ युद्ध मे पिसते हजारो के सपन-सधान, युद्ध दुश्मन शान्ति का है, दप की मुस्कान युद्ध मे मिटते हजारो जन, निरीह-निकाय युद्ध से घर टूट जाते, नैश-नाश-उपाय ॥१३॥ . -- युद्ध ने अब तक पचाये हैं, कई रणवीर युद्ध ने अनगिन मिटाये, धोर, गुण-गम्भीर युद्ध ने समस्त कर डाली हमारी शाति युद्ध ने सव ध्वस कर डाली, हमारी काति ॥१४॥ युद्ध के प्रागार मे, कालुष्य फा विस्तार गुद्ध में अभिसार में है, रमन का शभिचार युद्ध में प्रासार विवृत है, बड़े विपराल युद्ध पारावार मे, जोवित भयपर व्यार ।।१५।। युद्ध से विप फैलता है, राज्यक्ष्मी-रोग युद्ध केवल वाटता, शोलो भरे सयोग युद्ध की वेदी, सदा बलिदान से है लाल युद्ध मे हविष्यान्न होते, वृद्ध वनिता बाल ।।१६।। युद्ध था, बस राजवशी शान का अभिधान युद्ध ने भोगे अनेको, राजसी अभियान युद्ध की छाया भयानक, प्राज भी तैयार युद्ध से पानात सारे, विश्व या बाजार ।।१७।। युद्ध से सर तोलते है, शक्तियो को सिद्धि युद्ध मे दिन रात, होती जा रही अभिवृद्धि युद्ध के बाजार, सारे विश्व मे है गम युद्ध बनता जा रहा है राष्ट्र जीवन-धम ॥१८॥ युद्ध ने पोछे, हमारी मांग के सि दूर युद्ध ने छीने, हमारे पुत्र, प्रण के शूर युद्ध के दामन भरे है, दद हाहाकार युद्ध ने वाटे भयानक, नाश के उपहार ।।१९।। युद्ध मे अधिकार-लिप्सा, की भरी है पाग युद्ध मे सहार के करमप, भरे हैं दाग युद्ध करता है, हमारी शान्ति का उपहास युद्ध-अजगर मे सजग है, दूरता की प्यास ॥२०॥ - गजवती ह्राम युग हिमा TI, नयारह यस्मिार पुद्र पगुमा बदना पर हार युट्ठ मान पता नहीं है, युटु दराव पान युद्ध म जीवित मदा, हिमामया विप ज्या ।।२१।। मुा सी थी माविया, पित्तोर मा इतिहास युद्ध पा तन-प्रपतन प्रायना परती सदा, परपद हा नत माय गान्ति दो ह प्रभु ममी , . जगा नाथ ॥२२॥ गरण दाह प्रभु । मभी वा नातिका दा जय युद्र से हो दूर, जीवन हो यहा निम्सा प्रीति मानव धम का दा, मह, ममता, गान युद्ध पर छाय तुम्हार नाम की मुस्कान ।।२३।। अन 'उदय चितौट TITT ममरी शूर, या प्रशमित, गान के वन से भरे भरपूर दूत भेज माधिका व पाम, गनगिन बार पर प्रणयिनी को न था, प्रामाद मे अव प्यार ।।२।। मडता मी युद्ध घर म हा गया ागरात रा रहा महार से, वह गाति पूरित-प्रात राय वीरम ने संभाला, तत्र, शामन मन अाज तर गृह दाह मे जो, ये दुपी परतत्र ॥२५॥ माधिका का पाथना, परन गए युद्ध राव पर प्रणयिनी को न माया, राजसी यह भाव लौट आये, राम वीरम ले उदामी साथ फिर उठी चित्तौट जाने की, वहा पर बात ।।२६॥ हो गई चितित, प्रणयिनी सुन उदय आदेश अव न था, चित्तौड में, उम भक्त का उमेष रामि मे विनिमय हुआ, ललिता खडी थी पास चल पड़े वादा विपिन मे द्वारिका अधिवास ।।२७।। .

कर बिहारी को नमन, द्वारावती की राह चल पडी वे भक्त दोनो, छोड ग्रज को चाह गगन-चुम्बी मन्दिरी से, था सुसज्जित शात लोल लहरो से निमज्जित द्वारिका का प्रात ॥२८॥ रो रहा वृन्दा-विपिन, खो साधिका अनुरक्त साघुजन स्नेही मभी थे, प्रणयिनी के भक्त नित्य फूलो से बनाती थी, पिया का ताज़ और कहती-'सुनो मैंने पिय मिलन-पावास ।।२९।। चल चुका है सपि प्रभो का रथ, मिलन अभिप्रेत अब न होगा प्राण । तन मन से न कोई द्वैत गूजते द्वारावती के अजिर चारो पोर गीत मीरा के मधुर, दिन-रात, सध्या, भोर ॥३०॥ भक्त-गण, सैलाब से उमडे, समन्दर तोर भक्ति के माधुय से, सागर वना मधु-नीर द्वारिका के मन्दिरो के, स्वण-कलश-वितान साधिका की प्राथना से, पुण्य पूरित गान ॥३१॥ भक्त गण उमत्त हो, जय बोलते रणछोड भक्त औ' भगवान मे, अव लग गई थी होड मन्दिरो मे था चतुर्दिक, गीत का ध्वनि-धम प्राण-प्रण से हो रहा, प्रभु साधना का कम ॥३२॥ साधु भी ब्रज से चले, द्वारावती के धाम राजसी थे ठाठ प्रभु के, कोटि-कोटि प्रणाम कर्म-योगी कृष्ण का, लगता यही दरबार राजवैभव थे सभी, धय धान्य से साकार ॥३३॥ प्राप से झरझर गिरे, प्रिय प्रीति-अधु अपार भक्त गण जय बोलते, सुन करुण, कान्त पुकार रो रही ललिता प्रभो की, प्रणयिनी को देख हेम की थाली लगी हो, लोह की ज्यो मेष ॥३०॥ , - और फिर देखा सभी ने, साधिका का वेश दूध से धोये हुए परिधान, प्रीति विशेष अगर, चदन, धूप, पूजा-भाव के अम्बार गीत का उन्माद छाया, रग का शृगार ॥३५॥ 'जय-प्रणयिनी' जय विजय के, नाद गूजे द्वार अब अजिर रणछोड प्रभु का, भक्ति पारावार वीन सी लहरें वजाती, ज्वार का ज्यो दौर पुण्य का निर्माल्य अपित, भक्ति का सिरमौर ॥३६।। आ गई आनन्द की, वृन्दा-विपिन से सृष्टि हो रही थी स्वस्ति की, अब द्वारिका मे वृष्टि इस तरह कुछ वर्ष बीते, तीर्थ के उस धाम भक्ति-तन्मय प्रणयिनी, रसना सतत घनश्याम ।।३७।। एक दिन थे नृत्य कीर्तन में, सभी बेहाल साधिका प्रभु दरस को, मन्दिर चली प्रतिपाल सामने देखा, नहीं विग्रह, स्वय भगवान बाह फैलाये खडे, ले प्रीति की मुस्कान ।।३।। यावरी सी दौडकर, चरणो गिरी वह बाल प्रीति से प्रभु ने उठाया, भक्त मालामाल कण्ठ थे अवरुद्ध, नयनो, प्रथु-पारावार ले चलो दासी चरण मे, प्राण प्रिय ! साकार ।।३९।। ज्योति की मुस्कान का, तूफान आया एक भक्त को रख ली प्रभो ने, भावभीनी टेक फिर हुई वह देह, अतर्लीन, स्प विदेह कोटि भगल-मेघ थे, पीयूप बरसा मेह ।।४।। भक्त गण हैरान थे, देखा न लौटी देह साधिका प्रमु-प्रीति-विग्रह, अङ्ग-अङ्ग-सनेह धन्य थे, सब देखकर, रणछोड प्रभु का रूप देह तज, ललिता गिरी, झझा लता ज्यो धूप ।।४।। - ७८ ज्योति अन्तीन मीरा, कृष्ण अन्तर्धान सिसकता था सामने, चित्तौड का अभिमान सामने रणछोड का विग्रह बचा था मात्र हो गया अदृश्य, मीरा के प्रणय का गान ।।२।। फूल केवल शेप ये, अव था न कोई प्रश्न ज्योति-लीला, ज्योति-रथ, पारद प्रिय थे कृष्ण भक्त गण सब चकित होकर, कर रहे यश-गान साधिका की देह का, पाया न कुछ सन्धान ॥४३॥ शप बाहर था लटकता, खण्ड चीवर मात्र साधिका का बस यही, परिचय बचा था पात्र राव राणा चल पडे, नैराश्य लेकर हाथ झुक गया प्रभु के अजिर मे, स्वय उनका माथ ॥४४॥ भक्त गण ले देह ललिता की, चले हो शान्त यष्टि से फूटी मलय की गध, फैली प्रान्त साधुग्रो को मण्डली गूजी, विजय-जय बोल प्रणयिनी की भक्ति के, जयकार गीत अमोल ।।४।। वृद्ध स्तोता वर पुजारी ने कहा, इति गीत कृष्ण । माधव । प्रो मुरारी दिव्य प्रणयिनी प्रीत कर नमन, करबद्ध मन था, तन उदासी थाम अश्रु-पूरित नेत्र, रसना पर प्रभो का नाम ॥४६।। अणु-सजग जीवन सदा है, मृत्यु केवल व्याज देह धर्मों से न बँधता, आत्म रूप समाज कह 'त्वदीय वस्तु' जो, करते समपण प्राण प्रणयिनी-सा प्यार दे, गोविंद करते प्राण ॥४७॥ भक्ति से तन मन समपण, साध्य को है इप्ट एक सम्बल श्रेष्ठ है, जिसका स्वरूप विशिष्ट भक्ति ही वह सिद्धि, जो लाती प्रभो को घेर लोक-वैभव, इद्रिया की प्यास, श्रम का फेर ।।४।।

- , ७९ एक सम्बल, एक मन से प्रीति और प्रतीति नष्ट करती है वहीं, सब ईति जग की भीति प्रणय प्रभु का सत्य है, बस शेप सब निस्सार है वही शिव और सुन्दर साधना साकार ॥४९॥ यो प्रणय की साधिके । तुम धन्य वन्य विराट धन्य राजस्थान की, तुम भक्ति-यश-सम्राट श्रो प्रणय की दीप्ति रखा साधिका निष्काम साधना की दीपिया है, धन्य प्रणयिनी नाम ।।५।। पूत सीता-सी, प्रणय मे राधिका का रूप शक्ति गीता-सी, करुण भवभूति सृजन अनूप प्रार्थना-सी दीन, तुम हो भारती का गीत पतित पावन जाह्नवी सी, निष्कलुप चिर-प्रीत ।।१।। सात्विको निर्वेद-सी, वाणी मधुरता दान अडिग सयम-सी, विजय मुस्कान हो अम्लान वेणु-सी मुखरित गिरा, गम्भीर सागर शान्त गील शकर की उमा सा, भाव मन के कान्त ॥५२।। दिव्य लीला सी, सरस ज्यो, सलिल मुक्त-प्रवाह सुदृढ लक्ष्मण-रेख सी, तुम मजिलो को राह प्रान-सा निश्चय लिए थी, जलधि-सी गभीर भक्ति से भी पूत, ज्यो भागीरथी का नीर ।।५३।। पात्मजा नगराज सो, प्रभु भक्ति रूप-निधान प्रीति नूतन, नित्य ऊषा सी, सरल छविमान पुण्य थी तुम वेदवाणी सी, सहज उद्बुद प्रभु प्रणय का लक्ष्य पाकर, यज्ञ जैसी शुद्ध ॥५४।। तीय-सी कल्याणकारी, साधना की सिद्धि कौमुदी सी स्वच्छ-वमना, भक्त जन की सिद्धि प्रीति जन जन की, मधुर संगीत जमी कात गोत सी वोमन, अमल औ' भक्ति जसी शान्त ।।५।। - ८० ओ स्थित-प्रज्ञा । तुम्हारा मन्त्र जग कल्याण युग-युगो करता रहेगा, लोक जन का वाण योगिनी तुम दिव्य पथ की, प्रणय का प्रतिमान दीप लौ तिल तिल जले ज्यो, त्याग का सधान ॥५६॥ तुम अखडित आत्मा हो, धन्यम ममतावान धन्य तुमको प्राप्त कर, यह राज राजस्थान प्रेम और वैराग्य का, हो समरसी-पालोक तुम जहां जन्मी सदा, वह धन्य मां की कोख ॥५॥ नत तुम्हारी स्मृतियो मे हैं हमारे माथ प्रणय-पथ चिर सगिनी पावन तुम्हारा साथ चीर कर गहरे तमस को जीत लाई प्रात बांट कर अमृत गिग से, दिव्य पुण्य-प्रभात ।।५।। आज तक भीगे, तुम्हारी प्राथना से प्राण शिखा थी तुम दिव्य, प्रणयिनी नाम से कल्याण दद जो तुमने जिये, वैसे जियेगा कौन? इसलिए, इतिहास तुम पर हो गया है मौन ।।५९।। स्वप्न जैसा लक्ष्य तुमने, कर दिया था सत्य शुभ समपण था, तुम्हारी साधना का कृत्य कल्प कल्पो तक अमर, यह मधुर-ग्स की कान्ति प्रणयिनी प्रभु नाम की, लौकिक, अलौकिक-शान्ति ।।६।।

सप्तम तरस
दीप्ति-दान
-
प्रो प्रणय को दीप्ति-लौ' तुम दो हमे वह शक्ति
रख सकें थाती तुम्हारी, साधना अनुरक्ति
कल्पतरु सी तुम रहोगी, कठ की गल-हार
भक्ति-धन की कामदा औ' सिद्धि यश-अवतार ॥१॥
दो हमे पाशीप, जिससे हो अमगल दूर
युद्ध की छाया हटे, टूटें सपन सब क्रूर
क्लेश पोडा और ईर्ष्या, शेप हो निरुपाय
दप, हिंसा, वासना के नग्न-नृत्य उपाय ॥२॥
राष्ट्र सारे सौम्य हो, अधिकार लिप्सा शेप
दीनता के शाप टूटे, हो प्रगति उमेष
अह से आक्रान्त जो है, दो उन्हे सद्बुद्धि
मन्त्र दे जन धम का, कर दो सभी की शुद्धि ॥३॥
युद्ध के बादल छटे, हो शान्ति मगल -वृष्टि
राष्ट्र सारे प्रणति ममता की, लिए हो सृष्टि
मा ' तुम्ह गोविन्द से कुछ मांगना है शेप
आज पार्यावर्त पर, मॅडरा रहे है क्लेश ॥४॥
भक्ति की क्या बात, लिप्सा का छिडा है युद्ध
शान्ति के प्रादर्श का है, नाम केवल बुद्ध
चीखता इस शान्ति में है, एक हाहाकार
प्रेम केवल वासना का, रूप, रस, अभिसार ।।५।।
सभ्यता ऐसी बढी, पापानका का ज़ोर
कूट-मन का हो गया, ईमान कोरा गोर
मदिरो में भक्ति का है, सिर्फ अभिनय शेप
दृव्य वाले जन यहाँ हैं श्रेष्ठ भक्त-रसेश ॥६॥

८२ वासना उद्दाम केवल, प्रेम हे व्यापार नित्य नूतन-रग मे डूबे हुए अभिसार छम, धोखा और कटुता, सभ्यता का नाम पारदर्शी वस्त्र, जसे कृत्य, कलुपित काम ।।७।। भूख, रोटी, दीनता की हाय के अभिशाप छा गए हैं देश पर, अनगिन हमारे पाप आज तीनो ताप, तन को खा रहे हैं नित्य कष्ट, अत्याचार बन कर, आ रहे हैं नित्य ।।८।। शस्य श्यामल भूमि, उसमे अब नहीं है अन्न, हा रहे प्रतिवप जन जन, भूख-मरणासन चुभ रहे अतिवृष्टि के, सदेश शर विकराल सालते हर वर्ष तन को, क्रूर व्याघ्र-अकाल ।।९॥ यादमी को प्रादमी, बस नोचता है नित्य तप्त अणु विस्फोट जग मे, ग्रीष्म ज्यो आदित्य स्वाथ-पशु को मिल गया, सहार का आनन्द शान्ति का आदश, लगता कटघरे मे बन्द ।।१०।। वोल मां । क्या था तुम्हारा देश ऐसा देश ? हम कहा ढूढे तुम्हे, किम भक्ति के परिवेश? है वही वृन्दा-विपिन, यमुना पुलिन है पास तुम कहा मैं पूछता, बन गीत, गति, आभास आज की अणु-सभ्यता के, नश-नाश उपाय विश्व मे सहार की आंधी, सभी निस्पाय दौड शस्त्रो की, तना उनका कुटिल है जाल जल रही विद्वेष को, मन मे भयकर ज्वाल ॥१२॥ सृजन धर्मी लिख रहे है, नग्नता के गीत बन रही पादश अव, विवस्त्रता को प्रोत अब नहीं जीवत, तुलसीदास जसे पूत अब नहीं हैं राम, श्री हनुमान जैसे दूत ॥१३॥ , ? ॥११॥ है . कहाँ है रघुवंश, सागर-सूर ? जैमी दृष्टि कहाँ 'उत्तरराम' जैसी, करुण मगल वृष्टि ? हैं कहां सब, प्रीति के वे मेघदूती गान? रह गई साहित्य की मजिल ग्रह का दान ।।१४।। 'पावती' के बाद चमका 'एकलव्य' महान उर्वशी के पारदर्शी, हैं सभी परिधान झांकती वाणाम्बरी, अतिवाद का प्रतिबन्ध शब्द-यश लोकायतन को, काव्य-रजनीगन्ध ॥१५॥ हम करे आग्रह-दुराग्रह, सभ्यता के नाम चल रही है लेखनी, अतिवादिता है धाम हाथ मैं स्मिति ध्वज उठा, चलता मनोविज्ञान बोलता हर एक पना, दर्द, कुण्ठा सान ॥१६॥ सब पुरानन व्यथ है, जिसके चरण है छन्द सान-नूतनता चढी, बौने पुराने बन्ध इस तरह जो आ रहा, वह शुद्ध है अतिवाद अब नही सामान्य-जन का, आशिक सवाद ||१७॥ वर्ग कुण्ठा, हीनता, आक्रोश का साहित्य वासना, विकृत-जवानी, जोश का साहित्य भावना है शून्य केवल, बुद्धि का आदेश चल रहा है सृजन बहुरूपी, बदल कर भेष ॥१८॥ राह दो हे मा। इन्हे, गोविन्द की आशीष प्रीति सच्ची, कार्य में ईमान, धन-वारीश राजनैतिक छद्म-कृत्यो, का विछा है जाल राष्ट्र का सेवक वही, जो दृव्य मालामाल ।।१९।। धर्म तो निरपेक्ष, पर सापेक्ष हैं सब काम शुभ्रता की बांह थामे, चल रहे उद्दाम डाल ले मुस्कान, चलता राजनैतिक-सत हाय मे जन-भक्ति की, ज्योनित मशाल दुरल ।।२०।। , - - ८४ कृष्ण | तेरे देश, भारत का यही है हाल वस्त पार्यावतं के सव वद, वनिता, वाल सो रहे हैं नयन मूदे, जागने के बाद पा रहा जीवन, बनावट से भरी हर दाद ॥२१॥ नारियो वी क्या कहे, कंधा मिलाकर साथ चल रही अधिकार सुख का, पन लेकर हाथ कार्य मे नूतन, बने परिधान सारी सिद्धि प्रय और अनथ दोनो, मत्र देते रिद्धि ।।२२।। लाज-बधन, मोह तज, करती नये अभिसार प्रीति-सज्ञा-साधना का, अाधुनिक प्राकार मन्दिरो के नाम अब, वदले हुए है अम्व । पात्र है प्राचीन, नृतन सभ्यता कादम्य ।।२३।। अाज की शिक्षा लुटाती जा रही है रंग, प्रय विदेशी बादलो की, तपिश पाकर सग इन सभी से झाँक्ता है, एक हाहाकार स्प, कृत्रिम-जिन्दगी का, हो रहा है भार ।।२४।। क्म के खाली पड़े है, नीति नैतिक-पान बच गया प्रातिथ्य का, प्राकार छूछा मात्र कुछ लुटेरो की लगी, इस भूमि पर है पाख दभ, छद्म, असत्य से, कुछ मूल्य लेते पाक ।।२५।। विश्व के “यायालयो मे, मांगते है न्याय देश के उम स्वग का, जिस पर हमारा दाय कुछ विदेशी, दप-रोगी, कर रहे अन्याय युद्ध के पोपक लुटेरे, नाश, हिंसा, हाय ॥२६॥ हम-पाखी देश के सब नोच डाले पख बज रहे है, अब विदेशी-सभ्यता के शख वही भारत भूमि, जिस पर बुद्ध, माधव, राम खेनते जमुना पुलिन पर, गोपियो के श्याम ।।२७।।

1
ज़िन्दगी का या-चालित, रूप केवल शेप
देखना है तो उठानो, नेत्र हे सर्वेश ।
कामना, ऐश्वय मे खुलकर लगी है होड
लग गए है रेशमी-पट मे, अनेको जोड ॥२८॥
प्रेम के उद्दाम ज्वर से, हर युवक आक्रान्त
शत-जीवी से रहित है, देश का हर प्रान्त
वासना के स्प-रूपक, भिन्न-भिन्न अनन्त
देह-यष्टि, वितृष्ण-सुख, विप-ज्वार रूप-दुरत ॥२९।।
इन्द्रियो की प्यास, अपने चरम पर गोपाल ।
मांग, वभव, रूप का, कृत्रिम तना है जाल
हर कला के प्रेत, अब, मंडरा रहे दिन रात
नोचते है देह से ममता, सुरुचि की बात ॥३०॥
मां प्रणयिनी 1 है तुम्हारे देश का यह हाल
तुम बता देना, यही है दुनिवार अकाल
फिर कभी सभव उन्हे, पा जायें सवकी याद
हो कदाचित् देश फिर, गोविन्द से आवाद ।।३१।।
भक्ति दो महिमामयी, पाराधिके । बस भक्ति
जिन्दगी से जूझने की, शक्ति दो, बस शक्ति
हाथ मे तिनका लिए है, सामने उत्ताल
कम सागर, पार कर, जाना हमें तत्काल ॥३२॥
जिन्दगी अतिवाद से, कर मुक्त हे गोपात्र ।
वर्म की शैवालिनी को, दो प्रवाह-विशाल
झरणता हो दूर, बल का सिद्धि-पारावार
देश की संस्कृति जिये, जीवन्त यह साकार ॥३३॥
छद्म के मब जाल टूटें, पुण्य, समता गान
दूर कर विभ्रम, बढायो शक्ति का प्राधान
नारियां दो प्रणयिनो सी, साध्य-पथ बलिदान
फिर न हो वह म्वाथ, ईर्ष्या से भरा विष पान ॥३४॥

देश को दो सिद्धि से, सम्पन्न ऐसे शूर युद्ध नर-सहार से, रक्षा करें भरपूर भक्ति का अवलम्ब, अमृत-दान कर दो कृष्णा न साधना, विश्वास, ममतावान पर दो कृष्ण ॥३शा पार्थ दो ऐसे कि जिनके सव्यसाची-हाथ मान की रक्षा करें, जन धम लेकर साथ फिर वजा दो वेणु, जो जन-जन करें कल्याण शान्ति का उद्घोप फूको, मानवी परिमाण ॥३६।। हर कदम पर्तव्य का हो, बस गिरा मे सत्य जिदगी समरस बने, कर मित्रता के कृत्य कर रहे अपित तुम्हे, यह प्रार्थना गोविन्द । लो नमन कोटीश, यह पाराधना गोविन्द । ॥३७॥ कर दिया विधाम, कह पास्यान का इति-गीत मन्त्र सुन उद्बोध, तुलसी-दल, अजिर मे प्रीत चल पडा, बोला पथिक 'सकल्प जीवन-कर्म माँ । तुम्हारी साधना का मम कर्मठ धर्म ।।३८।। जा रहा हूँ, कर्म, ममता, शाति का ले ज्वार ले अटल विश्वास, सेवा, प्रीति का साकार हर प्रजिर की देहरी, उसकी प्रतीक्षा नित्य कर्म का प्रतिबोध करता, ज्योति ज्यो आदित्य ॥३९॥ प्रान्त था निस्पन्द, मन्दिर जागता था नित्य बिखरता प्रतिदिन वहाँ, प्रभु-प्रीति का लालित्य भक्त गण पाते वहाँ, पारस-परस शृगार बिदु की थी साधना, अब सिधु का प्राकार ॥४०॥ आज भी चित्तौड के उस दुग पर साकार प्रणयिनी की प्रीति-ममता के खुले ह द्वार कीर्ति का वह स्तभ, गौरव की लिए मुस्कान प्रणयिनी की साधना से अमर राजस्थान ॥४१।। 00 .

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Divya Pranay Ki Deepshika

Author
Dr. Harish
Title
Divya Pranay Ki Deepshika
File name
Divya Pranay Ki Deepshika
Text
OCR done
Citation
1960
Published
2011/03
Publisher
Krishna Brothers Mahatma Gandhi Road Ajmer
Language
Sanskrit
Pages
102
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Poetry
DLI number
551168
Barcode
4990010031936.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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