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Pashu Rog Aur Upchar
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पशु-रोग और उपचार
(गाय-भस तथा घोडे आदि अनेक पशुओ के रोग,
नक्षण तथा उपचार आदि तथा औपधिया दी गई हैं)
लेखक-सका
चौ० लोदी
तथा
मा श्री वीर सिंह, प्रसा
B.
प्रकाशक
मधुर-प्रकाशन
२८०४, गली आयसमाज, बाजार सीताराम,
दिल्ली-११०००६
जनवरी १९६०
प्रथम सस्करण
प्रकाशक- राजपाल सिंह शास्त्री अध्यक्ष, मधुर प्रकाशन आर्यसमाज मन्दिर, बाजार सीताराम, दिल्ली ११०००६ फान २६८२३१ ५१३२०६ प्रथम सस्करण जनवरी-१९६० भूल्य २० रुपये मुद्रक यशिष्ठ पम्पोजिंग एजेंसी द्वारा तिलय प्रिंटिंग प्रेस, दिल्ली-६
पशु-रोग और उपचार
प्रस्तावना-
पहा पशुता का
भारतवप पशु-धन मे ससार मै अग्रगम या है।
पालन तथा चिकित्सा पहले से ही चली आ रही है परन्तु बड़े दुख की बात
है कि माधुनिक काल मे देहातो मे पशु रोगो को दूर करने के उपचार के
साधन उपलब्ध नही हो सकते। मैंने इस कठिनाई को, अपने किसान भाइयो
की एक बड़ी समस्या समझकर इस पुस्तक को लिखने का प्रयास किया है।
इसमे सभी नुस्, औषधी आदि ऐसे दिये हैं, जो गाव मे सुलभ हैं, भाषा भी
सोदी-सादी देहातियो वाली है।
इस छोटी सी पुस्तक मे लगभग सभी ऐसे पशु रोगो की चिकित्सा है,
जो साधारणत ग्रामो को पशुओ के होते रहते हैं । मेरा २० वष का पशु
चिकित्सा का अनुभव तभी सफल होगा जब मेरे किसान भाई इस पुस्तक
पढ़ें और लाभ उठा सकेंगे।
.
।
भूमिका इस छोटी-सी पुस्तक मे लगभग उन सभी रोगों का इलाज है जो विशेपकर देहातो मे पशु-धन को नष्ट करते रहते हैं। लेखक ने पुस्तक लिखने मे साफ और सादी देहाती भाषा अपनाई है जो मेरे विचार में देहा तिया के लिए सुविधाजनक होगी। यदि किसान इस छोटी-सी पुस्तक का अध्ययन करें तो लगभग वह अपने पशु-धन को छोटे मोटे रोगो के निवारण करने मे पूणत सफल हो सकेगा। मैंने इस पुस्तक मे अन्य अनेक पुस्तका से उपयागी नुस्खे लक्र चौधरी लोटन सिंह को बताये, तापि पुस्तक अत्यत उपयोगी सिद्ध हो सके। वैसे चौधरी लोटन सिंह के अनुभव चिरकाल प्रसिद्ध हैं । गाव मे या आस पास जहा कही पशु रोग से पीडित हो, सभी आपसे परामश लिया करते हैं और लाभ उठाते हैं। हर गाव सभा के प्रधान से निवेदन है कि वह इस पुस्तक का प्रचार कराकर किसान भाइयो तथा पशु पालको को लाभ पहुचाने की कृपा करें। विशेष--इतना होने पर भी अपने निकटवर्ती वद्य अथवा पशु चिकित्सक से परामश लेवें। प्रसाराध्यापक
पशु-रोग और उपचार
।
१-बन्द लगना
लक्षण -पशु गोबर करना बद कर देता है और जुगाली बद कर देता
है, पशु की कोखें ऊपर उभर जाती हैं।
उपचार --पशु को बद लगने की दशा मे पहले यह दवा दी जाय ।
नौसादर २ तोले, कलमी सोरा १ तोला ।
इन दोनों चीजों को जाधा किलो ताजे पानी में घोल कर पशु को नलकी
के द्वारा दे दिया जावे । यदि इस दवा से २ घण्टे तक पशु को फायदा न हो तो
नीचे लिखी दवा दी जाये।
नमक खाने का १ छटाक, गन्धक ऑवलासार १ छटाक, सूट ढाई तोले,
लवा दाई तोले पुराना गुड या राब ४ छटाक ।
इन सारी चीजो को पत्थर पर पीस कर १ सेर पानी मे खूब गरम किया
छाये और इस गरम की हुई दवा को कुछ गरम सा रहन पर पशु को दो बार
ती जावे । पहली दवा देने के बाद दूसरी दवा १ घण्टा बाद दी जावे ।
अगर ऊपर को दवा से बद न ? तो ये दवा दें।
नमक १छटाक, एलवा १ छटाक, सूठ १॥ छटाक, राब या गुद्ध ४ छटाक
गम सेर भर पानी म पशु को देने से बद टूट जाता है।
२-चेचक (सिरडवा)
लक्षण --पशु कानो को नीचे को ढलका लेता है आंखो मे ढीठ आ जाती
है और शरीर की रूम फाड लेता है, मुह मे छाले पड़ जाते हैं कभी-कभी परो
के छाले पड़ जाते हैं जिससे पशु चल-फिर नहीं सकता।
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२ इलान -(१) इस रोग मे पहले यदि पैर या मुह मे छाले हों तो पहले उसके मुह तथा पैरो को दो तोल फ्टिकरी १ सेर पानी गम करके पानी से कई बार घोयें । जानवर को फिर ३ दिन तक, दिन में कई बार एक-एक सेर चावलो का मांड पिनावें। इलाज -(२) यदि चावलो के माड से फायदा न हा तो जानवर को पीली सरसो की खल दिन में दो बार पानी मे खूब गरम करके तीन दिन तक दें, सरमो को खल की एक खुराक में आधा सेर खल तया १ सेर पानी होना चाहिए। इलाज -(३) यदि सरसो की खल से भी फायदा न हो तो नीचे लिखी दवा कूट कर १ सेर चावल के माड मे मिला कर दो दिन तक दें । दवा दिन में केवल एक बार ही दें। धतूरा ६ माशे, शराब ६ छटार,। नोट -१ खुराक - म १ सेर माह और ऊपर लिखिन दोनो चीजें शामिल हैं। जब जानवर इसी बीमारी मे बार बार पतला गोवर करन लगता ह और गोबर मे कुछ आव भी आ जाती है या कभी-कभी गोबर में खून भी आने लगे ता पशु को पूरा खतरा हो जाता है, ऐसी हालत में रोजाना नीचे लिखी १ खुराक-१ सेर चावल के माह मे मिला कर तीन दिन तक देना चाहिए । ढाक का गोद ६ माशे, खडिया मिट्टी ४ तोले अफीम ४ माशे, शराब १ छटाक। नोट -ढाक के गोद को पहले पीस लिया जावे तब बाकी ३ चीजों में साय मोड मे पिलाया जावे। ३-कटरा या बछडा यदि पैदा होते ही बीमार हो लक्षण -या तो थन को न पक्डे या अधिक दूध पी जाधे ऐमी स्थिति मदवा-- सुखम वालगु ३ मागे, घो १ तोला। इनको मिला कर गम परफे नली द्वारा देवें, दवा ३ दिन तर दें। -
४--जरब आना।
। लापण -(१) जम पशु जोर पर आ जाता है तो उसके पर सीध नहीं
पडते।
(२) यदि बैल की छाती पर हाथ लगा पर दया दिया जाये तो बैल पीछे
या बराबर मे हट जाता है।
(३) मवेशी का सास ठण्डा लगने लगता है।
(४) बैल घसक्ने लगता है और रूम फाडने लगता है।
उपचार -(१) तुक्ष्म गाजर २ तोले, मन्जी २ तोले, सूठ २ तोले, राई
२ तोले, तुरूम सोआ २ तोला, तुरुम कामनो २ तोले।
इन ६ चीजो को पाव भर पुराने गुड म मिला पर ६ गोलिया बना ली
जा और इन गोलियो की ३ दिन तक दें।
(२) बल की छाती पर बाधने के लिए १ किलो दूध गाय का उसमे नमक
डाल कर फाड लिया जावे और ३ दिन तम बदल भर आघते रहना चाहिए
और लेप को हुई छाती को कहे की आव से सर देना चाहिए।
नमक ४ छटाक, अफीम १ तोला, एलवा १ नोला, अमलतास की फली
का गूद ६ छटान, जमीन में फैली बटहली वे बेर ४ छटोक ।
(३) इन सब चीजों को अलग-अलग पीस कर ३ तोले दही में मिला दिया
जाय और लेप कर दिया जावे । बैल को लेप हो जाने के बाद ३ दिन तर यह
चीज पिलायें।
हलदी १॥ छटाक, गुड ४ छटोक, दूघ २ सेर ।
यह खुराक रोजाना सुबह को दी जावे।
नोट -दूध को पहले खूब गरम पर देना चाहिए और फिर उतार कर
हलदी गुड डाले जायें और जब कुछ गरम रहे तब बल को नलकी से दिया
जावे।
उपचार -(४) बल को पेट भर घास खिलाने के लिए नीचे लिखी चीजें
१५ सेर पानी में खूब गरम करके, उसमे ८ छटाक मेथी का आटा मिला देना
पाहिए।
.
४
आखे के पत्तै १ छटाक, रूसे के पत्ते १ छटांक, धतूरे के पत्ते १ छटाक,
जमक १ छटार, अजवायन १ छटार, हल्दी १ छटाक ।
इनको १५ सेर पानी मे सूब गरम किया जावे और फिर राजाना दो
नलकी सुबह दी जावे। यह दवा वल के जरब के अलावा उन सभी जानवरो को
को भी दी जा सकती है, जो घाम कम खाते तथा हाजमा ठीक न हो।
नोट ---दवा का इलाज चलत ममय पशु से काम न लें।
५-जहर दिये पशु का इलाज
लक्षण -~-मवेशी उलटा देखने लगता है और खडे-खडे पैरो को पीटने
लगता है, मुह मे झाग आने लगते हैं, जानवगे को आसो का रग हरे पन पर हो
जाता है और आखों से पानी पडने लगता है।
उपचार ~जब पशु की यह दशा हो जावे तो फौरन यह दवा दें-
नमक ४ छटाक, गधक १ छटाक, सोहा बारीक २ छटाक, सू४२॥
छटाक, अलसी का तेल ४ छटा ।
इन दवाइयों को १ मेर चावलो का माड में मिला कर नलकी से दिया
नावे।
সব
६-वाय
-- हाथ परो पर सूजन आ जाती है, पशु का उठना-बैठना मुश्किल
हो जाता है।
उपचार -~-(१) राई २ तोले, कुटकी २ तोले, बच्छ २ तोले, सूरु २
तोले, अजवायन २ तोले, हल्दी २ तोते।
इन दवाइयों को पहले अलग-अलग सूब कूट लिया जावे और ४ हटाफ
गुह मे मिला कर १२ गोलियां बना ली जायें। रोजाना ३ गोली पशु को दो
1
जायें।
उपधार--(२) पीपर वटा २ तोले, न २ तोले, काली मिष १ तोल,
मा नमर ! टर, हाग भुना हुआ ६ माशे, लहसुन २ तोले ।
इन धोनों का बलग-असग कूट पर पाव सेर गुड में मिला कर १२
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गोलिया बना ली जावें और रोजाना ४ गोलिया तीन-तीन घण्टे के बाद दी
-
जावें।
७-धसका
लक्षण ---इस रोग मे पशु जोर से धसक्ने लगता है, इस रोग की दवाई
इस प्रकार है
उपचार -(१) गधक आग पर डाल कर दिन में कई बार पशु को
सुधावें।
यदि गधक की धूनी से फायदा न हो तो चावलो का माड सेर भर दो
दिन पिलाया जावे।
उपचार -(२) १ सेर दूध मे २ छटा प्याज पीस कर खूब गम क्यिा
जावे और पशु को दे दिया जावे ।
उपचार -(३) अगर ऊपर की दवाइयो से आराम न हो तो पशु को
दिन में एक बार यह दवा दें।
मलाई ४ छटाक, मिसरी ४ छटाक,।
इनको मिला कर दे दिया जावे।
उपचार -(४) शराब देशी ४ छटाक रोजाना देनी चाहिए । इस प्रकार
की दवाई देने से पशु को घसके का रोग नहीं रहता।
उपचार -(५) नमक १ तोला, मुलहटी १ तोला ।
इनको कूट कर तीन तोते घी में मिला लें। इसके वाले पशु को तीन
दिन तक चटावें।
८-कब्ज
लक्षण -पशु वो इस रोग मे घाम मे टक्हे आन लगते हैं और घास
चहुत बम खाने लगता है।
उपचार -(१) पोली सम्मों की खल ४ छटोक, नमक १ छटाक, गुड
४छटोंक।
इन चीजो को शाम को डेढ़ सेर पानी में भिगो दिया जाये और सुबह को
सूब परा पर नलवी द्वारा दी जाये।
उपचार-(२) वन के बीमार बल को मस का और मैस को वल का पेशाव ३ दिन तक नलकी द्वारा देना चाहिए पन्ज बिल्कुल साफ हो जावेगा। उपचार -(३) सिधा नमक ५ तोल, गधक २ तोले, सौंफ १ ताले, राब २ तोले। इन ऊपर लिखित को ८ छटाक पानी को निवाया करप पशु को दे दें। उपचार -(४) त्रिकुटा १ छटाक, काला जीरा २ तोले, सफेद जीरा २ तोले, वच्छ २ तोले, हीग भून कर २ तोले, सौंफ २ तोले, राई १ छटांक, रवरी ३ तोले, अजवायन १ छटाक, सुहागा १ छटाक, फिटकरी १ छटोर, सधा नमक ३ तोले, समुद्री नमर २ तोले, त्रिफला १ छटाक, कुटकी ३ तोले, बाय बिडग १ छटाक, सज्जी खार २ तोले । उपरोक्त सभी वस्तुओ को कूट कर एक वतन में रख लें, एक छटाक मिश्रण को ४ छटाक ताजे पानी मे ८ दिन तक सुबह के टाइम पशु को दें। ९-जकडा लक्षण-इस रोग मे पशु सर्दी के कारण कापने लगता है, आँखें लाल हो जाती हैं और उनसे पानी बहने लगता है और शरीर टण्डा हो जाता है। उपचार -(१) १ सेर मठठा (छाछ) और २ छटाक मिच लाल पीस कर दोनो को मिला कर पिलावें तो पहला जबडा बट हो जाता है। (२) राई २॥ तोले, कुटको २॥ तोले, मैथी का आटा १ छटाक, २॥ तोले, सूठ २॥ तोल हल्दी २॥ ताले अजवायन २॥ तोले । इन चीजो को फूट कर पाव मेर पुरान गुड मे मिला लिया जाव और १२ गोलियां बना ली जायें । पशु का ४ गोली दिन मे और ३ गोली रात मे दो दिन तक दें नोट - जकडे वाने पशु को उबला हुआ ठण्डा पानी होने पर पिनार्य, पशु को मैंयी या मोठ के आटे को सिलावें। १०-घरडवा (गिल्टी) सक्षण-इस रोग मे पशु के कान और मुह के बीच मे सूजन ला जातो ७ wn- ₹1 -- - N ३ है और पशु घुरड घुरड की आवाज करने लगता है। इस रोग को गिल्टी भी कहते हैं। उपचार -(१) अलसी ८ छटांक, नमक २॥ तोले। अलसी के दलिये मे नमक डाल कर पका कर मबेशी.मोन्दे दे। (२) कुम्हार के बांसे के पत्ते पशु को खिलायें यदि पत्तै न खा को उबाल कर उनका पानी मवेशी को दें। पानी १ सेर, कुम्हार के पत्ते ४ छटांक । (३) जहा सूजन हो, उसकी मालिश की जावे। जमाल घोटे का तेल १ तोला, कडुवा तेल २ शटाके । उपचार--(४) निम्न को सूजन पर लेप करना चाहिए छपकली १ नग, लहसुन छिला हुआ २ तोले, पुराना गुड ४ तोले । इनको मिला कर लेप करना चाहिए। ११-वर खाये का इलाज जब जगल में चरते-चरते पशु बर खा लेता है तो मुह से झाग आ जाते हैं, पेट पर अफारा आ जाता है, कुरकरी सो मारने लगता है । उपचार -(१) घी चार छटाक फौरन मवेशी को दें। (२) पशु को कमर पर दही डालनी चाहिए तो दही की वजह से कौआ बैठेगा तब पशु विल्कुल ठीक हो जावेगा। (३) पशु को गोबर के कण्डे की राख २ छटाक का ८ छटाक ठण्डे पानी मे घोल कर पशु को दी जावे। १२-जुए लक्षण--इसमे पशु के शरीर से बाल उडने लगते हैं, वह बार-बार गैर को दीवार से रगडने लगता है। शरीर में कमजोरी आ जाती है। उपचार-(१) सरमा के तेल मे टिक्यिा का कपूर मिला कर पाक शगेर पर मालिश करनी चाहिए। तेल सरसो का ४ छटा, कपूर १ तोला। लक्षण
M
(२) पशु को नरा (तारापोन) का तेल देना चाहिए।
(३) कुम्हार के आवे को रास को पानी में पान पर जुओ वाले भाग पर
३ घण्टे नर मालिश करें।
(८) चा की रोटी म अजवायन नमक मिना कर रोटी को सरसों के तेल
मै चुपड दें।
१३ --गर्मों की दवा (हाफना))
लक्षण-पशु हाफ्ने लगता है और बार-बार पानी पीने लगता है। पेशाब
क्म करने लगता है और कभी कभी अफारा आ जाता है।
उपचार-(१) मेहदी ४ छटान, खोड, ४ छटोर, शोरा १ तोला।
इन तीनो को एक जगह मिलावर १ सेर चावती के माह को नलकी
द्वारा दें।
(२) यदि पशु जाडो के दिनो मे गर्मी मानता है ता उस पशु को सुबह हो
१ सेर ताजे गाने के रस मे १ तोला पारा मिला कर पिलामें।
(३) जीरा सफेद २ तोले, सफेद मिच २ नोल हीग मुना हुआ ६ माये,
धनिया २ तोले।
इन सब को कूटकर १ सेर चावला के माड मे मिलाकर रोजाना एक बार
तीन दिन तक
१४-दतना
लक्षण-मस या गाय की योनि म लाल पिंडी आ जाती है और जानवर
घुक्डने लगता है।
उपचार -(१) गराब मे कपडा भिगो कर पिडी पर हाथ से लगा कर
अदर योनि में कर दें फिर पशु के पिछले भाग पर छोटी-मी टोकरी बाघ दें,
पशु को आट दिन तक बैठने न दिया जावे ।
(२) यदि पशु ग्याभन होने के वाद टुसराने लगे तो उस पशु को ५ छटाक
उदद की दाल को १० छटाक पानी मे भिगो दें और आठ घंटे में उसका
-01 पीस लें और १२ गोली बना कर रोजाना एक गोली दें।
६ (३) जो मवेशी दनने लगे तो मुने हुए चने की दाल निकाल पर अमली सराय मै तीन चार दिन तक भिगा लें और उमर बार उसको पीस पर झाडबेरी ये बराबर गोली बना लें और सुबह-शाम एम-एप गाली बम से यम १५ दिन तक सिसानी पाहिए। वजन दाल आघ सेर, शराब ३ पाय । (४) आघ सेर चिनोले पानी मे उबाल कर आध पाव तेल सरसो का मिला कर पशु को पिला देना चाहिए। यह इलाा ७ दिन तक लगातार करना चाहिए। १४-चक्कर आना लक्षण-जानयर यो कम दिखो लगता है और पागल-मा हो जाता है । कभी कभी घरसर काट कर जमीन पर गिर जाता है। उपचार -(१) चने यो पत्ती जिसका साग भी बनता है छटार १, घटक ४ पानी ताजे मे भिगो लें। एक घण्टे तब फिर पानी में पत्ती मसलें फिर सदर का एम गज पहा उममे भिगो लें। थोडा मा निचोड कर मवेशी के सिर पर बाघ दें। ६ घण्टे के बाद खोल दें। ऐसे तीन दिन बांध । जीरा सफेद १ तोला, धनिया १ तोला, हीग ६ माशे, नौसादर १ तोला, मेहदी १ छटाक, सांड ४ छटाक । इन दवाओ को २ सेर मोड आधी दवा मिला लें, दिन में दो बार दें, तीन दिन तक लगातार दें। (२) तारपीन का तेल तीन तोले आप सेर पानी मे मिला कर दें। मवेशी की आख बाघ कर टटरे पर पानी डालें। १५-बैल की सुतार -वल की नाड सूज जाती है और झाटे की भी सूज जाती है जहाँ जुओ धरा जाता है ऐसी शक्ल मे-- उपचार --(१) चने की कढ़ी बना कर नाड पर लेप कर दें। कही में मिष न हो। (२) हल्दी का ६ गाठ मिट्टी के बरतन मे भून लें । भुनी हुई हल्दी को पीस लक्षण कर छटाक १ अलसी तेल मे मिला लें, कंधे पर मालिश करें। (३) आखे के पत्ते छटांक ४, दो सेर पानी मे पका कर नाड झारें । एक मप्ताह तक नाड ठीक होगी। (४) मोम १ तोला, साबुन १ तोला । २ छटाफ सरसा के तेल मे पका कर कई दिन तक नाड पर लगावें, ठीक हो जाएगी। १६-चन्देल लक्षण -नाड पर जा जुआ धरा जाता है, नाह से खून जाने लगता है, जब भी बैल को हल या गाही में जोतते हैं तब खून जारी हो जाता है । ऐसी शकलम- १७- उपचार -(१) मुर्दे की हडी २ तोले, नोनी पी १ छटाक में मिला कर गह पर लगा दें। हही पीस ली जावे १५ दिन लगावें, हल मे जोडे नहीं। (२) गेहू का भाटा पानी मे गूथ लें। आटा ४ छटांक अगारो पर जला से फर बारीक पाम कर नोनी घी मे मिला वर नाड पर लगायें। -वैल या भैस को आख मे नखूना (१) चीनी व वतन का टुकडा २ तोले, शहद म मिला कर आख धोकर आख मे लगा फोला नही रहेगा। (२) माले के पत्तों का अक निकाल कर तोले १, शहद तोला २ म मिला लें। प्राख में चार दिन तक लगा फोला क्टेगा। १८-बल के सींग मे सलाई लक्षण -जिम मोग मे यह रोग होता है वह सोग नीचे का युक जाता जा है मीग की जड मे कोडे पट जाते हैं और पशु अपने सिर को बार बार दीवार या पेट पर मारता है। उपचार - कलकत्ती तम्बाकू २॥ तोले, कपूर ६ मागे, आग में फँकी माप की घुली २ तले। इन तीनों को एक जगह मिपार फिर रिमीकांच या बीम की नली को लक्षण . , agri वारी सेकर इस दवा को उसके नाक पर रख लिया जाए। पशु की नाक मे नली को लगाकर फूक मारने से दवा सास द्वारा जाकर कीड़ों को मार देगी। एक बार नली पर ६ माशे दवा रखी जाए। १६-जेर कामना माय • जब पशु बच्चा दे देता है तो वेभी कमी हेडकया वाय कारण जेर नही डालता और वह पशु घास खाना छोड देता देष नहीं देता। उपचार -(१) राई २ तोले, अजवायन २ तोले, फुटगरी २ तोले, ! २ तोले, बच्छ २ तोले । इनको एक जगह बारीक फूट लिया और ४ छटाक गुड म मिला कर १२ गालिया बना ली जावें और रोजाना ६ गालियां दी जायें । पशु को बास या ईख की पत्ती खिलायी जावें, यदि पत्ते न मिलें तो सूरी बिनौले खिलाये जावें। (२) यदि पशु पहली दवा देने पर भी जेर न डाले तो उसे २ दिन तक ४ छटाक रोजाना घी दिया जावे और भम को गाय का दूध और गाय को मस का दूध देना चाहिए । दूध को पका कर मीठा करके देना चाहिए। २०--जेर खाना लक्षण ---कुछ पशु अपनी जैर स्वय खा जाते हैं । जिससे उस पशु को गर्मी हो जाती है और वह सूख-सूख कर मर जाता है । उपचार ~~(१) गुड पुराना ८ छटाक, नमक २ छटाक, तेल सरसो ४ छटाक 1 इन सब चीजो को मिला कर गम किया जावे और ठण्डा होने पर नलकी द्वारा पशु को देना चाहिए। (२) ८ छटाक पराड (झाडों में शकरकद की तरह को मिला कर ४ छटाक गुड म मिला कर जीटी बनाई जावे और पशु को दे देनी चाहिए। २१-कद्दा • पशु जुगाली करना छोड़ देता है और घास पेट म फूल जा! लक्षण है और मुंह से खाया घास मुह से निकल कर जुगालते समय जमीन पर गिरता रहता है। उपचार –(१) निम्नलिखित दवाई २ तोले, नौमादर को आध सेर पानी मे मिला कर पशु को दे दें। (२) अफारा आने पर- अजीर ४ तोले, हरी मेहदी के पत्ते ४ तोले, पाली मिव २ तोले, अमरूद की जड की बक्ली २ तोले। इनको बारीक पीस कर ४ छटा सिरका मे दोनो कोख पर लेप कर दें। विशेष बीमारियाँ २२-जो पशु अनाज अधिक खा जावे सरसों का तेल ४ छटाक, खारी नमक एक छटाक इनको एक जगह मिला कर नली द्वारा दे दिया जावे। २३-जो पशु अचानक अफर जावे नमक २ ताले, कचरी एक छटाक इन दोनो को पीस कर १ सेर छाछ (मठा) मे मिला कर पशु को दिया जावे। २४-जो पशु सुई या कोल खा लेते है घास खाना छोडते हैं, रूम फाड जाते हैं, पशु सूख जाते हैं, दात क्डि किडाने लगता है । ऐसी दशा मे- -चुम्बक पत्थर पीसकर १ छटाक मवेशी को खिला दें। ३ ४ घण्टे बाद अरण्डी का तेल ८ छटाक, दूध १ सेर दाना को मिला कर पशु को दे दें। जब तक सुई या कील गावर मे न आवे १ सप्ताह तक देत रहना चाहिए, निकलने पर बद कर दें। २५-जिस पशु का कान बहने लगे, पानी सा जाने लगे खडी कटहनी के फूल ४ तोले तोड कर कान मे निचोड दें, कान बहना चद हो जाता है। - ।
२६-जिस पशु के पागल कुत्ते ने काट लिया हो
उस जगह गम करके उसके दाग दें और कुचला पीस कर उस जगह
लगावें।
उपचार २ --आखे की जह की बकली २ तोले, धतूरे के पत्ते १ तोला।
इन दोनो को कूट कर आखे का दूध १७० मिला कर कटी हुई जगह पर लगा
२७–पशु को बिच्छ इत्यादि काटने पर
जमाल घोटा दो तोले, नीबू का अक ३ ताले, जहा पर घाटा हो, मिला
पर लगा देने से आराम हो जाता है।
२८-साप के काटने पर
नौमादर ६ माशे, आले का दूध १ तोला जहा साप काटे उसी जगह लगा
-
१छटांक
"
२६-जिस पशु को जीभ पर काटे से जम जाते है
उसकी दवा
हल्दी
नमक
काली जीरी
जीभ पर लगा देने से काटे समाप्त हो आते हैं।
३०-मवेशी के घाव होने पर खून बन्द न हो
पुराने कम्बल का टुकडा फूल कर उसकी राख को घाव मे भर कर बांध
देना चाहिए या मकडी का जाला घाव मे भर देने से खुन बद हो जायेगा।
३१-मवेशी के थन सूज जाते है
दो सेर पानी मे मकोय १ छटांक को पका कर थन धो देने चाहिये,
दिन तक दिन में दो बार धोयें।
उपचार कपूर १ माशा, सुहागा भून कर २ माशा, नौनी घी २ तोला।
पाच
१४ इन तीनो को मिलाकर ३ दिन तक लेप करें। ३२-पशु के थन को यदि बछडा काट दे एक कसोरा आग मे लाल करके धनो के नीचे रख के उसमें घार मारने से थन ठीक हो जाता है, ३ दिन तक परें। ३३–पशु के छेरा लग जाए दूध निकालते ही १ सेर कच्चा दूध फोका फौरन दे देना चाहिए, यदि इस से भी बद न हो तो- उपचार -(२) सभर नमक सीधा नमक सामभल नमक जवाखार सज्जी हरड वेहडा १ तोला " " छोटी हरड " " " ६ माशे आवला हल्दी सफेद जीरा काला जीरा भाग देवदारू काली मीच पीपल मूली के बीज सोआ के बीज बाय बिडङ्ग सतावर नागोडी असगध " १ ताला . " " ३५-जिस अजवायन: अजमोद सोहजने की छाल इन को कूट कर नमक की तरह १२ दिन तक मवेशी का गला पक जाने से घास न... ऐसी दशा मे-अलसी दो छटाक पका कर शराब देशी ४ छटार मे मिला कर दें। ३४.-जो मवेशी ग्याभन न रहे, बार-बार फिर जावे सेर भर बिनौले पका कर उसमे आध पाव तेल डाल कर ३ दिन तक खिलाने से पशु ग्यामन रह जावेगा। पशु को कोडे पड जावें बच्छ तीन तोले पानी मे साफ करके घाव मे भर दें, यदि इससे भी आराम न हो उपचार २-तारपीन का तेल एक छटाक, कपूर तीन माशे मिला कर घाव पर रग्वने से कीडे मर जाते हैं। ३६- जिस पशु के पेट मे कोडे पड जाते है मवेशी का मुह फाड कर ऊपर के हिस्से मे उ गली लगा कर हटाने से बदषु आने पर पेट में कीडे होते हैं- उपचार १-खिसारी की दाल , छटाक को पानी मे शाम को भिगो दें सुबह उम दाल का पानी पशु को दें, १ घण्टे बाद दाल को भी खिला दें। २-एक पेड तम्बाकू जैसा, जो जगल मे रहता है उसका अक चार छटान मवेशी को दें। पशु के गोबर मे खून आवे धनिया १छटाक ३७-जिस सिधा नमक " २ १ तोला १छटाक इनको १ जगह पीस कर जौ का आटा तीन छटोंक इन तीनो को मिला कर ३ दिन तक दें, यदि इस से भी फायदा न हो उपचार २-माजू फल का चूण १छटाक पत्था खडिया मिट्टी इन तीनो को १ सेर मॉड मे मिला कर दें दिन मे २ बार तीन दिन तक दें खून बद हो जावेगा। ३८–पशुओ का मसाला यह मसाला प्रत्येक रोगी पशु को दिया जा सकता है, पशु निरोग हो जाता है यह सब बीमारियो म फायदेमद है नसाद्दर १ छटाक, पाँचो नमक २ छटाक कलमी शोरा १ छ०, हीग लाहौरी १ छ०, काली मिच १७०, बाय बडङ्ग २ ७०, बिडाल डोटे २ ७०, राई दो तोते, कुरकी दो तोले, बच्छ दो तोले, सूठ दो छ०, अजवायन देशी दो छ० अमलताश फली २७०, जीरा सफेद २ ७०, स्याह जीरा २ छ०, धनिया दो छ०, गधक दो छ० सोडा सर्फद ४७०, कडू ४ छ० छोटी हरड दो छ०, बढी हर दो छ०, सुहागा १७०, कपूर ॥ तोला, गिलोय छ०, पोपलमेट १ तोला, सनाय दो छ. कुचला दो तोले को ४ वटा घी मे अलग भून लिया जाय । पचे धो को जमीन में दाव दिया जाय । तीनो हल्दी दो छ. प्रत्येक, मेथी एक सेर, अडब अजवायन दो छ०, तुलम सोमा १७०, तुखम गाजर १ छ० फिटकरी दो छ को भून लिया जाय गुम्मा ४ छटाक, एलवा १ छटा लोग ४ छटाक, २॥ तोले कायफल १ छ० इन सब चीजो को कूट कर कोरे बतन में रख लिया जावें और पशु को नमक देने की तरह दें। ३६--डोरिया डिगाना सक्षण -इस रोग में पशु का अगला पर वह सा जाता है तथा लगाना गुरू पर देता है। --१ रदूरी के हरे पत्तों को शूट कर अब निकाल लिया जाय . अफीम , ८ छटाक ४६टाक ४ " " डोरिया उतरे पर पर इस जन की मालि मालिश बडे हाथ स करें, बाद में हल्के हाथों की जो २-जिस पर का डोरिया उतरा हो, उस को लाल की हुई नोहे की पत्ती से जला दिया जाय दूध मे भीगा फोआ रख देने से डोरिया ठीक हो जाना है ४०-बैल जो मुतार हो जाने दया ---धार काटा वाती छ अगुल डाडी काट य तान अगुन खावी + लें । वाम हल्दी भर कर, कपड़े म लपेट कर और गारा लगा कर अगारो में दवा दें, फिर निकान ते गरम पानी मे पाड झारे जूते से नाट मलता है। इम बाद नाड पर लेप कर दें और धूप म बाध दें। ४१-जिस भैस या बैरा के सरण हो जाय पवा-भसलुम्बा वाली जीरी कलौंजी ४ कगार पटठा इन सब चीजो का एक जगह मिला कर कूट ले फिर ५ सेर मटठा यानी छाछ म मिला लें, आध सेर रोजाना दें, १७ दिन तक दी जाएगी। मवेशियो के विषय में मब मज्जनों से निवेदन है कि मवेशियो को साफ जगह रखें । पानी साफ पिला, मकान मजाले न पडने पायें और आठ दिन मे चारा बदल दें, चाहे एक दिन के लिए वदन दे एा परन म मवेशो वीमार नहीं होगा, आशा है कि इम मेरी प्राथना पर ध्यान देंग। ४२-बन्द जब पशु वा गाबर व पेशाव करना बन्द हा जाता है, यह याद कराना है । यद भी अनेक प्रकार के हैं- (१) गोबर न करना । (२) पेशार न करना । (३) गोवर व पेशाव साप-साथ बद हो जाना । २ सेर नमक आघसर
-
(२) सोरा
पहचान -यह रोग होन पर अपारा आ जाता है। मुह से राल जाने
लगती हैं, पट म दद होता है, जिससे हाप-पर मारता है ।
उपचार गायर पद-(१) पीपल के हरे पत्ते - विलो।
पितो।
(३) काला नमर -१५० ग्राम।
(४) कास्टर आयल
=२५० ग्राम।
बनाने का तरीका -पीपल के पत्ते, मीरा पाला नमप, क्लिो पानी
म लगभग तीन उबाल तक पयाओ, फिर पत्ते निचोड पर फर दो फिर उसमे
२५० ग्राम कास्टर जायल मिलाकर निवाया निवाया ५० ग्राम साने के सोरे
यो नारा पर रम्पकर पशु को दा, यदि किमी कारण एप सराव से बाद न टूटे
तो, पिर अगले दिन इमी नुस्से वो तैयार कर पिनाओ, बन्द अवश्य ही
टूट जाएगा। फिर भी अगर बद न टूटे तो आगे लिखी औषधी प्रयोग म
लायें।
(१) दूध (गाय या मम) १ किलो इस दर मकिलो पानी ।
(२) क्लमी सोरा दो सो ग्राम ।
(३) शक्कर या गीग पितो।
(४) कपूर की टिक्यिा १० ग्राम
(५) कास्टर आयल तेल २५० ग्राम ।
उपाय-दूध में कलमी मोरा और शकार पकाओ, दो उवाल आने पर
नीचे उतार कर, क्पूर वास्ट्रायल तेल मिलाकर ढक दें। थोड़ी देर बाद थोडा
गम रहने पर, उसे ढके-ढके हिलायें । पचाम ग्राम, खाने का सोडा नाल पर
रख कर औपधी के साथ देवें । बद टूट जाएगा।
प्रत्येक नुस्खे की कम से कम तो खुराक तैयार करें चार-पाच घटे के
अतर से देनी चाहिए।
(प्रयेक वौषधी का तीन खुराको तक प्रयोग करें, फिर दूसरी औषधी बदले)
४३-पेशाब बन्द
इसमे पेशाव बद हो जाता है, अफारा अधिक आएगा, दद अधिक होगा,
१६
मवेशी पर पीटेगा। अगहाई तोडता है।
उपचार -(१) परात का धोक्न (खाना बनाने के पश्चात्)=२ किलो।
(२) कलमी मोरा।
=१०० ग्राम ।
इन दानो मे 1 किलो गाय या बारी का दूध मिलाकर पशु को दें।
दो खुराक तैयार करें, चार पाच घण्टे के फामले से देखें, अगर इससे
बद
न टूट तो निम्न दवा प्रयोग परे ।
(१) गाय का घी २५० ग्राम ।
(२) शगव देशी २५० ग्राम ।
होना एक जगह मिलाकर देवें, अगर एक गुराक मे बद नहीं टूटता है ।
तो चार पांच घण्ट वाद दूपरी गुराक देवें।
४४-पेशाव, गोचर, एक साथ बन्द होने पर
(१) दूध गाय या मैम १६ किलो मे क्लिा पानी। इसके साथ ही साथ
'पृष्ठ १८ पर गोबर बद वानी जोपधी भी दें।
४५ - गोवर बन्द टूट जाने पर, छेरा चल जाने पर, खून
गोबर में आने पर
(१) धान का चावल 1 किलो, उसे उबाल (मडमार) कर, उसको ५०
ग्राम इसबगाल की मुस्मी मिलाकर दे दो।
उपचार - (१) बेन गिरि
=१२५ ग्राम।
(२) आम की गुठली की बिजली =५० ग्राम।
इन दोनो को दो विला पानी म पकाओ, एक किलो रहने पर नीचे उतार
कर १०० ग्राम शहद मिलाकर ठडा करके पिना दें।
अगर बन्द भी टूट गया, छेरा बद हो गया, फिर भी पशु चारा
नहीं खाता है । जुगालता नहीं है तो निम्नलिखित दवाई प्रयोग करें।
छाय फा साडा-(१) छाय १० क्लिा । (२) प्याज, ७५० ग्राम
(३) खल (सरमो) ५०० (४) नमक २५०, देशी।
२० २५०" " . (५) मनियारी नमन १००, (६) कान नमक (७) माल्ट न २ ५० इमामदस्ते म प्याज कूट कर तथा बाकी दवायें मिट्टी के बतन मे बद करके डक्वन नगाकर कपडा जादि वाधार, तीन दिन बाद रक्ये, तथा चौथे दिन अपना मुह बचाकर खालें । माथ ही छलनी से ढक दें, जिसस हवा आती जाती रहे, उतन + खोलने के आठ घण्ट बाद--- १०० ग्राम राई पीमक, मो ग्राम अजमोद भी पीस कर, दस ग्राम लह मनिया होग, ५० ग्राम नोमादर, तईवा, मो ग्राम भाग इन सबको पीसकर वतन में डाल दें। इसम स शिलो सुबह । विना शाग चारा खिलान के बाद देवें। इसे छलनी से वद रक्वें, काई मक्खी मच्छर ही गिरना चाहिए । ४६-अफारा अफारा तीन प्रकार का होता है । (१) एक दम अफारा सा जाना (गैस रखती है) (२) सहल गोबर करना अफारा रहना, (कोख मरुत रहना) (३) पशु कपडे आदि खा ले, वे रुक जाते है, उससे अफारा आ जाता है । (१)-एक दम अफारा आने पर- -(गैस रुक्ती है। कोख ढोल की तरह बजती है । बीस बीस ग्राम मिट्टी का तेल दोनो नयनो मे डाले , ५० ग्राम छोटी हैट, ५० ग्राम काला नमक, २० ग्राम नोसादर तईवा, १० ग्राम होग, इन सबको सौ ग्राम गुड डान पर, एक विलो पानी में उबालें, पानी ७५० ग्राम रहन पर उतार लें, फिर निवाया निवाया मवेशी को देवे । दो या तीन खुराक । (२)-सरत गोवर पर आने वाला अफारा- (१) छाय का माहा, जो गोपर य पेगाव, बर पर लिखा है दें तो आराम होगा। उपधार--(१) आरो के फूल पिलो। (२) प्याज पक्लिो (भाग मे भूनकर) इनमे सौ ग्राम वाला नमक, १० ग्राम छोटी हैड, लहरिया हीग दस ग्राम, इन सवको एक जगह मिल कर पीसकर चटनी बनालो। इस चटनी को चीनी या मिट्टी क बतन म रक्खें। खुरार -~-३० ग्राम योनी घी मे ५० ग्राम चटनी मिलाकर २४ घटे मे एक बार घटा दे । जगर योनी घी नहीं मिलना, तो ३० ग्राम गुलक द में मिलाकर ५० ग्राम चटनी चटा द । (३) मवेशी कपडे आदि खाने पर अफारा आ जाता है । इसमे ऊपर लिखा छाया साडा दवे । ४७-धसका (खासी) धमका, पट की खावी, मैल में जान पर, जोर पड़ने पर होता है। घसका-(१) जो मवेशी जोर पडने पर झटका खा जाता है तथा पानी पीकर ठड लगने पर खून छाती पर जम जाता । उम पशु का जाग का हिस्मा काला पड़ जाता है तथा धमक्ता रहता है । उपचार--(१) मुर्दे की हड्डी, भस्मी = किलो। (२) गुलावी फ्टकी 1 किलो। (३) डडे का नोसादर = ५० ग्राम । इनको एक जगह पीम तो, २५ ग्राम मुबह तथा २५ ग्राम साम, ताजे पानी के माथ नाल से दवे । यह दयाई नौ दिन की है। नौ दिन के बाद दूसरी दवाई बदली जाएगी। जा निम्न है- (१) मितावर 1 किलो। (२) जम्बा हल्ली ४०० ग्राम। (३) नीया माली ५० ग्राम । (४) पाहार मूल पास एक साथ भूट र, एक पिना दूध, २५० ग्राम मिला कर, भुटो वाइया भ स ५० ग्राम मिना कर उबाल । पानी-पानी नष्ट हो जाने पर उसे उतार । ठडा करो,पर ५० ग्राम शहद दालपर, २४ पटे में एर वार, % 3D - " ग्राम।
२२ चारा खाने के दो घटे याद, १२ दिन तक लगातार शाम के ममय दे । धमका ठीक हो जायेगा। (२) मल में आने पर धमका (बुखार) इममे मारे शरीर का स आ काला हो जाता है, मुह में छाले पड़ जाते हैं, राल टपकती है, पर पर जाते है । इस परे म आने वा मन भी कहते हैं । ४८-मुह मे छाले पड़ने पर औषधी-(१) पपडिया क्या ५० ग्राम । (२) सैलखडी ५० ग्राम । (३) हसराज ५० ग्राम । इन तीनो को मिलाकर वारीक वूट लें । पटकी के पानी से मुह धोकर (फटकी पीसकर पानी मे डालकर) दिन में तीन बार पाच-पाच ग्राम सूखी औषधी पशु के मुह मे फेंक दे । एक पिलो अम्बा हल्दी लेवें, उसे पीस कर क्पड छान कर लें। फिर ५० ग्राम पिसी हल्दी १ किलो दूध थोडा पानी मिलाकर उबालें, नीचे उतारवर ५० ग्राम खाड ठण्डा करके मिलावें, चारा खिलाने के बाद साय को दा घर पश्चात पशु को दे दें। सुबह के समय तीन दिन तक ५० ग्राम पोदीना का अ, ५० ग्राम प्याज का अक मिलाकर सुबह - ४६-पैर पटकने पर उपरोक्त दूध की दवाई प्याज पोदीन के जक के अलावा देवें । उपचार (२)-(१) वीकर वी छाल १ किलो, इसको काट कर बारीक करके १२ क्लिो पानी में उबालें जब १० किलो रह जाये उसे छान ला, छने पानी मे १०० ग्राम देसी हरदी पीसकर उमम डाल दो। दिन में तीन बार ५० ५० ग्राम पानी खुरो पर डालें, जब तक ठीक न हो, डागते रह तथा १० ग्राम काली मिच पीसकर २५० ग्राम डालडा घी मे मिनाकर दिन म एक बार दिन तव देवें। , २३ ५०-मवेशी को दवाई आदि पिलाते, धसका लगने पर सरसो का तेल २५० ग्राम उसमे ५० ग्राम गुड की डली डालकर रस दो। (१) कागडा मीगी १० ग्राम । (२) मुलठी १० ग्राम । (३) छोटा पीपल ५ ग्राम (एक समय की) नोट :- इन तीना दवाओ को पीसकर गुड की डली तेल में से निकालकर गुड को इनमे मिलाकर सुबह-माय ८ रोज तक देवें । (गुड की डनी तेल मे लगभग १२ घण्टे पडी रहनी चाहिए) पहली बार तुरन्त तेल मे डली भिगोकर दवा मे मिलाकर दे देते हैं। उपचार (२)-(१) सौफ ५० ग्राम । (२) मुलटी ५० ग्राम । (३) सफेद इलायची २० ग्राम । (४) पीपल २० ग्राम । (५) मिश्री ५० ग्राम । इन पाचो दवाओ को एक जगह कूटकर क्लिो सोरे मे मिलाकर मिट्टी के कोरे बतन म रखें, ५० ग्राम सुबह, ५० ग्राम साय को चटा दें। सब प्रकार के धसको मे प्रयोग होने वाली दवाई- (१) नागर मोथा ५० ग्राम । (२) मुलेठी ५० ग्राम । (३) काकडा सीगो ५० ग्राम । (१) बच्छ ५० ग्राम । (५) छोटा पीपल ५० ग्राम ! (६) गोद चूनिया १०० ग्राम । (७) गोद वरून ५० ग्राम । इन सबका एक जगह क्टर क्पड छान कर लें । मलाई या शहद जितने में २० ग्राम उपरान चूण अच्छी प्रकार मिल जाए, तो इस चटनी को दिन में दो बार प्रात' साय चटायें ।
२४ , ५१ रिही का दर्द पशु गोचर या पेश पिता है तर पर पीटा है । उठना, बैठना है तो यह दद ही 77 कहा उपचार ---(१) गुत- १०० ग्राम । (२) नोमादर ५० ग्राम । (३) देवदार वा वस्दा ३० ग्राम । (एक खुराक) नौसादर देवदार ये वरदे को १ मिलो पानी मे उबालो । ७५० ग्राम पानी रहन पर गुनकद १०० ग्राम Tमक ५० ग्राम उबले पानी को नीचे उतारकर उसम मिला दो । निवाया निवाया पानी मवेशी को दे दो, इसकी दो खुराक दो तीन चार घण्टे के अनर से दूसरी सुराव देवें । ५२-विस्यारी (बुखार) पशु को लगभग ३६ प्रकार का बुखार होता है । इगम मुम्ब ११ हैं- (१) ठडी बिस्यारी बाहर से पशु ठडा लगता है। पर तु शरीर के अदर का भाग गम रहता है । यह थर्मामीटर से जाना जा सकता है । इसमे पशु कापन भी लगता है और अफारा भी आ जाता है उपचार-मालिग करने की (१) अजवायन कुरेसानी १० ग्राम । (२) सोठ मतवा १० ग्राम । (३) नमक देसी १० ग्राम । इन तीनो दवाजो का एक साथ वारी पीगकर ३० ग्राम पानी पी अथवा ३० साम तल परडी मे मिलाकर इससे पशु की पूरी रीड की हड्डी पर हाथ से मालिश करें तथा मालिश करने के तुरत पश्चात पशु की कमर पर हल्का पडा डाल दें तथा पसीना आने पर कपडे ये दर ही बिना उघाडे उसे पोछे -गर पमीना पहली मालिश मे न आए ता फिर मालिश वरें। उपचार-पिलाने को औषधी (१) माल कगनी २० ग्राम । (२) मसा गूगल २० ग्राम ।
२५
(३) मोठ २० ग्राम। (४) गार १५० ग्राम ।
इन पवको पूटवर १ किलो पानी म पाल 17 जब ७५० ग्राम पानी
बवन पर पानी नीचे उतार बर छान लो। फिर २० ग्राम घी या सरमो का
तेल मे छोरवर उमे उतार कर निवाया निवाया दे दो। पार पटे बाद दूसरी
खुराक दवें।
(२) गर्म विस्यारो
ओमें लाल, आधे भान जट से गम, अग्रभाग (फुगल) म ठडे, रीड की
हड्डी गम तया हाफने लगता है ।
उपचार-(१) गूलर की छात 1 किलो।
(२) आम की छाल क्लिो।
(३) काये की छाल क्लिा ।
(४) नीम की छाल 1 किलो।
(५) माले की जडविलो।
इनको लगभग ७ क्लिो पानी म भिगो दो। २४ घटे के बाद उसी पानी
में उबालो। ५ क्लिो पानी रहने पर, उसे छान तो, इसम से आधा क्लिो
पानी लो, उस पानी मे १० ग्राम अजवायन, १० ग्राम सुहागे की खील, ३ ग्राम
काली मिच, १०० ग्राम खाड मिलाकर प्रात साय पान दिन तक दें।
(३) खूनी यिस्यारी
गोवर अथवा पेशाव मे खून जाने लगता है, बुखार तेज होता है ।
उपचार-(१) नाली का साग ५० ग्राम ।
(२) तुरूम खुम्पा २० ग्राम ।
(३) शीतल चीनी २० ग्राम ।
(४) ब्रह्मी घास २० ग्राम । (एक सुरा)
इन मवको एक साथ कूटकर, शहद में मिलाकर जितन म पटनी मी बन
जाय ३० ग्राम दिन मे दो बार देवें। दो-तीन दिन तक पशु को चटायें,
सिलायें।
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(कर का पड जिसका अचार पडता है वि लकडी को फूककर छाई बनाई
इन पाचा वीजा का ए माप कटकर उसे ढाई क्लिो मथे वाचून, ढाई
२६
(४) पुरानी विस्यारी (बुखार)
इसमे बुखार पुराना पड़ जाता है, पशु जुगालना बाद कर देता है । चारा
बहुत कम माना है । दिन प्रतिदिन कमजोर होता चला जाता है ।
उपचार-(१) याऊ का दूर ५० ग्राम ।
(२) सीको का दूर ५० ग्राम ।
(३) रेवह चीनी ३० ग्राम ।
(४) बाली मिच ५ ग्राम।
इन सबको पीसकर सवा किलो पानी मे पकाओ। ७५० ग्राम पानी रहने
पर, उतारकर लो फिर उसममा मकर डालकर पशु को देवें ।
पशु के ऊपर हल्का कपडा डाल देवें। दिन में दो बार प्रात साय, पाच दिन
तर देवें । जवश्य ही लाभ होगा।
(५) बाय बिस्पारी
इममे पशु के पैरो पर सूजन आ जाती है । पशु या तो अगले आधे हिस्म
से उठता है या पिछले आधे हिस्मे से उठता है। यदि उसे सहारा देकर खडा
कर दिया जाए तो निम हिस्से मे बाय होगी, पशु कापेगा । कापने वाला हिस्सा
ठडा होगा बाकी हिस्मा गम होगा। इसको अपरग वाय के नाम से भी जाना
जाता है।
उपचार - (१) मनवा सोठ २५० ग्राम ।
(२) सितावर २५० ग्राम ।
(३) श्याम मूसली १०० ग्राम ।
(४) इदरायण का फल ५०० ग्राम ।
(५) घर की छाई २५० ग्राम ।
मिला चने या मुना घन पांच पिला गुड ।
गुह वा पढ़ाई में पिघलाकर, इमम चने, मेघे का चन व पाच दवाओं की
जाती है।)
२७ । मिलाकर २५०-२५० ग्राम के लड्डू बना लें । एक प्रात तथा एक लडडू सार्य को खिलावें। मालिश करने को औपधि (१) सौंफ २५० ग्राम । (२) अजवायन कुरेसानी २५० ग्राम । इनको छ क्लिो पानी में साय को भिगो दो, रात भर भीगी रहने दो, प्रात उवालो । तीन क्लिो पानी रहने पर उतार कर, छान लो । उसके २५० ग्राम पानी मे ५० ग्राम अरण्डी का तेल, ५० ग्राम बफ डाल दो। इसकी मालिश प्रभावित भाग पर करो तथा पशु पर गर्मी मे हल्का तथा सर्दी मौसम में यूल डान दो । पमीना आये तो उसे बिना कपडा उघाडे पोछ दो। छनी हुई सौंफ कुरेसानी अजवायन मे १५० ग्राम काता नमक २० ग्राम लहमनिया होग मिलाकर ५० ग्राम रोज एक बार दोपहर, चारा खाने के पश्चात देवें (६) गठिया बाय इससे पशु के जोडो पर वम आ जाता है । उठन-बठन में परशानी होती है, उसे गठिया बाय कहते हैं। उपचार--(१) बेर कटेली ढाई रिलो (इसकी कुट्टी काटकर सुखाओ)। (२) आखे के पत्ते ढाई किलो (सुखाओं) (३) भाग एक किलो (सुखाओ) (४) नमक देशी २ किलो। (५) क्लमी सौरा २५० ग्राम । मिट्टी का बतन लेकर, उसके चारो ओर पीली मिट्टी का लेप लगाकर, फिर उसमे पहिले तली म सूखे कुछ आखे के पत्ते फलावें, उस पर क्लमी सोरा नमक की तह, फिर बर क्टेली की तह, फिर कलमी सौरा नमक को तह, फिर मगरी प्रत, फिर कलमी मोग नमक वीतह, फिर आले के पत्तो की तह, फिर बलमी मोरा की नमा तह, इसी प्रकार कई तह लगा। फिर सब तह लगन पर माप की काचली रखकर बतन पर ढक्कन लगार उसे गारा मिट्टी से लेप दें। एक जमीन म गहडा पादकर, बतन में चारा आर ऊपर नीच दा टाकरे २८ । , " " " पुराने उपलो म दवाकर आग लगा दें। आग लगाने पर ऊपर से राय स अवे की तरह ढा दे नियस आग धिक् न भडके। उसे २४ घट बाट उसी गडडे मे वतन का मुह सालें तथा १२ १४ घर ठडा होन दें। फिर वहा से निकाल कर वारीक पीस लें। फिर इसमे २५० ग्राम अजवायन, १०० ग्राम राई, ५० ग्राम सनवा ठ को पीसकर उसमे मिता। उसमे से २५ ग्राम दवा ५० ग्राम चने ५ अ टे म मिलाकर, गोला अथवा सूषा पशु को दिन म प्रात माय दो बार खिलायें । जब तक ठीर हो, खिलाते रह, वप तय भी। मालिश की औषधि- ११) रोगन महुमा २० ग्राम । (२) रोगन बबूना २० (३) अरडी तेल १०० (४) सरमो तल १०० (2) तारपीन तेल ५० (६) जायफल एक ५० (७) सतवा सौंठ ५ (८) लाहारी नमक ५ (8) कुरासानी अजवायन ५ ग्राम । छ से नौ नम्वर दवाई तक एक साथ पीसकर एक से पाच नम्बर तक के तेल मे घोट दें। उसे जोडा पर मालिश दिन मे एक बार करें। (७) पित्त बाय इममे पशु शरीर पर दापड पड जाते हैं। उनमे खुजली लगी है । पशु उनको मुह से प ड डालता है, खून निन पडता है। इसम पगु के मुह से पानी मिला है। औपपी- ये पत्ते एकत्रिो इनको नम क्लिो पानी म पकाआ, जब ोि पा रह जाये, उसार ला! पत्ते निचोड पर बाहर में दो । बवे पाणी म ५० ग्राम काली मिच पीपार, आधा विला शहट गालर भाषा रिता प्रात दिन म एक बार पशु को दवे, १४ दिन तक । चिरायते का सक एक 1 " " २६ बोतल लेसर ५० ग्राम अक, आधा क्लिो, गाय या वारा ये पच्चे दूघ म मिला कर साय का दें। मालिनदी यौषधी (१) अरीका तेल २५० (२) जारला मार गधा १० (३) नीम की पोपस ४) मेहही २० (५) दही १०० इन सबको एक गाय भिलावें तथा दायर आदि पडे स्थान पर दिन मे एक वार लगावें। (८) गुझ बिस्यारी (फब्ज) गोबर सन्त हो जाता है। गरीर मदद होता रहता है, मगडाई तोडता रहता है । यह बीमारी प्राय वर्षाऋतु मे होती है । (१) मा के पत्ते २१ किलो । (२) गुड २१ किलो। (२) नमक सादा २ क्लिो। इनको तीस क्लिो पानी में मिला कर मिट्टी के बतन म वद करके भूमि में दवा दो । आठ दिन के बाद इम बतन को निका, गड्ढे मे ही खोलो, शाम तक उसी मे खुला रखा रहने वा, साय के समय निकालकर उसे छान लो। एक क्लिो अम्बा हल्दी बारीक पीसकर उसमे डाल दो। उस पानी म से २५० ग्राम सुबह आधा किलो शाम को पशु को दें। प्राय बरसात मे चारे म कोडा हा जाता है जिसके कारण यह पन्ज विस्यारी हो जाती है। यह काढ़ा इस कीडे को ममाप्न करता है, जिससे कब्ज समाप्त हो जाता है। - (8) बुखार नथनो से पानी टपकना, आखा स आसू टपरना, पोर मे मुह लटकाये. खडे रहना। १ ५० ग्राम। उपचार-(१) सम दर झाग (२) माल क्गनी ५० ग्राम " " । (३) मसा गूगल (४) अमल ताम का गुद्दा (५) देवदार बस्दा इनको २५ क्लिो पानी मे किसी भी बतन में पका लो। जब २० किलो रह जाए, उतारकर छान ला । काली मिच पीसकर ५० ग्राम गुड, दो किलो पानी में मिलाकर फिर गम कर दो। इसको ठडा करके आधा किलो सुबह आधा किलो साय को दो और ऋतु के अनुसार पशु पर कपडा डाल दो। जाराम हाने के बाद दस दिन ता निम्न दवाई दें। (१) दूध १ किलो। (२) अम्बा हल्दी ५० ग्राम । दूध को उबालती बार अम्बा हल्दी डालकर एक उफान दे दो, नीचे उतार कर १०० ग्राम शक्कर डालकर ठण्डा करके सुबह-शाम दस दिन तर दें। (१०) फालिज बिस्यारी- पशु का पूरा शरीर शिथिल हा जाता है, तापमान गिर जाता है । चारा पानी, बिल्कुल प्रयोग नही करता है। जिस करवट लेट जाता है, पडा रहता है। उपचार-मोर को पच के दो च दे लेकर, फूककर छाई बना लो राप को योनी घी म मिलाकर पशु की माखो मे डालकर पट्टी बाप दा। भोपारा -दो क्लिो छाय म अजवायन १०० ग्राम, नमर १०० ग्राम हातर धूप मे किमी भी वतन मे डालपर तगभग दो घटे क लिए रस दो। चार इंटे नाल हाने तक गम करो, पशु पर जमी7 तक लग कपडा से ढका पेमा मुह बाहर रहना चाहिए किमी तगले मे गम इट रखकर, भएडा पिडतो तरफ म हटाकर इट पर छाय का छपवा मारो जिममे धुआ उठेगा, सपटा ढा दें। पुए से मुह बचना चाहिए । इसी प्रकार चारो टोपर मानते-बल्लत धमा मारते रहो जब ना धाय गरम हा । पशु को जो पमीना बाये अगर होअर उम पाउन रहा हवा नही लगनी चाहिए। औषयो-(१) जवा मिर्ष २० प्राम, ५० ग्राम गुह मे मिलाकर सिसा ।
उपरोक्त औषधी को भोपारा करने के तुरंत बाद देवें । भोपारा तीन दिन तक दिन मे एक बार देवें । साय को एक किला दूध, १०० ग्राम सीड ग्राम काली मिच, १० मुनका १०० ग्राम घी मे छाकर दूध में उबालकर तीन दिन तक देखें। नोट -अगर पशु पूछ तथा चारो पैर हिलावे, ता यह दवाई ठीक कर देगी अगर पशु एक कान, एक पर हिलावे, तो नहीं बचेगा। पशु की पूछ पर दबाव डालो, अगर वह हिलाये तो समझो बचेगा अगर वह दबाव महसूस ही न बरे तो बचेगा नही । (११) चमक बाय- इसम पशु को चमक होती है, मारता है भागता है, रम्भाता है। पागल सा हो जाता है। उपचार--२५० ग्राम गेहू का आटा मांड लो, उसकी दा क्टोरी बनाओ, दोना क्टोरियो मे २५ २५ ग्राम घी ताया हुमा रक्खो, इनको पशु की आग्यो 'पर रखकर पट्टी से बाघ दो । खडे सीगो वाले पशु के सींगो की नोक पर करीब तीन इञ्च तक मिट्टी के तेल मे कपडा भिगोकर मीगो पर लपेट दो, पट्टी के नीचे की ओर गीली मिट्टी सीगो चारो जोर लपट दा, और कपडे पर आग लगा दो, सीग के पटकने की आवाज तक सीगो पर मिट्टी का तेल डालत रही। सीग को गिरि पटकते ही आग तुरत बुझा दें। दोनों सीगो को गिरि मागे-पीछे पटकेगी, जिस सीग थी गिरि पटके, उमी की आग बुझा दो दूसरे पर जाने दो। जय तर पटके नहीं । जिन पशुमो के मीग बराबर म फले, या नीचे लटवे हैं, उनरे लिए, माकि पशु का कोई मोर हिस्सा न जले, लोहे का टुक्डा गम कर सीग के ऊपरी हिस्म पर कम से कम तीन-नीन बार दोनो मोगो पर दाग दें, जब तक कि मोग को नार पर सुराख सा न होवे । पिलाने को औषधी (१) माले को जड २५० प्राम। (२) आसे की जड २५० ग्राम ।
(३)चिरचिटे की जड २५० ग्राम । (४) केले की जड १२५ ग्राम । (५) गूलर की छल १२५ ग्राम । एन सवा १५ क्लिा पानी म उवालो। १२ वितो पानी बचने पर उतार कर छानो । उसमे ५० ग्राम गोठ सनवा ५० ग्राम कुरेसान अजवायन, १० ग्राम हीग २० ग्राम काली मिच, २ क्लिो गुड, इन दवानी को पीसक, उप ाक्न पानी मे एक किलो पानी ताजा मिलार इह उसमे डालपर एक उवा न दो। इम कार्ड को मिट्टी से बता म ढकर रख दो। चार दिन लगातार सुबह शाम १०० ग्राम की मात्रा मे दी। चार दिन के बाद पहिले १२५ ग्राम चने का भना हुआ आटा सूमा खिलाकर ऊपर से आधा क्लिा काढे का पानी देवें । दिन में दो बार । ५३ वेदन की बीमारी गोबर क रास्त खून जाने लगता है, अधिक बढ़ जाने पर आत कटन लगती है । पशु चाग खाना छोड़ देता है पूरा पारीर गम होकर भभकता है । उपचार-परला (१) इमली के पत्ते २५० ग्राम । (२) काली मिच (यह एक खुराक है) इन दानो वा बारीक पीसकर ताजे पानी म मिलाकर दिन मे चार चार घटे के अतरस पिलाओ। उपचार दूसरा--(१) वेलगिरि (२) जाम की गुठली की विजनी इन दोनो को कूट बर दो पिलो पानी मे पानी । एव पिलो पानी रहने पर उतारकर छान तो खूब ठाकर उसम १२५ ग्राम शहद मिलाकर पिला दा । (पत्ती दवा 4-ने के दो घटे के तर से दिन म चार बार दवें।) इन दवाआ ये प्रयोग के बाद जब खून जावद हो जाता है तो घेरा पतता है, शरीर स गर्मी निकलती है ता निम्न तीसरी दवा प्रयोग करें। उपधार तीसरा-(१) पादीना हरा ५० ग्राम । ५ . २५० प्रम। १० ग्राम (२) सौष ५० ॥ ।
इनको पीसकर एक किलो ठडे पानी में भिगो दो। लगभग छ घटे रक्से रहने के बाद, उसी पानी मे घोटो, उसमे १२५ ग्राम मिश्री मिलाकर पिला दें। दूसरी बार चार घटे बाद पिलावें, यदि छेरा बदन हो तो खून व छेरा बन्द होने पर पशु पारा खाना आरम्भ कर देता है तो निम्न औषधी देवें । दही आधा किलो मे तीन नीम्बुओ का अक निचोडो, २० ग्राम नमक सुलेमानी, ५० ग्राम भुने चने का आटा दही मे मिलाकर, एक खुराक रोज लगातार तीन दिन तक खिलाओ। पशु चारा अच्छी प्रकार खायेगा। नोट-वेदन को बीमारी वाले पशु का तीन अगुल सीधा कान पर से नापकर उसे उस्तरे से काट दें, जब थोडा खून बह जाय, तो फटकी सफेद, बारीक पीसकर कटी हुई जगह पर लगा दें, ताकि खून बद हो जाए । अगर किसी कारण खून बन्द न हो तो एक कटोरी आदि मे सिरका डालकर, उसमे कान डाल दें, सून अवश्य ही बन्द होगा। इसके पश्चात् कान को किसी रस्सी में भाषकर सीम से बांध दें ताकि कान हिलकर, सून न निकले। ५४ गाय तथा भंस का फूल निकलना उपचार-(१) गोला २५० ग्राम । (२) देशी घी २५० ग्राम । (३) खाड गोला कसकर, सब एक साथ मिलाकर गर्म करके अच्छी प्रकार पका लें, ठा करके, पशु को न्याने के कम से कम दो महीने पहिले एक या दो सुराक दे दें। एक खुराक एक दिन मे। उपचार र--(२)-(१) बकरी का दूध आधा किलो। (२) चाक के पास की रखी कुम्हार की हडिया की मिट्टी 4- २५० ॥ (४) पानी २५०-॥ ५० प्राम। (३) शहद ५० ग्राम । इन तीनो को मिलाकर, फूल जरा भी दीखने पर लगातार आठ दिन पिलावें। मह ओषधी व्याने से चार-पाच महीने पहिले प्रयोग करने की है। उपचार--(३) (१) चिरनी सुपारी आधा किलो।
३४ २५० ग्राम " -- (2) चुनिया गोद इहें एक जगह मिलावर, २५० ग्राम उडद की दाल धोकर, पीसकर, इस दाल मे पचास ग्राम औषधी मिलाकर आठ दस दिन एक खुराक रोज पिलावें। यह औषधी दस से बीस दिन पहिले ब्याने के फूल निक्लता देखकर देखें। उपचार-(४) जो व्याने से दो-चार दिन पहिले फूल चमके उसको औषधी । (१) कधी की डोढी, २५० ग्राम । (२) मेहदी 50 ग्राम । इनका एक जगह मिलाओ, तीन खुराक बनाओ, तीन दिन तक २५० ग्राम देशी घी मे मिलाकर पिलाओ। फूल निकलने पर जिस पशु का फूल निकल जाय तो उम पर शराम का छोटा देकर जूती आदि का सहारा देवर अदर धकेलें । (अगर कछुए की खोपडी की भस्मी मिल,जाए तो निक्ले फूल पर शराब का छोटा देकर उसके चारो ओर कछुए की खोपडी की भस्मी बुरककर उसे अन्दर कर दें। अगर हो सके तो दो चार बार भस्मी को बाद मे साये में फक दें। .) उपचार-(५) (१) कधी का अक २५० ग्राम । (२) सूजी २५० ग्राम । २५० ग्राम। (२) घी देशी २०० ग्राम । चारों को एक साथ मिलाकर'(गोला कसकर) एक दिन छोडकर एक दिन तीन खुरार लगातार देवें। (मह दवा फूल दीखने से जब तक ब्यावे कभी भी दे सकते हैं । आराम करेगी। उपचार-(६) (२) कच्ची राल २५ ग्राम लगातार तीन नि ता पीसकर ताजे पानी से एक नाल के साथ देखें। (मह औषधी भी कभी भी दे सरते हैं)। ५५ अकडे की औपधि पशु के चारो पर अबड जाते हैं आस लाल हो जाती है अगर पडा हो (३) गोला ܝܩܪ पांच ग्राम। - - . 7 -- " T । जाय तो पर डगमगा जाते हैं। सावधानी-मक्डे में आये पशु को बैठे हुए को उठाना नही चाहिए। उपचार-(१) काली मिच पाच ग्राम । (२) हल्दी देशी बीस ग्राम। (३) अजवायन बीस ग्रोम । (१) हलवा इन चारों दवामो को १०० ग्राम घी मे भूनकर १ किलो दूध में छोक देखें। दो उफान आने पर उसे उतार लेवें। उसमे १५० ग्राम पपमा मीठा मिलावर ठडा करके पिलाओ । पशु पर कपडा डाल दें। पसीना आये तो उसे अन्दर ही पोछे । एक खुराक रोज तीन दिन अवश्य दें। ५६- (क), जोर आने पर (छाती भरने पर) इसमे पशु की छाती भर जाती है । उस पर सूजन आ जाती है । अगले पर कचे उठाकर रखता है। । रूंआ फाड़ता है। चारा कम खाता है, पानी कम पीता है। उपचार-(१) सितावर ३ किलो। (2) अम्वा हल्दी किलो। (३),पोहकर मूल क्लिी। भीका माली क्लिो। इन चारों दवाओं को एक साथ कूट लें। इसमे से ६० ग्राम दया, सवा किलो दूध, ३६० ग्राम पानी, एक साथ मिलाकर पवावें । खूब उबालकर नीचे उतार, उसमे १०० ग्राम चीनी मिलाकर पशु को चारा खाने के बाद दिन में एक बार, साय के समय-धोवीस दिन तक लगातार देवे । चारा खाने से पहले 'प्रात काल की औषधी- (१) गुलाबी फटकी एक किली। (२) लोटा सज्जी सफेद आधा क्लिो। दोनो को एक जगह कूट लो, ५० ग्राम औषधी प्रात ताजा पानी के साथ चौबीस दिन तक देखें। ५७ लिफाडा (फोडा) (१) यह एक प्रकार का फोडा होता है । जो पशु के शरीर में कही भी हो जाता है। यह कई प्रकार के हैं । '(१) जैसे हडह बहायला (२) विष - । । 1 . 7 . 7 बहायला (३) जल बहायला (४) वेन बहायला (५) बाय बहायता आदि-आदि। (१) हड पहायला-- इसमे पशु की हड्डी मे मवाद पट जाती है, वह सदा बहती रहती है । फुके हुए मुर्दे की हड्डी २५० ग्राम एक हडिया मे बद करके बाग के दहरे रख दो, उस हाडी की फुककर छाई हो जायगी। ५ ग्राम हहही की छाई लो, ५० ग्राम ताजे पानी मे घोल लो, इस तैयार दवा को पिचकारी मे भरकर घाव याले हड्डी के स्थान पर सुबह शाम भर दो, जब तक ठीक हो, यह प्रक्रिया जारी रहे । पशु जब तक ठीक हो, पेठा आधा किलो सुबह आधा किलो शाम रोज कच्चा सिमा । (२) विष बहायता- यह फोडा अधिकतर छाती पर आता है। यह शरीर के बाहर दिखाई देता है। उपचार-(१) मैसा गूगल ५० ग्राम । (२) गेरू पक्का (३) कीकर गोद २० ग्राम । (४) मेथी (१) माथे की लकी बकनी २० ग्राम । इनको पीसकर, कूटकर, पानी मिलाकर घुटाई करो। पशु के कोडे पर इसका लेप कर दें। ध्यान रहे जब तक यह मेप सूचे नही, पशु को बठने न दे । इसके लेप बढाएँ, दूसरा लेप तीन दिन पश्चात चढ़ायें, पहला सेप पोकर साफ कर ही दूसरा लेप चढायें । इसी प्रकार ठीक न होने पर तीसरा, चौया लेप बढा सकते हैं। पिलाने की औषधो-(१) माले के पते आधा किलो । (२) बिडाल मोठा ५० ग्राम । (३) चिरायता ५० ग्राम । इसको ७ किलो पानी मे पकवायें पकाती बार २५० ग्राम, नमक छोड़ दिया जाय, ५ क्लिो पानी रहन पर उतारकर छान लो, उसमे से २५० ग्राम पानी सुबह २५० ग्राम पानी साय को, सुबह चारा खाने से पहिले शाम को साने के बाद मे। ५०ग्रामा २० ग्राम M ३७ 7 F (३) जलबहायला- यह फोडा पेट के नीचे, पीछे से आगे गदन के नीचे तक कही भी उभर आता है । इस फोडे मे पानी भर जाता है। लेप -(१) लाजवन्ती ५० ग्राम । (२) गेरू पक्का ५० ग्राम । (३) सरेश ३० ग्राम । सेलखडी २० । सरेश को अलग गम पानी में भिगोलें व गम करलें। बाकी दवाओ को इसी मे पीमलें। इसका लेप रोजाना लगभग तीन दिन तक उसी लेप पर करते रहें। लाने की दवा -(गठिया बाय मे पिलाने वाली दवा दोहराओ।) (४) बेल बहायला- यह शरीर मे बल की तरह, कभी पेट के नीचे तो कभी कमर के ऊपर या क्भी रही और गूले की तरह उभरते रहते हैं। खाने की दवा-(१) साँप की काचली लगभग दो तीन फुट । (२) धतूरे की डोढ़ी दो । (३) जवा मिचं २० ग्राम । (४) चिरचिरे के पत्ते २५० ग्राम । एक हडिया मे इन सब दवाओं को रखने १२५ ग्राम देशी नमक रखके हाडी का मुह बन्द करके दहडे मे रखकर फूक दो। दवाओं की राख हो जानी चाहिए, चाहे हाडी दुबारा दहडा मे रखनी पडे । इस भस्मी मे १ किलो भुने चने या मेथे का चून मिलाकर रख लो, इस दवा मे से २० ग्राम सुबह, २० ग्राम शाम ताजे पानी के साथ सुबह चारे खाने के दो घण्टे पहिले या माय को चारा के दो घण्टे बाद मे जब तक ठीक हो, खिलाते रहें। (५) बाय बहायला- यह भी शरीर में कही भी हो जाता है इसे पशु अधिक महसूस नहीं करता है। औषधी-(१) इद्रायण २५० ग्राम । (२) सौंठ १०० ग्राम । (३) कुरैशानी अजवायन ३० ग्राम, (४) कर की छाई १०० ग्राम । ५ क्लिो गुठ, ५ किलो मेथे के चून मे मिलाकर २५० ग्राम सुबह, २५० ग्राम शाम को खिलावे। T ३६ - (६) ऊबक पहायला- यह पशु को गदन पर मुह के नीचे ठोटो पर निकलता है। लेप--(१) साड २५ ग्राम, (२) गेरू ५० ग्राम, (३) काली जीरी ५० प्राग, (४) सेलखडी ५० प्राम, (५) क्ली १०० ग्राम, (६) एलवा ५० ग्राम । इन सबको एर जगह मिला कर पीस लें, अगर पानी की जगह सिरका मिला कर लेप तयार करें तो अधिक लाभदायक है। लेप लगा कर करसी स सेक स । रोजाना, तीन दिन तक लेप लगायें। पिलाने को औषधी-(१) चिरचिटे के पत्ते ५० ग्राम, (२) काली मिर्च ५ग्राम। . - T इन दोनो को एक जगह पीस कर गम तेज पानी में मिला कर दिन में तीन बार पिला दें। ५८-गलघोट यह फाडा बिल्कुल टेटु मा पर निकलता है, इतनी सूजन आ जाती है कि सास नली बाद हो जाती है, इसे गलघोट फीडा कहते हैं । गलघोट फोडा बहुत जल्दी बढता है-अगर कोई कर सके तो इस स्थान पर गम सरिया कर दाग दे दिया जाय, जिमसे उसका सोतन उतर जाता है, जला भाग बाद मे ठीक हो जाता है, उसकी मियाद १२ घटे है । इसी समय में उपचार हो जाना चाहिए, नहीं तो पशु नहीं बचेगा। खिलाने की दवा- एक दम काले कुत्ते की पूछ के दस-पन्द्रह बाल फाड कर गुड मे मिला कर खिला दें। औषयो--(१) जवा मिच ५० ग्राम, (२) कलमी सोरा ५० ग्राम, (३) कपूर टिक्यिा ५ ग्राम । मिच इतनी फूटी जाए कि साबुत बोजन रहे । फिर कलमी सोरा, कपूर मिला कर कूटें। ५०० ग्राम मंदा क्पड छान करके, उसकी चकलाबेलन पर रोटी बनाओ, ३ r . ये दवायें इसके बीच म रस कर इसका शोला सोखनासो- उपलीमा दहा सिलगा वर जब धुआ न रहे, उसके बीच मे शीना रख दो, अगर कहीं से गोला फूट निकले तो उस पर चून लगा दे और मोकाला होने तक भर्ने । फिर इसे ठण्डा करके इमामदस्ते में फूट लें। बीस धीस ग्राम की गोलिया बना लें, २५० ग्राम पानी में एक गोली धोलो, दो घंटे के अंतर से जितनी दी जा सके दे दो। पिलाने की औषधी- (१) इमली के पत्ते ५० ग्राम, (२) काली मिच १५ या २० । इन दोनो का पीस कर पानी में मिला कर जल्दी जल्दी पिला, दो-दो घटे के अतर से। ५६-(क) पशु की आखो का उपचार पशु की आख लाल हो जाए, ढीड आने लगे, फोला पड जाए आदि-आदि। औषधी--(१) काले सिरस के चीज दो रत्ती, (२) अफीम एक रत्ती। इन दानो को एक साथ पीसकर मिलाकर, न्योनी घी में मिलाकर, सुवह- शाम पशु की आखो मे डालें। - दूसरी औषधी-(१) भेड़ का दूध, (२) नमक सादा कपडछन ३ ग्राम, (३) अफीम १ ग्राम । भेड के दूध मे पकाकर मरहम बना लें तथा सुबह शाम डालें। (ख) कान की औषधी कान मे फुसी हो जाए, बहने लगे। औषधी-बेरी के पत्ते २५० ग्राम, (२) नीम के पत्ते २५० ग्राम, (३) नीम के पत्ते २५० ग्राम, (४) तहसन का अक १० ग्राम, (२) प्याज का अक १० ग्राम, (६) अजवायन ५ ग्राम । इन सबको १०० ग्राम सरसो के तेल मे पका लें जब पत्ते काले हो जाए, तेल को छान कर शीशी में रख लें, कान साफ करें तथा पिचकारी से डालें। . १ + - ४० T + - "1 ६०-जेल (जेर) गेरना कभी भी गाय मम ब्याने पर जेर नहीं गेरती, पशु को जेर ज्यादा से ज्यादा व्याने के पाच घटे बाद तक डाल देनी चाहिए। औषधो-२ किलो पानी उबालो जब १६ किलो रह जाए उममें ५० ग्राम सोंठ, ५० ग्राम अजवायन, २५० ग्राम शक्कर, १५० ग्राम सरमों का तेल, रहे पानी में मिलाकर पशु को दे दें। यदि इतने पर भी न डाले तो औषधी-(१) गूलर की छाल २५० ग्राम, (२) आम की छाल २५० माम, (३) जामन की छाल २५० ग्राम । इनकी कुट्टी काटकर ५ किलो पानी मे पकाओ, जब २ किलो पानी रह जाए उसे छान लो, उसमे ५० ग्राम सुहागा, ५० ग्राम नोसाद्दर कतली, ५० माम अजमोय । इनको पीसकर इसी पानी में मिला दो। क्लिो गुड डालकर फिर उबाल दे दो ताकि गुड मिल जाए । २० ग्राम चौंटली, इन्हें बहुत बारीक पीसरर चटनी बना दो, तमाम चटनी को नाल पर रखकर आधा किलो उप रोक्त पानी के साथ देखें अगर फिर भी जेर न डाले तो पांच घटे बाद एक तोला चौंटली पीसकर उपरोक्त काढे पानी के साथ देवें। ६१-जेल (जेर) डालने के बाद अगर मैला न डाले औषधो-(१) जापे का बत्तीसा आषा स्तिो, (२) दशमूल दो बोतल । बत्तीसा को कूटकर आठ खुराक बना तो, ५० ग्राम बत्तीस २५० ग्राम गुरु, १ क्लिो पानी म पवावें, जब १ क्लिो रह जाए नीचे उतारकर ठग पर लें, उसमे दशमूल की बोतल का एक चोयाई मिलाकर दिन में एक बार - धाम प्रात ६ (यह रेवल एक समय की औषधी है।) , नाम देने की दवा- माधी रिसो सरमों दलार बाधी ग्लिो छाछ म भिगोकर रख यो २५० ग्राम गकार गसार पशु भो गिलाओ। आठ दिन तर हिलायें। साप हो जाएगा।
अगर किसी पशु को मैला रुक जाता है और दूध देना बंद कर देता है।
नेहोशी मी की दशा में रहने लगता है तो
औषधी--(१) शराब २५० ग्राम देशी, (२) वच्चा दूध आधा किलो।
(गाय हो तो भेस का, मस हो तो गाय का)
दोनो को एक साथ मिलाकर दिन में एक बार चार दिन तक दें।
६२-मुह के मवासे व अलाई
मुह मे जो अदर कगारे से होते हैं, वे फूलपर नीले रंग के मोटे हो जाते
हैं, उहे मुह के मवासे कहते हैं। जीम के कार जो गुठली सी होती है वह
फूलकर मोटी हो जाती है, उसे अलाई कहते हैं । इन दोनो बीमारियो में पशु
चारा खाना तथा जुगाली भी बद कर देता है।
औषधी - (१) मक्का की कूकडी की गिल्ली एक, (२) नमक ५० प्राम,
(३) अकरकरा २० ग्राम ।
इन तीनो को एक जगह मोटा मोटा पीस लें, इसको फिर पशु की जीभ
की गुठली व मवासों पर रगहो । मवासो से खून निकलेगा, दोनो रोग ठीक हो
जायेंगे।
-
६३--पर को
गुम
चोट
औषधी सेलखडो २० ग्राम, (२) पना (दीवार) ५० प्राम, (३) हल्दी,
दार २० ग्राम, (४) सीरा १०० ग्राम, (५) दीवार की रेह, ५० ग्राम, (६) सरसो
का तेल ५० ग्राम।
इन सबको एक बर्तन मे पका लें, जब मिल जाए तथा मरहम सा बन
जाए तो उतारकर कुछ निवाया-निवाया सा भरहम रुई के टुकहे पर रखकर
चोट वाली जगह पट्टी से बांध दें, चौथे दिन दूसरी पट्टी बाप ।
६४-नसपाड
जब किसी पशु के किसी भी पैर की नस के ऊपर नस चढ जा
जो लग करना है, उसे नसपाह कहते हैं।
+1
है - ग्राम, (३) मोआ औषधी -गुम्मा २५० ग्राम, (२) विसेन्दू के पत्ते २५० ग्राम, (३) नमक देशी १०० ग्राम। इन तीनो को १० निवो पानी मे उबालें । जब आठ किलो रह जाए उसे उतारकर नसपाट की जगह के ऊपर एक कपडा रखकर गम-गम पानी से उसे झारते रहे । जब पानी समाप्त हो जाए उस स्थान को कपडे से पोछ कर साफ कर सुसा दें। यह प्रक्रिया तीन दिन तक करें। मालिश का तेल (१) तिल का तेल ५० ग्राम, (२) अलसी का तेल का तेल ५० ग्राम, (४) बवूना तेल ५० प्राम, (५) सरसों का तेल १०० ग्राम, (६) सिदूर १० ग्राम, (७) कतूर की टिकिया चार, (८) तारपी का तेल १०० ग्राम (E) स्प्रिट २०० ग्राम । नोट- (कपूर पहिले स्प्रिट म घोल, उसके बाद उसम, तारपीन का तेल डाल दें। फिर ७ ८, ६ मिली दवा में उपरोक्त सब तेल व सिदर मिला देखें । मिश्रण को शोशी मे डाल लें तथा नसपाड की जगह पर इमकी मालिश प्रतिदिन दो बार तीन-चार दिन तक करें। इस मालिश के बाद सिकाई आदि पहबान-जिस पर मे मासपा हो, उस पर पोतनी मिट्टी का लेप करें, जिस जगह नमपाड होगी वह स्थान देर में सूखेगा अर्थात् और स्थान सूक्ष जावेगा, नसपाह की जगह गीली रहेगी। ६५-पैर में फाली लगना औषधी-(१) सीरा २५० ग्राम (२) मुहागा३० ग्राम, (३) नमक देसी ५० ग्राम (४) सिदूर २० ग्राम, (५) भाग ३० ग्राम । इन सबको एक जगह सौरे में पकावर, पाली लगे स्थान को नमक के पानी से धोकर अच्छा तो यह है कि जब दवा पकावें तो साथ ही रुई का शुकडा बर्तन में डालकर अलट पलट करते रहे, जब सारी दवा हई म चिपट जाय तो कुछ ठडा करके, निवाई-निवाई, फाली लगी जगह पर यह रुई रस नपरे। . - है कर पट्टी बाघ दें, पट्टी करीद चार दिन, रहनी चाहिए, फिर दूसरी पट्टी बाध ६६-घाव ! शरीर में कही भी धाव कसे भी हो जाता है। औषधी--(१)-साईकिल टायर वा दो फुट लम्बा टुकडा लेकर उसकी छाई बना लो, १०० ग्राम सरसो का तेल, १० ग्राम नीम की कोपल १० ग्राम सिन्दूर इन सबको तेल मे घोट लें, जब मेरहम बन जाए तो घाव को जगह पर, घाव को नीम के पत्ते के पके पानी मे साफ कर दिन में दो बार लगावें, जब तक ठीक हो, लगाते रहे। औषधी २-(१) राल कच्ची १० ग्राम (२) कच्चा बेरजा १० ग्राम (३) पपडिया तया १० ग्राम (४) सि दूरी २० ग्राम (५)पूर दो टिकिया (६) मुर्दासिंह (पहछन करके) २० ग्राम (७) सरसो का तेल, ५० PE ' इसको तेल मे घोटकर पाय के स्थान पर साफ करके दिन में दो बार जब तक ठीक हो, लगावें। ६७ धाव में कोई पड़ना औषधी ~(१) आडू के पत्तो का अक २० ग्राम (२) कपूर डली का ५ ग्राम (३) त्रिपर्ण का तेल इन तीना दवाओ को एक साथ घोटकर रुई मे भिगोकर धाव मे लगा ग्राम . 5 २० ग्राम - - " पशु ठीक है, परन्तु चारा कम खाता है। औषधी --(१) गुलाबी फ्टकी एक किलो । (२) नमक देशी ढाई किलो। , (३) भांग २५० ग्राम । (४) गुड नाधा किलो । (3) अजवायन २५० ग्राम । इन सबको एक साथ पाच क्लिो छाय मे पकाओ, जब हलवा सा रह जाय, उसे एक मिट्टी के बतन में रख ला, इस चटनी को ५० ग्राम दूसरे-तीसरे दिन चटा दें, अथवा शय मे घोलकर नाल से दे दें। - 'EE-सींग टूटना उसो समय, या तुरन्त पाई मस का पहले खीस मे एक पौआ भिगोकर टूटे हुए सीग पर चिपटा दें, टूटा सीग, जुड़ जायेगा, फौआ ठीक करने पर ही हटेगा। , . " दूसरी औषधी २-औरती के सिर के बाल, ईट का खोरा, सरसो का तेल टूटै संग पर डालकर इहें चिपटा दें, रोज तेल गम के करके प्रतिदिन उस पर डालते रहें। अगर घाव रह जाय तो, मुर्दामिह कपडछन करके, सरसों के तेल मे मिला कर घाव पर लगायें। ६६-चल के कन्धे में चादी हो जाना जिस स्थान पर (क घे) जुआ रक्खा जाता है, वहां गोल रुपये जितने स्थान पर घाव हो जाता है वह कभी रुक जाता है, कभी खुल जाता है । उसे माघे मे चादी का रोग कहा जाता है। औषधो १-मुर्दासिंह को पडछन करके सरसों के तेल मे घोटकर, जब जा तब लगायें, जब हल से छोडे तब लगायें। दूसरी भाषषी २-गाठे का कपडा २५ सेंटीमीटर लो, इसको आखे के दूध मे अच्छी तरह भिगोकर छाया में सुखा दें, तीन दिन बाद फिर इसी कपडे पो आसे के दूध मे भिगोकर धूप में सुखाने जग खूब सूख जाये, इसको जला- पर राख कर दो। (१) जवा मिर्च २० ग्राम । (२) कपूर दो टिकिया। ५० ग्राम रात तथा इन दोनो देवाश्रो को सरसो के तेल में पाओ, गा मिष माली पर जाय नीचे उतार कर घोट लो। यह मरहम सा बने जाएगा, 'इमको पाय पर हल में जोड़ने से पहिले तथा हल से छोड़ने के पश्चात सगा। -बत्तीसा यह औषधी बत्तीस पेड़ों की बरसी की छाल से बनती है । मह पशु जोर पर तुरे हायमेरी सरारी या मेस-गामापा बिगडने पर, पशु 4 ४५ मैल मे आ जाता है, इन सब को ठीक करने की औषधी है। किन्ही बत्तीम प्रकार के वृक्षो की छाल आधा-आधा किलो लो। इन सबकी कुट्टी काटकर ३० किलो पानी मे किसी बडे बर्तन नाद मादि मे भिगो दें उसमे तीन-चार दिन भीगा रहने दें। फिर किसी बडे वर्तन में इतना पका कि ३० किलो पानी का २० किलो पानी रह जाय । उसे उतार कर छान लो, उस बचे पानी मे डेढ किलो काला नमक, २५० ग्राम अजवायन, २५० ग्राम सौंप, १५० ग्राम तई का नोसाद्दर, २५० ग्राम छोटी हैड, १० मा हीग लहसनिया, इन सबको बारीक पीसकर उसी पानी में मिला दें। हाजमे के लिए पशु को दो-तीन दिन मे आया किलो पानी एक बार, बीमार पशु को आधा किलो, रोजना,'चारा खाने के बाद मे हैं। ७१- कधे फूलने पर थोषको १-(8) सीरा १०० ग्राम । (२) धूना दीवार का ५० ग्राम (३) हल्दी अम्बा १० ग्राम (४) नमक देशी २० ग्राम (२) रेह ५० ग्राम इन सबको ५० ग्राम सरसो के तेल मे पकाकर, जव मरहम सा बन जाय, उसके करे पर लेप कर दो, इसी सेप के साप, २५० ग्राम सरसों का तेल १०० ग्राम पानी में घोटकर दोनो नयनो के द्वारा पिला दो। मोषधी २-(१) आख धतूरे की होडी एक । (२) अम्बा हल्दी ५०. 7 . प्राम। इन दोनों को एक जगह पीसकर सूजे हुए रघे पर लेप करें। ७२-पशु का नम जाना जिस पशु के कधे को दोनों ओर की नसें अकड जाती है । जिससे पशु की गदन नही हिलती । न वह चारा खा सकता है, न पानी पी सकता है अर्यात् गर्दन ऊपर-नीचे नहीं कर सकता। औपषी -(१) दम किलो ताजा गोवर लेकर उसके कघे पर नसों मे दूर से फैक्कर मारें, जब गोवर सत्म हो जाय तव दस पिलो पानी में आधा गिलो विसादु के पत्त, आधा क्लिो गुम्मा, २५० ग्राम सादा नमक, इनको पानी में . y --- 11 सुहागा उसमे मिलाकर मरहम बना लें। इसका फटे या पर, दूध निकालने के पमाले, जब पानी आठ क्लिो रह जाय, नीचे उनरिगरनवाये-नवाये पानी में उमौधे को शारें। औषधी --(२) धार-पाच उरले लो, जनरे 'दो दो टुकड़े कर उनके अगार बना लें, दो किलो छाय लो, उसम'२५० प्राम नमक डाल दो, जब । उपले के टुकड़े, अगार हो जायें, उनमे से एक लें और डालते ही एक्दमै निकाल लो, उसको किमी बोरी के टुकड़े में लपेट कर सकी सिकाई करें, इसी प्रकार मन पगारो से सिकाई पर, अगारे समाप्त होने पर जा पाय वर्षे उससे पधा झार दें। ७३पशु को पूछ फटना या गलना जहाँ से पूछ गल गई है। उसके उपर से पू, को काट दें। सरसों के सदक्ते सेल, मे पूछ का सिरी दे दें, जब सन निकलना बद हो जाय, तब पूछ को तेल में से निकालकर गम गम मूबल (राख) में बांध दे। ७४-बिसवा गाय या मस के माने के पश्चात् पो"पर सूजन औ जाती है । बाल पर सूड तक झलका यानि, सोजन मी आ जाती है। कभी-भी ज्यादा सोर्जन आने पर पन फट भी जाते हैं । औपयो १-(१) हल्दी १० ग्राम (२) अजवायन '१० ग्राम (३) खाह इन तीनों को एक जगह मिलावर, एक अगारे-पर थोड़ी-चोटी डालकर, जा धुआ उठे, उसस उस स्थान को सेव करें। फिर २० ग्राम सुहागा सेपर उसको तवे पर भून लें, फिर उसे योनी घी को पानी में पन्द्रह-बीस बाद लेप कर दें। जब तक ठीक हो लेप करते रहें। 'औषधी २-२५० ग्राम सरसो का तेल किसी बलन में पकायें। उसमे करीव ५० ग्राम मोम पकते तेल में डाल दें। अगर मोम न मिले तो मोम की बातो मास दें। जर्भ'वह सब पक जाय, तो किसी चौहे बतन में एक किलो " -1 २ - - , १० ग्राम - 'वार धोवर 'पानी में खोलते तेल को उस पानी मे -एक्दम पलट दें। उस पानी के ऊपर मोम तेल दोनो का चक्कर सा जम जायेगा उस चक्के को किसी वतन में रख कर उसमे १० ग्राम मुर्दासिंह पहछन करके उसमें घोट दें। दूध निकालने के बाद उस मरहम को थन पर लगायें। किसी मनुष्य के पैर, पकते हो, दिवाइ हो, वे भी इसे प्रयोग कर सकते . + . 11 FILM पिलाने की औषधी -चिरचिटे के पत्ते ५० ग्राम, काली मिच ३ ग्राम एक साथ पीसकर, ताजे पानी में मिलाकर कई बार पिलाए, अर्थात् जब पशु पानी पिये, उमको पानी की बाल्टी मे मिला दें। ७५ थान रुकने को, दवा. जब पशु पा किसी कारण से थन मे से दूध निकलना बद हो जाता है और-मवाद या खून आने लगता है। "औषधी आधा किलो पानी मे २५-ग्राम नमक डालकर गम नरें, पानी को एक गिलास मे करके निवाये निवाये पानी मे, उस यन योद दें। काफी,देर पश्चात पहिले उसफा दूध आदिया जो कुछ भी मवाद मा खून निकले हसे निकालें । उसके पश्चात् अमृत बूटी २० प्राम को ५० ग्राम सरसों के तेल मे पका लें, जब अमृत बूटी की राख हो जाए तो तेल को छानकर शीशी मे कर लें। इस तेल की मालिस उस धन पर करें। अगर अमन यूटी न मिले तो, रिन स्लोएस याम, की मालिश पन पर करें। पिलाने की क्या-२५० ग्राम सरसों का तेल, १०० ग्राम नींदू का अर्क । (यह एक खुराक है।) इन दोनों को एक जगह मिलायर रोजाना एक खुराक तीन चार दिन तक . 1 ७६-पशु के शरीर पर दाफड पड जाते है, उनमे कीडा पड जाता है। पोने की दवा-चिरायता ५०० ग्राम, अजवायन कुरेगानी २५० प्राम, ४८ - खिलावें। पली का नमक, हल्दी देशी, खाने का सोहा, इन तीन दवाओं को एक अकरकरा ५० ग्राम, नमक मनिहारी १० ग्राम, काला नमक १०० ग्राम, काली मिचं १० ग्राम । इनको पाच किलो पानी मे पका लें, ५०० ग्राम पानी सुबह ५०० ग्राम शाम का दें, शाम को पारा पाने के बाद २५० ग्राम मेषे का चून भिगोकर ७७--जू मारने की औषधि पशु के शरीर म जू पड जाने पर-- हल्दी देशी २० ग्राम, कच्चा दूध २५० ग्राम, सरसो का तेल ५० ग्राम । इन तीनों को एक जगह मिलाकर पशु की मालिश करें, तीन-चार दिन नहलाए नही। दिन में एक मेयो का धून ५०० ग्राम खिलायें तो और भी अच्छा है । देशी घी गम करके मालिश भी जू मार देती है । ७८- ताकत की औषधी राई १०० ग्राम, सोमा १०० ग्राम, सौफ १०० ग्राम, धनिया ५० ग्राम, हालो १०० ग्राम, अजवायन कुरेशानी १०० ग्राम, अजवायन देशी ५० ग्राम, बाव भडग ५० ग्राम, छोटी हैड ५० ग्राम, सुहागा ५० ग्राम, नौसादर का ५० ग्राम, नौमादर तई का ५० ग्राम, अम्बा हल्दी ५० प्राम, समन्दर मान ५० ग्राम, लोटा सज्जी ५० प्राम, अजमोध ५० प्राम, हीग ल्हनिया २० ग्राम, नमक मनिहारी ५० प्राम, नमक सारी पेला ५० प्राम, नमक साल्ट ५० ग्राम, काला नमक १०० ग्राम, फटकी सफेद ५० ग्राम, फटकी गुलाबी ५० ग्राम थैली का नमक पिसा हुआ २०० ग्राम, हल्दो देसी पिसी हुई १०० ग्राम, साने का सोडा ५० ग्राम, भाग ५० ग्राम, गुड २५० ग्राम । साप पीसकर अलग रख लो गुड भी अलग रखो। बाकी सब दवायें एक साथ कूटकर आठ किलो छाछ में पकाओ। जब भी उफान आये, तीनों दवाओ के घृण में से २५ ग्राम कदाई में दो, जब भी उफान आए ऐसे ही करते रहो । फिर उसम गुड डाल दो, जब ढाई मे से छोटे फुदकने बाद हो ना और हलवा सा बन पाये उसे नीचे उतार लो, उस हलवे को एक मिट्टा के *
४६
बतन मे रख लो। इसमे से प्रतिदिन ५० ग्राम हलवा, एक किलो दही, २५०
प्राम चने के चून में मिलाकर एक बार पशु को खिला दो।
यह औषधि जा पशु जोर पर आया हो, मैल मे आया हो तथा ताक्त के
लिए लाभदायक है।
५८-पेशाब मे खून आना
२५० ग्राम भग लेकर पानी मे खूब उबालो, १ क्लिो पानी का
किलो पानी रह जाये तो उतार लो, भांग खूब मलकर मुतान का रास्ता छोड
कर उसे बाघ ला । बवा पानी आधा क्लिो म १२५ ग्राम गुड मिलाकर पिला
दो । जब तक सुजाक सही न हो, यह प्रक्रिरा रोजाना जारी रहे।
५६--पशु को सुजाक होना
पोदीने का अक १२५ ग्राम, प्याज का अक ५० ग्राम, घी देशी १५०
ग्राम । (यह एक खुराक है।)
इन तीनो का मिलाकर दिन में दो बार देवें। दो नीन दिन तक देखें।
६०.-पशु के पेट मे ही बच्चा मर जाय और निकल
न रहा हो
औषषि (१) सोठ १०० ग्राम सिरका १०० ग्राम, चिरचिटे की जड
१०० ग्राम, गुड २५० ग्राम ।
सोठ, चिरचिरे की जड, गुड एक साथ कूटकर डेढ किलो पानी में पकायें,
जब एक किलो पानी रह जाये, नीचे उतार कर १२५ ग्राम सिरका डाल दें
और यह दवा पशु को दे दें।
यदि इस दवा से बच्छा बाहर न आये तो निम्न दवा दें-
तालमखाना ५०० ग्राम, गुड ५०० ग्राम ।
इन दोनो को हेढ क्लिो पानी मे पकायें । जब एक किलो रह जाए, नीचे
उतारकर पशु को देवें, बच्चा अवश्य ही आ जायेगा।
तालमखाने की पहचान-यह पौधा पुराने नाले, तालाब के किनारे उगता
है । इस पर सफेद फूल आता है और फूल के ऊपर काटे होते हैं।
-
जिसके चारों पर पखाले (सफेद), माथे पर खुला पटटा, निवला होंठ
सफेद, वह बढिया, स्वस्थ घोडा होता है।
जिस घोड़े के तीन पर पखाले, दाहिना पर अगला हमरग, मापे पर पान,
वह बहुत भाग्यशाली घोडा होता है जिसके गदन के नीचे लम्बी देवमन होगी
(लम्बी भोरी) वह शुभ होगा।
अश्व (घोडा) को औषधिया
(अ) शुभ लक्षण
जिसके पैर मे पदम हो वह बेशकीमती घोडा होता है (दम-पर के गट्टे
के नीचे सुम तक मोर के च दे जसा गोल निशान होता है, जो शीशे की तरह
झिलमिल चमकता है। जिस घोडे की पूछ में ताद हो, जिस घर में रहेगा,
वह घर धनवान बनेगा।
जिस घोडे के पैर के नीचे गंगापाठ (भोरो) जो तग के दोनो ओर बाहर
निकल जाये, बह घोडा शुभ होता है।
जिसके माथे पर दो भोरी ऊपर नीचे हों, उसे दोघड कहते हैं, शुभ होती
हैं । जिसके गले का कठमन हो (गले पर दो भोंगे), शुभ होती हैं। छोटी पीठ,
लम्बी पूछ, मोटी रान वाला पाहा मजबूत और सवारी के लिए
अच्छा होता है । उसकी उन अधिक होती है।
(आ) अशुभ लक्षण
(१) सबमे बहा ऐव, सोगन (माये पर दो भारी बराबर मे),
(२) अकरम, माथे पर टीका इतना छोटा हो कि हाथ के अयठे के नीचे
दब जाए,
(३) हृदावल (छाती के नीचे गोल भोरी)
() चतर मग, (वह भोंरी जो सबार के नितम्बों के नीचे आ जाये।
ऐसे पोहे पर चढ़ने से घोहे व सवार दोनों को मति मग हो जाती है।
(५) सपिन पान से सेवार पाड के पीछे तक लम्बी भोरी, जिसमा मुह
सवार की तरफ हो,
(१) गोम गोल भोंरी जो तग के नीचे दब जाए,
छोटे कान,
(७) जिस घोडे के पुट्ठो पर कई रग के टीके (जाल) हों, (८) कुलच, जिसके दोनों पिछले पैरों के घुटने आपस मे लगें, (E) अजल, जिमके तीन पर हमरग और पिछला एक पैर दूसरे रग का हो, वह चोरी जरूर जाता है। रग-सबसे अच्चा कुमत रग (काला स्याह), सबसे जानदार घोडा मुस्का (हलका काला), अवलय (लाल सफेद) गजरा चम्मा घूमरा, लाल, बादामी आदि। उम्र-आयु लगभग ५० वष होती है। ऊचाई (माप)-टांग का चौगुना (घुटने तक), कान वा नो गुना, चौदह अगुन टाक वाला, छोटा घोडा उसकी माप चौदह-दो सोलह अगुल टाक वाला, अरबी घोडा, उसी माप चौदह-ढाई अठारह अगुल टांक वाला विलायती नाप चौदह तीन अठारह अगुल टाग वाला वैलर । चार महीने घुआ पानी, चार महीने प्यावे पानी । चार महीने सूखी घास, घोडा जोवे बरस पचास ।। चढे रोज भगावे थोडा, चालीस बरस सवारी दे घोडा।। आयु पहचान-जब घोडा दो दात हो जावे, उन २६ वष । चार दात ३४ वष । दांत भरना, पजार थाना ४१ वष से ६ वप । दातो और जाडों के बीच में पीले निकलते हैं, जि हे नेस कहते हैं । ७ वष की उम्र मे निकलते हैं । १२ वष वी उम्न तव स्वय समाप्त हो जाते हैं। दाता पर अन्दर की ओर स्याही आ जाती है । १८ वर्ष की आयु तक चह स्याही रहती है । फिर सफेद हो जाते हैं। नाधुओ मे दो सुराख खुल जाते हैं । १८ वष से २४ वष तक । इसके बाद उम्र की जाच आंखो से होती है । बच्चो की आख मे मनुष्य का पूरा शरीर दिखाई देता है। ३४ वर्ष की उम्र के बाद आधा (घड से ऊपर का) हिस्सा दिखाई देता है । ३२ वप के पश्चात उसकी आख मे गले से ऊपर का हिस्सा दिखाई देता है। ४० वर्ष के बाद उसकी आस मे कुछ दिखाई नही देता।
५२
घोडों की दवाई
१ बजर हडडी
बजर हड्डी घोडे के घुटने की पाली मे होती है । इसमे नली मे गलाव सुरू
हो जाता है, जिससे वह लगडा हो जाता है।
औषधि-सिर के बाल १० ग्राम दो नीबुआ का गूदा, अण्डा एक ।
इन तीनो को बारीक पीसकर, टिकिया बनाकर घुटन पर कम से कम तीन
पट्टी बाधे, प्रति तीसरे दिन ।
२-बेर हडडी
गटटे और घुटने के बीच के बराबर वाले हिस्से मे नली फूल जाती है।
उससे भी घोडा लग कर जाता है।
औषधि-ठिकमा अरण्डी के तेल मे भिगोकर उभरी हुई हड्डी पर क्स
कर बाधे व उसे आठ दिन तक बधा रहने दें। आठ दिन के बाद पटटी खोल
कर अम्बा हल्दी कपड छान करक नीबू काटकर उसमे सींक से भर दें, उभरी
हुई हड्डी पर अरण्डी का तेल लगाकर नीबू हड्डी पर रखकर पटटी से बाध
दें। तीन दिन की एक पटटी और कम से कम तीन पटटी करें।
३-कुराली
इसमे सुम के अदर गांठ पड जाती है । उसमे पानी मरा रहता है । इससे
घोडे को दद होता है, वह लगाता है। जहां वह सुम टेक्ता है, उससे पानी
टपक्ता रहता है
औषधि-
को साफ करें और मिटटी का तेल दो तीन बार दिन में
हालें, ठीक हो जायेगा।
४-हड्डा मोचरा
सुम के पास से गट्टा फूल जाता है, जिससे दद होता है।
ओषधि-(१) पुराना गुठ २० ग्राम, (२) गुग्गल २० ग्राम, (३) राई २०
प्राम, (४) रुई २० ग्राम ।
इन सबको इमामदस्ते में सूर कूट लें। जव उमकी टिकिया सी बन जाये,
और रई पर नियाई-सी करप बांध दें। पट्टी आठ दिन तक बधी रहे
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पहले ५० ग्राम तम्बाकू का सूखा धूरा आधा किलो
पर दे दें। यदि इससे उल्टी न हो तो दूसरी औपधि-
गाय का पेशाब (बिना ब्याई) एक किलो, घी गवार का
लाहोरी नमा ५० ग्राम, नौसादर तई का ५० ग्राम ।
अच्छा तो यह हो कि इमरी शराब खीच ली जाये (यह
को १० बूद की गात्रा गम पानी मे देने पर उल्टी अवश्य होग
घूद ठण्डे पानी में मिलाकर रोज दें तो पेट ठीक हो
की उल्टी कराने के लिए १० ग्राम शराब आधा क्लिो गम
या शराब न खीची जा सके तो इन चारो औषधियो
उबाल लें और तीन घटे के तर से चार खुराक दें। जब
अगली खुराक न दें।
लीन करना-इममे घोडा लीद करनी बद कर देता
होता है । हाथ पैर पीटने लगता है।
मस का एक किलो दूध, उममे ५० ग्राम कलमी शोरा,
शकार, दूध म आधा किलो पानी मिलाओ, कलमी शोरा वश
पकाओ, जब पानी फुक जाय तब उतार दो । उसमे २५० ग्राम
६ ग्राम कपूर डालकर उसे ढक दें, जब तिवाया-सा रहे,
हिलायें और ठडा होने पर बोतल से घोडे को पिला दें। एष
बार तीन दिन तक दवें । यदि इससे भी बद न टूटे तो दूसरी
(१) एक टिक्की सालाइट माबुन, (२) जाधा क्लिो सी
पाती मे पकावें । जब १ किला पानी रह जाये और जब पानी
२० ग्राम कबीला डालकर, दे दें।
८-पेशाब बन्द
इसमे पेशाब आना बद हो जाता है, वेतुका दद होता है।
चढ़ावें। नीम की सीक लेकर उसस पोडी सी रुई लपेट लें कई
पीसकर रगड़ लें और उसे घोडी के मांके म चढ़ा दें तथा
फिर भी पशाव न करे तो आया विलो बकरीया
एक किलो परात का धोवन उबालकर जब आधा किलो रह जाये तो दूध मे मिलादें जोर जब खूब ठण्डा हो जाय तो उसमे ५० ग्राम कलमी शोरा भोर आधा किलो खाड मिलावें और बोतल से दे दें। इसकी दो दिन मे एक खुराक रोज दें, अगर बद फिर भी न टूटे- आधा किलो चावल का माह ठडा करके १२५ ग्राम घी मे छौंक दें। फिर ठडा करके ५० ग्राम कलमी शोरा डाल दें। एक दिन में एक बार या सुबह-शाम दो बार दे दें। ६-बदहजमी यह मसाला घोडे को बारह महीने देना चाहिए। इससे चारा अच्छा खायेगा, हाजमा ठीक रहेगा, पैरो पर रस नही उत्तरेगा। औषधि - राई २५० ग्राम, सोया १२५ ग्राम । हालो १२५ ग्राम, अजमोद १२५ ग्राम , कुरेशानी अजवायन १०० ग्राम, छोटी हैड १२५ ग्राम । देशी हल्दी ५० ग्राम समदर झाग ५० ग्राम । वायविडग ५० ग्राम, काला नमा २५० ग्राम । नमक मनियारी १०० ग्राम, नमक खारी पेला ५० ग्राम, नमक लाहौरी ५० ग्राम, नमक सुलेमानी २० ग्राम । हडिया का नौसादर १०० ग्राम । सुहागे को खील १०० ग्राम । काली मिच ५० प्राम । इन सबको एक साथ कूटकर छलनी मे छान लें और आधा किलो मेथी का आटा मिला दो। इसकी ५० ग्राम की एक खुराक लो। ५० ग्राम पानी मे २० ग्राम गुड घोल लें। उसमे ५० ग्राम दवाई मिलाकर शाम को मिटटी के बतन मे रख दें। सुबह उसकी लाई बनाकर घोडे को खिलादें। १०-चैट की दवा आयला सार गषा १० ग्राम । दही ५० ग्राम । नीम की वोपल १० ग्राम । अरडी का तेल ६ ग्राम । इन सबको एक साथ मिलाकर महम बना लें। सुबह-शाम दोनों समय घंट पर लगायें।
घोडे क पित्त उछल कर सारे शरीर पर दाफड पड़ जाते है। उसमें
११-~-पित्त की दवा
कूटवर १० किलो पानी में
खुजली लगती है। घोडा उसे मुह से फाडने लगता है।
औषधिबासे के पत्ते-एक क्लिो
पकाओ । जब क्लिो पानी रह जाये उसे उतारकर छान ला, उसम ५०
ग्राम काली मिच, आधा क्लिो शहद मिला दो, एक बोतल चिरायते का
अब उमी मे मिला दो। इसकी खुराक २५० ग्राम वह पानी मुबह व २५
ग्राम शाम को दें। इसके अतिरिक्त सादे पानी मे १०० ग्राम फिनाइल का तेल
डालकर उससे घोडे को नहलायें।
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भारत मे पशुओं का महत्व यो तो ससार के प्रत्येक देश मे पशुओ का महत्त्वपूर्ण स्थान है और वे वहां की आर्थिक, व्यावसायिक और प्रशासनिक व्यवस्थाओ मे महत्त्वप्ण भूमिका अदा करते हैं, कि तु भारत जैसे विकासशील और निधन देश मे तो पशुओ का और भी अधिक महत्त्व है । हमारे देश के किसान अत्यात निधन हैं । शताब्दियो की परतत्रता ने उनका इतना शोषण किया है कि वे अपना खून पसीना रहा कर दूसरो को नाना प्रकार के व्यजन भर पेट खिलाते रहे हैं, कितु स्वय आधे पेट भूखे रह कर जीवन व्यतीत करते रह हैं। उनमे आज इतनी सामथ्य नहीं कि वे ट्रैक्टर और ट्रक जैसे बहुमूल्य यत्र खरीद कर कृषि व्यवसाय करें और न ही उनके पास इतनी अधिक भूमि हाती है कि वे कीमती मशीनें उनके लिए उपयोगी सिद्ध हो सकें। उहें अपने छोटे-छोटे खेतो मे पशुओ से ही खेती करनी पड़ती है। उहें और उनके बच्चो को दूध घी नहीं, तो कम से कम छाछ तो पशुओ के माध्यम से ही प्राप्त होती है। दूसरे पशुओ का सहगेग उहें जितने कम मूल्य तथा व्यय पर प्राप्त होता है, उतने कम मूल्य नथा व्यय पर मशीनों का सहयोग प्राप्त नहीं हो सकता। मशीनें तो केवल बडे-बडे जमीदारो के लिए उपयोगी हो सकती हैं। इन सब बातो पर गहराई से विचार करने पर यह बात स्पष्ट हो जाती है कि भारत मे पशुओं का न केवल विसाना की व्यक्तिगत सम्पत्ति के रूप म अपितु राष्ट्रीय सम्पत्ति और विकास साधन के रूप में भी विशेष महत्व है । कृषि के लिए उपयोगी पशुआ का बैल, मैसे आदि के अतिरिक्त घोहे, ऊट, खच्चर, हाथी आदि पशुओ का एक स्थान से दूसरे स्थान तक माने जान व माल ढोने के लिए विशेष महत्त्व व उपयोगिता है। गाय, मस, बकरी आदि पशु दूध प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण है। भेहें ऊन प्राप्त करने की प्रमुख साधन है । ऊन तपा मनी कपडे जहा देश के कराहों लोगों की सर्दी से रक्षा करने का माधन है वहां निर्यात द्वारा विदेशी मुद्रा A उपयोगिता रखते हैं । तात्पय यह है कि देश मे पशुओ का अत्यधिक महत्व है स विभिन्न जातियो में दुधारू पशुलावर रवखे जात हैं और उन पर शानिय औमत वाल में (जो वर्ष थे ३६५ दिन में लगभग २७५ दिन या कुछ म्यूनाधिक रहता) लगभग साढ़े छह हजार पोण्ड दूधमा औसत जसदन रि प्राप्त किया गया है। दश हेरी पायाम निम्नलिखित प्रमुरा पमहै ५८ पुलिम जैसी महत्वपूर्ण प्रशासनिक व सुरक्षात्मक सेवाआ मे अपना स्थान में पमान और देश को समृद्ध करने मे मुम्य भूमिका अदा करते हैं। भेदों महत्त्व सर्वावदित है । कुत्ते जहां घरो, सेतो और खलिहानो को चोरों से एक करते हैं, वहाँ अपनी जद्भुत घ्राण शक्ति (सूघने की शक्ति) द्वारा सेना द्वया और रहेगा। पशु-पालन एक सुदृढ़ व्यावसायिक व आर्थिक आधार बडे बडे उनत देशो मे भी पशु पालन एक सुदढ आर्थिक व व्यावसायिक आधार बा गया है, जिनके द्वारा लाखो स्त्री पुरुषों और बच्चो का भरण पोषण हो रहा है। यही कारण है कि अप उद्योगों व व्यवसायो की भांति यह भी एक स्वतत्र व्यवसाय बन चुका है, जो समूचे राष्ट्र की उन्नति व सद्धि में सहायक होता है। उदाहरणाथ दुधारू पशुओ को लेकर बडे बडे पशु पालन पेन्द्र खोले गए हैं, जिनम लाखो गायो, मनो गौर वारियों का पालन बानिक छग से किया जाता है । बडी बडी मानिक प्रयोगशालाओ मे रात दिन ऐमी- ऐसी सोजें होती रहती हैं, जिनसे पशुआ की नस्ल अधिक हृष्ट-पुष्ट तथा स्वस्थ हो गये और उनसे दुग्ध उत्पादन में भी अधिक से अधिर भदौतरी हो राये । हमारे दशम भी मरवारी तथा गर-सरकारी अथवा सहकारी हमसे ऐसे अनेक पशु पालन ये द्रो मा संचालन हो रहा है, जहां देश के कोने-कोने प्रयोग किए जाते हैं। परिणामस्वर एक एव पशु से दूध प्राप्त होने के - 1-सरकारीरी फाम, तेलनरोडी नागपुर (मध्य प्रदेश २-रारी मिनिटरी री फाम फिरोजपुर २-भारतीय रेयरी अनुसथानसापा, बगलोर ।
४-पशु धन अनुसधान के द्र, हिसार (हरयाणा)। ५-एग्रीकल्चरल कालेज डेरी, किरकी, पूना महाराष्ट्र ६- सरकारी गौ पशु फाम, पटना (बिहार) ७-सरकारी परीक्षण फाम, काके, रोची (बिहार)। ५-सरकारी गौ पशु फाप, शासी (उत्तर प्रदेश)। E--सरकारी कृषि स्टेशन, सूरत (गुजरात)।. १०-भातीय कृषि अनुसंधानशाला, नई दिल्ली आदि ...... इनके अतिरिक्त अनेक अय केंद्र भी हैं, जो महकारी रूप से अथवा धर्माथ गोशालाओ के रूप मे चल रहे हैं। बम्बई की दुग्ध योजना के अधीन भी एक वहुन विशारा पशु पालन केद्र का सचालन होता है। वहीं अनेक जातियों के पशुओ का दुग्ध उत्पादन बढाने के विभिन्न वैज्ञानिक उपाय खोजे तथा प्रयोग किये जाते हैं। दूध निकलने के पश्चात इही के द्रो में स्थापित अथवा अन्य स्थानों मे स्थापित बड़ी-बड़ी मशोनो द्वारा मक्खन तथा घी निकालकर तथा दूध को बैज्ञानिक ढग से सुखाकर दुग्घ चूण तयार किया जाता है, जो देश के कोने- कोने में आपको उपलब्ध हो मक्ता है । दिल्ली दुग्ध योजना के अतगत भी ऐसे ही प्लाष्ट लगे हुए हैं तथा और लगाए जा रहे हैं । 'अमुल' का मक्खन तथा शुष्प दुग्ध चूण तो देश के प्रत्येक माग मे ही नही, विदेशो में भी अपनी उञ्च पोरि की वनानिष उत्पादकता के कारण विशेष ख्याति व लोकप्रियता प्राप्त कर चुश है । यह सहकारी संस्थान है, जो थोडे-से समय में ही बहुन उन्नति करगया है। इस प्रकार आपने देखा कि थोडे से पशुओं से प्रारम्भ किया गया केन्द्र सन गर्न क्तिने बड़े सस्थान का रूप धारण कर गया, जिसकी दैनिक विक्री और साम लाखो रुपए प्रतिदिन तक जा पहुंचे। यह निविवाद मत्य है कि पशु पालन भी एक सुदृढ व्यावसायिक व आर्थिक आधार है। घोडी-सी पूजी से आप पोहे से पशुओ को लेकर व्यवसाय शुरू करें। धीरे- घोरे पशुओ को सख्या उही से पैदा होकर प्रति वर्ष बढती जायगी और उमी तरह आपकी आय व पाम भी बढ़ता जायगा। कारखाने में यदि एक मशीन लगाए, तो एक ही मशीन रहेगी, जब तक कि आप दूसरी गशीन और न लगाए । वितु पशु पालन मे एक गाय या मस से हो बिना खरीदे ४५ वर्ष मे आपके पास ४५ गायें या मसे या बल मैसे आदि हो जायेंगे और आपकी सम्पति स्वत बढती चली जायगी। फिर उन ४५स और ४ प म १५१६ हो जायेंगी और अगले ४-५ वर्षी म ३०.४० होगी। भला सोचिए कि इससे घेष्ठ व्यवसाय और कौन सा होगा। इसी प्रकार भेट पालन के द्र, मुर्गी पालन के द्र, मत्स्य पालन केद्र आदि व्यवसाय भी बडे काम क हैं और उनमे भी आपको सम्पत्ति स्वत बढती रहती है । हाँ, आवश्यकता इस बात की है कि उनकी देख रेख सही ढंग से हो। यदि आपको असावधानी के कारण इन पशु पालन के द्रो मे छून की कोई भयकर बीमारी फैल जाती है और आपको इसकी रोकथाम के बारे में जान- बारी नहीं, तो कुछ ही दिनो मे समस्त पशु मरकर आपकी आर्थिक व व्याव- सायिक इमारत को ढहा देते हैं। व्यावसायिक दृष्टिकोण से तथा आर्थिक लाभ को देखते हुए पशु पालन व्यवसाय का एक और भी महत्त्व है । वह यह कि पशुओ के मरने के पश्चात उनकी साल, हडिडयां, खुर तथा सीग भी अच्छे मूल्यो पर बिकते हैं, जो पशु को खरीदने पर व्यय की गई राशि का लगभग आधा होता है। इस समय खाल तथा हड्डियां विश्व को निर्यात करने वाले देशो में भारत का प्रमुख स्थान है। इस प्रकार व्यक्तिगत तथा राष्ट्रीय लाभ के दष्टिकोण से यह व्यवसाय श्रेष्ठ है। हमारे ग्रामीण भाइयो को कृषि के लिए, दुग्ध, घृत आदि पौष्टिक आहार के लिए तथा विशुद्ध लाभदायक व्यवसाय के लिए पशु पालन की तिहरी उप यागिता तथा महत्त्व भली प्रकार समझ लेना चाहिए। पशु-पालन एक आदिकालीन धार्मिक कर्तव्य रामायण, महाभारत आदि धार्मिक प्रपों को पढने या सुनन से आपका होगा कि प्राचीन काल से ही हमारे देश में पशुओ का विशेष कर - गो-वश को बहुत महत्व प्राप्त होता रहा । गौ को हमारे पूर्वजो ने माता का पद दिया है, क्योकि उसके दूध से ही हमारे देश के बच्चे पलते, बडे और होनहार बनते हैं । अय पशुओ यथा हाथी बैल, साड, घोडा आदि को बडे आदर भाव में पाला जाता है। क्योकि पशु-पालन एक धार्मिक, सामाजिक तथा नैतिक क्त्तव्य के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। आप प्रश्न कर सकते हैं कि पशु पालन भला धार्मिक कृत्य कैसे हुआ? विचार कीजिए-धम क्या है ? प्रत्येक वह बम, जिसमें अपने को व दूसरो को आस्मान द की प्राप्ति हो तथा अपना अथवा दूमरे का किसी भी प्रकार का अहित न होकर दोनो का सवथा हित मम्पन हो यही घम है। यह धम भावना जब कम में ही नहीं, मन और बचन म भी पूरी तरह से समा जाती है, तो मनुष्य बहुत ऊचा उठ जाता है । खेद का विषय है कि आज के युग मे सच्ची धार्मिकता तो लुप्तप्राम होती जा रही है और शहरो में विशेष रूप से धम के नाम पर गुटबदी, विद्वेष, घृणा, स्वाथ और दानवता का जो भीषण नृत्य हो रहा है, उसे देखकर भारत के प्राचीन महपियो, त्यागियो और धर्मपरायण शूर वीरो की आत्मा चीत्कार कर रही होगी। पशु पालन करने से आप अपना ही नही, समूचे देश का और समूचे विश्व का पालन करते हैं, जिससे अपनी आत्मा को आन द व सुख प्राप्त होता है और दूसरो को भी। दूसरे किसी का भी इससे अहित नहीं होता । तो फिर इमसे बडा धामिर पसव्य भला और मौन-सा होगा? म पूर्ण विश्वास में साय कह सकता हूँ कि पशु पालन एक व्यावसायिक राष्ट्रीय क्त्तव्य ही नहीं, एक धामिर साधन भी है। पालतू पशुओ को जातिया यो सो ससार में असत्य प्रकारचे पशु पाये जात है, स्न्तुि व्यावसायिक रूप से उसपोगी उन पशुप्रो को ही मनुष्य पालता है, जिनसे उनको रिमीन घिमी प्रसार से आपिर माम जीवन यापन में सुगमता अपवा सुरक्षा प्राप्त होती है। भारत में इस प्रार के पशुओं में गाय, भैम, बैल मसे, बबरे, पारी, में, स्ट, पोरे, पोरिया, सच्चर, हाथी, ग, सूमर, दुत्त लादि तथा पक्षियो में मुर्गे, मुर्गियां, बत्तखें एव अय अतुओ में मछलियां, कछुए, मधुमक्खी, रेशम के कोडे आदि का प्रमुख स्थान है, जो लाखो परिवारों की आय का साधन बने हुए हैं । जब आप पशु पालन व्यवसाय मे अभिरुचि रखते हैं, तो उनको विभिन्न जातियो, उनके गुणावगुण, उनके रख-रखाव के विषय मे समुचित जानकारी, उनके रोगो की रोक थाम व इलाज, उनके व्यावसायिक पहलुओ आदि के बारे मे पर्याप्त ज्ञान होना नितात आवश्यक है।
सर्वश्रेष्ठ पशु गाय गाय हमारे दश का सवश्रेष्ठ तथा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पशु है । चिरकाल से हमारे देशवासी उसे माता के ममान आदर और श्रद्धा की दष्टि से देखते हैं और बडे आदर भाव से उसे पालते आए हैं। प्राचीनकाल मे जब भारत सभ्यता और सस्कृति के चरमोत्वष पर था, कोई घर ऐसा न था, जिसमे गायन पलती हो, क्योकि वे गाय के महत्त्व को भली भाति जानते थे। एक तो गाय का दूध सर्वोत्कृष्ट, सर्वाधिक पौष्टिक तत्वो से भरपूर, सुपाच्य एव स्वादिष्ट होता है और बच्चे, बूढ़े, स्त्री, पुरुष सभी के लिए जति गुणकारी होता है, दूसरे गाय ही बैलो को जन्म देती है, जिन पर हमारी कृषि तथा ग्रामीण जीवन की संचार व्यवस्था निमर थी। हमारे पूर्वज जानते थे कि कोई भी देश उनति के शिखर पर तभी पहुच सकता है जब वह खाद्यान के उत्पादन में आत्मनिमर हो। साथ ही परिश्रमी, बलशाली, बुद्धिमान, धौर और गम्भीर नागरिक उत्पन करने के लिए उहे यथेष्ट पोष्टिक भोजन तथा भरण-पोषण प्राप्त हो । खाद्यान के लिए दूसरे देशो के आसरे रहने वाला देश कभी उनति नहीं कर सकता। इसीलिए वे लोग पशुपालन विशेषत गोपालन को अपने जीवन का श्रेष्ठ घम समझते थे। खेद का विषय है कि आज के युग मे लोग गाय के उस महत्त्व को भूलकर पाश्चात्य जीवन की कृत्रिम चमक चमक मे भटक गए हैं। उसी का यह फुपरिणाम है कि जिस देश मे घी - दूध की नदिया बहती थी, उसी देश के नहे-न हे शिशु आज बूंद-बूद दूध के लिए तरमर मर जाते हैं । जिस देश में भीम और अजुन जैसे महान योद्धाओ ने जम लेकर संसार में अपनी वीरता का सडा फहराया, नाज उसी देश के लोग यही नहीं जानते कि भोजन वास्तव में क्या है, यौवन मे शक्ति और शौम्य का विकास किस प्रकार होता ६४ स्टर बगल है । बेचारे डालडा के सहारे पलकर बच्ची उम्र में ही आखो पर चश्मा पहा दफ्तरो मे कलम घिस-घिस कर जीवन यापन करते है और सूट पहन कर बाबू वन जाना ही जीवन का लक्ष्य समझते हैं । न उनके शरीर के अवयव ठीक से विकसित होते हैं और न मस्तिष्क मे बुद्धि का ही विकास होता है । इससे भी अधिक खेद का विषय यह है कि हमारे ग्रामीण भाई भी दिन प्रतिदिन उसी राहगे रग मे रगते जा रहे हैं। वे भी अपने बच्चो को कृषक, पशुपालक अथवा परिश्रमी व पराक्रमी न बनाकर एक ऐसा बाबू बनाना अधिक पसंद करने लगे हैं जो सारा दिन कुर्सी पर बैठा रहे, स्कूटर पर चडार घूमने जाये, ट्राजि- दवाकर शौच करने जाये और सोकर उठते ही पाय मांगे । भारत मे पाई जाने वाली गायो की २६ प्रमुख नस्लें हैं, जो अपने-अपने क्षेत्र की वर्षा, तापमान, नमी ५ वातावरण पी अय विशेषताओम अनुकूल गुणावगुण से युक्त होती हैं। वे इस प्रकार है (१) कोकरेज (२) हिमार, (३) केनवारिमा या केनयठा (१) संरीगढ़ (५) माती (६) परपारकर (७) पछोर () गायसाय (E) हरयाणा (१०) कृष्णाघारी (११) मेवाती (१२) मागौरी (१३) जोगोल (१४) राठ (१५) गी (१६) देवनी (१७) गोर (१.) साहीवाल (सात निधी) (१६) हल्लीपर २०) आलमवादी (२१) अमृत महा (२२) बरगुर (२३) पगापम (२४) सिलारी। इनमें अतिरिक्त पवार, मीटी पदाही समा गैर सीए भी बहार प्रार भी पाई जाती है गितु आगार और वसादनक्षमता की दृष्टि म मस्यरत होन होने कारण उनमा विशेष महार नहीं है। प्राय गे पामोत्तम होते हैं और मधिर पर्या, नमी मपया पहारी क्षेत्रों ने पशु पटिया माम माने पाते हैं। यही कारण है Pिार, हरयाणा, रामस्या, महाराष्ट्र गुगरात मंगूर, ओप्रमग मम्म प्राय सार प्रदेशमगनी मा. घेक होते हैं । अपार, सीम-प, बम तथा दुग्ध उITr हो। पनि प्रगम, यमाम, रिहार, नहीमा म तपा और मामी, मोरम ने यमे होते है। इस नी दृष्टिमि), Trम परप मान मरपेठ ति धन पर .
उत्पादन दोनो ही दष्टियो से हरयाणा, घरपारकर, काररेज, ओंगोल और देवनी नस्ल की गौए मर्वोत्तम मानी गई हैं। वागायम गयें भी दुग्ध उत्पादन म मध्यम श्रेणी की होती है। शेष नस्लें केवल बैल देने के दष्टिकोण से ही उपयागी हैं। उनम दूध तो बम परिवार के भरण पोषण भर को ही प्राप्त होता है । दृग्ध अथवा दुग्ध पदार्थों का व्यवसाय करने के दष्टिकोण से डेरी उद्योग के लिए उपयुक्त नहीं होती। साथ ही यह भी ध्यान रखें कि इनमे मै कुछ नस्लें तो ऐसी होती हैं, जो किसी भी प्रकार की जलवायु मे पहुच कर शीघ्र ही अपने का उम जाव यु के अनुकूल बना लेती हैं, कि तु कुछ नस्लें अपनी विशेष प्रकार को जनवायु मे ही रहने की अभ्यस्त होती है और हर स्थान पर नहीं पाली जा सकती। हम यहाँ इन नस्लो की गायो के विषय मे कुछ विस्तार से प्रकाश डाल साहीवाल-(लाल सिंधी गाय) सबसे अधिक दूध देने वाली होती हैं। हप्ट पुष्ट, भारी डीलडोल, मुडे हुए सींग और ताल रग इनकी विशेषता और पहचान है। यरपारकर--कच्छ, सिंघ, जोधपुर व जमलमेर क्षेत्रो मे पाई जाती हैं। दूध दने मे ये भी श्रेष्ठ हैं। ये चपटे व चौहे माथे तथा मुडे हुए सीगो वाली भूरे रंग की होती हैं । कद गठीला व दरम्याना होता है । इनसे उत्पन्न बैल हृष्ट पुष्ट व भार खीचने में अच्छे हात है । यद्यपि इस नस्ल की अधिकतर गोए भारत विभाजन के पश्चात पाकिस्तान मे रह गई हैं, जैसा साहीवाल के विषय मे भी हुआ है, तथापि इन दोनो नस्लोवे कुछ ममूह भारत मे भी हैं। थरपारवर गोए फार्मा स्थदा डेरियों पर पाली जाने वाली एव वियांत (दूधशल) में चार हजार से ५ हजार पौण्ड तक दूध देती हैं सामा य घगे म पाली जाने वाली लगभग ३,००० पौण्ड औसत दूध देती हैं । ५ व्यावसायिक दृष्टि से उत्तम हैं। गोर-य गौए भी फार्मों तथा डेरियो म पाली गाने पर दूध काल में ३७०० पौण्ड औसत दूध देती हैं और सामान्य घरों में २५०० से २८०० पोण्ड एती हैं। ये भी माहीवाल की तरह भारी डीलहील और मो पा तर औसत हुए सीगो वाली होती है। प्राय काठियावाड, राजस्थान, बडोदा और उत्तरी महाराष्ट्र के क्षेत्रो में पाई जाती हैं। ये लाल रग या चित्तीदार होती हैं । इनसे उत्पन बैल हृष्ट पुष्ट तथा बलवान होते हैं । किंतु ये सुस्त और धीमे होते हैं । हरयाणा- यह गाय उभरी हुई खोपडी सफेद या भूरे रंग की होती है । इस नस्ल की गौए भी सर्वाधिक मात्रा मे दूध देने वाली होती हैं । एक बियात में फार्मों तथा डेरियों में पाली जाने वाली गाय औमतन ६७०० पौण्ड और घरो में ५००० पौण्ड तक दूध देती हैं । इस नस्ल की सामा य गाय भी ३००० पौण्ड तक दूध देती है। यह नस्ल पजाब तथा हरयाणा में विशेष रूप से पाई जाती है और इससे पैदा होने वाले बैल भी अत्यन्त हृष्ट पुष्ट, बलवान, अधिका धिक भार ढोने वाले, चुस्त व फुर्तीले होते हैं। यह गायो में एक श्रेष्ठ नस्ल है। कांकरेज - इस नस्ल की गाय कच्छ के रन के दक्षिणी पूर्वी भाग, अहमदा. बाद, पूर्व मे देसा से पश्चिम मे राधनपुर तक वे क्षेत्रो मे पाई जाती है । यह चपटे य चौडे माथे, मुडे हुए सीग तथा भूरे रग की होती है और दुग्ध उत्पादन की दष्टि से तो बहुत अच्छी नहीं मानी गई है क्योकि फार्मों मे औसता एक व्यात मे ३००० पौण्ड तक दूध देती है, जो हरयाणा की एक सामान्य गाय का औसत है, जितु इसके बैन अत्य। तेज, चुस्त, बलवान् और माल ढोने वाले होते हैं। ओंगोल-गोल नस्ल की गाय दक्षिण में जिला गुतूर के क्षेत्र म पाई जाती हैं । रग भूरा या सफेद होता है और खोपडी उभरी हुई होती है । दुग्ध उत्पादन का औसत फामों तथा डेरियो मे ५००० पौण्ड तक तथा सामा य परी मे ३००० पौण्ड तक होता है। इससे उत्सन बल घलने मे सुस्त विन्तु भार दोने में महत यच्छे होते हैं। वनी-इस नस्ल की गाय परिषमी हैदराबाद में पाई जाती है और गीर सपा डांगी नस्ल की गायो से मिलती-जुलती होती है । यह प्राय काले और • मा सास और सफेद दो रगो में पाई जाती है और हैदराबाद क्षेत्र की मपिर दुधारू गायो में मानी जाती है।
कागायम--इस नस्ल की गाय से एक ब्यात मे लगभग १८०० पौण्ड दूध अर्थात् २५ पौण्ड प्रतिदिन के औसत से प्राप्त होता है। पहले यह नस्ल दूध कम देती थी। यह दक्षिणी भारत मे कोयमुत्तूर जिले में पाई जाती है । इसके बल मझोले कदके, फुले, बलवान् और अच्छे भारवाही होते हैं। यह गाय लम्बे सींगो वाली तथा उभरे हुए माथे की होती है। दुग्ध उत्पादन की दृष्टि से उक्त नस्लें ही उत्तम हैं । शेप नस्लें तो वस बैल उत्पन करने की दृष्टि से विशेष उपयोगी हैं, दूध के व्यावसायिक दृष्टिकोण से नहीं । इनमे हिसार, हरयाणा क हासी व हिसार जिलो मे, केनवारिया उत्तर प्रदेश के बांदा जिले मे तथा मध्य भारत के कुछ पूर्वी क्षेत्रो मे, खरीगढ जिला खीरी लखीमपुर में, मालवी मध्य भारत के ग्वालियर जिले तथा हैदराबाद में बछौर बिहार के जिला मीतामढी मे, गावलाव मध्य प्रदेश के छिन्दवाडा व वर्धा क्षेत्र मे, मेवाती राजस्थान के भरतपुर-अलवर जिलो मे, नागौरी जोधपुर के पूर्वी भागों मे, राठ अलवर व समीप के क्षेत्र मे, कृष्णाधारी महाराष्ट्र व हैदराबाद के सीमावर्ती क्षेत्र मे, डांगी बम्बई, नासिक, अहमदनगर आदि के क्षेत्र में, हल्लीकर मैसूर के हमन, तुमकुर तथा मैसूर जिलो म, आलमवानी सलेम तथा कोयमुत्तूर के पहाडी क्षेत्रा मे अमत महल तथा बरगुर जिला कोयमुत्तूर मे तथा खिल्लारी दक्षिणी महाराष्ट्र के क्षेत्रो में पाई जाती हैं । इनम कुछ नस्लो के बैल फुर्तीले होते हैं, जो आवागमन के साधन के रूप मे श्रेष्ठ होते हैं । कुछ के बैल सुस्त वितु भार ढोने मे अच्छे होते हैं और कुछ नस्लों के बल हल जोतने व माल ढोने के लिए उपयोगी होते हैं।
सर्वाधिक दूध प्रदायक पशु भैंस यपि गुणो मे गाय का दूध सर्वोत्तम होता है, किन्तु गाय उतनी अधिक मात्रा मे दूध कभी नही देती, जितनी मात्रा मे मसें । अधिक दूध दने वाले पशुओ म मम का ही प्रथम स्थान है। जसे मसो से उत्पन होने वाले क्टरे (भेसे) भार ढोने मे तथा बल मे चलो स अधिक मजबूत होते हैं, कि तु वे इतन सुस्त और धीरे चलने वाले होते हैं कि चलो की तुलना में घटिया समझे जाते हैं, वैसे ही मस भी गाय की अपेक्षा अधिा बनवान, डोलडोल मे भारी तथा सुस्त होती है, विन्तु दूध गाय से कही अधिर देती है। इसके दूध मे चिकनाई की मात्रा अधिक पाई जाती है। डेरी उद्योग के लिए प्राय मसें ही अधिक पाली जाती हैं। हमारे देश मे मसो की ६ प्रमुख नस्लें पाई जाती हैं जिनका वर्णन यहा किया जा रहा है। वैसे कुछ पशु विशेषगो की राय मे स्थानीय जलवायु के प्रभाव के कारण उनके शरीर के डीलडोल मे ही भिनता होती है अपया उनकी नस्लो में विशेष अतर नहीं होता। कि तु दुग्ध उत्पादन की ष्टि से तो भिनता पाई हो जाती है। प्रमुख ६ नस्लें ये हैं (१) मुर्रा (२) नीली रावी (३) जफराबादी (४) मेहसाना (५) सूरती (६) नागपुरी । इनमे मुर्रा, नीली रावी, जफराबादी और सूरती अधिक मात्रा मे दूध देती हैं किंतु नियमित रूप से ब्याई रहती हैं । ये अधिक दिन तक दूध देती रहती हैं इस लिए डेरी उद्योग के लिए यह नस्ल भी उपयोगी है । नागपुरी मम उक्त छहो नस्लों मे अपेक्षाकृत कम दूध देने वाली होती है। देश में पाई जाने वाली मैसो मे लगभग चौयाई इही नस्ली की हैं । शेष नस्लें या तो उपयोगी नही है अथवा इही नस्लो की घटिया जातिया हैं । मस में एक विशेष गुण होता है कि यह हर क्षेत्र को जलव यु को शीघ्र ही सहन करने लगती है और प्राय ६८ बीमार भी कम पड़ती है। अगर पडनी भी है तो जल्दी ठीक हो जाती है। इसलिए ससार भर मे इनकी अच्छी माग तथा कीमत है। मुर्रा भस--हरयाणा पजाब के पूर्वी क्षेत्र तथा दिल्ली के आस-पास पाई जाती है। इसका रग गहरा काला डीलडोल भारी भरकम, किसी किसी भैस पर सफे धब्बे भी पाए जाते हैं। दुग्ध उत्पादन मै मबसे अच्छी मानी जाती नीली राघो अधिकतर पाकिस्तान मे रह गईं, किंतु कुछ समूह पजाब के पश्चिमी भागो म पास जाते हैं। यह मुर्रा भस से डोलडोल में अधिक भारी- भरकम होती हैं और दूध भी अच्छी मात्रा मे देती हैं । इनके शरीर मे काले रग म गफेद धब्वे अधिक तथा पल हुए होत है। जफराबादी-यह गुजरात के गिरि वन क्षेत्र म पाई जाने वाली मस है, जो अत्यधिक भारी भरकम, डीलडील वाली तथा अच्छी दुधारू होती है । इस की एक विशेषता यह भी है कि सूखा चारा खाकर भी बनी रहती है और फिर भी दूध अच्छी मात्रा मे देती है। यदि इमे वैज्ञानिक ढग से तैयार, अच्छा, पौष्टिक चारा-दाना खिलाया जाये तो दूध काफी मात्रा में बढ़ जाता है। व्यावमायिक दृष्टि से इसका पाला लाभदायक है। मेहसाना - आकार व होलडोल मे मध्यम, शीघ्र जवान हो जाने वाली तथा दुग्ध उत्पादन मे अच्छी नस्ल मानी जाती है । यह मुर्रा आदि की अपेक्षा तो कम ही दूध देती है किन्तु नियमित रूप से ग्याभन होती रहती है और दीर्घकाल तर दूध देती रहती है। इसलिए घरो तया डेरियों में भी इसका पालना लाभदायक समझा जाता है। यह बहोदा के आस पास पाई जाती है। सरती-यह नस्त गुजरात में पाई जाती है। इसका शरीर भी मध्यम डोलडोल व आवार का होता है। सुडौल, गठी हुई, पीठ सीधी और सीग हसिए की तरह मुडे हुए होते हैं । दूध देने में भी अच्छी है । नागपुरो-इसका कद छोटा तथा सोग लम्बे, चपटे और टेढे होते हैं । यह मस्त मध्य भारत तथा दक्षिणी भारत में पाई जाती है। इससे उत्पन मैसे अत्यधिर सुस्त होते हैं और प्राय भार ढोने में ही प्रयुक्त होते हैं । यह नस्ल 4 ७० भी बहुत पौष्टिक, अपेक्षाकृत कम दूध देने वाली होती है और हेरी फाम आदि व्यावसायिक उद्योगो के लिए उपयुक्त नहीं । हां, घरो के लिए ठीक है। उत्तम दूध प्रदायक सस्ता पशु-पकरी चरी हमारे देश मे सुलभ और सस्ता पशु माना गया है, जिसे हर अमीर और गरीब आसानी से खरीद कर पाल सकता है। इसका दूध सुपाच्य और गुणकारी तत्वा से परिपूर्ण माना गया है। महात्मा गाधी तो सदैव बकरी का दूध पीते थे। वैसे भारत के गावो मे आपको अधिकतर घरों मे बकरिया ही मिलेंगी। ग्रामीण बच्चे प्राय यकरियो के दूध पर ही पलत है, क्योकि एक तो वे मूल्य मे सस्ती होती हैं, दूसरे उहें पालने पर अधिक व्यय नहीं होता। तीसरे यह एक छोटा और सीधा पशु है जो बच्चों तक को कोई हानि नहीं पहचाता । गावो में इसे प्राय जगल या खेतो मे चरने के लिए छाड दिया जाता है। पास पतवार चर कर ही यह अपना गुजारा कर लेती है और पालक को दूध देती रहती है। एक अय लाभ भी है । यह एक बार में कई कई बच्चो को जम देती है, जिनमे बरिया तथा बकरे दोनो होते हैं । इस प्रकार इस पशु का परिवार बहुत जल्दी बढता है और पालने वाले का उतना ही अधिक लाभ होता है। भारत मे बकरी की प्रमुख जातिया भारत मे अनेक जातियो की बरिया पाई जाती हैं, किन्तु उनम दुग्ध उत्पादन की दृष्टि से निम्न जातियां प्रमुख हैं-(१) जमुनापारी (२) बीतल (३) बारवारी (४) कच्छी या कच्छवी (५) उस्मानाबादी (६) बगाली-- इनम भूरी, काली और सफद दादी वाली तीन मस्लें हैं (७) मरती (८) मनाबारी (E) उत्तर गुजरात, जिसे मिरोही भी कहते हैं (१०) गद्दी या सफेद बालों वाली पवतीय बकरी (११) भासरवाल, जो कश्मीर में पाई जाती है । इनके अतिरिक्त लहास, गिलगित तपा तिम्चत के क्षेत्रों म पश्मीना जाति की बारी भी पाई जाती है जिससे पश्मीना प्राप्त होता है और उसके वस्त्र बनते है। पश्मीने रे यस्त बहुत मूल्यवान और उत्कृष्ट कोटि में मान जाते हैं। जों के सम में यह बररी टिहरी, मशाल आदि पहाडी जिलो में भी देखनको . मिलती है, क्योंकि अधिक उचाई पर बफ पड़ने पर यह निचले पहाडी क्षेत्रों मे आ जाती है। कुछ विशेषज्ञो के अनुसार मलाबारी जाति की बकरियां शुद्ध नस्ल बी नहीं हैं। उनमे सूरती नस्ल का प्रभाव व रक्त पाया जाता है, जो अरब तथा मेसो- पोटामिया नस्ल से उत्पन हुई हैं। उत्तर गुजरात नस्ल की बकरियो मे भी तीन जातिया हैं मारवाडी, मेहसाना तथा जालवाडी। उत्तर भारत मे जमनापारी, बीतल तथा बारबारी नस्ल की बकरियो की ही अधिक माग है, क्योवि दुग्ध उत्पादन मे ये तीनो नस्लें सर्वोपरि हैं । वैसे सरकार की ओर से आजकल देशी तथा गैर नस्नी बकरियो की नस्ल सुधारने के लिए देहात मे जगह-जगह केद्र स्थापित किये जा रहे हैं जहा बढिया नस्ल के बोक (साड बकरे) वितरित किये जाते हैं । सरकारी फार्मों में भी ऐमी सुधारी गई नस्लें पाली जा रही हैं । दक्षिणी भारत मे बकरियो की अधिकाश आवश्यकता सूरती तथा मलाबारी बकरिया पूरी करती है । पूर्वी भारत मे घगाल की काली, भूरी तया सफेद दाढी वाली बकरियां अधिक पाली जाती हैं, क्योकि वे वहा की जलवायु के लिए अनुकूल सिद्ध होती हैं । पश्चिमी भारत मे अधिकतर घरो म कच्छी, उस्मानाबादी तथा सिरोही नस्ल की बकरिया पाली जाती हैं। जमुनापारी नस्ल के बकरे भी बहुत उच्चकाटि के माने गए है । यहा तक कि इनको इग्लड मे भी बडी माग है । वहा ये बकरे मशहूर ऐंग्लो नूबियन नस्ल की बकरियो की नस्ल सुधारने तथा विकसित करने के लिए प्रयोग किए जाते हैं। विश्व में सर्वाधिक दूध देने वाली बकरियो की दो नस्लें मानी जाती हैं- एक स नेन, दूसरी रोजेनबग । ये दोनो ही विदेशो नस्ल हैं और भारत में नहीं पाई जाती। हा, भारत सरकार प्रयत्न कर रही है कि सकर प्रजनन द्वारा यह नस्ल भारत में भी सुलभ कराई जा सके। भारत की मशहूर नस्ल जमुनापारी बकरिया जिला इटावा (उत्तर प्रदेश) और ग्वालियर (मध्य प्रदेश) के मध्य भाग मे अर्थात यमुना तथा चम्बल नदियो के बीच में क्षत्र में पाई जाती हैं। इस नस्ल का काई एक रग-विषेष नहीं होगा । राफेद भी होती है पानी भी सपा पातेदार भी। ये बारियों को तमा सम्धी रोगो यासी और तगही होती है। इस नस्ल की बारिमा प्रतिमि १५ोण म दूध देती है। दूसरी मशहूर स्ल यारवारी एटा, इटावा, आगरा ७२ तथा ग्युर ( उत्तर प्रवेश म) पाई जाती है । इनका पद गाटा तथा टा मार होता है । रग आमतौर पर मफे पितु बुछ पर याले भूरे धन्वै भा होते हैं । टोहाटी तथा मजबूत होती है। ययारियां प्रतिदिन ५६ पोर तक दूध देती हैं। इनम एक विशेषता और भी है कि ये जमुनापारी बकरियो की भाति जगलो म परना अधिक पसद नही बरती। ये परा पर भी आराम से पाली जा सकती हैं, इसलिए गहरा तथा वस्यो म उपयोगी हैं। बकरी या दूध बच्चो यूदों तथा जवानो सभी के लिए उपयोगी, आवश्यक तत्त्वो से परिपूण तथा पौष्टिक होता है । निम्नाक्ति तुलनात्मक चाट सरकारी अनुसंधानशालाओ मे मिय गय जाच प्रयोगो के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें आप देखगे कि मा के दूध और गाय के दूध से बकरी का दूध किसी प्रकार कम उपयोग नहीं। यहां तक कि कुछ आवश्यक तत्त्व तो बकरी के दूध मे मा वेघ तया गाय के दूध से भी अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। तीन श्रेष्ठ दूधो का तुलनात्मक चाट आवश्यक तत्वो की प्रतिशत मात्रा दूध प्राटीन चिनाई । शकरा खनिज ०४५ १मा का दूध १५२ २ गाय का दूध ४४८ ३ बरीका, ८७६८ ९७०२ ५२८ । ०५८ उक्त तालिवा बरी दूध की श्रष्टना को स्पष्ट रूप से प्रकट करती है। रोगियो तथा छाटे बच्चो के लिए तो सुपाच्य होने के कारण बकरी का दूध अत्युत्तम है। साथ ही साजन, दमा तथा गरमी के शिशु ज्वर में भी बडा लाभदायक होता है। गाय का दूध अम्लीय प्रभावकारी होता है और वरी का दूध क्षारीय प्रभावकारी। अम्लपित्त रोगो में इकी का दूध विशेष गुणकारी है । तीसरे बकरी के दूध मे कुछ उपयोगी तत्त्व मा के दूध से भी अधिक मात्रा में पाए जाते हैं, यथा-दूध में पाए जाने वाले १२ प्रकार के खनिज लवणो मे से मा के दूध में केवल ५ लवण, गाय के दूध में केवल ६ खनिज लवण और बकरी के दूध मे ६ खनिज लवण पाए गए हैं। माथ ही गाय के दूध मे लौह की मात्रा अत्यल्प पाई जाती है, जबकि शरीर मे लोह तत्त्व की पर्याप्त मात्रा होना स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। बकरी के दूध में गाय के दूध की अपक्षा आठ या दस गुना लौह तत्व अधिक पाया जाता है । इन सब बातों से प्रकट है कि बकरी का दूध भी अति उत्तम तथा स्वास्थ्य लिए उपयोगी है। बकरी पालन को भी वही महत्त्व दिया जाना चाहिए, जो गोपालन अथवा मम पालन को। बकरी के दूध मे कभी-कभी एक तज गध (होक, मी आती है, उसका मूल कारण बकरियो को गदे स्थानो मे रखना, दूध को असावधानी से दुहना तथा बकरियो को भेडो अथवा बकरो के साथ रखना है। इसी गध के कारण प्राय लोग बकरी के दूध से पणा करते हैं और उस निकृष्ट मानते हैं।
होता । सफेद भी होती हैं, काली भी तथा चक्तेदार भी। ये बकरियां तथा लम्बी टागो वाली और तगडी होती हैं। इस नस्ल की बखरिया प्रतिनि ७२ - १३ पौण्ड दूध देती हैं। दूसरी मशहूर नस्ल बारबारी एटा, इटावा, आगर तथा मथुर (गव उत्तर प्रदेश म) पाई जाती है । इनका कद पाटा तथा टर कार होता है । रग आमतौर पर सफेद पितु कुछ पर काले भूरे धब्बे भी हो, हैं । टागें छोटी तथा मजबूत होती हैं। ये बकरियां प्रतिदिन ५६ पौण्ड तत्र दूध देती हैं । इनमे एक विशेषता और भी है कि ये जमुनापारी बकरियो में भाति जगलो मे परना अधिक पसद नही करती। ये घरो पर भी आराम से पाली जा सकती है, इसलिए शहरा तथा स्थो में उपयोगी है। बकरी का दूध बच्चो, बूढ़ो तथा जवानो सभी के लिए उपयोगी, आवश्यक तत्त्वो से परिपूर्ण तथा पौष्टिक होता है । निम्नाक्ति तुलनात्मक चाट सरकारी अनुसधानशालाओ मे किय गय जाच प्रयोगों के आधार पर तयार किया गया है । इसमे आप देखेंगे कि मा के दूध और गाय के दूध से बकरी का दूध किसी प्रकार कम उपयोग नहीं । यहा तक कि कुछ जावश्यक तत्व तो बकरी के दूध मे मां के दूध तथा गाय के दूध से भी अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। तीन श्रेष्ठ दूधों का तुलनात्मक चाट आवश्यक तत्वा की प्रतिशत मात्रा प्रोटीन चिकनाई खनिज शकरा १ मा वा दूध १५२ २ गाय का दूध,४४० ३ पारीया ४०६ ०४५ ०६० ०५६ ८७६८ ९७०२ ५१४ ५८ - उक्न तालिका वररी दूध को श्रेष्ठामो स्पष्ट रूप से प्राट पती है। रोगियो तथा छाटे बच्चा के लिए तो सुपार होने के कारण बारी का दूध भायुतम है। साथ ही हारन, दमा तपा गरमी के शिशु सर म भी बर लाभदायक होता है। गाय का दूप अम्लीय प्रमावरारी होता है और बारी पाय धारीय प्रभावकारी। अम्लपित्त रोगों में सरीष विषेष ७३ गुणकारी है। तीसरे वक्री के दूध मे कुछ उपयोगी तत्व मा के दूध से भी अधिक मात्रा में पाए जाते हैं, यथा-दूध में पाए जान वाले १२ प्रकार के खनिज लवणों मे से मा के दूध मे केवल ५ लवण, गाय के दूध में केवल ६ खनिज लवण और बकरी के दूध मे ६ खनिज लवण पाए गए हैं। साथ ही गाय के दूध म लौह की मात्रा अत्यल्प पाई जाती है, जबकि शरीर मे लौह तत्त्व की पर्याप्त मात्रा होना स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। बकरी के दूध में गाय के दूध की अपक्षा आठ या दस गुना लौह तत्त्व अधिक पाया जाता है । इन मव बातों से प्रकट है कि बकरी का दूध भी जति उत्तम तथा स्वास्थ्य के लिए उपयागी है। बकरी पालन वो भी वही महत्त्व दिया जाना चाहिए, जो गोपालन अथवा मस पालन को। बकरी के दूध मे जा कभी-अभी एप तन गघ (होक) सी आती है, उसका मूल कारण बकरिया यो गदै स्थानी म ए, दूध को असावधानी से दुहना तथा बकरियों को भेडों यथया वपर गाय रखना है। इसी गध के कारण प्राय लोग बकरी के दूध रा घृणा मम और उसे निकृष्ट मानते हैं।
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७५ मूलत स्पेनिश भेड़ें हैं, किन्तु सुनहरे परो वाली ये भेडे आजकल आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका तथा अमरीका मे बहुत बडी संख्या में पाली जाती हैं। इस नस्ल की सर्वोत्तम किस्म की होने के कारण बहुत ऊचे दामो मे बिकती हैं । विश्व की कुल ऊन उत्पादन का लगभग ४० प्रतिशत भाग ब्रिटेन आदि देशो में इसी नस्ल से विकसित अ य नस्ल की भेडो से प्राप्त होता है, जो मध्यम श्रेणी की ऊन मानी जाती है । शेष २० प्रतिशत भाग एशियाई देशो की नस्लो मे प्राप्त किया जाता है, जो मोटी ऊन या घटिया ऊन कहलाती है और विशेष रूप से गलीचे बनाने म प्रयुक्त होती है, कि तु भारत जैसे विशाल कि तु निधन देश में वस्त्र, कम्बल आदि बनाने के लिए आतरिक खपत इस मोटी कन की ही अधिक है। ब्रिटेन की जलवायु आर्थिक स्थिति वहा के निवासियो की इस व्यवसाय म अभिरुचि आदि कारणो से वहा भेड पालन का अच्छा विकास हुआ है । वहा की भेडो में डाउनी नस्लें यथा साउनडाउन व हैम्पशायर, पहाडी नस्लें यथा चवियर फैरी व ग्लैक फेम, लस्टर वूल आदि और चमकीली ऊन देने वाली नस्लो मे घोडर वालीसेस्टर तथा लिकजन आदि विशेष रूप से विख्यात हैं। लिंकजन नस्ल की भेडो से और भी अनेक नस्लें तयार की गई हैं। ब्रिटेन में अच्छी नस्ल की एक भेड का वजन १२० पौण्ड से १७५ पौण्ड तक होता है, जबकि भारतीय भेड का वजन ५०-६० पौण्ड ही होता है। वहा एक मेंढे का भार १५० पौण्ड से २४० पौण्ड और किसी किसी का ४०० पौण्ड तक होता है, जब कि भारतीय मेंढे प्राय ८० से १०० पौण्ड के मध्य ही रहते हैं। भेडो से ब्रिटन, आस्ट्रेलिया आदि देशो मे केवल कन ही नहीं प्राप्त की जाती वरन दूध तथा मास भी प्राप्त किया जाता है और वहां इन दोनो वस्तुमो की भी बड़ी माग है । रितु हमारे देश मे अधिनाशत भेड मन प्राप्त करने के लिए ही पाली जाती है। यद्यपि भेड का दूध बहुत शक्तिदायक और स्वास्थ्यवद्धक होता है तथापि भारत में इसे पसद नही किया जाता। भारतीय भेडों की नस्लें व ऊन का उत्पादन भारतीय भेडो की नस्लो मे गलीचे की ऊन की सबसे बढिया विस्म देने मे - वाली बीकानेर की मगरा और चाकेला तथा जोरिया की अच्छी नस्लें मानी गई हैं । कश्मीर तथा तिब्बत, नेपाल, भूटान आदि मे भेडो की मिली-जुली नस्ल पाई जाती हैं जो मुलायम तथा बारीक ऊन के लिए प्रसिद्ध हैं । पजाब म लोही नस्ल की भेड पाली जाती है जो ऊन तथा मास दोनो की दष्टि से उपयोगी है क्योकि यह नस्ल दूसरी नस्लों की अपेक्षा डीलडोल व वजन भारी व तगडी हाती है। भारत मे राजस्थान कच्छ, महाराष्ट्र व उत्तरी गुजरात ही भेड पालन व का उद्योग क प्रमुख क्षेत्र हैं। भारत की एक भेड से औसतन पोन पौण्ड से ४ पाण्ड तक ऊन प्राप्त होती है। भारत की कुल ऊन उत्पादन क्षमता लगभग ५ करोड ४० लाख पौण्ड वार्षिक है। विश्व भर मे लगभग ६० करोड भेडें हैं जिनमे ४ करोड भेडे अकेले भारत में हैं । भारतीय भेडो की अधिकाश ऊन मफेद होती है, किन्तु कुछ की रशीन भी होती है। उतरी भारत मे उत्पन सफेद ऊन की विदेशो मे अच्छी ख्याति है। भारत को ऊन के निर्यात से लगभग ८ करोड रुपए वार्षिक की आय होती है। भारत की ऊनी मिलें, जो सूट का ऊनी कपडा चनाती हैं प्राय विदेशी ऊन आयात करके प्रयोग करती हैं। भेडो को खाल भी विक्ती है । उससे भी लाखो रुपये की आय होती है। दूसरे इसकी मेगनी खेती के लिए बहुत उत्तम खाद मानी जाती है, क्योकि इसमे नाइट्रोजन व पोटाशियम की मात्रा अ य पशुओ से प्राप्त गोबर खाद से दुगनी होती है । मुलाया ऊन के लिए कश्मीर जादि पहाडी क्षेत्रो मे पाई जाने वानी भेडो म पुछ करनाह तथा कश्मीर घाटी मे तीन नस्लें प्रसिद्ध है। तीन कन के लिए रामपुर की बुशायर नस्ल प्रसिद्ध है जो मूलत हिमालय के मासो स्थान की नस्ल है । पूर्वी भारत म नेरोली माडया, यालगा या तेंगुरी नस्लें पाई जाती हैं । ये भेडें देखने मे बकरी के समान लगती हैं। इनके गले के नीचे दो झम्ने होने हैं। राजस्थानी गडरियों के किसी किसी रेवड मे छनोत्तर या सोमाही नस्ल की भेड़ें भी पाई जाती हैं, जिनके कान विशेष रूप से बड़े होते हैं और जो दूध भी अधिक देती हैं। इस प्रकार हम इस निष्क्ष पर पहुचते हैं कि यदि अच्छे ढग के रेवर बनाकर समुचिन रखरखाव व पशुधा की चिकित्मा व देखभाल का पर्याप्त पान हो, तो भेड पालन भी लाभ का व्यवसाय है। कन, दूध तपा चमडा और साद प्राप्त कर हम उनसे वोहरा लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
तेज दौड़ने वाला हप्ट-पुष्ट पशु घोड़ा पाहा एक बहुत ही चुस्त फुर्तीला तेर दौडने दाता, समसदार धोर स्वानिमत पा है । यह सदाये रे कान में आग है और माल ढोने के लिए भी उपयुक्त होता है । पिठली गताब्दी तक एक स्थान से दूसरे स्थान तक नावागमन का प्रमुख माघन घोडा ही पा । यह भारत में फैली हुई छोटी-बड़ी रियासतों की मेना तया पुलिम का एक प्रमुस अग पा। यही कारण है कि पिछले राजाओं महाराजाओ नवाबो, रईसो जमींदारो आदि मे घुड़सवारी का बहुत शौक तथा प्रचलन था और दूर-दूर देशो से एक से एक वडिया नस्त के घोडे मगाए जाते थे। अधिकाश सेना घुडसवार सेना होती पी अपवा पदल मेना । व्यापारी वर्ग में भी दूर-द्र प्रदेशो मे जाकर व्यापार करने, अपने प्रदेश को वस्नुए दूसरे प्रदेशों अथवा देशों में से जाने पौर यहाँ से उपयोगी वस्तुए लाने में निगा घोडों का ही अधिक प्रयोग क्यिा जाता पा। अब तो मोटरें रेलें, जहान आदि चल जाने के कारण घोडो की मांग तपा उपयोगिता घट गई है और जन-जीवन से इसका बहुत घोडा सम्बध रह गया है अर्थात् छोटे छाट कस्बों शहरो अथवा गावो म तागो तपा इक्को मे घोडे बोतकर सगारिया तया माल ढोया जाता है अथवा पहाडी स्थानो मे जहाँ रेलें तथा मोटरें नहा पदाच पाती, वहा आने-जाने व माल ढोने के लिए ही घोडो का अश्या सच्चरों का प्रयोग किया जाता है। सच्चर भी पोडो की एम मस्त समशी - जाती है। आजकल भारत में घाडों का प्रयोग सेना अपवा पुलिस विभागो मे ही मुख्य रूप में होता है और इही से निकाले गये घोडे बाजारों में जनता के हाथों में पहुंचते हैं, जो तांगो, इको आदि मे जोते कही कही सवारी के काम में लाये जाते हैं।
विशालकाय पशु हाथी हाथो हमारे देश का सर्वाधिक विशालकाय, ताक्तवर और बहुत सीधा सादा पालतू पशु है। गत शताब्दी तक यह पशु राजाओ महाराजाओ के महलो मे बडे आदर व पाव से पाला जाता था, क्योकि यह राजाओ की विशेष प्रिय सवारी के रूप में प्रयोग किया जाता था। सेना मे एक डिवीजन हाथी सेना का भी होता था। यह पशु भी बहुत समझदार तथा स्वामिभक्त हाता है, कि तु इसे बिलाना पिलाना, रखना पालन व्यय आदि एक सामा य जन की सामथ्य के परे है। यह राजमहलो मे ही पाला जाता था । पहाडी स्थानो मे पहाडो जगलो की लकडी ढोकर मैदानी भागो में पहुचाने के लिए भी इसका प्रयोग होता था और अब भी हो रहा है चूकि यह इतना ताकतवर और विशाल पशु है कि कई मन लाड़ी के लट्ठे एक साथ लादकर आसान से चल सकता है, जबकि उतनी लकडी ढोने के लिए भय साधन अधिक महगे पडते है । पहाडी लवडी के व्यापारियो के लिए, जहाँ अन्य साधन सुलभ नही, आज भी हाथी की विशेष उपयोगिता है। यह इतना समझदार जानवर है कि मनुष्य की भाति ही इशारो को जल्दी समझ लेना है। अत इसका सकस कम्पनियों में भी बहुत महत्त्व है। वे लोग हाथियों को टूल पर बैठना, मोटर साइकल चलाना, नाचना आदि पाय सिखा कर जनत का अच्छा मनोरजन करते हैं। देश के विभिन्न चिडियाघरों में तो हापियो ही विविध नस्लें रखी तथा पाली जाती हैं और वहाँ भी वे जन साधारण विशेष कर बच्चो) के लिए आवर्षण का प्रमुख केद्र बनते हैं। शिकारियों मे भी हाथी का विशेष महत्त्व व उपयोगिता है, क्योकि हापी र बैठकर शेरो, चीतो मादि का शिकार खेलना वहा आन ददायर व सुरक्षित Tना जाता है। गुजरात के गिरि आदि वनों में सरकार द्वारा विशेषरूप से ७६ शिकार के लिए हाथी पाले व रखे जाते हैं, जिहें विदेशी शिकारी यहा आने 'पर अच्छे पैसे देकर शिकार खेलने के लिए प्रयोग करते हैं । विश्व मे हाथियो की थोडी सी ही नस्लें पाई जाती है, अधिक नहीं। भारत के जगलो मे पाये जाने वाले हाथी बचपन में ही पकड कर विदेशा के चिडियाघरी को बेचे जाते हैं और उनसे अच्छी आय होती है । उडीसा, बिहार, बगाल, असम, मध्य प्रदेश, गुजरात आदि के जगलो मे तथा हिमाचल को तराई म हाथियो र झुण्ड के झुण्ड विचरते दिखाई पडेंगे। चूकि इनकी संख्या दिन प्रतिदिन कम होती जा रही है और कुछ विशिष्ट नस्लें तो समाप्त प्राय हो रही हैं, इसलिए सरकार ने इहें कानूनी सुरक्षा प्रदान करते हुए हाथियो के शिकार पर सस्त प्रतिबंध लगा रखा है। भारत के कुछ विशिष्ट साधु समुदाय भी हाथी पालते हैं और बडे-बडे मठों तथा मन्दिरो में हाथी रखे जाते हैं। इस प्रकार आम जनता के लिए उपयोगी न होने पर भी हाथी देश का एक विशिष्ट व महत्त्वपूण पशु है । इसके दात बहुत कीमती होते हैं । हाथी दात की अनेक कलात्मक वस्तुए बनाफर भारत विश्व के बाजारो मे भेजता है, जो बहुत ऊचे दामो में बिकती हैं । हाथी का नाखून आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति मे महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है, क्योकि अनेक रोगों को जड से नष्ट करने का गुण उसमे पाया जाता है । इसीलिए हमारे यहा कहावत मशहूर थी जिदा हाथी लाख का, तो मरा सवा लाख का।
। । - रेगिस्तान का उपयोगी पशु ऊट लम्बी टागो तथा लम्बी गदन वाला यह पशु भारत के सब पशुओ से अधिक कचा होता है । यह पशु सामा य चाल से तो धीरे चलता है कि तु दौडने पर काफी तेज दौड सकता है। प्राचीन काल मे यह सवारी के काम आता था और बोझा ढोने के काम भी। राजा महाराजा अपनी सेना मे कट सवार सेना की बिग्रेड भी रखते थे। मुख्य रूप से ऊट रेगिस्तानी पशु है। रेगिस्तानी इलाको में पानी की बहुत कमी होती है और मीलो तक फले रेगिस्तान मे न कही कोई पेड पौषा नजर आता है और न कुआ-नालाब । पानी की एक बूद भी दिखाई नहीं देती। इस पशु मे प्राकृतिक तौर पर एक विशेषता होती है । इसकी लम्बी गदन मे पानी पी एक विशेष थैली बनी होती है। यह जब पानी पीता है तो उस पेली को भी भर लेता है और फिर कई कई दिन तक इसे पानी की जरूरत नहीं पड़ती। क्योंकि जब भी इसे प्यास लगती है यह उसी पली मे से योडा थोडा पानी उहेल कर पीता रहता है । यही कारण है कि पानी की कमी वाले रेगिस्तानी क्षेत्रो मे यह अत्यधिक उपयोगी पशु साबित होता है । आजकन कट का प्रयोग राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्रो अथवा पहाडी स्थानो मे भी होता है । वैसे इका-दुक्का तौर पर मैदानी क्षेत्रों में भी देखने को मिलता है। राजस्थान मे यह गाडी मे बल या पोडे के स्थान पर जोतकर माल ढोने के भी काम आता है और एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाने के लिए सवारी के काम म भी आता है। इस पर भी ऐस बने होते हैं कि रेगिस्तान की रेतीती भूमि पर यह बडा आराम से घस गना है। यहाँ तक कि दोपहर पी चिपिलाती धूप में जबधि रेत बहुत गरम हो जाती है, यह पतु बडे मने १ उस पर दौडता चला जाता है। पहाडी क्षेत्रो मे यह जगली लकडी लादकर मदानी क्षेत्रो म पहुचाने के काम में आता है। राजस्थान मे, जहां यह सवारी के पाम भी आता है, इसकी पीठ पर दो या तीन व्यक्ति वठकर बड़े मजे मे दूर तक ना सवत हैं। भारत की सेना मे आजकल भी कट सेना रखी जाती है, ताकि रेगिस्तानी क्षेत्र मे सैनिको का पहुचाने के लिए ययावसर उनका प्रयोग दिया जा सके। यह पशु यद्यपि घोडे तथा हाथी के समान समनदार तथा स्वामिभक्त तो नहीं होता, फिर भी सीधा होने के कारण तथा अपने प्राकृतिक विशेष गुणो के कारण महत्त्वपूर्ण है।
मालवाही सस्ता पशु गधा . गधा माल ढोने वाले पशुओ में सबसे सस्ता पशु है । व्यक्तिगत रूप से ऐसे व्यवसाय करने वाले व्यक्ति, जिहें लाभ थोडा होता है और माल ढोना पडता है, गधे का प्रयोग करते हैं, जैसे धोबी तथा कुम्हार आदि जातियो के लोग। धोबी को घूचि सुबह कपड़ों के गटठर लादकर नदी या तालाब पर ले जाने होते हैं, जहां वे घाटो पर कपडे धोते हैं और शाम को उहें पुन इक्टठा करके घर लाना होता है और यह उनका लगभग प्रतिदिन का ही काम होता है, इस लिए वे कपडे लाने ले जाने का काम गधे से ही लेते हैं । इसके रखरखाव पर भी उन्हें कुछ व्यय नही करना पडता । क्योरि जब तक धोबी कपड़े धोत हैं, गधे नदी या तालाब के किनारे इधर-उधर घर कर अपना पेट भर लेते हैं और शाम को कपडे वापस लाकर धोबी या तो इहे वाघ देते हैं या रात में भी खुला ही छोड़ देते हैं। यह भी इतना सीधा पशु होता है कि खुला रहने पर भी भागकर कही नही जाता । हो, दुलत्ती चलाने में इसे बडा मजा आता है इसलिए गये आपस म ही एक दूसरे को दुलत्ती मारते रहते हैं । कुम्हार जाति के लोग, जो घडे, सुराहिया मादि मिट्टी के बतन बनाते हैं, गयो पर ही अपना माल लाद कर एक स्थान से दूसरे स्थान तथा मडियो व शहरो तक ले जाते हैं, क्योकि अप सचार साधनो से ले जाने मे एक तो खर्चा अधिक बैठता है दूसरे बतनो के टूटने का भी भय रहता है । गधे की पीठ पर वे एक विशेष प्रकार से बुने जाल के थलो मे रखकर इसकी पीठ पर दोना ओर लटका कर इस प्रकार रख देते हैं कि फिर कितनी ही दूर चले जायें, वे वतन एक-दूसरे से टकराकर टूटेंगे नहीं। इस प्रकार गधा धावियों तथा कुम्हारों का ही पशु विशेष बन गया है । ८२ ३ यद्यपि बडे शहरो मे अब कपडे मशीनो द्वारा धुलने तथा ड्राईक्लीन होने लगे हैं, फिर भी अधिकाश जनता गावो, छोटे कस्बो या छोटे शहरो मे बमी है और बडे शहरो में भी सामाय व निधन व्यक्तियो के कपड़े धोबी लोग नदी- तालाबो के घाटो पर ही धोते हैं। यही कारण है कि मशीनी युग मे भी भारत मे गधों की उपयोगिता व महत्त्व में किसी प्रकार की कमी नहीं हुई है, वरन् इसका महत्व वढता ही जा रहा है। इसको भारत में अधिक नस्लें भी नहीं है । सब गधे एक दो नस्लो के ही हैं। ६ स्वामिभक्त व सजग पशु कुत्ता कुत्ता एक छोटा-सा पशु है, जा न तो सवारी के काम आता है और न माल ढाने के हो । फिर भी यह मनुष्य जाति के लिए बहुत उपयोगी पशु सिद्ध हुआ है । क्योकि इसमे कुछ बहुत ही उत्कृष्ट कोटि के स्वाभाविक गुण पाये गये हैं । एक तो यह बडा ही स्वामिभक्त होता है और अपने पालने वाले स्वामी से बहुत प्यार करने लगता है । दूसरे यह इतना चोक ना पशु होता है, कि रात फो सोते समय भी तनिक से खटके या पद-चाप से ही फौरन जाग जाता है और भौंकने लगता है। इसके भौंकने से घर तथा पडोस के दूसरे व्यक्तियो की भी नीद खुल जाती है । उस दशा मे यदि कोई घोर-उच्चका घर में चोरी करन के इरादे से घुसा है, तो वह असफल रहकर भाग खड़ा होता है । इस प्रकार यह एक सजग प्रहरी का काम करता है, यही कारण है कि घरो मे लोग कुत्ते पालते हैं। शहरों मे तो प्रत्येक कोठी मे कुत्ते का पाला जाना आवश्यक सा हो गया है। साथ ही कुत्ता बहुत समझदार पशु है । यह अपनेप राये पो अच्छी तरह पहचानता है। यही कारण है कि जिस पर मे यह पाला जाता है, उस परके छोटे छोटे बच्चे तक उसे मारते रहते हैं, मान खीचते रहते हैं, सवारी करते हैं, जितु वह उहें कभी नहीं वाटता । किन्तु यदि पडोस का दूसरा आदमी भी पर ये दरवाजे ये अदर पवि रखने की चेष्टा करता है, तो कुत्ता पौरन भोक पर उम पर दौड पडता है और यदि पालने वामा उसे रोने नही अपवा जाने याला पोये न हट पाये, तो दुत्ता उसे फौरन काट लेता है। इग पशु मे एक विशेषता और नी पाई जाती है, जो अब पशुओं म नहीं। इसकी प्राण शक्ति (संपने की शक्ति) बहुत तेज होती है और यह विगी भी व्यक्ति के पैरो के निशान सूप सूप फर निघर और जहा तर बह गया है, वहाँ तक पहुंच सकता है। इसी गुण विदोष के कारण कुत्ते का विश्व के प्रत्येक देश में पुलिस तथा सेना विभागो में बड़ा महत्त्व है। इन विभागों म अपराधियों अथवा जासूसो का पता लगाने के लिए कुत्तो को विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है और करल, चोरी, डाक आदि जप य अपराधो मै इन प्रशिक्षित युत्तो की प्राण शक्ति को सहायता से पुलिस अयवा सेना के अधिकारी इन कुत्ता के पीछे-पीछे जाकर शीघ्र ही असली अपराधी को जा पपडते हैं । इस नाय में यह पशु अत्यत विश्वसनीय काय करता है । अपराधी के पैरो के निशान या हाथ के निशान को सूधकर कुत्ता फोरन उस दिशा मे बढने लगता है, जिधर अपराधी गया है। विश्व म कुत्तो की अनेक जातिया पाई जाती हैं । रूस के उत्तरी क्षेत्रों तथा साइवेरिया मे कुत्तों की एक ऐसी नस्ल पाई जाती है, जो बफ वे पर गाडियां खींचकर सवारियों को सैर पराने या एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुचाने के काम आती है । बफ पर चलने वाली विशेष प्रकार की गाडियां वहाँ प्राय उस जाति के कुत्ते ही खीचते हैं। भारत में भी कुत्तो की अनेक जातिया है, जिनमे शिकारी कुत्ते विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। ये अत्य त दुबले-पतले, लम्बे और काफी ऊचे होते हैं । प्राय' ये कुत्ते भारत को खानाबदोश जातियो के पास पाये जाते हैं । क्योकि वे लोग सफर मे इन कुत्तो द्वारा ही खरगोश, हरिण आदि पशुओ का शिकार करते हैं और उनके मास स ही अपना व अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं। ये शिकारी कुत्ते इतने खूख्वार तथा फुर्तीले होते हैं कि शिकार को दूर देखते ही बिजली की तरह झपटते हैं और देखते-देखते शिकार को धर दबोचते हैं । इन कुत्तों की छलागें भी बहुत लम्बी पडती हैं। घरो मे पाले जाने वाले सामान्य कुत्ते न तो इतने फुर्तीले ही होते हैं और न ही खूश्वार । इनम कुछ बहुत छोटे, कुछ बडे और कुछ मध्यम आकार के होते हैं । ये कृते प्राय भौंकने वाले अधिक होते हैं, ताकि पहरेदारी कर सकें और भीक कर गृहस्वामी को चौक ना कर व्यावसायिक रूप से कुत्ते पालने को हमारे देश मे कोई उपयोगित' नही और न ही ये व्यावसायिक तौर पर पाले जाते हैं । क्योकि यहा के कुत्ते इतने अच्छी नस्लो के भी नही होते, जो अय देशो को निर्यात करके धन प्राप्त किया जा सके। बल्कि हमारे देश के बडे-बड़े शहरो मे तो गलियो व मडको के आवारा कुत्तो को पक्डने व समाप्त करने के लिए स्थानीय प्रशासन को एक अलग विभाग स्थापित करना पडता है। फिर भी ये सिरदद बने रहते हैं । । - चर्चा के लिए उपयोगी पशु सूअर प्रकृति ने इस सष्टि मे कैसे-कैसे जद मुत जीव उत्पन किए हैं । सूअर एक अति साधारण पशु होते हुए भी अदभुत पशु है । इसका मुख्य भोजन मनुष्य का मल (टट्टी) है जो इसे बहुत ही प्रिय है और यहीं इसके लिए सबसे अधिक अनमोल, लाभप्रद तथा उपयुक्त भोजन है । इससे आप सहज ही समझ सकते हैं कि इसे पालने के लिए किसी प्रकार का व्यय नही उठाना पडता । यह पशु स्वत इधर-उधर घूम घूम कर लोगो की टट्टी खाता रहता है और उसी से इसका पेट भरा रहता है । अय क्सिी वस्तु की इसे आवश्यकता नहीं । इसमे एक विशेषता और भी है कि इसके शरीर मे चरबी जितनी अधिक मात्रा में पाई जाती है, उतनी किसी अय पशु में नहीं और यह भी आप जानते ही होंगे कि आज के वैज्ञानिक युग मे ड क्टरो ने मानव स्वास्थ्य के लिए च को एक आवश्यक व उपयोगी तत्व माना व सिद्ध किया है। यही कार कि सूअर की चर्बी से असख्य दवाइया बनती हैं, जो लाखों-करोडो मनुष्यो स्वास्थ्य व जीवन दान देती हैं। इस प्रकार आज के युग मे यह पशु भी एक महत्त्वपूण पशु बन गया यद्यपि प्राचीन काल मे हमारे देश में इसे प्राय मेहतर जाति के लोग ही पा थे, किन्तु अब सरकारी तौर पर बडे-बडे केद्रो मे भी इसे पालने की योज बन रही है और लघु स्तर पर भी यह काय हो सकता है । इस प्रकार अनेक देशों में सूअर पालन भी एक अच्छा व्यवसाय बन गय भारत में भी यह व्यवसाय बन जायेगा। और भविष्य पशुओ की शरीर-रचना हम आपको पशुओ के शरीर की रचना, उनके विविध अगो व अवयवों और उनकी काय प्रणालियों आदि के विषय में आवश्यक जानकारी करा देना चाहते हैं । क्योकि इन बातों की जानकारी के बिना पशुओ के रागो की चिकित्सा करना कठिन होगा। जिस प्रकार मनुष्यो को विविध रोगों से बचाने के लिए डाक्टरो ने मानव शरीर को चीर फाडकर उसकी बनावट, उसके अग प्रत्यग की स्थिति व काय प्रणाली का गहन अध्ययन करके उपयोगी ज्ञान अजित किया, उन अवयवो की काय-प्रणाली में दोप अथवा अवरोध उत्पन होने के धारण तथा रोगो की उत्पत्ति आदि के बारे मे जाना और तब उन रोगों अथवा दोपो के निवारण के लिए तदनुकूल चिकित्सा, भौषधि व उपचार की खोज की, ठीक उसी प्रकार पशु चिकित्सा विज्ञान भी पशु के शरीर की रचना से भारम्भ हो कर आज इतना विकसित हो गया है कि मानव रोगो की भाति ही पशु रोगों के लिए भी अनेक प्रकार की जोपधियो तथा इजेक्शनों का अविष्कार हो गया है, जिनके द्वारा शीघ्र ही पशु रोगो पर नियत्रण पाया जा सकता है । साराश यह कि हम पशुओ के रोगो की चिकित्सा भनी भाति तभी कर मक्ते हैं, जबकि हमे उसके शरीर की रचना यानी अग प्रत्यग की स्थिति, बनावट, काय तथा उत्पन्न होने वाले दोषो आदि का समुचित मान हो । आशा है कि निम्नाक्ति जानकारी पाठकों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी। पशु शरीर के प्रमुख अवयव-सस्थान मनुष्य या पशु, किसी भी जीव के शरीर का प्रत्येक छोट से छोटा अग उपयोगी होता है। प्रकृति ने जीवो के शरीर की रचना में अदभुत कमाल दर्शाया है। प्रत्येक अग शरीर के पोषण, शक्ति प्रदान, आवश्यक तत्त्व ग्रहण, शरीर रक्षा तथा काम करने वाले एक प्रमुख केन्द्र अथवा सस्यान से सम्बधित होता है और इन सस्थानो का पारस्परिक सम्बध इस प्रकार जुड़ा होता है कि वे समस्त शरीर की आवश्यक्ता एक-दूसरे द्वारा पूरी करते रहते हैं। इसी प्रकार अपनीलपनी काय प्रणालियो के अनुसार पशु शरीर को निम्नलिखित आठ प्रमुख सस्थानो में विभाजित दिया जा सकता है १ पोपण-सस्थान इस संस्थान का मुख्य काय शरीर के पोषण से लिए आवश्यर आहार का ८६ प्राप्त करना व उसमे रक्त बनाना है । इस संस्थान के कार्यों को तीन श्रेणियो में विभक्त किया जा सकता है। पहली भोजन को शरीर मे पहुचाना, दुमरी खाये हुए आहार को रामायनिक क्रियाओ द्वारा पचाना और तीसरी पचे हुए भोजन से रस खीचकर यकृत (Liver) मे रक्त निर्माण के लिए पहुचाना । इन तीनों श्रेणियो की क्रियाओ को पूरा करने मे पशु शरीर के जो अग सहायता देते हैं, वे इस संस्थान में अतगत आते हैं, यथा थूथनी या थाथ (Muzzle or Muffee)--जो विभिन प्रकार के चारे चरने तथा उहें जानने मे पशु की सहायता करती है। मुह (Mouth)-जिमके द्वारा पशु खाद्य पदाथ ग्रहण करता है और उसे चबापर लार के मिश्रण द्वारा पाचन योग्य बनाकर अदर ले जाता है । जबडे (Jaws)- इसमे एक नीचे का जबडा (Lower jaw) और दूसरा ऊपर का जबडा (upper yaw) होते हैं। नीचे के जबडे मे वस्तु को कुतरने वाले दात लगे होते हैं, और ऊपर के जबडे मे वस्तु को चबाने या जुगाली करने में सहायता करने वाले (चौह) लगे रहते हैं । गात (Cheeks)--इनमे अदर को और मैसीटर (Masater) नामक मास होता है, जो जुगाली के समय मदद करता है। जीभ (Tongue)-इसके द्वारा पशु खाने की वस्तु को समेटकर अन्दर सोच ले जाते हैं। पशुओ की जीभ प्राय' काफी लम्बी और बाहर निकल सकने योग्य होती है। इसका दूसरा भाग बहुन सूखड और दृढ होता है तथा धारे को ठीक प्रकार से समेट लेता है। खाने की नली (Food pipe or Oesophagus)-इस नली के द्वारा मुह से लार सयुक्त हो, गोले के रूप मे प्रथम आमाशय (Rurren) या मोम में जाता है । झोस या प्रथम आमाशय (Rumen) पागुर या जुगाली करने वाले पशुओं के शरीर मे यह प्रथम आमाशय होता है, जिसमे लगभग 30 से 50 गला तक साच पदाथ आ सकता है। यह आमाशय पट अयात Abdomen के बाई ओर होता है। शोझ मे इक्ट्ठा दिया हुआ खाद्य पशु आनी इच्छानुसार किसी भी क्षण पुन मुष मे निकालकर जुगाली कर सकता है। जुगाली करना उसे कहते हैं जो कि घारे आदि खाद्य को पशु भोजन पशु
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अनुपयोगी, दूपित या अवशिष्ट रस रह जाता है, वह यकृत की निचली सतह में बनी एक थैली में जमा होता रहता है, जिसे गाल ब्लेडर (Gall Bladder) कहत हैं । हि ती मे इसे पित्ताशय कहते हैं। दूसरे कलेजे का मुख्य काम रक्त मे मिधित अनुपयोगी अथवा दूपित अणुओ व यूरिया व यूरिक एसिड (urna and uric acid) जैसे पदार्थों को खीचकर रक्त को शुद्ध रूप में प्रवाहित रखना भी होता है । पशुओ के शरीर मे क्लेजा दाई ओर डायाफ्राम (Diaphragrm) के निकट होता है, जो दूसरे और तीसरे आमाशय को स्परा करता है। इस सस्थान के काय को सुचारु रूप से चलाने के लिए कुछ अय तत्व भी शरीर म विद्यमान रहते हैं, यथा-लैक्टिक ऐसिड (Lactic acid), गैस्ट्रिक जूस (Gastric juice), कजीन (cagine), पैप्टीन (paptone), रेनेट (Rennet), रेनीन (Renun), कैसीनोजेन (casinogen) इत्यादि । इस प्रकार इन तत्त्वो व उक्त अगो द्वारा इस सस्थान का काय ठीक प्रकार से सम्पन्न होता रहता है। २ "वास-सस्थान (Respiratory system)-जिस प्रकार मनुष्य के शरीर मे फेफडे वायु मण्डल मे से प्राणवायु (Oxygen) खीचने और काबन- डाइआक्माइड गैस (Carbondioxide) बाहर निकालने का काय करते हैं, उमो प्रकार पशु के शरीर मे भी फेफडो और श्वास नलिका द्वारा यह क्रिया होती है। क्योंकि वायु सभी जीवो के लिए जीवन का एक आवश्यक तथा प्रमुख आधार है। पशुओ के शरीर मे श्वासनली के ऊपर एक नली और होती है, जो पशु के पानी पीते समय ऊपर को उठ जाती है। इसे स्वर पत्र कहते हैं । नाक द्वारा वायु खीचे जाने पर फैरिक्म (Phyrynx) और लैरिक्स (Lrynx) में जाती है। इन दोनों से ही मिलकर स्वर यत्र अथवा (Copso- IN Eox) बना है। उसके बाद वायु बढी श्वास नलिका (Trachea) गा टेंटा म पहुंचती है। धूल के वेषण जो नाक के वालों आदि से नहीं रुक पाते हैं, रिक्स की सार मे फंस जाते हैं। आगे चलकर यह नली दो भागों में पट जाती है । एक भाग पशु के दायें फेफड़े में पहुचता है दूसरा बायें फेफडे दातो से धीरे धीरे चबा-चबा कर पीसता रहता है। इसके पश्चात वह पदार्थ आमाशय नम्बर दा (जिसे मधुहत्राकार (Reticulum) कहते हैं) मे जाता है। पोडे जुगाली नहीं करते, अस्तु उन्हे अपना चारा पहले अपन मुह मे बडी तरह चबाकर तभी अदर ले जाना पड़ता है। यह आमाशय पहले आमाशय से एक चौडे मुख द्वारा जुड़ा होता है, और दूसरी ओर एक छोटे मुख द्वारा तीसर आमाशय, जिसे अंग्रेजी मे Osman कहते हैं से भी जुड़ा होता है जो शरीर के दाई ओर चौथे आमाशय से कुछ कपर होता है। दूसरा नामाशय शरीर के मध्य मे पहले आमाशय के कुछ नीचे होता है । चौथा आमाशय Abomen Sum अथवा जिसे वास्तविक पेट (True Stomach) कहा जाता है। तीसरे आमाशय से चौथे आमाशय मे आने पर खाद्य पदाथ कुछ समय तक क्षारयुक्त रहते हैं और फिर कीटाणु चीनी को बदलकर लक्टिक एसिर (Lactic acid) बनाता है। इस प्रकार पशु शरीर मे चार आमाशय (मेदे) होते हैं। यही कारण है कि पशुओ को मैदे की बीमारिया प्राय नहीं होती क्योकि भोजा यो पचाने का काम क्रमश पारी मेदे करते हैं और उन पर अधिक दबाब या जोर नही पडता । प्रत्युत वे स्वाभाविक ढग से अपना काम करते रहते हैं। मौत (Intestines)-- मनुष्य के शरीर की भांति ही पशुओं में शरीर में भी सिकुडी हुई अति रहती हैं, जो आमाशय द्वारा पचाये हुए भोजन म से रस घूसती हैं और पदाय के रहे-सहे अश को और पपाती है । आत दो प्रकार की होती है। छोटी आतें और रही आते। दोनो प्रबार पी आतो ये मध्य में जोडने वाली एक तीसरी आंत (Caccam) होती है, जो गो-पशुप्रो म छोटी पितु पोडो मे बहुत वही होती है। कारण-गो पशुओं में जो काय माश (Rumen) भरती है, पोड़ों में यही पाय Caccam करती है माहार म से समस्त शरीरोपयोगी रत्व सोचपर मति शेष पोर यो गुणा माग से गोबर या सीद के रूप में बाहर निकाल देती हैं। क्सेना या पकत (Liver)-आमागायों व बांतों द्वारा प्राप्त किये बहरम कोने में सार रस्त कालपारण करते हैं । यह में रस्त बहने के परमात् अनुपयोगी, दूषित या अवशिष्ट रस रह जाता है, वह यकृत् की निचली सतह मे बनी एप थेनी मे जमा होता रहता है, जिसे गाल ब्लैडर (Gail Bladder) रहते हैं । हि दी मे इसे पित्ताशय कहते हैं। दूसरे क्लेजे का मुख्य काम रक्त मे मिश्रित अनुपयोगी अथवा दूपित अणुओ व यूरिया व यूरिक एसिड (urna and uric acid) जैसे पदार्थों को खीचकर रक्त को शुद्ध रूप में प्रवाहित रखना भी होता है। पशुओ के शरीर मे क्लेजा दाई ओर डायाफ्राम (Diar phragm) के निकट होता है, जो दूसरे और तीसरे आमाशय को स्पश करता है। इस सस्थान के काय को सुचारु रूप से चलाने के लिए कुछ अय तत्व भी शरीर में विद्यमान रहते हैं, यथा-लैक्टिक ऐसिड (Lactic acid), गैस्ट्रिक जम (Gastric juice), कैजीन (cagine), पैप्टीन (paptone), रेनेट (Rennet), रेनीन (Renun), कैसीनोजेन (casinogen) इत्यादि । इस प्रकार इन तत्त्वो व उक्त अगो द्वारा इस सस्थान का काय ठीक प्रकार से सम्पन होता रहता है। शरीर मे फेफडे वायु मण्डल मे २ श्वास-सस्थान (Respiratory system)-जिस प्रकार मनुष्य के प्राणवायु (Oxygen) खीचने और काबन- डाइआक्साइड गैस (Carbondioxide) बाहर निकालने का कार्य करते हैं, उसी प्रकार पशु के शरीर मे भी फेफडो और श्वास नलिका द्वारा यह क्रिया होती है। क्योंकि वायु सभी जीवो के लिए जीवन का एक आवश्यक तथा प्रमुख आधार है। पशुओ के शरीर मे श्वासनली के ऊपर एक नली और होती है जो पशु के पानी पीते समय ऊपर को उठ जाती है। इसे स्वर यत्र कहते हैं । नाक द्वारा वायु खीचे जाने पर फरिम (Phyrynx) और लैरिक्स (Lrynx) मे जाती है । इन दोनो से ही मिलकर स्वर यत्र अथवा (Copso- ISe Eox) वना है। उसके बाद वायु बडी श्वास नलिका (Trachea) गा टेंटआ मे पहुचती है । धूल के वे कण जो नाक के बालो आदि से नही रुक पाते हैं, फैरिक्स की लार मे फंस जाते हैं। आगे चलकर यह नली दो भागों में बट जाती है । एक भाग पशु के दायें फेफडे मे पहुचता है दूसरा बायें फेफरे ६२ में। फेंफडो मे पहुचकर यह नली घागे के समान पतली हो जाती है और इसके ऊपर फेफडे को बारीक झिल्ली पढी रहती है। इस झिल्ली के ऊपर अति सूक्ष्म रमन शिराएं बहती रहती हैं। श्वास से माथ वायु म जो ऑक्सीजन फेफ्डो म पहुंचती है। वह उसी झिल्ली से धनवर रक्त शिराओ मे चली जाती है और रक्त को शुद्ध तथा गतिशील बनाती रहती है तथा उस रक्त मे जो अम्ल गैस (Carbon Dior xide) रहती है, वह भी उसी झिल्ली द्वारा छनकर श्वासनली मे होकर वाहर निकलती रहती है। फेफडे हर समय सदन करते रहते हैं, क्योकि ये स्पज के समान होते हैं, जो स्वाभाविक रूप से सिकुडने तथा फैलते हैं। इनके स्पदन से ही श्वास का आवागमन निर्वाधगति से होता रहता है। पशुओ के दोनी फेफडे बराबर नहीं होते। दाया फेफडा बायें फेफडे से तौल में आधा तथा जाकार मे भी छोटा होता है । ये गहरी दरारो द्वारा पिण्डो मे घटे रहते हैं । इस प्रकार शरीर मे यह श्वास-सस्थान अपना कार्य करता रहता है। ३ मलमूत्र वाहक सस्थान (Excretory System)-~मानव शरीर की भांति ही पशुओं के शरीर मे भी भोजन व पानी के अवशिष्ट सारहीन अश तथा पारीर की गदगी को निकालने के लिए प्रकृति ने मलमूत्र वाहक संस्थान (Excretory System) का निर्माण किया है। इभ सस्थान के अन्तर्गत तीन मुख्य अवयव होते हैं (१) गुर्दे या मसाने-पशु के शरीर में दो गुर्दे होते हैं, जो सेम से बोज की लाकृति के होते हैं और प्रत्येक गुर्दा 20 से 25 तक मासपिण्डो से मुक्त होता है। ये गुर्दे कमर के ऊपरी भाग में होते हैं, जिनमे मूत्रवाहिनी नलिका निकलकर मूत्रालय (Urinary Bladder) तक जाती है। यह इस सस्थान का दूसरा अवयव है। तीसरा अवयव मूद्रिय है, जिसे (uretor) कहते हैं। गुर्दा मुषम्ना शीपा अगल-बगल यानी मीने के दाई व बाई ओर रहता है। भून अर्थात् जल या अनुपयोगी वश मूत्रवाहिनी नलिमो द्वारा गुर्दे मे मूत्राशय मे जमा होता है और फिर समयानुसार मूत्रदिम द्वारा बाहर निकाल दिया पाता है। इसी प्रकार खाध का अनुपयोगी अश, पो ठोस रूप में होता है, गुदा माग से गोवर, लीद अथवा मेगनी की शक्ल मे निकल जाता है। स्वस्थ अवस्था मे पशु प्राय 5-6 बार मलमूत्र त्याग करता है। इन दो मलमूत्र हक अवयवो के अतिरिक्त शरीर का विषला अश पानी द्वारा बाहर निकालने के लिए खाल में सफेद ग्रथिया तथा छिद्र भी काय करते हैं और छिद्रो द्वारा पसीने के साथ शरीर का विषाक्त मल निकलता रहता है। पशुओ के शरीर की भी खूब रगड कर सफाई करनी चाहिए ताकि उनकी खाल के छिद्रो पर जमी धूल, मिट्टी आदि साफ होती रहे और वे बद न हो जायें। वर्ना पशु जल्दी बीमार हो जाते हैं। ४ रक्त सचारक संस्थान (Circulatory System)- रक्त-सचार संस्थान का केद्र हृदय होता है और रक्त को शरीर के एक भाग से दूसरे भाग तक पहुचने का माध्यम नसे होती हैं, जिहे नाडिया भी कहते हैं। पशु के शरीर मे हृदय यानी दिल शरीर के निचले भाग मे छाती के सम्मुख दोनों फेफडो के मध्य मे होता है, जो दाई ओर की अपेक्षा बाइ ओर कुछ निकला रहता है। पशु के धुपचाप खडे रहने की स्थिति में यह फुहनियो के मध्य मे अवस्थित रहता है । पशुओ के दिल और द्वितीय आमाशय जिसे मधुछत्राकार कहते हैं, के मध्य योडा सा ही अतर होता है, इसीलिए यदि पशु कोई नुकीली वस्तु खा लेता है और वह दूसरे आमाशय तक पहुच जाती है, तो वह नुकीली वस्तु उसके हृदय मे जाकर घुभ जाती है और पशु को तत्काल मृत्यु हो जाती है। इसी प्रकार पशु के आमाशय मे यदि कारण विशेष से कोई रोग उत्पन हो जाता है तो वह हृदय की स्थिति को भी शीघ्र ही प्रभावित करता है । पशु का हृदय स्वाधीन मास पेशियों का बना, अदर 'खोखला और बाहर से एक पद से ढका होता है जिसे पेरीकार्डियम (Pericardium) कहते हैं। इसमे चार कोठरिया होती हैं, दो बाई ओर, दो दाइ ओर जो अपनी-अपनी ओर के दूसरे कोठे से वाल्व द्वारा सम्बघित होते हैं, पितु एक ओर की कोठरियो का दूसरी ओर की कोठरिया से प्रत्यक्षत. कोई लगाव नहीं होता। हृदय का मुख्य काय रक्त को खोचकर शुद्ध करके उसे पुन बाहर जान निकालकर नाडियो व नसो द्वारा शरीर के अंग प्रत्यग मे पहुर्वाना होता है, इसीलिए वैज्ञानिको ने हृदय को रक्त का पम्पिग स्टेशन (Pumping Station of Blood) कहा है। इसकी मास पेशिया प्रतिक्षण सिकुडती तथा फलती रहती हैं और उनके इस सिकुडने व फैलने से ही रक्त के आने और बाहर काय सम्पन होते हैं । जिस समय हृदय का सिकुडना व फलना बर हो जाता है अर्थात् हृदय अपना कार्य बद कर देता है, उसी क्षण मनुष्य हो या पशु, उसको मत्यु हो जाती है । इस प्रकार जीवन को गतिशील रखने के लिए हृदय बहुत महत्त्वपूर्ण अग है । हृदय से शुद्ध हुआ रक्त शरीर के अय अवयवो तक पहुचाने और दूषित रक्त को शरीर के विविध अगो से एकत्रित कर हृदय तक शुद्ध होने के लिए पहुचाने का काम पथक-पथक नाडियां करती हैं, क्योंकि शुद्ध रक्त ही प्रत्येक अग को शक्ति प्रदान करता है और तभी वे सब ठीक प्रकार से अपना-अपना काम करते हैं । इन रक्तवाहिनी नाडियो को वैज्ञानिको ने तीन भागो मे बांटा है -(१) धमनी (Artery), (२) शिराए (Veins), और (३) रासायनी नाडिया (Lymphatics) । इनके अतिरिक्त पारीर में जो अय सहायक नाडियां या में होती हैं वे सूक्ष्म होती हैं । उहें अग्रेजी मे (Nerves) पहते है। धमनी नाडिया दिल द्वारा शुद्ध पिए गए रक्त को सब अगो ता पहुपाने का काम करती है और शिराय शरीर के अगों से सपा फेफडों व जिगर से रक्त को शुद्ध होने के लिए हृदय ता पहुंचाता है। रासायनी नाडिया रक्त ने दूपित तत्वा को खीचने का काम करती है। धमनी व शिरा नाडियों को परस्पर जाने वाली सूक्ष्म रसन नानियों का कोशिए (Capularnes),पहते हैं। स्मस्य पशु की धमनी नाडी को पात एक मिनट में ३०५० रहती है, वितु रोगी पशु को नारी की गति तेज हो जाती है । इमी प्रभार स्यस्प पा का टेम्परेचर सामा यत १०२ फारनहीट रहता है। पाका तापमान और माटी की गति पूछ के नीचे गुा माग र पाम देसी जाती है। ५-स्नायु-सस्थान-(Nervous System) मनुर अपवा पगु रे गरीर में जितनी भी ज्ञानेरिया होती है, ये सब इसी सस्यान के अत्गत आती तथा काम करती है । जिस प्रकार रवर सस्थान के अन्तर्गत काय करने वाली धमनियो, शिरागो और केशिकाओं का समस्त शरीर मे जाल सा विछा होता है, उसी प्रकार उज्ज्वल धागे के गनान पतली और सूक्ष्म स्नायु नाडियो का भी घना जाल फैला है । रक्त सचार की नाडिया हृदय से सम्बंधित और निर्देशित होती हैं । उसी प्रकार स्नायु त तुओ का सीधा सम्बध मस्तिष्क से होता है और ये उसी के निर्देशानुसार काम करती हैं । इही स्नायु त तुओ द्वारा मस्तिष्क को विद्युत् गति से भी अधिक तीव्र गति से हर बात की सूचना तत्क्षण मिल जाती है और मस्तिष्क तत्काल शरीर तदनुकूल काय करने व सजग होने का निर्देश कर देता है । माथ ही शरीर मे कुछ अग ऐसे भी हैं, जो न तो हृदय द्वारा निर्देशित होकर वाय करते हैं और न मस्तिष्क द्वारा । वे स्वतत्र रूप से बिना इच्छा या आवश्यकता के भी अपना काम स्वतत्र रूप से व निर्बाध गति से करते रहते हैं । श्वास क्रिया, पाचन-क्रिया, पसीना निकालना आदि क्रियाए ऐसे ही के विभिन्न अगों स्वतत्र अगो के काय हैं। पशुओ के स्नायु ततु अथवा ज्ञानेन्द्रियां भी कितनी तीव्र गति से काय करती हैं, यह सहज ही देखा जा सकता है । पशु के शरीर पर कही भी कोई मक्खी या कीडा बैठ जाये, तो मस्तिष्क को तुरत सूचना मिल जाती है और उसके निर्देश से पशु की पूछ फौरन उसे उडा देती है। यह सब क्रिया स्वत और क्षण मात्र मे पूरी हो जाती है । मस्तिक यानी Brain के जो इस सस्थान का मुरय निर्देशक केद्र है, चार भाग होते हैं (१) बहत मस्तिष्क (Cerebrum) (२) लघु मस्तिप्प (Cerebellum) (३) सेतु (Pons) (४) सुपुम्नाशीपक (Medulla) मस्तिष्क के ये चारा भाग पृथक्-पृथक विभाग समझिए, जो अलग अलग कार्यों के लिए बने हैं। परीक्षणो से ज्ञात हुआ है कि बुद्धि, भाव, इच्छा आदि बहत् मस्तिष्क से ही सम्बन्धित होते हैं । पीडा, सुख, दुख, शीत, ग्रीष्म, वर्षा आदि का शरीर पर प्रभाव स्नायु ततुआ द्वारा तत्क्षण वहद मस्तिष्क को ही प्रेपित होता है और वहा से अग विशेष का निर्देश दे दिया जाता है । यथा धूप, वर्षा आदि स रक्षा के लिए तत्काल पैरों को छाया की और चलन की आज्ञा हो जाती है और पशु चल देता है । इडा आदि मारने की दशा मे परों को तेजी से भागने का निर्देश दिया जाता है और पशु भाग खड़ा होता है । देखने, सुनने तथा स्थने आदि से मस्तिष्क के पृथक्-पथक् हिस्सों का पथक पृथक् सम्बध होता है । एक विशेष बात और भी होती है कि बहद मस्तिष्क का बाया भाग शरीर के दायें भाग के अगो का नियंत्रण करता है और दायाँ भाग शरीर के बायें भाग के अगो का नियत्रण सचालन करता है । दूसरा लघु मस्तिष्क (Cerebellum) अपेक्षाकृत बहुत छोटा और नीचे की ओर होता है। यह पशु को खडे रहने तथा चलने फिरने के समय मदद देता इसमे खराबी आ जाने पर पशु चल फिर नहीं सकता। तीसरा भाग सेतु (Pons) है, जो लघु मस्तिष्क के सामने पुल की भौति बना होता है और लघु मस्तिष्क के दोनो भागो को मिलाए रखता है। इसी से होकर बहत मस्तिष्क से आई हुई स्नायु नीचे की ओर जाती है और मायें व दायें भागो से आई हुई स्नायु नाडियां एक दूसरे को यही से पार कर दाएं बाए भागों में पहुचती हैं। चतुप भाग सुपुम्ना शीपर (Medulla) होता है । इसके नीचे सुपुम्ना (Spinal cored) निकलती है। श्वास सचालन, रक्त-सपार तथा आहारको निगलने आदि क्रिपाए इसी के अतगत होती है। मस्तिव ये इस प्रमुख भाग मे आधात लग जाने की दशा में मनुष्य या पशु की तलाल मृत्यु हो जाती है । ६ अस्यि-सस्यान (Bones structure)-इम सस्पान का आधार सस्थान भी बहते हैं, क्योकि इमी पर किसी भी पशु या मनुष्य का शरीर सहा रहता है। शरीर के अन्दर जितनी भी हसिया है, वे सब इसी अन्तगत है। हरियो मे अति ददता भार वाहन शक्ति होती है। यदि शरीर म गयों का यह मजदूत ढांचा न हो, तो जीवमात्र गरीर वाम दबाव !
से ही मांस का लोपडा बनकर एक ही स्थान पर धरा रह जाये और शरीर के अय समस्त का कार व निष्क्रिय हो जायें। इस से स्पष्ट सिद्ध होता है कि शरीर रचना मे हड्डियों का कितना महत्त्व है । हड्डिया ही शरीर के प्रत्येक अवयव को सुरक्षित रखती है । उन्हें अपना काय स्वतत्र ढग से करने के योग्य बनाए रखती हैं। यहां तक कि सूक्ष्म से सूक्ष्म नाडियाँ भी इस आधार के कारण ही बाह्य दबाव व आघात से सुरक्षित रहती हैं। साथ ही अपनी भार- वहन क्षमता के कारण हड्डियां ही पशुओ को यातायात कृषि आदि के लिए इतना उपयोगी बनाती हैं। हडिडयां कई प्रकार की होती हैं, जिसे प्रमुख रूप से निम्न ७ वर्गों मे विमान किया गया है १ चपटी व घोडी हडिडया (Flat Bone.)-इसमे कधे की हड्डियां तपा थोपडी की हडिडया आती हैं । जिसे अंग्रेजी म स्कल (Skul) कहा जाता है। दायर्या और बायो माया बनाने वाली चपटी हड्डियां इसी स्क्ल का भाग है बिहें पटल बोस (Frontal Bones) कहते हैं। कघे की हड्डी (Osteonominet or Pelvic Bone or Pelvic Girdie) # ata fesat atat गि इलियम (Item), इस्तियम (Ischium) और प्यूबिस (Pubis) रहते हैं। २ लम्बी हडिया (Long Bones)-इम वर्ग में कमर से लेकर बुटन तर दी जाधों वाली हडिडयाँ (Feunurs) जाप से पावों तक की हडिडयां (Tibras) आग वाले पांवो की ह मेरस तथा अलना (Humerus and ulna Bones) हटियाँ हपा घुटने से पांव में जाड तक को हदिया (Matacar Palbirयादि सम्बो हडिडयां आती है। ३ फसने शासो हटिया (Elongated Bones)- -इस वग में पसलियां (Ribs) विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जो पशुओं के शरीर मे १३ जोडी पलिया होती है। ४ मध्यवरियत हलिया (Irregular Bones)--इस वा मे एष तो गदन को गात हयाती है जिन्हें (Cersical Verbral) कहते हैं। दूसरी १८ मुह से कमर के अगले भाग तक १३ अय हडिडयां होती हैं, जिहें (Dorsal Vertebral) कहते हैं। तीसरी कमर की पॉच हड्डिया (Lumber vert Ibrat) और चौयो पुठे की हडडी (Sacrum) होती हैं, जो पांच हडिडया एक-दूसर से सटी रहकर एक हडडी के रूप मे रहती हैं। इन के अतिरिक्त पांचवी पूछ की हडिडया भी इमी वग मे आती हैं। इनकी संख्या १८ होती है और ये पुठठे से लेकर पूछ के बालो के गुच्छे तक अव्यवस्थित ढग से फैली हुई होती हैं । इहे Coceigral Vertebral कहते हैं। ५ छोटी हडिडया (Short Bones)-इस पांचवें वग मे घुटने तथा रहने की हड्डियां (Knee or Carpus Bones) ऊपर नीचे दो कतारों में होती हैं । ऊपर वाली कतार मे चार हण्डियां और नीचे वाली मे दो होती हैं । दूसरी मुखे की सघि हडियां (Fetlock Joints) होती हैं, जिनमे दो मुखे के ऊपर (Pastern Bonee) होती है। इनमे पैस्टन ज्वाइट (मुखे के कार वाली) मे दो हडिडयां होती हैं। साथ ही सुर के भीतर का जोड भी इसी वर्ग की हड्डियो मे आता है, जिसे (Coffin Joint) कहते हैं। इनके, अतिरिक्त पिछले पांव के घुटने के जोड की हडडी (Patelha) जो कि (Stitc joint) बनाती है, तथा पिछले घुटनो के जोड की (Astraglus) तथा (Oscalcis) दो हरिया होती हैं 'जिहें (Small hock Bones) भी कहते हैं। ६ सोने को हरी (Sterrum)-जो कोमल अस्थि मार्टीलेज) की बनी होती है और सोने का धरातल (Brisket and floor of chest cavity) बनाती है। ७ मय हरियो-उपरोक्त प्रमुख हहियों के अतिरिक्त कुछ अन्य हल्डियां भी होती हैं, यया- नाप की दो हड्डियां-(Right nasal and len nasal) आँख में नीचे की हडियो-(Lacbrymal) पुट पुटी के ऊपर की हाही-(remporal bone) परी सासू की हसी-(Palatine bone) नीपेरे घर की हारी-(Mandible) शयादि-इत्यादि ।
~ ८--प्रेरक-सस्थान-(Inspirative System) यह सस्थान शरीर के अग प्रत्यग को प्रेरणा, उत्तेजना तथा शक्ति प्रदान पर उसे क्रियाशील रखता है । जिगर, गुर्दे आदि शरीर की ऐसी अथिया हैं, जो उनमे बने हुए रम तत्त्वो को नालियो द्वारा विभिन्न गा मे भेजते हैं, किन्तु उनके अतिरिक्त शरीर मे कुछ ऐमी ग्रन्थियां भी होती हैं, जो कि नली द्वारा रस नहीं निकालती, किन्तु उनसे भी रस निकलकर रक्त मे मिलकर अय अगा को प्राप्त होता है। इहें अंग्रेजी में (Ductless glands) कहते हैं । इनके रमे ही शरीर को प्रेरणा व उत्तेजना प्रदान करते हैं । इस प्रकार की प्रथियों में प्रमुख ये हैं (१) याइराय: प्रन्थियां-(Thyroid glands) (२) पाईमस थियां -(Thymus glands) (३) रामारिनल या एड्रीनल प्रयियो-(Suprarenal or Adrenal glans) (४) पियूटरी-(Pituitary body) (५) पिनियल पि-(Pineal glands) (६) लिंग अपि-(Gonds or sex glands) इसमे प्रपम पाइराइड ग्रयियो गदन में वायु नली के किसी ओर वाणी साम में आम-पास होती है। ये गतिप्रदायर प्रयिमा है, जो शरीर में विरास, गति तपा नेत्र, चम, सि, दन्त आदि की पचलता में वृद्धि र विकास में गति देती है। समारिनल प्रथियां गुर्दे के आग-पाम होती हैं। ये प्रपियो हृदय को पति सपा गति प्रदात करती हैं। इनका पजन एर से दो औग तक, पौड़ाई साढ़े तीन सा और मोटाई मापा इचये लगभग होती है। मेडों को पहा पियों से एनेनिस (Adrenalin) नाम औषधि बनाई गई है। पिपूटरो एरप पाम २ एर माम रे मोपटे मी प्राय है, जो मस्तिपदी में सटी हुई अवस्थित है। इससे एक विशेष प्ररारा रस १०० प्रवाहित होता रहता है, जो मादा पशुओं के डिम्बाशय (Ovary) को शक्ति तथा जीवन प्रदान मरता रहता है। पिनियल अपि भी पियूटरी के सान्निध्य मे ही अवस्थित होती है और इस प्रधि से प्रवाहित होने वाला रस यौवनावस्था के विकास, जननेद्रियो में स्फूर्ति व उत्तेजना, वाणी मे ओज तथा भग-अग में उत्साह पैदा करता है। इसी कारण इन सब प्रथियों को प्रेरक सस्थान कहा गया है। STARA-HEUTA (Generative or productivesystem) चूकि मानव जाति की भांति पशुओ मे भी नर और मादा दो जातिया होती है और इन दोनों की प्रजनन इद्रियां अलग-अलग प्रकार की होती हैं, जो एक-दूसरे की पूरक होती है, और इन दोनो के पारस्परिक ससग से ही प्रजनन क्रिया सचालित होती है, इनमे से कोई भी एक जाति (नर या मादा) बिना दूसरी जाति की सहायता के प्रजनन नही कर सकती। जिस प्रकार पुरुष के बिना स्त्री और स्त्री के बिना पुरुष व वा पैदा नहीं कर सकता, उसी प्रकार पशु भी। नर पशुओ प्रजनन-सस्थान-नर पशुमो के प्रजनन सस्थान में निम्न छह इन्द्रियां होती हैं (१) अण्डकोषो का बाह्य भाग (Scrotum) (२) अण्डकोष (Testicles) (३) शुक्रनाडी का छिद्र (Inguinal canal) (४) शुक्रनाडी (Spermatic cord) (५) लिंगेन्द्रिय का बाह्य भाग (Prepuce) (६) लिंगेद्रिय (Pents) इनमे अण्डकोपों के बाह्य भाग (Scrotum) सात तहें होती हैं-(१) घमही (Skin), (२) सबक्यूटिस (Subcutis), (३) डारटस (Dartus) (४) परपुरा बजीनेलिस (Purpura Vaginalis), (५) परपुरा रिफ्लेक्सा (Purpura Refiexa), (६) परपुरा एलजिनिया (Purpura Albugina), अण्डकोष का मूल भाग- - (Substance of Testicle) I - अण्डकोष को चर्म थली अण्डकोषो को बाह्य आघात से रक्षा करती है। अण्डकोषो में दो अथिया होती हैं, जो शुक्र नाडियो के सहारे पशु के पिछले भाग मे दोनो जांघो के मध्य आमाशय के नीचे लटकती रहती हैं। इन्ही नाडियो के साथ रक्त धमनियां तथा शिराए व केशिकाए आदि अण्डकोषो में पहुच कर उनका पोषण व निर्माण करती हैं। पशुओ के अण्डकोप प्राय' अण्डाकार (Oval Shape) होते हैं । इन अण्डकोषो मे ही शुक्र अथवा वीय बनता है, जो मादा पशु के गर्भाशय मे रज के साथ मिलकर गर्भाधान करता है । पशु को घधिया या अखता करने में उसकी शुफ नाडी को चाप दिया जाता है, जिससे उसमे शुक्र का निर्माण रुक जाता है और अण्डकोष धीरे धीरे सूख जाते हैं। शुक्रनादी (Spermatle Cord) रस्सी के समान मजबूत होती है और इसी के सहारे दोनो अण्डकोष लटके होते हैं। जॉप की जड़ मे जो दो छिद्र होते हैं, जिनसे होकर शुक्रनाडी नीचे उतरता है और अण्डकोषो को पामे रखती है, इहें शुक्रनाडी उतरने के छिद्र (Inguinal Canal) कहते हैं । इन्ही छिद्रो द्वारा बछडो की कभी-कभी आत उतर जाती है, जिसे (Inguinal Hernea) कहते हैं । लिगेन्द्रिय का कपरी भाग पेशाव को नली के ऊपरी भाग को कहते हैं, यह लिंग के ढक्कन तथा भूत्र त्याग का काय करता है। मुख्य लिंगेद्रिय (Penis) जननेन्द्रिय है। इसकी लम्बाई व मोटाई भिन्न-भिन्न पाई जाती है । पोडे, गधै आदि को लिगद्रिय की लम्बाई सब से अधिक होती है। सांड, पल आदि की मोटाई व लम्बाई उनकी अपेक्षा कम होती है । इस इन्द्रिय मे दो प्रकार की मासपेशिया प्रमुख होती हैं। एक लिंगेद्रिय को खड़ी करने वाली (Erector) और दूसरी सिकोड़ने वाली ( Retractor ) मांसपेशि भादरा पशुओं के प्रजनन सस्थान मादा पशुओ के प्रजान सस्थान के मुरूप अंग ये हैं (१) जननेन्द्रिय (Vulva), (२) जननेद्विम नली (Vagira), (३)गभाशय कहलाती है।
१०२ (Uterus), (४) हिम्बपियां (Ovaries), (५) पन (Mammal), (६) भग- नासा (Chtoris)। मादा पशुओं में जननेन्द्रिय सबसे पीछे पूछ के नीचे होती है, जिसम दो खडे होठ से होते हैं, जिन्हें (Labra या Labiar Lips) कहते हैं । इन होठो के अदर ऊपर की ओर मटर के दाने सदृश भगनासा (Clitorns) हाती है, जो अति सूदमनाही होती है। योनि के निचले भाग मे एक छिद्र होता है, जिसे मूत्र नली कहते हैं। जननेद्रिय नली (Vagina or Vaginal) प्रजनन योनि तथा गर्भाशम को मिलाता है। इसकी लम्बाई १ से २ फुट तक होती है, जो पशु के आकार पर निभर है। गर्भाशय (Uterus) वह अग है, जिसमे गर्भाधान के उपरात बच्चा बनता तथा विकसित होता है और जाम के समय तक रहता है । गर्भाशय के मुख को Osuterus कहते हैं । यह मुख गर्भाधान के बाद बद हो जाता है और जम के समय पर ही पुन खुलता है। गर्भाशय डिम्ब मे तैयार होने वाला रज दो नलियो Fillopian Tubes द्वारा गर्भाशय मे जाता है और नर पशु के शुक्र से मिलकर गर्भ स्थापित करता है। गर्भाशय डिम्ब (ovaries) दो होते हैं । वही मादा पशु के शरीर मे रज बनाते हैं । थन (Mammal) गो पशुओ मे ऊपर से नीचे दोनो जायो के मध्य होते 'है । ये चार प्रयि कोषों में विभक्त होते हैं और इही मे दूध तयार होता है, जो दुहकर निकाला जाता है। पशुओ की नाक, आख, कान यादि ज्ञानेद्रिया बहुत ही तीव्र संवेदनशील व अदभुत शक्ति से सम्पन्न होती हैं। पशु हिंसक जगली पशुआ, कसाईखानो अथवा विषले धास, पौधो आदि को दूर से ही जान लेते हैं। अपने पालने वाले या दुहने वाले व्यक्ति को पशु सूप कर ही पहचानते हैं। साढ गाय को सूधकर उसके गभिणी होने का बोध कर लेते हैं । इसी प्रकार पशुओ की आखें व कार भी बहुत तेज होते हैं। थोड़ी सी आहट पर ही कुत्ता सोते हुए भी तुरन्त सुन लेता है । अय पशु भी आहट को फोरन सुन लेते हैं। यहां तक को साप आदि रेंगने वाले पशुओ की आवाज भी उहें सुनाई दे जाती है और चौकन्ने हो जाते हैं। 1 है
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हवा या सर्दी गरमी सहन नहीर सक्ता। परिणामस्वरूप मनुष्य के शरीर की शाबिल का दिन प्रतिदिन ह्रास होता गया। नाना प्रकार के रोग उसे घेरने य सताने लग और शीघ्र ही वह युग आने वाला है कि बिना दवाइयों का सहारा लिये मनुष्य का एक वर्ष जी सकना भी कठिन हो जायेगा। सभ्यता का विकास मानव जाति के लिए एक अभिशाप बन गया है। पशुओं का प्रकृति से कितना घनिष्ठ सम्बध है, इसका एक प्रमाण और भी है। वह है पशुओ मे ज्ञानेन्द्रियो की अदभुत शक्ति । इन ज्ञानेन्द्रियो की शक्ति के सहारे ही वे अपना हित, अहित, आहार की शुद्धता अथवा विषाक्तता, यहा तक कि सभावित रोग अथवा प्राकृतिक विपत्तिपो तक का आभास उन्हें पहले ही हो जाता है। यदि क्सिी जगल या शहर मे प्लेग आदि कोई महा- मारी फैलने वाली होती है, तो बिलो में रहने वाले जीव-ज तुओं को उसका पूर्वाभास हो जाता है और वे बिलों को छोड पर अन्यत्र भागने लगते हैं, ऐसा देखा गया है। हरिण, वन गाए, सरगोश, गीदव आदि मी जगलो को छोडकर भागने लगते हैं। घास परने-परते यदि कोई विषला जगली पौधा मा जाता है, तो उन्हें उसकी गध दूर से पता चल जाती है और वे उसे छोडकर दूसरी ओर मुह जाते हैं। कई बार भूचाल आने, मकान गिरने आदि का पूर्वाभास हो जाने के कारण कुत्तों ने भोक भोक पर तथा मनुष्यों कपडे पकड-पकड कर बाहर खींचकर प्राकृतिक विपतियों से मानव जाती को रक्षा की है। कुत्ते, बदर आदि पशु आपस मे लडकर पायल हो जाते हैं, उनके खून भी बहने लगता है, पाप भी हो जावे हैं, किन्तु प्रायः कुत्ते जीम से पाट पाट पर ही अपने शरीर के पावों को ठीक कर लेते हैं। उ ह रिसी शक्टर के पास नहीं जाना पडता । इसी प्रकारबदरों के पाव मी स्वत: ठीक हो जाते है या रहें प्राकृतिक रूप से ऐसी जड़ी-बूटियों का ज्ञान होता है कि वे जगल से उन यूटियों को लामर रगह सते हैं और उनके पार शीघ्र ही मर जाते हैं। ये सब बातें पशुओं में प्राकृतिक जीवन, उनके प्राकृतिक ज्ञान और उनकी अनुभूतियों को परिपाया है। इसी प्रसग म एक और घटना इलाहाबाद में मुझे एकालिज मिसिपल महोदय ने सुनाई थी। वह इस प्रकार है- कश्मीर के रिमी गांव में एक किसान रहता था, जो नियमित रूप से १०५ प्रात काल अपने बाग मे जाया करता था और शाम को वापिस आ जाया करता । उम बाग के पेडो पर कुछ लगूर रहते थे। शनै शनै एक लगूर उस किसान से बहुत हिल मिल गया। किसान उसे नित्य अपने खाने मे से रोटी देने लगा और उसे खूब प्यार करने लगा। सयोगवश एक दिन उस किसान को ज्वर हो गया और वह उस दिन बाग मे नही जा सका। वृद्धावस्था के कारण बुखार ने उसे ऐसा दवाया कि कई दिन तक वह चारपाई से भी नही उठ सका और हालत दिन प्रतिदिन गिरते गिरते अत मे वह मरणासन्न अवस्था में पहुच गया। उधर लगूर बाग मे प्रतिदिन उदास रहकर सुबह से शाम तक उस किसान को प्रतीक्षा करता रहता । जब वह कई दिन तक नही आया तो लगूर उसके पैरो के निशान सूघता सूघता उसके घर जा पहुवा । किसान को चारपाई पर भरणास न पडा देखकर लगूर प्यार से उससे लिपट गया। किसान के घर वाले इस घटना को देख अवाक रह गए। उधर किसान भी अपने प्यारे लगूर को देखकर वडा खुश हुआ और उसने उसे रोटी मगाकर खाने को दी। उसके बाद उस लंगूर ने किसान के सारे शरीर को सूघा, हाथ फेरा और इस प्रकार परीक्षा करने लगा मानो भोई डाक्टर हो। पूरी तरह परीक्षा करने के बाद वह भागा भागा जगल मे गया और न जाने कौन-सा फल तोड पर ले आया। उस फल को लेकर अब लगूर को पुन वापस आते उसके घर वाले व गाव के अय लोगों ने देखा, तो उनके आश्चय व उत्सुकता का पारावार न रहा । लगूर ने वह फल लाकर जबदस्ती विसान के मुह मे ठूस दिया। किसान उसे खा गया और लगूर पुन बाग में लौट गया। इघर किसान को एक-दो दिन तक तेज बुखार चढ़ा । लेकिन तीसरे दिन वह बिल्कुल रोगमुक्त और स्वस्थ हो गया और चलने-फिरने मे भी समय हो गया। यहां तक कि एक सप्ताह के अन्दर तो उसका काया पलट हो गया। उसे ऐसा लगने लगा मानो वह बुढ़ापे से निकल कर पुन जवानी मे आगया । अततोगरवा उस किसान ने तीन शादियां और की और कई वर्ष तक जीवित रह पर अपनी तीनों पलियो को सन्तुष्ट रखते हुए सुखमय जीवन विताया+ इस घटना के पश्चात् उस किसान ने तथा अय लोगो ने वैसे फल की महुत खोज की, कितु में असफल रहे। इन सब बातो से प्रकट होता है कि पशुओ का प्राकृतिक ज्ञान क्तिना बढा चढा होता है। इसी कारण वे बहुत कम बीमार पड़ते हैं और अधिक स्वस्थ व हृष्टपुष्ट रहते है । वैज्ञानिको द्वारा ध्यानपूर्वक अध्ययनक रने से यह निष्कप निकला है कि पशुओं का स्वास्थ्य मुख्य रूप से निम्नलिखित 8 बातो पर आधारित है (1) वायु (2) जल (3) प्रकाश (4) आहार (5) स्वच्छता (6) श्रम (7) विश्राम और (8) स्वच्छ दता । यहा हम इस विषय पर कुछ विस्तार से प्रकाश डालना आवश्यक तथा उपयोगी समझते हैं, ताकि पशु पालन मे रुचि रखने वाले बधु पशु स्वास्थ्य के लिए इन के महत्त्व को अच्छी तरह समझ लें और उनके द्वारा पाले जाने वाले पशु स्वस्थ रह सकें। -- वायु (Air) शुद्ध वायु न केवल पशुओ के लिए प्रत्युन जीव मात्र के लिए जीवन का प्रमुखतम आधार है, यहां तक कि पेड, पौधे व जल में रहने वाले जीव जतु भी किसी न किसी प्रकार वायु ग्रहण करके ही जीवित रहते हैं। आज के बैज्ञानिक इन सब बातों को सप्रमाण सिद्ध कर चुके हैं। पृथ्वी के जीवमात्र वायुमडल मे से ऑक्सीजन व नाइट्रोजन (Oxygen and Nitrogen) खींचते रहते हैं । पानी के जीव जतु पानी मे घुली ऑक्सीजन खोपकर जीवित रहते हैं और अपने शरीर से कावनडाइऑक्साइड को निकालते रहते हैं। पेड-पौधे,तथा वनस्पतिया काबनडाइऑक्साइड को वायुमडल में से खीचते रहते है क्योकि इन के लिए वही प्राणवायु है और वे जीवधारियो की प्राणवायु आक्सीजन को छोडते रहते हैं। इस प्रकार प्रकृति ने जीवधारियों तथा वनस्पतियो को एक दूसरे के जीवन के आधार का पूरक बनाकर ऐसा आश्चयजनक कौशल और सतुलन स्थापित किया है कि जीवन के लिए नितान्त आवश्यक इस तत्व अनन्त काल तक कभी अभाव न होने पाए और सृष्टि चलती रहे, क्योंकि न तो वनस्पतियो का विनाश हो सकता है और न जीवमात्र का। वे दोनों सदा ही एक-दूसरे की आवश्यक्ता की पूर्ति करते रहते हैं और करते रहेंगे। वायुमण्डल में ऑक्सीजन, नाइट्रोजन तथा काबनडाइऑक्साइड आदि गैसों का सम्मिश्रण रहता है। ऑक्सीजन अत्यधिक ज्वलनशील होती है। अकेली ऑक्सीजन भी घातक सिद्ध होती है । यदि वायुमण्डल मे उसके साथ नाइट्रोजन गैस न होती तो उस दशा मे विश्व में किसी भी कोने मे आग जलाते ही सारा- विश्व धू धू करके जल उठता। मनुष्य, पशु आदि जीवधारी नाक द्वारा श्वास क्रिया में वायुमण्डल से आवश्यकतानुसार वायु खीचते रहत हैं, शरीर के अदर ऑक्सीजन तथा नाइट्रोजन तो जल्द हो जाती है और काबनडाइआक्साइड नि श्वास के साथ बाहर निकल जाती है। उस काबनडाइऑक्साइड को पेड पौधे पत्तियो के छिद्रो द्वारा खींच लेते हैं और वायु के शेष भाग ऑक्सीजन को छोडते अथवा बाहर निकालते रहते है । यह क्रम निर तर चलता रहता है। ऑक्सीजन हमारे शरीर मे बड़े बड़े काम करती है, जिनमे फेफडो को गतिशील रसना, रक्त शुद्ध करना, पाचन क्रिया को ठीक प्रकार से सचालित करना तथा विषले तत्त्वो को शरीर से बाहर निकालना आदि प्रमुख हैं। पशुओ के शरीर मे भी वह उसी प्रकार. काम करती है और उनके लिए भी उतनी ही आवश्यक तया उपयोगी है । मनुष्यों अथवा पशुओ के रहने का स्थान जितना ही खुला हुआ, हवादार तथा पेड पौधो व वनस्पतियों से घिरा हुआ होगा, उतनी ही उसे अधिक शुद्ध वायु प्राप्त हो सकेगी। तग, अधेरी, बद और गदी कोठरियो मे बाधने से पशु शीघ्र रोगी हो कर मर जाते हैं । घनी आबादी वाले शहरो मे तग कोठरियो मे रहने वाले गरीब लोग अक्सर बीमार रहते हैं। रोगी पशुओ के लिए तो शुर वायु की और भी आवश्यक्ता है। जिस ओर पशु का मुह हो, उधर कोई छोटी-सी खिडकी आदि होनी चाहिए, ताकि उसे शुद्ध वायु मिलती रहे। किन्तु ध्यान रहे, बीमार पशु को हवा के तीन झोको से बचाना आवश्यक है । ऐसा प्रयप करें। जल (Water) प्राणिमात्र के लिए पानी जीवन का एक अति आवश्यक आधार है..
जिसके बिना वह जीवित नहीं रह सकता। वैज्ञानिकों ने परीक्षणों द्वारा यह सिद्ध कर दिया है कि शरीर मे दो तिहाई भाग जल का होता है। इसीलिए प्रकृति ने ससार प्रत्येक स्थल पर किसी न किसी रूप मे जल का प्रवाघ किया है। यहा तक कि पृथ्वी के नीचे भी जल ही जल भरा है, पहाहो के गम ने भी जल पाया जाता है, और नदियो तथा समुद्रो के रूप मे भी जल की अपार राशि प्राप्त है। इतना ही नही, हरी शाक सब्जिया, पेडों पत्तों और वायुमण्डल मे भी हर समय जल समाया रहता है, जो भोजन तथा श्वास द्वारा हमारे शरीर मे पहुचता रहता है। प्रकृति की अद्भुत लीला देखिए कि उसने केवल जल आदि तत्व ग्रहण करने का ही प्रबध नहीं किया, अतिरिक्त अथवा अनुपयोगी मात्रा त्याग करने के लिए भी उसने समुचित प्रावधान रसा है। मल मूत्र, पसीने आदि द्वारा हर समय जल शरीर से निकलता भी रहता है। जव शरीर मे जल की थोड़ी-सी भी कमी होती है तो तुरन्त हमे प्यास लगती है और हम पानी पीकर उसे शान्त करते हैं। यदि यह कमी पूरी न की जाये तो शरीर का रक्त गाढ़ा होकर जम जाये। रक्त सचार क्रिया को नियमित व सुचारु रूप से पलाने के लिए पानी महत्त्वपूर्ण कार्य सम्पन्न भरता है । यदि भी किन्हीं विशेष परिस्थितियों में फसकर किसी व्यक्ति अपवा पा आदि प्राणी को पानी पीने को नहीं मिल पाता, तो कुछ पष्टों के उपरात ही उसका खून गाढ़ा होने लगता है, रक्त का सचार रुक जाता है, मांसपेशियां सूखकर ऐंठने सग जाती है और अन्त में पानी के अभाव मे उसरा प्राणा त हो जाता है। बिना भोजन के तो मनुष्य कई दिन जीवित रह सकता है नितु पानी के बिना वह कुछ पटो से अधिन जीवित नहीं रह सकता। हैजा आदि महामारियों में जय उल्टी तपा दस्तों द्वारा शरीर से जल की मात्रा तेजी से निकलती है, तो एटर उसकी कमी को पूरा करने के लिए जवानों द्वारा संलाइन पाटर शरीर में पहुचाते हैं। अयपा ये रोगी को बचा नहीं माते। क्योधि मुस सारा पिलाया हुआ पानी रोगी को नहीं पचता और वह उल्टी दारा तरान मिल जाता है। बेपारे पासतू पा पराधीन और मूर होते हैं। वे आप रे बन्धन में गये होते हैं और मुह से बोतार अपनी इण्टा बापो नहीं बना सकते। इसलिए उनकी भूख, प्यास आदि का स्वत ध्यान रखना व यथोचित समय पर उन्हें भोजन व पानी देना हमारा मानवीय पम तथा उत्तरदायित्व है। जो लोग निरीह पशुओं के प्रति लापरवाही बरतते हैं और उनकी आत्मा को कष्ट' पहुपाते हैं, वे मानद नही, राक्षसों के समान है और जीवन में कभी सुखी नही रह सकते। पशुआ के लिए केवल समय पर पानी पिलाना ही हमारा फत्तव्य नहीं है, वरन उहें पीने के लिए स्वच्छ जल प्रदान करना भी हमारा उत्तरदायित्व है। गांवो मे प्राय लोग इस बारे मे आलस्य करते हैं और पशुओ को जोहड, पोखर या तालाव पर ले जाकर नाना प्रकार के कीटाणुओ से युक्त पदा पानी पिला लाते हैं। बेचारा पशु प्यास में मारे उसे पी तो लेता है, किन्तु अन्तरारमा से वह प्रसन व सतुष्ट नहीं होता और प्राय बीमार पड़ जाता है। हमारा घम है कि हम पशुओ को कुए से निकालकर स्वच्छ जल पिलाए अपवा नदी पर ले जाकर साफ पानी पिलाए । बहने वाला पानी पोखरों के एक ही स्थान पर भरे रहने वाले जस की अपेक्षा अधिक स्वच्छ व निमल होता है । गदा पानी पिलाने से न केवल पशुओ के स्वास्थ्य पर ही प्रभाव पड़ता है, प्रत्युत दुधारू पशुओं के पेट मे पहुचे थे कीटाणु उसके दूध द्वारा हमारे बच्चो के स्वास्थ्य पर भी प्रभाव डालते हैं, क्योंकि गांवो के बच्चे प्राय जगलो मे ही पशुओ का दूध निकालकर बिना उबाले बच्चा ही पी जाते हैं और वे कीटाणु आसानी से उनके शरीर मे पहुचकर तरह-तरह के रोग उत्पन्न कर देते हैं। इसीलिए डाक्टरों द्वारा यह सलाह दी जाती है कि दूध को हमेशा उबाल कर ही पीना चाहिए, ताकि यदि उसमे किसी प्रकार के कीटाणु हो तो वे मर जायें। हमेशा ध्यान रखिए कि पशुओ को शुद्ध जल यथोचित समय पर पिलाते रहने से वे आना दत रहते है और उसके दूध की मात्रा 3 से 5 प्रतिशत तक तथा घी की मात्रा 7 से 10 प्रतिशत तक बढ़ जाती है, यह वैज्ञानिक परीक्षणो द्वारा प्राप्त निष्कप है। इस प्रकार पशुओ का ध्यान रखना हमारे और आपके अपने ही हित मे है । साथ ही पशु बीमार भी कम पडते हैं मरते भी कम है और अधिक समय तक दूध देते हैं। - * - पानी का उपयोग न केवल पीने के लिए होता है, वरन् स्वच्छता के लिए भी। मनुष्य को अपने शरीर की भाति ही पशुप्रो के शरीर को भी सफाई रखनी चाहिए और नियमित रूप से रगड रगह पर नहलाते घुलाते रहना चाहिए। यदि उनके शरीर की ठीक प्रकार से सफाई न रखी जायेगी, तो उनकी त्वचा के छिद्र बद हो जायेंगे और शरीर से इन छिद्रों द्वारा पसीने के साथ निकलने वाला विपाश बाहर नहीं निकल पाएगा। परिणामस्वरूप पशु शरीर मे वह पिप अश नाना प्रकार के रोग उत्पन कर देगा। कम स कम तीसरे चौथे दिन अपने पशुओ को खुरारे से रगड़-रगड पर मली प्रकार से अवश्य नहलाना चाहिए। यदि पास मे कोई नदी हो, तो नदी पर ले जाकर डेढ़-दो पटै अच्छी तरह नहनाना चाहिए। इस प्रकार पशु अधिक स्वस्थ, हृष्ट पुष्ट व अधिक दूध देने वाले रहेगे और उन पर किया गया परिश्रम "निष्फल नहीं जायेगा। सूर्य का प्रकाश (Sun Rays) यह सष्टि प्रकृति की रचना का एक अदभुत कला-कौशल और विलक्षण नमूना है, जिसका सर्वांगीण भेद मनुष्य लाखो वर्षों में भी अभी नक नहीं पा सका है यद्यपि वह निर तर इसकी खोज में लगा रहा है। सूय भी उसकी रचना भी एक उतनी ही महत्वपूर्ण, आश्चयजनक और शक्ति सम्पन्न कृति है, जितनी वायु, जल आदि तत्व ।-सूप फे विना भी इस पथ्वी पर एक दिन तो क्या एक पटा भी जीवित नहीं रह सकता। यदि पाच मिनट के लिए सय हट जाये या ठण्डा पड जाये, उसका प्रकाश तथा गर्मो पृथ्वी पर न आ मके तो सारी पृथ्वी बर्फ से ढक जाये। कोई प्राणी अथवा वनस्पति जीवित न रह सके। कल्पना कीजिए प्रकृति की उम उदारता की, जिसने जीवन के लिए इतनी महत्त्वपूण व नितात यावश्यक वस्तुए हर गरीब, अमीर छोटे, बडे, मनुष्य, पशु, पक्षी सबको इतनी प्रचुर मात्रा म और विना मूल्य के सुलभता के साथ प्रदान की हुई हैं, इसे देखकर दिम नराधम का सिर वृतज्ञता से नत्त न होगा। सूर्य का प्रकाश और गर्मी प्राणिमात्र के जीवन व स्वास्थ्य के लिए ही आवश्यक नही वरन् वनस्पतियो के लिए भी परम आवश्यक है। साधानो, - शाक-माजियों तथा वनस्पतियों में स्टाचं, शर्करा, कार्वोहाइड्रेटस आदि पोषक तत्व सूर्य की किरणो से ही उत्पन होते हैं। हमारा शरीर भी गरमी से ही जीवित है। यदि शरीर की गरमी समाप्त कर दी जाये, तो क्षण भर मे ही शरीर प्राणहीन व निश्चल हो जाये। शरीर की इस गरमी को स्थायी रूप से बनाए रखने के लिए हम सब सूय की किरणो पर ही निमर हैं । सूर्य की किरणो में एक और विशेष गुण होता है कि वे वायु को शुर रहने और कीटाणुओ को नष्ट करने का भी महत्त्वपूर्ण काय सम्पन करती हैं । प्राणियो के अनेक रोगो के कीटाणु सूर्य की किरणो के तेज से हो नष्ट हो जाते हैं, यहा तक कि तपेदिक जैसे रोगो के कीटाणु भी सूर्य की किरणों से नष्ट हो जाते हैं । इस प्रकार सूर्य के प्रकाश का महत्त्व समझ लेने के उपरान्त हमारा यह पत्तव्य हो जाता है कि निरीह पशुओं को भी हमें ऐसे स्थान पर रखें, जहा यथोचित रूप से उन्हें धूप तया प्रकाश मिलता रहै, जंसा मनुष्य अपने लिए एक से एक सुदर हवादार मकान बनाता है । इसका यह मतलब कदापि नहीं कि आप सारे सारे दिन गरमी के मौसम की चिलचिलाती धूप में' ही पशुओ को बाधे रखें । अति किसी भी वस्तु की हानिकारक होती है । अत' पशुओ को भी धूप उतनी ही सुलभ करानी चाहिए, जिननी दे आराम से सह' कर प्रसन व स्वस्थ रह सकें। जब धूप की तेजी उहें सताने लगे, तो तुरत वहा से हटाकर छायादार स्थान में बांध देना चाहिए। आहार अथवा भोजन-(Food) आहार यानी भोजन ही ससार के प्रत्येक प्राणी को शक्ति प्रदान करता है। पर्याप्त मात्रा में पौष्टिक, स्वच्छ, अहानिकर तथा उपयुक्त भोजन को न- केवल मनुष्य को अपितु पशु-पक्षी आदि प्राणियो को भी आवश्यकता होती है ।.. यही कारण है कि मनुष्य ने सभ्यता विकास के साथ-साथ जहा अपने लिए अय प्रकार की सासारिक सुख-सुविधाए जुटाई हैं, वहा भोजन के विषय मे भी निरतर खोज की है और आज विश्व में मनुष्य के आहार के लिए नाना - प्रकार के सुस्वादु व्यजन प्राप्त हैं, जो सब प्रकार के पौष्टिक तत्वों से भरपूर, अति रुचिकारक, है। T --- - आहार विषयक खोज का यह क्रम आज तक जारी है और आगे भी जारी रहेगा क्योकि जन-सख्या वृद्धि, जीवन की तीव्र गति, रहन-सहन के ढग आदि में परिवर्तन, शारीरिक क्षमता व शक्ति का दिन प्रतिदिन ह्रास होते जाना, माधुनिक जीवन मे यत्रों तथा मशीनो का प्रयोग बढ़ते जाना इत्यादि अनेक ऐसे प्रमुख कारण है कि आहार विषयक आवश्यकताए, अनुकूलताए नित्य प्रति बदलती जा रही हैं । एक युग था, जब हमारे देश मे घी-दूध की नदिया बहती थी। घर-घर में पशु पाले जाते थे। दूध, घी, मक्खन, छाछ मादि पौष्टिक पदार्थों की कोई कमी न पी। आज वह दिन है कि सुद्ध घी-दूध कठिनता से ही प्राप्त होता है। पशु-पालन फार्मों अथवा गांवो के थोडे से परिवारो तक ही सीमित रह गया है । मशीनों द्वारा वनस्पति तेलो से जमाए गए नकली घी और विदेशों से भगाए गए दुग्ध-पाउडर का प्रयोग बढ़ता जा रहा है। और तो और, अब तो मनुष्य चाद तक पहुच गया है, और अन्य ग्रहों पर भी पहुचने के लिए प्रयत्न- शील है, जिन पर हजारों मील प्रति घण्टे की गति से उड़ने वाले राकेटो (यानों) द्वारा भी कई महीनों मे पहुचा जा सकता है । भला सोचिए कि उन राकेटो मे न तो इतना अनाज या खाद्य पदाथ रखकर ले जाया जा सकता है कि उसकी इस लम्बी व साहसिक यात्रा की आवश्यकता पूरी कर सके और न ही राकेटो मे भोजन पैदा किया जा सकता है, क्योकि अतरिक्ष मे न वायु- मण्डल है और न जल है। इस प्रकार ऐसी यात्राओं पर जाने वाले मनुष्यो के लिए आहार की समस्या प्रमुख है। प्रयास किया जा रहा है छोटी छोटी गोलियों में ही आहार के वे सब तत्व एकत्रित कर दिए जायें कि एक गोली खाकर ही मनुष्य के शरीर की आहार सम्बधी आवश्यकता १२ या अधिक दिन के लिए पूरी हो सके । इसमे मुख्य समस्या भूख लगने की है कि पौष्टिक तत्त्व तो गोली के रूप मे इक्टठे किए जा सकते हैं, कि तु एक गोली से भूख तो शान्त नहीं हो सकती । इस प्रकार तात्पय यह है कि आने वाले युग मे मनुष्य की आहार सम्बधी आवश्यकताए और उनका रूप दिन प्रतिदिन बदलता ही जायेगा । ।
११३ मर्नुष्य ने अपने आहार पर ही नहीं, पशुप्रा के आहार पर भी पर्याप्न वैज्ञानिक साजें की हैं। जगतो में घूमने वाने पशु ता प्रकृति की गोद म उस न होने वाल फापून तथा वनस्पतिया खाकर अपनी आवश्यकता पूरी कर लेते हैं, क्याकि वनस्पतियो मे सभी पौष्टिर तत्त्व विद्यमान होते है और उन तत्वों को प्राप्त कने के लिए मनुष्य भी नाना प्रकार के शाप भाजी भादि वनस्पनियो का प्रयाग करता है । हिंसव जगली पशु घोटे छोटे जानवरो को शिकार करके उन माम से अपनी आवश्यक्ता पूरी करते है । पालतू पशुजो की दशा बडी ही वरुणाजनक शमी है। य निरीह पापकी क्ष्यालुता और समयदारी के ही सहारे जीते है । उ हे न तो अपनी इच्छानुसार स्वच्छन्दतापूव घूम-फिर कर अपना भोजन तलाश करने और प्राप्त ने पी स्वतत्रता है और न ही वे मुह से कुछ वो नकर आपसे ग ही सरत है। वे आपके बधन मे बधे पगधीन हो पडे रहते हैं। आप हं खाने-पीने के लिए जो कुछ दे देंगे, व चुपचाप सावर उमी पर सतोप कर लेंगे। साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य बात है Pि इन बेचारो को जापये लिए स्वतत्र पशुओ की अपेपा परिश्रम भी अधिक कना पडना है । स्वार्था व होकर हमे इस निरीह पामा को उचिन भोजन देने मे नाच, क्रूरता जयवा लाप वाही से काम नहीं लेना चाहिए । यह हमारा मतिक व मानवीय क्त्त य है । हममे से बहुतेरे हृदय से तो दयालु तथा पूरी तरह पत्त य परायण होते हैं, किन्तु शिक्षा के अभाव मे वे यह नहीं जानते कि पालतू पशुओ को किस प्रकार का चाग-1 दिया जाना चाहिए । इम शााता के कारण उनले पशु बीमार हो जाते हैं अथवा मर जाते हैं। पशुओ का आहार निर्धारित कते समय उनकी जाति उनका काम, उनका स्वास्थ्य, उनकी उम्र तथा उनका शारीरिक ढांचा, भार मा बनेक बातो का ध्यान रखना आवश्यक है क्योकि पशुओ मे ह थी, घोडे, बैल, माह आदि विशालकाय और शक्तिशाली पशु भा होते हैं और बारी भेडे, कुत्त, दिनी आदि छोट छोटे पशु भी। भला इन दोनों प्रकार के पशुओं के लिए एप समान आहार कसे उपयोगी हो सकता है ? बहे पओिं को अधिक मात्रा में तथा अधिक पौष्टिक भोजन चाहिए। इसी प्रकार यल, मसे, घोडे आदि भार ढोने अथवा सवारी आदि पामो म प्रयुक्त हान वाले पशुओ को शारीरिक श्रम अपेक्षाकृत अधिक परना पडता है। उनका भोजन विशेषरूप से ऐसा होना चाहिए कि उस परिधम से क्षीण हुई शक्ति की पुन पूर्ति हो सके। यो तो हरी घाम, पतिया, हरियाली, जिनमे पेड पौधे, वेलें आदि शामिल है, इत्यादि वनस्पतिया पर्याप्त पोषक तत्वो से परिपूर्ण और पशुआ के लिए अति उपयोगी हैं, तथापि विशेष परिश्रम करने वाले बैल, घोडे, खच्चर आदि पशुओ की आवश्यकता केवल वनस्पतियो से पूरी नहीं हो सकती। वनस्पति से जो पोषर तत्त्व अथवा शक्ति प्राप्त होगी, वह तो उनके शरीर के पोषण तथा विकास मे ही व्यय हो जायेगी। परिश्रम से काय करने के लिए उहें अतिरिक्त शक्ति की आवश्यकता है, जो खली दाना आदि देकर पूरी करनी पड़ती है। इसके अभाव म उन पशुओ की शक्ति दिन प्रतिदिन क्षीण होती जाती है। वे दुबल होकर बीमार पड़ जाते हैं और फिर भी यदि उनसे उसी प्रकार काम लिया जाता रहे, तो वे अकाल मत्यु के ग्रास बन जाते हैं। इसी प्रकार दुधारू पशु, यद्यपि शारीरिक श्रम अधिक नही करते, तथापि दूध निकालने से उनके शरीर की काफी शक्ति बाहर जा जाती है। वे जा कुछ खाते हैं उसे पचाकर दूध बना देते हैं और दूध निकालकर एक प्रकार से उनका सारा खाया-पिया भोजन पुन बाहर निकाल लेते हैं। उसका बहुत थोडा अश ही उनके शरीर के पोषण म व्यय हो पाता है । यह कभी न सोचना चाहिए कि गौए, मसें, बकरियां आदि तो सारा दिन आराम से बैठी रहती हैं। इहे पौष्टिक भाजन की जावश्यक्ता ही नहीं। सच पूछा ज ये, तो उहें ही सबसे ज्यादा पौष्टिक भोजन की आवश्यकता है। समझदार पशु पालक सदैव दुधारू पशुओ को तथा भारवाहक पशुओ को उचित मात्रा मे खली, दाना, विनोले आदि खिलाकर उनको आवश्यकता पूरी करते एक बात और भी ध्यान मे रखिए । पशुओ को भी नमक की उसी प्रकार यावश्यक्ता होती है, जिस प्रकार मनुष्य को। इसलिए उसकी पूर्ति के लिए कभी भी पशुओं को नमक भी अवश्य खिलाते रहना चाहिए । अन्यथा परिश्रम से पसीने द्वारा उनके शरीर का लवण बाहर निकलता है और उसकी पूर्ति न होने की दशा मे नमक के भाव से भी उनके शरीर मे अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। पशु आहार तथा उनके गुण-पशुजो का आहार दो श्रेणियो मे विभक्त क्यिा जा सकता है -(१) माधारण चारा दाना (२) वैज्ञानिक खोजो क आधार पर विटामिन आदि पोषक तत्त्वो मे युक्त तयार किया जाने वाला विशेष प्रकार का चारा दाना । पहले प्रकार का पशु आहार वह है, जो हमारे देश के अधिकतर घरो में पशुओ को खिलाया जाता है । दूसरे प्रकार का वह पशु आहार है, जो सरकारी डेरियो पशु-पालन के द्रो आदि मे वैनानिक खोजो के आधार पर तैयार कर के पशुओ को खिलाया जाता है और नस्ल-मुधार, दुग्ध-उत्पादन में वृद्धि, पशु- स्वास्थ्य विकास व पशु रोगो की रोकथाम व चिकित्सा विषयक खोजो के लिए परीक्षण के तौर पर प्रयोग किया जाता है। सामाय प्रकार का चारा-दाना-इम श्रेणी के चारे दाने में मुख्य रूप से चारा यानी हरी व रूखी घास, पत्तियां, छीलन, पेड-पौधे आदि वनस्पतिया और दाना अथात अनाज, उसकी भूसी, चोकर, खली आदि होती हैं, जो हमार देश के सर्वसाधारण द्वारा पशुओ को खिलाया जाता है। साथ ही कभी भी चूना, नमर आदि खनिज तत्त्वो का भी प्रयोग किया जाता है । देश में प्रयुक्त होने वाली इस सामा य चारे-दाने की प्रणाली का भी वैज्ञानिक परीक्षण तथा अनुसघान किया गया है जिसके निष्पपस्वरूप प्राप्त जानकारी विस्तार से आप मब के लाभाथ प्रस्तुत की जा रही है । धारा-यग का पग-आहार-चारा वग के अनर्गत चरागाहो की पास, खेतो मे उगाई जाने वानी चारे की फसलें गया ज्वार, बाजारा, मका, जई, रागी तया दलहनी पारे यी फसलें यया बरनीम, लोबिया, सोयाबीन, मटर, मार तथा धान का पुपाल, भूसा नादि मुख्य रूप से आते हैं । इसके अतिरिक्त पेट की पत्तियां तथा अपहरी वनस्पतियां यादि भी चारे में आती हैं। बाम २ तौर पर बरसात के दिनो में हरे चारे की बहुतायत रहती है, जाहे के दिनो म भी कुछ विशिष्ट चारे की फसलें उगाकर तथा घास आदि से आवश्यकता पूरी होती रहती है, वितु गरमी के दिनो म, जब मैदानो व चरागाहो की पास भी सूख जाती है, चारे की समस्या विक्टरुप धारण कर लती है विशेष कर उस परिस्थिति में जब समय पर उपयुक्त मात्रा मे वर्षा न हुई हो। इस समस्या का हल करने के लिए चारे को सुखाकर तथा सायलेज तैयार करक भण्डारण करने की पद्धतिया निकाली गई हैं। घास-वितु यह निर्विवाद सत्य है कि पास ही पशुओ का प्रमुख तथा अति प्रिय आहार है । पास कई प्रकार की होती है, जिसम चरागाहो की घास मर्वोत्तम और सस्ती है । आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, अमरीका आदि देशा में पशुओ के चरने के लिए विशेष रूप से चरागाह बनाए जाते है। हमारे देश को चूकि अधिकाश भूमि खाली पड़ी रहती है, जहा पास पेठ पौधे तथा जंगल हैं, इस लिए पशु स्वच्छ दतापूवर चरते रहते हैं । हर गाव के आस पास मीलो नम्बे मदान तथा जगल होते हैं। हरा तथा कच्ची घास मे पकी तथा सूखी घास की अपेक्षा प्रोटीत तत्त्व अधिक मात्रा में पाये जाते है । साथ ही कल्शियम, फास्फारस, विटामिन और खनिज तत्व भी प्रचुर मात्रा में होते हैं। इसके अतिरिक्त स्थान स्थान की भूमि के गुणावगुण के अनुसार भी घास में इन पोषक तत्त्वा तथा खनिजो की मात्रा कम या अधिक होती है। भारत की घासों मे दूर्व, अजन, पल्वान, मुसल स्टार, सूर्याला, वौरिया, सरपत जादि घासें अच्छी तथा प्रचुर मात्रा में प्राप्त हैं। यदि जगलों के किनारे किनारे इन घासो के चरागाह बनाकर पशुओं को पराया जाये, तो बहुत लाभ हो सकता है । पहाडी चरागाहो के लिए विशेष- रप से उत्तम बारहमासी राई घास उगाना भी लाभदायक है। सूखी घास में यद्यपि हरी घास की अपेक्षा पोषक तत्त्व कम हो जाते हैं' किंतु भारम्भिक अवस्था मे काटकर सुखाई गई पास भी पर्याप्त गुणयुक्त होती है। सूखी घास का चारा तैयार करने में इस बात का ध्यान रखना पडता है कि उसे इतना सुखाया' जाएं कि १० १५ प्रतिशत से अधिक नमी न रहे, अपघा घास मे सडांद, बदबू तथा फफूद उत्पन हो जाती है और फिर पशु उसे नहीं खाते। धूप, ओस या वर्षा में अधिक समय तक पठी रहने पर भी घास गुणहीन तथा अपाचर हो जाती है । घाम को सुखाते समय यह भी ध्यान रख कि उसकी पत्तिया इडने न पाए । वरमात के शुरू के दिनो मे ही जब चारो ओर खूब हरी घास उग रही हो, काट कर हवादार गोदामो आदि मे एकत्रित करके सुखा लेनी चाहिए। बरसात खुलने पर थोडी थोडी धूप भी दिखा दें। बरसात के आखिरी दिनो तक घास पकने लगती है। पेडो की पत्तिया-बकरिया, भेडे, कट तथा अन्य पशु पेडो की हरी पत्तियो को बड़े चाव से खाते हैं। भेडो तथा वरियो का तो मुख्य आहार ही पत्तिया है। पेडो की कोमल पत्तियो मे भी पोपर तत्त्व प्रचुर मात्रा मे होते हैं। पेडा की पत्तियो के अलावा झाडियो की पत्तियो मे भी कैल्शियम विशेष परिमाण में पाया जाता है। परीक्षणो व अनुसधान से यह निष्कप निकलता है कि शहबेरी, वास, गोज, तूत, सदल, मरोडफली, कचनार, पीपल गूलर बेर, खर, फलीयोत, बवूल, बल, मिरस, सेजना, रोहिणी, कजू कुसुम, हन्दू, बरगद, फलद, साल आदि पेडो व झाडियो की पत्तिया पशओ के लिए उत्तम आहार हैं, यदि उनके साथ उहें उपयुक्त मात्रा म दाना तथा दूसरे चारे आदि भी दिये जाए । गरमी के दिनों मे, जब घास प्राप्त नहीं होती, पेडो की पतिया पशुओ को खिलाई जा सकती हैं। हमारे देश मे गावों मे वो प्राय लोग पशुआ को 'चरने के लिए खुला छोड़ देते हैं और वे -स्वन ही पास न मिलने पर पेडों की पत्तियां आदि परते रहते हैं । चारे दाने की फसलें-हमारे देश में ज्वार, बाजरा, मक्का रागी तया जई चारे की मुरूप फमलें है। कि तु चूकि ये सिर्फ चारे के लिए ही नहीं उगाई जाती, इनके दाने मनुष्यो, विशेषकर निधना व किसानो के घरों में खाने के काम आते हैं और पौधो की कुट्टी पशुओ के चारे के लिए रखी जाती है । इस चारे मे पौष्टिक तत्त्व तो दानो मे निकल जाते हैं । दानो की अधिक पदावा प्राप्त करने के लिए फमल अच्छी तरह पक जाने पर ही काटी जाती है । यदि दाने निकलने से पहले ही ये फसलें काटकर पशुओ को चारा खिलाया जाए तो उहें अधिक पोषक तत्त्व प्राप्त हा। सरकारी फार्मों आदि म नेपियर गिनी, सूडान आदि पासा की फसलें विशेषरूप से चारे के लिए ही उगाई जाती हैं। दलहनी चारे की फसलों म वरसीन, रिजका लोबिया सोयाबीन ग्वार, मटर आदि की फसलें भी उगाई जाती है, वितु इन फसलों का भी मनुष्य तथा पशु दोनो के लिए दुहरा लाभ उठाया जाता है । इन फमला के चारों में अन्य फसलों की अपेक्षा प्रोटी। कैल्शियम, कैरोटीन आदि की मात्रा अधिक होती है । इसलिए ये अच्छी हैं। भूसा तथा धान का पुआल भूमा गेहू ज्वार आदि अनाजो की फमलों स प्राप्त होता है और पुआल चावल की फसल से । चूकि ये फमलें हमारे देश मे बहुतायत से उगाई जाती हैं, इसलिए यह चारा आमानी से प्राप्प और सस्ता है । यही कारण है कि पौष्टिक तत्त्वो की सबसे ज्यादा कमी होने तथा देर में पचने पर भी भारत म पशुओ के आहार मे ५० प्रतिशत मात्रा भूसा या पुआल की होती है । धान के पुमाल पो पानी मे घोर तथा थोडी सी सडिया मिला देने से उसके पापक अश मे पर्याप्त सुधार हो जाता है। गेहू के भूसे म भी खली तथा थोड़ी सी सहिया मिला देने से स्वाद व गण दोनो बढ जाते हैं। दाना-वर्ग के पण आहार दाने मे पोषक तत्त्व अधिक होते हैं इसलिए पाओ को पार साथ थोहा-बहुत दाना अवश्य खिलाया जाना चाहिए। विशेपर दूध देने वाले पशुओं तथा अधिक परिश्रम घे काम करने वाले पानी के लिए ता यह नितान जावश्यर है । इस वग पशु आहार में अनाजों के दाने, तिलहन तथा उनकी सली आदि आते हैं। अनाजों का मानानाजी दानों में स्टाच पास्फोरम और पोटा की पर्याप्त मात्रा पाई जाती है । साथ ही विटामिन बी और ई भी अनाजो म पापी होते हैं। मक्का ये दानो में विटामिन ए अधिक का है। इस प्रकार ये सब दाने पशुओं में परीर की पोपा आवश्यक्तामा को पूरा करने के लिए ११६ जरूरी तथा उपयुक्त हैं। हा, इनमे प्रोटीन, एमिनो एसिड, कैल्शियम, सोडियम क्लोरीन आदि तत्त्वो की कमी रहती है। जो तथा जई का दाना पशुओ के लिए सर्वोत्तम है। मक्का का दाना अय दानो के साथ ही मिलाकर देना चाहिए, क्योकि अकेला मक्का पशुओ को अफारा पैदा कर देता है। चने के दाने मे चूकि कैल्शियम और फास्फोरस अधिक पाया जाता है, इमलिए वह भी पशुओ के लिए बहुत अच्छा है और हमारे देश में अधिक पदा होने के कारण चना पशुओ को खिलाया भी जाता है। यदि चना प्राप्य न हो तो अरहर तथा ग्वार प्रयोग कर सक्ते हैं । गेहू की चोकर यानी दानो की भूसी पशुओ के लिए बहुत लाभदायक है । यद्यपि पशु इसे चाव से नहीं पाते, कि तु उनका पेट साफ रखने के लिए यदा कदा अवश्य खिलानी चाहिए । इसमे फास्फोरस सबसे अधिक पाया जाता है इसलिए दुधारू पशुओ के लिए भी विशेष लाभ प्रद है। तिलहन तथा उनको खली-तिलहन यथा राई, बिनौले, अलसी मूगफली, सोयाबीन, सरसो, तिल, नारियल आदि तैलीय अश वाली फसलें तथा उन्हें पेरकर तेल निकालने के बाद बची हुई खली पशुओ के लिए बहुत ही पौष्टिक तथा उपयोगी मानी जाती है। हमारे देश मे सरसो, राई, अलसी, मूगफली आदि की खली का ही विशेष प्रयोग होता है। दुधारू पशुलो को बिनौले खिलाए जात है क्योकि उनसे दूध मे चिकनाई की मात्रा बढ़ जाती है । अलसी आमतौर पर फार्मों के पशुओ अथवा घोडो को राधर खिलाई जाती है। दुधारू पशुओं के लिए कोल्हू की पिरी खली ही विशेषरूप से उपयोगी होती है, क्योंकि इसमे १२ से २० प्रतिशत तक तैलीय अश रह जाता है, जो दूध की चिकनाई वढाता है । मूगफली की सली म लगभग ५० प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है और इतना ही सोयाबीन की फली मे। वितु हमारे देश में ये खलियो बहुत कम मिलनी हैं। नारियल और खजूर की गुठली की खली भी उत्तम प्रेणी में आती है और निलों की खली तो सब सलियो में श्रेष्ठतम पाई गई है क्यामि इसमे प्रोटीन, कैल्शियम, फास्फोरम आदि तत्त्व प्रचुर मात्रा म हाते हैं । सरमो की सली, जो भारत में सबसे ज्यादा प्रयोग की जाती है गुणदायर . .
१२० ता है, किन्तु पुरूश मे पशु इसे पस द नहीं करते । बाट मे आदत पड़ जाने पर पशु इस चाय स साने लगते हैं। पशु आहार सम्बधी नवीनतम सोज-उपरोक्त पशु-आहारो के अलावा चारे दान की कमी को पूरा करने के लिए वनानिको ने भारतीय जनुस धान शापाजो मे प्रयोग तथा परीक्षण करके कुछ उपयोगी अनुमधान किए हैं । इन परीक्षणो से ज्ञात हुआ है कि देश मे अनेक व्यथ समझी जाने वाली तथा सरलतापूर्वक प्रचुर मात्रा में उपलब्ध वस्तुए पशुओ के लिए उत्तम आहार सिद्ध हो सकती हैं क्योकि उनमे शरीर के लिए पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में पाए गए है । नई खोज पर आधारित य वस्तुए निम्नाकित हैं आमो की गुठलिया, जामुन की गुठलिया, इमली के बीज, पनेवर में बीज, बबूल की पलिया, मोटी घासें तथा कास, मूज आदि, कटियारा जसे पौधे, गन का छीनन तथा पोवर की फलिया आदि विशेषरूप से उल्लेखनीय हैं। इनके अतिरिक्त मूगकती के छिलके, महुअ को खली, महुआ के फूल, सनबीजा व साम की फलिया, बाजरा तथा पतझड मे पेडों से झडी पत्तिया आदि भी धारे के अकाल के दिनो में पशुओ को खिलाई जा सकती हैं, क्योकि इनम भी पोषक तत्व पाए गए हैं। अभी तक ये सब वस्तुए वेकार समझ कर पडे मे 1ो दी जाती थी और पशुओं को नहीं खिलाई जाती थी, कि तु वैज्ञानिक परीक्षणो ने इनकी उयोगिता प्रमाणित कर दी है और हर भाई बिना किमी प्रवार को हानि नी । किर इन चीजो को पशुओ को खिला सकता है। साय ही यह भी पात हुआ है कि पशुओ के रातव मे अनाजों के छिलके वी जगह गोपा शीरा भी प्रयाग किया जा सकता है क्योकि वह भी इतना ही गुणकारी है। विभिा परमों का आहार निश्चित करना--जसा पहल भी बताया जा चुपा है सब पशुओ को एय रामान जाहार (चारा दाना) नहीं मिलाया जा मदता। उनके शरीर का आकार, वजा, प्रम, उनकी शारीरिक स्थिति, स्थानीय जलवायु आदि अनेर वासा कर ध्यान रखर उनके लिए तदनुमार अलग-अलग सुराक निश्चित करनी पडती है। यषा-एक भेड़ अपवा यारी dan- १२१ 1 कोपा गाय, मम घोज वैल, हायो सादि की खुराक उनके शरीर के आकार काल अधिर होगी। इसी प्रकार घाडे बैर आदि सारीरिक परिश्रम के काम करन वाले पशुओ को बुराम गाय, नस नादि दुधारू पशुओ से अपवा साह, हायो आदे बैठे रहने वाले पशुओ से रावया भिर रोगी । इसी प्रकार नवजान वहडो तपा भिणी मादा पशु को खुराक भी उनकी आवश्यक- तानुसार इमर नर पशुओ से भिन्न होगी। जिस प्रकार मनुष्य के लिए उपयुक्त पौष्टिक तथा आवश्यकतानुसार भोजन निर्धारित करने के लिए वैज्ञानिक अवेषण हुए हैं उमो प्रकार इस नाली मे पशुओ के अहार पर भी भनु सपान हाते रह हैं और उन अनुम धानो में जो निष्पप निकले है, उन्ह आज घे हर एक पशु-पालक को अवश्य जानना चाहिए । पशुओ के उनित भाहार पर ही उनका स्वास्थ्य, उनकी उत्पादन ममता, उनकी कार्यक्षमा और उनकी भावी नस्ल निमर करती है। पशुओ की खुराक को हम दो वर्गों में विभाजित कर सकते हैं --(1) निर्वाह खुराक जो सभी प्रकार के पशुओ को शरीर में पोषण तथा जीवित रहने व कम करने की शक्ति प्राप्त करने के लिए 1 वश्यक रूप में पाहिए और (2) सतुलित आहार, जो विभिन्न साकार, शारीरिक भार काय आदि के आधार पर वज्ञानिको द्वारा अनुसधान करके निधारित की गई है, ताकि पशुओं का स्वास्थ्य, उत्पादन-क्षमता, पायक्षमता आदि मे यथोचित वद्धि के लिए जावश्यक मात्रा मे पोषक तत्व प्राप्त हो सकें। सबसे पहले पशुओ को बाल्पराल मे पानी जब वे बच्चे ही होते हैं, हहिया मांस, रक्त आदि के निर्माण और शरीर के समुचित विकास के लिए उपयुक्त माना मे फास्फोरस कैलशियम, प्रोटीन तपासना भादि की विशेष आवश्यक्ता होती है, पत उहे अपनी मा पशु का दूध कम गे कम 301 महीने पर्याप्त मात्रा मे पीन देना चाहिए, क्योकि दूध म वे सब । पश्या तर पाए जाते हैं जो शरीर के विकास के लिए अनिसाय हैं। दुर्भागवा हमारे लोग गाप भयो के बछडो को दूध बहुत ही कम पीने देते हैं, ताई स्वर अधिक दूध प्राप्त कर मकें । रितु यह दोहन गलत है । पाये १२९ यदि आप उसकी आवश्यकतानुसार दूध पीने देंगे तो दुधारू पशु को दूध उत्पादन क्षमता बढती है और इसके विपरीत अधिक दूध स्वयं प्राप्त करने के लालच मे यदि आप उसके बच्चे को दूध नहीं पीने देंगे, तो पशु वे थनों में कम दूध वनगा अथवा पशु उतरने नही देगा। कभी-कभी तो पशु बिल्कुल दूध देना बद कर देता है। जब बच्चा गरा, दाना आदि खाने लग जाए तो प्रारम्भ म उसे कोमल हरी घाम जनाजो का रातव दाना आदि धीरे धीरे उसकी रुचि के अनुमार खिलाना चाहिए। साथ ही यदि वैज्ञानिक अनुसंधान पर आधारित तथा पशु- विनान विशेषनों द्वारा निर्धारित निम्न मिश्रण भी प्रतिदिन के हिसाब से उनक भारे में मिलाकर खिलाया जाये, तो बहुत ही अच्छा है। यह मिश्रण गाय, भस आदि दुधारू पशुओं को 2 औंस प्रतिदिन और 5 सेर यानी 10 पौण्ड से अधिक दूध देने वाली गाय भसो को 3 जोस प्रतिदिन के हिसाब से दिया जाना चाहिए । इस मिश्रण द्वारा पशुओ के आहार के समस्त आवश्यक पोपा तत्व पूरे हो जाते हैं। आमतौर पर पशु अपने शरीर के प्रति 100 पौण्ड भार के लिए रोजाना 2 पोण्ड से 21 पौण्ड तक सूखा चाग दाना खाता है। दुधारू पशुओ की खुरार का औसत इससे कुछ अधिर होता है। इनमे भी मस की खुराक गाय की अपेक्षा अधिक होती है। पशुओ के चारे में मोटे चारे की भी पर्याप्त मात्रा अवश्य होनी चाहिए। क्याकि यह नाना, खली आदि को पचाने मे सहायक होता है। परीक्षणा से पता चला है कि 100 पौण्ड वाले पशु के लिए कम से क्म निर्वाह खुराक 06 पौण्ड पचनीय प्रोटीन 0 6 पौण्ड, माड (स्टाच) 75 पौण्ड कुल पचनीय पोषक तत्त्वो से युक्त होनी चाहिए। सूसे चारों म बरसीन का सूखा पारा सबसे अधिक पोपक तत्वो से युक्त माया गया है, इसलिए यदि सम्भव हो और आसानी से प्राप्त हो मके, तो पशु को बरसीम का मूखा चारा पर्याप्त मात्रा खिलाना चाहिए । इमसे पशु को दाना, बली बादि दने की विशेष आवश्यकता नहीं रहती, क्यो1ि0 पौग सूखी बरसीम में 09 पौण्ड पचने वाला कच्चा प्रोटीन (DCP) और १२३ 5 92 पौण्ड परने वाले पुल पोषम तत्त्व (T DN ) पाए जाते हैं, जो पा की दनिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए पर्याप्त होते हैं । इसमे प्रोटीन की मात्रा आवश्यक्ता से भी कुछ अधिक हाती है, किन्तु अन्य पोषक तत्वो की मात्रा कुछ कम होती है जो एक पौण्ड गेहू का भूसा मिलाकर पूरी की जा सकती है । यदि सूखे बारे मे बरसीन की मात्रा पूरी देना सम्भव न हो तो मक्का, जई, गेहू का भूसा इन तीनो से ही उसकी कमी पूरी कर सकते हैं । पशुओ के चारे दाने मे पचनीय कच्चे प्रोटीन तत्त्वो की मुरप रूप से आवश्यकता होती है और उसे ध्यान में रखकर ही पशु के लिए चारा दाना निश्चित करना चाहिए। किन्तु हमारे दश के विभिन्न स्थानो की जलवायु भिन भि न होन के कारण तथा भूमि की उपजाऊ शक्ति के अतर के कारण कहीं कोई वस्तु सुलभ है, दूसरे स्थानो पर वही वस्तु दुलभ है और दूसरे स्थाना पर सुलभ वस्तु पूर्व स्थान पर दुलभ है। इसलिए सारे देश के हर स्थान के लिए एक जैसी खुराक निश्चित करना असम्भव है। गर्भावस्था मे पशु का उचित आहार-गर्भावस्था मे गाय, मस आदि मादा पशुओ को कुछ विशेष मामा मे पोषक तत्त्वा की आवश्यकता होती है, क्योकि उसके अपने शरीर की आवश्यक्ता के अलावा गमस्थ बछडे के शरीर के विकास के लिए अतिरिक्त पोषक तत्त्व चाहिए । वनानिको के मतानुसार गर्भावस्था के अन्तिम एक तिहाई वाल मे गाय को अपने शरीर निर्वाह तथा गमस्थ शिशु के विकास के लिए प्रतिदिन लगभग 1 5 पौण्ड बुल पचनीय पोषक तत्व (T DN) की आवश्यकता होती है। प्रसवकाल से लगभग एक या दो सप्ताह पूर्व दाना तथा खली की मात्रा बढा दनी चाहिए तथा बढिया किस्म का चारा और रोचक वस्तुए, जिहें पशु बडी रुचि के साथ खा सके, खिलानी चाहिए, यथा गेहू की भूसी, अलसी की खली आदि । प्रसव के समय चारे व दाने को मात्रा घटाकर ब्याने के पश्चात् दाने की मात्रा धीरे धीरे इस प्रकार बढानी चाहिए कि एक या दो सप्ताह मे वह चारे दाने की पूरी-पूरी मात्रा खाने लगे। उसमे भी यह ध्यान रखें कि उसे अच्छी से अच्छी और पौष्टिक खुराक अधिक से अधिक प्राप्त हो सके। यानी उसकी खुराक गुण १२४ तपा माता की दृष्टि से इतनी बड़ा देनी पाहिए कि उसे मामा य अवस्या की अपेक्षा एर पौण्ड अतिरिवन टी डी एन (कुन पचनीय पोपर तत्व) प्राप्त हो म । माय भी गौर करें वि उम सराव से पशु के दूध की मात्रा बढ़ती है या नहीं और जब तब दूप पो मात्रा बढ़ती रहे गाने ने उसके दूध की माना भी बढाते जाना चाहिए । इस प्रकार गाभिन पशु पो सतुलित, पोषक और उचित आहार देबर आप उससे अधिकतम मात्रा म दूध प्राप्त कर सकेंगे। गमकाल म पशु पो प्रसव से ४५ दिन पूर्व से लेकर प्रसव के ३ ४ दिन बाद तक तीन छटाक या एन पाव सरमो का तेल पिलाना भी श्रेष्ठ है, क्योकि एर तो प्रसव के समय पशु को कष्ट कम होता है दूसरे दूषित रक्त निरल कर पेट साफ हो जाता है। रोगी पशुओं के लिए उपयुक्त आहार-रोगी पशु चूकि दुबल हो जाता है, उमती भूव तथा पाचन क्रिया भी शिथिन हो जाती है, इगलिए वह एक स्वस्य पशु के लिए बताई गई खुराग नहीं पचा सकता। यदि रोगी पशु को बिना सोचे समझे दाना चारा खिलाया जाता रहे तो कुछ दिनों में वह पशु मर जायेगा। अत जिस प्रकार रोगी मनुष्य के लिए इलाज के साथ साथ पाया- पग्य का भी ध्यान रखना अनिवाय है, उसी प्रकार रोगी पशु के लिए भी हमे अत्यात सावधानी बरतनी चाहिए । यह ध्यान रखना चाहिए कि पशु को अपथ्य भोजन न दिया जाये। उसकी शारीरिक अवस्था, पाचन क्रिया, गोबर आदि को देख विचार पर ही चारा-दाना दें। इस विषय मे निम्नलिखित वातो का ध्यान रखना लाभदायक सिद्ध होगा- (१) रोगी पशु को मुलायम, हरा और जल्दी पचने वाला चारा थोडा थोडा करके दिन में कई बार मे देना चाहिए । एक बार मे ही भरपेट खिलान की कोशिश ही करनी चाहिए, क्यावि उसकी अशक्त इद्रियां उसे ठीक प्रकार से पचाने में मदद नहीं दे पाएगी और पशु का रोग व कष्ट दानो वढ.जाएगा। (२) रोगी पशुओ को अधिक गरम अथवा अधिक बादी व कोष्ठबद्धता उत्पन करने वाली वस्तुए कदापि नही देनी चाहिए जैसे मटर का दाना भारी । - - तथा बादी है । वह रोगी पशु में लिए उपयुक्त नही जब समस्य-मा के उपयोगी दाना है। (३) यदि रोगी पशु को खूनी अथवा पतले दस्त आ रहे हो, तो उसे तरल पदाथ अधिक नहीं खिलान चाहिए । क्योकि तरल पदाथ बिना पचे ही मल के रास्ते निकल जायेंगे और जितन ही रस्त अधिक होगे पशु की कमजोरी वढती जायेगी। (४) मुह का पद जाना, गले की सूजन आदि मुख सम्बधी अनेक रोगों म पशु दान चारे को भली प्रकार चबाकर जुगाली करके नहीं खा पाता, इस लिए उम दशा में उसे कठोर पदाय यथा चरा, घाम दाना आदि न देकर मुलायम व तरल पदाथ यथा रातव, महेरी मुलायम पत्तिया, तलिया, छाछ सत्तू या घोल, रोटी, चोकर, माड आदि खिलाना पिलाना चाहिए । फिर जब पशु थोडी थोडी जुगाली करने लग जाय, तो मुलायम हरियाली, जो की कुट्टी, जई वा भूसा, गेहू या भूसा आदि पानी से तर करके खिलाए। अलसी को कांजी भी रागी पशु क लिए लाभदायव पथ्य है । इसके बनाने की विधि यह है कि डेढ पाव अलसी ५ सेर पानी मे पकाए और पकने पर उतार कर छानं लें। फिर उसमे थोडा नमक अथवा गुड मिलापर थोडा ठण्डा होन पर पशु यो ढरके आदि से पिलाए । आवश्यकता पड़ने पर पशु को दूध, चाप आदि भी पिलानी चाहिए। (५) जहा तक सम्भय हो रोगी पशु को अधिक कमजोरी की दशा में दाना, चारा आदि न खिलाना ही अच्छा है। कभी कभी मुलायम हरा चारा उसे दिखाए । अनिच्छा होने पर पशु स्वत नही खाते । (६) यद्यपि कुछ विशेष रोगो में पशुओ को जल पिलाना यजित होता है, उहें छोडकर अय सब रोगो मे पशु को कुए का साफ पानी उबाल छानकर ठण्डा करके पिलाना चाहिए। ध्यान रहे कि रोगी पशु को जोहड, तालाब आदि पर ले जाकर गदा पानी नही पिलाना चाहिए । (७) रोगी पशु की तीमारदारी भी उसी प्रकार परनी पाहिए, जैसे अपने परिया में किसी रोगी सदस्य की करते हैं। उसे हवा, पानी, धूप १२४ तथा मात्रा की दृष्टि से इतनी बढा देनी चाहिए कि उसे सामा य अवस्था की अपक्षा एक पौण्ड अतिरिक्त टी डी एन (कुल पचनीय पोषक तत्व) प्राप्त हो सके। साथ ही गौर करें वि उम खुराक से पशु वे दूध की मात्रा बढती है या नही और जब तर दूध की मात्रा बढती रहे सन शनं उसके दूध की मात्रा भी बढाते जाना चाहिए । इस प्रकार गाभिन पशु को सतुलित, पोषक और उचित आहार देकर आप उससे अधिकतम मात्रा मे दूध प्राप्त कर सकेंगे। गमकाल मे पशु को प्रसव स ४५ दिन पूर्व से लेकर प्रसव के ३४ दिन बाद तक तीन छटाक या एक पाव सरमो का तेल पिलाना भी श्रेष्ठ है, क्योंकि एक तो प्रसव के समय पशु को कष्ट कम होता है, दूसरे दूषित रक्त निकल कर पेट साफ हो जाता है। रोगी पशुओं के लिए उपयुक्त आहार-रोगी पशु चूमि दुबल हो जाता है, उसकी भूष तथा पाचन क्रिया भी शिथिन हा जाती है, इसलिए वह एक स्वस्थ पशु के लिए बताई गई खुराक नही पचा सकता। यदि रोगी पशु को बिना सोचे समझे दाना चारा खिलाया जाता रहे तो कुछ दिनों म वह पशु मर जायेगा। अत: जिस प्रकार रोगी मनुष्य के लिए इलाज के साथ साथ पक्ष्या पण्य का भी ध्यान रखना अनिवाय है, उसी प्रकार रोगी पशु के लिए भी हमे अत्यत सावधानी बरतनी चाहिए । यह ध्यान रखना चाहिए कि पशु को अपच्य भोजा न दिया जाये । उसको शारीरिक अवस्था, पाचन क्रिया, गोबर आदि को देस विचार कर ही पारा-शना दें। इस विषय म निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना लाभदायर सिद्ध होगा. (१) रोगी पशु को मुलायम, हरा और जल्दी पचने वाला पारा पाहा थोडा करके दिन में कई बार में देना चाहिए। एक बार में ही भरपेट चारा सिलान की कोशिश Tीं करनी चाहिए, क्याकि उसरी अशक्त दिया उसे ठी प्रकार से पचाने में मदद नही दे पाएगी और पशु का गेग व कष्ट दोनो बढ़ जाएगा। (२) रोगी पशुओं को अघिन गरम अपवा अधिन वादी व कोष्ठबद्धता उत्पन्न करने वाली वस्तुएं कदापि नहीं देनी चाहिए जैसे मटर का दाना भारी १६ तथा बादी है । वह रोगी पशु पे लिए उपयुक्त नहीं, जबकि वारस म फलिए -- उपयोगी दाना है। (३) यदि रागी पशु वा पूनी अथवा पतले दस्त आ रहे हो तो उसे तरल पदाप अधिक नहीं खिलान चाहिए । क्योकि तरल पदाथ बिना पचे ही मल के रास्त निकल जायेंगे और जितन ही दस्त अधिक होगे, पगु की कमजोरी वढती जायेगी। (४) मुह था पर जाना, गले की सूजन आदि मुख सम्बधी अनेक रोगों मे पशु दाने चार को भली प्रकार चवाकर जुगाली करके नहीं खा पाता, इस लिए उस दशा में उस कठोर पदाथ यथा चरा, घाम दाना आदि न देकर मुलायम व तरल पदाथ यथा रातव, महेरी, मुलायम पत्तिया, नलिया, छाछ सत्तू का पाल, रोटी, चोकर, माड आदि खिलाना पिनाना चाहिए । फिर जब पशु पोडी थोडी जुगाली करने लग जाये तो मुलायम हरियाली, जो की युट्टी, जई वा भूसा, गेहू या भूसा आदि पानी से तर कर खिलाए। अलसी की काजी भी रागी पशु क लिए लाभदायर पथ्य है । इमो बनाने की विधि यह है कि डेढ पाव अलमी ५ सेर पाणी म पकाए और पकने पर उतार कर छोन लें। फिर उसम थोडा नमक अथवा गुड मिलायर थोडा ठण्डा होन पर पशु को दर आदि स पिलाए । आवश्यकता पड़ने पर पशु को दूध चाय आदि भी पिलानी चाहिए। . (५) जहा तक सम्भव हो रोगी पशु को अधिक कमजोरी की दशा में दाना, चारा आदि न खिलाना ही अच्छा है। कभी कभी मुलायम हरा चारा उसे दिखाए । अनिच्छा होने पर पशु स्वत नहीं खाते। (६) यद्यपि कुछ विशेष रोगो में पशुओ को जल पिलाना वजित होता है, उहें छोडकर भ प सब रोगो मे पशु को कुंए का साफ पानी उबाल छानकर ठण्डा करके पिलाना चाहिए। ध्यान रहे कि रोगी पशु को जोहड, तालाब आदि पर ले जाकर गदा पानी नहीं पिलाना चाहिए। (७) रोगी पशु की तीमारदारी भी उसी प्रकार करनी पा अपने परिवा- के विसी रोगी सदस्य को करते हैं। उसे हवा, १२६ आदि से बचाना, उसक बांधने के स्थान की स्वच्छता, उसे समय पर खाना और पानी आदि देना, उसे समय पर वा देना और आवश्यकता होन पर अस्पताल पहुंचाना आदि वातो का ध्यान रखना आपरा नैतिक उत्तरदायित्व है । लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए । (८) राग मुक्त होने पर भी पशु को एकदम भरपेट पारा दाना नहीं खिलाना चाहिए। उसकी खुराक धीरे धीरे इस प्रकार बढाते जायें कि वह हजम करता रह । अयथा पुन बीमार पड़ने की अशा रहेगी। स्वच्छता-आहार के उपरान्त पशुओ को स्वस्थ रखने के लिए स्वच्छता भी एक महत्त्वपूर्ण आधार है । गदगी असख्य रोगो को जड है और यदि ठीक प्रकार से सफाई न रखी जाये, तो पशु अनेकानेक रोगी का शिकार हो जाता है। स्वच्छता मे वेवल पशुओ के शरीर की ही स्वच्छना नहीं, वरन् उनके चारे दाने तथा ती को स्वच्छता तथा उनके बाधने के स्थान के आस-पास की जगह की स्वच्छना ध्यान में रखने की भी विशेष आवश्यकता है। पशु के शरीर को स्वच्छ रखने के लिए उसे दूसरे-चौथे नि नदी या स्वच्छ पानी के तालाब या कुए पर ले जाकर खूब मल मल कर नहलाना चाहिए, कि तु किसी ऐसी वस्तु से शरीर को नहीं रगडना चाहिए जिससे उसकी खाल छिल जाये । मनुष्य को त्वचा की भाति ही पशु की चमडी मे भी छोटे छोटे छिद्र होते हैं । ये छिद्र जब मैल से बद हो जाते हैं तो पा के शरीर से पसीने के रूप मे निकलने वाला मल बाहर नहीं निकल पाता और वह कुछ दिनो मे अनेक रोगो को जन्म देता है। पशु को नहलाते रहने से उसकी चमडी के छिद्र खुले रहते हैं और उनसे पसीन के द्वारा शरीर के अदर का मल तथा विप बाहर निकलता रहता है, जिससे पशु प्रसनचित्त, फुर्तीला और नीरोग रहता है और काम भी चुस्ती के साथ करता है । इसके बाद पशु के बांधने के स्थान तथा आस-पास की सफाई का नम्बर आता है । चूकि पशु अपने बैठने के स्थान पर ही मल मूत्र त्याग परते रहते हैं, इमलिए उस स्थान की सुबह शाम नियमित स्प से अच्छी तरह सफाई करनी चाहिए। इस काम में कभी आलस्य नही फरशा चाहिए। क्योंकि पशु वे गोबर में बहुत जल्दी कीडे पड जाते हैं और वे कीडे ही अनेक रोगो की उत्पत्ति का कारण बनते हैं। इसलिए यदि सम्भव हो, तो मलमूत्र त्याग करते ही उस स्थान को तत्क्षण साफ कर देना चाहिए । एक वात का और विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए कि पशु के बाधने का स्थान गडढेदार अथवा समतल नहीं रखना चाहिए। क्योकि ऐसे स्थान में पाका मलमून थोडा बहुत भरा रह जाता है अथवा दलदल-ता हो जाता है और फिर पशु वहा बठता है, तो उसके शरीर मे लिपट जाता है। यदि पशु के बाधने का स्थान ऐसा बना लिया जाये कि वह पीछे की ओर कुछ ढलान-सा लिए हुए हो तो मूत्र तत्काल बह जाएगा और वहा दलदल नही होने पाएगा। साथ ही उस स्थान की भूमि यदि पक्की न हो, तो कठोर अवश्य ही होनी चाहिए । मुलायम मिट्टी की भूमि पशु के मूत्र का तत्काल साखर दलदल कर देती है । इसीलिए बडे बडे फार्मो तथा पशु पालन के द्रो मे तो पशुओ के वाधने ना स्थान हमेशा पक्के फश का बनाया जाता है । अत मे पशुओ की शारीरिक स्वच्छता के सम्बध मे एक आवश्यक बात और भी ध्यान में रखनी चाहिए कि पशुआ के शरीर म प्राय जुए अथवा कीडे पड़ जाते हैं, जो उनकी खाल से चिपटे रहकर उनका खून चूसते रहते हैं । इन कीडा को छुडावर फेरते रहना चाहिए। जुए तथा कीडे मारने के लिए पा को कभी-कभी तम्बाक के पानी से नहलाते रहना चाहिए। मिट्टी के तेल से भी जुएं आदि मर जाती हैं, जिन्तु इसका पयोग मावधानी से करना चाहिए। पाक धिने के स्थान की सफाई के लिए कभी भी फिनायल आदि कीटाणु- नाशर दवाइयो के पानी से स्थान को धोते रहना चाहिए। ताकि वहां के घोडे मर जायें। तात्पर्य यह है कि स्वच्छता का पूरा पुरा ध्यान रखना यावश्यक है। धम अर्थात् मेहनत -~यम भी पा के स्वास्थ्य का प्रमुख थाधार है। योकि बिना यम के न तो वे अपना आहार (चारा दाना) ही ठीर प्रवार से पचा पाते हैं और न ही उनके शरीर में स्फति, शक्ति तथा बलिष्ठता का संघार ठोर से होता है । यदि पशु चौबीसो घटे एक ही स्थान पर वघा रहे, १२८ तो वह निकम्मा, शिथिल , आलसी उदासीन और स्वस्थ होकर अ त में मर जाएगा। इसलिए पशओ का श्रम करना भी अत्यत आवश्यक है। थम करने से उनका साया पीमा चाग दाना भती भाति पचार उनव शरीर म लगेगा। साथ ही पमीन द्वाग शरीर के अनुपयागी तत्व बाहर निकलेगे, जिससे पशु नीरोग तथा फुर्तीला रगा । सवारी तथा खेती-बाडी अथवा भारपाहन मे काम आने वाले पशु तथा घोडे, गधे, वा भम आदि पशु तो श्रम करते ही है, क्योकि उनका वाम ही श्रमसार है, नितु समस्या दूध देन वाले पशुतो की है। इन पशुओ को दिन में खूटे से खोलकर कम से कम 5-6 घण्टे जगल मे स्वच्छतापूवर विचरण करने देना चाहिए । विगेपर गाभिन पशु के लिए ता यह अनिवाय है । जगल में चरते ममय पशु जावश्यक्तानुसार स्वत ही दौड भाग कर अथवा चलकर थोडा-बहुत श्रम कर लेता है, जिससे उसे जान द भी प्राप्त होता है। विश्राम अर्थात आराम--मनुष्य हा अथवा पशु स्वस्थ रहन पे लिए जितना श्रम करना आवश्यक है, उतना ही विश्राम करा भी अनिवाय है। इमी लिए प्रकृति 1 दिन और रात बनाए है, ताकि जीवमात्र दिन मे श्रम करत रामि म स्थान विक प म जाराम वर सके। कठिन परिश्रम करने वाल पशु बलो, घोडी आदि के विथ म वा भी पूरा-पूरा ध्यान रखना चाहिए। अधिक परिश्रम के उपरा त यदि पर्याप्त विश्राम न मिस और उनसरी धावट दूर न हो तो शरीर क्षीण होने लगता है और पशु निरन्तर दुवल होता चला जाता है। कठिन से कठिन प म लेने के पश्चात यदि उसे कुछ घटा र लिए पूग विधाम मिलता रहे, तो उममे पुन परिश्रम करने के लिए नई शक्ति व स्फूति उत्स न हो जाती है और उगा स्वास्थ्य भी ठीक रहता है। विश्राम के अलावा गुओं की थकावट दूर करने के लिए उनकी जांघो को अच्छी तह एपटे तर मनना पाहिए और मालिश के वा पाडी देर उहें धोरे धीरे टहलाना चाहिये । इस प्रकार उनकी पावट जली दूर हो जाती है। घोहो के लिए तो यह अनिवाय सा है। स्पग्छ दता मर्यात विचरण--पालतू पशु भी एr स्थान त बघारे रहना १२९ कभी पसन्द नहीं करते, उहें स्वच्छन्द होकर विचरण करने में आनन्द आता है, इसलिए पोडी-बहुत देर को पशु को आजाद छोडना भी बड़ा जरूरी माना गया है। ताकि वे इच्छानुसार भागदौड, लोट-पोट अथवा पहलकदमी कर सके। इन कामों से उसका मन बडा प्रसन्न रहता है और स्वस्थ रहने के लिए मन का प्रसन्न रहना जरूरी है। यदि पशु काटने वाला, सींग मारने वाला या अय विमी प्रकार से दूसरो के लिये हानिकारक है, तो उसे आजाद न छोडवर स्य उम पशु मे मालिक को उसकी रस्सी पकडकर जगल मे घुमाने ले जाना चाहिए । उक्त सब बातें पशुओ को स्वस्थ व नीरोग रखने में बहुत सहायक सिद्ध होती हैं। पशु पालको के लिए आवश्यक हिदायतें प्राय देखा गया है कि पशु हमारी गलतियो तया असावधानियो के कारण ही बीमार पड़ते हैं, अ यया उनके शरीर मे रोगो की रोश्याम के लिए पर्याप्त प्राकृतिक क्षमता होती है और यदि हम से भूल न हो तो पशु बहुत ही कम बीमार पड़ें। इसलिए यहा हम अपने पशुपालक बघुमा के लिए कुछ आवश्यक बातें लिख रहे हैं, जिनका ध्यान रखने से उनके पशु बीमार भी कम पडेंगे और उनकी उत्पादकता भी बढ़ेगी। (१) सबसे प्रमुख बात सफाई को है । पोछे लिखे गए शारीरिक स्वच्छता आहार व जल की स्वच्छता तथा स्थान को स्वच्छता के नियमो का पूरी तरह पालन करें। (२) किसी बीमार पशु को दूसरे स्वस्य पशु के साथ कभी नहीं बाधना चाहिए और विशेषकर उस दशा मे जब पशु किसी छूत वे रोग से पीडित हो। याद रखिए कि एक पशु की छूत की बीमारी के कोडे उडकर तमाम पशुओ को बीमार कर सकते हैं। इस लिए रोगी पशु को तुरत अलग स्थान पर अन्य पशुआ से काफी दूरी पर रखें। (३) बहुत-से पशु पालक लोभ के कारण बीमार पशु की नाद मे बचा हुआ चारा-दाना स्वस्य पशुओ को खिला देते हैं और इस प्रकार दूसरे पशु भी बीमार ण्ड जाते हैं। इसलिए वीमार पशु का बचा चारा स्वस्थ पशु को कभी न डालें। .
१३० (१) पशुओ को सर्दी, गरमी, धूप वर्षा मादि से बचाने का समु अवध होना चाहिए । उहें छप्पर अथवा छत के नीचे बांधना चाहिए। (५) साप ही ऐसा भी न हो कि स्वस्थ पशु को धूप तथा खुली है बिलकुल न मिले । उह ये चीजें उचित रूप में अवश्य मिलनी चाहिए। (६) पशुओ के बीमार पडने का एक मुख्य कारण उहें पर्याप्त मात्रा पोषक तत्त्वो से युक्त चारा-दाना न मिलना भी होता है। साथ ही पशु पा भी काफी मात्रा मे पीते हैं, इसलिए उह आवश्यक्तानुसार स्वच्छ पानी अवश्य पिलाते रहना चाहिए। (७) पशुओ को आहार, उनके काम, परिथम, शरीर के आकार तर भार के अनुसार उचित ढग से निर्धारित क्यिा हुआ तथा उपयुक्त मात्रा में दिया जाना चाहिए। यह नही कि गाय, मस, बकरी, घोडा कट सबक एक जैसा चारा-दाना बिना सोचे समये खिलाते रहे, चाहे उनकी आवश्यकत की पूनि हो या न हो। (5) यदि पशु को खाने के लिए तो अत्यधिक पौष्टिक और अच्छा चारा- दाना दिया जाये, और उससे काम कुछ भी न लिया जाये, बल्कि वह एक खूटे से बधा रहे, तो भी वह असदिग्ध रूप से बीमार पड़ जाएगा। पौष्टिक आहार को हजम करने के लिए उससे पर्याप्त परिश्रम का काम अवश्य लिया जाना चाहिए। (E) भारत में अधिकतर पशु पोखरों का गदा पानी पिलाए जाने के कारण ही बीमार पड़ते हैं क्योकि गदे पानी के कोडे पेट में जाकर तरह- तरह के रोग उत्पन कर देते हैं। पशु को नदी या कुए का स्वच्छ जल पिलाना चाहिए। (१०) इसी प्रकार चारा-दाना भी अगर साफ न किया जाये, तो उसमे लगी मिट्टी, कीडे आदि पशु के पेट मे जाकर रोग पैदा कर देते हैं। इसीलिए चारे तथा दाने आदि पशु को खिलाने से पूर्व धाकर अच्छी तरह साफ वर लेना चाहिए। (११) दुधारू पशुओ का दूध निकालते समय उनके सामने खली, गुड, चोकर आदि कोई जच्छो रुचिकारक वस्तु रखनी चाहिए। इससे पशु चुपचाप खडा रहता है और दूध भी अधिक देता है। (१२) चोकर खली आदि जो भी पौष्टिक पदाथ रहें दूध बढाने के लिए दिया जाये वह कम से कम चार गुने पानी में मिलाकर देना चाहिए ताकि वे पशु को भली प्रकार पच जायें। (१३) साथ ही इस बात का भी ध्यान रखें कि खली, चोकर, चून, दाना आदि पशु को खिलाने से कुछ घटे पूर्व ही पानी मे भिगो देना चाहिए। इससे पशु उमे रुचिपूवर खाएगा और वह चारे आदि म ठीक से मिल सकेंगी। कितु अधिक समय तक पानी मे पडी पडी सहने भी नहीं देनी चाहिए । (१४) पशुओं के मामने मेंधा नमक का एक बडा ढेला सदा रखा रहना चाहिए ताकि वे अपनी इच्छानुसार जब चाहें, उसे चाटते रहें। नमक पशु के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है । यदि हर समय रखना सम्भव न हो, तो कभी कभी नमक अवश्य खिलाते रहना चाहिए। (१५) बडे शहरो मे लालची पशु-पालक दुधारू पशुओ को कुछ ऐसी दवाओ का सेवन कराते हैं कि उनका दूध तत्काल बढ जाता है, किन्तु इस प्रकार अप्राकृतिक ढग से दूध बढाना आगे चलकर पशु को बिल्कुल वैकार कर देता है और फिर वे सामा य मात्रा में भी दूध नही देते । इसलिए हमे लोभवश ऐसे तरीके नही अपनाने चाहिए। (१६) कुछ लालची भाई पशु के बच्चो को विल्कुल भी दूध नहीं पीने देते बल्कि बच्चे को पास म खडा करके ही दूध निकालना शुरू कर देते हैं । इससे बच्चे शीघ्र मर जाते हैं और उन पश की प्रजनन शक्ति व दुग्ध उत्पादन क्षमता धीरे धीरे नष्टप्राय हो जाती है। बच्चे को बिल्कुल दूध न पिला भारी भूसंता है। स्वस्थ व रोगी पशुओं के लक्षण पशु एक मूर प्राणी है । रोगग्रस्त होने की दशा में भी वह अपना कष्ट मुह से नहीं बना सक्ता। वितु वर्षों के अध्यया ये आधार पर मनुष्य को आज इतना अनुभव प्राप्त हो चुका है कि उसके लक्षणा से ही पा पिलिक १३२ अथवा अनुभवी पशुपालक उसके रोग, कष्ट तथा दशा का तत्काल निदान कर लेते हैं। स्वस्थ पशुओ के लक्षण (१) स्वस्थ पशुचारे और दा ने आदि को खूब रुचि के साथ खाता है और जब भी उसे खाने के लिए कोई नई वस्तु दी जाए, वह बड़े उत्साह से उसे खाने के लिए झपटता है। (२) स्वस्थ पशु खाये गये चारे और दाने को भली प्रकार जुगाली पर के घटो चबाता रहता है। ताकि वह अच्छी तरह पच जाये और उसके शरीर को आवश्यक शक्ति दे। (३) स्वस्थ पशु दिन भर में कम से कम दो बार पेट भरकर पानी पीता है और यह पानी की मात्रा उसके शरीर के आकार के अनुमार पयाप्त होती है। आपको नान होना चाहिए कि एक गाय या भस प्रतिदिन ६ गैलन से ८ गलन तक पानी पीती है। घोडा बधे रहने पर मामा य मौसम मे ८ गलन और गरमी के दिनों मे अधिक काम करने पर लगभग उससे दूना अर्थात् १५-१६ गलन पानी पीता है । ऊट को यदि रोज पानी पिलाया जाये तो ४ से - गैलन तक प्रतिदिन और कई दिनों बाद पिलाया जाये तो एक ही बार में २० गैलन तक पानी पी जाता है। वकरी, भेष्ठ, सूअर आदि छोट पशुओ को प्रतिदिन लगभग ४ गैलन पानी की आवश्यकता होती है। हाथी प्रतिदिन २० से २५ गैलन तक पानी पी जाता है। तात्पय यह कि स्वस्थ पशु पानी खूप पीते हैं । (एक गलन १० पौण्ड के बराबर हाता है।) (४) स्वस्थ पा हमेशा अ य पाआ के साथ रहना पसद करता है और सामूहिक रूप से चरने, धूमने तथा आपम म लड-लड पर खेलने मे विशेष आदि पाता है। (५) स्वस्थ पामा को पाखो म हमेशा चमक और तेज पाया जाता है। उगवे नयने तथा मुट की पूरी सटा चमकीली मी दिखाई देती है। (६) स्यस्प पशु असा बानो तया पूपो हर समय स्वाभाविक रूप से हिलाया-लाया परता है और हर समय पोर ना तथा चुत दिखाई देगा।
उसके पास जसे ही कोई जाएगा, वह सतप होपर उसे देखेगा। (७) स्वस्थ पा दिन भर कम से कम ५६ यार गोवर तथा मूत्र का स्याग करता है। (८) स्वस्य पा मा गोबर, लीद आदि न अधिर गाढ़ा व कट होता है और न अधिक पतला। (e) स्वस्य पशु के शरीर मे रिसी प्रकार की असह्य दुर्गध नहीं होती--- सामा म दुग घ तो होती ही है। (१०) स्वस्थ पा को गुदा अर्थात मल त्याग का स्थान गोबर करने के पश्चात् भी बिल्कुल साफ रहता है। उसका गोबर गुदा से आस पास विपटता नहीं। (११) स्वस्थ पा के बालो, रोम तथा त्वचा म हर समम चमक-सी रहती है और वह चेतन दिखाई देता है। (१२) स्वस्थ पशु के शरीर के किमी भाग पर अगुली रखते ही वह शरीर को सिकोडने या थरथराने लगता है। यही परपराहट वह शरीर पर मक्सी या रिसी पक्षी आदि के बठ जाने पर करता है और यदि वह फिर भी नही उडे तो पशु तुरन पूछ द्वारा उहा देता है। (१३) स्वस्थ पशु एक मिनट मे १०-१२ बार श्वास लेता है । (१४) स्वथ पशु को नाडी को गति ४०-५० के मध्य प्रति मिनट रहती है। पशु की नाडी हमशा पूछ के नीचे देखी जाती है। (१५) गाय, मस आदि पशुओ का सामान्य तापमान १०१ व १०२ डिग्री फारनहींट के लगभग रहता है। विशेष अवस्था में थर्मामीटर द्वारा उसका तापमान लेकर भी जाना जा सकता है। जसा पीछे लिखा जा चुका है, पशु का तापमान पूछ के नीचे गुदा स्थान पर लिया जाता है। रोगी पशु के सामान्य लक्षण रोगी पशुओ मे विशेष लक्षण तो उसके रोग की किस्म के अनुसार अलग प्रकट होते हैं, कि तु साधारण रोगो की दशा मे ये लक्षण पशुओ मे दृष्टिगत होते हैं, जिहे देखकर सहज ही यह पता चल १३४ पशु किस बीमारी से ग्रस्त हो गया है। (१) सबसे पहला लक्षण यह प्रकट होता है कि रोगी पशु चारा दाना आदि खाना बद कर देता है और यदि खाता भी है तो बहुत थोडा और बेमन (२) रोगी पशु जुगाली करना भी बद कर देता है और अगर थाडी बहुत करता भी है, तो इतने धीरे जैसे उसे जुगाला करने म भी बहुत कष्ट हो रहा हो । यह पशु के रोगी होने का प्रमुख लक्षण है। (३) इसी प्रकार रोगी पशु या तो पानी पीना विल्कुल छोट देता है या फिर कुछ विशेष रोगो मे इसको प्यास उतनी बढ़ जाती है कि वह बार बार पानी पीना चाहता है। सामा य रोगो मे वह २ ४ घूट पानी पीकर ही रह जाता है। (४) रोगी पशु अ य पशुओ का झुण्ड छोडकर अलग अलग चुपचाप जा पहा होता है और भय पशुओ से अलग ही रहना चाहता है । यह लक्षण देख कर तत्काल समझ लेना चाहिए कि पशु बीमार है । (५) रोगी पशु की आखों को चमक क्षीण हो जाती है, नथुने तथा मुह की धूपरी भी सूखी-सूखी सी दिखाई देती है और उनम चमक अपना तेज नहीं रहता है। (६) रोगी पशु फान पूछ आदि स्वाभाविक रूप से हिलाना बन्द कर देता है। कभी कभार ही विवश होकर पूछ हिलाता है। (७) रोगी पशु गोबर मूत्र भी स्वाभाविक ढग से नहीं करता। या तो बहुत कम करता है अथवा बहुत अधिर और बार-बार करता है। (८) रोगी पशु का गोवर अधिक पतला अपया कभी-कभी अधिक गाढ़ा च कडा भद्दे तथा मटमैले रग का, घब-विहीन और तीव दुर्गय वाला होता है, जिसमे सहज ही पता चल जाता है कि पशु वीमार है। (6) रोगी पशु की गुदा वा याह्य भाग गोवा परत समम सन जाता है। पानी गोवर गुदा में आमपास चिपट जाता है क्योंकि बीमार मा गोबर सदार होता है।
१३५ (१०) रोगी पशु का शरीर दुबल, क्षीण, निस्तेज तथा सुस्त हो जाता है और उसकी स्फूर्ति और चेतना नष्ट हो जाती है । प्राय वह आसे बद किए शिथिल-मा पडा रहता है और उसके पास चाहे जो चला जाये, वह तनिक भी घेतन अथवा हिलता जुलता नहीं दिखाई देता। (११) रोगी पशु के शरीर को छूने पर भी उसमे किसी प्रकार का स्फुरण अथवा थरथराहट पैदा नहीं होती। यहा तक कि कभी कभी तो कोओ, कबूतरो आदि पक्षियो द्वारा चोच मारते रहने पर भी वे चुपचाप पड़ा रहता है और उहें उड़ाने के लिए न तो उसमे पूछ उठाने को ही शक्ति होती है और न शरीर को हिलाने डुलाने की हो । (१२) रोगी पशु को वाम की गनि भी या तो अधिक तेज हो जाती है अथवा बहुत कम हो जाती है । (१३) इसी प्रकार रोगी पशु वी नाडी की गति भी या तो सामा य गति से तेन हो जाती है अथवा काफी कम हो जाती है । श्वास तथा नाडी की गति का इस प्रकार घटना या बढना रोग के अनुसार होता है । (१४) ज्वर आदि रोगो मे पशु के शरीर का तापमान भी उसी प्रकार बढ जाता है, जसे मनुष्य का । अय अनेक रोगो मे तापमान मामा य से गिर भी जाता है। (१५) दुधारू पशु रोग की दशा मे दूध या तो बिल्कुल ही नहीं देते अथवा बहुत कम देते हैं । ध्यान रहे कि रोगी पशु का दूध निकालना भी नहीं चाहिए। उस दूध के सेवन करने से आपके परिवार के लोग भी भयकर रोगो से प्रस्त हो सकते हैं। (१६) रोगी पशुओ के कान प्राय नीचे को लटक जाते हैं और रोम तथा बाल खडे खडे-से दीखते हैं। उसके बालो तथा चमडी की चमक भी नष्ट हो जाती है। (१७) कभी कभी पशु के कानो की जड़ के पास वाला भाग गरम और ऊपरी सिरा ठण्डा मालूम देता है। यह भी पशु के रागी होने के लक्षण हैं। (१८) रोगी पशु की आखो से कीचड बहुत निकलता है और प्राम से पानी भी बहने लगता है तथा मुह से झाग और लार भी अधिक गिरने लग जाती है। (१६) इन सामा य लक्षणो के अतिरिक्त कभी-कभी कुछ विशेष रोगा की दशा में पशु बेचनी से बार-बार करवटें बदलता है, कभी जीभ को बार-बार बाहर निकालता है । ये लक्षण भी उसके रोग की तीव्रता को प्रकट करते हैं । (२०) पशु का जोर जोर से हाफना, एक ही स्थान पर वेचनी से चक्कर काटना, घबराया हुआ-सा दिसाई देना, अपने मालिक को बेचैनी से देखना आदि लमा भी उसके रोग की दशा के परिचायक होते हैं । उक्त लक्षणो को देखकर तत्काल समझ लें कि पशु बीमार हो गया है और उसे तत्काल अय पशुओ से अलग करके आगे बताए गए लक्षणो के आधार पर उसके राग का सही निदान करने की चेष्टा करें और तदनुकूल चिकित्सा करें अथवा किसी पशु चिकित्सालय मे ले जाकर दिखायें । रोगी पशु को शुश्रूषा तथा देखभाल पूरी सहानुभूति के साथ करनी चाहिए। रोगी पशु की शुश्रूषा व देखभाल कैसे करें? रोगी पशु की तीमारदारी तथा देखभाल हमे बहुत सावधानी, प्रेम, दया और क्त्तव्य की भावना से ठीक उसी प्रकार करनी चाहिए, जसे हम बीमारी की दशा में अपने परिवार के किसी सदस्य की करते हैं। अपने परिवार का कोई रोगी सदस्य तो आवश्यकता पड़ने पर पानी, दूध दवा आदि वस्तुए मुह से माग मी सकता है अथवा अपना कम्ट, रोग मादि भी बता सकता है, किन्तु ये निरीह प्राणी, जो आपके परिवार को दूध, घी, मक्खन जमे अमत तुल्य व पौष्टिक पदाथ प्रदान करके पालते हैं अथवा ऊन द्वारा आपकी जावश्यक्तायें पूरी करने में अपने जीवन तक का बलिदान दे देते हैं बीमार पड़ जाने पर न तो अपना कष्ट ही आपको बताने में समय होते हैं और न स्वय उस निवारणाथ कुछ उपक्रम कर सकते हैं । ये तो पूर्णतया मापकी सहृदयता और सहायता पर ही आश्रित रहते हैं। हमारा यह क्त्तव्य तथा नतिक उत्तरदायित्व है कि हम अपने आश्रित इन निरीह पशुओं की रोग की दशा में पूरे ध्यान से और सहानुभूतिपूर्वक शुश्रूषा तथा देसमाल करें। यदि उनको ऐसी दयनीय दशा में भी कोई मनुष्य उनके साथ क्रूर व्यवहार करता है अथवा उनकी उपेक्षा करता है, तो वह मनुष्य नहीं। फिर हमारी भारतीय संस्कृति मे ता प्राणिमात्र के साथ दयाभाव रखना सर्वोपरि माना गया है । हमारे धम म पशु-पक्षी आदि जीवो तथा दीन-दुखियारे मनुष्यो के साथ दयापूण व्यवहार करना सर्वोच्च क्त्तव्य बताया गया है। यदि कोई पशुओ के साथ निदगतापूर्ण व्यवहार करता दिखाई दे तो हमे प्रेम से उमे समझा देना चाहिए, ताकि वह फिर वैसा न करे। रोगी पशु की तीमारदारी चिक्मिा और देखभाल मे हमे निम्नलिखित वातो का ध्यान रखना चाहिए- (१) रोगी पशु को तेज हवा के झोको से बचाना चाहिए। उहें खुले स्थान में न बाधे रखकर छायादार स्थान मे बाधना चाहिए। (२) तेज सर्दी से बचाने के लिए हमे पशु के शरीर पर मोटे कपडे की सोल, कम्बल आदि डालकर उनका शरीर ढक देना चाहिए और यदि असा. धारण सर्दी हो, तो उसके आस पास आग जला देनी चाहिए ताकि जिस स्थान मे पशु वधा है, वह स्थान गरम रहे। कि तु एक बात याद रहे कि माग आदि जलाकर पशु का कमरा गरम रखते समय यह जरूरी है कि कमरे के रोशन- दान खुले हो, ताकि साफ हवा आती रहे। यदि कमरा बिल्कुल बद हुआ और हवा न आ-जा सको तो पशु दम घुटकर मर जायेगा। साथ ही यदि आपने एक ओर तो पशु के निकट आग जला दी, दूसरी ओर खिडकी और दरवाजा खुला रहने दिया, जिससे होकर ठडी हवा पशु के शरीर मे सीधी लगती रही, तो भी वह पशु के लिए हानिकारक सिद्ध होगी। प्रबध ऐसा करें कि न तो पशु को सोधी हवा के झोंके ही लगें और न ही ऐसा हो कि कमरे मे बाहर की शुद्ध हवा जा हो न सके और न कमरे की दूषित वायु निकल सके। दोनो बातो का ध्यान रखकर समुचित प्रबध करें। (३) रोगी पशु को मक्खी, मच्छर आदि से बचाने के लिए उसके बाधे जाने के स्थान पर प्रतिदिन सुबह शाम गूगल, राल और गधक अथवा किसी अन्य ऐसी ही चीज व कीटाणुनाशक दवा का धुप्रा करना चाहिए।
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तथा रोगाणुरोधक बनाने के लिए प्रयोग की जाती है। योगाणुनाश (च) पारे का क्लोराइड (Mercury ch रीला पदाथ है इसलिए इसका प्रयोग बहुत सावधानी से भरनी चार किंतु यह सम्भवत सब से तेज रोगाणुनाशक है। एक हजार भाग पदाथ एक भाग मे डालना पर्याप्त होता है। (छ) फिनायल-यह भी एक विश्वस्त रोगाणुनाशक पदार्थ है । १०० भाग पानी मे ५ माग फिनायल डालकर घोल तैयार किया जाता है । किन्तु इमको दुगन्ध देर तक रहती है, इसलिए दुधारू पशुओ के बाडो आदि मे इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए। हा, रोगी पशु के स्थान को शुद्ध करने के लिए अच्छा है। (ज) कोलतार-कोलतार भी एक कीटाणुनाशक पदाथ है । दीवार आदि के नीचे के भागो पर प्राय कोलतार का कोट किया जाता है । घरो म अब इसके प्रयोग का प्रचलन बहुत कम हो गया है क्योकि गर्मियो में पिघलकर कपडे आदि खराव कर देता है। (A) इनके अतिरिक्त-डिटोल, लिस्टराइन, लायसोल तथा फोरमेलहे हाइड आदि औषधियां भी रोगाणुनाशक (Antiseptic) होती हैं । कि तु इहें पानी को काफी बड़ी मात्रा मे घोलकर फुहारे द्वारा इनका छिडकार करना चाहिए, क्योकि ये सभी दवाए तज गघ वाली हैं। (५) रोगी पशु को नाल, ढरका (बांस की पाली नली) बोतल आदि से दवा पिलाते समय या पशु को लिटाकर दवा लगाते समय अथवा पशु का कर- वट बदलवाते समय या एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते समय उसके साथ जबदस्ती अथवा निदयता से काम नहीं लेना चाहिए, बल्कि प्यार से पुचकार कर उसके शरीर पर हाथ फेरते हुए इस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए कि पशु को तनिक भी कष्ट न हो या कम से कम कष्ट हो। कुछ अज्ञानी जन पशु के अड जाने या प्रतिरोध करने पर आवेश मे आकर उसे दुरी तरह मारने लगते हैं । यह घोर नशसता और दानवता है । रोगी पशु के साथ १४० हमेशा दयापूण बर्ताव करना चाहिए । (६) यदि पशु एक दिन से अधिक समय एक ही करवट पडा रहे, तो उसकी दवे हुए भाग को खाल गलने लग जाती है । इस बात का ध्यान रखें कि पशु एक ही करवट न पडा रहे। उसे दिन में एक दो बार करवट बदलवाते रहना चाहिए । यदि पशु अपने आप करवट न बदल सके, तो आप स्वय उसे करवट बदलवा दें। (७) यदि किसी घाव, फोडे, फुसी आदि पर कोई तेज जहरीली दवा लगानी हो, तो बहुत सावधानी से लगाए, ताकि वह शरीर के अन्य कोमल भागो यया आख, नाक, मुह आदि पर न लगे। (८) यदि पशु मे किसी असाधारण रोग के लक्षण प्रकट हो और आप ऐसा महसूम करें कि अब उसकी चिकित्सा करना आपकी सामथ्य से परे है, तो तत्काल ही उसे किसी पशु चिक्त्सिालय में ले जायें अथवा पशु डाक्टर को वही बुला कर उपचार कराए । इसमे उपेक्षा नहीं करनी चाहिए । (९) रोगी पशु को दवा भली भांति रोग का निदान परके तथा पूर्ण विचार विपश व दूसरो की सलाह लेकर ही देनी चाहिए। ऐसा न हो कि असावधानी या अनानतावश आप कोई जहरीली दवा उसे अधिर मात्रा में खिला दें, जिससे लाम होने की बजाय उसके प्राणा पर ही आ धने । (१०) रोगी पा की तीमारदारी का भार नौररों या नासमझ बच्चा के भरोस नहीं छोड़ना चाहिए--जब तक नौकर पूरी तरह विश्वासपात्र और जिम्मेदार न हो। (११) वीमार पशु कोअर स्वम्प पाओं मे तुरन दूर कर देना चाहिए। छूत की बीमारी म ता तीमारदारी करने वाले मक्ति को भी काफी बचाय व सफाई का ध्यान रखना चाहिए । अ यया छा फनने वा डर रहता है। (१२) रोगी पा को ठौर हान के उपरात भी सुरत मय पाओं के साथ नही बांधन लगना चाहिए जब तक यह पूरी तरह निश्चय न हो जाये कि उम गरीर के रोगाणु पूरी तरह नष्ट हो । (१३) रागो पाको ठीक होने के पूर्ण सुराक या मर पाग-दाना नहीं खिलाने लगना चाहिए, क्योकि रोग की गा में उसकी पाचन शक्ति क्षीण हो जाती है और उसके समस्त मग पमजार व शिथिल हो जाते हैं । इसलिए उसकी खुराक्ष धीरे धीरे बढाते हुए नई रोज में पूरी खुराक तक पहुंचाना चाहिए अयथा पा पुन बीमार पड जायेगा । (१४) सूय को धूप और गरमी ये दोनो ही पाक्तिशाली रोगाणुनाशक का काम करती है। इसलिए स्वस्थ अथवा रोगी दोनों ही प्रकार के पशुओ को पाडी-बहुत देर के लिए ऐसे स्थान पर अवश्य रखें, जहां सूर्य की किरणें सीधी उनये शरीर पर पडे । गरमी के दिनो मे अधिक दर तक दोपहर म धूप म न रखें। इसी प्रकार सर्दी के मौसम मे रोगी पशु के आस-पास आग जलाकर गरनी पहचाना भी लाभदायक सिद्ध होता है, क्योकि गरमी भी स्वत रोगाणु- नाशक है। (१५) रोगी पशु के लिए स्वच्छ और गुद्ध वायु मिलना अति आवश्यक है, क्योरि गुद्ध वायु भी रोगाणुनाशक है। शरीर के अदर के अनेक रोगाणु तो सोस द्वारा शुद्ध वायु पहुचन से ही नष्ट हो जाते हैं। (१६) रोगी पशु वो झूल या उसे ओढाए गए कपटे बाद मै खोलते हुए सोडे या साबुन के पानी मे अच्छी तरह उबालने चाहिए, साथ ही तीमारदारी करने वाले व्यक्ति को भी अपने कपडे रोज साबुन के घोल मे खौलाने चाहिए, ताकि कीटाणु मर जायें। पशु के मल मूत्र को भी क्लई आदि डालकर पीटाणुओं से रहित कर देना चाहिए। उपरोक्त नियमों का पालन करने से एक तो रोग आपके गाव म अथवा अय पाओ मे नहीं फैलेगा दूसरे आपका रोगी पशु भी शीघ्र ही स्वस्थ हो जायेगा। गाभिन पशु को शुश्रूषा व देख-भाल कैसे करें? मादा पशु यथा गाय, मैस, घोडी अँटनी, गधी, भेड, बकरी कुतिया तथा सूअरी आदि जब गाभिन होती है, यानी उनका गमकाल चल रहा होता है. तो उनकी देख भाल और सेवा शुश्रूषा बहुत ही सावधानी से करने की आव श्यकता है, जैस एक वीमार पशु की। यदि उचित ढग से उनकी देख-भाल न .
१४० हमेशा दयापूण वर्ताव करना चाहिए। (६) यदि पशु एक दिन से अधिक समय एक ही करवट पहा रहे, तो उपकी दवे हुए भाग की खाल गलने लग जाती है । इस बात का ध्यान रखें कि पशु एक ही करवट न पडा रहे। उसे दिन में एक दो बार करवट बदलवाते रहना चाहिए । यदि पशु अपने आप करवट न बदल सके, तो आप स्वय उसे करवट बदलवा दें। (७) यदि किसी पाव, फोडे, फुसी आदि पर कोई तेज जहरीली दवा लगानी हो, तो बहुत सावधानी से लगाए, ताकि वह शरीर के अन्य कोमल भागो यथा आख, नाक, मुह आदि पर न लगे। (5) यदि पशु मे किसी असाधारण रोग के लक्षण प्रकट हो और आप ऐसा महसूस करें कि अब उसकी चिकित्सा करना आपकी सामथ्य से परे है, तो तत्काल हो उसे किसी पशु चिकित्सालय मे ले जायें अथवा पशु-डाक्टर को वहीं बुला कर उपचार कराए । इसमे उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। (e) रोगी पशु को दवा भली भाति रोग का निदान करके तथा पूर्ण विचार विमश व दूसरो की सलाह लेकर ही देनी चाहिए। ऐसा न हो कि असावधानी या अनानतावश आप कोई जहरीली दवा उसे अधिक मात्रा में खिला दें, जिमस लाभ होने की बजाय उसके प्राणा पर ही आ बने । (१०) रोगी पशु की तीमारदारी का भार नौकरों या नासमझ बच्चों के भरोसे नही छोडना चाहिए--जब तक नौकर पूरी तरह विश्वासपात्र और जिम्मेदार न हो। (११) बीमार पशु को अप स्वम्य पशुओ मे तुरन दूर कर देना चाहिए। छूत की बीमारी म तो तीमारदारी करने वाले व्यक्ति को भी काफी बचाव व सफाई का ध्यान रखना चाहिए । अयया छून फैलने का डर रहता है । (१२) रोगी पशु को ठीर हाने के उपरात भी तुरन अप पाओं के साथ नहीं बाधन लगना चाहिए जब तक यह पूरी तरह निश्चय न हो जाये कि उमचे शरीर के रोगाणु पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं । (१३) रागी पशु को ठीक होने के पश्चात् एपदम पूरी खुराक या पेट १४१ भर पाग-दाना नहीं खिलाने लगना पाहिए, क्योनि रोग की म उसकी पाचन शक्ति क्षीण हो जाती है और उसके समस्त अग बमजोर य शिपिल हो जात है । इसलिए उसकी खुराक धीरे-धीरे बढाते हुए कई रोज मे पूरी खुराम तक पहुचाना पाहिए, अयथा पगु पुन बीमार पड जायेगा। (१४) सूप को धूप और गरमी ये दोनों ही शक्तिशाली रोगाणुनाशर या काम करती है। इसलिए स्वस्थ अथवा रागी दोनो ही प्रकार के पशुओ को पानी बहुत दर के लिए ऐसे स्थान पर अवश्य रखें जहां सूय की किरणें सीधी उन शरीर पर पड़े। गरमी के दिनो मे अधिक देर तक दोपहर में धूप म न रखें। इसी प्रकार सर्दी के मौसम में रोगी पशु के आस-पास आग जलाकर गरनी पहुचाना भी लाभदायर मिद होता है, क्योकि गरमी भी स्वत रागाणुन नाशक है। (१५) रागी पशु के लिए स्वच्छ और गुद्ध वायु मिलना अति आवश्यक है, क्योंकि गुद्ध वायु भी रोगाणुनाशक है । शरीर अदर के अनेक रोगाणु तो सास द्वारा शुद्ध वायु पहुचने से ही नष्ट हो जाते हैं। (१६) रोगी पशु की झूल या उसे ओढाए गए वपटे बाद में खोलते हुए सोडे या सावुन में पानी में अच्छी तरह उबालने चाहि साथ ही तीमारदारी करने वाले व्यक्ति को भी अपने कपडे रोज साबुन के घोल मे खोलाने चाहिए, ताकि कीटाणु मर जायें। पशु के मल मूत्र को भी क्लई आदि डालकर कीटाणुओं से रहित कर देना चाहिए । उपरोक्त नियमों का पालन करने से एक तो रोग आपके गाव मे अथवा अ य पाओ में नहीं फैलेगा, दूसरे आपका रोगी पशु भी शीघ्र ही स्वस्थ हो जायेग। गाभिन पशु को शुश्रूषा व देख-भाल कैसे करें? मादा पशु यथा गाय, भस, घोडी, ऊंटनी, गधी, भेड, बकरी, कुतिया तथा सूअरी आदि जब गाभिन होती है, यानी उनका गभकाल चल रहा होता है. तो उसकी देस माल और सेवा गुथूपा बहुत ही सावधानी से करने की आव एयकता है, जसे एक बीमार पशु की। यदि उचित ढग से उनकी देख-भाल न MAH -- भी जाये तो उनके पेट का बच्चा और स्वय मादा पशु के मर जाने का हर समय अदेशा रहता है। इस बात को अच्छी तरह समझ लें कि गर्भकाल मादा पशुओ के लिए भी गभिणी स्त्री के समान ही सक्टकाल होता है जिसमे वह प्रतिक्षण जीवन और मृत्यु के झूले मे पूलती रहती है । इसलिए इस सम्बध में कुछ मुख्य मुख्य नानव्य बातें आपकी जानकारी के लिए हम यहा लिखना निता त आवश्यक समझते हैं (१) मादा पशुओ को गाभिन कराने की तारीख तथा महीने आदि का रिकाड रखना चाहिए, ताकि आप सही तौर पर अदाजा लगा सकें कि अमुक पशु किस दिन और विस महीने मे प्रसव करेगा यानी बच्चे को जन्म देगा । इसके लिए विभिन पशुओ का गमवाल ज्ञात होना चाहिए, जो इस प्रकार होता है (१) गाय का गमकाल औसतन २८५ दिन या ६ मास से कुछ दिन ऊपर होता है। (२) मस का गम काल औसतन ३१० दिन होता है। (३) घोडी का गमकाल औसतन ३४० दिन होता है। (४) कटनी का गमकाल औसतन ५४ सप्ताह रहता हैं (५) गधी वा गमाल ११ से १२ महीने तक होता है। (६) भेड का गमकाल औसतन १५० दिन होता है। (७) बकरी का गमकाल औसतन १५४ दिन होता है। (८) सुअरी का गमकाल औमतन ११३ दिन होता है। (६) कुतिया का गमकाल औसतन ६२ दिन का हाता है। इस प्रकार यदि आपके पाम पशु के गाभिन होने की तारीख लिखी हुई है तो आप ठीक ठीर जान सकते हैं कि आपका पगु कत्र वच्चा जनेगा और उसी प्रकार उसका प्रबध कर सकेंगे। (२) गाभिन पशु को अपने शरीर के पोपण के लिए तया गमस्य शिशु के पोपण व गरीर विकास के लिए दुहरी खुराक व पोषा तत्त्वो की आवश्यकता होती है इसलिए उ हैं रुचिकारक पोषक तत्वा से भरपूर अच्छी खुराक के - भारे मे पीछे विस्तार से लिखा जा चुका है। उसके अनुसार ही उसकी खुराक निर्धारित की जानी चाहिए। (३) गाभिन पशु के साथ बहुत ही प्यार भरा, विनग्न और दयापूर्ण ध्यवहार करना चाहिए, जैसा रोगी पशु क साथ । गाभिन पशु से भद्दे ढग से काम लेने ठोकर मारने या डण्डे आदि से मारने से उसका स्वभाव बिगड जाता है। यदि एक बार उनका स्वभाव बिगड गया, तो फिर उस सुधारना बहुत कठिन हो जाना है। (४) गाभिन पशु मे अधिक मेहनत वाले काम नहीं कराने चाहिए । उहें अधिक चलाने, तेज दौडाने, कुत्तों द्वारा पीछा कराना या डराना, दूसरे पशुओ के साथ लडने देना आदि बातें बहुत हानिकारक हैं। इसलिए इनसे गामिन पशु को सदा बचाना चाहिए। ध्यान रहे कि जिस प्रकार एक गमवती स्त्री को ठोकर लग जाने, चोट लग जाने या अधिक भार उठाने से गमपात होने का डर रहता है, उसी प्रकार अधिक तेज दौडाने, लहाने या ठोकर खाकर पशु के गिर जाने से गाभिन पशु के भी गमपात होन की भाशका होती है, अत सावधानी बरतनी चाहिए। (५) साथ ही गाभिन पशु को एक स्थान पर बधा रखना या पडे रहने देना भी उचित नहीं है । उसे थोड़ी देर सुबह शाम धीरे धीरे घुमाना चाहिए अथवा मैदान मे परने के लिए छोड देना चाहिए । (६) गाभिन मादा पशु को ऐसे पशुओ के साथ कदापि नही बाधना चाहिए, जो लडाका, मारखोर या शरारती हो। उसे ऐसे पशुओ के साथ भी न था, जिनका गभरात हो चुका हो। इस बात का विशेषरूप से ध्यान रखने की आवश्यक्ता है । (७) प्रसव से कुछ दिन पहले मादा पशु का अयन बढ जाता है और उभर आता है, उसके थन नी फूल जाते हैं और प्राय उनमे दूध भी निकलने लगता है । ये सब लक्षण कोई असामा य वातें नहीं, इसलिए इनकी चिता न करें। (6) प्रसवकाल निकट आने पर पशु को जननेन्द्रियाँ बडी, ढीली ढाली, मुलायम तथा कुछ-कुछ फूली हुई-सी दिखाई देने लगती है। पूछ के दोनों ओर को मास पेशिया और जगह पोली होवर लटक आती हैं। ये भी प्रसवकाल के पूर्व लक्षण हैं। (६) प्रसव के समय पशु को साफ सुथरी, एका त और आरामदेह जगह पर रखना चाहिए और उस स्थान पर काफी साफ-सुथरी विछाई होनी चाहिए। प्रसव के समय पशु के साथ किसी प्रकार की छेड छाड नही करनी चाहिए और न ही बच्चो आदि का जमघट होने दे। सावधानी से एक दो अनुभवी व्यक्ति ही उसकी निगरानी करे। अनुभवहीन ग्वालो या गूजरो को उसके अग नहीं छूने देना चाहिए । इस प्रकार उसे शात स्थान में प्रसव कराए। (१०) व्याने से कुछ दिन पूर्व से ही पशु को हल्का, सुपाच्य याहार देने लगना चाहिए जैसे हरियाली भूमी, दलिया तथा कोमल पत्तिया आदि । प्रसव के कुछ दिन बाद तक भी ऐसा ही आहार दिया जाना चाहिए। मोटा चारा दाना खिलाने से उनका पेट अधिक भर जाता है, आतें तन जाती हैं और उससे प्रसव में बाधा पड़ सकती है। (११) अगर गाय, मस आदि गाभिन पशु को कब्ज रहता हो, चारा दाना ठीक से हजम न होता हो, जो उसके गोबर को देखने में सहज ही जाना जा सकता है, तो उसे कभी कमी २० औंस अलसी का तेल पिला दें। वितु ध्यान रहे कि अधिक तेज दस्तावर चीज कभी नहीं देनी चाहिए । (१२) जब पशु के ब्याने में १२ दिन की ही देरी हो तो उसे एक पोण्ड इप्सम साल्ट और एक चम्मच पिसी हुई सोठ तीन पिट गुनगुने पानी में मिलाकर पिला दें। यह खुराक पशु के ब्याने बाद भी १२ दिन दें। साथ ही व्याने से एक सप्ताह पूर्व और ३४ दिन बाद तक पशु को पीने के लिए उबालबर ठण्डा दिया हुआ गुनगुना पानी दें तो बहुत अच्छा है। मगर ठण्डी हवा और तेज धूप से बचाव करना आवश्यक है। (१३) प्रसवकाल पे निक्ट आन पर ओसरी वा असा बहुत बढ़ जाता है और प्राय एलपर यहून रहा हो जाता है। उसकी सूजन प भी कभी अयन वे सामने पेट के मध्य भाग तर बढ़ जाती है। जो कभी-कभी खतरे का लक्षण मानी जाती है, वितु वह सूजन प्रसव के पूर्व ही होती है, इसलिए हरने की कोई बात नहीं। (१४) यदि ओसर प्रसव के समय अधिक चिडचिही हो जाये, तो विना किसी तरह की छेडछाड किए उसे एकात स्थान मे छोड देना चाहिए। (१५) पशु के व्य। चुकने के बाद हर बार दुहने से पहिले उसके अयन तथा पनों पर कपूर मिल सेल की हल्के-हल्के हाथ से मालिश करनी चाहिए, ताकि अयन का तनाव दूर हो जाये । कपूर की मालिश करने से अयन से दूध का सचार बढ़ जाता है। (१६) ज्याने के समय गाय आदि पशुओ के शरीर पर बहुत जार पडता है, इसलिए माने के बाद उसे हल्की हकी चीजें यया गेहू या जो का दलिया या बाजरे का दलिया थोडी-सी पिसी हुई देशी खाड, पिसी हुई सोंठ तथा थोडा सा पिसा हुआ नमक डालकर देना चाहिए। यह दलिया म्याने के १२ घटे बाद दें। पीने के लिए गुनगुना पानी दें तथा बाद मे चोकर, भूसी या हरियाली व मुलायम पत्तिया आदि खिलाए । उस समय तिलहन, जई या बाजरा विशेष लाभप्रद है। क्योकि यह सुपाच्य तथा रोचक है। १० १२ दिन तक ऐसी खुराक देनी चाहिए। (१७) लगभग १५ दिन बाद दाना तथा मोटा चारा थोडा-थोडा बढाते हुए लगभग एक महीने मे पशु को अपनी पूरी खुराक पर लाना चाहिए । (१८) इस बीच गाय को पोषक तत्वों से युक्त पौष्टिक खुराक खिलाने, प्यार से यपथपाने, समय पर खाना, पानी आदि देने से पशु का दुग्ध उत्पादन बढता है। (१६) पशु के ब्याने के तुर त बाद ही उसके बच्चे की ओर ध्यान देना चाहिए और गुनगुने पानी मे क्पडा भिगोकर उसके आस, मुह, नाक आदि सारे अगों को पोछ देना चाहिए, तादि वह ठीक से सास ल सके । आमतौर पर गाय मस आदि अपनी जीभ से ही बच्चे को चाटने लगती है और चाट- घाट कर साफ कर देती है, किन्तु यदि पशु बच्चे को न चाटे तो उसके ऊपर थोडा-सा पिसा हुआ नमक छिड़क दें। इस प्रकार पशु उसे तुरत चाटने लग जायेगा। (२०) बच्चे को साफ करने बाद साफ बिछाली बिछा कर बिठा देना चाहिए । अगर बछडा स्वय हो जपनी मां के अयन से लगकर दूध पीने लगे, तो फिर उसे और कुछ खिलाने-पिलाने की आवश्यक्ता नहीं । कि तु यदि वह थन से दूध न पिए, तो पशु को बिना बच्चा लगाए ही दुहने की चेष्टा करें जोर पहली दोहन के इस दूध या खीस मे से थोडा सा बच्चे को अवश्य पिलाए । फिर धीरे धीरे उसे थन से लगाने की कोशिश करें। (२१) जव पशु व्याने के बाद बच्चे को चाटने लगे, तो उसकी जेर पर निगरानी रखने की जरूरत है। जेर आमतौर पर ४% घटे मे बाहर आ जाती है कि तु अगर जेर रुक जाये और उससे बदबूदार स्राव निकलता रहे, तो ऐसी हालत मे फौरन किसी योग्य पशु चिकित्सक या पुराने अनुभवी बुजुर्ग की सहायता लें । आमतौर पर गूजर, ग्वाले व पशु-पालक स्वय गाय को रुकी हुई जेर निकाल मकते हैं, किंतु उनका ढग भद्दा गदा और दोषपूर्ण होता है । पशु चिक्मिर सफाई के साथ और सही ढग से जेर को निकाल देगा । यथा- सम्भव यह काम उमी से कराना चाहिए, जिसे पूरी पूरी जानकारी और अनुभव हो । अनाडी हाथो से जेर निकालना भारी खतरा उठाना है। इस प्रकार मादा पशुओं के गमकाल और प्रसव के समय उनकी पूरी-पूरी सुश्रूषा और देखभाल करनी चाहिए। पशु चिकित्सा सम्बधी प्रारम्भिक ज्ञान पशुओं के विविध रोगो की चिकित्सा सही ढंग से करने के लिए उनकी औषधियां, औषधि निर्माण प्रयोग विधि आदि के विषय में कुछ मूलभूत पातो का ज्ञान होना अति आवश्यक है । इन बातों का मान न होने पर कभी- कभी औषधियां लाभदायक सिद्ध होने की बजाय हानिकारक सिद्ध हो जाती हैं । हम आपकी जानकारी हेतु पशुओ की औषधियों के बारे म आवश्यक बातें संक्षेप मे लिख रहे हैं।
१४७ दवाइयों की किस्मे मानव चिकित्सा विज्ञान की भाति ही आज के युग में पशु चिकित्सा विनान भी बहुत उनति पर चुका है। पशुओ के विभिन रोगो की रोकथाम व चिकित्मा के लिए भी हजारो औषधिया मिक्स्चर, तेल, पलस्तर, इजैक्शन आदि का आविष्कार तथा निर्माण हो चुका है। नीचे पशु चिकित्सा के लिए प्रयुक्त औपधियो की प्रमुख रिस्मो तथा उनके प्रयोग करने की विधिया अक्ति की जा रही हैं। औषधियों की सेवन विधियो को दृष्टिगत रखते हुए उहें मुख्य रूप से ५ वर्गों में विभक्त किया जा रहा है (१) खिलाई जाने वाली औषधिया--यपा चूण गोलिया रोटी अथवा गुड यादि मे मिलाकर पशुओ को खिलाई जाती हैं। (२) पिलाई जाने वाली औषधिया-यथा काढे, तेल आदि जो ढरका, नली आदि द्वारा तरल औषधि के रूप मे पिलाई जाती है । दवाइयो के मिक्स्चर भी इसी में आते हैं। (३) बाह्य प्रयोग की औषधिया--मलहम, पलस्तर, घावो आदि पर लगाई या चुपडे जाने वाले तेल, ऊपर से बुरके या छिडये जाने वाले औषधीय चूण, धूनी अथवा भाप द्वारा बाह्म उपचार के लिए प्रयुक्त औपधियां आदि इस धग में आती हैं। (४) डूश अथवा एनिमा द्वारा प्रयुक्त औपधिया-पशु के योनि माग से पिचकारी द्वारा अदर दया पहुचाना डूश करना कहलाता है और गुदा माग से दवा पहुचाना एनिमा या हकना देना कहलाता है । इस प्रकार प्रयोग की जाने वाली औषधिया इस वग मे याती हैं । (५) इजक्शन अर्थात सुई द्वारा प्रयोग की जाने वाली औषधिया-ये औषधिया अनेक उपयोगी औषधियों का सार खीचकर तैयार की जाती हैं और इजक्शन द्वारा शरीर की आंतरिक नसो या रक्त में सीधी पहुचाई जाती हैं, ताकि वे शीघ्रातिशीघ्र अपना प्रभाव दिखा सकें। यही कारण है कि मानव रोगो मे तथा पशु रोगों में भी इजैक्शन-चिकित्सा प्रणाली अधिक प्रचलित हो १४८ गई हैं, यद्यपि इस प्रणाली से एक रोग तो तत्काल दब जाता है किन्तु बाद में कभी कभी अ य विकार उत्पन्न हो जाते हैं। फिर भी रोग की तत्क्षण रोकथ और तात्कालिक प्रभावकारी होने के कारण अधिकतर लोग इसी को अच समझते हैं। १ खिलाई जाने वाली औषधिया जैसा पहले बताया जा चुका है, औषधियो के चूण, गोलियां आदि । वग मे आती हैं । इन दवाओ को खरल, ओखली अथवा सिलबट्टे पर कूट-पी कर बारीक चूर्ण बना लिया जाता है और फिर किसी झीने कपडे अथवा मारी छलनी से छानकर चूण तैयार कर लिया जाता है। कि तु इस बात का विशे ध्यान रखें कि यदि उनमे कोई विपली दवा हो तो खरल, मोखली अथ सिलबट्टे, छलनी आदि को बाद मे अच्छी तरह साफ कर लें। ऐसा न हो। विपली दवा का तनिक भी अश या प्रभाव उनमे रह जाए और बाद मे उन मे आप अपने घर की चीजें कूटें, पीसें तो वे विषाक्त हो जायें। साथ ही य भी जान लें कि ऐसी विषाक्त औषधिया मुह मे जीम, तासु आदि में लग जा से मुह मे घाव उत्पन्न कर देती हैं । ऐसी तेज दवाए आटे मे दबाकर रोट सेककर अथवा गुड के गोले के अन्दर सपेटकर पशुओ को खिलाई जाती हैं पई साधारण औषधियो के घूण यो ही हाथ से पशु चुकी जीभ पर परकर पट दिए जाते हैं, बशर्ते कि उनका स्वाद कडवा न हो। कई दवाओं के घूण पशु । धारे दाने पर छिडक दिए जाते हैं । पशु पारे-दाने के साथ रहें सा जाता है इस प्रकार भिन भिन प्रकार की खिलाई जाने वाली औषधियां भिन्न भिन्न ढगों से पशुओं को खिलाई जाती हैं जिनके बारे मे पहले औषधियो रे साथ ही सेवन विधि भी अकित है। २ पिलाई जाने वाली औषधिया द्रव, घोल, मिक्स्चर पहा, तेल आदि के रूप में जो तरल औपथियो इस गये विविध रोगो म पशु वो सेवन कराई जाती त आती हैं । इन तरल औपपियो म तेल, शवद, होत हैं और रहें सी ही बांस की नली (४ १४६ । - है, किन्तु कुछ दवाइया पानी अथवा अय क्सिी द्रव पदाथ मे पोलकर दी जाती हैं। कुछ औषधियां ऐसी भी होती हैं, जो आसानी से पानी मे नही घुलती। उन्हें गरम पानी में घोलकर तैयार किया जाता है। जो गरम पानी में भी नही घुलतीं, उहें पानी के साथ उबालकर और चौथाई पानी रह जाने पर छानकर काढे के रूप मे उनका प्रयोग किया जाता है। बहुत्-सीदवाए एवं निर्धारित समय तक पानी मे भिगोये रखकर अथवा सहाकर भी दव रूप मे तैयार की जाती हैं । ये दवाए, यदि पशु स्वत अपनी रुचि स पो से तो पहले क्सिी चौडे मुह के बतन में रखकर उसे अपनी इच्छा से ही पीने देना चाहिए। किन्तु जब पशु अपनी इच्छा से न पिए, तो ढरके द्वारा पिलाना चाहिए । टोन अपवा शीशे की मजबून शीशी अथवा नली द्वारा भी पिलाई जा सकती है। ढरके द्वारा पिलाने की सही विधि ढरपे अथवा बास की नली द्वारा पशु को दवा पिलाने का ठीक-ठीक तरीका यह है कि आप पशु के बाइ ओर खडे होकर बायें हाथ से उसका मुह पकहकर और खोलकर सावधानी से ढरका उसके मुह मे जबाटो के बीच रख दें और ढरके मे भरी हुई दवा धीरे धीरे उठेलपर उसे पिलायें। दवा पिलाते समय सावधानी से काम लें, ताकि दवा नथुने मे न जाने पाये। यदि दवा पिलाते समय पशु को खांसी उठती प्रतीत हो, तो तत्काल उसका मुह छोड दें और ढरफा बाहर निकाल लें। अयथा दवा के सास की नली में चले जाने की आशका है और उससे पशु का दम घुट सक्ता है । अगर पशु को खासी अथवा गरमी अधिक हो, तो उसे चटनी के रूप मे चटाई जाने वाली या खिलाई जाने वाली दवाए ही देना अच्छा है। (क) पावो आदि पर बुरकी या छिडकी जाने वाली चूण रूप औषधिया जो खिलाये जाने वाली घूण औषधियो की भाति ही ओखली, परल या सिल- चट्टे मे कूट-पीस व छानकर तैयार की जाती हैं, इही मे प्राय विषैले पदार्थ होते हैं । इसलिए इहें तैयार करते समय विशेष सावधानी बरतें । इनके प्रयोग करने की विधि यह है कि जिस घाव पर दवा बुरकनी हो, उसे पहने रुई के फाहे से साफ करके हाथ की चुटकी अथवा रुई से उस पर दवा छिडक दें। पदि 4 ते चुपड कर बुरकना बनाया गया हो, तो तेल भी घुपट दें। ऊपर स रई रखकर पट्टी आदि बाप दें, ताकि पाव पर धूल, मिट्टी आदि न लगे। (ख) द्रव अथवा लेल के रूप में चुपडी जाने वाली वाह्य प्रयाग की औष- धिया पानी अथवा तेल में घोलकर तैयार की जाती हैं और दवा के अपन गुणो अनुसार भिन भिन तरीको से प्रयोग की जाती हैं। क्योकि उनम बहुत से दवाए शीघ्र ही उडने वाली (Volatule) हाती हैं, कुछ शीघ्र ही आग पकड वाली (Inflammable) होती हैं। यदि ऐसी दवाओं को गरम करने के यावश्यक्ता हो, तो बहुत सतकतापूर्वक गरम करनी चाहिए । उहें आग से दू रखें। बहुत हल्की आंच पर दूर रखते हुए गरम करें, ऐमी दवाइया प्राय पतली लकडी की लम्बी तीली के एक सिरे पर रुई लपेट कर फरेरी बना र्ल जाती है। उस फुरेरी द्वारा घाव आदि पर लगाई जाती हैं। यदि गुदा, योनि अथवा गले, नाक, कान आदि के भीतरी भाग मे दवा लगानी हो तो फुरेरी द्वारा अथवा स्प्रे (Spray) द्वारा लगाई जाती है। स्प्रे एक प्रकार का फुहारा होता है, जिससे दवा की बारीक फुहार-सी निकलती है । इस यत्र का प्रयोग आमतौर पर पशु चिकित्सालयो मे ही होता है । (ग) बाह्य प्रयोग की बहुत सी दवायें मलहम के रूप मे तयार की जाती हैं, जो औषधियों के चण को चीं, तेल, मोम, वैसलीन, मक्खन आदि में फेंटकर तैयार की जाती हैं। ये पदाथ मलहम का आधार (Base) कहलाते हैं । मलहम लगाने की विधि यह है कि जिस घाव आदि पर मलहम लगाना हो, उसे पहले रुई तथा कीटाणुनाशक औषधि (Antiseptic) से साफ कर लें। फिर एक साफ कपड़े का टुक्ता काटकर उस पर उक्त मलहम का लेप करें और उसे पशु के घाय पर सावधानी से चिपका दें तथा ऊपर से रुई रखकर बांध दें। कुछ मलहम ऐसे भी होते हैं, जो लगाकर खूब मले जाते हैं, तब उनका प्रभाव अदर तक पहुंचता है । उनका प्रयोग करते समय यह ध्यान रखें कि बालो के रुख की और को मालिश करें। विपरीत दिशा में मालिश करने से बालतोड होने की सम्भावना रहती है। दवाइया बनाने वाले कारखानों से बाजरल विविध मलहम कपडे की पट्टियों पर चिपके पलस्तर के रूप मे आते हैं। उहें काटकर ज्यो का त्यों अथवा हल्की आच दिखाकर घाव पर चिपका दिया जाता है । इसके अतिरिक्त बाह्य उपचार के अन्तगत अनेक ऐसी औषधिया भी होती है, जो न तो लगाई जाती हैं और न छिडकी जाती हैं, बल्कि उनकी धूनी (धुआं) अथवा भाप दी जाती है, ताकि उनके सेंक द्वारा लाभ पहुचे जथवा उनका धुआ राग के कीटा- णुओ को नष्ट कर दे । इसकी विधिया इस प्रकार हैं- यदि धूनी देनी हो तो किसी मिट्टी की हाडी मे आग रखें और उसमे दवा डालकर हडिया का मुह किसी ऐसे ढक्कन से ढक दें, जिसमे एक छोटा-सा छेद हो । उस छेद मे से हाडी के अदर का धुआ निक्ले । अव सावधानी से उस छेन के मुह पर रबड अथवा हुक्के आदि की नली रखकर उम नली द्वारा धुआ सीधा पशु के उसी अग पर लगायें, जहा धुआ देना हो। शेप भाग का बचाव रखें । यदि भाप देनी हो, तो इस प्रकार हाडी मे पानी के साथ दवा उबालें और जब खोलने लगे, तो उसी प्रकार छेद पर नली लगाकर धुए की भाति ही भाप भी सीधी अभीष्ट अग पर लगाए । कि तु ध्यान रहे भाप या धूनी बन्द स्थान पर देनी चाहिए, जहा हवा सीधी न आती हो। अगर भाप या धूनी सांस द्वारा मान्तरिक भाग म पहुचानी अभीष्ट हो, तो पशु की नाक धुए अथवा भाप के पास ले जाए, ताकि वह सास के साथ अन्दर जा सके। किन्तु उस दशा मे पशु की आखों पर क्स कर पट्टी बांध दें क्योकि किसी किमी दवा का धुआं पा भाप आंखों के लिए हानिकारक होता है। पशु की भाप अथवा धूनी द्वारा चिकित्सा करने वाले व्यक्ति को अपनी आख, नाक आदि का भी पूरा बचाव डूश अथवा एनिमा द्वारा प्रयुक्त दवाए डूश अथवा एनिमा पेट के अदरूनी भाग, आतो आदि की सफाई के लिए दिया जाता है। जैसा पहले बताया जा चुका है, हुश क्रिया पशु की मूत्र यानि में उसके अतिरिक भाग मूत्राशय, मूत्रननी आदि की सफाई के लिए की जाती है और एनिमा या हरना गुदामाग द्वारा पेट, आंतो तथा मलाशय आदि की सफाई के लिए दिया जाता है। इन क्रियाओ के लिए पहले निम्नलिखित उपादान तैयार कर लें- रखना चाहिए। - १५२ (१) लगभग ८१० लिटर पानी में नीम की हरी पोपलें डालकर सूब उम्र लें और फिर उस पानी वा छानकर ठण्डा करके रख लें। अथवा सादा पानी उबाल कर ठडा होने पर उसमे लाल दवा (Potassium Permangnate) डालकर अच्छी तरह धोनकर रख लें। (२) रबड की नली लें। यदि रबड की नली न हो, तो पतले बास की नली दोनो सिरोपर चिक्नी छीलकर नली तैयार कर लें अथवा पपीते की पोली टहनी या प्याज की नली भी काम म ली जा सकती है । यह नली लग भग आधा इच मोटी और २३ हाथ लम्बी हो। (३) लालटेन मे तेल भरने वाली एक कुप्पी (टीप), जिसका ऊपर का मुह चोडा हाता है और नीचे पतली सी नली होती है, ले ले । अथवा एक चौडे मुह वाली चिलम अथवा मुसलमानी बदना भी प्रयोग किया जा सकता है इसमे नीचे की ओर उक्त रबड की नली या बास, पपीता या प्याज की नली इस प्रकार लगा दें कि उसके आस पास खुला स्थान न रहे और नली उसमे से जल्दी निकन भी न सके । (४) एक छोटी मशक या टोपीदार वल्टी अथवा गगासागर लें, जो उस टीप मे धार बांधार दवा मिला पानी डालने के काम आ सके। उक्त सब वस्तुए तैमार करने के पश्चात पशु की पिछली दोनो टाँगें इस प्रकार बोध दें कि वह अधिक हिल-डुल न सके। फिर नली फो नीम के तेल या कपूर मिले तिल के तेल से चुपटकर नीचे वाला सिरा पशु की गुदा अथवा योनि के अदर लगभग एक बालिश्त धीरे धीरे पुसे । नली का दूसरा सिरा टीप या चिलम के साथ जुड़ा है, उस टीप मे गगासागर या बाल्टी द्वारा धार बाधकर दवायुक्त पानी डालें। पानी डालने वाला बर्तन पशु से काफी ऊचा रखें, ताकि पानी आसानी से मदर जा सके । उस समय पशु का इधर उधर न हटने दें। जब इस प्रकार से काफी पानी अदर पना जायेगा, तो पशु उसे निकालने के लिए जोर लगायेगा, फिन्तु उस समय क्सकर दवायें रखें। एक-दो मिनट तक पानी को अदर रोके रहने के पश्चात् छोर हैं और नली बाहर में। पानी निकलना शुरू हो जायेगा और उसरे साप ही अन्दर या जमा - .
हुना मल, कोडे आदि सब बाहर आ जायेंगे। इस क्रिया को २-३ दिन नित्य करने से शरीर के आतरिक अवयवो को पूरी तरह सफाई हो जाती है । ५- इजंक्शन या टीके लगाना जिस प्रकार चेचक, प्लेग, हैजा आदि छूत की महामारियों के लिए इज- क्शन आविष्कृत हो चुके हैं, वैसे ही आज के इस वज्ञानिक युग मे पशुओ के भी विविध रोगा और विशेषकर छून के रोगो के लिए एक से एक उत्तम इजक्शन तथा टीके तैयार हो चुके हैं। किन्तु इजैक्शन हर अनाडी व्यक्ति न तो ठीक से लगा ही सकता है और न ही उसे लगाने की चेष्टा करनी चाहिए। इजक्शन हमेशा कुशल डाक्टर से ही लगवाने चाहिए। क्योंकि गलत ढग से या गलत स्थान पर इजंक्शन लगा देने से पशु की तत्काल मत्यु हो सकती है । पशु- चिकित्सालय में ले जाकर अथवा पशुओ के डाक्टर को घर पर बुलाकर ही इजक्शन लगवाना चाहिए । डाक्टर न हो, तो कम्पाउण्डर भी इजक्शन लगा सकता है। कि तु स्वय अथवा किसी नाडी व्यक्ति द्वारा इजैक्शन हरगिज नही लगवाना चाहिए। मिन भिन्न प्रकार की औषधियो का यथावसर भिन्न ढगों से प्रयोग किया जाता है । इस बात का ज्ञान प्रत्येक पशु-पालक को होना चाहिए। औषधियों की मात्रा या खुराक विविध औषधियो की मात्रा के विषय में कुछ मूलभूत बाता को समझ लेना नितात आवश्यक है । क्योकि एक दवा यदि उचित मात्रा से अधिक दे दी जाये, तो वह लाभदायक होने की अपेक्षा हानिकारक सिद्ध होगी और यदि उचित मात्रा से कम दी जायेगी, तो अपेरि समय मै पूरा पूरा लाभ प्रदान नही कर सकेगी। मनुष्य के लिए तो औषधियों की मात्रा प्राय आयु-भेद के आधार पर ही निर्धारित की जाती है। कुछ विशेष रोगो अथवा ददाओ में ही शरीर का बलाबल अथवा अन्य बातों का विचार किया जाता है । किन्तु पशुओं के लिए औषधि को मात्रा निश्चित करने मे आयु भेद के अतिरिक्त जाति-भेद, आकार, वजन-भेद आदि का भी ध्यान रखना पड़ता है, क्योंकि एक ही आयु के हाथो और बकरी के शरीर भार व आकार में बहुत अन्तर होता है। इसी - लिए दोनों के लिए समान औषधि मात्रा नही निश्चित की जा सकती । बकरी की अपेक्षा हाथी के लिए आठ गुनी मात्रा दरवार होगी। पहले प्रारणो मे जहा पशुओ के विविध रागो की चिकित्सा वणित की गई है, वहा औषधियो की मात्रा भी दी गई है। कि तु वह मात्रा पूरे कद के एक प्रौढ पशु के लिए समझनी चाहिए । कम आयु के पशुओ को उनकी आयु के अनुसार मात्रा कम कर देनी चाहिए । तदनुसार सांड अथवा हाथी जसे विशालकाय पशुओं के लिए जिनका शरीर भार व आकार सामाय पशुओ से बढकर हाता है, ओषधि की मात्रा बढापर देनी चाहिए। विविध पशु रोग व उनकी चिकित्सा मनुष्य जाति की भाति हो पअशुओ में भी अगणित रोग पाये जाते हैं जिन मे से कुछ रोग सूक्ष्म कीटाणुओ द्वारा उत्पन होते हैं और सबसे अधिक भय- कर होते हैं। दूसरे कुछ रोग जीवाणुओं द्वारा अथवा फफूद द्वारा उत्पन होते हैं । ये रोग भी यद्यपि भयर होते हैं, तथापि समुचित इलाज द्वारा शीघ्र ही नियत्रण में जा जाते हैं, किन्तु यदि उपयुक्त समय पर समुचित चिकित्सा व्यवस्था न हो, तो ये भी पशु जीवन के लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं । अन्य रोगों मे कुछ। रोग शरीर मे किसी तत्त्व विशेष अथवा पोषक तत्वों के अभाव मे स्थानीय जलवायु के दूपण आदि से उत्पन हो जाते हैं, तो कुछ गेग परजीवी रोग होते हैं जो दूसरे कोडो, कृमियो या मच्छर मक्खियो द्वारा उत्पन कर दिए जाते हैं। इन सबके अधिक विस्तार मे न जाकर हम पशुओं के इन समस्त रोगों को मोटे तौर पर दो मुख्य श्रेणिया में विभक्त कर सकते हैं (१) छूत के राग (Contagious or Infectious diseases), (२) सामाय रोग या बिना छूत के रोग (Non-contagious diseases), जो रोग किसी भी पशु के शरीर मे उत्पन होकर उसके सम्पक मे माने वाले दूसरे स्वस्थ पशु को भी लग जाते हैं, उहें छूत के रोग महा जाता है । क्योकि ये रोग सूक्ष्म कीटाणुओं अथवा रोग के कीटाणुओं से उत्पन्न होते है और ये सूक्ष्म कीटाणु रोगी पशु की टट्टी, पेशाब, यूक आदि द्वारा हवा मे फैलकर पाओ के शरीर मे सांस द्वारा प्रविष्ट होकर उहें भी तत्काल उस रोग का शिकार बना देते हैं। जिस प्रकार मनुष्यों के रोगों में हैजा, चेचक, ले आदि महामारियां छ्न के भयकर रोग माने जाते हैं और जब-किसी शहर फैलते हैं तो हजारों की संख्या मे मनुष्य प्राणो से हाल धो बैठते हैं, उसी का पशुओ के ये छून के रोग भी जब फलते हैं और उनकी तुरन्त रोकथाम जाये, तो कभी भी सारे गांव के पशुओ को समाप्त कर देते हैं । इन रोगो बीमार पशु की चिकित्सा के साथ साथ सबसे पहले उसके कीटाणुओ को फैलने देने तथा अय पशुओ को उसकी छूत लगने से बचाने का भरसक प्रया करना चाहिए । पशुओं के छूत रोगों को फैलने से रोकथाम करने के लिए आ कुछ विशेष नियम तथा हिदायतें लिखी गई हैं, जिनका पालन करने से आ अपने तथा गाव के अय स्वस्थ पशुओ की रक्षा कर सकेंगे। दूसरे वग के सामाय राग, जो बिना छूत के रोग कहलाते हैं, इतने खत नाक नही होते । फिर भी एक बात का तो हमेशा ध्यान रखिए कि चाहे बीमार पशु को छूत का रोग हो, अथवा बिना छूत का, बीमार पशु का बचा हुआ पारा दाना अय स्वस्थ पशुओं को कभी नही खिलाना चाहिए। प्रथम तो बीमार पशु को चारा दाना दीजिए ही उतना कि बचे नहीं । यदि बच जाये, तो उसे फेंक या जला डालना चाहिए । इसी प्रकार बीमार पशु का जूठा पानी आदि भी अय पशुओ को नही पिलाना चाहिए, क्योंकि इस प्रकार प्राय एक पशु के रोग के कीटाणु दूसरे पशु के पेट मे चले जाते हैं । छूत वाले रोग यो तो विश्व मे असख्य प्रकार के छूत रोग पशुओ मे फैलते रहते हैं, जो प्रत्येक देश की जलवायु के अनुसार भिनता लिए हुए होते हैं, किन्तु उनमे से कुछ रोग ऐसे हैं, जो सब देशो के पशुओ में पाए जाते हैं। हमारे देश भारत के पशुओं में जो छूत रोग आमतौर पर फैलते हैं, उनका वणन यहा हम कर रहे हैं । इनमें प्रमुख राग ये हैं- (१) माता रोग-जिसे अग्रेजी म रिंढरपस्ट (Rurderpest) कहते हैं। (२) विष ज्वर या जहरी बुखार-बिसे अग्रेजी म एन्यरेक्स (Anthrax) कहते हैं।
१५६ (३) लगडा ज्वर-जिसे अग्नेजी ग्लैक क्वाटर (Black Quarter) कहते हैं। (४) गलघोटू रोग-जिसे अंग्रेजी मे हेमरजिक सेप्टोसिमिया (Haemrrhagic Septicima or Malignant Soar throat) कहते हैं। (५) पशुओ का क्षय रोग (तपेदिक) जिसे अंग्रेजी में टयूबरकुलोसिस (Tube culosis) कहते हैं । (6) फेफडे का स्वर - (निमोनिया) जिसे अंग्रेजी मे प्लूरोनिमोनिया (Contagrous Pleuro pneumonia) कहते हैं। (७) खुर-पका मुह पका रोग-- {foot movrb disease) (5) सूखा रोग-(John's disease) छून के उक्त आठ पशु रोग भयकर माने गए हैं, क्योंकि ये रोग इतनी तेजी से बढ़ते हैं कि एक-दो दिन का चिकित्सा विलम्ब भी इनके जीवन के लिए घातक सिद्ध होता है। दूसरे ये अय पशुओ मे भी तेजी से फैलते हैं। इनके अलावा छूत के कुछ अय रोग भी हैं, जो अपेक्षाकृत कम भयकर हैं और समुचित किक्मिा से शोघ्र ही नियत्रण में आ जाते हैं। वे इस प्रकार (६) छूत के कारण गमपात हो जाना-(Contagions Abortion) (१०) छूत के कारण खूनी पेशाब आना--(Red Water) (११) दूध का बर-(Milk Fever) (१२) चेचक-(Cow pox) (१३) गज धर्म या मैज-(Mange) (१४) सजली-(Khujb) (१५) दाद या रिंगवम -(Ringworm) (१६) पोडों-मकोड़ों में दुम्यल, मूबे या मनिया फूटना-(Warble fates) (१७)ज पंदा हो जाना—(Lice) ट्रा रे इन रोगों में प्रथम माठ भरपर रोगा को तो पेयल ऐनापथिर रा ही ठीर पिया जा सकता है। यदि सभी आपरे पास उनमें १५७ से कोई रोग हो जाये, तो शीघ्र ही निक्ट के पशु चिकित्सालय मे ले जाकर दिखाना चाहिए। हा, प्रारम्भिक अवस्था मे ही यदि समुचित ढग से देशी इलाज भी किया जाये, तो पशु ठीक हो सकता है। किंतु अधिक विश्वसनीय इलाज इजैक्शन ही हैं। शेष नौ प्रकार क अय छूत रोग इतने भयकर नही । हा, अय पशुओ का इनसे भी बचाव करना आवश्यक है । ये रोग देशी इलाज द्वारा भी ठीक हो जाते हैं और ऐलोपैथिक दवाइयो द्वारा भी । हर हालत मे आप पशु को निकट के पशु-चिकित्सालय मे ले जाए। वहां सरकारी डाक्टर तया इजक्शन तैयार रहते हैं। पशु को समय पर डाक्टरी सहायता मिलने से उसे बचाया जा सकता है। अब जैसा हमने पहले लिखा है, छूत की बीमारियों से प्रसित पशु की चिकित्सा पर जितना ध्यान दिया जाना चाहिए, उतना ही अय स्वस्थ पशुओ को छूत लगने से बचाने पर ध्यान देना आवश्यक है । सबसे पहले हम छूत की रोकथाम के लिए आवश्यक नियम तथा हिदायतें लिख रहे हैं, जिन पर आशा है, आप पूरा-पूरा ध्यान देंगे य यथासमय उनका पालन करेंगे। छूत रोगो को रोकथाम के उपाय छूत के रोग सूक्ष्म कीटाणुओ द्वारा फैलते हैं । ये कीटाणु इतने सूक्ष्म होते हैं कि एक सुई की नोक पर हजारो की संख्या मे बैठ सकते हैं। मनुष्य की आखें दूरबीन की सहायता के बिना इह नहीं देख सकती। साथ ही इनकी एक विशेषता यह भी है कि इनकी संख्या बहुत तेजी से बढ़ती है । एक ही दिन मे १ से १००० अथवा इससे भी अधिक हो जाते हैं। अब आप स्वत समझ सकते हैं कि इतने सूक्ष्म कीटाणु तो वायु द्वारा ही क्तिनी तेजी से फैल सकते हैं। फिर स्पा, गोवर, मूत्र, जूठा पारा, जूठा पानी, यूक, लार तया टहल करने वाले व्यक्ति के माध्यम से इहें अन्य पशुओ तर पहुंचने में विशेष सहायता मिलती है। यही कारण है कि एक बार किसी पशु को छूत का कोई रोग हो भर जाये हि विना विशेष स्तर पर कारवाई रिए यह उस क्षेत्र में फैलता ही जाता है और हजारो की सस्या मे पा उसके शिकार हो जाते हैं। अस्तु जैसे ही किसी पशु मे छूत का कोई भयवर रोग उत्पन हो, अपने गांव १५८ आस-पास के गावों तथा अपने क्षेत्र के पशु-चिकित्सालय के डाक्टर को तुरन्त इसकी सूचना दे देनी चाहिए । साथ ही उसकी रोकथाम के लिए सतकतापूर्वक चेष्टा करनी चाहिए। ग्रामीण भाइयो के लिए एक हितकारी राय गाव के लोगो का सबसे बहुमूल्य धन पशु धन ही है। क्योकि पशुओ पर ही उनकी खेती बाडी निमर करती है और पशुओ से ही उहे दूध, दही, घी आदि पौष्टिक पदाथ प्राप्त होते हैं। साथ ही कृषि उत्पादन और दुग्ध उत्पादन की बिक्री से ही उनके परिवार की अय आवश्यकताए पूरी होती हैं । पशु धन की रक्षा, उसका विकास ग्रामीण जनता की समृद्धि का एक प्रमुख सोपान है। इसी बात को दृष्टिगत रखते हुए हम अपने देश के ग्रामीण भाइयो को एक उत्तम सलाह देना चाहते हैं, जो उनके लिए परम हितकारी सिद्ध हो सकती आज भारत स्वतत्र राष्ट्र है । देश के कोने-कोने मे आपका अपना ही राज्य है। प्रत्येक गाव मे ग्राम-पचायतें तथा ग्राम विकास खड बने हुए हैं, जिनके द्वारा आप लोग अपना, अपने गाव का और सारे राष्ट्र का नव निर्माण कर सकते हैं । आवश्यक्ता केवल इस बात की है कि प्रत्येक बात के लिए आप सरकार के मुखापेक्षी न रहें, वरन मिल जुल कर अपनी समस्याओ का समा- धान करें, अपने विकास के लिए साधन जुटाएं और फिर सरकार से जा सहा. यता अपेक्षित हो, उसे प्राप्त करके उन कार्यों को पूरा करें । यहा हम पशु धन की रक्षा विषयक एक श्रेष्ठ तथा उपयोगी योजना आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं । आशा है कि आप सब मिलकर उस पर विचार करेंगे। योजना इस प्रकार है कि प्रत्येक गांव के निवासी मिल-जुल कर अपने- अपने गाव मे रोगी पशुओं की देख भाल, रख रखाव आदि के लिए गाव से बाहर एक ऐसी आदश व सामूहिक पशु शाला का निर्माण करें, जहां गाव भर के रोगी पशुओ को रोग प्रसार के दिनों में रखा जा सके, ताकि अप स्वस्थ पतु उन रोगों को लपेट से [वचे रहें और रोगी पशुओं की भी समुचित रूप से देख भाल, चिकित्सा आदि हो सके । ।
१५६ पशुओ को महासक्रामक महामारिया व इलाज माता रोग रोग के लक्षण तथा अवधि-किसी स्वस्थ पशु को इस रोग को छूत लगने के बाद उममे छह दिन के भीतर रोग के लक्षण प्रकट होने लगते हैं। सबसे पहले पशु को तेज ज्वर चढता है, जिसमे १०४ डि फा से १०६ डि फा तक तापमान हो जाता है, जो ४८ घटे म अपनी चरम सीमा पर पहुच जाता है । उस समय पशु अत्यधिक सुस्त होकर थर थर कापता है, रोगटे खडे हो जाते हैं, आखो की पुतलिया सिकुड जाती हैं, आँखो मे पानी छलछलाया होता है, नाक के नथुनो पर खुश्की छा जाती है, पीठ अकड कर कमानी की भाति मुड जाती है, चारा दाना खाना तथा जुगाली करना बद कर देता है, पेट में कब्ज हो जाती है । एक दो दिन के पश्चात पशु पतला गाबर फकने लगता है, फिर उसमे आव आने लगती है, कभी कभी खून के कतरे भी आते हैं । यह गोवर बहुत बदबूदार होता है। प्यास अधिक लगती है, पशु दात पीसता है, पटठे ऐंठने लगते हैं, कान तथा गदन लटक जाती है, नाडी की गति ७० से १०० प्रति मिनट तक होती है, आखा से पानी तथा कीचड बहने लगता है और पशु की दशा बडी शोचनीय हो जाती है । देशी इलाज (१) सुप्रसिद्ध पशु चिकित्सक डा० थैकर साहब का यह कई बार का अनु भूत प्रयोग है। योग इस प्रकार है- कपूर ६ माशा, शोरा ६ माशा, धतूरे के बीजो का बारीक चूण ३ माशा, चिरायता ३ माशा, देशी शराब १० तोला यानी आघा पाव । पहले कपूर को शराब मे घोल लें, फिर अन्य दवाओं को उसमे घोल लें और पशु को पिला । माता रोग के कीटाणुओ को नष्ट करने में प्रभावकारी है । (२) हिना की पत्ती २ तोला, नीम के फूल ३ तोला, चिरायता १ तोला --सवको पानी मे पकाकर छान लें और नमक मिलाकर पशु को पिलाए। (३) धतूरे के बीज ३ माशा, दारू हल्दी १ तोला, चोब चीनी १ तोल, सोंठ ६ माशा, फेन चिसहर २ माशा, उन्नाब २ तोला-सबको आधा पानी मे पकाए। जव आधा रह जाये, तो ठण्डा करके उसमे २ तोला कलमी शोरा पीसकर मिला दें और पशु को पिलाए । (४) बबूल की पत्ती ८ तोला, क्त्या ३ तोला, चूना ६ माशा- सबको पीसकर १२ तोला देसी शराब और आधा सेर पानी में मिलाकर पशू को पिलाए । (५) चूने का पानी आधा सेर, अभीम ३ माशा, बबूल की गोद आधा पाव, चूने के पानी मे गोद और अफीम को अच्छी तरह घोल लें। जब दोनो पूरी तरह से घुल जाए तो उसकी बराबर-बराबर की तीन खुराकें बना लें और ४.४ घटे के अन्तर से पशु को तीनो खुराके एक ही दिन मे पिला दें। (६) चूकि इस राग मे पशु के शरीर मे इस रोग का विष अथवा कीटाणु फैल जाते हैं, उसे निकालने के लिए पशु को जुलाव देकर २४ दस्त करा देना लाभदायक है, किन्तु यह इलाज रोग को प्रारम्भिक अवस्था मे ही प्रभावकारी सिद्ध हो सकता है। रोग को रोकथाम के लिए उपाय (१) छून के रोगों की रोकथाम के लिए पूर्वोक्त सभी नियमों व हिदायतो का पूरी तरह पालन करें। (२) माता निरोधक टीके लगवा दें। सर्वोत्तम है। (३) अपने स्वस्थ पशुओ को बीमार पशु अथवा अन्य स्थानो के पशुआ से अलग रखें । जब आस पास कहीं भी किसी पशु को यह रोग हो गया हो, तो अपने पशुओ को प्रतिदिन महुए मे फूल खिलाए । महुए मे फूल पशु के शरीर मे मातारोग की निरोधक शक्ति उत्पन्न कर देते हैं और वे छूत से बचे रहते हैं। (४) माता निकलने से पूर्व तीन दिन तक पशु को २०२५ समल के बीज प्रतिदिन चार घंटे के अतर से खिलायें । (५) गल दवा युक्त पानी पशु को पिलायें अपवा उबाल कर ठण्डा रिया हमा पानी पिलायें। (६) रोगी पशु को तत्काल अय स्वस्थ पशुओं से पृषक जगल में ले जाकर - - रखें अथवा गाव से बाहर किसी बाडे आदि में रखें। (७) टहल करने वाले व्यक्ति को चाहिए कि बीमार पशु की टहल करने के बाद जब तक स्वय नीम के गरम पानी अथवा साबुन आदि से अच्छी तरह नहा न ले और अपने कपडो को भी खोलते पानी मे डालकर धो न ले, तब तर माय स्वस्थ पशुओ के पाम न जाए। (८) यदि पशु मर जाए, तो उसे या तो जला दें अथवा भूमि मे गहरा गड्ढा खोदकर गड दें। उसकी खाल न उतारने दें। विष ज्वर या बावला रोग भयनाम -विष ज्वर भी पशुओ का एक भयकर सक्रामक रोग है जिसे हमारे देश के विभिन्न प्रातो मे ओबरो, खुदरुवा, गिल्टी, गोली, धुडका, चक्कर, भौरा, सेडा, बाबूना, बाद्या, पटा, वेबी तिल्लहा, बोगमा, बेसारी, बावला तथा जहरी बुखार आदि अनेक नामो से जाना जाता है। अग्रेजी में इसे एयरक्स (Anthrax) कहते हैं। यह रोग भी ससार के प्राय सभी देशो के पशुओ में फैलता है । इस रोग के आक्रमण के पश्चात् पशु बहुत जल्दी मर जाते हैं और उ है बचाना मुश्किल हो जाता है । दूसरे छूत का रोग होने के कारण यह अय पशुओ में भी तेजी से फैलता है। यह रोग गौ पशुओं के अतिरिक्त अय पशुओं को भी होता है। रोगोत्पत्ति के कारण-यह रोग भी विशेष प्रकार वे अति सूक्ष्म रोगा- णुओ के रक्त में प्रवेश कर जाने से ही उत्पन्न होता है । इस रोग के कीटाणु भी शीघ्र ही लाखो की सख्या मे बढते हैं । १२ से ४८ घटो के भीतर ही रोग के लक्षण प्रकट होन लगते हैं। छूत का रोग होने के कारण हवा, पानी, जूठे चारे-दाने, मल मूत्र तथा स्पश आदि द्वारा इसके कीटाणु अन्य स्वस्थ पशुओ में बहुत तेजी से फलकर हजारो पशुओ को इस रोग का शिकार बना देते हैं। रोग के लक्षण यदि कोई पशु अचाना मर जाये और उसके मुह, नाक और टट्टी के रास्ते काला खून निक्ला दिखाई दे, तो फौरन समय लेना चाहिए कि वह पशु जहरी बुखार या विष-ज्वर रोग से मरा है । उसके रक्त मे रोग का विष फैल जाने से उसका रंग नीला तथा काला-सा पड़ जाता है । साथ ही खाल का रंग भी तीलापन लिये काला हो जाता है और पशु का मृत शरीर शीघ्र ही सडो लग जाता है। ऐसे पशु के शव तथा उसके मल, मूत्र थूक, लार, जूठा चारा आदि सबको या नो जला दें अथवा गहरा गडढा खोदकर गाड दें। उसके वधने के स्थान पर सूमो क्लई (चूना) आदि छिडक दें ताकि गेग के कीटाणु फैनने न पायें । जब किसी पशु पर इस रोग का आक्रपण होता है, तो प्रारम्भ मे उसे १०६ से १०७ डिग्री तक तेज बुखार चढता है, नाडो की गति म द पड़ जाती हैं, खाल की चमक जाती रहती है, चमडी का रग मटमैला तथा नीला-सा हो जाता है, पशु बडी बेचनी के साथ चक्कर काटता है पीडा से चिल्लाता है, आखो का तेज व चमक जाती रहती है, नाक से सून मिला पानी व मवाद सा बहन लगता है और कभी कभी काले रंग का खून भी निकलना है । साथ ही सिर, गर्दन, छाती पेट, पीछे के पैर आदि सूज जाते हैं और उनमे दुखन होती है । कुछ ही दिन मे पशु अत्यधिक दुवल व क्षीण होकर लडखडान लगता है और इसी प्रकार छटपटाते हुए अत मे मर जाता है । इस रोग मे पशु को पतला दलिया तथा दूध देना चाहिए। यदि पशु खा सके तो मुलायम हरी घास व पत्तिया भी दें। देशी इलाज-(१) शरीर की सूजन को लोहे की गरम करके लाल की हुई सलाखो से दाग देना चाहिए। इसमे भी लाभ होता है और कभी-कभी पशु बच जाता है। (२) ढाई तोला तारपीन का तेल आधा सेर अलसी के नल मे मिलाकर रोगी पशु को पिलाए। (३) दो तोला पिशायल और आधा सेर देमी घी दोनो को मिलाकर गुन गुना कर पशु को पिलाए। यह भी शरीर में फले रोग के कीटाणुओ का मार कर उसे रोगविरोधी शक्ति देता है। घोडो का बोगमा रोग पोहो अथवा हाथियों में जब विष-ज्वर फलता है, तो उसे 'घोडो या बोगमा' नाम से जाना जाता है । इसमे घोडे अपवा हाथी को तेज बुखार में पथ्य साथ शरीर से पसीना बहुत आता है तथा पेट पर सूजन आ जाती है । इनमें बस यही लक्षण प्रकट होते हैं । चिकित्सा - (१) इनके लिए भी एटी ए थरक्स सीरम का टीका ही कार- गर सिद्ध होता है । ऐलोपैथी मे इस रोग का भय कोई इलाज नहीं । (२) चार माशा कार्बोलिक एसिड आधा सेर गुनगुने घी मे मिला कर पिलाना भी लाभदायक होता है। (३) सूजन के स्थान पर लाल गरम लोहे की सलाखो से दगवा देना भी कभी-कभी अति लाभदायक सिद्ध हुआ है। लगडा बुखार अय नाम-अकडा रोग लगडी, चेवडा चिरचरा, गोली, फलसूजा आदि अय नामो से भी यह रोग देश के विभिन भागो में जाना जाता है। रोगोत्पत्ति के कारण--यह रोग एक विशेष प्रकार के कीटाणुओ के चारे- पानी अथवा घाव द्वारा शरीर म प्रवेश कर जाने से उत्पन होता है । प्राय यह रोग जलवायु परिवतन पर हो जाता है । यदि कोई तराई या पहाडी क्षेत्र का पशु मैदानी भाग के क्सिी स्थान पर लाया जाता है, तो वह अक्सर इस रोग का शिकार हो जाता है । साथ ही यह रोग बड़ी आयु के पशुजो की अपेक्षा कम उम्र के पशु को अधिक होता है। रोग के लक्षण-यह भी पशुमो के भयवरतम रोगों में से एक है, क्योकि इस रोग का आक्रमण होने पर अच्छा भला पशु देखते-देखते अकडने लगता है और २४ घंटे के अदर मर जाता है। जैसे ही इस रोग के लक्षण प्रक्ट हो, पोरन पशु चिकित्सालय मे दिखाकर इलाज कराना चाहिए । इस रोग की पहचान के लिए पशु मे निम्नलिखित लक्षण देखे जा सकते हैं-सबसे पहले पशु सुस्त पड़ता है, फिर उसके शरीर के भिन्न भिन मगो में अकहन पंदा होने लगती है। धीरे-धीरे उसका शरीर इस तरह भरह जाता है वह पलने-फिरने में भी विवश हो जाता है । कुछ पंटे बाद पसु गिर पडता है, उसके सिर व कान लटक जाते हैं। कमर, जाधों, गले को लटक्ती साल मादि पर सूजन मा जाती है। इस सूजन को दवाने पर कर-कर की आवाज होती है। फिर सेज युसार घडना है सांस फूलो लगती है। पशु दांत पीमता है, साना पीना पद पर देता है और इमी दगा में पठे-पड़े मर जाता है। लगमा युवार को चिकित्सा देगी इलाज-(१) यदि उपयुक्त समय पर वैस्मीन, पेनिसिली अथवा लंगरी गेषी मीरम के टोर व इजक्शन आदि प्राप्त न हा, तो फौरन ही पशु ये सूजन याले भाग पर चीरा नगारर उसमे नीम का तेन जयवा निम्नांक्ति पपू रादि तेल भर दें। गरीर के जिम जिस भाग मे रोगाणुओ का जोर होता है, उस उस स्थान पर सूजन आ जाती है। सूजन वाले स्थानों मे उक्न कीटाणु नाशर औषधियां भर देने से पशु को रोग रोधी शक्ति प्राप्त होती है। (२) सूजन वाले स्थानो को गरम लोहे की लाल सलाखो से दाग देने से भी कीटाणु मर जाते हैं और पशु फे बचने की आशा हो सकती है। (३) अनुभवी लोगो के कथनानुसार इस रोग में छेदन अर्थात छिदना फराना भी बड़ा प्रमावकारी सिद्ध होता है। छिदना कराने से पशु प्राय बच जाता है। कुछ लोगो का तो मत है कि छिदना से उत्तम इस रोग का अय कोई इलाज है ही नहीं। (४) यदि पशु के शरीर मे सूजन अधिक बढ जाये, फेफडा से खून-मा भरा मालूम दे तथा सास लेने मे पशु को कठिनाई प्रतीत होने लगे तो उसके बचने की बहुत कम आशा रह जाती है। क्यापि उस अवस्था में पहुंचने पर कोई दवा प्रभावकारी सिद्ध नही होती । उस अवस्था से पूर्व ही यदि निम्नलिखित औषधि प्रयोग की जाये, तो अवसर पशु बच जाते हैं। औषषि का योग इस प्रकार है- अलमी वा तेल एक पाय, पिसा हुआ गधक आधा पाव, पिसी हुई सोठ सवा तोला-इन मव दग्यो को आधा सेर पानी में मिलाकर पशु को पिलाए और जब तक पशु का पेट न चलने लगे अर्थात उसे पतले दस्त न होने लगें तब तक हर तीसरे घटे के बाद यही दवा देते रहें। यह दवा एक प्रकार का जुलाब है, जो टट्टी द्वारा पशु के शरीर के अदर का सारा राग विष बाहर निकाल देगा और इस प्रकार पशु बच जायेगा। है अब एक-दो देशी नुस्खे इस रोग को छून अन्य स्वस्थ पशुओ मे न फैलने देने के लिए भी लिखे जा रहे हैं- रोग फलने से रोकने वाली दवा -(१) नमय दम तोला, गधा साढे सात तोला, सोठ सवा तोला-तीनो को पीस कर साढे सात तोला राब मे मिला कर सब स्वस्य पशुओ को चटा दें। इससे उन पशुओ का बचाव रहेगा और उहें इस रोग को छूत लगने का खतरा कम हो जायेगा। दूसरा उपाय यह है कि पानी में घोडा सा कलमी शोरा और घोडासा नमक धोल कर पशुओ को पिलाते रहें ताकि यदि कभी रोग के कीटाणु उनके अदर पहुच भी जाये, ता तत्वाल नष्ट हो जायें। इस प्रकार उक्त दोनो प्रयोग लगडा राधी सीरम उपलब्ध न होने की सूरत में किसी अश तक आप पशु की रक्षा करेंगे। छिदना करने की विधि लगडा बुखार की देशी चिकित्सा के अनगत हमने छिन्ना करना विशेष लाभदायक बताया है । उसकी विधि यहा अक्ति की जा रही है- पशु के गले मे लटकती हुई खाल, जिसे हेलुआ बोलते हैं, म तेज चाकू या छुरी से कोई एक अगुल की चौडाई का छेद खाल के आर-पार कर दें, किन्तु ध्यान रहे कि जिस चाकू या छुरी का प्रयोग करें, उसे पानी में खोलाकर पहले कीटाणु रहित कर लें। फिर ऐसा ही एक और छेत्र पहले छेद से ३-४ अगुल की दूरी पर करें। अब इन दोनो छेदो मे से होकर एक मोटा डोरा या घोडे की पूछ के बालो की साफ डोरी सुए द्वारा पिरोवर दानो सिरो पर मजबूत गाठ लगा दें। कितु यह डोरी अथवा बालो की होरी इतनी ढीली रहे कि उससे कहीं पर भी साल न खिचे--में दबे । अब इन दो पर नीम का तेल, पपूरादि तल चुपट दें, ताकि मक्खिया न बैठें। यह कीटाणुनाशक तेल दिन में कई बार चुपडते रहें । यदि घाव का अगूर ऊचा हो गया हो, तो उस पर पिसा हुआ नीलायोथा बुरक दें। कर्पूरादि तल बनाने की विधि एक तोला कपुर, एक छटाक तारपीन का तेल, पाव भर सरसों का । A - -इन सबको मिलाकर कपूर को तेलो के मिश्रण में भली प्रकार घोल लें यह तेल रोग के कीटाणुओ को भी नष्ट कर देता है और छिदना क घावो पर मक्खियां भी नहीं बैठो देता । लगडा बुखार से मिलते-जुलते अय रोग घातक सूजन-यह रोग भी ब्लव काटर रोग से मिलती जुलती विस्म का ही है जो गो पशुयो तथा भेडाम वच्चा देने के बाद उत्पन्न हो जाता है। भेटो म यह रोग ऊन उतारने, दुम काटन या वधिया करने के बाद क्लोस्ट्री- डियम संप्टीकम नामक जीवाणुओ की छूल पेशियो की कतको में लगने के कारण सूजन उत्पन हो जाने से होता है। इस रोग के लक्षण आदि लगडा बुखार से इतने मिलते जुलते हैं कि अनुसंधान शाला मे जविवीय परख द्वारा ही इनका भेद ज्ञात हो सकता है। चिरित्सा-यदि रोग बढ़ने से पूर्व ही क्लोस्ट्रीडियम संप्टोक्म जीवाणुना की फामलिनीकृत वैक्सीन का टीका लगवा दिया जाये, तो इमसे पशुओ को काफी हद तक रोग से मुक्ति मिल जाती है । बक्सो रोग (Braccy)-यह राग भेडो आदि की घातक सूजन का ही एक भिन रूप है, जो क्लोस्ट्रीडियम संप्टीकम जीवाणुओ के आक्रमण के कारण उत्पन होता है। ये जीवाणु जठराशय म बहुत तेजी के साथ बढ़ते हैं और एक अति घातक विस्म का विप उत्पन कर देते हैं। लक्षण-यह रोग भी अति उग्र रूप होता है। प्राय रोग के लक्षण स्पष्ट रूप से प्रकट होने से पूर्व ही रोगी पशु मर जाता है। भे. तो प्राय भरी हुई अथवा बिल्कुल मरणासन अवस्था में ही पाई जाती हैं। किन्तु फिर भी यदि ध्यानपूर्वक देखा जाये, तो इस रोग मे भेट अथवा अय रोगी पशु के पेट में तेज दद होना, मुह से झाग गिरना, कभी कभी पेचिश होना, लष्मिा झिल्लियो का पीला पड़ जाना आदि लक्षण प्रकट होते हैं। आमतौर पर ४ घटे के अदर-अदर ही इस रोग से ग्रसित पशु मर जाता है। ब्रक्सी रोग से मरे पशु की लाश बहुत जल्दी सड़ने लगती है। आमाशय दीवार पर विशेषकर रोमथिका या प्रथम भामाशय की दीवार के सामान भागो पर इस रोग को सूजन के कारण चकत्ते से पडे दिखाई देत हैं । ये चकत्ते ही इस रोग की पहचान के प्रमुख जाधार हैं । साथ ही आमाशय तथा आंतो की दीवार और अय भीतरी अगो की झिल्ली मे खून जमा हो जाना भी इस रोग का विशेष लक्षण है। चिरित्सा-क्लास्ट्रीडियम संप्टीरम जीवाणुओं की फामलिनीकृत वैक्सीन का टीका ही इस रोग का अब तक ज्ञात प्रभावकारी उपाय है । वैस जब इस रोग पर अनुसंधान शालाआ म और भी खाज तया परीक्षण दिए जा रहे हैं। अवात सक्रमण रोग भेडा मे अवात सक्रमण राग उत्पन करने वाले अवात जीवी जीवाणुओं में सम्भवत क्लास्ट्रीडियम बेल्शीआई विस्म के जीवाणु सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण हैं । इन जीवाणुओ की चार विभिन किस्मे पाई जाती हैं और वे चारो किस्म अलग-अलग तरह का विष उत्पन परती हैं । मलोस्ट्रोडियम वल्शीआई जीवा- णुओ की शेष तीन विस्म अलग-अलग तरह के रोग पैदा करती हैं, जिनका सक्षिप्त वणन नीचे किया जा रहा है। यद्यपि अभी भारत में इन रोगो के मामले स्पष्ट रूप से सामने नहीं आए हैं, तथापि पशु चिकित्सको को ध्यानपूर्वक इनकी खोज करनी चाहिए, क्योकि अय देशो मे य रोग काफी पाए जाते हैं, विशेषकर भेडो मे। मेमनों की पेचिश -यह रोग मेमनो को जान से दस दिन के भीतर होता है । यह क्लोस्ट्रीडियम वल्शीयाई टाइप के जीवाणुओ द्वारा उत्पन्न होता है, जो मम्भवत दूषित दूध द्वारा मेमनो के शरीर मे पहुच जाते हैं और ज्यो-ज्यो ये जीवाणु एक पशु के शरीर से दूसरे पशु के शरीर मे पहुचते जाते हैं, अधिक प्रबल हाते जाते हैं। लक्षण-छूत के इस रोग से प्रभावित मेमने अत्यधिक सुस्त हो जाते हैं और दूध पीना छोड़ देते है। उनके पेट की दीवार कडी हो जाती है और उस मे दद होता है। साथ ही उहें दस्त लग जाते हैं, जिनका रग शुरू में पोला होता है और बाद में चाफ्लेटी सा आने लगता है । अन्तिम दशा मे तो बिल्कुल सनी दस्त आने लगते हैं और दो या तीन दिन म मेमना मर जाता है।
- चिकित्सा-इस रोग मे क्लोस्ट्रीडियम वेल्शीआई टाइप बी ए टी सीर का इजक्शन लगाकर मेम्नो मे कुछ समय के लिए रोगरोधक शक्ति उत्पन्न की जा सकती है। दूसरे यदि भेडो को गर्भावस्था मे ही फामलिनीकृत जीवा णुओ की सम्पूण सवधन सामग्री का टीका लगवा दिया जाये, तो मेमने के शरीर मे जमोपरात स्वत रोगरोधक शक्ति पहुच जाती है और वे इस रोग के आक्रमण से बचे रहते हैं। धनुर्वात या हस्तस्तम्भ रोग (Titanus or Lock Jaw)-यह रोग यो तो सभी पशुओ यहां तक कि मनुष्यों को भी होता है, किन्तु सबसे अधिक घोडो को होता है। इसलिए मूलत यह पोडो का रोग कहलाता है । धनुर्वात रोग (टिटेनस) क्लोस्ट्रीडियम टेलानी नाम जीवाणओ विष का स्नायु- प्रणाली पर कुप्रभाव पड़ने से होता है। ये जीवाण मुख्यत घोट, घाव आदि द्वारा पशुओ तथा मनुष्यो के शरीर में प्रविष्ट हो जाते हैं और फूटे हुए गहर पावों में बढ़ते तथा पनपते रहते हैं। आमतौर पर ये जीवाणु घोडो पी बात मे पाए जाते हैं और लीद के माथ बाहर निकलते रहते हैं । जब कोई पशु या मनुष्य मिर शरीर मे चाट या घाव हो, इन जीवाणुओं से युक्त लीद में सम्पर म आ जाता है, तो पौरन ही ये जीवाणु उस पोट अपचा पाय के जरिये उसरे रक्त में प्रविष्ट हो जाते हैं । इसलिए जब सम्म आदि पर गिरर पिसी व्यक्ति को चोट लग जाती है और खून आ जाता है अपया विसी याहन आदि भी कार में दुपटना हो जाती है, तो सबटर लोग उस व्यक्ति को एहतियात धे तौर पर टिटनस रोधर टोरा सगा देते हैं, क्योंकि यह रोग इतना उप होता है कि यदि घोट आनि सगने पर इस रोग के जीवाणु रक्त में प्रवेश पर जाए और ४ पटे के भीतर ही उसे सन इजशन मगाया जाये, तो टिटनग रोगरे रोगी को पाता पटिन हो जाता है। पशुओं में इस रोग सदा मुछ दिनों से मेर तीन गमाह तग में प्रस्ट होत है जो दम मारहाते है- सन-पोडों में रम रागप्रारम में पान होगा आसों की पनी मागे गेबा जाना पा उगम साधारण नरोगना पंग होना, चेहरे की पेशिया सिकुड जा, फ्लस्वरूप घोडे को चारा चबाने तथा निगलने में कठिनाई महसूस होना, फिर जबडे की पेशिया अकड जाने से मुह का न खुलना आदि लक्षण प्रकट होत हैं । इसीलिए इसे हनुस्तम्भ रोग यानी जबडा न खुलना राग भी कहते हैं। तदुपरा त धीरे धीरे पशु का सारा शरीर ही अकड जाता है। पूछ उठी रहती है और देखने से यह काठ का पाडा सा मालूम होता है । मल मूत्र रुक जात हैं कि तु पसीना खूब आता है । इस रोग मे पशु का तापमान नही बढना। श्वास नलियो की पेशियां लकवा मार जाती हैं और उसे श्वास लेने में कठिनाई होती है । अन्त मे श्वास न ले पाने से ही उसकी मृत्यु हो जाती है । जुगाली करने वाले पशुओ मे इस रोग के लक्षण इतने उग्र नहीं होते। उनका जबडा अकड जाने से वे जुगाली नहीं कर पाते और पेट में अफारा हो जाता है। चिकित्सा तथा नियन्त्रण-इस रोग के प्रारम्भिक लक्षण प्रकट होते ही घोडे के पावो का सावधानी से इलाज करना चाहिए । घावो को दबा दबाकर तथा मदर तक खोलकर उनकी पस, छिछडे आदि साफ कर दें और ऊपर से टिचर आयोडीन अथवा क्लोरीन आदि कीटाणुनाशक दवायें लगा दें। यदि उसके धाव अधिक गहरे फूटे तथा बुरी तरह क्षत-विक्षत हों, तो उसे टिटेनस एल्टी-टॉक्सीन की मात्रा, जो घोडो के लिए १,००० यूनिट की होगी, दे देनी चाहिए। इसके अलावा अ य घोडों तथा पशुओ को फिटकरी द्वारा अवपेपित टोक्साइड का इजक्शन लगा देना चाहिए । जिन क्षेत्रो मे यह रोग पशुओ का होता रहता हो, वहा हरेक पशु को प्रतिवष उक्त टीका लगा देना आवश्यक अगर इस रोग को प्रारम्भिक दशा मे ही पशु को ऐसी दवायें दे दी जायें, जो पेशियो का सकुचन कम करने वाली हो, तो रोग पर नियंत्रण पाया जा सकता है । इस प्रकार के इलाज मे पशु की आंतरिक त्वचा मे मैग्नीशियम सल्फेट के घोल का इजेक्शन लगाना उपयोगी है । पहले १० दिन तक प्रतिदिन दो बार और फिर अगले दस दिन तक प्रतिदिन एक इजैक्शन लगायें। प्रत्येक बार १७० इजंक्शन के लिए १५ औम दवा भरें। वितु मात्र इजैक्शन लगाना ही पर्याप्त नहीं । साथ मे विष के प्रभाव को दूर करने के लिए पशुओ को कोई विष- नाशक औषधि भी खिलानी चाहिए। मुह का लकवा रोग यह रोग विशेष रूप से गो पशुओ को होता है और जिन क्षेत्रो की मिट्टी में फास्फोरस की कमी पाई जाती है और उसकी पूर्ति के लिए पशु हड्डिया खान लगते हैं, वहा यह रोग अधिक होता है। जिन हड्डियों में क्लोस्ट्रीडियम वोट- लीनम टाइप डी जीवाणु अथवा उनका विप उपस्थित रहता है, उन हड्डियो को जब पशु निगल जाता है, तो उस पर इस रोग का आक्रमण हो जाता है। लक्षण-इस रोग का प्रमुख लक्षण यह है कि पेशिया अत्यधिक कमजोर हो जाती हैं, हर समय उसके मुह से लार टपकती रहती है, जीभ, ग्रसनी तथा जवडे को सकवा मार जाता है, जिससे पशु चारा दाना खाने, जुगाली करने और निगलने में असमय हो जाता है। कुछ घण्टे पश्चात पशु बेहोश होकर गिर जाता है और उसी दशा में उसकी मृत्यु हो जाती है। चिकित्सा- इस रोग की कोई विश्वस्त चिकित्सा अभी तर ही खोजी जा सकी । अलबत्ता पशु को खुराक के साथ खनिज चूण खिलाना एक्दम बद कर देना चाहिए और इस बात को सावधानी रखनी चाहिए कि उसे हड्डियां खाने का अवसर न मिले। - पशुओं का क्षय रोग अर्यात् तपेविक यह भी धून का एक रोग है, जो टयूबरक्लि सोलस नामक जीवाणुओ द्वारा उत्पन हाता है। ये जीवाणु शरीर के पिसी भी भाग में आसानी से पहुँच जाते हैं और वहां सेजी से अपनी सख्या बढ़ाने लगते हैं। जिस भाग में भी ये जीवाण स्थायी रूप से बस जाते हैं, वहाँ गोल गाउँ-सी बन जाती हैं। यह रोग दुधारू पशुओ, पक्षियों तथा रेंगने वाले जीवों से भी हो जाता है। रोग के जीवाण गरमी और प्रकार (धूप) में बहुत जल्दी मर जाते हैं।
रोगोत्पत्ति के कारण इस रोग की उत्पत्ति का प्रमुख कारण पशु को उचित परिमाण मे पौष्टिक आहार न मिलना, धूप, हवा आदि से रहित गदे स्थानो मे रखा जाना और स्वच्छ जल पीने को न मिलना ही होते हैं और तब पूर्वोक्त क्षय रोग के कोटाणु पशु के शरीर मे प्रविष्ट होकर धीरे धीरे बढते रहते हैं और पशु इस रोग का पूरी तरह से शिकार हो जाता है। फिर उस पशु के गोबर, मूत्र, लार, शाग आदि द्वारा ये कीटाणु बाहर निकल कर अन्य पशुओं में भी फैल जाते हैं। किन्तु यदि पशु को धूप-हवा वाले स्वच्छ स्थान मे रखा जाये, तो इस रोग को रोकथाम म सहायता मिलती है। इस पुस्तक मे प्राय सभी पशु रोगो की चिकित्सा आदि लिख दी गई है। लेकिन विषम रोगो की चिकित्सा पशुमा के डाक्टर से अथवा पशुओ के अस्पताल में करवाना अधिक और शीन लाभकारी होगा।
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