University Library,gurukul Kangri Vishwavidyalaya
संस्कृत भाषा चतुर्थ पुस्तकम्
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Arrymau awraxnpower,ARANTEERENTINAammewormeranparair mNNAR ओ३म् संस्कृत-भाषा-चतुर्थं पुस्तकम् तच्च परीक्षितगढ़ (जिला मेरठ) निवासि स्वामि-तुलसीराम-शर्मा-विरचितम् "वेदप्रकाश” नामक-मासिकपत्र सम्पादकेन, मनु- स्मृतेरनुवादकेन; सामवेदभाष्यकारण, निर्मात्रा स्वीये मेरठ नगरस्थे “ स्वामि मेशीन यन्त्रालये " मुद्रितं प्रकाशितं च CHE कमी को छो छपवाने का अधिकार नहीं ३१।५॥ १९१०. TIE SANSKRIT-PRIMER • FOURTH PART. .' EDITED, PRINTED AND PUBLISHED BY P. TULSI RAM SWAMI Anthor of Sama Veda Bhaiya, Translator of Manu Smuriti in Hindi AND Editor Veda-prakasha Vonia Paper-Meerut. Price 6 Annus. C 84 Horgama वार २५०० मूल्य ) भो३म् भूमिका माज इस चतुर्थ पुस्तक का छठी वार मुद्रण प्रकाशित होकर ग्राहकवर्ग के सम्मुख है। मैं आशा करता हूं कि जिस प्रकार प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, पुस्तकों की पूर्व छपी ८०००० प्रति रुचिपूर्वक ग्राहकों ने ग्रहण की और मेरे श्रम को सफल किया, इसी प्रकार इस के ग्रहण द्वारा भी मेरे श्रम का साफल्य और पाठकों का सपकार होगा। इस पुस्तक का प्रथम भाग तीसरी, द्वि० भाग चौथी, १० भाग पांचवीं और यह चतुर्थ भाग छठी कक्षा वर्तमान भङ्गरेजी स्कूलों में दूसरी भाषा संस्कृत लेने वालों को उपयोगी है और देवनागरी स्कूल मेरठ आदि कई स्कूलों में इस का प्रचार भी है । यही कारण है कि प्रथम पुस्तक का ४६००० मुद्रण ११ वार हुवा और यह चतुर्थ भाग भी इसी प्रकार उपयोगी समझा गया । मख चारों भागों में व्याकरणसम्बन्धी विषय थोड़े २ सब आगये हैं। इस लिये इतने ही पर इमे समाप्त किया है। तुलसीराम स्वामी विषयानुक्रमणिका- विषयः- पृष्ठम् विषयः- पृष्ठम् मध्ययार्थाः यङन्तप्रक्रिया भवादयः यङ्लुकप्रक्रिया : ७१ अदादयः नामधातुप्रक्रिया जुहोत्यादयः ३४ कगड्वादिप्रकिया दिवादयः ३९ मात्मनेपदप्रकिया स्वादयः ४३ परस्मैपदप्रक्रिया तुदादयः भावकर्मप्रक्रिया रुधादयः ५५ कर्मकर्तृप्रक्रिया तनादयः लकारार्थप्रक्रिया क्रधादयः ६२ कृदन्ताः चुरादयः ६७ कारकप्रकरणम् गयन्त प्रक्रिया ६७ समासप्रकरम् सक्षम्तप्रक्रिया ६ तद्वितप्रकरणम् ... ... ... my 90 ... ... ५ २७ १२ ... ... १४ ... ... १४ ... ... ... ... ... ... ... CO ... ८२ ... ... ... खीप्रत्ययप्रकरणम् //y संस्कृत-भाषा-चतुर्थं पुस्तकम् - - अव्ययानि- सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु सर्वासु च विभक्तिषु। वचनेषु च सर्वेषु यत्न व्येति तदव्ययम् । अर्थ -जो शम-पुरुष, बी, और नपुंभक इन तीनों लिङ्गो तयाम्पमा द्वितीयादि मप्त विभक्तियां और एक, द्वि, बहु इन तीनों वचनों में (सलूशम्) एक ही रूप से रहे, उम में कुछ दूसरा विकार न हो, वह भव्यप कहाता है। सो उदाहरण सहित कुछ भव्यय नीचे लिखे जाते है:- स्वर-स्वर्ग । प्रातर-प्रातःकाल । पुनरफिर । सञ्चैः । नीचः । शन धीरे । ऋते विना । युगपत् एक साथ । भारात्दूर, समीप। पूषक् । यस गत दिगममागामिनिन । विवादिन । रात्री-रात्रि। मायभ-सम्ध्या, सूर्यास्तकाल। चिरम्-विलम्ब । षत-किञ्चिता तूष्णीम्=चुप। बहिस्बाहर। समया=साया। स्वयम्=भाप । कपा । नक्तम्-रात्रि । म (ज)-नहीं। मद्वा- साक्षात • तिम-मिरका का सिपा। अमलरा, मन्तरेण विना। सहसा शीघ्र.। विनाविन नाना-नेक । स्वस्ति । स्वधा-पितवान । मलम्बस, काफी, फकत ! योषा-दिन । एषा, मिया, मुषा=भूठ। पुरापूर्वकाल । मिषस्, मिपो-परस्पर । प्रायस् बहुधा, भकसर । मुस-चार २ । साकम्, सार्थ, समम्-साथ । नमन नमस्कार । धिक धिक्कार । अधुना, बदानीम् मम ॥ waर से लेकर इदानीम् पर्यत अध्ययों के क्रम से सदाहरण लिखते स्मरण रक्खो कि अव्यय-सब लिङ्ग, वचन और विभलियों में समान रह ऋषयः स्वगताः । पपीः प्रातरूदितः । पुनरागमिष्यामि । उच्चैः पठ में मीनं पश्यति । शनरभ्यामोभवति। ऋते. जामा मुक्तिः । युगपत भागताः । आरादनं वर्तते । पथक २ गङ्गा यमुना च मछौ गच्छामः । पचौर भाग । बोगन्ताहिम ( कल जाऊंगा) । दिवा जागति लोशः सपिति च । प्रायः सायं साप्योपासनं कुरु। चिरं न कर्तव्यम् । ईषलवणमति। तुम्ही ति। हाम्रो बहिन एका समय नितः । लामो सई . । रात्री अध्ययप्रकरणम् कथितम् । - द्रष्यति । वृषा धादो न कार्यः । मक्तं जागरणं न शोसनम् । ( नन )- आवयोनास्ति भेदः । सूर्योद्धा प्रकाशते। तिरोगात। तिरोभूतः । व्याड. रणमन्तराउन्धः । पादमन्तरेण कथं गच्छति सर्पः । सहसा पठति बेदम् । नेत्रं विमा काणः । विष्णु मित्रेण नाना शास्त्राणि पठितानि । राजे स्वस्ति । पि. तृभ्यः स्वधा । पलं महीपाल ! तव अमेण । दोषा व्यापारः प्रवर्तते । मृषा वदति। मिथ्या हठः । मुधा पुरा रामो राजा बभूव । मिथो यु भ्यन्ते धानः । वर्षासु प्रायो मेघो वर्षति । मुहालकः खादति । साकं, साधू, समं वा गुरुणा गच्छति छात्रः । गुरुवे नमः । पापभिडनं धिक् । भप पञ्चम पुस्तकं लिखामः । अधुना ऽश्य पानि पठामः । इदानी म्यायं पठ । निम्रलिखित च मादि व्यय मिपात भी कहाते हैं:- घऔर, भी । घा-अथवा, या । ह-प्रसिद्ध मह सत्कार, महा । एकत्र हो, निश्चय। एयम्=ऐसे। ममम् निश्चय । शश्वत सदा । यस फिर भी। चेत यदि । यत्र। कच्चिस्=क्या (प्रश्न) । मह नहीं करना । हन्त-दुःख। नकिर- सपमार्य । यावत् जब तक । सायततब तक । स्वाहा विनिमित्त दाम । सपा हिऐ से ही। सलु निश्चय किल-सुनते हैं कि । अय-अब मे । स्म=पूर्व समय में। ** गादि २२ अध्यय, उपसर्ग सी कहाते हैं। ये प्रायः क्रिया के पूर्व भाते हैं भोर किया में मिलकर ही अर्थ भी होता है। प्र । परा। गप । सम् । भनु । भय । नि । निम् । निर । दुम् । दुर् । वि। मधि । म । सत् । परि। प्रति । भभि । अलि । अपि । उप । मा(क॥ यपाकपाच-जैसे फेमे । है, हे-सम्बोधन । भोम-सम्बोधन । जिम के गन्त में तस हो । जैसे-भवतः सब से । उभयतः दोनों ओर से इत्यादि । तथा जिन के अन्त में सम् हो । जैसे- बहुशः बहुतसा । प्रायशः बहुत करके । इत्यादि। जिन के अन्त में त्वा, वन हों जैसे कस्वा, भुक्त्वा, ब्राह्मणवत्त, क्षत्रिय धत् इत्यादि भी व्यय कहलाते हैं । सब क्रम से *ध भादि के उदाहरण लिखते हैं। यथा-स्वमहं च गच्छाका। अहं च पठामि । माता पिता या पुत्र रक्षति । यद्वेभ्यो ह श्रूयतेपदों में प्रसिद्ध सुना जाता है। भह माणवको मुक्त अहा ! बालक खाना है। महमेव पदामि। एवं पठ । नूनं शरदृतुः, कासाः प्रफुखाः। शद्वदति कुशिक्षितः। भूयः पठनि। शान्तिश्चेदमतेम किम् । यत्र धर्मस्तत्र जयः । कश्चिज्जीवति ते माता। मह पठामिाहत बालो मषितो व्यासपो मकिन यति । मात्र वास्पति, - - - - मध्ययप्रकरणम् ५ । ताव गमिष्यामि । अग्नये स्वाहा । तपा हि स परति । दिनेशः खलु धमी। पुरा किल दशरपोराजा मक्य । म धतुर्थं पुस्तकं पठामः । वसप्ति स्म रावणोलङ्कायाम् ॥ • प्र• नादि २२ उपसगों के सदाहरण कुछ धातुरूप लिख कर पक्षात् लिखेंगे । क्योंकि वे धातु के प्रथम आते हैं । यपाकपाच सहितं धगम् । हे घरामने । हे जगदीश्वर । भो विष्णु मित्र । सर्वतीग्रामं जनाः सन्ति । उभयतोराजामौ युध्येते । बहुशः प्रमाणानि सन्ति । प्रायगोरोगिणोनियन्ते । भुवा पठिष्यामि । पाठं कृत्वा लिखामि । ब्राहमणवत् पठति धेश्यः । क्षत्रियवत युध्यन्ति मटाः ॥ ये सङ्केतमात्र अठयय तथा नन के सदाहरण लिखे हैं । यथार्थ में एकर अध्यय के अनेक अर्थ होते हैं जो प्रकरणानुसार पड़ने पढ़ाने वालों को पात हो जाते हैं। उक्तञ्च- धातवश्वोपसर्गाश्च निपाताश्चेप्ति ते प्रयः । अनेकार्या हि विज्ञेया: पाठस्ते पां निदर्शनम् ॥ भर्थात् धातु, उपसगं, निपाल, इन तीनों के अनेक मर्थ , परन्तु को कुछ इन के अर्थ पुस्तकों में लिखे हैं वे निदर्शनमात्र हैं। अब कुछ धातुओं के रूप लिखेंगे। १- भू, स्पा, गम, पठ गावि धातु कहाते हैं। धातुगों के गण दश । यथा-भ्वादि, भदादि, जुहोत्यादि, दिवादि, स्वादि, तुदादि, रुधादि, तनादि, कपादि भीर चुरादि ॥ २-इन में से भ्वादिगण के धातुरुप प्रथम लिखेंगे । ३-धातु में जो १८० विभक्तियां लगती हैं वे तिङ् कहाती सतएक स धातुप्रकरण की रिहन्त प्रकरण कहते हैं । -धातु के कालभेद मे दश प्रकार के रूप होते हैं। उन दश के नाम ये हैं। पपा प्रथम ( लद् ) यह वर्तमान काल में होता है । द्वितीय ( लिक ) और पतीय (लोद ) ये दोनों विधि भादि अर्थों में होते हैं। चतुर्थ (ला। यह समीप भूतकाल में होता है, इसे ' भगद्यतनभूत ' कहते हैं। पञ्चम ( लिट् ) माचीनभूतकाल में होता है, से “परीक्षभूत" कहते हैं। (भाशीर्षिक) या माशीर्वाद मायबोला है। मान (द) यह किम से प्रवि. - . पत्काल में होना है। मटन (द ) वह सामान्य भविष्य में होता नवम ) यह हेतुहेमद्धाव (शत) के भून वा भविणकाल में होता है। जैसे सुवष्टि होती वा होगी मी सुनिक्ष होता वा होगा इत्यादि । दशम. ( लुङ ) यह सामान्यसूमकाल में होता है। ५- १. लकारों में तीन . पुरुष होते है जिस किपाका वाय भस्मद् मैं) हो यह “उत्तम पुरुष जानो। जिस का माश्य युष्मद् (तू) हो वा मध्यन पुरुष जानो। जिस का युष्मद् और मम्मद से भिका भम्प कोई वाच्य समझा जाधे वह पुरुष होता है। -सुबन्त के समान सिकन्स में भी एकवचन द्विवचन भीर मावान को तीन २ कर होते हैं। इस प्रकार तीनों पुरुष तीनों वचन से मिलकर रूप थे। फिर एक एक (लट् ) मादि १० लकारों के सप मिलकर होते हैं। फिर ९० परस्मैगन और भात्मनेपद मिलकर उपर्युक्त १५० सप. एक २ धातु के होंगे। परन्तु कोई धातु केवल परस्मैपद में ही रहता है, कोई केवल भात्मनेपद में ही रहना है। उन के केवल cer ही रूप होंगे परन्तु जो उसयपदी धातु हैं उनके १८० रुप होंगे। सब नीचे लिखे कम से भू* मादि धातु मों के रूप लिखते हैं पपा- १-"भू (धातु)="होना के लट् लकार वर्तमानकाल के रूप- प्रपन पुरुष -एक-निहै। द्वि०-भवतः-३ हैं । बहुव-प्रवन्ति 1 । मध्यम पु० - प्रमि-तू । भवपः तुप २ हो । भवप=तुम हो। उत्तम पु० -भवामिः हूं। मवावा हम २ हैं। भवामः हम ३२॥ २-लिङ् लकार विधि आदि अर्थों में जैसे:- प्रपमपु० -भवेत् १ होवे । भवेताम्-२ हो । भवेयुः=३ हो । मध्यमपु-मय-तू होवे । मवेतम्-तुम २ होवो । भवेत-तुम होवो। उत्तमपु०-वेपम्=मैं होकं । अषहम दोनों होवें । सवेम-हमरो । ३-विधि आदि अर्थों में ( लोट् ) प्रामपुर-भवतु, सकतात १ हो । सवताम् २ हो । भवन्तु-३ हो । माध्यमपु०-भव, तात्=तू होवे। भवतम् तुम होवो। भवत-तुमाहोयो। सत्तमपुर-सवानि-मैं होकं । भयावहम हो । भवाम-हम होवें ॥ *१. विमान और ३ से पशुवचन पुस्तक भर में समभाना चाहिये । - ..
स्वादयः - । । ४-अनदातम भूतकाल में ( लङ् ) प्रथमपु०-भवत-हुवा है । मभवताम्-२ हुवे हैं । मभवन्-३हुवे हैं। मध्यमपु०-अभवः तू हुया है। अभवतम्-२ हुवे हो । अभवत=३ हुवे हो। उत्तमपु०-समयम्=मैं हुवाहूं। अभवाव=२ हम हुवे हैं। असवाम=३ हम हुवे हैं। ५-परोक्ष भूनकाल में (लिट् ) प्रथमपु० बभूव हुवा था । मभूवसुः=२ हुवे थे । बभूवुः-३ हुधे थे। मध्यमपु० बविय-तू हुवा था। बसूवथः-२तुम हुवे थे। बभूव=३ तुम हुवे थे । उत्तमपु-बभूव-मैं हुवा था । बभूविव-२ हम हुवे थे। बभूविम=३ हम हुवे थे। ६-आशीर्वाद में ( आशीर्लिङ् ) इस का अर्थ भाषा में दूसरे ( लिङ्) के तुल्य बोला जाता है । यथा- पुत्रयान् भूयात् " यह पुत्र वाला होवे । अहं पण्डितो भूयासम्=मैं पगित होऊ । सत्यादि । प्रथमपुः भूयात । भूयास्ताम् । भूयासुः ॥ मध्यमपु० भूयाः । भूयास्तम् । भूयास्त ॥ नुत्तमपु० -भूयामम् । भूयास्त्र । सूयास्म ॥ ७-आगामिदिन ( कह) आदि अर्थ में भविष्यत् ( लुट् ) इस का अर्थ भाषा में यथा--देवदत्तः राजा भविता देवदत्त कम्ल आदि को राजा होगा। अहं धनी भवितास्मि=मैं कह आदि को धनी होंऊंगा इत्यादि। प्रथमपुर-भविता । सवितारी। भवितारः। मध्यमपु०-सवितासि । सवितास्थः। भवितास्थ ॥ उत्तम पु०-भवितास्मि । भवितास्वः । भवितास्मः ॥ ८-सामान्य भविष्यत् काल में ( लूट ) प्रथमपु० भविष्यति । भविष्यतः । भविष्यन्ति ॥ मध्यमपु०-भविष्यसि । भविष्यथः । भविष्यथ ॥ अत्तमपु- भविष्यामि । भविष्यावः । भविष्यामः ।। उदाहरण, जे ने कुरुदेवापी राजानी भविष्यतः कुरु और देवापि २ राजा होंगे। व्यापारेण त्वं धनाचो भविष्यसि व्यापार मे तू धनाढ्य होगा। इत्यादि । -हेतुहेतुमदाव ( शतं ) में ( लुङ्) प्रथमपु०-अभविष्यत् । प्रभविष्यताम् । अभविष्यामध्यमपु० - समविष्यः । भाविष्यतम् । अाविष्णता उत्तमपु०-अभविष्यम् । अभविष्याव । भविष्याम उदाहरण जैसे - यदि उद्यममकरिष्यन् सहि लक्ष्मीवन्तोऽभविष्यन् यदि उद्यम करेंगे तो लक्ष्मीवान होंगे। इत्यादि । - । २ सिडन्त । १०-सामान्य भूतकाल में ( लुङ्) प्रथमपु०-आभूत् । भक्ताम् ।। भभूवन् । मध्यमपु०-भः । मनम् । भभूत ॥ उत्तम पु० - अभूवम् । अभूव । असूम " उदाहरण, जैसे - आवां दुःखिती अभूव-हम २ दुःखी हुवे । सरु शुष्कम- भूस्तालाब खुश्क हुवा । इत्यादि । २-" चित् " धातु-चेतना, चीन्हना, स्मरण १-लट् ( वर्तमानकाल में ) प्रथमपु०-चेतति । घेततः। धेतन्ति ॥ मध्यमपु०-धेनसि। तथः । चेतथ। उत्तमपु०-चेतामि । घेतानः । चेतामः ॥ त्वं मातरं चेतसि तू माता को चीन्हता है ॥ इत्यादि ॥ २-लिङ ( विधि आदि अर्थ में ) घेतेत् । चेतेताम् । चेतेयः ॥ चेतेः । चेतेतम् । चेतेत ॥ चेतेयम् । चेत्तेत्र । घेतेम ॥ साक्षिणश्चेतेयुः साक्षी लोग चीन्हें ॥ इत्यादि । ३-लोट् ( ऊपर के ही अर्थ में) चेततु, चेतसात् । चेतताम् । चेतन्नु ॥ चेत, घेवतात् । चेततम् । चेसस । तामि । चेताव । चेताम ॥ पावान् ब्रह्म घेततु ॥ ४-लङ् ( अनदयतन भून में ) अचेतत् । अघतताम् । अचेतन ॥ सचेतः । सचेततम् । अचेतत ॥ अथे. तम् । अचेताव । अघेताम ॥ त्वं यः पाठमथेतः तूभे कल्ह पाठ याद किया। ५-लिट् ( परीक्षाान में ) चिचेत । चिचिततुः । चिचितुः ॥ चिन्थि । चितितथुः । चिचित । चिचेत ।चिचितिव। चिचितिममीतारामं चित-सीता ने रामको स्मरा था। ६-आशीलिङ चित्यात् । चित्यास्ताम् । चित्यासुः ॥ चित्याः । चित्यास्तम् । पित्यास्त ॥ चित्यासम् । चित्यास्व । चित्यास्म ॥ सर्व सुखं चित्यामुः=मब सुख को चेत करें। ७-लुट् ( अनदातन भविष्यत् में) तिता । सितारौ । चेतितारः ॥ तितासि । चेतितास्थः । चेतियास्थ ।
- भवादयः चेतितास्मि। चेतिताखः । चेतितास्मः॥भद्य पठितं श्वः तितास्मि- माज पढ़े को कह याद महंगा ॥ इत्यादि । ८-टट् ( भविष्यत् में) निष्यति । तिष्यतः। चोतिष्यन्ति ।। चेतिष्यसि । तिघ्यथः । तिष्यथ ।। घेलिप्यामि । तिष्यावः । तिष्यामः॥ पदत्ये चेतिष्यसि-तू बुढ़ापे में याद करेगा। -लङ् ( हेतुहेतुमद्भाव में) भचेतिष्यत् । अचेतिष्यताम् । अचेतिष्यन् । अचेतिष्यः । अचेतिष्यतम् । अचेतिष्यत॥अचेतिष्यम् । सचेतिष्याव । अथेतिष्याम॥यदि पाठम् भतिष्याम सहि पगिता भविष्याम=यदि हम पाठ याद करेंगे तो पखित होयेंगे । १०-लुङ् ( सामान्यभूत में) मधेतीत् । अचेतिष्टाम् । अचेतिषुः ॥ अघेतीः । अथेतिष्टम् । अचेतिष्ट । नचेतिषम् । प्रतिष्व । अचेतिष्म ॥ यूपं मातरं पितरं च नाऽचे तिष्ट-तुमने माता और पिता को नहीं याद किया। ३-“शुच " धातु-शोक, शोच करना, १ लट शोचति । शोधतः। शोचन्ति। शोचसि । शोचणः । शोचथ ।। शोचामि। शोचावः । शोचामः॥ वट्ठा मृतं पुत्रं शोधति बुढ़िया मृत पुत्र को शोचती है। २ लिङ शोधेत् । शोचेताम् । शोचेयुः ॥ शोधेः । शोघेतम्। शोचेत ॥शोचेयम् । शोचेष । शोचेम ॥ गतं किं शोचेयम् =गये को क्या शोक करूं? ३ लोट शोचतु, शोचतात् । शोषताम् । शोचन्तु ॥ शोच, शोधतात् । शोधतम् । शोधत ॥ शोचानि । शोचाव । शोचाम ॥ - ४ लङ् । अशोचत् । अशोचताम् । अशोचम् ॥ शोधः। शोचतम् । भशोचत । मशोचम् । अशोचाव । अशोचाम ॥ म भ्रातरमशोषत्तस ने भाई को शोक किया है। पत्यादि। - सिडन्ते ५ लिट शुशोध । शुशुचतुः । शुशुचुः ॥ शुशोचिष । शुशुचयुः । शुच ॥ शुशोध । शुचिव । शुशुचिम ॥ शुशोच सीता लङ्कायाम् । इत्यादि ॥ ६ आशीर्लिङ् शुख्यात् । शुष्यास्ताम् । शुरुयामुः ॥ शुध्याः। शुच्यास्तम् । शुष्यात ॥ शुच्यासम् । शुध्याय । शुध्यास्म ॥ गतं न शुच्याः तू गये को न शोचे ॥ लट् शोषिता । शोचितारी । शोचितारः ॥ शोचितासि । शोधितास्थः । शोधितास्थ ॥ शोधितास्मि । शोचितास्वः । शोचित्तास्मः। येऽद्य म पठन्ति ते श्वः शोचितारः । इत्यादि ॥ ७ ८ लूट - शोषिष्यति । शोचिष्यतः । शोषिष्यन्ति ॥ शोचिष्यसि । शोचिष्यपः । शोषिष्यथ ॥ शोधिष्यामि। शोधिष्यावः । शोचिष्यामः। ये बारूमे न पठन्ति ने स्थविरत्वे शोधिष्यन्ति। यौवने धनं नाउर्जयसि वार्द्ध के शोचिष्यसि । इत्यादि। ६ लङ् मशोचिष्यत् । अशोषिष्यताम् । अशोचिष्यन् ॥ मशोषिष्यः । शोधि. ज्यत्तम् । मशोचिष्यत ॥ अशोचिष्यम् । शोधिष्याव । अशोचिष्याम ॥ धन मलत्येथाम् तहिं नाशोचिष्यतम् । इत्यादि। १० लुङ् भशोधीत् । अशोचिष्टाम् । मशोचिषुः । मशोचीः । शोचिष्टम् । भशोधिष्ट ॥ मशोचिषम् । भशोचिष्त्र । मशोचिष्म ॥ धीरो गतं नाशोचीत्- धीर मे गये का नहीं शोच किया । इत्यादि । ४-" गद " धातु-बोलना, कहना १लट्- २ लिङ्- ३ लोट- ४ लङ प्रथमपुरुष प्रथमपु० प्रथमपु० प्रथमपु० गदेव गदत, गदतात् अगदत् गदतः गदेताम् गदताम् अगदताम् मदग्लि गरन्तु भगवन - १ गति गदेयुः स्वादयः ४ लङ्- h- १ लट्- मध्यमपु० १ गदासि २ गदथः ३ गदप उत्तमपु० उत्तमपु० १ गदामि २ गदावः ३ गदामः ५ लिट् प्रथमपुरु १ जगाद ८ लङ् २ जगदतुः ३ जगदुः मध्यमपु० २ लिङ्- ३ लोट् - मध्यमपु० मध्यमपु० मध्यमपु० गदेः गद, गहनात् अगदः गतम् गदत्तम् अगदतम् गदेत गदत भगदत उत्तमपु० उत्तमपु० गदेयम् गदानि भगदम् गदेव गदाव भगदाव गदेम गदाम अगदाम ६ आशीलिंग प्रथमपुर प्रथमपु० प्रथमपु० गद्यात् নি। गदिष्यति गद्यास्ताम् गदितारी गदिष्यतः गद्यासुः गदितारः गदिष्यन्ति मध्यमपु० मध्यमपु० मध्यमपु० गद्याः गदितासि गविष्यसि गद्यास्तम् गदितास्थः गदिष्यथः गद्यास्त गदितास्थ गदिष्यथ उत्तमपु० उत्तमपु० उत्तमपु० गनासम् गदितास्मि गदिष्यामि गद्याख गदितास्वः गदिष्याव: गद्यात्म गदितास्मः गविष्यामः १० लुक-सामान्यभूतकाल शम्भुः सत्यं गदाति । साक्षी अगादीत्, अगदीत् तथ्यं गदेत, गदतु । ती भगाविष्टाम्, भगदिष्टाम् मिथ्यागदताम् । जगाद भगादिषुः, भगदिषुः वाक्यं देवर्षिः । शाखाणि मयासुः पुत्राखषा १ जगदिथ २ जगदथः जगद उत्तमपु० १ जगाद, जगद ९ जगदिव ३ जगदिम - एखछ प्रथमपु. १-अगदिव्यत् २ भगदिष्यताम् ३ भगदिष्यन् १२ तिहट उत्तम पुर के समक्ष मध्यमपुर १अगदिष्यः भगादीः, अगदी यः पुरासं वेदं वा यदिता अगादपतम् अगाविष्टम्, अगटिम स्मि । निगदिष्यति सर्व- ३ अगदिव्यत भगादिष्ट, अगविष्ट मात्मनः । असत्यमगदि. ध्यामाविश्वस्ता नभबि. १ अगदिष्यम् भगादिष्यम्, अगदिष्यम् घ्याम । अगदिष्ट यथेशित २ अगदिष्याव अगादिष्व, अगदिश तथा-सुम ने कहा जैसा ३ अगदिष्याम भगादिष्म, अगदिम थाहा वैसा॥ संस्कृत बनावो युधिष्ठिर सत्यवादी हुवा था। भामरुत को मत शोच करो। सत्य कहो। अमन्य कहोगे तो अविश्वस्त होवोगे। सत्य कहूंगा सौ विश्वासयोग्प होऊंगा। तुमने परमेश्वर को स्मरण किया इस मे भास्तिक हुये । तुम पिता के साथ जागो। पाठशाला में बैठे हैं, तुम भी यहां जामो और पाठ पढ़ो। यदि तुम्हारा अपराध हो तो गुरु में सत्य कहो । अन्य मब विद्यार्थियों फे साथ तुग भी पढ़ो । भाज नहीं याद करोगे तो कलह केसे कहोगे । भतः अपने पाठ को सम्यक् याद करो ॥ अर्च" धातु-पूजना, सत्कार करना १ लट् २ लिङ् ३ लोट प्रथमपु० अर्चति भर्चतु, अर्थतात नाचत भताम् मर्थताम् भार्थताम् २ अर्चन्ति भयः मर्चन्तु मार्चम मध्यमपु० अर्थसि मई, नतात् मार्चः २ अर्चयः मचैतम् अर्चतम् भातम् सर्चत भर्चत भार्चत उत्तमपु० अयम् मानि मार्चम् २ अर्चाया भव अर्घाव आर्वाद मार्चम अर्धाम भार्धाम ५ ४ला मत १ २ भर्चतः १ अर्थः ३ अर्थथ १ अर्यामि ३ भर्चामा लुट् द लुट् १ भामर्थ ३ मामः आर्थियषः ३ आमर्च १ आमचं मचिप्यावः छ यादव १३. ३ लिद भाशीलिंग गर्यात् भचिंता अधिष्यति २ भागचतुः मर्यास्ताम् अर्चितारी चिष्यतः मासुः भर्चितारः र्थियन्ति १मामचिंथ माः आर्थिशासि माध्यान २ नाम: अर्यास्तम् सर्चितास्थः मर्यास्त अचिंतास्थ चिंच्या मासम् भचिनास्मि अर्पियामि २ आना नार्थिव अस्थि अचिताम्वः ३ आनर्चिन भास्म अर्चितास्मः मचिंच्यामः उदाहरण- १ आर्चिष्यत् आर्चीत् गुरुमर्चन्ति छात्राः । ईशमर्चन्तु । २ मार्चिष्यताम् मार्चिष्टाम् मातरभान पितरं च श्रवाः । मार्चिष्यन् आर्थिः मुखमर्च न्ति वेश्याः । प्रतिष्ठार्थी आधीः राजाममास्त्वम् । पित्तर मध्य द् २ भाष्यितम् भार्चिष्टम् भवान् । अहं तु पुस्तकमेवाार्थम्। ३ मार्चिष्यत मान्यानानर्थ: आर्चन्त्यमकिंगाः। १ आर्थिष्यम् आर्चिषम् मार्चीः केवलं मुखम्, किन्तु धिय- २ भाचिया मर्चवात् ॥ ३ आर्थियाम भार्थिम ६-“गुपू" ( गुप् ) धातु-रक्षण, रक्षा करना १ लद २-लिङ्ग ३-लोट १ गोपायति गोपायेत् गोपायतु, गोपायतात् २ गोपायतः गोवायेताम् गोपायताम् ३ गोपायन्ति गोपायेयः १ मोपायसि गोपायेः गोपाय, गोपायता २ गोपायथः गोपायेत गोपायत १ गोपायामि गोपायेयम् गोपायानि १ मार्चिष्यः भाष्टि आर्थिव गोपायन्तु गोपायेतम् गोपायतम् ३ गोपायथ १४ सिंह.ते २ गोपायावः ३ गोपायामः गोपायेव गोपायेम गोपापाव गोपायाम. ४ राज १ ar १ अगोपायः ३ ५ लिट १ मगोपायत् १ गोपायाञ्चकार, गोपायामास, गोपायाम्मभूव, गोप । २ भगीपायताम् २ गोपायाचकतुः,गोपायामासतुः,गोपायाम्बभूवतुः,जुगुपतुः । अगोपापन् ३ गोपापाचक, गोपायामासुः, गोपायाम्बभूवुः, जुगुपुः । मध्यमपु० १ गोपायाञ्चकर्थ, गोपायामामिप, गोपायाम्ब. २ गगोपायतम् भूषिय, जुगोपिष, जुगोप्य । २ गोप्रायाञ्चक्रथुः, गोपाया। ३ अगोपायत मासपुः, गोपायाम्बभूवयुः, जुगुपथुः । ३-गोपायाचक्र, १मगोपायम् गोपायामाम, गोपायाम्बसूब, गुप । उत्तमपु. १-गोपा. २ अगोपाया याच हार, गोपायाञ्चकर, गोपायामास, गो पायाम्बभूव, ३ भगोपायाम जुगोप । २- गोपायाचरुव, गोपायामासिव, गोपायाम्ब. भूविष, जुगुपिय, जुगुप्य । -गोपायाञ्चकम, गोपायामा. सिम, गोपायाम्बभूविम, जुगुपिम, जुगुम्म ॥ ६-माशीलिङ्प्रयमपु १-गोपाख्यात, गुप्यात् । २ -गोपाप्यास्ताम्, गुप्या. स्ताम् । ३-गोपाप्यासुः, गुप्पामुः। मध्यमपु०१-गोवाय्याः, गुप्याः।२- गोपा. प्यास्तम् । गुप्यास्तम् । ३-गोपाप्यास्त, गुप्यास्त, । उत्तमपु. १-गोपाय्या- सम्, गुप्यासम् । २-गोपाय्याख, गुप्यास्त्र । ३-गोपाय्यास्म, गुप्यास्म ॥ ७-लुट् -गोपायिता, गोपिता, गोप्ता । २-गोपायितारी, गोपितारी, गोतारी। -गोपापितारः, गोपितारः, गोप्तारः । मध्यमपु० १-गोपायितासि, । गापिनामि, गोप्तासि ।२-गोपायितास्थः, गोगितास्पः, गोप्तास्थः।३ गोपा. यितास्थ, गोपितास्थ, गोप्तास्थ । सत्तमपु० १-गोपायितास्मि, गोपितास्मि, गोमास्मि । २-गोपायितास्वः, गोपितास्वः, गोप्तास्थः । ३-गोपायितास्मा, गोपितास्मः, गोतास्मः ॥ ८-स्वट्-प्रथम पु०१-गोपायिष्यति, गोपिष्यति, गोप्स्यति । २-गोपाय- ष्यतः, गोपिष्यतः, गोपायिष्यन्ति, गोपिष्यन्ति, गोप्स्यन्ति । मध्यम पु०१-गोपायिष्यसि, गोपियामि, गोप्स्यसि । २-गोपायिष्यथः, गोपि. ध्यपः, गोप्स्य यः । ३-गोपायिष्यथ, गोपियाथ, गोष्स्यप । उत्तम पु. १-गोपा- ३ गोप्स्यतः । ३ भवादयः १५ यिष्यामि, गोपियामि, गोप्स्यामि । २-गोपायिष्यावः, गोपिष्यावः, गोप्स्यायः । ३-गोपामिष्यामः, गोपिष्यामः, गोप्स्यामः ॥ ७ सृङ् प्रथम०१ अगोपायिष्यत, भगोपिष्यत, अगोप्स्यत्। २-मगोपा. यिष्यताम, भगोविष्यताम्, गोप्स्यताम् । ३-अगोपायिष्यन्, मगोपिष्यन्, अगोप्स्यन् । मध्य नपु० १ अगोपायिष्यः, भगोपिष्यः, भगोप्स्यः। २-गोपा. यिष्यतम् , अगोपिष्यतम् , अगोप्स्यतम् । ३-अगोपायिष्यत, अगोपिष्यत, भगोप्स्यत । उत्तमपु०-१मगोपाथिष्यम्, भगोपिष्यम् , अगोप्स्यम्,।२-मगो. पायिष्याव, भगोपिण्याव, अगोप्स्याव। ३-अगोपायिष्याम, भगोपिष्याम, भगोप्स्याम १० लुङ-प्रथमपु०१-अगोपायीत, अगोपीत, अगौमीत्। २-अगोपायि. हाम्, भगोपिष्टाम्, भगौप्ताम् । ३-अगोपायिषः, आगोपिषुः, अगौप्सुः । मध्यम पु०१-भगोपायीः, अगोपीः, अगोप्सीः । भगोपायिष्टम्, गोपिष्टम् , भगी- सम् । ३ अगोपायिष्ट, भगोपिष्ट, भगीप्त। उत्तम पु०१ - अगोपायिषम् , अगो. पिषम्, मगोप्सम् । २-अगोपायिष्य, मगोपिष्व, भगौप्स्व । ३- अगोपायिम, गोपिम, भगीरस्म ॥ इस प्रकार गुप् " धातु के रूप लिट् लिङ् लट् लृट् तृङ् और लुङ् इन छः लकारों में एक २ प्रयोग तीन २ प्रकार के भौर कभी इस से अधिक मकार के भी होते हैं। ७-"क्षि" धातु-क्षय-नाश और निवास रहना १-लट्-मयति । क्षयतः । क्षयन्ति ॥ क्षयमि । क्ष यथः । क्षयथ ॥ इत्यादि ॥ २-लिङ्-१ क्षयेत् २-क्षयेताम् ३ क्षयेयुः ॥ १ क्षयेः ३ क्षयेतम् इत्यादि । ३ लट् -१ क्षयत, क्षयतात् २ क्षयताम् ३ क्षयन्तु इत्यादि ।। ४- लङ् १ अक्षयत् २ - अक्षयताम् ३ - अक्षयन् । १अक्षयः । २ अक्षयतम् इत्यादि । ५-लिट् १ चिक्षाय २ चिक्षियतुः ३ चिक्षियु: । चिक्षयिण, चिक्षेथ । २-चिक्षियथुः। चिक्षिय। विक्षाय, चिक्षय। २ चिक्षियिव । ३धिक्षिपिम । ६-माशीर्लिङ-१ क्षीयात् । २क्षीयास्ताम् । ३ क्षीथासुः । १क्षीयाः । इत्यादि ॥ ७ लुट् क्षेत्रा, क्षेता, क्षेतारः । क्षेतामि, क्षेतास्यः इत्यादि ॥ ८- लट्-१ क्षेष्यति २ क्षेष्यतः ३ क्षेष्यन्ति । १ क्षप्य सि २ क्षेष्यथः इत्यादि। & छ -१ अक्षेष्यत् २ अक्षेष्यताम् । ३ अक्षष्यन् इत्यादि ॥ १०- लुङ-१ अक्षैषीस् । २ अक्षष्टाम् । ३ क क्षेषुः । १ भक्षेषीः । २ अझैष्टम् । ३ अर्वेष्ट । भोषम् । २ मष्त्र । ३ मडम ।। १ ३ । or १६ यश्चतुर्दश्यामक्षपचन्द्रः । राजा प्रजाः गोपायेस् । युधिष्ठिरो धर्मेण प्रताः गोपायाञ्चकार । क्षीयात् पापिना सम्पत् । गोपाय कुटुम्बम् । मामानं गो- पायतु सर्वथा । युवामन गेहे लयतम् (रहो) । स्तेन भामाममेवागोपायत् । चिमाय राक्यः सकुटुम्बो रामद्रोहेण । सुभगे पुत्रं गोपाख्याः गुण्याः वा। योद्य पापी स श्वः क्षेताकालान्तरे जम्मान्तरे वा क्षेष्यति। धर्मात्मनो गोपायिवाति, गोप्स्यति वा जगदीशः । यदि वीर्यमगोपायिष्यो बलवान भविष्यस्त्वम् । मक्षेषुर्धनानि बहुव्यग्रशीलस्य । इत्यादि । ८ "तप" धातु-सन्ताप, गरमी करना, गरम होना, दुखना १ लट्-तपत्ति इत्यादि। २ लिङ् तपेत् इत्यादि । ३ लोट-मपतु, तपतात इत्यादि । ४ लङ्-मतपत् इत्यादि । ५ लिट् १ तताप २ तेतुः ३ तेपुः । १ तेपिथ, ततष्य २ तेपथुः ३ तेप। । तताप, ततप । २ से पिव । ३ तेपिन । ६ माशीलिङ्-१ तप्यास् २ तप्यास्तामित्यादि । ७ लट्-तप्ता. तप्तारी इत्यादि । ८ बद्-तस्पति इत्यादि । लङ् मतप्स्यत् इत्याद । २० लुङ् -१ अता- प्सीत् २ अताप्ताम् ३ भताप्सुः । १ मताप्सीः२ मताप्तम् ३ अताप्त। १ अलाप्प्तम् २ अताप्स्व ३ अताप्स्म ॥ -इसी प्रकार पत्तृ " धातु (पतन, गिरना) के सूप हैं परन्तु ५ लिट् मध्यम पुरुष एकवचन में, “पेतिथ" एक ही रूप है । लुट् में पसिता, पति तारौ इत्यादि । ८ स्मृट्-पतिष्यति इत्यादि । स्तृङ् अपतिष्यत् इत्यादि । १०-लुङ् भपतत्-अपप्तताम् इत्यादि जानी ॥ धावतोऽश्वाद पप्तत् । पपात मूर्छया भूमौ । पापिनः पतिप्यन्ति नरके । सूर्यस्तपति इत्यादि ॥ १०-"क्रमु" धातु पादविक्षेप, चलना, पांव रखना। १ लट् -१ काम्पति, कामति २ क्राम्यतः, कामतः ३ काम्यन्ति, कामन्ति इत्यादि दो २ रूप ॥२-लिङ्-१ क्राम्येत, काभेत् २ क्राम्येताम् कामेताम् इत्यादि दो दो॥३- लोट-१ काम्यतु, काम्यतात्, कामतु, कामतात, काम्यताम्, कामताम् ३ काम्यन्तु, कामन्तु इत्यादि दो दो॥४-लङ्-१ मक्राम्यत, मकामतरमकाभ्यताम्, अक्रामतामित्यादि दो दो ॥५ लिट् १चक्रामर चक्रमातुः ३ चक्रमुः । १ चक्रमिथ २ चक्रमथः ३ चक्रम । १ धक्राम, चक्रम २ चक्रमिव । पक्रमिम ॥ आशीलिंङ्-म्यात् इत्यादि । लुत् - कमिता इत्यादि ॥८-खट- क्रमिष्यति ॥ तृङ्मक्रमिष्यत् ॥ लुङ्-मानमीत् इत्यादि ।
स्त्रायः धातु-पीना । १ ११-" पा लट् पिबति।। पिबतः । पिबन्ति । इत्यादि । लिड-पिवेत्। पिबेताम् । पिबेयुः इत्यादि ॥ ४ लट् पिबतु, पिबतात् । पिबताम् । पिबन्तु इत्यादि। लङ्-अपिबत् । अपिबताम् इत्यादि ॥ लिट् १ पपी । २ पपतुः । ३ पपुः ॥ १ पपिथ, पपाथ। २ पपथुः । ३ पप । १ पपी । २ पपिछ । ३ पपिम ॥ भाशी. र्लिङ्-१ पेयात् । २ पेयास्ताम् इत्यादि ॥ लुट-पाता, पातारी इत्यादि । स्तृट् पास्यति। पास्यतः इत्यादि । लुङ् -अपारगत् इत्यादि ॥ लुङ्-अपात् । अपाताम् । अपुः ॥ अपाः । भपालम् । अपात ॥ अपाम् । अपाव । अपाम ॥ सूर्यापति । वृक्षापत्राणि पतन्ति । भावः सुष्टु काम्यति । दुग्धं पिबन्ति बालाः । दिवा भानुग्तानीस् । पतन्ति पाविनः नरके घोरे ॥ १२-" ग्लै धातु-हर्ष क्षय, वीर्यक्षय, सुस्ती लट् ग्लायति । ग्लायतः । लिङ् ग्लात् । गलायेताम् । लोट-ग्लायत, ग्लायतात् । ग्लायताम् । सायन्तु। लङ् अग्लायत् । लिट-अग्लो । जग्छतुः । सग्लुः ॥ जग्लिथ, जग्लाथ । जग्लथः। अगर ॥ जग्गो । जग्लिय । जग्लिम । आशीलिङ्-ग्ले यात्। ग्लेयास्ताम् । आयशा - लायात् । ग्लायास्ताम् । इत्यादि। लुट् - आता । ग्लातारी ॥ लृट् ग्लास्यति ॥ तृङ् अग्लास्यत् । अग्ला- स्यताम् ॥ लुङ- छाग्लामीत् । अग्लामिष्टाम् । अग्लासिषुः ॥ अग्लासीः । अग्लासिष्टम् । अग्लासिष्ट ॥ मग्लासिषम् । सग्लासिष्य । अग्लामिम ।। चन्द्रमाः ग्लायति ॥ १३-“श्रु " धातु=सुनना, श्रवण लट् -तृणोति । ऋगुतः। ऋग्वन्ति । ऋगोधि । शृणुथः । शृणुष॥ शोमि। शृणुवः, एवः । शृणुमः, गमः ॥ लिङ् गुयात् । शृणुयाताम् । टणु युः ।। शृणुयाः इत्यादि । लोट-शृणोतु, शृणतात् । शृणुताम् । ऋगवन्तु ॥ ऋणु, ऋणुतात् । शृणु तम् । समुत ॥ शणवानि । टपापाय । ऋणयाम ॥ लङ्-अशु. गोत् । अणु नाम् । अशगवन् ॥ अशोः । अशणुतम् । भऋषुत ॥ अऋणवम् भगव, अणव । भटएम, मशृणु म ॥ लिट् - शुभाय । शुश्रुषतुः । शुश्रुवुः ।। शुश्रुव ॥ शुश्राव, शुभत्र । शुश्रुय । शुश्रुम । माशी. लिङ्-भूयात् । श्रूयास्ताम् इत्यादि ॥ लुट्-श्रोता । श्रोतारी इत्यादि। सट्-ओष्यति । श्रोष्यतः ॥ लुङ्-अश्रोष्यत् ॥ लुङ् मनीषीत् । मौष्टाम् । भीषुः । मनीषीः । अनौष्टम् । मोष्ट ॥ भोषम् ॥ अौध्य । अभीष्म । । । शुश्रोथ । शुश्रुवथुः १८ तिङन्ते बधिरो न शृणोति। धनिनोन गवन्ति प्रायशः। महंसिंहनादमश्रणवम् । राजा वः प्रार्थनां श्रोष्यति, न घेत् ईश्वरः श्रोष्यति खलु । शृणु मम वधर्म शुभम् । सावधानाः सर्वे ऋण्वन्तु । शास्त्रं शृणुतात् त्वम्, गानं मा शृणु, गाने मनो विषयि भवति । अश्शीलवादिनां वचनानि साधुन शृणुयात् । शुश्राव रामः शास्त्राणि । इत्यादि । १४-" गम्ल ” धातु-चलना, जानना, प्राप्त होना लट्-गच्छति । लिङ्-गच्छेत् । लोट् - गच्छतु । लङ्-भगच्छत् । लिट्- जगाम । जग्मतुः । जग्मुः ॥ जगमिथ, जगन्थ । जग्मथुः । जग्म ॥ जगाम, जगम । जग्मिव । जमिम ॥ माशीलिङ्-गम्यात् । गम्यास्ताम् इत्यादि । लुट- -गन्ता । गन्तारी । लूट-गमिष्यति । तृङ्-अगमिष्यत् । लुङ् - अगमत् । अगमताम् । अगमन् ॥ अगमः । अगमतम् । भगमत ॥ भगमम् । भगमाव। अगमाम॥ बालो गच्छति । पगिताः शास्त्रस्यायं गच्छन्ति । वनं जगाम रामः ॥ १५-" घ्रा "धातु-सूचना लद-जिघ्रति । लिङ् -जि त् । लोट-जिघ्रतु । लङ्-अजिघ्रत् । लिट् - जघ्रौ । जघ्रतुः । जत्रुः ॥ जघ्रिथ, अघ्राण । जघ्रथः । जघ्र ॥ अघ्री। जत्रिव। जनिम ॥ आशीर्लिङ्-घ्रायात्, प्रेयात् । लुट् प्राता। वृट् घ्रास्यति । तृङ्- अघ्रास्यत् । लुङ् -अघ्रासीत् । अघ्रामिष्टाम् । अघ्रामिषुः ॥ अघ्रासीः । मघ्रा. सिष्टम् । अघ्रासिष्ट ॥ अघ्रासिषम् । मघ्रामिष्य । अघ्रासिम ॥ १६-“धमा" धातु-धोंकना, फूंक मारना लट्-धमति * लिङ्-धमेत * लोट-धमतु * लङ्-अधमत् * लिट्- दध्मौ । दध्मतुः । दध्मुः ॥ दधिमथ, दधमाथ। दध्मः । दध्म ॥ दध्मौ । दमिव । दधिमम * पाशीलिङ -४मायात्, मेयात् * लुट्-माता * खट् - धमास्यति * लुङ्-अघमास्यत * लुङ्-मासीत् । भध्मासिष्टाम् । अध्मा- सिषुः ॥ अधमासीः ॥ अमासिष्टम् । भध्मासिष्ट ॥ अधमामिषम् । मध्मासिष्य। मासिष्म * उपवनं गत्वा तत्र पुष्पाणि घ्रास्यामः । भ्रमरो शिघ्रति । स्वर्णकारी मुखेनाग्मिं धमति । शङ्खं दधमो प्रतापवान् ॥ - - वादयः . १७ " स्था=तिष्ठ धातु-ठहरना, रहना, बैठना लट्-तिष्ठति * लिङ्-तष्ठेस लोट् - तिष्ठतु, तिष्ठतात् * लङ्-भतिष्ठत् . लिट्-तस्थौ । सस्थतुः । तस्थुः ॥ तस्थिथ । तस्थाथ । तस्थथुः । सस्थ ॥ तस्थी तस्थिय । सस्थिम * आशीर्डिङ् स्थेयात * लुट् स्थाता * लट्-स्थास्यति * खङ्-अस्थास्यत* लुङ्-अस्थ.त् । अस्थादार । आगे पा धातु के समान रूप हैं। १८ दाण=यच्छ धातु-दान, देना लट्-यच्छति * लिङ्- यच्छेत् * लोट-यच्छतु * लङ्-अयच्छत् * लिट् - ददौ । ददतुः । ददुः * आशीर्लिङ्-देयात् * लुट् दाता * स्ट्- दास्यते * स्तृङ्-भदास्यत् * लुङ् - अदात् । मागे * पा" धातु के सदृश हैं । १९ " दृशिर-पश्य " धातु-देखना लट्-पश्यति लिङ् पश्येत लोट् - पश्यतु*लङ्-अपश्यतलिट्-ददर्श। दशतुः । ददृशुः ॥ ददर्शिय, दद्रष्ठ । ददृशथुः । दश ॥ ददर्श । ददृशिव । दशिम * आशीर्लिङ् दृश्यास् * लुट-द्रष्टा * लूट-द्रक्ष्यति । तुङ् - अद्रक्ष्यत् ॥ लुङ्-अदर्शत् । अदर्शताम् । वा अद्राक्षीत् । अद्राष्टाम् । अद्राक्षुः ॥ भद्राक्षीः । भद्राष्टम् । भद्राष्ट ॥ अद्राक्षम् । भद्राव। भद्राक्षम ॥ पक्षस्तिष्ठति। धनं यशवति । कुमारं ददर्श । गृहे तस्थौ । पुस्तकं ददौ । रूपं पश्यति इत्यादि । "" मलै " धातु-हर्षक्षय, ग्लानि लट्-म्लायति * लिङ् म्लायेत् * लोट्-म्लायतु, म्लायतात् * लङ्- मम्लायत् * लिट्-मम्लो । मम्लतुः । मम्लुः ॥ महिलय, मम्लाथ । मम्ल थुः । मम्ल ॥ मम्ली । भम्लिय । मम्लिम * माशीर्लिङ् म्लायात, म्लेयात् । म्लायास्ताम्, म्लेयास्ताम् । म्लायासुः, म्लेयासुः । इत्यादि दो २ रुप होंगे* लुट्-म्लाता * लट्-म्लास्यति * लुङ्- अम्लास्यत * लुङ्-अम्लासीत्। मम्ला. सिष्टम् । भम्लासिषुः । इत्यादि “मा, धातु के तुल्य जानो॥ ऐसे ही ग्ल ।। २१ “ हू." धातु-कौटिल्य, कुटिलपना, वक्रता लट् हरति लिङ्गहरेत् लोट् हरतु, हरतात * लङ्-शहर * लिट्- जहार । जवरतुः । जहरूः ॥ जहुर्थ । जहरथुः । जहर ॥ जट्टार, जहर । जब रिव । जहरिम * भाशीलिङ्-हर्यात * लुट्-हर्ता • लट्-वरिष्यति * लुङ्- । .. - २० " ग्लै २० तिम्ते - * वरिष्यत् * लुङ् अवार्षीत् । महाष्टम् । अहार्दुः ॥ भवार्षीः । महाष्टम् । अहष्टं ॥ महर्षम् । ॐहा उर्व । पाहा धर्म ॥ मांसं रुधिरं च दृष्ट्वा मनो मायति । धूर्तों हरति । वनं शृणु नात् । धर्मेगा गच्छेत् । मित्रेण न हुरन्तु । पापे ग्लायन्तु । सत्यं भगवन्तु । मार्गण ग्राम गच्छति । पापिना ग्लायेत् । फैश्चिदपि न हरेत् . बंद शृणुयात् । धर्मेस गच्छन्तु । मनोग्लायत् । वञ्चकोहरत् । वचो ऋशोत् । गृहमगच्छत् । अषगः किल्विषे जग्लुः । शौनकादयः शुभ्रवः । रावणो जहार । मृगयां जगाम । मनहते न ग्ठायात, ग्यात् । धर्म न हयात् । मङ्गलानि शणु धाः । सद्गतिं गम्याः । मद्य पापी श्वो ग्लाता । श्रोतास्मि पाठम् । गतास्मो ग्रामम् मलिने ग्लास्थाम । धूत हरिष्यामि । ध्यारूपानं प्रोष्यामि । आश्रमावाश्रम गमिष्यामि । कालोऽगमत् । उपदेशमनीषम् ॥ - अथास्मनेपदप्रकरणम् यहां से आत्मनेपदी धातुओं के रूप लिखते हैं- २२ “ एध " धातु-ऋद्धि, बढ़ना लट-एधते । एधते । एधन्ते ॥ एधसे । एधे थे। एध ॥ एधे । एधा- वहे । एधामहे * लिङ-एधेन । एधे याताम् । एधेरन् ॥ एधेगाः । एधेगा. थाम् । एवम् ॥ एधेप । एधेवहि । एधे महि * लोट-एयताम् । एधेताम् । ए चन्ताम् ॥ एधस्व । एघेपाम् । एघध्यम् ॥ एधै । एधावहै। एधाम है * स्नछ् - ऐधत । ऐधेताम् । ऐधन्त ॥ ऐधथाः। ऐधेथाम् । ऐधधम् ॥ ऐधे । ऐधावहि। ऐधामहि * पिट - एघाञ्चके । एधाच्चकाते । एघाञ्चक्रिरे ॥ एषाचवर्षे । एधा. ञ्चकाथे । एथाचरुवे ॥ एधाच्चके । एघावधाहे । एथाश्चकमहे । एधामास इत्यादि । एषाम्बसूव इत्यादि * आशीलिङ्-एधिषोष्ट ॥ एधिषीयास्ताम् । एधिषीरन् ॥ एधिषीष्ठाः । एधिषी यास्थाम् । एविवीध्वम् ॥ एधिषीय । एधिषी. वहि एधिषीमहि * लुट् एधिता । एपितारौ । एधितारः ॥ एधितासे । एधितासाथे । एधिता॥ एधि नाहे । एधितास्वहे । एधितास्महे * लट् एधि ष्यते । एधिष्येते। एधिष्यन्ते ॥ एधिष्यसे । एधिष्येथे । एविषये ॥ एधिष्ये । एधिष्वायो। एधिष्यामहे * लङ्-ऐधिष्यत । ऐधिध्येताम् । ऐधिबन्त ॥ ऐधि. प्यपाः । ऐधिष्येषाम् । ऐधिष्यध्वम् ॥ ऐधिष्ये । ऐधिष्यावहि। ऐषिष्यामहि । १ - भवादयः ६१ -- - कामयामास । लड-ऐधिष्ट । ऐथिषाताम् । ऐधिवत ॥ ऐशिष्ठा । ऐधिषाधाम् । ऐचिवम् , ऐधितम् ॥ ऐधिषि । ऐधिध्याहि । ऐधिकमहि ॥ २३-" कम धातु-कान्ति, इच्छा लट् - कामयते । कामयेते। कामयन्ते ॥ फागयसे । काम येथे। काम । कामये । काभयावहे । कामयामहे * लिइ--कामयेत । कामयेपाताम् । म. येरन् ॥ कामयेथाः । कामयेयाधाम् । कामयेध्वम् ।। कामधेय । कामयेवहि । कामयेमहि * लोट-कामयताम् । कामयताम् । कामयन्ताम् ॥ कामयस्व । कामयेथाम् । कामयध्वम् ॥ कामयै । कामयाब है कामयाम है * लिट्-घकमे। चकमाते । धामिरे ॥ धमिषे । चकमाथे । धमिध्वे ॥धकमे। धमिवहे। धकमिमहे ॥ वा-कामयाश्चके । कामयाञ्चक्र ते इत्यादि । कामयामासतुः इत्यादि ॥ कामयाम्बस्व । कामयाम्बभूवतुः इत्यादि एध धातु के समान जागो * आशीलिङ् कामयिषीष्ट । फामपिषीयास्ताम् । कामयिषीरम् ॥ कामयिषीष्ठाः । कामायषीयास्थाम् । फामयिषीध्वम् , काम. पिघीयम् ॥ कामविषीय । कामयिषीयहि । कामयिधीमहि ॥ अथवा - कमि. पीष्ट इत्यादि * लुट-कामयिता। कामपितारी। कामयितारः ॥ कामयितासे । सामयितासाये । कामयिताध्ये। कामयिनाहे । कामयितास्वहे । काम. यितास्महे ॥ वा-कमिता । कमितारी । कमितारः॥कमितासे । कमितासाथ। फमिता ॥ कमिलाहे । कमितास्त्र हे । कमितास्महे * लुट-कामयिष्यते । कामयिष्यते । कामयिष्यन्त ॥ कामविष्य में ॥ कामयिष्येथे। कामयिष्यध्ये ॥ कामयिष्ये । कामयिष्यावहे । कामयिष्यामहे ॥ वा-कमिष्यते ॥ कमिध्ये ते । कमिष्यन्ते ॥ कनिध्य मे । कमिध्येथे। कमिध्य ॥ कमिष्ये। कमिष्याव कमिष्यामडे * स्तु भकामयिष्यत । मकामयिष्येताम् । अकामयिष्यन्त ॥ कामयिष्यथाः । भकामयिष्येयाम् । भकामयिष्यत्रम् ॥ असामयिष्ये । अकामयिष्यावहि । भकामयिष्यामहि । मया --अकमिष्यत । कमिध्येताम् । भकमियत ॥ भकमिष्यथाः । अमिध्वेषाम् । भकमिष्यध्वम् ॥ अकनिष्ये। अकसियाकहि । अमिष्यामहि * लुङ्-अचीकमत । अचीकमेलाल् । बचीकमन्त । माघीकमपाः । भचीकमेथाम् । अचीकमध्वम् ॥ अचोकमे । आचीकमावहि। शोकमामहि। अपवा-अधकमता अचक मेताम् । अघकमन्त॥ मचकमयाः। अधकमेपाम् पत्यादि ।
तित - -- २४-" अय " धातु=गत-ज्ञान, गमन, प्राप्ति उपसर्ग के रेफ को ल होता है अय धातु पर हो तो ॥ लट्-भयते । भयेते। अयन्ते ॥ भयसे । अयेथे भयो ॥ अये । भयावहे । अयामहे * परा+अयते-पलायते । प्र+अयते= नायते इत्यादि * लिह-अयेत । गये. याताम् । भयेरन् । अयेथाः । अयेयाथाम् । भयेवम् ॥ भयेय । गयेवहि ॥ भयेमहि * लोट् -भयताम् । अयेताम् । भयन्ताम् ॥ अयस्त्र । भयेथाम् । भयध्धम् ॥ अये । भयाव है। अयामहै * लङ्-आयत। मायेताम् । भायन्त ॥ भायपाः । आयेथाम् । मायध्यम् ॥ माये । मायावहि। भायामहि * लिट् - अयाच भयाञ्चक्राते। अयाञ्चक्रिरे ॥ भयाश्चरुषे । अयाञ्चक थे। अयाञ्चकढवे॥ भयाचक्रे । भयाञ्चरुषहे । अयाचकमहे । अथवा-यामास । मायामासतुः । तथा--प्रयाम्बव । आयाम्बभूवतुः इत्यादि * भाशीलिङ्-प्रयिषीष्ट । पयिषीयास्ताम् । पयिषीरन् ॥ भधिषीष्ठाः। अथिषीयास्थाम् । अयिषीढ्वम् , अयिषीयम् ॥ अयिषीय । पयिषीव ह । अविषीमहि * लुट्-अयिता । अयितारी । मयि मारः ॥ अयितामे । अयितामाथे । अपितावे॥ अयिताहे। अयितास्वहे । अयिनास्महे * लूट-मयिष्यते । अयिष्येते । अयिष्यन्ते, अधिष्यसै। भयिष्यथ । अयिष्य ॥ अयिष्ये । अयिष्यावहे। मयिष्यामहे * स्लङ्- -मायिष्यत । भायिष्येताम् । भायिष्यन्त ॥ आयिष्यथाः । आयिष्येथाम् । मायिष्यध्वम् ॥ मायिष्ये । मायिष्यावहि । मायिष्यामहि ॥ लुङ्-मायिष्ट। मायिषाताम् । आपिषत ॥ आयिष्ठाः । मायिषायाम् । आयित्वम्, मायि. ध्वम् ॥ भायिषि । भाषिष्यहि । गायिष्महि ॥ २५-" दात" धातु-दीप्ति, प्रकाश लट्-द्योतते । द्योतेते । द्योतन्ते ॥ द्योत । द्योतेथे । द्योतको द्योते। द्योतावहे । द्योतामहे * लिङ् द्योतेत । द्योतेयाताम्। द्योतेरन् ॥ द्योतेषाः। द्योतेयापाम् । द्योतेध्वम् ॥ द्योतेय । द्योतेहि । द्योतेमहि * लोट-द्योत. ताम् । द्योतेताम् । द्योतन्ताम् ॥ द्योतव । द्योते याम् । द्योतध्वम् ॥ द्योते। द्योतावहै । द्योताम है* लङ् मद्योगत। भद्योतेताम्। मद्योतन्त ॥ मद्योतयाः । अद्योतेषाम् । अद्योतध्वम् ॥ अद्योते । मद्योतावहि । अद्योतामहि । लिट् दिद्युते । दिद्युमाते । दिद्युतिरे ॥ दिधुप। विद्युताथे । दिद्युतिध्ये॥ दिद्युते । विद्युतिवहे । दिद्युतिमहे * भाशीर्लिङ-द्योतिषीष्ट । द्योतिषीया. । - - ।
भवादयः - ताम् । द्योतिषीरन् ॥ द्योतिषीष्ठाः । द्योतिषीयास्थाम् । द्योतिषीध्वम् ॥ द्योतिषीय । द्योतिषीयाहि । द्योतिषीमहि * लुट् - द्योतिता। धोतितारी । योतितारः ॥ धोतितामे । द्योतिमामाथे। धोतिता ॥ द्योतिताहे। द्यो- तितास्वहे । धोतितास्महे * स्मृट् -द्योतिष्यसे । द्योतिष्येते। धोतिष्यन्ते ।। योतिष्यसे । द्योतिष्येथे। धोतिष्यलये ॥ घोतिष्ये। धोतिष्यावहे । योति- वामहे * बह-अधोतिष्यत । भद्योतिष्येताम् । भद्योतिष्यन्त ॥ मद्योतिष्य. पाः । अद्योतिष्येषाम् । अद्योतिष्यध्वम् ॥ अद्योतिष्ये । अद्योतिष्यावहि। मद्योतिष्यामहि * लुङ्-अद्युतत् । मद्युसताम् । अधुसन् ॥ अद्युतः । न्धुततम् । अद्युतत ॥ अद्युतम् । प्रद्युताव । मधुप्ताम ॥ अथवा-मद्योलिष्ट अद्योतिषाताम् । अयोतिषत ॥ अद्योतिष्ठाः । मद्योतिषायाम् । मद्योति- ध्वम् ॥ अद्योतिषि । मद्योतिष्यहि । अद्योतिष्महि * इसी प्रकारः- २६-" श्वित " धातु-वर्ण, रङ्गना लट् श्वेतते * लिङ् श्वेतेत * लोट् श्वेत्तताम् * -अश्वेतत * सिट- शिश्विते * भाशीलिं--प्रवेतिषीष्ट * लुट प्रवेतिता * लुट्-श्वेतिष्यते * स्तृङ्-श्वेतिष्यत * लुङ्-अश्वितत् , अश्वेतिष्ट इत्यादि । २७-(जि)"मिद" धातु-मित्रता, मिलना॥२८ (जि) स्विदधातु- स्नेह-चिकनाना और छुड़ाना तथा मोहित करना ॥२६ (त्रि) विद धातु भी उक्त अर्थ में ही ॥ ३० रुच धातु-प्रकाशन और प्रीति॥ ३१ घुट धातु-घोटना ॥३२ शुभ धातु-शोभा॥३३ क्षुभ धातु-क्षोभ,गुस्सा ॥३४ ॥३५ नभ, तुभ धातु-हिंसा ॥ ३६ स्रंस ३७ भ्रस धातु-रपटना ।। ३८ ध्वंस धातु-रपटना और गिरना तथा चलना ॥३-स्रम्भ धातु-भरोसा, विश्वास । इन सब के प्रयोग भी " श्वित " के तुल्य जानो॥ उदाहरणानि- यः सम्प्रति अधर्मेण एधते सः पश्चात् महद् दुःखं प्राप्स्वति। धनं कामयते जनः। तदयते निशि चन्द्रमण्डलम् । दिवि घि-द्योतते विद्युत् । रखकः श्वेतते वस्त्रम् । मे दन्त मियो माणघकाः । मामे ज्यैष्ठे स्वेदते सर्व धातु ४ २४ तित । गात्रम् । दन्ते ललना बहून् । बसन्ते रोचते दधि। मध्याहू रोचते रधिः। विजयां घोटते मनः । शुशुभे सरसीव चन्द्रमाः । गोपन्ते दिवि देवतागणार चुशुभे हदयं तस्य । तुतुभे मृगयागतान्मृगान् । नाते वन्य पशृंश्च केसरी । खंसते वर्षा पादः । ग’ण भंसते जामम् । सुखात् ध्वंमते मानीससम्मेगह- मतस्त्वयि प्रभो! वंशस्ते एधिषीष्ट। धर्मेन धनानि कामयध्वम् । युधतिं चमके युवा । अयेत दूरं पापात् । द्योतन्ते नक्षत्राणि भाकाशे । रजको न सुष्ट वक्षाणि अश्वितत् । मेदिघीष्ट जनः परस्परम् । स्वेदते हदयेन सहदयः । कामिनीधु न मनः क्षत्रेदेत । तक न रोचतेऽस्मभ्यम् । जुघुटेपूर्धमिवौषधम् । शोभिषीष्ट तव पुत्रमण्डलम् । सत्येमाग्नु मयं धूर्तस। मभिषीष्टारि- कुलानि भूमिपः । तोभिषीष्ट रिपुमपालं नृपः । संसिता विश्वात् खलः सलु । ध्वंसिध्ये रिपुवाहिनीम् । वेदेष्वत्र म्भिवामहि, दुःखं नाप्साम ।। ४०-वृतु धातु-वर्तमान, होना लट्- -वर्तते । वर्तते । वर्तन्ते ॥ वर्तमे। वसथे । वर्तमे ॥ वक्त । वर्तावहे। वर्तामहेलिङ्-वर्तत। वर्तयाताम्। वरन् ॥ वलथाः । वर्तयाथाम् । वर्तध्वम्।। घर्तय वर्तवहि वर्तमहि # लोट्-वर्तताम् । वर्तताम् । वर्तन्ताम् ॥ वर्तस्व । वर्तयाम् । वर्तध्वम् ॥ वत्त । वर्तावहै । वाम है * लङ्-अधर्तत । भवःताम् । भवन्ति ॥ भवतयाः । अवर्तधाम् । अवर्तध्वम् ॥ भव । भवर्तावहि । अवर्तामहि * लिट-घवृते । धवृताते । वतिरे ॥ वनिषे । वताथे । यतिध्वे ॥ ववृत्त । ववृतिवहे । ववृत्तिमहे * आशीर्लिङ्-वर्तिषीष्ट। वर्तिषीयास्ताम् । वतिषीरन् ॥ वर्तिषीष्ठाः । वतिषीयास्थाम् । वतिषीध्वम्॥ वर्तिषीय । वर्तिषीवहि । वतिषीमहि * लुट्-वर्तिता । वर्तितारी । वर्ति- तारः ॥ वर्तिनासे । वर्तितासाथे । पतिताध्ये ॥ वर्तिताहे । वर्तितास्थहे। वर्शितास्महे * ( तु, पधु, ऋधु और स्यन्दू इन ४ धातुओं के लूट् स्वा और लुङ् में परस्मैपद और भात्मनेपद दोनों रूप होते हैं। यथा स्मृट्-वत्स्यति । वत्स्यंतः । वयति ॥ वत्स्यसि । बत्स्यपः । वय॑थ । वरामि । यत्यावः । वामः ॥ वतिष्यते । यतिष्येते। वर्तिष्यन्ते ॥ धर्तिष्यसे । वत्तियेथे । वर्तिष्यध्वे ॥ वर्तिध्ये । पतिष्यावहे । वरिष्यामहे * लड्-अब- रस्य॑त् । भवस्य॑ताम् । भवत्र्यम् ॥ भवत्स्मः। अवस्पतम् । भवत्स्यंत ॥भव - । - - स्र्यम् । भवाव । मयाम * भवतिष्यत । भवर्तिध्येताम् । भवति। व्यन्त ॥ अवतियथाः । अवतिध्येथाम् । भवतिष्यध्वम् । भर्तिये । भव- तिष्यावहि । पचतिष्यामहि + लुङ्-मयतत् । भपतताम् । अवतम् ॥ भवतः । भवततम् । अपतत ॥ अवतम् । अताव । भवताम ॥ भवतिष्ट । भवतिषाताम् । मधर्तिषत ॥ भवतिष्ठाः । भवतिषायाम् । भवर्तिध्वम् । अतिषि भवतिध्वहि। भवतिहमहि ॥ ४१-वृधु=बढ़ना, वृद्धि। लट्-वर्धते इत्यादि * लिङ्-वर्धेत इत्यादि * लोट-वर्धताम् इत्यादि . ला-भवर्धन इत्यादिलिट्-वषधे इत्यादि माशीर्लिङ-वर्धिषीष्ट इत्यादि -वर्धिसा इत्यादि लट्-वयंति, वर्धिष्यते इत्यादि * लङ्-अवरस्य॑त् । मवर्षियला इत्यादि * लु-अवधत् अधिष्ट सन्यादि । इसी प्रकार:- १२-शृधु-शब्दनिन्दा और ४३-स्यन्दू-टपकना, चूना यथा-वृधु-लट्-शर्धतेलिङ्-शर्धतश्लोट-शर्धताम् * लङ्-मशर्थत * लिट् - शशधे * माशीलिङ्-शर्धिषीष्ट * लुट् शर्धिता * स्लृट् शत्यति। शर्षि ष्यते सूमशय॑त् । अशर्धिष्यत * लुङ- अवधत् । मशर्धिष्ट * स्यन्दू- लट्-स्यन्दते * लिङ्-स्पन्देत * लोट् - स्पन्दताम् * लङ्-मस्यन्दत * लिट्- संस्यन्दे माशीलिम्-स्यन्दिपोष्ट, स्यन्त्सीष्टः। लुट्-स्यन्दिता, स्यन्तामलुट- स्यात्स्यति । स्यन्दिष्यते, स्यन्त्स्यते । लक्-मस्यन्तस्यत् । अस्यन्दिष्यत, मस्यन्तस्यत - लुङ्-मस्यदत् । अस्यन्दिष्ट, अस्यन्त * दिमं वर्तते । वक्तारं शर्धन्ते श्रोतारः । दातारो वर्धन्ताम् । स्यन्दते घृतं. सरितपात्रात् इत्यादि। ४४-दद-दान, देना। दबते । दवेत । ददलाम् । भददत। दवदे। दादिषीष्ट। ददिता। वदिष्यते. मदविष्यत । मदादिष्ट । ४५-त्रपूषलज्जा, शर्म । अपते । अपेत । पताम् । मत्रपत्त । मे, पाते, पिरेत्यादि।अपिल पोष्ट वा-प्रप्सीट । अपिता वा-प्रप्ता । अपिज्यते वा-श्यते । भविष्यत वा-मनश्यत । मत्रपिष्ट बा-मत्रप्त दबदे दामसतीच पदोन अपते मिना कुलटाः इत्यादि । इत्यात्मनेपदिमः ॥ - २६ तिहनते अथोभयपदप्रकरणम् ४६-श्रिज्=सेवा, सहारा लेना, अनुकूलता लट्-अयति । अयते * लिङ- श्रयेत् । अयेत * लोट् । प्रयतु । श्रयताम् * मङ-अनयत् । अयत * लिट्-शिनाय । शिश्रियतुः इत्यादि। शिश्रिये शि. भियाते इत्यादि * प्राशीलिंङ्-श्रीयात् । अयिषोष्ट * लुट्-श्रयिता। अयिता खट-मयिष्यति । प्रयिष्यते • तृङ्-मप्रयिष्यत् । अप्रयिष्यत * लुङ्-अशि. भियत । अशियित । भशिश्रियेताम् । अशिश्रियन्त इत्यादि । ४७-भृ=पालन, भरण, पोषण । भरति । भरते भरेत् । भरेत * भरतु । भरताम् * अमरत् । अभरत . बमार । बचतुः । बधुः॥ बभर्ष । बभ्रथुः । बभ्र ॥ बझार, बाभर । बभूव । बभूम। बधे । बभ्राते । बभिरे ॥ बभूषे। बचाथ । बमुदधे ॥ बधे । बभवहे। बभूमहे * भ्रियात् । भृषीष्ट " भर्ता भर्तामरिष्यति। रिष्यते*मरिष्यत् । मभरि- ध्यत * मभार्षीत् । अमाष्टम् । अभार्घः ॥ अपार्षीः । अभाष्र्टम् । अभाई ॥ अमार्षम् । भसार्व। मार्म * अभृत । अमृषालाम् । मभूषत । मभृथाः ॥ अभूषायाम् । अभृत्वम् ॥ अभृषि । भभूष्वहि । मभूष्महि ॥ ४८-हृन-हरण, चुराना लिट्जहार। जहतुः। जहुः इत्यादि । जहै। जहाते। अहिरे ॥ इत्यादि ॥ शेषरूप भृञ् मे समान हैं। १६-धजधारण, रखना। लिट्-धार। बभ्रतुः इत्यादि । द] दम्राते इत्यादि ॥ शेषरुप भून के तुल्य हैं। ५०-णीज्=पहुंचाना, लेजाना, प्रापण नयति । मयते * नयेत् । नयेत. मयतु। नयताम् * मानयत् । समयत. निनाय । निन्यतुः इत्यादि ॥ निन्ये । निन्याते इत्यादि * मीयात् । नेषीष्टक नेता । नेता * नेष्यति। नेष्यते मनेष्यत् । भनेष्यत * ममेषीत् । अमेष्टाम् । अनेषुः ॥ अनैषीः । अनैष्टम् । अमेष्ट॥ मनैषम् । अनेष्व। ममेष्म * अनेष्ट । म- मेषाताम् । भनेषत ॥ भनेष्टाः। भनेषाचाम् । भनेयम्॥ ममेषि।भनेवहि। चामेमहि ।
अदादयः vasna तुल्य जामो॥ ५१-( डु) पच ( ५ )-पकाना, पाक पचति । पचते * पचेत् । पचेत • पचतु । पचताम् * अपचत् । भप. चत * पपाच पेचतुः इत्यादिपेचे । पेचाते इत्यादिशपच्यात् । पक्षीष्ट पक्ता पता पक्ष्यति । पक्षयते * अपक्ष्यत् । अपक्ष्यत * अपाक्षीत् । मपात || ५२-भजभजन, सेवन लिट्- बभाज भेजतुः भेजुः इत्यादि ॥ भेजे । भेजाते इत्यादि *शेष रूप पच के ५३-यज-देवपूजा, सङ्गति करना और दान लिट्-याज । ईजतुः । ईजुः ॥ इयजिथ, यष्ठ । ईजथुः । ईजायाज, इयज । ईजिव । जिम ॥ ईजे । ईजाते इत्यादि * माशीर्डि-स्यात् । यक्षीष्ट * लुट्-यष्टा * लुङ्-मयष्ट * शेष पच के तुल्य हैं । ५४-बह-पहुंचाना, ढोना, बहना लिट्-उवाह । महतुः। जहुः॥ उपश्थि, उवोट। बापुः । अह॥ पवार, उवह । कहिय । अहिम * कहे। जहाते इत्यादि * माशीलिंछ-उद्यात् । वक्षीष्ट ॥ लुट्-वोढा । वोढारी इत्यादि * लुङ् -भवाक्षीत् । अवोढाम् । अवा. क्षुः ॥ अवाक्षीः । भवोढम् । अवोढ़ : अवालम् । अवाक्ष्व । गवाक्षम ॥ भयोढा भवक्षाताम् । अवक्षत ॥ अवोढाः । भवक्षाधाम् । भवोदम् ॥ भवति । भव. वहि । भवक्षनहि * शेष पच के तुल्य हैं । धनिनं प्रयन्त दरिद्राः । भरते वकुटुम्बं जमः । धरति लोकं धर्मः । पाकं पचति सूदः । ईश्वरं भज । देवान् यजस्व । भारं वहसि गर्दः । प्रायः इसी प्रकार धातुपाठ में लिखे भ्वादिगणस्थ मन्य धातु भी जानो ॥ इतिउभयपदप्रकरम् । भ्वादिगणश्च समाप्तः ॥ अथ तिङन्ते अदादिगणप्रकरणम् सत्र परस्मैपदिन: ५५-अद-भक्षण, खाना भत्ति । मत्तः । मदन्तिमल्सि । मस्यः । अस्प ॥ भनि। मःमः। मद्यात अद्याताम् । मधुः॥भणाः। अद्यातम् । मद्यात मद्याम् । भद्याव ।
तिङन्ते - गद्याम * भत्तु, अत्तात् । भत्ताम् । भदन्तु ॥ अवि, मसात् । तिम् । मत भवानि । अदाव। अदाम * शादत् । भाताम् । मादन ॥ आदः । भातम् । भात ॥ मादम् । माद । भान * लिट्-माद । मादतुः । भादुः । आदिया भादथः । भाद् ॥ माद। आदिव। मादिम * अपवा-जघास । कक्षतुः । जसु ॥ जयसिप । अक्षथुः । जक्ष ॥ जघास, जघस । जक्षिक । जक्षिम *गाशीलिंड- भद्यात् । मद्यास्ताम् इत्यादि ॥ लुट् -सत्ता। भत्तारी इत्यादि * लुट- मत्स्यति लङ्-आत्स्यत् * लुङ्-मघमत्। मघमताम् । अघसम् ॥ अघसः। मघरतम् । अघसत ॥ अघसम् । अघसाव । अघसाम ॥ ५६-हन्-हिंसा, मारना, बध करना और गति हन्ति हतः प्रन्ति । हमि हपः हथ । हम्मि हन्यः हम्मः#हन्यात । इन्या- ताम् इत्यादि * हन्तु, हत्तात् । हताम् । प्रन्तु ॥ जहि, हतात् । इतम् । हन । हनानि । इमाव । हमाम * महन् महताम् अनन् । महन् अहतम् महत । महनम् अहन्व महम्म • जघान जनतुः जनः । जघनिष, अधम्प । जनयः । जन्न । जचान, जघन । जनिय । जनिम *वध्यात् इत्यादि * हन्ता * हनि- यति * महनिष्यत् * अवधीत् इत्यादि । ५७-यु=मिलाना और पृथक करना योति युतः युवम्ति यौषि युथः युथ। यौमि युवः युमः*युयात् प्रत्यादि यौतु, युतात् । युताम् । युवन्तु ॥ युहि, युतात् । युतम् । युत ॥ यवानि । यवाव । यवाम * भयौत् भयुताम् भयुवन् । भयौः मयुतम् मयत । भय- यम् अयुव प्रयुम * युगाव युयुवतः ययुः । युथविष युयुधथुः युयुव । युयाव, युयव युयुविष युयुविन • यूयात् इत्यादि * यविता इत्यादि यविष्यति इत्यादि भयविष्यत् इत्यादि • भयावीत् इत्यादि । ५८-या-यान, जाना, पहुंचना, पाना पाति यातः इत्यादि . यायात • यातु - मयात् । याताम् । मयुः, अपाम् । इत्यादिश्ययो ययतुः ययः ॥ पयिष, ययाय ययथः यय॥ ययौ ययिव यपिम यायात् यायायाम यातायास्यति प्रयास्यत् ॥ मयासीत इत्यादि। ५६-वा-गति, गन्धन, बूकरना ॥ ६०-भा चमकना, प्रकाश ॥६१-स्ना-स्नान, न्हाना ॥ आशीर्लिङ्-स्नायाद, - ।
मदादयः - - स्नेयात् ॥ १२-श्रा-पकाना ॥ प्रायात्, श्रेयात् ॥ ६३-द्रा धुरी चाल चलना॥द्रायात्, देयात्॥६४-सा-भक्षण,खाना॥ रसायात्, प्से यात् ॥ ६५-रा-देना ॥६६-ला-लेना ॥६७-दा ( प )-काटना । ६८-ख्या-कहना, बोलना ॥ ख्यायात्, ख्येयात् । इन धातुओं के शेष रूप भी “५८-या के तुल्य हैं। अन्नमत्ति । शत्रु हन्ति । दुग्धं मिष्टं च यौति । ग्रामं याति । वायुर्वाति । सूर्यो भाति । ब्राह्मणः स्नाति । सूपं श्राति पाचकः । द्राति धूर्तः । माति मगं ध्याघ्रः । धनं राति, लाति वा । दान्ति धान्य क्षेत्र कषकाः । ख्याति धर्म गुरुः शिष्याय ॥ ६९-विद्-ज्ञान, जानना लद-वेत्ति वित्तः विदन्ति । वेत्सि वित्थः विस्थ । वेद्मि विद्वः विद्मः ॥ अथवा-वेद विदतुः विदुः । वेल्थ विदथुः विद । वेद विद्ध विन* विद्यात् * वेत, वित्तात् । वित्ताम् । विदन्त । विद्धि, वित्तात् । वित्तम् । वित्त । वेदानि । वेदाय । वेदाम ॥ अपवा-विदाङ्करोतु इत्यादि * भवेत् । अवित्ताम् । भविदुः । अवे, भवेत् । वित्तम् । अवित्त ॥ मवेदम् । अविद । भविन * विदाञ्चकार इत्यादि पवा-विवेद विविदतुः इत्यादि * विद्यात विद्यास्ताम् . वेदिता * बेदिष्यति * अवेदिष्यत् भवेदीत् ॥ ७०-अस होना, सत्ता अस्ति स्तः सन्ति । असि स्थः स्थ । अस्मि स्वः स्मः * स्यात् स्याताम् इत्यादि * अस्तु, स्तात् । स्ताम् । सन्तु ॥ एधि, स्मात् । स्तम् । स्त ॥ भमानि । मसाव । असाम * मासीत् भास्ताम् भासन् । भासीः भास्तम् भास्त। भासम् आस्थ भास्म * शेष बभूव इत्यादि "भू" धातु के तुल्य जानो ॥ ०१-इ (ण )-गति, चलना, पहुंचना, पाना एति रतः यन्ति । एषि इथः इथ । एमि वः इमः स्यात् इत्यादि . एतु इत्यादि * ऐत् ऐताम् भायन् । ऐः ऐतम् ऐत । भायम् ऐष ऐम * इयाय ईयतः युः । इययिष, इयेथ ईयथुः य । इयाय, इयय ईयिव ईयिम ईयात् एता * एषति * ऐष्यत् * भगात् अगाताम् भगुः । भगाः भगातम् भगात। ननाम् अनाव भगाम" तिम्ते धेत्ति सर्वमीश्वरः । विद चकार कृष्णः चतुष्टिकलाः । विदाकुर्वन्तु भवन्तः शास्त्रोक्तं धर्मम् । अस्ति धान्यम् । ग्राममेति पान्थः । पद्भधामियात् किमपि दूर नित्यम् । भुवोन्तमियाय । इति परस्मैपदप्रकरणम् । अथात्मनेपदप्रकरणम् - ७२-शी=सोना, शयन करना, नींद लेना शेते शयाते शेरते । शेषे शयाथे शेत्रे । शये शेवहे शेमो - शयीत शयीयाताम् शयीरन् । शयीपाः शयी याथाम् शयीध्वम् । शयीय शयीयहि शयीमहि * शेताम् शयाताम् शेरताम् । शेष्य शयाथाम् शेध्वम् । शये शया- व है शयामहै * अशेत अशयाताम् अशेरत । अशेधा सशयाथाम् अशेध्वम् । अशयि अशेयहि भशेमहि* शिश्ये शिश्याले शिश्यिरे। शिश्यिषे शिश्याथे शिश्यिये। शिश्ये शिश्यिवहे शिश्यिमहे * शयिषीष्ट * शयिता* शयिष्यते * अशयिष्यत * प्रशयिष्ट अशयिषाताम् अशयिषत । अशयिष्ठाः मशयिषाथाम् मशयिध्वम् । मशयिषि भशयिध्वहि मशयिमहि ॥ ७३-इङ्=पढ़ना, अध्ययन पमे पूर्व अधि* तपसर्ग नहीं बिछुहना किन्तु सदा साथ ही रहता है। यथा-अधीते अधीयाते भधीयते । अधीषे मधीयाथे अधीधे । भधीये भधीवहे मधीमहे * मधीयोत अधोयी याताम् अधीयोरन् । अधीयीथाः मधी- यीयापाम् अधीयोध्वम् । मधीयीय मधी यीवहि मधीयीमहि * अधीताम् आधीयाताम् अघीयताम् । अधीब्ध अधीयाथाम् मधीध्वम् । अध्यय अध्यया- वह अध्ययामहै * ध्येत मध्य याताम् माध्यै यत । मध्ये पाः मध्येयापाम् अध्यध्वम् । मध्येयि अध्यैवहि मध्ये महि * अधिनगे अधिजगाते अधिन- गिरे । अधिणगिषे अधिजगाथे मधिजगिधये । भधिजगे मधिजगिवहे गधि. जगिमहे * अध्येषीष्ट मध्ये षीयास्माम् इत्यादि * अध्येता मध्येतारौ * मध्येष्यते मध्येष्ये ते * मध्यगीष्यत अध्यगीष्येताम् अध्यगीष्यन्त । मध्यगी. व्यथाः अध्यगीष्येथाम् मध्यगीष्यध्वम् । मध्यगीध्ये मध्यगीष्यावहि मध्यगी. ध्यामहि । अपवा-मध्येष्यत अध्यष्येताम् अध्यष्यन्त । मध्य ष्यथाः मध्य- ध्ये पाम् मध्येष्यध्वम् । अध्यष्ये मध्यष्यावहि अध्यध्यामहि * मध्यगीष्ट मध्यगीषाताम् मध्यगीषत। मध्यगीष्ठाः मध्यगीषापाम् भव्यगीध्वम् । अध्या अदादयः गीवि माध्यमोष्यहि अध्यगीमहि । अथवा-अध्यष्ट अध्यषानाम् अध्यषत । मध्ये ष्ठाः अध्यषाथाम् मध्येध्वम् । मध्य षि भध्यै ध्वहि भध्यैष्महि ॥ बालः शेते। छात्रोऽधीते । इत्यात्मनेपदप्रकरणम् ॥ अथोभयपदप्रकरणम् । ७४-दुह-दुहना, प्रपूरण, भरना ॥ परस्मै-दोग्धि दुग्धः दुहन्ति । धोक्षि दुग्धः दुग्ध । दोलि दुड्डः दुः* दुधात दुखाताम् इत्यादि * दोग्ध, दुग्धात् दुग्धाम् दुहन्तु । दुग्धि, दुग्धात् इत्यादि * अधोक् , ग का दुग्धाम् अदुहन् । अधोक्, ग अदुग्धम् भदुग्ध । भदो- हम् अदुष्व गदुल * दुकोह दुदुहतुः दुदुहुः । दुदोलिथ, दुग्ध दुदुहथुः दुदुह । दुहोह दुदुहिव दुदुहिम * दुध त दुह्य स्ताम इत्या:ि * दोग्धा दोग्धारी * धोक्ष्यति * अधोक्ष्यत् * अधु क्षत् ॥धुक्षताम् ॥५क्षन् । अधुक्षः अधुक्षतम् मधुक्षत । अधुक्षम् अधुक्ष व अधुक्षाम ॥ गाताने दुग्धे दुहाते दुहते । धुक्षे दुहाथे धुग्ध्वे । दुहे दुहहे दुहरहे * दुहीन दुही याताम् दुहीरन् इत्यादि * दुग्धाम् दुहाताम् दुहताम् । धुक्ष्व दुहायाम धुरध्वम् । दुहै दुहाव है दुहा- महै * अदुग्ध भदुहानाम् अदुभत । अदुग्धाः "दुहाताम् अग्ध्वम् । अदुहि भदुहहि अदुलहि * दुदहे दुदुहाते दुदुहिरे इत्यादि * धुक्षीष्ट धुक्षीयास्ताम् इत्यादि * दोग्धा दोग्धारी दोग्धारः । दोकासे इत्यादि * धोक्ष्यते * अधो. ध्यत* अदुग्ध, अधुक्षत। अधुक्षामाम् । अधुनन्त । अदुग्धाः, अधुक्षथाः । अधुक्षा. थाम् अधुग्ध्वम् , अधुक्षध्वम् ॥ मधु क्षे। अदु हहि, धुक्षाव ह । अधुक्षामहि ॥ रक्षकः शेते । विद्यार्थिनोऽधीते । गां पयो दोग्धि गोपालः-ग्याल गौ दुष्ह धातु के दो कर्म होते हैं। जैसे १ गो, २ दूध इत्यादि। ७५-दिह-उपचय, सञ्चय, जुड़ना, लोपना ॥ देग्धि। दिग्धे *दिद्यात्। दिहीत * देग्धु । दिग्याम् आगे दुह धातु के तुल्य जानो। ७६-लिह-आस्वादन, चाटना ॥ लेहि लीढः लिहन्ति ॥ लेक्षि ली ढः लीढ । लेलि लिहः लिहाः ॥ लोढे लिहाते लिहते । लिक्ष लिहाथे लीढ्वे । लिहे लहहे लिह हे * लिह्यात् । लिहीत * लेदु, लीढास लोढाम् लिहन्तु । लीहि लोढात लोढम् ली ढ । उहानि लेहाव लेहाम ॥ लीढाम् लिहाताम् लिहताम् । लिक्ष्य लिहाथाम् लीढ्वम् । डे है लेहावहै लेहामहै ** अलेट गाली ढाम् भलिहन् । मलेट भलीढम् - -- । से दूध दुहता है ३२ तिङन्ते - - मलोढ । मलेहम् अलिहू भलिम ॥ अलीढ भलिहाताम् आलिहत । अस्लीढाः मलिहाथाम् अलीढ्वम् । अलिहि अलिहि अलिलहि * लिलेह लिलिहतुः लिलिहुः । लिलेहिय लिलिहथः लिलिह । लिलेह लिलिहिय लिलि हिम । लिलिहे लिलिहाते लिलिहिरे। लिलिहिषे लिलिहाथे लिलिहिथ्थे । लिलिहे लिलिहिवाहे लिलिहिमहे * लियात् । लिखीष्ट " लेढा लेढारी लेढारः । लेढासि * लेक्ष्यति । लेक्ष्यते * जलेक्षयत् । मलेक्ष्यत * अलिक्षत् । सलीढ, मलिक्षत । अलिक्षाताम् । मलिक्षन्त । अलीढाः, अलिक्षथाः । भलिक्षायाम् भलीढ्वम् , भलिक्षध्वम् । अलिले। अलिहुहि, अलिक्षावहि । भलिक्षामहि ॥ युवा शरीरं देग्धि । भ्रमरो रसं लेढि इत्यादि । ७७-ब्रूज=बोलना, कहना ब्रवीति, आह । व्रतः, प्राथुः । ब्रुवन्ति, माहुः ॥ प्रवीषि, भात्य । यूथः माहथुः । बेथ ॥ ब्रवीमि । ब्रूयः । ब्रूमः ॥ ब्रूते बुवाते अबते । ब्रूषे ब्रुवाथे श्रूध्वे । ब्रुधे बेबहे ब्रूमहे * ब्रूयात ब्रूयाताम् । ब्रुयीत धीयासाम् ब्रवीतु, ब्रूतात् । ब्रूताम् । ब्रुवन्तु ॥ ब्रूहि, ब्रूतात् । ब्रूतम् । ब्रूत ॥ ब्रवाणि प्रवाव। ब्रवाम ॥ ए॒ताम् बुवाताम् अवताम् । अव्व ब्रुवाथाम् ध्वम् ॥ ब्रय अवाव है घाम है * अब्रवीत् अवताम् अब्रुधन् । अब्रवीः अबूतम् ब्रूत। अब्रवम् अव अब्रूम ॥ अब्रूत वाताम् अब्रुवत । अथाः अब्रुवायाम् अध्यम् ॥ युधि जब वहि भबमहि * उवाच जपतुः ऊचुः । सवचिथ, उवथ ऊचथुः ऊध । उवाच, सवच उचिव चिम ॥ ऊचे ऊचाते अधिरे इत्यादि * च्यात् । वक्षीष्ट * वक्ता। वक्ता * वक्ष्यति। वक्षयते * अक्षयत् । अवक्षयत * सोचत् अवो- चताम् इत्यादि ॥ भयोधत अधोघेताम् इत्यादि ॥ ७८-ऊर्ण-आच्छादन, ढकना, ओढ़ना कर्णोति, ऊर्णीति । ऊर्गुतः। कर्तुवन्ति ॥ जर्णोषि, जर्णोषि । ऊर्ग यः । कर्णथ ॥ कर्णोमि, जौमि । कर्णवः । ऊर्गुमः ॥ कर्णसे ऊर्सवाते कर्णवते । कर्णधे इत्यादि * ऊर्गुयात् । कर्णवीत * ऊर्णोतु, ऊर्गौतु, ऊ तात् । ऊर्गु. ताम् । ऊर्णवन्तु ॥ ऊर्गुहि, ऊर्गुतात् । कर्तृतम् ऊर्गुत ॥ कर्णवानि । कर्णवाघ । कर्णवाम ॥ जणुताम् ऊर्जुवाताम् अणुवताम् । ऊर्गुष्य इत्यादि * भौर्णोस् औणुताम् औषुवन् । और्णोः मोर्गुतम् भौटुंत । और्णवम् भौर्णव मौर्णम । भौणुन और्गुवाताम् भौषुवत । और्गुणाः इत्यादि * कर्णनाव - - - जुहोत्यादयः जर्णनुवतुः ऊर्गुन वः । ऊर्जुनविय, जणु मुविथ । कर्णनुषथुः । कर्णभूव ॥ कर्णनास, कर्णनव । कर्णनुविव, कर्णमविध । कर्णनधिम, कर्णनविम ॥ कर्ण नुधे की मुवाते जणुनविरे ॥ ऊर्णमुविषे, ऊर्जुनविषे । कर्णनवाथे । अणुविधे, जर्नुमविश्व ॥ कर्णनुवे । कर्णनुविधहे, कर्णमविवहे । कर्ण. नधिमहे, ऊर्जुनविमहे * अर्णयात् ॥ कर्ण विषीष्ट, कर्ण विषीष्ट # कर्णवि- सार, अणुविता २ * कर्ण विष्यति, जणुविष्यति ॥ ऊर्णविष्यते, कणुविष्यते * भोर्णविष्यत्, औणुविष्यत् । गौण विष्यत, गौणुविष्यत - भौर्णधीत, औधीत्, भीषुवीत् ॥ गौणविष्ट अणुविष्ट इत्यादि । गुरुहितं वचमं ब्रूते ब्रवीति वा । कर्णोति वस्त्रेस देहम् । सयाच पधनं सत्यम् । भवोचदयङ्गमम् इत्यादि । इत्यदादिगणप्रकरणम् ॥ - अथ सिङन्ते जुहोत्यादिगणप्रकरणम् सत्र परस्मैपदिनः ७६-हु-दान और खाना वा हवन करना न होति जुहुतः इति ॥ जुहोषि जुहुयः जुहुय । जुहोमि जुहुयः जुहुमः * शुद्धयात् * जुहोतु, हुतात् । जुहुताम् । जुवतु ॥ जुहुधि, जुहुतात् । नुहुतम् । जुहुत ॥ जुहधानि जुहवाय जहयाम * जुहोत् अजुहुताम् भज- हधुः । अजुहोः अनुहुतम् अनुहुत ॥ अजुहवम् मालुराव. मजुहुम * जुहवा- चकार जुहवाञ्चक्रतुः इत्यादि ॥ अथवा-जुहाव । जुहुवतुः । जुहुयः ॥ जुहोथ जुहुयथः । जुहुव ॥ जुहाव, तुक्षय । जुहुव । जाम * हूयात् होता. होष्यति * महोव्यत् * महौषीत् महीष्टाम् महौषुः । अहौषीः महीष्टम् महीष्ट । महौषम् महीष्व भीष्म ॥ ८०-( जि) भी-डरना बिभेति। बिभीतः, बिमितः । बिभ्यति ॥ विशेषि । बिभीयः, बिनियः बिभीथ, विभिप । प्रिमि । बिशीयः, बिभिवः । विभीमः, बिभिमः * बि. मीयात् मिभियात् इत्यादि * बिभेतु, बिभीतात , बिमितात् । बिभीताम् , बिभिताम् । बिभ्यतु । विभीहि, विभिहि । विशीतात्, बिभितात् । बिभी- तम्, बिभितम् । बिनीत, धिभित ॥ बियानि बिभयाव बिसयाम * मजि. " - - भेज । भविभीताम् । अविभिगम् । अविभयुः ॥ अबिसे । अनिमीतम्, अवि- भितम् । अबिभीन, गाबिभित ॥ अभियम् । अबिभीव, सबिभिव। भवि. भीम, मविशिम * बिभयानकार वा विमाय विभ्यतुः बिभ्यः । बिभेष । बिभ्यपुः । बिभ्य ॥ बिभाय, बिभय । बिभ्यिय । बिभ्यिम । श्रीयात् भीया. स्ताम् इत्यादि * भेता श्रेष्यति * अभेष्यत् * भैषीत् इत्यादि । ८१-ही-लज्जा करना शर्म करना जिति । निहीतः । जिहियति ॥ हिषि इत्यादि * जिहीयात् , * जिरेतु * अजित * शिड्याञ्चकार इत्यादि । वा जिहाय। जियितुः इत्यादि * ही यास् * हेता *ष्यति * महेष्यत् * अषीत् ॥ ८२-पृ-पालन और पूरण पूरा करना, भरना पिपर्सि पिपूर्तः पिपुरति । पिपर्षि पिपूर्णः पिपूर्ण ॥ पिपर्मि पिपूर्वः पिपूर्मः - पिपूर्यात * पिपर्नु, पिपूर्तास् । पिपूर्ताम् । पिपुरतु ॥ पिपूर्धि, पिपूर्तात् । पिपूर्तम् । पिपूर्ण ॥ पिपणि । पिपराध । पिपराम * अपिपः भपिपूर्ताम् मपिपतः । अपिपः अपिपूर्तम् अपिपूर्त । मपिपरम् अपिपूर्व अपिपूर्म * पपार। पातुः, पपरतुः । पमः पपरुः परिण। पप्रथः, पपरथुः । पप्र, पपर ॥ पपार, पपर। परिव परिघ । पत्रिम, पपरिम* पूर्यात् * परिता, परीता । परितारी, परीतारौ * परिष्यति, परीष्यति * अपरिष्यत् , अपरी- ज्यत पारीत आपारिष्टाम् नपारिषुः ॥ अपारीः अपारिष्टम् अपारिष्ट ॥ भपारिषम् पारिष्व अपारिएम ॥ ८३-( ओ ) हा ( क ) त्याग, छोड़ना जहाति । नहितः, जहीतः । अहति ॥ जहासि। जहियः, जहीयः इत्यादि जह्यात् । जहातु । जहितास्, जहीतात् । जहिताम् , जहीताम् । जहतु । जहाशि, जाहिहि, जहीहि । जहितम् , जहीतम् । जहित, जहीत ॥ जहानि। जहाव । जहाम । अजहात् । भजहिताम् , अजहीताम् । अजहुः ॥ अजहाः । मजहितम् , अजहीतम् । सहित, अजहीत ॥ जहाम् । अजहिव, भज. हीव । अजाहिम, अजहीम । हो । जहतुः । जहुः ॥ जहिय, जहाथ । जहथुः । जह ॥ जहौ जहिय जहम * हे पात् । हाता । हास्यति । महास्यत् । महासीत् महासिष्टाम् शहासिषः । महासीः महासिष्टम् महासिष्ट । भहासिषम् महासिष्य महासिम ॥
जुहोत्यादयः भाषा बनाओ ब्रामणाय दक्षिणां जुहोति । मिष्टं जुहोति । अग्नौ घृतं जहोनि । दुष्टाद् विक्षेति । पापात लिहीहि, जिहिदि । शूरः प्रतिज्ञां पिपर्ति । पात्रं दुग्धेन पिपूर्धि । सुखं जहाति धनाय कृपणः ॥ इति परस्मैपदिन: अथात्मनेपदिन:- ८४-मा ( ङ् )=मान, मापना वा मानना और बोलना मिमीते मिमाते मिमते । मिमीषे मिमाथे मिमी। मि मिमीवहे मिमी. महे * मिमीत मिमीयाताम् मिमीरम् । मिमीथा: मिमीयाथाम् मिमीध्वम्। मिमीय मिमीवहि मिमीमहि * मिमीताम् मिमाताम् मिमताम् । मिमीय मिमाथाम् मिमीध्यम् । मिमै गिमाव है मिमामहै * मिमीत अमिमाताम् भमिमत । भमिमीथाः समिमाथाम् अमिमीध्वम् । ममिमि ममिमीबहि ममिमीमहि * ममे ममाते ममिरे । ममिषे ममाथे ममिध्ये। ममे ममिवहे मामिमहे * मासीष्ट मामीयास्ताम् * माता * मास्यते - समास्यत . भमास्त समासाताम् समासत । अमास्थाः भमासापाम् भमाध्यम् । भमासि भमास्वहि भमास्महि ॥ ८५-(ओ) हा (ङ) गति-ज्ञान, गमन, प्राप्ति जिहीते जिहाते जिहते। जिहीषे इत्यादि * जिहीत जिहीयाताम् * जिहीताम् * मजहीत * जहे * हासीष्ट हाता * हास्यते * महास्यत* महासा॥ इत्यात्मनेपदिनः अधीभयपदिनः- ८६-(डु) भृ (जू)-धारण और पोषण, पालन परस्मैः-बिभर्ति * बिभूयात् * बिभर्स, निभृतात्। बिभृताम् । निश्चतु * मधिभः अविभूताम् अविक्षसः । सविधः मविभूतम् अचिभूत । अबिभरम् मबिभूव मविभूम * बिभराञ्चकार वा-बभार * भियात* भर्ता अरिष्यति * ঋষি অফার্থী জাদু জবা । अभार्षीः ममार्टम भनाई । सभाम् सभा मार्म *म-विमते बिचाते विनते । विपके तिबन्ते बिभ्राथे विभूध्वे । बिभ्रे बिमुवहे विभूमहे * विधीत बिनीयाताम् * बिम. ताम् बिभ्राताम् बिभ्रताम् । बिभृष्य बिभ्राथाम् इत्यादि * अबिमृत अवि- भ्राताम् भाविधत । अबिभूपाः अबिभ्राथाम् अबिमुध्वम् । भबिधि बिम्बह अबिभुमहि * बिराञ्चके बिसराञ्चक्रात वा-बधे बनाते * भूषीष्ट * अर्ता * भरिष्यते * मरिष्यत " अभूत अभृषाताम् ॥ ८७-(डु) दा ( ३ )-दान, देना ददाति दत्तः ददति । ददासि दस्थः दत्थ । ददामि दद्वः दमः ॥ दत्ते दवाते ददते । दरसे ददाथे पद्ध्वे । ददे ददहे महे * दद्यात् दद्याताम् दधुः । दद्याः दद्यातम् इत्यादि ॥ ददीत ददीयाताम् * ददातु, दत्तात् । दत्ताम् । ददातु ॥ देहि, दत्तात् । दत्तम् । दत्त ॥ ददानि । ददाय । ददाम * दत्ताम् ददाताम् ददताम् । दरख ददायाम् दध्वम् । ददै ददाय है ददाम है " अददात् भदाताम् अददुः । अददाः भददातम् भददात । शाददाम् अवदाय अददाम ॥ मदत गददाताम् अददत ददौ ददतुः ददुः । ददिथ, ददाय ददथुः दद । ददौ ददिव ददिम ॥ ददे द दाते ददिरे । ददिषे * देयात देयास्ताम् ॥ दासीष्ट * दाता ॥ दाता * दास्यति ॥ दास्यते * अदास्पत् ।। अदास्यत * दास् ॥ मदित अदिषाताम् भदिषत। मदियाः मदिषायाम् अदिध्वम् । अदिषि प्रदिष्वहि अदिष्महि । ८८-(डु) धा ( ञ् )=धारण और पोषण, पालना दधाति धत्तः दधति । दधासि ॥ थत्ते दधाते दधते * दध्यात् ॥ दधीत # दधातु, धत्तात् । धत्ताम् । दधतु ॥ धत्ताम् दधाताम् दधताम् । धरस्व मदधात् ॥ अधत्त * दधौ ॥ दधे * घेयास् ॥ धासीष्ट * धाता ॥ धाता * धास्यति । धास्यते * मधास्यत् ॥ मधास्यत - अधात् ॥ मधित ॥ ८९-णिजिर-शुद्ध करना, शौच और पोषण नेनेति नेनिकः निजति । नेनेक्षि मेनिक्थः नेमिक्थ । मेनेजिम नेनिज्वः मेनिज्मः ॥ नेनिक्त नेमिनाते नेनिजते । मेनिक्षे मेनिजाते नेनिग्ध्वे । नेनिजे नेनिज्वहे नेनिज्महे * नेनियात् ॥ निजीत * नेमेक्तु, नेनिक्तात् । नेनिक्ताम्। नेनिजतु ॥ मेनिग्धि, निक्तात् । मेनिक्तम् । नेमिक्तानेने जानि । नेनेजाव । नेनेजाम ॥ नेनिक्ताम् ने निजाताम् नेनिजताम् । नेनिक्ष्व नेमिजाथाम् मेनि. प्रम् । नेनेजे नेनेजावहै नेनेजामहे मनेनेक् ममे निक्ताम् भने मिजुः । भनेनेक 19 दियादयः अमेनिक्तम् अनेनिक्त । सनेनेजम् भमंनिज्व भनेनिज्म ॥ गनेमिक्त अनेमि. जाताम् जनेनिजत । समेनिक्याः भने निजाथाम् अमेनिग्ध्वम् । अनेनिजि अमेनियहि अनेनिज्महि * गिनेज निनिजतुः निमिजः॥निनेजिय, गिनेक्य निनिमः निनि ॥ मिनेज निनिजिन निमिजिम ॥ निमिजे निनिजाते नियात् ॥ निक्षीष्ट मेला ॥ नेक्ता नेष्यति ॥ नेक्ष्यते * भक्ष्यत् ॥ अनेयत * भनिजत् भनिजताम् अनिजन इत्यादि ॥ अथवा-अनैक्षीत अमे. ताम् अनैक्षुः । भनेक्षीः मनैक्तम् अनैत । भनेक्षम् अनैव अनेम । अनित अनिमाताम् भनि जसभनिक्थाः अनिशाथाम् भनिग्ध्वम् । अनिजि भनिन्वहि भनिज्महि ॥ भाषा बनामो- माता पुत्रं मिमीते। विद्यार्थी शाखस्यायं जिहोते। बिभर्ति त्रैलोक्यं विष्णुः विभुते कुटुम्खं गृहो । ददाति दक्षिणां यजमानः पुरोहिताय । दधाति माला माणवकः । चत्ते पुनं माता। नेनेक्ति वासांसि रजकः। नेनिक्त क्षुधातान् दयालुः॥ इति जुहोत्यादिगण प्रकरणम् ॥ अथ तिङन्ते दिवादिगणप्रकरणम् ।। सत्र परस्मैपदिनः ॥ १०-दिघु-क्रीडा, जीतने की इच्छा, जुआ खेलना, व्यव- र, चमकना, स्तुति, हर्ष, मद, स्वप्न, इच्छा और गति ॥ दीव्यति * दीव्येत् दीव्यतु * भदीव्यत् * दिदेव दिदिवतुः दिदियः इत्यादि * दीव्यात * देविता * देविष्यति । अदेविष्यत् * भदेवीत् अदेवि- ष्टाम् अदेविषुः । शदेवीः अदेविष्टम् भदेविष्ट इत्यादि । ११-षि-सीना, सूचीकर्म, तार पूरना सीव्यत्ति * मीठयेत् * सीव्यतु * भसीव्यत् * सिषेव * सीव्यात् * सेवि- सा सेविष्यति * भविष्यत् * अमेवीत् ॥ १२-नृती-नाचना, नृत्य करना नृत्यति * नृत्येत् ॥ मत्यतु - अनृत्यत् + मत मनततुः मन्तुः । नम- तिथ मनृतथुः मन्त । नमर्त नतिष नऋतिम * नृत्यात नत्यास्ताम् * म.
तिहस्ते - । तिसा * मतिष्यति, मत्र्यति # अनतिष्यत्, भनस्य॑त्, * भनषत् मन. तिष्टाम् अगर्तिषुः । मगर्ताः इत्यादि ॥ ६३-त्रसी दुख पाना, डरना त्रस्य सि, सति । त्रस्येत् , अमेत् । अस्यतु, प्रमतु । अनस्यत्, शत्रसत् । तत्रास । सत्रमतुः, सतुः । तन्नसु, सुः ॥ तमिथ, अमिथ । तत्रसयुः, मथुः । सत्रस, बेस । तत्राम, सत्रम । तत्रमिव, त्रेसिघ । तसिम, सिम ॥ अस्यास् । अमिसा । त्रसिष्यति । अत्रमिष्यत् । अत्रासीत्, अनसीत् ॥ ६४-शो-तन करण, बारीक करना, छोलना श्यति । श्येत् : श्यतु । अश्यत् । शशी शशतः शशः । शशिथ, शशाथ शशयुः पश। शशी शशिव शशिम ॥ शायात् । शाता । शास्यति । अशास्यत् । अशासीत् भशासिष्टाम् इत्यादि, अथवा - अशात् अशाताम् अशुः । अशाः मशातम् भशात । अशाम् अशाव अशाम ॥ १५-छो-छेदन, बींधना छति । छेघत् । छपतु । अच्छयत् । चच्छौ चच्छतुः । छायात् । छाता। छास्यति । मावास्यत् । अच्छात इत्यादि वा-अच्छासीत् इत्यादि । २६-षोअन्तकर्म, नाश करना स्यति । स्येत् । स्यतु । गस्यत । ससी ससतुः । सायात् । साता। सास्यति । शेष रूप शो के तुल्य हैं। ६७-दो-तोड़ना, खण्डित करना द्यति । द्येत् । द्यतु । गद्यत् । ददी ददतुः । देयात् देयास्ताम् इत्यादि। • शो " के तुल्य हैं । ८-व्यध-ताड़ना, दुःख देना, घाधना विध्यति । विध्येत् । विध्यतु । अविध्यत् ॥ विध्याध । विविधतुः । विविधुः ॥ विष्यधिथ, विव्यदु । विविधथुः । विविध ॥ विव्याध, विव्यध । विविधिव । विविधिम ॥ विध्यात् . व्यद्धा व्यद्वारौ। व्यत्स्यति । भठयत्स्यत् । अध्यात्सीत् अव्याद्वाम् भव्यात्सुः । गव्यारसीः अव्यागुम् अव्याहु । मध्यात्सम् शेष रूप अध्यात्स्व मठपास्स्स ॥ -पुष-पुष्टि, पालन, मज़बूत होना पुष्यति । पुष्येत् । पुष्य तु । भपुष्यत् । पुपोष पुपुषतुः । पुष्यात ।
ल । दिवादयः पोष्टा * पोक्ष्यति * अपोक्ष्यत् * अपुषत् अपुषताम् अपुषन् । अपुषः भपुष- तम् अपुषत । अपुषम् अपुषाव अपुषाम ॥ १००-शुप-शोषण, सूखना, खुश्क होना शुष्यति * शुष्येत् * शुष्यतु * शुष्यत् * शुशोष इत्यादि * शुष्यात् * शोष्टा * शोक्ष्यति * अशोक्ष्यत् * अशुषत् ॥ १०१-शअदर्शन, नाश नश्यति * नश्येत् * नश्यतु * अनश्यत् * नमाश ने शतुः नेशुः । नेशिथ, मनंष्ठ नेशथुः नेश । ननाश, ननश ने शिव नेशिम * नश्यात् * नंष्टा * मक्ष्यति * अनंध्यत् * अनशत् ॥ भाषानुवाद करो अक्षेदीव्यति दुष्टः । सूच्या सीव्यति वस्त्राणि । नृत्यन्ति निर्लज्जा: गणिकाः । अवष्टया त्रस्यति लोकः । तक्षकः काष्ठं श्यति । यति पाशान् दुःखस्य । स्यति सुखानि पापीयान् । द्यन्ति भाण्डानि वानराः । विव्याध शरैरिपून भटः । पुष्यति बालकः । शुष्यति सरोग्नावृष्टया । दिनानि नश्यन्ति वथा दुरात्मनः ॥ इति परस्मैपदप्रकरणम् अधात्मनेपदप्रकरणम्- १०२-५ (ङ)-प्राणिप्रसव, प्राणो का जनना लट्-सूयते * लिङ्- सूयेत * लोट-मृयताम् * लङ्-असूयत * लिट् - सुषुवे सुपुवाते सुपु विरे । सुषुविषे सुपुवाथे सुषु विध्वे । सुषु वे सुषु विवहे सुषु. विमहे * भाशीलिङ्-सोषीष्ट * लुट् -सोता, सविता * लृट् -सोष्यते, सवि. प्यते * लङ्-असोष्यत, असविष्यत • लुङ्-असविष्ट, असोष्ट ॥ १०३-दू ( ङ् )=परिताप, दुःखी होना दूयते दूयेते दूयन्ते । दूयमे दूयेथे दूयध्वे । दूये दूयावहे दृयामहे * दूयेत दृयेयाताम् दूयेरन् । दूयेथाः दूयेयाथाम् दूयेयम् । दूयेय दूयेवहि दूयेमहि * दूयताम् दूयेताम् दूयन्ताम् । दूयस्व दृयेथाम् दूयध्वम् । दूथै दूयावहै दृयामहै * अदूयल भदूयेताम् अदूयन्त । अदृयथाः प्रदूयेथाम् अदूयध्वम् । अदूये अदू. am- - तिङन्ते यावहि अदूपामहि * दुदुवे दुदुवाले इत्यादि * दविषीष्ट दविषीयास्ताम् इत्यादि * दविता दवितारी दवितारः । दवितासे दवितासाथे दविताध्थे । दविताहे दवितास्वहे दवितास्महे * दविष्यते दविष्येते दविष्यन्ते । दविष्यसे इत्यादि * अदविष्यत अदविष्येताम् अदविष्यन्त इत्यादि * भविष्ट अद. विषाताम् अदविषत ॥ अदविष्ठाः । अदविषायाम् । अदविध्वम् ॥ मदविषि भदविष्वहि । भदविष्महि । १०१-दी (ङ)-क्षय, नाश दीयते * दीयेत * दीयताम् * अदीयत * दिदीये दिदीयाते दिदी. पिरे । दिदीयिषे दिदीयाथे दिदीयिध्वे । दिदीये दिदीयिवहे दिदीयिमहे * दासीष्ट * दाता * दास्यते * अदास्यत * अदास्त अदासाताम् अदासत । मदास्थाः इत्यादि। १०५-डी ( ङ् ) उड़ना, आकाशगति डीयते * कीयेत * डीयताम् * महीयत * डिड्ये डिड्याते डिडियरे । डिविषे इत्यादि * डयिषीष्ट इयिता * इयिष्यते * भडयितअहयिष्ट ॥ इस के पूर्व सदा उद् उपसर्ग रहता है ॥ १०६-पी=पान, पीना पीयते * पीयेत * पीयताम् * मपीयत * पिप्ये * पेषीष्ट * पेता * पेष्यते * अपेष्यत * अपेष्ट ॥ भाषा बनाओ सूयते गौर्वत्सम् । दूयेत चित्तं पापेन । दीयतां पापिन: सम्पत् । उद. डीयन्त पक्षिणः । पिप्ये मधु च राक्षसः । सोषीष्ट पुत्रं तव धर्मपत्नी। दवि. तास्मि न पुण्यकर्मणा। दास्यन्ते पापिसम्पदः । सस्यानि भखादिष्यम् उदण्ड- यिष्यन्त पक्षिणः । अपेषातां बाली दुग्धं यथारूचि ॥ १०७-माङ्-मान, मानना, मापना, नाप मायते * मायेत * मायताम् * ममायत * ममे * मासीष्ट * माता * मास्यते * भमास्यत * अमान॥ - ४१ 4tainJU4144 दिवादयः १०८-जनी-प्रादुर्भाव, पैदा होना, प्रकट होना, उत्पत्ति जायते * जायेस * जायताम् * अजायत * जो-जजिवहे जज्ञिमहे * जनिषीष्ट * अनिता * जनिष्यते * अजनिष्यत * मजमि, अजनिष्ट । भज- निषाताम् । अजनिषत इत्यादि ॥ १०६-दीपी-दीग्नि, चमकना, प्रकाश दीप्यते * दीप्येत * दीप्यताम् * भदीप्यत * दिदीपे * दीपिषीष्ट * दीपिता * दीपिष्यते * भदीपिष्पत * भदीपि, मदीपिष्ट । अदीपिषाताम् ।। ११०-पद-गति-ज्ञान, गमन, प्राप्ति पद्यते । पद्येत * पद्यताम् * मपद्यत * पेदे पेदाते इत्यादि परसीष्ट पत्ता * पत्स्यते * अपत्स्यत * अपादि अपत्साताम् अपत्मत इत्यादि । १११-विद-सत्ता, विदयमानता, होना विद्यते * विद्येत * विद्यताम् * अविद्यत * विविदे * विस्मीष्ट * वेत्ता * बेत्स्यते * अवेत्स्थत * अवित्त वित्साताम् अविस्मत। अंविस्थाः अविस्माथाम् अविद्ध्वम् । अवित्सि अविस्स्वहि भविस्महि ॥ ११२-बध-अवगमन, समझना, जानना आशीर्लिङ्-भुत्सीष्ट * लुट-घोद्धा * स्मृट-भोत्स्यते * तृ-अशोत्स्थत लुङ्-प्रबोधि, अबुद्ध । अभुत्साताम् अभुत्सत । अबुद्धाः अभुत्सायाम् अमु. द्ध्वम् । भुत्सि भभुत्स्वहि अमुत्स्महि । शेष रूप" दीपी धातु के तुल्य जानो। ११३-युध लड़ना, युद्ध करना, संग्राम मुध्यते * युध्येत * युध्यताम् * भयुध्यत * युयुधे * युत्सीष्ट * योद्धा * योत्स्यते * अयोत्स्यत * अयुद्ध । ११४-सृज-विसर्ग, त्याग, छोड़ना सुज्यते * सुज्यन * सुज्यताम् * असूज्यत * मसूजे ससुजातें समृजिरे इत्यादि * सक्षीष्ट * स्त्रष्टा स्त्रक्ष्यते * अस्त्रक्षयत* असृष्ट मसक्षाताम् इत्यादि है भाषानुवाद करो- पुनः पितरं मातरं च मायंते ( मानता है ) । राजानः पृथिवी मास्मों (मागे)। कस्यापि गृहे कुपुत्रो जायेत.। मूर्यवत् दीप्यतां भवान् । बर्ष- ४२ तिङन्ते - मपद्यत । ग्राम पेदे । धनं पत्सीष्ट भवान् विद्यां च । पत्ता भवान् श्वोस्थ फलं कृतस्य । वेत्स्येऽहमपि जगले। वादं चे दाभोत्स्यत वितण्डा मा करिष्यत् । अयुत्सत वीराः सङ्गरे । सृज्यते गां दाता ॥ इति आत्मनेपदिनः ॥ अथोभयपादनः- ११५-मृष-तितिक्षा, सहना मृष्यति । मृष्यते * मृष्येत् । मृष्येत * मृष्यतु । मृष्यताम् * अमृष्यत् । अमृष्यत * ममर्ष ममृपतुः ममृषुः । मगांर्षय ममृषथुः ममृष । ममर्ष समृषिव ममृधिमः॥ ममषे ममृषाते इत्यादि * मृष्यात् ॥ मर्षिषीष्ट * मर्षिता मर्षि- तारौ मर्षितारः । मर्षितासि मर्षितास्थः मर्षितास्थ । मर्षितास्मि मर्षितास्वः मर्षितास्मः॥ मर्षिता मर्षितारी मर्षितारः। मर्षितासे मर्षितासाथ मर्षिताये। मर्षिताहे मर्षितास्वहे मर्षितास्महे * मर्षियति । मर्षिष्यते * समर्षिष्यत् । भमर्षिष्यत * समर्षीत् । अमर्षिष्ट ॥ ११६-नह-बन्धन, बान्धना नह्यति । नह्यते * नत् । नद्येत * नातु । गह्यताम् * नात् । मनात * ननाह नेहतुः नेहुः । नेहिय, ननद ने हथुः नेह । मनाह, ननह नेहिव ने हिम ॥ नेहे नेहाते इत्यादि * नह्यात् । नत्सीष्ट * नवा । नदार नत्स्यति । नत्स्यते * अनत्स्यत् । मनस्यत * भनात्सीत् अनाद्वाम् अना. त्सुः । अनारसी: अनाद्धम् अनाद्ध । अनात्सम् अनात्स्व अनात्स्म ॥ अन? अनत्साताम् अनात्मत। अनद्वाः अनत्साथाम् अनद्ध्वम् । भनत्सि अन- तस्वहि अनत्स्महि ॥ भापानुवाद करो- मृष्यति स्वामी मृत्यानामपराधान् । नाते रज्जः काष्ठानि । मृष्येत् स्तुतिमिन्दे उभे अपि साधुः । पुस्तकं सम्यक् न त् छात्रः । ममृषिरे सीता रामलक्ष्मणा बहुदुःखजातानि वने ॥ इति दिवादयः Homema खादयः - . अथ स्वादिगण प्रकरणम् तत्रोभयपदिनः- ११४-५ ( ञ् )-अभिषत्र, अर्क खींचना सुगोति सुनुतः सुन्वन्ति । सुनोषि सुनु थः सुनु थ । सुनोमि सुन्वः, सुभु वः , सुनमः ॥ सुनुते सुनवाते सुन्वते । सुनुषे सुन्वाथे सुनुध्ये । सुन्वे सुनुव हे, सुन्वहे सुनुमहे, सु-महे॥ सुनुयात् इत्यादि । सुन्वीत सुन्धीयाताम् सुन्वीरन् । मुम्वीथाः सुन्धीयाथाम् सुन्वी ध्वम् । सुन्वीय सुन्वीवहि सुन्धीमहि ॥ सुनोतु, सुन्तात् सुनुनाम् सुन्वन्तु । सुनु, सुनुतात् सुनुतम् सुनुत । सुनवानि सुनवाव सुनवाम ॥ सुनुलाम् सुवःताम् सुन्यताम् । सुनुष्व सुन्वाथाम् सुनतम् । सुनधै सुनवावहै सुनवाम है ॥ असुनोत् असुनुताम् असुन्वन् । असुनोः असु. नुतम् असुनुत । असुनवम् असुन्व, असुनुव असुन्म, असुनुम ॥ असुनुत असुन्याताम् भसुन्वत । असुनुथा: मसुन्वाथाम् असुनुध्वम् । अमुन्वि सु- न्यहि, असुनुमहि भमुन्महि, अमुनुमहि ॥ सुषाव सुषुवतुः सुषुवुः । सुष- विथ, सुषोथ सुषुवथुः सुषुव । सुषाव, सुषव सुषु विव सुषुविग ॥ सुषुधे सुषु- वाते सुपुघिरे । सुषुविषे सुषवाथे सुषुविध्वे । सुषुवे सुषविवहे सुषुविमहे ॥ मयात् । सोषीष्ट ॥ सोता। मोता ॥ सोष्यति । सोष्यते ॥ असोष्यत् । असो. प्यत । असावीत असाविष्टाम् ममाविषः । असावीः मसाविष्टम् मसाविष्ट । असाविषम् अमाविष्व असाविष्म ॥ ममोष्ट अमोषाताम् असोषत। असोष्ठाः असोषाथाम् असोध्वम् । असोषि असोष्यहि असोष्महि ॥ ११८-चि ( ञ् )=चयन, चुनना चिनोति चिनुतः इत्यादि । चिनुते चिन्वाते इत्यादि ॥ चिनुयात् । चिन्वीत ॥ चिनोतु । चिनुताम् ॥ अचिनोत् । अधिनुत ॥ चिचाय चिभ्यतुः चिच्युः । चिायण, चिचेथ चिच्यथः चिच्य । चिचाय, चिचय चियिव घिध्यिम ॥ अथवा--चिकाय चिक्यतुः इत्यादि । चिच्ये चिच्याते वा-चिक्ये चिक्याते इत्यादि ॥ चीयात् । चेषीष्ट ॥ चेता । घेता ॥ चेष्यति । चेष्यते ॥ अचेष्यत् । अचेष्यत ॥ सवैषीत अचेष्टाम् अचेषुः । अचैषीः अचेष्टम् अचेष्ट । अषम् भचैष्व अधम । अचेष्ट अचेषाताम् अचेषत। अचेष्ठाः अचेषायाम् भवेध्वम् । अचेषि अचेहि अचेष्महि ॥ - तिहस्ते ११९-स्ट ( ज् ) आच्छादन, ढकना स्तृणोति । स्तृणुते ॥ स्फुणयात् । स्तृण्वीत ॥ स्तुणोतु । स्तृणुताम् ॥ गस्तृणोत् । अस्णुत ॥ सस्तार तस्तरतुः तस्ततः । तस्तरिथ, तस्तथ तस्तरथुः तस्तर । तस्तार, तस्तर तस्तरिव तस्तरिम ॥ तस्तरे तस्तराते तस्तरिरे। तस्तरिषे इत्यादि ॥ स्तर्यात् इत्यादि । स्कृषीष्ट इत्यादि वा-स्तरिषीष्ट इत्यादि ॥ स्तर्ता । स्तर्ता ॥ स्तरिष्यति । स्तरिष्यते ॥ अस्तरिष्यत् । अस्त- रिष्यत ॥ अस्वार्षीत् मस्तासम् अस्ताएः । अस्तार्षीः मस्ताष्टम् अस्ताष्ट । अस्तापम् अस्ताय अस्तानं ॥ अस्तरिष्ट अस्तरिषाताम् अस्तरिषत । अस्तरिष्ठाः अस्तरिषायाम् अस्तरिध्वम् । अस्तरिषि अस्तरिष्वहि अस्तरि. उमहि ॥ अथवा-अस्तृत अस्तृषाताम् अस्तृषत । अस्तृथाः अस्तृषाथाम् भस्तृध्वम् । भस्तृषि मस्तृष्यहि भरवृष्महि । १२०-धू ( ञ् ) कम्पन, कांपना वा कम्पाना धूनोति । धू नुते ॥ धूनुयात् । धून्धीत ॥ धूनोतु । धूनुताम् ॥ अधूनोत् । अणनुत ॥ दुधाव दुधुवतुः दुधुवुः । दुधयिथ, दुधोथ दुधुवथुः दुधुव दुधाव, दुधव दुधविव दुधुविम । दुधु वे दुधुवाते इत्यादि ॥ घूयात् । धोषीष्ट इत्यादि वा धविषीष्ट इत्यादि ॥ धोता वा-धविता ॥ धोष्यति, विष्पति । पोष्यते, धविष्यते ॥ अधोण्यत्, अधविष्यत् । अधोष्यत, अधविष्यत ॥ मधोषीत् वा- अधावीत् अधाविष्टाम् अधाविषुः इत्यादि ॥ अविष्ट, अधोष्ट इत्यादि दो दो रुप जानो॥ भाषा बनाओ- मध्वर्यः सोमं सुनोति यज्ञाय । किमर्थं दशमूलानि सुषे ? । ज्वरितः पर्पटं सुनुयात् पिबेच्छ (पर्पट-पित्तपापडा नामक मोषधि का नाम है) चिनुयादिष्टका धेद्याम्। स्तृणुपारकुशैर्मक पम् । धुनोति चम्पकवनानि वायुः मुषुधे वैद्य ओषधीः । चिकाय भित्ति महती चमूपः । भष्म यो समिधः समन्तात् । स्तषीष्ठा यशसा दिवम् । इत्यादि । संस्कृत बनाओ- मैंने तुम्हारे लिये पञ्चमूल का मर्क खींचा है। तुम अपने लिये मकान बनामो । वक्ष को हिलाश्रो फल गिरेंगे। कर्मकार भींत को चिलते हैं। हम सोम का अर्क खींचेंगे, उस से दीर्घजीवी होवेंगे। रक्षक चोर को बांधता है। - तुदादयः महात्मा लोग सुख और दुःख दोनों को सहते हैं । वे दुःख में अधीर नहीं होते और मुख में प्रमाद नहीं करते। शिष्य प्रमाद नहीं करते। शिष्य गुरु को मानते हैं। दरजी कपडा सोता है। पाप अवश्य प्रकट होते हैं, तथा पुण्य भी । विद्यार्थियो ! मापस में मत लहो । आलस्य छोड़ो। द्वन्द्व सहो। अर्थ समझो । शिखा बन्धों । गुडूची का पार्क खींचो । पुष्प चुनो और ऐसे ही सद्गुणा चुमो । अपगुण त्यागी । देह को ढको । पांव मत हिलाभो । इत्यादि । इसि सिङन्ते स्वादिगणप्रकणम् - अथ तिङन्ते तुदादयः ॥ तत्रोभयपदिन:- १२१-तुद-व्यथन, चुभाना तुदति । तुदते ॥ तुदेत् । तुदेत ॥ तुदतु । तुदताम् ॥ अतु दत् । अतुदत॥ तुतीद तुतुदतुः इत्यादि ॥ तुतुदे तुतुदाते इत्यादि ॥ तुद्यात् । तुत्मीष्ट ॥ तोता। तोता । तोत्स्यति । तोत्स्यते ॥ अतोत्स्यत् । अतोत्स्थत ॥ अतीत्मीत् अतीत्ताम् अतीत्सुः । मतौत्सीः इत्यादि ॥ अतुल सतुत्साताम् अतुत्सत । अतुत्थाः अतुत्साथाम् अतुध्वम् । आतुस्सि अतुत्स्वहि अतुत्स्महि । १२२-णुद-प्रेरणा करना, उकसाना नुदति इत्यादि तुद, के तुल्य जानो॥ १२३-भ्रस्जपकाना, पाक, भूनना भृति । भृज्नते ॥ मृज्जेत् । भृजमोत ॥ भृज्जतु । भृज्जताम् । अभृज्जत् । अभृज्जत ॥ बमर्ज बमर्जतुः यमर्जुः । बभर्जिथ, बाष्ठं बनर्जघुः बार्ज । बमर्ज बभर्जिव बभर्जिम ॥ अथवा-बभ्रज्ज बभ्रज्जतुः बभ्रज्न: । बभ्रज्जिय, बभ्रष्ठ बभ्रज्जथः बनण । बभ्रज्जः बभ्रउिजव बभ्रज्जिम ॥ बमले बभर्जाते इत्यादि । अपवा-बचज्जे बधजजाते इत्यादि ॥ भृज्ज्यात भृज्ज्यास्ताम् इत्यादि ॥ भ्रक्षीष्ट वा-भीष्ट इत्यादि ॥ भी वा-भ्रष्टा ॥ प्रक्ष्यति, भक्ष्यति। भ्रक्ष्यते, अधर्यते भवक्षयत् , अभक्षपत् ॥ अक्षयत, सभघत ॥ मनाक्षीत् , अभाीत् । भ्रष्ट मचलाताम इत्यादि वा-मभष्ट अर्शताम् मार्फत । मष्टाः अभायाम् अभवम् । माक्षि मभवहि मर्महि ॥
सिडन्ते १२४-कृष-विलेखन, खादना, हलकर्म, जोतना कृषति । कृषते ॥ कृषेत् । क्षेत॥ कृषतु । कृषताम् ॥ अकृषत् । अकृषत। चकर्ष चरूषतुः चक्षुः । चकर्षिय, चकठ चकृषथुः चकष । चकर्ष चषिक चक. बिम ॥ कृष चरुषाते चकृषिरे इत्यादि । कृष्यात् । कक्षीट ॥ क्रष्टा वा -कष्ट। कक्ष्यति वा-कक्ष्यति । ऋक्ष्यते, बक्षयते ॥ अक्रयत्, अक्षयत् । अक्रक्षघत, आर्यन ॥ मकाक्षीत् अकायाम् अकाक्षः । अकाक्षीः अकाष्टम् अकाष्ट । अक्राक्षम् अक्राक्षत्र अक्राम ॥ अथवा-अक्षार्सीत् अकाष्टाम् इत्यादि ॥ अकृष्ट अकक्षाताम् अकृक्षत । मकृष्ठा: अकक्षाथाम् अकृढ़ वम् । अकृति अक्षवहि अरुक्ष्महि । अथवा-- कृसत आकृक्षाताम् अकक्षन्त । अक्षयाः इत्यादि । १२५-मिल-सङ्गम, मिलना मिलति । मिलते ॥ मिलेत् । मिलेत ॥ मिलतु । मिलताम् ॥ अमिलत् । अमिलत ॥ मिमेल मिमिलतः । इत्यादि ॥ मिमिले मिमिलाते इत्यादि ॥ मिल्यात् । मेलिषीष्ट ॥ मेलिता । मलिता ॥ मेलिष्यति । मेलिष्यते ॥ अमे. लिष्यत् । ममेलिष्यत ॥ ममेलीत् भमेलिष्टाम् अमेलिषुः । अमेलीः इत्यादि। अमेलिष्ट अमेलिपाताम् अमेलिषत । म मेलिष्ठाः इत्यादि । भाषा बनाओ- हस्तिपोऽङ्कुशेन हस्तिमस्तकं तुदति । तुदन्ति बाणा मर्मस्थाः । तुतुदे रावणवाहिनों स रामः । न तुदेत परस्य मर्म गूढम् । तुरमीष्ट शत्रुहृदयानि नृपः । अश्वं नदति । घणक भृज जति । क्षेत्रं कृषति । मित्रेण मिलति । रामरावण योद्धे रामोऽतीत्सीद्रियोश्चमूम् । बभ्रज्जे तपमा पापम् । स चकर्ष महीमेताम् । श्वो मेलितास्मि । प्रातर्मेलितास्महे । क्षेत्रं तावत् सम्यक् षेत तदनु बीजं वपेत् ॥ संस्कृत बनाओ- किमी का हृदय मत दुखा भो । संसार को धर्म में प्रेरणा करो । खेत को अच्छे प्रकार खोदो ( जोतो )। सब मे प्रीति से मिलो । दुष्ट ! तेरा हृदय बाण से बांध दूंगा । यदि गुरु पी पाप में प्रेरणा करे तो मत मानो । १२६-मुच (0) मीचन, छोड़ना मुञ्चति । मुञ्चते ॥ मुश्चेत् । मुञ्चेम ॥ मुञ्चतु । मुञ्चताम् ॥ अमुञ्चत् । समुञ्चत ॥ मुमोच मुमुचतुः । मुमुधे । मुच्यात् । मुचीष्ट ॥ मोक्ता । मोक्ता । । - - । तुदादयः मोक्षयति । मोक्षयते॥ ममोक्ष्यत् । अमोक्ष्यत ॥ अमुचत् अमुघताम् भमुचन् । भमुधः इत्यादि ॥ अमुक्त अमुक्षाताम् अमुक्षत । ममुकथाः अमुक्षायाम् ममुग्ध्वम् । भमुक्षि अमुक्ष्वहि ममुक्षमहि । १२०-लुप् ( ट )-छेदन, काटना लुम्पति । लुम्पते ॥ लुम्पेत । लुम्पेत ॥ लुम्पतु । लुम्पताम् ॥ अलुम्पत् । गलुम्पत ॥ लुग्गोप । लुलुपे ॥ लुप्यात् । लुप्सीष्ट ॥ लोप्ता । लोप्ता ॥ लोप्स्यति । लोप्स्यते ॥ अलोप्स्यत् । अलोप्स्यत ॥ अलुपत् ॥ अलुप्त भलुप्सा. ताम् मलुप्सत । अलुप्याः मलुप्सायाम् अलुब्ध्वम् इत्यादि । १२८-विटु ( ल ) लाभ, लेना, पाना विन्दति । विन्दते ॥ लिट्-विवेद । विविदे ॥ विद्यात् । वित्सीष्ट । वेत्ता । वेत्ता ॥ बेत्स्यति । वेत्स्यते ॥ लुङ्-अविदत् । अवित्त वित्माताम् इत्यादि ॥ किन्हीं के मत में-वेदिषीष्ट ॥ वेदिता॥ वेदिष्यति ॥ मवेदिष्यत् ॥ भवेदीत् । अवेदिष्ट इत्यादि प्रकार से भी प्रयोग होता है । १२९-सिच-क्षरण, बखेरना,टपकाना, चुवाना वा सींचना सिञ्चति इत्यादि ॥ मिषेच ॥ सिच्यात् । मिक्षीष्ट ॥ सेक्ता ॥ मेक्ष्यति इत्यादि ॥ सिचत् । असिक्त असिखाताम् इत्यादि ॥ १३०-लिप-उपदेह, लीपना, पोतना, देह बढ़ाना लिम्पति इत्यादि ( १२७ ) " लुप तुल्य जानो॥ भाषा बनाओ- हठं मुश्च । क्षेत्रं लुम्प । विद्यां विन्दा । वृक्षवाटिकां सिञ्चध्वम् । वेदि लिम्पताम् । मोक्ष्यामि गृह बन्धनात् । मोक्ष्ये मिगठबन्धनात् (निगडजेल)। लुलुपे पुस्तकानि मूषकः । कृतस्य विन्दते फलम् । वारिदोऽयं सेक्ष्यति सकलं भारतं वर्षम् , तदा सुभिक्षं वेत्स्यामहे । तैलेन लिम्पति देहं मामः ॥ संस्कृत बनाओ- छठ छोड़ो। मूर्खता के जाल को छेदो ( काटो)। पूर्व कर्मों का फल पामो । आंगन लीपो ( मांगन अङ्गण-स्थानादि का सहन ) खेत सोचो। घत टपकामो मत । दूध मत बखेरो। यह अमृत है । इत्युभयपदप्रकरणम् ॥ के ४८ तिहन्त - । अथ परस्मैपदिन:- १३१-कृती छेदन, कृन्तन, काटना कन्तति ॥ कृन्तत् ॥ कन्ततु ॥ भकृन्तत् ॥धकर्त धरुपतुः धकृतुः । चकर्तिय चकृतथुः धकृत । चकर्स चक्रतिव कृतिम ॥ कृत्यात् ॥ कर्तिता ॥ कतिष्यति ॥ अकतिष्यत् ॥ अकर्तीत् भकतिष्टाम् अकतिषः । अकर्तीः इत्यादि । १३२-खिद-दुःख पाना, खेद, कष्ट खिन्दति इत्यादि ॥ चिखेद चिखिदतुः इत्यादि । खिद्यात् ॥ खेत्ता ॥ खेत्स्यति ॥ मत्स्यत् ॥ अखैत्सीत् मखै ताम् अखैत्सुः । असत्सीः अखैतम् भखैत । अखत्सम् मखैत्स्व मत्स्म ॥ १३३-पिश-अवयव, टुकड़े करना, पीसना पिंशति ॥ पिंशेत् ॥ पिंशतु ॥ अपिंशत् ॥ पिपेश ॥ पिश्यात् ॥ पेशिता ॥ पेशिष्यति ॥ अपेशिष्यत् ॥ भपेशीत् ॥ १३४-( ओ ) वश्चूछेदन, काटना घश्वति ॥ वृश्चेत् ॥ वश्चतु ॥ अवश्चत् ॥ वत्रश्च यश्चतुः वनश्चः। घनश्चिथ, ववष्ठ वत्रश्चथुः वव्रश्च । ववश्व वव्रश्चिव वव्रश्चिम ॥ श्च्यात् ॥ श्चिता, ब्रष्टा । व्रश्चिष्यति, व्रक्ष्यति ॥ भवश्चिष्य त् , अव्रक्ष्यत् ॥ व्रवीत् ॥ १३५-व्यच व्याजीकरण, बहानेबाज़ी, ठगई विचति ॥ विचेत् ॥ विचतु ॥ भविचात् ॥ विव्याच विविधतुः विविधुः । विष्यचिष विविधथुः विविध । विव्याच, विध्यच विविचिव विविधिम ॥ विष्यात् ॥ व्यचिता ॥ व्ययिष्यति ॥ भव्यचिष्यत् ॥ अव्याचीत् , अव्यधीत् ।। भाषानुवाद करो- चणकं पिंशति बहा। पापेन खिन्दति लोकः । वृश्चिको मनुष्यं पादे वश्चति ( वृश्चिक-विच्छू ) । विधति खलः पथिकान् । कन्तति मूलं वक्षस्य तक्षकः ( बढ़ाई ) इत्यादि ॥ संस्कृतानुवाद करो- बुढ़िया गोधूम पीसती थी । पापी दुःख पाते हैं । विच्छू अङ्गुली में काटता है । धूर्त बहकाता पा । दुष्ट का शिर फाटो । मित्र से स्नेह करो। इत्यादि ।
ge तुदादयः १३६-उछि=उज्छ, शिल्ला चुगना अच्छति ॥ उच्छेत् ॥ उज्छतु ॥ औञ्छत् ॥ छाञ्चकार उञ्छाचक्रतुः इत्यादि वा सन्छामास सज्छामासतुःया- सज्छाम्बभूव सञ्छाम्ममूवतुः इत्यादि। उज्छघात् ॥ सजिता ॥ उछिष्यति ॥ भौमिछष्यत् ॥ मौज्छीत् ॥ १३७=ऋच्छ गति, मूर्छा, मूर्तिमाव, अचेतनता ऋच्छति ॥ ऋच्छेत् ॥ ऋच्छतु ॥ मार्छत् ॥ मानई मानई तुः आमर्युः मानईिथ मानर्छथुः मानछ। मानई मानलिव मानर्छिम ॥ ऋच्छपात् ॥ च्छिता ॥ ऋछिछष्यति । मार्छिष्यत ॥ आर्चीत् । १३८-उज्झ-त्याग, छोड़ना, उत्सर्ग उज्झति ॥ उज्झत् ॥ सज्झतु ॥ औझत् ॥ उज्झाञ्चकार, सुज्झामास, उज्झाम्बभूव ॥ उज्झयात् ॥ उज्झिता ॥ नमिष्यति ॥ औझिण्यत् ॥ मौकीत् ॥ १३९-लुभ-लुभाना, मोहित होना लुभति ॥ लुभेत् ॥ लुभतु ॥ अलुभत् ॥ लुलोभ लुलुभतुः लुलुभुः । लुलोभिय लुलभथः लुलुभ । लुलोभ, लुलुभ लुलुभिव लुलुभिम ॥ लुभ्यात् ॥ लोभिता, लोब्धा । लोभिष्यति, लोप्स्यति ॥ भलोमिष्यत्, मलोप्स्यत् ॥ अलोमीत् ॥ १४० । १४१ तृप, तृम्फ-तृप्ति, तृप्त होना तृपति । वृपेत् ॥ चपतु ॥ मतपत् ॥ ततर्प ततपतुः॥ सृप्यात् ॥ तर्पिता॥ सर्पिष्यति ॥ मतर्पिष्यत् ॥ अतर्षीत् ॥ तुम्फति इत्यादि ॥ तहम्फ तवम्फतुः शेष . " के तुल्य है। १४२ । १४३-मृड, पृड-सुखी होना, सुखपाना महति ॥ मृडेत् ॥ मृष्टतु ॥ अमृष्ठत् ॥ ममई ममूहतुः ॥ मृङ्घात् ॥ महिता महिष्यति ॥ ममर्डिष्यत् ॥ अमर्डीत् ॥ इसी प्रकार * १४४-शुन-गति-ज्ञान, गमन, प्राप्ति भुमति ॥ शुनेत् ॥ शुनतु ॥ अशुनत् ॥ शुशोन शुशुनतः ॥ गुम्यान 18 शोमिता ॥शोनिष्यति ॥ मशोनिष्यत् ॥. अशोनीत् ।। - तिङन्ते १४५-इषु इच्छा, चाहना इच्छति ॥ इच्छेत् ॥ इच्छतु ॥ ऐच्छत् ॥ इयेष । ईषतुः ॥ इष्यात्॥ एषिता, एष्टा ॥ एषिष्यति ॥ ऐषिष्यत् ॥ ऐषीत् ॥ भाषानुवाद करो ऋषय तज्छन्ति स्म । ग्राममृच्छति पान्थः। ऋछति रोगी। मानई शस्त्र. पातेन । सज्झति जलम् । लुमति परधर्म दृष्ट्वा पापीयान् । तृपन्ति ब्राह्मणाः यजमामगृहे । तृम्फन्ति भिक्षुका सदरपूतिमात्रेण । मृष्ठति सम्पत्या लोकः । पृडति जानेन तत्त्ववित । ग्रामं शुमति । अथ शुनेत् । वेदान् शुनतु ब्रामणः घनमिच्छन्ति लोलुपाः । इ यादि । संस्कृतानवाद करो कणाद ऋषि शिम्मा चुगता था। सस से ही तृप्त होता था और वैशेषिक दर्शन को बनाता था ( समापादीत् )। राहगीर ( पथिक ) चीन को जाता है। बाण से मूर्छित होता है । लोस को त्यागो । विद्या और धर्म को लुभाओ। अपने ही पदार्थों मे तृप्त होओ। जो परान्म और परधन से वप्त होते हैं वे पुरुषार्थहीन होते हैं, दुःख पाते हैं, सुखी कभी नहीं होते । घेदार्थ को जानो, इस लोक और परलोक में सुखी होओगे। यश और धर्म को चाहो । इत्यादि। अथ तुदादान्तर्गता: कुटादयः १४६-कुट कुटिलपना, कौटिल्य, खोटाई कुटति ॥ कुटेत् ॥ कुटतु ॥ अकुटत् ॥ चु कोट चुकुटतुः चु कुदुः । चुकुटिप चुकुटथुः धुकुट । धुकोट, चुकुट धुकुटिव चुकुटिम ॥ कुटघात् ॥ कुटिता। कुटिष्यति ॥ अकुटिष्यत् ।। अकुटीत् ॥ १४७-पुट-=संश्लेषण, चिपटना, चिपटाना १४८-स्फुरद र=विकसन, फटना, खिलना १४९-स्फुर-संचलन, फुरकना, चलना १५०-स्फुल इन सब के सूप. कुट * के तुल्य जानो । परन्तु निर, नि और वि से मागे इन धातुओं का सकार मूर्धन्य (घ) मी हो जाता है। जैसे-निरुकुलति निस्फुलति । निष्फुरसि, मिस्फुरति इत्यादि ।
mammeem तुदादयः १५१-णू-स्तुति, प्रशंसा करना मुवति ॥ मुवेत् ॥ भवतु ॥ अनुवत् ॥ नुनाव नु नवतुः मुमवः । नमविप नवथुः नुनुव । नुनाव , नुनय ननु विव नुनविम ॥ नूयात् ॥ नविता ॥ मुविष्यति ॥ भविष्यत् ॥ अनुवीत् ॥ इति कुटादयः १५२-(टु) मरजो शुद्ध करना वा मांजना मज्जति ॥ मज्जेत् ॥ मऊजतु ॥ अमज्जत् ॥ ममज्ज ममज्जतुः ममज्जः । ममजिजय ममज्जथुः ममज्ज । ममा मज्जिव ममज्जिम ॥ मज्ज्यात् ॥ मता ॥ मङ्ख्यति ॥ अमङ्ख्यत् ॥ अमाङ्क्षीत् भमाङ्क्ताम् अमाक्षुः । अमाहक्षीः अमाङ्क्तम् अमाङ्क्त । गमाङ्क्षम् गमाव अमाझ्म ॥ १५३-रुजो भङ्ग होना, टूटना, खराबी रुजति इत्यादि ॥ सरोज रुजतुः ॥ रुज्यात् ॥ रोक्ता ॥ रोक्ष्यति । भरोक्ष्यत् ॥ अरौक्षीत् भरौक्ताम् अरोक्षुः । अरोक्षीः अरोक्तम् भरोक्त ॥ भरोक्षम् भरीव परोक्ष्म ॥ १५४-भुजो-कौटिल्य, खोटापन, कुटिलता भुजति इत्यादि रुज " के तुल्य रूप जानो । भाषानुवाद करो- कुटन्ति वेश्याः । पुटति घृतं शिरसा तैलं वा । स्फुटन्ति पुष्पाणि वसन्ते । स्फुरति रुधिरं नाडीषु । स्फुलन्ति मगहूकाः सरस्सु । नुवत परमा. स्मानं सर्वदा स एकोगुरुः सर्वस्य । उपास्यश्च स एव । निमज्जत् प्रातः प्रातर्नित्यं जलाशयेषु । देखो रुजति पीडया । भुजति सर्पः इत्यादि ॥ संस्कृतानुवाद करो- मूर्ख कुटिलता करते हैं । कज्जल वस्त्र पर लिपट जाता है । आम बौरते हैं । भङ्ग फुरकते हैं । आंख फुरकती है । धर्मात्मा लोग परमात्मा की स्तुति करते हैं। प्रातःकाल नित्य जलाशय में देह शुद्ध करे । शिर दुखता । सर्प गण्डलाते हैं। इत्यादि ॥
सिकुन्ते १५५-विश-प्रवेश, घुसना विशति ॥ विशेत् ॥ विशतु ॥ अविशत् ॥ विवेश विविशतुः विविशुः । विवेशिष विविशथुः विविश । विधेश विविशिष विविशिम ॥ विश्यात् ॥ घेष्टा ॥ क्षपति ॥ मवेक्ष्यत् ॥ भवेक्षीत् ।। १५६-मृश-आमर्शन, छूना, स्पर्श करना मुशति इत्यादि ॥ ममर्श ममृशतुः ॥ मृश्यात् ॥ स्रष्टा, मी ॥ म्रक्ष्यमि, मक्षति ॥ सम्रक्ष्यत् , अमक्षयत् ॥ मम्राक्षीत् , । ममार्सीत् । अम्राष्टाम् , श्रमाम् । अम्राक्षुः, अमाझुः इत्यादि ॥ अथवा-अमृक्षत् अमृक्षताम् अमृक्षन् । अमृक्षः इत्यादि । १५७-षद् (ल) विशरण बिखरना । गति-ज्ञान, गमन, प्राप्ति । दुःखी होना ॥ सीदति ॥ सीदेत् ॥ सीदतु ॥ मसीदत् ॥ ससाद सेदतुः सेदुः । सेदिप से दथुः सेद । ससाद, ससद सेदिव सैदिम ॥ सद्यात् ॥ सत्ता ॥ सरस्थति ॥ असत्स्यत् ॥ असदत भमदताम् ॥ १५-शद् ( 0 )शातन, बिखरना, विशीर्ण होना यह धातु लट्, लि, लोट् और लङ् में भात्मनेपदी है, आगे परस्मैपदी ॥ शीयते शीयेते शीयन्ते । शीयमे ॥ शीयेत शीयेयाताम् ॥ शीयताम् शीयेताम् ॥ शीयन्ताम् ॥ अशीयत मशीयेताम् मशीयन्त । अशीयपाः ॥ शशाद शेदतुः ॥ शद्यात् ॥ शत्ता ॥ शत्स्यति ॥ अशत्स्यत् ॥ अशदत् ॥ १५६-क-विक्षेप, बखेरना किरति ॥ फिरेत् ॥ किरतु ॥ किरत् ॥ चकार ॥ चकरतुः चकरुः । धकरिथ चकरथुः चकर । चकार, चकर चकरिव करिम । कीर्यात् ॥ करिता, करीता करिष्यति, करीष्यति ॥ अकरिष्यत, अकरीष्यत् ॥ भकारीत भकारिष्टाम् ॥ " उपसर्ग से परेक धातु हो तो छेदन मर्थ में-उपस्किरति ॥ उपस्किरेत् ॥ उपस्किरतु ॥ उपास्करत् ॥ तथा-उपचस्कार इत्यादि सकार. युक्त प्रयोग होते हैं। "उप" और " प्रति" उपसर्ग से परे भी फ धातु के रूप हिंसा मर्थ में प्रतिस्किरति ॥ प्रतिस्किरेत् ॥ प्रतिस्किरतु ॥ प्रत्यस्किरत् ॥ प्रतिचस्कार इत्यादि प्रकार से ही होते हैं । - ॥ - तुदादयः १६०-ग-निगरण, निगलना गिरति, गिलति * गिरेत, गिलेत गिरतु, गिलतु * भगिरत, भगिलत * जगार, जगाल । जगरतुः, जगलतुः इत्यादि गीर्यात, गिल्यात् * गरिता, गरीसा, गलिता, गलीता * गरिष्यति, गरीष्यति, गलिष्यति, गलीष्यति । अगरिष्यत् , भगलिष्यत्, भगरीष्यत् , मगलीष्यत् * भगारीत, भगालीत् ॥ १६१-एच्छ पूछना, ज्ञीप्सा, जानने की इच्छा पृष्छत्ति * पृच्छेत् * पृच्छतु * अपृच्छत् * पप्रच्छ पप्रच्छतुः पप्रच्छुः । पप्रच्छिण, पप्रष्ठ पप्रच्छथः * प्रघात * प्रष्टा * प्रक्ष्यति + मप्रक्षयात् ॥ अप्रासीत् भमाष्टाम् सप्राक्षुः । मप्राक्षः । भाषानुवाद करो- घृतं मृशति तदनु शुध्यति । अन्नं मीदति । अग्नं विना सीदति लोको. उमावृष्टी । दुः शिरांसि रणे धीराणाम् । किरति सर्षपम्=सरसों को । उप- स्किरति कण्टकं पादम्। उपस्किरति माणवकं ध्याघ्रः । प्रतिस्करुवानरा बालम् । उरोविदारं ( पेट फाह कर ) प्रतिचस्करे नखैः । [मात्मनेपदप्रयो- गोऽपि दृश्यते ] गिरति नकोबालम् । माणवकं पन्पामं पृच्छति । पृच्छ धातु के दो कर्म होने से द्विकर्मक कहाता है । संस्कृतानुवाद करो- जल को छु भो । क्षेत्र में बीज बखेरो । चित्त में मत कुढो । दुग्ध मत बखेरो। मित्र को मत मारो । तुम साधु हो । बन्धन काटो । सिंह वन्य पशुओं को मारता है और खाता है, तथा मनुष्य को भी । सर्प मण्डूक को निगलता है । गुरु मे धर्म पूछो, इत्यादि । इति परस्मैपदिनः । अधात्मनेपदिनः- १६२--मृ (ङ) प्राणत्याग, मरना इस धातु के सूप भी प्रथम ४ लकारों में मास्मनेपदस्थ होते हैं, मागे परस्मैपदत्य । चियते * चियेत * म्रियताम् + अम्रियत - ममार मम्रतुः । ममर्थ * चिपात् * मर्ता * मरिष्यति + अमरिष्यत् * लुङ् में भी भात्मनेपद होता है। जैसे-अमृत अमृषाताम् ममूषत । अमुथाः समृषाधाम् भमृत्वम् । भमृषि ममध्वहि ममृष्महि ॥ - - मनुः
নি
१६३-पृ (ङ)-व्यायाम, व्यापार, काम करना
यह धातु विशेष करके व्या ( ब ) पूर्वक रहता है। जैसे-व्याप्रियते *
व्याप्रियेत * व्याप्रियताम् * व्यामियत * व्यापप्रे व्यापनाते व्यापमिरे * व्या.
पषीष्ट * व्यापत्ती व्यापरिष्यते * व्यापरिष्यत * व्याप्त ध्याएषाताम् ॥
१६४-जुपी प्रीति और सेवा करना
जुषते * जुषेत * जुषताम् * अजुषत * जुजुषे * जोषिषीष्ट * जोषिता
जोषिष्यते * अजोषिष्यत * भजोषिष्ट जोषिषाताम् भजोषिषत ।
भजोषिष्ठा: अजोषिषायाम् इत्यादि ।
१६५-( ओ ) विजी-भय और चलना
प्रायः यह धातु "उत्" सुपसर्गपूर्वक रहता है । उद्विजते * अद्विजोत *
अद्विताम् * सदगविजन * उद्विविजे * उद्विजिषीट * उद्विजिता #
उद्विजिष्यते * उदरविजिष्यत * सदाविजिष्ट सदविजिषाताम् उदविजिषत ।
उदविजिष्ठाः उदविजिषायाम् इत्यादि ।
भाषानुवाद करो
नियन्ते रोगिणः । व्याप्रियते वैश्यः । धर्म जुषते । भायां जुषते ।
अद्विजते हदयं दुरास्मनः । इत्यादि ॥
संस्कृत बनाओ
निर्धन अब विना मरते हैं । धनी रोगों से मरते हैं । मैं दिन भीर
रात्रि में भी काम करता हूं। तुम सत्य को सेवन करो और मैं भी सेवन
करूं। मेरा हृदय पाप से उरता है। इत्यादि ॥
इति तुदादिगणप्रकरणम्
अथ तिङन्ते रुधादिगणप्रकरणम्
सत्रोभयपदिन:-
१६६-रुधिर-आवरण, छादन, रोकना, ढकना
लट्-रुणद्धि रुन्छः रुन्धन्ति । रुणत्सि रुन्दुः रुम्दु । रुणहिम रुमध्वः
रुन्धमः ॥ रुन्द्वे रुन्धाते रुन्धते । रुन्त से रुन्धार्थ रुन्छे । सन्धे सन्ध्वरे
सन्ध्महे * लिङ्-सन्ध्यात् ॥ रुन्धीत * लोट्-रुणदथ, रुन्द्वात् सन्धाम्
रुधादयः रुन्धन्तु । सन्धि, रुन्द्वात् सन्तुम् रुन्टु । रुणधानि रुणधाव रूणधाम ॥ रुन्द्वाम् सन्धाताम् रुन्धताम् । सन्तस्य सन्धाथाम् सन्ध्वम् । रुणधै रुणधाव है रुण- धामहै * लड्-अरुणत अरुन्टाम् अरुन्धन् । अरुणत, अरुणः मरुन्द्वम् अरुन्छ । मरुणधम् । अरुन्ध्व भरुन्ध्म ॥ भरुन्छ अरुन्धाताम् अरुन्धत । अरुन्दाः अरुन्धाथाम् अरुन्ध्वम् । अरुन्धि अरुन्ध्यहि अरुन्ध्महि * लिट्-रुरोध रुरुधतुः रुरुधुः । रोधिथ, सरोद्ध रुरुधथः रुरुध । रुरोध रुरुधिव धिम ॥ करुधे रुमधाते करुधिरे इत्यादि * आशीलिङ-रुध्यात् ॥ रुत्मीष्ट * लुट रोद्धा। रोहा * लूट-रोत्स्यति । रोत्स्यते * लुङ-अरोत्स्यत् । भरोत्स्यत * लुङ् -परौत्मीत् अरौद्धाम् अरौत्सुः । अरौत्सीः अरौद्धम् भरौद्ध । गरौत्सम् अरोत्स्व गरौत्स्म ॥ अपवा-अरुधत् शरुधताम् अरुधन् । अरुधः इत्यादि ॥ अरुद्ध मरुत्साताम् अरुत्मत । इत्यादि । १६७-भिदिर-विदारण, फाड़ना, चीरना भिनत्ति भिन्तः भिन्दन्ति । भिनत्सि इत्यादि * भिन्त भिन्दा भिन्दते। भिन्से भिन्दाथे भिन्द्ध्वे । मिन्दे भिन्द्वहे भिन्महे * भिन्द्यात्। भिन्दीत* भिनत्तु, भिन्तात् मिन्ताम् जिन्दन्तु । भिन्धि, भिन्तास् भिन्तम् शिन्त । भिनदानि भिनदाव भिनदाम ॥ भिन्ताम् भिन्दाताम् मिन्दनाम् । भिन्त्स्व भिन्दाथाम् सिन्ध्वम् । भिनदै भिनदावहै भिनदाम है * अभिनत् अभि. न्ताम् अभिन्दन् । अभिनः, अभिनत् अभिन्तम् अभिन्त। अभिनदम् असिन्द अभिन्न * अभिन्त अभिन्दाताम् अभिन्दत इत्यादि * बिभेद बिभिदतुः बिभिदुः । बिभेदिय बिभिदथुः इत्यादि * बिभिदे बिभिदाते बिभिदिरे । बिभिदिषे इत्यादि * भिद्यात् । भित्सीष्ट * भेत्ता । भेत्ता * भेत्स्यति । भेत्स्यते * अभेत्स्यत् । अभेत्स्यत * अभैत्सीत् भैत्ताम् अत्सुः । अभैरसीः अथवा-अभिदत इत्यादि * अभित्त अभिसाताम् इत्यादि । १६८-छिदिर-द्वैधीकरण, छेदन, फोड़ना छिनत्ति ॥ छिन्ते * छिन्द्यात् ॥ छिन्दीत * छिनत्तु ॥ छिन्ताम् * अच्छि . नत् ॥ अच्छिन्त * चिच्छेद ॥ चिच्छिदे * छिद्यात् ॥ छित्मीष्ट * छेत्ता ॥ छेत्ता * छेत्स्यति ॥ छेत्स्यते * अच्छेत्स्यत् ॥ अच्छेत्स्यत * अच्छत्सीत् मथवा-मच्छिदत् ॥ मच्छित्त अच्छित्साताम् इत्यादि । १६८-युजिर-योग, जुड़ना युमक्ति ॥ युते * युज्यात् ॥ युञ्जीत * युनक्तु ॥ युङ्क्ताम् इत्यादि ॥
सिडन्ते
१७०-रिधिर-विरेचन, दस्त आना, खालीकरना
रिणक्ति ॥ रिले * रिज्च्यात् ॥ रिक्षीत * रिरेच ॥ रिरिचे इत्यादि ॥
१७१-विचिर-पृथग्भाव, अलग होना
विनक्ति ॥ विले * विध्यात॥ विञ्चीत * विनक्तु ॥ विङ्क्ताम् * विवेच ।
विधि इत्यादि ॥
१७२-क्षुदिर-संपेषण, पीसना, चूरा करना
क्षुत्ति ॥ क्षुन्ते * क्षुन्द्यात् ॥ शुन्दीत * क्षु णातु ॥ क्षुन्ताम् * चुक्षोद इत्यादि
१७३-उच्छृदिर-दीप्ति और देवन-प्रकाश,
चमकना और खेलना
उत् उपसर्गपूर्वक वृद धातु है। उच्छृणात्ति। उच्छुत्ते * सुन्द्यात्
उच्छृन्दीत * उच्छृण । उच्छृन्ताम् * उदाङ्गणत्। उदच्छ्न्त * उच्चच्छर्द ।
उच्चच्छृदे * उच्छृद्यात् । उच्छर्दिषीष्ट * उच्छदिता। उच्छर्दिता * नछर्दि-
प्यति वा-तुच्छत्स्यति * उदइच्छर्दिष्यत् वा-सदाच्छय॑त् * उद्ऽच्छ दत् वा
सदापछीत् ॥
भाषानुवाद करो-
मार्ग रुरुधिरे दुष्टाः।वाचं रुणद्धि कुशलः । भिनत्ति जलं कमलम् । बिभिदे
मित्तिं चौरः । छिनत्ति पाशबन्धनम् । युनक्ति चित्तमीश्वरे । रिणक्ति स्थान
गही। विनक्ति यती गृहात् । क्षुणत्ति मृदम् । सम्पत्ति सूर्यः बालो वा ।
पणत्ति व्याघ्रः इत्यादि ।
संस्कृतानुवाद करो
छिद्र को रोको। मोहजाल को तोड़ो । रज्जु ( रस्सी ) को काटो।
मकान को खाली करो। घर मे पृथक् होता है। सहाग को खोदता है। तारा
चमकती है। बालक खेलते हैं। इत्यादि ।
१७४-( उत् ) तृदिर हिंसा और अनादर
वृणत्ति । तृन्ते * वन्द्यात् । तृन्दीत * तुणतु । हन्ताम् * भतृणत् ।
अवन्त * ततर्द ॥ ततदे * दद्यात् ॥ सर्दिषीष्ट * तर्दिता ॥ सर्दिष्यति *
भतर्दिष्यत् * अवदत, मतर्दीत् ॥ अतर्दिष्ट *
इत्युभयपदिनः
रुधादयः ४ अथ परस्मैपदिन:- १७५-कृसी-वेष्टन, लपेटना लणत्ति इत्यादि ॥ धकतं ॥ कृत्यात् ॥ कर्तिता ॥ कतिष्यति ॥ भकति. यत् ॥ अकर्तीत् ॥ १७६ । १७७-तृह, हिसि हिंसा, वध करना तृणेढि तृगढः तहन्ति । तृणोक्षि तृगढः खण्ड । खणेलि रोहः हृमः ॥ तृह्यात् ॥ तृणेढु, तृण्ढात् वगढाम् तुं हन्तु । तृपिढ, तरढात् वगढम् तृगढ । तृण हानि तृणहाय तृण हाम ॥ अतृगेट अतृगढाम् अनुहन् । अतृणेट् मतगढम् अतुगढ । अतृणहम् मह अनुमा ॥ ततह ॥ वृह्यात् ॥ तर्हिता ॥ तहि व्यति ॥ मतहिष्यत् ॥ मलहीत् ॥ हिनस्ति ॥ हिंस्यात् ॥ हिनस्तु ॥ अहिनत् ॥ भिहिंस. ॥ हिंस्यात् ॥ हिंसिता ॥ हिंसिष्यति ॥ अहिसिष्यत् ॥ अस्मिीत् ॥ १७८-उन्दी-क्लेदन, भिगोना, गीला करना अनाति उन्तः उन्दन्ति । उनत्सि ॥ उन्यात् ॥ उनत्तु ॥ भौमत् मोन्ताम् औन्दन् । औनः औन्तम् औन्त । भौन दम् भौग्र मौन्न ॥ नन्दाञ्चकार इत्यादि श- उन्दामाम, इत्यादि वा-उन्दाम्ब सूव इत्यादि ॥ उद्यात् ॥ नन्दिता । उन्दिष्यति ॥ गौन्दिष्यत् ॥ औन्दीत् ॥ १७६-अज्ज प्रकट होना, चिकनाना, इच्छा, गति अनक्ति. अतः अञ्जन्ति ॥ अज्यात् ॥ भनक्त, मनात मलाम् अनन्तः । अग्धि, अनात् भतम् अङ्क । अनजानि ॥ मानक मालाम् आजन् । मानक भातम् आङ्क्तः । भानजम् आश्व भाऊजम ॥ आना भानजतुः आनरुजः । मान जिथ, मानकय इत्यादि ॥ अज्यात् ॥ अजिता, अता । भविष्यति, अझपति ॥ आञ्जिष्यस् , माझ्यत् ॥ आजीत् माख्रिष्टाम् माविषुः । १८०-तउचूसङ्कोचन, सकोड़ना तनक्ति ॥ तच्चयात् ॥ तनक्तु ॥ मतनक ॥ ततञ्च ॥ तच्यात् ॥ तश्चिता, तक्ता ॥ सचिष्यति, तक्ष्यति ॥ मतच्चिष्यत्,, मतपत् ॥ मातचीत भताङ्क्षीत ॥
५६
तिम्ते
१८१-(ओ) विजी भय और कांपना
विनक्ति विङ्क्तः विचन्ति ॥ विजचात् ॥ विनक्त ॥ अविनक् ॥ विवेज
विविजतुः विविजुः । विविजिथ इत्यादि ॥ विज्यात् । विजिता ॥ विजिष्यति॥
भविजिष्यत् ॥ अविजीत अविजिष्टाम् ॥
१८२-शिष् ( ल ) विशेषण, विशेष, बचना
शिनष्टि शिंष्टः शिंषन्ति ॥ शिंष्यात् ॥ शिनष्टु, शिष्टात् शिंष्टाम्
शिंषन्तु । शिगिढ, शिंष्टात् शिष्टम् शिष्ट । शिनषाणि ॥ अशिनट मशि-
ष्टाम् अशिंषम् ॥ शिशेष ॥ शिष्यात् ॥ शेष्टा ॥ शेष्यति ॥ अशेक्षघत् ॥
अशिषत् ॥ इसी प्रकार:-
१८३-पिष् ( ट )=संचूर्णन, पीसना
१८४-भजो-आमर्दन, भङ्ग करना, तोड़ना, फोड़ना
भनक्ति पङ्क्तः भञ्जन्ति । मनक्षि ॥ भज्यात् ॥ भनक्तु ॥ अभनक
बभञ्ज । बजिथ, बभङक्थ ॥ भज्यात् ॥ सङ्क्ता ॥ अङ्ख्यति॥ अभक्ष्यत् ॥
अभाङ्क्षीत् अभाङ्क्ताम् अभाङ्क्षुः । अभातीः इत्यादि ॥
भाषानुवाद करो
कणत्ति पुस्तकं छात्रः । तृणोढि वालं व्याघ्रः । हिनस्ति मृगान् व्याधः ।
उनत्ति वस्त्राणि। अनक्कि सौन्दर्यम् । अञ्जन्ति पयसा शिरः । अमक्त विद्याम् ।
तनक्ति करं लुब्धः । विनक्ति रोगभीत्या लोकः । विजन्ति वातेन वृक्षाः ।
शिनष्टि शिष्यं गुरुः । पिनष्टि गोधूमान् वराकी ( बेचारी ) । बा रामो
धनुर्जनकपुरे शिवस्य । इत्यादि ॥
संस्कृतानुवाद करो
वक्षों को बांधो । शत्रु को मारो। कपड़ा मिमोमो । स्वरूप मत दिखा
भो । शिर को तैल से चिकनामी। धन और कीर्ति को चाहो । ग्राम को
चलो। रस्सी को सकोहो । मत डरो । मत कांपो। अपने को विद्या से विशेष
करो । बुढ़िया चने पीसती है । लकही तोहो । इत्यादि ॥
इति परस्मैपदिनः
-
-
तनादयः
अथात्मनेपदिन:-
१८५-भुज-पालन और अभ्यवहार भोजन
यह धातु पालन अर्थ में परस्मैपदी है। जैसे
भुनक्ति * भुञ्जयात *
भुनक्तु * अभुनक * बुमोज * भुज्यात् * भोक्ता * मोक्ष्यति * अभोक्षयात*
अभीक्षीत् अभी काम् इत्यादि ॥ यह पालन अर्थ को छोह भोजन अर्थ में
वा धातुओं के अनेकार्थ होने से अन्य किसी अर्थ में जाम मेपदी रहता है।
मैसे-भुङ्क्ते * भुञ्जीत * भुताम् * अभुत * बुभुजे * भुक्षीष्ट * माता *
मोक्ष्यते * अभोक्ष्यत * अभुक्त अभुक्षाताम् अभुक्षत इत्यादि ॥
१८६-( जि ) इन्धी-दीप्ति, चमकना, प्रज्वलित होना
इन्धे * इन्धीत * इन्धाम् * ऐन्ध * इन्धाच्चके इन्याञ्चक्राते * इन्धिषीष्ट
इन्धिता * इन्धिष्यते * ऐन्धिष्यत * ऐन्धिष्ट ।
१८७-बिद-विचारना
विन्ते * विन्दीत * विन्ताम् * अविन्त * विवि * वित्सीष्ट * वेत्ता*
वेत्स्यते * भवेत्स्यत* भवित्त वित्साताम् ।।
भाषानबाद करो
महीं भुनक्ति भूपालः।
मोदनं भुते बालः। इन्धीत वेद्यां समिधः ।
विन्ते वेदान् श्रोत्रियः इत्यादि ।
संस्कृधानवाद करो
गृहस्थो ! कुटुम्ब को पालो । धर्मार्जित अन्न को खामो । इन्धन जलता
है। सत्यासत्य को बिचारो इत्यादि ॥
इति रुधादिगणप्रकरणम्
अथ तिङन्ते तनादिगणप्रकरणम्
तत्रोभयपदिन:-
१८८-सनु-विस्तार, फैलाना
तनोति तनुतः तन्वन्ति । सनोषि तनुयः तनुथ ।
तनुवः तन्मः, तनुमः ॥ तनुते तम्घात तन्वते । तनुषे तम्बाथे तमुध्वे । तन्ये
तनोमि तभ्यः,
तिङन्ते तनु वहे, तन्वहे तनुमहे, तन्महे * समुयात्॥ तन्वीत तन्वीयाताम् तन्वीरन्। तन्वीथाः * तनोतु, तनुतात् तनुताम् तन्वन्तु । तनु, तनुतात् तनुताम् तनुन । तनवानि तनवाव तनवाम ॥ तनुताम् तन्याताम् तन्वताम् । तनुष्य * अतनोत अतनुताम् अतन्वन् । अतनोः अतनुतम् अतनु त । मतनवम् तन्व, अतनुव भतन्म, अतनुम ॥ अतनुम अतन्याताम् अतन्वत । छत्तनु धाः अतन्वायाम् अतनुध्वम् । अतन्धि अतमु यहि, तन्वहि अतनुमहि, अन. महि * ततान तेनतुः तेनुः । तेनिय तेनथुः तेन । ततान, ततन तेनिध तेनिम ॥ तेने तेनाते * तन्यात् ॥ तनिषीष्ट * तनिता ॥ तनिता * तनि- ष्यति । तनिष्यते * मतनिष्यत् ॥ अतनिष्यत * भतानीत् , भतनीत् ॥ अतन, अतनिष्ट गतनिषाताम् अतनिषत । तथाः, अतनिष्ठाः पतनिषा.. पाम् भतनिध्वम् । अतनिषि अतनिष्वहि अतनिम्महि ॥ १८६-षणुदान, देना सनोति । सनुते * सनुपात् । सन्वीत * समोर । समुताम् * ममनोत् । असनुत * ससान। सेने * सन्यात, सायात्। सनिषीष्ट * सनिता। सनिता सनिष्यति । सनिष्यते * असनिष्यत् । असनिष्यत * अमानीत , भमनीत । असात, असनिष्ट असनिषाताम् असनिषत । अमाथाः, असनिष्ठा असनिषाथाम् इत्यादि । १९०-क्षणु-हिंसा क्षणोति इत्यादि * लिट्-घक्षाण चक्षणः चक्षणः। चक्षणिय ॥ चक्षणे चक्षणाते *क्षरयात् । क्षणिषीष्ट * क्षणिता। क्षणिताक्षणिष्यति। क्षणिष्यते * मक्षणिष्यत् । क्षणिष्यत * भक्षणीत् अक्षणिष्टाम् ॥ अक्षत, मक्षणिष्ट इत्यादि ।। १९१-क्षिण-हिंसा, मारना क्षिणोति इत्यादि । किम्ही के मत में क्षेणोति इत्यादि चिक्षेण चिक्षि- णतुः ॥ चिमिणे * क्षिण्यात । क्षेणिषीष्ट * क्षणिता । क्षेणिता * क्षेणिष्यति क्षणिष्यते * अक्षेणिष्यत् । अले शिष्यत * भक्षेणीत् । अक्षित, अक्षेणिष्ट अक्षे. णिपाताम् मक्षेणिषत । अक्षिथाः, प्रक्षेणिष्ठाः इत्यादि १९२-तृण-अदन, चरना, खाना तृणोति वा तोति इत्यादि * ततर्ण समृणतुः ॥ ततृणे * तृण्यात् । तर्णिषीष्ट * तर्णिता । तर्णिता * तर्णिष्यति । तर्णिप्यते * अतर्णिष्यत् । मतर्णिष्यत * अतीत् ममृत, भतर्णिष्ट । भवृथाः, अतर्णिष्ठाः ॥ - तनादयः ६१ १९३-(डु) कृ ( ञ् ) करण, करना, बनाना फरोति कुरुतः कुर्वन्ति। करोषि कुरुथः कुरुथ। करोमि कुर्वः कुर्मः॥ कुमते कुत्ते कुर्वते । कुरुर्ष कुर्वाथे कुमध्धे । कुर्वे कुवं हे कुर्महे ॥ कुर्यात् ॥ कुर्वीत ॥ करोतु, कुरुतात् कुरुताम् कुर्वन्तु । कुरु, कुरुतात् कुरुतम् कुमत । करमाणि करवाव करवाम ॥ कुरुताम् कुर्वाताम् कुर्वताम् । कुमय कुर्षायाम् कुरुध्वम् । करवै करवावहै करवामहै ॥ अकरोत् कुरुताम् अकुर्वन् । अकरोः अकुरुतम् मकुमत्त । अकरवम् अकुर्व अकुर्म ॥ अकुरुत मकुर्वाताम् अकुर्वत । भकुरुपाः अकुर्वाषाम् अकुरुध्वम् । अकुर्वि अकुर्वहि अकुर्महि ॥ चकार चक्रतुः चकः । धकर्थ । धके चक्राते चक्रिरे ॥ क्रियात् । कृषीष्ट । कर्ता। कर्ता॥ करिष्यति । करिष्यते ॥ भकरिष्यत् । गकरिष्यत ॥ मकार्षीत अकाष्टाम् अकार्षः। अकार्षीः अकार्टम् अकार्ट । अकार्षम् भकावं अकार्म ॥ अकृत अकृषाताम् अरूषत । अकृथाः अकृषाधाम् इत्यादि ॥ सम् और परि उपसर्ग से परे "क" धातु को सुट् ( स ) भागम होता है भूषण और समवाय अर्थ में । जैसे:- सम्+करोति संस्करोति । परि+करोति-परिष्करोति ॥ उप उपसर्ग से परे भी क धातु को सट् आगम होता है प्रतियन, वैकृत, वाक्याध्याहार, भूपण और समवाय अर्थों में । जैसे:-प्रतियन में उदकस्यो- पस्कुरुते जल को गुणयुक्त करता अपगुण दूर करके गुणाधान करता है। वकृत में-उपस्करोति अन्नम्मन को विकृत करता है। उपस्कृतं ब्रूते-चायों के अध्याहारपूर्वक उच्चारण करता है । उपस्कृता कन्या न्या भूषिता इत्यर्थः । उपस्कृता ब्राह्मणाःब्राह्मण इकट्ठे हैं । भाषानुवाद करो तनोति वस्त्रं तन्तुवायः । सनोति दक्षिणां यजमानः । क्षणोति, क्षियोति, क्षेणोति वा माणवकं व्याघ्रः । तृण्वन्ति वने गावः । कुरुते घटं कुलालः ॥ संकृतानवाद करो कपड़ा बुनो। ऋस दो। दुर्बल को मत मारो। गाय घरती है। इत्यादि। इत्युभयपदप्रकरणम् - NA तिङन्ते अथात्मनेपदप्रकरणम्- १५४-वन-याचन, मांगना वनुते इत्यादि १८ के तुल्य ॥ धवने यवनाते ॥ वनिषीष्ट ॥ वनिता । यनिष्यते । वनिप्पल ॥ अवत, भवनिष्ट भवनिषाताम् भवनिषत । अवधाः, अवनिष्ठाः इत्यादि । १९५-मनु-अवबोधन, समझना, मानना मनुते इत्यादि । मेने मेनाते मेनिरे । मनिषीष्ट इत्यादि १९४ के तुल्य है । भाषानुवाद करो यमुले विद्यार्थी । जात्मानं पगिडतं मनुते । इत्यादि । संस्कृतानुवाद करो भिक्षा मत मांगो। अर्थ समझो इत्यादि ॥ इति तनादिगण प्रकरणम् अथ तिङन्ते क्रयादिगणप्रकरणम् १९६-(डु) क्री (ञ् )-द्रव्यविनिमय, खरीदना क्रीमाति कीणीतः क्रीणन्ति क्रीसासि क्रीमीथः क्रीमीप। कोणामि कीशीव: क्रीणीमः ॥ कोणीते कीगावे कोणले । क्रीणीधे क्रीमाथे क्रीणीवे । क्रीणे क्रीणीवहे कोणीमहे ॥ क्रीणीयात् । क्रीणीत इत्यादि ॥ कोणातु, क्रीणीतात् क्रीणीताम् क्रीणन्तु । क्रीणीहि, कोणीतात् क्रीणीतम् कोणीत । क्रोणानि कोणाव क्रीणाम ॥ क्रीणीताम् क्रीणाताम् क्रीणताम् । कोणीष्व क्रीणायाम् क्रीणीध्वम् । क्रोणे क्रीणाव हे क्रीणाम है ॥ अक्रोणात सक्रीणीताम् । अक्रीणन् । लकीणाः अक्रोणीतम् अक्रोणीत । अक्रीणम् मक्रीणीव अक्रीणीम ॥ भक्री- गीत क्रीणाताम् अक्रीणत । मक्रीणीथाः अक्रोणाथाम् प्रक्रीणीध्वम् । अक्रोणि अक्रीणीधहि अक्रीणीमहि ॥ धिक्राय चिक्रियतुः चिक्रियः । चिकेप चिक्रिय थुः चिक्रिय । चिकाय, चिक्रय चिक्रिमित्र चिक्रियिम । चिकिये चिक्रि- याते चिक्रियिरे। चिक्रियिषे चिकियाथे चिक्रियिष्ये। चिक्रिये। चिक्रियिवहे चिक्रियिमहे॥क्रीयात् । ऋषीष्ट ॥ क्रेता। क्रेता॥ ऋष्यति। वेष्यते ॥मष्यत् । मकेष्यत ॥ अकैषीत् । मकेष्ठ अषाताम् इत्यादि । - धादयः - १९७-प्री (ज) सर्पण, तृप्त करना प्रीति और इच्छा प्रीणाति ॥ प्रोणीते * प्रीगीयास ॥ प्रीणीत • प्रीणातु ॥ प्रीणीताम् * अप्रोगात् ॥ अप्रीणीत * पिप्राय ॥ पिप्रिये * प्रीयात् इत्यादि " की " तुल्य है । इसी प्रकारः- १९:-श्री (अ )-पाक, पकाना। १६-मी ( ञ् ) हिंसा इस धातु के प्रयोगों में न को ण हो जाता है, जबकि प्रादि उपसर्गस्थ रेफादिनिमित्त मे परे हो । जैसे-प्रमीणाति । परिमीणाति इत्यादि ॥ लिट्- ममी मिभ्यतुः मिम्युः । ममिथ, ममाथ मिम्यथः मिम्य । ममी मिम्यिव मिमियम ॥ मिम्ये मिम्याते ॥ मीयात् । मासीष्ट ॥ माता । माता॥ मास्यति मास्यते ॥ अमास्यत् । ममास्यत ॥ अमासीत् । भमास्त अमासाताम् ॥ २००-पि ( ञ् )-बन्धन, बांधना सिनाति । मिनीते ॥ मिनीयात् । सिनीत ॥ भिनातु । सिनीताम् ॥ भमिनात् । असिनीत ॥ सिषाय सिष्यतुः सिष्पः । सिषे य॥ सिष्ये मिष्याते। मीयात् । मेषीष्ट ॥ सेता । सेता ॥ मेष्यति । सेप्यते ॥ अमेष्यत् । ममेष्यत ॥ असेषीत् असेष्टाम् । अमेष्ट अमेषाताम् ॥ २०१-स्कु ( ञ् )-आप्लवन, कूदना, उछलना स्कुनाति । स्कुनीते ॥ स्कुगीयात् । स्कुनीत ॥ स्कुनातु । स्कुनीताम् ॥ अस्कुनात् । अस्कुनीत ॥ अथवा - स्कुनाति सकुनुतः स्कुन्वन्ति इत्यादि स्वादिगण के तुल्य । लिट् चुस्काव धुम्कुवतुः इत्यादि। स्कूयात् । स्कोषीष्ट । फोता इत्यादि। २०२।२०३।२०४ । २०५-स्तन्भु, स्तुन्भु, स्कन्भु, स्कुन्भु- =रोकना ये ४ धातु परस्मैपदी मौत्र हैं। जैसे: - स्तभ्नाति स्तमनीतः ॥ सतनी. यात् ॥ सतभन तु, नीतात् स्तगीताम् स्तभ्नन्तु । स्तभान, स्तभनी तात् सलमनीतम् इत्यादि ॥ शस्तनात् ॥ तस्तम्भ तस्तभतुः तस्तभुः । तस्तम्भिय : नसता । तस्तम्भ तस्तमिव तस्तमिम ॥ स्तभ्यात् ॥ सम्भिता । खसिध्यति । मम्भिष्यत् ॥ मस्तात् मस्तभताम् या-मस्तम्भोत अस. तस्तभथुः ,
-
सिडन्ते
भिष्टाम् इत्यादि । इसी प्रकार तुभ्नाति इत्यादि ॥ तुम तुष्टुभतुः तुष्टुभुः
इत्यादि ॥ तथा-स्कभनाति इत्यादि ॥ घस्कम्भ चस्कभतुः इत्यादि ॥ स्कु.
भ्नाति इत्यादि । चुस्कुम्भ चुस्कुभतुः इत्यादि ।
२०६-यु ( ज् )-बन्धन, बांधना
युनाति । युनीते ॥ युनीयात् । युनीत युनीयाताम् ॥ युनातु । युनीताम्
भयुनात् । अयुगीत ॥ युयाव यु यवतुः युयुवः । युयोथ, युविथ युयुदथुः
ययुव । युयाव, युयव युयांवव युयुधम । युयुवे युयुवाते इत्यादि ।
यूयात् । योषीष्ट ॥ योता इत्यादि ॥ अयोषीत् अपौष्टाम् अयौषुः। अयोषीः
इत्यादि । अपोष्ट अयोषाताम् ॥
२०७-क्रू ()शब्द, बोलना, कू २ करना
नोति इत्यादि । चुनाव चनु वतुः कः । चुकविथ ॥ चुकने चुकवाते ।
यात् । कविषीष्ट ॥ कविता इत्यादि ॥ सनाधीत् अनाविष्टाम् ॥ नविष्ट ।
२०८-दृ ( अ )-हिंसा
दूणाति इत्यादि ॥ ददार ददरतुः । ददरे ददराते ॥ दीर्यात् । दरिषीष्ट ॥
दरिता, दरीता इत्यादि ॥ गदारीत् । मदरिष्ट ॥
२०६-द्रू (ज्
)=हिंसा
द्रूणाति इत्यादि ॥ दुद्राव । दुद्रुवाः ॥ दुद्रुधे ॥ द्रूयात् । द्रविषीष्ट ॥ द्रविता
इत्यादि ॥ मद्रावीत, अद्रवीत् । भद्रधिष्ट ।
२१०-पू ( ञ् ) पवन, शोधन, शुद्ध करना
पुनाति इत्यादि।पुषाव पुपुवस्तुः । पुपुधे॥पूयात् । पविषीष्ट ॥ पविता इत्यादि ।
२११-स्तु ( अ ) =आच्छादन, ढकना
स्मृणाति इत्यादि । तस्तार तस्तरतुः । तस्तरे ॥ स्तीर्यास् । स्तीर्पोष्ट ॥
स्तरिता, स्तरीता इत्यादि ॥ अस्तारीत् । जस्तरिष्ट अस्तरिषाताम् इत्यादि
वा-भस्तीष्टं अस्तीर्षाताम् अस्तीर्षत इत्यादि ॥
२१२-क ( )-हिंसा
रुणाति इत्यादि ॥ चकार चकरतुः । चकरे ॥ भागे " २०८ के तुल्य
है। इसी प्रकार:-
४ - ऋपादयः २१३-३ ( ञ् )-वरण, स्वीकार घृणाति इत्यादि । ववार ववरतुः इत्यादि । ववरे ववराते ॥ सूर्यात वरिषीप्ट, वर्षीष्ट ॥ वरिता, बरीता । वरिता, वरीता ॥ वरिष्यति, वरीष्यति इत्यादि । लुङ्-अवारीत् अवारिष्ठाम् आवारिषुः । वरिष्ट भावरिषाताम् बा-अवरीष्ट भवरीषाताम् धा-अवर्ल्ड अवताम् इत्यादि । २१४-धू ( )=कम्पन, कांपना, हिलना धुनानि । धुनीते ॥ धुनीयात् । धुनीत ॥ धुनातु । धुनीताम् ॥ अधुनात् । अधुनी न ॥ दुधाव दुथु बनुः । दुधवे ॥ धूयात । विषीष्ट, धोषीष्ट ॥ धषिता, धाता ॥ धविष्यति, धोष्यति ॥ भविष्यत, अधोष्यत् ॥ अधौषीत् वा-, अधाधीत् अधाविष्टाम् । अधविष्ट, अधोष्ट । २१५-ग्रह-उपादान, लेना, ग्रहण करना, पकड़ना गृह्णाति । गृह्णीते ॥ गृह्णीयात् । गृहोत ॥ गृह्णातु, वृहीतात् गृहीताम् । गृह्णन्तु । गृहाण, गृह्ण तात् गृहीतम् इत्यादि । अगृह्णात् । भगृहीत ॥ जग्राह जग तुः । जगृहे जगृहाते ॥ गृह्यात् । ग्रहीषीष्ट ॥ ग्रहीता । ग्रहीता ॥ ग्रही. ध्यति । ग्रहीष्यते ॥ अग्रहो ष्यत् । अग्रहीष्यन ॥ अग्रहीत् अग्रहीप्टाम् ॥ अग्र- हीष्ट अग्रहीषाताम् अग्रहोषत । भग्रहीष्ठाः । इत्यादि । भापानुवाद करो भन्न क्रीणानि । फलानि विक्रीणीते । पितरौ प्रीणीतो बालम् । ओदनं श्रीणात । गीनानि धको मीमान् । मिनाति रक्षकश्चौरम् स्कुनोति स्कुनाति या मगडू मस्तष्ठागे । स्तम्नाति खडगम् । स्तुभ्नाति शत्रु हस्तं धीरः । स्कम्नाति हस्तिनमङ्कुशेन । स्कुभ्नाति गां दराडेन । युनाति पशून् । कनन्ति श्वशावकाः ( कुतिया के पिल्ले ) । दणाति सिंहो जम् । दूणाति व्य प्रो गाम् पुनाति यज्ञधूमो गृहाणि सताम् । स्तृणन्ति यज्ञे कुशान् ऋत्विजः ॥ कृमन्ति पगन् शूराः संग्रामे। वृणाति कन्या युवानं पतिम् । धुनाति वृक्षान् वायुस्तीवः। गृह्णाति दक्षिणामाचार्यः । इत्यादि। संस्कृतानुवाद करो गोधम ख़रीदो । सरमों। यो । भाचार्य को प्रसन्न करो । सूप ( दाल) भोर भात पका मो। मली मत मारो। भन्य अदुष्ट प्राणियों को भी मत है - निहन्ते - - भारो। दुष्टों को मारो। भोजनार्थ मान बांधो । गर्व से मत उछलो । खड्ग प्रहार को रोको शत्र को हटाओ। घोड़े को थांभो । कू कू क्यों करते हो । शत्रु के वक्षःस्थल को फाडो। जल और वायु तया गृह को शुद्ध करो। जलपात्र और घुनपात्र को ढको। सिर ढको । बिना अपराध किसी को मत मारो । भाचार्य का वरण करो। पांव मन हिलाओ। मज़बूत पकड़ो । इत्यादि । इत्यभयपदप्रकरणम् ॥ अथ परस्मैपदप्रकरणम्- २१६-कुष-निष्कर्ष, निकालना, दबाना, निचोड़ना कुष्णाति इत्यादि ॥ लोट-मध्यमपुरुष कवचन-कुषाण ॥ लिट् धु कोष धु कुषतुः ॥ कुष्यात् ॥ कोषिता । कोषिष्यति ॥ अकोषिष्यत् ॥ अकोषीत् ॥ २१५-अश-भोजन, खाना प्रश्नाति इत्यादि ॥ लोट-मध्यमै कवचन-अशान ॥ लिट्-माश अशतुः॥ भश्यात । भशिता ॥ अशिष्यति ॥ माशिष्यत् ॥ आशीत् ।। २१८-मुप-स्तेय, चुराना मुष्णाति इत्यादि ॥ लोट् - मध्यमैकवचनमुषाण ॥ मुमोष ॥ मुष्यात ॥ मोषिता इत्यादि ॥ इति परस्मैपदप्रकरणम् ॥ अथात्मनेपदप्रकरणम्- २१९-७ (इ) संभक्ति, सेवा करना वृणीते ॥ वृणीत ॥ वृणीताम् ॥ अमृणीत ॥ वक्रे खाते ॥ वरिषीष्ट ॥ धरिना, वरीता ॥ वरिष्यते, वरीष्यते ॥ भवरिष्यत, अवरीष्यत ॥ भवरिष्ट, भवरीष्ट, भक्त । मषाताम् इत्यादि ॥ भाषानुवाद कगे कुष्णाति वस्त्रम् तिलान्या । मनन्ति ब्राह्मणाः पायसम् । मुष्णन्ति तस्कराः परधनम् । गीते पतिं वधः । इत्यादि ॥ संस्कृतानुवाद करो धोती निचोड़ो। सरसों से तेल निकालो। अभक्ष्य मत खाओ। किसी की वस्तु मत चुरायो । गुरु को सेयो । इत्यादि । इति क्रयादिगणप्रकरणम् ॥ ९ ॥ - । चुरादयः अथ तिङन्ते चरादिगणप्रकरणम् २२०-चुर=स्तेय, चुराना चोरयति । घोरयते * घोरयेत् । घोर येत * चोरयतु । घोरयताम् * पाचोरयत् । अचोरयन * चोरणाञ्चकार चोर य वक्रतुः, धोरयामास चोरया. भासतुः, चोरयाम्बभूव चोरयाम्बयतुः इत्यादि * चोयोत् । चोरयिपीट * धोरपिता । चोरयिता * चोरयिष्यति । धारयिष्यते * मचोरयिष्यत् । मचोरयिष्यत् * अचूचरत् । अचू करत ॥ २२१-कथ-बोलना, कहना, वाक्यप्रबन्ध कथयति इत्यादि * माशीलिङ्-कथ्यात् * टुङ्-अधक थत् ॥ अघकथत शेषरूप “ चुर " के तुल्य हैं । २२२-गण-सङ्ख्या करना, गिनना गणयति इत्यादि तुल्य है परन्तु लुङ् में मजीगणत् वा- अजगणात् । अजीगणात, अजगणत । इत्यादि दो २ रूप होते है। भापानुवाद करो- पापः परधनं धोरयति । सत्यं कथयति धर्मात्मा । परापराधान् न गायन्ति साधवः । इत्यादि । संस्कृतानुवाद करो- किसी के वक्षादि मत धुरामो । सत्य कहो । रुपये गिमो । इत्यादि । इति तिङन्ते चुरादिगणप्रकरणम् कथ के - । Lacs दश गणाः समाप्ताः अथ तिङन्ते ण्यन्तप्रक्रिया का से कोई क्रिया कराना अर्थात कर्ता को प्रेरणा करके को क्रिया बाना स्पात का है। जैसे-'घतो भवति" से "भावयति पड़े को ६८ r सिडन्ते. हवाला अर्थात् बनाता है अश्वो घासं खादति" मे “मश्वं घासं खादयति": घोड़े को घास खिलाता है। इत्यादि । इम गयन्त अवस्था में पूर्वावस्या का कर्ता प्रायः कर्म बन जाता है । १-भू-होना ॥ * भवति" इत्यादि भ्वादिगण में कह आये हैं। यहां परस्मैपद में - पहा- वति भावयतः इत्यादि * भावयेत् भावयेताम् इत्यादि * भादयतु, भावय- नात् इत्यादि * अभावयत् इत्यादि * भावयाच कार, भावयामाम, भावयाम्नझूध इत्यादि * भाव्यात् * मावपिता * भावयिष्यति * असावधियत् * अबी. अवत अबीभवताम् अबीभवन् । अबीभवः इत्यादि । भात्मनेपद में भावयते * भावयेत * भावयताम् * अभावयत * भावयाचक्रे * भावयिषीष्ट भाव. यिता * भावयिष्यते * ममावयिष्यत * अबीसवत अबीभताम् इत्यादि । २-स्था-ठहरना॥ निष्ठति इत्यादि कह पाये हैं। यहां-स्थापयति * स्थापयेत् इत्यादि भावयति भादि के तुल्य हैं। लुङ्-प्रतिष्ठिपत् ॥ अतिष्ठि पत इत्यादि । ३-घट-चेष्टा, बनाना घटते इत्यादि भ्वादिगण में । यहां घटयति इत्यादि । लुङ्-शशीघटस् अजीघटत इत्यादि ॥ ४-ज्ञप-ज्ञान, जानना ॥ चुरादिगणस्थ है। यहां-जापयति इत्यादि । इसी प्रकार-आतयति * आतितत् ॥ भादपति * प्रादिदत् ॥ हावयति * अजीहवत् ॥ देवयति * अदी दिवत् ॥ सावयति * अमूषुवत् ॥ तोदयति *. अतूतुदत् ॥ रोधपति * अस्रुवत् ॥ तानयति * अतीतनत् ॥ काययति * भाचक्रियत्॥ चोरयति भी मधू चुरत् ॥ इत्यादि सब गणों से सब धातुओं के रूप समझने चाहिये । स्मरण रहे कि इस पुस्तक में उस २ गण के सश्र धातु नहीं लिखे, किन्तु बहुत से ऐसे धातु भी हैं जो इम पुस्तक में नहीं लिखे, परन्तु अपने अपने गण के मुख्य धातु के प्रायशः तुल्य हैं और जिन २ में कुछ वि. शेष है वह व्याकरण की इस से अगली बड़ी पुस्तकों के पढ़ने से समझ में आवेगा, परन्तु लघु कौमुदी में जितने धातु दिये हैं प्रायः वे सब हमने श्री यहां लिख दिये हैं। . - धातु पाठ के मनन्तप्रक्रिया - - उदाहरणानि-घटं भावयति-घड़े को बनाता है। सःधुं गृहे स्थापयति- साधु को घर में ठहराता है । घटयति कम्बलम् कम्बल को बनाता है । अर्थ पयति अर्थ को जतलाता है। मिष्ट मादयति मिठाई खिलाता है। हाव- यति दक्षिणाम् दक्षिणा दिलाता है। देवयति बालकान्-बालकों को खेलाना है। माम मावयति सोम का अर्क खिंचवाता है। तो यति रथी मारथिना. वान् रथी, सारथि से घोड़ों को व्यथित कराता है। रोधयति भृत्यैः पथिकान = नीकरों से पथिकों को रुकवाता है । यज्ञार्थमासनानि तानयति यज्ञार्थ भासन बिछवाता है। सर्षपं काययति-मरसों ख़रीदवाता है। घोरर्यात खलः परधनम्-दुष्ट पराये धन को चुरवाता है इत्यादि ॥ इति ण्यन्तप्रक्रिया अथ तिङन्त सन्नन्तप्रक्रिया अब धातु के अर्थ में इच्छार्थ पाया जावे तब सम्नन्त का प्रयोग होता है। जेसे भवति से-बुभूषति होना चाहता है इत्यादि । १-पठ-पढ़ना ॥ पिपठिपति * पिपठिषेत्र * पिपठिषतु * अपिपठिषत् * पिपटिया. स्वगार * पिपठिष्यात् * पिपठिषिता * पिपठिषिष्यति - मपिपठिषिष्यत् * अपिपठिषीत् इत्यादि । २-अद ( घरट ) भक्षण । जिघत्सति इत्यादि ॥ ३-कृ ( ञ् ) करना ॥ चिकीर्षति * चिकीत् * चिकीर्षतु * अचिकीर्षत * चिकीर्षाञ्चकार इत्यादि। ४-भू-होना ॥ घुलपति* बुभूषेत * बुमूषतु * अबु भूषस् * युसूषाञ्चकार * बभूष्यात् इत्यादि । इसी प्रकार-जुहूषति । दिदेविषति । सुषूषतिं । तुतुत्मति । ससत्मति । तितांसति, तितंमति वा तितनिषति। चिऋषति । चुचारयिषति इत्यादि जानो। , उदाहरणानि-पिपठिषति वेदान् श्रोत्रियः श्रोत्रिय (वेद पाठी) वेदों को पढ़ना चाहता है। चिकी पति गहं गृही-गृहस्थ घर को. बनाना चाहता लिखते है। छ। त्रः पगिडतो युभूषप्ति विद्यार्थी पगिडत होना चाहता है । जिस्मति मिष्टं ब्राह्मणाःत्राह्मगा मिठाई खाना चाहता है। पान्यो ग्रामं जिगमिषमित पायक ग्राम को जाना चाहता है । जुहू पनि दक्षिणां यजमा मःम्प प्रभाग दक्षिणा को देना चाहता है मुहूति हव्यमग्निः म हव्य को खाना ( फंकना ) चाहता है । याला दुयू पन्ति, दिदेविन्ति वा बालक खेलना चाहते हैं । अहं गुडूचीं सुषूपामि=मैं गिलोय का अ क खींचना चाहता हूं तुतुत्मनि बस्नः माधन दुष्ट रूत्पुरुषों को दुख देना चाहता है । सारुति शत्रु वीरः-शू वीर शत्रु को रोकना चाहता है । तितां मति, तितंसात या तितनिषति जालं वञ्चकः=ठग जाल को फैलाना चाहता है। व्यापारी चिऋषति गं धूमराशिम् व्यापारी गोधूम को ढेगे को खरीदना चाहता है। चु चोरयि. पति चौरः परथमानि= वोर पराये धनों को चुराना चाहता है । इत्यादि । प्रायः इसी प्रकार के अन्य धातुओं के रूप जानी ॥ इति सन्नन्तप्रक्रिया - अथ तिङन्ते यङन्तप्रक्रिया जो धातु एक स्वर चाले और व्यञ्जनादि हैं सुन के अर्थ में जब अतिश. यता या वारंवार का अर्थ रहता है तब यन्त प्रयोग होता है । जैसे:- बोसूयतेबहुतायत से होता है वा वारंवार होता है । इत्यादि । बोसूप * बोभूपेम* बोस्यताम् * अबोभूयत * बोभूपाञ्चक्रे * बोमू. यिषीष्ट * बोभूयिता * बोभूयिष्यते * अबोभूयिष्यत * अबोभूपि ष्ट प्रबो. भूयिषाताम् इत्यादि ॥ जिन धातुओं का “गति" अर्थ है उन का यङन्त प्रयोग कुटिलता अर्थ में होता है । क्रियासमभिहार (एक दूमरे का काम करना) में नही । जैमे:- यात्रज्यते * याद्रज्येत * वाव्रज्यताम् * अवव्रज्यत * वावजाचके * वाव्रजिषोष्ट * वात्रजिता * धान जष्यते * वाव्रजिष्यत * भुवःव्रजिष्ट । वरीत्यते * वरीत्येत * वरीवृत्यताम् * अवरी कृत्यत . वरीकृताञ्चके बरोवृतिषीष्ठ * धरीकृतिता * वरीपतिष्यते * वरीपतिष्यत * भवरीषतिष्ट । नरी मृत्यते * मरीनृत्येत * गरीनृत्यताम् मरीनृत्यत * गरीनता. चके * नरीनतिषीष्ट * नरीर्तिता । इत्यादि ।
- - यलप्रक्रिया ११ जरीगृह्यते इत्यादि ॥ जरीगृहाञ्चके ॥ जीगृहिष ट ॥ गरीगृहिता इत्यादि । इसी प्रकार:- जहन्यते । जो हूयते । देवीव्यते । सोधूयते । सो तुद्यते । शेमध्यते । तम्तन्यते । चेक्रीयते । चोचू यंते इत्यादि जागो ॥ उदाहरणानि वर्षा बोभूयते मेवः-वर्षा में मेघ वारंवार वा बहुतायत मे हुवा करता है। वाव्रज्यतेऽश्व-घोडा तिरछा चला करता है। वरी वृत्य तेऽन्तम अन्न बतायत से वर्तमान है। नरी नृत्यते गणिकारी वार २ नाचती है। अजरी गृहिष्ट चौरं रक्षकः वारंवार पकसा चोर को छोझीदार ने । ऊवर ते पक्षिणी बांधकः-वधिक पक्षियों की बहुतायत मे म. रता । जोहूयते दानं दाता दाना बहुतायत से दान देता है । जो हू ते घृत मग्निः=अमित घृत को पलायन से जन्माता है । कोई दी व्यन्ते खला: दुष्ट करता यत से पात्रों मे खेलते हैं । सोधूयते ऋत्विक मोम= ऋलिज ( यर्ता ) मोम का अधि. कता आकं खींचना है। तोतुद्यतेऽश्वान् मारथि: कोचमैन घोहों को बहुत वा वारंवार बोधता है चाबुक मारता है । द स्यवो मार्ग रोसध्या ते डाकू रास्ता बहुत रोकते हैं। चेक्री पन्ते वणिजोऽन्न म्--बनिये नाज बहुत ख़रीदते हैं । घोचर्धन्तेऽमावस्यायां चौपाचोर अमावस में बहुत चुराते हैं इत्यादि। इति रङन्तप्रक्रिया है - अथ तिङन्ते यङ्लुक प्रक्रिया यङन्त के ही अर्थ में दूसरे प्रकार के प्रयोग यङ्लुक के भी होते हैं । भू-होना .. बोभवी ति, ब भोति बोभूतः बोभुवति । बीसवीषि, बोभ पि बोभूयः बोभूध । बोभवीमि, बोभःमि वोभूवः बोभूमः ॥ कोभूयात् बोभयानाम् गोभूण: इत्यादि ॥ बोअबीतु, बोतु, बाभूतात् को भृताम् बोबतु । बोभूहि, वोभूतात् बोभूनम् बा मृत । बोभवानि ॥ आबो भत्, को मोत् बोमृताम् नाको ममः । अबोस यी:, अलोगोः, यो भूकम् अबाभूत । दो. भवम् बा भूव कायाभूग ॥ बोधवचार. बोवामान, वायाम्य ॥ बोभूयात् बोभूयः स्तम् ॥ बोगिता ॥ बीमाभिष्यति ॥ यो भबिध्यत् ॥ अबाभवीत् , अबोकोत् भबोभूताम् अवोभूवः । अबोपदी:, अयोभोः इत्यादि। १० तिङन्ते - इसी प्रकार-जनीति, अङ्कुन्ति । जोहवीति, जो होति । देदेवीनि । मोषधीति, सोषोति । तोतोदीति, तोतोत्ति । रोरोधीति, रोरोद्धि । तात. नीति, तन्तन्ति । चेक्रयीति, चेति । घोचोरीति इत्यादि जानो। उदाहरण यङन्त के तुल्य हैं । इति यङ्लुकप्रक्रिया का कर्म अथ तिङन्ते नामधातुप्रक्रिया नामधातु उसे कहते हैं जो प्रथम प्रातिपदिक ( संज्ञा ) हो और फिर विशेष क्रियार्थ के योग में धातु के समान तिङन्त प्रयुक्त होवे ॥ १-जिन शब्दों का वर्णन प्रथमा द्वितीयादि विमक्तियों महित तृतीय पुस्तक में कर आये हैं, वे और उन के सदृश पान्य प्रातिपदिक जो सुबन्त दशा में थे, जब कि अपने लिये इच्छा क्रिया के कर्म हों तव उन के इस प्रकार रुप होते हैं। जैसे-"अपने लिये पुत्र की इच्छा करना" यहां इच्छा पुत्र है तौ पुत्र शब्द से क्यच प्रत्यय लगाकर- पुत्रीयति पुत्रीयतः इत्यादि ॥ पुत्री येत् पुत्री येताम् ॥ पुत्रीयतु ॥ आपु- त्रीयत् ॥ पुत्रीयाञ्चकार, पुत्रीयामास, पुत्रीयाम्बभूव ॥ पुत्रीय्यात् ॥ पुत्रीषिता॥ पुत्रीयिष्यति ॥ अपुत्रीयिष्यत् ॥ अपपुत्रीयीत् अपुत्रीयिटाम् इत्यादि । राजीयति ॥ राजीयेत् ॥ राजीयतु ॥ अराजीयत् ॥ राजीयाञ्चकार इत्यादि । वाच्यति ॥ वाच्येत् ॥ वाच्यतु ॥ भवाच्यत् ॥ वाध्याञ्चकार ॥ वाच्यात , वाच्यात् । वाध्यिता, वाचिता इत्यादि ॥ गीर्यति ॥ पूर्यति । दिष्यति ॥ गीर्यिता, गीरिता ॥ पूर्यिता, पूरिता ॥ दिव्यता, दिविता इत्यादि । ममिध्यति ॥ समिध्येत् इत्यादि ॥ समिध्यिता, समिधिता ॥ समिध्यि. ध्यति, समिधिष्यति इत्यादि । २-पूर्वोक्त अर्थ में काम्यच् प्रत्यय भी लगाते हैं । जैसे-पुत्रकाम्यति ॥ राजकाम्यति ॥ वाक्लाम्यति ॥ गी:काम्यति ॥ पूःकाम्यति ॥ ममित्काम्यति ॥ पुत्रीयति मे पत्री=मेरी पत्री अपने लिये पुत्र चाहती है । राजीयन्ति प्रजाः प्रजायें अपने लिये राजा चाहती हैं। वाच्यति मूकः गूंगा अपने लिये ( वाच् ) वाणी चाहता है । गीर्यति माणवकः-बालक अपने लिये ( गिर ) । मामघातुप्रक्रिया वाणी चाहता है । पूर्यन्ति कषका:- पूर्यन्ति कृषकाः किसान लोग अपने लिये ( पुर् ) नगरी चाहते हैं । मुमुक्षुन दिव्यति-मोक्ष का इच्छुक स्वर्ग (दिव) नहीं चाहता है। समिध्य ति मग्निः अग्नि अपने खिये लकहो ( समिधु ) चाहता है । दश. रथः पुत्रकाम्याञ्चकार इयाज चाश्वमेधेन-दशरथ ने अपने लिये पुत्र चाहा था और अश्वमेध में यजन किया था। समित्काम्यन्ति अग्निहोत्रिण: अग्निहोत्री लोग समिध् चाहते हैं। पूःकाम्यन्ति दरिद्रा:दरिद्र लोग पुरी चाहते हैं । राजकाम्यन्ति सम्पन्नाः सम्पन्न लोग राजा होना चाहते हैं । बुद्धि काम्येत छात्रः विद्यार्थी बुद्धि को चाहे इत्यादि ॥ ३-आचरण अर्थ में जिम से उपमा दी जावे उस (उपमानवाचक शब्द) कर्म मे भी क्य व प्रत्यय लगाते हैं । जैसे-“विद्यार्थी को पुत्र के समान माच- रण करता है" इस अर्थ में पुत्रीयति इत्यादि दुग्धीयति जलम् जल को. के तुल्य आचरण करता ( वर्तता ) है । पित्री यति माचाप्यम् आचार्य को पिता के मदृश आचरण करता है ॥ अमृतीयति मिष्टम् मिठाई को अमृत के समान आचरण करता है। ४-प्रातिपदिकमात्र से आचारार्थ में क्विा प्रत्यय लगाते हैं। जैसे-कृष्णति ॥ कृष्णेत् ॥ कृष्णतु इत्यादि ॥ स्वति ॥ दानति ॥ राजानति ॥ पयीनति इत्यादि ॥ कृष्णन्ति कृष्णभक्ताः कृष्णभक्त कृष्ण के तुल्य आचरण करते । रामति रामभक्तः रामभक्त राम के तुल्य आचरण करता है । स्वन्ति परकीयाः पराये लोग अपने ( स्व) सा आचरण करते हैं। राजानति दस्युः= हांकू राजा के सा आचरण करता है। पाथीनति जलम् =पानी मार्ग सा जान पड़ता है। इत्यादि । कष्ट के लिये उद्योग करना अर्थ में कष्ट. शब्द से क्यङ् प्रत्यय लगाते. हैं। जेसे:-कष्टायते * कष्टायेत * कष्टायताम् * अकष्टा यत * कष्टायाश्चके * कष्टायिषीष्ट * कष्टायिता * कटायिष्यते * अकष्टायिष्यत * अकष्टायिष्ट । कष्टायते पापी-पापी फष्ट के लिये उद्योग करता है। ६-शब्द, वैर, कलह, अम्र, कण्व और मेघ शब्दों से करने अर्थ में क्या प्रत्यय लगाते हैं। जैसे:-शब्दायते शब्द करता है। वैरायते वैर करता है। कलहायते कलह करता है । इत्यादि। । ५.
१४ तिवन्त 9- करने और कहने अर्थ में फर्मवाचक प्रादिपदिक से णिच प्रत्यय लगाते हैं। जैसे-घट यति-घड़े को बनाता है वा कहता है । इत्यादि । इति नामधातप्रक्रिया अथ कगढ़वादिप्रक्रिया कण्डू ( ञ् ) गाबिघर्पण, खुजलाना कण्डूयति । कगडूयते * कण्डूयेत् । कराडयेन * दगडूयतु । य ग दूयनाम् * भकण्डूयत् । काकराडू य त * फगयाञ्चकार । करायाश्चक्रे * प एडूय्यात् । कराडूयिषीष्ट * क गटू यिता २ * कण्डयिष्यति। कण्डूयिष्यते * अकराडूयिष्यत् । अकगडूयिष्यत * अकराधीत् । अकराडूयिट * इत्यादि । कण्डूयन्ति पशवो भित्त्या=पशु दीवार से खुजाते हैं इत्यादि । मन्तु अपराध करना मन्तूपति इत्यादि ५२ धातु, धातुपाठान्तर्गत क गडवादिगण में लिखे हैं उन सब के रुप इसी प्रकार हैं। इति कण्ड्वादिप्रक्रिया अथात्मनेपदप्रक्रिया क्रिया के अदल बदल ( विनिमय ) अर्थ में आत्मनेपद होता है। व्य लुन ते कृपका:-कृषक लोग परस्पर अदला बदली मे काटते हैं अर्थात वह उम का और वह उन का काटता है। व्यतिपाठ यन्ते छात्रा: विद्यार्थी परस्र पढ़ाते हैं। गति और हिं सार्थक धातुओं से उक्तार्थ में आत्मनेपद गहीं होता। व्यतिगच्छन्ति पथि का.मुमाफ़िर एक दूसरे के मार्ग को अल बदल कर जाते हैं। यहां आत्मनेपद न हुवा । ऐ मे ही=ध्यतिनत दुरात्मानः=पापी एक दूसरे को वध करते हैं । इत्यादि ॥ नि नपमर्ग में आगे “विश धातु से मात्मनेपद होता है। निविशते- वह प्रवेश करता है। इत्यादि ।
७५ की । - धातु मात्मनेपद प्रक्रिया * परि, वि और अव उपसगा से आगे धातु से शामनेपद होता है। परिक्रोणीते-मोल लेता है। विक्रीणीते-बेचता है। भयको गाते- खरीदता है । इत्यादि । * वि और परा नपसगों में आगे जिसे से आत्मनेपद होता है। विजयते मीतता है। पराजयत-हारता है। * भम् , अव, प्रभऔर वि उपनगों से परे "म्या धातु से भात्मनेपद होता मंतिष्टते-मरला मरला है। बतिष्ठते ठहरता है । प्रतिष्ठते= उज्जत पाता है। विनिछतेविचलता है। न यमर्ग के योग से प्रायः धातु का अर्थ अन्य हो जाता है। * छिगने पार्थ में से आत्मनेपद होता है । शतमपगा. गीते-शत १००) को छिपाता है । * अकर्मक ज्ञा धातु ने की आत्मने यद होता है। सर्विषो जानीते- घृत ( उपाय ) में प्रवृत्त होता है। यहां का धातु का कर्म कोई नहीं, इस से अकर्मक है ॥ * तृतीयान्त पद के साथ चर धातु मे भात्मनेपद हो, जब कि सम् उप- सर्ग पूर्व हो । रथेन मञ्चरते रथ के साथ चलता है । * सम् उपसर्ग से परे दा ( ण ) धातु में आत्मनेपद हो, यदि तृतीयात पद का योग हो और वह वृत्ती या विभक्त, चतुर्थी विभक्ति के अर्थ में हो। दास्या संयच्छते कामी-कामी पुरुष दासी के लिये देता है। * सम्मन्त प्रक्रिया में धातु मे वही पद होता है जो कि पूर्व (दश गणों में) कह आये हैं । अर्थात् परस्मैपदी धातु मे परस्मैपद, भात्मनेपदी से बात्मनेपद । जैने 'मू' धातु परम्मैपदी है उम से मन्नन्त मे भी “घुभूषति" यह परस्मैपद हुवा तथा एध' धातु भात्मनेपदी है उम से मनन्त से भी एदिधिषते यह आत्मनेपद हुवा । नि पूर्वक 'विश' धातु आत्मनेपदी है तो निधिविक्षते" यह सन्नन्त भी आत्मनेपदी रहा ।। * का धातु से भात्मनेपद होता है, गन्धन, अवक्षेपण, रेवन, साहमिक्य प्रतियन, प्रमथन और उपयोग अर्थों में । जैम - गन्धन=चुग़ली करना । उत्कु- रूते-चुगन। कता । वक्षे-धमकाना । श्येनो वर्तिका मुस्कुमते कसं- यतीत्यर्थः । हरिमु कुरुते सेवत इर.र्थः । साहसिक्य बलात्कार जबर्दस्ती। परदारान् प्रकुरुते दुष्टः परसियों को बलात्कार करता है दुष्ट । प्रतियन- .
तिङन्त सुधारना । एघोदकस्योपस्कुरुते इन्धन पानी को सुधारता है। कां प्रकुरुते= कथा को कहता है । शतं प्रकुरुते सौ ( धर्मार्थ ) लगाता है । इत्यात्मनेपदप्रक्रिया अथ तिङन्ते परस्मैपदप्रक्रिया- * अनु और परा उपसर्ग से परे कञ् धातु से परस्मैः पर होता है। अन करोति-नकल करता है। पराकरोति-दूर करता है । * अमि, प्रति और मति मे परे विश धातु से परस्मैपद होता है । अशिक्षिपति । प्रतिक्षिपति । अतिक्षिपति ॥ * प्र से परे “वह" धातु से परस्मैपद होता है। प्रवदत्तिबहता है ।। * परि से परे “मृष" धातु से परस्मैपद होता है। परिमुषतिमहता है । * वि, आ ( अ ) उप और परि से परे धातु से परस्मैपद होता है। विरमति=थमता है । भार मति । परिरमति । उपरमति ॥ इति परस्मैपदप्रक्रिया - अथ तिङन्ते भावकर्मप्रक्रिया * ति तः आदि प्रत्ययों के साथ भाव और कर्म एकार्थ हों तो धातु मात्मनेपद होता है। प्रथम दश गणों में जो रूप लिखे हैं, वे कर्तृवाध्य है। जैसे-गच्छति देव. दत्तः देवदत्त जाता है। यहां जाता है का एकार्थ देवदत्त से है और देव दत्त गति क्रिया का कर्ता जाने वाला है, इम गिये 'गच्छति यह रूप कर्तृवाच्य हुवा । इसी प्रकार- छात्रो वेदं पठति विद्यार्थी वेद को पढ़ता है। यहां पढ़ता है का एकार्थ छात्र से है अर्थात् पढ़ता है, कौन पढ़ता है ? छात्र पढ़ता है और छात्र पठ क्रिया का कता पढ़ने वाला है, इस लिये 'पठतिः यह कर्तृ- वाच्य रूप हुवा, परन्तु जब पठ धातु का कर्मवाध्य सूप बनायेंगे लव "वेदः पठ्यते छात्रेण ऐसा होगा। गर्थात् “ छात्र से घेद पढ़ा जाता है " । पढ़ा जाता है। क्या पढ़ा जाता है । वेद पढ़ा जाता है और वेद पठ क्रिया का कर्म जो पढ़ा जाता है, वह है, इस लिये 'पठ्यते' यह कर्मवाच्य रूप हुवा । क्रिया का करने वाला कर्ता, जो काम किया जाय वह कर्म भौर कामः करना व होना आदि भाव कहलाता है ।
भावकर्मप्रक्रिया 99 WHAme- अबइम भाव-से “ अहं तिष्ठामिमैं ठहरा हूं यह कर्तव्य है। को भाववाच्य बनाना हो तब मया स्थीयते-मुझ ठहरा जाता है यहां ठहरा जाता है। यह क्रिया ही अपमा वाध्य है। इत्यादि । * प्रायः पाकर्मक धातुओं ( होना, बैठना, वसना, रहना, ठहरना, से लना, फूपना, हंसना, हर्ष आदि अर्थ वाले जिन का कर्म नहीं होता ) से भाववाच्य रुप बनते हैं और सकर्मक धातुओं ( आना, खाना, शोचना, पढ़ना, मारना, फूकना आदि मर्थ वाले जिन का कर्म होता है ) से कर्म- वाध्य रूप होता है । इन्हीं को कत्तों में प्रत्यय, भाव में प्रत्यय और कर्म में प्रत्यय है, इस प्रकार कहा करते हैं । इम भावकर्मप्रक्रिया में वे रुप लिखे जायंगे जो भाव में प्रत्यय वा कर्म में प्रत्यय लगाकर बनते हैं। जैसे:- भू--भूयते॥भूयेत्त॥ भूयताम् ॥ भूयत ॥ बसूबे ॥ साविषीष्ट, भविषीष्ट ॥ भाविता,विना॥ भाविष्यते, भविष्यते॥ अभाविष्यत,अभविध्यताअभाविप क्योंकि धातु का अर्थ जो क्रिया वा भाव है उम में द्विवचन और बहुवचन नहीं। इस लिये परिशेष से एकवचन ही होता है और मध्यम पुरुष तथा उत्तम पुरुष भी नहीं होते। इस लिये परिशेष में प्रथमपुरुष ही होता है, अन्य नहीं ॥ अनु उपमर्ग पूर्व लगने से दू धातु का अर्थ अनुभव करना हो जाता है, इस लिये 'अनुभू" यह सकर्मक रहता है । मनुसूयते अनुभूयेते अनुभूपन्ते अनुभूयमे इत्यादि ॥ अनुभूपेत अनुसूयेयाताम् अनुभूयरन् इत्यादि ॥ अन- भूयताम् अनुभूयेताम् अन भूयन्ताम् इत्यादि ॥ शेष रूप अपने आप समझने मकर्मम होने से कर्म में एकत्व, द्वित्व और बहुत्व होते हैं। युष्मद् और अस्मद् भी कर्म ( अवस्था में ) वाच्य रहते हैं, इस लिये तीनों पुरुष और तीनों वचन होकर मब रूप होते हैं । जैसे - भूयते पगिहतेन= पण्डित मे हुवा जाता है । यह भाववाच्य होने में एक ही प्रयोग होता है। मोर सुखमनुभयते धनिना=धनी से सुख भोगा जाता है । त्वमनु भूयसे राजा तू राजा में प्राज़माया जाता है । अहमनु भूये सभया=मैं सभा से अनुभव किया जाता हूं इत्यादि। ऐसे ही द्विवचन और बहुवचन समझो । णिजन्त भ धातु से भाव्यते ॥ भाठयेत ॥ भाव्यताम् ॥ अभाव्यत ॥ भावयाञ्चके, भावयामा मे, भावयाम्बभूवे ॥ भाविषीष्ट । भाविष्यते ॥ अयिष्यत ॥ अभावि अभावविषाताम् अभावयिषत । अमावयिष्ठाः मभावयिषायाम् इत्यादि। - भाविता ॥
तिहते -- पाठयेते घटौ कुल्ला लेन-कुम्हार से दो घड़े बगाये जाते हैं। माव्यमे त्वं पगिडतो गुरुण' = गुरुसे तू पण्डित बनाया जाता है। मान्येऽहं निपुणः शिक्ष. केण-शिक्षक ने मैं निपुण बनाया जाता हूं । इत्यादि ॥ मन्नत भू धातु मे-भुभूयते ॥ बुभूप्येत ॥ बुभूप्यताम् ॥ अबमष्यत ॥ बुन पाञ्चके ॥ भूमिग्रीष्ट । बुभूपिता ॥ बुभषिच्यते ॥ आधु भूषिष्य न ॥ बभूपि ॥ भाव में प्रत्यय होने से प्रथम पुरुष और एकवचन ही होना है । बतष्यते पुषे धाननाचुरुष में धगी होना चाहा जाता है । इत्यादि । यङन्त भू-बोमय्यते ॥ बो भूघ्येत ॥ बोभूख्य नाम ॥ शोभूरयत । बोभूय च के ॥ यो भू यत्रोष्ट ॥ बोभूयिता ॥ वोभूमिप्यते ॥ बोभूयिष्यत ॥ माधोभूयि ॥त्र मया, स्वया, तेन या बोभूय्यते वहां मुझ से, तुझ से, वा उस से अत्यन्त हुवा जाता है ॥ इत्यादि ॥ प्टु (ज्) धातु-स्तुति करना स्तूयते स्तूयेते स्तूयते । स्तूप मे इत्यादि ॥ स्तूयेत ॥ स्तूपताम् ॥ शास्तूयत ॥ तुष्टुवे ॥ स्ताविपोष्ट. स्तोषीष्ट ॥ स्ताविता, स्तोता ॥ स्तावि- ध्यते, मोष्यते ॥ अस्ताविष्यत, अस्तोष्यत ॥ सस्तावि । अस्तोधाताम् , प्रास्ताविषाताम् । प्रस्ताविषत, स्तषत इत्यादि ॥ स्तूयसे त्वं मया तू मुझ से स्तुत किया जाता है। स्तूयेऽहं समारेण= मैं संपार से स्तुत किया जाता हूं । स्तूयते मया जगदः श्वरः-परमेश्वर मुझ से स्तुत किया जाना है । इत्यादि ॥ ऋ-गनि अर्यते अयंते अयन्ते इत्यादि। अयंत ॥ अस्यताम् । गायर्यत ॥ पारे । आरिय'ट, भीष्ट । आरिता, अतो ॥ पारिष्यते, अष्यते ॥ आरिष्यत, मायत ॥ मारि । मारिषाताम्, भार्याताम् । इत्यादि ॥ मर्यते ग्रामो देवदत्ते न देवदत्त से ग्राम गाया जाता है । स्मृस्मरण स्मयते स्मयते ॥ स्मत ॥ स्मयताम् ॥ स्मन ॥ मस्मरे ॥ मारिषीष्ट, रूष्ट ॥ स्मारिता, स्मता इत्यादि ॥ सयंते माता पुत्रे ग-पुत्र से माता स्मरण की जाती है। इत्यादि ॥
मायकर्मप्रक्रिया संसु-गिरना, चूना, टपकना स्वस्थते ॥ स्त्र येन ॥ स्रस्यताम् ॥ पास्त्रस्यत ॥ सत्रं ते ॥ स्रंसिपीष्ट ॥ स्त्रमिता ॥ स्त्रंमिष्यते ॥ असिष्यत ॥ अस्त्रंमि ॥ स्त्रस्यते जलेन तेन वा-घृत वा जल मे टपका भाला है इत्यादि । ( टु ) दि-समृद्धि, आनन्द मन्यते ॥ नन्धेत ॥ द्यताम् ॥ ॐनन्धत ॥ नगन्दे ॥ नन्दि पोष्ट पत्यादि ॥ ब्राहाणेन नद्यतेवहा से आनन्दित हुवा जाना है न्यादि । यज्ञ- इज्यत इज्यते इज्यते ॥ ज्येत ॥ इज्यताम् ॥ ऐज्यात ॥ ई ईजाते॥ पक्ष ष्ट ॥ यष्टा ॥ यक्षपते ॥ यक्ष्यत ॥ आयाजि ॥ ज्यन्न धारादयो देवाः होमेन होम से वास्वादि देव पूजे जाते हैं ( सुधारे जाते हैं ) इत्यादि । . तन-विस्तार तायते, तन्यते ॥ तायेत, सन्येत ॥ तायताम् . तन्यताम् ॥ प्रतायत, अतन्यत ॥ तेने ॥ तनिषीट ॥ तनिता ॥ तनिष्यते ॥ अतनिध्यत ॥ अतामि अतनिषाताम् ॥ तन्य ते तन्तवः तार फैलाये ( पूरे ) जाते हैं इत्यादि । तप-तप्यते । तध्यंत ॥ तप्यताम् ॥ अतप्यत ॥ तेपे ॥ तमीष्ट ॥ सप्ता ॥ तस्यते । अतप्स्यत । अतप्त, अतापि ॥ अन नाप र्थ में 'अतप्त' ही होता है। जैसे अन्वतप्त पापनापी ने अपनाए ( पछताया । किया ॥ दा-दीयते दीयेते दीयन् ॥ दीयेत ॥ बीयताम् । प्रदीयत ॥ ददे ॥ दासीष्ट दायिधीष्ट ॥ दायिता, दाता ॥ दायिष्यते ॥ दास्यते ॥ अदायिष्य त, अदास्यत ॥ दायि । अदायिपाताम्, अदासाताम् । अदायिपत, दामत । पदाधिष्ठाः, दाम्पा: । अदायिषाथाम् . पादामा पम् । इत्यादि ॥ दीयतेऽन्न धनिना बुभुक्षितेभ्यः धनी मे भूखों के लिये का.िया जाता है । इत्यादि ॥ भञ्जी-भज्यते ॥ भज्येत ॥ भज्यताम् ॥ भज्यत ॥ बाजे ॥ अष्ट । मता ॥ भक्षते ॥ अभक्ष्यत ॥ अमाजि, अञ्जि । अमक्ष ताम् । ११. क्षत ॥ अगाः । अनाथाम् इत्यादि ॥ भज्यन्ते वानरक्षा: वानरों से वृक्ष तोड़े जाते हैं । इत्यादि ॥ लभ लभ्यते ॥ लभ्येत ॥ लभ्यताम् ॥ अलभ्यत ॥ लेखे ॥ लप्सीष्ट ॥ ला ॥ समस्यते ॥ अलप्स्यत । अलामि, पलम् । अलपाताम् । इत्यादि। लभ्यते लक्ष्मी व्यापारिणा व्यापारी से लक्ष्मी पाई जाती है । इत्यादि । इति भावकर्मप्रक्रिया - ४ १९ तिम्से अथ तिङन्ते कर्मकर्तृप्रक्रिया जब कर्म के तुल्य क्रियाफल वाला कर्ता हो तब कर्ता-कर्मवत् हो अर्थात् कर्म में प्रत्यय होने पर जैसे कार्य होते है वैसे ही यहां भी हो ॥ जैसे कर्ता में प्रत्यय की दशा में फलं पचति होता है, अब कर्मकत में पध्यते फलम् " ऐसा होगा । पच्यते ॥ पच्येत इत्यादि सब रूप कमें में प्रत्यय के सदृश जो मे इस से पूर्व भावकर्मप्रक्रिया में बने, वैमे ही यहां भी जानो ॥ फलं पच्यते फल आप से ही पकता है। काष्ठं भिद्यतेलकड़ी भाप से ही फटती है। इत्यादि ॥ इति कर्मकर्तृप्रक्रिया । :* - अथ तिङन्ते लकारार्थप्रक्रिया अब लकारार्थप्रक्रिया में दश लकारों के भर्थ का व्याख्यान किया जायगा । यद्यपि दश गण और प्रक्रियाओं में उम २ लकार के झूपों के सामने भाषार्थ प्रायः लिखा गया है, उस मे विद्यार्थियों को कुछ २ अर्थ का जान हो भी गया, तथापि लट् गादि लाकारों के व्या रूपापूर्वक विशेष अधों के बोधार्थ इस प्रक्रिया में नियम ( सूत्र ) देते हैं । १-जब कि स्मरणार्थ पद समीप में हो तब धातु मे भूतानद्यतन काल में लृट् होता है । जो काल बीत गया वह भूत कहाता है और प्रातःकाल जगने के समय से रात्रि में सोने के समय पर्यन्त जितना काल है वह “अद्यतन" है। अथवा गत रात्रि के अगले दो प्रहर, समस्त दिन और आगामिनी रात्रि के प्रथन के दो प्रहर यह “अद्यतन" है ( जिसे भाषा में शाम कहते हैं। और अद्यतन (आज) को छोड़ कर जो भूतकाल है वह " अनद्यतन " भूतकाल कहाता है । उदाहरण-स्मरसि वरम ! मथुरायां वत्स्यामः याद है प्यारे ! हम मथुरा में वसते थे। यहां " स्मरसि " के समीप में भूत काम में भी "वत्स्यामः " यह लूट का प्रयोग होता है। इसी प्रकार- बुध्यसे हरिवषं गमिष्यामः याद है ? कि यूरोप को गये थे । चेतय मे कलाः पठिष्यामः-तू स्मरण करता है कि हम कलामों को पढ़ते थे ? इत्यादि । यत् " शब्द के योग में उक्त प्रकार स्तृट् नहीं होता । जैसे- अभिजानासि यदने अभुमहि याद है कि जो वन में भोजन किया था (हमने)। शब्द माने से • भोक्ष्यामहे "न हुवा ॥ ? २-परन्तु . यत लकारार्थप्रक्रिया दर ३-'स्म' के योग में अनद्यतनभूत परोक्ष काल में लट् लकार होता है। जैसे-य गति स्म युधिष्ठिरः युधिष्ठिर ने यज्ञ किया था। ४ - वर्तमान के समीप का जो भूत और भविष्यत् सम में भी विकल्प से वर्तमान के सदृश लट् लकार होता है । जेसे-कदागतोसि-तू कब माया है। यहां भगमन क्रिया यद्यपि भूनकाल की है तथापि बहुत देर न होने से वर्स मान के समीप है इसी लिये " असि " यह लट् का प्रयोग हुवा । अय. मागच्छामि आगमं वा=यह भाया हूं। यहां यद्यपि आगमन हो चुकने मे भूतकाल स्थ है, तथापि वर्तमान के ससीप में भागच्छामि ऐसा प्रयोग होता है और दूसरे पक्ष में 'भागमम्' यह लुङ् का प्रयोग भी। एष गच्छामि गमिष्यामि वा=यह जाता हूं। यहां जाना क्रिया यद्यपि भविष्यत् में होगी, तथापि वर्तमान के समीप होने से गच्छामि, यह लट् का प्रयोग भी होता है । ५-हेतु हेतुमान् अर्थ में भविष्यकाल में लिङ् लकार होता है। जैसे- परमात्मानं नमेञ्चेत् आनन्दमाप्नुयात् यदि परमात्मा को नमस्कार करेगा तो मानन्द को प्राप्त होगा। यहां नमस्कार करना हेतु और मानन्द पाना हेतु- मान् है । दोनों में न मेत्' और 'माप्नुयात' ये लिङ् लकार के प्रयोग हुवे ।। ६ विधि, निमन्त्रण, भामन्त्रण, अधीष्ट, सम्प्रन और प्रार्थन अर्थों में लिङ् लकार होता है। विधि-भृत्य आदि अपने से छोटों को माज्ञा देगा प्रेरणा करना । जैसे त्वं ग्रामं गच्छेः तू ग्राम को जा । निमन्त्रण=किसी आवश्यक कार्य में नियुक्त करना जैसे - मम गृहे भुञ्जीत भवान्=मेरे घर में माप भोजन कीजिये। मामन्त्रण=किसी को ऐमी आज्ञा करना कि जिसे वह चाहे तो करे चाहे न करे । जैसे-इहासीत भवान् भाप यहां बैठिये। मधीष्ट= सत्कारपूर्वक किसी से कुछ निधेदन करना। जैसे-पुत्रमध्यापयेद्धवान = भाप पुत्र को पढ़ाइये। संप्रश्न पूछना। जैसे-भोः वेदमधीयीय वा तर्कम् ? क्यों जो ! वेद पढू वा तर्क ? प्रार्थन=प्रार्थना, जैसे- मह्यमन्नं, विद्या, शिक्षा या दद्यास-मेरे लिये अन्न, विद्या वा शिक्षा देओ । इसी प्रकार उन्हीं अथों में लोट् लकार भी जागो॥ इति लकारार्थप्रक्रिया समाप्नं चेदं तिङन्त प्रकरणम् ८२ रुदन् अथ कृदन्ताः इम प्रकरण में जो प्रत्यय धातु पे भागे लगाये जायगे वे 'कृत्' कहाते हैं। हमी लिये इस प्रकरण को 'जात' कहते हैं । कृदन्त की प्रातिपदिक संज्ञा होकर सुबन्त शाद बन जाते हैं। इम प्रकरण में यदि एक प्रत्यय का पवाद दूमरा प्रत्यय व हें और वह प्रत्यय एक दूसरे से भिन्न स्वरूप का हो, तो वा। २ से दोनों ही प्रत्यय होते हैं, यह नहीं कि एक का अपवाद दृमरा काटने पर प्रथम की बाधा हो जावे परन्तु यह नियय स्त्र प्रत्ययों के लिये नहीं ॥ इस से आगे थक और तृच प्रत्ययपर्यन्त जो प्रत्यय कहेंगे के कृत्यासी कहाते हैं। १-भाव और कर्म अर्थ में धातु मे तव्य और अनीय प्रत्यय गाये जाते हैं। जैसे-एधितव्यम् । एधनीयम् । चेतव्यः । चयनीयः । पक्तव्यः । पचनीयः । भेत्तव्यः । भेदनीयः । स्नातव्यम्। स्मागीयम् । दातव्यम्। दानी यम् इत्यादि । २-इमी अर्थ में एभिम प्रत्यय भी लगाते हैं। पचेलिमः । भिदेलिमः। इत्यादि। ३- कृत्य प्रत्यप और ल्युट्(भक प्रत्यय बहुल कर के होते हैं। बहुल का लक्षणः- क्वचित्प्रवृत्तिः क्वचिदप्रवृत्ति: वचिद्विभाषा क्वचिदन्यदेव । विधेर्विधानं बहुधा समोक्ष्य चतुर्विधं ब बाहुलकं वदन्ति ॥१॥ अर्थ-१- जो कार्य किमी विधि ने न कहा हो और हो जावे । २--ओ होना चाहिये परन्तु न हो। ३-नित्य कहा हो परन्तु विकल्प मे हो । ४- और कहीं कुन प्रकारों के अतिरिक्त और भी कुछ व्यवहार होना । यह ४ प्रकार का वाहुल कहाता है। जे मे-दानीयो विप्रः जिन के लिये दान दिया जाय वह दानीय ब्राहमण यहां दा धातु से “ मनीय प्रत्यय नहीं हो सकता था परन्तु हो गया क्योंकि भाव और कर्म में ही उक्त प्रत्यय का नियम था। ब्राह्मण न तो भाव है, न कर्म, किन्तु सम्प्रदान है (सम्प्रदान नसे कहते हैं जिसे दान दिया जावे) तथापि अनीय प्रत्यय हो गया । स्नान्ति यन तत्-स्नानीयम् जलम् स्नान करते हैं जिस से वह जल स्त्रानीय है। यहां भी जल न तो भाव है न कर्म, किन्तु करण है (करण उम साधन को कहते हैं जिस से कोई काम किया जावे) तथापि “स्नानीय" में स्ना' धातु से अनीय प्रत्यय होगया। ४-स्वरान्त धातु से उक्त अर्थ में यत् ( य ) प्रत्यय होता है। जैसे:- चि-चेयम् । दा-देयम् । ग्ला-लेयम् । इत्यादि । । - - । कृत्यप्रक्रिया ८३ ५-जो धातु पवर्गान्त हैं और उन में अन्त में पूर्व प्रकार भाक्षर है, म धातुओं से उक्त अर्थों में यत् (य) प्रत्यय हो। जेमे शप-शप्यम लभ लभ्यम्।। ६- स्तु शाम व दू जुष इन मे उक्त अर्थ में पाप (य) प्रत्यय होता है। इ - इत्यः। स्तु-तुन्यः । गाम- शिष्यः । - शुन्यः । T (ङ) दृ - शादन्यः । जप फु प्यः ॥ 9-मृज् धातु मे विकल्प से क्यप (य) प्रत्यय होता है। जैसे - मृज्यः,मृग्यः॥ -यन्ति और व्यञ्जनान्त धातुओं से गयत ( य ) प्रत्यय होता है। रू-कार्थम् । हु-हार्यम् । ५ धार्थम् । मृग-मार्यः । भुज - भोज्यम्=अक्ष्य । भोग्यम्=पागनीय ॥ एधितव्यं धर्मण-धर्म थे बढ़ना चाहिये । एधनीयं वा। चेतव्यो धर्मः-चुनना चाहिये धर्म । चय नीयाः समिधो बेद्याम् धुननी चा. हियें ममिधा बंदी में । पक्तव्यः सूपम्त्यया पकानी चाहिये दाल तुम्क को पक्तव्यम् पायमम् खीर पकानी चाहिये । पचेस्लिम भोदनः सुष्ठु-भात भले प्रकार पकाना चाहिये । भत्तव्यो रिपुमूर्ती बीरेण-छिन्म करना चाहिये शत्रु शिर वीर को । मेदनीयं न जलम-पानी न तोहना चाहिये । स्नातव्यं प्रत्यहं प्रातः प्रातःकाल नित्य स्नान करना । स्नानीयं वा । भिक्षु केभ्यो भोगानं दातव्यं, दानीयं, देयं वा=भिक्षुकों के लिये भोजन देना। भिदेलिमा भित्तिः-भीत तोड़नी । चेयं धनं धर्माय-धर्म के लिये धन सञ्चय करना । ग्लेयं पापात् धर्मात्मना-धर्मात्मा को पाप से ग्लानि करगी।मभ्येन सभायां निरर्थक न शप्यम् सभ्य को सभा में व्यर्थ न बोलना लभ्यं धनं वाणिज्येन- वाणिज्य से धन प्राप्त करना । इत्यो ग्रामो मया=मुझ को ग्राम जाना। स्तुत्यो गुमः शिष्येण शिष्य को गुरु स्तुत करना । शिष्यो गुरुणा छात्रः गुरु को विद्यार्थी सिखाना चाहिये । वृत्यः पुरुषः इन्यया वरना चाहिये पुरुष कन्या को । आइत्याः सर्वे जनाः भादर किये जावे सब मनुष्य । मृज्यम् पात्रम् धर्तन मांजना चाहिये । कार्यो धर्मः धर्म करना चाहिये। सभा कार्या-मभा करनी। कार्य गृहम घर करना=बनाना । हायं न कस्यापि धनम्-किसी का भी धन नहीं चुगना । धार्य तेशः तेग धारमा । मायः सूपः=दाल साफ़ करनी । भोज्य भोदनःआत खाना । भोग्या प्रजा-प्रजा पालनी । इत्यादि । इति कृत्यप्रक्रिया E-कर्ता अर्थ में धातु से बुल् (भक) और तृच प्रत्यय होते हैं । जैसे- - यः करोतिः सः कारकः । तृच - कर्ता। हर्ता। भर्ता । वक्ता। पता। भोका। गन्तम । पाता। दाता ।ग्रहीता। भविता । चेतिता । भत्ता। होता। देविता . - पत-पनापत्तः । - । । कदन्त सोता। तोत्ता । तनिता। क्रेता। चोरयिता॥ हारकः । याचकः । पाचकः। भोजकः । गमः । दायकः । ग्राहकः । भावकः । चेतकः । सोदकः इत्यादि । १० पचादि धातुभों मे का अर्थ में अच् प्रत्यय होता है । पचादिगण की पहचान स्वरूप से ही करनी होगो तथापि कुछ रूप लिखे जाते हैं - पचः। नः । नदी । चोरः । चोरी । देवः । देवी। जारभू जारभरा । अन्+पच= श्वपचा । यह न क्री - चे क्रियः । नो- नेन्यः । लू लोलुयः । लुप-लोलुपः। - पू- पोपुवः । मृग-मर मृजः । घर-घराचरः । चल-चलाचलः । वद वदावदः । हन् घनाघनः । चरः । पतः । वरः । हनः । रात्रि+घर- रात्रिञ्चरः, रात्रि वरः । इत्यादि। ११-ग्रह आदि धातुगों मे णिनि (इन् ) प्रत्यय होता है। जमे - ग्राही। स्थायी । मन्त्री । विशयी । विषयी । परि भू-परिभावी, परिभवी । धायी। वादी । प्रतिवादी इत्यादि । १२- नदि आदि धातुओं से ल्यु (अन) प्रत्यय होता है। नदि-नम्नमः। लवणः । छेदनः । भेदनः । वचनः । करणः इत्यादि । उदाहरणानि- घटस्य कर्तारं बोधयामि=घड़े के बनाने वाले को समझाता हूं। धनस्य हारं दगड यामि । राज्यस्य भत्तारं नमामि । वक्तारी व्याख्यास्यन्ते । पक्तारः पक्ष्यन्ति । सोक्तारो भोक्ष्यन्ते । गन्तारो गमिष्यन्ति । यातारी यास्यन्ति । दातारो दास्यन्ति । ग्रहीतारो ग्रहीष्यन्ति । भवितारो भविष्यन्ति पण्डिताः । चेतितारश्चेलिष्यन्ति । असारोत्स्यन्ति । होतारी होष्यतः । देवितारः क्रीडि. ध्यन्ति । मोता सोध्यति सोमम् । तोत्ता जनानां न सुखं समेधते । शाकपच मागतः। वशंवदा कि कथयति । नदे न द्यां वा बहु जलं प्रवहति । बद्धेयं चोरी वर्तते । कल्माषगदोऽयं चोरोस्ति । यायदेवोस्ति । उषा देवी राजते। जारभरा कुलदा, नेयं कुलाङ्गना। अपचा चण्डाली, श्वपचः पुमांशण्डाला । क्रियो रेलमातारेलीब्रादर ( एक प्रसिद्ध व्यापारी का नाम है ) अत्यन्त खरीदार है । नेन्यः स हि भन्नस्य वही मन का अतिशय पहुंचाने वाला है। लोलुपः क्षेत्रेषु प्रशम्यते अधिक काटने वाला, क्षेत्रों में प्रशंसा पाता है। लोलुपः साधुषु निन्द्यते । पोपुषः प्रशस्यते। मरीमृजः पात्राणां भृत्योऽयम् । चराचरो दूतोऽयम् । पतापतो निर्बुद्धिः । वदावदः परितोग्यम् । धनाधनः शूरः । रात्रिचरा राक्षसा भवन्ति इत्यादि ॥ - निष्ठादिप्रक्रिया ८५ - १३-भूतकाल में धातु मे क प्रत्यय लगाया जाता है, कर्म अर्थ में । कः करना से, जो किया गया वह कृतः । मृतः । वृतः। दत: । जितः । पा. जितः । दृष्टः । श्रुतः । ज्ञातः । उक्तः । कथितः । गृहीतः । मारितः । पाठितः । अध्यापित्तः । मधोतः । मत्तः इत्यादि। १४- भूतकाल में धातु से फर्ता भई में क्तवतु प्रत्यय लगाते हैं । जैसे - जिम ने पढ़ लिया वह ---अधीतवान् । जिप्त ने चल लपा वह गतव न् । कृतवान् । अध्यापिनवान् । दत्तवान् । हतवान् । दृष्ट गान् । जातवान् । उक्तवान् । कथितवान् । क्रीतवान् । चोरितवान् । इत्यादि । १५-अकर्मक और गति अर्थ वाले धातुओं से कर्ता अर्थ में क्त प्रत्यय लगाते हैं। जैसे-गतः। मृतः। भूतः । स्थितः। भीतः। पाङ्कह-आरूढः इत्यादि । १६-धातु से तुमुन् ( तुम् ) प्रत्यय लगाते हैं जब कि वह क्रिया किमी दूसरी क्रिया का प्रयोजन हो । जैसे भुनभोक्तुं गच्छति खाने को जाता है। यहां भोजन क्रिया प्रयोजन है गमन क्रिया का । इसी प्रकार - स्थातुम् । पठितुम् । भध्ये तुम् । मारयितुम् । सेवितुम् । भवितुम् । अनुम् । होतुम् । सेवितुम् । सातुम् । केतुम् । चोरयितु सत्यादि श का व्यय बन ज ते हैं । ११-जब कि दो क्रियाओं में एक पूर्व काल की और दू मरी उत्तरकाल की क्रिया हो तो पूर्वकाल की क्रिया में वर्तमान धातु मे क्त्या प्रत्यय नाते हैं । जैसे भुज - क्त्वा भुक्त्वा पठति खाकर पढ़ता है । यहां भोजन और पठन दो क्रियामों में भोजन क्रिया का पूर्व काल और पठन क्रिया का उत्तर काल है इस लिये “ भु " धातु से “ क्त्वा " प्रत्यय हुवा । इसी प्रकार- कृत्वा । पठित्वा । गत्वा । स्थित्वा इत्यादि। १८-पूर्वोक्त भर्थ में क्त्वा के स्थान में ल्यप् (य) रहता है, जबकि मन छोड़ कर कोई अन्य पद धातु में मिला हो। जैसे - उस स्थानत्थाय । प्र-गाम=प्रणम्य सम् -कृसंस्कृत्य । उत्-लिख लिय। इत्यादि शब्द भी मव्यय बन जाते है । इस कदन्त प्रकरण को यहीं समाप्त करते हैं। हमारी समझ में इम चतुर्थ पुस्तक को पढ़ चुकने पर विद्यार्थी संस्कृत पुस्तक से ही संस्कृत पढ़ने की योग्यता रक्खेंगे, अनः इस कृदन्त प्रकरण को संस्कृत में ही जो व्याकरण हैं उन्ही के द्वारा पहना अत्तम होगा। यह प्रकरण विस्तृत अवश्य है पर परन्तु सुगम होने से संस्कृत द्वारा पढ़ना सुलभ है ॥ * ॥ इति रुदन्ताः ॥
४ करके - अथ कारकप्रकरणम् सब प्रथमा द्वितीयादि ७ विभक्तियों के स्थान का वर्णन करेंगे। किस २ स्थान में कौन २ विमति होनी चाहिये, मो २ भागे लिखे अनुमार जानो ॥ "कारक उमे कहते हैं जिम का क्रिया में साक्षात् । झरेक्ट वा मीधा) सम्बन्ध हो । जोसे - कुलालो घटं करोति। यहां कुनाल कर्मा, घट कर्ग और करोति क्रिया पद है । करना रूप क्रिया का कुलाल और घट दोनों से साक्षात् सम्बन्ध है । पोंकि न तो कुनाल के विना करना बन सकता, कर्म ( घट ) के विना करना बन सकता है। इसी प्रकार करण, मम्प्रदान, अपादान और अधिकरण ये ४ मिल कर सब ६ कारक होते हैं । हम सब का अर्थ नस २ कारक के अवसर में करेंगे। १- जब किमी प्रातिपदिक का अर्थ मात्र वा उम का खो पुरुष नपुंसक इन में से कोई लिङ्गमात्र वा एक, द्वि, बहु; कुन में मे कोई वचनमात्र ही दिख. लाना हो, मान्य कोई कारक न हो तब उम प्रातिपदिक से प्रथमा विभक्ति होती है। जैसे - घटः । स्त्री । कुलम् । रामलक्ष्मणौ । वनानि इत्यादि । यहां इन शब्दों का अर्थ लिङ्ग और वचनमान ही बतलाया गया है किन्तु ये घ. टादि पदार्थ बनते, बिगहते, रक्खे, फेंके, फोहे, गये, भाये शादि किमी क्रिया. विशेष से सम्बद्ध नहीं हैं। अर्थात् संस्कृत में जब किसी वस्तु का नाममात्र भी लेना होता है तो विना प्रथमा विभक्ति के प्रयोग नहीं होता। २-सम्बोधन में भी प्रथमा विभक्ति होती है जैसे हे राम ! भो बालको ! हे शिष्याः ! इत्यादि । ३-कर्ता क्रिया के फल को जिम पर अत्यन्त चाहे वह 'कर्म' कहाता है और उस में द्वितीया विभक्ति होती है । परन्तु यदि कर्म में ही प्रत्यय हुषा हो तब ती कर्म में प्रथमा ही होती है जैने - वदं पठति । यहां पढ़ने वाला पठन क्रिया के फल को वेद पर चाहता है कि पठन से वेद पठित होजावे इम लिये वेद कर्म है नस में द्वितीया विभक्ति हुई। ऐसे ही-ग्रामं गच्छति । घृतं स्पृशति । मिष्टं खादति । पायसं जुहोति । अश्वं तुदनि । सोमं सुनोति । पुत्रं सूते। वस्त्रं तनोति। कटं करोति कम्बलं क्रीणाति। धनं घोरपति इत्यादि। परन्तु जब कर्म में प्रत्यय होता है सब इन मब कर्मों में प्रथमा होती है। जैसे-वेदःपठ्यते=घेद पढ़ा जाता है। ग्रामो गम्यते । घृतं स्पृश्यते । सूप: खाद्यते । पायसो हूयते । अष्ट्रस्तुद्यते । सोमः सूयते। पुत्री सूयते मात्रा । सम्तवस्तन्यन्ते । कटः क्रियते। कम्मलः क्रीयते । मुद्राश्चोर्यन्ते इत्यादि। - - कारकविसक्तयः mpt नौण । इम मूत्र - - - ४-और भकथित कर्म में भी द्वितीया होती है। अकषितकर्म-जैसे-दुह, याध, पच, दमा, रुध, प्रच्छ, चि, भू, सु, जि, मन्थ, मुष, मी, ह, कृष और वह तथा इन्हीं के समानार्थ वाले अन्य धातु मों के दो कर्म होते हैं, एक कथित दूमरा अकथित अर्थात् एक मुख्य दूमरा से गौण कर्म में गी द्वितीया होती है, यह कहा गया है । जैसे गां दुग्धं दोग्धि-गौ से दूध को दुहता है। यहां दूध तो मुख्य कर्म है और गौ गौण कर्म है, नम में भी द्वि- तीया धिमक्ति हुई । ऐसे ही-धनिनं कम्बलं यागते लक्षुः । ताछुलानोदनं पचति मूदः । अपराधिनं शसं द ग यति । गां गोष्ठं रुणद्धि । बालं पन्थानं पृच्छ। वृक्षं फलानि अवचिनु । शिष्यं धर्म ब्रूहि । पुत्रं धर्म शाधि। शत्रु ग्राम जयति। दुग्धं घतं मध्नाति । धूर्ती धनिनं प्रातं मुष्णाति । अजा ग्राम नयति । इत्यादि। जिम साधन को महायता से कता अपना काम करे, वह करण कहाता है और काम करने में जो स्वतन्त्र हो वह कर्ता कहाता है । कर्ता और करण इन दोनों में तृतीया विभक्ति होती है । जेसे वीरेणा असिना शत्रुहंतः= वीर ने खङ्ग से शत्रु मारा । यहां वीर पुरुष मारने के काम में स्वतन्त्र है इस से कर्ता है, तुम में तृतीया हुई और ख मारने का साधन (करण) है इस मे असि ( ख ) में तृतीया हुई । परन्तु यदि फर्ता वा करण में प्रत्यय हो तब इन दोनों में भी प्रथमा ही होती है । जैसे वीरो हन्ति । यहां हन् धातु से कर्ता में तिङ् प्रत्यय है और वीर कर्ता है इस लिये उस में प्रथमा हुई । करण में प्रत्यय का उदा. हरण कृदन्त पूर्ण पढ़कर आवेगा। ६-दाता जिम के लिये दान करे वह मम्प्रदान कहाता है, उस में चतुर्थी विभक्ति होती है । जैसे- ब्राहमणाय गां ददाति यजमानः । विद्यार्थिने पुस्तकं विद्यां च ददत्ति पण्डिताः । शीतार्ताय कम्बलोदेयः । बुभुक्षितायान्न दातव्यम् । पिपासवे जलं दानीयम् इत्यादि । 9-ममः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा, अलम् भोर वषट् इन के अर्थ से जिस शब्द का योग हो उम से चतुर्थी विमक्ति होती है। जैसे परमात्मने नमः । राने स्वस्ति । भग्नये, वायवे, वरुणाय, इन्द्राय, प्रजापतये, मूर्याय, चन्द्रमसे वा स्वाहा । पितृभ्यः स्वधा । अलम्पय्याप्त, काफ़ी--अलं मोघमपरम. माय । भल मन्नमिदं सुधायै । भलं जलं पिपासायै । इन्द्राय वषट् इन्द्र के लिये पूजा सत्कार इत्यादि ॥ .
कारके -दो पदापों का जब विभाग होता है तो जहां में विभाग हो समे अपादान कहते हैं । अपादान में पञ्चमी होती है। जैसे वृक्षात् फलानि पत्तन्ति । यहां वक्ष और फल का विभाग न भवधि मे हुधा है, अतः वक्षा से पञ्चमी हुई। भश्वात् पतति । पयंतात् गङ्गा अवतरति । ग्रामादागच्छति। ग्रहादागतः । इत्यादि । -शेष अर्थात् प्रातिपदिकार्थमात्रादि जहां प्रथमा होती है, उस से सपा कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान और अधिकरण इन सब कारकों और सम्बोधन से शेष रहा जो सम्बन्ध " उस में षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे-मम वचम् । यहां मेरा वन के साथ संबन्ध है । गुरोचरणयोः रूपा। यहां गुरु का चरणों से भऔर चरणों का कृपा से सबन्ध है । पितुः पुत्रः । देवदत्तस्याश्वः । विष्णुमित्रस्य पुस्तकम् । इत्यादि । १०-आधार को अधिकरण कहते हैं उस में सप्तमी विभक्ति होती है। और समीप शहद और इन्हीं के अर्थ वाले अन्य शब्दों से भी सप्तमी होती है। भधिकरण को कोई लोग ३ प्रकार का मानते हैं १- ऊपर२ विषय में ३-भीतर। जैसे-मामने उपविशति आमन के ऊपर बैठता है। मोक्षे बुद्धिरस्ति-मोक्ष विषय में बुद्विशे। तिलेषु तैलमस्ति । तिलों के भीतर तेल है । गृहे गृहिणी मस्ति । घर के भीतर स्त्री है । दूरे वसामि । समीपे तिष्ठामि । भन्ति के पठामि इत्यादि। इति कारकविभक्तयः । - - अथ उपपदविभक्तय:- उपपद विभक्ति किसी समीपस्थ पद के कारण से हुआ करनी है। जैसे- १९-पृथक, विना और नाना के योग में तृतीया, पञ्चमी वा द्वितीया होती हैं। जैसे- गृहात पृयक तिष्ठ। मां पृथक गच्छ। रामेण पृथक् लक्षमणः। पापं विमा न दुःखम्। पुण्येन विना न सुखम् । भ्रातुविना कः सुखदायकोऽस्ति । इत्यादि। १२-हेतु शब्द और उस के योग में षष्ठी होती है। जैसे-मोजनास्य हेतोस्तिष्ठति शिक्षुः । पठनस्य हेनोर्गच्छामि इत्यादि ॥ १३-उपरि अधि अधम प्रति आदि के योग में द्वितीया होती है। जैसे । गृहमुपरि शेते । ग्राममधितिष्ठत । भूमिमधः पातालम् । कं प्रति वदति। मां प्रत्युक्तम् । सत्यादि ॥ इत्युपपदविभक्तयः । समाप्तञ्च कारक प्रकरणम् मध्ययीमाया ce mins - -- अथ समासप्रकरणम् समाम छः प्रकार का होता है । यषा अध्ययीभाव, तत्पुरुष, द्वन्द्व, बहु- प्रीहि, कर्मधारय और द्विगु । इन में मे द्विगु और कर्मधारय ये दोनों तत्पुरुष के मन्तत होकर चार सभास रहते हैं । सन में प्रथम- अव्ययीभाव मध्य पप्रकरण में अव्यय पढ़ आये हैं। विभक्ति, समीग, समृद्धि, व्यति, मर्थाभाव, गत्यय, भसम्प्रति, शब्दप्रादुर्भाव, पश्चात, यषा, भानुपूर्व्य, योग- पद्य, सादृश्य, सम्पत्ति, साकल्य और मन्तवचन; इन अर्थों वाला कोई अध्यय शद किसी सुबन्त के साथ जोड़ा जावे वह अव्ययीभाव समास * क हाता है। जैसे-9 विभक्ति के अर्थ में मधि अव्यय का हरि के साथ समास किया तो माधिहरि-हरि में। अधिहरि आदि भव्ययीभाव समास किये हुवे समस्त शब्द नपक लिङ्क और प्रथमा के एकवचमान्त ही रहते हैं। अधिस्त्रि- स्त्री में। भधिगृहम-घर में । समीप-कृष्णस्य समीपे उपकृष्णम् । उपकुम्भम्। त्यादि । समृद्धिधनस्य समृद्धिः सुधनम् । मुझपम् । सुलक्ष्म । इत्यादि । व्यद्धि- यवनानां व्यद्धिः दुर्यवनम् । पापानां व्यद्विः दुष्पापम् इत्यादि । अर्थाभाव-मक्षिकाणामभावः निर्मक्षिकम्।धनस्यामायः निर्धनम् । निलम्। निर्विद्यम् । निःशकटम् । निर्मनुजम् । निःप । निर्भनष्यम् इत्यादि । प्रत्ययो माशः-हिमस्याग्त्ययः गतिहिमम् । मिद्राया प्रत्ययःमतिनिद्रम् । भति. क्षधम् इत्यादि । अमम्मति-निद्रा सम्प्रति न युज्यते अतिनिद्रम् इत्यादि । शब्दप्रादुर्भाव-हरिपाठदस्य प्रादुर्भावः प्रकाश: इतिहरि इत्यादि । पश्चात - विष्णोः पश्चात-अनुविष्णु । भनुशिवम् । यथा- यथा शब्द के ४ भर्थ हैं- योग्यता, वीमा, पदार्थानतित्ति और मादृश्य । इन में से योग्यता-रूपस्य योग्यम्= अनुरूपम् इत्यादि । वीमा-मर्थमर्थं प्रतिप्रत्यर्थम् अर्थ अर्थ यो प्रति, हर एक मर्य के प्रति इत्यादि । पदार्थानतिपत्ति-किसी पदार्थ का सलन न करना । जैसे-शक्ति मनतिक्रम्य=यपाशक्तिशक्ति के अनुमार ग शक्ति को न उलङ्घन करके इत्यादि । सादृश्य-ब्रामणस्य मादृश्यम् यथा. ब्राहमणमधीते शूद्रः शूद्र ब्राह्मण के सदृश पढ़ता हे इत्यादि । भानुपूर्य- ज्येष्ठ स्यानु पूर्यनज्येष्ठम् ज्येष्ठ ( बड़े ) के अनुक्रमपूर्वक इत्यादि । योगपद्य-एक साथ जैसे-चक्रेण युगपत सचक्रम् साम्यति पिपीलिकाकीही * अनेक पदों का एक पद बनाना समास कहाता है।
समासे - -- चक्र के साथ घूमती है इत्यादि । सादृश्य सदृशः सख्या-ससखि इत्यादि । सम्पत्ति-क्षत्रियाणां मम्पत्ति: मक्षत्रियम् इत्यादि। साकल्य-तृणमपरित्यज्य- सतृणम् भुतेतृण म निकाल कर खाता है अर्थात् सकल-सब खाता है। इत्यादि । अन्तवचन-न्यायपर्यन्तम् सन्यायमधीते-न्याय तक पढ़ता है ॥ अव्ययीभाव समास में अकारान्त पाद समास हो कर नपुंसकलिङ्ग प्रथमैकवचनान्त रहते हैं परन्तु तृतीया, पञ्चमी और सप्तमी के रूप भिन्न २ होते हैं। जै-३ उपकुम्भेन, ५ उपकुम्मात , ७ उपकुम्भे । इसी प्रकार अन्य शब्दों के भी रूप जानो ॥ संख्यावाचक शब्दों का नदीवाचक शब्दों के माथ समास होता है वह अध्ययीभाव समास कहाता है। जै मे पञ्च गङ्गा:=पञ्चगङ्गम् । द्वियमुनम् इत्यादि। जब अध्ययीभाव समाम में शरद् भादि शब्दों का अव्यय के साथ समास होता है तब शरद् प्रादि व्यञ्जनान्त शब्द टच प्रत्ययान्त होकर अकारान्त बन जाते हैं। जैसे-शरदः समीपम्-नपशरदम्। विपाशं प्रति-प्रतिविपाशम् । विपाश शब्द शकारान्त से अकारान्त होगया। यह एक नदी का नाम है। इत्यादि । अव्ययीभाव में जरा शब्द को जरम् हो जाता है । जरायाः ममीपम्= उपजरसम् इत्यादि ॥ अव्ययीभाव में अनन्त शब्द भी टच प्रत्यय होकर अकारान्त बन जाते हैं। राज्ञः समीपम् उपराजम् । आस्मानमधिकृत्य-अध्यात्मम् इत्यादि । परन्तु जो शब्द नपुंसकलिङ्ग नकारान्त हैं वे अध्ययीभाव में विकल्प से अकारान्त बनते हैं। जैसे धर्मन् शब्द नपंसका नपुंसकलिङ्ग उस का उपके साथ समास हुआ तौ-चर्मणः समीपम् उपचर्मम् , उपचर्म इत्यादि । जिन शब्दों के अन्त में वर्गों के प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ अक्षर हों, धे शब्द अव्ययीभाव में विकल्प से अकारान्त हो जाते हैं। का: समीपम्- उपककुप, उपककुमम् । समिधः समीप-उपसमित् , उपसमिधम् । स्त्रजः समीपम् उपस्रक , उपस्रजम् । स्वचः समीपम् सपत्वक, उपत्वचम् इत्यादि। इत्यव्ययीभावः है अथ तत्पुरुषः- त्रित, मतीत, पतित, गत, अत्यस्त, प्राप्त और भापा, ये सुबन्त-द्विती- यान्त सुबन्त के साथ मिलाये जाते हैं तो सत्पुरुष समास होता है। परमा.
अर्थ तत्पुरुषः मानं श्रितः=परमात्मश्रितः । राम शहद के तुल्य ७ विभक्तियां होंगी । ऐसे ही दूष्टिम् अनीतः=दृष्टयतीतः । इन्द्रियातीतः । कूपं पतितः कूपपतितः । ग्रामं गतः ग्रामगतः । दिशमत्यस्ता दिगत्यस्तः । ग्राम प्राप्तः ग्रामप्राप्तः विपदमापमा विपदापनः इत्यादि । किसी ऐसे सुबन्त से तृतीयान्त का समास हो, जो उम तृतीयान्त ने ही किया हुआ गुणवाचक हो तौ तत्पुरुष ममाम होता है । जैसे शङ्कुल या खण्डः शङ्खलाखण्डः । शगुलामरोते मे ही किया हुवा ख ग -टुकहा जो गुणवाचक है, ममाम को ममाम को प्राप्त हुवा । अतः यह तत्पुरुष ममाम कहाया ॥ तृतीयान्त न्त सुबन्त, सुबन्त के माथ ममास पावे तौ तत्पुरुष होता है। पठनेन अर्थः पठनार्थः । धान्यार्थः । पोजनार्थः ॥ कर्ता और फरणकारक के मुबन्त ( जोकि तृतीयान्त होते हैं, देखो कारक) कदन्त सुबन्त के साथ मिलते हैं तो तत्पुरुष ममाम होता है । जैसे-ईश्वरेगा रक्षितः=ई पररक्षितः । यहां ईश्वरेण* कर्ता है और “रक्षितः यह उस का कर्म कृदन्त है । नखःविारितः नखविदारितः। यहां ' नखैः " करण है और “ विदारितः " कर्म कृदन्त है इत्यादि ॥ चतुर्थी विभक्तयन्त सुबन्त तदर्थ, अर्थ, बलि, हित, सुख और रक्षित सुबन्तों से मिले तो तत्पुरुष होता है। तदर्थ- यूपाय दारु यूपदारु । यूप== यजस्तम्भ । द्विजार्थः सूपः । भूतेभ्योबलिः भूतबलिः। गधे हितम्-गोहितम्। मनुष्येभ्यः सुखम् मनुष्यसुखम् । गुरवे रक्षितम्-गुरुरक्षितम् इत्यादि। पञ्चम्यन्त सुबन्त-भय सुबन्त से मिले तो तत्पुरुष होता है । चोरात् भयम्=चोरभयम् इत्यादि । पञ्चम्यन्त स्तोक, अन्तिक, दूर गौर दूरार्थवाचक तथा कृच्छ्र सुबन्त-- तत्रत्ययान्त सुबन्त के साथ मिले तो तत्पुरुष होता है और पञ्चमी विभक्ति एक पद होने पर भी बीच में बनी रहती है। जैसे-स्तोकात् मागतः स्तोका. दागतः। शन्तिकादागतः। अभ्यासादागतः। दूरादागतः। कृच्छान्मुक्तः इत्यादि । षष्ठयन्त सुबन्त किसी सुबन्त में मिले तो तत्पुरुष होता है । रासः मन्त्री राजमन्त्री । इत्यादि । पूर्व अपर अधर उत्तर ये सुबन्त जब कि अवयववाचक हों गौर अवयवी के साथ मिले तो तत्पुरुष समाम होता है। यदि अवयव अवयवी में जुहा हो(एक ही अधिकरण हो)जैसे - पूर्व कायस्यपूर्व कायः।यहां पर काय अवयवी और पूर्व उस का भवयव है और दोनों मर्थात काय ( भषयको ) और पूर्व समासे । (अवयव) इकट्ठे हैं। ऐसे ही अपरकायः । अधरकायः । उत्तरकापः सत्यादि। यदि एकाधिकरण न कहते की, पूर्वः छात्राणम् । यहां भी समास हो जाता। साधं सुबन्त ( आधे का वाचक ) सुबन्त से नपुंभक लिङ्ग में मिले तो * पुरूष होता है । अधैं विपस्या:= अर्धशिपली इत्यादि । मतम्यन्त सुमन्त शौण्डादि सुबन्तों से मिले तो तत्पुरुष होता है। क्षेषु श राडः= "क्षशो गहः । द्यूते गिपुणः द्यूतनिपुणः इत्यादि । दिशा और संख्या के वाधक मुबन्त, समानाधिकरण सुबन्त से मिले और मिलकर कोई मंशा बने तो तत्पुरुष समास होता है । पूर्वः इषुक शमी-पूष मामशमी पूधला इषुकामशमी (पाम यिशेष ) । मत ऋषयः= सप्तर्षयः इत्यादि । जहां संज्ञा नहीं यहां समास नहीं होता। जैसे---पञ्च ब्राह्मणाः । उत्तराः वृक्षाः इत्यादि । सद्धिनार्थ का विषय हो, उत्तर पद परे हो वा ममाहार वाध्य हो तो दिशा और संख्या के वाचक शब्द समाम को प्राप्त हों और वह तत्पुरुष समास हो । तद्धित का अर्थ स्पष्ट करके सद्वितप्रकरण में जाना जायगा, तथापि भाव ( होने ) आदि मयों में जो प्रातिपदिकों से आगे प्रत्यय लगाये जाते हैं, वे तहित कहाते हैं । तद्वितार्थ पूर्वस्यां शालायां भवा=पीशालः । पञ्च गाधो धनं यस्य पञ्चगवधनः ॥ समानाधिकरणों का जो तत्पुरुष बह कर्मधारय समाम कहाता है। एक ही अर्थ को जो शब्द कहें वे समानाधिकरणा कहाते हैं । जसे-रक्ता लता-रक्त लता। वृद्धः पुरुषः वृद्धपुरुषः इत्यादि । जिम तत्पुरुष में पूर्व पद संख्यावाचक हो वह “द्विगु कहाता है। द्वी गावी समाहृतो-द्विगवम् । पञ्चगवम् इत्यादि । उपमानवाचक सुबन्त, सामान्य सुबन्तों से मिले ती कर्मधारय समास होता है। घन इव श्यामःघनश्यामः इत्यादि । शाकपार्थिवादि शब्दों में मध्यम पद का लोप हो जाता है। शाकामिय: पार्थिव शाकपार्थिवः । देवप्रियः ब्राह्मणः-देवब्रामणः इत्यादि । न ( ) का सुबन्त के साथ समास हो । ग ब्रामणब्रामणः ।, शुभम् अशुभम् । म अधः= मनः । म उत्तमःअनुत्तमः इत्यादि । कु भादि भी, सुधन्तों के माथ नित्य समस्त होते हैं। कु पुरुषःकापुरुष, कुपुरुषः । मु पुरुषा-पुरुषः । दुः पुरुषः दुष्पुरुषः । प्रमाद:-मनादः। करी सत्य-बरीकरय इत्यादि । pa- - बहुव्रीहि-द्वन्द्वी अति मादि शब्द, द्वितीयान्त सुधन्तों के साथ समास को प्राप्त होते हैं कान्तादि अर्थों में । अतिक्रानो मालाम्मतिमालः इत्यादि। अधादि उपसर्ग, तृतीयान्त सुधन्तों के साथ समाम को प्राप्त हों क्रुष्ट दि मयों में । अवऋष्टः को किया=भवकोकिलः। कोयल से बुलाया गया। इत्यादि । परि आदि उपमर्ग, चतुर्यन्त सुबन्तों से ममास को प्राप्त हों, ला नाद कार्यों में । अध्ययाय परिग्लानःपयध्ययमः ॥ निर आदि सपमर्ग क्रान्तादि अथों में पञ्चभ्यन्त सुबन्त के साथ ममाम को प्राप्त हों। मथुरायाः निष्क्रान्त:- =निर्मधरः ॥ रुदन्त के साथ नन के उपपदों का समास होता है। जैसे कुम्भं करोति= कुम्भकारः । भारं वहति भारवाट । जिम सत्पुरुष समास में पूर्वपद संख्यावाचक और मव्यय हों, तथा उत्तरपद गङ्गुलि हो तो समासान्त अ ( ५ ) प्रत्यय लगाते हैं। वे अङ्गुली प्रमाणमस्यद्वयङ्गुलम् । मिर्गतममुनिभ्यः निरङ्गुलम् इत्यादि । जच महन् शब्द का रात्रि के माप द्वन्द्व समास हो (जिमे आगे कहेंगे) तथा सर्व, एकदेशवाचक, संख्यात और पुण्य शब्दों से आगे रात्रि शहद का समाम हो तब ममामान्त सच प्रत्यय लगाते हैं। जैसे-महश्च रात्रिच महोरात्रः । भर्वा रात्र:=सर्वरानः । पूर्व रा-पूर्व रात्रः । यहां पूर्व शब्द रात्रि के एक देश का वाचक है। संख्याताः रात्रयःसंख्यालरात्राः । पुगयरात्रः ॥ जिस रात्रि के पूर्व संख्यावाचक शब्द हो वह नपुंनक लिङ्ग होता है । जैसे-द्वे रात्री द्विरात्रम् । तितः रात्रयः त्रिरात्रम् । पञ्चरात्रम् इत्यादि । राजन् , भहन और सखि शब्द जिन से भागे हों उन का तत्पुरुष टच (अ) प्रत्ययान्त होता है। राजां परमः परमराजः । महान् राजसुमहाराजः । देवदत्तस्य सखा-देवदत्तमसः। अहस्सु द्वादशः द्वादशाहः इत्यादि । अथ बहुव्रीहिः- अन्य पद का अर्थ जिस में पाया जाय वह बहुव्रीहि समाम अनेक सुधन्तों साथ होता है। जेमे-कगठे कालो यस्य सः कण्ठे काणः । त्वचि सारोयस्प सः त्वचिसारः। प्राप्तम् उदकं यं सःप्रतोदकः। ऊढो रथो येन सः= ऊढरपो वषभः । सधृतम् भोदनं यस्याः सा= ‘धृतोदमा स्थाली । पीतम् सम्बर पत्य सः पीताम्बरः । वीराः पुरूषा यस्मिन् सः वीरपुरुषकः । प्रपतितानि पर्णानि यस्य सः प्रपर्यः । म पुत्रो यस्य साभपुत्रः । चित्राः गावो यस्य - - चित्रगुः । संपवती भार्या यस्य सार पवद्भार्यः । वामोहः भार्या यस्य साम्यामोसभार्यः । कल्याणी पञ्चमी यामां ता:-कल्य ल्याणीपञ्चमः । स्त्री प्रमाणी यस्य सःश्रीप्रमाणः । पाल्याणी मिया यस्य मः कल्याणीप्रियः । दीर्ध सक्थिनी यस्य मा दीर्घनक्यः । कमले इव भक्षिणी यस्य सः कमलामः। जल साक्षः । वक्षः । दुरक्षः । द्वयक्षः । चतुरक्षः । दीर्घ मक्थिनी यस्य तत्= दीर्घमविय। यह । यह प्रयोग जड पदार्थों की बाध्यता में होता है । स्थूले मक्षिणी यस्यां सा स्थूलाक्षा यष्टिः । द्वौ मर्दानी यस्य सः द्विमुद्धः =द्विमूर्द्धः । त्रिमूर्द्धः । मन्तः =अन्तलोमः । बहिलोमः । व्याघ्रस्य पादौ व पादौ यस्य मः व्याघ्र पात् । द्वौ पादौ यस्य सः- द्विपात् । चतुष्पात् । सु (शोभनी) पादौ यस्य सः-सुपात्। उत् (उच्चैः) काकुद यस्य सः उकाकुत् । विकाकुत् । पूर्ण काकुत्, पूर्ण काकुदः । स ( शोभनं ) हृदयं यस्य मा=सुहृद् । दुर्शद् । व्यूढम् उरो यस्य सः व्यूढोरस्कः। विशालारस्कः । स्थूलोरस्कः । दृढोरस्कः । प्रियं सर्पिः : यस्य सः=प्रियमर्पिकः । युक्तः योगः येन सः=युक्त योगः । महत् यशो यस्य सः महायशस्कः, महायशाः इत्यादि । . - अथ द्वन्द्वः - च के अर्थ में सुबन्तों का सुबन्तों के साथ द्वन्द्व ममास होता है । जैसे- वटच पिप्पलश्च वटपिप्पली । धर्मश्च अर्थश्च धर्मायौं । अर्थधम्म । हरिश्च हरश्च-हरिहरौ । ईशविष्णू । इन्द्राय हस्पती । इन्द्राघरुणो । इन्द्राग्नी । सूर्या चन्द्रममौ। शिवकेशवी। मातापितरौ पितरौ । पाणी च पादौ चक्रपाणि. पादम्। मार्दङ्गिकपाणविकम् । रथिकावारोहम्। वाक् च त्वक् च-वाक्त्वचम् । स्वक्त्रजम् । शमोदूषदम् । छत्रो पानहम् । प्रावृट् शरदौ इत्यादि ॥ इति समासप्रकरणम् अथ तद्धितप्रकरणम् १ अश्वपत्यादि प्रातिपदिकों से अपत्यादि अर्थों में भण आदि प्रत्यय होते । जैसे- अश्वपतेः अपत्यम्=आश्वपतम्। गणपतेः अपत्यम् गाणपतम्। वितेः अपत्यम्=दैत्यः। मदितेः भापत्यम्-आदित्यः। प्रजापतेः अपत्यम्=प्राजापत्यः। देवस्यापत्यम् दैव्यम् , देवम् । बहिः भवम् आह्यम्, पाहा कस् । गोः भप. - - - तद्विताः त्यम्-गव्यम् । सत्सस्यापत्यम् औत्सः । स्त्रिया अपत्यम्-स्त्र त्यम्=पौंस्नः । उपगोः अपत्यम औपगवः ॥ अपत्य नाम संतान का है, परन्तु पुत्र पुत्री तक अपत्य कहाते हैं, के पश्चात् पौत्रप्रपौत्रादि जो सन्तान हैं, उन को गोत्र कहते हैं । उपगो: गोत्रम् औपगवः । गर्गस्य गोत्रम् गायः गाग्यौँ गर्गाः । गाग्र्यम् गाग्यौँ गर्गान् इत्यादि । बहुवचन में प्रत्यय नहीं रहता परन्तु उस का मर्थ रहता है । वरमस्यापत्यम् गोत्रम् वा वात्स्यः इत्यादि । जो सन्तान पूर्वज के जीवन काल में सम्भव हो वह युवापत्य कहाती है । गर्गस्य युवापत्यं गाायणः । दक्षस्य युवापत्यम्-दाक्षायणः । दक्षस्या- पत्यम् -दाक्षिः । बहोरपत्यम्बाहवः । उडलोम्नः अपत्यम्-मोडुलोमिः । विदस्य गोत्रम् वैदः । पुत्रस्यापत्यम्=पौत्रः । दुहितुः अपत्यम्=दौहित्रः । शिवस्यापत्यम् शैवः । गङ्गायाः अपत्यम्=गाङ्गः । वसिष्ठ-वासिष्ठः । वैश्वा- मैत्रः त्रः। श्वफल्क-श्वाफल्कः। वसुदेव-वासुदेवः। नकुल-माकुलः । सहदेव-साह. देवः । द्वयोः मात्रोः अपत्यम् द्वैमातुरः । षष्-मातृ-शायमातुरः । सम्-मातृ- सनातुरः। भद्र मातृ-भाद्रमातुरः। विनता-वैनतेयः। कन्या-कानीनः । राज्ञः जातिः राजन्यः । श्वशुर-श्वाशुर्यः । क्षत्र-क्षत्रियः। रेवतीरैवतिकः । पञ्चाल- पाञ्चालः । पञ्चलानां राजा-पाञ्चालः । पूरोः राजा अपत्यं वा पौरवः । पागहोः राजा-पागष्यः । कुरोः राजा कौरव्यः । निषधस्य राजा नैषध्यः । स्त्रीलिङ्गों को छोड़ कर बहुवचन में राजा अर्थ में हुवे प्रत्यय का लोप कर शब्द का पूर्वस्वरूप ही रह जाता है । जैसे पाञ्चालः पाञ्चालौ पच्चालाः कौरव्यः कौरव्यो कुरवः । नैषध्यः नैषध्यौ निषधाः इत्यादि ॥ कम्बोज शब्द से सर्वत्र ही राजार्थक प्रत्यय नहीं रहता परन्तु उम अर्थ रहता है। कम्बोजस्य राजा कम्बोजः कम्बोजौ कम्बोजाः। इत्या जिन २ शब्दों मे ऊपर जो २ प्रत्यय कहे हैं वे२ प्रत्यय अपत्य (सन्न अर्थ के अतिरिक्त भव आदि अन्य अर्थों में भी जानने चाहिये । जैसे- माथुरः । यह रूप, मथुरायां भवः= मथुरायां भवः माथुर: मथुरा में जो होघे यह मार मथुराया मागतः माथुर:=मथुरा से जो आया वह माथुर। मथुरायां जा माथुरः मथुरा में जो जन्मा वह माथुर । इसी प्रकार अन्य प्रातिपदिक यथासम्भव मन्य अर्थों में प्रत्यय की कल्पना करनी चाहिये । - -मर तद्धिताः Prande मतु - मैं प्रातिपदिक से त वा त्व प्रत्यय लगाते हैं। जैसे-ब्राह्मणस्य ब्राह्मणता, ब्राह्मणत्वमब्राह्मणपना । दरिद्रस्य भावः दरिद्रता, बम दरिद्रपना । गुरोर्भावः=गुरुता, गुरुत्वम् =गुरूपना । इसी प्रकार भुता, प्रभुत्वम् । दीनता, दीनत्वम् । लघुता, लघु.जम् । पशुता, पशुत्वम् । चतुरता, चतुरत्वम् । दुष्टता, दुष्टत्वम् । धीरता, धीरत्वम् इत्यादि । वह जिस का वा जिस में वा जिस के पास है * ऐ मे अर्थ में किन्हीं प्रातिपादिकों से वत, किन्हीं से और इन् प्रत्यय लगाये जाते हैं। जैसे, धन जिस के पास है वह-धनवान् । धनिन् धनी । गुणवान् । गुणी । जान- वान् । ज्ञानी । अग्निमान् । बुद्धिमान् । रूपवान् । शीलवान् श्रीमान् । क्षमीवान् । धीमान् । दगडी । चक्री । हली इत्यादि । इसी अर्थ में असन्तों तथा माया, मेधा और सज प्रातिपदिकों से विन् प्रत्यप लगाते हैं . जसे-असन्त-यशम् - यशस्वी । तेजस्वी । मनस्वी। तपस्वी। मायावी । मेधावी । स्त्रग्वी इत्यादि । अतिशयार्थ में प्रातिपदिक से आने तर वा तम प्रत्यय लगाते हैं। जैसे- अनिशयितः स्थूलः स्थूलतरः । स्थूलतमः अतिस्थूल । ऐसे ही-दृढतरः । दृढतमः । चतुरतरः । चतुरतमः । मूर्खतरः । मूर्खतमः । श्रेष्ठतरः । श्रेष्ठतमः । इत्यादि ॥ जिस मे जो बना है इस अर्थ में मय प्रत्यय लगाते हैं। मृत् मे जो ना है वह-मृण्मयः । सुवर्ण से जो बना है वह सुवर्णमयः । लोहमयः । तमयः । जलमयः । शोकमयः । बुद्धिमयः । धनमयः । तेजोमयः । माया- । छलमयः इत्यादि । प्रकार मर्थ में धा भौर था प्रत्यय लगाते हैं जैसे-एकधा एकप्रकार। । त्रिधा । चतुर्धा । पञ्चधा। षोढा । सप्तधा । अष्टया । नवधा । ॥ अन्यथा-अन्य प्रकार । मर्वथा। इतरथा। अयथा । ।। ये शब्द अव्यय हो जाते है ॥ ल्य पर्थ में वत् प्रत्यय लगाते हैं यदि क्रिया में तुल्यता हो। जैसे- के तुल्य क्रिया ब्राह्मणवत्। क्षत्रियवत्। मूखवत् । पछितवत् । पुत्रवत् । 'त् । गुरुवत् । मातृवत् । पितृयत् । चन्द्रवत । सूर्यवत् । दुर्बलवत् । त् । दुष्टवत् । मुहद्वत् । मित्रवत् इत्यादि ॥ द्धित प्रकरण भी कदन्त के समान बहा प्रकरण है और सुगम है, इस । . यथा तथा •-- - स्त्रीप्रत्यया. - लये इस को भी विशेष न लिख कर यहीं समाप्त करते है । बने हुवे व्याकरण पुस्तकों द्वारा स्वयं पढ लेना कठिन नहीं है । इति तद्धितप्रकरणम् अथ स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् - - १-छाब किसी अकारान्त शब्द को स्त्रीलिङ्ग बनाते हैं तो उस के आगे मा प्रत्यय लगाते हैं। नौसे - सर्व-सर्वा । गण-गङ्गा । देवन-देवता इत्यादि ॥ २-पचत् भादि कई एक शब्दों के स्त्रीलिङ्ग बनाने में ई ( प्रत्यय ) लगाया जाता है । जेसे :-पचत्त-पचती । भवत् - भवती । इत्यादि । ३-और भी कई प्रकार के अकारान्त शब्दों से स्त्रीलिङ्ग बनाने में ई ( प्रत्यय ) लगाया जाता है। जैसे:-कुरुचर कुमचरी । नद-नदी । देव -- देवी। सीपणेय- सौपर्णेयी । ऊरुद्वयम्- करुद्वयसी । ऊरूदन-ऊरूपनी । ऊरुमात्र-जम्मात्री । पञ्चाय-पञ्चतयी पञ्चाय-पञ्चतयो । भाक्षिक-आक्षिकी । प्रास्थिक प्रास्थि की । लावणिक -लायणि की । यादृश - यादृशी । गत्वर-गत्वरी । इत्वर-इत्वरी इत्यादि। ४-कई शब्दों का यकार लुप्त हो जाता है, जब कि ई (प्रत्यय) परे हो। जैसे-गाग्र्य-गार्गी॥ ५-जब दो पदों के समाम में पूर्वपद संख्यावाचक हो ऐसे तत्पुरुष भी ई ( प्रत्यय ) लगाते हैं। जैसे:-त्रिलोक-त्रिलोकी इत्यादि । ६ वर्ण (रंग) वाचक शब्द के अन्त्यवर्ण से पूर्व वर्ण न हो तो 'त' वं 'न' कर देते हैं और ई ( प्रत्यय ) लगाते हैं तथा कमी ई नहीं लगाते र त को न भी नहीं करते । जैसेः-एत-एनी, एता। हरित- हरिणी, हरित रोहित-रोहिणी, रोहिता इत्यादि । 9-गुणवाचक नकारान्त शब्दों से भी त्रीलिङ्ग बनाने में विकल्प ई लगाते हैं। जैसे:-मृदु-मृवी, मृदुः । पटु-पट्वी, पटुः ॥ ८-बहु आदि शब्दों से भी उक्त कार्य होता है । जैसे:- बहु-बही, बहु -रात्रि मादि में भी विकल्प से ई लगाते हैं। जैसे:-रात्रिः, रात्री १२-पुरुषवाचक को सबी की स्त्री बनाने में ई प्रत्यय लगाते हैं। जैसे ब्राह्मण-ब्राह्मणी । गोप-गोपी इत्यादि। in प्रत्ययाः शब्द अन्त में हो सब नहीं किन्त मा लगाते लक- गोपालिका । अश्वपालिका ( देखो १२) इत्यादि । १२-जिन शब्दों में तद्धितादि प्रत्यय या ककार हो और फिर स्त्रीलिङ्ग बनाये जाधैं तो क से पूर्व अ को १ कर देते हैं। जैसे:-कारक-कारिका पाचक-याचिका । पाठिका । गोपालिका इत्यादि। १३ -सूर्य और अगस्त्य के य का लोप करके जीलिङ्ग में लगाते हैं। जैमे:-सूर्य सूरी । अगस्त्य - अगस्ती ॥ १४-इन्द्रादि कई शब्दों से स्त्रीलिङ्ग बनाने में मामी ( प्रत्यय ) लगाते ई। जै:-इन्द्र-इन्द्राणी । वरुण-वरुणानी । भव-भवानी रुद्र रुद्राणी। शर्य-शर्वाणी । मृह-मृहानी। हिम-हिमानी * । अरण्य-अरण्यानी * । + यव-यवानी। यवन-यवनानी । मातुल -मातुलागी।भाचार्य-भाचार्याणी ॥ १५ मातुल और उपाध्याय से मातुली और उपाध्यायी भी होते हैं। १६ --आचार्य से प्राचार्या भी बोलते हैं । ११-अर्यसे अर्याणी वा भर्या ॥ १०-क्षत्रिय से क्षत्रियाणी वा क्षत्रिया ॥ ९९ - चन्द्रमुख से चन्द्रमुखी । चन्द्रमुखा । सुशिख मे मुशिखा । कल्या. सोड मे कल्याणक्रांडा । सुगघन से मुजघना इत्यादि । -शूर्पणख से शूर्पणखा। गौरमुख से गौरमुखा। ताम्रमुख से ताम्र मुखी ॥ २९-तट से तटी। वृषल से वृषली। बवच से अपची। मुण्ड से मुण्डा । लिक से बालिका॥ २२ -गवय से गवयी । हय से हयी । मत्स्य से मत्सी । मनुष्य से षी इत्यादि ॥ २३-पङ्गु से पङ्कः । कुरु से कुलः । श्वशुर से अभूः । करसोरु से करभोसः। रुः । वामोरुः । लक्षणोसः ॥ २४-नृ भीर मर से नारी । इत्यादि ॥ २५-युवम् से युवतिः ॥ ये संक्षेप से स्त्रीप्रत्यय हैं। ति तुलसीराम-शर्म-विरचितं चतुर्थं पुस्तकम् समाशम् * इन का स्त्री नहीं, किन्तु बहुतायत अर्थ है। इस का दुष्ट अर्थ है। यानी बुरे जौ। इस का स्त्री नहीं किन्तु लिखना अर्थ है । यवनानी-यवनों का लेख ॥ -
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